Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mahaveer Stuti Vatere

Gopaldas · 2011/07

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प्रस्तावना. - आ पंधनी प्रथमावृत्ति संवत रएनी सासमां उपाधी हती, ते ढूंक मुदतमा खपी गइ हती. त्यार पठी तेनी घीजी आपत्ति गुजराती लीपिमां संवत १९५१ नी सालमा उपाधी हती, ते पण पूर्ण थवे. दासमां घणा गृहस्थो तरफथी ते चुक शास्त्री सीप मां पारवानी सूचना घयाथी था त्रीजी थात्ति शास्त्री लीपिमां पावी. प्रथमावृत्ति करतां श्रा धीजी थावृत्तिमा दररोज पांचवामां नहि थावतुं धीमहावीरस्वामीन कच रित्र अने श्रीदशवकालिकसूत्रनुं चोथु अध्ययन ए ये विषयो कमी फस्या दे. मादको, थाप जाणता तो दशो के, मुंवना नि र्णयसागर तापखानामां अमदावाद करतां पामणी नो नाव घमणो से ,तो ते प्रमाणे घमणो जाय थापी था श्रीजी थावृत्ति उपरना छापखानामांव पावी ; उतां पण प्रथमावृत्ति करतां वे थाना किम्म त उठी करी मात्र चार थानाज किम्मत राखी तेर-

२
श्रा त्रीजी थात्ति पनती रीते पूर्ण कालजी रा
खीने सुधारी ठे, उतां को ठेकाणे थशुद्ध जणाय
तो पंमित पुरुपो सुधारीने वांचशो एवी श्राशा दे.
किंबहुना!
लि. शा. क. गो.

: ॐ असिआउसाय नमः महावीरस्तुति विगेरे. तत्र भयम मंगलाचरण रूप नमस्कार मंत्र प्रारंभः नमो अरिहंताणं, नमो सिसाणं,नमो आयरियाणं, नमो उवझायाणं, नमो खोए सब साहूर्ण. अत्र नीतियांग श्री सूयगडांग सूचना प्रथम श्रुतस्कं धनुं वीरस्तुति नामे उई अध्ययन मुस, थर्थ, नावार्थ भने कथा सहित प्रारंजिये ठीए. (काम्यम्.) पुहिस्सुणं समणा मादणा य, श्रागारिणोया परतिहिया य॥ से केणेगंत-दियधम्ममाहु, अलिसं सासमिफयाए ॥१॥ थर्थः-श्री सुधर्मखामी प्रत्ये, जंवूखामीए था भकारे पूज्युं के, हे जगवन् ! (समणा के) श्रमणो मारणा के०) ब्राह्मणो (य के०) वली (थागारिणो

३
या के०) गृहस्थो (य के०) थने (परतिष्ठिया के०)
परतीर्थयो; ए सर्वे मने (पुठिस्सुणं के०) पूढे ठेके.
(से के०) ते (एगंत के) एकांत (हिय के०) ।
कारक, तथा (अणेविसं के०) एना जेवो वीजो क
ठे नहि एवो, जे (धम्मं के०) धर्म, ते (सास :
याए के०) साधुसमिक्षाए एटले यथास्थित तत्त्वा
ने करी (केश्ण के०) कोणे (श्रादु के०) कह्यो ?॥
जावार्थः-पांचमा गणधर श्री सुधर्मखामी प्रर
जंवूखामीए था प्रकारे पूव्यु के, हे जगवन् ! स
मुनिराजो, ब्रह्मचर्यादि अनुष्ठान करनारा ब्राह्मए
क्षत्रियादिक गृहस्थोथने शाक्यादिक (तापसादि
थन्यतीर्थियो, ए सर्वे मने पूर्व के, ते एकांत
कारक, एना जेवो चीजो को वे नहि एवो थने
गतिमां पडता जीयोने धरी राखे एवो धर्म, यया
त नत्वाने ययवा समताये करी कोणे कह्यो
ते धर्म श्री महावीरदेवे कयो छे, परंतु ते महावीरस्व
ना गुणो केवा हना ? ते संबंधी जयूस्वामी पृच्छा करे
कदं च नाणं कदं दंसणं से,
सीलं कई नायसुयस्स यासी।

जापासितं निग्य जदानंदे, प्रदासुपं वृद्धि जहाणिसंतं ॥५॥ पी-(म पं० ) ते (नामुपग्स 10)पुन महापौर दिनु (नाणं पं.)मान (कादं फ०) (धामी २) दन (प.) पसी (रणं .०) न (ड) मे एर्नु ? घने (मी पं.०) याचार पदं पद) प.यो दनो से (निरकु ०) निष्ठा ! मर्म जदाराहाण में) ययातच (जावासिणं ..) जायो हो, से (प्रदानुयं प.०)जम सांगव्यु होय थने सां नसीन (जहाधिसतं .०) जेम पारो दोय, सेम : पहिये.. ) फलो. ॥२॥ । भावार्थ:-तेशातन धप्रिय शिरोमणी सिद्धार्थ गाना पुन धी पमानन्सामीप विशेष प्रकारे ज शापनारंशान घे.पी रीते संपादन फर्ष ? अथवा ते कान. सामान्य व्यर्पने जणायनारं दर्शन थने यम नियम रूप याचार, तेमनो फेयो हतो? ते दे श्रीमु धर्मसामिन्! श्राप सम्पर प्रकारे जाणोतो, तेजेम सां नायु होय, सांजसीने हदयने विपे धारण कर होय घने जेम दी होय, तेम कृपा परी प्रकासो. ॥२॥" ग (४) एवी गने पूछवाथी सुधर्मस्वामी, श्री महावीर देवना गुणो वर्णवे छे. खेयन्ने से कुपले महेमी, अणंतनाणीय अगंतदंसी। जमम्मिणी चकुपनयिम्म, जाणादि धम्मं च घिउंच पेढी ॥३॥ थर्थः-(मे के०) ते (संयन्न के0) संसारी जीगोन खेद(कु.व ना जाण गया,तथा कुमो के कर्मने विद रवामां निपुण पवा.नयाः महेन। के०)म्होटा शपीश्वर गया,तथा(थणंननाणी के०) यनंतहानी (य के)तथ (थर्णतदंसी के०) थनंतदर्शि एवा,नया (जसस्सिण के०) मंपूर्ण यशस्वी गवा थने ( पसुपदाध्यिम के०) सोकोने दृष्टिगोचर थयथा सोकने नाचून एवा श्री महावीर देय, तेमना प्ररूपेला (धम्म के । धर्मने (च के०) तथा, तेमनी (विज्ञक) धिरजने हे! तुं (जाणादि के०) जाण (न के) ने (पट्टी के०) देय अर्थात् बिचार. ॥ ३ ॥ नाचार्यः-ले नात्रीनश्यतिशये करी विराजमान न गर्वन (वयन के०) पदमट गंसारीजीयोना फर्म अंपायची व पालापन जाणीने नमने उप सपटासदाने सग, अपया (गय 2) पदो मारमपम्पने जाणनाग, समया ( गोपाई क) प्रातः पटले सोमप्रने सोपना मापने नायनारा, परफर्म रुप पुराने नागपात प्राणियोनां फर्मने पापी नांग्या म निपुण, उप सपर्या कारवापीचन गाट परिस তো परवाची म्होटा स्पीश्वर, तपा पानांतरे पर गयो पाप तेथी ) नरयना दी हिनदि पण शिम युधियान्. तपा पंपस हमान ने पंचसदन परी युग एपा गयंतनोन र थने असुर लोपामां जश व्यापी रयो, माटे पशवी तपासोकोने टिगोचर थपात फेरसता पचीनी अयस्याने प्राश्नीने नगपंतने सोको दे ली, प्रथया सोफोना अंतर्गत नापने प्रका श पर है. माटे पहसमान; एवा श्री मदापीर देय, मना मंगारमांधी उकार करनारा भुत चारित रू. र धर्मन,तथा देवादि मृत पसन्धी पण से नहि एवी तेमनी धिरजने हे जंच ! तुं जाण श्रने पाणी 'ज सूक्ष्म बुद्धिधी विचार. ॥३॥ 14 .

(६) कमी पण गुधर्मगामी भगांरामा गुणो कहेले. उ अदेयं तिरियं दिसासु, तसा य जे धारर जेद पापा । से नियणिोदि समिम पन्ने, दर धम्म समियं उदाटु ॥४॥ -(क) TM (पहेयं फे०) यापोट (artin) नामि, प्रण (दिगामु के०) दिशाः Fritirio) (मगा 20 ) प्रग (20) {ria) (गार के) स्थायर (पाणा 20- Friनाने (गे) (प.) प्राशन यदि) निग्मानिणद (गणि के मारे जाणी (दीप)' मान नपा (निर्ग 2.0) गगनाती गो' (Araj. ने (वादक) का AITri: अषी श्रागिरि मोरोमांप्रग योग मनान प्रान श्रीमदानी ना निपानियोगटार Fi नंगी (०) ने प्रसार गमुडमां सूना प्राणियोने जीप समा प्रपा पदार्थना गार प्रगट करवापीदीश মান ন শাসিথ মন্ত্রী খন শুয়া तोप पुग्पो प्रत्ये पायो . ॥ ४ ॥ पी से भारत कया हाले पन्हे जे. से सपदंसी अभिनयनाणी, णिरामगंधे विमं ग्यिप्पा ।। अणुत्तरे सब जगंसि विक, गंया प्रतीते प्रनये महाक ॥५॥ अर्थ:-(रो पा०) ते नगपत (सपदंसी के०) सर्य सिएपा, नथा (अभिनयनाणी 2) परिसद जी ने ग्रास पार्नु मेयलझान जेमणे गया, तथा (णि मगंध फे०) मृत थने उत्तर गुण विशुभ संयम पा अनारा पयानया (विमं 2.6) धर्ययंत एपा तथा (वि पप्पा.) स्थित धयोटे थारमा जेमनो एवा तथा (स • समभाषी धर्म कहा, सेर्नु कारण ए से, श्रीपी सराग द्रव्यपान् गधा गरिय माणसोने एक सरणी या जोधी उपदेश देता ता.कारण, से एकांत प्राणियोना हितने or নাকাে, বামনী ধূলা ফায়া* () व जगंसि के०) सर्वजगत्ने विपे(श्रणुत्तरे के) निर मप्रधान (विडं के.) ज्ञानवान एवा, तथा (गंथा के परिग्रह यकी (अतीते के०) रहित एवा तथा (श्रत के०)नये करी रहित एवा अने(श्रणा के०) चार तिना श्राउखाथी रहित एवा श्रीमहावीर देव हता. जावार्थः ते जगवंत सर्वदर्शि एटले लोकालो ना जावने देखनारा, मतिझानादि चार ज्ञान म्होटुंजे केवलज्ञान, ते वावीश परिसहने जीती प्राप्त कलुं ने जेमणे एवा, मूलोत्तर गुण संयमना, लनार, असह्य परीसह उपसर्गने सहन करवा धेर्यवान्,समस्त कर्म नाश पामवाथी स्थित थयो थारमा जेमनो एटले निर्मल आत्मावंत, सर्व तुने विषे निरुपम ज्ञानवान् अर्थात् सर्व जगत रहेला पदार्थोंने हाथमा रहेला थामखानी पेठेत पनारा, व्यादि वाह्य ग्रंथ श्रने कर्मादि धान्यंत, ग्रंथ ए वे प्रकारना ग्रंथथी रहित, तथा इहलोका नय, परलोक लय, थादान जय, अकस्मात् नयब- वेदना नय, अपकीर्ति जय थने मरण नयाए सातो प्रकारना जयश्री रहित थने देवता, मनुष्य, तियंचय तथा नारकी ए चार गतिना थानखाथी रहित ए, से पाली नागडे फर्म कर धीज जेमणे एवा श्री दापीर देय हता. ॥ ५॥ सेनापने अगिएप्रचारी, देतरे धीरे अर्णतयम्॥ अणुतरे तप्पा रिएवा, यहरोयर्णिदेव तमं पगासे ॥६॥ सर्पः-(से फे०) ते जगवंत (परो फे०) थ न शनवान् गया. तथा (यपिण्यचारी के0) विध पिटारी एषा, तथा (उदंतरे को०) संसार ताजने तरनार एवा, तथा (धीरे फे०) धिरजवान् तथा (थपंतररफुफे०) अनंतदान रूप वाले शेने पपा, ते (सरिगया के०) सूर्य जेम (थणुत्तरे सर्वधी अधिक (तप्पश्ये) तपेठे, तेम जगवं पण शाने परी सर्वोत्तम . पसी (परोपण के०) रोचन थपिते जेम सक्षगयाधी (देय के०) भनी वे (तम फ०) थंधकारने दूर करी (पगासे के) काश करे ठे, तेम नगवंत पण थाहान रूप थंध भरने दूर करी यथास्थित तत्वने प्रकाश फरे .६ जावा चली ते भगवंत थनंत ज्ञानवान् थथवा -- सर्व मंगनी मिमां कुगल. अप्रनिबंधपणे विद करवानी चे याचार मनो एवा मंमार ममः तरनार, बुजिये की विराजमान अथवा परी अने उपसर्गने सहन करवाने समर्थ.अनंता वा योग्य पदार्थने जाणुनाग अथवा अनंत ला रहेला पदार्थने प्रकाढा करनाग पटले अनंत ? रूप चकुना धरनारतं मर्य जेम मधी या तप ने. तेम नगवंत पण जाने की सोनम वली वैगचन अग्नि ने जम मलगवाथ। उनी अंधकारने करी प्रकाश को . तम श्री वीर देव पाग थकान कप अंधकारने दुर करी । स्थित तत्त्वने प्रकाश करे . ॥ ६ ॥ अणुनरं धम्ममिणं जिणाणं, ऐया मुणि कामव आमुपन्ने ॥ इंदेव देवाण मदाणुनावे, सहस्सणेता दिविणं विसि ॥७॥ थार्थः-(दिविणं के०)देवलोकने विपे (ईदेव के इंजेम (देवाण के०)देवोमां (महाणुनावे के हा प्रजावयान तथा सामसोताना समुजपाशा(मोरहित मागमणिED) माया प्रम(Eataniमए (पा6ि) धर्म, रोने (पा) - पाता फरमाग (कामया) फायपगोत्रीने वापर प.०) परमानी एपा (मुणि ०)मा - पगान पुनि पपंधी सनम रे.॥3॥ नावा:-ऐपतीपने विप जेम ऐपोमा महा • मापन. एमागे पेयोनो नाप ने ler नया पणादियमशेषम मधील दापसानी विगरे नीधपरोए प्रपंडा मानन प्रभाग फारनाग फारसपगोत्री ने : श्री पर्फगानपानी पर्प परी मो.un से पमया प्रकार सागया, मदोददिवाचितपारे।। श्रणालेया परमा निग सोय देवादिया मं ॥ ५ यर्थ:-( ) गन (पारा करी(थरकाप पं.)यदा एपा.

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(१३) परणादि कर्म बंधनना बजावथी मुक्त एवाथनेक गुण युक्त तथा देवतानो स्वामीजे शकेंप्रतेनी पेठेतेजखी एवा श्री महावीर देव दे.॥७॥ से पीरिएणं पडिपुन्न विरिए, सुदंसणेवा एगसब से॥ सुरांखएवासि मुदागरे से, विरायए रोगगुणोववेए॥ए॥

(२)
नामे म्होटो समुफ.ते जम (श्रागनपार के०) अर
श्रपार थने (श्रणाश्वेया के०) निर्मल जल वालो
तेम नगवंतनुं ज्ञान पण निर्मल . वली ते नगर
(थकसा के०)कपाय रहित एबा.नया (जिरकृ के।
निक्षाये श्राजीविका करनारा एवा श्रने (देवाहिक
के) देवतानो अधिपति जे (सकंव के०)शर्के,ते
पेठे (अश्मं के०) तेजस्वी एवा श्री महावीर देव
जावार्थः-ते जगवंत बुद्धिये करी अक्षय एटले
णवा योग्य पदार्थने विपे कालथी सादि अनंत,
अव्य, क्षेत्र थने नावधी अनंत एवी केवलज्ञान
बुद्धि, तेणे करीने अक्षय एवा,हां सर्व रीते ते
लतुं श्रावे तेवा दृष्टांतना अनावयी,फक्त एक
दृष्टांत कहीए जीए.जेम स्वयंनूरमण नामे म्होटो
मुड ते विस्तीर्ण, गंजीर थने निर्मल जलवा
मजगवंतर्नु हान पण विस्तीर्ण,गंजीरथ
रूप मलना थनावथी निर्मल ठेवली ते जगचं,
परहित, जो के समस्त अंतराय कर्मने क्षय करार
त्रैलोक्यने पूज्य ते, तथापि निक्षाये थाजीविका कर्म
बक्षीणमहानसी प्रमुख सब्धिने प्रयुंजता:
तथा (पागंतरे मुफे एवो पारने तेथी)हानी

(१५) हजार जोजन (देव) नीनो प्वीमां ॥१०॥ जाग-ते मेरुपर्पत एक साख जोजननो, सेना एक मिमय, बीजो सुपर्णमप थने घीजो मूर्यरत मय एया प्रण कांग, तया ते मेरुपर्वतनी टोचक पर पंगफ वन धायी रj ठे,ते जाणे तेने बजाज होय नहि ! तेयु दीपे . पली ते मेरुपर्पत नयाणु र जार जोजन उंचो थने एक हजार जोजन नीचो भूमिमय कंद रूपे ठे. ॥१०॥ पुढे पने चिमिवहिए, जं स्त्रिया अणुपरिवयंति॥ से देमवन्ने बटु नंदणे य, जंसी र६ वेदयंति मदिंदा ॥११॥ यर्थः-बली ते मेरुपर्वत (णने के०) थाकाशने पु के.)फरशीने ( चिके०)रयो,तथा(भूमि हिए के)मिने थवगाही रखो ,पली (जं के०) मेरुपर्यतनी याशपाश (सूरिया के०) सूर्य प्रमुख णुपरिवयंति के०)प्रदक्षिणा करी के०)ते मेरुपर्वत (हेमवन्ने के)सु जातो.(य के०) वली,ते मेरुपर्व

वली तेऊपर साडीवाशपहजार जोजन उंचा चढीये,
तने विपे (बहु के०) घणां एटले चार (नंदणे के)नं
दन वन वे (जंसी के०) जेने विपे (महिंदा के०) म्होटा
इंसो पण (रइंके०) रतिसुख (वेदयंति के०) वेदे .११
जावार्थः-वली ते मेरुपर्वत थाकाशने फरशी र
हेलो, एटले व्यापी रहेलो वे अने नूमिने श्रव
गाही रह्यो ठे. ए रीते ऊर्ध्व, अधो श्रने तिर्यक्लो
कने फरशी रह्यो वे.वली जे मेरुपर्वतनी थाशपाश
अगीयारशेने एकवीश जोजनने श्रांतरे सूर्य प्रमुख
ज्योतिषी देवो प्रदक्षिणा करी रह्या वे. वली ते मेरु
पर्वत तपेला सुवर्णना जेवी कांतिवालो वे श्रने ते
मेरुपर्वतने रमणिक एवां नंदनादिक चार वन
तेनुं वर्णन कहीए वीए.
नूमि ऊपर नशाल वन , त्यांची पांचशे जोजन
ऊंचा चढीए, त्यां मेखलाने विपे वीजें नंदन वन ,
त्यां त्रीजु सौमनस वन , वली पण तेना ऊपर
उत्रीश हजार जोजन ऊंचे शिखर ऊपर चोथु पंगक
वन ; ए रीते ते मेरुपर्वत नंदनादिक चार वन सहि
त विचित्र प्रकारनां कीडा करवानां स्थान युक्त के
जेने विपे म्होटा इंसो पण देवलोकमांथी श्रावीने

अधिक रमणीय गुणपडे रतिसुखने नोगवे ठे. ॥ ११ ॥ से पाए सह महप्पगासे, विराय कंचरामचन्ने ।। अगुत्तरे गिरिसु य पदग्गे, गिरिवरे से जलिएव नोमे ॥ १२ ॥ थर्थः-पक्षी (से के०) ते (पहप के) मेरुपर्वत (सद के०) सोल शब्दे (नामे) करी (महप्पगासे के) महा प्रकाशवान् (विराय के०) शोने है, वही ते मेरु (कंचमहवझे के०) सुवर्णनी पेठे शुरू वर्णवालो, तया (गिरिसु के०) पर्वतोमा (थणुत्तरे के०)प्रधान (य के०) तथा (पघग्गे के) मेखलाए करी विपम थने यसी (से के०) ते (गिरिवरे के०) गिरिराज, मणि बने थोपधियोए करी देदीप्यमा न , तेथी (जोमे के०) जमीननी पेठे (जखिएव के) जसजसायमान थ रह्यो . ॥ १२ ॥ भावार्थः चली ते मेरुपर्यत १ मंदर, २ मेरु, ३ मनोरम, ४ सुदर्शन, ५ सयंप्रन, ६ गिरिराज, र लोचय, तिलकोपम, ए लोकमध्य १० लोकनाजी, ११ रन, १५ सूर्यावर्त, १३ सूर्यावर्ण, १४ - - Amir गिरिंगजनाने Emm के ) परंतनो १. (पनोरम केस) Fe) अमापया ? म श्री महावीरवामी, - ( जसों के )जो करी : करी (नाग के) ज्ञाने करी अने मारेकरी प्रधान कहेवाय ते.॥१४॥ जश मेक गिरिराज नामेन्टोटाप Frॉक मे पतनी उपमाये * हानपुत्र श्री महा मी जातिये, ने. शाने थने थ' पर यक्षा सोकोची, कोमोगी, मने दर्शनि- सर सदाचारी पुरपोर्ट पुरुषा- म

(20)
एतोवमे समणे नायपुत्ते,
जाई जसो दंसण नाण सीले ॥२४॥
अर्थः-(जसो के०) था जश (सुदंसणस्सेव
गिरिस्स के०) सुदर्शन एटले मेरु गिरिराज नामे
(महतो के०) म्होटा ( पचयस्स के०) पर्वतनो
(पवुञ्चई के०) कहेवाय . ( एतोवमे के) ए पू
वोक्त मेरुनी उपमाये करी(समणे के०) श्रमण एवा
जे ( नायपुत्चे के) ज्ञातपुत्र श्री महावीरस्वामी,
ते (जाई के०)जातिये करी ( जसो के)जशे करी
(दसण केय) दर्शने करी (नाण के०)झाने करी थने
(सीले के०) आचारे करी प्रधान कदेवाय ते. ॥१४
नावार्थः-था जश मेरु गिरिराज नामे म्होटाप
वैतनो कद्देवाय , ए पूर्वोक्त मेरु पर्वतनी उपमाये
श्रमण जगवंत शातपुत्र श्री महावीरखामी जातिये,
जशे, दर्शने, ज्ञाने थने याचारे करी एटले
उत्तम जातिवाला सोकोथी, यशस्वी पुरुषोधी,
कीर्तिवान् खोकोथी, सर्व दर्शनियोथी, सर्व ज्ञानी
चीने सर्व सदाचारी पुरुपोथी उत्तम एटले प्रधान
कदेवाय ते. ॥ १४ ॥

(२१) गिरिचरया निसदो ययाणं, रुपएप से बलयायताणं, तउपमे से जगनूश्पन्ने, मुपीण मने तमुदादु पन्ने ॥ १५ ॥ अर्थः- (पयाणं के०) खांपा पपंतोमा (निसदो 0) निपप नाम ( गिरिपरेवा ) पर्पत जेम सर्पधी म्दोटो , तम ज(वसयायताणं के०) गो साफार पर्वतोमा ( रुपएच के०) रुचक पर्यत, जेम (सं०) श्रेष्ठ ते. तेम श्री मदापीर देव पण (त उपम पं.०) ते उपमा युक्त ठे. ए प्रकारे (से फे०) ते नगवंत श्री वीरसामी(जगनूइपने पे०)जगतूने विपे पणीज प्रसिक प्रशापडे करीने श्रेष्ठ फया वे, तथा (मुषीण मते फ०) सर्य मुनियोनी मध्ये (तं के०) ते जगपंतने (पने के०) प्राज्ञ (उदानु के०) कह्या ठे. नापापः-जंयूछीप तथा थप छीपोना सांपा पर्य तोमा जेम निषध पर्यंत सर्पथी म्होटो , तेमज गोसा फार पर्पतोमा जेम रुचक पर्वत सर्पथी श्रेष्ठ, तेम श्री महावीर देय पण ते उपमायुक्त एटसे सांयपण' मायने गोलाकारमा यर्थात् संघयण,संस्थान या (२२) मानोन्माने करीमग्री श्रेष्ठ प्रकारे ने नगवंत श्री महावीरखामी जगन्ने विण घाणीज प्रमित प्रशा ये करीने श्रेष्ठ कन्या ठे, नया मय मुनियोनी मध्ये ते जगवंतने, सर्वयी उत्कृष्ट कानवान कन्या ठे. ॥२५॥ अणुत्तरं धम्म-मुईना, अणुत्तरं जाणवरं कियाई॥ सुसुकसुकं अपगंगसुकं संखिज्वेगंतवदातसुकं ॥ १६ ॥ थर्थः-वली ते जगवंत (अणुत्तरं के०) प्रधान एवो जे (धम्म के०) धर्म, तेने (उरश्ता के०) प्रकाशीने (अणुत्तरं के०)प्रधान एवं,तथा (सुसुकसुक के०) मुं दर उज्वलमां उज्वल एवं, तथा (थपगंमसुकं के) दोप रहित उज्वल एवं, तथा (संखिंव के.) शंख अने चंजमानी पेठे (एगंतवदातसुकं के०) एकांत न ज्वल ए, अने (फाणवरं के०)सर्व ध्यानमा प्रधान ए बुं जे शक्तध्यान, तेने(फियाई के०) ध्याय ते. ॥१६॥ जावार्थः तेन्नगवंत प्रधान धर्मने प्रकाशीने सवों त्तम, सुंदर उज्वलमां उज्वल, दोप रहित अर्जुन सु वर्णनी पेठे उज्वल अथवा पाणीना फेण सरझुं उज्व . (२३) स, तपाव चनेप्रमा सरगं एकांत उम्पस यो सर्प ध्यानमा प्रधान जे पान. तेने करसज्ञान ग्राम पया पनी श्रीमहावीर देय, योग निरोधने घर मरे सूधनकापयोगनो निरोध करता सता, शुमच्या ननो प्रोजो नंद जे मुश्नक्रिपथप्रतिपात नामे थने यांग रुंधाया पठी गुगप्पाननो घोषो जेद जे व्युप रतक्रिय यनिन नामे, ए रीते ये दे प्याप ठे. अणुत्तरग्गं परमं मदेसी, असेसकम्म स चिसोदश्त्ता ।। सिटिंग साश्मणंत पत्ते, नाणे सीलेण य दंसणेण ॥ १७ ॥ थर्पः-(स के०) ते (महेनी के०)म्दोटारपीश्वर एवा श्री महावीर देव (यसेसफम्मं के०) समस्त मने (विसोदश्ता के.) खपाधीने (नाणेण के०) माने करी (दसणेण के०) दर्शने करी(य के०)वली सीखण के०)चारिने करी (थाणुचरगं के०)सयों म एवा खोफना यमनागे (परमं के०) उत्कृष्ट ए थने (साश्मपंत के०)सादि यनंत जांगे एवी जे सडिंग फे०)सिकिंगति, तेने (पत्ते के०)पाम्या.

(२४) नावार्थः-ते म्होटा झषीश्वर श्री महावीर देव शै शीयवस्थाये शुक्तध्यानना चोथानेदन अनंतरज्ञा वरणीयादिक समस्त कर्मने विशाधीने एटले खा वीने ज्ञान, दर्शन, चारित्र थने दायक समकितेक सर्वोत्तम एवा लोकना श्रग्रजागे उत्कृष्ट सादिय त एटले जेनी थादि , पण अंत नयी एवी पां मी सिद्धिगतिने पाम्या. अर्थात् मोदगतिमां गय वली उपमाये करी भगवंतने स्तवे छे. रुकेसु गाए जह सामलीया, जस्सिं रई वेदयंति सुवन्ना ॥ वणेसुवा नंदण-मादु से, नाणेण सीलेण य नूश्पन्ने ॥२७॥ थर्थः-(जह के०) जेम (रुरकेसु के०) वृक्षोने । पे (सामलीवा के०) शाल्मली वृदा (पाए के० प्रसिद्ध ले (जस्सिं के०)जे वृक्षने विपे (सुवन्ना के सुवर्णकुमार देवो (रई के०) रतिसुखने (वेदों के०) वेदे दे. वली (वणेसुवा के०) वनने विपे, म (नंदणं के०)नंदन वन (सेउं के)श्रेष्ठ (थाइ के) कयुं , तेम (नाषण के)शाने करी (र

iro) (Asfru Mantra
प्राrenin aerire. hapki
नावार्थ- भूमीन xिitter
ruit Treasung Hix pirti
मे
पिम माम मनोहर
ANS यावी ॥४.n: x**
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क (२६) उमा जेम (चंदणं के०) चंदन (मे के०) श्रेष्ठ (थादु के) कडं ठे; (एवं के०) ए प्रकारे (मुणीणं के०) मुनियोमा (थपडिन्नं के०) प्रतिज्ञा रहित एटई थालोक परलोकनी थासंशा रहित एवा जगवंत श्री वीरस्वामी श्रेष्ठ (थादु के०)कह्या वे. ॥रए नावार्थः-वली सर्व जातिना शब्दोंने विपे जेम मेघनी गर्जनानो शब्द सर्वोत्तम ठे, ताराने विपे जे म चंझमा प्रधान , एटले सर्व थंधकारने रनारी कांतिथी मनोरम ठे, गंधवाली वस्तुर्डमां जेम गोशीप चंदन अथवा बावना चंदन श्रेष्ठ क युं , तेम सर्व मुनियोमा थप्रतिज्ञ अर्थात् प्रति झा रहित एटले थालोक परलोकनी थासंशा रहि त एवा जगवंत श्रीमहावीर देव श्रेष्ठ कह्या वे.॥१॥ जदा सयंनू उदहीण सेके, नागेसुवा धरणिंद-माहु सेहं॥ खोउदएवा रसवेजयंते, तवोवदाणे मुणि वेजयंते ॥२०॥ अर्थः-(जहा के०) जेम (उदहीण के०) सर्व समु प्रोमां (सयंनू के०) स्वयंजूरमण समुज (सेठे के०) (२७) श्रेष्ठ फलो , तथा (नागेनुया के०) नागकुमार मांजेम (परपिंदं के०) धरणे (से के०) श्रेष्ठ । के०) कह्यो ठे थने (खोउदएवा के०) क्षो मेि समुष ते जेम (रसवेजयंते के०) रसमांप्रधान म(तयोपदाणे के०) तप उपधाने करी (मुणि वेज के०) मुनियोमा प्रधान श्री महावीरदेव .॥२० जावार्थ:-सर्व समुप्रोमा जेम वयंजूरमण समुह 'जेने विपे स्वयंनू नामे देयो, थावीने क्रीडा करे , तेथी सयंजूरमण समुज नाम पड्युं , वली सर्प पथने सर्व समुसोने यंते फरीबलेलो वयंजूरम ण समुष) श्रेष्ठ कह्यो ठे, नागकुमार देवोमा जेम परणं घेष्ट करो ,जेनुं पाणी शेखडीनारस जेवू ठे वो क्षोदक समुफ, जेम रसमा प्रधान थने ताना गुणवडे सर्प समुसोने विपे ध्वजा समा ते, तेम तप उपधाने करी मुनियोमा प्रधान थ न प्रण जगत्नी थवस्थाने जाणनारा श्री महावीर परमात्मा . ॥२०॥ इचिसु एरावण-मामु णाए, । सीदो मियाणं सलिलाण गंगा ।।

(२०) परिकसुवा गेरुले वेणुदेवे, निघाणवादीपिढ णायपुने ॥१॥ थर्थः-(दृधिसु के०) हायीन विप, जेम ( रावणं के०) थैरावण हायी (णाए के०) प्रथा (थाहु के०) कह्यो ,तथा (मियाणं के०) मृग प्रमु श्वापद जनावरोमां, जेम (सीहो के०) सिंह प्रध कह्यो ठे, तथा ( सखिलाण के) पाणीयोने वि जेम (गंगा के०) गंगा नदीनुं पाणी श्रेष्ठ कह्यु अने (परिकसुवा के०) पदीने विपे, जेम (गेर के०) गरुड पक्षी अपर नामे (वेणुदेवे के०) वे देव प्रधान कह्यो ; तेम ( निवाणवादीपिद के निर्वाण मार्गना वादियोमां. श्रा (णायपुत्ते के झातपुत्र श्री वर्षमानस्वामी श्रेष्ठ कह्या वे.॥१ जावार्थः- हाथीठमां इंजनुं वाहन औरावण । थी, मृग प्रमुख श्वापद जनावरोमां सिंह, जरतदे नी अपेक्षाये अनेक जातनां पाणीयोमां गंगा नदी पाणी थने पक्षीमा गरुड पक्षीयपर नामे वेणुदे जेम प्रधान कह्या ,तेम निवाण एटले मोक्ष अर्था कर्म क्षय थवा, ठे लदाण जेनुं एवा सिझक्षेत्र । O -- (ए) लवपाना उपाय) ना उपदेशकोमा सिद्धार्थ क्षधि ना पुत्र श्री वर्धमानखामी प्रधान कसा . ॥२१ जोदेसु णाए जद चीससेणे, पुप्फेसुवा जद अरविंद-मादु ॥ खत्तीण से जद दंतवके, इसीण सेठे तद वझमाणे ॥२२॥ थर्थः-(जोडेसु के०) योझाउँने विपे (जह के) जेम (वीससेणे के०) विश्वसेन एटले चक्रवर्ती (णाए के०) प्रधान करो तथा (पुप्फेसुवा के०) सोने विपे (जह के०) जेम (थरविंद के०) अरविंद क मल, प्रधान (थाहु के०) कडं ठे थने (खत्तीण के०) . क्षत्रियोने विपे (जद के०)जेम (दंतवके के०) दांतवा शक्य एवो चक्रवर्ती (सेठे के०) श्रेष्ठ कह्यो ठे; (तह के०) तेम (इसीप के) शपियोने विपे ( वझमाणे के०) श्री वर्धमानखामी (सेठे के०) श्रेष्ठ कह्या ठे. ॥२२॥ जावार्थः-पोझाउँने विपे जेम विश्वसेन एटले हा यी, घोडा, रथ थने पायदखवाली संपूर्ण सेनावासो वक्रवर्ती प्रधान कह्यो , फुलोने विपे जेम थर बेंद एटखे सूर्यविकाशी कमस प्रधान कj ठे थ (३०) ने क्षत्रियोने विपे जेम दांतवाक्य एटले जेना वच न मात्रयीज शत्रु उपशांत पामे ते एवो चक्रवर्ति श्रेष्ठ कह्यो ; तेम सर्व झपियोने विपे श्री वर्धमा नखामी श्रेष्ठ कह्या ठे.॥२२॥ दाणाण से अनयप्पयाणं, सच्चेसुवा अपवळं वयंति॥ तवैसुवा उत्तम चंभचेरं, लोगुत्तमे समणे नायपुत्ते ॥२३॥ थर्थः-(दाणाण के) दानने विपे,जेम (थन प्पयाणं के०)थनयप्रदान (सेहं के०)श्रेष्ठ कर तया (सच्चेसुवा के०) सत्य वचनोने विपे, जेर को जीवने पीडा न थाय एवा (थणवऊं के०) नवद्य वचनने श्रेष्ठ (वयंति के०) कहे , तथा वेमुवा के०) तपने विप जेम (यंजरं के०) ब्रह्मचर ने (उत्तम के०) श्रेष्ठ कहुं तेम(खोगुत्तमे के० )स खोकने विपे उत्तम यने (समणे के०)श्रमण एवा(न ययुने के०) झातपुत्र श्री महावीरदेव श्रेष्ट . ॥२३॥ नावार्थ:-जे पोताना थने परना कल्याणने थर्थ देवामांथावे ठे तेने दान कहेवाय ते.ते दान थनेक कारना .तमा पए जीवितना यर्षि प्रापियोनर स्प करपापी घनपदान भेकमुकावे के- दीयो प्रियमाणस्य, कोटि जीवितमेव या॥ पनकोटिन गन्हीयात, सयोंजीरिमिछति ॥१॥ थर्पः-जोमरता माणसने शोर सोनया, थपवा वित मापयामां याये, तो ते मांधी कोड सोने न देता, ते जीवितने जछे .॥१॥ ते कपर चोरनी कथा कहे ते. पसंतपुर नगरने विप धरिदमन नामे राजा राज्य रतो दतो. ते एकदा पोतानी चार राणियोसहित मासने विपक्रीडा करतो हतो. एका थपसरमा रा हाथपालो, गवामां करेणाना फूसनी मालापासो, पता पखवाखो, शरीरे राता चंदनना लंपवालो भने नाथागस हुंमी वागी रही ठे एवा चोरने राजमा विश्जतां राजा थने चार राषियोए दाठो. राणि एचौरने देखीने पूज्यु के, “एणे एई शुं उप्कृत्य सुंक, थाया ट्वास जाय ठे?" त्यारे एक रा पुरुषे कई. "पणे पारकुं धन दपाधी राम्यविरुक नामकमु ते." ते सांगली एक राणीप राजाने विनं करी के थापेमने प्रथम जे वरदान थाप्यु हतुं,

(३२)
ते आज हुँ मागुं हुं माटे ते वरदान थापो.जेपी हुँ
श्राने (चोरने)उपकार करु !” राजाये ते वात कर
करी,त्यारे राणीए चोरने स्नान विगेरे करावी एक ६
जारसोनेया खरची शब्दादिक पांच प्रकारनुं विषय
ख एक दिवस आप्यु.वली वीजी राणीए पण तेम
वीजे दिवसे एकलाख सोनैया खरची सुख थाप्यु.
सीत्रीजी राणीए पण त्रीजे दिवसे एककोड सोनेर
खरची सुख थाप्यु; परंतु चोथी राणीए तो, राजा
थाज्ञा लेइथजयदान वडे मरणथी बचाव्यो. त्य
था राणीनी वीजीवण राणीए मश्करी करीने कर
"तें याने कांश पण अव्य थाप्यु नहीं" ? एम क
याथी ते राणीने माहोमांहे एक वीजाने ते चोर
म्होटो उपकार कोणे कस्यो? ते वायतनो विवाद
यो. ते विवाद नागवा माटेराजाये चोरने वोलाची
पूयु के,"हे नाई! तने वधारे उपकार कोणे कस्यो?
तेणे जवाव थाप्यो के, "देमहाराज ! में मरणनीय
कयीस्नानादिक कांपण मुख जाण्युं नहीं ! परंड
मने यनयनदान एवं सांनलवायी जाणे हुँ फर
थीज जन्म पाम्यो होउं नहि ! एम जाणुं तुं
तेज कारण माटे सर्व दानोमांयनयप्रदान

९. तपासाप पाम्पोने विपे अनपरा एट पा रहित पचन यर्थात् जेपी कोइपण जीवन पादान उपजे, एपा पचनने श्रेष्ठ फ, परंतु जे पचनधी रिजीयने पीटा उत्पन्न पाय,पर्चे पचन जो फनी व्यय हारमा सत्य देखातुं दोप, तो पण परने पीडा उपस ग्याना कारणपी तेने सत्य पचन न ज फदेवाय यात् ते यसप पचन ज कडेवाप. कडुंठे में- लोकेपि श्रूयते पादो, पपा सत्येन कौशिकः ।। पतितो यथयुरो.न, नरके तीवेदने ॥१॥ प्रोफमा एपी फाइवत फे, पप युक्फ सत्य पचन रहे एटो हिंसा युफ सत्य पचन पोखपाची कौशिक नामनो साधुतीय वेदनावाली नरकने विपेगयो! श्दा ते फोशिकसाधुनी कथा संक्षेपथी कदीरीए. : एफदा फोशिक मुनि पनने विपे काउस्सग क रीयानारुट पया इता, तेवामां केटसाएक मृगो तेमनी पासे घश्ने चाख्या गया. पाठलथी मृगने प ध करनारा पारधियोए थावी मुनिने पूज्यं के, “हे मुने! तमे म्हारा मृगोने जता दीग?" ते सांजली पांच पण न योखतां मुनि मौन रक्षा. वक्षी पारधि पोए बीजी पार पुग्यं, तो पण मुनि मौन रखा. ३ ---

(३४)
वटे त्रीजी वार पूव्यु तो पण मुनि न बोल्या,
पारधियोए मुनिने दोरडादिके ताडना तर्जना
री घणी ज पीडा जपजावी!! वली पारधियोए कह
"हे मुने ! हजु पण जो तमे ते मृगोनी जाल वर
वो तो तमने मूकी दइए." एम सांजली ते मुनि व
दिक परीसह सहन नहि करी शकयाथी वोल्या
"हे वधक ! तमारा मृगो था थमुक मार्गे गया !!!"
ज वखत मुनिने पडता मूकी ते पारधियोए जे र
ते मृगो गया हता ते ज रस्ते जश् मृगोने हण्या
वांचनार, जो के, था कोशिक मुनि, व्यवहार
सत्य वचन बोल्या हता, तथापि ते वधकारक वच
होवाथी मरीने तीव्र वेदनावाली नरकने विपे गय
वली पण ते ज विषय ऊपर वसुराजानी कया कहे।
वखापवा लायक एवी शुक्तिमती नगरीमाया
चंड राजानो वसु नामे पुत्र इतो. ते वसुन्दानपा
थी सत्य वचन योजनारो हतो.
हवे तेज नगरीमांसये साखनोजाण क्षीरकद
कनामे उपाध्याय रदेतोहतो.तेने खनावे कुटिल य
शपवालो पर्वतक नामे पुत्र हतो. ते पर्वतक, पसुराज
यनेनीजो नारद,पत्रणे क्षीरकदंयक उपाध्याय सारे

(३५)
पिला इता. एकदा ते प्रापे शिष्य थगाशीमा सूता
1. उपप्पाप पण यगाशीमां बेगे जागे , एयामा
प्राकारा मार्ग चे पारणमुनियो पातो करता चाच्या
जाप , तमांधी एक मुनि पोया के, "था प्रथमां
जण तो, नरफगामी अने एक देवसोकगामी
"ए पाता सोनली उपाध्याय उग पाम्या.
पठी कोण देवलोकगामी अने कोण नरफगामी
तेनी परीक्षा फरया माटे गुरुए जुदा जूदा सो
दना प्रण कूकडा पनायी, प्रपणे शिप्यने पहेंची था
जीने कार्यु के, "ज्यो को देखेनदि, त्यां एने मारी
ने यापजो." पठी पमुराजा यने पर्वतक ए वे जप
तो, जंगलमा जइ कोई एकांत जग्पाये फडानो पि
नाश करीने थाल्या! थनेनारदे तो घणां स्थानक
जोयां, पण क्यादि कोश्न देखे एई स्थानक दीन
ही, त्यारे कडाने पागे श्रायो. ते देखी उपाध्याये
पूज्युं फे,“पाठो केम थाव्यो?" नारदेको.देव,दानव
भने ज्ञानीए सर्वेज्या त्या देखी रहावे, तेमज म्हा
रो थारमा पण देखतो इतो, माटे तमारी थाानो
अंग करी एनोशी रीते विनाश करूं? ते सांजली
उपाध्याये चिंतव्यु के, "या नारद देवलोकगामी
है

(३४)
वटे त्रीजी चार पूव्युं तो पण मुनि न वोल्या,
पारधियोए मुनिने दोरडादिके ताडना तर्जन
री घणीज पीडा उपजावी !! वली पारधियोए
"हे मुने! हजु पण जो तमे ते मृगोनी जाल
वो तो तमने मूकी दइए." एम सांजली ते मुनि
दिक परीसह सहन नहि करी शकबाथी वोल्य
"हे वधक ! तमारा मृगोथाश्रमुकमार्गे गया !!!
ज वखत मुनिने पडता मूकी ते पारधियोए जे
ते मृगो गया हता ते ज रस्ते जर भूगोने हए
वांचनार,जो के, श्रा कोशिक मुनि, व्यवहा
सत्य वचन बोल्या हता, तथापि ते वधकारक व
होवाथी मरीने तीव्र वेदनावाली नरकने विपे ग
वली पण तेज विपय ऊपर बाजानी कथा कहे
वखाणवा लायक एवी
चंड राजानो वसु नामे पुन वसु न्हान
यी सत्य वचन वोखनारो
हवे तेज नगरीमांसर्व
क नामे उपाध्याय रहेतो.
शयवालो पर्वतक नामे पुत्र हता
अनेत्रीजो नारद,ए प्रणे क्षीर'
.

(३५)
माता इता. एकदा ते प्रणे शिप्पथगाशीमा सूता
, उपापार पण अगाशीमां बेगे जागे ठे, एपामां
घारा मार्ग चे पारणमुनियो पातो करता चाया
माप ठे, तेमांची एक मुनि पोख्या के, “था प्रणमां
ये जप तो, नरफगामी ठे यने एक देवलोकगामी
ठे." ए पाता सांगली उपाध्याय उग पाम्या.
पठी कोष देवसोफगामी अने कोण नरकगामी
? तेनी परीक्षा करया माटे गुरुए जूदा जूदा लो
ना प्रण कूकदा पनायी, प्रणे शिप्यने पहेंची या
ने फाएं के, "ज्यां को देखे नहि, त्यां एने मारी
थापजो. " पती पसुराजा यने पर्वतक ए वे जण
, जंगलमा जश कोई एकांत जग्याये कूकडानो वि
रा.करीने याव्या ! यने नारदे तो पणां स्थानक
५i, पणफ्यादि कोईन देखे एवं स्थानक दी न
त्यारे कडाने पाठो यायो. ते देखी उपाध्याये
कि,"पागे कैमथान्यो?" नारदे कगुं.देव,दानव
शानीए सर्वेज्यां त्यां देखी रहाते, तेमज म्हा
गरमा पण देसतो इतो, माटे तमारी याज्ञानो
फरी एनोशी रीते विनाश करूं? ते सांग
पाये चिंतव्यु के, "या नारद १५०

(३६)
तया पर्यनक अने वमुगजा एवे नरकगामी है."
नुक्रमे उपाध्याय श्रायुष्य पूर्ण करी देवलोके गया
एकदा एक याहंडीए वनमां जर कोइ मृगन
अपर घाण नांग्युं, श्रागल जश्ने जोयुं नो. मृग
ठेकाणे स्फाटिकनी शिला दीठी, तेणे श्रावी राज
ने फणुं. राजाये तुरत ते शिला गनी मंगाव
पीठिका मंगायी ऊपर सिंहासन थापी पोते के
पा मांगु. तेथी सर्व लोक एम जाणवा लाग्या
पसुराजा सत्य वचनना प्रनावथी अर वेसे
तेथी सिमाडिया राजा प्रमुख सर्व लोक तेनी से
करवा लाग्या. एटलुं ज नहि पण ते वसुराजा म
प्रतिष्ठावान् सत्यवादी इनवाणो.
एकदा अवसरे पर्वतपर
'मलवा माटे नारद
ग्रामांतरयी त्यां थाली
शुभन्ने जण पोत पोता
मिलीने चेना. तेवा समान शिप्यने तणावतां य
शब्दनो ठग (वोकडा) ना हतो, करवो एयो अर्थ
वैतके कह्यो. त्यारे नारद पाटबके, "गुरुये तो था
एनेनपावतां थज शब्दनों थथे, त्रण वर्षेनी बी।
(मांगेर) कही ठे, तो तमे श्रज शब्दनो थर्थ ग
कैम कहो ठो?" पर्वतके कयुं, "हुंजेयर्थ कहूँ

(३७)
ते खरो, "एम पोत पोतामा विवाद करतां जे खो
टोवरे, तेनीजी वेदी नांखधी, एवी प्रतिज्ञा करी.
ते वखते पर्वतकनी माताये आयुं के, श्रा नारद
कहे, ते पात खरी. माटे हुँ पसुराजानी पासे
पुत्र शिक्षा मागी लेजं. कारण के, वे जण वसुराजा
पाले साक्षी दाखल जपाना . एवं विचारी वसुरा
जा पाते जश्ने कालापाला कस्खा. अनुक्रमे ते बने
जण पाद करतां वसुराजा पासे श्रर्थ पुरवा श्राव्या.
पसुराजाये पण मिश्र वचन पोलीने कj के,
"अज शब्दनो श्रर्थ योकडो पण थाय ! थने ने
दांतरे मांगेर पण धाय ते." एवं सांसतां तेज व
खते देवताये पाट प्रहारे करी रसुराजाने सिंदास
नधी नीचे पाडी नाल्यो ! यावत् ते विपनि पामी म
रीने नरके गयो. पाउस पर्वतक पण थायुप्य पूर्ण
:करी नरके गयो थने नारद शील पाली सत्य पच
निना प्रजावधी देवलोके गयो.
वांचनार सजानो ! वसुराजाये थज शब्दनो जे
योकडो थर्थ करयो, ते जो के, सरो हतो, तो पण
-हिंसाकारक वचन होवाथी सत्य वचन ते, असत्य
प्राय वर्नु थने तेधीज ते नरफने विपे गयो.

ने कह्यु. राजाये तुरत ते शिला ठानी मंगावी-
(३६)
तथा पर्वतक थने वसुराजा ए वे नरकगामी है."
नुक्रमे उपाध्याय थायुष्य पूर्ण करी देवलोके गया.
एकदा एक थाहेडीए वनमा जइ को मृगना
ऊपर वाण नांख्यु, थागल जश्ने जोयुं तो,
ठेकाणे स्फाटिकनी शिला दीवी, तेणे थावी राजा
के
पीठिका मंमावी ऊपर सिंहासन थापी पोते वेस
वा मांड्यु. तेथी सर्व लोक एम जाणवा लाग्या
वसुराजा सत्य वचनना प्रजावथी थर वेसे में
तेथी सिमाडिया राजा प्रमुख सर्व लोक तेनी सेव
करवा लाग्या. एटढुंज नहि पण ते वसुराजा मह
। प्रतिष्ठावान् सत्यवादी इन वाणो.
एकदा अवसरे पर्वतपर अमलवा माटे नारद के
ईग्रामांतरथी त्यां थाय शुगन्ने जण पोत पोताम
मलीने वेवा. तेवा समान प्यने जणावतां अ
शब्दनो वाग (वोकडा)ना, हतोकरवो एवो थर्थ
वैतके कह्यो. त्यारे नारद बाल्यके, "गुरुये तो था
पनेलणावतां यज शब्दनो अर्थ,त्रण वर्पनी बीहि
(मांगेर) कही ठे, तो तमे श्रज शब्दनो श्रर्थ वाग
केम कहोगे?" पर्वतके कडं, "टुंजे थर्थ कहुँ ई
-

:
ते खरोवे," एम पोत पोतामा विवाद करतां जे खो
टोकरे, तेनी जीन वेदी नांखवी, एवी प्रतिज्ञा करी.
ते वखते पर्वतकनी माताये जाण्यं के, था नारद
कहे , ते वात खरी ठे. माटे हुं वसुराजानी पासे
पुत्रनिक्षा मागी लेलं. कारण के, वे जण वसुराजा
पासे साक्षी दाखल जवाना वे. एवं विचारी वसुरा
जा पासे जश्ने कालावाला करूया. अनुक्रमे ते पन्ने
जप वाद करतां वसुराजा पासे थर्थ पूठया थाव्या.
वसुराजाये पण मिश्र वचन योलीने कर्यु के,
थज शब्दनो थर्य धोकडो पण थाय थने जे
दांतरे मांगेर पण थाय वे." एवं सांनसतां ते जय
खते देवताये पाटु प्रहारे करी वसुराजाने सिंदास
नधी नीचे पाडी नांख्यो ! यावत् ते विपत्ति पामी म
रीने नरके गयो. पावस पर्वतक पण यायुप्य पूर्ण
करी नरके गयो थने नारद शील पाली सत्य वच
निना प्रजावथी देवसोके गयो.
पांचनार सङनो ! पसुराजाये था शब्दनो जे
योकडो अर्थ कस्यो, ते जो के, खरो हतो, तो पण
हिंसाकारक वचन होवाथी सत्य वचन ते, असत्य
माप ठj थने तेधी ज ते नरकने विपे गयो.

..-
(३६)
तथा पर्वतक थने वसुराजा एवे नरकगामी है."
नुक्रमे उपाध्याय श्रायुप्य पूर्ण करी देवलोके गया
एकदा एक थाहेडीए वनमा जश को मृगन
ऊपर वाण नांख्यु, बागल जश्ने जोयुं तो, मृग
ठेकाणे स्फाटिकनी शिला दीठी, तेणे श्राची राज
ने कझुं. राजाये तुरत ते शिला गनी मंगाव
पीविका मंगावी ऊपर सिंहासन थापी पोते वे
या मांड्यु. तेथी सर्व लोक एम जाणवा लाग्या
वसुराजा सत्य वचनना प्रनावथी अकर वेसे
तेथी सिमाडिया राजा प्रमुख सर्व लोक तेनी से
करवा लाग्या. एटलुज नहि पण ते वसुराजा मर
प्रतिष्ठावान् सत्यवादी हनवाणो.
एकदा अवसरे पर्वत पर मलवा माटे नारद :
ग्रामांतरथी त्यां थामा भन्ने जण पोत पोतार
मलीने वेग. तेवा समशुत्र शिष्यने नणावतां श्र
शब्दनोगग (वोकडा)ना हतोकरयो एवो थर्थ
तके कह्यो. सारे नारद बल्पिा के, "गुरुये तो था
एनेक्षणावतां शज शब्दनो श्रर्थ, नण चर्पनी बी
(मांगेर) कही है, तो तमे अज शब्दनो अर्थ वा
केम कहो ठो?" पर्वतके कम्युं, "ढुंजे अर्थ कहुँ ।
-

(३७)
खरोके, "एम पोत पोतामा विवाद करता जे खो
उरे, तेनी जीन दीनांखवी, एवी प्रतिज्ञा करी.
वखते पर्वतकनी माताये जाण्यं के, था नारद
हे , ते वात खरी . माटे हुँ पसुराजानी पासे
निक्षा मागी खेजं. कारण के, वे जण वसुराजा
से साक्षी दाखस जवाना . एवं विचारी वसुरा
। पासे जश्ने कामावाला कल्या. अनुक्रमे ते पन्ने
व वाद करतां वसुराजा पासे श्रर्थ पुढवा याव्या.
वसुराजाये पण मिश्र वचन बोलीने कj के,
आज शब्दनो थर्थ पोकडो पण थाय ! थने ने
तरे मांगेर पए थाय ते." एवं सांजसता ते जय
ते देवताये पाटु प्रहारे करी वसुराजाने सिंहास
नीचे पाडी नांख्यो । यावत् ते विपत्ति पामी म
ने नरके गयो. पास पर्वतक पण थायुप्य पूर्ण
नरके गयो थने नारद शीस पाली सत्य पच
रामजावधी देवलोके गयो.
पांचनार सानो ! वसुराजाये था शब्दनो जे
कडो अर्थ कस्यो, ते जो के, खरो हतो, तो पण
साकारक पचन होवाथी सत्य वचन ते, थसत्य
यि यु थने तेषीज ते नरफने विप गयो.

तथा पर्वनक श्रने यमुगजा ए वे नरकगामी हैं." नुक्रमे उपाध्याय थायुष्य पूर्ण करी देवलोके गय एकदा एक श्रादडीए वनमा जश् कोश् मृग- ऊपर वाण नांग्यु. श्रागस जश्ने जोयुं तो, मृग- ठेकाणे स्फाटिकनी शिला दीवी, तेणे थावी रा- ने कह्यु. राजाये तुरत ते शिक्षा वानी मंगान पीठिका मंमाधी ऊपर सिंहासन थापी पाते वा मांड्यु. तेथी सर्व लोक एम जाणवा लाग्या वसुराजा सत्य वचनना प्रनावथी थर वेसे तेथी सिमाडिया राजा प्रमुख सर्व लोक तेनी से करवा लाग्या. एटर्बुज नहि पण ते वसुराजा म प्रतिष्ठावान् सत्यवादी इनवाणो. एकदा अवसरे पर्वतपर मलवा माटे नारद ३ ग्रामांतरथी त्यां थाय शुजन्ने जण पोत पोता मसीने वेग. तेवा समयान शप्यने जणावतार शब्दनो वाग (पोकडा) ना हतो करवो एयो अर्थ वंतके कह्यो. त्यारे नारद वायर के, “गुरुये तो श्र एनेजणापत्तां बज शब्दनो थर्थ, त्रण वर्षेनी श्री (मांगेर) कही है, तो तमे अज शब्दनो अर्थ ठग केम कहो ठो?" पर्वतके कयुं, “ढुंजे थर्थ कई

पोकडी थर्थ भयो, जो के, सरो हतो, नो पर
प्राय ने नदीज ते नरकने पिगलो.
(३७)
ते सरोके,"एम पोत पोतामा विवाद करतां जे खो
टो उरे, तेनी जीनदी नांखवी, एवी प्रतिज्ञा करी,
ते वसते पर्वतकनी माताये जाण्यु के, या नारद
कहे , ते वात खरी ठे. माटे हुँ धसुराजानी पासे
पुत्रनिदा मागी बेजं. कारण के, वे जण वमुराजा
पासे साक्षी दाखल जवाना वे. ए, विचारी बमुरा
जा पास जश्ने कानावाखा कस्वा. थनुक्रमे ते पने
जण वाद करतां यमुराजा पासे श्रर्थ पूठवा याव्या.
यमुराजाये पण मित्र वचन पोखीने कडं के,
"यज्ञ शब्दनो अर्थ पोकहो पण पाय ! यने ने
दांतरे मांगेर पण याय ते." एवं सांनखतां तेज 4
सत्ते देवताय पाटु प्रहार करी यमुराजाने सिंहास
नधी नीचे पाटी नाम्न्यो ! यावत् ते विपनि पामी म
रीने नरके गयो. पाव/पर्यंत पण यायुप्य पूर्ण
करी नरके गयो अने नारद शील पाली साय पर
नना प्रनारथी देवो गयो.
यांचनार सझनो ! वसुराजाय धन सम्दनो वे
हिंसाकारक परन होगयी सत्य वचन ते, असत्य
!
4
२"

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(३ए) माव सना के०) सोधर्मा सना जेम (सेता केप) नेष्ट ठे, तथा (सबधम्मा के०) सर्व धर्मोंने विपे (जह के०) जेम (पिघाण के०) मोक्षधर्म (सेडा के०) श्रेष्ठ ; तेम (णायपुत्ता के०) शातपुत्र श्री पदावीर देव थकी, कोइ (परम के०) उत्कृष्ट (ना पी के) ज्ञानी (ण थहि के०) नथी. अर्थात् स्थि तिमां लवसप्तम देवोथी,सजाउंमां सौधर्म सनाथीथ धर्ममां मोक्षधर्मथीकोश्श्रेष्ठ नथी;तेम हातपुत्र श्री महावीर देवथी पण को उत्कृष्ट झानी नथी.॥२४॥ नावार्थ:-स्थितिवाला लोकोमा जेम सबसतम दे वो एटले पांच थनुत्तर विमानवासी देवो, (शहां पां च थनुत्तर विमानवासी देवोनुं लवसप्तम नाम, ए उपरथी पड्युं वे के, जो कदि तेउनुं मनुप्यनवमां पो ताना थायुप्य करतां, सात सव यायुप्य पधारे हो त, तो जरूर ते सिमगति पामत! तेथी) सर्वोत्कृष्ट स्थितिवाला , तथा सर्व सनाउने विपे धयां क्रीडा करवानां स्थानक विगेरे होवाथी, जेम सोधर्मा सना श्रेष्ठ ते थने सर्य धर्मोंने विपे, (सर्व दर्शनियो पण पोत पोताना धर्मने विपेमोक्षाने उत्तम गणे , तेथी) मोक्षधर्म जेम श्रेष्ठ नेतेम शातपुत्र श्री महावीर प्र सूचना सवाक्यशुद्धिन (३७) वली श्री दशवकालिक मे सातमा अध्ययनमां कांठे के- तहेव काणं काणित्ति, पंडगं पंडगंति वा॥ वाहियं वावि रोगित्ति, तेणं चोरेचि नो वए॥" तेमज काणाने कायो, नपुंसकने नपुंसक, रो याने रोगियो थने चोरने चोर न कहेयो. जो के, चन सत्य के, परंतु परने पीडाकारी होवाथी न वोल ए प्रकारे सत्य वाक्योने विपे जेम थनवयं यच अंश, तया तपने विपे जेम नयवाद सहित ब्रह्मार यंन श्रेष्ठ कथु , तेम खोकने विपे रूप, संपदा,य तिशय, शायक समकित, शान, दर्शन थने चारिने करीश्रमण नगयंत श्री महावीर देव उत्तम जाणवा विईण सहा संवसत्तमावा, सना मुदम्माव सनाण सेहा॥ णिवाण सेठा जद सबधम्मा, शपायपुत्ता परम चिनाणी॥२४॥ थर्यः-(चिंगा क)स्थितिवासासोकोमा(पर सनमाया केस) सनम देयो जग (संहा०) अंततया (सनाण क) सर्य सनाउँमा (गुर (३ए) वसना के०) सोधर्मा सना जेम (सेडा केस) गे, तथा (सबधम्मा के०) सर्व धर्मोने विपे ह के) जेम (पिघाण के०) मोक्षधर्म (सेडा .) श्रेष्ठ नेतेम (पायपुत्ता के०) शातपुत्र श्री वीर देव थकी, कोश (परम के०) उत्कृष्ट (ना के) ज्ञानी (ण अधि के०)नथी. अर्थात् स्थि मां लपसप्तम देवोधी, सनामांसोधर्म सनाथीथ चर्ममा मोक्षधर्मधीकोइश्रेष्ठानची तेमझातपुत्र श्री वीर देवथी पण को उत्कृष्ट ज्ञानी नथी.॥२४॥ नावार्थ:-स्थितिवाला सोकोमा जेम लवसप्तम दे एटले पांच अनुत्तर विमानवासी देवो, (हां पां अनुत्तर विमानवासी देवोर्नु अवसप्तम नाम, ए रथी पज्यु ले के, जो कदि तेनुं मनुष्यनवमां पो ना थायुप्य करतां, सात लव थायुष्य वधारे हो तो जरूर ते सिहगति पामत! तेथी) सर्वोत्कृष्ट पतिवाला ठे, तथा सर्व समाउने विपे घणां क्रीडा रवानां स्थानक विगेरे होवाथी, जेम सोधर्मा सना तेथने सर्व धर्माने विपे, (सर्व दर्शनियो पण तपोताना धर्मने विषमोक्षने उत्तम गणे, तेथी) दाधर्म जेम श्रेष्ठ के तेम ज्ञातपुत्र श्री महावीर देवथी को उत्कृष्ट ज्ञानी नयी. अर्थात् स्थिति ला लोकोमा लवसप्तम देवोधी, सनार्डमां सोधन सनायी थने सर्व धर्ममा मोक्षधर्मथी जेम को छ नथी, तेम शातपुत्र श्री वर्धमानखामीश्री को पण उत्कृष्ट शानी नथी. ॥ २० ॥ पुढोवमे धुण विगयगेहि, न समिहिं कुवर आसुपन्ने । तरितुं समुदं च मदानवोचं, अनयंकरे वीर अणंतचकु ॥२५॥ श्रर्थः-जेम पृथ्वी सकल वस्तुने थाधारनूत, ते जगवंत पण (पुढोत्रमे के०) पृथ्वी समान तथा व प्रकारनो कोने (धुण के) दूर कत्यांचे मणे एवा, तथा ( विगयगेहि के) बाह्य थनेश त्यंतर वस्तुमाथी गयो वे थलिलाप ते जेमनो एव तया (सणिहिं के०)संनिधिने (न कुवर के)नक नारा, तथा (थासुपन्ने के) उतावली प्रज्ञावा (च के०) वली (महाजयोधं के) चार गति रूप होटा (समुदं के०) समुपने (तरितुं के) तरीने । णिपदने पाम्या ठे एवा, तथा (थनयंकरे के०)

(४१)
क्षयना करनार तथा (वीर के०) शूरवीर थने (थ
दीतचरकु के) अनंत चावाला श्रीमहावीर देव .
ई नावार्थ:-जेम पृथ्वी सकल वस्तुने थाधारनूत,
या सर्व वस्तुने सहन करनार ठे, तेम जगवंत प
सर्व प्राणियोने थजयदानथी तथा समुपदेश दे
थी प्राणिमात्रने थाधारभूत थथवा सर्व परिसद
उपसर्गने सहन करवाथी पृथ्वी समान तथा थाव
कारनां कमोंने दूर कस्वां वे जेमणे एवा, तथा या
अने थान्यंतर वस्तुमाधी गयो ते शनिलाप ते
मनो एवा, तथा अव्य संनिधि ते धन, धान्य,
विपद तथा चतुप्पद थने नाव संनिधि ते क्रोध,
मान, माया थने लोन ए रीते वे प्रकारनी संनिधि
ने न करनार तथा उतावली प्रज्ञावान्, तथा चार
गति रूप घणा दुःखे करी जरपूर एवा जवना उघ
.. समूह रूप संसार समुने तरीने निर्वाण
पदने पाम्या ठे एवा, तथा प्राणियोने समुपदेश
नयापवाथी पोताने थने परने अजयना करनार, तथा
न्यष्ट प्रकारनां कोने विशेष प्रकारे प्रेरी प्रेरीने क्षय
कियां जेमणे तेथी वीर थने थनंतचापाला एट
क्षे फेवलज्ञानी एवा श्री महावीर देव . ॥ २५

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किरियाकिरियं पश्याएवायं, अन्नाणियाणं पडियच गणं। से सवायंतिवेयश्त्ता, सर्प प्राणिधम्म सदीदरायं ॥२७॥ पी प्रालिमान धारियं के०)फियावादीथने थ सर्गने सहन करवाश्य के०) धिनयवादी, तथा गरनों कमाने दूर फलज्ञानवादी, ए सर्व पाखंमि अने थान्यंतर वस्तु के०) अनुवाद एटले जेद मनो एवा, तमा रे दर्शनियोना (गणं केव) पद तथा चतुष्पद २०) जापीने (से केव) ते नि, माया थने हैं सबवायं के) सर्व वादने (३ नहार न ५ प्रकारे जापीने (धम्म के०) रित्र रूप धर्मने विपे (सदोहराय के०) दीर्घ रात्रि हेत (वहिए के) सावधानपणे रह्या. ॥ २७॥ नावार्थ:-क्रियावादीना एकशोने एशी, थक्रिया दीना चोराशी, विनयवादीना पत्रीश थने थज्ञान दीना सडशन, ए सर्वे मलीने प्रयशेने तेशन द न्या. ते पाखनिदर्शनियोना नेद जाणवा. ए प्रका ए चारे दर्शनियोना स्थानकने एटखे थंगी । भ (४४) करेला पदने अथवा दर्शन स्वरूपने स (पुर्गति जवानां कारण) जाणीने, ते श्री देव सर्व वादने ए प्रकारे जाणीने थर्थात नो त्याग करीने,चारित्ररूप धर्मने दी हितअर्थात् जावजीव सूधी सावधानपणेर से वारिया वि सराश्नत्तं, नवहाणवं उकखयध्याए । लोगं विदित्ता आरं पारं च, सवं पनू वारिय सबवारं ॥३॥ थर्थ:-( से के) ते जगवंत (सराश्नत्तं विनोजन सहित (शठि के०) स्त्रीने (वारि निवारण करीने (उकखयध्याए के०) थष्ट प फुःखने क्षय करवाने थर्थे (उपहाणवं धानवान यया. वली (पलू के०) ते प्रनु : वीर देवे (थारं लोगं के०) थालोक(च के०): रंके) परखोकने (विदिता के०)जाणी के०)सर्व प्रकारनांपापनां स्यानकोने (सवय घणी वार (वारिय के०) निवारण कस्यां. नावार्थ:-ते जगवंत रात्रिनोजन सहित (४५) उन) उपलक्षषयी प्राणातिपात, भूपावाद, अदत्ता मान अने परिप्रदने पण निवारण करीने, अष्ट फर्म रूप दुःखनो क्षय करवाने अर्धे उपधानवान् थर्या तपश्चयांवडे सूकची नाख्यो रे देह ते जेमणे ए का घया. पली ते प्रनु श्री महावीर देवे यासोक ते नुप्यलोक थने परलोक ते नरकादिक, तेना खरु ने जाणीने, सर्व प्रकारनां पापनां स्थानकोने घणी र निवारण करयां. थात् जगवते पोते प्रापाति तादिकनो निपेध कस्यो भने वीजाने पण ते प्रणातिपातादिक उगेति जवानां कारण ; एम शांवी तेथी विरक करया. ॥ २ ॥ । हवे सुधर्मस्वामीए श्री महावीरदेवना गुणोने वर्णवीने गताना शिष्य जंयूस्वामीने आ प्रकारे कर्यु. सोचा य धम्म अरिहंतनासियं, समादियं अपविसुर ॥ ( तं सददंता य जणा अणाक, इंदाव देवादिवागमिस्संति त्तिवेमि॥२॥ । यर्थः-दे जंबू! (समाहियं के०) सम्पर प्रकारे (यपधिसुझं फे) थर्थ थने पद पडे शुद्ध 3 ह 1

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(४५) न) उपलक्षणधी प्राणातिपात, मृपावाद, यवत्ता नि थने परिप्रहने पण निवारण करीने, थट फर्म पःखनो कय करवाने थचे उपधानवान् अर्घा तपश्चर्यावढे सूकवी नांख्यो रे देव ते जेमणे ए 'यया. वली ते प्रजु श्री महावीर देवे यासोक ते उप्यलोक थने परलोक ते नरकादिक, तेना सरू जाणीने, सर्व प्रकारनां पापनां स्थानकोने घणी र निवारण करयां. थर्थात् जगवंते पोते प्राणाति तादिकनो निपेध कस्यो थने वीजाउने पण ते प्रणातिपातादिक उर्गति जवानां कारण ; एम शिवी तेथी विरक्त कस्या. ॥ २७॥ हवे मुधर्मस्थानीए श्री महावीरदेवना गुणोतो ताना शिष्य जंयूस्वामीने आ प्रकारेमग्गं, सोचा य धम्म अरिदमनगं॥ १६ समादियं अउपविभय सारं, तं सदइंता य जणाय दारं ॥३॥ 5 इंदाच देवादिवागमिसय पूश्यं, । यर्थः-दे जंवू ! (समा मग्गं॥ स्थळपउविसु के०)२ F

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(ए) स, तेथी पण प्रधान मंगल; अर्धपै एटले जेनो परा न करीशकाय एवा गुणोनो एकनो एक जनायक ने मोक्षमार्गमांजे सम्यदर्शन विगेरे तेने विपे ट समान एबुं शीयल व्रत ठे. ॥१॥२॥३॥ हवे ते शीयल पासवानुं माहात्म्य कहे रे. (अनुवृत्तम्) देव दाराव गंधवा, जक रकस किन्नरा ॥ चंचयारिं नमसंति, करंजे करिति ते॥४॥ जे पुरुप पुष्कर एबुं ब्रह्मचर्य मत पाले , तेने वि निवासी देवता,ज्योतिषी देवता, जुवनपतिदेव ज,देवताना गया गांधर्व देवता, पक्षमा रहेनारा दो,मांस खावामांतत्पर एचाराक्षसोथने व्यंतरजा ना किन्नर देवता;ए सर्वे नमस्कार करे .॥४॥ एस धम्मे धुवे णियए, : सासए जिणदेसिए॥ सिसा सिति चाणेणं, सिसिस्संति तदावरे त्ति बेमि।। ५॥ था ब्रह्मचर्य सक्षण एवो शीवधर्म, ते ध्रुव एटले विस, परतीर्थियोए पण एनो निपेध नधी करखो (G) मुझरिसं गुण नायक-मेकं, मोरूपढ्स्स-वडंसग नूयं ॥ ३ ॥ पंच महावत नामे सुव्रतोमूल, श्रथवा पंच मर त पालनारा सारा मुनियोना नियमोनुं मूल, थध- पंच महावत अने अणुव्रतोतुं मूल; शुद्ध खना ला साधु मुनिराजोए सेवेवं श्रने परस्पर विरोध थवा वैरनुं उपशमन ए वे परिणाम जेनुं एवं समुसोमा म्होटो उदधि जे स्वयंजूरमण समुसते पेठे कुःखे तरी शकाय एवा तीर्थ रूप, अथवा समुसोमां महोदधि रूप जे संसार, तेने तरवा' टे तीर्थ समान; तीर्थकर देवोबडे सारी रीते उपदे- ला गुप्तियादिक मागने पालवानो उपाय, नरक तिर्यंचनी गतिने रोकी वे जेणे एवं; सार पदार्थोने वरीते पवित्र थनेसारा कस्या ते जेणे एवं;सिकंग थने वैमानिकपणानां उघाड्यां वे वारणां जेणे ए देचेंजोये थने नरेंजो (चक्रवर्तियो) ए जेने नमर र कस्यो , तेवा पुरुषोने पण पूज्य; सर्व जगत्मां चम मंगसोनोमार्ग थर्यात मंगलकारी वस्तु मेलव नो उपाय अथवा सर्व जगत्मां उत्तम मंगल एy ... " (४ए) संगल, तेघी पण प्रधान मंगल; ऽर्धएटले जेनो परा वन करीशकाप एवा गुग्णोनो एकनो एक ज नायक प्रने मोक्षमार्गमांजे सम्यक्रदर्शन विगेरे तेने विषे गट समान एवं शीयख प्रत ठे. ॥१॥२॥३॥ हवे ते शीयल पासवानु माहात्म्य कहे . (अनुपुरवृत्तम्.) देव दाणव गंधवा, जस रकस किन्नरा ।। बनवारिं नमसंति, उकरं जे करिति ते॥४॥ जे पुरुप उप्कर एवं ब्रह्मचर्य व्रत पावे ठे, तेने वि मानवासी देवताठ,ज्योतिषी देवताउँ, जुवनपति देव नाज,देवताना गवेया गांधर्व देवता,वृक्षमारदेनारा दो,मांस खावामांतत्पर एवाराक्षसोयनेव्यंतरजा लेना किन्नर देवताउँ;ए सर्वे नमस्कार करे .॥४॥ एस धम्मे धुवे णियए, सासए जिणदेसिए॥ सिसा सितंति चाणेणं, सिनिस्संति तदावरे त्ति मि॥५॥ था ब्रह्मचर्य बक्षण एवो शीलधर्म, ते ध्रुव एटले वस, परतीर्थयोए पप एनो निषेध नथी कखो . (6) उहरिसं गुण नायक-मेकं, मोकपदस्स-वडंसग नूयं ॥३॥ पंच महावत नामे सुव्रतोतुं मूल, अथवा त पालनारा सारा मुनियोना नियमोनुं मूल, पंच महाबत अने अणुव्रतोतुं मूल; शुद्ध खना- ला साधु मुनिराजोए सेवेबुं अने परस्पर विरोध थवा वेरनु उपशमन ए वे परिणाम जेनुं एवं समुस्रोमां म्होटो उदधि जे स्वयंनूरमण समु, पेठे कुःखे तरी शकाय एवा तीर्थ रूप, अथवा समुखोमां महोदधि रूप जे संसार, तेने तरवा टे तीर्थ समान; तीर्थकर देवोबडे सारीरीते उप ला गुप्तियादिक मार्गने पालवानो उपाय, नरक तिर्यंचनी गतिने रोकी वे जेणे एवं; सार पदार्थो वरीते पवित्र अनेसारा कस्या ये जेणे एवं सिद्धर यने मानिकपणानां उघाड्यां वे वारणां जेणे। देवेंजोये थने नरेंडो (चक्रवर्तियो) ए जेने नम र कस्यो , तेवा पुरुषोने पण पूज्य; सर्व जगत्म त्तम मंगलोनो मार्गथर्थात् मंगलकारी वस्तु मेख नो उपाय अथवा सर्व जगत्मां उत्तम मंगल एवं

एएदि कारणदि,
तिज्यरतं स जीरो
१पार पातिकम मानि करखान पामेसा
रिहंत; २ घाउ फर्मपी रदिन पनि मिलान
पामेला तिक जगत: ३ प्रापन पटने धुनमान
या भूतदानना उपयोगपी दो नदिदायाधी
१४ पमोपदेश देनारा गुरु: ५ साउ पनी पा
थप स्थविर, समयायांग सूमने पारण फरनारा
। स्थपिर बने पीशवनी दीदापयामा
। स्थविर, ए प्रप प्रकारना स्थविरः ६ एम. पीता
थपेक्षाये पणा ज्ञानपाखा यर्थात् पफ वीजा
रे
दानवान् पया पहुभुतः तपसी पटसं थन
दिक विचित्र प्रकारना तपे फरी युग एपा सा
य साधुध ए रीतं जगत्ने धंदनीक एपा जय
सादिक, तेमनी निरंतर सानोपयोग उपा
1 फरवी पटरी तेगना अपर यनुराग फरयो,
गर्नु यथापस्थित गुण फीसन फरः तथा !!
नफित्ता १०ज्ञानाशिफनी विना सभा
• संयगना दगापारधी निप्पर धपणीया

ककर + (५०) माटे प्रमाणबडे प्रतिष्ठित, त्रिकालमां पण एनो पामवानो नथी माटे नित्य, त्रणे कालमांसद.. होवाथी शाश्वत श्रने तीर्थकरोए प्रकाशेलो वे. यावा शीलधर्मे करीने पूर्वे घणा जीवो सिद्धि ने पाम्या ठे, वर्तमान कालमां पामे वे श्रने क काले पण पामशे.ए प्रकारे हे जंबू! ढुंतने कई प्रसंगेतीर्थकरनामकर्मबांधवानांव... (आर्यावृत्तम्.) अरिहंत सि६ पवयण, गुरु थेर बदुस्सुए तवस्सीसु ।। वचल्लया य तेसिं, अनिक नाणोवनगे य॥६॥ दंसण विणय आव- स्सए य सीलवये निरश्यारे॥ खणलव तव चियाए, वेयावच्चे समादीए ।। ॥ अपुब नाणग्गदणे, सुयं नत्ती पक्यणे पनावणया ॥

(५१) एएदि कारणेदि, तिचयरतं लद जीयो ॥७॥ १ चार घातिकर्म खपावीने केवलझान पामेला रेहंत; २ था। कर्मथी रहित थश्ने सिद्धगति पामेला सिह नगवंत;३ प्रवचन एटसे श्रुतज्ञान ग्वा श्रुतज्ञानना उपयोगथी जूदो नहि होवाथी धोपदेश देनारा गुरु५ साठ वर्पनी वयवा वय स्थविर, समवायांग सूत्रने धारण करनारा । स्थविर थने वीश वर्पनी दीक्षापर्यायवाला प प स्थविर, एत्रण प्रकारना स्थविर ६ एक वीजा थपेक्षाये घणा शानवासा थर्थात् एक वीजाथी रे ज्ञानवान् पवा बहुश्रुत; ७ तपस्वी एटसे थन दिक विचित्र प्रकारना तपे करी युक्त एवा सा य साधु ए रीते जगत्ने चंदनीक एवा जे थ तादिक, तेमनी निरंतर ज्ञानोपयोग उते; या यता करवी एटले तेमना ऊपर थनुराग करयो, तेमनु यथावस्थित गुण कीर्तन कर तथा ए न ते समकित १० ज्ञानादिकनो विनय; ११ था कि एटले संयमना व्यापारथी निप्पन्न भएलीय . । ।

(५२) वश्य करणी; १२ व्रत एटले मूलगुण अने शील ले उत्तरगुण, ए रीते ए दर्शनादिक चार वोलने पे निरतिचारपणे वर्तवू; १३ काल वे उपलक्षण एवं दणलवादि ग्रहण, तेमां दणलव कालने : .संवेगनावना नाववी,तथा ध्यान धर; १५ ७५॥ दिक तप करवो; १५ त्याग ते मुनिने उचित देवू १६ दश प्रकारे वैयावृत्य करवी; १७ समाधि टले गुरुयादिकनुं काम करवामां चित्तने सं उत्पन्न करवो; २७ अपूर्वज्ञान ग्रहण करवू; २ए झाननीनक्ति तथा वहुमान करबुथने २०५ जेनमार्गनी देशना देश्ने प्रवचननी प्रजावना ए प्रकारनां वीश कारणे करी एटले वीश वारंवार सेवन करवायी जीव तीर्थकर न धे ठे. थर्थात् तीर्थकरपणुं पामे ठे.॥६॥७॥ हवे जिनवचन पासवानुं फस कहे ते. जिणवयणे अणुरत्ता, जिपवयएं जे करंति नावणं ॥ अमला असंकिलिका, ते ढुंति परित्तसंसारी॥ए॥

(५३) थरिहंत जगवंतना वचनने विपे अनुरक्त घर, पचनने मन, वचन यने कायाए करी थाराधन रनारा; मिथ्यात्व रूप मक्ष, मोह, मछर थने के [ करी रहित एवा जीवो परित्तसंसारी थाय ए ले संसारने वेदीने मोक्षगतिने पामे ठे.॥ ए॥ (अनुष्टुश्चम् .) वं खु नालियो सारं, जन हिंसा किंचणं॥ प्रदिसा समयं चैव, एतावत्तं वियाणिया॥२॥ ए प्रकारे ज्ञानी एटले विशिष्ट विवेकवान पुरुप उपदेशनो सार ए जवे के, ज्ञानवान् पुरुप न थिने स्थावर प्राणियोने हणे नहीं, उपलक्षणथी पावाद बोले नहीं, चोरी करे नहीं, थब्रह्म सेवेनही, रिम राखेनहीथनेरात्रिनोजन पण करेनही.यली वे कहेली थहिंसावडे समता आवे, तेथी एम जाणे , जेम मने मरण थलखामणुं लागे, तेम वीजा बोने पण तेवुज लागे. ए प्रकारे विचारीने झानी रुपे कोई पण जीवने पीडा न उपजाववी.॥१०॥ (काव्यम्.) जा च बुद्धिं च ज पास, नृतेहिं जाणे पडिलेट् सायं ॥ . . + M (५२) वश्य करणी; १२ व्रत एटले मूलगुण अने शील ले उत्तरगुण, ए रीते ए दर्शनादिक चार बोलने पेनिरतिचारपणे वर्तवं, १३ कासवे उपलक्षण एq क्षणलवादि ग्रहण, तेमां क्षणलव काखने .संवेगलावना जाववी,तथा ध्यान धरवू; १५. दिक तप करवो; १५ त्याग ते मुनिने उचित देवू १६ दश प्रकारे वैयावृत्य करवी; ७समा दले गुरुयादिकनुं काम करवामां चित्तने उत्पन्न करवो; १७ थपूर्वज्ञान ग्रहण करवू; १५ झाननीलक्ति तथा बहुमान करवूथने २०५५ जैनमानी देशना देश्ने प्रवचननी प्रनावना ए प्रकारनां वीश कारणे करी एटले वीश चारंवार सेवन करवायी जीव तीर्थंकर . :: घे. यर्थात् तीर्थंकरपणुं पामे ते. ॥६॥७॥ दवे जिनवचन पासवानुं फल कहे ते. स जिणवयणे अणुरत्ता, जिरावयणंजे करंतिनावणं॥ अमला असंकिलिका, ते ढुंति परित्तसंसारी॥ए॥

} (५३) थरिहंत जगतना वचनने विपे अनुरक्त यश वचनने मन, वचन श्रने कायाए करी थाराधन करनारा; मिथ्यात्व रूप मल, मोह, मछर थने हो से करी रहित एवा जीयो परित्तसंसारी थाय ने ए ले संसारने ठेदीने मोक्षगतिने पामे ॥ ॥ (अनुष्टतम् .) एवं सु नापिणो सारं, न दिसा किंचणं ।। अहिंसा समयं चेव, एतावत्तं बियाणिया॥१॥ ए प्रकारे ज्ञानी एटले विशिष्ट विवेकवान पुरुष उपदेशनो सार एज के, ज्ञानवान् पुरुप प्र थने स्थावर प्राणियोने दणे नही, उपलक्षणी पायाद बोले नही, चोरी करे नही, यशाम सवेनही, रिमद राखेनहीअनेराप्रिोजन पण फरेनही.पक्षी कहेली यहिंसापडे समता थापे, तेथी पम जाणे जेम मने मरण थलखामणु सागे, रोम पीना योने पण तेवुज लागे, र प्रकारे विचारीने मानी रुपे को पण जीपने पीडा न उपजायची. ॥१०॥ (कास्यम्) जाई च बुद्धिं च क पास, नृतेहिं जाणे पडिलेद सायं ।।

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(५५) न जोश्ने तुं जागृत था एटले बोध पाम थने जे तियादिक न याय, तेम पोतानुं श्रने पारकुं एट दप्रकारना जीयोनी साये तुं पोतानुं सुख सरसाव, पन कर.तेथावी रीते के,जेमतने सुख वहादुथने सयवसामगुं लागे,तेम वीजाजीवोने पण तेम सागे .ए प्रकारे विचारीने वीजा जीयोने यशाता ... उपजाववाथी पूर्वे कहेली जातियादिकने तुं नही मे. वली जेम तने इष्ट विपयो सुख थने यनिष्ट पयो पुःख थापे ठे, तेम पीजा जीयोने पण ते ज सागे ते. एम धारीने तुं कोइपण जीपने पीडा उपजावीश. पूर्वे कहेलां जाति जिना पुःसने पायी यत्यंत विद्वान एटले तत्वज्ञानी पुरुपो, ते रकृष्ट एयुं मोक्ष थने ते पामयानो मार्ग ज्ञानादिक एम जाणीने सम्यक्त्वदर्शि होवाथी पाप (सायय नुष्ठान) करे नही.॥ ११ ॥ उमुच्च पास इद मचिएदि, आरंजीवी उनयाणुपस्सी॥ कामेमु गिधाणि चयं करंति, संसिघमाणा पुपरेति गप्नं ॥ १२ द (५४) तम्दातिविको परमंतिणचा, सम्मत्तदंसी ण करे पावं ॥ ११॥ हे जीव ! जाति एटले जन्मावस्या, वाल्यावस्था, कुमारावस्था, यौवनावस्था थने वृद्धावस्यामां जेनो अंत श्रावे, ते जाति, तथा वृद्धि एटले थालोकने विपे अथवा संसारने विपे जे कालदेपथाय ते वृद्धि ए प्रकारनी जाति थने वृद्धिने तुं सूक्ष्मदृष्टिये करीने जो. वली जीवने जन्म पामतां तथा वृद्धावस्थामां शारीरिक अने मानसीक संबंधी जे दुःख चाय के तेने पण हे जीव! तुं विवेक रूप चकुबडे जो.कडंठे के जायमाणस्स जं दुख्खं, मरमाणस्त जंतुणो ॥ तेण दुरुखेण संतत्तो, न सरइ जाइ-मप्पणो ॥१॥ जन्मता थने मरण पामता जीवने जे पुःख धा। य ते, ते पुःखवडे पीडाएलो जीव, पचीथी पोतानी जातिने संजारतो नथी. अर्थात् पूर्वे जोगवेला पुर खने जूली जाय रे ॥१॥ अथवा जगवंत श्री महावीर देव, गौतमखामीने चोखावीने कदे के, हे थार्य! थहिं जाति थने' जिथवानुं कारण ते कर्म अने तेनुं कार्य जे फुःख

(५५)
तेने जोक्ने तुं जायत था एटले बोध पाम भने जेम
जातियादिक न थाय, तेम पोतार्नु थने पारकुं एटले
चौद प्रकारनाजीवोनी साथे तुं पोतानुं सुख सरखात्री
नेशान कर.तेवावी रीते के, जेमतने सुख वहादुथने
जसथलखामणुं लागे,तेम वीजा जीवोने पण तेम
जलागे.एप्रकारे विचारीने वीजाजीवोने यशाता
न उपजावाथी पूर्व कहेली जातियादिकने तुं नही
पामे, वसी जेम तने इष्ट विषयो सुख थने थनिष्ट
विपयो दुःख थापे ने, तेम धीजा जीवोने पण ते
मज मागे . एम धारीने तुं कोई पण जीवने पीडा
न उपजावीश.पूर्व कहेखां जाति हिना खने
देखवाथी थत्यंत विधान एटले तत्वज्ञानी पुरुपो, ते
उत्कृष्ट एवं मोक्ष अने ते पामवानो मार्ग झानादिक
एम जाणीने सम्यक्त्वदर्शि होवाथी पाप (सावध
थनुष्ठान) करे नही.॥ ११ ॥
जमुच्च पास इद मच्चिएहिं,
आरंजीवी जनयापुपस्सी।
कामेसु गिहाणि चयं करंति,
संसिधमापा पुणरेति गनं ॥ २२॥

(५६) हे जीव ! था लोकमां मनुष्योनी साये व्य व नेदवडे जिन्न एवा स्नेहपासने तुं उत्कृष्टपणे सने दूर कर. कारण के, ते स्नेहपास कामनोग । श्वावासो रे, तेने लेवाने माटे एटले ते काम ग जोगवाने थर्थे जीव, हिंसादिक पापारंज करे . एवो थारंज करनारो जीव थालोक तथा परलो नुं सुख श्रथवा शारीरिक थने मानसिक एवे प्रका ना सुखने जोवानी श्वावालो होय ते. वली काम टले विपयनी ठाउँमा बुब्ध थएलो जीव, कर्मनो चय करे ते थने तेथीज एटले कामोपादान जनि कर्मवडे पूराएलो जीव, एक गर्नथी वीजा गर्न पामे ठे. अर्थात् अरहट्ट घटिकानी पेठे संसार प चकवालने विपे परित्रमण करे .॥ १२ ॥ (अनुष्टुववृत्तम्.) वणे नाणे य विन्नाणे, पच्चरकाणे य संजमे ॥ अपहनए तवे चेव, वोदाणे अकिरिा सिही जगवंत श्री महावीरखामी प्रत्ये, गौतमखामीए वधु के, हे जगवन् ! साधु मुनिराजोनी सेवा कर थी झुं फल थाय ? त्यारे जगवंते कडं के, हे गौ तस ! श्रवण पटले तेमनी वाणी सांजलवातुं फल थाय. तेथी गुंफल थाय ? श्रुतज्ञान फल थाय. ते थी शुं फल थाय ? श्रुतज्ञानमा हेय उपादेय रूप वि झान फल थाय. तेधीशु फल थाय ? पापने त्याग करवा रूप पचरकाण फल थाय.तेथी शुं फल थाय? संयम फल थाय. तेथी शुंफर थाय ? धनाश्रय एटले संयमी पुरुप नवां कर्म न ज बांधे; ते फल थाय. तेथी शुं फल थाय? तप फल थाय. एटले जे थ नाश्रवी होय ते हलुकर्मी होवाथी तप करनारा था य. तेथी शुं फल थाय ? जूनां कर्मने खपावनाएँ निरा फल याय. तेथी शुं फस थाय? योगनिरोध करवानें फल थाय, तेथी शुं फल थाय ? सर्व फलने विपे अंतर्गत रदेलु एवं मोक्ष फल थाय. ॥ १३ ॥ (आर्यावृतम्) सारं दस नाणं, सारं तव नियम संजमं सीले। सारं जिपवर धम्म, सारं संलेदणा मरणं ॥ १४ ॥ सामान्य उपयोग रूप दर्शन, विशेष र (५७) रुप झान, बाह्याच्यंतर वार प्रकारे तप, सत्तर प्र फारे संयम, नव प्रकारे ब्रह्मचर्यनी गुप्ति, जिनेश्वरनो रूपेलो धर्म थने संलेपणा मरण; एज सर्व जगत् ने विपे सार पदार्थ ठे.॥ १४ ॥ कल्लाणकोडि जणणी, पुरंत रियारि वग्गणी ग्वणी॥ संसार जल दि तरणी, एगं च दो जीवदया ॥ १५ ॥ जीवदया कोटानकोटि कल्याणने प्रगट करना , पुरंत दुरितने नाश करनारा शत्रुनी स्थाननूत वेयने संसार रूप समुज्थी तारनारी ३, श्यादिक सर्व कार्य करनारी एक जीवदया ज जाणवी.॥ १५ ॥ यारंने नचि दया, मदिला संगण नासए बंनं॥ संकाए सम्मत्तं, पवळा अलगदपणेणं ॥१६॥ थाम्नमां दया होती नथी, ग्रीनी संगत फरया श्री ब्रह्मचर्यनो नाश थाय , जिनपचनमा शंकारा रए) ख तेने समकित होतुं नथी थने धन ग्रहण क तेने चारित्र होय नही. ॥ १६ ॥ मऊं विसय कसाया, निदा विकदा य पंचमी नाणिया ।। एए पंच पमाया, जीवं पाउंति संसारे ॥ १७ ॥ मद्य, विषय, कपाय, निशा थने विकथा; ए पांच प्रकारना प्रमादो जीवने संसारमा पाडे वे.॥१७॥ (अनुप्रवृत्तम्.) लप्रति विमला नोए, लप्रति सुरसंपया ॥ लनंति पुत्त मित्तं च, एगो धम्मो न लाई १७ विमल एवा जोग, देवतानी संपदा तथा पुत्र थने मित्र;ए सर्वे जीवथी मेलवी शकाय , परंतु जिनेश्व रनोप्ररूपेसो एक धर्म,ते मेखवी शकातो नथी.॥१॥ एगो-ई नचि मे कोई, नाद-मन्नस्स कस्सई॥ एवं अदीपमणसो, अप्पाण-मणुसासई ॥ हुँ एक हुँ, कोश म्हारो नधी, तेम हुँ पण कोश्नो थीएम थदीन मन थको एटले सावधान चित्तया O

सो थश्ने पोताना थात्माने शीखामण थापे.॥१९॥
एगो मे सासन अप्पा, नाणदसणसंजु ।।
सेसा मे वाहिरा नाचा, सवे संजोग लकणा॥
झान दर्शने करी संयुक्त, सदा शाश्वत एटले
नित्य अने रागादिक परनावथी रहित एवो म्हारो
थात्मा, ते एक जठे थने शेप एटले बाकी रहेसा
अन्य थकी तन, धन, कुटुंवादि संयोग मेलाप रूप
अने जाव थकी विषय कपायादि रूप संयोग मेलाप
एवा नाव; ते सर्वे म्हारा स्वरूपथी जूदा ॥२०॥
(काव्यम्.)
नवि सुदी देवता देवलोए,
नवि सुदी पुढविपराया।
नवि सुदी सेठ सेपावणं,
एगंत सुदी मुणि वीयरागी॥२॥
श्रा संसारमा देवलोकमां वसनारा देवता सुखी
नथी, पृथ्वीनो पति राजा सुखी नधी, नगरशेव थ
ने सेनापति सुखी नथी; परंतु वीतरागी मुनि ज
एकांते सुखी ठे.॥२१॥

(कलश.) चौद पुरवधारि कहीए, ज्ञान चार वखाणीए जिन नहीं पण जिन सरीखा, सुधर्मखामी जाणीए। मात पिता कुल जाति निर्मल, रूप थनूप वखाणीए देवताने ववन एवा, जंबुखामी जाणीए ॥ १ ॥ अथ श्री दशवैकालिक सूत्रनुं पदेखें, वीजें अनेत्रीजुं तथा उत्तराध्ययन सूत्रनुं त्रीजु अने चोयु ए पांच अध्ययनो मूल पावे प्रारंनः (अनुसुव्वृत्तम.) धम्मो मंगल-मुकिळं, थहिंसा संजमो तवो॥ देवावि तं नमसंति, जस्स धम्मे सया मणो ॥१॥ जहा उमस्स पुप्फेसु, नमरो थावियाई रसं ॥ न य पुप्फ फिखामेई, सो य पीणेश थप्पयं ॥२॥ एमे ए समणा मुत्ता, जे लोए संति साहुणो ॥ विहंगमाव पुप्फेसु, दापजनेसणे रया ॥३॥ वयं च विति सप्पामो, न य को उपहम्मई ॥ थहागडेसु रीयंते, पुप्फेसु जमरा जहा ॥४॥ महुकारसमा युद्धा, जे नवंति थपिस्सिया ॥

याने पोताना श्रात्माने शीखामण थापे.॥
मे सास अप्पा, नाणदंसणसंजु ॥
सा मे वादिरा नावा, सवे संजोग लकणा॥
ज्ञान दर्शने करी संयुक्त, सदा शाश्वत एटले
नित्य थने रागादिक परनावथी रहित एवो म्हारो
यात्मा, ते एक जठे थने शेप एटखे वाकी रहेसा
अव्य थकी तन, धन, कुटुंवादि संयोग मेलाप रूप
थने नाव थकी विपय कपायादि रुप संयोग मेखाप
एवा नाव; ते सर्वे म्हारा खरूपथी जूदा ठे॥२०॥
(काव्यम्.)
नवि मुदी देवता देवलोए,
नवि सुदी पुढविपश् राया।
नवि सुदी सेह सेणावणं,
एगंत सुदी मुणि वीयरागी॥२॥
श्या संसारमा देवलोकमां वसनारा देवता मुर
नयी, गृथ्वीनो पति राजा मुखी नयी, नगरशेव
ने गेनापति मुखी नथी; परंतु वीतरागी मुनि
एकांत मुनी ते. ॥२१॥

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(६०)
यश्ने पोताना यात्माने शीखामण थापे.॥१॥
गो मे सास अप्पा, नाणदसणसंजु ॥
रसा मे वादिरा नावा, सवे संजोग लकणा॥
झान दर्शने करी संयुक्त, सदा शाश्वत एटले
नित्य श्रने रागादिक परजावथी रहित एवो म्हारो
थात्मा, ते एक ज ठे थने शेप एटले वाकी रहेला
अव्य थकी तन, धन, कुटुंवादि संयोग मेलाप रूप
अने जाव थकी विषय कपायादि रूप संयोग मेला
एवा लाव; ते सर्वे म्हारा खरूपथी जूदा वे ॥२॥
( काव्यम्.)
नवि सुदी देवता देवलोए,
नवि सुदी पुढविपश् राया॥
नवि सुदी से सेणावणं,
एगंत सुही मुणि वीयरागी ॥२॥
था संसारमा देवलोकमां वसनारा देवता र
नथी, पृथ्वीनो पति राजा सुखी नथी, नगरशेव
ने सेनापति सुखी नयी; परंतु वीतरागी मु
एकांत मुखी ठे. ॥१॥

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(६४) तेगिळं पाहणा पाए, समारंनं च जोश्णो॥४॥ सिंजायर पिमंच, थासंदी पलियंकए । गिदंतर निसिङाए, गायस्सुवदृणाणि य ॥५॥ गिहिणो चेयावडियं, जाइ थाजीवत्तिया ।। तत्ता-निवुड नोश्तं, थाउर स्सरणाणि य ॥६॥ मूलए सिंगवेरे य, उनु खंमे थनिबुडे । कंदे मूले य सञ्चित्ते, फले वीए य श्रामए ॥ ७ ॥ सोवञ्चले सिंधवेलोणे, रोमालोणे य थामए । सामुद्दे पंसुखारे य, कालालोणे य थामए ॥७॥ धूवणित्ति बमणे य, वछिकम्म विरेयणे ॥ अंजणे दंतवणे य, गायानंग विनूसणे ॥ए सब-मेय-मणान्नं, निग्गंयाणं महेसिणं ॥ संजमंमि य जुत्ताणं, खहुन्नूय विहारिणं ॥१०॥ पंचासव परिन्नाया, तिगुत्ता उसु संजया ॥ पंच निग्गहणा धीरा, निग्गंथा उकुदसिणो ॥११॥ ग्यावयंति गिम्हेसु, हेमंतेसु थवाउडा ॥ एव पडिसंलीणा, संजया सुसमाहिया ॥ १२ ॥ उ दता, धूयमोहा जिदिया । पखंदे जलियंहीणा, पकमंति महेसियो ॥ १३ ॥ नेछति तयं आएं, पुस्सहाई सहितु य ॥

-
माणुस्सं विग्ग सर्छ,
सुस्स अवदा।।
(६५)
के श्ठ देवलोपसु, केशतिसंति नीरया ॥१४॥
खविता पुष फम्मा, संजमेण तवेष य॥
सिझिमग्ग-मणुपत्ता,ताश्योपरिनिगुडे तिमि १५
इतिखुडगतियापारफहानामंतश्यंथनयणं सम्मतं.
चत्वारि परमंगाणि, पुलदाणीह जंतुषो ।
माणुसतं सुई सझा, संजमंमिय वीरियं ॥१॥
समावन्नाण संसारे, नाणागोचासु जाश्सु ॥
कम्मा नापाविहा कटु, पुढो विस्संनया पया ॥२॥
एगया देवलोएसु, नरएसुवि एगया ।
एगया थातुरंकायं, थहाकम्मेहिं गठ॥३॥
एगया खत्तियो होश त चंगाल वोकसो॥
त कीड पयंगो य, त कुंथु पिपीलिया ॥४॥
एव-मावहजोणीसु, पाणियो कम्म किविसा ।।
न निविति संसारे, सबसुत्र खतिया ॥५॥
कम्मसंगहि संमूदा, किया वहु वेषणा ॥
थमाणुसासु जोपीम, विणिहम्मति पापिणो॥६॥
कम्माणं तु पहाणार आणुपुती कयाच ॥
जीधा सोहि-मणुपत्ता यति मणुस्सयं ॥७॥

(६४) तेगिळं पाहणा पाए, समारंजं च जोश्णो ॥४॥ सिंजायर पिंमंच,थासंदी पबियंकए ॥ गिहंतर निसिजाए, गायस्सुबहपाणि य ॥५॥ गिहिणो वेयावडियं, जाइ थाजीववत्तिया॥ तत्ता-निवुड जोश्त, थाउर स्सरणाणि य॥६ मूलए सिंगवेरे य, उसु खेमे थनिबुडे ॥ कंदे मूले य सच्चित्ते, फले वीए य थामए ॥७॥ सोवच्चले सिंधवेलोणे, रोमालोणे य थामए । सामुद्दे पंसुखारे य, कालालोणे य थामए।।७॥ धूवणित्ति वमणे य, वञ्चिकम्म विरेयणे । अंजणे दंतवणे य, गायान्नंग विनूसणे ॥ ए॥ सव-मेय-मणान्नं, निग्गंथाणं महेसिणं ॥ संजमंमि य जुत्ताणं, बहुजूय विहारिणं ॥१०॥ पंचासव परिन्नाया, तिगुत्ता उसु संजया ॥ पंच निग्गणा धीरा, निग्गंथा उकुदसियो ॥१९ ग्यावयंति गिम्हेसु, हेमंतेसु थवाउडा ॥ एव पडिसंलीणा, संजया सुसमाहिया ॥ १२ उ दता, धूयमोहा जिइंदिया। पखंदे जलियंहीएका, पकति महेसिणो ॥ १३ ॥ नेति वंतयं आणं, उस्सहाई सहितु य ॥

माणुस्सं विग्ग समु, सुस्वास्स उवहा॥
(६५)
के देवलोपसु, केश सितंति नीरया ॥ १४ ॥
खवित्ता पुष फम्माई, संजमेण तवेण य॥
सिजिमग्ग-मणुपत्ता,ताश्णोपरिनिडे तिमि १५
इतिखुङगतिथाघारफहानामंतश्य थायणं सम्म.
चत्तारि परमंगाणि, फुलदाणीद जंतुणो॥
माणुस सुई सझा, संजमंमिथ वीरियं ॥१॥
समावनाण संसारे, नाणागोत्तासु जाश्सु ॥
कम्मा नाणाविहा कटु, पुढो विस्संनया पया ॥२॥
एगया देवलोएसु, नरएसुवि एगया ।
एगया थातुरंकायं, बहाकम्मेहिं गम ॥३॥
एगया खचियो होश त चमाल वोकसो॥
त कीड पयंगोय, तजे कुंथु पिपीलिया ॥४॥
एव-भावजोणीसु, पापिणो कम्म किविसा॥
न निधिजंति संसारे, सबसुव खत्तिया ॥५॥
कम्मसंगेहिं संमूहा, सुस्किया बहु वेयणा ॥
श्रमाणुसासु जोपीस, विणिहम्मति पापिणो ॥६॥
कम्माणं तु पहाणाए, वायुपुती कपाश्॥
जीवा सोहि-मणुपत्ता यति मणुस्सयं ॥३॥

जं सोचा पडियऊंति, नवं खंति-महिंसयं ॥७॥ थाहच्च सवणं लहं, सझा परम उबदा । सोचा नेयाज्यं मग्गं, वहवे परिजस्सई॥ए। सुई च लहुं समं च, वीरियं पुण उल्लहं॥ वहवे रोयमाणावि, नो यणं पडिवाए ॥१०॥ माणुसत्तंमि थाया, जो धम्मं सोच सबहे ॥ तबस्सी वीरियं खलु, संवुड़े निझुणे रयं ॥ ११ ॥ सोही उयिनूयस्स, धम्मो सुझस्स चिठई ।। निवाणं परमं जाश, घयं सित्तेव पावए ॥ १२ ॥ वीगिंच कम्मुणो हेज, जसं संचिणु खंतिए ॥ पाढवं सरिरं हिचा, उठें पक्कम दिसं ॥१३॥ विसालसेहिं सीलेहिं , जरका उचर उत्तरा ।। महासुकाव दिप्पंता, मन्नंता अपुणचयं ॥ १४ ॥ अप्पिया देव कामाणं, कामरूव विजबिषो.॥ उईकप्पेसु चिति, पुवा वास सया वहू ॥ १५ ॥ तव हिचा जहा गणं, जरका थाउरकए चुया॥ उति माणुसं जोणिं, से दसंगेऽजिजाय ॥ १६ ॥ खेत्तं वतु हिरन्नं च, पसवो दास पोरुसं ॥ चत्तारि कामखंधाणि, तब से उववडाए ॥१७॥ मित्तवं नाश्वं होश, जच्चागोए य वनवं ॥

थप्पायंके महापन्ने, अजिजाये जसो पले ॥ १७ ॥ सुच्चा माणुस्सए जोए, थप्पडिरुवे थहाउयं ॥ पुर्व विसुङ सम्मे, केवढं वोहि बुझिया ॥ १५ ॥ चउरंगं उखहं नशा, संजमं पडिवडिया ॥ तवसा धुय कम्मंसे, सिझे हवश्सासए-चि वेमि ॥ ॥ इति चजरंग नाम तश्यं यतयणं सम्मनं. ॥ थसंखयं जीविय मा पमायए, जरोवणीयस्स दु नधि ताणं ॥ एवं वियाणादि जणे प्पमत्ते, किं नु यि हिंसा थजया गहिंति ॥१॥ जे पावकम्मे हिंधणं मणूसा, समाययंती थमयं गहा य ॥ पहाय ते पास पयहिए नरे, वेराणुपक्षा नरयं उचिंति ॥२॥ तेणे जहा संधिमुहे गहीए, स कम्मणा फियर पावका A॥ एवं पया पेच हं च खोए, कमाण फम्माष न मोकथछि॥३॥संसार-मावन्न परस था, सादा रणं जंच करे। फम्मं । कम्मरस ते तस्स उपेय काले, न घंधया पंध पयं उपिति॥४॥ वित्तण ताएं नसने पमने, श्मंमि खोए बया परा ॥ दीपप्प पहेव थपंत मोहे, नेयाज्यं दा-मदछु-मेव ॥५॥ सुते मुयापिपदिबुरुजीपी,नवीससे पंभिप थामुपम्प (६०) घोरा मुद्त्ता अवलं सरीरं, जारंमपरकीय चरेऽपम त्तो ॥६॥ चरे पयाई परिसंकमाणो, ज किंचि पास शह मन्नमाणो॥ लानंतरे जीविय वहश्ता, पठा परि पाय मलावधंसी ॥७॥ठंदं निरोईण उबेश् मोरक, थासे जहा सिस्किय वम्मधारी । पुवावासा चरे ऽपमत्तो, तम्हा मुणी खिप्प-मुवेश मोरकं ॥ ७ ॥स पुर-मेवं न लन्नेका पठा, एसोवमा सासयवाश्याएं । विसीय सिढिले थाउयंमि, कालोवणीए सरिरस्स नेए ।। ॥ खिप्पं न सकेश विवेग-मेलं, तम्हा समु काय पहाय कामे ॥ सम्मेच लोग समया मदेसी, अ प्पाण रकीव चरे ऽप्पमत्तो ॥१०॥ मुहुँ मुटुं मोदय णे जयंतं, अणेगरूवा समपंचरं तं फासा फुसंति असमंजसं च, न तेसु जिस्कू मणसा पर्नसे ॥११॥ मंदाय फासा वहु लोहणिजा, तहप्पगारेसु मणं न कुजा ॥ रखेडा कोई विणएज माणं, मायं न सेवे जा पहेजा लोहं ।। १५ ।। जे संखया तुछ परप्पवाईते पेज दोसाणुगया परशा ॥ ए ए अह-मोति जुगं ठमाणो, कखे गुणे जाव सरिरस्स उति वे मि ॥१३॥ इति थसंखयं नामंचनठं थायणं सम्मतं॥ ॥ इति श्रीमहावीरस्तुति विगेरे समातम् ॥ .

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Mahaveer Stuti Vatere

Author
Gopaldas
Title
Mahaveer Stuti Vatere
File name
Mahaveer Stuti Vatere
Text
OCR done
Citation
1897
Published
2011/07
Publisher
Mumbai,niryansagar Press
Language
Sanskrit
Pages
97
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313784
Barcode
99999990311177.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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