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Vasunandeeshavkachar

Babu Surajbhanu · 2009/11

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(२) जह्मा ण संति तह्मा । सम्मत्त सुणहु वोच्छामि ॥५॥ अर्थ-जिसको सम्यक्त्व नहीं है उसको इन पदों में से कोई भी दर्जा नहीं होता है इस कारण मैं सम्यक्त्व का वर्णन करताई तुम सुनो- . - . अचागमतचाणं । जसदहणं मुणिम्मलं होदी ।। सकाइदोसरहियं । तै सम्मत्तं मुरोग्रव्वं ॥६॥ अर्थ-आस आगम और तत्वों में शंका आदिक दोष रहित निर्मल श्रद्धान होने को सम्यक्त्व जानना चाहिये- अत्ता दोसंविमुक्को। पुव्वापरदोसवन्नियं वयस ॥ तञ्चइ जीवहव्वा- दियाइ समयाहि गयाइ ॥ ७॥ अर्थ-जिसमें कोई दोष नहीं यह प्राप्त है जिसमें पूर्वापर पिरो. धी कथन नहीं वह आगमहै, और जीव आदिक द्रव्यही तत्व इनको शास्त्र से जानना चाहिये- छहतबहाभयदेसी। राऊ मोहो जरारुजा चिंता ॥ मच्चु खऊ सेऊ । अरह मऊ वाहऊँ जम्मं ॥८॥ णिदा तहां विसाादोसा एदेहि वज्जि अत्ता।। वयणं तस्स पमाणं । सुचत्यपरूपये जमा ।।९।। अर्थ-भूख, प्यास , भय, द्वेष, राग, मोह,जरा, रोग, चिन्ता मरण, खेद, पसीना, अरति, मद, विनम, जन्म, निद्रा और विषाद यह १८ दोषकहलाते हैं,जो इन दोघाँस रहितहे वह आसह,सूत्रका अर्थ निरूपणकरनेवाले होनेसे उसके वचन प्रमाण होते हैं और सत्य होते हैं- जीवाजीवासवबंधसंवरणिज्जरा तहा.मोख्खो ।। एयाइ सत्त सच्चाइ सद्दहणं तस्स. सम्मच ॥ १० अर्थ-जाब, अजीव, आस्रव, बंध संवर निर्जरा, और मोक्ष यह सात तेत्व हैं इनका श्रद्धान करना सम्यक्त्वहै- : . - सिद्धा संसारत्या । दुविहा जीवा जिणेहि पण्णत्वा । असरीरातचउठ्याणिया णिन्बुदा सिद्धा ॥ १५ ॥ अर्थ-सिद्ध और संसारी दो प्रकार के जीव श्रीजिनेंद्रने कहे हैं । सिद्ध वह हैं जो शरीर रहित, अनंत दर्शन अनन्त ज्ञान , -- LAALL . 1 (३) अनन्त वीर्य, और अनन्त सुख संयुक्तहैं, और जन्म मरणादिक से रहित हैं। संसारत्या दुविहा । यावरतसभेददो मुणेयन्वा ॥ : पंचीवह थावरा खिाद- जलग्गिवाजवणफ्फइणो ॥१९॥ अर्थ-संसारी जीव दो प्रकारके जानो, स्थावर और, प्रस। स्थावत्र पांच प्रकारके हैं, पृथिवीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायु काय और वनस्पति- पज्जत्तापज्जता । वायरसुहमा गिणगोयाणच्चयरा ।। पत्तेयपइठियरा । थावरकाया. अणेयविहा ॥ १३ ॥ अर्थ-पर्यास, अपर्याप्त, पादर,मूक्ष्म, नित्य निगोद, इतरनिगोद, प्रतिष्ठित प्रत्येक, अप्रतिष्ठित प्रत्येक इस प्रकार स्थावरजीवोंके अनेक भेद हैं- वितिचउपदियो । यदो तसा चउविहा मुणेयव्वा । पज्जत्तियरसरणीयर-। विभयदो इंति बहुमेया ॥१४॥ अर्थ-दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय चतुरिन्द्रिय और पंचन्द्रिय इसप्रकार चार भेद सजीवोंके जानने चाहिये, पर्याप्त अपर्यास, संज्ञी और असंज्ञी आदिक इनके भेद होकर अनेक भेद होजाते हैं- भाउकुलजोणिमग्गण- । गुणजीवोवग्गपाणसपणाहि ।। पाऊण जीवदव्वं - सदहणं होय . कायव्वं ॥ १५ ॥ अर्थ-आयु, कुल, योनि, मार्गणास्थान, गुणस्थान, उपयोग, प्राण और संज्ञाआदिक जानकर जीव द्रव्य में श्रद्धान करना -- - चाहिये। -- दुविहा अजीवकाया । दुरूविणो अरूविणो मुणयब्वा ॥ खंदादेसपएसा ! अविभागी कविणो चदुधा ॥ १६ ॥ अर्थ-अजीवद्रव्यके दो भेद.रूपी और अरूपी जानने चाहिये, रूपी चार प्रकार का होता है स्कंध, देश, प्रदेश, और परमाणु- सयलं मुह खंद । अद्धं देसो पएसमद्धद्धं ॥ परमाण अविभागी। पुग्गलदव्वं जिगाहिं ॥ १७ ॥ अर्थ-सकल पुनल. द्रव्यको, स्कंध जानना चाहिये स्कन्ध के आधे को देश देश के आधेको प्रदेश और जिसका कोई विभाग नहोसकै उसको परमाणु जानो- , -- । .

- L (.) अइयूलथूल भूलं । थुलं सुहमं च सुहमथूलं च ॥ . सुहमं च सुहसुसहमं । धराइयं होइ छभयं ॥१४॥ अर्थ-अति स्थूल स्थूल, स्थूल, स्थूल मुक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल, सूक्ष्म, और सूक्ष्म मूक्ष्म इस प्रकार पृथ्वी आदिक पुद्गल द्रव्य के छै भेद हैं ।। पुढवा जलं च छाया। चारिदियविसयकम्मपरंमाग । छहविहभेय भणियं । पुग्गलदव्वं जिणिदेहि ॥ १९॥ अर्थ-पृथ्वी, जल, छाया,चारइन्द्रियों के विषय, अर्थात् शब्द, स्पर्श,रस,गंध, कर्म और परमाणु इस प्रकार के भेद पुद्गलद्रव्य के श्रीजिनेंद्रदेयने कहे हैं। भावार्थ-ऊपरकी गाथा में स्थूल, और सूक्ष्म आदिक, भेद वर्णन किये हैं उनके यह छ रष्टान्त हैं- चउविहमरूविदव्वं । धम्माधम्मांवराणि कालो य॥ गइठाणुग्गहलख्खणाणि । तह वट्टणगुणो कालो ॥२०॥ अर्थ-अरूपी अजीव द्रव्यके चारभेद हैं धर्म,अधर्म, आकाश, और काल । धर्मका लक्षण गति, अधर्मका स्थित, और आकाश का अवगाहन है और कालका गुण वर्तना है- परमहो ववहारी । दुविहो कालो जिणेहि पण्णत्तो ।। लोयायासपएसे । रियाणवो मुख्खकालस्स ।। २१ ।। अर्थ परमार्थ और व्यवहार यह दो भैद कालके जिनेंद्रने कहें, परमार्थ कालके अणु, लोकाकांश के प्रदेशों में भरे हुवे हैं एदेकारणभूदा । णिच्छयरूवा जिणेहि णिद्दिष्टा ।। तीदाणागदभूदो । ववहारो एतसमऊ ,.य ॥ २२ ॥ अर्थ-वहही परमार्थकाल कारणरूप होकर जब भूत और भवि. ध्यत् रूप होताहै तब वह व्यवहार काल होता है जिसके अनन्त समय हैं, ऐसा जिनेन्द्र ने कहा है- परिणामिजीवमुत्ता-। एहिं णाऊण दव्यसम्भावं ॥ जिणवयणमणुसर-। तेहिं थिरमइ होई कार्यव्वा ॥ २३ ॥ अर्थ-परिणामीपना, जीव पना, मूर्तिमान् पना से द्रव्य के स- द्भावको जानकर जिनवाणी में श्रद्धा करने से अपनी बुद्धिको स्थिर करना चाहिये- परिणामि जीव मुत्तं । सपएस एय खित किरिया यं ।। - - . .

Luna PADMAAAALA (५) 1 णिचं कारण कत्ता । सवगदमियम य पवेसो ॥ २४ ॥ दुरिण य एयं एवं पंच य तिय एय दुरिण चउरो य ।। पंच य एयं एवं मूलस्स हि उत्तरं यं ॥ २५ ॥ अर्थ-जीच और पुद्गल यह दो द्रव्य परिणामी हैं, एक जीवद्र- व्य चेतनह और सव द्रव्य अचेतन हैं, एक पुद्गल द्रव्य मूर्तीक है और सब द्रव्य अमूर्तीक हैं, जीव पुद्गल धर्म अधर्म और आकाश यह पांच द्रव्य प्रदेशी हैं इसही कारण अस्तिकाय कहलाते है, धर्म अधर्म और आकाश यह तीन द्रव्य एक एकही हैं. एक आकाश द्रव्यही क्षेत्रवान् अर्थात् आकाश ही अन्य द्रव्यों को क्षेत्र देताहै, जीव और पुद्गल यह दो द्रव्य क्रिया- धान हैं, धर्म अधर्म आकाश और काल यह चार द्रव्य नित्य है क्योंकि इनमें व्यञ्जन पर्णय नहीं है,पुद्गल धर्म अधर्म आकाश और काल यह पांच द्रव्य कारण रूप है,जीव द्रव्य करता है, एक आकाश द्रव्य सर्वव्यापी है,यह छहों द्रव्य एक क्षेत्रमें रहनेवाले हैं मुहुमा अवायविसया । खणखहणो अस्थपज्जया दिया। वंजणपज्जाया पुण। थूला गिरगोयरा चिरविवत्था ॥ २६ ॥ अर्थ-पर्याय दो प्रकारकी है, एक अर्थ पर्याय और दूसरी व्य जन पर्याय, अर्थ पर्याय सूक्ष्म है शब्दसे नहीं कही जासरती है और क्षण क्षण में बदलती है, व्यञ्जन पर्याय स्थूल है शब्दसे उस का वर्णन होसक्ताहै और चिरस्थाई है- परिणामजुदो जीऊँ । गइगमणुवलमत्रो असदेहा ॥ राह पुग्गलो य पाहण- । पहुईपरिणामदसणे णेऊ ॥२७॥ अर्थ-जीवपरिणाममयुक्त होकर नरकस्वादि गतिमें जानेवाला होताहै यह जीवकी व्यञ्जन पर्यायहै और पत्थर मिट्टी आदिक पुद्गल की व्यञ्जन पर्याय हैं- वंजणपरिणइविरहा | धम्मादाया हवे अपरिणामा । अत्यपरिणाममासिय । सन् विपारिणामित्रो प्रहा।। २८ ।। अर्थ-धर्म, अधर्म, आकाश और कालमें व्यञ्जन पर्याय नहीं होती है इस अपेक्षासे यह चार द्रव्य अप्रणामी हैं परन्तु अर्थ प- र्याय की अपेक्षा सबही द्रव्य परिणामी हैं क्योंकि अर्थ पर्याय सप ही द्रव्यों में होती है- re- LA - - - जीवो हु जीवदच्वं । एकं चिय चेयणाचुया सेसा ॥ मुत्त पुग्गलदव्वं । वाइविलोयणा ण सेसाणि ॥ २९ ॥ अर्थ-एक जीव द्रव्यमें जीवित पणाहै क्यों अन्य किसी भी द्रव्यमें चेतना नहींहै, एक पुद्गल द्रव्यही मूर्तीकहै क्योंकि अन्य किसी भी द्रव्यका रूप दिखाई नहीं देताह- सपएस पंच कालं । मत्तूण पएससचया गया। अपएसो खलु कालो । पएसवंधचुदो जरा ॥ ३० ॥ अर्थ-काल द्रव्य के सिवाय अन्य पांचव्य प्रदेशवान हैं इस कारण प्रदेशी अथवा अस्तिकाय कहलातेहैं काल गव्य अप्रदेशी अर्थात् अकाय है क्योंकि उसमें प्रदेशपंध नहीं होता है उसके अणुअलगही अलग रहते हैं- धम्माधम्मागासा । एकसरूवा पएस अविउग्गा ॥ विवहारकालपुग्गल । जीवा हु अणेयमचा वे ॥१॥ अर्थ-धर्म अधर्म और आकाश यह तीन द्रव्य अपना अपना एकही स्वरूप रखते हैं, स्वरूपको बदलते नहीं हैं, व्यवहार काल जीव और पुद्गल यह तीन द्रव्य अनेक रूपधारण करते हैं- आगासमेव खितं । अवगाहणलखणं जदो भरिणयं ।। सैसाणि पुणोऽखित्ता । अवगाहणलख्खणाभावा ॥ १२ ॥ अर्थ-एक आकाश द्रव्यही क्षेत्रवान है क्योंकि अवकाश देना उसका लक्षण कहागया है,अन्य पांच द्रव्य क्षेत्रवान् नहींहैं क्यों. कि उनका लक्षण अवकाश देना नहींहै- सकिरिय जीवपुग्गल । गमणागमणाइकिरियज्वलंमा । सेसाणि पुण वियाण सु । किरियाहाणा तदाभावा ॥ ३३ ॥ अर्थ-जीव और पुद्गल यह दो द्रव्य क्रियावान हैं क्योंकि इन में हिलना चलना देखाजाताहै, अन्य चार द्रव्य अक्रिय हैं क्योंकि उनमें हिलना चलना नहीं है- मुत्तानी कार्य । णिचा सेसा पयासिया समये ॥ वंजमपरिणामुचुया । इयरे तं परिणय पत्ता ॥ ३४ ॥ अर्थ-धर्म अधर्म आकाश और काल इन चार द्रव्यों को जैन सिद्धान्त में नित्यकहाहै क्योंकि इनमें व्यञ्चन पर्याय नहीं है, जीव 1 स 2 - (७) । और पुद्गल इन दो द्रव्यों में व्यञ्जन पर्याय होती है इस हेतु पहा परिणामी हैं और अनित्यहैं- जीवस्सुक्यारकरा । कारणभूया हु पंच कायाई ॥ जीवो सत्ताभूऊ । सो ताणं ण कारणं होई ॥ ३९ ॥ अर्थ-पुद्गल धर्म अधर्म आकाश और काल यह पांचों दूव्य जीवका उपकार करते हैं इस हेतु कारणहै,जीवसत्तास्वरूपहै वह किसीफाभी कारण नहीं होताहै- कत्ता सुहासुहाणं । कम्माणं फलपत्तोयर्ड जला ॥ जीवो तफ्फलभोया। भोया सेसाण कचारा ॥३६॥ अर्थ-कौका शुभ अशुभ फल उत्पन्न करनेवाला जीवही है और वहही कर्म फलकाभोगनेवाला है, इसकारण कर्ता है अन्य कोई भी द्रव्य न कर्ता है और न भोक्ताहै- सव्वगदत्ता सच । गमयासं ण य सेसगय दव्यं ।। अपरिणामादीहि य । वोहन्या ते पयत्तेण ॥१७॥ अर्थ-सर्वव्यापक होने से आकाश को सर्वगतं कहते हैं अन्य कोई भी द्रव्य सर्वगत नहीं है आकाशके अपरिणामी आदिक स्वरूपको यत्नके साथ जानना चाहिये। णाणपवेसो वि तहा। णेऊ अएणोरणमणपवेसेण ॥ रिणयाणियभावं वि सया। एगीहूर्ण वि ण मुयति ।। २८ ।। अर्थ-यह छहाँ द्रव्य एकही क्षेत्र में अर्थात लोकाकाश में भरे हुवे हैं। भावार्थ-एकही स्थानमें छहों द्रव्य रहते हैं, परन्तु अपने २ भावको कभी नहीं छोड़ते हैं और पृथक २ जाने जाते हैं- मिच्छत्ताविरइकसा- । यजोयहेतूहि पासवइ कम्मं ॥ जीवलि उहहिमज्झे। जह सलिलं छिद्दणावाए ॥३९॥. अर्थ-मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, और योग के कारण से जीवमें कर्मों का आसूव होता है, जैसा कि छिद्र के कारण छिद्र- घाली किश्ती में समुद्र के बीच पानी सूवता है- अरईतभात्तयाइसु । सुहोवर्जगेण भासयह पुराण ॥ -विवरीएण दु पावं । णिदिई, जिणवरिदेहि ॥ ४०॥ अर्थ-अरहंत भक्ति आदिक के द्वारा शुभ उपयोगसे पुण्यका LAYALAMAALRAKAL (८'): - -- . - आसूव होता है और इसके विरुद्ध क्रिया से पापका आमूव होता है ऐसा श्रीजिनेंद्रने कहा है- अएणोरणागुपवेसो । जो जीवपएसकम्मसंधाणं ।। सो पयडिष्टिदिअणभवः । पएसदो चउविहो वधो । ४१ ॥ अर्थ-जीवके प्रदेश और कर्म के स्कंधों का मिलकर एकमेकहो, जाना चंधहै, वह बंध चार प्रकार का है, प्रकृति,स्थिति, अनुभाग और प्रदेश- सम्मत्तेहि चर्हि । कोहाइकसायाणग्गहगुणादि ।। 'जोगणिरोहण तहा । कम्मासवसंवरो होई ।। ४२ ।। १२ ॥ अर्थ- -सम्यक्त्व, व्रत और क्रोधादि कषायों का रोकना आदि गुणों के द्वारा मन वचन और कायकी क्रिया को रोकने से संवर होता है अर्थात् कर्मों का आस्रव स्कजाता है- सविपागा प्रविपागा दुबिहा पुणे णिज्जरा मुणेयव्वा ।। सन्वेसि जीवाणं पढ़मा विदिया तबस्सीणं ॥ ५३॥ अर्थ-निर्जरा दाप्रकार की जाननी चाहिये, सविपाक और अ- विपाक, सविपाक सबजीवों को होती है और अविपाक तपस्वी को ही होती है- जह रूद्धम्मि पवेसे । सुस्सइ सरपाणियं रविकिरणेहि। तहासवे णिरुदे । तवसा, कम्मं मुणेयव्वं ॥ ४४॥ अर्थ-यदि तालाब में पानीका आना बंदकरदिया जाये तो तालाब का पानी सूर्यकी धूपसे सूखजाता है इसही प्रकार की का आस्रव रोकदेने पर तपकरनेसे कर्मनाश होजातहै-अर्थात जीव कर्म रहित होजाताहै. हिस्सेसकम्मोक्खो । मोक्खो जिणसासणे समुदिठो । तमि कये जीवो यं । अणुइवइ अणंतयं सोक्वं ॥१५॥ अर्थ सर्व कर्मों का नाश होनेको जैन सिद्धान्त में मोक्ष कहा है, ऐसा होने से जीव अनन्त सुखका अनुभव करता है- णिदेसं सामित्त । साहणमहियरणठिदिविहाणाणि || एएहि सवभावा । जीवादीया मुणेयचा ॥ ४६॥ अर्थ-निर्देश; स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति, और वि. धान जीव आदिक द्रव्योंके यह सब भाव जानने चाहिये सत्तवि तच्चाणि मए । भणियां जणागमाणुसारेण ॥

(९) एयाणि सदहतो । समाइटी मुणयन्वो ॥ ४७॥ अर्थ-जैन सिद्धान्त के अनुसार मैने सात तत्वोंका वर्णन किया है, जो कोई इन तत्वोंका श्रद्धान करता है उसको सम्यकदृष्टि समझना चाहिये- णिस्सका णिक्कंखा । णिन्विदिगिच्छा अमूढदिही य ॥ उचगृहण ठिदियरण । वच्छल्ल पहावणा चेव ॥ १८॥ अर्थ-निशङ्का, निष्काक्षा, निर्विचिकित्सा, अमूह दृष्टित्व, उपग्रहन, स्थितीकरण, वात्सल्य और प्रभावना यहसम्यक्त्व के आठ अंग है- संवेणिवे। रिणदा गरहा उसमो भत्ती ।। वच्छल्लं अणुकंपा । अगुणा हुंति सम्मत्त ॥ ४९ ॥ अर्थ-संवेग, निर्वेग, निंदा, गर्दा, उपशम, भक्ति, वात्सल्य, और अनुकम्पा यह सम्यक्त्व के आठ गुण होतेहैं- इन्चाइगुणा वहऊ। सम्मत्तविसहकारया भणिया । जो उज्जमेदि ऐसु । सम्माइटी जिणखादो ॥ ५० ॥ अर्थ-इत्यादिक यह सर्व गुण सम्यक्त्वकी शुद्धि करनेवालेह, जो कोई इन गुणोंकी प्राप्तिमें उग्रम करता है उसको श्रीजिनेन्द्र ने सम्यदृष्टि कहाहै- सकाइदोसरहिऊँ । णिस्संकाइगुणजुयं परमं ॥ कम्मणिज्जरणहेज । तं मुद्धं होइ सम्मतं ।। ५१ ।। अर्थ-जो कोई जीव शङ्का आदि दोषसे रहित और निःशङ्क भादि गुण संयुक्तहै उसका सम्यक्त्व उत्कृध शुद्ध और कर्मों की निर्जरा करनेवाला होता है- रायगिहे णिस्सको । चोरो णामेण अंजणो भणि॥ चपाए णिक्कंखा । वणिगसुदाणंममइणामा ॥ १२ ॥ णिविदिगिच्छो राऊ । उद्दायगु णाम रुद्दवरणयरे ॥ रेवइ महुराणयरे । अमूढदिष्ठी मुणेयव्वा ॥ ५३ ॥ ठिदियरणगुणउपत्तो । मागहणयराी वारिसेणो हु ।। हथणापुराम णयरे । वच्छल्लं विण्हुणा रइयं ।।१४॥ उवग्रहणगुणजुत्तो। जिणयत्तो तामलित एयरएि । - (१०) . । वज्जकुमारेण कया । पहावणा चेव महुसए ॥ ५५ ॥ अर्थ-राज गृह नगर में अंजन चोर निःशंकित अंगका पालन वाला प्रसिद्ध है, चंपा नगरी में अनंत मती एक बनिये की पुत्री निष्कांक्षा अंग पालने में विख्यात है, रौद्रवरनगरमें आहायन राजा निर्विचिकित्सा अंग पालने में और मथुरा नगर में रेवती रानी अमूढ़ दृष्टित्व' अङ्ग पालने में मशहूर है , मागध नगर में पारिषेण राजा स्थिति करणके पालने में और हस्तिनापुर नगरमें विष्णु कुमार वात्सल्य अंग पालने में विख्यात है,ताम्रलिस नगर में जिनदत्त सेष्ठ उपग्रहण अंगके पालने में और मथुरा नगरमें बज्र कुमार प्रभावना अंगके पालने में मशहरहै- परिसगुण अर्जुयं । सम्मच जो धरेइ दिढचित्तो॥ सो हवइ सम्मादिही । सदहमाणो, पयत्ये य ॥ ५६ ॥ अर्थ-पदार्थों में श्रद्धान रखनेवाला जो कोई उपरोक्त अष्टगुण संयुक्त और दृढ़चित्त होकर सम्यक्त्व को अंगीकार करता है वह सम्गक्दृष्टि होता है- पहलीप्रतिमादर्शन श्रावक। पंचुवरसहियाई । सत्तचि. विसणाइजो विवज्जेई ॥ सम्मत्तविसुद्धमई । सो दसणसावर्क भाऊ ॥ १७॥ . अर्थ-पांचउदम्बर और सात व्यसन को जो कोई सम्यकदृाष्ट लाग करता है उसको दर्शन श्रावक कहते हैं अर्थात् वह पहली प्रतिमाका धारी होताह- उंबरवडपीपलपियपायरसंधाणतरुपसूणाई॥ णिच्चं तससंसिद्धाइ ताई परिवज्जियच्चाई॥१८॥ अर्थ-गूलर, बड़, पीपल, पिलखन, और अंजीर यह पांच फल तथा संघाणा,(अचार)और वृक्षों के फूल इन सबसे त्रसजीवों की निरंतर उत्पत्ति होती है इसे वास्ते यह सब त्यागने योग्य हैं- जयं मज्ज मंसं । वेसा पाराद्ध चोर परयारं ।। दुग्गइगमणस्सेदा। णि हेउभूदाणि पावाणि ॥ ५९ ॥ अर्थ-जूआ, शराय, मांस, वेश्या, शिकार, चोरी, और परस्त्री यह सात कुव्यसन दुर्गतिमें लेजानेवाले पाप हैं- 10 . . + (११) जूयं खेलंतस्स हु । कोहो माया य माणलोहा य ॥ एए हवंति तिव्वा | पावइ पावं तदो चहुलं ॥६॥ अर्थ-जूआ खेलने से मान,माया, लोभ, क्रोध तीव्र होजाते हैं जिसमे अधिक पाप उत्पन्न होताहै ।। पावेण तेण जरमर-रणवीचिपवरम्मि दुक्खसलिलम्मि ।। चउगइगमणावत्त- 1 मिम हिंडइ भवसम्मुद्दम्मि '॥ ६१ ॥ अर्थ-इन पापों के कारण वह ऐसे संसार समुद्र में भ्रमताहै जिसमें वुढापा और 'मरण आदिक अनेक रोग और अत्यंत दुःखहैं और जहाँ चतुर्गति में घूमना पड़ताहै। तत्यीव दुक्खमणतं । छयणभेयणविकत्तणाईणं ।। पावइ सरणविरहिऊ । जुवस्स फलेण सो जीवो ॥६२॥ अर्थ-जूआ खेलनेवाला शरणरहित होकर जूआ खेलने के फल के कारण इस संसारमें छेदन भेदन कतरन आदिक अनंत दुःख भोगता है- रण गणइ इहमित्त । ण गुरु ण मायर य पियरं वा ।। जयंधारण मएणइजह कुएणइ अवज्ज बहुलं ।।६३॥ अर्थ-जुआ खेलने में अन्धा हुआ पुरुष इष्टमित्र को गुरु को माता को वा पिता को कुछ नहीं गिणता है इसकारण स्वच्छन्द होकर बहुत पाप करता है- सजणे यं परजणे वा । देसे सव्वत्थ होइ णिलज्जो ॥ मायोचि ण विस्ससई । बच्चा जूर्व रमंतस्त ॥१४॥ अर्थ-जूआ खेलनेवाला स्वजनों में परजनों में देशमें परदेशमै सयही जगह निर्लज्ज होताह उसकी पात का विश्वास उसकी माता भी नहीं करती है- अग्गिविसचोरसप्पा | दुक्ख थोक कुणंति इहलोए ।। दुक्ख जणयइ सूर्य । परस्स ममसयसहस्सेसु ॥ १५ ॥ अर्थ-इस लोक में आग,जहर,चोर और साँप तो कमती दुःख देनेवाले है परन्तु जूआ खेलनेसे मनुष्य को सैकड़ों और हजारों भष में दुख उठाने पड़ते है- अख्खेहि णरो हिऊ। ण मुणइ सेसिदिएहि वेएइ ।। - + - - 4.M maan (१२) जूयंधो ण य केणवि। जाणीव संपुगएकर णोचि ॥६६॥ अर्थ-जो आँखों का अन्धाहै वह यद्यपि नहीं देखसक्ताहै परन्तु अन्य इन्द्रियों से तो कुछ जान लेताहै, और जो कोई जूआ ख- लने में अन्धा होरहाहै वह पांचों इन्द्रियोंके होते हुवे भी कुछ नहीं जानताहै- अलियं करेइ सवहं । जपइ मोसं मणेह भइझुठं ।। पासम्मि वहिणिमायं । सिपि हणेइ कोहधो ।। १७ ॥ अर्थ-वह उल्टी २ सौगन्द खाता है, मूठी बकवाद मारता है, दुष्ट वचन बोलताहै, और क्रोध अन्धा होकर छोटी पहन,माता और बालकको भी मारने लगताहै- ण य भुंजइ आहारं । णि ण लहेइ रनिदिएणति ।। अत्यवि ण कुणेइ रई । अत्यइ चिंताउरो णिचं ॥ ६८ ॥ अर्थ-वह नित्य चिंतावान रहताहै, न खानाखाता है और न रातदिन सोताहै और न किसीसे प्रीति करताहै- इच्चेवमाइ बहुलं । दोसं गाजण जूयरमणम्मि । परिहरियव्वं णिचं । दसणगुणजुयमहंतेण ॥६९ ॥ अर्थ-जुआ खेलनेमें इस प्रकार महान्दोष जानकर दर्शन प्र- तिमावाले उत्तम पुरुषको जूएका सदाही त्याग करना चाहिये- मज्जेण णरो अवसो । कुएणइ कम्माणि णिलज्जाई ।। इहलोए परलोए । अणुइवइ अणताइ टुक्खाइ ॥ ७० ॥ अर्थ-शराब पीने से मनुष्य स्वच्छन्द होकर निर्लज्ज क्रिया क- रताहै और इस लाक तथा परलोकमें अनन्त दुःख उठाता अइलघेय विविठो। पडेइ रत्यायंगणे मत्तो ॥ पडियस्सं सारमेया । वयणं विलिहति जिम्भाय ॥१॥ अर्थ-शराब पीनेवाला रीतिको उल्लंघन करके बेसुध होकर रस्ते में गिढ़पड़ताहै और उसके शरीरको कुत्ते चाटने लगते हैं- उच्चारं पस्सवणं । तत्थेव कुणति तं समुल्लवई ।। पडिवुवि सुरा मिठो । पुणो वि मे देइ मूढमई ॥ ७२ ॥ अर्थ-कुने उसके मुंहमें मूतते हैं और वह मूर्ख उस मृतका. अव दि लेकर कहता है कि बहुत मीठी शराब है और भी दे- - 1 ग (१३) नं किंचि तस्स दव्वं । अजाणमाएस्स हिंथ परेहिं ।।. लहिऊण किंचि सरणं । इदो तदो धवाइ खलंतो ।।७३ ॥ अर्थ-उस पेसुध पड़े हुवे का द्रव्य अन्य लोग हर लेजात हैं, जब उस को कुछ होश आतीहै तो गिरता पड़ता लोगों के पीछे दौड़ता है जेण हु मज्म । गहियं दुठेण सेज्ज मो कुरो ।। कहि जाय सो जिवंतो । सीस छिदामि खग्गेण ।। ७५ ॥ अर्थ-और इस प्रकार पकता जाता है कि जिस पदमाश ने मेरा द्रव्य लिया और मुझको क्रोध उपजाया है वह जीता बचकर कहां चला जायगा, मैं उसका सिर खगसे काढूंगा- एवं सो गज्जतो । कुविऊ गंतूण मंदिर णिययं ।। छित्तूण लरहि सहसा । रुहो भंडाई फोडेई ॥ ५ ॥ अर्थ-इस प्रकार वह क्रोध में गरजता हुवा अपने घरजाता है और खिजाहुवा लाठीसे घरके बर्तनों को फोड़ता है- णिययं पि सुयं वहिणि । अणिच्छमाणं बला विधंसेइ ।। जपइ अज्जवजिज । ण विजाणइ किंपि य पमत्तो ॥७॥ अर्थ-वह अपने बेटेको पहन को और अन्य भी सब को जिनको अपनी इच्छा के अनुकूल नहीं समझता है मारने लगता है और जतपटांग बकने लगता है, वह बेसुध हुवा कुछ नहीं जानता कि क्या कररहा हूं- इयअवराइवि वहुसो । काउण वह णिलज्जकज्जाणि ।। अणुवंधइ बहु पावं । मज्जस्स वसंगदो संतो॥७॥ अर्थ-शरायके नशे के घश होकर इत्यादिक अनेक निर्लजकार्य करनेसे वह बहुत पाप बंध करताहै- पावेण तेण वहुसो । जाइजरामरणसावयाइएणे ॥ पावइ अणंतदुख्खं । पडिङ संसारकनारे ।। ७ ।। अर्थ-इन पापों के कारण वह संसार षणमें पड़कर जन्म जरा मरण आदिक अनन्त दुःख उठाता है- एवं बहुप्पयारं । दोसं णाऊण मज्जपाणम्मि ॥' मणवरणकायकयका-रिदाणुमोएहि धज्जिज्जो॥७९॥- अर्थ-शराब पीनेमें इस प्रकार बहुत से दोष जानकर मन पधन . .

- (१४) काय और कृतकारित अनुमोदना अर्थात सर्वप्रकार से इसका त्याग करना चाहिये। जह मज्ज, तह य महू | जणयदि पावं णरस्स अइवहुगं ।। अमुइन्च रिणदणायं । वज्जेयन्वं पयत्तण ॥ २० ॥ अर्थ-शराब के समान शहदसे भी मनुष्यको बहुत पाप होता है इस अपवित्र और निंदनीय वस्तुका त्याग यत्न के साथ करना चाहिये। दखूण असणमझे । पढियं जइ मच्छियपि णिठिवई ।। कह मच्छियंडयाणं । णिज्जासं णिग्घिणो पिवई ।। ८१ ।। अर्थ-यदि भोजन में मक्खी पड़ी हुई नजर आजाती है तो म. नुष्य उस भोजनसे घृणा करताहै, परन्तु नहीं मालूम मक्खियों के अंडों केरसको अर्थात् शहद को विनाघृणा किये कैसे पीलेता है- ? भो जिभिदिय लुद्धया । ण मख्खेयरं पलो एह ।। ? किं मखिखयणिज्जासं । महु प्यवित्तं भगति जदो।।,८२ ॥ अर्थ-हे जिवा लंपट तू मक्खियोंको मतखा-तुम शहदको जो मक्खियों का रसहै किस प्रकार पवित्र कहतेहो- लोगे वि मुप्पासिद्धं । वारहगामाइ जो दहइ अदऊँ । तचो सो अहिययरो। पाविठो जो महुं हणई १८३ ॥ अर्थ-लोकमें भी यह कहावत प्रसिद्ध है कि जो निर्दयी १२ ग्रामों को फूंकता है उससे भी अधिक पापी वह है जो शहद के छत्त को तोड़ता है- जो अवलेहई णिञ्च । णिरयं सो जाइ णस्थि संदेहो । एवं णाजण फुड । वज्जइदव्वं महुँ तहमा ।।८४॥- अर्थ-जो नित्य शहद खाताहै वह अवश्य नरकमें जाता इसमें कोई संदेह नहीं है , ऐसा जानकर शहद का त्याग करना चाहिये- मंस अमेज्मसरिस । किमिकुलभरिय दुगंध वीभच्छं । पाएणवि ण छिवय । रणे तीरए तं कहें भोत्तु ॥ ५ ॥ अर्थ-मांसअमेध्य अर्थात् विष्टा के समान है, बहुत जातिके कीडोंकी खानहै, दुर्गन्धि युक्त है, और घिणावणा है, वह पैरों से . * १m - 154 ( १५) भी छने योग्य नहीं है और न पास जाने योग्य है, वह मांस खाने योग्य कैसे होसक्ता है- मंसासणेण वट्टइ । दप्पो दप्पण मज्जमहिलसइ॥ जयंपि रमइ तोतं ! (पिविणए)इ पाउण दोस।।। ८६ ॥ अर्थ-मांस खानेसे उन्माद होता है, उन्मादी शरायकी इच्छा करता है और जुआ खेलता है इस हेतु इससे यह दो दोष भी उत्पन्न होते हैं- लोइयसत्यम्मि विं व-1रिणयं जहा गयणगमणो वि। भुवि विप्पा, मंसासणेण । पडिमो तह्मा वाज्जियं मंसं ॥७॥ अर्थ-लौकिकशास्त्र में भी ऐसा वर्णन है कि कोई महान ब्रामण आकाश में जाताथा परन्तु मांसके खानेसे जमनिपर गिरपड़ा, इस कारण मांसका त्याग करना चाहिये- कास्यकिरायचंडा-। लडोवपारसियाणमुच्छिदं ।। सो भवेख्खेइ जो सह-। वसई एयरात्त पिवेस्साई ॥ ८८ ॥ अर्थ-जो कोई एकरात भी वेश्या से भोग करता है वह धोवी किरात चांडाल होयारी पारश आदि नीच लोगों की झूठ खाताहै- रत्तं णाऊण रणरं । सव्वस्स हरइ वचणसएंहि ॥ काउण मुंचइ पच्छा । पुरुसं चम्माठिपरिसेसं ॥९॥ अर्थ-घेश्या मनुष्य को अपने ऊपर आसक्त जानकर सैकड़ों ठगयाजी से उसका सर्वस्व हर लेतीहै और जब उस पुरुष में चाम और हाड़ ही बाकी रहजाताहै तब उसको छोड़ देती है- पभणइ पुरऊ एय- । स्म सामि मुत्तूण णस्थि मो अपणो । उच्चइ अण्णस्स पुणो । करेइ चाटाणि बहुयाणि ॥ ९ ॥ अर्थ-एक पुरुषसे वह कहती हैं कि तुम्हारे सिवाय मेरा कोई स्वामी ही नहीं है इसीही प्रकार दूसरे मनुष्य से भी अनेक चाल की बातें बनाती है- माणी कुलजो सूरो । वि कुणई दासचण पिणीयाणं ॥ वेस्साक एण बहुगं । अवमाण सहइ कामंधो ॥ ९१ ।। अर्थ-कामान्ध पुरुष कैसा ही मानीहो कुलवान हो शूरवीर हो परन्तु उसको नीच पुरुषों का दास बनना पड़ता है और वेश्याके कारण बहुत अपमान सहने पड़ते हैं । जाणा Im - 1 ( १६ ) जे मज्जमंसदोसा । वेस्सागमणे वि होत ते सव्वे ।। पाववि तत्थ दिई । पावइ णियमेण सविसंस ॥१२॥ अर्थ-शराब और माँस में जो दोष हैं वह सब दोष वेश्या- गमन में भी प्रास होते है, इसकारण धेश्यागमन में वह पापभी होते हैं और उनसे अधिक भी होते हैं- पावेण तेण दुक्ख । पावइ संसारसायरे घोरे ॥ तमा परिहरियव्वा । वेस्सा मणवयणकाएहिं ।। ९३ ।। ईन पापोंस संसार सागरमें घोर दुःख उठाने पड़ते हैं, इसका- रण मन वचन कायसे वेश्या का त्याग करना चाहिये- सम्मत्तस्स पहाणो । अणुकंवा परिणऊ जमा ।। पारद्धिरमणसीलो । सम्मत्तविराह तमा ॥११॥ अर्थ-सम्यक्त्व का प्रधान कारण अनुकम्पा अर्थात् दयाहै इस का- रण शिकार खेलनेवाला सम्यक्त्व का नाश करनेवाला है- दहूण मुक्ककेसं । पलायमाणं- तहा पराहूतं ।। रद्धारयतिणं सरा । कयापराहं पिण हणंति ॥ ९५ ॥ अर्थ-जो बालों को छोड़े हुवे भागताहै.और पराधीन होकर दांतों में तिनका लिये हुये है ऐसे जीव को देखकर चाहे वह अ- पराधी भी है परन्तु शूरवीर पुरुष उसको नहीं मारताहै- गिच्च पलायमाणो । तिणचारी तह णिरापराहे वि। कह णिग्घणो हरिणज्जइ।आरएणणिवासिको विमए ।। ९६.॥ अर्थ-नित्य भागजानेवाले, घास खानेवाले, बेकसूर, और जंगलमें रहने वाले गरीव पशुको शिकार करनेवालाक्यों मारताह- मोवंभणमहिलाणं । विणिवाए हवइ जह महापावं ॥ सह इयरपाणिपाए । वि होई ,पावं ण संदहो ॥ ९७ ॥ गोवंभणत्थिपापं । परिहरमाणस्स होइ जइ धम्मो ॥ सव्वेसि जीवाणं । दयालुता किं ,ण सो जाये ।। ९८ ॥ अर्थ-गौ, ब्राह्मण, और स्त्री को मारनेसे जो महान्पाप होता है वहही अन्य जीवों के मारने से भी होताहै, इसमें कोई संदेह नहीं, जिस प्रकार गौ, ब्राह्मण और स्त्री की हत्या न करने से,धर्म होताहै इसही प्रकार अन्य जीवोंपर दया करने में भी धर्म क्यों नहीं होताहै- 1 xt4. ॥ 4 , - (१७) महुमज्जमससेवी । पाचइ पात्र, चिरेण, जे घोरा- तं एयदिणे ण पुरिसी । लहेइ पारद्धि देसविरपण ॥ १९ ॥ अर्थ चिरकाल तक शहद, शराब, और मांसका सेवन करने- से जितना घोर पाप होता है उतनाही घोर पाप गृहस्थी भावकको एक दिन शिकार खेलनेसे होता है- संसारम्मि अणतं । दुख पावेदि तेण पावेण ॥ १० ॥ तमा विवज्जियव्वा । पारधी देसावरएण ॥ अर्थ-शिकार खेलने के पापसें संसार से अनन्त दुःख होता है इस कारण गृहस्थी श्रावक को शिकार का त्याग करना चाहिये- परदव्वहरणसीलो । इहलोए असाय बहुलाऊ ।। पाउणइ जायगणाऊँ । ण कयाँ वि सुहे विलोएहि ।। १०१ ।। अर्थ-परद्रव्य हरनेवाली अर्थात् चोरी करनेवाली इस लोकमें बहुत दुःख उठाता है और कभी भी सुख नहीं देखता है- हरिउ परस्स धणं । चौरो परिवेवमाणसव्वंगो। 'चइऊण णिययगेई । धावइ उपहेण संतत्तो ॥ १०२ ॥ "अर्थ-चोर परायेधन को हरकर डरकेमारे धरथर कांपना है और अपने घरको छोड़कर त्रास भोगता हुवा इधर उधर भागता फिरताहै किं केण वि दिठो हैं । ण वेदि हिदएण धगधगतेण ॥ हुकई पलायमाणो खलई णि णलहेइ भयविठो।। १०३ ।। अर्थ-क्या मुझे किसीने देख लियाहै, नहीं देखा नहीं है, इस प्र कार उस का हृदय कांपता रहता है, वह लुक छिपकर भागतारहता है और भय के कारण उसको नींद नहीं आती है- रणं गणेइ मायव । गुरुमित्त सामिणं तवस्सि वा ।। परवलेण हरइछलेण किंचिरण किपि जसेसि ॥१४॥ अर्थ-माता, बापाशुरू, स्वामी और साधु'को भी चौरं कुछ नहीं मिलता है। उनका माल भी, जो कुछ मिलता है. जबरदस्तीसे या छलसे हरलेता है। लज्जा तहामिमाणं, । जससीलविणासमादणासं च। परलोयभयं चौरो अगणतो "साहस कुणे ॥ १० ॥ अर्थ लज्जा, आभिमान, यश, शील, आत्मा और परलोक भयका नाश करनेसे चोर अनगणित साहस करता - - A IIIIIIIMIT 17 प - . 5 - (१८) हरमाणे परदव्वं । दणाररिखएहि तो सहसा ।। रज्जाह बंधऊणं । धिप्पइ सो मोरबंधेण ॥१०॥ हिंडावज्जइ टिंटइ ! रत्यासु चहाविऊण खरपुष्टि।। वित्थारज्जइ चौरो । एसोति जरणस्स मज्झम्मिा। १०७॥ अएणो वि परस्सं जो । हरेइ सो एरिस फलं लहई।।. एवं भणिऊण पुणो । णिज्जइ पुरवाहिरे तुरियं ।। १०८ ।। उध्दार प्रहवा । पाणिपाय गहणं णिसुभण ।, अहवा जीवंतस्स वि । मूलविराहणं किरेइ खलेहि।। १०९॥ . अर्थ-चोरको पराया द्रव्य हरते हुये यदि चौकीदार देखलेताह तो वह उसको पकड़कर, रस्सी से बांधकर, व कमरसे जकड़ कर और गधेपर चढ़ाकर गली २ में घुमाता हुवा लोगों में यह कहता है कि देखो चोरका ऐसा हाल हुवा करताहै, और भी जो कोई पराया माल हरेगा उसका भी यही हाल होगा, इस प्रकार कह- ता हुवा तुरंत उसको-गांवसेवाहर लेजाताहै, और उसकी आंख फोड़ देताहै या हाथ पैर काटकर उसको विरूप कर देता है.या जानसेही मारडालता है- एवं पिच्छंसो विहु । परदव्वं चोरयाइ गिराहांते ।। र मुणति किमपि साहिये । पेच्छह हो मोहमाहप्पं ।। ११०॥ अर्थ-इस प्रकारकी दशा देखते हुवे भीजो मनुष्य पराये मालको चुराकर ग्रहण करते हैं यह नहीं जानते हैं कि अपना हित क्याहै, अहो इस मोहके माहात्म्य को देखो- परलोए वि य चौरो। चउगइसंसारसायरे णिम्मएणो । पावइ दुक्खमणंत । तेयं परिवज्जय तह्मा ॥ १११।। अर्थ-चतुर गति रूप संसारसागर में डूबकर चोर परलोकमें भी अनन्त दुःख उठाता है। इस कारणचोरीका त्याग करना चाहिये। दखूण परकलत्तं । णिन्बुद्धी जो करेइ अहिलासं । रण य किपि तत्थ पाचई ! पावं एमेव अंजेई. ।। ११२ ।। अर्थ-पराई स्त्रीको देखकर निर्बुद्धि पुरुष उस स्त्रीकी अभिला- षां करताहै परन्तु वह स्त्री तो उसको मिलती नहीं और पापबंध अवश्य होजाता है- . - २ ALLLL - (१९) हिस्सासइ रुयइ गायइ णियसिरहणइ महीयले पटइ। परमहिलमलभमाणो'। असप्पलावं पि जप्पेई ॥११३॥ अर्थ-परस्त्री का अभिलाषी.पुरुष लंबे २ सांस लेताहै, रोताह, गाताहै, अपना सिर फोड़ता है, धरती पर गिरताहै, झूठी षक- वाद भी करने लगताहै चितइ म किमिच्छइ । ण वेइसा केण वा उवाएण ॥ आणमि कस्स विणवे!!ण वे ति चिंताउरो सददें ।। ११४ : "" अर्थ-वह सोचमें पड़ा हुवा विचार करता रहता है कि वह स्त्री मेरी चाहना करती है कि नहीं, वह मेरे घशमें नहीं आतीहै मैं क्या उपाय करूं, उसको किसतरह लाऊं, किसीसे कहूं या न कहूं- रण कुत्थ वि कुणइरई । मिह मिय भोयणं ण भुजेई ।। णि पि अलहमाणो । इत्थीविरहेण संतचो ।। ११५ ॥ अर्थ-बीके पिरहसे संतप्त हुवा वह कहीं भी,चित्त नहीं लगाता है, मीठा-अर्थात् स्वाद भोजन भी उससे नहीं खाया जाता है और उसको नींद भी नहीं आतीहै- लज्जा कुलकमंछ । विजण मज्जाइमायण किच्चा ।। परमालाणं चिचं । अमुणतो - पच्छणं कुणइ ॥११६ ॥ अर्थ-वह लज्जा और अपने कुलकी मर्यादा को छोड़कर और शराव आदिक पीकर पराई अनजान स्त्री से भी प्रार्थना करताहै प्पेच्छति जइ वि ताऊ । उवयारसयाणि कुणई सो । तह विणिन्भडिज्जते । पुण अप्पाण झूरइ विलख्खो ॥ ११७ ॥ अर्थ-वह स्त्री उसको नहीं चाहती है अर्थात् उसकी प्रार्थना को स्वीकार नहीं करता है तो भी सैकड़ों पान पनाता है और शिड़के खाता है और मुरता है- अह मुंजइ परमादिलं । भाषच्छमाणं बला धरेजण ॥ किं तत्य हवइ सुक्खं । पञ्चेलिंग पावइ दुक्ख ॥ ११८ ॥ अर्थ-जब परस्त्री इस प्रकार राजी नहीं होती है तो जबरदस्ती करताहै, परन्तु ऐसी दशा में क्या आनन्द मिलताहै और पीछे दुःख बढ़ाना ही पड़ता है। श्रह का वि पावबहुला। असई णिएणासिजणणियसीलं ॥ T १ --- (२०) सयमेव पीलियाऊन उवरोहवसेण अप्पाणं ॥ ११९ जइ देवि तत्य सुणहर: । खडदैउलयमझाम्म। * साचतो भयभीदौ । सौख्खे कि तत्य पाउणई ॥१२० अर्थ-यदि कोई दुराचारणी पापिनी स्त्री अपने शील का नाश करके कामीपुरुष की प्रार्थना को मंजूर करले और किसी खाली मकान या किसी टूटे फूटे मदिर' आदिक. में अपने आपको उस कामी पुरुष को सौंप भी देखें तो दहा वह 'कामीपुरूष चिंतावान् और भय मौत हवा' क्या आनन्द उठा सक्ता है- सौऊण कि.यि सबै । सहसा, परिवेत्रमाणसम्बंगी। छिपेइपलाइ लुक्कड़ । चास णियई , भयभीः ॥ १२ ॥ अर्थ-वह किसी प्रकारकी. मी जरासी.आवाज सुनकर घबराकर कांपने लगता है, छिपता है, भागता है और भयभीत और बे- चन होकर चारोतरफ देखताह- जइ पुरण-कण विदीसंह पिजइ तो वंधिऊण णिवगैहै ।। चोरस्स णिग्गहं सो । इत्थइ पाउणइ सविसेंस ॥ १२ ॥ अर्थ-इसपर भी यदि कोई देखलेता है तो उसे बांधकर राज दरबार में लेजाता है, वहाँ वह चौर से भी अधिक दण्ह पाता है- पेच्छह मोहविडेवण । लोगों देण परिसं दोस । ' पेच्छखे तहं वि खलो । पररीत्यमहिसलाद दुचित्तो ।। १२३ ।। अर्थ-मोह की विडंबना को देखो कि लोकमें दोषों के दृश्यको देखतेहुवे भी दुष्ट लोंग परस्त्री की अभिलाषा करते हैं- परलोयस्मि अंगत दुक्ख पाउणादिं भवसमुद्दम्मि ।। परयारो परमहिला । तमा तिविहेण वज्जिज्जा ।। अर्थ-परस्त्री सेवन से जन्मान्तरमैं भी इस संसारसागरम-अ. नन्त दुःख उठाने पड़ते हैं इसकारण मन-वचन:कायसः परस्त्री सेवनका त्याग करना चाहिये । रज्जमसं बसोमं । वारहसंबच्छराणि वणवासं ॥ पत्तो हावभाणा जपण 'मुहिहिरो-रायाः॥ १२५।। अर्थ-जूआ खेलनेसे युधिष्ठिर राजा में राज्य खोयाँ पारह वर्ष का वनवासं लिया और अपमान उठायो HTI ."

(२१) उज्जाम्मिं रमता तिसाभिभूया जलेति णाऊण ।। पविऊण जूर्णमजं । गठा ते जादवा तेण !! १२६ ।। अर्थ-जंगल में क्रीडा करते हुये प्यास के वश होकर यादवों ने 'पुरानी उतरी हुई शराषको पानी समझ कर पीलिया और सही के कारण नष्टहोगये; मंसासणेण लुदो ।'गरखो एवचक्करणयरम्म । रज्जाऊँ,पयभट्ठों । यसैण मऊँ गयो यर ।। १२७ ॥ अर्थ-एकचक्र नाम नगर में बकासुर राजाने मांस खाने में लुन्ध होकर राजपद भ्रष्ट किया और अपयश में मरकर नरकंगया-- सव्वत्य रिणवुर्णवुद्धी । वेसासगण चारुदत्तो वि ।। खइऊण धणं पत्तो । दुव परदेसंगमणं वा ।। १२८ ।। अर्थ-चारुदत्त सेठने जो संघ प्रकार चतुर था वेश्यासंगति के कारण अपना सारा धन नष्ट किया और परदेश जाकर अनेक ॥ . दुःख भोगे- । 4. . होऊणं चक्कंवटीं । चउदहरयणहिपत्तं सैपत्तो ।। मरिजण बह्मयत्तो। णरय पारद्धिरमणेण ॥ १२ ॥ अर्थ-ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती राजी जो १४ रत्ननिधान था शिकार खेलने के पापसे नरक में गया- णासापहारदोसे- 1 ण दंडणं पाविऊण सिरिमई ।। मरिऊण अंडमाणे- । णं हिंडिऊँ दाहसंसारे ॥१३०।। अर्थ-श्रीभूतने चोरीके दोषमें दंड पाया और आतध्यान में मर कर संसार में बहुत बार रुलता फिरा- होऊण खपरणाहो विर्यक्खणो अद्धचकवटी वि॥ मरिऊण गऊ णरयं । परथिहरणेण लकसो ॥११॥ अर्थ-लकाका राजा राधणजो विद्याधरों का सरदार तथा बहुत चतुर और अर्द्धचक्री था परस्त्री हरनेके कारण नरक में गया- एदे. मंदाणुभावा ।' दोस एपिसणसेवाऊँ ।' पत्ता-जो पुण संत्त वि।सेवई परिणज्जए किं सो ॥ १३२॥ अर्थ-ऐसे २ महान् पुरुष एकही एक व्यसन के सेवन करने से दुर्गतिमें गये,जो सातोही व्यसन करते हैं उनकी वायत क्याकहाजावै . 2 -- । . (२२) साकेते सेवतो । सत्त वि विसणाइ रुद्ददत्तो वि ।। मरिजण गऊँ रणरया भमिऊण पुण दीहसंसारे ॥१३३॥ अर्थ-साकेत नगरमें रहनेवाला रुद्रदत्त सातों व्यसन करता था वह मरकर नरक में गया और दीर्घकाल तक संसार में भ्रमता फिरा- सत्तएणं दिसणाणं । फलेण संसारसागरे जीवो।। जं पावइ बहुदुक्खं । तं संखेवेण चोच्छामि ॥ १३ ॥ अर्थ-सात व्यसनों के फलसे संसार सागरमें जीव बहुत दुःख उठाता है, उन दुःखों का में संक्षेपसे पर्णन करताएं- अइणिगुरफरसाइ । पूयरुहिआइदुगंधाई ।। असुहावई च णिच्चं । णिरएसू पत्तठाणाइ ।। ११५ ॥ वो तेसु समुप्पएणो। आहारेजण पोग्गले असुहे ।। अंतोमुहृत्तकाले । पज्जनार्ड समाणेई ॥ १३६ ॥ अर्थ-जिसके स्थान का स्पर्श अति कठोर है, पीप और रुधिर आदिक दुर्गंध और अशुभ पदार्थ जहाँ बहते हैं ऐसे नरकम व्य- सनी पुरुष उत्पन्न होकर और अशुभ पुद्गल परमाणुओं को ग्रहण करके अन्तर महून में पर्याप्ति को करलेताहै अर्थात् अपने शरीर को पूराकरलेता है- उपवायाउ णिवडई । पज्जत्तउ दंडती महीविहे ॥ अइकक्कडमसहनो । सहसा उपडीदि पुण पड़ई॥ १३७ ॥ अर्थ-पर्याप्ति को कर नरकमें उत्पन्न होने के समय लाठी के स मान एक दम नरक पृथिवीपर गिरपड़ता है, नरककी धरतीअति कर्कश होने के कारण वह सह नहीं सक्ताहै और ऊपरको उछलता है और फिर नीचे गिरताहै- जड़ को वि उसणणरए । मेरुपमाणं विवेइ लुहदंड | ण वि पावइ धरणितलं विलयं जात्यंतराले वि ॥ १३८ ॥. अर्थ-यदि किसी गर्म नरक में मेरू पर्वतके घरावर लोहेकागोला फेंकाजावै तो वह गोला नरककी धरती तक नहीं पहुँचेगा, नरक की गर्मीसे रास्तेही में गलजावेगा- अइतेब वट्ट तत्तं विवेइ जइ को विसीयणस्यामि ।।

414141441AAAA. (२१) सहसा धरणिमपत्तं । सडेज्ज' तं खंडखंडोई ।। १३९.॥. अर्थ-यदि किसीठंडे नरकमें उतनाही बड़ा तप्ता हुवा लोहेका गर्म गोला फेंकाजावै तो वह नरककी धरतीपर पहुंच कर खंड २ होकर गल जावैगा- तं तारिससीदुण्इं । खेत्तसहावेण होइ णरएम् ॥ विसहइजावज्जीव । विसणस्स फलेण(१)जीवो ॥ १४ ॥ अर्थ-नरकमें इतनी गर्मी सर्दी क्षेत्रके स्वभाव से है, जीव व्य. सन सेवनके फलके कारण अपनी आयु पर्यंत यह सर्दी गर्मी सहता है- R- तोताही जायमचे। सहसा दंणणारया सव्वे ॥ पहरंनि सत्तिमुगगर । तिसूलणारायखग्गेहिं ।। १४१ ॥ अर्थ-जय नरक जीव उत्पन्न होताहै तब उसको देखकर सब नारकीजीय शक्ति, गदा, त्रिशुल, पाण और खग से मारने लगते हैं। तो खडियसव्वंगो । करुण पलावे रुवेइ दीणमुहो । पभरणति नदो रहा । किं कंदास रे दुरायारा ॥ १४२ ।। अर्थ-उसके सय अंग टुकड़े होजाते है तय वहादयाका पात्र दीन होकर भागताहै और रोताहै, और वे नारकी उसपर क्रोधित होकर कहते हैं किरे दुराचारी तू क्यों धाड़ मार कर रोताहै- जोनणमए मत्तो । लोहकसोयेण रनिङ पुग्वं ।। गुग्वयां लंबित्ता । जूयं रमिऊ सि जम्मम्मि ॥ १४ ॥ अर्थ-यौवन के मदमें मस्त होकर, लोभकषाय के वश होकर,और गुरुके वचनको नमानकर तूने जुआ खेला है- तस्स फलमुदयमागय । मलं हि रुपणेण विसह रे दुइ ॥ रोवंतो वि ण छुट्टसि । कया वि पुवकयकम्मस्स ॥ १४॥ अर्थ-अब उसके फलका उदय आयाहै,अरे दुष्ट! इस फलको सह, रोनेसे क्या होताहै, पूर्व उपार्जित कर्म रोनेसे कदाचित् भी नहीं छूटसक्त हैं- एवं सोऊण तर्क । माणसदुख्खं विसेसमुप्पण्णं ।। तो दुविहदुख्खदग्यो । रोसाइटो इमं भाई ॥१४॥ अर्थ-ऐसा सुनने से उसके मन में बहुत दुःख होताहै,इस प्रकार - .. 1. -- 4 .(२४) मानसिक और शारीरक दोनों प्रकारके दुःख उठाता, हुवा यह क्रोध में आकर कहताहै: जइ वा पुवाम्म भवे । जूयं रमियं मए मदवशेन । तुझं को अपराहो । कोहवला जेण हं हाई ॥१४६ ॥ अर्थ-यदि मैंने पूर्वजन्म में मदके यशहोकर जूआ खेलाहै तो मैंने तुम्हारा क्या अपराध किया है जिसके कारण तुम क्रोध में आकर मुझे मारतेहो- एवं भरिणए वित्तुाण । मुधा रुदेहि अग्गिकुंडम्मि । पज्जालयम्मिरिणहितो । अभ्भंगउ अंगेसु ॥ ११७ ॥ अर्थ-ऐसा कहने पर वेनारकी क्रोधमें आकर उसको पकड कर अग्निकुंड में डाल देते हैं, वहां उसका सारा शरीर अग्निमें झुलसा जाता है तत्तो रिणस्सरमाणं । दळूण तासही अगरणकुंतेहिं ।। पिल्लेऊंगा रहतं । तत्थेव 'छुहात अदया ए ।। १४८ ॥ अर्थ-अग्निकुंडसे बाहर निकलते को देखकर वे निर्दयी नारकी त्रास देनेके वास्ते उसको मारते हैं और रोते हुवे को अग्निकुंडमें डाल देते हैं- हा मुयह मम परिहर । पुरणो- विण करोमि एरिसं पावं ।। देताह अंगुलिङ । धरेइ करुण पुणो पुरखो रुबई ।। १४९ ॥ अर्थ-हाय मुझे छोडदो, मुझको मत मारो, मैं यह पाप फिरनहीं करूंगा, वह करुणा के वास्ते दाँतों में उंगलीवाता है और बार बार रोता है- - णं मुयंति तह वि पावा । पच्छइ लीलए कुणइ जं जूर्व।। तं पावं विलवतो । एयहदुख्खेहि गित्थरो हं हो ॥ १५०,1. अर्थ-तौ भी वे पापी नारकी उसको नहीं छोड़ते हैं और कहते है, कि देख जुआ क्या २ लीला करता है जब तक यह तेरा पाप बिनाश नहीं होगा तब तक तू दुःखसे नहीं, छूटेगा-- . . तत्तो पलायऊण । कह वि पाएणे दद्धसव्वंगो ।। गिरिकंदांम्म सहसा पविसइ सरणत्ति मांगतो ।। १५१ ॥ अर्थ-यदि नाराकियों की किसी बेपरवाही से वह शरीर मुलसा हुवा अग्निकुंड में से भाग निकलता है, तो शरण ढूंढता हुवा किसी पहाडकी गुफा में जा घुसता है.' HTTYTY TIVITYIN RAMuniANATA - -- । (२५) तत्य वि पडति उवार। सीलाउ ततो हि चुरिणर्ड संतो।। गलमाणहिरधारो । रहिऊण खणं ततो रिणयई ॥१५॥ अर्थ-वहां भी पत्थर गिरकर उसके सिरपर पड़ते हैं,वह पिस- जाता है और उसके शरीर में से खूनकी धारा बहने लगतीहै इस कारण क्षणभर रहकर वहांसे भी निकलता है- गरइयाणा सरीरं । कीरइ जइ तिलपमाणखडाइ॥ पारदरसबल्लगई । अपुराणकालाम्म ण मरेई ॥१५३ ॥ अर्थ-नारकियों के शरीरके यदि तिल के बराबर भी टुकड़े करदिये जावे तो भी वह पारेकी समान तुरंत मिलजाते हैं, आयु पूर्ण होने से पहले नारकी नहीं मरता है- तत्तो पलायमाणो । संधइ सो रणारएहि दखूण ।। पाविज्जइ विलवंतो । अयसं वय कलयलं तत् ॥ १५४ ॥ अर्थ-वह गुफामें से निकलकर भागता हुवा नारकियों को देख कर रोनेलगता है, नारकी उसको पकड़ कर जबरदस्ती तपे हुवे लोहे का रस पिलाते हैं- पच्छादिज्जइ जतो,। पीय मज्ज महूं च पुन्वभवे ॥ तं पावफलं पत्तं । पिवेहि अयकलयलं घोरं ॥ १५५ ॥ अर्थ-वे उसको याद दिलाते हैं कि पूर्वजन्म में तूने शराब और शहद पियाहै उसका फल प्रास होने पर यह घोर रसपी. कह वि तडे जइ छुट्टो । असिपत्तवरणम्मि पविसई भयोः ।। पिपडति तत्य पत्ताई। खग्गसरिसाइ अणवरयं ॥ १५६ ॥ अर्थ-यदि किसी प्रकार उनसे छूटता है तो वह हराहुआ आसिपन्न वर्णमें जा घुसनाहै, परन्तु वहां भी तलवार की समान तेज धारवाले वृक्षों के पत्ते उसपर पड़ते हैं- तो तलि पत्तपडणेण । छिएणकर चरण भिएणपुष्ठिसिरो॥ पगलंतरुहिरधारो । कंदतो सो सर्ड गियई ।। १५७ ।। अर्थ-पत्तोंके गिरने से हाथ पैर सिर और धड़ कट २ कर अलग होजाते हैं और खून की धारा बहने लगती है, तब रहाता हुवा वहांस भी निकलता है-- ,' : सुरियं पलायमाणं । सहसा धरिजण णारया कूरा ॥ कसान ४ (२६) छित्तण तस्स मंसं । तुंडम्मि छुहंति तस्सेव ।। १५८ ॥ अर्थ-तब उस भागते हुवे को क्रूर नारकी तुरंत पकड़ लेते है और उसका मांस नोचकर तुंडे में डालते हैं। भोत्तु अणिच्छमाणं । णियमंस तो भणति रे दुठा ।। अइमिडं भणिऊण । भक्खेतो आसि जं पुव्वं ॥ ११९ ॥ अर्थ-वह अपने मांस को नहीं खाना चाहता है,तब वह कहते हैं कि रे दुष्ट तू तो पूर्वजन्म में परजीवों के मांस को मीठा कहकर खाया करता था- त किं ते विस्सरियं । जेण मुहं कुणसिरे पराहूत ।। एवं भणिऊण कुर्सि । छुहति तुडम्मि पज्जालियं ।। १६०॥ अर्थ-वह बात तूने कैसे भुलादी जो अव मुख मोड़ता है,ऐसा कहकर जलते हुवे लोहे के टुकड़े तुंडे में डालते है- अइ तिव्वदाहसंता- | विउँति सो वेयणासमभिभी ॥ किमिपूहरुहिरपुण्णां । वइतरणी गई तर्ड विसई ।। १६१ ॥ अर्थ-तब अति तीव्र दाह में संतापवान् वह वेदनासे व्याकुल हुचा वैतरणी नदी में घुसता है, वह नदी पीप खून और कीड़ों से भरी हुई होती है-- तत्य वि पविष्ठमित्ता । खारुएहजलेण दसम्बंगो।। णिस्सरइ तर्ड तुरिर्ड । हाहाकारं पकुर्वतो ॥ १५२॥ अर्थ-उसमे घुसतेही खारी और गर्म जलसे उसका शरीर दाझा जाता है, तत्र तुरंतही उसमें से हाहाकार करता हुवा निकलता है-- ठूण णारया रणील- 1 मंडवे तत्तलोहपडिमाऊँ ।। प्रालिंगाविति तहिं । धरिऊण वला. विलवमाणं ॥ १६ ॥ अर्थ-तय नारकी उसको देखकर पकड़ते हैं और विलाप करते हुचे को तप्ती हुई लोहे की मूर्ति जबरदस्ती आलिंगन कराते हैं- अगणित्ता गुरुवयणं । परस्थिवेस च आसि सेवतो ।। एइह ते पावफलं । ण सहास कि रुवास तं जेण ॥१६४॥'. अर्थ-गुरुवचन को कुछ न गिणनेवाले, परस्त्री और वेश्या का min 46

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(२७)
सेवन करनेवाले अब तू उन पापों का फल क्यों नहीं सहता
और क्यों रोता है-
पुचभवे जे कम्मं । पंचेर्दियवसगएण जीवेण ।।
हसमाणेण शिवध्वं । तो किं णित्थरसि रोवंतो ।। १६५ ॥
अर्थ-पूर्वजन्म, में पांचों इन्द्रियों के चश होकर जो पाप हँस २
कर किये हैं क्या वह रोनेसे दूरहोसक्ते हैं।
किकवाउगिद्धवायस । सरूव धरिऊण णारया चेव ।
पहणंति वज्जमय- तुंडतिख्खणेहिं रदहिं दयारहिया ॥ १६६ ॥
अर्थ-वह निर्दयी नारकी मुर्गा, गिद्ध, कव्वा, आदिक का रूप
धारण करके वन के समान कठोर चोंचों से और दातों से उस
को नोचते हैं।
धरिऊण उढघ । करकयचेकोहि केइ फाडति ।
मुसलाह मुग्गगेहं य । चुरणीकुवंति परे णिरया ॥ १६७ ॥
अर्थ-अन्य नारकी उसकी जांघ पर आरा रखकर काटते
और मुसल मुद्गर से उसका चूर्ण करते हैं-
जिव्भाछेयण रणयणा । ए, फोडणं दंतचूरणं जलणं ।।
मिलणं कुणति खंड- । ति केइ तिलमत्तखंडेहि ॥ १८ ॥
अर्थ--जीभकाटते हैं, आंख फोड़ते हैं, दांत तोड़ते है, जलाते हैं,
काट २ कर तिलके रायर टुकड़े करते हैं और फिर मिलाते हैं।
अएणे कलंववालुय । थलम्मि तचम्मि पाडिऊण पुणो॥
लोटाविति रहंत । णिहणंति घसति भूमीए ॥ १६९ ॥
अर्थ-कोई नारकी उसको मोटे २ और गरम २ यालू रेतपर
डालते हैं, रोतहुवे को धरतीपर छुड़काते हैं,मारते है,और धरती
पर घसीटते हैं-
असुरा वि कुरा पावा । तत्थ वि गंतूण पुचवे राई॥
सुमरावीण त । जुध्दं लावति अएणोएपं ॥ १७०।।
अर्थ-क्रूर और पापी असुर जातिके देव भी वहां जाकर नार-
कियोंको पूर्व वैर याद दिलाकर आपस में लड़वाते हैं-
सचेय अहोलाए । पुढवीऊ तत्थ सयसहस्साई ।
तिरियाणी चुलसीसइ । सेडिंदपइएणयाइ हवे ॥ १७ ॥

AALIA LAAL 4 5 (२८) अर्थ-नरक की सात भूमि हैं इनमें श्रेणीबद्ध, इंद्रक, और प्रकी- णक इसप्रकार तीन जाति के बिल अर्थात् नारकियों के स्थान है, उन सब बिलों की गिणती ८४ लाख हैं- रयणप्पह सकरपह । वालुप्पह पंकधूमतमभासा ।। तमतमपहपुढवीणं । जाणह अणुवठणामाई ॥ १७२।। अर्थ-नरक की सातों पृथिवीयों के यह नाम है, रत्नप्रभा शर्कराप्रभा, पालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमप्रभा, और तमस्तममभा, इनके नामों के अर्थ से ही उनकी दशा जान लो- पढमाइ जमुक्कस्सं । विदियाइ मुसाहि जहएणं तं ।। तिय सत्त दस य सत्तरः । स दु सहि वाईस तेतसि ।। १७३ ।। अर्थ-पहले नरक में जो उत्कृष्ट आयु है वह दूसरे नरक में जघन्य आयु है, तीन, सात, दस, सतरा, बाईस और तेतीस- सायरसंखा एसा 1 कमेण विदियाइ जाण पुढवीसु ॥ एक्कस्स साउमाणं । णिदिई जिणवारदेहिं ॥१७॥ अर्थ-इतनी सागर संख्या उत्कृष्ट आयु की दूसरे नरक से सिलसिलेचार है और पहले नरक में एक सागर की आयु ऐसा जिनेंद्रदेवने कहा है- एतियपमाणकालं । सारीरं माणसं बहुपयारं ।। दुक्खं सहेइ तिव्वं । विसणस्स फलेणिमो जीवो।। १७५ ॥ अर्थ-व्यसन सेवन के फलसे इतन कालतक जीव नरक में मानसीक और शारीरक बहुत प्रकार के तीव्र दुःख भोगता है- तिरियगईए वि तहा । थावरकायेसु बहुहयारेसु ॥ अत्यइ अणंतकालं । हिंडतो जोणिलक्खेमु ।। १७६ ।। अर्थ-तिर्यंच गतिमें और बहुत प्रकार की स्थावर काय में भी लाखों योनियों में भ्रमताहुवा अनन्त काल रहता है- कहमवि णिस्सरिजणं । तत्तो विलिदियेसु संभवइ ।। तत्य वि किलिस्समायो। कालमसंखिज्जइ वसई ॥ १५७ ॥ अर्थ-अस्थावरकाय में से किसी कारण से निकलकर यदि विकलन्द्रिय अर्थात् दोइन्द्रिय तेइन्द्रिय वा चौइन्द्रिय होता है तो वहां भी क्लेश उठाताहुवा असंख्यात कालतकनमतारहतारे तो खिल्लविजोएण । कह वि पंचेंदिएसु उववरण ।। । - ..

+ ( २९ ) सत्य वि असंखकाल । जोणिसहस्सेसु परिभमइ ॥ १७८ ॥ अर्थ-वहां से छूटकर यदि किसी कारण से पंचेंद्रिय होता है तो वहां भी असंख्यात कालतक हज़ारों योनियों में भ्रमतारहताहै- छेयण भेयण तासण । णिलथणं जहा तहा दमणं ।। णिखलण मलणं दलणं। पउलणे उक्काचणं चैव ॥ १७९ ॥ पंधण भारारोवण । लण्णपाणस्स रोहणं सहणं ॥ सीउएइ भुक्खनछ । हियाण तह पिल्लयविय ॥ १८० ॥ अर्थ-छेदन, भेदन, त्रास, वशमै रहना, किसी प्रकार दपना। मलना, दलना, जलना, कतरना, बंधना, बोझलदना, खानापीना रुकना, सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास, मनकी चिन्ता और बालक का वियोग- इक्षेत्रमाइ बहुलं । दुवं पाउणइ तिरियजोणीए ॥ विसणस्स फलेण जदो । विसणं परिवज्जए तमा ॥ १८१॥ अर्थ-तिर्यच योनि में भी व्यसन सेवन के फल से इसप्रकार पहुत दुःख उठाने पड़ते हैं, इसकारण व्यसनों का त्याग करना चाहिये- मणुयत्वे विय जीवा । दुक्खइ पावंति बहुवियप्पेहिं ।। इटारिणडेसु सया | वियोयसंजोयज तिव्वं ॥ १८२ ॥ अर्थ-मनुष्य जन्म में भी इष्ट अनिष्ट के संयोग वियोग से जीव के चित्त को अनेक दुःख होते हैं- उप्पएणपढमसमय- । लि केइ जणणीइ छडिर्ड संता ।। कारणवसभउएह- । भूखत्तएहाउरो मरई ॥ १८३ ।। अर्थ-कोई पैदा होते ही माता के मरने से सर्दी, गर्मी, भूख और प्यास की अनेक तकलीफ उठाकर मर जाता है- बालत्तणे वि जीवो। मायापियरेहि कोवि परिहीणो ।। उच्छिठं भक्खंतो | जीवइ दुक्खेण परगेहे ॥ १८ ॥ अर्थ-कोई पालक अवस्था ही में मा बाप के न रहने से पराये घर में झूठे टुकड़े खाकर दुःख के साथ जीता है- पुच्वं दाणं दाऊण को वि सधणो जणस्स हायं ।। पच्छा सो धणरहिउँ । ण लहइ कर पि जायते ॥ १८५ ।। -- - (३७) अर्थ-कोई धनवान अपने धन को, यथायोग्य दान में देता है पीछे यदि वह निधन होजाता है तो उसको मांगने पर भी एक मुट्ठी अन्न नहीं मिलता है- अपणो उ पावरोएण । वाहिजण वरवज्ज देसाम्म ॥ अच्छइ सहायरहिउँ । ण. लहइ सघरे वि चिठे ।। १८६ ॥ अर्थ-कोई पाप के उदय से किसी व्याधि के आने पर अपना देश छोड़ता है और सहायरहित होजाता है, इसप्रकार अपने घर में भी ठिकाणा नहीं पाता है- तिसर्ड वि भुख्खिर्च हं । पुत्ता मे दोहे पाणमसणं च ।। एवं कुव्वंतस्स वि । ण को वि वयणं च सहइदि।। १८७ ॥ अर्थ-मैं भूखाहूं, मैं प्यासाहूं, बच्चा मुझको अन्न पानीदे, उसके ऐसा कहनेपर भी उसकी बातका कोई विश्वास नहीं करता है- तो रोयसोयभार । सम्वोस सव्वाहियाउ दाऊण ॥ दुक्खख मरइ पच्छा । धिगत्यु मणुयत्तणमसारं ॥ १८८ ॥ अर्थ--सारी उम्र सबको दुःख देताहुवा और रोग शोक उठाता हुवा जो मरता है उसके असार मानुष जीवन को धिक्कार है- अण्णाणि एवमाई-णि जाणि दुक्खाणि मण्यलोयम्मि ॥ दीसंति ताणि पावइ । विसणस्स फलणिमो जीवो ॥ १८९ ।। अर्थ-इस संसार में अन्य मनुष्यों को अन्य भी अनेक प्रकार के दुःख देखेजाते हैं, उन दुःखों को जीव व्यसनों के फल से उत्पन्न करता है- किंचुवसमेण पाव- । स्स कहवि देवत्तणं वि संपत्तो । तत्य नि पावइ दुक्खं । विसणज्जियकम्मपागेण ॥ १९० ॥ अर्थ-यदि कुछ पाप के उपशम होने से किसी प्रकार देवगति भी प्राप्तहोजावतो वहां भी व्यसन सेवन के पापके फलसे दुःख ही उठाता है- दण महद्धीण । देवाणं ठियज्जरिद्धिमाहप्पं ।। अप्पडिङ विसूरइ। माणसदुक्खेण डभंतो ।। १९१ ॥ अर्थ--अधिक ऋद्धिवाले देवोंकी स्थिति, जाति, और ऋद्धि के माहात्म्य को देखकर वह अल्प स्थितिवाला मानसिक दुःख से दग्ध होकर रोता है- .

हा मणुयभेन उप्प-ज्जिऊण तवसंजमं विलध्दूण ॥ मायाएजीवकप्पं । देवदुग्गइ तेण संपत्ता ॥ १९ ॥ अर्थ-हाय हाय मनुष्य जन्ममें भी उत्पन्न होकर और तप सं. यमकी शक्ति पाकर भी मायाचारी विकल्पों को करता है और उससे खोटे देवोंकी गति पाताहै- कंदप्पकिल्विसामुर-। वाहणसमूहदेवजाईसु ॥ जावंजीवं णिवसइ । विसंहतो माणसं दुक्ख ॥ १९॥ अर्थ-कन्दर्प, किल्विष, असुर, वाहन आदिक खोटे देवोंकी जाति में मानसिक दुःख उठाता हुवा आयु व्यतीत करताहै- छम्मासाऊसेसे । वच्छाहरणाइ हुँति मलिणाई ।। खाऊण चवणकालं । अहिययर स्यइ सोगेण ॥ १९४ ॥ अर्थ-जप आयुके छै महीने बाकी रहजाते हैं तब उसके वस्त्र और आभरण मैले होजाते हैं, इस से वह जानलेता है कि मेरा म- रण निकट आगया और शोक करके अधिक रोताहै- हा हा कह णिलोए । किमिकुलभारयम्मि अइदुगंधम्मि । पवमासं पुइरुहिरा--। उल्लाम्म गंमम्मि वसियव्वं ॥१९५॥ अर्थ-हाय हाय मनुष्य किस प्रकार नौ महीने गर्भ में रहता है, वह गर्भ अनेक प्रकार के कीड़ों से भरा हुवा, दुर्गंधमय और पीप तथा रुधिर से व्याप्त होता है- किं करामि कस्स वच्चाम । कस्स साहेमि जामि के सरणं ॥ ण वि अत्थि अत्थ बंधू । जो मे धारेइ णिपडतं ॥ १९६॥ अर्थ-मैं क्याकरूं किस प्रकार ब. क्या उपाय करूं, किसकी शरण जाऊं, ऐसा कोई मित्र नहीं है जो मुझको यहां से गिरते दुवे को बचाव- वज्जाउहो महप्पा । ऐरावणवाहणो सुरिंदो वि ॥ जावंजीव सो से-विर्ड विण उद्धरे में तहावे ॥१९७ ॥ अर्थ-बन्न आयुधवान, महात्मा,ऐरावण हाथी की सवारी धाला और सुरेन्द्र भी जिसकी मैंने सारी उम्र सेवा की है मुझको यहां रखनेकी शक्ति नहीं रखता है- जइ मे होई मरणं । ता होज्जइ किंतु मे समुप्पत्ती ॥

(३२)
-
एगिदिएमु जायज ! णो मणुसेसु कझ्या वि ॥ १९८॥
अर्थ-यदि मेरा मरण होगा ही तो में एकेन्द्रिय जीव उत्पन्न न
होऊ, मनुष्य होजाऊं-
अह वा किं कुणइ पुरा-1 जियम्मि उदयागयम्मि कम्मम्मि ।
सक्को वि जदो ण तरइ । अप्पाणं रखिव काले ॥ १९९ ।।
अर्थ-अथवा अब क्या कियाजावै उपार्जन किये कमों के उदय
आनेपर उस कालमें इन्द्र भी अपनी रक्षा नहीं करसक्ता है-
- एवं बहुप्पयारं । सरणविरहिउँ खरं विलवमाणों।
एइदिएमु जायइ । मरिजण तर्ड विवागेण ॥ २० ॥
अर्थ-इस प्रकार शरण रहित वह देव अनेक प्रकार बहुत २
बिलाप करता हुवा मर कर उस विलाप के फलसे एकेन्द्रिय जीव
उत्पन्न होता है-
तत्थ वि अणंतकालं । किलिस्समाणो सहइ बहुदुख्खं ।।
मिच्छत्तसंसयमइ जीवो । किं किं दुक्खं ण पाविजइ ।। १०१ ।।
अर्थ-वहां भी अनन्तकाल तक क्लशित होता हुचा बहुतदुःख
सहता है, मिथ्यात्व और संशय में पड़ा हुवा: जीव क्या २ दुःख
नहीं उठाता है-
पिच्छह दिव्ये भोए। जीवो भोत्तूण देवलोयम्मि ।
एइंदिएसु जायइ । धिगत्यु संसारवासस्स ॥ २०२ ॥
अर्थ-देखो स्वर्ग में दिव्य भोग भोगता हुवा यह जीव एकेन्द्रिय
जाति में जन्म लेताहै, ऐसे संसारपासको धिक्कार है-
एवं बहुप्पयारं । दुक्खं संसारनायरे पोरे ।
जीवो सरणविरहिउँ । विसणस्स फलेण पाउणई।। २०३ ॥
अर्थ-शरण रहित जीव इस घोर संसार सागरमें इस प्रकार ध्य-
सन संवनके फलसे बहुत दुःख उठाता है-
पंचुवरसहियाई । परिहरई सचविसाणाई ॥
सम्मत्तविसुद्धमई। सो दंसणसावयो भणिज। २०४॥
अर्थ-जो कोई पंचउदम्बर सहित सात व्यसनों का त्याग करता
है उस शुद्ध सम्यक्ती का दर्शन श्रावक कहते हैं-
एवं दसणसावय-1 ठाणं पहम समास भणियं ॥
वयसावयगुणठाएं । एदो विदिय पवख्खामि ॥ २० ॥

AAAAAAAAAL (३३) अर्थ-इस प्रकार मैंने श्रावककी पहली दर्शन प्रतिमाका संक्षेप रूप वर्णन किया अप दूसरी प्रतिमा का वर्णन करता हूं- दूसरी त्रतप्रतिमा। पंचेव अणुव्वयाई । गुणन्वयांइ होति पुण तिरिण ॥ सिख्खाबयाणि चत्तारिजाइए विदियाम्मि ठाणम्मि॥ २० ॥ अर्थ-पांच अणुव्रत, तीनगुण व्रत, चार शिक्षाबत को जो कोई पालता है वह दूसरी प्रतिमाका धारी है- पाणाइवायीवरई । सच्चमदत्तस्स वज्जणं चेव ॥ थूलयड बमचेरं । इच्छाए गंथपरिमाणं ॥२०७॥ अर्थ-जीवहिंसा, झूठ,चोरी और अब्रह्म का स्थूलरूप त्याग और इच्छानुसार परिग्रह का परिमाण करना यह पांच अनुव्रत हैं। जे तसकाया जीवा । पुबुदिहाण हिसियव्वा ते । एइंदिया वि पिका- । रणेणा पढमं वयं थूलं ॥ २०८॥ अर्थ-आंखों से दीखते हुवे त्रसजीवको नहीं मारना और ए. केन्द्रियजीव की भी विना प्रयोजन हिंसा नहीं करना स्थूल अ- हिंसा व्रत है। आलयं ण जपणीयं । पाणिवहकर तु सञ्चवयण पि । रायेगा य दोसणा य । सेयं विदियं वयं थूलं ॥ २०९ ॥ अर्थ-राग वा द्वेष से अनीति पचन नहीं बोलना और जिस से किसी जीव की हिंसा होती हो ऐसा सत्य वचन भी नहीं बो- लना इसको स्थूल सत्यव्रत जानों। पुरगामपट्टणाइम्स । पड़ियंणहं च ग्रिहियवीसरियं ॥ परदव्यमधिएहंत-1 स्स होय थूलवयं तिदियं ।। २१०॥ अर्थ-नगर, ग्राम, पट्टन आदिमें पड़ा हुाव, खोया पड़ा हुवा, भूला हुवा, परायाद्रव्य नहीं लेना स्थूल अचौर्यव्रतहै ॥ पव्वेसु इत्थिसेवा । अगकीडा सया विवज्जतो ।। थूलयह भयारी । जिणेहि मणिऊ पवयणम्मि॥२११॥ अर्थ-पके दिन सर्वथा स्त्रीका त्याग और अनङ्गक्रीडाका सदा त्याग ऐसेको जिनेन्द्रने शास्त्र में स्थूल ब्रह्मचारी कहा है- जं परिमाणं कीरइ । धणधागणहिरएणचणाईणं ।। हुवा, गिर ५ ५ - (१४) तं जाण पंचमवयं । णिदिमुवासयमझयणे ॥ २१२ ॥ अर्थ-जो कोई धन, धान्य, रत्न, और स्वर्ण आदिका परिमाण करताहै उसको परिग्रह परिमाण व्रती जानो, उपासकाध्यान शास्त्र में ऐसा कहाहै- पुन्वुत्तरदक्षिणप-च्छिमासु काऊण जोयणपमाणं ॥ परदो गमणणियत्ती । दिसिगुणवयं पढम ।। २१३॥ अर्थ-पूर्व, उत्तर दक्षिण और पश्चिम दिशा में योजन का प्रमाण करके उससे बाहर जानेका त्याग करना प्रथम गुण ब्रत अर्थात् दिग्वत है- वयभंगकारणहो-18 जाम्म देसम्म तत्य णियमेण ॥ कीरइ गमणणियची । तं जाण गुणञ्चयं विदिय ।।२१४ ।। अर्थ-जिसदेश में व्रतके भग होनेका कारण होताहै उस देशमें जानेका नियम रूप त्याग करना दूसरा गुण ब्रत अर्थात् देशवत है.. अयदंडपासविस्कय । कूडतुलामाणकूरसचाणं ॥ ज संगहो ण कीरइ । तं जाण गुणव्वयं तिदियं ॥ २१५ ॥ अर्थ-लोहे का टुकड़ा तलवार आदिक, लाठी, फांस अर्थात् मेख आदिक इनका बेचना और झूठी तराजू, झूठेवाद, तथाक्रूरजानवर रखना तीसरा गुणव्रत अर्थात् अनर्थदंड त्यागत्रतहै- जे परिमाणं कीरइ । मंडणंतवोलगंधपुफ्फाणं ॥ तं भोयविरइ भणियं । पढमं सिक्खावयं सुत्चे ॥ २१६ ॥ अर्थ-शरीर को शोभा देनेवाले पदार्थ, तांबूल, सुगंध और पुष्प आदिकका परिमाण करना भोग विरति नामा पहला शिक्षावत है- सगसत्तीए महिला-1वत्थाहरणाण जे तु परिमाणं ॥ तं परिभोयाणवुत्ती । विदियं सिक्खावयं जाणे ॥२१७॥ अर्थ-अपनी शक्तिके अनुसार स्त्री, वस्त्र, आभरण आदिक का परिमाण करना उपभोगनिवृत्ति नामका दूसरा शिक्षाबतहै- अतिहिस्स संविभागो । तिदिय सिक्खावयं मुणेयव्यं ।। तत्थ वि पंचाहियारा । णेया मुत्ताणुमग्गेण ॥२१८ ।। अर्थ-अतिथि संविभाग अर्थात् अतिथि को भोजनादिक दान I INVITITUUTUUtriuirirritvirviYYNTITYTYTI - -- 4 के . (३५) देना तीसरा शिक्षाप्रत जानो, इसके पांच अधिकार हैं जो सूत्र अनुसार जानने चाहिये- पत्तंतर यादारो । दाणविहाणं तहेव दायव्वं ।। दाणस्स फलं गया । पंच हियारा कमेणेदे ॥ २१९ ॥ अर्थ-पात्रका भेद, दाता, दानविधि, देनेयोग्य पदार्थ, और दानका फल यह पांच अधिकार क्रमसे जानने चाहिये- तिविह मुणह पत्र । उत्तममझमजहण्णभेएण ॥ वयरिणयमसंजमधरो । उत्तमपत्र हवे साहू ॥ २२० ।। अर्थ-उत्तम, मध्यम, जघन्य ऐसे तीन प्रकार के पात्र है, प्रत नियम और संयमका करनेवाला साधु उत्तम पात्र है- एयारसगणाठया। मज्झमप सुसावया भणिया ॥ अविरयसम्माइटी । जहएणपत्तं मुणेयव्वं ॥ २२१ ॥ अर्थ उत्तम श्रावक मध्यम पात्र हैं इसके ग्यारह दर्जे अर्थाद प्रतिमा हैं, और अविरति सम्यकदृष्टिको जघन्य पात्र जानना चाहिये- वयतवसीलसमग्गो । सम्मत्तविवजिर्ड कुपत्तं तु ।। सम्मत्तसीलवयवज्जिई । अपत्तं जो हवे रिणयमा ।। २२२ ॥ अर्थ-जो कोई व्रत, तप,और शील पालता है परन्तु सम्यक्त्व रहितहै वह कुपात्र है, और जो सम्यक्त्व,शील और व्रत रहित वह अपात्र है- सद्धा भगती तुट्ठी। विएण्णाण मलुद्धया खमा सत्ती ।। जत्थेदे सत्तगुणा । तं दायारं पसंसंति ॥ २२३ ॥ अर्थ-श्रद्धा, भक्ति, संतोष, विज्ञान, निर्लोभता, क्षमा, और शक्ति यह सातगुण जिस दातामें हैं वह प्रशंसा योग्य है- पडिगहणमुच्चठाणं । पादोदयमच्चणं च पणमं च ।। मणवयणकायसुद्धी । एसणसुद्धी य एवविहं पुरणं ॥ २२४ ॥ अर्थ-पात्रको बुलाना, उच्चस्थान देना अर्थात् ऊंचे विठाना, पैरघोना, पूजा करना, नमस्कार करना, मनशुद्धि, वचन शुद्धि, कायाशुद्धि, और शुद्ध आहार देना यह नौ विधि पुण्य प्राप्त कराने वाली है- - (३६ ) पत्तं णियपरदारे । दटूणाणिच्छ वा विमागिता ।। पडिगहण कायव्वं । णमोत्थु ठाहुत्ति भणिजण ॥ २२५ ।। णेत्तूण णिययगेहं । णिखज्जाणु तह उच्चठाम्मि । उविजण तहा चलणा- धोवणं होय कायव्वं ।। २२६ ॥ वाउँदयं पवित्तं । सिरम्मि काऊण अचणं कुच्चा ॥ गंधक्खयकुसुमणेव- । ज्जदीवधूवेहि फलेहिं ॥ २२७॥ पुफ्फजलि खिवित्ता । पयपुर वंदणं तर्ड कुज्जा ।। चइऊण अठरुदे । मणसुद्धी होय कायन्वा ॥ १२८ ।। णिछुरकक्कसवयणा-इवजणं तं वियाण वचसुद्धिं ॥ सव्वत्थसंपुडंग- 1 स्स, होइ तह कायसुद्धीए । २२९ ।। पहजवुरोमनत्थी । करणकुडयमंसरुहिरचम्माइ । कंदफलमूलाविया- 1 छण्ण मला चउद्दसा होति ॥ २३० ॥ चउदसमलपरिसुद्धं । जे दाणं सोहिऊण जइणाइ।। संजामिजणस्स दिज्जइ । सा गया एसाणासुद्धी ।। ३३१॥ दाणसमयाम्मि एवं। सुत्तणुसारेण एवविहाणारिण॥ भणियाणि मया एहि । दायव्वं चरणइस्सामि ॥ २३२ ।। अर्थ-पात्रको अपने घरके द्वारपर देखकर अथवा अन्यत्र से बुलाकर नमोऽस्तु नमोऽस्तु तिष्ठ तिष्ठ कहकर प्रतिग्रहण करना चाहिये- तब अपने घरमें लाकर वहां ऊंचे स्थान पर बिठाकर उसके पैर धोने चाहिये- पैरके धोवनको सिरपर लगाकर गन्ध, अक्षत, फूल, नैवेध, दीप, धूप और फलसे उसकी पूजा करें- पुष्पकी अंजुली उसपर बरसा कर उसके पैरों की बदनाकर और आतरौद्र ध्यान को छोड़कर मनको शुद्ध करै-निष्ठुर कश आदिक बचन नहीं बोलना इसको वचन शुद्धि जानो, अपनी कायाको सब तरफसे संकोच करना कायशुद्धिहै-नाखून, जीव जंतु, केश, हड्डी, मल, मूत्र, मांस, रुधिर, धर्म, कंद, फल, मूल, पोज और अशुद्ध आहार यह । ४ मल हैं-१४ प्रकारके मलसे रहि- त यत्नसे शोधा हुचा जो.दान संयमी मुनिको दिया जाताहै उसको एखणा शुद्धि जानो- 1 1 eye (३७) दानके समय की यह विधि सूत्र के अनुसार मैंने कहीं अनमै वर्णन करता हूं कि देने योग्य क्या है- माहारोसहसत्था.। भयभेज चउन्विहं दाण ॥ सं उच्चइ दायव्यं । णायन्वमुवासयाझवणे ॥२३३ ॥ अर्थ-आहार, औषधि, शान, और अभय यह चार प्रकार का दान देने योग्यहै, इनका स्वरूप उपासका ध्ययन शास्त्रसे जा नना चाहिये- असणं पाणं खाइयं । साइयमिदि चड़विहो वराहारो॥ पुव्वुत्तणवविहाणे । हि तिीवहपत्तस्स दायब्वं ॥२३४॥ अर्थ-भोजन, पीने योग्य, खाने योग्य, स्वादलेने योग्य यह चार प्रकारका आहारहै, यह आहार९विधिसे तीन प्रकारके साधु को देना चाहिये- अइबुढ्ढबालमूर्य-। धवहिरदेसतरीयरोइई ।। जहजोग दायव्वं । करुणादाणेति भाणिकण ॥ २३ ॥.. अर्थ-बहुत बूढा, पालक, गंगा, अन्धा, बहिरा, परदेशी रोगी इनको यथा योग्य देना चाहिये, इसको करणादान कहा है- उपवासवाहिपरिसम- । किलेसपरिपीडियं मुणेऊण ॥ पच्छं सरीरजोगं । भेसहदाणं पि दायव्वं ॥२३६ ॥ अर्थ-उपवास, व्याधि, परिश्रम, और क्लेश से किसी जीव को पीडित देखकर उसके शरीर के योग्य पथ्य और औषधि आदिदेना चाहिये- आवस्ससच्छाइ लिहा- 1 विजण दाजीत जं जहाजोगं । सं जाण सत्यदाणं । जिणबयणज्झावणं च तहा ॥२३॥ अर्थ-जिस शास्त्रकी जरूरत हो उसको लिखवाकर यथा योग्य देना वा जैन सिद्धान्त पढ़ाना सिखाना इसकोशास्त्रदानजानो- जं कीरइ पररक्खा । णिच्च मरणभयभीरुजीवाणं ॥ तं दाण सिंहासण-1 संठियं सव्वदाणाणं ॥ २३८ ॥ अर्थ-मरण भयसे भयभीत.जीवोंकी जो कोई नित्य रक्षा करता है उसके सप दानोंको .यह अभयदान सिंहासन पर विधा देता है.... . - r -- - - (१८) अण्णाणणो वि जह्मा । कजण कुणति रिणप्फलारंभ । । तमा दारणस्स फलं । समासदो वरणइस्सामि ।। २३९ ॥ अर्थ-अज्ञानी भी वह कार्य नहीं करते हैं जिसमें कुछ लाभ न हो इसकारण दान का फल संक्षेप से वर्णन करता हूं- जह उत्तम्मि खित्ते । पइणमणं सुबहुफलं होदि । तह दाणफलं गेयं । दिएणं तिविहस्स पत्तस्स ।। २४०।। अर्थ-जैसे उत्तम खेतमें बीज बखेरने से बहुत फल प्राप्त होताहै इसही रीतिसे तीन प्रकारके पात्रको दान देनेका फल समझो- जह मज्झमम्मि खित्ते । अप्पफलं होई वावियं वीयं । मझमफलं विजाणह । कुपत्तादिरणं तहा दाणं ॥ २४१॥ अर्थ-जैसे मध्यम ग्लेत में बीज डालने से कमती फल होता है इसही प्रकार कुपात्रको दान देने से मध्यम फल होताहै- जह उसरम्मि खित्ते । पइणं वीयं ण कि पि रुहेइ ।। फलवज्जियं वियाह । अपचदिएणं तहा दाणं ॥ २४२॥ अर्थ-जैसे ऊसर खेतमें बीज योनेसे कुछ नहीं उगता है इसही प्रकार अपात्र को दान देनेसे यह समझो कि कुछ भी फल नहीं होता है- कह्मि अपत्ताविससे । दिएणं दानं दुहावहं होइ ॥ जह विसहरस्स दिएणं । तिव्यविसं जायए खीरं ।। १४३ ॥ अर्थ-जैसे सांपको दूध पिलाने से वह दूध ज़हर होजाता इसही प्रकार कोई ऐसाभी अपात्र होताहै जिसको देनेसे दुःख ही प्राप्त होताहै- मेहाविजण सेसा । सामरणपरूवणा भए उत्ता ॥ इण्हेय भणामि फलं । समासर्ड मंदवुद्धीण ॥ २४ ॥ अर्थ-बुद्धिमानों के समझने के अर्थ मैंने साधारण रूप दान का फल वर्णन किया, अब मन्दबुद्धि जीवों को समझाने के वास्ते स- क्षेपसे वर्णन करता हूं- मिच्छादिही भद्दो । दाणं जो देइ उत्तम पत्ते ।। तस्स फलेणुवचज्जइ । सो उत्तमभोयभूमीसु ।। २४६ ॥ अर्थ-जो कोई भद्र पुरुष मिथ्यादष्टि भी है और उत्तम पात्र , - -- ५ F - AAAAAALAL (३९) को दान देताहै तो उसके फलसे उत्तम भोगभूमि में जन्मलेताह- जो मज्भमम्मि पत्तः । मि देइ दाणं खु वामदिही किं ।। सो मज्झमासु जीवो । उप्पज्जइ भोयभूमीसु ॥ २४६ ॥ अर्थ-जो कोई मिथ्यादृष्टि होकर भी मध्यम पात्रको दानदेता है वह मध्यम भोग भूमि में जन्मलेता है- जो पुण जहएणपत। मि देइ दाणं तहाविहो णरो॥ जइए फलेण जहएण-। मु भोयभूमीसु सो जीवो ।। २४७॥ अर्थ-जो कोई विधि अनुसार जघन्यपान को दान देताहै वह इस दानके फलसे जघन्य भोग भूमिमें जाता है- जइए कुपत्तदाणे । णवाम दिही कुभोयम् मीसु॥ अणुमोयणेण तिरिया । वि उत्तमठाणं जहाजोगं ॥ २४ ॥ अर्थ-जो कोई मिथ्या दृष्टि कुपात्र को दान देवै तो कुभोग भूमिमें जाताहै और दानकीअनुमोदना करनेसे यथा योग्य तिर्य- चकी उत्तम पर्याय में भी जन्मलेता है- वध्दाउगा सुदिष्ठी । मणुया अणमोयणेण तिरिया वि ॥ णियमेणुववज्जति य । ते उत्तमभोगभूमीसु ॥ २४९ ।। अर्थ-यदि भोग भूमिकी आयु वाँधकर कोई सम्यक् दृष्टि मनुष्य वा तिर्यंच दानकी अनुमोदना करता है तो नियम रूप वह उत्सम भोगभूमिमें जन्मलेता है- तत्य वि दहप्पयारा । कप्पदुमा दिति उत्तमे भोए । खेत्तसहोवण सया । पुन्वज्जियपुगासहियाणं ॥२५० ॥ अर्थ-भोग भूमिमें दश प्रकारके कल्पवृक्ष हैं जो क्षेत्रके स्वभा- बसे पुण्यवान्जीवों को उत्तम र भोगदेते हैं- वज्जंगतूरमसण- । जोइसगिहभायणंगमालंगा ।। भोयणवत्थपदीव-1 गा एदे सुरतरु दसहा ॥ २५१ ॥ अर्थ-मद्यांग, तूर्याग, भूषणांग, ज्योतिरंग, ग्रहांग, भाजनांग मालांग, भोजनांग, वस्त्रांग,प्रदीपांग,यह दशप्रकारके कल्पवृक्ष हैं- अइसरसमइसुगंधं । दिहं चिय जं जणेहि हिलासं ॥ इंदियवलपुष्ठियरं । मज्जंगा पाणयं दिति ।। २५२ ॥ अर्थ-रुचिकर और सुगंधित जिसके देखने से अभिलाषा पैदाहा - - A ALLALAYALAY (४०) -- L और इन्द्रिय और पलकी पुष्टि करनेवाली हो ऐसी पीनेकी वस्तु मद्यांग वृक्ष से मिलती है- तयविनयघणसुखिरं । वाजितरं पायवा दिति ॥ वरमकुटमालाइय । आभरणा भूसणदुमा वि। २५३॥ अर्थ-तत्त, वितत, धन, सुषिर आदिक बाजे जिससे प्रासही वह तूर्यांग वृक्ष है और उत्तम मुकट माला आदिक आभरण और भूषण देनेवाला भूषणांग वृक्ष है- ससिसुरपयासाऊँ । अहियपयासं कुणति जोईय ।। दुम्मा रणाणविहप्पा- 1-साए दिति सवा गिद्धमा दिन्वा ।। २५४॥ अर्थ-ज्योतिरंग:वृक्ष चांद सूर्य से भी अधिक प्रकाश करताहै और ग्रहांग वृक्ष नाना प्रकारके मकान देता है- कच्चोलकलसथाला-। इयाइ भायटुमा पयच्छति ।। उन्जोयं दीवदुमा । कुणति गेहस्स मज्झम्मि ।। २५५ ।। अर्थ-बार्टी, कलशा, थाली आदिक बर्तन देनेवाला भाजनांग वृक्षहै और दीपांग वृक्ष घरमें उजपाला करताहै- वरवटचीपाखोमा-इयाइ वत्थाइ दिति वत्थदुमा ॥ वरचउविहमाहारं. 1. भोयणरुक्खा पयच्छंति ।। २५६ ।। -अर्थ-उत्तम पद तथा रेशमी चीनी आदिक वन वनांग वृक्ष देता है और चार प्रकारका आहार भोजनांग वृक्ष देताहै- वरवडुलपरिमलामो । यमोइयासामुहाउ मालाउ ॥ मालादुमा पयच्छ । ति विधिहकुसुमेहि रइयाउन॥ २५७॥ अर्थ-नाना प्रकार के फूलोंसे बनाई हुई उत्कृष्ट और बहुत सु. गंधवाली माला जो चित्तको खुश करनेवाली हो मालांग उक्किभोयभूमी । सुजे णरा उदयसुज्जसमतया ॥ . छधयासहस्सुत्तुंगा । हुति तिपल्लाउगा सव्वे ।। २९८ ।। अर्थ-उत्तम भोग, भूमिका मनुष्य उद्य होते हुवे सूरज के समान तेजेवाला, छ हज़ार धनुष ऊंचा और तीन पल्यकी आयु वाला होता है- देहस्मुच्चत्तम-1 झमासु चत्तारि धणुसहस्साई ॥ पल्लाणि दूणियाऊ । पुण्णदुसमप्पहा पुरिसा ॥ २९९ ।। वृक्ष देता है- ।

AAAAAAAAAAAL । (११) अर्थ-मध्यम भोग भूमिका मनुष्य चार हज़ार धनुष ऊंचा, दो पल्यकी आयु, और पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रभावाला होता है- दोषणुसहस्सुस्तुंगा । मणुया पल्लाउगा जहएणासु॥ उत्तमकंचरणवरणा । हवंति पुगणाणु भावेण ॥ २६०॥ अर्थ-जघन्यभोग भूमिका मनुष्य दोहजार धनुष ऊंचा, एक पल्पकी आयुवाला और उत्तम स्वर्ण के समान वर्णवाला पुण्य के प्रभाव से होता है- जो पुण कुभोयभूमी- । सु सक्करासमिट्टियाहारा ॥ फलपुप्फहरा केई । तत्थ पल्लाउगा सव्वे ॥२१॥ अर्थ-कुभोग भूमिके मनुष्य शकरके समान मीठा आहार करने वाले वा कोई २ फूल फलका आहार करनेवाले होते हैं और सब एक पल्यकी आयुवाले होते हैं- जायति जुपलजुयला | उणवरणदिहि जावणं तेहि ।। समचउरससंठाणा । ववज्जसरीरसंहणणा ।। २६२॥ वाहतरिकलसीहया | चउसद्रिगुणएिणया तणुकसाया । बत्तीसलक्षणहरा । उज्जमसीला विणेया य ॥२६३ ॥ णवमासाउगि सेसे । गमे धरिऊण सूइसमयसि ।। मुहामञ्चुगा मरित्ता । णियमा देवच पावति ॥२६४॥ अर्थ-भोग भूमिमें एक साथ लड़का लड़की का जोड़ा पैदा होता है और १९ दिन में यौवन दशाको प्राप्त होजाते हैं, उनका शरीर समचतुन संस्थान और बन षमनाराच संहननवाला होता, वे मनुष्य ७२ कला और ६ गुणवे, कमती कषायवाले। १२ लक्षण वाले, उद्यमवान, विनयवान होते हैं, जब आयु नौ म- हीने की रहजाती है तष स्त्री गर्भवती होतीहै,बालकके जन्मतेही स्त्री पुरुष दोनों शुभमरणसे मरकर अवश्य देवगतिमें जाते हैं- पुण सम्माइही । बिरयाविरया ति तिविपत्तस्स ।। जायंति दाणफलर्ड । कप्पेस महद्धिया देवा ॥२६॥ अप्पचरसयमज्झगया।तत्थाणुभोगइ विविहसरसोक्खा। तत्तो चुया सम्माण-1 मंडलीयासु जायते ।।.२६६ ।। तत्य वि बहुप्पयारं । मणुयमुहं भुंजिऊण णिन्विग्धं ॥ ते ।

-- -- - (४२) विगयभयावैर । गकारणं किंचि दडूण ॥ २६७ ।। पडिबुद्धिऊण चइऊ । ण गिणवसीरिं संजमं च धितूण ॥ उप्पाइऊण णाणं । केई गच्छंति णिव्वाणं ॥२६॥ अण्णे सुदेवत्तसुमा-। गुसचं पुणो पुणो लहिऊण ॥ सचमवाहि तर्ड । करंतिकम्मक्खयं णियमा ॥ २६९ ॥ अर्थ-व्रती वा अव्रती सम्यक् दृष्टि तीन प्रकारके पात्र को दान देनेके फलसे स्वर्ग में महर्द्धिक देव होताहै-वहां सैकड़ो अप्सराओं के बीच रहकर अनेक प्रकारके दिव्य भोग भोगताहै, वहाँसे-मर- कर मध्यलोकमें मंडलेश्वर राजा आदिक उच्च पदवीकाधारी होता है वहां भी निर्विघ्नतासे बहुत प्रकारके मनुष्य सम्वन्धी सुख भोगकर पीछे वैराग्य प्राप्तहोने का कोई भी कारणपाकर वह बु. द्धिमान् निर्भय होकर राज पाटको छोड़कर और संयमको ग्रहण करके ज्ञान के प्राप्त होनेपर मोक्षको चला जाताहै- और कोई जीव फिर श्रेष्ठ मनुष्य होताहै और सात आठ भवमें नियमरूप कमौको क्षयकरदेताहे अर्थात मुक्तिपालेताहै- एवं पत्तविसेसं । दाणविहाणं फलं च पाऊण ॥ अतिहिस्स सविभागो। कायबो देसविरदेहि ॥ २७० ॥ अर्थ-इस प्रकार पात्रको, दान देनेकी विधिको, और दानके फलको जानकर देश विरति श्रावकको अतिथि सीवभाग करना चाहिये- धरिजण पत्थम । परिग्गई छडिजण अवसेस। सगिहे जिणालये वा । तिविहाहारस्स बोसरणं ॥ २७१ ॥ जंकुणइ गुरुपएस-म्मि सम्ममालोइऊण तिविहेण॥ सल्लेखणं चउत्थं । सुत्ते सिक्खावयं भणियं ॥२७२॥ अर्थ-वस्त्रेमात्र परिग्रह रखकर और पाकीको त्यागकर अपने ही घरमें वा जिन मंदिर में रहकर और तीन प्रकार का आहार' त्यागकर जो कोई गुरुके सामने भले प्रकार मन वचन कायसे आलोचना करताहै वह सल्लेखना करता है जिसको 'शास्त्र में चौथा शिक्षा व्रत कहाहै- एवं वारसभेयंः। वयठाणं घरिणयं मए विदियं ॥ सामाइयं तिदीयं । ठाणं संखेवर्ड वोच्छं ॥२७३।। । - -- AAAAA AAAAAAALAALAIMAHAIRMALAL (४३) अर्थ-इसप्रकार मैंने दूसरी प्रतिमाके १२ व्रत वर्णन किये, अब तीसरी सामायिक प्रतिमाको संक्षप से वर्णन करतां तीसरी सामायिक प्रतिमा॥ होऊण सुई चेइय । गिम्मि सगिहे व चेइयाहिमुहो ।। अरणच सुइपएसे । पुव्वमुझो उत्तरमुहो वा ॥२७॥ जिणवयणधम्मचेइय-। परमेडिजिणालयाणि णिच पि ॥ ज वंदणं नियाल । कीरइ सामाइयं तं खु ।। २७५ ॥ अर्थ-जो कोई शुद्ध होकर अर्थात् स्नान आदिक करके जिन मन्दिरमें वा अपने घरमें जिन पिम्पके सन्मुख वा अन्य पवित्र स्थान में पूर्व दिशा की तरफ घा उत्तर दिशाफी तरफ मुखकरके नित्यतीनकाल जिन धर्म, जिनशास्त्र, जिन विम्ब, परमेष्ठि और जिन मंदिरकी चंदना करताहै वह निश्चयरूप सामायिक प्रतिमा का धारी है- काउस्सग्गलि ठिर्ड | लाहालाहं च सत्तुमित्तं च ।। संजोयविप्पयं । तिणकचंणदणं वासि ॥२७६ ॥ जो पस्सइ समभावं। मणम्मि धरिऊण पंचणव यारं। वरअळपाडिहारे-1 हि संजुयं जिणरूवं च ॥२७७॥ सिद्धसत्वं झायइ । अहवा झागुत्तमं ससंवेयं ।। खणमेकमविचलंगो । उत्तमसामाइयं तस्स ॥ २७८ ॥ अर्थ-जो कोई कायोत्सर्ग में स्थित होकर लाभ अलाभ, शत्रु मित्र संयोग वियोग,तृण और स्वर्ण,चन्दन और सर्पको समान दृष्टि से देखता है और मन में पंचनमस्कार मंत्र धारण करता है आठ श्रेष्ठ प्रातिहार्य संयुक्त जिन भगवान के स्वरूप का ध्यान करताहै वा एकक्षण के वास्ते भी निश्चल अंगहोकर अपने आत्मरूपका ध्यान करताहै उसकी सामायिक उत्तम है- एवं तिदियं अणं । भणियं सामाइयं समासेण ।। पोसहविहि चउत्थं । ठाणं एदो पवक्खामि ॥२७९।। अर्थ-इसप्रकार संक्षेप रूप तीसरी सामायिक प्रतिमा का वर्णन किया, अब मैं चौथी प्रोषध प्रतिमाकी विधि का इसप्रकार वर्णन करता हूं-- ।

(४४ ) - चौथी प्रोषधोपवास प्रतिमा उत्तममज्झजहएणं । सिविहं पोसहविहाणमुदिहै। सगसत्ति एयमास- 1 म्मि चउस्म पव्वेसु कायव्वं ।। २८० ॥ अर्थ-उत्तम, मध्यम, और जघन्य तीन प्रकारका प्रोषध उपवास कहागया है जो एक महीने में चार पर्वमें अपनी शक्ति के अनुसार करना चाहिये- सत्चमितेरसिदिवस्सम्मि । प्रतिदिनणभोयणावसाणम्मि ।। भोत्तुण मुंजण जोयं । यत्यावि काऊण मुहुमुद्धिं ॥ २८॥ अर्थ-सप्तमी और त्रयोदशी के दिन आतिथिको भोजन देकर और आप भोजन खाकर अपने मुखको शुद्ध करलेना चाहिये- पक्खालिऊण वयणं । करचरणे थियामिऊण तत्थेव ।। पच्छा जिणंदभवणं । गंतूण जिणा णमंसित्ता॥२८२॥ अर्थ-शरीरको और हाथ पैरको धोकर उपवास के नियम नि यत करके पश्चात् जिन मंदिर में जाव और जिनेश्वरको प्रणामकर- गुरुपुरउ किरिय कम्मं । वंदणपुव्वं कमेण काऊण ॥ गुरुसक्खियमुववासं । गहिऊण चउविहं विीहणा ॥ २८३ ॥ अर्थ-गुरुको बंदना करके और पहले कहे हुवे क्रमके अनुसार आलोचना आदिक करके गुरुकी साक्षी से चार प्रकारके आहार का त्याग कर अर्थात् उपवास ग्रहण करे- वायणकहाणुपेहण-। सिक्खावणचिंतणाइउवजोगेहि ॥ जण दिवसं सेस । अवराणिहयचंदणं किच्चा ।।२८॥ अर्थ-शान यांचना, धर्मकथाकहना, अनुपेक्षा अर्थात बारह मकारकी भावना करना, दूसरों को शास्त्र सिखाना, विचारना- इत्यादिक उपयोग दिन व्यतीत करके संध्या समय की क्रिया बंदना आदिक करे- रयणिसमयनि ठिच्चा । काउस्सगेण रिणयसत्तीए । पहिले हिजण भूमि । अप्पपमाणेण संथारं ।।२८५॥, अर्थ-रात्रिके समय अपनी शक्ति के अनुसार कायोत्सर्ग में स्थित होकर अपने शरीरके बराबर भूमिपर सांथरा करै- णेऊण किंचि रातिं । सइऊण जिणालए रिणयघरे वा ।।

MAA. (४५) AAAAA अहवा सयलं रात्।ि काउस्सगेण णेऊण ॥ २८६ ॥ अर्थ-जिन मंदिरमें बा अपने घरमै सारीरात वा थोड़ीरातके वास्ते कायोत्सर्ग रहै- पच्चुस्से उहित्ता । वंदणीवहिणा जिणा णमंसित्ता ।। तह दन्वभावपुज्ज । जिणसुयसाहण काऊण ॥२८७॥ अर्थ-प्रातःकाल उठकर वन्दना और नमस्कार आदिकरके देव गुरु और शास्त्रकी द्रव्यपूजा और भावपूजा करकै- सुत्तविहाणेण सहा । दिण्हं रत्ति पुणो वि गमिऊण ।। पारणदिवसम्मि पुणो । पूजं काऊण पुव्वं वा ॥२८॥ अर्थ-शास्त्रोक्त विधि के अनुसार वह दिन और रातभी व्य- तीत करके पारणा के दिन फिर पहले की समान पूजा करै- गंतूण य णियगह । प्रतिहिविभागं च तत्थ काऊण ॥ जो भुंजइ तस्स फूड । पोसहविहि उत्तम होई ॥२८॥ अर्थ-फिर अपने घरमें जाकर वहां अतिथि संविभाग करके जो कोई पीछे से भोजन करताहै उसका उत्तम प्रोषधोपवासहोताहै। जह उक्कस्स तहाम-झमवि पोसहविहाणमुठ्ठिं ।। णवरबिसेसो सलिलं । छडित्ता वज्जए सेसं ॥२९०॥ अर्थ-उत्कृष्ठ पोषधोपचासकी जो विधिहै वहही मध्यम प्रोषधोपचासकी समझनी चाहिये, कुछ पहत फरक नहीं है, मध्यम उपचासमें पानीके सिवाय और सर्व वस्तुका त्यागहोताहै मुणिऊण गुरुवकज्ज । सावज्ज विवज्जिऊण णिरारंभ ॥ जइ कुण्इ तंपि कुज्जा । सेसं पुव्बंध णायव्वं ॥ २९१ ।। अर्थ-पापसे बचने के वास्ते बड़े कामों का आरम्भ भीछोडना चाहिये यदि कोई काम करना भी हो तो करै परन्तु पाकी कामों को पूर्व कथित समझना चाहिये अर्थात् घाफी आरम्भ का त्याग करना चाहिये- आयंविलं य णियडी । एइठाणं च एयभत्तं वा ।। ज कीरइ तं रणयं । जहएणयं पोसहविहाण।।२९२।। अर्थ-आश्विल पीना वा मीठा न डालकर कोई एक पदार्थ पीना वा एक स्थानमें बैठकर भोजन करना यह जघन्य प्रोष- घोपचास है- LALA IMALALLLLLL (४६ ) सीरगहाणूचट्टण- । गंधमलकेसाइदेहसंकप्पं ।। अएणं पि रागहेऊ । विवज्जए पोसहदिणाी ॥ २९३ ।। अर्थ-प्रोषधके दिन स्नान करना, उवटना मलना, सुगंधिलगा ना, मालापहनना, बाल धनवाना, देहको साफ करना आदिक क्रिया जो राग उत्पन्न करने वाली नहीं करनी चाहिये, एवं त्तउत्थठाणं । विवारणयं पोसई समासेण || एदो कमेण सेसा ।णि सुणह संखेवउ वोच्छं ॥ २९४ ।। अर्थ-इस प्रकार संक्षेपरूप चौथी प्रतिमा का वर्णन किया अब अन्य प्रतिमाओंका भी वर्णन सुनो संक्षपसे कहता हूं-- पांचवीं सचित्तत्यागप्रतिमा जं वज्जिज्ज हरियं । तुयपत्चपवालकंदफलवीयं ।। अप्पासुगं च सलिलं । सचित्तविणिवित्तितं ठाण।। २१५ ॥ अर्थ-लकड़ी, पत्र, अंकुर, कंद, फल,बीज आदिक हरित पदार्थ और अप्रासुक पानी का त्याग सचितत्याग प्रतिमाहै- छटी दिवाब्रह्मचर्यप्रतिमा ॥ मणवयणकायकयका-1 रियाणुमोएहि मेणहुं णवधा ॥ दिवसह्मि जो विवज्जइ । गुणम्मि सो सावर्ड छछो । २९६ ॥ अर्थ -मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदना अर्थात् ९ प्रकार से दिन के समय मैथुन का त्याग छटप्रितिमा सातवीं ब्रह्मचर्य प्रतिमा॥ पुव्वुत्तणवाविहाणं । पि मेहुणं सव्वदा विवज्जतो।। इत्यिकहाइणिवित्तो । सत्तमगुणवंभयारी सो.॥२९७ ॥ अर्थ-पूर्वोक्त ९ प्रकारमे सर्वथा मैथुनका त्याग और स्त्री कथा काभी त्याग सातवी ब्रह्मचर्य प्रतिमा है- आठवीं आरंभत्यागप्रतिमा॥ जं किंचि गिहारंभ । बहु थोगं वा सया वियज्जेई ।। आरंभणियट्टिई । सो अहम सावळ भणिऊ ॥ २९८ ॥ अर्थ-थोड़ा वा बहुत सदाके वास्ते गृहसम्बन्धी आरम्भ का. त्याग करना आठवीं आरम्भ, त्याग प्रतिमाहे- - .

AAP - (४७) नवमी परिग्रहत्यागप्रतिमा। मोत्तूण वत्थमत्तं । परिग्गहं जो विवज्जए सेस ॥ तत्य चि मुच्छंण करेइ । जाणइ सो सावर्ड एवमो ।। २९६ ।। अर्थ-वस्त्रमात्र पारिग्रह रखकर जो बाकी परिग्रहका त्याग करताहै और जितनो परिग्रह रखता है उसमें भी ममत्व नहीं कर ताहै वह नवी प्रतिमाका श्रावक है-- दशवीं अनुमतित्यागप्रतिमा॥ पुठो विणियप्रहि । य परेहि लोगेहिं स गिहकज्जम्मि ।। अणुमणणं जो ण कुणइ । वियाण सो सावर्ड दसमो ॥ ३०० ।। अर्थ-अपने वा पराये गृहकार्यकी पाबत पूछने परभी जो अनुमो. दना नहीं करताहै अर्थात उस कार्यको अच्छा नहीं कहताहै और अनुमति अर्थात् सलाह नहीं देताहै वह दशमी प्रतिमाका श्रावकहै- ग्यारहवीं उद्दिष्टत्यामप्रतिमा॥ एयारसम्मि ठाणे । उक्किहो सावर्ड हवे दुविहो । वत्थेकधरो पढमो । कोवीणपरिग्गहो विदिउँ ॥ ३०१ ॥ अर्थ-ग्यारहवीं प्रतिमाका श्रावक उत्कृष्ट भावक होता है उसके दो भेदहूँ,प्रथम वस्त्रका रखनेवाला और दूसरा कोपीनमात्र रखनेवाला धम्मिल्लाणं चयणं । करेइ कत्तरि छुरेण वा पढमो ।। ठाणाइसु पडिलहइ । उवयरणेण पयडप्पा ॥ ३०२ ।। अर्थ-पहले दुर्जेवाला अपने बाल उस्तरेसे बनवाताहै या कैचांसे कतरवाताहै,और यत्नके साथ उपकरणसे स्थान आदिको साफ करताहै भुंजइ पाणिपत्त- । म्मि भायणे वा सुई समुन्टो ।। उपवासं पुरण णियमा । चउव्विहं कुणइ पव्वेसु ।। ३०३ ॥ अर्थ-हाथमें वा पवित्र बर्तन में खाना खाता है और चार पोम नियमके साथ उपवास करता है- पख्वालिऊण पत्तं । पविसइ चरियाय पंगणे ठिचा ॥ भणिऊण धम्मलाई । जायइ भिख्खं सयं चेव ॥ ३०४ ॥ अर्थ-धोये हुवे वर्तनको लेकर भिक्षाके वास्ते जाताहै और आवक के घरके आंगन में ठहरकर धर्मलाभ कहकर आप भिक्षा मांगता है- सिग्धं लाहालाई । अदीणवयणो हिउयत्तिऊण तर्ड ।। अण्णम्मि गिहे वचइ । दरिसइ मौणेण क्रायव्वं ॥ ३०५॥ अर्थ-भिक्षा न मिलनेपर दीनषदन न होकर शीघ्र वहांसे नि- कल आताहै और दूसरे घर जाता है और मौनधरकर अपना आ- शय प्रकट करता है- - LALAAALAKAR - (४८) जइ अद्धहवे कोई । पभणइ पच्छइ भायेणं कुणह ।। भोतूण णिययभिक्खं । तसरणं भुंजइ सेसं ॥३०॥ अर्थ-रस्तेके बीचही में यदि कोई बुलाताहै और भोजन करनेकी प्रार्थना करताहै तब पहली लाहुई भिक्षाको खाकर उसकी दीहुई भिक्षाको खाताहै- पच्छा एयाम्म गिहे । जाइज्जइ पासुगं सलिलं ॥ ३०७॥ जं कि पि परिय भिख्खं । भुज्जिजो सोहिऊरण जत्तेण ॥ पख्वालिऊण पत्त । गच्छिज्जो गुरुसयासम्मि || १०८ ॥ अर्थ-यदि कोई नहीं बुलाताहै तब अपने पेट भरनेके मुआफिक भिक्षाके वास्ते फिरता रहताहै, फिर किसी एक घर जाकर जो कुछ मिलाहो उसको खाकर और प्रासुक पानी पीकर और यत्न के साथ बर्तनको धोकर गुरुके पास जाताहै- जइ एवं ण लहिज्जो । काउरिसगिहम्मि चरियाए । पविसत्ति एयाभिक्खा-। पवित्तिरिणामयणं ता कुज्जा॥३०॥ अर्थ-यदि कृपण पुरुषोंके ही घर हों और भोजन न मिलै तय एक दिनके उपवासका नियम करताहै- गंतूण गुरुसमीवं । पच्चख्वाणं चरविहं विहिणा ॥ गहिऊण यर्ड सव्वं । अलोचेर्ड पयत्वेणु ॥ १० ॥ अर्थ-गुरुके समीप जाकर चार प्रकारके आहारका त्याग करके यत्नके साथ सब बातोंकी आलोचना करताहै अर्थात् अपने दोषी को प्रकट करताहै- एवं भेडे होई । णवर विसेसो कुणिज्ज णियमेण ।। लोचं धरिज्ज पिच्छं। भुंजिज्जो पाणिपत्नम्मि ।। ३११ ।। अर्थ-दूसरे दर्जे वालेकी भी यहही क्रियाहै फरक इतनाहै कि नियम के साथ केशलोंच करताहै,पीछा रखताहै और हाथमें भोजन करताहै दिणपडिमवीरचरिया- । तियालजोगेसु रणस्थि अहियारो ॥ सिध्दांनरहस्साणवि । अझयणं देसविरदाणां ।। ३१२ । अर्थ-दिनमें प्रतिमा योग होना अर्थात् नग्नदिगम्बर होना, बीर आसन, त्रिकालयोग अर्थात् गर्मी में पर्वतके शिखरपर वरसातमें वृक्षके तलै और सरदीमें.नदीके किनारे ध्यान करना, सिद्धान्तके रहस्यका पढ़ना, इन गातौका देशविरतिको अधिकार नहींहै- उदिपिंडविर्ड । दुवियप्पो सावरई समासेण ॥ एयारसम्मि ठाणे । भणि मुत्तणुसारेण ॥ ३१३ ॥ - -- h पाठकोंको सूचना दजाती है कि-आगेको दृष्टिदोषसे १९ पृष्ठके स्थानपर ५७ पृष्ठसे नबर लगगेय

HAAAAAAAAAMATIMU
'(५७)
अर्थ-उत्कृष्ट श्रावक के दोभेद और प्रतिमाका वर्णन शास्त्रके
अनुसार संक्षेपसे कियागया-
रात्रिभोजनदोष ॥
- एयादसेसु पढगं । वि जदो णिसभोयणं कुणंतस्स ॥
ठाणं ठाइ तमा। णिसिभुत्तं परिहरे रिणयमा ॥ ११ ॥
अर्थ-यदि कोई रात्रिभोजन करता है तो वह ग्याइह प्रतिमा
में से पहिली प्रतिमा काभी श्रावक नहीं रहताहै इस कारण
रात्रिभोजन का त्याग करना चाहिये-
चम्मठिकीडउंदुरु । भुयंगकेसाइ असणमझम्मि ।
पडियं ण किंपि पस्सइ । भुंजइ सवपि णिसिसमए ॥ ३१५ ॥
अर्थ-रात्रिके समय चमड़ा, हड्डी, कीड़ा, ऊंदर, सांप, और
वाल आदिक जो कुछभी भोजन में पड़ जाता है वह नजर नहीं
आता है और सब खाया जाता है-
दीवज्जोई कुणइ । तह वि चरिंदिया अपरिमाणा ॥
णिवडति दिहिराए-ण मोहिया असणमज्झाम्मि।। ३१६॥
अर्थ-यद्यपि दीपक से रोशनी होतीहै परन्तु दृष्टिराग से मो.
हित होकर अणगिणत चौ इन्द्रिय जीव भोजनमें आपड़ते हैं-
इय एरिसमाहारं । भुंजतो श्रादणासमिह लोए ।
पाउणइ परभवाम्म । चउगइसंसारदुक्खाई ॥ ३१७ ॥
अर्थ-इसप्रकार के आहार का खानेवाला इस लोक में अपनी
आत्माका नाश करता है और परभव में चतुर्गति रूप संसारक
-
दुःख पाताहै-
'एवं बहुप्पयारं । दोस णिसिभोयणम्मि णाऊण ।।
तिविदेण राइसुची । परिहरियव्वा हवे तह्मा ।। ३१८॥
अर्थ-इस प्रकार बहुतदोषरात्रि भोजनमें जानकर मन वचन काय
से रात्रि भोजनका त्याग करना चाहिये-
देशविरतिकेअन्यकर्तव्य ॥
विण वयाविञ् । कायकिलेसो य पूयणविहाणं.॥
सगसची जहजोगं । कायव्यं देसविरएहि ॥१९॥

- - (५८) अर्थ-देश विरतिको अपनी शक्ति के अनुसार यथायोग्य विनय वैयावृत्य, कायक्लेश, और पूजा करनी चाहिये- दंसणणाणचरित्ते । तव उवयारम्मि पंचहां विणर्ड ॥ पंचमगइगमणत्यं । कायव्यो देसविरपण || २२० ।। अर्थ-दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप, और उपचार यह पांच प्रकार की विनय मोक्षके अभिलाषी देश घिरति को करनी चाहिये- हिस्संकियसंवेगा-1 इ जे गुणा परिणया मए पुव्वं ।। तेसिमणुपालणं जं । स त्रियाणीहि देसणे विणर्ड ।। ३२१ ॥ अर्थ-निःशङ्कित और संवेग आदिक जो गुण मैंने पहले वर्णन किये हैं उनको पालन करना दर्शन विनयहै- णाणे णाणुवयरणे । णाणवंतम्मि तय भत्ती य !! जं पडियरणं कीरइ । णिच्चं तं णाणविण ।।३२२॥ अर्थ-ज्ञानकी, ज्ञानके प्राप्त करानेवाले शास्त्रकी और ज्ञानी पुरुषकी भक्तिकरना, और ज्ञानका अभ्यास करना ज्ञान पिनयहै- पंचविहं चारित्तं । अहिगारा से हि वरिणग तस्स ।। ज तेसिं वहुमाणं । वियाण चारित्तविणर्ड सो॥३२॥ अर्थ-पांच प्रकारके चारित्रका आदर करना अर्थात यथाशक्ति पालना चारित्र विनयहै- वालो यं वुढ्ढो यं । संकप्पं वज्जिऊण तवस्सीणं ।। ज पणिवायं कीरइ । तवविणयं तं वियाणीही॥३२४।। अर्थ-यह तपस्वी चालक है, यह वृद्ध है इस प्रकार का विकल्प नहीं करके सर्व तपस्वियों को नमस्कार करना तप विनय है- उवयारिड वि विणर्ड । मणवचिकायेण होइ तिीवयप्पा ॥ सो पुण दुविहो भणिर्ड। पञ्चख्खपरोख्खभेएण ॥ ३२५ ।। अर्थ-मनसे, वचन से, काया से, इस प्रकार उपचार विनय के तीन भेद हैं और इनके भी दो दो भेद प्रत्यक्ष और परोक्ष वर्णन किये गये हैं- जं दुप्परिणामाई । मणो णियत्ताविऊण सुइजोए ।। वाविज्जइ सो विणर्ड । जिणेहि माणस्सिर्ड भणिर्ड ।।३२६॥ अर्थ-मन को खोटे परिणामों से हटाकर शुभयोग में लगाना इसको जिनेंद्र ने मन विनय कहा है- - . (५९) हियमियपुज्ज सुत्ता- । गुवचि अफरसमककसं वयणं ।। संजमिजणम्मिचा-भासणं वाचिर्ड विण ॥३२७॥. अर्थ-हित, मित, पूज्य, शास्त्र के अनुसार वचन कहना, ऐसे पचन कहनाजिनकी हृदय पर चोट न लगे, जो कर्कश न हों, संयमी मुनि को आदरकरनेवाले वचन कहना पचन विनय है- किरियं अब्भुट्ठाणं । णवणंजलि पासणं च करवाणं ॥ एते पच्चुगमणं । च गच्छमाणे अणुव्वजणं ॥ ३२८ ॥ कायगुरूवं महणं । करणं कालागुरूव पडियरणं ।। संथाराईकरणं । उवयरणाणं च पाढलिहणं ॥ ३२९ ॥ इच्छेवमाइ काइय-। विर्ड रिसिसावयाण कायचो । जिणवयणमणुगणं-1ण देसविरएण जहजोग्गं ॥ ३३ ॥ अर्थ-मुनि और श्रावकों का आदर सत्कार करना, नमस्कार करना, हाथ जोड़ना, आसन देना, आते को देखकर सत्कारके पास्ते उनके सन्मुख जाना, जाते समय उनके पीछे २ जाकर पहुं- घा देना, उनके शरीर की शक्ति के अनुसार बदन मलना, समय के अनुसार मदद करना, सांथरा और उपकरण आदिकी सिंभाल करना, जिन आगम के अनुसार इत्यादिक काय विनय देश वि- रतिको करनी चाहिये- इय पचखो एसो । भणिर्ड गुरुणा विणर्ड वि अण्णाए । अण्वज्जह जंतं । परोक्खविणऊ ति णायन्वो ॥३३॥ अर्थ-इसप्रकार मन वचन कायकी जो विनय वर्णन कांगईहै यह प्रत्यक्ष विनय है और गुरूके मौजूद नहोने पर गुरू के पीछे गुरूकी आज्ञा के अनुसार चलना यह प्रोक्ष विनय है- विणएण ससीउज्जल- । जसोहधवलियदियंतर्ड पुरिसो।। सव्वत्य हवइ सुहिर्ड । तहेव आदिज्जवयणो य ॥ ३२ ॥ अर्थ-विनय के फलसे पुरुषका चंद्रमा समान उज्ज्वल यश सप तरफ फैलता है और वह सर्वत्र सुखी होता है और सूर्यके समान तेजस्वी होताहै- जे केइ वि उवएसा । इहपरलोए सुहावा सति ॥ विणएण गुरुजणार्ड । सच्चे पाउणइ ते पुरिसा ॥ ३१३ ।। - Jin TrTTTTTTTIT , JAAAL अर्थ-इस लोक और परलोक सम्बन्धी सुख प्राप्त करानेवाले गुरुओं का उपदेश विनय से ही प्राप्तहोताहै- देविंदचक्कहरमं । डलीयराया ण जं सुई लोए । ते सव्वं विणयफल। णिव्वासुहं तहा चेवा॥३३४॥ अर्थ-इसलोक में देवेंद्र चक्रवर्ती और मांडलिक राजा आदिक को जो सुख है और मोक्ष सुख यह सब विनय काही फल है- सामण्णा वि य विज्जा । ण विणवहीणस्स सिद्धिमुवयाइ । किं पुण णिन्दुइविज्जा | विणयविहीणस्स सिझेइ ॥१५॥ अर्थ-सामान्य विद्याभी विनयहीन पुरुषको प्राप्तनहीं होती है तोमुक्ति प्राप्तकराने वाली विद्या विनयहीन को कैसे प्राप्त होसक्तीह- सत्तू वि मित्तभावं । जला उवयाइ विणयसीलस्स ।। विणर्ड तिविहेण तर्ड । कायव्यो देसविरदेण॥३३६।। अर्थ-विनयसे शत्रुभी मित्र होजाताहै, इस कारण देश विरति को मन बचन कायसे विनय करनी चाहिये- अइवालवुढ्ढरोगा । मिभूयतणुकिलेससंजुत्ताणं ।। चाउन्धरणे संघे । जहजोगं तह मणोरणाणं ॥ १७ ॥ करचरणपिहिरसाणं । मद्दण अभंगसेयकिरियाहिं ।। उच्चत्तणपरियतण । पसरणसंकुइणाइहिं ॥ १८॥ पडिजग्गाणेहिं तणु । जोयभत्तपाणेहि मेसोहैं ।। सह उच्चाराईणवि । किंचणेणेहिं तणुंधोवणेहिं च ।। ३३९ ।। संथारसोहणेहि या वज्जावच्चं सया पयत्तेण ॥ कायव्वं सत्तीए । णिन्विदिगिच्छेण भावेण॥३४॥ अर्थ-मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका, इनमें कोई बालक बूढा, रोगी हो वा शरीर में क्लेशहो वा दश प्रकारके मुनि इनके हाथ पैर पीठ सिर दधाना अंग सेकना, उठाना विठाना इनका अंग पसारना सिकोड़ना कड़थल दिलाना, प्रकृतिके समान अर्थात् मिजाजके मुआफिक अन्नपानी देना, मल मूत्र आदि फेंकना, शरी रधोना, सांथराठीक करना इत्यादि वैय्या वृत्यअपनी शक्ति समा- न ग्लानि को छोड़कर सदा करनी चाहिये- णिस्सकिय सेवेगा- 15 जे गुणां वएिण्या मणोविसया ॥ 1-- (६१) रों होति प्पयहा पुग्ण । विज्जावचं करंतस्स ॥ ३४१ ।। अर्थ-नि: शंकआदिक सम्यक्त्व के आठ अंग और संवेगादि आठगुण जो मन सम्बन्धी वर्णन कियेगये है वह धैय्या वृत्य करने से प्रकट होतह- देह सवाणियममंजम-1 सीलसमाहाण अभयदाणं च ॥ गई मइ वलं च दिएणं । विज्जाव करतेण ।।३४२ ॥ अर्थ-देह, तप, नियम, शील,समाधान, अभयदान, गति, धुद्धि पल आदिक यावृत्य करनेवाले को मिलते हैं- गुणपरिणामो जाइय । जिणिदमागणा य पालिया होइ ।। जिणसमयतिलयभू । लन्मइ पत्तो वि गुणरासी ॥ ३४३ ॥ भमइ जए जसकिची। सन्माण सुइ हिययणयणसुहजणणी ॥ अएणे वि य होति गुणा । विज्जाबच्चेण इह लोए ॥ ३४४ ॥ अर्थ-वैयावृत्य करनेवाले के परिणाम गुणरूप होजाते हैं वह जिने. न्द्रकी आज्ञाका पालनेवाला होजाता है, वह जैन विद्या में श्रेष्ठ होकर परलोक में भी उत्तम गुण प्राप्त करता है, सज्जन पुरुषों के कानको मनको और आंखों को सुख देनेवाली उसकी यशकी- ति जगत् में फैलती है और इसलोक में अन्यभी बहुत से गुण प्रास होते हैं- परलोए वि समचो | चिराउसो रोयसोयपरिहीणो॥ बलसयसत्तजुत्तो । जायइ अखिलप्पपार्ड व ॥१४५ ।। अर्थ-वैश्यवृत्य करनेवाला जन्मान्तर में भी सुंदररूप, दीर्घ आयु, रोगशोक रहित बल तेज और सथ संयुक्त और पूर्ण प्रतापीहोता है- जल्लोसीहसयोसहि-। अरू वीणमहाणसाइरिद्धीः ॥ अणिमाइगुणा य बहा | बिज्जावचण पाउगाई ॥ ३४६.॥ अर्थ-जलोपधि, सौंपधि, अक्षीण महानस आदिक ऋदि और अणिमा आदिक गुण वैयारत्य से प्राप्त होतेहैं.. किं जप्पिएण बहुधा । तिलोयसखोहकारण महत्तं ।। तित्ययरणामपुरणं । विज्जावचेण अज्जेइ ॥३४॥ अर्थ-बहुत कहने से क्या होताहै तीन लोक में आश्चर्य: * , (६२) 1 .. १ कारी जो महामहत्व तीर्थंकर नाम पुण्यप्रकृति है वह भी वैयावृत्य से उत्पन्न होजाती है- तमाणिमायणहारी। रूपवलतेयसत्तसं पएणो॥ जार्ड विजावच्चं । पुव्वं काऊण वसदेवो ॥ ३४८॥ अर्थ-पूर्व जन्म मे वैयावृत्य करने से वासुदेव स्त्रियोंके मन और नयन को हरनेवाला रूपवान् और पूर्ण बल तेज और सत्त वाला हुआ. आइरियाणा विज्जा- विच्चं किच्चा असंजदेशावि।। तित्ययरणाम पु एणं । समाजयं वासुदेवेण ।। ३४९।। अर्थ-असंयत अर्थात् व्रतहीन होनेपर भी वासुदेव ने आचार्यों की वैयावृत्य करने से तीर्थकर नाम पुण्य प्रकृति का बंध किया- एवं णाऊण फलं । विज्जावच्चस्स परमभत्तीए । णिच्छयजुत्तेण सया। कायव्वं देसविरएण ॥ ३९० ।। अर्थ-इस प्रकार वैयावृत्य के फल को जानकर दृढ़ निश्चय होकर देशविरति को सदा भक्ति के साथ वैयावृत्य करनी चाहिये- : प्रायविलणिब्धियडी । एयठाणं छठमाइवस्खेण ॥ ज कीरइ तणुतावं । कायकिलेसो मुणयन्वो ॥३५१॥ अर्थ-आंबील पीकर, बिनामिठाई के खाकर, एक स्थान में मोजन करके वा छठे दिन आठवें दिन वा पंद्रहें दिन भोजन करके शरीर के आताप देने को काय क्लेश जानना चाहिये- मेहाविणरा एए-1 ण चेत्र बुझांति वुद्धिविहवेण ॥ मंदबुद्धिणो तेण । कि पि वोच्छामि सविसेसं ॥३५२।। अर्थ-जो बुद्धिवान मनुष्य हैं वह तोअपनी बुद्धिबल के बास इतनी ही बात से उपवास का स्वरूप जान लेते हैं परन्तु मन्दबुद्धि पुरुषों के समझाने के वास्ते विस्तार के साथ वर्णन करता हूं- आसाढ़ कचिए फ- । ग्गुणे य सियपंचमीए गुरुमूले ॥ गहिऊरण विहिं विहिणा। पुव्वं काऊण जिरणपूजा ३५३ पडिमासमेकरखमो- जावज्जासाणि पंचमासा य ॥ अविछिए कायब्बा। मुतिसुई जायमाणेण ।। ३५४ ।। अर्थ-आपाढ़, कार्तिक, नाफाल्गुण महीने में से किसी एक महीने - - 4 . म की शुक्लपक्ष की पंचमी को प्रथम जिन पूजा करके और गुरू फे समीप आकर विधिपूर्वक उपचास व्रत ग्रहण करके मुक्ति मुख चाहने पालों को पांच वर्ष तक उसही महीने और उसही पक्ष में मरायर करते रहना चाहिये पीचे में किसी घर्ष भी अन्तर नहीं- पड़ना चाहिये ॥ अवसाणे पंच घडा- विगु पढिमाय जिणवरिंदाण ॥ सह पंच पुत्थयाणि य- । लिहापिकणं ससनीए ॥१५॥ सेमि पहियाले । जे कि पि पइजोगमुवयरगं । रासन्ध कायच्वं । पत्नयं पंच पंच संखाए ॥ १५९ ॥ अर्थ-व्रतपूर्ण होजानेपर जिनंद्रकी पांच प्रतिमावनपानी चाहिये भौर अपनी शक्ति समान पांच पुस्तक लिखधानी चाहिये और उनकी प्रतिष्ठाकराने में जो जो उपकरण चाहिये वाह भी पांच २ धनवाने चाहिये- मुहिरएणपंचकन्नसे । पुरउ वित्यारिऊण वत्यमुद्दे ।। पागणं बहुभेयं । फलारिण विविवाणि तह चेव ॥ ३५७ ॥ दागं च जहाजोगं । दाउण चरविदस्स संघस्स ।। उज्जावणीवधि एवं.। कायन्बो देसविरगण ॥३५८ ।। अर्थ-उत्तम सोने के पांच फलशजिनका मुख वस्त्रसे पंधाचा हो और पहन प्रकारके पफान और फल पास रखदे और चतुर्विध संघको अर्थात मुनि श्रावक और आर्यका और श्रावका को यथा योग्य दानदेकर देश चिरतिको इसप्रकार उद्यापनकी विधि करनी पाहिये- उज्जवगाविहिं गण तरइ । काउंजई कोवि अत्यपरिहीणो । तो विपी कायव्यं । उववासविहाणं पयत्तेण ।। ३५९ ।। अर्थ-यदि कोई निधन उद्यापनकी विधि नहीं करसक्ताह तो विधिपूर्वक यत्नके साथ दुगणे उपवास करने चाहिये-अर्थात दश वर्षतक करना चाहिये-- जइ अंगरम्मि कारण । वसेण एको व दो व उपवासा ।। ण कर्ड तो मूलाई । पुणो वि सो होइ कायन्चो ॥३६० ।। अर्थ-यदि किसी कारणसे एक वा दो उपवास पीचमें न हो - 1 (६४) सके तो प्रारम्भ ले फिर उपवास करना शुरू करना चाहिये- एस कमो गायन्यो । सव्वविहीणं भणिज्जमाणाण ॥ एवं गाऊपा फुडं । णियमाई होइ कायव्यो ।। ३६१ ॥ अर्थ-व्रतकी सर्व विधिजो वर्णन कीगई है उनको जानकर यदि किसी प्रकार भी व्रत भंग होजावे तो फिरसे उसही क्रमानुसारकरे- पंचमिउववसविहि । किच्चा देविदचकवाहत्ते ।। भोत्तूण दिवभोए । पच्छा पाउपाइ णिवाणं ।। ३६२ ॥ अर्थ-इस पंचमी व्रतका करनेवाला देवेंद्र और चक्रवती आदिक फे दिव्य भोग भोगकर पीछे निर्वाणपद प्राप्तकरताहै- विहिणा गहिऊरण विहिं । रोहिरिणरित्वम्मि पंचवासाणि । पंच य मासा जावउ । उववासं तम्मि रिख्खम्मि ॥३१॥ काऊणुज्जावणं पुण । पुन्वविहाणेणा होइ कायव्वं ।। पावरि विसेसो पडिमा । कायन्या वासुपूज्जस्स ॥ ३६४ ॥ तस्स फलेणित्थी वा । पुरिसो सायं या पच्छवि कया वि। भोत्तूण विहुलभोगं । पच्छा पाउराइ शिवाणं ॥ ३१५ ॥ अर्थ-रोहिणी नक्षत्र में विधिपूर्वक उपवास ग्रहण करकेपांच वर्षतक पांच महीने में रोहिणी नक्षत्र में विधिपूर्वक करता है,और पूर्व विधि के अनुसार उद्यापन करै परन्तुप्रतिमा वास पूज्य भग- वान् की करावै,इस ब्रतके फलसे स्त्री हो वा पुरुषहो उसको शोक कभी नहीं होताहै बल्कि उनम २ भोग भोगकर पीछे निर्वाणपद प्राप्त करताहै- ( यह रोहिणी व्रत कहलाताहै) गिहिऊपासिणिरिक्ख- | म्मि विहि रिक्वेसु सत्तासेस ।। 'रिक्वंपडि एक्कक्को । उववासो होइ कायच्चो ॥ ३६६ ॥ एवं काऊण विहि । सत्तीए को करीस उज्जव ।। मुत्तर्णभुदयसुहुं । सो पावइ अक्खयं सुक्खं ॥३६७॥ अर्थ-अश्विनी नक्षत्र में उपचास ग्रहण करके १७ सत्ताईस नक्षत्र में प्रत्येक नक्षत्र के दिन उपवास करना चाहिये इसप्रकार उपवास करके जो कोई शक्ति समान उद्यपान करता है वह अभ्यु: दय और सुख भोग कर मुक्तिपद प्राप्तकरता है-- . ALAAAAAYALAAAAAAAAAAAA AIMURALA (६५) : काऊण अंठ एयं- । तराणि रइयरणगेमु चत्तारि ॥ एया पहिवा वाया।उ दुरिणतीयाउ तिरिणचउरई ॥ चउरो य पंचमी । पंच य छहीउ छट्टेव ॥ ३६८॥ सत्तेव सत्तमाः । अहाम्मर्व य पाव य एवमी । दसमा य तहा ए-1 यारस एयारसीडे य ।। ३६९ ॥ वारस य वारसी। तेरह तह रसोई रणायव्वा ॥ चौदस य चौदसीई पएणरसा पुगिरणमाई य ॥ १७ ॥ उववासा' कायवा | जहुत्तसंखा कमेण एयासु ॥ एसा णमेण विहि । णेयाउ सुखसंपत्ती ॥३७१ ॥ एयस्सा संजाइए । फलेण अन्भुदयसुखसंपत्ती ॥ 'कमसो मुत्तिसुइस्स वि । तमा कुज्जा पयत्तेण ॥ १७२ ॥ अर्थ-प्रतिपदा अर्थात पड़वातथि का एक उपवास, द्वितिया के दो उपयास, तीजके तीन, चौथके चार, पंचमी के पांच, छटके छ, सप्तमी के सात, अष्टमी के आठ, नवमी के नौ, दशमों के दशएका दशीके ग्यारह, दादशीके १२, प्रयोदशी.के.१९, चतुर्दशी के १४, पूर्णमासी के १५, इस प्रकार सिलसिले वार. उपवास कर इसको सुख सम्पत्ति व्रत कहत है इससे . अभ्युदय और सुख सम्पत्ति प्रास होती है और इसही से सिल सिलेवार प्रयत्न करनेसे मुक्ति सुख भी मास होजाता है- दहिमुहसेलसु पुणो । अंजणजिणचेइएछहं ॥ ३७॥ नंदीसराम्म दीव एवं उस वि दिसामु कार्यन्वा।। स्ववासा एस विहि । दीसरपंति णामण ॥ ३७४॥ -, “जकिपि देवलोए । महादेवाण माणुसाण सुह।। भोत्तण सिद्धिसोक्वं । पाउणइ फलेण एयस्स ।। ३७५ ॥ अर्थ-एक दिन उपवास करके फिर बीचका दिन छोड़कर तीसरे दिन उपवास करें फिर एक दिन छोड़कर अगले दिन उपवास करे इस प्रकार नंदीश्वर द्वीपक्के आठ रतिकर पर्वत सम्बंधी जिनेंद्र प्रति- माके अर्थ आठ-उपवास करें और फिर दधिमुख पर्वत सम्बंधी चार उपवास करै फिर अंजनगिर सम्बधी एक उपवास कर इसप्रकार १२ उपपास एकदिशा के अर्थ कर इसही प्रकार चारों दिशासम्बंधी + ९ - ५२ उपवास कर इसको नंदीश्वर पंक्तिव्रत कहते हैं-इस व्रत के करनेसे महर्दिक देव और मनुष्यों का सर्व प्रकारकासुख भोगकर सिद्ध पदका सुख प्राप्त होताहै- एयंतरांववासा । चत्तारी चउदिसामु काऊण ।। छठं मज्झे एवं । तिसहिखुत्तो विहि कुन्जा ॥ ३७६ ॥ पहवणे णिवणे।छद्रं मझाम्म अष्ठयं च तहा।। एस विही स्थायव्यो । विमाणपंति णामेण ।। ३७७ ।। फलमयस्सा भोत्तुण देवमणुसेसु इंदियजं मुखं ।। पच्छा पावइ मोक्वाथुणिज्जमाणो मुरिंदोहि ।।३७८ ।। अर्थ-प्रथम एक बेला फिर एकासन फिर उपवास फिर एका सन फिर उपचास फिर एकासन फिर उपचास फिर ऐकासन फिर उपवास यह एक पटलका नत हुवा इसप्रकार ६३ पटल के व्रत करै अर्थात् एक पटलका व्रतकरके फिर एकासन फिर उपवास फिर बेला फिर एकासन फिर उपवास फिर एकासन फिर उपवास फिर एकासन फिर उपपास फिर एकासन फिर उपवास कर यह दूसरा पटल हुवा इसही प्रकार ६३ पटलके व्रतकरै अन्त में तेला भी कर इसको विमान पंक्ति मत कहने हैं इसमें १९७ दिन लगते हैं इसवतके फल से देवगति और मनुष्यगति के कुल मिलते हैं जिनको भोगकर मुक्ति प्रास होतीहै जिसकी वंदना स्तुति देवों के इन्द्रभी करते हैं- उद्दसमत्तमेयं । कीरइ एणं पिजं ससत्तीए । सुत्तोचतवविहाणं । कायकिलेसात तं विति ॥ ३७९ ।। अर्थ-थोड़े से व्रतों का यह वर्णन किया गयाहै, अन्यभी वहुन प्रकार के व्रत शास्त्र में वर्णन किये गये इनको शक्ति समान करना चाहिये, तपविधान में इसको काय, ल श समझ- ना चाहिये- जिणांसद्धसरिपाठय- साहूणं जं सुपरस विहवेण ।। कीरइ विविहा पूजा । वियाण तं पूजणविहाणं ॥ ३८० ॥ अर्थ-जिन भगवान, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय साधु और शास्त्रकी विविध प्रकार पूजा करनेको पूजन विधान जानो ।

4A LAAAAAAA AAD । -- 4 (१७) णामावणादब्चे । खित्ते काले वियाण भावे य ॥ छोव्वहपूया भणिया । समास जिणवरिंदेहि ॥ ३८१ ॥ अर्थ-नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव यह छै प्रकार की पूजा जिनेंद्र भगवान ने संक्षेपसे कही है- उच्चारिजण णामं । अरुहाईणं विसुद्धदेसम्मि ॥ पुफ्फाणि खिविज्जति । विएणया णामपूयासा ॥ ३८२ ॥ अर्थ-अरहंत आदिक का नाम उच्चारण करके शुद्ध स्थान में पुष्प क्षेपण करना नाम पूजा है- सभ्भावासभ्भावा । दुविहा ठवणा जिणेहि परणचा ॥ सायारवंततवत्युभि । जं गुणारावेणं पढमा ॥ ३८३ ॥ अर्थ-सद्भाव और असद्भाव दो प्रकारकी स्थापन जिना भगवान ने कही है, साकार वस्तु में भगवान् के गुणोंका भारोपण करना सद्भावस्थापना है- अक्खेयवराडर्ड वा। अमुगो एसोत्ति 'णीयबुद्धीए । सकाप्पऊण वयणं । एसा विणेया असभ्भावा ।। ३८४ ॥ अर्थ-अक्षत वा कमल के बीज या किसी फूल में यह संकल्प करना कि यह अमुक देवता है और वैसाही उच्चारण करना इस को भसद्भावस्थापना जानो- हुंडावसाप्पणीए । विदिया ठवणा ण होदि कायव्वा । लोए कुलिंग मइमो । हिया जदो होयसंदेहो ॥१८॥ अर्थ-इस हुंडावसर्पिणी कालमें अतदाकार स्थापना नहीं करनी चाहिये, क्यूंकि अन्य मति वाले भी इस प्रकार की स्थापनाकरते हैं इस कारण बुद्धिको भ्रम उत्पन्न होगा इसमें संदेह नहीं है- कारावगिदपहिमा । पइठलख्खणविईि फलं चेव ॥ पदे पंचहियारा । णायन्या पढमठवणाया ॥१०॥ अर्थ-सद्भावस्थापना में पांच अधिकार हैं, कारापक अर्थात प्र- तिष्ठा करानेवाला, इंद्र अर्थात् प्रतिष्ठाचार्य प्रतिमा, प्रतिष्ठाके ल. क्षणकी विधि, और प्रतिष्ठाकाफल- भागी वच्छलपहा । वणाखमासच्चमवावेदो।। जिणसासणगुरुभत्तो । मुत्ते कारावगो भणिदो ।। ३८७ ॥ VIITTETTE (६८) , अर्थ-भाग्यवान्, वात्सल्यगुणयुक्त प्रभावनावान, क्षमासत्य, मार्दव गुणवाला, देवगुरुशालकी भाक्त करनेवाला ऐसा पुरुषका रापक होसक्ताहै यह शास्त्र में कहाह- देसकुलाइसुदो । णिरूवमांगो विध्दसम्मत्तो।। पढमाणुजोगकुसलो । पइटलस्खणविहिविदागा !! ३८८ ।। साश्यगुणोववेदो । उवासयज्झयणसत्याथरवुद्धी । एवंगुणो पइठाइरि । जिणसासणे भणिर्ड ।। १८९॥ अर्थ-देश, कुल, जाति, आचार, विचार. शुद्धहो, सुंदररूपहो, सम्यक्त्व शुद्ध और अतीचार रहितहो,प्रथमानुयोग शास्त्रको अ च्छी तरह जानताहो, प्रतिष्ठाको लक्षण विधिमें विद्वानहो,जिस में श्रावक के गुण हैं उस उपासकाध्ययन शास्त्रको भलीभाँतिजा. नताहो,जैन, शास्त्र में प्रतिष्ठाचार्यके यह गुण वर्णन किये गयेहैं- मणिकणयणरुप्पय- । पित्तलमुत्ताहलोवलाइहि ॥ पाडिमालख्खणविहिणा । जिणाइपडिमा घडाविज्जा ॥ ३९० ।। अर्थ-मणि, सोना, रूपा, पीतल, मोती और पत्थर आदिमें जिन भगवान के लक्षण बनवाकर प्रतिमा बनवावै । वारहगंगी जा । दसणतिलया चरित्तवत्यहरा ।। चोदहपुवाहरणा । ठावेयव्वा य मुयदेवी ॥ ३९१ ॥ अहवा जिणागमं पु-! त्यएसु सम्म लिहाविऊण तई। सुहतिहिलग्गमुहूत्ते । भारंभो होइ कायवो ॥ ३९२|| अर्थ-द्वादशांग शास्त्र जिसके अंगहैं, सम्यक् दर्शन जिसका तिलकहै, सम्पक् चरित्र जिसके वस्त्र हैं, और चौदह पूर्व शास्त्र जिसका अलंकार है ऐसी श्रुत, देवी.प्रथक स्थापन करै वा कोई जैन शास्त्राभले प्रकार लिखवाकर रक्खे, और शुभतिथि शुभ- लग्न और शुभमहूर्त में आरम्भ करै- अष्टदसहत्यमत्तं । भूमि संसोहिऊण जइणाण..! . तस्मुवरि मंडई पुण। कायलो, तप्पमाणेण ॥ ३९ ॥ अर्थ-अठारह हाथ लम्बी चौड़ी भूमिको यत्नके साथ शुद्ध करके उसके ऊपर उसहीके प्रमाण मंडप-धनावे- बड़तोरणचउदारो- वसोहिउँ चिविहवत्यकयभूतो।। 4 - - . - (६०) धूयतधयवहाउँ । णाणांपुफ्फोवहारद्धो ।। ३९४ ।। अर्थ-मंडप ऐसा पनाये जिसके चारोंतरक चार तोरण (मह' रापदार दरवाजे) और चारद्वार होवे, जो नाना प्रकार के पत्रों से भूषितहों, जिसके ऊपर ध्वजापताका हवालाहल नहींहों और जिसकी भूमिपर नानाप्रकार के फूल विखर रहेहों।. लवंतकुमुमदामो । वंदणमालाहिभूसियदुवारो ।। दारुवार उभयकोण-|सु पुण्णकलसहिरमणी।। ३९५ ।। 'अर्थ-जिसमें जगह २ फूलोंकी माला लटकरही हो जिसका द्वार पन्दन मालाओंसे सजाहुआ हो और जिसके द्वारके दोनों कोणोंपर जलसे भरे हुए कलश रखहों और उनसे वह शोभ नीक होवै॥ तस्स बहुमज्झदेसे । पइसत्यम्मि उत्तमाणेणे ।। समचउरस्सं पाठं । सव्वत्थ समं च काऊण ।। ३९६ ॥ अर्थ-तिसं मंडपके मध्य में (बीचों बीच) प्रतिष्ठा शास्त्र में कहे प्रमाण चौकोर और सर्व तरफ से समान ऐसी वेदी बनावै चउसु वि दिसामु तोरण-। मालोववेददाराणि ॥ छत्तावत्ताणि तहा । दिणि रइजण कोणेसु ॥ ३९७॥ अर्थ-तिस वेदीकी चारों दिशामें तोरण और पन्दनमाला कर युक्त चार द्वार धनावै तथा वेदीके चारों कोणोंपर छनके आकार सुन्दर गोल चित्रोंकी रचना करे । पड़िवीण णेत्तपट्टावरहि । वत्यहि बहुविहेहि तहा ॥ उल्लोविऊण उवरि । चंदोवयमणिनिहाहि ॥ ३९८॥ अर्थ-तिस वेदीके ऊपर नाना प्रकार के मुन्दर चमकीले वनों से वेष्ठित तथा रत्नो की किरणों से घिरा हुआ अर्थात रत्नजदित चन्दोआ सान- संभूसिऊण चंदउ-1 वएण वरेहि सरलहि । मुत्तादामेहिं तहा ! किंकिणिजालोह विविहेहिं ॥ ३९९॥ अर्थ-चन्दोभा, उत्सम सरल मोतियोंकी माला और नाना प्रकारकी छोटी २ घटियोंके समुह से वेदी के ऊपर मंडप शोभित करें- । ATTI HA - LAALA (७०) छत्तेहि य चमोहि य । दप्पणभंगारतालवहाँहि ॥ कलसहि पुफ्फवडिलिय । सुवइयदीवणिवहहिं ।। ४.०॥ अर्थ-और छन, चमर दर्पण, झारी, पंखा, पुष्पमाला गले में पड़े हुए कलश स्वस्तिक (सांतिया) और दीप समूह इन मङ्गलद्र ध्यास मंडपको भूषित करै ।। एवं रयरंग काउण! तर्ड अभ्भंसराम्म रइजण ।। विविहेहि वहुमंडेहिं । घेईयाचउसु . कोणेसु ।। १०१ ॥ अर्थ-इसप्रकार ऊपर कहे प्रमाण रचना करके तिस वेदीके अन्दर चारों कोणों में नाना प्रकार के बहुत से .परतन मांडे स्थापित करे। इंदो तह दायारो । पामुयसालेलेण धारणादिरहे ।। पक्खालिजण देह । पच्छा भोचूण महुरएणं ।।४०२॥ अर्थ-इसके पश्चात् इन्द्र अर्थात् प्रतिष्ठाचार्य और दाता अर्थात् प्रतिष्ठा कराने वाला यजमान दोनों उपवास से पहिले दिन प्रासुक जल से स्नान करके मधुर अन्नका भोजन करें। उववासं पुण पोसह । विहिणा गहिऊण गुरुसयासम्मि ।। णवधवलवत्थभूसो । सिरिखंडविलितगो॥ ४०३ ॥ अर्थ-फिर नवीन उज्ज्वल वस्त्र पहन कर और सर्व अंग में पन्दन का लेप करके गुरुके निकट विधिपूर्वक प्रोषधोपवास ग्रहण करें। भाहरणवासियाहि । भूसिययगो सयबुद्धीए । सको हमक्यिप्परहि । विसेज्ज जग्गावाण इंदो।। ४०४ ।। अर्थ-(इसके पश्चात् ) गहने कपड़े आदिसे सजाहुआ है अंग जिसका ऐसा वह प्रतिष्ठाचार्य अपने मन में " में इन्द्रह" ऐसी कल्पना करता हुधा यज्ञभूमिमें प्रवेश करे। पुव्वुत्वेइमज्झे । लिहज्ज चुरणेण पंचवरणेण ॥ पिहुकरिणयं पइहा- । कलावविहिणा सुकंदुत्थं [?]४०९ अर्थ-पूर्वोक्त वेदीके मध्यमें, पांच वर्णके रत्नोंके चूर्णसे, प्रतिष्ठा शास्त्रमें कही हुई विधिके अनुसार, मोटी कर्णिका वाला सुन्दर कमल खचे। रंगावाल च मझझे । उविज्ज सियवत्थपरिवुडं पीठं। - . -- . (७१) उच्चदेसेसु तह पइटो- । वपरणदव्यं च ठाणेसु ।। १०६ ॥ अर्थ और रंगावली खेचकर मध्यभागमें सफेद वस्त्र सेहकी हुई घेदी स्थापित कर और ऊंचे २ स्थानोंपर प्रतिष्ठा के योग्य न्य स्थापन करे। एवं काऊण तर्ड । इसाणदिसाए. वेइए दिवं ।। रइजण एहवणपीठे सस्य यमझम्मि गवेज्जो ॥ ४०७॥ भर्थ-इस प्रकार कार्य करने के पश्चात ईशान दिशा में एक सुन्दर बेदी तय्यार करके उसके मध्य में एक स्नान पीठ (स्नान करानेकी चौकी वा आसन स्थापन करें। अरुहाईणं पहिमं । विहिणा संहाविऊण तस्सुवार । धूलीकलसाहिसे यं कराविये सुत्तहारेण ॥ ४०८ ॥ अर्थ-उस स्नान पीठपर श्रीअरईतादिक की प्रतिमा विधिपूर्वक स्थापन करके तिम प्रतिमा का सूत्रधार (कारीगर) द्वारा धूलीक- लश तीर्थक्षत्र वगरः की मिट्टी तथा धानके चूर्ण वगैरःसे भराहुआ कलशसे अभिषेक कराव। वस्थादियसम्माणं । कायन होदि तस्स सत्तीए.॥ पेखणणविहिज मंगल-1 वयणं कुज्जा तर्क कमसो ।। अर्थ-फिर उस कारीगर को अपनी शक्तीके आनुसार पनवग्ने र देकर उसका सन्मानकरै और इसके बाद उसको रुखसत कर और मंगल शब्दकरावै। सप्पाउग्गुवयरणं । अप्पसमी णिवसिजण तर्ड ।। अगारसुद्धि कुज्जा । पइठ्ठसत्युत्तमम्गेण ॥११॥ अर्थ-इसके पश्चात् पहले कहे हुए अर्थात उच्च स्थान में स्थापित किये हुए प्रतिष्ठा के योग्य द्रव्यको अपने पास रखकर प्रतिष्ठा शास्त्र में कही हुई विधिके अनुसार मंदिर शुद्धि करै- एवं काऊण रवो । खुहियसमुदेहि गज्जमाणेहिं ।। परमेरिकरडकाहल-जयघंटासंखरिणवहचिं॥४११॥ अर्थ-इस प्रकार मंदिर शुद्धि करने के पश्चात उमटे हुए समुद्र की समान गर्जने वाले बटुतसे नगारे, करंड, काइल, जय घंटा और शंखोंका शब्द करावे अर्थात ये बाजे बजवावै । गुलगुलंतेहि तिविलहिं । कसतालेहि झमझमंतोहि ॥...

P uri (७२) घुमंतपडहमदल- । हूटकमुक्खोहि विविहेहिं ।। ४१२॥ अर्थ-गुल गुल शब्द करनेवाले तयले, झम झम शब्द करने वाली कांसी की झांश और घुम घुम शन्द करने वाले दोल मृदंग इंदभि आदि अनेक प्रकारके बाजे बजावै । गज्जतोह संधिबंधा- । इएहिं गिएहि बहुपयारेहिं ।। वीणावसहि तहा। श्रारणयसदोहिं रम्मेहिं ॥ ४१३ ॥ अर्थ-संधि, बंधन और पड़दे आदि ठिकानों से जिनमें अनेक प्रकारके गीतों की गर्जना निकलती है ऐसी बीण, पासुरी तथा रमणीक ढोलक घजवावै। बहुहावभावविम्भम- विलासकरचरणतणुवियाहि ।। पञ्चतु एवरसेहि । भिएणणाडएहि विविहाँही।४१४|| अर्थ-अनेक प्रकारके हाव, भाव, विभ्रम, विलास तथा हाथ,पैर और शरीरकी मटकाने चटकाने रूप चेष्टा से नवरसर्युक्तं नृत्य कराव और अनेक प्रकारके भिन्न २ नाटक करावे । थोतेहि मंगलेहि य.। उच्चास्सएहि महुरवयणस्स ।। धम्माणुरायरत्तः । स्स चाउवण्णस्य संघस्स ॥४१५॥ भत्तीए पिच्छमाणस्स । तर्ड उच्चाइजण जिणपडिमं ।। सियासयायवत्तं । सियचामरंधूयमाणसम्बंगो ॥ ४१६ ॥ पाराविऊण सीसे । काउण पयहिणं जिणंगेहस्स। विहिणा उविज्ज पुब्बु- । तवेइमझपीठम्मि ॥ ४.१७ ।। अर्थ-इस के पश्चात् धर्म के विर्षे लवलीन ऐसा जो मुनी आ यिका श्रावक श्राविक रूप चार प्रकार का संघ तिसके मंगलीक स्तोत्र और सेंकडो मधुर उच्चारणके साथ श्रीजिनप्रतिमा को. जिसके ऊपर सफेद छत्र फैलरहाहै और सर्व अंगपरसफैद, चमर दुलरहे हैं, भक्ति पूर्वक उठाव और मस्तकपर धारण करके जिन मंदिरकी प्रदाक्षिणा कर और फिर. उस मतिमाको पूर्वोक्त बेदी के मध्यमे जो पीठ हैं उसपर विधि पूर्वकस्थापनकरै । - चिक्रेज जिणगुणरो- । वणं कुणतो जिणंदपडिविवे ।। इढे लग्गस्सुदए-1 चंदणातिलयं तर्ड दिज्जा ।।४१८ ॥ : अर्थ-और जिन प्रतिमा विष जितेंद्र के गुणों का आरोपणकरता 1-4 (७३) हुआ तिष्ठै पश्चात शुभमुहूर्त में तिस प्रतिमा के मस्तकपर चंदन का तिलक करे। सव्वाश्यवेस पुणो । मंतरणासं कुणज्ज पडिमाए । विविहचणं च कुज्जा । कुमुमहिं बहुपयारोह ॥ ११९ ॥ अर्थ-इसके बाद प्रतिमाके सर्व अंगोंमें मंत्रोका निक्षेप करै अर्थात् मंत्र लिखै और नाना प्रकारके पुष्पों से अनेक प्रकारका पूजन करें। दाऊण मुहपडं धवल-1 वत्थजुयलेण मयणफलसाहयं ॥ अख्खयचरदीवाइ-1 धूवहिँ फलेहिं विविहेहिं ।। ४२० ॥ वलिवत्तिपाई जुवारे-1 हि य सिध्दत्थपएणरुखवहिं ।। पुव्वुत्तुवयरणेहि य । रहज्ज पुज्ज सविहवेण ॥ ४२१ ॥ अर्थ-इसके अनन्तर दोहरे सफेद वस्त्रसे प्रतिमाको ढांककर अक्षत, नैवेद्य, दीप, धूप और मदनफल सहित नाना प्रकार के फलों वगैरसे तथा बलि तिल सिद्धार्थ वृक्षकेपत्र और पूर्वोक्त उपकरणों से अपनी शक्ति अनुसार पूजा करै ।। रतिजगिज्ज पुणो । तिसहिसलायपुरुसमुकहाहि ।। संघेण सयं पुज्ज। पुणो वि कुन्जा पहायमि ॥ ४२२ ।। अर्थ-फिर उस रात्रिको त्रेशठ शलाका पुरुषोंकी कथा वाताके साथ जागरण करे और फिर प्रभातको संघके साथ पूजा करे । एवं चत्तारि दिणा- 1णि जाव कुज्जा तिसंझ जिणपुज्जं ॥ तुम्मीलणपुज्ज । चउत्थरहवणं तर्ड कुज्जा ॥ ४९३ ।। अर्थ-इस प्रकार चार दिनतक तीन २ वक्त श्रीजिनेन्द्रदेवकी पूजा करे। उसके पश्चात् नेत्रोन्मीलन पूजा तथा चौथा अभिषेककरै एयं रहवणं काउण ! सत्थमग्गेण संघमज्झम्मि । ती वख्खमाणविहिणा | जिणपयपूयाइ कायन्या ॥ ४२४ ॥ 'अर्थ-इस प्रकार शास्त्र के अनुसार संघके मध्य में (प्रतिमाका) अभिषेक करके उसके पश्चात् आगे कही हुई विधिके अनुसार जि- नेन्द्र के चरणकी पूजा करनी चाहिये। गहिऊरण सिसिरकफिर- । परिणयरधवलं रयणभिंगारं ।।

. MAAAAAAA (७१) मोत्तियपवालमरगय- । सुवरणमणिखचियवरकं ॥ ४२५ ॥ मुयवृत्तकुसुमकुवलय-। रजपिजरसुरहिविमलजलभरियं ।। जिणचरण कमल पुरई । खविज तिएण धारा ॥ ४२६ ।। अर्थ-जो चन्द्रमाकी किरणों के समूह समान शुक्लवर्ण की धरने वाली है, जिसका कंठ मोती, मूगा, मरकत, सुवर्ण और रत्नोंसे जड़ा हुआहै और जिसमें शास्त्र में कहेहुए फूलों और कमलोंके मकरन्द ( पराग) से सुगंधित हुआ निर्मल जल भरा हुआहै, ऐसी रत्नझारी हाथमें लेकर श्रीजिनेंद्रके चरणकमल के सन्मुख तीन धारा क्षेपण करै। कप्पूरकंकुमायरु- । तरुक्कामिस्सेण चंदणरसेण ॥ वरवहलपरिमलामो- । थवासियासासाहेण ॥ ४२७ ॥ वासागुयग्गसंपत्त- । मयमत्तालिरावमुहरेण ॥ सुरमउडघटिजरणं | भत्तीए समलहिज्ज जिणं ॥४२८ ।। अर्थ जिसमें कपूर, केसर, अगर और तरुष्क ( एक प्रकारका सुगंध द्रव्य ) मिले हुए हैं जिसकी उत्तम बहुतसी सुगंधके प्र- मोदसे सर्व दिशा सुगंधित होरही हैं और जिसकी सुगंध से रास्ते में भौहरे गुंजार कर रहे हैं, ऐसे चंदन के रस से भक्तिपूर्वक श्री जिनेंद्रका, जिनके चरणों पर देवोंके इन्द्र मस्तक रगड़ते स्पर्शन करावै अर्थात् तिस प्रतिमा के गंधलेपन करै ।। ससिकंतखंडविमलेहिं । विमलजलसितघइसुयंधेहि ।। जिणपडिमपइव्यज्जिय-1 विसुध्दपुरणंकुरोहिं च ॥ ४२९ ॥ वरकलममसालिसंडुल-। चयहिं सुरडियदाहसयलेहि ॥ मण्यसुरासुरमहियं । पुज्जिज जिणंदपपजुयलं ।। ४३०॥ अर्थ-चंद्रकान्तमणि के खंड प्रमाण स्वच्छ,निर्मल जलसे धोये हुए अत्यंत सफेद और सुगंधित, मानो जिनप्रतिमा की प्रति- ष्ठासे उत्पन्न हुए निर्मल पुण्य के अंकुरही हैं ऐसे, अखंड और लांवे जो उत्तम कलमी धानके चावल है उनसे, मनुष्य, सुर और असुरों कर पूजित जो श्री जितेंद्र के चरण युगल हैं तिन- की पूजा करें। मालइकयंवकरणया- । रियप्पयासोयवलतिलपाहि ॥

AALAAAAAAA AAAAALALLALAASAA Adi (७५) मंदारणायचंपय- । पउमुप्पलसिंदुवारोहि ॥ १३ ॥ कणवारमल्लियाहि । कंचरणारमचकुंदकिकराएहि ॥ सुरवणजजुहीयापारिजातयजासवणटगरेहि।। ३९।। सोवएणरूवमेहिय । मुत्वादामेहि बहुवियप्पेहि ॥ जिणपयपंकयजुयलं। पुज्जिज्ज सुरिंदसयमहिलं ४३३॥ अर्थ-मालती, कदम्ब, सूर्यमुखी, अशोक, बकुल, तिलक, मन्दार, नागचम्पा, कमल, निर्गुडी, कण बीर,मल्लिका,कचनार, मचकुन्द, किंकर, कल्पवृक्ष, जुही, पारिजात, जासवन और तगर वगैरह के फूलों से तथा सोने चांदीके फूलों से और नाना प्रकार के मोतियोंकी मालाओं से देवेंद्रों कर पूजित ऐसे श्रीजिनेंद्र के दोनों चरण कमलकी पूजाकरै ।। दहिदुग्घसप्पिमिस्सहिं । कलमभत्ताह बहुप्पयारोई ॥ तेवठिविजणहि य । बहावह पक्कएणभेगाह ॥ ४३४ ॥ रौप्पसुवरणकसा इथालिणिहिएहि विविहभक्खोहि ।। पुज्जं विच्छारिज्जो । भत्तीए जिणिदपयपुर ॥४३॥ अर्थ-दही, दूध और घीसे मिलेहुए नानाप्रकार के चावलों के भानसे, शाक और व्यंजनों से तथा बहुत प्रकार के पक्वान्नौसे इस प्रकार सोने, चांदी, कांसी वगैरः के थालों में रखे हुए अनेक प्रकार के खाने योग्य पदार्थों से भक्तिपूर्वक श्रीजिनेंद्र के चरणो के आगे पूजा करें। दीवहिं णियप्पहोहाभिय- । कतेहि धूमरहिएहिं ।। मंद चलमंदाणिनः । वसेण णिच्चं अञ्चण कुज्जा ॥ ४३६ ॥ घणपडलकम्मणिवह । व्व दूरमवसारियंधयारोह ॥ जिणचरणकमलपुरठ । कुणिज्ज रयणं सुभत्तीए ।। ४३७ ॥ अर्थ-अपनी प्रभासमूह से सूर्य के समान तेजको धरनेवाले, धूमसे रहित, धीरे २ चलती हुई मन्द पवन से पूजन करनेवालों की तरह नृत्य करते हुए और मेघपटल के समान कर्मरूप अं- धकार के समूह को अपने प्रकाश से दूरकरने वाले दीपकों से जिन भगवान् के चरणकमलों के आंग रचना करै अर्थात दीप से पूजा करै। :

(७६) . " कालायरुणहचंदह । कप्पुरसिल्हारसाइदबेहिं ॥ णिप्पएणधूपवत्तिहि । परिमलापत्त्यालीहि ॥ ४३८ ।। उग्गसिहादेसियस- । गमोख्खमग्गेहि वहलधूमेहि ।। धूविज जिणिंदपाया-रविंदजुयलं सुरिंदणुयं ॥ ४३९ ।। अर्थ-काला गरु, अम्बर, कपूर और शिलारस वगैरः द्रव्योंसे बनी हुई, जिसकी सुगंध पर भ्रमर लुब्ध होरहेहैं, और जिस की ऊंची शिवा मानों स्वर्ग मोक्षका मार्ग हीदिखा रही है तथा जिसमें से बहुतसा धुआँ निकलरहा है ऐसी धूपकी बत्तीसे देवों के इन्द्रों कर पूजित जिनेंद्र के दोनों चरणकमलों को सुगंधित करे। जबीरमोयदाडिम-। कवित्थपनसनालिएरोहि ॥ हिंतालतालखज्जू- । रावणारंगचूदहि ॥४४०॥ वूईफलगिदुल आमल-यजवुविल्लाइसुरहिमिहि।। जिणपयपुर रयणं । फलेहिं कुज्जा सुपकोहि ॥ १४१ ॥ अर्थ-जम्बीर, केला, दाडिम, कपित्थ, पनस,नारियल,हिंताल, ताल, खजूर, किंदूरी, नारंगी, आम, सुपारी, तिन्दुल, आमला, जामन, विल्व इत्यादिक अनेक प्रकारके सुगंधित, मीठे और पक्के हुए फलोंसे जिनेंद्र के चरणों के आगे रचना करै। अठविमंगलाणि य । वहुविहपूजोवयरणदव्वाणि ॥ धूनदहणाइ तहा । जिणपूयत्थं विसीरिज्जइ ।।४४२॥ अर्थ-आठ प्रकारके मंगल द्रव्य और अनेक प्रकार पूजाके उप- करण रूप द्रव्य तथा धूपदान वगैरः जिन पूजा करने के वास्ते वितरण करें। एवं चलपडिमाए । उवणा भणिया थिराए य ॥ रणवर विसेसो आगर-मुद्धि कुन्जा सुराणाम्मि॥४४॥ चित्तपडलेवपरिमा-। ए दप्पणे दाविऊण पडिविवं ॥ तिलयं गऊण तर्ज- । मुहबत्थं दिज्ज पडिमाए ॥ आगरसुद्धिं च करेज्जादपणे अहवा अएणपडिमाए । पत्तवमत्तविसेसी । स विही जाणेय पुन्वो य ॥४४५ ॥ एवं चरित्तणाणं । पि कट्टिमाकट्टिमाण पडिमाणं ॥ ज कीरइ बहुमाणं । ठवणापूज्जं हि तं जाणे ॥ ३४६ ।।

( ७७) अर्थ-इसप्रकार चल प्रनिमाकी स्थापना कही गई है। स्थिर प्रतिमाकी स्थापना भी इसी प्रकार की जाती है केवल इतना वि. शेषहै कि गृहशुद्धि मुस्थानमें करें और चित्रामकी तथा वस्त्र- वा भीतपर खेचीहुई जो जिन प्रतिमाहै तिसका प्रतिविम्य दर्पण में दिखकार उसके मस्तकपर तिलक करें और उसके पश्चात वस्त्रसे तिस मतिमाको ढांपदेव । गृहशुद्धि दर्पण में कर अथवा अन्य प्रतिमासे करै केवल इतनाही भेद है अन्य नहीं बाकी सविधि वहीहै जो पहिलै कहीहै । इसीप्रकार सम्यक् चारित्र, सम्यग्ज्ञान और कृत्रिम अकृत्रिम प्रतिमाओंकी बहुत आदर पूर्वक पूजा की जाती है उसको स्थापनापूजा जाननी चा- हिये । ( इस विषयका विशेष वर्णन प्रतिष्ठातिलक आदि ग्रंथों से जानना चाहिये) जे पुव्वसमुद्दिष्ठा । ठवणापुयाए पंच आयारा ॥ चत्वारि तेसु भणिया । अवसाणे पंचमं मणिमो।।४४७ ॥ अर्थ-पहले (गाथा ३८७ में)जो स्थापनापूजाके पांच अधि- कारोंके नाम कहे गये हैं उनमें से चार अधिकारों का वर्णन तो किया गया अब अन्तमें पांचवे आधिकारका वर्णन करते हैं ।। दन्वेण य दव्वस्सय । जा पूजा जाण दवपूना सा ।। दब्बेण गंधसलिला- 1 इपुव्वभाणपण कायव्वा ॥ १४८ ॥ अर्थ-द्रव्यात और द्रव्यकी जो पूजा की जाती है उसको द्रव्य- पूजा समझना चाहिये, द्रव्यसे पूजा पूर्व कहेहुवे जल चदनादिसे करनी चाहिये। तिविहा दब्वेपूजा । सचिवाचितमिस्सभेएण ॥ पच्चख्खजिणाईणं । सचित्तपूजा जहाजोगं ॥ ४४९ ॥ अर्थ-द्रव्यकी पूजा सचित्त, आचित्त और मिश्र (सचित्ताचि- त) भेदसे तीन प्रकार है । प्रत्यक्ष जिनेंद्र वगैरः की जो पूजाहै वह सचित्त पूजा है। तेसिं च सरीराणं । दध्वसुदस्स वि अचित्तपूजा सा ।। जा पुण दोण्हं कीरइ । णायव्या मिस्सपूजा सा ॥ ४५० ।। अर्थ-तिन जिनेंद्रदेवोंके शरीरोंकी तथा द्रव्युयत (शास्त्र) की - ar RAMAALA AAAAAAAAAL BARANA - (७८) जो पूजाहै वह अचिनपूजा जाननी और जो दोनोंकी पूजा की जाती है वह मिश्रपूजा जाननी चाहिये। अह वाआगमरणोमा-माइ भेएण बहुविहं दव्वं ॥ णाऊण दव्वपूजा । कायव्वा सुत्तमग्गेण ।। ४५१ ।। अथ अथवा आगम द्रव्य, नौ आगम द्रव्य इत्यादि भेदसे अ. नेक प्रकार द्रव्यको जानकर शास्त्रमार्गके अनुसार द्रव्यपूजा करनी चाहिये। जिणजरणमाणखखवण- णागुष्पत्तिमोरग्वसंपत्ति-। णिसिहीसु खत्तपूजा । पुत्वविहाणेण कायव्वा ।। ४९२ ॥ अर्थ-जिनेंद्रकी जन्मभूमि, दीक्षाभूमि, केवल ज्ञान उत्पन्न होने की भूमि और मोक्षमाप्त होने की भूमि, इतने स्थानों में पूर्वकही हुई विधि के अनुसार (जलचंदनादिसे )पूजा करनी चाहिये इस का नाम क्षेत्रपूजाहै। गम्भावयारजम्मा- । हिसेयरिणख्खवणणाणाणिव्याणं ।। जम्मि दिणे सजादं । जिणण्हवणं तदिणे कुज्जा|४५३॥ वख्खुरससप्पिदहिखी- । रगंधजलपुण्णविविहकलसेहिं ।। णिसिजागरं च संगी । यणाडयाईहि कायव्वं ॥ ४६४ ।। रणदीसरहदिवसे- । सु तहा अरणसु उचियपव्वेसु ॥ ज कीरइ जिणमहिमा । विएणया कालपूजा सा ॥४५॥ अर्थ-जिस दिन भगवान के गर्भावतार, जन्माभिवैक, दीक्षाक ल्याण, ज्ञान कल्याण और मोक्षकल्याण हुएहो उस दिन इक्षुरस, घी, दूध, दही और गंध जलसे भरेहुए कलशों से जिनदेवको अभिषेक तथा रात्रिको भगवान के गुणोंका गान और नाटक आदि सहित जागरण करै । इसी प्रकार नन्दीश्वर पर्वके आठ- दिनों में तथा और अनेकपों में जो जिनेंद्रका अभिषेकादि किया जाताहै उसको कालपूजा कहते हैं । काऊणाणतचउ । ठ्याइगुणकित्तणं सुभचीए । जं वंदणं तियाल | कीरइ भावच्चणं तं खु ॥ ४५६ ॥ अर्थ-जिनेंद्र के अनंत दर्शन, अनंतज्ञान, अनंतसुख औ अनंत, वीर्यआदि गुणोंकी उत्तम भक्ति के साथ स्तुति करकै जो त्रिकाल AAA (७९) बन्दना कीजाती है वह निश्चयकर भाव पूजा है। पंचणमोयारोह । अहवा जावं कुणिज्ज सत्तीये ॥ अहवा जिणिंदोत्तं । वियाण भावच्च तं पि ॥ ४६७ ॥ अर्थ-अथवा पंचपरमेष्ठी के नमस्कार से अपनी शक्ति प्रमाण जपकर वा जिनेंद्रका रावन (स्तोत्र) करे, तिसको भी भावपूजा कहते हैं। पिंडत्थं च पयस्थ | रुवत्थं स्वीजयं अहवा ॥ जं झाइज्जइ माणं | भावमहं तं विणिदिई ।। १५८ ।। अर्थ-अथवा पिंडस्थ, पदरथ, रूपस्थ और रूपातीत रूपध्यानों का जो ध्यान करना है तिसका भाव पूजन कहा गया है । सियकिरणविफ्फुरत । अहमहापाडिहारिपरियारियं । झइज्जइ गियरूवं ॥ पिंडत्थं जाण तं भाणं ।। ४५९ ॥ अर्थ-अशोकक्ष, पुष्पष्टि आदि आठ महाप्रतिहार्यों से युक्त और चंद्रमाकी किरण समान प्रकाशमान ऐसा जोकेवली भ- गवानका रूपहै तिसकी निजरूप भावना करके (अपना पिंड तैसाही है ऐसा मनमें जानकरके ) जो ध्यान करना है उसको पिंडस्थ ध्यान जानना चाहिये। अहवाणाहिं च वियः। पिऊण मेरु अहोविहायम्मि। झाइज्ज अहोलोय । तिरियम्मि तरिय वीयं ।। ४६० ।। उहम्मि उ परलोए । कप्पविमाणाणि खंदपरियते ।। गेविज्जाणवी । अणुदिसं हणुपएसम्मि ॥ ४६१ ॥ विजयं च वैजयंत । जयंतमवराजियं च सव्वत्थं ॥ झाइज्ज मुहपएसे । ललाटदेसम्म सिद्धसिला ॥ ४२ ॥ तस्सुवरि सिद्धणिलयं । जयसिहरं जाण उत्तमंगम्मि । एवं जणियदेहं । झाइज्जइ त पि पिंडत्यं ।। ४१३॥ अर्थ-अथवा अपने नाभि स्थान में मेरु पर्वतकी कल्पना करके उसके नीचे अधोलोक का चिन्तवन कर, नाभि के तिधक भाग में मध्यलोक की और नरलोक से ऊपर स्कंध (कंधा) पर्यंत स्वर्गलोक के विमानोंकी भावनाकरैतथा ग्रीवामें नौ ग्रैचेयकोंकी,हनुः प्रदेशठोडी अनुदिशकी और मुखमें विजय,वैजयंतजयंत,अपरा.

(८०)
जित और सर्वार्थसिद्धि इन विमानों की भावना कर और लला.
द (कपाल ) में सिद्धशिला और तिसके ऊपर अर्थात् मस्तक
पर जगत्का शिखर अर्थात अग्रभागऐसा सिद्धस्थानको जाने
इस प्रकार जो निज देहका ध्यान करना है उसको भी. पिंडस्थ
ध्यान कहते हैं।
जं भाएई उच्चा- 1 रिजरणपरमेष्ठिमंत पयकमलं ।।
एयरुखरादि विविहं । पयत्यमाणं मुणेयच्वं ।। ४६४ ॥
अर्थ-एक अक्षरको आदि देकर अनेक प्रकार परमेष्ठीके मंत्र
का उच्चारण करके परमेष्ठी के चरणकमल का जो ध्यान किया
जाताहै उसको पदस्थध्यान जानना चाहिये।
भावार्थ-ऊं, सिद्ध, अहं अरहंत, आसिआ आउसा, अरहंतसि-
द्ध, "अरहंत सिद्ध आयरिय उबज्झाय साहू" वा "अहत्सिदा.
चार्योपाध्याय सर्व साधुभ्यो नमः" और " णमो अरहं ताणं,णमो
सिद्धाणं, णमो आयरियाणं णमो उवझायाणं, णमो लो।
सव्व साहूण" इत्यादि मंत्रों का जो ध्यान करनाहै वह पदस्थों
ध्यान है।
सुण्ण अयारपुरर्छ । झाइज्जो उढ्ढरेह विदुजुयं ॥
पावांधयारमहणं । समंतई फुरियससिभयं ॥४६५ ।।
अर्थ-अकारके आगे ऊ रेफ व विन्दु (अनुस्वार) इनसे युक्त
तथा पापरूपी अंधकारका नाशकरनेवाला और चन्द्रमाकी समान
चहुंओरसे मकाशमान ऐसाजो हकार ( अहं ) है वह ध्यान
करने योग्यहै ।।
असिमाउसासुवरणा । झायव्वाणतसत्तिपरणार्ड ॥
चउपत्तकमलमज्झे । पढमाइकमण णिसिऊण ॥ ४६६ ॥
ते चिय वर्पणा अठ्ठ-। दलपंचकमलाण मज्झदेसेसु॥
णिसिऊण सेसपरमे-1 हि अख्खरा चउसु पत्तेसु ॥ ४६७ ॥
स्यणत्तयपढमा ए । वएणा णिसिऊण सेसपत्तेसु ॥
सिरवयणकंठहियए । णाहिपएसम्मि झायव्वा ॥४६८॥
अहवा णिलाडदेसे । पढम विदियं विसुद्धदेसम्मि ॥
दाहिणदिसाइ णिसिऊ-गण सेसकमलाण झाइज्जो ॥ ४६९ ॥

ALAILAJ (८१) अर्थ-जिनकी शक्ति अनंत है ऐसे असि आ उ सा ये पांच उत्सम वर्ण चार पांखड़ीके कमलमें क्रम से स्थापन करकै अर्थात कमल के मध्यभाग कर्णिका "अ" (अरहंत ) तिसके पाहर पूर्वके पत्रपर 'सि' (सिद्ध) दक्षिणके पत्रपर 'आ'(आचार्य) पश्चिमके पत्रपर' उपाध्याय) और उत्तरकी ओरके पत्रपर 'सा' (साधु ) ऐसे क्रमस स्थापन करके तिनका ध्यान करै। और तिनही अक्षरोंको आठ पांखड़ीके कमलमें (धार पांखड़ीके कमल प्रमाण) स्थापन करकै पाकीके चार पत्रोंमें 'द' (दर्शन) ज्ञा (ज्ञान)चा (चारित्र)त(तप) ये चार वर्ण क्रमसे स्थापन करकै मस्तक, मुख, कंठ, हृदय और नाभि इन पाँच स्थानों में पाँच अष्टदल कमलका ध्यान कर अथवा पहला कमल कपालपर स्था- पन करकै पाकीके कमल मस्तक पर व तिसके दक्षिण आदिशुद्ध प्रदेशों में स्थापन करकै तिनका ध्यान करना चाहिये। अदलकमलमज्झे । झाएज्ज ह दुरेहविंदुजुयं ॥ सिरिपंचरणमोकारे- । हिं. वलइयं पत्तरेहास ।। ४७० ।। णिसिऊण णमो अरई-। ताणं पचाइमष्ठवग्गोहि ॥ भणिजण वैदिऊण यामायावीऐणतंतिजणी।४७१॥ अर्थ-आठ पांखड़ीके कमलकी कर्णिका पर-दो रेफ और एक बिंदु इनसे युक्त ऐसाह ( है ) स्थापन करके और तिस कर्णिका के बाहर पत्रोंके भीतरं वलय करकै तिस वलयमें णमोअरहंताण' इत्यादि पंच नमस्कार मंत्र वलयाकार स्थापन करै और आठ पत्रों पर क्रमसे आठवर्ग स्थापन करके तथा त्रिकोणको श्रीवाज से चेष्टित करकै तिस कमलका ध्यान करें। आयासफलिहसाणह- तणुप्पहासलिलणिहिणिवुडत ।। परसुरतिरीडमणिकिरणसमूहरंजियपयपंदुरुहो।।४७२॥ वरष्ठपाडिहारेहिं । परिउडो समवसरणमझगडे ॥ परमप्पाणंतचठ-1 याणि पवणमगहो ॥ ४७३ ॥ परिस उकिय परि-। वारवान्जिर्ड खीरजलहिमज्झेव ॥ घरखारवरणकंदुः। स्यकारिणयामझदेसहो ।। ४७४।।. खीस्वहिसीललधारा; । 'हिसेयधवलीकयंगसव्वंगो ॥ - . 1 AAAAALAALALA14444 - AALAALLAAN ( ८२) जंझाझज्जइ एवं 1-रूवत्थं जाण ते झाणं ॥ ४७५ ॥ अर्थ-जोआकाश तथा स्फटिकमणिकी समान स्वच्छ और नि- मल अपनी देहकी कान्तिरूपी समुद्र में निमग्न तथानम्रीभूतहुए जो मनुष्य व वदे तिनके मुकुटोंके रत्नोंकी किरणोंसे जिसके चरण कमल चित्रविचित्र रंगके दिखाईदेते हैं, जो उत्तम आठ प्राति हार्योंसे घेष्टित,समवसरणके मध्यमै प्राप्त आकाशमें स्थित तथा परि- वार करके रहित है और उत्तमशुक्ल वर्णके कमलकी कर्णिका पर विराजमानहुआऐसामालूमहोताहै मानोंक्षीरसमुद्र के मध्यमें स्थित तथा क्षीरसमुद्रकी जलधाराके अभिषेकसे जिसकासर्व अंग धवल (शुक्लवर्ण) होगयाहै ऐसा अनंत चतुष्टयसे युक्त जो उत्कृष्ट परमात्मा है तिसका जो इस प्रकार ध्यान करनाहै उसको रूपस्थ ध्यान जानना चाहिये। वएणरसगंधफासे-1 हिं वज्जिऊ णाणदसणसरूऊँ-10 झाइज्जइ एवं जं । तं भाणं रूवरहियेत्ति ॥ ७६ ॥ अहवा. आगमणोआ-। गमाइमेएहि सुत्तमग्गेण ॥ पाऊण :भावपूजा । कायव्वा देसविरएहि ॥ ४७७॥ अर्थ-वर्ण (रस), रस, गंध और स्पर्श, इनसे रहित और ज्ञान- दर्शनस्वरूप अर्थात रूपरहित ऐसे आत्माके शुद्ध स्वरूपका जो चिन्तवन करना यह रूपातीत ध्यानह । अथवा-आगम नोआगम आदिके भेदसे अनेक प्रकारकी भाव पूजा शास्त्र के आधारसे जान कर देशव्रती श्रावकोंको करनी चाहिये। एसा छन्विहपूजा । णिचं धम्माणुरायरत्तेहि ॥ जहजोग्गं कायव्वा । सव्वेहिं देसविरएहि ॥ ४७८ ॥ अर्थ-यह छः प्रकारकी पूजा धर्मके विषय अनुराग रखने वाले समस्त देशवती श्रावकोंको नित्य विधिपूर्वक करनी चाहिये । एयारसंगधारी । जीहसहस्सेण मुरवारदो वि ॥ पूजाफलं ण सको । णिस्सेस वरिण जमा ।। ४७९ ।। तमा ई णियसत्तीए । थोयवयणेण किं पि वोच्छामि।। धम्माणुरायरत्तो । भवियजणो होइजे सव्वो ॥ ४८०.. अर्थ-ग्यारह अङ्गके जानने वाले मुनि तथा देवोंके इन्द्र भी हजार TWITRITI -- AN - N । - - (३) जितासे पूजाके फलको पूरा वर्णन करनेको समर्थ नहीं हैं । में अपनी शक्तिप्रमाण थोड़े वचनों में कुछ कहता हूँ ( तिसको सुन कर) समस्त भव्यजीव धर्मके विषय प्रीति करने वाले होवें।. कुंथुभरिदलमेत्ते । जिणभवणे जो ठवेइ जिणपडिम ॥ सरिसवमेत्तं पि लहइ । सो णरो तित्ययरं पुरणं ॥ १८१ ॥ अर्थ-जो मनुष्य कुन्थुम्भरीके पत्र परायर जिनमंदिर बनाकर उसमें सरसोंके घरावरभी जिनप्रतिमा स्थापन करता है वह तीर्थ- कर पदके पास होने योग्य पुण्य उपार्जन करता है। जे पुण जिणंदभवणं । समुरणयं परिहितोरणसमग्गं ।। रिणम्मावइ तस्स फलं । को सका परिण सयलं ॥ ४४२ ॥ अर्थ-फिर जो प्राकार (चहारदीवारी ) तोरण आदिसे पूर्ण और ऊँचा ऐसा जिनमंदिर बनाताहै तिसका पूरा फल वर्णन करने के लिये कौन समर्थ होसकता है। *जळहाराणिरुखवणे- । ण पावलसोहणं इन्वे ॥ णियमण चंदणलेवेण । णरो जायइ सोहग्गसंपएणो॥४.३॥ अर्थ-पूजाके समय जलधाराके छोड़नेसे पापका मैल धोया जाताहै और चंदनका लेपन करनेसे पूजनकरनेवाला भाग्यवान् होताह-ऐसा नियम जानना । जायइ अख्खयणिहिरय-सामि अख्खएहि अख्खोहो ॥ प्रवीणलद्धिजुतो । अख्खयसोख्खं च पावेई ॥४८४i अर्थ-अक्षतसे पूजाकरनेवाला ९निधि और १४रत्नों का स्वामी होता है उसको अक्षय आनन्द मिलता है अर्थात उसके आनन्दमें कभी भंग नहीं पड़ता है और वह अक्षीणलब्धि पाकर मोक्षपदी प्राप्त करताहै। कुसुमीह कुसेसयवतण- । तरुणीजणणयणकुसुमवरमाला- ॥ वलयेणच्चियदेहो । जायइ कुमाउहो चेव ।।-४८५ ॥.. अर्थ-पुष्पसे पूजाकरनेवाला मनुष्य, कमलकी समान सुंदर मुख- वाली स्त्रियोंके नेत्ररूपी पुष्पमालासे जिसकीदेह पूजीगईहै अर्थात् तरुण त्रियां जिसको आदरकी राष्टसे देखती है ऐसाकाम- देव होताहै। 4 - 4 WAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA (४४) --- जायइ णिविज्जदाणे । ण सचिगो कवितेयसंपणो । लावएणजलाहिवेला- । तरंगसंपावियसरी रो॥४८६ ॥ अर्थ-नैवेद्य अर्पण करने वाला मनुष्य, शक्तिमान, कांतिमान, तेजस्वी और सौन्दर्य रूपी समुद्रकी तरंगोंसे जिसका अंग भीज गयाहै ऐसा अर्थात् अतिसुंदर होताहै। दीवहिं दीवियासे- संजीवदवाइतच्चस भावो ॥ सम्भावजणियकेवल-1 पईवतेणे होइणरो ॥ ४८७ ॥ अर्थ-दीपसे पूजाकरने वाला मनुष्य, उत्तम भावों के योगसे उत्पन्नहुआ जो केवलज्ञानरूपी सूर्य निसके तेजसे समस्त जीवादि तत्त्वोंके प्रकाश करने वाला अर्थात् केवलज्ञानीहोता है। धूरेण सिसिरयरधव- । लकित्तिधवलियजयत्तई पुरसों । जायइ फलहि संप । त्तपरमानव्याणसोख्खफलो ॥ ४५८॥ अर्थ-धूपसे पूजा करनेसे मनुष्य, चन्द्रमाकी किरण समान निर्मल कीर्तसे स्वच्छ किया है तीन जगत जिसने अर्थात जिसकी पुण्य कीर्ति तीन जगतमें फैल रहीहै ऐसा होता है और फलकर पूजा करनेसे परम निर्वाण सौख्य रूपी फलका प्राप्त करनेवाला अर्थात् मुक्त होता है। घंटाहि घंटासदा- । उलेस पउरच्छराणमझम्मि । संकीडइ सुरसंघा- । यसैविर्ड वरविमाणेमु ॥४८९॥ अर्थ-जिन मंदिर में घंटा अर्पण करनेवाला मनुष्य, घंटोंके शब्द से व्यास जो स्वर्गोंके विमान तिनमें देवोंके समूहसे सेवा किया गया अर्थात् इन्द्र होकर बहुतसी अप्सराओंके मध्यमें क्रीड़ा करता है। छत्तेहि एयछत्तं । मुंजइ पुहवी सवचपरिहीणो ॥ चामरदाणेण तहा । विज्जिज्जइ चमराणिवहहि ॥ ४९०॥ अर्थ-छन अर्पण करनेसे मनुष्य (अन्यजन्ममें) शत्रु रहित राजा होकर पृथिवीका एकछत्र राज्य भोग करताहै और.चमरके दान करनेसे चमरोंसे सेवा कियाजाताहै अर्थात् राजा होताहै। अहिसेयफलेण णरो । अहिसिंचिज्जइ सुदंसणस्सुवरि ।। खीरोयजलेण सुरि । दप्पमुहबेहि भत्तीए ॥ १९१ ॥ 1 . .

BARALLA (६४) अर्थ-जिनंद्रका अभिषेक करनेके फलसे मनुष्य (अन्यजन्ममें) सुदर्शन मेरुपर सुरेन्द्र वगैरा देवोंसे भक्तिपूर्वक क्षीर समुद्रके जल से अभिषेक किया जाताहै अर्थात तीर्थकर होताहै। विजयपडाएहि णरो । संगाममुहेसु विजइ उ होइ ।। अखंडविजयणाहो। णिपडिवक्खो जसस्सी य ॥ ४९२ ॥ अध-श्री जिनमंदिर में विजयपताका अर्पण करने से मनुष्य संग्राम में विजय प्राप्त करने वाला होता है और षटखंड का विजय करने वाला, शत्ररहित व यशस्वी ऐसा राजा अर्थात चक्रवर्ती होता है। किं जंपिएण वहुणा। तास वि लोएस किंपि जं सोरुवं ।। पूजाफलेण सवं । पाविज्जइ णत्यि संदेहो ॥ ४९३ ॥ अर्थ-बहुत कहनेसे क्याप्रयोजन ? तीनलोकमें जितना कुछभी सुखहै वह सपाजनपूजाके फलसे प्राप्तहोताहै, इसमें सन्देह नहीं है अरगुपालिऊण एवं । सावयधम्म तउँवसाणम्मि ।। सल्लहणं च विहिणा | काऊण 'समाहिणा काल ॥ १९ ॥ सोहम्माइसु जायइ । कप्पविमाणेसु अञ्चयंतेमु ॥ उवायागहे कोमल । सुयधसिलसंपुटस्संते ॥४९॥ अर्थ-इसप्रकार विकधर्म को पालन करके, अन्त में विधि- पूर्वक सल्लेखना करके शांतचित्त से देहका त्याग करने वाला श्रावक सौधर्म आदि अच्युत स्वर्गपर्यंत किसी एक स्वर्ग विमान में जाकर वहांपर जो उपपाद गृह है तिसमें कोमल व सुगंध- शिला के सम्पुट में जन्मलेता है। अंतोमुहुँत्तकाले । ण तर्ड पज्जत्ति समाणेइ ॥ दिव्यामलदेहधरो । जायइ णवजुब्वणो चेव ॥ १९६ ॥ अर्थ-जन्मलेने के पश्चात् अन्तर्मुहूर्तकाल में (अहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा और मन इन छहों) पर्याप्ति को प्राप्त होकर सुन्दर पवित्र देहका धरने पाला और नवयौवनवान् (जवान) होजाता है। समचउरसंठाणो । रसाइधाउहि वज्जियसरीरो ।। दिणयरसहस्सतर्ड । णवकुवलयसुरहिणिस्सासो ॥ ४९७ ॥ - न २ (८६) अर्थ-तिस देवका शरीर समचतुर संस्थान को लिये हुए होता है और रस, रुधिर, मांसादिक सप्तधातु से रहित होता है तथा वह देव हजारों स्याँके तेजप्रमाण तेजस्वी और नवीन कमलों की गंधप्रमाण सुगंधित सांसका लेनेवाला होता है। पडिवुझिजण सुत्तु- । हिउव्व संखाइमहुरसदेहिं ।। दळूण सुरविभूई । भियहियर्ड पलोएइ ॥ ४९८ ॥ अर्थ-(पश्चात् वह देव वहांपर) शंखवगैरः के मधुर शब्दों से सोकर उठेहुए की तरह जागकर, देवलोक की विभूतिको देख- कर चकितचित होकर चारों तरफ देखता है। कि सुमिणदसणमिणं ।। ण, वेति जा चिठए वियप्पेण ॥ आयति तरूसणं चिय । थुइमुहला अयाररख्खाई ।। ४९९ । अर्थ-और क्या यह मुझको स्वम दिखाई देता है ? वा स्वम नहीं है अर्थात् वास्तव में ही ऐसा है, इसप्रकार विकल्प करता हुआ तिष्ठता है, इतने ही में उसीवक्त उस विमान के रक्षक वगैरः देव उसकी स्तुति करते हुए आते हैं। जयजीवणंदवद्धा-1 इचारुसदेहि सोयरम्मोहिं ।। अच्छरसयाउ वितई । कुणति चाइणि विविहाणि ॥ १० ॥ अर्थ-तुम जयवंत प्रवर्ती, जीवन्तरहो, आनंद तथा वृद्धिको प्राप्त होवो इत्यादि कानों को प्यारे लगने वाले सुन्दर शब्दों से सैकडों अप्सराएं भी अनेक प्रकारसे तिसको आनंदित करती हैं। एवं थुणिज्जमायो । सहसा णाऊण उबहिणाणेण ।। गंतूण रहाणगेह । उठणवाविम्हि रहाऊण ॥ ५०१॥ आरहणगिहम्मि त । सोलहसाहूसणं च गहिजण ॥ पूजोवयरणसहिउँ । गंतूण जिणालयं सहसा ।। ५०२ ॥ वरवज्जविविहमंगल- । खेहि गंधख्खयाइदञ्चोई ॥ महिजण जिएवरिंदीथुतसहस्सेहिथुखिऊण ।। ९०३ ॥ गंतष समारोहं । अणेयसुरसंकुलं परमरम्मं ।। सिहासणस्स उवरि । चिटइ देवहिं थुवंसो ॥ ९०४ ।। उस्सियसियायवत्तो । सियचामरधूवमाणसञ्चंगो ॥ पउरच्छराहि कीडइ । दिवगुणप्पहावेण ॥ ५० ॥ अर्थ-इसप्रकार देव, देवांगमाओंसे स्तुति किये जानेपर यह २ 4 - - - in (८७) देव शीघ्रही अवधिज्ञान से अपना सब वृत्तान्त जानकर, स्नान- गृह में जाकर यहां स्नान वापिका (बावड़ी) में स्नान करता है और वहां से आभरणगृह में जाकर सोलह प्रकार के आभूषण (गहने) धारण करनेके पश्चात् पूजाके योग्य उपकरण लेकर शीघ्रता के साथ श्रीजिनमन्दिर को जाता है और वहां पर उत्तम वादिनों ( पाजे ) व नाना प्रकार के मंगल शब्दोंके साथ गंध अक्षतादि द्रव्यासे श्रीजिनेंद्रका पूजन करने और हजारों स्तोत्रों से भगवानकी स्तुति करने के पश्चात्, अनेक देवोंसे भरपूर और परमरमणीक ऐसाजो सभागृह है तिसमें प्रवेश करके देवों से स्तुतिकिया जाता हुआ सिंहासनपर बैठता है। तिससमय सफेद छन उसके मस्तकपर विराजताहै और समस्त अंगपर सफेद चमर दुलते हैं । और फिर देव वहांपर बहुतसी 'अप्सराओंसे क्रीडाकरता है। और अपने दिव्य अणिमाआदि अष्ट गुणोंके प्रभावसे ॥ दीवसु सायरेसु य । सुरसरितीएसु सेलसिहरेसु ॥ अखलियगमणागमणो । देवुज्जाणाइसु रमेई ।। १०६ ॥ अर्थ-द्वीपों, समुद्रों, गंगाआदिनदियोंके तटों, पर्वतोंके शिखरों और नन्दनयन आदि उद्यानों के विष, गमनागमनका प्रतिथंघ(रोक) न होनेसे ( यथेच्छ) क्रीडा करताहै । और आसाढकत्तिए फ-1 गुणे यदीसरहदिवसेसु ।। विविहं करेइ महिम । गंदीसरचेइयागहेसु ॥४०॥ पंचसु मेस्सु तहां । विमाणाजणचेइएसु विविहेसु।। पंचसु कल्लाणेसु य । करेइ पुज्जं बहुवियप्पी।५०८।। इन्चाइवहुविणोए । हि तत्थ वि णेऊण सगाई ।। तत्तो उब्वइ समाणो । चक्कहराइमु जाएइ।।५०९॥ अर्थ-आषाढ, कार्तिक और फाल्गुन इनतीन महीनों के विर्षे नन्दीश्वर पर्वके आठ दिनों में नन्दीश्वरबीपके चैत्यालयोंमे जाकर अनेक प्रकारकी पूजाकरताहै और इसीप्रकारके पंचमेरु,अनेकप्रकार विमानोंके जिनविम्यतथा,जिनेश्वरके पंचनकल्याणक इनठिकानॉम जाकर अनेक प्रकारकी पूजाकरता है । इन ( अनेक प्रकारकी पुण्य, ।

MARALA ॥ 1 (८८) कारक व आनंद कारक क्रियाओं) को आदि देकर बहुत आनंद के साथ स्वर्गमें अपनी स्थिति को पूरी करके वहांसे चयकर मध्य लोकमें आकर चक्रवत आदि पदवीधारक पुरुषोमें जन्म लेता है अर्थात चक्रवर्त आदि राजपीका धारक होता है। भोत्तण मणुयसोख्ख । पस्सिय वेरग्गकारण किंचि ।। मोत्तूण रायलच्छी। तणं व गहिऊण चारित्वं ।। ५१० । काउण तवं घोरं । लद्धीर्ड . तप्फलेण लध्धूण ॥ अगुणीसरियं तं च किंग सिझं तवेण जए ॥५११॥ अर्थ-(इसके पश्चात वह महात्मा ) मनुष्यलोकके सुखोंको भो- गकर किंचित् वैराग्यका कारण पाकर राज्यलक्ष्मीको तृणसमान त्यागकर जिन दीक्षाधारण करकै तीव्रतपश्चरण करताहै और तिस तपके फलसे ऋद्धियोंको पाकर अणिमा आदि अष्टगुणोंके ऐ. श्वर्यको प्राप्तहोताहै। वहकौनसीवस्तु है जो तपसे सिद्धनहींहोती? अर्थात् ऐसा कोई भी कठिनकार्य नहीं है जो तपसे सिद्धनहोसकै बुद्धी तवो वि लद्धी । विउच्चणलद्धी. तहेव उसहीया ॥ रसवलअख्खाणा विषय । रिद्धी सत्त पएणत्ता ५१२॥ अर्थ-बुद्धिऋद्धि, तपऋद्धि, विक्रिया ऋद्धि, ओषधि ऋद्धि, रस ऋद्धि घल ऋद्धि और अक्षीणमहानस ऋद्धि, ऐसे सातपकार की ऋद्धि कहींगई हैं। अणिमा महिमा लधिमा । पगम्मि वसित कामरूवित्तं ॥ ईसत्तपावणं तह । अष्ठगुणा वरिणया समये ॥ ५१३ ॥ अर्थ-आणमा ( सूक्ष्महोना ) महिमा ( बड़ाहोना) लधिमा हलकाहोना),माकाम्य, वशित्व (वंशकरना), कामरूपित्व( इच्छा के अनुसाररूप बनालेना), ईशत्व (प्रभुपणामिलना), और प्राप्य- त्व (जोचाहै मासकरलेना) ये, आठगुणशास्त्र में वर्णन कियेगये हैं। एवं काऊणं तव । पासुंयठाणम्मि तहेय गंतूण ।। पालियकं वैधित्ता। काउस्सग्गेण वा ठिच्चा ॥ ५१४॥ जइ खाइयसाईटी । पुवं खवियाउ सत्तपयडीउ । सुरणिरयातिरख्खाऊ । तमि भवे मिडियं चेव ।। ५१९ ॥ अह वेदगसाइट्टी । पमत्तठाणम्मि अप्पमत्ते वा॥ सरिऊण धम्ममाणं । सत्तात्र णिवइ पयडीउ ॥ ५१६ ॥ F , LAAAA MLALLAALAAA ( ८९ ) अर्थ-इसप्रकार (वह मुनि) तपश्चरणकरकै तथा प्रासुकस्थानमें जा- कर पकासन बांधकर या कायोत्सर्गरूपसे स्थितहोकर,यदि पहले सात प्रकृतियोंका क्षय करकै क्षायक सम्यग्दृष्टि होगया हो तो देव नारक औरतिच इन तीनआयुका उसी भवमें नाश करताहै और जो वेदक सम्पदृष्टिहोतो ममत्त वा अप्रमत्त गुण स्थान में धर्म ध्यानका आश्रय करकै सातही मकृतियों का नाशकरताहै । और काऊण पमत्तेयर-1 परियं तसयाणि खवइ पाउग्गो ।। होऊण अप्पमत्ता । विसोहि पाऊरिऊण खणं ।।५१७॥ करणं अधापवत्वं । पढमं पडिवज्जिऊण सुकं च ॥ जायइ अपुचकरणो। कसायखयणुज्जर्ज वीरो॥ ५१८ ॥ एक ठिदिखंड । पाइ अनोमुहुत्तकालेण ॥ ठिदिखडपडणकाले । अणुभागसयाणि पाई ॥ ५१९ ॥ गच्छइ विसुद्धमाणो । पडिसमयमणंतगुण विसोहीए । लदीए अणियट्टिगुणं । तत्थ वि सोलह पयडीइ ५२० ॥ अर्थ-अप्रमत्त गुणस्यान के चढने पर्यंत प्रायोग्यलब्धि के पल से नसकाय वगैरः कर्म प्रकृतियों का नाश करके अप्रमत्तगुणस्थान वती होता है । उसके पश्चात् अत्यंत शुद्धता को माप्त होकर वह अप्रमत्त साधु एक क्षण में अधःप्रवृत्तकरण नाम का पहला करण और प्रथम शुक्ल ध्यान ( पृथक्त्ववितर्कविचार )को अंगी- कार करके अपूर्व करणको प्राप्त होता है । और कषायोंके नाश करने में उद्यमी हुवा वह वीर अन्तर्मुहूर्तकाल में स्थिति बांधके एक एक बडका नाश करता है। स्थितिबंध के एक खडके पतन (नाश) होते समय अनुभाग पंधके सैकड़ों खंड पतनको प्राप्त होजाते हैं। इस प्रकार प्रतिसमय अनंतगुणा विशुद्ध होता हुआ विशुद्धलब्धिके पलसे वह साधु अनिवृत्त गुणस्थान को प्राप्त होता है और वहांपर सोलह प्रकृतियों का नाश करता है। अटकसाये च तई । णपुंसयं तहेव इत्थीवेयं च ।। छएणोकसायपुरिस । कमेण कोहं पि सछुहई ॥ ५२१ ॥ कोई माणं माया । एतं पि छुहइ लोहम्मि । वायरलोहं पि त । कमेण पिष्टवइ तत्थेव ॥ ५२२ ॥ . १२ AAAAA (९०) अणुलोहं वेयंतो । संजायइ सुहुमसंपरायो सा ।। खविऊण सुहुमलाई । खीणकसाउं तई होई ॥ ५२३ ॥ तत्थेव सुक्कझाणीविदियं पडिवज्जिऊण तो तेण ।। णिदापयलार्ड दो । चरमसमयम्मि पाडेई ।। ५२४ ।। गाणंतरायदसयं । दसणचत्तारि चरमसमयम्मि ।। हणिऊण तख्खणेचिय । सजोगकेवलिजियो होइ ।। ५२५।। अर्थ-इसके पश्चात (प्रत्याख्यान व अप्रत्याख्यान रूप क्रोध, मान, माया, लोभके भेदसे) आठ कपायों का नाश करता है और तैसे ही नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, छै नोकषाय (हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा) और पुरुषवेद इनका क्रमसे नाश करता है और क्रोधका भी नाश करता है । तथा सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान में क्रोध,मान,माया और लोभमें से बादर लोभ इनका पूर्ण नाश करकै सूक्ष्म लोभका अनुभव करने वाला वह साधु सूक्ष्म सांपराय गुणस्थानी होता है । इसके अनन्तर सूक्ष्मलोभ को भी नाश करकै क्षीणकषाय नाम का जो बारहवां गुणस्थान है तिसको प्राप्तहोता है और वहाँपर दूसरे शुक्ल ध्यान (एकत्व वितर्कविचार ) को प्राप्त होकर तिसके योगसे निद्रा और प्रचला इन दो काँका अन्तसमयमें नाश करता है और इसीप्रकार ज्ञानावरणकी पांच व अन्तरायकर्म की पांच और दर्शना वरणकमकी चार प्रकृति वारहवें गुणस्थान के अन्त समय में नाशकरकै तत्काल वह संयोगकेवली जिन अर्थात् १३ वां गुणस्थानवी होताहै। तो सो तियालगोयर-। अणंतगुणपज्जयपयत्यं ।। जाणइ पस्सइ जुगवं ।णवकेवललद्धिसंपण्णो ॥ ५२६ ॥ अर्थ-तब ९ प्रकारकी केवललब्धिका स्वामी हुआ वह केवली जिन तीन कालके अनन्त पर्यायों सहित समस्त द्रव्योंको युगपत्र- जानता और देखता है। दाणे लाहे भोए । परिभोए वीरिए य सम्मत्ते ।। णवकेवललद्धी दसणणाणे चरित्तेय ।। ५२७ ॥ अर्थ-दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य,सम्यक्त्वदर्शन,ज्ञान, और चरित्रये ९ लब्धि होती हैं।

MAR ( ९१ ) उक्कसं च जहएणं । पज्जायं विहरिऊण सिंज्झई ।। सो अक्कियसमुग्घार्ड । जस्साउसमाणि कम्माणि ॥ ५२८ ॥ जस्स ण हुअाउसरिसा । णि णामगोयाणि वेयणीयं च ॥ सो कुणदि समुग्घायं । णियमेण जिणो ण संदेहो ॥ ५२९ ॥ अर्थ-जिनके आयु कर्मकी स्थिति के बराबर अन्य कर्मों की स्थिति वाकी है वह केवली जिन समुद्घात किये विनाही उत्कृष्ट व जघन्य पर्याय पूर्ण करकै सिद्ध होते है और जिनके नाम, गोत्र और वेदनीय कर्मकी स्थिति आयु कर्मकी स्थिति के बराबर नहीं है अर्थात अधिकहै वह केवली जिन नियम से समुद्घात करते इसमें सन्देह नहीं है। छम्मासाउगसेसे । उप्पएणं जस्स केवलं गाणं ।। सो कुणइ समुग्घायं । इदरो पुण होइ वा भणिजो ॥ ५३० ।। अर्थ-जिसके छामहीने की आयु पाकी रहने पर केवल ज्ञान उत्पन्न होताहै वह केवली समुद्धात करताहै और इसके सिवाय अन्यकेवली समुद्धात करते भी हैं और नहीं भी करते है । कुछ- नियम नहीं ऐसा कहाहै। अंसोमुहुत्तसेसाउगम्भि । दंड कवाडपयरं च ॥ जयपूरणमथ कवाड । दंड रिणयतणुपमाणं च।। १३१ ॥ अर्थ जव आयुकर्म अन्तमहूर्त मात्र बाकी रहता है (और अन्य गोत्र आदिकर्मों की स्थिति अधिक रहती है )तव (तिन गोत्र आदिकर्मों की स्थिति आयु कर्मके घराबर करने के लिये समुद्धात करनेवाला केवली अपनी आत्माके प्रदेश १४ रज्जु ऊंचे दंडा- कार करताहै, दूसरे समयमें कपाटके आकार तीसरे समयमें प्रता. राकार और चौथे समय में लोकपूरण (समस्त लोकप्रदेशों में व्यापना) करताहै पांचवे समयमें पुनःप्रताराकार छठे समय में कपाटके आकार सातवें में दंडाकार और आठवें समय में अपनी देह प्रमाण करता है। एवं पएसपसरण- । संवरणं कुणइ अठसमयहि ।। होहिति जोयजरमें | अघाइकम्माणि सरिसाणि ॥ ५३२ ॥ अर्थ-इस प्रकार आठ समयमें अपनी आत्माके प्रदेशोंको वि- -- LAAAL -- ( ९२) स्ताररूप व संकोचरूप करताहै और तेरहवें गुणस्थान के अन्त मेवाकी अघातियाकर्मों की स्थिति आयु कर्मके यरावर होजातीहै। वायरमणवचजोगे । रुंभइ थो थूलकायोगेण ॥ मुहुमेण तं पि रुंभइ । सुहुमे मणवयणजोगे या। ५३३ ॥ ता सुहुमकायजोगे । वेतो झायए तइय सुकं ॥ सभित्ता तं पि पुणो । अजोगकेवलिजिणो होइ ।। ५३४ ॥ अर्थ-इसके पश्चात् स्थूल काययोगसे स्थूल मनोयोग और स्थूल वचनयोगका निरोध करता है और सूक्ष्मकाययोगसे स्थूल काय- योग व सूक्ष्म मन वचन योगोंका निरोध करताहौतिस समय सूक्ष्म काययोगका अनुभव करने वाला वह केवली तीसरे शुक्ल ध्यानका ध्यान करता है और तिसके योगसे सूक्ष्म काययोगका भी निरोध करके अयोग केवली अर्थात् १४ वां गुणस्थानवती होजाताहै। वावत्तरिपयडी । चउत्थमुक्केण तत्थ घाए॥ दुचरमसमयम्मि तर्ज । 'तेरस चरमाम्म णिष्ठवइ ।। ५३५ ॥ तोतम्मि चेव समये । लोयगो उद्गमणसभाई ॥ सचिहइ असरीरो । पवरहगुणमई णिच्च ॥ ५३६ ॥ अर्थ-तिस चौदहवें गुणस्थान में चौथे शुक्लध्यान के योग से पहले समयमें ७३ वहत्तर कर्म प्रकृतियों का नाश करता है और दूसरे समयमें बाकीकी १३ तेरह प्रकृतियों का नाश करता है। फिर उसी अन्तिम सनयमें ऊर्ध्वगमन स्वभाव के कारण लोक के अग्रभागमें देहरहित और उत्कृष्ट आठ गुणोंसे युक्त होकर हमेशाके लिये निवास करता है । सम्मत्तणाणदसण-1 वीरियमुहमं तहेव' अवगहणं ॥ . अगुरुलहुमव्वाबाहं । सिद्धाणं वरिणया गुण दे ॥५२७ ।। अर्थ-सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहन, अगुरु- लघुत्व और अव्यावाधव, ये सिद्धोंके आठ गुण वर्णन कियेगयेहैं। मोहखखयेण सम्म । केवलणाण हणेइ अरणाणं ॥ केवलदसण दसण । अणंतवीरियं चांतरायेण ।। ५३८ ॥ मुहुमं च णामकम्मं । आऊहणणेण हवइ अवगहणं ।। गोयं च.अगुरुलहुयं । अव्वावाहं च वेयणीय च ।। ५१९ ॥ । , AAAA AAAAA { ९१) अर्थ-मोहनीय कर्मके क्षय होनेसे सम्यक्त्व नामका गुण, ज्ञाना. वरणीयके क्षयसे केवलज्ञान, दर्शनावरणीय के क्षयसे दर्शन, अन्तरायके नाशसे अनन्तवीर्य, नामकर्मके नाशसे सूक्ष्मत्वगुण, आयुकर्म के नाश से अवगाहनागुण गोत्र कर्मके क्षयसे अगुरु लघु- स्वनामका गुण और वेदनीय कर्मका अभाव होनेसे अव्यावाधत्व नामका गुण प्रगट होता है । (निश्चयनय से सिद्धात्मा अनंत. गुणस्वरूप है)। जं कि पि सोख्खसारं । तिस्सु वि लोयसु मणुयदेवाणं ॥ समणंतगुणं पण एय-। समयसिद्धागुभयसोख्खसमं ॥५४०॥ अर्थ-तीन लोकमें मनुष्य और देवोंको जितना कुछभी उत्तम सुखई उससे अनंतगुणा सुखभी एक समय में अनुभव किये हुए सिदों के सुखकी परावरी नहीं कर सकताह । सिइइ तइयम्मि भवे । पंचमए को वि सत्तमहमए । भुजिवि सुरमणयमुहं । पावेइ कमेण सिद्धपयं ॥ ५४१ ।। अर्थ-(उत्तमरीतिसे श्रावकाचार को पालने वाला गृहस्थ ) ती- सरे भवमें मुक्तिको प्राप्त होता है और कोई २ देवलोक और मष्नुयलोकके मुखौंको क्रमसे भोगकर पांचवें, सातवें, या आठवें जन्ममें सिद्ध पदको प्राप्त होता है। आसी ससमय परसम- । यविद् सिरिकुंदकुंदसंनाणे ॥ भन्बयणकुमुयवणसिसि-1 रयरो सिरिणाद णामेण ॥ ५४२ ॥ अर्थ-श्री कुन्द कुन्दस्वामीकी आम्नाय में श्रीनन्दानामधारक आचार्य अपने मत और परमतके शास्त्रोंका जानने वाला और भव्य- जनरूप कमलोंके वनको चंद्रमाके समान प्रफुल्लित करनेवाला हुआ। कित्ती जस्सेंदुमुन्मा सयलभुवणमझे जहेत्थं भमित्ता। णिञ्च सा सज्जणाणं हिययवयणसोए णिवासं करेइ ।। जो सिद्धतंबुरासिं सुणयतरणमासेज्ज लीलावतिएणो । वएणड को समत्यो सयलगुणगणं सेवियतो वि लाऐ। ५४३ ॥ अर्थ-जिसकी चन्द्रमासमान निर्मलकीर्ति सर्वजगत् में भले प्रकार फैलकर सज्जन पुरुषों के हृदय पचन और कानों में सदा निवास करती थी-और जो उत्तम नयरूपी नौका में बैठकर सिद्धांतरूपी USAA14441 (९४) समुद्रको सहजही तरता था ऐसे उस श्रीनन्दी आचार्य के स' कल गुणों को वर्णन करने को कोई न समर्थ होसकताहै ? अर्थात् कोई भी समर्थ नहीं है। सिस्सो तस्स जिणिंदसासणार्ड सिद्धंतपारंगई। खतीसहवलाहवाइदसहाधम्मस्मि णिचोजर्छ । पुराणेंदुज्जलभित्तिपूरियजई चारित्तलच्छीहरो । सजाई णयणंदिणाम मुणिणो भव्बासयाणंदर्ज।। ५४४ ॥ अर्थ-उस श्रीनन्दी मुनिका शिष्य नयनन्दिछुवा जो जैन शास्त्रों में रत और सिद्धान्त का पारगामी था तथा क्षमा, मार्दव आर्जच आदि दशधर्म के पालने में सदा उद्यमवान् रहताथा और ऐसी चारित्ररूपी लक्ष्मीका धारक था जिसकी निर्मलकीर्ति पूर्णमासी के चन्द्रमा समान जगत्में फैली हुयी और जो भव्यजीवोंके चित्तको आनन्द का देनेवाला था। सिस्सो तस्स जिणागम- । जलणिहिवेलातरंगधुयमाणो । सजाई सयलजए- । विख्खा रेमिचंदुत्ति ॥ ५४५ ॥ तस्स पसारण मए । आयरियपरंपरागयं एयं ।। वच्छलायररइयं । भवियाणमुवासयन्झयणं ॥ ५४६ ॥ अर्थ-उस नयनन्दी का शिष्य नेमिचंद्र हुवा जो जिनागम रूपी समुद्रकी लहरोंसे धूयमान था और सर्व जगत्में विख्यात था उस नेमिचंद्रके प्रसादसे मैंने यह आचार्य परम्परासे चला आया जो उपासकाध्ययनशास्त्र, तिसको प्रेम और आदर से भव्यजीवों के लिये रचाहै। जं कि पि एत्य भणियं । अयाणमाणेण पवयणविरुध्दं ॥ खमिऊण पचयणागण । सेहत्ता तं पयासंतु ॥ ५४७ ।। अर्थ-इस धमें अज्ञानभावसे यदि मुझसे कुछ आगमके विरुद्ध कथन किया गया हो तो उसके लिये आगमके जानने वाले मुझ पर क्षमाकरें और शुद्ध करके प्रकाशित करें। छच्चसया पण्णासु- त्तराणि एयरस गंथपरिमाणं ।। वमुणदिणा रिणवध्दं । वित्थरियव्वं वियदृहि ॥ १४८॥.

1
A
AAAAA
( ९५ )
अर्थ-छासौपचास श्लोक ( ३२ अक्षरों का एक श्लोक) परि-
माण यह उपासका ध्ययन नामका ग्रंथ वसुनन्दी आचायने रचा
है। विद्वान लोगों करके यह विस्तार करने योग्य है ।
समाप्त.

- T - -- . AAAAAA Lana देवशास्त्र गुरुपूजा संस्कृत प्राकृत भांपा अर्थ सहित। -- , जैसा भाव होता है वैसाही कर्म वन्ध होता है, पूजन पाठको न समझ- कर केवल द्रव्य चढानेसे पुण्यबंध नहीं होसक्ता है, इसकारण हमने देव- शास्त्र गुरुपूजा संस्कृत माकनको जो नित्य पूजन के समय पढ़ी जाती है सरल हिन्दीभाषा अर्थ सहित छपवाया है जिससे पूजन करनेवालोंको पूजन पाठका अर्थ सहजही में समझ में आसक्ता है, पाठको समझनके पश्चात् पूजन करने से अवश्य पुण्य प्राप्त होगा इसकारण सब भाइयोंको यह पुस्तक मॅगानी चाहिये मूल्य तीन आना। द्रव्यसंग्रह। बहुस विस्तारके साथ सरल हिन्दी भाषाटीका सहित सम्यक् दर्शन ज्ञान चरित्र, छै द्रव्य, पंचास्तिकाय, सात तत्त्व और नव पदार्थ जैन सिद्धान्त के समझने के वास्ते यह अनिही उत्तम पुस्तक है । श्रीगोमसार और तत्त्वार्थ सूत्रकी महान् टीका श्रीसर्वार्थसिद्धिके आधारपर हमने इसकी टीका बहुत विस्तारके साथ लिखी है और सर्व कथनको बहुत सरल और सुगम कर दिया है। इस ग्रन्थको पढकर सब कोई जैनसिद्धान्त से जानकार होसक्ता है यह एक बहुत ही उत्तम ग्रन्थ वनगया है सब जैनी भाइयोको इस ग्रन्थ का पढ़ना अति आवश्यक है । हम इस ग्रन्थकी बहुत प्रशंसा नहीं करना चाहते हैं बल्कि अपने भाइयोंसे प्रार्थना करते हैं कि वह एक वार मंगाकर देखें तव वह अपने आप ही प्रशंसा करने लगें । मूल्य सिर्फ आठ आना । परमात्मप्रकाश। सरल हिन्दी भाषाटीका सहित-यह प्राकृत ग्रन्थ निश्चय कथनी का एक उत्तम ग्रन्थहै इसके पढ़नेस वैराग्य की वहुन बड़ी प्रेरणा होती है और चित्त में शांति प्राप्त होती है-अर्थ बहुत सुगम कियागया है-मूल्य छै आना । पुरुषार्थसिङ्यपाय। यह भी श्रावकाचार का अतिही उत्तम संस्कृत ग्रन्थ है सरल हिन्दीभाषा में टीका करके छपवाया है हिसाका स्वरूप इस ग्रन्थ में बहुत ही उत्तम वर्णन कियागया है-मूल्य चारानां । Orana - F

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- जैनसिद्धान्तप्रचारक मण्डली देवबन्द, जिला-सहारनपुर ! " श्रीजिनवाणीके भक्तोंने जैनशास्त्रोंके उद्धारके वास्ते यह मंडली बनाई है। इस मंडलीने जैनशास्त्रोंके छपवाने का बहुत कहा बीड़ा उठाया है । बहुतसे अन्य विद्वानों द्वारा सरल हिन्दीभापामें टीका कराकर छपचुके हैं और बहुत से छपरहे हैं और बहुतसे ग्रन्थोंकी टीका होरही है-इसके अति- रिक्त देहली,बम्बई,वर्धा,कोल्हापुर, शोलापुर, बनारस, इटावा, कटनी आदि सही स्थानों के छपेहुवे जैनग्रन्य यहांसे मिल- सक्तेहैं,उपाकर सूचीपत्र मंगाकर देखिये और जैनशास्त्र मंगाइये। सब भाइयोंको उचित है कि वह अपने घरमें जैनशास्त्रों काभंडार रक्खें, लिखित ग्रन्थोंमें धन बहुत लगता था इसे कारण सब भाइयोंको अपने घरमें ग्रन्थोंका भंडार रखना कठिन था, परन्तु अब छपजानेके कारण थोडेही द्रव्यमें बहुतसेः ग्रन्थ मिलजाते हैं इसवास्ते यह अवसर नहीं चूकना चाहिये, ग्रन्थोंका संग्रह घरमें होनेसे आप वा अपना बेटा पोता, भाई भतीजा,बाप,दादा,चाचा,ताया, माता, स्त्री,बहन, वेटी आदिक कोई न कोई उन ग्रन्थों को पढ़कर लाभ उठाता ही है और अन्य मौजूद होने के कारण थोड़ा बहुत समय स्वाध्याय औरै धर्म ध्यान में लगहीं जाता है- भाइयोंका दास-सूरजभानु वकील मन्त्री जैनसिद्धान्तप्रचारक मंडली. देवबन्द (सहारनपुर - ग । - +

Vasunandeeshavkachar

Author
Babu Surajbhanu
Title
Vasunandeeshavkachar
File name
Vasunandeeshavkachar
Text
OCR done
Citation
1909
Published
2009/11
Publisher
Moradabad, Lakshaminarayan Press
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344234
Barcode
99999990234111.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
2fJALbgyxHK
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