Sanmati Library, Jaipur
Sanskritpraveshini Volume-ii
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वक्तव्य। विज्ञवर महोदयगण ! लीजिये!आपके करकमलों में यह संस्कृत प्रवेशिनी का द्वितीयभाग भी आज हम सादर समर्पित करते है । इस पुस्तकके लिखे जानेके प्रधान कारण इसके प्रथमभागमें लिख आये है अतः उनकी यहांपर पुनरुक्ति करना निरर्थक है। हम यह अपना सौभाग्य समझते है कि हमारे इस प्रयत्नको समस्त देशवासियोंने अपनाया है और इसकी लेखन प्रणालीका सर्वथा अनुमोदन किया है । इस भागमें प्रायः व्या- करणके मुख्य २ उपदेशी उदाहरणों सहित समस्त नियम आगये है जिनके कि पढनेसे लघुसिद्धांतकौमुदीके बरावर व्याकरणका बोध हो- सकता है । शब्दसिद्धिके नियम और धातु तथा प्रत्ययोंके अनुबंध, सुगमताके लिये जैनेंद्रव्याकरण के अनुसार लिखे गये है। जोकि सर्वत्र प्रचलित पाणिनीय व्याकरणसे सर्वथा भिन्न न होनेपर भी बहुत ही सरल और सुपाठ्य है । उन नियमोंके भली भाति ध्यानमें रखलेने से, विनाही किसी लघु व्याकरणके पढे सिद्धांतकौमुदी, शब्दार्णव- चंद्रिका प्रभृति वृहद् व्याकरणकी टीकाओंमें विद्यार्थीका अच्छीतरह प्रवेश होसक्ता है । इस पुस्तकके बनानेमें जिन२ ग्रथोंकी हमने सहा- यता ली है उनके नाम अन्यत्र प्रकाशित है और उनके रचयिताओंके हम चिर कृतज्ञ हैं। पुरातन हस्तलिखित प्रोंके देखनेसे यह बात भली भांति सिद्ध होती है कि पूर्वमें विद्वान् लोग व्याकरणसे अशुद्ध होनेपर भी साहित्य- प्रचारकी सुगमताकेलिये परसवर्ण पंचमाक्षरको अनुस्वार करकेही लिखते थे अत एव हमने भी इस सनातनी प्रवृत्तिको अत्युत्तम समझकर पंचमाक्षरकी जगह अनुस्वार ही लिखा है। अंतमें हम अपने हितैषियोंसे निवेदन करते है कि इस ग्रंथमें जो ૨ प्रथम भागपर- कहीं प्रमादवश या बुद्धिभ्रमसे अशुद्धियां रहगई हों अथवा कहीं पर कुछ त्रुटियां आगई हो तो उनसे हमें सूचित करें जिससे कि द्वितीयसंस्क- रणमें वे सब दोष निकाल दिये जाय । कलकत्ता। विद्वत्समाजका सेवक श्रीलाल जैन , ३०-११-१६ संस्कृतप्रवेशिनीके सहायक ग्रंथ जैनेंद्रव्याकरण, चंद्रप्रभचरित, धर्मसंग्रहश्रावकाचार, सुभाषितरल- संदोह, क्षत्रचूडामणि,आराधनाकथाकोष, सामायिक पाठ, धर्मशर्माभ्युदय, महावीरपुराण, श्रेणिकचरित, हेमलिगानुशासन, ईसब्नीतिकथा, संस्कृत- शिक्षा, संस्कृतशिक्षिका, संस्कृतमार्गोपदेशिका, संस्कृतप्रवेश, दश कुमारचरित, हितोपदेश, गणप्रदीप । अभिज्ञानशाकुंतल, कादंबरी, तत्त्वार्थसूत्र, एडस् टू ट्रासलेशन इन द सस्कृत, बृहत्स्वयंभूस्तोत्र । प्रथमभागपर समाचारपत्रों की संमतियां- सरस्वती। यह पुस्तक इसलिये बनाई गई है जिसमें सस्कृत भाषाकी सज्ञाओ और धातु- ओ आदिके रूपोका ज्ञान विद्यार्थीको होजाय और उन्हे सस्कृतमें बातचीत करना आजाय । “इस भागमे शब्दोके प्रथमा, द्वितीया तथा सवोधन विभक्तीके, धातु- ओंमें भ्वादि और तुदादि गणीय धातुओंके वर्तमान, भूत, भविष्यत् और आज्ञा अर्थके रूप बतलाये गये है " सस्कृतसे हिंदी और हिंदीसे सस्कृत अनुवाद करनेके लिये पाठ भी दिये गये हैं। शुद्ध करनेके लिये अशुद्ध पद भी दिये गये है। पु- स्तककी रचनामें जैनव्याकरणोंका अनुसरण किया गया है जिस प्रयोजनके लिये यह पुस्तक लिखी गई है उसकी बहुत कुछ सिद्धि इससे हो सकी है १ विभक्ति और विभक्ती दोनो ही शब्द है ह्रस्व इकारात तिन् प्रत्ययात तो विना ही स्त्रीत्वद्योतक प्रत्ययके स्त्रीलिंग है और तिच् प्रत्यात दीर्घ ईकारात स्त्रीत्व योतक डीप्रत्ययात है। जैनेंद्र व्याकरणमें इसी विभक्ती शब्दसे इसकेस्वरोंमें प् और समाचारपत्रोंकी संमतियां। ३ विद्यार्थी इस पुस्तकमें हिंदीके साथ सस्कृत भाषाके सीखनेका अच्छा कम रक्खा है। पुस्तक संस्कृत सीखनेवालो के बड़े काम की है। जैनमित्र। यह एक संस्कृत व्याकरणका ग्रंथ नई पद्धतिसे विद्यार्थियोंके हितार्थ तयार किया गया है ।इससे बहुत ही सुगमतासे व बहुत कम कंठ किये संस्कृत का अनुवाद करना आजायगा । अलाहाबाद विश्वविद्यालयमें प्रचलित ऋजुव्याकरण व ववई वि वि. में प्रचलित मार्गोपदेशिकासे यह पुस्तक बहुत उपयोगी है । इसमे शब्द, और धातु व उदाहरण बहुत है । हरएक वालक सुगमतासे समझ सकेगा। हमारी सम्मतिसे सर्व जैन व अजैन विद्यालय पाठशाला व स्कूलोमे ऋजु- व्याकरण, मार्गोपटेशिका आदि वटकर इसीको पढाईमें भरती करना चाहिये । प्रकाशकसे मंगाकर एकवार इसको देखना चाहिये। इसके द्वारा हिदीका ज्ञाता अपने आप सस्कृत सीख सकता है। दिगंवर जैन । संस्कृत पढनेके लिये मार्गोपदेशिका आदि जितनी पुस्तकें प्रकट हो चुकी हैं उन सवसे यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है। पुस्तककी रचनाशैली ऐसी है कि रोज एक २ घंटा ध्यानसे पढनेसे विना गुरुके चार छह महीनेमे सस्कृत समझ-. नेका ज्ञान प्राप्त होजायगा । इसमे सब प्रकारकी समज हिंदी भाषामे दी गई है। हरएक जैन विद्यालय और पाठशालाओमे अब इसग्रंथको ही प्रवेश कर देना चाहिये। संस्कृत पढनेवाले भाईयोको अवश्य ही मंगाना चाहिये। छपाई सफाई अच्छी है और मूल्य भी कम है। कान्फरंस प्रकाश। संस्कृत सिखानेकी प्रचलितरुढि विद्यार्थियोंको कुछ बोझारूप है और समय भी बहुत लगता है इससे कुछ कम बुद्धिवाले विद्यार्थी उसे थोडा पढकर छोड देते हैं इस कठिनाईको दूर करनेके लिये हिंदी भाषा भापियोंके हितार्थ यह ग्रंथ . व्यंजनोमें 'आ' लग देनेसे सातो विभक्तियोके नाम निकाले हैं। जैसे-वा, इप्, भा, अप् का, ता, ईप् । ।
समाचारपत्रोंकी संमतियां। बनाया गया है। पाठशाला और अंग्रेजी स्कूलोमें सस्कृत पढनेवालोंकेलिये यह अथ बडा ही, उपयोगी है। इससे संस्कृत भाषाका सुखपूर्वक अबबोध होनेके साथ ही साथ उस्कृत भाषामे वातीलाप या अनुवाद करनेमें सुगमता होगी। जैनवोधक। तोही ग्रंथ सर्वजैनानी विशेषतः उत्तरीय हिंदलोकानी त्याचा संग्रह करणे अत्यंत अवश्य आहे । यात संस्कृतभाषेत नियम वगैरे मुखोद्गत करण्याचा त्रास न करिता सहजरीतिने सस्कृत भाषेत प्रवेश होण्या सारिखी व्यवस्था केलेली आहे । आमच्या मते हे पुस्तक उत्तर हिदुस्थानाच्या पाठशालेत चालू के ल्यास त्याचा फार उपयोग होण्या सारिखा आहे। अलीकडेण्या प्रमाणे अगेजी प्रवेश वगैरे अनेक ग्रथ परभाषा शिकण्यासाठी प्रकाशित होत आहेत व त्यायोगे अनेक मुख वस्तु सगृहस्थाना आपल्या फुरसती प्रमाणे घरीवसन तीभाषा शिकतीयेसे त्याच प्रमाणे आपने धर्मग्रंथ समजण्यासाठी अवश्य असल्येल्या संस्कृतभाषेचे ज्ञान सहजरीतिने सपादन करिण्यासाठी प्रत्येकाने हे पुस्तक सग्रही ठेवण्यासारिखा आहे । जैनप्रभात । इसे वर्तमान ढगसे सपादन किया है और सरल वनानेका प्रयत्न किया है। संस्कृत पढनेवाले विद्यार्थियोको यह बहुत ही उपयोगी है। सत्यवादी। इसपथकी छपाई सफाई उत्तम है, साथ ही नाम भी अन्वर्थ है। इसमे कोई संदेह नहीं कि जो परिपक्व विद्यार्थी संस्कृतसे अनभिज्ञ हैं उनको इसके द्वारा सं- स्कृतमें प्रवेश हो सकता है। इस वातका प्रयत्न किया गया है कि इसके अभ्यास करनेवालेको शुद्धाशुद्धका ज्ञान होजाय और वोलने तथा अनुवाद करनेका अभ्यास होजाय । त्रुटि इतनी है कि इसमे सस्कृत प्रयोग बनानेका सिद्ध करनेका नियम एक भी नहीं बताया है । यदि थोडेसे नियम भी बता दिये जाते तो उससे अभ्यास करनेवालोका बोध दृढ होता। तो भी नि सटेह यह विद्यार्थियोके अतिलाभकी चीज है। १ नियम प्रयोगोके सिद्ध करनेके प्राय मुख्य २ सव बतलाये गये हैं। परंतु वे टिप्पणीमे लिखे हैं।
ॐ
सनातनजैनग्रंथमाला।
१३
संस्कृतप्रवेशिनी
द्वितीय भाग।
!
प्रथम अध्याय।
द्वितीया (कर्म) विभक्तीका भिन्न २ रीतिसे व्यवहार
(१) प्रथम पाठ।
१ हा देवदत्तं वर्धते व्याधिः-हाय ! देवदत्तको व्याधि वढ रही है।
हा त्वां अविचार्यकारिणं हा विना विचारे काम करनेवाले तुझको।
हा मां पापकारिणं हा पापकरने वाले मुझको।
२ अतरा त्वां मां च पुस्तकं वर्तते तुम्हारे व मेरे वीचमें किताव है।
निषधं नीलं च अतरा विदेहस्तिष्ठति-निषध व नीलपर्वतके वीचमें
विदेह है।
वाराणसी कालिकात्तांच अतरा पाटलिपुत्रः बनारस तथा कलकत्ताके
वीचमें पटना है।
३ अतरेण विद्यां मनुष्यः पशुः-विद्याके विना मनुष्य जानवर है ।
अंतरेण पुरुषकारं न किंचित् -पुरुषार्थके विना कुछ नहीं होता।
अतरेण गुरु विद्यालाभो न-विना गुरुके विद्याकी प्राप्ति नहीं होती है।
१-हा आदिक शब्दोंका जिन शब्दोके साथ संबंध रहता है उन शब्दोंसे
द्वितीया विभकी होती है अर्थ कर्मका रहे चाहे न रहे ।
२ सनातनजैनग्रंथमालायां- ४ धिक् ब्राह्मणं पलांडुभक्षिणं-प्याज सानेवाले ब्राह्मणको धिक्कार है । धिग् जैन मद्यपायिन-मद्यपीने वाले जैनको धिकार है। धिक् कवि कुनृपप्रशंसिनं-खराव राजाकी प्रशंसा करनेवाले कविको धिक्कार है। ५ निकषा पर्वतं नदी वर्तते-पर्वतके पास नदी है। निकषा मां कुमारी तिष्ठति-मेरे समीप कुमारी वैठी है। निकषा मुनि श्रावको वसति-मुनिके पास श्रावक रहता है। ६ समया जिनालयसुद्यानं शोभते-जिनालयके पास वगीचा शोभता है । समया तीर्थकरं भव्या व्रजति-तीर्थकरके निकट भव्य लोग जाते हैं। समया केवलिनं विरोधं मुंचंति हिंसकाः केवलीके पास हिंसक जतु विरोध छोड देते हैं। ७ अतिशोभते काष्ठांगारं जीवंधर:-जीवंधर काष्ठागारसे अधिक शोभित होता है। को मां अतिगच्छति -कौन मुझे उल्लंघन करता है। अयं असु अति धनं अर्जति यह (व्यक्ति) इस (व्यक्ति) की अपेक्षा अधिक धन कमाता है। ८ प्रजाः पश्यति नृपं प्रति-प्रजा राजाको देखती है। वृणीष्व भद्रे!प्रति भातियत्त्वां-भद्रे! जो तुझे अच्छा लगे उसे वरण कर। मां प्रति कथमिदं दुर्वचनं-मेरे प्रति यह दुर्वचन क्यो ? ९ अनुजीवकमेवान (जीवलोके) विपश्चितः इस लोकमें विद्वान् जीवं- धरसे (अनु) नीचे हैं। मां अनु वदति स्म स:-मेरे वाद वह बोला । वाराणसीमनु प्रथते प्रयाग-वाराणसी (बनारस) के बाद प्रयाग (इलाहाबाद) प्रसिद्ध है। नीचे लिखे शब्दोंके व्यवहारसे वाक्य बनाओ- हा, अन्तरा, अन्तरेण, घिरा, निकषा, समया, अति, प्रति, अनु । - संस्कृतप्रवेशिनी। * द्वितीय पाठ। १ परितो ग्राम सेना वसति-गावके चारो तरफ सेना रहती है। परितो वृक्षमालवालो वर्तते-पेडके चारोतरफ आलवाल (क्यारी] है। परितो राजानं सेना गच्छति-राजाके चारो तरफ सेना चलती है। २ अमितो मामनुचरास्तिष्ठति मेरे चारो तरफ नौकर हैं। अमितस्त्वां नार्यों वर्तते तुम्हारे चारो तरफ स्त्रिया है। अमितो हस्तिनं सिंहाः गर्जति हाथीके चारोतरफ सिंह गर्जते हैं । ३ सर्वत पुष्पाणि भ्रमरा भ्रमंति-फूलोके चारो तरफ भ्रमर घूमते हैं । सर्वतो गृहं सरो वर्तते-घरके चारो तरफ तालाब है । सर्वतो धनवंतं खला भ्रमंति-धनवालेके चारो तरफ दुर्जन धूमते है । ४ उभयतो मार्ग वृक्षास्तिष्ठति-मार्गके दोनो तरफ वृक्ष हैं। उभयतो वाराणसी नदी वर्तते-बनारसके दोनो तरफ नदी है । उभयतो जिनमिंद्रौ गच्छतः-जिन भगवान्के दोनो तरफ इंद्र चलते है। ५ ऋते धर्म कुतः सुखं-धर्मके विना कैसे सुख हो। ऋते शानं कुतो मुक्तिः-विना ज्ञानके कैसे मोक्ष हो । ऋते दयां कुतो धर्मः-दयाके विना धर्म कैसे हो । ६ विना ध्यानं कुतो मुक्तिः-विना ध्यानके मुक्ति कैसे हो । विना श्रमं कुतो विद्या-विना परिश्रमके विद्या कैसे हो । विना विद्यां कुतो यशः-विना विद्याके यश कैसे हो। नीचे लिखे शब्दोंके व्यवहारसे वाक्य बनाओ- परितः, अभितः, सर्वतः, उभयतः, ऋते, विना । * तृतीय पाठ। १ अधोऽधो नरकं नरका वर्तते-नरकके नीचे नरक अधोऽधो ग्रंथं ग्रंथा:-ग्रंथ के नीचे ग्रथ है। - - * पहले पाठकी टिप्पणी देखो। । - ४ सनातनजैनग्रंथमालायां- अधोधश्छात्र छात्रा:-एक विद्यार्थीसे नीचे दूसरा विद्यार्थी है। २ अध्यधि पात्रं पात्राणि तिष्ठति-वर्तनके नीचे वर्तन है। अध्यधि नृपं नृपा राजंते-एक राजाके बाद दूसरा राजा शोभता है। अध्यधि गृहं गृहाणि-एक घरके नीचे दूसरा घर है । ३ उपर्युपरि स्वर्ग स्वर्गा वसंति-एक स्वर्गके ऊपर दूसरा स्वर्ग है। उपर्युपरि भृत्यं भृत्याः-एक सेवकसे ऊपर दूसरासेवक है। उपर्युपरि विद्यां विद्याः-एक विद्या दूसरी विद्यासे अच्छी है । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- उपर्युपरि, अध्यधि, अधोऽधः। - चतुर्थ पाठ । १ मासं (एकं ) गुडापूपा भक्षिताः-एक महीने तक गुडके पुवे खाये। द्वौ पक्षौ दुग्धं पीतं-दो पक्ष ( पखवाडे ) तक दूध पीया त्रीन् सवत्सरान् दधि न खादित-तीन वर्ष तक दही नहीं खाया । क्रोश पर्वतो वर्तते-एक कोश तक पर्वत हे। द्वौ क्रोशौ राजमार्गः -दो कोश तक राजमार्ग ( सडक ) है। असंख्यानि योजनानि आकाशःप्रसते-असख्यात योजनतक आकाश फैला है। २ मास मथुरा कल्याणी-महीने भर तक मथुरा कल्याणी ( अच्छी ) है। दिन समग्रं वृष्टिर्मविष्यति-सपूर्ण दिन भर वर्षा होगी। । +-कालवाची तथा मार्गके प्रमाणवाची शब्दोंसे द्वितीया विभक्ती होती है यदि कोई काम वे नागा किया गया हो । जैसे-मासमेकमपूपा भक्षिता -एक महीने तक पुऐ खाये अर्थात् एक दिनका भी वीचमे नागा नहीं पड़ा। क्रोश कुटिला नदी एक कोश तक नदी टेढी है अर्थात्-वीचमें विलकुल सीधी नहीं है यह अर्थ होता है यदि एसा मतलब कहने वालेका न होगा तो द्वितीया विभक्ती न होगी ।
संस्कृतप्रवेशिनी।
पक्षमेकं परीक्षा भविष्यति-एक पक्षतक परीक्षा होगी।
क्रोशं कुटिला नदी-एक कोशतक नदी टेढी है ।
३ बहूनि योजनानि गृहाणि न दृष्टानि-बहुत योजनतक घर नहीं देखे ।
मासमेकमधीतं-एक महीने तक पढा ।
श्रीन सवत्सरान् संस्कृतविद्या पठिता-तीन वर्षतक सस्कृत विद्या पढी।
नीचे लिखे शब्दोंको व्यवहारमे लाकर वाक्य रचो-
मासं, योजने, क्रोशौ, पक्षान्, संवत्सरं, दिनानि, समयान्,
घटिकाः, पत्रिं, गन्यूतिं (दोकोश)
पंचमपाठ।
१ मुनिः पर्वतमधितिष्ठति-मुनि पर्वत पर रहते है ।
जीवंधरो दंडकारण्यमधितिष्ठति स्म-जीवधर दंडकवनमे रहे थे।
योद्धारौ अश्वौ अधितिष्ठतः-दो योद्धा दो घोडोपर चढते हैं।
२ पक्षिणो नीडमनुवसति-पक्षी घोसलेमे रहते है।
मत्स्याः जलमनुवसंति-मछलिया पानीमे रहती है।
३ वणिजो नगरमुपवसंति-चनिया नगरमे रहते है।
साधवः वनमुपवसंति-साधु लोग वनमे रहते है।
छात्राः पाठशालामुपवसंति-विद्यार्थी लोग पाठशालामे रहते हैं ।
४ पितृहीनो वालो मातुलालयं आवसति-पितारहित लडका मामाके
घर रहता है।
ब्रह्मचारी गुरुकुलमावसति-ब्रह्मचारी गुरुकुलमे रहता है।
५ शिष्यः पाठकगृहं अधिवसति-विद्यार्थी गुरुके घर रहता है ।
शवरा वनमधिवसंति-भील लोग वनमे रहते है।
६ सञ्चरित्राःधर्ममार्गअमिनिविशंते-सच्चरित्र लोग धर्ममार्गमे प्रवेश करते हैं ।
कः पापं अमिनिविशते-कौन पापका आलंवन करता है।
मनो विधां अभिनिविशते-मन विद्यामे लगता है।
६ सनातनजैनग्रंथमालायां नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य रचो- अनुवसामि, उपवससि, अधितिष्ठामि, आवत्स्यति, अमिनिवि- श्यते, अधिवसंतु, उपवस, अमिनिविशेथां, अमिनिविष्टवान्, अध्यु- पितवान्, उपोषितवती,अनूषितवत्यो, अधितिष्ठ, अभिनिविशावहै । षष्ठ पाठ। + द्विकर्मक धातु। १ श्रावको मुनि धर्म पृच्छति-श्रावक मुनिसे धर्म पूछता है । श्रेणिकः श्रीवीरं धर्म पृष्टवान्-श्रेणिकने श्रीवीर भगवानसे धर्म पूछा। चेलना बौद्धसाधून प्रश्नं पृष्टवती–चेलनाने बौद्ध साधुवोको प्रश्न पूछा। २ निर्धनो गृहस्थं धनं याचति (ते)-गरीव गृहस्थसे धन मागता है। अहं तं पुस्तकं याचिष्ये-मै उससे किताव मागूंगा । को मां विद्यां याचते-कौन मुझसे ज्ञान मागता है। का समुद्रं रत्नानि मंथितवान्-किसने समुद्रसे रत्नाको मथा । के समुद्रं रत्नानि मंथिष्यंति-कौन समुद्रमेंसे रत्नोंको मथेगे। ४ स त्वां पुस्तकं मिक्षिष्यते-वह तुमसे पुस्तक मांगेगा। मुनयःगृहस्थान् धनं न मिक्षते-मुनि लोग गृहस्थोंसे धन नही मागते। ५ सा तं मधुरं वाचं भाषितवती-उसने उससे मीठे वचन कहे। अहं तं वचनं वदिष्यामि-मै उससे वात कहूगा । नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य रचो- पृच्छतिस्म, याचिष्यते, मंथितवती, भाषितवान्, वदामि, वदति, भाषते, भिक्षतेस, पृष्टवान् । * अधि-स्था, अनु-वम्, उप-वस्, आ-वस्, अधि-वस्, अभिनि-विश् धातुओके आधारमें द्वितीया विभक्ती होती है। + पृच्छो (पूछना) याचून् (मांगना) मंथ (मथना) मिक्ष (मागना) भाष, वद (कहना) इन धातुवोंके दो दो कर्म होते हैं। .
संस्कृतप्रवेशिनी।
द्वितीय अध्याय ।
क्रियाके विशेषण।
प्रथमपाठ।
*काल और स्थान वाचक अव्यय ।
१ चिरंजीवतु गुणी भवान्-गुणी आप बहुत दिनतक जीवो।
जनाः शश्वत् प्रणमति मां लोग मुझे नित्य प्रणाम करते है।
अमी शिशवोऽभीक्ष्णं क्रंदंति-ये लडके हमेशा रोते हैं ।
नगरमागच्छंति मुनयः कदाचित्-मुनि लोग कभी २ नगरमे आते हैं ।
दिवा राजते सूर्यः-दिनमे सूरज शोभता है ।
नक्तं शोभते चंद्रः-रात्रिम चंद्रमा शोभता है ।
दहति स्म सद्य कर्माणि भरतः-भरतने शीघ्रही कर्म जला दिये।
सपदि वेष्टते स नगरं सेना–सेनाने शीघ्रही नगरको घेर लिया।
प्रातरुत्तिष्ठ नित्यं हमेशा सवेरे उठो।
सायं पठंतु शुभस्त्रोत्रं-सांझको शुभस्त्रोत्र पढो ।
अद्य फलवत् जन्मा जातोऽहं-आज मै फल सहित जन्मवाला हुआ।
पूर्वेद्यु १स मुनि वंदते स्म-कल (वीता हुआ) उसने मुनिकी वंदनाकी।
अन्येधु श्रेणिकश्चेलनां पृच्छति स्म-एक दिन श्रेणिकने चेलनासे पूछा ।
कदा त्वमागमिष्यसि कब तुम आवोगे ।
तदा वयं क्रीडिष्यामः-तब हम
:-तब हम खेलेंगे।
युगपत् मेधा स्मृतिश्च वर्धथां-एक साथ ज्ञान व स्मृति वढें ।
अधुना सफल नेत्रं जातं इस समय आंखे सफल हुईं।
साप्रतं पदामि तत्त्वं इस समय सच्ची वात कहता हूं।
--अव्ययोंके लिंग तथा वचन नहीं होते। अव्यय शब्द ज्योंके त्यों वाक्यों
में रखदिये जाते है। १ एतत् तथा तद् शब्दके कतीके एक वचनके विसर्गोका लोप
हो जाता है यदि व्यंजन उसके बादमें हो
,
८ सनातनजैग्रंथमालायां। सदा यूयं धर्मरता भवत-तुम लोग हमेशा धर्ममें रत होवो । सकृत् दुःखकरं मूर्खपुत्रमरणं-मूर्ख पुत्रकी मृत्यु एक बार दु ख देती है। यावद् असौ न म्रियते तावद् त्वं सेवस्व-जवतक यह न मरे तबतक तुम सेवो। परत् छात्रा अत्र आगता:-परसाल विद्यार्थी यहा आये थे। पुरा महावीरो जिनो भवति स्म-पूर्वकालमें महावीर जिन हुये थे। २ कोऽयमत्र आगच्छति-यहा यह कौन आता है । तत्र के जना वसंति-वहा कौन लोग रहते है। कुत्र यूयं गछथ-तुम लोग कहा जाते हो। विद्वान् सर्वत्र पूजितो भवति -विद्वान् सब जगह पूजा जाता है । अधार्मिकाः इह दुःखमनुभवंति-पापीलोग इस संसा मे दुख भोगते हैं। परत्र अमुत्र च धार्मिकाः सुखं लभते धर्मात्मालोग इस लोक व परलोक में सुख पाते हैं। प्राक् विद्योतते विद्युत्-विजली पूर्व दिशामें चमकती है। उदक् प्रतिष्ठते स्म श्रीवर्मा अरिजयार्थ-श्रीवर्माने दुश्मनोको जीतनेके लिये उत्तर दिशामें प्रस्थान किया। सायंसूर्यः प्रत्यक् गच्छति-सामको सूरज पश्चिममे जाता है। पुर पश्य देवमंदिरं भोः-सामने देवमंदिरको देखो। समतत समायाताः सामंतास्तं सेवंते स-चारो दिशावोसे आये हुये सामंत [ योद्धा ] लोग उसकी सेवा करने लगे। आरात् वसंति मुनयः-समीपमें अथवा दूरमें मुनि लोग रहते हैं । मुहुर्मुहुरीक्षते स सा-वह वार वार देखती थी। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्यरचना करो- परेयुः, अन्येयुः, सर्वदा, यदा, तदा, कदा, सदा, सर्वदा, अभी- क्ष्णं, शश्वत्, नित्यं, पूर्वेयुः, परारि, परुत्, प्रत्यक्, प्राक्, उत्तराहि, (उत्तरदिशामें) पुरः, पुरस्तास्त, ( सामने ) आरात्, समंतता, पश्चात् संस्कृतप्रवेशिनी। मुहुः, पुनः, ( फिर ) नक्तं, दिवा, रात्रौ, परत्र, अमुत्र, इह, कुत्र, तत्र, अत्र, सर्वत्र, सायं, प्रातः, निशि, (रातमें ) सपदि, सकृत, उदक, युगपत् । - द्वितीय पाठ। प्रकारवाचक [ अव्यय] १ झटिति गच्छति स्म सा-वह शीघ्र ही चलागया । साक् स तं मुञ्चति स्म-उसने उसे जल्दी छोडा । अहाय स पठति स्म-उसने शीघ्र पढ लिया । तिर सर्पाः सर्पति साप तिरछे सरकते हैं। साचि असौ वर्तते यह आदमी टेडा है। यथा अयं पंडितस्तथा त्वमपि जैसा यह पंडित है वैसा तू भी है। सर्वथा मुनयः शिवं इच्छंति-मुनि लोग सब तरहसे मोक्ष चाहते है। इत्थं इमे दिवसा गता: -इस तरह ये दिन चले गये। शीघ्रं आगच्छ-शीघ्र आवो। सत्वरं गच्छ-शीघ्र जावो । क्षिप्रं कार्यमारभस्व-जल्दी कार्य आरंभ करो। सहसा स त्यजति स्म मां-उसने मुझे अकस्मात् छोडदिया। मां दृष्ट्वा ईपत् हसति स्म सा-वह सी मुझे देखकर थोडीसी हंसी । मनाक् अपि पापं न कर्तव्यं-थोडा भी पाप न करना चाहिये । कथं सा एवं मां उक्तवती -उसने मुझे ऐसा क्यों कहा। तूष्णीं भव भो वाल!-ऐ लडके ! चुप रह । सिंहो गर्जति स्म प्रसह्य-सिह वल पूर्वक गर्जा । नूनं दुर्जनो विपदं लप्स्यते-निश्चयसे दुर्जन विपत्तिको पावेगा । सा एवं भापितवती-वह इस तरह बोली। मिथ्या असौ वदति-यह झूठ बोलता है। ૨ !
यतिररिरपि पूज्य:- पूज्य हैं। सनातनजैनग्रंथमालायां आशु कार्याणि सेधति धीमंतः-ज्ञानी लोग शीघ्र कार्य सिद्ध कर लेते हैं । शनैः शनैर्लभते स विद्यां वह धीरे धीरे विद्याको प्राप्त करता है। वहिर्वसंति यतयः-मुनि लोग बाहर रहते हैं। अथ स पठनं प्रारभते स्म-इसके बाद उसमे पढ़ना शुरू किया। प्रादुर्भवति स्म यक्षः पुनः-फिर यक्ष प्रकट हुआ। आधिर्भवति नकं चंद्र:-रात्रि में चंद्रया उगता है। स एव अयं राजा पर्वते वह ही यह राजा है। -मुनि दुश्मन भी अतो ऽहमेवं गदामिइसलिये ऐसा मैं कहता हूं। त्वां निंदति-क्योंकि वह तुम्हारी निंदा करता है। ततो दुग्धं पिवामि स्म-उस लिये मैंने दूध पिया । कथमयं वृथा भाषते क्यों यह व्यर्थ वोलता है। इति मंत्रिण काष्ठांगारं विज्ञापितवंतः- इस तरह मत्रियोंने काष्ठागारको स पुनरागत: वह फिर आया। [जतलाया। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्यरचना करो- सहसा, प्रसा, इति, पुनः, एव, एवं, यतः, ततः, कुतः, अतः, कथं, तथा, यथा, सर्वथा, झटिति, ममाक्, ईषत्, शीघ्र, क्षिप, द्वंतं, साचि, वलात्, इत्थं, त्वरितं, तूष्णी, नूनं, वृथा, मिथ्या, पहिः, अथ. प्रादुः, आविः, अपि, सर्वत । य . तृतीय पाठ। एक क्रियाविशेषणका मिन्न २ अर्थों में प्रयोग। अथा १ मंगलसूचक- अथ अहं ग्रंथ प्रारमे-मै ग्रंथ शुरू करता हूं।
संस्कृतप्रवेशिनी। ११ अथ श्रीजिनेंद्राभिषेकसमयः उपस्थितः-श्रीजिनद्रेभ वान्के अभिषे- कका काल उपस्थित हुआ। २ अनंतर- अथ तौ परस्परं मित्रतां संप्रासौ-अमंतर घे दोनों मित्रताको प्राप्त हुये। अथ जीवंधरो व्याधान् जयति स्म-अनंतर जीवंधरने व्यांधोंको जीता। अथसपापीधर्म आचरितवान्-अनंतर उस पापीने धर्मका आचरण किया। अथ तत्र मेधा वर्षतिस्म-अनंतर वहा मेघ वरखे। ३ आरंभ- अथाहं तं पदामि-तो मैं उसको कहता हूं। अथ कोऽयं द्वतीय:-यह दूसरा कौन है । - 2 अथ को मां सविण्यते-कौन मे । सेवा करेगा! अथ सा कुत्र वर्तते-वह [स्त्री ] कहा हैं ? ५ और- गुणवान् अथ सपवान् जनो दुर्लभः-गुणी और सुन्दर आदमी दुर्लभ है। जीवकोऽय नंदाल्यो राजपुरींगच्छतास्म-जीवंधर और नंदाढ्य राज- पुरीको गये। ६ सम्मति सूचक- प्रश्न-कार्य किं कृतवान् क्या काम करलिया ? उत्तर-अथ किं-जी हा । प्रश्न-किं त्वं तत्र गतवान् क्या तुम वहा गये थे? उत्तर-अथ कि-और क्या [जी हा ] प्रभा--पाठ पठितवान-पाठ पढलिया ? उत्तर-अथ किं-जी हां। ननु। ननु त्वंतत् कार्यमाराधंवान् ? क्या तुमने उस कामको शुरु कर दिया।
१२ सनातनजैनग्रंथमालायां- ननु सेवकस्त्वां सेवते ? क्या सेवक तुम्हारी सेवा करता है? २ निश्चय- स ननु पंडित:-वह निश्चयसे पंडित है। [ होती हैं। ननु गुणलुन्धाः स्वयमेव संपदः-संपत्तिया निश्चयसे खुदही गुणोंकी लोमिनी ननु वृष्टिर्भविष्यति-जरूर मेघ वर्षेगा । ३ अनुनय-मनाना । ननु मां प्रति मोदस्व-मेरे ऊपर प्रसन्न हूजिये । ननु मद्गृहं प्रविश-कृपया मेरे घरमें प्रवेश कीजिये । ननु तान् तिजध्वं-कृपाकर उनको क्षमा कीजिये । अपि। है १ अपि सुखं वर्तते?-सुख तो है ? अपि मां प्रति रुष्टा ? क्या मुझसे रुष्ट होगई हो ? अपि स मां कदाचित् पृच्छति-क्या वह कभी मुझे पूछता इस पर भी- २ उइंडोऽपि अहं क्षेतव्यः-उदंड हूं तो भी मैं क्षमाके योग्य हूं । मुनिरपि मिथ्या गदितवान्-मुनि भी झूठ बोला ! समुच्चय-(तथा, भी) ३ जीवंधरोऽपि तत्र आगतः-जीवधर भी वहा आये । चेलना अपि तं दृष्टवती-चेलनाने भी उसे देखा । खलु। कोऽयं खलु अत्र आगच्छति?-यहा यह कौन आता है ? कथं खलु एतत् कार्य कार्य ?यह काम कैसे करना चाहिये । २ अनुनय- न सल नखल हंतव्योऽयं मृगः-नहीं नहीं! यह मृग मारनेके योग्य नहीं है। - ।
संस्कृतप्रवेशिनी। १३ मां खल पृच्छ कृपापूर्वक मुझसे पूछिये । यूयं खल जैनेंद्रं पठत-आप लोग कृपाकर जैनेद्र व्याकरण पढिये। ३ निश्चय- स खलु महामुनिः-वह निश्चयसे महामुनि है । जीवकः खल महापंडितः-जीवंधर निश्चयसे वडा भारी पंडित है। श्रेणिकः खलु सम्राट्-श्रेणिक निश्चयसे सम्राट् है । इति । १ हेतु- शिष्योऽहं इति त्वां अर्चामि मै विद्यार्थी हूं इस कारण तुमको पूजता हूं। गुरुरहं इति त्वां उपदिशामि-मैं गुरु हूं इस कारण तुझे उपदेश देता हूं। दुर्जनः स इति जनास्तं निंदंति-वह दुर्जन है इस कारण लोग उसकी निंदा करते हैं। २प्रकार- इति जैनेंद्र महाव्याकरणं संपूर्ण-इस प्रकार महाव्याकरण जैनेंद्र पूर्ण हुआ। इति गुरुस्तं दिशति स्म-इस तरह गुरुने उसको कहा । इति दिनानि गच्छंति इस तरह दिन वीतते हैं । ३ यह (जो कुछ कहा जाय उसके वादमे ) "यूयं ज्ञानध्यानतत्परा भवत" "तुम लोग ज्ञान और ध्यानमे लीन होओ" इति जीवंधरस्तपस्विनो वदतिस्स-यह यात जीवंधरने तपखियोंसे कही। सूरिः "त्वं वर्षमेकं काष्ठांगारं "तुम एक सालतक काष्ठागार को क्षमा करो" तिजस्व" इति जीवकं कथितवान् यह बात आचार्य ने जीवंधरसे कही। तावत्। १ पहिले-(प्रथम)। तावत् एतत् वदामि-पहिले मैं यह वात कहता हूं। त्वं तावत् वाराणसी वज-तुम पहिले वनारस जावो । २ इसके वीचमें (मध्यमें)।
सनातनजैनग्रंथमालायां ततोऽहं तावत् मुनीन् दृष्टवान्-इतनेमे मैंने मुनियोंको देखा। ३ तब तक (पर्यंत)। [ सेवा करो। यावदसौ जीवति तावत् अमुं सेवस्व-जब तक यह जीवे तब तक इसकी हि। । १ हेतु-(क्योंकि)। कालायसं हि कल्याणं कल्प- क्योकि रसायनके सबंधसे लोहामी सोना ते रसयोगतः। [हो जाता है। लोको हि-अभिनवप्रिया-क्योकि लोग नवीन वस्तुके इच्छुक होते हैं । अनवद्या हि विद्या (स्यात्) लोक- क्योकि निर्दोष विद्या दोनो लोकों- द्वयसुखावहा। में सुख देनेवाली होती है। अपुष्कला हि विद्या (स्याद् ) अ- क्योंकि अधूरी विद्या कहीं केवल अप- वकफला कचित्। मानरूपी फलकोही देनेवाली होती है। २ निश्चय-(ही)। अन्याभ्युदयखिन्नत्वं तत् हि दौ- जो दूसरेके ऐश्वर्यसे जलना है वह- जन्यलक्षणं । निश्चयसे दुर्जनताका चिन्ह है। न हि नीचमनोवृत्तिरेकरूपा स्थि- निश्चयसे नीचोंके मनकी वृत्ति एक ता (भवेत्)। रूपसे स्थित नहीं रहती। अलंध्यं हि पितृवाक्यं-पिताके वचन निश्चयसे उल्लंघन करने योग्य नहीं होते। ३ केवल-(मात्र)। मूर्खा हि पंडितान रिपंति-मूर्ख लोगही केवल पंडितोकी हिंसा करते है। स हि सततदरिद्री (यस्य )- वहही हमेशा गरीव है जिसकी- तृष्णा विशाला। तृष्णा बढी हुई है।
संस्कृतप्रवेशिनी। OM तृतीय अध्याय असमापिका क्रिया प्रथमपाठ तुम् १ अहं जैनेंद्र (१)पठितुं इच्छामि मै जैनेंद्र के पढने की इच्छा करता हूं। स्वर्ग गंतुं को न ईहते ?-खम को जाना कौन नहीं चाहता। ईश्वरं इक्षितुं को नकांक्षति ?-ईश्वरको देखनेके लिये कौन नहीं चाहता। कृषीवलोभूमि क (२)यतते-किसान भूमि जोतने के लिये प्रयत्न करता है। सा मां दृष्ट्वा कंदितुं प्रवृत्ता-वह मुझै देखकर रोने के लिये प्रवृत्त हुई। गजं छषितुं सिंह आरब्धवान् हाथी को मारने के लिये सिंह प्रवृत्त हुआ। सेवका भारंवोढुं असमर्थाः-सेवक लोग वोझा ढोने के लिये असमर्थ हैं। जीवकोवनंक्रमितुंचेष्टतेस्म-जीवंधरने वन उल्लंघन करने के लिये चेष्टा की साबाला नदींतरितुंयतवती-उस लडकी ने नदी पार करने के लिये प्रयत्न किया विद्वांस एव शास्त्राणि गाहितुं पटवः-विद्वान् लोग ही शास्त्रों का अव- गाहन करनेकेलिये चतुर होते हैं। भोमहाराज!(३)अरीन् लवितुं यतस्व-हे महाराज दुश्मनोंको नाश करने के लिये प्रयत्न करो। सुधर्म सेवितुं यतध्वं यूयं-अच्छे धर्मको सेवनेके लिये यत्न करो। (१) धातुवोंसे तुम् प्रत्यय होनेसे धातु के व तुमके वीचमें इ ( इट् ) आता । (२) तुम होनेसे धातुके-इ, उ, क को क्रमसे ए, ओ, अर् होजाता है जैसे-चित्र (इकठा करना) से तुम् किया तो चि+तुं चेतुं, स्तु-तुं स्तोतुं, स्मृ-तुं स्मत्तुं । -जिन धातुवोंका लु, औ, इत् गया है उनसे, तथा जिनके भतमें दीर्घ आ, इ, ई, हस्ख उ, हख ऋ, है उनसे तुम् प्रत्यय करने पर वीचमे इ (इट्) नहीं आता परंतु, पत्ल, श्वि, त्रि, शी, डी, रु, क्ष्णु, क्षु, स्नु, नु, यु इनके लिये यह नियम नहीं हैं। (३) धातु के अतके ए, ओ, ऐ, औको वादमें खर रहनेसे कमसे अय् , अव्, आय, आव होजाते हैं। -- खते हैं। सनातनजैनग्रंथमालायां- राजा प्रजाः रक्षितुं समर्थः-राजा प्रजाकी रक्षा करनेमें समर्थ है । यूयं जीवान् हंतुं मा चेप्टध्वं-तुम लोग जीवोंको मारनेकी चेष्टा न करो। सीतां हर्तुं रावणः संप्रवृतः-सीताको हरनेके लिये रावण प्रवृत्त हुआ। वीरान् श्लाधितुं ग्रंथान् लि- वीरोंकी प्रशंसा करनेकेलिये हम ग्रंथ लि- खामो वयं। जीवंधरो दीक्षां लब्धं श्री- जीवंधरने दीक्षा लेनेकेलिये श्रीवीरभगवान्- वीरं श्रितवान् । का आश्रय लिया। पंडितानष्टंशोचितुंन इच्छंति-पंडित लोग गई हुई चीजका शोक नहीं करते। नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य रचो- कर्तु, हर्तु, श्रयितुं, गदितुं, प्राप्तुं, नर्तितुं, भ्रमितुं, जेतुं, ज्ञातुं, दातुं, विधातु,यसितु, ईहितु ,एषितु',एष्टु,सोढुं,सहितु,रोष्टुं रोषितु रेष्टुं, रेषितुं, बोडु,रोदितु',शपितु',प्रष्टु,स्थातु,सेक्तु, गृहीतु, पातु, सृष्टु, खादितु, भक्षयितु', अर्चितु', पूजितु, अटितु, बजितुं, भवितु,' घटितु ,श ,वर्धितु,प्रष्टुं, सर्तु, जीवितु, अंचितु', स्फुटितु', एधितु', फलितु',चलितु',चरितु',कत्थितु ,लाधितु, असितु,दीक्षितु',धोति- तु,प्रकाशयितु', प्रथितु, योग्धं, द्रष्टुं, स्मेतु, नंदितु',चेति',खेलितु', क्रीडितु। , 1 द्वितीय पाठ। णम् । १ जीवकः तीर्थस्थनानि (१) याज जीवंधर तीर्थस्थानोको पूज पूजकर याज अटतिस्म। जाते थे। बाल: हासंहास आगच्छतिस्म-लडका हंस हंस करके आता था। सोऽसत् तपो दर्भ दर्श वदति-वह झूठा तप देख देखकर कहता पांथाः पक्षिकूजनानि श्रावंश्रा- पथिक लोग पक्षियों के शब्द सुन सुन- वचलंति। कर चलते हैं। (१) धातु से णम् प्रत्यय होने पर धातुवों के अंत अक्षर से पहिले 'अ' को आ हो जाता है। है। - मोदे। संस्कृतप्रवेशिनी। अहं सदुपदेशं स्मार (४) स्मारं- मैं अच्छे उपदेशको स्मरणकर करके आनंदित होता हूं। माता सुतं(५)स्पर्श स्पर्श चुवति–मा पुत्रको स्पर्श कर करके चूमती है । मानवा मुनीन् सेवं सेव उ- मनुप्य मुनियोंकी सेवा कर करके उन्न- नता भवति । त होते हैं। शिशुः ज्वार ज्वार ग्लायति-लडका रुग्ण हो हो कर क्षीण होता है। निर्धनः काठं काठं म्रियते--निर्धन जन दुखी हो हो कर मरते है। लोकाःशास्त्राणि (६)नायं नायं लोग शास्त्रोंका मनन कर करके विद्वा- विद्वांसो भवति । न होते हैं। विद्यार्थिनः ग्रंथान् पाठंपाउंप- विद्यार्थी लोग ग्रंथोको पढ पढकर परी- रीक्षां तरंति। क्षा पास करते हैं। अध्यवसायिनः चेष्ट चेटं श- अभ्यवसायी लोग चेष्टाकर करके शक्ति- क्तिमंतो भवंति। वाले होते हैं। औषधं ग्रास ग्रास रुग्णो स्वा- दवाई खा खाकर रोगी स्वस्थ स्थ्यं लभते। होता है। गुरुं मानं मानं शिष्या उदारा गुरुका सम्मान कर करके शिष्य उदार- भवंति। होते हैं। जनान् गर्ह गर्ह जना निंदुका लोगोकी निंदा कर करके मनुष्य निंदु- भवंति। क हो जाते हैं। ४-नित् णित् (न् ण् जिनमे लगा हो ) प्रत्यय होनेसे धातुके अतके इ, ई के स्थानमे ऐ, उ ऊ के स्थानमें औ, ऋऋ के स्थानमे आर् होजाते हैं । जैसे क्षि-अम् (णम् ) +अम्=क्षायं, गी+अम् गायं श्रु+अम् श्राव, भू+अम्=भावं, स्मृ+अम्-स्मारं, तृ+अम्=तार। ऐ, औ को आग, आव १५ पृष्ठकी तीसरी टिप्पणी से होते है । ५ धातुके अतके अक्षरसे पहिले अ, इ, उ, ऋ को क्रमसे आ,ए,ओ अर् हो जाते है यदि कित् द्वित् (क्, इ जिसके इत् हो) प्रत्ययसे भिन्न प्रत्यय वादमे हों । ६ आकारात धातुवोंसे नित् णित् प्रत्यय होनेपर वीचमे 'य' आजाता है जैसे-पा+अम्=पायं, म्नाअम् ( णम् ) म्नायं । mm
सनातनजैनग्रंथमालायां-
दोषिणः तेज तेज मुनयो य- अपराधियोंको क्षमा कर करके मुनि
था भवंति।
सच्चे मुनि होते हैं।
पर्वताःक्षायंक्षायं समतला जाता:-पर्वत नष्ट हो होकर समतल होगये।
प्रभु ईक्षं ईक्षं नयनानिन तृप्तानि-स्वामीको देख देखकर नेत्र तृप्त न हुये।
सा सायं सायं पतिमानंदित- उस स्त्रीने मुस्करा मुस्करा कर पतिको-
आनंदित किया।
स धर्म देशं देशं जीवान् नं- उसने धर्मका उपदेश दे देकर जीवोको-
दतिल।
आनंदित किया।
नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य रचना करो-
सारं, मेष,वेपं, शंकं, व्याथं, प्याय,प्रासं, वेष्टं, कत्थं, शिक्ष, शायं,
जायं, प्रच्छं, ग्राहं, श्रायं, हारं, भोज, सेवं, लाभ, शोचं, गाह, कामं ।
वती।
-
तृतीयपाठ।
(७) त्वा (क्त्वा)
१ ईश्वरं अर्चित्वा पुण्यं लभध्वं भगवान्की पूजा करके पुण्यकी प्राप्ति करो।
तत्र स्थित्वा स पठति स्म-वहा रहकर उसने पढा ।
श्रावका (८)स्नात्वा जिन अर्चति-श्रावक लोग स्नानकरके जिनको पूजते हैं
धनं दत्त्वा ते न मिषंति-
ते न मिषंति-धन देकर वे गर्व नहीं करते।
जीवकं (९) दृष्ट्वा यक्षो हृष्टः--जीवंधरको देखकर यक्ष हर्ष युक्त हुआ ।
७-धातुओंसे "करके" अर्थमें क्त्वा (त्वा) प्रत्यय होता है । एवं धातु तथा
त्वा के वीचमें इ (इट् ) आती है। ८ जिन धातुवोंका ल, औ-इत् गया है उन
से तथा जिनके अन्तम दीर्घ आ, इ, ई, ह्रस्व उ, ह्रस्व ऋ हैं उनसे क्त्वा करने
पर मध्यमें इ (इट्) नही आता परतु पत्ल शी, डी, श्वि धातुवोंको छोड देना।
९-प्रयमभागमें-त, क्तवतु प्रत्यय करनेसे धातुके रूपमें परिवर्तन श्-को प
होना आदि बतलाया है वह यहा भी समझना ।
मति। स्म सः। संस्कृतप्रवेशिनी। सम्राट् अरीन् जित्वा राज- चक्रवर्ती दुश्मनोको जीतकर राजधानी- धानीमागतः। को आया। स जिनालयं गत्वा जिनान् न- वह जिनमंदिरमे जाकर जिनको नम- स्कार करता है। स जिनं नत्वा स्तोत्रं पठति-वह जिनको नमस्कार करके स्तोत्र पढता है। गुरु (१०)सेवित्वास वरं प्राप्तवान् गुरुकी सेवा करके उसने वर पाया । बद्धान् मुक्त्वा पुण्यमर्जति- कैदियोको छोडकर उसने पुण्य प्राप्त किया। तमिदं पृष्ट्वा समागतोऽहं-उसको यह बात पूछकर मैं आया हूं। आलयान दग्ध्वा अग्निस्तृप्तः-घरोंको जलाकर आग तृप्त हुई। अरिं हत्वा क्रोधाग्निः शांतः दुश्मनको मारकर क्रोधाग्नि शात हुई । अत्र उपित्वा अहं संस्कृतं शिक्षितवान्-यहा रहकर मैंने संस्कृत सीखी। शश्वत् (१०)सदित्वासा इदं लब्धवती-बहुत वार रोकर उसने इसको पाया। दुग्धं पीत्वा पुष्टस्त्वं दूध पीकर तू मोटा हुआ है। विद्यां लब्ध्वा का पापी भविष्यति-विद्या पाकर कौन पापी होगा । भारं ऊद्वा भृत्यः क्लांत:-भार ढोकर नौकर थक गया । वाचं उदित्वा शीघ्र प्रत्यागच्छ-संटेशा (वात) कहकर शीघ्र लौट आओ। विद्यासं श्रित्वा मूर्खा अपि पंडिता भवंति-विद्वान्का आश्रय लेकर मूर्ख भी पंडित हो जाते हैं। मिक्षित्वा अन्नं खादति भिक्षु:-मिखारी माग करके अन्न खाता है । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- अचित्वा, अर्चित्वा, कृत्वा, उषित्वा, गदित्वा, अदित्वा, गत्वा, उदित्वा, सूत्वा, ईहित्वा, एपित्वा, एण्ट्वा, रुषित्वा, एधित्वा, मिक्षित्वा, मयित्वा, वेष्टित्वा, शंसित्वा, शोभित्वा, शिक्षित्वा, शं- १०-१० सेट् (जहा वीचमे इट् आया हो)क्त्वा परे रहनेसे धातुके इ, उ ऋ को क्रमसे ए, ओ, अर् होजाता है । परंतु रुद्, विद्के लिये यह नियम नहीं ।
सनातनजैनग्रंथमालायां कित्वा, मृत्वा मृष्ट्वा, शोचित्वा, लिखित्वा,लेखित्वा, क्रीडित्वा, नत्वा, ब्रजित्वा, सेवित्वा, पतित्वा, श्रुत्वा, जित्वा, स्थित्वा, गृहीत्वा, भुक्त्वा, शपित्वा, हृत्वा, पृष्ट्वा, भ्रांत्वा, भ्रमित्वा, (११) श्रांत्वा, ज्वलित्वा, दुग्ध्वा, विष्ट्वा । चतुर्थपाठ। (१२) य (प्य) १ पुष्पाणि आघ्राय भ्रमरा मोदंते-फूल सूंघकर भ्रमर हर्षित होते है । अहं तं प्रणिपत्य इदं उक्तवान्–मैने उसको प्रणाम करके यह बात कही। अरि (१३)निहत्य द्योततेराजा-राजा दुश्मनको मारकर शोमित होता है। अधीत्य शास्त्राणि अपि भवंति शास्त्रोको पढकरके भी लोग मूर्ख रहते हैं । लोका मूर्खाः। जिनालयं प्रविश्य जिनं स प्र- जिनालयमे प्रवेश करके जिनभगवान्को णतवान्। उसने प्रणाम किया। वाचं परिष्कृत्य पंडितागदंति-पंडितलोग वाणीको परिष्कृत करके वोलते है गृहं उन्मुच्य सकुत्रापिनगच्छति-घर छोडकर वह कहीं भी नही जाता है तरु आरुह्य वानरः फलानि खादति-पेडपर चढकर वंदर फल खाता है। । ११-जिन धातुवोंका “उ” इत् गया है उनसे क्त्वा प्रत्यय करने पर वीचमे इट् विकल्प (इच्छानुसार) से आता है । १२-प्र, परा, अप, सम् अनु, अव,निर् दुर्, वि, आइ , नि, अधि, अपि, अति, मु, उद्, अमि,प्रति, परि, उप ये २० शब्द उपसर्ग कहलाते हैं । वातुमे पहिले उपसर्ग रहनेसे "करके" अर्थमे य (प्य)प्रत्यय होता है क्त्वा नहीं। १३-ह्रस्व-अ, इ, उ, ऋ के बादमे पित् (प्-इत् जिसका हो) प्रत्यय होनेसे वीचमे 'त्' आता है । जैसे 'नि' उपसर्ग पूर्वक हनौ (मारना) धातुसे प्य (य) किया तो हन्+य हुआ नकारका लोप होनेसे ह-य रहा अब 'ह' के अ से पर पित् प्य प्रत्ययका 'ग' हे इमलिये वीचमे त् आनेगे निहत्य हुआ। इसी तरह परिष्कृत्य आदि समझना । 9 ।
संस्कृतप्रवेशिनी। २१ वकः। जिनं समर्थ्य अन्नं खादति श्रा-' श्रावक जिनकी पूजा करके भोजन खाता है। धनं प्राप्य के दरिदा भवितुं धन प्राप्त करके कौन दरिद्र होना- एषिष्यते। चाहेगे। ईश्वरं प्रणम्य (त्य)प्रथं लिखामि-भगवान्को प्रणाम करके ग्रंथ लिखता हूं। पुत्रविद्वांसं प्रेक्ष्य के न मोदंते-पुत्रको विद्वान् देखकर कौन नही हर्षित होता है पर्वतं उत्तीर्य वयं उपत्यकांआ- पर्वतको पार करके हम लोग उपत्यका- गताः। मे आगये हैं। विपन्नान् परित्राय यशः पुण्यं- विपद्ग्रस्तोकी रक्षा करके यश तथा च लभध्वं। पुण्यको प्राप्त करो। असि आकृष्य स आदिशति स्म-तलवार खीचकर उसने आना दी। मां आदिश्य स प्रस्थितः-मुझे आज्ञा देकर वह चला गया । स प्रात: उत्थाय ईश्वरं स्म- वह सवेरे उठकर भगवानको स्मरण करता है। फलानि आनीय अहं भक्षितवान्-फल लाकर मैने खाये । नदी अवगाह्य अहं शीतलोजातः-नदीमे स्नान करके मैं ठंडा हो गया । स पुस्तकं आदाय गृहं गतवान्-वह किताव लेकर घर गया । धैर्य अवलंव्य साधवः कार्याणि धीरताको अवलंबन करके साधु लोग साधयंति। कार्य करते हैं। स वहिनिसृत्य मां पश्यति स्म-उसने बाहर निकलकर मुझे देखा । नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य रचना करो- पदाय, विधाय, प्रतिज्ञाय, परिज्ञाय, संपाल्य, आलिंग्य, परिष्व- ज्य, विमिद्य, पूछिद्य, आगत्य, आनन्य, निरूप्य, विकीर्य, विस्तीर्य, आक्रम्य, परिव्रज्य (संन्यास लेकर) संत्यज्य, विमुच्य, आलोच्य, संवीक्ष्य, अवलोदय, निधाय, पूत्यावृत्य, विमृश्य, उपसृज्य, नि:- सृत्य, उद्धृत्य, आसाध (पाकर) संपूज्य, उपसृत्य, समेत्य, पुकथ्य, रति। , २२ सनातनजैनग्रंथमालायां- प्रणय, आनंद्य, संस्तुत्य, निपीय, संहृत्य, निक्षिप्य, संचेष्ट्य, 'विलिख्य, आकर्ण्य, संश्रुत्य, प्रहस्य, संदृश्य, प्रदीन्य, (जुआ खेल करके), मलिनीकृत्य, स्तब्धीकृत्य, नमस्कृत्य । परिशिष्ट (१४) समासयुक्तपद-(अव्ययी[१५]भाव) १ विभक्ति अर्थ (मे)- अधिस्त्रि [१६] रागः क्रूरोऽयं-स्त्रीमे जो प्रेम करना है वह क्रूर है । अधिवनं वानरा वसंति -वनमें वंदर रहते हैं। अधिनदि इमे तरंति-ये लोग नदीमें तैरते है। अधिमंडपं राजानः समागता:-राजा लोग मंडपमें आये । अधिनगरं जना वसंति-मनुष्य नगरमें रहते हैं। अधिनारि विश्वासो न कर्तव्यः-स्त्रीमे विश्वास नहीं करना चाहिये । सिहोऽधिगुहं गर्जितवान्-सिंह गुहामें गर्जा । अधिपाठशालं छात्राः पठति-विद्यार्थी लोग पाठशालामे पढते हैं। २ ऋद्धिका अभाव- दुर्यवनं जातं-मुसल्मानोकी संपत्तिका नाश होगया । ३ अभाव- भवान् निर्मक्षिकं कृतवान् एतत् गृहं आपने यह घर सूना कर दिया। बालको निःशब्दं स्थितः-लडका शब्द रहित (चुपचाप) खडा होगया । -- १४-परस्परमे संबंधवाले दो या दोसे अधिक पदोको मिलाकर समुदायसे विसतीका लाना समास है। १५-विभक्ती आदि दश अर्थोंमें जो अधि वगैरै अव्यय हैं उनका दूसरे शब्दोके साथ जो समास होता है उसको अव्ययीभाव समास कहते है १६-अव्ययीभाव समासके रूप हमेशा नपुंसकलिगके समान चलते है [प्रथमभाग- के तृतीय अध्यायकी टिप्पणी देखो)परंतु अकारातसे भिन्न इकारातादि अव्ययीभावके रूप सव विभक्तियोके सव वचनामे कर्ता [प्रथमा ] के एक वचनके सदृश होते है ।
२३ संस्कृतप्रवेशिनी। एतत् वनं निर्जनं वर्तते-यह वन मनुष्यरहित [सूना] है। उल्लंघन करना ( अत्यय)- पक्षिण: अतिमेचं उत्पतंति-पक्षि मेघको अतिक्रम करके उडते है सुकर्माणि अतिवाधं फलंति-अच्छे काम वाधाको उल्लंघन करके फलते है। ४ पश्चात्- शिशवः अनुशकटं धावंति-लडके गाडीके पीछे दौडते हैं। अनुरथं पदातयो गच्छंति-थके पीछे प्याटे चलते है। [करते हैं। अनुस्नानं जिन अर्चति श्रावका:-श्रावक लोग मानके वाद जिनकी पूजा ५ वीप्सा- प्रतिवृक्ष सिचति सेवकः-सेवक हर एक वृक्षको सीचता है। प्रतिदेशं अयं सामाचार: प्रच- हर एक देशमे यह समाचार प्रसिद्ध- लितः। हो गया। प्रतिनगरं रक्षका वसंति-हर एक नगरमें सिपाही [ रक्षक ] रहते हैं। ६ अनतिक्रम-[ अनुसार ] । यथाविधि श्रावका व्रतमा श्रावक लोग विधिके अनुसार व्रतका आच- चरंति। रणकरते हैं। यथाशक्ति धर्म आचरणीयः-शक्तिके अनुसार धर्म करना चाहिये। यथावृद्धं साधून अर्च-साधुवोंको वृद्धोंके क्रमसे पूजो अर्थात् जो वढा है ७ मर्यादा- [उसको पहिले और छोटेको पीछेसे पूजो । आपाटलिपुत्रं मेघो वृष्टः-पाटलिपुत्र [अर्थात् पाटलिपुत्रके पहिले तक अत तक नहीं] मेह वरषा। आजलस्थानं अतिथिरनु- जलस्थान तक अतिथि [ मिहमान ] गंतव्यः। के पीछे जाना चाहिये। आनदि वृक्षपंक्तिः शोभते-पेडोंकी लेन नदी तक शोभती है। ८ अभिविधि- [अर्थात् लडके भी उसको जानते हैं । आवालं यशोगतंसमंतभद्रीयं-समंतभद्र खामीका यश लडकोंतक फैला है- सनातनजैनग्रंथमालायां आबाल्यं अहं दुर्बल:-लडकपनसे मै दुर्वल हूं। ९ आभिमुख्य- धेनवोऽमिगोशालं धावंति-गाये गोशालाकी तरफ दौडती हैं। । हस्तिनोऽमिनदि जवंति–हाथी नदीके मंमुख टौटते है । १० समीपार्थ- उपगृहं जलाशयो शोभते-घरके पास तालाब शोमित होता है। उपघट कुलालो वर्तते-घडेके समीप कुम्हार है । उपमेघ पक्षिण उत्पतंति-मेघके समीप पक्षी उडते है । नीचे लिखे शब्दोंमेसे एक एक शब्दसे वाक्य वनाओ- निरन्नं, निर्विघ्नं, उपनदि, उपगुरु, आछात्रं, आवाराणसि, आसमुद्रं, आशिशु, अनुनृपं, अनुगिरि, प्रतिमासं, यथामति, अध्य- ग्नि, अधिपर्वतं, अभिगृहं, प्रत्यक्ष, समक्ष, प्रतिसंवत्सरं, अनुविद्य', उपकुलालं। विभक्तीयुक्त शब्द। तृतीया विभक्ती। पुंलिंग। अकारात । १ छात्रेण सह गुरुरागत:-विद्यार्थीके साथ गुरु आया । विवादेन किं प्रयोजनं-विवादसे क्या मतलब है । स्वभावेन स सरल:-वह खभावसे सरल है। हस्तेन माता मां स्पृशति-माता मुझे हाथसे स्पर्श करती है। [होने लगा। प्रकृष्यमाणरागेण कालो विलयमीयिवान्-वढतेहुये रागसे समय नष्ट दैवतेन पूजिता भवंति धार्मिका:-धर्मात्मा लोग देवोंसे पूजित होते है । तद्वीक्षणमात्रेण वैभवं निर्णीतं-उसके देखने मात्रसे ऐश्वर्यका निर्णय कर - लिया। " संस्कृतप्रवेशिनी। २५ २ वालकाभ्यां अहं पृष्टः-दो वालकोंने मुझै पूछा। हस्ताभ्यां स स्पृशति-वह दोनो हाथोसे मुझे छूता है । छात्राभ्यां गुरु सेवितः-दो विद्यार्थियोने गुरुकी सेवा की। क्षत्रियाभ्यां ग्रामो रक्षितः-दो क्षत्रियोंने गावकी रक्षाकी । अनलाभ्यां वृक्षा दग्धाः-दो अग्नियोने पेड जलाये । पाठकाभ्यां प्रशाः कृताः-दो पाठकोंने प्रश्न किये। ३ छात्रैः ग्रंथा लिखिताः-विद्यार्थियोंने ग्रंथोको लिखा । वालैः ओदनाः खादिताः-लडकोंने चावल खाये । जिन दयाधर्मः उपदिष्ट:-जिन भगवानने दया धर्मका उपदेश दिया । अश्वैः नदी तीणी-घोडोंने नदीको पार किया । सस्कृत वनाओ- मद्यसे मनोभ्रम होता है। मनोभ्रमसे अशुभकर्मबंध होता है। पापसे दुर्गति मिलती है। इसलिये कृतकारितानुमोदनसे मद्यको छोडो। सम्यग्दृष्टि जीव देवोंसे पूजा जाता है। पतिव्रता स्त्री अग्निसे भी नहीं जलती है। पुण्यसे सांप भी रज्जु हो जाता है। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- सज्जनेन, वचनैः, खलाभ्यां, क्षुधातुरेण, देवेन, मद्यवशेन, गायति, मांसभोजनेन । इकारांत। १ अहिना वालो दष्टः-सांपने बालक काटा । मुनिना धर्म उपदिष्टः-मुनिने धर्मका उपदेश दिया। ऋषिणासह विवादोन कार्य:-ऋषिके साथ विवाद नहीं करना चाहिये। कपिना सह क्रीडा न कर्तव्या-वंदरके साथ क्रीडा न करनी चाहिये । २ नृपतिभ्यां आशा इयं प्रचारिता-दो राजाओंने यह आज्ञा निकाली । मुनिभ्यां परस्परं विवादोन कर्तव्यः-मुनियोंको परस्परमे विवाद न करना चाहिये।
- २६ सनातनजैनग्रंथमालायां कविभ्यां आदिपुराणं रचितं-दो कवियोंने आदिपुराण रचा । अरिभिः स हतः दुश्मनोंने उसे मार डाला। मुनिभिः सुप्रवर्तितं-मुनियोंने अच्छा किया। कपिमिः वनमिदमाक्रांतं बंदरोंसे यह बन घिर गया । सस्कृत बनाओ.- अग्निने इस घरको जलाया। दुश्मनोंने इसको घेर लिया। राजाने यह वात कही। मुनियोंने उनको क्षमा किया। कवियोंने बहुतसे ग्रंथ लिखे। उकारांत। १ बंधुना सह विवादो न कार्य:-भाईके साथ विवाद नहीं करना चाहिये । शत्रुणा मैत्री न उचिता-दुश्मनके साथ मित्रता ठीक नहीं है। गुरुणा वयं आदिष्टा:-गुरुने हम लोगोंको आज्ञा दी। २ शिशुभ्यां इदं कृतं-दो लड़कोंने यह काम किया। तरुभ्यां गृहं वेष्टितं-दो पेड़ोंने घरको घेर लिया । परशुभ्यां वृक्षश्छिन्न-दो परशुओं ( कुल्हाड़ी ) ने वृक्ष काटा । ३ साधुमिः उपकृता वयं-साधुवोंसे हम उपकृत हुये। अंशुमिः प्रकाश्यते जगत्-किरणोंसे ससार प्रकाशित होता है। प्रभुभिः भृत्या आदेष्टव्या:-स्वामियोंसे नौकर लोग आज्ञापित होने चाहिये संस्कृत बनाओ- सूरजने (भानु) किरणे फैलाई। किरणोंने जगत् प्रकाशित किया। बंधुओंने आशाकी। दो बाहुओंसे उसने ऐसा किया । दो शत्रुओंने उसे घायल (आहत) किया। चंद्रमा (हिमांशु) रात्रिमें (नक्तं) शोभता है। ऋकारांत । १ गृहीत्रा दाता आर्चितः-गृहीताने दाताको पूजा । सवित्रा राजते दिवा-सूर्यसे दिन शोभित होता है।
संस्कृतप्रवेशिनी। २७ श्रोत्रा पृष्टो वता-श्रोतासे वका पूछा गया । २ भ्रातृभ्यां आदिष्टोऽहं-दो भाइयोंने मुझे आज्ञा दी। कर्तृभ्यां कृतमिदं कार्य-दो खामियोने यह काम किया । उपदेण्दृभ्यां सर्वत्र भ्रांतं-दो उपदेशकोंने सर्वत्र भ्रमण किया । ३ जेतृमिर्वद्धा अरयः-जीतनेवालोंने शत्रुओंको वाध लिया। दोग्धृमिः धेनुर्मुक्ता-दोहनेवालोंने गाय छोड़ दी। पितृभिः पुत्राः पाठनीयाः-पिताओंको पुत्र पढाने चाहिये । संस्कृत बनाओ- छेदनेवालेने (छेत्तृ) वृक्ष काटा। माता पिताके साथ (माता पितृ) विवाद नहीं करना चाहिये। भाइयोंके साथ तेने धन चुरा- या। देवके साथ (विधात) कलह अनुचित है। व्यंजनांत पुंलिग। १ (च) जलमुचाचातकोसंतुष्टिं गच्छति-मेघसे चातक सतुष्ट होता है। (ज) परिवाजा सर्वत्र गंतव्यं-सन्यासीको सब जगह जाना चाहिये। (ज) सम्राजा राजान आदेष्टव्याः-चक्रवर्ती द्वारा राजा लोग आज्ञा- पित होने योग्य हैं। (त्) पापकृता दुःखमनुभूतं-पापीने दु ख भोगा । (मत्) बुद्धिमता आशुकार्यसाध्यं बुद्धिमान्को शीघ्र कार्य करना चाहिये। (मत्) चलवता सह विरोधो न विधेयः-बलवान्के साथ विरोध न करना चाहिये। (अत्) गायता रुदन अहं पृष्टः-गातेहुयेने मुझ रोते हुयेको पूछा। (द) सुहृदा सह सर्वदा वसनीयं-मित्रके साथ हमेशा रहना चाहिये। (अन्) राज्ञा सह विरोधो न विधेयः--राजाके साथ विरोध न करना (अन्) मूर्धा अहं तंप्रणतवान्-मस्तकसे मैंने उसे प्रणाम किया। [चाहिये। (अन्) दुरात्मना सह वार्तालापोन कार्यः-दुरात्माके साथ बातचीत न करनी चाहिये।
२८ सनातनजैनग्रंथमालायां- (इन्) स्वामिना भृत्य आदिष्टः-स्वामीने नौकरको हुक्म दिया। (इन्) मंत्रिणा राजा उक्तः-मंत्रीने राजासे कहा । (अस) चंद्रमसा रात्रिः राजते-चंद्रमासे राति शोमित होती है। (वस्) विदुषा धर्मः कार्य:-विद्वान्को धर्म करना चाहिये । (वस्) जग्मुषा सह सर्वे गताः-जानेवालेके साथ सब गये। (इयस्) ज्यायसा अहं आज्ञप्तः-बड़े भाईने मुझे आज्ञा दी। २ वारिसुग्भ्यां पर्वतः कुंवितः-दो मेघोने पर्वत ढक लिया। देवराड्भ्यां देवा आदिष्टाः-दो इंद्रोने देवोंको आज्ञा दी । पुण्यकृद्भ्यां सुखकरं एतत् स्थानं-दो पुण्यात्माओसे यह स्थान सुख शानवद्भ्यां अहं उपदिष्टः-दो ज्ञानवालोने मुझै उपदेश दिया। [कर है। ज्योतिष्मद्भ्यां इदं जगत् प्रकाशते-ज्योतिवाले दो पदार्थोसे यह जगत गायद्भ्यां ते संतुष्टाः-दो गानेवालोसे वे सतुष्ट होगये। [प्रकाशित होता है । सभासद्भ्यां सभा सम्पन्ना-दो सभासदोंसे सभा अच्छी हो गई। राजभ्यां सह व्रजति सम्राट्चक्रवर्ती दो राजाओंके साथ चलता है। उक्षभ्यां भग्नोऽयं नदीतट:-यह नदीका किनारा दो साड़ोंने तोड़ा है। धर्मात्मभ्यां शोभते गृहं-दो धर्मात्माओंसे घर शोभता है। पक्षिभ्यां इह आगतम्-दो पक्षी यहा आये । तपस्विभ्यां सह स वनं गतः वह दो तपस्वियोंके साथ वनको गया । उदारचेतोभ्यां ग्रंथोऽयं दत्तः-उदारचित्तवालोने यह अथ दिया । विद्वद्भ्यां शिक्षितोऽयंजनः-दो विद्वानोंने इस आदमीको शिक्षित किया । ज्यायोभ्यां कनीयान् आदिष्टः-टो वडे भाइयोने छोटेको आज्ञा दी। ३ जलमुग्भिः आकाशः कृष्णो जातः-मेघोसे आकाश काला होगया। राजराड्मिः साधवः सेविताः-महाराजाओंसे साधु सेये गये। पापद्भिः सह निवासो न विधेयः-पापी लोगोके साथ निवास न चक्षुष्मद्भिरिदं दृष्टव्यं नेत्रवालोंको यह देखना चाहिये। [करना चाहिये । नामवन्द्रिः धयं पृथाः-ज्ञानियोंने हमे पूछा । -- संस्कृतप्रवेशिनी। २९ धर्म ध्यायद्भिः मुक्तिर्लब्धा-धर्मको ध्याते हुओंने मुक्ति पाई। ग्रामंगच्छद्भिः तृणानि स्पृष्टानि-प्रामको जाते हुयोने तृणोका स्पर्श किया। दिविषद्भिः साहाय्यं कृतं-ठेवतायोंने सहायता की। सुहृद्भिः महत् उपकृतं-मित्रोंने वडा उपकार किया। राजमिः यथाक्रम त्रिवर्ग सेव्यं-राजायोको क्रमानुसार त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का सेवन करना चाहिये। अशामिः निर्मितमिदं-पत्थरोसे यह बनाया है । द्विजन्ममिः उपदिष्टं इदं शास्त्रं ब्राह्मणोंने इस शास्त्रका उपदेश दिया है। ज्ञानिभिः प्रशंसितोऽयं जनःज्ञानियोंने इस पुरुषकी प्रशंसा की है। दिवौकोभिर्जिनः पूजितः-देवताओंसे जिन पूजित हुये है । उदारतोभिः दानं दत्तं-उदारचित्तवालोंने दान दिया । विद्वद्भिः विचार्य कार्य-विद्वानोंको विचार करके करना चाहिये । जग्मिवद्भिः तस्थिवांसः गदिताः-मनकारियोने वैठेहुओंसे कहा। कनीयोभिः ज्यायांसः प्रणमिताः-छोटोंने वडोको प्रणाम किया। नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य वनावो-- सुहृद्भ्यां, गुणवद्भिः, उदारचेतसा, धर्मवचोभिः, महामनोमिः, गरीयोभ्यां, लघीयसा। संस्कृत वनावो- जो प्रेमके साथ पत्थरकी भी पूजा करते हैं वे लोग देवताओंसे (दिवौकस्) उपकृत होते हैं। सच्चे मित्रोंसे (सुहृद) बहुत उप- कार होता है। क्योंकि वे उदार चित्तवाले होते हैं। ब्राह्मणोंसे (द्विजन्मन्) पहिले बहुतसे ग्रंथ रचे गये हैं। तपस्वियोंने सच्चे धर्मका उपदेश दिया उसको सुनकर विद्वान मुग्ध हुये। भक्ति वाले श्रावकोंने इक्षुरसका आहार दिया। उसे देखकर देवताओं ने रक्षवृष्टि की । पापियों (पापकृत् ) ने पुन्यात्माओंको दुःख तद्-तेन यद्येन यैः ३० सनातनजैनग्रंथमालायां दिया। शरीरवालोंको (वपुष्मत्) धर्म अवश्य करना चाहिये । छोटे भाइयोंने वडे भाइयोंसे कहा। सर्वनाम पुंलिंग। एकवचन द्विवचन बहुवचन सर्व-सर्वेण साभ्यां सर्वैः ताभ्यां तैः याभ्यां किम्-केन काभ्यां कैः इदं-अनेन आभ्यां एभिः अदस्-अमुना अमूभ्यां अमीभिः अस्मद्-मया आवाभ्यां अस्माभिः युष्मद् त्वया युवाभ्यां युप्माभिः सस्कृत वनावो- उस पंडितने उसे पराजित किया। जिस आदमीने यह काम किया है वह प्रशंसाके योग्य है। किसने यह कविता बनाई है। इस विद्वानने यह बात कही है। इस पंडितके साथ मैंने बात- चीत की। क्या तुमने इसे पढा है। सब लोग इस बातको कहते है। जिन्होंने धर्मका उपदेश दिया वे पूजनीय है। इन लोगोंने जैनेंद्र पढा है। हमलोगोंने आज भगवानकी पूजा की। स्वरांत स्त्रीलिंग एकवचन द्विवचन बहुवचन आ--कन्यया कन्याभ्यां कन्याभिः इ--मत्या मतिभ्यां मतिभिः इ--ऊर्ध्या ऊर्मिभ्यां ऊर्मिभिः इ--आपध्या ओषधियां ओपधिभिः ई-नद्या नदीभ्यां नदीभिः ३१ उ--रेवा - संस्कृतप्रवेशिनी। ई-तस्थुप्या तस्थुषीभ्यां तस्थुषीभिः रेणुभ्यां रेणुभिः उ--धेन्वा धेनुभ्यां धेनुभिः उ--चंच्या चंचुभ्यां चंचुभिः क--बध्वा वधूभ्यां वधूभिः ऊ-चम्वा चमूभ्यां चमाभिः ऋ--दुहित्रा दुहितुभ्यां दुहितृभिः व्यंजनांत । एकवचन द्विवचन वहुवचन च-ऋचा ऋग्भ्यां ऋग्भिः वाचा वाग्भ्यां वाग्भिः त्वचा त्वग्भ्यां त्वग्भिः विपद्भ्यां विपद्भिः परिषदा परिषद्भ्यां परिषद्धिः शरदा शरद्भ्यां शरद्भिः वीरुद्भ्यां वीरुद्भिः समिधा समिद्भ्यां समिद्भिः क्षुधा क्षुद्भ्यां क्षुद्भिः योपिद्भ्यां योषिद्भिः सरिता सरिद्भ्यां सरिद्भिः विद्युद्भ्यां विद्युद्भिः सर्वनाम-स्त्रीलिंग सर्व-सर्वया सर्वाभ्यां सर्वाभिः अपर-अपरया अपराभ्यां अपराभिः अन्य-अन्यया अन्याभ्यां अन्याभिः ताभ्यां ताभिः द् विपदा ध् वीरुधा त्-योषिता विद्युता तद् तया ३२ सनातनजैनग्रंथमालायां- यद्यया याभ्यां याभिः किम्-कया काभ्यां काभिः इदम्-अनया आभ्यां आभिः अदस्-अमुया अमूभ्यां अमूभिः ऊपर लिखे शब्दों से एक २ शब्द लेकर वाक्य बनाओ। संस्कृत वनाओ- केवल अर्थकरी विद्यासे क्या मतलव है। सुंदर भार्यासे घर शोभता है। लड़कियोंके साथ लड़के खेलते है। किस लताने तुमको मोहलिया। विदुषी नारीके साथ वार्तालाप करना चाहिये। किस (स्त्री) ने यह काम किया है । मैं भूखसे पीडित हूं। नदीसे वहुत उपकार है । तोता (शुक) लाल चोंचसे आम खाता है। नवीन बहुवोंके साथ दासियां वाते करती हैं। दुर्जन मीठे वचनोंसे वशीभूत करता है। इन स्त्रियोंने इस ग्रंथको वनाया है। माताने पुत्रोंके साथ भोजन किया। सेनाने (चमू) घर घेरलिया। आपत्तिने उस नगरको देखा भी नहीं था। शुद्धकरो- तै.वालाभिः सह कुत्र गच्छसि त्वं?। अनया नरेण किं कथितं । तया मातृणा आदिष्टा सा।वधूना कदा आगतं । अल्पजलै. सरिद्भिः देशो विभक्तः। संपदेन विरहिता तप्यति वधूः । ज्ञानं वितरद्भिः परिषदैः आज्ञप्तः सः । मनोहारिणी अनेन योषिता मोहिता सर्वे । दुहिता क. स्त्री न संतुभ्यति । स्त्रीलिंगके स्थानमे पुलिग करके वाक्य बनावो- परिसूचनया (१)विनाऽपि राज्ञा शाता जातिकुलोन्नतिस्तदीया। परेगितशया तया सखी गदिता। १-हस्व तथा दीर्घ अ, इ, उ, ऋसे परे हस्व तथा दीर्घ अ, इ, उ, ऋ होंगे तो उन दोनोंके स्थानमें एक दीर्घ हो जायगा । जैसे-विना अपि, इस उदाहरणमें संस्कृतप्रवेशिनी। ३३ नरनाथ ! युवा यदा स दृष्टो भवतो (आपकी) देहजया महेंद्र- मर्दी। मुषिता वदनश्रिया मम (मेरी) श्रीरनैयेतीव (अनया इति इव) रुषोप (रुषा उप) जातमूछी विदधाति मुहुर्मुहुर्मंगाक्षी विपनिष्यंदिमिरंशुभिः शशांकः। वनवह्निशिखावलीव (आवली इव) सापि (अपि) ज्वलयत्यं (ति+अं) वुजकोमलं तदंगं । एकवचनके स्थानमें द्विवचन करके लिखा- विदुष्या तया अहं आहूतः। कन्यया पृष्टा सा गदितवती । सरिता अयं देशो विभक्तः। धेन्वा यवा भक्षिताः। अमुया दु. श्चरित्रया किं कृतं । नपुंसकलिंग। नोट-नपुंसकलिंगमें तृतीया आदि विभक्तियों के रूप प्रायः पुलिंगके समान होते हैं तो भी स्पष्टज्ञानके लिये नीचे लिख देते हैं । - 'ना' में के 'आ' से पर 'अपि' का 'अ' होनेसे दोनो मिलकर एक 'आ' हो गये तो "विनापि" हुआ। इसी तरह दधि+इदं दधीदं, नदी+इयं नदीयं, मधु+ उच्छिष्टं मधूच्छिष्टं, वधू ऊढा-वधूढा, पितृ+ऋकार =पितृकार आदि जानना । २-हख अथवा दीर्घ 'अ' से परे ह्रख अथवा दीर्घ कोई भी इ, उ, ऋ होंगे तो उन दोनोंके स्थानमें क्रमसे ए, ओ, अर् हो जायेंगे। अर्थात् 'अ' से परे (वाद) में इ, ई होगी तो दोनोंके स्थानमें 'ए', उ, ऊ होंगे तो 'ओ' ऋ, ऋ होगे तो 'अर्' होगे । जैसे-अनया+इति, इसमें 'या' के 'आ' से परे 'इति' का 'इ' है इससे दोनों (आ, इ) के स्थानमें एक 'ए' होनेसे 'अनयेति' होता है। इसी तरह रुषा+उप-रुषोप, महा+ऋषि-महर्पि, आदि समझना । ३-हख तथा दीर्घ इ, उ, ऋ के स्थानमें क्रमसे य, व, र हो जाते हैं यदि उनके वादमें कोई स्वर हो। परंतु जहा नं० १ नियमकी प्राप्ति होगी वहा यह नियम नहीं लगेगा। जैसे ज्वलयति+ अवुज यहा पर 'ति' में के 'इ' को 'अंबुज' का 'अ' बादमे होनेसे 'य' हो गया तो ज्वलयत् य् अवुज हुआ सव अक्षरोंको मिलाकर लिखनेसे ज्वलयत्यंबुज हुआ। इसीतरह-मधु+अपनय-मध्वपनय, धातृ अश+धात्रंश आदि समझना ।
सनातननग्रंथमालायां- एकवचन द्विवचन बहुवचन कुसुमेन कुसुमाभ्यां कुसुमैः। दानेन दानाभ्यां दानः। वारिणा वारिभ्यां वारिभिः मधुना मधुभ्यां मधुमिः। सानुना सानुभ्यों सानुभिः। व्यंजनांत। श्रीमता 'श्रीमदृश्यां श्रीमद्भिः। शर्मणा शर्मभ्यां शर्ममिः। पयसा पयोभ्यां पयोमिः। चेतसा चेतोभ्यां चेतोमिः। ज्योतिषा ज्योतियों ज्योतिर्मिः। धनुषा धनुयों धनुर्भिः। सर्वनाम। सर्वेण सान्या तान्या तैः। इत्यादि पुलिंगके संस्कृत वनाओ- समान जानना। लडका दूधके साथ चांवल खाता है। इस धनुषसे लोग मस्तक छेदते हैं। बडे २ घरोंसे क्या प्रयोजन है। मोटे शरीरसे लोग दुवं पाते हैं। सर्वैः। - - संमतप्रमेशिनी। वाच्य परिवर्तन । प्रथम पाठ। के और कवतु (द) कर्तृवाच्य कर्मवार्य १ अहं शियं स्पृष्टवान् । मया शिशुः स्पृष्टः। मैंने लडके को छुआ। मेरे द्वारा लडका छुआ गया । अहं विद्वांसी पूजितवान् । मया विद्वांसौ पूजितौ। मैंने दो विद्वानोंको पूजा। मेरे द्वारा दो विद्वान पूजे गये। त्वं गुरुं पृष्टवान् । त्वया गुरुः पृष्टः। तुमने गुरुसे पूछा। तुम्हारे द्वारा गुरु पूछे गए। त्वं ग्रंथान् पठितवान् । त्वया ग्रंथाः पठिताः। तुमने ग्रंथ पढे। तुम्हारे द्वारा प्रथ पढे गए। ४-वाक्य बनानेकी रीति विशेष (प्रकार) को वाच्य कहते है उस वाच्यके तीन भेद हैं-कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य, भाववाच्य । कर्तृवाच्यमें कर्ताके आधीन किया रक्खी जाती है। अर्थात् कर्ताका जो पुरुष (उत्तम, मध्यम, अन्य) होगा और जो वचन होगा वही पुरुष और वचन क्रियाका भी रखना होगा। जैसा कि प्रथम भागमें बतलाया गया है। परंतु कर्मवाच्यमें क्रिया कर्मके आधीन होती है अर्थात् कर्मके पुरुष और वचनके अनुसार क्रियाके भी पुरुप वचन होते हैं। काके अनु- सार नही, कता चाहे कोई पुरुष और कोई वचनमें रहे। और जब धातु अकर्मक है उसका कर्म न होनेसे क्रिया सर्वदा अन्यपुरुष तथा एकवचनकी होती है उसे भाववाच्य कहते हैं। इस तरह हम एक वाक्यको दो तरह. (कर्तृवाच्य या कर्मवाच्य कर्तृवाच्य या भाववाच्य) से बोल सक्ते हैं। ५। सकर्मक धातुओंसे कर्मवाच्यमें, तथा अकर्मक धातुओंसे कर्तृवाच्य या भाववाच्यमें 'क' प्रत्यय होता है। कवतु प्रत्यय कर्तृवाच्यमे ही होता है। इन दोनो प्रत्ययातोके रूप बनाने के नियम प्रथमभाग ८ वे अध्यायम देखो। ६-कर्मवाच्य होनेसे कीमे तृतीया विभक्तीका और कर्ममें प्रथमा विभकीका प्रयोग करते हैं। धातुके रुपमे पुरुष, वन कर्मके आधीन रहते हैं तोके माधीन नहीं ।
३६ सनातनजेनग्रंथमालायां- . मुनिः धर्म उपदिष्टवान् । मुनिना धर्मः उपदिष्टः। मुनिने धर्मका उपदेश दिया। मुनि द्वारा धर्म उपदेशा गया । कारु, वृक्षौ छिन्नवान् । कारुणा वृक्षौ छिन्नौ। बढईने दो वृक्ष काटे। वढई द्वारा दो पेड़ काटे गये। २ आवां ईश्वरं पूजितवतो। आवाभ्यां ईश्वरः पूजितः। हम दोनोंने भगवान्को पूजा । हम दोनोके द्वारा भगवान् पूजे गये। आवां पितरौ प्रणतवंतौ। आवाभ्यां पितरौ प्रणतो। हम दोजनोंने मातापिताको प्रणामकिया। हम दोके द्वारा मातापिताप्रणाम कियेगये। युवां अश्वं दृष्टवंतौ। युवाभ्यां अश्वो दृष्टः। तुम दोने घोडा देखा। तुम दोके द्वारा घोडा देखा गया। युवां कूपो खनितवंतो। युवाभ्यां कूपों खनितौ। तुम दोने दो 'कुए खोदे। तुम दोके द्वारा दो कुए खोदे गये । अश्वौ घासान् खादितवंतौ। अश्वाभ्यां घासाः खादिताः। दो घोडोने घास खाई। दो घोडोंके द्वारा घास खाई गई। प्रभू भृत्यौ आदिष्टवंतौ। प्रभुभ्यां भृत्यौ आदिष्टौ। दोखामियोंने दो नोकरोंको आज्ञा दी। दोखामियों द्वारा दो नोकर आज्ञापित हुए। ३ वयं चंद्रमीक्षितवंतः। अस्माभिश्चंद्र ईक्षितः। हमने चंद्रमा देखा। हम लोगोंके द्वारा चंद्रमा देखा गया। वयं वालान् शिक्षितवंतः। अस्माभिर्वालाः शिक्षिताः। हमने लडकोंको पढाया । हम लोगोंके द्वारा लडके पढाये गये। यूयं मोदकान वितीर्णवंतः। युष्मामिर्मोदका वितीणीः। तुमने लड्डू वाटे। तुम लोगोंके द्वारा लाडू वाटे गये। जना अर्थ लन्धवंतः। जनैरों लब्धः। मनुष्योंने धन पाया। मनुष्योंके द्वारा धन पाया गया । बालका लाजान विकीर्णवंतः । बालकैलांजा विकीणा । नहफोंने धान विखेरे। लडकों द्वारा धान बिखेरे गये।। T ।
संस्कृतप्रवेशिनी। संस्कृत वनाओ- विद्वानोंके द्वारा इस ग्रंथकी प्रशंसा कीगयी। श्रावकोंके द्वारा मुनिलोग पूजे गये। हमारे द्वारा यह वालक पढाया गया। सूर्य के द्वारा यह लोक प्रकाशित किया गया। तुमारे द्वारा दो पर्वत अतिक्रमण किये गये। पुत्रशोक द्वारा पिता दुःखी किया गया। विद्यार्थी द्वारा अध्यापक पूछा गया। नदी द्वारा ग्राम विभक्त किया गया। द्वितीय पाठ। कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य । श्रावकः आर्यिकां अर्चितवान्-श्रावकेन आर्यिका आर्चिता। मुनिः श्राविके पृष्टवान्-मुनिना श्राविके पृष्टे। सर्वे नारीः मानितवंत:-सर्वः नार्यः मानिताः। के कथां कथितवंत:-कैः कथा कथिता। वाच: उच्चारितवंत:-तैः वाच: उच्चारिताः। वालको नदी ईक्षितवंती-चालकाभ्यां नदी ईक्षिता। स्वामी भाया पृष्टवान्-स्वामिना भाया यूयं सरितः अवनाहितवंतः-युष्माभिः सरितः अवगाहिताः। सर्वे परिषदं मानितवंतः सर्वैः परिषद् मानिता। ते पृष्टा। शुद्ध करो- अनया नरेण मुनि इमं अर्चिता। कया नायर्या स पृष्टवान् । पाठकेन पाठिका पृष्टवती। चम्चा पर्वता निर्वृक्षाः कृतवंतः। केन सुमधुरां वाचं उक्ता। कैरियं कथां कथितवती। ताभ्यां वालि. काभ्यां माता पृएवती। कर्णधारः नद्यः तीणीः । बंधुभ्यां मुनि सेवितवंतौ।
सनातनजैनग्रंथमालायां- संस्कृत वनाओ-- पवन द्वाराजल विखेरा गया। अग्निद्वारा लड़की दग्धकी गयी। लडकी द्वारा माता सेई गयी। किस दोस्त्रीके द्वारा अपराध हुआ। मेघ द्वारा चातक संतुष्ट किये गये। दो नंदों (ननांड) द्वारा वधू प्रशंसित हुई। किस सेनापति द्वारा यह सेना पराजितकी गई। किस अध्यापक द्वारा ये छात्री पढाई गई (पाठिताः)। वने - तृतीय पाठ। कर्तृवाच्य । कर्मवाच्य। अहं पुस्तकं पठितवान् । मया पुस्तकं पठितं। अहं हटवान् । मया घने दृष्टे। पक्षी फलानि खादितवान् । पक्षिणा फलानि खादितानि । अग्नि: इंधनं दग्धवान् । अग्निना इंधनं दग्धं। वीरः धनूंषि कांक्षितवान्। वीरेण धनूंषि कांक्षितानि । शिशुः पयांति पीतवान् । शिशुना पयांसि पीतानि । हिंदी बनाओ- नृपेण सुतं वीक्ष्य चिंतितं यत् (कि) मयाऽध स्वजन्मफलं लब्धं। मदीयं (मेरा) कुलमनेत पुत्रेण गुणैर्दीपितं । यथा कुसुमेन वृक्षा, नवयौवनेन वपूंषि, प्रशमेन पंडिताः शोभिता भवंति तथा सुपुत्रेण कुलं दीप्तं भवति । अथ केनचिद् दूतेन राजसभामागत्योक्तं नृप ! स मत्प्रभुः स्वतेजसा उद्धतानपि राशस्तप्तवानिति विनयरहितं त्वां कथितवान् यत् (कि) त्वदीया वंशजा मदीयान्वयजं सदा प्रणतवंतः परं त्वया सा पद्धतिलंधिता। मदेन मूढवुद्धिः-जन्मना अंधश्चक्षुषाइव वुझ्या स्वहितं न पश्यति । मदादयः षड् रिपवो नयविद्भिर्गदिताः । ते मदीयनुपेण पूर्व एव जिताः । यः स्वमनोभवं मदादिरूपं-ई.
संस्कृतप्रवेशिनी। - जेतुं न शक्तस्तं त्यक्त्वा संपदः सत्वरमेव व्रजति । मया त्वदीया शठता चिरमवधीरिता परं. त्वया तद् सर्व न विचारितं । "मदीयो द्विपाधिपः स्वयमागत्य त्वदीयं पुरं संविष्टवान । स त्वया धृतः" (पकड लिया) इति शीघ्रगामिभिश्चरैः (दूतैः ) निश्चित्य निवेदितं । अतः स्वयमेव तं गजराज मदीयसमीपं प्रेषय (भेजो) । नो चेत् स मत्स्वामी त्वां अर्दिष्यति । संस्कृत वनाओ- उस रानीने सुंदर पुत्र जना । लडकोंने पुस्तकें पढी। नौकरोंने भार ढोया।राजाने वहां एक हिरण देखा । हिरण हररोज (प्रत्यहं) धान्य खाता था। एक दिन (एकदा) वह किसानके द्वारा देखा गया। मेरे द्वारा पत्र लिखा गया। नीचे लिसे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- दयावत्या, सुंदराणि, उद्योगिभिः पुरुषेण, नद्या,ऋजुनी, उदार- चेतसा, पवित्रं, क्रंदत्या, गच्छंत्या, जिनं, अर्चत्या, किरणः, रज्जुभ्यां, दृष्टेन, द्विपाधिपेन, चरैः, संप्रविष्ट, ऊढं। चतुर्थ पाठ। कर्तृवाच्य । भाववाच्य । राजा जीवितवान् । राशा जीवितं । घेनुः गतवती। घेवा निर्धनः कठितवान् । निर्धनेन रूप्यक: कांतवान् । रूप्यकेण वीर: क्रांतवान्। वीरेण मालकाः फ्रीडितवंतः। बालकैः क्रीडितं। हस्तिनः नर्दितवंतः। हस्तिमिः नर्दितं । ७-भाववाच्यमें क्रिया सर्वदा एकवचनकी होती है कर्ता चाहें कोई वचनका हो। औरि लिंग नपुंसक लिंग ही होता है। गतं। कठितं। कांत। क्रांती चरितं। तप्त। सनातनजैनग्रंथमालायां- सिंहः गर्जितवान् । सिंहेन गर्जितं । मृगाः चरितवंतः। मृगैः सेनापतिः जितवान् । सेनापतिना जितं। शिशुः ज्वरितवान् । शिशुना ज्वरितं । औषधयः ज्वलितवत्यः। औषधिभिः ज्वलितं। मनः तप्तवत् । मनसा दैवं 'फलितवत् । देवेन फलितं। साः सृतवंतः। सपैः सृतं । बालिका होच्छितवती। बालिकया होच्छितं। पुष्पाणि स्फुटितवंति। पुष्पैः स्फुटितं । नार्यः ईषितवत्यः। नारीमिः ईषितं। परिश्रमिणौ ईहितवंतौ। परिश्रमिभ्यां ईहितं । संपत् एधितवती। संपदा पधितं। वेश कचितवत् । वेशेन कचितं। गुणग्राहिणः कत्थितवंतः। गुणग्राहिमिः कत्थितं। मनः क्षुब्धवत् । मनसा अध्यवसायिनः चेष्टितवंतः। अध्यवसायिमिः चेष्टितं। ब्रह्मचारिणौ दीक्षितवंतौ। ब्रह्मचारिभ्यां दीक्षितं। रत्नानि धोतितवंति। रतैः घोतितं। वाराणसी प्रथितवती। वाराणस्या प्रथितं । साम्राज्य प्रसितवत् । साम्राज्येन प्रसितं। चित्रं मोदितवत् । चितेन मोदितं । दीपः वर्चितवान् । दीपेन नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनावो- वर्द्धितं, व्यथितं, शंकितं, शिक्षितं, शोभितं, श्वेतितं, सितं, स्फुटितं, मृतं, उद्विग्नं, ग्लानं, अतितं, मिषितं, रुचितं, गर्वित, क्षीणं, फुलं, उषितं, रुदितं । क्षुब्ध। वचितं। - * mire १ संस्कृतप्रवेशिनी। मोक्ष पंचम पाठ। वर्तमान (लविभक्ती ) काल । अन्यपुरुष कर्तृवाच्य। *कर्मवाच्य । १ छात्रः जैनेंद्र पठति-छात्रेण जैनेंद्र पच्यते शिप्यः ग्रंथ लिखति-शिष्येण ग्रंथो लिख्यते श्रावकाः धर्म चरंति-श्रावकैः धर्मः चर्यते मुनिः इच्छति-मुनिना मोक्षः इष्यते सेने ग्राम रक्षतः-सेनाभ्यां ग्रामो रक्ष्यते अग्निः काष्ट्र दहति-अग्निना काष्ठो दह्यते भृत्यः ग्राम गच्छति-भृत्येन ग्रामो गम्यते शिशुः फलं खादति-शिशुना फलं खाद्यते विद्यार्थी उपाध्यायं पृच्छति-विद्यार्थिना उपाध्यायः पृच्छ्यते स्वामी सेवक वदति-स्वामिना सेवक उद्यते सर्पः वृद्धां दशति-सपेण वृद्धा दंश्यते दासी आदिशति-राशा दासी आदिश्यते पिता पुत्रं चुंबति-पित्रा पुत्रः चुंब्यते अहं वालकं पश्यामि- पश्यामि-मया चालको दृश्यते त्वं मुनि अर्चसि त्वया मुनिः अय॑ते आवां वक्तारं गदाव:-आवाभ्यां वक्ता गद्यते * कर्मवाच्यमें क्रियाके पुरुष और वचन कतीके अनुसार नहीं होते। कर्मके अनुसार होते हैं अर्थात् यदि कर्म एकवचन है और युष्मद, अस्मद्से मिन्न है तो क्रिया भी एकवचन और अन्यपुरुषकी रक्खी जायगी कती चाहे कोई वचनका और कोई पुरुषका हो । कर्मवाच्यमें (प्रथमपुरुषमें) धातुओंसे 'यते, येते, यंते' प्रत्यय क्रमसे एकवचन, द्विवचन, बहुवचनमें लगते हैं। और परस्मैपदी, उभयपदी, आत्मनेपदी धातुओसे केवल आत्मनेपद ही होता है। राजा ६ ४२ सनातनजैनग्रंथमालायां- २ पुत्राः लमे-मया त्वं युवां शव अर्दथः-युवाभ्यां शत्रुः अर्थते वयं जिनं अर्हामः-अस्माभिः जिन: अद्यते यूयं घट सृजथ-युष्माभिः घट: सृज्यते पितरौ प्रणमंति-पुत्रैः पितरौ प्रणम्येते भृत्या: अश्वौ स्पृशंति-भृत्यैः अश्वौ स्पृश्येते राजा মু प्रहरति-राज्ञा হাসু प्रहियेते सेवकः तरू आरोहति-सेवकेन तरू आरोते श्रावकाः जिनौ यति-श्रावकैः जिनौ इज्येते अहं विधे विद्ये लभ्येते घटौ यच्छसि वया घटौ यम्येते आवां वस्तुनी याचाव:-आवाभ्यां वस्तुनी याच्येते युवां पुष्पे जिघ्रथ-युवाभ्यां पुष्पे घ्रायेते वयं शंखे धमामः-अस्माभिः शंखे ध्मायेते अजे नयथ-युष्माभिः अजे नीयेते ३ जनाः नारी: मानंते-जनैः नारी: मान्यते कर्षकाः क्षेत्राणि उक्षति-कर्षकैः क्षेत्राणि उक्ष्यंते छात्राः शास्त्राणि मनंति-छात्रैः शास्त्राणि सायंते धार्मिकाः ग्रंथान् वितरंति-धार्मिकैः ग्रंथाः वितीर्यते प्रभवः अनुजीविनः तर्जति-प्रभुमिः अनुजीविनः तज्यंते विदुषः शंसामि-मया विद्वांसः शंस्यंते जनान् लुभसि त्वया जनाः लुभ्यंते यूयं अहं म. ८-ऋकारात धातुओंके अंतके 'ऋ'कारको 'रि' आदेश होजाता है यदि 'या' (भाववाच्य, कर्मवाच्यका प्रत्यय) लिङ् (आगे कहेंगे) प्रत्यय हुये हो। जैसै ह ( हरना ) धातुसे कर्मवाच्यका रूपवनानेके लिये यते प्रत्यय लाये तो 'हृ+यते' एसी अनस्था हुई अव इस नियमसे ऋके स्थानमें रि होगया तो वियते रूप हुआ इसी प्रकार द्विवचनादिकमें छियेते, हियंते, आदि समझना ।
आवां युवां वयं यूयं संस्कृतप्रवेशिनी। ४३ क्षेत्राणि शीकाव:-आवाभ्यां क्षेत्राणि शीक्यंते जलानि मथथ:-युवाभ्यां जलानि मध्यंत হারুন तामः-अस्माभिः तर्धते गृहाणि प्रविशथ-युष्माभिः गृहाणि प्रविश्यते शत्रवः पष्ठ पाठ। १ स वालो HE जना: त्वं युवां यूयं २ माता पितरो उत्तम पुरुप। मां महति-तेन अहं महो मां आमृशति-चालेन अहं आमृश्ये मां जयतः-ताभ्यां अहं जीये मां प्रणमंति-जनैः अहं प्रणम्ये मां ईक्षते-त्वया अहं ईश्ये मां सेवेथे युवाभ्यां अहं सेव्ये मां श्लाघध्वे-युष्माभिः अहं श्लाघ्ये आवां उपदिशति-मात्रा आवां उपदिश्यावहे आवां तर्जत:-पितृभ्यां आवां तयावहे आवां पश्यंति-साधुभिः आवां दृश्यावहे आवां लोचसे-त्वया आवां लोच्यावहे आवां कवेथे-युवाभ्यां आवां कव्यावहे. आवां कांक्षथ-युष्माभिः आवां कांक्ष्यावहे अस्मान् तुदति-दुर्जनेन वयं तुद्यामहे अस्मान् शसतः-बधकाभ्यां वयं शस्यामहे अस्मान् दहंति-अग्निभिः वयं दह्यामहे अस्मान् तिजसे-त्वया वयं तिज्यामहे अस्मान् गर्हेथे युवाभ्यां वयं गद्यामहे अस्मान् महथ-युष्मामिः वयं मयामहे साधवः त्वं युवा यूयं ३ दुर्जनः वधको अग्नयः त्वं युवां यूयं सनातनजैनग्रंथमालायां- - सप्तम पाठ। मासे २ बाला मध्यम पुरुष । त्वां स्पृशति-तेन त्वं स्पृश्यसे बालो त्वां पृच्छतः-चालाभ्यां त्वं पृच्छ्यसे सजनाः त्वां प्रशंसंति-सजनैः त्वं प्रशंस्यसे अहं त्वां महामि-मया त्वं आवां त्वां गदाव:-आवाभ्यां त्वं गद्यसे वयं त्वां दिशामः-अस्माभिः त्वं दिश्यसे युवां आमृशति-बालया युवां आमृश्येथे नायौँ युवां उद्धहेते-नारीभ्यां युवां उद्-उद्दथे गुरवः युवां मानंते-गुरुभिः युवां. मान्येथे अहं युवां जयामि-मया युवां जीयेथे आवां युवा तर्जावः-आवाभ्यां युवा तयेथे वयं युवां कत्थामहे-अस्माभिः यवां कत्थ्येथे युष्मान् निंदति-नाया यूयं निद्यध्वे आवां युष्मान् श्लाघावहे-आवाभ्यां यूयं श्लाघ्यध्वे वयं युप्मान् गहीमहे-अस्माभिः यूयं गयध्वे नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य वनाओ- विकीर्यसे, तीर्यते, गम्यते, तिज्यध्वे, लभ्यते, पठ्यते, सेव्ये, अय॑से, उहाध्वे, दृश्यामहे, दह्यते,मुच्यसे, शुच्ये, पीयंते, त्यज्यध्वे। संस्कृत बनाओ- दो गुरुओंसे दो विद्यार्थी तर्जित होते हैं । मेरे द्वारा इंद्रियसुख अनुभूत होते हैं। दो पुत्र द्वारा हम दो जने स्पर्श किये जाते हैं। सब लोगोंके द्वारा तुम प्रशंसित होते हो। दुर्जनोंके द्वारा हमलोग निंदित होते हैं। उनके द्वारा वे छोडे जाते हैं। पिताके द्वारा पुत्रको ३ नारी संस्कृतप्रवेशिनी। ४५ उपदेश दिया जाता है। हमलोगोंके द्वारा जैनेंद्र पढा जाता है। स्त्रीरागसे सव लोग ठगे जाते हैं । (प्र-तृ)मातापिताके द्वारा पुत्र ताडा जाता है। अष्टम पाठ। कर्तृवाच्य। भाववाच्य । शिशुः ज्वरति-शिशुना ज्वर्यते पक्षिणः कूजति-पक्षिभिः कूज्यते बाला हीच्छति-बालया होच्छ्यते दैवं फलति-देवेन फल्यते संपत् एधते-संपदा एभ्यते वेश कचति-वेशेन कच्यते रूप्यकं कनति-रूप्यकेण कन्यते कन्या: क्रीडंति-कन्याभिः क्रीड्यते उद्योगिनः ईहते-उद्योगिभिः ईह्यते ओषधयः ज्वलंति ओषधिभिः ज्वल्यते मृगाः चरंति-मृगैः चर्यते सिंहः गर्जति-सिंहेन गय॑ते छात्राः वसंति-छात्रैः उष्यते गजौ नर्दत:-गजाभ्यां नद्यते राजानः जयंति-राजभिः जीयते पुष्पाणि स्फुटंति-पुष्पैः स्फुट्यते त्वं वर्द्धसे-त्वया वय॑ते अहं भूयते ९।-भाववाच्यमें एकवचन, और अन्यपुरुषही होताहै द्विवचन, बहुवचन, उत्तमपुरुष, मध्यमपुरुष नहीं होते। M - भवामि-मया - - ४६ सनातनजैनग्रंथमालायां- नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य वनाओ- क्रम्यते, तप्यते, कळते, फल्यते, स्फूयंते, मिष्यते, वऱ्याते, पत्यते, अंच्यते, रुच्यते, रुद्यते, विलप्यते, गद्यते, वय॑ते, शिक्ष्यते, दीक्ष्यते, यत्यते, मोक्ष्यते, म्रियते, स्मर्यते, दीप्यते । नीचे लिखे वाक्योको वाच्य वदलकर लिखो- बौद्धपरिव्राट् श्रेणिकं गदति स्म । “हे कुमार! त्वं यदि स्वपितराज्यमिच्छसि तर्हि बौद्धधर्ममाचर। बौद्धधर्म एव एकः सत्यधर्मो वर्तते । विज्ञानादयः पंच संज्ञा एवात्र जीवान तुदंति । इदं जगत् प्रतिक्षणं नाशं गच्छति। यान् पदार्थान् भगवान् बुद्ध उपदिशति स्म ते एव समीचीनाः" इति । तहाक्यं श्रुत्वा कुमार- श्रेणिको बौद्धधर्ममाचरति स्म । तथा तेन एव सह कंचित् कालं वसति स। अथ बहुदिनपर्यतमनेन सह निवासोऽनुचित इति स कुमारस्ततः प्रतिष्ठते स्म। कुमारेण सह केनचित् श्रेष्ठिवर्येण इंद्र- दत्तनापि प्रस्थितं। कंचित् मार्ग गत्वातौ कांचित् नदी म पश्यतः। तां प्रवेष्टुं कुमारश्रेणिकः स्वकीये उपानही (जूते) हस्तमध्यं नयति स्म, इदं दृष्ट्वा श्रेष्ठिना विचारितं यत्-अवश्यमेवायं कुमारो निर्व- द्धिः, अन्यथा कथं लोकविरुद्ध कार्यमाचरति । शुद्ध करो- - त्वया अहं प्रच्छ्यसे। मया त्वं आदिश्ये। छात्रेण पुस्तक पठ्ये । तेन यूयं सेव्यते। युवाभ्यां आवां श्लाध्येथे । आवाभ्यां युवा संदिश्यावहे । युष्माभिः ईह्यते । मुनिना अहं भाण्यामहे । पंडितः शास्त्राणि गाोते। मात्रा पुत्री स्वज्यसे । सर्वैः वयं उपहस्यंते । सस्कृत वनाओ जिसमे क्रिया भाववाच्य वा कर्मवाच्य हो । कुमार श्रेणिकने जिस समय (यदा) कुमारी द्वारा भेजा हुआ (प्रेषितं) थोडा पानी देखा उस समय विचारा कि (यत्) इतने (इयत्) जलसे इतनी कीचड (पंक) किस तरह (कथं) दूर हो .
४७ 4 संस्कृतप्रवेशिनी। सक्ती है । पश्चात् एक वस्त्रखंडसे अपने (स्वीय) पैर पोंछे (मार्जित) और जलसे उनको धोया (धौत) इस चातुर्यको देख कर कुमारी बोली-अहो जैसा (यथा) यह कुमार बुद्धिद्वारा कार्य करता है (आचरति) वैसा कोई नहीं करता। पश्चात् विनय सहित प्रार्थना की (प्रार्थ्यते स्म) कि महाभाग! आज यहां (अत्र) ही भोजन करें। ऐसे वचन सुन कर कुमारने कहा। लोद विभक्ति। नवम पाठ। पठतु-छात्रेण चरतु-श्रावकेण अन्य पुरुप। कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य। १ छात्र: जैनेनं जैनेंद्र पठ्यता श्रावकः धर्म धर्मः चर्यतां क्षत्रियौ ग्राम रक्षतां क्षत्रियाभ्यां ग्राम: रभ्यतां अहं मोक्ष गच्छानि-मया मोक्षः गम्यतां आवां ग्रंथं इच्छाव-आवाभ्यां ग्रंथः इष्यतां वयं सेवक वदाम-अस्माभिः सेवकः उद्यतां गुरु पृच्छ-त्वया गुरुः पृच्छ्यतां युवां पुत्रं चुंबतं-युवाभ्यां पुत्रः चुंव्यतां यूयं मुनि अर्चत-युष्माभिः मुनिः अर्च्यतां पितरौ नमतु-पुत्रेण पितरौ , नम्येतां भृत्यो अश्वौ स्पृशतां-भृत्येन अश्वौ स्पृश्येतां श्रावकाः जिनौ यजंतु-श्रावकैः जिनौ इज्येतां अहं विद्य विद्य लभ्येतां आवां धर्मार्थो याचावहे-आवाभ्यां धर्मार्थों याच्येतां त्वं २ पुत्रः - ल-मया में सनातनजैनग्रंथमालायां- वयं शंखे धमाम-अस्माभिः शंखे धम्येतां त्वं विद्य लभस्व-त्वया विद्य' लभ्येतां युवा पुष्पे जिघ्रत युवाभ्यां पुष्पे घ्रायेतां यूयं अजे नयत-युष्माभिः अजे नीयेतां ३ जनः नारी: मानतां-जनेन नारी: मान्यता कृषीवलौ क्षेत्राणि उदंतु-कृषीवलाभ्यां क्षेत्राणि उध्यंतां छात्राः मनंतु-छात्रैः शास्त्राणि नायंतां अहं अनुजीविनः तर्जानि-मया अनुजीविनः तज्यतां आवां गृहाणि शीकाव-आवाभ्यां गृहाणि शीक्यंतां वयं शत्रून् तर्दाम-अस्मभिः शत्रवः तर्थतां जनान् लुभ-त्वया जनाः लुभ्यंतां युवां जलानि मथतं-युवाभ्यां जलानि मयंतां यूयं गृहाणि प्रविशत-युष्माभिः गृहाणि प्रविश्यंतां शास्त्राणि त्वं । महतु-तेन मझे। दशम पाठ। उत्तमपुरुष मां अहं बालौ मां आमृशतां-बालाभ्यां अहं आमृश्यै । जनाः मां नमंतु-जनैः अहं त्वं मां ईक्षस्व-त्वया अहं युवां मां भाषेथां-युवाभ्यां अहं श्लाघध्वं-युष्माभिः अहं लाध्यै। आवां उपदिशतु-मात्रा आवां उपदिश्यावहै। पितरौ आवां तर्जतां-पितृभ्यां आवां तयावहै। साधवः आवां पश्यंतु-साधुभिः आवां दृश्यावहै । आवां लोचस्व-त्वया आवां लोच्यावहै। नम्यै। ईक्ष्यै। भाष्यै। यूयं. मां २माता त्वं संस्कृतमवेशिनी। युवां आवां कवेथां-युवाभ्यां आवां कव्यावहै। यूयं आवां कांक्षत-युष्माभिः आवां कांक्ष्यावहै । ३ सज्जनः अस्मान् पृच्छतु-सजनेन वयं पृच्छ्यामहै। वधको अस्मान् त्यजतां-वधकाभ्यां वयं त्यज्यामहै । अग्नयः अस्मान् परिचरंतु-अग्निभिः वयं परिचर्यामहै। अस्मान् तिजस्व-त्वया वयं तिज्यामहै। युवां अस्मान् शंसतं-युवाभ्या वयं शंस्यामहै। यूयं अस्मान् महत-युप्माभिः वयं महामहै। त्वं एकादश पाठ। स्पृशतु-तेन स्पृश्यस्व पृच्छ्यस्व प्रशंस्यस्व महस्व गदाव-आवाभ्यां त्वं २ वाला मध्यम पुरुष त्वां त्वं वालो त्वां पृच्छतां-चालाभ्यां त्वं सज्जनाः त्वां प्रशंसंतु-सज्जनः त्वं अहं त्वां महानि-मया त्वं आवां त्वां वयं त्वां दिशाम-अस्माभिः त्वं युवां आमृशतु-चालया युवां नार्यों युवा उद्-वहेतां-नारीभ्यां युवां गुरवः युवां मानंतां गुरुमिः युवां अहं युवां जयानि-मया युवां आवां युवां तर्जाव-आवाभ्यां युवां वयं युवां कत्थामहै-अस्माभिः युवां ३ नारी युष्मान् निंदतु-नाया यूयं आवां युष्मान् श्लाघावहै-आवाभ्यां यूयं वयं युष्मान् महाम-अस्माभिः यूयं गद्यस्व दिश्यस्व आमृश्येथां उत्-उधेयां मान्येयां जीयेथां तयेथां कत्थ्येथां निंद्यध्वं लाध्यध्वं माध्वं .
सनातननग्रंथमालायां- नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- विकीर्यस्व, तीर्यता, गम्यतां, तिज्यध्वं, लभ्यस्व, पठ्यता, सेव्यै, अच्य, उप्यंतां, उह्येतां, दृश्यामहै, दह्यतां, मुच्यस्व, शुच्ये, पीयतां, त्यज्यध्वं, उद्यतां, लुप्यंतां, संस्कृत बनाओ- दो गुरुओंसे दो विद्यार्थी पूछे जाय। मेरे द्वारा आत्मसुख अनुभूत हो। कमौके द्वारा हमलोग छोडे जांय । विद्वानोंके द्वारा तुम उपदिष्ट होओ। विद्यार्थियोंके द्वारा जैनेंद्र पढा जाय। उनके द्वारा तुम पूजित होओ। ये दो वृक्ष दो वढइयोंके द्वारा काटे जाय। विद्यार्थी लोग गुरुको सेवें। द्वादश पाठ। कर्तृवाच्य। भाववाच्य । शिशुः नंदतु-शिशुना नंद्यतां पक्षिणः कुजंतु-पक्षिमिः कूज्यतां विद्या फलतु-विद्यया फल्यता संपत् एधता-संपदा एध्यता कन्ये क्रीडतां-कन्याभ्यां क्रीड्यता जनाः यता-जनैः यत्यतां मृगाः चरंतु-भृगैः चर्यता छात्राः वसंतु-छात्रैः उष्यतां राजानः जीवंतु-राजभिः जीव्यता पुष्पाणि स्फुटंतु-पुष्पैः स्फुट्यता १०-कर्मवाच्य या भाववाच्यमें धातुके और आत्मनेपदमे आनेवाले 'ते, एते, अते आदि प्रत्ययके वीचमें यक् (क इत् है) प्रत्यय आता है शेष 'ते आदि को ता आदि कार्य सं० प्र० प्रथम भागके दशवें अध्यायकी टिप्पणीके अनुसार होते हैं।
संस्कृतप्रवेशिनी। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- क्रम्यतां, तप्यतां, स्फूयंतां, जीव्यतां, मिष्यतां, वर्ध्यतां, पत्यतां, अंच्यतां, रुच्यतां, रुद्यतां, विलप्यतां, गद्यतां, वय॑तां, शिक्यतां, दीस्यतां, यत्यतां, मोद्यतां, म्रियतां दीप्यतां । वाच्य परिवर्तन करो- कमठः श्रीमंतं पार्श्वनाथं गदितवान्-मिक्षो! त्वं मया सह युद्ध- त्वया पूर्व महदपकृतं । अधुना मदीय अवसर इति व्यर्थः कालक्षेपः शीघ्रमेव योद्धु सन्नद्धो (तय्यार) भव। त्वं मित्रं एतं तुंगं (पर्वत) आपृच्छस्व (पूंछ), अत्रस्थान् देवान अनुसर, सिद्धिक्षेत्र रामशैलं (चित्रकूटपर्वत) वा गच्छ, वा प्रेम्णा हर्पितचित्तः सन् मां निजभुजाभ्यां निगृह परमहं तु त्वां मंक्षु (शीघ्र) एव यमराजगृहं नयामि । माचर। शुद्ध करो- - - गजेन दुर्जनः तुचंतां, पालिकामि पुष्पाणि विकीर्यता, संपद्भिः एध्यंतां, गुणिभिः साधवः पृच्छ्यस्व, ब्रह्मचारिमिः शिस्यंतां, आ- वाभ्यां पुस्तकं पठ्यै, कर्ममिः संसारिणः त्यज्यस्व । भाववाच्य या कर्मवाच्यमें संस्कृत बनाओ- तुम लोग हमेशा पुस्तकें पढाकरो। अधिक इंद्रिय सुखको न भोगो। मांस मद्य मधुको छोडो। जो सर्वदा सच्चे संयमको पालन करते हैं वे मुनि मेरे (मदीय) हृदयमें प्रविष्ट हों। जिसने संसारवर्ती समस्त जीवोंको जीत लिया है उस कामको भी जिन्हों- ने जीता है उन मुनियोंका दर्शन करो। जो सच्चे तपको करते है वे तुमें सचा मार्ग बतलावें। *४२ पृषी टिप्पणी देखो।
१ अहं ३ वयं ५२ सनातनजैनग्रंथमालायां- लैट विभक्ति। त्रयोदश पाठ कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य। १ मुनिः वनं गमिष्यति-मुनिना वनं गमिष्यते २ छात्र: पुस्तके पठिष्यति-छात्रेण पुस्तके पठिष्येते ३ विद्यार्थिनः गुरुन् सेविष्यते-विद्यार्थिमिः गुरवः सेविष्यंते १ पिता मां स्वक्ष्यते-पित्रा अहं स्वक्ष्ये २ माता आवां उपदेक्ष्यति-त्रा आवां उपदेल्यावहे ३ साधवः अस्मान् प्रत्यंति-साधुमिः वयं प्रक्ष्यामहे त्वा ईक्षिष्ये-मया त्वं ईक्षिष्यसे २ साधवः युवां श्लाघिण्यंते साधुभिः युवां ग्लाधिष्येथे युष्मान् स्पामः-अस्माभिः यूयं स्पर्थ्यध्वे नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनावो- अर्चिष्ये, द्रक्ष्येथे, लप्स्यत, जेण्यामहे, स्मेष्ये, स्मरिष्यामहे, धक्ष्यध्वे, याचिष्यध्वे, तोत्स्यसे, अंचिष्यते । चतुर्दश पाठ। कर्तृवाच्य भाववाच्य १ छात्रः वत्स्यति-छात्रेण वत्स्यते। कन्ये क्रीडिष्यतः-कन्याभ्यां क्रीडिष्यते। उद्योगिनः ईहिष्यंते-उद्योगिमिः ईहिष्यते। अहं एघिष्ये-मया एधिष्यते। त्वं जेष्यसे त्वया जेष्यते। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- नर्दिष्यते, ग्लायिष्यते, मोदिप्यते, स्फुटिष्यते, कूजिष्यते, वर्द्धि- ध्यते-ज्वलिष्यते--~-~~- ११-५० भा० नवम अध्यायकी टिप्पणी देखो।
संस्कृतप्रवेशिनी। ५३ भाववाच्य या कर्मवाच्यमें संस्कृत वनाओ- श्रेणिक तीर्थकर होंगे। इन्द्रादि उनको पूजेंगे। वे जिससमय माताके गर्भमें (मातृगर्भ) प्रवेश करेंगे उससमय कुवेर रत्न विखे- रेगा। जब माता उनको उत्पन्न करेगी (जनिप्यते) तव देव यहां आवेंगे। इंद्राणी इंद्राशाले प्रसूतिगृहमें जावेगी। वहां माताके साथ पुत्रको सोता (शयान) देख उसकी मनसे पूजा करेगी। माता दुःख न पावे इसलिये ( अतः) इंद्राणी एक मायामयी पुत्रको रचेगी उसे वहां रखकर (निक्षिप्य) भगवान्को लावेगी (आ-नी) और इंद्रको देगी। हिंदी वनाओ- तीर्थंकरशरीरेण सप्तहस्तप्रमाणं भविप्यते, आयुपा च पोडशा- धिकशतवर्ष (११) प्रमाणं। त(द )नारीभिः नानागुणगण- मंडितामिः सुवर्णसमकांतिधारिकामिर्युवतिमिरधिकं शोमिप्यते । यथा आदिनाथपुत्रेण भरतेन चक्रवर्तिना भूयते स्म तथा एव पद्म- नाभपुत्रेणापि चक्रवर्तिना भविप्यते । आदिनाथेन इव तेनापि प्रजाः रक्षिष्यंते, देशग्रामनगराणि स्त्रक्ष्यते । एवं नीतिपूर्वकं राज्यं कृत्वा तेन स्वामिना विरक्ष्यते । एवं तीर्थकरविरक्ति ज्ञात्वा लोकांतिक- देवैरागमिष्यते। पंचदश पाठ ये, तव्य, अनीय । - पुंलिंग कर्मवाच्य कर्मवाच्य छात्रेण गुरु स्पर्श्यते-छात्रेण गुरुः स्पृष्टव्यः, स्पृश्यः, स्पर्शनीयः। १२-सकर्मक धातुसे कर्ममे और अकर्मक धातुसे भावमें तव्य, अनीय, य, ण्य [ ण् इत् ] और क्यप् [क्, प-इत् ] प्रत्यय होते हैं । तव्य प्रत्यय होनेसे धातुके अंतमें इद कार्य आदि तुम् के समान होते है पृष्ठ १५ देखो 'अनीय' प्रत्यय हो- - सनातननग्रंथमालायां- श्रावकेणातिथि सैविष्यते- केणातिथि सेव्या,सेवितव्यः,सेवनीयः सेवकै वृक्ष धक्ष्यते-सेवकैः वृक्षः दाह्या, दग्धव्यः, दहनीयः। राज्ञा चौर मोक्ष्यते-राशा चौरः मोच्यः मोक्तव्या, मोचनीयः। २ भृत्यै स्वामिनी सेविष्येते-भृत्यैः सेव्यो, सेवितव्यौ, सेवनीयो। पुत्रेण पितरौ अर्चिष्येते-पुत्रेण पितरौ अच्यौं, अर्चितन्यौअर्चनीयो। ३ पित्रा पुत्रा स्वक्ष्यते-पित्रा स्वळ्याः स्वतव्याः स्वजनीयाः। वृष्टया वृक्षा उक्षिष्यते-वृष्ट्या वृक्षाः उक्ष्या:, उक्षितव्याः उक्षणीयाः मया ग्रंथा पठिष्यते-मया ग्रंथाः पाठ्याः, पठितव्याः पठनीयाः। षोडश पाठ। स्त्रीलिंग १ तया नदी इक्षिष्यते-तया नदी ईक्ष्या, ईक्षितव्या, ईक्षणीया। मात्रा कन्या स्वक्ष्यते--मात्रा कन्या स्वंज्या,स्वड्तव्या, स्वजनीया। २ तेन पुस्तिके पठिष्येते-तेन पुस्तिके पाव्ये, पठितव्ये, पठनीये। गोपेन धेनू मोक्ष्येते-गोपेन धेनू मोच्ये, मोक्तव्ये, मोचनीये। ३ वृष्टया वीरुध सेक्ष्यते-वृष्ट्या वीरुधासेच्याः,सेकच्या सेचनीया:। दुहिना जनन्या सेविष्यते-दुहित्रा सेव्याःसेवितव्या,सेवनीयाः। सप्तदश पाठ। मपुंसकलिंग द्रक्ष्यते-मया वनं हश्य, द्रष्टव्यं, दर्शनीयं । पास्यते त्वया दुग्धं पेयं, पातव्यं, पानीयं । १ मया वनं दुग्धं त्वया नेसे धातुके इ, उ, ऋको कमसे ए, ओ, अर हो जाते हैं। ऋकारके सिवाय शेष खरात धातुओंसे 'य' होता है। ऋकारात और व्यंजनांत धातुओंसे 'ण्य' और जिनके अतके अक्षरसे पहिले ऋ है उनसे क्यप् प्रत्यय होता है। १३-आका- राप्त धातुके नतके 'मा' को 'ए' हो जाता है 'च' प्रसव होनेसे।
संस्कृतप्रवेशिनी। राज्ञा २ बालकेन पुष्पे प्रास्येते-बालकेन पुष्पे घेये, घातव्ये, घ्राणीये। सरसी सूक्ष्येते-राज्ञा सरसी सय, सृष्टव्ये,सर्जनीये। ३ मया फलानि खादिष्यंते-मया खाद्यानि,खादितव्यानि,खादनीयानि अग्निना काष्ठानि धक्ष्यते-अग्निना दाह्यानि,दग्धव्यानि, दहनीयानि . अष्टादश पाठ। भाववाच्य भाववाच्य देवेन फलिप्यते-देवेन फल्यं, फलितव्यं,फलनीयं । संपदा एधिष्यते-संपदा एध्यं, एधितव्यं, एधनीयं । छात्रैः वत्स्यते-छात्रै वास्य, वस्तव्यं, वसनीयं । साहित्य परिचय अथ नगरं प्रविष्टः सोऽजितसेननामा राजकुमारः पलायमानं (भागतेडुये ) लोकं विलोकते स्म। तत उपजातकौतुकः सन् एकं पुमांसमुपसृत्य (पास जाकर) पलायन (भागनेका) हेतुं पृष्टवान् । स राजपुत्रपृच्छया (प्रश्नेन ) निर्विण्णमनाः ( उदासी- नचित्तः) सन् गदितवान् “किं त्वमेतद् प्रसिद्धमपि उदंत (वृत्तां- तं) न जानासि । अयमरिंजयाभिधानेन (नामसे) प्रथितो धन- धान्यान्यजनाकुलो देशो वर्तते । यत्रस्था धरित्री (जमीन) सदा नवसस्यांकुरैर्हरिद्वणी शोभते। तमध्यवर्ति विपुलामियां दधानं पुरं, यदुधसौधभंगैलिखदाकाशं खचराधिवासतुल्यं राजते । तत् नगरं जयवर्मनामधेयः पृथ्वीपतिः शास्ति। तद्नृपदुहिता सर्वज- गल्ललाममता शशिप्रभाख्या वर्तते । तां महेंद्रनामा कश्चित् क्षितीशो याचितवान् । परं तां प्रदातुं स जयवर्मा निमित्तिना (ज्योतिषी) निषिद्धः। अतो निराकृतप्रार्थनो महेंद्रवमी समस्तराजलोकैः सह संभूय, जयवर्मसेनां निहत्य पुरमावृत्य वितिष्ठते तद् स्वविनाशमी- क्षमाणः सकलो राष्जन इतस्ततो धावति, इति ।
। सनातननग्रंथमालायां- हिंदी-इसके बाद नगरमें जाकर उस अजितसेन नामक कुमार ने भागतेहुये लोगोंको देखा इसलिये क तुकसहित हो एक आदमी के पास जाकर भागनेका कारण पूंछा। उस आदमीने राजपुत्रके प्रश्नसे उदासीनमन होकर कहा कि-"क्या तुम इस प्रसिद्ध वृत्तां- तको भा नहीं जानते। यह अरिंजय नामसे प्रसिद्ध धन धान्यवाले जनोंसे व्याप्त देश है। यहां की भूमि सर्वदा नवीन नवीन धान्योंके अंकुरोंसे हरेवर्णकीसी शोभित होती है। इसदेशके मध्यमें "विपल" नामको धारण करनेवाला नगर है जोकि ऊंचे २ मकानोंके शिखरों से आकाशको घर्षण करनेवाले विद्याधरोंके निवासस्थानके समान शोभित जानपडता है। इस नगरको जयवी नामक राजा पालता है। उस राजाकी लडकी संपर्ण जगत्की भूषणस्वरूप शशिप्रभा नामकी है। उस लडकीको महेंद्रनामक दूसरे राजाने मांगा लेकिन उस लडकी को देनेके लिये जयवाको ज्योतिषीने रोकदिया। प्रार्थना अस्वीकार होनेसे महेंद्रवमा संपूर्ण राजाओं के साथ जयवाकी सेनाको मारकर नगरको घेर बैठा है। इसलिये अपने नाशको देखते हुये संपर्ण देशवासी इधर उधर भागते हैं। सस्कृत बनाओ- मणिवतदेशवर्ती एक दारा नामक नगर है क्षत्रियवंशी मणिमाली नामक राजा उस नगरकी रक्षा करता था। उसके (तदीय) मणि- शेखर नामक पुत्र था। वह राजा इंद्रिय सुखोंको अतिभोगताथा। किसी समय उसने अपने शिरमें (स्वशिरस्थं) श्वेत बालको देखा। उसको देखकर अपना मृत्युसमय निकट जाना। इसलिये राज्यभार पत्रको देकर (पत्रनिक्षिप्तराज्यभारः) वह वनको चलागया और वहां गुणसागर मुनिके समीप दीक्षाली तथा जैनसिद्धांत पढा। अंतमें जव कि उग्र तपस्वी होगया तवएकाकी विहारकरनेलगा (विहरति स्म) राजन् ! इस तरह विहार करते २(विहरन्) वह उजयिनी पहुंचा ५७ संस्कृतप्रवेशिनी। और वहां श्मशानभूमिस्थ होकर (सन् ) ध्यान करने लगा। उस समय रात थी इसलिये एक मंत्रवादी-जातिका (जात्या) कोली (कौलिकः) वैताली विद्याको सिद्ध करनेके लिये (साधयितुं) वहां आया । और उसके (तदीय) शरीरको मृत समझा इसलिये उसपर उसने (तत्र ) अग्नि जलाई। हिंदी वनाओ- श्मशानभूमिमागत्य जिनदत्तादयः श्रावका मां भक्त्या प्रणत- वंतः । मदीयां दुरवस्थां विलोक्य परमदु:खिताः संजाताः । केन दुष्टेन महानुपसर्गोऽयं रचित इति क्रुध्यन् (क्रोधकरता हुआ) जिनदत्तो मामुत्थाप्य ( उठाकर) स्वगृहमानीतवान् । एवं तदा एव कंचित् वैद्यमाहूय (बुलाकर ) मदीयां व्याधि दूरीकर्तुमौष- धिं याचितवान् । वैद्येन कथितं-भोः जिनदत्त! रोगोऽयमसाध्यो- उत्तो लाक्षामलतैलं विना पतदीयं (इसका) दूरीभवन-(दूर- होना) मशक्यं । तद् तैलमानेतुं यतस्व । अत्र एव सोमशर्मनामा ब्राह्मणो निवसति । तदीयं गृहं गत्वा तत् तैलमानय" इति । अथ- तद् गृहं गतो जिनदत्तस्तत्र तुंकारीनामधेयां ब्राह्मणभार्या दृष्टवान् । एवं तां भगिनी( वहिन ) शददेन संवोध्या (बुलाकर) तैलं च याचि- तवान् । तयोक्तं श्रेष्ठिन् ! निर्भयः सन् मद्गृहं प्रविश तैलं च गृहाण (लेलेओ) जिनदत्तस्तत्र गत्वा घटमेकं गृहीत्वा चलितुं यदा प्रारब्धवान् तदा एव स घटः पतति स्म तथा तत्रस्थं सर्व तैलं च विकीर्ण। - शुद्ध करो- १ शीतं रविभवतः शीतरुचिः प्रतापी, स्तब्धो नभो जलनिधी सरिदम्वुतृप्तः । स्थायी मरुद विदहनं दहनोपि जातु (कदाचित् ) लोभानलस्तु न कदाचिद (अ) दाहकं स्यात् । - ८ सनातनजैनग्रंथमालायां- ? इति श्रुत्य तेन गदितवान् । भोः पडितः त्वं सत्यं उक्तं एवमेव पूर्वैः शास्त्रज्ञैः अपि उपदिष्टवंतः। २ ब्रह्मारण्यस्थः कर्पूरतिलको नाम हस्तीः वर्तते । तं अव- लोक्त्वा सर्वैः शृगालैः चिततः। यदि अयं केन अपि उपायेन मृत्यु गच्छति तदा अस्माकं [हमारा एतद् देहेन भासचतुष्टयपर्यंत भोजनं भोष्यति। तत्र एकेन शृगालेन प्रतिज्ञातवान् अहं बुद्धिप्रभा- वेण अयं मारणीयः। अनंतरं स वंचकः कर्पूरतिलकसमीपं गत्य साष्टांगपातं प्रणत्वा गदितः । देव! दृष्टिप्रसादं कुरु । हस्ती गदितः। का त्वं ? कुतः समायातः ? स उक्त जंबुकोऽहं सर्वे वनवासिमिः मिलित्य भवत्सकाशं प्रस्थापितवान् यद् विना राशेण अवस्थातुं न युक्त। तद् अत्र वनराज्यं कर्तुं भवान् सर्वस्वामिगुणोपेतः निरुपितवान् तद् यथा लग्नसमयो न विचलतः तथा कृत्वा शीघ्र आगम्यतां देवेन । इति निगदित्वा उत्थित्वा च चलितवान् । ततो- ऽसौ राज्यलोभाकृष्टः कर्पूरतिलकः शृगालमार्गेण धावन्तः महा- पंकनिमग्नौ जाते ततः तेन हस्तिया उक्तं । मित्रः शृगाल! किम अधुना विधेयं पंकमग्नवान् अहं प्राणा त्यजति । परावृत्वा पश्य । शृगालो गदितः। देव! मदीयपुच्छकावलंबनं कृत्य उत्तिष्ठ । यदू मदीयं वचनं विश्वस्तं तद् अनुभूयेतां अशरणः दुःखं । चतुर्थी विभक्ति। प्रथम पाठा १ श्रावक छात्राय पुस्तकं वितरति-श्रावक विद्यार्थीके लिये पुस्तक देता है। १४-की-कर्मके द्वारा जिसको प्राप्त करे उसे संप्रदान कहते हैं। जिसकी संप्रदान संज्ञा होती है उस शब्दसे चतुर्थी विभक्ती लानेका नियम है । जैसे श्रावक छात्राय आदि वाक्यम कती श्रावक है वह कर्म जो पुस्तक है उसके द्वारा छात्रको प्राप्त करता है इसलिये छात्र शब्दसे चौथी विभक्ती हुई । अथवा- जिसके लिये कोई चीज दो और उसे फिर वापिस न लो तो जिसके लिये वह चीज दी गई है उससे चतुर्थी विभकी लायी जायगी।
संस्कृतप्रवेशिनी। दातव्यं भवति विदुषा संयताय अनशुद्धं-विद्वानको संयमीके लिये शुद्ध अन्न देना चाहिये। नमः श्रीवर्द्धमानाय-श्रीवर्द्धमान भगवानके लिये नमस्कार है। मुनये चतुर्विधं दानं देयं-मुनिको चार तरहका दानदेना चाहिये । बंधवे मोदको रोचते-बंधुको लाडू अच्छा लगता है। गुरवे किं न प्रदेयं-गुरुको क्या देने योग्य नही है। दात्रे कोऽपि न ऋध्यति-दाताके लिये कोई भी क्रोध नही करता है। पित्रे नमः-पिताको नमस्कार [सुखकारी है। २ अयं प्रस्तावः वालीभ्या सुखकर:-यह प्रस्ताव दो वालकोंके लिये अश्वाभ्यां घासः आहतः-दो घोडोंके लिये घास लाई गई है। फलानि कपिभ्या सुखानि-फल दो वदरोके लिये सुखकर हैं । दुग्धं अहिभ्या हितं-दूध दो सापोंको हितकर है। शिशुभ्या फले आनीते-दो लडकोंको दो फल लाये गये हैं। बंधुभ्या चिरंजीवितं भवतु-दो भाई चिरायु हो। पितृभ्या नमः-माता पिताको नमस्कार है। दातृभ्या आशिषः प्रदत्तास्तैः-उनने दो दाताओंको आशीर्वादें दी। है मे १५-नमः, खस्ति, स्वाहा, वषड्, खधा, हित और "अलं" के पर्याय वाची शब्द जिसकेलिये प्रयोगमें लाये जाय उस शब्दसे चौथी विभक्ती होती है । १६- रुचि [ अच्छा लगना ] अर्थ वाली धातुओंका प्रयोग करने पर जो प्रीयमाण [जिसे अच्छी लगे ] होगा उससे चौथी विभक्ती लायी जायगी जैसे ऊपरके वाक्य लाडू बंधुको अच्छा लगता है तो बंधु शब्दसे चौथी विभक्ती होती है । १७- क्रोध, द्रोह, ईर्ष्या, असूया अर्थ वाली धातुओंके योगमे जिसके प्रति क्रोधादिक किये जाय उससे चौथी विभक्ती होती है। १८-जहा "के लिये" एसा अर्थ मालूम पडे उस जगह जिस शब्द से "के लिये" का संबंध हो उससे चौथी विभक्ती होती है। १९-कल्याण, और आयु अर्थवाले शब्दोंके योगमें यदि आशीर्वाद हो तो जिसके लिये आशीर्वाद दिया गया है उस शब्दसे चौथी विभक्ती होनी है।
६० सनातनजेनग्रंथमालायां- ३ वालकेभ्य. मिष्टान्नं स्वदते वालकोंको मिठाई अच्छी लगती है। मुनींद्रेभ्यो नमो नमः-मुनीद्रोंके लिये वार वार नमस्कार है । मुनिभ्यः दान देयं-मुनियोंको दान देना चाहिये। कपिभ्यः दुःखं न विधेयं-बंदरोंको दुख न करना चाहिये । गुरुभ्यः सर्वदा नम:-गुरुओको हमेशा नमस्कार है। साधुभ्यः कल्याणं भवतु-साधुओका कल्याण हो । उपकर्तृभ्य क्षेमं भवतु-उपकारियोका कल्याण हो । सस्कृत बनाओ- पात्रके लिये धन देना योग्य है। मनियोंको जो भोजन देते हैं वे पुण्यभाग् होते हैं। दुखी लोग सुख चाहते हैं (स्पृहयं ति) एक सेठने विद्यार्थियोंको पस्तके यांटी। वह मल्ल उस मल्लके लिये काफी है (अलं)। लडकोंको कटु चीज अच्छी नहीं लगती। जीवंधरने साधुओंके लिये धर्मको उपदेशा। भव्यलोगोंका चिर- जीवन हो। रथके लिये लकडी लाओ। द्वितीय पाठ। व्यंजनांत पुंलिंगशब्द नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- जलमुचे जलमग्भ्यां परिवाजे परिवाड्भ्यां सम्राजे सम्राड्भ्यां पापकृते पापकृद्भयां वुद्धिमते वुद्धिमभ्यां बलवते वलवभ्यां गायते गायद्भ्यां सुहदे सुहत्भ्यां जलमुग्भ्यः। परिवाइभ्यः। सम्राड्भ्यः। पापकृद्भ्यः। बुद्धिमद्भ्यः। बलवदभ्यः। गायद्भ्यः। सहदभ्यः।
संस्कृतप्रवेशिनी। मूद्ध भ्यां राशे राजभ्यां राजभ्यः । मूने मद्धभ्यः। दुरात्मने दुरात्मभ्यां दुरात्मभ्यः। स्वामिने स्वामिभ्यां स्वामिभ्यः। मंत्रिणे मंत्रिभ्यां मंत्रिभ्यः। चंद्रमसे चंद्रमोश्या चंद्रमोभ्यः। विदुषे विद्वभ्यां विद्वद्भ्यः। जग्मुषे जग्मिवदूभ्यां जग्मिवदभ्यः। ज्यायसे ज्यायोश्यां ज्यायोभ्यः। सर्वादि सर्वस्मै सर्वाभ्यां सर्वेभ्यः। तस्मै ताभ्यां तेभ्यः। यस्मै याभ्यां येभ्यः कस्मै काभ्यां केभ्यः। अस्मै आभ्यां एभ्यः। अमुष्मै असूभ्यां अमीभ्यः। मा आवाभ्यां अस्मभ्यं। तुभ्यं युवाभ्यां युष्मभ्यं । संस्कृत वनाओ- उन महात्मा लोगोंको नमस्कार है। वि हो। स्वामीके लिये सेवक प्राणोंको भी देदेर के लिये वडे भाई शुभकामनायोंको करते हैं चाहो। राजा मंत्रियों पर क्रोध करता है ! लिये दो कितावें दो। पाप करनेवालेको तपस्वियोंके लिये चतुर्विधदान संगति [विद्वत्संगति] अच्छी 1121411 11111111 सनातनजैनग्रंथमालायां- कन्याभ्यः। -- तृतीय पाठ। स्त्रीलिंग कन्यायै कन्याभ्यां बालायै बालाभ्यां मत्यै मतिभ्यां ऊम्यै ऊर्मिभ्यां नथै नदीभ्यां तस्थुष्यै तस्थुषीभ्यां रेण्वै रेणुभ्यां धन्वै धेनुभ्यां वध्वै वधूभ्यां चम्वै चमूभ्यां मात्र मातृभ्यां दुहिने दुहितृभ्यां ऋचे ऋग्भ्यां त्वचे त्वम्भ्यां विपदे विपद्भ्यां परिषदे परिषद्भ्यां वीरुधे वीरुभ्यां क्षुधे क्षुद्भ्यां योषिते योषिद्भ्यां सरिते सरियां सर्वस्यै सर्वाभ्यां अपरस्यै, अपरायै अपराभ्यां अन्यस्यै अन्याभ्यां तल्यै ताभ्यां बालाभ्यः। मतिभ्यः। ऊर्मिभ्यः। नदीभ्यः। तस्थुषीभ्यः। रेणुभ्यः। धेनुभ्यः । वधूभ्यः। चमूभ्यः। मातृभ्यः। दुहितुभ्यः। अग्भ्यः। त्वम्भ्यः। विपदभ्यः। परिषदभ्यः। वीरुभ्यः। क्षुदूभ्यः। योषिभ्यः। सरिभ्यः। सर्वाभ्यः। अपराभ्यः। अन्याभ्यः ताभ्यः।
- संस्कृतप्रवेशिनी। ६३ यल्यै याभ्यां याभ्यः। कस्यै काभ्यां काभ्यः। अस्यै आभ्यां आभ्यः। अमुष्यै अमूभ्यां अमूभ्यः। सस्कृत वनाओ- १। जिन (यदीय) नारियोंकी संतानसे यह पृथ्वी सफल है उनको मै चाहती हूं (स्पृहयामि) २। मुझे संतुष्ट करनेके लिये ( परितर्पयितुं) शाति मित्रादि कोई भी समर्थ नहीं हैं। ३। एक समय राजा मित्रोंके साथ वन देखने [वनदर्शन] गया। ४। पापको नष्ट करनेके लिये [पापनाश] बहुत दूर जाकरके भी मुनि दर्शन करना चाहिये। ५। इस लडकीके लिये वर ढूंढना चाहिये [अन्वेष्य] ६। सभाके लिये योग्य योग्य सभासद ढूंढने चाहिये। ७। गायको भूसा [बुस ] अच्छा लगता है ८। माताके लिये हमेशा नमस्कार है। इसके सिवाय [विहाय] उसके लिये हम क्या कर सक्त हैं ? जो उपकारके लिये काफी हो [अलं] कुसुमाय दानाय वारिणे मधुने सानुने चतुर्थ पाठ। नपुंसकलिंग कुसुमाभ्यां दानाभ्यां वारियां मधुभ्यां सानुभ्यां कुसुमेभ्यः। दानेभ्यः। वारिभ्यः। मधुभ्यः। सानुभ्यः।
सनातनजैनग्रंथमालायां- श्रीमते श्रीमद्भ्यां श्रीमदभ्यः। गुणवते गुणवद्भ्यां गुणवद्भ्यः। शर्मणे शर्मभ्यां शर्मभ्यः। कर्मणे कर्मभ्यां कर्मभ्यः। पयसे पयोभ्यां पयोभ्यः। चेतसे चेतोभ्यां चेतोभ्यः। ज्योतिष ज्योतिभ्यां ज्योतिर्म्यः। हविषे हविभ्यां हविर्यः। धनुषे धनुभयो धनुयः। सर्वस्मै सर्वाभ्यां सर्वेभ्यः। तस्मै ताभ्यां तेभ्यः। अमुष्मै अमूभ्यां अमीभ्यः। अस्मै आभ्यां एभ्यः। चतुर्थी विभक्तीका व्यवहार शातारं (विश्वतत्त्वानां) वंदे तद्- [समस्ततत्त्वोके] ज्ञाताको उसके गुणकी गुणलक्धये। प्राप्तिके लिये मैं नमस्कार करता हूं श्रयामि तानमलपदाप्तये यतीन्-उन यतियोंको निर्मलपदकी प्राप्तिकेलिये ते गुरवो विमुक्तये भवंतु-वे गुरु मुक्तिके लिये हों। [आश्रयण करता हूं। स राजा राज्यस्थित्यै दंड्यान दं- वह राजा राज्यकी स्थितिके लिये अप- डितवान् । राधियोंको दंड देता था। ते प्रसूतये नारीरुद्वहंते स्म-वे संतानके लिये स्त्रियोंको विवाहते थे । साबालाभवता विदेशकाय वितीर्णा-वह लडकी आपने विदेशीके लिये दी है इति दूतमसो विसृज्य राजाऽजि- इसतरह दूतको विदाकरके राजाने अ- तसेनाय कार्य कथितवान् । जितसेनके लिये कार्य कहा । राजा प्रजायै राज्यभारमावह- राजाने प्रजाके लिये रग्ज्यभारको धारण ति स्म। किया।
लिये हुआ। लोकः। संस्कृतप्रवेशिनी। ६५ भूमिपतिः पल्यै तत्कथयन् अति- राजाने पत्नीके लिये वह बात कहते हुये क्रांतमपि मार्ग न ज्ञातवान् । वीता हुआ मार्ग भी न जाना । स दृष्टमात्रोऽपि गिरिगरीयान् प्र- वह देखागया ही महान् पर्वत हर्षके मोदाय भवति स्म। सभार्याय तस्मै राक्षे सर्वाः प्रजा पत्नीसहित उस राजाकी सब प्रजाने अर्हणां कृतवत्यः। पूजाकी। [ देते हैं। योद्धार: शस्त्र भ्यः तोयं रांति योद्धा लोग शस्त्रोपर जल चढाते हैं धर्मार्थकामसेवकाय राक्षे श्लांघते धर्म अर्थ कामको सेवनेवाले राजाकी लोग प्रशंसा करते हैं। मह्यं धर्मः स्वदते मुझे धर्म अच्छा लगता है। निर्धना धनाढयाय शतानि साय- निर्धन लोग धनाढयोंके सैकडों रुपये काणि धारयति । धारते हैं [ कर्जा करते हैं ] । यत्रस्था जना:-अर्थ धर्माय सेवंते जहाके लोग-धनको धर्मके लिये, कामं संतानवृद्धये। कामको संतानवृद्धिके लिये सेवते हैं। मया छात्राय पुस्तकं प्रतिश्रुतं । मैंने विद्यार्थीकेलिये एक पुस्तककी प्रतिज्ञाकी। पापिनो धार्मिकाय द्रा ति-पापी लोग धर्मात्माका द्रोह करते हैं। संयमाय श्रुतं धत्ते पमान धर्माय मनुष्य संयमके लिये शास्त्र और धर्मके लिये संयमको धारण करता है। धर्म मोक्षाय मेधावी धनंदानाय बुद्धिमान् आदमी धर्मको मोक्षके लिये धन- भक्तये। को दान और भक्तिके लिये धारण करते इदं मंगलाचरणं विश्नध्वंसाय अलं-यह मंगलाचरण विघ्नध्वंसके लिये काफी है "तुष्ट्या ददत् स्वसुतजन्म निवेद- अपने पुत्रके जन्मको कहनेवालोंकेलिये यद्भ्यो देयं न देयमित्यथवा क्षि- संतोषसे दान देता हुआ राजा देय तीशः" नो बोधति स्म ।। और अदेयको नही समझता हुआ । १-श्लाघ्, न्हुड्, स्था, शप धातुके योगमे जिसके श्लाघादिक किये जाते हैं उससे चौथी विभती होती है। संयम।
६६ सनातनजैनग्रंथमालायां- - नामश्रोशब्दानुगतं कृतं मंगलाय-मंगलके लिये श्रीशब्दसे सहित नाम रक्खा इति [त्या] आशास्य तं [मा] इस तरह आशीर्वाद और धैर्य देकर आश्वास्य कृच्छ्रे स तपसे गतः। कष्टपूर्वक वह तपके लिये वनको गया। ते विद्याभ्यासाय वाराणसीमागता: वे विद्या पढने काशी आये। संस्कृत वनाओ- १ । कुमार! हमें आपके [ भवदीय ] वचन अतिप्रिय लगते हैं। कृपाकर हमैं ठंडे ही फल दीजिये। २। श्रोणिकने चेलनाके लिये महादेवी पद प्रदान किया। ३। महाराज पुत्रके लिये युवराजपद देकर संसारसुखकोभोगते हुवे ४। वह पुत्रके लिये मुनिसे प्रार्थना करता है। ५। वे दोनों धनके लिये परस्परमै [ परस्परं ] कलह करते थे। ६। उन स्त्रियोंने राजसभामे जाकर राजासे निवेदन किया। ७। अभयकुमारने उन स्त्रियोंको लानेके लिये नौकरसे कहा । ८। माता पुत्रके लिये दुख कभी नहीं चाहती। पर पुत्र माताके लिये कभी २ दुःख पहुंचाता है [ यच्छति ।] ९। कुमारने सब लोगोंसे यह बात कहकर वसुमित्राको पुत्र दिया १०। यदि आप मोक्षके लिये ही तप करते हैं तो वृद्धावस्था पाकर [प्राप्य ] करना,, ऐसा उस दुश्चरित्राने मुनिसे कहा । पंचमीविभक्ती। प्रथम पाठ। खरांत शब्द १ भृत्यः अश्वात् पतति-सेवक घोडेसे गिरता है। अहं सार्थात् अवहीनः-मैं सगसे छूट गया। २०-जिस पदार्थसे साक्षात् या बुद्धि द्वारा किसी पदार्थका वियोग मालूम पडे तो उस पदार्थके अर्थको कहनेवाले शब्दसे पाचवी विभक्ती होती है। जैसे- संस्कृतप्रवेशिनी। ६७ देवत्तो जिनदत्ताद् आगतः-देवदत्त जिनदत्तके पाससे आया। शरःशंगाद् जायते-बाण शीगसे उत्पन्न होता है। अंकुरो वीजाद् अवरोहति-अकुर वीजसे उगता है। नद्यः अद्रेः उत्पतंति-नदिया पहाडसे गिरती हैं। अहेः वालो विभेति-सापसे वालक डरता है। पिता गुरोः नान्यः-पिता गुरुसे मिन्न नहीं है। दस्यो धनं रक्षति-चोरसे धनकी रक्षा करता है। गृहीतुः दाता श्रेष्ठः-लेनेवालेसे देनेवाला अच्छा है। हंतुः निर्वलो विभेति-मारनेवालेसे निर्वल डरता है। २ वृक्षाभ्या फलानि पतंति-दो पेडोंसे फल गिरते हैं। आसनाभ्या उत्तिष्ठते छात्रौ-दो आसनोसे दो विद्यार्थी उठते हैं। शिशुः व्याघ्राभ्या रक्षितः-दो वाघोंसे लडकेकी रक्षाकी । छात्रैरियं विद्या मुनिभ्या शिक्षिता-विद्यार्थियोंने यह विद्या दो मुनियोंसे सीखी गुरुभ्या के बलाध्यतरा:-दो गुरुओसे अधिक कौन प्रशंसनीय है। अहं पितृभ्या सदाचारं लब्धवान्-मैने माता और पितासे सदाचार पाया। ३ अलसारछात्रा उपाध्यायेभ्य अंतर्दधते-आलसी विद्यार्थी उपाध्यायोंसे छिपते हैं। माथुरा: पाटलिपुत्रकेभ्यः आढ्यतराः-मधुरावासी लोग पटनावासि- योंसे अधिक धनाढय हैं। जना जिनरथोत्सवंप्रासादेभ्यः पश्यंति-लोग जिनरथोत्सवको मका- नोंसे देखते हैं। 'अश्वात् भृत्य पतित' इस उदाहरणमें घोडेसे नौकर चियुक्त साक्षात् मालूम होता है तो घोडेके अर्थवाले अश्व शब्दसे पाचवी विभक्ती आती है इसीप्रकार पापसे डरता है इस उदाहरणमें 'पापसे दुख होता है एसा विचार कर मनुष्य बुद्धिसें उसके पास जाता है फिर उसको भयका कारण जान लौट आता है तो पाप शब्दसे पाचवी विभक्ती होगी यहा वुद्धि द्वारा वियोग मालूम होता है। संक्षेपमें- जहां हिंदीमें 'से' लगता है वहा संस्कृतमे पांचवी विभकी होती है।
६८ सनातनजैनग्रंथमालायां- गीतानि ग्रंथिकेभ्यः शृणोति राजा-राजा गीतोको नटोंसे सुनता है । कृपीवल: यवेभ्यो पशून् वारयति-किसान जौके खेतोसे पशुओंको- अहिभ्य सर्वदा भयं कार्य-सापोसे सर्वदा भय करना चाहिये [रोकता है। मुनिभ्यः उपदेशः श्रोतव्या-मुनियोंसे उपदेश सुनना चाहिये । गुरुभ्य विनयपूर्वकं विद्या पठनीया-गुरुओंसे विनयपूर्वक विद्या पढनी- दस्युभ्यः द्रव्यं रक्षणीयं-चोरोंसे द्रव्यकी रक्षा करनी चाहिये [चाहिये । हंतृभ्यो दूरीभवनमेव श्रेयः-हताओसे दूर होनाही अच्छा है। दातृभ्यो धनानि यांचति मिक्षुका:-दाताओंसे भिखारी धन मागते हैं। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- विभावसोः, अंशुभ्यः, गिरेः, मुनेः, शिशुभ्यः, अधर्मात्, कले, ग्रामाभ्यां, शिक्षयितुः, अध्ययनात्, भोजनात्, शत्रुभ्यः, नेतृभ्यः, वक्तृभ्यां, श्रोतुः। संस्कृत वनाओ- १ हमेशा पापसे दुःख होता है इसलिये इसको छोडो। २ जो धर्ममें प्रमाद करता है वह अपनी हानि चाहता है। ३ गांवसे वाहिर चांडालों के घर होते हैं। ४ पर्वत समुद्रसे एक योजन है। वहां [ तत्र ] बहुत वंदर हैं । ५ द्वारपाल से यह वृत्तांत सुन कर राजा सिहासन से उठा। ६ पूर्वजन्मकृतपुण्यसे जीव सुखी होते हैं । ७ अन्य से क्या यह जीव शरीरसे भी वियुक्त होजाता हैं, एसा विचारकर राजा संग्रामसे विरत हुआ। २१-प्रमाद, निंदा, विराम और भय अर्थवाली धातुओंके योगमें जिससे प्रमाद आदि किये जाय उससे पाचवी विभक्ती होती है। जैसे “धर्ममें प्रमाद करता है" इस वाक्यमे प्रमाद धर्मसे किया गया है तो धर्म शब्दसे पाचवी विभक्ती होगी।' - - संस्कृतप्रवेशिनी। ६९ ८ मुनि लोग गृहस्थोंके पाससे पूजाके योग्य हैं। [धानीको आया ९ सुधर्माचार्यसे धर्मोपदेश सुनकर श्रेणिक समवशरणसे राज- १० जिसतरह मियान [कोष ] से तलवार भिन्न है उसीतरह [तथा एव] शरीरसे आत्मा अलग है। हिंदी वनाओ- १ मित्र! विरम त्वं निष्फलात् आरभात् । २ तदीयसंगात् [द] अखिलोऽपि [ही] भीरुरन्यो जनः शूरतरो बभूव [हुआ]। ३ अन्योन्यकृताद स्पधाटू इव गुणा वृद्धि गच्छंति स्म । ४ पितु [पिताकी ] निदेशाद् [द ] अथ सुंदरांगी स राजकन्यां विधिना नो] उपयेमे । [न युक्तः। ५ दुष्कर्मक्षयात् कथंचित् मानुपजन्म लब्ध्वा स्वहिताय प्रमादो ६ यावत् इमानि इंद्रियाणि प्रवलानि तावद् एव दुःखितं आत्मानं प्रयत्नात् भवात् यूयं मोचयितुं यतध्वं । ७ इति क्षितीशः सह शिक्षयाऽसौ विश्राणयामास [वितीर्णवान् ] सुताय लक्ष्मी । सोऽपि प्रतीयेष [स्वीकरोतिस्म] गुरूपरोधात् (गुरुके आग्रहसे)। ८ न काचिद् [दी] ईहा कृतकृत्यभावात् न च क्वचित् प्रेम शमत्व- योगात् [शांतिगुणसंयोगात् ] इयं हि कल्याणकरी प्रवृत्ति - गहिताय [येव एव [भवादृशानां] । ९ नराधिप! त्वां प्रियविप्रयुक्तं [प्रियरहितं विलोक्य दिव्येन सुलो- चनेन । गुणानुरागाद दि] अहमागतोऽस्मि [ आया हूं। द्वितीय पाठ। व्यंजनांत-पुंलिंग १ जलमुचः वारि पतति-मेघसे पानी गिरता है।
७०
सनातनजैनग्रंथमालायां-
परिव्राज उपदेशः श्रोतव्यः-सन्यासीसे उपदेश सुनना चाहिये ।
सम्राज शत्रव पलायंते-चक्रवर्तीसे वैरी भागते है।
पापकृत भयमुचितं-पापीसे डरना योग्य है।
बुद्धिमत शास्त्रमध्येयं बुद्धिमानसे शास्त्र पढना चाहिये ।
बलवत निर्वलो विमेति-वलवानसे निर्वल डरता है।
गायत गीतं श्रुतवान् राजा-राजाने गानेवालेसे गीत सुना ।
सुहृद अन्य स्वं न दृष्टव्यं-मित्रसे मिन्न अपनेको न समझना चाहिये ।
राज्ञ इतरः कोऽन्यः प्रजा रक्षति-राजाके सिवाय और कोन प्रजाकी
मूर्ध्न शिरस्त्राणं पतित-शिरसे टोपी गिरगई। [ रक्षा करता है।
अश्मन वह्निर्वहिर्गतः -पत्थरसे अग्नि निकल आई।
स्वामिन अधिको धार्मिको भृत्यः-स्वामीसे नौकर अधिक धार्मिक है।
चद्रमस ज्योत्स्नाः निस्सरति-चंद्रमासे चादनी निकलती है।
विदुष सूर्खः पराजयते-विद्वान्से मूर्ख हार जाता है।
ज्यायस मेतव्यं-वडेसे डरना चाहिये।
नोट-व्यंजनांत शब्दोंके पंचमी विभक्तीके द्विवचन और बहु-
वचनके रूप चतुर्थी विभक्तीके रूपोंके समान होते हैं इसलिये यहां
दुवारा नहीं लिखे गये हैं।
संस्कृत वनाओ।
१। राजासे बढकर कोई उपकारी नहीं है इसलिये उसके साथ
विरोध न करना चाहिये।
[निकली है।
२। हिमवान् [ हिमवत् ] से गंगा और महाहिमवान्से रोहित् नदी
३। हे राजन् ! मैंने तेरा ( त्वदीय) वृत्तांत सुधर्मनामा मुनींद्रसे
४। देवोंसे मनुष्य वर मांगते हैं।
[सुना है।
५। विद्वानसे मूर्ख दुःखी हैं । ६ छोटोंसे भी विद्या पढनी चाहिये।
संस्कृतप्रवेशिनी। ७१ युष्मत् । तृतीय पाठ। सर्वनाम सर्वस्मात् सर्वाभ्यां सर्वभ्यः। तस्मात् ताभ्यां तेभ्यः। यस्मात् याभ्यां येभ्यः। कस्मात् काभ्यां केभ्यः। अस्मात् आभ्यां एभ्यः। अमुष्मात् अमूभ्यां अमीभ्यः। मत् आवाभ्यां अस्मत् । त्वत् युवाभ्यां ऊपर लिखे हुये शब्दोंसे वाक्य वनाओ। संस्कृत वनाओ। १ इस मोही [ मोहिन् ] मुनिसे तो [तु] व्रती गृहस्थ अच्छा है। २ किसी शत्रुसे भयभीत हुआ मनुप्य राजाके समीप आया। ३ मुझसे वह गांव बहुत दूर है इसलिये मैं वहां नहीं जा सकता। ४ जो शास्त्रज्ञाता मुनि हों उनसे पढना योग्य है। ५ इस पेडसे गिरे हुये सव फल मीठे [मधुर] हैं। ६ तुम कहांसे आये हो ? मैं पटनासे आया हूं। ७ संमंतभद्र स्वामी भट्टाकलंकले पहिले हुये हैं। ८ आचार्य देवनंदिके वाद श्रीगुणनंदी हुये। ९ गंगा कहां से निकलती है और रोहित् कहां से । [कहा। १० माम? मुझसे भिन्न पद्मास्यको मत जानो [पश्य] एसा जीवंधरने ११ जो शरीरमात्र से भिन्न होते हैं वे ही सांचे मित्र हैं। १२ दारिन्ध से दूसरी चीज कोई अधिक दुःखदायक नहीं है। १३ तत्त्वज्ञानसे सर्वत्र सुख मिलता है। १४ शिथिल दो हाथों से पुस्तक गिरगई। १५ उदारचेताओं से भिन्न कौन दान दे सक्ता है ?
७२ सनातनजैनग्रंथमालायां- कन्यायाः कन्याभ्यः॥ वालायाः वालाभ्यः। मत्याः, मतेः ऊाः ऊमः नद्याः चतुर्थ पाठ। स्त्रीलिंग कन्याभ्यां वालाभ्यां मतिभ्यां ऊर्मिभ्यां नदीभ्यां तल्थुषीभ्यां रेणुभ्यां धेनुभ्यां वधूभ्यां चम्भ्यां मातृभ्यां दुहितृभ्यां ऋग्भ्यां त्वग्भ्यां विपद्भ्यां परिषद्भ्यां वीरुद्भ्यां मतिभ्यः। ऊर्मिभ्यः। नदीभ्यः। तस्थुषीभ्यः। रेणुभ्यः। धेनुभ्यः। तस्थुष्याः रेण्वाः रेणोः धेन्वाः धेनोः वध्वाः बधूभ्यः। चमूभ्यः। चम्वाः मातुः दुहितुः ऋचः मातृभ्यः। दुहितृभ्यः। ऋग्भ्यः। त्वचः त्वग्भ्यः। विपदः परिषदः वीरुधः क्षुदूभ्यां क्षुधः योषितः सरितः सर्वस्याः विपदभ्यः। परिषद्भ्यः। वीरुद्भ्यः। क्षुद्भ्यः। योषिभ्यः। सरिद्भ्यः। सर्वाभ्यः। योषिभ्यां सरिद्भ्यां सर्वाभ्यां अपराभ्यां अन्याभ्यां ताभ्यां अपरस्याः अपराभ्यः। अन्यस्याः अन्याभ्यः। तस्याः ताभ्या।
यास्यः। काभ्यः। आश्यः। अमूभ्यः। संस्थतप्रवेशिनी। यस्याः याभ्यां कस्याः काभ्यां अस्याः आभ्यां अमुष्याः अमूभ्यां १। कामपीडितो जनः पराराध- कामसे पीडित मनुष्य दूसरे लोगोंकी नात् उत्पन्नाया दीनतायाः, सेवा शुश्रषासे उत्पन्न हुई दीनतासे, पिशुनतायाः, परिवादात् चुगली खानेसे, निंदासे, और तिरस्का- पराभवात् अपि नाविभेति । रसे भी नही डरता है। २। इति ईशवाक्यं शुश्रूपी महि- इस तरह पतिके वाक्यको सुनती हुई षो तन्मुखग्लानेमर्छिता भ- पटरानी राजाके मुखकी मलिनतासे वति स्म। [ को देखकर ] मूर्छित हो गई। ३। तदवाण्याः सर्वे सभ्याः त्रा- उसकी वाणीसे संपूर्णसभाके लोग संगच्छंति स्म। त्रासको प्राप्त हुये। ४। गुरुगोचराभ्यःप्रश्रयशुश्रषा- गुरुके लिये की गई विनय, सेवा और चतुरताभ्यः विद्याः स्मृता चतुराईसे विद्यायें याद सरीखी हो इव भवंति। जाती हैं। ५। विद्यायाः परं किं श्लाघ्य- विद्यासे दूसरी कौनसी वस्तु प्रशंस- भूतं वस्तु। नीय है। ६। तस्याः परिषद: शिक्षार्थि- उस सभासे विद्यार्थी लोग ज्ञान नो ज्ञानं लभते। ७। आक्रोशवचःश्रुतेः काष्ठां- चिल्लानेके वचन सुननेसे काष्ठागार गारो रुष्टो जातः। क्रुद्ध हुआ। ८। अमुष्याः कन्यायाः पराजिताः इस लडकीसे राजा लोग हार गये । पार्थिवः । ९ । अल्याः महिण्याः चक्रवर्ती इस महारानीसे चक्रवर्ती पुत्र पैदा हुआ पाते हैं। सुतो भूतः। १० - सनातनजैनग्रंथमालायां- १० । गुणसंपदः परं कि लभ्यं । गुणरूपी संपत्तिसे दूसरी क्या चीज प्राप्त करने योग्य है। सस्कृत वनाओ- १। गुरुवाणीसे अधिक कोई हित करने वाला नहीं है । २। मातासे किसने ज्ञान नहीं पाया क्योंकि [ यस्मात् ] सव उससे उत्पन्न हुये हैं। ३। संपूर्ण सेनासे एक आदमी हारगया तो क्या आश्चर्य है। ४। गुरुभक्तिसे दूसरी कोई भी वस्तु कठिन नहीं है । ५। उपाध्यायीले लडकियां छिपती हैं। - पंचम पाठ। नपुंसकलिंग नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- पुष्पात् पुष्पाभ्यां वनात् वनाभ्यां दानात् दानाभ्यां वारिणः वारिभ्यां मधुनः मधुग्यां सानुन सानुभ्यां श्रीमतः श्रीमद् भ्यां गुणवतः गुणवदुभ्यां शर्मणः शर्मभ्यां कर्मणः कर्मभ्यां पयसः पयोभ्यां चेतसः चेतोभ्यां ज्योतिषः ज्योतिभ्यां पुष्पेभ्यः। वनेभ्यः। दानेभ्यः। वारिभ्यः। मधुभ्यः। सानुभ्यः। श्रीमदभ्यः। गुणवद्भ्यः। शर्मभ्यः। कर्मभ्यः। पयोभ्यः। चेतोभ्यः। ज्योतियः।
७५ संस्कृतप्रवेशिनी। हविष: हवियों हविर्यः। धनुषः धनुभ्यां धनुर्यः। सर्वस्मात् सर्वाभ्यां सर्वेभ्यः। तस्मात् ताभ्यां तेभ्यः। अमुष्मात् अमभ्यां अमीभ्यः। अस्मात् आभ्यां एभ्यः। यस्मात् याभ्यां येभ्यः। कस्मात् काभ्यां केभ्यः। १। वनादू वहिन गंतव्यं वनके वाहर न जाना चाहिये । २। आशैशवात् चपलः सः-वह लडकपनसे चपल है। ३। सम्यग्दर्शनशानचारित्रेभ्यः सम्यग्दर्शन ज्ञान और चारित्रके विना ऋते न मुक्तिर्भवति। मोक्ष नही होती है। ४। मधुभक्षणात् महती हिंसा भवति । मधुखानेसे वडी हिंसा होती है। ५। पयसः नवनीतं उत्पद्यते-दूधसे मक्खन पैदा होता है। ६। धनुषः शरं निर्गच्छति-धनुषसे वाण निकलता है। [ तप है। ७। किमतिदीनोद्धरणात् परं तपः-दीनोंके उद्धारसे अधिक बडा कौनसा ७। वाराणस्याः परं कालिकात्ता वर्तते-बनारसके वाद कलकत्ता है। ८। पतितं कुसुममपि दुर्भाग्य- गिरा हुआ फूल भी दुर्भाग्यके वशसे वशात वज्राद् अपि निष्ठरं वज्रसे भी ज्यादा निष्ठुर हो जाता है। भवति। ९ । पुण्यात, वज्रोऽपि कुसुमं जायते । पुण्यसे वज्रमी फूल हो जाता है। १० । दारुण अग्निः, अग्नेः उष्णता काष्ठसे आग, आगसे गरमी पैदा उत्पद्यते। होती है। सस्कृत वनाओ- १। एक दत स्वामिवचनसे राजसभामें आकर कहने लगा। २। छलसे जो किसीको मारता है वह अवश्य ही पापी है।
७६ सनातनजैनग्रंथमालायां- ३। राजा चार (चतुर्भिः) उपायोंसे शत्रुको वश करते है (न- यंति) उनमें (तत्र) दानसे धनहानि, दंडसे बलहानि, मे. दसे निंदा होती है इसलिये सामके सिवाय दूसरा कोई अच्छा उपाय नहीं हैं। ४ । इसतरह मंत्रिमुख्योंसे सम्मति नकर राजाने कहा। ५। तृणसे हलकी (लघु) रुई [तूल ] होती है और रूईसे भी हलका याचक होता है। [ऊंगा (आनेण्यामि)। ६ । मैं तुम्हारे लिये मुम्बई [ मोहमयी] से बहुत सी किताबें ला- ७। मेरे [ मदीय'] वचनोंसे तुमने यह दुष्कर्म किया है इसलिये- ८। मोहसे लोग अति दुष्कृत्य कर्म भी करते हैं । [मुझसे वर मांगो ९। तिरस्कृत होनेपरभी स्वामीसे विरक्त न होओ। [ने चाहिये। १० । तत्त्वज्ञान कठिन है इसलिये तत्त्वज्ञसे प्रयत्नपूर्वक तत्त्व जान- ११ । दुर्जन स्वभावसे सजनोंकी निंदा करते हैं। १२। मैने बडे भारी वैयाकरणसे व्याकरण पढा है। १३ । जो लोग संसारसे डरते हैं उन्हें जिनधर्म सेवना चाहिये। १४ । तुमसे उसने पढा ? और तुमने किससे पढा? । १५ । मकानोंसे गिरता हुआ जल अतिशोभता है। ? साहित्य परिचय। हिदीमें अनुवाद करो- गर्वेण मातृपितृबांधवमित्रवर्गाःसर्वे भवंति विमुखा विहितेन पुरुषात्री वर्द्धस्व, जीव, जय, नंद, विभो! चिरं त्वमित्यादि चाटुवचनानि विभाषमाणः । दीनाननो (दीनमखः) मलिननिंदितरूपधारी लोभा- कुलो भवति ॥२॥ चौरं कुलं विशति लोभवशेन मयो नो धर्मकर्म विदधाति कदाचिद् (द) अज्ञः॥३॥ तिष्ठंतु वाह्यधनधान्यपुररसरार्थाः संवर्द्धिता:प्रचुरलोभवशेन पंसा (जनेन) कायोऽपि नश्यति निजोऽय- + संस्कृतप्रवेशिनी। मिति प्रचिंत्य लोभारि (मु) उग्रं (मु) उपहति विरुद्धतत्त्वं ॥४॥ वरं हालाहलं पीतं सद्यः प्राणहरं विषं । न पुनर्भक्षितं शश्वद् दुःखदं मधु (देहिनां प्राणियोंको) ॥५॥ प्रमादेन (नापि ) अपि यत् पीतं भवभ्रमणकारणं । तद् (द) अनाति (खादति) कथं विद्वान् भीतचित्तो भवात् मधु ॥६॥ योऽश्नाति मधु निस्त्रिंशः (राक्षसः) जीवास्तेन मारिताः। चेद् नास्ति खादकः कश्चिद् वधकः स्याद् (होगा) तथा कथं ॥७॥ दीनैर्मधुकरैर्वर्गः संचितं मधु कृच्छ्रतः । यः स्वीकरोति निस्त्रिशः सोऽन्यत् त्यजति कि नरः॥८॥ संसारभीरुभिः सद्भिर्जिनाज्ञां परिपालितु । यावज्जीवं (जीवनभर) परित्याज्यं सर्वथा मधु मानवैः ॥९॥ प्रवर्तते यतो दोषा हिंसारंभभयादयः । सत्यमपि न वक्तव्यं तद् वचः सत्यशालिभिः ॥१०॥ इह दुःखं नृपादिभ्यः परत्र (परलोकमें) नरकादितः निरकादेः] । प्राप्नोति स्तेयत (चौयात् स्तेन स्तेयं त्याज्यं सदावुधैः ॥ ११ ॥ येऽपि (प्य) अहिंसादयो धास्तेऽपि नश्यति चौर्यतः। मत्वा (त्वे) इति न त्रिधा ग्राह्य परद्रव्यं विचक्षणैः ॥ १२ ॥ मातृस्वस्सुतातुल्या निरीक्ष्य परयोषितः। स्वकलत्रेण (नाया ) यस्तोषश्चतुर्थ तदणुव्रतं ॥ १३ ॥ किं सुखं लभते मर्त्यः सेवमानः परस्त्रियं । केवलं कर्म बध्नाति श्वभ्र (नरक) भूम्यादिकारणं ॥ १४ ॥ हिंसातो विरतिः सत्यं (म) अदत्तपरिवर्जनं । स्वस्त्रीरतिः प्रमाणं [ तृष्णा रोकना] च पंचधाऽणुव्रतं मतं ॥ १५॥ चेतो निवारितं येन धावमानं मि] इतस्ततः । किं न लब्धं सुख तेन संतोषामृतलाभतः ॥ १६ ॥ निर्मथं (परिग्रहशून्य) निर्मलं तथ्यं पूतं (पवित्र) जैनेंद्रशासनं १७ - सनातनजैनग्रंथमालायां- मैथुनं स्त्रीसंगं] भजते भयो न दिवा [दिनमें] यः कदाचन। दिवा मैथुननिर्मुक्तः स वुधैः परिकीर्तितः ॥ १८ ॥ संसारभयं [मा] आपन्नो मैथुनं भजते न यः। सदा वैराग्यं [मा] आरूढो ब्रह्मचारी स भण्यते ॥१९॥ सप्तधा पृथिवीभेदात् नारकोऽपि प्रमिद्यते । अधोलोकस्थिताः सप्त पृथिव्यः परिकीर्तिताः ॥ २० ॥ आद्या प्रथमा] रत्नप्रभा नाम द्वितीया शर्कराप्रभा । सिकतादिप्रभान्या च परा पंकप्रभा मता ॥ २१ ॥ धूमप्रभा ततो ज्ञेया परा तस्यास्तमम्प्रभा । महातमा प्रभा च [चे] इति [तासां] नामानि (न्य) अनुक्रमं ॥ २२ ॥ रक्षायै प्रजया दत्तं षष्ठांशं छठवांभाग] वेतनोपमं नौकरीके समान] गृह्णन् भृतकचत् मूढी राजाहं [ मि ] इति मन्यते ॥ २३ ॥ भ्रातृन हंति पितॄन हंति वंधून नि] अपि निरागसः [निरपराधिनः] हंति [त्या] आत्मानं [म अपि क्रोधात् धिक क्रोधं [म] अविचारकः२४ भोगान् धिग, धिग, धनंधिग धिग, घिग धिग. (गिं) इद्रियजं सुखं धिग, धिग, परोपघातेन (परहिंसया) यद (द) अन्यदपि जायते।२५। न परं बंधनं प्रेम्णो न विष विषयात् परं । न कोपा [द] अपरः शत्रुर्न दुःखं जन्मनः परं ॥ २६ ॥ विशुद्ध्यति दुराचारः सर्वोऽपि तपसा ध्रुवं ॥ २७ ॥ अंगारसदृशी नारी नवनीतसमा नराः। तत् (इसलिये) तत्सानिध्यमात्रेण द्रवेत् (पुसां) हि मानसं ॥ २८ ॥ संलापवासहासादि तद् वयं (त्याज्यं ) पापभीरुणा। वालया, वृद्धया, मात्रा, दुहित्रा वा व्रतस्थया ॥ २९ ॥ भुक्तपूर्व (मि) इदं सर्व त्वयाऽऽत्मन् भुज्यते ततः [(प्राणियोंकेजन्म) उच्छिष्टं (जूठा) त्यज्यतां राज्यं (म) अनंता हि (ह्य) असुभृद्भवाः पाकं ( पवित्रतां) त्यागं ( दानं ) विवेकं च वैभवं मानितां म] अपि ७९ संस्कृतप्रवेशिनी। कामार्ताः [कामपीडिता:] खलु मुचंति किं [म]अन्यैः स्वं च जीवितं गुरुभक्तो भवादू भातो विनीतो धार्मिक सुधीः। शांतस्वांतो [शांतचित्तः] हि [य] अतंद्रालुः[परिश्रमी] शिष्टः शिष्योऽयं (मि) इष्यते । ३२। ऊपर लिखे हुये लोकोमें वाच्यपरिवर्तन करो। सस्कृत वनाओ- मुनिश्रेष्ठ यशोधरने श्रेणिकसे कहा-नरनाथ ! तुमको विपरीत वात न विचारनी चाहिये। पापविनाशार्थ जो तुमने आत्महत्या विचारी है सो अयोग्य है आत्महत्यासे थोडाभी पाप नष्ट नहीं होता है । इसकर्मसे पुण्यके स्थानमें पाप ही होता है। भगधेश ! जो जीव अज्ञानवशसे तलवार विष आदि द्वारा आत्महत्या करते हैं कि हमारी (अस्मदीय) आत्मा कष्टोंसे मुक्त हो जायगी और सुख मिलेगा वे दुःख पाते हैं। आत्मघात से कदापि सुख नही मिलता । आत्मघातसे परिणाम संक्लेशमय होते हैं। संक्लेशमय परि- णामोंसे अशुभकर्मबंध होता है और अशुभवंधसे नरक आदि दुर्गतियां मिलती हैं । राजन् ! यदि तुम स्वहित चाहते हो तो इस अशुभ संकल्पको छोडो। अपनी आत्माकी निंदा करो। एवं इस पापकेलिये शास्त्र विहित प्रायश्चित्त आचरो। पापोंसे विनिर्मुक्त होनेका यही उपाय है। मुनिराजसे यह उपदेश सुनकर महाराज श्रेणिक आश्चर्यान्वित होगये वे महारानीकी तरफ देखकर बोले "सुदर ! यह क्या वात है ? मुनिने मेरे मनोभिप्रायको कैसे जाना अहो! ये मुनि साधारण मुनि नही किंतु कोई महामुनि हैं" महाराजसे यह बात सुन कर चेलनाने कहा-नाथ ! हस्तरेखाके समान समस्त पदार्थोके जाननेवाले ये मुनिराज हैं । प्राणनाथ ! भवदीयमनोवाती मुनिरा- ने स्वकीय परमपवित्र ज्ञानसे जानी है। आप आश्चर्य न करें। मनि- ८०. सनातनजैनग्रंथमालायां- राज आपके पूर्वभवोंको भी कह सक्ते हैं । यदि पूछनेकी इच्छा हो तो पूछिये" चेलनासे इसतरह अपूर्वमहिमान्वित ज्ञानधारी मुनि को जान कर श्रेणिकने अपने [ स्वकीय ] पूर्वभव पूछे । प्रश्नमाला--- आत्महत्यया कि भवति? श्रेणिकेन कि विचारितं? पापनिर्मुक्तये क उपायः ? मुनिज्ञानं कीदृशं? चेलनया के प्रति किं मुक्तं ? श्रेणि- का किं श्रोतुमिच्छतिस्म। आत्महत्याफलं लिख्यतां । षष्ठी विभक्ती। प्रथम पाठा स्वरांत पुलिंग १ वीरस्य चरणं सेवते लक्ष्मी-वीरके चरण लक्ष्मी सेवती है। जंबूद्वीपस्य मंडनं भरतक्षेत्र-जंबूद्वीपका भूषण भरत क्षेत्र है। मुने वचसास धर्ममाश्रितः-मुनिके वचनसे उसने धर्मका आश्रयण किया हरेः गर्जनं श्रुत्वा स भीत:-सिहकी गर्जना सुनकर वह डर गया । गुरो आशया गृहं गतः-गुरुकी आज्ञासे घर गया। विभावसोः तेजोऽसा-अग्नि या सूर्यका तेज असह्य है। [विवाहा । पितुर्नियोगात् तेन भाया परिणीता-पिताकी आज्ञासे उसने भायाको दातुः सत्कारः कार्य:-दाताका सत्कार करना चाहिये। २ बालकयोः पुस्तकानि अपहृतानि-दो लडकोकी पुस्तकें चुराली हैं। मुन्या ग्रंथोऽयं-दो मुनियोका यह ग्रंथ है। गुर्वो पुस्तकानि इमानि-दो गुरुओंकी ये पुस्तके हैं । पित्रोः आशा अनुष्ठेया माता पिताकी आज्ञा करनी चाहिये । २२-सबंध अर्थमे षष्ठी विभक्ती होती है जैसे "वीरके चरण" यहा वीरका और चरणका अवयव अवयवी संबंध है सामान्यसे हिदीमें जहा "का-की-के" बोले जाते हैं वहा संस्कृतमें छठी विभक्ती है।
संस्कृतप्रवेशिनी। ३ जीवाना शानं महत् हितकर-जीवोको ज्ञान बडा हितकारी है। खलाना वाणी असह्या भवति-दुर्जनाकी वाणी असह्य होती है। कवीनां रसवत् वचः-कवियोका वचन रसीला होता है। मुनीना देहोऽपि अप्रियः-मुनियोको देह भी प्यारा नही होता है। गुरूणा मधुरं वाक्यं भवति-गुरुओंके मीठे वचन होते हैं । शिशूना चपलता दृश्या भवति-वचोकी चंचलता देखने योग्य होती है। भ्रातॄणा मनांसि प्रफुल्लानि-भाईयोंके मन प्रफुल्लित हैं। उपकर्तृणां उपकारो विधेयः-उपकारियोंका उपकार करना चाहिये। हिंदी वनाओ- १। अलंध्यं हि गुरोवाक्यमपत्यैः (पुत्रैः) पथ्यकांक्षिभिः । २। दितेरपि सुतो मदीयामाशामप्राप्य इमां भूमिमागंतुं न अलं। ३ । दुहितुश्चित्तवृत्तिं स्वकीयचित्तवृत्तेः सदृशी ज्ञात्वा भूपः हृष्टो ४ । कामस्य वशं गतो जीवो हिताहितंन विचारयति। [भवति स्म। ५। सत्यंधरस्य अतिगुणी पुत्रो जीवंधरो जातः। द्वितीय पाठ। अन्यान्य पुंलिंग शब्द नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- जलमुचः जलमुचोः परिवाजा परिवाजोः सम्राजः सम्राजोः पापकृतः पापकृतो वुद्धिमतः बुद्धिमतोः बलवतः बलवतोः गायतः गायतोः सुहृदः सुहृदोः जलमुचां। परिवाजां। सम्राजां। पापकृतां। बुद्धिमतां । बलवतां। गायतां। सुहृदां।
सनातनजैनग्रंथमालायां- यस्य राज्ञोः राक्षां। मूर्ध्न: मूनों: मूनों। अश्मनः अश्मनोः अश्मनां। स्वामिनः स्वामिनोः स्वामिनां। चंद्रमसः चंद्रमसोः चंद्रमसां। विदुषः विदुषोः विदुषां। ज्यायसः ज्यायसो ज्यायसां। सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषां। तयोः तेषां। ययोः येषां। कस्य कयोः केपां। अस्य अनयोः एषां। अमुष्य अमुयोः अमीपां। आवयोः अस्माकं। तव युवयोः युष्माकं। हिंदी वनाओ- । परस्परदर्शनस्य उत्सुका इव सकला: नरनाथविद्यास्तं राजानं २। स्वस्वामिनो मनो वशीकर्तुं सा राशी अलं । [प्राप्तवत्यः। ३ । स राजातमालतरुमूलगतस्य तपस्विनश्चरणौ मूनी नमति स्म। ४। विशुद्धपाठः स महर्षिरपि आत्मनो योगं परिसमाप्य आशी- पंचांसि पठति स्म। ५। भवतः पुत्रोदयेऽपि जन्मांतरस्य अंतरायोऽस्ति । ६ । इयं तव अग्रमहिषी अस्य नगरस्य एव देवांगदस्य वणिजः सुनंदा नाम्नी पुत्री वर्तते स्म । ७। रागादिदोषाणामगारो (घर) देवः प्राणिनां मोक्षदायको न । ८। अस्य विदुषोऽपि कश्चिद् विसंवादो न जातः । मम - है संस्कृतप्रवेशिनी। ९। अत्र विद्याप्रदायिनां का प्रत्युपक्रिया अस्ति? १० । ज्यायसो लघीयसो वा भ्रातुर्विलोकनं प्रीत्यै भवति यदि ते वियुक्ताश्चेद् पुनः किं? ११ । सुहृदां हितकामानां वचांसि विधेयानि भवति । संस्कृत बनाओ- १। जब उस राजपुत्रका जन्म हुआ तब वैरियोंके हृदय भी विक- २। विद्वानोंका सत्कार विद्वान् ही करते हैं। [सित हो गये। ३। जोजिसके गुण नहीं जानता वह उसकी हमेशानिंदा करता है। ४। मेरा मन संसारके भोगोंसे विरक्त हो गया है। ५। हमारा यश चिरस्थायी हो ऐसी भावना सज्जनोंकी होती है। ६ । जयशाली, गुणोंसे भूषित, गुरुवंशसमुद्भूत राजाके थोडासा [मनाक् ] भी मद नहीं हुआ। ७। चंद्ररुचि नामक दैत्यने पृथिवीपतिके पुत्रको हरा था। ८। हे पुत्र! तू मेरे यश, सुख और तेजका कारण था। ९। संपूर्ण देहियोंको अनिष्टका संयोग और इष्टका वियोग होता है। १०। चंद्रमाका प्रकाश ठंडा और मनको मोदक होता है। ११ । पत्थरके आघातसे शिर फूटगया [भिन्नं] तृतीय पाठ। स्त्रीलिंग नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- कन्याया। कन्ययोः बालायाः बालयोः मत्योः नद्याः नधोः तस्थुष्या तस्थुण्योः मत्याः, मते कन्यानां। बालानां। मतीनां। मदीनां। वस्थुषीणां। A क IA सनातमजैनग्रंथमालायां- रेवाः धेन्वाः बध्वाः चस्वाः मातुः दुहितुः ऋचः त्वचः विपदः परिषदः वीरुधः रेण्वोः धेन्वोः बध्वोः चम्वोः मात्रोः दुहित्रोः ऋचोः त्वचो विपदोः परिषदोः वीरुधोः क्षुधोः योषितोः सरितो सर्वयोः अपरयो अन्ययोः तयोः कयो अनयोः अमुयोः रेणूनां । धेनूनां । बधूनां। चमूनां। मातॄणां। दुहितॄणां । ऋचां। त्वचां। विपदां। परिषदां। वीरुधां। क्षुधां। योषितां। सरितां। सर्वासां। अपरासां। अन्यासां। तासां। कासां। आसां । अमूषां। क्षुधा योषितः सरितः सर्वस्याः अपरस्याः अन्यस्याः तस्याः - कस्याः अस्याः अमुष्याः चतुर्थ पाठ। नपुंसकलिंग नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- पुष्पस्य पुष्पयोः घनस्य धनयोः पुष्पाणां। बनानां।
संस्कृतप्रवेशिनी। ८५ दानस्य दानयोः दानानां। वारिण: वारिणोः वारीणां। मधुनः मधुनोः मधूनां । सानुना सानुनोः सानूनां ।. श्रीमतः श्रीमतो श्रीमतां। गुणवतः गुणवतोः गुणवतां। शर्मणः शर्मणोः शर्मणां। कर्मणः कर्मणोः कर्मणां । पयसः पयसोः पयसां। चेतसः चेतसोः चेतसां। ज्योतिषः ज्योतिपोः ज्योतिषां। हविषः हविषोः हविषां। घनुपः धनुपोः धनुषां। सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषां। अपरस्य अपरयो अपरेषां। तस्य तयोः तेषां। यस्य ययोः येषां। कयोः केषां। अस्य अनयोः एषां। अमुष्य अमुयोः अमीषां। हिंदी वनाओ- १ । असंख्यजीवानां घातात् एको मधुनः कणो जायते । २। भ्रमरा एकस्य एकस्य पुष्पस्य रसमादाय (लेकर) मधु एकत्र ३। जना दानस्य प्रभावेण स्वर्गसुखमनुभवंति । [कुर्वति। ४। चेतसो मलिनतया अशुभकर्मणां बंधो भवति । ५। हविषो धून ऊर्व घेगेन गच्छति ।
८६ सनातनजैन ग्रंथमालायां- पंचम पाठ। षष्ठी विभक्तीका व्यवहार । १। स राजपुत्रस्तस्य योद्धर्व- उस राजपुत्रने उस योद्धाके वचनोंसे चोभिः क्रुद्धः सन् एकस्य कुंद्ध होते हुये एकके हाथसे धनुष छीन करात् धनुर्हरति स्म। लिया। २। पूर्वजन्मकृतपुण्यकर्मणः अनंतर-पूर्वजन्ममें किये हैं पुण्यकर्म पाकशासनसमानतेजसः । जिसने ऐसे तथा इद्रके समान तेजवाले चक्ररत्नमथ तस्य खंडिता- उस चक्री (चक्रवर्ती) के खंडित किया रातिचक्रमुदपादि चक्रिणः॥ है शत्रुचक्र ( समूह) जिसने ऐसा चक्ररत्न उत्पन्न हुआ। ३। कामकल्पवपुष नगरी प्र- कामके तुल्य शरीरवाले, नगरीमें प्रवेश विशंतं तं सम्राजं वीक्ष्य पुर- करते हुये उस सम्राटको देखकर नगरकी सुंदरीणां निवहः क्षुब्धः। सुंदरियोंका समूह क्षुब्ध होगया। ४। जनैःसंकुलं मार्गगच्छंत्याः लोगोंसे व्याप्त मार्गमे चलती हुई कस्याश्चित् कृशांग्या हार- किसी कृश अगवाली स्त्रीकी हारलता लतिका त्रुटिता। टूटगई। ५। क्रम-सरोज-नताया जन चरण कमलोंमें नम्रहुये जनसमुदायका ताया रक्षकः स भूपोरांज- रक्षक वह राजा राजमंदिरमे प्रवेश करता मंदिरं विशति स्म। ६। नव-नवांकुर-लीनामलीनां नये नये अकुरोंमें लीन भ्रमरोंके समूहको संहति इष्टुं विरहिणो न देखनेके लिये विरही समर्थन थे। समर्थाः। ७। वियोगिनीनां हृदि कलि- वियोगिनियोंके दृदयमें कलियुगके समान कालं मधुकरं धारयंती के- काले भ्रमरको धारण करती हुई केसर सर-तरोःकलिकाऽन्यथां पक्षी की खूब पीडा करती हुई। छत्तपती। हुआ।
संस्कृतप्रवेशिनी। ८। हे मानिनि ! मम तांतं मा- हे मानशीले ! मेरे लात मनको वसंत- नसं मधुदिनानि नितांतं ऋतुके दिन अत्यंत संतप्त करते हैं। तापयंति। ९ । अविचारितरम्यं हि रागां- रागाधोंका काम विना विचारे रमणीय धानां विचेष्टितं। होता है। १० । अस्वप्नपूर्व जीवानां न हि- जीवोंका शुभ, अशुभ विना स्वप्नके जातु शुभाशुभं। नही होता। ११ । नृणां विपदः परिहाराय मनुष्योंको विपत्ति दूर करनेके लिये शोको न उचितः। शोक करना ठीक नहीं है। १२। जीवितात् तु पराधीनात् पराधीन जीवनसे तो प्राणियोंका मरना जीवानां मरणं वरं। अच्छा है। १३। अर्थिनां जीवनोपायमपायं याचकोंके जीवनके उपायको शत्रुओंके चामिभाविनां । कुर्वतः खलु नाशको करनेवाले राजा लोग होमा- राजानः सेव्याहव्यवहा यथा। निके समान सेवनीय हैं। १४ । पित्तज्वरवतः क्षीरं तिक्तमेव पित्तज्वरवालेको दूध कडुआ ही ल- भासते। गता है। संस्कृत बनाओ- १। अनुनय महात्मा लोगोंके माहात्म्यको बढाता है। २। माताओंके स्थूलप्राण पुत्र होते हैं। ३। तत्त्वज्ञानके अभावमें रागादिक निरंकुश हो जाते हैं ४। संपत्ति और विपत्तियोंकी प्राप्ति किसी छलसे होती है। ५। स्त्रियोंका भूपण लजा है उद्दण्डता नहीं। ६। नदियोंके जलसे समुद्रको विकार नहीं होता। ७। प्राणियोंके मनोरथ करोड [कोटि ] से भी अधिक होते हैं। - १-पृष्ठ ३२-३३ की टिप्पणी देखो। .
सनातनजैनग्रंथमालायां-
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८। संपत्तिके लाभका फल विद्वानोंका पोषण करना है।
९। जो स्वामीके गुप्तमंत्रको प्रकट करदेता है वह अवश्य ही नरक
को जाता है।
१०। जिस आदमीके धन है वही बड़ा है क्योंकि सम्पूर्ण गुण
सुवर्णका आश्रय करते हैं।
११। मनुष्यका रूप विद्या है विद्या गुरुओंकी गुरु है विद्याके
अभावमें मनुष्य पशु है।
१२। जिस जिसको देखो उस उसके सामने दीन वचन मत कहो।
१३ । बहुत कहनेसे क्या! राजाके समक्ष ही हम दोनों की
परीक्षा होगी।
१४। सुखके अनंतर दुःख, दुःखके अनंतर सुख होता है ऐसी
संसारकी रीति है।
१५। पक्षियोंका भूपण एक चातक है क्योंकि या तो वह पिपासासे
मर जाता है या फिर प्रथम मेघकी ही बूंद पीता है ।
१६ । हे विद्वन् ! शोक मतकर । तेरा नाश नहीं है और संसार
सिंधुके तरनेका उपाय है।
१७ । सुर असुरोंसे नमस्कृत श्रीजिनेद्रको नमस्कार कर गृहस्थोंके
व्रतोंको कहूंगा।
१८ । शोकके वशीभूत हुये आदमीका सुख चला जाता है ।
१९ । जो भव्यकमलोंको हर्ष देती है, अज्ञान अंधकारके प्रभावको
हरती है, संपूर्ण पदार्थोको प्रकाशित करती है ऐसी जिनेंद्रकी
वाणी हमलोगेांका कल्याण करे।
२० । इन्द्रियविषय देवताओंको भी दुख देता है।
२१ । जो जीव-देव, देवेंद्र, चक्रवर्तियोंके भोगांसे तृप्त नहीं हुआ
वह सामान्य मनुष्यके भोगेांसे कैसे तृप्त हो सकता है।
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संस्कृतप्रवेशिनी। साहित्य परिचय। सूचना-श्लोकोंका अर्थ विचारते समय विद्यार्थियोंको चाहिये कि वे सबसे पहिले लोकोके सघिसे जुड़े हुये पदोको अलहदा करें उसके बाद उनकी विभक्ती विभक्तियोका अर्थ, धातु, धातुसे आये हुये प्रत्यग और उनके अर्थ तथा एक दूसरेके साथ उनका संबंध विचारे और तव हिदी वनावे । तव रूपस्य सौदर्य दृष्ट्वा तृप्ति ( म ) अनापिवान् ( अप्राप्तः)। ध्यक्षः (द्विनेत्रः) शक्रः सहस्राक्षो बभूव (जातः) बहुविस्मयः ॥ १ ॥ आपगा (नदी) सागरस्नानं (मु) उञ्चयः (संग्रहः) सिकताऽश्मनां। गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढं निगद्यते ॥२॥ प्रहतं मरणेन जीवितं जरसा (वुढापेसे) यौवनं (मे) एप पश्यति। प्रतिजंतु, जनस्तद् (द) अपि (प्य)अहो स्वहितं मंदमतिन पश्यति ॥३॥ नसंति (है) वाह्यामम केचनार्थी भवामि तेपांन कदाचन (ना) अहं । इत्थं विनिश्चित्य, विमुंच वाह्य, स्वस्थः सदा त्वं भव भद्र! मुक्त्यै ॥४॥ स्वयं कृतं कर्म यद् (दा) आत्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभं । परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा ॥५॥ निजार्जितं कर्म विहाय देहिनो, न कोऽपि कस्यापि ददाति किंचन । विचारयन् (ने) एवं (म)अनन्यमानस:, परो ददाति (ती) इति विमुंच शेमुपी (वुद्धि)॥६॥ शरीरतः कतै (म) अनंतशक्ति विभिन्नं (मा) आत्मानं (म)अपास्तदोपं। जिनेंद्र ! कोषाद् (दि) इव खड्गप्टिं, तव प्रसादेन मम (मा) अस्तु (हो) भक्तिः ॥७॥ एकेंद्रियाद्या यदि देव! देहिनः, प्रमादतः संचरता इतस्ततः । क्षता विभिना मिलिता निपी- डितास्तद् (द)अस्तु मिथ्या दुरनुष्टितं (दुष्कार्य) तदा ॥ ८॥ विमुक्ति- मार्गप्रतिकूलवर्तिना मया कपायाक्षवशेन दुर्धिया। चारित्रशुद्धेर्यद (द) अकारि लोपनं, तद् (द) अस्तु मिथ्या मम दुष्कृतं प्रभो ॥९॥ अतिक्रमं यं विमतेर्व्यतिक्रम, जिन ! (ना) अतिचारं सुचरित्रकर्मणः। व्यधाम् [किया हो] (म) अनाचारं (म) अपि प्रमादतः, प्रतिकर्म १२ ९० सनातननग्रंथमालायां- तस्य करोमि शुद्धये ॥ १०॥ क्षतिं मनःशुद्धिविधेरतिक्रम, व्यतिक्रम शीलवृतेर्विलंघनं । प्रभो! s(अ) तिचारं विषयेपु[विषयमें] वर्तन, वदंति (त्य) अनाचारं (मि) इह (इही) अतिसक्तितां ॥ ११ ॥ यद् (द) अर्थमात्रापदवावयहीनं, मया प्रमादान यदि किंचन [नो] उक्तं। तत् मे क्षमित्वा विद्धातु (कर) देवी.सरस्वती केवलवोधलब्धि॥१२॥ सुखितस्य दु:खितस्य च संसारे [संसारमें धर्म एव तव कार्यः । सुखितस्य तदसिवृद्ध्यै दुःखभुजस्तदुपघाताय ॥ १३ ॥ धर्मः सुखस्य हेतुहेतुर्न विरोधकः स्वकार्यस्य । तस्मात् सुखभंगमिया मा भूः [मतहो] धर्मस्य विमुखस्त्वं ॥१४॥ कृत्वा धर्मविघातं विषयसुखानि (न्य) अनुभवंति ये मोहात् । आच्छिद्य काटकर] तरंमूलात् फलानि गृह्णति लेते हैं] ते पापा:१५ स धर्मो यत्र न (ना) अधर्मस्तत् सुखं यत्र न (ना) असुखं । तत् ज्ञानं यत्र न (ना) अशानं सा गतिर्यत्र न [ना] आगतिः ॥१६॥ अर्थिनो धनं [म] अप्राप्य धनिनोऽपि [प्य] अवितृप्तितः। कटं सर्वेऽपि सीदति परं मे एको मुनिः सुखी ॥ १७॥ पलित [श्वेतकेश] च्छलेन देहात् निर्गच्छति शुद्धिरेव तव बुद्धः । कथं [मि] इव परलोकार्थ जरी वराकस्तदा स्मरति ॥ १८ ॥ प्रज्ञा [झै] एव दुर्लभा सुष्ठ, दुर्लभा साऽन्यजन्मनि [दूसरे भवमें] । तां प्राप्य ये प्रमाद्यति ते शोच्याः खलु धीमतां ॥ १९॥ [(किया) कंठस्थकालकूटोऽ [विष] पि शंभोः किं मि] अपि न [ना] अकरोत्। सोऽपिदंदहते जलाया जाता है] स्त्रीमिः, स्त्रियो हि विषमं विषं ॥२०॥ लोकद्वयहितं वक्तुं श्रोतुं च सुलभाः पुरा । दुर्लभाः कर्नु, [म] अद्यत्वे [आजकल] वक्तुं श्रोतुं च दुर्लभाः ॥२१॥ निर्धनत्वं धनं येषां मृत्युरेव हि जीवितं । किं करोति विधिस्तेषां सतां शानकचक्षुषां ॥ २२ ॥ जीविताशा धनाशा च येषां तेषां विधिनिधिः।
संस्कृतप्रवेशिनी। किं करोति विधिस्तेषां,येषां मा] आशा निराशता [निराशा होगई है]२३ परां कोटिं समारूढौ द्वौ द्विावे] एव स्तुतिनिंदयोः। यस्त्यजेत् [छोड़दे] तपसे चक्र यस्तपो विषयाशया ॥ २४ ॥ अपि रोगादिमिर्वृद्धैन मुनिः खेदं [] ऋच्छति [गच्छति । उडुपस्थस्य [नावमें बैठे हुयेको] कः क्षोभः प्रवृद्धेऽपिनदीजले ॥२५॥ पापाद् दुःखं धर्मात् सुखं मि] इति सर्नजनसुप्रसिद्धं मि] इदं । तस्माद् विहाय पापं, चरतु सुखार्थी सदा धर्म ॥ २६ ॥ संस्कृत बनाओ। मुनिराज यशोधरके मुखसे अपने पूर्वभवके वृत्तांतको सुनकर राजा श्रेणिकको जातिस्मरण होण्या। जातिस्सरणके प्रभावसे शीघ्र ही उनने पूर्वभवका वास्तविक हाल जान लिया। वे मुनि- राजके गुणोंकी प्रशंसा कर ऐसा विचार करने लगे "अहो! मुनि यशोधरका ज्ञान धन्य है। उत्तमक्षमा इनकी प्रशंसनीय है। परी- पह जय तो लोकोत्तर है। इनके प्रत्येक गुणोंसे जाना जाता है (ज्ञायते) कि ये अछितीय मुनि हैं मुनियोंके शिरोमणि हैं । इनके आगमज्ञानको भी धन्य है। इनके प्रतिपादित पदार्थ सत्य है पदार्थीका जिस रीतिसे स्वरूप कहा गया है ये वैसा [तादृशं] ही कहते हैं । जीवादितत्त्वोंसे भिन्न तत्त्व मिथ्या हैं"। इसके बाद अिथ श्रेणिकने श्रावकके व्रत ग्रहण किये और पट्टराशी चेलना सहित विनयसे मुनिके चरणोंको नमस्कार कर अपने राज- मंदिरकी तरफ प्रस्थान किया। कदाचित् बौद्धसाधुओंको समाचार मिला कि महाराज श्रेणिकने किसी मुनिके उपदेशसे अन्य धर्मको धारण कर लिया है उनके परिणाम बौद्धधर्मसे विचलित होगये हैं। तो वे बौद्धसाधु महाराजके पास आफर धर्मका उपदेश देने लगे। उनके उपदेशसे जिलतरह जलके न होनेसे नवीन लता सनातनजैनग्रंथमालायां- मुरझा जाती है उसीतरह श्रेणिकका अभिनव अन्य धर्मका ज्ञान मुरझा गया । उसका चित्त संशययुक्त होगया। कदाचित् मंडलेश्वर श्रेणिकने मुनियोंकी परीक्षाके लिये एक गढा खुदवाया। उसमें [ बब] हड्डी [ अस्थि] चर्म आदि अ- पवित्र चीजें रखदी [ नि-क्षिप] और रानीले जाकर कहा- "प्रिये ! भै अब उस थर्मका भक्त होगया हूं इसलिये कदाचित् कोई मुनि उस धर्मके आवें तो उन्हें भक्तिसे अहार देना"। छपर लिखे गद्यमे प्रश्नोत्तर माला रचो। सप्तमी विभक्ती। प्रथम पाठा ११ वादे वादे जायते तत्त्वबोधः-फिरफिर वाद होनेपर यथार्थ ज्ञान होता है। अतत्त्वज्ञेऽपि तत्त्वज्ञैर्भवितव्यं दयालुमिः-मिथ्या तत्त्व जाननेवालों पर भी तत्वज्ञोंको दयालु होना चाहिये। कूपे पातुमिच्छन् शिशुर्न केन अपि उपेक्ष्यते--कुएमें गिरनेकी इच्छा करनेवाला वच्चा किसीसे मी उपेक्षित नहीं होता है। अखें विषं तिष्ठति-सांपमे विष होता है। मुनौ वयं विश्वस्ताः-मुनिमें हम विश्वासू हैं । गुरौ भक्तिर्गुरौ भक्तिर्गुरौ भक्तिः सदाऽस्तु-सर्वदा गुरुमे भक्ति हो। पशौ छपा उचिता-पशुमें दया करना योग्य है। दातरि कृतज्ञता विधेया-दातामे कृतज्ञता करनी चाहिये । पितरि शिशवोऽनुरक्ताः-पितामे लडके अनुरक्त हैं। २। वृक्षयो पुष्पाणि शोभते-दो वृक्षोंके फूल शोभते हैं। प्रामयोः पंडिता निवसंति-दो गावोंमे पंडित रहते हैं। मुन्यो विद्वांसो भक्तिमंतः-दो मुनियों में विद्वानलोग भक्तिवाले हैं। १-हिदीमें जहा 'में, पै, पर' अर्थ होता है वहा सातवी विभक्ती होती है।
संस्कृतप्रवेशिनी। गिर्योः बहवो वानराः-दो पहाडोंपर बहुत वंदर है। गुर्वोः शिष्या अनुरक्ताः-दो गुरुओंमें शिष्य अनुरक्त हैं। शिश्वो बांधवाः स्निग्धाः-दो लडकोंमे वाधव स्नेही है । दातृगृहीत्रोः दाता श्रेष्ठ:-दाता और गृहीतामें दाता श्रेष्ठ है। पित्रो को महान्-माता और पितामें कौन वडा है। ३। खलेषु उपकारो न कार्य:-दुर्जनोमे उपकार न करे। विवादेषु अहं साक्षी भवामि-विवादमे मै साक्षी [गवाही] हूंगा। अद्रिषु हिमवान् उच्च:-पहाडोमे हिमालय ऊंचा है । मुनिपु क्षमावान् श्रेष्ठः-मुनियोंमे क्षमाधारी मुनि अच्छा है। शिशुपु विश्वासो न विधेयः-लडकोंमें विश्वास न करना चाहिये । शपु अपि क्षमा विधेया-शत्रुओंमें भी क्षमा करना चाहिये । प्रात्पु को बलवान् भाईयोंमें कौन बलवान है। पितृपु भक्तिः कार्या-पिताओमे भक्ति करना चाहिये । हिंदी वनाओ- १। दुष्प्रवेशे ऽपि पुराणसागरे यथाशक्ति यतिष्ये। २। फलकाले समागते किं पुप्पसमुदायः प्राप्तो भविष्यति । ३। तत्र सर्पकुलेपु द्विजिह्नता, मुनिपु ध्यानतत्परता दृश्यते। ४। स राजा समीपस्थे जलगत्तै पयः परिपीय उत्तरंतं गोगणं पश्य- ५। यः हितकरे मार्गेन प्रवर्तते सोऽवश्यं दुःख लप्स्यते। [तिस्म। ६। सुखं मि]इटसमागमे यथा विरहे तस्य तथैव च [चा] असुखं । ७। चारुचेताः स मुनिमागे चेतसा विशति स्म । ८। देव ! देवोचितस्थाने सुगंधिपवने वने । मुनिरेकः समायातः शब्दार्थाभ्यां मनोहरे ॥ ९। ददृशे [दृश्यते स्म] च मुनिस्तेन स्थितो नीलशिलातले। १०। दैवसाध्ये पदार्थ शोको न युक्तः। [गमिष्यति। ११ । सर्वमनोऽभिरामे सूना [पु.] राज्यभारं निक्षिप्य तपसे त्वं છે सनातनजैन ग्रंथमालायां- - संस्कृत वनाओ--- १। प्रसूति समय प्राप्त होनेपर शुभदिनमें रानीने पुत्र जना। २। घरकी छत्त [गृहपृष्ठ] पर बैठे हुये राजाने आकाशसे गिरती हुई विजुली देखी उसको देखकर वह विपयोमें विरक्तवुद्धि होगया। ३। उसने श्रीप्रभ मुनिके चरणसमीपमें तप करके मुक्ति पाई। ४। उसने द्वीपोंमे दुर्गों में देशोंमें कोई भी वैरी नहीं छोड़ा। ५। दैव अनुकूल होनेपर क्या अनुकूल नहीं होता। ६। धार्मिक राजाके रक्षा करनेपर पृथ्वी बढ़ती है। ७। मन सांसारिक पदार्थो में स्वयं चला जाता है। का तत्त्वज्ञानसे उभयलोकमें सुख मिलता है। ९। दीपकोंसे प्रकाशित देशमें अंधकार नहिं जा सक्ता। [नहीं। १०। सजनलोग यशरूपी कायमें प्रीति करते हैं पौद्गलिक शरीरमें ११ । अविवेकी लोग विपाक होनेपर हितकर वाक्योंका विश्वास करते हैं विश्वसंति] । द्वितीय पाठ। अन्यान्य पुंलिग शब्द । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- जलमुचि जलमुचोः परिव्राजि परिवाजोः सम्राजि सम्राजोः पापकृति पापकृतोः बुद्धिमति बुद्धिमतोः बलवति बलवतोः गायति गायतोः सुहृदि सुहदोः जलमुक्षु। परिवाट्सु। सम्राट्सु। पापकृत्सु। बुद्धिमत्सु। बलवत्सु। गायत्सु। सुहृत्सु।
29 तेषु। संस्कृतप्रवेशिनी। राशि राज्ञोः राजसु। मूनि मूर्नो मूर्धसु। अश्मनि अश्मनोः अश्मसु। स्वामिनि स्वामिनो स्वामिषु। चंद्रमसि चंद्रमसोः चंद्रमासु। विदुषि विदुपोः विद्वत्सु। ज्यायसि ज्यायसोः ज्याय:सु। सर्वस्मिन् सर्वयोः सर्वेषु। तस्मिन् तयोः यस्मिन् ययोः येषु। कस्मिन् कयोः केषु। अस्मिन् अनयोः येषु। अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु। मयि आवयोः अस्मासु। त्वयि युवयोः युष्मासु। संस्कृत वनाओ-- १। विद्वानोंमें भक्ति, गुणियोंमें प्रमोद, क्लिष्टजीवोंमें दया, शत्रुओंमें माध्यस्थभाव सर्वदा करना चाहिये। २। सजन-सुखमें, दुःखमें, वैरीमें, मित्रमें, संयोगमें, वियोगमें और जंगलमें समान भाव रखते हैं। ३। मैंने अपने ही पुण्य पाप दोनों देखे। ४। स्थायी आत्मामें अपनी बुद्धि स्थिर करो। ५। इस कार्यकारण रूप प्रबंधके अनादि होनेपर जिस पदार्थसे तुम दुःख पाते हो उसको छोड़ दो। ६। तेजोनिधि, कल्याणधाम, सुवर्णनाभ नामवाले पुत्रमें युवराजपद व्यवहृत कर [प्रवर्त्य] वह राजा भोगोंका अनुभव करने लगा।
सनातनजेनग्रंथमालायां- - ७। उस सम्राट्के रक्षक होनेपर प्रजा सुखी हुई। है। ८। दूसरेआदमियोंमें तोक्या? देवताओंमे भी अभ्युदय नित्य नहीं १। प्रणयीआदमी में कोप ठीक नहीं है क्योंकि पश्चात्ताप होता है। १०। कृतार्थ ! तुम्हारे दीखनेपर सव कार्य सफल होते हैं । हिंदी वनाओ- १। स कृती रात्रिषु तरुमूलं आस्थितो घोरघनांधकारिणि वपीकाले वारिधाराः सहते स्म । २। तप्तसूचिसदृशैः रविकिरणैः पीडितोऽपि स योगतो न चलति स्म । सत्यं-"स्थिराः हि संतः करणीयवस्तुनि"। ३। “वसुधातले प्रसृतैर्नृपसैन्यैर्मदीयो महिमा खंडितः" इति लज्जयाइव नभः अश्वखुराघातैः प्रवृद्ध रजसि तिरोभवति स्म। ४। परिचितेऽपि महीश्वरे पतंति नगरनारीनयनानि तो न गच्छं- ५। सुरमुक्तानि पुष्पाणि पतंति स्म महीनाथरथे। ६। जिनजन्मदिवसे देवसदसि मणिघंटिकाः करताडनं विना शब्द कृतवत्यः। [जिनं हृतवती। ७। इद्राणी जिनमातृवक्षसि मायया निर्मितं शिशुं निधाय रिखकर] ८। हे प्रभो! यदीये हृदयसरसि त्वदीयं चरणकमलं प्रतिदिनं स्फुर- ति स एव अस्मिन् साररहिते संसारे सारवान् । [मंतो भवति । ९। ईश्वर ! त्वदीयचरणसमीपं आगताः पशवोऽपि त्वयि भक्ति- १० तस्मिन् नृपे महीं रक्षितरि अखिलेषु अपि जंतुषु अकाल- मरणं न जातं। [ति स्म। तृतीय पाठ। स्त्रीलिग। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- कन्यायां कन्ययोः बालायां बालयोः - कन्यासु। बालासु।
संस्कृतप्रबेशिनी। मत्यां, मतौ ऊयां, ऊर्मी नयां तस्थुष्यां रेण्वां, रेणौ धेन्वां, धेनौ वध्वां चम्वां मातरि दुहितर ऋचि त्वचि विपदि परिपदि वीरुधि क्षुधि योपिति सरिति सर्वस्यां अपरस्यां अन्यस्यां तस्यां यस्यां कस्यां अस्यां अमुन्यां मत्योः ऊयोः नधोः तस्थुष्योः रेण्वोः धेन्योः वध्वोः चम्वोः मात्रोः दुहितोः ऋचोः त्वचोः विपदोः परिषदोः वीरुधोः क्षुधोः योषितोः सरितोः सर्वयोः अपरयोः अन्ययोः तयोः ययोः कयोः अनयोः अमुयोः मतिषु। ऊर्मिषु। नदीषु। तस्थुषीषु। रेणुषु। धेनुषु। वधूषु। चमूषु। मातृषु। दुहितृषु। ऋक्षु। त्वक्षु। विपत्सु। परिषत्सु। वीरुत्सु। क्षुत्सु। योषित्सु। सरित्सु। सासु। अपरासु। अन्यासु। तासु। यासु। कासु। आसु। अमूषु।
सनातनजेनग्रंथमालायां- कुसुमेषु। दानेषु । वारिषु । मधुषु। सानुषु। श्रीमत्सु। गुणवत्सु। शर्मसु । कर्मसु। चतुर्थ पाठ। नपुंसकलिंग कुसुमे कुसुमयोः दाने दानयोः वारिणि वारिणोः मधुनि मधुनोः सानुनि सानुनोः श्रीमति श्रीमतोः गुणवति गुणवतो शर्मणि शर्मणोः कर्मणि कर्मणोः पयसि पयसोः चेतलि चेतसोः ज्योतिषि ज्योतिषोः हविषि हविषोः धनुषि धनुषोः सर्वस्मिन् सर्वयोः तस्मिन् तयो कस्मिन् कयोः यस्मिन् अमुष्मिन् अमुयोः अस्मिन् अनयोः ऊपर लिखे शब्दोंसे वाक्य रचना करो- पयासु। चेतासु। ज्योतिःषु। हविषु। धनुषु । सर्वेषु। तेषु। केषु। येषु। अमीषु । ययोः संस्कृतप्रवेशिनी। । ९९ पंचम पाठ। सप्तमी विभक्तीका व्यवहार । १ भूतपतिपदेषु भक्तिः, सत्यतत्त्वे ईश्वरके चरणोमे भक्ति, वास्तविक प- भावनाः, विषयसुखेषु विरक्तिः, दार्थोंमें चिंतवन, इंद्रियसुखोंमे विरागी- प्राणिवर्गे मित्रता, श्रुतौ, शमे, पना, जीवोंके समूहमें मित्रता, शास्त्र, यमे च शक्तिः, अन्यदोषकथने शाति और सयममे समर्थता दूसरेके मूकता करणीया। दोषोंके कहनेमे गूंगापन करना चाहिये । २ कोपो दृशोरागं, वपुषि कंपं, क्रोध-आखोमे लालिमा, शरीरमे कप- चित्त वैक्लव्यं, बुद्धौ मालिन्यं कपी, मनमे विक्लवपना, बुद्धिमे मली- विदधाति, अतो बुद्धिमता स नता करता है इसलिये वुद्धिमानसे त्याज्य:। वह छोडने योग्य है। ३ दोषेषु सत्सु यदि कोऽपि ददाति दोषोके रहनेपर यदि कोई गाली दे शापं, सत्यं ब्रवीति (त्य) अयं तो यह सत्य कहता है ऐसा विचार [मि] इति प्रविचित्य सा । दोषे- कर सह लेना चाहिये । दोषाके न र- षु [व] असत्सु यदि कोऽपि हनेपर यदि कोई गाली दे तो ददातिशापं मिथ्याब्रवीति [त्य] यह झूठ बोलता है ऐसा समझ सह- अयं [मि] इति प्रविचित्य सा॥ लेना योग्य है। ४ माने कृते यदि भवेद् [दि] इह मान करनेपर यदि यहा कोई लाभ कोऽपि लाभः, यदि [य] अर्थ होता और नम्रता करनेपर कोई धन- हानिरथ काचन मार्दवे स्यात् । की हानि होती तो मान करना तदा मानः सफल: ॥ सफल होता। ५ इति मानदोषं चेतसि प्रविचिं- इसतरह मानकरनेके दोषको दिलमें वि- त्य गुणदोषविचारदक्षोऽहंकारं चार कर गुण दोषके विचार करनेसे च- न आचरति। तुर आदमी अहकार नहीं करता है। ६ नरो निकृत्या मलिननिदितरू- मनुष्य मायासे मलिन और निंदित पासु नारीषु भवं लभते । रूपवाली स्त्रियोंमे जन्म लेता है।
सेनातननग्रंथमालायां- ७ यथा वारिणि प्रच्छादितं वर्गों जिस तरह जलमें छिपाई हुई विष्ठा प्रकाशमुपगच्छति तथा एवं प्रकट होजाती है उसीतरह संसारमें लोके कपटेन संछादितोऽपि कपटसे छिपाया हुआ भी दोष प्रकट दोषः प्रकटतामटति । हो जाता है। ८ अतिविमले विपुले जले तिष्ठन् अतिनिर्मल बहुतसे जलमें बैठा हुआ भ्रमरः जिह्वावशात् निष्कारणं भ्रमर जीभके वशसे निष्कारण मरण- मरणं लभते। को पाता है। ९ येऽनपेक्षाः संतोऽपकारकारिणि जो अपेक्षारहित हुये अपकारकरने- जने अपि उपकारमाचरंति ते वाले आदमीमे भी उपकार करते हैं मान्याचाराजना विरलाः। वे मान्य आचरण वाले लोग विरले हैं।. १० कल्पांते तिऽ] अपि प्रजति वि- कल्पात होनेपर भी सज्जन स्वभावसे कृति सजनो न स्वभावात् । विकारको प्राप्त नहीं होते । ११ पृथिव्यां विमुक्तपापे विचित्रे पृथिवीपर पापरहित नानाप्रकारके सु- सुलभे आहारवर्गे विद्यमाने ये लभ आहारोंके रहनेपर जो मासखाते मांसं खादति ते नरानृशंसाः। हैं वे लोग राक्षस हैं। संस्कृत बनाओ- १। जिन शास्त्रोंमें प्राणिबध लिखा है वे अपठनीय हैं । [भोगते हैं। २। कुयोनियोमें जो २ दुख होते हैं उन सबको मांसभक्षक लोग ३ । कामपीडित आदमी घरमे, नगरमें, कुटुम्बियोंमें, तथा अन्य लोगोंमे कहीं भी शातिको नहीं पाता है। ४। जो द्रव्य देनेवाले अकुलीन मनुष्यमें भी प्रीति करती है और निर्धनको छोड देती है उस वेश्याको बुद्धिमान नहीं सेवते हैं। ५। जो वचनमें कोमल और चित्त कठोर है ऐसी गणिका छोडने ६। सत्यवचनोंमें रत तपस्वी मुझे सुखदे । [योग्य है। ७। जिसप्रकार वनमें भ्रमणकरने वाले सिहकेमुखमें प्रविष्ट मृगकी एसा करनेमें कोई भी नहीं समर्थ है उसीतरह संसार भ्रांत और
संस्कृतप्रवेशिनी।
यममुखमें प्रविष्ट जीवकी रक्षा करनेमें भी कोई समर्थ नही है।
८। यदि मृतक मनुष्य शोक करनेपर पुराने शरीरको पाले अथवा
अपना मरण होजाय तो शोक करना उचित है।
९। हे विद्वानो! तुम लोग सर्वदा सम्यग्दर्शनशानचारित्ररूप नदि-
योंमें स्नान करो।
१० । नगरको जाते हुये लोग वृक्षच्छायामे बैठते हैं ।
११। गंगाप्रभृति नदियोंमें बडे २ मत्स्य रहते हैं।
१२। करणीयवस्तुमे भाग्य ही प्रमाण है ।
१३ । चंद्रवदने! मैं तेरी (त्वढीय) सरल. आशानुकूल प्रवर्तन करने-
वाली दासियोंमें भी अविनयकी संभावना नहीं करता हूं
(न संभावयामि)।
साहित्य परिचय ।
यदि भवति समुद्रः सिंधु नदी]तोयेन तृप्तो यदि कथमपि वह्निः
काष्ठसंघाततश्च । अयमपि विषयेषु प्राणिवर्गस्तदा स्यात् होगा
इति मनसि विदंतो जानते हुये] मा व्यधुः (मत करो) तेषु यत्नं ॥१॥
सततविविधजीवध्वंसनाधरुपायैः स्वजनतनु शिरीर] निमित्तं कुर्वते
[करते हैं] पापमुग्रं । व्यथिततनुमनस्का जंतवोऽमी सहते नरकगति
[मु] उपेताः [प्राप्त हुये दुःखमेकाकिनस्ते ॥२॥ किमिह परमसौख्यं
निस्पृहत्वं यदेतत् किमथ परमदुःखं सस्पृहत्वं यदेतत्। इति मनसि
विधाय [करके] त्यक्तसंगाः परिग्रहरहित] सदा ये विद्धति (धारते
है) निजधर्म ते नराः पुण्यवंतः ॥ ३ ॥
-त्यजत युवतिसौख्यं क्षांतिसौख्यं श्रयध्वं
[होओ)
विरमत (विरसहोओ) भवमार्गात् मुक्तिमार्गे रमध्वं (आसक्त-
जहित (छोड़ो) विपयसंगं ज्ञानसंगं कुरुध्वं (करो)
अमितगति (मोक्ष) निवासं येन नित्यं लभध्वं ॥४॥
१०२ सनातननग्रंथमालायां- आत्मानं (म) अन्य (म) अथ हंति (मारता है)जहाति (छोड़ता है)धर्म पापं समाचरति युक्तं (म) अपाकरोति (दूर करता है)। पूज्यं न पूजयति वक्ति (वदति) विनिंद्यवाक्यं किं किं करोति न नरः खलु कोपयुक्तः ॥५॥ तावद् नरो भवति तत्वविद् (द) अस्तदोपो मानी मनोरमगुणो मननीयवाक्यः । शूरः समस्तजनता(जनसमूह) महितः कुलीनो यावद् हृपीक (इंद्रिय) विषयेषुन सक्तिमेति (प्राप्त होता है)॥६॥ यथाऽन्धकारांधपटावृतो जनो विचित्रचित्रं न विलोकितुं क्षमः। यथोक्त (वास्तविक) तत्त्वं भवनाथभाषितं निसर्ग (स्वभाव) मिथ्यात्वतिरस्कृतस्तथा ॥ ७ ॥ वरं विषं भुक्तं [म] असु [प्राण] सयक्षम वरं वनं श्वापद्वद् (हिंस्रजंतु) निषेवितं । वरं कृतं वह्निशिखाप्रवेशनं परं न मिथ्यात्वयुतं हि जीवितं ॥ ८॥ विचित्रवाचित (सहित) चित्रं (मु) उत्तम यथा गताक्षो (अंधः) न जनो विलोकते। प्रदर्यमानं न तथा प्रपद्यते (विश्वास करता है) कुदृष्टि (मिथ्याइष्टि) जीवो भवनाथशासनं ॥९॥ सुरेंद्रनागेद्रनरेंद्रसंपदः सुखेन सी लभते भ्रमन् भवे । अशेष (सर्व) दुःखक्षयकारणं परं न दर्शनं पावनं (म) अश्नुते (पाता है)जनः ॥१०॥ न बांधवा नोसुहृदो न वल्लभा न देहजा नोधनधान्यसंचयाः। तथा हिताः संति शरीरिणां (जीवोंको) यथाऽत्र सम्यक्त्वं सच्चे पदार्थों- को श्रद्धान करना] (म) अदूषितं हितं ॥११॥ विनश्वरं पापसमृद्धि- दक्षं विपाक (अंतमे) दुःखं चुनिंदनीयं । तदन्यथाभूतगुणेन (विप- ३ संस्कृतप्रवेशिनी। रीत गुणवाले) तुल्यं ज्ञानेन राज्यं न कदाचिद् (द) अस्ति ॥ १२॥ पूज्यं स्वदेशे भवति (ती) इह राज्यं, ज्ञानं त्रिलोकेऽपि सद् (द) अंचनीयं । शानं विवेकाय, मदाय राज्यं, ततो न ते तुल्यगुणे भवेतां [हैं] ॥१३॥ सर्वेऽपि लोके विधयो यथार्थी ज्ञानाद् ऋते नैव भवंति जातु [कभी]। अनात्मनीयं [ आत्माके अहितको] परिहर्तुकामा- स्तदर्थिनो [आत्माके हितेच्छु] शानमतः श्रयंति ॥ १४ ॥ धर्मार्थकामव्यवहारशून्यो विनष्टनिःशेष [सर्व] विचारबुद्धिः । रात्रिदिनं भक्षणसक्तचित्तो ज्ञानेन हीनः पशुरेव शुद्धः ॥ १५ ॥ वरं विपं भक्षितं [मु] उग्रदोपं वरं प्रविष्टं ज्वलने (अग्नौ) ऽतिरौद्रे। वरं कृतांताय [यमाय] निवेदितं स्वं,न जीवितं तत्वविवेक शिान] मुक्तं १६ परोपदेशं स्वहितोपकारं ज्ञानेन देही वितनोति [करता है] लोके । जहाति छोड़ता है] दोपं श्रयते गुणं च ज्ञानं जनस्तेन समर्चनीयं ॥१७॥ निरस्तभूपो [भूषणरहित] ऽपि यथा विभाति शोभते पवित्रचा- रित्रविभूपितात्मा। अनेकभूपामिरलंकृतोऽपि विमुक्तवृत्तो [चारि- त्रशून्य] न तथा मनुष्यः ॥१८॥ विनश्वरमिदं वपुर्युवतिमानसं चंचलं भुजंगकुटिलो विधि: पवनगत्वरहिवाके समान गमनशील]जीवितं। अपायवहुलं धनं वत परिप्लवं [विनाशीक] यौवनं तथापि न जना भवव्यसनसंततेर्विभ्यति डरते हैं] ॥ १९ ॥ बांधवमध्येपि जनो दुःखानि समेति [पाता है] पापपाकेन । पुण्येन वैरिसदनं [घर] यातो गितः] ऽपि न मुच्यते सौख्यैः ॥ २० ॥ द्वीपे जलनिधि [समुद्र] मध्ये गहनवने चैरिणां [वैरियोंके समूहेऽपि । रक्षति मर्त्य सुकृतं पूर्वकृतं भृत्यवत् सततं ॥ २१ ॥ तावत् नरो कुलीनो मानी शूरः प्रजायतेऽत्यर्थ । यावत् जठर [उदर पिशाचो वितनोति न पीडनं देहे ॥ २२ ॥ दासीभूय मनुष्यः परवेश्मसु नीचकर्म विदधाति ।
१०४ सनातनजैनग्रंथमालायां- चाटुशतानि [सैकड़ों मीठे वचन] च कुरुते जठरदरी [कंदरा] पूरणा- संस्कृत बनाओ। [कुलितः॥ २३ ॥ अति विनयी श्रेणिकसे मुनिने कहा कि यदि तुम स्वकीयपूर्व- भव सुनना चाहते हो तो ध्यानपूर्वक सुनो-शृणु] मैं कहता हूं- इस लोकमें एकलक्षयोजनपरिमित जम्वूनामक द्वीपमें भरतक्षेत्र है उसमे सूर्यकांत देश है वह देशधनधान्यादि पदार्थोंसे सर्वदा शोभित रहता है वहांके सूरपुर नामक नगरमें एक मित्र राजा राज्य करता था। जो कि नीतिमार्गानुसार संपूर्ण प्रजाकी रक्षा करने में प्रसिद्ध था । कालवीतनेपर महारानी श्रीमती सुमित्र और मंत्रिपनी सुषेण नामक पुत्रोंको जनती हुई [सूतवत्यौ] उनमें सुमित्र अमिमानवशसे सुषेणकोदुःख देताथा और सुषेण भयवश उस दुःखको सहताथा । बादको जब मित्रके मरनेसे सुमित्र राजसिंहासन पर विराजा तव मंत्रिसुत सुषेण अतिचिंतान्वित हुआ उसने यह विचारकर कि-"सु- मित्र अति क्रूर है उसने मुझै लड़कपनमें अति दुःख दिया है । इस समय वह राजा होगया है इससे अधिक कष्ट देगा इसलिये इसके राज्यमें रहना ठीक नहीं है" कुटुंबमोहको छोड़ दीक्षा लेली। जबसे सुषेण वनको गये तबसे राजमंदिरको न आये। राजा सुमित्र भी राज्य पाकर भोगोंका अनुभव करने लगा। एकदिन राजा एकांतमे बैठा था कारणवश उसकोसुषेणकी याद आई (सुषेणं स्मृतवान्) पूछनेपर किसी पार्श्वचरने कहा कि वे तो दिगंबर मुनि होगये हैं। उन्होंने समस्त संसारसे मोह छोड़ दिया है। किसी समय मुनि सुषेणको सूरपुरके बगीचे [सूरपुरारामे] मे आया जान- कर राजा सुमित्र अतिप्रसन्न हुआ। तत्काल वह दर्शनके लिये गया । प्रबल मोहनीयोदयसे मुनिमुद्राकोन विचार राजा कहनेलगा "प्रिथमित्र ! मेरा राज्य अतिविशाल है शुभकर्मसे मैने उसे पाया है। ऐसे विशाल राज्यको छोड़कर मेरे विना पूछे आपने
संस्कृतप्रवेशिनी।
१०५
दीक्षा लेली यह ठीक न किया। आप मेरा आधा राज्य ले इंद्रिय
सुखोंका अनुभव करें।
राजा सुमित्रके मुखसे मोहपूर्ण वचन सुनकर मुनि सुपेणने
कहा-"राजन में अपनी आत्माको शांतिमयी अवस्थामें लाना चा-
हता हूं। परभवमै मेरी आत्मा शांतिस्वरूपका अनुभव करे इसलिये
मैंने दुष्कर तप आचरा है । मैं विश्वास करता हूं कि उत्तम तपस्यासे
में अवश्यही अपरिमित सुखका अनुभव करूंगा।"
मुनिराज सुपेणसे यह उपदेश सुन राजाने कहा-"मुनिनाथ!
आप तप छोडना नहीं चाहते तो रुपाकर मेरे राजमंदिरमें आहा-
रार्थ अवश्य आवें । मुनिने कहा-"मैं यह काम करने में भी अस-
मर्थ हूं। दिगंबरमुनिको ऐसा करनेका पूर्णतया निषेध है"
राजाने इसतरह विरक मुनिको देख नमस्कारकर राजमंदिरकी
तरफ प्रस्थान किया।
उपसंहार।
हिंदी बनाओ-
वीरो वीरनरामणीर्गुणनिधिवीर हि धीरा:श्रिताः।
वीरेण (णे) इह भवेत् [हो] सुवीरविभवं वीराय नित्यं नमः।
वीरात् धीरगुणा भवंति सुधियां विद्वानोंको) वीरस्य नित्या गुणाः ।।
वीरे मे दधतो मनोऽरिविजये हे वीर शक्तिं कुरु ॥१॥
यो जानाति समं समस्तमनिशं यं सूरयः (आचार्य] संश्रिताः
येन (ना) अदर्शि दिखा] विमुक्तिवमै सुधियो यस्मे स्पृहां कुर्वते ।
यस्मात् तत्त्वविनिश्चयोऽप्रतिहतं यस्य [स्यै] एव शास्त्रं जयो
यस्मिन् विस्मयनीयपुण्यमहिमा भूयात् (हो) स धः (युप्माकं)
श्रीजिनं त्रिगन्नाथैः समर्चितपदद्वयं ।
[श्रेयसे ॥२॥
नत्वा पाथरस्य (स्यो) उर्जिनभक्तिकथा (थो) उच्यते ॥१॥
१०६ सनातनजैनग्रंथमालायां- देशेऽत्र मागधे रम्ये मिथिलायां महापुरी । राजा पद्मरथो जातो विख्यातो मुग्धमानसः ॥२॥ एकदाऽसौ महाटव्यां पापद्ध्यै (शिकारखेलने) भूपतिर्गतः । दृष्ट्वा (ट्दै) एकं शशकं पृष्ठे तस्य (स्था) अश्वं वाहयद् द्रुतं ॥ भूत्वा (त्वै) एकाकी वने कालगुहां प्राप्तः स्वपुण्यतः ॥ ३ ॥ तत्र दीप्ततपो-योगात् विस्फुरकांतिमद्भुतं । सुधर्ममुनिमालोक्य रत्नत्रयविराजितं ॥ शांतो बभूव संतप्तो लोहपिंडो यथाऽम्भसा (जलेन)॥४॥ तुरंगाद् (द) अवतीर्याशु तं प्रणम्य महामुदा। धर्ममाकर्ण्य जैनेंद्रं सुरेंद्राद्यैः समर्चितं ॥ सम्यक्त्वाणुव्रतानि (न्यु) उच्चैः समादाय सुभक्तितः । संतुष्टः पृष्टवान् (नि) इत्थं सुधीः पद्मरथो नृपः॥५॥ भो मुने! भुवनाधार ! जैनधर्माम्बुधौ विधो! वक्तृत्वादिगुणोपेतस्त्वादशः पुरुषोत्तमः ॥ किं कोऽपि वर्तते क्वाऽपि परो वा न ने] इति धीधन । संदेहो मानसे मेऽ [मम]स्ति ब्रूहि [ कहिये] त्वं करुणापर ॥ ६॥ तत् श्रुत्वा स मुनिः प्राह ( बोले ) सुधर्मों जैनतत्त्ववित् । शृणु त्वं भो महीनाथ ! चम्पायां विबुधार्चितः। तीर्थकृत् वासुपूज्योऽस्ति द्वादशो भवशर्मदः ॥७॥ तस्य वासुपूज्यस्य शानदीप्तिगुणोदये। अतरं मे [मम ] तरां चाऽस्ति मेरुसर्षपयोरिव ॥ ८॥ तदाऽऽकर्ण्य मुनेवाक्यं धर्मप्रीतिविधायकं । तत्पादवंदनाभक्त्यै संजातः सोत्सवो नृपः ॥९॥ यावत् चचाल [चला ] सद्भूत्या प्रभाते प्रीतिनिर्भरः ॥१०॥ तावत् धन्वंतरिनाना सुधीविश्वानुलोमवाक् । तौ सखायौ [सुहृदौ ] सुरौ भूत्वा समागत्य महीतले।
संस्कृतप्रवेशिनी। १०७ तस्य भक्त परीक्षार्थ मार्गे संगच्छतो मुदा । दर्शयामासतुः (दिखलाते हुये ) कष्टं कालसर्प तिरोगतं ॥ ११ ॥ मायया छत्रभंगं च पुरोदाहादिकं पुनः। अकालेऽपि महावृष्टिं निमग्नं कर्दमे द्विपं ॥ १२ ॥ मंत्री [व्या ] आदिभिस्तदा वार्यमाणोऽपि बहुधा नृपः। "अमंगलशते जाते गम्यते नैव भूपते" ॥ १३॥ "नमः श्रीवासुपूज्याय" भणित्वा [त्वे] इति प्रसन्नधी। कर्दमे प्रेरयामास [हांक दिया] भक्तिमान् निजकुंजरं ॥१४॥ तथाभूतं तमालोक्य जिनभक्तिभरान्वितं । स्वमायां (मु) उपसंहृत्य संप्रशस्य सुरोत्तमौ । सर्वरोगापहरं हारं मेरी योजन-नादिनी । धर्मानुरागतस्तस्मै दत्वा स्वस्थानकं गतौ ॥१५॥ यस्य चित्ते जिनेंद्राणां भक्तिः संतिष्ठते सदा । सिध्यति सर्वकार्याणि तस्य नैव (वा) अत्र संशयः॥ १६ ॥ ततः पन्भरथो राजा प्रहृष्टहृदयांबुजः । गत्वा चंपापुरी तत्र दृष्ट्वा त्रैलोक्यमंगलं॥ वासुपूज्यं जिनाधीशं समभ्यय॑ सुभक्तितः। स्तुत्वा स्रोत्रैस्तथा नत्वा श्रुत्वा तत्त्वं जिनोदितं । दीक्षा (मा) आदाय जैनेंद्री पादमूले जिनेशिनः संजातो गणभृत् चारुचतुर्मानविराजितः ॥ १७॥ अतो भव्यैः सदा कार्या जिनभक्तिः सुशर्मदा । त्यक्त्वा मिथ्यामतं शीघ्र स्वर्ग-मोक्ष-सुखाप्तये ॥ १८॥ यथा पद्मरथो राजा जिनभक्तिपरोऽभवत् (हुआ)। अन्यैश्चाऽपि महाभव्यैर्भवितव्यं तथा श्रिये (लक्ष्म्यै ) ॥ १९ ॥ सस्कृत वनाओ- काशीके राजा पाकशासनने एक समय अपनी प्रजाको महा- १०८ सनातनजैन ग्रंथमालायां- मारी (अतिदारुणरोग) से पीड़ित देखकर ढिंढोरा (राजाहा) पिटवाया (निम्सारिता) कि-"नंदीश्वर पर्वमें आठदिन पर्यंत किसी जीवका वध न हो, इस राजाज्ञाका उल्लंघयिता प्राणदंडसे दंडित होगा" वहीं एक सेठपुत्र धर्मनामक रहता था वह महा अधर्मी सप्तव्यसनकासेवक था। वह मांसभक्षणके विना एक दिन भीनरह सक्का था । एकदिन वह राजाके बगीचे (उद्यान) में गया। वहां राजा का एक मेंढा (मेष) था उसको उसने मारडाला और वह उसके कच्चे (अपक्क) ही मांसको खागया। दूसरे दिन जब राजाने बगीचे मेंढा न देखा तब उसके अन्वेषण करनेको बहुतसे गुप्तचर नियुक्त किये उनमेसे एक गुप्तचर राजाके बागमें भी गया। वहांका माली ( आरामरक्षक) रातको सोते समय सेठपुत्रद्वारा मेढेके मारे जानेका वृत्तांत अपनी स्त्रीसे कह रहा था । सो वह उस गुप्तचरने सुनलिया और महाराजासे जायह बात कह दी । राजाको भेष्ठिसुतपर बड़ा गुस्सा आया और कोत- वालको कहा कि-"पापी धर्मने जीवहिंसा तथा राजाशोल्लंघन कि- या है अतः इसको शूलिपर चढ़ा (आरोग्य) मारडालो।" कोतवाल धर्मको शूलिगृहमें लेगया और नौकर यमपालनामक चांडालको बुलानेको मेजे क्योंकि यह कार्य उसीका था यमपालने एक दिन सर्वौषधिऋद्धिधारी मुनिराजसे धर्मोपदेश सुन प्रतिक्षा ली थी कि "मैं चतुर्दशीके दिन जीववध न करूंगा" इसलिये उसने राजसेवकों- कोआते हुये देख अपने व्रतकी रक्षाकेलिये अपनी स्त्रीसे कहा कि- "प्रिये ! किसीको वध करनेकेलिये मुझे बुलाने (आह्वयितुं) राज- सेवक आरहे हैं। सो तुम उनसे कहदेना कि घरमें वे नहीं हैं दूसरे गांव गये हुये है" इसप्रकार कहकर वह गृहके एक कोने (कोण) में छिप रहा । जब राजनौकर उसके घरपर आये तब चांडालप्रियाने उसीतरह कहदिया। इसबातको सुनकर नौकरोंने कहा-हाय ! (हंत) 1 संस्कृतप्रवेशिनी। वह बड़ा अभागी है देवने उसे ठग लिया (वंचितः) आज ही तो एक सेठसुतके मारनेका अवसर हाथ आया । आजही वह प्रामां- तर चला गया । यदि वह आज यहां होता (स्यात्) तो उसे वस्त्र- भूषण प्राप्त होते (प्राप्येत्) चांडालिनीने इस बातको सुनकर अंगुली के इशारे (संज्ञया) से उसे बता दिया (दर्शितः)। राजनौकरोंने उसे धरसे बाहर निकाला चांडालने निर्भय हो कहा कि "मैं आज चतुर्दशीको वध न करूंगा" यह सुन राजकिंकर उसे राजाके पास ले आये। वहां भी उसने वैसा ही कहा। राजा ऐसा सुन आशा दी कि इन दोनोंको मकर मत्स्यादि क्रूर जीवोंसे पूर्ण तालाबमें डाल दो। राजाज्ञाके अनुसार तालाबमें डालते ही पापी धर्मको तो जलजंतु खागये और यमपालकी उस व्रतमें दृढ़ता देख देवोंने सहायता की। उसको तालाबमें ही सिहासनपर वस्त्र- आभूषणोंसे सज्जितकर बैठाया [स्थापितः]। जव राजा और प्रजाको यह मालूम हुआ तब उनने भी उसका सत्कार किया और बहुत पारितोषक दिया। यद्यपि यमपाल जाति (जात्या) का चांडाल था पर उसके हृदयमें दृढ़ प्रतिज्ञापालनकी पवित्र वासना थी इसलिये उसका देवोंने भी सत्कार किया। परिशिष्ट । पुलिंग पतिशब्द दीर्घ ईकारात ग्रामणी शब्द एक० द्विव० वहुव० एक० द्विव० तु. पत्या पतिभ्यां पतिभिः प्रामण्या ग्रामणीभ्यां ग्रामणीभित्र १ सखि शब्दके रूपभी इसीके समान होंगे। २ सुधी और नी आदि एक स्वरवाले शब्दोंको छोडकर शेष दीर्घ ईकारात शब्दोंके रूप इसके समान होगे। बहुव० सनातनजैनग्रंथमालायां- . प. पत्युः पत्योः एक. द्विब० बहुव० एक० द्विव० बहुव० च. पत्ये पतिभ्यां पतिभ्यः ग्रामण्ये ग्रामणीभ्यां प्रामणीभ्यः। पं. पत्युः पतिभ्यां पतिभ्यः ग्रामण्या ग्रामणीभ्यांग्रामणीभ्यः। पतीनां प्रामण्यः ग्रामण्योः ग्रामण्यां। स. पत्यौ पत्योः पतिषु ग्रामण्यां ग्रामण्योः ग्रामणीषु । सुधीशब्द क्रोष्टुशब्द तृ. सुधिया सुधीभ्यां सुधीभिः क्रोष्ट्रा, क्रोष्टुभ्यां क्रोष्टुमिः । क्रोष्टुना च. सुधिये सुधीभ्यां सुधीभ्यः क्रोष्ट्र, क्रोष्टुभ्यां क्रोष्टुभ्यः । क्रोष्टवे पं. सुधियः सुधीभ्यां सुधीभ्यः क्रोष्टुः, क्रोष्टुभ्यां क्रोष्टुभ्यः । फोटो ष. सुधियः सुधियोः सुधियां क्रोष्टुः क्रोष्ट्रोः, क्रोष्टूनां । क्रोटोः क्रोष्ट्वोः स. सुधियि सुधियोः सुधीषु क्रोष्टौ, क्रोष्ट्रोः, क्रोष्टुषु । क्रोष्टर क्रोष्ट्वोः दीर्घ ऊकारात खलपूशब्द लूशब्द तृ. खलपवा खलपूभ्यां खलपूभिः लुवा लूभ्यां लूभिः। च. खलप्वे खलपूभ्यां खलपूभ्यः लुवे लूभ्यां पं. खलप्वः खलपूभ्यां खलपूभ्यः लुवः लूभ्यां लूभ्यः। ष. खलप्वः खलप्वोः खलप्वां लुवः लुवोः स. खलग्वि खलप्वोः खलपूषु लुवि लुवोः लूभ्यः। लुवाम् । लूषु। ३-नी शब्दके रूप इसके समान होंगे परतु सप्तमीके एक वचनमें "निया' रूप ४ दृम्भू, करभू, पुनर्भू, वर्षाभूको छोडकर शेष शब्द जिनके अतमे 'भू' उनके रूप 'लू' के समान होते हैं और इन्भू आदि चारोंके 'खलपू' के समान होगा।
संस्कृतप्रवेशिनी। पं. स. रासु। एक द्विव. वहु एक द्विव बहु. ओकारात गोशब्द ऐकारात शब्द तृ. गवा गोभ्यां गोभिः राया राभ्यां राभिः। गवे गोभ्यां गोभ्यः राये राभ्यां राभ्यः। गोः गोभ्यां गोभ्यः रायः राभ्यां राभ्यः। गोः गवोः गवां रायः रायोः रायां। गवि गवोः गोषु रायि रायोः औकारात ग्लौशब्द जफारात मिषशब्द तृ. ग्लावा ग्लौभ्यां ग्लौभिः मिपजा मिषग्भ्यां मिषभिः । च. ग्लावे ग्लौभ्यां ग्लौभ्यः भिषजे भिषग्भ्यां मिषभ्यः । पं. ग्लाव: ग्लौभ्यां ग्लौभ्यः भिषजः भिषग्भ्यां भिषग्भ्यः। ग्लावः ग्लावोः ग्लावां मिषजः मिषजोः भिपजां। स. ग्लावि ग्लावो ग्लौषु भिपजि भिषजोः मिपक्षु। श्वन् शब्द युवन् शब्द तृ. शुना युवभ्यां युवमिः। च. शुने श्वभ्यः यूने युवभ्यां युवभ्यः। पं. शुनः श्वभ्यां श्वभ्यः यूनः युवभ्यां युवभ्यः। शुनोः यूनोः स. शुनि शुनोः श्वसु यूनि यूनोः नकारात पथिन् शब्द तकारात ददत् शब्द तृ. पथा पथिभ्यां पथिमिः ददता ददद्भ्यां ददद्भिः। च. पथे पथिभ्यां पथिभ्यः ददते ददश्यां ददभ्यः। पं. पथः पथिभ्यां पथिभ्यः ददतः ददद्भ्यां ददभ्यः। श्वभिः यूना श्वभ्यां श्वभ्यां ष शुनः शुनां यूनः यूनां। युवसु। १-जिन शब्दोके अतमें भृज, सृज्, मृज्, यज् राज्, भ्राज् हैं उनसे तथा परि- वाज् युज इन शब्दोंसे भिन्न शब्दोंके रूप इसके समान होंगे।
सनातनजैनग्रंथमालायां- बहु एक ददतः पथिषु ददति पथां एक. द्विव ष. पथः पथोः स. पथि पथोः पुम्स् शब्द तृ पुंसा 'भ्यां च. पुंसे पुंभ्यां पं पुंसः पुंभ्यां ष. पुंसः पुंसोः स. पुंसि पुंसोः . पुम्भिः 'भ्यः 'भ्यः पुंसां पुंसु द्विव ददतोः ददतोः द्विशब्द द्वाभ्यां द्वाभ्यां द्वाभ्यां द्वयोः द्वयोः बहु ददतां । ददत्सु। त्रिशब्द त्रिमिः। त्रिभ्यः। त्रिभ्यः। त्रयाणां। त्रिषु। स्त्रीलिंग त्रिशब्द तिमिः। तिसभ्यः। तिसुभ्यः। जरा शब्द तृ. जरसा, जराभ्यां जरामिः जरया च. जरसे, जराभ्यां जराभ्यः जरायै पं. जरसः, जराभ्यां जराभ्यः जरायाः ष. जरसः, जरसो, जरसां, जरायाः जरयोः जराणां स. जरसि, जरसोः जरासु जरायां जरयोः श्रीशब्द श्रीभ्यां श्रीमिः तिसृणां। . तिरुषु। चतुर शब्द तृ. श्रिया चतसृमिः। १ ही, भी, धीके रूपमी इसके समान होगे।
संस्कृतप्रवेशिनी। . भ्रूभ्यः गिरे पं. भ्रवाः एक द्विव द्विव बहुव बहुव. च. श्रियै, श्रीभ्यां श्रीभ्यः चतसृभ्यः। श्रिये पं. श्रियाः, श्रीभ्यां श्रीभ्यः चतसृभ्यः। श्रियः ष. श्रिया:, श्रियोः श्रीणां चतसृणां। श्रियः स. श्रियि, श्रियोः श्रीषु चतसृषु। श्रियां दीर्घ ऊकारात धूशब्द इर् भागात गिशब्द तृ. भुवा भ्रूभ्यां भूमिः गिरा गीया गीर्भिः। च. भुवै भ्रूभ्यां गीया गीयः। भ्रुवाः भ्रूभ्यां भ्रूभ्यां भ्रूभ्यः गिरः गीया गीर्यः। ध्रुवाः ध्रुवोः गिरोः गिरा। स. ध्रुवां भ्रुवोः गिरो गीर्ष। भकारांत ककुभ् शब्द अप शब्द तृ. ककुभा ककुभ्यां ककुभिः अद्भिः। च. ककुमे ककुभ्यां ककुम्भ्यः अभ्यः। पं. ककुभः ककुठभ्यां ककुभ्यः अभ्यः। ष. ककुभः ककुभोः ककुभां स. ककुमि ककुभोः ककुप्सु अप्सु। दिश शब्द आशिषशब्द प्र. दिक् दिशौ दिशः आशी: आशिषौ आशिषः। १-इन्भू, करभू, पुनर्भू, वर्षाभूके सिवाय शेष शब्दोंके जिनके कि अंतमें 'भू' है उनके रूप इसके समान होंगे। २-पुर् आदि उर् भागांत शब्दोंके रूप भी इसके समान होंगे। १५ ष. भ्रवां गिरः 5षु गिरि ० अपां।
सनातनजैनग्रंथमालायां- एक द्विव. बहुव एक द्विव बहुव द्वि. दिशं दिशौ दिशः आशिष आशिषौ आशिषः। तृ. दिशा दिग्भ्यां दिग्भिः आशिषा आशीया आशीभिः। च. दिशे दिग्भ्यां दिग्भ्यः आशिष आशीभ्या आशीर्व्यः। पं. दिशा दिग्भ्यां दिग्भ्यः आशिष: आशीया आशीर्थ्यः । दिशः दिशोः दिशां आशिषः आशिषोः आशिषां। स. दिशि दिशोः दिक्षु आशिषि आशिषोः आशीषु । दिव शब्द एक द्विव बहुव दिवा दिवः। द्वि दिवं दिवौ दिवः। तृ दिवा दुयुभ्यां न्युमिः। च. दिवे द्युभ्यां युभ्यः। युभ्यां ष. दिवः दिवोः दिवां। स. दिवि दिवोः प्र. धौः पं. दिवः युभ्यः। युषु। अक्षि शब्द नपुसकलिंग कर्तृ शब्द एक द्विव बहुव एक द्विव बहुव तृ. अक्षणा अक्षिभ्यां अक्षिमिः कर्तृणा कर्तृभ्यां कर्तृमिः। च. अणे अक्षिभ्यां अक्षिभ्यः कर्तृणे कर्तृभ्यां कर्तृभ्यः। पं. अक्षणः अक्षिभ्यां अक्षिभ्यः कर्तृणः कर्तृभ्यां कर्तृभ्यः। ष. अक्षणः अक्ष्णोः अक्षणां कर्तृणः कर्तृणोः कर्तृणां। स. अश्णि अक्ष्णोः अभिषु कर्तृणि कर्तृणोः कर्तृषु। १-दधि, अस्थिके रूप भी इसके समान होंगे।
संस्कृतप्रवेशिनी। द्विव वि. नाम नामन् शब्द पायिन् शब्द एक. द्विव. बहुव एक बहुव प्र. नाम नाम्नी नामानि पायि पायिनी पायीनि। नाम्नी नामानि पायि पायिनी पायीनि। तृ. नाम्ना नामभ्यां नाममिः पायिना पायिभ्यां पायिमिः । च. नाम्ने नामभ्यां नामभ्यः पायिने पायिभ्यां पायिभ्यः। पं. नानः नामभ्यां नामभ्यः पायिनः पायिभ्यां पायिभ्यः। प नानः नाम्नो नाम्नां पायिनः पायिनोः पायिनां। स. नास्नि 'नाम्नो नामसु पायिनि पायिनोः पायिषु। अहन् शब्द एक द्विव. बहुव. प्र. अहः अहनी, अही अहानि। द्वि अहः अहनी, अही अहानि। तू अहा अहोभ्यां अहोमिः। च. अहे अहोभ्यां अहोभ्यः। अहोभ्यां अहोभ्यः। ष. अहः अहो अह्नां। स. अहि, अहनि अहो अहासु। पं. अह्नः त्रिलिंग शब्द पंचेन शब्द षष् शब्द प्र पंच अन् शब्द यहुवचन बहुवचन बहुवचन षट् द्वि. पंच षद १-सप्तन, नवन्, दशन् आदि नकारात सख्यावाचक शब्दोके रूप इसके समान होंगे एकोनविंशति [१९] से आगेकी सख्याके अर्थको कहनेवाले सब शब्दोंके रूप एकवचनमें ही चलते हैं और वे अपने समान शब्दवालोंके समान ही होते हैं। अष्टौ, अष्ट। अष्टौ, अष्ट।
सनातनजैनग्रंथमालायां- 4 बहुवचन बहुवचन बहुवचन तु. पंचमिः षभिः अष्टमिः, अष्टामिः। च. पंचभ्यः षड्भ्यः अष्टभ्यः, अष्टाभ्यः। प. पंचभ्यः षड्झ्या अष्टभ्यः, अष्टाभ्यः। प. पंचानां षण्णां स पंचसु षट्त्सु अष्टसु, अष्टासु। नोट-प्रथमभागके परिशिष्टमे तो जो शब्द दिये हैं और यहां नहीं दिये गये हैं उनके तृतीया आदि विभक्तियोके रूपोमें कुछ अतर नहीं समझना, उनके रूप उन सारिखे शब्दोंके समान ही चलेगे । अष्टानां। चतुर्थ अध्याय । (भ्वादि और तुदादिगणीय धातुओंका विधि [लिड्] अर्थमें व्यवहार) प्रथम पाठ। परस्मैपदी धातु । १ शानार्थी विद्वांसं श्रयेत्-ज्ञानका इच्छुक विद्वानका सहारा ले। तृष्णातः जलं पिबेत्-पिपासाकुल पानीको पीवे । सुखार्थी ईश्वरं अर्चेत्-सुखका इच्छुक ईश्वरको पूजे । तपस्वी सत्तपः चरेत्-तपस्वी सच्चे तपको करे । जिज्ञासुः गुरुं पृच्छेत्-जाननेका इच्छुक गुरुसे पूछे । ब्रह्मचारी असंयमं त्यजेत्-ब्रह्मचारी असयमको छोडे । जनः सदा सत्यं वदेत्-मनुष्य सदा सच बोले । १-विधि (नियोग, आज्ञा करना) निमंत्रण, आमंत्रण (इच्छानुसार करनेकी आज्ञा देना) अधीष्ट (सत्कारपूर्वक किसी कामको करने कहना) संप्रश्न (पूछना) प्रार्थना (याचा करना) इन अर्थोंमें लिट् लकारका प्रयोग होता है।
संस्कृतप्रवेशिनी। २ शिशू खेलेतां-टो लडके खेलें । क्षत्रियौ कवचं वहेतां-दो क्षत्रिय कवच पहिने । राजानौ दुर्जनान् अर्देतांदो राजा दुर्जनोंको दंड दें । कारू तरू कृतेतां-दो बढई दो पेड काटें । ३ मुनयः कर्माणि संहरेयुः-मुनि कर्मोको नष्ट करे । कुलालाः घटान् सृजेयु:-कुम्हार घडोंको बनावे । केऽपि कानपि न रिपेयुः--कोई भी किसीको न मारें। जनाः मा मुधा लपेयु:-लोग व्यर्थ न बोलें । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनावो- वांछेत्, ध्यायेतां, सरेयुः, अहेत्, पश्येतो. अंचेयुः, स्पृशेत्, दिशेतां, कांक्षयुः, निदेव, तुदेतां, रिपेयुः, नमेत्, श्रणेतां, यजेयुः, अटेत्, यच्छेत्, याचेयुः, शपेत्, विशेतां, कुंवेयुः, सरेत्, कूजेता, भ्रमेयुः, जिनेत्, धमेतां, नयेयुः, धावेत्, पतेतां, तिप्ठेयुः, मनेत् । हिंदी वनाओ- सत्यपूतां वदेत् वाणी । कचित् काणो भवेत् साधुः । वर्तमानेन कालेन, विहरेत् हि सदा वुधः। अज्ञातकुलशीलेषु न कदाचन विश्वसेत् । सर्वदेवमयो राजा मनुना संप्रकीर्तितः, तस्मात् तं देव- पत् पश्येत् न व्यलीकेन [ मिथ्या कर्हि चित् ॥ दहेत् स्वमेव रोषा- ग्निनी [अ] परं विषयं ततः । प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रमिव [वा] आचरेत् । यस्तु भोगान् परित्यज्य शरीरेण तपश्चरेत्, न तेन किंचित् न प्राप्तं तद् मे बहुमतं फलं । यस्मिन् देशे न सन्मानं न प्रीतिर्न बांधवाः न च विद्यागमः कश्चित् तं देशं झटिति त्यजेत् ॥ अर्थ- नाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च, वंचनं चापमानं च मतिमानो बहिर्वदेत् ॥ अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः, आरोग्य प्रियसंसगों गृध्येत् तत्र न पंडितः ॥ अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः, आत्मनेष सहायेन यश्चरेत् स सुखी भवेत् ॥ - ।
सनातनजैनग्रंथमालायां- संस्कृत बनाओ- प्रतिदिन ईश्वरकी पूजा करनी चाहिये । विद्यार्थी गुरुकी सेवा करें। रथसे उतरते समय ऊपरकी तरफ देखना न चाहिये। जो इस ग्रंथको पढ़े वह अवश्य ही शानी होवे । वह सर्वश हमको सुख दे जिसने सच्चे धर्मका उपदेश दिया। विद्वान् लोग गरीवोंको विना मूल्य शिक्षा दें। धनाढ्य गरीबोंका पालन करें। दो शिष्य गुरुके चरणोंको प्रणाम करें। आपके रक्षक रहनेपर हमारा घर क्यों निरापद न होगा। आत्मा अपने स्वभावको प्राप्त करे। यदि अर्थ, मात्रा, पद और पाक्योंमें कुछ भी अशुद्ध कहा हो तो सरस्वती-माता उसे क्षमा करे। हे भगवन् ! तुम्हारे प्रसादसे संसारमें शांति हो । द्वितीय पाठ। आत्मनेपदी धातु। १ जनः गुणिनं कत्थेत-लोगोंको गुणी आदमीकी प्रशंसा करनी चाहिये । शिशुः चंद्रं ईक्षेत-लडका चंद्रमाको देखे । पापभीरुः अनृतं न भाषेत-पापसे डरनेवाला आदमी मूठ न बोले । परिखा दुर्ग वेष्टेत-खाई किलेको वेष्टित करे। कश्चिदपि न म्रियेत कोई भी न मरे । २ इमौ विद्यार्थिनौ ईहेयातां ये दो विद्यार्थी यन करें। घने शरीरं कवेयातां-दो कपडे शरीरको ठक्के । वालिके स्मयेयातां-दो लडकियोंको मुस्कराना चाहिये । वर्षायां नद्यौ एधेयातां-वर्षामें दो नदियोंको वढना चाहिये। सूर्याचंद्रमसौ धोतेयातां-सूर्य और चंद्रमाको प्रकाशित होना चाहिये । ३ धार्मिकाः सुख लमेरन्-धर्मात्मा लोग सुख पावे । जना: गुणिनो न ईजेरन्-लोगोंको गुणियोकी निदा न करनी चाहिये। विद्वांसः गभीरान् ग्रंथान् गाहेरन्-विद्वानोको गभीर ग्रंथोंका अवगाहन संस्कृतप्रवेशिनी। साधवः सीन् तिजेरन्-साधुलोग सबको क्षमा करै। [करना चाहिये कर्मवीराः जगति प्रथेरन्-काम करनेमे वीर आदमी संसारमें प्रसिद्ध हों। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- भिक्षेत,मानेयातां, मोदेरन्, म्रियेत, रोचेयाता, वर्चेत, वल्मेरन्, उद्वहेत, व यातां, व्यथेत, वेपेयातां, शंकेरन्, शिक्षेत, श्वेतेयाता, स्वादेरन्, स्फुटेत, स्यंदेयातां, मयेयातां, आद्रियेरन् , उद्विजेत, प्यायेरन्, प्रसेत, गार्द्धत, वाधेरन्, दधेयातां, ददेत, यतेरन् , श्रृंथेत, चंडेयाता, कंपेत, त्रपेरन् , काशेत, घूर्णेयातां, ऊहेरन् । सस्कृत बनाओ विद्यार्थियोंको तर्क वितर्क करना चाहिये। राजाको प्रजाकी रक्षा करना चाहिये। मनुष्योंको पापसे डरना चाहिये। कायर आदमी सिंहसे डरें। लड़कोंको खेल देखना चाहिये । जहां कहीं घे रहें पर उनको साधुओंकी सेवा करनी चाहिये। वह राज्य बढे । इससमय दिये जलने चाहिये। हिंदी बनाओ- परलोकं प्रयातस्य न गर्हेत कदाचन । माऽनृतं कदापि कत्थेरन् । अप्राप्ये न ईहेत । स्वजननीं निरीक्ष्य मोदेत प्राणेभ्योऽपि गरीयसीं। सखायौ सखायौ ईक्षेयातां । आपत्सु मित्रं परीक्षेत। विनयिनश्छा- त्रान् पाठकाः शिक्षेरन् । शुद्ध करो- जनः शत्रोरपि गुणान् वदेरन् । सपाः शनैः सरेयातां । पक्षिणौ मधुरं कूजेत् । मधाह्ने शंखान् छात्राः धमेरन् । पापशांत्यर्थं धर्म ईहेत् । रुग्ण औषधं स्वदेयातां । सजनो दुर्जनान् दूरात् परित्यजे- रन् । केऽपि कानपि न वाधेयुः। श्रावको मुनि वीक्ष्य हादेत् ।
१२० सनातनजैनग्रंथमालायां- तृतीय पाठ। उभयपदी धातु। १ कर्षक: गर्त खनेत् [त]-किसान गडा खोदे । निर्धनः धनिनं भजेत् [त]-गरीव धनवालेकी सेवा करे । पुण्यात्मा दरिद भरेत् [ त]-पुण्यात्मा दरिद्रका पोषण करे । २ रजको वस्त्राणि रजेतां [ यातां]-दो धोबी (रंगरेज) कपडे रंगे । नृपो बद्धान मुंचेतां [ यातां ]-दो राजा कैदियोको छोडें । मृगौ अद्रि श्रयेतां [ यातां]-दो मृग पहाडका सहारा लें ३ दुर्जनाः हृदयं मा तुदेयुः [रन् ] -दुर्जन हृदयको व्यथा न दे। भृत्या भारं वहेयुः [रन् ]-नौकर भार ढोवें । शिष्याः समिधः आहरेयुः [रन् ]-शिष्य लकडी लावें । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ। मूहेत, छषेयाता, भजेरन्, यजेत्, याचेतां, वयेतां, भृज्जेत्, लुपेयुः, तुदेयाता, चपेत । - सस्कृत वनाओ- मनुष्योंको कोई जीव न मारना चाहिये । शूद्रको तीनों वाँकी सेवा करनी चाहिये । जुलायोंको कपड़ा वुनना उचित है । मुनियों को सच्चे तपका सहारा लेना ठीक है। मनस्वियोंको याचना करनी ठीक नहीं। दो विद्यार्थियोंको वनसे लकड़ियां लाना चाहिये। समीको दीन दुखियोंकी सेवा करनी चाहिये। चतुर्थ पाठ। उत्तम पुरुष। परस्मैपदी धातु। १ अहं पुस्तकानि पठेयं-मुझे पुस्तकें पढनी चाहिये। अहं किमपि न इच्छेयं-मैं कुछ भी न चाहूं ।
संस्कृतप्रवेशिनी। १२१ A अहं क्लिष्टं सततं रक्षेयं-मुझे दु खियाकी हमेशा रक्षा करनी चाहिये । अहं व्यर्थ न वदेयं-मैं व्यर्थ न बोलूं । २ आवां उचितसमये खेलेव-हम दोनो उचित समयमे खेले। आवां भिक्षार्थ चरेव-हम दोनो मिक्षाकेलिये चले । आवां सुपात्रदानं श्रणेव-हम दोनो सुपात्रदान देवे । ३ वयं पूज्यान् नमेम-हमलोग पूज्योको नमस्कार करे । वयं दुग्धं पिवेम-हमलोग दूध पीवे । वयं अस्पयं न स्पृशेम-हमलोग अस्पीको न छूवं । नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य वनाओ- यच्छेयं, लिखेव, गच्छेम, नमेयं, वितरेम, विकिरेव, क्रीडेयं, अतेव, जीवेम, कूजेयं, गर्जेम, तपेयं । - सस्कृत बनाओ- मै कभी भी झूठ न बोलूं। हमें बुरा काम न करना चाहिये। हम दोनोंको प्रतिदिन ईश्वरकी पूजा करनी चाहिये । मुझे गुस्के पास जाना चाहिये। भाई ! हमको शत्रु जीतने चाहिये । हमलोग विद्यार्थी हैं हमें इससमय ध्यानसे पढ़ना चाहिये । हम दोनोंको अभक्ष्य न खाना चाहिये । हमलोग स्त्रियां हैं हमें शर्म करना योग्य है । मुझे क्यों खेलना चाहिये । तुम दोनों पंडितोंको अच्छे अच्छे ग्रंथ देखने चाहिये। हिंदी बनाओ- अहं सदा धर्मतत्परो भवेयं । वयमेव पर्वतं किं गच्छेम । आवा सर्वदा विद्यादानं यच्छेव । दूतोऽहं नृपमर्चेयं । शठ ! त्वया सह नाहं वदेयं । हा! तामावां पश्येव । । १६ १२२ सनातनजैनग्रंथमालायां- पंचम पाठ। आत्मनेपदी धातु। १. अहं सुखं लमेय-मैं सुख प्राप्त करूं । अहं अपराधिनं तिजेय-मैं अपराधीको क्षमा करूं। अहं सततं ईहेय-मैं सर्वदा काम करूं। २ आवां शत्रोन क्षोभेवहि-हम दोनों शत्रुसे न क्षुब्ध हों। आवां कमपि न गवहि-हम दोनों किसीकी भी निंदा न करें। आवांशास्त्राणिगाहेमहि-हम दोनोंको शास्त्रोंका अवगाहन करना चाहिये। ३ वयं सत्तपसि दीक्षेमहि हमलोग सच्चे तपमे दीक्षित हो । वयं शंकेमहि हमलोगोको शंका करनी चाहिये । वयं कदाचन न उद्विजेमहि हमलोग कमी भी उद्विग्न न हो। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनावो- आद्रियेवहि, प्यायेमहि, ईक्षेमहि, कचेय, ईषेवहि, ईजेमहि, भिक्षेय, द्योतेमहि, एधेय, प्रथेमहि, मानेवहि, बल्भेय, वर्द्धमहि । शुद्ध करो- वयं साधून कत्थेयरन्, आवां सयेव, अहं स्वादेयं, आवां शिक्षयातां, वयं शेमेयुः, अहं व्यथेत्, वयं क्षोमेय, आवां गर्हेमहि, अहं ईहेमहि । हिंदी वनाओ- अहं सर्वोत्कृष्टं वार्त्तिकादिरहितं व्याकरणं गाहेय। आवां सजनं] कत्थेवहि । अहं भगवद्विषयकं गीतं शिक्षेय । विपदाऽभिभूतोऽप्यह धर्म न त्यजेयं । शिष्यस्याविनयमहं न सहेय । प्रजानामनुरंजनाय राजनो वयं यतेमहि । वर्धमानं व्याधि जयंतं शत्रु च नोपेक्षेमहि । सस्कृत बनाओ- मुझे गुरुके पास न्यायशास्त्र पढ़ना चाहिये। हमलोगोंको शुद्ध अंत:करणसे ईश्वरपूजा करनी चाहिये।हम दोनोंको गरीव आदमि- संस्कृतप्रवेशिनी। १२३ योंकेलिये धन देना चाहिये । मैं उसके साथ लड़ाई करूं? यदि मैं खराब काम करूं तो मुझैतर्जना देनीचाहिये।मा बाप प्रसन्न हो इस- लिये मुझे सदाचारी होना चाहिये। १ [ षष्ठ पाठ। उभयपदी धातु । कर्षकोऽहं गर्त खनेयं [य] मुझ किसानको एक गड्ढा खोदना चाहिये। अहं परपरिवादं गूहेयं [य]—मैं दूसरेकी निदाको छिपाऊं । अहं भक्ष्यं चषेयं [य]-मुझै भक्ष्य चीज खानी चाहिये । २ आवां शत्रु छषेव [ वहि ] हम दोनोको शत्रु मारना चाहिये । आवां निस्वं भरेव [ वहि ] हम दोनो निर्धनको पालें। आवां ईश्वरं यजेव [वहि - हम दोनों ईश्वरको पूजें । ३ वयं वीजं वपेम [महि ] हमलोगोंको बीज बोना चाहिये। वयं विदुषं भजेम [ महि] हमलोगोको विद्वानका सहारा लेना चाहिये। वयं वनं श्रयेम [ महि] हमलोग वनका आश्रय लें। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- आहरेय, तुदेम, आदिशेमहि, भृज्जेय, लिंपेव, लपेवहि, सिंचेम, भृज्जेमहि, वहेयं, नयेमहि । संस्कृत बनाओ- यदि मैं काशी जाऊं तो बहुतसी पुस्तकें लाऊं। मुझे जहर न खाना चाहिये । हम दोनोंको धनाढयोंका सहारा न लेना चाहिये। हमलोगोंको शरीर लेपना चाहिये । मैं किसीका भी धन न हरूं। हिंदी बनाओ- पंडितानां समाजेऽपंडिता वयं मौनं भजेमहि । कुसुमैः सुरमिणि भवनेऽध्वखेदं अपनयेयं । धर्मे रता वयं सर्वशं पश्येम । विपत्तौ धर्म न परित्यजेम।
१२४ सनातननग्रंथमालायां- शुद्ध करो- अहंज्यायांसंश्रयेमहि ।आवांवृक्षान् लुम्पेमहि, वयं वस्त्राणि वयेय। सप्तम पाठा मध्यम पुरुष । परस्मैपदी धातु । १ त्वं चिरं जीवेः-तुम चिरकाल तक जीवो । त्वं शीबूं जवे:-तुम जल्दी चलो। त्वं कदापि मा कर्वः-तुम्हें कमी भी घमंड न करना चाहिये। त्वं सततं मा क्रीडे:-तुम्हें हमेशा खेलना न चाहिये । २ युवां मत्तौ मा गर्जेतं-तुम दोनो मत्तोंको गर्जना न चाहिये । युवां व्याकरणं पठेतं-तुम दोनोको व्याकरण पढना चाहिये । युवां पत्रं लिखेतं-तुम दोनोंको पत्र लिखना चाहिये । युवां ग्रामं गच्छेतं-तुम दोनों गावको जाओ। ३ यूयं शिवं इच्छेत-तुमलोग मोक्षको चाहो । यूयं तत्त्वं पृच्छेत-तुमलोग तत्त्व पूछो । यूयं दरिद्रान् रक्षेत-तुमलोगोको दारिद्रोंकी रक्षा करनी चाहिये । यूयं मा मृषा वदेत-तुमलोग झूठ न बोलो । नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य वनाओ- कंदे, खेलेतं, अर्दत, अर्चः, दिशेतं, व्रजेत, कृतेः, इच्छेत, गदे, स्पृशेः, अर्हेत, उपदिशेः, कांक्षत, अवेः, पश्येतं, विकिरे, सृजेत, रिषेत। हिंदी वनाओ- मा मुधा त्वं लपेः। यूयं बहून दिवसान् जीवेत । युवां दुग्धं पिबेतं । यूयं स्वनयनरीश्वरं पश्येत । त्वमतीतं वृत्तांतं कथं न सरे। सद्धर्म सदा उपदिशेः। अलभ्यं न कक्षेत । युवां निरप- राधिनं न निदे।
संस्कृतप्रवेशिनी। १२५ संस्कृत बनाओ- तुमको जीवोंकी हिंसा न करनी चाहिये। तुमलोग प्रतिदिन मान करो। तुम दोनोंको पेड़ सींचने चाहिये। तुम संसाररूपी समुद्रको तरो। तुम दोनोंको प्रतिदिन पाठशाला जाना चाहिये। तुम्हें सच्चे शास्त्र पढना चाहिये। पंडितजी महाशय ! इस लड़के को कृपया पढ़ाइये । हमारे चिरंजीव नेमिचंद्रका विवाह है उस दिन अवश्य २ पधारियेगा। अष्टम पाठ। आत्मनेपदी धातु। १ त्वं जगत्स्वामिमूर्ति सततं ईक्षेथा:-तुम ईश्वरकी मूर्तिको हमेशा देखो। त्वं कमपि कदापि न ईजेथाः-तुम किसीकी कमी भी निंदा न करो। त्वं सत्कार्याणि सर्वदा ईहेथाः-तुम अच्छे कामोंकी हमेशा इच्छा करो। त्वं विपदि न क्षोमेथाः-तुम आपत्तिमें क्षुब्ध न होओ। २ युवां शत्रुमपिन गर्हेयाथां-तुम दोनोंको शत्रकी भी निंदा न करनी चाहिये। युवां न्यायशास्त्राणि गाहेयाथां-तुम दोनोन्यायशास्त्रोंका विवेचन करो युवां सततं चेप्टेयाथां-तुम दोनोको हमेशा काम करना चाहिये। युवां अपराधिनं तिजेयाथां-तुम दोनोंको अपराधीपर क्षमा करनी चाहिये। ३ यूयं वृद्धत्वे दीक्षेध्वं-तुमलोगोंको बुढापेमें दीक्षा लेनी चाहिये । यूयं साधून कत्येवं-तुमलोगोंको साधुओंकी प्रशंसा करनी चाहिये । यूयं विद्यां मिलेध्वं-तुमलोग विद्या मांगो। न्यूयं गुरून् मानेवं-तुमलोग गुरुओंका सत्कार करो। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- रोचेध्वं, वल्मेथाः, वर्द्धयाथां, व्यथेथाः, वेपेचं, शंकेथाः, शि- सेथाः, सयेध्वं, शोमेयायां, आद्रियेध्वं, म्रियेथाः, उद्विजेयाथां । -- सनातनजैनग्रंथमालायां- हिंदी बनाओ- न्यायरीतिषु प्रवर्तथाः।युवा मंद मंदं स्मयेयाथां। रुग्णा यूयमौ- षधं स्वादेध्वं । विपदि मा उद्विजेथाः संपदि च मोदेथाः । सजना यूयं सजनान आद्रियेध्वं । यस्मिन् कस्मिन् न विभंभेथाः। सस्कृत वनाओ- तुम्हें घी न मांगना चाहिये। भाई ! तुम गरीबोंको दान दिया करो। गुणवान आदमीको देख तुम दोनोंको प्रसन्न होना चाहिये। गुरुकी आज्ञा तुम्हें उल्लंघनी न चाहिये। डरसे मत कपो। तुम्हें मुनियोंकी वंदना करनी चाहिये। शुद्ध करो- आवश्यकेषु त्वं मा श्रंथेय । सततं सत्कार्येषु युवां यतेवहि । गुरुषु यूयं न चंडेमहि । इतस्ततो यूयं निष्प्रयोजनं मा मयेरन् । क्लियेषु जीवेषु त्वं दयेतायुवांगुरून् दृष्ट्वात्र पेयातां यूयं जीवान् न वाधेयुः। नवमा पाठ। उभयपदी धातु। १ त्वं विदुषः श्रयेः [था:]-तुमको विद्वानोका सहारा लेना चाहिये । त्वं परधनं मा हरेः [थाः] तुम दूसरेके धनको मत हरण करो। त्वं ओदनं पचेः [था]-तुम चावल पकाओ। २ युवां वस्त्राणि वयेतं [ याथां]-तुम दोनों कपडे वुनो । युवां शरीरं लिंपेतं [याथां]-तुम दोनों शरीर लिपन करो। युवां ईश्वरं यजेतं [ याथां तुम दोनों ईश्वरकी पूजा करो। ३ यूयं विद्यां याचेत [ध्वं] -तुमलोगोंको विद्या मागनी चाहिये । यूयं क्षेत्राणि सिंचेत [ध्वं] तुमलोग खेतमें पानी दो । यूयं वंदिनं मुंचेत [ध्वं]-तुमलोग कैदियोको छोड दो।
संस्कृतप्रवेशिनी। ૧૨૭ नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- खनेथाः, गूहेयाथां, चषेत, छषेतं, भजेध्वं, भरेतं, एधेयाथां, उद्धहेत। संस्कृत वनाओ- तुम्हें गरीवोंको न सताना चाहिये। तुम लोगोंको नौकरोंकेलिये आज्ञा देनी चाहिये। तुम दोनोंको एक कुआ खोदना चाहिये! भाई ! तुम गरीबोंका पालन करो। शुद्ध करो- त्वं भृत्यं आदिशेतं । यूयं निर्धनं मा तुदेरन् । युवां क्षेत्र क- र्षत । त्वं हृतं धनं गूहेतां । दशमा पाठा विधिलिड्के व्यवहारका दृष्टांत । आरंभ मोत्कट चरेत्-बहुतसा आरभ न करना चाहिये । पत्युः स्त्रीणामुपेक्षैव वैरभावस्य कारणं । लोकद्वयं हितं वाछंस्तदपेक्षेत तां सदा । पति और पत्नियोंकी परस्परकी उपेक्षा ही वैरभावका कारण है इसलिये दोनो लोकके हितको चाहनेवालेको सर्वदा परस्पर अपेक्षा (चाहना) ही रखना चाहिये । सदपत्ये गृही स्वीयं भारं दत्त्वा निराकुलः। सुशिष्ये सूरिवत्प्रीत्या प्रोद्यमेत परे पदे ॥ अच्छे शिष्यमे आचार्यके समान प्रीतिपूर्वक गृहस्थ अपने भारको सुपुत्रम दे कर निराकुल हो परम ( उत्कृष्ट) पदमे उद्यम करे । यत्नवान् निष्कषायोऽसावहिंसाणुवतं श्रयेत् । यह कपाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) रहित हो प्रयत्नपूर्वक अहिसाणु व्रत (किसीको न सताना ) का आश्रय करे । हिंसां त्यजेत् यथा नैव प्रतिज्ञा हानिमाप्नुयात् ।
૨૮ सनातनजैनग्रंथमालायां- जिसप्रकार प्रतिज्ञाकी हानि न हो उसप्रकार हिंसाको छोडे । वस्त्रेणातिसुपीनेन गालितं तत्पिबेजलं । अत्यंत गाढे वस्त्रसे छाना हुआ पानी पीना चाहिये । अंबुगालितशेषं तन्न क्षिपेत् क्वचिदन्यतः। तथा कूपजलं नद्यां तजलं कूपवारिणि ॥ कपडेसे छाननेके वाद जो जल बचे उसे कहीं दूसरी जगह न डारे तथा कूए के जलको नदीमें और नदीके जलको कूएमें न डाले। कदाचित्प्राणिरक्षार्थमसत्यं सत्यवद्वदेत् । कभी ( समय पड़ने पर ) प्राणियोंकी रक्षाकेलिये असत्य वातको भी सत्यके समान बोल देना चाहिये। [होना चाहिये। त्वं पंचाणुव्रतधारको भवेः-तुमको अहिंसा आदि पाच अणुव्रतोंका धारक सर्वदा सत्कार्येषु प्रवर्तथा हमेशा सत्कार्यों में प्रवृत्त होओ। [सना करे । वयं प्रातरुत्थाय ईश्वरं उपतिष्ठामहे-हमलोग सबेरे उठकर ईश्वरकी उपा- यूयं सन्मुनीन् सदा सेवेवं-तुमलोगोंको हमेशा सच्चे मुनियोकी सेवा करनी चाहिये। सस्कृत बनाओ- १। राजाओंको क्रोध, मान, माया, लोभ जीतने चाहिये। २। संसारमें सव जीवोंको एक दूसरेपर दया करनी चाहिये। ३। भाइयो! तुमलोग युद्ध में जाओ और शत्रुओंको मारो। ४। हमारे यहां आज महावीरनिर्वाणोत्सव होगा कृपाकर आप लोग अवश्य ही पधारें। ५। हमलोगोंको सर्वदा पापोंसे डरना चाहिये। [चाहिये। ६। लडको! यही समय पढ़नेका है तुम्हें इससमय न खेलना ७। बेटी! तू सासुरेमें (श्वसुरालय) जाकर अपनेसे बड़ोंकी सेवा करना, अपनी सोतों (सपत्नी) को सखी समझेना, अपने पतिसे कभी भी रुष्ट न होना, दासियों पर दया करना, -
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त्वं युवा ३ कर्षक: १३० सनातननग्रथमालायां- अहं ग्रंथौ गाहेय-मया । ग्रंथौ गाोयातां। आवां विद्वांसौ मानेवहि-आवाभ्यां विद्वांसौ मान्येयातां । वयं मोदकौ वल्मेमाहि-अस्माभिःमोदको वल्भ्येयातां । शत्रू तिजेथा:-त्वया शत्रू तिज्येयानां। कीटको न बाधेयाथां-युवाभ्यां कीटकौन बाध्येयातां । यूयं पितरौ सेवेवं-युष्मामिः पितरौ सेव्येयातां। गतान् खनेत् [त]-कर्षकेण गत्ताः , खन्येरन् । शिष्यौ पाठकान् श्रयेतां याता]-शिष्याभ्यां पाठकाः श्रियेरन् । शिष्याः समिधः आहरेयुरिन्]-शिष्यैः समिधः ओहियेरन् । त्वं दुर्जनान् तु देथाः] त्वया दुर्जनाः तुघेरन् । युवां बद्धान मुंचेतं याथा]-युवाभ्यां बद्धाः मुच्येरन् । यूय दरिद्रान् भरेत[व]-युलामिः दरिद्राः प्रियेरन् । अहं गुणिनः भजेयं [य]-मया गुणिनः भज्येरन् । आवां विद्याःयाचेव वहि]-आवाभ्यां विद्याः याच्येरन् । वयं ओदनान् पचेम[महि]-अलामिः ओदनाः पच्येरन् । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- सेव्येत, मान्येरन्, गायेत, ईज्येयातां, गरन्, लिख्येत, पठये- यातां, दहरन, रक्ष्येयातां, दिश्येत, रिष्येयातां, ढुंप्येत, अटयेरन्, सिच्येत, मुच्येयातां, व्रज्येत । हिंदी बनाओ- धमार्थकामा जनैरविरोधेन भज्येरन् । राजमिः प्रजाः सत्का- येषु दिश्येरन् । गुरुणा छात्रोऽवहितमनसा शिस्येत । सुशिष्यमान्ये- रन् गुरवः। प्रातरुत्थाय नित्यं पितरौ बालैनम्येयातां। पवित्रैर्धा स्ममिः पापिनो न स्पृश्येरन् । धर्मोपदेशृमिरसत्यं न लप्येत । १-पृष्ट ४२ की टिप्पणी देखो।
संस्कृतप्रवेशिनी। अपने सौभाग्यका घमंड न करना। ८। धनिकोंको धन, विद्वानोंको विद्या विना स्वार्थके देना चाहिये। ९। मुझे सर्वदा माता पिताकी आज्ञा माननी चाहिये। १०। मनुष्योंको इंद्रियविपयोंमें आसक्त न होना चाहिये। ११ । गुरु महाशय ! इसने व्याकरण पढ़ लिया है कृपाकर इसे अव न्यायशास्त्र पढ़ाइये। १२। अनाथरक्षक ! मैं बहुत गरीव हूं मुझे मिक्षा दीजिये। १३। या तो मैं मर जाऊंगा या इस कार्यको करूंगा। १४। विनयी शिष्योंको ऊटपटांग शंका न करनी चाहिये। १५। हमलोगोंको साफ सुथरे (परिष्कृत) घरमें रहना चाहिये। एकादश पाठा वाच्य परिवर्तन । कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य। १ सुखार्थी ईश्वरं अर्चेत्-सुखार्थिना ईश्वरः अर्यंत । तपस्विनी सत्तपः चरेतां-तपस्विभ्यां सत्तपः चर्यंत । ब्रह्मचारिणः असंयमं त्यजेयुः-ब्रह्मचारिभिः असंयमं त्यज्येत । अहं पुस्तकं पठेयं मया पुस्तकं पठ्येत । शत्रु रिपेव-आवाभ्यां शत्रु: रिष्येत। वयं दुर्जन अम-अस्मामिः दुर्जनः अर्थत। त्वं गुणिनं अर्ह:-त्वया गुणी अात। युवां सा, पश्येतं-युवाभ्यां साधुः दृश्येत । यूयं शत्रुमपि न निदेत-युष्माभिः शत्रुरपि न निद्येत । २ शिशुः क्रीडनके दोसिलोने ईक्षेत-शिशुना क्रीडनके ईध्येयातां । परिखे दुर्गों वेटेयातां-परिखाभ्यां दुर्गों वेष्टयेयातां । सुखदुःखे लभेरन्-जनैः सुखदुःखेलभ्येयातां । . आवां जनाः 1 ३ कर्षक: १३० सनातनजैनप्रथमालायां- अहं ग्रंथौ गाहेय-मया । ग्रंथौ गाोयातां। आवां विद्वांसौ मानेवहि-आवाभ्यां विद्वांसौ मान्येयातां । वयं मोदको वल्भेमहि-अस्माभिःमोदको वल्भ्येयातां । त्वं शत्रू तिजेथाः त्वया शत्रू तिज्येयानां। युवा कीटको न वाधेयाथां-युवाभ्यां कीटकौन बाध्येयातां । यूयं पितरौ सेवेवं-युष्मामिः पितरौ सेव्येयातां । गतान् खनेत् [त]-कर्षकेण गताः , खन्येरन् । शिष्यौ पाठकान् श्रयेतां याता]-शिष्याभ्यां पाठकाः श्रियेरन् । शिष्याः समिधः आहरेयुरिन्]-शिष्यैः समिधः ओहियेरन् । त्वं दुर्जनान् तुर्दै देयाः त्वया दुर्जनाः तुघेरन् । युवां बद्धान मुंचेतं [याथा]-युवाभ्यां बद्धाः मुच्येरन् । यूय दरिद्रान् भरेत[]-युस्सामिः दरिद्राः भ्रियेरन् । अहं गुणिनः भजेयं [य]-मया गुणिनः भज्येरन् । आवां विद्याःयाचेव विहि-आवाभ्यां विद्याः याच्येरन् । वयं ओदनान् पचेम महि]-अस्माभिः ओदनाः पच्येरन् । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- सेव्येत, मान्येरन्, गायेत, ईज्येयातां, गाँरन्, लिख्येत, पठये- 'यातां, दहरन्, रक्ष्येयातां, दिश्येत, रिष्येयातां, ढुंप्येत, अटयेरन्, सिच्येत, मुच्येयातां, व्रज्येत । हिंदी बनाओ- धमार्थकामा जनैरविरोधेन भज्येरन् । राजमिः प्रजाः सत्का- येषु दिश्येरन् । गुरुणा छात्रोऽवहितमनसा शिस्येत । सुशिष्यमान्ये- रन् गुरवः। प्रातरुत्थाय नित्यं पितरौ बालैनम्येयातां । पवित्रैर्धा. स्ममिः पापिनो न स्पृश्येरन् । धर्मोपदेशृमिरसत्यं न लप्येत । १-पृष्ट ४२ की टिप्पणी देखो।
संस्कृतप्रवेशिनी। संस्कृत बनाओ पर क्रिया कर्मवाच्यकी हो- हमलोगोंको उपकारियोंका प्रतिदिन स्मरण करना चाहिये। इन नेत्रोंसे अच्छे २ पदार्थ देखने चाहिये । यदि प्रतिदिन ईश्वरकी पूजा की जाय तो अवश्य ही मनोरथ सफल हों। विद्यार्थी एक दूसरेको गाली न दे। श्रावकोंको अभक्ष्य पदार्थ न खाने चाहिये। तुमलोग इस मुंहसे अच्छे २ वचन बोला करो। जनाः २ शिष्यः द्वादश पाठ। उत्तम पुरुष। कर्तृवाच्य। कर्मचाच्य। १ ईश्वरो मां रक्षेत्-ईश्वरेण अहं रस्येय। वालको मां पृच्छेतां यालकाभ्यां अहं पृच्छ्येय । मां अर्हतु-जनैः अहं अहोय। त्वं मां स्पृशे:-त्वया अहं स्पृश्येय। युवां मां स्मरेतं-युवाभ्यां अहं स्त्रियेय । यूयं मां न अदेत-युस्मामिः अहं न अद्यय। आवां नमेत्-शिष्येण आवां नम्येवहि। पितरौ आवां तर्जता-पितृभ्यां आवां तयॆवहि। भूषणानि आवां भूषेयुः-भूषणः आवां भूप्येवहि । आवां वंदेथा:-त्वया आवां वंधेवहि। युवां आवां पायेयाथां-युवाभ्यां आवां बायेवहि । यूयं आवां मानेध्वं-युस्माभिः आवां मान्येवहि । ३ माता अस्मान् चुंबेद-मात्रा वयं चुंन्येमहि । पाठको अस्मान् उपदिशेतां-पाठकाभ्यां वयं उपदिश्येमहि । छात्रा असान् भजेयुः-छात्रैः वयं भज्येमहि । त्वं अस्मान् सेवेथाः-स्वया वयं सेव्येमहि । त्वं १३२ सनातनजैनग्रंथमालायां- युवां अस्मान् हरेतं-युवाभ्यां वयं हियेमहि । यूयं अस्मान् मरेयुः-युस्माभिः वयं मृष्येमहि । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- ईश्येवहि, ईज्येय, ग.महि, मान्येय, स्पृश्येमहि, मुच्येमहि, शंस्येवहि, चुव्येमहि, दिश्येय, रक्ष्येमहि । संस्कृत वनाओ परतु क्रिया कर्मवाच्यकी हो- स्वामिन् ! तुम मेरी रक्षा करो। गुरुजी ! हम दोनोंको शिक्षा दीजिये । हा पुत्र ! क्या तुझे हमलोग छोड़ने थे? महाशय ! हम अनाथों पर दया कीजिये। लड़कपनमें हमको अच्छे २ उपदेश दीजिये। माता पिता मुझे प्यार करे। वेटी! तू मुझे याद करना । - शुद्ध करो- सुतया अहं स्त्रियेत । पुत्ररावां भज्येथां । साधुभिर्वयं मृष्येरन ।। प्रभुणा अहं दिश्येवहि । धर्मेण आवां रथ्येमहि । सर्वैर्वयं अर्येय । त्रयोदश पाठ मध्यम पुरुष । कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य । १ गुरुः त्वां शिक्षेत-गुरुणा त्वं शिक्ष्येथाः। दासौ त्वां सेवेयातां-दासाभ्यां त्वं सेव्येथाः। जना: त्वां पश्येयुः जनः त्वं दृश्येथाः। अहं त्वां उपदिशेयं मया त्वं उपदिश्येथाः। आवां त्वां वंदेवहि-आवाभ्यां त्वं वंद्यथाः। वयं त्वां त्यजेम-अस्माभिः त्वं त्यज्येथाः। युवां अनुगच्छेत्-मंत्रिणा युवां अनुगम्येयाथां । पुरुपौ युवां अनुवर्तयातां-पुरुषाभ्यां युवां अनुवत्यैयाथां । जनाः युवां भणेयु:-जनैः युवा भण्येयाथां। २ मंत्री संस्कृतप्रवेशिनी। १३३ अहं युवां मुंचेय-मया युवां मुच्येयाथां। आवां युवां नमेव-आवाभ्यां युवां नम्येयाथां । वयं युवां तुदेम-अस्माभिः युवां तुद्येयाथां। ३ बाल: युष्मान् प्रतीक्षेत-चालेन यूयं प्रतीक्ष्येवं । शिशू युष्मान् स्पृशेतां-शिशुभ्यां यूयं स्पृश्येवं । विद्वांसः युष्मान् मानेरन्-विद्वद्भिः यूयं मान्येवं। अहं युष्मान् स्मरेयं मया यूयं स्नियेध्वं। आवां युष्मान् दिशेव-आवाभ्यां यूयं दिश्येध्वं। वयं युप्मान् पश्येम-अस्मामिः यूयं दृश्येवं। नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य बनाओ- प्रविश्येथाः, कत्थ्येध्वं, शिक्ष्येयाथां, ईोथाः, वाध्येध्वं, यल्भ्ये- थाः, हियेवं, याच्येयाथां, भज्येध्वं । मंस्कृत बनाओ जिसमें कि क्रिया कर्मवाच्यकी हो- सवलोग तुम्हें ही याद करें। विद्यार्थी तुम्हें पूजे । शत्रुलोग भी तुम दोनोंकी प्रशंसा करें । लतायें तुमलोगोंको आलिंगन करें। बेटा! ऋद्धियां आकर तुम्हें प्राप्त हों। यदि राज्य समृद्ध होजाय नो तुम्हें धन्यवाद मिले। शुद्ध करो- धनिना निस्वस्त्वं रक्ष्येत । गुरुभ्यां युवां शिक्ष्येयातां । अरिमि- रपि यूयं न निंद्येवहि । विद्वद्भिस्त्वं तिज्येमहि । सुभटेन सुभटौ युवां प्रहियेरन् । सेनया यूयं नीयेमहि । कर्तृवाच्य । मूढः हस्तिनौ १७ चतुर्दश पाठ। भाववाच्य । कर्वत्-मूढेन कर्व्यत। नर्देतां-हस्तिभ्यां नर्धेत ।
चर्यत। ज्वरे:-त्वया मोघेत । - अत्र सनातनजैनग्रंथमालाया- मृगाः चरेयुः-मृगैः त्वं ज्वर्येत । युवां जयेतं-युवाभ्यां जीयेत। यूयं एघेवं-युष्मामिः एध्येत। अहं मोदेय-मया आवां दीक्षेवहि-आवाभ्यां दीक्ष्येत । वयं वसेम-अस्माभिरत्र उष्येत। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- अंच्येत, जीव्येत, हठ्येत, स्फुट्येय, क्षीयेत, क्रीब्येत, कूज्येत, नियेत, भूयेत, उद्विज्येत, कन्येत, ईहोत । सस्कृत वनाओ परतु क्रिया भाववाच्यकी हो- मेघ वर्षे । संपत्ति बढे । भाग्य फले। हमलोग प्रयत्न करें। वे प्रसन्न हों। विद्यार्थी यहां रहें। मालायें मुरझा जावे । कृपाकर अब तो जाइये । रत्न चमचमावें। शुद्ध कर वाच्यपरिवर्तनसे लिखो- यदि कश्चित् भवेदन मंक्षु आगच्छेतं सः। गुरून् दृष्ट्वा मोदेत शिष्टः । सजनाः शत्रौ मित्रे वाऽपि समदृष्ट्या ईक्षेयुः। भारतवर्षः प्रतिदिन विद्यायां प्रथेरन् । वर्षायां एधेतां नद्यः। - - - साहित्य परिचय । हिंदी बनाओ- एकदा प्रवलवाते वहति सति तजनितक्षोभवशात् समस्तमही- रहेषु कंपितेषु सत्सु भूतलगतशुष्कपत्रेष्त्पतितेषु सत्सु, सासु दिक्षु धूलिच्छन्नासु सतीषु कामपि क्षेत्रवृत्ति (मेंड) माश्रयंत शशाः परमया भीत्या इतस्ततो धावंति स्म । महताऽऽयासेन क्षेत्रवृत्तिमु- लंध्य प्राणरक्षणपरा: प्लायमानाः पुरतो महतीमापगां (नदी) पश्यंति संस्कृतप्रवेशिनी। १३५ स्म । तदा निर्विण्णमनसोऽन्योन्यमुक्तवंत:-"अहो! कीदृशीयं विप- त्परंपरा। यत्र यत्र वयं व्रजामस्तत्र तत्रैवानुधावति सा (विपत् ) वरं तर्हि मजनं कृत्वा प्राणत्यागः । न पुनरीदृशेषु व्यसनेषु काल- यापनं"। एवं विनिश्चित्य सर्व नदीनिकटतीरमागच्छंति स्म । तत्र वहिर्निर्गतास्तीरे वर्तमाना मेकास्तान् शशान् वीक्ष्य जले उत्पतंति स्म तले भज्जितवंतश्च । तटेकेन वृद्धशशेन दृष्टं । स तानंगुल्या नि- दिश्य सखीन भाषते स्म-"भो मित्राणि! भीरखिलानाक्रम्य तिष्ठति। यद्येवं तर्हि किमस्माभिरेव प्राणास्त्यज्येरन् ? कुतो धैर्यमवलंब्याप- तितानि दुःखानि सहित्वा व्यसनं प्रत्यभिमुखैन भूयते" । तच्छ्रुत्वा सर्वे धैर्यमवलंव्य तत्रैव वसंति स । एवं कृते कतिपयैरेव मुहत्तै- वोत्या (आंधी) शांतिं गतवती ते च स्वस्था भूताः । केचन पुरुषा नानाविधानि साध्वसानि प्रकल्प्य "हा हा कथं भवेत्, का गतिः स्यात्" इति रात्रिंदिवं चिंतयंतः कालं नयंति । "वयमेवाखिलानां दुःखानां भाजनानि" इति च तेषां प्रतिभाति । "इतरत्र सर्वे सुखिनः" इति च मन्यते तैः । परं यान् ते सुखभाजो वोधंति तेषां दुःखानि यदि ईक्षेरन् तर्हि 'वयमेव सुखिनः' इति ते मन्येरन् । भगवता विश्वसृजा देवेन सुखदुःखयोरंशा यथायथं सर्वेभ्यो दीयंते । सस्कृत वनाओ- जो पुरुप अपने दोपोंको दूर करनेमे असमर्थ है वह दूसरेके दोपोंको दूर करनेकेलिये यत्न न करे । जो दूसरेको उपदेश दे उसे वैसा ही आचरण करना चाहिये जिससे कि उसमें कोई शंका न करे। ऐसा करनेसे उसका उपदेश मान्य होता है। क्योंकि जो दोष दूसरोंको छोड़ना चाहिये उसे ही यदि हम करे तो लोकमें हमारी क्यों न हंसी होगी। घरमें आग लगनेपर कुआ न खोदना चाहिये । जो लोग ऐस - १३६ सनातनजैनग्रंथमालायां- - करते हैं वे मूर्ख हैं । इसलिये जबतक बालक अवस्थामें हैं संसारके (भारसे आक्रांत नहीं हुये हैं तब तक हमलोगोंको खूब विद्या पढ़- लेनी चाहिये जिससे कि युवा अवस्थामें आनंद प्राप्त हो। और युवा अवस्थामें इंद्रियोंका दमन करना चाहिये, दुश्चरितोंसे अपनी रक्षा करनी चाहिये, धनको इकट्ठा करना चाहिये जिससे कि बु- ढ़ापेमे सुखसे रहें । जो पुरुष पहिलेसे सव काम कर लेता है वही निरालस है, वही पंडित है, वही पुरुष है और उसीने बुद्धिका फल पाया है। जो मनुष्य इंद्रियोंको वश करना चाहता है उसे पहिले अपने मनको जीतना चाहिये। क्योंकि सेनापतिके जीत लेनेपर सेना स्वयं ही जीतली जायगी। अपने इस मनरूपी चंचल बंदरको पहिले तो ज्ञान और वैराग्यरूपी सांकल (शृंखला) से बांधना चाहिये बाद को शास्त्ररूपी वगीचेमें इसे छोड़ देना चाहिये। यदि कदाचित् मन दूसरी तरफ जाय तो उसे वैराग्यकी तरफ खींचना चाहिये । आत्मन् ! जब तैने पराधीन अवस्थामे नाना दुःख सहे हैं तब इससमय भी कमौकी निर्जराकेलिये उन्हें सहना चाहिये। अपने शुद्ध स्वरूपका ध्यान करते हुये जब तक तुम इस जगतमे रहोगे तब तक बहुतसे पापोंको नष्ट करोगे।' .
संस्कृतप्रवेशिनी। १३७ पंचम अध्याय। (भ्वादि और तुदादिगणीय धातुओंका अनंद्यतन भूतकाल [लड् ] में प्रयोग ) प्रथम पाठ। परस्मैपद (अन्य, उत्तम, मध्यम पुरुष) छात्रोऽयं व्याकरणं अपेठत्-इस विद्यार्थीने व्याकरण पढलिया। अहं मुनि अपश्यम्-मैने एक मुनि देखे । त्वं गुरुं अपृच्छ:-तुमने गुरुको पूछा । २ दास्यौ पुत्रोत्पत्ति अवदतां-दो दासियोने पुत्रकी उत्पत्ति कही। आवां शत्रु आदीव-हम दोनोने शत्रुको पीडा दी । युवां मुनी अपूजतं-तुम दोने दो मुनिकी पूजाकी । ३ जनाः वनं अगच्छन्-लोग जंगलको गये । वयं भृत्यान् अदिशाम-हमने नौकरोंको आज्ञा दी । यूयं अनाथान् अरक्षत-तुमलोगोने अनायोंकी रक्षा की । हिंदी वनाओ- एको वृपो जलं पातुं नदीमागच्छत् । अश्वमारोढुं मतिरभवत् । १-आधी रातसे लेकर सपूर्ण दिन और आधीरात पर्यन कालको अद्यतन कहते है और उससे पहिलेका काल अनद्यतन भूत है। अर्थात् जिस दिन हम किसी बातको कह रहे हैं यदि वह वात उसदिनकी आधीरातसे पहिले हुई है तो इस लकारका प्रयोग होगा । जैसे-किसीने आज किसी समय कहा कि-'अलिखत् पत्रं देवदत्त =देवदत्तने एक पत्र लिखा । तो इससे यह अभिप्राय निकला कि उसने पत्रको आजकी आधी रातसे पहिले लिखा है आज नहीं। २-वर्तमान कालके जो 'पठति, पठत' आदि रुप बतलाये हैं उनमें जिन धातुओंके आदिमें व्यंजन है उनसे पहिले तो 'अ' और जिनके आदिमें खर है उनसे पहिले 'आ' लगादेनेसे तथा 'ति, त , न्ति, मि, वः, म , सि, थः, थ' जो प्रत्यय हैं उनके स्थानमें क्रमसे 'त् , ता, न् , म्, व, म, (विसर्ग), तं, त' करदेनेसे इसके रूप होजाते हैं।
૪૨૮ सनातनजैनग्रंथमालायां- सखीभिः पृष्टा ललना अगदत् । पदि निषण्णो गुरु शिष्यान् धर्म- मुपादिशत् । केकैय्या दारुणं वचः श्रुत्वा महाराजो दशरथः सहसा भूमावपतन्निश्चेष्टश्चाभवत् । अस्मिन्नेव लतागृहे त्वमभवः । अमू तौ तरू यौ ह्योऽपश्यम् । पुर्या पुराऽस्यां किल कालिदासो नाझा- ऽभवद् यो भ्यवसत् कवीशः। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- अशंसत्, अकांक्षस्, अनिंदन, अवजा, अस्पृशत, अगायाम, अध्यायन् ,अस्सरत,न्यलपत्, अगच्छन् ,असजाव, आवत,अरिषाम। द्वितीय पाठ। आत्मनेपद। १ धरित्रीपतियतिमेकं ऐक्षत--राजाने एक मुनिको देखा। अहं कुत्रापि सुखं न अलमे-मैंने कहीं मी सुख न पाया । १-वर्गके पहिले और तीसरे अक्षरके वाद यदि 'ञ, म, ङ, ण, न' में से कोई होगा तो उस (वर्गके पहिले वा तीसरे अक्षर ) को उसी वर्गका पाचवा अक्षर हो जायगा । जैसे-वाग् मधुरा-वाङ्मधुरा, तत् नयन-तनयन । २-हस्व स्वरके वाद यदि 'न् , इ, ण, में से कोई होगा और उस (न् , इ, ण,) के वाद भी कोई स्वर् होगा तो वे 'न् , इ, ण, दो हो जायगे। जैसे-'अस्मिन् एव' यहा पर मका- रकी ह्रस्व इकारसे पर 'न' है और उस 'न' के वाद फिर 'एवं' का 'ए' स्वर है इसलिये 'न' टो होगये तो 'अस्मिनेव' हुआ। ३-पृष्ठ ३३ की नं० ३ की टिप्पणी देखो । ४-आत्मनेपदी धातुओके लड् प्रत्ययके रूप बनानेकेलिये प्रथमपुरुषमें 'त, एता, अत' उत्तमपुरुषमें 'ए, आवहि, आमहि' और मध्यमपुरुपमें 'याः, एथां, ध्व' लगा देना चाहिये । एव जिनके आदिमें व्यंजन है उन धातुओंसे पहिले 'अ' और जिनकी आदिमें स्वर है उनसे पहिले 'आ' लगा देना चाहिये। ५-जो लड् आदिके रूप बनानेकेलिये धातुसे पहिले 'आ' आता है यदि उसके वाद 'इ, है' होंगे तो उन (आ और इ, ई) दोनोंके स्थान में 'ऐ' उ, ऊ होंगे तो औ ऋ होगी तो 'आर' हो जायेंगे। जैसे-आ+ईक्षत-ऐक्षत।
संस्कृतप्रवेशिनी। १३९ -- त्वं उद्यमेन धनं अलभथा:-तुमने परिश्रमसे धन प्राप्त किया। २ छात्रौ शीतेन अकंपेतां-दो विद्यार्थी ठंडीसे कापे । आवां व्याकरणं अगाहावहि-हम दोने व्याकरण शास्त्रका अवगाहन युवां तान् अगhथाम्-तुम दोने उनकी निंदा की । [किया। ३ जनाः मुनि अलोकंत-मनुष्योंने मुनिको देखा । वयं अन्नं अमिक्षामहि-हमने अन्नकी भीख मागी । यूयं मंद मंदं अस्मयध्वं तुमलोग मंद मंद मुस्कराये। नीचे लिखे शब्दोंसे सस्कृत वनाओ- अशोभत, अमानावहि, अप्रथध्वं, अमोदंत, अद्योतेथां, अम्रि. यामहि, अशिक्षेतां, अवेपंत, ऐजत । हिंदी वनाओ- कदाचिद् वामदेवशिष्यः सोमदेवशमी नाम, कंचिदेकं बालकं राज्ञः पुरतो निक्षिप्याऽभापत । "देव! रामतीर्थे स्नात्वा प्रत्यागच्छ- नहं काननावनौ वनितया कयाऽपिधार्यमाणमेनमुज्ज्वलाकारं कुमार विलोक्य तां वृद्धां सादरमभणं । 'स्थविरे ! का त्वं? एतस्मि- नटवीमध्ये बालकमुद्वहंती किमर्थमायासेन भ्रमसीति' वृद्धाऽप्यग- दत्। "मुनिवर!कालयवननाम्नि द्वीपे कालगुप्तो नाम धनाढयो वैश्य- वरः कश्चिदस्ति । तन्नंदिनी नयनानंदकारिणी सुवृत्तां नामैतस्माद् द्वीपादागतो मगधनाथमंत्रिपुत्रो रत्नोद्भवो नाम रमणीयगुणालय उद- वाहत । कालक्रमेण नतांगी गर्भमधरत् । ततः सहोदरविलोकनला- लसया रत्नोद्भवस्तया सह प्रवहण (जहाज) मारुह्य पुष्पपुरमभ्या- गछत् । जलतरंगताडितः पोतः ( जहाज ) समुद्रांभस्यमजत् । तां ललनां धात्रीभावेन कल्पिताऽहं कराभ्यामुहंती फलक (काठका टुकड़ा) मेकमधिरुह्य दैववशात् तीरभूमिमलमे। सुहृज्जनपरिवृतो रत्नोद्भवस्तत्र निमग्नो वा केनोपायेन तीरमगच्छद्वा न बोधामि । क्ले- शस्य परां काष्ठामधिगता सुवृत्ताऽस्मिन्नटवीमध्येऽद्य सुतं सूतवती । -- १४० सनातनजैनग्रंथमालायां- - प्रसववेदनया निश्चेष्टा सा प्रच्छायशीतले (छायासे ठंडे) तरुतले निवसति । जनरहिते वने स्थातुमसमर्थतया देशगामिनं मार्गमन्वे- ष्टुमुद्युक्ताऽहं विवशायास्तस्याः समीपे बालकं निक्षिप्य गमनम- नुचितमिति कुमारमप्यनयमिति" । तस्मिन्नेव क्षणे कंचित् वन्यं (जंगली )वारणं (हाथी) वयमलोकामहि । तं विलोक्य भीता सा वृद्धा बालकं निपात्य ( गिराकर) प्राद्रवत् । अहं च समीपलता- गृहे प्रविश्य परीक्षमाणोऽतिष्ठम् । निपतितं वालकं गृहीतवति गज- पतौ भीमरवो (भयंकर शब्द वाला) कंठीरवो ( सिंह )न्यपतत् । भयाकुलेन तेन दंतावलेन वियति समुत्पात्यमानो (फैकागया) बा- लको भूमावपतत्। तंचाहं ततःपरिगृह्यभवत्सकाशं समागच्छमिति । सस्कृत बनाओ- किसी जंगली पशुकी लड़की बहुत ही रूपवती थी। एक दिन उसे किसी सिंहने देखा और वह उसको जी जानसे [प्राणपणेन ] चाहने लगा। उसे कामदेवके वाणोंने इतनी पीड़ा दी कि उसकी यादमें वह खाना पीना भी भूल गया । इसलिये वह निःशंक हो शीघ्र ही उस लड़कीके पिताके पास पहुंचा और उसे मांगने लगा। लड़कीके पिताने उस सिंहकी अनुचित इस प्रार्थनाको सुन विचा- रा “यदि मैं पुत्री देनेसे निषेध करता हूं तब तो यह अभी मुझे मार डालता है और लड़की दे दूं तो इसके संगसे लड़की भी मर जायगी इसलिये इसको किसीतरह [ केनापि प्रकारेण ] ठगना चाहिये। इसके बाद वह सिंहसे बोला-“हे मृगराज! खुशीसे [प्रीत्या ] मैं अपनी लड़की आपको दे दूंगा परंतु आपसे यह प्रार्थना करता हूं कि-मेरी पुत्री बहुत ही कोमलांगी है और तुम्हारे नख और दांत अति तीक्ष्ण हैं उनसे उसै पीड़ा होगी। इसलिये आप अपने दांतों को गिराने [पातन ] और नखौंको कतरने [कर्तन] की आशा । दीजिये"। उसकी यह प्रार्थना सुन कामांध सिंह बोला “अच्छा संस्कृतप्रवेशिनी। [साधु] क्या हानि है ऐसा ही करो" उस जंगली पशुने यह सुन शीघ्र ही उसके नख काट डाले और दांत तोड़ डाले [अपातयत् ] अनंतर एक मुद्गर लेकर उसकी कमरमें [कटिभाग] मारा जिससे कि उसीसमय वह मर गया। नोट-जो धातु उभयपदी हैं उनके रूप दोनो प्रकार ( परस्मैपद, आत्मनेपद) से चलते है इसलिये उनके रूप दोनो प्रकारकी धातुओके समान चलाना । परिशिष्ट (क)। अदादिगणकी धातुओंका वर्तमानकाल (लह) में प्रयोग । परस्मैपदी धातु। १ बधकः पशून् हन्ति-कषायी पशुओंको मारता है। अहं सद्वाणीं वच्मि-मैं अच्छी वात कहता हू । त्वं अनाथान् पासि-तुम अनाथोंकी रक्षा करते हो । २ राजानौ तेजसा भातः-दो राजा तेजसे गोभित होते है। आवां व्याकरणं विद्वः-हम दोनों व्याकरण जानते है । युवां किमर्थ नाथः-तुम दोनो किसलिये स्नान करते हो । ३ गोपाः गाः पांति-ग्वाले गायोकी रक्षा करते है। वयं सज्जनं स्तुमः-हम सज्जनोकी स्तुति करते है। यूयं अनर्थ बूथ-तुमलोग अनर्थ कहते हो । नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य वनाओ- हंति, हतः, वक्षि, भांति, पांति, स्वाति, वेत्ति, वित्तः, विदंति, - १-जिसप्रकार भ्वादि और तुदादिगणीय धातुओक और प्रत्ययोके वीचमें 'अ' आता था [तुद्+अ+ति आदि ] उसप्रकार अदादिगणकी पातुओंके वीचमे नहीं आता पर प्रत्यय वेही [ति, तः, अति आदि] आते है। जैसे-हन्+ति = हन्ति । २-प्रथम, उत्तम, मध्यम पुरुषके एकवचन' ति, मि, सि' को तथा और भी प्रत्यय जिनका कि [प] इत् गया है उनको पित् कहते हैं और इनसे भिन्न जो त अति, . १४२ सनातनजैनग्रंथमालाया- स्तौति, नंति, वक्ति, वक्तः, ब्रवीति, ब्रूतः, ब्रुवंति, ब्रवीमि, था, ब्रूवा, बेमा, ब्रवीषि, ब्रूथ, अस्ति, स्त: एति । संस्कृत बनाओ-- धीवर लोग मछलियोंको [मत्स्यान मारते हैं। हम क्या कहें ?। थः, थ, व , म जिनका प् इत् नहीं गया है और इ भी इत् नहीं है तो भी वे डित कहेजाते हैं । जिन डित् और कित् [क् जिनका इत् है] प्रत्ययों की आदिमें वर्गके पाचवे (ज, म, ड्, ण, न) अक्षरको छोडकर कोई भी क से भ तकका या श, ष, स व्यंजन है ऐसे प्रत्ययके पर होनेसे हन् , मन् , यम् , रम् , नम् , गम् , वन और तनादि गणकी वातुओंके अतके न और म्' का लोप होजाता है। जैसे-हन्-तम्= हत.। ३-शब्दके चवर्गको कवर्ग हो जाता है यदि ञ, म, ड, ण, न, य, व, र, ल,से भिन्न कोई व्यंजन वादमे हों । जैसे वच्-सि-वक्-सि हुआ । कवर्गके वादमे यदि स होगा तो ष होजायगा जैसे-वक् सि वक्-षि-वक्षि (क् और ष् मिलकर क्ष लिखा जाता है)। ४-पित् प्रत्यय परे होनेसे धातुके आदिके 'ई' को ए, और 'उ' को 'ओ' होजाता है। जैसे-विद्-ति-वेद-ति । वर्गके दूसरे, तीसरे और चौथे अक्षरको उसी वर्गका पहिला अक्षर होजाता है यदि उसके बादमें किसी वर्गका पहिला वा दूसरा अक्षर होगा। जैसे-वेद्-ति-वेत्ति, विद्-तः वित्त । ५-उकारात अदादिगणकी पातुओके अतके 'उ' को 'औ' होजाता है यदि ति, सि, मि, और त् या विसर्ग बादमे हो। जैसे स्तु-ति-स्तौति, स्तौषि, स्तौमि । ६-'अड्' प्रत्ययसे भिन्न कित् और 'डित् प्रत्यय बादमे होनेसे 'गम् , हन् , जन्, खन्, घस्' धातुओके 'अ' का लोप होजाता है। हन् वातुके ह को 'घ' आदेश होता है यदि 'न्' बादमै हो। जैसे-हन्-अन्ति-न् अन्ति-घन्+अन्तिनंति । ७-इसी पृष्ठकी न ३ की टिप्पणी देखो। ४-धातुके अतके 'इ, ई' को इय् , 'उ, ॐ' को 'उन्' होजाता है यदि पित्से भिन्न स्वरादि प्रत्यय बादमे हो । जैसे-बे+ अति-अव्+अति-ब्रुवति । ९-ब्रू धातुसे परे यदि ति, सि, मि, त् और (विसर्ग) बादमे होगे तो बीचमे 'ई' आवेगा। जैसे-बू+ति=बू ई ति ॥ धातुके उ, छ को 'ओ' और इ, ई को 'ए' होता है पित् प्रत्यय परे होनेसे । जैसे-बू+ई+तिबो- ई+ति, हुआ । बादको १५ पृष्ठकी तीसरी टिप्पणीसे 'अव' हुआ तो ब्-अव-ई- ति-अवीति हुआ। इसीतरह ब्रवीषि, ब्रवीमि । १०-कित् डित् प्रत्यय परे होनेसे अस् धातुके 'अ' का लोप होता है । जैसे-अस्ता-स्त ।
संस्कृतप्रवेशिनी। १४३ वह गुरुकी स्तुति करता है। जो सब पदार्थोंको जानता है वह सर्वज्ञ कहलाता है। लोग गंगामें नहाते हैं। धात्वर्थ । हनौ-मारना। अन-जीना। प्टुञ्-स्तुति करना। पा-रक्षा करना । अस होना। भा-शोभित होना। ला-लेना। इण्-[३] जाना। विद-जानना। प्णा-स्ना] नहाना । ब्रूजौ-चोलना । रा-देना। आत्मनेपदी धातु । १ क एवं आस्ते-कौन इसतरह वैठता है। अहं दिवसे न शये-मैं दिनमे नहीं सोता हूं। त्वं किं अधीषे [अधि-वे-तुम क्या पढते हो। २ स्त्रियौ व्याकरणं अधीयाते-दो स्त्रिया व्याकरण पढती हैं। छात्रौ परस्परं वाते-दो विद्यार्थी परस्परमे बात चीत करते है । आवां न्यायं अधीवहे-हम दो जने न्याय पढते हैं। युवां ईश्वरं स्तुवाथे-तुम दोजने ईश्वरकी स्तुति करते हो। ३ अलसाः दिवसे शेरते-आलसी दिनम सोते हैं। वयं धर्मशस्त्रं अधीमहे-हम धर्मशास्त्र पढते हैं। यूयं परस्परं किं ब्रूध्वे तुमलोग परस्पर क्या बोलते हो । १-आत्मनेपदके प्रथम पुरुपमे 'ते, आते, अते' मध्यम पुरुषमे 'से, आथे, ध्ये' और उत्तमपुरुषमे 'ए, वहे, महें' प्रत्यय लगते हैं । २-शीट् (सोना) धातुमें दीर्घ 'ई' है तो भी उसकी 'ई' को 'ए' होता है । जैसे-शी-ए-गेरए(१५ पृष्ठ की तीसरी टिप्पणीसे अय्) शये । ३-इइ (पढना) धातुका प्रयोग 'अधि' उपसर्ग पहिले लगाकर ही करते है केवलका नहीं । जैसे-अधिxइ-ते = अधीते । ४-पृष्ठ ४२ की ८ वी टिप्पणी देखो । ५-केवल शी धातुसे प्रथम पुरुषके वहुवचनोंमें 'रते' प्रत्यय आता है।
१४४ सनातनजैनग्रंथमालायां- नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- आसाते, शेषे, अधीये, आस्से, ब्रूते, स्तुते, आसते, शयाते, अधीते, स्तुवते, शेरते। धात्वर्थ। आसै-बैठना (रहना) शीङ्-सोना (नींद लेना) हिंदी वनाओ- नास्ति संदेहो महाप्रभावोऽयं मुनिः। महदपि परदुःख शीतलं सम्यगांडः। क्षणे क्षणे यन्नवता [नवीनपना] मुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः। साऽधिशेते कथं देवी ज्वलंतीमधुना चितरं । स्तु- वेऽहं तं प्रथमं जिनेंद्र। इड्-पढना। परिशिष्ट (ख)। दिवादिगण धातुओंका वर्तमान कालमें प्रयोग। परस्मैपदी धातु । १ हविः शरीरं पुण्यति-घी शरीरको पुष्ट करता है। अहं सततं दीव्यामि–मै हमेशा खेलता है। त्वं अल्पेन तुष्यसि-तुम थोडेम सतुष्ट होजाते हो। २ स्त्रियौ परस्परं श्लिष्यत'-दो स्त्री परस्पर आलिंगन करती हैं । आवां तं निहावः-हम दोनों उसमे प्रीति करते हैं । युवां किं कुप्यथ:-तुम क्यों नाराज हो । १-ब्रून् धातुके लट्के प्रथमपुरुपके एकवचनमे आह, द्विवचनमे आहेतु , बहु- वचनमे आहु , मध्यमपुरुषके एकवचनमें आत्थ , और द्विवचनमे आहथु होता है। २-तुद आदि धातुओंके रुपोंके समान इस गणकी धातुओंके भी रूप चलते हैं केवल इतना ही भेद है कि उन धातुओके ओर प्रत्ययोंके वीचमे 'अ' आता है और इसके वीचमें 'य'। जैसे-पुष्प+य+ति पुष्प्यति। ३-दिवु, षिवु, वातु । ओंके 'इ' को 'ई' होजाता है।
संस्कृतप्रवेशिनी। ३ स्त्रियः वस्त्राणि सीव्यंति-स्त्रिया कपडे सींदी हैं। वयं तं दृष्ट्वा नश्यामः-हम उसको देखकर छिप जाते हैं । यूयं नघां लुख्यथ-तुम लोग नदीमे लोटते हो। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- पुष्यामः, शिलप्यथः, स्निह्यति, कुप्यसि, सीव्यसि, नश्यति, लुव्यति, हुह्यसि, मुह्यति, माद्यति, क्षाम्यति, शाम्यति, थाम्यति । धात्वर्थ । दिवु-खेलना, जीतनेकी षिवु-सीवना । क्षिप-प्रेरणा करना। इच्छा करना, चमकना। पुष्प-खिलना। पुषौ-पुष्ट करना । शुष-सूखना। तुषौ-सतुष्ट होना । शिलषौ-आलिंगन करना । णशू-छिपना, नष्ट होना । द्रुह-द्रोह करना । मुह-मुग्ध होना । ष्णिह स्निह]-प्रीतिकरना। लुठ-लोटना । कुप-क्रोध करना। मदी-हर्पित होना, शमु-शात होना । श्रमु-थकना । मत्त होना। भ्रमु-चलना। क्षमु-क्षमा करना। क्लमु-दुखी होना। दमु-दमन करना । नृतु-नाचना । संस्कृत वनाओ- पानी सूखता है ! वेले खिलती हैं। कामी पुरुष सुंदर स्त्रीको देखकर मुग्ध होजाते हैं । दुष्ट लोग उपकारीको द्रोह करते हैं । देव नंदनवनमें क्रीडा करते हैं। आत्मनेपदी धातु। १ मृतः को वा न जायते-मरा हुआ कौन आदमी पैदा नहीं होता। १-मदी, शमु,श्रमु, भ्रमु,क्षमु, दमु, क्रमु क्लम इन धातुओके 'अ' को 'आ' हो- नाता है 'य' वादमें होनेसे । जैसे-मयति = माद्यति, शाम्यति, श्राम्यति, क्षा- म्यति, क्लाम्यति । २-पृष्ठ ५९ की १७ टिप्पणी देखो । ३-आत्मनेपदमे भी 'तुदते' आदिके समान लड् लट् लोट् और विधि लिड्में रूप समझना और बीचमें 'य' लाना २-जनीड् (उत्पन्न होना) धातुके 'न' को 'भा' होजाता है लट्, लड्, लोट, विधि- १८ - १४६ सनातनजनग्रंथमालाया- . - अहं संसारे क्लिश्ये-मै संसारमे दुःख पाता हूं । त्वं तेजसा दीप्यसे-तुम तेजसे दीप्त होते हो। २ छात्रौ तत्र खिद्यते-दो विद्यार्थी वहा खेदको प्राप्त होते हैं। आवां तेन सह युध्यावहे-हम दोनो उसके साथ युद्ध करते हैं। युवां किं न्यायं बुध्येथे—क्या तुम दोनो न्याय जानते हो? ३ पंडिता एवं मन्यते-पंडितलोग ऐसा मानते हैं । वयं न दूयामहे-हम खिन्न नहीं होते है। पक्षिणो यूयं वियति उई-डीयध्वे-पक्षिगण ! तुम आकाशमें उढते हो। नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य बनाओ- दूये, उड्डीयते, खिद्ये, मन्ये, युज्यते, जाये, क्लिश्यसे, युध्यते । हिंदी वनाओ- भृत्ये कृतागसि [कृतापराधे] भवत्युचितःप्रभूणां पादप्रहार इति सुंदरि ! नात्र दूये। परिणामसुखं शरीरिणां जिनवाक्यं न विहाय विद्यते । तावजल्पति, सर्पति, तिष्ठति, माधति, विलासति, विभाति। यावन्नरो न जठरं देहभृतां जायते रिक्तं ॥ गायति, नृत्यति, वल्गति, धावति पुरतो नृपस्य वेगेन । कर्षति, वपति, लुनीते [काटता है), दीव्यति, सीव्यति, पुनाति [साफ करता है] वपते च। विदधाति किं न कृत्यं जठरानलशांतये तनुमान् ॥ धात्वर्थ । जनीड्-पैदा होना। दीपी-दीप्त होना। क्लिश-दुख पाना । विदौड्—होना । खिदौर-खिन्न होना । युधौड्-प्रहार करना । बुधौड्-जानना। मनौद्-जानना। युजौ-सभव होना। दूडौ-दुःखी होना। डीडो-उडना। लिड् इन चार लकारोंमे । १-पृष्ठ १४८ की ५ नं० की टिप्पणी देखो संस्कृतप्रवेशिनी। १४७ परिशिष्ट (ग)। स्वादिगणकी धातुओंका वर्तमानकालमें प्रयोग । १ जनः धर्मेण सुखं आप्नोति-मनुष्य धर्मसे सुख पाता है। अहं एवं कर्तुं शक्नोमि-मैं ऐसा करनेकेलिये समर्थ हूं। त्वं धर्मशास्त्रं श्रेणोपि-तुम धर्मशास्त्र सुनते हो । २ पापपुण्ये प्राणिनः दुनुतः-पाप पुण्य जीवोको सताते हैं । आवां परकार्य साध्नुवः-हम दोनो मरेके कामको सिद्ध करते है। युवां पुष्पाणि चिनुथः-तुम दोजने फूल चुनते हो । ३ नार्यः नरान् वृण्वंति–निया पुरुपोको वरती [पंसद करती हैं। वयं वृक्षान् धुनुमः हम पेडोंको कॅपाते है । यूयं सत्फलं आ'नुथ--तुम रोग अच्छा फल पाते हो। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- शृण्वंति, शक्नोति. दुनोमि, आप्नुवंति, चिनुवः, धुनोति, शक्नुवंति, चिनुते, वृण्वते, चिन्थे । - धात्वर्थ । आप्ल-पाना । शक्ल-समय होना । शु-सुनना। दृदु-दुखी होना। साध-सिद्ध करना। चिन्-इकट्ठा करना। वृञ्-वरना। धुञ्-कपाना। नोट-जिस गणमें केवल आत्मनेपदी धातु नहीं है उभयपदी और परस्मैपदी है उसमे जब उभयपदियोके आत्मनेपदमे रूप चलाने हों तो टिप्पणी लिखी रीतिसे बनाकर चलाना । १-खादिगणकी यातुओंसे 'लट्, विधि लिट् , लट. लोट् लकारके [ति, तः, भति, मि, व , म , सि, थ , थ. ते, एते, अतं, ए, वह, महे, से, एते, ध्वे आदि प्रत्यय परे रहते यीचमे नु दिनु] आता है। -श्रुसुिनना] धातुको लट्, लिड्, उड् , लोट्में श समझना । ३-खरात धातुओंके बाद यदि 'नु' होगा और उसके सनातननग्रंथमालायां- परिशिष्ट (घ) रुधादिगणकी धातुओंका वर्तमान काल (लट् ) में प्रयोग। १ परशुः काष्ठं मिनत्ति-कुल्हाडी काठको काटती है। अहं पापं छिननि-मैं पापको छेदता हूं। त्वं महीं भुनक्षितुम पृथ्वीका भोग करते हो । २ देवी नदीजलं रिक्तः-दो देव नदीके जलको खलाते हैं। आवां व्यजनं भैज्व:-हम दो जने पंखेको तोडते हैं। युवां गोधूमान् पिष्ठः--तुम दो जने गेहुओको पीसते हो । ३ मुनयः पुण्यपापानि भिंदंति-मुनिगण पुण्य और पापोंको भेदते है। वयं सेवकं अनु-युज्म:-हम लोग सेवकको प्रेरणा करते हैं। यूयं तान् वि-शिष्ठ-तुम लोग उनको शामित करते हो। बाद कोई कित् या डित् खर होगा तो 'तु' क 'उ' को व् होगा। जैसे-तुxअ- ति = वृण्वंति। परतु व्यंजनात पातुओंके वाटके 'नु' को कित् या डित् स्वर वादमें होनेमे 'उ' होगा। जैसे-आप्नु अति = आप्नुवंति । १-रुधादि गणकी वातुओंके अतके अक्षरसे पहिले श्नम् [ न ] वीचमें आता है यदि लट्, लड्, विधि लिड्, लोट्र' के ति, त आदि प्रत्यय वादमें हों। जैसे-भिदि- ोंमे 'ति', लाये तो इसमें अतका अक्षर जो 'दु' है [इों नहीं क्योंकि इत् है ] उससे पहिले 'न' आया जिससे कि मि न दूति' आ। फिर १४२ पृष्ठकी चौथी टिप्पणीसे 'द्' का त् हुआ तो भिनत्ति हुआ। २-पृष्ठ १४२ की ३ री टिप्पणी देखो ३--'ति, मि, सि' को छोडकर शेष जितने आत्मनेपद परस्मैपदीके प्रत्यय हैं वे डिन कहलाते हैं। सो उनके तथा 'कित् प्रत्ययोके परे होनेसे नम् [न ] के अकारका लोप हो जाता है । जैसे मिरनxदरते = मिन्तते भित्ते। रिxनच त -रिक्त ४-'न्' कोवादमें जिस वर्गका अक्षर होता है उसी वर्गका पाच- वा अक्षर हो जाता है। रिन् करत रिक्त , भन्ज्वः भव । ५-धकार, वा टवर्गके परवर्ती या पूर्ववर्ती सकार, और तवर्गक्रमसे षकार टवर्ग हो जाते हैं । पिष् + 'य-पिंह उडीयते उड़ीयते ।
संस्कृतप्रवेशिनी। १४९. नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ-~- मिन्त्तः, छिनत्ति, भुनक्ति, रिणच्मि, भनज्मि, युनक्ति, विशिन- ष्टि, पिपति। छिदिओ-[इ -इत् है] भिदिनों-दो टूक करना। रिचिों-खालीकरना। विदीर्ण करना। भुजो-रक्षा करना । पिप्ल-पीसना। उभंजो-[ उ, ओ, इत् है ] युजिों-मिलाना। शिल-शोभित करना। मर्दन करना। परिशिष्ट (ङ)। तनादिगणकी धातुओंका वर्तमान कालमें प्रयोग १ आचार्यः व्याकरणं तनोति-आचार्य व्याकरणको विस्तारते हैं। अहं ग्रन्थरचनां करोमि मैं ग्रथ रचना करता हूं। त्वं कटं करोपि-तुम चटाई वुनते हो। २ छात्रो विवादं तनुतः-दो विद्यार्थी विवाद करते है। आवां स्वकार्यहानि न कुर्वः-हम दोनो अपनी कार्यहानि नहीं करते है। युवां किमेवं कुरुथा-तुम दोनो क्या ऐसा करते हो। १ तनादि गणकी धातुओके और लट् लड् विधिलिड् लोट् लकारोके ति, तः, अति मादि परस्मैपद प्रत्ययोंके तथा ते, आते, अते, ए, वहे, महे, से, आथे, ध्वे आदि आत्मनेपद प्रत्ययोंके वीचमे 'उ' आता है। जैसे तन्+उ+ते तनुते । २-पृष्ठ १४२ की १ नं. की दूसरी टिप्पणी देखो। ३-'कृ' धातुकी 'ऋ' को 'अर' होजाता है पित् प्रत्यय वादमे रहनेसे परतु टित् प्रत्यय वादमे रहनेसे 'उर्' होजाता है। जैसे कृxउति=कर्xixति-करोति, कृ+उ+थ: कु उxय कुरुथ । ४-जिन प्रत्ययोकी आदिमें 'व' अथवा 'म' है उन प्रत्ययोके बादमें होनेसे वीचके विकरणसंबंधी 'उ' का इच्छाधीन लोप होता है। परंतु कृ धातुके वीचके 'उ' का सर्वथा लोप होता है। जैसे-तx+व तनुव., नब Ira+r=(इसी पृष्ठकी ३ नं. की टिप्पणी देखो)कुर-उव-कुर्वः।
१५० सनातनजैनग्रंथमालायां- - - - ३ साधवः सत्तपः तन्वंति–साधु लोग श्रेष्ठ तप करते हैं। वयं एवमेव सदा कुर्मः-हम सदा ऐसा ही करते हैं। यूयं न्याय्यं कुरुथ-तुम लोग न्याग्य बात करते हो । नीचे लिखे शब्दोसे सस्कृत वनाओ- तनोमि, करोति, तनोषि, कुरुतः, कुर्वति, तनुते, तन्वते, मनुते, कुर्वीते, तन्वे, कुरुषे, तन्वहे, तनुवहे, क्षिणोति। धात्वर्थ तनु-विस्तार करना । डुकृा-करना । मनुइ-जानना। क्षिणुञ्-हिसा करना। परिशिष्ट (च) यादि गणकी धातुओंका वर्तमानकाल [ लट् ] में प्रयोग १ वणिरु धान्यं क्रीणाति-बनिया धान्योका क्रय विक्रय करता है। अहं छात्रं प्रीणामि-मै विद्यार्थीको सतुष्ट करता हू । त्वं कि सर्व जोनासि-क्या तुम सब जानते हो। २ कृषीवलौ धान्यानि पुनीतः-दो किसान धान्योको साफ करते हैं । आवां पुस्तकानि गृह्णीवः-हम दो जने पुस्तकें लेते है। युवां वृक्षान् लनीथ:--तम दो जने पेडोको काटते हो। चौराः धनं मुष्णंति-चौर धनको चुराते है । १ क्रयादिगणकी धातुओके और लट्, विधि लिङ्, लड्, लोट् लकारके ति, ते आदि प्रत्ययोके वीचमें ना [ना ] आती है। जैसे--क्रीxनाति = क्रीणाति आदि। २- ज्ञा [जानना] धातुको लट्, विधि लिङ्, लड्, लोट्के प्रत्यय परे होनेसे 'जा' आदेश हो जाता है । ३-व्यंजनादि त , ते आदि क्त् िया डित् प्रत्यय परे होनेसे ना स्ना] के 'आकारको'ई' होजाता है । जैसे कि-क्री+नाxत = क्रीणीतः, जानीव , कुनीते । ४--पून और लञ् धातुके 'ऊ' को ह्रस्व 'उ' तथा बन्ध, और ग्रन्थ के 'न' का लोप हो जाता है लट्, विधि लिट्,लङ्, लोट् के प्रत्यय वादमें होनेसे । ५ जिस- की आदिमें स्वर है ऐसे कितू या टित् [पृ. १४१ टि.२ देखो] प्रत्यय परे होनेसे 'ना' के 'आ' का लोप होजाता है। जैसे--क्रीxना+अति कीर्णति, क्रीणा-ए-क्रीणे ।
१५१ - संस्कृतप्रवेशिनी। वयं चौरान बध्नीम:-हम लोग चोरोको बाधते है। यूयं शास्त्राणि प्रथ्नीथ-तुम लोग शास्त्रोंको रचते हो। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- क्रीणीते, जानंति, पुनीवहे, गृह्णीयः, प्रीति, गृहाति, गृहंति गृह्णते, क्रीणे, लुनते। धात्वर्थ डुक्री-लेन देन करना। प्री-तृप्त करना । शा-जानना। पूज-साफ करना। गृह-ग्रहणकरना। मुप-चुराना। ग्रंथ-पुस्तक रचना । लूझ-छेदना। वंधो-बाधना । परिशिष्ट (छ)। चुरादिगणकी धातुओंका वर्तमानकालमें प्रयोग । १ स्तेनः धनं चोरयति-चोर धन चुराता है। अहं तं चितयामि-मे उसकी याद करता हूं। त्वं जीवान् पीडयसि-तुम जीवोंको पीडा देते हो । २ वाली मोदको भक्षयतः-दो लडके दो लड्डू खाते है । आवां तान् छादयावः-हम दो जने उनको ढकते है। युवां चोरं ताडयथः–तम दो जने चोरको ताडना देते हो। ३ नार्यः शरीराणि मंडयंति-स्त्रिया शरीरोको भूषित करती है। १ चुर आदि धातुओसे सब कालके रुप चलाते समय 'णि' आता है। 'ण' इत् होनेसे धातुओके अत अक्षरसे पहिले 'अ' को 'आ' 'ई' को 'ए' और 'उ' को 'ओ' हो जाता है। जैसे--छद्--इ-छाद्+इ, चुरxइ = चोर् इ । उसके बाद णिके, 'ड' को अय् हो जाता है। जैसे-चो+इ = चो“अय् = चोरय् । इस तरहका रूप होजानेके वाद ति आदि प्रत्यय आनेसे स्वादि गणकी धातुओके समान रूप चलते हैं। ये धातु सब उभयपदी हैं । २-प्रथम भागके १६२ पृ. की २ री टिप्पणी देखो। ।
१५२ सनातनजैनग्रंथमालायां- वयं ईश्वरं ईडयामः-हम ईश्वरकी स्तुति करते हैं। यूयं धनं अर्जयथ-तुमलोग धन कमाते हो । नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य वनाओ- चेतयते, चोरयसे, पीडयध्वे, ताडये, छादयावहे, ईडये, अर्ज- यामि, मंडये। धात्वर्थ । चुरचुराना। चिति-चिता करना, पीड-पीडा देना। भक्ष-खाना। याद करना। छद-ढकना। तड-मारना। मडि-भूपित करना। ईड-स्तुति करना। भूष-भूषित करना। अर्ज कमाना। सूच-सूचना देना। परिशिष्ट (ज) जुहोत्यादिगणकी धातुओंका वर्तमान (ल) कालमें प्रयोग। १ पुरोधाः अग्नौ हविः जुहोति-पुरोहित आगमे घीकी आहुति देता है। १-हादिगणकी धातुओके लट्, लड्, विधि लिड्, लोट्' इन लकारोके और अन्य समस्त गणकी धातुओके लिट् लकारके रूप चलाते समय दो रूप होजाते है । परतु जिन धातुओकी आदिमे स्वर है उनके उस स्वरको द्वित्व न होकर वचे हुये अक्षरोको द्वित्व होता है । धाके दोरुप होनेपर पहिले रूपके खरको ह्रख हो- माता है । जैसे-हु धातुसे लटके रूप चलानेकेलिये 'ति' प्रत्यय लाये तो धातु 'हु' के दो रूप 'हु+हुति' होगये (यहा धातुके पहिले रूपमे हख 'उ' है इसलिये हस्वका ह्रस्व ही रहा । दीर्घका ह्रस्व जैसे-दा धातुसे दा+दा+ति-द+दा+ति- ददाति) [ख] धातके जो दोरूप होते है उनमे पहिले रूपके वर्गके चौथे अक्षरको उसी वर्गका तीसरा अक्षर, वर्गके दूसरे अक्षर को उसी वर्गका पहिला अक्षर कवर्गको चवर्ग और हकारको जकार होजाता है । जैसे-हुरहु+ति इस जगह पहिला रूप भो 'हु' है उसको-'जु' होगया तो जु हु+ति हुआ । १४२ पृष्ठकी नंवरकी टिप्पणी '' को 'ओ' होगया तो जुहोति हुआ। ।
संस्कृतप्रवेशिनी। महं तस्मै पुस्तकानि ददामि-मैं उसे पुस्तकें देता हूं। त्वं अनाथान् दधासि-तुम अनाथोंको पोषते हो। २ छात्रौ चौरेभ्यः विभीत:-दो विद्यार्थी चोरोंसे डरते है । आवां कुकृत्यं जहावा हम दोजने कुकर्म छोडते हैं। युवां हविः जुहुथ:-तुम दोजने घीका हवन करते हो। ३ छात्रा: अष्टदन्यं जुम्हेति-विद्यार्थी अष्टद्रव्यका हवन करते हैं । वयं धनं देनः-हम धन देते हैं । यूयं दरिद्रान् त्थ-तुमलोग दरिद्रोंकी रक्षा करते हो । बिमेति, बिभ्यति, विभेमि, विभीवः, विभीमः, विभेषि, विभी यः, बिमीथ, दत्तः, ददति, दध्वः, दध्मः, दधासि, धत्थः, दधाति, 'घत्ता, दधति । धात्वर्थ । हु-हवन करना । डदा-देना। डधाञ्-धारना, पोषना। विभी-डरना। सूचना--परिशिष्टमे दिये गये गणोकी धातुओंके लड्, लोट्,विधिलिड् और -लट्र आदि लकारोंक तथा त आदि प्रत्ययोंके रूप पृथक् २ नहीं बताये गये हैं सो उनके रूप भ्वादि और तुदादि गणकी धाओंके लडादिके रूपोंकी तथा जिसगण की वह धातु हो उस गणकी टिप्पणीको देख कर चलाना । १-पृष्ठ १५२ की १ न० की टिप्पणी देखो । २--इस गणमें प्रथमपुरुषके बहु- वचनमें 'मंति' प्रत्यय न आकर 'अति' आता है । संधिक लिये ३३ पृष्ठ नं. ३ की टिप्पणी देखो । ३-जुहोत्यादि गणकी आकारात धातुओंके दूसरे रूपके 'आ' का लोप हो जाता है विपि लिइ, लट् लोट् और लड् के कित् वा डित् प्रत्यय पर होनेसे। जैसे-दा-दाम-द दम । ४ डधानधातुके दो रूप होनेसे जहापर कि दूसरे रूपके 'आ' का लोप होगया हो वहा पहिले रूपके 'ध' को जो १५२ पृ. की नं० १ (ख) की टि. से 'द' होगया था उसको फिर ध हो जाता है य, र, स, व, न मरण न से भिन्न व्यंजन वादमें रहनेसे ।
सनातननग्रंथमालायां- साहित्यपरिचय हिंदी बनाओ- रुणद्धि पापं, कुरुते विशुद्धि ज्ञानंतदिष्टं सकलार्थविद्भिः ॥१॥ क्रोधं धुनीते, विदधाति शांति, तनोति मैत्री वि-हिनस्ति मोहं। पुनाति चित्तं, मदनं लुनीते, येनेह वोधं तमुशंति विदंति] संत ॥२॥ तमो धुनीते, कुरुते प्रकाश, शमं विधत्ते, विनि-हंति कोपं । तनोति धर्म वि-धुनोति पापं ज्ञानं न किं किं कुरुते नराणां ॥३॥ क्रीणाति, खनति, याचति, गणयति, रचयति विचित्रशिल्पानि । जठरपिठरी न शकः पूरयितुं गतशुभस्तदपि ॥ ४॥ सद्यः पातालमेति, प्रविशति जलधि गाहते देवगर्भ भुक्त भोगान् नराणाममरयुवतिमिः सं मं याचने च । वांछत्यैश्वर्यमार्य रिपुसमितिहतेः कीर्तिकांतां ततश्च धृत्वा त्व जीव ! चिचं स्थिरमतिचपलं स्वस्य कृत्यं कुरुष्व ॥५॥ पापं वर्धयते, चिनोति कुमति, कीर्त्यगनां नश्यति, धर्म ध्वंसयति, तनोति विपदं, संपत्तिमुन्मर्दति । नीति हन्ति विनीतिमत्र कुरुते, कोपं धुनीते समं किं वा दुर्जनसंगतिर्न कुरुते लोकद्वयध्वंसिनी ॥६॥ धर्ममत्ति तनुते गुरुपापं या निरस्यति गुणं कुरुतेऽन्यं (दोषं)। सौख्यमस्यति ददाति च दुःखं तां धिगस्तु गणिकां बहुदोषां ॥७॥ १-समस्त गणकी समस्त धातुओसे णि प्रत्यय आता है और उसके रूप चु- रादि गणकी धातुओंके समान होते हैं परंतु अर्थमें भेद होता है। चुरादि गणमें तो जो धातुका अर्थ है वही रहता है और अन्य गणकी धातुओंका 'प्रेरणा' अर्थ वढ जाता है। जैसे कि- देवदत्तो वदति देवदत्त वोलता है । देवदत्तो वद्र स्वादअतिवादयति-देवदत्त बुलवाता है अर्थात् स्वयं नहीं बोलता दूसरे को बोलनेकी प्रेरणा करता है। इसीतरह 'दुर्जनसगति पापं वर्धयते' इससे यह अभिप्राय निकलता है कि-दुर्जनकी सगति पापको वढने में प्रेरणा करती है। .
संस्कृतप्रवेशिनी। १५५ हंति, ताडयति, भाषते वचः कर्कशं, रटति, खिद्यते, व्यथां। संतनोति, विदधाति रोदनं, यूततोऽथ कुरुते न किं नरः ॥ ८॥ रुभ्यतेऽन्यकितवैर्निपेध्यते वध्यते वचनमुच्यते कटु । नोद्यतेऽत्र परि-भूयते नरो हन्यते च कितवो विनिद्यते ॥९॥ एकदा धर्मकाले आतपक्लांत एकोऽजशिशुः पिपासापीडितो भूत्वा जलं पातुमदूरवर्तिनीमल्पसरितमैत् । तत्रोन्नतप्रदेशे जलं पिवंतं वृकमीक्षित्वा निम्नप्रदेशस्थं जलमादातुमारभत सः। वृकस्तु दूरात् तं दृष्ट्वा “केनापि निमित्तेन कलहमुत्पाद्याहमेनं व्यापादयामि भक्षयामि च" इति मनस्यकरोत् । ततस्तममिगत्यावोचत्-"आ. पाप! कथं मां न गणयसि ! यदेवं जलमाविलयसि ( मैला करते हो) किनिमित्तोऽयमनुचितारंभः । इति तूर्ण नि-वेदय, नो चेत् वध्यो भ- वसि" भीतः सोऽजशिशुः सविनयमकथयत् “भो वृकश्रेष्ठ ! यत्र भवान (पूज्य ) ब्रूते तत्कथं संभवेत्, भवतो यज्जलं वहति तदहं पिवामि, एवं स्थिते मया कलुपितं जलं प्रतिकूलं त्वां कथं यायात्"। वृकोऽवोचत "अस्तु नामैतत् । त्वमधमोऽसि । षण्मासात् प्राक् मां त्वमशप इत्यहमशृणवम्" सोऽजशिशुरब्रवीत् 'हा कष्टं ! कथमस्य संभवः ? यद् मां जातस्य मासत्रयमपि न पूर्ण सोऽहं षण्मासात्माक् भवंतमशपमिति कथं संभवेत्” वृकोऽत्रापि निरुत्तरोऽभवत् । ततो महताऽऽवेशेन नेत्रे विस्फार्य दंतैर्दतान् विघट्टयन् पादाघातैर्भुवं कं- पयन्निव तमुपसंगम्य तारस्वरेणावोचत्-"भो दास्याः पुत्र ! यदि त्वं नाशपस्तर्हि शप्त्रा तव पित्रा भाव्य । नो विशेषः" एवमुक्त्वा सतं टीनमहन् । १-कर्मवाच्य और भाववाच्यमें समस्तगणोकी धातुओंके एकसे ही रूप होते हैं । इसलिये ३५ पृष्ठके वाच्य परिवर्तनकी टिप्पणी देखो। २ ह्रस्व अकारके वाद यदि 'य' अथवा 'व्' होगा और उस य् अथवा व के वाद कोई स्वर् होगा तो य और व् का इच्छाधीन लोप हो जायगा । जैसे-धर्मकाले+आतप-धर्मकाल आतप, धर्म- ? कालयातप।
१५६ सनातननग्रंथमालायां- षष्ठ अध्याय। संपूर्णगणकी धातुओंका परोक्षभूत (लिट् ) कालमें प्रयोग प्रथम पाठ। , परस्मैपदी धातु। १ छात्रः व्याकरणं पपाठ,-विद्यार्थाने व्याकरण पढ लिया । अहं मत्ता बहु जगंद, जगाद-मै मत्त हुई बहुत बोली। त्वं ग्रामं ववजिथ-तुम गावको गये । २ क्षत्रियौ नगरं ररक्षतुः-दो क्षत्रियोने गावकी रक्षाकी । आवां स्वप्ने जगमिव-हम दोनों स्वप्नमें चले। १-लिट् लकारके परस्मैपदमें रूप चलानेके लिये प्रथमपुरुष मेंणश् (अ) अतु,' उ उत्तमपुरुष में णश् (अ) व, म, मध्यमपु में थ, अथुः अश् (अ) प्रत्यय आते है। जैसे 'पठ' धातुसे णश् [प्र पु.] आया तो प अ हुआ। १५२ पृ. १ नंवरकी टिप्पणीसे दो रूप हुये तो पट्-पट-अ हुआ । (ख)धातुके जो दो रूप होते हैं उनमें पहिले रूपके आदिके स्वरसहित एक अक्षरको छोडकर वाकीके सब अ- क्षरोका लोप होजाता है। जैसे-'पट्-पट-अ' यहा पर पहिला रूप जो पठ् है उसमें पहिलेका स्वर सहित एक अक्षर 'प' वच रहा और वाकीका जो '' था उ- सका लोप होगया तो प-प-अ रहा । अव-जित् ओर णित् प्रत्ययबादमें रहनेसे शब्दके अत अक्षरसे पहिले अक्षरमेंके 'अ' को 'आ' हो जाता है । इसलिये 'प+ पट्रअ' यहा पर णित् प्रत्यय णश् का 'अ' वादमे रहनेसे पठ्मेंके 'प' के 'अ'को 'आ' हो गया तो पपाठ हुआ। इसीतरह जुहोत्यादिगणके और यहाके नियम देख- कर अन्य धातुओंके रूप चलाना। २-उत्तमपुरुषके णश् प्रत्ययके वादमें रहनेसे धातुके अत अक्षरके पहिले 'अ' को आ इच्छाधीन होता है-अर्थात् होता भी है और नहीं भी होता । ३-धातुसे यदि लिट् लुट्, लूट, लङ् और लुड् लकारका ह और य व्यंजनसे मिन्न व्यंजनादि प्रत्यय बादमे होगा तो वीचमें इ (ईट्) आवेगा जैसे बज्+थ-व+व+य बजिथ । ४-पृष्ठ १४२ की ६ नंबरकी टिप्पणी देखो।
- संस्कृतप्रवेशिनी। १५७ युवां ओदनं चखादथुः-तुम दोनोने भात खाया । ३ शिष्याः गुरुं पप्रच्छु:-शिष्योंने गुरुको पूछा। वयं मत्ताः जगदिम-हम लोग मत्त हुये वोले । यूयं धनं जंह-तुम लोगोने धनको हरण किया । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- जहार, चकर्त, विदेश, आनर्च, आर्ट, रिरेष, जग्मुः, पैस्पर्श, तुतोदिव, विविश । उवाच ऊचतु , ऊचुः, जधान, जन्नतुः, जघ्नु, पपौ, पपतुः, पपुः, विवेद, विविदतः ततान, तेनतुः, तेनुः, चिकाय, चिक्रियतुः, चिक्रियुः। १-जिस धातुमे 'ऋ' है उसके दो रुप होनेपर पहिले रुपकी ऋको 'अ' हो जाता है । जैसे-दृ+ह +अ=(१५२ पृष्ठकी ख टिप्पणीसे हकोज) ज+ह+अ-जह । २-पृष्ठ १७ की चौथी टिप्पणी देखो। ३-जिस धातुकी आदिमे 'अ' स्वर है और उस स्वरके वादमें संयुक्त व्यंजन है तो उस 'अ' को दीर्घ 'आ' होजायगा और उन व्यजनोंके और 'आ' के वीचमें 'न' (नुक्) आजायगा। जैसे अर्च+अआ+ न+च+अ आनर्च । ४-(क) जिन अकारादि धातुओके अतमें संयुक्त व्यंजन नहीं है उनके अकारको केवल दीर्घ ही होगा नुक् नहीं । (ख) धातुके दो रुप होने- पर आदिके व्यजनको छोडकर दूसरे तीसरे आदि सब व्यंजनोका लोप हो जाता है । जैसे-अट (जाना ) धातुसे लिट् लकारके प्र पु एकव मे णश् आया तो १५२ पृष्ठकी १ नंवरकी टिप्पणीसे स्वरके वादके अक्षर ट को दोरुप होनेसे 'अट्+ द्+अ' हुआ और इस टिप्पणीके [ख] नियमसे आदिके ट्र को छोड दूसरे ट्रका लोप होगया जिससे कि अट् +अ रहा । पश्चात् इसी टिप्पणीके [क] नियमसे दीर्घ हुआ तो आट हुआ। ५-जिस धातुकी आदिमे श, ष, स मेंसे कोई है और उन श, ष, स के वाद वर्गका पहिला वा दूसरा अक्षर है तो उस धातुके दो रुप होनेसे पूर्व रूपके श, ष, स नष्ट हो जाते हैं और दूसरे व्यंजनको छोडकर शेष ओर पासके सब व्यंजन नष्ट होजाते है अर्थात् केवल स्वर सहित दूसरा व्यंजन वाकी रहता है। जैसे स्पृश+स्पृश् +अ पस्पर्श । ६-पृ. १६७ टि १ देखो । ७-पृ १५८ की दूसरी और १५९ की टि १ देसो । ८-पृ. १५८ टि. ४ देखो। १९ सनातननग्रंथमालायां- द्वितीय पाठ। आत्मनेपदी धातु | १ इति हिरण्यनामा कश्चित् अभिदधे-यह हिरण्य नामक किसी मनु- प्यने कहा। - अहं दृष्ट्वा तं स्वप्ने अति-मुमुदे-मै स्वप्नमे उसे देखकर अति प्रसन्न हुआ त्वं सत्तपस्विनं ईक्षांचकृषे-तुमने श्रेष्ठ तपस्वीको देखा था। २ पंडितौ तदेवं जज्ञाते-दो पंडितोंने उसे ऐसा समझा । आवां पूर्व ववृधिवहे-हम दो जने पहिले वढे थे। युवां महद्धनं चोरयांचनाथे-तुम दोनोंने बहुत धन चुराया था। ३ जनाः तदाज्यकाले मुमुदिरे-लोग उसके राज्यसमयमे प्रसन्न हुये थे। वयं वस्त्राणि चिक्रियिमहे-हम लोग वस्त्रोका लेन देन करते थे। यूयं ओदनं पेचिध्वे तुम लोगोने चावल पकाये थे । नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य वनाओ- मुमुदाते, दधिरे, पेचे, चोरयांचक्रे, जज्ञे, मुमुदिषे, पेचाते, चोर- यांवभूवतुः, चोरयामासुः, शिश्ये, शिश्याते, शिश्यिरे, चक्रिरे । हिदी वनाओ- भगवान् हसन्निति जगाद कारणं । धर्मरुचिरिति सुरस्त्रिदि- १ आत्मनेपदमे लिट्लकारके रूप चलानेकेलिये प्र पु में ए, आते, इरे, म- ध्यमपु. में से, आथे, ध्वे और उत्तसपु० में ए, वहे, महे प्रत्यय लगते है और द्वित्व आदि कार्य परस्मैपदके समान होते है । २ आकारात वातुके द्वित्वके दूसरे रूपके अतके 'आ' का लोप होजाता है। ३ जिनधातुओकी आदिमें दीर्घ 'ई ऊ, ऋ हैं उनके (ऋच्छ, ऊर्णके सिवाय) तथा काम्, अनेक स्वरवालियों और णि सन् आदि प्रत्ययात धातुओंके लिट्में दो रूप नहीं होते लेकिन अतमे आम् लगाकर कृ, भू अस् धातुके लिट्के रूप लगा देते हैं और कृ, भू, अस् का जो पंद है उभयपद या परस्मैपद' है उसीमे रूप चलते हैं। जैसे-ईक्ष-आम्-चके,= ईक्षाचक्रे, ईक्षा- चकार, ईक्षामास, ईक्षाम्वभुव, चोरयामास आदि । ४-लिट्लकारका कित् या संस्कृतप्रवेशिनी। १५९ वात् ( स्वर्गात् ) समुपा-ययौ विकृतवृद्धविग्रहः । भेजुरमरनि- वहाः स्वभुवं । तस्य जननसमये पवनः सुरभिर्ववौ सुरभयन् दिगं- गनाः । प्र-जगर्जुसर्जितरवं गजारयः [सिंहाः] । तंमहिमानं स हिर- ण्यजं विवेद । विलुलोके स जनं पलायमानं । उपजातकुतूहल: कुमारः परि-पप्रच्छ पलायनस्य हेतुं । ददृशे च गतेन तेन तस्मिन् नगरं तद् रिपुसैनिकैः परीतं । विधवां स चकार तस्य राज्यलक्ष्मी। राशा बुबुधे जातिकुलोन्नतिस्तदीया। गुरुविष्टर[ सिंहासन ]मा- स्थितेन तेन स्मितपूर्व स कृताशिषा वभाषे। अधिपस्तं विससर्ज नम्रमौलिः । नृपः पुरं रुरोध गत्वा सभयैः पौरजनौर्वलोक्यमानः। हृदि सस्मार दृढस्मृतिर्हिरण्यं । मुमुचे नृपेन तेन कोपादरि- मोहप्रवलेन तामसास्त्रं । द्विपतां वले विपुलतेजसि य प्रबबंध कीट- कधियं प्रधने (युद्धे) । निजनाम सर्वभुवनप्रथितं दधुरर्थशून्यमधिपाः ककुभां [दिगा] । तिलकःक्षितरुप-चिकाय कलाः।जनता (जनसमूह) तं प्र-णनाम बालमिव चंद्रमसं। मनो न जहे व्यसनैर्मनस्विनः। अधीश्वरः सुतेन तेनैव रराज जिष्णुना [जयशीलेन] । तपः समधि- शिश्रिये नृपतिमिः समं भूरिमिः [बहुभिः] । विनीत: शिष्यवद् मेजे देशमुनिसमाश्रितं । 'लोक' शीतांशवेचिंद्रायन नितरा स्पृहयांवभूव । सवा वुभोज वसुधां निजतेजसैव । या कांतिमापधिपतेः परिभूय द्वित् प्रत्यय अथवा जिसकी आदिम इद है ऐसा प्रत्यय परे होनेसे पहिले रुपके असयुक्त व्यजनके वाट यदि दूसरे रूपका प्रारभका व्यजन अकारात होगा तो पहिले रूपका तो सर्वथा नाश हो जायगा और दूसरे रूपके प्रारभिक व्यंजनके 'अ' को 'ए' होजायगा । जैसे-पच्-अतु = प-पच्-अतु = पेचतु , पच-वे- प-पच-इ-"वे = पेचिश्वे । १-आकारात धातसे परके णश् को औ होजाता है। २-कर्मवाच्यमें आत्मनेपद हो जानेके सिवाय कुछ विशेष भेद प्रायः नहीं होता। ३-चिन (इकट्ठाकरना) धातुके लिरके दूसरे स्पके 'च' को 'क' इच्छाधीन होता है । चिकाय, चिचाय।
- सनातनजैनग्रंथमालायां- तस्थौ ।'सनृपः' देव्या सुखान्युनुभवन् दिवसान निनाय । 'स'देवी- मुदश्रुनयनांसहसाददर्श ।गर्भ कियद्भिरथ सा दिवसैर्वभार । अभ्यु- धमः [प्रयत्न सह ननाश वलित्रयेण। उदयनिलये (उदयशील) जाते तस्मिन् ननंद सनंदने (पुत्रे)नि पस्पृशे दोषगणैः कुमारतानृपाः प्रणेमुः प्रणतैकचनसलं विलोकमामासस सेवयाऽऽगतं सभाऽजिरे (अंगणे) राजगजंप्रजापतिः । धीरधीर्जधान मुष्टयाधनपीवरे करे । नरेश्वरस्तं प्रणिपत्य योगिनामधीश्वरं स्तोतुमिति प्रचक्रमे । अपि शशंस स गोकुलवासितां (गौओंके झुडमें रहनेको) क्षितिषु गौरिव गौ-(वाणी) जगतीभुज-(नृपस्य) चिरतरं विचचार निरंकुशा। वसुमतीपतिराप स वाहिनी (सेनां)। सप्तम अध्याय समस्तगणकी धातुओंका सामान्यभूत (लुइ)कालमें प्रयोग प्रथम पाठ। परस्मैपदी धातु । , १ नेत्रहयं धवलतां अगंमत्-दोनों आखे श्वेत होगई । अहं शत्रु अजैषम्-मैंने शत्रुको जीता। १ वातुओसे लुट् लकारके [ त्, ता, उ त, त, अम, व, म] आदि लडके समान प्रत्यय आनेपर मध्यमे कही अड् [अ] कहीं कच् [अ] कहीं क्स (स) कही निह) और कही सि [स् ] आता है एव व्यंजनादि समस्त धा- तुओंके प्रारभमें अ'तथास्वरादि वातुओंकी आदिम आ' लगाया जाता है।२ जिन- धातुओंका 'ल' इत् गया है उनसे 'अ' आता है जैसे गम्ल, आप्लके गम्+अ+ =अगमत्, आप्रअ आ आप्+अxत् आपत् । ३ जिनधातुओंके लुके मध्यमें अद् आदि कोई नहीं आते उनके मध्यमे सि [स् प्रत्यय आता है ओर परस्मैपदमे उस सिके आनेसे वातुके अतके 'इई' को ऐ, 'उ,ऊ' को औ, ऋ, ३' को आर् हो जाता है। जैसे-जि+र+अं=अ+जि-ष्+अ=अजैष ।
संस्कृतप्रवेशिनी। १६ त्वं किमेवं अवादी:-तुमने ऐसा क्यो कहा। २. भिक्षुको मिक्षा अयाचिष्टाम्-दो भिखारियोंने भीख मागी। आवां वाराणसी अवाजिव हम दोनों वनारस गये थे। युवां जीवान् अवधिष्टं तुम दोने जीवोंको मारा । ३ छात्राः विद्यालयं अमुचन्-विद्यार्थियोने विद्यालय छोडा । वयं सर्वज्ञ अनंसिष्म-हम लोगोने सर्वज्ञको नमस्कार किया। यूयं हपीकसुखं अन्वभूत-तुम लोगोने इंद्रियसुखको भोगा। नी लिसे शब्दासे वाक्य बनाओ- अजैपीत्, अजैप्टाम्, अजैषुः, अजैपीः, अजैष्टं, अजष्ट, अजैव, अजैष्म, अगमतां. अगमन् , अगमः, अगमतं अगमत, अगमं, अग- माव, अगमाम, अवादीत्, अवादियां, अवादिषुः, अवादी,अवादिष्टं, अवादिष्ठ, अवादिषं, अवादिष्व, अवादिष्म, अभूत्, अभूतां, अभू- १-जिन वातुओका 'ल.' या 'औं इत् है या जिनके अतमे 'आ, इ, ई, उ' मेसे कोई स्वर है उन बातुओके तिवाय समस्त धातुओके और "सि' प्रत्ययके वीचमे इद [इ ] आता है । जैसे “वदxस्+ =अ+व+स्x:=अवढXXम्+:" हुआ ।' अव-(स) "सि [म् ] और त् [प्र. पु० एकव ] एवं (विसर्ग-म म पु ए.व) के वीचमें ईद (इ) आता है। [ग] यदि वह सि (म्) इट् और ईट् के वीचमें आ- जाय तो नष्ट हो जाती है। इस नियमसे 'ई' आया तो 'अवxxस्+ई+ यह अवस्था हुई। यहा इट् एवं ईटके वीचमे 'म्' आगया है इसलिये वह नष्ट हुआ तो सधि होनेसे तथा [५] 'वद व्रज, और रकारात, लकारात, धातुओके अतके अक्षरसे पहिले ह्रस्व 'अ' को सि परहोनेसे दीर्घ होजाता है" इसनियमसे 'आ' होनेसे 'अ- वाद्-ई-:''अवादी' हुआ है । २ यम् रम्, नम् और दा, धा के सिवाय शेष आकारात धातुओस सि [स्] आनेपर उस सि [स् ] से पहिले 'सि' आती है।' जैसे नम् स्+म= अनम्-सि-स्xम-अनंसिष्म । ३-द, धा,भू, स्था, इण, इक्पा [ पीना ] इन धातुओके परवर्ती परस्मैपदके सि [म् ] का लोप होजाता है । अx भूस् त अभूत, अदात्, अधात् । .
१६२ सनातनजैनग्रंथमालायां- वन, अभूः, अभूतं, अभूत, अभूवं, अभृव, अभूम, अनंसीत्, अनं- सिष्टां, अनंसिपुः, अनंसी:, अनंसिष्टं, अनंसिष्ट, अनंसिपं, अनंसि- प्व, अनंसिष्म, अयासीत्, अयासिष्टां, अयासिषुः, अदात्, अढातां, अदुः, अदाः, अढातं, अदात, अदां, अटाव, अदाम, अविक्षत्, अवि- क्षतां, अविक्षन, अविक्षः, अविक्षतं, अविक्षत, अविक्षं, अविक्षाव, अविक्षाम, अचूचरत्, अचूचुरता, अचूचुरन्, अंचीकरत्, अची- करतां, अचीकरन् , अचकथत्, अर्चकथतां, अचकथन् , १-दृश् धातु को छोड कर जिस धातुकै अतका अक्षरश, प, ममें से कोई एक है और उस अतके श, प, मग पहिले यदि इ. ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ मे से कोई स्वर है तो उस धातुके तथा त आदि प्रत्ययो वीचमे क्स [स] आता है। नगे विश-त्-अ+विण+सरत [पूर्वके समान २ को प आर उस पको क, तथा सको प-क+प-क्ष] अविक्षत् । २-जिन धातुओसे णि होता है उनमे लुट् लकारकेस्प बनानेके लिये त् आदि परस्मैपद और आत्मनेपद प्रत्ययोंके वीचमें कन् [अ] आता है। [क] कच् प्रत्यय होनेसे णिका लोप होता है और धातुका रूप जैसा शुद्ध पहिले था वैसा ही होकर द्विगुणित होजाता है । जैसे-चुर+ह [णि] चोरि+अत् [कटिप्पणीम] चुर+अ+त् [पृ १५६ के न 1[स]की टि देखो] अ+चुचुअत् [ख] जिस व्यंजनादि और व्यजनात धातुके कच् परे होने से दो रूप हुये हैं उसके पहिले रूपके व्यजनमे मिले हुये स्वर को दीर्घ होजाता है और यदि वह पहिलेका स्वर् अ है तो उमे इ हो नाता है । जैसे-चुचुर+अ+त अचूचुरत्, छादिxअत्--अ+छ+अत्-अच +च्छद्+अ+त्-अचिच्छदत् । ३--जिस बात का द्वित्व होनेसे आया हुआ पहिला रूप सयुक्त व्यंजनसे पूर्व नही होता है उस धातुके पहिले रूपके अको दीर्घ ई होता है । जैसे अचिच्छदत् में तो हुआ नहीं, क्योंकि पहिला रुप च च्छ से पूर्व है इसलिये हस्व इही हुआ और कारिअ त्, अ च कृमत् ,अचीकरत् यहाई हो गया ४-यह अकारात धातु है व्यंजनात नहीं । जिनके मतमे व्यंजनात है उनके यहा, अचीकथञ्च मंत्रिभ्यो राजद्रोहो विधीयता [क्षत्रचूडामणि १सर्ग] होता है। ।
संस्कृतप्रवेशिनी। १६३ हिंदी वनाओ। सुरथो नाम राजाऽभूत् समस्ते क्षितिमंडले। भर्तुर्विप्रकृताऽपि रोषणतयां मा स्मै प्रतीपं गमः। अन्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्र- मना अभूवं नाश्रौष । शुकनासोऽपि महांतं कालं तं राज्यभारम- नायासेनैव प्रज्ञावलेनाऽभार्षीत् । यथैव राजा सर्वकार्याणि अका- पौत् तद्वदसावपि द्विगुणितप्रशानुरागश्चकार । उद्भूतमूर्छाधकारा च पातालतलमिवावतीणी तदा वाहमगमं किमकरवं किं व्यलपमिति सर्वमेव नाऽज्ञासिषं प्राणाश्च मे तस्मिन् क्षणे किमतिकठिनतयाऽस्य मूढहृदयस्य, किमनेकदुःखसहिष्णुतया हतशरीस्य किं भाजनतया जन्मांतरोपात्तस्य दुष्कृतस्य, कि दुःखदाननिपुणतया दग्धदैवस्य केन हेतुना नोद्गच्छंति स्म तदपि नावेदिपं। कदाऽगुरोकसो भवंतः । स आह-नाहं तस्य किमपि वस्तु अमोपिपं । स तेनेष्टका- भारानवीवहत् । स दृष्टपूर्वोऽपि सुरासुराणामजीजनत् कजलशै- लशंकां । तटाग्रभूमिर्जधनस्थलीव जलैरुदाऽऽप्लावि वनापगायाः (वननद्याः) । सुरनिवहमवादीद्वारपालः कुबेरः। वृद्धिं परामुदर- माप यथा यथाऽस्याः, श्यामाननः स्तनभरोऽपि तथा तथाऽभूत् । 'पंचदश' मासान् व्यधत्त नृपधामनि रत्नवृष्टिं । परिजनपरिवेष्टितः सोऽत:पुरमयासीत् । कस्यचिद् 'वनवासिनो नदीतटवर्तिनं वृक्ष लुनतो हस्तात् सहसा निःसृतः कुठारो जलमभजत् । ततः सोऽशोचीत् मुक्तकंठं चारोदीत्। तस्य विलापं श्रुत्वा वरुण प्रादुरभूत् । तं वनस्थः स्वशो- ककारणमचकथत् । तदा पाशी (वरुण) जलांतः [जलमध्ये प्रविश्य शातकौम्भ (सुवर्णरचित) स्वधिति (कुठारं ) हस्तेनादायोदमजत् . १--जव कि 'मा'का या मास्म का सवध धातु से रहता है तब अ, आ धातु से पहिले [पृ. १६० टि १ के अनुसार] नहीं आता है । ६१ १६२ टि.२-३ देखो। ..
- सनातनजैनग्रंथमालायां- (ऊर्ध्वमागमत्)एवं तं वनवासिने दर्शयित्वा अप्राक्षीत् “रे किमयं ते परशुः"। सोऽवादीत्" नायं मदीय इति । ततो भूयोऽपि निमज्ज्य राजतं (चांदीका बना) व्रश्चन (कुठार) मुदधरत् । तं दृष्ट्वा" नायमपि मम" इत्यरण्यसदुवाच । तृतीयोन्मजने विपिन (वन) चारिणो नां वृक्षादनी (-कुठार ) गृहीत्वोदगमत् । तां स मुदा स्वीचकार, वरुण- मत्युपकारिणं चाबोधि। तदा वनचरस्याजिह्म (ऋजु)व्यवहारदर्श- नेन संतुष्टो यादसांपति(वरुण)स्तापनीय( सुवर्णनिर्मित )राजते द्वेऽपि कुठारे तस्मै पारितोषिकत्वेनादात् । सस्कृत बनाओ परतु क्रिया सामान्यभूत (लुड्) की हो- इस वृत्तांतको सुनकर उसका एक जातीय भाई भी नदीके किनारे गया और अपने कुठारको जान बूझकर नदीमें डाल रोने लगा। उसके रुदनको सुनकर पहिलेकी तरह ( यथापूर्व) वरुण किनारे पर आया और सौनेके तथा चांदीके दो कुठारों को क्रमसे नदीमे डूव २ कर लाया तथा "क्या यही तेरा कुठार है" इस तरह उस जंगलीसे पूछा । उत्तरमें जंगली ने कहा कि-"हां ! (वाढं) यही मेरा कुठार है' वरुण इस प्रकारके मिथ्यावादीको देख कर बडाही क्रुद्ध हुआ और उसे उसकालोहेकाभी कुठार न दिया। सो ठीकही है जो लोग सत्यपर रहते हैं मायाचाररहित होते हैं उनपर सव लोग दया दिखाते हैं और जो लोभके वशीभूत हो झूठ बोलते हैं के अपनी भी चीज खो बैठते हैं। द्वितीय पाठ। आत्मनेपदी धातु। १ छात्री गुरुं निरीक्ष्य अमोदिष्ट-विद्यार्थी गुरुको देखकर हषित हुआ । १-पृ १५४ टि. १ देखो २-पृ १४२टि.३ देखो। ३-दीप,जन,बुध, धातुओसे इच्छानुसार, और पद धातुसे तथा भाववाच्य, और कर्मवाच्यमें समस्त धातुओंसे लुड्के [प्र. पु. व.] त परे होनेसे वीचमे 'जि' (इ) आता है। १ आत्मनेपदमे धातुओंसे त, आता, अत, था, आथां, ध्वं, इ, वहि, महि संस्कृतप्रवेशिनी। १६५ अहं दिवा अशयिषि-मैं दिनमे सोया । त्वं आहारदानं दिया:-तुमने आहारदान दिया । २ भृत्यौ कटं अकृषातां दो नौकरोंने एक चटाई बनाई। आवां शत्रुसेनां व्यजेवहि-हम दोनोंने शत्रकी सेना जीती। युवां किं शानदानं अदिषाथां-क्या तुम दोनोने ज्ञानदान दिया। ३ के शत्रुसेनां अरुत्सत-किन्होंने शत्रुसेनाको रोका । [ ढका। वयं वस्त्रेण स्वशरीरं अचिच्छदामहि-हमने कपडेसे अपने शरीरको यूयं कदा अंशयिध्वं वं-तुम लोग कब मोये । - १ प्रत्यय आते हैं और उनके मध्यम सि [म] आदि पृ १६० टि १ में दिये गये अनु- सार समझना । आत्मनेपदमे वातुके अत अक्षरसे पहिले इ को ए और उ को ओ होजाता है इट्के वाद यदि सिका स्परे हो। जैसे मुद स्त-मुद इस् त-अमोद् इ प् त [पृ. १४८ टि. ५ देखो] अमोदिष्ट । ३ दा, धा, और स्था वातुके आ को इ होजाता है लुट् आत्मनेपदमे [क] ह्रस्व स्वरके वाद यदि मिका स् होगा और उसके वाद य, र, ल, व, न, म, ह, ण, न, के सिवाय कोई व्यजन होगा तो उस स् का लोप हो जायगा । जैसे दा त अदा म् त-अ दि स् त, अदित, अटिथाः । कृ त, अकृ स् त अकृत । ४ दा, या, और स्थाके [इसी पृष्टमे ३ न० की टिप्पणी देखो] इको छोडकर शेप वातुओके इकारको एकार, उकारको ओकार होजाता है सि परे होनेसे । (क) वि और परा उपमर्गपूर्वक जि धातु आत्मनेपदी है। वि जि स् त वि अ जे प त-व्यजेष्ट १५ जिन धातुओका इर् इत् है उनसे क्स आता है । पृ. टि देखो । ६ य, र, ल, व, न, म, ट, न, म, झ, और भ इन व्यंजनादि प्रत्ययोंके परे रहते पूर्वके अको दीर्घ होजाता है । जैसे पृ १६२ नं० २-३ की टिप्पणीसे अचिच्छद महि अचिच्छदामहि । ७-इ, उ, ऋ, ए ऐ, ओ औमेपर जो पीध्वं, लड्, और लिट् का ध्वं होताहै उसको ढ्वं नित्यं होता है और इट् या नि के 'इ' से पर होनेसे इच्छाधीन ढ्वं होता है और 'ध्वं' से पहिलेका जो सि- का स् होता है उसका लोप होजाता है । जैसे अचेढ्वं, अशयिध्वं, अशायित्व ।
सनातनजैनग्रंथमालाया- नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य बनाओ--- अमोदिषि, अजनिषत, अवर्तिष्ट, अतीतडिध्वं, आर्चिषि, अश- यिषातां, अशयिषत, अशयिष्ठाः, अशयिषाथां, अशयिवहि, अश- यिष्महि, अचिच्छदि, अचिच्छदावहि, अचिच्छदथा, अचिच्छदाथां, अचिच्छदध्वं, अचिच्छदत, अचिच्छदातां, अचिच्छदंत, अरुंद्ध, अरुत्सातां, अरुद्धाः, अरुत्साथां, अरुध्वं, अरुत्सि, अरुत्स्वहि, अरुत्स्महि, अद्विक्षत, अद्विक्षातां, अद्विक्षत, अद्विक्षथाः, अद्विक्षाथां, अद्विक्षध्वं, अद्विक्षि, अद्विक्षावहि, अद्विक्षामहि । हिंदी बनाओ- कैस्मिंश्चित् काले कोऽपि कंठीरवो मति व्यधित-"यदहं खरं (रासभं) सहायं कृत्वाऽऽखेटे (शिकार करनेमें) व्याप्रियेय" इति । स चक्रीवंतं (गर्दभं) निर्दिदेश "भो रासभ! त्वं वृक्षगुल्मच्छा- दितो भूत्वा तिष्ठ, तथाऽस्मिन् काले च भयोत्पादकं चीत्कारं कुरु, तस्मादारंभाञ्च मा विरंसीः। एवं त्वयाऽनुष्ठिते सर्वे पशवो मिया- क्रांताः पलायितुं प्रवत्तरन् । अहं तु निर्गमपथं रोत्स्यामि। तेन मार्गेण गच्छतः सर्वान् च रेपिण्यामि ।" तत. खरेण यथानिर्देशं कृते दृत- गतीन् धावतः पशून् निर्गममार्गस्थितः सिहोऽश्रमेणैवैकैकमवधिष्ट, यदेमानि पशुशवानि ममोदरपूर्तये पर्याप्तानीति सिहोऽमानिष्ट तदा स गर्दभं व्याहूयाभ्यधात्" भो चक्रीवन् ! साधु, साधु , साधु कृतं १-य,र, ल, व, ज, म, ङ, ण नसे भिन्न किसी व्यजनसे पर यदि स् होगा तो उसका लोप हो जायगा य, र, ल, व, ञ् म, ङ, ण, न से भिन्न व्यंजन पर होनेसे २ पृ १६२ टि १ देखो। ३.शब्दके अतके न् के और स्वरसहित च या छ के वीचमै श् स्वरसहित ट या ठ के वीचमे प् और स्वरसहित त या थ के वीचमै स आता है और न को अनुस्वार ] या अनुनासिक हो जाता है। जैसे कस्मिन् चित् कस्मिंश्चित्, कस्मिश्चित् , भवाश्छादयति ।
संस्कृतप्रवेशिनी। सखे, अलमधुना ते चीत्कारेण । विरम तावत् । इत एहि" इति । तमाह्वानमनुखरश्चित्रकायं (सिह)प्रतिनिवृत्य स्वनियोगः सुष्ठ्वशून्यः कृतः" इति मत्वा तं सलीलमप्राक्षीत् “भो मृगाधिप! यदहं कृत- वांस्तत् तुभ्यमरोचिष्ट नवा।" हर्यक्ष आह--" मतं तव कृत्यमिति किं कथयामि । अतीवामिनंदामि तत् । अष्टम अध्याय। समस्तगणकी धातुओंका आशीर्वाद अर्थ (लिड्) में प्रयोग १ कुशलं ते भूयात्-तेरी कुशल हो। अहं वः श्रियं पुण्यासं-मै तुम्हारा धन बढाऊ । त्वं मे शिवं दद्या:-तुम मुझे कल्याण दो। २ मुनी युष्मभ्यं शिवं क्रियास्तां-दो मुनि तुम लोगोका कल्याण करै । आवां नृपौ भूयास्व-हम दोनो राजा हो। युवां दीनान् न तुद्यास्तं-तुम दोनो दीनोको न सताओ। ३ वीतरागाः युष्मान् पुण्यासुः-वीतरागी तुम्है पुष्ट करें । वयं आहारदानं सर्वदा देयास्म-हम हमेशा आहार दान दें। यूयं सत्तत्वं श्रद्धेयास्त–तुम लोग यथार्थतत्त्वोंका श्रद्धान करो। नीचे लिखे शब्दासे वाक्य बनाओ। मुच्यासं, चोयास्व, अद्यासं, ह्रयास, दीन्योत्, निश्चीयास्तां, शयिपीय, शयिपीवहि, शयिषीमहि, शयिषीष्ठाः, शयिषीयास्थां, शयिपीढ्वं ( ध्वं) शयिषीष्ट, शयिषीयास्तां, शयिषीरन्, उंच्यात्, १ आशीलिट् मे परस्मैपदधातुसे यात्, यास्ता, यासु , या, यास्त, यास्त, यास, यास्व, यास्म प्रत्यय आते हैं । २ दा धा, स्था, गै, पा (पीना) धातुके आ को ए होजाता है परस्मैपदके आशीलिङ् मे । ३ धातुके ह्रस्व इ, उ को दीर्घ इ, ऊ होजाते हैं आशीलिङमें । ४ आत्मनेपदी धातुओसे आशिर्लिङमें सीष्ट, सीयास्ता, सीरन्, सीष्ठा , सीयास्था, सीढ्वं, सीय, सीवहि, सीमहि प्रत्यय लगते हैं और इट् आनेका नियम लिट् या लुड्के समान प्रायः समझना । ५ परस्मैपदमे वच् धातुके .
१६८ सनातनजैनग्रंथमालायां- उच्यास्तं, उच्यास्त्र, वक्षीय, वक्षीवहि, वक्षीमहि, निश्चिषीय, भुक्षीष्ट, तनिषीष्ट, कृषीष्ट, नवम अध्याय। समस्तगणकी धातुओंका अनद्यतन भविष्यत् अर्थ(लंद) में प्रयोग १ देवदत्तः कदा पाठं पठिता-देवदत्त कब पाठ पढेगा। अहं गुरुं प्रश्नं प्रष्टास्मि-मै गुरुसे प्रश्न पूछूगा । त्वं कदा ग्राम गंतासि-तुम कव गाव जाओगे । २ इमौ छात्रौ नूनं पंडितौ भवितारौ-ये दो विद्यार्थी निश्चयसे पंडित होगे। आवां स्वगृहं यातास्व: हम दोनों अपने घर जावेगे। युवां धर्म उपदेयास्था-तुम दोनो धर्मका उपदेश देगे । ३ प्रजाः राजगृहं गतार:-प्रजा राजगृह जायगी। वयं कदापि धन न चोरयितास्मः-हम कमी धन न चुरावेंगे। यूयं कि कार्य कर्तास्थ-तुम लोग क्या काम करोगे। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- हासि, भोकारः, तनितास्मि, तनिताहे, ताहे, एधिता, एधि- तारौ एधितारः, एधितासे, एधितासाथे, एधिताध्वे, एधिताहे, एधितास्वहे, एधितास्महे । दशम अध्याय। समस्तगणकी धातुओंका क्रियातिपत्ति अर्थ हॅिड् ] में प्रयोग १ वृष्टिन यदि अभविष्यत् यदि मेह न वी तो वको उ होजाता है ।१-परस्मैपदी धातुओंसे लुट्मे ता, तारौ, तार , तासि,तास्थः तास्थ, तास्मि, तास्व तास्म प्रत्यय आते है इट्का नियम लुड् की. भाति समझो, २--आत्मनेपद धातुओसे लुट्ने ता, तारो, तार , तासे, तासाथे, ताध्वे, ताहे, तास्वहे, तास्महे प्रत्यय आते हैं । इट् आदिका नियम परस्मैपदके समान हैं। १--परस्मैपद धातुओसे लड़में-स्यत, स्यता स्यन्, स्यः, स्यतं, स्वत, स्य, स्याव - १ संस्कृतप्रवेशिनी। १६९ अहमवश्यमेव आगमिष्यं-मैं अवश्य ही आऊंगा। यदि त्वं न अपठिप्यः-यदि तुम न पढोगे तो कथमपि पंडितो न अभविष्यः-किसी भी तरह पंडित न होओगे। २ यदि तौ मत्समीप आगमिष्यतां यदि वे मेरे पास आयेंगे तो बहु पारितोषकं अलप्स्येतां-बहुतसा इनाम पावेगे । यद्यावां स्तेयं अकरिष्याव-यदि हम चोरी करेंगे तर्हि तत्फलं दुःख अन्वभविष्याव-तो उसका फल दु ख भोगेंगे। युवां यदि भिक्षार्थ आटिष्यतं यदि तुम भिक्षाके लिये जाओगे तर्हि महदन्नं आप्स्यतं-तो वहुतसा अन्न पावोगे । ३ यदि ते स्वामिसेवां अकरिष्यन्-यदि वे स्वामीकी सेवा करेंगे तो नूनं स्वर्ग अयास्यन्-निश्चयसे स्वर्गको जायगे। यदि वयं सद्वतं आचरिप्याम–यदि हम लोग श्रेष्ठ व्रत आचरण करेंगे कथं न संसारसमुद्रं अतरियाम-क्यो नहीं ससारको पार करेंगे। यदि यूयं जीवान् अरिपिण्यत-यदि तुम लोग जीवोको मारोगे तो तर्हि नरकं अवजिष्यत-नरकको जाओगे। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- अभोक्ष्यावहि, अमोक्ष्यत्, अरक्षिष्यः, उद्-अपत्स्यत, अजनिष्या- महि, अखनिष्यत्, अयाचिष्यत, अजेप्यन् । सस्कृत बनाओ- १। यदि माता पिताकी आज्ञा मानोगे तो संसारमें सुख पावोगे। २। यदि तुम इस बातको थोड़ा भी विचारोगे तो जरूर ही आग्रह छोड़ दोगे। सकेगा। ३। यदि वहां सब लोग निरालस रहेंगे तो कोई भी कुछ न ले स्याम और आत्मनेपदियोंसे स्यत, स्येता, स्यत, स्यथा , स्येथा स्यध्वं, स्ये, स्यावहि, स्यामहि प्रत्यय लगते हैं और व्यजनादिसे अ एवं स्वरादिसे आ पहिले लगता है । इट्का नियम पृ. नं टि. के समान समझो। २० सनातनजैनग्रंथमालायां- ४। यदि मैं भी तुम्हारे शब्दको सुनता तो अवश्य ही डरजाता। ५। यदि वे दोनों उसकी वात न सुनते तो सुखसे रहते। तद्धितं प्रत्यय अपत्यवाचक [ इन्, ण्य, अण्, एयञ्, ईय] १ सात्यंधरिस्तु तच्छ्रुत्वा तद्घोषणमवारयत्-सत्यधरके लडकेने तो उस घोषणाको सुनकर रुकवा दिया। २ सेनापत्य स्वपितरमाह्वयत्-सेनापतिके लडकेने अपने पिताको बुलाया । प्राजापत्योऽयं वहूननान् नाशयति-यह राजाका लडका बहुतसे अनाको नष्ट करता है। ३ चैत्रगंवोऽद्य समागतः-चितकवरी गायवालेका लडका आज आया है। यामुनोऽयं वाल:-यह लडका यमुनाका पुत्र है। विद्याधर है। ४ वायुवेगेयो कृतधमा विधाधरः-वायुवेगाका लडका कृतधानामका १ जो प्रत्यय वातुसे न आकर विभक्तयत शद्रोंसे आते हैं वे तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं। तद्धित प्रत्ययात शब्द विशेषण होते हैं। २-हस्व अकारात शब्दोंसे 'उसका पुत्र' इस अर्थमे इञ् प्रत्यय होता है, जैसे सत्यधरस्य पुत्र सत्यधर इ (क) नित् और णित् तद्धित प्रत्यय होनेसे शब्दमे जो एक वा अनेक स्वर होते हैं उन सब स्वरोंमे पहिला स्वर यदि अ है तो वह आ, इ ई है तो ऐ, उ ऊ हैं तो औ, ऋऋ है तो वे आर् होजाते हैं । जैसे-सत्यधरxइ, यहापर सव स्वरोंमे पहिला स्वर 'स' का अ है उसे आ होगया तो सात्यधर+इ हुआ । (ख) यकारादि और स्वरादि तद्धित प्रत्यय वादमें रहनेसे शब्दके अतके 'अ आ, और इईका लोप हो जाता है और उ को ओ होजाता है। जैसे-सात्यंधर+इ-सात्यंधरिः।३-पति शब्दात शब्दोंसे पुत्र अर्थमे ण्य प्रत्यय होता है बाकी नियम २री टिप्पणीके देखो। ४-जिनशब्दोंसे पुत्र अर्थमें विशेष नियमसे कोई प्रत्यय नहीं होता उन सबसे अण् आता है। जैसे चित्रगुxम-चैत्रगव । इसी पृष्ठकी नं. २ की टिप्पणी देखो। ५-जिनशब्दोंके स्वरोंमें सबसे पहिला स्वर आ, ऐ, अथवा औ है ऐसे जो स्त्री संस्कृतप्रवेशिनी। १७१. वासवदत्तेयं दृष्ट्वा जहर्ष सः-वासवदत्ताके लडकेको देख कर वह हर्षित हुआ। नामेर्यमादिनाथं सततमानताः स्मः-नाभिराजके पुत्र आदिनाथको हम लोग सदा नमस्कार करते हैं। ५ स्वस्नीयं कोन पूजति-बहिनके लडके (भानेज) को कौन नहीं पूजता । भ्रात्रीयं को न स्निहाति-भाईके लडके (भतीजे) को कान नहीं प्यार करता। नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य बनाओ- जैवंधरि, आंजनः, सौलोचनः, वार्हस्पत्यः, चांद्रमसः, राधेयं, मानोरमः, ऐरावतिः, मायेयं, वैनतेयः, कौकिलेयः, माणेयं । रक्तादि अर्थवाले तद्धितप्रत्यय १ हारिद्रं परिदधाति पटमेषः यह हलदीसे रगे हुये कपडेको पहिनता है। २ आर्हता हि स्याद्वादिनः-जैनी लोग एक वस्तुमें अनेक गुण मानते है । वैष्णवा विष्णुमर्चति-श्रीकृष्णके भक्त श्रीकृष्णको पूजते हैं । ३ वार्क दृष्टं मया वने-वन में मैने वृको ( भेडियो ) का समूह देखा । जनता एकीभूता तत:-इसलिये लोग इकडे होगये । लिंग दीर्घ आकारात और ईकारात शब्द है उनसे एयन् प्रत्यय होता है। जैसे-वायु- वेगाxएय-वायुवेगेय । ६-इन् प्रत्ययातोंसे भिन्न जिन इकारात शब्दोमे कुल दो स्वर है उनसे अपत्य (पुत्र ) अर्थमें एयम् प्रत्यय होता है । जैसे-नाभि-एय- नामेय । ७ स्वस और भ्रातृ शब्दसे अपत्य अर्थम ईय प्रत्यय होता है स्वस. ईय+स्वस्रीय । श्रातृ+ईय भात्रीय । १-'उससे रगा गया' इस अर्थमे रागवाची शब्दोसे अण् प्रत्यय होता है। जैसे-हरिद्रासे रगा गया-हरिद्रा xअ-हारिद्र । २-देवता अर्थमें अण प्रत्यय हो- ता है। जैसे-अहंत जिसका देवता है वह अर्हतxxआहेत । ३ समूह अर्थ- में अण् होता है। वृकोका समूह-वृकxअवार्क । ४-प्राम, जन, बंधु और सहाय १७२ सनातनजैनग्रंथमालायां- ४ वैयाकरणोऽयं विद्वान्- यह विद्वान व्याकरण जानता है या पढताहै । सौवागमा इमे छात्रा:-ये विद्यार्थी स्वागम पढते या जानते हैं। ५ माथुरा: पाटलीपुत्रकेभ्योऽधिका:-मधुरावासी पटनावासियोसे ज्यादा हैं। [उत्पन्न होते हैं। ६ कंट्या: अकुहविसर्जनीया:-अ, कवर्ग, हकार और विसर्ग कंठसे दंत्याः लतुलसा:-ल, तवर्ग, ल और स दातोंसे बोले जाते हैं। ७ पूज्यपादीयान् ग्रंथान पठामि-मै पूज्यपाद स्वामीके बनाये ग्रंथोको पढता हूं। [रोका गया खिन्न हुआ। ८ दौवारिकेण निषद्धोऽखिद्यत सः-वह द्वारमे नियुक्त किये गये मनुष्यसे शोल्कशालिको मामभाषत-शुल्कगाला (खजाना ) में नियुक्त किये गये मनुष्य (खजानची) ने मुझसे कहा। [की रक्षा करते हैं। ९ शरण्याः सजनाः जगत् रक्षति-शरणदेनेमे साधु सज्जन लोग जगत् शब्दोसे समूह अर्थमें 'ता' प्रत्यय आता है। जैसे-ग्रामोका समूह-ग्रामxता= आमता, जनता, बंधुता, सहायता । ५-'पढता है या जानता है' इस अर्थमे अण प्रत्यय होता है । (क) शब्दकी आदिमे यदि इ, ई, के स्थानमे सधिसे आया हुआ य और उ, ऊ, के स्थानमे आया हुआ व् होगा तो नित् और णित् प्रत्यय होनेसे उनके स्थानमें क्रमसे ऐय् और आव आदेश होजायेगे । जैसे-व्याकरण अ यहापर णित् प्रत्यय 'अ' पर है इसलिये पहिले जो विxआ+व्या हुआ था अर्थात् सधिके नियमसे य् आया था उसके स्थानमे ऐय् हो गया तो व-ऐय्x आकरण अ-वैयाकरण , सुxआगम स्वागमxअ सौवागम । ६-'रहने वाला' अर्थमे अण् प्रत्यय होता है। जैसे-मथुरामें रहनेवाला-मथुरा+अमाथुर । ७-शरीरके अवयववाची शब्दोसे 'पैदा-होनेवाला' अर्यमे 'य' प्रत्यय होता है। जैसे दतमें होनेवाला-दंत-य-दत्य । ८ ! नामवाची शब्दोसे तथा तद् आदि सर्व- नाम शब्दोसे अपत्य अर्थसे भिन्न अथॉमे ईय प्रत्यय होता है-पूज्यपादका बनाया हुआ-पूज्यपाद+ईय = पूज्यपादीय , तस्येद-तदीय । ९-"नियुक्त' अर्थमे इकण् प्रत्यय होता है+द्वारमे नियुक्त-द्वार-इक = दौवारिक [ इसी पृष्ठ टि ५ देखो] १-"उपकारी है, अच्छा है" इस अर्थमे 'य' प्रत्ययहोता है। जैसे शरणमे संस्कृतप्रवेशिनी। १७३ सर्वे सभ्यास्तत्रसुः-सम्पूर्ण सभाके प्रवीण लोग डर गये। १० उष्ट्रीयोऽयं वृक्षायोहिपुर:संतिष्ठते-यह पेड जो कि सामने खडा है ऊँटको हितकर है। पित्रीयोऽयं वाल:-यह लडका पिताको हितकर है। ११ मथुरावत्मान्यखेटे प्रासादा:-मान्यखेट नगरमे मथुराकेसे महल हैं। पात्रवत् अपात्राय न देयं-पात्रके समान अपात्रको न देना चाहिये। १२ मनुयंता मनुष्ये वसति-मनुष्यपना मनुष्यमे रहता है । किं गवि गोत्वमुतागवि गोत्वं गायमें गोपना रहता है या गायसे भिन्न पदार्थमें? १३ सौराज्यं हि सुखावहं-सुराजता सुखदेनेवाली होती है । वार्हस्पत्यमभात् तस्मिन्-उसमे वृहस्पतिका कार्य शोभित हुआ। जाडये नास्ति सुखं क्वचित्-मूर्खपनेमें कहीं सुख नहीं है। कविः करोतिकाव्यानिलालयत्यपरो जनः--कवि काव्य ( कविका कर्म) बनाता है और दूसरे लोग उसे लालते पालते हैं। गौरवं हि मुखमंडनं सतां सज्जनोंके मुखका भूषण गुरुता है । एकमात्राया लाघवेन पुत्रोत्सवं-एकमात्राकी लघुता [कमिताई] से मन्यंते वैयाकरणाः वैयाकरण लोग पुत्रके समान उत्सव मानते हैं। १४-कियन्मात्रं जलं विप्र! हे ब्राह्मग कितना जल है ? उपकारी शरण+य गरण्य. । २-'उसके लिये हित कर है" इस अर्थमें ईय प्रत्यय होता है। ३-" वरावर" अर्थमें वन् प्रत्यय होता है । ४-'भाव (पना)' अर्थमें त्व और त (तल्) दोनों प्रत्यय होते हैं । जिसमें से त्व प्रत्ययातोके नपुंसकलिगमें और तल् प्रत्ययातोके स्त्रीलिंगमें रूप चलते है । ५-'उसका काम,या भाव' इस अर्थमे राज, शब्दात और पति शब्दात तथा गुणवाचक शब्दासे टयण (य) प्रत्यय होता है। सुराज का भाव वा कम-सुराज+य= सौराज्यं । ६-गुणवाचक शब्दोंसे भाव अर्थमें अण् प्रत्यय होता है । ७-ऊर्ध्व प्रमाण अर्थमे मात्रट दम्नट्, द्वयसट् प्रत्यय होते हैं। और लंबे, तिरछे प्रमाण अर्थमे केवल मात्र होता है। - १७४ सनातनजैन ग्रंथमालायां- जानुदघ्नं नराधिप !-राजन् ! जाघके बराबर है। पादमात्रस्थानं देहि-पैरकी बराबर जगह दो । पुरुषद्वयसं वारि वर्ततेऽस्यां-इसमे एक आदमीकी यरावर पानी है। १५ अयमनयोः पटुतेरः, पटीयान्- यह इन दोनोमे अधिक हुशियार है । अयमेषां पटुतमः, पटिष्ठ-यह इन सवोमे अधिक चतुर है। १६ कृष्णीकरोति सतां यशांसि दुर्जनः-दुर्जन सज्जनोंके शुभ्र यशको काला कर देता है। लघूभवति सर्वो दीनताया प्रसंगात्-दीनताके कारण सब लोग लघु नहो करभी लघु होजाते हैं। १७ श्रीकल्पाऽभूदकिंचना-लक्ष्मीसे कुछ ही कम वह [रानी] दीन हो गई। इंद्रदेशीयोऽयं नृपः--यह राजा इंद्रसे कुछ ही कम है। अष्टादशवर्षदेश्योऽयं बाल:-यह लडका १८ वर्षसे कुछ कम है। नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य बनाओ- सैद्धांतः, नैयायिका, मीमांसकः, छांदसः, आपणिकः, पाणि- नीयं, सामंतभद्रः, नादेयं, पाण्यः, पाद्यः, श्रीनः, ऐद्रप्रस्था, काकं, आपूपिकं, पैतः, कौसुंभः, काषायः, सहायता, ग्रामता, बंधुता, १-दो पदार्थोंमे जब एकको बडा [अधिक] बताना होता है तब तर और ईयस् और जव बहुतोमे एक को बढा बताना होता है तव तम और इष्ठ प्रत्यय 'गुणवाची शब्दोसे' होते हैं । २-'जो पदार्थ पहिले तो वैसा नहीं होता परतु किसी अन्य पदार्थके कारणसे वैसा हो जाता है जब ऐसा अभिप्राय रहता है तबा च्चि [कुल इत् है] प्रत्यय आता है कृ भू और अस् धातुका रूप परे रहते । और उस चिके होनेसे अकारात शब्द ईकारात तथा ह्रस्व इकारात और उकारात दीर्घ इंकारात, ऊकारात होजाते हैं। जैसे अकृष्ण कृष्ण करोति-कृष्ण+च्चि (च्चि इत् होनेसे नहीं रही तो) कृष्णxकरोति= कृष्णीकरोति। असाधु साधुर्भवति–साधू भवति ३' कुछ कम' अर्थमे कल्प, देश्य, देशीय प्रत्यय होते है। ४-५-न्याय आदि कुछ शब्दोसे 'जानना या पढना' अर्थमें इकण और मीमासा आदिसे अक प्रत्यय होता है। ६-अचेतन पदार्थवाचीशब्दोसे 'समूह अर्थमे इकण होता है। ।
१ संस्कृतप्रवेशिनी। १७५ कर्मण्याः, गणीयः, यौवराज्यं, नार्पत्यस्य, मौर्येण. स्थौल्यं, हस्त- मात्रं, शिरोदघ्नं, आढ्यतराय, पंडिततमान, शुक्लीकरोति, गुरू- करोति, सत्यकल्पं, नृपदेशीयं, सुंदरीभूतं, पंडितकल्पस्य । समासयुक्त पद। (तत्पुरुष, बहुव्रीहि, द्वंद्व ) शय्यागता रोगिणः कंदंति-शय्या पर लेटे हुये रोगी रोते हैं। सुखप्राप्ता देवाः क्रीडंति-सुख को प्राप्तहुये देव क्रीडा करते हैं। धर्मश्रिता श्रावका जिनमर्चति-धमात्मा श्रावक लोग जिन भगवानकी पूजा करते हैं। २ माषोनमपि तत् न ग्राह्य-वह मासे भर कम भी न लेना चाहिये। आत्मकृतं कर्म कस्मै न रोचते-अपना किया हुआ काम किसे अच्छा नहीं लगता। परशुच्छिन्ना लता अम्लायत्-कुठारसे काटी गई लता मुरमा गई । ३ कुंडलहिरण्यं मंक्षु आनेयं-कुंडलके लिये सुवर्ण गीघ्र लाना चाहिये । प्रजाहित राजमिः कार्य-राजाओंको प्रजाका हित करना चाहिये । पित्रथ पुत्राःप्राणानपि त्यजेयुः-पिताके लिये पुत्रोंको प्राण भी दे देने चाहिये। ४ वृकमीतोऽजशिशुरवदत्-भेडियासे डरा हुआ वकरीका वच्चा बोला। मृत्युभयं सीन् तुदति-मृत्युका डर सवको दुख देता है। १-दो या दोसे अधिक पदोसे विभतीका लाना समास है। [२२पृ देखो] उसके मुख्य चार मेद हैं-अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि, और द्वंद्व । जिन दो पदोंके समाममें पहिलेके पटका अर्थ प्रधान न होकर दूसरे पदका अर्थ प्रधान हो- ता है वह तत्पुरुष समास कहलाता है और प्रथमपद यथाशास्त्र द्वितीयात आदि 'विभक्त्यंत विग्रह्म रहना है जैसे शय्या गता शय्यागता , मषेण ऊनः माषोनः, कुंडलाय हिरण्यं कुडलहिरण्यं, वृकाद् मीत -वृकमीत , मोक्षस्य मार्ग -मोक्षमार्गः, दाते निपुण द्यूतनिपुण ।
१७६ सनातनजैनग्रंथमालायां- ५ मोक्षमार्गस्य नेतार-मोक्षके मार्गके नेता, कर्मरूपी पर्वतोंके भेदने मेत्तारं कर्मभूभृतां वाले और समस्त तत्त्वोके ज्ञायक ईश्वर सातारं विश्वतत्वानां-को उसके गुणोंकी प्राप्तिके लिये वंदे तद्गुणलब्धये ।-मैं नमस्कार करता हूं। ६ तनिपुणा जनाः कठंति-जुएमें चतुर आदमी दुख पाते हैं। क्रीडासक्ता वालका न पठंति-क्रीडामें लगे हुये वालक नहीं पढते हैं । ७ केवलज्ञानमुदियाय तस्य---उसके असहाय[इंद्रियों की सहायताके विना होनेवाला] जो ज्ञान उसका उदय हुआ। नवानं भुज्यतां भो:-अजी ! नवीन जो अन्न उसे खाईये । ८ निपुणेमति पुरुष कथयामासैव-निपुण बुद्धिवाले मनुष्यने ऐसा कहा। त्रिकालगोचरं द्रव्यं स हि जानाति पश्यति-तीन काल में गोचर निस के ऐसे द्रव्यको वह जानता वा देखता है। [जिसने ऐसा वह वहासे लौटा । पराजितपरविभवः स ततो न्यवर्तिष्ट-हराया है दूसरेके ऐश्वर्यको ९ रामलक्ष्मणौ वनमगाहिष्टां-राम और लक्ष्मण दोनोने वनमे प्रवेश किया। धवखदिरौ छिधि-धव और खदिर को काटो। हुये देखे। हंसचक्रवाकास्तत्र परिभ्रमंतो दृष्टाः-हस और चक्रवाक वहा घूमते नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- पाशपाणिः, हितबुद्धिः, सपरिवारः वीहियवान, जीवादीन् कर्मरता:, दुःखातीतस्य, रथदारुः, राजपुरुषेण, गोक्षीरं, पुराण- पुरुष, कृष्णतिलान् , क्षत्रियभीरुः, पंचगोधनः । ॥ समाप्त ॥ १ जो विशेषण और विशेष्योका समास होता है उसे कर्मधारयनामक तत्पुरुष बोलते हैं । जैसे-केवलं च तत् ज्ञान च [ केवल जो ज्ञान] केवलज्ञानं । २-जिससमासमें समस्तपदोंसे मिन्न पदका अर्थ प्रधान रहे उसे बहुव्रीहि कहते हैं। जैसे-निपुणा मतिर्यस्य-निपुणमति , यहापर निपुण और मति दोंनो पदो का अर्थ गौण है और अन्य पदार्थ जिसकी कि बुद्ध निपुण है वह प्रधान है तो इसे बहुव्रीहि समझना । ३ जिसमें कि समस्त समासमे आये हुये पदमुख्य हों उसे द्वंद्व कहते हैं । रामश्च लक्ष्मणश्च रामलक्ष्मणौ ।
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Inmamimm - - . बड़े हरिवंशपुराणजीका -अतिशय मनोहर हिंदी भाषानुवाद-(वचनिका) यद्यपि इस इरिवंशपुराणजीकी स्वर्गीय पंडित दोलतरामजी कृत वच- निको दो बार छप गई है परंतु यह वचनिका जयपुर प्रातकी ढूंढाड़ी भाषामे होनेसे सर्वसाधारण भाइयोके व गुजराती महाराष्ट्रीय जैनी भाइ- योके समझमें नहिं आती इसके सिवाय उस वचनिकामें मूल सस्कृतके सैकडों श्लोकोका अर्थ छूट गया है । इमलिये हमने प्राचीन ४' प्रतियोंसे मिलाकर प्रत्येक श्लोकका अक देकर यह अविकल सपूर्ण १३ हजार श्लो- कोंका नया अनुवाद कराया है । इस अनुबादकी भाषा बहुत सरल और मनोहर लिखी गई है। इस ग्रंथमे जिनमतके समस्त उपदेश व-पदार्थोके स्वरूप जगह २ बडे विस्तारसे सरलताके साथ बताये गये हैं। पुराणोंमें इस पुराणकीसी उपयोगिता किसी भी अन्य पुराणमे नहीं है इसीलिये ही इस सस्थाने इतना परिश्रम व द्रव्य खर्च करके इसका यह सर्वप्रकारसे नवीन सस्करण वा जीर्णोद्धार कराया है। अतएव समस्त जगहके जैनी भाइयोको चाहिये कि इस प्रथकी एक एक प्रति मगाकर इसका स्वाध्याय कर । जिन्होंने पहिलेका छपा हरिवंशपुराण मगा लिया है वा जिनके यहां हायका लिखा मोजूद है वे भी इसकी एक एक प्रति अवश्य मगाकर देखे और पहिली वनिकासे मिलान कर देने कि इसमे कितना परिश्रम करके कसा अच्छा अनुवाद किया गया है। प्रत्येक प्रामके मदिरजीमे इसकी एक प्रति अवश्य मगा लेना चाहिये ।' यह तो सबको मालूम ही है कि यह सस्था और २ दुकानदारोंकी 'तरह प्रथोंमे नफा लेकर धनसग्रह नहि करना चाहती किंतु दानवीरोकी उदारतासे जो धन प्राप्त हुवा है वह ज्योका त्यों रह कर ग्रंथोंका उद्धार व कुछ २ अजैनी पंडितोंमे विना मूल्य प्रचार होता रहै इसलिये लागतके ऊपर ऑफिस खर्च मात्र चढाकर बहुत सुलभ मूल्यसे अथ देती है सो आज . कल कागज छपाई महगी होनेपर भी इसका मूल्य सस्थाके पक्के प्राहकोंको ४॥) रुपया है और अन्य सर्वमाधारणको.६) रुपया है।' मगानेका-श्रीलाल जैन मत्री-भारतीयजनसिद्धांतप्रकाशिनी सस्था, ९ न० विश्वकोपलेन वाधवाजार कलकत्ता । , V - 1
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