Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Gun Vilash 22 Samudaya

Shri Amar Chand · 2011/01

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॥ श्री॥
गुणविलाश, २२ समुदाय
(संग्रहकर्ता)
उपाध्याय, श्रीरामरिद्धिसारजी गणिः
(वाचक)
वैद्य-मंत्री, श्रीजीवणमल्ल गणिः
(प्रसिद्धकर्ता)
प्रेमचंद, अमरचंद, विकानेर,
रागडी
मारवाड,
मुंबईमे
निर्णयसागर छापखानेमे बाळकृष्ण रामचद्र घाणेकर
इनीके प्रबधसे छपवाया
प्रथमावृत्ती २०००
शाके १८३४, सन १९१३
मूल्य १७

Printed by B R Ghunekar, at the Nunaya-sagar Prese
23, Kolbhat Lano, Boinbay.
Published by Premchand Amarchand, Bihanor,
Marwar, Rapgadi
1

॥श्री॥
॥इस गुणविलाश छपाणे मै प्रयत्नकर्ता तथा सहायकर्ता
सेठ श्रीमान् मोहणलालची पूनमचंद गोलछा.
(अर्पण पत्रिका)
అతలాజలాలా
भीनासर वास्तव्य, वांठिया सेठजी,श्रीहजारी मलजी ऐसे उदार
दिलवालेथे, जिनो. २२ समुदायवालोमै, ज्ञानवृद्धिवास्ते,
सहस्रो मुद्रायें सर्च किया, अपणे समुदाई दीनहीनोका
उद्धार करणे मै भी हरवख्त कटिबद्धथे, प्रार्थना
सफल करणा तो उनोका परमशीलथा, इस
ग्रंथकै छपाणेमें भी अधिकांश सहायक
श्रीमान हीथे, अब परलोकसिद्वाये, ऐसे
नररत्नकों शातिमिलो, उन श्रीमान्के
पौत्र श्रीबहादरमलजीभी अपणे
पितामहकीतरे दिनोदिन धर्ममैं
दानशूरता दिखायगें, कारण
पीरोंके वीरही होते है.
versentenseRSEASEASERSense
ERSERS

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उदर [अथ ऋपभदेवजीकी लावणी ।] ।। शीसनमाकै करूंरे चीनती, चरणकमलमैं चितलाउं हे जीरेचर० ऋपभ देव महाराज, करो सिद्धकाज, आज मैं जसगाऊं, [टेर,] अवल हकीगत कहूंरे आपकी सरवा- र्थसिद्धी चचिया, माता कूखै आया, बहोत सुखपाया मैं वासलिया, चवदै सुपना आयारे मातानै मा- ताका हुलसा जोहिया, गई पतीकै पास, अर्थ देवो भास, सुनो तुम मेरा पिया, [उडावणी] हे अव कहता राजा लुपना भला तो है आया, एहां आया, तुम बहोत खुसीसैं रहो हुसी जिनराया, एहां राया, माता मनमैं हरख पांमियो जायके मंगल गवाउं, ऋ० १, सुभ घेला मैं जनम लियो प्रभु, इंद्रादिक मिलकर आये, मेरू पर- वतपर, जाय, देव सव आय, महोच्छव करवाये, आठ- जातकै कलस मंगाकै, सुगंधजलसें भरवाये, प्रभुजीका जसगावै, चमर ढोलावै, प्रभूजीकू नवाये, [उडावणी] हे इंद्राण्यां मिलकै भगतीस मंगल गावै, एहां गावै, अठाई महोच्छव फरकै पीछा जावै, एहां जाये, इंद्र प्रभूजीसै करै वीनती वर्ग लोकमै में जाऊं, ऋ० २, कंचन वरणी देह प्रभूकी वृपभ लंछन है सुखदाई, धनुप पांचसै है काया मेरे मन भाया यही है अधिकाई, जुगला धर्म निवारै प्रभुजी कला बहोत्तर सिखलाई, वरसी दान प्रभु दिया, जगमै जसलिया, फेर दीक्षा पाई, [उडावणी] हे सब देवी देवता दीक्षा महोच्छवमे आये, एहां आये, हे प्रभुजीके चरनमै लुल २ सीस नमाये, एहां नमाये, च्यार सहससे लीनी है दीक्षा जिनकू मै नित उठ ध्या- ऊं, म०३ लाख चौरासी पूरव आयू बीस लाख रया , ,

ने०२, सब सखियां मिल आई मारी स० राजलदे=
कवर पदे, पूर्व लाख दीक्षा पाली, शास्त्रमें चाली,
भगवंत वदे, सहस्र वरस छद्मस्तरया प्रभुचाकी र
केवली खामी, तीरथ थाप्याचार, भवी हितकार, में
नगरी पांमी, [उडावणी] हे कहे आवड महात्मा
जीका जसगाते, एहां गाते, हे देवो आवागमण निन
यही हम चातै, एहां चाते, सुखसंपत आपो मे
आपका द्रशण मैं पाऊं, ०४, इतिपदं ।।
[नेमनाथजीकी लावणी]
॥ कहती है राजुलनार मारीसहियां है इसडोहठी
मारो दिलजानी, नेम गये गिरनार सखीरी एक व
मोरी नहीं मानी, [टेर, विधसैंजांन वणाय मोरी सहि
है जूनेगढ प्रभू आये है, छपन कोड जादवकी जोड मि
जांन सजाकर लाये है, इन्द्रादिक सब साथ मारी के
सखियन मंगल गाये हैं, तरेतरेका वाजा वाजता सु
कर सहु हरखाये हैं, [उडावणी] हे अब कहती सखि
सारीरे, मारो वनडो फूल हजारी, हे क्या जानव
हभारीरे, जिनकी शोभा लगती प्यारी, हाथी घो
रथ ऊंठ मारीसहियां हे, घूम रह्या चारूकानी, ने०
सुणकै पसुकी पुकार मारीस नेमजिनंद कियो वीचार
जांनवास्ते लाये पसुकू भोजन होसी तइयारी, पसुवां
दिये छोडाय ह्मारी स० छोडदीवी राजुलनारी,
रथ फेर प्रभूजी संजमकी दिलमैं धारी [उडावणी]
प्रभु जाय चढे गिरनारीने वहांपर पंच महानतधार
हे अव सुणलो वचन हमारेरे,प्रभुजी छोड दियो संसान
करी हसीकी वात मारी स राजुल होरही दीवान
तोरण

समझावै, नेम गयो तो जावोवाईजी और वींद तोहे परणावै, जुगमें बींद अनेक मारी स. जोथारे चितमैं चावै, परसनकर मनोगमवरलो यूंसखियां सब वतलावै, [उडावणी] हे जव राजुलयूं फुरमाईरे, मारे और पुरुष सवभाई,हे मैं किसीकू पर' नाईरे,मारे एक चींद जादु- राई सुण राजुलकी वात झारी स० सखी लगी सब पि- छताने ने० ३, सब सखियां लेलार मारी स० चालीरा- जुलगढ गिरनारे, उठी घटा घनघोर मारगमै मेहवरस्यो मुसलधारे, सब सखियां गई विछड मारी स० न्यारी २, हुयगईसारे, चीर सुकावण काज सती जब गईहै गुफाकै मझारे [उडावणी] हे सती रहनेमी समझायोरे, उनकू धर्मको राह वतायो, हे जय रहनेमी सरमायोरे, सतीकू वारंवार खमायो, आवड महात्मा गाथै ह्मारीस० पिऊसे पहली गई निरवानी, ने० ४, इतिपदं ।। ॥ प्रभु जाय च गिरनारीरे, वानैं छोडी है राजुल- नारी, सुनी पशु पुकारी दयाचितधारी वारी ममता मारी विसारी, [टेर] जलचरी खेचरी मरतांउवारी वाने मिरगाकी सुनी पुकारी, पशुवांकों छोडदीना, प्रभुजा०१, सहसारी वनमै संजमलीनो पंचमहाव्रतधारी, ऋद्धिना त्यागकीना, प्र. २, चौतीस अतिशय पैतीसवानी, प्रभु भये हैं केवल ज्ञानी, आवडनै छंद कीना, प्रभु जा० ३ इतिपदं ॥

- [निवेदन] ॥ पूज्य श्री श्री लालजीऋपिराज अच्छे सुशील क्षमा दया निस्पृहता इंद्रीदमनादि व्यवहार क्रियासें विराजित साधु आर्यायें भाये वायोंसे सेवितचरण, आर्यावर्त्तमै प्रसिद्ध एक महापुरुप है, किसी गृहस्थ गृहस्थणीसे पत्र- व्यवहार नहीं करते धातृकी ताडीका चस्माभी इनका साधू कोई नहीं लगाता, कपडा रंगते नहीं, न सावूसै धोते हैं, रातपडे वाद सूर्य उद्यतक धर्म ध्यानके वास्ते भी यह और इनके साधू स्त्रीकों अपनेपास नहीं आणे देते, साधुओंके वास्ते जो मकान गृहस्थने वणवाया उसमें नहीं उतरेते हैं, गृहस्थका धातृ वगेरे पात्र काममे नहीं लाते हैं, कठोर ओर मर्मभेदक शब्द नहीं बोलते है, महान्पूर्वाचार्य श्रीजिनदत्तसूरिः प्रमुखका बडा उप- गार जैनधर्मपर मानते है, पूर्वाचार्यरचित आगम प्रकीर्ण पंचागीयुक्त मानते है, वावीस अभक्षका खाणा पीणा चुरा समझते है, व्याकरण पठण अच्छा फरमाते जिनमंदिरकी भक्ती करणेवालोंकी बुराई, नहीं करते है, पलकै श्रावकका कुलाचार धर्म फरमाते है, अपणे संग- ग्रहस्थ दूरदिसावर पोहचाणे चलेतो मना करते हैं, निश्राकृत आहार नहीं लेते हैं, गृहस्थकों कहकर मन्त्रा- दिक नही लिखाते है, सीधा लिखा हुआ मिलै जरूरी होय तो वहरते है, विनपडिले है पुस्तकादिक अपणेपास नहीं रखते हैं, न दिशावरोंसें पुस्तकोंकी पारसले संदूकै मंगवाते है, पायखाना आदिकमें फरागत यह और इनकै साधु नहीं जाते है, ग्रहस्थोंसे पगचंपी आदिवे यावच्च नहीं कराते हैं, तपभी वडा भारी यह और इनके ऋपीलोक करते हैं लिफाफा कार्ड सावू बहरते नहीं , घा० स० . 50 नपास रखते हैं और एसे काम करणेवालेको साधू नहीं समझते हैं इत्यादि अनेक व्यवहारोंसें अपणे साधुवेषकों शोभारहे है, इत्यादि गुणोंकै विलास इस ग्रंथका नाम गुणविलास धरा गया है निश्चयसम्यक्ततो केवल विगर कोन कह सकता है, लेकिन अच्छा व्यवहार हमेस इस लोकपरलोक मैं लाभदायक है अढाई दीपके पनरे कर्म भूमी मै रजोहरण पात्र और गुच्छके धारणेवाले जिना- ज्ञामुजय पंचमहाव्रत पालणेवाले अठार हजारशीलांग रथ धारणेवाले अखंड आचार चारित्र पालणेवाले एसें सर्व साधुओंकों सिरसें मनसें वंदन करताहं, इस ग्रंथकों छपाते प्रथम ग्राहक वणकर- (सहायता देणेवाले श्रीमंतोंकै नाम ) श्रीयुत जोरावर मल हिम्मतमल मालू ५६) श्रीयुत अगरचंद भैरूंदान सेठी ७५) श्रीयुत चांदमलजी डागा १८) श्रीयुत हस्तमल लिखमीचंद डागा १८) श्रीयुत सतीदासजी तातेड ११॥ श्रीयुत शिवदासजी कावडिया ११) श्रीमान्सेठ पेमराज हजारीमल वांठियां ३००1110 श्रीयुत गणेशीलाल डालचंद मालू १८॥ श्रीयुत लाभचंदजी श्रीमाल १५॥1) श्रीयुत अगरचंदजी पूगलिया ११) श्रीयुत मोहणलाल पूनमचंद गोलछा १५), [ये पुस्तक विगरमूल्य विकानेर पास भीनासरमें सेठ पेमराज हजारी मल्लकेपास मिलेगी, मूल्यसे विद्या- शालामे- अथानुक्रमणिका. १ २ २९ ३५ मगलाचरण चौवीसी कृपारामजीकृत सबडया १३ पथीयोकू उत्तर भावनाविलाश सवइया ३१ सा पाच वादियोकी चरचा सरइया ३१ सा मध्यमगल २४ तीर्थंकरोंका सपइया ३१ सा साधुवर्णन समइया ३१ सा कुडलियाशिक्षारा ३ योजुगजाल मुपनकी, सिझाय जैजिनओंकारा, पद प्रभु नेमनाथ त्रिभुवनतात, लावणी पामजिन एसा, लारणी, प्रभु नेमनाथ तजगयेसाथ, लावणी, माहाविदेझें चोथो आरो, सीमवरस्तनन, सीमधरस्वाम इकचितबदू होवेकर जोडने राजगृहीनानासियाजी, जनूसिझाय चदनवालाकी लावणी, सतानीक ओरदधिः देसत भूली ख्याल तमासा, लापणी, करम न चावे ज्यूहीनाचे, लावणी श्रीजिनपरदीधाजी ये उपदेशकै सात विसनमतसेचो कोई, लावणी कयो मान बजाजी, लावणी सदामोय स्त्र लगे प्यारा १३ पथियोकू निक्षा यूल भवजी कियो चोमासो, लावणी पूजधीलाउजीरी लावणी, श्री श्रीमहाराज पूजजी ५१ ५२ . ७९ ८२ .... . . ९४ .. श्रीहुकममुनि महाराज० पूज श्रीलालजी लावणी मन वचकायलाय प्रभूसे, रुवनायजीकी लापणी करलै पूजचर्णका ध्यान० उदयचटजीरी लावणी हुकम मुनि दीपै जगमाही, लावणी मुन्नालाल मुनि महातपधारी, लावणी किरपा रामजीकी लावणी गैनचदजी गुनवान, लारणी रूपचदजीकृत सवडया ३ शरणमें आया तुमारीरे, कर्मचटजीकी लागणी १ मुनिकरमचदजी सहरवीकाणे आया, लावणी २ प्रट्कायाके पीर मुनीसर कर्मचदजीकी लावणी ३ कर्मचदजी माहाराज जाउ बलिहारीरे लावणी ४ लावणी शोभालालजीकी सिरदाराजीकी लावणी कायामे ज्ञान कर परा ज्यान लावणी ध्यान नित धरता तेरारे पार्श्व प्रभु लावणी मुगतिरो मारग दोहिलो श्रावक करणी सिझाय, ते श्रावक किम उतरेपारो, ओ मारग नहीं सावरो, सिझाय सुणो २ अगरेज बहादुर गऊ अरजी करती संग्रह करणेकी प्रशस्ति ऋषभदेवजीकी लावणी सीसनमाके करू वीनती कहती है राजुलनार मोरी सहिया है प्रभु जाय चढ़े गिरनारी वाते छोडी है राजलनारी ९८ .... - १०२ १०३ १०४ १०५ . . ... .. १०८ ११० १११ १ २ ३ - . AUGUR LANO AHAIRODAI. JAIT LIBRARY. जाहिर खबर.) ॥ श्रीजिनायनम विद्याभाला, बीकानेर, राजपूताना, उपाध्याय श्रीराम- लालजी गणि की तर्फसे इतने पुस्तक छपके प्रसिद्ध हुये हैं नगदी निडरा- बलसे मिलता है, परदेशी ग्राहकोको । बी । पी। से भेजा जाताहै पैरंग- पत्र नहा लेगे, जो परदेशी ग्राहक प्रथम पुस्तक । वी । पी। से मगाकर फेर नहीं लेगा वह धोखाबाज अपणे २ इष्टधर्मको गुनहगार वे मुख ठह- रेगा पुष्ट चिकणे कागज भारतवर्षके नामी निर्णयसागर प्रेसके अक्षर शुद्ध छपाई मसहूरहै, महाराज उपाध्याय श्रीजीके जैनसिद्धातानुसार प्रबल उक्तियुक्तिकेभी अमृतरसके पानकरणामिलापी हमेस इन प्रथोके रसिक वणरहे हैं पढिये २, लीजिये २, विलब न कीजिये, सारतत्व देखके धन्यवाद दीजिये, लौकीकसे वाकरहोय अध्यात्मरस पीजिये- (छपे हुये ग्रंथोंके नाम.) || करुणावत्तीसी दादासाहिबके गुणानुवाद प्रत्यक्ष दरसार देणेका मत्रयुक्त पूजा सिद्धमूर्ति भाग प्रथम सिद्धमूर्ति भाग द्वितीय श्रावक लोकोका रुजगारी प्रथ, धर्म, धन, राजनीति, अनेक दृष्टातयुक्त १) ६ चाणाक्यका अर्थ, कार्य सिद्ध देखणेकू शकुनाबली, जीणा, मरणा, काल, सुकाल, जीत, हार, इत्यादि अनेक वात जाणनेकू जैन स्वरोदय जिन पूजामहोदधी, इसमें ३७ गायन पूजा मत्रयुक्त सर्वविधि २७ रत्नसागर नूतन, इसमे जैनधर्मनालोंका सर्व धर्म कर्त्तव्य, वडेस्तवन, छोटेस्तवन, सिझाये, चो ढालिये, तपस्याविधि १२ मासपा- धिकार, लावणी या जैनधर्मवालोके रखणे यो है ५) Moholla Marolian Wari. Bikanır. .... . ... CESS - . , , , , - . , , वैद्य दीपक, ये अथ सनगृहस्थोके रखणे योग है, रोगपासभी नहीं आ सके एसे खानपानका वर्ताव धरा गयाह, पढणेसे मालम होगा, तारीफ क्या लिख, मनुष्य, स्त्री, बालक, जानवर, और सव तरेकै जहरोका इलाज, देशी, अग्रेजी, होमियोपथी, और यूनानी, पथ्य, कुपथ्य, सब दवासोधन, और वणाणेकी विधि, दयाधर्मवालोके वास्तेही रचागयाहै, इसप्रथमें सर्वज्ञधर्मका नमूना है, ५) शकुनशास्त्र, श्रीजिनटत्तसूरि रचित इसमें शकुन चिडी, कउआ, कुत्ता, स्याल, हिरण, इत्यादि जाननरोकी चेष्ठासे आगे होणेवाला फल, सब मनुष्योकी चेष्टासे शुभाशुभ फल, अगफुरकणका फल, गिलेरी गिरणका फल, मेघ कब होगा, काल होगा, या मुकाल, इस वर्षमे कोन वस्तु तेज रहेगी, कोनसी मदी विकेगी, मकान कराणे जमीनके धूलके रगका शुभाशुभफल इत्यादि जाणनेको ये प्रथ साक्षात केवल ज्ञानीका भान दिखती है महाजनपगमुक्तावली, इसमे सब ओसवालोके अलग २ गोत्रोकी उत्पत्ती महेश्वरी, अग्रवाल, श्रावगी, नरसिंघपुरे, गोरारे, हूवड, पोरवाल श्रीमाल, उत्पत्ती दसावीसा होणेका वयान ८४ गछोत्पत्ती, श्रीभोजगउत्पत्ती, श्रावकोको, आचार, विचार, शिक्षा १) सरतर बृहद्गन्छका पचप्रतिक्रमण अर्थयुक्त इसमै, शप्तस्मरण, भक्तामर, कल्याणमदिर, छोटी शाति, बृहच्छाति, ऋमिमटल, जिनपजर, तिजयपटुत्त, दोसावहार, जगद्गुरु, नवग्रह शातिमत्र तथा पूजाविधि, प्रतिक्रमण पाचोकी करणेकी विधि, पोसहविधि इत्यादि सब अर्थयुक्त २) .... 1) . , . . . ..

(इन सब पुस्तकोंके मिलणेका ठिकाणा.) ॥वीकानेर, मारवाड, उपाध्यायश्रीरामलालजीगणिः, विद्याशाला, मुंबई, विचला भोईवाडा, श्रीचिंतामणिजीका मंदिर, वा। श्री- जीवणमलजीगणिः, वैद्यपास, नाटपेट पत्र नही लैंगै, ये पुस्तक सप सरकारकै ऐन मुजब रजीप्टर कराई हुयी है छापेगा सो सजा चार होगा, पुस्तक मंगाकर फेर लोटायगा वह अपणे इष्टधर्मस हरामी करेगा. ।। स्वप्नसामुद्रक छप रहा है, इसमें स्वप्नेका फल, सामुद्रक, स्त्री, पुरुपोंकै, शिरसे पैरतक, अच्छे और बुरे चिन्हाकै सब फल प्रगट किया है भापा कविता बंध है मूलग्रंथ रचयीता भद्रबाहु स्वामी है, छंद रचयिता । श्रीरामलालजीगणिः है, इसमै कामशास्त्रका कुलसार दरसाया है, ज्ञानीकों तो वैराज्ञका मूल है, कामी पुरु- पोंकों कोक दरसेगा, ग्रंथनिर्दोप है, रचणेवाले मूल सर्वत्रयीत- रागकी वाणीके अनुसार है, किसीको आरसी, किसीको तवा मुझेगा, " १

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बावास समुदाय. ॥ श्रीधर्मशीलसद्गुरुभ्यो नमः शाश्वतशाश्वत् सिद्धा- यतनस्थ सिद्धेभ्यो नमः इति मंगलं ।। अथानेक पदानि लिख्यते । अथ चौवीस तीर्थ करोंकी लावणी, चालपणिहारी, चौवीस जिन सब देव है, मुगतीकै दाताः सदा मैं तेरा जस गाताजी, टेर,ऋपभ अजित महाराज, तिरणकी जि- हाज बडी भारी, संभवकी वाणी सुखकारीजी, अभि- नंदन गुणधार सुमतकी जाउं बलिहारी, पद्मप्रभुकी सु- रत पियारीजी, उडावणी, जनममहोछवकरवाभणी, इंद्रादिक सहु आय, मेरूगिरिलै जायक, मंगल कलस ढोलाय, नेकचार जो करणा है सो करकै सव जाता, सदा में तेरा जस गाताजी,१,श्रीसुपारसनाथ जगत वि- क्षात प्रभुचंदा, सुविधि शीतल सुखकंदाजी,श्रेयांसवास- पुज्य, सेवा करता सुरनर इंदा, सेवकका काटो भवफ- दाजी, उडावणी, देवलोकांतिक आयकै, प्रतियोध्या जि- नराय, तारो तारो जगभणी, एहवा सबद सुणाय, तत- क्षण प्रभु संजम लेकर तोडै जगनाता, सदामे ते २, विमल अनंत धरमनाथ सोलमा शांति जिन जाणो, जिनोंका ध्यान हिय आणोजी, कुंथुनाथ अरनाथ बहु- गुणपात्र पिछाणो, पख झूठी कुमति ताणोजी, उडावणी, च्यार कर्मघन घातिया, कीनाछै जिन दूर तपजप करणी खपकरी. पाम्या ज्ञान. पट्टर, चार तीरथसो थाप आप २ फिर करता कहलाता, सदा में ते० ३, मल्लिमुनिसुव्रत वीसमा जाणो तुम भाई, नेमी है सबकू सुखदाईजी, रिठनेमी पारस प्रभुकी महमा हद छाई वीरप्रभु सासन वरताईजी, उडावणी, अष्टकर्मदल चूरकै, पोहचा है निर- वाण, अटल सुखों मैं जायकै, कीया आप असथांन, ज- नम मरणकी तिरसफासमैं, फेरवो नहीं आता, सदामैं ते०४, चोवीसों महाराज रखो अब लाज आज मारी, सरणमें आयोहूं थारीजी, प्रभुगुण अनंत पावै नहीं अंत सुणो पियारे, करतगुण इंद्रादिक हारेजी, उडावणी, कनीराम जिनंद गुण गाया मन अति कोड, एक जिह्वा मेरे प्रभु, काहां लग गाउं जोड, अगम अगोचर तुम अ- विनासी पार कोण पाता सदा मैं तेरा जस गाताजी ५. इति पदं ॥ अथ सवइया घनासरी चालरा लिख्यते । चोथे आरे केरा वर्ष तीन साढी आठमहिना वाकी रया जदवीर मुगत पधाया है, पीछे जिन शासनमे मोटामुनि- राज थया आपतिया संसारथी घणा जीवताया है, स- म्वतअठारे पनरेके सालचेत सुदिनवमसुक्रवार दिननिहव निकाल्या है, डेप करी देव गुरु धर्म तीमें भेद करी खोटो मत झाल्यो सठा ज्याने गुरुधाय है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो कृपा राम कहै खेचो पार दया पाल्यां है १, चोवीशमा महावीर देव ज्यांने चूका कहै ज्यांके नामसेती माथो मुंडी मांग खावे है, गुरुगीतारथ दया देखी काठ्यो संसार थी ज्यांकी निंद्याकर सठ ज- नम गमावे है, जीवके वचाये मांहे पाप कहै दशआठ , ३ कां करा मेलीने घोघा लोकानें बेकाये है, देव गुरु धर्म तीन तीनांमे बताच भिन्न सिद्ध पावडेमे कह्यो न्याय नर्क जावे है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो कृपाराम कहै दया पुन्यवांन पावै है, २, सात निय आगे हवा उवाईमे जिन कह्या आठमो निहव सिद्ध पा- वडियेमे चाल्यो है, वाणियेको सुत ग्राम कंटालेको वासी गुरु गीतारथ दया देखी दुखसुं निकाल्यो है, अ- विनीत हुवो गुरांकर दियो जुवो मोहकर्म उदय हुवो सठ खोठो मत झाल्यो है, चूका कहे देव सतगुरांम वताव दोप जीव वचायां पापकेवै बोले जिमसाल्यो है, सवइयो सवायो कीनो धनासीरी नाम दीनो कृपाराम दयाधर्म पुन्यवान झाल्यो है, ३, जीव दयासुत्रांमांहि ठाम रकही जिन जीवके वचायां पाप कठेही न जाणी है, दशमें अंगरे मांह ग्यांनी दीनो फुरमाय सब जीव दयाकाज कही जिनवाणी है, सूत्र आगम टीकाचूर्णीपयन्ना मांह जिहां तिहां जोवो जीवद्याही वखाणी है, या रुचे कोई पुन्यवान रे घटमांह निहव कसाइ मांस खावै जिणां ताणी है, सवडयो सवायो कीनो घनासीरी नाम दीनो ज्ञानीका वचन सत्त हिरदेमें आणी है, ४, श्रेणक रा- जारे सुत हाथी भवया पाली मृगरथराजा दयाकाज धान्यो मरणो, धर्मरुचि द्याधार करगया खेवो पार श्रे- पाक पडहो वजायो सुत्रांमे निरणो, नेमजिन दया पाली छोड दी राजुल नारी मेतारज दया पाली मेट दियो मरणो, तेवीसमां जिनराय तापसके पासे जाय जीवांने वचाय दियो नवकारको सरणो, सबइयो सवायो कीनो घनासीरी नाम दीनो जीवदया धर्म पालो जोये चाहो तिरणो, ५, आज्ञामे आलस मत करो जिन वैणसुणी , ४ आज्ञा वाहिर उद्यम तूं कदे मती कीजिये, आज्ञा तीन प्रकार केरी कही जिनवर ज्ञान समकित चारित्र चित्त दीजिये, धर्म दोय प्रकार सुत्रचारित्रसार मिथ्यात्वीरी करणी कहो किणमांहे लीजिये, आहार तणो इधकार उत्तराध्ययनमझार छकारण छोडिये छकारण करली- जिये, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नामदीनो जे तूं सुख चावै जिनवचनामें रहीजिये, ६, निह्नव निकल इण भांत अधिकाइकीनी आर ज्यानै पासवैठी राखे सारो दिन्नरे, छेद उत्तराध्ययन मांहि ज्ञानी दीनो फरमाय चाड मांहे दोस नहीं वसरहे मनरे, थापरूप दोष नहीं लगावां इमकही जुदो क्षेत्रवताय नित्तरोज बहिरे अ- नरे, दया दान पूछयां कपटाइसहित जुआय देवै जहर जहर वटकेसु मिल्या अन्यो अन्यरे, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो कृपाराम दयाधर्म धारे सोही धन्यरे, ७, श्रावकरो खाणोपीणो गहणो अवृतकहै उवाइसूत्र सुयगडांगजी वतावे है, गहणा कपडाने अवृत कहे ज्यांने कहणो गृहीलिंगी केवल पाय मुगत क्यों जावेहै, श्रावकनें तीर्थ सुवृती कह्या जिनमुख्य आराधक सेतीकी अवृत वधावे है, व्रत अव्रतपर नामाकेरी कही- जिन चोफरसी पुद्गल नजर न आवे है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो निहव कपटकर बोघानें बह- कावे है,८, पडिमा धारी श्रावकनें दान दियां पाप कहै किसो पाप हुवे कहो निहवांने केवणो, तीन करण तीन जोग पाप रातो त्याग हुवा जिनजी वतायो पडिमांमे मांगलेवणो, निहव कपट करी बोघा आगे इम कहै, साधूके जो आहार वचे वांनें क्यों नहीं देवणो, कलप संभोग मिल्यांविना लेवे देवे नहीं कपट क्या करो सठ कितरोक रैवणो, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो पारख्यातो करो वहतेलारे नहीं वैवणो, ९, श्राव- करे तीन करण तीन जोग त्याग हुवा भगवती सूत्र माहे वीरजी वतायो है, अंबडजी श्रावकरा सातसेही शिष्य लारे तीन करण तीन जोग पाप बोसरायो है, श्रावकने दशाश्रुतस्कंधमे श्रमण भूत कह्यो उवाईमे जिन सुसाहु वुलायो है, ज्ञाताजी सुत्रमाह ज्ञानी दीयो फरमाय श्रा- वकनी समाव्रत श्रावक नाम पायो है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो श्रावकने जहर चटको कहणो कठै आयो है, १०, कवाड देहेडी जिणमाहे नहीं साध- पणो उत्तराध्ययन अध्ययन पैतीसमोंवतावेहै, जिहां नहीं कवाड देहेडी एडवो नाम जिहां मनोहर इत्यादिक रह्यां दोप धाये है, वृहदकल्पमाहे रहणो साधुने अभंग दुवार आर ज्यांने रणो जठे पडदो बंधावै है, गोचरीकी पटीकरो नामले निखेधे ज्यांने कहणो गोचरीमे साधु आर ज्यांजी जावे है, सवइयो सवायो कीनो घनासीरी नाम दीनो कवाड निखेधी चटा कवाच्या जमावे है, ११ भगवती सतक पनरमे केरोनाम लेई चोवीसमा महावीर ज्यांने चूका केवे है, अणुकंपा करी जिन आपरो वचायो शिक्ष अछता ओगण बोली माथे आल देवे है, समणा- समणी कोई नदीमांहे बहता हुवै आज्ञाने उल्लंघ साधु आप काढलेवै है, अनुकपा कीजै जिनपारको मिटायो दुःख उत्तराध्ययन अध्ययन पनरमे जेवैहै, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो ज्यांको खेयो पार जिन बचनामे रैवै है, १२, कालादिक वारकरो मरण यतायो चीर सोमल मरण जिननेमजी वतायो है, तिल- छोडमा तिल चीरजीवतायोअर मरण गोसालेकेरोवीर- , जतायो है, दवारकारो दाह नेम जिणभाख्योसें मुख ना- श्रीरीहीलानिंद्या ज्ञातामांही आयोहै,महाशतक श्रावक वतीको मर्ण कह्यो गौतमजी मूंकी जिन प्रायच्छित्त दि- यो है, सबइयोसवायो कीनो घनासरीनाम दीनो आगम वहारी देख्यो जिम फरमायो है,१३, पुन्यपाप आज्ञामें नहीं नाज्ञा बार नहीं छंद वारो कीयो तेरे दुवारमें युं गावै है, नमें तोश्रधा एम लोकां आगे कहे केम आज्ञा माहे पुन्य नाज्ञा बाहिर पाप थावै है, उवाई सुत्रमांहि ज्ञानी दीनो करमाय आज्ञा बाहिर पुन्यवंधे देवतामे जावे है, गोसा- जमाली जाण तापसादि तज प्राण देव हुवै आराधक द नहीं पावै है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो आज्ञाका आराधक सुख मुगतीका पावे है, १४, साधु आर ज्यांरे महाव्रत नववाड मांहे ओछे अधकेरो पाठ कठेही न आयो है, आर ज्यांने पहलो व्रत भांग चोथो राखणेको वीतराग देव ऐसो धर्म न बतायो है, आर ज्यांने कवाड देवण खोलणेको नाम साधुविना न्यारो सठ मुंढेसुं उठायो है, कवाड देवण खोलणेको नांम आयो जठे साधु आर ज्यांरो पाठ भेलोइ बोलायो है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो बृहत्क- ल्पमे आर ज्यांने पडदो बंधायो है, १५, थाप दोष लगावै जिणांमें नही साधपणो कपदसुं बोले सठ ज्यांन इम केवणो, आडवरकाज इणभांत पञ्चक्खाण देवै दशन- विनाथे आश्व नहीं सेवणो, केई गांम जावै इम सोगन करावै दुपञ्चक्खाण उपदेश साधूने नहीं देवणो, दरशण आवै केई आरंभ करावै आय भाव नाही भावे यूं साधूने नहीं लेवणो, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो पारक्षातो करो वहतेलारे नहीं वेवणो, १६, रायप्रसेणीमैं , . परदेशी राजा मुनीपासे समझ्यांने व्रत लिया पीछे दान दियो है, आरंभसहित दानादिक प्रश्न पूछ सुयगडांग माहै मुनिराज मूंन लीयोहै, दशमे अंगमें दान देवणो निषेधे जैनें वीतरागदेव झूठा बोलो चोर कह्यो है, दान- दया सुत्रांमांहि ठांम२कही जिन दांन दया निषेधे जिणा- को फूटो हीयो है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो दांन दया रसकेई पुन्यवांन पीयो है, १७, केसी समणने चित्र प्रधान कयो परदेशी धर्म सुण्यां घणीदया पालसी, समणभिक्षारी सुख डंडकर थोडो लेसी दोपद चोपद घणां जीवाने उधारसी, आगम विहारी चित्र परधान सेती कह्यो जाके हाथे धर्म आवै चार बोल धा- रसी, उपावसुं राजाने प्रधान लायो मुनिपासे वाणी सुणी राजा जांण्यो येही गुरु तारसी, सवडयो सवायो कीनो घनासरी नांम दीनो राजने असार जांण्यो देखी ज्ञान आरसी, १८, अनंत चौवीसी सब दान दे संजम लीधो देवे देसी अनंती चौवीसी जिन कयो है, दान दियो वीर ज्यांने परीसह ऊपना कहै सट ज्यांने कहणो दांन मल्लि जिन दियो है, पहर छद्मस्थ रही केवल ज्ञान लही आढूही करम दही शिवसुख लीयो है, चवदे प्रकार दान पडी लाभ कयो जिन नवभांत पुन्य न्यारो समुच्चयमै रयो है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नांम दीनो निहव गा- डर जेम भइयेलारे भझ्यो है,१९,बालकनी वोलीबोल चारी सुद्ध नहीं जिम निहवनें वेस्या भांड तीन लज्यार हितरे भांड बोले विकल वेस्याके नहीं शील शर्म निव कहे चूकादेव गुरुमाहे केहतरे, चोरादिक सुत्तनें सीखावै चोरी तरवानो जिम निहवाके दयारहित वाण देतरे, मूंजीपणो कपटपन द्यारहित हुवै कुसंग निहवाको मत झाले एता बोले सहितरे, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो निहव कोयल जिम नहीं हुवै खे- तरे, २०, अभिग्रहोधारी मुनिराज काया पोसराई आ- गकोपरी सहो हुवै तोही नहीं निकलणो, कोई काढेयांने आय मुनीतणो तन सहाय सागारी निकाल बंछ उनीको उपरणो, जीवको वचावणो निशीथमांहे दूजेपद वारमें सतरमें उद्देसे मांहे निरणो, ठाणांग मांहे कलह मि. टायांको लाभ कयो जीवणो वंछणो कह्यो भगवतीमें वरणो, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो जींको खेचो पार दया धरमको सरणो, २१, कपट करीने सठ सुत्रांको नाम लेई जीवणो मरणो नहीं बंछणो वतावे है, आहारादिक लाय आछीतरे पोखे शरीरने ढांढांदिक देखी झटकेसुंटल जावे है, इम कयां कहे हमे संजम जीवण बंछा कपटकी कही जड आगे पलटावे है, कोई अनारज आय साधांने परीसहो देवै श्रावक वचावै । जीनें पाप किम थावे है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो संथारेको नाम गोपी वोघांने बहकावे है, २२, साधुने छकारणांसुं आहार करणो छोडणो कह्यो उत्त- राध्ययन अध्ययन छावीशमे वखाणिये, आहार कर- चाको न्याय ज्ञानी दियो फुरमाय ज्ञाता अध्ययन दूजे अठारेमें जाणिये, दशमीकालक बत्तीस बंध आजीव- कानो आहार कन्यां धर्मकेवै सुत्र अणजानिये, धर्म- क्षयोपशमभाव मांहे कह्यो जिनमुख आहारादिक उद्य भाव हिरमे आणिये, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो ममता उतारी जीयां शिवसुख माणिये, २३, दूजे अंगजिन कयो प्राक्रमनो इधकार अज्ञानीको अशुद्ध ज्ञानीकों शुद्ध भाखियो, तेवीशमी गाथा पद चोथेमांहे टी- कायाले पुन्यवंध कयो निर्जराको नहीं दाखियो, सुयगडां- गमें कयो मिथ्या कर मास २ संसारमे कले कपटाईसल्य राखियो, निहव कपटकर घोघां आगे इम कहे मिथ्यात्वी आज्ञाके बारै करणीमे नाखियो, सवइयो सवायो कीनो धनासरी नाम दीनो मिथ्यात्वी मिथ्यात एक अनुयो गढारसाखियो २४ सुत्रसिद्धांतसार चाहदिरदेमें धार निन्हवाको मत जाणो झूठकपटाई है, छोडनिन्हवाको संग ज्ञानरूप लागो रंग द्यादान रुचि जांकी बडीही पु- न्याई है, गुरुगीतारथ भेटी मिथ्यामतदियो मेटी क्षमाका सागर गुरुभेदया सुखदाई है, छत्तीऋद्धिछिटकाय संज- मसुं मनलाय सुगणामगनमुनि चडा गुरुभाई है, सव- इयो सवायोकीनो घनासरी नाम दीनो कृपाराम दया- वान कीरत सवाई है २५ उगणीसे साल वत्तीस सवझ्या कीना छचीश सुणमतीकीजोरीस हिरदेमें धारजो, चार वोले नरके जाय कह्यो ठाणा अंगमांय ओरही सिद्धांत सुणहिरदे विचारजो, जीवके वचायामांही ज्ञानी पाप कयो नांहीं अज्ञानीके वचनांने दूरांइं निवारजो, अनंते चौवीसे जिन धर्म कह्यो भिन भिन इम नहीं कह्यो मत- जीवांने उवार जो,सवइयो सवायोकीनो घनासरी नाम दीनो कृपाराम कहै जीव दया नित्त पाल जो २६ अथ कुंडलिया लिख्यते । गृहस्थीके घर साधनें,वैठणवर ज्यो वीर, कारलोप वैठे- कदा, वधे पापकी सीर १ वधे पापकी सीर, भृष्ट संजम सुंभाख्यो, दशमी काल अध्ययन, छठेमे जिनवर दाख्यो सुद्धसंजम आराधतां, पहुंचै भवजलतीर, गृहस्थीके घर , २बा० स० १० . साधनें, बैठणवर ज्यो वीर१ जरा रोग तपस्या करी, दुर- बल थयो शरीर, तिण कारण वैठणतणी, आजादी महा- वीर १ आजादी महावीर, मानतजसुत्र देखो, विनकारण नहीं कह्यो, बैठणो सुत्रपेखो, मवावीसे जिनतणा, कल्पातीतगुण धीर, जरारोग तपस्या करी, दुरवल थयो शरीर, तिण कारण वैठण तणी, आज्ञादी माहावीर २ नि- न्हवकाढी भावना, बोलायांने आय, लीधा झोली पातरा, लारे चाल्या जाय ३ लारे चाल्याजाय, पूठ दो नारी ऊठी पूछयांक है निरदोप, कपटसूं बोले झूठी, रसनारा गृद्धी- थका, जिहां लावै जिहां खाय, निवकाढीभावना,वोला बाने आय : दोपवतावैपारका, पोते घोर अंधार, रोगान- सपेतो हींगलू, चित्राम बहोत प्रकार १ चित्राम बहोत प्रकार, थाप बोघाभर मावै, पूछयां नहीं देजुआव, नहीं सिद्धांत वतावै, वोघागुर चेला मिल्या, नहीं पूछे निरधार, दोप वतावै पारका, पोते घोर अंधार ४ गृह- स्थीके घर जायनें, निहवकथा सुणाय, वृहत्कल्पमें वर- जियो, तीजे उद्देशामाय१तीजे उद्देसेमाह, एक गाथाको भाख्यो, उहां नहीं विस्तार, वोही कारण सुंदाख्यो, कथा भट्टज्यूं मांडीयो, नहीं सुत्रको न्याय, बडे घरांमें जायने, निहव कथा सुणाय ५ निहव महासत्यां कहै, बैठी राखै पास, उत्तराध्ययनमे जिन कह्यो, होवै शील विनाश १ होवै शील विनाश, लोकमे अपजसथावै, विनभायां वह पास, राखतांलाजन आवै, बोघा गुरुचेला मिल्या, नहीं पूछने त्रास, निहव कैवै महासत्या, वैठीराखे पास ६जिन- कल्पीने वरजिया, चार वोल जिन आप, निहव तीन छिपायने, देवे चाड उथाप, १ देवै वाड उथाप कपट बोघाभरमाचे, समझ्या करै पिछान, अजाण्या , . ११ गोताखावै, निहव करता कपटसूं , एक बोल उत्थाप, जिन कल्पीने वरजिया, चार योल जिन आप, ७ जंगलमै ले आतापना, नहीं समणी आचार, उपासरेमे रेवणो, कपडो वांधी वार १ कपडो यांधी बार, वृहत्कल्पमे आयो, पां- चमे उद्देसेमांहि, श्रीमुख आपवतायो, कयाड जडयोनां कह्यो, लोहिरमे धार, आरज्यांने रहवणो, कपडो बांधी बार ८ महासत्यांनांम धरायने, संजाय पटली देव, दो झोल्यां ले हाथमें, धवकरती बेच १धव २ करती येव सीखले भेला जावै, साधुस्वांगवणाय, जिणांको लायो खावे, व्यवहार सूत्रमे वरजियो, निकारण नहीं लेव महासत्यां नाम धरायनें, संजाब पटली देव ९, निहवाळू पहुंचायवा, गृहस्थी जाचै लार, आगे जाय यारी कर भोजन बहोत प्रकार १ भोजन बहोत प्रकार, त्यारकर भावना भावै, वोलायाने जाय, तुरत पातर ले आवै, रस- नारा गृद्धिथका, जिहांलावै जिहां खाय, निहवाळू पोहचा यया, गृहस्थी लारे जाय १०. भधारक भ्रामरकहै, जती खमासण योल, निहब के वै भावना, ये तीनूं समतोल १ ये तीनूं समतोल, बुलायां तीनूं जावै, निहव साध केचाय, सांग लेई भेख लजावै योधागुरुचेला मिल्या, नहीं आचारको तोल, भट्टारक भ्रामरक है, जतीखभासण बोल ११ गोसालांने दिखियां अन्यमत वध्या अनेक, जमालीने क्यूं दियो, ज्ञानी प्रतक्ष देख १ ज्ञानी प्रत्यक्ष देख, तिलांको छोडवतायो, वो- घाने इम कहै, इणीमें स्यो गुणथायो, जिन सोमल ब्राह्मण तणो, मरणो कह्यो विशेष, जो जो कारण जिन कह्या आगम ज्ञानी देख १२ आहार देवै भावमुं, थानै पासे आण,रजी आदिक देखने, देवै फूंक अजाण १ देवै फूंक अ- , १२ जाण, देख पाछा घिर जावो, आडा फिर कहेलो, तुरत अ- शुद्ध वतावो, मारगादि करे कारणे, बतलावो बहु वार, थां कारण हिंसा हुई, केमरहे आचार १३ काठावंधन वांधिया भातकरी अंतराय, इत्यादि करियां कह्या, अतीचार जिनराय १ अतीचार जिनराय, भात अधि केरो दीयो गाढा बंधन देख, तेहढीलाकर लीयो, अतीचार लागो किसो,थे निखधो किस न्याय, काठा बंधन वांधिया, भात करी अंतराय १४ कह्यो लगाणे पातरे, तीन पसल्ली तेल, चंदरस देणो किहां कयो, कहो मानकू मेल १ कहो मानकू मेल, रात राखण किहां आयो दशमी काल अध्ययन छठे, गृहस्थी समोवतायो निहव योघां आगले, यूंही चलावै फैल, कह्यो लगाणो पातरे, तीन पसल्ली तेल १५ जनम गांठ आदिक करी, महोच्छव मांड्यो कूड, निह्नव साध कहवाय कर, करै जमारो धूड १ करे जमारो धूड, वीरनें चूका भाखे, पो- ताको निरदोप, पणो योघांने दाखै, झूट कपट निवतणो, जांणी रह ज्यो दूर, जनम गांठ आदिक करी, महोच्छव मांडयो कूड १६ वारी पाणी आहारकी, वांधी भर २ लाय निहव साध केवायनें, आधाकर्मीखाय १ आधाकर्मी खाय, हियेमे इतीन आणे, निरदोपण लै आहार, जिणांसुं झूटीताणे, रसनारा गृद्धीयका, आहारादिकने जाय, वारी पाणी आहारकी, बांधी भर २ लाय १७ बाहर दिसा अरु गोचरी, गृहस्थी राखै लार, आचारांग निशीथमें, वरज्यो ते दिलधार १ घरज्यो ते दिलधार, तइयादिकमांहे बहरै, जो सुबमांहि निषेध, करे ते आपणे महरै, घोघा गुरुचेल्या मिल्या, नहीं पूछ निरधार बाहर दिशा अरु गोचरी, गृहस्थी राखै लार १८ करे जा- यतो घरतणो, खोली देखो चीत, लेख करावै हाजरी, यातो कूडी रीत १ आतो कूडी रीत, केम परतीत न आवै जो होवै परतीत, नित्त क्यूं लेख करावै, आगे जिनकीधी नहीं, नहीं वताई रीत, करे जावतो धरतणो, खोली देखो चीत १९ आधाकर्मी आहारको, परतिख दीसे दोख, हीयाफूट भेला हुवै, पूजै योधा लोक १ पूजै योधा लोक, हिये एतीनहीं आणे, निरदोपण जल आहार, किणीतरे लेतो जाणे, मीठो पाणी राखनो, आहारादिकदै लोक, आधाकर्मी आहारको, परतक्ष दीपै दोप २० वोघाने भर- मायचा, निहव मांडी जार, कह कोडी कह कांकरा, पाटी रीगटकार १ पाटी रीगटकार, लेख ऊंचाहीं वचावै, जो देखणनें जाय, रागरंग करी रीझावै, अण समझ्यो भरमी पडे, समझू करे विचार, वोघाने भरमायवा, निहव मांडी जार २१ विन कारण नहीं सुधपणो, निग्रंथी साथ विहार, तुच्छपलेवण नहीं राखणो, नहीं उद्देसादिक आहार १ नहीं उद्देसादिक आहार, भलोकर भूडोगेरे दोय घडी दिन रह्यां, उच्चारादिकने पडिलेरे, साध आर ज्यां साथ रहे, नहीं निशीत अधिकार, विन कारण नही सुधपणो, निग्रंथी साथ विहार २२. नित लावैजो एकण घरसे, चारामें एक आहारजी, दश- मीकालिकती जेमे कह्यो, साधु नहीं अणाचारजी १ गाथा १०, श्री वीरजिनंद अनुकंपा कीधी, फोरी लद्धिगो सालो बचायो, छ लेश्या छद्मस्थके होती, मोहकर्म वस रागज आयो१, जीव उठाय छांयां मेले तो, जाय महा- व्रत पांचूही भागी, या गाथा १९ मी बोल ४९ मां, वहा मन जिमायां तमतमा पोहचावै साख उनाध्ययन १४ में संजतीरी वेयावच लागियां अणुकंपा साध करे ३, पहला .

१४ महाबत पूरापडिया, आडा जडै किवाडजी, कूदा आगल होडा अटकावै, ते निश्चै नहीं अणगारजी १, निवारा लेख है। जवाव। मोलमें जो दांम देई जोरसुं वचायो कोई उपदेश समझाय जीव वचावियो, कारण चारमेंसुं एक कारज कियो किणमांहेनफो किणमांहे दोप थावियो, इम कह्यां कहै एक उपदेशमाहे धर्म तीनमाहै पापइम उत्तर वतावि- यो,इम कहे ज्यांने केणो कारणमे पाप हेके कारजमें पाप हे के दोनांमांहे आवियो, सवइयो सवायो कीनो धना- सरी नांम दीनो उपदेश आसरोले चोघाने बहकावियो २७ भगवती शतक पहले उद्देसे दूजामें कह्यो साधुजीमें तीन भली लेश्याका उच्चारजी, आचारांग श्रुतस्कंध दूजे अध्ययन पनरमे भली लेश्या आयां जिन हुवै अण गारजी, भगवती शतक नवमें उद्देसे इगतीसमांहे भली- तीन लेश्या आगममें अधिकारजी, ठाणाअंग ठाणे तीजे दूजे उद्देसेमे घणो पन्नवणापद उत्तराध्ययन विस्तारजी, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो लेश्याका लक्षण सुणहिरदे विचारजी २८ गोसालाने वीरजी वचा- योजीसुं चूका केवै कुहेत लगावे सठ झूठा देवे आलजी, निव कपट कर योघां आगे इम कहै उवायां हो लाभ क्योंनीराख्या अणगारजी, इम कहे ज्यांने केणो केवली त्रिकाल जांणे सावत्थी क्यों आया कर जावता विहारजी, आउखो निमत्त आयो जांणीलियो जिन- राज मेल्या नहीं दूर वा राखियो व्यवहारजी, सव- इयो सवायोकीनो घनासरीनाम दीनो वीरजीने चूका क , है डूवा कालीधारजी, २९, निशीथ उद्देसे जारमांमें वीर भांगा चार कह्या साधु ओर आर ज्यांने भेला नहीं रेवणो, व्यवहार उद्देसे पांचमांमे साधु छतांमुनिः आर ज्यांक पासवचन प्रायश्चित्त नहीं लेवणो, निशीथ उद्देसे चोथे साधु संज्ञा कियांविना आरज्यारे उपास रे प्रवे- शन कैवणो, साधु आर ज्यांने एक उपासरे आहारा- दिकमने वृहत्कल्पमे उद्देसे तीजे केवणो, सवइयो सवा- यो कीनो घनासरी नाम दीनो कारणसुं आहारादिक लेवणो नदेवणो, ३०, निहब कपट कर बोधाने बताचे पाठ साधु आर ज्यांने भेलो भोगणोनैं रैवणो, व्यवहार उद्देसे सातमांमे एसो पाठ नहीं दीखै कठे किम बोलो पाठ देखावोयूं कैवणो, उत्तराध्ययन सोलमें अध्ययन तीजी चाडमां है स्त्री वैठे घडी दोय जिहां नहीं ठेवणो, उत्तराध्ययन निशीथ व्यवहार वृहत्कल्प आदि स्त्रीको परचो वरज्यो पाठ देख लेवणो, सवइयो सवायो कीनो धनासरी नाम दीनो स्त्रीको कर फरसे ज्यांने डंडकाई कैवणो ३१ अचित्त द्रव्यादिक सेती कोई पुन्यवान आप आपको तो पापटारे दूजाकोटरायो है, अशुभ योग आश्र- वमांहि लियो कह्यो शुभयोग संवरमे ईमे किस्यो पायो है, सनत कुमार तीजे देव लोक ऋद्धि पाई चारोंही ती- रथने सुग्य शाता उपजायो है, नेमजिन वागमे विराज्या तिण अवसर किसन साहायदे संजमदिरायो है, सवडयो सवायो कीनो धनासरी नाम दीनो ज्ञाता अंतगडमांहे एसो पाठ आयो है ३२, अनुकपा निरवद सापद्य कहीने सठ योघलांके घट घोचो झूठोही फसायो है, अनुकंपा निरवद्य सावध हुवांधी सट धरमदलालीमाहे पिण फेर थायो है, नंदिपेण उपदेश देइने दिक्षादिराई #aholta चित्र परदेशी केशी वांमि समझायो है, कोई मुख जयणा करी मारग वतायो शुद्ध कोई अजयणासुं मारग दिखायो है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो भारग सावद्य निरवद्य किम थायो है ३३, भगवती स- तक सोलमें उद्देसे छठामाहे रतनांकी माला जोडा देख्योजगन्नाथजी,चोथा सुपनारेमाहे छोटी वडीकही नहीं झूठी ढाला जोड सठ बोधाने बहकातजी, समकित र- तन आवश्यकमें जिन कह्यो सम्यक्त रत्न ज्ञाता सूत्रमाहे वातजी, सम्यक्त रत्न ले दोई धर्म सम कह्या व्रतर- तनाको जो बहोत पखपातजी, सवइयो सवायो कीनों घनासरी नाम दीनो समकित पायां निश्चै मुगतीमें जा- तजी ३४ अन्नवस्त्रादिक दियां अव्रत सेवाई कहे अव्रत तो दीधी लीधी आवै नहीं पारकी, निवांके श्रद्धाएम अव्रत अरूपी जीव खावे देवै पुद्गलरूपी वात ये विचा- रकी, भगवती शतक पहले उद्देसे नवमेंमें कह्यो अत्र- तकी क्रियाक्षत्री राजारंक सारखी, चोरादिक वित्त ग्रह्यो आकुल व्याकुल थयो थोडी क्रिया लाधां या है वाणी अणगारकी, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो पारखातो करो सठ खयर न पारकी, ३५, मूल दृष्टांत कुण आत्मा जीव अरूपी निरवद्य भाव द्रव्य गुण पर्यायी है, गव्यादि अज्ञान ज्ञान तलावतेमे कियो हिसाब निवाकी आसुणो कपटाई है, मूल नव नाम कहेय दूजो दृष्टांत देय आश्रवजीव एक जुगल मिलाई है, तलावनें नालो एक उत्तर यूं देणो देख पुद्गल तलाय नालो एक करवाई है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नांम दीनो यूं नाम हवेलीको उत्तर देखाई है ३६ तीन करण तीन योग अठारे पापरा त्याग किया वर्णना गिणती भ- गवतीमें जाणीयो,तीन कर्ण तीन योग अठारे पापरा त्याग किया अंबडजीका चेला उवाई पिछाणीयो, तीन करण तीन योग अठारे पापरा त्यागकिया आनंदादि श्रावग उपासक दसा आणीयो, तीन कर्ण तीन योग अठारा पा. परा त्याग किया संखादिक भगवती मांहि जिनवाणीयो, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नांम दीनो अवतरी किसी देखोतेज पखताणीयो, ३७, श्रावकरो खाणो पीणो कपडो आदि सबाने अव्रतमे गिणे ज्यांने इण भांत कै- वणो, राख्यांपापदियांपाप भलोजाणैतैमैपाप तीनां मांहेजिनसाधूनेक्यासेवणो, कोईतोआगेडालेवै कोईपाडी- हारासेवै इत्यादिपापकेवोथांनेकलपेनहींरेवणो, भगवती- सतकवारमे उद्देसेपांचमांमे पापनेंचोफरमी कह्यो पाठदेख- लेवणो, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो पार- ख्यातोकरो वहतेलारे नहीं वैवणो ३८ भगवती सतक- बीसमे उद्देसे आठमांमे श्रावकने तीरथमें लीनोयाजिन- चाणी है, पालतजी श्रावकनें महात्मा कह्या जिन सीक्ष- कह्या उन्नाध्ययन इकीसमें जांणीहै, धम्मिया धम्माणुया धर्मइष्ट आद देई सुसीला सुव्वयागुण उवाई पिछाणीहै, सुयगडांगमाहे धर्माधर्म पक्ष दोय तीहां धर्मपक्षमा साधुश्रावक दोआणीहै, सवइयो सवायो कीनो धनासरी नाम दीनो साधुनें श्रावकगुणव्रतासुंवखाणीहै, ३९, दशमीकालिक छठे अध्ययन आठमी गाथा अठारे था- नक जुदा जुदा किया जाणजी, सोलमाथानकमाहे गृ- हस्थी घर बैठेताकू अनाचार मिथ्यात अब्रह्म प्राणहाणजी, आधाकर्मी दोप थाय जाचकादी अंतराय फ्रोधषधे अ- पूठी कूशीलवतहाणजी, इत्यादिक दोप घणा बैठा कडा तीनजणा तपसी जराने रोगादी हुसुर ठाणजी, सहयो ३ बा०रा० १८ सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो दशमीकालिक देखो तजपरखताणजी ४० बृहत्कल्प कह्यो तीजे उद्देसे अंतर घरमांहि सतरे बोलकरणा वीतराग पालीया, अंतर घरको खोटो अर्थ करीने निहव सठ रसोडादिक घरकह वोघांने वहकालिया, अंतरघरमें तपसीने जरारोगी यांने सतरे बोल करणा कह्या ईमें आगेचालीया, दशमीकालिक सुयगडां- गबृहत्कल्प ओर सुत्रांमे वरज्यो पिणदेखे नहींवालीया, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो अज्ञानमें खू- ताजिणां अज्ञानी सरणालिया, ४१ छठे गुणठाणे मनपर जब कपाय कुशील छद्मस्थ रागसहित करी चूका कैवैहै, चारित्रनियंठायोग हेतु आदिककेतापावै भवकेताकरे संसारमें केता रैवैहै, लारे पांचे तेतो भगवंतमें बतावो सब इम पूछयां मूढ सफा जुवाब नहीं देवैहै, भगवंत जीवदया ऊपरें अध्ययन देख परिक्षातो करे नांही वह- तांलारेवैवैहै, सवइयो सवायो कीनो घनासरीनाम दीनो कल्पातीत जिनकी बराबरी लेवैहै ४२ जानु परिमाणे नदी उतरे धर्म कहै पाणी संघद्यासुं आहार देखी टल जावे है, कमाड निखेधी अने किवाडिया जडावैसठ जि- नकै उपर एसी कुजुगत मिलावै है, लडकी वापकी केई गर्भवंतीको नामलेय पट्मासवध्यां उट्यां बैठा दोषथा. वैहै, इमकहे ज्यांने केणो याको परमाण किसो किवाड किमाडी केता हाथको कहवाचै है, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो निन्दवकपटकरी बोधाने बहका वैहै ४३ इसाभद्र श्रावकाने आवकां वंदनाकीनी भगवंत अ- रुबरु जिन नहीं पालिया, पोष्कलीजी संखजीरी हवेलीमें आया जिहां उपलाजी वंदना कीनी आसणादि दिद्यालिया, संखजीने पुष्कलीजी पोसामार वंदनाकीनी कह्यो चालों , आहार करो संखजी नहीं हालिया, भगवतीमें बहुभाव ज्ञानी दिया फुर माव चंदना करी लियां पछे अपराध खमालिया, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो अंबडने सिष्यां वंदनाकीनी उवाईमें चालिया ४४ उत्त- राध्ययन अध्ययन छावीसमे छकारणसुं आहार करणो कह्यो नाम न्यारा २ धारजी, वेदना व्यावच चैत्य इर ज्यांने संजमठाये जीतयने अर्थ छठी धर्मनो विस्तारजी छकारण छोडणा बतायो वीतराग देव ज्यारा न्यारा २ नांम करत उचारजी, रोगर्ने परीपह जीवद्या ब्रह्मचर्य अर्थ तपहेत शरीरत्याग कर दे संथारजी, सवइयो सवा- यो कीनो घनासरी नाम दीनो खाणेमे धर्म होतो क्यों तजे अणगारजी ४५ इति ऋपि कृपारामजीकृत सवइया संपूर्णम् ॥ अथ भावनाविलास लिख्यते । प्रणमी चरण युग पासजिनराज जूके विघनके चूरण पूरण है आसके, दृढ दिलमाझि ध्यानधर श्रुत देवताको सेवेते संपूरत है मनोरथ दासके, ज्ञान दृगदाता गुरु वडे उपगारी मेरे दिन कर जैसे दीपे ज्ञान परकासके, इनके प्रशाद कविराज सदासुख साज सवीए वनावत है भा- चना विलासके १ प्रथम द्वादश भावना नामानि, प्रथम अनित्य भाव दूजो असरण पुन तीजो है संसार चोथो एकत्व अत्यंत है, अन्य भाव पांचमो अशुचि भाव छठो जांनि सातमो आश्रवसुनि महादुर दंत है, आठमो संपर भाव निर्जरा है नवमो जुदशमो है धर्मभाव मा- नत महंत है, लोकको स्वरूप राज इज्ञारमो भाव पुन

२२
अंग होत है मतंग चंग कबहु पतंग भुंग कीटक अकार
जू, कबहुक धनी निरधनी सुखी दुखी जीव कबहुक
वेदविन कबहु चमारजू, जेसें नट एक भेष थटत अनेक
थाट तेसें एक जीवके अनेक अवतार जू, धन्नधनाशालि
भद्र थूलभद्र जंवू वडा त्यागी जे संसारकेजू अभय कु
मार जू १४ अथ चतुर्थ एकत्व भाव कथन ॥ दोहरा।
जडतो करताहे नहीं, करता चेतनराव, जो करता सो
भोगता, यह एकत्व स्वभाव १५सवइया ३१ सा, कौन ते
माततात कौनतेरे अंगजात कौन भ्रात जात तेरे सब
सवारथी, अरथ खटाऊ परलोकके वटाऊहोतधन
वटाय लेत मिलके धनारथी, ताकी गति कोन बूझे स्त्रा
रथके मोह बूझें भवमे अरूझे कोऊ नांही परमारथी
चेतन विचार चित्त इकेलोतो तूंहेमित्त उवट चलत आप
आप होऊ सारथी १६ एक असहाई आप करत है पुन्य
पाप करमळू मेले आप आपही प्रमाथीजू, स्वारथके का
सब मिलत समाजराज वेदनीके उपजत न को संग
साथी जू, अंतकाल आवै जब आखर इकेले सव कह
भयो काइके जू बहु रथहाथी जू, एक भाव मनधर माय
लोभ परिहर भयेजू वैरागी त्यागी अतिथि अनाथीज
१७ तेरोतो न कोऊजीव तूंहिपैनकाको यांहि आयो।
इकेलो तूं इकेलो फिर जाइयो, काहे• विराणेका
निघट कपटराज रहत है आठोंयाम धंधेहीम
घाइवो, दुकृत सुकृत दोऊ साथिह्वौहे तेरो सोऊ और
केनकोऊ पुन्यपाप फल पाइवो, करे, हरेहैं आप इकेलोह
पुण्यपाप जीव असहाई एक वहै ध्यान ध्याइयो १८
अथ पंचम अन्यत्व भावना कथन, ॥ दोहरा ॥ न्यारो पे
पुद्गलयंध्यो, संसारी जियद्रव्य, ज्ञानी यूं न्यारो लखै, दूध

२३ दही घृतगव्य १९ सवइया ३१ सा, पुद्गलजीव काल धर्म अधर्म नभ एईषद्रव्यजू अखंडरूप जानीयै, पुद्गलमू- तिक और है अमूर्तिक जीव द्रव्य चेतन अजीव पांच मानीयै, अपने स्वभाव धरि रहेहै सवेही द्रव्य यद्यपि मिले हैं तोऊ न्यारो पहिचानीयै, योही अन्य भाव जान राजजीव न्यारो मान निहचे निगमबांन संसय न आनीयै २० न्यारो धन धाम गांमठांम काम सब मात तात भ्रात न्यारा अंतकाल पाइकै, राज अविनासी लख चोरासी- को वासी कहूं होत न उदासी जगवासी सदभाइकै, मिथ्या मत छक्यो बक्यो मिथ्या मेरी २ सय ढक्यो है विवेकरवि तमो घनठाइकै, वाजीकू संकेलि जैसे वाजीगर ऊठजात पल एक खलककू ख्यालसो दिखाइकै २१ संध्याकालि तरुडार बैठे आय खग कुल राति बसि प्रात कठिन्यारे २ जात है, लेतहै वसेरा रातपंथी ज्यूं सराह- वीच जोरत है प्रीतजोलं होत न प्रभात है, गइयानके संग ग्वाल डोलत है सबदिन आवत प्रदोष गेह इकेलो दिखात है, असें अन्यभाव मन आनियेतो राजकवि ज्ञानके उद्योत होत अज्ञान विलात है २२ अथ अशुचि भावना पष्टम कथन, ॥ दोहरा ॥ अशुचि मिले यह ऊपजे, अशुचिहि बंध्यो पिंड, जेसी माटी होइहै, तैसोही हे भंड २३ सवइया ३१ सा, मांस हाडचा- मनस मेदगुदरसवस मजा केस शुक्र रेतयद पिंड रच्यो है, शुचिको न अंस परसंस याकी करे कोन चामको सामेला घेला मैलहीसं मच्यो है, महारुठो झूठो दूट छिनमे अपूठ होत लपट निपट लोभी लाल- चमें लच्यो है, ऐसो राजदेह यांसू कीजिये कहा सनेह यांसू नेहकर नर कहो कोन वच्यो है, २४ अंबर अनूप २४ । मृगनाभिधनसारघस कुंकम चंदनघोर खोल आछी कीजिये, चोवा मैदा जवादिसुं चरचित चारचित्र अरगजा संगचंग नास सुख दीजिये, चंवेली चंपेल तेल मोगरेल केवरेल तिलौंछि अंगोछि आछे सोंधि राजभी जियै, छिनक सुगंध गंध फिरहोत है दुगंध पिंडया अपावनसूं केसेंधू पतीजियै २५ सरस आहार सार कीने चार परकार पट्रस सुखकार प्रीतकर पोखीहै, आछे २ अंबर अनूप आच्छादन कीजै तोष जो न राखिये तरतीकमैं रोखीहै, नरके हैं नवद्वार नारीकै इग्यार हजु वहति अशुचि जेसें मंदिरकी मोखी है, मलहीसुं मंढी गढी काचकीसी कुंपी किधुं अरंडकी झूपी ऐसी काय पर घोखी है, २६ अथ सप्तम आश्रव भावना कथन, ॥ दोहरा॥कारण जोहे पापको, जाकर आवत आप, तासो आश्रव कहतु है,दै आतमकू ताप २७ सवइया ३१ सा, प्राणीको संहार मृषा वाणीको उचार पर द्रव्यकोजू अपहार दूर परि हरिये, नीके २ काम नीके काम सुख दुख हेतु फीके होत छिन मांझ धोखे विनुधरिये, सचित्त अचित्त पुन वाहिर अंतरंग निबंध हेतु परिग्रह दुहनतें डरिये, पाप नीर पूरके प्रवाहमग आश्रव ए इनहिसुं प्राणीनिके पिंडसर भरिये २८ वडे २ वारण हरावण एरावणके फरसके बसधस फसति है फंदमैं, दमकि कर- तदौर वनिवनि चिहुं ओर हिरण अवणवस पडत पुलिं- दमें, लीन जे अगाध जल औसै मीन माहावल रसनाके रसभरे गिरे दुख धंदमे, जरत पतंग दृग रंग दीप ज्योति- संग धधमरे नासाखाद अलि अरविंदमें २९ विपम विपाक कट विरसविरूप अति विपतरुकैसै फल विपय विलास है, क्रोध मांन माया लोभ करत चढे न शोभ चौगुनै २५ पाय चार दोपके निवास है, राज देश भोजन त्रियाकी गत विकथाए अविरति क्रियायोग मिथ्याकर्म पास है, माश्रवकी भावनाए भाव हुभविकराज इनके निवारतही जानको प्रकाश है ३० अथ अष्टम संबर भावना कथन, दोहरा ॥ज्यू कुल आगम राहुसिर, रुके पालके बंध,त्यही भाअवरो कियै, संवर भाव सुसंध ३१ सा, चरण धरण परे जीवको यतन करे बोलत वचन असे रागरोषना बढे, नोजन विशुद्धि गृद्ध होय वो नरसनाके ग्रहन धरत वस्तु इन दयाम मढ़, कफ मल मूत्र विट् श्लेपमको डारिवो जु नैसी भांति डारे जेसें जंतु तामे नागदै, मनवच काय ती- गुपत करत नित इनहि निश्रेणी साधु मोक्षधांम जे बढे ३२ प्राणि बध मृषावच अदत्त मैथुनरुचि परिग्रह लोभमूल पातिकको पोपहै, इनको निरोध सोउ संघर पखानियतु इह सुखहेतु जांनि संवर संतोष है, संवरसुं नीति जाकै सोऊ ऊपदेश योग ओरन• उपदेश वृथा कंठशोपहै, मोक्षपुरगोनविच संवलसो संवरकै सेवतही वाणीगण जीवतही मोपहै, ३३, संवरकुँ तिर करकिते जीव गयेतिरं तारेगे कितही आगे अब धुतरतुहै, संवर समान और ज्ञानविज्ञान कछु धरमीहै सोऊ जोऊ सवर तरतुहै, संवरको वकतर सुदृढ कस्यो है तन तासुंतो करम अरि कहुं नलरतुहै, वदंत मेतारिज धर्मरुचि निराज गजसुकमालजेसे पातक दलतुहे ३४ अथ न- मी निर्जराभावना स्वरूप कथन, दोहरा, तासुंकहियेनि- नैरा कमजुआतमकीन तप जप खपकर आपवस जीर्ण- करे प्राचीन ३५ सवडया ३१ सा, कसकै लंगोंट कटितट लपेट चाम घांम शीत काटतु ओटदै पहारिकै, ए- कासन आठोंयाम पैठत डीठिसांधि जारतहै पीठ पांच ४ या०स० २६ पावक प्रजारिक, ऊरधचरण अधोवदनद्वै मौनग्रहि नगन रहत चीर वसन सुडारिक, जानकै संयोगविन निर्जरा अकामयह ज्ञानविनुहेतुनांही होत निसतारकै, ३६ जिते जगवासी जीव थावरजंगम जांनि अज्ञानीकू होत वही निर्जरा अकाममें, रोगसोग आधिव्याधि विपत वियोग- दुख भूखप्यास तापशीत घुमरेट घांममें, इत्यादिक कष्ट कर सहसवरसमांझि निर्जरा अज्ञानी करे ज्ञानी इकया ममें आपवस त्यागीसहै सकलकर म, द है छिनकतूं मि लहै, शिवगति धाममैं ३७ प्रायश्चित्त विनय सिझाय ध्यान, का उसग्ग वे यावच्च नीकी भांति कीजै साधुजनकू अंतरंग तप खट्भेदके वपानीयत करत विमल यह सद निज मनकुं, उपवास ऊनोदरी वृत्तिको संक्षेप पुन कार क्लेस रसत्याग लीन भावतनकू पट् यह ब्रह्मतप उभर मिलै दादश निर्जरा पावक शम पातकके वनकू, ३८ अथ धर्मभावना दशमी कथन, दोहरा, शुद्धधर्म पदको अरथ पंडित बूझे मर्म भवजलमें यह जीवकू धारत सोही धर्म ३९ सपझ्या ३१ सा, दानशील तप भाव चारोह चिराज पाउ विमल विज्ञानहग दयामुख दाखीहै, सो भाको समूहजाको विसद विवेक पूंछ निश्चय व्यवहार सार उभै शृंगसाखी है, संपदाको हेतु दुहु लोकन सुख देत अमृत अवतधार संत वच्छ चाखीहै, अर्स कामधेनु चरत विपततृण राज तेरे चोर नितें नीक भांति राखीहै ४० धरम अरथ काम तीनूंवर्ग हितकाम उत्तम उदार सुविचार मनठानी यै, चारूं गतिमा अिसा मानवको अवतार साधन त्रिवर्गको चतुर चित्त आनीय तीनोंमे प्रधान बुद्ध कहत धरम शुद्ध अर्थकांमको जुधर्म कारण पिछानीय, राजनर भव पाय धर्म जो करत नाहि २७ , पशु ज्यूं विफलताको जियत बजानीयै ४१ मांनी जिन- यांनी जिन्हीनीके जाण पहचानी ज्ञानी धर्मध्यांनी जिन्हें तृसनाळू तोरीहै, जिनोंकी अमूढता नगूढा है न- वोढाजेसें समिति आरूढ प्रौढा जैसी प्रौढा गौरीहै, ले- तन अदत्ता अभैदान सुंजूरत्ता मत्ता कबहुं नहोत तत्ता मायाकू मरोरीहै, धर्म भावधारी असे धन २ नरनारी इला पुत्र भरतसे धर्मरथ धोरीहै, ४२ अथ इज्ञा- रमी लोकखरूपभावना कथन, दोहरा, नांयकाहूने धखो, काहू धखोन आहि, स्वयंसिद्ध यह लोकहै, देखे ज्ञानीताहि ४३ सातराज ऊरध पाताल सातराज पुन चौद राजलोक गती आगत है । जीयकी, चौद् राजलो- ककी सुथिति भांति जैसी आहि उभय हाथ टेके कटि प्रति जेसे तियकी, यांमें जैसी ठौर कहूं नाही, जहां आ- तमकों नहींभई पराभूति जरा मृत्यु भीयकी, जाति जोति कुलथान फरसे अनंत वेर दीव्यदृष्टि देखे ज्यूं वि- लोकदृष्टि हीयकी, ४४, देवर भतीजो भ्रात काका सुत न्याती पुन एक बालसंग पदसंबंध सहाते है, भात तात सुत भरतार दादो सुसरसु पट्ही पुरुप साथ तातके सुतांते है, बंधव वधू सौति सासू यधू दादी जननी जु इतेतो संबंध निजमातहीके भांते है, वैस्या सुतासुत जायो कर्म वस,सो उव्यायो मातसुता सुतजायो कर्म वसिसो अव्याह्यो मातसुत सुताराज अठारह नातेहै ४५ अर्थः कुवेरसेन पालकसे ६ नाता देवर लगे भर्तारका भाईके नाते १ भतीजा लगे भाईका चेटा होणेसे २ भाई लगे'सगीमामा जन्मा हुआ इस नाते ३ काका लगे था- पका भाई होणेसे ४ वेटा लगे गोकका बेटा होणेसें ५ पोता लगे सो सोकके जणे वेटेका बेटा होणेसें ६, अथ ६ कुवेरदत्तसे नाता, भाई लगे एकमासें दोनही जन्मे इसवास्ते १ बाप लगे माकापती होणेसें २ शोकका पुत्र होणेसे बेटा लगे ३ आपइससे परणे गई इस नाते भ- र लगे ४ काकेका बाप होणेसें दादा लगे ५ देवरका वाप होणेसे सुसरा लगे ६, अब ६ नाते कुवेरसे नासे, सो संबंध दिखाते हैं, भाईकी बहू होणेसें भोजाई लगे १ दोनों एकभारकी स्त्री होणेसें सोक लगे २ पतीकी माहोणेसे सासू लगे ३ सोकके वेटेकी बहू होणेसें वह लगे ४ काकेरी माहोणेसें दादी लगे ५ इसके पेटसें पैदा हुई इस संबंधसें मालगे ६ इसतरे १८ नातेकी कथा जं- बूचरित्रमेंहै इस लोकका ये स्वरूप है खारथही भाई विन खारथ है शत्रुनाई माता विनुसारथ असाताकी जोदाताहै, आपसमें राजकाज भिडे गजराजजेसें भर- तरु बाहूबल काहू कोन भ्राताहै, चुलनी जलायो लाख मंदिरमे ब्रह्मदत्त विरतंत असोतो सिद्धांतमें विक्षाता है, लोकको खरूप असो ज्ञाता चित्त मांझि भाई दुनियांकू छार यार कहायामें राताहै ४६ द्वादशमी दुर्लभ भावना कथन, दोहरा, मणिमाणिक सुतमानिनी भोगसंयोगअ- नेक ये दुरलभ नहीं जीवकू दुरलभ समकित एक ४७ सवइया ३१ सा, थलभयो जलभयो अनिल अगनिभयो तरु पशु पंखीभयो कलभ कुरंगरे, देवभयो दानव भयो नारकी निगोदभयो जलथल नारीभयो भीपण भुयंगरे, नरभव धरम श्रवण जिन वचरुचि, व्रत धरवेकू धीर सकति अभंगरे, अऊचार सुविचार दुरलभ राजसार शिवसुख साधनके उत्तमहै अंगरे १८ अरे नर नर भव पायवोन, वेर २पायो है तो प्रीतिकर वोधि दुरलंभसु, देव गुरु धर्मकू परखनीके लीजीयत देखियत दरशण राचि रहै दंभसु, निरंजन देव देव गुरु निरगंथ सेव द्यामूल धर्म सदा देख निरारंभमुं, ज्ञानकी जंजीर जर जकर पकर करि बंधमन गजराज समकित थंभसुं ४९ देव गुरु धर्मको संयोग अंग चंग अति पायोतो प्रमाद एक पल- हीनकी जिये, चवद पूरवधारी ताहकी जो होतख्वारी बहुल संसारीकों निगोद मांझि दीजिय कोडीकाज हारियै नकनककी कोडि कहुं वेचिकै मतंग तुंग कहा खर लीजिये, मिथ्या मत विपपान कीजियै नराज कवि वोधि सुधारस श्रुति संपुटकै पीजियै ५० द्वीपयुगज मुनि शशि वरप जादिन जनमे पास तादिनकीनो राजकवि यह भावना विलास ५१ यह नीकै कह जानियै पढियै भाषा शुद्ध सुखसंतोप अति संपजै बुद्धि नहोय विरुद्ध ५२ इति श्री भावना विलास पंडित राजसिंह मुनिकृतं संपूर्ण ॥ तीतर व्याल विलार चिरी मकरा मकरी इन मांझि फसेहै, घूस छिडूंदर यूं छविमां कण भूप दिवारण मांहि धसेहैं, तैजु कियो अपणे रसकुं अपणे २ रसते हुरसेहैं, जाघर कुंजु कहै अपणा घर ता घरमें घरके अवसे है,१, अथ पांच एक पक्षवादीयोंका मत, छठा सर्वज्ञस्या- द्वादीका सिद्धांत स्वरूप वर्णन चरचा लिख्यते । अरिहंत सिद्धसूरि नमूं उपाध्याय मुनिराज पंचपर- मेष्टी नित नमूं सारे आतमकाज १ जिनवरवाणी सर- खती मतिविस्तारणमाय तिहुलोकहितकारणी प्रभु यांणी सुखदाय २, गुरुगुणसागर आगरू नागर नवल अनूप कृपा करी मुझ तारियै, पायो जैनस्वरूप ३ प्रणमुं गुरुपदकमलकुं स्थाढादको भेद पंचवादी चरचा कई ३० श्रोता सुणो उमेद ४, अथ सवइया ३१ सा, केवलीको मारग अनूप भूप रूपसम सप्तनय वैणनैण अंतर खुलत है, काहूकोन पक्षपात मिथ्या मत होत घात मत मतां- तर जेसे कांटेमें तुलत है, निर्वद्ययाण सुखदान भव्य जीवनके सुणत हृदय धीच अमृत घुलत है, मनमें वि. लोक यह तिलोकके भव्यनके सुनके आराधेविन चिहुंगति रुलत है, १, सुणे नहीं वाणी मिथ्या मत- चित्त आणी मोह मदरामें अंध होय, रह्यो सटसो, खें- चत है पक्षपात मांने मिथ्या मत साच होय रह्यो एसे जेसे अरककी लटसो, काहूकै बदन मांहि होत पील्यो रोग जव सब रंग पीलो दीखै सत मांने अटसो, कहत तिलोक सोध बोध वीज समकित स्यादवाद माने सोहीलहे भव नटसो, २, अथ कालवादीके वचन, काउक- कालवस सकल द्रव्य न भाव कालहीतें होत पूत नहीं मात तातको, कालहीते नारी जुगर्भधरै जनत पूतका- लहीतें बोले चाले काल करै वातकों, कालसें जुवान पुन कालहीतें वृद्ध होत कालहीते मरकर भ्रम जात २को, एकजिन मतनय जांनेविन जगजीव कहत है तिलोक लोक खेंचे पक्ष पातको, ३, कालहीतें दरखत होत है पतंग पण कालहीतें जीवपण रहे पात पातको, काल- हीतें फूलखिरे फल परिपाक होय कालहीतें रसफेर होत भांत भांतको, कालेजिन चक्रवर्ति वासुदेव बलदेव बेहुंरुत कालचक्र भिन्न दिनरातको, एक जिनमत नय जानविन जगजीव कहत है तिलोक लोक खेचे पक्षपात कों, ४, अथ स्वभाव वादीके वचन, कहत है खभाव- वादी कहा करसके कालविनांही स्वभाव कोऊ वसतन जगमें, महिलाकै मूंछ नहीं वांझण जणे वाल रोम नहीं ३ AUQUR HAND BHA JAIN LISPY करताल । हीचु नहीं रगमें, जात जात दुखत पानफूल भांत २ थलचर थलपरे पंखी ऊडे खगमे, एकजिन मतनय जाणेविन जगजीव कहत है तिलोक लोक भूले पग २ में, ५, कांटे वोर बंबूलके कोण करै तीक्ष्णता। हंसकी सरलता कपटाई वगमे, विनांही खभाव मोर पंखकोण चित्तरता कोकिलाको सादवर खरभंगकगमें, विपधर सिरमणी विप हरै ततकाल पवनको चलभाव थिरभावनगमें, एक जिनमतनय जाणेविन जगजीव कहत तिलोक लोक भूले पग २ मे, ६, पृथची कठिन पुन शीतलता जलमांहि तुंबति रै ऊंठ डूबै झाल उठे आगमे, सुंठ उपशमे वाय हरडविरेच करे रवितपे शशी सील सुखन नरकमे, पट् द्रव्य छऊ काय भावा- दिक भाव सब विनांही खभाव कोउ होत नवरगमे, एक जिनमतनय जांणे विन जगजीव कहत तिलोक लोक भूले पग २ मे, ७, अथ भवितव्यता वादीके वचन, भवितव्यवादीकहै सुणरे स्वभाव मूढ भवितव्य विन कोज काज न सरत है, अंब मोर वसंतमे लागत है केई लाख केई खिरे केई ढांके अंबके परत है, उदत तिरत पुन भ्रमत जगलविच करत जतन कोड भावी नाटरत है, एकजिनमतनय जांनेबिन जगजीव करत तिलोक लोकपचके मरत है, ८, होत चके यसविन चि- तव्यो मिलत आय विनाही जतन होनहार नट रत है, ब्रह्मदत्तचक्री नैण फोडा है गुवाल तय सोले सरस देवसें काजन सरत है, अटका लागत केई रण माहे वचे नर नियतके वससास धीरन धरत है, एक जिन- मतनय जांणे यिन जगजीव कहत तिलोक लोक पचके मरतहै, ९, कोकह सकत है कोयल केसें रहे प्राण, पारधी ३२ , तान्यो है तीर सींचाण फिरत हैं, पारधीकों नागडस्यो सींचाणेके लागो बाण उडगई कोयल सो नियत करत है, जनम मरण जरा व्याधी रोग सोग जोग सुख दुख भूखादिक नियत धरत है, एक जिनमतनय जांणे विन जगजीव कहत तिलोकलोक पचकै मरतहै १०, अथ कर्मवादीके वचन, नियत स्वभाव काल तीनूंही जुगनी ताल कर्मका अजय ख्याल कर्म बलवान है, कर्मथी नर- क तिरयंच नर सुरगति कर्मके वस त्रिहुं लोकही हैरान है, कर्महीतें बुद्धिवंत कर्महीतें ऋद्धिमंत कर्महीते चु- द्विहीन मुरख अजान है, कर्महीते निरधन फिरत है वन २ जन २ पास जीव मांगे मुनिथान है, ११ को उक पृथवी जल अगन अनिल काय कोउक वनसपती फल फूल पान है, कोउ पोराज लोकमें किरमा अलस्या कीडी धनेस्या जूं लीख टीडी होत विकलान है, कोऊखर करी हरी रिच्छ कच्छ मच्छ खग स्याल व्याल नोल कोल कर्म सेती खानहै, एक जिनमतनय जाणे विन जगजीव कहतति लोकलोक भ्रमत अज्ञान है १२ कोउ महा सुंदर अनूपरूप तेजवंत कोउ कुष्ठीकूबडो सो कुसीयोकुखान है, कोउच्छत्रपती राजा सेठ साहूकार लोक कोउ दल- दरी नीचलोक चोर खांनहै, कोउक सीतल पुनवांन लोक आणमांने कोउअक क्रोधी लोक मांनतन बान है, एक जिनमतनय जांणेविन जगजीव कहत तिलोक लोक भ्रमत अज्ञान है, १३, कोउक पहरतहीर चीर जरी साल जोडी कोऊक फाटे टूटे पटहीन पान है, कोउक आरोगे मेवा क्षीर खांड मिसटांन सीरो पूडी सीरणी अनेक पकवान है, कोउकू मिलेन कुटी कोदराकी राय खाटी सूखा लूखा टुकडा न मिले भाजी पान है, एक , प्रचार है, एक जिनमतनय जांणेविन जीव सव कहर तिलोक लोक वे मझधार हैं. १८, अथ सर्वज्ञ स्थाr दीके वचन, खेंचाताण करत है पांचों वादी भिरस जिनमतनय जांणे विन सब जीव कहत तिलोक लोक भ्रमत अज्ञान है, १४, कर्महीते आदेसर जीकू दुवादस मास अंतराय रही नहीं मिल्यो अन्नपान है, वर्ध- मान स्वामीजीके पगपर रांधी खीर करकै गुवालेरीस खीला रोप्याकान है, तीर्थकर चक्रवर्त्ति हरीहर हलधर मंडलीक तलवर खांन सुलतान है, एक जिनमतनय जाणेविन सब जीव कहत तिलोक लोक भ्रमत अज्ञान १५, अथ उद्यमवादी वचन, कहत उद्यमवादी कर्मसें न होत कछु होत है उद्यम काम उद्यमही सार है, उ- द्यमधी शुभाशुभ कर्म सुख दुख होत उद्यमथी नया चेला सीखत तइयार है, लिखत गिणतगीत नाद चित्र उद्यमथी हाट खाट पाट पट सरव तइयार है एक जिन- मतनय जांणे विन सब जीव कहत तिलोक लोक इवे मझधार है, १६, लेउ धातू तिल्ली तेल द्धी लूणी पर मेल उद्यमधी भिन्न होत धातुनको खार है, उद्यमी हलखडै नाज बोवे धरतीमे उद्यमथी काट खटा मांडी देतडार है, उद्यमधी तुस दूर करके पीसत पुन उद्यान रसोईकर खाय नरनार है, एक जिनमननय दिन सब जीव कहत तिलोक लोक हूये मझयार है, १७, उद्यमथी तपजप नित्तनेम पानध्यांन गृह । शम डांट- कर होत अणगार है, धन घाती दूर होन नात है उद्यम कर्म अंगज कहीं जै तास कर्म किन्तार है, उद्यमसे कराव धनधान्य योग भोग गढकोट सबकाम उद्यम णतन नयज्ञान कौनतंत मार है, बच को , ५ या. सक जाणिये न दक्षताको सुद्धनय जांणेविना जाणे जो गमा रहै, किसी भांत झूठो नर कहीं जै गुरूजीवाको ताहिको द्रष्टांत कहो होत निसता रहै, एक जिनमतनय जाणे विन सब जीव कहत तिलोक लोक इवे मझधार है,१९, जेसें काउ अंधलानें हाथी देखवाद गिण्यो पांव जिण ग्रयो तिणथंभ जैसो दाख्यो है, सूंड ग्राही तिण कयो दगल्लकी यांह जेसो पूंछ ग्राही कहे नाग कान सूप भा- ख्यो है, दंत ग्राही मूसलसो पेट देख चोतारेसो कहत है तिलोक लोक एक पक्ष राख्यो है, आप मन साच कहै सूज्ञतेके भाव झूठ एसें ज्ञानी एक पक्ष वाद दूर नाख्यो है, २०, सुणके द्रष्टांत शिक्ष करत प्रश्न एसो आगे पीछे छोटो वडो कोन इनमे ठानिये, गुरु कहे सांकडी सेरीमे चले पांच नर आघे पीछे छोटो वडो यांमें नहीं जाणिय, रवि शसी जीवा जीव सासू बहु बाप बेटा पहली पीछे पक्ष इंडो केसें पहला मानिये, आगे पीछे छोटा वडा तिलोक कही जे केम एकेकी व- डाई कर पक्ष नहीं ताणिये, २१, जेसें पांच अंगलीसें लेते हैं कवलमुख टेक आणी एकवाद दैणी नाभिडाइके, सेना मिले सर्वही रणांगण मांडेजिम सुभट समूह मिल तीतत पडाइकै, धनुप पणछ तीर न्यारी रहै जवलग तवलग मारे नहीं खेचेंना चढाइके, एसें पांच मिल्यां- विन काम नहीं होत कछु कहत तिलोक एक दीजै नव- डाइकै २२ तंतु समभाव पटकाल अनुक्रम होत नीपजै नियतवस विघन अनेक है, उद्यम हीते तंतुवाय भुक्ता- दिक भोगे कर्म पांचु पदारथ मिल्यां होतकाज एक है, नियतीके वस हलुकी हुईनें जीव निकल्यो निगोद सेती पुन्यको विशेक है, मानुष जन्म पाय सदगुरु पास ३५ जाय कहत तिलोक वैण सुणत विवेक है, २३, भवथित तणो परिपाक भयो चेतनके पंडित वीरज उल्लसियों तिणवार है, भव्यके खभाव शिवगत गामी मुनिवर तपस्या करत अति धौतकर्म खार है, सूर वीर धीर भीर तुरत भौजलतीर केवल दसनकर टाले अंधकार है, कहत है तिलोक ऋषि पांचु पदारथ जोग शिवपुर जावै जीव होत जैजैकार है, २४, सम्वत एकोनवीस ऊपर गुणतीस वैशाख कृष्ण दशमी तिथ दिन गुरुवार के, नियत स्वभावकाल कर्मको उद्यमवाद पांचोहीको मतपक्ष कह्यासु विचार के, आज्ञाविरुद्ध होय मिथ्यामें दुष्क्रत तस्य सुरताथामें चूक जाणो लीजोथे सुधारके, कहत है तिलोक ऋपि स्यादादपचीसी कथी निर्मल होय मती सुणविसतारकै, २५, इति पंचवादी एकांत पक्ष निराकरण स्थाबादखरूपवर्णन जैनधर्म न्यायानुसार संपूर्ण ॥ ॥ श्रीसद्गुरुभ्यो नमः अथ मध्यमंगलाचरण ॥ अरिहंत चारागुण सिद्ध आठ मूलगुण सूरिके छत्तीस गुण शोभाकर राजे हैं, उवझाय शोभते पचीसगुण दु- निचीच साधु मुनिराज गुण सत्तावीस छाजे हैं, सबके मिलाय चेतें एकसो जु आठ भये धापना इनोंकी कर माला सुख साजे है, ज्ञानादिक तीनका सुमेरू वणाय भवि राम ऋदि सारक है सरव पाप भाजे है १, अथ २४ तीर्थंकरोंका गुणवर्णन सवइया ३१ सा नाभि मरु देवानंद छोडदिया सवी फंद योगधारी जिन- चंद् ममता मिटाई है, करीने करमहाण पांम्याहै अनंत ज्ञान भविक विमल भाण कुमति उडाईहै, तरण तारण स्त्रांम पोहता शिवपुर ठाम तीन लोक ठांम २ कीरत स. वाईहै, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान आदि अ- रिहंत ध्यान महा सुखदाई है, १, छोडीने सरव आध जोग लियो जगनाथ सीयल चलायो साथ अभी रस- वाणीहै, सुण २ रावराण साचो मतलीयो जाण आया निस जिनआण किरिया प्रनाणी है, पालनाख्या कर्म चंस मूल नहीं राख्यो अंस उत्तर परमहंस पांम्या निर- वाणी है, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान अजित जिनंद ध्यान महा सुखदानी है, २, वीमण वीमणजेम आगनामें गिणेएम ततखिण कियो नेम तजे राजकाज है, घातिया करम घाव केवल गिनान पाय उपगारी जि- नराज बांधी धर्म पाजहै, जीव घणा कीयारढ क्षपकनि- श्रेणी चढ पांमिया मुगत गढ अविचल राजहै, भणे मु- निचंद्र भाण सुणहो विवेकवान संभव जिनंद ध्यान अ- खूट जिहाज है, ३, देखीने अधिकरूप पर संसाधरी भूप करी चितध रचूंप वार वार वंदणा, जगर्ने अथिर जाण सुपनो सीझ्यारो भाण भयहर भगवान तोडा मोह फं- दणा, अखंड चारित्र पाल मोक्ष गया कर्म टाल साश्व- ता सदाई काल लिया सुखकंदणा, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान अंगमें हुलास आण वंदो अभिनंदणा ४ सुमति सुमतिधार कुमतने दीवी टार सुमति भजन सार जिम गुण पातहै, सुमतिमें रह्या झूल सुमतिरा फल्या फूल सुमति भूषण सूल दीठां दुखजात है, सुमति दातार सूर अंधकार कियो दूर सुमतिरा रणतूर बाजे दिनरात है, भणे मुनिचंद्र भाण सुणो विवेकवान सु- मतिरा किया धान सुमतही आतहै, ५, हींगलू वरण गात लाल मणी दिनरात जोगलियो जगतात तजी- राजरिद्धहै, तप जप खपकर पदमास जिनवर पांमि- याकेबलवर हुवा पर सिद्धहै, सुरनर इंद्रपास कीयो ज्ञानपर कास क्लेस करम नास करी, आप थया सिद्धहै, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान पद्म जिनंद ध्यांन किया नवनिद्ध है, ६, लोकांतिकसुर आय प्रति- योधे जिनराय वैठा कर्म घरमाय जगत बबूल है, काम भोग तज कीच मार लियो मोह नीच बारेई पर खदा- वीच गाजै ज्यूं सादूल है, रावरंक कर मुख काहु कीन राखै रुख शिवपुर पांम्या सुख शाश्वता अतुल है, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान सुपास जिनंद ध्यान महासुख मूल है ७, चंद्रसी वरण देह लागे दीठां धर्म- नेह उत्तम चारित्र लेह तजे लाभ वैरीहै, मार लिया मोह आप भारी तेजपर ताप तीही भवन व्याप निज आंण फेरीहै, सुरनर करै सेव रातदिन नित्तमेव हुवा निरंजन देव बाजे जसभेरी है, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवे- कवान चंदाप्रभु जिन ध्यांन मुगतिकी सेरी है ८, सुग- सीचरायनंद देही फूल अरीविंद परहरे सह फंद थया अणगार है करीने करणी हद्द मारलियो मोह मद्द पां- मिया केवल पद्द जगत आधार है, उपगार फियो अति मेट दियो मिथ्यामति पांम्या अविचल गति सुखकोन पार है, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान सुविध जिनंद ध्यान कियो सुखकार है ९ दाघज्वर रोगतात गयो मातातणे हाथ नांमदियो शीतल नाथ दियो मावाप है, जगत दुखासुंडर मनमें वैराग धर काम- भोग परिहर तजे सब पापहै, भलो उपदेश दीधो जगने शीतलकीधो अविचल गढलीधो मेटिया संताप .

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भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवांन शीतल जिनंद
ध्यांन टाले भवताप है १०, ज्ञान घोडे भगवान चढ्या
महा बलवान शील शैन्या सावधान समकित शेल है,
धीरज कटारी धार तपसारी तरवार गुणारी गुरज सार
पाप दिया पेलहै, जीत हुई जिनराय सुर नर लागा पाय
मुगति विराज्या जाय सदा सुख रेलहै, भणे मुनिचंद्र
भाण सुणहो विवेकवान श्रेयांस जिनंद ध्यान आप सुख
बेलहै, ११, वासुपूज्य जायापूत शिवपुर दिया सूत आप
घणा अद्भूत संबर कषाय है, अठ लख दशवास ली-
लामणि गृहवास परहरे मोहफास तजे लोभ लायहै,
धरीने शुकल ध्यान पांम्यापद निरवाण सुरनर रावराण
वंदेसिर नाय है, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान
वासुपूज्य जायेपूत महा सुखदाय है १२, विमल विमल
वैण अमल कमलनैण सकल जीवांरा सैण दीठां जागेपे-
महै, सुमता सिरेहै शोभ लाभ नहीं मूल लोभ समुदर
जु अण क्षोभ निरमल नेमहै, सुरनर काज सार जनम
मरण जार निरमल निराकार लिया सुखपेम है, भणे मु-
निचंद्र भाण सुणहो विवेकवान विमल विमल वैण चिं-
तामणि जेमहै, १३, अजोध्या पुरीना ईस आयु वरस
लक्षतीस जोगलियो जगदीश दयादिल आणीहै, काम
कुंभ जेम साम सारी या जगत काम जीव घणा ठाम २
किया गुणवाणी है, सुखदाई सुरतर पारसजु गुणकर
अजर अमरपुर थया निरवाणी है, भणे मुनिचंद्र भाण
सुणहो विवेकवान अणंत जिनंद ध्यान शिवकी निसाणी
है १४, धर्मनाथ धर्मधार कीयो घणो उपगार उपदेश
दियो धार मोटा किर पालहै, उघाड्या अंतर नेत किया
घणा सावचेत पर उपगारहेत वांधी धरमपाल है, धर्मखे

वो पारकी धो अदभूत लाभ लीधो अनोपम जान दीयो दीनके दयाल है, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान धर्मनाथ ध्यान धरो तिरे भवजाल है, १५, खट खंड सिरदार चोसठ हजार नार हयगय परवार अखूट भंडार है, अनुत्तर कांमभोग आय मिले पुन्ययोग क्षमा २ करे लोग कीरत अपार है, एसी ऋद्धि- तणो थाट तजलीनी शिव वाट आहही करमकाट हुवा सिद्धसार है, चंद्रभाण चितधार शिक्षकहै, हितकार संतनाथ तंतसार जपो जैजैकार है, १६, चवदै रतनसार अदभुत गुणकार नरवर अज्ञाकार बत्तीस हजार है, पोडस हजार सुर अज्ञाकारी तंतपुर पटखंड नरवर साराही सिरदार है नाटक बत्तीसविध रिद्ध सिद्ध नवनिद्ध सहु छोडी हुवा सिद्ध लीया सुख प्यार है, भणे मुनि चंद्रभाण सुण हो विवेकवांन कुंथुजिनंद- ध्यांन तारत संसार है, १७, चउअसील खचाज इतारूडा गजराज पियादल सबसाज छिनवैक रोड है, छिनचक- रोडगांम चोसठ हजार वांम पासवान दूणीतांम रहे कर जोड है, एसी ऋद्धितजकर जोगलिया जिनवर अ- जर अमर पुर गये करम तोड है, भणे मुनिचंद्रभाण सुण हो विवेकवान अरिनाथ ध्यांन कियां मिटे करम कोड है, १८, विरकत रह्या आप जगको न लागो पाप परि हरै सहताप बैठा धरम पोत है, द्यावंत खंतदंत गुण तणो नहीं अंत उपगारी अरिहंत, टाली मिथ्या छोत है, घटमें गिनान घाल काढीया करमसाल धरममें रहै लाल लीनी शिव जोत है,भणे मुनि चंद्रमाण सुणहो विवेकवान मल्लि जिन ध्यान किया निरमल होत है १९, धीसमा जिनंद राय सांवलीसरतकाय चारित्रसुं चित्तलाय तजेठाट है, अरीसंसु यथा तत्त जिनमत परमत उपदेश जगपत मा. यातणोमाट है, पातक पिंडलहर घटमें उद्योतकर जीवघणा जिनवर घाला शिववाट है भणे मुनिचंद्रभाण सुणहो विवे- कवान मुनि सुव्रत ध्यान कियां मिटै करम काट है, २०, राजरिद्धि परिहर जोगलियो जिनवर डिग्या नहीं तिलभर मेरु अडिग्ग है, मिथ्या मत अति घोर फैल रह्यो चिहुं ओर ताहीको काटण जोर निरमल खग्ग है, थापि याती रथ चार तारथा घणा नरनार शिवपुर पांम्यासार सुखको नथग्ग है, भणे मुनिचंद्र भांण सुणहो विवेकवान नेमि जिन ध्यान कियां नासेकरम ठग्गहै, २१, समुदर विजै- नंद बाई समाजिन चंद सांवली सुरत इंद बाल ब्रह्म- चारी है, पशुवांनी सुणीकांन ततखिण बाली जान वार २ कह्यो कांन एसी क्या विचारी है, नारी तणो मारे नेम मुगतसुं लागोपेम राजीमती रहनेम हुवा जोगधारी है, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान नेम जिन ध्यांन कियां महा सुखकारी है, २२, नोकाररत्नमांन स- मरता सुरत भान पटकाया दियो दांन तजी धनरास है, वडभागी वीतराग गुण तणो नहीं धाग यथातथ्य जिन माग कीयो परकास है, मोक्षगया कर्म तोड जगमें की- रत कोड सुरनर ठोड ठोड समरत पासहै, भणे मुनिचंद्र मांण सुणहो विवेकवांन पारसजिनंद ध्यान कीयां शिव- वास है, २३, चोईसमा महावीर सूरवीर महाधीर वाणी मीठी खांडखीर सिद्धारथनंद है नागणीसी नार जांण घटमें वैराग आण जोग लीयो जगभांण छोडा मोह फंद है, चवदे हजार संत तार दियो भगवंत करमोंका किया अंत पांम्या सुखकंद है, भणे मुनि चंद्रभाण सुणहो विवे- कवान मरावीर जपै जन उपजै आनंद है,२४, तीर्थंकरवी- सचार गुण तणो नहीं पार मेरी बुद्धि अनुसार कीया ये यखाण है, सवइया पचवीस गाया गुण जगदीशभ- भणे गुणे निसदीस करत कल्याण है, संवत अठारेवास पचावन माघमास सुदि पांचम फले आस बार भला भाण है, भणे मुनि चंद्रभाण सुणहो विवेकवान चोवीस जिनंद ध्यान महासुख खाण है. इति चउवीस जिन- स्तुति भीष्मपंथी चंद्रभाणजीकृत संपूर्णम् ॥ [अथ मुनिगुण ३२ सवइया ३१ सा ] ॥ पापपंथ परिहरे मोक्षपंथ पगधरे अभिमांन नहीं करे निंद्याकू निवारी है, संसारको छोडयो संग आलस नहीं है अंग कर्मासुं करे जंग मोटा उपगारी है, मनमांहे नि- रमल जेहयो गंगाको जल काटे है करम दल नवतत्व धारी है, संजमकी करे खप वारे भेदे तपेतप एसे अण- गारताळू वंदना हमारी है १ ज्ञानकरी भरपूर विकथासुं रहे दूर तपस्या करण सूर मोटा अणगारी है, तारण तरण ज्याज आतमाका सारे काज दोष सेती आणे लाज गुणांरा भंडारी है, छोड़ी सब खोटी मत चोखी राखे समकित निरवद्य बोले सत्त झूट परिहारी है, देई सुद्ध उपदेश घालत हे या मे रेस एसा अणगार ताईं वंदना हमारी है, २ तन सहे गीतताप जिन जीरो जपे जाप कर्म मल देवै काप बहुत विचारी है, छोडदियो धन धान ध्यावे हे शुकल ध्यान सूधार है सावधान कु- मति विडारी है, सुनाघर समधार नकरे देही की सार शील पाले खग धार विपय दूरवारी है, राग देप मल दोय निरमल होवै धोय एसा अणगारताकू चंदना ह- मारी है,३ क्रियाको कयाण कीघ दद्यातणा पंध दीघ " ६ मा० स० ४२ - साचरी पणछ सीध बहोत करारी है, तपस्याका किया वाण इा निशाण जाण वाज्या हे मधुरी वाण ध्यान की कटारी है, समकित सेल झाल ज्ञान घोडे चढया लाल धीरज की करी ढाल क्षमा तरवारी है शीलसे न्यालई लार कमासु करे राड एसे अणगारताकू वंदना हमारी है, ४ परीसा ऊपनां धीर हुवै नहीं दिलगीर सैठा रहै सूरवीर हेपन लिगारी है, ममता नांही शरीर पर जीवां जांणे पीर सचित्त न पीवै नीर पाप परिहारी है, मारण कर्म मीर तपस्याका वावै तीर राखे नहीं तक- सीर आतमाकू तारी है, मान पेचे राखी मीर कोडी नही राखे तीर एसे अणगारताकू वंदना हमारी है,५ अखंड आचार पाले दोप सब दूरे टाले जामण मरण जाले ममताकू मारी है, तप करी तनगाले नारी सामो नहीं नाले विपे दृष्टि पाछी वाले विशुद्ध विचारी है, छोडदियो रंग नाद करे नहीं परमाद चखे अनुभो को खाद उद्यत विहारी है, बस करे तन मन वाले हे करम वन एसे अणगारताकू वंदणा हमारी है, ६ ज्ञान ध्यान रहै लीन जमुनाके मांहे मीन प्रवचन रस पीन शुद्ध गु- णधारी है, इंद्री पांच वसकीनडाह्या घणा परवीन देव गुरु धर्म तीन विशुद्ध विचारी है, देहीने पाडत क्षीण हुवै नहीं खिण दीन कर्म काटे छीन छीन धर्मके बेपारी है, यथातथ्य पंथ जिन मुगतका सुत दिन एसे अणगार ताळू वंदना हमारी है, ७ जिन जीको लीयो धम्म मेट दियो मिथ्या तम काम भोग दिया वम तजी ऋद्धि सारी है, साकर काकर सम गाल बोल्यां खावै गम दीना है आतम दम क्षमा गुण भारी है, वाईस परीसा सम सहे मुनि एकदम जाको काखू करे जम कुगति विडारी है सिद्धांतमें रहे रम चाले नहीं धम धम एसा मुनिराज ताकू वंदना हमारी है, ८ मुगति कालेइ मग जोयरमेले पग तन मन राखे दृग तजी सब जारी है, ज्ञान ध्यान रहे लग गुणांरो नहीं छैथग्ग उपदेश देवे जग कुमति विसारी है, दुर्जन नर बग गालबोल्यां मुख अग हुवै नही धग धग खमता अपारी है, तपस्याको झेल्यो खग्ग मारण करम ठग असे अणगार ताकू वंदना हमारी है, ९निरवद्य बोले बैण सकल जीवारां सैण चारनमें पावै चैन आतमा सुधारी है, निरवद्य सेवे लेण वसराखे नि- जनेण नारी सब जाणे वैण शुद्ध ब्रह्मचारी है, साचो जाणो मत जैन वीजा सहू माने फेन उपदेश देवै ऐन जग हितकारी है, ध्यान धरे दिन रैण समजांणे वैरी सैण ऐसे अणगार ताकू वंदना हमारी है १० करणी करै कठिन दुरवल करे तन तिरे है कर मरन चोकडी घटारी है, अशुद्ध न लेवै अन्न कुकथा न देवै कन्न धूड समजाणे धन्न समता तो सारी है, मारिये दुसट मन गावे सब शुद्ध गण हटे नांही कीर्त्त धन महिमा वधारी है विलंबन करे खिन ज्ञान भणे भिन भिन एसे अण- गार ताकू चंदना हमारी है, ११ अकल बहोत ऊंडी साचो पंथ लियो ढूंढी रात दिन ताकी हुंडी प्रभुजी सि- कारी है, ज्ञान तरणी घणी पीक भिन्नरपाडे तीक सदा र निरभीक माया सब डारी है, क्या लीस दोप टार निरदोप लेचे अहार संजम रो रहे भार लडे नलिगारी है, तप तेज रहे दीप परीपहकू लेवे जीप असे अणगार ताळू वंदना हमारी है, १२ दिलसाफ निसदिन भजंत है भगवन मिथ्या सेती दूर मन मुनि गुणधारी है, अशुद्ध न खावै अन तप कर दहेतन कोडी नहीं राखे धन छत्ती n .

४४ . ऋद्धि छांडी है, धरत धरम धन छांडे नहीं एक छिन गौतम ओपमगिन धीर गुणधारी है, भलो उपदेश भन जुगतिसुं तारे जन एसे अणगार ताकू वंदना हमारी है, १३ तजय चंपेल तेल मांन सव दियो मेल विपरूप विपे वेल उपरथी उपाडी है, वधारे धर्म देल परीसाकू लेवे मेल खेलत उत्तम खेल साचा सुविचारी है, इंद्रियांकू देवे गोप क्षमासु रह्या है ओप करे नहीं मूलकोप गिरवा अपारी है, सदा रहै निरलेप काकू देवे खेप ऐसे अ- णागार ताळू वंदना हमारी है, १४ भगवंत ज्ञांनभेट, सुरत लगाई ठेट, मिथ्या मत दीयो मेट, अखंड आचारी है, शशि जिम दीसे सोम हुवै नांही प्रति लोम संथारों करे छै भोम या अधिकारी है, दिखाडत सुद्धराह स- कल जीवानां नाह मेट देवे भवदाह आतमा सुधारी है, विरकत रहे सदा लोभ न धरे कदा एसे अणगार ताकू वंदना हमारी है, १५ दिलसाफ निसदिन भजत है भ- गवन मिथ्या सुर नाणे मन एसी इकतारी है, अधिक न खावै अन तप करी दहै तन कोडी एक नहीं कन छती ऋद्धि छारी है, धारत धरम धन छोडे नहीं एक छिन गोसुत ओपमगिन धीर गुणधारी है, भलो उपदेश भन जुगत मुंतारै जन असे अणगार० १६ मिथ्या मोह उनमूल हिंसा तजी लघु थूल झूठ नहीं बोले मूल तजी सव चोरी है, परिहखो मैथुन, नवविध तज्यो धन राते नहीं भखे अन धरमका धोरी है, सुगुरूकी पाले सीख कुपँडै न भरे वीख भमरा ज्यू लेवै भीख तजी सव जोरी भिन्नरभाखै भेद मूल नहीं करै खेद, एसे अण०१७ पर छन परगट मारे नही काय पट कूडरूंख देत कट सत समसेरी है,वरजीने मनवट उनमूले मदअटकायासै

४५
तजी कपट ग्रंथरासगरी है, विचरत योगवट नभपर जे
मनट तपैं लही भवतट आतमा उजेरी है, घणो साफ
करी घट रहै जिन नामरट, ऐसा अण० १८, ज्ञान घोडे
असवार हवा सन्तअणगार सिझायना वाजासार विधि-
सुं बजाय , संजम सिनाह दोप अधिक रह्या छै ओप
दया आउघ अनोप कर मै संभायनें, दांन शील तप
भाव चारों मोटा अमराव साधे हवा सम भाव मन मै
उमायनैं, मुगति किल्लारे मांय जंगकरी वैसे जाय, ऐसा
अण० १९, काटत करमदल छोडदीया सब छल परिहरै
फूल फल जोवै नहीं आरसी अनुकूल प्रतिकूल परीसहा
पर बल अपना रहे अचल सोही काज सारसी, मेटे मोह
मिथ्या मल ग्यानतणी अटकल सीखाई ने परघल संसा
सब टारसी, आणीने संतोप जल मेट दीवी लोभ झल
ऐसा गुरुधारो जीव तिरे सोही तारसी, २० संसार
नीत जीलील सिद्धांतमे करी झील साचै मन पालै सील,
नहीं जोवै नारसी, दुरवल करी देह गिरवा गुणारा गेह
न्याती हूं ती तज्यो नेह माया जांणै छारसी, आतमारा
दाल दोष कर मांरो करै शोप मगतराडक मुनी वेगाइ
बजारसी दातातूंम रंकराव सहू सेती समभाव एसा
अणगार सही तिरे सोही तारसी, २१, भाव नीद गई
भाग जंबू जेम उठया जाग विधि सुंलीयो वैराग छती
ऋद्धि छोडनें, निमी यणी तजी नागरंचकन धरैराग तेम
जगदियो त्याग मायादल मोडनै, अन्तर बुझाई आग
लवलेस नहीं लाग दिलरा मेटण दाग तपैतन तोडना,
वास करी मन वाग मालत मुगत माग ऐसा अणगार
इस जपुं कर जोडने, २२, झीणो जिन मत झाल सोधि-
या भीतर साल मुनी भए तज माल चित जाणै चन्दणं,

४६ लग्यो ज्ञान रंगलाल चालै ऋपतणी चाल सखरा लेवे सवाल नखरनि कंदणं, अनोपम ज्ञान आल खेलत उ- त्तम ख्याल वेग शिव करे भाल नमी नाभिनंदणं, घण दढ धाव घाल पापरिपु दैतपाल ऐसा अणगार ताकू वारबंदणं, २३ अङ्गे धरी उछरंग सुंदरी को तजै संग भाव नहीं करै भंग कुल सोभ करसी, आगम अरथ अंग चित माहै धरै चंग ज्ञान जिसो तोय गंग दया मग दरसी, राचत सक्षम रंग अरिहंत धरै अंग जोरावर करी जंग पाप पर हरसी, लीयां फिर जैनलिंग रहै सदा एक- रंग एसा अणगार इस वेग शिववरसी, २४, सिद्धान्त का बैणसुणी माया तज हुआ मुनी गिरवा बहोत गुनी अंगमें उल्लासता, भिन्नरज्ञान भणी चोखा गुण लेतचुनी दया करतारै दुनी भला वैण भासता, हरखत पाप हनी घटमे अकल घणी, धारै जिन राजधणी दुरमति चासता, गीत नाद तुछ गिणी, याल दैतकाम भणी ऐसा अण- गार एसे सुख लहै सासता, २५, उरसें गयो अन्धेर ग्र- न्थरा सदीयी गेर फाहि नांहि धरै फेर सूर वीर सतमें, मन दृढ जेममेर शत्रुअघ पर सेर हणत है हेर हेर मुनी जिन मत मैं, साही सत्त समसेर घोर काल लीयो धेर जमहकू कियो जेर चतुराई चित्तमें, भगवंत वैण भेर बजायत्त बेर बेर एसा अणगार इस गछै शिवगत मैं, २६, परम धरम पांम वरजत भाव वाम हणने हियारी हांम ओर तजै दामकू, गच्छत नगर गांम ठहरै नहीं एकठांम जतना सूं राखै जाम कामी करै कामकू, घोर नार कीरी धाम तप करी टालै ताम निसदिन सिरनाम समरत सांमकू, सूरपणे संगराम करीनै सुधार, असा अणगार थे सिधावै शिव च re ४७ जीरकाट वहै शिवपुर वाट आंणै नहीं मद् आठ निरम- ल नेम है, व्रत धर तजी खाट परदत्त सेवै पाट आणे नहीं अब चाट सुर अन्त सीम है, दुरमत दीवी दाट मया या तणा माट थिर करै नरथाट हीयो ठाढो हेम है क्षमता खजाना खाट कर्म रिपु देवै काट ऐसा अण- गार ताकू मेरी तसलीम है, २८, सहु मेट दीवी संक फीही कारी फक फक वर जीने मन वक रेड दीवी री- सकू, पर हर काम पक करै नांही फेर कंख रागदेष करी रंक काट दे कलीसकू, अरीतणो खोवै अंक टालो नहीं करटंक देतहै मुग तडक जपैजगदीसकू, अंजे मंजे नहीं अंख सोहै जेम दूध संख नमो सह नर नार असे मुनी ईसकं, २९, समकित हिय शुद्ध बहुत घट भई बुद्ध रीट जेम तजी रिद्ध ममता मिटायने, दिलसाफ जेम दूध नि- रमल गुणनिध विद्या भणे विध विध आलस उडायन, मार देत मोह मद कार नहीं लोपे कद् हेत कथा कहै हद कापी है कपायन, पूजीने परम पद रिपुकर देतरद ऐसा अणगार ताकू वंदू सिर नांय, ३०, वुझाई भीतर आल कापदीयो मोहजाल सिद्धन्तर चल ढाल खुली ज्ञान जोत है, माया नहीं राखै मूल किमही मैं बोले कूड भवि जीवतणी दूर टालै मिथ्या छोत है, अंगधी आलस छोड गांमपुर ठोर ठोर जिनवर तणो जोर करत उद्योत है, सुरत मुगत मांहि और बंछा करै नांहि ऐसे अणगार ताकू हमारी डंडोत है, ३१ जगतरी तजी बुद्ध आतमांसे करै युद्ध तार वाने भयोवृद्ध अखंडत पोत है, सण जेम देतसीख मीठो जेम दूध ईख तंतयात तहतीक मिथ्या तम खोत है, रातदिन रूडी रीत प्रभुजीसुंधरी प्रीत गावै रुडा गुणगीत तज्या सव तोत है, विचर ज- लग्यो ज्ञान रंगलाल चालै ऋपतणी चाल सखरा लेवै सवाल नखरनि कंदणं, अनोपम ज्ञान आल खेलत उ- त्तम ख्याल वेग शिव करे भाल नमी नाभिनंदणं, धण दह घाव घाल पापरिपु दैतपाल ऐसा अणगार ताईं वारश्चंदणं, २३ अङ्गे धरी उछरंग सुंदरी को तजै संग भाव नहीं करै भंग कुल सोभ करसी, आगम अरथ अंग चित माहै धरै चंग ज्ञान जिसो तोय गंग दया मग दरसी, राचत सञ्जम रंग अरिहंत धरै अंग जोरावर करी जंग पाप पर हरसी, लीयां फिरै जैनलिंग रहै सदा एक- रंग एसा अणगार इस वेग शिववरसी, २४, सिद्धान्त का वैणसुणी माया तज हुआ मुनी गिरवा बहोत गुनी अंगमे उल्लासता, भिन्नरज्ञान भणी चोखा गुण लेतचुनी दया करतारै दुनी भला चैण भासता, हरखत पाप हनी घटमें अकल घणी, धारै जिन राजधणी दुरमति त्रासता, गीत नाद तुछ गिणी, बाल दैतकाम भणी ऐसा अण- गार एसे सुख लहै सासता, २५, उरसें गयो अन्धेर अ- न्थरा सदीची गेर फाहि नांहि धरै फेर सूर वीर सतमें, मन दृढ जेममेर शत्रुअघ पर सेर हणत है हेर हेर मुनी जिन मत मैं, साही सत्त समसेर घोर काल लीयो घेर जमहूकू कियो जेर चतुराई चित्तमे, भगवंत वैण भेर यजायत्त बेर घेर एसा अणगार इस गछै शिवगत मै, २६, परम धरम पांम वरजत भाव वाम हणने हियारी हांम ओर तजै दांमकू, गच्छत नगर गांम ठहरै नहीं एकठांम जतना सूं राखै जाम कामी करै कामकू, घोर नार कीरी धांम तप करी टालै ताम निसदिन सिरनाम समरत सांमकुं, सूरपणे संगराम करीनै सुधारै काम असा अणगार थे सिधावै शिव धामकू, २७, कुमत जं. , !

[अथ वैराज्ञ स्तवन] । यो जुगलाल सुपनकी माया इणपर क्या गरवाणारे, थारी घटगई आय रहण नहीं पावै क्या राजाक्या राणारे यो०१ करमका चराचर मुख निरखै रूप देख हरखाणारे सुंदरनार खडी मुख आगे छेवटवास मसाणारे यो०२ गादी वैसगरच अतितोले बोले मगज भराणारे अंतर- ज्ञान इतो नहीं सझै आखर निपट पयाणारे यो० ३, कर २ कपट निपट धन जोडयो संच२इकदाणारे मद छ कियो मनमे न विचारे छेवट माल विराणारे यो०४,थोडा दिव- समें कर्म बहु वांध्या कर २ ने कमठाणारे पोढणकाले पोहतो परभव ठाली पट्या ठिकाणारे यो० ५, विवखित पुरुष सीसतल छाणा जांणे घेवर पेट भराणारे उडगई नींद खुलगई अंखिया अंतछाणाका छाणारे यो०६ सुप ने राजलियो सब जगको सिरपर छत्र ढुलाणारे योगी छन्नपति रंक जाग्यो मांगरअन्न खाणारे यो०७ रतनचंद जुग देख ये थिरता निजगुण मन ठहराणारे अलपलख्यो सद्गुरु वचनानं पुदगल भरम मिटाणारे यो०८ इतिपद।। [चौवीस तीर्थंकर स्तवन लिख्यते ] ॥जैजिन ओंकारा प्रभुरट जिन ओंकारा जामण मरण मिटावो प्रभुजी कर भवोदधि पारा [जैजिन ओंकारा०] केवल लोक अलोकं प्रभु तीर्थंकर पद धारा प्रभु ती. तिलोक दयाल जग प्रतिपालं गंभीरं भारा [जैजिन ओं- कारा० १,] कर्मदल खंडण सिवमग मंडण चंदण जिम शीलं प्रभुचं० छचकायाना रक्षण मनरूपी भक्षण ततक्षण अमीलं, जैजिन० श्रीऋपभ अजित शंभव अ- वा० स० ४८ गत मांहि प्रतिबंध करै नांहि ऐसा अणगार ताकू ह- मारी डंडोत है, ३२, ऐसा सन्त अणगार तरण तारण हार नमो सहू नरनार पूरा गुणपात है, साची सीख दैतसूल कुपंथ न पडै भूल सुमत मैं रहै झूल समकित आत है, सवइया बत्तीस सार गाया गुण अणगार आ- गमकै अनुसार यथातथ्य बात है, भणै मुनि चन्द्रभाण सुणोहो विवेकवान बत्तीसी उल्ट आण भणियां दुख जात है, ३३ इति पदं ॥ " [अथ सीख कुंडलिया] ॥ दद्यारसब कोईक है, दया न जाणे मर्मसाठ दयाकै नाम है, दशम अंगमें शर्म, १, दशम अंगमं शर्म द्रव्य और भावदया है, खदया परदया जांण निश्चय व्यवहार लया है, हैखरूप अनुबंध दयाके आठही भंगा, समझ करै जो दया लहै वो मुक्ति प्रशंगा १ तप जप संजम व्रत नियम क्रिया कष्ट भरपूर जिन वचलोपक पुरुषकै मोक्ष नगर है दूर १ मोक्षनगर है दूर जमाली संजम पाला गौतम जैसी क्रिया दोप सब दूरे टाला कहै राम ऋद्धिसार एक जिन वचन उठाया फिरा बहुल संसार त्याग कोई काम न आया, २ साधू उसका नाम है सूधादै उपदेश नयनिक्षेपे सरद है फिर सामान्य विशेष १ फिर सामान्य विशेष, भक्ति जिनवर की सारे, मन कल्पित नहीं कहै, पंचागी दिलमें धारे, भगवती अंगप्रमाण होय नहीं मतका दंभी, शुभ- योगमे परवर्त पुरुपवो निरआरंभी, ३, [अथ वैराज्ञ स्तवन] ॥ यो जुगलाल सुपनकी माया इणपर क्या गरवाणारे, थारी घटगई आय रहण नहीं पावै क्या राजाक्या राणारे यो० १ करमका चराचर मुख निरखै रूप देख हरग्बाणारे सुंदरनार खडी मुख आगे छेवटवास मसाणारे यो०२ गादी वैसगरव अतितोले योले मगज भराणारे अंतर- जान इतो नहीं सूझै आग्वर निपट पयाणारे यो०३, कर २ कपट निपट धन जोडयो संचरइकदाणारे मद छ कियो मनमें न विचारे छेचट माल विराणारे यो०४, थोडा दिव- समे कर्म बहु वांध्या कर २ ने कमठाणारे पोढणकाले पोहतो परभव टाली पड्या ठिकाणारे यो०५, विवखित पुरुष सीसतल छाणा जाणे घेवर पेट भराणारे उडगई नींद खुलगई अंखिया अंतछाणाका छाणारे यो०६ सुप ने राजलियो सब जगको सिरपर छत्र दुलाणारे योगी छत्रपति रंक जाग्यो मांगरअन्न खाणारे यो०७ रतनचंट जुग देख ये थिरता निजगुण मन ठहराणारे अलपलख्यो सदगुरु वचनातूं पुदगल भरम मिटाणारे यो०८ इतिपदं॥ [चौवीस तीर्थकर स्तवन लिख्यते ] ॥ जैजिन ओंकारा प्रभुरट जिन ओंकारा जामण मरण मिटायो प्रभुजी कर भवोदधि पारा [जैजिन ओंकारा०] केवल लोक अलोकं प्रभु तीर्थकर पद धारा प्रभु ती० तिलोक दयालं जग प्रतिपालं गंभीरं भारा [जैजिन ओं- कारा० १,] कर्मदल खंटण सिवमग मंडण चंदण जिम शीलं प्रभुचं० छचकायाना रक्षण मनरूपी भक्षण ततक्षण अमीलं, जैजिन० श्रीकपभ अजित शंभव अ- ७ वा.स.

५०
भिनंदन शांती करतारा प्रभुशांतिक० सुमति पद्मसु
पास चंदा प्रभु चंद्र जतहारा जैजि०३, सुविध शीतल
श्रेयांस वासुपूज्यखामी प्रभुवासुपूज्यसामी विमल
अनंत श्रीधरम शांतजी सायर गंभीरा जैजिन०४ कुंथु
अरि मल्ही मुनि सुव्रतजी तीन भवन स्वामी प्रभु तीन०
नमि नेम पारस महावीरजी पंचम गति गांमी जैजिन ओं
५, गोतमादिक गणधर गणधर मुनिसेवा प्रभु गण.
वखाण सुणता मन आनंदा जोनर ले मेवा जैजिन०६,
जीव आराधे जिनमत साधे पामे सुखठामं प्रभु पामे-
सु० नंदलाल तेही गुण गावै जोजिन लै नामं जैजिना
७ इति पदं ॥
-
[अथ नेमनाथजीकी लावणी लंगडी चालमें, ]
॥ प्रभु नेमनाथ त्रिभुवनतात जगमें विक्षात महिमा
भारी, राजुलसी नार दीवी पलमे छार लिया संजम
भार आतमतारी, टेर, सिवा देवी मात समुद्र विजै तात
जादवकी जातमें अवतारी, महोछवकी वात इंद्रादिक
आत क्या मंगल गात छप्पन कारी, द्वारकाके नाथ कि
रसनसे भ्रात दिलमें हर खात जो अतिभारी, घर घरकी
नार गाये मंगलाचार करकै शृंगार सखियां सारी, दिन
२वधाय जोवनमें आय ठाढा कहाय है सुखकारी राजु
लसी नार० १, एक रोजकी वात किलोलमें आत लिया
धनुप हाथ किया टनकारी, सुणीकृष्ण वाज आये अटवे
भाज घल देखू आज ये दिलधारी, नेमीकी बांय मरोर्ड
आय मुसकी जो नांय करे विचारी, लेवेगा राज नई
संका आज क्या करणा काज हैवल भारी, बलदेव क
नहीं राज लेचे शिववाट वहै है ब्रह्मचारी, राजुलसी नार'

२, बलदेवकी वाय सुणी कृष्णराय सखीयनसें जाय यह
फुर माया, परणावो नेम कृष्ण बोलाएम सखीधरके पेम
मन हुलसाया, किरसनकी थान किये परमान नेमीकू
आणकै विलमाया, होलीमें फाग खेले धरके राग सब
सखी लाग व्याह मनाया, उग्रसेण राय जोकी कीना
लाय क्या जान सझाई भारी राजुलसी ना० ३,
मिल छपन कोड जादवकी जोड नेमी बांध मोड रथपर
चढिया, बांदे तोरण जाय सुण पशुवोंकी हाय दया चि-
तमे लाय रथ फेर दिया, तजके संसार चढगये गिरनार
सुमतीकू धार सुधरस पीया कहे राजुलसती नवभवके
पती तुम छोडो मती क्या गुना किया, मत छोडो हाय
मुझै लेयो साथ तुम दीनानाथ हो उपगारी राजुलसी
नार०४, चरसी दान दिया वनमे संजम लीया काया
सफल कीया अपणाजीया, धनराजुल नार संजमकू धार
रहे नेमि तार समझाय दिया, इंद्रियोंकू जीत तज जगकी
रीत प्रभूरां प्रीत कर ज्ञान लिया, चोपन दिन जान प्रभु
पहली आन लहै शिवथान शुद्ध काम किया, कहै कनी-
राम भज आई याम प्रभूका नाम ले चितधारी राजुलसी
नार दीवी०५, इति पदं ।
[श्रीपार्श्वनाथजीरी लावणी टेर अलखके लावणीमें,]
॥ पास जिन ऐसा देहौ पास जिन ऐसा वोहो सचा
देव मेरा पास पास नितरटुं धरूम ध्यान सदा तेरा, टेर
अश्वसेन हेराजा हेहो अश्वसेन राजा हेवो वटे तप धारी
सकलकलागुण खान जिनों घर वामादे नारी, तीन ज्ञानों-
से देहो तीन ज्ञानोंसें आये उदर मातारे सुपना दश
और चार देख माता हरखी भारे राणीराजास हेहोराणी

५२ . , जि- राजासें कहती सुपनातिण वेला पास पास नितरहूं धरूं में ध्यान सदा तेरा १ टेर, वनारस नगरी हेहोव० हेहो प्रभु आप जनम लीया, चोसठ इंदर छपन कुमारी जनम महोछव कीया, नीलचरण काया हेहोनी० देखीने हुलसे मेरा हीया, कमठ विडार नाग• ताखो धरणेदर कीया, सवी मन मोहे होकांइ दरस पास केरा, पास० २, तीस वरसां लग हेहो तीस वरसां लग प्रभु रहै घरमांही, वरसी दांन प्रभु देकर लीनो संजम सुखदाई, चाईस प. रीसा हेहोवा० प्रभु खचित लाये, तप जप करणी करकै प्रभु केवल पद पाये, करम खपाकर दिया शिवपुरमें डेरा पास० ३, दासकी अरजी हेहोदा०, प्रभु सुणियो जिन राया, किरपा करकै दीजो मुझकू शिवरूपी माया, नंद गुणगाया हेहोजि० सय काहूके मन भाया, ओर देव सय दिया छोड़ पारस चित लाया, कनीराम कहता प्रभु मेटो भवफेरा, पास० ४, इति पदं ॥ [लावणी दूसरी नेमनाथजीकी ] ॥ प्रभुनेमनाथ तजगये साथ मेकहुं कवलग यात सखी कहै राजुलनार मेरे जिनसें प्यार में जाऊं नेमके साथ सखी, टेर, थे आठ भवोंके सजन मेरे करगये गमन उत पात सखी, ना आप आये ना पाती लिखीना रखी कुछ लोकात सखी, हुये वारेमास करै सवी हास जा दिनसे चढी वरातसखी, फेरोंकी बार तजगये प्यार मन मार मार पिसतात सखी, चुप कहांसे रहुं, दुखकासे कहूं मन देखत यात लजात सखी, कहै राजुलनार मेरे जि. णसे प्यार मे जांऊ नेमके साथ सखी, १, मोहोकी झडी में सूती पडी थी जोवनमें मद्भात सखी, अव आपा सुझा मेरे दिलकुं वुझा अब निसंक गिरिकू जात सखी, रस्तेके बीच मच रहाकीच थी विर खारुत वरसात सखी, भीजे हे चीर वरसे हैं नीर सती चीर सुकाणे जात सखी रहनेम भुला ज्ञान ध्यान डुला यो देखे उघाडा गात सखी कहेरा०२ रह नेम बोल नहीं तेरे तोल है अदभुत रूप विक्षात सखी, घरमांही रहो फिर कांसुच हो सुख विलसो मेरे साथ सखी, कहै सती पिछाण सुणहो सुजाण तेरे दिल• तूं समझातो जती, संजमर्के धार फिर वंछै नार विकार तुझे है सात जती, सुण सती वैण खुलगये नैण रहनेम ठिकाणे आत सखी राजु० ३, रहनेमि वीर होगये धीर तै तार दिया मुझ मात सखी केवल उपाय शिवपुरकुं जाय करगये नाम विक्षात सखी, सती भव सुधार रहनेमि तार हुई ब्रह्मरूप सा- क्षात सखी, दाखला दिया धन उसका जिया सुण समझे उत्तम जात सखी, वीकानेर गुलजार सेहर ये राम मुनि छंद गात सखी राजु०४, इति पदं ।। [अथ श्रीसीमंधर स्वामीका स्तवन लिख्यते] ॥ महा विदेहमें चोयोआरोजिहां विराजो आप भरत क्षेत्रमें करूंजीवंदना जप सुं थांरोजाप मै तो दरसणकर- सूंजी मैतोसेवा करसूजी म्हारेरे सतगुरूजीरीमैतो सेवा करतूंजी, १, सेवाकरसुं दशणकरसुं जिकोदि हाडो धन्न, क्यातो जांणे केवल ज्ञानी, के जांणे मारोमन्न म्है- तोद० २, हंस घणादि नारी हती मुझहि वडे में तेज आ- वणरी मारी आसंग होती,तो ईन करतो जेज म्हेंतोद०३, खामीजीतो माहरो साहव म्हें स्वामीजीरोदाश वस रखा मारे हिवडे भीतर ज्यूं फूलनमे वास, म्हेंतोट०, ४,स्वामी , । ५४ जीरी सूरत मूरत वाली लागे मोय निर खंतारा नैणन धापै, वाणी मीठी होय म्हेंतोद०५, स्वामी जीतो सो- वन वरणा दिप २ करती देह नैणा दीठां लागे मीठा ज्यांरीकर सुंसैव, म्हंतोद०६, अंतर जामीरा बारणा लेऊ द्याडामें लखवार करुणा सागर किरपाकी जो भवसागरथी तार म्हेंतोद०७, खामीजीतो म्हारे मनमें, व्याप्या सगली देह, रूम रूममे वस रहामारे, ज्यूं वादल में मेह, म्हंतोद० ८, दूर दिसावर म्हारा साहब, मिलियां चाथै मन्न, पपइयो पाणीने तरसे जूतरसे म्हारो मन्न, म्हेंतोद० ९, म्हारो मनडो आवै जावै, जहां बैठा जगनाथ, भाखर भीतर कोही न गिj, नहीं गिणुं दिनरात, म्हंतोद० १०, स्वामीजी तो मिलियां पीछे, रंगमे पडगयो पास, स्वामी जीरे आगल करता, सुणसी सब अरदास, म्हेंतोद०११, म्हारेनें जिनवरजी सरखा नहीं कोइ जगमें देव, जिन- वरजी तो साचा साहब ज्यांरीकरसुं सेव म्हंतोद० १२, ओर देव म्हारे दाय न आवै, जीता रागनें ढेप ऋपि रा- यचंद इम कहे, केवल ज्ञानी एक म्हंतोद० १३, समत अठारे वरस छत्तीसे रेवाड रह्या च्यार रात सीमंधर मिं- दरजी आगे जोड्या दोनूं हाथ म्हेंतोद० १४, इति पदं ॥ [अथ सीमंधरजीरो दूसरो स्तवन लिख्यते ] ॥ श्रीसीमंधरसांम इकचित बंदू हो बेकर जोडनें पूरब- देसे हो प्रभुजी परवस्खा नगरी पुंडरपुर सुख ठाम येकर जोडी हो श्रावक चीनवै श्रीसीमंधर खाम इक- चित बंद हो घेकर जोडने, १, चौतीस अतिशय हो प्रभु जी शोभता बाणीपन रे ऊपर बीश एक सहस लक्षण हो प्रभुजी आगला जीता रागनेरीस इकचि०२, काया धारी हो धनुप पांचसे आउखो पूर्व चोरासी लाख निर वद्यवाणी हो श्रीवीतरागनी ज्ञानी अग्गम गया छैभाख इकचि० ३, सेवा सारे होयारी देवता, सुरपति थोडा तो एक कीरोड, मुझमन मांहे हो होंस बसे घणी बंदू बेकर जोड इकचि०४, आडापरवत हो नदियां अति घणी विचमे विकट विद्याधर गांम इण भव मांहे हो आयसकू नहीं, लेसुं नित उठ्यारो नाम इकचि० ५, कागद लिखू हो प्रभु थांने वीनती वंदणा वारंवार कुंदन सागर हो किरपाकीजियें वीनतडी अवधार इक- चि०६, इति पदं ॥ [अथ जंवूकुमारजी रीसिझाय लिख्यते ] ॥राजगृहीनावासीयाजी जंबूनांमक वार पभ दत्त- राडी कराजी भद्रा ज्यांरी मांय जंवू कह्यो मान ले जाया मतलै संजम भार, १, सुधर्मा खामी पधारीयाजी राज- गृहीरे माय कोणक यांदण चालियोजी जंत्रू वांदण जाय जंबूक० २, भगवत पाणी वागरीजी घरसै अमृतधार वाणी सुणी वैरागियाजी जांण्यो अधिरसंसार जंबू० ३, घर आया माता कनेजी बंदे वारमवार अनुमत दीजो मारी मातजी मातालेसुं संजम भार जंबू० ४, माता मोरी सांभलो जननीलेसूं संजम भार जंवू० ये आढूही कामणी जंबू अपछररे उणीदार परणीने किमपरिहरो ज्यांरो किम निकले जम वार जंबू०५, ये आहही का. मणी जंबू तुझविना विलखी थाय रमियां ठमियां सुनी सरे जांरो बदन कमल विलखाय जंबू० ६, मत हीणो कोई मानवी माता मिथ्या मत भरपूर रूप रमणी सूं राचिया ज्यांरा नहीं हवा दुरगत दूर माता मोरी सां.

५६ भलो जननो लेसूं संजम भार, ७, पाल पोस मोटो कियो जंबू इम किम दे छिट काय मातपिता मेले झूरता थाने या नहीं आवैमांय जंवू०८, एक लोटो पाणी पीयो माता मायर बाप अनेक सगलांरी दया पालतूं माता आणीने चित्त विवेक माता मोरी सांभ० ९, ज्यूं आधारे लाकडी जंबू तूंमारे प्राण आधार, तुझविना म्हारे जग सूनो जाया जननी जीत पराख जंबू० १०, रतन जडतरो पी- जरो माता सुओ जाणे सही फंद, काम भोग संसारना माता ज्ञानी जाणे झूठा फंद जंबू० ११, पंच महाव्रत पालणो जंबू, पांचूं ही मेरू समान, दोप ययालीस टा. लणो जंबू, लेणो सूझतो आहार, जंबू० १२, पंच महा- व्रत पालतूं माता पांचूं ही सुख सामान दोष वयालीस टालतूं माता लेसूं सूझतो आहार माता मो०१३, संजम मारग दोहिलो जंबू चलणो खांडेरी धार नदी किनारे संखडो जंबू जद् तद् होय विनास, जंबू० १४, चांद विना किसी चांदणी जंबू तारां बिना किसी रात बीर विना किसी बैनडी जंबू झुरसी वारतिवार जंबू० १५, दीपक विना मिंदर सूनो कता पुत्रविना परचार कंत- विना किसी कामनी कंता झुरसी बारूही मास बालमजी कह्यो मानलो थेतो मतलो संजमभार १६, भात पितामे लो मिल्यो गोरी मिल्यो अनंतीवार तारण समरथ कोई नहीं गोरी पुत्र पिता परिवार सुंदर कह्यो सांभलो म्हेले सूं संजमभार १७, मोह मत करो मोरी मातजी माता मोह कियां बंधे कर्म हालर हूलर क्या करो माता मोर कियां बांधे कर्म माता० १८, ये आई ही कामणी जंबू सुख विलसो संसार दिन पाछो पडियां पछे थेतोली जो संजमभार जं० १९, ए आई ही कामणी माता सम-

झाई एकण रात जिनजीरो धर्म पिछाणियों माता संज
मलेसी म्हारे साथ मातामो० २०, मात पिताने तारिया
जंबू तारी छे आढू ही नार सासू सुसराने तारिया जंबू
पांचसे प्रभव परिचार जंवू भलो चेतीयो थेतीली जो
संजमभार २१, पांचसेनें सत्ताईस जणानं जंवू लीनो
संजमभार इशारे जीव मुगते गया साधू वाकी वर्ग
मझार जं० २२, इति पदं
[ अथ माहासती चंदनवालारी लावणी
॥ सतानीक ओर दधीवाहन दोनूं राजोंके आंट पड़ी
एसी जय तकरार होय गई दो। तरफसें फोज चढी
दधि बाहन राजाजी हारगये रणसे भागे उसी घडी
सतानीक राजाने लूंटी चंपा नगरी खडी खडी, सुण)
प्यारे चंपा नगरीको लोक लूंटणे लागे, मुण प्यारे फो-
जोंके लोक धनमाल लूंट कर भागे, सुण प्यारे इक पा.
यक महलों में जो घुस गया आगे, [झेला,] इक तो रा-
जाकी पाई, इक राणी वैठी पाई, पायकके मनमें आई,
ले चलू दोनोंके तांई, नहीं लिया धनमाल बैठाय रथमें
दोनोंकू हो गया पार जिनके जनमी महासती चंदनवाला
गुण अपरंपार, टेर, रस्ता दीया छोड अजी ऊबट रस्ते
रवकू हांक्यो, घणी जो देख ऊजाड वनीके विचमें रथ
जभो राख्यो, वो पायक पापकी निजर करी राणीजी
ऊपर शांख्यो, कोप ऊठी राणीजी मनमे आज जोग
कैसो पाक्यो, सुण प्यारे राणीजी अपणो अवसर तुरत
विचारो, सुण प्यारे अठारा पापकू स्याग कियो संधारो
सुण प्यारे कर लिया त्याग पञ्चखाण यों कारज सारो,
[मेला, राणीजीको मन सुरो यो चढ्यो तेज भरपूरो,
८या०स०

५८ जीभ काट कीयो चूरो, करदियो आऊखो पूरो, करम करे सो करे न कोई सची बंधे करमोंकी लार, जिनके०२, राणीकी दाह किरीया करी, पायक कन्याळू वचन कयो, राखू तुझे बेटीके वरावर, कन्याकू विसवास दियो, मती रोय तूं मेरी पुत्री आंसुकू पूंछ अव थांभ हियो, चंदण बालाजीकू पायक इण रीते समझायरयो सुण प्यारे ओ नगरी कोसंवीमें जद् पायक आया, सुण प्यारे चंदण वालाजीकू अपणे घर लाया, सुण प्यारे कन्याकू देख पाय कणी फैल मचाया, झेला,] कन्या है रूपकी भारी, या होगी शोक हमारी, पाय कणी एसी धारी, कन्याकू वाहर निकारी, पायक कन्या वेच नहीं वेचेतो राजमे करूं पुकार, जिनके ज० ३, चंदणयालाजीकू वेचणे, पा- यक बजारमे आया, रूप देख चंदन बालाका, सवकाही मन ललचाया, मोल वताय कन्याका लोक कहै तूं कन्या वेचण लाया, वीस लाख सोनइया लेऊंगा एसा मोल इण वतलाया सुण प्यारे वैश्या बोली कन्याकू मोलमें लूंगा सुण प्यारे ये वीस लाख सोनइया तेरेकू दूंगा, सुण प्यारे कन्या का मोल मेने खरचा वड़ा जो मुंहगा, [झेला,] चंदण वाला पूछेरी, तेरी जांत पांत कह देरी, ये जात है वेस्या मेरी, मैं नगर नायका ठैरी, चंदण वाला चोली वैस्या से में नहीं आउं तेरे लार, जिन- केज. ४, हाथ पकड चंदण बालाका, वैस्या कररही खेचा ताण, मोल खरीदी मेने तुझकू अब क्यूं खाली करे डफाण, मेरे घर ले जाउं तुझकों ये कन्या अब साची जाण, रतन जडतका गहणा पहरो सुख भोगो अर मोजामाण सुण प्यारे, चंदन याला पर वैस्या जोरज माया, सुण प्यारे, नवकार मंत्रका इक मन ध्यान ल- AUQUA. HAND BHAIRL JAIN LIBRARY गाया, सुण प्यारे जद शील अधिष्ठायक देवता तुरत ही आया, [भेला, देवता तुरत जब आये, चंदरका रूप वणाये, वैस्याके संगही धाये, कन्याका फंद छोडाये, लगेल बूरण वैस्या ताई नाक कान कीया लोही आर, जिसकेज०५, वैस्या को तो रूप विगडियो, पायक रह्यो बहोत पिस्ताय, अव कन्या मे किसकू वेचूं लेनेवाला एक न आय, कन्या मोल जो लेणे आया धन्ना सेठ एक मोटा साह, धन्ना सेठजी उस कन्याका पायकसे रहे मोल कराय, सुण प्यारे धन्नाजी कहै कन्याका मोल सुणावो, सुण प्यारे पायक कहै सोनइया वीस लाख तुम लावो, सुण प्यारे एक लाख सोन इया देउं जो लेतो आवो, [झेला, कन्याकू सेठ लेजारे झट लाख सोनइया लारे, कन्या यों घचन उच्चारे, आचार सेठ क्या थारे, सेठ कहे कन्या हम श्रावक मेरे धरमका है इधकार, जिसकेज० ६, चंदण- बाला जीकू लेकर सेठ हवेली आया है, लाख सोनइया उस पायककू सेठने तुरत चूकाया है, जात न्यात ओर कुटम कबीला सेठने तुरत बुलाया है, में इसकू पूतरी कर मांनी सवकू वचन सुणाया है, सुण प्यारे चंदणवाला कू पूत्री सेठ वणाई, सुण प्यारे सेठाणी मनमे घणी खुसी जदलाई, सुण प्यारे सुखें सुखे ये वरते घरके मांही, [ झेला, सांपडरही चंदणवाला, है गले रतनकी माला, मुख ऊपर चंद्ऊ जाला, सिर लंबे केस हे काला, धन्ना सेठजी आया हवेली, पग धोवणका करे विचार, जिनकेज.७ अनो पाणी धियो होय तो, चंदणवाला इहां ले आय, ऊने पाणीसे अव पुत्री, मेरा आकर पांव घोवाय, ऊनो पाणी हाजर पिताजी, मारे हाथसूं घोऊ पाय, चरण पिताजी धो यारा, म्हारे मनमें लग रही Molyolla Marotian Bikanir ६० चाय, सुण प्यारे खोले हे पिताका मैल चरण हाथोंका, सुण प्यारे मैल खोलते छूटाकेस माथार्की, सुण प्यारे माथासें केस लटका दो दो हाथोंका झेला, धन्नाजी केस सवारा, आंख्या आडे सुंटारा, सेठाणी पाप विचारा, धनदत्तजी सामाभारा, ये मेरी सोकडली होगा मने निकालै घर सुंवार, जिनकेज० ८, सेठसिधाया गांम अजी, सेठाणी मन उठियो पाप, रीस करी चंदनवाला पर, मूंढा पर दी एक दो थाप, पकड कतरणी माथो मूंड्यो, सभी केस कर डाल्या साफ, हाथ हथकडी पां- वोंमें घेडी मूंद दई कोठामें आप, सुण, प्यारै चंदण- वालाकू मूंदी कोठा मांही, सुण प्यारे सेठाणी तो वा अपणेपी हरसि धाई, सुण प्यारे चंदणवाला पर एसी आफत आई, [झेला), म्हें केसी करी कमाई,आ पूर्व जन- मके मांही, म्हेथी राजाकी पाई, अव हाटोहाट विकाई, जेसा वांधा जेसा भोगे जीव, अव क्यूं झांके आल जं- जाल, जिनकेज०९, घणाजी वांसें चैरमें वांध्यो, घणाजी वोकं दुखी करा वैर भाव ये जीव समझले, येतो टाला नहीं दरा, महा अघोरमे पाप कीया था वृक्ष सताया हराहरा, रतन हीडोलेमें झूलेथी वहतो सुख सव रह्या धरा, सुण प्यारे चंदनवालाजी अपणा मन समझाती सुण प्यार करते लाखों पचखाण ज्ञान गुण गाती, सुण प्यारे, इस संकटमें वो जरान हीधभराती, झेला,] जद सेठ गांमसे आया, घरताला जडिया पाया, जद ताला सेठ खोलाया पाडोसण हाल सुनाया, सेठाणी तो पीहर गई चंदणवाला पर कर तकरार, जिनकेज० १०, माहावीर सामी प्रभूजी एसो अभिग्रह लीनो धार तेरा जोग मिले इक ठोडां, जिनके हाथसें बहरूं, अहार, रा- , जाकीतो कन्या होवै, मोल विकाणी वीच वजार, हाथ हथकडी पांवों वैडी, सिर मुंडा हो एसीनार, सुण प्यारे काछडो लग्यो तेलेको पारणो होवै, सुण प्यारे सूपडे आहार उडदोका बाकला जोवै सुण प्यारे सुद्ध परणामे देहलीमें बैठी रोवै, एक तो पग देहली माई, इक पग वाहर हो भाई, आ जैसी मिले जोगवाई, नहीं मिले तो लेणो नाई. इतना जोग नहीं जो मिल छच महीना भुग ते लेसं आहार जिनकेज० ११, धनजी कहै चंदण- बाला तेलेका पारना ले तूं कर, हाजर है उडदोका बा- कला, विन वरतण लाउं क्यो कर, आमा सामा लग्या देखने, ओर वरतण नहीं आयो निजर पड्यो सूपडो देख्यो धनजी लिया वाकला उसमें भर सुण प्यारे सू- पडे माहे उडदोंका वाकला लीना सुण प्यारे धन्नाजी जाके चंदणवाला दीना, सुण प्यारे, चंदणचाला हा- थोमें सूपडा लीना, झेला.] बंधन तेरा तोडाफ जाकर लुहारकू लांऊ मेरे मन मे पिस्ताउं, क्या गुण मूलाका गाऊं, महावीर स्वामी प्रभु करते गोचरी आनिकले ध- नजीकै हार जिनकेज० १२, आया देख्या सती मुनीकू, मन इनका हो गया हरिया, आहार चहरावण लगी मुनीकू महा सती सुंदर तिरिया, ओर जोग तो सब मिला पिण नेणोंमे जल नहीं भरिया, एक जोग नहीं मिला जिणीसुं वीर प्रभू पाछा फिरिया,सुण प्यारे मुनि- राज फिर गया आहार आप नहीं लीना सुण प्यारे चंदनवाला जिस घडी रोदन कीना सुण प्यारे पीछा तो फिरो म्हाराज यूं हेला दीना, [ झेला, चंदणवालाजी रोई, ये नैण वरस रहे दोई, पीछा तो फिरो निर मोही, मारे तो संको नहीं सोई, दयावंत पर उपगारी भगवान ૬૨ , सतीकी सुणी पुकार, जिनकेज० १३, सुण करुणाका बचन फिरै भगवान सती पर निजर पडी, देख रह्या भगवान सतीके दोनू नेणसे लगी झडी, जो धारासो जोग मिल गया आहार बहिराया उसी घडी, धन २ चंदणवाला महा सतीयोमें आप हो सती वड़ी, सुण प्यारे उस वख्त सतीका देवत कारज सारा, सुण प्यारे उसी वख्त सती सिणगार एसा ले धारा, सुण प्यारे सिंहासण वैठी दोनूं हाथ पसारा, [झेला, धोवांसुं दांन लगी देणे, भगवान लगे हैं लेणे, देवता लगे हैं केणे, शुभ दान लगा है वैणै, भला दान दिया भला दान दिया करे देवता जैजैकार जिनकेज०१४, साढाबारे कोड रतनोंकी विरखा हुई घणी भारी, वाजा बजा देव दुंदुभी ओर पुष्प वनकी वृष्टि हुइ न्यारी, घणा वांन कपडा वरसाया खुसी हुई दुनिया सारी, शोभा अपरंपार सतीके द्वार आये सब नरनारी, सुण प्यारे भगवान अभिग्रह कीयो देवता जाणे, सुण प्यारे सबके सुणताहितरे जोग वखाणे, सुण प्यारे देवताके कहणेसे जाणे भव्य पिराणे, [झेला,] धन्नाजी पीछा आया, घरे वडाहगाम पाया, मन मांहे अचरज लाया, एसा क्या दांन दि- राया, आनेलगे दशणकरणे धनजीकेघरसवसंसार, जिनकेज०१५, चंदणवाला कखो पारणो अपणा कारज सार दिया, धन २ पुत्री हे वडभागन धनजीकानांमउ- जाल दिया, हे वड भागण कीना थेतो अपणे कुलकू तार दिया, राग हेप अहंकार ईरखा चंदणवाला मार दिया सुणप्यारे चंदणवाला कहै अरजी एक सुणाऊं, सुणप्यारे पहली मेरी माताका दरशण पाऊं,सुण प्यारे दरशण कर पहली पीछे आहार चुकाऊं, [झेला, माता है , धर्म संघाती, म्हें मूलाका गुण गाती, मुझकू नहीं कष्ट वताती हुआ कैद पदवी पाती, सेठाणीकू सेठ बुलाई आई मूला हो लाचार, जिनकेज० १६, आवत देखी मूलाईं चंदणबाला सांहमी दोडा, करी वंदना पडी चर- णमें भी भई हाथ न जोडा, तेरा गुन नहीं भूलूं माता करमोंका वंधन तोडा, क्षमा धरममे धारन कीना राग टेप सारा छोडा, सुण प्यारे, मे ओगण गारी तूं गुणकी सागर है,सुण प्यारे.अव करो पारणो तूं सब गुनकी आग- रहै सुण प्यारे नगरीयाकोसंबी करदी उजागर है, झेला हुई मनमें घणी खुसाली, जद मूलाकै संग चाली, भोजनकी पुरसी थाली, पारणो करो गुणवाली, कयो पारणो चंद- णवाला धनजीकैघर मंगलाचार जिनकेज० १७, खोल ओरा देखे मूला रतनोंका भरिया भंडार उछव चंदण- वालाका मूलाकर रही वारमवार, वोही पायक ओर बोही वैस्या फेर आया धनजीकेदार, इस कन्याकू मोल लईमे इसधनपर मेरा इखत्यार सुण प्यारे पायक यै धनजीकू वचन सुनाया, सुण प्यारे, ए रतनवर सिया जिस पर मेरा दाया, सुण प्यारे इस कन्याकू तो मेई जहरके लाया, झेला मूलाक है वैस्या झूठी, तने मिले न कोडी फूटी, पायक तेरी किस्मत रूठी क्यूंपिये जहर- की बूंटी, मूला ओर पायक वैस्या इन तीनोके होरही तकरार, जिनकेज० १८, इतनेमे हलकारा राजका धन- जीकैघर पहुंचौ आय, छिपकरकै ऊभा हलकारा सब सुणी बात यह कान लगाय, वैस्या ओर पायक पक- डकै ले गया देख कचेडी मांय, लगे पूछने राजा इनकू कैसे खडा किया है लाय, सुण प्यारे, चंपा नगरीका राजाजीकी चाई, सुण प्यारे, में हरलाया वैची धनजीकै .

, , ६४ ताई, सुणप्यारे, पायक राजाकू एसी बात सुणाई, [झेला,] कन्या भाणेजी हमारी, पायक आसंग क्या थारी, इतनेमें भीड भई भारी, गई वैस्या निजर चोरारी पायक अपणो ओसर देखकै निजर चोर कै भग गयो वार, जिनकेज० १९, दधिवाहन राजाजी पाछा आया है चंपा नगरी, नहीं राणी नहीं पुत्री महलमें भूप करी चिंता जवरी, राजाजी परजाकू कहै अब चातसुणो पर- जासगरी, म्हारो दुखतो भूल गयो पिण थांरी घणी चिंता लगरी, सुण प्यारे, नहीं मेरी चंदणवाला नहीं मेरी राणी, सुण प्यारे, वो गई किधर थेवी कोई जाती जाणी सुण प्यारे परजा कहै राजा राणीकी खबर क- राणी, [झेला,] एक सेठ कहै चिठी आई, राजाकू वांच सुणाई, धन चंदणवालावाई, है नगरकोसंवीमाही, चंदनवालाजीकै हाथ भगवान दान बहखो ततकार जि- नकेज० २०, चंदणयाला दान दियो आ खवर पोहचगई वडी २ दूर, दधिवाहनराजा बोला, कन्यासुंमिलणो जाय जरूर, नगरकोशांबी आयाराजा हरख हुआ मनमें भरपूर, जाय मिला पुत्रीसें चंदणयालाके मुखवरसे नूर, सुण प्यारे, पुत्रीको देख राजाकोहीयो भर आयो सुण प्यारे, गदगद वाणी हो गई नैणजलछायो, सुण प्यारे, राजा कहै पुत्री अब जीव सुख पायो, [झेला, सुण चंदणवाला प्यारी, पद्मावती माता थारी, थे सांमल रहीके न्यारी, सोसाची वात वतारी, वर्तमान वरतोसो पुत्री राजाकहे कहो ततकार जिनकेज० २१, पुत्री कहै सुणो पिताजी होणहार है समरथवान, आप कठ हूं कठै मेरीमाताने तजदिया वनमें प्राण, वीच वजारे हूं वेचाणी कट रद्यो यो मांन गुमान धन्ना सेठ पुत्री कर लाया घणो वधायो म्हारो मान सुण प्यारे राजा पुत्रीसें सुणी हकीगत सारी, सुणप्यारे, राजा कहे चंपापुरीकू चलो मेरी पियारी सुणप्यारे पुत्री राजासें एसी अरज- गुजारी, [झेला,] में एसो अभि ग्रहलीनो, संसार सवी तज दीनो, ओ जोग मिल्यो रंगभीनो, म्हारो मन मैं दृढकीनो, जद केवल भगवत• ऊपजै जद में लूंगा संज- मभार, जिनके ज० २२, धन्ना सेठजी धनका बेला, भर राजाकी भेट करी, चंदण बाला मिली पितासे, मनकी पाते कही सगरी, धन्य भाग मिलगई पितासें म्हारे मन एसी लगरी, दधिवाहन राजाजी पीछा आय गया चंपानगरी सुणप्यारे, राजाजी कहै चिंताथी म्हारे मनमें सुणप्यारे राणीकी चिंता घणी लगी थी तनमे, सुण- प्यारे पुत्री से मिला जब चिता मिटगई छिनमें, [ झेला, पुत्री तो हुई वडभागी, चैरागमें इछालागी संसार तुरत जिन त्यागी धन पिरालय दया जागी, दधिवाहन राजा कहै पुत्री मातपिताकू दिया उजार जिनके ज० २३, चारा बरस साडाछव महीना छद् मसत भगवान रया इजारे वर्प पचवीस दिन इतना नपस्या मे वीत गया, इजारा मास उगणीस दिनोंका इतरा आप पारणा कीया, फिर केवल भगवानकू उपजा घणा जीवांकू तार दिया, सुणप्यारे, चंदण वाला भगवानके लागी चरणा, सुण- प्यारे मोहे दिक्षादो म्हाराज देर नही करणा, सुणप्यारे संसार छोड में लीया आपका सरणा, [झेला,] दीक्षा ले जनम सुधारा, ये पंच माहा व्रत धारा, सुत्तरकी रीतसें पारा, महा सतीज कारज सारा, छत्तीस हजार सत्यान चंदण वालासे लीया संजमभार जिनके ज० २४, उग- णीसे गुण चास साल भाद महीना एकम वुधवार, ९वा० स० रतरांम विरामण गाया चंदण बालाजीका अधकार, पांच महा व्रतधारी मुनीकू करूं वंदणा बारमवार, धन जावदकी रत भोमका जैन धरमका भरा भंडार, सुण- प्यारे अठारे पापोंकू त्यागे वडा वो त्यागी, सुणप्यारे ए पंच महाव्रत पाले वोही वैरागी, सुणप्यारे ये वाईस परीसा सहै सोही वडभागी, [झेला,ये महासती बडभा- गन, चंदण वाला वैरागन, यो तवन सतीको धन धन, गुनीपेमसें कियो वरनन, धनवो हे जैन धरमकू धार लेवै अपणा जनम सुधार जिनके ज० २५, इति पदं ॥ अथ वैराज्ञ लावणी लिख्यते] ॥ देखत भूली ख्याल तमासा बाजी गरका है खलका यो संसार धूं वेसा वादल ओस बूंद विजली चमका, [टेर,] सतगुरु शीखतूं माने क्युंनी जनम सरणका, दुख मिटता, टांनशील तपभाव आराधो, संसार समदका फंद कटता, संवर पोसा करो सामायक सुत्रसिद्धंतप- रचित्त धरता, वखाण बांणी सुणोरे सरधा पाप घदे जव पुन्य वधता, तवनसिझायां बोलो थोकडा नउं पदारथ मुखकरता, जांणपणे आ समकित फरस्यां पापकरमसुं रहै डरता इती वुद्ध जो नहीं हुवे तो नोकार मंत्रहिरदे धरता, भाव चढायां भवने छेदे मन बंछित सव सिद्ध करता [उडावणी] चवदै पूरव विद्यासारी, भाख्यो यो अधिकारी, अनंत तिरयंच तिरिया नरनारी, सरधा शुद्ध पांमे हितकारी, नोकार जप्यां उंचीगत पांमें सिवरमणी सुग्व है तबका, यो संसार धुं० १, पृ: थची अप वा तेऊ वाऊ वनस्पती वा वस काया, छऊं कायाने मार रहो है आरंभ कर र हरखाया, छेदन भे- भगवंत दन फरस वासना गालीदे दे धमकाया, जिकेजिकेनें दुख तूं देवै बैर जीवासु विसाया, झूठ चोरी मैथुन सेवा परनारीसुं विलमाया, स्वाद भोग सुखरसना पोखी पर- भव चिंता नहीं लाया, कोडी २ माया जोडी लालच लोभमे बहु छाया, आसा तृष्णा मेटी नांही करता है माया माया, (उडावणी) कृड कपट छल छेदर करता कोडीसटे हुं जा लडता, जोड २ घरमे धन धरता भायां कुटुंबसे खोटा करता, जनममरण ये बुरा जगतमें ज्यूं कंपैजीया हमका, यो संसार० २, क्रोधमान अहंकार भरा है, रागद्वेषमे रंगराता, जालफासी द्गारे फटका अनेक हुन्नर तूं चल्लाता, मैणा मोसा देवै लोकांने सा- चेने कूडा करता, वडो आदमी वजे लोकांमें मिथ्यात तुझकों सुहावता, पाप अठारे रुचरुच बांधे मोह करममे मदमाता, अनेक वस्त तूं लेवै करावै पापकी पोट माथे परता, मातपिता सब कुटंब कवीला वेटा लुगाई तेरा धन खाता, पापफरमतूं बांधे एकलो नरक निगोदमे पड- जाता, [उड़ावणी] सय मुतलवकी प्रीत सगाई, विना- सवारथ करै लडाई, घणा वल्लभ जो धाले घाई, पाप- उदे फेर नहीं कोई साई, सागर पल्योपम होता आउखा खूट जाय आतम दमका योसंसार० ३, म्हारा म्हारा कररह्यो मूरख थारा सब पेखणका है, कनककामनी कु- दमकवीला जमीघर देखणका है, ज्यूंवटाउ वासो लियो पंखी पंथपयाणा है, खरची होतो खारे मूरख आखर परभव जाणा है, मातपिता सव कुटम कबीला मिलीया जू अयाणा है, विछड जाय सब जूआ २ मोहजाल मुर- आणा है, जरदा सुपारी खानपांनमे भूदां दिन हलाणा है, खावै पीवै गप्पा मारे योही जनम गमाणा है [उडा- है समझ जीव , वणी] सोस शब्द कुछ कीनो नांही, ढोर चरे ज्यों च- रियो याही मिथ्या दृष्टकै खतो मांही. जैनधरम तुझ रुचियो नांही, मनुष्य जमारो फेर नहीं छै लोकलाज सु सैधमका यो संसार० ४, मिनख देवगत दुरलभ पांमे तिर जंचगतिमें जावोला, छउंकायामें भमता डुलतां जनममरण वधावोला, लोह वांणियो घणो पिसतायो ज्यों तूं फेर पिस्तावेला, अल्प आउखो भूख तृषाशीत धूप दुख पावेला, नर्कनिगोदमें दुख घणा ढेठेवाला, सागर पल्योपम मार नरकमें छेदन भेदन बहु ज्वाला, आंखमींच खोले तिलमातर सुख नहीं इतना काला, ससतरसूली अगन पछाडा जहर छांटमारे भाला [उडावणी ] पछाड २ जम पकडे चोटा, विकराल मुद्गर मारे सोटा, टुकडाकर २ मारे खोटा, ज्यूंदडी परलागे दोटा, काल अनंतो हुओरे रुलतां छाती नानूकी करे धवका यो संसार धुं०५, इति पदं ॥ [अथ कर्मोकी लावणी] ॥ करम नचावै ज्यूंही नाचै उंची हुवणनें सवी खसता नकसी हुवणसुं कोई न राजी निंद्या विकथा क्यूं करता [ टेर,] ओगण बादतूं बोले लोकांरा चेतन भूल है तुझ- मांही, थारे करममें कांई लिखी है, थारी तुझैं सूझै नाही, चवदै पूरव च्यार ज्ञानथा करमोंसे छूटा नांही उंचो चढकै पडे कीचडमें ज्ञांनी वचन झूठा नाही, पाप उमे आवै चेतन फिर संभणी आवै नांही, पुंडरीक गोसालो देख जमाली खोटी व्यापै घटमांही, [उडावणी ] मोह छाझमोटो मदपीमे, ओगण औरोंका तूं क्यों घीसे, थारा ओगण तुझको नहीं दीसे, अनेक ओगण या,थारी , , आतमा ज्ञानीवचन पकडो रस्ता, नकसी हु० १, पाच प्रकारे काम भोगतूं सेवे सेवावै सारा करता, शब्दवरण गंधरूप फरसतुं जहर ग्वायकै क्यूं मरता, आछी भूडी कथा लोकांरी करतां आतम भारी करता, केने सराव फेने विसरावै हरख २ आनंद धरता, आपछै ओर चं- चूल चाचे, आंबरस मुखकिम पडता, रोग सोग दुख कलह दालिदर दुखमें दुख पैदा करता, [उडावणी] धारी म्हारी करतां दिन जावै, आमा सामा भाठा भि- डाचे, सुखमे दुखतूं बैर घलावै, ज्यूं दीपकमें पड़े पतंगा चेतन दुरगति क्यूं पडता, नकसी० २, #तरो तूं क्या सरावै, अणहूंतका विसराता है, पुन्यपाप जो वांधा जी- वने वैसाही फल पाता है, किणने माया दीवी भोगणने कोई रुखवाली करता है, जस अपजस जो लिखा कर- ममें जैसा करज बनाता है, पाप अठारे सेधाजीवरे इणमे सपही फसता है, स्वाद वाद सुखकांम भोगमे कूचापु. नोका करता है, [उडावणी] रुच २ पाप बांधे तूं सोरा, उदे आयां भोगता दोरा, लखचोरासी भुगते फोडा, आकथोर ओर तुंचा नियोली पापफल कडया लगता, नकसी०३, विपाक सूत्रमे मिरगा लोढो देखो पाप उदै आया, हाथ पांच मुख आकार नाही राजा घर बेटा जाया, जीमण पाणी एकही सुरमे झाडा नाडा उणमे लाया, जो नदीको टोल सुमारे इनखा खेउन धकाया, नरक सरीखा दुख जिनभाख्या मलमूत्रमे लपट रहा, अत्यंत दुर्गध जगा गंधावै भवरे मांही ढकारहा, [उटा- वणी] गाडी भरियो आहार करावे, उण भवरेम कोर्ट यन जावै, जो जावै तो मुरछा आवै, विचित्रगति कर- मोंकी भाखी ज्ञानीवचन तं रहटरता, नकसी०४, को- , , धमांन ओर मायालोभमें योलरतणी गततपाई खायै रगड तुझथूका चेतन पगोमें ठोकर खाई, विवधप्रकारे साग चोहटे ओडीमें मालण लाई, एक कोडीरेकेई भा- गमें अनंतीवार तूं विकीयायो, चारगती छवकाया मांही दडीदोटे ज्यूंभमी आयो, काल अनंतो वीत्यो हे चेतन नरक निगोद झोकों खायो [उडावणी ] उठेमांनथें क्यों कीनोनी, हणे बोले ज्यूं वोल्यो क्यूंनी अनंत जीवांरो तं जोखुनी, नानुचवाण ओकीयो उपदेश चतुर अरथहि- रदै धरता, नकसीहु० ५, इति पदं ॥ [अथ उपदेश ढाल लिख्यते] ॥ श्रीजिनवर दीधाजी ये उपदेशकै, जे कोई राखे जो धरम नीरेसकै, दयाभाव दिल आदरो, मसतक आवै छै धोलाजीकेसकै, बूढापो आण कखो परवेसकै आठकर मानदो थे पेसकै, साधपणो सुध आदरो, पांच महाव्रतके मेरुसमानकै, मारग लीजोपाधरो, मीठीज योलीये अमरत वाणकै, सांभल चेतियांसू निरबाण के, चेतही चेतहो मानवी १, पुन्यरे जोगे मिल्या तृने साधकै, वाणी सुनतां तूं मत करै वादकै, तहत करीने तुमे सरधजो, उत्तम कुल मानवभव लाधकै, सतगुरु देवे छे सरले सादकै, भिन्न २ भावजभाखिया, सगलाई कटाकरे ते भविजीवकै, तिणरेतो सेठीहो समकित नीवकै, कइंकतो हिरदेमे राखजे, सोंस सगत व्रत माफक धारकै, मानव- भव अलोमती हारकै, मतवात मनमें करोनी विचारकै, चेतहो चेतहो मानवी २, साधतो कहेछै पर उपगारकै, घसतवताय देवै तंतसारकै, थारी परतिख जोय पटावली नही तरनैण उघाडले दोयकै, उतपत पारी तूं इणविध ।

७१ जोयकै, जानी देवपिण इस कह्यो तिणमे भत जाणरे ति- लभर झूठकै, प्राण पाराया हूँ मती लूटके, जैसुग्व चावै थारे जीवनो, खिण २ आऊखो जावे छे खूटकै, तिण २ को कर जावसी छूटकै, चेतहो चेतहो मानवी 3, सुखम भाव सुणावै सत्यकै, आदि अनादो लोनही अंतकै, भव २ मांहे तूं भटकियो, नवघाटी उलांघीने आयो लभ मानव भव पायकै, ऊंचनीच कुल ऊपनो सुतरमै चाली घणी बातकै, ओ म्हारो चापने याम्हारी मायमै, मोह मायामे फस रधो, मोड मिल्या घणा रागने ढेपकै, लारली उतपत इण विधतूं देखक, चेतहो चेतहो मानवी ४, नरने नारीनो टुवोरे संजोगकै, भोगवतां संसारना भोगकै, उतपत जोय जीव आपणी, विस्तार भाखसी पेटरे मांहिक, जिण जगामे तूं ऊपनो आयकै, सांकड सरीररो बांधणो, नीचो है मस्तक ऊंचा है पायक, छाती कने है गोड़ समायकै, नेत्र कने रहै मूठियां, आयनें ऊपनो उदरमझार शुक्र निरु धरणरो कीयोत आहारकै, अवतो सेखी करे रे हजारकै, धार रे धार द्याधर्म सा- रके, चेतहो चेतहो मानवी ५, अशुचि जगामे ऊपनो जीवकै, झाझेरो नवमास तणी न्यायकै, चमचेड ज्यूं लटकी रयो, माताने क्षुधाकै बेटानै भूखकै, निसदिन भोगियो है घणो दुखकै, सुत्र आचारांगमें कह्यो, गर- भने दुग्वगे कियोरे निचोडकै सुई सांमठी साढातीन करोडकै, अगनवरण कीवी आफरी, चांपदीवी तेतो सकल शरीरकै, तेसुं गरभमे हुवै अठगुणी पीडकै, मुत्त- रमे भाखगया महावीरकै, चेतहो चेतहो मानवी ६, सी- झारे बालक चामडै डाटकै, चवडे चोवटे नांखियो वाटक, अठगुणी वेदनागरभमे जनमतां पिण कोडगुणी बले , ,

जांणकै, ज्यूं जंनडीमें सोनी काढेजी तांणकै, तूं जनमपा-
चनें मोटो थयो, बलवंत हुवोरे जोवन पायक, जनमतणी
जागा मन जायकै, दुख पट्यां सागे आवै नहीं, मोह
रह्यो तूं तो रमणीरे रूपकै, राखै घणी चतुराईमे चूंपकै,
धरम विना पडसी अंधकूपकै, चेतहो चेतहो मानवी७,
ऊजली राखतो आपणी देहकै, किंचित् मातर लागती
खेहकै, झटकै झाटकनाखतो, मैलरीक दैन सुहावती
रेसकै, थारे तोहंतीरे अधिकसनावकै, अब पाटियै बैठ
पीठी करूं, अणगल नीररे तूं करेरे सिनानकै, लाग रह्यो
थारे आरत ध्यानकै, चोवाने चंदन चरचतो, खायतो
खोपरा खारक दाखकै, देही हुय जासीरे बल जल रा-
खकै, चेतहो चेतहो मानवी, ८, कालारे भमर हूंता थारा
केसकै, निसदिन पहरतो नवलाजी वैसकै, छेलायां करतो
घणी निरखंतो चालतो आपणी पागकै, तीज तमासा
देखतो वागकै, आडा आरीसावले जावतो, वात करेसुं
मांही नैं पूछकै, तावदेने मरोडतो मूंछकै, मदमाहै नहीं
मावतो तेल चंपेलने अतरगुलायकै, जग सगलो न्यारो
इथारो फावकै, चावतो वीडाने सुंघतो फूलकै, धरमविनां
आगे काई होसी सूलकै, चेतहो चेतहो मानवी ९, हा-
थामें कडा कानामांही मोतीकै, लाग रही थारे झिगमिग
जोतकै, उंचो लपेटो तूं बांधतो, ऊपर निरादेतो घणा
बंधक, वांकी वो गरदनकै आंखियां अंधकै, ऊंठनें गोट
हिवे नहीं निरखंतो चालतो पारकी नारकै, भव २ माहै
तूं हुसी खराक्कै, जनम जरा घणी पांमसी पापरी बांधी
है वहुलीरे पोटकै, थारी नेडी है नरक कमाईने खोटके,
काल इक दिनकर जावसी चोटकै, धरमीने धन धनकै
पापीने फोटकै, चेतहो चेतहो मानवी १०, सोनेरा पि-

७३ , याला रूपेराधालकै, मोहगी मिठाईनें चावल दालकै, भोजन नव २ भांतरां, गांधीयो दाखपाणी पीयो ठारकै, मनवांरा बले पेलीजी पारकै, वसतमंगावै तिका तुरत तइयारकै, कमी नहीं कोई वातरी, केलगर्भ हुँती ज्यारी कायक, वादल जिमगई विलायकै, सुख जो भोगीयाहै भरपूरकै, देही ज्यांरी देखता हुयगई धूडकै, चेतहो चेतहो मानवी १२, सोवनरा सिंहासण हीडोलाजी खा- टक, विरदायली देवेछ चारण भाटक, गिदरा दुले चाथु- रमांनी ओटकै, जां नर नराने काल करगयो चोटकै, पो- हचा नरक दुवारे धूजै होठकै, लीजो सील यातणी ओटकै, चोबाने चंदण तेल चंपेलकै, नारी मिली जांणे मोहन चैलके, चालती चालै हंसगज गेलकै, भरतार जोडी मिली तो भणी कंचनयरणी हुती ज्यांरी देहकै, तिणमाहे बल जल होयगई खेहकै, प्रीतम पद्मणीने दे गयो छेहकै, साहिब राखता अधकोस नेहकै, कारमो जोवनकारमी देहकै, इमजांणी धरमसुं तूं राखजे नेहकै, चेतहो चेतहो मानवी १३, रमणी पिणराचरही संसारकै, नितनया करती सिणगारकै, इंद्रतणी जाणे अपछरा, दासी उभी रहती चे कर जोडकै, एक वुलावै तो दश आवै दोडकै, सेज बैठी रहती सुंदरी चावती वीडाने सूंघती फूलक, कंतने बालीजी वसमानकै, हुकम घरमें हलावती, वेटा बहने कुटुंब परवारकै, लोपे नहीं कोई तेनी कारकै, पूरबलादेखोरे पुन्यपर कारकै, पाम्या सुख संसारना, नितनव करती कपडां रीज लूसकै, गहणारा डव्या कपडारी मंजूसकै, कामणीकनें गिणती नही इती- सदाई लीलविलासकै, एक दिन समान जाणती मासकै, तिण बाईरो निकल गयो सासकै, जाय मसाणामे कर- , १०वा. स० ७४ दियो वासकै, मिलगई मादी ऊपर ऊगो घासकै, इम- जाणी धरम करोथे मन हुलासकै, ज्यों टल जाय थारो गरभाजी वासकै, सतगुरुने दीजो सावासकै चेतहो. १४, भारी करमा हुवै केई जीवकै, नरक जावणरीदीधी है नींवकै, आंगूच येह नाण येहुवा सुण नहीं भगवंतनी यांणकै साधूरे ऊपर दुष्ट परणामकै, जिन मारग ऊपर तपतो रहै, कूडो कलंकदै बोलतो झूठकै, मारनें मोड़ ऊपाडतो मूठकै, चार बोलवले चालिया, तीनसे तेसठ चालिया मत्तकै, झालमिली मिथ्यात्वनीलत्तकै पाहुणों फिरसी तूं चारोई गत्तकै चेत० १५, परनारी सूं तो लग रह्यौपेम खोटा ते करदिया सोंसने नेमकै, परणीरे दायन आवती रहती घणी थारी माठीरे दृष्टकै, काछ लपेटी तूं होगयो भृष्टकै, अह नाण जोय इह लोकना, परगट पंचनदेवजी साखकै, भूपत डंडल काटसी नाककै, लोका मांहि फिट २ हुवै परभवमे पडसीरे थारी रे ठीककै, जठे पडसीवले जम्मनी झीककै, मानरे मानरे तूं सतगुरुनी सीखक चेत०१६, जनकरी वेटीने लेगयो लंक रावण रावहुओ घणो वंककै, तिको लछमण हाथ माखो गयो, दशतो तेहना हूंताजी सीसकै, वैक्रिय भुजवणावतो वीसकै, पदमोत्तर द्रोपदाने लेगयो तिणतो बांधिया माठाजी करमकै, कृष्ण गमायदी तेहनी सरमकै, पदमो. त्तरपापीरो निकलगयो भरमकै, इम जाणी सीयलमे जांणजो धरमकै चेत० १७, मयणरेहा तो मोहियो रूपकै, मनोरथ राव गयो अंधकूपकै, पांच जणा हुया कोढीया चार जणा घाल्या पईरे खंडकै, भूडा कामथकी हुया घणा भंडकै, शीलवती पालियो शील अखंडकै, कवले विशेपबहुजणा बंधुमती हुँतीजी नारकै, माली अरजुन - तेना भरतारकै, जक्षरी जजामें गया, निजरा देखतां भोगवी नारकै, छचतो पुरुप एकया नारकै, सातोंईज- गारो वोरे संहारकै, नरक गया घणा जावसी, परनारी रोमोटोरे पापकै, जीवने जोखो परभव खरावकै, चेत- हो०१८, इसडी सांभल भगवतनी वाणकै, केडयक चेतिया चतुर सुजाणकै, परनारी धुर परिहरे श्रावक व्रत सीधाछै चारकै, साचीजी पामेछै समकित सारकै, पडि- फमणाने पोसाकरे, सूधीजी पालेछ जिनवर आणकै, तनेहुसी देवविमाणकै, चेतहो. १९, केइयक साधांरा करै गुणग्रामकै, केहीक करै दरसणसं कामकै, केहीक वखाणसुणे सदा केहीक नहीं सकेछ आय पिणभावना राखेछै मनरे मांहिकै, तो पण गरज सरै घणी, केहीक छोड दिया घरचारकै, केहीयक लीनोछै संजम भारकै, मुगत गया घणा जावसी, इम परूपियो श्रीवृद्धमानकै, शालभद्दरने संभालो जो सुख विपाकमें चाल्योछै पा- ठकै, कुमर सुबाह बांध्या पुन्यरा ठाठकै, चेतहो० २०, अधर जांणजो आऊखो इसक, अथिर जाण जो कारमी देहकै, अथिर जोवन धन जांणजो, अबिर जाण जो यो परवारकै, इम जांणीने लाहो लीजो थैलारकै, दीजीयै दांन तजिये अभिमानकै, ममता टालीने ध्याइयै ध्या- नकै, ज्ञान रतन जतन राखियै, मान टालने विनय जो- कीजकै, सीयलपालीने सोजस लीजकै, तपस्या करीने करम क्षय करो, करमारो बंधछै फिर धन लोभकै, तेहने जीतीयांसु हवै मोखकै चेतहो. २१, धरमपर भाव जावै देवलोककै, मन गमता जठे मिले, थोककै रतन जडत घर आंगणो, नाटक पडरह्या बत्तीस प्रकारकै, कोडगमे देही- तणासुख भोगवे, करेजेधथारे थेइ थेई करे घणा, चोसठ , ७६ , मणरा हुवैजठे मोतीकै,लाग रही जठै, झिगमिग जोतकै, पल सागरना आऊखा जुज लग रही जराने भूखकै, आवागमण आगलगी इसी लगा, थारेहेत जुगततो वेगी मिल जावैतने मुगतकै, जठेरे सुखसै सासता चवद राज लोक ऊपर जांणकै, सिद्धसिल्लाछै तेहनो नांमकै, आवा गमण जट नहीं ओ उपदेश कह्योछै एमकै, शुभ चित्त तूं राखजै पेमकै, गुण उपजसी अति घणा नरनारी मति कर- जो वेषकै, जो तुमें चावोछो जीवनें चैनकै, सीख साचकर मांन जो एमकै, चेतहो चेतहो मानवी २२, इतिपदं ॥ [ अथ सात विसनकी लावणी ] ॥ सात विसनमत सेवो कोइ, सब शुण ज्यो नरनार, इण सेव्यां कुण २दुखपाया, सो कहूं एक तार, एक चि. त्तसुं शुणिया सेती, जव निकलेगा सारजी, मतसेवो कोइ विसन बुराछै परतिख देखलो, [टेर, पांडव राजा मोटा राजवी, सूरवीर जोधार कृष्णशरीखा सायक वांहरै, पोते पल अपार, जूवै रमणरे, माह नैस कांइ, हारी द्रोपदा नारजी, मत २, तीनखंडरा साहबास कांडू, रावण राज माहाराय, सती सीताकुं लेकर आयो, वै ठो लंक गमाय, फीट २ हवो मुल करै मांही, धका नर- कमे खायजी, मत 3, सेठ माकंदीतणाडीकरा, जिन रखनै जिनपाल, मदत कीवीजक्ष देवता, लिया आपरी लार, देवी देख जिनरिख डिगीयो तव, नाख दीयो तत- कालजी मत० ४, मांस आहारी नरवै पापी, करै जीवांरी घात, ढांढा ज्युं चरतारहैसकाइ, नही गिणे दीनरात, परभवमाहै, इसी खरावी नहीं, चालै कोइ साथजी, मत० ५, विपय विकाररा चिकल हवोडा, रग्वै वेस्थासु , -- प्यार, नरकामा घणीज पड़सी, ज्यु जूत्यांरीमार, आ चरणी पृतलीसथा, चांपसी हीयै मझार मत० ६, . दरापान पीयनै उल्लू, हो ज्यावै मनमांहै, लाज बीहण मानवीस फीरै, गली २ के मांह, सातविसन इह से जिनोंका, जनम अक्यारथ जायजी, मत० ७, चोरी के पारकीस काइ, कुलनै दाग लगावै, राजार्डडै लोकीव संडे, फिट २, घणो वोथावे, यांह पकड बैड्यामें नाखै कोरडारी मार लगावैजी,मत०८, संवत उगणीसै गुणता लीस, माहावदीमझार, उदयचंदगुरु आज्ञासेती, जोड करी चितलाय, ऋपिहजारी वीनस काई विसन तज्यां सुख थायजी, मत०९, इतिपदं ॥ [अथ धर्म वजाजकी लावणी ] ॥ कयो मान बजाजी सद्गुरुदै पूंजी मांड दुकानजी, हटेर, काया रूप नगरकै माही, वैरागमालमो जाय रज मिध्यामत बाहर कढावो, शुद्धभाव पाल विछाय हो कहो०१, जिनवाणीको गजलै भारी, जरा फर्क मत जाण, माप २तने सतगुरुदेवै, मतकर खेचातापहोकयो २, जीवदयाका मुखमलभारी, रेसमहै संतोप, डब्वल जीणसमता तणोसरे, ज्ञान दामदै रोकरे कह्यो० ३, तप- स्थाको धंदागरभारी, साडी शीलकी जांण, एसा व्या- पार करो चेतनजी, मिले तुझें निर्वाणजी कह्यो०४, इतिपदं ।। , [ तेरा पंथीयोंके चरचाकी लावणी] ॥ सदाशिव पारवती प्यारा जटाविचवहत गगधार ये चाल । ॥ सदा मोहे सूत्र लगे प्यारा जिनोंसे रोता निसतारा, - सदामुझ सुगुरु लगे प्यारा कुगुरुका करियै मूंकारा, टेर,] जीववचायां पापवतावै, वोले मूढ अन्याय, प्रत्यक्ष गोसालो वीरवचायो, सतकपनरमें माय, उत्तर देणकों ठोरनपाई वीरनें चूका बताय, उनके मोह राग वतावै प्रभूकों पाप लगावै, नीचवै निगोदजासी, ऊंचाफेर क- बहू न आसी, धकागतचारमे खासीवे, सदा० १, सूत्र आचारंग देखलोसरे, नवमाध्ययन मझार, गौतमखामी पूछियोसरे, भाखी दीनद्यार, तीनकरण तीन जोगसूंस, नहीं कीधो पाप लिगार, देखलो सूत्रसाखी, श्रीजिन मुग्वसें भाखी, संका मत इसमें जाणो, तहतकर वचन प्रमाणो, कुगुरु तज सुगुरु पिछाणो, वे सदा० २, दांन दियो श्रीवीरजिनंदजी लागो कहै बहु पाप, अनारज बहु ऊपना परीसा, करता एहवी थापतो मल्लिजिनंदकों एक पोहरमें, केवल ज्ञान समाप, सूत्र श्रीज्ञातामांही, झूट रती इसमें नाहीं, अष्टकम दूर खपाया, जन्म ओर मरण मिटाया, परम पदमुक्ति पायावे, सदा० ३, अनन्त चोवीसी दान देयकर लीधो संजमभार, वरतमानमें दे रह्या, महाविदेह क्षेत्र मझार, आगामी कालमे देसी अ- नंता, इसमें फरक नसार, सोच हिरदेकेमाही, कहूंमें कहा लगतांई, दानकों मूढ उठावै, झूठा बोला चोर कहावै, दशमे अंगे जिन फुरमावै ये, सदा० ४, दान यामें पाप वतावै, अनर्थ भाखै सोय, देवगुरु धर्म तीन विराधो, निश्चै दुरगति होय, ओतो मरकर गयो नारकी, सिद्ध पावडियो जोय, आठमो निन्हव जाणो, समझकर खूय पिछानो, ज्ञानचंद सुगुरुपसाये, कनीराम जोड- वणाये, वादीकों आण हटाये वे सदा मु०५, इतिपदं ॥

[अथ थूलभद्रजीकी लावणी] ॥ थूलभद्रजी कियो चोमासो दुधार २ चित्रशाल प्रतियोधी वारे व्रत दीया समझाई वैश्यावाला, टेर,ज नभंडारा खोल्या मुनिवर हेतजुगतकर समझाच, लस चौरासी जीवाजोनिआ गतीचार कह बतलावै, तिर्य- नारकी ओर देवता मनुष्यगतिया कहलावै, रुल्यो कार अनंतनिगोदे तुरत छेडो नहीं आचै, [उडावणी] हेवं अजाण आंधो मिथ्यात्वी कहलावै, हेवो उजड पडत जिन मारग मुनिलावै, कामभोग विष जहर सरीख विपाक फल मतखा आला, प्रतियो० १, जीवाजीव पुन्य पाप वताया, आश्रव संवरचितलाया, निर्जराबंध अर मोक्षभेदनव भिन्न २ कर बतलाया, पृथ्वी अप्प ओर तेऊबाऊ वनस्पती ओर तसकाया, छउंकायाका नांव बताया उणकै घटमें विठलाया [उडावणी] हेवो बस थावर सुक्ष्म चादर बोले, हेवो परजापता अपरजापता खोले, पाप अठारै सब समझाया जन्ममरणका भय आला प्रतियो० २, अष्टकमका भेद सुणाया प्रकृती ओर न्यारे २ समकित पांमी व्रत आदरिया बारे व्रत उन सुद्ध प्यारे, मोहछाक ममताने मारे तपजप करणी अधकारे, पक्कीधनंतर हुई श्रावगासमझगई वो सवसारे, हेवो दानशील तप भावफेर आराधे, हेवा सम्बर पोसा फेर सामायकसाथै, पडिकमणो वाकर रोजीनां नेमधर्म पाले आला, प्रति० ३, व्रतपाले दोपण टाले तपजप सं- जम खप करता, बाईसपरीसा सेवै मुनीसर बारेभावना चित्त धरता, मन्न वचन काया वसकीनी पांचं इंद्री थिर करता, चार कपाय आठमद त्यागी इच्छा रहत 1. तपस्या करता, [उडावणी] हेवे थूलभद्रजी धन्य मोटा मुनिराया हेवे शीलसंजम वेश्याके घर वच्चाया, दुक्कर २ माहादुक्कर नानुजपै थांकी माला प्र० ४, इतिपदं ॥ [ पूजश्री श्रीलालजीरी लावणी ] ॥ दोहा ।। राग सोरठ॥ ॥ पूजपधाया आप हुवा आनंद चित्तचावीया, गुणरत नारी खाण थारा दरशण पावीया १, उगणीसे गुणसठे नव साधूथे आवीया, चोमासो सुखकार धरमध्यान चित लावीया २, बांणी अमृत धार, सुणताही हुलसे- हीया परसन पूछ आय, भिन्न २ कर समझावीया ३, भाया बाया करै अरज चितमनसें सुण, लीजीये, कलपे सोचोमास, फेरवीकाणे कीजीये ४, [चाल पणिहारी] श्रीश्रीमहाराज पूजजी श्रीलाल जीथै आया, चीकाने- रका श्रावक श्राविका दशणकर २ हरखाया, टेर] बाल- पणेमें व्रत आदरिया जवानीमें संजम धारै, भणियागु- णिया सूत्र वांचिया निरनोकीनो बुधभारे, पंचमहाव्रत मेरू जैसा ऐसे बोझसें नहीं हारे गुणसत्ताईस दीपै मुनी- सर जिनवचनोंकू सिरधारे, गांम नगर पुरपाटण विचरै प्रतियोधै यहु नरनार, भवि जीव मुणकर सरधा पांमै समकित सेंठी हुवै ज्यारे, [उडावणी] हेवो दानदयाकै मारग मुनिवरचालै, हेवो अज्ञानीकू रस्ते मुनिवर घालै, हेवों पाले शुद्ध आचार दोष सब टाले, ऊमर छोटी बुध है मोटी ज्ञान ध्यानकर पदपाया, बीकाने० २, मन वच- काया वसकरलीनी आठ वचन पूरा पावै, करै तपस्या धरै थोकडा रागढेपकू पोलावै दोपवयालीस टालै मुनी- सर सावज मिसर वंचावै, वडे धीर गंभीर विचक्षण अव- ।

सर देख घरमें जाचे पूछागाछा करै चोकसी आहार 5. सूझतो वैलावै, जिसघर मुनिवर हाथ जो फरसै सो वड- भागी कहलावै [उडावणी] हेवो उपयोगसहित वसकी काया आतमकू, हेवो धनधन मुनिवर मारै अपणे दमकू, हे मैं जाउं बलिहारी सीस नमाउं उनकू, साधु करणी- पार उतरणी क्षमातणा गुण है सवाया, वीका० २, राज मलजी लालचंदजी मगन चांद मुनि तपधारै, गबूजी टीकम कजोडी गंभीर मलजी सुखकार, आठ मुनिः संग आया पूजकै इज्ञा माफक रहै सारै, माहा सतियां महा- राज विराजै सात ठाणास अधिकार, सोनाजी जिवणाजी कहियै पान कवर विद्या धारे, सिणगारांजी पेमकव- रजी सो भाग भूरांजीरी बलिहारे, [उडावणी ] हेवो सतरे भेदे संजमका गुण छाजै, हेवो तपस्या करके देखो सिंघ ज्यूं गाजै, हेवो धरम करै सो सब निर्जराकै काजै, आश्रव रोकै संवरमां है तप जपमें नहीं सरमावै, वी- काने०३, अनाचार वै वाचन टालै नवकलपी विहार करे, बारे भावना भावै मुनीसर नववाड सुद्ध मनमै धरै, दोन वखत वखाण वाचता अष्ट कर्मासं खूब लरै, हेत जुगत दृष्टांत सवइया भिन्न भिन्न भिन्न करकै खवर पडै स्वमती परमती आवै परिपदा पुन्यवत दया धरम करे, जिनवर वांणी अमिय समाणी आराध्यां दुख दूर करै [उडावणी हे गुण बहोत गुरुका केणेमे नहीं आते, हेवो छोडा जगत जंजाल भवितुं समझाते हेवो निज गुणपाते सो शिव पुरकू जाते, तेज करण गुण करै जि- यांरा ज्ञान ध्यान हुवा चितचाया पीका० ५ इति पदं ॥ ११ घा०स० 1 ८२ [ पूजश्री श्रीलालजी महीजीकी लावणी ] ॥ श्री हुकम मुनि महाराज हुवे वड भागी महाराज क्रिया उद्धार कराया जी शिव लाल उदय मुनि पाट चोथश्री लाल दीपायाजी, [टेरे,] उगणीसै छब्बीसे टोंक सहरके मांही महाराज पूज्यका जनम जो थायाजी है ओसवंश बंब जिन कुल धन २ कह लायाजी, चुनी ला- लजी पिता हरख बहु पाये, महाराज सर्वको अधिक सुहायाजी, धन्य चंद कवरजी, मात, जिनोंने गोद खि- लायाजी, [ उडावणी ] हे क्या वालपणामें सूरत मोह नगारी, जो देखे जिसकुं लागे अतही प्यारी, हे छोटी- वयमे संगत साधांकी धारी, शुद्ध सरधा पांमी मिथ्या मतकों दारी महाराज जैनका भक्त कहायाजी, शिव- लाल उ० १, फिरकीवी सगाई मात ओरभाईने महा- राज नार सुंदर परणायाजी हे मान कुवरजी नाम रूप गुण संपन पायाजी, फिर थोडा दिनांमे चढा अतुल वै- रागै महाराज संजम लेवाचित चायाजी, नहीं दीनी आज्ञा मात भेख साधूको गायाजी [उडावणी] उग- णीसे वीस दूणा जोचार सालमें, मुनि दीक्षा लीधी कोटेके साध नालमें, सवतजा जगत नहीं आये महो जालमे, नहीं लगा दिल आचार उनकी चालमे, महाराज फेर चोय मुनीपै आयाजी, शिव लाल० २, उगणीसे सेंता- लीस साल महा सुखदाई महाराज चोथरै दिक्षा पाईजी, मुनि वृद्धि चंदजीने सरांय शिक्ष सदगुरु फुर माईजी, फिर संजम क्रिया पाले दिन २ चढते महाराज सूत्रको ज्ञान सिखाईजी, बहु चोल थोकडा सीख वुद्ध अधकी दिखलाईजी [ उडावणी] अढारे वरस ऊमरमें तज घर- वारे, नहीं ममता किससे तजा सर्व संसारे बहु संजम । ८३ ~ किरिया पाले शुद्ध आचारे वे पंच महाव्रत मेरूसम सि- रधारे महाराज भव्यजीवां मन भायाजी, शिव० ३. फिर केईवरसालग ज्ञान गुरांसे लीना महाराज सालसो यावन जाणोजी, क्या काती सुदिके माह सहर रतलाम- पिछाणोजी, मुनि विनयवैया वच्च कर साता उपजाई, महाराज पूज्य मन अतिहरखाणोजी, हे लेवो पूज्यपद आज खयं मुख इम फुर माणोजी, [ उडावणी ] जय गुरु आग्रहसें पूजपद मुनि लीनो, पूज मस्तक हाथ रख हित उपदेश बहु दीनो, मुनि शुद्ध भावसें अमृत सम- रस भीनो, चारों संघ सन्मुख भोलावण बहु दीनो, महाराज चौथ पूज्य खर्ग सिधायाजी, शिवला. ४, मु- निसम भाव शांति मूरत है प्यारी, महाराज संप गुण अधको पायाजी, ये भक्त वच्छल मुनिराज सर्वकों अधिक सुहायाजी, रतलाम सहर चउमासो पूरण करके महाराज फेर इंदोर सिधायाजी, केई गांम नगर पुर विचर बहु उपगार करायाजी, [उडावणी] मुनि जहां जावै जहां सबको लागै प्यारे, क्या अमृत वाणी मूरति मोहन गारे, मुनि जहां विचरै जहां करै वहुत उपगारे, तपस्या सामायक पोपध व्रत बहुधारे महाराज भव्य मन बहु हुलसायाजी शिव०५, फेर साल अठावन नवे सहर पधाखा महाराज जहांमें दरशण पायाजी कांई रोम २ हर खाय हीया मेरा उमटायाजी, उस वखतथी मेरे मनमे गुण कथ गाऊं महाराज दिलमेरा ललचा- याजी पिण थिरता नहीं थी जिससें नहीं कुछ गुण कथ गायाजी [उडावणी ] अव दीन दयाल यानिधि तुम हो मेरे अब रखो हमारी लाज सरण हेतेरे, कृपाकर का- टोलख चौरासी फेरे, दरशण कर पीछा आया फिर , ८४ - अजमेरे महाराज मनमें बहु पछतायाजी शिव०६, अठा- वने साल जोधाणे चउमासो कीनो महाराज धर्मका ठाठ लगायाजी अमराव मुसद्दी लोग वचन सुण बहु हरखायाजी जहां वहु त्याग पञ्चखाण खंध हुवा भारी महाराज जैनका धर्म दीपायाजी, अमृतसम वाणी सु- णकै, बहु जीव सरधालायाजी [उडावणी] फिर साल एक कम साठ वीकाणे चौमासो, श्रावक श्राविका धर्म ध्यांन कीयो खासो, तपस्याका नहींथा पार झूठ नहीं मासो स्वमति परमति सुण वचन हुवा हुलासो, महा- राज भव्य जीवकेइ समझायाजी, शिवला. ७, फिर साल साठके उदेपुर चउमासो महाराज मुलक मेवाड कहायाजी जहां लगन धर्मकी बहुत जिनवचनां चित- लायाजी, जहां राजमुसद्दी अहलकार केई आये महाराज दरशन कर प्रश्नथायाजी, फेर दिया खूब उपदेश जैन झिंडा फर रायाजी, [उडावणी] फिर साल इकाप्टे टोंक चौमासो ठायो, जहां हुआ बहुत उपगारकै आनंद पायो, सब श्रावक श्राविका धर्म करण हुलसायो, बहु हुवा त्याग पञ्चखाण सर्व मन भायो, महाराज जन्मभूमी कह लायाजी शिवला०८, फिर साल वासठ जोधाणे चउमासो महाराज दूसरी वार करायोजी, एह वचन अ- मोलख सुनकै भव्यजीव बहु हरखायोजी जहां दया सामायक हुवा वहुतसा पोसा महाराज खंध कितनांही उठायोजी, तपस्या सम्बर नहींपार भविकमन बहु लोभायोजी, [उडावणी] फेर खमति परमति प्रश्न पूछ- णकू आवै, बहु हेत जुगत भिन २ करकै समझावै, बलिनय निक्षेप प्रमाण जो खूब बतावै, नहीं पक्षपातका काम है सरल सभावै, महाराज वचन सुण सब उल- शायाजी शिवला०९, फिर साल तेसठे रतलाम आप पधारे महाराज श्राविक श्राविका मनभायाजी, की चउमासेकी अरज पूज्यसे आण मनायाजी ये वचन पू- ज्यका अमृतसम नित वरसै, माहाराज सुणन सहुमन ललचायाजी, दिवान मुसद्दी ओरराज अहलकार केई आयाजी, [उडावणी ] जहां मुसलमानकेइ वखाण सु- गवा आये, उपदेश पूज्यका सुण कर बहु हरखाये, जहामद मांसका त्याग किया शुद्ध भावे, फिर ठाकुर पचेडे काकू सिकार छुड़ाये, महाराज जैन परभावक था- याजी, शिवलाल० १०, फिरकर चोमासोभाण पुरे पधारे, महाराज भव्य जीव बहु हरखायाजी, एक ठाकुरकों समझाय बद सेरा वचायाजी, फिरके जाल मछयांका बंध करवाये, महाराज अतिसय गुण अधिका पायाजी, कांइ सूरत देख दिलमस्त हुवै धरम चितलायाजी, [उ- डावणी ] जो वखाण सुणवा एक चार कोइ जावै, फिर नहीं कहणेका काम तुरत चल आचे, उपदेश सुणके दिल उनका हुलसावै, करे आपसुं पञ्चखाण त्याग मन भावै महाराज आपका गुण बहु छायाजी, शिवला० ११, फिर कोटेसे अजमेर जो आप पधारे महाराज नव ठा- णेसे आयाजी, बहु हाव भावके साथ चोमासो जाण मनायाजी, अजमेर पधाखा सुणके झटमे आया महाराज दरशण कर प्रश्न थायाजी दृवो हरख दिये उल्लास जोड कथ गुणमें गायाजी [उडावणी ] कहे लालकनइया वीकानेरकावासी, अजमेर लावणी जोडकै गाई खासी, चोसटे साल असाढ एकममुदि भासी सब श्रावक श्राविका सुणकै हुआ हुलासी, महाराज पूज्यका जसस- N ८६ वायाजी शिवलाल उदय मुनि पाट चोथश्री लालदी पायाजी १२, इति पदं ॥ [अथ रुघनाथजीकी लावणी] ॥मन वचकाय लाय परभूसें, निज आतमकू तारी है, रुघनाथ मुनीकै मुनीकै, दरशणकी वलिहारी है,[टेर०] पंच महाव्रत पाले निरमल, सुमत गुपत चितधारी है, इंद्री पांचूं जीतकै, मन ममताकू मारी है, हजारी मलजी शिक्ष आपकै, अघोर तपस्सी भारी है, देश णोकमें चो- मासो, कीयो बहोत उपगारी है [उडावणी] बडे धीर गंभीर पीर छवकाया अधिकारी है, रुग० १, गऊतणी परकरै गोचरी, दोप बेतालीस टाली है, वडे विचक्षण घरतर्फे, वारंवार संभाली है, तीन करण तीन जोग शुद्धवे, जिनकी आज्ञा पाली है, अष्ट मदकू जीतकै निज आतम उजवाली है, शील जो पाले नववाड क्षमा ख- डग दिलधारी है, रुघना० २, बेले २ करे पारणो अरस निरसवे आहार करे, तपस्या रूपी बाण धार अष्ट कर- मसुं खूब लडे, क्रोध मान माया कपटाई लोभ लालचकू दूर हरै, वीर जिनंदका जिनंदका हिरदे वीचमें ध्यान धरै, पर सन पूछे कोई मेवारी वेपरसन पूछे कोई दैउत्तर सुविचारी है, रुगना० ३, दोनूं वखत वखाण यांचता नव तत्वादिक भेदकहै, हेत जुगत कर भव्य जीवां हिरदेमें बैठाय दहे, वाणी जिनकी अमृत जैसी निरमल गंगा नीरव है, सुण वैराग पांमें भव्य जीव तत खिण उठकर त्याग लहै, ममता मूरछा नहीं किसीसें अप्रति- यद्ध विहारी है, रुगना०४, सरव पृथवी करूं जो कागद लेखण करूं जोगिर राई, खीर समंदर करूं जोस्याही -

तो गुणपार आवै नाई, जेसे पंगु चढे गिरपै मन
आनंद लाई, सुण वैराग पांमे लावणी कनी
सुखदाई जगणीस पचासे चोमासो भीनासर :
है, रुघना० ५, इति पदं ॥
[पूज श्री उदयचंदजी महर्पिजीरी लाव
॥ कर लै पूज चरणका ध्यान जिणासुं पामें
धान, [टेर, मुरधर देश मालवै मांही जनम भो
उज्वल वंश उजागर अपना उद्य चंद भूभान,
१, देख अनंत असार जगतनें, विपकी चेल सम
कितसेल संभाही सूरां, ऊठ खडेमै दान, क
ज्ञान तुरीपर चढ़ कर बैठा, सुमती साज पला
तरवार ढाल धीरजकी करता अष्ट करमकीहाण
३, आदित्यजेम उद्योत करत है, मिथ्या मेदन
हेत उपदेश देत सुखकारी, उपगारी पद प्राण,
४, परंपरागत पद आचारज सोहत गुणकी खा
सारांमें वृद्ध विराजै योही इंद्र विधान करले०५
का नरने नारी, धरता चरणा ध्यान, पुन्यवंत वर
हमारा, मिलिया दरशण, आन, क. ६, चारू
चीच विराजै पंडितपणा वखाण, भरी सभातो एर
जाणे फूलण श्रीजिनवाण, क० ७, देव गुरुधरम
सदा जोत जगान हीरालाल कहै पूजजी दिन :
चान, करले०८, इति पदं, ॥
[अथ हुकम मुनीजीकी लावणी]
॥ हुकम मुनी दीपै जगमांही सूरवीर हो रह्य
सर तपस्याके माही, [टेर, कोटे कानीसुं आया
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किसन गढमांही संवत अठारे साल तेणवै फागण मास मांही हु. १, बेले वेले करे पारणो हुवै जठां तांई एक पिछे वडीमें रहे मुनीसर बारे मास तांई हु. २, लिखी वीनती आप पधारो, म्हारे सहर मांही, मोटा छो मुनि राजकै, महिमा फैली जगमांही, हु. ३, ज्ञान ध्यान तो घणोईकहीजै, ज्यांरो पार नाही, भगवतरी अज्ञामें चालै, धन २ मुनि राई, हु. ४, ज्ञानतणे धुडलेपर च- ढिया, दृढ किरिया मांही, कर केसरिया उडदीवां मुनि करम कटक मांही, हु०५, पंच महाव्रत निरमल पाले संका ओर नाही, दोप वयालीस टाले मुनीसर धन २ जगमांही हु. ६, सरवमीठेरा त्याग मुनीने, जाव जीव- तांही, तलीवस्त खावैनहीं मुनिवर धन २ मुनिराई हु. ७, कोड जिभ्यासुं गुण करूं तो तोही पारनाही, एक जिभ्यासूं गुण करूं तो, करूं कठाताई, हु. ८, संवत अढारे साल गुणंतरे मिगसर मास मांही, गुरू भेट्या श्रीलालचंदजी, बूंदी सहर मांही, हु० ९, पूज २ श्रीला- लचंदजी मोटा मुनिराई ज्यारे गुणांरो पार न आवै, सवकू सुखदाई, हु० १०, इति पदं ।। [ऋषि मुन्नालालजीकी लावणी चाल पणिहारीकी.] ॥ मुन्नालाल मुनि महातपधारी जाउं सदामे बलिहारी पट कायाके पीर बडे गंभीर धीरगुण अधिकारी, [टेर,] मुलक मालवा रतनपुरीमें जनम लियो मुनि सुखकारी, अमरचंदजी तात नंदाबाई मात जिनोंघर अवतारी,ओ- सवाल बोहरोंके कुलमें शसिसम शोभै अतिभारी, उगणीसे छब्बीसे साल जनम सुकमाल हरख बहु नर- नारी, [ उडावणी] है काया बालपणै मुनि वचन मिष्ट , प्रयधारा, है कायासरीर सुंदराकार लगै बहु प्यारा है क्या छोटी वयमें प्रगटे हैं गुण सारा, सतसंगत साधोंकी करकै सीखा ज्ञान अपरम पारी, पट० १, उगणीसै अड- तीसे सालमें रतनपुर लागे प्यारी, असाढ सुदनम्मजाण मंगलवार आण मुनि दीक्षाधारी, पूज उद्यचंदजीकैपासै महा वरत शुद्ध उच्चारी, रतन चंदजी गुरु किया चरण चितदिया वडे आज्ञाकारी, [उडावणी ] है क्या शुद्ध नन चित्तसे संजम मुनि वरलीना, है क्या तजा जगत जंजाल या चितदीना, है क्या अल्प दिनोंमें ज्ञान ध्यांन रंग भीना, विनय विवेक नेकगुण प्रगटे क्षमा गुण- पर तिखजारी, पट्० २, पंचमहाव्रत सूधा पालै तप जप संजम खप करता, दोप वयालीस दार लेवै शुद्ध आहार भावना चित धरता, बारे भेदे तपस्या करकै अष्ट करमकू वैहरता, पालै शुद्ध आचार सूत्र अनुसार पापसें वै ड- रता [उडावणी] है क्या सतरे भेदे संजम मुनिवर पाले, है क्या यावीस परीसाजीत दोप सहु टाले, हेक्या नवकलपी विहार मुलकमे माले, यहु घरसां लग पुज्य पासमें सुत्र उद्यमकीनो भारी, पट० ३, गांमनगर पुर- गटण विचरे महावाल विरमचारी, नववाडसील पार लोपै नहींकार जगमे महिमा सारी, गुण सत्ताईस दीपे मुनीसर कई कहांलग विस्तारी, तीन करणसे योग पाले शुद्धयोग निज आतमकू उजवारी [उडावणी,] हे क्या खमती परमती पूछ परशन आई, हे क्या हेतजुगत दृष्टां- तसें दै समझाई, हैक्या न्यायनीतकी रीतसे दै वैठाई, वचन जिनोंका सरधे सोही पांमें भवजलसें पारी पट् ४, मुन्नालालजी महागुणधारी थालचंदजी परउपगारी. लालचंदजी मुनिजाण हुकम गुण खाण चंद आतमतारी १२ या० स० गंभीर मल्ल और चूनीलालजी धनराजजी धीरजधारी, ठाणे आठसुं सोहै भवी मनमो है सबकू है हितकारी [उडावणी] हेक्या बहु सूत्रकैजान चरचा बहु करता, हैक्या पूछ परशन तुरत संशय हरता, हैक्या जैन आ- गम परमाण पापसे डरता, एकएकसें अधिक गुणोंमें कहुं कहां लगविस्तारी पट्० ५, उगणीसे ओर साठेसा- लमें वीकाणे मुनि आया है, पूरी मनकी आस कीयो चोमास सबकै मन भाया है, दोनुं वखत वखाण वांचता सुणकै भवि हरखाया है, अमृत जैसी वाण वरसती आण सवकै चितचाया है, [उडावणी] है क्या भव्यजी- वोंके भाग मुनीसर आया हेलगा धरम ध्यानका ठाठ सबकै मनभाया हेक्या आवड महातमा छंद जोडकै गाया, फेलं दरशन दीजो मुनिवर अरज करै सब नर- नारी पटू० ६, इति पदं ॥ [अथ किरपारामजी ऋषीकी लावणी ] ॥मुनिवर मोटा महाराज हुकमचंदजीने गुरु कीया, च- तुरभुज महाराज उणपासै संजम लीया, विनयवंत सुवि- नीत थां । सरखा शिष्य दीपता, संजम सूरालाल इंद्री पांचं दीपता , कोडजिभ्या गुणग्राम वरणीमै आवै नहीं, साधु रतनारी खाण इकजिभ्यासुं इमकहुं, वैयावचरे काज चार मुनीथे आविया, सादुलजी महाराज मिथ्यात घणारा झाडिया, सादलजीकी वैयावच्चमें बीकानेर साथे आया, धीरज शीतल क्षमा सागर किरपाचंद मुनीराया, [टेरे,] चतुर विचक्षण जाणअवसरका पंडतराज है गुण- धारी, भिन्न २ कर समझावै सभीने विद्यावंत है अधि- कारी, तजुगत दृष्टांत सवइया कहत कुंडलिया लघु ॥

रता, हेलिया मुक्तिमारगका रसता, इरिया भाषा और, उपयोग सहित वसकरी काया, धीर०, ग्रागी वैरागी नहीं सवादी नित्त बुलाया जाये नहीं, अयमर. देसकर घरमें जावै अजाण तकसुआवे सही, पळा गाठा करे चोकसी गाला गोली करे नहीं, अचिरा यम्य लेने कलपती दोपण लागेसो लेवै नहीं, हेवे जिमघर उम वडभाग बहरण मुनि जावे, हेवे हरखे चित्तलाम आ- हार बहरावै हेवो भवसागरतिर जावै, निम वित्त पात्र संजोग मुस्कल भवि जीवांकै मनभाया घी०५, पालै नववाडसुंक्षमा सटगईं हाथ लहा. आटकर प्यारे, महमोहन वेलसरव परपदा घरसे ज्यूं अमृत धारे है सादलजी महाराजकै मुनीसर मोटा, है वारी सेवाकर नरनार उसीकै नहीं टोटा, हेलिया महावीरका ओटा, पडिकमणा ओर बोल थोकडा सीखै वायां और भाया, धीरज० २, पांच महाव्रत औजी पाले सुत्र सिद्धांत भण- तासारा, पांच सुमती तीन मनगुप्ती बुद्धवार जो विस्तारा, पांचं इंद्रीगोपै मुनीसर पटरस छोड्या सब सारा, धो- वणपाणी पीवै मुनीसर साध मारग खंडै धारा, हेवे स- तरे भेदे संजम मुनिवर पाले, हेवे नवकलपी विहार मु- लकमे माले, हेवे वावन अनाचार टाले, पालपरूप पर- भव चिंता जनम मरणका भय लाया धी० ३, दोप वयालीस टाले मुनीसर आहार सूझतो वेलावे, यारे भेदे करे तपस्या आठ करमाने उडावै, वारे भावना भावै मुनीसर सवी जिनेसर बेचावै, निरवद्य भाषा बोल मुनीसर धरम उपदेशमे विलमावै, हेवे सज्या मंथाग सदा पलेवणा करता, हेवे वाईस परीसासरे पाप , . , एपणा •, गुण मसामिदीप मारहटाया धरमधूसां ९२ नीसर जिन वचनापर चित लाया, चार कपाय आठ- मद त्यागी रागदेप उपसमा लिया, हेमें चढते उछरंग पेमनानु गुण गाया, हेमें ऊजड पडते मुनिवर मुझ सम- आया, हेमें खोटा धरमा वोसराया, धरम ध्यान उद्योत वीकाणे भाग संजोगेथे आया, धीर० ६, इति पदं ॥ [ऋषि गैनचंदजीकी लावणी ।] ॥ गैनचंदजी गुणवान गुणोंका पार नहीं पाया, भव जीवां उपगार चोमासे चीकानेर आया, [ टेर, ] असाढ सुदि चोथ वार सनिवारने आया धनघडी धनभाग पू. जका दरसण जो पाया, वायां भायां मिल करे वीनती सुणियो मुनिराया, महरकरीने भलां पधाया हुवा चि- तका चाया, [उडावणी] वायां भायांकी अरज सुणीजै, चौमासो चीकाणै कीजै, इतनी मोपरमहिर करीजै, हुसी घणो उपगार सरव जीवनकै मन भाया, भव्य जी० १, मुलक मालवै मांह बडोदासहर बडा भारी, परमेचा मोहताकुल ऊपना हुवा जोगधारी, धन्य मात और पिता जिनोंने जैसा सुतजाया, पूज जीवराजजी पर दिक्षा लेकर जिन धरम दीपाया [उडावणी] सुद्ध मन चित्तसें संजम लीना, छव कायाने अभय दान जो दीना एहवा उत्तम काम जो कीना, वैयावच बहु करै गुरांने साता उपजाया, भवि० २, पंच महाव्रतधार कार नहीं लोपे श्रीजिनकी, सम परिणामें सहै परीसा नहीं ममता तनकी, दोष बयालीस टाल आहार शुद्ध वै लेता है, तपस्यारूपी मालकारने भाडो कायाळू देता है, [उडा- वणी] अष्टकर्मासु सन्मुख लडता तपस्यारूपी वाण जो ९३ . " , धरता, पापरूप रज दूरै हरता, जनम मरण ओर जर। तीनोंका भय घटमें लाया, भवि० ३, नववाड शीलपाल आठ प्रवचन चितलाया, चार कषाय आठमद त्यागी रागदेप उपशमाविया, घारे भेदे कर तपस्या जिसका पार नाही, वडी तपस्या करी जिनोंने कहूं कठाताई [उडावणी] सोले पारणे सोले करिया, दिन बत्तीस अ- भिग्रह शुद्ध फलिया, धोवण आगार इता तप करिया, छुटकर तपस्या करी जिसीकी गिणती नहीं लाया, भवि. ४, सवाद्वाद इंदरी सब जीता समता चितधारी, धन्य पुरुष रसना वस करता जिन पुरुपोंकी बलिहारी, पूज पधाया वीकानेरमें हुवा उपगार भारी, सम्बर पोसा- या समायां नहीं आवै पारी, [उडावणी] वायोंमें त- पस्या हुई भारी, कहां लग महिमा कहुं जियारी, जिन घरकी चाह बलिहारी, पांच महीना सुखसे वीता आ- नंद बहु पाया, भवि० ५, दोनूं वखत वखाण देवे जद अमृतधारा वरसै भविजीव पिराणी सुण २ हरखै सम- कित शुद्ध फरसै, खमती परमती पूछ परसन दै उत्तर सुनन्याय, कोहूमानै कोऊ नही मानै सव परसम भाव, [उडावणी] न्याय नीत सब चितधरे हैं, पक्षपात दूर करे हैं, जो पुरुषोंका काज सरे हैं, एसे मुनीकै चरण भेट दुरगति विरलाया भवि० ६, गैनचंदजी गुणवान जिनोंद महिमा हदछाया, कोड जिभासें करूं गुणतो पार: पाया, चुनीलालजी चोखे चित्तसें छोडी जगमाया, यठाणास कियो चोमासो भविजीव मन भाया, वणी] कनीराम मन उछरंग आया, वुधसारू अलए गाया, पेम मगन हुइ मेरी काया, उगणीसे संताप साल काती सुदि नवम गाया. भविजी० इति पर्ट , , , [अथ सवइया रूपचदजीकृत ।] ॥ उद्योत प्रकाश भयो अंधकार नासभयो जेसें भानु उगतही तिमर नसाखो है, जेसे उदै चंदमुनि भेटत मि- थ्यात भागो दानशील तपभाव हिरदे विचाखो है, डूबतोहो कूपमांहि, काढलीनो ग्रहबांहि सावचेत कर शुद्ध मारग वतायो है, चोराहतो दीनो मोय खरच नम्मंगे कोय असो निगरंथ गुरु रूपचंद धाखो है १, सुमत गुपतधार निरदोष लेवे आहार दोष वयालीस टार ममताकू मारी हे, मिथ्यामत परिहरे समकित चि- त्तधरे संजमकी खपकरे मोटा उपगारी है, तपस्या कर- णशूर विद्यागुण भरपूर दोपसेती रहे दूर गुणारा भंडारी है, रूपोकरे अरदास राखो चरणारे पास पूज श्रीलाल- जीसें वंदना हमारी है २, कर्मकारण शूर क्षमागुण भरपूर दीपे है अधिकनूर कीरत सवाई है, हीरालालजी है तात साकरवाई है मात ओसवंशगांधी जात बहोत नरमाई है, गुरुरतनेस पाय घटमें वैरागलाय दीक्षालीनी चित्तवाय ऋद्धि छिट- काई है, कर्मचंदजी मुनि ज्यारी प्यारी लागेधुनि रूपचं. दकाने सुनी अमीवरसाई है ३, [ अथ ऋषि कर्मचंदजीकी लावणी।] ॥ आलाप, अरिहंत सिद्ध समरूं सदा आचारज उव- झायरे साधु,सकलके चरणकू मे यांदू शीश नमायरे १, कर्मचंद महाराजका में निरमल दरशण पायरे धरम ध्यान उद्योत देखी, मनडो बहु हरखायरे २, शरणमे आया तुमारीरे श्रीकर्मचंदजी महाराज अ- .

रजअब सुणो हमारी रे, [टर, हीरालालजी पिता आपकै, साकरवाई मात, कडवड,गांममे जनम लियो सिरे, गां- धीयांरी जात लागती सबकू प्यारीरे, श्रीकर्म० १, उग- णीसे गुणचालीसमें, रतनचंदजी गुरुकीना आसोज सुदि तेरसदिन मंगल, संजमके रंगभीनां, छोडदी ममता सारीरे श्रीक०२, सतरे भेदे संजमधारी, दोप वयालीस दाल, ज्ञान ध्यान क्षमागुण भारी, जिन मारग उजवाले, लोभ ममता• मारीरे श्री०३, ज्ञान ध्यान भणनेतणो सरे, उद्यम करै दिनरात, धरम ध्यानमे दिन गमेसरे कांई, नहीं दूसरी बात, मुनी मोटा उपगारी रे, श्रीक० ४, चीकानेरका श्रावक श्राविका, एककरे अरदास, चो- मासेरो कलपजिकोस काई, करो वीकाणेवास, अरजली जो अवधारीरे, श्रीक० ५, कजोडी मलजी है गुणचंता, जुहारमलजी छाजे, सूरजमलजी मांगीलालजी, धर्म- ध्यांनमें गाजै, मुनीसर सय गुणधारीरे, श्रीक० ६, धर्म- ध्यांनका ठाठ घणेरा, तपस्या हुई अतिभारी दोनुं वखते वखाण वाचता मूरतमोहन गारीरे सुणे है सब नरना- रीरे श्रीक०७, महासतियां उगणीस विराजै, अधिक अधिक गुण दीप, ज्ञान ध्यान ओर करै थोकडा, आठ कम्मान जीप, तपस्या इण विधधारीरे, श्रीक०८, रंग- जीकी धापांजीतो, नवठाणातूं सोवै, धूलांजीतो इक- सठकीना और घणी तपस्या होचे, करदिया अगता जारीरे, श्रीक० ९, खेतांजीकी लीछमांजीकै, थोक सैती- सको कीनो, सुगन कवरजी पानकवरजी, दोइकतीस जलीनो आठ ठाणा सुखकारीरे, श्रीक० १०, रतनकवर समुदायमें सिरे, सिरदाराजीरी चेली, फतैकवरजी करी अठाई ठाणा दोय रहेली, सतियां सोभैसारीरे, श्री० 1 ९६ ११, सात आठ नव दस थोकडा छुटकर गिणती नाई ज्ञान ध्यानकी घटा ऊमटी तपस्या मेह वरसाई मुलकमें जसविस्तारीरे, श्रीकर्म० १२, उगणीसे छासठके वरसे, द्वितीय सांवणमाई, सुदि चोथकी करी संवच्छरी, धर्म- ध्यांन चितलाई गुरूकी महिमा भारीरे, श्रीकर्म०१३, धीरगंभीर क्षमाके सागर गुणको पार नपावै, रूपचंद चरणाको चाकर लुल २ सीस नमावै, वंदना मानो हमारीरे, श्रीकर्म० १४, इतिपदं ॥ [लावणी दूजी ऋषि कर्मचंदजीकी ] ॥ मुनि करमचंदजी सहर वीकाणे आया अरे हारे छासटे आया मुनिवर सबके मन भाया, [ टेर, हीराला- लजी पिता आपके साकरवाई मात ओस वंशमें जन्म आपको गांधीजात विक्षात हेक्या जन्म आपका कडवड गांममे थाया, १, उगणीसे गुणतालीस मांही, रतनपुरी मझार, आसु सुदि तेरस मंगलने लीनो संजम भार हेक्या क्षमातणा गुण आपमें अधिक सवाया, अ० २, रतनचंदजी गुरु आपका जाणे सव नरनार पूज उदै चं- दजीकै पासे महाबत लीनाधार धन्य एसे मुनिकों आपने शिक्षवनाया, अ० ३, हेजी रातदिवस खप करै ज्ञानकी, भरपूर, हेजी एसे मुनीके चरणसरणसे, दुखजावै सब दूर,मुनि संगत सेती निरमल हुय जावै काया अ०४, हेअंग पांचमा वचे दोपारे सबहीकै मनभाय दिन ऊगे- तीजो अंग वांचे अमृत धुनवरसाय हेक्या वाणी सुणकै "सह भविजन हरखाया, अ०५, हेजी वारे भेदे तप करे सतरे संजमधार दोपवयालीस टालकेस कांई विद्यामें भरपूर, लावै सूझतो आहार धन २ भाग उसीका जिसका हाथ फरसाया, अ०६, हेजी पंचमहाव्रतधारी मुनिःकों, चंदन करूं त्रिकाल, समकित होवै निरमलीम काई, पाव मं- गलमाल, अनाथी मुनिसे श्रेणिक समकित पाया अरे ७, चार मुनिःजी संग आपक, तपसी ओर गुणवांन कजोडी मलजी जुहारी लालजी अर कमलजी गुणखान, हेक्या मांगीलालजी चपल बुद्धि दरसाया अरे० ८, उगणीसे छासठकै मांही, वीकाणे चोमास, चोमासो फेर करो कलपतो आ सबकी अरदास, हेक्या आवद माहातमा छंद जोडकर गाया अरे हारे० ९, इतिपदं ॥ [अथ लावणी ऋपि करमचंदजीकी तीजी.] [आलाप,] करजोडकै बीनती करूं, चरणामें शीश न मायकै, गुरू गुणवरणन करू, अज्ञा वडोंकी लायके १, मातपिता ओर जनमनगरी, कहताहूं समझायकै, कोण गांममें लीनी दीक्षा वोकहमें गायकै २, साधुसंतकी करे सेवा,वो नर चतुर सुजाण है, जो उनोंकी करे निदा, वो मूरख नादान है ३, थार २ करताई अरजी तुमारे चर- णमे ध्यान है, करो चोमासो कलपतो अब अरज लेवी मान है , पटकायाके पीर मुनीसर पंचमहाव्रतके धारी वीका- नेरमे कियो है चोमासोकरमचंदजी मुनि उपगारी [टेर] अवल हकीगत कहूं आपकी पांच मुनिसंग आये है, राजमलजी जुहारीलालजी, धनराज मन भाये है, सूर- जमलजी मांगीलालजी एकसे एक सवाये है, विनयचंत सभी संतोंर्क लुल २ सीस नमाये है [उडावणी] हेथे पंचमहावत पालो उत्तम है किरिया, देशुद्ध पालो शील १३ या० स० ९८ आचार संजम चितधरिया, विनयवंत गुणवंत आपहो क्षमातणा गुण है भारी, वीका० १, हीरालालजी पिता आपका साकरवाई है माता कडवड गांममें जनम लियो है, गांधी जात है विक्षाता, रतनचंदजी गुरू आपका उनका गुणमे नितगाता, पूज उदेचंदजी पै दीक्षा लीवी सभीकै मन भाना, [उडावणी ] है उगणीसे गुणतालीस सालमें संजम लीना, हेआसुसुदि तेरस वार मंगलरंग- भीना, रतनपुरीमें लीनी दीक्षा जाउं चरणकी बलिहारी वी०२, महासतियां महाराज विराजै सतरठाणासे इध- कारे, एकएकसे अधिक गुणोंमे नहीं आवै गुणका पारे नंदकवरजी ओर रंगूजी खेताजी था तपधारे करकरणी करम काटता जाऊं जिनोंकी बलिहारे, [उडावणी] है क्या सतरे भेदे संजम मुनिवर पाले, हे क्या वाईस परीसा जीत दोष सब टाले, गुणातणा भंडार आपहो नहीं आचै गुणका पारी, वी० ३, उगणीसे अर तेसठ सालमें वीकाणे मुनिथे आया दोनुवखत वखाण वाचतां भविजीवोंके मन भाया, सूत्र भगवती वांचे दुपारां सपहीकै चितमें चाया, ठाणा अंग यांचै दिनऊगै अमृत ध्वनि कर वरसाया [उडावणी] हेक्या वाणी आपकी दिन २ अधिक सवाई हेक्या आवड महातमा सहर वीकाणेमें गाई, करो चोमासो ओर कलपतो अरज करै सब नरनारी वीका०४, इति पदं । [अथ लावणी।] ॥ श्रीकर्मचंदजी महाराज जाउं बलिहारीरे गुरुसुख- 'कारीरे हुवा संवत उगणीसे छासठ चोमासो वो सुख- बीकाणे मझार, पांच ठाणांसुं आप पधारिया वरते सुखशाता गुणसताईस दीपे मुनीका क्षमारस पाता, दोष वयालीस टाल मुनीसर निरदोषण लाता निरदो- पण लाता सयकू हितकारीरे गुरुशुभकारी रे, १, पंचम- हावत पाले मोटका जिन आजाअनुसार दानदयाका मारग बतावै सुमती गुपतीधार दोय वखतको वखाण देवै पालै शुद्ध आधार मुनी ब्रह्मचारीरे गुरुसुखकारीरे, २, मन वचन काया वसकर लीनी रागद्वेषको मार वारे भेदे करे तपस्या नवकल्पी करे विहार वारे भावना भावै मुनीसर निरवद्य बोले विचार क्षमासुखकारीरे गुरुमुखकारीरे, ३, कजोडी मलजी जुवारीलालजी मुनि- वर हितकारी, सरजमल ओर मांगीलालजी, चांदो नर- नारी, घोल थोकडा सीखणकेरा आदेश कर भारी आ- तमकों तारीरे गुरुसुखकारीरे, ४, श्रावक श्राविका अरज करत है, मुनिवर सुणलेणा, कलपेसो चोमास चीकाणे दशण नित देणा, तेजकरण हे शरण आपकी भेटे गुरु- चरणा, अलप वुध माहारीरे गुरुसुखकारीरे, ५, इतिपद।। . [अथ लावणी शोभालालजी ऋपीकी ।] ॥ अथ आलाप ससदोड लिख्यते ॥ । अरिहत सिद्ध आचार्या उवाया मुनीराजरे पंचप- रमेष्टी नितनमूं तारण तरणजिहाजरे १, गुणवंतके गुण गावतां पूरे जोमनकी पाजरे उत्कृष्ट रस उत्पन्न दुवै सारै बोसगला काजरे दौडगुणीका गुण कोई गावैगा दुखदरिद्र गमावेगा फल मनवंछित पावेगा पार सागरसे लघावेगा जीव खट् काय न हणावेगा धर्म अहिंस्या यतावेगा भक्ती गुरुकी जो करावेगा विधीसें सीसन १०० मावेगा कन्हइया कहै वचन रसाल धारो सव हुवो पल- कमें निहाल मुनितूंही- पूज्य श्रीयके हे गुरुभाई शोभालाल मुनिजसधारी, जानतणा भंडार गुणका नहीं पार कहांलग कई विस्तारी टेर, नानालालजी तात आपकै जडाववाई है माता, ओसवंश विक्षात चोधरी जात सभीकै मनभाता,उदयपु- रमेवाड मुलकमं गांव जावद् है विक्षाता, गाल छत्तीसे जाण जन्मलीयो आंण अम्मा पिया हरखाता, [उडा- वणी] हेवहु गोरी मिलकर मंगलगीत जो गाते हेहद- गाते, हेसब सजनसनेही दैणवधाई आते, हेहां आते, हेवडभाई ज्ञानमल दिलमें बहु हरखाते, हेहरखाते, छो- टाभाई फेर हुवै इंद्रमल जावदमें परतिखजारी, ज्ञान १, तरुणभये फिर माततातकै सगपण करवाकी लागी, दिया नीमच परणाय हरखसे व्याह फेर कीनासागी, गृहवास छोटी ऊमरमें धर्मरुचि जवरी जागी, संसारका व्यवहार लगे जंजार भाववण गये त्यागी [उडावणी] हेअनित्यपदारथ जांणै जगसवीका, हेरंग २ में वीररस व्यापगये तवीका, हेवैरागी बनडा यणगये थे कवीका साल पचावन भंडारीसंग आयाचिकानेर मझारी,ज्ञानत. २, आज्ञा नहीं दीनी घरकांजव खमेव संजम लीना, साधु- भेप लियाधार तजा संसार खटकाय दान दीना, साल छपन्नवृद्धि चंद मुनियरकों जाके फेर गुरुकीना, करै बहुत अभ्यास ज्ञानका खास अमृतरस बहु पीना, [उडावणी] हेसडकडों थोकडा अल्पकालम मुखकीने, हेजिनमतकी रहस्या भिन्न २ करके चीने, हेखमतपर मतमे हुवे बहुत "परवीने, गृहवास सूत्रतीस वांचे गुरुगमसें लीया अर्थ- री, ज्ञान०३, गुरुभाई पूज्य श्रीयसंग त्रण चउमास , १०१ या आपसही, विनयभक्ति अपार नेकप्रकार करकै बहु निलही, पूज्य श्रीमुख प्रशंसा आपकी सुणीसो मुझसे जाय कही, मुझजिभ्या हेएक गुण अनेक पारकैसे जो पही, [उडावणी] हेकोडकवी मिल गुणकरै कोई आ- पका, हेसुरपतीनल हेपारसोई आपका, हेशुद्धक्रिया ज्ञान है दोई आपका, पंचमहाव्रत पालत विचरै दोपसह दूरां टारी, ज्ञान० ४, पांचे सुमती सोहे मुनीसर वणगुप्तीके भंडारी, पकायाके पीर ज्ञान गुणधीर सम दम खम गुणभारी, नववाडशील पाले मुनीसर दशविध जतीध- नेके धारी, अष्टमदको गार कपाय चार टार निजातम उजवारी, [उडावणी] हे मुनिचरण करण गुणधार सुणो नरनारी, हेदोप बैंतालीस टार लेवै शुद्ध आहारी, हेपूज आणावरते राखे घणो विचारी, पडिलेहण प्रतिक्रमण हमेसां सुषेशांम करता सारी ज्ञान० ५, सूत्रभगवती पन्नवणादी भाव विविधमुनि फुरमावै, हेतजुगत दृष्टांत देवै बहु सत भिन्न २ कर समझावै, अमृत समवाणी हमेसां दोनुवखत मुनि वरसावै, सुणकै मस्त होजाय भव्य हरखाय मजा आनंदपावै, [उडावणी] हेमुनिनय निक्षेपा सप्तभंज्ञादी जाणे, हेकरे न्यायसहित परमाण पक्ष नहीटाणे, हेपूछ प्रष्ण उत्तर देवै सूत्रप्रमाणे, त्याग खंध बहु हुवा वीकाणै तपस्याका नही आवै पारी, ज्ञान ६, शाल अडसठ चोमासो वीकाणे शोभामुनिकी हद- छाई मुनि देविचंद गेवर उमंग छति ऋद्धि छिटकाई, आ- रजियां तेवीस ठाणेसें त्रण समुदायकी सुखदाई, करै तपस्या घणी खग्गकी अणी जनम सफलथाई [उडावणी] हेअवलाल कन्हया छंद् जोडकै गाय, हेसब साध सं- तोको लुल २ सीस नमावै, हेमुझपंछित पूरोयेही अरज १०२ सुणाचे, चिंता चूरो सर्व संघकी संकट सब देवो दारी, ज्ञान० ७, इति पदं ॥ [सिरदारांजी आर्याकी लावणी ।। ॥ माहासती सिरदारकवरजी गुणरतनांकी है माला, दुकर करणी करै हमेसां करमतणा काटे जाला, [टेर रामसुखजी पिता जिनोंका फूलांवाई है माता, ओश वंशमे जन्म लियो है जातसूराणा विक्षाता, जोधपुरमें लीनी है दीक्षा भविजीवोंकै मन भाता, सुगन कवर महाराजर्षे दीक्षा लीवी सभीके चितचाता, [उडावणी] हेडगणीसे तीस नवसालमें संजम लीनो, हेसंगतीज कंवरजी पटकाया दान दीनो, हेसब तीनजणा माहाउ- तम कांमजो कीनो, गांमनगर पुरपाटण विचरै करै धर- मका उजवाला, दुक्कर० १, पंचमहाव्रत निरमल पालै सुमत गुपत शुद्ध चितलावै, बाईस परीसा सेवेहो आ- करा समभाव नहीं डरपाच, ज्ञान ध्यानमें लीन सदा रहै एकप्रभूकू येध्यावै, रागडेप पक्षपात नहीं है भवि जीवाकै चितचावै, [उडावणी] समभाव तपस्या कर सदा सुखदाई, हेगुण बहोत सतीका कहणेमें नहीं आई, हेनहीं क्रोध अंगसंत संग कियां तिरजाई, कहूं कहांलग शोभा उणकी सब जीवनकै रिछपाला, दुकर० २, नव- वाड शुद्ध शीलपालता सुत्रसिद्धांत मणता सारा, रात- दिवस खप करे है ज्ञानकी कहूं कहांलग विस्तारा, दोप- वैतालीस टाले मोटका लेवे सातो वै आहारा, छोटा मोटा दोपण टालै राखै घणो बे विचारां [उडावणी] . SA सुभाव सरल माहा गुणखाणी, हेआगम अनुसारे वचन कहै सुखदानी, भिन्न २ ज्ञान सीखावै सवकू वचन जि- नोंका है बाला, दुकर० ३, तीजांजी महाराजकी महिमा कहूं सुणो सब नरनारी, सोहतीस भाव अहो निस जि- नका क्षमातणा गुण है भारी, नरम वचन निरदोष वोलता राखे घणो दिल विचारी, रातदिवस करै ज्ञानका उद्यम कहूं कहांलग विस्तारी, [उडावणी ] हेक्या सोन- कंवर छगनांजी जीवणांजी सोहै, हेक्या पेमाजी वरखता वरांजी मन मोहै, हेमाणकभूरांजी राजकंवर गुण दोवै, हरखांजी महाराज ग्याराजी वारे ठाणा शोभे आला, दुकर० ४, नंदकवरजीकै टोलेमे गुणवंती सतियां सारी, एकएकसे अधिक गुणोंमे विद्यावंत है अधिकारी, किरि- या पातर सरल खभावी सरब सती महागुणधारी, का- डजिह्वा गुण करे हो जिनूंका नहीं आवै उनका पारी, [उडावणी] हेक्या आवड महातमा छंद जोड गाता है, फेर सुखसंपत पाता है, हेक्या श्रावक आविका दश सदा चाता है उगणीसे ओर साठसा- लमे जोडकरी अतिरसाला, दुकर०५, इति पदं । हेदुख जावै [अथ साधपणेकी लावणी लिस्यते ।] ॥ कायाम ज्ञान कर धरा ध्यान जिन जिगकी माया छोडदिया, होगया साध सघ छोद वाद जिन समता रस भरपूर पीया, टेर,शुठे मात सव नात भ्रात ये सय खारथके जनिलिया, परभृसें प्रीत तज जगकी रीत श्री- जिन मारग पहचान लिया, भजते अरिहंत रहते एकत जिन चित मनसेती ध्यान किया, होगया० १, तज हिंसा , , .

१०४ झूठ दीवी जग• पूठ जिन अदत्त दांनळू दूर किया, मैथुन परिग्रह छोड कोडसो पंचमहाव्रत धारलिया, तज ज- गका भोग लेलिया जोग छवकायाकू अभयदान दिया, होगया० २, क्रोधमांन सब झूठा जाण जिन माया लो- भकू दूरकिया, दिल दया धार होगये पार फेर करम- किल्लेकू तोडदिया, कुमतीकू कार बहै शिवकी वाट जिन खूब धरम उपदेश दिया, होगया० ३, एसे जोसंत गुणके महंतमें बेर २ परणाम करूं, शुद्धमनसें धार करूं खेवा पार हिरदेमें उनका ध्यान धरू, कहै कनीरांम सब छोड काम जिन राजरटेसो सफल जिया होगये०४, इतिपदं । [पार्श्वप्रभूकी लावणी।। ॥ ध्यान नित धरता तेरारे श्रीतेईसमा जिनराज काज सिद्ध करदो मेरारे, [आलाप,] अरिहंत सिद्ध आ- चारजजी, उवझाया मुनिराजरे, पंचपरमेष्ठीकू नमूं तारण तरण जिहाजरे, पारस गुण वरणन करूं अज्ञा गुरुकी पायकै, मातपिता जनमनगरी दाखू शुभचित लायक, [१,चाल,] कासीदेश बनारसनगरी अश्वसेन तिहां राय, वामाराणी है गुणखाणी, जिनकी कूखे आया लीया ज- नम शुभवेरारे, श्रीतेई० १, मातपिता मनहर खियासिरे पांम्या सुख अथाय, इंद्रादिक मिल महोछव कीनो मेरू- परवत जाय, गावता गीत घनेरारे श्रीते०२, इकदिन गंगाऊपर आये माताजीकी लार, वडे नागकू जलता देखा तापसके दरबार, लोक बहु होरह्या भेलारे श्री०३ कुणसा नाग जले लक्कडमें, हमकू आंख दिखाय, प्रभु सिमानता भाग घशा AUCUACHAND CHAIRODA १०५ JAIN LIBRARY तपना तेरारे, श्रीते०४, बडे नाग• काढउयाखा, मेल्या वर्ग मझार, पद्मापति धरणेदर हूवा, सुणा मंत्र नवकार, उठालिया तापसडेरारे, श्रीते० ५, कमठमर हुआ मेघ- माली, प्रभुहुये अणगार, मेहवरसाये प्रभु न चलिये रचिया फैनहजार, कमठ मन भया अछेरारे श्रीते० ६, धरणेदर पदमावती सरे, आसण अधर उठाय, उपसरग टाल्या प्रभुजीका, आया जिणदिसि जाय, गावैगुण प्रभु- केरारे श्री०७, पारस केवल पांमिया सिरे, तीरथ थाप्पा- चार, साधसाधवी श्रावक श्राचिका इसमे फरक नसार जगतमे किया उजेरारे श्री०८, पलते नागकू जिम तुम ताखो, तिम प्रभु मुझतार, हिमत मलसुत कनीरामकी अरजीये अवधार,मेटभव २ का फेरारे श्रीते०९, इति पद। [अथ मुक्तिमार्गकी दुक्करता ढाल] । मुगतिरो मारग दोहलो जीया चतुर सुजाण, [टेर,] पृथवी काया नहीं छेदिये, जाणो निज मातसमान, त्र- सथावरवासोवसे, घणाजीया हंदीसाण, मु. १, पाणी- विना परजा इले, आसा करेरे राजान, ऊंचो मुखकर जोवता, किरपा करो भगवान, मु. २, चेचेरे फरजन आपरा, तोपिण नहीं मिलेधान धसको खाय धरती पडे, ऊभा तजदै माण, मु. ३, तेऊ कायारो शसतर आकरो, वायू देवेरे वधाय, उडता पडेरे पतंगिया, जीव घणा जलजाय, मु.४, तेज चाउरो नीसखो, मानवभव नहीं पाय, निश्चरे जावै तिर्यंचमें, घणो दुखियोरे थाय, मु०५, सतावर पानाय चरित्र में एक नाग लकदेमें अपवरे यचाया ऐमा डेरा है नाग नागणो दिगायर कहते हैं इसका पाठ बदलाया है मनसे नहीं। Mshailer १४ पास .

वनास्पती दोय जातरी, भाखी श्रीभगवान, सूई अग्रनि गोदमें, जीव अनंता वखाण, मु. ६, येपांचोंही थावर जांणियै, मति वाओतरवार, जीव गरीव अनाथ है, मति काटो निराधार, मु०७, बसथावर हणियांविनां, पुद्गल पूजा न होय, विणभुगत्यां छूटे नहीं, मरसी घणो- रोय २, मु०८, पुद्गलरी ब्रपती करै, परतिख लूटेरे प्राण, अनुकंपा घटमें नहीं, खुली दुरगति खाण, मु. ९, रम्मत देखणनें गयो, ऊभो रह्यो सारीरात लघूनीत संका घणी वाहिर निसरियो नहीं जात, मु० १०, नाचै वैस्यारो ता- यफो, निरखै रंगसुरंग, रमणीरे संगमें राचियो, पोहे- लाल पिलंग, मु. ११, दुखकरने सुख माणतो, रुलियो काल अनंत, लेखचौरासी जीवायोनिमें, भाख्यो श्रीभग- वंत, मु०१२, गलकटू मिलिया घणा भरियो ठगांरोव- जार, कोई पूत्रजणनी जण्यो, चाले सूतररे अनुसार, मु० १३, आसव संपदाकारमी, जांणो वालूडांरो ख्याल, निसचे परभव जावणो, बांधो पाणी पहिलांपाल, मु० १४, सुसरारे घरे जीमतो, सखियां गायरही गीत, थो- डादिनांमें पडसी आंतरो, निश्चै जांणो यही रीत,'मु० १५, कायरने चढे धूजणी, सूरासनमुख होय, नाठा जावै गीदडा, मानवभव दियो खोय, मु. १६, ओसंग्राम कह्यो केवली, सूरा सन्मुख थाय, झूझ रह्या अपणी देहसूं गुमान गर्व गमाय, मु०१७, 'जीव दयारो सिर सेहरो, बांध्यो श्रीनेमजिनंद, गजमुक माल वनडोवण्यो, पाम्यां परमानंद, मु० १८, मेतारज मोटा मुनी, धर्मरुचि अण- गार, हिंस्या कुमति डिग्यानहीं, खोल्या यांना भंडार,.." मु० १९, सेठ सुदर्शन जीतियो, जीवदयारे प्रसादार, परदक्षणा, ऊभाकरे धन्यवाद, 'मु० २०, १०७ कर बांधियो, श्री श्रीकृष्णमुरार, आज्ञा दीधी आणंदसु, लेवो संजमभार, मु. २१, साढी वारे घरसां लगै, झूझ्या श्रीवीरजिनंद, जीवद्यारो सिर सेहरो, बांध्यो त्रिसला- रेनंद, मु० २२, कालोरे मुखकीयो चोरनो, फेखो नगरम- झार, समुद्र पाल ते देखने, लीनो संजमभार, मु० २३, हिंस्याम चोरीरी नियमा कही, लूंटे जीवांतणां धुंद, कु- गुरुरो भरमावियो, होरह्यो अंधाधूंद, मु० २४, करण मुनीसर इमभणे, पालोवरत अखंड, जीवदयारो धर्मआ- दरो, भाख्यो श्रीभगवंत, मु. २५, इति पदं ।। [अथ श्रावककरणीकी सिक्षाय ] ॥ श्रावक नाम धरायने, एहवाकरै अकाज, तिनं समझु अद्धतां, मनमे आवै लाज, [१, ढाल, बांदू सोले जिनसो, ॲडामारीने धडियां उडाचे, सुदरी बदि करीने दीखावे, त्यागे नहीं पारकी नारो, तेश्रावक किम उत्तरै पारो, १, परनारीने रहै तकता, जिम ग्रहण ,माहिं मंगता फिरता, वचन बदै अतिविकारो, २, ते०, सूंक खायने पेटभरै, विसवास देयने घात करे, दाले धर्म निंदै सं- सारो, ३, ते नीर अछापया मांहि पडै, भैसा जिम पैसीने रोल कर, बलै पीवणरो नहीं परिहारो ४, ते०, कंदमूल भखैनें तकै मूला, बहु वीजारांध करै होला, पलै घोरभखै लटसंहारो, ५, ते०, बले गेररमेनें घोलै अछता, परनार तकै रातूं फिरता, सपडतो खावै मारो, ६, ते०, अछताक जिया मांहि मिले, कवड़ी साटै पै- जार चलै, ओ उत्तमरो नहीं आवारो, ७, ते०, शुको पीवैनें मांस भग्वे, रात्री भोजन निशदिवस तक, h १०८ खातां पडजावै अंधारो, ८, ते०, कुलनी कूडी रूढताणे, वल खलगुल एकसमोजाणे, जिम मद 'छकियोई नर- नारो, ९, ते०, गुरु मिलिया हीणाचारी, विरदाय कियो निज अधिकारी, चोरकुत्या मिल्यां किणरो सारो, १०, ते०, गाहक मिलियां सखरी दाखै, छलवल करनै नखरी नांखे, कूडा सुंसकरै केई अणपारो, ११, ते०, कर्मादान कर पनरै, बले पत्थर फुडायने विणज करै, ऊंठ बलधरो लेवै भाडो, १२ ते०, वचन आडंबर करै अछतो, 'थोथा बादल जिम गाजतो, लोकलाज नहीं लिगारो, १३ ते०, चुगली खाय कहै अछती, परघर वो नहीं साचरती, जाणै धर्मी ठग वुगलाकारो, १४ ते०, परदोपन देखै ति- लजितरो, अछ तोही आल देवै नितरो, परनिंद्यारो न- हीपारो, १५ ते०, नहीं सूंसविरतपच खाणरती, तपमूल करै नहीं शक्ति छती, तूट पड्यो खावणलारो, १६ ते, देव गुरु धर्म नहीं लखिया, बलि श्रावकमें वाजै मुखिया पिण अंतरगतमैं अंधारो, १७ ते०, तत्वतणो न करै नि- रणो, तिण अछतो मांड मेल्यो सरणो, किम उतरे भवजल पारो, १८ ते०, नितरा कुदेव देवी पूजे, पिण अंतर, गतिमै नहीं सूझै, अरिहंत ब्रह्म तारणहारो, १९, ते०- इम सुणने ममता मेटो, इकदेव निरंजन शुद्ध भेटो, जो थैचावो निसतारो, २० ते०, श्रावक सीखनी इक- वीसी, चोमासे अजमेर में निवसी, रत्नकहै सुणो नर- नारो, २१, ते०, इति पदं ॥ . [अथ साधुकरणी शिक्षा, ढाल, मानसी सवाल.

आपै आछीतरै, बांधे पेटनी पाल, ओमारग नहीं साधरो [आंकडी, बेटा बहू मायापना, असत्रीनैं भरतार, सासू बहू सगातणा, कहै समाचार, २ ओ०, लाभ अलाभ भाखै वले, जोतपर्ने जोय, जनममरण बतायदै दोष तीसरो होय, ३ ओ०, जात जणावै आपरी, दीनदया मणोथाय, आहार नआवै पातर, मूंढोदै कुमलाय, ४ ओ०, ओषध भैपज करै, बलेदेवै सराप, क्रोधकरी लड- विध लिये, ज्ञानी कह्यो पाप, ६ ओ०, मान माया लोभ करी, हवा दोपण दश, पहिला पछेने साथे, करै घणो- जस, ६ ओ०, चारणदै विरदावली, भोजगर्ने भाट, अ- णदीधां ओगुणकरै, थोथो बैठो पाट, ७ ओ०, विद्या फोर कामण करै, वलै मंत्रने चून, संजोगमेले सर्वथा, इसड़ां करै खून, ८ ओ०, उसासणारा दोपए, गलावै, गर्भ, उत्तम ए नहीं आदरै, साधूटाले सर्व, ९ ओ०, रसनाना लंपटीथका, मेलै आहार संजोग, आछो मि- लियां राजी हुवै, भूडो मिलियां सोग, १० ओ०, ताक २ जावै गोचरी, लावै ताजामाल, उवास व्रत करै नही, कुंदा वणरह्या लाल, ११ ओ०, रसनारा गिरधीयका, आरामें जाय, लघुता लागे लोकमे, निंद्या धर्मनी थाय, १२ ओ, उणदिन जायसकै नहीं, रहै रातरा ध्यान, प्रभाते जावै तेडियो, स्यूंपायो ज्ञान, १३ ओ०, भारी आहार भलीतरे, खावं ठंढोठार, भांगेवाड तोल्यांधका, पीछे दुवै भांड, १४ ओ०, वेसवार भला घालिया, भलो दीयो वधार, तीषण आछीतरे कियो, यले कहै छमकार, १५ ओ०, चावलदालमे घी घणो, सरायने खाय, चारि- चने करै कोयलो, कथो सूत्तरमांय, १६ ओ०, निरसो आहार तीवणवले, नहरी मिरचनें लूंण, चारित्रमें निकले धुंओ, खावै माथो धूण, १७, ओ०, एकण घरसुं बहरता, दश २ जणनो आहार,बाई असन करै मोकलो, भावना भावै तिवार, १८ ओ०, कोई पंथी पूछै क्यूं खडा, देखू साधारी वाट, रसगिरधांने वो जाय कहै, दोव्या जाय गहगाट ओ० १९, माटे पाणी मांहनें, नाखै मूठीराख, यहरा वणरे कारण, बहरे साधपणो नाख, २० ओ०, आधा करमी आहार लै, बाजै मोटा साध, जिन पंथनें तेरे तीन कियो, सेवै सुख अगाध, २१ ओ०, लाखांकी डारी घातसुं, वणै रेसमीवस्त्र, सो पहिरे निरदईथका, पाजै पूज पविन्न, २२ ओ० दूसरे गांम पोहचायवा, जावै गृहस्थी लार, भावभेल आरंभ करै, बहरी खावै वो आ- हार २३ ओ०, जागा नीपावै आपणी, कवेलू देवै फि- राय, 'आमना जतावै आपरी, साधपणो उठजाय, २४ ओ०, वस्त्रपात्र थानक वलै, अनें चोथो “आहार, साधू जोसूझता भोगवै, ज्यांरी हूं बलिहार, २५ ओ०, आर- जा जीमावै हाथ , चांटकर देवै आहार, पासे बैठी रहै आरज्या, चोथो व्रत गयोहार, २६ ओ०, सुगडांग सूत्र- में कयो, 'तिरेसो तारणहार, डूबै जिकै किम तारसी, जोवो हिरदे विचार, २७ ओ०, इति पदं ।। ॥ सुणो२ अंगरेज वहादुर, गउ अरजी-करती, मुझ क्या तकसीर आजमें, बेनाहक मरती, १, मेरा दूध सब दुनियां पीवै, मैं जगकी माता, एसी वात विचार देख,क्यों मुझकों मरवाता, २, नर दुनियां में ज्ञान जोपाया, नजर नहीं आता, मुझे-मारकर पाप न जाणे, क्यागुरु सिख- * लाता, ३, वे दरदीतूं दरदन जाणे, जुलमहुवा जाता, 1. कसाइयांसें, मुझकू मरवाता, ४, सभी , , समझकै देखो साहिब, गऊ बहुत डरती, गरीव ओर लाचार दीनमें, दूध पिलाकै सुख करती, ५, मेरा दुखमें कहूं किसीपैं, कोणसुण अरजी, ज्ञानी होयसो ज्ञानसे समझे, और सवी गरजी, ६, दूध पिलाती पूत्र जनमती, दुनियां पालणकुं, जमी दारका करूं गुजारा, हासल रा- जा·७, वैद्यकग्रंथ पढ़ा जो पूरा, मेरीकदर जांण, शोथ संग्रहणी अजीर्ण खोवै, मेरी छाछ स्यांणे, ८, रक्तपित्त दही शिखरन सेती, अतीसार जावै, नैत्ररोग सब और रतोंधी, घीसै नास पावै, ९, सवी रोगपर दवा घृतकी, दवा संग वणती, वादी पित्त सव रोग मिटावै, एसा में सुणती, १०, दवा शुद्ध गोवरसे केई, गोमुत्रसे होती, पांडू सोथ गोमूत्रसे मिटता, जहर केई खोती, ११, दूध दही धृत छाछ विगरनर, किसीकै नहीं सरता, मुझसें पले और मुझकों मारे, एसा जुलम करता, १२, दूध दही घी घरमे वरते, छाछज बैटनकू, इतने सुख मेरे संगरहते, लष्ट पुष्ट तनकू, १३, गाडी रथके पूत्र जूतते, खेती करन- नकू, इंधन और घरकी कर शोभा, गोबर नीपनकू, १४, नृपतीके शिर चमर ढोलावै, शोभा बटुत करती, मेंअ- बला लाचार होयकर, सरणा हियेधरती, १५, इति गौअरजी पदं ॥ [ अथ प्रसरित 11 ॥ समकित कैलक्षण यही गुणका ग्राहक होय, जैसे' जैसा समझ, रखै विरोधन कोय, १, सम परिणामी शंतका कवलग करूं घखाण, अन्यमती शुभगुण धरै, चोभी- नीका जाण, २, धनकण कंचन सय तजे, निंद्याविकथा

११२
त्याग, जिन आज्ञामें चलतजो, सोही संतवड भाग, 3,
उगणीसै अडसठमे, वुधजन किया विचार, संपवढे जिन
धर्ममे, तो होवै जयकार, ४, मांने कर्त्ता तो कहा, नहीं
मै कहा विशेप, मनमांने मानेविगर, नगई ममतारेख, ६,
धर्म अनादि जैनका, देवपूज अरिहंत, शुद्धदेत उपदेशसो
साधू वजैमहंत, ६, सूत्रादिकमें जो कहा, नय निक्षेपामूल,
स्थाढाद रुचि जब व?, यही धर्म अनुकूल, ७, गोले छा.
गोत्रीप्रवर, वींझराज सुतनेक, मोहणलाल पूनमशशि,
बडभागी सुविवेक, ८,इनके कहणेसें किया, संग्रहपाठक
राम, छपायके परगट किया, तद्भक्तोंके काम, ९, वा-
चक जीवण प्रेमचंद, अमरचंद गुणरास, वीकानेर मरुदे-
शमैं, विद्याशाल प्रकाश, १०, जैसा जिसने रचदिया,
सोहीलिखा सुजाण, अगर अशुद्धि होयतो मुझ दोपण
मतजाण ११, वायां भाया पढतही, मनमै हरखित होय
अधिक ओछ लिखते रहा, मिच्छामि दुकडमोय १२, इति।।
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Gun Vilash 22 Samudaya

Author
Shri Amar Chand
Title
Gun Vilash 22 Samudaya
File name
Gun Vilash 22 Samudaya
Text
OCR done
Citation
1913
Published
2011/01
Publisher
Bal Kirshan Ramchandar Chapakhan,
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546396
Barcode
4990010024876.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
2fhaDd6S1IO
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