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Usha Muskara Uthi

Shri Balkrishan Vyas · 2011/03

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পী জাতীw২৭
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प्रकाशक
व्यास-मन्दिर
६७ए, बलराम दे स्ट्रीट,
कलकत्ता-६।
मुद्रक
जोशी 'निर्भीक'
राजस्थान प्रकाशन गृह
१४३, काटन स्ट्रीट, कलकत्ता-७
मूल्य : ३ २०५० न० ०
आवरण-शिल्पी : प्रहाद आचार्य
शीर्षक-शिल्पी :०प्र० श्रीवास्तव
प्रकाशन-तिथि: रामनवमी, संपत्-२०१७

SHAYARI Sठी अपनी ओर से विराट विश्व काव्यमय है। काव्य का स्रोत संगीतमय-तालमय है धवल हिम-गिरि के शिखरी से काव्य की निझरिणी कल्लोल करती हुई अनवरत प्रवहमान है-आहाद फूटा पड़ता है। अनन्त नील गगन ६ अन्तराल में अनन्त काल से काव्य का मधुर गुञ्जन व्याप्त है। प्रकृति के काव्यमय सम्भापण से कुछ न कुछ सभी परिचित हैं किरणों के स्पर्श से कमल-दल विहँस पड़ता है यह एक काव्य है और शशि के हास्य को देखकर सागर में जो आलोड़न जागता है यह भी ते एक काव्य ही है। प्रत्येक व्यक्ति में काव्य की भावना प्रकृति ने दी है। कुछ शब्दों के छन्दों के बन्धन में बाँधना न वाँधना यह अन्य विषय है। पर है प्रत्येक व्यक्ति कवि इसमें सन्देह नहीं । जीवन में गुनगुनाने-गाने का अथवा रोने-कन्दन करने का अनुभव प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ होता ही है। मेरा कवि भी समय-समय पर जागा है और उसने कुछ लिख दिया है। उसमें से चयन की हुई कुछ रचनायें आपके कर-कमलों में है। हो सकता है इसमें आप सब कुछ सुन्दर समझ कर कुछ कहें-सम्भव है इसमें कुछ न समझ कर भी

कुछ कहें। अपनी ओर से मैं सबका आदर करूंगा। हातिरेक से
पागल बनने में हानि है और शोक से रोने में भी।
वर्षों पहले कहीं-कहीं मैं आपके सम्मुख आया था, आपकी स्मृति
पर कहीं किचित रेखा उसकी आज भी हो सकती है।
आज नित्य नवीना 'उपा मुस्करा उठी है नित्य की ही भौति और मै
उसकी अरुणिम् आभा में आपको मुस्कराते देख रहा हूँ।
अवलोकन, अभिमत और आमुख लिखकर जिन महानों ने अपनी
महती उदारता का परिचय दिया है-यह मेरे लिये चिर स्मरणीय है।
पुस्तक की सौन्दर्य-वृद्धि में मेरे अनुज समय-जोशी निभीक'
एवं प्रिय शम्भू प्रसाद श्रीवास्तव ने जो श्रम किया है वह साधनीय है।
श्री प्रहादजी आचार्य के आवरण चित्र के लिये आशा है आप स्वयं
उन्हें धन्यवाद देंगे।
प्रकाशक के दायित्व के लिये प्रकाशक किसी से कम धन्यवाद के
पात्र नहीं है।
चैत्र शु० तृतीया
वाळकृष्ण व्यास

अवलोकन श्री लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी एम० ए० (हिन्दी, संस्कृत) एल० टी०, साहित्यरल आदि युग से आजतक मानवता ने अपने क्रमिक विकास के इतिहास का संकलन वाङ्मय के जिन विविध रूपों में किया है, उनमें काव्य साहित्य का स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसका प्रधान कारण यह है कि यह माध्यम आत्मा के त्रिविध सन्-चित्- आनन्दमय स्वरूपों की अभिव्यक्ति को सर्वाधिक सफलता के साथ चित्रण करने में सफल होता आ रहा है। किसी भाषा का वाङ्मय जहाँ बहुमुखी चेतना को आधार मान उसे रूप देने में तल्लीन रहता है, काव्य हमारी आत्यंतिक चरम सिद्धियों की प्राप्ति को ही लक्ष्य बनाकर हमें उस अनिर्वचनीय आनन्द की झलक दिखाने का प्रयास करता है जो सृष्टि के सारे विकास का लक्ष्य है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि विश्व-चेतना ने अपने रसात्मक स्वरूप को काव्य के माध्यम से ही पहचाना है। 'उपा मुस्करा उठी' का कवि अपने समाज, समय और परिस्थितियों की देन है। हर युग ने सृष्टि के विविध पदाथों, . . [?]

व्यापारों को अपनी विशेष परिस्थिति एवं काल के अनुरूप ही अपनी रसात्मक भावनाओं का आलंबन स्वीकार किया है। अतः एक ओर कवि जब अपने “स्व” को रूप देने में तहीन रहता तो उसका काव्य एक विशेष युग की व्यापारात्मक छाया की भी अपरोक्ष रूप में अभिव्यक्ति करता चलता है। तात्पर्य यह कि अभिव्यक्ति का माध्यम जो भी हो, उसका विपय मौलिक रूप में एक ही रहता है। सृष्टि की प्रथम 'उपा' ने चेतना के रूप में जवसर्व प्रथम आँख खोली और जिन रहस्यों की गहराई में प्रवेश कर उसे समझने की चेष्टा की, वे रहस्य आज भी ज्यों के त्यों हैं और मानव चेतना उन्हीं में डूवती-उतराती चली आ रही है। उनकी अभिव्यक्ति न तभी हो सकी थी, न आजतक हो पायी है और न भविष्य में हो सकने की सम्भावना ही है। हम केवल उन रहस्यों का आभास मात्र पाते रहे हैं और उनकी संवेदनात्मक अनुभूति करते रहे हैं। इन्हीं अनुभूतियों को वेदकालीन मनीषियों ने वेदों, उपनिपदों में गाया, आदि कवियों ने रामायण, महाभारत में व्यक्त किया, बौद्ध-जैन दर्शनों ने अपनी गाथाओं में दुहराया, कवीर-मीरा ने अपने भजनों में रूप दिया और वर्तमान कवि भी उन्हीं को भिन्न लय, भिन्न स्वरों में गाता जा रहा है। जिस प्रकार आदि मानव आरम्भ से आजतक एक है, चाहे उसके स्वरूप में कितना भी परिवर्तन क्यों न हो गया हो, उसी प्रकार उसके स्वर भी एक ही हैं। मानव अपनी रहस्यात्मक जिज्ञासा को ही विभिन्न रूपों, में संवारता सजाता आ रहा है। प्रस्तुत काव्य संग्रह की रचनाओं में भी अभिव्यक्ति की उपयुक्त परम्परा का निर्वाह दृष्टिगोचर होता है। विकास के क्रम में उपा ही सर्व प्रथम अपने आहादमय वातावरण में आकर्षक रूप लेकर, अवतरित होती है जिसकी सापेक्षता में तमासावृत जगत् अपने

अस्तित्व को पहचानता है। चेतना पर से अचेतन का आवरण
निराकृत होता है। अतः कवि का यह संकलन नव जागरण का
प्रतीक है जिसकी सापेक्षता में ही कवि ने अपने को पहचाना है।
अपनी कविता "उपा मुस्करा उठी” की पंक्तियों में कवि बहुत सीधे-
सरल रूप में अपनी इस नयी अनुभूति को अभिव्यक्त कर देता है-
प्राण में नवीन प्राण पुष्प में पराग दान
मधुप में नवीन राग नवल स्वर जगा उठी
उपा मुस्करा उठी।
वैदिक ऋचाओं का गायक भी तो अपनी इसी अनुभूति से
प्रभावित होकर कह उठा था-
दन पश्यद्भम उर्विया विचक्ष, उपा अजीगर्भुवनानि विश्वा ।।
ऋग्वेद उ० सू०१५॥
विश्व के व्यापारों में निहित अनिर्वचनीयता ने ही मानव में
रहस्य के प्रति उत्कंठा जागृत की और उसने सृष्टि के कण-कण में
उस असीम सत्ता की व्याप्ति का अनुभव किया जिसकी अभिव्यक्ति
अपने सीमित साधनों से न कर सकने के कारण उसे अनेक नाम
रूपमय उपाधियों की कल्पना करनी पड़ी। किन्तु नाम और रूप
से अनाम और अरूप की अभिव्यक्ति भला कैसे संभव होती!
पराभूत मानव नेति, नेदम्, सोऽहं आदि उपाधियों से उसकी ओर
संकेत मात्र करने में ही सफल हुआ है। वह उस असीम का अनुभव
करता है, उसकी सापेक्षता में ही उसे अपने को सीमित लधुकण होने
का ज्ञान होता है और अपनी पराजय स्वीकार करता हुआ कह
उठता है-
तू असीम में सीमित लघुकण
तुझको मैं कैसे पहचानें।

कहा जा सकता है कि ऐसी बातें तो बहुत कही जा चुकी हैं और एक ही प्रकार की पुरानी यातों के पिष्टपेपण मात्र से काव्यकार के किस उद्देश्य की सिद्धि होती है? ऐसी बातें तो विश्व के सभी उच साहित्यों में किसी न किसी रूप में लिखी गई हैं और रहस्यात्मक भावनाओं के अभिव्यक्तिकरण की एक परम्परा सी बन गई है। बात किसी विशेष मात्रा तक ठीक भी है। परन्तु उस परम्परा ने धर्म का रूप ग्रहण कर लिया है। आखिरकार धर्म भी तो उसी रहस्य की जिज्ञासा का उद्बोधन करते हैं और वे अति प्राचीन होते हुए भी सर्वथा नवीन हैं। धर्म की इस परम्परा से कोई भी अपने को तटस्थ नहीं रख सकता। अतः प्राचीन कवि ने जिसे गा दिया है पुनः गाना प्राचीनता का पिष्टपेपण नहीं वरन् नवीनता की सृष्टि है और इस प्राचीनता को कपि युग-युगान्तों तक गाता जायगा। वास्तव में कवि की मौलिकता विपय में न होकर वस्तु में होती है। प्रत्येक युगका कवि अपने इस विषय को अपने युगकी उपयुक्त वस्तुओं से सजाता जायगा और इसी में ही उसकी मौलिकता के दर्शन भारतीय साहित्य में आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के लिये उन्ही सामान्य उपकरणों का आधार लिया गया है जिसके द्वारा कवि अपने लौकिक रागद्वपात्मक भावों की अभिव्यक्ति किया करता था। पुरुष-नारी का पारस्परिक आकर्षण और एक दूसरे की प्राप्ति के लिये उसके अनेक प्रकार के प्रणय-व्यापार मानव हृदय का अनादिकाल से स्पर्श करते चले आ रहे हैं। आदि काव्यों में प्रकृति को पुरुप की प्रियतमा मानकर उसको अनेक हावों-भावों द्वारा पुरुष को रिझाते हुये दिखाया गया है। जगन् ने प्रणय-सम्बन्ध में ही अपने भावों की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति की है। अतः यही आधार. उस रहस्य को भी अभिव्यक्त करने का कारण बनाया गया। अनेक [४] - कविताओं के अन्तर्गत ऐसी पंक्तियाँ हमें प्रस्तुत संकलन में देखने को मिलती हैं। एक ओर अपने प्रियतम को रिझाने के लिये कवि- छिप छिप डर अवगुण्ठन खोलूँ, नत ग्रीवा कर सस्मित बोलूँ , कमल करों के बन्धन में बँध- सिहर-सिहर पेसुध सी होलू, देकर अपना तन-मन-जीवन , में चिरन्तन सुख पाने की कामना करता है, अपना सब कुछ भूलकर अपना चञ्चल चिर यौवन लेकर उसी के उर में मिल जाना चाहता है, तो दूसरी ओर अपनी प्रियतमा को पाने के लिये यह पुकार उठता है- पंछियो का एक जोड़ा वृक्ष पर बैठा विहँसता विजन में अज्ञात का अभिसार है, कितनी सरसता अधर अधरों से मिलाओ, प्राण प्राणों में मिलाओ भूल बैठी हो कहाँ तुम शीघ्र आओ-शीघ्र आओ। और एक दूसरे स्थल पर- दूर रह कर भी प्रिये मैं गीत तेरे गा रहा हूँ। तू समझती मैं पिरह मैं दिवस-निशि रोकर बिताती, मेघ पावस के बने है नयन–पर आती न पाती, किन्तु यह भी सत्य सुन्दरि हैं वहीं पर प्राण मेरे, शून्य तन-मन शून्य जीवन पास तेरे गान मेरे.. संसार के सभी रहस्यवादी कवियों ने उस रहस्य से प्रणय- सम्धन्ध जोड़कर अपने लौकिक प्रणय-व्यापारों के आधार पर आत्मनिवेदन करते हुए उसके समीप पहुंचने की चेष्टा की है। कबीर ने-राम मोर पिउ "मैं राम की बहुरिया', मीरा ने-'दरद की ७ [५] मारी वन-वन डोलूँ', महादेवी वर्मा ने-'प्रियतम को मेरे भाता, तम के पर्दे में आना, ओ नभ की दीपावलियों क्षण भर को तुम बुझ जाना' आदि पंक्तियों में उसी सान्निध्यता का अनुभव किया है। तात्पर्य यह है कि “उपा मुस्करा उठी" का कवि रहस्यवादी कवियों की ही परम्परा की एक कड़ी है। उसके अन्तर में कुछ ऐसी ही कुतूहलपूर्ण अनुभूतियों जागृत हुई हैं जिनसे हमारे रहत्ववादी प्राचीन कवि प्रभावित थे । इन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति भी कवि ने उन्हीं परम्परागत आधारों पर की है । जहाँतक मौलिकता का सम्बन्ध है वह कधि के स्वरूप-चित्रण, हायों-भावों की नवीन योजना, शब्द चयन के अपने विधान में है। विरह की वेदना से आकुल-उद्विम कवि जब-जब अपनी हत्तन्त्री के तार जोड़ कर व्यथित मन की पीड़ा को स्वर में बाँधने की चेष्टा करता है तो वह तार "धन-वन कर बिगड़-बिगड़ जाता है। उसके स्वर नीलगगन से टकरा कर भूतल पर छितरा जाते हैं और वह मन ही मन खीमकर प्रश्न कर उठता है- संसृति के सुख-दुख से थककर, एकाकी मैं निर्जन तट पर वृक्षों की व्यथित छाँह नीचे, सोये क्लों की छाती पर कुछ साध लिये जब गाता हूँ...... निस्तब्ध निशा में गीतों का उपहार टूट क्यों जाता है यह तार टूट क्यों जाता है। उन्मना की अनुरक्ति का यह कैसा सजीव चित्र है ! प्रेमी-प्रेमिका के प्रणय व्यापारों के आधार के अतिरिक्त प्रकृति के व्यापारों में अज्ञात सत्ता की व्याप्ति के अनुभव द्वारा भी कवियों ने अपनी रहस्यात्मक भावना की अभिव्यक्ति की है। गुह्य की इस व्याप्ति का अनुभव प्रायः दो रूपों में होता आया है। प्रथम रूप में तो कवि प्रकृति के सारे व्यापारों में उसी सत्ता की व्याति देखता है। नैसर्गिक सुपमा आकर्षण से भरी होकर जिस कारण हृदय- हारिणी बनी हुई है उसमें अलौकिकता की अनुभूति ही एक ऐसा सौन्दर्य है जो मानव-कल्पना को मनमानी उड़ान भरने की शक्ति देता रहा है। प्रकृति के वातावरण में व्याप्त किसी रहस्यात्मक सत्ता की अनुभूति कवि की अनेक पंक्तियों में व्यक्त हुई है। उदाहरणार्थ- फमल की सोल पंसुड़ियाँ हँसा कर स्वयं छिप चैटा । x x x कहीं से चाँद में हँसफर किरण से राग में स्वर में सुधा विसरा रहा है दूसरी दिशा में प्रकृति में मानवीय गुणों के आरोप द्वारा उसे प्रणय सम्बन्धी हावों-भावों से सुसजित फरफे प्रियतम को रिझाने की चेष्टा की जाती है। ऐसी भी पंक्तियां हमें यत्र-तत्र विखरी दीख पड़ती है- देख मरनों का विहंसना चपल सरिता उमड़ना, मूल से अटखेलियो कर सिन्धु लहरों का पकड़ना; वृक्ष से लतिका लिपटती-देस कर तू ही बता यह प्यार क्या है ? का x x x उमड़-उमड़ कर वहती जाती कुछ बलखाती कुछ इटलाती, कभी उर्वशी सी मदमाती नव गति में नव लास्य दिखाती, परिरम्भन चुम्बन में पल-पल नव-नव रूप बनाती है, लहर मंजु मृदु गाती है। इस प्रकार उसी रहस्य की अभिव्यक्ति करने वाले प्रमुख माध्यम जैसे:-- (१) स्वतः प्रियतमा के रूप में प्रियतम के प्रति आत्म-निवेदन (२) प्रियतम के रूप में प्रियतमा की प्राप्ति की उत्कंठा- [७] (३) प्रकृति के कण-कण में व्याप्त चिरन्तन सत्ता का आभास (४) मानवी गुणारोपित प्रकृति-सुन्दरी द्वारा प्रियतम को रिझाने की चेष्टा का निर्वाह कवि ने प्रस्तुत संकलन में सफलतापूर्वक किया है। भौतिक संघपों की जटिलताओं से धवड़ा कर और अपने अस्तित्व की निर्वलता का आभास पाकर ही कवि कल्पना लोक में विचरण करता है। ऐसी विचार धारा का अभ्युदय भी साहित्य के क्षेत्र में उस समय हुआ जब कि दार्शनिक कवितायें रूढ़ि की कोटि में आने लगी और जाने अनजाने में भावुकों का एक वर्ग अनुभूति शून्य कल्पनाओं के एक ढाँचे को दर्शन के क्षेत्र में प्रयुक्त होनेवाले चुने-चुने शब्दों से सजाकर उन्हें दार्शनिक कविताओं की कोटि में रखने लगा। यथार्थ की ओर उन्मुख होने वाले विचारकों ने रहस्य अथवा गुहा की ओर प्रवृत्ति रखने वाले कचियों को आडम्बरी और पलायनवादी कहना शुरू किया। अतः यह स्वाभाविक ही था कि असीम अन्तरिक्ष में उड़ने वाला कवि भी धरती की ओर अपनी आँखें खोले। यद्यपि रहस्यवादी कवियों को पलायनवादी कहना सर्वा शतः सत्य नहीं था। इन कवियों की साहित्यिक देन, जिसने कविता को साधारण मानवीय स्वार्थ की संकुचित परिधि से बाहर निकाल कर उसके अनेक प्रच्छन्न द्वार उन्मुक्त किये, उसे नवीन रंग और नयी भावनायें प्रदान की, अस्वीकार नहीं की जा सकती। किन्तु अनुकरण वृत्ति वालों के पक्ष में तो यथार्थवादियों के दृष्टिकोण में कुछ सत्यता थी ही। फलतः दार्शनिक उड़ानों की गति धीमी हुई और गगनचारी को भूमिचारी होना पड़ा। इसके साथ ही इसे भी समझ लेना चाहिये कि काव्य-क्षेत्र में युग चेतना से सम्बन्ध रखने वाली कविता दार्शनिक कवि की प्रौढ़ता को द्योतित करती है, किसी नये अध्याय अथवा नवीन दृष्टिकोण का सृजन नहीं। . [८ मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी विकास की परंपरा कल्पना के पश्चात् विचारों की प्रौढ़ता का रूप धारण करती है। बालक कल्पना प्रधान ही होता है जो प्रौढ़ और मृद्ध होफर विचारक और विवेचक घन जाता है। प्रायः सभी भाषाओं के दार्शनिक कवि अपनी प्रौढ़ावस्था में समाज की ओर झुकते पाये जाते हैं। हिन्दी साहित्य में 'पन्त' और 'निराला' की रचनाओं में भी विकास का यही क्रम पाया जाता है। लोक-दर्शन करने में वही समर्थ हो सकता है जिसने विश्व के रहस्यों का दर्शन किया हो, इसके संघपों के कारण को समझ लिया हो और अज्ञानता के अन्धकार में पीडित हुई मानवता को छुटकारा देने के लिये आकुल भावना रखता हो। जो जगती के आविर्भाव, विकास और चरमसमाप्ति को जानने में सफल नहीं हुआ तो भूले- भटकों को पहचान कर उन्हें प्रशस्त मार्ग पर लाकर खड़ा करना उसके लिये असम्भव है। ज्ञान का आलोक ही तिमिर के पर्दे को भेद सकता है- गहन तिमिर से भरे विश्व में पावन प्रणय प्रकाश चाहिये मान्त-यधिक को ज्वलित-पन्थ पर सम्बल, दृढ़ विश्वास चाहिये एक अन्य स्थल पर कवि की वाणी अत्याचारों का विरोध करने के लिये क्रांति का आह्वान करती है :- भैरवी, भीषण प्रलय के गीत गाती क्यों नहीं है सुप्त वीणा तार पर भैरव जगाती क्यों नहीं है और कहीं पर युग-चेतना के स्वरों में अपना स्वर मिलाती हुई वह पूंजीवाद का सशस्त्र विद्रोह करने के लिये उठ खड़ी होती है-- ताण्डव से झंझा से बढ़ कर आज मुझे करना है नतन

तथा:-
धन सत्ता मद से जो अन्धे उनका नाम मिटाऊँगी मैं
भम कुटीरों को महलों में परिणत कर सुख पाऊँगी में।
इर प्रकार सम्पूर्ण जगती को नव जागरण का संदेश देता हुआ
वह कह उठता है-
शिशुओं में भी उन्माद जगे जागे जगती का ओर-छोर
पद दलित जगें, जानें किसान जागे जग-जन का स्वाभिमान
कवि भीम भयङ्कर छड़ गान डोले भू-भूधर विश्व प्राण ।
प्रस्तुत संकलन का सिंहावलोकन कर लेने के पश्चात् उसके
सम्बन्ध में दो शब्द और कह देना अयुक्तिसंगत न होगा कि कवि की
इन रचनाओं का संकलित रूप में प्रकाशन प्रगति और प्रयोग के
इस युग में यदि न होकर कहीं उनके जन्मकाल में सम्भव हो पाता
तो हिन्दी-साहित्य की आधुनिक काव्य-धारा में इनका एक विशेष
स्थान होता। इन रचनाओं में विगत २० वर्षों का विकासक्रम
छिपा हुआ है। अतः पाठक इनकी ऐतिहासिकता को दृष्टि में रख
कर इनका रसास्वादन करने का प्रयास करे तो उसे वर्तमान
उत्तेजनात्मक कविताओं की तिक्तता से भिन्न एक अनूठे रस की
उपलब्धि होगी।
“उपा मुस्करा उठी” के आशावादी कवि की भावी काव्य
कृतियाँ जन-मानस की स्वस्थ मनोवृत्तियों को जाग्रत करने में और
भी अधिक समर्थ होंगी ऐसा मेरा विश्वास है ।
पानागढ़
लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी
महाशिवरात्रि
२५-२-६०
[१०]

ওসিসন डा० सत्यनारायण शर्मा पी० एच डी, डी० लिट भूतपूर्व अध्यापक गटिंगन विश्वविद्यालय, जर्मनी, वर्तमान प्रिसिपल, मानव-भारती, मसूरी। का वर्तमान युग में विज्ञान ने काव्य-साधना और दर्शन-साधना से ही अधिक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर लिया है। यह कोई वैसी न्ता की बात नहीं है, क्योंकि सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर यह हो जाता है कि इन तीनों प्रकार की साधनाओं का पर्यवसान ही गंतव्य-स्थल में होता है, और तीनों मिल-जुलकर अन्त में ही विश्व-देवता के किरणोंज्वल स्वरूप का उद्घाटन करती हैं। In की बात जो है, वह यह कि अर्थनीति और राजनीति इन तीनों चिो र की साधनाओं को हतवीर्य करके उनपर अपना प्रभुत्व स्थापित प्रकको सचेष्ट है। सौभाग्यशाली हैं वे लोग, जो इस युग का साहित्य, दर्शन अथवा विज्ञान-साधना को इस प्रकार के अ और विषवर्षी प्रभावों और प्रभुत्वों से मुक्त रखने में समर्थ ITE बा साधना की सामाजिक प्रतिष्ठा का आंशिक विलोप इस होना सर्वथा स्वाभाविक ही था। इससे अंततः हानि मानव- युग [११] समाज के ही आभ्यन्तर विकास की हुई है, उसी के मन-प्राण की पिपासा को अवहेलिल और अपूरित रहना पड़ा है, सच्चे काव्य- साधकों की उससे अणुमात्र भी हानि नहीं हुई है। सचा काव्य-साधक अंतरिक्ष के सहस्राधिक नक्षत्रों की छाया में किसी सरसी के तट पर बैठकर निशीथ के अन्धकार में या चन्द्र- किरणोंज्वल यामिनी में अपनी कल्पना-परी को नृत्य-निरत करके जिस सुमनोहर भावलोक की सृष्टि करने में समर्थ हो पाता है, उसका दर्शन मानव-समाज नहीं कर पाता या करने की लालसा से ही पराङ्गमुख हो जाता है तो यह किसी भी विज्ञ पुरुप की दृष्टि में कवि का दुर्भाग्य नहीं माना जायगा। सच्चे कवि की साधना का प्रमुख उद्देश्य होता है अपने पार्थिच अस्तित्व के अशोमन अंधकार में पुनीत स्वर्गिक चन्द्र-किरणों के आगमन द्वारा अपार्थिव सौंदर्य की दृष्टि करना। यह उसकी अनुकम्पा है, जो वह मानव-समाज को भी इस अपार्थिव सौदर्य राशि का आस्वादन करने का अवसर प्रदान करता है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह दोप का भागी भले ही माना जाय, स्वार्थपरता का दोपारोपण उस पर भले ही हो, वह दुर्भाग्यग्रस्त कभी नहीं माना जायगा । सारांश यह है कि प्रख्याति या जन-तप कवि की साधना की गरिमा से विशिष्ट सम्बन्ध रखे ही, यह आवश्यक नहीं। समा कवि साधना का परिपाक होने पर एकान्त में गीतों की सृष्टि करता रहेगा और काव्य-सौंदर्य का प्रवाह अविच्छिन्न रूप में उसके मानस-लोक में चलता रहेगा। भारतवर्ष लोटने पर जिन साहित्य-साधकों से नया परिचय हुआ, और जिनसे और जिनकी काव्य-साधना से परिचित होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई, उनमें श्री बालकृष्ण व्यास एक हैं। यश की लालमा से दूर, काव्य-सर्जना करने वाले इस कवि के जीवन के [१२] वे क्षण भी काव्य-साधना फे पीयूय कणों से प्रभावित हैं जिनमें उन्हें जीविकोपार्जनार्थ औद्योगिक क्षेत्र में संघर्ष-निरत होना पड़ता है। "उपा मुस्करा ठी" उनकी विगत कुछ वर्षों में लिखी गई कविताओं का संग्रह है। जो भी साहित्य-रसिक इन कविताओं का रसास्वादन करेगा, वह निश्चय ही पायेगा कि उसने अपने समय का सदुपयोग किया है और उसको रसोपलब्धि हुई है। उत्कृष्ट काव्य-सर्जना के लिये तीन बातें मर्वाधिक आवश्यक है -भापा का सौष्ठव और प्रवाह, कल्पना का सशक्त अन्तरिक्ष- विचरण और–अनुभूति की प्रखरता। इन तीनों को यदि सशक्त अध्ययन का वल मिल जाय तो फिर काव्य का स्वरूप और भी निखर जाता है। व्यासजी की भाषा में सौष्ठव भी है, प्रवाह भी। कोमलकांत शब्दावली “उपा मुस्करा उठी" में प्रचुर मात्रा में मिलती है। भाव-वहन के लिये उपयुक्त शब्दों का चुनाव करने में भी व्यासजी . कुशल हैं। साधक होने के कारण पृथ्वी पर पैर होने पर भी ऑखें उनकी आकाश की ओर हैं अतः उनका कल्पना-विग व्योम-विचरण पड़ चाव से करता है, केवल चाव से ही नहीं, शक्ति से भी। अनुभूति की प्रखरता का भी अभाव उनकी कविताओं में नहीं मिलेगा। जैसा कि मैंने आरम्भ में ही कह दिया है-च्यासजी की प्रवृत्ति प्रचारमुखी कभी नहीं रही, और इसी कारण दो दशाब्दियों की काव्य-साधना के बाद भी वे साहित्यिक क्षेत्र में अज्ञात ही हैं। महाकवि शेली ने Defence of Poetry में यह जो निम्नलिखित वाक्य लिखा है, वह व्यासजी के जीवन में दृष्टिगत होता है- "A post is a nightingale who sits in darkness & sings to cheer its own solitude with sweet sounds." (Shelly) यश ऐसे व्यक्तियों को मिले न मिले, उससे उनका कुछ बनता बिगड़ता नहीं। विशेप कर कवि की तो यश के अभाव से कोई भी हानि नहीं होती! यदि यश है तो अच्छा है, उससे जीवन की वाहा सुविधायें मिल जाती हैं, लेकिन नहीं है तो और भी अच्छा है। बिना किसी व्यवधान के साधना का क्रम चलता रहता है। प्रकृति के राज्य में मात्र मनुष्य का ही अधिवास नहीं है। महस्राधिक अन्य प्राणी भी हैं। और फिर सच्चे कवि की दृष्टि में तो उपा और सन्ध्या, नक्षत्र और पुष्प, लता और लहर तक में सजीवता रहती है। फिर उसके लिये मानवी सम्बन्ध की आवश्यकता उतनी उत्कट कहाँ रह पाती है ! यहाँ स्काट के एक पद्य का उद्धरण करने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहा- Call it not vain-they do not err. Who say that when the poet dies, Mute nature mourns her worshipper. And Celebrates the obsequies, (Scott.) व्यासजी कवि ही नहीं हैं, उनमें दार्शनिक अन्तष्टि भी है, दार्शनिक जिज्ञासा वृत्ति भी है अतः इस पुस्तक में कई कविताएँ ऐसी भी हैं जो हृदय के साथ ही पाठक के मस्तिष्क को भी आहार प्रदान करती हैं। मैं आशा करता हूं, व्यासजी की काव्य-साधना निरन्तर सजग रहेगी और उससे उनके जीवन-यात्रा-पथ पर तो आलोक और सौरभ प्रसारित होगा ही, साथ ही हिन्दी के पाठक भी उससे लाभान्वित होने से वंचित न रहेंगे। मैं व्यासजी की इस काव्य-कृति को एक सुन्दर और रसवर्षिणी कृति के रूप में पाता हूं। सत्यनारायण शर्मा १४-२-६० . कलकत्ता [१४] आसुख --उस श्री आरसी प्रसाद सिह जत्र छायावादी रचना का अन्त हो रहा था और उसके स्थान को अधिकृत करने के लिये नये नये वादों के प्रयोग चलने लगे थे- समय व्यासजी की रचनाएँ कलकत्ते के पत्रों में प्रकाशित हुआ करती धी। वर्षों के मौन के बाद आपके हृदय में पुनः उमंगों की ज्वार उठी और फलस्वरूप जीवन की "उपा मुस्करा उठी"। संग्रह की कविताएँ मुख्यतः छायावादी रीति-कालीन युग के स्पष्ट प्रभाव को ही परिलक्षित करती हैं। कहना नहीं होगा कि छायावादी वीणा का तार जब टूटने लगा, तब उसके स्वर सौ-सौ गीतों के रूप में बिखर गये और एक-एक गीत में सौ-सौ तारों का स्पन्दन वोलने लगा। जिन भावुक प्राणों ने उन स्पन्दनों को निष्कपट भाव से ग्रहण कर लिया, उन्हीं में श्री बालकृष्ण व्यास की गणना की जा सकती है। उनकी रचनाएँ प्रायः गीतों के माध्यम से मुखरित हुई हैं, अतएव इनमें गीत-काव्य के अनुकूल भावधारा ही विशेष रूप से प्रवाहित हो रही है और यही उनकी सफलता का कारण है। गीतों का भाव- जगत ही और है, जहाँ बड़ी सावधानी से एक एक फूल चुन कर देवता को अर्पित करना पड़ता है। उसका सीधा सम्बन्ध हमारी माणगत अनुभूतियों से होता है, अपने अन्तर के सुख से ही आत्मा संतुष्ट रहती है और वाह्य जगत भी उसके असीम अन्तर लोक में एकाकार हो जाता है। व्यासजी की कविताओं को हम साधारणतः तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं। पहली श्रेणी में वे रचनाएँ आती हैं, [१५] जिनमें आत्मा परमात्मा का सम्बन्ध व्यक्त किया गया है और जिन्हें हम साहित्य में रहस्यवाद के नाम से अभिहित करते हैं। दूसरी कोटि की वे रचनाएँ हैं, जिनमें प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन है अथवा अलौकिक प्रेम, विरह, मान, राग आदि का भाव अभिव्यक्त होता है। तीसरी कोटि में हम उन रचनाओं को भी पाते हैं जिनमें सांसारिक सुख दुःख के क्षणभंगुर अनुभवों ने पश्चाताप, विराग, आक्रोश एवं उद्वग का भाव ग्रहण किया है और जिससे संसार या परिस्थितियों को बदल देने वाली प्रतिक्रिया भी विद्यमान है ! भावना परक एवं अनुभूति प्रधान गीतों से प्रस्तुत काव्य ग्रन्थ का अधिकांश है । ऐसा लगता है कि कविअपने हृदय जगन् की अनुभूतियों में खो गया है और वहीं उसका स्वर अत्यन्त उद्दात्त, करुण तथा निश्छल निन्द हो उठा है, जहाँ उसने भावों की गहराई में डुवकी लगायी है। कवि की आस्था भी अपने गीतों में वोलती है-- एक मधुमय गीत तेरा एक लघुतम गीत मेरा भरा पूरा x x x प्रणय के प्रिय गीत पावन गा रहा हूँ x x x अन्तर के अन्तःपुर में नित चीन बजाकर गाता हूँ मैं। रसज्ञ पाठक अनायास इसके रस में डूबने उतराने लगेंगे और भावों के प्रवाह में बह जायेंगे। मेरा कार्य इतना ही है कि वाणी के मन्दिर में,मंगलमयी के द्वार पर कवि का अभिनन्दन कर दूं । व्यासजी की कविताओं में अनुभूति की प्रखरता, एक स्वस्थ, सवल और सुन्दर दृष्टिकोण सर्वत्र प्राप्त होता है, जो हृदय को आनन्द से विभोर कर देता हैं। आशा है कि व्यासजी निरन्तर नये नये पुप्पों से भारती का शृङ्गार करते रहेंगे। आरसी प्रसाद सिंह कलकत्ता १८-२-६० प्रसून दल वृन्त ऋतु-कम १९ अक्टूबर ५१ ५६ ४४ ४१ ४४ ४६ ४४ आह्वान १७ सितम्बर गीत १८ जनवरी उपा मुस्करा उठी अभीप्सा २१ सितम्बर तेरा गायक गान २३ अगस्त अनिर्वचनीय २५ मई कहाँ मिले मधुदान २७ दिसम्बर एक मधुमय गीत २९ नवम्बर यह कैसा संसार ३१ जनवरी प्रकाश चाहिये २२ मार्च अभिषेक चढ़े ३५ जुलाई गीत पावन गा रहा हूँ यत्र-तत्र- -सर्वत्र लहर मंजु मृदु गाती है अन्तर के अन्तःपुर में ४३ अगस्त भैरवी से ४५ अप्रेल तुम नित आते ४९ जनवरी धूप-छांह ५? नवम्बर गीत न नूतन लिख पाता हूँ ५३ नवम्बर पागल ५५ जनवरी ५७ मई भूल ६५ मई ३७ मई ३९ मई ४१ मार्च ४६ ५३ मुक्त प्रणय बैठी हो कहाँ तुम जयगुप्ठन सोलो ६७ अक्टूबर ४३ ४५ द्वार खोल ६९ जुलाई ७१ मई ७३ जुलाई ४८ ४८ ७५ अक्टूबर ७७ अक्टूबर ७९ अक्टूबर ४३ कैसे दीप जलाऊँ रे पंछी यह तिमिर कैसे मिटा दीप जलाया वैभव लुटाता जा रहा हूँ व्रती मधुकर क्यों नीरव है गीत तेरा मधुमय स्वर स्मृति मिलन आंसू तुम्हें पुकारे ८१ जनवरी ८३ अप्रेल ८६ जून ८७ अगस्त ८९ जुलाई ९१ अक्टूबर ९३ सितम्बर ९५ सितम्बर ४६ ५६ ५६ गीत ४६ तुम विहँस रहे यह रहस्य ९७ जून ठुकरा सकोगे १०० सितम्बर १०१ जुलाई १०८ मई कवितावाणी गीत १०९ अक्टूबर गीत १११ जनवरी ११५ फरवरी देख ले यह सृष्टि गीत पाञ्चजन्य गीत भारती ११७ अक्टूबर १२१ नवम्बर १२४ जून ४५ ४६ ४१ ५८ ിൽ SSEാക്കിക്ക

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मामला सोटाला
थाहान
मानस-मन्दिर में आओ!
हंस-विवेक वाहिनी विमले,
मधुर - मधुर मुसकाओ।
मृदु मञ्जुल बीन बजाओ!
नये स्वरों में भर सम्मोहन,
मुग्ध करो तुम जग-जन-जीवन,
वीणा वादिनि ! अन्तर मन में-
भर दो भ्रातृ-प्रेम पावन धन,
नये ठाठ में, नयी रागिनी,
गीत नये नित गाओ!
सुख के स्वर-दीप जलाओ!
मानस - मन्दिर में आओ!
[?]

सामुस्कमाउठा
.
प्राण में यह कौन आया।
गगन से मृदु गीत किसने है सुनाया ,
हैं प्रफुल्लित सर दिशाएँ,
तृप्त हैं सर कामनाएं,
महा तम के सिन्धु पर आलोक है किसने विछाया !
प्राण में यह कौन आया!
टूटते हैं बन्ध सारे,
गूंजते हैं तार प्यारे,
मिलन - मुरली के स्वरों ने सुप्त प्राणों को जगाया!
प्राण में यह कौन आया !
गूंथ सुरभित मञ्ज माला,
लिये कर में प्रणय-प्याला,
विहँसता सा अमरता का कौन प्रिय सन्देश लाया!
प्राण में यह कौन आया।

उषा मुस्कराठा
करा ही
उपा मुस्करा उठी।
तिमिर जाल भेदकर
रश्मियो विखरा उठी।
उपा मुस्करा उठी।
प्राग में नवीन प्राण
पुष्प में पराग दान
मधुप में नवीन राग
नवल स्वर जगा उठी।
उपा मुस्करा उठी।
.
[१९]

घा मुस्कराहा
प्यार ओस से पली
बन्त पर खिली कली
निर्भरी विहँस-मचल
लास्य नव दिखा उठी।
उपा मुस्करा उठी।
देखकर अनेक रंग
गगन पर उड़े विहंग
गॅज रहा साम गान
अध्य ले घरा उठी।
उपा मुस्करा उठी।
-

Bषा मुस्कराठा
गायक बनकर गीत सुनाऊँ !
मधुर-मधुर स्वर सरित बहाकर,
झलमल ज्योति-सिन्धु लहराकर,
तिमिराच्छादित निविड़ निशा में-
स्वर का शुचि आलोक विछाकर,
स्वर की मदिरा दिग दिगन्त-भर
प्रिय, तेरे स्वर में मिल जाऊँ!
वधू नवेली बन कर आऊ!
छिय, छिप डर-अवगुण्ठन खोलूँ,
नत ग्रीवाकर सस्मित बोल,
कमल- करों के बन्धन में बँध
सिहर - सिहर येसुध सी हो लूँ,
देकर अपना तन-मन-जीवन
प्रणय - पयोधि-केलि सुख पाऊँ!
तू बनकर तुम में मुस्काऊँ!
[२१]

COM
उषा मुस्कुराउला
सरिता बन लहराती आऊँ!
तोड़ पथ वाधाएँ यन्धन,
छोड़ निर्मर - सुरभित कानन,
फ्रीड़ा करती, हँसती, गाती
आऊँ ले चञ्चल चिर यौवन,
सुख -दुख की स्मृतियों बिसार कर,
प्रिय, तेरे उर में मिल जाऊँ!
[२२]

ॐषा मुस्कराठी
बरागाथगा
धारा,
मधुर मृदु तेरा गायक गान !
मधुर स्वर - लहरी मोहक तान !
स्वरों में है प्रकाश प्यारा,
फैलकर करता उजियारा,
गगन गुञ्जित - स्वर परसन से
यही पाषाणो से
व्याकुला सरिता चञ्चल बन,
स्वरो से लेकर
पागलपन,
तरंगित करती कल-कल नाद,
ढूँढती अपना
स्वरों की सुखकर शाक्ति महान,
कहूँ क्या मैं स्वर से अनजान
जीवन - धन,
[२]

घा मुस्कराठी
उठा, स्वर का कोमल कम्पन,
चाह है गायक बन जाऊँ,
प्राण, पर डर करता क्रन्दन,
न जब
तक स्वर तेरा पाऊँ,
विछाकर स्वर का मनहर जाल,
दिया बन्धन में मुझको डाल,
मुक्त कर दे, गायक द्युतिमान,
काठ में भरकर गीत रसाल,
बनूँ फिर गायक चतुर, सुजान,
स्वरो से कर स्वर का आह्वान !
[२४]

दिमागमा नुमको में कैसे तू असीम में सीमित लघु कम, पहचानें! विद्युत वनकर वन घोर से, दिग् दिगन्त को तू बहराता, कमी शान्ति की शीतल रिमझिम- चा बनकर गीत सुनाता, वीणा के मादक वर से तू कमी वहाता पवन यहीं से कुछ कण लेकर जग के आंगन में विसराता, निहित भेद तुम में ही तेरा, तुमको मानें तो क्या मानूँ? जीवन प्यारा,

उठनि
कुछ कहते, तू प्रति मानव के
मानस में हँसता
रहता है,
विरह - मिलन की क्रीड़ा करता
जग के सब सुख दुख सहता है,
नील गगन का चाँद तुझे ही,
कहते हैं कुछ प्रेमी मानव
महातिमिर
महानाश में
प्राण-ज्योति बन तू बहता है,
सृजन - स्थिति - संहार रूप तू
मैं क्या सम., में क्या जानूँ ?
निराकार, साकार भेद की
बातें सुन सुन कर मै हारा,
अगणित रंग बहुरूपी
नेति, नेति, कहता जग सारा,
विधियों, मंत्र, अपरिमित साधन
तुझे समझने के व्रत, पूजन,
पर उलझन यह अति-विचित्र सी
नहीं सुलझने का कुछ चारा,
तू ही आकर आज बता दे,
क्या मैं नेरा भेद बखानूँ?
तू असीम मैं सीमित लघुकण
कैसे पहचान?
नाम
७
तुझको मैं
[२६]

ॐषा मुस्कराउडी
AME TORRE
कैसे हो आहान
प्रिये !
भनुपति का गुणगान प्रिये !
पिंजरे में श्यामा सोती है,
परवश पड़ पीड़ा रोती है,
वह वसन्त सुरभित क्या जाने
जो अजस्त्र आँसू खोती है,
धधक रही जब उर में ज्वाला,
तान प्रिये!
ऋतुपति का गुणगान प्रिये !
कैसी मादक
.
[२७]

ॐषा मुस्कराउँठा
प्रिये!
प्राणों में विष - सिंचन होता,
वाणी पर प्रतिबन्ध पड़ा है,
शुचि स्वतंत्रता के भावों पर
किसी क्रूर का शाप खड़ा है,
प्रतिबन्धों में पड़ी लेखनी,
कौन करे सम्मान
ऋतुपति का गुणगान प्रिये !
अगणित धर्म-जाति-बन्धन हैं,
ऊँच-नीच के कटु क्रन्दन हैं,
मन्दिर मस्जिद के बन्धन में
सिसक रहा मानव. जीवन है,
स्वर्ण शृङ्खला में बन्दी जग,
कहाँ मिले मधुदान प्रिये !
ऋतुपति का गुणगान प्रिये।
[२८]

Bषा मुस्कराहट
Latessfe
एक मधुमय गीत तेरा!
एक लघुतम गीत मेरा
गीत दो पर एक स्वर है,
सर्वव्यापी है, अमर है,
एक गति, लय, ताल,रागिनि,
एक सम है, अति मधुर है,
जन, विजन, चैतन्य जड़ में
एक स्वर का विमल घेरा,
एक मधुमय गीत तेरा!
एक मनहर गीत मेरा !
गीत सुख में साथ बहते,
गीत दुख में साथ रहते,
साथ ही घरदान लेकर,
साथ ही अभिशाप सहते,
साथ होती ललित सन्ध्या,
साथ ही सुख प्रद सयेरा,
मञ्जुहासिनि गीत तेरा!
है चना आलोक मेरा!
[२५]

ॐषा मुस्कराउठा
.
गायें,
गीत दो जग प्राणप्यारे,
गीत दो जग के सहारे,
फैलकर दोनों गगन पर
लौट आते फिर अवनि पर,
क्षितिज के उस पार जाकर
साथ ही लेते बसेरा,
गीत तेरा, गीत मेरा
बीन मेरी, गीत तेरा!
आज जी भर सूर
आज जी भर मधु लुटायें,
तृप्त हो त्रैलोक्य पीकर,
शान्ति मानव मात्र पाये,
साग्य नव निर्माण कर दे
प्रिये,अव प्रिय गीत तेरा।
शक्ति पाये गीत मेरा
प्राण मेरा, गीत तेरा!
[१०]

6षा मुस्कराउदा
HAU SFDFDIEN
यह कैसा संसार प्रिये !
भरा हुआ है त्याग, राग में,
और संयोग-वियोग आग में,
खिलने में मुझाना ही है-
पतझड़ सुरमित सुमन-बाग में,
छिपा हुआ है रुदन हास में
सुख में दुख-व्यापार प्रिये !
यह कैसा संसार
प्रिये!
[१]

ॐघा मुस्कराठा
कंचन घट में भरा हलाहल,
जन्म-मरण का है क्रीडास्थल,
उन्नति के उतुन शृङ्ग से
वहता अवनतिकाजल अविरल,
मघु वीणा - तारों में मंहत,
कैसा हाहाकार
प्रिये!
यह कैसा संसार प्रिये !
क्यों ये संघर्षों के बादल,
मानव मन में उठते पल-पल
पत्र निहित विद्युत में क्यों है ?
सुन्दर योयन मंगुर चञ्चल,
सुजन सुखद की छाती पर क्यों
विहँस रहा संहार प्रिये ?
यह कैसा संसार प्रिये !
RS247

Cषा मुस्कसउह be प4 गहन तिमिर से भरे विश्व में पावन प्रणय-प्रकाश चाहिये। भ्रान्त पथिक को ज्वलित पंथ पर सम्बल, दृढ़ विश्वास चाहिये ! विद्धशों की चिता-वह्नि में, स्वयं जला करता जो मानव- जलकर भस्म नहीं हो पाता- पर बन जाता हिंसक दानव, उसे पुनः मानव बनने में क्षमा भरा मृदु हास चाहिये ! [F]

छषा मुस्कराठी
सत्य दर्श की लिये कामना,
युग-युग से पलता-गलता जो,
गल-गलकर नित नूतनता में
विविध रूप से है ढलता जो,
उसे अमर उल्लास चाहिये,
चिरानन्द मधुमास चाहिये !
प्रलय-पयोधि प्रखर लहरों पर
वही नया निर्माण करेगा-
महा शक्तियर प्राप्त जिसे हो
मृतकों में नव प्राण मरेगा !
अमरों का हो भू पर मेला,
कल्पवृक्ष का वास चाहिये।
[३]

ॐषा मुस्कराठी तुम भधुमय मोहक गान बनो! शाश्वत, सुन्दर, शिव तान बनो ! भू से अम्बर तक एक लहर, आरोही बनकर जाय बिखर, अभिषेक चढ़े जग-कण-कण पर, जब अवरोही उतरे मनहर, त्रय गाम सप्त स्वर, मधुर मीड़, रस-राग-भेद विज्ञान बनो! शैशव का निश्छल सरल हास, सुरभित सुमनों का नव विकास, शशि स्निग्ध ज्योत्सना-रवि प्रकाश- हो सिन्धु पीचियों का विलास, श्रावण, का मेघ मल्हार लिये, चातक का .पिहु आहान बनो !

उषा मुस्करारा
श्रुतियों का जिसमें वैभव हो,
मूर्च्छना ताल शुचि अभिनव हो,
मंत्रो की जिसमें महाशक्ति,
भगवान स्वयं जिसमें लय हो,
उस विश्व-चीन के तारों की-
झकार, प्रणय का दान बनो।
गा उठे दिशाएँ वह गायन,
हो जाय मुग्ध देवों का मन,
सुधि भूली किन्नरियाँ, परियों,
करने लग जॉय सुखद नर्तन,
आनन्दित हों सब लोक, भुवन,
नव अनुपम स्वर उत्थान बनो!
तुम मधुमय मोहक गान बनो।
-00-
२६].

धामस्कराउठा।
प्रणय के प्रिय गीत पावन गा रहा हूँ !
शून्य में जाकर घरा से-
आज शहनाई बजी है,
प्रकृति रानी आज चिर
तरुणी बनी सुन्दर सजी है,
मैं स्वरों का जाल घुन-बुन,
तिमिर तारों पर बिछाता,
हास्य स्नेहिल तिमिर का,
आलोक फिर मुझको दिखाता,
मधु स्वरों के यान पर चढ़, स्वर-लहर लहरा रहा हूं :
प्रणय के प्रिय गीत पावन गा रहा हूं!
[३५]

मुस्कराउठी
शलभ ने चुपचाप आकर,
साधना में सिर चढ़ाया,
दीप के स्मित से अमरता-
का नया वरदान पाया,
शलभ शाश्वत, दीप शाश्वत,
स्वर मधुर त्रयलोक छाये,
मिलन के मधुमय क्षणों में
वाद्य अमरों ने बजाये,
प्राण-तारों पर किसी का परस कोमल पा रहा हूँ!
प्रणय के प्रिय गीत पावन गा रहा हूँ !
८]

ॐषा मुस्कराठी
সবঙ্গবন্ধ
वह आ रहा है, आ रहा है !
सरस शीतल समीरण में,
सुरभि वह भेजता अपनी,
जगाता ज्योति कण-कण में
भुवन में छा रहा है!
आ रहा है!
बजाता वेणु मधुवन में,
स्वरो से प्राण हैं चञ्चल,
न जाने क्या हुआ मन में
कि मन कुछ गा रहा है!
आ रहा है।
[३९]

वामस्कारहाधि
कमल की खोल पंखुड़ियों,
हँसा कर स्वयं छिप बैठा,
पलक से निरखतीं परियों
कही फिर जा रहा है !
आ रहा है !
उठाता रोर
सागर में
कहीं से चाँद में हंसकर,
किरण से राग में स्वर में
सुधा विखरा रहा है !
आ रहा है !
उतर कर कब किसी क्षण में
गहन अन्तर-गुहा में भी
सकल जड़ और चेतन में
झलक दिखला रहा है !
आ रहा है !
[१०]

Fাওয়াতী
वरी
★
लहर मंजु मृदु गाती है!
अपने में ही हो मतवाली अपना प्यार लुटाती है !
उमड़-उमड़ कर बहती जाती,
'कुछ बलखाती कुछ इठलाती,
है साजन की मिलन वायरी
फिर भी रूस छिपाती है!
लहर मंजु मृदु गाती है!
....कभी उपशी.- सी मदमाती,
नव गति में नव लास्य दिखाती,
नव स्वर लय में पिया रिझाती
मधुरस सार
पिलाती है।
लहर मंजु मृदु गाती है!
[४]

पामस्कार
सोम सुधा की पीकर प्याली,
चनी किन्नरी वह मतवाली,
परिरम्भन चुम्बन में पल-पल
नव-नव रूप बनाती है।
लहर मंजु मृदु गाती है !
स्वर पर स्वर के जाल बिछाती,
वहते स्वर को पकड़ न पाती,
हँस-हँस खेल मुक्ति-बन्धन के
खेल-खेल मुसकाती है !
लहर मंजु मृदु गाती है !
सखियों से कर मधुर ठिठोली,
भरती नव-जीवन की झोली,
करती है कल शोर प्राण में-
पी के प्राण मिलाती है!
लहर मंजु मृदु गाती है!
[१२]

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यामुस्कराउडर
पथ-पथ पर स्वर दीप जलाता,
तिमिर मिटा भय प्रान्ति मिटाता,
स्नेह सुधा का स्निग्ध सिन्धु वन
जन मन में लहराता हूँ में!
बीन बजाकर गाता हूँ मैं!
नील गगन से गुअन लाकर,
अन्तरिक्ष में प्रणय जगा कर
क्षिति-तट श्याम मनोहरता पर
स्वर-किरणें बिखराता हूँ मैं !
वीन बजाकर गाता हूं मैं !
ध्वनियों पर ध्वनियों उठती हैं,
नर्तन पर नतन करती है,
पवन भकोरों में पागलपन
देखो आज दिखाता हूँ मैं।
बीन बजाकर गाता हूँ मैं !
लोक-लोक की अगणित तानें,
लोक-लोक के अगणित गाने,
एक ताल-सम-लय
सुधा पिलाता हूं में!
यही ऐक्य समझाता हूं मैं!
बीन वजाकर गाता हूँ मैं !
समरस
पर अटके
[४]

घा मुस्कराठी
भैरवी, भीपण प्रलय के गीत गाती क्यों नहीं है ?
सुप्त वीणा तार पर भैरव जगाती क्यों नहीं है ?
हो रहे हैं आज कितने देख अत्याचार जग में,
देख कितने हो रहे हैं पाप के व्यापार जग में,
अन्न का, औ' वस्त्र का है आज हाहाकार जग में,
मानवों ने है बढ़ाया दानवी संहार जग में,
रुधिर लोलुप रक्त रसना तू दिखाती क्यों नहीं है ?
लुब्ध किस शव पर हुई आकर बताती क्यों नहीं है ?
[५]

घा मुस्कराउठा
आज कितने बन पुजारी पूजते पाषाण प्रतिदिन,
लूटते बलि पैदियों पर मूक पशु के प्राण प्रतिदिन,
डोर सत्ता की लिये कुछ मत्त करते गान प्रतिदिन,
पीड़ितों के प्राण लेकर कर रहे उत्थान प्रतिदिन,
देखती निजीब सी तू दौड़ आती क्यों नहीं है ?
शत्रु-दल पर ध्वंश का ताण्डव मचाती क्यों नहीं है ?
जन्म भूमे और जननी से बड़ी जो पूज्य धात्री,
लोक क्या त्रैलोक्य-सुख की जो सदा से है विधात्री,
मधुर पय सबको पिलाती विश्य की जो प्राणदात्री,
कट रही गौएँ हमारी पुष्टिकी प्राण दात्री,
अब भला भू कॉप कर जल में समाती क्यों नहीं है?
धरा में फँस नाम अपना तू मिटाती क्यों नहीं है ?

आ मुस्करोउठी
एक शासन-मार भी सहना मला कितना कठिनतर,
पर यहां पर बढ़ रहा है शासकों
भार दुसकर,
धनिक बन्धन, पूज्य नेता और बड़ों के विकट बन्धन,
शृखला परतन्त्रता की शक्त होती है निरन्तर,
बन्धनों को तोड़ कर जड़ से हटाती क्यों नहीं है ?
भौन अपना छोड़ सब कुछ देख जाती क्यों नहीं है ?
क्यों न उञ्चासों पचन निश्वास में भर आज लाती,
क्यों न झंझावात स्वर भर मत्त मदिरा तू वहाती,
क्यों न सागर-लहरियों में एक हलचल सी मचाती,
क्यों न पर्वत श्रेणियों में गहन प्रतिध्वनि तू जगाती,
अट्टहासिनि ! वाद्य मारू का सुनाती क्यों नहीं है ?
खिलखिलाकर विश्व को झकझोर जाती क्यों नहीं है ?
[७]

या मुस्कुराउ
क्यों न चपला बन चमकती, क्यों न यादल बन गरजती,
क्यों न अम्बर को हिलाती, क्यों न पाहन बन बरसती,
क्यों न चन्चल चरण तेरे तड़ित गति से विरक जाते,
प्रेत-प्रेतिनि-भूत-भैरव क्यों न तेरे संग गाते,
मुण्डमालिनि ! शत्रु-मण्डों को उड़ाती क्यों नहीं है ?
सोल लोहित नेत्र पशुता को जलाती क्यों नहीं है ?
तोड़ कर छोटे-बड़ों के जाति धार्मिक सब झमेले,
क्यों भला सब गोद तेरी में न सुर से खेत खेले,
क्यों न मिलकर साथ ही दुख-शोक सब जग साथ मेले,
क्यों न मानव प्रेम के हो विश्व में नित प्रेम-मेले,
मन्त्र नव निमाण का आकर सिखाती क्यों नहीं है?
भीरता की भावना जग से भगाती क्यों नहीं है?
[२८]

ॐषा मुस्कराठी
तुम नितीन
मुझे जगाने तुम नित आते !
गीत सुनाने तुम नित आते !!
लास्यमयी चिर सुखद सहचरी,
शुचि यौवन मधुमरी गागरी,
छोड़ प्रेयसी नवल नागरी
सोये
मानस को
जाते
मुझे जगाने तुम नित आते !
[.४९]

सामुस्कराउठा
मीन स्वरों में गुन-गुन गुनकर,
शाश्वत स्वर से भरते अन्तर,
बना देते तुम सुन्दर
प्राण
सम्मुख रह मृदु-मृदु मुसकाते
मुझे जगाने तुम नित आने !
तुम्हें ढूँढने को जब आती-
उपा रश्मियों पर इठलाती,
देख तुम्हें अरुणिम् बन जाती
उस लाली से मुझे खिलाते,
उज्ज्वल-उज्ज्वल मुझे वनाते !
गीत सुनाने तुम नित आते !
1 ५० ]

या मुस्कराठी
उन
महातिमिर. के महालोक में
एक महा दीपक जलता है,
तिमिर वहीं आलोक वहीं है
दोनों में अद्भुत समता है!
दीपक के आश्रय में रहकर
चीतराग हो तम है सोता,
लौ बलखाती, दीप मॉक कर
देख तिमिर को पुलकित होता
चिर-युग का दोनों का नाता
पावन प्रेम यहाँ पलता है।
[५१]
m

उषा मुस्कराठी
नील गगन के उर विशाल में
तम का सागर है लहराता,
सुधारश्मियों का शशि सुखकर
वसुधा पर अभिषेक चढ़ाता !
प्रातः उपा लिये रवि हँसता
निशा तिमिर उस पर ढलता है!
ज्ञान, अज्ञता पर जो हँस दे
तो वह उत्तम ज्ञान नहीं हैं,
विजय, पराजय पर इठलाये
तो यह भाव महान नहीं है
मिथ्या तम है, सत्य ज्योति है
धूप-छाँह का रथ चलता है !
साथ-साथ यह रथ चलता है!
[५२]

या मुस्कराठी
गीत न नूतन लिख पाता हूँ !
लेकर कुछ स्मृतियों अतीत की
मैं अपना मन बहलाता हूँ !
CTERFEx
हिमिगिरि के ऊँचे शिखरों सी
उन्नत है मादक अमिलापा,
गगन विहारिणि मधुर कलाना
मानवता की शुचि शुम आशा,
सत्य ज्योति के दिव्य दर्शकर
उसमें ही में खो जाना हूँ!

घा मुस्कराउदा
महासिन्धु के पागलपन का--
अट्टहास्य है देखा मैंने !
किकिणि कण-कण नूपुर मृदु स्वन
मदन लास्य है देखा मैने !
उलम-उलझ कर उन सपनों में
वही गीत फिर-फिर गाता हूँ !
संमृति "मै" बन गया अफेला,
अपने में संमृति को पाया,
साग्यवाद का नाम बताकर
पही पुराना
राग सुनाया,
प्रगति पंथ पर पाँच बढ़ा कर
लोट उसी पथ पर आता हूँ!
फिर अतीत के स्वर गाता हूँ!
[५]

उषा मुस्करायला
लोग मुझे कहते है पागल !
पर इससे कब मैं हूँ चञ्चल !
मुझे छले जग पर न किसी को मैं छलता हूँ,
विष को अमृत समझ उसी से मैं पलता हूँ,
दीपक साजल-जलगलगल फिर मैं जलता हूँ,
अपने पथ पर अपनी गति से मैं चलता हूँ।
छल-छल करता पल-पल बढ़ता
मेरा जीवन निर्मर कल-कल
सब कुछ देकर जो कुछ जग से पाया मैंने,
यही प्राप्त हँस-हँस कर सदा लुटाया मैंने,
जिसमें जन-कल्याण गीत वह गाया मैन,
सुगम शान्ति-पथ सुमनों का दिसलाया मैंने,
ज्योति-सिन्धु को लहरों पर में
मूम-घूम कर चलता प्रतिपल

कराराठी
जिसको दृष्टि चूमती मेरी
वही चमक हो उठता उज्ज्वल!
नील गगन में नीड़ यना मृदु वेणु यजाता,
युग-युग का साथी आकर सम्मुख मुसकाता,
कमल-करों में बाँध मुझे वह भी बँध जाता,
सत्य और शिव, सुन्दर का नव देश वसाता,
मैं जाकर जग-हित फिर आता
अपने साथी का ले सम्बल !
में अमृतत्व प्राप्त हूँ निश्छल
क्या समझे जग कैसा पागल
यस कह देता जग, यह पागल
पर न कभी में होता व्याकुल !

छषा मुस्करोउठा
मुक्त अजय
दीप की लौ ने गाया गीत !
शलभ में प्रकटी पावन प्रीत
हुए मिल दोनों एकाकार,
बन गया मधुर महा सङ्गीत !
पवन बहता है पर पसार,
पल पर विछा स्वरों का प्यार,
लक्ष्य है नील गगन की ओर
गगन में गुञ्जित है झङ्कार !
एक
स्वरबाला है सुकुमार,
मिलाती उर तन्त्री के तार,
युगों से बैठ 'पिरोती हार
बहाती स्वर-रस की मधुधार!
[५७ 7
:
एका

अषामुस्कराहा
नृपुरों का व अमिट अपार,
कण्ठ में खग-कुल के साकार,
धरा पर आने को आकुल
अमित कर करता है विस्तार !
मेघ में उमड़ा नव-नव नाद,
दिशाओं में झूमा उन्माद,
प्रणय का बिखराती सन्देश
चञ्चला चमकी ले आह्वाद !
स्वाति की कुछ बूंदें कर पान,
पिहू-पिहु पंछी भरता तान,
मयूरी के हैं उन्मुख प्राण
मेघ सुनता मयूर का गान !
मुक्त स्वर-सरिता का कल्लोल,
कान में देता मधु-सा घोल,
सिन्धु से खुला खुला अभिसार
उठाता पल-पल नव हिलोल!
[१८]

उषा मुस्कराउठा
रसिक मधुकर जय करता गान,
गान में भर अनुपम विज्ञान,
सुनाता अपने उर की बात
सुमन सौरभ में हँसते प्राण !
दीप के जलने की मुस्कान,
शलभ का करती है आहान,
शलभ भी देकर अपने प्राण
ज्योतिका करता हँस-हँस पान !
प्राण में मिल जाते हैं प्राण,
विहग बन भरते मादक तान,
व्योम के अन्तर का प्रिय गान
धरा पर आता बन वरदान!
दिया अपने अन्तर का प्यार,
बन गया दिया तिमिर आधार,
कल्पना सुन्दर सुखद, अपार
दिये के सृष्टा धन्य कुम्हार ।
[५९]

ॐषा मुस्करिठा
अनल जल धरती व्योम समीर,
इसी से बनता दिव्य शरीर,
धरा में इन पाँचों का मेल
दिया लघु बना धरा उर चीर !
मृत्तिका है इसमें साकार,
छिपा है सब तत्वों का प्यार,
तत्व में रहता है चैतन्य
दिया करता है ज्योति प्रसार !
दिया ही दिया व्योम ने दिया,
धरा ने दिया, मनुज ने दिया,
सूर्य ने दिया, चन्द्र ने दिया
धन्य वह, सब कुछ जिसने दिया!
कमल-दल अपनी आँखें खोल,
सुरमि से विखरा कर कुछ बोल,
भ्रमर का करता है आह्वान
पिलाने जीवन मदिरा घोल !
[६]

घा मुस्कराठठी
घटाएँ जब घिर करती शोर,
नाच उठता मेरा मन-मोर,
चञ्चला क्षण-क्षण जाती चमक
हृदय में आता तू चितचोर !
उपा का नव अनुपम शृङ्गार,
छेड़ता रहता उर के तार,
स्वरों का मादक-सा संसार
प्राण में ला देता है ज्वार !
विहँस कर खिलते प्राण-प्रसून,
प्राण से मिलते प्राण-प्रसून,
सुरभि से मादक बना दिगन्त
हार घन हिलते प्राण-प्रसून !
स्वरों में है उठने का मोह,
सींचता अधर-अधर अवरोह,
धरा से अम्बर का है मिलन
मिलन में सुख-सुख का सम्मोह !
[६]

पामुस्कराठी
मुझे है केवल तुझसे प्यार,
देखता मैं तुममें संसार,
उदधि में उठती प्रणय-हिलोर
इन्दु करता रजनी शृङ्गार !
बैत ही है मेरा आधार,
एक 'मैं' 'तू' वनता साकार,
शून्य में शाश्वत स्वर की ज्योति
ज्योति में तेरी झलक उदार !
वेद के सूत्र, सूत्र का ज्ञान,
ज्ञान में अन्तहीन विज्ञान,
अमिट है सत्ता एक महान
गगन मे शाश्वत जिसका गान!
प्राण में प्राण, श्वास में श्वास,
तुही तो कण-कण का मधुहास,
तुही सत् चित् आनन्द अपार
साम, यजु, भक तेरा उच्छ्वास !
[२]

पामुस्कुराउदा
भेद का यहां भला क्या काम,
ईश तू ईशा तेरा नाम,
देखता मैं तो आठौं याम
सभी में तेरी मृदु मुसकान !
शून्य लगता है यह संसार,
प्राण का तुम बिन भारी भार,
निठुर क्यों बन बैठा है तू
रित क्या हुआ प्यार भण्डार ?
चाहने वाले तुझे अनेक,
किन्तु मुझसा मैं फेयल एक,
हृदय में
आकर मेरे देख
कहेगा तेरा सत्य विवेक।
कभी तू आ जाता है पास,
युमा लेता हूँ कुछ-कुछ प्यास,
भड़कती विरह वह्नि की ज्वाल
जागती रहती फिर भी आश!

षा मुस्कराठा
एक प्याले में थोड़ी ढाल,
समझता तू कर दिया निहाल,
सिन्धु पी जाने की है शक्ति
पिला अपनी आँखो में डाल !
वृष्टि ने लिया धरा को चूम,
धरा पर मची अजब सी धूम,
पुलक से सुले कली के पलक
स्वयं पर कली उठी लो झूम !
गगन सा मैं कर लूँ विस्तार,
लुटा दूं सारे जग में प्यार,
भूम
उठे
सब लोक
पूर्ण हों रिक्त प्राण भण्डार !
प्यार से
[६४]

मामुस्कराहा
भी हो
भूल बैठी हो कहाँ तुम शीघ्र आओ, शीघ्र आओ!
में अफेला व्यथित बैठा, हृदय में मेरे समाओ!
मेघ ये आपाढ़ के कितने मनोहर झूम आये,
वरसती मधुमय फुहारें, मोर का कल-शोर भाये।
वीन लेकर हाथ में तुम मानिनी, मृदु गीत गाओ।
पंछियों का एक जोड़ा वृक्ष पर बैठा विहँसता,
विजन में अज्ञात का अभिसार है, कितनी सरसता!
अधर अधरों से मिलाओ, प्राण प्राणों में मिलाओ!
[५]

षा मुस्कराठी
एक मधु की यूँद पीकर आज तक में जी रहा हूँ,
स्मृति-स्मित हास्य का मधु आज तक में पी रहा हूँ !
आज अव जी खोलकर अमरत्व की मदिरा पिलाओ!
आज मैं जग भूल बैठा और जग ने भी भुलाया,
स्नेह-कड़ियों आज टूटी आज छूटी विश्व माया !
चात युग-युग की प्रिया, तुम आज आकर के निभाओ!
मैं अफेला व्यथित बैठा हृदय में मेरे समाओ!

घा मुस्कराउट
इ
तपठन वा
प्रेयसि, अवगुंठन खोलो!
नश्वर है यह भंगुर जीवन
झरता बहता प्रतिपल प्रतिक्षण,
पृथा अहं के मायाफ्ट में
क्या सुख है ? मन में तोलो!
प्रैयसि, अवगुंठन खोलो!
कल-कल कर क्यो मृदु मुसकाती
तृपित हृदय में तृपा बढ़ाती,
आज सुधा सौन्दय पिला कर
पञ्चम में पिक सी बोलो!
प्रेयसि, अवगुंठन खोलो !
[ ६७

या मुस्कराउठा
क्यों आशा के दीप जलाती,
क्यों मानव को तुम बहकाती,
क्षणिकक्षणों हित निज अतीत के
पापों को प्रेयसि, धोलो।
प्रेयसि, अवगुंठन खोलो।
नवजीवन नवज्योति दिखादो,
भावों का नव स्रोत वहादो,
तोड़ अरी, संसति के बन्धन,
अब मेरी अपनी हो लो!
प्रेयसि, अवगुंठन खोलो।
एक जगा दो प्यारी सिहरन,
जड़ में ला दो चञ्चल चेतन,
द्वैत मिटा कर प्रणय मिलन में
कुछ जागो, कुछ-कुछ सोलो।
प्रेयसि, अवगुंठन खोलो।
परहित अर्पणकर निज तन मन,
धन्य बनालो पावन जीयन,
मानवता के चिर गायन का
कानो में मधुरस घोलो!
प्रेयसि, अवगुंठन खोलो।
[६८

एषा मुस्कराहा
ਲਕਸ਼ੀਲ
क्यों बन्द अरी करके बैठी है द्वार ?
उठ देख कौन यह लिये खड़ा उपहार !
कुछ जन सुमनों के भर-भर डाले लाते,
सुरभित मालाएँ सुख से भेंट चढ़ाते,
कुछ रो-रोकर हँस गाकर तुझे रिझाते,
मानस पर तेरी छवि का ध्यान लगाते,
पर इसके खाली हाथ नहीं कुछ लाया,
-सारा जग सोया शान्त देख यह आया!
[६९] .

-~-
उषा मुस्कराउठा
बैठा है तेरे द्वार मौन सुधि खोकर,
सर्वस्व त्याग आया है निर्भय होकर !
अर्पण करने को सारे जग व्यवहार
अर्पण करने को प्यार और शृङ्गार !
है तुझमें सीमित अब इसका संसार
प्रतिश्यास श्वास में है तेरी मंकार
यह सौंप चुका है तुझे प्राण सुकुमार,
उठ खोल द्वार, तू शीघ्र इसे स्वीकार !
उठ देख, कौन यह लिये खड़ा उपहार !
-00-
[0]

पा मुस्कराठी
sanladsens
कैसे दीप जलाऊँ मैं?
निष्ठुर पयन झूम आता है,
रह-रह झोंक-झोंक जाता है,
अधर चूमत्ता स्निग्ध ज्योति के
और बुझाकर होता है,
।
.
ऐसे 'प्रवल प्रहारों से फिर
क्योंकर इसे बचाऊँ मैं !
कैसे दीप जलाऊँ मैं?
[७१

वामुस्कसउटा
बार-बार में दीप जलाता,
द्वार वन्द कर ध्यान लगाता,
पर छिद्रों से पागल अन्धड़
सांय-साय कर विकल बनाता,
पवन रहित पावन मन्दिर अव
चोलो कैसे पाऊँ मैं ?
कैसे दीप जलाऊँ मैं ?
वायु स्तम्भन-मंत्र सिखा दो
पूर्ण प्रभामय लौ दिसला दो
हो चैतन्य प्रकाश चतुर्दिक
ऐसा मानस को विकसा दो,
रोक व्यथा-भ्रम-सिहरन कह दो
सजाऊँ मैं ?
कैसे इसे
कैसे दीप जलाऊँ मैं?
[७२]

एषा मुस्काउली - (D रे पंछी यही है अपना देश ! यहाँ प्यार है राग रंग है दुख है दुख पर सुख प्रसंग है, यहाँ त्याग से जीत लिया हँस- हमने जग का द्वप! रे पंछी यही है अपना देश ! यहाँ भक्ति के सुमन खिले है सन्त परस्पर विहॅस मिले हैं, यहाँ रंक की नहीं भावना सब है यहाँ नरेश ! २ पंछी यही है अपना देश ! [३]

पामुस
ওলি
यहीं कही तुम ठाठ जमा लो
जी भर हॅस लो जी भर गा लो,
पर-हित और परार्थ बना लो
अपना लक्ष्य
विशेष!
रे पंछी यही है अपना देश !
प्रकृति-नटी का अन्तर विकसा
आलोड़ित मन सागर सहसा,
शाश्वत है आनन्द चतुर्दिक
-
सबका
सौम्य सुवेप !
रे पंछी यही है अपना देश।
यहाँ मेघ गुरु-गुरु गाते हैं
परस-चरस कर सुख पाते हैं,
सरिता, निर्मर कल-कल बहते
रुकते कहीं न लेश!
रे पंछी यही है अपना देश !
[१]

ॐषा मुस्कराठा
यह तिमिर कॅसेमिटॐि
*
दीप मैं क्योकर जलाऊँ ?
वासनाएँ आँधियों बन
औ' प्रलय का रूप धर कर
ध्वंस का ताण्डव मचाती
आ रही हैं उतर मन पर
धूल ही से भर गया जब
दीप लघु कैसे सजाऊँ?
। [G]

छिपा मुस्कुराउठी
टिमटिमा कर गगन के ये
दीप हैं मुझको चिढ़ाते,
विवशता पर
आज मेरी
करता
से मुस्कराते,
एक दिन है पतन इनका
यह इन्हें क्योंकर बताऊँ ?
पवन के कोमल परस से
दीप जो चिर मुक्ति पाता,
व्यर्थ का साहस दिखा जग
क्यों उसे फिर-फिर जलाता
तू बता दे आज संगिनि
यह तिमिर फैसे मिटाऊँ?
दीप में क्योंकर जलाऊँ।
-०--
.

उषा मुस्कराउठा
दीप है मैंने जलाया!
आदि युग से जल रहा है
दीप यह सुन्दर सुहाना,
जल रहे हैं शलभ हँस-हँस
मरण भय किचित न माना,
आज मै भी दीप लो की
ज्योति बनकर जगमगाया !
दीप है मैने जलाया !
.
आंधियों अगणित चलें पर
शक्ति क्या जो लो हिला दे,
कर मंझा के मकोरे
शक्ति क्या जो लौ घुमा दे,
[७]

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ॐा मुस्कराउट नव लुटाता जारहा हूँ मैं अफेला जा रहा हूँ फूल देकर शूल लेता, रुदन लेकर हास्य देता, शुष्क पथ को लहलहाता स्वग उपवन सा सजाता, पिकट मर में स्नेह फे सोते-यहाता जा रहा हूँ ! में अफेला जा रहा हूँ! पोट कर सुरा, दुस मिटाता, विजय-पर दे हार पाता, मा को दे प्यार सुन्दर- मान्ति को शान्ति नुसरूर, [१

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ॐघा मस्कराठी
पल पहा जय रोक सकता कौन सा बन्धन यही फा!
फूलमय पथ मूलमय यन जाय तो परवाह क्या है,
मलय-ममुल पायु यदि पन जाय मंझा आह क्या है,
भारत-धन की ज्योत्सना यदले प्रलय के बादलों में,
चल सगा अनल पथ पर फठिन मुमको राह क्या है,
प्राण में है प्राण जय तक अनवरत चलता रहूँगा,
छोड़ कर सय प्रिय जनों का प्यार औ' मन्दन यही का!
प्रेम से फल गान गाकर स्नेह से सरिता बुलाती,
विश्य की रजीनियो भी लोरियो देकर सुलाती,
पर रुया पयोंकर भला है लक्ष्य पर मुझको पहुँचगा-
छोड़कर पन रम्प उपपन हरित पसुधा लहलहाती,
मधुर विहगों का चहकना सरस गायन किन्नरों का,
रोक सकता है न मुझको तालमय नर्तन यहाँ का!
[१]

8षा मुस्कराठी
तोड़ कर सब यिन-बाधा पहुँच जाऊँगा वहाँ पर,
लौट आऊँ शक्ति साहस साधना अमरत्व फिर भर,
चाह के अनुकूल सबके में रहूँ सब कुछ लुटाता,
विहंस जन-मन तृप्त में करता रहूँ बनकर अभय वर,
क्यों भला हिसा रहेगी, क्यों भला फिर देय होगा-
सत्य शिव सुन्दर बना हूँ जब कि मैं जीवन यहाँ का !
चल पड़ा जब रोक सकता कौन सा बन्धन यहाँ का!

पा मस्कराठा
ना क्यों हो
मधुकर
पों नीरच है!
शिथिल आज पाणी तरी फ्या...-
शिथिल सभी अवयव
गुन गुन गायन छोड़ दिया क्यों,
कलियों से मुरा मोड़ लिया क्यों,
फंजनेणु से पिरत करे यह--
आसव
मधुकर
पयों नीरय है!
आया पायन
करने तुमसे
पर तू क्यों
करता फ्या
मधुकर
क्यों
मलय मकोरा,
प्रणय निहोरा,
उन्मन हो पैठा
अनुभव
नीरव
[८६

छपा.मुस्कसएका
सुमन सुरभि में वही लास्य है,
कुज-कुज में यही हास्य है,
मधु मदिरा पिसरा-वसन्त-1
1-शिशु-
मुक्त बनाता
भव
मधुकर पयों नीरव
मंजु मृदुल मोहक स्वर सुन्दर,
छाया सरिता की लहरो पर,
चंचरीक, चञ्चल, चुप रहना
कह कर तक सम्भव है।
मधुकर
क्यों नीरव
क्या समाधि में भक सो गया,
दैत मुलाकर एक हो गया,
याकि मानकर
बैठे मोहन
मौन वेणु का रव
मधुकर
क्यों नीरव
stres
1 ८४]

या मुस्कराठा
ज्योति-पुञ्ज के सिन्धु विमल में,
ढूँढ़ रहा क्या उदधि अतल में,
मधुर स्वरों रागों का तुझको
करना शुचि उद्भव है।
मधुकर क्यों नीरव
अपने स्वर का जाल बिछा कर,
वन्दी कर ले सब को सत्वर,
विहगों के कण्ठों से बहता
प्रेम-स्रोत अभिनव
मधुकर क्यों नीरवं
मानवता
te
Shes
खोई-खोई,
गुजन से
भावना
अरे, तुझे तो
गढ़ना अति
मधुकर
क्यों
मानव
नीरव
[५]

धामुस्करायला
la
प्रिय तुम्हारी भावना के सघन बादल !
झूमते, झुकते, उमड़ते, बरसते हैं विकल चञ्चल !
लास्य ले रिमझिम स्वरो का
प्रिया के प्रिय
नूपुरों का,
मूक वसुधा को हँसाने, झर रहे हैं आज · पल-पल !
इन्द्र धनु पर वेणु लेकर,
विहॅसते हैं छेड़ नव स्वर,
स्वर परस से पिघल गिरि उर बना निर्भर सुरसद कल-कल !
ज्योति के कुछ कण लुटाती,
चपल चपला थिरक जाती,
प्रणय-धारा यहा जग पर कर रहे हैं तृप्त जलथल !
प्रिय तुम्हारी भावना के सघन वादल!
भूमते, मुक्त, उमड़ते, परसते हैं विफल
[८]

मा मुस्कराठी
Hair
नेटमा नधुवनय स्वर
★
मैं मन की बीन बजाता हूँ
तेरा मधुमय स्वर सुनकर !
मै त्रिभुवन का सुख पाता हूँ
तेरा मधुमय स्वर सुनकर !
स्वर-सरस शान्त है व्याप्त विश्व कण-कण में,
स्वर सुप्त चेतना-शून्य गगन प्राङ्गण में,
स्वर अमृतमय
स्वर ज्योतिर्मय
स्वर जरा जन्म से रहित
बनाता
है निर्भय,
मै उसी स्नेह-स्वर की मधु मदिरा पीकर,
चैतन्य प्रभा पावन से लेता जी भर;
[८७]

पामुस्कराठा
में तेरे गीत सुनाता हूँ
तेरा मधमय स्वर सुनकर,
जग में आनन्द लुटाता हूँ
तेरा मादक स्वर सुनकर ।
तुम रूप राशि को देख चकित हो जाता
तुम रूप राशि से युग-युग का है नाता,
तुम सा सुन्दर
तुम सा मनहर,
तू है, असीम हे महाप्राण
हे सर्वेश्वर !
मैं भूल विश्व को जाता तेरा होकर,
सब कुछ तुम में पाता हूँ सब
खोकर;
मैं सुधा-सिन्धु बन जाता हूँ
तेरा मधुमय स्वर सुनकर,
आलोक नया
विखराता हूँ
तेरा मधुमय स्वर सुनकर !
[८]

या मुस्कराठी
सुन चुका सन्देश तेरा
आ रहा में आ रहा हूँ।
दूर रहकर भी प्रिये ।
मैं गीत तेरे गा रहा हूँ !
तू समझती में विरह में
दिवस-निशि रोकर बिताती,
मेघ पारस के बने है-
पर आती न पाती,
नयन,
किन्तु यह भी सत्य सुन्दरि,
हैं वहीं पर प्राण मेरे
शून्यतन-मन, शून्य जीवन
पास तेरे गान मेरे!
हास्य तेरा देख स्मृति में
शान्ति कुछ-कुछ पारहाहूँ!
[८९]

पा मुस्कमाउछा
हम भला कब पृथक होते
तन पृथक पर प्राण साथी,
चिर-युगों का साथ अपना
युग-युगों के गान साथी,
मै वना हूँ नील अम्बर
नील वसुधा तू सुहानी,
नित्य नव यौवन हमारा
नित्य नव यौवन कहानी,
आज पी मधु खोलकर जी
मैं पिलाता जा रहा हूं।
दूर रहकर भी प्रिये !
मैं गीत तेरे गा रहा हूं!
७.-
[ ९० ]

उषा मुस्कराउडर
मुनि
*
आँसू तुम्हें पुकारे !
बूंद-बूंद गिर-गिर कर सोये,
धरती के सँग मिलकर रोये,
कण-कण वन खग व्याकुल फिरते
ढूंढ-ढूँढ कर हारे !
सूख-सूख कर भर-भर आये,
पतझड़ वन फिर पावस लाये,
[९१]

पासुस्कराठी
सारे सागर में मिल चञ्चल
मिट-मिट जाते तारे!
आँसू तुम्हें पुकारे !
शशि बन एक बूंद ने देखा,
मिली न अबतक सीमा-रेखा,
प्राण-प्राण में मिले न जब तक
कैसे धीरज धारे!
आँसू तुम्हें पुकारे ।
[९२]

अषा मुस्काउट वेणु गीत सुन मन की पीणा पोल ज्जी है। असदो मा सद्गगम तमसो मा ज्योतिर्गमय, मुलोस्रोिगगम, कवि के दिन भारत पर हंसफर- जपा मे गय-तिस किया धोरे-~-धीरे संग-पसी सिहर-सिहर उर सोर दिया है।

षा मुस्कराठा
बिखरा,
सौरभ दग-दिगन्त में
कण-कण में नव प्राण जगा है !
मधुकर के गुन-गुन गुञ्जन में
जीवन का नव
गान
अमृत पुत्र की अमर साधना,
अब अपने हग खोल उठी है!
वेणु-गीत सुन मन की वीणा चोल उठी है !
--00--
[ ९४ ]

छषा मुस्कसाठी
গতি
तुम विहँस रहे हो जल-थल-बन-उपवन में प्रति प्राङ्गण में !
अणु-अणु में पशु-पक्षी में, जग-जीवन में, जड़ चेतन में|
बन कर वर्षा तुम वन को हरा बनाते,
चन पशुधनकर क्षण में तुम ही चर जाते,
फॅकरीली भू मरु भू में खेल रहे हो,
पर्वत श्रेणी से वन कल धार बहे हो,
संफेत तुम्हारा होता नील-गगन में औ' कण-कण में!
तुम सरिता में नय यौवन लहर उठाते,
मिल सागर में अपना अभिसार मनाते,
तुम लहर-लहर में चुम्बन वाद्य बजाने,
तुम विश्व प्रणय का स्वर सङ्गीत सुनाते,
नभ पुरुष शान्तरति करते प्रति मिलन में उस निर्जन में!

वो मुस्कराठी
तुम सुमनो में बन सुरभि पवन यनजाते,
सौरभ सन्देशा दे मधुपों को आते,
निज हृदय खोलकर मत्त पराग लुटाते,
वे सुधि भूले से गुन-गुन गायन गाते,
तुम अनासक्त हो हर कृत सञ्चालन में-जग पालन में !
तुम सब में हो पर छिपे हष्टि से रहते,
भूले मानव को अन्तर से कुछ कहते,
तुम सत्य तुम्हीं शिवपरमतत्व शुचि सुन्दर
तुम पूर्ण ब्रह्म अखिलेश्वर हो सर्वोपर,
,
भर विश्व-प्रेम दो मेरे नन्हें मन में, ले चरणन में-
अणु-अणु में, पशु-पक्षी में, जग-जीवन में, जड़-चेतन ।
९६]

पामुस्कराठठाल
तू एक वार, कैसा है यह संसार, बता दे आकर !
क्यों प्यार बना है जग-जीवन-आधार बता दे आकर ?
क्यों लता माधपी लिपट वृक्ष से जाती ?
क्यों सरिता सिन्धु-अङ्क में छिप सुख पाती ?
क्यों सुरभि कोप में मधुप मौन सो जाता?
क्यों मृग मृदु स्वर सुन भूल स्वयं को जाता-
वह कैसी मोहक वीणा की झवार बता दे आकर !
क्यों प्यार बना है जग-जीवन-जाधार बता दे जाकर ?
[९]

अपामस्करना
क्यों देस सिन्धु को शशि चञ्चल बन जाता?
उच्छ्यास तरङ्गों को लेकर क्या गाता ?
क्यों चन्द्र, चकोरी को प्रिय प्यार पिलाता ?
क्यों कुमुदिनि पर वह मधुरस धार वहाता?
इन सबके मन के कौन मिलाता तार बता दे आकर !
क्यों प्यार बना है जग-जीवन-आधार यता दे आकर ?
क्यों मेघ-हृदय से चपला झोक रही है?
किस विरह-मिलन की छवि पह ऑक रही है ?
शत-शत रङ्गों का कौन लंगाता मेला?
मुसकाता इन्द्रधनुष पर कौन अकेला ?
क्या नम-थाली में तारों का शृङ्गार बता दे आकर !
क्यों प्यार बना है जग-जीवन-आधार बता दे आकर !
क्यों श्याम श्यामता का यह मधुर मिलन है ?
कितने युग-युग का नित नव आपण है ?
क्यों धरा और अम्बर का आलिङ्गन है ?
क्यों अन्तहीन अधरों का चिर चुम्बन है ?

रामस्कराएठ
यह किसका अनुपम प्यार भरा अभिसार बता दे आकर !
क्यों प्यार बना है जग-जीवन-आधार बता दे आकर !
तू आकर प्रेयसि, सारे भेद बता दे,
तू आकर सुन्दरि, विरह-विपाद मिटा दे,
छु कोमल-कर से सोये तार जगा दे,
गीतों का मधु तू आकर स्वयं पिला दे !
क्या जीवन में शाश्वत यौवन-उपहार बता दे आकर !
क्यों प्यार बना है जग-जीवन-आधार बता दे आकर !
.
[ ९९]

षा मस्कराठी
कुका सकोगे
मै तुम्हारे द्वार पर लो आ गया हूँ।
क्या भला टुकरा
सकोगे?
घेणु-स्वर मधुरिम सुनाकर
क्या न तुमने ही बुलाया !
स्वम में खोया हुआ था
क्या न तुमने ही जगाया !
तम भरी गहरी निशा में
पाँव काँटो पर बढ़ाता,
छोड़ सुख-दुख अभय होकर
रक्त धरती पर चढ़ाता,
लक्ष्य अपना आज जब मै पा गया हूँ,
क्या भला टुकरा
सकोगे?
[१०]

या मुस्कराठा
सुख से प्रासादों में कलतक,
मैं करती थी हँस-हँस क्रीड़ा ।
आज कुटीरों का सुन क्रन्दन
रुला रही है मन की पीड़ा।
मैंने बल पौरुष पाया था
वन में और गहन कुञ्जन में,
निर्मर फे-छल छल-सरिता के-
कल-कल-प्रमरों के गुञ्जन में।
युग-युग से कर अमित साधना
कवियों ने था मुझको पाया।
रखकर मुक्त, विविध. छन्दों से-
नित नव मेरा' रूप सजाया।
[१०१]

षा मुस्कसउठा
प्यार हृदय का देकर पाला
जीवन का तप तेज मिलाया।
नित-नव-रस भावों से सींचा
सुख-वैभव के शिखर चढ़ाया।
पर, मैं भूली रम्य वनों को,
भूली उस पावन जीवन को
कव, प्रासादों के वैभव ने
वरबस पौधा मेरे मन को!
कैसे अपना मुख दिखलाऊँ !
नत-मस्तक है उर में बीड़ा,
छली गई जाने में कैसे
किसने दी है कृत्रिम-क्रीड़ा ?
धिक् यह कीड़ा जिसमें पीड़ा,
जग का यह अभिशाप लिया है।
किस मुख से कहर्दू अपनालो !
क्या मैंने कुछ : त्याग किया है!
[१०२]

मुस्कमउवा बीते कुछ वर्षों में मैंने--- धनिकों के मन है बहलाये। मदिर-मत्त मदिरा के प्याले हँस-हँस कर भर पिये-पिलाये। छन्-छन् छम-छम छनन-छनन छन पायल के मृदु बोल सुनाये। रुनझुन रुनझुन रुनन रुनन झुन- नूपुर रुनझुन नृत्य दिखाये । मननन फंकृत हृदय हो उठा, गीतों के रस-स्रोत बहाये। वीणा के मादक तारों से जाने कितने स्वर विसराये ! । पश्चाताप मरण को अब तो चरण किया, जी जाग उठी हूँ। क्षमा किया कह दो यस इतना, मैं तप कर हो आग उठी हूँ! ज्योतिर्मय जल आग उठी हूँ !! [१२] ट

वामुस्कराइका
दलित किसानों-मजदूरों पर
अत्याचार न जाते देखे।
कृश शिशु-जीवित कंकालों के
हाहाकार न जाते देखे !!
जीभर नाच दिखाया जिनको,
उनको नाच नचाऊँ जी भर ।
वन्य-कुटीरों का महलों पर,
नव तम देश वसाऊँ जी भर ।
सुन्दर साज सजाऊँ जी भर !!
ताजमहल, मन्दिर-मस्जिद ये
ये गिरजा घर
ये मीनारें
खड़ी रक्त मानव का लेकर
ये सब महलो की दीवारें।
था विश्वास, श्रमिक युग-युग से-
इनसे ही पलते आये हैं,
हटी यवनिका भेद खुला, ये-
धनिक सदा छलते आये हैं!
१०.]

ॐषा मुस्कराउठा
बिस्कुट-मक्खन-मांस इधर तो
श्वानों को गटकाते देखा,
अलबेली की सजी गोद में
मोटर से गुर्राते देखा!
उधर तड़प भूखे मानव को
छटपट कर मर जाते देखा !
शिशु को माँ की छाती पर ही
जीवन-दीप बुझाते देखा !!
अर्ध नमसी वह दिगम्बरा-
जननी-नारी-बहन हमारी,
अन्न यस के अम्बारों में
भटक रही व्याकुल दुखियारी;
रोटी के लघु टुकड़े पर ही
उसको लाज लुटाने देखा !
धन से, जीवित उसी मांस को
बन कर गीध चवाते देखा!
[१०५]

पामुस्कमाएका
दलित किसानों-मजदूरों पर
अत्याचार न जाते देखे।
कृश शिशु-जीवित कवालों के
हाहाकार न जाते देखे!!
जीभर नाच दिसाया जिनको,
उनको नाच नचाऊँ जी भर।
वन्य-कुटीरों का महलों पर,
नव तम देश वसाऊँ जी भर ।
सुन्दर साज सजाऊँ जी भर !!
ताजमहल, मन्दिर-मस्जिद ये
ये गिरजा घर ये मीनारें
सड़ी रक्क मानय का लेकर
ये सय महलों की दीवारें।
था विश्वास, श्रमिक युग-युग से-
इनसे ही पलते आये हैं,
हटी यवनिका भेद सुला, ये-
पनिक सदा छलते आये हैं!
[१४]

पामु
विस्कुट-मक्खन-माँस इधर तो
श्वानों को गटकाते देखा,
अलघेली की सजी गोद में
मोटर
से गुर्राते देखा !
उधर तड़प भूखे मानव को
छटपट कर मर जाते देखा !
शिशु को मां की छाती पर ही
जीवन-दीप बुझाते देखा !!
अर्ध नम सी वह दिगम्बरा-
:: जननी-नारी-बहन हमारी,
अन्न-वस के अम्बारों में
भटक रही व्याकुल दुखियारी;
रोटी के लघु टुकड़े पर ही
उसको लाज लुटाते देखा !
धन से, जीवित उसी मांस को
बन कर गीध चवाते देसा!!
[१०५]

छषा मुस्कराहा
भाग्य और भगवान नाम से
पूर्व जन्म के किये कर्म पर,
कितने जाल विछा रक्खे हैं-
पूंजी ने बस एक धर्म पर।
बहुत सहा अब नहीं सहूँगी
फिर से नव निर्माण करूँगी!
दुखी दीन शोपित जन मन में
नव जागृति के गान भरूंगी !
ताण्डव से मैंमा से बढ़कर
आज मुझे करना है नर्तन ।
हार मान ले विद्युत गति भी
होगा नर्तन भीषण !
ऐसा
धन-सत्ता-मद से जो अन्धे
उनका नाम मिटाऊँगी मैं।
भग्न कुटीरों को महलों में-
परिणत कर सुख पाऊँगी. में !
[१०६]

ॐषा मुस्कुराउठी
.
कविः तुम मेरे साथ-साथ रह
सब कुछ आँखों-देखा करना !
लौह लेखनी ले निर्भय हो-
इन पापों का लेखा करना !
यह है भीषण सत्य इसी पर
बनकर तुम पागल परवाने !
बढ़े चलो मिट-मिट युग-युग का
शासक-शोषण-शाप मिटाने !
[१७]

षा मुस्कराउही
गोवा
उठ सजनि दीप सँवार ले।
आ रहे प्रिय अनिल कहता, सुरभि ले उल्लसित वहता,
सिहरते हैं आज अवयव, श्यास में है चेतना नव,
शलभ करते हैं प्रतीक्षा-प्राण का उपहार ले।
ले, प्रणय दीपक वार ले।
हास्य शशि में आज अभिनव, रश्मियों में नृत्य नवनव,
ताल नव-लय-मन्द्र लेकर यह चला पाषाण का उर,
उदधि-अम्बर मिल रहें हैं-युग-युगों का प्यार ले।
सखि, स्निग्ध दीपक बार ले!
हो रहा है मौन उत्सव, है यही प्रिय पद मधुर रख,
उच्छ्वसित हैं सब दिशाएँ, प्रणति में भर मधुर आसव,
द्वार पर प्रिय आ गये हैं, सुमुखि सज शृङ्गार ले!
उद ज्योति दीपक बार ले!
[१०८ ]

मा मुस्काउठा
जीवन दीप जले !
हग-जल में विरहानल जलता
मिले गले!
सुस
शलभ विहँस कर दीपक लौ को-~
चूम प्रेम से खो जाता है-
चिर निर्वाण पंथ का प्रेमी
चिर निद्रा में सो जाता है,
फिर कैसे नव जीवन लेता
क्यों फिर-फिर यह जीवन देता!
यह कैसी मोहक क्रीड़ा है
अद्भुत खेल चले।
[१०९]

षामुस्कराहा
चिर जीवन चिर यौवन में फिर
चिर निर्वाण-भावना कैसी
जीवन में है मरण, मरण में-
चिर अमरत्व साधना कैसी,
विमल प्रेम में सब कुछ देना,
सब कुछ देकर फिर क्या लेना,
धन्य प्रणय के सच्चे साधक,
तुमसे सृष्टि पले !
जीवन दीप जले!
[११० ],

arent
कमाएका
केरलले यक ष्ट
जी भर,
देस ले यह सृष्टि
पूछ फिर इस सृष्टि के उस पार क्या है ?
देख ले शुचि उपा सुन्दर
भव्य नव जीवन जगाती,
देस ले सन्ध्या सुरंगी
भाव नप उर में खिलाती,
कलुप धोती अनवरत
रवि किरण राका रश्मियों भी-
-
नव
देख : ले
धनु
में
कलामय उच्छ्वास का व्यापार क्या है ?
[ ??? ]

या मुस्कराउठा
R"
देख मरनों का विहँसना,
चपल सरिता का उमड़ना,
कूल से अठखेलियों कर---
सिन्धु लहरों को पकड़ना,
त्याग
का
सन्देश
देकर,
देख निर्मर बढ़
देख सरिता मिट रही है,
स्वयं मिटने का मधुर उपहार क्या है ?
विहग कलरय भ्रमर गुञ्जन,
और कोकिल मधुर कूजन,
मुक्त ये स्वाधीनता के
हैं सुनाते सुखद गायन
पन्थियों
को छोह में रख,
मधुफल
नम्र
सिलाते,
-
पृक्ष से लतिका लिपटती-
देखकर तू ही बता यह प्यार क्या है ?

घा मुस्कराउँठी
मलयका पाकर परस प्रिय,
मंजु कलिका खिलखिलाती,
मधुप दल को सुरभि का-
सन्देश देकर है बुलाती,
देख रवि, हँसता कमल-दल,
कुमुदिनी शशि देख खिलती,
प्राण
जो जड़
में जगाती-
मौन वह मधु बीन की मङ्कार क्या है ?
ताप सहते, शीत सहते,
वृष्टि सहकर भी खड़े हैं,
देख ऊँचे हिम-शिखर ये,
आन पर अपनी अड़े हैं,
उपवन,
देख ले
देख ले
वन-सुखद
प्रासाद
सुन्दर,
वसुधा नव वधू
का-
क्षितिज-तट पर होरहा अभिसार क्या है ?
[११३

घामस्कसठनि भूलकर उद्देश्य मत उड़, कल्पना के पल्स पर तू, श्रम-समय सो, रो पड़ेगा, यों न पागल पन पिचर तू, देस ले यह विश्व पहले- जो भरा रंगीनियों से -- फिर समझ उस शून्य में सुस- या व्यथा के भार का चीत्कार क्या है ? [१]

उषा मुस्कराठा
यह तार टूट क्यो जाता है ?
जो जीवन का है सार मधुर
श्वासों का शुचि शृङ्गार मधुर
युग-युग से करती है नर्तन
जिसमें स्वर की मङ्कार मधुर
झङ्गार मौन क्यों हो जाती !
यतला दो मेरी वीणा का;
आधार टूट क्यो जाता है?
यह तार टूट क्यों जाता है ?
[११५]

मुस्कराह वन बनकर बिगड़ बिगड़ जाता, क्यों थिर न ठाठ यह रह पाता? स्वर नील गगन से टकरा कर- फिर क्यों भूतल पर छितराता है क्या रहस्य इसमें चोलो ? मेरे मृदु स्वर्णिम सपनो का संसार टूट क्यों जाता है ? यह तार टूट क्यों जाता है ? संसति के सुख-दुस से थककर एकाकी मै निर्जन तट पर पृक्षों की व्यथित छौंह नीचे सोये कूलो की छाती पर, कुछ साध लिये जब गाता हूँ निस्तब्ध निशा में गीतों का- उपहार टूट क्यों जाता है ? झंझा-मोकों से गीतों का उपहार टूट क्यों जाता है ? यह तार टूट क्यों जाता है ? [११६ ।

ॐषा मुस्कराठी
--
AISAGAR
कवि, भीम भयङ्कर छेड़ गान,
डोले भू-भूधर विश्व प्राण !
अरुणिम् अपा ले ज्वाल जगे
शशि किरणें हों विकराल जगें,
युग-युग की सोई रुधिर तृषित
करवट लेकर करवाल जगे,
शोणित असुरों का चाट-बाट
द्विगुणित चण्डी का पढ़े क्रोध
कर दे अरि-दल विध्वंश म्लान
कषि दिखला अपनी आन-बान,
अपने पन का बस रहे मान,
कवि, ऐसा अभिनव छेड़ गान !
[१७]

ॐषा मुस्कराठी
यादल-दल करके शोर जगे,
चपला चञ्चल चहुँ ओर जगे;
चल पड़े प्रभञ्जन प्रलयङ्कर
सागर ले भैरव रोर जगे,
शव सोये भूत-प्रेत
जागे दिक्-दिक् में अट्टहास
कवि, उठा स्वरों का अभियाण
कवि, दिखा स्वरों की नई शान,
जागे
कह उठे शत्रु-दल नहीं त्राण,
कवि, नव जाति का छेड़ गान !
डिम डमरू-ध्वनि उत्ताल जगे,
रण भेरी-स्वर ले काल जगे
वह चले हलाहल की धारा
सोये विषधारी व्याल जगे.
जागे प्रचण्ड हो अनल क्रुद्ध
जागे शङ्कर का भाल नेत्र,
कवि छेड़-छेड़. उन्मत्त तान
स्वर गति में ले तूफानन्यान
[१८]

মুভিটা তোৰ
कवि, आज दिखा अपनी उड़ान
तू विश्व विजय के सुना गान !
चीरो की सोई आन जगे
रण-कुशल 'कृष्ण' का ज्ञान जगे,
'पारथ' के तीखे तीरों की
तरुणों में शक्ति महान जगे,
जागें महिलाएँ ले त्रिशूल
बढ़ चलें सभी कर विजय घोष
रिपु मुण्डों पर नाचे कृपाण
खप्परवाली का जगे ध्यान
मो अभया से ले अभयदान;
कवि, वीर भावमय छेड़ गान !
जागे वृद्धों में नव कौशल
वे निकल पड़ें बन महा प्रबल
अरिदल दल-दलकर कर विनाश
विद्युत बन झपटें पल प्रतिपल,
[११९ ]

उषा मुस्कराउडी
शिशुओं में भी उन्माद जगे
जागे जगती का ओर-छोर'
पददलित जगें, जानें किसान
जागे जग-जन का स्वाभिमान,
होकर सतर्क हो सावधान,
कवि, स्वाधिकार हित छेड़तान !
हर हर शङ्कर जय बोल-योल
सब पढ़ें वीर जी खोल-खोल,
तड़-तड़ तोड़ें मों के बन्धन
रह जाय कालं भी डोल-डोल।
जागे स्वतन्त्रता विमल ज्योति-
हो विश्व विजेता हिन्द देश ।
ले प्रजातन्त्र का नंब विधान
कयि, बढ़ चल आगे हो प्रधान,
लेकर स्वदेश का शुचि निशान
कवि, मीम भयकर छेड़ गान !'
[१२०

ॐषा मुस्कराउन
आज मृदु स्वर चीन की झङ्कार लाया।
प्यार का मधुमय मधुप गुजार लाया ।।
वालिका उपा हँसी ले मौन प्याली,
अधर से सुर-सुन्दरी ने है लगाली,
सिहर सुमनों ने सुरभि भर प्राण ढाली,
छाई संसृति के हगों में मदिर लाली,
आज पिक पञ्चम में नव शृङ्गार लाया।
प्यार का मधुमय मधुप गुआर लाया ।
[१२१]

षा मुस्कराउठी
आज विगलित स्नेह से पापाण चञ्चल,
यह चले ले गान व्याकुल आज कल कल,
आज सरिता पंग से आई उमड़ कर,
सिन्धु में मिल हृदय करने को सु शीतल,
आज गायक श्रेष्ठ नव अभिसार लाया।
प्यार के गीतों में मंजुल प्यार लाया ।
आज अनुपम प्रेम का नव दान करने,
प्रेम के नव देश का निर्माण करने,
शत्रु-मित्रों में मधुर भर प्रेम जीवन,
शान्ति शुचिता ऐक्यता का गान करने,
मृत्यु बन्धन तोड़ अमृत-धार लाया।
प्यार का मधुमय मधुप गुजार लाया ।।
विजन में है कुटी-सरिता शान्त तट है,
आज तुमसी प्रेम-प्रतिमा भी निकट है,
'तुम बनी मै, मैं चना तुम' एक दोनों
आज नभ-सा हृदय विस्तृत मुक्त पट है,
[१२२]

सपासमाहार
आज कवि नय काव्य नव उद्गार लाया ।
प्यार का मधुमय मधुप गुजार लाया ।
आज सब कुछ छोड़ आया हूँ अकेला,
आज सब कुछ पारने की सुखद चेला,
मोल अघरों से अधर का है चुकाना,
देखना है आज सुन्दर प्रणय मेला,
आज प्राणों का मधुर उपहार लाया।
प्यार का मधुमय मधुप गुजार लाया ।

उषा मुस्कराठा
.
यार
अरी भारती ! जाग, जाग री जाग ! जाग !!
उर में विकसित कर कमल नये,
मकरन्द नया,
नव मधुप गीत,
भर भाव नवल, अनुराग राग
वाणी की देवी जाग जाग!
अरी भारती! जाग, जाग ।
यह कलि है,
इस युग की मिश्रित वाणी में
है सृजन-हीन इङ्गित विनाश का फेवल,
परमाणु शक्ति की लगी होड़ के भय से-
आतङ्कित जग-जन व्याकुल, चञ्चल-चञ्चल,
वैभव से जो हैं पूर्ण-पूर्ण से लगते ।
पर देख झांक कर तू उनका अन्तर भी,
वे सब हैं कितने रिक्त बुद्धि, धन, पल से,
[१२]

षा मुस्कराठा
आज मृदु स्वर बीन की झकार लाया।
प्यार का मधुमय मधुप गुजार लाया ।
पालिका उपा हँसी ले मौन प्याली,
अधर से सुर-सुन्दरी ने है लगाली,
सिहर सुमनों ने सुरभि भर प्राण ढाली,
छाई संमृति के हगों में मदिर लाली,
आज पिक पञ्चम में नव शृङ्गार लाया।
प्यार का मधुमय मधुप गुजार लाया ॥
[ १२१]

ॐषा मुस्कुराउदी
आज विगलित स्नेह से पापाण चञ्चल,
वह चले ले गान व्याकुल आज कल कल,
आज सरिता वेग से आई उमड़ कर,
सिन्धु में मिल हृदय करने को सु शीतल,
आज गायक श्रेष्ठ नव अभिसार लाया।
प्यार के गीतो में मंजुल प्यार लाया ॥
आज अनुपम प्रेम का नव दान करने,
प्रेम के नव देश का निर्माण करने,
शत्रु-मित्रों में मधुर भर प्रेम जीवन,
शान्ति शुचिता ऐक्यता का गान करने,
मृत्यु बन्धन तोड़ अमृत-धार लाया।
प्यार का मधुमय मधुप गुजार लाया ।
विजन में है कुटी-सरिता शान्त तट है,
आज तुमसी प्रेम-प्रतिमा भी निकट है,
'तुम बनी मैं, में बना तुम' एक दोनों
आज नभ-सा हृदय विस्तृत मुक्त पट है,
[१२]

वामुस्कराउटी है वही स्वग, हैं दैव सदैव वहीं रमते ! किन्तु, कैसी है अवमानना आज उसी पूज्या नारी की, अधःपतन कैसा है अधिकार और उत्थान नाम पर उसका । नारी में भर, फिर से ममता, समता, करुणा सनेह औ' सहन-शक्ति क्षमता! बना मांग उसकी उज्ज्वल । नारी के प्रति नर के मन में भर दे श्रद्धा, भर शुद्ध प्रणय । नारी को दे तू चिर सुहाग। x जन-मन में लहरे शान्ति-मल्टि! बह निकले झरनों के मानम माता फिर वही प्यार, वन जाय मरक मान! प्रेम की सब में मर दं यह नयव दान! त्याग से मरा हुआ सन्दरका दान- मिटा दे अरी भगवती मनिश अवमा! वनें सब निरलस, निव, निलंग्य !

उषा मुस्कराउँदा
भागे कश्मल,
हो शान्त शीघ्र विद्वेष-वह्नि की दुखद ज्वाल ।
बन जाय सभी पावन चन्दन !
बन जाय धरा परिवार एक
सब के सुख भी हों एक और दुःख भी एक !
होकर तन्मय मिलकर छेड़ें--
सब प्रणय-प्रभाती के कोमल स्वर
और
मिलकर ही गायें फिर मोहक मधु-विहाग!
है सब में तेरी ज्योति,
सदा आनन्दमयी,
स्वर-शब्दमयी, वरदानमयी
भर प्राणों में सबके
अपने स्मित का जीवन-पराग,
वाणी में सब की भर दे आकर
परम प्रेम का विमल राग,
वाणी की देवी जाग-जाग!
अरी भारती! जाग-जाग!
[१२८ ]

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Usha Muskara Uthi

Author
Shri Balkrishan Vyas
Title
Usha Muskara Uthi
File name
Usha Muskara Uthi
Text
OCR done
Citation
1957
Published
2011/03
Publisher
Vyas Mandir Balram The Street Kolakatta
Language
Sanskrit
Pages
142
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551299
Barcode
4990010032054.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
2NHXSWkMmdP
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