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Sri Geetha Jnanmarg

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सूची। विषय भूमिका... गीताका परिचय श्रीमद्भगवद्गीतासार १ ६ . ... १५-७८ पहला স্বার্থ दूसरा तीसरा चौथा पाँचवाँ ११४ . ." .छठा মানৰ .. আনা ... नवौ .. " " ... २७५ ... दसवाँ ग्यारहवों बारहवाँ तेरहवा चौदहवाँ ਵ सोलहवाँ ३० -- ३२२ 4.. १५ . अठारहवा 8

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भूमिका। ता अनमोल रत्न है। जिस तरह अनमोल रत्न गी बड़ी कठिनतासे मिलते हैं, उसी तरह इस गोलाके महान् उद्देश्य, शुभकर उपदेश और कठोरतर विषय भी बड़ी कठिनतासे समझमें आते हैं। फिर मुझ मरोरडे अल्पज्ञ और अत्यन्त तुच्छ बुद्धिवाले मनुष्यको क्या साम्भ कि, इस ग्रन्यको भूमिका लिख सके। लिखना इतजादी में स्के इस वेदमयी, सर्वशास्त्रमयो और तत्त्वज्ञानमयो गोतामें दिये हुए श्रीकृष्ण भगवान्के अमृत सरीखे उपदेशोंके,केवल हिदीजानीवालोंका समझ न आनके कारण जनसमाजका उतना उपकार नहीं होता जितना कि होना चाहिये और न गोताको रचनाके उद्देश्यको घूगा- तया सिद्धिही होती है तथा संसार इस दुर्लभ अमृतको देख-देश तथा पूज-पूजकरही बिना पान किये रह जाता है। ऐसा न होना चाहिये । उचित तो यह है, कि बालकपनसे ही इसके अर्थ का थोड़ा-थोड़ा वीज बालकों के कोमल हृदयों पर आरम्भमही बो दिया जाय, जिसमें उनकी बुद्धिको बुद्धि के साथ- हो-साथ वेदव्यासके उद्देश्यको भौ कुछ सिद्धि होतो जाय जगत्का कुछ उपकार भी हो। बस, इसी उद्देश्यले तथा । यही विचारकर कि निन महाशयोंका संस्कृत में उतना तथा স্ময় प्रयत्न २. अतएव अभ्यास नहीं है कि, वे गीता सरीखे कठोरतर ग्रन्यका समझ कर परब्रह्म जनार्दनके उपदेशोंको समझ सके, मैंने अपनी अल्पशक्ति और होनबुद्धिके अनुसार इस ग्रन्थ के आशयोंको, जहाँ- तक बन पड़ा है, सरल हिन्दीमें खुलासा तौर पर समझानका उद्योग किया है। सो भी, अपनेही भरोसे नहीं बल्कि मैसूर- राज्यके श्रीयुत महादेव शास्त्री एम० ए० को अनुवादित भग- बहोता और शङ्कर-भाष्यके सहारे अपने उद्देश्यको सिद्धिका किया है। यद्यपि इन अमूल्य उपदेशोंके अर्थ को समझाने के समय अन्यान्य महानुभावोंकी बनाई हुई टीकाएँ, गौतापर उनके विचार, अादि जहाँ तक मिले हैं, मैं सभोंको देखता गया है; परन्तु प्रधान सहायता उपर्युत महोदयके किये हुए अंगरेजी अनुवादसेही ली है। आपके ग्रन्थ को सहायतासही मैंने यह कार्य पूरा किया मैं आपका विशेष सतज्ञ है। ६ आगे इस ग्रन्थ के प्रथम दो फार्म एक अन्य महाशय ने लिखे कारणवश वे न लिख सके, अतएव लाचार हो कर आगे के १६ अध्याय मुझेही लिखने पड़े। यदि उक्त लिखना न छोड़ बैठते, तो मैं इस महा कठिन काममें हर्गिज़ हाथ नलगाता। इस ग्रन्थको लिखते समय, मैंने इस बातपर विशेष ध्यान रखा है कि गीताके उपदेशोंके भाव भली भाँति व्यक्त हो, इसलिये साफ सरल शब्दों में भावार्थ अलग समझानका उद्योग किया है, साथही विषय ठोक-ठीक रखने पर भी पूरा ध्यान रखा है। जहाँ अपनी सामर्थ्य थी, इसको सुन्दर सजाकरही पाठकों को अर्पण करनका साहस किया है। अब यह ग्रन्थ कैसा हुआ, यह पाठक- गण आपही समझ लें और यदि कहीं त्रुटियाँ नज़र आवें तो समय-समयपर मुझे भी सूचित किया करे', ताकि द्वितीय संस्करणमें इसका तक छ . इसका कुछ सुधार हो जाय। मैं इतनाही चाहता कि बालक इससे शिक्षा ग्रहण करें, केवल हिन्दी पढ़े-लिखे मनुष्य श्रीमधुसूदनके उपदेशोंका सार समझकर लाभान्वित हों और देशका कुछ उपकार हो। यदि इसका कुछ भी अंश सत्य हुआ, तो मैं अपने उद्योगको सफल जानूंगा। विनोत- हरिदास । द्वितीय संस्करण की भूमिका। हूँ . में एक नितान्त अल्पज्ञ मनुष्य । सच तो यह है, कि सुभ में कुछ भी विद्या और बुद्धि नहीं, तिसपर भी मैंने मोला जैसे कठिन ग्रन्थके अनुवाद करने में क्यों हाथ डाला और उसकी क्या ज़रूरत थी,इन सब प्रश्नों का उत्तर में पहले संस्करणको भूमिका में लिख चुका है। अब यहाँ फिरसे दोहराने की आवश्यकता नहीं। मेरे जैसे अल्पज्ञ के अनुवादमें अनेक भूलें और त्रुटियाँ रह गई होंगी, इसमें कुछ भी संशय नहीं। अनेक दोषोंके रहने पर भी प्रायः सभी हिन्दी-पत्रोंने मेरे अनुवाद की जो सराहना की, वह उन सबको उदारताके सिवाय और कुछ नहीं है। समालोचकोंके सिवा, साधारण पढ़े-लिखे सज्जनों और अनेक विद्वानोंने भी मेरे अनुवादको पसन्द करके गोताको १००० कापियाँ हाथों-हाथ खरीद लों और अपनी अमूल्य सम्मतियाँ प्रदानकर मुझे बहुत कुछ उपरत किया।

.. ( ४ ) दरभंगके "मिथिलामिहिर" और इटावेके "ब्राह्मण सर्वख" ने, अनुवादको सराहना करते हुए, अनुवादकै साथ मूल श्लोक देने को सम्मतियाँ दीं। मैंने भी उनको सम्मतियॉ नितान्त उचित समझों इसौसे इस वार अनुवाद के ऊपर मूल श्लोक लगा दिये हैं। अनु- बाद वही पहले का है। सिर्फ पहले और दूसरे अध्याय में कुछ नया काम किया गया है। इन दो अध्यायोंमें, टीका-टिप्पणियाँ और शंका-समाधान ख व खोज-जाँचके साथ अधिकतासे लिखे गये हैं। अनुवादमें मूलका भाव, जैसे तैसे, लानेकी चेष्टा की गयी है; मगर एक-एक शब्द के अर्थ पर ख्याल नहीं रखा गया है ; क्योंकि वैसा करने से यह अनुवाद भी उसो पुराने ढाँचेका होता । जो सरलवा इसमें अब है, वह न रहती। इस बार मुझे अनेक झंझटोंसे ज़रा भी फूर्सत नहीं मिली ; इसीसे मेरे प्रिय मित्र बाबू हरिरामजीनेही मूलके साथ अनुवादका मेल मिलाया और प्रफ वगैरः देखे हैं। आपको इस बड़ी पुस्तकके तय्याद कराने में बड़ी मिहनत पड़ी है, इसलिये मैं आपको हृदयसे धन्यवाद देता हूँ। हरिदास । । तृतीय संस्करणकी भूमिका। गोताके प्रेमियों, धर्मके अनुरागियों और दयालु पाठकोंने जिस प्रेमसे मेरे किये हुए गौताके अनुवाद को अपनाया है, उसे देखकर यदि मैं यह अनुमान करूं कि मैंने जिस उद्देश्यसे यह अनुवाद किया था वह सफल हुआ है वो शायद अनुचित न होगा। गौता जैसे गम्भीर ज्ञानमय ग्रन्थका आशय सरल भाषामें, सहजही में समझानक लियेही मैंने यह अनुवाद किया था। बड़े-बड़े जटिल अनुवादोंसे पाठकोंका जी घबरा उठता है और मूलका आशय समझना तो दूरको बात, वे टोका भवँरजालमें फंस कर चक्कर खाने लगते हैं। मैंने अपने अनुवाद में अपनी शक्ति-भर कहीं भी जटिलता नहीं आने दी है और मतलबको आइनको तरह दिखला देनेका विशेष रूप से प्रयत्न किया है। यही कारण है कि इसके दो संस्करण थोड़ेही दिनों में समाप्त हो गये और आज तीसरा संस्करण प्रकाशित किया जाता है। जिस उदारतासे गोताके भक्तोंने मेरे परिश्रमको सराहा और पुस्तक खरीद कर समस्त व्ययको सार्थक किया है, उसके लिये मैं उनका सदैव कृतज्ञ रहूँगा। इस संस्करणमें, दूसरे संस्करणमें रही हुई बेटियोंको दूर करने के सिवा, आरम्भमें "श्रीमद्भवगीता-सार" नामका एक निबन्ध भी दे दिया गया है, जिससे गौताके महत्त्व और उसके भीतरी तत्त्वों पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। यह निबन्ध श्रीयुत बाबू शिवपूजन रायजी, एम. ए० ने लिखा है, जिसके लिये मैं इन्हें हार्दिक धन्यवाद देता है। यह निबन्ध कसा उपयोगी है, यह पाठक स्वयंही देख लेंगे, मेरा कुछ कहना निष्प योजन है। तोभी इतना कह सकता है कि इससे इस संस्करणको उपयोगिता बढ़ गई है। मुझे पूर्ण आशा है कि इस संस्करणको भी पाठक पहलेहीको तरह अपनावेंगे और भगवान्के उपदेशामृत का पान कर, पुण्यके पथमें अग्रसर होते हुए मुझे कृतार्थ करेंगे। , . कलकत्ता, विनोत, १५ अकोबर, १८१८। हरिदास ।

गीताका परिचय । यस्माद्धर्ममयी गीता, सर्वज्ञान-प्रयोजिका । सर्वशःस्त्रमयी गीता, तस्माद्गीता विशिष्यते ॥ RINKA त् गौताके पढ़ने और उसको समझनेसे धमकी बाते मालूम होती हैं, सब तरहके ज्ञानोंको वृद्धि होती है, RAINST सब शास्त्रोंके तत्त्वको बातें मालूम होती हैं, इसलिये गीता सब शास्त्रोंसे श्रेष्ठ है। इसमें कोई सन्देह नहीं, कि अपर दिये हुए श्लोक का एक-एक अक्षर सत्य और ठोक-ठीक है; क्योंकि गोताको एसेही समयमें सृष्टि हुई है और श्रीकृष्ण भगवान्ने अर्जुन को ये अमृत-भरे उपदेश ऐसेहो समय दिये हैं, जिस समय अर्जुन बहुतही व्याकुल हो उठे थे, क्षत्रियोचित भाव उनके हृदयसे दूर हुआ जाता था तथा वह, क्षत्रियों के कर्मको भूल, रणभूमिसे भागा चाहते थे। ऐसी अवस्थामें, ऐसे अवसर पर और ऐसे रणभूमि सरोखे चित्तको हिला देनेवाले स्थानमें जिस अमृतरूपी उपदेशने अर्जुन सरीखे व्यग्र-चित्त मनुष्यका हृदय स्थिर और शान्त कर दिया, उस उपदेशको मुख और शान्तिमें बैठा हुआ मनुष्य यदि ध्यान देकर, समझकर पढ़े ; तो इसमें क्या सन्देह है कि उसका ज्ञान बहुत बढ़ जायगा और धर्म तथा कर्मके पूरे-पूरे तत्त्वको वह भली भाँति समझ सकेगा-यही एक प्रधान कारण है कि प्रत्येक विचारशील उन्नत जातिने इस पवित्र ग्रन्थका बहुतही विशेष आदर किया है। । ७ महाभारतके समयकी बात है, ठीक-ठीक समयका पूरा पता न लगनेयर भी, अनुमानसे पाँच हजार वर्ष पहिले को यह घटना एक .. ( ७ ) भालुम होती है। उस समय भारतमें हस्तिनापुर नामक समृद्धिशाली नगर था। वहाँ चन्द्रवंशी राजा राज्य करते थे। उन राजाओंमें शान्तनु बड़ेही प्रतापी राजा हुए। उनके पुत्रका नाम था भीष्म । कारणवश, भीमके रहते हुए भी शान्तनुने योजन- गन्धा नामको मल्लाहकी कन्यासे विवाह किया। उससे उनके दो पुत्र हुए, जो असमयमेंही मर गये। उनके उन दोनों पुत्रोंसे पाण्डु और धृतराष्ट्र नामके दो पुत्र हुए। पाण्डु, ही राज्य के मालिक हुए। पाण्डुसे युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव-ये पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए ; जिनमें सबसे बड़ा दुर्योधन था। धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहलाये और पाण्डु के पाँचों पुत्र पाण्डव कहलाये। पाण्डु भी अपने पुत्रोंको छोटो अवस्थामही छोड़ परलोक सिधार गये; इसलिये राज्यकी देख-भालका काम धृतराष्ट्र के हाथों में गया। आरम्भसेही धृतराष्ट्रको नीयत खोटी थी। उनके कामोंसे मालूम होता है कि, उनको इच्छा अपनेही पुत्रों को समस्त राज्य दे देने की थी। उनका बड़ा बेटा दुर्योधन भी पाण्डवोंको देख न सकता था, दिन-रात उनका निधनही मनाया करता पाण्डवोंके मारनेके बहुत कुछ यत्न करने भी, ईश्वरको कपासे, वह पाण्डवोंका कुछ भी बिगाड़ न सका, पाण्डव बाल बाल बचते हो गये । पाण्डवोंकी शिक्षा भी अच्छी हुई, अम्ब -शिक्षामें भी पाण्डवोंनही विजय पायो। अर्जुन बड़ेही भागे धनुईर हुए। पाण्डवोंसे दुर्योधनको न पटतो देख, अन्तमें बहुत कुछ समझाने- बुझानेपर धृतराष्ट्र ने पाण्डवोंको राज्य बाँट दिया । राज्य पानेपर पाण्डवोंने अपने राज्यकी उन्नति प्रारम्भ की। पाण्डव ख ब बलौ थे। उन्होंने अपने भुज-बलसे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाएँ जीत कर राजसूय यज्ञ किया। उनका सभा-मण्डप मय नामक एक दैत्यने ऐसा अद्भुत जैसा न कभी पृथ्वी पर बना और न बनेगा। भारतके सभी था। बनाया, किया। कुछ । ८ ) राज्योंने पाण्डवोंको वश्यता स्वीकार को चीन, कम्बोजिया, कन्दहार आदि पृथ्वौके सभी नरपतियोंने पाण्डवोंको अपना सम्राट समभा। पृथ्वीभरके राजाओंने पाण्डवोंको अनेक प्रकारके धन- रत्न आदि भेटमें दिये। पाण्डव अब बड़ेही वैभवशाली हुए। समस्त भूमण्डलके वह एकमात्र चक्रवर्ती राजा हुए। दुर्योधनसे पाण्डवों को यह बी और उन्नति देखो गई। उसने पाण्डवोंको बुलाकर छलसे जूभा खेलना प्रारम्भ जएमें पाण्डव बराबर हारते गये, यहाँ तक कि अपनी परम प्रिया स्त्रो द्रौपदी को भी हार गये। इस घ त-सभामें दौपदीको बहुत कुछ अपमान सहना पड़ा। जूएमें दुर्योधनका छल भी पाण्डवोंसे छिपा न रहा । पाण्डव उसी समयसे समझ गये कि दुर्योधन अनर्थ करेगा। सब सभासदोंके समझाने पर, बड़ी कठिनतासे द्रौपदी को तो छटकारा मिल गया ; परन्तु पाण्डवोंको १२ वर्षका बनवास और १ वर्षका अज्ञातवास मिला। प्रतिज्ञाबद्ध होने के कारण पाण्डवों को ये सब दुःख सहन करनेही पड़े। का १३ वाँ वर्ष भी पाण्डवोंने राजा विराट के यहाँ छिपकर नौकरी करके बिता दिया । प्रतिज्ञाके तेरह वर्ष बीत जाने पर पाण्डवोंकी ओर से श्रीकृष्ण भगवान दूत बनकर कौरवोंके पास गये और उनसे पाण्डवोंका राज्य माँगा। इस समय दुर्योधनके हाथमें राज्यको देख-रेख थी, दुर्योधनने राज्य देनेसे इन्कार कर दिया। कृष्णने बहुत कुछ समझाया, अन्तमें पाँच गाँवही माँगे ; परन्तु दुयो धनने साफ़ कह दिया कि बिना युद्ध के मैं एक सुई की नोक बराबर भूमि भी न दूंगा । लाचार, कृष्ण लौट आये। अब दोनों ओरसे युद्ध को तय्यारियाँ होने लगीं। दुर्योधनको अज्ञातवास * पाण्डवों के अज्ञातवास के १३ वें सालका हाल अगर औपन्यासिक भाषामें देखना 'हो तो हमारे यहाँ से "पाप-परिणाम" नंगा देखें। दान ॥८, डाक खर्च ।

(८) भी मालुम हो गया कि पाण्डवोंसे लड़ाई होगी। भीमपितामह, द्रोणाचार्य, कर्ण, शल्य, जयद्रथ आदि बड़े-बड़े नामो धनुर्धर कौरवों की ओर हुए। धृष्टकेतु, चेकितान, कुन्तिभोज, शैव्य, धृष्टद्युन्न, सात्यकि आदि राजे तथा अभिमन्यु एवं द्रोपदौके पाँचों पुत्र पाण्डवोंकी ओर हुए। कौरवी सेनाके सञ्चालनका भार भोल- पितामहको दिया गया और पाण्डवी सेनाके सेनापति भीमसेन हुए। दोनों ओरकी सेनाएँ सजधजकर मोर्चों पर आ डटौं। दोनों ओरसे लड़ाई का मारू बाजा बजने लगा। जब दोनों सेनाएँ एकत्रित हो गई, तब अर्जुनने अपने सारथि (क्योंकि श्रीकृष्णनेही अर्जुनके रथको चलानका भार लिया था) श्रीकृष्ण को रथ दोनों दलों के बीच में, इसलिये, ले चलनेको कहा कि देखें कौन-कौन हमलोगोंसे युद्ध करने के लिये विपक्ष में खड़े हुए हैं। भगवान् श्रीकृष्णाने रथ दोनों दलोंके बीच में ले जाकर खड़ा अब अर्जुन अपने विपक्षी दलको देखने लगे-अपने सम्बन्धी, बाबा, गुरु, चाचा, मामा, पौत्र, श्वशुर, सभी अपनेही अपने दिखाई देने लगे। यह दृश्य देख, अजनको बड़ा दुःख हुआ। वह करुणामें भरकर, कृष्णसे बोले-“हे करण ! इस स्थानपर पाकर लो अब मेरी युद्ध करनेकी इच्छा नहीं होती, मेरा मुँह सूख रहा है, नसें ढीली पड़ी जाती हैं, कलेजा कॉप रहा है, यह धनुष मेरे हायसे गिराही चाहता है, माधमें चक्कर पा रहे हैं ; क्योंकि जिनसे युद्ध करना होगा, वे सब अपनेही सम्बन्धी, भाई-बन्धु, गुरु आदि हैं। इन अपनेही मनुष्योंको सारकर मैं क्या सुखी होऊँगा ? यह राज्यपाट यदि मैंने जीत हो लिया तो किस काम आवेगा? यह बात मेरी समझमें नहीं अब मुझे जयको ज़रूरत नहीं है, मैं राज्यको भी इच्छा नहीं करता, न इतने प्राब्दीयों को मारकर मुझे सुख-भोग भोगनेकी राज्य-भोगसे क्या होगा ? जिनके लिये राज्य-भोगको किया। आती। । २ (१०) आवश्यकता है, वे तो यहाँ मरने-मारनेके लिये खड़े हैं ! ये हमारे गुरु, पितामह, श्वशुर, साले और अन्यान्य सम्बन्धी हैं। है मधुसूदन ! ये चाहें मुझे मार डालें, पर मैं इन पर शस्त्र नहीं चला सकता। इन गुरुजनोंको मारकर राज्य भोगनेकी अपेक्षा भीख माँगकर दिन काटना अच्छा है। यदि मुझे त्रिलोकी का राज्य भी मिल जाय, तोभी में इनपर शस्त्र नहीं उठा सकता।" श्रीकृष्ण भगवान्ने देखा कि, अर्जुन इस समय वृथा मिथ्या मोह-जालमें फंसकर अपने धर्मसे डिग गया है, इसे ब्रह्मज्ञान नहीं है ; इसोसे मोह और शोकने इसे धर दबाया है। यदि इस समय इसे ब्रह्मज्ञानका उपदेश दिया जाय, तो यह फिर अपने क्षत्रियोचित धर्मपर आरूढ़ हो सकता है। यह सोचकर श्रीकृष्ण भगवान् समस्त वेदोंका सार, ब्रह्मज्ञान, साधनों-सहित अर्जुनको सुनाने लगे। भगवान् श्रीकृष्णने यहाँ जिस ब्रह्मविद्याका उपदेश देकर अर्जुनको आँखें खोलौं और उसे अपने धर्म में लगा दिया उसोका नाम “गोता" हुआ। यही गीताका यथार्थ परिचय ७. गीता ज्ञानका भण्डार है। गीता धर्ममयो, सर्वशास्त्रमयी और सब प्रकारके तत्त्वज्ञानोंसे भरी हुई है। गीता का एक-एक श्लोक, एक-एक पद, यहाँ तक कि एक-एक अक्षर भी ज्ञानसे शून्य नहीं है। यह योग-शास्त्रका विषय है; इसमें एकमात्र ब्रह्म विद्याका निरूपण है। इस ग्रन्थके सभी श्लोक मन्त्र हैं। समूची गौतामें ज्ञाननिष्ठाका वर्णन है ; क्योंकि ज्ञाननिष्ठाही मोक्षका कारण है। बिना ज्ञाननिष्ठाके मुक्ति नहीं हो सकती, परन्तु ज्ञाननिष्ठाके पहिले उपासना और उपासनाके पहिले कर्मयोग या कर्म-निष्ठाको आवश्यकता आ पड़ती है। अतः कर्म, उपासना और ज्ञान तोनोंही मोक्षके कारण हैं। इन तीनोंमें से किसी के विर काम नहीं चल सकता। तीनोंही के साधनको आवश्यकता ७.

(११) । तीनों के माधनसेही मोक्ष मिलती है। उपासना और ज्ञानके विना, केवल कर्म काम नहीं चलता। न कर्मके बिना केवल उपासना और ज्ञानसेही काम चलता है, इसी तरह ज्ञानके बिना केवल कर्म और उपासनासे भी काम नहीं चल सकता। तात्पर्य यह है, कि तीनों में से एक भी न रहने से, दोनों बेकार हो जाते हैं। ये सदा एक दूलरको अपेक्षा रखते हैं अब इन दोनों में भेद यह है, कि कर्म करनेसे अन्तःकरण शुद्ध होता है, उपासनासे चित्त एकाग्र होता है और ज्ञानसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिये नीताके पहले छः अध्यायों में कर्म- काण्डका वर्णन है ; दूसरे छः अध्यायोंमें उपासनाका वर्णन है और शेषके छः अध्यायों में ज्ञान-निष्ठाका वर्णन है। इस तरह १८ अध्यायों श्लोकों में गीता समाप्त की गयी है। जव मनुष्थ कर्मयोग और उपासना, पक्का हो जाता है, तब उसके सामने ज्ञान-निष्ठा मुख्य हो जाती है और जब वह ज्ञान-निष्ठामें भी परिपक्व हो जाता है, तब उसके सब दुःखों का नाश होकर उसे परमानन्दको प्राप्ति हो और ७०० , जाती है। .. जिस तरह वेदमें कर्म, उपासना और ज्ञानका निरूपण किया गया है ; उसी तरह इस गोतामें भी कर्म, उपासना और ज्ञानका निरूपण किया गया है। गोतामें ऊँच-लोचका भेद नहीं है। गोताका मुख्य उपदेश है कि आत्मा सबमें समान है, सभी ब्रह्म हैं और जीव तथा ब्रह्ममें भेद नहीं है। कृष्णने अर्जुनके उपकारके लिये जिस तरह यह ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया, अर्जुनने जिस भाँति इन उपदेशोंको ध्यानसे समझ- कर अपना कर्म ठीक-ठीक साधन किया ; उसी तरह महर्षि वेद- व्यासने भी जगत्के उपकारके लिये यह विचार कर कि कुछ दिनों में वह समय आवेगा जब लोग वेदको समझ न सकेंगे और ब्रह्मविद्याको भी जान न सकेंगे, भगवान् के मुख से निकले हुए ब्रह्मज्ञानको युथा- AN ( १२ ) स्थान सजाकर अपने लिखे महाभारतके भौष्म-पर्वमें उसे जोड़ दिया और उसका नाम "भगवडीता" रख दिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि गीता अलभ्य अन्य है, इसके समान उपदेशपूर्ण कोई ग्रन्थ नहीं है ; इसके प्रमाण-स्वरूपमें कृष्ण भगवान् ने स्वयंही कहा है :- गीताश्रयेऽहतिष्ठामि, गीतामंचोत्तमंगृहम् । गीताज्ञानमुपाश्रित्य, त्रील्लोकान्पालयाम्यहम् ॥ मैं गौताके आश्रय परहो रहता हूँ, गीताही मेरा परमोत्तम घर है और मैं गीताके ज्ञानका आश्रय लेकरही निलोकोका भरह- पोषण करता है। और भी कहा है-- चिदानन्देनकृष्णेन, प्रोक्ता स्वमुखतोऽर्जुनम् । वेदत्रयींपरानन्दा, तत्त्वार्थज्ञानसंयुता ॥ यह गीता स्वयं परब्रह्मरूप चिदानन्द ओंकणने अपने मुखसे अर्जुनको सुनाई है; इससे यह वेदत्रयो-रूप, कर्मकाण्डमय और सदा आनन्द तया तत्त्वज्ञान को देनेवाली है। विचारनेकी बात है कि, जिस गोताके वक्ता स्वयं पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण हैं, श्रोता अर्जुन सरीखे महाधुरन्धर तेजस्वी और जिते- न्द्रिय पुरुष हैं और कती कृष्णद्वैपायन व्यास जैसे महात्मा हैं, भला उसके भवनी, त्रयतापनाशिनी और तत्त्वार्थज्ञानदायिनी होने में क्या संशय है? इसमें तो कोई सन्देहही नहीं है, कि गीतासे बढ़कर ज्ञानका कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं है, इसको समझकर पढ़नेसे मनुष्य ज्ञान- सिद्धि प्राप्त करता है, और अन्तमें जन्म-मरणसे छुटकारा पाकर ब्रह्मरूप हो जाता है। जो मनुष्थ-देह पाकर इस गीतारूपी " . ( १३ ) अमृतको नहीं पीता है, वह अमृत छोड़कर विष पीता है; अत- एव जिन्हें जन्म-मरण के काष्टसे छुटकारा पाना हो, जिन्हें संसार- सागरसे तरना हो, वे गीताको समझ कर पढ़ें, पढ़ावें, सुने और सुनावें। गीताका विषय कठोर है, इसमें ज्ञानको बातें हैं, ज्ञानकी बातें बिना समझे, बिना बुद्धि लड़ाये, माथे में नहीं घुसतौं। जो बात समझमें नहीं आती, जिस बातमें मस्तिष्क काम नहीं करता, उन बालोंको केवल रट लेनेसे कोई फल नहीं मिलता। गीता बोलण- प्रदत्त उपदेश है। किसीके उपदेशको रटनेसे फल नहीं हो सकता। उपदेशका अर्थ समझकर उसोके अनुसार कार्य करना चाहिये, तब फल मिलता है। कहा है- गीतार्थश्रवणासतो , महापापयुतोऽपिया । वैकुण्ठस मवाप्नोति, विष्णुनासह मोदते ॥ महापापी भी यदि गोताके अर्थको ( केवल पद्यको नहीं) सुनने में आसक्ता होता है तो वह भी वैकुण्ठ पाकर विष्णु भगवान्के पास रहता हुआ आनन्द करता है। और भी कहा है- गीतार्थं ध्यायते नित्यं, कृत्वाकर्माणिभूरिशः । जीवन्मुक्तः सविज्ञेयो, देहान्ते परमं पदम् ॥ जो अनेक प्रकारके कम करता हुआ भी गीताके अर्थका नित्य ध्यान करता है वह मरनेपर परम पद पाता है। विशेष समझानको बात नहीं है, जैसे जब तक अन्न नहीं पचता तब तक रुधिर आदि धातु नहीं बनती ; उसी तरह जब तक उपदेश समझमें नहीं आते तबतक मनुष्य उनके अनुसार काम भी नहीं कर सकता और इसी कारणसे कुछ फल भी नहीं मिलता।

(१४ )
अतएव, इस गीतारूपी उपदेशने एक-एक अक्षर, एक-एक पद
और एक-एक शब्द तथा वाक्यको सब समझाकर पढ़ना और
याद रखना चाहिये। समझाकर पढ़नेसेहो गोता-पाठका यथार्थ
फल मिल सकता है।

श्रीमद्भगवद्गीता-सार ( माधवाचार्यके गीता-भाष्यके अनुसार गीताके प्रत्येक अध्यायका संक्षिप्त भाव* ) प्रथम अध्याय ण्डवों और कौरवों को सेनायें कुरुक्षेत्रमें सम्मुखीन हुई Ma पा हैं। दुर्योधन दोनों सेनाओंको देखता है। देखने पर उसके हृदय में यह भाव उठता है कि यद्यपि उसके दलको अक्षौहिणियों और प्रसिद्ध योद्धाओंको संख्या अधिक है, तथा- पि पाण्डव-सैन्यही अधिकतर बलवती है। अपनी शक्तिको पूर्णता पर उसे संशय होता है और द्रोणाचार्य को ही इस विषयमें सबसे सुचतुर समझ, वह उत्साह वाक्य सुनने को आशासे, दौड़ा हुआ उनके पास जाता है। द्रोणाचार्य तो कुछ नहीं कहते, किन्तु सेनानायक पितामह भीष्म राजकुमार को मानसिक व्यग्रता समझ जाते हैं # जिस लोकसे जो भाव लिये गये है, उस श्लोकको मंगल्या दे दी गई है।

( १६ ) अपना .. और उसके दुःखाभिभूत हृदय को उत्तेजित करने के लिये शंख बजाते हैं। इन बातोंसे यह झलकता है कि, दुर्योधन खब समझ गया है कि मेरा पक्ष अन्याय्य है। और इन बातोंसे यह भी प्रकट होता है कि, महती सेनाके रहते भी, धर्मपथसे विचलित होने के कारण, उसपर मानसिक निर्बलता अपनी छाप जमा रही है। इस संघटन से और दुर्योधनका यह मनोभाव देखकर मानों पाठकों और चिन्ताशील पुरुषों को इस संघर्षके अन्तिम फलका आभास मिल रहा है। दूसरी ओर ; अर्जु नमें कोई धार्मिक दोष नहीं, जिससे उन्हें यह युद्ध परित्याग करना पड़े अथवा जिसके कारण उनको विजयमें सन्देह हो सकता हो ; तथापि करुण और उच्चसे उच्च भावोंके वशीभूत होकर अर्जुन अपनी प्रतिज्ञासे डिगना चाहते हैं । वह देखते हैं कि युद्धक्षेत्रमें जिनसे उन्हें लड़ना पड़ेगा, उनमें उनके आत्मीय, श्रद्धास्पद गुरु जन, स्निग्ध मित्र और लड़के मौज द हैं। परन्तु यदि अर्जुन युद्ध क्कोड़कर भाग जायँ तो लोगोंको यह कहावत चरितार्थ होगी कि, संसार में अन्याय और अधम्म भरा हुआ है तथा अन्याय और अधर्म की जीत और न्याय और धर्मको हार होती है। अर्जुनको कर्तव्य-पथपर आवश्यक है और उनको कर्तव्य के महत्त्वका ज्ञान उचित है। उनको अच्छी तरह समझाने के लिये भगवान् बहुत ज़ोर देकर यह नियम बतलाते हैं कि, कर्तव्य-सम्यादन के लिये कुछ उत्सर्ग-कभी-कभी बहुत उत्सर्ग की आवश्यकता होती है। प्रथमतः, प्रशंसनीयसे भी प्रशंसनीय व्यक्तिगत भावोंको विना आहुति दिये कर्त्तव्य-पालन नहीं हो सकता है। यही साधारण नियम, दैवौ तथा मानवो न्याय का मूलमन्त्र है। करुण-भावसे अभिभूत होकर अर्जुन युद्ध छोड़ देनेके लिये कुछ युक्तियाँ उपस्थित करते हैं। वे कहते है कि, जिन गुरुजनों को मुझे म्जा करनी चाहिये, जो आत्मीय मेरे सारे सुखको जड़ हैं, कराना कृषण . ( १७ उनले गोंके मारनेसे मुझे क्या लास ? उनका संहनन करने में केवल रक्तरञ्जित सम्पत्तिका स्वामी बनूंगा ; परन्तु ऐसी सम्पत्ति ज़राभी सुखदायिनी नहीं होगी। प्रत्युत् यह सम्पत्ति वादको मुझे जर कमें भी लेजा सकती है। बुद्धिमानों की तरह बातें करते हुए अर्जुन युद्धसे देश, समाज तथा धर्मपर होनेवाली बुराइयों का वर्थन करते हैं । संक्षेपतः, अर्जुन शत्रुको हरा, उसको सम्पत्तिको अधिकार में लानसे, न अपनीही न संसारकोही कोई सलाई देखते हैं। वे कहते हैं, कि यदि मैं शत्रुहौल धनधान्यपूर्ण सारी युथिकोला अकेला राजा हो जाऊँ अथवा स्वर्गका राज्य भी मेरे हो हाथमें आ जाय, तोभी मुझे नहीं दीखता कि मेरी इन्द्रियोंका जलानेवाला शोक दूर हो जायगा। अर्जुनको इहलोकके अनुभव को सत्यता पर पूरा विश्वास है और वे यह माननेके लिये तैयार नहीं, कि इस अनुभव का विनिमय इस या दूसरे किसी लोकको किसी चीज़से हो सकता है। समस्त वार्तालापमं घोसणा भी यह अस्वीकार नहीं करते, कि इस संसारके अनुभव मायिक नहीं, बल्कि सच्चे अनुभव हैं। उनका केवल यही कहना है, कि जो पुरुष मुख और दुःख दोनोंही को एकही तरह अनुहिग्न चित्तसे देखता है, वही पुरुष अमरत्वके योग्य होता है। अर्थात् इस क्षणसङ्गर जीवन के तुच्छ आमोद-प्रमोटके लाभको अपेक्षा और भी उद्देश्य हैं, जिनपर मनुष्यको लक्ष्य रखना चाहिये । श्रीक्षण बतलाते हैं कि अर्जुन ! तुम्हारी युक्तियाँ ठीक नहीं। सच्चे प्रज्ञावान् पुरुष को चाहिये, कि कुछ व्यक्तिगत असुविधाओंकी परवा न करे और विश्वब्रह्माण्डको अधिकसे अधिक सुख-वृद्धि के लिए यत्न किया करे। जिन उद्देश्यों की सिद्धि की चेष्टा करनी चाहिये तथा जो भाव चित्तमें उत्पन्न हो सकते हैं, उनके इस भेदको जब तक हृदयङ्गम नहीं करता, तब तक यह नहीं कहा जा सकता, कि उसने सच्ची प्रज्ञा प्राप्त कर ली है। ३ दूसरा अध्याय। . । MNA गवान् कृष्ण कहते हैं, कि पण्डित लोग न मृत म व्यक्ति के लिए, न जीवित व्यक्तिहोके लिये , चिन्ता करते Naik हैं। अर्जुन, केवल तुम बुद्धिमानोंको तरह बातें करते हो। भगवान्के कहनेका तात्पर्य यह नहीं, कि अर्जुनको मञ्ची है। जैसा शोक अर्जुन अनुभव कर रहे हैं, वैसा शोक सच्ची प्रज्ञाका चिन्ह नहौं । अब प्रश्न यह उठता है, कि तब सच्ची प्रज्ञा है क्या ? भगवान अर्जुनके ध्यानको अभ्यस्त मार्ग से खींचनेके लिये, इनके तर्क को नौवही पर आय करते हैं। वे कहते हैं, कि अर्जुन तुमको प्रज्ञा का अर्थही माल म नहीं। जो लोग जीवित हैं, उनके लिये पण्डित या मूर्ख कोई शोक नहीं करता। जो लोग मर गये हैं, उनके लिये भी पण्डित लोग शोक नहीं करते ; केवल मूर्ख उस भूलभूलैया में पड़ते हैं। यहीं बुद्धिमानों को बुद्धि देखी जाती है। अब यह शङ्का हो सकती है, कि आत्मोवोंके मरनेसे बुद्धिमानों तथा मूर्थीको हानि तो बराबरही होती है, तब बुद्धिमानों को व्यथा क्यों नहीं होती ? इसी जिज्ञासाको चित्तमें उद्घोप्त करना वक्ताका उद्देश्य है। इसका तर यह नहीं, कि प्राच पुरुषों के लिये एक अलग और मूखोंके लिये । ? ( १८ ) एक दूसराही लोक है। ऐसे उत्तरका कुछ अर्थ नहीं निकलता। यक्षार्थ में दोनोंही के लिये एक लोक है। पर सोचना यह है, कि किस दृष्टि से इन बातोंको देखना बुद्धिमत्ता और किस दृष्टिसे देखना मूखता है। यदि ससूची गोतामें इस एक विषयका भी पूर्वापर विरोधरहित विचार किया गया है और यदि यह निजको भाषा तथा स्थिति की व्याख्या और विवरण प्रगट करती दिखायी देती है, तो जिज्ञासु पुरुषको इतनही से यह सोच कर सन्तुष्ट होना चाहिये, कि एक यथार्थ और समुचित फल उसके हाथ लगा है। श्लोक १२।१३-प्रारम्भमेंही चिन्ताशील घुरुषको ये बातें साव- धानता-पूर्वक मारण रखने का आदेश किया जाता है :- (१) मुख्यतः, क्या सत् और क्या असत है ? (२) मनुष्य में कोई ऐसी चीज़ है, जो मानों उसे शरीर और आत्माको एक समझने से मना करती है। (३) अहम् का तात्पर्य एक प्रधानतः सत पदार्थ से है एक ऐसा सत पदार्थ जो परिवर्तनशील स्थितिसे भिन्न-भिन्न रूपसे प्रभावान्वित होने पर भी स्वयं परिवर्तनशील नहीं तथा जो अपनेको सबका आधारभूत समझता है। ऐसेही सत् पदार्थको आत्मा कहते हैं। ( ४ ) जो कुछ मुख्यतः सत् है, उसका बिल्कुल अभाव नहीं हो सकता । तर्कशास्त्र के कार्य-कारण नियमके अनुसार रुत् पदार्थ को जड़ एक नित्य पदार्थ ही हो सकता है। और जो कुछ परिवर्तन इसके सम्भव हैं, वे इसको केवल भिन्न-भिन्न अवस्थायें तथा विकारमात्र हैं। इसौको विनाश कहते हैं, विनाश कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं। चाहे यह चैतन्य जीव हो या जड़ वस्तु हो, मुख्यत: इस सत्-पदार्थको खतः या इसके प्रधान रूपमें अवश्यही नित्य मानना होगा। यदि यह नियम अतीत और वर्तमानके विषय में सत्य है, तो भविष्यत्के विषयमें भी इसको सत्य माननेके लिये विवश होते हैं। यह एक

Sri Geetha Jnanmarg

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