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Shreemadnuyogdwar Sutram (purwardh)
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प्रस्तावना। प्रिय महाशय ! यह संसार चक्र बड़े वेग से चल रहा है उस में प्रतिक्षण पौर प्रातिपल में अनेक परिवर्तन होते हैं तथा वर्तपान भूत से परिवर्तित होता इसलिये विचारशील पुरुष अपने भविष्य जीवन को सदुपयोग वा परोपकार सथा श्रात्मचिंतन श्रादि में ही लगाते हैं अतः इस संसार चक्र में परिभ्रमण करत हुए प्राणियों को मनुष्य जन्म प्राप्त होना अति दुर्लभ है यदि किसी प्रात्मा को पूर्वोदय से मनुष्य जन्म प्राप्त भी होगया तो फिर उसको पंचेन्द्रिय पूर्ण आयु, नीरोगी शरीर आदि सामग्रिये प्राप्त होनी बहुत कठिन हैं। यदि उक्त सामग्रिय भी मिल गई तो फिर विद्या अध्ययन, करना तो परम कठिन है संसार में अनेक विद्वान् हुए वा है अथवा होंगे परन्तु इस विपय में वक्तव्य इतना ही है कि जिस शाख से आत्मबोध की प्राप्ति हो ऐसे शास्त्रों के पठन वा पाठन कराने वाले विद्वान् बहुतही अल्य होते हैं सांसारिक कलाओं के उपदेष्टा अनेक विद्वान् वा उन कलाओं के उत्पादक अनेक तत्ववेत्ता विद्यमान हैं और भूतकाल में विद्यमान थे किन्तु अंत समय यह कलायें आत्मा की सहायक नहीं होती इसलिये सब से घढकर सब से उत्तम एक धर्म है सो धर्म की जिज्ञासा करने वालों के लिये धर्म श स ही अति उपयोगी हैं जिन में श्रीमान् देव के कथन किये हुए वाक्य परम पवित्र हैं और उन वाक्यों के संग्रह का नाम ही सूत्र वा सिद्धान्त शास्त्र है सो जिन पाणी के पठन करने का अभ्याग प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिये जिस से आत्मबोध की प्राशि हो । श्री जिनेन्द्र भगवान् की वाणी ने पदार्थों का सत्य २ स्वरूप प्रतिपादन किया है जिसके श्रवण वा मनन करने से प्रात्मा को अतीव शांनि की प्राशि होती है। अंत में प्रात्मा का से मुक्त होकर मोक्ष में विराजमान होजाता है इस लिये माना गया कि स्वाध्याय के समान कोई भी दूसरा तप नहीं है । क्योंकि (स्वाध्यायस्तपः ) किन्तु श्रुतज्ञान के प्रति पादक अनेक महान २ ग्रंथ हैं। उन में जिज्ञासुओं को पहले उन शास्त्रों का स्वाध्याय करना योग्य है कि जिन में अनेक विषयों का समावेश हो और वे शास्त्र नियमवद्ध हों।
* अनुयोगद्वार सूत्र * २ किन्तु जैन सूत्र, मूल प्राकृत वा इत्ति संस्कृत में ही प्रायः प्रतिपादित है जिन में प्रवेश करना प्रत्येक व्यक्ति को सुगम नहीं है तथा जो गुजराती भाषा में "डब्यादि" लिम्बे हुए हैं यद्यपि वे परम उपयोगी हैं किन्तु वे एक प्रान्त के लिये ही उपयुक्त हैं सर्व प्रान्तों के लिये नहीं । इसलिये सर्व हितैषी अाज दिन हिन्दी भाषा को ही प्रायः सर्व विद्वानों ने स्वीकार किया है इसलिये मेरा विचार भी यही हुआ कि जैन शास्त्रों का हिन्दी अनुवाद करना चाहिये जिस से प्रत्येक व्यक्ति आत्मिक लाभ ले सको, किन्तु इस काम में अपनी असमर्थता को देख कर इस शुभ कार्य में आज तक विलम्ब होता रहा अपितु १६७१३ वर्षका चातुर्मास श्रीश्रीश्रीगणा- वच्छेदक वा स्थविरपद विभूषित श्री स्वामी गणपतिरायजी महाराज ने कसूर नगर में किया तथा मैं भी आपके चरणों में ही निवास करता था तब मुझे वाचू परमानन्दजी ने व पं० मुनि ज्ञानचन्द्रजी ने प्रेरित किया कि आप श्री अनुयोगद्वारजी सूत्र का हिन्दी अनुवाद करो जिससे बहुत से प्राणियों को जैन शासन के अमूल्य ज्ञान की प्राप्ति हो क्योंकि इस सूत्र में मायः सर्व विषयों का समावेश है और प्रत्येक विषय को बड़ी योग्यता के साथ वर्णन किया गया है और जैन सिद्धान्त की बहुत ही सुंदर शली से व्याख्या की गई है प्रत्येक विषय की व्याख्या उपक्रम १ निक्षेप २ अनु- गम ३ नय ४ द्वारा की गई है। इसी वास्ते इस का नाम अनुयो. गदार है। यथा-स्वाभिधायक सूत्रेण सहार्थस्प अनुगीयते अनुकुलोवा योगोस्यदम् अभिधेय मित्येवं संयोग्यशिष्येभ्यः प्रतिपादनमनुयोगः स्वार्थकथनमित्यर्थः अथवा एकस्यापि सूत्रस्यानन्तोर्थ इत्यर्थो महान् सूत्रं त्वणु ततश्चाणु ना सूत्रेण सहार्थस्ययोगो अनुयोगः तथा अनुयोगस्य विधिर्वक्तव्यो थथा प्रथम सूत्रार्थ एव शिष्यस्य कथनीयं द्वितीयवारे सोपिनियुक्त्यर्थ कथन मिश्रस्तृतीयवारायां तु प्रस- जानु मंसगानुगतः सर्वोप्यर्थीवाच्पस्तदुक्तं सुत्तत्थोखलुपढमोबीओनिज्जुतिमीसतो भणियो तइयो निरविसेसो एसविही अणुओगो॥ इत्यादि प्रकार से अनुयोग की विधि वर्णन की गई है तथा अन्य प्रकार से * अनुयोगद्वार सूत्र * ३ और भी विधि जाननी चाहिये जैसे कि- ज्ञात, अज्ञात, परिपद् तो अनुयोग के योग्य है किन्तु दुर्विदग्ध परिपद् अनुयोग के अयोग्य हैं। फिर संहिता, पदच्छेद, पदार्थ, पदविग्रह, शंका, (तर्क) और प्रत्ययंवस्थान द्वाराही अनुयोग करना चाहिये इत्यादि अनेक प्रकार से अनु- योग की व्याख्या की गई है। और इस मूत्र में प्रत्येक पद मूक्ष्म बुद्धि से विचारने योग्य है तथा नाम । पद में दश प्रकार के नामों का बड़ी सुन्दर शैली से निरूपण किया गया है फिर ममाण विषय तो बहुत ही गहन है इस लिये इस मूत्र के हिन्दी अनुवाद की अत्यन्त आवश्यकता थी तब मैंने वाय परमानन्दजी की प्रेरणा से व पं० मुनि ज्ञानचन्द्रजी की प्रेरणा से इस काय करने में साहस किया यद्यपि यह बात स्वतः सिद्ध है कि यावन्मान अनुवाद होते हैं वे पाठकों की रुचि मूल से घटाकर भापाकी और ही खींचते है क्योंकि मनुष्य स्वभावतः सुगम मार्ग की और ही चलते हैं इसलिये मूल पटन करने का मायः अभ्यास स्वल्प होरहा है किन्तु मेरी इच्छा सर्व साधारण की रुचि को मूल की ओर ले जाने की है इसी भाव से प्रेरित होकर मैंने मूळ पदार्थ की ही व्याख्या लिखी हैं । नथा मूत्र व्याख्यान की समाप्ति में पूर्ण मूत्र का भावार्थ भी दिया है जिससे साधारण पुरुप भी मूत्रक श्राशय को यथार्थ रीति से जान सके। गया जिन नियों को संयोग के न मिलने पर इस अपूर्व ज्ञान से अब तक अयानिन रहना पड़ा है उनको भी अवश्य लाभ होगा। फिर विहार (भ्रमग) के कारण व मुीन ज्ञानचन्द्रजी के रुग्णावस्था के कारण इस काम में विलम्ब होने लगा किन्तु अनुवाद फिर भी कुछ होता ही रहा फिर बरनालामंडी में मुनि ज्ञानचन्द्रजी का स्वर्गवास होगया। यद्यपि यह ग्रंथ पूर्ण तो हो चुका था किन्तु इसकी द्वितीयाति करने में बहुत ही विलम्ब हुआ मुनि ज्ञानचन्द्रजी की प्रेरणा से इस भापा टीका के लिखने का प्रारम्भ हुअा था इसी बास्नं इस भाषा टीका का नाम ज्ञान प्रबोधिनी" भाषा टीका रखरखा गया है इसमें जहां तक होसका है इसको मुगप करने का उधोग किया गया है जिससे कि प्रत्येक व्यक्ति इससे लाभ ले सके और भापा के स्पष्ट करने में भी यथाशक्ति उद्योग किया गया है प्रत्येक पद का अर्थ भिन २ लिखा है। नया जो प्रश्न रूप पद है उनको एकत्र लिख कर ही उनके अर्थ में (प्रश्न) गग लिख दिया है, जैसे कि "सेकिंत" शब्द है इसके अर्थ में (मन) ऐसेही -~- ४ प्रश्न - * अनुयोगहार सूत्र * लिख दिया है क्योंकि संकिंतं शब्द का संस्कृत "अकितत्" प्रयोग बनता है . उसको वार वार न लिखकर कंवल " शब्द को ही लिखा है और "बहुलं" "आर्षम्" ब्पत्ययश्च इन तीन सूत्रों की प्राकृत भाषा में विशेष प्राप्ति है किन्तु जहां जिम सूत्र की प्राप्ति है वहां पर हेमचन्द्राचार्य कृत प्राकृन व्याकरण के सूत्र वा संस्कृत शाकटायन व्याकरण के सूत्र दिये गये हैं और संस्कृत के प्रकरणों में केवल संस्कृत व्याकरण के ही सूत्र लगाए गए और इरा सूत्र के संशोधन में मैं तीन पुस्तकों का ऋणी हूं जिन में एक तो वहुत ही प्राचीन प्रति है, द्वितीय नूतन है, तृतीय रायवहादुर सेठ धनपतिसिंहजी की मुद्रित की हुई हैं । किन्तु तृतीय प्रति में दृष्टि दोप के कारण से कुछ अशु. दिये रह गई है यद्यपि बड़ी सावधानी से प्रेस में काम किया जाता है फिर भी दृष्टि दोप के कारण से मनुष्य का भूलना स्वाभाविक है । किन्तु मुझ से जहां तक हो सका है इस के शुद्ध करने में मैंने बहुत ही उद्योग किया है और हर्प का विषय है कि मैं बहुत से अंश में इस कार्य में उत्तीर्ण हुआ हूं । इस शास्त्र को योग्यता पूर्वक पठन करने का प्राणी मात्र को अधिकार है । और प्रत्येक व्यक्ति जो इस शास्त्र को पठन करना चाहे उसको उचित है कि अनध्याय काल को छोड़ कर इस शास्त्र का अध्ययन करे । क्योंकि विधिपूर्वक शास्त्र अध्ययन किया हुआ ही फलीभूत होता है इसलिये आशा है भव्यजन इस भूत्र से लाभ उठाकर और नय निक्षेप के वेत्ता होकर पूर्ण दर्शन शुद्धि के विषय में स्वात्मा को प्रविष्ट करते हुए मेरे परिश्रम को साफल्य करेंगे और जो कुछ मैंने लिखा है वह श्रीश्रीश्री १००८ श्राचार्य वर्य षटत्रिंशत् गुणालंकृत श्रीश्रीश्री पूज्य मोतीरामजी महाराजजी की कृपा से लिखा है किन्तु मेरी मंद मति इस कार्य में सर्वथा असमर्थ थी। सुज्ञजनो ! अन्य विकथा युक्त उपन्यासादि ग्रंथों के पठन से आत्मिक लाभ नहीं हो सकता है इसलिये इस शास्त्र के पठन से अपने यात्मा को ज्ञान से विभूषित कर और अन्य आत्माओं को परोपकार द्वारा सन्मार्ग में प्रवृत्त करायें फिर जव "आत्मा" और "ज्ञान" एक रूप हो जायेंगे उस काल में ही आत्मा सिद्धगति को प्राप्त होगा जो सादि अनंत पदयुक्त है इसलिये उक्त पद के वास्ते प्रत्येक प्राणी को परिश्रम करना चाहिये । गुरु चरणकमल सेवी, विनीत- उपाध्याय जैनमुनि अात्माराम. ( पंजावी , भी बड़मानाय नमः . श्री अनुयोगद्वार सूत्रम् ' मूल-नाणं पंचविहं पगणतं, तंजहा-आभिणिबोहिय नाणं सुयनाणं प्रोहिनाणं मणपज्जवनाणं केवलनाणं । तत्य चत्वारि नाणाई ठप्पाई ठवणिज्जाइं जो उद्दिसति यो समुदिसंति णो अणुगणविज्जति ॥ १॥ हिंदी पदार्थ-(नाणं) शान, (पंच विहं ) पांच प्रकार से (पएणतं) प्रतिपादन किया गया है, (तंजहा ) जैसे कि, (आभिणियोहनाण) श्राभि- निरोधिक-मति-ज्ञान, ( सुयनाणं ) श्रुतज्ञान, ( मोहिनाणं ) अवधिज्ञान, (मगपञ्जवनाण ) मनापर्ययज्ञान, (फेत्रलनाणं ) केवलज्ञान, ( तत्थ) इन पांच ब्रानों में ( पत्तारि) चार ( नागणाई) ज्ञान, (उप्पाई) संव्यवहार्य नहीं, (ठवणिजाई ) स्थापनीय है, क्योंकि मतिज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलबान ये चारों ही (णोउदिसंति ) उद्देश-उपदेश-नहीं करते हैं (णो समुहिमति ) समुदंश नहीं करते (ो अगुएणविनंति ) आज्ञा नहीं करते हैं " मुखाभावात् " मुख का अभाव होने से, क्योंकि ये चार ज्ञान अपने अनुभव को प्रकाश नहीं कर सकते. इस लिये परोपकारी न होने के कारण यह चार ही ज्ञान स्थापनीय है। भावार्थ:-सर्व पदार्थों का ज्ञाता और शास्त्र की आदि में मङ्गल रूप, विघ्नों को उपशम करने वाला, निज आनन्द का प्रदाता, आत्मा का निज गुण भदर्शक, शान है, इसलिये सब से प्रथम ज्ञान का वर्णन किया जाता है । प्रहन देवने भान पांच प्रकार से प्रतिपादन किया है क्योंकि ज्ञान शब्द का अर्थ यही है, कि जिस के द्वारा वस्तुओं का स्वरूप जाना जाय, अथवा जो निज स्वरूप का प्रकाशक है, वही मान है अथवा जो मानावरीयादि कर्मों के आय वा त- ( २ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * योपशम के कारण से उत्पन्न होता है वही यथार्थ ज्ञान है सो यह ज्ञान अहन् भगवन्तों ने तो अर्थ करके और गणधरों ने सूत्र करके पांच प्रकार से वर्णन किया है जैसे कि-जो सन्मुख आए हुए पदार्थों को मर्यादा पूर्वक जानता है वह आमिनिकोधिक ज्ञान है तथा इस ज्ञान को मतिज्ञान भी कहते हैं । द्वितीय सुनकर पदार्थों के स्वरूप को जानता है उसे श्रुतंज्ञान कहते हैं । तृतीय जो प्रमाणपूर्वक रूपवान् द्रव्यों को जानता है उसे अवधिज्ञान कहते हैं । चतुर्थ जो मन के पर्ययों को भी जानलेता है वही मनापर्ययज्ञान है । और सम्पूर्ण लोकालोक के स्वरूप को जानने वाला केवलज्ञान कहलाता है। किन्तु इन पांचों में से श्रुत ज्ञान को छोड़ कर शेष चारज्ञान स्थापनीय (पृथक् करने योग्य ) हैं। चार ज्ञान लोक में व्यवहार का उपयोगी नहीं है, अर्थात् परोपकारी नहीं है, अपितु जिसं आत्मा को जो ज्ञान होता है, वही उस का अनुभव करता है अन्य नहीं किन्तु श्रुतज्ञान परोपकारी है । इसलिये शास्त्र में अब श्रुतज्ञान का ही वर्णन किया जायगा, क्योंकि उद्देशादि श्रुतज्ञान. से ही उत्पन्न होते हैं, इस से भिन्न शेप ज्ञानों के उद्देश तथा समुदेशादि नहीं हैं । जो गुरु कहते हैं वही श्रुतज्ञान है। अपितु जो चारों ज्ञानों का स्वरूप वर्णन किया जाता है वह सर्व श्रुतज्ञान के द्वारा ही वर्णन किया जाता है। अथ श्रुतज्ञान के विषय में सविस्तर स्वरूप । मूल-सुयनाणस्त उद्देसो समुद्दे सो अपुण्ण अंणुश्रीगोय. पवत्तइ । जइ सुयनाणस्स उद्देसो समुद्देसो अणुगण अणुप्रोगोय पवत्तइ, किं अंगपविट्ठस्स उद्देसो समुद्देसो अशुगण अणुोगोय पवत्तइ ? किं अंगबाहिरस्स उद्दसो सशुद्देसो अणुरण, अणु- ोगोय पवत्तइ ? ॥२॥ हिन्दी पदार्थ-(सुयनाणस्स ) श्रुत ज्ञान का, (उद्देसो) उद्देश, (समुद्देसो) समुदेश, ('अणुएण ) अनुज्ञा, और ( अणुओगोय ) अनुयोग (पवत्तई ) होता । (जइ) यदि (सुयनाणस्स.) श्रुतज्ञानं का, ( उदेसो) उद्देश, (समुदेसी): समुद्देश, ( अणुरण-) अनुज्ञा और ( अणुओगोय ) अनुयोग; ( प्रवत्तई ) प्रवृत्त होते हैं तो ( किं अंगपविटुस्स ) क्या अंगप्रविष्ट सूत्रों में श्रुतज्ञान का (उद्देसो) उद्देश, ( समुद्देसो ) समुद्देश, ( अणुएण ) अनुज्ञा, (अणुअोगोय पवत्तई ) अनु-.
. ? * अनुयोगद्वार सूत्र * योग प्रवर्तता है । ( कि अंगवाहिरस्स ) अथवा अंगसूत्रों से वाहिर. के उत्तरा- ध्ययनादि सूत्रों में श्रुतज्ञान के ( उद्देसो ) उद्देश (समुद्देसो ) समुद्देश, (अणुरण) अनुज्ञा, ( अणुअोगोय पवत्तई ) और अनुयोग प्रवर्तता है ? .: ..भावार्थ:-इन पांच ज्ञानों में से श्रुतज्ञान के ही उद्देश, समुद्देश, अनुज्ञा और अनुयोग होते हैं, किंतु शेप चारों के नहीं । ऐसा कहने पर शिप्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! यदि श्रुतज्ञान के उद्देश, समुद्देश; आज्ञा और' अनुयोग है तो क्या अंग मूत्रों में जो श्रुतज्ञान है उसके उद्देश, समुद्देश, आज्ञा और अनुयोग हैं वा जो अंग सूत्रों से वाहिर के उत्तराध्ययनादि सूत्र हैं एन में श्रुतज्ञान के उद्देश, समुद्देश आज्ञा और अनुयोग हैं ? शिष्य के ऐसा पूंछने पर गुरु कहते हैं। मूल-अंगपविट्ठस्सवि उद्देसो जाव पवत्तह, अंग बाहि-. रस्सवि उद्देसो जाव पचत्तइ ? इमं पुण पट्ठवणं पडुश अंग. बाहिरस्सवि उद्देसो ४ ॥ ३ ॥ हिन्दी पदार्थ-( अंग पविट्टासवि ) अपि शब्द समुच्चयार्थ में है, अंगमाविष्ट मुत्रों में भी, ( उद्देसो जाब पवत्तइ ) उद्देश, समुदेश, अनुज्ञा और अनुयोगः प्रवृत्त हैं । तथा ( अंग बाहिरस्सवि ) अंग वाहिर के सूत्रों में भी, ( उद्देसों जाव पवत्तइ ) उद्देश, समुद्देश, अनुज्ञा, अनुयोग प्रवर्त्तते हैं । ( इमं पुण पट्टवणं ) पुनः इस प्रकार वर्तमान आरम्भ की ( पडुच ) अपेक्षा से ( अंग वाहिरस्सवि उसो ४ ) अंग वाहिर के सूत्रों का उद्देश, समुद्देश, अनुज्ञा और अनुयोग विद्यमान हैं। भावार्थ-अंगप्रविष्ट सूत्रों में भी उद्देशादि प्रवर्तमान हैं, और अंगवाहिर . के सूत्रों में भी श्रुतज्ञान के उद्देशादि विद्यमान हैं, तथा जो वर्तमान में अनु- योग का प्रारम्भ किया हुआ है, उसकी अपेक्षा से तो अंगवाहिर के सूत्रों में श्रुतज्ञान के उद्देशादि विद्यमान हैं । शिंप्यने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! :- मूल-किं कालियस्त उहेसो ४ ? उकालियस्स उद्देसो ४ ? कालियस्सवि उद्दसो ४ उकालियस्मवि उद्देसो ४ इमं पुण पढेवणं. पडुच्च उक्कालियस्स उद्देसो ४ जइ उकालियस्स उद्देसो .
? ( ४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * किं श्रावस्सयस्स उद्देसो ४ ? श्रावस्सयवइरित्तस्स उद्देसो ? प्रावस्सयस्सवि उद्देसो आवस्सयवहरित्तस्सवि उद्देसो ४ इम पुण पट्टवणं पडुच्च प्रावस्सयस्स अणुशोगो ॥ ४ ॥ हिन्दी पदार्थ-( जइ) यदि (अंगवाहिरस्स ) अंग बाहिर के सूत्रों में ( उद्देसो ४ ) श्रुतज्ञान के उद्देश, समुदेश, आज्ञा और अनुयोग विद्यमान हैं तो (किं कालियस्स ) क्या कालिक सूत्रों के (उदेसो ४ ) उद्देश, समुददेश, आज्ञा, और अनुयोग हैं वा ( उकालियस्स ) उत्कालिक सूत्रों के (उसो ४) उद्देशादि हैं ? गुरु कहते हैं ( कालियस्सवि) कालिक सूत्रों के भी, (उद्देसो ४) उद्देश, समुद्देश, आज्ञा, अनुयोग हैं और (उफालियस्सवि) उत्कालिक सूत्रों के भी (उसो ४ ) उद्देश, समुद्देश, आज्ञा, अनुयोग हैं पुनः ( इमं ) इस (पुण पट्ठवणं पडुच्च) वर्तमान आरम्भ की अपेक्षा से, ( कालियस्मवि उसो ४) कालिक सूत्रों के भी उद्देश, समुद्देश, अनुज्ञा और अनुयोग हैं तथा ( उका- लियस्स) उत्कालिक सूत्रों के भी (उदेसो ४ ) उद्देश, समुदेश, प्राज्ञा और अनुयोग हैं, गुरु के ऐसे कहने पर शिष्य ने फिर तर्क की, हे भगवन् ! (जइ ) यदि ( उकालियस्स) उत्कालिक सूत्रों के ( उद्देसो ४) उद्देशादि तो ( किं भावस्सयस) क्या आवश्यक सूत्र के ( उद्देसो ४ ) उद्देशादि वा ( आवस्सयवहारत्तस्स ) आवश्यकव्यतिरिक्त सूत्रों के ( उदेसो ४) उद्देशादि हैं ? गुरु कहते हैं ( आवस्सयस्सवि ) आवश्यक सूत्र के भी ( उद्- देसो ४) उद्देशादि और ( आवस्सयवइरित्तस्सवि) आवश्यक से व्यतिरिक्त सूत्रों के भी ( उद्देसो ४ ) उद्देशादि हैं । ( इमं पुण पटवणं पडुच्च ) इस वर्त- मान मारम्भ की अपेक्षा से (आवस्सयस्स) आवश्यक सूत्र का (अणुओगो) अनुयोग, या व्याख्यान किया जाता है। भावार्थ-शिष्यने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! यदि अंग वाहिर के सूत्रों के उद्देशादि हैं तो क्या कालिक सूत्रों के भी उद्देशादि हैं-जो प्रथम महर और पिछले महर में पठन किये जाते हैं-वा उत्कालिक सूत्रों के उद्देशादि हैं जो अनध्याय काल छोड़कर शेष सर्व काल में पठन किये जाते हैं ? गुरु कहते हैं कि कालिक सूत्रों के भी उद्देशादि हैं और उत्कालिक सूत्रों के भी उद्देशादि हैं, शिष्य ने फिर पूछा कि हे भगवन् ! यदि उत्कालिक सूत्रों के उद्देशादि हैं तो क्या .
.', * अनुयोगदार सूत्र * आवश्यक सूत्र के संदेशादि हैं या आवश्यक से व्यतिरिक्त सूत्रों के उद्देशादि गुरु ने फिर. उत्तर दिया कि:-आवश्यक वा आवश्यक से व्यतिरिक्त दोनों सूत्रों के उद्देशादि हैं, इस प्रकार से अनुयोग का वर्णन करते हुए अब आव- श्यक सूत्र के अनुयोग का वर्णन करते हैं। मूल-जइ श्रावस्सयस्स. अणुोगो श्रावस्सयं किं अंगं अंगाई सुयक्खधो सुयक्खंधा अज्झयणं अज्झयणाई उद्देसो उद्देसा ? श्रावस्सयस्सणं णो अंग णो अंगाई सुयक्खंधो नो सुयक्खंधाणोअझयणं अझयणाई यो उद्देसो पो उद्देसा तम्हा प्रावस्सयं । निक्खिविस्सामि सुयं निक्खिविस्सामि क्खधं निक्खिविस्सामि अझयणं निक्खिविस्सामि जत्थय जं जाणिज्जा निक्खवं निक्खिवे निरवसेसं जत्थविय न जा- णिज्जा चउक्यं निक्खिवे तत्थ ॥ १ ॥ हिन्दी पदार्य-(जइ ) यदि ( आवस्सयस्स ) आवश्यक सूत्र का (अणु- आगो) अनुयोग-व्याख्यान-किया जाता है तो ( आवस्सयं कि अंग) क्या आवश्यक एक अंग है वा (अंगाई ) बहुत से अंग हैं ? तथा (सुयक्खयो ) एक श्रुतस्कंध है वा (सुयक्खंधा ) बहुत से श्रुतस्कंध हैं ? तथा (अझयणं) आव- श्यक सूत्र का एक ही अध्ययन है । ( अज्झयणाई) वा बहुत से अध्ययन हैं ? तथा ( उद्देसो ) एक उद्देश है वा ( उद्देसा ) बहुत से उद्देश हैं ? गुरु कहने लगे ( आवस्सयस्सणं ) आवश्यक सूत्र (णो अंग) एक अंग नहीं है (णो अंगाई ) न बहुत से अंग हैं ( सुयक्खधो) आवश्यक का एक श्रुतस्कंध है किन्तु ( णो सुयक्खंधा ) बहुतश्रुतस्कंध नहीं है । (णो- अझयणं ) और आवश्यक का एक अध्ययन नहीं है किन्तु ( अ- भयणाई) बहुत से अध्ययन हैं, अर्थात् आवश्यक सूत्र के पट् अध्याय हैं (णो उद्देसो णो उद्देसा) आवश्यक सूत्र का न तो एक उद्देश है, और न वहुत से उद्देश है इस लिये आवश्यक को (तम्हा आवस्मयं ) १ सेकिंतं ग्रावस्सयमित्यादि अत्र से शन्दो मागध देशी प्रसिद्धो अथ शब्दार्थे वर्तते । अथ शब्दस्तु वाक्यो पन्यासधिस्तथा चोग्रम् अथ प्रक्रिया प्रभानन्तर्यमं मलोपन्यास निर्वचन समुच्चये श्रित, किमिति परम प्रभे तरिति सर्वनाम पूर्व प्रकान्त परामर्शा, इत्यादि टीकायाम् ॥ ६॥ ? ,
.
(६)
* अनुयांगद्वार मूत्र
*
( निक्खिविस्सामि ) निक्षेपों करके वर्णन करूंगा (सुयं निविखदिमसामि )
श्रुत को भी निक्षेपण करूंगा, (खंध निक्खिविास्सामि स्कंध को भी निय-
रणं करूंगा और ( अज्झयणं निक्खिविस्सामि) अध्ययन को भी निक्षों
करके निक्षेपण करूंगा, (जत्थ जंजाणिज्जा ) जिस जीवादि वस्तुओं में जि-
तना निक्षेपा जाने, (निक्खे निक्खिव ) उस में उतना निक्षेपों का निक्षेपण
करे ( निरवसेस) सर्व प्रकार से, अपितु, ( जत्यविय न जागिना) जिस
वस्तु में निक्षपाका अधिक प्रकार न जाने उसमें भी ( चउका निविखव तत्व)
चारों निक्षेप निर्विशेषता से निक्षेपण करे, अर्थात् उस वस्तु में भी चार निक्षप.
करके दिखलावे।
भावार्थ-यदि आवश्यक सूत्र का अनुयोग किया जाता है तो क्या श्राव-
श्यक सूत्र एक अंग है, या बहुत से अंग है, अथवा एक श्रुनस्कन्ध है या
बहुत से श्रुतस्कन्ध हैं तथा एक अध्ययन है या बहुन से अध्ययन है, अथवा
एक उद्देश है या बहुत से उद्देश है ? । गुरु कहते हैं आवश्यक मूत्र एक
अंग नहीं है न बहुत से अंग हैं, एक श्रृंतस्कन्ध है, बढुन से श्रुतस्कन्ध नहीं
हैं, और एक अध्ययन नहीं है किन्तु बहुत से अध्ययन है, न एक उदश है .
न बहुत से उद्देश है इसलिय आवश्यक सूत्र के निक्षेप करेंगे और श्रुत के भी
चार निक्षेप करेंगे, स्कंध के भी चार निक्षप करेंगे, अध्ययन शब्द के भी चारों .
निक्षेप करेंगे क्योंकि जिन पदाथा के जितने निक्षेप जाने उनके उतने निक्षप
निर्विशेपता से करे, अपितु जिन पदार्थों के पूर्ण स्वस्प को न जाने, उनमें भी
चार निक्षेप करे अर्थात् उन पदार्थों को भी चार निक्षपों द्वारा वर्णन करें,
इसलिये अब आवश्यक का वर्णन किया जाता है ।
"अथ श्रावश्यक विशेष
मूल-१ सेकिंतं श्रावस्मयं ? अावस्मयं चउविहं परणतं
तंजहा नामावस्सयं १ ठवणावस्सयं २ दवावस्सयं ३ भावा
वस्सयं ४ सेकिंतं नामावस्सयं २ ? जस्तणं जीवस्सवा अंजी-
वस्सवा जीवाणंवा अजीवाणंवा तदुभयस्तवा. तदुभयाणंवा
श्रावस्सएत्ति नामं कंज्जइ सेतं नामावस्सयं ॥६॥
* अनुयोगद्वार मुत्र * ( ७ ) हिन्दी पदार्थ-( सेकिंतं ) अब वह आवश्यक कौनसा है ? गुरु कहते हैं (श्रावस्मयं आवश्यक (चउनिह पएणतं ) चतुर्विध से प्रतिपादन किया गया है ( तंजहा) जैसे कि (नामावस्लयं) नामावश्यक (ठवणावस्सयं) स्थापनावश्यक. ( दबावल्सयं ) द्रव्यावश्यक ( भावावस्सयं ) भावावश्यक, (सपित नामावस्मयं ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! वह नामावश्यक किस प्रकार से वर्णन किया गया है ? गुरु कहते है कि (नामावस्सयं) नामा- वश्यक इस प्रकार से है जैसे कि ( जस्स जीवस्स ).जिस जीव का (वा) अथवा ( अजीवस्त ) अजीव का (वा) अथवा (जीवाणं ) बहुत से जीवों का (ना) अथवा ( अजीवाणं) बटुन से अजीवों का (वा) अथवा (तदु- भयम्स ) जीव अजीव दोनों का (वा) अथका ( तदुभयाणंवा ) बहुत से जीनों शोर अजीवों का (आवस्सपत्ति नाम करजइ ) अावश्यक इस प्रकार से नाम किया जाना है (सेनं नामावस्मयं )बही नामावश्यक भावार्थ-शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! वह आवश्यक किस प्रकार से वर्णन किया गया है ? गुरु ने उत्तर दिया कि आवश्यक चार प्रकार से वर्णन किया गया है, जैसे कि नामावश्यक १, स्थापनावश्यक २, द्रव्यावश्यक ३, और भाव आवश्यक , शिष्य ने फिर पूछा कि हे भगन् ! नामावश्यक किस को करने में ? गुरु ने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! नामावश्यक उसे कहते हैं जैसे कि- किमी न एक जीवं का अधवा एक अजीय का नथा दोनों का वा बहुत जीवों और अनीयों का या दोनों का आवश्यक " ऐसे नाम रख दिया सो वही नागरम्यक है. क्योंकि-फिर लोग उसे भी आवश्यक, इस नाम से आमन्त्रण देने हैं, इसलिये ही उन नागावश्यक कहा जाता है । अथ स्थापनावश्यक विषय मूल-मेकिंतं छ्यणावस्मयं ? २ जगणं कट्टकम्मे वा चिनकम्मेवा पोत्थकम्मेवा लेप्पकम्मेवा गंथिमेवा वेढिमेवा.पूरि- मेवा संघाड़मेवा अक्खेवा वराडएवा एगोवा अणेगोवा सम्भावट्टवणाएवा असम्भावट्ठवणाएवा प्रावस्सएत्तिवणा ठविज्जड़ सेतं वणावस्सयं २ नामढवणाणं को पइविसेसो ? .
(८) * अनुयोगद्वार सूत्र * णामं श्रावकहियं ध्वणा इत्तरियावा होज्जा आवकहिया वा (सेतं ठवणावस्सयं ॥७॥ हिन्दी पदार्थ-(सेकिंतं हवणावस्सयं) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! स्थापना आवश्यक कौनसा है ? गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! (कृषणा- वस्सयं) स्थापना आवश्यक इस प्रकार से है जैसे कि-(जएणकठकम्मे ) जो काष्ठ कर्म अर्थात् काष्ठ में कोतड़ी हुई मूर्ति (वा) अथवा (चित्तकम्मे ) चित्र कर्म-पिक्चर (वा) अथवा (पोत्थकम्मे ) बन की पुतली (लेप्पकम्मे) लेपकर्म (वा) अथवा ( गंठिमे ) गुंथकर बनाया हुवा कोई रूप (वा.) अथवा ( वेढिमे ) वेष्टन से बनाया रूप (वा.) अथवा (पूरिमे ) पीतल कांस्य आदि धातुएं पिघला कर प्रतिमा आदि वनवाना वा माला आदि, (बा.) अथवा (संघाइमेवा ) वस्त्रादि खंडों के संघात से बना हुवा रूप संघातन (अक्खेवा ) अक्षररूप पासा आदि ( वराडए ) अथवा वराड (कौडी प्रमुख) कर्म ( एगोवा) एक रूप अथवा ( अणेगोवा ) अनेक रूप । ( सम्भावहवणा एवा) सदस्थापना जैसे कि-आवश्यक की आकृति पूर्ण प्रकार से स्थापन करना और ( असम्भावनणाएवा ) असद् रूप स्थापना जैसे कि वराट को आवश्यक मानना ( आवस्सएत्तिवणा ठिविन्जइ ) इस प्रकार से उक्त वस्तु को आवश्यक के अभिप्राय से स्थापना करना, (सेतंहवणावस्सयं) वही स्थाप- नावश्यक है, अर्थात् इस प्रकार से स्थापनावश्यक माना जाता है, शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! (नामवणाणं) नाम स्थापना का (कोपइ- विसेसो) परस्पर क्या विशेष है ? क्योंकि दोनों का स्वरूप परस्पर प्रायः एक सामान्य है, गुरु कहते हैं कि भो शिष्य ! (णाम आवकहियं ) नाम आयु पर्य्यन्त रहता है अथवा यावत् उस द्रव्य की स्थिति है तावत् काल पर्यन्त उसका नाम रहता है किन्तुं स्थापना (वणा इत्तरियावा होज्जा )स्तोक काल तथा (आ- वकहियावा हविज्जा) आयु पर्यन्त भी रह सकती है क्योंकि स्थापना मानने वाले की इच्छा पर निर्भर है इसलिये इतना ही परस्पर दोनों का भेद हैं (सेतं- हवणावस्सयं) सो वही स्थापनावश्यक १ जैसे मुनि आवश्यक क्रियायें करता है, तद्वत् ध्यानयुक्त उसकी स्थापना करना उसे सद् स्थापना कहते हैं ॥
* अनुयोगद्वार मूत्र * भावार्थ:-स्थापना श्रावश्यक उसका नाम है . जो चित्रादि कर्म है उनमें आवश्यक की पूर्णाकृति की जाय. यदि वे उसी प्रकार स्थापना. की हुई है, नव वे सद्र स्थापना कही जाती है, यदि वरटादि को स्थापना माना हुआ है, तब वो असद् रूप स्थापना मानी जाती है और नामस्थापना का परस्पर भेद इतना ही है कि नाम आयु पर्यन्त रह सक्ता है स्थापना अल्प काल की भी हो सक्ती है, यावत् स्थिति पर्यन्त भी रह सकी है, सो इतना ही भेद होने पर इन फो नाम और स्थापनावश्यक कहने हैं। किन्तु यहां पर स्थापना निक्षेप ही दिखाया गया है ननु पूजनीय; क्योंकि यदि वह पूजनीय ही होता तो सूत्रकार यहां उसका अवश्य ही विधान कर देने । अब द्रव्यावश्यक का वर्णन किया जाता है। मूल-सेकिंतं दवावस्सयं? २ दुविहं पएणतं तंजहा त्रा- गमयो यनोग्रागमयो य । सेकिंतंभागमयो दवावस्सयं? २ जस्सणं ग्रावस्मएत्ति पयं सिक्खियं ठियं जियं मियं परिजियं नामसमं घोससम अहीणक्खरं अणचक्खरं अव्याइद्धक्खरं अक्खलियं अमिलियं अबञ्चामेलियं पडिंपुन्नं पडिपुत्रघोस कंठोढविप्पमुकं गुरुवायणोवगयं सेणं तत्थ वायणाए पुच्छ- पाए परियहणाए धम्मकहाए पो अगुप्पेहाए कम्हा ? अणु- वनोगो दब्यमितिकड ॥ ८ ॥ हिन्दी पदार्थ-( सकिनं दव्यावस्सयं ) वह कौनसा द्रव्यावश्यक है ? गुरु कहते हैं (दव्यावस्मयं ) द्रव्यावश्यक (दुवि पन्नतं ) द्वि प्रकार से प्रतिपादन किया गया है । (सहा) जसे कि भागमाय) श्रागमस और (नो भागमभोय) नो आगम से, शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! (सेकिंत आगमयो द- लावस्मयं ) बागम से व्यावश्यक कौनसा है ? गुरु ने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! ( भागमा दबाबस्सयं) आगम से द्रच्यावश्यक उसका नाम है कि, (जसाणं) जिसन ( आवस्सएपि) श्रावश्यक ऐसे ( पयं ) पद (सिक्खियं) सीख लिया है (ठियं ) हृदय में स्थित कर लिया है (जियं) अनुक्रमता पूर्वक पठन किया (मियं ) अनादि की मर्यादा भी भली भान्ति से जानता है (प- .. २.
( १० ) * अनुयोगद्वार सूत्र * सिनियं) अननुक्रमता से भी पठन कर लिया है (नामसमं) अपने नाम की माफक याद किया गया है (घोससम) उदातादि घोप भी सम हैं (अहीणक्खरं) फिर हीन अक्षर भी नहीं है ( अणच्चक्खरं ) अधिक अक्षर भी नहीं है (अ- व्वाइद्धक्खरं) विपरीत अक्षर भी नहीं है और ( अक्खलियं ) पाठ स्खलित भी नहीं है (अमिलिय) परस्पर मिले हुए अक्षर नहीं है तथा अन्य सूत्रों के पार्टी के साथ भी वर्ण एकत्व नहीं हुए हैं (अवच्चामेलिय) अन्य सूत्रों के पाठ एकार्य रूप ज्ञात करके अन्य सूत्र से एकत्व कर देने उसका नाम बच्चामेलिय है, तथा स्वमति से कल्पित करके अधिक पाठ कर देना उसका नाम भी बच्चा मेलियं है सो वह आवश्यक रूप पद अवच्चामेलिय रूप है फिर वह (पडिपुन्नं) प्रतिपूर्ण और (पडिपुन्नघोसं ) प्रतिपूर्ण घोप है फिर (कंठोडविप्पमुक्कं) कंठ और ओष्ट-होठ-दोनों के दोपों से रहित है, क्योंकि शुद्ध उच्चारण कंठादि के दोपों से रहित ही होता है; अपितु (गुरुवायणावगयं) गुरु से पटन किया हुआ है। किन्तु स्वबुद्धि से अध्ययन नहीं किया और नाही अविनय भाव से पठन किया है (सेणं तत्थ वायणाए) सो वह आवश्यक पद वाचना करके (पुच्छणाए ) पृच्छणा करके ( परियट्टणाए ) परिवर्तना करके (धम्मकहाए ) धमकथा करके तो पुनः पुनः अस्खलित किया हुआ है वह द्रव्यावश्यक क्योंकि (णोअणुप्पेहाए) अर्थ ज्ञान पूर्वक अनुमेक्षा करके जिसकी पउनादि क्रिया एं नहीं की अथवा अनुपेक्षा नहीं की। शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि (कम्हा) क्यों ! उसे द्रव्यावश्यक कहा जाता है ? गुरु ने उत्तर दिया कि (अणुवओगो- दव्यमितिक१) अनुपयोग की अपेक्षा वह द्रव्यावश्यक है, क्योंकि यदि वाचनादि क्रिया उपयोगपूर्वक की जाय तब वे भावावश्यक ही हो जाता, द्रव्यावश्यक इसी लिये ही कहा गया कि वह उपयोगशून्य है । भावार्थ--द्रव्यावश्यक द्वि प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि- आगम से १ और नो अागम से २ सो आगम रूप द्रव्यावश्यक उसका नाम कि जिसने "आवश्यक" ऐसे एक पद सीखलिया है और उसको चतुर्दश ज्ञान के दोपों से रहित ही उच्चारण करता है और घोप भी जिसका शुद्ध है, के- गदि स्थान भी पवित्र है, साथ ही वाचना १ पृच्छना २ परिवर्तना ३ धर्मोपदेश ४ में भी उक्त पद को व्यवहृत करता है। किन्तु एक अनुपेक्षा ही नहीं करता इस- लिये वह द्रव्यावश्यक है, क्योंकि यदि उपयोग पूर्वक अनुमेक्षा हो तब वह भा-.. ? ।
* अनुयोगद्वार सूत्र * वावश्यक हो जाए सो अनुपयोग के ही कारण से उसे द्रव्यावश्यक ऐसा पद दिया गया है। अथ नयों की अपेक्षासे सूत्रकार द्रव्यावश्यक का विवेचन करते हैं। मूल-णेगमस्सणं एगो अगुवउत्तो आगमओ एगं दवा वस्सयं दोनि अणुवउत्ता आगमत्रो दोनि दवावस्सयाई तिनिअणुवउत्ता आगमो तिन्निदवावस्सयाई एवं जावइयां अणुवउत्तो आगमयो तावइयाई दवावस्सयाई एवमेव ववहा रस्सवि ॥६॥ हिन्दी पदार्थ-(णेगमस्सणं एगो अणुवउत्तो)नैगमनय के मतमें यदि एक व्यक्ति अनुपयोग पूर्वक आवश्यक करता है तो ( आगमओ) आगम से ( एग. दवावस्सयं) एक द्रव्यावश्यक है अर्थात् नैगमनय के मत में एक द्रव्यावश्यक है यदि (दोन्निअणुवउत्ता) दो अनुपयोग पूर्वक श्रावश्यक करते हैं तो (आगमओ) आगम से (दोन्निदव्यावस्सयाई) दो द्रव्यावश्यक हैं यदि (तिनिअगुवउत्ता) तीन पुरुप अनुपयोग पूर्वक आवश्यक करते है तो ( आगमओ ) आगम से (ति- निदबावस्सयाई ) तीन द्रव्यावश्यक हैं ( एवं जावइया ) इसी प्रकार से यावत् परिमाण ( अणुवउत्तो ) अनुपयोग पूर्वक आवश्यक करते हैं ( आगमओ) आ- गम से (तावइयाई ) उतने ही परिमाण में (दबावस्सयाई) द्रव्यावश्यक होते हैं (एवमेव यवहारस्सवि ) इसी प्रकार मन्तव्य व्यवहार नयका भी है और अपि शब्द समुच्चार्थ में है । भावार्थ-नैगमनय के मतमें यावत् प्रमाण अनुपयुक्त आगम से द्रव्यावश्यक करते हैं उतने ही नंगम नय के मत से द्रव्यावश्यक होते हैं, अपितु इसी प्रकार व्यवहार नया भी मन्तव्य है। मूल-संगहस्सणं एगोवा अणेगो वा अणुवउत्तोवा अणुव उत्तावा भागमत्रो दबावस्मयं वा दवावस्सयाणि वा से एगे दवावस्सए ॥ १० ॥ हिन्दी पदार्थ-( संगहस्सणं) संग्रह नयके मत से ( एगो) एक (वा )अ- ( १२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * थवा ( अणेगो ) अनेक ( अणुवउत्तो) एक अनुपयुक्त पूर्वक (वा)अथवा (अ-. णुवउत्तावा ) बहुत अनुपयुक्त पूर्वक (दवावस्सयंवा ) एक द्रव्यावश्यक करता है अथवा (दव्यावस्सयाणिवा ) बहुत जन द्रव्यावश्यक करता है ( से एगेद- बावस्सए ) वह संग्रह के मत से एक ही द्रव्यावश्यक है ।। भावार्थ-संग्रह चय के मत से यदि एक वा अनेक पुरुप अनुपयोग पूर्वक द्रव्यावश्यक करते हैं वह सर्व एक ही द्रव्यावश्यक है क्योंकि समान और वि- शेष भाव को संग्रहनय एक रूप से ही मानता है ।। अथ ऋजुसूत्र नय विषय । मूल-उज्जुसुयस्स एगो अणुवउत्तो आगमनो एगंदब्बा वस्मयं पुहुत्तं नेच्छइ ॥ ११ ॥ हिन्दी पदार्थ-( उज्जुसुयस्स एगो अणुवउत्तो आगमओ एगं दवावस्सयं पुद्दुत्वं नेच्छइ ॥ ११ ॥) जुसूत्रनय के मत से एक अनुपयुक्त आगम से जो द्रव्यावश्यक करता है वह एकही द्रव्यावश्यक है। किन्तु यह नय पृथक् २ प्रा. वश्यक की इच्छा नहीं करता क्योंकि यह नय वर्तमान काल के पदार्थों को ही स्वीकार करता है ॥ ११ ॥ भावार्थ:-ऋजुमूत्रनय के मत में यावन्मान प्रमाण आगम से द्रव्यावश्यक करते हैं वे सर्व अनुपयुक्त होने से एकही आगम से द्रव्यावश्यक है क्योंकि अनुपयुक्त भाव सर्व में एक समान ही है, इसलिये यह नय पृथक् २ आवश्यक को स्वीकार नहीं करता ॥ अथ शब्द, समभिरूढ एवंभूत नय विषय । मूल-तिएहं सदनयाणं जाणए अणुवउत्ते अवत्थु क- म्हा ? जइजाणए अणुवउत्ते ण भवइ जइ अणुवउत्ते जाणए ण भवइ तम्हा नत्थि भागमत्रो दवावम्सयं सेतं श्रागमत्रो दव्वावस्सयं ॥ १२॥ हिन्दी पदार्थः-(तिएहं सदनयाणं) तीनों शब्द नयों के मत से जैसे कि शब्दनय १ समभिरूढनय २ एवंभूतनय ३ इन तीनों नयों का नाम ही शब्दनय है क्योंकि यह नय विशेप करके शुद्ध शब्दों पर ही स्थित हैं और ?
है * अनुयांगद्वार सूत्र * ( १३ ) शुद्ध वस्तुओं को मानते हैं जैसे कि तीनों नयोंके मत से ( जाणए अणुव- उत्ते अवत्यु ) जो जानता तो है किन्तु उपयोग पूर्वक नहीं है वह अवस्तु है (कम्दा । क्योंकि-( जइ जाणए ) यदि जानता है तब (अणुवउत्तेण भवइ ) अनुपयांग युक्त नहीं है ( जइ अणुव उत्ते जाणए न भवइ ) यदि अनुपयोग युक्त है तब जानकार नहीं है-(तम्दा ) इसी वास्ते (नस्थि आगमओ दवावस्सयं) तीनों नयों के मत में पागम से न्यावश्यक होता ही नहीं क्योंकि यह तीन नय शुद्ध वस्तु पर ही श्रारूद हैं और उस आगमरूप द्रव्यावश्यक को अवस्तु रूप से ज्ञात करते हैं इसलिये वे आगम रूप द्रव्यावश्यक को अवस्तु करके मानते हैं (सेतं आगमओ दवावस्सय ) वही आगम से द्रव्यावश्यक का स्वरूप सो यह द्रव्यावश्यक का स्वरूप पूर्ण हुआ। भावार्थ:-तीनों शब्द नय अनुपयुक्त आगम रूप द्रव्यावश्यक को अवस्तु रूप से मानते हैं, क्योंकि इन नयों का मन्तव्य है कि-यदि जानता है तब अ- नुपयुक्त नहीं है यदि अनुपयुक्त है तब जानता नहीं हैं सूत्रों में आत्मा का गुण शान माना है इसलिये जाना और अनुपयुक्त यह दोनों परस्पर विरोधी भाव है इसलिये इन नयों के मत से आगम रूप से द्रव्यावश्यक नहीं होता है सो यह श्रागम रूप द्रव्यावश्यक का विवचन पूर्ण हुआ । श्रथ नो पागम द्रव्यावश्यक का स्वरूप वर्णन किया जाता है। मुल-सेकिंतं नो भागमयो दबावस्सयं ? २ तिविहं प- गणतं तंजहा-जाणगसरीर भवियसरीर दव्यावस्मयं २ जाणगसरीर भवियसरीरवइरित्तं दवा- वस्मयं ३ सेकिंतं जाणगसरीरदव्वावस्सयं ? २ श्रावस्सएत्ति पयत्वाहिगार जाणगस्स जं सरीरयं ववगयचुयचाविय चत्त देहं जीवविप्पजढं सिज्जागयं वा संथारगयंवा निसीहि- यागयं वा सिद्धसिलातलगयंवा पासित्ताणं कोईवएज्जा अहो! णं इमणं सरीर समुस्सएणं जिणोव इतुणं भावेणं श्रावस्सए- तिपयं पापवियं परणवियं परूवियं दंसियं निदसियं उवदंसियं दव्वावस्सयं १ -- ( १४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * जहा कोदिलुतो ? अयं महुकुंभे अासी अयं घयकुंभे अासी सेतं जाणगसरीरदव्वावस्सयं ॥ १३ ॥ हिन्दी पदार्थ-(सेकिंतं नो आगमओ दवावस्सयं) नो भागम से वह द्रव्यावश्यक कौनसा है जो केवल क्रियारूप तो है किन्तु पठन रूप नहीं है अपितु नो शब्द सर्वथा पठन का निषेध करता है अर्थात् क्रियारूप नो भागम द्रव्यावश्यक कौनसा है ऐसी पृच्छा करने पर गुरु कहने लगे कि (नो आगमओ दव्वावस्सयं तिविहं पन्नत्तं तंजहा) नो आगम द्रव्यावश्यक तीन प्रकार से प्र- तिपादन किया गया है जैसे कि-( जाणग सरीर दवावस्सयं ) प्रथमज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक जैसे कि आवश्यक के पूर्ण ज्ञाता का शरीर ( भविय सरीर दबा- वस्सयं ) द्वितीय भव्य शरीर द्रव्यावश्यक जैसे कि आवश्यक के सीखने वाले का शरीर और ( जाणग सरीर भविय सरीर वइरित्तं दवावस्सयं) तृतीयज्ञ शरीर और भव शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यावश्यक-यह तीनों प्रकार का नों आगम . द्रव्यावश्यक है (सेकिंतं जाणग सरीर दबावस्सयं) ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक कौनसा है-गुरु कहने लगे कि (जाणग सरीर दवावस्सयं ) ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक इस प्रकार से है जैसे कि-( आवस्सएत्ति ) श्रावश्यक के ( पयत्थाहिगार ) पद और अर्थ के अधिकार ( जाणगस्स) के जानकार का ( जं सरीरयं) जो शरीर है किन्तु ( ववगयचुयचाविय चत्तदेहं ) चेतना से रहित प्राणों से मुक्त होकर के वल शरीर ही उपचय रूप है अर्थात् जो जीव से रहित शरीर है (जीव विप्पजढं ) और जीव का त्यागन किया हुआ जो शरीर हैं (सिज्ज़ागर्यवा) शय्या गत हो अथवा (संथारगयंवा ) संस्तार कगत हो अर्थात् माण छूटने पर भी समाधिस्थ हो अयवा बैठा हुआ हो (सि. सिलातलगर्यवा) जिस शिला पर मुनि अनशन करते हैं उस शिला पर (पासित्ताणं) देख करके ( कोई वएज्जा) कोई भाषण करता कि ( अहोणं इमेणं सरीर समुस्सएणं) अहो यह शरीर का समूह (जिणोच इट्टेणं भावेणं) जिनेन्द्र देव के उपदिष्ट भावों करके (आवस्सएत्तिपयं) आवश्यक इस प्रकार का पद (प्रायवियं) प्रतिपादन किया (पएणवियं) प्रज्ञप्त किया (परूवियं) विशेष करके प्रतिपादन किया ( दसियं निदंसियं उवदसियं) आवश्यक पद को दिखाया और विशेष करके दिखलाया फिर उसका उपदेश करके इसने परिपक किया था (जहा को दिटुंतो) किस दृष्टान्त से यह कथन सिद्ध हो जैसे कि ( अयं महुकुंभे आसी) . * अनुयोगद्वार मूत्र * यह मधु का घट था अधवा ( अयं घयकुंभे आसी) यह धृत का घट था क्योंकि घट वर्तमान काल में विद्यमान रूप तो है; किन्तु घृत और मधु से रहित है. इसी प्रकार घट तुल्य शरीर तो है अपितु घृत और मधु के समान जीव आव- श्यक करने वाला वर्तमान काल में नहीं है इसी लिये ही उसका नाम ( सेतं- जाणगसरीर दवावस्सयं) ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक है अर्थात् आवश्यक के जानकार का शरीर है। भावार्थ:-नो आगम व्यावश्यक तीन प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि ज्ञ शरीर त्यावश्यक १ भव्य शरीर द्रव्यावश्यक २ ज्ञ शरीर भव्यशरीर व्यतिरिक, व्यावश्यक ३ सो ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक उसका नाम है जो श्रा- वश्यक को पूर्ण विधि से करता हुआ किसी स्थान पर मृत्यु को प्राप्त होगया, किन्तु आवश्यक की आकृति पूरी उसी प्रकार से है जसे कि आवश्यक के करने वालों की होती है, इस में केवल जानने वाले की अपेक्षा से नैगमनय के मतसे न शरीर द्रव्यावश्यक कहा जाता है। जैसे मधु या घृन का घट था। अथ भव्य शरीर द्रव्यावश्यक विषय । मूल-सेकिंतं भवियसरीर दव्यावस्स ? २ जे जीवे जो- णिजम्मणनिक्खते इमेणं चेव यात्तएणं सरीरसमुस्सएणं जियोव इटेणं भावणं आवस्सएत्तिपयं सेयकाल सिक्खिस्सइ न ताव सिक्खड् जहा को दिलुतो ? अयं महुकुंभे भविस्मइ प्रयं धयकुंभे भविस्सइ सेतं भवियसरीर दवावस्सयं सेकि- तं जाणगसरीरभवियसरीरवतिरितं दबावस्मयं ? २ तिविहं पन्नत्तं तंजहा लोइयं कुप्पावयणियं लोउत्तरिया सेकिंतं लोइयं दवाव स्सयं ? २ जे इमे राईसर तलवर माडंविय कोडेविय इभ सेट्टि सेणावइ सत्यवाह प्पभिइनो कल्लं पाउप्यभायाए रयणीए सुविमलाए फुल्लुप्पल कमल कोमलु म्मिलियम्मि अह पंडुरे पहाए रत्तासोगप्पगासकिंसुयसुय मुह गुंजद्धरागसरिमे कमलायर नलिणि संडवोहए उट्ठिय-
( १६ )
* अनुयोगद्वार सूत्र *
म्मि सूरे सहस्सरस्तिम्मि दिणयरे तेयसा जलते मुहंधोयण-
दंतपक्खालणतेल्फणिहसिद्धत्थयहारीयालय अदागधूव पुष्फ
मल्ल गंध तंवोल वत्थाइयाई दवावस्सयाइं काउं तो.
पच्छा रायकुलं वा देवकुलं वा पारामं वा उज्जाणं वा
सभं वा पवं वाणिगच्छंति सेतं लोइयं दवावस्सयं ।
सेकिंतं कुष्यावयणियं दवावस्सयं ? २ जे इमे चरग चीरिय
चम्मखडिय भिक्खोंड पंडुरंग गोयम गोबइय गिहिधम्म
धम्मचिंतग अविरुद्ध विरुद्ध वुडसावयपभिइओ पासंडत्या
कल्लं पाउप्पभाए रयणीए जाव तेयसा जलते इंदस्स वा
खदस्स वा रुद्दस्सवा सिवस्स वा वेसमणस्स वा देवस्स वा
नागस्त वा जक्खस्स वा भूयस्स वा मुगुदस्सवा. अज्जाएवा
दुग्गाएवा कोट्टकिरियाएवा उवलेवण सम्मजणावरिस्स-
णधूव पुप्फ गंध मल्लाइयाई दवावस्सयाई करेंति सेतं कुप्पा
वयणियं दवावस्सयं ॥ १४ ॥
हिन्दी पदार्थ-(सेकित भवियसरीर दवावस्सयं ) शिप्यने प्रश्न किया
कि हे भगवन् ! कि भव्य शरीर द्रव्यावश्यक कोनसा है ? गुरु कहते हैं (भ:
त्रिय सरीर दव्यावस्सयं) भव्यशरिद्रव्यावश्यक उसका नाम है जैसे कि
( जेजीवे जोणिजम्मणनिक्खते इमेणं चेत्र आत्तएणं सरीर समुस्सएणं
जिणोव इटुंगं भावेणं श्रावस्सएत्ति पयं सेयकाले सिक्खिस्सइ नतावसिक्खइ)
जो जीव योनि के द्वारा जन्म को प्राप्त हो गया है और वह आगामी काल में अपने
शरीर समुदाय करके जिनेन्द्र उपदिष्ट भाव से " आवश्यक " ऐसे पद भवि-
ष्यत् काल में सीखेगा; किन्तु वर्तमान काल में उसने आवश्यक के पद को
धारण नहीं किया है-इस में दृष्टान्त देते हैं कि (जहा को दितो अयं धयकुंभेभ
विस्सइ ) जैसे कि यह घट घृत के लिये होगा ।
१ स्याद् भव्य चैत्य चौर्य समेपुयात् ॥ त्यादादिपु चौर्य शब्देन समेपुत्र संयुक्तस्य यात्
पूर्व इद भवति ॥
.
प्राकृत व्याकरण-श्र० पा०२ सूत्र ॥ १०७ ॥
? * अनुयोगद्वार-सूत्र * ( १७ ) (अयं महुकुंभे भविस्सइ) यह कुंभ मधु के वास्ते होगा, अर्थात् इस में घृत इसमें मधु रखा जावेगा (सेतं भवियसरीरदबावस्सयं ) वही भव्य गरीर द्रव्यावश्यक है अर्थात् होने वाले शरीर को भव्य शरीर कहते हैं (स- कित .जाणगसरीरभवियसरीरवइरित्तं दव्यावस्मयं ) इसके पश्चात् शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! ज्ञ शरीर और भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यावश्यक कौनसा है ? ( जाणगसरीरभवियसरीरवरितंदवावस्सयं ) गुरु कहते हैं किन शरीर और भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यावश्यक (तिविहं पएणतंतजहा) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है-जैसे कि (लाइयं १ कुप्पावयणियं २ लोगुत्तरियं ३) लौविक १ कुमावचनिक* २-परमत वालों का-और लोकोत्त- रिक ३ ( सेकिंतं लोइयं दवावस्वयं? लोइयं दवावस्सयं) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि लौकिक द्रव्यावश्यक कौनसा है ? गुरु कहते हैं कि लौकिक द्रव्या- वश्यक इस प्रकार से है जैसे कि-(जेइम राईसरतलवर माइंविय कोडविय इभ सहितणावसत्यवाह पभिइनी) जो राजा, ईश्वर, कोतवाल-थानेदार- माउंवि, बड़े परिवार वाला, प्रधान श्रष्टि-शेठ-सेनापति, : सार्थवाह प्रमुख लोग ( कलंपाउप्पभायाण) प्रभातकाल में किंचित् मात्र प्रकाश होते हुए और ( रयणीय ) रात्रि के व्यतिक्रम होने पर ( सुविमलाए) अतिनिर्मल आकाश होने पर (फुल्लुप्पल कमलकापलुम्मिल्लियम्मि ) विकसित होगये हैं कमल और नेत्र और (श्र पंडग्पभाए ) प्रातःकाल में प्रकाश भी होगया है और जिसमें निम्नलिखिन प्रकार से सूयोदय हुया है ( रत्तासोगप्पगास. किंसुयसुयं मुहगुंजदरागमरिम ) लाल अशोक वृक्ष के समान और केसुओं के पुष्प वा शुक मुख-नाने के तुल्य-तथा गुंजाई-अर्द्ध गुंजा, रती- के रंग स- मान ( कपलागर ) कपलों के जलाशय को जिसमें ( नलीण संडबोहए) नलि नादि कमल हैं, उनको अगवा मामलों में वन को प्रतियोधित करता हुआ ( रहियंमिन) उदय हुआ सूर्य मिकी (सहस्सरस्सिमि ) सहस्त्र किरणें है ऐसा (दिणयरे) दिनकर (तेयसा) तेजसे ( जलंते ) जो प्रकाश मान है उसके उदय होने पर ( मुधोयणं ) मुख धोते हैं. ॥ (दंतपक्खालण) दांत प्रनालण करने हैं ( तेल्लफणिहसिद्धत्थय ) तेल * अयान निन्दनीय भूत आदिकों की उपासना फरने घाला ॥ सानेन त इति सेना, प्रमः प्रभो सूर्य नृपे इत्यादि। -- 툝 - ( १ ) * अनुयोगदार सूत्र * अथवा केश समाचरण फणि अर्थात्-कंघी (सिद्धत्थय ) सरसों के पुष्प ( हरियालिए ) हरिताल अर्थात् दूब ( अदाग ) दर्पण, (धूव पुप्फ) धूप पुष्प ( मल्लगंध ) माला अथवा सुगंध (तंत्राल) नाम्बूल-पान-( वत्थमाइयाई ) वस्त्रादि को भी पहिरते हैं (दव्यावसयाई करेंति) सो द्रव्यावश्यक इस प्रकार से वह नित्य ही करते हैं फिर वह इस प्रकार से द्रव्यावश्यक करके ( तापच्छा रायकुलं वा देवकुलं वा सभं वा पवं पा) तत्पश्चात् राजाल में अथवा देवन्त में अथवा सभा में पानी के स्थान में ( आरामं वा उज्जाणवाणिगच्छंति ) आराम अर्थात् वाग में अथवा उद्यान में-वीड-जाते हैं (सेतलोइयं दया- वस्सयं ) वही लौकिक द्रव्यावश्यक है (सेकिंतं कुप्पात्रयणियं दवावस्सयं कुप्पावणियं दवावस्सयं) अथ कुमावचन का वर्णन किया जाता है, शिप्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! कुमावचनिक द्रव्यावश्यक कौनसा है ? गुरु कहने लगे कि भो शिष्य ! कुमावनिक द्रव्यावश्यक इस प्रकार से है जले कि (जे इमे चरग ) जो चरक ( चीरिय ) वस्त्र के पहिरने वाले (चम्यखंडिय) चर्म खंड रखने वाले तथा मृग शाला धारण करने वाले (भिक्खाँड ) भिक्षा करने वाले (पंडुरंग ) भस्म शरीर के लगाने वाले (गोयम गोयन्त्रइयं) वृपभादि के निमित्त से आजीविका करने वाले जैसे वृषभ को श्रृंगार के आजीविका के करने वाले और गौवृत्ति के समान भोजन करने वाले अर्थात् जैसे गो क्रिया करती है उसी प्रकार काम करने वाले और (गिहधम्म) गृहस्थधर्म के उपदशेक (धम्म चिंतगा) धर्म के चिन्तन करने वाले अर्थात् लौकिक शास्त्र अध्ययन करने वाले ( अविरुद्ध) विनयवादी-विरुद्ध-नास्तिकवादी (बुहसावय ) वृद्ध श्रावक ब्राह्मणों का नाम है क्योंकि इन्होंने जैन धर्म को श्री ऋषभदेव भगवान् के समय धारण फरके फिर पीछे त्याग कर दिया इसी करके इन्होंका नाम आजपर्यन्तभी वृद्ध ओवक करके चला आता है (पभित्री) सो वृद्ध पायक प्रमुख (पासंडया) यावत्प्रमाण पाखंडी. है वे सर्व (कल्लंपाउप्पभायाए) प्रातःकाल होते ही जिस समय किञ्चिन्मात्र ही प्रकाश होता है (रमणीय)रात्रि व्यतिका होजाती है (जावजते) यावत् जाज्वल्यमान सूर्य प्रकाश करता है उसी समय वे उक्त सर्व (इंदस्सवा) इन्द्र को अथवा (खंदस्सवा ) स्कंद को ( रुदस्सवा ) रुद्र को. (सिवस्सवा ) शिवको (वेसमणस्सवा ) वैश्रवण को ( देवस्सवा) देव को (नागस्सवा ) नागकुमार को (जक्खस्सवा ) यक्ष को (भूयस्सत्रा ) भूत को ( मुगुदस्सवा) वलदेव को (अ- ) * अनुयोगद्वार मूत्र * (१६) नाएवा ) आर्य देवी अथवा (दुग्गाएवा) दुर्गा को ( कोकिरियाएवा) -कोह क्रिया उसका नाम है जो देवियां हिंसा करवाती हैं-प्रतिमा और यह सर्व उपचार नय के मत से इन के आयतनही समझेन चाहिये क्योंकि यह द्रव्यावश्यक कुमावनिक नीनों काल की अपेक्षा से है इसलिये इनके मंदिर ही झात करने चाहिये सो वे लोग इनके स्थानों को अथवा इनकी प्रतिमाओं को (उबलवण : लेपन करते हैं (सम्पजण ) संमार्जन करते हैं ( वरिसण ) पानी के छोटे देने हैं । ( धूत्र पुष्फ) धूप और पुष्प चढाते हैं (गंध मलाइयाई ) सुगंध और पुष्पमालादि भी चढ़ाते हैं इस प्रकार से वे ( दवावस्सयाई करति ) व्यावश्यक करते हैं ( सेतं कुप्पावणियं दवावस्सयं ) यही कुमावनिक द्रव्यावश्यक है क्योंकि कु अव्यय निन्दा अर्थ में व्यवहृत है इसलिये जिन का कुमावचन है वे उक्त प्रकार से द्रव्यावश्यक करते हैं । भावार्थ:-भव्य शरीर ट्रव्यावश्यक उसका नाम है जिस जीव ने भविष्यत् काल में अईन देव के उपदेशानुकूल अावश्यक सीखना है, किन्तु वर्तमान काल में वह श्रावश्यक का अज्ञाता है जैसे यह घट, मधु वा घृन के लिये होगा. इसी मकार अमुक व्यक्ति भविष्यत् काल में आवश्यक सीखगा उसी का नाम भव्य शरीर द्रव्यावश्यक है अपितु जो शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त आवश्यक वह तीन प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि १ लौकिकी, कुपायचनिक २, लो कोतरिक ३ सो लाफिक व्यावश्यक उसको कहते हैं जैसे कि-राजा, ईश्वर, (तलवर ) कोतवाल, धनाध्य कौटुंबिक, प्रधान सेठ, सेनापति, सार्थवाह, प्रभृति लोक प्रात:काल होने ही मुखधावन, दंतप्रक्षालन, तैल कंघी सरसों को पुष्प, दुर्नादि का स्पर्श करके दर्पण को देखकर फिर धूप पुप्पमाला सुगंध ताम्बूल चनादि को पहिन कर फिर इसी प्रकार से नित्यमेवही द्रव्यावश्यक फरके नत्पश्चात् राजद्वार वा यथेष्ट स्थानों में चले जाते हैं सो इसी का ही नाम लौकिक द्रव्यावश्यक है, किन्तु जो कुप्रावचनिक है जैसे दि-चरक चीर को धरने चाले, चर्म रोडको गहिरने वाले भिक्षा से आजीविका करने वाले अंगपर भस्म लगाने वाल, गौतमत्ति, या गोति से निर्वाह करने वाले गृहस्थ धर्म के उपदेशक अथवा धर्म के चिन्तक विनयवादी वा नास्तिक आदि लोग शानः काल होते हुए इन्द्रादि के मन्दिरों में जाकर योचित क्रियायें करते हैं सो उसीका ही नाम कुमावनिक द्रव्यावश्यक है और अब लोकोत्तर द्रव्यावश्यक - (२०) * अनुयोगद्वार सुत्र * का वर्णन किया जाता है। मूल-सेकिंतं लोगुत्तरियं दवावस्मयं ? २ जेइमे समण गुणमुक्कजोगी छक्कायणिरणुकंपा या इव उद्दामा गया हब निरंकुसा घट्टा मट्ठा तुप्पोट्ठा पंडुरपडपाउरणा जिणाणम- णाणार सच्छंद विहरिउणं उभोकालमावस्सगस्सउवट्ठति सेतं लोगुत्तरियं दव्वावस्मयं सेतं जाणगसरीरभचिय सरीरवइरित्तं दवावस्सयं सेतं नो ग्राममनो दवावसायं सेतं दवावस्सयं । पदार्थ-( सेकित लोगुत्तरियं दव्यावस्मयं २ ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! लोकोत्तर द्रव्यावश्यक कौनसा है? गुरु ने उत्तर दिया कि (जे इमे समण गुणमुक्कजोगी) जो यह प्रत्यक्ष साधु गुणों से रहित और जिसने अपने. योगों को संयम से वाहिर कर लिया है और ( बकाय निरणुकंपा) पट्काय के जीवों की अनुकंपा से भी रहित होगया है अपितु निर्दय होकर (हया इव उद्दामा ) अश्व की नाई शीघ्र गामी है क्योंकि जसे घोड़ा चलता हुआ अवि- वेक से जीवों का उपमर्दन करता है उसी प्रकार वह मुनि होगया, किन्तु (गया इवणिरंकुसा ) हस्ती की नाई निरंकुश है किसी की भी भाजा नहीं मानता (घट्टा मट्ठा तुप्पोट्टा ) नवनीत करके जांघों को मर्दन किया हुआ है, तैलादि करके शरीर और मस्तिष्क भी अलंकृत है फिर जिसके आष्ट भी शृंगारित हैं अपितु ( पंडुरपडपाउरणा ) श्वेत वस्त्र को जिसने पहिरा हुआ है, और ( जिणाणमणाणाए ) अहंतों की विना आज्ञा ( सच्छंदं विहरिउणं ), स्वच्छन्दता से विचर करके जो ( उभोकाल आवस्मयस्स उबटुंति ) दोनों काल में आवश्यक को करता है. अर्थात् आवश्यकः के लिये दोनों काल में सावधान होता है, अपितु मूत्र में चतुर्थी के स्थान में षष्ठी विभक्ति दी हुई है सो वह ( सेतं लोगुत्तरियं दवावस्सयं) लोकोत्तर द्र-. व्यावश्यक है क्योंकि यह द्रव्यावश्यक इसलिये है कि कथन मात्र ही यह आ- वश्यक है और यहां पर नो शब्द देश निषेधक है ( सेतं जाणगसरीरभविय सरीर वरित्तं दवावस्सयं) अब इस की पूर्ति इस प्रकार से की जाती है कि । * अनुयोगद्वार मूत्र * ( २१ ) यही ज्ञ शरीर भव्य शरीर से व्यतिरिक्त द्रव्यावश्यक है (सेतं नो आगमओ दबास्सयं संतं दवावस्सयं) अथानन्तरम् नोआगम द्रव्यावश्यक पूर्ण हो गया है और इसी का ही नाम द्रव्यावश्यक हैं । भावार्थ-लोकोत्तरिक द्रव्यावश्यक इसका नाम है जो साधु गुणों से रहित पदकाय में दया न करने वाला अव की नाई शीघ्रगामी गजवत् निरंकुश श्वेत वस्त्रों को धारण करने वाला, अपितु जिसने शरीर को शृंगारित, किया हुआ अतः अरिहंनों की आज्ञा से रहित स्वच्छन्दता से विनरकर जो दोनों समय मावश्यक के लिये सावधान होजाता है उसी का नाम ज्ञ शरीर भव्य शरीरव्यनिरिक्त लोकोत्तरिक नो आगम द्रव्यावश्यक है क्योंकि पठन रूप ही उसका कर्तव्य है । इसीलिये उसका नाम नो पागम द्रव्यावश्यक है । इस के अनन्तर भावावश्यक का व्याख्यान किया जाता है । अथ भावावश्यक विषय मूल-सेकिंतं भावावस्सयं ? २ दुविहं पण्णत्तं तंजहा भागमयोय नो पागमोय सेकिंतं प्रागमो भावावसायं ? २.जाणए उवउत्ते सेतं श्रागमयो भावावस्मयं ॥ पदार्थ-(सेकिंतं भावावस्मयं ) शिप्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! भा. वावश्यक कौनसा है ? तब गुरु कहने लगे ( भावावस्मयं ) भावावश्यक (दु: विहं पएणतं तंजहा ) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (आगम- ोय ना आगमओय ) आगम से और नायागम से अर्थात् क्रिया रूप | शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! (सेकिंतं श्रागमयोभावावस्तयं २ ) आ- गम से भानावश्यक कौनसा है ? तब गुरुने उत्तर दिया कि (जाणए उवउत्ते) जो आवश्यक के स्वरूप का उपयोग पूर्वक जानता है, उसी का नाम आगम से भावावश्यक है (संत आगमओभावावस्सयं) अथानन्तर इसी का नाम श्रागम से भावावश्यक है सो आगम से भावावश्यक का स्वरूप पूर्ण दुथा । भावार्थ:-भावावश्यक दो प्रकार से वर्णन किया गया है--एक तो आगम में और द्वितीय नो आगम से जा आवश्यक के स्वरूप को उपयोग पूर्वक जानता है और आत्मा के भाव उसमें स्थित है वह श्रागम से भावावश्यक 1.गपस्त्रादि उसके बिशपण पद है। , - - (२२ ) * अनुयोगद्वार मूत्र * अथ द्वितीय भेद विषय । मूल-सेकिंतं नो अागमो भावावस्सयं ? २.तिविहं पन्नतं तंजहा लोइयं कुंपावयणियं लोगुत्तरियं, सेकिंतं लो- इयं, भावावस्मयं? २ पुबरहे भारहं अवरण्हे रामायणं सेतं लोइयं भावावस्तया पदार्थः-( सेकिंतं नो आगमओ भावावस्सयं२ ) शिष्यने पूछा कि हे भग- वन् ! नो भागम भावावश्यक कौनसा है ? गुरुने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! नो आगम भावावश्यक (तिविहं पन्नतं तंजहा) तीनों प्रकार से कथन किया गया है जैसे कि-(.लोइयं कुप्पावणियं लोगुत्तरिय ) लौकिक १ कुप्रावचानिक २ : लोकोत्तरिक ३ ( सेकिंतं लोइयं भावावस्सयं २ पुचएहे भारहं अवररहे रामायणं सेतं लोइयं भावावस्संयं) शिष्यने फिर प्रश्न किया कि हेभगवन् ! लौकिक भावावश्यक कौनसा है ? गुरुने फिर कहा कि हे पृच्छक ! जो लोग प्रथम प्रहर में भारत और अपरान्ह (पश्चिम) काल में रामायण सुनते हैं वा पठन करते हैं उसी का नाम लौकिक भावावश्यक है। भावार्थः-नो आगम भावावश्यक तीन प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि लौकिक १ कुमावनिक २ लोकोत्तरिक ३ अपितु जो प्रातःकाल में भारत वा वेदाध्ययन करते हैं और अपरान्ह काल में रामायणादि ग्रन्धों को भावपूर्वक अध्ययनादि करते हैं उसी का नाम लौकिक भावावश्यक है । अथ कुमावचनिक भावावश्यक विषय । मूल-सेकिंतं कुप्पावयणियं भावावस्सयं ? २ जेइमे च- रंग चीरिय जाव पासंडत्था इज्जं जलि होम जप उंदुरकरण मोकारमाइयाई भावावस्सयाइं करेंति सेतं कुप्पावणियं भावावस्सयं । पदार्थ-(प्रश्न ) कुमावचनिक भावावश्यक कौनसा है ! (उत्तर) कुमावच. निक भावावश्यक उसका नाम है जैसे कि (जेइमे चरग चीरियं जीव पासंडत्था) - जो चरक वस्त्रधारी यावत् पापंडी जो पूर्व कथन किये गये हैं वे सर्व ( इन्ज- ।
है * अनुयोगदार मूत्र * (२३) मलि ) यज्ञव्य अपने इष्टदेव के सन्मुख हाथ जोड़ते हैं तथा निज माता को नमस्कार करते है अथवा (इनलि ) अपने इष्टदेव को अंजलि द्वारा नमस्कार परके तथा पानी देकर ( होम ) वनादि क्रियायें करते हैं फिर ( जप गायत्री प्रमुख मन्त्रों का जाप करते हैं ( उंदुरुकणमोकारमाइयाई भावावस्सयं कति ) मुख से वृपभवत् शब्द करके फिर नमस्कार आदि पूर्ण क्रियायें करते हुए इस प्रकार से भावावश्यक पूर्ण करते हैं, (सेतं कुप्पावरणिय भावावस्सयं) यही कुमारचनिक भावावश्यक भावार्थ-कुमावनिक भावावश्यक उसे कहते हैं जो परमतवाले लोग अपने इष्टदेव को अंजलि द्वारा नमस्कार करते हैं पुन: हवन और जाप करके पभवन् शन्द करते हैं, फिर नपस्कार प्रमुख भावावश्यक उक्त प्रकार से करके अपन भावावश्यक की पूर्ति करने हैं, यही कुप्रावचनिक भावावश्यक है । अथ लोकोत्तरिक भावावश्यक विपय । मूल-सेकिंतं लोगुत्तरियं भावावस्सयं ? २ जणं इमे समणो वा समणी वा सावनो वा साविया वा तच्चित्ते तम्मणे तल्लेसे तदभवमिए तत्तिव्बन्झवसाणे तदट्टोवउत्ते तद- प्षियकरणे तभावणाभाविए रागमणे अविमणे जिण वयण धम्मरागरते तभावणा भाविए' अण्णत्य कथइ मणमकरे भाणे उभयोकालं प्रावस्सयं करेई सेतं लोगुत्तरियं भावाव- स्सयं सेतं नोयागमयों भावावस्सयं तस्सणं इमे एगट्ठिया नाणाघोसा पाणावंजणा नामधेज्जा भवंति तंजहा श्राव- स्सयं अवस्सकरणिज्जं धूवणिग्गहो विसोहीय । अझय- गच्छकवग्गो । नायो धाराहणामग्गो ॥१॥ समणेण सावएणया अवस्सकायब्वयं हवइ जम्हा।अंतोत्रहो निसस्सय तम्हा यावस्सयं नाम ॥ २ ॥ सेतं श्रावस्सयं ॥ पदार्थ-( सकितं लोगुत्तरियं भावावस्सय २) लोकोतरिक भावावश्यक फोनसा है ? पसे शिष्य के प्रश्न करने पर गुरु कहने लगे कि भो शिष्य ! .
है ( २४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * लौनोत्तरिक भावावश्यक इस प्रकार से है कि जैसे (जणं समणोवा); जो साधु अथवा ( समणीवा ) साध्वी अथवा (सावोवा) श्रावक वा (सावियावा) श्राविका ( तचित्ते) जिनका आवश्यक में चित्त है ( तम्मणे ) आवश्यक में मन है ( तल्लंसे ) आवश्यक में भाव है ( तदभवसिए ) आवश्यक के ही अध्यवसाय है ( तत्तिवझवसाणं ) अन्तःकरण में आवश्यक का तीव्र अध्यत्र- साय है ( तदहोवउत्ते) और आवश्यक के अर्थों में उपयोग लगा हुआ ( तदप्रियकरणे ) आवश्यक के योग्य उपकरण जैसे कि रजोहरण, मुखपति आदि भी शुद्ध है. अर्थात् आवश्यक के अनुकूल है ( तब्भावणाभाविए) और आवश्यक के विषय ही एकांत भाव है और उसी की. भावना है. फिर ( रागयणे ) आवश्यक के विषय एकाग्रमन है ( अविमणे ) अपितु विमन नहीं है जैसे कि चित्त की विकल्पता (जिणवयण ) जिन वचनों में अथवा (धम्माणुरागरत्तमणे ) धर्मानुराग में रक्त है मन जिनका फिर ( अण्णत्थ कत्थइ मणं अकरेमाणे ) अन्यत्र कहीं पर मन न करते हुए जो (उपओकालं आवस्पयं करेई ) दोनों काल में शुद्ध आवश्यक को करते हैं (सेतं लोगुत्तरियं भावावस्सयं ) वही लोकोत्तर भावावश्यक है ( सेतं नों आगमओभावावस्सयं) अथ इसी का नाम नो आगम से भावावश्यक है ( सेत भावावस्सयं ) अथानन्तर इसी प्रकार से भावावश्यक होता है और यही भावावश्यक है किन्तु ( तस्सणं इमे एगहिया ) उस आवश्यक के परमार्थ करके एकार्थ रूप (नाणाघोसा) नाना प्रकार के घोप है ( नाणा जगा नामधेना. भवंति ) और नाना प्रकार के व्यञ्जनों से युक्त इस प्राव- श्यक के नाम भी हैं ( तंजहा ) जैसे कि ( आवस्सयं अवस्सं करणिज्ज) आवश्यक उसी का नाम है जो अवश्य करणीय है अपितु यह शब्दार्थ किन्तु पर्यायार्थ इस प्रकार से है जैसे कि ज्ञानादि गुण वा मोक्ष जिसके वश में है उसी का नाम आवश्यक है अथवा सर्व प्रकार से इन्द्रिय जिसके. वश में हो उसी का नाम आवश्यक है अथवा जो सर्व गुणों का आवास भूत है वहीं आवश्यक है सो यह. आवश्यक (:धूवनिग्गहो ) धूव और इन्द्रियों के निग्रह करने वाला है (विसोहीयं) कर्मों की शुद्धि करने वाला है ( अझयणच्छक- वग्गो) सामायिक आदि पट अध्यायों का एक.वर्ग है (नाओ.आराहणामग्गो न्यायकाः है. जीव को आराधना कराने वाला..और.मोक्ष का मार्ग है. सो * अनुयोगद्वार पत्र ( २५ ) (समणेणं) साधु को अथवा ( सावएग) श्रावक को उपलक्षण से साध्वी और भाविकाओं को ( अवस्सकायस्सोवयं हवइ जम्हा अंतो अहोनिसस्स. नम्हा आवस्सयं नामं २)जो रात्रि दिवस के अन्तर में अवश्य ही करणीय है, इसी करके आवश्यक इमका नाम स्थापित है अथवा जो दोनों समय अवश्य- करणीय है इसी करके आवश्यक इसका नाम स्थापित हुआ है (सेतं आर- स्सयं ) इस प्रकार से आवश्यक का स्वरूप है। इतिश्री अनुयोग द्वार सूत्र में आवश्यक नामक प्रयमाधिकार समाप्त हुआ | 'भावार्थ:-लोकोचरिक भावावश्यक उसका नाम है.जो साधु साध्वी श्रावक श्राविकायें एकाग्रता के साथ जिनवचनों में चित्त रखते हुए दोनों समय आवश्यक करने है वही नो आगम से लोकोत्तरिक भानावश्यक है अथवा इस भावश्यक के एकार्यरूप शब्दों के नाना प्रकार के योप व नाना प्रकार के व्यंजन और चतुर्विध के संघ को अवश्य ही करणीय है क्योंकि ध्रुव और इन्द्रियों के निग्रह करने वाला विशुद्धि का मार्ग है सामायिकादि पद अध्याय रूप एक वर्ग न्यायकारी और मानकामी मार्ग है साधु साध्वी और श्रावक श्राविकानों को रात्रि और दिवस के अन्तर में अवश्य ही करणीय है, इसी लियं यावश्यक इसका नाम है और गुणों का श्राश्रयभूत है । इतिश्री अनुयो- गटार मूत्र में (शानमेवा ) आवश्यक नाम प्रथमाधिकार समाप्त हुआ । अथ श्रुतशब्द के निक्षेप चतुष्ठय के विषय में कहते हैं . मूलं-सेकिंतं सुयं २ चउविहं परणत्तं तंजहा नामसुर्य ठवणासुयं दबसुयं भावसुयं नाम ठवणानो भणिो सेकिंतं दबमुयं १२दुविहं पगणतं तंजहानागमोय नो.अागमोय सेकिंतं श्रागमयो दव्वसुयं ? २ जस्सणं सुएत्ति-पयं सिक्खियं ठियं मियं जियं परिजियं जीव जो अणुप्पेहाए कम्हा ? अ- गुवयोगो दबमितिकटु णेगमस्सणं एगो अणुवउत्तो भाग- मन्यो एग दब्बसुयं जाव जाणए अणुवउत्तेण भवइ सेतं श्रा- ४.
( २६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * गमओ दव्वसुयं । सेकिंतं नो ओगमो दव्वसुयं ? २ तिविहं पण्णत्तं तंजहा जाणगसरीरदव्वसुयं भवियसरीरदव्वसुयं जाएंगसरीर अवियसरीरवहरितंदव्वसुयं सेकिंतं सेकिंतं जाणग सरीरदव्वसुयं ? २ . सुयपदत्याहिगारजाणयस्स जं सरीरयं ववगयचुयच । विय चत्तदेह तंव पुबमणियं भाणियव्वं जाव सेत्तं जाणगसरीर दव्वसुयं । सेकिंतं भवियसरीरदव्वसुयं ? २ जे जीवे जोणीजम्मणनिक्खंते जहा दव्वावस्सए तहेव भाणियब्वं जावं सेत्तं भवियसरीरदब्वसुयं सेकिंतं जाणग सरीरभवियसरीरवइरित्तं दध्वसुयं २० पत्तयपोत्थयलिहियं पदार्थ-(सेकिंत सुर्य २ चउविहं पनत्तं तंजहा ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! श्रुत कितने प्रकार से वर्णन किया है ? गुरु ने उत्तर दिया कि. हे शिष्य ! श्रुत चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि ( नामसुयं उवणासुयं दव्वसुयं भावसुयं ) नामश्रुत १ स्थापनाश्रुत २ द्रव्यश्रुत ३ और भावभुत ४ सो (नाम ठवणाओ भणिओ ) नामश्रुत और स्थापना श्रुत का वर्णन पूर्ववत् है जैसे आवश्यक के स्वरूप में किया गया है उसी प्रकार जानना ( सेकिंतं दव्वसुर्य २ (प्रश्न) द्रव्य श्रुत के कितने भेद हैं ( उत्तर ) द्रव्य श्रुत (दुविहं पबत्तं तंजहा) दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि ( आगमओय नोआगमओय ) आगम से द्रव्यश्रुत (सूत्र ) और नोआगम से द्रव्यश्रुत ( सेकिंतं आगमउ दव्वसुयं २)(प्रश्न ) आगम से द्रव्य सूत्र (श्रुत ) कैसे होता है (उत्तर ) आगम से द्रव्यश्रुत इस प्रकार से है जैसे कि ( जस्सणं सुएत्ति पय सिक्खियं ठियं मियं जियं परिजियं जाव णो अणुप्पेहाए) जिसने श्रुत ऐसे पद सीख लिया है और हृदय में स्थापना कर लिया है और जिसको अक्षरों की मात्रा का भी वोध होगया है और पूछने पर अस्खलित है किन्तु पश्चात् अनुपूर्वी से भी स्पष्ट हो रहा है यावत् अनुप्रेक्षा से रहित होकर पठन किया जाता है अर्थात् पठन करते समय उपयोग पूर्वक पठन नहीं किया. जाता (कम्हा ) किस लिये ( अणुवउग्गो दृव्वमितिकड्ड ) अनुपयोग पूर्वक होने पर ही उसको द्रव्यश्रुत कहा जाता है सो ( णेगमस्सर्ण एगो अणुव * अनुयोगद्वार मूत्र * ( २७ ) उत्तो आगमउ एग दबसुय) नैगमनय के मत से एक अनुपयुक्त आगम से एक द्रव्य श्रुत है (जाव जाणए अणुवउत्तेण भवइ ) यावत् यदि जानता है तव अनुपयुक्त नहीं है । यदि अनुपयुक्त है तब जानता नहीं है जहां पर्यन्त यह पाठ है वहां पर्यन्त ( सेतं आगमउ दन्चसुयं ) वही आगम से द्रव्य श्रुत है-(सें. किं तं नो आगमउ दब्बसुयं २) (प्रश्न ) वह कौनसा है जो नो अागम से द्रव्य भुत माना जाता है ( उत्तर ) द्रव्य से नो आगम श्रुत (तिविहं पन्नत्वं तंजहा) तीनों प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि:-( जाणयसरीरदब्बसुयं) शरीर द्रव्य धुत १ (भविय शरीर दन्वसुयं ) भव्यशरीर द्रव्यश्रुत २ (जाणग सरीरभावियसरीरवहरि दन्नसुयं) ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्य भूत (सेकिन जाणगसरीरदबसुयं २ ) शिष्यने फिर प्रश्न किया कि हे भग- पन ! शरीर द्रव्यवत किसको कहने है ? गुरु ने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! शरीर द्रव्यधुत उसका नाम है जैसे कि-(सुयपदत्याहिगार जाणयस्स जं सरीरयं रवगयत्यवावियवत्तदेई तं चेत्र पुन्यभणियं भाणियन्वं जावसत्तं जाणय सरीरंदच मुयं ) अनपद के अर्धाधिकार के ज्ञाता का जो शरीर है जिससे जीव प्युन होगया है और शरीर जीव से रहित है जैसे कि पूर्व वर्णन किया गया है उसी का नाम ज्ञ शरीर द्रव्यभूत है (स किंतं भवियसरीरदबसुयं २ जे जीवे जोणी जम्मण निरखंत जहा दबाबस्सयं तदा भाणियब्वं जावसेत्तं भवियसरीरं दवगं ) ( प्रश्न ) भव्यशरीर द्रव्यश्चन फिस का नाम है ( उत्तर ) जो जीव . योनि के द्वारा जन्म लेकर ध्रुतपद सीखेगा जैसे क्रि-पूर्व द्रव्यावश्यक का वर्णन किया गया है उसी प्रकार द्रव्यश्रुत का वर्णन जान लेना सो वही द्रव्यश्रुत है (सकिन जागयसगर भवियशरीरवरितं दधसुयं तं० पत्तयपास्थय लिहिय) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! शरीरभव्यशरीरव्यति. रिक्त न्यधुत किस का नाम है ? गुरु ने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! ज्ञ शरीर भव्य सरीर व्यनिरिक द्रव्यश्चत उमका नाम है जैसे कि-पत्र अथवा पुस्तक पर जो लिखा हुआ श्रुन है उसी का नाम ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यश्रुत है । पुस्तक को द्रव्यश्रुन का पद इसलिये दिया गया है कि भावश्रुत का अधि- । करण। भावार्थ:-श्रुन शन्द के भी चार निक्षप हैं जैस कि-नाम १ स्थापना २ द्रव्य ३और भाव 21 सा नाम और स्थापना का स्वरूप जैसे श्रावश्यक शब्द के (२८) * अनुयोगद्वार सूत्र * स्थान पर वर्णन किया गया है वैसे ही जानलेना किन्तु द्रव्यश्रृंत के दो भेद हैं आगम से और नोआगम से पागम से पूर्ववत् . कथन है जैसे कि-श्रुतशब्द को सर्व प्रकार से धारण किया हुआ है किन्तु अनुपयुक्त पूर्वक है । इसलिये नैगम और व्यवहार नय के मत से यावन्मात्र अनुपयोग पूर्वक पठन करते हों ताव- मात्र द्रव्यश्रुत हैं किन्तु संग्रह और ऋजुसूत्र नय के मत से यावन्मात्र पठन करते हों अनुपयोग पूर्वक होने से एक ही द्रव्यश्रुत है। अपितु तीनों शब्दादिक नयों के मत से अश्रुत है क्योंकि यदि जानता है तो अनुपयुक्त नहीं है । यदि अनुय- युक्त है तब जानला नहीं है। यही द्रव्य से आगम श्रुत है और नोआगम से द्रव्य श्रुत तीनों प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि श शरीर द्रव्यश्रुत १ भव्य शरीर द्रव्यश्रुत २ ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यश्रुत ३ सो प्रथम दोनों का स्वरूप तो पूर्ववत् ही है किन्तु ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्तश्रुत जो पत्र और पुस्तक पर लिखा हुआ हो तो उसका नाम भी श्रुत है । क्योंकि जो पुस्तकों पर सूत्र लिखे हुए हैं वे आगम से द्रव्य सूत्र हैं, क्रियादिरहित होने से उनकी द्रव्य संज्ञा होगई है ।। अर्थात् प्राकृत में श्रुत शब्द तथा सूत्र शब्द इन दोनों के लिये केवल "सुय" पद का प्रयोग किया जाता है । इसीलिये अब सूत्र "डोरा" शब्द के विषय में वर्णन किया जाता मूल-अहवा जाणगभवियसरीरवइरित्तंदव्वसुयं पंचविहं पएणत्तं तंजहा अंडये वोडयं कीडयं वालयं वकयं सेकिंतं अंडयं? २ हंसगभ्भाई बोडयं कप्पासमाइ कडियं पंचविहं पन्नत्तं तेजहा पट्टे मलए अंसुए चीणंसुए किमिरागे वालयं पंचविहंः परणत्तं तंजहाउरिणय उद्दिय मियलोमेय कोतवे किहिसे सेत्तं वालयं सेकिंतं वक्कयं सरणमाइ सेत्तं वक्यं सेत्तं जाणगसरीर भवियसरीरवहरितं दब्बसुयं सेत्तं नो अागमो दव्वसुयं सेत्तं दबसुयं । पदार्थ:-( अहवा ) अथवा ( जाणगसरीरभवियसरीरवइरित्तं दव्वसुर्य पंचविहं पन्नतं तंजहा.) ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक द्रव्यसूत्र पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-अंडयं बोडयं कीडयं वालयं वकयं) अंड से * अनुयोगदार सूत्र * (२६) उत्पन्न होने वाला मूत्रफलं से उत्पन्न होने वाला कृमि से अथवा वाल और चल्कल से उत्पन्न होने वाला सून जो हैं सो वे भी ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त सूत्र है। जहां पर कार्य और कारण के सम्बन्ध होने से ही इनको सूत्र शब्द दिया गया है सो (अंडय इंसगम्माए ) अंडक से इंसगर्भ प्रमुख जान लना ( वोडयं कप्पासमाई ) फल से अथवा वनस्पति प्रसुख से-कर्पास का सूत्र २ (कीटयं पंचविह पमत्तं तंजहा पट्टे १ मलए २ अंसुए ३ चीणं सुय ४ किमि- गगे ५) कीटक से जो सूत्र की उत्पत्ति वे पांच प्रकार से कंथन कीगई है जैसे कि-पट्ट १ मलयदेश का सूत्र २ अंशुक सूत्र ३ चीनांशुक सूत्र ४ कृमिराग मूत्र ५-यह पांच ही प्रकार के मूत्र की कृमियों से उत्पत्ति होती है इसीलिये इनको मूत्रपद दिया गया है। भपितु (वालयं पंचविहं पन्नत्तं तंजहा ) वालों से जो मूत्र की उत्तत्ति होती है वे भी ५ प्रकार से वर्णन कीगयी है जैसे कि-(उ- गिय, उहिय, मियलोमए कुतो फिहिसे सेतं वालयं) र्णिय के रोमों का सूत्र जन, उसी प्रकार ऊंट के रोगों की ऊन और मृग के रोमों का सूत्र अथवा मृगवत् भन्य जीव विशेष के रोगों का सूत्र और ऊंट के रोमों का सूत्र जो. ऊनादि के वा नाना प्रकार के संयोग से सूत्र उत्पन्न होता है उसको किस सूत्र कहते हैं ।। अथवा भवादि के रोमों से जो सूत्र उत्पन्न होता है उसको भी फिस सूत्र करते हैं यही वालों का सूत्र है (. सेकिंतं वकयं २) (प्रश्न ) वल्कल (छालि से कौनसा सूत्र उत्पन्न होता है ) (उत्तर) (सएणमाइ) सनि आदि यह कल्कल सूत्र है (सेत्तं वकयं) यही स्वरूप वल्कल सूत्र का है (सेत्तं जाणग सरीरभवियसरीर वहरि दन्नसुयं) अथानन्तर से यही ज्ञ शरीर भव्य शरीर न्पतिरिक्त व्यसूत्र (सेतं मागम उदयसुयं सेत्तं दव्यमुयं ) यही आगम से ट्रन्य सूत्र है और इसी स्थान पर द्रव्यसूत्रका समास पूर्ण होगया है। भावार्थ:-द्रव्यसूत्र और भी प्रकार से कथन किया गया है जैसे कि अंडज१ वोट न २ कीटन ३ वालज ४ वल्कलन ५ अंडज हंसगर्भादि वोडज कर्पासादि कीटज से पट्टज १ और मलय देशोद्भव २ अंशुय ३ चीणांशुक ४ कृमिराग ५, और वालन सूत्र यह है कि-ऊर्णादि को सूत्र १ अष्ट्रिकसूत्र २ मृगरोमैंसूत्र ३ बंदरिक सूत्र ४ किंटिस सूत्र और वल्कलन सूत्र सनि आदि है यह सर्व ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यसूत्र है और इसी स्थान पर नो आगम से द्रव्य मूत्र का समास पूर्ण होगया है।
है। ( ३० ) * अनुयोगद्वार सूत्र * ( अपितु सूत्र शब्द का वर्णन करते हुए जो सूत्र ( दोरा) का वर्णन किया गया है वे प्राकृत की शैली के अनुसार किया गया है क्योंकि प्राकृत में सूत्र शब्द दोनों अर्थों में व्यवहृत ॥अथ भावश्रुत विषय॥ मूल-सेकिंतं भावसुयं २ दुविहं पण्णत्तं तंजहा आगम- श्रो नोश्रागमो सेकिंतं श्रागमोभावसुयं २ जाणए उवउत्ते सतं आगमनोभावसुयं सेकिंतं नोागमनोभावसुयं ? नोग्रा- गमोभावसुयं दुविहं पन्नत्तं तंजहा लोइयं लोगुत्तरियं सेकिंतं लोइयनोभागमोभावसुयं जं इमे अन्नाणीहि मिच्छदिहिहि सच्छंद बुद्धिमइ विकप्पियं तंजहा भारहं रामायणं भीमासुरुक्ख कोडिल्लयं घोडयमुह सगडभद्दियानो कप्पासियं नागसु- हमं कणगसत्तरीवेसियं वइसोसयं बुद्धसासणं काविलं लो- गायतं सठितंत्तं माढरपुराणं वागरणं नाडगाई अहवा वाव- तरिकलारो चत्तारिय वेया संगोवंगाणं सेनोबागमत्रो भावसुयं । पदार्थ:-( सेकिंतं भावसुयं २ दुविहं पण्णतं तंजहा) (प्रश्न) भावश्रुत कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ( उत्तर ) भावभुत दो प्रकार से कहा गया है जैसे कि-( आगमउय ) आगम से और नो भागमं से (सेवितं आ- गमओ भावसुयं २) (पूर्वपक्ष ) आगम से भावश्रुत कौनसा है ( उत्तरपक्ष) पागम से भावश्चत उसका नाम है ( जाणय उवउत्ते सेत्तं आगमओ भावसुयं-) जो श्रुत शब्द के अर्थ को उपयोग पूर्वक जानता है वही आगम से भावश्रुत (सेकितं नोआगमनोभावसुयं २) (प्रश्न ) नो आगम से भावश्रुत कितने प्रकार से है ( उत्तर ) नो आगम से भावश्रुत (दुविहं पएणत्तं तंजहा ) दो प्रकार . से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-( लोइयं लोगुत्तरियं ) लौकिक और लो- कोत्तरिक ( सेकिंतं लोइयनोआगमओभावंसुर्य २ ) (पूर्वपक्ष) लौकिक नो. आगम से भावभुत कौनसा है ( उत्तरपन) लौकिक नो आगम से भावश्रुत उस . है.
* अनुयोगद्वार सूत्र * का नाम है जैसे कि-(जइमं अन्नाणीहि मिच्छदिठी हिंसच्छंद वुद्धिमइ विगप्पियं तंजहा) जो अज्ञानी तथा मिथ्यादृष्टियों ने स्वच्छंदता की बुद्धि से कल्पना किये जो ग्रन्थ हैं. जैसे किं-(भारई) भारत (रामायणं ) रामायण २ ( भीमा- सुरुक्खं) भीमासुरुक्ष.३ (कोडिल्लयं) कौटिल्य (अर्थ) शास्त्र (घोडयमुह) घोड़ा- मुख शास्त्र (सगडभदियाउ) शकटभद्रशास्त्र ( कप्पासियं) कासिक शास्त्र (नागसुहुमं ) नागसूक्ष्म (कणग सत्तरी) कनकसप्तति शास्त्र (वइसोसयं) वैशेषिक शास्त्र (घुद्धसासणं ) बुद्धशासन ( काविलं ) कापिल (सांख्य ) शास्त्र (लोगायत) लोकायित (चार्वाक) शास्त्र (सही तंत) पष्टितंत्र शास्त्र (मांढर पुराणं) मादर पुराण (वागरणं) व्याकरण शास्त्र (नाडगाई ) नाटिकादि शास्त्र ( अहवा) अथवा (चावत्तरिकलाओ) ७२ कलाओं से लेकर ( चत्तारि क्या संगोवंगाणं सेत्तं लोइयनोआगमओ भावसुयं ) चारवेद सांगोपांगयुक्त जैसे कि-शिक्षा १ कल्प २ व्याकरण ३ छन्द ४ निरुक्त शास्त्र ५ ज्योतिः ६ यह पद शास्त्र वेदों के उपांग कहाते हैं यह सर्व लौकिक नोआगम से भावसूत्र हैं । भावार्थ:-भावश्रुत दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-आगम से और नो आगम से सो आगम से भावभुत उसका नाम है जो श्रुतशब्द के अर्थ को उपयोग पूर्वक जानता है वही आगम से भावश्रुत अतः नो आगम से भावश्रुत के दो भेद हैं लौकिक और लोकोत्तरिक, सो लौकिक उसका नाम है जो मिथ्यादृष्टि लोगों ने अज्ञानता के वश होकर नाना प्रकार के शास्त्र कल्पित कर लिये हैं और उन में पदार्थों का सत्य स्वरूप लिखा है वही नो आगम से लौकिक भावभुत है ॥ ॥ अथ लोकोतरिक नो अागम से भावभुत विषय ॥ मूल-सेकिंतं लोगुत्तरियंनोग्रागमनोभावसुयं ? २ जंइयम अरिहंतेहिं भगवंतेहिं उप्पन्ननाणदंसणधरेहिं तीय पड्डुप्पण्ण मणागयजाणएहिं तिलुक्कनिरक्विखयवहियमहियपुइएहिं सब्बएणहिं सव्वदरिसीहिं अप्पडिहयवरनाणदंसणधरेहिं पणीयं दुवालसंगं गणिपिडगं तं. अायारो १ सूयगडो २ ठाणं ३ समवायो ४ विवाहंपण्णत्ती ५ नायाधम्मकहाओ ६उchor ( ३२ ).. * भनुयोगदार सूत्र * वासगदसाश्रो ७ अंतगडदसायो ८ अणुत्तरोववाइयंदसा-: श्रो पबहावागरणाई १० विवागसुयं ११ दिछिबानो य १२ सेत्तं लोगुत्तरियं नोबागमत्रो भावसुयं सेत्तं नो भागमो भावसुयं सेत्तं भावसुयं तस्सणं इमे एगढिया नाणाघोसा. नाणावंजणा नामधेज्जा प० तं० सुयं १ सुत्तं २ गंथं ३ सि- दंतं ४ सासणं ५ प्राणती ६.वयण ७ उवएसो ८ पण्णवन्ने ६ आगमेय १० एगट्ठापज्जवा सुत्ते ११ सेत्तंसुयं ॥ पदार्थः-(सेकिंतं लोगुत्तरियं नो आगमश्रो भावसुर्य २) (प्रश्न ) वह कौनसा है जो लोकोत्तरिक नो आगम से भावश्रुत है ( उत्तर ) लोकोचरिक नो आगम से भावथुत उसका नाम है (जंइमे अरिहंतेहिं भगवंतेहिं उप्पननाण दसणधरेहिं तीय पडुप्पन्न मणागय जाणएहिं ) जो यह अरिहंतो करके भग- वन्तो करके पुनः जिन्हों को ज्ञान और दर्शन उत्पन्न होगया है सो ज्ञान दर्शन के धरने वालों ने तथा जो भूतकाल और वर्तमान और अनागत काल के शा- ताओं ने (तिलोकनिरक्खिय वहिय महिय पुइएहिं ) और जिन्होंको देव मनुष्य भवनपत्यादि देवों ने आनन्दाश्रु पूर्णदृष्टि से अवलोकन किया है और जो गुण कीर्तनरूप भाव पूजा करके पूजित हैं तथा जो सर्वत्र पूज्य हैं उन्होंने अथवा जों ( सन्नएहि सव्वदरिसीहिं ) सर्वज्ञ वा सर्वदर्शी हैं उन्होंने फिर ( अप्पडि. हयवरनाणदंसणधरेहिं ) अप्रतिहत (न इनन होने वाला) ज्ञान दर्शन के धरने वालों ने (पणीयं ) प्रतिपादन किया है. ( दुवालसंग गणिपिंडगं तंजहां ) द्वादशांग की वाणी जो आचार्यों की मञ्जूषा समान है जैसे कि-( आयारो सूयगडो ठाणं समवाओ विवाहपएणत्ती. नायाधम्मकहाओ वासगदसाओ अंतगडदसाओ अणुतरावेवाइयदसाओ पाहावागरणाई विवागसुयं दिहि- वाओय से लोगुत्तरियं नो आगमनो भावसुयं सेतं नोआगमओ सुयं से भावसुयं ) आचागंग सूत्र १ सूत्रकृताङ्ग सूत्र २ स्थानाङ्ग सूत्र ३ समवायांग सूत्र ४ विवाहप्रज्ञप्तिसूत्र ५ ज्ञाताधर्मकथांग सूत्र ६ उपासकदशांग सूत्र ७ अं. तकृतदशांग सूत्र ८ . अनुत्तरोपपातिक सूत्र । प्रश्न व्याकरण सूत्र १० विपाक सूत्र ११. दृष्टिवाद सूत्र १२ यही लोकोत्तरिक नोआगम से भावभुत है और इसी स्थान पर नो. आगम से भावश्रुत का संक्षेप से वर्णन पूर्ण किया गया है।
1 * अनुयोगद्वार सूत्र * भावार्थ:-लोकोतरिक नोभागम से भावश्रुत उसका नाम है जो अन्ति भगवन्तों ने जिन्होंको त्रिकाल ज्ञान उत्पन्न होरहा है और सर्वज्ञ सर्वदर्शी हैं त्रैलोक्य पूजनीय हैं सो उन्होंने द्वादशांग की वाणी प्रतिपादन की है अतः वही द्वादशांग लोकोत्तरिक नांआगम से भावभुत है। यहां पर नो शब्द देशनिषेध- बाची नहीं है (तस्सणं इमे एमटियानांणा घोसा नाणा वंजणा नामज्जा पन्नता तंजदा) उस भावश्रुत के यह एकाथि नाम जिनके नाना प्रकार के घोष वा व्यञ्जन हैं निम्न प्रकार से कहे जाते हैं। अथ भावश्चत के पर्यायवाची नाम विषय ॥ मूल-सुयं १ सुत्तं २ गंथ ३ सिद्धन्त ४ सासण ५ आपत्ति ६ वयणं ७ उवएसो ८ पण्णवणे आगमेय १० एगट्ठा.पज्ज- वासुत्ते सेत्तं सुयं पदार्थः-भावश्रुत के निम्नलिखित दश नाम हैं जैसे कि-(सुर्य ) गुरुमुख से श्रवण करने से इस भावसूत्र को श्रुत कहा जाता है १ ( सुतं ) और अर्थ की सूचना होने से ही सूत्र भी इसी का नाम है २ ( गयं ) अतः नाना प्रकार की ग्रन्धना होने से ही इसे ग्रन्थ कहते हैं ३ (सिद्धन्त ) जो स्वयं प्रमाण में प्रतिष्ठित होकर ज्ञानस्वरूप को दिखलाता है उसी का नाम सिद्धान्त है ४ (सासणं) और शिक्षामद होने से ही शामन कहा जाता है ५ ( आणति) और मुक्ति के लिये आज्ञा करना इसी करके भावसूत्र का नाम भी आया है। ६ ( वयणं ) सत्यवक्ता होने से वचन भी इसी का नाम है ७ ( उवएसो) माणीमात्र को सत्य में प्रारूढ़ करने से ही उपदेश भी इसी का नाम है । (परणवणे ) सत्य कथन के प्रभाव से प्रज्ञापन नाम है है (आगमेय ) और परम्परा से आरहा है इसी करके आगम कहा जाता है १० (एगठे पञवा मुत्ते सेत्तं सुर्य ) सो यह एकार्थी शब्द पर्याय करके भावभुत के ही नाम हैं और इनी को भावसूत्र कहा जाता है ।। इति श्री अनुयोगद्वार सूत्र में द्वितीयाधिकार श्रुतरूप समाप्त हुआ ॥ भावार्थ:-भावश्रुत के एकार्थी नाना प्रकार के घोप और व्यञ्जनों से युक्त बश नाम है जैसे कि-श्रुत १ सूत्र २ ग्रन्थ ३ सिद्धान्त ४ शासन ५ भाका ६ * अनुयोगद्वार मूत्र * वचन ७ उपदेश ८ प्रज्ञापन ६ आगम १० सो यह पर्यायवाची दश नाम भावश्रुत के हैं और इसी स्थान पर अनुयोगद्वार सूत्र का द्वितीय अधिकार पूर्ण हो गया है । अव स्कन्ध का विवर्ण किया जाता है ।। ॥अथ स्कन्ध शब्द विषय ।। मूल-सेकिंतं क्खंधे ? २ चउविहे पण्णत्ते तंजहा नाम क्खंधे ठवणाक्खंधे दबक्खंधे सावक्खंधे नाम ठवणाओ ग- यात्रो सेकिंतं दव्वक्खंधे ? २ दुविहे पन्नते तंजहा आगमश्रोय नोबागमश्रो सेकिंतं प्रागमत्रो दव्वक्खंधे २ दबक्खंधे २ जस्सणं खंधेत्ति पयं सिक्खियं सेस जहा दवावस्सए तहा भा- पियवा नवरं खंधाभिलावो जाव सेकितं जाणगसरीर भवियसरीरवइरित्ते दबक्खंधे? तिविहे पण्णत्ते तंजहा सचित्ते अचित्ते मिस्सए। पदार्थ:-( सेकिंतं खंधे १२ चउबिहे पन्नचे तजहा नामक्खंधे, ठवणा क्खंधे, दव्वक्खंधे, भावक्खंधे नाम टवणाओ गयाओ) (प्रश्न) स्कंध शब्द कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ?( उत्तर ) स्कंध शब्द भी चार प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-नामस्कंध १ स्थापनास्कंध २ द्रव्यस्कंध ३ और भावस्कंध ४ सो नाम और स्थापना का विवर्ण पूर्व आवश्यक के अधिकार में किया गया है ( प्रश्न ) द्रव्यस्कंध के कितने भेद हैं ? (उत्तर) (सेकित दन्छ- खंधे २ दुविहे पएणते तंजहा आगमओ नोआगमओय) द्रव्यस्कंध भी दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-आगम से और नोआगम से ( सेकितं आगमओ दबक्खंधे २ जस्सणं क्खन्धेति पयं सिक्खियं सेसं जहा दवावस्स: ए तहा भाणियबा नवरं क्खंधाभिलावो) (प्रश्न ) आगम से द्रव्यस्कंध किस को कहते हैं ? ( उत्तर) आंगम से द्रव्यस्कंध उस का नाम है जिसने स्कंध ऐसा पद सीख लिया है शेप विवर्ण जैसे द्रव्यावश्यक का है उसी प्रकार. जानना चाहिये किन्तु यहां पर स्कंध शब्द का. आलापक ग्रहण करो। (जाव- सेकिंत जाणगसरीरभवियसरीरवइरित्ते दव्वक्खंधे तिविहे. पएणन्ते: तंजहा सः * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ३५ ) चिते अचित्ते मिस्सए) यावत् शरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त द्रव्यस्कंध तीनों मकार से वर्णन किया गया है जैसे कि सचित्तः१ अचित्त २ और मिश्र३। भावार्थ:-स्कंध शब्द भी चारों प्रकार से वर्णित है जैसे कि-नामस्कंध १ स्थापनास्कंध २ द्रव्यस्कन्ध ३ भावस्कन्ध ४ सो नाम और स्थापना का विवर्ण पूर्व आवश्यक के अधिकार में किया गया है किन्तु द्रव्यस्कन्ध दो प्रकार से आगम से और नोआगम से सो इन का भी विवर्ण पूर्व हो चुका है यावत् शरीरभन्यशरीरव्यतिरिक्त द्रव्यस्कन्ध के भी तीन भेद हैं जैसे कि-सचित्त द्रव्यस्कन्ध अचित्त द्रव्यस्कन्ध २ मिश्र द्रव्यस्कन्ध ३ । अब तीनों का विवरण सूत्रकार निम्न प्रकार से करते हैं । मूल-सेकिंत सचित्ते दबक्खंधे ? २ अणेगविहे पण्णत्ते तंजहा हयक्खधे गयक्खंधे नरक्खंधे किंनरक्खधे किंपुरिसक्खंधे महोरगक्वंधे गंधवक्खंधे उसभक्खंधे सेत्तं सचित्ते दव्वक्खंधे । पदार्थः-संकित सचित्त दबक्खंधे २ (मन) सचित्त द्रव्यस्कन्ध कौ- नसा है ? ( उत्तर ) सचित्त द्रव्यस्कन्ध ( अणेगविहे पण्णत्ते तंजहा ) अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि (हयक्खन्धे १ गयक्खन्धे २ नरक्खन्धे ३ किंनरक्खन्धे ४ किंपुरिसक्खन्धे ५ महोरंगक्खन्धे ६ गंधवक्खन्धे ७ उसभक्खंधे -सेचं सचित्ते ) अञ्चकन्धं १ गजस्कन्ध २ मनुष्यस्कन्ध किंनर ( व्यंतर विशेष) स्कन्ध किंपुरुपस्कन्ध महोरगस्कन्ध गन्धर्वस्कन्ध यह व्यन्तर विशेष हैं पभस्कन्ध यह सब सचित्त द्रव्यस्कन्ध हैं। भावार्थ-सचित्त द्रव्यस्कन्ध अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि पभ स्कन्ध अवस्कन्ध गजस्कन्ध नरस्कन्ध अथवा किंपुरुषादि देवों के स्कन्ध सचिचस्कन्धं उसी का नाम है-जिस जीव के साथ स्कन्ध की उत्पत्ति हुइ हो जैसे उपर लिखे हुए नरस्कंधादि हैं। अथ अचित्त द्रव्यस्कन्ध विपय । मूल-सेकिंतं अचिचे दव्वक्खंधे ? २ अणेगविहे पण्णते तंजहा दुप्पयसिएक्खंवेतिप्पएसिएक्खंधे जावदसप्पएसिएक्खंधे * भनुयोगद्वार सूत्र * संखेज्जपएसिएक्खंधे असंखिज्जपयसिएक्खंधे अपंतपए- सिएक्खेंधे सेत्तं अचित्ते दव्वक्खंधे । ‘पदार्थ-( सेकिंतं चित्ते दव्वक्रवंधे?२ अणेगविहे पएणते तंजहा (मन) अचित्त द्रव्यस्कंध कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ? (उत्तर) अचिच द्रव्यस्कंध अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि ( दुप्पएसिएक्खंधे तिप्पए सिएक्खंधे जावदसपएसिएक्खधे ) द्विपदेशिक स्कंध, त्रिपदेशिक स्कंध यावत् दश प्रदेशिक स्कंध (संखेज्जपएसिएक्खंधे) संख्यात प्रदेशिक स्कंध। असंख ज्जपएसिएक्खंधे ) असंख्यातप्रदेशिकस्कंध (अणंतपएसिएक्खधे ) अनंत प्रदेशिक स्कंध ( सेत्तं अचित्त दबक्रखंधे ) यही अचित्त द्रव्यस्कन्ध है, अर्थात् अचिव द्रव्यस्कंध का समास पूर्ण हुआ। भावार्थ-द्विप्रदेशिकादि से लेकर अनन्त प्रदेशिक पर्यत अचिच द्रव्यस्कंध होता है उसी का नाम अचित्त द्रव्यस्कंध है क्योंकि परमाणुद्वय के एकत्व होने से द्विप्रदेशिक स्कंध बन जाता है इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिये । अथ मिश्र द्रव्यस्कंध विषय । मूल-सेकिंतं मीसए दबक्खंधे ? २ अणेगविहे पन्नत्ते तैजहा सेणाए अग्गिमक्खंधे सेणाए ®.मज्झिमक्खंधे सेणाए पच्छिमक्खंधे सेत्तं मीसए दव्वक्खधे ॥ पदार्थ-( सेकिंतं मीसए दबक्खंधे १२ ठाणेगविहे पएणत्ते तंजहा )(प्रश्न) मिश्र द्रव्य स्कंध किसका नाम है ? (उत्तर) मिश्र द्रव्यस्कंध के अनेक भेद हैं जैसे कि ( सेणाए अग्गिपक्खंधे ) सेना का अग्रिम स्कंध है वा ( सेणाएमझि- मस्कंधे ) सेना का मध्यम स्कंध है (सेणाए पच्छिमक्खये ) अथवा सेना का पश्चिम स्कंध है (सेत्तं मीसए दलक्खंधे ) इस प्रकार मिश्र द्रव्य स्कंध का विवर्ण समाप्त हुआ। भावार्थ-मिश्र द्रव्यस्कंध उसका नाम है जिसमें सचित्त और मचित्त * मध्यमकतमे द्वितायस्य ॥प्रा० 41.4. पा. १ सूत्र ४८॥ मध्यम शब्देक तम पदे व मित.यस्यात इत्वं भवति || N * अनुयोगद्दार सूत्र * दोनों ही सम्मिलित हो सो सेना का अग्रिम स्कंध कहने से सचित्त इस्त्यादि गर्भित हुए अचित्त खड्गादि शस्त्र लिये गये इसी प्रकार मध्यम वा पश्चिम भाग की भी संयोजना कर लेनी चाहिये इसी का नाम मिश्र द्रव्य स्कंध है। अथ प्रकारान्तर विषय । मूल-अहवा जाणगसरीरभवियसरीरवहरिते दब- खंधे तिविहे पण्णते तंजहा कसिणक्खंधे अंकसिणक्खंधे श्रणेगदपियक्खंधे सेकिंतं कसिणक्खंधे ? २ सोचेव हयक्खंधे गयक्खंधे जाव उसभक्खंधे सेत्तं कसिणक्खंधे संकिंतं अक- सिणक्खंधे? २ सोचेव दुप्पएसियाइक्खंधे जाव अपंतपए सिएक्खंधे से अकसिणक्खंधे सेकिंतं अणेगदवियखंघे? २ तस्स चेव देसे अवचिए तस्स चेव देसे उवचिए सेत्तं अणेग दवियक्खंधे सेत्तं जाणगसरीरभवियसरीरवीरित्ते दव्वक्वंधे सेत्तं नोभागमो दबक्खंधे सेत्तं दव्वक्खंधे ॥ पदार्थः-( अहवा ) अथवा ( जाणगसरीरभवियसरीरवहीरत्त दब- वखंधे तिबिहे पएणते तंजहा ) शरीरभव्यशरीरव्यतिरिकद्रव्यस्कंध तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि ( कसिणक्खंधे ) सम्पूर्ण स्कंध ( अकसिणक्खंधे ) असम्पूर्ण स्कंध ( अणेगदवियरखंधे ) अनेक द्रव्यस्कंध (सति कसिणवंधे? २ सोचेत्र हयक्खंधे गयखंधे जाव जसभक्खधे सत्तं क- मिणक्खंधे ) ( प्रश्न ) सम्पूर्ण स्कंध किसे कहते हैं ? ( उत्तर ) सम्पूर्ण स्कंध उसी का नाम है जो पूर्व लिखा गया है जैसे कि अश्वस्कंधे १ गजस्कंध २ यावत् पभस्कंध इत्यादि जान लेने क्योंकि वही सम्पूर्ण स्कंध है। उनमें किसी प्रकार की भी न्यूनता नहीं है (सेकिंतं अकसिणक्खधे ) ( प्रश्न) असम्पूर्ण स्कंध किसे कहते हैं ? ( उत्तर ) असम्पूर्ण स्कंध द्विप्रदशिक से लेकर अनन्तपदेशी पर्यन्त जो स्कंध हैं उन्ही का नाम असम्पूर्ण स्कंध है क्योंकि द्विप्रदेशिक से लेकर अनन्तप्रदेशिक पर्यन्त असम्पूर्ण स्कंध ही कह जाने हैं (सेकित अगदवियवधी २) (प्रश्न) अनेक द्रन्यस्वध किसे कहने ( ३८ ) * अंनुयोगदार सूत्र * हैं । उत्तर ) अनेक द्रव्यस्कंध उसका नाम है ( तस्स चैव देसे अवचिए तस्सव देसे उवचिए सेतं अणेगदवियक्खधे ) जो पूर्व अश्वादिस्कंधों का विवरण किया गया है उन्हीं स्कंधों का देशमात्र नखादिस्थान अचित्त जीव प्रदेशों से रहित होता है और हस्त उदरादि स्थान जीव प्रदशों से सहित होते हैं इसी वास्ते उसे अनेक द्रव्यस्कंध कहते हैं क्योंकि एक शरीर में ही देशअपचित्त देश उपचित्त यह दोनों स्वरूप पाए जाते हैं और यही अनेक द्रव्य स्कंध का स्वरूप है (सेत जाणगसरीरभवियसरीरवइरिते दमखंधे सेत्तं नोआगमत्रों दबक्खंधे से दव्यखंधे ) अब वह ज्ञ शरीरभव्यशरीरव्यातीरक्त द्रव्य स्कंध का स्वरूप नोआगम से सम्पूर्ण हुआ क्योंकि इसी का नाम द्रव्यस्कंध है। भावार्थ:-- :--अथवा ज्ञ शरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त द्रव्यस्कंध तीनों प्रकार से अन्य भी कथन किया गया है जैसे कि सम्पूर्ण स्कंध १ असम्पूर्ण स्कंध २ अनेक द्रव्यस्कंध ३ सो सम्पूर्ण स्कंध पूर्ववत् अश्वादि के ही स्कंध हैं और असम्पूर्ण स्कंबविमदेशी आदिस्कंध से लेकर अनन्तप्रदेशिक स्कन्ध पर्यन्त हैं किन्तु अनेक द्र- व्यस्कन्ध उन्हीं का नाम है जो सचित्त स्कंध के विवर्ण में नखादि छोड़ दिये गये थे वही देश अपचित स्कंध हैं और करचरणादि देश उपचित स्कंध हैं सूत्र का प्राशय यह है कि जो जीव प्रदेशों से सहित स्कन्ध है वह उपचित के नाम से अनेक द्रव्य- स्कन्ध कहा जाता है जो हित हैं वह अपचित संज्ञा के नाम से उच्चारण किये जाते हैं सो इसी स्थान पर ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त नोमागम से द्रव्य- स्कन्ध का स्वरूप पूर्ण होगया है और उक्त लक्षणोंयुक्त को ही द्रव्यस्कंध कथन किया गया है । || अब भावस्कन्ध का व्याख्यान किया जाता अथ भावस्कंध विपय। मूल-सेकिंतं भावक्खंधे? २ दुविहे पण्णत्तेतंजहा भागम ोय नोआगमनोय सेकिंतं आगमनोभावक्खंधे २ जाणए उवउन्त सेत्तं प्रागमनोभावक्खधे । पदार्थ:-(सेकितं भावबंधे २ दुविहे पण्णत्ते तंजहा) (प्रश्न) भाव- स्कन्ध किसे कहते हैं। (उत्तर) भावस्कन्ध दो प्रकार से वर्णन किया गया * अनुयोगद्वार मूत्र * जैसे कि--( आगमओ नोआगमओ.) आगम से और नौश्रागम से (सेकिंत आगमनी भावक्खन्? २ जाणए उवउत्ते सेचं आगमओ भावक्खन्धे ) (प्रश्न) आगम से भावस्कन्ध किसे कहते हैं? (उचर ) आगम से भावस्कन्ध उसका नाम है जो स्कन्ध शब्द के अर्थ को उपयोगपूर्वक जानता है वही आगम से भावस्कन्ध हैं। भावार्थ:-भावस्कंध द्विप्रकार से प्रतिपादन किया गया है आगम से और नोआगम से, सो जो स्कंध शब्द के अर्थ को उपयोगपूर्वक जानता है वही आगम से भावस्कंध है। अव नोागम के विषय में कहते हैं। मूल-सेकिंतं नो अागमत्रो भावखंधे ? २ एएर्सि चैव सामाइयमाइयाणं छण्हं अज्झयणाणं समुदयसमिइसमागमण- निप्परणे आवस्सयसुयक्खंधे भावक्खंधेत्ति लब्भइ सेतं नो श्रागमयोय भावक्खंधे सेत्तं भावक्खंध सेत्तं क्खंधे तस्सणं इमे एगट्ठिया नानाघोसा नामधेज्जा भवन्ति तंजहा गण १ काए २ निकाए चिए ३ खंधे ४ वग्गे ५ तहेव रासीय ६ पुंजय ७ पिंडे ८ णिगरे ६ संघाए १० अाउल ११ समूहे १२ सेत्तक्खन्थे । श्रावस्सयस्सणं इमे अत्थाहिगारा भवन्ति तंजहा सावज्जजो- ग विरह उकित्तण गुणवत्रोय पडिवत्ती खलियस्स णिंदणावण- तिगिच्छ गुणधारणा चेव १ आवस्सयस्सणं एसो पिंड- स्थो वरिणो समासेणं एत्तो एक्केकं पुण अज्झयणं कित्तइ- स्सामि तंसामाइयं चउवीसत्यत्रो वंदणयं पडिकमणं काउस. ग्गो पच्चक्खाणं तत्थ पढमं अज्झयणं सामाइयं तस्सणं इमे चत्तारि अणुशोगदाराणि भवंति तंजहा उवकमे निक्खेवे श्रणुगमे नए। : पदार्थ:-( मेकिंत्रं नो भागमओ भावकवन्धे,१२) (मन) नो आगम से १ (१०) * अनुयोगद्वार सूत्र * भावस्कन्ध किस कहते हैं ? ( उत्सर.) नो आगम से भावस्कन्ध निम्न प्रकार से. है ( एएसिं चेवे सामाइयमाझ्याणं) यह निश्चय ही सामायिकादि से लेकर (छएई अन्झयणाणं समुदय ( पद् अध्ययनों का नो समुदाय रूप है वह ( समिइसमागमेण निप्पएणे भावस्सयसुयक्खन्धे भावरखधत्ति लम्भइ) सर्व परस्पर एकत्व करने पर आवश्यक सूत्र का भाव स्कन्ध निष्पन्न होता है और जो आवश्यक सूत्र क्रियायुक्त किया जाता है (भावक्खन्धेचिलंभइ) वहीं आवश्यक मूत्र का भावस्कन्ध कहा जाता है अर्थात् जो भाव स्कन्धरूप आवश्यक सूत्र है वह अवश्यही करणीय है क्योंकि--भावस्कन्ध वहीं माप्त होता. है ( सेनोबागमओय भावक्खन्भे) अब नोश्रागम से भावस्कन्ध का स्वरूप सम्पूर्ण हुआ क्योंकि (सेच भावक्खन्धे सेक्खन्धे ) यही भावस्कन्ध है और यही स्कन्ध का स्वरूप है ( तस्सणं) उस स्कन्ध के ( इमे एगढिया नाणा घोसा नामरेज्जा भवंति तंजहा ) यह एकार्थिक और नाना प्रकार के घोषयुक्त नाम है जैसे कि अपेक्षा गण भी इस का नाम है १ ( काय ) पटकाय के समान काय भी है और निकाय चिय ) शरीर के तुल्य निकाय भी कहते हैं (खंध ) द्विपदेशिक आदिस्कंध के समान स्कन्ध है । (गे) गो वर्ग के समान वर्ग ( तहेव रामीय ) उसी प्रकार शान्यादि के तुल्य राशि ( पुंजय ) धानों के समान पुंज और गुड़ादि के ममान (पिंड ) पिंड भी कहते हैं द्रव्य के तुल्य (णिगरे ) निकर भी इस का नाम है ( संघाय ) संघ मिलने के समान संघात भी इमी का नाम है और महानगर के समान (माउल ) प्राकुल भी कहते हैं और ( समूहे ) ममूह भी इसे कहा जाता है ( सेक्खंधे ) यही स्कंध का स्वरूप है और ( आवस्सयस्सणं इमे अत्याहिगारा भवंति तंजहा ) आवश्यक के यह भार्थाधिकार होते हैं जैसे कि ( सावनजोग विरह ) सावध योग की विरति रूप प्रथमाध्याय है ( उकित्तण । गुण कीर्तन रूप द्वितीयाध्याय है ( गुणव- ओयपडिवत्ती ) गुणयुक्त को वंदना रूप तृतीयाध्याय है ( खलियस्स निंदणा- वण तिगिच्छ गुणधारणा चत्र ) अतिचारों को निवृत्ति रूप चतुर्थ अध्याय है और व्रण की औपधि रूप पंचमाध्याय है मूल गुण और उत्तर गुण के धारण करने रूप छठा अध्याय है (श्रावस्सयस्स एसो) यह आवश्यक रूप (पिंड- स्थो वरिणओ समासेणं ) स्कंध का संक्षप से अर्थ वर्णन किया है किन्तु (एतो एककं पुण) स्कंध के एक (अभयणं किचइस्मामि तंजहा) अध्ययन (४१) भत्यन्त दूर * अनुयोगद्वार मूत्र * की व्याख्या करूंगा जैसे कि-(सामाइयं ) सामायिक (घउसिस्थयं चतुर्विंश- 'ति स्तव (बंदयणं ) वंदना (पडिकमणं ) प्रतिक्रमण (काउसग्गो) कायोत्सर्ग (पञ्चक्खाणं) प्रत्याख्यान ( तत्थ पढमं अज्झयणं सामाइयंतस्सणं इमे चत्तारि अणुश्रीगदााराणि भवन्ति तंजहा ) उन पद् अध्यायों में से प्रथम अध्ययन सा- मायिक है उसके यह चार अनुयोगद्वार होते हैं जैसे कि-( उवक्कमे ) जो वस्तु. हो उसको निकट करना उसी का नाम उपक्रम है और फिर उसको (निरखे। ) नामादि निक्षपों में स्थापन करना उसका नाम निक्षेप है फिर सत्रानुकूल कार्य करने का नाम ( अणुगमे ) अनुगम है अपितु (नय ) अनन्त पर्पयुक्त वस्तुओं में से एक अंश को लेकर वस्तु के स्वरूप को वर्णन करना उसका नाम नय है उसी नय के द्वारा सदसद् का ज्ञान भली प्रकार से हो जाता है। भावार्थ-नो पागम से भावस्कंध आवश्यक सूत्र के पट् अध्यायों का ही नाम है और यही भावस्कंध है इन्दी के नानाप्रकार के घोपयुक्त द्वादश नाम हैं जैसे कि- गण १ काय २ निकाय.३ स्कंध ४ वर्ग ५ राशि ६ पुंज ७ पिंड निकर संघ १० आकुल ११ और समूह १२ फिर आवश्यक सूत्र के पद अर्थाधिकार रूप अन्याय है जैसे कि-सामायिक १ चतुर्विंशति स्तव २ वंदना ३. प्रतिक्रमण ४ कायोत्सर्ग ५ और प्रत्याख्यान ६ अपितु अतिचार रूप व्रण की. भापधि रूप पंचम अध्याय है आपघि भक्षण रूप छठा अध्याय है फिर जैसे महां नगर के चार मुख्य द्वार होते हैं उसी प्रकार इस सामायिक रूप प्रथम अध्याय के चार अनुयोगद्वार हैं जैसे कि उपक्रम जो वस्तु दूर हो उसको. निकट करना १ फिर उसके निक्षेप करके अनुगम करना फिर नय द्वारा.व्या-. ख्या फरनी यह चार अनुयोग द्वारा पदार्थों की व्याख्या अवश्य ही करणीय । इसी कारण से प्रथम उपत्रम का वर्णन किया जाता है। मूल-सेकित्तं उबक्कमे ? २ छबिहे पन्नत्ते तंजहा नामोव-: कमे ? वयोवकमे २ दबोवक्कमे ३ खत्तोवक्कमे ४ कालोवक्रमे ५ भावोवकमे ६ नामठवणानो गयाग्रो सेकिंतं दवावकमे ? २ 'दुविहे पण्णत्ते तंजहा आगमोय नोभागमभोग जाव जाणगसरीरभवियसरिवह रित्तेब्बोधकामे तिविहे पण्णचे H . * अनुयोगद्वार सूत्र * तंजहा सचित्ते अचित्ते मीसए । सेकिंतं सचित्ते दबोवक्रमे १३ तिविहे पण्णत्ते तजहा दुपए चउप्पए अप्पए एकेक पुण दुविहे पण्णते तंजहा परिक्कमेय वत्थुविणासेय । पदार्थ:-- सेकिंत उवक्कमे १ २ छव्विहे पण्णत्ते तंजहा ) (प्रश्न ) उपक्रम. कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) उपक्रम पट प्रकार से प्रतिपा- दन किया गया है जैसे कि-( नामोवक्कमे १ ठवणोक्कमे २ दव्योवक्कमे ३ ख. लोबको ४ कालोवक्कमे भागोवक्कमे ६ नामठवणाओ गयाओ) नामोपक्रम : स्थानोपक्रम २ द्रव्योपक्रम ३ क्षत्रीपक्रम ४ कालोपक्रम ५ भावोपक्रम ६ सो नाम और स्थापना का विवर्ण पूर्व किया गया है ( सकिन दब्बोवक्कमे २)(प्रश्न) द्रव्योपक्रम किसे कहते हैं ( उत्तर ) द्रव्योपक्रम ! दुविहे पण्णते तंजहा) दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-(आगमओय नोआगमओय ) आगम से और नोआगम से ( जाव जाणगमगरभवियसरवहरित्तेदव्यांवक्कमे तिविहे पएणत्ते तंजहा ) यावत् . ज्ञशरीरभव्यशरीग्व्यानिरिक्तद्रव्योपक्रम तीनों प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि- साचत अचित्ते मी- सए) सचित्त अचित्त और मिथ (सेकिंतं सचित्तीवक्कम २ सिपि पएणचे तंजहा दुप्पए चउप्पए अपए । (प्रश्न ) सचित्तद्रव्यापक्रम कितने प्रकार से कथन किया गया है ? ( उत्तर । सचित्तद्रव्योपक्रम तीनों प्रकार से कथन किया गया है, जैसे कि-द्विपदोपक्रम १ चतुष्पदोपक्रम २ अपदोपक्रम ३ फिर ( एकक पुण दुविहे पएणत्त तंजहा परिकम वत्थुविणासेय ) एक एक के दो दो भद कहे मये हैं जैसे कि-परिक्रम जो वस्तु का मूल गुण है, उमको प्रकाश करना ति- सको परिक्रम कहते हैं किन्तु जो किमी वस्तु द्वाग किसी पदाथ के गुण का नाश किया जाय उसे वस्तुविनाश कहते हैं सा उक्त तीनों भदों के साथ इन दोनों गुणों की भी प्राप्ति है। भावार्थ:-उपक्रम का पट् प्रकार से विवेचन किया गया है जैसे कि- नायोपक्रम, १ स्थापनोपक्रम, २ द्रव्यांपक्रम, ३ क्षेत्रापक्रन ४ कालोपक्रम, ५ भांवोपक्रम, ६ नाम और स्थापना का विवण तो पहिले किया जा चुका है . किन्तु 'ज्ञशरीरभव्यशररिव्यातरितद्रव्योपक्रम के तीन भेद हैं जैसे कि सचित्त अचित्त और मिश्र फिर सचित्त द्रव्योपक्रम तीनों प्रकार से वर्णित है, * अनुयोगद्वार सूत्र * (४३) हिपदोपक्रम चतुष्पदोपक्रम अपदोपक्रम, अपितु इनके भी दो दी भंद है परिक्रम भार वस्तुविनरा बग्दु के मूल गुण का प्रकाश करना उपक्रम कहाता है यदि मूल गुण का नाश किया जाय उसे वस्तुपिनाराद्रव्य उपक्रम कहते हैं। अथ दिपदोपक्रम विषय । सेवितं दुप्पए उचक्को? २ दुप्पयाणं नडाणं नट्टाणं जल्लाणं मल्लाणं मुट्ठियाणं वेलंवगाणं कहगाणं पवगाणं लासगाणं थाइक्खगाणं लंखाणं. मंखाणं तूणइल्लाणं तुंबवीणियाणं कावोयाणं मागहाणं सेत्तं दुप्पए उवकमे । पदार्थ-(प्रश्न ) द्विपदोपक्रप किसे कहते हैं ? ( उत्तर ) द्विपदोपक्रम निम्न मकार से है जैसे कि ( नहाणं) नचाने वाले ( नट्टाणं ) नृत्य करने वाले (मल्लाणं) राज्यस्तुति करने वाले ( मलाणं ) मुष्टि आदि युद्ध करने वाले (मुट्टियाणं । केवल मुष्टि हो युद्ध करने वाले (बलंवगाणं) नाना प्रकार के वैप करने ( विद्पक ) वाले ( कहगाणं ) कथा करने वाले (पवगाणं । गादि वा नद्यादि के तैरने वालं ( लासगाणं) राश खेलने वाले अथवा जयध्वनि करने वाले (श्राइक्खगाणं ) देवज्ञ आकाश विद्या के कथक ( लंखाणं) वंशान में नृत्य करने वाले ( मंखाणं) चित्र पट्ट के द्वाग श्राजीविका करने वाले (तूणइलाणं) वादित्र के बजाने वाले (तुंवीणियाणं) अलावु की वीणा बनाने वाले ( कावायाणं) कावड (कउड ) के बहने वाले ( मागहाणं ) मांग-. लिक वचन के बोलने वाले इनको यदि घृतादि द्वारा उपचित किया जावे उसे परिक्रम द्रव्योपक्रम कहते हैं यदि खडगादि द्वारा विनाश किया जाय उसका नामवस्तुविनाशद्रव्यापक्रम है क्योंकि बलय याद्ध के लिय पथम उपक्रम है इसस विपरीत द्वितीय उपक्रम है ( सत्तं दुप्पर उपक्रम अथ द्विपद उपक्रम का स्वरूप इसी स्थान पर पूर्ण हुश्रा.इसी का नाम द्विपद सचित्तापक्रम है । भावार्थ-द्विपद उपक्रम उसे कहते हैं कि जो नृत्यादि क्रिया करने वाले हैं उनको बलादि की वृद्धि के वात प्रथम उपक्रम होता है और नाश के लिये द्वितीय उपक्रम हाना है सो इसका नाम दिपढ़ सचित्तापकर है।
*इनुयोगद्वार सूत्र * अथ चतुष्पदोपक्रम विषय । सेकिंतं चउप्पए उवक्कमे २ चउप्पयाणं आसाणं हत्थीणं इच्चादि सेत्तं चउप्पए उवक्कमे । ‘पदार्थ-(सेकिंत चउप्पय उवक्कमे ? २) (प्रश्न) चतुष्पदोपक्रम कौनसा है ? (उत्तर) चतुष्पदोपक्रम इस प्रकार से है जैसे कि-अश्वों को हस्तियों को इत्यादि चार पाद वाले जीवों का परिक्रम वा वस्तु विनाश के द्वारा शिक्षित पा नाश करना उसी का नाम चतुष्पदोपक्रम है । भावार्थ-चार पैर वाले जीवों को परिक्रम अथवा वस्तु विनाश द्रव्योपक्रम इनके द्वारा शिक्षितादि कर्म करने उसी को चतुष्पदोपक्रम अथवा द्रव्योपक्रम कहते हैं। अथ अपद विषय । सेकिंतं अपए उवक्कमे ? २ अपयाणं अवाणं वाडगाणं इच्चाई सेत्तं अपए उवक्कमे सेत्तं सचित्तदव्बोवक्कमे । पदार्थ- सेकिंतं अपए उवक्कमे ? २) (प्रश्न ).अपद उपक्रम किसे कहते हैं ? ( उत्तर ) अपद उपक्रम उसे कहते हैं जैसे कि (अपयाणं अंबाणं अंबाड- गाणं इचाइ सेत्तं अपए उबक्कमे ) आम्रफल अंबाडग फल इत्यादि फलों को ..परिक्रमद्रव्योपक्रम के द्वारा पारिपक्क किया जाता है तथा वस्तु विनाश द्रव्योपक्रम के द्वारा इन फलों को अन्य प्रकार से किया जाय जैसे आम्रफल पाक वा कु- हमाण्ड फल पाक वदाम पाक अथवा अन्य प्रकार से औषधियों का बनाना उस का नाम परिक्रम वस्तु विनाश है और इसी का नाम (सेत्तं सचित्तदबावक- से ) सचित्त द्रव्योपक्रम हैं। भावार्थ-अपदसचित्तद्रव्योपक्रम उसका नाम है जो फलादि को परिक्रम और वस्तु विनाश के द्वारा बनाया जाए जैसे कि-फलादि के गुण दीप्त करने तथा उनके पाकादि वनाने उसी का नाम अपदसचित्तद्रव्योपक्रम हैं । यह सांचना:व्योपक्रम का स्वरूप पूर्ण हुआ। . .
* अनुयोगद्वार मूत्र * ( ४५ ). अथ थचित्त द्रव्योपक्रम विपय । सेकिंतं अचित्तदब्बोवक्कमे ? २ खंडाईणं गुडाईणं मच्छं डीणं सेत्तं अचितदबोवक्कमे । पदार्थ-(प्रश्न ) अचित्तद्रव्योपक्रम किसे कहते हैं? (उत्तर ) अचित द्रव्यो- पक्रम उसका नाम है ( खंडाइणं गुडाईण मच्छंडीणं ) जो खांड, गुरु, मत्संडी (मिसरी) भादि पदाथी को परित्रम और वस्तुविनाश के द्वारा, पवित्र व नाश किया जाय उसी का नाम ( से अचितदव्यात्राम ) अचित्त अन्योपक्रम है। भावार्थ-मनित्तद्रव्यापक्रम उसका नाम है जो खांड, गुड़, मत्संडी आदि पदाथों की परिक्रम द्रव्योपक्रम द्वारा मिद्ध किया जाता है और वस्तुविनाश फे द्वारा उसके रसादि का नाश किया जाना है उसी का नाम अचित्त द्रव्योपक्रम है । अथ मिश्र द्रव्योपक्रम विषय । सर्कितं मीमए दबावकमे ? २ सेवेव थासग मंडीए अस्माई सेत्तं मीसए दबोवको । पदार्थ-(मेकित मीसपदव्यौवयमे ) ( प्रश्न) मिश्र द्रव्योपक्रम किसे कहने । (उत्तर (सोचवथासग मंदीप अस्साइ सेत्तं मीसए दबोचक्कमे) वही अन्धादि जो भूएणों से अलंकृत होरहे हैं उनका उपक्रम द्वारा वा वस्तु विनाश द्वारा मिक्षित करना वा नाना प्रकार से दीप्त या नाशकारी कार्य मग्न हन्दी का नाम मिश्र द्रव्यापक्रम है मो इसी स्थान पर उक्त समास की पनि है (सनं जाणगसरीरभषियमगरवरित दबावफमे सेत्तं नो आगमओ दन्चीवमे मनं दव्यांवक्रम ) यही ममरीरभव्यगरीरव्यतिरिक्त द्रव्योपक्रम है अब ना पागम से द्रव्यापक्रम का स्वरूप सम्पूर्ण हुआ। भावार्थ-मिश्र द्रव्योपक्रम उसे कहने हैं जो यही पूर्वोक्त अश्वादि आभूपणों से अलंकन उनकी परिक्रम द्रव्यांपनाम द्वारा वा वस्तु विनाश द्वारा शिक्षित करना अथवा विनाम करना सी दली का नाम ज्ञसरीगभव्यसरीर व्यतिरिक्त नो पागप में द्रव्यांगनाम होना है और यही व्यापक्रम है। .
* अनुयोगद्वार सूत्र * ॥ अथ क्षेत्रोपक्रम विषय ॥ सेकिंतं खेत्तोवको? २जगणं हलकुलियाइहिं खेत्ताई उव. कमिज्जति इच्चाइ सेत्तं खत्तोवक्कमे सेकिंतं कालोवकमे?२ जणं- नालियाईहिं कालस्सोवक्कनणं कीरइ सेत्तं कालोवक्कमे सेकिंतं भावोवकमे? दुविहे परगत तंजहा भागमोय नोागमोय प्रागमत्रो जाणए उवउने नोग्रागमो दुविहे पन्नत्ते त. जहा पसत्थेय अप्पसत्य तत्थ अपसत्थे डोडिणिगणिया श्रमच्चाइणं तत्थयसत्थे गुरुमाइणं सत्तंनोबागमत्रो भावो. वक्कमे सेत्तं भावोवक्कमे सेत्तं उबक्कमे । पदार्थ:-सेकिंत खत्तोवकमे २)(प्रश्न ) क्षेत्रोपक्रम किसे कहते हैं (उत्तर) ( जणं हलकुलिहहिं खेत्ताई ओवकमिज्जति इन्चाई ) जो (णं इति व्याक्या- लंकारे) हल और कुलिकर के क्षेत्रादि का उपक्रम वा वस्तुविनाश उपक्रम किया जाता है उसको क्षेत्रोपक्रम कहते हैं क्योंकि यह सामान्य वचन है अपितु क्षेत्राधार वस्तु के ही उपक्रम होते हैं, क्षेत्र तो अमूर्ति पदार्थ है क्षेत्राधार भूमि और भूमि आधार तृणादि की उत्पत्ति वा विनाश करने को ही क्षेत्रोपफम कहा जाता है । सेत्तं खत्तीवक्कमे ) अब क्षेत्रोपक्रम क पीछ कालोपक्रम का विवर्ण किया जाता है (मेकिंतं कालोवक्कमे २ ) (प्रश्न) कालोपक्रम किसे कहते हैं (उत्तर) अण्णं नालियाइहिं कालस्सोवक्कमणं कीरइ सेतं कालोवक्कमे ) जो घटी (घंटा) आदि द्वारा, कालका उपक्रम किया जाता है उसे कालोपक्रम कहते हैं अथवा तृणादि द्वारा पौरुषि आदि का प्रमाण करना और नक्षत्रादि द्वारा काल के फलाफल का उपक्रम करना जसे कि-इन ग्रहों के बल से सुभिक्ष वा दुर्भिक्ष -होगा इत्यादि परिक्रम और वस्तुविनाश उपक्रम यह दोनों ही कालोपक्रम में उक्त प्रकार मे सिद्ध हैं । अथ कालोपका के पीछे भावोपक्रम का विवेचन करते हैं ( सेकित भावोवक्कमे २ दुवह पएणते तंजहा) (प्रश्न) भावोपक्रम किसे कहते हैं । उत्तर ) भावोपक्रम दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि- (.श्रागमनाय नोआगमओय ) आगम से जो जानता है और उपयोग युक्त भी * अनुयोगदार सूत्र * (४७) है उसे आगम से भावोपक्रम कहते । द्वितीय नोआगम से किन्तु ( नोआगमओ दुबिहे परणचे तंजहा ) नो आगम से भाव उपक्रम द्वि प्रकार से है जैसे कि- (पसत्येय अपसत्थेय ) सुन्दर भाव उपक्रम और अप्रशस्त भाव उपक्रम अर्थात् असुन्दर भाव उपक्रम अपितु (तत्थ अप्पसत्थे डोडिणिगीणया अमच्चाइणं ) इन दोनों में जो अप्रशस्त भाव उपक्रम है उसकी सिद्धि के लिये सूत्रकार ने तीन उदाहरण दिये हैं जो अनुक्रमता से निम्नलिखितानुसार प्रथम उदाहरण ब्राह्मणी का है द्वितीय वेश्या कां तृतीय मन्त्री का । सो प्रथम ब्राह्मणी के उदा. हरण का स्वरूप लिखा जाता है। अमुक नगर में एक ब्राह्मणी की ३ पुत्रियां थी जो कि उसके हृदय को नित व हर्षित रखती थी ब्राह्मणी का भां उन पर असीम अनुराग था, वह सदव चाहती थी कि क्षण मात्र भी इनका मेरे से वियोग न हो तथा इन को क्षण मात्र भी दुःख न हो, समय बीतने पर वह तीनों कन्या यौवनावस्था की प्राप्त हुई तथा लावण्यवती भी होगई, अतः माताने उन तीनों का विवाह कर दिया परन्तु मनमें सोचने लगी की कोई ऐसा उपाय करना चाहिये जिस से इन के पति इन पर सदैव प्रसन्न रहें और इनके सुग्व में कोई विन्न नहां, ऐसा विचार कर पुत्रियों को विदा करने के समय बढी लड़की को कहीं एकान्त ले. जा कर उसे कहने लगी की हे पुत्रीके ! जब तंग पति वासभवन में मिलने के लिये आवे तब तूने उसका कोई अपराध जानकर उस के मस्तक पर पाद प्रहार करना, ऐसा करने पर जो वर्ताव वह मेरे साथ करे वह मेरे स आकर कहना. मेरी इस शिक्षा को अवश्यमेव याद रखना, अनन्तर कन्या के वैस ही करने पर उस का पति स्नेह से आई हृदय होकर तथा उस के अपराध को गुण समझ कर उस से बोला कि प्रियतमे ! तेरे चरण रूपी कमल अतीव सुकोमल हैं और मेरा शिर पत्थर की नां अति कठिन है इसलिये तेरे पाद में पीड़ा तो नहीं हुई इस प्रकार अनेक विनय युक्त वचनों से अपनी पत्नी को शीतल करके प्रसन्न किया और उसके पांव को मदन किया। अनन्तर कन्याने आकर समस्त वर्ताव आद्योपान्त माता से कह सुनाया वह भी ऐसे जामात पर अति प्रसन्न हुई और अपनी पुत्री से वाली कि हे पुत्रिके ! तरे घर में तेरी अखंड आज्ञा चलेगी क्योंकि तेरे पति आज्ञानुकूल कार्य करने वाला है इसलिये तं निर्भय होकर अपने घर में यथेष्ट सुखों को भोग तुझे कोई डर नहीं 1 इसी ( ४८) * अनुयोगद्वार सूत्र.* प्रकार ब्राह्मणी ने दूसरी कन्या को भी करने की शिक्षा दी इसलिये उसने भी अपने पति के मस्तक में पादपहार किया-तब उस का पति कुछ समय क्रोष करके तथा श्रेष्ठ पुरुषों को स्त्रियों से ऐसा अपमानित करवाना योग्य नहीं है, विचार कर फिर प्रसन्न हो गया और कन्या को कुछ भी न कहा । दूसरी कन्याने भी अपनी माता के पास आकर वैसे ही सागवृतान्त कहा माता आनन्दित होकर दूसरी. पुत्री से बोली कि हे कन्ये ! तूं भी. मन माना सुख भोग जैसे तेरी इच्छा हो वैसे अपने घर में वर्ताव कर तुझे कोई भय नहीं है क्योंकि तेरा पति क्षणमात्र क्रोधित होकर प्रसन्न हो जायगा, इसी प्रकार ब्राह्मणी ने तीसरी कन्या को कहा उसने भी वैसे ही अपनी माता की आज्ञा पालन'की अर्थात् जब उसका पति मिलने के लिये उसके आवास भवन में आया तो तीसरी कन्याने ( अर्थात् उस की पत्नी ने ) उसके मस्तक में पाद प्रहार किया, तब उसका पति विचार ने लगा कि-पुरुपों को स्त्रियों से ऐसी अधोगति नहीं करवानी चाहिये अथवा कुलीन स्त्रियों का यह कर्तव्य नहीं है । पति की सेवा करनी ही नारियों का धर्म है नकि ऐसा अपमान करना इस प्रकार सांच कर उसने उसको (तीसरी कन्या को ) बहुत मारा अंत में स्वगृह से बाहर कर दिया, सो वह भी अपने पति से निकाली हुई अपने घर आई तथा अपनी माता को सर्व वृतान्त कह सुनाया माता सुनकर बड़ी दुखित और बोली कि हे पुत्रीके ! तेरा पति दुराराध्य होगा तूं जितनी भी उसकी विनय भक्ति तथा उसकी आज्ञानुसार वर्ताव करंगी उतना ही तुझे सुख होगा यदि उस से पराङ्गमुख होगी तो कदापि तुझे आनन्द और सुख प्राप्त न होगा इसलिये तुझे योग्य है कि सदैव काल अपने पति की आज्ञानुकूल वर्ताव करें ऐसी शिक्षा दे चुकने के पश्चात् ब्राह्मणी ने अपने जामाता को बुला कर बहुतः नम्रता से तथा अनेक शीतलोपचारोंसे उसे संतुष्ट व शान्त कर दिया और पुनः वह स्वं पत्नी पर प्रसन्न होगया ब्राह्मणी ने एवं ( इस प्रकार ) तीनों जा- माताओं की परीक्षा कर ली सो इसी का नाम अप्रशस्त भावोपक्रम है। अथ द्वितीय उदाहरणं । किसी नगर में ६४ चौसठ कला प्रवीण एक वेश्या. व सती थी उसने दून सरों का अभिप्राय जानने के लिये एक रतिभवन बनवाया जिस की. समस्त 3 * अनुयोगद्वार मूत्र * (४६) भीतों पर, राजपुत्र, सेठ, सेनापति, आदि नगर में प्रधान पुरुषों के अत्युत्तम और मनोहर चित्रों से.चित्र कर्म बनवाया अनन्तर राज पुत्रादि जो कोई भी वहां आता है वह वहां अपने मुन्दर चित्र को देख कर अतीव आल्हादित होकर उसकी (गणिका की) प्रशंसा करता था इस प्रकार उसने (वेश्याने.) नगर के प्रायः सर्व वड़े बड़े पुरुषों को अपने पर मोहित कर लिया और यथेष्ट धन उनसे लूटकर सुखों को भोगने लगी इस प्रकार से अप्रशस्त भावोपक्रम का द्वितीय उदाहरण है। ॥ अथ तृतीय उदाहरण ॥ किसी नगरी में कोई राजा राज्य करता था. जो कि राजा के समस्त गुणों से युक्त प्रजा को पुत्रवत् समझने वाला और न्यायविक्रम अनुकम्पादि गुणों से भूपित था पुण्य योग से जिसका मन्त्री भी महाबुद्धि शील और अत्यन्त विच- तण था फिम्बहुना, राज्य में धुरा के समान होने से राज का सारा भार उसपर ही निर्भर था, राजा भी अन्तःकरण से उसपर मुग्ध तथा मोहित था अतएव: सर्व कार्यों में राजा उसकी सम्मति लेता था । एक समय राजा और मन्त्री दोनों ही घोड़े पर आरूढ़ होकर वन क्रीड़ा के लिये गये, तव मार्ग में चलते हुए राजा के घोड़े ने कहीं सखिलमदेश में प्रसूत्रण (मूत्र ) करने लगा अपितु वहां पर पृथिवी सुन्दर होने से वह मूत्र चिर के पश्चात् शुष्क होता था, इसलिये राजा ने ऐसी दशा देखकर विचार किया कि यदि यहां पर तड़ाग वनवाया जावे तो वह बहुत सुन्दर चिरस्थायी होवे इस प्रकार चिरकाल तक उस अचंभे को देखता रहा किन्तु मन्त्री को कुछ भी न बोलकर चल दिया और भ्रमण करके अन्त में वे अपने २ स्थान पर आगये परंच इंगिताकार ज्ञान की कुश- लता से मन्त्री झट ताड़गया कि राजा के मन में यह परिणाम उत्पन्न हुए थे उसके अनुसार राजा के न कहने पर भी विचारशील मन्त्री ने स्वअनुमति से यहां पर एक परम और मनोज्ञ सरोवर बनवाया और उसके चारों ओर नानां प्रकार वृक्ष तथा अनेक प्रकार के पुष्प देने वाली लताएं लगवाई जो कि पद ऋतुओं के पुष्पों को देवी थी इस प्रकार वह थोड़े काल में ही एक परम मुन्दर श्राराम ( वाग) बन गया तथा उनकी शोभा ने उस सरोवर को महापद्म शतपत्र सहसूपत्र आदि कमलों से उसका पानी सुगन्धि वाला तथा अनीव शीतल होगया । अन्यथा फिर कभी राजा मन्त्री के साथ वनक्रीड़ा के के ( ५० ) * अनुयोगद्वार सूत्र * लिये गया और जाते हुए राजा ने उसी सरोवर को देखा और आश्चर्य से मन्त्री को बोला कि हे मंत्रिन् यह सुन्दर और रमणीय सरोवर किसने बनवाया है ! प्रधान ने उत्तर दिया कि हे देव ! यह आपका ही ताल है और आपने इसे स्वयं बनवाया था ऐसा उत्तर सुनकर राजा अत्यन्त आश्चर्य्य युक्त होकर बोला कि हे.प्रधान ! इसके बनाने के लिये मैंन कर श्राज्ञा दी ? तब मन्त्री ने सविस्तर आद्योपांत वह. वृत्तान्त राजा को सुनाया सुनने के अनन्तर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और प्रधान की अति स्तुति करके कहने लगा कि हे मंत्रिन् तूं महा कुशाग्र बुद्धि तथा अत्यन्त मन के भावों का (इंगिताकार का परिचित हैं) इस प्रकार राजा ने मंत्री की बहुतसी स्तुति करी और उसका वेतन अधिक कर दिया इसको सांसारिक फल होने से अप्रशस्त भावोपक्रम कहते हैं, अब प्रशस्त भावोपक्रम दो प्रकार से कथन करते हैं, एक तो गुरु सम्बन्धी, द्वितीय शास्त्र सम्बन्धी । प्रथम गुरु सम्बन्धी का विवर्ण किया जाता है (तत्थपसत्यो गुरु माइणं ) ( तत्र ) प्रथम प्रशस्त भावोपक्रम गुर्वादि का इंगितानुसार वर्ताव करना जैसे कि श्रृंताध्ययन के समय गुर्वादि के भावों की परीक्षा करना तथा उनके इंगिताकार द्वारा जानकर, अन्न पानी वस्त्रादि द्वारा उनकी सेवा करनी सो इसे प्रशस्त भावोपक्रम कहते हैं (सेत्त नो आगम उभावोवक्कमे सेत्तं भावविक्कमे सेतं प्रवक्कमे ) अथ इसकी पूर्ति करते हैं कि यही नो आगम से भावोपक्रम है और इसे भावोपक्रम कहते हैं इतना ही स्वरूप भावोपक्रम का है अथ द्वितीय शास्त्रीय उपक्रम का स्वरूप वर्णन किया जाता है । भावार्थ-क्षेत्र सम्बन्धी उपक्रम उसे कहते हैं जो हल और कुलिकादि द्वारा क्षेत्र का माप किया जाए, कालोपक्रम उसका नाम है जो घटिकादि द्वारा काल मान किया जाता है किन्तु भावोपक्रम दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया एक तो आगम रूप से दूसरे नोआगम से, आगम से जो सामायिकादि भावों को उपयोग पूर्वक जानता है उसे आगम से भावोपक्रम कहते हैं अतः नोआगम से जो भावोपक्रम है वह भी दा प्रकार से है एक तो प्रशस्त, द्वितीय अप्रशस्त, अपितु अप्रशस्त भावोपक्रम में पूर्वोक्त तीनों उदाहरण हैं प्रशस्त में केवल गुर्वादि के अंग चेष्टानुकूल कार्य करने उसी का नाम प्रशस्त भावोप- क्रम है और इसे ही भावोपक्रम कहते हैं किन्तु एक भावोपक्रम शास्त्रीय भी होता है जो निम्न लिखितानुसार है ।
* अनुयोगद्वार सूत्र * ( ५१ ) ॥ अथ पुनः भावोपक्रम विषय ।। अहवा ओवक्कमे छविहे पण्णत्ते तंजहा प्राणपुची १ नाम २ पमाण ३ वत्तवया ४ अत्याहिगारे ५ समवयारे ६ से- किंतं श्राणुपुवी २ दसविहा पन्नत्ता तंजहा नामाणु पुवी ? ठवणापुब्बी २ दव्वणुपुव्वी ३ खेत्ताणुपुवी ४ कालाणुगुब्बी ५ श्रोक्कितणाणुपुन्नी ६ गणणाणुपुब्बी ७ संठाणाणुपुब्बी ८ सामायारीयागुपुब्बी , भावाणुपुब्वी १० सेकिंतं नामाणु- पुवी नामवणाो गयाओ तहेव दवाणुपुव्वी जाव सेकिंतं जाणग सरीर भविय सरीर वहरिना दव्वाणुपुब्बी २ दुविहा पएणता तंजहा प्रोवणिहिया अणो वणिहियाय तत्थणं जा- सानो वणिहिया साइप्पातत्थणं जासा प्रणो वणिहिया सा- दुविहा पन्नत्ता तंजहा नेगम ववहाराणं संगाहस्सय सेकिंत नेगम ववहाराणं. अणो वणिहिया दव्वाणुपुव्वी २ पंचविहा पं० २० अकृपयपरूवणया १ भंगसमुक्कितणया २ भंगोव दस- गया ३ समोयारे ४ अण्णुगमे ५ ॥ पदार्थ:-(अहवा) अथवा (ओवक्कमे छीवह पन्नते तंजहा) शास्त्रीय उपक्रम पट् प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि ( आणुपुची) आनु पूर्वी अनुक्रम १ (नाम) नाम उपक्रम २ (पमाण) प्रमाण उपक्रम ३ (वत्त- वया) वक्तव्यता उपक्रम ४ (अस्थाहिगार) अर्थाधिकार उपक्रम ५ (समवयारे) समवतार उपक्रम ६ (सेकिंतं आणुपुची २ दसविहा पन्नता तंजहा) (प्रश्न) आनुपूर्वी कितने प्रकार से वर्णन कीगई है ( उत्तर ) दश प्रकार से जैसे कि-- (नामाणुपुब्बीछवणाणु पुन्नी दवाणुपुब्बी खेत्ताणुपुब्बी कालाणुपुवा ) ना- मानुपूर्वी १ स्थापनानुपूर्वी २ द्रव्यानुपूर्वी ३ क्षेत्रानुपूर्वी ४ कालानुपूर्वी ५ ( उक्कित्तणाणुपुची गणणाणुपुच्ची संहाणाणुपुची सामायारीयाणु वी . भावाणु पुर्ची ) उत्की नुपूर्वी ६ गणनानुपूर्वी ७ संस्थानानुपूर्वी ८ सामा- ( ५२ ) * अनुयोगद्वार मूत्र * चारी आनुपूर्वी भावानुपूर्वी १० (सेकिंतं नामाणु पुची नामवणा उगयाउ तहेव दवाणुपुन्ची जाव सेकिंतं जाणग सरीर भविन सरीर वइरित्ता दबाणु पुचीरदुविहा पं० त० उवाणिहिया अणो वणिहिया य)(प्रश्न ) नामानु पूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर) नाम स्थापना का पूर्व विवर्ण किया गया है उसी प्रकार जानना यावत् द्रव्यानुपूर्वी पर्यन्त (प्रश्न) ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त द्रव्यानुपूर्वी कितने प्रकार से कहीगई है। (उत्तर) ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्यानुपूर्वी दो प्रकार से प्रति- पादन की गई है जैसे कि उपनिधि की और अनुपनिधि की क्योंकि उप 'नाम समीप का है निधि नाम निधान तुल्य जो होवे उसे कहिये निधिसो जो समीप की हुई वस्तुओं का स्वरूप पूर्ण प्रकार से करा जाए उसे उपनिधि कहते हैं तथा प्रयोजनार्थे इकण प्रत्यायान्त करने से उपनिधि की ऐसे शब्द वन जाता है सो अनुक्रमता पूर्वक पदायों को स्थापन करना उसे " उपनिधिकी " कहते हैं अथवा वस्तुओं के स्वरूप को जो निक्षेप करे उसी का नाम " उपनिधिकी" है अपितु इससे विपरीत अर्थ देने वालों को अनु- पनिधि की कहते हैं सो यहां पर वर्तमान प्रयोजन सामायिकाधिकार है इस लिये इन्हों की आवश्यक्ता है । अथ इन्हीं का विस्तार फिर करते हैं ( तत्थणं. जासा उवणि हिया साठप्पा) उनमें प्रथम जो उपनिधिकी है वह इस समय स्थापनीय है क्योंकि इसका स्वरूप अल्प है और अनुक्रमता पूर्वक है इसलिये सुगम भी है किन्तु ( तत्थमं जासा अणे वणि हिया सादुविहा पं० २० नेगम अवहाराणं संग्गहस्सय ) जो अनुपनिधिकी है वह भी दो प्रकार से प्रतिपादन की गयी है जैसे कि-नैगम व्यवहारनय के मत से और संग्रहनय के मत से (सेकित नेगम ववहाराणं अणो वणिया दवाणु पुची २ पंच विहा पं. तं. (प्रश्न ) नैगमः और व्यवहार नय के मत से अनुपनिधि की कितने प्रकार से वर्णन की गयी है ( उत्तर ) पांच प्रकार से जैसे कि ( अपयपरूवणया) प्र. थम भेद अर्थ पद का कथन रूप है जैसे कि-अर्थ परमाणु आदि की प्ररूपणा (भं- गसमुकित्तणया) द्वितीय भेद अर्थ पद के भंगो को उत्कीर्तन रूप है अर्थात् जो भगवनए हुए है उन को प्रकाश करना ( समो पारे) चतुर्थ भेद आनुपूर्वी आदि द्रव्यों को यथा स्थान समवतार करना जैसे कि-जो द्रव्य जिस जाति का हो उसी जाति में स्थापन करना ( अणुगमे ) पंचम भेद अनुयोग द्वार करके वि. चार करना उसे अनुगम कहते हैं अव सत्रकार पृथक २ स्वरूप वर्णन करते हैं ।
, * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ५३ ) भावार्थ-शास्त्रीय उपक्रम पट् प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि- मानुपूर्वी १ नाम २ प्रमाण ३ वक्तव्यता ४ अर्थाधिकार ५ समवतार ६ आनुपूर्वी दश प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि नामानुपूर्वी, स्थापनानुपूर्वी, ट्रंन्यानुपूर्वी, क्षेत्रानुपूर्वी, कालानुपूर्वी, उत्कीर्तनानुपूर्वी, गणनानुपूर्वी, संस्थानु- पूर्वी, समाचारानुपूर्वी, भावानुपूर्वी, सो नाम और स्थापना का विवर्ण आवश्यक के अधिकार में किया जा चुका है, द्रव्यानुपूर्वी भी पूर्ववत् ही जान लेनी किंतु शरीर भन्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्यानुपूर्वी दो प्रकार से कथन कीगई है जैसे कि उपनिधिकी और अनुपनिधिकी, उपनिधिकी उसे कहते हैं जो अनुक्र- मता पूर्वक वस्तुओं को स्थापनकरे. इस से विपरीत कानाम अनुपनिधि की इस का विस्तार महान् है इसीलिये प्रथप अनुपनिधिकी का विस्तार किया जाता है वह. दो प्रकार से वर्णित है नैगम व्यवहार और संग्रहनय के मत से भतः नैगम और व्यवहार नयक मत से उस के पांच भेद हैं जैसे कि अर्थपद प्ररूपणा भंग समुत्कीर्तनता भंगोपदर्शनता, समवतार, और अनुगम अव सूत्रकार इन्हों का पृथक् २ ता से विवेचन करते हैं। मूल-सेकिंतं नेगम ववहाराणां अपयपरूव याति- पयसिए आणुपुब्बी चउपयसिए प्राणुपुब्बी जावदस पासिए आणुपुब्बी संखेज्ज पएसिए प्राणपुब्बी असंखेज्ज पएसिए प्राणपुवी अणंत पएसिए.प्राणुपुवी परमाणु पोग्गले अ- पाणु पुबी दुप्पएसिए अवत्तव्वए तिपएसिएयाआणुपुब्बीयो जाव अणंत पएसियानोश्राणुपुब्बीओ परमाणु पोग्गला अणा- णु पुब्बीयो दुपए सियई श्रवत्तव्ययाई सेत्तं णेगम ववहाराणं आठपय परवणया एयारणे गम ववहाराणं अपयपरूवणयाए किं पयोयणं एयाराणं ऐगम ववहाराणं अपय परूवण याए भंग समुकित्तणया कीरइ । पदार्थ-( सेकिंत नेगम यवहाराणं अकृपय परुवर्णया) (प्रश्न) वह कौन. है नंगम और व्यवहार नय के मतसे जो अर्थ पद की प्ररूपणा की जाती है (उत्तर) ( ५४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * नैगम और व्यवहार नय के मत से जो अर्थपद प्ररूपणा है वे निम्न लिखितानुसार है (तिपए सिए आणुपुन्निए चउपएसिए आणुपुब्बी जावदस परसिए आणु पुन्नी संखेज्जपएसिए आणुपुची असंखेज्न पएसिए आणुपुची अणंत पएसिए आणु.. पुची) जो तीन प्रादेशिक स्कंध चतुर प्रादेशिक स्कंध यावत् दश प्रादेशिक स्कंध- इसी प्रकार संख्यात प्रादेशिक स्कन्ध असंख्यात प्रादेशिक स्कन्ध अनंत प्रदेशिक स्कन्ध हैं वे सर्व आनुपूर्वी में ही गर्भित हैं इन्हें ही आनुपूर्वी कहते हैं (किन्तु परमाणु पोग्गले अनाणुपुची ) केवल परमाणु पुद्गल अनानुपूर्वी द्रव्य है क्योंकि अनानुपूर्वी नञ् समासान्त पद है न आनुपूर्वी यस्यासा अनानुपूर्वी और (दु- पएसिए अन्यत्तन्वए) द्रिपदेशिक स्कन्ध अवक्तव्य होता है ये सर्व एक वच- नान्त शब्द हैं इसीलिये एक वचनान्त ३ भंग हुए अव बहुवचनान्त तीनं भंग दिखलाते हैं ( तिपयसिएया आणुपुचीयो जात्र अणंतपय सियाओ आ- णुपुबीओ) बहुत से ३.प्रदेशिक स्कन्ध से लेकर अनन्त प्रदेशि पर्यन्त पुद्गल द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्य में कहे जाते हैं और ( परमाणु पोग्गला अणाणु पुब्बीओ ) बहुत से परमाणु पुद्गल द्रव्य अनानुपूर्वी में होते हैं अर्याद अनन्त परमाणु पुद्गल जो प्रत्येक २ फिरते हैं वे सर्व अनानुपूर्वी द्रव्य में हैं किन्तु (दुपएमियाई अवत्तव्बयाई ) भनेक द्विपदेशिक स्कन्ध अवक्तव्य हैं (क्योंकि त्रिभदेशी से लेकर अनन्त प्रदेशी पर्यन्त द्रव्य आनुपूर्वी है एक परमाणु पुद्र- लता प्रत्येक २ अनन्त परमाणु पुद्गल अनानुपूर्वी में हैं अपितु द्विमदेशी स्कन्ध अवक्तव्य मंज्ञक होता है । सेतणेगपववहाराणं) यही नैगम और व्यवहार नय के मत से ( अपयपख्वणया) अर्थ पद की पदप्ररूपणा है उक्त पद् भंग दोनों नयों के मत से सिद्ध हैं शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! (एयाणंणेगमववहाराणं अट्ठपयपरूवणया एकिंपयोयणं इन नैगम और व्य- वहार नय के मत से जो अर्थपद की पदप्ररूपणा कीगई है उसका क्या प्रयो- जन है क्योंकि-सूत्रों में निरर्थक वचन कोई भी नहीं होता फिर इन के कयन 'करने का प्रयोजन क्या है इस प्रकार से शिष्य के पूछने पर गुरु कहने लगे कि ( एयाएणणेगमववहाराणं अपयपरूवणाए भंगसमुकित्तणयाकीरइ ) इन नैगम और व्यवहार नय के मत से जो अर्थपद की प्ररूपणा कीगई है वे सर्व भंगों की समुकीर्तन वाम्ते ही है अर्थात् इनके द्वारा भंगों की समुत्कीर्तनता कीजात. है अतः इन दोनों नयों के द्वारा भंग बनाए जाते हैं।
* अनुयोगद्वार सूत्र * ( ५५ ) भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय के मत में अर्थपद की प्ररूपणा इस प्र- कार से की गई है त्रि प्रदेशी से लेकर अनंत प्रदेशी पर्यन्त द्रव्याआनुपूर्वी में गिना जाता है और परमाणु पुद्गल अणाणु पूर्वी में होता है द्विप्रदेशी स्कंध अवक्तव्य संज्ञक कहलाता है एक वचनान्त से और वहुवचनान्त से इनके पद् भंग बन जाते हैं जैसे कि-नीचे पहिये. आनु पूर्वी अनानु पूर्वी अवक्रव्य १ १ . ३ और इन्हीं नेगम और व्यवहार नयके मत से भंगो की समुत्कीर्तनता की जाती है अर्थात् उक नयों द्वारा ही भंग बनाए जाते हैं । अब भंगो का स्वरूप निम्न प्रकार से सूत्रकार प्रति पादन करते हैं. ॥ अथ भंग समुत्कीर्तन विषय ॥ सेकित्तं णेगम ववहाराणं भंगसमुक्त्तिणया २ अस्थिप्रा- गुपुव्वी १ अस्थि अणाणुपुब्बी २ अस्थि अवत्तव्वए ३ अस्थि आणुपुब्बी ३ ४ अत्थि श्रणाणुपुब्बी ३ ५ अत्थि अवत्तव्य याई ६ अहवा अस्थि प्राणु पुब्बीयः। प्रणाणु पुब्बी७ अहवा अस्थि भाणु पुवीय प्रणाणु पुवीय ८ अहवा अस्थि प्राणु पुब्बीनीय प्रणाणुपुत्वीय अहवा त्थि प्राणु पुवीरोय प्रणा णु पुचीश्रोय १० अंहवा अस्थि प्राणु पुब्बीय अवत्तव्वएय ११ अहवा अस्थि प्राणु पुव्वीय अवत्त याइंच १२ अहवा अस्थि माणु पुचीसोय अवत्तव्वएय १३ अहवा अत्थि प्राणुपुवी- ( ५६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * ओयं श्रवत्तव्वयाइंच १४ अहवी अस्थि प्रणाणु पुवीय श्र- वत्तव्बएय १५ अहवा अत्थि प्रणाणु पुब्बीय अवत्तब्बयाइंच १६ अहवा अस्थि अणाणु पुवीभोय अव्वतव्वएय १७ अहवा अत्थि प्रणाणु पुवीअोय अवत्तव्वयाइंच १८ अहवा अस्थि प्राणु पुवीय अणाणु पुवीय अवत्तव्वएय १६ अहवा अस्थि आणुपुव्वीय प्रणाणुपुवीय अवत्तव्वयाइंच २० अहवा अस्थि प्राणुपुवीय प्रणाणु पुवीभोय अवत्तव्बएय २१ अंहंवा अस्थि प्राणु पुवीय प्रणाणु पुवीभोय अंवत्तव्ययाइंच २२ अहवा प्राणु पुब्बीअोय अपाणु पुब्बीय अवत्तव्बएय २३ अहवा अत्थिाणु पुवीभोय प्रणाणु पुवीय अवत्तव्वयाइंच २४ अहवा अत्थिाणु पुवीउय अपाणु पुव्वीभोय अवत्तव्य एय २५ अहवाअत्थिाणु पुवीभोय अणाणु पुवीभोय अवत्त बयाइंच २६ एए अभंगाएवं सब्बे विछब्बी संभंगा सेत्तणे. गम वपहाराणं भंग समुकित्तणया एयारणंणे गमववहाराणं भंग समुक्त्तिणयाएकिं पोयणं एयारणे गमववहाराणं भंग समुकित्तणयाए भंगो बदसंणया कीरइ । पदार्थ-(सेकिंतणे गमववहाराणं भंगसमुक्तित्तणया २)शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! नैगम और व्यवहार नय के मत से भंग समुत्कीतर्न कैसे होता है गुरु कहते हैं कि भी शिष्य ! नैगम और व्यवहार नय के मत से षट् विशति भंगों की समुत्कीर्तना होती है जो निम्नलिखितानुसार है ( अत्थि- आणुपुत्री ) जो अर्थपदका पूर्व विवर्ण किया गया है उस द्रव्य से २६ भंग- होते हैं जैसे कि-एक पुद्गल भानुपूर्वी का है १ (अस्थि अणाणु पुची) एक अनानुपूर्वी का है २ (अत्थि अवत्तव्वए ) ऐक अवक्रव्य का है ३ फिर ( अत्थि आणुपुन्वीओ) बहुत से पुद्गल आनुपूर्वी के है ४ अत्थि अणाणुपुवीओं बहुत से पुद्गल अनानुपूर्वी के हैं ५ (अस्थि अवत्तव्बयाई) बहुत से पुहूल * अनुयोगदार सूत्र * ( ५७ ) अवक्तव्य के हैं ६ अब विकसंयोगी १२ भंग कहते हैं जैसे कि- (अहवा अत्यि श्रायुपुब्बी य अणाणुपुब्बी य) अथवा एक अानुपूर्वी एक अना- नुपूर्वी है ७ ( अहवा अत्थि श्राणुपुब्बी अणाणुपुब्बीओ य) अथवा एक आनु- पूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी है ८ (अहवा त्यि आणुपुचीओ य अणाणुपुलीय) अथवा बहुत से आनुपूर्वी एक मानानुपूर्वी है है ( अहवा अत्थि आणुपुच्ची ओ य अणाणुपुचीओ य ) अथवा वदुत से आनुपूर्वी और बहुत से अनानुपूर्वी दन्य हैं १० किन्तु जो ऊपर श्रानुपूर्वी भनानुपूर्वी लिखी है वे इन के अन्तर्गत द्रव्य ही समझने चाहिए-अथ आनुपूर्वी और प्रयक्रव्य के साथ चार भंग बनते है जो निम्न लिखितानुसार ( अहुवा अस्थि आणुपुब्बी य अन्वत्तए य ) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य और एक ही अवक्तव्य द्रव्य ११ (अहवा अत्यि आणुपुब्बी य अवतन्बयाई च ) अथवा एक आनुपुर्वी और बहुत से अबकव द्रव्य हैं १२ (अहवा आत्थ आणुपुबीओं य भवत्तबए य ) अथवा बहुत से श्रानुपूर्वी द्रव्य और एक अवक्तव्य द्रव्य है (अहवा अस्थि आणुपुवाओ य अवत्तब्धयाइंच) अथवा बहुत से आनुपूर्वी ब- हुव से ही अवक्तव्य द्रव्य १४ यह चतुभंग और आनुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य के साथ हुए अब अनानुपूर्वी और अवक्रव्य द्रव्य के साथ चार भंग दिखलाए जाते हैं ( अहया अस्थि अणाणुपुच्चीय अवत्तव्वए य ) अथवा एक अनानुपूर्वी गतद्रव्य और एक अवक्तव्य द्रव्य है १५ (अहवा अस्थि अणाणुपुवीय अव- तन्वयाई च ) अथवा एक अनानुपूर्वी बहुत से प्रवक्तव्य द्रव्य हैं १६ ( अहवा भत्यि प्रणालीयो य अवतन्त्रए य ) अथवा बहुत से अनानुपूर्वी एक अ- नाव्य १७ ( अहवा अत्यि अणाणुपुब्बीओ य अवचन्चयाइं च ) अथवा बहुत से अनानुपूर्वी द्रव्य और बहुत से प्रवक्तव्य १८ यह सर्व एकत्र करने से दिक- संयोगी द्वादश भंग हुए अब त्रिकसंयोगी भंग का विवर्ण करते हैं ( अहवा अस्थि आणुपुन्बी य अणाणुपुची य अवत्तव्चए य) अथवा एक द्रव्य आनुपूर्वी एक अनानुपूर्वी एक अवतव्य १६ (अहवा अत्यि प्राणुपुबी य प्रणाणुपुची य अवतन्वयाइं च ) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य एक अनानुपूर्वी द्रव्य बहुत से अवक्रव्य द्रव्य २० (अहवा अस्थि आणुपुबीय अण्णाणुपुब्बीआय अवचन्बए य) अथवा एक आनुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी एक अवतव्य २१ ( अहवा अत्थि आणुपुची य प्रणाणुपूबीओ य अवचन्बयाई च) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य और बहुत से अनानुपूर्वी और बहुत से अवकन्य २२ ( अहवा अस्थि आणु * अनुयोगद्वार सूत्र * पुबीओ य आणुपुवी य अवत्तवए य ) अथवा बहुत से प्रानुपूर्वी एक अनानु- पूर्वी और एक अवतव्य २३ अहवा ( अस्थि आणुपुचिओ य अणाणुपुच्ची य अवत्तव्बयाईच ) अथवा बहुत से प्रानुपूर्वी द्रव्य एक अनानुपूर्वी और बहुत से अवक्तव्य द्रव्य २४ ( अहवा अस्थि आणुपुव्वीओ य अणाणुएबीओ य अवत्तव्य- ए य ) अथवा बहुत से आनुपूर्वी द्रव्य बहुतसे अनानुपूर्वी एक अवक्तव्य २५ ( अहवा आणुपुष्वीओ य अणाणपुव्वीओ य अवत्तव्बयाई च) अथवा बहुत से आनुपूर्वी बहुत से अनानुपू और बहुत से अवक्तव्य द्रव्य २६ (एए अह भंगा.) यह त्रिकसंयोगी अष्टभंग हैं ( एवं सब्चे बिछवासं भंगा) अपि शब्द समुच्चयार्थ में है सो यह सर्व एकत्रित करने से पद् विंशति भंग होते हैं जैसे कि-एक वचनान्त और बहुवचनान्त पर भंग द्विकसंयोगी द्वादश भंग हैं तीन संयोगी ८ भंग हैं सो (सेत्तं णेगम वत्रहाराणं भंग समुक्तिणया ) यह नैगम और व्यवहार नय के मत से भंग समुकीर्तना पूर्ण हुई-एसे कहने पर शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! (एयाएणगंगमववहाराणं भंग समुक्तिणयाए कि पोयणं) इन नैगम और व्यवहार नय के मत से जो भंग समुकीर्तनता है सो इस के करने से क्या प्रयोजन है-ऐसे शिष्य के प्रश्न को सुन कर गुरु कहने लगे कि (एयाए णेगमववहाराणं भंग समुक्त्तिणयाए भंगोवदसणया कीरई ) भो शिष्य ! इस नैगम और व्यवहार नय के मत से और भंगो को समुकीर्तनता से भंगोपदर्शनता की जाती है अर्थात् प्रथम भंग बनाकर फिर दिखलाए जाते हैं। भावार्थ:-नैगम और व्यवहार नय के मत से भंगों की समुकीर्तनता की. जाती है (गणना) सो सर्व भंग पद् विंशति होते हैं जैसे कि-आनुपूर्वी द्रव्य ? अनानुपूर्वी द्रव्य २ अचक्तव्य द्रव्य यह तीन प्रकार के द्रव्य हैं इनके एक बच- नान्त और बहुवचनान्त करने से पद् भंग होजाते हैं और द्विसंयोगी द्वादश भंग हैं तीन संयोगी अष्ट भंग हैं सर्व एकत्रित करने से पद् विंशति भंग बन जाते हैं इनकी पूर्ण गणना पदार्थ में लिखी गई है इसी का नाम समुकीर्तनता है अब सूत्रकार भंगोपदर्शनता क विषय में कहते हैं। 'मूल-सेकिंतं ऐगमववहाराणं भंगोवदंसणया १२तिपए. सिए प्राणुपुव्वी. १ परमाणुप्रोग्गले अणाणुपुबी दुपएसिए * भनुयोगद्वार सूत्र * अवत्तव्बए ३अहवा तिपएसियाानुपुब्बीयो परमाणुपोग्गला प्रणाणुपुवीरो दुपएसिया अवत्तव्वयाइं ३ अहवा तिपए- सिया परमाणुपुग्गले अप्राणुपुब्धीअप्रणाणुपुब्बी अ १ चट- भंगो अहवा दुपएसिए तिपएसिए अ अणाणुपुवीअ अ अव- त्तवए य चउभंगो अहवा दुपएसिया य परमाणुपोग्गले अ. श्रबत्तवए य आणुपुवी ३ अहवा तिपयसिया य परमाणु पोग्गलाय प्राणुपुवीश्रो अणाणुपुबीनोय ४ अहवा तिपए सिए अदुपएसए अ आणुपुब्बी य अवत्तव्वए य ५ अहवा तिपएसिए यदुप्पएसिवाए श्राणुपुब्बी प्रवत्तब्धयाइंच ६अहवा तिपएसिधा य आणुपुब्बी अप्रवत्तव्वगाइंच ७ अहवा तिपए सिया दुपएसिए अप्राणुपुब्बीअोश्रअवत्तव्वएअअहवा तिपए सिवाय दुपेयसिए अप्राणु० अवतब्बए अ अहवा तिपएसि- याय दुपएसियाय प्राणु० अवत्तब्धयाइं च ८ अहवा परमाणु पोग्गले अदुपएसिए प्रणाणु० अवत्तव ए अअहवा परमाणु पोग्गले अन्दुपएसिया एअणाणु अवत्तव्वयाई च १० अहवा परमाणु पोग्गला य दुपएसिए अश्रणाणु० अवत्तव्बए अ ११ महवा परमाणुपोग्गला य दुपएसित्राय प्रणाणु० अवत्तव्व- याइंच १२ ग्रहवा तिपएसिए श्र परमाणु पोग्गल अदुपए सिए अप्राणपुवी अप्रणाणु अवत्तव्बए श्री अहवा तिपए सिए अपरमाणुपोग्गले य दुपएसिया य श्राणुपुवी अवं- त्तव्बयाई च २ अहवा तिपएसिए अ परमाणुपुग्गले य दुपए सियाय श्राणपुवी अप्रणाणुपुवीयोअभवत्तए अ३अहवा तिपएसिए अ परमाणुपोग्गला य दुपएसिए अ आणुपुब्बीय (६०) * अनुयोगद्वार सूत्र * प्रणाणुपुब्वीश्रो अवत्तव्वए अ४ अहवा तिपएसिए अपरमाणु पोग्गलाय दुपएसियाय प्राणुपुव्वीअश्राणुपुषीनो अअव- तब्बए अ५ अहवा तिपएसिया यपरमाणु पोग्गले अदुपए- सिए अप्राणुपुत्वीयोअश्रणाणुपुवीओअश्रवत्तव्वयाई च ६ अहवा तिपएसिवाय परमाणुपोग्गले अदुपएसिाय प्राणु पुचीअो अणाणुपुवी श्रवत्तव्वयाइं च ७ अहवा तिषए सिवाय परमाणुपोग्गले अाए दुपएसिया यशाणुपुवीयो अणाणुपुव्वीओ भवत्तव्वयाइं च ८ से तं नेगम ववहाराणं भंगोवदंसणया ॥ पदार्थ-(सेकित नेगमववहाराण भंगोवंदसणया २ ) (प्रश्न) नेगम और व्यवहार नय के मत से भंगोपदर्शनता किस प्रकार से होती है ( उत्तर) नैगम और व्यवहारनय के मत से भंगोपदर्शनता और भंगो का अर्थ निम्न प्रकार से है जैसे कि (तिपएसिए आणुपुन्नी) तीन प्रदेशिक स्कंध को आनुपूर्वी द्रव्य कहते हैं १ ( परमाणुपोन्मले अणायुपुची ) परमाणु पुद्गल को अनानानु- पूर्वी द्रव्य कहते हैं २ ( दुप्पएसिए अवत्तबएय) द्विपदेशिक स्कंध को अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं यह तीन भंग एक वचनान्त हैं, अब तीनों भंग बहु वच- नान्त कहते हैं यथा (तिपएसियाई आणुपुबीउ ) बहुत से तीन प्रदेशिक स्कंध अनुपूर्वी द्रव्य हैं ४ ( परमाणु पोग्गला अणाणुपुब्बीउ ) बहुत से परमाणु पुद्गल अनानुपूर्वी द्रव्य हैं ५ ( दुप्पएसियाईअवत्तन्वयाई ) बहुत से द्वि प्रदे- शिक स्कंध अवक्तव्य हैं ६ यह तीन भंग बहुवचनान्त हैं एवं सर्व पद् भंगहुए अथ द्विकसंयोगी द्वादश भंगो का विवर्ण किया जाता है । अहवातिपएसिए य परमाणुपोग्गले आणुपुत्वीय अंणाणुपुवीए य ) अथवा एक तीन प्रदेशिकस्कंध और एक परमाणु पुद्गल यदि एकत्व होजाय तो तब उनको आनुपूर्वी और अनानुपूर्वी कहते हैं ७ इसी प्रकार अग्रे भी संभावना करलेनी चाहिये ( अहवा तिपएसिय परमाणुपोग्गलाय आणुपुचीय प्रणाणुपुबीउ य )अथवा एक तीन प्रदेशिक स्कंध और बहुत से परमाणु पुद्गल उनको आनुपूर्वी और बहुत से अनानुपूर्वी द्रव्य कहते हैं ८ (अहवा तिपएसियाय परमाणुपोग्गले आणुपुब्बीउ य से * अनुयोगदार सूत्र * भणाणुषुम्बीय) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कंध और एक परमाणु पुद्गल उनको बहुत भानुपूर्वी एक अनानुपूर्वी द्रव्य कहते ६ (अहवा तिपए सियाय परमाणु पोग्गलाणं आणुपुबीउ प्रणाणुपुच्चीउ य ) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कंध और बहुत से परमाणु शुद्गल उनको बहुत से प्रानुपूर्वी औ- र बहुत से अनानुपूर्वी द्रव्य कहते हैं १० ( अहवा तिपएसियाय दुपएसिय आएपुचीउ अवतन्वय ) अथवा रहुत से ३ प्रदेशिक स्कंध एक द्वि प्रदेशिक स्कंध उसे बहुत से आनुपूर्वी एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं ११ । अहवा तिपए सिय दुप्पएसिया य आणंपुन्बीय अवतन्वयाई च) अथवा एक ३ प्रदेशिक कंघ यदुत से दि मदेशिक स्कंध उन आनुपूर्वी और बहुत से अवक्तव्य द्रव्य कहते है १२ ( अहवा पिएसिया य दुपएसिय आणुपुब्बीउ य अवत्तन्वयए). भयवा बहुत से ३ प्रदशिक स्कंध और एक द्वि प्रदेशिक स्कंध उसे बहुत से आनुपुत्री और एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं १३ ( अहया तिपएसियाय दुप्पए सियाय भाणुपुचीय भवत्तवयाइंच ) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कन्ध और बहुत से द्वि प्रदेशिक स्कंध उन्हें बहुत से आनुपूर्वी द्रव्य और बहुत से अवतन्य द्रव्य कहते हैं १४ ( अहवा परमाणु पोग्गलेय दुपए सि- रच अणाणुपुत्री य अवतन्वया य ) अथवा एक परमाणु पुद्गल और एक द्वि प्रदशिक स्कंध उसको एक अनानुपूर्वी और एक प्रवक्तव्य द्रव्य कहते है १५ ( अहवा परमाणु पोग्गले य दुपएसिया य अणाणु पुत्री य अवतन्वयाइंच) अथवा एक परमाणु पुद्गल और बहुत से द्विप्रदेशिक स्कंध व एक अनानुपूर्वी बहुत से अवक्तव्य ट्रम्प कहाते हैं १६ ( अहवा पर- माणु पोग्गलाय दुपएसिएय श्रणाणुपुन्नीउ अवतन्बएय ) अथवा बहुत से परमाणु पुद्गल एक द्विपदेशिक स्कंध उन्हें बहुत से अनानुपूर्वी एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं १७ ( अहवा परमाण पोग्गलाय दुप्पएसियाय आणुपुब्बीउ य श्रवत्तव्ययाई च) अथवा बहुत से परमाणु पुद्गल और बहुत से द्विपदशिक स्कंध उनें बहुत से अनानुपूर्वी और बहुत से अवक्रव्य द्वन्य कहते हैं १८ (श्र- हवातिपएसियय "परमाणु पोग्गले" दुपएसिए य आणुपुच्ची य अणाणुपुची य अवनव्यय) अथवा एक तीन मदेशिक स्कंध एक परमाणु पुद्गल एक द्विम- देशिक स्कंध उन्हें एक भानुपूर्वी एक अनानुपूर्वी एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं १६ (अात्रा विपरसिय परमाणुपोग्गलेय दुपएसिया य भायुपुत्री य अशाणुपुब्बी ( ६२ ) * अनुयोगदार सूत्र य अवत्तब्धयाइंच ) अथवा एक तीन प्रदोशक स्कंध और एक परमाणु पुद्गल बहुत से द्विपदेशिक स्कंध उन्हें एक आनुपूर्वी एक अनानुपूर्वी बहुत से प्रवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २० ( अहवा तिपएसिय य परमाणुपोग्गला य दुपएसिए य आ- पुच्ची य अण्णाणुपुब्बीउ अवतब्बए य ) अथवा एक तीन प्रदेशिक स्कंध बहुत से परमाणु पुद्गल एक द्विपदेशिक स्कंध उन्हें एक प्रानुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी एक प्रवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २१ ( अहवा तिपएसिए य परमाणुपोग्गला य दुपए सिया य आणुपुवी य अणाणुपुव्वीउ य अवतव्ययाई च) अथवा एक ३ प्रदेशिक स्कंध बहुत से परमाणु पुद्गल बहुत से द्विपदोशक स्कंध उन्हें एक आनुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी बहुत से अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २२ ( अहवा तिपएसियाय परमाणु पोग्गले य दुप्पएसिए य आणुपुब्बीउ य अणाणपुची य अवत्तच्च य) अथवा बहुत से तीन मदेशिक स्कन्ध एक परमाणु पुद्गल एक द्विपदेशिक स्कन्ध उसे बहुत से आनुपूर्वी एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २३ (अहवा तिपएसिया य पर- माणुपोग्गले य दुप्पएसिया य आणुपुबीउ य अणाणुपुन्वी य अवत्तन्वयाई च) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कन्ध एक परमाणु पुद्गल बहुत से द्विप्रदेशिक स्कन्ध उन्हें बहुत से आनुपूर्वी एक अनानुपूर्वी और बहुत से अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २४ (अहवा तिपएसिया य परमाणुपोग्गला य दुप्पएसिए य आणु पुचीओ य अनानुपुन्वीओ य अवत्तव्यए य) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कन्ध बहुत से परमाणु पुद्गल एक द्विपदेशिक स्कन्ध उन्हें बहुत से आनुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी एंक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २५ (अहवा तिपएसियाय परमाणु पोग्गलाय दुप्पएसियाय आणुपुब्बीउ य अणाणुपुब्बीउ य अवत्तव्बयाई च) अथवा बहुत से ३ प्रदेशिक स्कन्ध बहुत से परमाणु पुद्गल बहुत से द्विपदेशिक स्कन्ध उन्हें बहुत से श्रानुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी बहुत से अवक्तव्य द्रव्य क. हते हैं २६ ( से नेगम ववहाराणं भंगोवदंसया) अब इसकी पूर्ति कहते हैं, यही नैगम और व्यवहार नय के मत से भंगोपदर्शनता है । भावार्थ-भंगोपदर्शनता उसका नाम है जो पूर्व भंग बनाए गये थे उन को अर्थों में संयोजन करना वही भंगोपदर्शनता है जैसे कि कल्पना करो कि-एक तीन प्रदेशिक स्कंध है, एक परमाणु पुद्गल है तब उनको बहुत से भानुपूर्वी द्रव्य एक अनानुपूची द्रव्य ऐसे कहा जाता है इसी प्रकार सर्व भंग जान लेने * अनुयोगदार सूत्र * ( ३ ) जो उपर हिन्दी पदार्थ में लिखे गये हैं यह सर्व समास नैगम और व्यवहारनय के मत से होता है सो भव नैगम और व्यवहारनय के मत से समवतार का वर्णन किया जाता है। ॥ अथ समवतार दार विपय ।। मूल-सेकिंतं समोयारे ऐगमववहासणं आणुपुब्बी दवाई कहिं समोयरति किं श्राणुपुवीदव्वे समोयरंति अणाणुपुब्बीदव्वे हिं समायति अवत्तब्बयदव्वेहिं समोयरति गमववहाराणं ग्राणुपुबीदव्बाई आणुपुवीदव्वेहिं समोयरंति को अपाणुपु- ब्बी दबेहिं समोयरंति जो अव्वत्तव्वयदव्वेहि समोयरंति एवं प्रणाणुपुबीदव्वाइं अवत्तव्वय दव्वाणि विसठाणे समो- यारेयवाणि सेत्तं समोयारे ।। पदार्थ-(सेकिंत समोयारे २ णेगमवहाराणं ) शिष्य ने प्रश्न किया कि, हे भगवन् ! नंगम और व्यवहार नय के मत से समवतार कैसे होता है-अथवा (आणुपुच्ची दवाई कहिं समायरंति ) आनुपूर्वी द्रव्य कहां पर समवतार होते हैं (किं आणुपुची दबेहि समोयरंति)क्या प्रानुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होते हैं अर्थात् वे स्वजाति में गर्भित होते हैं वा प्रणाणुपुच्ची दबेहिं समोयरंति ) अनानुपूर्वी द्रव्यों में समयतार होते हैं अथवा ( अवतन्बय दवहिं समोयरंति) भवक्तव्य द्रव्यों में समवतार होते हैं ऐसे शिष्य के पूछने पर गुरु कहते हैं कि (गमववहाराणं आणुपुच्ची दवाई प्राणुपुत्री दबेहिं समोयरंति ) नैगम औ- र पवहारनय के मत से श्रानुपूर्वी द्रव्य श्रानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होते हैं किन्तु (णो अणाणुपुत्री दहिं समोयरंति ) अनानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार नहीं होते हैं (णो अवक्रव्यय दहि समोयरंति ) अवक्तव्यप्रव्यों में समवतार नहीं होते ( एवं अणाणु पुची दयाई ) इसी प्रकार अनानुपुर्वी द्रव्य और (अत्तव्यय दन्याणिपि ) अबक्तव्य द्रव्य भी (सठाणे समोयारे यवाणि संतंस- मोयार ) स्वस्थानों में समवतार होते हैं यही समवतार द्वार का वर्णन है : भावार्य-नगम और व्यवहारनय के मत से जो आनुपूर्वी द्रव्य है वे स्वस्था- "* अनुयोगद्वार सूत्र * नों में ही गर्भित होते हैं अर्थात् जिस जाति का जो द्रव्य है वे अपनी जाति में ही रहता है अथवा उसकी गणना उसकी जाति में की जाती है उसी का नाम समवतार द्वार हैं। ॥अथ अनुगम विषयं ॥ सेकिंत अणुगमें २ नवविहे पएणते तंजहा संतपयप रूवणया १ दव्वपमाणं च २ खेत्तं ३ फुसणाय ४ कालो य ५ अंतरं ६ भाग ७ भाव ८ अप्पाबहुंचेव ६ सेकिंतं ऐगम ववहाराणं संतपयपरूवणया प्राणुपुब्बीदवाइंकि अस्थि नस्थिति नियमा अस्थि एवं दोनिवि १ नेगमववहाराणं आणुपुब्बी दवाई. किं संखेज्जाई असंखेज्जाइं अताई नो संखेज्जाइं नो असंखेज्जाइं अपंताई एवं दोनिवि ॥२॥ पदार्थ:-(सेकिंतं. अनुगमे २) (प्रश्न ) अनुगम- किसे कहते हैं (उत्तर) अनुगम (नवविहे. पं० १०) नव प्रकार से प्रतिपादन किपा गया है. अनुगम उसका नाम है जो सूत्रानुसार व्याख्या कीजाए अथवा जिसके द्वारा अर्थों का पृथक् २ बोध हो, उसे अनुगम कहते हैं वे नव प्रकार से निम्न लिखितानुसार है, (संतपयपरूवणया) विद्यमान पदों की प्ररूपणा करनी अर्थात् सत्रूप प- दार्थों का विवर्ण किन्तु असत् रूप खरशृंगवत् नहीं हैं १ (दव्ययमाणं चं) द्रव्यों का प्रमाण २ (खेत्तं ) क्षेत्रद्वार ३ (फुसणाय ) स्पर्शनाद्वार ४ (कालोय) कालद्वार ५ ( अन्तर) अन्तरद्वार ६ (भाग) भागद्वार ७ (भाव) भावद्वार (अप्पाबहुचेव ) अल्प बहुत्वद्वार यह निश्चय ही नवद्वार है (सेकिंतं. प्रेगम चवहाराणं संतपयपरूवणया) ( प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के मत से ( आणुपुव्वी दवाई कि अस्थि नस्थिति.) आनुपूर्वी द्रव्यों की अस्ति है किम्बा- नास्ति है. गुरु कहते हैं (नियमा अस्थि एवं दोनिवि ) निश्चय ही अस्ति है है इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्यों की भी निश्चय ही अस्ति है।।१।। गम ववहाराणं आणुपुच्ची दव्वाई) नैगम और व्यवहार नय के मत से आनु पूर्वी द्रव्य (किं संखेज्जाइं असंखेज्जाई अणंताई.) क्या संख्यात पद वाले हैं * अयोगद्वार भूत्र * या असंख्यात अथवा अनन्तपद वाले हैं। गुरु कहते हैं ( णो संखेज्जाई हो - संखन्नाई अणंताई एवं दोनिवि ) अानुपूर्वी द्रव्य उक्त नयों के मत से संख्यात असंख्यात नहीं है केवल अनन्त है इसी प्रकार अनानुपूर्वी द्रव्य और अवक्तव्य द्रव्य भी अनन्त है ॥२॥ भावार्य-अनुगम नव प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि विद्यमान पदों की प्रसाणा १ द्रव्यों का परिमाण २ क्षेत्र ३ स्फर्शना ४ काल ५ अन्तर ६ भाग ७ भाव शल्प बहुत्व । सो मथम द्वार में नंगम और व्यवहार नय के मनसे नीनों द्रव्यों की सदैव काल अस्ति हैं फिर नैगम और व्यवहार नय के मन से तीनों द्रव्य अनंत है अपितु संख्यात वा असंख्यात नहीं है ।। अथ क्षेत्र हार विषय । मूल-गमववहाराणं श्राणुपुब्बीदव्बाई लोगस्सका भागे होज्जा किं संखिज्जाइंभागे होज्जा असंखेन्जाइंभागे होज्जा, संखेन्जेनु भागे होज्जा असंखेज्जेसु भागे होज्जा सब्बलोएसु होज्जा? एगं दब्बं पडुच्च संखेज्जइंभागे वा होज्जा श्रमखेजहभागे वा होज्जा संखेज्जेसु भागेसु वा होज्जा असंखज्जेसु भागेतु वा होज्जा सबलोए वा होज्जा नाना दबाई पडच नियमा सव्वलोए वा होज्जा ऐगमववहाराणं अणाणुपुवदिव्वाइं कि लोगस्स संखेन्जइंभागे होज्जा श्रसंखेन्जहभागे होज्जा संखेज्जेसु भागेसु होज्जा असंखेज्जे- सु भागेसु होज्जा सब्बलोए होज्जा?, एगं दब्बं पडुच्च नो, सं- जहभागे होज्जा असंखेज्जहभागे होब्जा नो संखेज्जेसु भागे- सु होज्जा नो असंखेज्जेमु भागेसु होज्जा नो सव्वलोए होज्जा नाणा दवाई पडच नियमा सव्वलोए होज्जा, एवं अवत्तव्य गदबाणिवि।
* अनुयोगद्वार सूत्र * पदार्थ-( नेगमववहाराणं ) नैगम और व्यवहारनय के मत से (आणुपुम्ची दवाई लोगस्सकइ भागे होज्जा ) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! जो आनुपूर्वी द्रव्य हैं वे लोक कितने भाग में होते हैं ( किं संखिजाइंभागे होज्जा असंखेज्जाइंभागे होज्जा ) क्या लोक के संख्यात भाग में होते हैं अथवा ( संखज्जेसु भागे होज्जा असखेज्जे भागे होज्जा ) बहुत से संख्यात भागों में होते हैं वा बहुत से असंख्यात भागों में होते हैं अथवा (सब्बलो एसु होन्जा) सर्व लोग में होते हैं इस प्रकार के शिष्य के पूंछने पर गुरु कहने लगे कि भो- शिष्य ( एगं दव्वं पडुच्च ) एक आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा ( संखेज्जेइभागे वा होज्जा) लोक के संख्यात भागमें भी होते हैं अथवा (असंखज्जइ भावे होज्जा) असंख्यात भाग में भी होते हैं वा (संखेज्जेसु भागेसु वा होज्जा) बहुत से संख्यात भागों में भी होते हैं अथवा ( असंखज्जेसु भागेसु वा होज्जा ) बहुत से असंख्यात भागों में भी होते हैं अथवा (सव्वलोएवा होज्जा)सर्व लोक में भी होते हैं जैसेकि श्रीकेवली भगवान् के समुद्घात के समय आनुपूर्वी द्रव्य सर्व लोक में होजाते हैं किन्तु समुद्धात की स्थिति केवल अष्ट समय प्रमाण मात्र है और यह उन तीनों अंक केवली समुद्धात की अपेक्षा से कहे गये हैं अपितु (नाणा दबाई पडुचनियमा सव्वलोए होज्जा ) नाना द्रव्यों की अपेक्षा नियम से सर्व लोक में होते हैं यह सर्व गुरु का उत्तर आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से है, अब शिष्य आनानुपूर्वी द्रव्य की पृच्छा करता है जैसे कि ( नेगमववहाराणं) नैगम और व्यवहार नय के मत से (अनानुपुच्ची दवाई कि लोगस्स संखेज्जइ भागे होज्जा) शिष्य पूंछता है कि हे भगवन् अनानुपूर्वी द्रव्य क्या लोक के संख्यात भाग में होते हैं अथवा ( असंखेज्नइभागे होज्जा ) असंख्यात भाग में होते हैं अथवा (संखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से संख्यात भागों में होते हैं वा ( असंखेज्जे- सु भागेसु होज्जा ) बहुत से असंख्यात भागों में होते हैं (सब्बलोए होज्जा) अथवा सर्व लोक में होते हैं गुरु कहने लगे कि ( एगं दव्वं पदुच्च ) एक द्रव्य की अपेक्षा ( नो संखेज्जइभागे होज्जा ) लोक के संख्यात भाग में नहीं होते क्योंकि अनानुपूर्वी द्रव्य एक परमाणु पुद्गल का नाम है (असंखेज्जइभागे होजा) अपितु लोक के असंख्यात भाग में होता है किन्तु (नोसंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से संख्यात भागों में नहीं होता ( नोअसंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से १ सेसत्तोदो दुहिहिंतो लुकू । इस सूत्र से पंचमी लोप होगई है।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (६७ ) असंख्यात भागों में नहीं होते क्योंकि केवल एक परमाणु है(नो सबलोएहोज्जा) और नाही सर्व लोक में होते हैं किन्तु ( नाणादवाई पडुच्च ) नाना द्रव्यों की अपेक्षा ( नियमा सबलोए होजा) निश्चय ही सर्व लोक में होते हैं । एवं अ- बत्तबगदवाणिवि ) इसी प्रकार प्रवक्तव्य द्रव्य भी जानलेने चाहिये जैसे कि अनानुपूर्वी द्रव्य का विवर्ण किया गया है । भावार्थ:-नगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य लोक के संख्यात भाग में वा असंख्यात भाग में अथवा बहुत से संख्यात भाग में वा असंख्यात भाग में अथवा बहुत से संख्यात भागों में और बहुत से असंख्यात भागों में होता है अथवा सर्व लोक में भी हो जाता है (केवली भगवान की समुद्घात की अपेक्षा यह विवर्ण केवल एक द्रव्य की अपेत्ता से है, किन्तु नाना द्रव्यों की अपेक्षा से यह द्रव्य निश्चय ही सर्व लोक में होते हैं । नैगम और व्यवहार नय के मत से अनानुपूर्वी एक द्रव्य लोक के केवल असंख्यात भाग में होता है किन्तु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा यह द्रव्य निश्चय ही सर्व लोक में होते है सा इसी प्रकार अवनव्य द्रव्य के स्वरूप को भी जान लेना चाहिये ।। ॥ अथ स्पर्शना द्वार विषय ।। मूल-णेगमववहाराणं प्राणुपुब्बीदव्वाइं लोगसा किं संखेज्जइभागं फुसंति असंखज्जइभागं फुसंति संखेज्जा सुभागे फुसंति असंखज्जइसुभागे फुसंति सव्वलोग फुसंति एग दव्यं पड्डुच्च लोगस्स संखेज्जइभाग वा फुसइ असंखेज्जइ भागं वा फुसन्ति संखज्जेवाभागं फुसन्ति असंखेज्जेवाभागे फुसन्ति सबलोगं वा फुसन्ति नाणादवाइं पडुच्च नियमा सबलोगं फुसन्ति । पदार्थ:-(गम क्वहाराणं ) नगम और व्यवहार नय के मत से (आणु- पुची दन्वाई ) श्रानुपूर्वी द्रव्य (लोगस्स किं संखेज्जइ भागं फुमति ) क्या लोक के संख्यात भाग को स्पर्श करते है अथवा ( असंखेज्जइ भागे फुसंति) असंख्यात भाग को स्पर्श करते हैं ( संखेज्जइ सुभागे फुसंति ) अथवा बहुत (६) * अनुयोगद्वार सूत्र * से संख्यात भागों को स्पर्श करते हैं वा (अंसंखेजेसु भागे फुसति) बहुत से असंख्यात भागों को स्पर्श करते हैं अथवा ( सच लोगं फुसंति ) सर्व लोक को स्पर्श करते हैं । शिष्य के ऐसा पूंछने पर गुरु कहने लगे कि (एगं दच्च पड्डच्च लोगस्स संखेज्जइ भागं वा फुसंति ) एक आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से लोक के संख्यात भाग को स्पर्श करता है ( अथवा असंखेज्जइ भागं वा 'फुसंति ) असंख्यात भाग को स्पर्श करता है अथवा( संखज्ज वा भागे फुसत्ति) अथवा आनुपूर्वी द्रव्य बहुत से संख्यात भागों को स्पर्श होते है अथवा ( असं- खज्ने वा भागे सु फुसंति ) बहुत से असंख्यात भागों को स्पर्श होते हैं अथवा ( सन्च लोगं वा फुसंति ) सर्व लोक को भी स्पर्श होते हैं यह कंचल एक द्रव्य की अपेक्षा से है किन्तु (नाणा दबाई पडुञ्च नियमा सच लोगं फु- संति ) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से निश्चय ही, सर्व लोक को स्पर्श होते हैं। भावार्थ-एक श्रानुपूर्वी द्रव्य लोक के संख्यात वा असंख्गत अथवा बहुत से संख्यात भाग वा बहुत से असंख्यात भागों को अथवा सर्व लोक को स्पर्श होता है किन्तु नाना प्रकार के आनुपूर्वी द्रव्य सर्व लोक को स्पर्श करते हैं। अथ अनानुपूर्वी विपय । णेगमववहाराणं प्रणाणुपुरी दव्वाणं पुच्छा एगंद: व्वं पडुच्च नो संखेज्जइभागं फुसइ असंखज्जाभागं कुसंति नो संखेज्जे भागे फुसंति नो असंखेज्जे भागे फुसंति नो सब. लोगं फुसंति नाणादव्वाइं पड्डुच्च नियमा सबलोगं फुसति एवं अवंतव्वगदवाणिवि भाणियवाणि । पदार्थ-(णेगमववहाराणं) नैगम और व्यवहार नय के मत ( से अणाणु पुची दव्वाणं पुच्छा) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! अनानुपूर्वी द्रव्य लोक के कितने भाग को स्पर्श होता है, गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! ( एग दव्वं पहुच्च ) एक द्रव्य की अपेक्षा से (नो संखेज्जइभाग फुसइ) " लोक के संख्यात भाग को स्पर्श नहीं करता अपितु (असंखेज्जइ भाग फुसति) * अनुयोगद्वार सूत्र * असंख्यात भाग को स्पर्श करता है किन्तु ( नो संखेज्जभार्ग फुसंति ) बहुत. संख्यात भागों को स्पर्श नहीं होते नाही (नो असंखज्जेभागं फुसंति) लोक के बहुत से असंख्यात भागों को स्पर्श होते हैं (नो सव्वलोगं फुसंति) किन्तु सर्व लोक को भी स्पर्श नहीं होते यह केवल तो एक द्रव्य की अपेक्षा है किन्तु (नाणा दबाई पडुच्च ) नाना प्रकार के द्रव्यों की.अपेक्षा से सर्व लोक को स्पर्श होते हैं ( एवं अवत्तव्यगदवाणि विभाणि यचाणि ) इसी प्रकार अवक्तव्य द्रव्य भी कथन करने चाहिये। भावार्थ-भनानुपूर्वी द्रव्य और अवक्तव्य द्रव्य केवल लोक के असंख्यातवें भाग को ही स्पर्श करते है शेष भागों को स्पर्श नहीं होते । अथ स्थिति द्वार विषय । मूल-णेगमववहाराणं श्राणुपुब्बीदवाई कालो केव चिरं होइ ?, एगं दव्यं पड्डुच्च जहरणेणे एगं समयं उक्कोसेणं असंखज्ज कालं नाणादव्वाइं पडुच्च सव्वद्धा एवं दोनिवि । पदार्थ-(णेगमववहाराणं ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् नैगम और व्यवहार नय के मत से (श्राणुपुव्वी दवाई कालओ केवचिरं होइ ) श्रानुपूर्वी द्रव्य काल से कंवतक रह सकता है अर्थात् एक आनुपूर्वी द्रव्य काल की अपेक्षा सकिनने चिर की स्थिति युक्त होता है, इस प्रकार पूछने पर गुरु कहने लगे कि भो शिष्य ! (एगं दव्वं पडुच्च जहन्नेणंएगं समयं उक्कोसेणं असंखेनं कालं) एक द्रव्य की अपेक्षा से जघन्य (न्यून से न्यून ) एक समय प्रमाण स्थिति होनी है उत्कटकाल की अपेक्षा असंख्यात काल पर्यन्त स्थिति करता है अ- र्थात् यदि एक आनुपूर्वी द्रव्य एक ही स्थान पर स्थिति करे तो उत्कष्ट काल असंख्यात काल पर्यन्त स्थिति कर लेता है किन्तु (नानादब्याई पडुच्च निय- मा सम्बद्धा) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा नियम से सर्व काल में रहते हैं क्योंकि नाना प्रकार के जो पानुपूर्वी द्रव्य है वे सदाकाल ही रहते हैं इसलिये उनकी अपेक्षा श्रानुपूर्वी द्रव्य सदा विद्यमान है ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी द्रव्य और अवनव्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये । भावार्थ-तीनों द्रव्यों की स्थिति जघन्य एक समय प्रमाण उत्कष्ट असं- (७०) * अनुयोगद्वार मूत्र * ख्यात काल पर्यन्त है नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा सदा ही विद्यमान रहते हैं। अथ अन्तर दार विषय । मूल-णेगमववहाराणं आणुपुव्वी दव्वाणं कालो के वंचिरं अंतर होइ?,एगं दव्वं पडुच्च जहरणेणं एगं समयं उक्को सेणं अणंतं कालं नाणादवाइं पड्डुच्च नत्थि अंतरं । गमव- वहाराणं अणाणुपुत्वीदव्वाणं कालत्रो केवइयं अंतर होइ? एगं दव्वं पडुच जहरणेणं एगं समयं उक्कोसणं असंखेज्जं कालं नाणादव्वाई पडुच्च नस्थि अंतरं । ऐगमववहाराणं अवत्तव्यय दवाणं कालो केवंचिरं अंतर होइ? एगं दव्वं पडुच्च जहणणे- एं एगं समयं उक्कोसेणं अणंतं कालं नाणादवाई पडुच्च नत्थि अंतर होइ ॥६॥ पदार्थ-( गमववहाराणं आणुपुचीदव्याणं कालओ केवंचिरं अंतरं (प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के मत से श्रानुपूर्वी द्रव्यों का काल की अपेक्षा से कितने काल पर्यन्त अंतर होता है अर्थात् भानुपूर्वी द्रव्यों. का अन्तर काल कितना है ( उत्तर ) (एगं दव्यं पडुच्च जहरणेणं एग समयं उक्कोसेणं अणतं कालं ) एक आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून एक समय मात्र अंतर काल होता है उत्कृष्ट अनंत काल पर्यन्त अंतर काल होता है जैसे कि-एक द्रव्य अब आनुपूर्वी द्रव्य की व्यवस्था में हैं किन्तु वह आनु- पूर्वी भाव को छोड कर अन्य भाव को प्राप्त होगया यदि वह फिर आनुपूर्वी द्रव्य के भाव को प्राप्त हो जाय तो जघन्य एक समय के पीछे हो जाय उत्कृ- टता से अनन्त काल पीछे आनुपूर्वी द्रव्य को प्राप्त होवे इसी प्रकार सर्व द्रव्यों की सम्भावना कर लेनी चाहिये किन्तु (नाणादबाई पडुच्च नत्थि अंतरं) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अन्तर काल नहीं होता क्योंकि वे सदैव काल विद्यमान रहते हैं (णेगमववहाराणं अणाणुपुच्ची दवाणं काल- ओ केवइयं अंतर होइ) (प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के मत से अनानु- . * अनुयोगद्वार सूत्र * (७१) पूर्वी द्रव्यों का अंतर काल कितना होता है ( उत्तर ) एग दव्वं पडुच जह रणं एगं समयं उकोसणं असंखेज्ज कालं ) एक अनानुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून एक समय मात्र अंतर काल होता है उत्कष्ट असंख्यात काल प्रमाण अंतर काल कथन किया है अंतरं काल का अर्थ प्राग्वत् जान लेना किन्तु (नानादबाई पडुध नत्थि अंतरं) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से मंतर काल नहीं होता (अंगमववहाराएं अवत्तव्ययदवाणं कालो केवइ चिरं होइ) (प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के मत से अवक्तव्य द्रव्यों का फाल की अपेक्षा से कितना चिर अंतर काल है ( उत्तर ) एगं दबं पडु- च जहएणणं एगं समय उधोसेणं गणंतं कालं) एक प्रवक्तव्य द्रव्य की अ. पेक्षा से न्यून से न्यून एक समय मात्र अंतर काल उत्कृष्ट अनंत काल पर्यन्त अन्तर काल होता है किन्तु (नाणादचाई पडुच्च नस्थि अंतर ) जो अबक्तव्य द्रव्य नाना प्रकार के हैं उन्हों की अपेक्षा से अंतर काल नहीं होता है क्योंकि वे सदैव काल विद्यमान रहते हैं। भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय मतसे पानुपूर्वी द्रव्यों का जघन्य एक समय उलए अनंतकाल पर्यन्त अंतर फाल होता है किन्तु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा अंतर काल नहीं है और अनानुपूर्वी द्रव्यों का अंतर काल न्यून से न्यून एक समय प्रमाण उत्कृष्ट असंख्यात फाल पर्यन्त अंतर काल होता है क्योंकि असंख्यात काल. प्रमाण परमाणु पुद्गल की स्थिति है और नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अंतर काल नहीं होता है अपितु प्रवक्त- व्य द्रव्यों व अंतर फाल जघन्य एक समय उत्कृष्ट अनंत काल प्रमाण रहता है नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा अंतर काल नहीं होता क्योंकि प्रवक्तव्य द्रव्य सदा विद्यमान रहते हैं। श्रथ भाग द्वार विपय । मूल-णेगमववहाराणं प्राणुपुब्बीदव्वाई सेसदव्वाणं कहभागे होज्जा कि संखेज्जड़भागे होज्जा असंखेज्जइभागे होज्जा संखज्जेसु भागेसु होज्जा असंखेजेसु भागेसु होज्जा नो संखेज्जइभागं होज्जा नो असंखेज्जइभागे होज्जा नो संखेज्जेसु भागेसु होज्जा नियमाप्रसंखेज्जेसु भागसु होज्जा ( ७२ ) * अनुयोगद्वार मूत्र * नेगमववहाराणं अणाणुपुब्बी दवाणं पुच्छा असंखेज्जइ भागे होज्जा सेसेसु पडिसेहा एवं प्रवत्तबगदम्बाणिवि ॥७॥ पदार्थ-(णेगमवमहाराणं आणुपुन्नी दबाई सेसदवाणं कहभागे होना) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य शेप द्रव्यों ( अनानुपूर्वी द्रव्य और अबक्तव्य द्रव्य ) के कितने भाग में होता है (किं संखेज्जइभागे होज्जा असंखेन्जइभागे होज्जा ) क्या उन के संख्यात भाग में वा, असंख्यात भाग में अथवा (संखे- ज्जेसु भागेसु होजा ) बहुत से संख्यात भागों में होता है वा (असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से असंख्यात भागों में होता है गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! ( नो संखजइभागं होजा) संख्यात भाग में नहीं होता (नो असंखज्जइभागं होज्जा) और असंख्यात भाग में भी नहीं होता (नो संखे- ज्जइसु भागेसुं होज्जा) नाहीं बहुत से संख्यात भागों में होता है किन्तु (नियमा असंखेज्जइसु भागेसु होज्जा) नियम से अर्थात निश्चय ही बहुत से असंख्यात भागों में होता है क्योंकि आनुपूर्वी द्रव्य तीन प्रदेशी से लेकर अनंत प्रदेशी पर्यन्त हैं। वे अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य से भसंख्यात गुण अधिक हैं इस लिये सूत्र में कयन किया गया है कि उक्त दोनों द्रव्यों से प्र- संख्यात गुणाधिक आनुपूर्वी द्रव्य हैं (णेगमक्वहाराणं अणायुपुच्ची दन्या- णं पुच्छा ) नैगम और व्यवहार नय के मत से अनानुपूर्वी द्रव्यों का भी शि- व्य ने पृच्छा की गुरु ने उत्तर में कहा कि (असंखज्जइभागे होज्जा सेसेसु पहिसेहा ) आनुपूर्वी द्रव्य से अनानुपूर्वी द्रव्य असंख्यात भाग में होता है, शेष प्रश्नों का निषेध किया गया है जैसे कि संख्यात भाग असंख्यात बहुत से संख्यात भाग वा बहुत से असंख्यात भाग इत्यादि ( एवं अवतन्य गद- या णिवि ) इसी प्रकार अवक्तव्य द्रव्य के भी स्वरूप को अनानुपूर्वीवद् जा. नना चाहिये। भावर्य-नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्य और अवक्तव्य द्रव्य से असंख्यात गुणाधिक हैं क्योंकि तीन प्रदेशी से लेकर अनंत प्रदेशी स्कंध पर्यन्त सर्व आनुपूर्वी द्रव्य हैं किन्तु अनानुपूर्वी द्रव्य और अबक्तव्य द्रव्य यह दोनों ही द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्य के असंख्यात भाग में होते हैं अर्थात् असंख्यात भाग न्यून है ।
* अनुयोगद्वार मूत्र * ( ७३ ) अथ भाग द्वार विषय । नेगमववहाराणं आणुपुब्बीदव्याई कतरंमि भावे होज्जा? किं उदइए होज्जा उवसमिय भावे होज्जा खइए भावे होज्जा वयोवसमिए भावे होज्जा पारिणामिए भावे होज्जा सन्निवाइय भावे होज्जा ? नियमा साइयपारिणामिए भावे होज्जा एवं दोनिवि ॥८॥ पदार्थ-(गमवहाराणं आणुपुची दवाई कयरंमि भावे होज्जा ) (प्रश्न) नंगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य कौन से भाव में होता है जैसे कि (किं उदइए भाव होज्जा ) क्या उदय भाव में होता है ( उत्सपिए भाव होज्जा ) उपशम भाव में होता है (खइए भाव होज्जा) अथवा सायिक भाव में होता है या (खश्रावसमिए भाये होज्जा ) क्षयोपशम भाव में होता है वा (परिणामिए भाव होज्जा ) पारिणामिक भाव में होता है अथवा ( सन्निवाइय भाषे होजा) सन्निपान भाव में होता है.गुरु ने उत्तर दिया कि ( नियमा साइयपारिणामिण भाव होज्ना) नियम से (निश्चय ही) सादि पारिणामिक भाव में होता है अर्थात् जिसकी आदि है और परिणमन शील है उसी का नापा सादि पारिणामिक भाव होता है ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी अवलव्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये । भावार्थ-पट भावों में सादि पारिणामिक भाव में आनुपूर्वी द्रव्य होता है । क्योंकि श्रानुपूर्वी द्रव्य परिणमन शील होता है इसीलिये उसका नाम सादि पारिणामिक भाव है। ॥अथ अल्प वहुत्व विषय ।। एएमिं भंते ! णेगमववहाराणं प्राणुपुबीदव्वाणं श्रणाणुपुब्बीदवाणं अवत्तव्वगदव्वाणं य दवट्ठयाए पए. सट्टयाए दवट्ठपएसट्टयाए कयरे कयरोहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ? गोयमा! सबथोवाइं गमववहा .
( ७४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * राणं अवत्तव्यगदव्वाई दवट्ठयाए अणाणुपुब्बीदव्वाई दबट्टयाए विसेसाहियाई आगापुब्बीदव्वाइं दवट्ठयाए असंखेज्जगुणाई पएसट्ठयाएं सव्वत्थोवाइं ऐगमववहाराणं अणाणुपुब्बीदव्वाई अपएसट्टयाए अवतव्वगदव्वाइं पए सट्टयाए विसेसाहियाई प्राणुपुब्बीदव्वाइं पएसट्टयाए अणं- तगुणाई दबट्ठपएस्सट्टयाए सबथोवाइं गमववहाराणं अवत्तव्यगदव्वाइं दवट्ठयाए १ अणाणुपुब्बीदव्बाई दव्वट्ठ- याए अपएसट्टयाए विसेसा हियाइं २ अव्वत्तवगदम्बाई पए सट्टयाए विसेसाहियाइं ३ आणुपुब्बीदव्वाइं दबट्टयाए असंखेज्जगुणाई ४ ताई चेव पएसट्टयाए अणंतगुणाई ५ सेनं अणुगमे सेत्तं गमववहाराणं प्रपोवणिहिया दवाणु पुवी॥ पदार्थः-(.एएसिणं भंते णेगम ववहाराणं आणुपुत्री दवाणं) हे ! भग- वन् यह नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्यों की (अणाणुयुधी दवाणं) अनानुपूर्वी द्रव्यों की ( अवत्तव्यगदवाणं) और अवक्तव्य द्रव्यों की (दबयाए ) द्रव्यार्थिक से (पएसष्टयाए ) प्रदेशार्थिक से और (दन्व- द्रुपएसहयाए ) द्रव्य और प्रदेशार्थिक से ( कयरे २ हितो ) सो किन २ से ( अप्पा वा) अल्प अथवा (वहुपा वा ) बहुत्व (तुल्ला वा )तुल्य अथवा (बिसे- साहिया वा) विशेषाधिक द्वार है अर्थात् यह द्रव्य परस्पर तुल्य हैं वा विशेषा- धिक हैं वा अल्प हैं वा बहुत्व हैं । इस प्रकार प्रश्न करने पर भगवान् कहने लगे कि ( गोयमा ) हे गौतम ! (सर्वत्योबाई ) (णेगमववहाराणं) नंगम और व्यवहार नय के मत से सर्व द्रव्यों की अपेक्षा से प्रवक्तव्यद्व्यस्तोक है ( अवचध्वगदव्याई दवट्टयाए ) || ( अणाणुपुचीदवाई दवट्टयाए विसेसा हियाई ) किन्तु अनानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थिक से विशेषाधिक हैं (आणुपुब्बी १ स्तोकस्य थोक्यो वयवाः । प्राकृत व्याकरण पाद २ सू० १२५ स्तोक.शब्दस्य एतेभय यादेशा भवंति बा। . .
) * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ७५ ) दबाई देवष्ठयाए) असंखज्जगुणाई) आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्याथै से असंख्यात गुण हैं (पएसट्टयाए ) अपितु प्रदेशार्थिक से ( सव्वत्थोवाई ) सर्व से स्तोक (अंगमववहाराणं ) नैगम और व्यवहार नय के मत से (अणाणुपुबी द- ब्वाई अपएमट्टयाए') अनानुपूर्वी द्रव्य अमदेशार्थ की अपेक्षा से हैं और ( अ- बतच्चगदम्बाइं पएसयाण विसेसाहियाई ) अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशार्थिक से वि- शेपाधिक है किन्तु प्राणुपुत्रीदवाई पएसध्याए अणंतगुणाई ) आनुपूर्वी द्रव्य प्रदेशों की अपेक्षा से अनंत गुण है अपितु (दबपएसध्याए सम्बत्यो- वाई ) द्रव्य और प्रदेशों की अपेक्षा से सर्व से स्तोक (गयववहाराणं अ. वत्तव्यग दबाई दबयाए १) अवतव्य प्रव्य हैं अर्थात् नैगम और व्यवहार नय के मत से द्रव्य और प्रदेशों की अपेक्षा से अवनव्य द्रव्य सर्व से स्तोक है किन्तु (अणाणुपुचीदवाई दबट्याए अपएसध्याए विसेसाहियाई ) अ. नानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से अप्रदेशों की अपेक्षा से विशेषाधिक हैं २ ( अव- तबग दबाई पपसच्याए बिसेसाहियाई) अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशार्थक से वि- शाधिक हैं ३ (आणुपुच्चीदव्यांइ ढवठ्याए असंखज्जगुणाई ) आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्याथैक से असंख्यात गुण हैं ४ ( ताईचेव पएसट्टयाए अणंतगुणाई) आनुपूर्वी द्रव्य से प्रदेशों की अपेक्षा वे द्रव्य अनंत गुण हैं (सेत्तं अनुगमे ) यही समास अनुगम का है इसीलिये इसे अनुगम कहते हैं (सेत्तं गमववहा- राणं अणावणिदिया दन्वाणुपुची ) अब नंगम और व्यवहार नय. से अनुप- निधि द्रव्यानुपूर्वी का सपास सम्पूर्ण हुआ सो इसे ही अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी महत ॥ भावार्थ-नगम और व्यवहार नय से आनुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी. द्रव्य अ. वक्तव्य द्रव्य न्यार्थक और प्रदेशार्थक नयों के मत से निन्न प्रकार से उक्त द्रव्य न्यूनाधिक हैं ।। नैगम और व्यवहार नय के मत से द्रव्यार्थक से सर्व से म्तांक अवक्तव्य द्रव्य है और अनानुपूर्वी दव्य द्रव्यार्थक से विशेपाधिक हैं और आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थिक से असंख्यात गुणाधिक है फिर नैगम और व्यवहार नय के मव से अमदेशार्थक भाव से सर्व से स्तोक अनानुपूर्वी द्रव्य है क्योंकि एक परमाणु का नाम अनानुपूर्वी है और प्रदेशों की अपेक्षा से अवक्रव्य द्रव्य विशेषाधिक है किंतु अानुपूर्वी द्रव्य अनंत गुणाधिक हैं श्रतः दोनों की अपेक्षा से नंगम और व्यवहार नय के मत से द्रन्य और प्रदेशों की अपेक्षा (७६) * अनुयोगद्वार सूत्र * सर्व से स्तोक द्रव्यार्थक से अवक्तव्य द्रव्य है १ अनानुपूर्वी द्रव्य और प्रदेशों की अपेक्षा से विशेषाधिक २ बहुत से अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशार्थक से विशेषा- धिक हैं ३ बहुत से आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से असंख्यात गुणाधिक हैं ४ और प्रदेशों की अपेक्षा से वे द्रव्य अनंत गुणाधिक हैं ५. इसी का नाम अनु- गम द्वार है सो नैगम और व्यवहार नय के मत से अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी का समास सम्पूर्ण हुआ । अथ संग्रह नय के विषय । सेकिंतं संग्गहस्स अणेवणिहिया दवाणुपुती २ पंच विहा पं० २० अठ्ठपयपरूवणया १ भंगसमुकित्तणया २ भंगो- वदंसण या ३ समोयारे ४ अनुगमे ५ ॥ पदार्थः-( सेकिंत संग्गहस्स अणोवणिहिया दवाणु पुन्बी २ पंचविहा पं० तं० ) ( प्रश्न.) संग्रह नय के मत से अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी कितने प्रकार से वर्णन की गई है ( उत्तर ) पांच प्रकार से जैसे कि-(अट्ठपयपरूवणया.) अर्थ- पद की प्ररूपणा १ ( भंगसमुक्त्तिणया) भंगसमुत्कीर्तनता २ (भंगोरदसणया) 'भंगोपदर्शनता ३ (समोयारे) समवतार ४ और (अणुगम) पंचम अनुगम || भावार्थ-संग्रह नय के मत से अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी पांच प्रकार से वर्णन की गई है जैसे कि-अर्थपद प्ररूपणा १ भंग समुत्कीर्तनता २ भंगोपदर्शनता ३ न्समवतार ४ और अनुगम ५। अथ प्रथम भेद विषय । सेकिंतं संग्गहस्स अपयपरूवणया?, २तिपएसिया प्रा- णुपुब्बी जाव अणंतपएसिया प्राणुपुब्वी परमाणुपुग्गले अ- पाणुपुव्वी दुप्पएसिया अवन्त्तवग सेत्तं संग्गहस्स अपयपरू- वणया एयाए णं संग्गहस्स अट्ठपयपरूवणयाए किं पयोयणं एयाए णं संग्गहस्स अट्ठपयपरूवणयाए संग्गहस्स समुक्त्ति- एया कीरइ ॥ ५३॥ पदार्थ-(सेकित संग्गहस्स अपयपरूवणया २ तिपए सिया आणुपुच्ची A * अनुयोगद्वार सूत्र *. नाव अणत पएसिया माणुपुची ) ( प्रश्न ) संग्रह नय से अर्थपद मरूपणा किसे कहते हैं (उत्तर) जो तीन प्रदेशिक स्कंध से लेकर अनन्त भदेशिक स्कंध पर्यन्त द्रव्य हैं वे सर्व प्रानुपूर्वी संज्ञक द्रव्य हैं और (परमाणु पोग्गले श्रणाणुपुन्नी) परमाणु पुद्गल अनानुपूर्वी द्रव्य है (दुपएसिया अवत्तव्यए) द्विमदेशिक स्कंध अवतव्य द्रव्य है (सेत्तं संग्गहस्स अपएपख्वणयाए) अथान- तर से इसी का नाम अर्थपद प्ररूपणा है किन्तु ( एयाए, संग्गहस्स अपय पस्वणयाए कि पयोयणं ) इस संग्रह नय से जो अर्थपद प्ररूपणा कथन की गई है इस का प्रयोजन ही क्या है इस प्रकार के प्रश्न पूछने पर गुरु कहने लगे कि ( एयाए णं संग्गहस्स अपयपख्वणयाए भंगसमुकित्तणया कीरइ ) इस संग्रह नय से अर्थपद की प्ररूपणा करने से भंग समुत्कीर्तनता की जाती है यही इसका मुख्य प्रयोजन है। भावार्थ-संग्रहनय के मत से अर्थ पद प्ररूपणा उसका नाम है. जो तीन प्रदेशी द्रव्यों से लेकर अनन्त प्रदेशी द्रव्य पर्यन्त पुद्गल है वह सर्व आनुपूर्वी द्रव्य कहा जाता है जो परमाणु पुद्गल है उसका नाम अनानुपूर्वी द्रव्य है अतः जो द्विपदेशिक स्कंध है वह अवक्तव्य द्रव्य संज्ञक द्रव्य है और जो अर्थ पद प्ररूपणा संग्रहनय के मत से कीगई है उसका मुख्य प्रयोजन भंग समुत्कीर्तन करना ही है। अथ भंगसमुत्कीर्तनता विपय । सेकिंतं संग्गहस्स भंगसमुक्त्तिणया ? २ अस्थि आणु गुब्बी १ अत्थि प्रणाणुपुब्बी २ अत्थि अवत्तव्बए ३ अहवा अस्थि प्राणुपुब्बी अणाणुपुब्बी य ४ अहवा अत्थि प्राणु पुब्बी अवत्तब्बए य ५ अहवा अस्थि प्रणाणुपुब्बी य अवत्त- बए य ६ श्रवा अत्थि प्राणुपुव्वी य प्रणाणुपुब्बी य अव- त्तव्वए य७ एवं पएसत्त भंगा सेत्तं संग्गहस्स भंगसमुकित्तणया एयाए णं संग्गहस्स भंगसमुक्त्तिणयाए किं पयोयणं ? एया- ए एं संग्यहस्स भंग समुकित्तणयाए. मंगोवदंसणया कीरइ॥ पदार्थ- सेकिन संग्गइस्स भंगसमुकित्तणया २) (प्रश्न ) संग्रहनय के ( ७८ ) * अनुयोगद्वारं सूत्र * मत से भंग समुत्कीर्तनता किसे कहते हैं ( उत्तर ) संग्रहनय से भंग समुत्कीत- नता निम्न प्रकार से है जैसे कि ( अत्थि आणुपुब्बी१) एक आनुपूर्वी द्रव्य १ (अत्थि अणाणुपुव्वी २) एक अनानुपूर्वी द्रव्य है २ (अस्थि अवतव्वए३) एक अवक्तव्य द्रव्य है ३ और द्विक संयोगी के ३ भंग है जैसे कि (अहवा अत्थि आणुपुवी अणाणुपुब्बी य ) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य एक अनानु- नुपूर्वी द्रव्य है ४ ( अहवा अत्थि आणुपुच्ची अवत्तव्यए य) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य एक अवक्तव्य द्रव्य है ५ ( अहवा अत्थि अणाणुपुन्धी य अव. त्तव्यए य ६) अथवा एक अनानुपूर्वी द्रव्य और एक अवक्तव्य द्रव्य यह दो संयोगी ३ भंग है किन्तु तीन संयोगी केवल एकही भंग होता है जैसे कि (अहवा अत्थि प्राणुपुब्बी य अणायुपुची य अवचचए य ) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य और एक अनानुपूर्वी द्रव्य और एक अवक्तव्य यह तीनों भंग एक वचनान्त हैं संग्रहनय के मत से बहुवचन नहीं होता है (एवं पयसत्तं भंगा) इस प्रकार से इन पदों के सांत भंग होते हैं (सेत्तं संग्गहस्स भंग समुकित्तणया) यह संग्रह नय से भंग समुत्कीर्तनता पूर्ण हुई ( एयाए णं सग्गहस्स भंग सम्मु- कित्तणयाए इस संग्रह नय के मत से भंग समुत्कीर्तना करने से (किं पयोयणं) क्या प्रयोजन है ? गुरु कहने लगे कि (एयाए णं संग्गहस्स भंग समुक्त्तिणयाए भंगोवदसणया कीरइ ) इस संग्रह नय के मत से भंग समुत्कीर्तनता करने से भंगोपदर्शनता की जाती है। भावार्थ-संग्रहनय के मत से भंग समुत्कीर्तनता के ७ भंग होते हैं जैसे कि तीन भंग, एक वचनान्त हैं और तीन अंग द्विक संयोगी हैं एक भंग तीनसंयोगी इनका पूर्ण विवर्ण पदार्थ में दिया गया है और इन का मुख्य प्रयोजन भंगो- पदर्शनता करना ही है। अथ भंगोपदर्शनता विषय । मूल-सेकिंतं संग्गहस्स मंगोवदंसणया ? २ तिपएसिया प्राणुपुन्वी १ परमाणुपोग्गला अणागुपुवी २ दुपएसिया अंवत्तव्वए ३ अहवा तिपएसिया परमाणुपोग्गला य आणु- पुन्वी य अणाणुपुब्बी य ४ अहवा तिपएसियाए दुपएसियाए प्राणुपुब्बीए अवत्तव्वए य ५ अहवा परमाणुपोग्गला य दुपए * अनुयोगद्वार मूत्र * ( ७६ ) सियाए प्रणाणुपुब्वी य अवत्ताए य ६ अहवा तिपएसियाए परमाणु पोग्गलेय दुपएसियाए प्राणुपुब्बी य प्रणाणुपुव्वी य अवत्तव्वए य ७ सेत्तं संग्गहस्स भगोवदसणया। पदार्थ-( सेकिंत संग्गहस्स भंगावदसणया) (प्रश्न ) संग्रह नय के मतसे भंगोपदर्शनता किसे कहते हैं ( उत्तर ) संग्रह नय से भंगोपदर्शनता निम्न प्रकार से है जैसे कि (तिपएसिया आणुपुब्बी) तीन प्रदेशिक स्कंध आनुपूर्वी . द्रव्य कहाता है १ ( परमाणु पोग्गल अणाणुपुन्नी) परमाणु पुद्गल का नाम अनानुपूर्वी द्रव्य है २ (दुपएसिया प्रयत्तव्वए) द्विभदेशिक स्कंध अवक्तव्य द्रव्य है ३ अथ द्विक संयोगी ३ भंग दिखलाते हैं-( अहवा तिपएसिया परमाणु पोग्ग- ला य आयुपुली य अणाणुपुबी य ४) अथवा यदि । तीन प्रदेशिक स्कंध और एक परमाणु पुद्गल इन दोनों का सम्बन्ध होवे तो उन को आनुपूर्वी और अनानुपूर्वी द्रव्य कहते हैं ४ ( अहवा तिपएसियाए दुपएसियाए आणु- पुचीए अवचन्चए ५ ) अथवा तीनदेशिक स्कंध और द्विसदेशिक स्कंध एकत्व होवे तब उनको आनुपूर्वी और अवकव्य द्रव्य कहते हैं ५ ( अहवा परमाणु पोग्गलयं दुपएसियाए प्राणुपुब्बी य अवत्तव्यए य ) अथवा परमाणु पुद्गल और द्विपदेशिक स्कंध मिल जाये तो आनुपूर्वी और अचंक्रव्य द्रव्य उन्हें कहत हैं ६ ( श्रवा तिपएसियाए परमाणुपोग्गल य दुपएसियाप प्राणपुचीय अणाणु- पुचीय अवत्तव्यए य ७) अथवा तीन संयोगी एक भंग होता हैं उसका विवर्ण किया जाता है जैसे कि-एक ३ पदेशिक स्कंध है और एक परमाणु पुद्गल है और एक २ प्रदेशिक स्कंध है यदि वे सर्व एकत्व हो जावे तो उन को श्रानुपूर्वी ट्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्य और प्रवक्तव्य द्रव्य कहते हैं ७ ( सेत्तं संग्गहस्स भंगोवदं- सणया) यही संग्रह नय के मत से भंगोपदर्शनता है और इसे ही भंगोपदर्श- नता कहते हैं। भावार्थ-भंगांपदर्शनता के विषय प्राग्वत् ही कथन है ३ भंग एक वचना- न्त है और तीन भंग द्विक संयोगी हैं और एक भंग तीन संयोगी है-इन्हीं का नाम भंगोषदर्शनता है इन का पूर्ण स्वरूप हिन्दी पदार्थ में लिखागया है । अथ समवतार विपय । सेकिंतं संग्गहस्स समोयारे ? २ संग्गहस्स प्राणुपुर्वी १८.) * अनुयोगद्वार सूत्र * दव्वाइं कहिं समोयरंति किं प्राणुपुतीदव्वेहि समोयरति ? प्रणाणुपुवीदव्वेहिं समोयरंति ? अवत्तव्वगदव्वेहिं समोय- रंति ? संग्गहस्स प्राणुपुवीदव्वाइं प्राणुपुत्वीदव्वेर्हि. समोयरंति नो अणाणुपुत्वीदव्वेहिं समोयरंति नो अवत्त- अवत्तव्वगदब्वेहि समोयरंति एवं दोनिवि सट्ठाणे समोयरंति सेत्तं समोयारे॥ पदार्थ-( सेकिंत संग्गहस्स समोयारे २ संग्गहस्स आणुपुवी दच्चाई कर्हि समोयरंति ) ( प्रश्न ) संग्रह नय के मत से समवतार किसे कहते हैं और प्रानु- पूर्वी द्रव्य किस द्रव्य में समवतार होते हैं (किं आणुपुची दव्वेहि समोयरति) क्या आनुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होते हैं ( अणाणुपुची दव्वेहिं समोयरंति) वा अनानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होते हैं ( अवत्तच्चग दबेहिं समोयरंति ) अथवा अवक्तव्य द्रव्यों में समवतार होते हैं (उत्तर) (संग्गहस्स आणुपुची. दमाई आणुपुब्धी दव्वेहि समोयरंति ) संग्रह नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्यों में ही समवतार होते हैं किन्तु ( नो अणाणुपुब्बी दहिं समोयरंति ) आनुपूर्वी द्रव्य अनांनुपूर्वी द्रव्यों में समक्तार नहीं होते (नो अव- तब्बगदव्वेहिं संमोयरंति ) न अवक्तव्य द्रव्यों में समवतार होते हैं अत: सिद्धं हुआ कि आनुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्यों में ही संभवतार होते हैं ( एवं दानिविसठाणे समोयरंति. सेत्तं समोयारे ) इसी प्रकार अनांनुपूर्वी द्रव्य और अवक्तव्य द्रग भी स्वस्थानों में ही समंवतार होते हैं अन्य द्रव्यों में नहीं इसी का नाम समवतार द्वार है। भावार्थ -समवतार द्वार उसी का नाम है जो द्रव्य हैं वे अपने २ स्थानों में ही समवतार (गर्भित ) होते हैं अन्य द्रव्यों में नहीं जैसे कि आनुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होता है इसी प्रकार अनानुपूर्वी द्रव्य और प्रवक्त- व्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये। अथ अनुगम विषय। सेकिंतं अणुगमे २ अट्टविहे पण्णत्ते तंजहा संत पयपरू- वण्या १ दन्वयमाणं च २ खित्त ३ फुसणया ४ कालोय ५ * अनुयोगद्वार मूत्र * ( ८१ ) अंतरं ६ भाग ७ आवे ८ अप्पावडं नत्थि १.संग्गहस्स प्राणु पुब्बी दबाई किं अस्थि नत्थि नियमा अस्थि एवं दोनिवि संग्गहस्स प्राणुपुब्बोदव्वाई किं संखिज्जाइं असंलेजाई श्रणंताई ? नो संखिज्जाई नो असंखेज्जाई नो अणं ताई नियमा एगो रासी एवं दोनिवि ।। पदार्थ-(सेकिंतं अणुगमे २ भठविहे पण्णते तंगहा) (प्रश्न ) अनुगम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है (उचर ) आठ प्रकार से जो निम्न- लिखितानुसार है (संतपयपरूवणया) विद्यमान पदार्थों की प्रति पादनता १ (दवपमाणं च ) द्रन्य प्रमाण और २ (खिच ३ ) क्षेत्रहार. (फुसणया ४ ) स्पर्शना द्वार ४ ( कालोया) कालद्वार ५ (अन्तरं ) अन्तर द्वार ६ ( भाग) भागद्वार ७ (भावे ) भावद्वार (अप्पा बहु नस्थि ) संग्रहनय के मत में अल्प वहत्व द्वार नहीं होता क्योंकि संग्रह नय के मत में सर्व द्रव्य एक रूप में ही रहते हैं (संग्गहस्स आणुपुन्नी दवाई किं अस्थि नत्थि) (अन्न) संग्रहनय के मत में श्रानुपूर्वी द्रव्य है किम्बा नहीं है (उत्तर) (नियमा अस्थि ) नियम से हैं अर्थान् निश्चय ही हैं ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अव- व्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये इसी का नाम विद्यमान पदार्थों की प्रतिपाद- नता है। अव द्रव्यों के ममाण विषय में करते हैं (संग्गहस्स आणुपुन्चीदवाई कि संखिजाई भसंखज्जाई अणंताई) (मन) संग्रहनय के मत से भानुपूर्वी द्रव्य क्या संख्यात है अथवा भसंख्यात हैं वा अनंत हैं ( उचर) (गो संखि- जाई नो असंखज्जाई नो अणंताई नियमा एगो रासी) संग्रहनय के मत से भानुपूर्वी द्रव्य संख्यात असंख्यात वा अनन्त नहीं हैं किन्तु नियम से ही एक राशि ( समूह ) है क्योंकि संग्रहनय द्रव्यों को अभेद रूप से मानता है सो (वं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और भवनम्प द्रव्य भी जानने चाहिये। भावार्य--अनुगम ८ प्रकार से कहा गया है जैसे कि विद्यमान पदार्थों की प्रतिपादनता १ इन्य प्रमाण २ क्षेत्र ३ स्पर्शना ४ काल ५ अंतर ६ भाग ७ और भाव ८ और संग्रह नय के मत से तीनों द्रव्यों की सदैव काल भस्ति भी है और द्रव्यों का प्रमाण संग्रहनय के मत से संख्यात असंख्यात वा अनन्त ऐसे भेद-रूप नहीं है केवल एक राशि रूप है।
( ८२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * अथ क्षेत्र द्वार विषय। संग्गहस्स आणुपुब्बीदव्वाइं लोगस्स कहभागे होज्जा ? कि संखेज्जइ भागे होज्जा असंखेज्जइ भागे होज्जा संखेज्जे सु भागेसु होज्जा असंखज्जेसु भागेसु होज्जा सव्वलोए. होज्जा ? संग्गहस्स प्राणुपुवीदवाई नो संखेज्जइभागे होज्जा नोअसंखेज्जइ भागे होज्जा नो. संखेज्नेसु भागेसु होज्जा नो असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा नियमा सव्वलोए होज्जा, एवं दोनिवि । पदार्थ-(संग्गहस्स आणुपुचीदव्याई लोगस्स कइ भागे होज्जा)(प्रश्न) संग्रहनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य लोक के कितने भाग में होता है (किं संखेन्जइ भागे होज्जा असंखेज्जइ भागे होज्जा) क्या लोक के संख्यात भाम में होता है वा असंख्यात भाग में होता है तथा ( संखेज्जेसु भागेसु होज्जा असंखज्जेसु भागेसु होज्जा )लोक के बहुत संख्यात भागों में होता है वा बहुत से असंख्यात भागों में होता है ( सव्वलोए होज्जा ) अथवा सर्व लोक में ही आनुपूर्वी द्रव्य होता है ( उत्तर ) नो संखेज्जइ भागे होना नो असंखज्जइ भागे होज्जा) आनूपुर्वी द्रव्य लोक के संख्यात भाग में नहीं होता और असंख्यात भाग में नहीं होता (नो संखेज्जेसु भागेसु होज्जानो असंज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से संख्यत भागों में नहीं होता वा बहुत से असंख्यात भागों में नहीं होता किन्तु (नियमा सव्वलोए होज्जा) नियम से (निश्चय ही) सर्व लोक में होता है क्योंकि संग्रह नय अभेद रूप द्रव्यों को मानता है। ( एवं दोनिवि) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये । भावार्थ-आनुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्य और श्रवक्तव्य संग्रह नय के मत से सर्व लोक में ही होते हैं। अथ स्पर्शना विषय। संग्गहस्स आणुपुवी दवाइं लोगस्स किं संखेज्जा भागं फुसंति असंखेज्जइ भागं फुसंति संखेज्जेसु भागे फुसंति * अनुयोगद्वार सूत्र * (८३) असंखेज्जे भागे फुसंति सव्व लोगं फुसंति ? नो संखेज्जइ भागे फुसंति जाव नियमा सव्वलोगं फुसंति एवं दोनिवि॥३॥ पदार्थ-(संग्गहस्स आणुपुचीदव्वाइं लोगस्सः किं संखेज्जइ भागे फुसंति असंखेज्जइ भागं फुसंति ).(प्रश्न.) संग्रह नय से आनुपूर्वी द्रव्य लोक के क्या संख्यातभाग भाग को स्पर्श होते हैं ( संखेज्जेसु भागेसु होज्जा असं- खेज्नेसु-भोगसु होज्जा) वहुत से संख्यात भागों को स्पर्श करते हैं अथवा बहुत से असंख्यात भागों को स्पर्श होते हैं तथा ( सव्वलोए फुसंति ) तथा सर्व लोक में स्पर्श होते हैं ( उत्तर ) ( नो संखेज्जइ भागं फुसंति जाव नियमा सबलोग फुसंति एवं दोनिवि ) संख्यात असंख्यात वा बहुत से संख्यात बहुत से असंख्यात भागों को स्पर्श नहीं करते केवल नियम से ही सर्व लोक को स्पर्श करते हैं क्योंकि जब संग्रह नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य सर्व लोक में हैं तव स्पर्श भी सर्व लोक को कर रहे हैं इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य. द्रव्य भी जानलेने चाहिये । भावार्य-संग्रह नय के मत से तीनों द्रव्य सर्व लोक को स्पर्श कर रहे हैं क्योंकि यह तीनों द्रव्य सर्व लोक में हैं इसीलिये सर्व लोक को स्पर्श कररहे हैं ।। ॥ अथ शेष द्वार विषय ॥ संग्गहस्स आणुपुवीदव्वाई कालो केवच्चिरं होइ नियमा सव्वद्धा एवं दोनिवि ५ सग्गहस्स आणुपुवीदब्वाई अन्तर कालो केवचिरं होह ? नत्थि अंतरं एवं दोनिवि ६ संग्गहस्स आणुपुवीदव्वाइं सेसदव्वाणं कहभागे होज्जा ? किं संखेज्जहभागे होज्जा अंसंखेज्जइभागे होज्जा-संखेज्जे सुभागेसु होज्जा असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा ? नो संखेज्जइ भागे होज्जा नो असंखेज्जइ भागे होज्जा नो संखेज्जेसु भागे सुहोज्जा नो असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा नियमातिभागे होज्जा एवं दोनिवि ॥ ७॥ .
+ (८४) * अनुयोगद्वार सूत्र * पदार्थ-(संग्गहस्स णाणुपुब्बी दवाई कालओकेवचिरं होइ) ( प्रश्न) संग्रह नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्यों का काल से अन्तर काल कब तक होता है अर्थात् परस्पर द्रव्यों का अंतरकाल का तक रहता है (उत्तर) (नत्यि अंतरं एवं दोनिवि ) अंत्तरकाल नहीं होता है क्योंकि यह द्रव्य सदैव काल वि- धमान रहता है और इसी प्रकार दोनों द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये ६ (संग्गहस्स आणुपुच्चीदवाई सेसदबाणं कइभागे होज्जा (प्रश्न ) संग्र- ह नय के मत से पानुपूर्वी द्रव्य, अनानुपूर्वी द्रव्यों के और अवक्तव्य द्रव्यों के कितने भाग में होता है (किं संखेज्जइ भागे होज्जा असंखेज्जइ भागे होज्ना) क्या संख्यात भाग में होता है वा असंख्यात भाग में होता है अथवा (संखेज्जे सुभागेस होज्जा असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से संख्यात भागों में होता है या बहुत से असंख्यात भागों में होता है (उत्तर) नो संखेज्जइ.भागे होजा) संख्यात भाग में नहीं होता (नो असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा)असंख्यात भागों में भी नहीं होता ( नो, संखेज्जे सुभागे सुहोज्जा ) बहुत से संख्यात भागों में नहीं होवा ( नो असंखेज्नेसु भागेसु होज्जा) बहुत से असंख्यात भागों में भी नहीं होता किन्तु (नियमा तिभागे होज्जा) नियम से तीन भागों में से एक भाग में होता हैं क्योंकि-संग्रह नय के मत से तीनों द्रव्य हैं सो आनुपूर्वी द्रव्य तीसरे भाग में होता है ( एवं दोनिवि) इसी प्रकार दोनों द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये। भावार्थ-संग्रहनय से आनुपूर्वी द्रव्यों का अंतर काल नहीं होता है और यह आनुपूर्दी द्रव्य दोनों द्रव्यों के तीसरे भाग में होता है क्योंकि संग्रहनय में तीन ही द्रव्य हैं सो यह तीसरे भाग में ही होता है । अथ भाव विषय । मूल-संगहस्स प्राणपुवीदव्वाई कयरंमि भावे होज्जा?, नियमा साइपारिणामिए भावे होज्जा एवं दोनिवि ८ अप्पाबहुं नत्थि सेत्तं अणुगमे सेत्तं संगहस्स अणोवणिहिया दवाणु- पुब्बी सेत्तं अणोवणिहिया दव्वाणुपुची। पदार्थ-(संग्गहस्स) माणुपुब्बीदवाई कयरंभि भावे होज्जा) (प्रश्न) संग्रनय से आनुपूर्वी द्रव्य कौनसे भाव में होते हैं (उत्तर) (नियंमासाइ पा- .
. * अनुयोगद्वार सूत्र * (८५) रिणामए भावे होज्जा नियम से सादि पारिणामिक भाव में होते हैं अर्थात् जो आदि सहित परिणमन शील है ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार दोनों द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये ( अप्पा बहुनत्थि ) संग्रहनय से अल्प वहुत्व नहीं होता है (सेसं अणुगमे ) यही अनुगम द्वार है (सेत्तं सग्गहस्स प्रो- वाणिहिया दवाणुपुष्वी से अणो वणिहिया दव्वाणपुव्वी) यही संग्रहनय से अनुपनिषि द्रव्यानुपूर्वी है अपितु अनुपनिषि द्रव्यानुपूर्वी का स्वरूप इस- स्थल पर ही सम्पूर्ण होगया है। भावार्थ-संग्रह नयसे आनुपूर्व्यादि द्रव्य सादि पारिणामिक भाव में रहते हैं और अन्य बधुत्व द्वार इस नय से नहीं होता है सो इस का नाम अनुगम है और संग्रहनय से अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी का यहां पर ही समास सम्पूर्ण होगया है। अथ उपनिधि का विषय । मूल-सेकिंतं उपणिहिया दवाणुपुवी ? २ तिविहा पं० २० पुव्वाणुपुब्बी पच्छाणुपुब्बी श्रणाणुपुब्बी सेकिंतं पुवाणु- पुब्बी २ धम्मत्थिकाए १अधम्मत्थिकाए २ श्रागासस्थिकाए ३ जीवत्यिकाए ४ पोग्गलत्थिकाए ५ अद्धासमय ६ सेत्तं पुवाणु पुब्बी सेकिंतं पच्छाणु पुवी ? २ श्रद्धासमय जावधम्मस्थिकाए सेत्तं पच्छाणुपुब्बी सेकिंतं अणाणु पुब्बी २ एयाए चेव एग- इयाएच्छ गच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नम्भासो दुरूवूणो सेत्तं श्रणाणुपुवी। पदार्थ- सेकित उचणिहिया दवाणुपुची तिविहा पं० ) (प्रश्न ) ( उप- निधि का द्रव्यानुपूर्वी किसे कहते हैं (उचर ) उपनिधि का द्रव्यानुपूर्वी तीन प्रकार से कथन की गई है जैसे कि ( दवाणुपुच्ची) द्रव्यानुपूर्वी (पच्छाणु पुची पथात् भानुपूर्वी और (अणाणुपुब्बी) अनानुपूर्वी ( सेकिंतं पुवाणु पुची ) ( प्रश्न ) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) पूर्वानुपूर्वी निम्न प्रकार से है जैसे कि-(धम्मत्यिकाय) धर्मास्तिकाय (महम्माथिकाय ) अधर्मास्तिकाय (भागासस्थिकाए ३)भाकाशास्तिकाय (जीवात्थकाए) जीवास्तिकाय ४ (पोग्ग- * अनुयोगद्वार सूत्र लस्थिकाय) पुद्गल अस्सिकाय ५ (अद्धासमय ६) काल द्रव्य (सेचं पुन्वाणपुची) यही द्रव्यों की पूर्वानुपूर्वी है ( सेकिंतं पच्छाणुपुच्ची २)(प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं जैसे कि- अद्धासमय जावधम्मत्थिकाय सत्तं पच्छाणुपुच्ची ) काल द्रव्य १ पुद्गलास्ति काय २ जीवास्तिकाय ३.आकाशास्तिकाय ४ अधर्मास्तिकाय ५ धर्मास्तिकाय ६ इस प्रकार से गणन करने की संख्या को पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं (सेकिंतं अणाणुपुब्बी. २ एयाए चेव एकादियाए छगच्छगयाए सेहीए अनमन्वम्भासो दुख्खुणो सेत्तं अणाणुपुव्वी) ( प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन्हीं षट् द्रव्यों की एक आदि से आरंभ कर पट् गच्छ रूप श्रेणी करली जावे फिर पद् श्रेणी में रहने वाले अंकों को परस्पर अभ्यास करके जो ७२. भंग होते हैं उन में से आदि और अन्त के दो रूप न्यून कर दिये जावें तव ७१८ भंग शेष रहते हैं इन्हीं का नाम अनानुपूर्वी है और यही अनानुपूर्वी का स्वरूप है। : भावार्थः-उपनिधि का द्रव्यानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन की गई है जैस कि-पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ द्रव्यों के स्वरूप को समीप करने के नाम को उपनिधि का द्रव्यानुपूर्वी कहते हैं सो पूर्वानुपूर्वी पदं द्रव्यों को अनुक्रमता पूर्वक गर्णन करने का नाम है पश्चात् आनुपूर्वी उन्हीं द्रव्यों को उल्था गणन करने का नाम है जैसे काल द्रव्य से लेकर धर्म द्रव्य पर्यन्त गिने जाए परन्तु अनानुपूर्वी के लिये एक से लेकर पट् पर्यन्त छै गच्छ रथापन करके (१, २, ३, ४, ५, ६) फिर इन्हों को परस्पर अभ्यास करके उनमें से दो अंक न्यून करने से अनांनुपूर्वी बनती है जैसे-( १, २, ३, ४, ५, ६ ) ये छै अंक स्थिति हैं इनको अन्यो अन्य परस्पर गुणाकार करो अर्थात् जरव दो तर (१४२४३४४+५+६) ऐसा रूप हुआ पुनः एक को दो गुणा किया तो दो एकमदो, तब दो सिद्ध हुआ फिर दो को ३ से गुणा करने पर २ तीया ६ अर्थात् (छै) ऐसे सिद्ध हुआ फिर ६ को ४ से गुणा किया जैसे ६ चौका चौबीस ( २४ ) पश्चात् २४ को ५ गुणा करने से अर्थात् २४ पांचे १२० अनन्तर १२० को ६ से गुणा किया तब १२० छिक्के ७२०, इस प्रकार समस्त भंग सिद्ध हुए. इन में से ( १ ) एक वाला अंक तो पूर्वानुपूर्वी है और ७२० वाला अंक पश्चात् प्रानुपूर्वी है अतः ७२० में से २ कम करने पर (७२०-२) ७१८ सात सौ अठारह शेष अंक रहे हुए हैं इनको अनानुपूर्वी कहते हैं!
* अनुयोगद्वार सूत्र * (६७) ॥ फिर उसी विषय ॥ श्रहवा उवाणिहिया दवाणुपुव्वी तिविहां पं० तं० पुव्वाणुपुत्वी पच्छाणुपुची अणाणुपुब्वी, सेकिंतं पुवाणु- पुवी ? २ परमाणुपोग्गले दुपएसिए निपएसिए जाव दस पएसिए संखेज्जपएसिए असंखेज्जपएसिए अपंतपएसिएं सेत्तं पुवाणुपुवूवी सेकिंतं पच्छाणपुची ? अणंतपएसिए असंखेज्जपएसिए संखेज्जपएसिए जाव . दसपएसिए जाव परमाणुपोग्गले सेत्तं पच्छाणुपुती ।। पदार्थ-(अहवा उवणिहिया दवाणुपुची तिविहा पं० तं) अथवा उप- निधि का द्रव्यानुपूर्वी तीनों प्रकार से प्रतिपादन की गई है जैसे कि-(पुवा- गुन्बी ) पूर्वानुपूर्वी (पच्छाणु पुची ) पश्चात् आनुपूर्वी ( अणाणुपुची) अनानुपूर्वी ( सेकिंतं पुवाणुपुत्री) (पन्न ) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उ. सर) पूर्वानुपूर्वी उसका नाम है जैसे कि-(परमाणुपोग्गले दुपएसिए तिपए सिए जावदसपएसिए) परमाणु पुद्गल द्विपदेशिक स्कंध तीन प्रदेशिक स्कंध यावत् दश प्रदेशिक स्कंध (संखेज्ज पएसिए असखेज्न पएसिए अणंत पएसिए सेतं पुन्वाणुपुची ) संख्यात प्रदशिक स्कंध असंख्यात प्रदशिकस्कंध और अनंतपदेशिक स्कंध यह सर्व पूर्वानुपूर्वी द्रव्य हैं क्योंकि अनुक्रमता पूर्वक गणन करने का नाम ही पूर्वानुपूर्वी है ( सकिंतं पच्छाणुपुची अणंतपएसिए असंखेज्ज पएसिए संखेज्ज पएसिए जाव दसपएसिए जाव परमाणु पोग्गले सेत्तं पच्छाएं पुब्बी) (प्रश्न ) पश्चात् प्रानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) पश्चात् आनुपूर्वी उसका नाम है जैसे कि-अनंत प्रदेशिक स्कंध असंख्यात प्रदेशिक स्कंध संख्यात प्रदेशिक स्कंध यावत् दश प्रदेशिक स्कंध से लेकर एक परमाणु पुद्गल पर्यन्त जो द्रव्य है इस प्रकार से गणना करने पर उसे पश्चात् श्रानुपूर्वी कहते हैं। भावार्थ-उपनिधि का द्रव्यानुपूर्वी तीनों प्रकार से और भी कही गई है जैस-कि पूर्वानुपूर्वी, पश्चात् आनुपूर्वी और अनानुपूर्वी सो एक परमाणु से लेकर अनंत प्रदेशी पर्यन्त पूर्वानुपूर्वी कहते हैं इस से उल्था करने को पश्चात् आनुपूर्वी कहने हैं।
* अनुयोगद्वार सूत्र * अनानुपूर्वी विषय निम्न लिखितानुसार है । सेकित प्रणाणुपुवी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए जाव अपंतगच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नम्भासो दुरूवृणो सेत्तं अणाणुपुवी सेत्तं उवाणिहिया दवाणुपुवी सेत्तं जा- णगसरीर भवियसरीर वइरित्ते दवाणुपुची सेत्तं नोंभागमो दव्वाणपुव्वी सेत्तं दवाणुपुब्बी। पदार्थ-(सेकिंतं अणाणुपुब्बी २) (प्रश्न) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर) (एयाए चेव एगाइयाए एगुतरियाए जाव अणतगच्छ गयाए जाव अणंतगच्छगयाए. सेढीए ) इन को एक से लेकर वृद्धि करते हुए यावत् अनंतगच्छ किए जाए फिर अनंतगच्छ की श्रेणी को. (अन्न मन्नभ्मासो दुरुखुणो सेचं अणाणुपुग्वी) परस्पर गुणा करने से यावत् भंग बनजाते हैं उनमें से आदि अंत के भंग को न्यून करने से शेष रहेहुए भंगो का नाम अनानुपूर्वी है से अणाणुपुब्बी ) यही अनानुपूर्वी का स्वरूप है (सेत्तं उवणिहिया दवाणुपुब्बी) यही उपनिधेि का द्रव्यानुपूर्वी है सेत्तं जाणग सरीर भविय- शरीर वहरित्तं दवाणुपुन्बी से नो आगमोदवाणुपुत्री सेचं नो भागमओ सेतं. दवाणपुची ) यही ज्ञ शरीर और भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यानुपूर्वी नो आ- गम से वर्णन की गई है और इसे ही द्रव्यानुपूर्वी कहते हैं । भावार्थ-अनानुपूर्वी उसे कहते हैं कि-जो अनंत प्रदेशि श्रेणी है-उसको परस्पर गुणा करने से यावत् परिमाण भंग बनते हैं उनमें से दो भंग न्यून- करने से अनानुपूर्वी बन जाती है और इसी का नाम उपनिधि का द्रव्यानु-. पूर्वी है और इसी का नाम ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यानुपूर्वी नो आगम से वर्णन की गई है। अथ क्षेत्रानु पूर्वानुपूर्वी विषय । . मूल-सेकिंतं खेत्ताणुपुव्वी २ दुविहा पं० तं० उवणिहिया अणोणिहिया तत्थणं जासा उवाणिहिया साट्टप्पा तत्थंणं, जासा अणोवणिहियासा दुविहा पं० तं० णेगम ववहाराणं ?
* अनुयोगद्वार मत्र * (८६) संगाहस्स २ सेकितं गमक्वहाराणं अणोवणिहिया खेशाणु पुची २ पंचविहा पं० त० अठ्ठपयपरूवणया १ भंगसमुक्त्ति- गया भगोवदसणया समोयारे ४ अणुगमे ५ सेकिंतं अकृपय परूवणया २ तिपएसोगाढे श्राणुपुब्बी जाव असंखेज्जपए सोगाढे थाणुपुब्बी एगपएसोगाढे अणाणुपुब्बी दुपए सोगाढे अवत्तव्बएति सोगाढा प्राणुपुवीयो जावं असंखे- ज्जपएसोगाढा श्राणुपुवीश्रो एगपए सोगाढा अणाणुपुव्वीश्रो टुपएसोगढा अवत्तवए एयाएं ऐगमववहारांएं अकृपयप- रूवणया एणं किं पयोयणं एयाणं ऐगमववहाराणं अप- यगरूवणयाए भंगसमुकित्तणया कीरइ । पदार्थ-( मेकित खत्ताणुपुत्री २ दुविदा पं० सं० उवणिहिया अणोव- गिहिया ) (प्रश्न ) क्षेत्रानुपूर्वी किसे कहते हैं (उचर ) क्षत्रानुपूर्वी द्विपकार से प्रतिपादन की गई है जैसे कि-उपनिधि का और अनुपनिधि का ( तत्थणं जासा उपणिहिया साहप्पा) उन दोनों में से जो प्रथम उपनिधि है वह केवल स्थानीय है क्योंकि उसका विवर्ण फिर किया जायगा अपितु जो (तत्यग्णं जासा अगो वणिहिया सादुविहा पं० तं० णेगमववहाराणं संगाहस्स २) अनुपनिधि का है वह दो प्रकार से वर्णन की गई है जैसे कि नेगम व्यवहारनय और संग्रहनय से-इस प्रकार के कथन करने पर शिष्य ने फिर शंका की (सेर्किन ऐगमववहाराणं अणोवणिहिया खेत्ताणुपुच्ची २ पंचविद्या पं० त०) वह कौनसी है जो नंगम और व्यवहार नय से अनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी है । गुरु ने उत्तर में कहा कि नंगम और व्यवहार नय से अनु- पनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी पांच प्रकार से प्रतिपादन कीगई है जैसे कि-( अकृपय-. परुवणया ) अर्धपद की प्रतिपादनता १ (भंगसमुकित्तणया) भंगसमुत्कीर्तनता २ ( भंगोवदसणया) फिर भंगोपदर्शनता ३ और ( समोयारे ) समवतार ४. ( अगम ) अनुगमता ५ ( सेक्षित अपयपरुबखया २ (प्रश्न) भर्थ प्रति- पादनता किसे कहते हैं (उत्तर) (तिपएसोगाढे आणुपुच्ची नाव असंखेज-- (१०) * अनुयोगद्वार सूत्र * पए सोगाढे आणुपुच्ची ) अर्थपद प्रतिपादनता उसका नाम है जो तीन प्रदेशि से लेकर आकाश के असंख्यात प्रदेशों पर पुल अवगाहन हुआ है उसे क्षे- अमानुपूर्वी कहते हैं और ( एगपएसोगाढे अणाणुपुची) आकाश के जो एक प्रदेशोपरि अवगाहन हुआ है उसका नाम- अनानुपूर्वी है ( दुपए सोगाढे अव- तबए ) द्विप्रदेशोपरि जो अवगाहन हुआ है उसका नाम अवक्तव्य द्रव्य है इसी प्रकार (तिपए सोगाढा आणुपुवीओ) बहुत से आनुपूर्वी द्रव्य बहुत से तीनों प्रदेशोपरि अवगाहन हुए हैं उनका नाम बहुत सी क्षेत्रानुपूर्षियां हैं ( जाव असं- खज्ज पएसोगाढा आणुपुवी ३ ) इसी प्रकार यावत बहुत से असंख्यात प्रदेशोपरि अवगाहन कीहुई बहुतसी आनुपूर्वीयायें है किन्तु ( एगपएसो गाढा अणाणुपुच्चीओ ) जो एक आकाश के प्रदेशों पर बहुत से पुद्गल अव- गाहन हैं उनका नाम बहुतसी अनानुपूर्वियां है ( दुपएसोगाढा अवत्तव्यए) पूर्ववत् ही बहुत से द्विपदेशों पर अवगाहन हुआ पुद्गल उसका नाम बहुत से अवक्तव्य द्रव्य हैं ( एयाणं णेगमववहाराणं) इन नेगम और व्यवहारनय से (अकृपयपरूवणयाए किं पयोयणं ) जो अर्थ पद की प्रतिपादनता कीगई है उसका क्या प्रयोजन है ? गुरु कहते हैं कि ( एयाणं णेगमववहाराणं अपयपरू वणयाए भंग समुक्त्तिणया कीरइ) इन नैगम और व्यवहारनय से अर्थ पद दिखलाया गया है इसका मुख्य प्रयोजन भंगो का कीर्तन करना ही है। भावार्थ-क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्यों की अपेक्षा से ही सिद्ध है क्योंकि जैसा द्रव्य जिस प्रकार से क्षेत्र में स्थित है उसी प्रकार उसकी गिणती की जाती है सो क्षेत्रानुपूर्वी द्वि प्रकार से प्रतिपादन की गई है जैसे कि-उपनिधि का और अनुपनिधि का सो उपनिधि का अभी स्थापनीय हैं अनुपनिधि का द्वि प्रकार से प्रतिपादन की जाती है एक नैगम व्यवहार नय से द्वितीय संग्रह नय से-सो नैगम और व्यवहार नय के मत से अनुपानधि क्षेत्रानुपूर्वी पांच प्रकार से कही गई है जैसे कि-विद्यमान अर्थों की प्रतिपादनता १ भंग समुत्कीर्तनता २ भंगो- पदर्शनता ३ समवतार ४ और अनुगम ५ विद्यमान पदार्थों की प्रतिपादनता उसका नाम है जो तीन प्रदोश से लेकर असंख्यात प्रदेशों पर्यन्त आकाश में पुद्गल स्थित हैं वे क्षेत्रानुपूर्वी हैं एक प्रदेश पर जो स्थित है--उसका नाम अना- नुपूर्वी है द्वि प्रदेशों पर जो हैं वे अवक्तव्य द्रव्य हैं यह कथन एक वचनान्त किन्तु इसी प्रकार यही कथन वहुवचनान्त भी जान लेना तब बहुत आनुपूर्वि- .
*अनुयोगद्वार सूत्र * यायें मनानुपूर्वियाँ अवक्तव्य द्रव्य सिद्ध हो जाते हैं अतः इस विद्यमान अर्थ प्रतिपादनता का मुख्य प्रयोजन भंग समुत्कीर्तन करना ही है, अपितु यह सर्व कथन नैगम और व्यवहार नय से कहा गया है जो अर्थ पद है वह सर्व तीनों मकार से द्रव्यों की सिद्धि करता है सो लोक में तीनों प्रकार के द्रव्यों की अ- स्ति है इसीलिये इसका नाम अर्थ प्रतिपादनता. है ॥ अथ भंग समुत्कीर्तनता विषय । मूल-सेकिंतं गमववहाराणं भंग समुक्त्तिणया ? २ अत्थिाणुपुव्वी १ अणाणुपुवी २ अत्थि अवत्तव्वएय ३ एवं जहे वहेठा तहेक्ने यवं नवरउगाढा भाणियव्या तहेव भंगो व दंसणया तहेव समोयारे । पदार्थ-(सेकिंतं णेगमववहाराणं भंग समुक्त्तिणा २ ( प्रश्न ) नैगम और व्यवहारनय के मत से भंग समुत्कीर्तनता किस प्रकार से है (उत्तर) नैगम और व्यवहारनय से भंग संमुत्कीर्तनता निन्नप्रकार से है जैसे कि-( अत्थिाणु पुची १ अणाणुपुच्ची २ अस्थिप्रवत्तव्यएय ३) एक आनुपूर्वी द्रव्य १ एक मनानुपूर्वी २ एक अवक्तव्य ३ ( एवं जहेवहेटा तहेव नेयव्वं नवरंउगाढा भा- णियचा तहेव भंगोवदंसणया तहेव समोयारे ) इसी प्रकार भंग जो पूर्व लिखे गये हैं वैसे ही यहां पर जान लेने चाहिये और उसी प्रकार पट् विंशति भंग क्षेत्रानुपूर्वी के जान लेन किन्तु अवगाहन शब्द का प्रयोग कर लेना चाहिये और पूर्ववत् ही समवत्तार द्वार जान लेना तद्वत् ही भंगोपदर्शनता है । भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय के मत से प्राग्वत् भंग समुत्कीर्तना और भंगोपदर्शनता समवतार द्वार अथवा क्षेत्रानुपूर्वी आदि सर्व जान लेने क्योंकि-. इनका विवर्ण पूर्व कई स्थलों में किया गया है । अथ अनुगम विषय । सेकित्तं अणुगमे २ नवविहे पएणत्ते तंजहा संतपयपरू- वणया गाहा सेकिंतं संतपयपरूवणया २ गमववहाराणं. खेत्ताणुपुव्वीदवाइं किं अत्थि नत्थि नियमा अस्थि एवं दो (६२), * अनुयोगद्वार सूत्र निवि १ णेगमववहाराणं खेत्ताणुपुब्बीदवाई किं संखेज्जाई असंखेज्जाई अणंताईनो संखेज्जाई असंखेज्जाईनो अर्थताई एवं दोनिवि २ गमववहाराणं खेवाणुपुवदिव्वाइं लोग- स्सकहभागे होज्जा कि संखेज्जइभागे होज्जा असंखेज्जइ, भागेहोज्जा संखेज्जेसु भागेंसु होज्जा: असंखेजेसु भागे- सु होज्जा सव्वलोएहोज्जा एगं दव्वं पडुच्च लोगस्स संखेस्जइ भागे वा होज्जा असंखेज्जइभागे वा होज्जा संखेज्जेसु भागे.. सुहोज्जा असंखेज्जेसुवामागे सु होज्जादेसूणे लोए वा होज्जा.. नानादब्वाइं पडुच्च नियमा सबलोए होज्जा अणुपुवी दबाई अवचव्वग दव्वाणिय जहेव हेडा तहेव. नेयवाणि फुसणावि तहेव काल तहेवा ॥ पदार्थ-(सेकिंतं अणुगमे २ नवविहे पं० त० संतपयपरूवणया गाहा ) (प्रश्नः) अनुगम किसे कहते हैं ( उत्तर ) अनुगम नंव प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-विद्यमान पदार्थों की प्रतिपादनता की गाथा पूर्व लिखी जा चुकी है. वहीं जाननी चाहिये ( सेकिंतं संतपयपरूंत्रणया २) पूर्वपक्ष वि-. धमान पदार्थों की प्रतिपादनता किस प्रकार से है. ( उत्तर ) जो निम्न लिखि- तानुसार हैं ( गमंचवहाराणं खेत्ताणुपुत्वीदव्वाइं किं अत्थि नत्थि) नैगम, और व्यवहार नय से क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्य है किम्बा नहीं है । इस प्रकार से गुरु को पूंछने पर गुरु कहने लगे कि-(नियमा अत्थि एवं दोनिवि १) नियम से अस्ति है अर्थात् निश्चय यही है इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य के स्व- रूप को भी जानना चाहिये (गमववहाराणं खेत्ताणुपुची दव्वाइं कि संखेज्जाई. असंखेज्जाई अणंताई) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! नैगम और व्यवहारनय से क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्य क्या संख्यात है वा असंख्यात है अथवा अनंत है गुरु कहने लगे कि (नो संखेज्जाई) संख्यात नहीं है क्योंकि आनुपूर्वी द्रव्य तीन प्रदोश से लेकर अनंत प्रदेशि पर्यन्त है सो वे संख्यात प्रदेशों पर नहीं हैं किन्तु (असंखेज्जाई) असंख्यात प्रदेशों पर अवगाहन की अपेक्षा असंख्यात क्षेत्रानुपूर्वी .
! * अनुयोगदार सूत्र * है (नो अणंताई एवं दोनिवि २) अनंत भी नहीं है इसी प्रकार अंनानुपूर्वी और अवक्रव्य द्रव्य भी जानने चाहिये २(णेगमववहाराण खत्ताणुपुच्चीदवाइं लोग- स्सकइ भागे होज्जा किं संखेज्जइ भागे होज्जा असंखेज्जइभागे होज्जा । (प्रश्न) नंगम और व्यवहार नय से उत्रानुपूर्वी गत द्रव्य लोक के कितने भाग में होता हैं क्या लोक के संख्यात अथवा असंख्यात भाग में होता है तथा-( संखेज्जे- सु भागेसु होज्जा असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से संख्यात भागों में वा बहुत से असंख्यात. भागों में होता है ( सन्चलोए होज्जा) या सर्व लोक में होता है । गुरु उत्तर देते हैं कि हे पृच्छक ! ( एगं दबं पड्डुच लोगस्स संखे, ज्जइ भागे वा होज्जा) एक द्रव्य की अपेक्षा से लोक के संख्यात भाग में भी होता है (असंखेनइभागे वा होज्जा) असंख्यात भाग में भी होता है (संख ज्जेसु भागेसु वा होज्जा) लोक के बहुत से संख्यात भागों में भी होता है (अ- संखेज्जेसु भागेसु वा होज्जा ) बहुत से असंख्यात भागों में भी होता है तथा- (देसूणे लोए वा होज्जा ) एक अंश छोड़कर सर्व लोक में भी होता है अर्थात् अचित महास्कंध आनुपूर्वी द्रव्य तीन प्रदेशों से न्यून सर्व लोक में हो जाता है अनानुपूर्वी द्रव्य का एक प्रदेश दो प्रदेश प्रवक्तव्य द्रव्य के इनके स्थान को वर्ज कर देशून सर्व लोक में हो जाता है क्योंकि यह तीन द्रव्य सर्व लोक में. व्याप्त हो रहे हैं अपितु ( नानादबाई पडुश्च नियमा सव्वलाए होज्जा) नाना प्रकार के आनुपूर्वी द्रव्यों की अपेक्षा निश्चय ही सर्व लोक में होते क्योंकि- यह द्रव्य सर्व लोक में सदैव काल विद्यमान रहते हैं (अणाणुपुवी दवाई अवतव्यए दवाणिय जहेच हेहा तहेवने यव्वाणि फुसणावि तहेव काल . तहेब ) अनानुपूर्वी द्रव्य और अवक्तव्य प्राग्वत् जान लेने चाहियें, स्पर्शना द्वार और कालद्वार यह भी पूर्ववत् है ।। भावार्थ-अनुगम द्वार नव प्रकार से वर्णन किया गया है जिसका विवर्ण पूर्व लिखित गाथा में होचुका है विद्यमान पदों की प्रतिपादनता के विषय में नगम और व्यवहारनय के मत में क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्यों की निश्चय ही अस्ति है इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्यों की भी अस्ति है फिर नैगम और व्यवहारनय से क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्य असंख्यात है किन्तु संख्यात वा अनंत नहीं हैं क्योंकि तीनों द्रव्य अनंत है किन्तु नभ के असंख्यात प्रदेशों पर ही स्थिति करते हैं और दोनों नयों के मत में क्षेत्रानुपूर्वी गत एक द्रव्य लोक के संख्यात (६४) * अनुयोगद्वार सूत्र * असंख्यात वा बहुत से लोक के संख्यात भागों में वा बहुत से वा असंख्यात भागों में अथवा अल्प देश न्यून सर्व लोक में होजाता है क्योंकि यदि अचित महास्कंध सर्वलोक प्रमाण भी होजावे तो तब भी तीन प्रदेश न्यून होता है जो अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य के स्थानों को छोड़ देता है यह दोनों द्रव्य सदैव काल इस लोक में विद्यमान रहते हैं अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा निश्चय ही यह द्रव्य सर्वलोक में विराजमान रहते हैं और इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये और स्पर्शना द्वार काल द्वार प्राग्वत् ही जान लेने चाहिये । अर्थ स्थिति द्वार विपय । खेत्ताणुपुब्बीदव्वाई कालो केवचिर होइ एगं दवं पडुच्च जहन्नेणं एगं समयं उक्कोसेणं असंखेज्ज काले नाना दबाई पडुच्च सव्वद्धा एवं दोनिवि गमववहाराणं खेत्ताणु पुवी दवाई कालउ केवीचरं अंतरं होइ एगं दुव्वं पडुच्च जहन्नेणं एगं समयं उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं नानादब्वाइं पडुच्च नत्थि अंतरं एवं दोनिवि होगमववहाराणं खेत्तायुपुबी दबाई सेसदवाणं कइभागे होज्जा किं संखेज्जइ भागे एवं पुच्छाणि वयणं च जहेव हेला तहेव नेयब्बा प्रणाणुपुब्बी दव्वाइं अवनव्वगदवाणिवि जहेव हेला गमववहाराणं खेत्ताणुपुब्बीदव्वाइं कयरंमि भावे होज्जा नियमा साइ : परिणामिए भावे होज्जा एवं दोनिवि ॥ पदार्थ-(णेगमववहाराणं खेत्ताणुपुब्बोंदवाई कालो केवचिरं होइ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे पूज्य ! नैगम और व्यवहार नय से क्षत्रानुपूर्वी गत द्रव्य काल से कब तक एक स्थान में स्थिति करते हैं गुरु कहने लगे कि भो शिष्य कि नैगम और व्यवहार नय के मत से क्षेत्रानुपूर्वी गत द्रव्यों की गति निम्न प्रकार से है यथा-( एग दबं पडुच्च जहन्नेणं एगं समयं उक्कोसणं असंखे ज्जकालं) एक द्रव्य की अपेक्षा जयन्यस्थिति एक समय प्रमाण उत्कष्ट असं-: " * अनुयोगद्वार सूत्र * (६५) ख्यात काल पर्यन्त होती है यदि एक द्रव्य एक एक स्थान पर स्थित रहे तो न्यून से न्यून एक समय मात्र उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त रह सकता है अ- पितु-(नानादबाई पडुच्च सम्बद्धा एवं दोनिवि ) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा सर्व काल में आनुपूर्वी द्रव्य रहते हैं और उसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य भी जानने चाहिये ( णेगमववहाराणं खेसाणुपुब्बीदवाई कालो केचिरं अंतर होइ) नैगम और व्यवहार नय के मत से जो क्षेत्रानुपूर्वी गत द्रव्य है उनका काल से कितना चिर अंतर होता है-ऐसा शिष्य के पूंछने पर गुरु कहने लगे कि-(एगं दव्वं पड्डुच्च जहन्नेणं एगं समयं उक्कोसेणं असंखे- ज्जंकालं ) एक द्रव्य की अपेक्षा जघन्य एक समय मात्र अन्तरकाल होता उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त अन्तर होता है किन्तु-(नानादबाई पडुब नत्थि अंतरं एवं दोनिवि ) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा अन्तरकाल नहीं होता है इसी प्रकार दोनों द्रव्यों के विषय में भी जानना चाहिये (णेगमवव- हाराणं खेवाणुपुब्बी दवाई सेस दवाणं कइ भागे होज्जा ) (प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के पद से क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्य शेप द्रव्यों के कितने भागों में होता है (.कि संखेज्जइ भागे होज्जा एवं पुच्छाणि वयणं च जहेवहेडा तहेव नेयच्चा) क्या संख्यात भाग में होते हैं वा असंख्यात भाग में इत्यादि जैसे पूर्व इस वि- पय में लिखा गया है कि वैसे ही जानना चाहिये ( प्रणाणुपुची दवाइं अव- संवगदवाणीव जहेव हेठा ) अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य भी प्राग्वत हैं। (णेगमववहाराणं खत्ताणुपुच्ची दवाई कयरंमि भावे होजा) नैगम और व्यवहार नय के मत से क्षेत्रानुपूर्वी गत द्रव्य कौन से भाव में होते हैं ऐसे पूंछने पर गुरु कहने लगे कि-(नियमासाइ परिणामिए भावे हाज्जा) निश्चय ही यह द्रन्य सादि पारिमाणिक भाव में होते हैं किन्तु यह द्रव्य नित्य नहीं हैं, इसलिये सादि पारिणामिक भाव में कहे गये हैं-(एवं दोनिवि ) इसी प्रकार दोनों द्रव्य भी जानने चाहिये ।। 'भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय के मत से क्षेत्रानुपूर्वी गत द्रव्यों की स्थिति जघन्य एक समय प्रमाण उत्कृष्ट असंख्यात्र काल पर्यन्त है किन्तु सर्व द्रव्यों की अपेक्षा सर्व काल में नाना प्रकारों के द्रव्यों की स्थिति रहती हैं इसी प्रकार इनका अन्तर काल है शेप द्रव्यों के कितने भाग में यह द्रव्य हैं इस विषय में प्राग्वत् जानना चाहिये और यह द्रव्य नियम से सादि पारिणामिकं (६५ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * भाव में होते हैं क्योंकि ये परिणमन शील है अपितु यह द्रव्य स्वाभाविक नित्य नहीं होते इसी प्रकार अनानुपूरी और अवक्तव्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जा 'नना चाहिये ॥ अथ अल्प बहुत्वदार विपय । एएसि णं भैते णेगमववहाराणं प्राणुपुब्बीदवाणं अणाणुपुब्बीदवाणं अवत्तव्वगदवाण य दव्वळ्याय पय, सट्टयाए दवडपएसहयाए कयरे २ हिंतो अप्पा वा वहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा गोयमा सव्वत्थोवाई णेगमव- वहाराणं अवत्तवनगदव्वाइं दव्वछ्याए प्रणाणुपुत्वीदवाई दुवयाए विसेसाहियाइं अणाणुपुतीदवाई दवछ्याए असंखेज्जगुणाई पएसछ्याए सव्वत्थोवाई गमववहाराणं अणाणुपुवी दव्याई अप्पएसठ्याए अवत्तव्वगदवाइं पए सट्टयाए विसेसाहियाई प्राणुपुतीदवाई पएसछ्याए असं- । खेज्जगुणाई दवछपएसठ्या सव्वत्थोवाइं ऐगमववहाराणं. अवत्तव्वगदखाई दवड्याए प्रणाणपुवीदव्वाइं दवड्याए अप्पएसठयाय विसेसाहियाइं अवत्तव्वगदव्वगदवाई. पए- सच्याए विसेसाहियाइं आणुपुत्वी दवाई दव्वळुयाए असं- खेज्जगुणाई ताई चेव पएसठयाए असंखेजगुणाई सेतं. अणुगमे सेत्तं गमववहाराणं अणोवणिहिया खत्ताणुपुवी। सेकिंतं संग्गाहस्स अणोवणिहियाखेत्ताणु जहेव दवाणुपुवी तहेव खेत्ताणुपुती विसेत्तं संग्गाहस्स अणोपणिहिया खेत्ता- रापुवी ॥ पदार्थ-(एएसि ण भत्ते णेगमववहाणं श्राणुपुब्बीदव्याणं अणाणुपुच्ची दवाणं अवत्तव्यगदव्वाणंय दवठ्याए पएसठयाए दबछपएसयाय कपरेर हिंतो अप्पा वा वहुया वा तुला वा.विसेसादियाई वा) श्री गौतम प्रभुजी श्री * भनुयोगद्वार मूत्र * ( ६७ ). भगवान् से पूछते हैं कि-हे भगवन् ! नैगम और व्यवहार नय से आनुपूर्वी द्वन्य, अनानुपूर्वी द्रव्य और अवनव्य द्रव्य, यह तीनों दी द्रव्य द्रव्यार्थिक से और प्रदेशार्थिक से तथा द्रव्य और प्रदेश दोनों के युगपत् स कौन २ से द्रव्य अल्प है वा बहुत है वा तुल्य हैं या विशेषाधिक है, इस प्रकार के पूंछने पर श्री भगवान् उत्तर देते हैं कि-( गोयमा) हे गौनप (सव्वयोवाई ममववहा- राण) सत्र से स्तोक नेगम और व्यवहार नय के मत से ( अवत्तव्यंगदम्बाई दम्बयाए ) अवनव्य द्रव्य द्रव्यार्थफ से हैं १ अपितु (अणाणुपुच्चीदवाई दबयाए विसेसाहियाई ) अनानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थफ से विशेषाधिक है २ ( आणुपुबी दनाई दवहयाए असंखे जगुणाई) श्रानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से. भसंख्यात गुणाधिक है किन्तु (पएसध्याए ) प्रदेशार्थक से (सन्चथोवाई णेगम चवहाराणं ) सर्व से स्तोक नैगम और व्यवहार नय के मत से ( अणाणुपुची दचाई अप्पएसयाए ) अनानुपूर्वी द्रव्य अप्रदेशार्थक से हैं किन्तु ( अवत्त- बगदवाई पएसछयाए विसेसादियाई ) अबकच्य प्रदेशाधिक से विशेषाधिक हैं उनमे-(आणपुच्चीदन्याई पएसच्याए असंखेज्जगुणाई ) आनुपूर्वी द्रव्य प्रदेशार्थक से असंख्यान गुणाधिक है अपितु (दबहपएसच्याए सव्वत्थो वा गपववहागणं अवत्तबगदवाई दबयाए ) द्रव्यार्थक और प्रदेशार्थक से सर्व से स्नोक नंगम मोर व्यवहार नय.की अपेक्षा से अवक्तव्य द्रव्य है अपितु (अग्णाणपुचीदवाई दन्वअप्पएसच्याए विसेसाहियाई ) अनानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से यार प्रदेशार्यक से विशेषाधिक हैं फिर उनसे ( अवत्तन्त्रगदवाई पासच्याए बिगेसाहियाई ) अवक्रव्य द्रव्य प्रदेशार्थक से विशेषाधिक है फिर (भाणुपुचीदवाई दबयाए असंखेज्जगुणाई ) आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से असंख्यान गुणाधिक है ( ताई च व पएसयाए असंखेज्जगुणाई उन द्रव्यार्थक स मदेश असंख्यात गुणाधिक हैं ( सेसं अणुगमे ) यही अनुगम है ( सेत्त गगमयवहाराणं अगायणिहिया खत्ताणुपुच्ची ) यही नैगम और व्यवहारनय के मत से भनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी है । ( सेवितं संग्गाहस्स अणोवणिहिया खत्ताणुपुल्ची नहेव दवाणपुची तहेव खेचाणुपुची विसेत्तं संग्गाहस्स अणो- पणिहिया खचाणपुब्बी) (मन) संग्रह नय के मत से अनुपनिधि का क्षेत्रा- नुपूर्वी किस प्रकार से है ( उत्तर ) जैसे द्रव्यानुपूर्वी कथन की गई है वैसे ही क्षेत्रानुपूर्वी का भी समास नान लेना यही संग्रह नय के मत से क्षेत्रानुपूर्वी है ।। .
(E) * अनुयोगद्वार सूत्र * भावार्थ-श्री गौतम स्वामीजी उक्त द्रव्यों को अल्प बहुत के नियम से भगवान् से विशेष निर्णय करते हैं कि हे भगवन् ! उक्त तीनों द्रव्यों में अल्प बहुत्व कौन २ से द्रव्य हैं, श्री भगवान् कहते हैं कि हे गौतम ! सर्व से स्तोक नैगम और व्यवहार नय के मत से द्रव्यों की अपेक्षा से अवक्तव्य द्रव्य हैं उन से अनानुपूर्वी द्रव्यों का द्रव्य विशेपाधिक है ! और उनसे आनुपूर्वी द्रव्यों का द्रव्य असंख्यात गुणाधिक है । अपितु प्रदेशों की अपेक्षा से सर्व से स्तोक नैगम और व्यवहार नय के मत से अनानुपूर्वी द्रव्य अप्रदेशार्थक हैं । और अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशों की अपेक्षा से उनसे विशेषाधिक हैं । फिर उनसे भी आनुपूर्वी द्रव्य प्रदेशों की अपेक्षा से असंख्यात गुणाधिक है किन्तु द्रव्य और प्रदेशों की अपेक्षा से सर्व से स्तोक नैगम और व्यवहार नय के मत से द्रव्यार्थक से अव- क्लव्यं द्रव्य हैं उनसे अनानुपूर्वी द्रव्य द्रव्य और अप्रदेशार्थक की अपेक्षा से विशेपाधिक हैं फिर उनसे अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशों की अपेक्षा से विशेपाधिक हैं फिर आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से असंख्यात गुणाधिक हैं किन्तु प्रदेश उनसे भी असंख्यात गुणाधिक हैं सो इसी का नाम अनुगम है नैगम और व्यवहार नय के मत से अनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी का समास सम्पूर्ण हुआ और संग्रह नय के पत से अनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी जैसे कि द्रव्यानुपूर्वी पहिले वर्णन की गई है उसी प्रकार जान लेनी चाहिये और संग्रह नय के मत से इसी का नाम अनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्थी कहते हैं । अथ उपनिधि का पूर्वी विषय । मूल-सेकिंतं उपणिहिया खेत्ताणुपुवी २ तिविहा पं० त० पुवाणुपुब्धी पच्छाणुपुव्वी अणाणुपुत्वी सेकिंतं पुव्वाणुपुब्बीर अहोलोए तिरियलोए उड्ढलोए सेत्तं पुब्बाणपुवी ॥१॥ सेकिंतं पच्छाणुपुव्वी उड्ढलोए तिरियलोए अहलोए, सेत्तं पच्छाणु- पुवी सेकिंतं प्रणाणुपुब्बी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तीर- याएतिगच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नम्भासो दुरूवूणो सेत्तं प्रणाणुपुवी ॥
* अनुयांगद्वार मूत्र (88) पदार्य-(सकित उपणिहिया खत्ताणुपुची २ तिविहा पं० तं० ) (प्रश्न) अव क्षेत्रानुपूर्वी उपनिधिका कौनसी है ( उत्तर ) उपनिधिका क्षेत्रानुपूर्वी तीनों प्रकार से प्रतिपादन कीगई है जैसे कि ( पुवाणुपुची ) पूर्वानुपूर्वी ( पच्छाणु- पुच्ची ) पश्चात् आनुपूर्वी (श्रणाणुपुबी ) अनानुपूर्वी (सकिंतं पुवाणुपुव्वी २) (प्रश्न ) पूर्वानुपूर्वी किसे कहने हैं (उत्तर) पूर्वानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि ( अहोलाए तिरियलोए उड्ढलोए ) अधोलोक तिर्यक्लोक ऊर्चलोक ( सेत्तं पुच्चागुपुच्ची ) यही पूर्वानुपूर्वी है ( साकितं पच्छाणुपुत्वी २) (प्रश्न ) पवान् आनुपूर्वी किसे कहने हैं ( उत्तर) पश्चात् भानुपूर्वी भी तीनों प्रकार से वर्णित है जैसे कि ( उहलाए तिरियलोए अहोलोए ) ऊर्धलोक तिर्यक लोक अंधोलोक ( सत्तं पच्छाणुपुची ) यही पश्चात् श्रानुपूर्वी है ( सेकिंतं अ- गाणुपुग्नी एयाए चैत्र ए गुत्तरियाए तिगच्छगयाए सेढीए अनमनभासो दुल्वृणों) (प्रश्न ) अनानुपूर्वी किम कहते हैं ( उत्तर ) इन्हीं तीनों आनुपूर्वी द्रव्यों को तीनों गच्छ करके अर्थान् (१-२-३) तीनों श्रेणियां स्थापन करके फिर इन्हीं को परस्पर गुणा करके दो आदि अंत के भंग न्यून करने से जो भंग शेप रहते हैं उन्हीं को अनानुवी कहते हैं ( सत्तं अशाणुपुत्री ) यही अनानुपूर्वी है ।। भावाश-उपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि पूर्वानुगुवी १ पत्रात् भानुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ सो पूर्वानुपूर्वी भी तीनों प्रकार से है अधोलोक निर्यक्लोफ अर्चलीक इन्हीं को उन्था करके पठन करना उन का नाम पश्वान् आनुपूर्वी है अपितु अनानुपूर्वी में तीनों गच्छ करके फिर उनको. परस्पर अभ्यास (गुणा) करने से यावन्मात्र भंग बनते हो उनमें से आदि और अंत के भंग को न्यून करने से यावन्मात्र भंग शेष रहे हो सो उन्हीं का नाम भनानुपूर्वी है ॥ श्रथ अधोलोक विषय । अहो लोए खत्ताणुपुब्बी २ तिविहा पं० तं० पुवाणु पुब्बी पच्छाणुपुब्बी प्रणातुपुब्बी सेकिंतं पुवाणुपुव्वी २ रयण पभा १ सकरप्पभा २ वालु यप्पभा ३ पंकप्पभा ४ धूमप्पभा ५ तमा ६ तमतमा ७ सेत्तं पुव्वाणुयुब्बी सेकिंतं पच्छाणुपुब्बी २ १०. (१००) * अनुयोगद्वार सूत्र * तमतमा जाव रयणप्षमा सेत्तं. पुच्छाणुपुवी सकिंतं श्रणाणु, पुब्बी २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए सत्त गच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासो दुरुवूणो सेत्तं प्रणाणुपुनी ॥ पदार्थ-( अहो लोए खेत्ताणुपुव्धी २ तिविहा पं० तं० पुवाणुपुब्धी पच्छा- गुपची अण्णाणुपुची ) अधोलोक की अपेक्षा से क्षेत्रानुपूर्वी तीन प्रकार से वर्णन कीगई हैं जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात आनुपूर्वी २ और अनानुपूर्वी ३ इस प्रकार के गुरु के वचन सुनकर शिष्य ने प्रश्न किया कि ( सेकितं पुव्वाणु पुन्बी र रयणप्पभा सक्करप्पभा वालुयप्पभा पंकप्पभा धूमप्पभा तमप्पभा तमप्पभा तमतमा पभा ) हे भगवन् ! पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं, गुरु ने उत्तर में कहा कि अधोलोक के क्षेत्र की अपेक्षा से सात प्रकार की प्रानुपूर्वी है क्योंकि नीचे लोक में सात पृथिवियां है जैसे कि रत्नप्रभा १ शर्करप्रभा २ वालुप्रभा ३ पंक- प्रभा ४ धूमप्रभा ५ तमप्रभा ६ तमतमाप्रभा ७ से यह अनुक्रमता पूर्वक गणन करने से इनकी आनुपूर्वी बन जाती है (सेत्तं पुन्वाणुपुची) यही पूर्वानुपूर्वी है (सेकितं पच्छाणुपुब्बी तमतमा जाव रयणप्पभा सेत्तं पच्छाणुपुब्बी) (प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) सातवें नरक से प्रथम पर्यन्त गणन करना उसे (७-६-५-४-३-२-१) पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं, सो यही पश्चात् आनुपूर्वी है (सेकिंतं अणाणुपुब्बी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरिया सत्व गच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नव्भासो दुरुपूणो सेत्तं अणागुपुची) (प्रश्न) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन सांतों को एक एक की वृद्धि करते जो सात गच्छ किये हैं जैसे कि ( १, २, ३, ४, ५, ६, ७) इनको परस्पर गुणाकार करने से ५०४० भंग बन जाते हैं जिनमें आदि अंत के भंग को छोड़कर ५०३८ भंग रहते हैं उन्हीं का नाम अनानुपूर्वी है । भावार्थ-अधोलोक की तीनों प्रकार से आर्नुपूर्वी होती हैं सात ही नरकों के नाम प्रानुपूर्वी और पश्चात् आनुपूर्वी पूर्ववत् ही जान लेनी चाहिये किन्तु अनानुपूर्वी में सात को परस्पर गुणाकार करने से ५०४० भंग बन जाते हैं सो उनमें से आदि अंत के भंग को छोड़कर शेष जो ५०३८ भंग रहते हैं उन्हीं को अनानुपूर्वी कहते हैं । + * अनुयोगदार मूत्र * (१०१) अथ तीर्यक्लोक विषय । तिरिय लोए खेत्ताणुपुवी २ तिविहा पं० तं० पुवाणु- पुब्बी पच्छाणुपुब्बी अणाणुपुब्बी सेकिंतं पुवाणुपुब्बी २ जंबूद्दीवे लवणे २ धायइ ३ कालोय ४ पुक्खरे ५ वरुणे ६१७॥ खार ८ घय : खोयनंदी अरुणवरे कुंडले रुयगे आभरण १ वत्य २ गंध ३ उप्पल ४ पडमेय ५ पुढवी ६ निधि ७ रयणे ८ पासहर : दह १० ननो ११ विजया १२ वक्खार १३ क- पिंदा १४ ॥ १५ ॥ २ कुरा १६ मंदर १७ श्रावासा १८ कूडा १६ नक्खत्त २० चंद २० चंद २१ सूरा यं २२ देवे ११नागे ११ जक्खो १ । १ भूएय १ । १ सयंभू रमणे य १ । १ ॥३॥ सेत्तं पुवाणुयुब्नी सेकिन्तं पच्छाणुपुब्बी २ सयंभू रमणे भूय जाव जंबूद्दीवे सेत्तं पच्छाणुपुब्बी सकित्तं अणाणुपुब्बी २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए असंखिज्ज गच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासो दुरूवृणो सेत्तं अणाणुपुब्बी पदार्थ -(निरियलोए खेत्ताणुपुच्ची २ तिविड़ा पं० तं० पुवाणुपुत्री पच्छा- गुपुन्नी प्रणाणुपुच्ची ) तिर्यक्लीक की क्षेत्रानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन की गई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पथात् प्रानुपूर्वी २ और अनानुपूर्वी ३ इस प्रकार । के गुरु के वचन सुनकर शिष्य ने प्रश्न किया कि ( सेकिंतं पुन्वाणुपुत्री २) हे भगवन् पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं:गुरु कहने लगे कि भी शिष्य ! पूर्वानुपूर्वी निम्न प्रकार से है जैसे फि( जंबूद्दीचे १ लवणे २) जंबूद्वीप ? लवणसमुद्र २ (धायई ३ कालाय) धात की खंड ३ कालोदधि ४ (पुक्खरे ५-६ ) पुष्कर द्वीप ५ और पुष्करसमुद्र ६ (वरुणे ७1८) वरुणदीप ७ वरुणसमुद्र ८ (खीर -१०) क्षीरद्वीप ९ और धीर समुद्र १० (घयं ११ । १२ ) घृत. तोऽत् प्रा० न्या. भ. सूत्र १२६ पादेकारस्य प्रबंमधति यथाधयं तणम् कयम् पसरी मया पड्लो एयादि । " . (१०२) * अनुयोगद्वारं सूत्र * द्वीप ११ और घृतसमुद्र १२ (खोय १३ । १४ ) इक्षुद्वीप १३ और इक्षुसमुद्र १४ ( नन्दी १५ । १६) नंदीद्वीप १५ नंदीसमुद्र १६ (अरुणवरे १७।१८) अंरुणद्वीप १७ और अरुणसमुद्र १८ कुंडल १६ । २०) कुंडलद्वीप १६ और कुंडलसमुद्र २० ( रुयगे २१ । २२) रुचकद्वीप २१ और रुचकसमुद्र २२।।अब विशेष द्वीपों के जानने का उपाय वर्णन करते हैं (आभरण १) आभूषणों के नामों पर द्वीप और समुद्र हैं १ (वत्थ.२) वस्त्रों के नामों पर २ (गंध ३) गंध के नामों पर ३ ( उप्पल ४ पडमेय ५ पुढवी ६ निधि ७ ) और यावन्गात्र उत्पल कमलों के नाम हैं ४ पद्म कमलों के नाम हैं ५ पृथिवियों के नाम हैं ६ और निधियों के नाम हैं ७ ( रयणे ८ वासहर ६ दह १० नइउ ११ विजया १२ वक्खार १३ काप्पिंदा १४-१५ ) रत्नों के नामों पर ८ वर्ष धरों के नामों पर 8 ( जो पर्वत क्षेत्रों के नियम कर्ता है ) ह्रदों के नामों पर १० विनयों के नामों पर इसी तरह आगे भी जान लेने चाहिये वष्करों के नाम पर ( यह भी पर्वत है .) कल्पों के नाम पर १४ और इन्द्रों के नाम १५ ( कुरु १६ मंदिर १७ आवास १८ कूडा १६ नक्खत्त २० चन्द २१ सूर २२ देवे २३ नाग २४ जवखे २५ भूयय २६ सयंभूरमणे २७) देवकुरु आदि के नाम मंदिरों के नाम आवासों के नाम कूटों के नक्षत्रों के चन्द्रमा के सूर्य के यावन्मांत्र नाम हैं उसी प्रकार द्वीप समुद्रों के असंख्यात नाम जानने चाहिये किंतु देव नाग यक्ष भूत स्वयम्भूरमण इन पांच द्वीप और पांच ही समुद्रों के एकैक ही नाम है इसलिये यह पांच एकत्व वर्णन किये गये हैं (सेत्तं पुवाणुपुची ) यही पूर्वानुपूर्वी है (सेर्कितं पच्छाणुपुको २ सयंभूरमणे भूय जाव जंबूद्वीवे सेत्तं पच्छाणुपुब्बी) (प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) स्वयंभूरमण समुद्र से लेकर जंबूद्वीप पर्य्यन्त यावन्मात्र द्वीप और समुद्र हैं उन्हीं का नाम पंचात् आनुपूर्वी है ( से- किंत अणाणुपुब्बी २ एयाए चेव एगा इयाए एगुत्तरियाए असंखिज्ज गच्छ- गयाए सेढाए अन्न मन्नम्भासो दुरूवणो सेत्तं प्रणाणुपुबी) (प्रश्न) अनानु पूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन सर्व को एक एक की वृद्धि करते हुए असं- ख्यात गच्छ रूप श्रेणि की जाय फिर उन को परस्पर गुणा करें यावन्मात्र भंगवनें उनमें से आदि और अन्त के भंग को वर्ज करके शेष भंग अनानुपूर्वीय कह- लाते हैं सो इसी का नाम अनानुपूर्वी है । भावार्थ-जम्बूद्वीप से लेकर स्वयम्भू रमण समुद्र पर्य्यन्त गणन करने को * अनुयोगद्वार सूत्र * . (१०३) पूर्वानुपूर्वी कहने है स्वयम्भू रमण से जम्बूद्वीप पर्यंत गिणती को पश्चात् आनु- पूर्वी कहते हैं असंख्यान रूप गच्छ श्रेणी को परस्पर गुणा करने पर यावन्मात्र भंग बनें उनमें से भादि और अंत के भंग को छोड़कर शेप भंग अनानुपूर्वी के होने हैं। ऊर्ध्वलोक क्षेत्रानुपूर्वी विषय । उड्ढलोए खत्ताणुपुब्बी २ तिविहा पन्नता तं० पुब्वाणु पुब्बी पन्छारापुब्बी प्रणाणुपुब्बी सेकिन्तं पुव्वाणुपुती २ सोहम्मे १ इसाणे २ सणं कुमारे ३ माहिन्दे ४ वम्भलोए ५ लत्ता ६ महासुफे ७ महस्सारे ८ प्राणएए ६ पाणए १० प्रारणे ११ अनुए १२ गेविजविमाणे १३ अणुत्तरविमाणे १४ इमीप्यभारा १५ सेत्तं पुवाणुपुवी सेकिन्तं पच्छाणुपुवी इसीप्पभारा जाव मोहम्मे सेत्तं पच्छाणपुच्ची सेकिंतं अपाणु पुब्बी २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए पन्नरस गच्छ गयाए सेढिये अन्न मन्नम्भासो दुरूत्रुणो सेत्तं श्रषाणुपुखी ।। पदार्थ-( उहलोए खत्ताणुपुच्ची २ निविदा पं० त० ) अलोक क्षेत्रा- नुपूर्वी नीनों प्रकार से वर्णिन है जैसे कि (पुब्बाणुपुची पच्छाणुपुब्बी अणाणु- पुनी) पूर्वानुपूर्वी पश्चान् श्रानुपूर्वी अनानुपूर्वी ( सकिंतं पुच्चाणुपुच्ची २) (प्रश्न) पूर्वानुपूर्वी किम कहने हैं (उत्तर) उप्रलोक की पूर्वानुपूर्वी निम्न प्रकार से है जस कि-( मोहम्पसाणसएं कुमार माहिन्देवम्मलोए लंत्तए महामुक्के सहस्सारे आणय पागणय श्राग्गे अचुग गजिविमाणे अणुत्तरोविमाणे इसीप्पमारा से पुन्वाणुपुत्री) सुधर्मदेवलोक इप्सी प्रकार देवलोक शब्द सर्वत्र संयोजन कर लवे १ ईमान २ सनत्कुमार ३ माहेन्द्र ४ ब्रह्मलोक ५ लांतक ६ महाशुक्र ७ सहमार : आनन हमाणन १० आरण ११ अच्युत १२ वयक १३ अनुत- रविमान १४ पत्यभाग पृथिवी १५ इन्हीं का नाम पूर्वानुपूर्वी है । (सेकिंत पच्छाणपुची २ इसीप्पभारा जायसाहम्म सत्तं पच्छाणुपुब्बी ) (प्रश्न ) पवाद श्रानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) ईसत्प्रभा पृथिवी से लेकर सुधर्म देवलोक - (१.४) * अनुयोमद्वार सूत्र *. पर्यन्त जो गणना है उन्हीं का नाम पश्चात् प्रानुपूर्वी है (सेकिन अणाणुपुच्ची २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए पन्नरसगच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नम्भासी दुरू- वुणो सेत्तं अणाणुपुब्बी ) ( प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर ) इन पंच दश (१-२-३-४-५-६-७-८-६-१०-११-१२-१३-१४-१५)अंको को परस्पर गुणा करने पर यावन्मात्र भंग*बने उनमें से आदि अंत के भंगों को छोड़कर शेष भंग अनानुपूर्वी कहलाते हैं सो इन्हीं का नाम अनानुपूर्वी है ।। भावार्थ-वर्ध्व लोक की तीनों प्राग्वत् पूर्वियां हैं सो द्वादश कन्या देवलोक चेयक १३ अनुसरि विमान १४ ईषत् प्रभा १५ इस प्रकार की गणना को पूर्वानुपूर्वी कहते हैं इससे विपरीत को पश्चात् श्रानुपूर्वी कहते हैं पंच दश अंकों की श्रेणी का परस्पर गुणा करने पर यावन्मात्र भंग वने उनमें से आदि अंतके भंग को छोड कर शेष रहे हुए भंग अनानुपूर्वी कहाते हैं सो इन्ही का नाम अंनानुपूर्वी है। अथ प्रकारान्तर विषय । अहवा उवणिहिया खत्ताणुपुवी तिविहापं० त० पुव्वाणु पुवी पच्छाणुपुब्वी प्रणाणुपुब्बी सेकिंतं ' पुन्वाणुपुब्बी २ एग पए सोगाढे जाव असंखेज्जपए सोगाढे सेतं पुव्वाणु- सेकिंतं पच्छाणुपुब्बी २ असंखेज्जपए सोगाढे जाव एगपए सोगाढे सेत्तं पच्छाणु सेकिंतं अणाणपुब्बी एगाए चेव एगा- इयाए एगुत्तरियाए असंखज्ज गच्छगयाए सेढीए अन्न मन्न म्भासो दुरूवुणो सेत्तं अणाणुपुब्वी सेत्तं उवाणिहिया खत्ता- णुपुब्बी। पदार्थ-(अहवा) अथवा ( उचणिहिया खताणुपुष्वी तिविहा पं० त०) • उपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी तीन प्रकार से विवर्ण की गई है जैसे-कि पुन्वाणु- पुची १ पच्छागुपुवी २ अणाणुपुन्वी २) पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ इस प्रकार गुरु के कहने पर शिष्यने फिर प्रश्न किया कि-गुरु * नोट-१३.७६७४३६८००.१६ इतने भंग १९ अंको के होते हैं।
~ * अनुयोगद्वार सूत्र * (१०५) (सकित पुन्वाणुपुली ) हे भगवन् ! पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरुने उत्तर दिया भी शिष्य ! पूर्वानुपूर्वी उसका नाम है जो ( एंगपए सोगाढे जाव असंखेज्ज- पएसोगाटे सेचं पुन्वाणुपुन्नी ) द्रव्य अनुक्रमता पूर्वक आकाश के एक प्रदेश- से लेकर यावत् भसंख्यान प्रदेशों पर्यन्त अवगाहन हुआ है उसे क्षेत्रानुपूर्वी कहते हैं (सेकिन पच्चाणुपुची २ असंखेज्जपएसोगाढे जाव एगपए सोगाढे संतं पन्छापुनी) (प्रश्न ) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) जो'. असंख्यात मदेशीपरि द्रव्य अवगाहन हुआ है यावत् एक प्रदेशोपरि अवगाइन दोरा दै उसे पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं ( सेकितं अणाणुपुब्बी २ एयाए चैत्र एगाइयाए एगुत्तरियाए असंखेन गच्छगयाए सेढीए अन्नमन्त्रभासो दुरूवूणो सेत्तं प्रणागुपुत्री (मन्न) भनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इस आनुपूर्वी को एक २ की रद्धि करते हुए भसंख्यात गच्छरूप श्रेणिये जव होजाएं तब उनको परस्पर गुणाकार करके फिर उसके आदि और अंत के रूप को छोड़ फर शेप जो भंग रहते हैं उनको अनानुपूर्वी कहते हैं क्योंकि अनानुपूर्वी में या- वन्यात्र अंक होते हैं उनको परस्पर गुणा किया जाता है अपितु आदि और अन के अंकों की वर्ज करके शंप रहे हुए अंक अनानुपूर्वी कहलाते हैं । (से स्वगिडिया खनाणुपुर्बी ) यही उपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी होता है ।। भावार्थ-उपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी तीन प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी, पथात् आनुपूर्वी, अनानुपूर्वी जो द्रव्य आकाश के एक प्रदेश से लेकर यावन् असंख्यात प्रदेशों पर अवगाहन हुआ है उसे पूर्वानुपूर्वी कहते हैं टीक इमसे विपरीत गणना को पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं और एक प्रदेश से तकर यावन् असंख्यान प्रदेश पर्यन्त जो श्रेणिये हैं उनको परस्पर गुणा करने से यावद् ममाण भंग बनते हैं उनमें से आदि और अंत के भंग को वर्ज करके, शेप रहे हुए भंग श्रनानुपूर्वी कहलाते हैं यही उपनिधिका क्षेत्रानुपूर्वी है और इस दी उपनिधिका करते हैं । अथ कालानुपूर्वी विषय । सेकिंतं कालाणुपुब्बी २ दुविहा पं० तं० उवणिहिया भयोवणिहिया तत्थ एंजा सा उवाणिहिया साप्पा तत्थ णं (१०६) * अनुयोगद्वार सूत्र जासा अणोवणिहिया सा दुविहा पं० तं० णेगमयवहाराण संग्गहस्स गमववहाराणं तव पंचविहा जाव तिसमय- हिए आणुपुव्वी जाव असंखज्ज समयहिइए प्राणपुवी एग- समय द्वितीय प्रणासुपुष्पी दुसमयहितीए अवतव्वए तिसम- यद्वितीयाओ आणुपुब्बीओ जाव असंखेज्ज समयद्वितीयात्रो प्राणुपुबीनो एगसमय द्वितीयाओ अणाणुपुवीयो दुसम- यष्ठितीयाइं अवत्तव्वयाई सेत्तं गमववहाराणं अपयपरूव- गया एयाए चेव गमववहाराणं अपयपरूवणयाए कि पोयणं २ भंग समुकित्तणया कीरइ सेकिंतं ऐगमक्वहाराणं भंगसमुकित्तणया २ अस्थि प्राणपुवी अस्थि प्रणाणुपुब्बी अस्थि अवत्तव्बए एवं दवाणुपुब्बी गमेणं कालाणुपुब्बी ए. वित्ते चेव छव्वीसं भंगाणेयव्वा जाव सेत्तं गमयवहाराणं भंगसमुक्तित्तणयाए एयाए णेगमववहाराणं भंगसमुक्त्तिण- याए किं पोयणं २ मंगोवदंसणया कीरइ सेकित्तं गमव- वहाराणं भगोवदसणया २ तिसमयलिइए प्राणुपुब्बी एगसम- यलिइए अणाणुपुब्बी दुसमयष्ठितीए अवतधए एत्थंविसो वेव गमो सेत्तं अंगोवदंसणया सेकिंतं समोयारे ऐगमववहाराणं प्राणपुब्बी दवाई कहिं समोयरंति किं प्राणुयुब्बि दबेहि समोयरंति पुच्छागो, प्राणुपुब्बी दब्वेहिं समोयरांति नो अ: णाणुपुवी दब्बेहिं समोयरंति नो अवत्तव्वग दव्वेहिं समोय- रंति एवं दोनिवि सठाणे २ समोयरंति सेत्तं समोयारे सेकिंतं अणुगमे २ नवविहे पण्णत्ते तंजहा संतपयपरवणया जाव अप्पावहु॥ - - * अनुयोगद्वार मूत्र* ( १०७) पदार्थ-( सेर्किनं कालाणुगुब्बी २ दुविहा पं० तं) (प्रश्न ) कालानुपूर्वी किसे कहने हैं ( उत्तर ) कालानुपूर्वी द्विपकार विवण कीगई हैं जैसे कि ( उव- णिदियाय अणावणिहियाए ) उपनिधि का और अनुपनिधि का अपितु (तत्थ णं जा सा स्वणिहियाए साहप्पा )जो उपनिधि का है वह इस समय स्थापनीय है क्योंकि उसका स्वरूप फिर किया जायगा किन्तु जी (तस्थ णंजा सा अणांव- णिदिया मादुविहा पं० २० ) उनमें से जो अनुपनिधि का है वह द्विषकार से प्रतिपादन कीगई है जो कि (गमववहाराणं संगहस्स ) नंगम और व्यव- हारनय और संग्रहनय के मन से किन्तु (गमवयहाराणं तहेव पंचविहा ) नैगम और व्यवहारनय से पूर्ववत् पांच प्रकार से वर्णन कीगई है (जाव तिसमयष्टिंइए माणुपुब्बी जाव असंखेज्न समयटिइए आणुपुत्री) यारत् तीन समय की स्थिति वाला द्रव्य यानुपूर्वी संतक होना है इसी प्रकार असंख्यात समय की स्थिति वाला भी आनुपूर्वी संजक होता है स्थिति की अपेक्षा से द्रव्यों की फालानुपूर्वी बननी है क्योंकि अभेदरूप होने से अपितु ( एगसमयहितीए भणाणुंपुची ) एक समय की स्थिनि वाला द्रव्य अनानुपूर्वी होता है ( दुसमय द्वितीय शवत्तच्चए ) हिमगय की स्थिनि वाला द्रव्य अवनव्य संज्ञक होता है यह तीन भंग एक वचनान्न है अब तीनों के मूत्रकार बहुवचन सिद्ध करत हैं (तिममयहितीयायी आणुगुब्बी जाव असंसंग्ज समयहितीयाओं आणुपु- जीओ) बद्न मे द्रव्य नीनों समय की स्थिति वालों की अपेक्षा से बहुतसी कालानुपूर्षियां होनी है इसी प्रकार यावत् असंख्यात समय की स्थिति वालों द्रव्यों की अपना से बहनसी कालानुपूर्वियां होती हैं । ( एगसमयहितीयानो अणाणुपुच्चीश्री ) बहुन में द्रव्यों की एक समय की स्थिति की अपेक्षा से वहुत. सी अनानुपूर्वियां होनी हैं (दुगमयटितीयाई अवत्तव्ययाई) बहुन से द्विसम की स्थिति वाले द्रव्यों की अपेक्षा से बहुत से अवक्तव्य द्रव्यं होते हैं । सेत्तं गमयवहाराणं अपयपम्यणया) यही नैगम और व्यवहारनय के मत से अर्थ पद की प्रतिपादनना है । जब गुरु ने इस प्रकार से कहा तव शिष्य ने शंका की कि ई भगवन् ! (पयाए चत्र गमववहाराणं अकृपयपरूवणयाए किं पोयण) रन नैगम और व्यवहारनय के मत से अर्थ पद प्रतिपादनता का पुख्य प्रयोजन क्या है ? इस प्रकार शिष्य की शंका होने पर गुरु कहने लगे कि! इनका मुख्य प्रयोजन (भंगसमुक्त्तिणया कीरइ) भंगों की समुत्कीर्तन (१०८) ॐ अनुयोगद्वार सूत्र * करना है अर्थात् इनके द्वारा भेगों की समुत्कीर्तनता कीनाती है जब गुरु ने इस प्रकार से कहा तब शिष्य ने फिर पूछा कि (सेकिंतं णेगमववहाराणं भंगसमु- कित्तणया) वह कौनसी है जो नैगम और व्यवहारनय के मत से भंग समुत्की- तनता है, गुरु ने उत्तर दिया कि ( अत्थि आणुपुच्ची अस्थि अणाणुपुब्बी अस्थि अवत्तव्यय एवं दवायुपुच्ची गमेणं कालागुपुब्बी एवित्ते चेव छब्बीस भंगाणेयचा जाव सेत्तं गमववहाराणं भंगसमुक्त्तिणयाए ) एक आनुपूर्वी द्रव्य है एक अनानुपूर्वी द्रव्यं है २ एक अवक्तव्य द्रव्य है इसी प्रकार द्रव्यानु- पूर्वीवत् कालानुपूर्वी जाननी चाहिये सो वही पद् विंशति भंग भी जानने चाहिये माग्यत् यावत् यही नैगम और व्यवहारनय के मत से भंगों की समु- कीर्तनता है जव गुरु ने ऐसे कहा, तब फिर शिष्य ने शंका की कि ( एयाए 'णेगमववहाराणं भंगसमुकित्तणयाए किंपोयणं २ भंगोवदसणया कीरइ) इन नैगम और व्यवहारनय के मत से भंग समुत्कीर्तनता का मुख्य प्रयोजन क्या है जब शिष्य ने ऐसे कहा तव गुरु ने उत्तर दिया कि इनका मुख्य प्रयोजन मंगोपदर्शनता है अर्थात् इनके द्वारा भगोपदर्शनता कीजाती है शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि (सेकिंतं गमववहाराणं भंगोवदसणया २ तिसमय- लिइए आणुपुब्बी एगसमयष्ठिइए अणाणुपुची दुसमठितीय अवत्तबए एत्थ विसो चेन गमो सेत्तं भंगोवदसणया) वह कौनसी नैगम और व्यवहारनय से भंगोपदर्शनता है गुरु ने कहा कि तीन समय की स्थिति वाला द्रव्यानुपूर्वी सज्ञक है. एक समय की स्थिति वाला भनानुपूर्वी संज्ञक है, द्विसमय की स्थिति वाला अवक्तव्य संज्ञक है. सो इसी प्रकार यहां पर उन्हीं भंगों का उच्चारण करना चाहिये जो भंगपूर्व दिखलाए गए है से शब्द अर्थ शब्द का वाचक हैं सो यही भंगोपदर्शनता है ( सेकित समोयारे) ( प्रश्न ) समवतार किसे कहते हैं ( गमववहाराणं आणुपुची दवाई कहि समायरंति ) और नैगम व्यवहार नयके मतसे श्रानुपूर्वी द्रव्य कहांपर समवतार होते हैं (किं आणुपुची दोहिं समोयरंति पुच्छा ) क्या आनुपूर्वी द्रव्यों में ही समवतार होते हैं या अनानुपूर्वी द्रव्यों में अथवा अवक्तव्य द्रव्यों में समवतार होते हैं ( गोयमा आणुपुची दब्बेहि समोयरंति नो अणाणुपुवी दव्वेहिं समोयरंति नो अवत्तव्यगदव्वेहिं समोयरंति ) भगवान् ने उत्तर दिया कि हे गौतम ! आनुपूर्वी द्रव्य आर्नुपूर्वी द्रव्यों में ही * अनुयोगद्दार सूत्र * (१०६) समवतार होते हैं भनानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार नहीं होते अवक्तव्य द्रव्य में भी समवतार नहीं होते केवल स्वजाति में ही समवतार होते हैं । ( एवं दोन्निवि सहाणे २ समोयरंति से समोयारे ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी द्रव्य और अब कच्य भी स्वस्थानों में ही समवतार होते हैं अन्य स्थानों में समवतार नहीं होते सो यही समवतार द्वार हैं ( सेफित अनुगमे २ नवविहे पं० त० ) ( प्रश्न) अनुगम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ( उत्तर ) नव प्रकार से जैसे किं (सेत् पयपरूवणया नाव अप्पाबहु ) विद्यमान पदों की प्रतिपादनता यावत् भल्प बहुत पर्यन्त पूर्ववत् जानना चाहिये अब इनका पृथक् २ ता से विवर्ण किया जाता है जिससे बहुन ही सुलभ बोध हो । भावार्थ-कालानुपूर्वी उसका नाम है जो द्रव्य काल से अभेद रूप जिनकी स्थिति काल से विद्यमान है सो कालानुपूर्वी कही जाती है स्थिति की अपेक्षा से कालानुपूर्वी वनजाती है सो कालानुपूर्वी के मुख्य दो भेद हैं उपनिधि का और अनुपनिधि का उनमें से उपनिधि का स्थापनीय है उसका स्त्र- रूप फिर किया जायगा अपितु अनुपनिधि का दो प्रकार से कही गई है नैगम व्यवहार से और संग्रहनय से पुनः नैगम और व्यवहार नग के मतसे उसके ५ भेद है यावत् तीन समय की स्थिति वाला द्रव्य आनुपूर्वी संज्ञक होता इसीप्रकार असंख्यात समय की स्थिति वाले द्रव्य को भी जान लेना चाहिये एक समय की स्थिति वाला अनानुपूर्वी होता है. द्विसमय की स्थिति वाला यवतव्य संझक होता है इन तीनों को बहुवचनान्त करने से आनुपूर्वी द्रव्य भनानुयुर्वी और अवकद्रव्य होते हैं, इस प्रकार जान लेने चाहिये यही नैगम और व्यवहारनय के मत से अर्थपद की प्रतिपादनता है सो इसका प्रयोजन भंगों की समुत्कीर्तन करना है । भंगों की समुत्कीर्तनता जैसे पूर्वद्रव्यानु- पूर्वी में की गई है उसी प्रकार जान लेनी पद विंशति भंगों का स्वरूप वहांपर दिखलाया गया है और भंग समुत्कीर्तनता का मुख्य प्रयोजन भंगोपदर्शनता है वहभी प्राग्वत् है क्योंकि पूर्व इनका सविस्तर स्वरूप दिखलाया जाचका है अपितु नैगम और व्यवहार के मत यावन्मात्र द्रव्य हैं वह स्व जाति में समवतार होते है अन्यजातियों में नहीं जैसे कि आनुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्यों में समावेश किए जाते हैं मनानुर्वी भार भवक्तव्य द्रव्यों में नहीं, इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवाच्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये इसी का नाम समवतार द्वार 4- ( ११० ) * अनुयोगद्वार सूत्र * है अतः अनुगम द्वार प्राग्वत् नव प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, विद्यमान अर्थोंका प्रतिपादन यावत् अल्प बहुत पर्यन्त जानना.।। अब इनका सविस्तार स्वरूपं वर्णन किया जाता है ।। मूल-णेगमववहाराणं आणुपुब्बीदव्वाइं कि अत्थिनस्थि नियमा अस्थि एवं दोनिवि ॥ पदार्थ--(णेगमववहाराणं आयुपुन्बी दवाई कि अत्थिं नत्थि नियमा अत्थि एवं दोनिवि ) ( प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के मत से 'आनुपूर्वी द्रव्यों की अस्ति है किम्बा नास्ति है ( उत्तर ) नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्यों की निश्चय ही अस्ति है। इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अव- क्तव्य द्रव्यों की भी अस्ति है ।। भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय के मत से तीनों द्रव्यों की सदैव काल अस्ति है तीनों द्रव्य दोनों नयों के मत से सदैव काल विद्यमान रहते हैं ।। अथ द्रव्यों के प्रमाण विषय । मूल--(णेगम ववहाराणं प्राणुपुवीदवाई किं संखे- ज्जाइं असंखेज्जाइं अणंताई नो संखेज्जाइं असंखेज्जाई नो अणंताई एवं दोन्निवि गमववहाराणं प्राणुपुब्बीदव्वाई लोगस्स किं संखज्जइभागे पुच्छा एगं दव्वं पड्डुच्च संखेज्जइ भागे पा होज्जा जाच देसूणे लोए वा होज्जा नानादव्वाई. पडुच्च नियमा सव्वलोए होज्जा एवं दोनिवि एवं फुसणावि. णेगमववहाराणं प्राणुपुवीदवाई कालो केवीचर होइ एगं दब्बं पडुच्च जहन्नेणं तिन्निसमया उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं नाना दव्वाइं पडुच्च सव्वद्धा णेगमववहाराणं अणाणुपुवीदवाई कालो केवचिरं होइ एग दव्वं पडुच्च अजहन्नमणुक्कोसेणंएगं समयं नानादव्वाइं पड्डुच्च नियमा सव्वद्धा अवत्तब्वग़दवाणं पुच्छा एगं दव्वं पडुच्च अजहन्नमणुकोसेणं दोसमगाई नाना * अनुयोगद्दार मूत्र * (१११) 'दबाई पडुच्च सव्वद्धा णेगमववहाराणं प्राणुपुत्वीदव्वाइं अंतर कालो केवचिरं होइ एगं दव्वं पडुच्च जहन्नेणं एगं समयं उक्कोसे- एं दोसमयानानादबाइं पडुच्च नत्थि अंतरं ऐगमववहाराणं प्रणाणुपुब्बीदवाणं पुच्छा एगं दब्बं पडुच्च जहन्नेणं दोस- मया उकोसेणं असंखज्जं कालं नाना दवाई पडुच्च नस्थि अंतरं ऐगमववहाराणं अवत्तव्वगदवाणं पुच्छा एगं दवं पडुच्च जहन्नेणं एगं समयं उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं नाना दवाई पडुच नत्थि अंतरं णेगमववहाराणं प्राणुपुब्बीद- ब्वाइं सेसदब्वाणं कहभागे होज्जा पुच्छा. जहेव खेत्ताणु पुब्बीय भावो वितहेव अप्पा वहुंपि तहेवनेयजंजावसेत्तं णेगम ववहाराणं अयोवणिहिया कालाणुपुवी पदार्थ-( गमववहाराणं आणुपुब्बीदवाई कि संखेज्जाई असंखेज्जाई अणंताई ) (प्रश्न ) नैगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य क्या संख्णत द्रव्य है वा असंख्यात द्रव्य है तथा अनंत द्रव्य हैं (उत्तर) (नो संखेज्जाई असंखेज्जाइं नो अणंताई ) संख्यात नहीं हैं असंख्यात हैं किन्तु भनंत भी नहीं है ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये । (णेगमववहाराणं आणुपुचीदवाई लोगस्स किं संखे- ज्जड भागे होजा पुच्छा) (प्रश्न ) नैगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य लोक के संख्यात भाग में होते हैं वा असंख्यात भाग में अथवा बहुत से संख्यात असंख्यात भागों में होते हैं तथा सर्व लोक में ही होते हैं ( एगे दव् पट्टच संखेनर भागे होज्जा जाव देमूणे वा लोए होज्जा नानादव्वाई पडच नियमा सन्चलोए होजा) (उत्तर) एक द्रव्य की अपेक्षा से लोक के संख्यात भाग में होजाता है असंख्यात भाग में भी होजाता है यावत् स्वल्प भाग को छोड़कर सर्वलोक में भी होजाता है अचित महास्कंधवत् अथवा केवली की समुद्धातवत् अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से निश्चय ही सर्व लोक में आनुपूर्वी द्रव्य होते हैं ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अपक्तव्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये ( एवं फुसणावि) इसी (११२) * अनुयोगद्वार सूत्र * प्रकार स्पर्शना द्वार भी जान लेना चाहिये (णेगमववहाराणं आणुपुचीदव्वाई . फालओ केवचिरं होइ ( प्रश्न ) नैगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य काल से कब तक रह सकता है अर्थात् स्थिति कितने चिर पर्यंत होसकती है ( उत्तर ) ( एगं दव्वं पडुञ्च जहन्नेणं तिन्निसमया उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं नानादवाई पडुश्च सव्वद्धा) एक आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून तोन समय की स्थिति है उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त एक द्रव्य रह सकता है अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से आनुपूर्वी द्रव्य सर्व काल में रहते हैं । अथ अनानुपूर्वी विषय प्रश्न करते हैं । (णेगम ववहाराणं अणाणुपुव्वी दवाई कालओ केवचिरं होइ (प्रश्न ) नैगम और व्यवहारनय के मतसे अनानुपूर्वी द्रव्य कबतक रह सकता है ( उत्तर ) ( एगं दन्नं पडुच्च अजहन्नमणुकोसेणं एगे समयं नाणादवाई पडुब नियमा सम्बद्धा) एक द्रव्य की अपेक्षा से न तो जघन्य काल है न उत्कृष्ट काल है केवल एक समय मात्र अनानुपूर्वी द्रव्य स्थिति करता है किन्तु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अनानुपूर्वी द्रव्य सदैव काल रहते हैं । अथ श्रवक्तव्य द्रव्य भी विषय निर्णय किया जाता (अवत्तव्य गदवाणं पुच्छा) (प्रश्न) नैगम और व्यवहारनय के मत से अवक्तव्य द्रव्य कवतक रह सकता है ( उत्तर ) ( एगं. दव्वं पड्डुच्च अजहन्न मणुक्कोसेणं दोसमयाई नानादबाई पडुच्च सम्बद्धा) एक द्रव्य की अपेक्षा से न तो. जघन्य काल न उत्कृष्ट काल केवल दो समय की स्थिति होती है अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अवक्तव्य द्रव्य सदेव काल रहते हैं। अथ अंतर काल विषय प्रश्न किये जाते हैं । ( णेगम यवहाराणं आणुपुचीदवाणं अंतरं कालओ केवचिरं होई) (मन्न) नेगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य का काल से कितना चिर अन्तर काल होता है ( उत्तर ) ( एग-दव्वं पडुन जहन्नेणं एगं समयं उक्कोसेणं दो सपया नानादवाई पड्डुच्च नत्थि अंतरं ) एक आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून एक समय का अंतर काल होता है क्योंकि सब से न्यून स्थिति अनानुपूर्वी द्रव्यों की है जब भानुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी भाव को छोड़कर अना- नुपूर्वी में चलागया फिर वहां से श्रानुपूर्वी में आगया तव न्यून से न्यून एक समय का अंतर काल हुआ और यदि उत्कृष्ट अंतर काल होजावे तो दो समय मात्र में होता है क्योंकि अवक्तव्य द्रव्य की स्थिति दो समय की है सो अबक्रव्य * अनुयोगद्वार सूत्र (११३) द्रव्य में जाकर फिर प्रानुपूर्वी में चला जाये तव उत्कृष्ट अंतर काल दो सगय प्रमाण हुआ, अपितु नाना प्रकार के आनुपूर्वी द्रव्यों की अपेक्षा से अंतर काल होता ही नहीं क्योंकि ये द्रव्य सदैव काल रहते हैं | अअअनानुपूर्वी द्रव्यों के अन्तर काल विपय प्रश्न किया जाता है (णेगम ववहाराणं अणाणुपुच्ची दवाणं पुच्छा) हे भगवन् ! नैगम और व्यवहार नय के मत से अनानुपूर्वी द्रव्यों का अन्तरकाल कितने चिर का होता है, गुरु कहते हैं भो शिष्य ! ( एग दव्वं पडुन जहन्नणं दो समया उकोसेणं असंखेजं कालं नाना दबाई पडुच्च नत्थिं अंतरं ) एक अनानुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून दो समय पर्यन्त अंतरकाल होता है जैसे कि अनानुपूर्वी द्रव्य अवक्तव्य द्रव्य में चलागया.अतः अवक्तव्य द्रव्यों की स्थिति दो समय प्रमाण है सों वहाँ पर दो समय स्थिति पूर्ण करके फिर अनानुपूर्वी द्रव्य में आजाए तो न्यून से न्यून दो समय मात्र अंतरकाल हुआ यदि वह द्रव्य आनुपूर्वी में चला जाय तो उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त अन्तरकाल होजाता है क्योंकि आनुपूर्वी द्रव्यों की उत्कृष्ट स्थिति असंख्यात काल प्रमाण है इसलिये उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात काल पर्यन्त होता है अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अंतरकाल नहीं होता है क्योंकि अनानुपूर्वी द्रव्यों का सर्वथा कभी भी अभाव नहीं होता है इसलिये अंतरकाल भी नहीं है । अव अवक्तव्य द्रव्य के विषय में वर्णन किया जाता है (गमववहाराणं अवत्त वगदवाणं पुच्छा ) हे पूज्य निगम और व्यवहार नय के मत से अवनव्य द्रव्यों का अंतरकाल कितने चिर पर्यन्त होता है गुरु कहते हैं भी शिष्य ! ( एग दन्वं पडुच्च जहन्नेणं एगं समय उक्कोसेणं असंखेज्ज कालं नाना दवाई पडुश नत्यि अन्तरं ) एक अवतव्य द्रव्य की अपेक्षा में न्यून से न्यून अंतरकाल एक समय मात्र होता है क्योंकि अनानुपूर्वी द्रव्यों की स्थिति एक समय मात्र की है जब अवक्तव्य द्रव्य अपने भाव को छोड़कर अनानुपूर्वी द्रव्य में चला गया और फिर वहां से अवक्तव्य द्रव्य के भाव को प्राप्त होगया तो न्यून से न्यून एक समय मात्र अंतरकाल हुआ यदि आनुपूर्वी में गया तो उत्कृष्ट असंख्यात काल प्रमाण अंतरकाल होजाता है अतः नाना प्रकार के प्रवकन्य द्रव्यों की अपेक्षा से अंतरकाल नहीं होता है क्योंकि इनका सर्वथा अभाव नहीं है अथ शेप द्रव्यों के कतिपय भाग में यह द्रव्य हैं इस विषय में,वर्णन किया जाता है.(ोगमववहाराणं आणुपुचीदवाई सेसदव्वाणं कई १११४ ) •* अनुयोगद्वार सूत्र* भागे होज्जा पुच्छा ) हे भगवन् ! नैगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य शेष द्रव्यों के कतिपय भाग में होता है गुरु कहते हैं ( जहंव खत्ताणुपु- व्वीय भावो वितहेव अप्पावडुपि तहेव नेयव्वं जाव सेचं गमयवहाराणं अणोव- णिहिया कालाणुपुत्री ) जैसे क्षेत्रानुपूर्वी का भाव वर्णन किया गया है उसी मकार कालानुपूर्वी का भी भाव जान लेना चाहिये और उसी प्रकार अन्प वहुत्वद्वार भी जान लेना यही नैगम और व्यवहारनय के मत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी है से शब्द अथ शब्द का वाची है इसीवास्त सूत्र में से शब्द पुनः २ ग्रहण किया गया है। भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय के मतसे तीनों द्रव्य असंख्यात हैं और तीनों द्रव्य लोक के संख्यात भाग में वा असंख्यात भाग में वा देशून सर्व लोक में हो सकते हैं अतः तीनों द्रव्य नाना प्रकार के द्रव्यों अपेक्षा से सदैव काल विद्यमान रहते हैं इसी प्रकार स्पर्शनाद्वार जान लेना । नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य जघन्य काल तीन समय उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त रहता है अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से यह द्रव्य सदैव काल रहते हैं तथा उक्त दोनों नयों के मतसे एक अनानुपूर्वी द्रव्य एक समय मात्र रहता है नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से सदैव काल रहते हैं और अवक्तव्य द्रव्य की स्थिति दो समय मात्र है नाना प्रकार के अवक्रव्य द्रव्य सदैव काल रहते हैं और नैगम व्यवहार नय के मत से एक आनुपूर्वी द्रव्य का जघन्य से एक समय प्रमाण उत्कृष्ट दो समय मात्र अंतर काल होता किन्तु नाना प्रकार के आनुपूर्वी द्रव्यों की अपेक्षा से अंतर काल नहीं होता है और अनानुपूर्वी द्रव्य का जघन्य दो समय प्रमाण उत्कृष्ट असंख्यात काल का अंतर काल हो जाता है किन्तु नाना प्रकार के अनानुपूर्वो द्रव्यों का अंतर काल नहीं होता है क्योंकि वे सदेव काल रहते हैं नैगम और व्यवहार नयके मत से एक प्रवक्तव्य द्रव्य का जघन्य से एक समय प्रमाण उत्कृष्ट असंख्याव काल पर्यन्त अंतर काल है अपितु अनेक अवक्तव्य द्रव्यों की अपेक्षा से अंतर काल नहीं होता है सो अंतर कालं का तात्पर्य इतना ही है कि-अपनी जाति को छोडकर पर जाति में प्रवेश करना फिर स्वजाति में आजाना तो उसको अंतर काल कहते हैं यह वर्णन उक्त दोनों नयों के मत से किया गया और यह तीनों द्रव्य परस्पर द्रव्यों के कतिपय भागों में होते हैं इस विषय में .
* अनुयोगद्वार सूत्र * (११५ ) मैस क्षेत्रानुपूर्वी में कथन किया गया है उसी प्रकार जान लेना चाहिये वैसेही भन्प बहुत्व द्वार का भी समास जान लेना । यह नेगम और व्यवहार नयके मत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी वर्णन की गई है अब संग्रहनय के मत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी का विवर्ण किया जाता है । अथ संग्रह नय विपय । सेकिंतं संग्गहस्स प्रणोवणिहिया कालाणुपुब्बी पंचवि- हा पं० तं० अपयपरूवणया एवमाइ जहेब खत्ताणुपुटवी संग्गहस्स तहा कालागुपुष्यी एविभाणियब्वाई नवरं टिह अभिलाचे जाव सेत्तं अणोवणिहिया कालाणपुब्बी ।। पदार्थ-(सेकिंतं संग्गहस्स प्रणोवणिहिया कालाणुपुली २ पंचविहा पं० २०) हे पूज्य ! संग्रह नय के मत से वर्णन की हुई अनुपनिधि का कालानुपूर्वी फौनसी है. गुरु कहते हैं कि-संग्रह नय के मत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी पांच प्रकार से प्रतिपादन कीगई है जैसे कि-(अट्ठपयपरूवणया एवमाइनहेव रेसचाणुपुच्ची संग्गहस्सं तहेव कालाणुपुत्री एविभारिणयवाई) जैसे कि-अर्थ पद प्रतिपादनता १ भंगसमुत्कीर्तनता २ भंगोपदर्शनता ३ समवतार ४ और अनुगम ५ और शेप विवर्ण जैसे क्षेत्रानुपूर्वी का कथन किया गया है उसी प्रकार कालानुपूर्वी का भी समास जान लेना चाहिये ( नवरं हिअभिलावेजाव . ससं अणावणिहिया कालाणुपुच्ची ) किन्तु इतना विशेप है कि स्थिति बोधक स्त्र कहना चाहिये सो इसी का नाम अनुपनिधि का कालानुपूर्वी कहते हैं। भावार्थ-संग्रह नय के मत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी पांच प्रकार से वर्णन कीगई है शेष विवर्ण जैस पूर्व क्षेत्रानुपूर्वी का विवर्ण किया गया है उसी प्रकार कालानुपूर्वी का विवेचन जान लेना चाहिये अपितु यहां पर स्थिति का अभिलापक ग्रहण करो सो इसी का नाम अनुपनिधि का कालानुपूर्वी कहते हैं पर इस के पश्चात् उपनिधि का कालानुपूर्वी का वर्णन किया जाता है. ।। अथ उपनिधिका कालानुपूर्वी विषय । सेकितं उवाणिहिया कालाणुयुब्बी २ तिविहा पण्णत्ते.
( १९६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र- तंजहा पुब्वाणुपुब्बी पच्छाणुपुब्बी अपाणुपुब्बी सेकिंतं पुवा- णुपुब्बी समय १ श्रावलिया २ श्राणां पाणु ३ थोवे ४ लवे ५ मुहुत्ते६अहोरते ७ पक्खे मासे ६ उऊ १० अथणे ११ संवच्छरे १२ जुगे १३ वाससए १४ वाससहस्से १५ वाससय सहस्से १६ पुगे १७ पुव्वे १८ तुडियंगे १६ तुडिय २० अङ्- डांगे २१ अडडे २२ अववंगे २३ अववे २४ हुहुअंगे २५ हुहु- ए २६ उप्पलंगे २७ उप्पले २८ पउमंगे २६ पउमे ३० एलिएंगे ३१ एलिणे ३२ अथिणिऊरंगे ३३ अथिणिउरे ३४ अजु- यंगे ३५ अजुए ३६ नउअंगे ३७ नउय ३८ पउगंगे ३६ पउए ४० चूलिअंगे ४१ चूलिया ४२ सीसपहलिअंगे ४३ सीसपहे- लिए ४४ पलिउवमे ४५ सागरोवममे ४६ अोसप्पिणि.४७ उस्सप्पिणि ४८ पौग्गलपरियट्टे ४६ तीतद्धा ५० अणागयद्धा ५१ सव्वद्धा ५२ सेतै पुव्वाणुपुवी सेकिंतं पच्छापुब्बी सव्व: द्धा जाव समय सेत्तं पच्छाणुपुब्बी सेकिंतं अणाणुपुब्बी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाएअणंतगच्छगयाए सेंढीए अन्नमन्न भासो दुरूवूणो सेत्तं अणाणुपुत्वी अहवा उवणिहिया का- लागुपुब्बी २ तिविहा पं० त० पुवाणुपुब्बी पच्छाणुपुब्बी २ अणाणुपुब्बी सेकिंतं पुब्बाणुपुव्वी २ एग समयहितीए जावं असंखेज्ज समयटिइए सत्तं पुवाणुपुब्बी सेकिंतं पच्छाणुपुब्बी २ असंखेज्ज समयछिइय जाव एगसमयष्ठिड्य सेत्तं पच्छाणु: पुब्बी सेकिंतं प्रणाणुपुब्वी २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरि- याए असंखेज्ज गच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नभासो दुरूवूणो सेत्तं प्रणाणुपुवी सेत्तं उवणिहिया कालाणुपुवी सेत्तं का- लागुपुची ।। .
. * अनुयोगद्वार मूत्र * (१.१७) पदार्थ-(सेकित उवाणिहिया कालाण पुची २ तिविही पं० तं० पुवाणु पुची पच्छाणुपुव्वी अणाणुपुब्बी ) हे भगवन् ! उपनिधि का . कालानापूर्वी कितने प्रकार से विवर्ण की गई है । ऐसे शिष्य के पूछने पर गुरु कहते हैं भो- शिष्य ! उपनिधि का कालानुपूर्वी तीनों प्रकार से कथन की गई हैं जैसे कि- पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ( सेकिंत पुवाणु पुची २.) (प्रश्न ) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर) उपनिधि का कालानुपूर्वी उसका नाम है जो उपनाम समीप का है कालानुपूर्वी नाम फालानुक्रमता का है सोजो काल को समीप किया जाय वही उपनिधि का कालानुपूर्वी कही जाती है उस की पूर्वानुपूर्वी निम्न प्रकार से है ( समय १) सर्वसे सूक्ष्म जिस के द्विभाग न दो उस समय कहते है वही काल की गणना का आदिभूत है इसलिये प्रथम समय कथन किया गया है फिर ( आवलिया २) भसंख्यात समयों के काल को आवलिका कहते हैं (आणु पाणु ३) संख्यात आवलिकाओं का एकसा वोच्वास होता है उसी को एक माण कहते है ( थोवे ४ ) सोत प्राणों का एक योव (स्तोक ) होता है ( लवे ५) सात स्तोकों का एक लव होता है ( मुहुः ६) और ७७ लबों का एक मुहुर्त ( दोघटिका) होता है (अहोरते७) तीस. सहनों का एक अहोरात्र होता है ( पक्खे ८) १५ पंचदश अहोरात्रों का एक पत्त होता है (मासे ) २ पक्षों का एक मास होता है ( उऊ १०) दो मासों. की एक ऋतु होती है (.अयण ११ ) और तीन ऋतुओं की एक अयण होती हैं (सम्बत्सर १२) दो अयणों का एक सम्वत्सर (वर्प) होता है (युगे) पांच सम्बत्सरों का एक युग होता है और (. वाससए १४ ) वीस युगों के १०० वर्ष होते है ( वाससहस्से १५) दशशत एकत्र करने पर एक सहस्र होता है (वाससयसहस्से १६) एक शर्त सहस्र वर्ष एकत्व होने पर एक लक्ष वर्प होता है (पुग्नंग १७) चौराशी ८४ लक्ष वर्षों का एक पूर्वाङ्ग होता है (पुच्चे १८) और ८४ लाख पूर्वाङ्गों का एक पूर्व होता है अर्थात् पूर्वाग को चौरासी लाख गुणा करने से एक पूर्व होता है एक.पूर्व के सत्तर लाख करोड़ और छप्पन सास करोड वर्ष होते है तथा अंकों को भी देख लीजिये ७०५६०००००००००० और (तुहियंगे १६ ) और एक पूर्व को ८४ लाख गुणा करने से एक त्रुटि: तांग होता है और (तुडिए २०) और त्रुटितांग को चोराशी लाख गुणा करने एक त्रुटित होता है ( अडडांगे २१ ) चोराशी लाख -त्रुटिंतों का एक * अनुयोगदार सूत्र * अटटांग होता है इसी प्रकार आगे सर्व को चोराशी लाख गुणा करते चले जाना ( अडड २२) चोराशी लाख अटटांगों का एक अट होता है (भव- वंगे २३ ) चोराशी लाख अटट को गुणा करने से एक अववंग होता है (अवये २४) और उसको चोगशी लाख गुणा करने से एक अवव होता है (हु अंगे २५ ) अवव को चौराशो लाख गुणा करने से एक हुहुतांग होता है (हु हुए २६ ) और हुहुतांग को चोराशी लक्ष गुणा करने से एक हुहुक होता है (उप्पलंगे २७) चोरासी लक्ष हुहुक को गुणा करने से एक उत्पलांग होता । है ( उप्पले २८) उत्पलांग को ८४ लक्ष गुणा करने से एक उत्पल होता (पउमंगे २६ ) उक्त को ८४ लक्ष गुणा करने से एक पद्मांग होता है इसी प्रकार आगे भी समझ लेना किंतु पिछले से अगला चौरासी लाख गुणा करते जाना (पउमे ३०) पद्म ( णलिणंगे ३१ ) नलिनांग (णलिण ३२) नलिन ( अस्थिणि उरे ३३ ) अधिनि पूरांग (अथिणिपुरे ३४ ) अर्थिनी पूर ( अजुयंगे ३५) अयुतांग (अजुय ३६ ) अयुत (नउअंगे ३७) नियुतांग और ( नउय ३८) नियुत ( पउमंगें ३९ ) और प्रयुतांग ( पउय ४०) प्रयुत (चूलिअंगे ४१) चूलिकांग और (चूलिया ४२) चूलिका (सीस पहेलि अंगे ४३ ) शीर्प प्रहेलिकांग और (सीस पहेलिय ४४ ) शीर्ष प्रहेलिका यह सर्व पिछले अंकों से अगला अंक चौराशी लाख गुणा किया जाता है तब शीर्ष प्रहेलिका के सर्व अंक इतने हुए, ७५०२६३२०, ३०७.२०१०२४११ ५७६७३५६६६७५६६४०, ६२१८६६६८४८०८०३२६६. इनों से आगे १४० चाली केवल विन्दु लिखे जावें तब १६४ अंकों पर्यन्त संख्या शन्द व्यवहृत होता है अर्थात् गणना १६४ वें अक्षरों पर्यन्तं है आगे उपमा से काम लिया. भाता है जिसका विवर्ण क्षेत्र प्रमाण के विषय में किया जायगा (पलिउवमे. ४५) पल्यापम प्रमाण और ( सागरोवमे ४६ ) सागरोपम प्रमाण ( उसप्पिणि ४७) उत्सर्पिणी काल (उस्सप्पिणिक ४८) अवसर्पिणी काल (पोग्गले परियट्टे ४६) दश कोटाकोटि सागरोपम से एक अवसर्पिणी काल होता और दश कोटाकोटि सागरोपम प्रमाण एक उत्सर्पिणी काल अपितु अनन्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणियों के एकत्रित करने से एक पुद्गल परावर्तन होता है ( तीतदा ५० ) अनन्त पुद्गल परावर्तनों का भूतकाल है और (अणागयदा ५१) तावत्प्रमाण भविष्यत् काल है ( सन्नद्धा ५२ ) दोनों के मिलने से सर्व . * अनुयोगदार सूत्र * (११९). काल होता है ( सत्तं पुवाणुपुन्नी) सो इसको पूर्वानुपूर्वी कहते हैं (सैकिंत पच्छाणुपुची सन्नद्रा जाच समय से पच्छाणुपुच्ची ) हे भगवन् ! पश्चात् भानुपूर्वी किसे कहते हैं भो शिष्य! सर्व काल से लंकर यावत् एक समय पर्यंत जो गणना कीजाती है उसी को पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं ( सेकितं अणाणु- पुन्बी २ एयाए चेव एगाइयाए एगुसरियाए अणन्त गच्छ गयाए सेढीए अन्न मन्नभासो दुरूवृणो सेत्तं अणांणुपुब्बी) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! अनानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! यह जो पूर्वानुपूर्वी की गणना है इसको एक से वृद्धि करते हुए अनन्त गच्छ रूप श्रेणिये जव होजाएं तब परस्पर गुणा करने से यावन्मात्र भंग वनते हैं उनमें से आदि और अंत के भंग के न्यून करने से शेप रहे हुए भंगों को अनानुपूर्वी कहते हैं । यही अनानुपूर्वी का विवर्ण है। अब सूत्रकार अन्य प्रकार से भी इनका विवर्ण करते जैसे कि-(.अहवा उचणिहिया कालाणुपुची तिविहा पं० त० पुव्वाणुपुची पच्छागुपुत्री प्राणाणुपुव्वी) अथवा उपनिधि का कालानुपूर्वी तीनों प्रकार से निवर्ण की गई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ इस प्रकार के गुरु के वचन सुनकर शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे पूज्य ! (सेकिंतं पुवाणुपुब्बी २ एगसमयहितीए जाव असंखेज समयाइए से पुन्वाणुपुन्नी ) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! पूर्वानुपूर्वी उसे कहते हैं जो द्रव्य काल से एक समय की स्थिति वाला है यावत् असंख्यात समयों की स्थिति वाला इस प्रकार की अनुक्रमता पूर्वक गणना को पूर्वानुपूर्वी कहते हैं और यही पूर्वानुपूर्वी है (सेकिंतं पच्छासुपुव्वी २ असंखेजसमयाठिइए जाच एग समयष्ठिइय सेत्तं पच्छाणुपुच्ची ) (प्रश्न ) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर ) जो पूर्वानुपूर्वी की गणना है उससे विपरीत गणना करना उसी का नाम पश्चात् भानुपूर्वी है जैसे कि-असंख्यात समयों की स्थिति वाले द्रव्य से लेकर एक समय की स्थिति पर्यन्त जो द्रव्य हैं उन पश्चात् भानुपूर्वी कहते हैं और यही पश्चात् भानुपूर्वी है (सोकतं अणाणुपुब्बी २ एकाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए असंखेज्जगच्छगयाए सेटीए अन्नमन्भासो दुरुपूणो से अपाणुपुब्बी सेत्तं उपणिहिया कालाणुंपुब्बी से कालाणुपुच्ची) (प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन एक समय से जो लेकर श्र- संख्यात समयों पर्यन्त स्थिति वाले द्रव्य हैं उनकी अंसंख्यात गच्छरूप श्रेणी ( १२० ) * अनुयोगद्वार सूत्र * जर की जाये तब उनको परस्पर गुणा करने से याचन्मानं भंग बनते हैं उनमें से आदि अन्त के रूप को छोड़कर शेष अंक अनानुपूर्वी के माने जाते हैं इस लिये अनानुपूर्वी गत उपनिधि का कालानुपूर्वी का व्याख्यान किया गया और इसी को कालानुपूर्वी कहते हैं अपितु समानता से तीनों का विवर्ण सम्पूर्ण होगया। भावार्थ-उपनिधि का कालानु पूर्वी तीनों प्रकारों से विवर्ण की गई है। जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ अतः कालसे पूर्वानु- पूर्वी निम्न प्रकार से है जैसे कि-जो विभाग से रहित और सबसे सूक्ष्म हो उसे समय कहते हैं सो काल से गणना जो की जाती है उसकी आदि में प्रथम समय ही ग्रहण किया जाता है अपितु असंख्यात समयों के प्रमाण से एक आवलिका होती है संख्यात पावलिकार्यों का एक प्राण होता है सातं माणों का थोष ( स्तोक) और सातों थोवों का एक लब, ७७ लवों का मुहूर्त, ३० मुहूर्तों की दिन रात्रि होती है १५ दिनों का एक पक्ष, २ पक्षों का मास, २ मासों का ऋतु ३ ऋतुओं की अयण २. अयणों का सम्बत्सर । सम्बत्सरों का युग, २० युगों का शतवर्ष १० शतवर्ष का एक सहस्र, १०० सहस्र का एक लक्ष ८४ लक्षवर्षों का एक पूर्वांग होता है और पूर्वांग को चौरासी लाख गुणा करने से एक पूर्व होता है इसी प्रकार शीर्षप्रहेलिका पर्यन्त चौरासी लाख गुणा करते जाना सो यहांसक गणित का विषय है उनके १६४ अचार बन जाते हैं इनसे आगे पन्योपम वा सागरोपम से काम लिया जाता है यह सर्व ५२. अंकों की पूर्वानुपूर्वी है इनका विवर्ण पदार्थ में किया, गया है और इन्हीं को उल्था गणन करने पश्चात् आनुपूर्वी बन जाती है, अपितु.५२ अक्षरों को परस्पर गुणा करने से फिर आदि और अंत के रूप को, छोड़ कर शेष जो भंग हैं उनको अनानुपूर्वी कहते हैं अथवा एक समय से, लेकर यावत् असंख्यात समयों पर्यन्त पूर्वानुपूर्वी होती है इसको उल्था करन: से पश्चात आनुपूर्वी बन जाती है जैसे कि. असंख्यात समय से लेकर याक्तः एक समय. पर्यंत अनानुपूर्ती है जो असंख्यात रूप श्रोणिः को परस्पर गुणाः करने से जो भंग बनते है उसके आदि और अंत के भंगों को छोड़कर शेष भंग अनानुपूर्वी के होते हैं -सो इसी का नाम उपनिधि का कालानुपूर्वी है ।
* अनुयांगद्वार मूत्र * (१२१) अथ उत्कीर्तन पूर्वानुपूर्वी विषय । सेकिंतं उकित्तणाणुगुब्बी २ तिविहा पन्नते तंजहा पुब्वाः गुपुची पच्छाणुपुवी अणाणुपुवी सेकिंतं पुवाणुपुत्वी उसमे १ अजिय २ संभवे ३ अभिणंदणे ४ सुमई ५ पउमप्पहें ६ सुपामे ७ चंद्रप्पहे ८ सुविहे ६ सीमले १०. सेज्जसे ११ वा सुपुज्जे १२ विमले १३ अणते १४ धम्मे १५ संति १६ कुंथु १७ अरे १८ मल्ली १९ मुनिसुव्वए २० एमी २१ अरिष्ठनेमी २२ पासे २३ वद्धमाणे २४ सेत्तंपुवाणुपुवी सेकिंतं पच्छाणुपुवीर वद्धमाणे जाव उसमे सेत्तं पच्छाणुपुब्बी सेकिंत अणाणुपुब्बी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए चउव्वीसगच्छगयाए संढीए अन्नमन्नम्भासो दुरूवूणो सेत्तं प्रणाणुपुब्बी सेत्तं उक्कित्तणागपुब्बी ॥ पदार्थ-(सेकितं उक्त्तिणाणुपुब्बी २ तिविहा पन्नत्तेतंजहा पुन्वाणुपुब्बी पच्छाणुपुची अणाणुधी) (प्रश्न ) उत्कीर्तनानुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर) उत्कीर्तनानुपूर्वी भी तीनों प्रकार से विधर्ण की गई है जैसे कि-पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ ( सेकितं पुव्वाणुपुत्री २) (प्रश्न ) पूर्वानु- पूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) पूर्वानुपूर्वी उसका नाम है जो अनुक्रमतापूर्वक गणन किया जावे जैसे कि-( उसमे ) ऋपभदेव १ ( अजिय ) अजितनाथ २ (संभवे ) शंभवनाथ ३ (अभिणदणे ) अभिनंदननाथ ४ (सुमई ) सुमति- नाथ ५ (पउमप्पहेसुपासे चंद्रप्पह ) पद्मप्रभु ६ मुपार्श्वनाथ ७ चंद्रप्रभु ८ (सु- विहे सीयलेसेज्ज सेवासुपुज्जे ) सुविधिनाथ : शीतलनाथ १० श्रेयांसनाथ ११ वासुपूज्य स्वामी १२ (विमले अणंते धम्मसंति) विमलनाथ १३ अनंतनाथ १४ धर्मनाथ १५ शान्तिनाथ १६ कुंथुनाथ १७ अरनाथ १८ मल्लिनाथ १६ मुनिसु- प्रतस्वामी २० (एमीअरिष्टनेमि पासेवद्धमाणे ) नमिनाथ २१ अरिएनेमि २२ दशेनया प्रा० व्या० प्र०८ पा० २ सू०८० ब्रशन्द रेफस्य वा लुग भवति । .
(१२२) * अनुयोगद्वार सूत्र * पार्श्वनाथ २३ वर्द्धमानस्वामी २४ ( सेत्तं पुव्वाणुपुची) अथ यही पूर्वानुपूर्वी है अर्थात् अनुक्रमता पूर्वक यह गणना है ( सेकिंतं पच्छाणुपुची २ ) (प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) पश्चात् आनुपूर्वी उसे कहते हैं जो वर्द्धमानस्वामी से लेकर ऋपभदेव पर्यन्त गणना की जाए उसी का नाम पश्चात् आनुपूर्वी है ( सेकिंतं अणाणुपुच्ची एयाए चे च एगाइयाइ एगुत्तरियाए च उव्वीसगच्छगयाएसेटिए अन्नमनभासो दुस्वुणो सेत्त अणाणुपुन्नी संत्तं उकिं- तणाणुपुच्ची ) ( प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) अनानुपूर्वी उसका नाम है जो इनको एक २ की वृद्धि करते हुए चतुर्विंशति अंकों पर्यन्त गच्छ- रूप श्रेणि की जाए जसे कि-१-२-३-४.-५-६-७-८-8-१०-११-१२-- १३-१४-१५-१६-१७-१८-१६-२०-२१-२२-२३-२४ फिर इनको प- रस्पर गुणा करना जैसे कि-१ को द्विगुण २ को त्रिगुण ६ फिर चतुर्गुण करने पर २४ इनको पांच गुणा करने से १२० फिर इन्हीं को ६ गुणा करने से ७२०, ७२० को ७ गुणा करने से ५०४० यावत् २७१४४६१७५७५८२६२२- ५४७२०००० इसी प्रकार २४ अंक पर्यन्त परस्पर गुणा करके श्रादि और अंत के भंग को छोड़कर शेष भंग अनानुपूर्वी के होते हैं सो इसी का नाम अनानुपूर्वी है । और यही उत्कीर्तनानुपूर्वी है ।। भावार्थ-उत्कीर्तनानुपूर्वी के प्राग्वत् तीनों भेद हैं किन्तु अनानुपूर्वी में २४ चतुर्विंशति तीर्थकरों को चतुर्विंशति अंकों को परस्पर गुणा करने से यावन्मात्र भंग वनते हैं उनमें से आदि और अन्त के भंगों को वर्जके शेष भंग अनानुपूर्वी के होते हैं सो इसी का नाम अनानुपूर्वी है और इसे ही उत्कीर्तनानुपूर्वी अथ गणनानुपूर्वी विषय । सेकिंतं गणणाणुपुब्वी २ तिविहा पं० तं० पुव्वाणुपुब्बी पच्छाणुपुव्वी श्रणाणपुब्वी सेकिंतं पुब्बी एगो दस सयं सहस्स दससहस्साई लक्खं दसलक्खं कोडि दसकोडिनो कोडिसयाई सेत्तं पुव्वाणुपुब्बी सेकिंतं एच्छाणुपुब्बी २ दसकोडिसयाई जाव एको सेत्तं पच्छाणुपुव्वी सेकिंतं अणाणुपुब्वी एयाए चेव * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १२३ ) एगादियाए एगुत्तरियाए दसकोडि सयाई गच्छगया सेढीए अन्नमनभासो दुरूवूणो सेत्तं अणाणुपुब्बी सेत्तं गणणाणु- पुवी ॥ . पदार्थ-( सेकित गणणाणुपुच्ची २ तिविहा पं० त० पुब्वाणुपुची पच्छा- णुपुच्ची अणाणुपुत्री ) (पन्न ) गणनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) गणना- नुपूर्वी उसका नाम है जो गणना कीजाती है वह तीन प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् अानुपूर्वी २ अणाणुपूर्वी ३ (सेकिंतं पुव्वाणुपुच्ची) (प्रश्न ) पूर्वानुपूर्वी किस प्रकार से वर्णन कीगई हैं ( उत्तर ) जैसे ( एगोदस सयसहस्स दससहस्साई लक्खं दसलक्खं कोडि ) एक-दश १० शत १०० सहस्त्र १००० दशसहस्र १०.०० लक्ष १००००० दशलक्ष १०००००० कोटि १००००००० ( दसकोडिओ कोडिसयं दसकोडिसयाई सेत्तं गणणाणु- पुत्री ) दश कोटि १०००००००० इस प्रकार सौ करोड़ सहन करोड़ इत्यादि प्रकार से गणनानुपूर्वी होती है (सेकित पच्छाणुपुची दसकोडिसयाई जाव एको सेतं पच्छाणुपुची) (प्रश्न ) पश्चात् आनुपूर्वी किस प्रकार है ( उत्तर) जो दश करोड़ से आरम्भ होकर एक पर्यन्त गणना कीजावे उसी का नाम पश्चात् आनुपूर्वी है (सकिंत श्रणाणुपुची २ एयाए चैव एगादियाए एगुत्तरि- याए दस कांडिसयाई गच्छगया सेढीए अन्नमनभासो दुरूवूणो से अणाणु- पुची सत्तं गणणाणुपुब्बी) (प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) जो श्रानुपूर्वी गत गणना है उनको एक से लेकर दश सहस्र कोटि प्रमाण गच्छरूप श्रणि कीजाव फिर उनको परस्पर अभ्यास करके गुणा किया जावे यावत् प्र- माण भंग बने उनमें से आदि और अंत के रूप को छोड़कर शेप रूप अनानु- पूर्वी के ही होते हैं । भावार्थ-गणनानुपूर्वी भी माग्वत् तीनों प्रकार से वर्णित है किन्तु एक लेकर दश सहस्र कोटि पर्यन्त गणना की संख्या वतलाई गई है अनुक्रमतापू- वक गणना को पूर्वानुपूर्वी होते हैं । ठीक उसके विपरीत गणना का नाम पश्चात् आनुपूर्वी है । इनको हरस्पर गुणा करके जो भंग होते हैं उनमें से आदि और अन्त के भंग को छोड़कर शेप भंग अनानुपूर्वी के ही होते हैं सो इसी का नाम गणनानुपूर्वी है ।। से (१२४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * अथ संस्थानानुपूर्वी विषय । सेकिंतं संहाणाणुपुब्बी २ तिविहा पं० तं० पुवाणुपुव्वी पच्छाशुपुब्बी प्रणाणुपुब्बी सेकिंतं पुब्बाणपुब्बी २ समचउरसे नग्गोहपरिमंडले साइ वामणेक्खुज्जे हुंडे सेतं पुव्वाणुपुब्बी सेकिंतं पच्छाणुपुवी २ हुंडे जाव सामचउरंसे सेत्तं पच्छा- णुपुब्बी सेकिंतं अणाणुयुब्बी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरि- याए छगच्छगयाए सेढीए अन्नगन्नभासो दुरूवूणो सेत्तं अ- पाणुपुब्बी सेत्तं संहाणाणपुची ॥ पदार्थ-( सेकिंता संहाणाणुपुब्बी २ तिविहा पं० तं० पुवाणुपुत्री पच्छा- णुपुब्बी अणाणुपुब्बी ) (प्रश्न ) संस्थानानुपूर्वी कितने प्रकार से विवर्ण कीगई (उत्तर ) तीनों प्रकार से है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् प्रानुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ यह तीन प्रकार हैं (सेकिंत पुन्वाणुपुन्वी २ समचउरंसो नग्गोहपरि मण्डले साइ वामणेक्खुज्जु डंडे सेत्तं पुन्वाणुपुच्ची) (प्रश्न) पूर्वानुपूर्वी किस प्रकार से है ( उत्तर ) पद् प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि-समचतुरंश संस्थान उसे कहते हैं जिसके शरीर के सर्व अंगोपांग पूर्ण हों और परियंक आसन में ( जानु और स्कंधों की विपयता न हो।) न्यग्रोध परिमंडल उसका नाम है जिसका शरीर नाभि से उपरिभाग में प्रमाण- युक्त हो जैसे वट वृक्ष होता है २ सादि संस्थान उसका नाम है जिसके शरीर के अंगोपांग नाभि के नीचले भाग के सुंदर होवें ३ वामन संस्थान उसे कहते हैं जिसका हृदय पृष्टि भाग और उदर को छोड़कर शेप अंग हीन होउँ अर्थात् प्रमाण पूर्वक न होवें ४ कुन्न संस्थान वह होता है जिसका हृदय पृष्टिभाग और उदर यह सर्वथा लक्षण रहित होवे और शेष अंग सुंदर होवें ५ जो सर्व प्रकार के शुभ लक्षणों से वर्जित होता है और अंगोपांग भी सम नहीं है अपितु अद- शनीय हैं उसीको हुंड संस्थान कहते हैं सो इन पद् प्रकार के संस्थानों को अनुक्रमतापूर्वक गणना करना उसी का नाम पूर्वानुपूर्वी है ( सेकिंतं पच्छाणु- पुच्ची २ हुंडे जाव सम चउरसे सेवं पच्छाणुपुब्बी ) ( प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी * अनुयोगद्वार मूत्र * (१२५ ) किस प्रकार से होती है ( उत्तर ) जो अनुक्रमपूर्वक गणना न की जावे वही पश्चात् भानुपूर्वी है जैसे कि-हुंड संस्थान यावत् सम चतुरंश संस्थान इसीका नाम पश्चात् श्रानुपुर्वी है- सेकितं अणाणुपुब्बी २) एयाए चेव एगादियाए एगुसरियाए छगच्छगयाए सहीए अनमन्नन्भासो दुरूवूणो सेवं अणाणुपुन्वी सत्र संहाणाणुपुच्ची । (प्रश्न ) अनानुपूर्वी की व्याख्या किस प्रकार से वर्णन की गई है (उत्तर ) जैसे इन पद् गच्छरूपों की श्रेणी की जावे १-२-३-४- ५-६ तव इनको परस्पर गुणा करके यावन्मान भंग बनें उनमें से आदि और अन के रूप को न्यून करके शेपरूप अनानुपूर्वी के होते हैं और इसी का नाम अनानुपूर्वी है अतः इसी स्थानों पर संस्थानानुपूर्वी का समास हो गया है ।। भावार्थ-संस्थानानुपूर्वी भी प्राग्वत् है किन्तु स्थानों के पट् भेद हैं जैसे कि समचतुरंश संस्थान १ न्यग्रोध परिमंडल संस्थान २ सादि संस्थान ३ वामन संस्थान ४ कुन संस्थान ५ हुंड संस्थान ६ अनुक्रयता से गणना करने का नाम पूर्वानुपूी है उल्या गणन करना उस पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं २ पद् रूपों का परस्पर अभ्यास करक रूप बनाने फिर उनमें से आदि और अंत के रूप को छोड़ देना उसे अनानुपूर्वी कहते हैं ।। अथ समाचारी प्रानुपूर्वी विपग । सेकिंतं समयारी प्राणुपुब्धी २ तिविहा पं० तं० पुवाणु पुब्बी पच्छाणुपुब्वी अणाणुपुब्बी सेकिंतं पुवाणुपुब्बी २ इच्छामिच्छातहकारो धावस्तियाए निस्सिहियाए श्रापुच्छ- णा य पडिपुच्छणा य छंदणा निमंत्तणा उवसंपया य काले समा- यारी भवे दसविहा उ १ सेच पुब्वाणपुब्बी सेकिंतं पच्छागुपुब्बीर उपसंपया जाव इच्छा सेत्तं पच्छाणुपुब्बी सेकिंतं प्रणायुपुब्बी एयाएचेव एगाइयाए एगुत्तरियाए दसगच्छगयाए सेढीए 1.४२. भंग.हत है।
( १२६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * अन्नमन्नभासो दुरूवूणो सेत्तं अणाणुपुवी सेत्तं समायारी आणुपुवी ॥ पदार्थ-( सेकिंतं समायारी आणुपुच्ची २ तिविहा पं० तं० पुवाणुपुची पच्छाणुपुत्री अणाणुपुब्बी) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! समाचारी भानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरुने उत्तर दिया कि भो ! शिष्य ! समाचार्यानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अना- नुपूर्वी ३ इस प्रकार गुरु के वचन सुनकर शिष्य ने फिर शंका की कि हे भग- वन् ( सेकिंतं पुनाणुपुब्धी २) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरु कहते हैं पूर्वानु पूर्वी निम्नलिखितानुसार ई ॥ (इच्छामिच्छा तहकारो) साधुओं को दश प्रकार समाचारी होती हैं जैसे कि-जो शिष्य ने काम करना हो तो पहिले गुरुसे इस प्रकार कहे कि-हे भगवन् ! यदि आपकी इच्छा हो तो अमुक काम करूं इसे प्रथम समाचारी कहते हैं १ द्वितीय समाचारी यह है जो भूल होने पर (मिच्छा- मि दुक्कई ) इस प्रकार कहा जाता है यथा “मैं अपनी भूल पर पश्चाताप करता हूं २ तृतीय समाचारी गुरु के वचन (तहत्ति ) तथा इति कह कर श्रवण करे ३ ( आवस्सियाय निसीहिया पापुच्छणायपडिपुच्छणा ) चतुर्थी समाचारी उसे कहते हैं कि जब साधु उपाश्रय से अन्यत्र कहीं जाने लगे तब (आवस्सहीर)- मैं आवश्यक कार्य के लिये जाता हूं-ऐसे शब्द उच्चारण करे ४ पांचवी समा- चारी जब उपाश्रय में प्रवेश करे तव "निस्सहि" २ ऐसे कहे ५ और छठी समाचारी में जो कार्य करने हो। तो गुरु से पूछकर करे ६ सप्तम समाचारी में यदि किसी अन्य मुनि ने कहा कि हे भगवन् ! कि आप मेरा अमुक कार्य करदें तब भी गुरु को पूछ ले कि यदि आपकी आज्ञा हो तो अमुक मुनिका अमुक कार्य कर, इमे सप्तम समाचारी कहते हैं (छंदणा निमंतणाओवसंप- याय काले समायारी भवेदसविहाओ) जो अन्न पानी आदि है उनका सम विभाग करना और ऐसे कहना हे पूज्य मुझपर अनुग्रह करो-इसे अष्टम समाचारी कहते हैं ८ | नवी आमंत्रण समाचारी होती है-जैसे कि पास वस्तु होने पर अथवा भविष्यकाल में किसी प्रकार से आमन्त्रण करना इसे निमंत्रण समाचारी कहते हैं ६ दशम समाचारी उसका नाम है जो श्रुताध्ययन के वास्ते किसी अन्य मुनिवर के पास स्थिति करना और उसे कहना कि, मैं आपका !
६. फरते हुए * अनुयोगद्वार मूत्र * ( १२७) हूं इत्यादि शब्दों को उपसंपदा समाचारी कहते हैं सो यह दश प्रकार की समा- चारी होती है ( सत्तं पुवायुपुत्री) और इनकी अनुक्रमता पूर्वक गणना क. रने को पूर्वानुपूर्वी कहते हैं । अब प्रश्न, पश्चात् आनुपूर्वी के विषय में किया जाता है (सेकित पच्छाणुपुची २ उपसंपया जाव इच्छा सेत्तं पच्छाणुपुच्ची) (प्रश्न) पक्षात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर) जो उपसंपदा से लेकर इच्छाकार पर्यन्त गणन किया जाता है उसे पश्चात् श्रा- नुपूर्वी कहते हैं । सकित भणाणुपुब्बी २ एयाए चेवा एगाइयाए एगुत्तीरयाए दसगच्छगयाए सढीए अन्नमनभासी दुख्खूणो सेत्त अणाणुपुब्बी ) ( प्रश्न) अनानुपूर्वी किसे कहने हैं ( उत्तर ) इन दश अंकों को १, २, ३, ४, ५, ७, ८, ९, १०, दश गच्छरूप श्रेणी करके फिर एक की एक के साथ चाद्ध और परस्पर अभ्यास से गुणा करके यावन्मान रूप हो (नोट- ३६२८०००) फिर उनमें से आदि और अंत के रूप को छोड़कर शेष रूप अनानुपूर्वी के होते हैं और इसे ही अनानुपूर्वी कहते हैं ( सेत्तं समायारीयाणु- पुच्ची) अथ शब्द मंगलवाची है यही समाचारी आनुपूर्वी है अपितु इसको ही सपाचारी आनुपूर्वी कहते हैं । भावार्थ-समाचारी प्रानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन की गई है पूर्वानुपूर्वी? पथान प्रानुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ अपितु आनुपूर्वी में जो दश समाचारियों के नाम हैं वह श्री उत्तराध्ययन सूत्र के २६ वें अध्याय के अनुकूल नहीं है क्यों- कि प्रयों में तो एकत्वता है किन्तु गणनानुसार एकता नहीं है इसलिये उत्त- राध्ययननी से उक्त नाप भावार्य में दिये जाते हैं किसी आवश्यक काम के लिये अब जाना पड़े तब (आवस्सहि २) ऐसे कहना चाहिये १ और जब उपाश्रय में प्रवेश करे तब निस्साहि २ ऐसे कई क्योंकि यह शब्द क्रिया का निषेध का- १२ यदि कोई काम अपना करना होवे तव गुरुजी से पूछे कि हे भगवन् ! मैं अमुक कार्य करूं ! ३ यदि अन्य मुनिवर का काम करना होवे तव भी गुरूजी को पूछ के करे ४ और जो अपने पास वस्तु होवे उसकी अन्य मुनि- वरों को निमंत्रणा करे ५ और अन्य मुनिवरों को उपदेश करे यदि आपकी इच्छा हो तो अमुक कार्य करो ६ किसी प्रकार भी भूल होने पर ( मिच्छामि दुक्कडं) ऐसे कई ७ गुरु के वचनों को तहित्ति करके सुने ८ और गुरु की (१२८ * अनुयोगद्वार मूत्र * भक्ति करे । श्रुताध्ययन के वास्ते अन्य के समीप रहे .१०॥ इसे आनुपूर्वी कहते हैं ।। और इन्हीं को उल्था गणन करने को पश्चात् श्रानुपूर्वी कहते हैं अपितु जो दश अंक हैं उनको परस्पर गुणा करने से ३६ लक्ष २८ हजार ८०० अंक बनते हैं उनमें से आदि और अंत के रूप को छोड़कर शेपरूप मनानुपूर्वी के होते हैं सो इसी को समाचारी आनुपूर्वी कहते हैं अब सूत्रकार भावानुपूर्वी का स्वरूप वर्णन करते हैं जिसके द्वारा भावों का भी बोध होजाए। अथ भावानुपूर्वी विषय ॥ सेकिंतं भावाणुपुब्बी २ तिविहा पं० २० पुवाणुपुब्बी पच्छाणुपुब्वी अणाणुपुवी सेकिंतं पुवायुपुब्बी २ उदइए उवसमिय खईय खोवसमिए पारिणामिए सन्निवाइए सेतं पुवाणुपुन्वी सेकित पच्छाणुपुब्बी २ सन्निवाइए जाव उदइय- सेत्तपच्छाणुपुब्बी सेकिंतं प्रणाणुपुवी २ एयाए चेव एगा- इयाए एगुत्तरियाए छगच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासों दुरूवूणो सेत्तं अणाणुपुब्बी सेत्तं भावाणुपुब्बी सेत्तं प्राणुपुवी- ति पयं सम्मत्तं ॥१॥ पदार्थ-(सेकिंतं भावाणुपुच्ची २ तिविहा पं० तं० पुवाणुपुची पच्छा: णुपुची अणाणुपुच्ची) (प्रश्न ) भावानुपूर्वी कितने प्रकार से वर्णन कीगई है ( उत्तर ) तीनों प्रकार से जैसे कि-पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आजुपूर्वी अनानुपूर्वी (सेकिंतं पुत्वाणुपुब्बी २ उदइय अवसमिएखईए खओवसमिए पारिणामिए स- निवाइय से पुवाणुपुब्बी .) प्रश्न) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) पूर्वानुपूर्वी पद् प्रकार से वर्णन कीगई. है जैसे कि-उदयिक भाव १ उपशमि कभाव २ क्षायिक भाव ३ क्षयोपशमिक भाव.४ पारिणामिक भाव ५ सनिः पातिक भाव ६ इनका सविस्तर स्वरूप आगे लिखा जाएगा इसलिये यहां पर इनका अर्थ नहीं लिखा है इस प्रकार इन भावों की गणना को पूर्वानुपूर्वी कहते हैं ( सेकिंतं पच्छाणुपुत्री २ सन्निवाइय जाव उदइय से पच्छाणुपुच्ची) . * अनुयोगद्वार मूत्र * - ( १२६) (प्रश्न ) पक्षात् श्रानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) जो सनिपात से लेकर उदयिक भाव पर्यन्त गणना कीजावे उसी का नाम पश्चात् आनुपूर्वी हैं (सेकि अणाणुपुत्री २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए छगच्छगयाए संदीए अन्नमनभासो दुरूवृणा सेत्तं अणाणुपुत्री सेत्तं भावाणुपुन्नी सेतं याणुपुल्ची निपयं सम्मत्तं ) ( प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते है ( उत्तर ) इन पद थकों को एक से लेकर १-२-३-४-५-६ एक एक की वृद्धि करते हुए जर पद गच्छरूप श्रेणी होजाए तर परस्पर अभ्यास से गुणा करे जिसके ७२० रूप होने हैं, उनमें स यादि और अन्त के रूप को छोड़कर शेष रूप अनानुपूर्वी के होने हैं यही अनानुपूर्वी है और इसी स्थानोपरि. भावानापूर्वी का समास सम्पूर्ण होगया है ।। अथ शब्द मंगलवाची भी है इसलिये इस समास के अंत में दिया गया है और आनुपूर्वी पद की भी यहां पर सपाप्ति है ।। इनि श्री अनुयोग द्वार शान में हिन्दी भाषा टीका रूप आनुपूर्वी पद समाप्त दुधा॥ भावार्थ-पद् प्रकार के भावों को नीनों श्रानुपूर्वी आदि हैं जिनका सम्पूर्ण स्वम्प ता यांग लिखा जायगा किन्तु अनुक्रमता पूर्वक नामोत्कीर्तन यहां पर किया गया है सब भावों का अाधार भूत प्रथम उदयिक भाव है फिर उपशम भाव है जिसका स्वरूप स्वल्प है क्षायिक भाव का उपशम. से विशेष स्वरूप है अपितु क्षयोपशम का उससे भी विस्तारपूर्वक वर्णन है पारिणामिक भाव का नयोपशम भाव से विशेप.कथन है सन्निपात का तो महान् स्वरूप है इस प्रकार स इनकी अनुक्रमना यांची गई । पूर्वानुपूर्वी पश्चात् आनुपूर्वी प्राग्वत् हैं किन्तु अनानुपूर्वी के ७२० रूप बनने हैं जिन में दो रूप आदि और अन्त के न्यून करने से ७१८ रूप अनानुपूर्वी के होते हैं इसी का नाम अनानुपूर्वी है और भावानुपूर्वी भी इसी का नाम है अतः श्रानुपूर्वी पद की समाप्ति भी इसी स्थान पर होगई है इसके अनन्तर उपक्रम के द्वितीय भेद की व्याख्या कीजाती है । अथ नाम विपय। मूल-सेकिंतं नामे नामे दसविहे पण्णत्ते तंजहा एग १ १३० ). * अनुयोगद्वार सूत्र * नामे २ दुनामे २ तिनामे ३ चउनामे ४ पंचनामे ५ छानामे ६ सत्तनामे ७ अनामे ८ नवनामे दसनामे १० सेकिंतं एगनामे . नामाणि जाणि काणिय दव्वाण गुणाण पजवाणं च तेसिंबा- गमणिहसे नामति परूविया सन्ना १ सेत्तं एगनामे सेकिंतं दु- नामे दुविहे पएणत्त तंजहा एक्खरिए १ अणेगक्खरिए थ सेकिंतं एगक्खरिए १ अणेगविहे. पं० तं० हीः श्री धी स्त्री सेकिंतं ए. गवखरिए सेकिंतं अणेगक्खरिय २ अणेगविहे पण्णते तंजहा कन्ना वीणा लता माला सेत्तंत्रणेगखरिए अहवा दुनामे दु- विहे पं० तं० जीवनामे य जीवनामे य सेकिंतं जीवनामे २ अणेगविहे पं० त० देवदत्ते जगणदत्ते विण्हुदत्ते सोमदत्ते सेत्तं जीवनासे सेकिंतं अजीवनामे २ अणेगविहे पं० तं० घडोपडो कडो रहो सेत्तं अजीवनामे ॥ ८ ॥ पदार्थ-सेकिंतं नामे नामे दसविहे पएणते तंजहा एगनामे दुनामे २ ति- नामे चउनामे पंचनामे छनामे सत्तनामे अनामे नवनामे दसनामे ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! नाम किसे कहते हैं गुरु ने उत्तर दिया कि-भो शिष्य ! नाम उसका नाम है जिसके द्वारा वस्तुओं के स्वरूप का पूर्ण बोध हो सो उस नाम के दश भेद विवर्ण किये गये हैं जैस कि-जो ज्ञानादि गुण का प्रकाशक हो उसका नाम एक नाम है जिसके द्वारा दो पदार्थी का बोध हो उसे द्विनाम कहते हैं २ जिसके द्वारा तीन पदार्थों का ज्ञान हो उसको त्रि- नाम कहते हैं ३ जो चार प्रकार से वस्तुओं का स्वरूप विवर्ण किया जाय वह चार नाम है ४ जो पांच प्रकार से पदार्थों का विवर्ण किया जाय वे पांच नाम हैं जिससे पट प्रकार से वस्तुओं का स्वरूप वर्णन किया जाये वही पट् नाम है ६ जिससे सात प्रकार से वस्तु निरूपण की जावे वही सप्त नाम है जिसके अष्टभेद वर्णन किये जावे उसीका नाम अष्ट नाम है ८ नव प्रकार से द्रव्यादि १ नोट:--निकप स्फटिक चिकुरेह; एएफस्य होभवति ॥
* अनुयोगद्वार सूत्र * (१३१ ) पदार्थों को कहा जाए वही नव नाम हैं । दश प्रकार. से जो पदार्थ वर्णन किये जावें उन्हीं का नाम दश नाम हैं १० !! गुरु के इस प्रकार के वचन सुनकर शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् (सेकिंतं एगनामे २ नामाणि जाणि काणिय दवाण गुणाण पज्जवाणं चतासें आग मणिहसे नामंति परूविया- सन्ना १) एक नाम किस प्रकार से वर्णन किया गया है गुरु कहने लगे कि भो शिष्य ! एक नाम इस प्रकार से है जैसे कि-( नामाणि ) नाम अभिधान ( जाणि ) यावन्मात्र उनमें से ( काणिय ). कितनेक एक नाम जैसे कि-द्रव्यों के (जीव जंतु आत्मा प्राणीसत्व) नाम जीव द्रव्य के अनेक नाम हैं उसी प्रकार आकाश द्रव्य के नाम हैं नभः आकाशमम्बरं इत्यादि यह द्रव्यों के नाम हैं औरंगुणनाम जैसे ज्ञानादि गुण हैं ज्ञान निबोध आत्मा इत्यादि तथा रूप, रस, गंध, स्पर्श यह भी अजीव गुण हैं और पर्यायनाम नरकतिर्यक् मनुष्यदेव इन भावों को प्राप्त होना उसे पर्यायनाय कहते हैं तथा एक गुण कृष्ण इत्यादि यह भी पर्यायवाची नाम है इत्यादि यह सर्व द्रव्य १ गुण २ पर्याय ३ च पुनः (तेसिं) उन सबको आगमरूपी निकप के ( कसौटी ) विपय नाम पदरूप संज्ञा प्रति- पादन कीगई हैं अथवा यह नाम पद आगम में कसौटी तुल्य है इसके द्वारा सर्व पदार्थों का बोध यथावत् होजाता है तथा द्रव्य १ गुण २ पर्याय ३ यह तीनों आगमरूपी कसौटी में यथावत् सिद्ध होचुके हैं जो संसार भर में बस्तु है 'चे सर्व समान प्रकार से एक नाम से भापण कीजाती है संर्व द्रव्यों के एकार्थ- चाची अनेक नाम होते हैं किन्तु वह एक नाम में ही गर्भित होजाते हैं तथा जैसे कसौटी (परीक्षणप्रस्तर) के द्वारा सुवर्णादि पदार्थों की परीक्षा कीजाती हैं उसी प्रकार ज्ञानरूपी कसौटी में जीवाजीव पदार्थ जो सुवर्णादि के तुल्य हैं. उनकी परीक्षा कीजाती है तथा नामपद कसौटी तुल्य है (सेत्त एगनामे ) सो वही एक नाम है जो अनेक नाम होने पर भी एक ही अर्थ में रहते हैं । इस कथन से जिज्ञासुओं को कोप की आवश्यकता है क्योंकि-एक २ वस्तु के. अनेक नाम कोपों में लिखे गए हैं सो आगमरूपी कसौटी में नामरूपी संज्ञा कथन कीगई है यही संज्ञा एक नाम है । अव शिष्य द्विनाम के निणय के लिये पृच्छा करता है कि (सेकिंत दु- नामे २ दुविहे पं०.२० एगवखरिए अणेगावखारिएय) (प्रश्न) द्विनाम किस भकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) द्विनाम दो प्रकार से प्रतिपादन किया (१३२ ) * अनुयोगद्वार सूत्रं * गया है जैसे कि-एकाक्षरिक नाम और अनेकाक्षरिक नाम-शिष्य ने फिर शंका की कि हे भगवन् ! (सेकिंत एगखारिए २ अणेगविहे पए तंजहाही श्री: धीः स्त्री सेत्तं एगक्खरियं ) एकाक्षरिक नाम किस प्रकार से वर्णन किया गया है ।। गुरु ने समाधान किया कि हे शिष्य ! एकाक्षरिक नाम उसे कहते हैं कि- सके उच्चारण में एक ही अक्षर हो तथा जिसके उच्चारण में अनेक अक्षरों की प्राप्ति हो उसका नाम अनेकाक्षरिक है किन्तु एकाक्षरिक नाम के मूत्र ने चार उदाहरण दिये हैं जैसे कि-ही श्री धी स्त्री-यही एकाक्षरिक नाम है क्योंकि इनका उच्चारण रूप एक ही अक्षर है ( सेकिंतं अणेगवखरिय २ अर्णगविहे पं० त० कन्ना वीणा लता माला संतं अणेगक्खरिएं) ( प्रश्न ) अनकातरिक नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) वह भी अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि कन्या वीणा लता माला, यह सर्व अनेकाक्षरिक नाम हैं क्योंकि प्रा- कृत भाषा में द्विवचन के स्थानों पर बहुवचन दिया जाता है इसीलिये द्वि शब्द के स्थानोपरि अनेक शब्द ग्रहण किया गया है इस प्रकार गुरु शिष्य का समाधान करके फिर शिष्य को कहने लगे कि हे अंते वासिन् ! (अहवा दुनाम दुविहे पं० तं० ) अथवा द्विनाम अन्य प्रकार से भी वर्णन किया गया है जैसे कि-(जीवनामेय ) जीवनाम ( अजीवनामेय ) और अजीनाम च समुच्च- यार्थ में है.शिष्यने फिर पूछा (सेकितं जीवनामे २) कि हे भगवन् ! जीव नाम किस प्रकार से वर्णन किया गया है गुरु ने उत्तर दिया कि (अणेगवविहे पं० २०) भो शिष्य ! जीव नाम अनेक प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि- ( देवदत्ते जएणदत्ते विएहुदत्ते सोमदत्ते सेत्तं जीवनामे ) देवदन शन्द इसी प्रकार यज्ञदत्त, विष्णुदत्त, सोमदत्त, यही जीव संज्ञक नाम हैं ( सकिंतं अजी- वनामे २) (प्रश्न ) अनीव चाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) अजीव नाम ( अ. णेगबिहे पं० तं० ) अनेक विधि से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-(घडो पडो कडो रहो ) घट, पट, कट, रथ ( सेत्तं अजीवनामे यही अजीव नाम क्योंकि-घटपटादि अजीव पदार्थ हैं इसलिये इनको अजीव नाम से लिखा गया है। भावार्थ-नामपद दस प्रकार से वर्णन किया गया है जो पदार्थ हैं उनको दस विभागों में करके जिज्ञासुओं के सुखाव वोध वास्तै नाम दिखलाया गया है क्योंकि- याक्न्मात्र संसार में द्रव्य है उनमें से कितनेक द्रव्य गुण पर्यायों * अनुयोगद्वार सूत्र* (१३३ ) के भनेक नाम एकार्थी होते हैं जैस कि जीव चतन आत्मा-जंतु सत्व इत्यादि यह सर्व अनेक नाम एकार्थी हैं इसी प्रकार गुणों के नाम और पयार्यों के नाम भी समझने चाहिये सो आगमरूपी सुवर्ण की परीक्षा के विषय यह नाम पद- रूप संज्ञा कसौटीरूप से प्रतिपादन कीगई है इसके द्वारा द्रव्य गुण पर्यायों को भलीभांति सो बोध होजाता है सो इसी का नाम एकनाम है और द्विनाम भी दिपकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-एकाक्षरिक और अनेकातरिक-एका- चाठिक उसका नाम है जैसे कि "ही: श्रीः धीः स्त्री" ये शब्द एकाक्षरिक हैं इससे यह सिद्ध होता है कि माकृत भाषा में किसी अनुकरण के विषय में इन संस्कृत शब्दों का प्रयोग हो सकता है क्योंकि प्राकृत के व्याकरण में इनकी सिद्धि इस प्रकार से कीगई है यथा- श्री, ही-कृत्स्न क्रियादिष्ठ्यास्वित् ॥ प्रा. व्या० म०८ पा २ मू० १०४ । ई, श्री-ट्री इत्यादि शब्दों के संयुक्त अन्त व्यञ्जन के पूर्व इकार का आगम होजाता है तब निम्नलिखित सर्व रूप हुए अरिहइसिरी-हिरी-कसिणी-किरिया-दिहिया-इस प्रकार रूप सिद्धि होनेपर सिरी ( श्री१ *) और हिरी इस प्रकार के रूप बने और स्त्री शब्द प्राकृत भाषा में ऐसे बनता है जैसे कि स्त्री शब्द इस प्रकार से स्थित है तब सर्वत्र लय राम वन्द्रे प्रा. व्या० अ०८ पा २ मुत्र ७६ || चन्द्र शब्दादन्यत्र लवरा सर्वत्र मंयुक्तस्योधमधश्च स्थितानां लुग भवति ।। इस मूत्र से रकार का लोप होजाता है तब रेफ कालोप होने पर ती ऐसे शब्द बना फिर-स्तस्यथा समस्तस्तम्वे ।। प्रा०व्या० अ०८ पा २०४५ ॥ समस्त स्तंब वर्जितस्तस्ययो भवति | इस शब्द से सी शब्द के स्त को थी ऐसे रूप बन गया फिर अनादौ शेषा दशयोत्विम् । सूत्र ८६ इस सूत्र से थी के धकार के दो रूप हुए तब थी ऐसे रूप बना फिर द्वितीयतुर्ययो रुपरि पूर्वः । मू. ६० इस मूत्र से प्रथम प्रकार के स्थानोपरि तकार होगया तव त्थी इस प्रकार से प्राकृत भाषा में रूप सिद्ध हुआ तथा स्त्रिया इत्थी इस मूत्र से स्त्री शब्द को विकल्प से इत्थी ऐसे भी आदेश हो. मू० १३० * किश्याच प्रछिश्रिान्यां दीर्घोऽसम्प्रसारणञ्च, उणादिवृत्तौ द्वितीयपा- दृश्य ५७ सूत्रम् ।। अनेनमूत्रेण श्रि सेवायाम् धातुत्वान श्रीरूपं सिद्धं भवति ।। ' । 1 (१३४ ) * अनुयोगद्वार मूत्र * जाता है सो मूल में अनुकरण अर्थ में स्त्री * शब्द ग्रहण किया गया है तथा . सूत्र प्रमाण होने पर उक्त प्रयोग सर्वदा आचरणीय है इन्हीं को एकाक्षरिक नाम से लिखा गया है और द्विवचन के स्थान में प्राकृत भापा में बहुवचन दिया जाता है इसलिये अनेकाक्षरिक नाम कन्या वीणा लतामाला इत्यादि प्रयोग ग्रहण किये गये हैं तथा द्विनाम अन्य प्रकार से भी वर्णन किया गया है जैसे किजीवनाम और अजीवनाम--जीवनाम के उदाहरण यह हैं-यथा देवदत्त यज्ञदत्त (नज्ञोर्णः ) इस सूत्र से प्राकृत भाषा में ज्ञ को एकार हुया और आदि यकार को जकार होनाता हैं फिर "अनादि शेपादशयोदित्व" इस सूत्र से णकार द्वित्व होगया तव जण्णदत्त ऐसे रूप बन गया और विष्णुदत्त को । सूक्ष्म पूनष्ण-लहहणं राहः । इस सूत्र से विराहुदत्त वन- गया और सोमदत्तादि यह सर्व जीव संज्ञक नाम है अजीच संज्ञक नाम निम्न प्रकार से हैं यथा--घटः पट: कटः रथः यह शब्द प्राकृत में घडो पडो कडो रहो इस प्रकार से लिखे गये हैं क्योंकि-(टोडः ) इस सूत्र से प्राकृत में टकार को इकार हो जाता है तब नड भड घड पड यह शब्द सिद्ध होते हैं (अतः से?: ) इस सूत्र से प्रथमान्त होजाते हैं क्योंकि सिवि भक्ति के स्थान में होकार का आदेश होकर पडो घडो इत्यादि रूप सिद्ध होते हैं किन्तु रथ शब्द को रहो ॥ "ख, घ, थ, ध भाम्" इस सूत्र से थकार को हकार होगया तव रहो ऐसे प्रथमान्त शब्द सिद्ध हुआ सो यह सर्व अजीव शब्द के नाम हैं अत: इस प्रकार से द्वि प्रकार नाम पद की प्रतिपादनता की गई है इस के. द्वारा जो जो द्वि प्रकार के द्रव्य हैं उन सभों का ज्ञान भली भांति से हो सकता है इसी कारण से सूत्रकार अब अन्य प्रकार से द्विनाम वर्णन करते हैं। पुनः दिनाम विषय ॥ अहवा दुनामे नवविहे पएणत्ते तंजहा विसेसिएय १ . * स्त्यायतेहूर ॥ उणादि वृत्तौ चतुथैपादस्य १६५ सूत्रम् ।। स्पैशब्द संघा- तयोः ।। अस्मात् इट् । डिस्वात् टिलोपः टित्वात्डीप् । वलिलोपः । स्त्रीस्तन केश- वती ।। इति रूपं सिद्धं । तथा चे स्यतेस्त्यायते स्तुणातेस्तनोतेवा | औरणादिक सूत्रेण. चट् प्रत्ययो धातोश्व सकारा देशो निपात्यते । टित्वातूड़ी । तृणाति स्वं परंच दोषे- पाच्छादयतीति स्त्री। 1 * अनुयोगद्वार सूत्र * (१३५) अवसैसिएय २॥१॥ विसेसियं दव्वं विससियं जीवदव् व अजीचदव्वं च २ अविसेसियं जीपदव्वं च विसेसियं नेरइउ- तिक्ख जोणि उमणुस्सो देवो ३ अविसेसिउनेर इउविससि- उरय गप्पभाए सकरप्पभाए वा लुप्पभाए पंकप्पभाए धूमप्पं- भाए तमाए तमतमाए ४ अविसेसिये रयणप्पभाए पुढवीने- रइंए विसेसिए पज्जत्तए अपज्जत्तए ५ एवं जाव अविसेसिउ तमतमा पुडविनेरइउ विसेसिउ तमतमा पुढविनरेइउ पज्जत्ता: पज्जत्तउ ११ अविसेसिए तिरिक्ख जाणिएविसेसिए एगि: दिय इंदिए तेइंदिए चउरिदिए पदिए १२ अविसेसिए एगिंधिए विसेसिए पुढविकाइए अाउकाइए तेऊकाइय. वाऊ- काइय वणस्सइकाइय १३ अविसेसिए पुढविकाइए विसेसिए. सुहम पुढविकाइय वादर पुढविकाइय १४ अविसेसिए सुहुम पुढविकाइए विसेसिए पज्जत्तए सुहुम पुढविकाइए अपज्ज- तए सुहुम पुढविकाइय १५ । अविसेसिए वादर पुढविकाइय विसेसिए पज्जत्तए वादर पुढविकाइय १६ अविसेसियं एवं श्राउकाइय १६ तेऊकाइय २२ वाउकाइय २५ वराणस्सइका. इय २८ अविसेसिए अपज्जत्तभेदेहिं भाणियवा अवसेसियं बेईदिय विसेसियं पज्जतउय अपज्जतउय २६ एवं तेइंदिए ३० चउरिदिय ३१॥ पदार्थ-( अहवा दुनामे दुविह पन्नत्ते तंजहा विसेसिएय १ अवसेसिएयं २) गुरु शिष्य को द्विनाम अन्य प्रकार से भी दिखलाते हैं इसीलिये सूत्र में यह पद है अथवा द्विनाम द्वि प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-- एक विशेष नाम दुसरा अविशेष नाम सो सर्व पदार्थ द्वि प्रकार से हैं इसी कारण से सूत्र- .
(१३६ ) * अनुयोगद्वार मूत्र * कार ने इनका सविस्तर वर्णन किया है । अविशेप नाम का यह अर्थ है कि- जो नाम सर्व स्थानों में गर्भित होजावे, विशेप नाम उसे कहते है जो केवल उसी द्रव्य का बोधक होवे--जो निम्नलिखितानुसार उदाहरण हैं।। १ ।। ( अविसे. सियंदव्यं विससियं जीवदव्यं च अनीवदयं च ) अविशेप नाम साधारण रूप से द्रव्य का बोधक है क्योंकि यह शब्द जीवद्रव्य और अजीवद्रव्य दोनों में व्यवहृत होता है इसीलिये अविशेष नाम में द्रव्य शब्द ग्रहण किया गया है और विशेष शब्द में जीवद्रव्य और अनीवद्रव्य हैं २ और इसी प्रकार भागे भी सम्भावना करलेनी चाहिये जैसे कि--(अविससिय जीवदन्नं विससिय नेरइउतिरिक्ख जोणि मगुस्तो देवो २) अविशेषक जीवद्रव्य है विशेपक . इसी जीव के भेद हैं जैसे कि-नारकीय १ तिर्यग्गेनिक २ मनुष्य ३ और देव ॥ ४ ॥३॥ इसी प्रकार आगे हैं जैसे कि (अविससिय नेरइय ) अवि- शेषक नाम नारकीय है और ( विससिए ) विशेषक नाम में नरकों के अंद हैं यथा--( रयणप्पभाए ) रत्नप्रभा च पुनर् अर्थ में है ( सक्करमाए करप्रभा ( वालुप्पभाए ) चालुप्रभा (पंकप्पभाए) पंकप्रभा (धूमप्पभाए) धूमप्रभा ( तपप्पभाए ) तमप्रभा ( तमतमाप्पभाए ) तमतमाप्रभा ७ यह सर्व नरकों के गोत्र विशेषक नाम में हैं ४ ॥ फिर (श्रवसीसए) अविशेषक ( रयणप्पभाए पुढवी नेरइय.) रत्नप्रभा के नारकीय (विसेसिए) विशेषक उसके भेद ( पज्जचाएय ) पर्याप्त और (अपज्जत्तए) अपर्याप्त हैं ५ ( एवं जाव अघिसेसिए तमतमा पुढवि नेरइय) इसी प्रकार सर्व नरकों का स्वरूप जानना चाहिये यावत् अविशेषक तमतमापृथ्वी के नारकीय और (विसेसिय- पज्जत्तण्य अपज्जत्तएय ११) विशेषक नाम में पर्याप्त और अपर्याप्त भेद 'जानने चाहिये ११ ॥ अब तिर्यक योनि के विषय में वर्णन करते हैं जैसे कि- (अविसेसिए ) अविशेषक नाम में (तिरिक्खजोणिए ) तिर्यक् योनिक् जीव हैं और ( विसेसिए ) विशेषक नाम में ( एगिदिए वेइंदिएत्तेइंदिए चउरिदिए पंचेन्द्रिये १२) एकेन्द्रिय जीव हैं इसी प्रकार द्विइन्द्रिय जीव हैं, त्रिइन्द्रिय * अनुयांगद्वार सूत्र * (१३७) पतुरिद्रिय और पंचिंद्रिय जीव हैं १२ और फिर ( अविससिए ) अविशेषक नाम में एकेन्द्रिय पद है और (विसेसिए विशेपक पद : पुढविकाइए आउकाइयं तेउकाइय चाइय वणस्सइकाइए १३ ) पांच स्थावर हैं जैसेकि पृथ्वीकायिक जीव इसी प्रकार अपकायिक जीव २ अग्निकायिक ३ वायु कायिक ४ वन- पति कायिक ५ फिर (अविसेसिए ) भविशेषक नाम में (पुढविकाइए ) पृथ्वीकायिक हैं और (विसेसिइय ) विशेषक पद में ( सुहमपुढविकाइय चादर पुदविकाइय) सूक्ष्म पृथ्वीकायिक और पादर (स्थूल ) पृथ्वीकायिक है १४ फिर (अविसेसिए सुहुम विकाइए ) अविशेषक नाम में पृथ्वीकायिक सूक्ष्म जीव हैं और (विसेसिए पजत्तए मुहुमपुदविकाइए ) विशेषक नाम में पर्याप्त सूक्ष्म पृथ्वीकायिक और (अपज्जत्तए सुहुमपुदविकाइय १५) अप- यर्याप्त सूक्ष्म पृथ्वीकायिक हैं ( भविसेसिय वादर पुदविकाइय ) भविशेषक में चादर पृथ्वीकायिक हैं और ( विसेसिए पज्जत्तए वादर पुढविकाइय ) विशे- षक नाम में पर्याप्त वादर पृथ्वीकायिक है १६ ( अविसेमिए ) अविशेषक पद में ( एवं भाउकास्य ) इसी प्रकार अपकाय के भी भेद जानने चाहिये जैसे कि-मयम भेद अविशेषक का होता है दूसग भेद विशेषक होता है सो पृथ्वी कायवत् अपकाय के भी सूक्ष्म चादर पर्याप्त भौर अपर्याप्त भेद जानने चाहिये १६ (तेउ) चार भेद तेजस्काय के २२ (वाउ) चार ही वायुकाय के २५ (वणस्सइ २८) चार की मंग वनस्पति के हैं (अविसेमिए अपनत्त भेदेखि (भाणियच्चा ) इस सूत्र का सम्बन्ध पूर्व सूत्र के साथ है अविशेषक नाम पद में अपर्याप्तादि भेद पूर्ववत् जानने चाहिये । अब द्विइन्द्रिय आदि जीवों के विषय में वर्णन किया जाता है ।। (भविससिड वेइंदिड ) अविशेषक नाम में द्विइन्द्रिय जीव हैं और (विसे- सिट विशेषक नाम में द्विन्द्रिय जीवों के ( पज्जत्तउय अपज्जत्तय ) पर्याप्त और अपर्याप्त भेद हैं २६ (एवंते इंद्रिय ३० चरिंद्रिय ३१) इसी प्रकार निरि- द्रिय और चतुरिद्रिय जीवों के भेद भी जानने चाहिये .अब पंचेंद्रियं के विषय में विवर्ण किया जाता है ।। भावार्थ-द्वि नाम अन्य प्रकार से भी वर्णन किया गया है जैसे कि विशे- पक नाम और अविशेषक नाम २ अविशेषक नाम से समान पदार्थों का बोध होता है विशेषक नाम से उनके भेदों का भी ज्ञान हो जाता है जैसे कि भरि- ~ ( १३८) * अनुयोगद्वार सूत्र * शेपक नाम में द्रव्य शब्द ग्रहण किया है किन्तु विशेषक नाम में उसी के भेदों का विवर्ण है यथा जीवद्रव्य और अजीवद्रव्य-इस प्रकार आगे भी समझना चाहिये अविशेषक पद में जीव द्रव्य है विशेषक पद में चार गति रूप जीवों के भेद हैं फिर नरक गति. विशेषक पद है-सात उन के भेद विशेपक पद में ग्रहण किये गये हैं फिर रत्नप्रभा अविशेषक शब्द है पर्याप्त और अपर्याप्त उसके भेद विशेषक पद में लिये गये हैं इसी प्रकार सातों नरकों के स्वरूप को जानना चाहिये फिर अविशेषक शब्द में तिर्यग्योनि है विशेषक पद में एकेन्द्रिय से लेकर पंचेंद्रिय पर्यन्त जीव हैं और अविशेषक पद में पृथ्वीकायिक जीव हैं विशेषक पद में सूक्ष्म वादर उन जीवों के भेद हैं इसी प्रकार पर्याप्त और अप- यप्ति यह भी भेद जान लेने चाहिये जैसे कि-पृथ्वी के चारः भेद विवर्ण किये गये हैं उसी प्रकार अप्काय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय इन के भेद भी जान लो अपितु द्विइन्द्रिय जीवों के पर्याप्त और अपर्याप्त: इस प्रकार के द्विद्धि भेद हैं जिस प्रकार द्विइन्द्रिय जीवों के भेद हैं तद्वत् त्रिरिंद्रिय चतुरिंद्रिय जीवों के भेद भी जान लेने चाहिये यहां तक ३१ सूत्र हुए हैं इसके अनंतर पंचेंद्रिय जीवों के भेदों का विवर्ण किया जाता है जिस के अविशेपक विशेषक. पूर्ववत् भेद हैं ।।... ॥ अथ पंचेद्रियादि जीवों के विषय ।। .. अवसेसिएपंचेंदिएतिरिक्खजोणिय विसेसिय जलयर पंचेंदियतिरिक्खजोणिय थलयरपंचेंद्रियतिरिक्ख जोणियं खेयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय ३२ अविसेंसिए जलयर पंचेंदिय तिरिक्ख जोणिय विसेंसिय समुच्छिय जलयर पंचेंदियतिरिक्खजोणिय गभ्भ वकंतियजलयरपंचेंदियति- रिक्खजोणिय. ३३ अविसेसिग समुच्छिमजलयरपंचेंदिय तिरिक्खजोणियए विसेसिय पज्जत्तएसमुच्छिमजलयर पैवेदियतिौरक्खजोणिय 'अपज्जत्तएसमुच्छिमजलयर पंचें- दिएतिरिक्खजोणियए "३४ प्रविसेसिए गम्भ वतिय * अनुयोगद्वार मूत्र * ( १३६) जलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय विसेसिय पज्जत्तएय गम्भ वतियजलयरपंचेंदिय तिरिक्खजोणिए य अपज्जत्तए गम्भ वक्रतियजलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिए ३५ अवि- सेसिए थलयरपंचेंदिएतिरिक्खजोणिए विसेसिए चउप्पए थलयरपंचेंदिएतिरिक्खजोणिए उरपरिसप्पथलय पंचेंदिए तिरिक्खजोणिए य ३६ अविसेसिए चउप्पएथलयरपंचेंदिय तिरिक्खजोणिए विससिए समुच्छिमचउप्पएथलयरपंचेंदिय तिरिक्खजोणिए गम्भ वकंतियचउप्पयथलयरपंचेंदियतिरि- क्खजोणिएय ३७ अविसेसिए समुच्छिमचउप्पएथलयरपं- चेंदिएतिरिक्खजोणिए य विसेसिए पज्जत्तयसमुच्छिम चउप्पयथलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिए य अपज्जत्तए समु- च्छिमत्रउप्पयथलयरपंचेंदियएतिरिक्खजोणिएय ३८ अवि- सेसिए गम्भ वकंतियचउप्पयथलयरपंचेंदिएतिरिक्खजोणिए विसेसिए पज्जत्तए गम्भ वकृतियचउप्पयथलयरपंचेंदि- यतिरिक्खजोणिय अपज्जत्त गभ्भ वकंतियचउप्पय थल- यरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय ३६ अविसेसिए परिसप्पथल- यरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय विसेसिए उरपरिसप्पथलयर पंचेंदियतिरिक्खजोणिय भुजपरिसप्पथलयरपंचेंदिय तिरि- क्खजोणिए य ४० एतेवि समुच्छमा पज्जत्तगा अपज्जत्तगा य गभ्भवतिय विपज्जत्तगा अपज्जत्तगा य भाणियव्वा अविसेसिए खेयरपंचेंदिएतिरिक्खजोणिए विसेसिए समु. च्छिमस्खेयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय विसेसिए पज्जत्तय समु. च्छिम खयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिए य. ४७ प्रविसेलिए समुच्छिमखयरपंचिंदियतिरिक्खजोणिय विसेसिए पज्जत्तएं . ११४०) # अनुयोगदार सूत्र * समुच्छिमखयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिए य. ४८ अविससिए गम्भ वतियखयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय विसेसिए पज्ज- त्तए गम्भ वक्कंतियखयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिए य अपज्ज- जए गम्भ वक्कंतियखयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय ४६ ॥ पदार्थ-(अविससिए ) अविशेषक पद में (पंचेंदिए तिरिक्ख जोणिय ) पांचेद्रिय तिर्यक् योनिक शब्द है और (विसेसिए ) विशेषक पद में ( जलयर पंचेंदियतिरिक्खजोणिए ) जलचर पांचेंद्रिय तिर्यक् योनिक जीव हैं और (यलयरपंचेंदियतिरिक्खनोणिए ) स्थलचर पांचेंद्रिय तिर्यक् योनिक जीव हैं ( खयरपंचदिएतिरिक्खीणए) और खेचर पचिंद्रिय तिर्यग् योनिक जीव हैं ३२ और ( अविससिय) अविशेषक पद में (जलयरपंचेदियतिरि- खज़ोणिए ) जलचर पत्रिंद्रिय तिर्यक् योनिक हैं। (विसेसिए ) विशेषक पद में ( समुच्छिमजलयरपंचेंदियतिरिक्खनोणिए ) समूछिम जलचर पांचेंद्रिय तिर्यक् योनिक. और ( गम्भववतियजलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय ) गर्भ में उत्पन्न होने वाले जलचर पांचंद्रिय तिर्यक् योनिक् शन्द. हैं ३२ फिर' ( अविससिए ) अविशेषक नाम में ( समुच्छिमजलयरपंचिंदियतिरिक्ख ओणिए ) समूर्छिम जलचर पांचेंद्रिय तिर्यग योनिक हैं और (विसेसिय पन्जत्तए समुच्छिमजलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय अपजत्तए समुच्छिमजलयर पंचेंदियतिरिक्खजोणिए य ३४) विशेषक में पर्याप्त समूच्छिम जलचर पांचे. न्द्रिय तिर्यग् गेनिक् और अपर्याप्त समूचिम जलचर पांचेन्द्रिय तिर्यग् योनिक जीव हैं ३४ अपितुः फिर ( अवसेसिए गभ्भ धक्कंतियजलयरपंचेंदियतिरि- खजोणिए ) अविशेषक नाम में गर्भ से उत्पन्न होने वाले जलचर पांचेंद्रिय तिर्यम् योनिक जीव हैं और ( विससिए पज्जत्तए गभ्भ वक्कंतियजलयरपंचीदीतीरक्खजोणिए अपज्जत्तए गभ्भवक्कतियजलयर पंचेन्द्रियतिरिक्खजोणिए य ) विशेपक नाम में पर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले जलघर पचिंन्द्रिय तिर्यग् योनिक और अपर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले जलचर पांचेंद्रिय तिर्यक् योनिक जीवं हैं भव स्थलचरों के विषय में विवर्ण किया जाता है (अविसेसिए थलयरपंचेंद्रिय * अनुयोगदार मन्त्र * (१४१) तिरिक्ख जोणिए ) भाषिक नाम में थलचर पचिन्द्रिय तिर्यग योनिक जीव हैं किन्तु (विससिए चउप्परयलयरपंचेंदियतिरिक्खज़ोणिय उर पर परिसप्पथलयर पंचेन्द्रियतिरिक्खोणिएय) विशेषक नाम में चार पाद वाले स्थलचर पादिय तिर्यग् योनिक और बाती के बल से चलने वाले सर्प स्थलचर पांचंद्रिय तिर्यग् योनिक जीव है ३६ (भविसेसिए चउप्पएथलयरपंचदिए- तिरिक्खजाणएय ) अविशेषक चार पाद वाले स्थलचर पांचंद्रिय तिर्यग् यो- निक जीप मोर ( विससिए समुच्छिमचउप्पएथलयरपंचीन्द्रयतिरिक्ख जाणिए य गम्भ रतिय चउपएथलयरपंचेंद्रियतिरिक्खजोणिएय) विशेषक समुछिय चार पाद नाले स्थलचर पांचद्रिय तिर्यग् योनिक और गर्भ से उत्प महोने वाले चार पाद वाले स्थलचर पांचद्रिय तिर्यग् योनिक जीच हैं चपाद पूरणार्थ में है ३७ फिर (अविससिए समुच्छिमचरप्पएयलयर पंचेंदियति- रिक्खजोगिए 4 ) आविशेषक समर्छिप चार पाद वाले स्थलचर पांचंद्रिय निर्यक् योनिक और ( विससिए पज्जत्तय समुछिमचउप्पएथलयरपंचेंदिय तिरिक्खनोणिय अपज्जत्तय समुच्छिमचउप्पएयलयरपंचेंदिएतिरिक्खजोणिएं य ) विशेषक नाम में पर्याप्त समूच्छिम चार पाद पाले स्थलचर पांचंद्रिय तिर्यक योनिक और अपर्याप्त समूच्छिम चार पाद गाले स्थलचर पनिद्रिय तिर्यक योनिक जीव है ३८ ( अविसेसिए गभ्भ वक्क तियच उप्पएपलयरपंचद्रियतिरिक्खजोणिए ) भविशेषक नाम में गर्भ से उत्पन्न होने वाले चार पाद वाले स्थलचर पांचंद्रिय तिर्यक् योनिक हैं और (विससिए पज्जाए गम्भवतिय चउप्पए थलयर पंचेंदिय तिरिक्ख जोणिय अपजनए गम्भयकंति चउप्पए थलयर पंचेंद्रिय तिरिक्ख जोणिय ३६) विशे- पर पर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले और चार पाद वाले स्थलचर पांचंद्रिय तिर्यग् योनिक और अपर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले चार पाद वाले स्थलचर पचिंद्रिय तिर्यग् योनिक जीव है ३६ ( अविससिए उरपरिसप्प थलयरपंचेंदिय तिरियखजोणिए ) अविशपफ नाम में उरपरिसर्प स्थलचर पांचेंद्रिय तिर्यक योनिक जीव है और ( विससिए उरपरिसप्प यजयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय मुयपरिसप्पयलयरपंचंद्रियतिरिक्खजोणिए य ) विशेषक नाम में छाती के पल चलने वाले स्थलचर पांचन्दिय निर्यक योनि और भुजा के पलसे (१४२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * चलने वाला परिसर्प स्थलचर पांचेंद्रिय तिर्यग् योनिक जीव हैं ४० (एतेवि समुच्छिमा पज्जत्तगा अपज्जत्तगा गभ्भ वतिय विपज्जतगाय अपज्जत्तगाय भाणियन्याः) फिर 'इन के भी समूर्छिम अविशेषक पद में रख कर पर्याप्त और अपर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वालों के भी पर्याप्त अपर्याप्त भेद जानने चाहिए ४६ अथ खेचरों के विषय में विवर्ण किया जाता है ( अविससिए खेयरपंचें- दियतिरिक्खजाणिय ) अविशेषक नाम में खेचर पांचंद्रिय तिर्यग् योनिक् शब्द है और (विसेसिए समुच्छिमखेयरपंचेंद्रियतिरिक्खजोणिय ) विशषक में समुच्छिम खेचर पांचंद्रिय तियर्ग योनिक हैं ४७ फिर ( आविससिए समुच्छिम खइयर पंचेंद्रियतिरिक्खजोणिए) अविशेषक में समुचिम खेचर पांचंद्रिय तिर्यग् योनिक हैं और (विसेसिए पज्जत्तए समुच्छिमखयरपंचेंदियतिरिक्ख. जोणिए य ) विशेषक में पर्याप्त समुछिम खेचर पांचंद्रिय तियग् योनिक हैं ४८ फिर ( अविसेसिए गभ्भ वक्कंतियखेयरपंचेंद्रियतिरिक्खजोणिए ) अविशेपक में गर्भ से उत्पन्न होने वाले खेचर पांचेंद्रिय तिर्यक योनिक जीव है और (वि. सेसिए पज्जत्तए गभ्भ वकंतिय खयरपंचेदियतिरिक्खजोणिए य अपज्जत्तए. गम्भ वकंतियखेयरपंचेंद्रियतिरिक्खजोणिए य ) .विशेषक में गर्भ से उत्पन्न होने वाले खेचर पांचेंद्रिय तिर्यग् योनिक पर्याप्त और अपर्याप्त रूप दो भेद हैं इस प्रकार से तिर्यग् योनि के जीवों का विशेष और अविशेष नाम से विवर्ण किया गया है अब मनुष्य विषय, विवर्ण किया जाता है ।। भावार्थ-अविशेष नाप में पांचेन्द्रिय तिर्यक स्थापन करके विशेष नाम में फिर उनके जलचर स्थलचर और खेचर इस प्रकार के तीनों भेद विवर्ण किये गये हैं और फिर प्रत्येक २ के समूर्छिम और गर्भज पर्याप्त और अपर्याप्त इस प्रकार. के चार चार भेद कहे हैं किन्तु स्थलचर के भेदों में चार पाद वाले जीव और सोदि भी ग्रहण किये गये हैं इनका पूर्ण विवर्ण पदार्थ में लिखा गया है क्यूं- कि अविशेष नाम सामान्य अर्थ का सूचक है और विशेष नाम में उसके भेद . वर्णन किये जाते हैं सो यह सर्व जलचर स्थलचर खेचर समूच्छिम और गर्भन पर्याप्त और अपर्याप्त प्रथम भेद को अविशेष नाम में रखकर फिर विशेष नाम में उनके भेद विवर्ण करने चाहिये अव मनुष्य जाति के विषय में वर्णन किया जाता है ॥
* अनुयोगद्वार मूत्र * (१४३) अथ मनुष्याणां भेदाना माह । अविसेसियो मणुस्सो विसेसिश्रो समुच्छिम मणुस्सो य गभ्भवति य मणुस्सोय ५० भविसेसिउ समुच्छिममणुस्सो विसेसिउ पज्जत्तउय अपज्जत्तउय ५१.अविससिउ गभ्भ वक्क- तिय मणुस्सो विसेसिउ कम्मभूमिगो अकम्मभूमिउ य अंतर दीवगो य संखेज्जवासाउय असंखेज्जवासाउय पज्जत्तउ अपज्जत्तउ भेदो भाणियव्यो.५७-८५ ॥ पदार्थ- अविससिओ मणुस्सो) अविशेषक नाम में मनुष्य शब्द है किन्तु (विसेसिओ) विशेष नाम में ( समुच्छिम मणुस्सो य गम्भवतियमणुस्सो य) समूच्छिम मनुष्य और गर्भ से उत्पन्न होने वाले मनुष्य हैं । अर्थात् गर्भज मनु- प्य है ५० फिर (अविससिउ समुच्छिम मगुस्सो ) अविशेष नाम में समूछिप मनुष्य हैं और ( विससिओ पज्जत्तर य अपज्जत्तउ य) विशेप नाम में पर्याप्त और अपर्याप्त उसके भेद है ५१ और ( अविससिओ गभ्भ वतियमणुस्सो) अविशप गर्भज मनुष्य है किन्तु (विसेसिओ कम्म भूमिगो अकम्म भूपिउय अन्तरदीवगा य संखजनवासाउय असंखज्जवासाउय पज्जत्ता अपज्जत्त भेउ भाणिययो) विशेष नाम में कर्म भूमिज मनुष्य १ अकर्म भूमिक मनुष्य २ और अन्तवीपों के मनुष्य ३ फिर संख्यात वपी की आयु वाले ४ और असंग्ल्यात बी की आयु वाले ५ फिर पर्याप्त और अपर्याप्त रूप यह दोनों भेद सर्व प्रकार से कहने चाहिऐं अर्थात् मनुष्यों के भेदों में जो मनुष्य पंच दश क्षेत्रों में उत्पन्न होते हैं उनको फर्म भूमिक कहते हैं और तीस क्षेत्रों में उत्पन्न होने वालों को अकर्मक भूमिक कहते हैं ५६ अपितु ५६ अन्तद्वीपों के मनुष्य भी युगलिय संज्ञक है इन सर्व मनुष्यों के भेद पूर्ववत् करने चाहिये ५७ अब दवों के विपयं में व्याख्यान करते हैं। भावार्थ-अधिशेप नाम में मनुष्य पद है विशेप नाम में समूच्छिम मनुष्य और गर्भन मनुष्य उनके भेदं हैं। इसी प्रकार पर्याप्त और अपर्याप्त भेद भी (१४४) * भनुयोगद्वार सूत्र * जान लेने चाहिये किन्तु जैसे समूचिम मनुष्यों के भेद हैं उसी प्रकार गर्नभ मनुष्यों के भेद भी जानने चाहिये अपितु विशेष इतना ही है कि गर्भज मनुष्यों के तीन भेद हैं कर्मभूमिक १ अकर्मभूमिक २ और अन्तरद्वीपों के मनुष्य ३ फिर इनके भी संख्यात वर्षों की आयु वाले और असंख्यात वर्षों की आयु वाले पर्याप्त और अपर्याप्त इत्यादि भेद वर्णन करने चाहिये । मनुष्यों के पश्चात् अब देवों का विवर्ण किया जाता है ।। अथ देवों विषय । (अविसेसिउ देवो विसेसिउ भवणवासी वाणमंतर. जोइसिय बिमाणिय ५८ अविसेसिउ भवणवासी विसेसिउ असुर कुमारो १ एवं नाग २ सुवन्ना ३ विज्जु भणग्गि ५ दीव ६ उदहि ७ दिसा ८ वाउ ६ थपिउ १०॥५६॥ सब्वे सिंपि अविसेसिउय विसेसिउय पज्जत्तग अपज्जत्तग भेया भाषियवो ६६ अविसेसिउ वाणमंतरों विसमिउ पिसाय १ मूय २ जक्खे ३ रक्खसे ४ किन्नरे ५ किंपुरिसे ६ महोरगे '७ गंधवे ८॥ ६१॥ एतेसिपि अविसेसिए विसेसिए पज्ज त्ता अपज्जत्ताया भेया भाणियव्वा ७८ अविसेसिउ जोइ- सिओ विसेसिउ चंद १ सूर २ ग्गह ३ नक्खत्त ४ तारा ५ ॥ ७६.॥ एते सिपि अविसेसिए विसेसिए पजत्तय अपज्जत य भेदा भाणियब्वा ८० अवसेसिउ. विमाणिो विसेसिश्रो कप्पोवउयकप्पा तहउय ८४ प्रविसेसिमो कप्पोवउय विससि- ओसुहम्माए. १ इसाणेय २ सणकुमारय ३ माहिदए ४ वंभलो ए ५ लत्तए ६ महासुक्कय ७ सहस्सारे ८ आणय : पाणय ए १० श्रारणए ११ अच्चुयए १२ एतेसिंपिय भविसेसिय वि सेसियं पज्जत्तय अपज्जत्तए भेदा भाषियव्वा ६८ प्रविसेसि ।
* अनुयोगद्वार सूत्र (१४५) उ कप्पातइय विसेसिउ गेविज्जउय अणुत्तरोक्वाइउय.. अविससिउ गेविज्जउ विसेसिउ हेछिमगेविज्जए मज्झिमगे विज्जए उवरियगेवज्जएय ६३ अवसेसिए' हेहिमगेविज्जए विसेसिए हेहिमहेछिमगेवेज्जए हेछिममज्झिमगेवेज्जए हेहिम, उवरिमगेवेज्जए ६४ अविसेसिए मज्झिमगेवज्जए विसेसिए- माझिमहोमगेवेज्जए मज्झिम मज्झिमगेवेन्जए मज्झि- उपरिमगेवेज्जए ६५ अविसेसिए उवरिमगवेज्जए विसेसिएं उपरिमहष्ठिसरोवेज्जए उपरिम मज्झिमगेवज्जए - उवरिम उवरिमगवेज्जए ६६ एतेसिंपिं सव्वेसिं अविसेसिए विसेसिए. पज्जत्तएअपज्जत्तए भेया भाणियब्वा १०५ प्रविसेसिय गुत्तरोववाइए विसेसिय विजय वेजयंतेए जयंतेए अपराजिए सब्बठ्ठसिद्धय १०६ एतेसिपि सव्वास अविसेसियविसेसिय पज्जत्तयत्रपज्जत्तएभेया भाणियब्वा .११ । ११ अविसेसिए अजीवदव्वे विसेसिए धम्मत्थिकाय अधम्मत्थिकाय भागास- थिकाय पोग्गलत्थिकाय अद्धासमय? अविसेसिए पोग्गलत्थि काय विसेसिए परमाणु पोग्गले दुप्पएसिय तिपएसिय जाव दसपएसिए जाव अणंत पएसिये २ ।२० सेत्तं दुनाम ८६॥. पदार्थ-( अविसेसिउ देवो) अविशेपक नाम में देव शब्द है किन्तुं (बिसेसिउ भवणवासी वाणमंतर जोइसिए चेमाणिय) विशेषक नाम में चारों प्रकार के देव हैं जैसे कि भवनपति १ वाणव्यंतर २ ज्योतिषी ३ वैमानिक ४ ५८ फिर (अविससिउ भत्रणवासी) अविशेष नाम में भवनपति देव हैं और (विसेसिड असुर कुमारो १ एवं नाग २ सुवन्ना ३ विज्जु ४ अग्गि ५ दीव ६ . उदहि ७,दिसा ८ वाउ ६ थणिउ १०)-विशेषक नाम में भवनपतियों की दश प्रकार की जातिग्रहण की गई है जैसे कि असुरकुमार १ नागकुमार २ सुपर्ण- कुमार;३ विद्युत्कुमार ८ वायुकुमार ६ स्तनितकुमार १० | ५६ ।। ( सचेसिपि (१४६) * अनुयोगद्वार सूत्र * अविसेसिउय विसेसिउय पज्जतंग अपज्जत्तग भेया भाणियचा) अपि शब्द समुच्चयार्थ में है इसलिये इन सर्व भेदों के अविशेष नाम और विशेष नाम पर्याप्तअपर्याप्त यह सर्व भेद जानने चाहिये अथवा कहने चाहिये जैसे. कि असुरकुमार अविशेष नाम है और पर्याप्त अपर्याप्त. यह दोनों भेद विशेष नाम में ग्रहण किये गये हैं इसी प्रकार दशों जातियों के भेद जान लेने चाहिये ६६. अब व्यंतरों के विषय कथन किया जाता है अविसेसि. वाण मंतरो) अविशेष नाम में वाणव्यंतर शब्द है और (विसेसिड) विशे- षक नाम में व्यतरों के भेद विवर्ण किए गये हैं जैसे किं-(पिसाए.) पिशाच जाति के.व्यंत्तर इसी प्रकार (भूय) भूत २ (जक्खे स्वखसे) यक्ष ३ राक्षस ४ (किन्नरे किं पुरिसे ) किंनर ५ किं पुरुष ६ महोरगेगंधच्चे ) महोरग ७ गंधर्ष ८ यह आठ जाति के व्यंतर प्रधान कहलाते हैं इसलिए इनका नाम सूत्र में दिया गया है. और अष्ट अन्य परायादि जाति के व्यंतर समान होते हैं इसी लिए उनका नामोल्लेखन ही हुआ है ७० अपितु ( एतसिपि अधिसेसिड विसेसिउ पज्जत्ता अपज्जात्ताय भेया भाणियचा ) इनके भी अविशेष नाम और अविशेष नाम पर्याप्त अपर्याप्त इत्यादि प्राग्वत् भेदं कहने चाहिए जैसेकि पिशाच जाति के व्यंतर अविशेष नाम हैं और विशेष नाम में पर्याप्त और अप- यति भेद कहने चाहिये ७८ और ( अविसेसिङ जोइसिउ) अंविशेष नाम में ज्योतिष्क देव हैं किन्तु (विससिउ चंद सूर गाह नक्खत्त तारा) विशेपक पद में चंद्र १ सूर्य २ ग्रह ३ नक्षत्र ४ और तार ५ हैं ७६ फिर ( एतेसिपि अवि- सेसिउ विसेसिउ पज्जत्तय अपज़्जत्तय भेदा भाणियबा । इनके भी अविशेष और विशेष पर्याप्त और अपर्याप्त भेद कहने चाहिये जैसकि-चन्द्र शब्द अंधि- शेषक है और पर्याप्त अपर्याप्त उसके भेद विशेषक हैं इसी प्रकार सर्व की सः म्भावना कर लेनी चाहिये ८४ और ( अविसेसिड वेयाणिउ ) अविशेषक नाम: में वैमानिक शब्द है अतः (रिसेसिउ कप्पोवजय कप्पातइय) विशेषक नाम में कल्प देवलोक और कल्पातीत देवलोग ग्रहण किये जाते हैं ८५ फिर (अविसेसि कप्पोवउय) अविशेष नाम में कल्प देव हैं अपितु (त्रिसेसि सुहम्माए. १ इसाणेसंणकुमारे माहिदए विशेषक नाम में द्वादश कल्प देवलोक हैं जैसेकि सुधर्मदेवलोक १ ईशानदेवलोक २ सनत्कुमार देवलोक ३ महें- न्द्रदेवलोक ४ ( भलोए लांतए महासुक्कर सहस्सारे ) ब्रह्म देवलोक - . * अनुयोगद्वार भूत्र * (१४७) लसिंक देवलोक ६ महाशुक्र देवलोक ७ सहस्त्रार देवलोक ८ (आणयए पाणंयए भारगए अच्चुयए) आनत देवलोक ६ प्राणत देवलोक १० श्रारण्य देवलोक ११ और अच्युत देवलोक १२ / ८६ ।। फिर इनके भी ( एतसिंपि अविसेसिड निसेसिय पज्जत्तय अपज्जत्तय भेदा भाणियन्यो ) अविशेष नाम और विशेष नाम पर्याप्त और अपर्याप्त रूप भेद कहने चाहिये ६८ फिर (अविसे सिर कप्पा- तहत ) अविशेष नाम में कल्पातीत स्वर्ग है किन्तु ( विससि गेविज्जव्य मणुतरो वाइउय ) विशेष नाम में अवेयक और अनुत्तरो वैमानवासी देव हैं ६ अतः फिर भी ( अविसेसिउ गेविज्जउ) अविशेप नाम में अवयक हैं और (विससिउ हिमहेहिमगविज्जर) विशेपक नाम में अधः अधो गैवेयक १ (हे- हिमझिम गविजउ) अधो मध्यम वयक ( हटिम उवरिमगेवेन्जउ ) नीचे के उपरला अवेयक फिर ( अविससिए हेडिमगविज्जउ ) अविशेष नीचे का अवेयक है और (विससिप हेहिमग्रेवेज्जड हेहिममझिमेगेवजउ हेहिमउव- रिमगेनेज्जए ) विशेषक नाम में नीचला वैयक १ नीचे के मध्मम वेयक २ नीचे के उपरला ग्रेवेयक ३ फिर (अविसेसिए मज्झमगेवेज्जड ) अविशेष नाम में मध्यम अवेयक है किन्तु ( विससिए मज्झिम हेहिमगवेज्जउ मज्झिम मज्झिम गेवेग्जए मझिम उवर्तिमगेयेज्जए) विशेष नाम में मध्यम के नीचे का ग्रैवेयक और मध्यम के मध्यम का ग्रैवेयक, मध्यम के उपर का अवेयक फिर ( अविस- सिर उवरिमगेवेन्जए ) अविशप नाम में उपरला ग्रैवेयक है ( विसे- सिउ उवरिम हेहिमगवेज्जए उवरिम मझिम गवेगए उवरिम उपरिम गेज्मए ) और विशेष नाम में उपर के नीचे का अवेयक, फिर उपर के मध्यमका ग्रैवेयक और ऊपर के ऊपर का ग्रेवेयक ३ । १०० ॥ (एत सिंसबेमि श्रविसेसिउय विससिय पज्जचय थपज्जत्तय भेदाणयच्या) फिर इन के भी अविशेष और विशेष पर्याप्त और अपर्याप्त रूप भेद सर्व प्राग्वत कहने चाहिये १०६ फिर ( आवसेसिर अणुत्तरोववाइड ) अविशेषक नाम में अणुत्त रोपातिक देव हैं किन्तु (विसेसिउ विजय विजयंत .जयंत अपराजित सध्या सिद्धउ ) विशेषक नाम में विजय १ विजयंत २ जयंत ३ अपराजित ४ सर्वार्थ सिद्ध ५ यह पांच ही लोक देव हैं फिर ( एतेसिपि सव्वेसि अविसेसि विसें- सिस पन्नचए अपज्जत्तय भेदा भाशियवा) इन सर्यों के अविशेपक नाम और (१४८) * अनुयोगद्वार सूत्र * विशेषक नाम पर्याप्त और अपर्याप्त नाम यह सर्व भेद कहने चाहिये क्युकि समान मेद अविशेष नाम होता है और उसके भेदों को विशेष नाम कहते हैं.११५ ॥ अब अजीव द्रव्य के विषय में विवर्ण किया जाता है जैसीक (अविसेसिर अजीवद) अविशेप नाम में अजीव द्रव्य है और (विसेसिउ धम्मात्यकाय अधम्मत्किाय आगासाथिकाय पोग्गलास्थकाये श्रद्धासमय,) विशेष नाम में धर्मास्तिकाय १ अधर्मास्तिकीय २ आकाशास्तिकाय ३ पुद्गलास्तिकाय और समय (काल) फिर (अविसेसिड पोग्गलस्थिकाय ) अविशेष नाय में पुद्गलास्ति काय है ( विसेसिए परमाणु पोग्गले दुप्पएसिए तिपएसिए जावदस पएसिए जात्र अणंतपएसिए) और विशेषक नाम में परमाणु पुद्गल द्विमदेशिक स्कंध त्रिभदेशिक स्कंध यावत् दश प्रदेशिक स्कंध संख्यात प्रदेशिक स्कंधा असंख्यात प्रदेशिक स्कंध यावत् अनन्त प्रदेशिक स्कंध यह सर्व भेद विशेष नाम के हैं (सेत्तं दुनामे ) अथ शब्द अथानन्तर के विषय में है और द्विनाम का विवर्ण पूर्ण हुआ इसी को द्विनाम कहते हैं ।। भावार्थ:-अविशेप नाम पद में देव शब्द ग्रहण किया गया है अतः वि- शेष नाम में चारों जाति के देव है फिर अविशेष नाम में भवनपति देव रख कर विशेष नाम में उनकी संख्या की गई है सो इसी प्रकार फिर उनके पास अपर्याप्त भेद कथन किये गये हैं जैसे भवन पतियों का विवर्ण है उसी प्रकार वाण व्यंतर ज्योतिषी वैमानिक देवों के भी भेद जानने चाहिये अपितु आठ जाति के व्यंतर ५ ज्योतिपी २६ वैमानिक देवों के भेद हैं यह सर्व जीव द्रव्य के ही विशेष और अविशष नाम से ११५ सूत्र विवर्ण किये गये हैं किन्तु श्र- जीव द्रव्य के अविशेष नाम में धर्मास्तिकायादि पांच भेद हैं क्योंकि जीव द्रव्य का विवर्ण तो पहिले किया जा चुका है और अविशेष नाम में पुद्गला- स्तिकाय के परमाणु पुद्गल से लेकर अनन्त प्रदेशिक स्कंध पर्यन्त विवर्ण है क्योंकि यह सर्व पारिणामिक भाव होने से विशेष नाम में ग्रहण किये गये हैं अतः धर्मास्तिकायादि अपने शुद्ध स्वभाव में स्थित हैं इसलिये उनके भेद नहीं कहे गये सो यह केवल दोनों सूत्र अजीव द्रव्य के हैं और इसी स्थान पर द्वि- नाम का विवर्ण भी पूरा किया गया है इसके अनंतर अब तीन नाम को व्याख्यान करते हैं । .:
* अनुयोगद्वार मूत्र * (१४६ ) ॥ अथ त्रिनाम विपय ॥ (सेकिंतं तिनामे २ तिविहे पण्णत्ता तंजहा, दबनामे गुणनामे २ पज्जवनामे सेकिंतं दबनामे २ छविह पएणत्ते तंजहा धम्माथिकाय अधम्मत्थिकाय भागासथिकाय ३जीव- थिकाय ४ पोग्गलस्थिकाय ५ श्रद्धासमयएं से दब्वनामे सेकिंतं गुणनामे २ पंचविहे पण्णत्ते तंजहा वननामे गंधनामे रसनामे फासनामे संहाणनामे सेकिंतं वननामे पंचविहे परणत्तेतंजहा कालवन्न परिणामे नीलवन परिणामे लेहियवन्न परिणामे हलिवन्न परिणामे सुकिलवन्न परिणामे सेवन नाम सकितं राधनामे २ दुविहे पं० तं० सुभिगन्धनामे य दुम्मिगंधनामे से तं गंधनामे सेकिंतं रसनामे २ पंचविहे पं० त० तित्तरसनामे कडुयरसनामे कसायरसनामे अम्बिलरसनामे मुहुररसनामे से तं रसनामें सेकिंतं फासनामे २ अविहे पण्णत्तं तं० कक्खड कासनामे मउयफासनामे गरु अफासनामे लहुअफासनामे सीयोफासणामे उसिण फासनामे निदफासनामे लुक्खफासनामे से तं फासनामें सेकिंतं संहाणपरिणामे २पंचविहे पं० त० परिमण्डलसंक्षण नामे वट्टसंहाणनामे तंसनामे चउरेसनामे प्रायासंहाण नामे सेत्तंसंटाणनामे सेत्तं गुणनामे सेकिंतं पज्जवनामे २ अणेगविहे पं०'तं.. एगगुणकालए दुगणकालए जाव दसगुणकालए संखेज्जगुणकालए : असंखज्जगुणकालए अपंतगुणकालए एगगुणनीलए · दुगुणनीलए .. तिगुणं नीलए जावदसगुणनीलए जावयणतगुणनीलए एवंलोहि- (१५०) * अनुयोगदार सूत्र * यहालिहसुकलावि भाणियवा एगगुणसुरभिगंधे दुगुण- सुरभिगंधे तिगुणसुरभिगंधे जावदसगुणसुरभिगंधे संखे- ज्जगुणसुरी रभिगधे असंखेज्जगुणसुरभिगंधे अणंतगुणसुर- भिगधे एवंदुरभिगंधो भाणियब्धा एगगुणतिते दुगुण- तिचे तिगुणतित्ते जावदसगुणतित्ते संखेज्जगुणतिते असं- खज्जगुणतित्ते अणंतगुणतित्ते एवंकडुयकसायअम्बिलमहुरा भाणियवा एगगुणकक्खडे दुगुणकक्खडे तिगुणकक्खडे जावदसगुणकक्खडे संखेज्जगुणकक्खडे असंखज्जगुणकक्खडे अपंतगुणकक्खडे एवंमउयगरुयलहुअसीय उसीणनिद्धलुक्खे भापियवा से पज्जवनामे ।। पदार्थ-( सेकित तिनापे २ तिविहे पं० २० दबनाम गुणनामे पज्जन नामे) (मन) तीन नाम किसे कहते हैं । ( उत्तर ) तीन नाम भी तीनों प्र. कार से वर्णन किया गया है जैसीक-द्रव्पनाम गुणनाम पर्यायनाम (से. कित बनामे २ छबिहे पं० त०) (प्रश्न ) द्रव्यनाम कितने प्रकार से कहा गया है ( उत्तर ) द्रव्य नाम पट प्रकार से वर्णन किया है जैसे कि-(धमत्थि- काय ) धर्मास्तिकाय ( अघमस्थिकाय ) अधर्मास्तिकाय २ (आगासथिकाय) अकाशस्विकाय ३ (जीवस्थिकाय ) जीवास्तिकाय ४ (पोग्गलथिकाय ) पु- द्लास्तिकाय ५ और ( अद्धासमय ) कालद्रव्य (सेत्तं दध्वनामे ) यही द्रव्य नाम है अर्थात् पट द्रव्यों का बोध होना और गति स्थिति अवगाह स्थान चैत. न्यता संयोग नियोग परिमाणुओं का होजाना वर्तना यह पट ही इन के लक्षण हैं सो इन्हीं पट् द्रव्यों को द्रव्य नाम कहते हैं ( सेकिंतं गुण नामे २ पंच विहे पंणते तंजहा) (प्रश्न ) गुणनाम किसे कहते हैं (उत्तर) गुणनाम पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसेकि-(कालपत्रनामे) कृष्णवर्ण नाम (नीलवननामे) नीलवर्ण नाम. ( लोहियवननामे) रक्तवर्ण नाम (हालिए- पंचनामे ) पीतवर्णं नाम (सुकिलपननाम) श्वेतवर्ण नाम ( सेवमनाम ) यही वर्ण नाम है. क्योंकि द्रव्यों के मुख्यतया पांच ही वर्ण है जैसेकि कृष्णं १ नील २ रक्त ३ पीत ४ और स्वत:५ - - सेकितं गधनामे) (मन) * अनुयोगद्वार सूत्र * (१५१).. गंभ नाम किसे कहते हैं:( उत्तर.) गंधनाम (दुविहे पं० २०) दो प्रकार से कथन किया गया है जैसेकि--(सुरभिगंधनामे ) एक सुगंध और द्वितीय, (. दु- रभिगंधनामेय सेतंगधनामे ) दुर्गन्ध नाम अप शब्द प्राग्वत् है, सो इसी को गंध नाम कहते हैं । सेकित रस नामे २ पंचविह पंणते तंजहा (प्रश्न) रसनाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) रसनाम भी पांच प्रकार से कहा गया है जैसे कि- (तित्तरस नामे ) श्लेष्मादि रोगों को हरण करने वाला तिकरस होता है ( कडु यरस नामे ) कंठ रोगादि के विद्धवंस करने वाला कटुकरस होता है ( कसाय रसना ) कपायलारस रक्तविकारादि के दोषों को दूर करता है ( अंबिल रसनामे ) खट्टारस जो अग्निदीपक होता है ( महुररसनाम ) मधुररस जो पिसादि के हरण करने वाला है इनका विवर्ण वैद्यक शास्त्र में सविस्तर के थन किया गया है क्योंकि यह.पांच रस मुख्यता से संसार में हैं इसलिये इन का विवर्ण किया गया है किन्तु जो लवण रस भी एक प्रकार से माना जाता हैं वह इनके संयोग से ही उत्पन्न होता है इसलिये उसकी पृथक् भाव से विवक्षा 'नहीं की अब स्पर्श विषय प्रश्न करते हैं (सेकिंतं फासनामे २ अहविहे पं० त० (मन) स्पर्शनाम किसे कहते हैं (उत्तर ) स्पर्शनाम आठ प्रकार से है जैसे कि-( कक्खुडफासनामे ) कर्कस्पर्शनाम जैसे पाषाणादि .१ ('महुय फासनामे ) मृदुस्पर्शनाम जैसे नवनीतादि पदार्थों में मृदुता होती है उसे मृदस्पर्शनाम कहते हैं (गरुयफास नामे ) गुरुस्पर्श नाम उसे कहते हैं . जो पदार्थ उपरि प्रक्षेप किये हैं फिर वह अधीगमन स्वभाव वाले हैं जैसे लंबण 'पाषाण अपादि ३ (लहुयफासनामे ) लघुस्पर्शनाम जो पदार्थ लघु हैं जैसे कि अर्कतूलादि आक और सीमल आदि की रूई. जिन्हों का ऊर्ध्वगमन स्वः भाव झे ॥ ४ ॥ ( सीयकासनामे ) जो शीतस्पर्शनाम जैसे है मादि पदार्य १५ ( उसणफासनामे ) उष्णम्पशनाम जैसे अग्न्यादि पदार्थ हैं.. निफास नामे) निग्धस्पर्शनाम जिस के कारण.से पदार्थ एकत्व होजावे जैसे. तैला- दि फिर (लुक्खफासनामे ) रुक्ष स्पर्श नाम.जैसेकि-भस्मादि पदार्थ हैं (सेच फासनामे ) यही आठ प्रकार स्पर्श नाम है क्योंकि यह सर्व पौगलिक गुण हैं अबसस्थानों के विषय में कहते है (सेक्षित:संठाण नामे पंचविहे पं० त०) १-गुरो केवा प्रा० व्या पाद सूत्र १०६ ॥ गुशी सायसति प्रादेहतो अंदवा भवति... . -- . .
(१५२) * अनुयोगदार सूत्र * ( प्रश्न ) संस्थान किसे कहते हैं ( उत्तर ) संस्थान (आकृनि ) पांच प्रकार से. कहा गया है जैसे कि (परिमंडल संगणनामे) परिमंडल संस्थान गोल आकृति- जैसे चूड़ी ( बट्टनामे ) वृत्ताकार मोदकवत २ ( तंस संहाणनामे ) व्यंसा कार त्रिकोण जैसे सिंघाड़ा ( चउरंस संहाणनामे ) चतुरंसाकार चतुष्कोण (-आयत संहाणनामे ) दीर्घाकार दंडवत् ( सेचं संहाणनामे यही संस्थान नाम है (सेचं गुणनामे ) और इसी को गुण नाम कहते हैं अब पर्याय विषय में कहते हैं (सेकिंत पवनामे अणेगविहे पं० त०) (प्रश्न) पर्याय नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) पर्याय नाम अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि- जो द्रष्य के समान सदा स्थिर नरहे उसे पर्याय कहन हैं अथवा जो द्रव्य को अवस्थांतर करे उसे पर्याय कहते हैं तथा जो पूर्व पर्याय सर्वथा द्रव्य भिन्न हो जावे और नूतन उत्पन्न हो उसे भी पर्याय कहते हैं जैसे कि-बायक आभूपणादि नाना प्रकार के पर्याय धारण करते हैं सो यह पर्याय अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-( एगगुणकालए ) एकगुग कृष्ण द्रव्य सर्व द्रव्यों की अपेक्षा से है जैसे असत् कल्पना द्वारा यदि सर्व कृष्ण द्रव्य एकात्रं किया जाय फिर उसके भेद किए जाएं उस द्रव्य की अपेक्षा एक परमाण्यादि द्रव्य. एकगुण कृष्ण वर्ण कहा जाता है इसी प्रकार ( दुगुणकालए द्विगुणं कृष्णवर्ण ( तिगुणकालए ) त्रिगुणकृष्णवर्ण ( जावदशगुणकालए ) यावत्दशगुण कृष्णवर्ण ( संखज्न कालए ) संख्यातगुण कृष्णवर्ण ( असं. खज्जगुण कालए ) असंख्यातगुण कृष्णवर्ण ( अणंतगुण कालए ) अनंत- गुण कृष्ण वर्ण इसी प्रकार ( एगगुण नीलए ) एकगुण नीलवर्ण ( दुगुण नीलए ) द्विगुण नीलवर्ण (तिगुणनीलए ) त्रिगुण नीलवर्ण ( जावदसंगुण नीलए ) यावत्दशगुण नीलवर्ण ( जावअणंतगुण नीलवणप) फिर संख्यात गुण नीलवर्ण असंख्यातगुण नीणवर्ण अनंतगुण नीलवर्ण ( एवं लोहिगं हालिहसुक्कलावि भाणियवा ) इसी प्रकार रक्तवर्ण पतिवर्ण और शुरुवर्ण के भी भेद जानने चाहिए और ( एगगुणसुरभिगंधे दुगुणसुरामगंधे तिगुण सुरभिगंध जावदसगुणसुरभिगंधे) गंध की अपेक्षा से एकगुणसुगंध द्विगुण सुगंध त्रिगुणसुगंध यावन्दसगुणसुगंध भी होती है तथा ( संखज्जगुण सुर भिगंध ) संख्यातगुण सुंगध ( असंखज्जगुण सुंगध ) असंख्यात्तगुण सुंगध (अणंतगुण सुराभिगंधे ) अनंतगुण सुंगध ( एवं दुरभिगंध) इसी प्रकार दुर्ग- अनुयोगद्वार मूत्र (१५३) न्य के भी भेद जानने चाहिये । अब रसों का पर्याय वर्णन करते हैं ( एगगुण- तिते)एक गुण तिक रस (दुगुण तिचे तिगुण तित्ते जाव दस गुणतिले (द्विगुण तिक्त रस त्रिगुण तिक्त रस यावत् दश गुण तिक्त रस ( संखज्ज गुणतिने असंखडा गुण तिसे अर्णतगुण तिचे) संख्यात गुण शिक्त रस असंख्यात गुण तिक्त रस अनंतगुण तिन रस ( एवं फड्डय फसाय विले मारविभाणि यन्ना ) इसी प्रकार फटु रस कपाय रस खडा रस और मधुर रसों के भेद भी जानने चाहिये । अथ स्पर्श विषय । (एगगुण कक्खडे दुगुणकरखडे तिगुणकक्खडे जायदसगुण करखड संखे. गुण कवखढे असंखज्जगुण कक्खटे अणंतगुण कक्खडे ) एक गुण कर्कश- स्पर्श द्विगुण कर्कशस्पर्श त्रिगुण कर्कशस्पर्श यावत् दश गुण कर्कशस्पर्श इसी प्रकार संख्यात गुण कर्कशस्पर्श असंख्यात गुण कर्कशस्पर्श अनंत गुण कर्क- शस्पर्श ( एवं मउय गरुय लहुय सीयउ सिण निद्धलुक्खा भाणियन्या सेत्तं पउनय नामे ) इसी प्रकार मृदु स्पर्श गुरु स्पर्श लघु स्पर्श शीत स्पर्श उष्ण स्पर्श निग्ध स्पर्श रुक्ष स्पर्श इन सबों के भेद जानने जाहिये क्योंकि गुण कहने से यह तात्पर्य है कि पुद्गल द्रव्य गुण युक्त है और पर्याय परिवर्तन अव. श्य होता रहता है सामान्य गुण द्रव्यों में अवश्य रहता है पुद्गल द्रव्य की पर्याय इसीलिये दिखलाई गई है कि जिज्ञासुओं को शीघ्र घोष होजावे क्योंकि यह द्रव्यरूपी होने से सब के प्रत्यक्ष है किन्तु धर्मादि द्रव्य अबोध प्राणियों के परोक्ष है इसी वास्ते उनकी पर्याय नहीं कथन कीगई अपितु सहवर्ती होने पर गुण शब्द ग्रहण किया गया है सो इसी का नाम पर्याय रूप तृतीय भेद है। भावार्थ-जो पदार्थ है वे सर्व तीनों प्रकार से हैं जैसेकि-द्रव्यनाम गुणनाम सौर पर्याय नाम क्योंकि द्रव्य होने पर गुण पर्याय सिद्ध होते हैं इसलिए ए तीन नाप में इन तीनों का ग्रहण किया गया है सो द्रव्य पट् प्रकार से हैं जो पूर्व लिखे गए हैं किन्तु पुद्गल द्रव्य पांच प्रकार से गुण कथन किए हैं जैसकि-वर्ण १ गंध २ रस ३ स्पर्श ४ और संस्थापन ५ वर्ण पांच प्रकार के होते हैं जैसे कि कृष्ण १ नील २ रक्त ३ पीत ४ और म्वत ५, गंध दो प्रकार है सुगन्ध और दुर्गन्ध, रस क पांच भेद है तिन रस १ कटुक रस २ फपाय रस ३.खट्टा. रस । , (१५४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * ४ मधुर रस ५, स्पर्श के ८. भेद हैं कर्कशस्पर्श, मृदुस्पर्श, गुरुस्पर्श, लघुस्पर्श, शीतस्पर्श, उष्णस्पर्श, सनिग्धस्पर्श, रुक्षस्पर्श, और संस्थान के भी पांच ही भेद हैं पति-परिमंडल संस्थान १ वृनाकार संस्थान.२ ञ्यंससंस्थान.३.चतुरस्त्र- मस्थान ४ आयातसंस्थान ५.इनको गुणनाम कहते हैं क्योंकि पुद्गल द्रव्य के श्री गुण हैं और इसी के होने से पुगल द्रव्य रूपी माना जाता है और पर्याय नाम उसे कहते हैं जो द्रव्य से द्रव्यान्तर करे स्मश्रवस्था से अवस्थान्तर कर देने अपितु द्रव्य के समान ओ सदा स्थिर रहे उसे ही पर्याय कहते हैं. किन्तु जो द्रव्यों को द्रव्याम्तर तो करदेवे और आप उत्पन्न होकर नाश भाव को प्राप्त होता रहे उसे पर्याय कहते हैं सो वह अपरं लिखे हुए पुद्गल द्रव्यों के भेदों की एक गुण से लेकर अनंतगुण पर्यन्त वृद्धिरूप अथवा हानि रूप करे उसी का नाम पर्याय है पुद्गत द्रव्यों के गुणों का नाश कभी नहीं होता किन्तु :पर्यान्तर, अवश्य होता हे सो संसार भर में जो द्रव्य हैं वह सर्व तीनों नामों के अन्तर्गत है इसलिये तीनों नामों का विवर्ण पूर्ण हुआ अपितु नाम शब्द नपुंसकलिंग है इसलिये जिज्ञासुओं को लिंग बोध भी सुगम होजाए इस बात "के आश्रित होकर सूत्र तीनों लिंगों के अंतिम वर्गों के स्वरूप का सामान्य प्रकार से विवर्ष करते हैं । अथ तीनों लिंग विषय। तं पुणनामंतिविहं इत्थिपुरिसनपुसगंचव एएर्सि तिरह- पिहु अंतमि पवेवणं वाळू १ तत्थपुरिसंस्सअंता बाई ऊ उ हवंति बजारितेवेव इत्थियाए हवंति उयार..परिहीणा २ अं- तिय इंतिय उतिय अंताउ नपुंसगस्त वोधब्बा एएसिति एवं पियवोच्छामि निरिसणं एतो ३. प्राकारतोराया इकारतो गिरीय सिद्धि सीहरी ऊकारंतो विराहू दुमोउ अंताउ पुरि- साणं. ४ आकारतोमाला इकारतोसीरीय लच्छीय उकारतो जंबूंबहुयश्रताउं इत्थींणं ५ अकारंत धन्नं इकारतं नपुंसगं अच्छि उकारंतं पीलुमहुंचभंता नपुंसाणं सेततिन्नामे !
* भनुयोगद्वार पुत्र * (१५५) पदार्थ-(पुण नाम तिमिह ) फिर वह नाम तीन प्रकार से और भी कहा गया है जैसे कि-( इन्यिपुरिसनपुमर्गव ) स्त्री नाम पुल्लिंग नाम नपुंगक नाम क्योंकि निश्चयही लिंग तीनों है इसलिये (अपमिति न पिछ) अन इन तीनों फ (अंतमि पलवणं वाच्छ १)(अंतिम वर्गों की प्रतिसदनता फरूंगा अपि शब्द समुच्चयार्थ में है १ अथ अंतिम बशी के विषय में कहते हैं (तत्य पुरि- सस्स यंता ) उन में प्रथम पुरुप लिंग के मन में ( भाईजउतिचचारि आकार-इंकार-उकार-उकार यह चार वर्ण हान हैं ( तेचैत्र इत्थियाएहति ) और वही उक्त वर्ण स्त्री लिंग के अंत में होने हैं किन्तु ( उकारपरिहीणा ) 3. कारांन को वर्नना चाहिये क्योंकि माकन में सीलिंग.. उकारान्त शब्द नहीं होते २ (अंतिय इंनिग उतिय ) आकारांन इकारान उन्तान ( अंनाउ नपुंस- गाणं बोधव्या ) अंत में वर्णन होने में नमक लिंग में ऐसे जानना चाहिये (एएसिनि राई पिदाच्यामि ) इन तीनों के उदाहरण भी फहंगा-अपि शब्द पूर्ववत् है ( निदरसणंएनी ३ ) और शब्द भेद भी दिखलाऊंगा इन तीनो के. उदाहरण विषय में कहत है। (आकारांना गया ) माकन में पाकागन्त रामा शब्द है और (इकारनी गिरीयसिहरीय) इकारांन गिरी शब्द और शिसरी पद है और ( ऊसापांतो: चिराह दुगाव) अकारान्न विराहू शब्द और दुमांऊ शब्द है (अंताउ पुरिमाणं. ४) अंत में यह शब्द पुरुष लिंग में मारे गये हैं ४ अथ सी लिंग के उदाहरण फईन है ( आकारता माला*) आकारांन शब्द सीलिंग में माला होता है और (कारन सिरीय लच्छीय ) ईकारान्त सिरी और लच्छी शब्द हैं. चपादपूर.. पार्थ में है ( ऊकारांना जंबू वाहूय ) उकारांन जंबू और वह शब्द हैं (अनाउ, इत्थीणं.५ ) स्त्रीलिंग में उक्त वर्ण शान्तिम होते हैं ५ अब नपुंसक लिंग के उदाहरण दिखलाते हैं यथा-( अकारतंधनं ) अकारान्त धन और धान्य शब्द (इकारंत नपुंसग अच्छिं) इकारांन नपुंसक लिंग में अच्छि शब्द है ( उका- ५ शुगमि-दि--विदि-दशि-मुचि. वधि-दिदि-भिदि-भुना-सोचई गच्छ- शे;- P----ो-ई-मे-मास , भादीनां धातूना भविष्यदिविहितम्यन्यानो रयान लोपनियोनि पारयन्ते ।। नन्द्राम पानिमकुम चुमनार मनोभे गेर शुक्र ाक रवरा माना ॥ उहादिप्र० पा०२.०८ ॥ मामाने निपा-यमान्च-नीक्षिगं सह ॥
है (१५६) * अनुयोगद्वार मूत्र * रांत पीलुं महुच) उकारान्त पीलु और मधु शब्द हैं (अंतानपुंसंगाणं). यह सर्व नपुंसक लिंग के अंत में वर्ण होते हैं ( सेति नाम) और यही तीन नाम का स्वरूप हैं। भावार्थ-तीनों नामों के अंतरगत तीनो लिंगों का विवर्ण किया गया और इनके अंतिम वर्ण बतला कर इनके उदाहरण भी दिखलाए गए हैं अपितु यह सर्व प्राकृत के व्याकरण से ही रूप सिद्ध होते हैं क्योंकि पुल्लिंग में आका- रान्त ईकरान्त उकारान्त और अकरांत यह चार शब्द पतलाए हैं किंतु अका- रान्त ऋकारांतादि शब्दों को ग्रहण नहीं कियागया इस से यह न समझ ली. जिये कि प्राकृत भाषा में अकारांत शब्द होते ही नहीं, अतः प्रथमा को ( अतः से डों) इस सूत्र से डोकार आदेश होकर ओकारांत शब्द बन जाते हैं यथा धम्मो-घडो-पडो-इत्यादि इसी प्रकार पितृ शब्द को ( आसानवा ) इस सूत्र से प्राकारान्त करने से पिया शब्द होजाता है यदि पितृ शब्द को (नायरः) इस सूत्र से अरकरता फिर (श्रतः सेझैः) इस सूत्र से डोकार आदश कर के पिपरो ऐसे शब्द वन गया इत्यादि-इसी प्रकार और भी शब्दों के रूपों को जानना चाहिये किन्तु स्त्रीलिंग में उकारांत शब्द नहीं है शेष सर्व शब्द होते हैं क्योंकि स्त्रीलिंग में जो धेनु आदि शब्द है उन को (अक्लीवसौं ) इस सूत्र से प्रथमा विभक्ति के एक वचन को दीर्घ हो जाता है तब प्राकृत में “ घेणू" ऐसे प्रयोग बन गया इसलिये उकारांत शब्दों को छोड़ कर केवल सूत्र में उकारांत दी शब्द ग्रहण किया गया है तथा सूत्र के लाघवार्थ भी यह कथन ठीक सिद्ध होता है और अकारांत इकारांत उकारांत यह तीनों शब्द नपुंसक लिंग के अंत में होते हैं अब तीनों लिंगों के प्राकृत में उदाहरण निन्न प्रकार से हैं यथ, रा- जन् शब्द को संस्कृत के (न्यक् ) सूत्र से दीर्घ हो कर फिर (न. ) सूत्र से नकार का लोप होकर फिर राजा ऐसे प्रयोग बन गया अपितु (राज.) इस प्रा- कृत के सूत्र से राजा शब्द का "सया" ऐसे प्रयोग बन गया सो यह शब्द आकारांत पुल्लिंग हो गया और इकारान्त गिरि शब्द है जिसको (अनीसौ) इस सूत्र से दीर्घ होकर गिरी और शिखरी इत्यादि प्रयोग बन जाते हैं, फिर उफरांत विष्णु शब्द को (सूक्ष्म श्नष्ण सं ह इक्ष्णराहः ) इस सूत्र से विराहु आदेश होकर फिर उक्त-सूत्र से दीर्घ हो गया तब विराहू ऐसे प्रयोग बन गया और इसी प्रकार संस्कृत दुय शब्द का प्राकृत में दुयोउ घन जाता * अनुयोगद्वार सूत्र ( १५७) और स्त्रीलिंग के रूप निम्न प्रकार से है आकारान्त शब्द स्त्रीलिंग में गाला दयालना इत्यादि है क्योंकि अदंत शन्द स्त्रीलिंग में होता ही नही अपितु इकारान्त श्री शम को (ई-श्री-ही-कृस्त्रक्रियादियास्वित ) इस सूत्र से सिरी ऐसे प्रयोग बन गया फिर (भालीसौं) इस सूत्र से दीर्घ होकर सिरी प्रयोग सिद्ध हो गया और लक्ष्मी शब्द को (चाच्यादी) इस मंत्र से लच्चि पद पनगया अपितु एक मूत्र से फिर प्रयमान्त करलेना तय 'लच्छी प्रयोग सिद्ध हो गया और अकारान्त नंबू वा वधू इत्यादि शब्द और नपुंसकलिंग फे उदाहरण यह है अकारांत शब्द धंन है; जिस को. (हावस्त्रगन्म से) इस सूत्र से प्रथमा के एक वचन सि के स्थान पर. सकार हो गया धन वा धर्म ऐसे प्रयोग बन गये और इकारान्त शब्द अति है जिसके कार को (छोक्ष्यादी) इस सूत्र से छकार होगया १ नत्र अच्छि ऐसे प्रयोग बन गया फिर पूर्ववत् प्रथमान्त करलेना चाहिये और जयारान्त पीलु और मधु शब्द है यह सर्व नपुंसकलिंग के उदाहरण दिखलाए गय है इम कयन से निश्चय होता है कि लिंगानुशासन द्वारा लिंग बोधः अब- इस होना चाहिए क्योंकि धर्मादि शन्द पुल्लिंग लक्ष्मी आदि, शब्द स्त्रीलिंग पनादि शब्द नपुंसकलिंग यह सर्व संक्षेप से विवर्ण किया गया है अब इसी की सिद्धि फ बाम्ते चार नाम के सूत्र में व्याकरण की सन्धि विषय में कहते हैं ।। ॥ अथ चार नाम विषय ॥ व्याकरण के संधि प्रकरण विषय । सेकिंतं चनामे चउविहे पं० २०यागमेणं १ लोवेणं २ पगढ़ प ३ विगारेणं । सकिंतं श्रागमणं २ पद्मानिपयांसिसेत्तं १ लपाय उणादि प्र. ०३.। सूत्र १६० ॥ लशदर्शनाङ्कनयोः । पुराविरायातः . भरमादी प्रत्ययः अस्य मुडागमः । शिलापः । नमी पनाविभूतिम । कधिकारादितिलिपि लक्ष्मीत्यपि भवतीति दुर्घटे शिना । लम्या अच्चेति पांमादिराठात न प्रत्ययो भकारान्ता पेशश्च | लक्ष्मणः, सुमित्रा पुत्री लक्ष्मण सारसप्रिया इति उज्यलदत्त टीफा ।। शब्दानुशासन सम्पूर्ण या मनसे सम्बन्धि अन्य ग्रन्थ अवश्य देखने पादिय जिनमे 3 सूत्रों का प्राणाय मुगम होगावे । २ (१५८) * अनुयोगद्वारं भूत्र श्रांगणं सेकितं लोवेणं २ ते अत्र तऽत्र “पठो पत्र पठोत्र घटो अत्र घटोत्र सेत्तं लोवेणं सेकिंतं पगइएवं २ अग्निएतो. पटूइौ शालै एते माले इमे सेत्तं पगईए सेकित विगारेणं दंडस्य अगं दंडाग्रताधागता सागता दधिइदं दधीदं नदीइह नदीह मधुउदकं मधूदकं सेतं विगारेणं. सैतं चउनामे ।। पदार्थ-(सेकितं च उनामे २ चलबिहे पं. तं.) से शन्द अथ शब्द का वांची है इसलिये से शब्द प्रश्न की आदि में ग्रहण किया जाता है सो अव प्रश्न लिखते हैं ( मन ) चार नाम किस प्रकार से हैं ( उत्तर ) चार नाम चार प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-( आगमेण ?) अक्षरों के आगम से जो नाम पर बनाया जता है अर्थात वणी के आगम से पद बनता है इसी प्रकार ( लोवेणं ) वर्गों के लोप होने से पद होता है ( पगईए ३) प्रकृति भाव से पद बनता है (विगारेणं ४ ) अक्षरों के विकार होने से जो पद बनता है सी इन्हीं का नाम चार नाम है अब सूत्रकार इनके उदाहरण देते हैं जैसे कि (सेकित आगमेणं २) (प्रश्न ) आगम से पद किस प्रकार से होता है (उत्तर) विभव्यंत पद होता है और उसमें ही वर्ण का आगम हो जाता है जैसे कि-- ( पञ्चानि पयासि ) पद्म शब्द है फिर " अरशसः" शिः इस सूत्र से नपुंसक लिङ्ग में प्रथमा विभक्ति के बहुवचन ( जस् को) शिका आदेश होगया फिर पद्म-शि इस प्रकार. रूप होने पर शकार का 'लोष करके: इकार मात्र रह गया तब पद्म इ.ऐसे हुआ फिर " शावचः।" इस,सूत्र सूत्र से. पद्म शब्द को नम.का अगिम हुआ तवं पम-नम्-३ इस प्रकार शब्द बनां फिर अम् मात्र का लोप होने पर पद्म-न्ह एसे पद रहा अपितु "न्य सूत्र से नकार से पूर्व पद्म शब्द का आकार दीर्घ होगया तब पद्मा-न्-इ इस प्रकार से प्रयोग बन गया फिर " अन चक् शन्द रूपं पर वर्णमा श्रयेत् " इस बचन से पूर्ण प्रयोग वनगया हैं जैसे कि-" पद्मानि" सो.यह नपुंसक लिंग के प्रथमा का बहुवचनान्त पद- है सो यह आगम होने पर पद वना है इस का अर्थ है कि बहुत से पन हैं द्वितीय उदाहरण-पयस् शब्द है फिर नपुंसक लिंग प्रथमा के बहुवचन के स्थानों. परि " जस्" प्रत्यय को शिका आदेश होगया फिर इकार मात्र शेप रहा ३ शल चलने घवंतान शाल शब्द सिद्धोभवति पश्चात् वीलिंगेशाला इतिसिद्धम्।।
" * अनुयोगदार मूत्र * ( १५६) नव पयर-इ इस प्रकार से रूप बना फिर "शावचः " मूत्र से नम्का आगम हुआ फिर अम् मात्र कालोप करके न्-कार शेप रहा तब--पय-न्-स्-इ इस प्रकार से प्रयोग हुँा.. क्योंकि नम्का आगम अंत के अच के पीछे होता है इसलिये इस प्रकार से प्रयोग बना-फिर " न्यक सूत्र से दीर्घ करके अनचक शब्द रूपं पर वर्णमा श्रयेत् " इस वचन से परिपक प्रयोग बनगया.नयं ". पयासि ", यह रूप. सिद्ध हुआ" इसका अर्थ यह है कि बहुत जल है वा बहुत दृध हैं इसी प्रकार अन्य वर्णों के भी आगम होनाते ई सकि-" उनस्तट सोऽध" इस सूत्र से तटमात्र का. पागम होजाता है तथा सर का आगम इत्यादि अनेक प्रकार के वर्णों का आगम होता है इसी लिये इसे आगम कहते हैं (सेत्तं आगमेणं) यही आगम वर्ण का स्वरूप है और थागम होने से ही पदबन जाता है । अब लोप वणों का विवर्ण किया जाता है ।। ( सकिंतं लोघेणं २ ) (प्रश्न ) वणे के लोप होने से पद कैसे बनता है (उत्तर ) वर्गों के लोप होने से पद इस प्रकार से होता है जैसाकि ( ते अत्र तंत्र पटीयन्त्र पटोत्र ) तद् शब्द को "प्तसांचात् " इस मूत्र से दकार मात्र को अन् हो गया तब " एदे" मूत्र से पूर्व अकार का लोप हो गया तब "त" पसे योग बन गया फिर पुंलिङ्ग में प्रथमा के बहुवचन जस् प्रत्यय को "जसः शि" इस मूत्र से शिकार का आंदश हो गया फिर शिकार का लोप होकर इकार मात्र शेष रहा तब त-इ-ऐसे प्रयोग बन गया अतः फिर."इक्येडर" सूत्र से संधि कार्य करके अर्थात् अकार वर्ण को इकार वर्ण परवर्ती होने पर एकार होजाता है तब "ते पस प्रयोगवना फिर ते अत्र ऐसी स्थिति करने पर "पदा- नतेऽता" इस सून से अन शब्द के अकार का लोय कर के "तेत्र" प्रयोग बन गया किन्तु जहां पर यणी का लोप किया जाता है वहां पर, प्रकार स एक चिन्ह भी. करदेन है जैसेकि “तेत्र " इसी प्रकार आगे भी जा. नना चाहिये, इसका अर्थ यह है कि वे यहां पर हैं इसी , प्रकार. " पटोपत्र" शब्द को " पदतिऽत्येद् " इसी सूत्र.से पटोत्र प्रयोग. होगया. अर्थ यह है कि वस्त्र यहां पर है -तथा ( घटोअत्र, घटोत्र ).घटा शब्द प्रथमा का एक वचन है इसके सकार को "सजूरहस्सोऽनिप्ययसन्सु ध्वन्सोरिः इस सूत्र से सकार को रिकार होगया फिर इकार मात्र का लोप करके शेष रकार रहगया फिर - तोऽद्धप्युः" इस सूत्र से रकार को उकार होगया फिर." इक्वेडरः" इस मंत्र (१६.० ) * अनुयोगद्वार सूत्र * से संधि कार्य करके घटोभत्र प्रयोग होगया फिर " पदान्तेऽत्येङ्" इस सूत्र से अकार मात्र का लोप करके घटोत्र इस प्रकार से प्रयोग बनगया इसका अर्थ यह है कि-घट यहां पर है ( सेतं लोवेणं ).इस प्रकार अन्य वर्णों उदाहरण भी जानने चाहिये इसाका नाम लोप.पद कहा जाता है अर्थात् वर्णो का लोप किया जाता है- : : अब प्रकृतिभाव का विवर्ण किया जाता है ।। (सेकित पगईए २) (प्रश्न) प्रकृति भाव किसे कहते हैं (उत्तर) प्रकृतिभाव उसका नाम है जो संधिकार्य के माप्त होने पर भी संधि कार्य न किया जाय और इस प्रकरण- को.निषेध संधि भी कहते हैं. अब इसके उदाहरण दिखलाए जाते हैं जैसे कि:-( अग्नीए तौपटूइमा ) जो. द्विवचन होता है उसको द्विवचन- की क्रिया दी जाती है सो यह अग्नि " इस प्रकार से रूप स्थित है फिर इसको प्रथमा के द्विवचन की माप्ति होगई तब " अग्निऔ" ऐसे रूप बनगया फिर " इदुतो-गिरवौतोऽस्त्रः" इस सूत्र से औ मात्र को गिकार का आदेश होगया फिर अग्नि-गि ऐसे सिद्ध हुआ फिर गकार की इत् संज्ञा करके शेष इकार मात्र रह गया तब अग्नि-इ इस प्रकार से प्रयोग- वनगया फिर : " दीर्घः " इस सूत्रसे दीर्घ करके तब अग्नी ऐसे परिपक्क प्रयोग वनगया सो यह प्रथमा का द्विवचन है इसको, द्विवचन की क्रिया करने से अग्नी एतौ ऐसे प्रयोग रक्खा किन्तु अब इसको "अस्वे " इस सूत्र से संधि कार्य की प्राप्ति हुई थी अर्थात् इकार को यकार की प्राप्ति या किन्तु "गित:" सूत्र से संधि कार्य का निषेध किया गया क्योंकि जिसका गकार इत्संझक होजाता है फिर उसकी संधि नहीं की जाती इसलिये अग्नी एतौ, ऐसा ही प्रयोग बना. रहा इसका अर्थ यह है कि यह दो भग्निये हैं इसी प्रकार " पटु इमौ" पटु शब्द को " इदुतौ गिग्वौ तास्त्रेः" इससूत्र से पटु प्रयोग बनगया फिर " पटुइमौ." पद रखने पर गितः सूत्र से संधि 'कार्य की निषेध किया गया क्योंकि यहां पर " अस्वे " सूत्र की प्राप्ति थी. किन्तु " गितः" सूत्रने संधि कार्य का निषेध कर दिया है इसका यह अर्थ है कि यह दोनों बुद्धिमान् हैं सर्व यह. द्विवचनांत पद हैं इसी प्रकार (शाले ए- ते माले एते): यह स्त्रीलिंग को द्विवचनान्त दोनों पद हैं इनकी सिद्धि निम्न -प्रकार से है:- यथा शाल शब्द को. अनाद्यताम् " इस सूत्र से आईत करके शाला शब्द सिद्ध होता है यह एक वचनान्त शब्द है किन्तु सीलिंग • " * अनुयोगदार घूत्र (१६१) के प्रथमा के द्विवचन को " माटातोगी: " इस सूत्र से गीकार आदेश हो- गया फिर गकार की इत् संज्ञा करके शेष ईकार रहगया तब “ इक्येार" सूत्र से संधि कार्य किया गया तवं शाले एते यह प्रयोग सिद होगया इसी प्रकार माले एते शब्द भी जानना चाहिये क्योंकि यह दोनों शब्द स्त्रीलिंग के द्विवचनान्त हैं (सेचं पगईए) इसे ही प्रकृतिभाव कहते हैं अपितु प्रकृति भाव के अन्य. नियम प्राकृत भाषा के व्याकरण में देखने चाहिये क्योंकि वहां पर प्रकृति भाव के बहुत से सूत्र वर्णन किये गये हैं किन्तु यहां पर तो केवल उदाहरण मात्र ही कयन किया गया है और इनका अर्थ यह है कि देशाभाय हैं दो मालायें हैं यदि यहां पर प्रकृति भाव न किया जाता तब "एवोऽच्यय वापाव" सूत्र से संधि कार्य होजाता सो निषेध संधि के द्वारा संधि कार्य का निषेध होगया। अब विकार भाव का वर्णन करते हैं ।। (सेकिंतं विगारेणं २) (पन्न) पों के विकार होने पर पद फैसे बनता है. अथवा विकार करने से पदान्त कैसे होता है (उचर ) वर्गों के विकार करने से जो पद बनते हैं उनके उदाहरण नीचे पढ़िये (दंडस्य भग्नं दंडाग्रं सा आगता सागता) यहां पर प्रकार को विकार होगया जैसे दंड-अग्रं-सा-भागता-यह दो शब्द है इनको "दीर्घ इस सूत्र से दीर्घ होगया-तव दंडाग्रं सागता यह दोनों प्रयोग सिद्ध हुए इनका अर्थ यह है कि दंड का जो अग्र भाग है उसी को दंडासं कहते हैं और स्त्रीवाची. शब्द में सा-का प्रयोग होता है तब "सागता" शब्द का अर्थ यह हुआ कि- "वह आई" इसी प्रकार (दधि इदं दधीदः) यह दधि है- इस अर्थ वाले शब्द को "दधि इदं को " दधीद" दीर्घः "सूत्र की प्राप्ति हुई तर उक्त प्रयोग सिद्ध होगया और ( नदिइह नदीह) नदिइह शब्द को भी" दीर्घः "सूत्र से नदीह होगया अर्थात् यह नदी है फिर (मधुज़दक ) ( मधूदक ) मधुउदकं शब्द को" दीर्घः "सूत्र से ही बनगया अर्थात् मधुरूप पानी है: ( से विगारेणं) इसी को विकार कहते हैं क्योंकि सवर्णी वर्ण को दीर्घता की प्राप्ति होती है.. और इसी को विकार के नाम से सूत्र ने सिद्ध किया है यदि असवर्णी वर्गों की प्राप्ति हो तो “नयु वर्णस्यास्वे" 'इस सूत्र में संधि कार्य नहीं होता अर्थाद दीर्घादि कार्य नहीं होते तथा "एदीतो स्वरे "स्वरस्योद्धृते" "त्यादेः" इत्यादि दोषः शा.व्या. म. १ पासू० ७७ ॥ अकः स्थान परणा चा साहितस्य तदा. समोदी निस्य समस्यीच परे, दंगागू, सागता, मुनीन्छ । नदीय । मधूवर्क । बदरं । पितृपभः । २१ (१६२) * अनुयोगद्वार सूक्ष सूत्र संधिकार्य के निषेध कर्ता हैं अत: कार का प्रयोग सूत्र में इसलिये नहीं दिखलाया कि ऋकार के स्थानों परि इकार अकार प्रकार आकार इत्यादि आदेश होजाते हैं यथा एफ उदाहरण दखिये "महा ऋषि" ऐसे रूप स्थित है तब इसको " इत् कृयादौ " इस सूत्र से ऋकार को इकार होगया तर महाइषि " ऐसे प्रयोग बनगया फिर "शपोसः" सूत्र से मुर्धन्य पकार को दंती सकार होगया तव महाइसि इस प्रकार से प्रयोग बनगया फिर " इक्येऊर " सूत्र से संधि कार्य करने से अर्थात् अकार को परवर्ती अच् के साथ ही एकार, होगया तव-महसि ऐसे प्रयोग बनंगया फिर " अक्लीवेसौ" सूत्र से प्रथमान्त शब्द दीर्घ होकर " महेसी इस प्रकार से रूप बना सो इसी प्रकार अन्य भी रूप जानने चाहिये (सेतं चउनामे) यही चार नाम का स्वरूप है और इसे ही चार नाम कहते हैं अथ शब्द पूर्ववत है ।। भावार्थ-चार नाम चार प्रकार से वर्णन किया गया है जैसेकि-आगम १ लोप २ प्रकृति भाव ३ विकार ४ आगम नाम उसे कहते हैं जो वर्णी के बागम से पदवनते हों जैसेकि--" पद्मानि"" पयांसि " यह नपुंसकलिङ्ग के प्रयमा- न्त बहुवचन हैं इनका नस् का भागम हुआ है सो इसी को श्रागम नाम कहते है लोप नाम यह है कि-तेप्रत्र-तेऽत्र-पटोपत्र-पटोत्र-घटोअत्र-घटोत्र इनमें पदा न्त से परवर्ती अकार मात्र का लोप किया गया है और " पदान्तेऽत्येङ " सूत्रकी सर्वत्र प्राप्ति है सो इसीको लोप नाम कहते हैं क्योंकि अकार मात्रका लोप किया गया है अतः प्रकृति भाव उसे कहते हैं-जिन शब्दों को संधि का- र्य की प्राप्ति भी होजावे फिर भी वह शब्द वैसे ही बने रहे किन्तु संधि न की जावे उसे प्रकृति भाव कहते हैं जैसेकि " अग्नीएतौ " " पटूइमौ " " शागले- एते " "मालेइमे " इन शब्दों को " अस्खे " सूत्र से संधि कार्य प्राप्त था भ- 'पितु किया नहीं गया क्योंकि यदि संधि कार्य करते तब “ अग्नीतौ " ऐसे प्रयोग बनजाता इसलिये यह सर्व द्विवचनांत शब्द प्रकृति भाव में रहते हैं और संधि प्राप्त होने पर भी संधि कार्य नहीं किया जाता सो इसी का नाम प्रकृति भाव है ॥ विकार का यह अर्थ है कि यदि दो वर्ण सवर्णी एक रूप हो जायें तब उनको परस्पर मिलाकर दीर्घ किये जाय उसीको विकार कहते हैं जैसेकि दंड-अग्रं-यह शब्द है और उकार में श्रकार है सो अग्र शब्द के प्रकार के साथ उसको दीर्घ किया जाता है तब "दंडाग्ने" यह प्रयोग बनगया इसी प्रकार * अनुयोगहार सूत्र *. (१६३) सा-मागता-सागता । दपि-इदं-दधादं । नदी-दह-नदीह । मधु-उदकं-मधूः दकं । इत्यादि रूप सिद्ध होने हैं यह सर्व वर्ण स्वजाति वाले वर्षों के साथ दीर्यता को माप्त होगये है सो इन्हीं को विकार नाम से कहते हैं यह सर्व व्या करण के प्रयोग हैं इनके वर्णन करने का मुख्य प्रयोजन यह है कि सर्वनाम चार प्रकार से ही होते हैं क्योंकि कोई भागम से पद बनता है कोई लोप से २ कोई प्रकृति भाव से ३ कोई विकार से ४ जब इनका पूर्ण चौध होजावे तब झान के चतुर्दश दोष सुगमता से दूर होसकते हैं क्योंकि -" हीणक्खरं अञ्च- क्खरं पयहीणं" इत्यादि यह ज्ञान के दोष बतलाये गये हैं किन्तु जो व्याकरण के शेष प्रकरण हैं उनका संक्षपता से विवर्ण पांच नाम में किया गया है इस- लिये अब पांच नाम का विवर्य करते हैं। ॥ अथ पांच नाम विषय ।। सेकिंतं पंच नाम २ पंचविहे पं० त० नामिक १ नेपातिकं २ श्राख्यातिकं ३ औपसर्गिक ४ मिश्रच ५ अश्वइतिनामिक १ खल्वितिनैपातिक २ धावतीत्याख्यातिकं ३ परीत्यायस. गिक ४ संयतइतिमिश्र ५ सेत पंच नामे ।। पदार्थ-(मकित पंच नामे २ पंचविहे पं० त०) अव शिष्प फिर मन करता है फि हे भगवन् ! पांच नाम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है इस प्रकार से शिष्य के प्रश्न को सुन कर गुरुने उत्तर दिया कि भोशिष्य ! पांचनाम पांच प्रकार से वर्णन किया गया है जैसेफि-(नामिक) मो नाम (नाममाला) आदि फोशों में वर्णन किये गये हैं उनको नामिक कहते हैं तथा नाम शब्द प्रकृति का नाम भी है क्योंकि प्रकृति से परे ही प्रत्ययों की संयोजना की जाती है सो जो प्रकृति में ही आकृति रहे उसको नामिक कहते हैं द्वितीय (नेपातिक) जो निपात में वर्णन किये गये हैं उनको नैपातिक शब्द कहते हैं तृतीय ( आख्या- तिक) जो प्रख्यात में शब्दों का विवर्ण कियागया है उसको भाख्यातिक कहते हैं चतुर्थ (ौपसर्गिक ) नाम जो उपसर्गों में वर्णन किया गया है उसको औप- , समास तदित २ धातु ३ निति इनका विवर्य भागे किया जायेगा । नोट x अनासप.प्रागमा प्राप्तस्य निषेत्रात निपातनगिति कम्यते ॥ , .
+ * अनुयोगद्वारं सूत्र . सर्गिक कहते हैं पंचम :(मिश्रच ) नाम मिश्र होता है जो उपसर्ग धातूक्त भादि प्रत्ययों द्वारा सिद्ध होता है उसको मिश्र नाम कहते हैं अब सूत्रकार इनके उदाहरण दिखलाते हैं ( अश्व इति नामिकं ) अंध इस प्रकार से एक नाम है फिर इसको प्रकृति रूप स्थापन करके प्रत्ययों की संयोजना करनी चाहिये जैसेकि अश्वः, अश्वौ, अश्वाः, अध, अश्वौ, अश्वान् इत्यादि सातों विभक्तियों के रूप जानने चाहिये इसी प्रकार पुरुषं धर्म वृक्ष घटपटादि सर्व नाम प्रकृति रूप होतें फिर यह प्रत्ययों के लगाने से विभक्तियांत पद होजाते हैं सो जो नाम (ना- म मालादि.) कोशों में पठन किये गये हैं उनको नामिक कहते हैं जिसका उदाहरण सूत्र में अश्व शब्द से सूचित किया गया है अश्व शब्द गोड़ेका वाची हैं १ अब निपातका उदाहरण देते हैं खन्विीत नैपातिकं २ (खलु आदि नैपातिक शन्द हैं और इनके अंतरगत ही अव्यय प्रकरण है क्योंकि जो शन्द तीनों लिंगों और सातों विभक्तियों और सर्व वचनों में एक समान रहे उस शंन्द की अव्यय संज्ञा होती हैं । निपात उसको कहते हैं जिसका सूत्रों द्वारा कुछ और रूप सिद्ध होता हो किन्तु निपात करके उसका वही रूप रखा जाए वही नैपातिक होता है.२ और जो क्रिया के वोधफ पद हैं उनको आख्यातिक पद कहते हैं जैसे कि-(धावति त्याख्यासिकं ३) धावति यह क्रिया पद है यथा अमुक पुरुषः धावति अमुक पुरुष भागता है इसकी सिद्धि निन्न प्रकार से हैं । सर्ने धौवेगे। शाक० १०-४! पा० २! सूत्र ५६ । इस सूत्र से सृगतौ धातु को " धौ" आदेश. होगया फिर “क्रिया| धातु " इस सूत्रसे धातु संज्ञा बांधकर फिर.." सति शा० । अ१ । पा० ३ ! सू० २१५ । इस सूत्र से वर्तमान काल में लट् का आगम हुश्रा फिर लट् के स्थान पर " लोऽन्ययुष्मदस्मासु. तिससझि सिपथस्थ मिव्वस् भस् " इन प्रत्ययों की प्राप्ति हुई अपितु इनके अन्य पुरुष, मध्यम पुरुष, उत्तम पुरुष, तीनों भेद करके फिर एक २ के तीन २ वचन करने चाहिये अतः "धौति" इस प्रकार से अन्य पुरुष के एक पचन को फिर " कर्तरिशप" || शा० । अ०.४ 1 पा०३। सू० २० इस सूत्र से शप् का विकर्ण हुमा अतः शपावितौ कर के शेष आकार रहा तव "धौ-अ-ति" इस प्रकार से रूप वना तब एचोऽध्ययवाया" शा०प्र० १ पा० १ सूत्र ६इस सूत्र से औकार को प्राव आदेश कर के फिर अनचक् शब्द रूपं पर वर्णमाश्रयेत् इस वचन से सांभिकर्ष करना चाहिये तब धावति " -- * अनुशंगद्वार सूत्र * ऐसे एक क्रियापद सिद्ध हुमा अपितु, धावति-धारता-धापन्ति, यह तीनों व चन अन्यपुरुष के हैं और धावासि-धावयः धावय-यह तीनों मध्यम पुरुष के है और धावामि-धावावः-धावामः यह तीनों उत्तम पुरुष के हैं सो इसी प्रकार दशों लकारों में सर्व किया पदों के रूप जानने चाहिये अत: इसी को आख्या- तिक पद कहते हैं और पाख्यातिक पद में सर्वगण सर्वा प्रक्रियाएं लकारार्थादि सर्वगर्भित । किन्तु सूत्र में केवल उदाहरण मात्र ही एक प्रयोग दिखलाया गया है भर औपसर्गिक पद का विवर्ण करते हैं यथा (परीत्यौपसर्गिक ४) म, पर, अर, सम्, अनु, अय, निर्, दुर्, वि, आङ्, नि, श्रधि, थपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप, यह उपसर्ग है और यह नाना प्रकार के अर्थों में प्रयुक्त होते हैं सो परि आदि उपसगी से युक ओ पद कहे गये हैं वह औपसर्गिक पद हैं अतः उपसर्ग के सम्बंध होने पर धातुओं के अर्थों का भी परिवर्तन होजाता है यथा, आहार, विहार, संहार, महार इत्यादि प्रयोगों में अर्थों का परिवर्तन दोता है इसलिये उपसर्गों का विशेष विवर्ण उपसर्ग इत्यादि व्याकरण ग्रों से देखना चाहिये सूत्र में केवल एक उदाहरण दिखलाया गया है किन्तु परि उ- पसर्ग " परिसंपंततोभाव च्याप्ति दोपाख्यानो परम भूषण पूजा पर्नन लिंग ननि वसन व्याप्ति शोक वीप्सासु" इन द्वादश अर्थों में वृबहत होता है इसलिये उपसर्गों में रहने वाले पद को औपसर्गिक पद कहते हैं अब मिश्रज पद का विवेचन करते हैं ( संयनइतिमि ५) मिश्रा नाम उसको कहते हैं जो दोतीन प्रकरणों से मिलकर शब्द बनता हो जैसेकि सम् उपसर्ग है यमु उपरमें धातु हैं कदन्त का प्रत्यय है सो तीनों के मिलने से “संयत" शब्द वनगया है इस लिये इसको मिश्रन नाम कहते हैं ( संत पंचनामे ) सो यह पांच नाम का स्वरूप.पूर्ण होगया है और इसको पांच नाम कहते हैं। १ परिएतेषु द्वादश स्वर्थेपुवर्तते । समन्त तो भावे परिम् ठमति । व्याप्ती परिमतोसिनामाम: । दोपाख्याने परिभवति देवदत्तः । परमेपरि पूर्णे घटः । भूषणे परि करोति पन्याम् । पूजायां परिचारायति गुरुन् । वर्जने परित्रिगर्तेभ्यो पृष्टोदेवः । अलिङ्ग परिप्वजते फन्याम् | निवसने परिदधाति । व्याप्ती परि वाहकः । शोक परि दुन्यिति । वशिायां वृत्तं वृक्षं परि सिंचति । सो यह द्वादश अर्थों में परि उपसर्ग व्यवहृत होते है इसी प्रकार अन्ध उपसर्ग भी नाना प्रकार के भों में व्यवहन होते हैं फिर उनका उसी प्रकार से पर्थ किया जाता है इसलिये सूत्रका. ने भापगिक पद दही बनाया है जो पद उपसमों के अंतर्गत रहनेवाला हो। .
. (१६६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * : भावार्थ-पांच नाम पांचों प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि नामिक १ नैपातिक २ आख्यातिक ३. औपसर्गिक ४ और मिलन ५-नामिक उसे कहते हैं जो मूल प्रक्रति रूप होवे जैसे अश्व शब्द के पक्ष मनति रूप फिर इसको विभक्तियों द्वारा पद किया जाता है नैपातिक प्रयोग सन्वित्यादि जो स्वयमेव होने वाले हों उसे नैपातिक पद कहते हैं आख्यात वृति से आख्यातिक पदों का भलीभांति से बोध हो जाता है जैसे भावति इत्यादि यह क्रिया पद है इनके द्वारा क्रिया पदों का ज्ञान ठीक होता है यथा स धावति तो धावतः, ते धावन्ति, त्वं पावसि, युवाम् धावयः ,युयम् भावथ, अहं धावाभि, आवाम् धावायः , वयं धावामः । अर्थात् वह भागता है वह दो भागते हैं, वह बहुत से भागते हैं, तूंभागता है, तुम दोनो भागते हो, तुम सब भागते हो, में भागता हूं, हम दो भागते हैं हमसव भागते हैं इत्यादि यह सब आख्यातिक पदहैं । जो उपसर्गों द्वारा सिद्ध हो उसे औपसर्गिक पद कहा जाता हैं अतः जो कतिपय प्रकरणों से सिद्ध हो उसे मिस्र नाम कहते हैं जैसे संयत शब्द है सो यही पांच प्रकार के नाम हैं किन्तु तीन नाम चतुर्नामि पांच नाम इनमें केवल व्याकरण का स्वरूप दिखलाया गया है इस लिये सूत्रकारका प्राशय सिद्ध होता है कि शन्द शास्त्र (व्याकरण) अवश्यमेवं पठन करना चाहिये और साथ ही जैन न्याय (तर्क ) शास्त्र का भी वोध होना चाहिये इसलिये जो जैन व्याकरण है उनमें यथाशक्ति परिश्रम करना वह शास्त्र विहित है क्योंकि श्री प्रश्न व्याकरण सूत्र के द्वितयि श्रुत स्कंध के द्वितीयाध्याय में लिखा है कि तथा च पाठः। मूल-नामक्खायं निवात उवसग्गतद्धिय, समाससंधिप- यहे उजोगिय उणाइकिरिय विहाण घातुसर विभत्तिवणजुत्तं- तिकालं दशविहंपि. सच जहभणिय तहयकम्मुणाहुँदि दुवा- लस्सविहायहोइ भासावयणंपिय होइ सोलस्स विहंएनं अर- हंतमणुणाय ।। टीका-तथा नामाख्यात निपातोपसर्ग तद्धित समास संधिपदहेतु चोगिको: णादि क्रिया विधान धातु स्वरविभक्ति वर्णयुक्तमिति तत्र नामेति पद शब्द सम्ब- न्धानाम पदमेव मुत्तरतापितचा व्युत्पन्नेतर भेदात् द्विधातत्र व्युत्पन्नं देवदत्तादि * अनुयोगदारं सूत्र * (१६७) अम्युस्परित्थेत्यादि आख्यातिपदं साध्यक्रिया पदं यथा अकरोत् करोति क- रिष्यति तत्तदर्यचौत नाय तेषु तेषु निपन्ती तिनिपाता: तत्पदं निपातपदं यथा वावा खस्वित्यादि उपसृज्यंते पातु समीपे युज्यते इत्युपसर्गास्तद्रूपं पदमुपसर्गपदं मपरापेत्यादिवत् तस्मैहितं तद्धितमित्यान्वाभिधाय काये प्रत्ययास्तेतद्धिताः सदन्तंपदं यथा गोभ्योहितोगव्योदेश: नामेरपत्यं नाभेय इत्यादि समसनं समासः पदानामेकी करण रुपः तत्पुरुपा दिस्तत्पदं समासपदं यथा राज पुरुपेत्यादि संधिः सन्त्रिकर्पस्तेन पदं यथा दधीद नपत्यादि तथास्तु साध्या विना भूतत्व लक्षणा यथा नित्यः शन्दः कृतकत्वादितियोगिकयदेतेषामेवदुव्यादिसंयोगम- तयधाउपकरोतिसेनयाभि याति अभिपेणयतीत्पादि तथा उणादिउणमभूति प्रत्ययान्तपदं यथा आशुस्वादु तथा क्रियाविधानं सिद्ध क्रिया विधेः कान्त- त्ययान्तपदविधरित्यर्थः यथा पाचकः पाक इत्यादि तथा धातवोभ्वादयः क्रि. याप्रतिपादिकाः स्त्ररा अकारादयः खड्गादयो सप्तकचिद्रसाइतिपाठः तत्रर- साःशृङ्गारा दयो नवपदार भृकारहास्य करुणारौद्र वीरभयानकः-वीभत्साहृत शान्ताश्चना नाव्यरसास्मृताः विभक्तयः प्रथमाधाः सप्त वर्णा ककारादि न्यजनानिएभियुनंयत्तस्था भय सत्यं भेद तमाह काल्यं त्रिकाल- विशयं दश विधमपिसत्यं भवतीति योगः दश विधत्वंच सत्यस्यजन पद सम्मन सत्यादि भेदात् आइच अणवय १ संपय २ ठवणा ३ नाम ४ स्वे ५ पडुच्च ६ सच्चेयववहार ७ भाव - जोगे १ दशमेवम्म सच्चेयत्ति तत्र जन पद सत्यं यथा उदकार्थे कोकणादि देशस्दयापय इति वचनं संमत सत्यं यथा समानेपि पङ्कसम्भवे गोपालादि नामपिसम्मसत्वे नारविन्द मेव पङ्कजमुच्यते न- कुवलयादीनि स्थापना सत्यं प्रतिमादिषु नामसत्यं यथा कुलमवर्द्धयन्नपि कुल- चर्द्धन इत्युच्यते रूपसत्यं यथा भावतो असमणो पितद्रूपधारि श्रमण इत्युच्यते प्रतीतसत्यं यथा अनामिका कनिष्टका प्रतीत्यदीर्घत्युच्यतेसैवमध्य मांप्रतीत्य ह- स्त्रतिव्यवहारसत्यं यथा गिरिततृणादिषुदह्यामानेषु व्यवहारागिरिदह्यते इति भाव- सत्यं यथा सत्यपिपञ्च वर्णत्वे शुक्रत्वलक्षण भावोत्कटत्वाच्छुक्ला बलाकेति योगसत्यं यथा दण्डयोगाइएडेत्यादि औपम्यसत्यं यथा समुद्रवत्तहाग इत्यादि तथा जहणियत तहयकम्मुणाहोदति यश येनप्रकारेण भाणितं भणन क्रियादश विधसत्यंसद भूतार्थनयाभवति तथा तेनैव प्रकारेणकर्मणा वाक्षरलेखनाति कि- पयास नार्य जापने सत्सं दश विषमेव भवतीति अनेन चेदमकं भवति न केवलं (१६८) * अनुयोगद्वार पुत्र र सत्यार्थ वचनं वाच्यं हस्तादि कर्माप्य व्यभिचार्यार्थ सूचकमेवे मुभयत्राप्य व्यमि- चारि तथा पराभ्यसनस्या कुटिलाध्यषसायस्पच तुल्यत्वादिति तथा दुवाल स- विहाय होइ भासत्ति द्वादश विधाच भवति भाषा तथाच माकृत संस्कृत भाषा मागध पिशाचसूरसेनीच षष्टोत्र भूरि भेदो देश. विशेषादपभ्रंशः इयमेव पविधा नापा गय पद्य भेदेन भिद्या माना-द्वादश धामदतीति तथा बचन मपियोदश विघं भवति तथाहि वयणतियं ३ लिंगतियं ३ कालतियं ३. तहपरोक्ख पच्चक्वं ज्वणीयाह चउक्कं अज्झत्थं चेवसोलसमं तत्र वचनत्रयं एफ वचनद्विवचन बहु वचन रूपं तथा धर्मः धर्मों धर्माः लिंगक्रिकं स्त्री पुनपुंसक रूपं यथा कुमारि वृक्षा कुण्डं कालत्रिकमतीतानागत वर्तमान कालरूपं यथा अकरोत् करिष्यति करोति प्रत्यक्षं यथायं एषः परोक्ष.यया: सातथाउपनीत वचनंगुणोप नयन रूपं यथा रूपवानयं अपनीय वचनं गुणाय नयन रूपं यथा दुःशीलोय उपनीताप- नीत वचनं यत्रैकं गुण मुपनीय गुणान्तर मपनीयते यया रूप वानयं किन्तु दुःशीलः विपर्ययेणत्वऽपनीतोपनीत वचनं तद्यथा दुःशीलोयं किन्तु रूपवान् अध्यात्म वचन- अभिमतमर्थगोपयितु कामस्य सहसा तस्यैव भणन मति एव मितिडल सत्यादि स्वरूपाव धारण प्रकारेण अईदनुज्ञातं ।। भावार्थ-नाम पद उसे कहते हैं जो-विभक्ति से रहित हो किन्तु कतिपय च्याकरणों में नाम पदकी प्रकृति संज्ञा वांधी है, और प्रकृतिसे परे प्रत्ययों की संयोजना की है जैसे कि-धर्म शब्द को पुल्लिंग में सातों विभक्तियों . से इस प्रकार साधन किया *"अध्ययात्स्वोजस्" " एकद्विवहो" इन शाकटायन ध्याकरण के सूत्रों का यह आशय है कि-अव्ययसेपरेसु-औ, नस् ,, प्रत्यों की प्राप्ति होती है फिर उनके यथाक्रम . एकवचन द्विवचन, और बहु वचन किये जाते हैं किन्तु उकार और जकार की इतसंज्ञा है अतः जिसकी इत् संज्ञा होती है उसका लोप होजाता है तव, स्, आ,ऽस, ऐसे प्रत्यय रहते हैं "प्रत्ययः कृतोऽपश्याः" शा० अ० २। पा-१। सू०४१। इस सूत्र से प्रत्यय संज्ञा की गई है किन्तु " पर "१ ११४४। प्रत्यय प्रकृति से परवर्तीही होते हैं जैसे कि धर्म शब्द तो प्रकृति रूप है सब धर्म स्, धर्म औ धर्म अस्, ऐसे एकवचन द्विवचन और बहुवचन किये गये फिर " सुङपदम् १।१।६२। इस सूत्र से सुबन्त और तिंडन्त के प्रत्यय लगने से पद बन जाता है तव "धर्म 'सू..ऐसे शब्द के सकार को.". सजू रहस्सो ऽतिप्पक स्मन्मध्वन्सारिः" यह शोधकार सूत्र है " " १४ अनुयोगद्वार सूत्र * (१६४ ) १।११७२। इस सूत्र से रिकार किया गया फिर इकार के इन संझा करके " २६ पदान्ते विसर्जनीयः ।।१।६७। इस सूत्र से रेफ की विसर्ग की गई तब धर्मः ऐसे प्रयोग सिद्ध होगया और धर्म औ शब्द को एजू च्यच् ॥ १।११६२। सूत्र से संधि कार्य करके " धर्मा " प्रयोग सिद्ध होगया और धर्म अस शब्द को: पदे 12॥२॥१०६। सूत्र से प्रकार के लोप की प्राप्ति थी किन्तु "भत्या" 1१।२।१६२॥ सूत्र से अमात्र को आत् होगया फिर इस फे प्रकार को " दीर्घ सूत्र से दीर्य किया गया और सकार को रिकारा देश और रेफ को विसर्जनीय पूर्व सूत्रों से करलेने चाहिये तव " धर्माः " ऐसे प्रयोग प्रथम विभक्ति के पहु वचन का सिद्ध होता है। यदि कार्यान्तर में कोई व्यक्ति व्याप्त हो उसको अपने सन्मुख करना होतो उसको सम्बोधन कहते हैं और उसकी विवक्षायें . श्रापन्य ११३।६६) सूत्र से सु औजस ! एकत्वादि संख्या में प्रत्यय लगाये जान है फिर हम्बानियाट १।२।१२२|| मृत्र से एक वचन में मुका लोप करके भौर सम्बोधन में है शठदका प्रयोग करना चाहिये नर हे धर्म, हेधौ हेधर्माः ऐसे प्रयोग बन जाते हैं और "क- मणि" १ । ३ । १०५ । सूत्र से क्रिया विषय में कर्म होता है सो कर्म में अम् भार शस्, यह प्रत्यय लगाये जाने हैं जिसमें ट और शकार की इत्संज्ञा होती है फिर " मोऽणोऽमः | १।२।। ३६ । सूत्र से अम् मात्र के प्रकार : फो मकार होगया फिर " पदस्य" १ । २ । १२ । सूत्र से पदकी ही लुगकी , प्राप्ति होनी थी किन्तु " शय्याः स्थानतेऽल ।। १ । १ ! ४७ । इस सूत्रसे : अन्त के वर्णका लोप किया जाता है तब " धर्मम् " ऐसे प्रयोग सिद्ध होगया फिर धर्म औ शन्द की पूर्ववत् एच् करना चाहिये तब धर्मोप्रयोग सिद्ध हो- गया और “ नन्तः पुंसः॥ १।१ ७६ । शस् के स्थान पर साथ अच्नान्त शब्द होजाता है तब धर्मान् ऐसे रूप सिद्ध हुआ और तृतीया विभक्ति के "टाभ्यां भिस्सिदो" सूत्र से टाभ्याम् मिस प्रत्यय होते हैं और-" हेतु कर्तृ- करणेन्धं धनलक्षणे "१११३ । १२८ । हेत्वादि कारणों में तृतीयाविभकि - । .
( १७०) * अनुयोगद्वार सूत्र होती है फिर " सास्येस्स्ये नायम् " १ । २ । १६५ । इस सूत्रसे टा मात्रको इन आदेश होगया फिर " अभिो" इस सूत्रसे नकार को णकारादेश होगया किन्तु " प्रचुल्दुस्तौनान्तरे " १ । २. | ५१ श-और च वर्गमें ल-और वर्ग में स और तवर्ग में न को णकारादेश नहीं होता फिर " इक्ये " सूत्रसे एङ् करने से " धर्मेण " ऐसे प्रयोग सिद्ध हुआ और भ्याम् प्रत्यय के परे होने से " भ्यत्याः " सूत्रसे दीर्घ होकर धर्माभ्याम् रूप वनगया फिर ऐस्भि- सोऽमशः । ११२१ १६४ । इस सूत्र से भिस् मात्र को ऐसादेश होगया फिर ऐचादेश करने से और सकार को रिकारादेश रेफ को विसजर्नीय तब परिपक प्रयोग धमैः सिद्ध हुआ फिर "भ्यां भ्यस्"।१३ । १३४ । सूत्रसे च.. तुर्थी को उक्तप्रत्ययों की प्राप्ति हुई फिर सत्यादि सूत्र से डेकोयकरादेश होगया और भ्यत्याः सूत्रसे धर्म शब्दका अकार दीर्घ होगया तब एकवचन में धर्मायः द्विवचन में धर्माभ्याम् प्रयोग सिद्ध हुए और बहुवचन में बहोसिस्भ्येत् । १॥ २ । १६३ । सूत्रसे एकार की प्राप्ति होती है तब धर्मेभ्यः ऐसे प्रयोग बनजाता है " अयायेऽवधौ ॥ ११ ॥ ३ । १५६ इस सूत्रसे पांचवीं विभक्ति की सिद्धि होती है और उसिभ्यां भ्यस् प्रत्ययों की प्राप्ति है फिर.. डिन्तावितौ करके उसेत्यादि सूत्र से ङसि को भात् का आदेश होजाता है फिर उसे " दीर्घः" सूत्र से दीर्घ करलेना चाहिये फिर " चर्जशः" सूत्र से विराम जश् को घर भी होजाता है तब धर्मात् वा धर्माद ऐसे प्रयोग बनजाते हैं और. भ्याम् परवर्ती होने पर भाग्वत् ही कार्य किया जाता है और भ्यास को भी. पूर्ववत् ही कार्य होता है तब धर्माभ्याम् धर्मेभ्यः प्रयोग सिद्ध हुए और उसो- साम् । १।३ । १६२ । सम्बन्ध में पष्टी होती है उसके प्रत्यय ङस् ओस् आम. हैं फिर उसेत्यादि सूत्र से ङस् को "स्प का आदेश होजाता है तब धर्मस्य प्रयोग सिद्ध हुआ फिर ओस्परे होने पर एत्व होगया फिर एचोऽध्ययवायाव' । १ । १ । ६६ । सूत्र से अया देश किया गया फिर सकार को पूर्ववत् कार्य करने से धर्मयोः प्रयोग सिद्ध होगया और नम्हस्वादसाः । १।२ । ३३ । में * अनुपांगद्वारं सूत्र * ( १७१) इस सूत्र से भाम् मात्र को नाम् आदेश किया गया फिर " नाम्यतिसृचतुष्पः १ । २ । १४० । सूत्र से पूर्वअक् दीर्घ किया तब धर्माणां प्रयोग सिद्ध होगयां और "आधारे । १ । ३ । १७५ । सूत्र से आधार में सातवीं विभक्ति होती है उसके डिभोम् और सुप् प्रत्यय हैं जिनको पूर्व सूत्रों से ही धर्षे धर्मयोः धर्मेषु प्रयोग बनाये जाते हैं। सो इसीमकार वृक्ष घटपट कुंभादि शब्दों को भी जानना चाहिये इस प्रकार नाम शब्दको विभक्तपन्त करना चाहिये सो . यही नाम शब्द है और श्रारख्यात प्रकरण में सर्व धातुः प्रक्रियागणादि का समावेश है और धातुऐं भी परस्मैपदी श्रात्मनेपदी और उभयपदी आख्यात प्रकरण में ही कथन की गई है और धातुओं को क्रिया पद भी कहते हैं और दश ही लकारों में अन्य पुरुष मध्यम पुरुप उत्तम पुरुष गिने जाते हैं इसलिये आख्यात प्रकरण का ठीक २ चोध होना चाहिये और निपात उसे कहते हैं जो अप्राप्ति की करे और प्राप्ति का निषेध करे वही निपात होता है जैसेकि खल्वा- दि शब्द हैं और विंशनि उपसर्ग गंण है प्रपंरादि उपसर्ग के वल से धातु के अर्थ में भी परिवर्तनता होजाती है जैसाकि-आहार विहारादि शब्द है तद्धित प्रकरण में अनेक मकार के प्रत्ययों का विवर्ण है जैनः नाभेयः वैयाकरणः सौगतः शैवः वैष्णवः अकारः इत्यादि शब्द सर्व तद्धित प्रत्ययान्त हैं और पद प्रकार के समास होते हैं । जिनके पोध से समासान्त पदोंका ज्ञान भली प्रकार होजाता है और संधि प्रकरण से संघिसान होता है किन्तु संधिय पांच प्रकार से पानिपादन की गई है जैसे कि-अच्संधि- अचों के साथ अचों का मिलजाना उसे असंधि कहते हैं जैसे कि नयन, लवन, रायो, नाचौ, दध्यत्र, शम्पत्र, मध्वपनय, वध्यानेनं, पित्रर्थः लाकृति, महऋपि दंडामुनीन्द्र, मधुदकम् पितृपभः देवेन्द्र, एहि गंधोदकम् मालोठा, महर्षि, तवैषा, नवादन, प्रौढः प्रैपः स्वैरिणी अक्षौहिणी ताकारः विम्यौप्टी सुखातः प्राणम् (१७२) * अनुयोगद्वार सूत्र * प्राीति, मेषयति, तेऽत्र, पटोत्र, गवायं, गवेश्वरः गवेन्द्र, गवाक्षः इत्यादि सर्व असंधि के हैं निषेधसंधि- 'प्लुत शब्द के परे होनेपर संधि कार्य नही किया जाता किन्तु यह नियम इति शब्द के परे होनेपर नहीं है जैसकि-सुश्लोका ३ इति तव सुश्लोकेत्ति भी बन जायगा । और मुनीइमौ, साधूएतौ अमीअत्र, अमूआसाते । खट्वेपत्र कुलइम । पचेतेअब पचेथेअब पचाबहेअत्र, अ अपेहि । इ इन्द्रपश्य । उ उत्तिष्ट पाएवं धन्पसे । आएवकिलतत् । आउष्णम् ओष्णम् अथौ अस्मै नो इंद्रियम् ॥ इत्यादि प्रयोग प्रकृति भाव के हैं दित्वसंधि- तीर्थ भईन मरुत्त् निध्ध्यान्तं प्रच्च्युतं देवदत्ता ३ दध्वस्तः इन्द्रः दर्शनं इर्षः तर्पः अात् छुङास्ते कन्याछत्रम् देवच्छत्रम् म्लेच्छति आच्छिनति माच्छिदत्त इत्यादि प्रयोग द्वित्वसंधि के होते हैं । इलसंधि- अमात्रम्, अजमात्रम्, ककुम्मण्डलं, ककुमण्डलं, वाडमधुरा वांग्मधुरा पएनया पड्नया तत्रयनंतदूनयनम्, वाङमय, गन्ता, चक्रम्पते अभूग्निहः त्वः यांसि त्वयंसि त्वल्लुनासि, सम्नाट, गूढस्वाराट् उत्थितः कश्शुभः मज़ति। तेच्छेते, यज्ञः कपण्डे कष्टीकते पेष्टा तहकारेण । मधुलिसीदति । महानपण्डः तल्लुनाति भवालिखति अज्झलौ त्रिष्टुन्भुत वाग्धंसति, तद्धितम् अच्छपम्. में- वाञ्चलूरः भवाञ्शूरः → पाति कांस्काने भवांश्छादयति भवष्टिीकते । भवांष्ठका- रायति, भवान्त्सरति, प्रशाचिनोति पुंश्चली पुंस्कोकिलः वृक्षहसति, देवाया- न्ति, अघोदेहि, भगोदेहि, असाइन्दुः असाविन्दुः । मसाविन्दुः । तस्मा आस- नम् । तस्मा यांसनं देवायांसते । श्रवणोऽरिम, धर्मोजयति; एषकरोति, संयाति, - -पांचौ संधियों का पूर्ण विवर्ण शाकटायन व्याकरण से देखें और इन शब्दोंकी साधनि का भी प्रक्रिया सहाह नामक वृत्ति से देखिये।
। * अनुयोगद्वारं मूत्र * (१७३) अनेपागच्छनि । महरत्र, अहोभ्याम्, अहोरूपम्, अहोसत्रिः अहोरूपम् । इत्यादि मयोग एलसंधिक विसर्जनीय सन्धि । मुनिरस्मि । साधुर्दयते, करछादयति, कष्टीकते ! कश्शुभः कःशुभः । क- एंड कःपएरे । कस्साधु, कासाधु । फरस्खलति । का+खनति का पचति क:- *फलति निरस्कृत्य तिरःकत्यतिरम् कृत्य ॥ नमस्कृत्य पुरस्कृत्य । चतुष्कटकं दुष्कनं ट्रिप्करोनि धनुप्खण्डपनि । अयस्कार: यशस्कामः यशस्काम्यति गीप्या- सा, गी+काम्यति चतुष्टयम् निष्पति । निस्तपनि कस्कः । कौतस्कुतः सार्पस्कु- ण्डिका भ्रानुपुत्रः इत्यादि प्रयोग विसननीय संधिके हैं सो इनकी शब्द सधिनिका शन्दागम जाननी चाहिये किन्तु किसी २ प्राचार्य ने तीनही संधियें स्वीकार की मेकि-समास्तर प्रकृति हलन विसर्ग जन्मा सन्धिस्तु पञ्चक मिनीन्य मिहारन्य तत्रस्वरमकृति हलनविफिल्पतोऽस्मिन् सन्धिविधा कथितवान् गुगकीनि मूरिः॥१॥ भावार्थ:-संज्ञा, स्वर, प्रकृनिभाय, दल और विसर्ग संधियों के स्थान पर गुणकीर्तिमृरि ने स्वर, प्रकृति, भौर हत् यह तीनही संघिय स्वीकार की हैं वास्तव में नानां संधियों में पांचों संधियों का समावेश होजाता है इसलिय संधि पदका भी पूर्ण बोध होना चाहिये फिर सुषन्त और निन्त प्रत्ययों के लगने से पद संवा रोनी है इसलिय पदनान होने पर हेतु शान भी होना चाहिए हेतु दाप्रकार से वर्णन किया गया कि अन्वय व्यतिरंक जो वस्तु विद्यमान होने पर विद्यमान- भान रहना है उसे अन्वय हेतु कहते हैं जैसे कि धूपके होने पर अग्निका अस्ति- व है। और व्यतिरेक हेतु वह होता है जो एकके भाव होने पर द्वितीय का भी प्रभाव होजाए उसे व्यतिरेक हेतु कहते हैं जैसे कि अग्नि के अभाव में प्रमका प्रभाव रहना है सो वही व्यतिरेक हेतु होता है तथा श्रीस्थानाङ्ग सूत्रके चतुर्धम्यान के नृतीय 'उदंश में लिखा है कि भहवाहे ऊपच्चिद्दे पमले तंजहा (१७४ ) * अनुयोगद्दार सूत्र * पञ्चक्खे अणुमाणे उवमें आगमें अहवाइऊ चउबिहे पन्नचे तजहा भत्थितं प्रा थिसोईऊ भत्यितंत्यि सोहे ऊणंत्थितं अत्यिसो ऊत्थितं णत्यिसोडे। वृति-अहवेति । डेतोः प्रकारान्तरता घोतके विकल्पार्थे हिनोति गमयति प्रमेयमय सवाहीयते अधिगम्यतेऽनेनेतिहेतुः प्रमेयस्य प्रमिती कारणं प्रपाण मित्यर्थः सचतुर्विधः स्वरूपादि भेदाचन ॥ पञ्चक्खेति प्रश्नात्यश्रुते ज्यांनीति अर्यानित्यक्ष पात्मतम्मति यद्वत्तते ज्ञान तत्सत्यक्षं निश्चयतोऽवधिमनः पर्याय केवलानि अक्षाणि चन्द्रियाणि प्रति यत्सत्यक्ष व्यवहार तस्तच चक्षुरादि प्रभवमिति लक्षणमिदमस्य अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानमीदृशं प्रत्यक्ष मितरद्ज्ञेयं परोक्षं ग्रहणे तया १ ग्रहणापेक्षयति भावः अन्विति लिङ्गदर्शन सम्बन्धानुस्म रणयोः पवादात्मानं ज्ञानमर्नुझानं एतल्लक्षणामिदं साध्याविना भूतलिङ्गात् साध्यनिधायकं स्मृतं अनुमानं तदभ्रान्त प्रमाणत्वासमक्ष वदिति ॥ १ ॥ ए- तच्चसाध्या बिना भूतहेतु अन्यत्वेवा ब्युपचारादेतुरिति तथा उपमान उपमा सैवोपम्यं अनेन गवयेन सदृशौ गौरिति सानय प्रतिपत्ति रूप उक्नंच गान्दृष्ट्वाय मरण्यन्य गवयंवीक्षते यदा भूयोव पवसा मान्य भाजवर्तुल कण्ठकं ॥१॥ तस्यामव त्वस्थायां यदिज्ञानं प्रवर्तते पशुनैतेन तुल्योसौं गोपिण्ड, इतिसोपमेति २ अथव' श्रुताति देशवाक्य समानार्थो पलम्भने संज्ञासंझि सम्बन्ध ज्ञान मुपमानं मुज्यत इति भागम्यन्ते परिच्छिद्यते अर्था भनेनेत्यागम आतवचन सम्पायो विपकृष्टाय मत्यय उक्तंच-दृष्टेष्टा व्याहता द्वाक्यात्परमार्थाभि धायिनः वत्वयादि तयोत्पन्नं मानशाब्दं प्रकीर्तितं ॥ १ ॥ आप्तोय जनुलंध्य मदृष्टे विरोधक तत्वो- पदेश कृत्सार्थ शाखंका पथ घनमिति ॥ २॥ इहान्यथा नुपपन्नत्व लक्षण हेतुजन्यत्वा दनुमानमेव कार्ये कारणो पचाराद्धतुः सच चतुर्विधः चतुर्भेगी रूपत्वात् तत्रअस्ति विद्यतेतदितिलिंगभूतं धूमादिवस्तु इतिकृत्वा अस्तिसोन्या- दिः साध्योर्थ इत्येवं । हेतुरिति अनुमान तथा तदग्न्यादिक वस्त्वतोनास्तिप्रसा तविरुद्धः शीतादिरर्थ इत्येवमपि हेतुरनुमानमिति तयांनास्ति तदग्न्यादिक मत शीतकालास्ति सशीतादिरयं इत्येवमपि तुमानमिति । तथानास्तितदवृत त्वा दिकपिति तथा नास्ति ससिंशयात्वादिकोथ इत्यपि हेतुरजुपानमिति इचशन्दे * अनुयोगद्वार.सूत्र * ( १७५) कृतकत्वस्यास्ति त्वादस्सानित्यत्व घटवत् तथा धूमस्यास्तित्वा दिहास्त्यग्नि में- हानस इवेत्यादिफ स्वभावानुमान कार्यानुमानञ्च प्रथम भङ्ग के न सूचितं तथा अग्नेरस्तित्वात् धूमास्तित्वाद्वा नास्तिशीत स्पर्श इत्यादि विरुद्धोपलम्भानुमान विरुद्धकार्यों पलम्भानुमान: च तथा- अग्नेधूमस्य वाचित्वान्नास्ति शीतस्पर्श ज.. नितदंत वाणारोम हर्षादि पुरुपविकारो महानसबदिति कारण विरुद्धो पलम्भाः नुमानं कारणविरुद्धकार्यो पलम्भानुपानचं द्विताय भंग के नाभिहित तथा छत्रा देरग्नेवानास्ति त्वादस्ति क्वचित् कालादिविशेपे आतपैः शीतस्पर्शीवापूर्वोप, लब्धपदेश इवेत्यादि विरुद्धकारणउपलम्भानुपानं विरुद्धानुपलम्भानुमानं च तृती- य भाकेनोक्त तथा दर्शनसामयां सत्यां घटोपलम्भस्य नास्तित्वा.भास्तीह घटो. विवक्षितपदेशवदित्यादि स्वभावानुपलब्ध्यानुमान तथा धूपस्य नास्तित्वा ना- स्त्य विकलो धूमकारणकलापः प्रदेशान्तरण दित्यादिकार्यानुपलब्ध्यमानं क्या वृक्षनास्तित्वात् शिशपा नास्तीत्यादि व्यापकार्नु पलम्भानुमान तथा अनर्नाः, स्तित्वात् धूपो नास्तीत्पादि कारणनुपलम्भानुमान च चतुर्थभंगकेना विरुद्धमिति नं च वाच्यंन जैनप्रक्रियेयं सर्वत्र जैनाभिमतान्यथा नुपपन्नत्वरूपस्य हेतुलक्षः णस्य विषमानत्वादिति . : . सारांश-रेतु चार प्रकारसे · वर्णन किया गया है जैसाकि प्रत्यक्ष अनुमान, उपमान, और आगम, अथवा अस्तिमें अस्ति १ अस्ति नास्ति : नास्ति में प्रस्ति ३.नास्ति में नास्ति ४ सो या सर्व हेतु तत्वों के निर्णय के लिये ही प्रतिपादन किये गये हैं इनका कुछ विवर्ण तो चित्ति में ही किया जा चुका है किन्तु विस्तार पूर्वक कथन इसी सूत्र के गुणा प्रमाण के अधिकार में किया गया है और अन्यंचय व्यतिरेक आदि हेतुओं का भी विवर्ण उसी स्थल पर किया है जो मस्तिमें अस्ति पद है उसमें प्रति व्यामि भव्याप्सि असंभव प्रादि दोषों को दूर करके केवल शुद्ध न्याय का ही विवर्ण है जैसे कि धूम की अस्ति होने से अमि का अस्तित्वस्वतः सिद्ध है। इसी प्रकार शेष भंगों का स्वरूप भी ति में लिखा गया है इसी लिये यहाँ पर इसका विस्तार ." (१७६) *' अनुयोगद्वारं सूत्र * नहीं किया इसलिये. हेतु ज्ञान में निष्णात . होकर फिर योगिक पदों में विक्ष होना चाहिये तथा लिंग झानका पूर्ण वोध होना चाहिये . जैसे कि पुलिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसक, जिनके निम्र लिखितांनुसार नियम हैं यथा पुलिङ्गः कटणप- भगवरपसस्न्वन्त भिमनलौ कि.रित ।। ननडने घघनी दः किर्भाचे खोऽतरि. चक: स्यात् ।। : ॐ नमः सर्वज्ञाय । लिङ्गानुशासन मन्तरेण शब्दानुशासन नावीलीमति सामान्य विशेषलक्षणाभ्यां लिङ्ग मनुशिष्यते ।। नामीत वक्ष्यमाणामिह संध्यते । कंटणथपभ भयरपसान्त स्वन्तं च -नाम पुलिङ्गं स्यात् । कादयोऽकारान्त । गुह्यन्ते पृथकसन्त निर्देशात् । दिस्वरसन्नांनां नपुंसकत्वस्य पक्ष्यमाणत्वेन एकत्रिस्वरादिसन्ता गृह्यन्ते ।। कान्तः मानक: पटहो दुन्दुभिश्च । इत्यादि ।। टान्तः कक्षापुट: सार संग्रह ग्रन्थः इत्यादि । णान्तः गुणःशुम्बेऽभधानादौ । इत्यादि । यान्तः निशीयः अर्धरात्रः । शपयः समयः । इत्यादि । पान्तः, दुयो लता समुदायः । इत्यादि ।। - भान्तः दो बर्हिः । इत्यादि.।। मान्तः गोधूमो नागरने स्यादित्यादि । यान्त भागधेयो दायादः । राजदेये तु पुत्रियोर्वेक्ष्यत । शुभे तु तन्नामत्वादेव कीरत्वम् । तन्दुलीय शाकविशेष । इत्यादि । रान्तः 'निर्दर कन्दरा । इत्यादि ॥ पान्त -गरातः ! गवानी शुक्रवारूपयां गवाक्षो जालके कपो इत्यादि । सन्तः माश्चन्द्रमासयो पुसि । भन हाः कालः । इत्यादि ॥ नन्तः प्राचा पाषाणो गिरिश्च । इत्यादिः उकारान्तः तर्कुः सुभवष्ट नमग्न्या धारमाएई च मन्तुः अपराधः इत्यादि। अन्तान्तं नाम पुंलिङ्गम् । पर्यन्तोऽवसानम् । विष्यन्तः मरणम् । मत्पन्तस्य बाडुलकत्वानपुंसकत्वमेव !! इमन्प्रत्ययान्तम् अल्प्रत्ययान्तं च नाम पुंलिङ्गम् ।। इमन् , प्रथिमा ।.प्रदिमा । द्रढिमा । इत्यादि ! नन्तलेनैव सिद्धे इमन्ग्रहणम् । 'प्रांत्वात्वादिः" इति नपुंसक वाधनार्थम् । यस्त्वौणांदिक स्तस्याश्रयलि- ङ्गता । भरिमा पृथ्वी, वरिमा तपस्वी । इत्यादि । मल, प्रभवः । " प्रभवस्तु . पराक्रमे । मोक्षेपवर्ग:":इत्यादि ॥ तथा क्यानं रितवन्तं च नाम जिङ्गम् ।।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (१७७) कि, अयं वृतिः कृतूर धातुस्तदर्थश्च ॥श्तिय, अयं पचतिः डुपीं पातुस्त- दर्थश्च ।। स्तिष् साहचर्यात् 'इकिश्तियस्वरूपार्थे " इति विहितस्यैवके. ग्रहणम् ॥ तथा नप्रत्ययान्तं च. नाम पुंलिङ्गम् स्वामः स्वापे प्रस्तुतस्य विज्ञाने दर्शनऽपि प' ॥ प्रश्नपच्छा । नङ् विश्नो गमनम् ॥ तथा धपत्ययान्तं घम्पत्ययान्तं प नाम पुंलिङ्गम् घः करः । 'करो वर्षांपले रश्मौ पाणी प्रत्यायशुण्डयोः ॥ परिसरो मृत्यौ देवोपान्तप्रदेशयोः ॥ उरश्छदः कवचं.। प्रच्छदश्वोत्तरपटः । छदस्य तु नपुंसकता वक्ष्यते । इत्यादि । घमन्तम्, पादः ।. पादो पुनाहि तुशिरश्मिप्रत्यन्तपर्वतादिषु ।। प्राप्ताः स्नानम् ॥ भावः । भाषासत्तास्व- भाषाभि प्रायचेष्टात्मजन्मसु ॥ क्रियालीलापदार्थेषु विभूतिबन्धजन्तुषु ।। अनुसन्धः प्रकृत्यादेरनुपयोगी ॥ दामंशकादातोर्यः, फिः प्रत्ययोवि- हितस्तदन्वं नाम, पुलिङ्गम् ॥ भादिः प्रायम्पम् । व्याधिः रोगः । उपाधि धर्ममिन्ता । कैतवं कुटम्बच्यावृता विशेपणंच । उपधिः कपटम् । उप- निधिः न्यासः प्रतिनिधिः प्रतिनिधिः प्रतिबिम्बम् । संधिः पुमान् सुरक्षगदी । परिषिः परिवेषः । अवधिस्त्व व धानादो । प्रणिधिः प्रार्थनमवधानं चाश्च । समाधिः प्रति समाधान नियमो मौनं चितकार्य च । विधिः कालः कल्पा प्रमा विधिवाक्यं विधानं देवं प्रकारश्च । चालधिः पुच्छम् । शब्दधिः कर्णः । जलधिः समुद्रः । मन्तर्दियवधा । प्रधेस्तु नेमौ स्त्रीपुंसत्वं रोग विशेष स्त्रीत्वम् इपुधस्तु स्त्रीसत्वं वक्ष्यते । इत्यादि ।। भावेखः, भावेऽर्थेयः खो विहितस्तदन्त नाम पुलिकम् । भाशितस्य भवनम् भाशितंभचो वर्तते, वृप्तिरित्यर्थः ॥ भाष इवि किम् । पाशितो भवत्पनया पाशितंभवापश्चपूली । भर्तरि च कः स्यात् । भावे कर्तृवर्जिते च कारके यः का प्रत्ययस्तदन्तं नाम पुंलिङ्गम् ।। भाखूना मुत्था नमात्यः विन्यतेऽनेनास्मिन्वा विघ्न भन्तरायः । इत्यादि । भर्तरि चतिकिम् । जानातीतिजा परिषद् ।। इस्त स्तनौष्ठ नस दन्त कपोल गुन्फ, केशान्धु गुच्छ दिनसतु पतवग्रहाणाम् । . निर्यासना करस कण्ठ कुठार कोष्ठ, हैमारि वर्ष विष बोल स्थाशनीनाम् ।। .
. ( १७८ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * हस्तादीनां नाम जलध्यादीनां तु सभिदासप्रभेदानामपि पुलिंगं भवति । हस्त- नाम पञ्चशाखः । करः। शयः । अयं शय्या यामपि यान्तत्वात्पुंसि । हस्तस्य तु पुंनपुंसकत्वम् ।। स्तननाम, स्तनः । पयोधरः। कुचः । वक्षोजः । इत्यादि ।। ओष्ठनाम, ओष्ठः । अधरः । दन्तच्छदः इत्यादि ॥ नखनाम करजः । कररुहः। . मदनांकुशः । इत्यादि । नखः पुंक्लीवः ॥ नखरस्तु त्रिलिंगः ॥ दन्तनाम दन्तः । दशनः । अयं रुद्रटेन क्लीवेऽपि निवद्धः दशनानि च कुन्दकलिकाः स्युः इति । वचिन्त्यम् । द्विजा रदः रदनः । इत्यादि । कपोलनाम, कपोल गण्डः । गल्लंः । इत्या- दि । गुल्फनाम, गुल्फः । गुटुः । प्रपदः । आप्रपदः। खुरकःनिस्तोदा पादशीप: इत्यादि ॥ हस्ति गुल्फस्तु मौहः । घुटिकघुण्टिधुण्टगुल्फास्तु स्त्री पुंसलिंगा वक्ष्य- न्ते ॥ केशनाम, केशः । शिरोजः। शिरोरुहः चिकुरः । चिहुरः । कचः । अयं बाहुलकबणेऽपि पुंसि । गुरोःपुत्र तु देहि नामत्वसिद्धम् । इभ्यां तु योनिम- वात्स्त्रीत्वम् । अस्त्रः । वेल्लिवायः । इत्यादि ।। वृजिनश्च । यद्गौडः । जिनं कल्म- पे क्लीवं केशेना कुटिले त्रिषु " कुन्तलाच । 'कुन्तलाः स्युर्जनपदो इलो वालश्चं . कुन्तला' ।हले वाहुलकात्पुसि। वोलः पुनपुंसको वक्ष्यते । तद्विशेषोऽपि केशः कुरलः अलकः ॥ अन्धुः कूपस्तन्नाम, अन्धुः । हिः । प्रहिः । इत्यादि । कूपस्तु स्त्रीपुंसलिंगः ॥ गुच्छनाम, गुच्छः । गुत्सः गुलुन्छ । स्तवकस्तुः पुंक्लीवः । दिननाम, घस्रः. सूर्याकः । दण्डयामः । दिनदिवसवासराणां पुनपुंसकत्वम् । दिवामोस्तुनपुंसकत्वम् । स इति समास- स्याख्या पूर्वाचार्याणाम् । तन्नाम, बहुव्रीहिः । अव्ययीभावः । द्वन्द्वः । इत्यादि। ऋतुनाम, हेमन्तः । वसन्तशिशिरनिदाघाः पुनपुंसकाः । शरत्मादृड्वांश्च स्त्री- लिङ्गाः । ऋतुस्तु उदन्त त्वात्पुंसि । पतद्ग्रह आचेलका धारस्तन्नाम, प्रतिग्रहः। प्रतिग्राहः । इत्यादि । नियासनाम, वृक्षादीनारसः । गुग्गुलः । श्रीपृष्टः । श्रीवे- टः । सर्जरसः । उषः । उलूखलनपुंसकम् निर्यासस्तुपुनपुंसकंः । कुम्भकुन्दो- लूपले तु बाहुलकानपुंसके । नाकनाम, स्वर्गः । स्व:अव्यम् । नाकत्रिदिवौपुं- नपुंसकौ । दिवत्रिविष्टपंक्लीवे । घोदिवौस्त्री ॥ रसाःश्रृङ्गारादया स्तनाम, श्रृङ्गा- । । * अनुयोगद्वारं सूत्र* ( १७६) रहास्यकरुण रौद्रवीरभयानक शान्तवीभत्साद्भुता इति । वत्सलस्तुपुत्रादि स्ने- हात्मारतिभेद एव । श्रृङ्गार पुक्लीवः । गोडस्तुश्रृङगारवीरौ वीभत्सरौद्रं हा- स्यंभयानकम् । करुणाचाद्भुतं शान्तवात्सल्यं च रसादश १ इति कण्टनाम, गलः नालः ॥ कुठारनाम, परशुः । पशुः । स्वधितिः । इत्यादि । कुठार पुंसी।। कोष्टनाम, कुशूलः । इत्यादि । हेमनाम, मो भेषजभेदः । किराततिक्त किरात- फसंज्ञः ॥ अरिनाम, द्विषन् । प्रत्यर्थी । रिपुःइत्यादि । वर्षनाम, वत्सः । संव- सरः । संवदित्ययमव्ययम पीतिकश्चित् । वर्षहायनान्दास्तुपुंक्लीवाः । शरत्समे- तुस्त्रीलिङ्गे । विपनाम, गरः । वुझसुतः । क्ष्वेडः । वत्सनाभः । इत्यादि ।। विषकालकूटगरलहालाहलकाकोलापुंनपुंसकाः । मधुरस्यवाहुलकातलीबत्वम् ।। चोलापध विशेपस्तन्नाम, गन्धरसः। माणः । इत्यादि । रथनाम पताकी । स्पन्दनः । पुंनपुंसकोऽयमितिगौडशेपः । रथापुंस्त्री ।। अशानिनाप, पविः । इत्या- दि॥ अशनि:पुंसी । वज्रकुलिशौ'कीयौ । भिदुरंवाहुलकातक्रीवम् ।। स्त्रीलिङ्गं योनिमम्रीसेनापलितहिन्निशाम् ।।वीचितन्द्राऽवडग्रीवाजिहाशास्त्रीदयादिशाम्।।१।। नामति स्मर्यते । यो निमदादीनां नाम स्त्रीलिङ्ग भवति । पुरुपी ! स्त्री। रामा | वामा । हस्तिनी । चशा दृषी अश्वा । मकरी मत्सी । मयुरी ! इत्यादि, वग्रीनाम उपदेहिका इत्यादि। सेनानाम { घमूः पृतना । वाहिनी । इत्यादि । बल्ली | अजमोदायां तुअस्य बाहुलकात् स्त्रीत्वम् ।। तडिन्नाम । शम्बा । चपला :चरा । इत्यादि । निशानाम । तुङ्गी । तमी । निशब्दोऽप्यस्ति निशावाची ।। वीचिनाम । पीचिः । उत्कलिका । लहरी। भङ्गिः । इत्यादि । तरङ्गालोलकल्लोलानां । पुंस्त्वमुक्तम् ॥ तन्द्राशब्देनालस्यनिद्रे गृह्यते ॥ अवटुनाम् घाटा । कार्टिका इत्यादि । अक्टोस्तु स्त्रीपुंसत्वम् ।। ग्रीवानाम । ग्रीवा । अयं तशिरायामपि ॥ जिह्यानाम | रसत्यादि ॥शस्त्रीनाम। शस्त्री असिपुत्री। इत्यादि । दयानाम । दया । करूणा । इत्यादि । दिग्नाम । आशा । ककृप् । इत्यादि ।।
(१८०) * अनुयोगद्वार सूत्र * अथ नपुंसक लिङ्ग नलस्तुतत्तसंयुक्तररूपान्तं नपुंसकम् ॥ वेधश्रादीन् विना सन्तं हिस्वरमभ- करें। नान्तं लान्तं स्त्वन्नं तान्त त्तान्तं संयुक्ता येररु यास्तदन्तं च नपुंसकलिङ्ग स्यात् । नान्तमजिनचर्मेत्यादि । लान्त, चक्रवाल समूहः । दलं शकलम् । स्त्वन्तम् । वस्तुतत्त्वं पदार्थश्च । मन्तु दधिनिस्यन्दः ॥ तान्त शीतमनुष्णम् अद्भुतमाश्चर्यमित्यादि । सान्त भित्तं शकलम्, निमित्तं हेतुरित्यादि । तस्य संयुक्तम् पृथगुपन्यासत्पूर्वेऽसंयुक्ता गृह्यन्ते । संयुक्तरान्तम् अग्रं पुरः अधिकं घ गोत्रं नाम कुल क्षेत्रच ॥ शुक्रं सप्तमो धातुः । इत्यादि । संयुक्तरुशब्दान्तम् श्मश्च कूर्चम् इत्यादि । संयुक्तयान्तं शख्य लक्ष्य वेध्यं च ।सानाय्यं हव्यमित्यादि वेधस्ममृतीन वर्जयित्वा सकारान्तं द्विस्वरं च नपुंसकम् । इदं रक्षः निशाचरः ॥ उपः प्रभात सन्ध्यायां तु पुंस्त्री । तपः कृच्छ्राचरणम् ॥ माघे पुंनपुंसकम् ॥ रजो रेणुः । पुंसीति गौडः ॥ जोपान्त्योऽयम् ॥ यादोजलचरः ॥ रोचिः शोचिश्व दीसी ।। वेध आदीनिति किम् । बेधावुधो विष्णुर्विधिश्च ।। सहा हेमन्त ॥ नभा मेघादिः । श्रीका प्राश्रयः ॥ ओकस्य तु कान्तत्वात्पुस्त्वम् । पूर्वापि वादो योगः । तेनाम्भः स्त्रोतो याद इत्यादीनां नघादिनामत्वेऽपि क्लीवत्वमेव ।। शुगत्तेस्त्वाश्रय लिङ्गता परत्वात् ॥ द्विस्वरमिति अनुवर्तते, अकीर विहितो . गोमतदन्तं नाम नपुंसकम् ।। धाम तेजः वर्ण प्रमाणं शरीरं च ॥ तम यूपाग्रम् । पसे मार्गः ॥ अकर्तरीति किम् ।। ददातीति दामा || करोतीति कर्मा ।। सारांश-लिंगानुशासन विना शब्दानु शासन का सम्पूर्ण बोध नही हो- सक्का इसलिये लिङ्ग ज्ञानकी अत्यन्त आवश्यकता है सो इस कारिका में पु- लिंग के निम्न प्रकार नियम बतलाये गए हैं जैसेकि-क-द--थ-प-भ-म- य-र-प-सान्त-स्नन्त-नाम पुलिंग होते ककारान्त-कान्तःमानक: । पटहोदुन्द्रभिश्चः। टकारान्त-कक्षापुट सार संग्रहमन्यः ।
* अनुयोगद्वारं मूत्र * (१८१) पान्तः-गुणः शन्द है यान्तः-निशीथ शब्द है जो अर्द्ध रात्रीका वाचक है पान्त:-तुप शन्द है जो लताओं के समुदाय में व्यवहृत होता है भान्त:-दर्भ शब्द है मान्त:-गोधूम शन्द है यान्त:-भागधेया शन्द है रान्तः-मिर्दरः पान्त:-गवानः सान्त:-मास् ( माचन्द्रमासयो). नन्तः-गीवा उकारान्तः तर्छः-अन्तान्तं नाम । पर्यन्तो । इमन्प्रत्ययान्तम् प्रथिमा । भलन्तः प्रभवः । क्यन्तं । वृति । रितवन्त : पचति । नप्रत्ययान्तः स्वमः । घपत्ययान्तः और घमत्ययान्त शब्द भी पुल्लिंग होते हैं जैसेकि-फरः घमन्तः पादः भावः । किमत्ययान्तः आदि व्यादि शब्द हैं भाव में जो ख प्रत्यय आता है यह भी पुत्रिंग ही होजाता है जैसे कि पाशितभवो और भाव कर्व को वर्गक जीभकर्ता का प्रत्यय है वहभी पुल्लिंग ही होजाता है यथा विघ्न । शन्द है ।। फिर हस्त के वाचक शब्द भी पुलिंग होते हैं जैसेकि-पंचशाख: इसीप्रकार स्तना-- ओष्ट-फरजः-दन्तः--कपाल:-गुल्फः शिरोजः गौडः कुंतल वालः कुरलः-अन्धुः गुच्छः घसः दंडयामः हेमन्तः गुग्गुलः स्वर्गः गला पर्युः रिपुः-वत्सः इत्यादि यह सर्व शब्द पुलिंग में ग्रहण किये जाते हैं इसीमकार अन्य शब्दों को भी जानना चाहिये। योनि और मदादि शब्द स्त्रीलिंगीय होते है जैसे कि-स्त्री-पुरुपी-रामा-अश्या इत्यादि और वम्रीनाम उपदेडिकादि है चमू-वल्ली-अजमोदा-शम्बा-तुंगी-तमी ची- चिनाम-लहरी-घाटा-ग्रीवा-रसज्ञा-शस्त्री-दया-आशा-फकृप-इत्यादिशब्द स्त्रीलिंगीय होते है और नान्त-लान्त-स्नन्त-शान नाना-संयुमेरु इत्यादि यह शब्द नपुंसक लिंगीय होते हैं इनके प्रयोग निम्रलिखितनुसार है जैसकि-भजिन-चकवालं । ..
. (१८२) * अनुयोगद्वारं सूत्र * दलावस्तुतच-मस्तु-शीत-भिन्तं-निमित्तंभग्रं-गोत्र-क्षेत्र-शुक्र-श्मश्रु-शख्यं ,सानाय्यं प्रभात,धाम,शरीरं, इत्यादि यह सर्व शब्द नपुंसकलिंगीय हैं इस प्रकार लिंगा नुशासन से लिंग वोध करके योग पदका अनुयोग करना चाहिये फिर उणा- दि प्रत्ययों को भी अभिगम करके श्रुत ज्ञान में निष्णातहो उणादि प्रत्यय निम्र प्रकार से है तथा च पाठ:- कृवाया जिमिस्वादिसा ध्यशूभ्य उण् ॥१॥ डुकब् करणे | वागतिगन्धनयोः ।।पा पाने ( जि अभि भवे (डुमिन् प्रक्षेपणे । ध्वद आस्वादने साध संसिद्धौ अशु व्याप्तौ । एभ्योष्टधातुभ्य उ- पत्ययः स्यात् । करोतीति कारुः । प्रसिद्धोऽसी क्रियाशब्दः शिल्पिन्यपि च वर्त्तते । तथा च धरणिकोशः कारुः शिल्पिनि कारके । राघवस्य ततः कार्य- फारुवानरपुङ्वः । सर्ववानरसेनानापावागमनमादिशत् । ७, २८, । इति भट्टिः । स्त्रियामुतः कारः स्त्री । वातीति वायुतिः आतो युक् चिणक्रतो पा, ७, ३, ३३ । इति युक् उभयत्र वायो प्रतिषेधो वक्तव्यः पा. ६, ३, २६, १, । इति देवताइन्द्रेच । पा. ६, ३,.२६ इत्यानङ् न भवति । वायवग्नी। अग्निवाय ।। पिवत्यने नीषधमिति पायुमुदस्थानम् । गुदंत्वपानं पायुर्नत्यमरः ॥ जयत्याभ- भवतिरोगानिति जायुरोप, वैद्योऽपि ।। मिनोति प्रक्षिपति देह उष्माणमिति मायुः पित्तम् । मायुः पित्त कफ श्लेष्मेत्यमरः । गोपूर्वांत् गां वाचं विकृतां मिनौति प्रक्षिपतीति गोमायुः श्रृगालः ॥ स्वद्यत इति स्वादु मिष्टम । त्रिलिंगः । शीघद्रव्ये. ऽसत्त्वे क्लीवम् । क्लीवे शीघाद्यसत्त्वे स्यात् । १, १, १, ६३, । इत्यमरखिलिं- गे। पृथ्वादिभ्य इमनिच् । पा० ५, १, १२२, । स्वादिमा । स्त्रियां डीप् । स्वाहीत्यपि ॥ साधनोंति परकार्यमिति साधुः सज्जनः । स्त्रियां वोतो गुणवंचनाद । पा० ४,१,४४, । इति ङीष् । साध्वी सती पतिव्रता । श्रम० २ ६, १, ६। पृथ्वादित्वात्साधिमा । अश्वत इत्याशु शीघ्रं धान्यस्य च नाम । पृथ्वादित्वा दाशिमा धान्यचाचित्वे पुंसि । आशुत्रीहिः पाटतः ।. अम० २,६, १५ ।। बहुलवचनात् रह त्यागे । ष्णा शौचे । कक लौल्ये हल विलेखन । यस * अनुयोगद्वार मूत्र * (१८३) निवासे । एभ्योऽप्युण भवति ।! गृहीत्वा रहति त्यजति चन्द्रमिति राहुः स्वभानुः । स्नात्यगमिति स्नायु:शरीरबन्धः । स्नायु:स्त्री वस्नसा स्मृतत्यमरः ।। कक्यते नेनेति काकुः स्त्रियां विकारो यः शोकमीत्यादि भिव॑नें रित्यमरः ।। हल्यतेऽ नेनेति हालुर्दन्तः ।। सर्वोऽत्रवसति सर्वाबासी वसति । अत्रार्थे वासु । वासुश्वासी देवश्चेति वासुदेवः । तथा च स्मृतिः । सर्वत्रासी समस्ते च वासत्पत्रेति वै यतः । ततोसौं वासुदेवेति विद्वदि परिगयिते ॥१॥सर्वत्रासी वसत्यात्मरूपेण विश्वम्भर वादिति वासुः ॥ वासुारायण 'पुनर्वसु विश्वरूपाः । ११ २६ । इति त्रिका- एडशेष । वसुदेवस्यापत्य मित्य स्मिन्नर्थ ऋष्य न्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च । पा०४, १. ११४ इत्यणि कृते वासुदेव इत्यपि व्युत्यत्पन्तरम् ।। दृसनिजानिचारचाभ्यो झुण् ॥ ३ ॥ दृ विदारणे । पण दाने । जन जननें । चर गतौ । घट भेदने । एभ्यो धुण् स्यात । दीर्यत इति दारू क्लीवे फाष्ठम । अर्घर्चादिः देवदारुः पुंसि । अमु पुरः पश्यसि देवदारुम् । २ ३६ इति रघुः । नपुंसके दारु । दारुणी । दारूणि । फाट दाविन्धनं वेध इत्यमरः ॥ सनोति सुनुते वा । सान: पर्वतकदेशः । सानुः श्रृङगेयुधे मार्गे वात्यायां पल्लवे बने । नान्त० १६, । इति विश्वः । पर्वतकदेशे स्नु प्रस्थः सानुरस्त्रियामिति कचित ।। जायन्ते जनयन्तिवा। जानुर्जयोपरिभागः । क्लीवे जानु । मानुनी । जानूनि । जानूरुपाठीवदस्त्रिया. मित्यमरः । प्रसंभ्यां जानुना ः । पा० ५, ४, १२६ । प्रक्षुः प्रगतजानुक संक्षुः संइतनानुक इत्यमरः । ऊर्ध्याद्विभापा । पा० ५, ४, १३० । ऊर्चक्षुरूर्ध्वजानुः स्यात् । द्वानुबन्धक ग्रहणं जान्वित्यत्र अनिवध्योश्च । पा० ७,३, ३५ । इत्यनेन द्धिमतिपयो माभूत् ।। चरति चक्षुरादिष्वितिचारु शेोभनम् ॥ चाटू प्रियं वाक्यम् । चाटूनरि मियोक्तिः स्यादीति रत्नमालाकोशः । चकर च वडुत्तान्मा- द योपिदस्य । ११, ३६ । इति माघः । माघे नपुंसकमपि दार्शतिम् । चाटू चाकृतकसंभ्रममासां कार्मणत्वमंगमन्मणेषु । १०, ३७ । चाटूः पिचिएडे च नु तो चाटूरालापे तत्सममित्युत्पलिनीकोशः । मृगग्वादित्वात्कुप्रत्यये चद् वित्यपि - ( १८४.) * अनुयोगद्वार सूत्र * भवति । चटु चाटु प्रियं वाक्यंमिति हट्टचन्द्रः । वत्सेनौदस्य मानोरचितचटुशतं मोचितः स्वर्गिवर्गेरिति बालरामायणञ्च् ।। इपिलिदोङ, ष्यविभ्यो नक् इक् गतौ । पिञ् बन्धने । जि जिये । दीङ्क्षये। उप दाहे । अव रक्षणे । एभ्यो न स्यात् । इनो राज्ञि प्रभौ सूर्ये । नृपे पत्यौ । नान्ते १, । इति विश्वः सह इनेन वर्तत इति सेना । सेनयाभियात्य भिपेणयति ॥ सिन काणः । जि- नो बुद्धः । जिनः स्यादतिवृद्धेऽपि बुद्धे चाहति जित्वरे । विश्वे नान्त० १, ।। दीनौ दुर्गतः ॥ उष्णभीपत्तप्तम् । ज्वरत्वरेत्यूह । जनमसम्पूर्णम् । सर्वस्वे तु ऊन- यतेरूनमिति साधितम् ॥ सारांश-कु-चा-पा-जि-मि-स्वादि-साध-इन धातुओं को उपमत्यय होजाता हैं तब इनके प्रयोग निम्नलिखितानुसार वनजाते हैं जैसेकि करोतीतिकारुः । चातीवायुतिः ॥ पिवत्यनेन नीषधमिति पायुर्गुदस्थानम् । जयत्यभि भवति रोगानितिजायुरौषधं वैद्योपि । मिनोति प्रक्षिपति देह उष्माणमिति मायुः पित्तम् । स्वद्यत इति स्वादुमिष्टम् । सानोति परकार्यमिति वा स्वकार्यमिति साधुः सज्जनः । इस प्रकार उप प्रत्ययान्त प्रयोग बनते हैं तथा सूत्र में बहुव- चन होने से-रह त्यागे । ष्णशोचे । ककलौल्ये । हल विलेखने । वसनिवासे। इन धातुओं को भी उण् प्रत्ययान्त करने से इस प्रकार प्रयोग बनते हैं जैसेकि गृहीत्वा रहति त्यजति चन्द्रमिति राहुः स्वर्भानुः । स्नात्यङ्ग मिति स्नायुः श- रीरबन्धः । कक्यतेऽनेनति काकु । हल्यतेऽनेनेति हालुदन्तः । सर्वोऽत्रवसति सर्वत्रासी वसति अत्रार्थेवासु ॥१॥ ह-पणु-जन-चर-चट-इनधातुओं को बुण् प्रत्यय होजाता है तब इनके प्रयोग इस प्रकार से बनते हैं जैसेकि दीर्य्यत इति दारु । सनोति सनुत चा सानुः पर्वतैकदेशः । जायन्ते जनयन्ति वा । जानु जङ्गो परिभागः । चरति चक्षुरादिष्वति चारुशोभनम् । चाटु पियवाक्यम् । २ भौर-इक्गतौ षिक्वंधने * अनुयोगद्वार सूत्र * (१८५) जिजये-दीर तपे-उपदाहे-अवरक्षणे इन धातुओं को नक् प्रत्यय होजाता है तब इनके प्रयोग इस प्रकारसे बनते हैं जैसाकि इनः तथा सह इनेन वर्तत इति सेना सिनः फाणः । जिनो जिनेन्द्रदेवः बुद्धो वा । जिनः अतिवृद्धेऽपि बुद्ध अईतिच । दीनो दुर्गतः । उष्ण भीपत्ततम् । इत्यादि अनेक प्रकार से उणादि प्रत्ययों का उणादि वृत्ति विवर्ण किया गया है सो जो शन्द उणादि प्रत्ययान्त हो उन्हें उणादि प्रत्ययान्त कहते हैं तथा जिस शब्द की व्युत्पत्ति किसी प्रकार से भी सिद न होती हो वह उणादि प्रत्ययों से सिद्ध की जाती है इसलिये उणादि मत्ययों का अवश्य ही वोध होना चाहिये फिर क्रियापद जैसे कि करोति, पच- ति, इत्यादि हैं धातु चादि हैं स्वर अकारादि है तथा स्वरपजादि इनका वेत्ता होफर फिर विभक्ति प्रकरण को भी जानना चाहिये तथा कारक विधि को ठी- फ २ मानकर फिर उसके अनुसार वचनानुयोग करना चाहिये जैसे कि । तत्र पञ्चविधः कर्ता, कर्म सप्तविधं भवेत् । करणं द्विविधं चैत्र संमदान त्रिधा मतम् ॥ १॥ अपादानं द्विधा चैत्र तथा धारश्चतुर्विधः । तत्रेति ॥ तत्र तस्मिन् त्रयोविंशतिधति दर्शित कारक चक्रे पञ्चविधः कर्ता, साविधं कर्म, द्विविधं करणम्, त्रिविध संप्रदानम्, द्विविधमपादानम्, चतुर्विधम- धिकरणं चति । सत्र पञ्चविधः कर्ता यया-स्वतन्त्रकर्ता, हेतुकर्ता, कर्मकर्ता, अभिहितकर्ता, अनभिहितकर्ता चेति । तत्राद्योयथा पुण्यं करोति भाद्धः, मैत्री भेजन्ते सन्तः । हेतुका यथा-हितं लभयन्ति विनीतान्धीराः । क्लेशादेव लोकं नियपयन्ति । 'तत्यानको हेतुश्च ' इति हेतुसंज्ञा ।। कर्मकर्ता यथा-स्वयमेव मुच्यन्ते कुशल- युद्धयः । स्वयमेव दृश्यन्ते दुष्टजनदोपाः । स्वयमेव छिद्यन्ते प्राकृतजनस्नेहाः । कर्मवकर्मण तुल्यक्रियः' इति हि कर्मवद्भावः ॥ अभिहितकर्ता यथा-साधकः परार्थमापादयन्ति 'भभिहित प्रथमा' इति प्रथमा । अनभिहितकर्ता यथा-साधु- भिरापायन्ते परार्थाः । 'अनभिहित करि' इति तृतीया ! । २४ ( १८६) * अनुयोगद्वार सूत्र * कर्म सप्तविधं कथम् । इप्सितं. कर्म, अनीप्सितं कर्म, ईप्सितानीप्सितं. कर्म, अकथितं कर्म, कर्तृकर्म, अभिहितं. कर्म, अनभिहितं कर्म चति ॥ तंत्रेप्सितं कर्म यथा-दुर्विज्ञानमपि धर्म विज्ञातुं श्रद्दधात्युदारधीः । कर्तु सीप्सतततं कर्म इति कर्म संज्ञा ॥ (अनभिहित कर्मणि द्वितीया अनीप्सितं यथा-कल्याणमपि धर्म प्रतिपन्ति पापयुद्धयः विपं भक्षयन्ति मुद्राः । तथायुक्त चानीप्सितम् इति कर्मसंज्ञाः ॥. ईप्सितानीप्सितं यथा-पायसं भक्षयस्तत्र पतितं रजोऽपि भक्षयति वालकः॥ अकथितं यथा-गां दोग्धि-पयो गोपालकः । यज्ञदत्त याचते कम्बल ब्राह्मणः । इशितार भिक्षते सुवर्णमाकिञ्चन । ब्रजमवरुणादि गां गोपालः । उपाध्यायं पृच्छति शास्त्र शिष्यः। वृक्षमवचिनोति फलानि दारकः । शिष्यं प्रवीति धर्म गुरुः । 'गतिवुद्धि-' इत्यादिना कर्मसंज्ञा ॥ अभिहित कर्म थथा कटाः क्रियते देवदन्तेन ॥ अनभिहितं कर्म यथा-कटं करोति देवदत्तः। कतमद्विविधं करणम् । बाह्यमाभ्यन्तरं चेति ।। शरीरावयवादन्यद्यत्तद्वाएं यत्तदाभ्यन्तरम् । यथा मनसा पाटलिपुत्रं गच्छति देवदत्तः । चक्षुपा रूप गृह्णाति नरः । साधकतमं करणम् इत्यनन करणसंज्ञायां कर्तृकरणयोस्तृतीया इति तृतीया कत्तमंत्रिीव, सम्पदानम् । प्रेरकमनुमन्तृकम निराकर्तृक चति ॥ तत्र प्रेरक यथा ब्राह्मणाय गां ददाति धार्मिकः । स हि ब्राह्मणो मनसाय गां मयं देहि इति प्रेरयति तस्मात्प्रेरक मित्युच्यते ॥ अनुमन्तृकं यथासूर्यायाध्यं ददाति पुरुषः । स. सूर्यो न मेरयति न निराकरोति तस्मादनुमन्तृकः ॥ अनिराकर्तृक यथा पुरुषोत्त- माय पुष्पं ददाति पुरुपः स पुरुषोत्तमोमयं पुष्पं न ददातीति न मार्थयते, नानुमन्यते न निराकरोति तस्मादनिराकर्तृकमित्युच्यते । कर्मणायमभिप्रति इति संपदानसंज्ञायाम् चतुर्थी संपदाने इति चतुर्थी u : . कतमविविधमपादानाम् । चलमचलं चेति ॥ तत्र चलं . यथा धावतो रथात्पतति सारथिः । परिधावतो । हस्तिनोऽङकुशं धारयन्पवत्या धोरणः ॥
* अनुयोगद्वार सूत्र * (१८७) अचलं यथा-ग्रामा दागच्छति देवदतः । पर्वतादवतरान्त महर्षयः । ध्रुवमपाये उपादानम् इत्यपादानसंज्ञायाम् अपादाने पञ्चमी' इति पञ्चमी ।। कतमञ्चतुर्विधमधिकरणम् । व्यापकमौपश्लेषिकं वैषयिक सामीपिकं चेति । तत्र व्यापक यथा-तिलेषु तैलं व्यासम् । औपश्लेपिकं यथा-कट आस्ते पुरुषः । शकट आस्ते ब्राह्मणः । वैषयिकं यथा-चनेषु शार्दूला वसन्ति ॥ सामीपिकं यथा नद्यां वसति घोपः । आधारोःधिकरणं" इत्यधिकरण संज्ञायां " सप्तम्यधिक- रणे च इति सप्तमी.॥ करोति कारक सर्व तत्स्वातन्त्र्य विवक्षया ।। ३ ।। करोतीति कारकमित्यन्वर्थसंज्ञा तर्हि कर्तेच कारकसंज्ञो भवति नैतरे । अ- त्राच्यते । तान्यपि कारकाऐयव,कुतः, तद्व्यापारेपि स्वातन्त्र्यविवक्षायां प्रतिकारक स्वातन्त्र्यं विचक्ष्यते । अतः कर्मकरणसंप्रद्रानापादाना धिकरणानामपि कारक सिद्धम् ॥ ३॥ तत्र कर्तर्यभिहिते प्रथमैत्र विधीयते । तृतीया वाऽध वा षष्ठी स्मृताऽनाभिहिते द्विधा ॥ ४ ॥ तत्रेति ॥ तत्र कर्ट कर्मकरणसंप्रदानापादानाधिकरणेषु मध्ये अभिहित कर्तरि प्रथमैव भवति । यथा । पचत्यो दनं देवदत्तः ।। अनभिहिते कर्तरि द्वे विभक्ती भवतः । तृतीया वा अथवा पष्ठीति । तत्र तृतीया यथा । आदेनः पच्यते देवदत्तेन । कर्तृकरण- योस्तृतीया " इति तृतीया" । पष्ठी यथा परलोकहितस्य सेवितव्यो धर्मः । परलोकहितेन वा सेवितव्यो धर्मः । 'कृत्यानां कर्तरि वा इति षष्ठी ।। तथा कर्मण्यभिहिते, विभक्तिं विद्धि पूर्विकाम् अनुक्ने प्रथमां हित्वा पंचमी सप्तमी तथा ॥ ५ ॥ तथति ॥ यथाभिहितें कर्तरि प्रथमा तथा कर्मण्यभिहिते प्रथमैव भवति । यथा प्रोदनः पच्यते देवदत्तेन । आहारो दीयते देवदत्तेन ॥ अनुक्त इति ।। अ. नुक्ने कमणि प्रथमां पंचमी सप्तमी वर्जयित्वा शपाश्चतस्त्रो विभक्तयो भवन्ति । काः (१८८) * अनुयोगद्वार भूत्र * शेषाः । द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, षष्ठी चेति ।। तत्र द्वितीया यथा-ग्रामंगच्छति पुरुषः कर्मणि द्वितीया' तृतीया यथा-पुत्रेण सजानीते पिता । पुत्रसज्जानीत इत्यर्थः । संज्ञोन्यत्तरस्यां कर्मणि" इति तृतीया । चतुर्थी यथा-ग्रामाय ब्रजति पुरुष । 'गत्यर्थ कर्मणि इति चतुर्थी षष्ठी यथा-कटस्यकारको देवदत्तः । कर्तृकर्मणोः कृति ' इति पष्ठी ।।५।। तृतीया पश्चमी चैव पष्ठी च करणे विधा। तृतीयेति ॥ तृतीया यथा-परशुना वृक्षं छिनात्ति देवदत्तः ' कर्तृकरणयो- स्तृतीया ।। पञ्चमी यथा-स्तोकान्मुक्तः स्तोकेन मुक्तः । इति तृतीया ।' करणे च स्तोकाल्पकृच्छ्कातिपयस्यासत्ववचनस्य इति पञ्चमी ॥ पष्ठी यथा-घृतस्य सजानीते मित्रं वृतेन मित्रं प्रेक्षत इत्यर्थः 'ज्ञोविदर्थस्य करणे' इति पष्ठी ॥५॥ षष्ठी चतुर्थी तृतीया संप्रदान तथा त्रियां ॥६ षष्ठीति [ षष्ठी यथा-पुनपण मृगश्चन्द्रमसो दातव्यः । चंद्रमसे दातव्य इत्यर्थः । चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ' इत्ति संप्रदाने पष्ठी ॥ चतुर्थी यथा-लुधिता यौदनं ददाति देवदत्तः । चतुर्थी संप्रदाने इति चतुर्थी ।। तृतीया यथा दास्या माला संप्रयच्छते । युवा दास्यै माला ददानीत्यर्य । समस्तृतीया इति सूत्रे दाणश्च सा: चेचतुर्थ्यर्थे इति तृतीया, उभयमनेसंभाव्यते । तृतीयाविभक्ति रात्मनेपदविधानं च यदययोगस्तृतीयायुक्ताहाणः । दाणश्च सा चेचतुर्थ्यर्थे इत्यात्मनेपद मनुशास्ति अशिष्टव्यवहार तृतीया चतुर्थ्यर्थे भवतीति वक्तव्यम् । अशिष्ठ व्यवहारो धूर्तव्यवहारः ॥ ६ ॥ पञ्चमी खल्यपादाने वर्तते न ततोऽन्यथा सप्तम्येवाधिकरणे कारकस्यैव संग्रहः ॥७॥ पञ्चमी इति ॥ पञ्चमी यथा-पर्वतावतरन्ति महर्षय | अपादाने पञ्चमी ।। : . सप्तम्यवेति । सप्तमी यथा-ग्रामे वसति । सप्तस्यधिकरणे च 'इति सप्तमी।। .
* अनुयोगद्वार मूत्र * ( १८६) कारकस्येति । दिमात्र प्रदर्शितम् ।। कारक संग्रहो विस्तरेण वृत्यादिपु द्रष्टव्य इति ।। सारांश-पांच प्रकार का कता, और सात प्रकार से कर्म, दो प्रकार से करण और नि प्रकार से संपदान होता है दो प्रकार से अपादान और चार मकार से आधार होता है पष्टी को कारक संज्ञा नही है क्योंकि-पष्टी के पल सम्बन्ध में ही होती है इसलिये कारक छ ही हैं क्योंकि कारण उसे कहते हैं जिसको क्रिया स्पर्श मानहो इनका पूर्ण विवर्ण ऊपर संस्कृत में किया जा चुका है हिंदी में इसलिये विस्तार नहीं किया है इसका संस्कृत बहुत हो सुगम है सो इसी का नाम विभक्ति प्रकरण है ।। ...फिर अकारादि वर्ण त्रिकाल ( भूत भविष्यत वर्तमान ) दश प्रकार का सत्यवचन संस्कृत १ प्राकृत २ मागधी ३ पेशाची ४ शौरसेनी ५ अपभ्रंश दृगय और पद्य के करने से द्वादश प्रकार की भापायें और पोड़श प्रकार प्रत्यक्षादिवचन इनके सीखने की भगवान् की श्राज्ञा है क्योंकि सत्यवचनानुपेोग के लिये ही शब्द नय का उक्त कथन है इसलिये ही श्री स्थानाङ्ग सूत्र के दशवें स्थान में दश प्रकार से शुद्धवचनानुयोग कथन किया गया है जैसे कि-........ दसविहे सुद्धावायाणु जोगे पणते तंजहा चंकारे मंकारे पिंकारे सेयंकारे सायंकारे एगत्ते पुडचे संजूहे संकामिए भिन्ने ।। दसेत्यादि ।। शुद्धा अनपेक्षितं घाक्यार्था यावाक् वचनं सूत्र मित्यर्थ स्तस्था अनुयोगो विचारः शुद्धवागनुयोगः सूत्रेचाऽवद्भावः प्राकृतत्वा तत्र चकारा दिकायाः शुद्धवाचो यो नुयोगः स च- फारा दिरेव व्यपदेश्य स्तत्र ॥ चंकारेत्ति । अत्रा नुस्वारो लाक्षीण को यथा ।। मुक्कसणिचरे इत्यादौ ।। ततश्चकार इत्यर्थ स्तस्यचानुयोगो यथा च शब्दः समा हारेत रेत रयोगसमुच्चयान्वा चया बंधारण पाद पूरणाधिक वचनादिष्यत्रि तत्र ।। इत्थो औस यणाणियत्ति । इह सूत्रे चकारः समुच्चयार्थः स्त्रीणां शय नाना चा- परि भोग्यता तुल्य त्व प्रतिपादनार्थः ॥ मंकारोति ।। मकारानुयोगो यथा ॥ स- (११०) * अनुयोगदार मूत्र * मणवामाइणवति ।। सूत्रे मा शन्दा निषेधे अथवा जेणमेव समणे भगवं महावीर तेणामेवेति ॥ अत्र सूत्र आगमिक एव यनने त्यनेनैव विवादित प्रतीनेमिति २॥ पिंकारेति ॥ अकार लोप दर्शनेना नुस्त्राराग मनचा पि शब्द उक्त मनुदनुयांगो यथा भपि सम्भावनानिवृत्य पेक्षा समुच्चय गाँशिक्षाम पणभूषण प्रश्नविनि तत्र ॥ एवं पिएगेआसासे || इत्यत्र सूत्रे एवमपि अन्यथा योति प्रकारान्तर समु. चयार्थोऽपि शब्द इति ३ ॥ संयकारोत्ति ॥ इहा प्याकारोऽलाक्षणिकस्तेन सकार इति तदनुयोगो यथा ।। सेभिक्खेवे ।। त्यत्र से शब्दोऽयार्थोऽय शब्दश्च प्रक्रिया प्रश्नानन्तय मगलोष न्यास प्रतिवचन समुचयेष्टि त्यानन्तर्यार्थः से शब्द इति कचित् तस्येत्यर्थो ।। ऽथवा संयंकार इति ॥श्रेय इत्येतस्य करणं श्रेयस्का श्रेयस उच्चारण मित्यर्थ स्तदनुयोगो यथा ॥ सेयमे भहिन्जिी अज्झयण ॥ मित्यत्र सूत्रे श्रेयोऽतिशयेन मशस्यं कल्याण मित्यर्थोऽयवा । सेयकाले अकम्पवा विभ- वइ ।। इत्यत्र सेप शब्दो भविष्यदर्थः ४ ॥ सायंफारति मायमिनि निपातः स. त्यार्थ स्तस्मा द्वात्किार इत्यनेन छान्दसत्वा स्कार प्रत्ययः करणं वा कार स्ततः सायंकार इति तदनुयोगो यथा सत्यं तथा बचन सद्भाव प्रश्नप्विीत एतेच चका- रादयो निपाता स्तेपा मनुयोगगभणनं शेपनि पातादिशन्दानुयोगी पलक्षणार्थ मिति !! एगत्तेत्ति । एकत्व मेकवचनं तदनुयोगो यथा सम्यग्दर्शन ज्ञान चारि- त्राणि मोक्षमार्ग इत्यत्रैकवचनं सम्यग्दर्शनादीनां समुदितानामे के पोषाग- वख्यापनार्थ मसमुदितत्वेत्व मोक्षमार्गतति प्रतिपादनार्थ मिति ६ ॥ पुहमति ॥. पृथक्नं भेदो द्विवचन बहुवचने इत्यर्थ स्तदनुयोगो यथा ।। धम्मत्यिकाए धम्मस्थि- कायदे से धम्मत्थिकायापदेसा ॥ इह मूत्रे धर्मास्तिकाय प्रदेशा इत्येत हुवचनं तपा मसंख्या तत्वख्यापनार्थ मिति ७ ॥ संजूहेति ॥ संगतं युकार्य यूयं पदानां पदयो पी समूहः सयूथं समास इत्यर्थ स्तदनुयोगो यथा सम्यग्दर्शन शुदं सम्य- ग्दर्शनेन सम्यग्दर्शनाय सम्यग्दर्शनाद्वा शुदंसम्यग्दर्शन शुद्ध मित्यादि रनेकधीत ॥ संकामियत्ति ॥ संकामित विभाक्ति नयनाद्यन्तर तथा परिणामिनं तदनु- योगो यथा साहुणवन्दणेणं नासइपावं असं कियाभावा ॥ हर साधना मित्ये .
* अनुयोगद्वार सूत्र * (१६१) तस्याः षष्टयाः साधुभ्यः सकाशादित्येवं लक्षणं पञ्चमोत्वन विपरिणामं कृत्वा अशंकिताभावा भवतीत्ये तत्पदं सम्बन्धनीयं तथा अच्छंदाजेन भुति न से बाइत्ति बुचड़ ॥ इत्यत्र सूत्रेन सत्यागी-त्युच्यत इस्येक वचनस्य बहुवचनतया परिणामं कृत्वा नते त्यागिन उच्यते इत्येवं पद घटना कार्येति ॥ ६ ॥ भिन्न मिति क्रमकान भेदादिभिभिन्नं विसदृशं तदनुयोगो यथा विविइंति विहेण मिति ।। संग्रह मुक्का पुन मणेण मित्यादिना तिविहेणंति विस्त मिति क्रम भिन्नं क्रमेणहि तिविह मित्ये तन्न करोमी त्यादिना विवृत्त्य तत त्रिविधनेति विवरणीयं भवतीति अस्यच क्रम भित्ररथा नुयोगोयं क्या क्रम विवरणहि यथा संख्यदोप: स्यादिति तत्प- रिहारार्थ क्रमो भेद स्तथाहि नकरोमि मनसा नकारयामि वाचा कुर्चतं नानुजा- नामि कायेनेति प्रसज्यत अनिष्टश्चै तत्मत्येक पक्षस्यै वेष्टत्वा तथाहि मनः प्रभृ. तिभिनं करोमि तैरेव न तुजानामीति तथा कालतो भेदो तीतादिनिर्देश प्राप्ते वर्तमाना दिनिर्देशो यथा जम्बूद्वीप प्रज्ञप्त्यादिषु ऋषभ स्वामिन माश्रित्य । स- केदे विदेदेवण्या वंदइ नमसइत्ति ॥ सूत्रे तदनुयोगश्चायं वर्तमान निर्देश स्त्रिका लभाविष्वपि तीर्य करेचे तन्न्याय प्रदर्शनार्थ इति इदंच दोपादि सू वत्रय मन्य यापि विमर्श नायं गभीरत्वा दस्येति वाग नुयोगत स्त्वर्थानुयोगः प्रवर्तत इति । भावार्थ-दर्श प्रकार शुद्ध वचनानुयोग प्रतिपादन किया गया है जैसे कि चकारानुयोग १ चाव्य यकिनन २ अर्थों में व्यवहृत होता है इस प्रकार बोध होने पर फिर यथा स्थान च अव्यय का अनुयोग करना चाहिये, अनुस्वार केवल प्राकृत के लासणिक के लिये ही है मंकारे २ मा शब्द किन २ अर्थों में संघटित है जैसाकि समणंवा माहणंवा" इस सूत्र में "मा शब्द निषेध के लिये विद्यमान है तथा " जेणा मेव समणे भगवं महावीरे तेरणा मंच" इस सूत्र में मकार प्पिा अर्थ में व्यवहत है इसलिये मकार के अर्थों को ज्ञाता होकर फिर मकारानुयोग करना चाहिये पिंकारे ३ अपिशब्द किन २ अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है जैसेकि-आपसंभावनायाम् समुच्चय गर्ना शिष्या ।
(१९२), * अनुयोगद्वार सूत्र * मर्षण भूषण प्रश्नादि में भपिशब्द आता है इसलिय: इस का उकि २ घोष होने पर फिर इसका अनुयोग करना चाहिये ।.. सेयकार ४ से शब्द मागधी भाषा में अथ शब्द का वाची है जैसाफ " सेकिंत" अथ किंतत् तथा अन्य अर्थों में भी व्यवहृत हो जाता है इस लिये से शब्द के अर्थों को जान कर फ़िर इसका प्रयोग करना चाहिये। सायंकार -५-सात् निपात का प्रयोग भी यथा स्थान करना चाहिये कको कि यह निपात बहुत से अर्थो व्यवहृत होता है। एगचे ६. एकवचन- का अनुयोग करना चाहिये जैसेकि-सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्ष मार्ग:- इस. सूत्र में एकवचन का अनुयोग किया गया, इस लिये यथा स्थान एक वचन का जो अनुयोग किया जाता है उसे वचनानुयोग कहते हैं पुडुत्ते ७ । पृथक् २ वचनों का अनुयोग करना जैसे कि धम्मस्थिकाय धम्मस्थि कायदेसे धम्मत्थि पएसा" जहाँ पर प्रदेश शब्द को बहुवचन इस लिये दिया गया है कि प्रदेशअसरूपे हैं इसलिये यया स्थान पुहुत्त शब्द के अर्थों को जानकर इसका प्रयोग करना चाहिये। : संजूहें -जो पद विग्रह किया जाता है उसे संयूय पद कहते हैं अर्थात् समासान्त जो पद है उनको समासान्त करके दिखलाना उसे ही संथूय पद कहते हैं । संकामिए ह-विभक्तियों का जो संक्रमण किया जाता है उसे संक्रमण कहत हैं इस लिये संक्रमण के साथ जो पद चनते हैं उन्हें संक्रमनानुयोग कहते हैं। भिन्न १०-काल भिन्नानुयोग जैसे कि-भूत भविष्यत वर्तमान काल के वंचनों को यया योग्य परिर्वतन करना उसे भिन्नानुयोग कहते हैं इन दश सूत्रों का विस्तार पूर्वक विवर्ण दृति में लिखा जा चुका है ..
* अनुयोगद्वार मंत्र
(१६३ )
इसलिये इनका संक्षप से विवर्ण किया है असएर दशं सूत्रों के जब पूर्ण अर्थो
को जाना जाए फिर उनी फे अनुमार भाषण किया जायं सब शुद्ध वचना
नुयोग होता है इस लिये सदैवकाल इनका अभ्यास करके वचन ‘गुमिका
फरना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है शप व्याकरण के प्रकरणों का प्रागे विवर्ण
किया जायगा । अब पांच नाम के पश्चात् पट् नाग का विवर्ण किया जाता
किन्तु छ नाम में पट् भावों का अधिकार है इसलिये भावों का विवेचन करते हैं।
अथ पट भाव विपय ।
सेकित छनामे २ छबिहे पं० तं० उदइए १ उपसमिए
२ खइए ३ खउपसमिए ४ पारिणामिए ५ सन्निवाइए ६
सेकिंतं उदइए २ दुविहे पं० तं० उदइएय उदय निष्फनेय
सेकिंतं उदय २ अढण्हं कम्म पगडीणं उदयएणं सेत्तं उदयो .
सेकितं उदय निष्फन्ने २ दुविहे पं० त० जीवोदय निष्फन्नेय
अजीवोदय निष्फन्नेय. सेवितं जीवोदय निप्फन्ने २ अणेग
विहे पं० त० (नेरईए ). १ तिरिक्खजोणिए २ मणुस्से ३
देवे ४ पुढाविकाइए ५. श्राजकाइए ६ तेऊकाइए ७. वाऊका-
इए ८ वाणुस्सइकाहए ६ तस्सकाइए १० कोहकसाय ११
माणकसाए १२ मायाकसाए १३ लोभकसाए १४ करहलेसा
१५ नीललेसा १६ काउलेसे १७ तेउलेसे १८ पम्हलेसे१६.
नुकलेसे २० इत्थिवेदए २१ पुरिसवेदए २२ नपुंसकवेदए २३.
मिच्छदिट्ठी २४ असन्नी २५. अन्नाणी २६ श्राहारए. २७ अविः
१ द्वारेवा प्रा. व्या. प्र.पा । सूत्र ७६ ॥
द्वाराने मामा बामपनि कनेरहयो नारहयो ।
(१६४ ) * अनुयोगद्वार मन * रए २८ सजोगी. २६ संसारत्थे. ३० छउमत्थे ३१ प्रसिद्ध ३२ः- अकेवली ३३ सत्तं जीवोदय निष्फन्ने सेकितं अजीवोदय निफने २ अणेग विहे पं० त० उरालिय वासरीर १ उरालिय सरीरप्पउगपारिणामियादव्वं वेउब्वियं वासरीरं ३ वेउब्धिय- सरीरप्पउगपरिणामियादव्वं ४ श्राहारगंवासरीरं ५ आहारग सरीरप्पउगपरिणामियं वादव्वं ६ तेयगवासरीरं ७ तेयगस- रीरपभोगपरिणामिश्रा वादब्वं ८ माहारगसरीरं ६ माहा-- रंगसरीरप्पउगपरिणामियंवादव्वं पयोगपरिणामिए , वाणे. गंधे.१३ से १३ फासे १४ सेत्तं अजीवोदय निफन्ने सेत्तं उदय निष्पन्न सेत्तं उदइएं नाम ॥ पदार्थः-(सेकित छनामे २ छच्चिई पं. तं.) वह पद नाम कौनसे हैं। (उत्तर) पद नाम के प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं जैसेकि ( उदइए १ उक्सपिए २ खइंए ३ ख उपसमिए ४ पारिणामिए ५ संनिवाइये ६ ) उदय शई से ठसा प्रत्यय करने से औदयिक भाव होजाता है. क्योंकि उदय भवं औयिकं । अर्थात् जो. उदय करके भोगा जाय उसे औदायिकं कहते हैं अतः नाम में जो भाव शब्द ग्रहण किया गया है वह केवल नाम और भाव अभेदो. पचार के ही मत से है क्योंकि नाम और भाव में परस्पर, अभेद भी होता है। इसी लिये औदयिक भाव शब्द ग्रहण किया गया है अथवा यथोक्तं उदय करके, जो नाम उत्पन्न होता है उसे औदयिक भाव कहते हैं .१ द्वितीय औपशामक भाव है.वह भी ठण् प्रत्ययान्त है क्योंकि. औपशतिक भाव उसे कहते हैं जो प्रकृतियाँ: नतो तय हुई हैं और नहीं प्रौदायिकं भाव में हैं. उन्हें औपशमिक भाव कहते हैं भस्माच्छादित अग्निराशिवत् २ क्षायिक भाव भी ठण् प्रत्यया- न्त है जो कौकी सर्व प्रकृतियें तय होगई हो उसे क्षाविक भाव कहते हैं ३ ३. अनुयोगदार सूत्र * यदि कुछ प्रकृतियें क्षय होगई हों और कुछ उपशम हुई हों तो उसे क्षयोपशम भाव कहते है ४ जो परिवर्सन शील हो उसे. परिणामिक भाव कहते हैं ५ जो औदायकादि भावों से मिलकर भंग बनाए जाते हैं उसे सन्निपात्त भाव कहते हैं। अथ उदय भावका सविस्तर स्वरूप लिखा जाता है ( सेकिंत उदइय २ दुविहे पं० त० उदयए उदयनिप्फनेय ) (प्रश्न ) अब वह औदयिक भाव कौनसा है ( उत्तर ) औदयिक भाव द्विप्रकार से प्रतिपादन किया गया हैं जैसीक-एकता प्रौदयिक भाव द्वितीय औदयिक निष्पन्न भौव अर्थात् एकनो उदय में रहने वाली प्रकृतियें द्वितीय उनके जो फल भोगने में आते हैं उन्हें औदयिक निष्फ- नभाव कहते हैं इस प्रकार से गुरुके कहने पर शिष्यने फिर प्रश्नं किया कि- (सेकित उदइय २. अठण्डं कम्पपगडीणं उदयणं सेत्तं उदंड्य ) हे भगवन् ! औदायिक भाव किसे कहते हैं गुरुने. उत्तर दिया कि है. शिष्य ! जो आठ कोः की प्रकृतिय हैं वह औदायिक भाव में हैं और उन्हें ही औदायक भाव कहते हैं ( सेकित उदइय निष्फने २ दुविह पं० २० ) ( प्रश्न ) औदायिक निष्फों भाव किस प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) औदायिक निष्पन्न भाष द्विपकार से वर्णन किया गया है जैसेकि (जीवोदय निष्पनेय अभीवोदय निष्फ- नेय) जीवके उदय से निष्पन्न और अनींव के संदर्य से निप्पन अर्थात् जो कर्मों के प्रभाव से जीवके भावों से निष्यन्न होता है उसे जीवोदये निष्पन्न क. हते हैं जो अनीव से फल निष्पन्न हों उन्हें अजीवोदय निष्पन कहते हैं अब प्रथम जीवोदय निष्पन्न का विवेचन करते हैं यथा (सेकिंतं जीवोदय निप्पो य २ अणेग विहे पं० २० (प्रश्न) जीवोदयं निष्पन्न भाव कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) जो मूल कर्मों की प्रकृतियों के प्रभाव से जो जीवांदय भाव है वह अनेक प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसेकि. ('नेरह- य? विरिक्त जोणिए २ गणुस्से ३ देव ४) नैरपिक, गार्व १ तिर्यम् योनिकभाव २ मनुष्य - भाव ३ और देवमात्र ४ इसी प्रकार (पुदविका इए. ५ आजकाइए ६. तेउकाइए ७ बाऊफाइण: ८. वणस्सइकाइए ** अनुयोगदार मूत्र * ६ तस्सकाइए १० ) पृथ्वीकायिक १ जलकायिक २ अग्निकायिक ३ वायुकायिक ४. वनस्पतिकायिफ ५ प्रसफायिक .१० और (कोद कसाए ११ माण फसाए १२ माया फसाए १३ लोभ कसाए १४) क्रोध काप, मान कषाय, माया (ब) कपाय, लोभ कषाय १४ (फएइ लसा १५ नील लेसा १६ फाज लेसे १७ ते लेसे १८ पम् लेसे १६ सुधा लेरो २०) कृष्ए लेश्या १५ नील लेश्या १६ कापोत लेश्या १७ तंजु लेश्या १६ पन लेश्या १६ शुक्ल लेश्या २०, सौर ( इत्यिवेदए २१ पुरिसवेदए २० नपुंसगदए १३) स्त्री वेद २१ पुरुष बेद २२ नपुंसकवेद २३ (पिच्छदिहि २४) मिथ्या दृष्टि २४ (श्रमणि २५) असंही भाव २५ (अनाणी २६.) आशालता २६ ( माहारए २७ ) आहारक भाष २७ ( अविरए २८) अंब. तभाष २८ ( सजोगी २६) योगयुक्त होना २६ (संसारत्ये ३०) सांसारिकमान ३० ( छउपत्ये ३१ ) छास्थभाव ३१ ( प्रसिद्ध ३१ ) असिद्ध भाव और ( अफेवली ३२ ) अवली भाव ३३ ( सत्त जीवोदयनिप्पन्न ) सो वही जीवोदय निरूपन्न भात्र है. अब जी- वोदय के पश्रात् अजीबोदय के फल वर्णन करते हैं ( सेक्षितं अजीवोदय निष्फको २ अणेगविहे पं० सं० (अथ शब्द भाग्यत् है (प्रभ) पर अजीनो. दए निष्फन्ने भाव कितने प्रकार से वर्णन किया गया है (उत्तर) अनीवोदय भाव अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है क्योंकि जो शरीरादिक का द्रव्य है वह अजीय द्रव्य का ही समूह है इसलिये उसको अंजीवोदय निष्फश कहा गया है पास्तव में तो यह भी जीवोदय भाव में है किन्तु विशेष पर्यायों की अपेक्षा प्रयोग द्रव्य अजीवोदय निष्पन्न माना गया है अब इसी बात को सूत्र- कार दिखलाते हैं (उरालिय वासरीरं १) वा शब्द परस्परापेक्षा के वास्ते है मनुष्य और तिर्यम् का मच से प्रधान औदारिक शरीर १. और (उरालियः सरीपरमपरिणायियं दध २) औजारकःशरीर के योग्य पारिणायिक प्रयोग द्रव्य अर्थात् औदारिक शरीर के योग्य ५ वर्ण २ गंध ५ रस ८ स्पर्श और * अनुयोगद्वार सूत्र ( १९७) श्वासांच्यासादि के योग्य द्रव्य हैं उन्हें औदारिक शरीर प्रयोग पारिणामिक द्रव्य कहते हैं इसीप्रकार आगे भी समझना चाहिये (वेरब्धिय सरीरं ३) वै. त्रिय शरीर ३ और (वेटब्धिय सरीर पयोग परिणामियंदच्वं ४) वैक्रिय शरीर प्रयोगिक पारिणामिक द्रव्य ४ (पाहारगं वा सरीरं ५ ) आहारिक शरीर ५ ५ और (आहारग सरीर पयोग परिणामियंवादचं ६ ) श्राहारिक शरीर के पारिणामिक द्रव्य ६ ( तेयग वा शरीरं ७.) तेजस् शरीर ७ (तेजस् सरीर पओग परिणामियं वादव्यं ८) तेजस शरीर प्रयोगिक. पारिणामिक द्वन्य ८ ( कम्पयं सरीरं ६ ) कार्मण सरीर है और (फम्म सरीर परोग परिणामियं वादग्नं १०) कार्मण शरीर प्रायोगिक परिणार्मिक द्रव्य १०) शिष्यने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! प्रयोग परिणाम क्या है गुरुने प्रति वचन में कहा कि भो शिष्य ! ( पग परिणामिय) प्रयोग परिणामिक द्रव्य उसे करते हैं जो जीव ने ग्रहण किया हुआ द्रव्य है क्यों कि प्रयोग १ मिस्सा २ विरोमा ३ यह तीनो प्रकार से द्रव्य प्रयोग वह होता है जो जीवन ग्रहण किया है पिस्सा चह होना है जो जीवन छोड़ दिया हो (विसेसा, उसे कहते हैं जो अपने आप परिणमनशील ही जैसे वादलादि सो प्रयोग परिणामिक द्रव्यसै परिणमन हुए हैं (वएणे ५) पांच वर्ण (गंध २) दो गंध (. रसे.५). ५ रम (फासे) ८ स्पर्श ( मेरो भनीचोदयानिष्फन्ने ) सो. यही अजीवोदय निष्पनभाव है क्योंकि यह सर्व ५ शरीर और पांचों के परिणामिक द्रव्य :अजीवोदय निष्पन्न हैं (सेत्तं . दय निष्फन सेत उदयनायो ) सो वही पदय निम्पन और इसे ही औदयिक नाम कहते हैं। नांट-१ औदयिक, २ औपशमिक, ३ क्षायिक, ४ तायोपशामिक व ५ पारिणामिक इन पांच भार के उत्तर भेद ५३ होने हैं सो इस प्रकार हैं । औदायिक के उत्तर भेद २१, औपशमिक के २, क्षायिक के ६, क्षायोप- 'शमिक के १८, पारिणामिक के ३ सब मिलकर ५३ उत्तरभाव. हुए.
(१९८) * अनुयोगद्वार मूत्र * ;" औदायिक भार के २१ भेद इस प्रकार हैं-४ गति, ६, लेश्या, ४ कपाया २ वेद, १ अज्ञान, १ प्रसिद्धपन, १ मिथ्यात्वपन, १ अविरतिपन. औपशमिक भाव के २ भेद-१ उपशम समकित, २ उपशम चारित्र. क्षायिक भाव के ह भेद-१ दानलद्धि, २ लाभलदि, ३ भोगलद्धि, ४ उप भोगलदि, ५ वीर्यलाद्धि, ६ केवलज्ञान, ७ केवलदर्शन, ८ क्षायिक समकित, पक्षायिक चारित्र. : क्षायोपशम के १८ भद-दानादिक, ५ अंतराय, १० उपयोग, १ यो- पशमसमकिन, १ सयोपशपचारित्र, १ देशविरतिचारित्र. पारिणामिक के ३ भेद-१ जीव पारिणामिक, २ भव पारिणामिक, ३ अभवपारिवामिक. उपर्युक्त ५३ उत्तरभाव का वासठिया लिखते हैं। गाथा-४ गइ, ५ इंदिय, ६ काए, ३ जोग, ३ वेय, ४ कसाय, ८ नाणेसु, ७ संजम, ४ देसण, ६. लेश्या, २ भव, ६ समे, २ सन्नी, २ आहारे । अर्थः-४गति, ५ इन्द्रिय, ६ काय, ३ योग, ३ वैद' ४ कषाय, ८ ज्ञान (५ ज्ञान और ३ शशान) ७ संयम, ४ दर्शन, ६ लेश्या, २ भव्य तथा अभ- ज्य ६ शम, २ संझी तथा असंही, २ आहारक व अणाहारक इन ६२ मार्गणा के ऊपर ५ मूल भाव व ५३ उसर भाव वतलाते हैं।
* अनुयोगद्वार मूत्र * (१६६) १० . - १ १ १ ع ع ع ع ل س ل سه w . ० . . ० ० ० mmmmmmmxS १४ ; १३ उत्तर भावक मूल उत्तर उदय उपशम तायिकाक्षयोपशम पारिणामिक ऊपर मार्गणा के ६२ भाव भावभाव भाव भाव भाव भाव. द्वार कहते हैं। २१ २ है २ १ | नरकगति १ ३३१३ १ २ विर्थचगति २ ३६ १८ १ १६ ३ | मनुष्यगति ३ १८.२ ह ४ . देवगति ४ ३७ १७ १५ ५ एकेंद्विय १ २५ १४ बैंद्रिय २ ३ २६ १३ '१० ७ तेंद्रिय ३ २६ १३ चौरिद्रिय ४ २७-१३ 8 पंचेंद्रिय ५ ५३ २१ ૨ १. पृथ्वी १. २५ १४ अप २ २५ १४ १२ । तेउ ३ २१ १३ १३ २४१३ वनस्पति ५ २५१४ १५ ५३ २१ २ है मनजोग १ ५ ५३ २१ है १८ वचन जोग २ ५ ५३ २१ १८ काया जोग ३ ५३ २१ १८ १६ स्त्रीवेद १ ४११८ १८ २० पुरुप बंद २ ५ १८ २१ नपुंसक वेद ३ ५ ४१ २२ क्रोध १ ५ ४५ (२१ २३ मान २ ४५२१ माया३ ५: ४५ २१ २५ लोभ ४५ १२१ २६ पतिज्ञान १ ५ ४५ | १६ १५ २७ २ २८ अवधि ३ ४८१ १५ मनः पर्यव ४ ३४ १५ २ १४ ३० केवल ५ ३ १४ ३ ह ३१ मति अ०६ ३ .३५ ૨૨ ३ ३५२१ ११ . س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س ع س م ر ل . هي سر سعی १७ १८ HI .. श्रुत०२ ०० श्रुत अ०७ • vowww ~~ ( २००) * अनुयोगद्वार मूत्र * ५६ उत्तर भाव के मूल | उत्तर उदय उपशमक्षायिकालयोपशम पारिणार्मिक ऊपर मार्गणा के ६२ | भाव | भाव भाव भाव भाव भाव भाव द्वार कहते हैं। ५ ५३२१ २ है १८ ३३ | विभंग ३ ३५ २१ ११ ३४ सामागिक १ ३३ १५ १ १४ ३५ छेदापे स्थापनीयर ५ ३३ १५ १ १४ ३६ । परिहारविशुद्ध ३, ५ २६ /११ १ ३७ । सूक्ष्मसंपराय ४ 4 २१ ४ १ १ १३ ३८ यधाख्यात ५ २८ ३ २ १२ ३९ । देश विरति ६ ३३ । १६ १३ ४० असंयम ७ ४१ | २१ १५ ४१ चक्षुद०१ २१२१ २ ४२ अचक्षु०२ २१२१ २ १८ ४३ अवधि३ २१ | २१ १८ ४४ केवल ४ ३ १४ ३ ४५ कृष्ण १ ३६ १६ ४६ नील २ ३६ १६ १८ ४७ कापोत ३ २९ /१६ १ ४८ तेजु ४ ३८ । १५ ४६ पझ ५ ५ ३८.१५ ५० शुक्ल ६ ४७/१५ २ 8 ५१ भव्य १ ५२ | २१ २ ५२ अभव्य २ ३ ३४ २१ ५३ उपशम १ ३८१६ २ १४ ५४ क्षयोपशम २ ३ ३६ ११४ १५ ५५ चायक ३. ४५ १६ १४ ५६ मिश्र ४ ३ ३३ २० ११ ५७ सास्वादन ५ ३ ३२ १६ ११ ५८ मिथ्यात्व ६ ३ ३५ | २१ . ११ ५९ संज्ञी १ १८ ६० असंज्ञी २ २६ १५ ११ ६१ आहारक १ ५३२१ २ २ १८ ६२ अयाहारक २ ५ ५०२१ २ 8 १५ मार्गणा ६२ ६२ ६२] ४२ ६० ६२ १ NMMOMomwowo.ov Mar 00.00Arr or mmm orm No.'oo' or mmm md . . ~~~~ * अनुयोगद्वार मूत्र * (२०१) भावार्थ:--पदनाम में पट् भावों का विवरण किया गया है अतः भाव और नाम में अभेद माना है इसी लिये नाम पद में भावों का विवर्ण है जैसे कि- औदायिक भाव १ श्रीपशमिक भाव २ क्षायिक भाव ३ क्षयोपशम भाव ४ पारिणामिक भाव ५ सनिपातिक भाव ६. औदयिक भाव उसे कहते हैं जिससे कों की प्रकृतिय उदय होकर कमी का फल दें औपशमिक भाव उसका नाम है जो कर्म न तो क्षयं हुए हैं और न उदय भाव में हैं इस लिये उन्हें उपशम भाव कहते हैं २ यदि कर्म क्षय हुग हो तो उसे नायिकभाव कहते हैं ३ यदि कुछ तय हुए हैं और कुछ उपशमभाव में हैं उन्हें क्षयोपशम भाव कहते हैं ४ जो द्रव्य परिणमनशील हो उन्हें पारिणामिक भाव कहते है ५ अपितु जो इन के संयोग होने से नाम उत्पन्न होता है उसे सन्नि- पातिक भाव माना गया है फिर उदय भाव दो प्रकार से माना है जैसे कि-एकनो श्रीदयिक भाव-द्वितीय श्रादयिक निष्पन्न भाव-श्रादयिक भाव में आठों कर्मों की सर्व प्रकृनिय हैं और प्रौदायिक निप्पन्न भाव दो प्रकार से माना गया है क्योंकि जो वस्तु उदय होती है उसका फल अवश्य होता है उसे उदयनिप्पन भाव कहने हैं वह भी दो प्रकार से हैं एक तो जीवोदय-द्वितीय अजीवादय-जीवोदय उसे कहते हैं जो जीव की शक्ति से पर्याय उत्पन्न हों जैसे कि चार गतियें पदकाय चतुर कपायें तीनों वेद पद् लेश्यायें 'मिथ्याष्ट्रिभाष अवनभाव असंज्ञिभाव अज्ञानभाव पाहारिकभावं छद्मस्थ भाव संयोगभाव संसारभाव प्रसिद्ध और अकेवलीभाव यह सर्व पाठों कर्मों की प्रकृतियों के ही फल हैं और इनके सहचारी ५ निद्रा हास्यादि सर्व और प्रकृतियें भी जान लेनी चाहिय लश्यायें इस लिये औदायिक भाव में हैं कि योगों के संबंध होने से ही लेण्याओं की उत्पत्ति है इसलिये अन्य सर्व प्रकृतियें भी ग्रहण करनी चाहिय यह सर्व जीवोदय निप्पनभाव है और अजीवोदय निष्पन्नभाव उसका नाम है जिसमें प्रयुक्त द्रव्य परिणाम को प्राप्त हों उसको अजीवोदय निष्पन्न भाव कहते हैं जैसे कि पांच शरीर पांच शरीरों का परिणमनशील द्रव्य और वर्ण ५ गंध २ रस ५ स्पर्श ८ पूर्वोक्त यह मर्च द्रव्यों के कारण से ही परिणत होते हैं इस लिये उन्हें अभीवोदय निप्पन्न भाव माना गया है साथ ही अन्य द्रव्य शरीरों के सहचारी भी जान लेने चाहिये और यह भी जीव के कर्मादय से ही प्राप्त होते हैं किन्नु विशप पुद्गलद्रव्यक सम्बन्ध होने से इनको अजीवोदयनिष्पा (२०२) * अनुयोगद्वार सूत्र * भाव माना गया है अतः इसी स्थान पर औदयिकभाव का समास सम्पूर्ण हो गया है अब इसके पश्चात् औपशमिकभाव का विवर्ण किया जाता है ।। ॥अथ औपशमिकभाव विपय ॥ मूल-सेकिंतं उपसमिए ? २ दुविहे प. सं. उवसमेय उव समनिप्पन्ने यसकिंतं उवसमे २मोहणिजस्स कम्मरस उवसमेणं सकिंतं उवसम निप्पन्ने ? २ अणेगविहे प. तं. उवसंतकोहे वसंत. माणे उवसंत माया उवसंतलोभे उवसंतपेज्जे उवसंत दोसे उवसंतदंसणमोहणिज्जे ७ उवसंत चरित्त मोहणिज्जे ८ उव संतियासम्मत्तलंद्धि उवसमिया चरित्तलाद्ध १० उवसंत कसाय उमंत्थे वीयरांगे ११ से तं उत्सम निप्पन्ने सेतं उवसमिए- नामे ॥ पदार्थः-( सेकिंत उपसमिए ? २ दुविहे प० त० ) अब वह कौनसा है औपशमिक भाव ? (उत्तर) औपशमिक भाव दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (उपसमेय उवसमनिप्पन्नेय ) उपशमभाव और उपशमनिष्पन्न.. भाव च पाद पूरणार्थ है (सेंकिंतं उव्यसमे २) वह उपशमभाव कौनसा है ? (मोहणिज्जस्तकम्मस्स उवसमेणं) (उत्तर) मोहनीय कर्म की अष्ठाविंशति प्रकृतियों का उपशम श्रेणी में उपशम होजाना उसे उपशम-भाव कहते हैं णं इति वाक्या लंकारार्थ में है (सेकिंतं उवसमनिप्पन्ने २) (प्रश्न) वह उपशम निप्पन्न भाव कौनसा है ? (उत्तर) उपशमनिष्पन्न भाव ( अणेगविहे प० २०) श्पनेक प्रकार से प्रतिपादन किया गया है क्योंकि मोहनीय कर्म की प्रकृतियों उपशम होने से जो फल उपलब्ध होते हैं उन्हें उपशमनिष्पन्न भाव कहते हैं सो वह फल निम्नलिखितानुसार हैं ( उवसंतकोहे १ उवसंतमाणे २ उव- संनमाया ३ उवसंतलोभे ४) क्रोध का उपशान्त होजाना जैसे भस्माच्छा- ? १ पम-छम-मूर्ख-द्वारे-वा। प्रा. व्या० अ०८ पा० २ सू० ११२॥ • • ए संगुन.स्थान्त्य, स्यानान, पूर्व उंदा भवति ॥
* अनुवोगदार मूत्र * (२०३) दित अग्नि होती है तद्वत् क्रोध होना इसी प्रकार मान माया लोभ और (पेज्ने ५ उपसंतदोसे ६ वसंतदसणमोहणिज्ने ७ उपसंत चरित्तमोहणिजे ८) उपशान्त राग ५ उपशान्त द्वेष ६ उपशान्तदर्शनमोहनीय कर्म ७ उपशान्त चारित्र मोहनीय कर्म ८ ( उपसमिया सम्मत्तलद्री ९ उपसमिया चरित्तलदी १०) उपशान्त सम्यवत्यलब्धि ह उपशमचारित्रलब्धि १० (उव- संतकसायछ उमत्ववीयरागे ११) उपशान्तकपायछास्थवीतराग जो एकादश गुणस्थानवी जीव है (सेत उवसमनिप्पन सेतं उपसमिये नामे ) सो वही उपशमनिष्पन्नभाव है और इसे ही उपशम नाम कहते हैं। भावार्थ:-श्रीपशमिक भाव भी दो प्रकार से वर्णन किया गया है एक तों उपशम द्वितीय उपशमनिष्पन्न । उपशम उसे कहते हैं जिस के द्वारा मोहनीय कर्म की भष्टाविंशत्ति प्रकृतिय भस्माच्छादित अग्निवत् उपशम हों द्वितीय उपशम निष्पन्न उसका नाम है जो मोहनीय कर्म के उपशम होने से फलों की प्राप्ति हो जैस कि चारों कपायों का उपशम होना राग और द्वेष का उपशम होना और दर्शनमोहनीय कर्म का उपशम होना चारित्रमोहनीय कर्म का उपशम. होना और इन दोनों के फल उपशम सम्यक्त्वलब्धि और उपशमचारित्रलब्धि का प्राप्त होजाना अर्थात् शंकादि का उपशम होना और उपशान्त कषाय . छास्थ वीनराग पद का प्राप्त होना यह सर्व उपशम भाव के फल हैं इन्हें उप- शाम निष्पन्न भाव कहते हैं। उपशम भाव का प्रतिपक्ष क्षायिक भाव है इसलिये अवसायिक पशाव का विवर्ण किया जाता ॥अथ क्षायिक भाव विषय ।। मूलः-सर्कितं क्खइए ? २ दुविहे प० त० खइएय खइय निप्पन्नेय सेकिंतं खहए? २ अट्ठएहं कम्मपगडीणं क्खएणं सेतं क्खइए सेकिंतं क्खइय निप्पन्ने २ उप्पन्ननाणदलणधरे अ.. रहा जिण केवली खीणाभिणीवोहियनाणावरणे १ खीणेसुय नाणावरणे २ खीण उहीनाणावरणे ३ खीण मर रज्जवना- गावरणे ४ खीण केवलनाणावरणे ५ अणावर निरावरणे - (२०४) * अनुयोगद्वार सूत्र * खीणावरणे नाणावरणिज्जेकम्मविष्पमुक्के केवलदसी सव्वदंसी खीणनिदेइ खीणनिहानिद्दे खीणपयले खीणपयलापयले खीणथीणनिद्धी १० खीणचक्खुदसणावरणे ११ खीण अच- खुदसणावरणे १२ खीण उहीदसणावरणे १३ खीण केवल- दंसणावरणे १४ अणावरणे निरावरणे खीणांवरणे दरिसणा- वरणिज्जस्स कम्मस्स विष्पमुक्के खीण सायावयणिज्जे १५ खीण असायावेयणिज्जे १६ अवेयणे निव्वेयणे खीणवयणे सुभानुभवेयणिज्जे विप्पमुस्के खीणकोहे खीणमाणे खीणमा- या खीण लोभे २० खीणपेज्जे २१ खीणदोसे २२ खीणदंसण मोहणिज्जे २३ खीणचरित मोहणिज्जे २४ अमोहे निमाहे खीणमोहे मोहणिज्जे कम्य विप्पमुक्के खीण नेरइयाउए २५ खीण तिरियाउय २६ खीणमणुयाउय २७ खीण देवाऊय २८ अणाउए निराउए खीणाउय आउयकम्मविप्पमुक्के गइ जाई सरीरं गोवंग बंधण संघायण संघयण संहाण अणेग वोंदि- विंद संघाय विप्पमुक्के स्त्रीण सुभनामे २६ खीण असुभनामे ३० अनामेनिन्नामे ३० खीणनामे सुभासुभनामकम्म विप्पमुक्के खीण उच्चा गोए ३१ वीण नीयागोए ३२ अगोए निगोए खीणगोए सुभा सुभ गोत्तकम्म विप्पमुक्के खीणदाणंतराय,३३ खीण लाभ अंतराय ३४ खीण भोगान्तराय ३५ खीण उ. वभोगान्तराय ३६ खीणवारियांतराय ३७ अणन्तराय खीण अंतराय कम्मरप्त विप्पसुक्के सिद्धे बुद्धे मुत्ते परिनिबुडे अं- तग सव्वदुख पहीणे सेत्तं खड्य निप्पन्ने सेत्तं खइय नामे. पदार्थ (सेकित खइए? २ दुविहे प००) (प्रश्न) वह नायिकभाव कौनसा है। वित्तर) क्षायिकभाव दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि (खइपय * अनुयोगद्वार सूत्र * (२०५) खइय निप्पन्नेय ) एक क्षायिकमाव द्वितीय ' क्षायिकनिप्पन्न भाव (सेकिंतं खइय? २ (प्रश्न) क्षायिक भाव किसे कहते है? (उत्तर) अपडं कम्म पगडीणं खइयणं से क्खइय) आठ कर्मों की प्रकृतियोंका क्षय होजाना उसे नायिक भाव कहते है क्योंकि क्षायिक भाव उसी का नाम है जो सर्व कर्म प्रकृतियों से रहित हो । अब तायिक निप्पनका वर्णन करते हैं (सतिं खड़य नि- पन्ने २ ) ( प्रश्न ) क्षायिक निप्पनभाव किसे कहते हैं? ( उत्तर ) नायिकनिष्पन्नभाव के निम्र लिखिन लक्षण है? ( उप्पन्न नाणदमणधरे ) निनको ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय के तय होने के कारण से ज्ञ.न और दर्शन उत्पन्न हुआ है इसलिये उत्पन्नज्ञानदर्शन के धरने वाले ( अरहानिंग केवली ) सर्व के पूजनीय अहन् फिर राग द्वेप के जीतने से जो जिन कहलाए हैं और सम्पूर्ण प्रान के कारण से जिन को केव- ली कहा जाता है और जो पाठों कमी की प्रकृतियों को क्षय कर के फिर उन के फल को माप्त हुए हैं वह सिद्ध है अब प्रथम ज्ञानावरणीय कर्म की प्रकृतियों का विवर्ण करते हैं यथा (खीरणाभिणि वाहियनावावरणे ) तीण किया है आमिनिवाधिक झान का प्रावरण और ( खीण सुय नाणा वरणे) तीण है जिन के श्रुनज्ञानावरणे (खीण प्रोहिनाणावरणे ) क्षीण हैं जिन के अवधिज्ञानावरण ३ वीणमणपजवनाणावरणे ) तीण है मनःपर्यय ज्ञाना चरण ४ (खीण केवल नागापरणे ) क्षीण है केवलज्ञानावरणे ५ (श्रणा- ज्ञानावरणे ) आवरण से रहित हैं निरावरणे ) निवरण हैं ( खीणावरणे ) जिनका आवरण क्षीणता को प्राप्त होगया है जब कि यावरण सर्वधा क्षीण है तब (नाणावरीणजे कम्मविप्पमुक्के) ज्ञानावरणीय कर्म से विषमुक्त हुए अर्थात् ज्ञानावाणीय कर्म की पांचों प्रकृतियों के आवरण तय करके केवल के धारक हुए फिर पर्वथा श्रावरण क्षीण करके कंवल दर्शन भी प्राप्त इस लिये दर्शनावरणीय कर्म की प्रकृतियों का विवर्ण करने हैं (केवलदंसी- सम्बदंसी) ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय होने से केवल ज्ञानी होकर फिर दर्शना वरणीय कर्म के क्षय होने से केवलदर्शी और सर्वदर्शी हुप है अब इन की प्रकृनियों का स्वरूप कहते हैं ( खोगनिदे ६) जिन्हों ने निद्रा क्षीण की है। निद्रा उसका नाम है जिसमें मुखपूर्वक सो कर अपनी इच्छानुसार उठे ६ और (खीगनिहानिहा, ) जिन्हों ने क्षीण की है निद्रानिद्रा क्योंकि-निद्रा (२०६॥ * अनुयोगद्ववार सूत्र * निद्रा उसे कहते हैं जिसमें सुखपूर्वक सोकर दुःखपूर्वक जागृत अवस्था को प्राप्त होवे ( खीण पयले ८ ) और जिसन शीण. की है प्रचला नामक निद्रा जो वैठेहुए को भी आजाती है ८ ( फिर खीणपयलापयला :) क्षीण की प्रचलाप्रचला-जो निद्रा चलते समय भी प्राप्त हो जाती हैं और ( खीण याण- निद्धि १० ) क्षीण है जिनके स्तीलागिई जो महा अशुभ कर्मों के उदय से जीव को होती है ( खीणचखुदसणावरणे ) क्षीण हो गया है चक्षुओं का आवरण ११ (खीण अचक्खुदंसणावरणे ) क्षीण है चक्षुभिन्न इन्द्रियों का आवरण अर्थात् चार इन्द्रियों के प्रावरण भी क्षीण हो गये हैं १२ ( खीण उहीदसणावरणे १३ ) क्षीण है. जिनके अवधि दर्शना वरण १३ और ( खीण केवलदसणावरणे १४ ) केवलदर्शनावरण भी चय होगया है इसलिये ( अणावरणे ) अनावरण है (निरावरणे) निरावरण है (खोणावरणे ) क्षीण आवरण- है ( दरिसणावरणनिजकम्मस्सविप्पमुके ) इसलिये दर्शनावरणीय कर्म से विममुक्त है अर्थात् जो दर्शनावरण कर्म के आवरण है उन्हों से रहित होगया है इस वास्ते सर्वदर्शी शब्द ग्रहण किया है अब वेदनीय कर्म का स्वरूप कहते हैं । ( खीण साया वैयणिज्जे १५ खीण असाया वेयणिज्जे १६) क्षीण है शाता वेदनीय कर्म १५ और क्षीण है अशाता वेदनीय कर्म १६ क्योंकि वेदनीय कर्म के क्षय होने से शाता वेदनीय और अशाता वेदनीय यह दोनों प्रकृतियें तय होगई हैं । फिर आत्मिक सुख प्रकट होगया है क्योंकि यह दोनों प्रकृतियें विनाशवती हैं सो वेदनीय कर्म के तय होने से ( अवेयणे निवेयणे खीणवेरणे ) वेदना से रहित हुए। जिनकी वेदना चली गई है अपितु क्षीण वेदना होगई है फिर ( सुभासुभवयाणज्ज कम्मविप्पमुक्के) शुभाशुभ वेदनीय कर्म से रहित हुए अतः वेदनीय कर्म से पीछे अव मोहनीय कर्म का स्वरुप लिखा जाता है. ( खीण कोहे खीण माणे खीण माया खीण लोभे २०) तय हो गया है क्रोध मान माया लोभ २० ( खीण पेज्ने २१ खीण दोसे २२) क्षीण होगये हैं राग और रेप फिर (खीण दसणमोहणिज्जे २३) जिनके दर्शनमोहनीय कर्म की तीनों प्रकृतियें चय हो गई हैं जैसे कि सम्यक्त्व मोहनीय १.मिश्र मोहनीय २ मिथ्यात्व मोहनीय तथा (खीण चरित्तमोहणिज्जे २४) चारित्र मोहनीय कर्म की भी दोनों प्रकृति क्षय हो गई हैं जैसे कि कपाय और नो कपायों के १६ भेद हैं नो * अनुयोगद्वार सूत्र * (२०७), कपायों के हास्यादि नत्र भेद हैं २४ इसलिये ( अमोहे निमोहे खीणमोहे ) मोहनीय कर्म के क्षय होने से अमोह निर्मोह और क्षीणमोह हो गये हैं अतः ( मोहणिज्जे कम्मविष्पमुक्के ) मोहनीय कर्म से विप्रयुक्त हो गये अर्थात् मोहनीय कर्म से सर्वथा रहित होकर फिर आयुप कर्म से रहित हुए इसलिये। अव आयुकर्म की प्रकृतियों का विवर्ण करते हैं (खीण नेरईयाउए २५ खी- ण तिरियाउए २६ खीण मणुयाउए २७ खीण देवाउए २८) क्षीण करदी हैं नरकायु तिर्यक् अायु मनुष्य आयु और देवायु जव चारों प्रकार से आयु तय करदी तव ( प्रणाउए निराउए खीणाउए) अनायु हुए निरायु हुए अपितु क्षीणायु हुए फिर ( अाउए कम्मस्स विप्पमुके) आयुकर्म से सर्वथा विम मुक्त हुए अर्थात् आयु कर्मो के बंधनो से छूट गये फिर नाम कर्म की प्रकृतियों से भी रहित हुए जिन का विवर्ण निम्न लिखितानुसार है .( गइ जाइ शरीर गोवंगवं धण संघायण संघयण संहाण अणेगवोधि विंद संघाय विप्पमुक्के) नामकर्म के उदय से ही शरीर की रचना है इसलिये इनकी सर्व प्रकृतियों का विवर्ण किया गया है जैसे कि चार गतियें पांच जातियें पांच शरीर तीनों के अंगोपांग ५ वंधन ५ संघातन ६ संहनन ६ संस्थान अनेक प्रकार के शरीरों का वृन्द और उनके संघात सर्व प्रकार से विमुक्त हुए अर्थात् नामकर्म की प्रकृतिय क्षय करी फिर (खीण सुमनामे २८) क्षीण कि- या शुभ नाम २८ और (खीण अशुभनामे ३०) क्षीण कर दिया है अशुभ नाम जैसे अनादेञ्ज नामादि ( अनामे निन्नामे खीणनामे ) इसलिये अनाम निर्नाम और. क्षीणनाम हुए अतः ( खीण मुमासुभनामकम्मविप्पमुक्के ) क्षीण कर दिया है शुभाशुभ नाम इसी वास्ते नाम कर्म से रहित हुए फिर खीण उच्चागोए ३१ (खीण नीयागोए ३२ ) गोत्रकर्म के क्षय होने से ऊंचगोत्र और नाचगोत्र भी क्षीण कर दिया है इस लिये ( अगोए निगोए खीणगोए सुभासुभगोत्तकम्मविप्पमुक्के ) गोत्रकर्म के क्षय होने से अगोत्र-निगोत्र क्षीणगोत्र हो गये अंतः शुभाशुभ गोत्र कर्म के बंधन से मुक्त हुए फिर (खीण दाणंतराय. ३३) अंतराय कर्य के क्षय होने से दानांतराय भी तय कर दी (खीण. लाभांतराय ३४ ) क्षीण की है लाभांतराय. ३४: खीण भोगांतराय ३५.) तय करदी है भोगांतराय: ३५ फिरः( खीण उव भोगांतराय ३६) क्षीण करदी है उपभोगांतराय, जो वस्तु पुनः पुनः आः (२०८) * अनुयोगद्वार सूत्र * सेवन करने में आती है उन्हें उपभोग कहते है (खीण वीरियंतराय ३७) क्षीण की है बल वीर्य की अंतराय जव अंतराय कर्म की पांची प्रकृतियें तय हो गई तव ( असंतराय ) अंतराय रहित हुए ( नाणंतराय ) नही रही है मिन के 'अंतराय ( खीणतराय अतः क्षय हो गई है सर्वथा अंतराय पुनः ( अंतराय कम्मस्सविप्पमुक्के ) अंतराय कर्म के बंधनों से मुक्त हुए इस लिए (मिद्धे बुद्धे मुत्ते परिवीवुडे अंतग , जो आत्मा क्षायिक भाव वाले हैं उनको सिद्ध, बुद्ध, मुक्त शीतलीभूत दुःखों के अंतकर्ता ( सव्वदुक्खप्पहीणे) सर्व दुखों से रहित ऐसे कहते हैं अर्थात् उनको उक्त नामों से कहाजाता है (सेतं .खड्य निप्पन्ने सेतं खइय नामे) अथ शब्द प्रागवत है वही क्षायिक निष्पन्न भाव है और इसे ही क्षायिक नाम कहते हैं सो इसी स्थानोपरि क्षायिक भाव का समास. पूर्ण हो गया है इस के आगे क्षयोपशम भाव का विवर्ण किया जाता है। भावार्थ-सायिक भाव दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि एकतो तायिक भाव द्वितीय क्षायिक निष्पन्न भाव है क्षायिक भाव उसे कहते हैं जि. ससे आठों कर्मों की प्रकृतियों का क्षय हो और क्षायिकनिष्पन्न भाव उस का नाम जो आठों कर्म की प्रकृतियों के तय होने से सुख का अनुभव किया जाता है जैसे कि-मतिज्ञानावरणीय १ श्रुतज्ञानावरणीय २ अवधिज्ञानावरणीय ३ मनःपर्यवज्ञानावरणीय ४ केवलज्ञानावरणीय ५ इन. पांचों के क्षय होने से जीव सर्वज्ञ हो जाता है फिर निद्रा १ निद्रानिद्रा २ प्रचला ३ प्रचला पूचला ४ स्थीनगिद्धि निद्रा ५ चक्षुदर्शनावरणीय ६ अचक्षुदर्शनावरणीय ७ अवधिदर्शनावरणीय ८ केवलदर्शनावरणीय ६ इन प्रकृतियों के क्षय होने से जीव सर्वदर्शी होजाता है और शातावेदनीय और अशातावेदनीय के क्षय होने से जीव वेदनीय कर्म से रहित होता है फिर क्रोध मान माया लोभ राग और द्वेष सभ्यत्व मोहनीय मिथ्यात्व मोहनीय मिश्र मोहनीय १६ कपायों नव नोकपायों के क्षय करने से जीव क्षीणमोहणीय कहा जाता है पुनः नरकायु तिर्यग् आयु मनुष्य आयु देवायु के क्षय करने से जीव निरायु हो जाता है अतः चारों गतियां पांचजांतियां ५ शरीर तीनों के अंगोपांग ५ बंधन ५, संघातन श्लेष रुप ६ संहनन ६ संस्थान अनेक प्रकार की शरीरों की आकृतियां और शुभनाम अशुभनाम को क्षय करके जीव क्षीण नाम वाला हो जाता है अर्थात् अपने निज स्वभाव अमूर्ति भाव में आ जाता है क्योंकि नाम कर्म * अनुयोगद्वार मूत्र * (२०१) सूत्रधार ( बढई ) के समान शरीर की रचना करता है फिर ऊंच गोत्र और नीच गोत्र की प्रकृतियों को तय करने से जीव अगात्रिक हो जाता है फिर दानां तराय लाभान्तराय भोगान्तराय उपभोगान्तराय वलवार्यान्तराय इन पांचों प्रकृतियों के क्षय होने से अनंत शनि सम्पन्न जीव हो जाता है फिर उस जीव को सिद्ध बुद्ध मुक्त शीतलीभूत सर्व दुखों का अंतकर्ता इत्यादि नाम हो जाते हैं इस लिये इसको क्षायिकभाव कहते हैं और यही क्षयिक भाव का स्व- रूप है अब क्षायिक भाव के पीछे जयोपशम भाव का विवर्ण किया जाता है। ॥ अथ क्षयोपशम भाव विषय ।। मुल-सेकितं खोवसीमए? २९विहे प०० खग्रोवसमिए यखओक्सम निफनेय सेमितं खयोगसमे?२ चाण्हंघाइकम्माएं खओवममेणं तंजहां नाणावरणिज्जस्स दसणा वरणिज्जल्स मोहणिज्जस्म अंतराइस्स खओवसमेणं सेतं खग्रोवसमणं सेकितखग्रोवसमेनिप्पने? अणेगविहेप.तं. खग्रोवसीमयात्रा भिणिवोहियनाणलद्धी खोवसमिया सुयनाणलडीरस्त्रोर समियाओहिनाणलडी खग्रोवस मिया मणपज्जवनाणलद्धी खओवसमियामहअणाणलद्री५ खोवसीमयांसुयअणाणलद्धी ६ खग्रोवसमियाविभंगणाणलद्धी खोरसमिया चरखुदंसण लद्धी ८ एवं अचक्दमणलद्धी श्रोहिदंसणलद्धी १० एवं सम्मदसणलद्धी ११ मिच्छादसणलद्धी१२ सम्ममिच्छादसण ल छी १३ खोवसमिया सामाइयचरितलन्द्री.१४ एवंछेदविट्ठारण लद्धी१५ परिहार विसुद्धियलद्धि१६ मुहुमसपरायलद्धी[१७खो वसमयाचारताचारत्तलद्धि १८ स्वओवसमियादाणलद्धि १९ एवं लाभ२०भोग२१अोवभोग२२खत्रोवसमियावीरियलद्ध २३ खउव समियावालवीरियलद्धी २४ खओवममियापंडियविरीयलद्रि २५
(२१०)
* अनुयोगद्वार सूत्र *
खोवसमियवालपडियलद्धी२६ खओवसामयसोइंदियलद्धि२७
खयोवसमियाचक्खुहंदियलबी२८ खओवसमियाघणिदियलाद्ध
२९ खरोवसमिया जिभिदियलद्धि ३० खओवसामिय फासिंदिय
लछी.३१ खोवसामया आयारधरे ३२ एवं सुयगड़धरे ३३
ठाणांगधरे ३४ समवायधरे ३५ विवाह पाण्णत्तिधरे ३६ एवं
नायाधम्मकहा ३७ आवासगदसा अंतगओदसा ३६ अणुतरो
ववाइयदसा ४० पाराहावागरे ४१ खओवसमिया विवांगसुयधरे
४२ खोवसमिया दिडिबायधरे ४३ खोवसमिया नवपुवधरे
४२ जो चौदसपुव्वधरे १५ खोवसमियागणीवायए ४६ सेतं
खओवसमेनिप्फन्ने सेतं खओवसामिये नासे ।।
पदार्थ-(सेकिंत खओवसमियर दुविहे पं० त०) अब वह क्षयोपशमभाव कितने
प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) क्षयोपशम भाव दो प्रकार से प्रतिपा
दन किया गया है जैसे कि (खोवसभेय १ खओवसम निष्फन्नेय ) एक सयो
पशम भाव द्वितीय क्षयोपशम निष्पन्न भाव (सेकिंतं खोवसमे २ चउघाइणं-
कम्माणं खओवसमेणं तंजहा) (प्रश्न) क्षयोपशम किसे कहते हैं ( उत्तर)
क्षयोपशम भाव उसका नाम है चारों घातिक कर्मों के क्षयोपशम होने से
निष्पन्न होता है जैसे कि- (नाणावरिणज्जस) ज्ञानावरणीय के (दसण
चरणिज्जस्स २) दर्शना वरणीय के २ ( मोहणीज्जस्सइ) मोहनीय कर्म के
(अंतराइयस्स ४) अंतराय के ४ (खोवसमेणं) क्षयोपशम होने से जो
भाव उत्पन्न होते हैं उसे तयो पशम भाव कहते हैं अर्थात जब चारों कर्म क्षयो
पशम भाव में होते हैं तब क्षयोपशम भाव कहा जाता है ( सेतं खोवसमे )
सो वही क्षयोपशम भाव है अर्थात कुछ उक्त कर्म तय हो गये हों और कुछ
उपशम हुए हों तब उसको क्षयोपशम भाव कहते हैं।
॥ अथ क्षयोपशम निष्पन्न का विवर्ण करते हैं ।
( सेकितं खोवसमे निष्फन्ने २ अणेग विहे पं० त०) (प्रश्न) क्षयोपशम
निष्पन्न भाव कितने प्रकार से विवर्ण किया गया है (उत्तर) क्षयोपशम
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२११) निष्पन्न भाव अनेक प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि- (ख खोव- समिया भिणिवोहिय नाणलद्धी १ ) ज्ञाना वरणीय कर्म के क्षयोपशम होने मति ज्ञान की लब्धि उत्पन्न होती है अतः पूर्णतया मति ज्ञान का उत्पन्न. होना यह सापशम भाव का मूल कारण है क्योंकि केवल ज्ञान के बिना ही शेप यावन्मात्र मूत्र दिये गये हैं वे सर्व क्षयोपशम भाव से ही उत्पन्न होते हैं इसलिये आगे सर्व अंको की सम्भावना इसी प्रकार कर लेनी चाहिये (खोवसमिया सुयनाणलद्वी १२ ) क्षयोपशप भाव से श्रुत ज्ञान की लब्धि उत्पन्न होती है (खयोवसमिया ओही नाण लद्धी १३ ) क्षयोपशम से अवीध ज्ञान की लब्धि उत्पन्न होती है ३ (खोवसमिया मएपज्जव नाणलद्धी ४) क्षयोपशम से मनः पर्यय ज्ञान की लब्धि होती है ४ ( खओव समिया मइअणाणलद्धी ५) क्षयोपशम से मति अज्ञान की लब्धि उत्पन्न होती है अत यह नन् समासान्त पद है जो कुत्सित ज्ञान है वही मति अज्ञान है क्यों कि न ज्ञान इति अज्ञान-जो ज्ञान का प्रति पक्ष हो उसी का नाम ' अज्ञान है. अतः व्यवहारिक वस्तुओं को. छोड कर षट् द्रत्यों के विचार में ज्ञान अज्ञान. की भली मकार से परीक्षा हो जाती है इसी प्रकार (खओवसमिया सुयः अणाण लीई ) क्षयोपशम से श्रुत अज्ञान की लब्धि है (खग्रोवसमिया विभंग नाणलद्धी ७ क्षयोपशम से विभंग ज्ञान की लब्धि है अर्थात् अवधि ज्ञान के जो विपरीत हो उसे विभंग ज्ञान कहते हैं और (खओवसमिया चक्खु दसण लद्वी ८) क्षयोपशम भाव से चक्षु दर्शन की लब्धि उत्पन्न होती है (खओवसमिया अचक्खु दंसपलद्वी) क्षयोपशम से अचक्षु चारों इंद्रियों के. दर्शन की लब्धि है ( खोवसमिया ओहि सणलद्धी १०) क्षयोपशम से अवधिदर्शन की लब्धि है १० अथ दर्शन विषय में कहते हैं (खोरसमिया सम्मदस्सपलद्धी ११) क्षयोपशम से सम्यक् दर्शन की लब्धि उत्पन्न होती है. अर्थात् जब मोहनीयकर्म की प्रकृतिय क्षयोपशम होती हैं तव सम्यक् दर्शन उत्पन्न होजाता है इसलिए क्षयोपशम भाव में सम्यक् दर्शन प्राप्त है । ( खोवसामिया मिच्छा दसणलद्धी १२ ) क्षयोपशम से मिथ्या दर्शन की. लब्धि उत्पन्न होती है अतः मिथ्यात्व में रुचि का होना यह भी क्षयोपशम भाक में है (खोवसामया सम्मा मिच्छा दंसपलद्धी १३) क्षयोपशम भाव से मिश्र दर्शन की लब्धि उत्पन्न होती है १३ और (खोवसमसमाईय चरित लद्धी १४) (२१२) * अनुयोगद्वार मूत्र * क्षयोपशम भाव से समायिक चरित्र की लब्धि उत्पन्न होती है १४ ) (खनीय समछेदोवठा वणियाचरितलद्धी १५) क्षयोपशम भाव से छेदोपस्थापनीय चरित्र को लब्धि उत्पन्न होती है.१५ और ( खोवसमिया परिहार विसुद्धि चरित लद्धी १६ ) क्षयोपशम भाव से परिहार विशुद्ध की चरित्र लब्धि १६ इसी प्रकार (सुहुम संपरागलद्धी १७) सूक्ष्म सम्यराग चरित्र की लब्धि और (खोवसमिया चरिता चरितलद्धी १८) क्षयोपशम भावसे ही चारित्रा चरित्र की लब्धि प्राप्त होती है अर्थात् श्रावक वृति का प्राप्त होना यह क्षयोप- शम भाव का महात्म्य है १८ और (खोवसमिया दाणलद्धी १६ ) क्षयोपशम से दान लब्धि होती है १६ (एवं लाभ ) इसी प्रकार क्षयोपशम भाव से लाभ लब्धि होती है २० ( भोगलद्धी २१) भोग लब्धि होती है २१ ( उव भोग २२ ) जो वस्तु पुनः आसेवन करने में आती है उसकी लब्धि भी क्ष- योपशम भाव से होती है २२ (खोवसमिया वीरियलद्धी २३ ) क्षयोपशम भाव से वीर्य की लब्धि उत्पन्न होती है यह सर्व अंतगय कर्म के लयोपशम होने का फल है तथा भेदान्तर विषय में कहते हैं (खओवसमिय वालवीरिय लद्धी २४) चयोपशम से वाल वीर्य की लब्धि उत्पन्न होती है २४ और (खोवसामिया पंडियवीरियलद्धी २५) क्षयोपशम से पंडित वीर्य की लब्धि होती है फिर (खनोव समिया वाल पं० चीरिय लद्धी) २६ क्षयोपशय भाव से वाल पंडित की वीर्य की लब्धि होतीहै २६ अर्थात् जो अज्ञानता से मिथ्यात्व में परिश्रम किया जाता है उसे वाल बीर्य कहते हैं जो ज्ञान से सम्यग् दर्शन में परिश्रम किया जाताहै वे पंडित वीर्यहोता हैं जो देश वृति जन परिश्रम करतेहैं उन्हें वाल पं. वीर्य कहते हैं ३ । और (खोवसमिया सोइंदियलद्धी २७) क्षयोपशम से श्रोतद्रिय की लब्धि प्राप्त होती है और अर्थात जो श्रुत इंद्रिय में सुनने की शक्ति है वह भी क्षयोपशम भाव से होती है इसी प्रकार-(खोवसमिया चक्खिदियलद्धी २८) तयोपशम से चक्षुरिंद्रिय की लब्धि होती है २८ (खओवसमिया घाणिदिय लद्धी २६ ) क्षयोपशम से घ्राणेंद्रिय की लब्धि होती है.२६ (खओवसमिया जिम्मिदिय लद्धी ३०) क्षयोपशम से रसेनद्रिय की लब्धि होती है ३० (खो समियाफां सिदियलद्धी-३१) क्षयोपशम से स्पर्शेन्द्रिय लब्धि होती है ३१ (खओवसमिया आयारघरे ३२) क्षयोपशम से अचारांग सूत्र के धरने की लब्धि होती है अर्थात आचारांग के पठन करने की शक्ति भी क्षयोपशम भाव पर . * अनुयोगद्वार सूत्र * (२१३) निर्भर है इसी प्रकार ( एवं मुयगडे ३३ ) सूत्र कृतांग की लब्धि ३३ ( ठाणां गधरे ३४)स्थानांग की लन्धि ३४ )(समयांग धरे ३५)समवायांग मूत्र के धारने की शक्ति ३५ (विवाह पएणतिधरे ३६ ) विवाह प्रज्ञप्ति के धारने की लब्धि ३६ ( एवं नामा धम्म कहा'३७) इसी प्रकार ज्ञाताधर्म कांग की धारने की लब्धि ३७ ( उवासगदसा ३८) उपासक दशांग के धारने की लब्धि ३८ (अंत गडदसाउ ३६ ) अंतगड़ दशांग के धारने की लब्धि ३६ ( अणुत्तरो वावा इयदसाउ ४० ) अनुतरो वबाइ दशांग मत्र ४० (पराह घागरे ४१ , प्रश्न व्याकरणांग मूत्र ४१ (खोवसमिया विवागधरे ४२) योपशम से ही विपाक मूत्र के धारने की लब्धि और (खओवसमिया दिशीवायघरे ४३) क्षयोपशम से दृष्टि वादांग के धारने की लब्धि उत्पन्न होती है और (खरोव समिया नवपुष्षधरे ४४ ) क्षयोपशम से नव पूर्व पारने की लब्धि ( जावं दस चउपुग्यो ४६ ) यावत चर्दश पूर्व पर्यंत क्षयोपशम से ही धारने की लब्धि होती है अर्शत ११-१२-१३.१४ इन पूर्वी के धारने की लब्धि भी क्षयोपशम भाव से होती है और (खोयसमिया गणी वायतए ५०) क्षयोपशम भाव से गणिपद चा वाचकपद की प्राप्ति होती है क्योंकि पावन्मात्र उपाधिय हैं वे सर्व क्षयोपशम भाव से ही माप्त होनी है ५० (सतं खयोवसमे निष्फन्ने सतं खीवनामिए नामे) सो यही योपशम निप्पन्न भाव है और इसी स्थान पर क्षयोपशम भाव की समाप्ति है क्योंकि कमी क क्षयोपशम भाव से ही उक्त वस्तुओं की प्राप्ति होती है। भावार्थ-क्षयोपशम भाव भी दो प्रकार से वर्णन किया गया. है जैसे कि एकनो क्षयोपशम भाव द्वितीय क्षयोपशम निप्पन्न भाव अतः क्षयोपशम भाव उसे कहने हैं जो चार्गे घातियों कर्म क्षयोपशम भाव को प्राप्त हो जाय तव क्षयोपशम भाव होता है जैसे कि-ज्ञानावरणीय कर्म १ दर्शनावरणीय कर्म मोहनीय कर्म ३ अंतराय कर्म अपितु क्षयोपशम निष्पन्न भाव उसका नाम है जो क्षयोपशम भाव होने पर फलों की प्राप्ति होती है उसको क्षयोपशम निष्प- न भाव कहने हैं सो क्षयोपशम भाव के निम्न लिखित फल हैं चार ज्ञान मान अज्ञान तीन दर्शन तथा सम्यक् दर्शन मिथ्या दर्शन सममिथ्या दर्शन साम यिक चरित्रच्छेदोपस्थानीय चारित्र परिहार विमुद्धि चारित्र सूक्ष्म संपराय चारित्र और क्षयोपशम भाव से चारित्रा चरित्र (देश ति ) की लब्धि पुनः . (२१४) * अनुयोगद्वार सूत्र * पांचों अंतरायों का क्षयोपशम होना इसी प्रकार वाल वीर्य पंडित वीर्य वाल पंडित वीर्य पांचों इंद्रियों की पूर्ण शक्ति का होना द्वादाशांग वाणी का अध्य- यन करना और क्षयोपशम भाव से नव पूर्व से चतुर्दश पूर्व के पठन की शक्ति का होना और गाणि आदि उपाधियों का मिलना यह सर्व क्षयोपशम भाव से फल उत्पन्न होते हैं और इन्हीं को क्षयोपशम निष्पन्न भाव कहते हैं अतः विचार- रणीय इतना ही कथन है कि सम्यग् दृष्टि जीवों को तो ज्ञानादि की लब्धियें उत्पन्न होती है मिथ्या दृष्टि जीवों को तीन अज्ञान मिथ्या दर्शन आदि उत्पन्न होते है और यह भाव संसारी सर्व जीवों को होता है इसका लक्षण यह है कि कुछ प्रकृतियें क्षय हुई हों और कुछ उपशम हुई हों अब इसके पीछे पारिणा- मिक भाव का विवर्ण किया जाता है । ॥ अथ पारिणामिक भाव विषय ॥ मूल-सेकिंतं पारिणामिए भावे २ दुविहे पं० तं० साइय पारिणामिय अणादियः पारिणामिण्य सेकिंतं सादि पारिणा- मिय २ अणेगविहे पं० त० जुन्नासुरा जुन्नघयंजुन्नतं दुल्लाचेव- अभ्भाय अभ्भरुक्खा जुन्नगुलासंझागंधव्व नगराय १ उक्कावाया दिसादाहा विज्जुयागज्जिया निग्घाया जूवाजक्खा लिता धूमिया महियारओग्घाया चन्दोवरागा सूरो वरागा चंदपरि- वेसा सूरपरिवेसा पडिचंदा पडिसूरा इंद्रधणुं उदगमछाकवि हसिया अमोहा वासावास धरागामो नगरो घडो पव्वडपापालो भवणो निरयापासा उरपणप्प भासकरप्पमा वालुपप्पहा पंक प्पमा धूमप्पभा तमातम तमा सोहम्मे कप्पे ईसाणोजाव श्रा- णपपाणप आरणाप अच्चुरागेवज्जए अणुत्तरे इसाप्पभाए परमाणुपोगलेय दुप्पएसिये जावदस पएसेये संखेज पएसिये असंखेज्ज पएसिये अणंत पएसिये सेतंसादिये पारिणामिए सेकिंतं प्रणादिय. पारिणामिए अणेग विहे पं० तं० धम्मत्थि भाव के * अनुयोगद्वार सूत्र * (२१५) काय १ अधम्मत्थिकाय २ अागासस्थिकाय ३ जीवात्थकाय ४ पुग्गलस्थिकाय ५ अद्धासमए ६ लोए ७ अलोय - भवसि- द्धिया : अभव सिद्धिया १० सेतं अणादिय पारिणामिय सेतं पारिणामिए भावे ॥ पदार्य (सेकिन पारिणामिय भावे २ दुबिहे पं० ० ) अब क्षयोपशम पश्चात् पारिणामिक भाव का विवर्ण करते हैं शिप्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् पारिणामिक भाव कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है गुरु कहते हैं पारिणामिक भाव दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि ( साइप पारिणामिए य अणादिप पारिणामिए य) एक सादि पारिणामिक भाव है द्वितीय अनादि पारिणामिक भाव है सादि पारिणामिक भाव उसे कहते हैं जो पुद्गल सादि सान्त भाव में ठहरते हैं उनको सादि पारिणामिक भाव कहते हैं अतः जो अनादि अमादि काल से परिणत हो रहे हैं और द्रव्याधिक नया पेक्षपा तद्धन् रहते हो उन्हें अणादि पारिणामिक भाव कहते हैं अब प्रथम सादि पारिणा मिक भाव का स्वरूप दिखाया जाता है (सेकिंत सादि पारिणामि २ अणेग विहे पं० नं.) (प्रश्न ) सादि पारिणामिक भाव कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ( उत्तर ) सादि पारिणामिक भाव अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे- ( जुन्नमुरा * जुनगुला ) जीर्ण सुरा जीर्ण गुड क्योंकि सादि पारिणापिक उसे कहते हैं जो द्रव्य परिणमन शील होते हैं उन्हें सादि पारिणा मिक भाव कहते हैं जैसे कि जवसुरा के परिणमन की भी आदि है और जीर्ण भाव की भी श्रादि है अर्थात् जब नूतनमुरा उत्पन्न की गई है तब उसमें जीर्ण भाव भी अवश्य है क्योंकि परमाणु परिणमन शील होते हैं जीर्ण शद्ध इस लिये सूत्र में दिया गया है कि जिज्ञासुओं को शीघ्र वोध होजाये इसी प्रकार गुड के भी. स्वरूप को भी जानना चाहिये अपितु जिसका आदि है उस पर्याप का अन भी साथ है इसीलिये ( जुएणंत दुलाचेय) जीर्ण ताण्डल आदि को भी निश्चय ही प्राग्वत् जानना चाहिये अब इसी प्रकार के उदाहरण और भी दिखलाए जाते हैं ।। * नोट--उज्जीणे ॥ प्रा० न्या० म०पा० ॥ सू० १०२ । जीवं शन्दे इत उद् भवति ।
(२१६) * अनुयोगद्वार मूत्र * ( अभ्भाय अम्भ रुक्खा ) वादलों का परिणमन होना तथा वृक्षों के आकार पर वादलों का होजाना (संज्झा) संध्या के समय बादलों का नाना प्रकार से रंगो में परिणमन होना ( गंधर्व नगराय) गंधर्व नगर के समान अाकाश ये वादलों का तथा अन्य प्रकार के परमाणुओं का परिणमन होना ? ( उक्का वाया) उल्कापात आकाश से अग्नि का पतित होना ( दिसा दाहा ] दिग्दाह होना (विज्जुआ).विद्युत् का होना (गज्जिया) गर्जित शब्द होना (निग्याया) निधीत होना तथा ( जुवा) शुक्ल पक्ष के तीन दिन पर्यन्त बाल चन्द्र का रहना अर्थात शुक्ल पक्ष के तीन दिन पर्यन्त चंद्रको वालचंद्र कहते हैं ( जक्खा लितए ) आकाश में यक्षकृत कार्य होने (धमिया ) धूम का होना ( महिया) स्नहका पतित होना तथा श्वतरजादिका होना तथा श्रोसका गिरना (रओग्याया) रजघात का होजाना (चंदोवरागा यूरोचरागा) चंद्र स्यों को ग्रहण लगजाना वहुवचन इसलिये ग्रहण किया गया है कि सार्द्धद्वीपवर्ती द्वीपों में सर्व चंद्र सूर्य। को सम काल में ग्रहण होता है ( चंदपरिवेसा सूरपरिवेसा ) चंद्र सूर्य का परिवप होना अर्थात परिवारक होना (कुंडल होजाना) (पडिचंदा पडिसूरा) दो चंद्र दो सूर्यो का आकाश में दृष्टि गोचर होना ( इंद्र धनु ) इंद्र धनुप का होना ( उदगमच्छा ) उदकमत्स्य उसे कहते हैं जो इंद्र धनुष का खंड होता है ( कवि हसिया) आकाश में भयानक शब्दों का होना तथा वादलों के विना विद्युत् संपतन होना ( अमोहा) आकाश में नाना प्रकार के चिन्हों का दीखना (वासावासधरा ) भरतादि क्षेत्र और हेमवंतादि वर्षधर पर्वत यह सादिपारिणामिक इसलिये हैं कि परमाणुओं की उत्कृष्ट स्थिति असंख्यात काल पर्यन्त होती है फिर वे अवश्यही चलनशील होजाते हैं इसी अपेक्षा से इन को सादि परिणाम में रखा गया है किन्तु द्रव्यार्थिक नायापेक्षा वे भर- तादि क्षेत्र और चून है मतादि पर्वत शाश्वत हैं नित्य हैं अतः पर्यायार्थिक नया पेक्षा से वेसादि पारिणामिक भाव में हैं इसी प्रकार आगे भी संयोजना करनी चाहिये (गामो) शुलक से ( जगात ) सहित होता है ( नगरो ) जो शुलक से युक्त होता है घर (घर) गृह पचड ( पर्वत (पयालो) पाताल कलश (भवण ) भवनपत्यादि देवों के भवन (निरय नरक और नरकों के प्रा. वास (पासाउ) प्रासाद-( रयणप्प भासक्करपमा ) रत्न प्रभाशर्कर प्रभा (वालुप्पहा.पकप्पहा ) वालुप्रभा पंकप्रभा (धूमप्पभा तमप्पभा तमतमा पभा * अनुयोगद्वार सूत्र * (२१७) धूम प्रभातम प्रभातम तमाममा अब देवों का स्वरूप लिखते हैं ( सोहम्मे कम्प) सुधर्म कल्प (ईसाणे) इशान कल्प (जाव आणए पाणा आरणए अच्चुए) यावत् मानत देवलोक, प्राणत देवलेाक, पारण्य देवलोक, अच्युत देवलोक (गेवेजए नव ग्रैवेयक देवलोक (अणुत्तेर ) पांच अनुत्तर विमान और ( इसीप्पभाए.) ईपद प्रभा पृथिवी परमाणु पोग्गले ( परमाणुपुद्गल . वा ( दुप्पए सिए ) द्विपदोशक स्कंध ( जाव दस पएसिए ) यावत् दश प्रदे- शिक स्कंध ( संखेज पपसिप) संख्यात प्रदेशिक स्कंध ( असंखेज. पएसिए ) असंख्यात प्रदेशिक स्कंध ( अणंतप्पएसिए ) अनंत प्रदेशिक स्कंध यह सर्व (सेतं सादि पारिणामिए ) सादि पारिणामिक भाव में है क्यों- कि यह सर्व कवन पर्यायाधिक नयापेक्षा से है अपितु द्रव्यार्थिक नया पेक्षा उक्त सर्व कथन शाश्वत और नित्य है अतः पुद्गल द्रव्य की उत्कृष्ट स्थिति असंख्यात काल पर्यन्त होती है फिर वह परिवर्तन शील हो जाता है इसी लिये उक्त कथन सादि पारिणामिक भाव में रक्खा गया है । अव अनादि पारिणामिक भाव का कयन किया जाता है क्योंकि अनादि पारिणामिक भाव उसे कहते हैं जो अनादि काल से उसी भाव में परिणमन हो रहे हैं कभी भी अन्य भाव में परिणत नहीं होते उस अनादि पारिणामिक भाय कहते हैं जैसे कि ( सेकिंत अणादि पारिणामिए ) अथ सादि पारिणामिक मिक भाव के पीछे शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् १ अनादि पारिणामिक भाव किसे कहते हैं गुरु ने उत्तर दिया कि भी शिष्य ! (अणेग विहे परणत्ते- संजहा ) अनादि पारिणामिक भाव अनक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-(धम्मत्थिकाय) धर्मास्तिकाय १ (अहमस्थिकाय ) अधर्मास्तिकाय २ (पागासत्यिकाय ३) आकाशास्तिकाय ३ (जीवत्यिकाय ) जीनास्तिकाय ४ (पुग्गलस्थिकाय ) पुद्गलास्तिकाय ५ ( अद्धा समय ) काल (लोए ) लोक ( अलोए ) अलोक ८ ( भवसिद्धिया 8 अभवसिद्धिया १०.) भव्य सिद्ध भाव ९ और अभव्य सिद्ध भाव १० अर्थात् भव्य भाव अभव्य भाव अतः मोक्ष के योग्य और अयोग्य यह सर्व सादि पारिणामिक भाव नहीं है अतः एव यह सत्र (सेतं अादिय पारिणामिए सेतं परिणामिए नामे ) अनादि पारिणामिक भाव हैं क्योंकि यह सर्व पदार्थ अनादि काल से स्त्रगुण में ही स्थिन है किन्तु पुद्गल द्रष्य के समान परिवर्बन शील नहीं हैं यदि यह शंका से (२१८) * अनुयोगद्वार सूत्र * उत्पन्न हो कि सादि पारिणामिक भाव में भी सर्व पुद्गल द्रव्य की पर्यायों का विवर्ण किया गया है और अनादि पारिणामिक भाव में पुद्गल द्रव्य को अनादि पारिणामिक भाव में दिखलाया गया है इसका कारण क्या वात का समाधान यह है कि जो सादि पारिणामिक भाव में विवर्ण हैं वह सर्व पर्यायार्थिक नयापेक्षा से सिद्ध हैं अतः जो अनादि पारिणामिक भाव में पुद- गल द्रव्य को सम्मिलित किया गया है इसका कारण यह है कि अनादिकाल पुद्गल द्रव्य परिवर्तन शील है और यह अपना गुण किसी और द्रव्य को नहीं देता इसीलिये इस द्रव्य को दोनों भावों में माना गया है सो इसी स्थान पर पारिणामक. नाम का समास पूर्ण हो गया है और इसी को पारिणामिक भाव कहते हैं। भावार्थ-पारिणामिक भाव दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है सादि पारिणामिक भाव और अनादि पारिणामिक भाव सादि पारिणामिक भाव उसका नाम है जो द्रव्य परिवर्तन शील हैं उनकी नाना प्रकार की आकृतियों का हो जाना उसे सादि पारिणामिक भाव कहते हैं तथा जो पदार्थ द्रव्यार्थिक नया पेक्षा नित्य और ध्रुव है परंतु पर्ययार्थिक नया पेक्षा से अनित्यता भी दिखला रहे हैं उस अनित्यता की अपेक्षा से उन्हें भी सादि पारिणामिक भाव वाले कह सकते हैं अतः अनादि पारिणामिक भाव उसका नाम है जो पदार्थ अनादि काल से अपने गुण में ही स्थित हैं पर गुण में परिवर्तनता नहीं करते सदैव काल अपनी २ पर्यायों में ही रहते हैं उन्हें अनादि परिणामिक भाव कहते हैं अब इनके पृथक् पृथक् उदाहरण कहते हैं । जीर्ण सुरा जार्ण गुड़, जीर्ण घृत, और चांवल, बादल, आकाश में बादलों की वृक्षों की आकृति का होना, संध्या गांधर्वनगर उल्कापात दिग्दाह विद्युत् स्तनित शब्द निर्घात ( रजधूलि ) युव, यक्षाकार, धूममही, रजघात चन्द्रग्रहण सूर्यग्रहण चन्द्र परिवेप सूर्य परिवेष, प्रतिचन्द्र और प्रतिसूर्य, इन्द्र धनुष और उसका खंड आकाश में भयानक शब्द आमोघ और भरतादिवास वर्ष धर पर्वत ग्राम, नगर घर पाताल भूमि भवन नरक प्रासाद ७ सातों नरक स्थान २६ देवलोक सिद्ध शिला परमाणु पुद्गल. यावत् अनंत प्रदेशिक स्कंध यह सर्व सादि पारिणामिक भाव में हैं क्योंकि पर्याय परिवर्तन शील है इसी लिये इनको सादि परिणामिक माना गया है और अनादि पारिणामिक भाव निम्न लिखितानुसार है।
. * अनुयोगद्वार मूत्र * (२१६) पट् द्रव्य लोक अलोक भव्य, अभव्य यह दश अंक अनादि पारिणामिक है अतः यह परिवर्तन शील नहीं है अब इसके आगे सन्निपातिक नाम का विवर्ण किया जाएगा क्योंकि पारिणामिक भाव का स्वरूप सम्पूर्ण हो गया हैं। ॥ अथ सन्निपातिक भाव (नाम ) विषय ।। मूल-सेकिंतं संनिवाइय नामे २ जन्नं एएसं चेव उदइय उवसमिएखड्यखओवसमिपपारिणामियाणं भावाणं दुग संजोएणं, तियसंजोएणं । चउक्कसंजोएणं पंचकसंजोएणं जेणं निप्फज्जइ सव्वे से संन्निवाइए नामे २ तत्थणं दसदुग संजोगा दस तिगसंजोगा पंच चउकसंजोगाए केयपंच सं- जोगा तत्थणं जे ते दसदुग संजोगा तेण इमे अत्थिनामे उद- इएउवसमनिप्फन्ने १ अस्थि नामे उदइयखइगनिष्फन्ने ३ अस्थि नामे उदइय खत्रोवसमनिप्फन्ने ३ अस्थि नामे उदइय पारिणामिएनिष्फन्ने ४ अस्थि नामे उवसमिएखइयनिष्फन्ने ५. अस्थि नामे उपसमिएखओवसमनिप्फन्ने ६ अस्थि नामै उवसमिएपारिणामिएनिष्फन्ने ७ अस्थि नामे खड्यखओव समनिप्फन्ने ८ अस्थि नामे खड्यपारिणामिएनिष्फन्ने । अत्थि नामे खओवसमिएपारिणामिए निष्फन्ने १० कयरे से नामे उदइय उवसमनिप्फन्ने उदइएति मणुस्से उवसंता कसाया एस एं से नामे उदइयउवसमनिप्पन्ने १ कयरे से- नामे उदइयखइयनिष्फन्ने उदइयत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्तं एस णं सेना मे उदइयखइयनिष्फन्ने २ कयरे से नामे उदइय खोक्समनिप्फन्ने उदइयत्ति मणुस्से खोवसमियाई इन्दियाई एसणं से नामे उदइयखोवसमिएनिष्फन्नेश्कयरेसे नामे उदइय . ( २२०) * अनुयागद्वार भूत्र * पारिणामिपं निष्फन्नेउदइयत्तिसगुस्सेपारिणामिएजीवे एसणंसे नामे उदयपारिणमिपीनप्फन्ने ४ कयरे से नामे उवसामिएखइय निम्फन्ने उवसंता कसाया खइयं सम्मत् एस णं से नामे उवस मिये खइयनिष्फन्ने ५ कयरे से नामे उपसमिएखविसमिएनि- एफन्ने वउसान्त कसाया खत्रोवसमियाइं इन्दियाइं एस णं से नामे उपसमिए खोवलमनिष्फन्ने कयरे से नामे उपसमिए पारिणामिएनिष्फन्ने उवसन्त कसाया पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उवसमपारिणामिएनिष्फले ७ कयरे से नामे खड्य खओवसमनिप्फन्ने खइयं सम्मत्तं खओवसमियाइं इंन्दियाइं एस एं से नामे सहय खग्रोवसमनिष्फन्ने ८ कयरे से नामे खइय पारिणामिएनिप्फन्ने ? खइयं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे एस णं से नाले खइयपारिणामिएनिम्फन्ने ९ कयरे से नाम खोक्समियंपारिणापिएनिष्फन्ने खोवसमियाइं इंन्दियाई पारिणामिए जीवे एस. णं से नामे खोवसमिएपारिणामिए निष्फन्ने ॥ १०॥ पदार्थ-(सेकिंतं सनिवाइए नामे २) अब पारिणामिक भाव के पश्चात् सान्निपातिक भाव का विवर्ण किया जाता है क्योंकि सानिपातिक भाव उसे कहते हैं जो औदयिक औपशामिक क्षायिक क्षयोपशम पारिणामिक भावों के मिलने से मंग बनते हैं उन्हें सन्निपातिक भाव कहते हैं इसी बात को सूत्र में स्पष्ट किया है जैसे कि शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! सान्निपातिक किसे कहते हैं (उत्तर) (जनं एएसिं चेव उदइय उपसमिय खइय खआवसामिए पारिणामियाणं भावाणं दुग संजोएणं, तिय संजोएणं, चउक्त संजोएणं, पंचक्क संजोएणं जेणं निप्पज्जइ सच्चे से सन्निवाइए नामे )इन औदयिक २ औपशमिक सायिक ३ सयोपशामिक ४ और पारिणामिक भावों के मिलने से जो द्विक सैयोगी, तीन संयोगी, चार संयोगी, पांच संयोगी भंग वनते हैं उन सक्का सन्नि- * अनुयोगद्वार सूत्र * ( २२१) पातिक नाम होता है परन्तु उनमें से ( दस दुग संजोगा) दश भंग द्विसंयोगी (दसतिग् संजोगा) दश भंग तीन संयोगी होते हैं और (पंच चउक्क संजो- गा) पांच भंग चार संयोगी होते हैं अपितु ( एक्के पंचसंजोगा) पांच संयोगी एकही भंग होता है ( तत्थणं जे ते दस दुग संजोगातेणं इमे ) उन सर्व भंगों में से जो दश भंग द्विक् संयोगी हैं वह इस प्रकार से हैं जो आगे कहे जाते हैं.. (अत्थि नामे उदयिय उवसमनिष्फने ) जो औदयिक और औपशामिक भाव के मिलने से नाम उत्पन्न होता है उसको अस्ति औदयिक औपशमिक सनि- पातिक भाव कहते हैं इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिये ( अत्थि नामे उद- श्य खइय निप्फन्ने २) अस्तिनामे औदायिक क्षायिक-निष्पन्न है ( अत्थि नामें उदइय खोवसमनिष्फने ३) अस्ति औदयिक क्षयोपशम नाम है ३ (अस्थि- नामे उदइय पारिणामिए निप्फने ४) अस्ति औदयिक पारिणामिक निष्पन्न नामे है ४ (अत्थि नामे उपसमिएखइयनिष्फने ५) अस्ति औपशमिक सायिक निष्पन्न नाम है ५ (अत्थि नामे उव समिए खोवसमीनष्फन ६) अस्ति औपशमिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम है ७ (अस्थि नामे खइयखो समीनप्फन्ने ८) अस्ति तायिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम है ८ (अस्थि नामे खड्य पारिणामिए निष्फने ९) अस्ति सायिक पारिणामिक निष्पन्न नाम है सो यह भंग सिद्ध भंगवंतों में होता है क्योंकि सायिक सम्यक पारिणामिक भात्र में जीव है सो यह भंग सिद्ध में ही होता है आपितु शेष भंग केवल दिग् दर्शन मात्र ही कथन किये गये हैं इस लिये दो संयोगी केवल नवमां भंग विद्यमान रूप हैं शेष भंग अविधमान रूप हैं तथा उदय मनुष्य गति १ क्षयो- .पशामिक इन्द्रिय २ पारिणामिक जीव ३ जघन्यता से यह भंग सर्वत्र विद्य- मान है किन्तु संयोगी केवल नवमें भंग की अस्ति है शेष नव भंग कथन मात्र ही है जैसे कि (अस्थि नामे खोवसमिए पारिणामिएनिष्फने १०) अस्ति चयोपशामिक पारिणामिक निष्पन्न नाम है १० यह दश भंग दो संयोगी दिखलाए गये हैं अब शिष्य ने पुनः इस स्वरूप को पूंछ कर निर्णय किया है जैसे कि- कयरे से नाम उदइय उवसम निप्फन्ने उदयइयत्ति मणुस्से उवसंत कसाया एस गणं से नामे उदइयउवसमनिष्फन्ने १) हे भगवन् ! जो औदयिक और औपशमिक निष्पन्न है वह कौनसा नाम है गुरु कहते हैं कि भो शिष्य श्रौदयिक भाव में मनुष्य गति है उपशम भाव में उपशांत कपाय है इसलिये (२२२) * अनुयोगद्वार मूत्र * यही नाम औदयिक उपशम निष्पन्न कहा जाता है १ किन्तु यह भंग दिए दर्शन मात्र ही है क्योंकि दर्शन मोहनीय कर्म की प्रकृतियें उपशम भाव में सम्भव हो सकती है किन्तु पारिणामिक भाव इस में नहीं है इसलिये यह भंग केवल दिग्र्दशन मात्र ही है इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिये १ ॥ ( कयरे से नामे उदइयखइय निष्फन्ने उदइयएत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्तं एस एणं सेनामे उदइयखइयनिष्फन १) (प्रश्न) औदयिक और क्षायिक निप्पन्न नाम कौनसा है ( उत्तर ) औदयिक भाव में मनुष्य गति है और नायिकभाव समम्यक्त्व हैं इसलिये इन से उत्पन्न हुए औदयिक सायिक निप्पन्न नाम होता है २ ( कयरे से नामे उदइए खउवसमनिष्फन्ने उदइयत्तिमणुस्से खोवसमियाई इंदियाइं एस णं से नामे उदइय खोवसमिए निप्फन्ने ३)(प्रश्न ) औदायिक क्षयोपशम निष्पन्न नाम कौनसा है ( उत्तर ) उदय भाव में मनुष्य गति हैक्षयोमशम भाव में इंद्रिय हैं सो यही औदयिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम है ३) (कयर से नाम उदइय पारिणामिएनिप्फने) औदयिक पारिणामिक निष्पन्ने नाम कौनसा है (उत्तर) (उदइएत्ति मणुस्से पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उदइंय पारिणामिए निप्फन्ने ४) औदायक भाव में मनुष्य भाव है पारिणामिक भाव में जीव है सो इसी का औदायिक पारिणामिक निष्पन्न नाम है ४ ( कयरे से नामे उपसमिएखइयनिष्फन्ने ] उपशम और, क्षायिक निप्पन्न नाम कौनसा है. (उत्तर ) उवसांत कसाया खड्यं सम्मत्तं एस गं से नामे ज्वसामए खड़यनि- प्फन्ने ५ ) उपशान्त कषाय क्षायिक सम्यक्त्व इन्ही का नाम औपशमिक शायिक निष्पन्न नाम है ५ ( कयरे से नामे उपसमिएखोदसमनिष्फन्ने उवमंता कसाया खोवसमियाई इन्दियाई एस णं से नामे उपसमिएखोव समिएनिप्फन्न ६.) ( प्रश्न ) औपशमिक क्षयोपशमिक निप्पन्न नाम कौनसा है ( उत्तर जैसे उपशमक कपाय हैं क्षयोपशमिक भाव में इन्द्रिय हैं सो यही औपशमिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम है ६ । ( कयरे से नामे उपसमिए पा- रिणामिय निष्फन्ने) (प्रश्न ) औपशमिक पारिणामिक निष्पन्न नाम किसे कहते हैं ( उवसान्त. कसाया पारिणामिए जीवे.एस णं से नामे उपसमिए पारि- णामिएनिष्फन्ने ७) (उत्तर) उशपम कपाय हैं पारिणामिक जीव हैं सो इसी का नाम उपशम पारिणामिक निष्पन्न भाव है ७ (कयर से नामे खड्यख- ओवसमिएनिष्फन्ने :) (. प्रश्न.) ज्ञायिक और नयोपशमिक निष्पन्न * अनुयोगद्वार सूत्र * (२२३) नाम किसे कहते है (खइय सम्मत्तं खअव समियाई इन्दिय ई एस से नाने खइय खओव समनिम्फन्न) ८ ( उत्तर ) सायिक सम्यक्त्व क्षयोपशामिक इन्द्रिय सो इसी का नाम क्षायिक क्षयोपशमिक भाव है ८ (कयरेसे नामे खड्य पारिणामिएनिप्फन्ने) (प्रश्न ) क्षायिक और पारिणामिक निष्पन्न नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) ( खइयं सम्मत्तं पारिणामिए जीके एस से नामे खइय पारिणामिएनिप्फन्ने 8) क्षायिक सम्यक्त्व पारिणामिक जीव हैं इन दोनों के निष्पन्न हुए नाम को क्षायिक पारिणामिक भाव कहते हैं सो यह द्विसंयोगी नवमां भंग सिद्ध भंगवन्नों में होता है शेष भंग केवल दर्शन मात्र है ( कयरे से नामे खोत्रमामिएनिप्फन्ने )( प्रश्न ) कौनसा क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पन्न नाम है ( उत्तर ) खग्रोवसमियाई इदिया: पारिणामिए जीव एस से नामे खोवसामएपारिणामिएनिप्फन्ने १० ) क्षयोपशमिक भाव में इन्द्रिय हैं पारिणामिक जीव है सो इनके निष्पन्न हुए नाम को क्षयो- पशमिक पारिणामिक भाव कहते हैं. १० इन सर्व द्विसंयोगी भंगों में केवल नवमां भंग सिद्ध है शेप भंग दर्शन मात्र है अव तीन संयोगी दश भंगो का विवेचन किया जाता है। भावार्थ सान्निपातिक भाव उसे कहते हैं जो औदायिक १ ऑपशामक २ सायिक ३ क्षयोपशामिक ४ पारिणामिक ५ इनके संयोग से द्वि संयोगी, तीनं संयोगी, चार संयोगी पांच संयोगी भंग उत्पन्न होते हैं जिसमें दश भंग संयोग वाले हैं दश भंग तीन संयोग वाले हैं ५ पांच भंग चार संयोगी अमितु एक भंग पांच मंयोगी है यह पड् विंशति भंग सान्निपातिक भाव में कहे जाते हैं अब प्रथम दो संयोगी दश भंगो का नाम लिखा जाता है। १ औद- यिक औपशामिक २ औदयिक क्षायिक ३ औदयिक क्षयोपशमिक ४ औदयिक पारिणामिक ५ औपशामिक दायिक ६ोपशामिक नायोपमिक ७ औपशामिकं पारिणामिक ८ क्षायिक क्षयोपशमिक ९ क्षायिक पारिणामिक यह भंग सिद्ध भंग वन्तों में होता हैं १० क्षयोपशामक पारणामिक यह दश भगं दो संयोगी जिसमें नवमां भंग सिद्धों में है शेप भंग दिग्दर्शन मात्र ही है और सर्व, भंगों के उदाहरण पदार्थ में दिये गये हैं अब तीन संयोगी भंगों का विवरण किया जाता है क्योंकि दो भार एकत्व करने से दो संयोगी भंग बन जाते हैं तीन (२२४) * अनुयोगद्वार मन्त्र भाव एकत्व करने से तीन संयोगीभंग उत्पन्न होते हैं इसलिये तीन संयोगी भंगों का विवरण किया जाता है। ॥अथ तीन संयोगी भंग विपय ।। तत्थ एंजे ते दसतिगसंजोगा तेणं इमेअस्थि नामे उद- इयउवसमिएखइयनिष्फन्ने १ अस्थि. नामे उदइयउवसमिए खत्रोवसमेनिप्फन्ने २ अस्थि नामे उदइयउपसमिएपारिणा मिय निष्फन्ने ३ अस्थि नामे उदइयखइयखत्रोवसमनिष्फ न्ने ४ अत्थि नामे उदइयखइयपारिणामिएनिप्फन्नेय ५ अत्थि नामे उदइयखओवसमियपारिणामियानप्फन्ने ६ अत्थि नामे उवसमियखझ्यखभावसमीनप्फन्ने ७ अस्थि उवसामिएखइयपारिणामियनिप्फन्ने ८ अस्थि नामे उवस- खओवसमियपारिणामियनिष्फन्ने र अस्थि नामे खइय. खओव समिए पारिणामिय निष्फन्ने १० कयरे से नामे उद- इयउवसामयखइयनिप्फन्नेय उदइएत्ति मणुस्से उवसन्ता कसाया खइयं सम्मत्तं एस णं से नामे उदइएउवसमिएखइय निष्फन्नेय १ कयरे से नामे उदइय उपसमिएखओवसामि य निष्फन्ने उदइएत्ति मणुस्से उवसंता कसाया खओवसमि याइं इंन्दियाइं एस णं से नामे उदइय उपसमिएखओव सम निप्फन्ने २ कयरे से नामे उदइय अोवसमिए पारिणा मिए निष्फन्ने उदइयत्ति मणुस्से उवसंता कसाया पारिणा- मिए जीवे एस णं से नामे उदइयखइयखओवसमीनप्फ- न्ने ३ एवं उदइंय खइयखओवसमिय ४ कयरे से नामे उदइय खायपारिणामियनिष्फन्ने उदइयत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्तं ** अनुयोगद्वार सूत्र (२२५) पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उदइयखझ्यपारिणामिय. निष्फन्ने ५ कयरे से नामे उदइयखओषसमिएपारिणामिय निप्फन्ने उदइएत्ति मणुस्से खत्रोचसमियाई इन्दियाइं पारि- णामिय जीवे एस णं से नामे उदंड्यखओवसमिएपारि- पामिएनिष्फन्ने ६, कयरे से नामे उवसामएखइयखग्रोव समिएनिफने. उपसन्ता कसाया खइयं सम्मत्तं खओवसमि- याइं इन्दियाइं एस एं से नामे उपसमियखइयखओव समनिप्फन्ने ७ कयरे से नामे उपसमियखइयपारिणामिए निष्फने उपसंता कसाया खइयं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे,ए- स एं से नामे उपसमिएखाइयंपारिणामिएनिप्फने ८ क- यरे से नामे उपसमिएखओवसमिएपारिणामियनिष्फन्ने उवसंता कसाया खओवसमियाइं इन्दियाइं पारिणामिए जीवे एस एणं नामे उवसमियखग्रोवसमिइयपारिणामिए निष्फन्ने ६ कयरे से नामे खइयखओवसमिएपारिणामिए निप्फन्ने खइयं सम्मत्तं खत्रोवसमियाइं इन्दियाई पारिणा- मिए जीवे एस एं से नामे खइयखओवसमिएपारिणा- मियनिष्फन्ने १०॥ पदार्थ-(तत्वणं जे ते दसतिग संयोगा तेणं इमे) इन पविशति भंगों में जो दश तीन संयोगी भंग है वह इस प्रकार से है (आत्थनामे उदइयउवसमिए- खइय निष्फन्ने १) अस्ति औदायिक १ ऑपशामिक २ नायिक निष्पन्न नाम हैं) (अस्थि नामे उदयउपसमिएखओवसमर्निप्फने २) औदयिक १ श्रीपशामिक २ क्षयोपसमिकनिप्पन्न नाम है २ (अस्थि नामे उदइयउपसमिएपारिणामिए निष्फने ३ ) औदायिक १ ऑपशमिक २ पारिणामिक ३ निष्पन्न एकनाम है ३ ( अस्थि नामे उदइयखइयखयोवसमनिष्फो ४) औदायिक १ क्षायिक २ क्षयोपशमनिप्पन्न नाम है ४ (अस्थि नामे उदइयखइयपीरणीमपोनप्फने .
(२२६) * अनुयोगद्वार सूत्र * ५ औदायिक ? चायिक २ और पारिणामिक निष्पन्न नाम है ५ यह भंग केवली भगवान् में होता है क्योंकि औदायक भाव में मनुष्य गति है तायिक भाव में केवल ज्ञान दर्शन चारित्र होता है पारिणामिक भाव में जीव होता है इसलिये पांचवां भंग केवली भगवान में कहा जाता है और (अत्थि नामे उदइयखोवसमिएपारिणामिएनिप्फने ६ ) औदयिक १ क्षयोपशमिक २ पारिणामिक ३ निष्पन्न एक नाम होता है ६ यह भंग चारों गतियों में होता है जैसे कि औदयिक भाव में कोई गति स्थापन करो १ सयोपशमिक भाव में इंद्रिय होती है २ पारिणामिक भाव में जीव है ३ सो यह भंग चारों गतियों में है जैसे कि मनुष्य गति १ तिर्यक् गति २ देव गति ३ नरक गति ४ शेप आठ भंग दिग्दर्शन मात्रही हैं किन्तु किसी स्थान पर उनकी अस्तित्व नहीं होती केवल अस्तित्व उक्त दोनों भंगो की है (अत्थि नामे उपसमिएखइय खोवसमनिष्फने ७) औपशमिक क्षायिक क्षयोपशम निष्पन्न एक नाम होता (अस्थि नामे उपसमिएखइयपारिणामिएनिप्फन्ने ८) औपशमिक नायिक और पारिणामिक भाव निष्पन्न एक नाम होता है । अत्थि नामे उपसमिए खओवसमिएनिष्फने है) औपशमिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पन्न एक नाम होता है । (अत्थि नामे खइय खओवसमिएपारिणामियनिष्फने१०) 'सायिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पन्न एक नामे होता है १० यह तो तीन संयोगी केवल १० भंग दिखलाये गये हैं अतः इनके अर्थों का अव विवर्ण करते हैं । ( कयरे से नामे उदइयउपसमिएखइयनिष्फने) (प्रश्न) औदयिक औपशमिक और क्षायिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है (उत्तर) (उदइएत्ति मणुस्से उवसंता कसाया खइयं सम्मत्त एस णं से नामे उदइयउव समिएखइयनिष्फन्नेय १) औदायिक भाव में मनुष्य गति है उपशान्त कपाय है तायिक सम्यक्त्व है सो इसी का नाम औदायिक औपशामिक क्षायिक निष्प न्न नाम है १ (कयरे से नाम उदइयउवसमिएखोवसमनिष्फन्ने ) (प्रश्न) औदायिक औपशमिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम किस प्रकार से होता है (उत्तर ) ( उदइयीत्त मणुस्स. उवसन्ता कसाया खओवसमियाई इन्दियाई) औदायिक भाव में मनुष्य गति है उपशम भाव में उपशान्त कपाय हैं क्षयोपशम भाव. में इन्द्रियां है सो (एस णं से' नामे उदइएउवसीमएखोवसमीनप्फन्ने २) इसी को औदयिक औपशमिक क्षयोपशम निष्पन्न नाम कहते हैं २ * अनुयोगद्वार सूत्र * (२२७) ( कयरे से नामे उदइय उत्सामिए पारिगामिएनिप्फन्ने ) (प्रश्न ) औदायिक औपशमिक पारिणामिक निप्पन्न नाम कौनसा है ( उत्तर ) (उदइएत्तिं मणु- स्से उपसंता कसाया पारिणामिए जीव एसणं से नामे उदइय खइयपारिणामिए निष्फन्ने ३) श्रादयिक भाव में मनुष्य गति है उपशम भाव में उपशान्त कपाय है पारिणामिक जीव है सो इन्दी का नाम श्रीदयिक क्षायिक और पारिणामिक निष्पन्न नाम है ३ ( कयरे से नामे उदइयखइयखओव समिएनिप्फन्ने) (प्रश्न ) आदयिक क्षायिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम फोनसा होता है ( उत्तर ) ( उदइएत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्तं खोवसमइन्दि- याई एस से नामे उदइयखझ्यखावसमनि'फन्ने ४) औदयिक भाव में मनुष्य गति है क्षायिक सम्यक्त्व और योपशम भाव में इन्द्रियां हैं सो इन्हीं को आदयिक क्षायिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम कहते हैं ४ (कयरे से नामे उदइयखइयपारिणामिएनिष्फन्ने ) (प्रश्न ) औदीपक क्षायिक पारि- यामिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है ( उत्तर ) ( उदइएत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे एस रणं से नामे उदइयखइयपारिणामिएनिष्फ- न्ने ५) श्रीदयिक भाव में मनुष्य गति है और क्षायिक भाव में नायिक सम्यक्त्व है श्रीरं पारिणामिक भाव में जीव है सो इन्हीं को औदायिक क्षायिक पारि- णामिक निष्पन्न भाव कहते हैं. ५) सो वह भाव केवली यगरानों में होता है क्योंकि औदायिक भाव में मनुष्य गति है तायिक भाव में क्षायिक सम्यक्त्व है और पारिवामिक भाव में जीत्र है सो यह भंग श्री केवली भगवानों में है ( कयरे से नामे उदइयखोबसमिएपारिणामिएनिम्फने ) (प्रश्न) प्रौदयिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पन्न भाव कौनसा है ( उत्तर) (उदएनि मणुस्से खोयसमियाई इंदियाई पारिणायिए जीवे एस रंग से नामे उदइयखोवसीमएपारिणामिएनिष्कने ६) प्रौदयिक भाव में मनुष्य गति है क्षयोपशम भाव में इन्द्रियां हैं और पारिणामिक भाव में जीव है सो इन्हीं करके उत्पन्न हुए नामको प्रौदयिक क्षयोपशामिक और पारिणामिक भाव कहने हैं ६ अतः यह भंग चारों गतियों में होता है जैसे कि औदायिक भाव में चारों गतियों में से कोई गति ले लो क्षयोपशामिक भाव में इन्द्रियां हैं और पारिणामिक भाव में जीव है इसी लिये चारों गतियों में यह भंग होता है शेप तीन संयोगी आठ ८ भंग दिग दर्शन मात्र हैं ( कयरे से नामे उपसमिए (२२८) * अनुयोगद्वार सूत्र * खइएखओवसामएनिप्फन्ने) औपशमिक शायिक और योगशमिक भाव किसे कहते हैं ( उत्तर) ( उपसंता कसाया खइय सम्मत्तं खगोवसमिया इंदियाई एस णं से नामे उवसामियखइएखयोवसमनिप्फन्ने ७) उपशम भाव में कपाय है क्षायिक भाव में क्षायिक सम्यक्त्व है और क्षयोपशम में इन्द्रियां हैं सो इस नाम को औपशमिक क्षायिक और क्षयोपशमिक निप्पन्न भाव कहते हैं (कयरे से नामे उपसमिएखइयपारिवामिएनिफने ७) (प्रश्न ) औपशामक नायिक और पारिणामिक निप्पन्न भाव किसे कहते हैं (उत्तर) उपसंता कसाया खइयं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे एस णं से नाम उपसमिएखइयपारणामिनिष्फने ८) उपशांत कपाय है क्षायिक सम्य- क्त्व है और पारिणामिक जीव है सो इस नाम को औपशमिक दायिक और पारिणामिक निप्पन्न भाव कहते हैं ८ । ( कयरे से 'नामे उवसमिएखोव समियपरिणामिएनिप्फने ) औपशमिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है ( उत्तर ) (.उवसंता कसाया खोवसमिया इंदियाई पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उवसमिएखोवसामएपारिणा. मिए निष्फने ६) उपशांत भाव में कपाय है क्षयोपशम भाव में इन्द्रियां है. और पारिणामिक भाव में जीव है सो इसी नाम को औपशामिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पक्ष भाव कहते हैं । कयर से नामे खइयखउवसमि- एपारिणामिएनिष्फने (प्रश्न ) तायिक और क्षयोपशामक और पारिणामिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है (उत्तर)सायिक सम्यक्त्व है क्षयोपशमिक इन्द्रि- यां हैं और पारिणामिक जीव है सो इसी नाम को क्षायिक क्षयोपशपिक और पारिणामिक निष्पन्न भाव कहते हैं १० सो यह तीन संयोगी दश भंगों का अर्थ वर्णन किया गया है जिसमें केवल दो भंगों का अस्तित्व है शेप भंग दिग्दर्शन मात्र हैं अब चार संयोगी ५ भंगों के स्वरूप कथन किया जाता है। भावार्थ-यदि तीनों भावों को एकत्व किया जाए तब उनके तीन संयोगी दश भंग वन जाते हैं जैसे कि १ औदयिक औपशमिक र क्षायिक २ औदायिक १ औपशमिक २ क्षयोपशमिक २ । ३ औदायक १.औपशीमक २ पारिणामक ३ । ४ औदयिक १ तायिक २ क्षयोपशमिक ३। ५ औदीयक १ क्षायिक २सारिणामिक ३ । यह भंग केवलियों में होता है । ६ औदायिक १ क्षयो- * अनुयोगद्वार मूत्र (२२६) पशमिक २ पारिणामिक ३ 1 यह ४ गतियों में होता है । ७ऑपशामक १ भा- यिक क्षयोपशमिक ३ । = प्रापशमिक १ क्षायिक २ पारिणामिक ३ 18 श्रीपशमिक १ क्षयोपशमिक २ पारिणायिक ३ । १० क्षायिक १ क्षयोपश- मिक २ पारिणामिक ३ यहतीन संयोगी दश भंग बनते हैं और इनके अर्थ पदार्थ में दिये गये हैं अपितु पांचवां छठा इन दोनों भंगो के अस्तित्व है शेप भंग दिग्दर्शन मात्र है। कथन किये गये हैं पांचवां भंग केवली भगवान् में होता हैं बटा भंग चारों गतियों में होता है शेष भंग शून्य कहे जाते हैं अब चार सं- योगी पांच भंगों का वर्णन करते हैं क्योंकि चारों भावों के एकत्ल करने से पांच भंग बन जाते हैं सो निन्नलिखितानुसार हैं। अथ चतुः संयोगी पांचों भंगो का विपय । मूल-तत्य णं जे ते-पंच चउपकमजोगा तेणं इमे अस्थि नामे उदइएउवमभिएखड़यलओवसमिनिष्फन्ने १ अस्थि नामे उदइयवसामेगखइएपरिणामिपनि फन्ने २ अस्थि नामे उदइयउपसमिएसआवसभिएपरिणामपनिष्फनं ३ अस्थि नामे उदइयखझ्यवओवमामिए पारिणामिए निम्फन्ने ४ अस्थि नामे उवममिएखइयस्खयोवलमिणपारिणीमएनिष्पन्ने ५ कयरे से नामे उदय उवसामियखाग्रस्खओवसमिपनि.. फन्ने ६ उदइएत्ति मणुस्से उवसंता कमाया खइयं सम्मत्तं खओवसमियाई इंन्दियाई एल एं से नामे उदइयउवासमिय खझ्यखओवमामिणनिष्पन्ने १ कयरे से नागे उदइयउवसमिएः खड्यपारिणामिनिकन्ने उदइत्ति मणुस्से उवसंता कसायां लाइयं सम्मत्तंपारिणामिए जीवे एस एणं से नामे उदइएउवस-: मिपखइयपारिणामियनिष्फन्ने २ कयरे से नामे उदइयरव- समिए खओवमामिएपीारणीमएनिप्फन्ने उदइपत्ति मणस्से उवमन्ता कसाया खोवसमियाई इंदियाई पारिणामिए जीवे * अनुयोगद्वार सूत्र * एस णं से उदइएउवसामएखइयपारिणामियनिष्फन्ने ३ कयरे से नामे उदइयखइयखओवसामिएपारिणामियनि'फन्ने उदइएत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्तं खयोव समियाई इंदियाई पारिणमिए जीवे एस णे से नामे उदइयखइयखोवसमिए पारिणामिएनप्फन्ने ४ कयर से नामे उवसमिएखइयंखओव समिएपारिणामिएनिप्फन्ने उवसंता कसाया खइयं सम्मत्तं खावसामयाइं इंदियाइं पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उवसमिएखइयखोवसमिएपारिणाामिएनिप्फन्ने ॥ ५ ॥ पदार्थ ( तत्थ णं जे ते पंचचउक्कसंजोग़ा तेणं इमे ) उन पविंशति भंगों में जो पांच संयोगी चार भंग हैं वह यह हैं जो आगे कहे जायेंगे-(अस्थि नामे उदइयउवसमिएखइयख वसमीनप्फने १. ) औदयिक औपशमिक नायिक क्षयोपशमिक निष्पन्न एक नाम है १ अतः (अस्थि नामे उदइएउवसीम एखइए- परिणामिएनिष्फने २ ) औदयिक औपशमिक क्षायिक पारिणामिक निष्पन्न एक नाम है २ ( अत्थि नामे उदइएउचसमिए खओवसमिएपारिणामिएन'फन्ने ३ ) औदयिक औपशमिक क्षयोपशामक और पारिणामिक निष्पन्न एक नाम है ३ सो यह भंग सर्व गतियों में सतत विद्यमान रहता है परन्तु सूत्र ने मनु- प्य गति का ही उदाहरण दिया है सो वह इस प्रकार से है जैसे कि औद- यिक भाव में मनुष्य गति है औपशमिक भाव में जो आत्मा उपशम 'श्रेणि में प्रतिपन्न है अथवा जो उपशम सम्यक्त्व करके युक्त है और क्षयोपशम भाव में इन्द्रियां हैं पारिणामिक भाव में जीव है इसलिये यह भंग मनुष्य गति में कहा गया है किंतु यह भंग चारों गतियों में होता है ऐसे जानना चाहिये। अथ चतुर्थ भंग का स्वरूप कहते हैं (अत्थि नामे उदइयखझ्यखोवसमिएपारिणामिए निप्फन्ने ४) औदयिक क्षायिक क्षयोपशामक पारिणामिक निष्पन्न भाव एक नाम है ४ सो यह भी भंग चारों गतियों में होता है क्योंकि औदयिक भाव में कोई गति लेलो नायिक भाव में चायिक सम्यक्त्व होता है अतः नरक * अनुयोगदार मूत्र * (२३१) तिर्यग और देवों में क्षायिक सम्यक्त्वपूर्व भाव की अपेक्षा जानना चाहिये और मनुप्य गति में पूर्व प्रतिपन्न भी हो नूतन भी उत्पन्न कर लेवे और क्षयोपशम भाव में इन्द्रियां हैं पारिणामिक भाव में जीव है इसलिये यह भंग चारों गति- ओं में होता है सो यह पांचों भंगो से दो भंग अस्तित्व रखते हैं शेष तीन भंग कथन मात्र ही है (आत्थि नामे उपसमियखइयखोवसामियपारणामएनिष्फने ५) औपमिक क्षायिक योपशमिक पारिणामिक निप्पन्न एक नाम होता है अतः यह तो पांच भंगा केवल नामोत्कीर्तन किया गया है अब इन के अर्थों का त्रिवर्ण करते हैं ( कयरे से नामे उदइयवसामिएखइयखावसामयनिष्फने ) (प्रश्न ) औदायिक ऑपशमिक क्षायिक क्षयोपशामक निप्पन भाव किस कहते हैं (उत्तर)(उदइएत्ति मणुस्से उपसंता कसाया क्खइयं सम्मतं खोव समियाई इन्दियाई औदयिक भाव में मनुष्य गति है उपशांत भाव में कपाय है सायिक भाव में सम्यक्त्व है क्षयोपशमिक भाव में इंद्रियां हैं सो (एम छ से नामे उदइयवसमिएखझ्यखओवसमिएनिष्फने १) इ का नाम औदायक पशमिक क्षायिक और क्षयोपशमिक निष्पन भाव है १ (कयरे से नामे उद- इयउपसमियवहयपारिणामिणनिप्फने १ ) ( प्रश्न ) औदपिक औपश- मिक नायिक और पारिणामिक नाम किस कहते हैं (उत्तर) (उदएत्ति मणुस्से उबसंता कसाया खड्यं सम्पत्तं पारिणामिए जीवे ) औदायक भाव में मनुष्य गति है उपशम भाव में कपाय है नायिक में क्षायिक सम्यक्त्व पारि- णामिक भाव में जीव सो (एस णं से नामे उदइए उपसमिएखइयपारिणा- मिए निष्फने २ ) सो इसी का नाम औदयिक औपशमिक क्षायिक पारिणा- मिक निप्पन्न भाव है २ ( कयरे से नामे उदइय उक्समिएखओवसमिए पारिणामिए निष्फन्ने) (प्रश्न ) औदयिक औपशमिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पन्न भाव किसे कहते हैं (उत्तर) (उदइएत्ति मणुस्से उव संता कसाया खओवसमियाइं इंदियाई पारिणामए जीवे ) उदय भाव में मनुष्य गति है, उपशम भाव में कपाय हैं अपितु क्षयोपशम भाव में इंद्रियां है इसलिये ( एस णं से नामे उयइएउवसमिएखोवसमिएपारिणामिए निएफने ) यह नाम औदायक औपशामिक क्षयोपशामिक पारिणामिक निष्पन्न कहा जाता है और चारों मतियों में इस भाव का अस्तित्व है ३ (कयरे से नामे उदइएखइएस्सभोवसमिएपरिणामिएनिप्फने) (प्रश्न) औदयिक मा- (२३२) * अनुयागद्वार मूत्र * यिक और क्षयोपशमिक पारिणामिक निष्पन्न भाव किसे कहते हैं (उत्तर) : उदइएत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्तं खोवसभियाइ इदियाई पारिणामिएजीवे )ओं इयिक भाव में मनुष्य गति है दायिक में शायिक सम्यक्त्व और क्षयोपशमिक नावमें इंद्रियां हैं अतः पारिणामिक भाव जीव है सो ( एस णं से नामे उदइए खइयखआवसमिएपरिणामिएनप्फने ४ ) इसी का नाम दियिक क्षायिक क्षयोपशामक पारिणामिक निष्पन्न भाव है अतः इस भंग की भी चारों गतियों में अस्तित्व है किंतु मूत्र में मनुष्य गति का उदाहरण दिया गया है अपितु यह भंग चारों गतियों में ही होता है ( कयरे से नामे उपसामयखइएखोर समियपारणामिएनिष्फन्ने ) ( प्रश्न ) आपशमिक शायिक क्षयोपशमिक पा- रिसामिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है ( उत्तर ) ( स्वसंता कसायाखइयं सम्मत्तं खोवसमियांइंदियाई पारिणामिए जीवे ( उत्तर ) उपशान्त कपाय हैं सायिक सम्यक्त्व है क्षयोपशमिक इंद्रियां है और पारिणामिक भाव में जीव है इसलिये ( एसणं से नामे उवसामएखइयखओवसामिएपरिणामिएनिप्फन्ने ५ यह नाम औपशमिक क्षायिक क्षयोपशमिक पारिणामिक निष्पन्न कहा जाता है यह चार संयोगी पांच भंग हैं जिन में तृतीय चतुर्थ भंगों की चारों गतियों में अस्तित्व रहती है शेष तीन भंग दिग्गदर्शन मात्र है किंतु अस्तित्व इन की नहीं है अब पांच संयोगी भंग का विवेचन करते हैं । भावार्थ-चारों भावों के एकत्व करने से चार संयोगी पांच भंग उत्पन्न होते हैं जैसे कि- है । इस १ औदयिक औपशमिक शायिक क्षयोपशमिक २ औदायिक औपशमिक सायिक, पारिणामिक । ३ औदायक, औपशमिक, क्षयोपशमिक, पारिणामिक भंग की अस्तित्व है । ४ औदायक, तायिक क्षयोपशमिक पारिणा- मिक-इस भंग की अस्तित्व है । ५ औपशमिक, क्षायिक, क्षयोपशमिक, पारिणामिक ५॥ यह चतुस्सयोगी पांच भंग हैं अपितु इन के अर्थों का विवर्ण पदार्थ में दिया गया है और इन पांच भंगों में से तीसरे चौथे भंग की अस्तित्व है शेष भंग केवल दिग्दर्शन मात्र है अव पांच सयोगी एकं भंग का विवर्स.करते हैं।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२३३) मूल-(तत्थणं जे ते एगोपंच संजोगो से ग इमे-अस्थि नामे उदइयउपसमिएखइयखओवसमिएंपारिणामिय निप्फन्ने कयरे से नामे उदइएउवसमिपखइयखोवसमियपारिगामिए निप्फन्ने उदइएत्ति मणुस्से उवसन्ता कसाया खइयं सम्मत्तं खओवसमियाई इंन्दियाई पारिणामिए जीवे एस णं से नाम उदइएओवसमिएखइयखओवसमिए पारिणामिएनिष्फन्ने से तं सन्निवाइए सेत्तं छन्नामे ॥ पदार्थ- (तत्य णजे ते एगो पंचसजोगो मे मे ) उन पर विशति भंगों में जो एक भग पांच संयोगी है वह इस प्रकार से ई ( अस्थि नामे उदइयउव समिएखइयखयोचसमियंपारिणामिएनिप्फन्ने ) जैसे कि-औदायक, ऑपशमिक सायिक, क्षयोपशमिक, पारिणामिक निष्पन्न एक नाम होता है ( कयरे से नामे उदइएउवसामिएखइएखओवसामिएपारिणामिए .निप्फने) (प्रश्न) औदायिक आपशामिक, नायिक, क्षयोपशमिक पारिणामिक निष्पन्न भाव किसे कहते हैं ( उत्तर ) ( उदइएति मगुस्स उवसंता कसायाखइयं सम्मत्तं खोवसपियाइं इंदि- याई पारिणामिएजीये ) आदयिक भाव में मनुष्य गति है उपशम भाव में उपशांत कपाय हैं और शायिक भाव में क्षायिक सम्यक्त्व है सयोपशम भाव में इंद्रिय है पारिणामिक भाव में जीव है इसलिये (एस णं से नामे उदइयज्वसमिए पारिणामिए निष्फन्ने सत्तं सन्निवाइए सेत्तं छन्नामे) इसको ओदायिक, औपशमिक, सायिक, क्षयोपशमिक, पारिणामिक निष्पन्न भाव कहते हैं सो इसी का नाम सान्निपातिक भाव है और यही पद नाम का स्वरूप है अतः इसीको पद नाम कहते हैं भावार्थ-पांच भावों के एकत्व करने से पांच संयोगी एक भंग बनता है जैसे कि औदायक औपशामिक क्षायिक और क्षयोपशामिक पारिणामिक यह भंग केवल उपशम श्रेणि में होता है सो यह पांच संयोगी एक भंग का स्वरूप पूर्ण हो गया है अपितु सर्व पद विंशति भंग कथन किये गये है जमे--कि दो संयोगी दश भंग हैं तीन' संयोगी दश भंग हैं और चार संयोगी पांच भंग है किन्तु पांच संयोगी एक भंग है सोयह सर्व २६ पद विंशतिभंग होते हैं फिर दुगसंजोगो सिद्धामं केवल संसारियाई (२३४) * अनुयोगद्वार सूत्र हुंतांती संजोगो चउ संजोगो दुचउसगई उक्सम सेटिउ पण संजोगाय ३१ अर्थात् दो संयोगी नववां भंग सिद्ध भगवंतों में होता है और तीन संयोगी पांचों केवली भगवान् में होता है और तीन संयोगी छठा भंग चारों गतियों में है अपितु चार संयोगी तीसरा और चतुर्थ भंग मनुष्य देवता नारकी में होते हैं तथा संज्ञि पांचेंद्रिय तिर्यग में भी हो जाता है किन्तु पांच स्थावर तीनों विकलेंद्रिय में नहीं होता और पांचवां भंग उपशम श्रेणी गत जीवों में होता है इसलिये पद विशति भंगों में से ६ भंग अस्तित्व रूप में हैं शेप २० भंग दिग्दर्शन मात्र कथन किये गये हैं तथा अन्य ग्रंथों में ( त्तत्वार्था दि शास्त्रों में* ) पांच भावों का.मूल प्रकृतियांच मान कर उतर प्रकृतिय ५३ लिखी हैं जैसे कि मूल प्रकृति औदायिक १ औपशमिक २ क्षायिक ३ सयो- पशर्मिक ४ और पारिणामिक ५ यह पांच मूल प्रकृति हैं अपितु उतर प्रकृति निम्न लिखतानुसार हैं औदयिक भाव की उत्तर प्रकृतियें २१ चारगति पद लेश्या ४ कपाय ३ वेद प्रसिद्ध १ अज्ञानी १ अविरति १ मिथ्यात्व १औपशामिक भाव की २ प्रकृतियें हैं उपशम सम्यक्त्व और उपशम चारित्र २ क्षायिक भाव की ९ प्रकृतियां हैं ५ अंतराय क्षायिक भाव में है अर्थात् पांचों अंतरायों का क्षय करना और केवल ज्ञान १ केवल दर्शन २ नायिक चारित्र ३ तायिक सम्यक्त्व ४ और क्षयोपशमिक भाव के १८ भेद हैं जैसे कि ४-चार ज्ञान ३ तीन अज्ञान ३ तीनों दर्शन ५ अंतराय क्षयोपशम भाव में क्षयोपशम चारित्र १ क्षयोपशम देश- व्रतक्षयोपशम सम्यक्त्वा और पारिणामिक भाव के ३ भेद हैं जैसे कि भव्य पारि- णामिक १ अभव्य पारिणामिक २ जीव पारिणामिक ३ यह सर्व ५३ उतर प्रकृतियां *नोट-१ औपशमिक शायिको भावी मिश्रव जीवस्य स्थतत्व मौदायक २ पारिणामिकौ च २ द्वि गवाष्टा दर्शक विंशति नि वेदायकथाक्रमम् । ३ सम्यक्त्व चारित्रे। ४ ज्ञान दर्शन दान लाभ भौगोपभोग वीर्याणि च । ५ ज्ञाना ज्ञान दर्शन लब्धयारवतुस्त्रि त्रियंच भेदाः सम्यक्रव चारिन संयमा संयमाश्च । ६ गति कपाय लिंग मिथ्या दर्शना ज्ञानासंयतासिद्ध लेश्या श्वतु श्वतु स्त्र के कै के कपद् भेदाः। ७ जीव भन्या भव्यत्वानि । सूत्र तत्वार्थ सूत्र के दूसरे अध्याय के हैं। यह सर्व * अनुयोगद्वार सूत्र * (२३५) है और इनके ऊपर ही एक ६२ अंकों का स्तोक बना हुआ है जिसकी मूल गाथा यह है-गई १ इंदिय २ फाय ३ जोए ४ वेद ५ कसाय ६ नाणे ७ संजए ८ दंसह लेस्सा १० भव ११ सगे १२ दिहि १३ सनि १४ आहारए १५ ॥१॥ इन ६२ अंकोपरि ५ मूल प्रकृतियां ५३ उतर प्रकृतियां की गणना की जाती है और सन्निपातिक भाव के पद विंशति भंग पूर्व लिखे गये हैं सो यह सर्व पट् भावोंके समास से पटू नामका विवर्ण पूर्ण होगया है यह सर्व जैन सिद्धान्त है मो जैन सिद्धांत का स्वरूप तीनों स्वरों वा सात स्वरों में प्रतिपादन किया गया है इसलिये सात नाम के प्रकरण में सातों स्वरों का स्वरूप लिखा जाता है। ॥ अथ सप्त नाम के अतरगत सप्तस्वरों के विषय ॥ मूल- -सेकिंतं सत नामे २ सतसरा पण्णत्ता तंजहा सजे ? रिसमे २ गंधारे ३ मग्झिमे ४ पंचमेसरे ५ धेवएचेव ६ निसा- एसरासत वियाहिया? एएसिणं सतरहं सराणं सत्त सरठाणा पं० २० सज्जं च अग्गजीहाए उरेण रिसभं सरं कंठुग्गएण गंधार मज्झजीहा ए मज्झिमं २ नासाए पंचमं बुया दंतोटेण धेवय भमुहक्खेवण णेसाए सरहाणा-वियाहियाइ । पदार्थ-(सेकित सत नामे २ सतसरा पन्नत्ता तंजहा) अथपट् नाम के पश्चात् सप्त नाम का विवेचन किया जाता है जैसे कि-शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् सप्त नाम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है इस प्रकार के शिष्य के प्रश्न को सुनकर गुरु कहने लगे कि -भो-शब्द प्राट् ! सस नाम को अंत- गत सप्तस्वरों का विवेचन किया गया है क्योंकि सूट शब्दोयता पनयोः धातु से स्वर शब्द की उत्पति है सो जो ध्वनिरूप है वे स्वर होता है सो जिसके सतनाम निन्न लिखितानुसार हैं ( सज्जे १.) षड्जस्वर उसका नाम है जोपट स्थानों से शब्द रूप ध्वनि उत्पन्न हो जैसे कि-नासिका १ कंठ २ उर (बाती) ३ तालु ४ जिहा ५ दंत ६ जो इन पट् स्थानों से शब्द उत्पन्न होकर उच्चारण * अनुयोगद्वार सूत्र * किया जाए उसको पड्ज् स्वर कहते हैं । और जो ऋषभवत् शब्द हो उसे षम् स्वर कहते हैं क्योंकि नाभि से वायु उत्पन्न होकर कएठ मस्तक में स. मावर्तन होकर जो शब्द अपभवत् उच्चारण किया जाये उसीका नाम (रिस- भे २) ऋषभ स्वर है अतः (गंधारे ३) नामि से वायु उत्पन्न होकर जो म- स्तकादि में समावर्तन करके जो नाना प्रकार के गंध से युक्त है उसे गांधार स्व र कहते हैं ( मज्झिमे ) मध्यम स्वर उसका नाम है जो काया के मध्य भाग नाभि से उत्पन्न होकर हृदय आदि में होकर जो शब्द उच्चारण कियाजावे उसे मध्यम स्वर कहते हैं ४ (पंचमे ५) जो पड्जादि की पंचम संख्याको पूर्ण करता है उसे पंचम स्वर कहते हैं तथा जिसमें पांच स्थानों में वायु समा वर्तन हो उसे पंचम कहते है जैसे कि-नाभि १ उदर २ हृदय ३ कंठ ४ मस्तक ५ सो जो इन में समावर्तन होकर शब्द उच्चारण किया जावे उस को पंचम स्वर कहते हैं ५ (धेवय वेप ६) धैवत स्वर उसका नाम जो अन्य स्वरों को धारण करता हो तथा अन्य स्वरों का साधन करता हो अपितु पाठान्तर में इस स्वर को रेवत स्वर भी कहते हैं (निसाए ७) निषाद स्वर उसे कहते हैं जिससे अन्य स्वरों का परिभव हो जाए तथा जिसका महा स्थूल शब्द हो उसे निपाद स्वर कहते हैं इस प्रकार से ( सगसत वियाहिया १ ) सप्त स्वर अन्तिा भगवंताने प्रतिपादन किये हैं (शंका ) अंसख्यात जीव रसेंन्द्रिय द्वारा शब्द उच्चारण करते हैं इस अपेक्षा से असंख्यात स्वर होने चाहिये ( समाधान ) अपितु ऐसे नहीं हैं यावन्मात्र रसनेन्द्रिय के शब्द हैं वे सर्व सात स्वरों के ही अंतर्गत रहते हैं इसलिये स्वर सात ही हैं और इनके अनेक स्थान उत्पति के हैं किन्तु मुख्य स्थान जिहा ही है इसलिये स्थूल स्थानों की अपेक्षा से सप्त स्वरों के स्थानों का निर्णय करत ( एएसिंणं सतएहं सराणं सत्तसरठाणा पण्णता तंजहा ) इन सप्त स्वरों के सप्त स्वर स्थान प्रतिपादन किये गये हैं जैसे कि (सज्जंच अग्गजिभ्भाए) पडज् स्वर जिहा के अगू भाग से उत्पन्न होता है यद्यपि पडज् स्वर के पट् स्थान वर्णन किए गए हैं किन्तु मुख्य स्थान जिह्वा ही है इसलिये पडज् स्वरका स्था न जिहा का अग्र भाग प्रतिपादन किया गया है और (उरेण) उर से (छाती से) रिसभं* ऋषभ ( स्वरं ) स्वर उत्पन्न होता है और ( कंटुग्गाएणं) कंठ से : फेदलस्य । प्रा० अ० ८ पा० १ सू० । १४० ॥ केवलस्य माने ना संपुक्कस्य प्रतोरिरादेशो भवति .
~ * अनुपांगद्दार सूत्र * (२३७ ) उत्पन्न होता है (गंधार ) गांधार स्वर अपितु (मज्जपजीहाए। जिला के मध्य भाग से (मज्जिपमर) मध्यम स्वर उत्पन्न होता है २ और (नासाए) नासिका से ( पंचम ) पंचम स्वर ( या ) भाषण किया जाता है दंताहणेय दान्त और ऑष्ठों से उच्चारण किया जाता है धेवयं धैवत स्वर अपितु भमुह खेवण भ्रकुटों के आक्षेप पूर्वक साए निपाद स्वर उच्चारण किया जाता है सो ( सर ) स्वर (ठाण ) स्थान ( वियाहिया ३) अर्हन्तो भंगवंतोने इस प्रकार से स्वर स्थान प्रतिपादन किए गये हैं क्योंकि इनके भिन्न २ स्थान होने पर भी मुख्य २ स्थान वर्णन किए गये हैं अब अग्रेजीच नित्सृत स्वरों के विपय में कहते हैं। भावार्थ-सात नाम के अंतगत सात स्वरों का विवेचन किया गया है जैसे कि पड्न स्वर-१ ऋषभ स्वर २ गांधार स्वर ३ मध्यम स्वर ४ पंचम स्वर ५ धैवत स्वर ६ र निषाद स्वर ७ और जो नाभि आदि पट स्थानों से उ- त्पन्न हो उसे पडज स्वर कहते हैं १ जो ऋपभवत् शब्द उच्चारित हो उसका नाम स्वर है २ जो नाना मकार की गंध से युक्त भापण किया जाए उसे गांधार स्वर कहते हैं । काया के मध्य भाग से जिसकी उत्पत्ति हो उस मध्यम स्वर कइते हैं ४ तथा नाभि श्रादि पांच स्थानों से जो उत्पन्न हो वह पंचम स्वर" होता है ५ जो और स्वरों को धारण करे वह धैवत ६ जिस का स्थूल शब्द हो वही निपाद स्वर है श्रापितु मुख्य स्थान इन के निम्न प्रकार से हैं जैसे कि-पद्ज स्वर जिवा के अग्र भाग से उच्चारण किया जाता है उरसे ऋपभ गाया जाता है कंठ से गांधार स्वर जिहा के मध्य भाग से मध्यम नासिका से पंचम दांत और ओटोसे धैवत भ्रकुटिके आक्षपसे निपाद स्वर उच्चारण होता है इस प्रकार से अईन देवों ने सप्त स्वरों के सस स्थान प्रतिपादन किए है किन्तु यावन्मात्र रसद्रिय युक्त जीव है उन सोंके स्वर सात स्वरों के अंतरगत ही जानने चाहिए ऐसे नहीं है कि तावन्मात्र स्वर संख्या भी हो जैसे कि अनेक वर्ण । रंग ) होने पर भी वे सर्ववर्ण पांच वर्षों के अन्तरगत होजाते हैं उसी प्रकार स्वर संख्या भी जाननी चाहिए अव सात स्वर जीवों की निश्राय से वर्णन करत हैं कि जिसके द्वारा जीवों को स्वर ज्ञान का शोधू बोध होजाए ।
(२३८) * अनुयोगद्वार सूत्र * ॥ अथ सप्त स्वर जीवनिश्राय विषय ।। सत्त सरा जीव निस्सिया पं. तंजहा । पदार्थ-(सत्त, सप्त (सरा) स्वर (जीव निस्सिया पं० तजहा) जीव निस्सत प्रतिपादन किए गये हैं जिन के द्वारा स्वर ज्ञान की शीघू प्राप्ति हो जाती है। • सो वे निम्न लिखितानुसार हैं ।। भावार्थ-सात स्वर जीव निस्सृत १ प्रतिपादन किए गए हैं जो निम्न लिखितानुसार हैं। ॥ अथ जीव निश्राय विषय.॥ सज्जं रवइ मऊरोकुक्कुड़ोरिसभंसर हंसो रवइ गंधारम- ज्झिमंतु गवेलगा ४ ॥ पदार्थ-(सज्ज खइ मऊरो) पड्ज स्वरको मोर वोलता है (कुक्कुडोरिसभंसरं) कुकड़ ऋषभ स्वर को, ( हंसोखइगधारं ) हंस गांधारको, (मझिमंतुगवेलगा) गाय और बकरी मध्यम स्वर को वोलती हैं । भावार्थ-मयूर षड्ज स्वर उच्चारण करता है, कुक्कुड़ का ऋषभ स्वर होता है, अपितु हंस गांधार स्वर में बोलता है, और गौ एलक आदि पशु मध्यम स्वर में वोलते हैं ॥४॥ ॥ अथ शेष स्वरों के विषय ॥ अह कुसुमसंभवे काले कोइला पंचमं सरं । छटुंच सारसा कुंचा नेसायंसत्तमं गओ ॥ ५ ॥ . पदार्थ--(अह) अव.(कुसुमसंभवे), पुष्पों के उत्पन्न होने के (काले) कालमें (काइला) कोइल (.पंचमं ) पंचम (सरं ) स्वर भाषण करतीहै अतः (छठंच) धैवत.स्वर (सरसा कुंचा ) सारस और कोंच पक्षी वोलते हैं पुनः ( नेसायं) निषाध स्वर ( सतम.) जो. सप्तम है वह (गतो ५) गज का होता है अर्थात .
-- * अनुयोगद्वार सूत्र * (२२६) जो निषाद स्वर है वो हस्ती का होता है इसलिये (सतमंगतो ५) यह सूत्र दिया गया है ५ यह सप्त स्वर जीव की निश्राय कथन किए गये हैं अब सात ही स्वर अजीव की निश्राय कहते हैं अर्थात जो वादिन से उत्पन्न होते हैं । भावार्थ-वसंत ऋतु में कोइल पंचम स्वरमें वोलती है सारस और क्रौंचपक्षि धैवत स्वर में शब्द उच्चारण करते हैं अपितु सप्तम स्वर में हस्ती का शब्द होता है यह सात ही स्वर जावों की निश्राय वर्णन किए गए हैं अब इस के आगे साबों स्वर अजीव की निश्राय में जो हैं उनका विवर्ण करते हैं । ॥अथ सप्त स्वर अजीवनिश्राय विषय ॥ सत्त सरा अजीवनिस्सिया पं. तं. । पदार्थ- (सत ) सप्त ( सरा) स्वर ( अजीव ) अजीव वादिनादि की (निस्सिया) निधाय (पं. तं.) प्रतिपादन किए गये हैं जैसे कि- भावार्थ-सप्त स्वरा अजीव की निश्राय में कह गए हैं जो आगे कह जातेहैं। मूल-सज्ज रवइ मुयंगो, गोमुही रिसभं सरं सक्खो रवइगं- धारं मज्झिमं पुणझल्लरी ६ चउचलणपइट्ठाणा गोहिया पंचमं सरंआडवरोयरेवइयं महाभेरी य सत्तमं ॥७॥ पदार्थ- ( सज्जरवइमुयंगो) मृदंग पड्ज स्वर में वमता है और (गोमुही) गोमुखी रामावादिन (रिसभं ) ऋपभ (सरं ) स्वर में वोलता है अतः (संक्खो) शंख (रवा) वोलता है (गंधारं ) गांधार स्वर और (मझिम) मध्यमस्वर (पुण) पुनः (झलरी ) छैणों का होता है क्योंकि छैणोंका शब्द मध्यभाग से निकलता है इसलिये उनका मध्यम स्वर होता है ६ (चउचलण ) चार जिसके चरण (पइठाणा) भूमि पर प्रतिष्ठित हैं और (गोमुही ) गोषिका उस वादित्र का नाम है वह (पंचम ) पंचम नामक ( स्वर ) स्वर में वोलता है और (आडंबरोय ) पटह ( ढोल ] नामक चादित्र (रेवइयं ) रेवत (धैवत) नामक स्वर में शब्द उच्चारण करता है और ( महाभेरीय ) महां भेरी नामक वादित्र (सतमं७) सतम निपाद नामक स्वर में उच्चारण करता है ७ किंतु यह सर्व एक अंश को लेकर इन के उदाहरण दिए गए हैं ।
. (२४०) * अनुयोगदार सूत्र * भावार्थ-षड्ज स्वर मृदंग नामक वादित्र से निकलता है क्योंकि यह सर्व देश मात्र उदाहरण हैं अपितु पड्ज स्वर की षट् स्थानों से उत्पत्ति मानी गई है किन्तु यहां पर केवल अग्र भाग के प्रमाण को मानकर मृदंग मानकर मृदंग को पड्ज स्वर माना है इसी प्रकार गोमुखी नामक वादित्र ऋपभ स्वर में शद्ध उच्चारण करता है और शंख का गांधार स्वर होता है झलरी (छैणों का) का. मध्यम स्वर है पटह (ढोल ) का स्वर धैवत स्वर होता है और महा भेरी सप्तम स्वर में शब्द उच्चारण करती है अतः जिस वादिन के चार चरण गोधिका उसका नाम है और भूमी पर रखकर उसे बजाया जाता है उसके शब्द को पंचम स्वर कहते हैं . यह सर्व सप्त स्वर जीव और अजीव की निश्राय वर्णन किये गये हैं किन्तु कतिपय ग्रन्थकारों ने जीव निश्राय स्वरों के विषय में निम्न प्रकार से भी उदाहरण दिये हैं जैसे कि-पंड्नरौ तिमपूरस्तु गावौ न- दंति चर्षभम । अनाविको चंगांधारे क्रौञ्जौनदति मध्यमम् ॥ १॥ पुष्प साधा रणे काले कोकिलोरौति पंचमम् अश्वस्तु धैवतं गैति निषाद रौति कुंजरः ॥२॥ अर्थात् मोर षड्ज शब्द को बोलता है वैल ऋषभ शब्द को बोलता है भेड बकरी गांधार स्वर को वोलते हैं क्रौञ्च पक्षी मध्यम स्वर को वोलता है घोडा धैवत स्वर को वोलता है कोकिल वसंत ऋतु में पंचम सुर वोलता है हस्ति निपाद स्वर को वोलता है सो यह सप्त स्वरों के जीव निश्रित उदाहरण दिख लाये गये है अब जिस जीव को जिस स्वर की स्वाभाविक प्राप्ति होती है उस के लक्षणों के विषय में कहते है क्योंकि लक्षणों द्वारा उस स्वर का पूर्ण प्रकार से निश्चय होता है। अथ सप्त स्वरों के लक्षण विषय । एएसि णं संतण्हं सराणं सत्त सरलखणापं० त० सज्जे ण लहईविंति कयं च न विण्णस्सइं गावो पुत्ता य मित्ता य नारीणं होइ बल्लभो ७ ॥ पदार्थ-(एएसिं णं ) इन ( सत्तएई ) सातों ( सराणं) स्वरों के (सत सर) सात स्वर ( लक्खणा) लक्षण प्रतिपादन किए गए हैं. अर्थात सप्त . स्वरों की लक्षणों द्वारा प्रतिती होती है जैसे कि (सज्जखं) षड्ज स्वर से
* अनुयोगद्वार सूत्र *
(१२४१
(लहइ ) प्राप्ति होती है ( वितं ) वृति का अर्थात पड्ज स्वर के प्रभाव से प्रा-
जीविका को वृद्धि होती है फिर ( कयं च ) उसका किया हुआ कार्य ( नवि-
राणस्सइ) विनाश को प्राप्त नहीं होता अतः जो वह करदे वह सबको माननीय
होता है और ( गावो ) गौएँ ( पुताय ) और पुत्र तथा (मिताय ) मित्र भी
उसके बहुत से होते हैं पुनः (नारीणं ) नारियों को (होई ) होता है
(वल्लभी) वल्लभ ॥१॥
भावार्थ-सात स्वरों के सात लक्षण बतलाए गये हैं जिन के द्वारा स्वर
शान बहुत ही शीघ्र उत्पन्न होजाए जैसे कि जिस व्यक्ति का पड्ज स्वर होता
है उसकी प्राजीविका ठीक होती है और उसके द्वारा उसे धन की प्राप्ति भी
अतीव होती रहती है फिर उराका किया हुआ कार्य सबको माननीय होता है.
गाऐं पुत्र वा मित्र उसके बहुन से होते हैं अतः नारी जनों को भी वह वल्लभ
होता है सो इन के द्वारा प्रथम स्वर की लक्ष्यना होती है ॥१॥
!! अथ ऋपम स्वर लक्षण विषय ।।
रिसभेणउ एसज्ज सेणावच्चंधणाणि य । वत्थंगधनलंकार
इथियो सयणाणि य ॥६॥
पदार्थ-( रिसभेणउग) ऋषभ स्वर से प्राप्त होता है (सज) ऐश्वर्य
भाव और (सेण वच्च ) सेनापतिभाव और (धणाणियः) धन का संग्रह
अतीव होना तथा (वत्थ) वस्त्र ( गंध ) सुगंधादि पदार्थ ( अलंकारं ) अलं-
कारादि पदार्थ उसको मिलते हैं तथा (इत्यिो) खियों की भी उसको माप्ति
होनी है (सयणाणियह ) और पर्यकादि की भी उसको छात्यंत प्राप्ति
होती है ।। ६॥
भावार्थ-- ऋषभ स्वर के महातम्य से ऐश्वर्य भाव वा सेनापति और
धन का अतीव संग्रह व स्वगंधं अलंकार स्त्रिये पर्यकादि प्रप्या सर्व प्रकार से
पदार्थ उपलब्ध होते हैं और इन लक्षणों से निश्चय होता है. कि-इस व्यक्ति
का ऋपम स्वर है ॥ ६ ॥
.
(२४२)
* अनुयोगद्वार सूत्र *
॥ अथ गांधार स्वर लक्षण विषय ।।
गंधारे गीइजुत्तिन्ना वज्जविति कलाहिया ॥ हवंति कवि-
गोपन्ना जो अन्ने सस्थपारगा ॥ १० ॥
पदार्थ- (गंधारे) गांधार स्वर वाला पुरुप ( गाई ) गीतोंका ( जुइन्ना)
ज्ञाता होता है और जिसकी (वज) प्रधान (वित्ति ) आजीविका होती है
पुनः (कलाहिया) कला अधिक होती है अथार्त कलाओं में प्रवीण होता है
पुनः इस स्वर वाले ( हवंति कविणोपन्ना ) कवि होते हैं अपितु ( प्रज्ञा ) वु-
द्धिवान् कवि होते हैं (जे ) जो ( अन्ने ) अन्य छंदादि ( सत्थ ) शास्त्रों के
भी (पारगा १०) पारगामी होते हैं ॥ १०॥ .
भावार्थ-गांधार स्वर वाला गीतों के ज्ञान का गीतज्ञ होता है और जिस
की संसार में (वज्जविति ) प्रधान आजीविका होती है पुनः कलाओं में
प्रवीण होता है फिर इस स्वर वाले कवि होते हैं अतः बुद्धिमान कवि होते हैं
जो अन्य छंदादि शास्त्रों के भी पारगामी होते हैं सो इन लक्षणों द्वारा गांधार
स्वर की पूर्ण लक्षणता होजाती है कि इस व्यक्ति का गांधार स्वर है ॥ १० ॥
॥ अथ मध्यम स्वर लक्षण विषय ॥
माझिमसर मंत्ताउ हवंति सह जीविणो । खायइ पियइ
देई मज्झिम सरमास्सिउ ॥ ११ ॥
पदार्थ- (मझिम ) मध्यम ( सर ) स्वर (मत्ताड ) वालेजीव ( इवंति)
होते हैं ( सुह जीवणे ) मुखपूर्वक जीवन व्यतीत करनेवाले जैसे कि (खाइय)
खाना (पीयइ ) पीना ( देइ ) देना अर्थात खानाहै पीनाहै देनाहै ( मज्झिम)
मध्यम (सर) स्वर (मस्सिउ ११) आश्रित वाला जीव ॥ ११ ॥
भावार्थ-मध्यम स्वर वाले जीव सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले हाने
उनके खान पान करने में वा देने में किसी प्रकार से भी विघ्न उपस्थित
नहीं होते किंतु पदार्थों के विशेष ग्रह करने में वे असमर्थ होते हैं इसी करके
वे मध्यम स्वर आश्रित कहे जाते हैं ॥ ११ ॥
- - * अनुयोगद्वार मूत्र * (२४३) ॥ अथ पंचम स्वर लक्षण विपय ।। पंचम सरमंताउ हवंति पुहवीपती । सुरा संग्रह कत्तारो अणेग नरणायगा ॥ १२ ॥ पदार्थ- (पंचम ) पंचम ( सर ) स्वर (मंताउ ) वाले जीव (इति) होते हैं (पुहवी ) पृथवी ( पनि ) के पति पुनः (सूरा) शूरवीर होते हुए (संग्गह ) पदाथों के । कत्तारो ) संग्रह करने वाले होते हैं, और ( अणेक) अनेक (नर नायगा ) नर नायक होते हैं अथार्त नरों के अधिपति होते हैं यह सर्च पंचम स्वर के लक्षण हैं और इन्हीं लक्षणों द्वारा स्वर को प्रतीति होती है ॥ १२ ॥ भावार्थ-पंचय स्वर वाले जीव भूमी के अधिपती होते हैं और समर में शूर वीर भी होते हैं तथा अनेक प्रकार के पदाधी के भी संग्रह करने वाले होते फिर अनेक नरों के नाय भी होते हैं यह पंचम स्वर के लक्षण हैं इसके पीछे अब छठे स्वर के लक्षण कहते हैं ।। १२ ।। घेवयं सरमंताउ हवंती दुहजीविणो कुचेला य कुविति उ चोरा चंडाल मुटिया ॥ १३॥ मोर, रेवन सरमनाउ भनि कल इथिया साथिया वगुरिया सोयरिया मच्छ धाय ? रेवन वर चाले नीयों को नेश प्रिय होता है ये पत्तियों के मारने वाले वा मृगाधि के पड़ने वाले रेने है तथा सूकरों के पकदने वाले या मत्स्य के बंधन करने वाले होते हैं ॥१२॥ २ चहाला मुष्टिया मैया ने भन्ने पात्र कम्मुगो जोधात गाजे बोराणे साय सरमस्सिया ॥१३॥ जो चंदालादि कर्म करने वाले और मुंठिक शादि का प्रहार करने वाले तथा जो अन्य प्रकार फे पाप कर्म करने वाले है जैसे कि गो घातक गायों की घात करने वाले अथवा जो चोर है वे सर्व मिपाद स्वर के आश्रित होते है अर्थात गोयादि उपकारी पशुओं की हिंसा करने वाले होता ॥ श्रीस्थानांग सूत्र भन्याय गाथा १२-१३॥ :
. , (२४४) * अनुयोगद्वार सूत्र पदार्थ-(धेवयं ) धैवत (सर) स्वर (संताज) वाले जीव (हवंति) होते हैं.( दुहजीविणे ) दुःख पूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले फिर. जिनके (कुचेला ) कुवस्त्र पहिरे हुए होते हैं और जिनकी (कुदितिय कुवृत्ति होती है यह स्वर प्रायः (चोरा) चोरों का ( चंडाल ) चंडालों का (मुट्टिया) मुष्ठि मल्लादिका होता है और यह स्वर निपिद्ध होता है ।।.१३ ।। भावार्थ--धैवत स्वर वाले जीव दुःख पूर्वकं जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं पुनः जिनके कुवस्त्र और दुष्टं आजीविका होती है इस स्वर के धारने वाले जीव चोर्य कर्म करने वाले होते हैं वा चांडालादि के क्रिया करने वाले वाष्टिकादि से प्रहार करने वाले होते हैं इसीलिए यह स्वर निषिद्ध होता है तथा इस स्वर वाला जीव पाप कर्म विशेष करता है ॥ १३ ॥ अथ सप्तम स्वर लक्षण विषय । निसाद सरमंताउ हवंतिहिंस गावरा । जंघाचारा लेह- वाहा हिंडगा भारवाहगा ॥ १४ ॥ पदार्थ-(निसाद ) निपाद ( सर ) स्वर (मंतार ) वाले जीव ( हवंति ) होते, हैं ( हिंसगा) हिंसक ( नरा) नर अर्थात् व हिंसा करने वाले होते हैं पुनः (जंघाचाए ) जंघादिकों को समर्दन करने वाले (लेहवाह ) लेख वाहक (लेख के लेजाने वाले (हिंडगा ) प्रमाण से रहित भ्रमण करने वाले और (भार वाहः गा १४ ) भार चाहक होते हैं क्योंकि निपाद स्वर वाले जीवों की भी क्रियायें अयोग्य होती हैं ॥ १४ ॥ भावार्थ-निषाद वाले जीव हिंसक और अतीव भूमण करने वाले होते तथा जंघाओं के मर्दन करने वाले लेख वाहक और भार वाहक भी होते हैं अर्थात् जो शूद्र क्रियायें हैं उनके करता निषाद स्वर वाजे ही होते हैं अब इनके सप्त स्वरों के तीन ग्राम और सप्त मूर्च्छना के विषय में कहते हैं ॥ १४ ॥ .. अथ सस स्वरों के ग्राम वा मूर्च्छना विषय । एएसिं णं सतण्हं सराणं तओगामा पं० त० सज्जगामे मज्झिम गामे गंधार नामे सज्जगामस्सणं सत्त मुच्छणाश्रो T * अनुयोगद्वार सूत्र * (२४५ ). पं० तं० मंगी को रविया हरिया स्यणी य सारकंता य छट्ठी य सारसी नाम सुद्ध सज्जा य सत्तमा ॥ १५॥ मझिमगाम- स्म णं सत्त सुच्छरणाओ पं० त० उत्तर मंदारयणी उत्तरा. उत्तर समासम्मो कताय सो वीरा अभिरुवा होइ सतमा॥१६॥ गंधार गामस्सणं सत सुच्छणायो पं० त० नंदिया खुडिया पूरिमाय चउत्थी सुद्ध गंधारा उतर गंधारा पुणसायं च मिया हवइ मुच्छा ।।१७॥ सुठुतर मा यामीसाछट्ठी सव्व उयनायव्वा ग्रह उत्तारायत्ता कोडिमा य सा सत्तमा हवइमुच्छा ॥ १ ॥ पदार्थ-( एणसिं णं सतएई सराणं तउगामा ५० त०) इन सात स्वरों को तीन ग्राम प्रतिपादन किए गए हैं ग्राम इसे कहते हैं जिन में मूर्छनाओं का स- मृह हो सो बह ग्राम समूह तीन प्रकार से कयन किया गया है जैसे कि ( सज्ज गामे १ ) पड्न ग्राम जिसमें पड्न ग्राम सम वंधि मुर्छनाओं का समूह हो इसी प्रकार (गांधार नाम ३) गांधार ग्राम (मज्झिम गामे २) मध्यम ग्राम यह सर्व ग्राम मूर्छनात्रों के समूह रूप होते हैं किन्तु ( सज्ज गामस्सणं सत मुच्छणा उ ५० त०) पइन ग्राम की सात मूर्छनायं प्रतिपादन की गई है अपितु मर्छना उसे कहते हैं जिस के द्वारा श्रोता या पक्का मूर्छित हो तथा मूर्छित के समान श्रीता गण वा वक्तागण हो उसे मुर्छना कहते हैं अथवा राग भेद का नामभी मूर्छना कहते हैं तथा जहां पर सगों के भेदानुभेद होते हैं वे मूर्छनायें हैं वे पडू ज ग्राम की सात मूर्छना प्रतिपादन की हैं जैसे कि ( मंगी १ ) मांगी १ (को रवीया २) कोरची २ (हरिया ३)न्हरिता ३ ( रयणीय ४) रत्ना ४ (सा- र कंता ५) शारकांता ५ (छट्ठीय सारसी नाम ) छठी मूर्छना सारसी नाम क है (मृद्ध सज्जाय सतमा १५ ) शुद्ध पड्ज नामक सप्तमी मूर्छना है १५ किन्तु इस स्थान में इनके नाम ही वर्णन किए गए हैं किन्तु इनका पूर्णस्वरूप दृष्टिवाद के अन्तर जो पूर्व ई उन में सविस्तर वर्णन किया गया है तथा जो सांगीत विद्या के पुस्तक हैं वहां से इनका स्वरूप जानना चाहिये और (म- निमय गामस्सणं सत मुच्छणाउ पएणता तं० (मध्यम ग्राम की भी सात मूर्छ- नायें प्रतिपादन कीगई है जैसे कि-(उतरमंदा १) उतरामंदा १ ( रयणी २) * (२४६) * अनुयोगद्वार सूत्र *. रत्ना २ ( उत्तरा ३) उत्तरा ३ (उतर समा ४) उतर समा ४ (समोकंताय ५) समकांता ५ ( सोविरा ६) सुवीरा ६ (अभिरुवा होई सतमा १६) अभिरूप होती है सातमी मूर्छना १६ फिर ( गांधार गामास्सणं सत मुच्छणाउ पं० २० गांधार ग्राम की सात मूर्छना प्रतिपादन की गई है जैसे कि (नंदिया १) नंदिका १ (खुद्दिया १) क्षुद्रिका २ (पुरिमाय ) और पुरिमाई पुनः (चउ- त्यीय सुद्ध गंधारा ) चतुर्थी शुद्ध गंधार नामक मूर्छना है ( उतर गंधारा ५) उतर गंधारा (पुणसा ) पुनः वह (पंचमिया ) पांचमिका ( हबई ) होती है (मूी १७) मू| १७ और (सुठुतरमायमा ) सुठुतर मायाम ) साछट्टी सव्व उयनायव्वा वह छठी मूर्छना सर्वथा प्रकार से जाननी चाहिये (अह) अथ ( उतारायता कोडीमाय.) उतरायन को टिमा नामक (सा ) वह सतमी इवई . (मूर्छ। १०) मूळ होती है सातवीं ॥ १८ ॥ भावार्थ -इन सात स्वरों के तीन ग्राम हैं और एक एक ग्राम में सात २ मूर्च्छनायें हैं मूर्च्छना उसे कहते हैं जिस रागके कथन करने से वक्ता वा श्रोता मूर्षित के समान होजाएँ तथा यह मूर्छना गगों के भेद रूप हैं इन का पूर्ण विवर्ण दृष्टिवाद अंतरगत पूर्षों में सविस्तरता से किया गया है तथा किंचित् विवर्ण जो राग विद्या के (गायन विद्या के ) पुस्तक हैं उन में भी कियागया है अपितु इस सूत्र में जो केवल सूचना मात्र ही विवर्ण है इसलिए इन का नामा लेख किया गया है तथा हतिकार ने भी इनकी कृति विस्तार पूर्वक नहीं लिखी है अपितु सूचना मात्रही वृति लिखी गई है अब सप्त स्वरों के विशेष वर्णणन में सूत्रकार प्रश्नोत्तर के रूप में विवर्ण करते हैं ॥ १८ ॥ ॥ अथ सप्त स्वरों के विशेष प्रोत्तर विषय ॥ सतसरा कओहवई गीयस्स का हवइ जोणी कइसमया अोसासा कइवा गीयस्स आगारा ॥ १६ ॥ पदार्थ-( सतसरा कओ हवइ) (प्रश्ननि) सातों स्वर किस स्थान में उत्पन्न होते हैं १ और ( गीयस्स का हवइ जोणी) गीत की कौनसी योनि (उत्पति स्थान ) होती है २ (कइ समिया ओसासा) और कितने समय • .
- . * अनुयोगद्वार मूत्र * (२४७) प्रमाण स्वर का उच्छास है ३ अपितु (कइ वागीयस्स आगारा १९ ) गीतों के कितने आकार ( स्वरूप ) हैं ॥ १६ ॥ भावार्थ -इस गाथा में चार प्रश्न किए गए हैं जैसे कि सात स्वर कहां से उत्पन्न होते हैं गीत की योनि क्या है और स्वर का उच्छास कितना होता है और गीत का आकार कैसा है इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर निम्न प्रकार से दिए जात है।। १६ ।। ॥ प्रश्नों के उत्तर विपय ॥ सत सरा नाभीओ हवंति गीयं च रुन्नजोणी पाय समा प्रोसासा तिन्नि य गीयस्स आगारा ॥ २० ॥ पदार्थ--(संतसरा) सातों स्वर ( नाभीयो ) ( इति ) उत्पन्न होते हैं और (गीयं चरुन जोणी ) गीतों की रुदित योनि है ( पायसमा उसासा ) गीतों के के पद पद में उच्छास है अर्थात् जो पद सम है वह गीतों के पद पद में उच्छास है और (तिनिय ) तीन ( गीयस्स) गीतके (आगारा २०) आकार होते हैं ॥ २० ॥ भावार्थ--उफ प्रश्नों के निम्न प्रकार से उत्तर दिए गए हैं जमे कि (प्रश्न) सात स्वर कहां से उत्पन्न होते हैं ( उत्तर ) नाभिसे (प्रश्न ) गीतों की योनि क्या है ( उत्तर ) गाना ( प्रश्न ) स्वर का उच्छ्वास कितने समय प्रमाण होता (उत्तर) पदकी पूर्ति के अंत प्रमाण उच्छ्वास होता है.(प्रश्न )गांत के आकार . कितने प्रकार से वर्णन किए गए हैं ( उत्तर ) गाँती के तीन प्रकार से आकार वर्णन किये गये हैं ( प्रश्न ) वे कान २ से हैं ( उत्तर ) निम्न लिखित गाथा देखिये ॥ २० ॥ आइमउआरंभता समुव्वहंता य मज्झयारंमि प्रवत्याणे भवित्ता तन्निवि गीयस्स आगारा ।। २१ ॥ पदार्थ--(भाइ) गीत की आदि में (आरंभता) आरंभ करता हुआ (मउ ) कोमल वर होना चाहिए फिर (समुच्च हंताय ) महा ध्वनि ( मज्झ
( २४८)
* अनुयोगद्वार मूत्र *
यारंमि ) मध्य भाग में होवे (अब साणेय ) गीत के अंत में ( भविता ) मंद
स्वर में होवे (तिन्निवि) अपि शब्द समुच्यार्थ में है इस लिए यही तीन (गीय
स्स आगारा) गीत के आकार हैं ॥ २१ ॥
भावार्थ-गीत के तीन आकार होते हैं जैसे कि जब गीत की ध्वनि उ.
ठाई जावे तव मृदु स्वर होना चाहिए जब मध्य भाग में ध्वनि जाए तव महा
ध्वनि होनी चाहिए अपितु जब गीत का अवसान समय आवे तव प्राग्वत्
मृदु ध्वनि और मंद ध्वनि होनी चाहिए यही गीत के तीन आकार हैं अब गति
के दोष वा गुणों का विवर्ण करते हैं ॥ २१ ॥
॥ अथ स्वरों के भेदानुभेद गुण और दोप विषय ॥
छहोसे अगुणा तिनि य विचाई दोनि भणिइयो।
जो नाहि सो गाहिई सुसिखिओ रंग मज्झमि ।। २२ ॥
पदार्थ-(छद्दो से.) गीत के पद् दोप हैं और ( अट्टगुणा) अष्ट गुण है
फिर (तिनिय ) तीन (वित्ताई ) छेदों के भेद हैं (दोनिय भणिइओ ३) स्वर
मंडल में दोनों भाषाएँ कथन की गई हैं (जो नाहि ) जो उक्त सर्व भेदों को
जानता है ( सो गाहिइ ) सो गीत शुद्ध गाता है अपितु (सुसिखिो रंगम
ज्झिमंमि २२ ) जिसने गायन विद्या को भली प्रकार से सीखा है रंग भूमी में
रंग भूमी उसे कहते हैं जो नाटक घर होता है अर्थात् गायन शाला अव सूत्र
कार पद् दोपों के विषय में कहते हैं ॥ २२ ॥
भावार्थ-गीत के षट् दोष अष्ठ गुण होते हैं और तीन प्रकार के छंदों के
भेदहोते हैं अपितु दो भाषाओं में स्वर मंडल गायन किया जाता है सो जो
इस को पूर्ण विधि से जानता है वही गीत गाता है किन्तु जिसने भली प्रकार
से गीत विद्या को रंग भूमिका में सीखा है २२ अब दोषों का विवर्ण करते हैं ।
॥ अथ षट दोष विषय ॥
भीयं १ दुय २ मप्पिच्छं ३ उत्तालं च कम्म सो मुणे पव्वं ४
कागस्सर ५ मणुणासं ६ छदोसा होति गीयस्स ॥ २३ ॥
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२४६) पदार्थ-(भीयं १ ) भय के साथ गायन करना अथवा ( दुयं २ ) शीघ्र २ गाना २ (अपित्यं ३) मा सहित गला होने पर गान ऋग्ना तथा अनी व श्वास के होने पर गान करना ३ तथा ( उत्तालंच) ताल से विपगीत गाना (कम्मसी मुणेयवं ४) इसी प्रकार अनुममता पूर्वक भेट जानने चाहिए (पाग- स्सरं ५) अथवा कागपत् यदिम्बर होवे नव भी गीत में दोप होता है ५ (अनु. णासं ६) और नासिका में स्वर उच्चारण करना यह भी दोप है सो (छद्दी सा) यह पद दोप ( हाँति ) होने हैं (गीयस ) गीन के ॥ २३ ॥ भावार्थ-गीन के गाने में पट् प्रकार के दोप होते हैं जैसे कि-भय दे. सा. थ गाना १ शीघ्र २ गान २ व.स होने पर गाना ३ ताल से विपरीत गाना ४ कागवत् स्वर के होने पर गाना और नालिका में गाना ६ अाध गुणों का विवर्ण करते हैं। अथ गुणों विषय में सूत्रकार कहते हैं। पुण्ण रतं च अलंकियं च वनं हेर विचुटुंलुहरं समं सुललियं अठ गुणा होति गीपरम ।। २४ ।। पदार्थ--(पुण्ण ) स्वर कला पूर्ण होये १ (पतंच) पुनः राग में रज होवे २ फिर ( अलंपियंच ) राग अलंकार के सदित होवे ३ ( वतंत न विधुहं ) और प्रगट यवन हो। अर्थात् स्पष्ट वान हो ४ उसी प्रकार द्ध स्वर होवे ५ फिर ( मुहुरं ६ ) कोकिलावन् मधुर स्वर होवे ( सप्त ७ ) तालादि वा दत्र सम हायें और ( मुललियं ) राग वा स्वर मुलाहित छौ ८ ( अह गुणा ) यह अष्टगुण ! हाँति ) होने हैं (गीयस्स ) गीत के ॥ २४ ॥ भावार्थ-गीत के गाने के प्रष्ट प्रकार के गुण निन्न प्रकार से प्रतिपादन किए गए हैं जैसे कि-स्वर कला में प्रवीणता १ राग में रक्तता २ अलंकार सहिन ३ प्रगट वचन ४ शुद्ध स्वर ५ कोकिलायत् स्वर मधुर ६ तासादि बादित्र सम हो ७ मुललिन स्वर वा राग ८ यही गीन के गाने के आठ गुण है इन गुणों के साथ गीत गाने से गीन निदाप कहे जाने में अब इन के अतिरिक गुणों का विर्यण करते हैं जो अवश्य ही जानने योग्य है ।
(२५०) * अनुयोगद्वार सूत्र अथ स्वरों के अन्य गुणों विषय में उरकंठ सिरपसत्यं च गिज्जंते मउयरिभियपदवंध समताल पउक्खवं सतसरसी भरणेय ॥ २५ ॥ अक्खर समं पदसमं समंताल समंलय समंगेह समंच निस्ससियोससिय समसंचार समंसरासत ॥ २६ ॥ पदार्थ--( उरकंठ ) यदि स्वर विशाल होता है तव उर.( वृक्ष स्थल ). | विशुद्ध कंठ विशुद्ध ( सिर वसत्वंच) और शिर प्रशस्त फिर (गिजंते ) गी- त गाऐं जाऐं किन्तु ( मउय ) मदु स्वर के साथ ( रिभिय ) स्वर को संचारण करता हुआ चातुर्यता के साथ उस रिभित कहते हैं और ( पदबंध शुद्ध पद- कद्ध वृत होवे और ( समताल ) समताल होवे तथा वादिनादि भी सम्यक् प्रकार से ध्वनि निकालते हो ( पुच्चुखवं ) प्रत्युक्षेप उस का नाम है जो कांसिकादि वादित्र हैं उन के शब्द वा नृत्य करने वाले के आक्षप भी ठीक होवें इसी लिए ( सत्तसरसी) सात स्वर ( भैरणय २५ ) संयुक्त और अक्षरादि सम गीत कहानाता है ५५ पुनः (अक्खरसमं ) दीर्घ ह्रस्व प्लुत वा अनुनासिकादि अक्षर सम होवें और ( पयसम) पिंगल शास्त्रानुसार पद सम होवे ( ताल सम ) हस्तादि ताल सम होवें ( लयसमं ) लतादि. वादंतादि के वादिन बने हों वह भी सम हो फिर (गहसमंच ) जो वीणादि राग मे गृहीत हैं वह भी सम हो (निस्सासियउससियसमं ) निःश्वास और उछास भी सम हों क्योंकि श्वासोच्छास के ठीक होने परही गाना गाया जाता है (संचारसमं ) तंती सतार आदि में अंगुली आदि का संचार भी सम हो ( सरासत २६) यह सात स्वरों के सात लक्षण प्रकारांतर से कहे गये हैं ॥ २६ ॥ अव इस के आगे छद के लक्षण वर्णन करते हैं। भावार्थ-प्रकारान्तर से भी गीत शुद्धि का विवर्ण इस प्रकार से किया गया है जैसे कि उर १ कण्ठ २ शिर ३ विशुद्ध होवें मृदु गीत गाया जावे चातुर्यता के साथ अक्षरों का संचारण किया जाए पद वद्ध रचना होवे फिर हस्तादि की ताल सम होवे प्रत्युक्षेप नृत्य करने वाले का ठीक होवे इस प्रकार विशुद्धि के साथ जब गाना गाया जाता है तब उस गीत को सप्त स्वरविशुद्ध कहते * अनुयोगद्वार सूत्र * ( २५१) है २५ फ़िर अपर सम हो ? पद सम हो, २ ताल सम हो, ३ लता सम हो,४ ग्रह सम हो ५, साधोडास समझो ६, और (संती ) सत्तार आदि में संचार भी सम हो, यह भी सात गुण स्वरा के प्रकारान्तर से कहे गये हैं क्योंकि जो गीत विद्या के वेत्ता है यदि वे शुद्धि पूर्वक उसे ग्रहण करते हैं तब वे विद्या उनकी फली भूत होता है जब कि सर्व प्रकार से शुद्धि हो जाये नव जो छंद है वह भी शुद्ध होने चाहिए इस लिए अब वृतादि विषय में कहते हैं। ॥ अथवत्तं शुद्धि विषय ।। निहोसे सारवतं च .हे उज्जुतं मलं कियं उवणयं सो चयारं च मियं महुरमेव य ॥२७॥ समंअद्ध समं चेव, सब्वत्थ विसमंसजे तिन्निवित्तपयाराइं च उत्थं नो वलम्मई ॥२८॥ पदार्थ-(निदोस ) द्वात्रिंशद दापों से रदिन और ( सार वतंच ) विशिष्ट अर्थ का गृर्षक पुनः ( हे उज्जुनं ). हेनु गुफ और ( प्रलंकियं ) उपमादि अल- कारों से अलकन पुनः ( उमणय ) नगमा दिनयों से युक अयुक्र अथवा (सो- प्रयारं च ) कठिन वचनों से रहित लज्जा युक्त अविरुद्ध अर्थ का प्रकाशक (मियं ) मितानर या मर्यादा पूर्वक अतरं फिर ( पहुर ) मधुर अक्षर 'गुत ( एवय ) इस प्रकार के शुद्ध गीत को वृत्त कहने हैं अब वृत्त के सम विषय में कहते हैं (समं ) जिस छंद के चारों चरणों के समान अक्षर हों उन्हें समछंद कहने है और ( अद्धसमं चर) जिस छंद के प्रथम पाद और नृनीय पाद द्विनीय पाद और चतुर्थ पाद के परस्पर सामान धर्ण होवे उन्हें अर्द्धसमच्छेद कहने हैं और ( सव्वत्थ विसर्ग चज्नं ) जिस वृत्त की सर्वथा प्रकार से ही विषमता होवे उसे सर्व विषम छद्र कहने है सो यह (तिनि) तीनों (वित्त ) वृत्त के ( पयाराई ) प्रकार कहे गये हैं इस लिये (नउत्थंनोव लभइ २८) वृत्त का चतुर्थ प्रकार कीसी प्रकार से भी उपलब्ध नहीं होता अर्थात् सम, अर्द्धसम, विपम यही तीनों प्रकार छंद के हैं ॥ २८ ॥ भावार्थ-पत्त के पाठ गुण होते हैं जैसे कि चंद निःप १ विशिष्ट अर्थ का सच कर हेतु युक्न ३ अलंकृत ४ नयों से युक्त ५ शुद्ध अलंकार पूर्वक विरु- (२५२) * अनुयोगद्वार मुत्र * द्धादि दोषों से रहित ६ मिताक्षर। ७ और मधुर ८ फिर तीनों प्रकार से वृत कहे गये हैं २७ जिनके चारों पादों के परस्पर समान वर्ण होते हैं. उन्हें सम छंद कहते हैं जिनके प्रथम पाद और तृतीय पाद द्वितीय पाद और चतुर्थ पाद परस्पर सम हों उन्हें अई समच्छंद कहते हैं किन्तु जिस वृत्त के चारों पाद विषम ही उन्हें सर्व विषय छंद कहते हैं यही तीन हत्तों के प्रकार कहे गये किन्तु चतुर्थ प्रकार कहीं भी उपलब्ध नहीं होता अब भाषा विषय में कहते हैं। अथ भाषा विषय । सस्कया पागया चेव भणिइओ होति दोणिवि सर मंडलं मिमिजते पसत्या इसी भासिया ॥ २६ ॥ पदार्थ-( साकया ) संस्कृत (पागया चेव ) और प्राकृत ( भणिइउ हो. ति दोनिवि ) दोनों भाषाएँ कही गई हैं (सर मंडलंमि ) स्वर मंडल में (अर्थात् अहत् गणधरों ने दोनों भाषाओं में स्वर मंडल प्रतिपादन किया है ) (गिजते ) और इन्हीं में ( गिजते.) स्बर मंडल गायन किया है क्यों कि यह स्वर मंडल और यही दोनों भापाऐं ( पसत्या ) प्रशस्त (सुन्दर ( इसी) ऋषि श्री भगवन् वर्द्धमान स्वायी से ( मासिया ) भापित हैं २६ अर्थात् दोनों भाषाएँ प्रशस्त श्री भगवान् ने प्रतिपादन की है ॥ २६ ॥ भावार्थ-तीर्थकरों ने संस्कृत और प्राकृत यह दोनों भाषाऐं प्रतिपादन की हैं और दोनों भापायों में स्वर मंडल गायन किया जाता है और यह दोनों • भाषा सुन्दर हैं और ऋपि भापित है यहां पर ऋपि.शब्द का सम्बन्ध भगवान से है २९ अब कुछ विशेष प्रश्नों के विपय में कहते हैं । अथ विशेष प्रश्न विषय । केसी गायइ महुरं केसी गायइ खरं च रुक्खं च केसी गायई चउरं केसी य विलंबिय दुपं केसी विस्सरं पुण केरसी ॥३०॥ .
* अनुयांगद्वार मूत्र * (२५३) पदार्थ-(केसी) कौन सी स्त्री (गायइ) माती है (महूर ) मधुर गीत और (केसी) कौन सी स्त्री ( गायइ ).गाती है ( खरंच ) खर र ( रुक्खंच ) रुक्ष ककर्श गीत और ( केसी) कौनसी स्त्री ( गायई ) गाती है ( चउरं ) चातुंर्यता पूर्वक और ( केसी य ) कौन सी स्त्री ( विलंबियं ) विलम्ब से गाती है (दु ) शीघ्र (केमी ) गाने वाली कौनसी स्त्री फिर ( विस्सरं पुणे के रेसी ३०) विस्वर गीत कोनसी स्त्री गाती है अर्थात् राग का विश्वंस करनेहारी कौनसी स्त्री होती है ॥ ३० ॥ भावार्थ-उक्त गाथा में यह प्रश्न किए गये हैं कि कौनसी स्त्री मधुर गीत गाती है कौनसी स्त्री कर्कश और रुक्ष गीत गाती है कौनसी स्त्री दक्षता पूर्वक गाना गाती हैं कौनसी स्त्री विलम्ब से गाती हैं कौनसी स्त्री शीघ्रता से गाती है कौनसी स्त्री विस्वर गीत ग ती है ।। ३० ॥ इन प्रश्नों के उत्तर निम्न गाथा में दिए गए हैं। अथ उत्तर विषय । गोरी गायइ महुरं काली गायइ खरंच रुखं च सामा गा- यइ चउरंकाणीयाविलावियं दुतं अंधा विस्मरं पुणपिंगला ॥३१॥ पदार्थ- (गोरी गायइ ) गौर वर्ण वाली स्त्री गाना गाती है ( महुरं) मधुर और ( कालीगायइ ) कृष्णा गाती है ( खरं च रुक्खं च ) कर्कश रुक्ष अ- पितु ( सामा गायइ चउरं ) श्यामा गाती है दक्षता के साथ ( काणीयविलवियं) एक चक्षुबाली विलम्ब से गाती है और (दुयं अंधा ) शीघ्र अधी स्त्री गातो है पुनः (विस्सरपुणपिंगला ३१) विस्वर पिंगला गाती है अर्थात् कपिला स्त्री विस्वर गीत गाती है।॥ ३१ ॥ भावार्थ-जो तीसवी ३० गाथा में प्रश्न किए गए थे उनका अनुक्रमता पूर्वक ३१ वी गाथा में उत्तर दिए गए हैं जैसे कि ( प्रश्न ) कौनसी स्त्री मधुर गीत गाती है ( उत्तर ) गौर वर्ण वाली ( प्रश्न ) कौनसी स्त्री कर्कश और रुक्ष गाना गाती है (उत्तर ) कृष्णा (काले वर्ण वाली ) ( प्रश्न) कौनसी स्त्री चातुर्यतापूर्वक गाती है ( उत्तर ) श्याम वर्ण वाली (प्रश्न) कौनसी स्त्री विलव से गाती है. ( उत्तर ) एक अांख वाली ( प्रश्न) कौनसी स्त्री शांघू २ गाती है (२५४) * अनुयोगद्वार सूत्र * ( उत्तर ) अांधी नेत्रहीन ( प्रश्न) कौनसी स्त्री विस्वर गाना गाती है (उत्तर) पिंगला (कपिला) स्त्री विस्वर गाती है. उक्त प्रश्नों के उत्तर अनुक्रमता पूर्वक ३१ वी गाथा में दिए गए हैं अब स्वर मंडल का उपसंहार करते हैं । अथ उपसंहार विषय । सतसरातओगामा मुच्छणाएगवीसइ ताणाएगुणपन्नास ससम्मत्तं सरमंडलं सेतसत्तनामे ॥ ३३ ॥ पदार्थ- ( सतसरा) पड्जादि सप्त स्वर हैं और ( तओगामा )इन के तीन ग्राम हैं फिर इन की ( मुच्छणाएगवीसइ ) २१ मूलनायें हैं क्योंकि एक २ ग्राम की सात सात मूर्छनायें हैं और ( ताणाएगुणपन्नास ) ४६ इन की तान हैं जैसे कि एक तंत्री की ७ तानें हैं उन में एक २ स्वर सातं सात बार गाया जाता है इसलिये ४६ तान कथन की गई हैं सो इसी विधि पूर्वक ( सम्मतं ) समाप्त हो गया है (सरंमडलं ) स्वर मंडल ३२ ( सेतसत्तनाम ) सो वही सप्त नाम है अर्थात् दश प्रकार के नामान्तर के विषय सप्तनाम इस प्रकार से वर्णन किया गया है अब इस के आगे आठ नाम का विवर्ण किया जायगा । भावार्थ-इस स्वर मंडल में सप्त स्वर तीन ग्राम २१ मूर्छना और ४६ तान वर्णन की गई हैं किन्तु नाम उसे कहते हैं जैसे कि एक वीणा में ७ छिद्र हैं उन में एक एक स्वर सात सात वार गाया जाता है सो इस प्रकार से सातों सात ४६ हुए सोयह ४६ तान भी स्वर मंडल के बीच में है इस प्रकार से स्वर मंडल की समाप्ति की गई है अपितु इसे ही सप्त नाम कहते हैं अब इस के पश्चात् आठ प्रकार के नाम का विवेचन किया जाता है किन्तु आठ नाम में आठ प्रकार से विभ- क्ति, दिखलाई गई हैं इसलिए अब विभक्तियों का स्वरूप दिखलाते हैं । अथ अष्टनामान्तर्गत अष्ट विभक्तिऐं विषय । सेकिंतं अहनामे२ अट्टविहा वयणविभत्ती पं० त० निदेसे पढ़माहोइ विइयाउवएसणं तइया कारणमि कया चउत्थी संप- * अनुयोगद्वार सूत्र *.. (२५५) पावणे१ पंचमीअवायाणे छटीस्सामिवाय गे सत्तमि सिन्निहा. णत्थअट्टमी प्रामंत्तणीभवे ॥ २॥ पदार्थ-सेकितं अट्ठ नामे २ अट्टविहा क्यणाविभत्ति पं० ० ) सो सप्त नाग के अनन्तर आठ प्रकार के नाम का नाम किस प्रकार से विवर्ण किया गया है अर्थात् वह आठ प्रकार का नाम कौनसा है इस प्रकार शिष्य के पूछने पर गुरु कहने लगे कि भो शब्द प्राट् ! आठ प्रकार के नाम में आठ प्रकार की . वचन विभनि कथन की गई है वचन विभक्ति उसे कहते हैं जो अर्थों के विमा ग को करें और वचनों के अनेक भेद करके दिखलाए किन्तु यह सुवंत वचन हैं अपितु तिङ्न्त न समझने चाहिए सो यह विभक्तिये आठ प्रकार से प्रतिपादन कीगई हैं जैसे कि (निद्देस पठमा होइ) केवल लिंग वोधनार्थ जो वचन भापण किए जाते हैं उनमें प्रथमाविभक्ति होती है अर्थात् निर्देश में प्रथमा होती है और (विइया उब एसणं ) द्वितीया उपदेश में होती है अर्थात् द्वितीया विभ- क्ति आदेश में होती है ( तइया ) तृतीय ( करणंमि ) करण में ( कया) वि. धान की गई है अपितु ( चउत्था ) चतुर्थी ( संपयावणे १ ) संपदान में कही. गई है १ और पंचमी पांचवीं ( आवादाणे ) अपादान में होती है (छछी सस्सा मि वायणे ; किन्तु पष्टी स्वस्वामि वचन में होती है अर्थात् सम्बंध में पष्टी हो ती है और ( सप्तमी ) सातवी ( सणिहाणत्थे ) सन्निधानार्थ में होती है अर्थात् आधार में सप्तमी विभक्ति होती है और (अठमी ) आठमी विभक्ति (आमंतणी भवे २) श्रामंत्रण अर्थ में होती है अर्थात् अष्टमी विभाक्त सम्बोधन में कथन की गई है किन्तु आधुनिक व्याकरणों में संवोधन को पृथक करके सात विभाक्तिये लिं- खी है और वृद्ध व्याकरणों के मत में विभक्तिऐं आठ ही होती है क्योंकि कर्ता के वचन भेद में ही आमंत्रण होता है सो वचन भद का नाम विभाक्त है यथा विभज्यन्ते विभागी क्रियन्ते संख्या कर्मादयो• अभिरिति विभक्तयः विभक्तिनां अर्थाः विभक्तार्थाः इसलिए आमंत्रण को भी विभक्तियों की संज्ञा में रखा गया है ॥२॥ A भावार्थ-आठ नाम के वीच में आठ प्रकार से विभक्तिये कथन की गई क्योंकि वचन के भेद को ही विभक्ति कहते हैं सो यह नाम.विभक्तियें हैं तिङत नहीं है और इसी को कारक प्रकरण जानना चाहिये अब जिन २.स्थानों में . (२५६) * अंनुयोगद्वार सूत्र * जो जो कारक होता है वे निम्न लिखितानुसार है निर्देश में प्रथमा होती है उप देश में द्वितीया होती है इसी प्रकार करण में तृतीया संप्रदान में चतुर्थी अपादा न में पंचमी सम्बन्ध में पष्टी अाधार में ससमी और श्रापत्रण में अष्टमी विमान होती है इस प्रकार के कारकों के स्थान वर्ण करने के पश्चात् अब इन के उदाह रण दिखाए जाते हैं। अथ अष्ट विभक्तियों के प्राकृत उदाहरण विषय । तत्थ पढमा विभत्ति निदेसे सो इमो अबति विइया पुण उवएसे भणकुणलु इमं वयं वति ३ ॥ पदार्थ-( तत्व पढ़या विभत्ति ) इन यादों विभक्तियों में जो प्रथया है वो (निले सोइयो अहंयत्ति ) निर्देश रूप इस प्रकार से है जैसे किसः य-अई- इत्यादि किन्तु अयं प्रयोग पुलिंग का इसलिये दिखलाया गया है यह भी प्र- योग केवल निर्देश मात्र ही है और (विझ्या पुण) द्वितियां फिर (उदएसे) उपदेश में होती है जैसे कि-(भणगुण सुइमं वयं यत्ति) शास्त्र को पढ़ कार्य को कर इस प्रकार के वचनों में द्वितीया होती है किन्तु इन से अन्य स्थानों में भी द्वितीया होती है जैसे कि-कटं करोति, शरं लुनाति, इत्यादि ३ ॥ भावार्थ-आठों विभक्तियों में से प्रथम प्रथमा के ही स्थान वर्णन किए गये हैं जैसे कि- केवल निर्देश में प्रथमा होती है यथा स अवं, अहं, इत्यादि निर्दे- श वचन प्रथमा में रहते हैं और उपदेश में द्वितीया होती है जैले कि-शास्त्रं पठ कार्य कुरु अर्थात् शास्त्र को पढ़ कार्य कर इत्यादि अयों में द्वितीया होती है अं. थवा इन से अतिरिक्त अर्थों में भी द्वितीया होती है जैसे कि-कट करोति, शरं लुनाति अर्थात् कट को बनाता है शर को काटता है इस में उपदेश कुछ भी नहीं हैं अपितु वह स्वयमेव ही वह क्रियाएं करता है यथा कुभं करोति इत्यादि प्रयोग जानने चाहिए अव तृतीया और चतुर्थी के उदाहरण कहते हैं । अथ तृतीया और चतुर्थी विषय । तइया करणमि कया भणियं च कयं च तेणेच मएवा है- दिनमोसाहाए. हवइ चउत्थी संपयाणमि ४ ॥
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२५७) पदार्थ-( तइया) तृतीया ( करणमि) करण में ( कया ) विधान की गई जैसे कि- (भणियं च कयं च) पठन किया और कृत किया (तेणे वमएवां) उसने अंथवा मैंने अर्थात् पठितं मया पठन किया मैंने तेन.ताड़िता उसने मारी इत्यादि अर्थों में तृतीया होती है और ( हंदि ) इत्युपदर्शने यह अव्यय दिख- लाने अर्थ में है यथा (नमा साहाए) नमो देवेभ्यां स्वाहा अग्नये अहते नमः इत्यादि अथों में ( हवइ ) होती है ( चउस्थि ) चतुर्थी विभाक्ति होती है (संप- याणंमि) सो दान पात्र में संमंदान कारक होता हैं यथा उपाध्याय गां ददाति इत्यादि प्रयोग जानने चाहिये ॥ ४ ॥ भावार्थ-तृतीया विभक्ति करण में होती है क्योंकि साधक तमं करणं इस प्रकार से माना गया है यथा शरेण हन्ति असिना छिनन्ति इत्यादि प्रयोग जा ! नने चाहिये और चतुर्थी संप्रदान में है जैसे कि नयो देवेभ्यः अईते नमः स्वाहा अग्नये उपाध्याय गां ददाति इत्यादि अर्थों में संमदान होता है क्योंकि नमः शब्द का सम्बन्ध सम्प्रदान के साथ ही प्रायः होता है सम्प्रदान उसे कहते हैं जिसको कोई वस्तु दीजाए अर्थात् लेने वाला सम्प्रदान कहाता है इसके अन्तर पंचम और छठे कारक के विषय में विवेचन करते हैं । अथ पंचम और छठे कारक विषय । अवणय गिएह य एत्तो इउत्तिवा पंचमी अवा-याणे । छछी तस्स इमस्सवा गयस्स वा सामिसवंधे ॥ ५ ॥ पदार्थ-(अवनय ) दूर कर (गिण्य ) प्रहण कर ( एतो ) उससे ( इड ति वा पंचमी वायाणे) अथवा इससे मुक्ति होती है यथा रत्न त्रयान्योक्षः इत्यादि अर्थों में पांचमी विभाक्ति अपादान नामक कारक में होती है क्योंकि अपायेऽव धौ॥शाव्या अ.१पा.३ सू.१५६ । बुधिकृत जो विभाग है उसके विषय अपादान कारक होता है और ( छठी ) छठी विभक्ति इन अर्थों में होती है जैसे कि- ( तस्स) उसकी वस्तु है (इमस्स ) इसकी है ( गयस्स वा ) अथवा गए हुए की है क्योंकि यह कारक (सांमि सम्बन्धे ५) स्वामी सम्बन्ध में होता है यथा राज्ञः पुरुपः" यह राजा का पुरुप है इत्यादि अर्थों में षष्टी विभक्ति होती है ॥५॥ ।
(२५८) * अनुयोगद्वार सूत्र * भावार्थ-पांचवीं विभक्ति अपादान में होती है जैसे कि इससे दूर करो इस से लो इत्यादि अर्थों में पांचवीं है और षष्टो सम्बन्ध में होती है जैसे कि..यह. उसकी वस्तु है वा इसकी है इत्यादि अर्थों में स्वामी सम्बन्ध होता है इसलिये इन अर्थों में षष्टी दी गई हैं अब इस के आग सप्तमी और आमंत्रण विषय में कहते हैं। अथ सप्तमी विभक्ति और आमंत्रण के विषयमें । हवइ पुण सत्तमी तइममि अाहारंकालभावेय आमत- णी भवे अट्ठमी जहाहे जुवाणेत्ति सेतं अहनामे ॥ पदार्थ-( हवइ ) होती है (पुण ) फिर ( सत्तमी ) सप्तमी विभक्ती (तंइमं मि) वो इस ( आहार ) आधार (काल भावेय ) काल और भाव के विषय में जैसे कि आधार के विषय में तो सप्तमी होती है साथ ही काल और भाव का भी सम्बन्ध करलेना चाहिए जैसे कि-" मधी रमते "वसंत मास में लोग कीड़ा करते हैं यहां पर काल में सप्तमी हो गई है और “ चारित्रेऽवतिष्ट ते" चारित्र में मुनि ठहरते हैं यहां पर भाव में सप्तमी है क्योंकि आत्मा निज भा- व में स्थिति करता है इत्यादि प्रयोगों में सप्तमी होती है और (आमंतणी भवे अठमी) आमंत्रण में अष्टमी होती है यथा ( हेजुवाणेति) हे युवान्-इस प्रकार के संवोधन · में अष्टमी होती है क्योंकि ( द्धस्वोऽनित्पाट ) इस सूत्र से संबोधन में हे शब्द का प्रयोग करना चाहिए.६ ( सेतं अ नाम ) यही आठ नाम है सो इसी स्थान पर अष्ट प्रकार का नाम पूर्ण हो गया है अव इ- सके आगे नव नाम विषय में कहते है ।। भावार्थ--सप्तमी विभक्ति अधार में होती है तथा काल और भाव में भी हो जाती है यथा " मधौ रमते" चारित्रेऽवतिएते " यह काल और भाव के प्रयोग हैं और आमंत्रण में अष्टवीं विभक्ति कथन की गई है जैसे कि हे युक्न् भो पुरुष इत्यादि प्रयोग हैं किन्तु वर्तमान काल में जो व्याकरण में प्रचलित हैं उनमें आमंत्रण प्रथमात्त माना गया है और सूत्र में आमंत्रण को आठवीं विभाक्ति करके माना गया इससे सिद्ध होता है कि प्राचीन ब्याकरण आमंत्रण को भी * अनुयोगद्वार सूत्र * (२५६) विभक्ति मानते थे और इन के सर्व प्रत्यय निम्न प्रकार से हैं जैसे कि- सुश्री जस् । अम् औ शस् । यभ्याम् भिस् । के भ्याम् भ्यस् । इसि भ्याम् भ्यस्। स् श्रोस् आम् ङिओस् सुप् । पुनः आमंत्रण में सु औ जम् । सो इस प्रकरण में कारक प्रकरण दिखलाया गया है अपितु इसका सविस्तर स्वरूप व्यकरणों में देखना चाहिये क्योंकि यहां पर तो सूचना मात्र ही वर्णन किया गया है सो इस प्रकरण को अवश्य ही ध्यान से पठन करना चाहिए अब इसके अनन्तर नव नाम के विपय में कहते हैं किन्तु नाम के अंतर्गत नव प्रकार के रस वर्णन किए गए हैं इस लिए नवरतों की व्याख्या की जाती है अथ नवरस विषय । नव कव्वरसा पन्नता तंजहा वीरो १ सिंगारो २ अभ्भु- तोय ३ रादोय ४ होई वाधवो वेलणो ५ वीभच्छो हासो ७ कलुणो ८ पसंतोय ॥ पदार्थ-( नव कन्वरसा पन्नता तंजहा ) नव प्रकार से काव्य रस प्रतिपा- दन किए गए है क्योंकि वेर्भावः काव्यं कवि काजो अंत:करण का भाव है व फिर वो वीरादि रस काव्य में बंधे हुए हैं उन्हीं को काव्य रस कहते हैं यथ वा ह्यार्था लंबनो वस्तु विकारो मान सो भवेत समावः कथ्यते सद्भिस्तस्योत् कर्पो- रसः स्मृतः १ यह काव्य रस नव प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (वीरो १) दान तप युद्ध इत्यादि में वीरता करना उसे वीर कहते हैं और (सिंगारो २) काम जन्य सर्व रसों में प्रधान स्त्री संग से उत्पन्न होने वाले रस को शृङ्गाररस कहते हैं २(अभ्भुतोय ३) अद्भत पदार्थों के देखने से जो रस उत्पन्न होता है उसको अद्भुत रस कहते हैं और ( रोदोय ४) वैरी के दिख- लाए हुए भयों को देखकर जो रस उत्पन्न होता है उसे रौद्र रस कहते हैं । ( होई बोधवा ) अर्थात् इस रस को रौद्र रस जानना चाहिए (वेलणओ ५) जो लज्जा का उत्पादक होये और लोकों में स्तुति का पात्र भी हो उसको वीडन रस कहते हैं ५ (विभच्छो ६) जिन पदार्थों के सुनने से वा देखने से घृणा उत्पन्न हो उस रस को विभत्स रस कहते हैं ६ ( हासो ७) जिसके. द्वारा हास्य की प्राप्ति हो उसे हास्य रस कहते हैं जैसे कि वेप परिवर्तन करना . (.२६०) * अनुयोगद्वार सूत्र * भाषा परिवर्तन भांड चेष्टा वा कुतुहल उत्पादक वचन उच्चारण करने उसी को हास्य रस कहते हैं ७ ( कलुणे ८) प्रिय वस्तुओं के वियोग से दुःख उत्पन्न होता है फिर मुखाकृति मलीन हो जाती है चित्त व्याकुल रहता है इत्यादि भावों को करुणा रस कहते हैं ८ फिर ( पसंतोय ९) जो क्रोध मान भापा राग लोभ और देशादिके बंधनों से विमुक्त हुआ है अत एवं आत्मज्ञान में हिनि मग्न है सदैव काल प्रशान्तात्मा है इत्यादि गुण पूर्वक जीव को प्रशान्त रस प्राप्त होता है ॥९॥ भावार्थ-नव प्रकार के नाम नव रस प्रतिपादन किए गये हैं और इनको नव काब्य रस भी कहते हैं क्योंकि कवि के भावों का नाम काव्य होता है अतः उनमें जो निवंधन किया हुआ है उसी को रस कहते हैं सो यह नव प्रकार के रस कान्य रस होते हैं जैसे कि वीर रस १, शृङ्गार रंस २, अद्भुत रस ३, रौद्र रस ४, ब्रीडन रस ५, वीभत्स रस ६, हास्य रस ७, करुणा रस, और प्रशान्त रस : यही नव प्रकार के रस हैं और अलंकार ग्रन्थों में मायः इन्हीं रसों का विशेष वर्णन होता है वह भी नव रसों के विधायक होते हैं और स्वरों में नव रसों का परस्पर विशेष सम्बन्ध रहता है सो जो संसार भर में पदार्थ हैं वे नव रसों के ही अंतरगत रहते हैं अब रसों के उदाहरण दिखाये जाते हैं। अथ वीर रस का उदाहरण विषय । तत्थ परिच्चागंमि य दाणेतवचरणा सत्तुजण विणासे य अणस्णुसयधितीपरकमलिंगो वीरोरसो होई ॥ २॥वीरोरसो. जहासो नाम महावीरोजो रज्जं पयहिऊण पव्वइओ कामको हमहासत्तु पक्ख निग्घायणं कुणई ॥ ३ ॥ ‘पदार्थ-(तत्थ परिच्चागंमि यदाणे ) इन नव रसों में प्रथम वीर रस का विवर्ण किया गया है सो यह वीर रस त्यांग में दान में तपश्चरण में च पुनः (तवचरणसत्तुंजणविणासे य ) शत्रु जन के विनाश में होता है जैसे कि (अणणं सयधितीं) दान करके गर्व न करना जैसे किमर्मतुल्योदानी. ना- स्तीति अर्थात् मेरे समान कोई दानी नहीं है इस लिए दान देकर मान न: ..
* अनुयोगद्वार सूत्र *
(२६१)
करना तप करके शांति रखना और ( परकम ) वैरी के हनन में, पराकम करता
है किन्तु व्याकुलता नहीं करता सो (लिंगो वीरोरसो होई २ ) इन लक्षणों से
वीर रस की पहचान होती है क्योंकि त्याग करना दान देकर पश्चाताप न करना
, तप में धृति धारण करना यह सव वीरता के लक्षण हैं और संसार पक्ष में
यह रस शत्रु के विनाश में भी होता है इसी का नाम वीर रस है अब इस रस
का उदाहरण देते हैं किन्तु यह उदाहरण भाष शत्रु के हनन करने का ही है
क्योंकि शास्त में मोक्षमार्ग का ही प्रारम्भ हुआ है. सो उसी के अनुसार उदा.
हरण हैं (वीरोरसो.).वीर रस (जहासोनाम महावीरो) जैसे वह सुप्रसिद्ध
नाम से श्री महावीर स्वामी जिन्होंने (जोरज्ज) राज्य को (पयाईऊण ).
त्याग करके और वर्षीदान देकर ( पव्वइओ ) दीक्षा ग्रहण की फिर ( कामकोह)
काम क्रोध रूपी जो ( महासत्तु ) महा शत्रुओं का (पक्ख ) समूह वा गर्व यां
(निग्घायणकुण ३) उसका नाश किया अथवा श्री महावीर देव स्वामी भावं
शत्रुओं को नाश करने लगे सो इसी का नाम वीर रस है ३ इस रस में भाव.
वरिता का ही उदाहरण दिया गया है किन्तु भावार्थ यह है कि जिस काव्यं
के सुनने से वीरता उत्पन्न होवे उसे ही वीर रस कहते हैं ।
भावार्थ-इन नव रसों में प्रथम वीर रस का विवर्ण किया गया है जैसे
कि यह रस त्याग में, दान में, तप में और शत्रु के विनाश में होता है दान देकर
अहंकार न करना, तप में धृति धारण करना, शत्रु के विनाश में पराक्रम करना,
इन लक्षणों द्वारा वीर रस की प्रतीती हो जाती है इस में उदाहरण. श्री भगवान्
महावीर स्वामी का ही है जिन्होंने राज त्याग कर दीक्षा लेकर काम क्रोध
रूपी भाव शत्रुओं के नाश करने में उद्यत हुए यही वीरता का लक्षण है तथा
जिस काव्य के सुनने से वीरता की प्राप्ति हो उसे ही वीर रस कहते हैं ।
अथ श्रृंगार रस विषय ।
सिंगारो नाम रसो रइस जोगामिलासे संजणणो मंडण
विलास. विव्वोय हासलीला रमण लिंगो ॥ ४॥ सिंगारो रसो
जहा महुर विलास ललियं हिययउम्मादण कर जुवाणाणं सा
मासदु दामं दायति मेह लादामं ॥ ५ ॥
(२६२)
* अनुयोगद्वार सूत्र *
पदार्थ-(सिंगारो नाम रसो) शृङ्गार नायक रस ( रई ) रति कामदेव स-
जोगा मिलास) स्त्री आदि के संजोग की अभिलाषा के (संजणणो) उत्पन्न
करने हारा है और ( मंडण ) कंकणादि का मंडण और नेत्रादि (विलास )
विलास युक्त होने वा ! विनोयण ) अंग विकार युक्त होजाने फिर ( हास)
हास्य करना अथवा ( लीला) काम जन्य वार्तात्री का उच्चारण करना फिर
रमण लिंगो ४) ली पुरुप का परस्पर संजोग होना वा क्रीडा करना इस रस
का चिन्ह है ४ अत्र इस रस का उदाहरण दिखलाते हैं (सिंगारो रसो जहा)
शृङ्गार नामक रस इस प्रकार से है जैसे कि (महुर ) मधुर वचन ( विलासल
लियं ) विलास और ललित पुनः (हियय उम्यादण कर जुवाणाणं ) हृदय के
उन्माद कारी अर्थात् काम के उत्पादन करने हारे जो वचन हैं अतः किनको !
युवा पुरुषों को ( सामासदु ) श्याम वर्णा स्त्री के धुगुरुओं के शब्द ( दामं
दायति ) कींकणी आदि के शब्द (मेहलादामं ५) मेखला के शब्द इत्यादि
शब्दों को सुनकर युवा पुरुषों की काम अग्नि संदीप्त होती है सो इसी को शृङ्गार
रस कहते हैं ॥५॥
भावार्थ-शृङ्गार रस का लक्षण इस प्रकार से है काम की प्राशा शरीर
काम उन काम चेष्टा युक्त अंगों का हो जाना, हास्य करना, लीला युक्त वचन
वोलने और क्रीडा में लगे रहना इन लक्षणों से शृङ्गार रस की प्रतीति होती है
४ जैसे कि युवा पुरुषों के हृदय में विकार उत्पन्न करने वाले मधुर और बिला
स लीलाकारी श्यामा नाम की स्त्री के आभूषणों के शब्द होते हैं अतः वे शब्द
युवा पुरुषों के काम उत्पादक होते हैं सो इसीको शृङ्गार रस कहते हैं ५ किन्तु
इस रस का लक्षण हास्य क्रीडा रमणादि क्रियायें करना ही है और इसके अ-.
नन्तर अद्भुत रस का विवर्ण करते हैं ॥५॥
अथ अद्भुत रस विषय ।
विम्हय करो अपुब्बो अणुभुयपुब्वो य जो रसो होइ
सोहास विसाउपतिलक्खणो अभुओनाम ॥ ६॥ अब्भुओ
रसो जहा अब्भुतरमिह मित्तो अन्नं किं अत्थि जावलागमि
जंजिणवयणे अत्था त्तिकालजता मुणिज्जति ॥ ७ ॥
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२६) पदार्थ-(बिन्हय करो) विस्मय करने हारा जो ( अपुव्वो ) पूर्व अनुभव नहीं किया उसके (अणुभुयपुन्चोय) अनुभव करने से पूर्व ( जो रसो होई) जो रस उत्पन्न होता है पुनः जिसकी (सोहा · सविसाउपति) हास्य और विपा द से उत्पति है ( लक्खयो अचए नाम ७) सो इन लक्षणों से अद्भुत रस जाना जाता है अर्थात् जो अाश्चर्यकारी वस्तु को देख कर हर्ष वा विपाद उ. त्पन्न होता है इन लक्षणों से अद्भुत रस की प्रतीती होती है ॥६॥ अथ इसका उदाहरण दिखलाते हैं (अब्भुय रसो जहा ) अद्भुत रस इस प्रकार से होता है जैसे कि ( अभुतंर इहमिता ) अद्भुत वातु इस लोकमें श्री जिनेन्द्र देव के. वचन ही हैं क्योंकि जो यथार्थ पदार्थों के उपदेष्टा हैं इसलिये ( अन्नं कि अस्थि ) और कोई अद्भुत वस्तु है (जीव लोगमि) समस्त संसार में आपितु नहीं है क्योंकि (जंजिण वयणे अत्था ) जो जिन वचनों में जीवादि पदार्थों का अर्थ है वे (तिकाल जुत्ता) त्रिकाल युक्त मुणिज्जति जाना जाता है ७ अर्थात् वे पदार्थों का अर्थ त्रिकाल में सद्प है इत्यादि भावों में जो हर्ष उ- त्पन्न होता है उसे अद्भुत रस कहते हैं ।। ७ ।। भावार्थ--श्रात्मा को विस्मय करने वाला जिसका पूर्व अनुभव नहीं किया जिसके अनुभव करने से हर्ष और विपाद उत्पन्न होता है वह अद्भुत रस है ६ इसका उदाहरण इस प्रकार से है जैसे कि-इस प्रकार से विचार करना कि इ. स संसार में जो अर्हन् देवों ने पदार्थों का स्वरूप प्रतिपादन किया है उसके समान कोई भी इतरजन पदार्थों का स्वरूप वर्णन नहीं कर सक्ने जो अर्हन् देव के पदार्थ कथन किए हुए हैं वे त्रिकाल युक्त जाने जाते हैं अर्थात् जो लक्षण वर्णन किए गये हैं वे यथार्थ हैं और तीनों कालों में इस प्रकारसे रहते हैं इसलिये विस्मय करने वाले इस संसार भर में श्री जिनेन्द्र देव के वचन हैं. अन्य कुछ नहीं इस प्रकार के भावों का अद्भुत रस कहते हैं । अथ रौद्र रस विषय। भयंजणणरूवसधयारचिंतकहासमुप्पन्नो संमोह संभम विसायमरणलिंगो रसो रुद्दो ॥ ८॥ रुद्दो रसो जहा भि- (२६४) * अनुयोगद्वार सूत्र * ऊडीविडबियमुहो संदुट्टाछइय रुहिरमाकिन्नो हणसि पसुं असुरनिभो भमिरसिय अइरुदो रुदोऽसि ॥ ६ ॥ पदार्थ-( भय जणण) भय के उत्पन्न करने वाला ( रूप ) पिशाचादि का रूप और ( सधयार ) शब्द तथा अंधकार तथा भय जन्य वाताओं की चिंता करनी वा ( कहा ) कथा करनी ( समुप्पन्नो ) इन कारणों से रौद्र रस उत्पन्न होता है और ( संमोह संभम ) संमोह उत्पन्न होना क्या किया जाए वा चित्त की व्याकुलता अथवा (विसाय) चित्त का निपाद जैसे कि-यहां पर मैं क्यों आ गया हूं इत्यादि विचार करने और ( मरण लिंगो रसो रुद्दो ८) सोमल ब्राह्मण वत् मृत्यु चिन्ह है जिसका सोरौद्र रस है ८ अब इस रौद्र रस का उदाहरण लिखते हैं (रुद्दो रसो-जहा) रौद्र रस जैसे कि-(भिऊडी विडवियमुहो ) ललाट में जिस के भौंहे चढ़ी हुई हैं और मुख जिस का विकृत होरहा है इसी के संबोधन में कहा गया कि-हे भ्रकुटि विंडवित मुख (सदु होइयरहिर माकिनो) और जो होगें को चबारहा है रुधिर से अंगोपांग पाकीर्ण हैं फिर इसी के आमंत्रण में कहा गया कि हे संदष्टौष्ट वा हे रुधिरा त्किन्न ( हणसियसुं) तूं मारता है पशू को किस प्रकार से मारता है जैसे कि (असुरोनिभो ) असुर के समान अतएव जैसे असुर (भीमरासिय) भीम शब्द करता है उस के संबोधन में कहा गया कि हे असुर इव भीम रसितं (अइसरोरुद्दोसि 8) तूं अतीव रौद्र वा रौद्र परिणाम युक्त हैं : शंका भय जिसका कारण है कार्य उसका रौद्र किस प्रकार से हो सका है (समाधान) शत्रु के देखने से रौद्र ध्यान की उत्पत्ति हो जाती है इसलिए इस में कोई दोष नहीं है ।। भावार्थ-भय के उत्पन्न करने वाले रूप शब्द 'अधकार चिंता कथा व्या- मोह व्याकुलता विषाद मृत्यु इस रौद्र रसके चिन्ह हैं ८ और हे भ्रकुटि विडवित मुख हे सदष्टौष्ट हे रुधिर क्लिन तूं पशु को मारता है असुर इव भीम रासित व रौद्र परिणामि है 'किन्तु शत्रु आदि के दर्शन से रौद्र ध्यान की उत्पत्ति हो जाती है इसलिए इस को रौद्र रस कहा गया अब वीडन रस का विवर्ण करते हैं।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२६५) अथ लज्जा रस विषय। विणोक्यारगुज्झगुरुदारमेरावइकमुप्पन्नोवेलणयोनाम रसो लज्जासंकाजणणलिंगो ॥१०॥ वेलणउरसो जहा कि लो. इयकरणीयायो लजणतरंग तिलिज्जिया। मेति वारिज्जमि गुरुजणो परिवंदेइज वहुप्पोति ॥ ११ ॥ पदार्थ-(विणयोव यार गुज्म गुरुदार) विनय उपचार के उल्लंघन करने से अथवा गुप्त तथा अश्लील वार्ताओं के करने से शिष्ट पुरुषों को लज्जा रस उत्पन्न होता है तथा अयोग्य कृत्य करने से भी लज्जा रस उत्पन्न होजाता है जैसे कि उपाध्यायादि की स्त्री से मैथुन क्रीडादिका आसेवन करना तथा (गुरुदार) जो पितृव्य आदि हैं उनकी स्त्रियों से काम क्रीड़ा करना फिर ( मेरावइक मु- प्फनो ) सुंदर मर्यादा के व्यतिक्रम से उत्पन्न हो जाता है (वेलसो नाम रसो) बीड़न नामक रस ( लज्जासंका जणण लिंगो १०) शिर और नेत्र नीचे करने गात्रादि का संकोच हो जाना इसे ही लज्जा रस कहते हैं और सदैव काल मन में शंका का रहना कि मुझे अमुक व्यक्ति क्या कहेगा तथा यदि अमुक स्थान पर गया तो लोग मुझे क्या कहेंगे इत्यादि वाताओं में शंका रखना सो लज्जा और शंका के उत्पन्न करने वाला चिन्ह है जिसका १० अब इस में उदाहरण देते हैं। (वेलणओ रसो जहा ) ब्रीड़ा नामक रस में यह उदाहरण दिया गया है जैसे कि किसी देशवा किसी कुल में प्रया है जव नव वधू स्वभर्ती से संग करती है तब अक्षतयोनि के कारण से उसके वस्त्रादि रुधिर से भर जाते हैं तब उस के श्वसुरादि उन वस्त्रों को बहुत से नर नारियों को दिखलाते हैं कि हमारी नव वधू पतिव्रता धर्म में दृटि भूत है इसने कभी भी पर पुरुषों का संग नहीं किया इसमें रुधिर चर्चित वस्त्र ही प्रमाण. भूत हैं अव यावन्मात्र वे नव वधू के शील की प्रशंसा करते हैं तावन्मात्र ही वह नय बंधू लज्जा को प्राप्त होती है क्योंकि मैथुन के नाम से ही लग्ना की प्राप्ति होती है जब उसके सेवन का ही उदाहरण दिया जाए तब तो क्यों न लज्जा प्राप्त होवे इसलिए वह नव वधू अपनी निय सखी.से कहती हैं कि (किं लोइय क- रणीयानो लज्जणतरगतिलज्जामोति ) है मेरी प्यारी सखी ! इस लौकिक १२६६) * अनुयोगद्वारं सूत्र * क्रिया से और क्या लज्जा स्थान होगा अपितु कोई भी नहीं है इसीलिए इन क्रियाओं से मैं पुनः २ लज्जित होती हूं और फिर यह ( वारिज्जंमि ) विवाह के समय में गुरुजणी ) श्वसुरादिजन (परिवंदेइ ३ ) वांधते हैं अथवा (परि- वदइ ) विवाहादि कार्यों में कहते हैं कि यह (जंबहुपोत्त ११) रुधिर चर्चित हमारी अभिनव वधू का वस्त्र है सो इस कारण से वधू परम लज्जा को प्राप्त होती है यही लज्जा रस का उदाहरण है ॥ ११ ॥ भावार्थ-विनय उपचार अश्लील वार्ता उपाध्यायादि की स्त्रियों से मैथुन क्रीडा मर्यादाओं का अतिक्रम करना इत्यादि कारणों से लज्जा नामक रस उत्प न होजाता है और शंका वा लज्जा इस रस के चिन्ह हैं।१०। जैसे कि नव वधू अपनी प्यारी सखी से कहती है कि हे मेरी प्यारी सखी ! जो मेरे भर्तादि के संयोग से रुधिर चर्चित वस्त्र हुए हैं उन वस्त्रों को मेरे श्वसुरादि अनेक नर नारियों को दिखलाते हैं यद्यपि यह मेरे पतिव्रता धर्म ही की प्रशंसा करते हैं किन्तु इन कारणों से मैं तो परम लज्जित होती हूं क्योंकि जब मैथुन क्रियाके नाम से ही लज्जा उत्पन्न होती है अपितु यह तो मेरे उदाहरण ही दे रहे इसलिये इस संसार में इससे वढ कर लज्जा का स्थान क्या होगा अपितु कोई भी नहीं है अतः विवाहादि में भी मेरे वस्त्र दिखलाये जाते हैं इसलिए मैं परम लज्जित होती जाती हूं। ११ । सो इसी का नाम लज्जा रस है अव वीभत्स रस का विवर्ण करते हैं। अथ वीभत्स रस विषय । असुइकुणवदुदंससजोगाभासगंधनिप्फन्नो निव्वेयवि- हिंसालक्षणो रसो होई वीभच्छो ॥ १२ ॥ वीभन्छोरसो जहा असुइमलभरिय निझरसभावढुंगधिसव्व । कालंपि धन्नाओ सरीरकलिं बहुमलकलूसं विमुंचति ॥१३॥ पदार्थ -( असुई ) अपवित्रता मूत्र पुरीपादि की वा (कुणब) मृतक कलेवर ( मांसपिंड ) ( दुदंसण ) दुर्दर्शन लालादि वा दान्तादि ( संजोगम्भास ) के वारम्वार देखने से और (गंधनिष्फन्नो ) उसकी दुर्गंध से उत्पन्न हो गया है (निव्वेयविहिंसा) वैराग्य अहिंसा सो यही ( लक्खयो ) लक्षण हैं जिसके * अनुयोगद्वार सूत्र * (२६७) ( रसो होई वीभच्छो १२) सो वही वीभत्स रस होता है अर्थात् वीभत्स लक्ष ण वैराग्य और अहिंस ही कथन किए गये हैं किन्तु यह वार्ता महा भागवशाली मोक्ष ममन करने वाले आत्माओं की अपेक्षा ही ज्ञात करनी चाहिये अन्यत्र नहीं अब इस का उदाहरण कहते हैं जैसे कि किसी सुज्ञ पुरुप ने कहा कि वी. भच्छो रसो जहा ) वीभत्स्य रस वह है जैसे कि ( असुईमलभरिय निझर) अशुची मूत्र विष्टादि और मल से भरे हुए हैं यह सर्व श्रोत्रादि विवर (स्थान) फिर यह ( समावदुगंधि सव्वकालंपि ) स्वभाव से दुर्गधि युक्त है अपितु सर्व काल में इसलिए (धन्नाओ) व धन्य हैं जो (सरीर काले) इस शरीर को जो अनिष्ट रूप है फिर ( बहुमलं कलुसं ) वहुत मल से कलुपित है अर्थात् मल का पिंड है इसको (विमुचति १३ ) छोडने हैं अर्थात् जो इस दुर्गंध मय शरीर को दोडकर मोत गमन होते हैं वे धन्य ।। १३ ॥ भावार्थ-बीभत्स रस उसे कहते हैं जो अशुची मांस पिंड दुर्दर्शन इत्यादि के बारम्बार देखने से और दुर्गन्धि के निमित्त से वैराग और दया भाव उत्पन्न होता है वही वीभत्स रस है अपितु यह वाती मोक्षगमन प्रात्मा की अपेक्षा से कही गई है ॥ १२॥ और चे धन्य हैं जिन्होंने अशुचि और मल से भरे हुए श्रोत्रादि विवर जो स्वभाव से दुर्गंध यह शरीर है इसको छोड़ दिया है क्योंकि यह शरीर मल से कलुपित हो रहा है सदैव काल इसके सर्व द्वार मल को प्रस्रवण कर रहे हैं इस लिये वे धन्यवाद के योग्य हैं जो इस असार मय शरीरं को छोड़ कर मोक्षगमन हो गए हैं। अब इसके अनंतर हास्य रस का विवर्ण करते हैं ॥ १३ ॥ अथ हास्य रस विपय । रूववयवेसभासाविवरिथनिलवण समुप्पन्नो हास मणप्प हासोप्पगासलिंगो रसो होई ॥ ११ ॥ हासो पासुत्मसीमंडियपडिबुद्धं देवरंपलोयंति हाज हणथणभर कंप्पणप्पणनियमज्मा इसई सामा ॥ १५ ॥ पदार्थ--( रूपवयवेसभासा): रूप, वय, और भाषा (विवरिय) से विपरीति जैसे कि हास्य रस के पत्पादन करने के लिए पुरुष स्त्री के रूप को 4 रसो जहा .
रूप
(-२६)
* अनुयोगद्वार सूत्र *
धारण करता है तथा स्त्री पुरुप के रूप को धारण करती है और तरुण पुरुप
हास्य रस के. वश में होता हुआ वृद्ध के को धारण करता है और राजा
के वेप से वणिग् का वेप धारण करता है अथवा भांडादि की नकलें इत्यादि
(विवरिय विलंपण समुप्पन्ने) विपरीत भावों से वा विंडपनासे उत्पन्न
होता है ( हासो पणप्पहासो) हास्य रस जो मन को मर्कप करने वाला
अर्थात् अतीव मनको प्रफुल्लित करने वाला है इसलिए (पगासलिंगोरसो
होई १४ ) नेत्र मुखादिका विकाश रूप वा उदर कर प्रकंपण अ हास्य आदि
इस रस के चिन्ह होते हैं १४ अब इसमें उदाहरण कहते हैं (हासो रसो जहा)
हास्य रस जैसे (पासुत्तमसिमंडियं) प्रसुप्त देवर को देखकर कर मपी के द्वारों
मुख को मंडित करती है फिर ( पडिबुद्धं देवरं यलोयति ) जागृत हुए देवर को
विशेष करके देखती है और कहती है कि ( हां.) हा इति खेदे क्या हुआ मेरे
देवर के सुख को जो मपी से अलंकृत हो रहा है अथवा ( ही ) शब्द कामका
उत्पादक है इसलिए देवर के मुख को देखकर जो मपी ( स्याही ) से अलंकृत
हो रहा है इस निमित्त को रखकर काम जन्य वार्ताओं को भाषण करती है.
फिर जिसके (जहथणभरकंप्पणं) कलश के सामान स्तनों के भार से
कांपती है और ( पणमियमझा) जिसका मध्य भाग स्तन भार से झुक रहा
है इस प्रकार से कोई किसी व्यक्ति को आमंत्रण देकर कहता है कि देखो
( हसइसामा) अपने देवर के सुख को देख कर यह श्यामा किस प्रकार से
इंसती है सो इसी का नाम हास्य रस है अब इसके आगे करुणा रसके विषय
में कहते हैं क्योंकि करुणा रस भी दीन वचनों से युक्त है इसलिए हास्य रस
का प्रतिपक्ष है सो प्रतिपक्ष का विवर्ण करते हैं ॥ १५ ॥
भावार्थ-रूप का परिवर्तन करना अथवा वृद्धादिका रूप धारण करना
भाषा विपरीतं भाषण करनी जिसके द्वारा हास्य की उत्पत्ति हो और मन प्रफु
ल्लित हो जाए. सो यही उक्त चिन्ह हास्य रस के हैं अर्थात् इन लक्षणों ही से
हास्य रस की प्रतीती होती है।॥ १४॥ इस के उदाहरण में केवल इतना ही विवर्ण.
है कि जैसे कि श्यामा स्त्री निज देवर का उपहास करती है और उस के मुख़ा
दि को. मपी से अलंकृत करती है केवल उपहास्य के लिए उसी को हास्यं रस.
कहते हैं ॥ १५ ॥
* अनुयोगद्वार भूत्र * (२६६) अथ करुणा रस विषय । पियविप्पओयवधववाहिविणिवायसंभसुप्पनो सोईयविल- वियपण्हयरुन्नलिंगो रसो करुणो ॥ १६ ॥ करुणो रसो जहा पम्भायकिलामिअयं वाहा गयपप्फ। अच्छियं बहुसो तस्स विओगे पुत्तया दुबलयंते मुहं जायं ॥ १७ ॥ पदार्थ-(पियवप्पोय ) प्रिय का वियोग(बंध वह ) वंध और वध (वा. हिविणीवापसंभमुप्पन्नो) व्याधि पुत्रादि की मृत्यु अथवा स्वचक्र पर चक्रों के भय से उत्पन्न होता है करुणा रस अपितु ( सोइय ) शोक करना (विलविय) विलाप करना (पएहय ) खेद का होना ( मूर्छागत ) सो ( रुनलिंगो, रसो करुणो १६ ) रोना लिंग होता है करुणा रस का अर्थात् नेत्रों से आंसु विमो चन करने इन्हीं लक्षणों से करुणा रस की प्रतीती होती हैं ॥१६॥अंब इस का उदाहरण दिखलाते हैं (करुणो रसो जहा ) करुणा रस इस प्रकार से होता है जैसे कि कोई वृद्धा स्त्री युवती स्त्री से कहती है कि हे पुत्रिके (प्पभ्भायाकला मि अयं ) परम मिय ( पति के) के वियोग से तूं परम दुःखित (क्लामना) हो रही है फिर ( वाहा गयपफअच्छियं बहुसो) पुनः २ तेरे नेत्रों में पानी के आने से नेत्र जल से भरे रहते हैं ( तस्स वियोगे) उस प्रिय के वियोग से (पुत्तया) हे पुत्रिके ! (दुबलयं ते मुहं जायं १७) तेरा मुख परम दुर्वल हो गया है इसी का नाम करुणा रस है ॥ १७ ॥ अव प्रशान्त रस के विपय में कहते हैं। भावार्थ-करुणा रस उसे कहते हैं जो प्रिय के वियोग से अथवा बंध और वध व्याधि से अथवा पुत्रादि की मृत्यु से चित्त को अशान्ति उत्पन्न होता है उसी के कारणों से चिंता करना, विलाप करना, मूर्छा वश होना इत्यादि लिंग यह सर्व करुणा रस के होते हैं इस में उदाहरण यह है कि जैसे किसी युवंती कन्या के पति के वियोग होने पर वह कन्या परम दुःखित अनु पूर्ण नेत्र जिसके मुख की आकृति मलीन है इत्यादि लक्षणों से निश्चय कराती है कि यह करुणा रस से व्याप्त हो रही है सो इसी को करुणा रस कहते हैं अब, मशान्त रस के विषय में विवर्ण किया जाता है ।। १७ ।।
(२७०) * अनुयोगद्वार मूत्र * अथ प्रशान्त रस विषय । निहोसमणसमाहाणंसभवो जो पसंतभावेणं अविकार लक्षणोसो रसो पसंतोत्तिनायवो ॥ १८ ॥ पसंतो रसो जहा सब्भावनिविकारं उवसंतपसंतसोमदिछीयं ही जण मुणिणो सोहइ मुहकमलं पीवरसिरीयं ॥ १६ ॥ एए नवकव्वरसा वत्तीसादोसविहिसमुप्पन्नो गाहा हिं मुणेयव्वा हवंति सुद्धा मीसावा ॥ २० ॥ सेतं नव नामे ।। पदार्थ-(निदोसमणं समाहाणं ) हिंसादि दोपों से रहित मनका समाधान (धारण) करना सो उसी से (संभवो जो पसंतभावेणं) उत्पति है जिसकी अर्थात् प्रशान्त भावों से ही प्रशान्त रस की उत्पति है और जिसका (अवि. कार) निर्विकार ( लक्षणो) लक्षण है ( सोरसो) वह रस (पसंतोनि नाय. व्वा १८) इस प्रकार से प्रशान्त जानना चाहिये ॥१८॥ अब इसका उदाहरण कहते हैं ( पसंतोरसो जहा) कोई पुरुप किसी व्यक्ति को आमत्रंण देकर कहता है कि प्रशान्त रस वह होता है जैसे कि - (सम्भावनिन्विकारं) यह साधु स्व- भाव से वा सद्भाव से निर्विकार है फिर (उच्चसंत ) इस का उपशान्त और (पसंत) प्रशान्त चित्त है पुनः सोमदिठ्ठीयं) सौम्य दृष्टि है अपितु (ही) ही शब्द विशेष प्रशान्त रस का द्योतक है इसलिए (ही) शब्द ग्रहण किया गया है सो (जह) हे प्रिय तूं देख जैसे (मुणिणो सोहइ मुह) मुनिका शोभता है सुख रूपी (कमल) कमल (पीवर सिरियं १६ ) जो उपशम रूपी रस से पुष्ट हो रहा है अर्थात् जिस के मुख पर उपशम रूपी लक्ष्मी (श्री) निवास कर रही है ॥ १६ ॥ (एए नव*) यह नव (कन्च रस ) काव्य रस (वतीस दो स- *.नोट १ इतिहास शुचः क्रोधोत्याही भयजुगुप्सन्ने॥ विस्मयः शाम इत्युक्तः स्पयायि भावा.नवक्र मात १ सम्भो गगो चरो वाच्छा विशेपो रति । विकार दर्शनादि जन्यो मनोरथो हासः । स्वस्येष्ट जय पियोगा दिना स्वस्मिन दुःखोत्कर्षः शोकः । रिपु कृताय कारिणश्चेत सिप्रज्वलनं क्रोधः कार्येषु लोकोत्कृष्ठेमु स्थिरतर प्रवस्न उत्साह । रौद्र विलोकनादिना अवर्चा शंकनं भ्यम् अर्थानां दोष विलोक नादिर्भी गही। जुगुप्सा अपूर्व वस्तु दर्शनादिना चितवस्तारो विस्मयः। विरागत्वा- ..
. * अनुयोगद्वार सूत्र * (२७१) विहि ) सूत्र के द्वात्रिंशत् दोपों की शुद्धि के प्रयोग से ( समुप्पन्नो ) समुत्पन्न हैं जैसे कि मूत्र वह होता है जिसमें अलीक दोप न हो सो इसी के द्वारा अद्भुत रस की उत्पति है इसी प्रकार आगे संभावना कर लेनी चाहिए अपितु ३२ दोपों का स्वरूप आगे लिखा जायगा पुनः (गाहाहिं मुणेयवा) यह सर्व रस गाथाओं करके जानने चाहिए अर्थात गाथा वा छंदादि के विपय यह सर्व रस होते हैं तथा (वंति सुद्धा) किसी २ काव्य में एक २ ही रस होता है अथवा (मोसावा२०) किसी २ काव्य में एक वा २-३ इत्यादि रसों का सम्बन्ध होता है अर्थात् एक काव्य में कई रसों के उदाहरण होते हैं ( सेतं नव नामे ) अब इसी का नाम नव नाम है अर्थात् नब नाम के अन्तर्गत नव प्रकार के रसों का संक्षेप से विवर्ण किया गया है ॥ २० ॥ भावार्थ-मन के निदाप होने पर और भावों की विशेप शान्ति होने पर प्रशान्त रस की उत्पत्ति होती है और निर्विकार रूप का होना यही प्रशान्त रस का मुख्य लक्षण है ॥१८॥ इस रस में उदाहरण इस प्रकारसे दिया गया है कि जैसे कंपायों के उपशम होने से और सौम्य दृष्टि होने से अतः परम शान्ति युक्त होने पर मुनि का मुख रूपी कमल उपशम रूप श्री से अलंकृत होता है उसीका नाम प्रशान्त रस है ॥१६॥ यह नव काव्य रस मूत्र के ३२ दोपों की. विधि की रचना से उत्पन्न होते हैं जैसे कि अलीक दोप से रहित, अद्भुत रस की उत्पत्ति होती है ऐसे ही और संभावना कर लेनी चाहिये सो यह रस गाथा काव्य छंदादि में जानने चाहिये किन्तु काव्यादि में शुद्ध रस भी होते हैं मि- श्रित रस भी होते हैं जैसे कि एक काव्य में एक रस हो उसे शुद्ध रस कहते हैं यदि एक काव्य में २-३ तीन रसों का समावेश हो उसे मिश्रित रस कहते हैं किन्तु ३२ दोपों के प्रयोग से भी इन की उत्पत्ति है अन्य प्रकार से भी उत्पत्ति हो जाती है अलंकार, चंपू और छंदादि ग्रंथों में इनका सविस्तर स्वरूप जानना चाहिए सो इसी स्थानोपरि नव नाम का स्वरूप पूर्ण होगया है अब दश प्रकार के नाम का विवर्ण करते है ॥ २० ॥ दिना निर्विकार मनस्तंशमः । इति अलंकार चिंतामणि युक्तम् अलंकार चिंतामणि नामक प्रस्थ में उस रनों का महान् सविस्तर रवरूप वर्णन किया गया है और इनके पृथक २ उदहरण और उडीयन.दि के क रण भी बतलाए गरे है किन्तु मूल सूत्र में तो केवल नक रसों का स्वरू सूचना मात्र ही दिखलाया गया है।
(२७२) * अनुयोगद्वार सूत्र * अथ दश नाम विपय । सेकिंतं दसनामे २ दसविहे पण्णते तंजहा गोणे १ नो- गुगे २ आयाणपदेणं ३ पडिवक्सपएणं १ पाहाण पण्णं ५ अणाइयसिद्धतेणं ६ नामेणं ७ अवयवेणं ८ संजोगेणं ९ पमागणं १० सेकिंतं गोणे २ अमुद्दो समुदो ३ अलालं पलालं ४ अकुलिया सकुलिया ५ नो पलं असङ् पलासं अमाइवाहए माइवाहए अवीयवाव्वए वीयवावए नो इदंगोवए इंदगो- वए ९ सेतं नो गोणे॥ पदार्थ-( सेकितं दसनामे २ दसविहे पं.सं.) वह प्रतिपादित दश नाम कौनसा है ( उत्तर ) दशनाम दश प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि ( गोणे १) जो गुग निष्पन्न हो उसे गुण नाम कहते हैं १ (नो गुणे २) जो गुण से रहित उत्पन्न हो उसे नो गुण निप्पन्न नाम कहते हैं सो प्रथम यथार्थ नाम है द्वितीय अथार्थ है २ (अयाण पदेणं ३) जो आदि पद से उत्पन्न हो उसे आदान पद नाम कहते हैं ३ और (पडियखपएणं ४ ) जो प्रति पन से उत्पन्न हो उसे प्रतिपक्ष नाम कहते हैं ४ (पाहाण परणं ५ ) प्रधान वस्तु के संयोग से जो उत्पन्न हो उसका नाम प्रधान पद है (अणाइयसिद्धिं तेणं ६ ) जो अनादिकाल से सिद्ध है उसी का नाम अनादि सिद्ध नाम है ६ (नामेण ७ ) नाम से जो निष्पन्न होता है उसे नाम पद कहते हैं ७ (अवय- बेमे =') अवयवों के संयोग से जो नाम उत्पन्न होता है उसे अवयव नाम कहते हैं ८ और ( संजोगेणं ९) द्रव्य के संयोग से जो नाम उत्पन्न होता है उसे संयोग नाम कहते हैं ६ (पमाणेणं १०) जो प्रमाणों के कारण से नाम उत्पन्न हो उसे प्रमाणपद कहते हैं १० अब इन के पृथक् २ उदाहरण दिख. लाए जाते हैं (सेकित गोणे २)(प्रश्न ) गुण निष्पन्न नाम किसे कहते ( उत्तर ) गुण निष्पन्न नाम निम्न प्रकार से है-जैसे कि-(खम इति खमणो १) जो क्षमा करे उसे क्षमण कहते हैं यह नाम तमा के गुण से निष्पन है इस लिए यथार्थ नाम है इसी प्रकार (जल इति जलणो) जो जलती है वह ज्वलन है सो यह ज्वलन गुण से निष्पम नाम है २ ( तब इति तवणो ३ ) जो तपता * अनुयोगद्वार सूत्र * (२७३) है उसे तपन कहते हैं (पव इति पत्रणो ४) जो पवित्र करता है उसे पवन कहते हैं (सेतं गाणं) इत्यादि और नामों की भी संभावना करलेनी चाहिए सो यही गुण निष्पन्न नाम है अब नोगुण निष्पन्न नामे के उदाहरण देते (सेकित नो गुणे २)(प्रश्न ) नो गुण निष्पन्न नाम कौनसा है (उत्तर) नो गुण निप्पन्न नाम इस प्रकार से हैं जैसे कि- (अकुतो सकुंतो १) जिस के कुंत नाम शस्त्र विशेष नहीं है उसे अकुंत कहते है यह अयथार्थ नाम है क्योंकि कुंन नाम शस्त्र (वी) का है और सकुंत नाम प्राकृत में पक्षी का है सो शस्त्रादि के न होने पर भी उसे शकुंत कहा जाता है सो इसी को नो गुण निष्पन्न नाम कहते हैं इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिए १ ( अमुग्गोसमुग्गो ३) नहीं है मुद्ग जिस के उसी का नाम अमुद्ग अर्थात् मुद्ग के न रखने पर भी समुद्ग कहा जाता है ) मुद् वस्तु प्राधार भाजन (करंड) विशेष होता है और (अमुद्दो समुद्दो ३) नहीं है मुद्रा जिसके उसी को समुद्र को कहत हैं अंतः मुद्रा न होने पर भी सागर का नाम सद्र कहा जाता है ३ (अलालं पलालं ४) मुखादि के लालों के न होने पर भी तुण विशेप को पलाल कहते ई ४) (अकुलिया सकुलिया ५) कुलिका से रहित होने पर सकुलिका कहने हैं यह मवे प्राकृत की शैली से नामों का विवर्ण है परंतु संस्कृत में तो शानक पत्नी का ही नाम होता है ५ ( नोपलं असइ पलामं ६) जो पक्ष (मांस) का आस्वादन नहीं करता उस को पलाश कहते हैं यह भी एक वनस्पनि के पत्रों के नाम है ६ (अयाइबाहएमाइबाहए ७) जो मात वाहक नहीं होता उसे मातृ वाहक कहते हैं द्विद्रिय जीव विशेपं होता है ७ (अवीय वावण वीयवावए ८) जो चीज के बोने वाला नहीं उसे वीज वांयक कहते हैं विकलेंद्रिय जीव विरोप का नाम है ८ (नोइंदगोयए इंदगोवा ६) जो इंद्र गोपक नहीं होता उसे इंद्र गोपक कहते हैं यह भी विकलेंद्रिय जीव विशेष है। (सेतं नो गुण ) अब यही नो गुण निष्पन्न नाम होता है अर्थात् यह नाम यथार्थ नहीं है किन्तु प्रसिद्धि में इसी प्रकार से उच्चारण किये जाते हैं इसी वास्त इन को नोगुण निष्पन्न नाम कहते हैं ।। भावार्थ-दश नाम दश प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि गुण निप्पन्न नाम १, अगुणनिष्पन्न नाम २, आदानपद नाम ३, प्रतिपक्षपद नाम ४, मधानपद नाम ५, अनादिसिद्ध नाम ६, नाम पद ७, अवयव नाम , सं.
(१२७४.) * अनुयोगद्वार मूत्र * योग नाम, प्रमाण नाम १०, अपितु गुण निष्पन्न उसे कहते हैं जैसे कि क्षमा के गुण से क्षमण १ ज्वलन होने से ज्वलन २ ताप होने से तपन ३ पवित्र करने से पवन ४ यह सर्व गुण निप्पन्न नाम हैं । किन्तु नो गुण निप्पन्न नाम निम्न प्रकार से है कुन्त के न होने पर शकुन्त १, अमुद्गन होने पर भी समुद् २, मुद्रा के न होने पर समुद्र ३, लाल के न होने पर पलाल ४, कुलिका के न होने पर शकुलिका ५, मांस के न खाने पर पताशं ६, अमात वाहक को मात वाहक ७, अवीज वापक को वीज वापक ८, इन्द्र के न गोपने पर इन्द्र गोप है, इत्यादि यह सर्व प्रयोग गुण निष्पन्न नहीं हैं किन्तु गुण से विरुद्ध नाम प्रसिद्ध हैं ॥ अव आदान पद और प्रतिपक्ष पद के विपंय में लिखा जाता है। अथ श्रादान पद और प्रति पक्ष पद विषय । (सेकिंतं आयाणपएणं २ आवन्ती १ चउरंगिन्ज २ असंखयं ३ जनइज्जं ४ पुरिसविज्ज ५ एलइज्जं ६ विरियं ७ धम्मो ८ मग्गो ९ समोसरणं १० अहात्तहीयं ११ गन्धो १२ जमइज्ज १३ अदइज्जम् १४ सेतआयाणपएगं ॥ सकिन्तं पडिवक्खपएणं २ नवेसुगामागर २ नगर ३ खड ४ कवड ५ म- डव ६ दोणमुह ७ पट्टण ८ आसम ६ सेवाह १० सन्निविसे- सुय ११ णिविस्समाणेसु असिवा सिवा १ अग्गी सीयलो २ विसें महुरं ३ कल्लालघरसु अविलं साउयं ४ जे लत्तए से अलत्तएं ५ जे लाउए से अलाउए ६ जे सुम्मए से कुसुम्भए७ आलम्बते.विवलीएमासए ८ से तै पडिवक्खएएणं । पदार्थ-( सेकित्तं अयाणपएणं २) (प्रश्न) जो आदान पद करके पद वनते हैं वे किस प्रकार से हैं ( उत्तर ) जिस अध्याय वा उद्देश के आदि पद के उच्चारण करने से उसी अध्याय चा उद्देश का बोध हो जाय उसे आदान पद से निप्पन्न नाम कहते हैं इनके उदाहरण निम्न प्रकार से हैं, (प्रावती) श्री श्राचाराङ्ग सूत्र के प्रथम श्रुत स्कन्ध के पंचम अध्याय के भादि में भावन्ती .
.* अनुयोगद्वार सूत्र * (२७५): के यावन्ती इत्यादि पद हैं सो वह अध्याय आदि पद के नाम से प्रसिद्ध है। जैसे कि आवन्ती अध्याय इसी प्रकार आगे भी जान लेना चाहिये (चउरं- गिज्नं २) चतुगी अध्याय (श्री उत्तराच्यवन सुन के तीसरे अध्याय का आदि पद है (चतार पर मंगाणि इत्यादि) (असंखयं ३ असंख्यय अध्याय उत्तराध्ययन सूत्र का ४ अध्याय (जन्नइज्जम् ५) यज्ञ का अध्याय (उचरा (ध्ययन सूत्रका २५ अध्याय) (पुरिस बिज्ज ) पुरुष विद्याध्याय ( उत्तर- सूत्राध्याय ६ ( एल इज्जम् ६) एलक अध्याय ( उत्तर सूत्र अध्याय ७) (वीरिपं ८) वीर्याध्याय (सूयगडांग सूत्र अ०८) (धम्मो ८) मोक्षधर्म अध्याय (सू० सू० अ० ११ (मग्गो) मार्ग अध्याय (सू. सू० अ० ६) (समोसरणम १०) समोसरण अध्याय (मू० सू० अ० १३) (आहात्तहीयम् ११) यथा तथ्याध्याय (सू० सू० अ० १३) (गन्थो १२ ) ग्रन्थ अध्याय (मू० सू० अ० १४) (जमइज्जर १३ ) यमईय अध्याय (सू० सू० अ० १३) (अद्दइज़्जम् १४) आर्द्रकुमाराध्याय (सू. सू० अ० २२) (सेतं अयाणपएणम् ) सो इसी का नाम आदान पद अर्थात् जिन अध्यायों का आदि पद से निष्पन्न नाम है उन्हीं अध्यायों को आदान पद कहते हैं इसी प्रकार और अध्यायों का भी सम्बन्ध जानना चाहिये ॥ अव प्रतिपत्त विपय में कहते हैं) सेति पडिवक्स- पएणम् ) (प्रश्न) प्रतिपक्ष धर्म से जो पद उत्पन्न होते हैं बेह किस प्रकार से हैं (उत्तर) प्रतिपक्ष धर्म निप्पन्न पद निम्न प्रकार से होते हैं जैसे कि (नवे सुगा- माम २) नूतन ग्रामों और पाकरों में इसी प्रकार (नगर) जो शुल्क रहित होता है उसे नगर कहते हैं ३ (खह ४) धृलिमय कोट वाला खेडा होता है ४ (कवर्ड ५) कुनगर को कट कहते हैं ५ (मंडव ६) जिसके दूरवर्ती नगर हों उसे मंडप कहते हैं (दोणमुह ७) जिस स्थान पर जल और स्थल दोनों मार्गः हो उसे द्रोण सुख कहते हैं (पट्टण ८) नाना प्रकार के पदार्थ नाना प्रकार के दोपों से विक्रीयमाण होते हो उसे पत्तन कहते हैं (आसम ९) तापसादि के स्थान को आश्रम कहते हैं (संवाह १०) जहां पर बहुत से लोकों का समूह उसे संवाह कहते हैं अथवा ( सन्निवसे सु अ०) घोसादिक में (णिविस्स. माणेसु) यसते.हुओं में यदि (अशिवा सिवा) शृगालादि प्रवेश करते हैं वा शब्द करते हैं बेह.शब्द अशिव (अशुभ) होने पर भी उन्हें शिवा ( कल्पाणा. रूप ) कहा जाता है क्योंकि शृगाली का.नाम कोस में शिवा भी लिखा है (२७६) * अनुयोगद्वार मूत्र * तथा कोई व्यक्ति (अग्गी, सीयलो २) अग्नि को शीतल कहता है और (विस- महुरं ३) विषको मधुर कहता है. अथवा (कलालघरेसु विलसाउयं ४) फलाल के गृह में मदिरा स्वरस चलित होगई है अर्थात् अम्ल को स्वादु कहता है फिर (जे लत्तए से अलत्तए ५) जो लाक्षादि से रक्त है उसको पाकृत में अलत्त कहते हैं और (जे लाउए से अलाउए ६) जो जलादि से वस्तु को ग्रहण करता है उसी को अलावुतूंवा कहते हैं और जों (जे सुंभए से कुसुभए ७) शुभ (मिय) है उसे देश भाषा में कुशुभा कहते हैं कु अव्यय कुत्सित अर्थ में है सो (आलंबते विवलीयभासए ८) जो उक्न प्रकार से भापा भाषण करते हैं वह विपरीत भाषा है क्योंकि पक्षधर्म से प्रतिपक्षधर्म है इसीलिए इस को विपरीत भापा कहते हैं अथवा भाषा के न होने से इसे अभापा भी कहन हैं सो यह समासान्त पद है (सेतं पडिवक्खपएणं) सो वही प्रतिपक्ष पद अर्थात् पक्षधर्म से प्रतिकूल होने से प्रतिपक्ष कहा जाता है शंका क्या यह प्रति. पक्ष पद नोगुण पद में अन्तर्भूत नहीं हो सकता है ( रामाधान) नहीं हो सका है क्योंकि नो गुण- पद कुन्तदि की प्रवृत्ति के निमित्तसे पैदा हुआ है और यह पद प्रतिपक्ष धर्म वाचक है इसलिये सापक्षत्वादितिशेषः ॥ ४ ॥ भावार्थ-आदान पद उसका नाम है जिस अध्याय का आदि सूत्र से नाम प्रसिद्ध होजाय और उसी नाम अध्याय से उच्चारण किया जाय सो इस पद में चतुर्दश उदाहरण दिखलाए गये हैं जैसे कि आवन्ती अध्याय १ चतुरंगि अध्याय २ असंख्याध्याय ३ यज्ञ नियमाध्याय ४ पुरुष विद्याध्याय ५ एलका. ध्याय ६ वीर्याध्याय ७ धर्माध्याय ८ मोक्ष मार्गाध्याय : समोशरणाध्याय १० याथा तथ्याध्याय ११ ग्रन्थाध्याय १२ यमइयध्याय १३ आर्द्रकुमाराध्याय १४ यह सर्व अध्याय श्रीआचारांग सूत्र श्रीसूयगडांग सूत्र श्रीउतराध्ययन सूत्र के अन्तर्गत हैं सो इन्ही का नाम आदान पद नाम कहते हैं और प्रतिपक्ष पद उस का नाम है जो धर्म से विरुद्ध पद हैं जैसे कि नूतन ग्राम नगरों में जब शृगा. लादि शब्द कहते हैं तब वे शब्द अंशुभ होते हैं किन्तु उनको लोक शिवा कहते हैं क्योंकि (शिवा गौरी फेरवयोः) इत्यमदः शिव शब्द पार्वती गीदडी शमी का वृक्ष हरॆ तथा आंवला इन अर्थों में भी व्यवहृत किया जाता है इसलिये आशिवा शब्द को शिवा कथन करना प्रतिपक्षधर्म वाचक पद है इसलिये आगे भी जानना चाहिये जैसे कि अग्नि शीतल १, विष मधुर २, कलाल के घर में मदिरा * अनुयोगद्वार मूत्र * (२७७). स्वादु ३, रक्त को अलत ४, लावु को अलावु ५, शुभ को कुशुभ ६ इस प्रकार प्रतिपक्ष वचन उच्चारण करने उसी को प्रतिपक्ष धर्म कहते हैं और यह नोगुण में उदाहरण नहीं गिने जाते क्योंकि यह कथन प्रतिपक्षधर्म वाचक पद है अत्र प्रधान पद और अनादि सिद्ध नाम का विवेचन करते हैं। अंथ प्रधान पद और अनादि सिद्ध पद विषय । सेंकिंतं पहाणपएणं २ असोगवणे १ सात्तिवणे २ चंप गवणे ३ चूयवणे ४ नागवणे ५ पुन्नागवणे ६ उच्छवणे ७ दक्खवणे, सालवणे ९ सेत्तं पहाणपण्णम सेकिंतं अनादिय- सिसिद्धतेषं २ धम्मत्थिकाय १ अधम्मस्थिकाय २ आगास- स्थिकाए ३ जीवत्यिकाए ४ पुग्गलत्थिकाए ५ अद्धासमए ६ सेत्तं अनाइयसिद्धतेणं ॥ ६ ॥ पदार्थ-( सकिनं पहाणपएणं २) से शब्द अब्द का याची है और किं प्रश्न अर्थ में होता है शब्द पूर्व सम्बन्ध के लिये होता है सो तात्पर्य यह हुआ कि प्रधान पद कौनसा हुआ गुरु कहने लगे कि भो शिष्य ! प्रधान पद उसे कहते हैं जिस वन में आम्रादि वृक्ष अनेक जाति के होते हुए उन में जो प्रधान और बहुत हो उन्ही के नाम से वन मसिद्ध हो जाता है जैसे कि (अ. सोगवणे १) अशोक वृत्त अनाव होने से अशोक वन कहा जाता है उसी प्र- कार ( सत्तिवरणवणे ३ ) सतवर्ण वन (चंपगवणे ४) चंपकवन ( चूयवणे ५) श्राम्रवन ( नागवणे ६ ) नागवन ( उच्चणे ७) इक्षुवन (सक्खवणे ८) द्राक्षावन और ( सालवणे ह ) शालवन यह सर्व प्रधानता. की अपेक्षा से कथन किये गये है ( संतपहाण पएणं ५) सो यही प्रधान पद है ५ (सेकिंतं अना- इय सिद्धं तेणं २)(प्रश्न) अनादि सिद्धांत नाम किसे कहते हैं (उत्तर) जो अनादि काल से मिद्ध और निर्णीत हो उसी का नाम अनादि सिद्धान्त नाम है क्योंकि जो अनादि सिद्धांत पद है वह कभी भी परिवर्तित नहीं होता प्रवासाझा ॥ प्रा. ज्या० अ०८ पासू० ६५. अनयारादे दिन उत्वम् भवति पायासु भेर-- ५शु- . --..--..- (. २७८) * अनुयोगद्वार मूत्र * जैसे कि ( धम्मत्थिकाय १) धर्मास्तिकाय १ (अधम्मत्यिकाय.२ ) अधर्मी स्तिकाय २ (आगासत्थिकाय ३) आकाशास्तिकाय ३ (जीवस्थिकाय ४) जीवस्ति काय (पुगगलस्थिकाय ५ पुद्गलास्ति काय ५) (अद्धासमय ६) समय (से तं अनाइय सिद्धतेणं ६) ये ही अनादि सिद्धांत नाम है क्योंकि यह पद नाम द्रव्य के किसी समय में भी परिवर्तन शील नहीं है अतः स्वतः सिद्ध है इसीलिये. इन्हें अनादि सिद्धांत नाम कहत हैं ॥ ६ ॥ भावार्थ-प्रधान पद उसका नाम है जो न अनेक जाति के हो उनमें जो असीच प्रधान वृक्ष हों उन्ही के नाम से वन शब्द व्यवहन किया जाता है जैसे कि अशाक बन १ ससाणे वन २ चम्पक वन ३ आम्र वन ४ नाग वन ५ पुन्नाग वन ६ इन वन ७ द्राक्षा वन ८ शाल वन 8 सो इसी का नाम प्रधान पद है ५ किन्तु अनादि सिद्धान्त नाम उसे कहते हैं जो अनादि काल से सिद्ध रूप और निर्णीत ही वही अनादि सिद्धान्त नाम है जसे कि धर्म १ अधर्म २ आकाश ३ जीव ४ पुद्गल ५ समय ६ यह अनादि निप्पन्न नाम है इसीलिये इन्हें अनादि सिद्धान्त नाम कहते हैं क्योंकि नाम और नाम कर्म भिन्न है अतएव नाम कर्म स्थिति वाला होता है नाम अनादि निष्पन्न है इसीलिये इन्हें अनादि सिद्धांत नाम कहते हैं ।। ६ ॥ अब नाम पद और अवयव नाम पद विषय में विवर्ण किया जाता है। अथ नाम पद और अवयव नाम पद विपय । (सेकिँतं नामेणे २) पिउपियामहस्स नामेणं उन्ना. मिजइ सेतं नामेणं ७ से किंतं अवयवेणं सिंगी १ सिखी २ विसाणी ३ दाडी ४ पक्खी ५ खुरी ६ णही ७ वाली ८ टुप्पय ६ चउप्पय १० वहुप्पया ११ गंगुली १२ केसरी १३ कउही १४ परियरबंधणं भउंजाणेज्जा १५ मिहिलियं निवसणेणं १६ सित्थेणदोणयागं १७ कविं च एगाए गाहाए १. सेतं अवय- वेणी १६) * अनुयोगद्वार सूत्र * (२७६) पदार्थ-(सेकिंत नामेणं २.) (प्रश्न ) नाम से नामपद किस प्रकार बनता है ( उत्तर ) नाम से नामपद निम्न प्रकार से है जैसे कि पिरापिया महस्सना मेणं उन्नामिन्जइ ) पिता अथवा पितामह पितृ . पितामह इत्यादि के नामा परि नाम प्रसिद्ध किया जाय जैसे पिता के नाम पर तेनलीपुत्र अथवा माता के नाम से मृगापुत्र थायचा पुत्र पितृ पिता के नाम पर वरुण नाग नतया इत्यादि यह नाम पूर्व पुरुपों के नाम पर प्रसिद्ध हैं सो इसी का नाम (सेतं नामेणं ) नाम से उत्पन्न नाम है. इस नाम के द्वारा पूर्व पुम्पों के नाम भी प्रगट हो जाते हैं अब अवयव विषय में कहते हैं ( सेकित अवयवेणं ) (प्रश्न) अवयव नाम कौनसा है गुरु कहने हैं भौशिष्य ! अवयवों के प्रधान होने से जिस का नाम अवयवों के अनुसार किया जाय उसी को अवयव नाम कहते है जसे कि (सिंगी १) शृंगों के होने से भृगी कहा जाता है ( पक्षविशेष) इसी प्रकार ( सिंखी २ ) शिखा होने से शिखी ( मोर) (विसारणी) विपाणों के होने से विपाणी ३ . दाढी ४) दाढों के होने से दाढी ( सूअर ) (पंखी) पांख होने से पक्षी ६ फिर अवयव प्रधान होने से पादादि प्रधान भी होते हैं इसलिये उस विषय में कहते हैं (खुरी ६) युर होने से पुरी ६ (नही ७) नख होने से नखी ७ (वाली ८) ( केश ) बाल अधिक होने से वाली ८ ( दुप्पए ) द्विपद होने से मनुष्य कहा जाता है इसी प्रकार ( चतुप्पय १०) चारपाद वाले गवादि १० ( बहुप्पया ११ ) बहुपाद वाले कान खजूरा आदि (गंगुली १२) पूंछ होने से नंगुली वानरादि (केसरी १३ ) केसर होने से केसरी १३ (कउद्दी १४ ) ककुभ होने से ककुभी (स्कन्ध वाले कृपभादि ) (परियरवद्रेणं भरंजाणिना १५ ) विशिष्ट वस्त्रादि की रचना देखकर शूर पुरुष जाना जाना है अर्थात् जिसके विशिष्ट वस्त्र राज चिन्हों से अंकित है वही शूर पुरुप होता है ( महीलियं निवसणेणं १६ ) इसी प्रकार वस्त्रादि की रचना देखकर और वेप को देखकर स्त्री जानी जाती है क्या यह पतिव्रता है अथवा पुश्थली है (सित्वेणं दोणवायं १७) द्रोण पाफ वर्तन से एक किणका मात्र अन्न ग्रहण करने से परिपक्क अथवा अपरिपक्क जाना जाता है (कविंच एगाए गाहाए १८) और कयि एक गाथा के उच्चारण करने से जाना जाता है कि यह सुकवि है वा कुकवि है विद्वान् है वा मूर्ख है साक्षर है वा निरक्षर भट्टाचार्य है ( संतयववेणं ) सो वही वर्वोक्त अवयव प्रधान नाम पद होता है (२८०) * अनुयोगद्वार सूत्र * क्योंकि जिसका जो अवयव प्रधान हो उसके अनुसार उसका नाम ग्रहण किया जाय उसी को अवयवी नाम कहते हैं ॥ ८॥ भावार्थ-नाम से नाम निष्पन्न उसे कहते हैं जो पिता और पितामह पितृ पितामह के नाम से नाम निष्पन्न होता है उसी से प्रमिद्धि को भी प्राप्त हो जाता है जैसे तेतली पुत्र वरुण नागनतुआ अथवा मृगापुत्र थावचा (स्तापत्य) पुत्र इत्यादि यह सर्व नाम से निष्पन्न नाम पद हैं, और अवयों की प्रधानता से जो नाम उत्पन्न हो उसे अवयवी नाम कहते हैं जैसे कि इस कथन में १८ उदाहरण दिये गये हैं जो निम्न लिखितानुसार हैं। शृंगी १ शिखी २ वि- पाणी ३ दाढी ४ पक्षी ५ खुरी ६ नखी ७ वाली ८ द्विपद ६ चतुष्पद १० बहुपद ११ नांगुली १२ केसरी १३ ककुभी १४ सैनिक वेप से शूरवीर जाना जाता है १५ वेष से ही सती वा असती स्त्री जानी जाती है १६ गले हुए अन के एक कण से टोकणे वा कडाहे का पाक जाना जाता है १७ कवि एक गाथा, से १८ यह सर्व अवयव प्रधान पद हैं क्योंकि जिस जीव का जो अवयव प्र. धान होता है उसी के प्रयोग से उसका वही नाम उच्चारण किया जाता है इसी करके इसे अवयव प्रधान नाम पद कहते हैं और गौण निष्पन्न नाम के यह अनतर्भूत है अव संयोग नाम विषय में विवेचना करते हैं । ॥ अथ संयोग नाम विषय ॥ सेकिंतं संजोएणं २ चउविहे पण्णचे त्त० दव्वसंजोए ? खेत्तसंजोए २ कालसंजोए ३ भावसंजोए ४ सेकित्तं दव्वसं-. जोए ५ तिविहे पं० २० सचित्ते १ अचित्ते २.मीसए ३ सेकिं ते संचित्ते २ गोहिंगोमिए १ महिसिंहिं महिसिए उट्टीहिं उंट्टीए पसूहि पसूइए ३ ऊरणीपहिं ऊरणीए ४. सेतं सचित्ते सेकित्तं अचित्ते २ छत्तेणं छत्ती १ दंडेणं दंडी२पडेणं पडी घडेणं घड़ी ३ कड़ेण कडी ४ सेत्तं अचित्ते सेकित्तं मिहस्सए २ नावए नाविए १ सगडेणं सागडिए २ रहणं रहिए ३. हलेणं हालिए सेत्तं मिस्सए सेतं दध्वसंजोए सेकित्तं खत्तं संजोए २ भरहें एरवए ** अनुयोगद्वार सूत्र * (२८१) हेमवए एरणवए हरिवासए रम्मगवासए देवकुरुए उत्तर कुरुए पुब्वविदेहए अवरविदेहए अहवा मागह मालवए सोरठ्ठए मरहठ्ठए कुंकमाए कोसलए सेत्तं खेत्तं संजोए सेकिंतं कालसंजोए २ सुसुमसुसुमाए मुसमाप' सुलमासमाए दुसमसुसुमाए अहवा पावसए १ . वासारत्तए २ सरदए ३ हेमंतए ४ वसंतए ५ गिम्हए ६ सेतकाल संजोगे सेकिंतं भाव संजोगे २ दुविहे पण्णत्ते तंजहा पसत्थे अषसत्येए सेकिंतं प- सत्थे २ नाणेणं नाणी सणे गं दसणी चरित्तेणं चरिती सेत्तं. पसंस्थे सेकिंतं अपसत्थे २ कोहेणं कोही माणेणं माणी मायाए, मापी लोभेणं लोभी (सेत्तं असत्थे ) सत्तं भाव संजोगे सेत्तं संयोगे ॥ ८॥ पदार्थ-( सकित संमोरण २ च बिहे पएणते तंजहा ) ( प्रश्नं ) संयोग जन्य नाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ( उत्तर ) संयोग जन्य नाम चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (दव्य संजोग १ खेत संजोगे २ काहा संजोगे ३ भाव संजोग ४) द्रव्य संयोग जन्य नाम १ क्षेत्र संयोग जन्य नाम २ काल संयोग जन्य नाम ३ भाव संयोग जन्य नाम ४ (सकिंत दब्ब संजोगे २ तिविहे पएणत्ते तनहा सेचित्त १ प्रचिते २ मीसए ३) (प्रश्न ) 'द्रव्य संयोग जन्य नाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया (उत्तर) द्रव्य संयोग जन्य नाम तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे- कि-सचित्त १ अचित्त २ मिश्र ३ (प्रश्न) (संकिंतं सचित्ते ) द्रव्य संयो: गज सचित्त के उदाहरण किस प्रकार से हैं (उन्नर ) ( गोहिंगोमए १ उहिहि उट्टीए २ पमूहि पमूहए ३ ऊरणीहि ऊरणीए ४ सत्तं सचित्त ) जैसे जिसके पास गौएँ हैं उसे गोमान कहते हैं १ इसी प्रकार जिसके पास ऊंट हैं उसे और ष्ट्रिक कहते हैं तथा जिसके पास पशु हैं उसे पशुओं वाला कहते हैं ३ जिसके पास अनादि हैं उसे अनादि बाला कहत है (सेवं सचित्ते ).यही सचित्त द्रव्य संयोगन नाम है इसी प्रकार अन्य भी उदाहरण जानने चाहिए १ (सेकित .
(२८२) * अनुयोगद्वार सूत्र * अचित्ते ) ( प्रश्न ) अचित्त द्रव्य सम्बन्ध कौनसा है और उसके .उदाहरण जानने चाहिए ? (सेकितं अचिते ) (प्रश्न ) अचित्त द्रव्य सम्बन्ध कौनसा है और उसके उहाहरण किस प्रकार से हैं ( उत्तर ) अचित्तं द्रव्य सम्बन्ध वह होता है जिस अचित्त के प्रयोग से संबोधन किया जाय और उसके उदा- हरण निम्न लिखित प्रकार से हैं (छत्तेण छत्ती १ दंडेण दंडी २ पढेण पडी ३ कडेण कड़ो ४ ) छात्र के सम्बन्ध होने से (छत्री) १ दंड के सम्बन्ध होने से दंडी पटके सम्बन्ध होने से पटी ३ कटके सम्बन्ध होने से कटी ४ ( कट ) चटाई ( सेत्तं अचित्ते ) सो यही अचित्त द्रव्य स- म्वन्ध है अब मिश्र द्रव्य सम्बन्ध विषय में कहते हैं (सेकि मिसए २) (प्रश्न ) मिश्र द्रव्य सम्बन्ध किसे कहते हैं ( उत्तर ) मिश्र द्रव्य वह होता है जैसे कि ( नावा एनाविए ? सगडेणं सगडिए २ रहेणं रहिए ३ हलेणं हलिए ४ सेत्तं मिसए ) ( सेतं दव्य संजोगे १) नाव के संयोग होने पर नाविक होता हैं १ शकर के संयोग से शाकटिक २ रथ के संयोग से र- थिक ३ हलके संयोग से हालिक ४ क्योंकि इन पदार्थों में सचित्त अचित्त दोनों प्रकार के पदार्थों का संयोग है जैसे कि पभ (बैल) सचित्त है हल अचित्त है सो दोनों के संयोग होने से हालिक कहा जाता है सो यही मिश्र संयोग है और इसे ही द्रव्य संयोगज कहते हैं। अव क्षेत्र संयोग विषय में विव- चन किया जाता है (सेकितं क्खेतसंजोए २) (प्रश्न ) क्षेत्र संयोगज नाम किस प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) क्षेत्र संयोगज नाम इस प्रकार से वर्णन किया गया है ( भारहेए रखए हेमवए एरणवए हरिवासर रम्मंगवासए) जैसे जिसका जन्म भारत में हुआ है अथवा भरत क्षेत्र में निवास करता है उ- से ही भारत कहते हैं इसी प्रकार ऐरवर्तक है मवर ऐ रण्यवए हरिवर्षीय रम्य . कवर्षीय (देवकुरुए उत्तरकुरुए पुवादेिहए अपराविदेहए) देवकुरुक उत्तर कुरुक पूर्वविदेहक अपरविदेहक यह सर्व क्षेत्र संयोगज नाम हैं (अहवा) अथवा अन्य प्रकार से भी क्षेत्र संयोगन नाम का वर्णन करते हैं जैसे कि (मागहे १ माल- बए २ सोरठए ३ मरठए ४ कोंकणए ५ कोसलए ६ सेतं क्खेत्त संजोए.) जिसका जन्म मगध देश में हुआ है अथवा मगध देश में वसता है उसे मागध कहते हैं इसी प्रकार मालवीय २ सौराष्ट्रिक महाराष्ट्रिक ४ कोंकण ५ कौशालिक ६ येही क्षेत्र संयोगज नाप होते हैं. इसी प्रकार अन्य देशों के सम्बन्ध होने पर * अनुयोगद्वार मूत्र * .(२८३) भी संभावना करलेनी चाहिये जैसे अंचनदीय (पंजाबी) गुर्जरी ( गुजराती) इत्यादि ( से काल संजोगे २) (प्रश्न) काल संयोग जन्य नाम किसे कहते उत्तर जिसका जन्म सुपम सुपम काल में हुआ है उसको सुपम सुपमन कहते इसी प्रकार (सुसमाए ) सुपगज (मुसमदुसमाय ३) गुपमपमन दुसममुस- माए) दुपम सुपमज (दुसमाए) दुपमज ( दुसम दुसमाय) दुपम दुपमन यह सर्व सप्त म्यन्तपढ़ पंचम्यन्त जानने चाहिए सो जिस काल में जिसका सम्बन्ध हुआ है वह कालिक संयोग से उसी प्रकार कहा जाता है अथवा काल का संयोग अन्य प्रकार से भी कहते हैं (अहवा पाचसए ? या सारचय २ सर- दए ३ हेमंतए ४ वसंतए ५ गिम्हए ६ ( सत्तंकाल संजोगे ) यदि पावस ऋतु में जन्म दुआ है तब उसको पारसिक कहते हैं इसी प्रकार वर्षा ऋतु २, शरद ऋतु ३, हेमन्त ऋतु, वसंत ऋतु ५, ग्रीष्म ऋतु ६, सो जिम ऋतु में जन्म हुआ हो उसी ऋतु के नाम से कहा जाता है वह भी काल संयोगज नाम है। श्रव भाव संयोगन नाम विषय में कहते हैं ( सेकि भाव संगोगे २) (मन) भाव संयोगज नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) भाव संयोगज नाम (दुविहेपरणने जहा ) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (पमन्धेय अपसन्थेय २) प्रशस्त भाव जन्य नाम और प्रशस्त भाव जन्य नाम (सतं पसर) (प्रश्न ) प्रशस्त भाव जन्य नाम किसे कहते हैं अर्थात् जो सुन्दर भादों से निप्पन नाम कौनसा है ( नागणं नाणी १) (उनर ) जैसे शान से युक होने पर शानी कहा जाता है १ (दसणेगंदसणी २) इसी प्रकार दर्शन से दर्शनी २ (चरित्तेणं चरिती चरित्र से चारित्री (सेतं पसत्थे ) सो यही प्रशस्त नाम होता है । सकतं अपसत्ये) (अन्न) समस्त निष्पन्न नाग कौनसा होता है (को- हेणं कोही १)(उत्तर) जैसे शोध से क्रोधी ( मागणं माणी २) मान से मानी (मायाए मायी ३ ) माया से मायी (लोभेणं लोभी ४) लोभ से लोमा ४ क्योंकि जो अप्रशस्त पदार्थ हैं उनके संयोग से अमशस्त नाम निष्पन्न होजाता है (सेतं अपसत्ये सेतं भाव संजोए सेत्तं संजोएणं ) सो यही अप्रशस्त नाम है और यही भाव संयोग है और इसी स्थान पा संयोग निप्पन्न नाम का समास पूर्ण होगया है ॥ भावार्थ-सांयोगिक नाम चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि द्रव्य संयोगज १, क्षेत्र संयोगज २, काल संयोगज ३, भाव संयोगंज ४, अपितु (२८४.) * अनुयोगद्वार मूत्र * इव्य संयोगन नाम तीन प्रकार में वर्णित है सचित्त १ अचित्त २ मिश्रित ३. सो सचित्त के उदाहरण इस प्रकार से हैं जैसे गाओंके होने से गीमान् ?, उष्ट्रों के होने से औष्ट्रिक २, पशुओं के होने से पशुओं वाला ३, अरणीयों के होने से ऊरणीक ४, यही सचित्त जन्म नाम हैं और अचित्तज नाम ऐसे हैं जैसे कि छत्र के संयोग होने से छत्री कहा जाता है १, और दंड के संयोग होने से दंडी २, पट के संयोग होने से पटी, कट के संयोग होने से कटी ४, सो येही अचित्त संयोगज नाम हैं और मिश्रन नाम निम्न प्रकार से हैं जैसे कि नाव के संयोग से न विक १, शटक के संयोग से शाकटिक २, रथ के संयोग से राधिक ३, हल के संयोग से हालिक येही मिश्रन नाम हैं क्योंकि हल अचित्त वृषभ सचित्त दोनों के संयोग से मिश्रन नाम उत्पन्न होजाना है इसे द्रव्य संयोगज नाम कहते हैं ? और क्षेत्र के संयोग से जो नाम निष्पन्न हों उसे क्षेत्रज नाम कहते हैं जैसे कि भरत क्षेत्र के संयोग से भारत यावत् अपर विदेहादि अथवा मागध १ मालवी २ कोशली इत्यादि यह क्षेत्रज निप्पन्न नाम हैं २ और काल के सम्बन्ध से जो नाम निप्पन्न होते हैं उन्हें कालज नाम कहते हैं जैसे एक काल के चक्र के पट २ भाग होते हैं उन के संयोग से अथवा षद् ऋतुओं के संयोग से जो नाम उत्पन्न हो उन्हें काल जन्य नाम कहते हैं ३ और भाव संयोग से जिस की उत्पत्ति है उसे भावज नाम कहने हैं अतः प्रशस्त भाव वा अप्रशस्त भाव यह दो प्रकार के भाव हैं इन दोनों से निष्पन्न नाम निम्न प्रकार से हैं जैसे कि प्रशस्त मात्र सम्बन्धी ज्ञान से ज्ञानी १ दर्शन से दर्शनी २ चारित्र के संयोग से चारित्री और अप्रशस्त भाव सम्बन्धी कोध के संयोग से क्रोधी १ मान के संयोग से मानी २ माया के संयोग से मायी ३ लोभ के संयोग से लोभी ४ सो यही भाव संयोगज नाम हैं और उन्हें ही संयोगज नाम कहते हैं क्योंकि यह सर्व नाम संयोग से ही उत्पन्न हुए हैं । अब प्रमाण नाम के विषय में विवेचन करते हैं। - अथ प्रमाण विषय । सेकिंतं पमाणेणं २ चउविहे पं० तं० नामप्पमाणे १ ठवणपामाणे २ दव्यच्पमाणे ३ भावप्पमाणे ५ सेकिंतं नाम- .. * अनुयोगद्वार मूत्र * (२८५) प्पमाणे जस्म णं जीवस्स वा अजीवस्स वा जीवाणं अजी- वाणं तदुभयस्स वा तदुभयाणं वाप्पागेत्ति नामं कन्जइ सेत्तं नामप्पमाणे १ सेकिंतं वनाप्पमाणे २ सत्तविहय पगण- ते तंजहा नक्खत्ते १ दवय २ कुले ३ पासंड ४ गणेय ५ जीवियाहेउं ६ आभिप्पाइयनामं वणानामंतु सत्तविहं ॥ १ ॥ सेकिंतं नक्खत्तनामे २ कित्ति याहि जाए कित्तिए १ कित्ति- यादत्ते २ कित्तियाधम्मे ३ कित्तियासम्मे ४ कित्तियादेवे ५ कित्तियादासे ६ कित्तिथासेणे ७ कित्तियारक्खिए ८ रोहि णीहिं जाए रोहिणिए रोहिणिदिन्ने रोहिणिधम्मे रोहिणि- सम्मे रोहिणिदेवे रोहिणिदासे रोहिणिसेणे रोहिणिरक्नेय गवंसव्वनक्खचेसु नामा भाणियव्वा एत्थं संगाहणि गाहाओ कित्तियरोहिणिमिगसिरअदा पुणव्वसू य पुस्से य तत्तो य अस्सिलेसा महा उ दा फग्गुणीरोय १ हत्थो चित्ता साती वि साहा तह य होइ अणुराहा जेट्ठा मूला पुव्वासाढ़ा तह उत्तरा चेव ॥२॥ अभिई सवण धणिट्ठा सत्तभिसदा दा अहोति भद्द वया रेवई अस्सिाणि भरणी एसा नक्खत्तपरिवाडी ॥३॥ सेत्तं नक्खत्तनामे । सेकिंतं देवयानामे २ अग्ािदेवयाहिं जाए अग्गिए अग्गिदिन्ने अग्गिसम्मे अग्गिधम्मे अग्गिदवे अग्गि- दासे अग्गिसेणे अग्गिरक्खिए एवं सव्वनक्खत्तदेवतानाम भाणियब्वा एत्यपि अट्ठनामे जावजमो इत्यपिय संग्गाणिगा हाअोप्राग्ग १ पयावई २ सोमे ३ रुदो ४ आदिती ५ विहस्सई ६ सप्पे ७ पिति ८ भग ९ अज्जम १० सविया ११ तट्टा १२ वाउय १६ इंदग्गी १४ मित्तो १५ इन्दो १६ निरई १७ भाऊ १८ विस्सो य १६ वंभ २० विएहुआ २१ वसु २२ (२८६) * अनुयांगद्वार सूत्र * वरुण २३ अय २४ विवाद्धि २५ पुस्सो य २६ आग्गि २७ जमे चेव २८ सेनं देवयाना २ सर्कितं कुलनामे । उग्गा १ भोगा २ राइन्नो ३ खातिए ४ इचखगा ५ णाया ६ कोरबा ७ सेत्तं कुलनामे ३ सेकिंतं पायंडनामे मुमणे १ पंडुरंग २ भिक्खू ३ कावालिए ४ ताव से ५ परिवायए ६ सेतपानं डनामे ४ सेकित्तं गणनामे २ सल्ले १ मल्लदिन्ने २ मल्ल धम्मे ३ मल्लसम्मे ४ मल्लदेवे ५. मल्लदासे ६ मल्लसेणे ७ मल्लविखए ८ सेत्तं गणनामे ५ सेकित्तं जीवियानामे.२ अवकरए १ ऊक्कुरुडिए २ सुप्पए ३ उझियए ४ कजवए ५ सेत्तं जीवियानामे ६ सेकित्तं आभिप्पाइयनामे २ अवए ? निवए २ ववूलए ३ पलासए ४ सिणए ५ पीलए ६ करीरए ७ सेत्तं आभिप्पाइयनामे ७ सेत्तं ठवणाप्पमाणे ॥ पदार्थ-( सेकितप्पम णे २ चउबिहे पं० २०) शिप्यने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! प्रमाण कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है क्योंकि प्रमाण उसे कहते हैं जिस के द्वाग वस्तुओंका निश्चय किया जाय सो गुरुने उत्तर दिया कि वह प्रमाण चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (नाम- प्पमाणे १ हवणाप्पमाणे २ दबप्पमाणे ३ भावप्पमाणे ४ ) नाम प्रमाण १ स्थापना प्रमाण २ द्रव्य प्रमाण ३ भाव प्रमाण ४ ( सेकिंत नामप्पमाणे २) (प्रश्न) नाम प्रमाण किसे कहते है ( उत्तर ) नाम प्रमाण के निम्न लिखिता: नुसार उदाहरण हैं जैसे कि (जस्सणंजीवस्सवा) जिस जीव का अथवा (अजी- वस्सवा ( अजीवका अथवा ) जीवाणंवा (बहुत से जीवों का अथवा ) अजी- वाणंवा) बहुत से अजीवों का ( तदुभयस्सवा ) अथवा एक जीव और एक अजीव का अथवा. ( तदुभयाणंवाप्पमाणेति नामंकिज्जइसेत्तं नामप्पमाणे १) बहुत से जीव.बहुल से अजीवों का प्रमाण " इस प्रकार से नाम रक्खा जाता है. इसे ही नाम प्रमाण कहते हैं क्योकि नाम प्रमाण से यह तात्पर्य है कि नाम प्रमान के द्वारा पदार्थों का निर्णय किया जाता है सो यही नाम प्रमा 4 * अंनुयोगद्वार सूत्र * (२८७) ग है १ (सर्कितं यणाप्पमाणे २ सत्तविहे पं० तं० ) (प्रश्न ) स्थापना प्रमाण कितने प्रकार से प्रतिपादित है ( उत्तर ) स्थापना प्रमाण सात प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि ( नक्खते १) नक्षत्र के नाम पर जो नाम स्थापन किया जाये उसी को नक्षत्र स्थापना कहते हैं इसी प्रकार ( देव- . य २ ) देवों के नाम पर स्थापना (कुलेयं ३) कुल के नाम पर स्थापना ३ (पासंउ ४) पासंड के नाम पर स्थापना ४ ( गणेय ) ५ गण के नाम पर ५ (जीवियाहेतु ६ ) जिस नाम के द्वाग पुत्र जीवित रहे ऐस नाम की स्थापना करना ६ ( अभिप्पाइय नाम ७) और निज अभिप्रायिक नाम अर्थात् जैसे मन का अभिप्राय होता है उसके अनुसार नाम स्थापन किया जाता है इसलिये (ठवणा नामंतु सत्तविहं १) स्थापन नाम सात प्रकार से कथन किया गया है (सेकितं नक्खननामे)(प्रश्न ) नक्षत्र नाम के ऊपर स्थापना नाम किस प्रकार से प्रतिपादन किया.गया है (उतर ) नक्षत्र नाम निम्न प्रकार से है जैसे कि (कित्तियाहि जाए कत्तिय १) जिसका कृत्तिका नक्षत्र में जन्म हुआ हो उसे उस नक्षत्र की अपेक्षा से कार्तिक कहते हैं १ (कित्तिया दत्ते २) जो कृत्तिका ने दिया हो वही कृत्तिकादत्त २ इसी प्रकार (कित्तियाधम्प्रे ३) कृत्तिका धर्म (३ वित्तिया सम्मे ४) कृत्तिका शर्म ४ (कित्तियादेवे ५) कृत्तिकादेव ५ (कित्तियादासे ६ ) कृत्तिकादास ६ (कित्तियासेणे ७) कृत्तिकासेन ७ (कि. तियारक्खिए ८) कृत्तिका रक्षित और इसीपकार (रोहिणिहि जाए रोहिणिए) जिसका रोहिणि नामक नक्षत्र में जन्म हुआ है उसे रोहिणेय कहते हैं (रोहि- रिणदो १) फिर रोहिणिदत्त २ (रोहिणिधम्मे ) रोहिणि धर्म (रोहिणि सम्मे) रोहिणि शर्म (रोहिणिदेवे । रोहिणि देव (राहिणिदासे) रोहिणिदास (रो- हिणिसेणे) रोहिणिसेन (रोहिणि रखिए) रोहिणि रक्षित ( एवं सव्वं न- खतेसुनामाभए यिन्या) सो इसी प्रकार सर्व नक्षत्रों के नाम कथन करने चा. हिये परन्तु ( इत्थं संग्गहणीगाहाऊ) इस स्थान पर संग्रहणी गाथाएँ कही जाती हैं जिनके द्वारा सर्व नक्षत्रों का बोध होजाय जैसे कि (कित्तिए रोहिणि मिगसिर ) कृत्तिका ९ रोहिणि २ मृगशीर्प ३ (अदाय पुणवसुयं) आर्द्रा ४ पुनर्वसु ५ (पुस्सोयतत्तोय असिलेसा) फिर पुष्प ६ तत्पश्चात् आश्लेषा ७ (म- घाउ दोफग्गुणीउय ) फिर मघा ८ और पूर्वा फाल्गुणी ९ उत्तरा फाल्गुणी १० ( इत्योचित्ता स्वाई ) हस्त ११ चित्रा १२ स्वाति १३ (बिसाहातहय अ:
1 २८८) * अनुयोगद्वार मंत्र * णुएहा ) विशाखा. १४ तथा अनुराधा १५ (जहा मूला पुबासाहा) जेष्ठा १६ मूल १७ पूर्वापाढा १८ (तह उत्तरोचव ) तथा उत्तरःपाढा १६ (अभिहीसवणे धणिठा ) अभिजित् २० श्रवण २१ धनिष्ठा २२ (सत्तभिसयादो अहोतिमद्द- वया) शतभिपा २३ पूर्वी भाद्रपद २४ उत्तराभाद्रपद २५ (रेवई अस्सिणि भरणी) रेवती २६ अश्विनी २७ भरणी (एसा नवखत परिवाडी) येही न. क्षत्रों की परिपाटी वर्णन की गई है (सेत्तं. नक्खतनामे ) यही नक्षत्र नाम हैं अर्थात् नक्षत्रों के नाम पर स्थापना नाम वर्णन किया गया है ॥ १॥ (सीक देवयानामे २ ) (प्रश्न ) देवताओं के नाम पर नाम किस प्रकार से होता है (उत्तर) देवताओं के नाम पर नाम इस प्रकार से है जैसे कि (अग्गि दव याहि जाए अग्गिए) जिसका अग्निदेव के समय जन्म हुआ है वह आनेय ? इसी प्रकार (अग्गिदिन्ने ) अग्निदत्त २ (अग्गिसम्मे) अग्निशर्म ३ (अग्गि धम्मे ) अग्निधर्म ४ (अग्गिदेव ) अग्निदेव ५ (अग्गिदासे) अनिदास ६ ( अ- गिसणे ) अग्निसेन ७ (अग्गिरक्खिए ) अनि रक्षित ८ (एवं : सम्बनखंत नामाभाणियब्बा) इसी प्रकार सर्व नक्षत्र देवों के नाम पर नाम कहने चाहिएँ इसलिये (इत्थंपियसंगाहणिगाहाउ) इस स्थान पर भी संग्रहणी गाथाएँ कही जाती हैं क्योंकि अष्टाविंशति नक्षत्रों के अधिष्ठाता अष्टाविंशति देव हैं. जिनके नाम निम्न गाथाओं में दिखलाए जाते हैं तथा उक्त पाठ २ नाम देवों के नाम पर लोग नाम संस्कार करते हैं (अग्गि पयवइ सोमेरुद्दे ) अग्नि १ प्रजापति २ सोम ३ रुद्र ४ (अदिति विहस्सई ) अदिति ५ वृहस्पति ६ (सप्पेपिउभग अ- ज्जम ) सर्प ७ पितृ ८ भग ६ अर्यमा १० (सवियातहावाउय) सविता ११ त्वष्ठा १२ वायु १३ (इन्दग्गी मिताइन्दोनिरत्ती) इन्द्रामि १४ मित्र १५ इन्द्र १६ निर्ऋति १७ (आउविस्सोय वंभविएहय ) अम्भः १८ विश्व १९ ब्रह्मा. २० विष्णु २१ ( वसुवरुणअयविवद्धि ) वसु २२ वरुण २३ अज २४ विधार्द्धि २५ (पुस्सो अग्गि जये चेव) पूपा २६ अग्नि २७ यम २८ (सेतं देवयानामे) सोयही देव नाम हैं अर्थात् अष्टाविंशति नक्षत्रों के अधिष्ठाता अष्टाविंशति देव हैं यदि उन देवों के नामों पर नाम स्थापन किया जाये तब उनको देव नाम कहते हैं ॥ २ ॥ अव कुल नाम का विवर्ण करते हैं (सेकितं कुल नामे) (प्रश्न ) कुल नाम किसे कहते हैं (उत्तर) उग्ग १ भोगा २ राइना खत्तिय ४. इक्खागा ५ णाया ६ कोरबा ७ सेत्तं कुल नामे ३ जिसका उग्र कुल में जन्म हुआ है उसको उग्र कुल कहते हैं १ इसी प्रकार भोग कुल २ राज्य कुल ३ में * अनुयोगद्वार सूत्र * (२८९) 'सत्रिय कुल ४ इक्ष्वाकु कुल ५ ज्ञात कुल ६ कौरव्य कुल ७ सो जिस कुल जिसका जन्म होता है उसी कुल के नाम से फिर उसकी प्रसिद्धि होजाती है येही कुल नाम हैं ॥ ३ ॥ (सेकित पासंडनामे ) (पश्न ) पापंड नाम किसे कहये हैं (उत्तर) (समशे पंडुरंगे भिक्खू ) श्रमण परमतावलम्बी पांच रंगादि वस्त्रों के धारण करने वाले वौद्ध भिक्षु ( कावालिएतावसेय) कपिल मतानु- यायी और तापस ( परिवायए ) परिनानक (सेतं पासंड नामे ) यह सर्व अन्य दर्शनीय पापंड नामाश्रित हैं। (सेकिंतं गण नामे २) (प्रश्न ) गण नाय किसे कहते हैं ( उत्तर ) मल्ले १ मल्ल दिने २ मल धम्मे ३ मल्ल सम्ये ४ मन्ल देवे ५ मल्ल दासे ६ मल्ल सेणे ७ मल्ल रक्खिर ८) सल्लादि गण नामों पर जो नाम स्थापन किया जाता है वही गण नाम हैं जैसे कि मल्ल १ मल्लदत्त २ मान्न धर्म ३ मल्ल शर्म ४ मल्ल देव ५ मल्ल दास ६ मल्लसेन ७ मल्ल रक्षित ८ (सेशं गणनामे ) सो येही गण नाग है । ( लेकितं जीवियानाम) (प्रश्न ) जीवक नाम किसे कहते हैं अर्थात् जिसका पुत्र जीवित न रहता हो वह पुत्र के जीवित रहने के वास्ते इस प्रकार से नाम धापन करता है (उत्तर ) अवकरए १ उकुरुडिए २ सुप्पए ३ उज्झिए ४ फुगवए ५ सेत्त- जीवियानामे ) जैसे के पुत्र के जीवित रहने की इच्छा से जन्म ए के पश्चात् पुत्र को कचरादि में गेर कर फिर उसका नाम स्थापन करना जैसे कि अबकरक १ उत्कुरुटक २ सूर्यक ३ उझित ४ कार्यापत ५ यह सर्व जीवित रहने की इच्छा से नाम स्थापन किये जाते हैं इसी को जीवित नाम कहते हैं ६ ( सकि- तं अभिप्पाइय नामे २)(प्रश्न) अभिमायिक नाम किसे कहते हैं (उत्तर) जो अपनी इच्छानुसार नाम स्थापन किये जावे जैसे कि (ए निवए २ वल ३ पलासए ४ सिणय ५ पीलू ए ६ करीर ( सेढवणापमाणे ) वृक्षा दि के नामों पर स्थापन करना यथा अंवक १ निवक वंदूल ३ पलासक ४ सिनक.५ पीलु ६ करीर ७ यही सप्त प्रकार से स्थापना प्रमाण वर्णन किया गया है इसलिये स्थापना प्रमाण की समाप्ति हुई है। अथ द्रव्य प्रमाण विषय । सेकितं दबप्पमाणे २ छबिहे पं० तं० धम्मत्थिकाए जाव प्रद्धासमय ६ सेत्तं दवप्पमाणे २।
4 (२६०) * अनुयोगद्वार मन्त्र * पदार्थ- सेकित्तं दबप्पमाणे २)(प्रश्न ) द्रव्य प्रमाण किसे कहते है (उत्तर) द्रव्य प्रमाण पट् प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि धम्म थिकाय जाब अद्धासमय ६ सेत्तंदचप्पमाणे ) धर्मास्तिकाय १ अधर्मास्ति- काय ३ आकाशास्तिकाय ३ जीवास्तिकाय ४ पुनलास्तिकाय ५ समय ६ यही द्रव्य प्रमाण हैं क्योंकि जो अनादि सिद्धांत में नाम वर्णन किए हैं वह केवल अनादि सिद्ध की अपेक्षा से वर्णन किये हैं और जहां पर द्रव्य अनंत धर्मात्मक होने से कथन किए गये हैं किन्तु पुनरुक्ति दोप न जानना चाहिए तथा धर्म शब्द अन्यत्र कहीं नहीं जा सका केवल द्रव्याश्रित धर्म रहता है इस लिये पुनिरुक्ति न जाननी चाहिये सो यही द्रव्य प्रमाण है। भावार्थ-प्रमाण नाम चार प्रकार से विवर्ण किया गया है जैसे कि नाम प्रमाण १ स्थापना प्रमाण २ द्रव्य प्रमाण ३ भाव प्रमाण ४ सो नाम ' प्रमाण उसे कहते हैं जो एक जीव और एक अजीव अथवा बहुत से जीव वा बहुत से शजीव वा बहुत से अजीव अथवा जीव अजीव दोनों का प्रमाण नाम इस प्रकार से जो स्थापन किया जाता है उसे ही नाम प्रमाण कहते हैं अपितु स्थापना प्रमाण सात प्रकार से कथन किया है जैसे कि नक्षत्र १ देव २ कुल ३ पापंड ४ गण ५ जीविका हेतु ६ और अभिप्रायिक नाम ७ सो इन्हों के कारण से जो नाम स्थापन किया जाता है उसे ही स्थापना नाम कहते हैं जैसे कि जिसका कृत्तिका नक्षत्र में जन्म हुआ है उसका नाम कार्तिक १ कृत्तिका दत्त २ कृत्तिका धर्म ३ कृत्तिका शर्म ४ कृत्तिका देव ५ कृत्तिका दास ६ कृत्तिका सेन ७ कृत्तिका रक्षित ८ इसी प्रकार २८ नक्षत्रों की कल्प ना कर लेनी चाहिए ॥१॥ और २८ नक्षत्रों के अधिष्ठाता २८ देव हैं यदि उनके नामों पर नाम स्थापन किया जाय उन्हीं को देव नाम कहते हैं जैसे कि कृत्तिका नक्षत्र का अधिष्ठाता अभि नामक देव है उसी के नाम पर आग्ने- यंक १ अग्नि देव २ अग्नि दत्त ३ अग्नि शर्म ४ अग्नि धर्म ५ अग्नि सेन ६ अग्नि दास ७ अग्नि रक्षित ८ इसी प्रकार २८ देवों पर नाम स्थापन कर लेने चाहिये और उग्र १ भोग २ क्षत्रिय ३ राज्य ४ इक्ष्वाकु ५ ज्ञात ६ कौरव्य ७ इत्यादि कुलों के नामों पर नाम स्थापन किया जाय उसी को कुल नाम कहते हैं ३ जो श्रमण पांडुरंग भिक्षुका पालिक तापस परिव्राजक आदि के नामों पर नाम स्थापन हो उसे ही पापंडनाम नाम कहते हैं ॥ ४ ॥ जो गल्ला- ३१) * अनुयोगद्वार मूत्र * (२६१) दि गुण के नामों पर नाम हो उसे गण नाम कहते हैं ५ तथा पुत्र के जी- वित रहने की आशा पर पुन को मेर देना फिर उसके अबकर उत्कुरुट आदि नाम रखने वही जीवित नाम है ६ अथवा गुण निधन वा नो गुण निप्पल भादि को न विचारते हुए अपने अभिप्राय के अनुसार नाम रक्खे उसे अभि- प्रायिक नाम कहने हैं जैसे कि अंधक १ निवक २ यल ३ पलाशक ४ सि. नक पीलुक ६ करीरक ७ यही अभिप्रायिक नाम हैं और इसे ही स्थापना प्रमाण कहते हैं इसका पूर्ण विवर्ण पदार्थ में लिखा गया है और द्रव्य प्रमाण में पद् द्रव्य वर्णन किए गए हैं क्योंकि द्रव्य संज्ञा इन्हीं की ही हैं इसीलिये यह द्रव्य संज्ञक हैं अब इसके आगे भाव प्रमाण का विवण किया जाता है। अथ भाव प्रमाण विषय । सकिंतंभावप्पमाणे २ चउविहे पन्नता तंजहा सामासिए तद्धितए धाउय निरुत्तिय सर्कितं सामालिए २ सत्तसमासा भवन्ति तंजहा दंदे अ १ बहुब्बीही २ कम्मधारण ३ दिगए ४ तप्पुरिसे अबइभावे ६ एगसेसे य सत्तमे सेकिंतं दंदे २ देताश्च प्रोष्टौ च दंतोष्टम् १ स्तनो च उदरं च स्तनोदरम् २ वस्त्रंच पात्रंच वनपात्रम् ३ अश्वाश्च महिपाच अवसहिषं अहिय नकुलंच अहिनकुलम् ५, सेत्तं दंदे ॥ १ ॥ पदार्थ-(सेकिन भावप्पमाणे चविहे पन्नता तंजहा ) (प्रश्न) शिष्य कहना है कि हे पुज्य थान प्रमाण कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) गुरु ने उत्तर में कहा कि भाव प्रमाण चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि सामासिक १ तद्धितज २ धातुज ३ और नैतिक ४ भाव प्रमाण इन्हें इसलिप कहा गया है कि अर्थ के युहा होने पर गुण उत्पन्न होता है सो गुण भाव में होता है प्रमाण शब्द का अर्थ यह है " प्रमीयतेच्छियते निश्चयी क्रियते अननतत्प्रमाणम् " जिसके द्वारा पदार्थों. का प्रमाणः, क्रिया जाय अथवा निर्णय किया जाय केही प्रमाण हैं सो इसीलिये शब्द बोध होने के लिये उक्त चारों का भाव प्रयाण में रक्खा है. अतएव यह युक्ति संगत कथन है कि (२६२) * अनुयोगद्वार सून* शब्द बोध होने से अर्थवोध शीघ्र हो जाता है पुनः अर्थ वोध से गुण की प्राप्ति है गुण है सो भाव है इसीलिये यह भाव प्रमाण है (सेकिंत समासिए सत्त समासा भवन्ति तंजहा) (प्रश्न ) सामासिक प्रमाण कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) सामासिक प्रमाण में सात समास होते हैं जैसे कि (दंदे १ बहुव्वीही २ कर्म धारए ३ दिए ४ तप्पुरिसे ५ श्रचई भान ६ एग सेसेय सत्तमे ७) द्वन्द १ वडुब्रीहि २ कर्म धारय ३ द्विगु ४ तत्पुरुष ५ अव्ययी भाव ६ एक शेष७ येही सात प्रकार के ससास हैं क्योंकि समास शब्द का यह अर्थ है कि बहुत से पदों का एक पद किया जाय उसे ही समासान्त पद कहते हैं जैसे कि “ समसनं संक्षेपणं परस्परा पेक्षयोः पूर्वोत्तर पदयो रेकत्वेनन्यसनं समासः" सो जो सम्मिलित हो कर पद उत्पन्न होता है वही सामासिक पद अपितु वर्तमान समय के शब्दानुशासनों में समास पद् प्रकार से वर्णन किये गये हैं जैसे कि बहुव्रीहि १ अव्ययी भाव २ तत्पुरुष ३ कर्म धारय ४ द्विगु ५ द्वन्द्व ६ तथा " परस्परा पेक्षाणास् पूर्वोचरपदानां सुवंतानां कथं चिर्दकपद्यम् समासः परस्पर की अपेक्षा से पूर्वोत्तर सुवेत पदों का एक पद किया जाय वही समा- सान्त पद है क्योंकि जहां पर अनेक सुवंत पद हो उनको एक पद में वर्णन किया जाय घही समासान्त पद है सो अव अनुक्रमता पूर्वक इनके उदाहरण दिखलाए जाते हैं जैसे कि (सेर्कित दंदे य२) (प्रश्न ) द्वन्द्व समास किसे कहते हैं (दंतोश्च ओटौच दंतोटस् ) ( उत्तर ) इन्द्व समास दो प्रकार से होता है एक अवयव प्रधान द्वितीय समाहार प्रधान सो यहां पर समाहार प्रधान के उदाहरण दिखलाए गये हैं जैसे कि दान्त और प्रोष्टों का समाहार करने से “ दंतोप्टम् " ऐये प्रयोग बन जाता है क्योंकि " प्राणि तूपकम् " शा० व्या अ० २ पा० १ सू१०१ प्राण्यङ्गानां तूर्याज्ञानां द्वन्द्वः एकार्थोनित्यं भवति पाणिपादम् शश पटहम् इत्यादि इस सूत्र से दंतोष्ट रूप होकर फिर " अतोऽम् " शा. व्या. अ० १ पा० २ सू० ४ अकारान्तस्म नपुंसकस्य सम्बन्धिनोः स्वमारंमित्या देशो भवति फिर "मोजोमः " . पदस्य पष्टयाः स्थानेऽन्तेलः" इन सूत्रों से “ दंतोष्टम् " शब्द सिद्ध हो जाता है किन्तु यह दन्तोष्टं शब्द नपुंसक लिङ्ग का एक वचनान्त है और द्वन्द्व समासान्त पद है और (स्तनोंच उदरच स्तनोदरं ) जब स्तन और उदर का समाहार किया तब स्तनादरम् प्रयोग सिद्धहुआ सो " प्राणि तूर्याङ्गम् " अतोऽम् इत्यादि सूत्रों की प्राप्ति है यह छन्दू समासान्त पद है. ( वस्त्रच पानंच अनयोः समाहारः वस्त्र पात्रम् ) जब * अनुयोगद्दार मूत्र * (२३) वस्त्र और पान का समाहार किया गया तत्र द्वंद्वी वा शा० व्या० अ०२ पा० १ ० ६३ इस सूत्र से वस्त्र पात्र प्रयोग सिद्ध हुआ फिर " अतोऽम् सूत्र से विभक्तधना पद वस्त्र पात्रम् हो गया तथा (अश्वध माहपश्च अश्व महिषम्। अश्व और महिप का जब समाहारा किया गया"नित्य वैरावरे" शा० २-१.१०३ और मोऽणोऽम्ः इन सूत्रों से अश्व महिपम् प्रयोग सिद्ध हुआ क्योंकि यह सर्वद्धि पदान्त और द्वंद समासान्त पद हैं फिर " अहिश्च नकुलश्च अदनकुलं" सर्प और नकुल का जब समाहार किया गया " नित्य वैरावैरे" २-१-१०३ इस सूत्र के द्वारा अहि नकुल प्रयोग सिद्ध हो गया फिर " अहतोऽम्" सूत्र से अहि नकुलम् शब्द बना सो यह सर्व द्वन्द्व समासान्त पद हैं क्योंकि जिस समास में चकार बहुत बार आता हो उसे ही इंद्व समास कहते हैं अपितु "प्रत्यय स्यच सुपः श्लूक" शा० अ० २ पा० २ सू० १ समासस्य प्रत्ययस्यश्च निमित्त स्य मुपः श्लूक भयंनि इस मूत्र से समाहार करते समय सुप् प्रत्यय का लोप हो जाता है ( सेतं द्वन्दे १ ) सो यही इन्द्व समास हैं यर्थात् । चकार बहुलो इन्द्रः जिसमें चकारों की संख्या अधिक हो वही द्वन्द समास होता है। भावार्थ-द्वंद्वसमास उसे कहते हैं जिस में चकारों का प्रयोग अधिक हो मौर मुख्यतया उसके दो भेद होते हैं जैसे कि अवयव प्रधान और समाहार प्रधान निसके निम्न लिखित उदाहरण है जैसे कि "दन्ताश्च पोटाच दंतोष्टम्" " स्तनौच उदरंच स्तनोदरम् " "वस्त्रंच पात्रंच वस्त्रपात्रम्" " प्रश्वय महिपश्च अश्वमहिपम् " अहिश्च नकुलंच " अहिनकुलम् "इसे ही द्वंद्वसमास कहते हैं अव बहुग्रीहि और कर्म धारय समासों के विषय में कहते हैं। मूल- सेकिंतं बहुब्बीहीसमासे २ फुल्लाइममि गिरिमि कु- डय कडयंवा सो इमोगिरी फुल्लिय कुडिय कयंवो सेत्तं वहुव्वीही समासे २ सेकिंतं कम्मधारय २ धवलोवसहो धवलवसहो ? किण्हो मिग्गो किण्हामिग्गो र सेतो पडो सेतपडोर रत्तोपडो रत्तपडो सेतं कम्मधारय ॥३॥ पदार्थ- (सीकत्तं वटुब्बीहीसमासे २) (प्रश्न ) वहुव्रीहि समास किस कहते हैं ( उत्तर ) बहुधीहि समास तीन प्रकार से कहा गया है जैसे कि उत्तर (२६४) * अनुयोगद्वार मूत्र * पदार्थ प्रधान, उभय पदार्थ प्रधान, अन्य पदार्थ प्रधान, किन्तु सूत्र में केवल सू- चना मात्रही उदाहरण दिया गया है जैसे कि (फुल्ला इममि गिरिमि कुडय क- डयंवा सो इमो गिरी फुल्लिय कुडयंवों से वहुन्बीही समास ) विकसित हुए हैं जिस गिरिमें कुटज वृक्ष और कदंब वृक्ष सो यही गिरि विकसित कुटज कदंबज है सो यही अन्य पदार्थ प्रधान का उदाहरण दिखलाया गया है और यह पद सप्तम्यन्त है और यही वहुव्रीहि समास होता है तथा यस्य येषां बहुव्रीहिः ॥२॥ (सेकित कम्म धारय २ ) ( प्रश्न ) कर्म धारय समास किसे कहते हैं (उत्तर) कर्म धारय समास द्वि प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि उत्तर पदार्थ प्रधान प्रधान १ और पूर्व पदार्थ प्रधान २ अब इस समास के उदाहरण दि- खलाते हैं जैसे कि (धवलो वसहो धवलवसहो १ किएहोमगो किराहामग्गो २ सेतोपडो सेतपडो ३ रत्तोपडो रत्तपहो ४ से कम्म धारय समासे ३) धवल- श्वासौ वृषभश्च धवल वृपभः इत्यादि संभावना करलेनी चाहिये अर्थात धवल है जो वृषभ उसे "धवलपम" कहते हैं इसी प्रकार कृष्ण है जो मृग सो वही कृष्णमृग है २ जोश्वेत पट है उसेही श्वेतपट कहते हैं ३ रक्त (लाल) है जो वस्त्र वही रक्त वस्त्र होता है सो इसी का नाम कर्मधारय समास कहते हैं किन्तु इन सर्व पदों में “ विशेपणं व्याभिचार्ये कात्थं कर्म धारयश्च" शा. व्या० अ० २ पा १ सू ५८ व्यभिचारि विशेषणं समानापि करणं सुबन्त विशेष्येण सुपां. समस्यते सच समासः तत्पुरुपसंज्ञः कर्म धारय संज्ञश्च और " जात महद् वृद्धा दुक्ष्णः कर्म धारयात् " शा० व्या० अ० २ पा० १ सू १५८ इन सूत्रों की माप्ति जाननी चाहिये सो इसे ही कर्म धारय समास कहते हैं। भावार्थ- बहुव्रीहि समास तीन प्रकार से होता है जैसे कि उत्तर पदार्थ प्र- धान १ उभय पदार्थ प्रधान २ अन्य पदार्थ प्रधान ३ उत्तर पदार्थ प्रधान तो जैसे द्विदशानि वस्त्राणि यह शब्द है उभय पदार्थ प्रधान जैसे द्वित्रा; पुरुषाः शब्द हैं अन्य पदार्थ प्रधान जैसे कि । उपविंशाः शब्द किन्तु सूत्र में केवल विकासित है यह गिरि कुटज और कदंवा वृक्षों से सो यह गिरि विकसित कुटज कंदम्बज है अर्थात् वृक्षों से यह गिरि विकसित हो रहा है और गिरि के विपय क्ष विकसित हैं यह सप्तम्यन्त वचन है इसी को बहुब्री हि.समास कहते हैं ? और कर्म धारय समास भी दो प्रकारसे प्रतिपादन किया गया है जैसे कि उत्तर पदार्थ प्रधान. १ और पूर्व पदार्थ प्रधान २ उत्तर पदार्थ " है * अनुयोगद्वार सूत्र * ( २६५) मधानं जैसे कि " नीलोत्पलम् शब्द है और पूर्व पदार्थ प्रधान जैसे कि "क्ष. भियभीरुः" इत्यादि शब्द जानने चाहिये किन्तु भूत्र में धवलजो है वृषभ सो कहिये धवल रपम १ इसी प्रकार कृष्ण मृग २ श्वेतपट ३ रनपट ४ इत्यादि कर्म धारय समासं के उदाहरण जानने चाहिये अव हिगु और तत्पुरुष समास के विषय में विवेचन किया जाता है। अर्थ द्विगु और तत्पुरुष समास विषय । सेकिंतं दिगुसमासे तिरिण कटुगानि तिकटुयं १ तिपिण महुराणिति महुरं २ तिगुणोणि तिगुणं ३ तिण्णि पुराणिति पुरं ४ तिपिण सराणि तिसरं ५ तिपिण पुक्खराणि तिपुक्खरं ६ तिषिण विंदुयाणि तिविंदुयं ७ तिण्णि पहाणि तिपहं . पंच नदीयो पंचनदी ६ सत्त गया सत्तगयं १० नवतुरंगा नवतु रंगं ११ दस गामा दसगाम १२ दस पुराणि दसपुरं १३ सेत दि गुसमासे १४ सेकिंतं तप्पारसे समासे २ तित्थे कागोत्थिकागो वणे हत्यीवण हत्यी २ वणे वराहो वणवराहो ३ वणे महिसो वणमहिसो ४ वणेमयूरो वणमयूरो ५ सेतं तप्पुरिसे समासे । पदार्थ-(सकिनं द्विगुसमासे २) (मन) द्विगुसमास किसे कहते हैं (उत्तर) जो संख्यावाची शब्दों से समाहार किया जाय वही द्विगु समास होता है जैसे कि (तिरिणकटुगानि तिकटुग १) संख्या पूर्वोद्विगुः प्रीण कटुकानिसमाहृतानि निकटुक अर्थात् जब तीन कटुक वस्तुओं का समाहार किया तब त्रिकटुकं शब्द सिद्ध हुया जो कि मुठ, पीपल, मरिच ३. और इसी प्रकार (तिरिणमहु राणिति महुरं ) "त्रिणि मधुराणि समाहनानि त्रिमधुरम्" जब तीन मधुर वस्तुओं का समाहार किया गया नव पिमधुर प्रयोग सिद्ध इया इसी प्रकार आगे भी संभावना कर लनी चाहिये जैसे कि ति एण गुणाणि तिगुणं ३ तीन गुणोंके समाहार से त्रिगुण शब्द सिद्ध हुया (निरिण पुराणि तिपुरं) तीन पुरों के एकत्व करने १ गुणापा विद्या प्रा०प० ० ० ० ३४ ॥
(२९६) * अनुयोगद्वार मूत्र * से तीन पुर (तिएिण सराणि तिसरं ) तीन सरों के एकत्व करने से त्रिसर (तिरिण पुक्खराणिति पुक्खरं ६) तीन कमलों के एकत्व होने से त्रिपुष्कर (तिरिण विदुयाणिति बिंदुअं) तीनों विदुओं के एकत्व होने से त्रिविंदुक (तिरिस पहाणिति पहं । तीनपयों के एकत्व होने से त्रिपंथ और (पंचनदीयो पंचनदं) पंच नदियों के एकत्व होने से पंचनद ( सत्तगया सत्तगयं १०) सात हस्तियों के एकत्व होने से सप्त गज अथवा सप्त गदाओं से सप्त गदा (नवतुरंगा नवतुरंग) नव अश्वोंके एकत्व होनेसे नव अश्व (दसगामा दसगाम) दशग्रामों के मिलने से दशग्राम ( दसपुराणि दमपुरं १३ ) दशपुरों ( नगरों) के एकत्व होने से दशपुर इत्यादि सर्व शब्द सिद्ध होते हैं क्योंकि "संख्या समाहारेच द्विगुश्चाना- भन्ययम् ॥ शा० व्या० अ० २ पा० १ सू० ६१ संख्यावाचि भुवन्त मेकार्य सुवन्तेन समस्यते संज्ञायां तद्धित प्रत्यये उत्तर पदेपरे समाहारच गम्यमाने सच तत्पुरुषः कर्म धारयो द्विभुसंज्ञश्चद्विगुर्ननाम्नि ॥ इस सूत्र की सर्वय प्राप्ति है और इस सूत्र से ही सर्वत्र प्रयोग सिद्ध होते हैं ( सेत्तं दिगु समासे ४ ) सो पूर्व क- थित ही द्विगु समास है ४ अव तत्पुरुप के विषय में कहते हैं (सेकित त पु- रिसे समासे २) (प्रश्न ) तत्पुरुप समास किसे कहते हैं (उत्तर) तत्पुरुप समास दो प्रकार से वर्णन किया गया है जसे कि पूर्व पदार्थ प्रधान १ और उत्तर पदार्थ प्रधान २ और इस संज्ञा को ही. तत्पुरुप समास कहते हैं "अनश्च" यह शब्द पूर्व पदार्थ प्रधान है और “ दुर्जनः " यह उत्तर पदार्थ प्रधान है और उत्तर भेद इसके आठ होते हैं जैसे कि सात विभक्तियों से आठवां तन् तत्पुरुष समास होता है किंतु सूत्र में सर्व उदाहरण सप्तम्यन्त त पुरुप के ही दिखलाये गये हैं जैसे कि ( तित्थे कागोतित्थकागो) तीर्थ में जो काक रहता है वह तीर्थ काक होता है (वणेहत्थी) वन में जो हस्ती है उसे वन हस्ती कहते हैं २ (वणेवराहो वणवराहो ३) वन में जो सूअर है उसे वन वराह कहते है ३ ( वणेमहिसो वण महिसो) वन में जो महिप है सो वन महिप कहा जाता है (वणेमयूरो वण मयूरो ) वन में जो मयूर है उसे वन मयूर कहते यह सर्व सप्तम्यन्त तत्पुरुष समासान्त पद है " सप्तमी शौंडादिभि " शा. व्या० अ० २ पा०१ सू० ५२ सप्तम्यन्तं शौंडादिभिः सुवन्तैस्समस्यते" इस सूत्र की सर्व प्रयोगों में प्राप्ति है (सेतं तप्पुरिसे समासे ५) सो यही पूर्वोक्त तत्पुरुष समास है किन्तु यहां पर केवल एक सप्सम्यन्त के ही प्रयोग दिखखाए (२९७) . ** अनुयोगद्वार सूत्र * भावार्थ-हिगु समास में संख्या पूर्वक समाहार करने से पद होता है जैसे कि" संख्या पूर्वोद्रिगुः त्रीणिकटुकाति समाहतानि त्रिकटुक १ पवंत्रीणि मधुराणि समाहृतानि मधुरम् २ प्रयाणां गुणानां समाहारः त्रिगुणम् ३ वीणिपुराणि समानानि पिपुरम् ४ त्रीणिसरोसि समाहनानि प्रिसरसं ५ त्रीणि पुष्कराणि समाहतानि प्रिपुष्करम् प्रयो विन्दवः समाहनाः मिचिन्दुकम् ७ त्रयाणां पयां समाहारः त्रिपथम् = इत्यादि संत्र प्रयोग द्विगु समास के जा- नने चाहिये ४ और नत्रुप के उत्तर भेद आठ हैं किन्तु यहां पर केवल सप्त म्यन्न बरन हैं जो कि नीर्य में जो काक है वह नार्थकाक कहा जाता है? वन में जो हस्ती है वह वनहस्ती २ वन में जो वराह है वह वनवराट ३ बन में जो पहिप है वह वन मटिप ४ वन में जो मयूर है वह वन मयूर ५ ये सब तत्पुरुष समास के उदाहरण है क्योंकि मूत्र में केवल सूचना मात्र ही कथिन है किन्तु मात विभनियों के निम्न लिखित उदाहरण हैं प्रथमा पूर्वकायस्गति पूर्वकायः १ दिनीया धर्मश्रितः धर्मश्रितः २ तृतीया मदन विहलः मद विन्डलः ३ चतुर्थी रथाय दारु स्थदारु ४ पंचमी सिंहाच भयंः सिंह भयम् ५ पट्टीरानः पुरुपो राजः पुरुषः ६ सप्तमी अनेषु शौंडः अतशीदः ७ कर्मणि कुशलः कर्म कुशनः इत्यपि नम् तत्पुरुप धर्मविरोद्धाधर्मः पापाभावः अपापम न अभ्धः अनन्ध इत्यादि प्रयोगों की संभावना कर लेनी चाहिये । अब इसके पश्चात् अन्ययीभाव और एक शप समास का विवर्ण किया जायगा क्योंकि जो पदार्थ हैं उनके चोध के लिये समासों का बोय आवश्यकीय है क्योंकि फिर पदार्थ बोध शीप हो जाता ६ । अथ अव्ययी भाव और शेष समास का विषय । सेकिंत अव्वईभाव समासे २ अणुगामा अणुण्इ- यं १ अणुगाम २ अणुफरिहं ३ अणुचरियं ४ ऐतं अब्बई भावे समासे ६ सेकितं एगसेसे समासे २ जहा एगो पुरिलो तहावः हवे पुरिस जहा वहवे पुरिसा तहा एगो पुरिमो २ एवं करिसा वणो ३ जहा एगो साली तहा बहवे साली सेतं एगमेसे समासे ७ सेत्तं सामामिए ।
(२९८) * अनुयोगद्वार मूत्र * पदार्थ-(सेकितं अबई भावे समासे ) (प्रश्न ) अव्ययीभाव समास किसे कहते हैं ( उत्तर ) अव्ययी भाव समास के निम्न लिखित उदाहरण जानने चा- हिए ग्राम के समीप जो ग्राम हो उसे अनुग्राम कहते हैं ( अणुणईयं ) जो नदी के समीप वा मध्य में हो उसे अनुनदी कहते हैं क्योंकि अनु अव्यय पश्चात् तुल्य अनुभव आदि अर्थों में होता है इसी प्रकार ( अणुगाम २) ग्राम के समीप वा ग्राम के मध्य में जो हो उसे अनुग्राम कहते हैं २ (अणुफरिहं ) खाई के पास वा मध्य में जो हो वह अनुफरिहा होती है ३ ( अणुचरियं ४ ) जो मार्ग के समीप हो वह अनुमाग होता है क्योंकि (शब्द प्रथा सम्यत्समृद्धिव्य र्थाभावात्पया सम्मति सुप्पयाधुग पद्यथा सदृक् साकल्यान्तेऽव्ययम् ) शा० व्या० अ०३ पा०१ सू० १८ और (समीपे ) शा० व्या० अ० २-१-१४ समीपे वर्त- मानम् अन्वेतत्सुवन्तं समीपवाचिना सुर्वतेने सह समस्यते । सर्व उक्त प्रयोगों में उक्त सूत्रों की प्राप्ति है और इन सूत्रों से प्रयोग भली भांति सिद्ध हो जाते हैं (सेत अन्बई भाव समासे ६) यही अव्ययी भाव समास है अब एक शेष समास विषय में कहते हैं (सेकिंतं एग सेसे २) (प्रश्न) एक शेप समास किसे कहते हैं ( उत्तर ) जो सामान्य जाति के वाचक शब्द हैं उनका लोप कर जव एक पद शेष रह जाए उसे एक शेष समास कहते हैं किन्तु वह एक शेष पद पूर्व पदों का भी वाचक रहेगाजैसे कि पुरुपश्च पुरुपश्चेति पुरुषौ पुरुष २ लिखकर द्विवचन पुरुषौ बना लिया इसी प्रकार बहुवचन की भी संभावना कर लेनी चाहिए तथा जाति वाचक शब्द होने से एक ही वचन होता हैं अथवा बहु वचन भी हो जाता हैं क्योंकि यह समास द्वन्द्व समास के ही अंतर्गत होता है इस लिये (समानामेक:) शा० अ०२पा० १ सू०८१ समानां तुल्यार्थानां शब्दानां मर्थ- स्यसह वचने तेषामेक एव प्रयोक्तव्यः॥ वक्रश्च कुटिश्ववक्री कुटिलौवा बहुवचनम- तंत्रम् “ सुप्पसंख्येयः शा० श्र२ पा १ सू ८२ इन सूत्रों से एक शेष समास होता हैं अब इस समास के उदाहरण कहते हैं (जहा एगो पुरिसे तहा वहवे पुरिसा १) जैसे एक पुरुष है वैसे अन्य बहुत पुरुष हैं यहां पर एक शेष जाति वाचक होने पर किया गया है इसी प्रकार (जहा वहवे पुरिसा तहा एगो पुरिसो २) जैसे बहुत पुरुष होते हैं वैसे ही एक पुरुष होता है यह भी एक शेष समास है (जहा एगो साली तहा वहवे साली) जैसे एकशा ली है वैसे बहुत से शाली हैं ( एवं करिसावणो ) इसी प्रकार सुवर्ण की मुद्राओं की भी संभावना कर लेनी चाहिये (संत्तं एगु सेसे समासे सेतं समासिए) अथ * अनुयोगद्दार भूत्र * (२६६) शब्द पूर्ववत् है तं शब्द पूर्व सम्बन्धार्थ में है सो यही एक शेष समास है और इसी स्थान पर समास की व्याख्या पूर्ण हो गई है इसी लिये यह सामासिक पद कहाते हैं। भावार्थ-श्रव्यची भाव समास तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है असे कि अन्य पदार्थ प्रधान ? पूर्व पदार्थ प्रधान २ उत्तर पदार्थ प्रधान ३ अन्य पदार्थ प्रधान दंडा दाडि मुष्टा मुष्टि इत्यादि पूर्व पदार्थ प्रधान पारगङ्गे मध्ये समुद्रं इत्यादि उत्तर पदार्थ प्रधान मूपमति दाधिपति इत्यादि और इनके उदाहरण अनुनदी १ अनुग्राम २ अनुफरियं ३ अनुचरियं यही दिये गए हैं सो यही अव्ययी भाव समास होता है ६ और एक शेष समास उसे कहते हैं जिसके अनेक पदों का लोप करके शेष एक पद रह जाए वही एक शेष समास होता है जैसे कि " समानामेक" इस सूत्र से वक्री वा कुटिला इत्यादि पद बन जाते हैं तथा जातिवाचक होने से इन का एक पद भी किया जाता है सो यही एफ शेप समास है अपितु समासों का पूर्ण विवर्ण वैयाकरण जानते हैं तथा यह पूर्ण समास शकटायनादि व्याकरणों से जानने चाहिये सूत्र में तो केवल गूचना मात्र ही कथन है और हेमचंद्र कृत प्राकृत व्याकरण " दीर्घ ट्रस्वी मिधानी " अ०८ पा० १ ० ४ और " समासेवा" अ०८ पा०२मूह केवल दो मूत्र ही उपलब्ध होते हैं क्योंकि प्राकृत व्यारण में समास प्रकरण संस्कृतवत् माना गया है इसलिये समास वोध व्याकरण से अवश्य ही करना चाहिये । प्रसंग वशात् एक अलुक् समास भी जानना चाहिये जैसे कि " ओजोऽञ्जस्सहोऽम्भस्तपसष्टः" शा. अ. २ पा. २ सू. ४ इस सूत्र से ओन साकृतमिति ओज साकृतम् इसी प्रकार अंज साकृतं सहसाकृत अभ्भ साकृत तपसाकृतं इत्यादि विवर्ण अलुक् समासान्तर्गत जानना चाहिये सो सो जैन व्याकरणों से समास प्रकरण अध्ययन करके फिर तद्धित प्रकरण पठन करना चाहिये इसीलिए अब मूत्रकार तद्भित के विषय में विवेचन करते हैं। अथ तद्धित विषय। सेकित तद्धित २ अट्टविहे पण्णत्ते जाहा कम्मे १ सिप्पे २ सिलोए ३ संयोग ४ समीवहोय .५ संजूहो . ६ (३००) * अनुयोगद्वार सूत्र * इस्सरिया ७ वच्चेणय ८ ततद्धितनामं तु अवविहं १ सेकि तं कम्मनामे २ तणहारए कठहारण पत्तहारए दोसिए पत्ति य सोतिए कप्पासिए कोलालिए भंडवे यालिए सेतं कम्म नामे सेकिंतं सिप्पनामे २ वाच्छिए तंती २ तुन्नाए ३ तं- तुवाए ४ पवाए ५ उपट्टे ६ वरुडे ७ मुंजकारए ८ कठ का- रए ६ छत्तकारए १० वम्भकारए ११ पोत्थकारए १२ चित्त- कारए दन्तकारए १३ सेपकारए १४ लेपकारए १५ को- ट्टिमकारए १६ सेत्तं सिप्पनामे सेकिंतं सिलोगनामे २ सपणे माहणे सव्वातिही सेत्तं सिलोगनामे २ सेकिंतं संयोगनामे-२ रन्नो ससुरए १ रन्नो जामाउए २ रन्नो सालए रन्नोदुए ४ रनोमगणीपई ५ सेत्तं संजोग नामे ॥ पदार्थ-(सेकिंतं तद्धितए २ अविहे पं० त०) (प्रश्न) तद्धित्तन किसे कहते हैं ( उत्तर) जो तद्धित प्रत्ययों के लगने से नाम उत्पन्न होता है उसे तद्धितज कहते हैं किन्तु वह तद्धितज नाम आठ प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि जो कर्म से नाम उत्पन्न होता है उसे कर्म नाम कहते हैं . इसी प्रकार शिल्प नाम २, श्लोक नाम ३, संयोग नाम ४, समीप नाम ५, संयूथ नाम ६, ऐश्वर्य नाम ७, अपत्य नाम ८ जिसका सूत्र यह है कि (कम्मे । सिपे २ सिलोय ३ संजोग ४ समीवहोय ५ सजुहो ६ ईसरीया ७ वच्चेणय ८) सो ( तद्धियनामंतु अहविहे १) तद्धित नाम पुनः आठ प्रकार से कहे गये हैं अव प्रत्येक २ विषय में कहते हैं । प्रश्न ) (सेर्कितं कम्म नामे २)(प्रश्न ) कर्म नाम किसे कहते हैं ( उत्चर ) कर्म नाम के उदाहरण निम्न प्रकार से हैं जैसे कि तणहारए कठहारए ) तृणहारक काठहारक यद्यपि प्रत्यक्ष भाव में तद्धित प्रत्यय यहां नहीं दीखते हैं किन्तु उत्पत्ति कारण की अपेक्षा तद्धित प्रत्यय की प्राप्ति है. इसी प्रकार (पत्तहारक ) पत्रों के लाने वाला (दोसिए) दोपिक यहां पर उप प्रत्यय की प्राप्ति है अर्थात् वस्त्र बेचने वाला क्योंकि दूप्य नाम वस्त्र का है ( सौतिए) सौशिक ठग् प्रत्ययान्त सूत्र के बेचने वाला (कप्पासिए) , यही कर्म नाम है में प्रत्यक्ष तद्धित * अनुयोगद्वार सूत्र * (३०१) कासिक ( उग् प्रत्यय ) कपास का विक्रय करने वाला (कोलालिए ) (ठण प्रत्ययान्त ) कौल लिक भाजन विक्रय करने वाला ( भंड वेयालिए ) भांड वैचारिक ( ठण पत्यय ) कांस्यादिक के विक्रय करने वाला (सेत्तं कम्म नामे) इन प्रत्यय उपलब्ध नहीं होते किन्तु ऋपि प्रणीत होने से यह कथन सर्वथा माननीय है ( से किंत सिप्प नाम २ ) (प्रश्न) शिल्प नाम किसे कहते हैं (उतर) शिल्प नाम भी निम्न प्रकार से है (वत्थिए) वास्त्रिक वस्त्र के शिल्प का झाता इसी प्रकार (तंतीए ) तंत्रीवादनं शीलमस्येति तांत्रिकः अर्थात् जिसका वीणा बजाने का शील है वह तांत्रिक कहाता है (तुनाए ) इसी प्रकार तुनार (तंतुबाए ) तंतुओंके समाहार करने वाला (पट्ट वाए ) पट्टवायक (पट्टे) उपट्ट (वडे ) वरुट यह देश रुहि नाम जानने चाहिये (मुंजकारए ) मूंज के कर्म कर्म करने वाले मुंजकार इसी प्रकार ( कह कारी) काष्टकार (छत्तकारी) छत्रकार (वम्भकार ) वध्यकार (पोत्थकारए) पुस्तक लिखने वाला (चित्तकारी) चित्रकार ( दन्तकारए ) दान्तकार (सेलका रए ) पाषाण का कृत्य करने वाला (लेपकारए.) लेपकार ( कोट्टिमकारए) भूमि आदि को सम्मान करके चित्रित करने वाला इत्यादि सर्व कर्म शिल्प विज्ञान के अन्तभूत हैं ( से सिप्प नामे ) और यही शिल्प नाम है तद्धित प्रत्यय की प्राप्ति होने पर ही इन्हें तद्धित प्रत्ययान्त मानागया है ( सक्ति सिलोगनामे २ ) ( प्रश्न ) श्लाघनीय तद्धित नाम किसे कहते हैं ( उत्तर) श्लाघा पूर्वक तद्धित नाम निम्न प्रकार से है जैसे कि (समणे माहणे सच्चा तिही सेत्तं सिलोगनामे ) श्रमण ब्राह्मण सर्व अतिथि इत्यादि श्लाघनीय नाम साधु पद में देख जाते हैं किन्तु श्लाघनीय अर्थ की उत्पत्ति हेतभूत अर्थ मात्र में तद्धित प्रत्यय होता है इसीलिये श्रम ग"भवं श्रामण्यं इत्यादि शब्दों में तद्धित के "राय" श्रादि प्रत्यय संयोजन करने चाहिये सो यही श्लोक नाम है सो अव संयोग नाम के विषय में कहते हैं ( सेकितं संजोग नामे) ( प्रश्न) संयोग नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) संयोग नाम उसे कहते हैं जिसे संयोग पूर्वक उच्चारण किया जाय जैसे कि ( रनोसुसुरए १ ) राजा का सुसुर (रनाजायाउए) राजा का जामातृ ( रनो साला ) राजा का साला (रभोदुए) गजा का दूत ( रन्नो भगणी पति ) राजा की भगिनी का पति है ( सेत्तं संजो ग नामे २) सो यही संजोग नाग्न है क्योंक सम्बन्ध में षष्ठी होती है इसीलिये (३०२) * अनुयोगद्वार मूत्र * षष्टी के प्रयोग हैं अथवा इन शब्दों में तद्धित प्रत्यय अप्रत्यक्ष है तथापि इनके हेतुभूत अर्थों में विद्यमान होने से सर्वथा माननीय हैं तथा पूर्वगत शब्द प्राभृत आजदिन अप्रत्यक्ष है इसीलिये स्वरूप के सम्यक् प्रकार के अवगमन होने पर भी यह कथन सर्वथा अशंकनीय है ।। भावार्थ-तद्धित प्रकरण आठ प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि कर्म १ शिल्प २ श्लोक ३ संयोग ४ समीप ५ संयूथ ६ ऐश्वर्या ७ और अपत्य ८ अर्थों में तद्धित प्रत्यय होते हैं सो क्रम से उदाहरण तृणहारक काष्टहारक पत्रहारक दाषिक पत्रिक सौत्रिक कार्यासिक कौलालिक भांड वैचारिक तथा शिल्य के उदाहरण वास्त्रिक तांत्रिक तंतुवाय पट्टवाय उपट्टे वरुड मुंजकारक काष्टकारक छत्रकारक वध्यकारक पुस्तककारक चित्रकारक दंतकारक पापाण कारक लेपकारक कोहिमकारक श्लोक के उदाहरण श्रमण ब्राह्मण अतिथि संयोग के उदाहरण राजा का ससुर राजा का जामातृ राजा का साला राजा का दूत राजा की भगिनी का पति यह सर्व संयोग नाम हैं उक्त अर्थों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तद्धित प्रत्यय सूत्र विहित हैं क्योंकि कतिपय शब्दों के हेतु भूत अर्थों में तद्धित प्रत्यय होता है । अथ शेष तद्धित नाम विषय (सेकिंतं समीव नामे २ गिरिसमीवे नगरं गिरि नगरं १ विदिसाए समीवे नगरं विदिसानगरं २ वेनाय समीवे नगरं वेनाएनगरं ३ नगर समीवे नगरस् नगरायउं सेतं समीव नामे ५ सैकिंतं संजूहनामे २ तरंगवकारए १ मलवईकारए २ अत्ताणुसडिकारए ५ विन्दुकारए ४ सेतं संजूहनामे ६ सेकिंतं ईसारय नामे २ ईसरे १ तलवर २ माडंविए ३ कोडविए ४ इम्भसेट्ठी ५ सेणावई ६ सत्थवाह ७ सेत्तं ईसरिय नामे : सेकिंतं अवच्चनामे आरिहंतमाया १ चक्कवट्टीमाया २ वल * अनुयोगद्वार सूत्र * (३०३) देव माया ३ वासुदेवमाया ४ रायमाया ५ मुणिमाया ६ वाय गमाया ७ सेत्तं अवच्चनामे सेत्तं तद्धितए) पदार्थ-(सेकित समीवनामे २) (प्रश्न ) समीप नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) समीप नाम इस प्रकार से है जैसे कि ( गिरिसमावे नगर गिरिनगरम् १) जो गिरि के समीप नगर है वह गिरि नगर होता है और (विदिसासमीवे नगरं विदिसानगरम् ) जो विदिसा के समीप नगर है वह वैदिशा नगर है यहां पर अण् प्रत्यय है और (वेनाय समीवेनगरं वेनाय नगरं ) जो वेनानदी के समीप नगर है वोह वेनाय नगर है (नगरसमविनगरं नगरायनगरम् ) जो नगर के समीप नगर होता है उसे नगराय नगरं कहते हैं ( सेत्तं समीचनामे ) यही समीप नाम है ५ (सेकित संजूह नामे ) ( प्रश्न ) संयूय नाम किसे कहते हैं (उत्तर) संयूथ नाम के उदाहरण निम्न प्रकार से हैं जैसे कि ( तरंगवइकारए) तरंगपतिकारक ( मलयवइकारए २) मलयपतिकारक २ (अत्ताणुसष्ठिकारए) श्रात्मानुपष्टिकारक ३ (विंदुकारए ) विन्दुकारक ( सेत्तं संयूहनामे ) यही संयूथ नाम हैं ( सेकितं इसरियनामे) (प्रश्न ) ऐश्वर्या नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) ( ईसरे १ तलवर २ मांडविए युवराज्य तलवर मांडविक ( कोडे- विएड्भ्भेसेट्टि ) कौटुम्विक प्रधान सेट ( सेणावई सत्यवाह ) सेनापति सार्थ वाई (सेतं ईसरियनामे ७) येही ऐश्वर्या नाम है इनकी उत्पत्ति में ताद्धत प्रत्यय है ७ (सेकिंतं अवच्चनामे २)(प्रश्न ) अपत्य नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) अपत्य नाम उसे कहते हैं जो पुत्र के नाम से माता का नाम प्रसिद्ध हो जैसे कि ( अरिहतमाया १) यह अरिहंत की माता है . अर्थात तीर्थंकरो अपत्ययस्याः सा तीर्थकर माता एवमन्यत्रापि सुप्रसिद्ध नामसिद्धं विशिष्यते अतस्तीर्थ करादि मातरो विशपितास्तद्धित नाम अतः प्रसिद्ध नाम के द्वारा जो अप्रसिद्ध नाम भी प्रकाशित हो जाए उसी का नाम अपत्य नाम है जैसे कि तीर्थंकर देव के सुप्रसिद्ध होने से माता भी मासिद्ध हो जाती है इसी प्रकार (चक्कवट्टीमाया २) चक्रवती की माता( वलदेव माया) वलदेव की माता (वासुदेव माया) वासुदेव की माता ( रायामाया ) राजा की माता (मुणिमाया) मुनि की माता ( वायगमाया) वाचक की माता (सेत्तं अवच्चनामे सेत्तं तद्धितए ) येही अपत्य नाम है और येही तदित नाम (३.०४) * अनुयोगद्वार सूत्र * नाम कहाते हैं किन्तु इन में आप वाक्य होने से और सर्व प्रत्यय हेतुभूत अर्यो में विद्यमान होने से सवर्थी माननीय हैं अब इसके आगे धातु का विवर्ण किया जाता है ॥ भावार्थ-समीपं नाम उसे कहते हैं जो किसी प्रधान वस्तु के समीप हो जैसे कि नो गिरि के समीप नगर वसता होवे उसे गिरि नगर कहते हैं ? जो विदिशा के समीप नगर हो वह विदिश नगर होता है २ अथवा जो नदी के समीप नगर वसता हो वह नदी नगर होता है ३ जो नगर के समीप नगर हो वह नगराय नगर है ४ इसे ही समीप नाम कहते हैं ५ अपितु संयूथनाम के निम्न उदाहरण हैं जैसे कि तरंगपतिकारक १ मलयपतिकारक २ आत्मा की पुष्टि कारक ३ विन्दुकारक ४ यह सर्व संयूथ नाम है क्योंकि समूह में संयूथ नाम की प्राप्ति है ६ और एश्चर्य नाम राजादि में होते है ईश्वर तलवर मांडविक इभ्य सेठ सेनापति सार्थवाह इत्यादि ऐश्वर्यवाची नाम हैं ७ और अपत्य • नाम उसका नाम है जो पुन के नाम से माता की प्रसिद्धि हो जैसे कि यह अरि हंत की माता है इसी प्रकार चक्रवर्ती की माता १ वासुदेव की माता वलदेव की माता राजा की माता, मुनि की माता वाचकाचार्य की माता यह अप- त्य नाम हैं इसे ही तद्धित नाम कहते हैं किन्तु इस प्रकरण में उत्पत्ति रूप भाव में तद्धित प्रकरण माना गया है विशेष विवर्ण तो पूर्षों में था- अतः लेश मात्र ही यहां पर दिखलाया गया है इसलिये यह कथन अशक नीय है तथा वर्गों के अनंत पर्याय हैं इसलिये यह कथन अादरणीय है अब इसके आगे धातु प्रकरण का विवेचन करते है। अथ धातु विपय । सर्कितं धाउए २ भू सत्तायाम् परस्मैभापा एंध वृद्धौ स्प- संघर्षे गाध प्रतिष्टा लिप्साग्रंथेषु वाध रोट (लोडने) सेत्तं धातुए। .. नोट-जैन कवि कल्पद्रुम में लिखा है कि एपितु वृद्धोपर्द्धितु संवर्षे गाधई भवेत् प्रतिष्टा लिप्सी ग्रंथेषु रोटनेवाधृङ् और इन के अशुबंध के पृथक २ फल लिखे हैं.
में * अनुयोगट्टार सूत्र ३०५ पदार्थ-(सेकिंतधाउए २ ) (प्रश्न) धातु कौन २ से है ? गुरु ने उत्तर दिया कि (भूससायां) भूधातु विद्यमान अर्थ में होता है फिर उसके (परस्मैभाषाए) परस्मै भापा में भवति भवतः भवन्ति भवसि भवथा भवथ भवामि भवावः भ- वामः तीनों पुरुषों के उक्त प्रयोग वन जाते हैं किन्तु इनकी साधना निन्न प्र- कार से की जाती है भूधातु को रखकर "क्रिया:धातुः । शा० व्या० अ०१ पा० १ ० २२" इस सूत्र से धातु संज्ञा बांध कर "सति २ शा० व्या० अ०. १ पा० ३ ० २१७" इस सूत्र से वर्तमान काल में लट् प्रत्यय होगया फिर "कृष्णोऽतुत्वाम्" शा० अ० ४ पा० ३ सू० ४५ । लट् प्रत्यय को कर्ता में रख कर "लोऽन्य युष्मदस्मासुजितक्रिसिप्थस्थमिव्वस्मस्" शा० अं० १ पा० ४ सूः १ । इस सूत्र से अन्य पुरुष मध्यम. पुरुष और उत्तम पुरुप अनुक्र- मता पूर्वक तीन २ प्रत्यय कर लेने चाहिये किन्तु लट्लकार में अकार और टकार की इत्संज्ञा होती है शेष ल के स्थान में अनुक्रमता पूर्वक तिप् तस् कि सिप् थस् थ मिर् वस् मम् येह प्रत्यय कर लेने चाहिए फिर "कर्तरिशप शा० अ. ४ पा० ३ मूत्र २० । इस मूत्र से कर्ता में शप् का विकरण हो जाता है: और श और प् की इत्संज्ञा करके केवल अकार मात्र ही शेप रह जाता है तब भू-अ-ति ऐसे रुप हुआ फिर "अकिग्ङ्घग्घेतो" शा० अ० ४ पा०.२ ०. १७ । इस सूत्र से एङ् और श् करके फिर "एचोऽच्ययवायावः" इस सूत्र से ओ का अ व होता है फिर "झोऽन्तः" १-४-८८ । इस सूत्र. से झ. मात्र को अंत आदेश कर लेना चाहिए फिर "आद्यन्यतः" शा० ४,२।३४ इस सूत्र से मकार वकार के परवर्ती होने से अकार को आकार शेजाता है तब इस प्रकार से उक्त रूप सिद्ध होते हैं और (एधवृद्धौ ) (एधिवृद्धौ) एध धातु वृद्धि अर्थ में होता है और ( स्पर्द्ध संघर्ष ) स्पर्द्ध धातु संघर्ष अर्थ में होता है (गाध प्रति ठालिप्साग्रन्धेषु ) गाधृ धातु प्रतिष्ठा लिप्सा (इच्छा) और संचय इन अर्थों में होता है ( वाई विलोउने) वाधृ धातु विलोउन अर्थ में होता है और फिर इनके दश लकारों में गण वो प्रक्रियाओं में भिन्न २ प्रकार से रूप बनाये जाते परस्मैपदी और आत्मनेपदी सेट् अनिर्दै सकर्मक अकर्मक भाव कर्म इत्यादि अनेक प्रकार से तिङन्त प्रकरण में धातुओं के भेद् वर्णन किये गये हैं और उपसर्ग वशात् धातुओं के अर्थों में भी परिवर्तन होजाता है जैसे कि हज हरणे धातु के उपसर्ग पूर्वक रूप आहार विहार संहार प्रहार परिहार इत्यादि-प्रयोग .
* अनुयांगवार सून * बन जाते हैं किन्तु इनका पूर्ण स्वरूप व्याकरण से देखना चाहिये सूत्र में तो केवल सूचना मात्र ही कथित है (सेत्तं धातुए ) इसे ही धातु कहते हैं। भावार्थ-धातु से जो नाम उत्पन्न हुआ हो उसे धातुज नाम कहते हैं जैसे कि भूसत्तायां धातु के परस्मै भापा में रुप बनाए जाते हैं इसी प्रकार एधि वृहोस्या संघर्ष गाई प्रतिष्ठा लिप्सा ग्रन्थेषु वाध लोडने इत्यादि धातु हैं इन का पूर्ण वोध व्याकरण के तिउत्त प्रकरण से हो सत्ता है दश लकार गण प्रक्रिया सकर्मक धातु अकर्मक धातु आत्मनेपदी उभयपदी इत्यादि विषयों का स्वरूप व्याकरणों से देखने चाहिये यहां पर तो केवल सूचना मात्र ही कथन है और प्राकृत भापा में ए भुवे? हब हवाः ॥ प्रा. व्या. अ. ८ सू. ६० भुवो धातो) हुव हव अादे शावा भवन्ति इस सूत्र से हो हुम हव येह तीनों विकल्प से आदेश हो जाते हैं जैसे कि होइ होति हुवइ छुवन्ति हवई हबन्ति पद में भवइ इत्यादि कथन भी उक्त व्याकरण से देखें अब नेरून विपय में व्याख्या करते हैं. अथ निरुक्त विषय । (सेकिंतं निरुत्तिए मह्यां शेतेमहिपः भ्रमति चरोतीतिभ्रमर मुहुर्मुहर्ल सतीतमुसलं कपिरिब लम्बते कपित्थं चिञ्च करोति खलंच भवति चिक्खलं उर्द्धकर्ण:उलूकमेपस्य माला मेपला सेत्तं निरुत्तिए सेत्तंभावप्यमाणे सेत्तं पमाणे सेत्तं दस नामे सेतनामे नामेति पदं सम्मत्तं ॥२॥ पदार्थ -(सेकित्तं निरुत्तिए २) ( प्रश्न ) निरुक्ति किसे कहते हैं ( उत्तर ) जो वर्णों के अनुसार अर्थ किया जावे उसे निरुक्ति कहते हैं सो जो निरुक्ति पद हो उसे नैरुक्तिक पद कहते हैं जैसे कि ( मह्यांशतेमाहिपे ) जो पृथिवी में शयन करे वही माहिप है और (भ्रमति रौतिइतिभ्रमरः ) जो भ्रमण करता हुवा शब्द करे वह भ्रमर है ( मुहुर्मुहुर्ल सतीति मुसलं ) जो पुनः २ ऊंचे नांचे होवे ( पड़े ) उसे मुसल कहते हैं किन्तु मुश खंड ने धातु से ("पादिभ्य- श्चित्." ) उणादि प्रकरण पा. १ सू. १८८ इस सूत्र से कल प्रत्यय होगया तब मुसल शब्द सिद्ध हो गया किन्तु ॥ शपोः सः ॥ इस प्राकृतं के सूत्र से तालव्य शकार के स्थान पर दन्त्यसकार होगया तब मुसल शब्द सिद्ध हुआ और कपिरिव लम्वत करोति पतति च कपित्थं जो कपि की न्याई वृक्ष शाखा में लं- में * कानुयोगद्वार सूत्र, * ३०७ वायमान होवे और चेष्टा बरे वायू के प्रयोग से कंपायमान होकर गिरपड़े उसे कपित्थ कहते हैं और (चिच्च करोति खल्लं च भवति चिक्खल्लं ; पादों को श्लेप करने वाला और पदों का स्पर्श होकर कठिन करने वाला वही चिखल होता है ( ऊद्धकर्णः उलूकः ) जिस के ऊर्ध्व कर्ण हो वही उल्लू होता है ( मेषस्य माला मंखला ) मेप ( सुख ) की जो माला हो वोही मेखला है ( सेनिरुत्तिए सेत्तं भावप्पमाणे ) यही निरुक्ति है इसे. ही भाव प्रमाण कहते हैं (सेत्तदसनाम सेत्तं नामे यही दश नाम का स्वरूप है और यही नाम पद है। और इसी स्थान पर (नामेतिपयंसम्मतं ) उपक्रमान्तर्गत द्वितीय नाम द्वार का स्वरूप सम्पूर्ण हुआ है अब इस के अंतगर्त तृतीय प्रमाण द्वारके विषय में व्याख्याकी जाती है।। भावार्थ-निरुक्ति *उसे कहते हैं जो वर्षों के अनुसार अर्थ किया जाय जैसे कि मह्यांशेत महिपम् जो पृथ्वी में शयन करे वही महिष है जो भ्रमण करता हुआ शब्द करे सो भ्रमर पुनः २ ऊंचे नीचे गिरे सो मुसल कपि की न्याई चेष्ठा करे सो कपित्थ पादों का स्पर्श करें उसे चिखल कहते हैं ऊचकर्ण होने से उल्लू और मेषस्य माला मेखला येह सव नैरु क्तक पद हैं क्योंकि सुउपसर्ग शोभन अर्थ में आता है और न शब्द का प्रथमैकवचनांत " ना" होता है तव सुना प्रयोग सिद्ध होगया फिर सीर (लांगलहल ) का नाम है इस लिये जिस के हाथ में सुष्ठुलांगल है उसे+सुनासीर कहते हैं तथा सुनासीर मांस यह भी शब्द नैरुतक है तथा अस्मद शब्द के द्वितीया के एक वचन में "मां" शब्द रूप बनता है और अन्य पुरुष के एक वचन में सः रूप होता है दोनों के एकत्व होने से (मांस ) प्रयोग सिद्ध होगया इस का तात्पर्य यह हुआ कि जिसको मैं खाता हूं वह मुझे खायगा सो इसी का नाम निरुक्ति है और येही भाव प्रमाण इ और इसी स्थान पर दशनाम का स्वरूप सम्पूर्ण हो गया है अतःउपक्रमान्तर्गत द्वितीय नाम द्वार की समाप्ति है इस के आगे प्रमाणद्वार के विषय में कहते हैं. * वर्णागमोवर्ण विपर्ययश्च द्वौचापरौ वर्णविकार नाशौ । भातोस्त_तिशयेन । योगस्तदु ध्यते पंप विधं निरुकं. ॥ वांगमौ गवेन्द्रादौ सिंह । वर्ण विपर्यय । पोडशादी विकारास्स्यावर्णनानाशः पादरे. २ वर्य नाश विकाराभ्यां धातोरतिशयेनयः योगस्तदुच्यते प्राहमयूर भ्रमरादिषु ॥ ३ ॥ भविहित लोपागमादेश विकाराः शिष्टप्रयुज्यमानाः अश्व रूपेणानिरवतिष्ठतीति भश्वथः इति लिंगा भट्यामुक्तम् । हिसु हिसायामिति धातोरुत्पत्रवाहिनस्तीति सिंह इति हफार विपर्ययः विकारः परिणामः यधा पोडशेस्पन दकारस्य डकारः । रह्यो रौतीति मयूरः । अन्न महाशब्देकारस्य नाशः हकारस्य विकारोयकारः रूधातोः अर इत्योदशः । भृमन् भ्रमरः । नलोपोरू शब्दस्यरादेशश्च ॥ -1- शोभनना सीरमप्रयानमस्प शुनासीरःशुःपूजायाम् श्वशुरवत् । दम्पादिरपि॥इन्द्रस्यनामाइतिहमः । टीका निरन्तर व्यारव्या इति हैमः टीकयति गमयत्नान किा सुपमाणां विप्रमाणां च निरंनर व्याख्या यस्यां सातथा ॥
॥ अथाऽस्मदीया गुर्वावलिः ॥
श्री वर्धमानस्यमोशितु. ह्याचार्य मुख्यस्य परात्मनश्च ।।
शिष्य प्रशिष्यादि परम्परायां वस्त्येव चेयं गुरुनाममाला ॥१॥
सुधर्मगच्छस्य प्रधानरूपा आचार्य्यवर्या यतिधर्मनिष्ठाः ।।
श्रीपूज्यपादामरासिंहवाच्या वन्द्याः सदैवापि ममात्र सन्तः ॥ २॥
तच्छिष्यभूतास्तु तदीयगच्छे आचार्यपदवीमनुलब्धवन्तः ।।
श्रीपूज्यपादाभिधमोतिरामाः वन्द्याः सदैवापि गया महान्तः ॥३॥
तच्छिष्या यतिवाः स्थविर पदविभूपिता महात्मान : ॥
श्रीयुत गणपतिरायाः सुगणाबच्छेदकावन्धाः ॥ ४॥
तच्छिष्या मुनिवर्याः सुगणावच्छेदकास्तुजयरामाः ॥
सन्तितुममगुरू गुरवः सदैव वन्यामहात्मानः ॥ ५ ॥
तच्छिष्या यत्तिवर्याः प्रवर्तकपदेनभूपितालोके ॥
ज्योतिषि कुशलाः श्रीमच्छालिग्रामाभिधागुरवः ॥ ६ ॥
तच्छिष्योऽस्मितुस्वल्पः पूर्वेपांपदसरोजमधुपोऽहम् ॥
श्रात्मारामानाम्नोपाध्याय पदंगतः सोऽहम् ॥ ७ ॥
स्वप्रियशिष्यस्यैव ज्ञानेन्द्रोः प्रार्थनां स्वहदि धृत्वा ॥
व्याख्याकृता मययंत्वनुयोगबारसूत्रस्य ॥ ॥
ज्ञान प्रबोधिनी नाम्ना टीकेयं नृगिराकृता ॥
ज्ञानचन्द्रस्यनामापि प्रकाशयतुसर्वदा ॥ ६ ॥
टीकेयं ज्ञानचन्द्रस्य स्मृतये रचितामया ॥
कल्याणकारिणी भूयाद्भव्यानां पठितानृणाम् ॥ १० ॥
करमुनिग्रहचन्द्र समेऽब्द के कुजदिनेखलु फाल्गुणशुक्लके ।
प्रथितजाङ्गलदेश इयायवै त्ववसितिं नगरे वरुणालये ॥ ११ ॥
शुद्धाशुद्धि पत्रम् । पृष्टा पति शुद्ध. १ २ २-३ ५ २३ २५ २६ ३० ३२ ३२ UNNYww चुपच । विय २२ २२ ४ ५ ४५ अस्साइ सेत्तं १३ २ ३ ५ अहन् अाईन् (जहां ) अणुएण ( है ) (वहां) भएणा (चाहिये) अज्झयणाई अज्झयणाई भारणे माणे जीव जाक चुयचाविंय सेत्तंनो भागमओ सेत्तं लोइयं नो भागमओ परणबन्न परगनण अणुत्तरावेवाइय अणुत्तरोववाईय पार्थाधिकार अर्थाधिकार अणुभागदाराणि अोगदाराणि मच्छडीणं मच्छंडीणं अस्साई सेत इंमितानुसार इंगित्तानुसार ओवक्कमे उपक्कम नाम २ पपाण ३ वत्तवया नाम २ पमाणं ३ बत्तब्धया दवणुपुची दव्वाणुपुब्बी संगाहस्सय संग्गहस्सय समो पारे समोयारे। सत्रकार सूत्रकार संस्थानुपूर्वी संस्थानानुपूर्वी दुपए सियई .दुपएसियाई एयारणेगम एयाएणं गम समुकीर्तन समुत्कीर्तन द्रव्या द्रव्य अवत्त याइंच अवत्तव्ययाइंच. ५१ ५१ ५२ ५२ ५३ ५३ ५३ २३ ४ २१. २२ २८ ३..
( २ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * पृष्टाङ्क पंक्ति अशुद्ध १ ५६ ५६ श्रागपुच्ची ओय पद विंशति ८ ५६ ६३ ६३ ६४ ६४ आणुपुबी उप २० पद पिंशति २१ भगं आनानुपूर्वी वत्तए भगा समुकीर्तना २२ अवच एत्र २५ द्वन्य ६ आणुपुची दधे अवक्तव्वय २४ श्रत्तन्वय ५ सेकित दव्वयमाणं २०.२१ संज्जइ भाग ३ लोक ७ भावे १८ पानानुपूर्वी १३ पडञ्च सम्बद्धा ५-१० केवच्चिरं २७ भागं भाग द्वार उदइए होज्जा अचतव गय अणेव णिहिया २२ अवन्त्तवग २४ समुक्त्तिणया' अवत्तव्य ५-६ अनानुनुपूर्वी नो श्रवत्त-- भंग अनानुपूर्वी अवत्तव्यए अंगा समुत्कीर्तना अवत्तव्ध एय द्रव्य आणुपुची दव्वहिं अवतन्वय अव्वन्तत्रय से किं तं दयपमा संखज्जइ भागे लोक के भागे अनानुपूर्वी पड्डुच्च नियमा सव्यद्धा केवञ्चिर भागे भाव द्वार उदइए भावे होज्जा श्रवत्तव्य गगमं अणोवणिहिया अवतन्धए भंगसमुक्त्तिणया: अवक्तव्य अनानुपूर्वी नो ६६ ७१. ७३ 11 AUN ওঃ ७६ ७६ ७८ * शुद्धाशुद्धि पत्रम् * पृष्ठाव पनि अशुद्ध -- दवय माणं दवपमाणं असंखउनु संख्यात सवाव्य द्रव्य भागेमु । संगम प्राणुपुची २७ ८२ १७ श्रसंग्नेम १८ संख्यन २२ अवतव्य ६ भोगमु ८३ सम्म हस्स ८४ १ णाणुपुवी भाग ग ८४ २८ । संग्रनय ८५ १८-१६ ८-१६ । एगइयाप ८६ १ अस्सिकाय ७ अन्नगव्यम्मासो १६ / गर्णन २२/४+५+६ ६ | पुनाणुपूवी ह सगाहस्रा 28 परुवखया ६१ १४ । अणागुपुची ६२ ६ संखस्न ६४ २६ जयन्य २ अनानुपूरी ६६ १६ अक्त्तव्यगदचग दवाई १६२०-२१ संग्गाहस्स २३ गमवयहाणं 8 उपणिदिया २२ : पुचाणपुच्ची १० ११ पुच्छापुची तपप्पभा तमप्यभा कुरा है २० चंद २० चंद १०२ ७। पावन्गान संग्रहनय एगाइयाए मस्निकाय अन्नमामासो } गरान ४४५४६ লায়ন্স। संगहरस যখা अस्थि प्रणाणुपुन्नी संखेग्जद जघन्य धनानुपूर्वी प्रवत्तव्यंगदम्बाई । संग्गहरा गपत्रवहागणं उपाणिहिया पुच्चारणुपुच्ची पच्चायुपुची : तमयमा । २० चंद यावन्मात्र (४) * अनुयोगद्वार सूत्र * पृष्टांक पंक्ति স্বযুক্ত -- द्रहों सहरसारे याणए | अच्चुए , ११३ १०२ ११ हूदों महस्सारे थाएएए १० अचुए ११ इसाप्यभारा पुच्चा पच्छाणु १०५ पच्छापुच्ची १०६ जहां (द्वि) है १०७ २२ द्विसम स्वस्थानों में २० अवतद्रव्य १० नेय ११२ (अन्न) १ समय ११३ ३ अध ११४ ११ द्रव्यों २६ परस्पर २ श्राणा ५ तुडिय ५-६ डांगे ११६ ११ सागसेवममे ११७ | १२-१३] एक साश्वोच्वास १३ सोत पउमंगे २६ अन्नमन्भासो १२१ अजिय १२१ सीपले १२२ २४ पुची १२३ २६ हरस्पर १२४ सामचउरसे इसिप्पभारा पुत्राणुपुची पच्छागुपुची पच्छापुची वहां (हि) चाहिये द्विसमय स्व स्व स्थानों में प्रवक्तव्य द्रव्य नेयवं (मश्न) समय अथ द्रव्योंकी पर आप तुडिए अडंगे सागरोचमे एक श्वासोच्छवास सात पउ अंगे अन्नपन्नभासो श्रजिये सीतले पुवाणुपुत्री परस्पर- समचउरसे .
* शुद्धाशुद्धि पत्रम् (५) पृष्टांक पंक्ति अशुद्ध शुद्ध १२५ समयारी सामायारी १२६ १५ भावों को भावोंकी १३१ २७ निणय निर्णय १३२ १६ थजीनाम शजीवनाम १३२ १८ ग्रणेगववि ; अगविहे १३५ २० अवसासागं संचिससिपय १३५ निवख निरिवख १३५ नाइस १३५ । १ । एगिपिए एगिदिए १३५ १६ घरापास्मइ वएणराई १३७ पाठ में । पंचेद्रिय पंचिंदिप १३८ २३ समुन्द्रिय संमृत्रिम १३६ थलय यलयर १४४ १ गजम गर्भज १४४ १० अगि अग्गि १४४ मृय भूय १४५ मंभि मज्झिम १४५ विद्युत्तुपार वायुकृपार ६ । विद्युत्कुमार अग्निामार ! द्वीपकुमार ६ उदधिकुमार ७ दिगकुमार वायुकृपार ६ १४७ लोक देव देवलोक १४६ लेयिवन्न १४६ १० मुभिगन्ध १४६ १४ फासनाम पासनाम १४४ २० दुगरणकालए दुगुणकाला १५२ १३ पक्गुण १५४ २० विराह विगह ३ तिरांह तिए विए उकारान अकारांन १५ विभन्न निभायन लारियवन्न सुरभिगंध 4 - : निराह (६ ). * अनुयोगद्वार सूत्र * पृष्टाङ्क पंक्ति अशुद्ध शुद्ध 1 १६१ १६२ १६२ १६४ स्वरस्योद्धृते कृयादौ उकार विभक्विन्यांत स्वरस्योद्ववे कृपादौ डकार विभक्त्यत ४009 Wo Dow गोड़े का घोड़े का २२ १६८ १६८ २३ १६८ २४ १६६ १७३ ४-५ १७४ १७४ १३ १७५ १७५ २१ १२ १७८ २४ १८० १८६ १८४ १२ १५ २०४ २०४ १४ २०५ २०५ २१ १२ मिस्नज युयम् मित्र दशविहंपि लिंगाक्रम प्रत्पों आ, कृतोऽपश्या: व्यापून कराड उपमें आग सात्रय पलम्भानुमानचं द्विताय अन्यवय कुटम्ब . स्वः अव्यम् अनुचतर्ते, अकीर देवदन्तेन दृगद्य सेंक्ति उव्वसमे खाणवयणे लाभ अतराय अहए नागावरीणज्ने शरीर ग्रोव गवं परिवी बुडे मिश्रज यूयम् मिश्र दसविपि लिंगत्रिक प्रत्ययों औ, कृतोऽषष्टया: व्यात कपण्डे उवमे अगमे साहश्य प्रलम्भानुमानंच द्वितीय अन्वय कुटुम्ब स्वः अव्ययम् अनुवर्तते, अकर्तरि देवदत्तेन ६ गद्य सेकिंत उपसमे खीणवयणे लामांतराय. अठ्ठण्ई नाणावरणिज्जे 'सरीरंगोवंग बंधण परिनिवुडे १ * शुद्धाशुद्धि पत्रम् * ( ७ ) पृष्टांक पंक्ति अशुद्ध द्र २०८-8 २०८ २३ है २०६ १३ २०8 २३ २१० २ २१० ३ २१० २१० w 95 पाराहा वागरे २१० २१० २१० २११ १७ २१२ १६ २१२ २१२ २१२ २६ २१२ २६ २१३ २ २१३ २१३.६ २१३ २१३ २१४ १३ २१४ २१४ १८ २१४ २१४ २२ प्रागवत माग्वत् सभ्यत्व सम्यक्त्व खोवसीमए खोवसमिए खयोवसीमया खयोवसमिया प्रोव भोग उपभोग घरिणदिय घाणिदिय जिभिदिय निभिदिय पाएणत्तिधरे पण्यत्तिधरे ओवासगदसा अंतग श्रो- उवासगदसा अंतगड दसा दसा ३६ अणुनरो ३६ अणुत्तरो पएहावागरे नवपुवधेर नवपुषधरे जो जात्र नापावरिणज्जस नाणावरणिज्जस्स लाई लद्धी ६ समायिक चरित्र सामायिक चारित्र सम्पराग चरित्र सम्पराय चारित्र रसनेंद्रिय रसनेंद्रिय फा सिदिय फासदिय समयांग समवायांग नामा नाया अणुत्तरोवा वाइ अणुत्तरोव वा- पण्डवागरे पात्रमात्र यावन्मात्र पारिणामिण्य पारिवामिय जुन्नासुरा जुनसुरा इंद्र धां इंद्रधणू पापालो पायालो श्रारणपपाणप भारण्य पाणय प्रारणाप अच्चुरा आरणाय अच्चुए इसाप्पभाए इसीप्पभारा पराह वागरे २१४ * अनुयोगद्वार मूत्र * पृष्टाङ्क अशुद्ध शुद्ध . २१५ १२ अनादि अयादि अनादि २१५ १२ नयापेक्षपा नयापेक्षा पर्याप पर्याय २१६ २२ नायापेक्षा नयापेक्षा २१६ । २३ चून है मंतादि चूलहैमवंतादि २२० ५ बउसान्त उवसंता २२२ समम्यक्त्व सम्यक्त्व २२२ उशपम उपशम २२३ १९ संयोग दो संयोग २२३ २० अमिनु अपितु २२३ भंगवन्तो भगवन्तों २२४ उपस- उपसमिय २२५ उषसन्ता उवसंता २२९ १६ इंन्दियाई इंदियाई २२९ उवससमिय उपसमिय २२8 २४ पीरणीमउ पारिणामिए २३१ ४ अस्तित्व अस्तित्व २३४ १ सेठित सेदिउ २३४ है। प्रकृतियांच प्रकृति पांच २३५ १० श्रतरगत अंतर्गत २३५ १२ । रिसमे रिसभे २३७ १-२ | मज्जपजीहाए मज्झजीहाए २३७ २ (मज्जिपमर) मज्झिमं २ २४१ २-३ नविराणस्सइ नविण्णस्सइ ४४२ १८ । मंत्ता मंताउ २४४ १६ | जंघाचाए जघाचरा २४४ २६ गंधार नामे गंधार गामे ३ मुच्छरणामो मुच्छरणाओ २४५ सतमा सत्तमा २४५ ६ उतर गंधारा पुण सायं | उत्तर गंधारा च मिया पुण सा पंचमिया * शुद्धाशुद्धि पत्रम् * ( 8 ) पृष्ठा पंक्ति अशुद्ध है उच्छ्वास होता है २५० २६५ मायागी मायामा .२४५ 'उत्तारापत्ता उत्तरायत्ता २४६ १०-११ इवई मूळ हवइ मृच्छा २४७ १०। (नामीओ) ( नाभीश्री ) नाभीस २४७ १२ उच्छ्वास २४७ १२ गीतों के पद पद में उच्छ्वास गीतों के उज्ञास २४७ २२ समुच समुख्य २४७ २२ अवल्याणे प्रसाणे २४७ २३ । तन्निवि तिनिवि २४८ २४ मुणे पव्वं पुणेय २५० २ सिरपसत्यं समंतार समलय सिरपसत्थं तालमम लवतम समंगेह. समंच गेहसमंच १० कद्ध बद्ध २५० २५१ निहोसे सारवनं निदोसं सारमंत २५२ २३ । दुपं दुयं २५२ २३ / केसी केरिसी २५४ ६ । ससम्मत्तं सम्मत्तं बट्टीस्लामिवायेण सत्तमि बट्टी सस्सामिायणे सत्ती सिन्निहा- सन्निहा- २५६ अवत्ति अवत्ति २५७ सबंध संबंध २५८ श्रामतरणी आमंतणी २५८ स्वोऽनित्पाट: हृस्वोऽनित्पाट: २५६ १४ भाव है वही कार २५६ वीर भाषा माया २६० हिनि ही नि- २६० १८ दाणेतवचरणा दागतववरण २६० १४ अणस्णुं अणण २६१ ७ शास्त शास्त्र भाव है १८ वीर रस ACC (१०) * अनुयोगद्वार मूत्र * पृष्टांक पंक्ति अशुद्ध शुद्ध -we- २५ २० नित संजोमा २६३ २६६ २६६ २६७ মুম্বা २६६ २६६ २७० २७० २७२ २२ २५ २ ३ २ ४ निलंत्रण पणनि वधं पएहय सभवो जण सेकित गोण २ . चिता संजोग धन्नाज विलंबण पणमि बंध पम्हाण संभवो जह संकित गौण २ ख माईति ख- मयी तवइति तवणी जल इनि जलयो पकडति परणों से नं गोराण। सेकिंतं नोगुएण अ. कुंता सकुंतो अमुग्गो समुरंगे । গাখ खड । मडंय संवाह : विसं सुम्भए सत्तबएण वर्ण सिद्ध भई महिलिये अवयवेणं अन्तर्भूत १५ १६ २७३ २७४ २७४ २७४ २७४ २७४ २७७ २७७ २७८ २७८ २७८ २८० २८० २८१ २८१ १६ ६ 8 २३ २३ খাগ: खड मंडव सेवा विस सुम्पए सत्तिवण सिसिद्ध भर मिहिलियं अवयवेणी अनतर्भून मिहस्सए सुसुमसुसुमाए दुसमसुसुसमाए २४ म.सए ५ सुसममुसमाए दुसमसुसमाए इसमाए दुसमदुसमाए अपसत्थ २८१ १० असत्थे * शुद्धाशुद्धि पत्रम् * (११) पृष्णाङ्क पंक्ति अशुद्ध १५ । २८१ २८३ १ ४ 8 २८४ २८५ २८५ २६४ २६५ २६७ २६७ २88 २६६ ३०० ३०० काहा अप्रस्त संयोगन जन्म दवय दाभ प्रधान प्रधान १ तिगुणाणि त्रमधुरम् पुरिस व्यारण संजाहा ततद्धितनाम वम्भकारए तरंगवकारए काल 'अप्रशस्त संयोगज जन्य देवय दाश्र प्रधान १ तिनि गुणाणि त्रिमधुरम् पुरिसा व्याकरण तंजहा तद्धितनाम बझकारए तरंगवइकारए ३ १७ २२ ~urn