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Satyamrit(manav-dharm-shastra)drashti-kand
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सत्यामृत
मानव-धर्म-शारक
[ दृष्टि--काण्ड]
प्रणेता--
दरबारीलाल सत्यभक्त
संस्थापक सत्यसम
मूल्य १)
प्रकाशक- सूरजचन्द सत्यप्रेमी [ डॉगी] सत्याश्रम, वर्धा [ सी. पी.] मूल्य- प्रथमावृत्ति, १० एक रुपया चार आने मुद्रक--- सत्येश्वर प्रिण्टिङ्ग प्रेस बोरगाँव, वर्धा [ सी. पी.]
प्राथमिक वक्तव्य सत्यसमाजी-वन्धुओं में यह चर्चा चल पड़ी थी कि अपने लिये किसी ऐसे मूल-ग्रन्थ की आव- श्यकता है जिसे हम विश्व-शान्ति के स्थायी उपाय-रूप सम्पूर्ण राष्ट्रों, सम्प्रदायों और जातियों में सांस्कृतिक ऐक्य स्थापित करने के तरीकों को अच्छी तरह समझने और मनन करने के लिये भगवान सत्य का प्रामाणिक सन्देश कह सकें। जब मैं प्रेमधर्म का प्रचार करता हुआ 'छिंदवाड़ा' पहुँचा तब वहाँ के अध्यक्ष ने एक मनोरजक बात सुनाई, बोले-"अनेक सम्प्रदायों के बन्धु हमें कहते हैं कि ' यह कैसा सत्यसमाज है ? जिस का कुछ जड़मुल ही नहीं, विना ही जड़-मूलवाला यह कोनसा झाड़ ?' तव साहब! हम उल्टा-सीधा यह उत्तर तो दे दिया करते हैं कि 'अमर-बल को जड़ नहीं हुआ करती' परन्तु हम को भी अनेक बार ऐसे विचार उत्पन्न हुए है कि एक विश्वमान्य सर्वोपयोगी धर्म-शस्त्रा की आवश्यकता अवश्य है ।" यह वात सुनकर मैंने कहा कि,---'सन्देश' के अंकों में सत्यसमाज का इतना साहित्य निकल चुका है कि यदि उसे एक स्थान पर एकत्रा किया जाय तो किसी भी महाशास्त्र से कम नहीं होगा और यह आप शीघ्र ही देखेंगे कि आपके इस सल्यसमाज-रूपी उपवन के लिये उस संपूर्ण सामग्री को पीस कर- कूट-छान कर ऐसा सत्यामृत तय्यार किया जाने वाला है जिससे तमाम वृक्षों को संजीवन, सिंचन और प्रगति मिले।" मैंने वर्धा आकर पूज्यवर पिताजी से प्रार्थना की कि वे सत्यसमाज के गंभीर, विस्तृत और ठोस सत्य- सन्देशों को व्यवस्थित और शृंखला-बद्ध बनाकर ऐसे उदार, सर्वव्यापक पारिभाषिक शब्दो में ढाल दें जिस के आधार पर संपार युग--युग तक वास्तविक सुख और शान्ति के असली मर्म को न भूल सके । वहाँ क्या देर थी? -तुरन्त काम शुरू कर दिया गया और आज आपके सामने उस मानव- धर्म-शास्त्र का यह पहला काण्ड मौजूद है जिसमें अपने जीवन के अनुभव-कोष का आधार लेकर विश्व-हित पर दृष्टि रखते हुए प्रेम-धर्म का ऐसा मौलिक विवेचन किया गया है जो सम्पूर्ण धर्मोका मूल कहा जा सकता है । इस ग्रन्थराज में अन्य शास्त्रों का उपयोग तो उतना ही हुआ है जितना आँखों के लिये अञ्जन का होता है:-- 'अनुभव और तर्क दो आँखें, अञ्जन सारे वेद' यह शास्त्र इस पंक्ति का निर्दोप उदाहरण है। मानव-जाति को अपना आदर्श निश्चित करने के लिये, विश्व-मानव के जीवन-रहस्य को समझने के लिये और उसके अनुसार आचरण करने के लिये एक असाधारण मौलिक दृष्टि प्राप्त करना हो तो हरएक मज़हब के अनुयायी को इस शास्त्र का नियमित रूप से मनन-पूर्वक स्वाध्याय करना चाहिये ।
(...) विषय-सूची ध्यान से पड़ने पर आपको यह माफ मालूम हो जायगा कि इस ग्रन्थ में आदर्श मानव-जीवन की कितनी ही जटिल समस्याओं को सुलझाते हुए गंभीर से गंभीर विषय को भी कितने सुन्दर, सरस, युक्तियुक्त, संक्षिप्त और सीधे-साधे नवीन पारिभाषिक शब्दों में स्पष्ट किया गया है जो अन्य शास्त्रों में आपको क्वचित् ही दिखाई देगा। यद्यपि इस महाशास्त्र का अवतरण सत्यसमाज के लिये हुआ है फिर भी इसका लाभ तो संसार को मिलनेवाला है । आप जानते है कि संसार के सर्वोत्कृष्ट प्रयत्न का नाम भगीरथ प्रयत्न है कारण कि सम्राट् भगीरथ गंगा-सरीखी सुर-सरिता को अपने पूर्वज सगर-पुत्रों के उद्घारार्थ घोर परिश्रम से हमारे बीच लाये हैं-परन्तु उन सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ या नहीं यह तो भगवान भूतनाथ ही जानते है लेकिन उस गंगावतरण से आज हमें कितना लाभ मिलता है यह आप प्रत्यक्ष देख रहे हैं । उसी प्रकार इस सत्यामृत-प्रवाहिनी पवित्र गंगा से सत्यसमाज का उद्धार हो चाहे न हो पर एक दिन ऐसा अवश्य आयगा जब संपूर्ण विश्व-मानव को इस पवित्र तीर्थ में स्नान किये बिना अपना जीवन अधूरा-सा या यो कहिये कि किंकर्तव्यविमूढ़-सा लगने लगेगा । इस शास्त्र के दो काण्ड और निकलेंगे जिनका नाम आचार-काण्ड और व्यवहार-काण्ड होगा । इस प्रकार यह शास्त्र दुनिया के लिये एक असाधारण मानव-धर्म-शास्त्र बन जायगा । इसके नियमित मननपूर्वकं स्वाध्याय करनेवाले पाठक एवा ऐसी ग्वास मौलिक और सम-भात्री दृष्टि पायेंगे जिसके द्वारा वे हरएक स्थान की हर एक वस्तु को हर एक समय यथावस्थित रूप में देख सके । मनुष्य के मानस का यह स्वभाव है कि वह कल्याणकारी समझकर जिस तत्व को प्रचण्ड प्रयत्न से ग्रहण कर पाता है उसे ही सुन्दर समझकर सहज ही स्वीकार कर लेता है। मुझे यह लिखते हुए सब से अधिक हर्ष होता है कि यह महाशास्त्र इसी उद्देश्य को सामने रख कर प्रकाशित किया गया है कि प्रत्येक श्रेयस्कारी तत्व मनुष्य के मानस को प्रिय, सुन्दर या सुख देनेवाला प्रतीत होने लग जाय ताकि सब लोग सरलतापूर्वक आनन्द के साथ उसका आचरण कर सकें । अंत मे मैं यह विश्वास-पूर्वक कहता हूँ कि यदि शिक्षण-संस्थाओं के संचालक इस ग्रंथ का श्रद्धा के साथ स्वाध्याय करेंगे तो वे साम्प्रदायिक विष से शून्य सम-भावी धार्मिक शिक्षा के लिये इसे एक मात्र पाठ्य-ग्रन्थ बनाने के लिये तुरन्त लालायित हो उठेंगे। आशा है कि गुण-ग्राही पाठक हमारे इस सर्वोपयोगी महान्-अनोग्वे प्रयत्न की काफ़ी कद्र करेंगे । २७-१-१९४० सत्याश्रम, वर्धा . [सी. पी.] विनीत-- सूरजचन्द सत्यप्रेमी [ डाँगी] ५ विषय-सूची पहिला अध्याय सत्यदृष्टि- पृ.१ से १८ , , भगवान सत्य । सत्यदर्शन की तीन बातें--निष्पक्षता, परीक्षकता, समन्वय-शीलता । कालमोह स्वस्वमोह, प्राचीनताका. मोह, नवीनताका मोह, प्राचीनता के मोह से विचारसत्य का विरोध और प्रत्यक्ष सत्य पर उपेक्षा । परीक्षकता, उस के लिये तीन बातें-बुद्धिमत्ता, अदीनता, प्रमाणज्ञान । वस्तुपरीक्षा अवस्तुपरीक्षा, मग्नपरीक्षा अमग्नपरीक्षा। शास्त्र का उपयोग, अनुभव की दुहाई, प्रत्यक्ष का उपयोग, तर्क का स्थान । दो तरह का समन्वय-आलङ्कारिक, पारिस्थितिक । आलङ्कारिक के दो भेद-उपपन्न और अनुपपन्न । दूसरा अध्याय - ध्येयदृष्टि - पृ. १९से ३२ जीवन का ध्येय सुख । अन्य व्ययों की आलोचना । सुखका व्यापक अर्थ । आत्मशुद्धि ध्येय की विवेचना, उस में दो आपत्तियाँ-अर्थ की अनिश्चितता और जिज्ञासा की अशान्ति । अधिक सुखका निर्णय । तीसरा अध्याय -मार्गदृष्टि- पृ. ३३ से ४७ दुःख-विचार । दुःख के भेद-शारीरिक मानसिक । शारीरिक दुःखके छः भेद-आघात, प्रतिविषय, अविषय, रोग, रोध, अतिश्रम । मानसिक दुःखके पाँच भेद--इष्टायोग, अनिष्टयोग, लाघव, व्यग्रता, सहवेदन । सुखविचार--सुखके छः भेद--प्रेमानन्द, जीवनानन्द, विषयानन्द, महत्त्वानन्द, मोक्षानन्द, रौद्रानन्द । उपायविचार--दुःखों के तीन द्वार, प्रकृतिद्वार, परात्मद्वार, स्वात्मद्वार । दुःखनिरोध के पाँच उपाय-सहिष्णुता, रोध, चिकित्सा, प्रेम और दंड। महत्त्व के अधिकार विभव आदि १४ भेद । , " चौथा अध्याय - योगदृष्टि - पृ. ४८ से ६४ चार योग । भक्तियोग । भक्ति के तीन रूप--ज्ञानभाक्ति, स्वार्थभक्ति, अन्धभक्ति । पहिली उपादेय । संन्यासयोग, सारस्वतयोग, कर्मयोग, परा मनोवृत्ति अपरा मनोवृत्ति । योगी की परामनोवृत्ति के तीन चिह्न न्यायविनय, विस्मृतवत् व्यवहार, पापीपापभेद। चारों योगों की मनोबुद्धि-निमित्तता ।
(७) पृ. ६५ से १४० - पाँचवाँ अध्याय - लक्षणहष्टि- योगी के पाँच चिह्न--विवेक, धर्मसमभाव, जातिसमभाव, व्यक्तिसमभाव, अवस्थासमभाव । सिद्धयोगी, साधकयोगी, साधकयोगी के तीन भेद--लवसाधक, अर्धसाधक, वहुसाधक । विवेक के द्वारा चार मूढताओं का त्याग---गुरुमूढ़ता, शास्त्रमूढ़ता, देवमूढ़ता, लोकगृढ़ता गुरु की तीन श्रेणियाँ-- स्वगुरु, संघगुरु, विश्वगुरु । कुगुरु, शब्दभापा, मौनभाया । वेष, पद, व्यर्थक्रिया, व्यर्थविद्या ये चार गुरुत्व के चिह्न नहीं है । गुरु की ज़रूरत किसे नहीं है ? गुरुडम या गुरु-वाद का परिहार । गुरु की परीक्षा। ६५ से ७३ । शास्त्रमूढ़ता । पाँच कारणों से शास्त्र-परीक्षा की ज़रूरत--गुरुपरोक्षता, परिस्थितिपरिवर्तन, शब्दपरिवर्तन, अर्थपरिवर्तन, अविकास । परीक्षामें स्वत्वमोह, प्राचीनतामोह, भाषामोह और वेषमोह का त्याग, उस में तीन बातों का विचार----वस्तु का मूल्य, परीक्षा की सुसम्भावना की मात्रा, परीक्षा न करने से लाभहानि की मर्यादा । ७३ से ७६ तक देवमूढ़ता । गुणदेव, व्यक्तिदेव । पाँच प्रकार की देवमूढ़ता-देवभ्रम, रूपभ्रम, कुयाचना, दुरुपासना, परनिन्दा । देवभ्रम में मूर्तिपूजा का विचार | लोकमूढ़ता, लोकाचार का विचार । ७६ से ८२ धर्म-समभाव । तीन तरह का समभाव-भक्तिमय, उपेक्षामय, घृणामय । तरतमता का भाव दो तरह का--वैकासिक और भ्रमजन्य । धर्मसंस्थापकों का आदर करने के तीन अनिवार्य कारण-पारि- स्थितिक महत्ता, सामूहिक कृतज्ञता, बन्धु-पूज्य-समादर । व्यक्तिदेवो की तीन श्रेणियाँ-उपयुक्त, उपयुक्त- प्राय, ईषदुपयुक्त । मूलधर्म और सम्प्रदाय का भेद । धर्म मे म्रम होने के पाँच कारण--धर्मशास्त्र के स्थान का भ्रम, परिवर्तन पर उपेक्षा, दृष्टि की विकलता, अनुदारता के संस्कार, सर्वज्ञता की असंगत मान्यता । धर्मशास्त्र का स्थान । ईश्वर-वाद, आत्मवाद, सर्वज्ञवाद, मुक्तिवाद, द्वैताद्वैत, नित्यानित्य पर विचार । परिवर्तन पर उपेक्षा आदि का विवेचन । पृ. ८२ से १०१ तक । जातिसमभाव-मूल मनुष्य-जाति की एकता की सर्वसम्मत-मान्यता, जाति-कल्पना से आठ हानियाँ । वर्णभेद विचार । राष्ट्र-भेद विचार, संस्कृति और सभ्यता । वृत्तिभेद विचार । छूआछूत विचार । उपजाति कल्पना। पृ. १०१ से १२३ तक व्यक्ति-समभाव । इसके लिये दो तरह की भावना--स्वोपमता और चिकित्स्यता । अवस्था-सम- भाव । यह तीन तरह का--सात्त्विक, राजस, तामस । सात्त्विक समभाव की नाट्य, क्षणिकत्व, लघुत्व, महत्त्व, अनृणत्व, कर्मण्य, अद्वैत आदि भावनाएँ । पृ. १२३ से १३२ तक । योगी की तीन लब्धियाँ -- विघ्नविजय, निर्भयता, अकषायता । चार तरह का विघ्नविजय- विपत्, विरोध, उपेक्षा, प्रलोभन-विजय । तीन प्रकार के भय--भक्तिमय, विरक्तिभय, अपायभय । निर्भ- यता का स्वरूप । भयके दसभेद-भोग, वियोग, संयोग, रोग, मरण, अगौरव, अपयश, असाधन, परिश्रम, १३२ से १४० तक। में - - , , अज्ञात । अकषायता का रूप ।
(८) , ६ छटा अध्याय जीवनदृष्टि - पृ. १४१ से २११ जीत्रार्थजीवन ( बारह मेद ) धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इन चारों जीवार्थी का स्वरूप । बारह भेदों का स्वरूप । १४१ से १४९ नक। २ भक्तजीवन-[ ग्यारह भेद ] भयभक्त, आतंक-भक्त आदि ग्यारह प्रकार के भक्त । छः जवन्य, दो मध्यम, तीन उत्तम । पृ. १४९ से १५५ तक ३ बयोजीवन -[ आठ भेद ] गर्भ जीवन [ जड़ ] बाल-जीवन [आनन्दी ] आदि आठ भेदों का स्वरूप । पृ. १५६ से १६१ तक ४ कर्तव्यजीवन-(छ: भेद ) मुप्त, जाग्रत, उस्थित, संलग्न, योगी । पृ. १६२ से १६६ तक। ५ अर्थजीवन-[ छः भेद ] व्यर्थस्वार्थान्ध, स्वार्थान्ध, स्वार्थप्रधान, समस्वार्थी, परार्थप्रधान, विश्वहितार्थी। दो जघन्य, दो मध्यम, दो उत्तम । हँसी के चार भेद-सुप्रीतिका, शक्षणिकी, विरो- धिनी, रौद्रिणी। पृ. १६७ से १७१ तक। प्रेरितजीवन-[ पाँच भेद ] न्यथंग्रेरित, दंडप्रेरित, स्वार्थप्रेरित, संस्कारप्रेरित और विवेक-प्रेरित । पृ. १७१ से १७९ तक। ७ लिंगजीवन-[ तीन भेद ] नपुंसक, एकलिंगी, उभयलिंगी । नरनारी विचार । दोनों का वेष और उसकी मयादाएँ । निर्वलता, मूढ़ता, मायाचार, भीरता, विलासप्रियता, संकुचितता, कलह- कारिता, परापेक्षता, दीनता, रुढिप्रियता, क्षुद्रकर्मता, अधैर्य, उपभोग्यता इन तेरह दोपों का नारी पर आरोप और उसका निराकरण । मायाचार के आठभेद--लनाजनित, शिष्टाचारी, राहस्यिक, तथ्यशोधक आत्मरक्षक, प्रतिबोधक, बिनोदी, प्रवञ्चक । उभयलिंगी जीवन | लैंगिक दृष्टि से कुछ महात्माओं की आलोचना । पृ. १७९ से १८६ तक। ८ यत्नजीवन- ( तीन भेद ) दैववादी, देवप्रधान, यनप्रधान ! दैववाद का रूप । अनीश्वरवादी या नास्तिकों में भी देववाद । देव और यत्न का रूप । पृ. १९६ से २०१ तक। ९ शुद्धिजीवन- ( चार भेद ) शुद्धि के तीन भेद--निर्लेपशुद्धि, अल्पलेपशुद्धि, उपयुक्तशुद्धि । शुद्धिजीवन के चार भेद-अशुद्ध, बाह्यशुद्ध, अन्तःशुद्ध, उभयशुद्ध । पृ. २०१ से २०८ तक । १० जीवनजीवन~ ( दो और पाँच भेद ) मृत और जीवित । पाँच मेद---मृत, पापजीवित, जीवित, दिव्यजावित, परमजीवित । पृ. २०८ से २०९ तक । ११ जीवनदृष्टि और दृष्टिकांड का उपसंहार २१० . . , nee Read समर्पण........ merone भगवान सत्य के चरणों में परम पिता! . तेरी वस्तु 'तुझी को' अर्पण । जो कुछ कहलाता है मेरा, है तेरी ही करुणा का कण ॥ तेरी वस्तु तुझी को अर्पण ॥१॥ तीर्थकर है तीर्थ बनाते । पैगम्बर पैगाम सुनाते ॥ तेरी ही झाँकी दिखलाकर कोई है अवतार कहाते ॥ करते हैं सर्वस्व समर्पण । तेरी वस्तु तुझी को अर्पण. ॥ २ ॥ पर यह दीन कहाँ क्याः पाये ? उसका क्या ? जो भेंट चढ़ाये ॥ दिल निचोड़कर ले आया बस, तेरा चरणामृत बन जाये । पीता रहे इसे जग' क्षणक्षण । तेरी वस्तु तुझी को अर्पण ॥.३ ॥.. ARENEReacher . - Read Nidanasasainine : तेरा दास --दरवारीलाल सत्यभक्त HAIR Lebrit ܒܝܼ PARA ne सत्यामृत . [ मा न व-धर्म-शा स्त्र] इष्टिकांड पहिला अध्याय सत्य-दृष्टि) परम निरीश्वर का ईश्वर तू वीतराग का राग । बुद्धि भावना का संगम त त है अजड़ प्रयाग ।। 7hc , , भगवान सत्य सकते । सुख प्राप्त हो जाय-दुःख असर न डाल भगवान एक अगम अगोचर तत्त्व है । उसने सके यही तो जीवन की पूर्णता है, सार्थकता है जगत बनाया है या नहीं बनाया है, वह न्यायाधीश और यह भगवान सत्यके दर्शन से ही मिल सकती है। और दंडदाता है या नहीं, ये सब दार्शनिक प्रश्न भगवान सत्य व्यापक और नित्य है । संग्र- विवादापन्न हैं और अधिक उपयोगी भी नहीं है। पर दाय-धर्म-मजहब आदि उसके कपड़े हैं जो बदलते सत्य के रूप में जो भगवान की मान्यता है वह उतनी रहते हैं । अगणित सम्प्रदाय अगणित शास्त्र उसके विवादापन्न नहीं है जितनी कि उपयोगी है। एक अंश के वरावर भी नही । इस विशाल विश्व भगवान मानने का मतलब यही है कि उस के अनन्त भूतकाल में और अनन्त भविष्य काल की कृपा से हम मुख--कल्याण की ओर बढ़ते हैं, हमारे मनमें मबुद्धि-विवेक जाग्रत होता है । इस में कब किम कार्य से प्राणी की भलाई हुई या लिये भगवान ज्ञान मूर्ति और कल्याण--धाम है । होगी ये अनन्तं घटनाएँ कब कहां कल्याणमय यह तत्त्व निर्विवाद रूप में सत्य है। और कब कहां अकल्याणमय, इसकी गणना कॉन मुग्नु हम अकारणक नहीं मिल सकता । कर सकता है ? इस विराट् सत्य को-अनन्त सत्य को उसके जो जो कारण हैं उनसे ही मिलेगा । सत्य शब्दों में या एक जीवन या कुछ जीवनों के अनुभवों उन्हें दिखायगा और पूर्ण दर्शन के बाद क्रिया में सीमित कर देना समुद्र के समस्त जल को चुल्लू अपने आप हो ही जायगी इसलिये सत्य-प्राप्ति मे भर लेना है । इस अहंकार के कारण लोग मुख-प्राप्ति है-दुःग्वनिवृत्ति है । सत्यसे दूर ही भागते है और इस प्रकार कल्याण भ्रम ही दुःखमूल है उसके दूर हो जाने से दूर भागते है। विराट् सत्य के विषय मे से सब सुख मिल जाते है अथवा जो दु ख बाहर अपनी अज्ञानता का ठीक ठीक ज्ञान हुए विना स दिखाई देत है वे अपने ऊपर अमर नही डाल सत्य-प्राप्ति नहीं होती-न सर्वज्ञता मिलती है ।
२] सत्यामृत - - तेरा कण पाकर बनते हैं जन सर्वज्ञ महान । (क) कालमोह- कालमोह दो तरह का पर न कभी हो सकता तेरी सीमाओं का ज्ञान ॥ होता है एक प्राचीनता का मोह एक नवीनता यहां सत्य का अर्थ सच बोलना या ज्यो का मोह । प्राचीनता-मोही उचितानुचित का का त्यों बोलना नही है । यह तो विराट् सत्य- विचार नहीं करते वे प्राचीनता देख कर ही अनन्त सत्य-भगवान सत्य का बहुत ही छोटा किसी बात को मान लिया करते हैं। इसलिये अंश है या यों कहना चाहिये कि भगवान सत्य सत्य जब समयानुसार किसी नयेमय में आता है की सहचरी भगवती अहिंसा का अंश है । भग तब उसका अपमान करते हैं । और पुराना रूप वान के भीतर तो वे सब दृष्टियाँ, वे सब अनु- जब विकृत होकर असत्य बन जाता है तब भी भव, वे सब तर्कणाएँ और वे सब योग आजाते है उससे चिपटे रहते हैं । इस प्रकार वे सत्य का जो और भोजन नहीं कर पाते और असत्य का मल सुख सुख-पथ का प्रत्यक्ष कराते हैं [ जो कि एक दिन भोजन था ] दूर नहीं कर प्रकृति नियमानुसार काम करती है । कार्य- पाते । इसलिये प्राचीनता का मोह उनके जीवन कारण की परम्परा ध्रुव है। हम सत्य को धोखा को बर्बाद कर देता है। दे तो कार्य कारण की परम्परा को धोखा देंगे। पर वह तो ध्रुव है इसलिये उसका कुछ न विग- प्राचीनता के मोह के दो चिन्ह हैं । विचार डेगा-हम पिस जायेगे । इसलिये हमे सत्य सम- सत्यका विरोध और प्रत्यक्ष-मत्य पर उपेक्षा झना चाहिये-सत्य पाना चाहिये उसके या उसका श्रेयोपहरण । दर्शन करना चाहिये । जब कोई विचारक समाज के विकारों भगवान सत्यके दर्शन करने के लिये तीन को के लिय समाज वातो की आवश्यकता । १-निप्पक्षता के कल्याण के लिये समाजके सामने नये २ परीक्षकता ३ समन्वय-शीलता। विचार रखता है तब प्राचीनतामाही इन विचार- सत्य का विरोध करने के लिये कमर कसता है। १ निप्पक्षता प्राचीनता का मोही अवसर्पणवादी होता है। जिस प्रकार एक चित्र के ऊपर दूसरा चित्र 'जितना कुछ सत्य था वह नहीं बनाया जा सकता । अथवा तत्र तक नही भूतकाल में आचुका, हमारे पुरखो को प्राप्त हो बनाया जा सकता जब तक नीचे का चित्र किसी गया अब उस में कोई सुधार सशोधन या नवी- दूसरे रंग से दबा न दिया जाय उसी प्रकार जब नता नहीं आ सकती। यह जगत धीरे धीरे तक हृदय किसी पक्ष से रँगा हो तब तक उस पतित हो रहा है आदि' । इन्हीं सब वासनाओ पर सत्य की छाप नही बैठ सकती। मनुष्य का के कारण वह नवीन रूप मे आये हुए विचार- हृदय दो प्रकार के मोहों से रँगा रहता है इस लिये सत्य का विरोध करता है । पतन मे संतोष करता सत्य का चित्र उसपर नही बनता । [क] कालमोह है, उन्नति के प्रयत्न को विडम्बना समझता है । [ख ] स्वत्वमोह । इन दोनों प्रकार के मोहो नये विचारक से कहता है 'हमारे पुरखे क्या का त्याग किये बिना सत्यके दर्शन नहीं हो सकते। मूर्ख थे ? क्या तुम्होर बिना उनका उद्धार नहीं दूर करने या वह सोचता है कि सत्य-दृष्टि [३ . में हुआ ? क्या तुम उनसे बढ़कर हो ? उन्हीं पर भी पतला कुती ही पहिनें, अगर कोई हमें की जूटन ग्वाकर तुम पले हो अव. उनसे बड़ा सलाह दे कि समयानुसार पोशाक बदल लेना बनना चाहते हो, उनकी भले निकालते हो ? चाहिये और हम कहें कि हमारे वाप क्या मूर्ख यह प्राचीनतामोही या अवसर्पणवादी यह थे जिनने यह पोशाक बनवादी तो यह हमारा नहीं सोचता कि हमारे पुरखों के पास जितनी पागलपन होगा इसी तरह का पागलपन प्राची- नता-मोही में पाया जाता है । पूँजी थी वह तो हमें मिली ही है साथ ही इतने समय में जगत ने जो और ज्ञान कमाया है वह धर्मसंस्थाओं में भी प्रारम्भ से ही असत्य भी पंजी के रूप मे हमें मिला है ऐसी हालत का जो काफ़ी मिश्रण हो जाता है उसका कारण अगर हम व्यक्तित्व की दृष्टि से न सही पर ज्ञान जनसाधारण मे फैला हुआ प्रचंड प्राचीनता- भंडार की दृष्टि से बढ़ गये हो तो इसमे आश्चर्य मोह है । जब जनता प्राचीनता की छाप के क्या है ? बल्कि यह स्वाभाविक या आवश्यक है। बिना किसी सत्यको ग्रहण करने को तैयार नहीं दृमरी बात यह भी सोचने की है कि पूर्वपुरुप होती तब धर्म-संस्थाओं के संचालकों को उस हमारी अपेक्षा कितने ही अधिक ज्ञानी क्या न नवीन या सामयिक सत्यपर प्राचीनता की छाप हों पर देश काल के अनुसार परिवर्तन या सुधार लगाना पड़ती है। इसलिये प्रत्येक धर्म-संस्था के करने से उनकी अवहेलना नहीं होती। अगर संचालक किसी न किसी रूप में अपनी धर्म- आज वे होते तो वे भी वर्तमान देशकाल के संस्था का इतिहास सृष्टि के कल्पित प्रारम्भ से अनुसार सुधार करते। शुरू करते है इस प्रकार धार्मिक-सल्य देने के लिये उन्हें सिर पर ऐतिहासिक असत्य का बोझ तीसरी बात यह है कि देशकाल के अनु- लादना पड़ता है | और कालान्तर में यह असत्य मार सुधार करनेवाला जनसेवक भले ही पुराने धार्मिक सत्य को भी दवा वैठता है पर इसका लोगो के टुकड़े पाकर पला हो—मनुष्य बना हो पर जिस प्रकार छोटे से बीज और आसपास उत्तरदायित्व धर्म-संस्था के संचालको पर नहीं डाला जा सकता या बहुत कम डाला जा सकता के कूड़े कचरे को पाकर एक महान वृक्ष वन जाता है जिसके फूल सुगंधित होते है, फल रसीले हैं, वास्तविक दोप तो प्राचीनता-मोही 'जन- होते हैं इस प्रकार उसका मूल्य बीज से और समाज का है। कूड़े कचरे से कई गुणा हो जाता है उसी प्रकार प्राचीनता-मोहियो का दूसरा चिह्न है प्रत्यक्ष पुराने टुकड़ों को पाकर भी एक मुधारक जन सत्य पर उपेक्षा या उसका श्रेयोपहरण । कुछ सत्य- सेवक महात्मा बन सकता है । जिन्हें प्रायः वैज्ञानिक-सत्य कहा जाता है-ऐसे स्पष्ट जब हम बालक थे तब माँ बाप ने उस होते है कि उन्हें अस्वीकार नहीं किया जा सकता। परिस्थिति के अनुसार छोटा कोट उनके विपय में प्राचीनतामोही उपेक्षा करता है दिया था, गरमी के दिनो मे पतला कुर्ती बनवा और जहां उपेक्षा करना असंगत होता है वहां दिया था अब उनके मरने के बाद जीवन भर उम नवीन को प्राचीन सावित करने की चेष्टा हम छोटा कोट ही पहिने या शीत ऋतु आ जाने करके नवीन के श्रेय का अपहरण करता है । , बनवा , ac ४] सत्यामृत ' अगर किसी ने अनेकान्तवाद या स्याद्वाद अगर किसी ने वायुयान बनाया तो प्राची- का प्रणयन करके दर्शनों में समन्वय कर दिया नतामोही को यह सब अपने शास्त्रों में दिखाई तो प्राचीनता-मोही कहेगा । उँह, इसमें क्या हुआ ? देने लगेगा । प्राचीनतामाही सामान्य और विशेष हम पहिले से जानते थे कि मनुष्य बाप की के मूल्य, महत्त्व और उपयोगिता का अंतर भुला अपेक्षा बेटा है और बेटे की अपेक्षा बाप है देता है। अनेकान्तवाद ने आखिर किया क्या ? वह यह भूल जाता है कि संसार मे ऐसे यह प्राचीनता-मोही यह न समझना चाहेगा बहुत से सिद्धान्त हैं जिनका पता मनुष्य ने तभी कि बाप बेटे की सापेक्षता व्यवहार मे रहने पर लगा लिया था जब वह पशु से मनुष्य बना था, भी इनसे नित्य अनित्य, द्वैत अद्वैत आदि का सम परन्तु उस क्षुद्र सामान्य ज्ञान के बाद मनुष्य ने न्वय नहीं हो पाता था और बेटे का सापेक्षवाद जो लाखों करोड़ों विशेषताओं का ज्ञान किया है इन दार्शनिक समस्याओं को हल नहीं कर पाता उनकी महत्ता उस क्षुद्र सामान्य ज्ञान में नहीं था, अनेकान्तवाद ने यही कर दिखाया । परन्तु समा जाती । सारे विश्व को सद्प जान लेना प्राचीनतामोही या तो अनेकान्तवाद का विरोध एक बात है और उसकी अगणित विशेषताओं करेंगे अथवा विरोध की असफलता पर उसे प्राचीन को जान लेना दूसरी । इन विशेष ज्ञानो की बताकर उसका श्रेय लूट लेंगे। उपयोगिता सामान्य ज्ञान से पूर्ण नहीं हो सकती। अगर किसी विद्वान ने भौतिक परन्तु प्राचीनता मोही अपने प्राचीनता के मोह के जगत् सापेक्षवाद ( Relativity) का आविष्कार किया कारण सामान्य ज्ञानों को इतना महत्व दे देता है कि विशेष ज्ञानो की कीमत और उसका महत्व और क्षेत्र कालको भी सापेक्ष और अनिश्चित कोटि उसके ध्यान मे नहीं आता। में डाल दिया तो इस सिद्धान्त के महत्त्वको न समझकर या उसकी युक्तिपूर्ण आलोचना न करके प्राचीनता के मोह को अड्डा जमाने के लिये प्राचीनता-मोही कह बैठेगा ‘उँह' इसमें क्या एक बात और सहायक हो जाती है । संसार हुआ । अनेकान्तवाद हमारे यहाँ है ही, सापेक्षवाद आविष्कार रूप सूर्योदय के पहले कल्पनारूपिणी में फिर रहा क्या ? वह शब्द की समानता बता उषा का दर्शन करता है । आज जो आविष्कार कर इस विशेष आविष्कार के महत्त्व को नष्ट कर हो रहे है-मानव समाज के हृदय मे सैकड़ो वर्ष पहले देना चाहेगा । अगर किसी विद्वान ने विद्युत की ही उनकी कल्पनाएँ अड्डा जमा चुकी थी । जैसे किरणो मे शब्द की लहरे पैदा कर उनको सुनने मनुष्य ने पक्षियो को उड़ता देख कर मनुष्यो मे लायक बना दिया तो प्राचीनतामोही इस आश्रर्य- उड़ने की कल्पना की । वह स्वयं तो उड़ नहीं जनक सत्य पर उपेक्षा करके कहेगा--ऊँह, इसमे सकता था इसलिये उसने कल्पना सृष्टि मे परियो क्या हुआ ? हम पहले से ही जानते थे कि पुद्गल की, गरुड़ आदि पक्षि-वाहनों की, दिव्य और यांत्रिक पुद्गल सब एक है । इसलिये प्रकाश और शब्द विमानो की कल्पना की । कल्पना के कोई लगाम परस्पर बदल गये तो इसमे नई बात क्या हुई तो होती नही इसलिये वह मनचाही दौड़ती है । हमारे शास्त्रकारो को यह सब मालूम था । जहां चाह हुई-यदि ऐसा होता तो कितना अच्छा में ' सत्य-दृष्टि [५ था-वहां मनने उसकी पूर्ति कर दी, ये ही सब पर स्वस्थ मनुष्य की तरह चल न सकेगा । यह कल्पनाएँ पहले तो अवतारी-पुरुषा और देवता प्राचीनता का मोह इस प्रकार मनुष्य को विल- आदि के विषय में रहीं, पीछे प्रयत्न करते करते कुल अंधा और अकर्मण्य बना देता है। सेकड़ों वर्षों की तपस्या के बाद मनुष्य ने इन्हें प्राचीनता के मोह को नष्ट कर देने का प्रत्यक्ष पा लिया । आविष्कारका यह साधारण मतलब हरएक प्राचीन वस्तु को नष्ट कर देना नियम है कि पहले वह कल्पना में आता है- नहीं है-आवश्यक और समयोपयोगी तत्व चाहे पीछे दुनिया के सामने प्रत्यक्ष होता है । आविष्कार नवीन हो या प्राचीन हमें ग्रहण करना चाहिये । के इतिहास के साधारण नियम को भूल कर फिर भी इतना कहना आवश्यक है कि जहां प्राचीनता-मोही कल्पनाओं को इतिहास बना लेता अन्य सब वाने समान हों और प्राचीन और नवीन में है फिर नर्वानता के सत्य की अबहलना करता है । से किसी एक का चुनाव करना हो तो हमें प्राचीनता के मोह से विचार-नुत्य का विरोध नर्गन को चुनना चाहिये। क्योंकि प्राचीन की करके, प्रत्यक्ष-सत्य पर उपेक्षा करके या उसका अपेक्षा नवीन में तीन विशेषताएँ रहती हैं । श्रेयोपहरण करके, मनुष्य अपनी उन्नति का द्वार बंद १--नवीन हमारी वर्तमान परिस्थिति के कर देता है । जीवन का चिह्न ही यह है कि निकट होने से प्राचीन की अपेक्षा हमारी परि- वह नये भोजन को ग्वा सके और पुगने भोजन स्थिति के अधिक अनुकूल होता है । के मल को दूर कर सके । इन में से अगर एक २ - यह स्वभाव है कि व्यों व्यों समय जाता भी किया बंद हो जाय तो मौत हो जाती है । है त्या त्यों मूलवस्तु विकृत या परिवर्तित होती प्राचीनता-माही इसी तरह मौत के पंजे मे पड़ जाती है । इसलिये नवीन की अपेक्षा प्राचीन को जाता है । न वह नया सत्य ग्रहण कर सकता है विकृत होने के लिये समय अधिक-मिलता है इम- और न पुराने विकारों को हटा सकता है । जिम लिये प्राचीन की अपेक्षा नवीन कुछ शुद्ध रहता है । समान में इस प्रकार के प्राचीनता-मोहिया की ३ प्राचीन के कर्ता को जितना अनुभव प्रबलता रहती है उस समाज का विकास ही नहीं रुक जाता किन्तु उसका जीवन भी मुसि और साधन-सामग्री मिलती है नवान के की बाजी लेने लगता है। वहाँ निराशा ही छाई रहती को उससे कुछ अधिक मिलती है इसलिये नवीन है । किमी कैदी को मृत्यु--दंड की आज्ञा मुना कुछ अधिक सन्य या अधिक पूर्ण रहता है । कर अगर किमी जल में बंद कर दिया जाय तो इसका यह मतलब नहीं है कि जितना उसके जीवन की घड़ियाँ जिस प्रकार निराशा नवीन है सब अच्छा है । तात्पर्य इतना ही है कि और दुःस्व मे व्यतीत होगी उसी प्रकार प्राची- प्राचीन की अपेक्षा नवीन को अच्छा होने नता-माही समाज का जीवन भी होगा । वह अपने का अधिक अवसर है। हो सकता है कि किसी अवमर्पण-बाद के कारण पतन की आशा लगाय नवीन में अधिक अवसर का ठीक ठीक या पूरा वटा रहेगा । दृमरों को आगे बढ़त देखकर वह उपयंग न हो और किसी प्राचीन में कम अव- उनकी नकल करेगा और उनके पीछे घिसड़ेगा सर का भी उचित उपयोग हुआ हो इसलिये ६ ] सत्यामृत n- --- ANTAWAKA चालू कहीं कोई प्राचीन नवीन से अच्छा हो । पर इस है । अब कोई उसको फिर व्यवस्थित और अच्छेपन का कारण उसकी प्राचीनता न होगी व्यापकरूप दना चाह तो प्राचीन होने के कारण ही किन्तु अवसर का या प्राप्त--सामग्री का उचित वह अग्मन्य न हो जायगा । उपयोग होगा। की एकतन्त्र में प्रजातंत्र और कभी मजा- नबीन में प्राचीन की अपेक्षा यद्यपि तीन तंत्र से एकतन्त्र पर आना पड़ता है । पुरानी विशेषताएँ रहती हैं फिर भी नवीनता को सत्या- चीज़ का पुनरुद्धार होते देखकर नवीनता-माही सत्य निर्णय की कसौटी न बनाना चाहिये । को ववराना न चाहिय । प्राचीन अगर उपयोगी प्राचीनता का मोह जैसे सत्य-दर्शन में बाधक है वैसे ही नवीनता का मोह भी सत्यदर्शन है तो वह नवीन ही है । सर्वथा नवीन असंभव है। में बाधक हो जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे तत्त्व हैं जो की नवीन हो जाने से ही कोई चीज़ प्राचीन पुराने नहीं पड़त । सत्य, अहिंसा, संत्रा, दान, त्याग से अच्छी नहीं हो जाती। कभी कभी प्राचीन ईमानदारी, विनय, समभाव और प्रार्थना आदि पुराने विकृत होकर नवीन रूप धारण करता है । धर्मो से पुराने होकर भी नये से नये हैं । इनके के इतिहास मे ऐसी बहुत सी बातें मिलेंगी कि प्रगट करने की भाषा बदल सकती है पर जो धर्म मूल में अच्छे थे वे पीछे विकृत हो गये । ये तो सदा नये हैं । एक समय का सार्थक क्रिया- पर पीछे का विकृत नवीनरूप नवीनता के कांड समय बीतने पर निष्प्राण हो जाता है फिर समय कारण अच्छा नहीं हुआ। बदलने पर प्राणवान क्रियाकांड लाना पड़ता है । इसलिये प्राचीनता के समान नवीनता की बीमारी को नवीन से फिर प्राचीन की ओर जाना पड़ता है ऐसे अवसर पर भी दर करना चाहिये । नवीनता-मोही प्राचीनता से घृणा के कारण काल-मोह चाहे प्राचीनता का होया नवीनता प्राचीनता की ओर नहीं जाना चाहता । जैसे का-सत्यदर्शन मे बाधक है । हमें नये पुगने वैदिक धर्म की आश्रम- व्यवस्था पुरानी चीज़ है का विचार न करके यही देखना चाहिये कि आज नष्ट हो चुकी है, अब फिर कोई उसकी कल्याणकर क्या है ? जो कल्याणकर हो उसे स्थापना करना चाहे तो प्राचीन होने के कारण ही अपनाना चाहिये फिर चाहे वह नया हो वह असत्य न हो जायगी । या पुराना। इसलाम में व्याज लेने की मनाई है पर यह (ख) स्वत्वमोह- सत्य-दर्शनेच्छुकों का विधान पुराना पड़ गया है। अब आज कोई व्याज यह विचार रहता है कि जो सच्चा वह हमारा, को बन्द करना चाहे तो यह प्राचीनता के कारण परन्तु स्वत्व-मोही इससे उल्टा होता है। वह कहता अनुचित न हो जायगा । है जो हमारा वह सच्चा । वल्कि कभी कभी यह मोह जैनियो और बौद्धो ने मूर्ति-पूजा को व्यवस्थित इतना प्रबल हो जाता है कि जो हमारा वही सच्चा। और व्यापक रूप दिया, पीछे परिस्थिति बदल अपने सिवाय वह दूसरी जगह सच मानता ही जाने से उसका विरोध हुआ जो कि अभी तक नहीं । अगर कभी कहीं सत्य दिखाई दिया तो कभी कभी मनुष्य सत्य-दृष्टि [७ वह यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि किसी तरह से अपनी बात सिद्ध करना चाहते यह सब हमारे घर की चारी है । अमुक दशके हैं। इसलिये अवसर के बिना ही अलंकार, एकाक्षरी- वैज्ञानिक लोक जो आविष्कार करते हैं वह सब कोप आदि का उपयोग करते है और सीधे हमारे ग्रंथों में लिखा है उन्हें पढ़कर उन लोगों ने तथा प्रकरण-संगत अर्थ को छोड़कर कुटिल अर्थ आविष्कार कर लिये है । वे यह नहीं सोचते निकाला करते है। यह मतमोह भी स्वत्वमोह है । कि शताब्दियों से जिन ग्रंथों को तुम पढ़ रहे हो बहुत से लोग तो सिर्फ इसीलिये किसी सत्य उनमें तुम्हें आज तक जिन आविष्कारों की गंध को अपनाने को तैयार नहीं होते कि वह हमारे तक न आई वे दूसरों को वहां कहां से मिल गय ? नाम का नहीं है । सत्यसमाज के सिद्धान्तों को ऐसे लोगों को अगर यह मानना पड कि नहीं जान कर बहुत लोगों ने उन्हें माना पर वे इसी- यह सब तुम्हारे ग्रंथों में नहीं हैं तो वे उस सत्य लिये प्रगट में समर्थन न कर सके, न उसके को मानना अस्वीकार कर देंगे इस प्रकार यह प्रचार में सहायता कर सके कि वे सिद्धान्त उनके स्वत्व-मोह सत्य-दर्शन में बाधक होजायगा। सम्प्रदाय के नाम पर न कहे गये थे । वे अपने कुछ लोगों का स्वत्व-मोह कुछ दूसरे तरह सम्प्रदाय के नाम पर कुछ दोषो को भी सहलेने के शब्दों से प्रष्ट हुआ करता है । व कहा करते को तैयार थे परन्तु अगर उनके नाम की छाप है-'विज्ञान की सब खो में हमार्ग मा यनाओं का न हो तो वे परम सत्य से भी घृणा या उपेक्षा समर्थन करती हैं। यह स्वाभाविक है कि विशेष करने को तैयार थे। ऐसे लोग सत्य की खोज आविष्कार सामान्य मान्यता का समर्थन कर पर नहीं कर सकते । सत्य के खोजी का स्वत्व मोह वह सैकड़ों भ्रमो का उच्छेदन भी करता है -निमे नाम-मोह भी कहा जा सकता है-से दूर स्वन्त्र-मोही उच्छेदन की बात पर तो ध्यान नही रहना चाहिये । इस प्रकार दोनों प्रकार के मोहो देता और एकाध सामान्य बात को पकड़ कर का त्याग करने से मनुष्य मे निष्पक्षता पैदा होती वह अपने गीत गाने लगता है । उसे सत्य से है । भगवान सत्य के दर्शन के लिये निःपक्षता प्रेम या भक्ति नहीं होती किन्तु अपनी वस्तु का एक आवश्यक गुण हैं। मोह होता है जोकि एक तरह से अहंकार का २ परीक्षकता परिणाम कहा जा सकता है । वह सत्यको सत्य समझ कर नहीं मानता किन्तु अपना समर्थक भगवान सत्य के दर्शन की योग्यता के लिये समझ कर मानता है । अगर अपना समर्थक नहीं दूसरा आवश्यक गुण परीक्षकता है । जो आदमी है तो वह मानने को तैयार नही है । अपने ग्रंथ परीक्षक नही है वह सत्य के सम्प्रदाय, मत आदि का मोह भी स्वन्ध-मोह है सकता । वह किसी बात को माने या न माने -जो कि सत्य-दर्शन में बाधक है । बहुत से पंडित उसके मत का कुछ मूल्य नहीं है । तुम यह क्यों अर्थ पहिले मान बैठते हैं फिर कोप और व्याकरण मानते हो ? क्योकि हमारे बाप मानते थे इस का कचूमर बना बना कर शब्दों से इच्छित अर्थ उत्तर में कोई जान नहीं है | बाप की मान्यता खींचने रहते है. । कोई भी वाक्य हो वे किसी न से ही किसी बात को मानने से मनुष्य होने का दर्शन नहीं कर ८] सत्यामृत था बाप , कोई ज्ञान-लाभ न हुआ । बाप हिन्दू या मो व धर्म की, शास की और गुरु की परीक्षा करने में हिन्दू होना सत्य, बाप मुसलमान अपने को असमर्थ समझते हैं। धर्म के चलान- सो मुसलमान होना सत्य, मनुष्य वाले तो अनाधारण महापुरुष थे, शासकारों का था सो मनुष्य होना सत्य, और बार पशु होता पांडिल्य अगाध था, गुरुदेव की गुरुता तो असीम तो पशु होना सत्य, यह मानव की विचारधारा है, हम तो बहुन क्षुद्र हैं, भला हम में परीक्षा नही है यह तो एक तरह की जड़ता है । पमी करने की क्या लियाकत है? इस प्रकार की जड़ता के साथ भगवान सत्यके दर्शन नहीं होत । दीनता से व मादि-भक्त बन जाते हैं, इसलिये ये उसके लिये परीक्षकता चाहिये । और परीक्षकता सदि के दर्शन ना कर टेने हैं पर सत्य के दर्शन के लिये तीन बातें अवश्य चाहिये-१ बुद्धिमत्ता नहीं कर पाते । २ अदीनता ३ प्रमाणज्ञान । प्रश्न-यह तो एक प्रकार का विनय है और बुद्धिमत्ता--यह परीक्षक होने के लिये विनय तो आवश्यक गुण है इसे आप सत्यदर्शन मे पहिली बात है । सत्यदर्शन करने के लिये जिस बाधक क्या समझते है ! बुद्धिमत्ता की ज़रूरत है वह उतनी दुर्लभ नहीं उत्तर-बिनय और दीनता में अन्तर है। है जितनी लोग समझते है। सत्य के दर्शन विनय गुणानुगग और कृतज्ञता का फल है करने की बौद्धिक योग्यता प्रायः फीसदी अस्मी और दीनता निर्बलता का फल है। विनया मनुष्य आदमियों में होती है । यह हो सकता है कि निर्बल या क्षुद्र भी हो सकता है पर उसका विनय वे कठिन भापा न समझ सके, भाषाओं के पंडित निर्बलता या क्षुद्रता का परिणाम न होगा । उसमें न हो, उन्हें पारिभाषिक शब्दो का ज्ञान न हो, निर्बलता रहे या न रहे वह गुणानुराग या कृतज्ञता पर इससे विशेष हानि नही है । सत्य का दर्शन के कारण विनय करेगा ही, पर दीन मे गुणानुराग कल्याणपथ का दर्शन है, अगर सरल भाषा मे मुख्य नहीं है निर्बलता मुख्य है। निर्बलता के समझाया जाय तो प्रायः हरएक आदमी को उस हटने पर उसकी दीनता हट जायगी। इसलिये की भलाई बुराई समझाई जा सकती है । अगर विनय के समान मालूम होने वाला व्यवहार भी हट उसे समझ मे नही आती तो इसका कारण बुद्धि का अभाव नही किन्तु उसके कुसंस्कार है । अगर शंका- तब तो दीनता को चापलूसी कहना कुसंस्कार दूर हो जाय, निष्पक्षता आ जाय तो चाहिये । विद्या सम्बन्धी थोड़े ही सहयोग से मनुष्य इतना समाधान-दीनता और चापलूसी मे भी बुद्धिमान हो जाता है कि वह सत्यदर्शन कर सके। सत्यदर्शन के लिये विशाल पांडित्य की जरूरत अन्तर है, चापलूसी में वंचना है, दीनता में वंचना नहीं है । चापलूमी मे सिर्फ अपना स्वार्थ नही है किन्तु प्राप्त-बुद्धि को उपयोगशील बनाने की ज़रूरत है। यही उपयोगशीलता बुद्धिमत्ता है । सिद्ध करने के लिये किसी को खुश करने का प्रयत्न किया जाता है और झूठी प्रशंसा भी की जाती है। अगर प्रशंसा सच्ची भी हो तो भी चापलूस को सत्यासत्य की पर्वाह नहीं होती। जायगा । , अदीनता- बहुत से लोगो मे बुद्धिमत्ता होने पर भी एक तरह की दीनता रहती है जिस से [९ सत्य-दृष्टि दीनता में किसी को महान् अवक्ष्य समझा जाता मग्न-परीक्षा वह है जिसमें परीक्षक के कर्तृत्व में है पर उममें किसी को खुश करके स्वार्थ सिद्ध परीक्ष्य का कर्तृत्व डूब जाता है-छोटा रहता है । करने की लालसा नहीं होती । दीनता परीक्षक जैसे एक अध्यापक विद्यार्थी की परीक्षा लेता है बनने में बाधा नहीं डालती. सिर्फ उसके तो अध्यापक के कर्तृत्व में विद्यार्थी का कर्तृत्व प्रगट करने में बाधा डालती है। इस प्रकार मग्न हो जाता है ड्व जाता है । दोनों में काफी अन्तर है । हां यह हो सकता है अमग्न परीक्षा में यह वात नहीं होती उसमे कि एक मनुष्य दीन भी हो और चापलूस भी परीक्षक का कर्तृत्व परीक्ष्य से छोटा रहता है हो । पर इससे तो इन दो दुर्गुणा की निर्विरोवता फिर भी परीक्षकता में हानि नहीं होती । जैसे ही समझना चाहिये--एकता नहीं । रसोई बनानेवाले ने रमाई स्वादिष्ट बनाई कि नहीं शंका-पर बड़े बड़े शास्त्रकारो की, महापुरुषों इसकी परीक्षा वह भी कर सकता है जो रमाई की परीक्षा की बाते करना छोटे मुँह बड़ी बात बनाने के कार्य में विलकुल अजान हो । है । अगर मान लिया जाय कि आजकल ऐसे इसी प्रकार कोई स्त्रयं तो गर्दभराग में ही विद्वान हैं जो पहिले के शास्त्रकारों से भी बड़े है क्या न गाता हो पर अच्छे से अच्छे गायक की तो भी हर एक आदमी तो वड़ा नहीं हो सकता परीक्षा कर सकता है, स्वयं नाचना न जानकर वह शास्त्रो की या गुरु आदि की परीक्षा भी नृत्यकार की परीक्षा कर सकता है, यहां तक केस करे ? कि रोगी वैद्यक का बिलकुल ज्ञान न रखते हुए भी वैद्य की परीक्षा कर सकता है । समाधान-जिसकी हम परीक्षा करते है उसमे हमें बड़ा होना चाहिये ऐसा कोई नियम इसका यह मतलब नहीं है कि अमन-परीक्षा नहीं है । परीक्षा दो तरह की होती है -एक वस्तु म योग्यता का बिलकुल आवश्यकता नहीं है, परीक्षा दृग्गंग कर्तृत्व परीक्षा । वस्तु परीक्षा मे उसमे कब भले ही न हो पर अनुभव करने की वस्तु के गुणागुण का ही विचार रहता है, किसी योग्यता अवश्य हो । जैसे रोगी वैद्यक भले ही के कर्तृत्व-अकर्तृत्व का विचार नहीं रहता । इस न जाने पर चिकित्सा से आराम हो रहा है या नही परीक्षा में अपने गुणों के साथ वस्तु के गुणों की इतना अनुभव तो उसमे होना ही चाहिये । इसी तुलना नहीं करना पड़ती । मोना, चाँदी, हीरा प्रकार अन्य परीक्षाओ की भी बात है । आदि की परीक्षा करते समय यह तुलना का इस प्रकार अगर हमे शास्त्रो की या शास्त्र- विषय नहीं है कि परीक्षक गुणों मे मोन, चाँदी कारो की या गुरुओं की परीक्षा करना हो तो यह आदि म बड़ा है या नहीं ? इसलिये आवश्यक नहीं है कि हम उनसे भी बडे शास्त्र- इस परीक्षा में परीक्ष्य--परीक्षक के बड़े छांट का कार या विद्वान हो । पर यह जानने की आवश्य- सवाल ही नहीं है। कता अवश्य है कि उनके उपदेशादि जीवन में कतत्य-परीक्षा में ऐसी तुलना हो सकती है। कितनी शान्ति पैदा करते है, व कितने वुद्धिसंगत पर कर्तृत्र-परीक्षा भी दो नाह की है आदि । इसी नाह स हम धमी की, शास्त्रो की हानी है-एक मग्न परीक्षा दृमी अमन्न परीक्षा । और शास्त्रकारों की परीक्षा कर सकते है ।
१०] सत्यामृत यह तो हुई सर्वसाधारण की बात । पर गिता, है इसका पता जिन्हे नहीं लगता वे परीक्षक सत्य-खोजी में यह अवसर्पणवाद न हो तो यह नहीं हो सकते। इसलिये हर एक प्रमाण का और भी अच्छा । मनुष्य के हृदय मे जहां यह बलाबल आदि जानना आवश्यक है। विश्वास हुआ कि हम तो धीरे धीरे गिरते जा रहे शास्त्रका उपयोग-शास्त्र एक उपयोगी है, पहिले लोगों के पास जो ज्ञान था वह हममें और आवश्यक प्रमाण है पर पूर्ण विश्वसनीय नहीं । नहीं है, किसी भी तरह हम उनसे बढ़ नहीं जैसे न्यायालय में गवाहो का स्थान होता है सकते, तो उसका विकास रुक जाता है । पूर्व वैसा ही सत्य के न्यायालय में शान्त्रका स्थान है पुरुषों को महान पूज्य परमोपकारी मानना उनका शास्त्र के वचन का यही अर्थ यशोगान करना-पूजा करना बुरा नहीं है पर उन्हे है कि अमुक व्यक्ति अमुक बात कहता है । पर सर्वज्ञ मान बैठना असत्य है, अनुचित और अकल्या- वह आदमी कितना भी पुराना और महान क्यो णकारी है। सर्वज्ञता की मान्यता जब मनमें पैठ न हो उसके कहने से ही कोई बात सिद्ध नहीं जाती है तब वह किसी व्यक्ति मे सर्वज्ञता भी हो जाती । इसलिये शास्त्र किसी बात को सिद्ध मान बैठती है फिर उसके विषय मे अन्ध-विश्वास करने में अक्षम है। और पक्षपात होना स्वाभाविक है । जहां अन्ध परन्तु शास्त्र का अगर बिलकुल उपयोग न विश्वास और पक्षपात है वहां परीक्षकता नहीं आ किया जाय तो सत्य की खोज कठिन हो जाती सकती ! किसी व्यक्ति में असाधारण अनुभव असा है । शास्त्र प्रागैतिहासिक काल से प्राप्त हुए अनुभवो धारण विद्वत्ता और परोपकारशीलता आदि मानने के संग्रह के समान है । यह हो सकता है कि उनमे में हानि नहीं है पर सर्वज्ञ मानना अनुचित है। कई अनुभव भ्रमपूर्ण हैं या विकृत है परन्तु अगर खैर, यहां तो इतनी बात ही कहना है कि उन अनुभवो पर विलकुल विचार न किया जाय हमें अपने में ऐसी दीनता न रखना चाहिये जो तो मनुष्य मनुष्य कहलाने योग्य ही न रहेगा। सत्यासत्य-निर्णय में हमारी योग्यता को प्रगट न इसलिये शास्त्रो पर उपेक्षा नहीं की जा सकती । होने दे । विनय, भक्ति आदि रखते हुए भी इस उनपर विचार अवश्य करना चाहिये । शास्त्र की प्रकार की अदीनता परीक्षकता के लिये आवश्यक है। किसी बात को प्रमाण मानते समय ये तीन बाते देख लेना चाहिये। प्रमाणज्ञान-परीक्षक होने के लिये तीसरी आवश्यकता प्रमाण-ज्ञान की है । बहुत से लोग १ वह किसी दूसरे प्रबल प्रमाण [प्रत्यक्ष परीक्षा करने बैठते है पर परीक्षा करने के शस्त्र तक] से खडित न होती हो । ही उनके ठीक नही होते इसलिये वे परीक्षा के २ देशकाल परिस्थिति का विचार करते लिये शक्ति लगाकर भी परीक्षक नहीं बन पाते । समय सम्भव मालूम हो । (बहुत सी बाते आज अमुक शास्त्र मे तो यो लिखा है फिर तुम्हारी बात सम्भव है पर पुराने समय मे सम्भव नही थी उस कैसे माने ? अथवा यह वात प्रत्यक्ष मे दिखती समय सिर्फ कल्पना, आकांक्षा, अतिशयोक्ति आदि नही फिर कैसे माने ? अथवा तर्क से क्या होता के कारण शास्त्र मे लिख दी गई थी वे आज है ? इस तरह किस प्रमाण की कहा क्या उपयो सम्भव होने पर भी जब तक उनका साधक कोई , ?
सत्य-दृष्टि [११ , में प्रवल प्रमाण न मिलेगा तब तक पुराने जमाने उपयोग होता है। इन्हें उपमान--प्रमाण कहना में वे असम्भव ही समझी जायेंगी) चाहिये । उपमान कार्य-कारण या स्वभाव का ३ अहितकर न हो। निश्चित सम्बन्ध नहीं होता पर अनेक स्थानों की जो बातें प्रत्यक्ष या अनुमान से सिद्ध हैं समानता से एक नये स्थानपर सम्भावना की जाती उनकी बात दूसरी है वे तो मान्य हैं ही, परन्तु है । जो व्यवस्था में पर्याप्त उपयोगी है। जो प्रत्यक्ष, अनुमान से सिद्ध नहीं हो सकती वे प्रत्यक्ष का उपयोग-प्रत्यक्ष एक तरह का अगर विचार के लिये हमारे सामने आ जाँय तो अनुभव ही है पर यहां मैने अनुभव शब्द से एक हमें उक्त तीन बाते देखलेना चाहिये। तरह का मानस--ज्ञान लिया है । जव की प्रत्यक्ष अनुभवकी दुहाई-किसी बात के समर्थन शब्द से इन्द्रिय प्रत्यक्ष लिया है । अनुभव और बहुत से लोग अनुभव की दुहाई दिया करते शास्त्र की अपेक्षा इस की प्रामाणिकता अधिक है । अनुभव एक प्रवल प्रमाण है परन्तु कल्पना है । पर प्रत्यक्ष के विषय विवादापन्न वहुत कम के स्वप्नो को अनुभव कहने का कोई अर्थ नहीं । होते है इसलिये इसकी उपयोगिता कुछ कम है । ऐसे अनुभव अपने लिये ही उपयोगी हो मकते हैं पर किसी शास्त्र, अनुभव या तर्क के विषय की या अपने अनुयायियो के लिये उपयोगी हो सकते जाँच करने के लिये इसकी उपयोगिता अधिक है पर दुनिया के लिये नहीं हो सकते । फिर भी सकते । फिर भी है। प्रबलता में यह सर्वश्रष्ट माना जाता है यद्यपि कभी शास्त्र की अपेक्षा इसका स्थान अधिक है। इसकी जाँच भी दृसरे प्रमाणों से करना पड़ती है। जीवन व्यवहार में या मानव-प्रकृति के तर्कका स्थान-यह सब से अधिक अभ्यास में जो अनुभव मिलता है उसका मूल्य व्यापक और प्रबल प्रमाण है। तर्क अनुभवों या बहुत अधिक है । बहुत से लोग दूसरों के विपय प्रत्यक्षांका निचोड़ है । प्रत्येक धर्मका तीर्थकर मे ऐसा होने से ऐसा हो जायगा' इस प्रकार अथवा प्रत्येक क्रान्तिकारी तर्क के वलपर ही लम्बी कल्पना सृष्टि कर डालते है और इमे तक अपने विचार जगत के सामने रखता है । प्रत्येक भी कहने लगत है पर यह तर्क नहीं है यह सिर्फ व्यक्ति अपने बचन या शास्त्र के अच्छेपनके कल्पना है इसका मूल्य अनुभव की अपेक्षा बहुत विषय में युक्तियुक्तता की ही मुख्य दुहाई देता है कम होता है | अनेक प्रकार के मनुष्या से काम यदि वह ऐसा न करे तो अन्धश्रद्वा मे पडा हुआ पड़ने मे, मानव-प्रकृति के अभ्याम से जो अनु- समाज उसकी बात सुने ही क्यों ? भव मिलता है वह इन कल्पनाओं से बहुत मूल्यवान परन्तु उसके बाद उसके अनुयायिओ मे है, उसमें पर्याप्त प्रामाणिकता भी है । पर ऐसे यह तर्कप्रियता नहीं रहती। तक अगर आये अनुभव भी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार हुए या अवशिष्ट विकार को दूर करे तो अनुयायी कुछ भिन्न भिन्न होते हैं और सब मनुष्यो की उसको सहन नहीं करते । उनका तर्क परम्परा- प्रकृति भी एकसी नहीं हाती इसलिये उसमें 'प्रायः गत बातो के समर्थन में ही खर्च होता है । जब रुपमे ना कोई बात कही जा सकती है पर वह परम्परागत वाता के समर्थन मे अक्षम रहता निश्चित रूपम नहीं; फिर भी इस 'प्राय. ' का काफी है वह तर्क या युक्तियुक्तता की निःसारता की १२ ] सत्यामृत घोषणा करने लगता है । कहने लगता है। नाचना होता है जब कि मंत्री मालिका की इच्छा "उँह तर्क से क्या होता है वह तो बुद्धि को अनुसार नहीं हित के अनुसार सलाह देना का खेल है जसा बनाओ बन जाता है। मानवी है। हां, मानना न मानना मान्टिक, के हाथ में बुद्धि परिपूर्ण वस्तु नहीं है। आज तर्क से एक है। परन्तु राना का अधिकार अधिक होने से बात सिद्ध होती है कल वही खंडित हो जाती है. मंत्री की विशेषता उसे नहीं मिल जाती इसलिये असली और दृढ़ वस्तु नो भावना और श्रद्धा है निर्णय करने में भावना की अपेक्षा बुद्धि तर्क तर्क तो भावना का दाम है-भावना स्वामिनी है। अधिक काम कर सकता है। हां, उस निर्णय तर्क-शास्त्री महीनों में उतना काम नहीं कर पाते को कार्य-परिणत करने में भावना ही अधिक जा- जितना श्रद्धालु दिनो मे कर जाते है या भाग योगी है। जो राजा मंत्री की अवहटना किया करता पर जाते है । तर्क का या बुद्धि का क्षेत्र ही है यह राज्य खो बैठता है उसी प्रकार जिनको सीमित है उसके निर्णय अस्थिर है आदि ।" भावना नको की अवहेलना करनी जीवन बर्बाद कर बैटने हैं। भावना और बुद्धि दोनो ही जीवन के लिये यह बात ठीक है कि भावना की अपेक्षा अति उपयोगी है । दोनो ही अपूर्ण हैं जो कुछ तक का काम कठिन और धीमा है पर उसके है उसीसे हमें काम चलाना है । हां यह निश्चित है कि भावना की अपेक्षा बुद्धि विशाल है और मूल्य में भी अन्तर है । भावना ने कल्पना द्वारा तथ्यातथ्य निर्णय के कार्य मे भावना की अपेक्षा थोड़े ही समय में ब्रह्मांड का अन्न पालिया, उनने बुद्धि में प्रामाणिकता अधिक है। भावना से हम सूर्य का रथ, सारथी, घोड़े आदि जान लिये. अब जितना धोखा खाते हैं बुद्धि से उससे बहुत कम नाग के मिरपर रखी हुई पृथ्वा देवी, देवताओं खाते हैं । भावना में हमारी इच्छा से अधिक के द्वारा विंचते हुए तारे देख लिये, इस प्रकार भोन्ने हुनय की सारी जिज्ञासाए शान्त कर दी। और वस्तु से कम सम्बन्ध रहता है बुद्धि या नर्क परन्तु वास्तविकता के क्षेत्र में इसका कुछ मे इससे उल्टी बात है। भावना के द्वारा बैठे बैठे मूल्य नहीं हुआ बल्कि मल्यान्वेषण के कार्य में आसमान के कुलावे मिलाते रहिये जो वस्तु असं- इसमे बाधा ही उपस्थित हुई । परन्तु इसमे अप- भव हो उसकी भी कल्पना करते रहिये परन्तु राध भावना का नहीं हैं हमारा है। हम हथौड़ वस्तु की प्राप्ति के समय हमें धोखा ग्वाना पड़ेगा का काम हाथ से लेते है इसमे काम तो होना जब कि बुद्धि मे यह बात न होगी। उसका नहीं ह हाथ ही घायल होकर हथौड़ा पकड़ने के निर्णय सकारणक है, वहां हेतु है जो कि वस्तु काम का नहीं रहता । बुद्धि या तर्क का काम से सम्बन्ध रखता है जब कि भावना इसकी भावना से लेने पर ऐसा ही होता है। इसलिये पर्वाह नहीं करती इससे धोखा खाना पडता तर्क के स्थान में भावना का उपयोग न करना भावना को स्वामिनी या साम्राज्ञी समझने में चाहिये । और वस्तु-तत्त्व के निर्णय में तर्क को कोई आपत्ति नहीं है पर बुद्धि या तर्क को दास प्रधानता देना चाहिये। न वनाना चाहिये उसे मंत्रीपद देना चाहिये । तर्क के निर्णय उच्छवल या अस्थिर नहीं दास का काम स्वामी की इच्छा के अनुसार हाते । वह कार्य-कारण या वस्तु-स्वभाव के नियत - है सत्य-दृष्टि [१३ 1 अन्त सम्बन्ध पर अवलम्बित है । वह अनुभव के मार्ग सभी को अग्रमाणित कहने की बीमारी का नाम में रोड़े नहीं अटकाता न संच अनुभव का विरोध तार्किकता नहीं है। करता है । जहां उसकी गति नहीं होती वहां सभी ज्ञानों का मूल अनुभव है परन्तु अनु- अपने आप अटक जाता है परन्तु अनुभव के भव भूत भविष्य को नहीं जान सकता, और नाम पर जो तथ्यहीन कल्पनाएँ उठती हैं उन जीवन के कार्य तो आगे पीछे का विचार करके का विरोध अवश्य करता है । इस बात को समझने करना पड़ते हैं तब इस जगह तर्क ही हमारी के लिये कुछ उदाहरण उपस्थित करना ठीक होगा । सहायता करता है । अनुभवों का फैला हुआ विश्व कितना बड़ा है, इस प्रश्न का उत्तर प्रकाश ही तर्क है । वह सर्वव्यापक नहीं है, फिर तर्क अभी नहीं दे सकता, क्योंकि करोडो माला भी उसका स्थान विशाल में भी विशाल है। म जो किरगे आना हैं उनसे मिर्फ इतना ही यद्यपि कल्पना का स्थान तर्कसे भी विशाल मालूम होता है कि करोड़ों मीलों तक विश्व हैं, है, परन्तु उसमे ग्रामाणिकता न होने से उसका परन्तु ऐमा काई चिह्न नहीं मिटता जो शून्यता कुछ मूल्य नहीं है । जब अनुभव और तर्क से का सूचक हो । इमलिय तर्क विश्व की सीमा मनुष्य विश्वके मारे रहस्य न जान पाया, किन्तु बताने में अभी अक्षम है। परन्तु जब उसम इसके बिना उसे संतोप नहीं हुआ, अथवा जब कोई पूछ कि जगह [ Space } का अनुभव और तर्क ने मनुष्य की आशाओं को है कि नहीं ? तब वह कहेगा-जगह का अन्त उसकी इच्छा के अनुसार तृप्त न किया, तब नहीं आ सकता, क्योंकि जगह की सीमा को उसने कल्पनासे काम लेना शुरू किया । तथ्या- निर्धारित करने वाला जो भी कुछ होगा, उसके तथ्य का विचार न करके अपनी आशा को पूर्ण लिय भी जगह की आवश्यकता होगी। इस करनेवाली उमने विशाल कल्पनाकी सृष्टि कर प्रकार जगह की सीमा के बाद भी जगह मिट्ट डाली । नर्क स ता उसका समर्थन हो नही हो गई, इमलिय तक ने जगह को अनन्त कह दिया । सकता था, क्योंकि तर्क का तो खुला खल है, इसी प्रकार वह कान्टको भी अनन्त सिद्ध तथ्यहीन कल्पनाएँ उसके सामने कैसे टिक कर देगा। परन्तु ज्ञान की अनन्नता का वह सकती थीं ? इसलिये उन कल्पनाओं को अनुभव खण्डन ही करेगा, क्योंकि ज्ञान को अनन्त मान कहा गया । अनुभव भीतर की चीज होने लेने मे पदार्थ को सान्त मानना पड़ेगा, से उसके नाम पर कुछ भी धकाया जा सकता था। परन्तु पदार्थ का अन्त आ नहीं सकता, इसलिये इसलिये वर्ग-नरक, भूत-भविष्य, लोक-पग्लोक ज्ञान को ही मान्त मानना पड़ेगा। आदि सब अनुभव के भीतर कर दिये गय । कोई इस प्रकार नर्क जहाँ निश्चितरूप में खण्डन बैठा बैठा कहे कि 'मुझे अपने दिव्य--ज्ञान से कर सकता है, वहां बुण्डन कर देता है, जहां मनुष्य की पहुँच के बाहर अमुक जगत दिखाई निश्चित रूप में मंडन कर सकता है, वहां मंडन द रहा है, वह एमा है, और वैसा है' आदि तो कर देता है । जहां उसकी गति नहीं, जहां कोई बचारा श्रोता क्या करे ? यह वात तर्क के नाम हेतु नहीं मिलता, बहा वह चुप रह जाता है । पर तो धकाई नहीं जा सकती थी, क्योंकि वहाँ १४] सत्यामृत तो तुरन्त ही कोई चिह बताना पड़ेगा । अनुभव है कि-'तक का क्या ? उनसे नो सल्ल भी की दुहाई देने में इन सब बातों की छुट्टी है । अमात्य सिद्ध किया जा सकता है, और असल्म यही कारण है कि अज्ञेय विषयों में सभी मत वाले भी सत्य सिद्ध किया जा सकता है। परंतु नाम्नत्र एक दूसरे से विरुद्ध कुछ न कुछ कहते हैं और में नर्क में यह लचक नहीं है, तर्क के नाम पर अनुभव की दुहाई देते हैं। जो वितण्टाबाद चलता है, उनकी यह नत्र है। परन्तु ये कल्पनायें उड़ते उड़ते कभी कभी और इस प्रकार की लचक तो जानमात्र में ऐसी ऊटपटाँग जगह पर पहुँच जाती हैं, जहां है । अनुभत्र और प्रत्यक्ष तो बटा जबर्दस्त प्रमाण तर्क की मार के भीतर आ जाती हैं, तर्क इन का माना जाता है, परन्तु वह न से भी अधिक खण्डन कर सकता है। वहां इनकी पोल खुल लचकदार है । कभी हम आनी अग्नी से देख जाती है । परंतु मनुष्य प्राचीनता की बीमारी के कर भी संप को रस्ता या रसना को मप ममदा कारण इनकी रक्षा में दौड़ता है, और कहता है जान हैं, मग्नी बाल में पानी का जान कर बैठने कि खबरदार ! ये बातें अनुभवकी हैं, यहां तर्क है, हजारों मीलों के गाल चन्द्रमा को छोटी सी की गति नहीं है ! परंतु अगर तर्क की गति न थाली मरीया देवंत हैं, मिनमा के पर्दे पर दावा- होती तो तर्क के द्वारा खंडित क्यों होती ? अगर नल, तालाब, समुद्र, मकान, पर्वत आदि सब कुछ तर्क उनका खण्डन कर सकता है तब वे तर्क के दल डाटते हैं, जहां यह सब कुछ नहीं होता; स्थान के बाहर नहीं कहीं जा सकती। पान्तु इन सब बातों से हरा प्रत्यक्ष को अग्रामा- आश्चर्य तो यह है कि जो बात अनुभव के णिक नहीं कह सकते, क्योकि ये सब प्रत्यक्षा- भास है। इसीप्रकार नाभान के कारण तर्क क्षेत्र के बाहर है उसे अनुभव का विषय कह को अप्रामाणिक नहीं कह सरले । प्रत्यक्ष ने दिया जाता है, और जो तर्क के क्षेत्र के भीतर है उसे तर्क के बाहर कह दिया जाता है । एक जिस प्रकार असत्य सला. और मध्य अमस्यमिद्ध नहीं किया जाता उसी प्रकार तक से भी नहीं आदमी प्रसन्न है, और उसकी प्रसन्नता को हम तर्क से न जान सकें तो उसकी प्रसन्नताको अनु- भव का विषय कहकर तर्क चुप रह जायगा, नर्क के भीतर जो हमें भ्रम होता है उनके परंतु देशकालान्तरित वस्तुएँ जिनंक अनुभव करने अनेक कारण है । जैस की कमी हमारी पूरी का कोई माध्यम ही नहीं मिलता और पारस्परिक मान्यता मे मयंक साथ अमन्यका मिश्रण होता विरोध आदि से कल्पना के सिवाय जिनका कोई है तब असत्य का बटन होने में मध्यका खंडन कारण ही समझमे नहीं उन्हे मान लिया जाता है । जन-जैनियों ने पित्त- अनुभव के नाम पर कैसे माना जाता है ? और लोना का खण्डन कर दिया, और कह दिया तर्क से खंडित हो जाने पर भी उन्हें तर्क-क्षेत्र हमने हिंदृ-धर्म का खण्डन कर दिया। या किमीने के बाहर कैसे कहा जा सकता है ? जैनियो के जंबीय का, एक लाग्य योजन के बहुत से लोग जब प्राचीन कल्पनाओ को ऐरावत हाथी का वण्डन कर दिया और यह तर्क से खडित होते देखते है, तब चिल्ला उटते दिया कि हमने जन-धर्म का ग्वण्इन कर दिया ! १ 5 किया जाना। आता, . सत्य-दृष्टि [ १५ ? - फिर लोग आश्चर्य में पड़ जाते हैं-अरे, जैन-धर्म तो नीचे गिरती है । इस निर्णय में तर्क के साथ सत्य है, या हिंदू धर्म तो सत्य है-क्या उसका कल्पना का मिश्रण था । पदार्थ ऊपर से नीचे भी खण्डन हो गया ? बस, तर्क को अप्रामाणिक गिरता है, इसके दो कारण कहे जा सकते थे---- कह दिया | अथवा सत्यांश की विजय होने पर एक तो यह कि या तो पदार्थ में ही कोई ऐसा असत्यांश की विजय घेोपित की जाने लगती है। धर्म है जिससे वह पृथ्वी की तरफ़ . आता है, इससे भी असत्यांश की विजय के भ्रम से तर्क अथवा पृथ्वी में कोई ऐसा धर्म है जिससे वह को गाली दी जान लगती है। परन्तु यह सब पदार्थ को अपनी ओर खींच लेती है। वहां तर्क हमारी नासमझी और अहंकार का परिणाम है, का काम इतना ही है कि दोनों में या दो में से तर्क की अनिश्चितता का नहीं । किसी एक में किसी शक्ति या धर्म का सद्भाव सिद्ध करदे । परन्तु पुराने तार्किकों ने इस विशेप बुद्धिमान आदमी कभी कभी तर्का- सामान्य निर्णय के साथ विशेष कल्पना को मिला भासों का प्रयोग करके सत्य को असत्य और असत्य को मुत्य सिद्ध कर देता है। परन्तु यह कर गिरनेवाली वस्तु में ही गुरुत्व धर्म मान लिया जबकि इसके लिये उनके पास कोई तर्क न था । वात स्थानविशेप पर अमुक आदमियों के सामने ही हो सकती है, यह टिकाऊ नहीं होती । जिस वाद में जब विशेष खोज हुई तब यही मालूम प्रकार इन्द्रजाल के दृश्य टिकाऊ नहीं होते उसी हुआ कि गुरुत्व नामका कोई धर्म नहीं है- प्रकार इसे समझना चाहिये । तीभासो का पता प्रत्येक पुद्गल ( Matter ) में आकर्षण शक्ति जब विद्वानो को लगता है और जब उन पर है जिससे वे एक दूसरे को खींचते हैं । पृथ्वी गंभीर विचार किया जाता है तब उनका रहस्योद- पुद्गलों का विशाल पिंड होने से वह छोटे पिंडों घाटन हो ही जाता है। को अपनी ओर खींच लेती है। इसीका नाम कभी कभी जिस विषय में तर्क का पूर्ण गिरना है । इस नये सिद्धान्त ने पुरानी बात का प्रवेश नहीं होता वहां पर खण्डन कर दिया परंतु पुरानी बात मे जितना सम्भावना के तर्क का अंश था उसका खंडन नहीं किया । आधार परे कुछ वात निश्चय की जाती है । अथवा कोई सामान्य बात निश्चित होती है और तर्क के साथ जो कल्पना के द्वारा विशेष निर्णय उसको विशेषरूप दे दिया जाता है । ऐसी किया गया था उसीका खण्डन किया गया । अवस्थामें कालान्तर में जब उस विशेषरूप को इसी प्रकार दिन-रातका भेद देखकर मनुष्य निश्चित करने वाले प्रमाण मिलते है तब पहिला ने सूर्य के गमन की कल्पना की, परन्तु यहाँ भी विशेषरुप खंडित हो जाता है। इसका कारण तर्क ने कल्पना को मिलाया । तर्क ने तो सिर्फ तर्ककी अनिश्चितता नहीं है किन्तु तर्क के साथ इतना ही निर्णय किया कि दोनों में कुछ अन्तर कल्पना का मिश्रण है। उदाहरणार्थ जव लोगो पड़ता | वह अन्तर सूर्य की गति से भी हो ने देखा कि प्रत्येक पदार्थ ऊपर से नीचे गिरता सकता है। पृथ्वी की गति से भी हो सकता है; है, तब उस जमाने के लोगोंने निर्णय किया कि दोनों की गति से भी हो सकता है । तर्क ने तो पदार्थ में गुरुत्व नामका एक धर्म है, जिससे चीज़ सिर्फ अन्तर को सिद्ध किया । यह अन्तर किस है १६ ] मत्यामृत डाला था। की गति से पैदा होता है, इसके लिये विशेष देता है, बाकी सब काम नर्कका ही है। इसलिय हेतु की आवश्यकता थी जो कि उस समय मिल्ला सर्वका स्थान विशाल है । वह हजागे अनुमत्राका नहीं । इसलिये विद्वानों ने कल्पना लडाकर सूर्य निचोड़ होने से अधिक उपयोगी को ही चल मान लिया । पीछे इस बात का खंडन के कारण या प्राचीनता के कारण अपनी पुरानी हो गया, परन्तु इस तर्क का खंडन न समझना मान्यताओं को सुरक्षित रखने के दिया ना चाहिये । तर्क ने जो अंतर सिद्ध किया था वह विरोध न करना चाहिये । बस्नु नत्र के निर्णय में तो आज भी सिद्ध है । अन्तर के कारणों के विषय तर्कका स्थान नवम अधिक विमान मनुष्यता में जो तर्कहीन कल्पना की गई थी अब उसका का विशेष निद भी यही । खण्डन हुआ है। प्रमाण की जीक्षा शरन में गा जिन वैज्ञानिक बातों में जो संशोधन होते रहने प्रमाण का जो स्थान है जहां सा स्थान न है और कभी कभी पुराने सिद्धान्त कट जान है जानने में परीक्षा करने की कोशिश करने पर वहाँ भी उन बातों का खण्डन नहीं होता तो भी परीक्षा नहीं हो पाती । इसलिय प्रमाण तर्कसिद्ध हैं; सिर्फ उन बातों का खण्डन होता है बलाबलका ध्यान अवश्य रखना चाहिये। जिन्हे उन तार्षिको ने अपनी कल्पना मे रच प्रकार वुद्धिमत्ता, अदीनता और प्रमाणकान इन नान बातो मे मनुष्य परीक्षक बन सकता है ! तर्क के वास्तविक रूपको न समझकर लोग ३ समन्वय-शालिता तर्क का विरोध करने लग जाते हैं और अन्ध- भगवान राम के दर्शन के लिये तीसरी आय- श्रद्धागम्य कल्पनाओ को अनुभव आदि सुन्दर श्यकता समन्वयशालता की है। समन्वयशीलता को नाम देकर तर्क को कामजोर अनिश्चित आदि निष्पक्षता का परिशि- ही कहना चाहिये । परन्तु कह देते है । परन्तु सच बात तो यह है कि यह इतनी आवश्यक है कि इसको अलावपमें अनुभव और तर्कका न कभी विरोध हुआ है, न समझ लेना उचित है। होगा । दोनों एक दूसरे के सहायक है ! कालमोह और स्वत्वमाह को छोड़कर निष्पक्ष बन जो कुछ गड़बड़ी है वह कल्पनाओं की है। जाने पर तथा अदीन, बुद्धिमान और प्रमाणज्ञानी कभी कभी हम कल्पनाओ को अनुभव बाह बैठते होकर निष्पक्ष बनजाने पर हमे तध्यानथ्य का हैं और कभी कभी तर्क कह बैठते है । तब इन ज्ञान अच्छी तरह हो सकता है परन्तु जब तक दोनो मे विरोध नजर आने लगता है, और एक उसका समन्वय न किया जाय तब तक भगवान दूसरे को काटने लगते है । परन्तु कल्पनाओं का सत्य के दर्शन नही हो सकते । तथ्य को सत्य मिश्रण न किया जाय तो दोनो हमारे ज्ञान को बनाने के लिये समन्वय आवश्यक है । सम- बढानेवाले और सच्चे सिद्ध होंगे। न्वय के द्वारा तथ्य को हितकारी बनाया जाता है। इस विश्वकी समस्याओं को सुलझाने के मार्ग घटना या सिद्धान्त ठीक हो परन्तु उसका उचित बढ़ानेवाला तर्क ही है । अनुभव तो रास्ते मे उपयोग क्या है, उसकी विविधता में एकता क्या गड़े हुए मील के पत्थरो की तरह हमें सूचना ही है, उसका ठीक स्थान क्या है, किम समय उनका मे सत्य-दृष्टि [ १७ कैसे उपयोग करना चाहिये आदि बातों की समझ निवेश वसा लेना, किया जाय तो यह अर्थ सोप- न हो तो हमारा ज्ञान सत्य-दर्शन की दृष्टि से पत्तिक होगा । इसलिये यह उपपन्न--आलङ्कारिक निष्फल हो जाता है। समन्वय कहलाया । यहां समन्वय का कार्य किसी की बात परन्तु गोवध अर्थात् इन्द्रियदमन, ऐसा अर्थ को जन-कल्याण के लिये उपयोगी बना देना करके समन्वय करना अनुपपन्न आलङ्कारिक है। इसके लिये नानातरह के विरोधों का यथायोग्य समन्वय है। क्योंकि गोवध का पशुवध अर्थ परिहार करना आवश्यक है । समन्वय दो तरह का प्राकृतिक या ऐतिहासिक दृष्टि से असंगत नहीं होता है । (१) आलङ्कारिक (२) पारिस्थितिक है । इसलिये यहां आलङ्कारिक अर्थ की अनि- आलङ्कारिक समन्वय-इसमें घटना के मूल वार्यता का कोई कारण नहीं है । इसलिये यह वर्णन पर उपेक्षा की जाती हैं और रूपक, श्लेष अनुपपन्न समन्वय कहलाया । आदि अलङ्कारों के द्वारा शब्दों का अर्थ बदल अनुपपन्न समन्वय तथ्यहीन होता है इसलिये कर प्राणी को बुराई से भलाई की तरफ़ ले जाया बुद्धिको सन्तुष्ट नहीं कर पाता, इसी से वह विश्व- जाता है । जैसे किसी ने कहा- हम गोवध ज़रूर सनीय नहीं होता और जो विश्वसनीय नहीं है करेंगे, हमारे शास्त्रो में लिखा है और पहिले भी वह स्थायी वस्तु नहीं बन सकता । इससे भोले होता था' । इसके उत्तर में आलङ्कारिक समन्वय प्राणियों के मनपर प्रभाव पड़ता है । थोड़ा बहुत वादी कहेगा, गोवध अवश्य होना चाहिये परन्तु गो पांडित्य का चमत्कार भी दिखाई देता है, पर का अर्थ गाय नहीं है किन्तु गो का अर्थ इन्द्रियाँ स्थायीरूपमें इससे लाभ की अपेक्षा हानि अधिक हैं सो उनका वध अर्थात् दमन अवश्य करना होती है । थोड़े से भोले प्राणियों के सामने थोड़ी चाहिये' यह गोवध का आलंकारिक समन्वय देर को लाभ होता है पर पीछे हँसी होती है और कहलाया। अपनी बात का विश्वास भी उठ जाता है । आलङ्कारिक समन्वय भी दो तरह का होता है । एक उपपन्न दूसरा अनुपपन्न । उपपन्न सयु- बहुत से लोग इस अनुपपन्न आलंकारिक क्तिक रहता है और अनुपपन्न युक्तिशून्य । समन्वयका उपयोग धर्ममद, जातिमद आदि के पोपण के लिये करते है। जैसे-अमुक लोग अग्नि शब्दों का अर्थ बदलते समय अगर अर्थ- में होम करते थे, इसका अर्थ करना-अग्नि अर्थात् परिवर्तन की अनिवार्यता सिद्ध हो तो उसे उपपन्न ध्यानाग्नि, ध्यानाग्नि तो हमारे ही धर्म की वस्तु कहेंगे । जैसे-विश्वामित्र ने क्रोध में आकर दूसरी है इसलिये वे लोग हमारे ही सम्प्रदाय को मानते सृष्टि की । कोई प्राणी दूसरी सृष्टि बना सकता थे, इसलिये हमारा सम्प्रदाय व्यापक, महान और है, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, तारे आदि की रचना कर प्राचीनतम है । इस प्रकार का समन्वय मिथ्यात्व सकता है यह असंभव और अविश्वसनीय है इस और असंयम है । इस दृष्टि से कोई भी समन्वय लिये सृष्टि बनाने को आलङ्कारिक मानकर इसका न करना चाहिये फिर यहां अनुपपन्न-समन्वय तो वास्तविक अर्थ नया समाज बनालेना या नये उप विलकुल निंद्य है। . - .
१८ ] सत्यामृत पारिस्थितिक समन्वय--पारिस्थितिक सम इस प्रकार समन्वय के विषय में निम्नलिखित वातें न्वय में तथ्य की उपेक्षा नहीं की जाती । बात ध्यान में रखना चाहिये। को ज्यों की त्यों रखकर उसकी परिस्थिति का १-जातिमद, धर्ममद आदि के झमें होकर विचार करके समन्वय किया जाता है । जैसे समन्वय न करे । खासकर ऐसी मनोवृत्ति से अनु- मुहम्मद साहिब ने गोवध आदि हिंसा के कुछ पपन्न आलंकारिक समन्वय तो अत्यन्त निंदनीय है। विधान किये तो इस वर्णन के अर्थ को बदलने २-अनुपपन्न. आलंकारिक समन्वय अवि- की कोई जरूरत नहीं है, न मुहम्मद साहिब के श्वसनीय है इसलिये धर्ममद आदि न होने पर विधान की निंदा करना चाहिये और न उसे भी जहां तक बने नहीं करना चाहिये । अपनाना चाहिये । पारिस्थितिक समन्वय से ये ३-अनुपपन्न आलंकारिक समन्वय में रूपक सब बातें ठीक बैठ जाती है। आदि (जैसे-अग्निका अर्थ ध्यान करना आदि) उस समय की परिस्थिति का ज़ब हम विचार और भी हेय है, श्लेप कुछ ठीक है (जैसे गोवध करते है तब यह साफ़ समझ में आ जाता है कि में गो का अर्थ गाय न करके इन्द्रिय करना) फिर मुहम्मद साहिब के हिंसा के विधान उससे भी भी अनुपपन्न आलंकारिक समन्वय रूपक हो या बड़ी और कई गुणी हिंसा को रोकने के लिये थे। श्लेष-हेय ही है । हाँ, कवित्व के लिये उसका इसलिये वे अहिंसा के सहायक या अंश थे उपयोग किया जा सकता है पर सत्य-दर्शन के परिस्थिति बदल जाने से अब उनकी ज़रूरत नहीं प्रयत्न मे यह ठीक नहीं है। है इसलिये आज उन्हे अलग कर देना चाहिये। पर ४-उपपन्न आलंकारिक समन्वय और पारि- अरब की प्राचीन परिस्थिति को देखते हुए उस स्थितिक समन्वय, ये दोनों ही तथ्यपूर्ण और समय वहां वे विधान आवश्यक थे इस प्रकार विश्वसनीय है इसलिये इनका उपयोग उत्तम है । पारिस्थितिक समन्वय में न अर्थ की खींचातानी है इस प्रकार निष्पक्षता, परीक्षकता और सम- न असत्योपदेश है; यह विश्वसनीय तथ्य--पूर्ण और न्वयशीलता के प्राप्त होने से मनुष्य को भगवान जनकल्याणकारी है। सत्य के दर्शन करने की योग्यता प्राप्त होती है। इस प्रकार के और भी उदाहरण दिये जा और भगवान सत्य के दर्शन हो जाने पर सुख की सकते है पर वे इसी ग्रंथ में आगे दिये जायेंगे। ।
- ध्येय-दृष्टि [१९ A - दृष्टिकांड, दूसरा अध्याय (ध्येय-दृष्टि) (अंतिम ध्येय) , New जिस व्यक्ति ने निष्पक्ष, परीक्षक और समन्व इनसे महान और व्यापक है । यशील बनकर सत्यदृष्टि प्राप्त करली है उसका प्रश्न--जैसे हम कभी कभी सुख की आशा सब से पहिला काम जीवन के ध्येय को देखना है में स्वतन्त्रता छोड़ देते हैं उसी प्रकार कभी कभी जिससे वह जीवन-यात्रा का मार्ग निर्माण कर स्वतंत्रता की आशा में सुख भी छोड़ देते हैं । सके । अगर अनेक मनुष्यों से पूछा जाय तो इस अनेक देश-सेवक देशकी स्वतन्त्रता के लिये प्रश्न के उत्तर नाना रूप में मिलंगे। जैसे स्वतं- फाँसी पर लटक जाते है, सारा वैभव त्याग देते त्रता, मोक्ष, · ईश्वर-प्राप्ति, दुःखनाश, यश, सुख हैं इससे मालूम होता है कि स्वतन्त्रता का स्थान आदि । इनमें से किसी को भी ध्येय बना लिया सुख. से भी महान है । इसी प्रकार बहुत से लोग जाय और उसके अर्थ का दुरुपयोग न किया ईश्वर-प्राप्ति के लिये सुख का त्याग कर देते हैं- जाय तो हमारा जीवन सफल हो सकता है । इससे मालूम होता हैं कि सुख ही अन्तिम साध्य फिर भी तत्त्व-विवेचन की दृष्टि से अंतिम ध्येय नहीं है। वही कहा जा सकता है जिसके आगे हमें प्रयो- उत्तर--देश की स्वतन्त्रता की वेदी पर जो जन का विचार न करना पड़े। किसीने पूछा नौकरी क्यों करते हो ? उत्तर मिला-पैसे के लिये, के लिये न्यून सुख का बलिदाने है । करोड़ों सुख का बलिदान है वह वास्तव में अधिक सुख पैसा क्यों ? रोटी के लिये । रोटी क्यों ? जीवन मनुष्यों के मुख के लिये एक मनुष्य के सुख का के लिये । जीवन क्यों ? सुख के लिय । इसके बलिदान है। ईश्वर--प्राप्ति या मुक्ति में भी देह वाद प्रश्न समाप्त हो जाता है । सुख किसलिये ? त्याग के बाद के अपरिमित सुख की आशा से ऐसा प्रश्न खड़ा नहीं होता इसलिये यही अंतिम अभी के थोड़े सुख का बलिदान है। इस प्रकार ध्येय कहलाया। के बलिदानों के मूल में काल या मात्रा की दृष्टि स्वतन्त्रता, मोक्ष, ईश्वर-प्राप्ति, यश आदि से अधिक मुख के लिये न्यून मुख का बलिदान ध्येयों के बाद भी प्रश्न खड़ा होता है कि ये किया जाता है । समाज के लिये व्यक्ति जब किसलिये ? बल्कि कभी कभी सुख के लिये या अपने सुख का बलिदान करता है तब भी बहुजन सुख की आशा मे इनका बलिदान भी किया के सुख के लिये अर्थात् अधिक सुख के लिये जाता है इसलिये इन्हें अंतिम ध्येय नहीं कहा एक जन के सुख का बलिदान किया जाता है। जा सकता । हां, इन्हें अंतिम या समर्थ--साधन इसलिये यह वात विलकुल ठीक है कि जीवन कहा जा सकता है। फिर भी सुख का स्थान का ध्येय सुख है। मोक्ष, स्वर्ग, स्वतन्त्रता, ईश्वर- २०] सत्यामृत 1 है प्राप्ति आदि सुख के साधन हैं और इन साधनों के सुग्व दुःख का अभाव हो जाना, इसका अर्थ भी साधन धन पैसा आदि हैं जिन्हे मनुष्य अपना हुआ संवेदन का अभाव होजाना । यह एक ध्येय मान बैठता है और जिस ध्येय की प्राप्ति के लिये' तरह की जड़ता है । पत्थर में भी सुख दुःख इन साधनों को ध्येय बनाया है उन्हे भूल बैठता है । संवेदन नहीं है पर इसीलिये उसे परममुक्त नहीं कुछ विद्वान लोग सुख के बदले दुःखामात्र कह सकते न ऐसी अवस्था किसी के जीवन का को जीवन का परम ध्येय मानते है । वह ध्येय बन सकती है। दुःखाभाव बड़ी मुश्किल से किसी किसी को मरने मनुष्य के मन की परीक्षा करने से भी पता के बाद परममुक्त होने पर शायद मिलता होगा। पहिले लगता है कि उसके सारे प्रयत्न सुख के लिये तो परममुक्ति की समस्या हल करना ही कठिन है होते हैं दुःख के अभाव के लिये नहीं । दाव क्योंकि संसार के प्राणी करोड़ो वर्ष में एकएक के रहे या न रहे पर मनुष्य मुग्व अवश्य चाहता क्रम से भी परम मुक्त होते तो इस व्यतीत अनंत इसलिये वह दुःग्व में भी मरना नहीं चाहता कोई काल में आज तक एक भी प्राणी न बचा होता। कितने ही आराम से उसे मारना चाहे वह मरना अगर किसी तरह इस परममुक्ति को मान भी लिया न चाहेगा । उत्तेजना-चदा आत्मघात करले यह जाय तो भी जीवन का ध्येय दुःखाभाव बताना दूसरी बात है, अथवा विचारपूर्वक जीवन की आकर्षक नहीं है। अपेक्षा मरने के बाद अधिक सुग्व का अनुभव दुःखाभाव को अन्तिम ध्येय बताने का करले इसलिये समाधि आदि से मर जाय तो बात कारण यह कहा जाता है कि दुःख और सुग्व दूसरी है इस में सिर्फ दुःख से छूटने की ही एक तरह से सापेक्ष है। बिना दु:ख के सुख आकांक्षा नहीं होती परन्तु इस दुःख से रहित नहीं मालूम होता । ठंड के कष्ट के विना राई किसी निराकुल स्थान में पहुंचने की आकांक्षा का आनन्द नहीं मिलता। साथ ही एक बात होती है । उत्तेजनावश अज्ञान से कोई कहे कुछ यह भी है कि कितना भी सुख हो उसके साथ भी पर बहुत से चक्कर काटकर भी अन्त में उस या आगे पीछे एक न एक दुःख लगा ही रहता की आकांक्षा का अन्त सुख मे होता है। अगर है इसलिये अगर दुःख से पिड छुड़ाना है तो दुःख के विना सुख नहीं मिलता तो यही कहना सुख का त्याग करना अनिवार्य है। इसलिये चाहिये कि दुःख से अधिक सुरव प्राप्त करना जीवन का ध्येय ऐसी अवस्था होना चाहिये जिस जविन का ध्येय है, जितने अंश मे सुख मे न तो दुःख हो न सुख हो । अधिक है उतने अंश मे मुग्व पाने के लिये प्राणी दुःख से घबराया हुआ मनुष्य ऐसी कल्पना का प्रयत्न है। करे इस मे कोई आश्चर्य नहीं है फिर भी गंभीर विचार प्रश्न--यह ठीक है कि दुःख से अधिक करने पर दुःखाभाव जीवनका ध्येय नहीं मालूम होता। सुख पाने के लिये हरएक प्राणी प्रयत्न करता सुख और दुःख एक प्रकार के संवेदन या है पर इसीलिये सुख को अगर ध्येय मान लिया अनुभव है । अनुकूल संवेदन को सुख कहते जाय तो पाप और अत्याचार जीवन के ध्येय बन हैं और प्रतिकूल संवेदन को दुःख कहते हैं। जायेंगे । सुख के लिये चोरी व्यभिचार झूठ हिंसा ध्येय-दृष्टि [२१ आदि सभी कार्य ध्येय के भीतर कहलायगे । एक प्रश्न-अपना सुख ही जीवन का ध्येय क्यों व्यक्ति को इससे सुख होगा पर दूसरे हज़ारों को न हो समाज का सुख जीवन का ध्येय क्यों हो ? दुःख होगा। इस प्रकार सुख बढ़ाने के लिये समाज से क्या लेना देना ? किया गया हमारा सारा प्रयत्न व्यर्थ जायगा । उत्तर-यदि तुम अपने सुखको ही जीवन उत्तर-व्यक्ति के पाप से समाज की तो का ध्येय समझोगे तब दूसरे भी अपने सुखको हानि है ही पर व्यक्ति की हानि भी कम नहीं जीवनका ध्येय समझेंगे तब जैसे तुम उनकी पर्वाह हैं । पाप करना स्वयं एक दुःखप्रद कार्य है । न करोगे वे तुम्हारी पर्वाह न करेंगे । इस पार- क्रोध के समय मनुष्य का स्वसंवेदन सुखात्मक स्परिक असहयोग और लापर्वाही का फल यद नहीं दुःखात्मक है । चोरी करते समय जो भय होगा कि संसार में जितना सुख है उसका शतांश होता है वह भी दुःग्य की अवस्था है । अज्ञान मात्र रह जायगा और दुःख सौगुणा बढ़ जायगा। आदि के कारण अन्य दुःखो की तरह ये दुःख इतना ही नहीं संसार का अन्त ही हो जायगा । को सहना पड़ते हैं। वास्तव में पाप कोई क्योंकि संसार सहयोग पर टिका हुआ है । इस आनन्द की चीज नहीं हैं। प्रलय से बचने के लिये और संसार को अधिक पर यहां जो प्रश्न उपस्थित हुआ है उस से अधिक सुरवी बनाने के लिये पास्परिक सह- का उत्तर इस सूक्ष्म--विवेचन से नहीं होता । योग की आवश्यकता है । जब संसार में अधिक बहुत पाप ऐसे है और बहुत से पापी ऐसे हैं से अधिक सुख होगा तब व्यक्ति को भी अधिक जहां पाप दुःखरूप नहीं मालूम होता । इसलिय से अधिक मिलेगा । यह हमें कदापि न भूलना जीवन के ध्येय का निर्णय करते समय हमें सामू चाहिये कि दूसरों का सुख अपने मुख के बढ़ाने हिद दृष्टि से विचार करना होगा साथ ही मुख मुख्य सहायक है इसलिये कहना चाहिये कि और दुःख की मात्राओं का हिसाब भी रखना होगा। सर्व-सुख या पर-सुख में निजसुख है । व्यक्ति जीवन का ध्येय दुःख से अधिक सुख का तो कर्तव्य है कि वह अपने पराये के भेद पाना है। इसका अर्थ अपना और आज ही को गौण कर के संसार में सुख बढ़ाने की कोशिश दुःख से अधिक मुख पाना नहीं है। आज का करे । दूसरे का उपकार करने में जितना दुःख मुख अगर कल अधिक दुःख देने वाला हो, हमारा हमें सहना पड़ता है उससे कई गुणा सुख दूसरे मुख अगर दूसरे अनेकों को अधिक दुःख देने को मिलता है, इस प्रकार सुख दुःख का अगर वाला हो तो इससे मुखवृद्धि न हुई । सामूहिक हिसाब मिलाया जाय तो उसमें मुख की मात्रा दृष्टि से सुखबर्द्धन जीवन का ध्येय है । अधिक निकलेगी। अथवा दृमरे शब्दों में इस या कहना चाहिये एक आदमी खड्डे मे गिर पड़ा हो और सार्वत्रिक और सार्वकालिक दृष्टि से यथास उसके निकालने का हम प्रयत्न करे तो हमे कुछ म्भव अधिक से अधिक प्राणियों का अधिक कष्ट तो होगा पर जितना हमें कष्ट होगा उससे से अधिक सुख जीवन का ध्येय है। अति- अति- कई गुणा आनन्द उस आदमी को मिलेगा । इस संक्षेप में समाज का मुख जीवन का ध्येय है। प्रकार सामूहिक दृष्टि से संसार में मुख की वृद्धि होगी। म .
२४ ] सत्यामृत इसलिये क्रोध प्रगट नहीं करना चाहिये तो चार आद. मानसिक विकारों को हटाने का नाम आत्मशुद्धि मियों के उठते ही क्रोध प्रगट करने का अवसर पाकर कहकर ध्येय-निर्णय किया जाय तो मानसिक प्रगट करेंगे । पाँचवीं श्रेणी का क्रोध-शम अत्यन्त विकार का निर्णय करना भी सरल नहीं है। निंद्य है । यह विश्वास-घातक होने से कई गुणा क्योकि मन की तामस अवस्था में जब एक प्रकार दुःख देने वाला है। की जड़ता आ जाती है, भले ही वह शान्ति या अब इस पांच प्रकार के क्रोध-शम की वैराग्य के नाम के आवरण से ढंकी हो, जैसे कि सुखवर्धकता के साथ मन-शुद्धि को मिलाइये। वृक्षों में पाई जाती है तब वह भी आत्मशुद्धि पहिली श्रेणी मे मन-शुद्धि अधिक है और कहलायगी । साधारणतः यह ममझ लिया जाता है सुखबर्धकता भी अधिक है अन्तिम श्रेणी में मन कि मन वचन और शरीर की स्थिरता आत्मशुद्धि शुद्धि बिलकुल नहीं है बल्कि अशुद्धि बहुत है है और क्रियावत्ता अशुद्धि । यह ऐसा ही निर्णय और सुखवधकता भी बिलकुल नहीं है बल्कि है जैसा कि जलकी क्रियाशीलता का नाम है जलकी दुखबर्धकता बहुत है । इससे मालूम होता है कि अशुद्धि और जलकी स्थिरता का नाम है जलकी जितने अंश मे सुखवर्धकता है उतने अंश मे शुद्धि । पर जैसे यह उल्टा नियम है उसी प्रकार मनशुद्धि है । सुखवधकता का मनशुद्धि से कोई मन वचन काय की स्थिरता अस्थिरता के साथ विरोध नहीं है बल्कि निकट सम्बन्ध है । शुद्धि-अशुद्धि को जोड़ना उल्टा नियम है । प्रश्न-जब दोनो मे ऐमा सम्बन्ध है तब आकाश में ऊपर मेघ के रूप मे नाचने सुसंवर्धन ही ध्येय क्या कहा ? आत्मशुद्धि क्यो वाला जल शुद्धतम है और गटर में बहनवाला नहीं? दोनो से बात तो वही निकलती है ? जल है अशुद्धतम | और साफ बोतल में भरा हुआ वर्षी का जल शुद्ध जल है और किसी गढ़े उत्तर--आत्मशुद्धि को ध्येय बनाने मे दो में रुका हुआ जल अशुद्ध जल हैं। चलाचल आपत्तियाँ है---१ अर्थ अर्थ की अनिश्चितता होन से शुद्धाशुद्धता का कोई सम्बन्ध नहीं है । २ जिज्ञामा की अशान्ति । इसी प्रकार मन वचन काय की चलाचलता का १- आत्मशुद्धि शब्द का अर्थ करना ही भी शुद्धाशुद्धता से कोई सम्बन्ध नहीं है । स्थिर कठिन है । आत्मा नित्य है या अनित्य, मूर्त मन शुद्ध भी हो सकता है और अशुद्ध भी, क्रिया- या अमूर्त इत्यादि विवाद खड़े हो जाते है । इन वान मन शुद्ध भी हो सकता है और अशुद्ध भी। विवादों के साथ धर्म का सम्बन्ध जुड़ जाने से मछली पर ध्यान लगाकर बैठने वाला बगुला धर्म भी दर्शन की तरह विवादास्पद हो जाता अशुद्ध है और कल्याण के लिये विश्वभर पर है । आत्मा के माथ भौतिक कर्म लगा है या नजर लगाने वाला साधु शुद्ध है । ऐसी हालत उसी का गुण अदृष्ट है या माया है इन मे से .मे आत्मशुद्धि-अशुद्धि की परीक्षा कैसे हो ? किसे मानकर आत्मशुद्धि की जाय यह समस्या क्रिया और अक्रिया से तो इसका ताल्लुक रहा भी खड़ी हो जाती है। स्वर्ग, मोक्ष के प्रश्न भी नहीं, तब इसके सिवाय और क्या कसोटी हो आड़े आ जाते है। सकती है कि विश्वहित-जगत्कल्याण--सर्वसुख मे अगर इन झगड़ो से पिड छुड़ाकर सिर्फ लगा मन शुद्ध है और इसमे उल्टा अशुद्ध । इस , ध्येय-दृष्टि [ २५ प्रकार आत्मशुद्धि का निर्णय भी सुग्वबंधन की बनने की अपेक्षा मनुष्य अहिंसक बने यहीं अच्छा कसौटी पर कसकर ही करना पड़ता है। है । सुख-वर्धन की अपेक्षा दुःख न देने का प्रयत्न अधिक अच्छा है। इसे ही आत्मशुद्धि कह सकते हैं। २-दूसरी बात यह है कि आत्मशुद्धि से जिज्ञासा शान्त नहीं होती । आत्मशुद्धि किस उत्तर-दुरुपयोग सभी का हो सकता है, लिये ? यह जिज्ञासा बनी ही रहती है । कहा जा होता है । मुख-वर्धन की ओट में अगर शैता- चुका है कि हर एक बात के लिये यह पूछा जा नियत छिपती है तो आत्मशुद्धि की ओट में हैवा- सकता है कि यह किसलिये ? स्वतन्त्रता किस नियन छिपती है । सुख-वर्धन की ओट में मनुष्य लिये ! भक्तिः किसलिये ? स्वर्ग या मोक्ष किस- स्वार्थी बन जायगा, स्वार्थ सिद्धि में भी विश्वहित की लिये ? पर यह नहीं पूछा जा मकता कि मुख दुहाई देगा तो आन्मशुद्धि की ओट में अकर्मण्य किसलिये ? इसलिये सुग्वको अंतिम ध्येय बताया । बनकर समाज पर बोझ बनेगा और इस पर भी सुख का प्रयोजन आत्मशुद्धि नहीं है किन्तु अहंकार की पूजा करेगा, दंभ फैलायगा, ठंडी आत्मशुद्धि का प्रयोजन सुग्ख है । करता का परिचय भी देगा । अन्याय और अत्या- चार को शक्ति होते हुए भी न रोकना एक तरह प्रश्न--सुग्ववर्धन व्येय है तो ठीक, पर की ठंडी करता है - आत्मशुद्धि के नाम पर जो जैसे आत्मशुद्धि ठीक होने पर भी उसम दो वीतरागता का नाटक किया जाता है उसम ये आपत्तियाँ हैं उसी प्रकार मुख-वर्धन ठीक होन सभी दोष आ मकल है। पर भी उसमे दो आपत्तियाँ है । पहिली आपत्ति तो यह है कि इस ध्येय का दुरुपयोग बहुत ही कहा जा सकता है कि नहाँ आत्मशुद्धि है मकता है। मुख-वर्धन के नाम पर मी स्वार्थियों वहाँ अहंकार आदि कैसे रह मकते हैं ? निःसन्देह और पापियों को अपना स्वार्थ या पाप छिपाने नहीं रह सकते, ठीक उसी तरह जिस तरह जहाँ की ओट मिल जाती है । किसी पाप को सुग्व- विश्व-मुग्व-वर्धन है वहाँ दुःस्वार्थ नहीं रह मकता। वर्धक सिद्ध करना जितना मरल है उतना सरल यह तो ओट की बात है सो तो आत्मशुद्धि के उसे आत्मशुद्धि-रूप सिद्ध करना नह। है । दृसर्ग नाम की ओट में भी सब कुछ हो सकता है और बात यह है कि मुग्ववर्धन के ध्येय से जो हम विश्व-सुग्ब-वर्धन की ओट मे मत्र कुछ हो सकता है। प्रयत्न करते हैं उसमें दुःख-वर्धन ही अधिक हो और ठीक अर्थ करने पर दोनों की ओट में कुछ जाना है । किसी आदमी को भूख से पीडित देख पाप नहीं हो सकता इस तरह इस विषय में ये दोनों कर मांस खिलाने की दया में विश्व-सुख-वर्धन पक्ष बराबर हैं । नव. अर्थ की अनिश्चितता और की अपेक्षा विश्व-दुःख-वर्धन ही अधिक है इसी जिज्ञासा की अशान्ति नामक आपत्तियाँ न होने प्रकार हमार अन्य पंगपकारो की बात भी समझिये मे विश्व-सुख-वर्धन-ध्येय ही उत्तम है । हम परोपकार के नाम पर अमंग्य क्षुद्र जीवां का अत्र रही दुसरी बात कि सुख-वर्धन के जीवन नष्ट कर देते हैं इस प्रकार एक जीवन के कार्य में दुःख-वर्धन अधिक हो जाता है, मो मुखवधन के लिंय असख्यं जीवा का दु:ग्व इसका तो यही उपाय है कि जहाँ दुःग्व-वर्धन वर्धन करते हैं । इमलिये दयालु और परोपकार्ग अधिक होता हो वहाँ मुख--वर्धन छोड़ देना ।
. २६] सत्यामृत चाहिये । दोनो का टोटल मिलाने से अगर सुन्न २--मुग्ववर्धन का निर्णय प्राणियों की वर्धन अधिक मालम हो तो वह करना चाहिये । संख्या पर नहीं चैतन्य की मात्रा पर करना इतना विवेक न हो तो ध्येयदर्शन या उसकी ओर चाहिये। गति कैसे हो सकती है ! हां मुख-दुःख का ३. नुग्ववर्धन के लिये अगर किसी को दु:ख मापतौल करते समय सिर्फ प्राणियों की गणना दना प्राकृतिक नियम ने अनिवार्य हो तो वह कम से का विचार न करना चाहिये किन्तु सुख दुःख की कम दिया जाय ऐमा प्रयत्न होना चाहिये । मात्रा का विचार करना चाहिये । निम्न श्रेणी के प्रश्न-काई जान छोटा हो या बड़ा उसका असंख्य प्राणियों के मुख दुःख की अपेक्षा उच्च मुग्व उसको उतना ही प्यारा है जितना अपना श्रेणी के एक प्राणी में सुख दुःत्व अधिक होता सुग्व हो प्यारा है । जान का जन्मसिद्ध अधिकार हैं । वनस्पतियों के मुख दुःख की अपेक्षा कीट भी जितना हम है उतना उस है फिर हम पतंगो का सुख दु:ग्व असंख्यगुणा है उनमे अनन्य प्राणियों का वध करव, स्वयं जिन्द रह असंख्य गुणा पशुपक्षियो मे है और उनमे अनेक या सुखा बने यह कहां तक उचित कहा जा गुणा मनुष्य मे है । ज्ञान-चैतन्य-या सबेदन दाक्ति सकता है? का जितना जितना विकास होता जाता है उतना उत्तर-प्रत्येक प्राणी को आत्मरक्षा का उतना सुख दुख बढता जाता है । इसलिय अधिकार है और आत्मरक्षा के लिये प्राकृतिक साधारणतः अनेक पशुओं की अपेक्षा एक मनुष्य दृष्टि से जो कार्य अनिवार्य है वे भी उनक का बचाना प्रथम कर्तव्य है। फिर भी उसकी कतन्य के भीतर हैं । जैम एक प्राणी वाम लेन मर्यादा है । मनुष्य पर प्राण-संकट आया हो तो म भी अमख्य प्राणियों का वध कर जाता है उसको बचाने के लिये पशु का जीवन लगाया नामी श्वास लेना आत्मरक्षा के लिय अनिवार्य जा सकता है पर मनुष्य को सिर्फ आराम पहुँचा- होने से श्वाम लेन का जीव--वध अन्तव्य है । ने के लिये पशु के प्राण नहीं लिये जा सकते यह प्राणी का अपराध नह। प्रकृति का अपराध क्योकि पशु के मरने के कष्ट की अपेक्षा मनुष्य है । प्रकृति के अपराध की जिम्मेदारी प्राणी के का भोगोपभोग सम्बन्धी सुख अधिक नहीं है। पर ऊपर नहीं है। आत्मरक्षा के संघर्ष में जो चलने फिरने मे खाने पीन मे · मनुष्य द्वारा जो अनिवार्य प्राणिवध या दुःखवधन हो जाता असंख्य वनस्पति का नाश होता है वह किया है वह धर्म के वश की बात नहीं है । इस मुख- जा सकता है। फिर भी कोशिश यह होना दुःख पूर्ण जगत मे धर्म तो इतना ही कर सकता चाहिये कि प्राणियो को कम से कम दु:ख दिया है कि यथासाध्य दु.ख को कम करे और मुग्व जाय । अनावश्यक वध कदापि न होना चाहिये । को बढावे । यही धर्म जीवन का ध्येय है । इसका विशेष विवेचन अहिसा के प्रकरण मे प्रश्न--यदि श्वासोच्छ्वाम का जीववध प्रकृति किया जायगा । यहां तो मिर्फ ये तीन बात का अपराध है तो सिंह के लिये मांस--भक्षण भी ममझ लेना चाहिये। प्रकृति का अपराध है इसलिये सिंह को हम दोषी १--विश्व-मुखवर्धन ध्येय है। नहीं कह सकते तव अनेक पशुओं और मनुष्यो - ध्येय-दृष्टि [ २७ - . की रक्षा करने के लिये सिंह का वध करना अनेक गुणा है । सुख दुःख का सम्बन्ध चैतन्य अनुचित है । पर सिंह आदि हिंत्र प्राणियों के शक्ति से है शारीरिक शक्ति से नहीं। इसलिये रक्षण से जितना सुखवर्धन होता है उससे कई अपनी रक्षा के लिये सिंह जो प्राणिवध करता है गुणा दुःखवर्धन होता है। ऐसी हालत में धर्म उससे जगत की कई गुणी हानि है क्या करे ? वह सुखवर्धन के लिये हिंस्र प्रश्न-मनुष्य तो पशुओं से श्रेष्ठ है इसलिये प्राणी का वध करे अथवा हिंस्र की हिंस्रता को वह अगर प्राणिवध करे तब तो हानि नहीं ? प्रकृति का अपराध मानकर उसका रक्षण करे ? उत्तर--एक पशु का वध अगर एक मनुष्य उत्तर--प्राणरक्षा के प्रयत्न में सार्वत्रिक और के रक्षण के लिये अनिवार्य हो तब तो हानि सार्वकालिक दृष्टि से विश्वसुखवर्धन का ही ध्यान नहीं-बशर्ते कि इस अपवाद का उपयोग रखना चाहिये। अगर आत्मरक्षा के लिये इस निस्वार्थता के साथ किया जाय- प्रकार के विश्वसुखवर्धन में बाधा पड़ती हो तो परन्तु एक पशु के वध से एक मनुष्य का प्राणत्याग कर देना चाहिये । जैसे अगर किसी रक्षण दो चार दिन के लिये ही हो सकता है मनुष्य को प्राण रक्षण के लिये दुसरे मनुष्यों का इस प्रकार उसके लम्बे जीवन में मनुष्य अनेक भक्षण करना पड़े तो उसका धर्म है कि वह पशुओं को नष्ट कर देता है इसलिये यह ठीक मनुष्य-भक्षण करने की अपेक्षा प्राण-त्याग करदे । नहीं, इससे मुख की अपेक्षा दुःख बढ़ जाता है। प्राण-रक्षण के लिये अपने समान कोटि के मतलब यह कि इस नीति के अनुसार मांस-भक्षण या उच्च कोटि के प्राणियों का नाश उचित का समर्थन नहीं किया जा सकता। नहीं है। सिंह की बात पर भी हम इपी दृष्टि से प्रश्न-जीवन निर्वाह के लिये जहां पशुवध विचार करें। सिंह प्राण-रक्षण के लिये ममान के बिना दूमरा कोई मार्ग न हो वहां वह क्या कोटि के अनेक प्राणियों को खाता है इसलिये करे ? जैसे उत्तर ध्रुव की ओर खेती आदि नहीं उसको उचित है कि वह अनशन करके प्राण हो सकती वहां पशुवध अनिवार्य है। और कई त्याग दे। पर उसमें इतनी समझदारी नहीं है देश ऐसे हैं जहां कृषि आदि इतनी मात्रा में इसलिये जो इस बात को समझते है उनका नहीं हो सकती कि सब मनुष्यों की गुजर हो कर्तव्य है कि वे सिंह को प्राण त्याग करायें । सके वहां जितने अश मे अन्न की कमी होगी प्रश्न--सिंह विक्रमशाली प्राणी है इसलिये उतने अंश में पशुवध या मत्स्यादिवध करना उच्च श्रेणी का है हरिण आदि निवल होने से पड़ेगा । क्षुद्र श्रेणी के प्राणी हैं इसलिये सिंह की कोटि उत्तर--जहां शाकादि का अभाव है वहां में केस रक्खे जा सकते हैं ? दो कारणो से पशुवध की छूट दी जा सकती है। उत्तर-यहाँ प्राणियों की श्रेणी शारीरिक पहिला तो यह कि जहां शाकादि नहीं है वहां शक्ति के अनुसार नहीं किन्तु चैतन्य शक्ति के अन्य जानवर भी मांसभक्षी होंगे उनके वध से अनुसार समझना चाहिये । शारीरिक शक्ति में उनके भक्ष्य अन्य अनेक जानवरों का रक्षण मनुप्य सिंह से निर्बल है पर इसका चैतन्य बल होगा। दूसरा यह कि वहां मनुष्य सरीखे असाधा- J २८ ] सत्यामृत - बान रण बुद्धिमान प्राणी का मूल्य अधिक हो जायगा प्रश्न-यदि धर्म की प्रानि का विरोध करना और इसीलिये उसका रक्षण अधिक जरी हो है तब भी आप ही मंगा नयाँकि प्राकृतिक जायगा । फिर भी यह बात तो रहेगी ही कि नियम अटन्न । जहां मांस भक्षण अनिवार्य हो उठा है। यहां उत्तर--प्राकृतिरनिया अदल पर जग में जीवन का ध्येय पूरे रूप में पाया नहीं जा ही वर्गक बाधक में प्राय: प्रा सकता, मनुष्यता का और धर्म का पूर्णम्प दिखाई जीव को दसरनीया कर, निर्वाह नहीं दे सकता । ऐसे स्थानों में उतने ही मनुष्यों करना पटना है। प्रान ने जो या त अंग को रहना चाहिये जितन का वहां शकिपर निर्वाह में आवश्यक महार सरण किया गया हो सके । शाक प्राप्त होने पर भी मांस भक्षण अमक अंशग नियन्त्रण किया जा सकता। करना जीवन के ध्येय को नष्ट करना है | जहां जगदुसर जांधी का काम मारी, मगर शाक प्राप्त न हो वहां हिंन्न पशुआ का वध अधिक चतन्य वाली का का हार न किया जा सकता है। भाजन के लिये शाका- प्रकार का नियन्त्रण या महान धर्म का काम भोजी पशुओं का वध न करना चाहिये । क्योंकि प्रमानना की इससे जितना दुःख बढ़ता है उतना दु:न्त्र रुकता के इस कार्य में प्रकृति काकी नहीं है न उतना मुरव बढ़ता है । महायता पहचाना । प्राकृतिक नियम अपने प्रश्न-क्या विश्वसुरववर्धन की नीति नियन्ट सपयोग के लिये या नियन्त्रण के लिय काही को सताने का अधिकार देती है । प्रकृति तो बलवान महायता पहुँनान है इसका इष्टान्न नाग और का ही चुनाव करती है अगर धर्म भी यही मेरे पर है । जैसे प्राकृतिक नियम के अनुसार कार्य करता है तो उसकी आवश्यकता ही क्या आकर्षण शक्ति के कारण पानी नाच (केन्द्र की है ? जो काम स्वाभाविक रूप हो में रहा है उसके ओर ) बहता जाता है परन्तु इसीनियम का उप- लिये इतना प्रयत्न क्यों? योग हम नद के द्वारा जन्ट कर जान में भी उत्तर--प्रकृति को सुखदुःख विवेक नहीं करते है । टॉकी के पानी पर जो आकर्षण शक्ति है उसको सिर्फ बलावल विवेक है । प्रकृति का दबाव पड़ता है वहीं दबाब नाल के जल की बलवान को जिलाती है और बल का मतलब ऊपर ले जाना । इस प्रकार प्राकृतिक नियम शरीर बल ही नहीं है किन्तु मन बुद्धि आदि का ही पानी को ऊपर ले जाने में सहायता पहुचाना वह बल भी है जो आन्मरक्षण के लिये अनुकूल । धर्म के विषय में भी यही बात है । प्रकृति हो । इस प्रकार प्रकृति सब से अनुकूल का के नियमानुसार ही हम प्रकृति की कमी को पूरा चुनाव करती है । न्याय अन्यायकी भी उसे करते है । उदाहरणार्थ-निर्बल होते हुए भी प्रेम पर्वाह नहीं है। प्रकृति की इस कमी को से संगठित जाति अधिक जाती है और परस्पर यथासाध्य दूर करने के लिये धर्म है । धर्म मे लड़नेवाली असंगठित जाति जल्दी नष्ट हो दुःख घटाने, और सुख बढ़ाने के लिये प्रयत्न जाती है या गुलाम बनकर दृपरो का शिकार करना है बनती है यह प्राकृतिक नियम धर्म में सहायक है ध्येय-दृष्टि [ २९. में है । इस प्रकार धर्म का प्रकृति में विरोध नहीं इसका कारण यह है कि गरीब की अपेक्षा अमीर की है। धर्म को प्रकृति के कार्यों में से चुनाव करना कम हानि होती है इसलिये उसे दुःख भी कम पड़ता हैं । और अधिक सुख के अनुकूल उसे होता है । जिसका शरीर बलवान है उसको चोट समतोल बनाना पड़ता है। करने में कम पाप है क्योंकि उसके स्नायु आदि प्रश्न-अधिक मुख पैदा करना अगर धर्म पैदा करना अगर धर्म मजबूत होने से उनपर चोट का असर कम पड़ता का कार्य हो तो इससे एक बड़ा अन्धेर हो जायगा। है इसलिये दुःख भी कम होता है । इस प्रकार अन्य परिस्थितियों की समानता में जहां पर दु:ख जब किसी कारण वश हमें दूसरों को मताना अनिवार्य हो जायगा या किसी स्वार्थवश कोई कम होता हो वहां पाप भी कम होता है । पर संयमी या योगी के विषय में यह बात नहीं है दूसरों को सतायगा तब निर्बल को सताने की उसे दुःख कम नहीं होता है परन्तु वह संयम के अपेक्षा बलवान को सताने में कम पार होगा, असंयमी को सताने की अपेक्षा संयमी को सताने में कम कारण सहन अधिक करता है । संयमी या योगी निर्बल होने पर भी अधिक से अधिक चोट सह- पाप होगा, अयोगी को सताने की अपेक्षा योगी जाता है इसका कारण यह नहीं है कि उसे दुःख को सतान में कम पाप होगा क्यों कि बलवान संयमी और योगी अपने तन बल और मन बल नहीं हुआ, दुःख तो पूरा हुआ पर उसने पर्वाह नहीं की । वह पर्वाह करे या न करे परन्तु विश्व के कारण अधिक दुःख महन कर सकते हैं । दुःख की वृद्धि नो हुई ही इसलिये संयमी को इस प्रकार संयमी और योगी के लिये आपकी अधिक दुःख देने की नीति खराब है । विश्वसुख- नीति विचित्र वदला देगी ! तब सताये जान के वर्धन का ध्येय उसका समर्थन नहीं करता । लिये संयम या योग कौन धारण कोगा ? तीसरी बात यह है कि असंयमों की अपेक्षा उत्तर--इसके उत्तर चार वातं कहीं जा संयमी या योगी को दुःख अधिक होता है । क्या- सकती हैं पहिली यह कि अमुक अंश में यह कि उसकी संवेदन शक्ति बढ़ी चढ़ी होती है । बात सत्य है । एक गरीव की चोरी की अपेक्षा जा झगड़ अमंयमी को दुखी नहीं करते उनसे अमीर की चारी में कम पाप है। हां, अन्य सब संयमी घबराता है दूर भागता है । इस प्रकार परिस्थितियाँ समान होना चाहिये । यही बात शक्ति उसकी संवेदन शक्ति अधिक होने से उसका आदि के विषय में भी कही जा सकती है । दाइ दुःख और मुख भी बढ़ता है । अगर उसे दुःख टते समय भी हम इस बात का विचार करते है दिया जाय तो असंयमी की अपेक्षा अधिक कि यह सहन करने योग्य है या नहीं ? जो वात हांगा । यह वात दूसरी है कि वह उस व्यक्त इस लोक नीति के लिये लागू है वही धर्म भी न करेगा वर न बसायगा विश्वप्रेम या नाट्य- कहता है । पर संयमी आदि के बारे में हम दूसरी भावना का चिन्तवन कर सह जायगा । पर बातों का भी विचार करना पड़ेगा। दुःव होगा अधिक, इसलिये विश्व सुखवर्धन के लिये दूसरी बात यह है कि दुःख होना एक बात मंयमी का अधिक ख्याल रखना चाहिये । और दुःख-सहन करना दूसरी बात । गरीव की चौथी बात यह है कि संयमी या योगी अपेक्षा अमीर की चोरी करने में कम पाप है दूसरों को कमसे कम दुःख और अधिक से में ३०] ० सत्यामृत ---- +man+4 --- अधिक सुख देता है इसके बदले में अगर उसे ही अंग हैं। इसलिये ध्येय के भीतर ही कहलाया। अधिक दुःख मिले तो मनुष्य असंयम की ओर उसे स्वतन्त्र ध्येय नहीं बनाया जा सकता। चला जायगा इससे दूसरों को और अपने को प्रश्न-मोक्ष पुरुषार्थ को ही अन्तिम या पूर्ण भी अधिक दुःख दे डालेगा इस प्रकार सार्वका- ध्येय मान लिया जाय तो ? लिक दृष्टि से विश्वसुख वर्धन मे बाधा पड़ेगी इस- उत्तर--सुख की पूर्णता काम और मोक्ष लिये भी संयमी को दुःख न देना चाहिये । दोनों के सम्मिलन मे है । एक एक से जीवन इस प्रकार विश्वसुखवर्धन का ध्येय संयमी सफल नहीं होता । केवल मोक्ष पुरुषार्थ को ध्येय को दुखी करने का समर्थन नहीं करता । बनाने से मनुष्य विश्वसुख की पर्वाह नहीं करेगा प्रश्न--विश्वसुख वर्धन का कितना ही प्रयत्न इसका परिणाम यह होगा कि विश्व भी इसकी पर्वाह किया जाय पर इस में सन्देह नहीं कि हमारे न करेगा, इस प्रकार सहयोग नष्ट हाने से जीवन द्वारा प्राणियो की हिंसा होगी ही और हम दूसरों का टिकाना अशक्य हो जायगा, यहां महामृत्यु के दुःख के कारण बनेंगे ही, ऐसी हालत मे हम का तांडव होने लगेगा। इसलिये मोक्ष पुरुषार्थ अपना ध्येय मोक्ष क्यों न रक्खे ? मुक्तात्मा किसी को विश्वमुख-वर्धन का अग मान कर ध्येय का की हिसा नहीं करता । अंश मानना चाहिये । उत्तर-इसमे भी वही बात है। हमारे द्वारा [इन पुरुषाधों का वर्णन विशेष रूप में पुरुषार्थ प्रक- हिंसा होती है हिंसा से दुःख होता है इससे मोक्ष रण में किया जायगा] चाहिये, इसका मतलब यही कि हमारे द्वारा जो प्रश्न--महामृत्यु का भय करना व्यर्थ है वह दूसरो को दुःख होता है वह दूर हो जाय । यह तो अनन्त शान्ति है । जीवन में सुख की अपेक्षा सुखवर्धन ही है; इस प्रकार हमारी मुक्ति-कामना दुःख बहुत है । अगर प्रलय हो जाय तो दुःख भी विश्वसुखवर्धन के लिये कहलाई । इसलिये और सुख दाना चले जाँय । इस तरह हम लाभ मोक्ष अंतिम ध्येय नहीं किन्तु उपध्येय कहलाया। मे रहे इसलिय प्रलय ही हमारे जीवन का अंतिम इसीलिये कदाचित् मोक्ष की मान्यता में बाधा आ ध्येय क्यो न हो? जाय तोभी हम विश्वसुखवर्धन के लिये प्रयत्न उत्तर--यह प्रलय की इच्छा भी इसीलिये करेंगे । विश्वसुख वर्धन का ध्येय हमे पथ-निर्देश है कि हम दुःख से छूटें और इससे हमें शान्ति करता है कर्तव्य-निर्णय की कसोटी बनता या सुख मिले । इस प्रकार प्रलय की आकांक्षा परन्तु मोक्ष अत्यन्त परोक्ष और विश्वासगम्य है के में भी सुखवर्धन की आकांक्षा ही काम वह कर्तव्य-निर्णय मे सहायता नहीं पहुंचाता । कर रही है। पर प्रलय के द्वार से यह बात उस मोक्ष के लिये कही जा रही मार्ग कुमार्ग इस है जिसका अर्थ शरीर और आत्मा का अनन्त मे दो आपत्तियाँ है । पहिली तो यह कि प्रलय काल के लिये विच्छेद है, परन्तु मोक्ष नाम का हमारे हाथ मे नहीं प्रकृति के हाथ में है । पृथ्वी पुरुपार्थ जो कि स्वाधीन सुखरूप और इसी किसी दिन जल उठे या सूर्य के बुझ जाने से जीवन की चीज है वह तो विश्वसुख-ईन का इकदम ठंडी हो जाय और पशुपक्षी मनुष्य सब मूल सुखवर्धन का है ध्येय-दृष्टि ३ १ नष्ट हो जाय तो प्रलय हो सकता है पर यह नाना शरीर धारण कर प्राणियों की सृष्टि करेगा हमारे हाथ में नहीं है । इसलिये गलय को ध्येय कदाचित् एक की जगह अनेक प्राणी हो सकते बनाना या न बनाना यह विचार ही निरर्थक हैं और वे हमारी अपेक्षा अधिक दुःखी हो सकते है। दूसरी बात यह है कि कोई प्राणी प्रलय हैं इसलिये आत्महत्या आदि करके दुःख से छूटने नहीं चाहता । विक्षोभ की अवस्था में कोई आत्म की कल्पना निरर्थक है । जीवन सब चाहते हत्या करले यह दूसरी बात है पर सभी अधिक हैं और दुःख कोई नहीं चाहता इसलिये जीवन से अधिक जीना चाहते हैं। प्राणियों की यह के साथ दुःख दूर करना या सुख बढ़ाना ही जीवनाकांक्षा इतनी प्रबल है कि प्रलय को ध्येय हमारा अंतिम ध्येय होना चाहिये । बनाना व्यर्थ हैं। प्रश्न--प्रलय असंभव है, अनिष्ट है इसलिये प्रश्न-जो प्रलय हमारे वश में नहीं है जाने दीजिये परन्तु अपायता को ध्येय बनाने उसे जाने दीजिये और जो लोग प्रलय नहीं में क्या आपत्ति है ? जितने दुःख हैं वे सब क्रोध चाहते उन्हें भी जाने दीजिये पर जो प्रलय हमारे मान माया लोभ आदि के परिणाम हैं, इन सब वश में है और जो उसे चाहते हैं उन्हें वह मनोवृत्तियों का नाश करना हमारे जीवन का प्रलय प्राप्त करना चाहिये। जैसे आत्महत्या ध्येय हो तो सब दु.ख दूर हो जायँ, सब झगड़े के द्वारा अंश-प्रलय पाया जा सकता है जो दुःख शान्त हो जाय, अनन्त मोक्ष अगर हो तो वह सुख का हिसाब लगा सकते हैं वे दुःख से छूटने भी मिल जाय न हो तोभी यहीं सुख शान्ति होने के लिये आत्महत्या क्यों न करें ? से अकपायता सफल हो जाय । उत्तर-जीवन में ऐसे अवसर भी आते हैं उतर--इस प्रश्न में भी यह बात तो है ही जब मनुष्य को विश्व सुख के लिये या स्वाभिमान कि अकषायता दुःख दूर करने के लिये या सुख आदि आत्मसुख के लिये प्राणदान करना पड़ता . शान्ति पाने के लिये है इसलिये अंतिम ध्येय है, ऐसे अवसर पर वह प्रलय या प्राणदान सुख- सुखशान्ति रही उसके साधन के रूप में अकषा- वर्धन का कारण होने से उपादेय बन जाता है । यता रही । अगर अकपायता का नाम या अर्थ अंतिम ध्येय तो वहां भी सुखवध. है । साधारण सुखशान्ति के मार्ग में बाधक हो तो उसे अवस्था में आत्महत्या हेय और व्यर्थ है। क्योंकि छोड़ा भी जा सकता है। अकपायता मुख की आत्मा अगर अमरतत्व है तो शरीर के छोड़ देने तरह निर्विवाद नहीं है न उसका कोई निश्चित पर भी वह दुःख से नहीं छूट सकता उसे तुरंत रूप है । क्रोध आदि वृत्तियों का नाश हो सकता दूसरा शरीर मिलेगा और वह इससे अच्छा ही है या नहीं ? अथवा होने से चैतन्य भी बचेगा होगा इसका कोई ठिकाना नहीं। अगर अच्छा भी या नहीं ये सब अनिश्चित बातें हैं । गंभीर विचार हो तो भी जन्म समय के कष्ट भारी पड़ते हैं। से यही मालूम होता है कि क्रोध मान माया और बुरा हुआ तब तो दुहरी मार समझना चाहिये। लोभादि का नाश नहीं किया जा सकता, उनका अगर आत्मा अमर नहीं है, भौतिक पिंड ही है तत्र दुरुपयोग रोका जा सकता है, उन पर अंकुश, भी आत्म हत्या व्यर्थ है क्योंकि यह भौतिक पिंड फिर रक्खा जा सकता है, यही अभीष्ट भी है। अन्याय २] सत्यामृत र क्रोध करना धर्म है और अन्याय पर उपेक्षा पराकाष्ठा पाने के लिये प्रसिद्ध महावीर बुद्ध आदि बलता या कायरता है इसलिये पाप है । महात्माओं में इन मनोवृत्तियों का सात्विक रूप भिमान से दूसरों का अपमान क ना पाप है था इसीके बलपर वे. समाजक्रान्ति कर सके थे र अहंकारियों या अत्याचारियो के सामने म त्म- संगठन कर सके थे। अगर उनकी ये मनोवृत्तियाँ रव या लोक-गौरवं या न्याय-गौरव की रक्षा हर तरह नष्ट हो गई होती तो वे जड़ समान करना धर्म है | स्वार्थवश दूसरो को छलना पाप हो जाते । मनोवृत्तियों के इस सात्त्विक रूप को अक- है किन्तु उसके कल्याण के लिये अतथ्य--भाषण षायता शब्द से ठीक ठीक नहीं समझ सकते उनकी पाप नहीं है । लोभ पाप है पर उसीका एकरूप सात्त्विकता का निर्णय विश्वसुख-वर्धन की कसौटी शुद्ध प्रेम पाप नहीं है । मतलब यह है कि इन मनो- वृत्तियों का उपयोग देखना चाहिये । इनके पर ही किया जा सकता है और उसीके लिये सात्विक रूप की आवश्यकता है। जनकल्याण उनका उपयोग है । इसलिये सार्वकालिक और विरोधी दुःस्वार्थमय रूप की आवश्यकता नहीं है, सार्वदेशिक दृष्टि से विश्वसुखवर्धन ही जीवन उन्हें ही नष्ट करना चाहिये । अकषायता की का अन्तिम ध्येय है।
मार्ग-दृष्टि है क दृष्टिकांड, तीसरा अध्याय (मार्गदृष्टि) [सुख-दुःख-समस्या ] . बुद सुखी रहने और जगत को सुखी करने मानसिक दुःखों में पहिले मनपर असर पड़ता है का ध्येय निश्चित होने के बाद उस ध्येय को पाने पीछे उसका असर शरीर पर होता है । शारीरिक का मार्ग ढूँढ़ना ज़रूरी है । इसके लिये पहिले दुःखों में पहिले शरीर पर असर पड़ता है फिर यह सोचना चाहिये कि दुःख क्या है, कितने तरह मनपर । जैसे किसी ने तमाचा 'मारा, तो तमाचे का है, किन किन कारणों से पैदा होता है ? दुसरी का दुःखद प्रभाव पहिले शरीर पर होगा पीछे बात यह कि दुःखों पर विजय कैसे पाना चाहिये ? मनपर । और किसीने गाली दी तो गाली का तीसरी बात यह कि सुख क्या है, कितने तरह का दुःखद प्रभाव शरीर पर नहीं है, मनपर है । हां, है, कैसे पैदा होता है ? चौथी बात यह कि सुख मनमें दुःख होने से चिन्ता हो उससे शरीर सूखने प्राप्त कैसे करें ? इन चार वातों के विचार में ध्येय लगे तो बात दूसरी है। मार्ग साफ़ दिखाई देने लगता है । इनमें से दुःख कभी कभी ऐसा होता है कि एक ही घटना दूर करने के उपाय और सुख पाने के उपाय प्रायः मन और शरीर दोनों पर सीधी ही दुःखद प्रभाव मिल जाते हैं इसलिये इनका विचार भी मिल कर डालती है जैसे किसी ने तमाचा मारा तो शारी- एक साथ करना होगा। इस प्रकार हमारे सामने रिक चोट से जो वेदना हुई वह शारीरिक दुःख तीन विचार बन जाते हैं । १ दुःख विचार कहलाया और अपमान के अनुभव से जो वेदना २ सुख विचार ३ उपाय विचार । हुई वह मानसिक कष्ट कहलाया । इस प्रकार १ दुःख-विचार संक्षेप में दुःख दो तरह के हुए १-शारीरिक २-मानसिक। दुःख एक ऐसा संवेदन है जो अपने को अच्छा नहीं मालूम होता अर्थात् प्रतिकूल या शारीरिक दुःख छः तरह के हैं-१ आघात अनिष्ट-संवेदन दुःख है। २ प्रतिविषय, ३ अविषय, ४ रोग, ५ रोध यद्यपि सभी दुःख मन के द्वारा होते हैं फिर ६ अतिश्रम । भी कुछ दुःख ऐसे है जो सीध मनपर असर पड़ने १-आघात-शस्त्रास्त्र से या हाथ आदि से होते है और कुछ ऐसे हैं जो शारीरिक विकार से अथवा और किसी चीज़ से शरीर को जो से सम्बन्ध रखते हैं । यद्यपि सभी दुःखों का दुःग्वद चोट लगती है वह आघात दुःख है । असर मन और शरीर पर पड़ता है फिर भी किसी २-प्रतिविषय-इन्द्रियों के प्रतिकूल विषय में मन की प्रधानता है किमी में शरीर की। स जो चोट पहुँचती है वह प्रतिविषय है । जैसे ३६ ] सत्यामृत APNemamurt or- ---- . जिससे लाघव कहा जाय इसलिये व्यग्रता एक दुःख दे सकती है । गरमी में वस्त्र-हीनता सुखद अलग ही दुःख है । व्यग्रता एक तरह की मान हो सकती है शीत में दुःखद । कभी हाथ पैर सिक निर्बलता का परिणाम है । व्यग्रता जितनी दवाना या मरोड़ना दुःखद हो सकता है कभी अधिक हो मानसिक शक्ति उतनी ही कम सम ( जैसे नाई के द्वारा ) सुखद । इसलिये सुख- झना चाहिये । व्यग्रता से क्रोध (झुंझलाहट) दुःख, संवेदन पर ही निर्भर है किसी क्रिया पर नहीं। चिन्ता, आदि भाव पैदा होते है । अभ्यास न सुख छः तरह के हैं:- होने से या मन निर्बल होने से व्यग्रता अगर बढ़ १ प्रेमानन्द २ जीवनानन्द ३ विषयानन्द जाय तो दुःख अधिक होगा पर अगर संयम हो ४ महत्वानन्द ५ मोक्षानन्द ६ रौद्रानन्द तो वह दुःख सहा जा सकेगा। १ प्रेमानन्द-प्रेमसे आनन्द तो होता ही है सहवेदन-प्रेम करुणा भक्ति आदि के वश परन्तु प्रेम आनन्द के इतने पास है कि उसे प्रेम होकर दूसरो के दुःख मे दुःखी होना सहवेदन ही कह दिया जाय तो यह कोई बड़ा रूपक न दुःख है। कभी कभी सहवेदन दुःख अपने किसी होगा । हृदय से हृदय मिलने का आनन्द सुलभ स्वार्थ के कारण अन्य दुःखों में भी परिणत हो स्वाभाविक और निर्दोष आनन्द है । दो सच्चे जाता है । जैसे अपने नौकर को चोट लगगई इससे मित्र जब मिलते हैं तो वे आपस में कुछ दें या अपने को दुःख हुआ । यह दुःख सहवेदन भी न दे परन्तु वे पूर्ण आनन्द पाते हैं । गाय बछड़े हो सकता है और नौकर दो चार दिन काम न से या मा बेटेसे कुछ पाने की इच्छा से सुखी कर सकेगा इस भाव से अनिष्ट--योग भी हो नहीं होती किन्तु प्रेम से सुखी होती है । प्रेम सकता है । जहाँ जितने अंश में शुद्ध प्रेम के जितना फैलता जाता है मुख उतना ही निर्दोष वश मे होकर दूसरों के दुःख में हम दुःखी होते और स्थायी होता जाता है । जो विश्वप्रेमी है वह है वहाँ उतने अंश मे हमे सहवेदन-दुःख होता प्रेमानन्द की पराकाष्टा पर पहुंचा हुआ है । वह है। लोकसेवी महात्माओ को सब दुःख छूट पूर्ण वीतराग, पूर्ण अकपाय, पूर्ण योगी और पूर्ण जाने पर भी यह दुःख बना रहता है । यह दुःख मुखी है | प्रेमानन्द सब सुखों में श्रेष्ट है वह अधिक से अधिक निर्दोप और अधिक से अधिक स्थायी है। जगत के दुःख दूर करने में सहायक होने से आवश्यक दुःख है । यह दुःख रौद्रानन्द का २ जीवनानन्द---जीवन के लिये उपयोगी विरोधी और प्रेमानन्द का सहयोगी है । पदाथी के मिल जाने से जो आनन्द होता है वह जीवनानन्द है। जैसे रोटी मिलना, पानी मिलना इस प्रकार कुल ग्यारह प्रकार के दुःख है। हवा मिलना आदि का आनन्द । जीवन की २ सुख-विचार स्थिरता और उसके साधन प्राणी को एक प्रकार जो संवेदन अपने को अच्छा लगे वह सुख का सुख देते है वह जीवनानन्द है । है अर्थात् अनुकूल या इष्ट-संवेदन का नाम ३ विषयानन्द-स्वादिष्ट भोजन, संगीत सुख है । सुख और दुःख किसी क्रिया का नाम सौन्दर्य, सुगंध, अच्छा स्पर्श आदि का आनन्द नहीं है जो क्रिया आज सुख देती है वही कल विपयानन्द है। , है मार्ग-दृष्टि [ ३७ । । शंका-जीवनानन्द भी खाने-पीने का आनन्द से लोग इस आनन्द के लिये मारी धन सम्पत्ति है और विषयानन्द भी खाने-पीने का आनन्द है अधिकार तथा जीवन तक दे डालते हैं। फिर दोनों में अन्तर क्या है ? मोक्षानन्द-अन्य सुख निरपेक्ष, दुःख से छूटने समाधान-जीवनानन्द में इन्द्रिय-विषय- का जो सुख है वह मोक्षानन्द है। कभी २ मोक्षानन्द सेवन की मुख्यता नहीं है । पेट भरना एक बात के साथ साथ जीवनानन्द विषयानन्द आदि मिल है और स्वाद लेना दुसरी बात । अगर भरपेट जाते हैं । जैसे बच्चों को छुट्टी मिली और उन्हें यह भोजन मिल जाय नो रुखे मूग्वे भोजन में भी आनन्द हुआ कि अब घर चलकर अच्छा अच्छा जीवनानन्द मिल सकेगा पर विषयानन्द न मिलेगा। भोजन मिलेगा या खेलने को मिलेगा तो इस विप- अगर स्वादिष्ट भोजन मिल जाय तो खाली पेट यानन्द और प्रेमानन्द के साथ छुट्टीका मोक्षानन्द रहने पर भी विषयानन्द मिल जायगा पर जीवना बढ़ गया पर अन्य आनन्द न मिलने पर भी दुःख नन्द न मिलेगा। शरावी जीवनानन्द नहीं पाता छूटने का जो आनन्द है वह एक स्वतन्त्र ही पर विषयानन्द पा जाता है। विषयानन्द जिस आनन्द है । अन्य आनन्दों की जहां कल्पना भी प्रकार अन्त में दुःख बढ़ाने वाला है वैमा जीवना- नहीं होती वहां मोक्षानन्द होता है। बीमारी से नन्द नहीं । विषयानंद के चक्कर में पड़कर मनुष्य छूटने पर या और किसी तरह बन्धन-मुक्त या जीवनानंद खो बैठता है इसलिये कभी कभी इन दुःखमुक्त होने पर यह आनन्द होता है । यद्यपि दोनों आनन्दा म विरोध भी हो जाता है । कभी कभी अन्य आनन्दों की आशा से मोक्षानन्द बढ़ जाता है या मालम होता है परन्तु कभी महत्वानन्द-मान, प्रतिष्टा, यश आदि का की वन्धन-मुक्ति के बाद का भविष्य अन्धकार- आनन्द महत्त्वानन्द है । दूसरों से अपनी तुलना मय होने पर भी मोक्षानन्द होता है। बहुत से करने पर जो कभी संतोष होता है वह भी मह- त्त्वानंद है। इससे मनुष्य एक प्रकार के महत्त्व का की लम्बी कैद काटने के बाद इस चिन्ता में परेशान रहते हैं कि जेल से छूटने के बाद कहां अनुभव करता है | महत्त्वाकांक्षा एक प्रबल जायँगे? क्या करेंगे ? आदि, इस प्रकार उनका आकांक्षा है जो थोड़े बहुत रूप में सब में पडि जाती है। निराशा या दीनता के कारण कमी भविष्य अन्धकारमय होने पर भी वे जेल से छूटने सो जाती है, गम्भीरता के कारण कमी कभी बाहर की तारीख की बाट प्रसन्नता से देखा करते हैं प्रगट नहीं होती, मात्रासे अधिक महत्त्व मिल इसलिये अन्य आनन्द मिले या न मिलें पर मोक्षा- जाने से या मिलते रहने मे उसपर उपेक्षा अर्थात नन्द स्वतन्त्र आनन्द है। लापर्वाही पैदा हो जाती है अथवा संयम के गेंद्रानन्द-दूसरों को निरपराध दुःखी होते कारण भीतर भी वह मर्यादित रहती है या चातु- देख सुखी होना रौद्रानन्द है । शिकार का आनंद यके कारण मर्यादितरूप में प्रगट होती है। यह इसी तरह का आनन्द है। ईर्ष्यावश शत्रु को सब है पर वह किसी न किसी रूप में सब में निरपराध दुःखी देखकर जो आनन्द होता है वह रहती है--वह निर्बीज नहीं होती। उसकी पूर्ति भी रौद्रानन्द है । जानवरों को लड़ाना और एक से एक अनिर्वचनीय आनन्द मिलता है । बहुत के या दोनों के घायल होने या मर जाने पर .
३८ ] सत्यामृत , सुखी होना भी रौद्रानंद है। रोद्रानन्द को ३ उपाय-विचार पापानन्द भी कहा जा सकता है। पहिले जो ग्यारह प्रकार के दुःरव बताये गये शंका-समाज को सत्तानेवाला कोई आत- हैं वे कसे कैसे पैदा होत है? उनके कितने द्वार तायी मनुष्य या पशु हो उसको दंड दिया जाय है ? वे कैस बंद किये जा सकते हैं जिससे दुःख और दंड दे सकने पर संतोप हो तो इसे भी न आवे, यदि आजाँय तो हम क्या करें. उन्हें कैस रौद्रानन्द कहना होगा पर यह तो समाज के सुख- जीते ? अथवा क्या काई दुःख अनिवार्य या आव- वर्धन के लिये आवश्यक कार्य है इसे पापानन्द श्यक है ? यदि है तो कितने अंश में ? आदि कैसे कह सकते है ? बहुत सी बात उपाय-विचार के विषय है । इसी समाधान-निरपराधों को दुःखी देखकर प्रकार छः प्रकार के सुखा में कौन कौन सुख जो आनंद होता है वह रौद्रानंद है--सापराधों को कितने अंश में उपादेय है ? और हम उन्हें कैसे पा नहीं, पर मन में क्रूरतारूपी पाप हो तो साप- सकते है ? इन मब का पूरा विचार एक अन्याय राधो के विषय मे भी हमे रौद्रानंद होगा । जैसे में नहीं किया जा सकता । यहां तो दुःख-निराध किसी अपराधी को हंटर से मार पड़ रही है, हम और सुख-प्राति के बारे में कुछ बातें कहकर अकस्मात् देखने पहुँच गये, हमें इससे कोई मत- दृष्टि-दान ही करना है। लब नहीं कि इसने कोई अपराध किया या नहीं, तीन द्वार-दुःखों के तीन द्वार हैं--१ प्रकृति हमे तो उसकी तड़पन देखकर ही आनंद आ द्वार २ परात्म--द्वार ३ स्वात्मद्वार । कुछ तो रहा है तो ऐसी अवस्था में यह आनंद रौद्रानंद प्रकृति की रचना ही ऐसी है कि एक न एक ही कहलायगा। अगर हममें जानकारी जानकारी और दुःख प्राणी के पीछे पड़ा रहता है । यह शरीर समाजहित का ध्यान हो तो आततायी के पीड़न ही घृणित है, इसमें जन्दा ही रोग हो जाते है, से जो समाज की रक्षा हुई उससे मोक्षानंद भोगों से कमजोर हो जाता है, थोड़े समय बाद मिलेगा पर समाजहित या न्यायरक्षण की तरफ़ यो ही क्षीण होने लगता है और अन्त मे छूट हमारा ध्यान नहीं है तो सापराधी के दंड-दुःख जाता है । फिर प्रकृति हमारी दासी नही है । में भी हमें रौद्रानंद मिलेगा और इसे पापानन्द उसके कार्य नियमानुसार होते रहते है, भले ही ही कहना चाहिये। वे हमारे अनुकूल हों या प्रतिकूल, प्रकृति को इस की पर्वाह नहीं है । हम भले ही ठंडी हवा चाहे प्रश्न-क्रीड़ा, विनोद आदि मे जो आनन्द पर अगर लू चलना है तो हमारी पर्वाह किये आता है इसे विनोद नामका स्वतन्त्र आनन्द क्यो विना लू ही चलेगी। हमे पानी की जरूरत है न कहा जाय पर अगर पानी के साधन नहीं जुडे है तो पानी उत्तर-विनोद नाम का आनंद प्रेमानन्द नहीं बरसेगा । इस प्रकार हमारी जरूरतो और है । कभी इसके साथ महत्त्वानन्द, विषयानन्द इच्छाओ का प्रकृति से मेल नहीं बैठता । इस प्रकार जीवनानन्द आदि भी मिल जाते है पर अन्य प्रकृति द्वारा हमे बहुत दुःखी होना पड़ता है । सुखों से निरपेक्ष विनोद का आनन्द प्रेमानंद है। प्राणियों के परस्पर संघर्ष से भी बहुत से 4 मार्ग-दृष्टि [३९ - - दुःख होते हैं । प्राणियों की लालसा असीम है अमुक अंश में वह भी प्रकृति का एक छोटासा और प्राप्त सामग्री परिमित है। सब अपने अपने अंश है। उसकी शक्ति प्रकृति की शक्ति के लिये खींचातानी करते है इसलिये दुःख कई गुण आगे नगण्य ही है । एक जरासा भूकम्प पृथ्वी पर बढ़ जाते हैं । अकाल को हम प्राकृतिक दुःख जैसा तफान मचा देता है वैसा मनुष्य कभी कह सकते हैं पर देश में भरपूर अन्न होते हुए नहीं मचा सकता । जब प्रकृति के द्वारा ऐसा भी जव आदमियों को भूखों मरना पड़ता है तब कोई प्रचंड आक्रमण होता है तब सहिष्णुता और यह परामद्वारी दुःख हो जाता है । चोरी चपाटी दूर भागने के सिवाय उस दुःख पर विजय पाने व्यभिचार, हिंसा, छल-कपट आदि के दुःख पराम का कोई उपाय नहीं रहता । फिर भी यथाशक्य द्वारी दुःख हैं। प्राकृतिक आक्रमणों से बचने के लिये प्रयत्न स्वात्मद्वार से आनेवाले दुःख है--इप्या, क्रोध करना चाहिये | मनुप्यने जो घर, वस्त्र आदि आदि । अज्ञान और असंयम से पैदा होनेवाली हजारों आविष्कार किये हैं उनसे मानव-जाति के हमारी मनोवृत्तियाँ दुःख का पर्याप्त कारण न बहुत दुःग्व कम हुए हैं। होने पर भी हमें दुःखी कर देती है । प्रश्न-प्राकृतिक जीवन में जो शान्ति और इस प्रकार तीन द्वारों से आनेवाले दुःग्वों आनन्द है वह आविष्कार-पूर्ण कृत्रिम जीवन में को दूर करने और सुग्व प्राप्त करने के पहिले कहाँ है कहाँ है ? सहिष्णुता ही सब दुःखों की दवाई यह भी समझ लेना आवश्यक है कि न तो सभी है | आदर्श जीवन बिलकुल नग्न और अमंग्रह- दुःख ग्वराव हैं न सभी मुग्छ अच्छे । किसी किसी शील होगा। का अच्छा वुरापन सदा के लिये या स्वाभाविक है उत्तर-अतिवाद से सदा बचना चाहिये । और किसी किसी का कभी कभी के लिये | जैसे आविष्कारों के द्वारा मनुष्य को बिलकुल निकम्मा सहवेदन-दुःख अच्छा है और है और और आलसी बनादेना जैसा बुरा है वैसा ही बुरा रौद्रानंद, सुख स्वाभावतः खराब । विषयानन्द . सहिष्णुता के द्वारा अपने रक्षण में असमर्थ वना देना और महत्वानंद में मात्रा से अधिक होने का बहुत है । सहिष्णुता की भी सीमा है और आविष्कार डर है इसलिये इनके विषय में सदा सतर्क रहना आदि के द्वारा रक्षण की भी सीमा । हमें आवि- चाहिये, ये पीछे बहुत दुःख देते हैं । दुःख सुख कारों का इतना गुलाम न बन जाना चाहिये कि के विषय में नीति यह है कि जो दुःख विश्व-सुख पद पद पर पराधीनता का कष्ट सहना पड़े और के लिये आवश्यक हो वह सहना चाहिये उनके लिये जीवन में इतना संघर्ष हो कि विश्व और जो सुख विश्वसुख में बाधक हो वह मे मुख की अपेक्षा दुःख बढ़ जाय । इधर सहि- छोड़ना चाहिये। प्णुता के ऊपर ही सारा बोझ न डालना जो दुःख दूर करने योग्य हैं उन्हें कैसे दूर करना चाहिये । अनिवार्य दुःखों को वीरता से सहजाना चाहिये इस विचार में पहिले प्राकृतिक दुःखों का अच्छा और आवश्यक हैं पर निरर्थक दुःखों को विचार आवश्यक है । प्रकृति की शक्ति असीम वुलाना अच्छा नहीं । हां, सहिष्णुता का व्यायाम है । मनुष्य कैसा भी महान प्राणी हो पर आखिर किया जा सकता है जैसा कि म. महावीर आदि स्वभावतः - ।
४०] सत्यामृत ने साधकावस्था मे किया था। यह कर्तव्य नहीं नहीं है किन्तु प्रकृति का ऐमा और इतना है । शान्ति और आनन्द न तो सर्वथा प्राकृतिक उपयोग करना है जिससे प्रकृति कुपित होकर जीवन में है न सर्वथा कृत्रिम जीवन में, दोनों के सुख की अपेक्षा अधिक दुःख न दे डाले। समन्वय में है । जब हम किसी एक जीवन से बच्चा माँ का दूध पिय यहां तक माँ को प्रसन्नता ऊब जाते हैं तब थोड़ी देर के लिये मिलनेवाला है पर वह दौती से स्तन काटने लंग तो माँ दुध दूसरा जीवन शान्ति और आनन्दमय मालूम होता न पिलायगी और तमाचा नक जड़ देगी। इसी है। घर में रहते रहते जब हम ऊब जाते हैं तब प्रकार प्रकृति का जो अत्युपयोग करते हैं, दूध के नगर के बाहर मैदान या जङ्गल में आनन्द आने साथ उसका रक्त भी चसलेना चाहते हैं उनका लगता है पर कड़ी धूप या घोर वर्षी मे मैदान में अप्राकृतिक जीवन दुःखद है, पर मर्यादा में रहना पड़े तो टहलने का सारा आनन्द भूल जाय । रहकर विश्वहित के अनुकूल प्राकृतिक शक्तियों भोजन मे चटनी की आवश्यकता है पर चटनी का अधिक से अधिक उपयोग करना अप्राकृतिक से ही पेट नहीं भरता उसी तरह कभी कभी नही है । थोड़े समय के लिये अतिवाद भी सुन्दर और प्रश्न- आप प्राकृतिक दुःखा से बचने स्वादिष्ट मालूम होने लगता है पर वह का उपाय भाग जाना भी बताते हैं। पर यह तो स्थायीरूप में वैसा ही मालूम नहीं हो सकता। कायरता है । कायरता कल्याण का उपाय नहीं इसलिये प्राकृतिक जीवन का अतिवाद और कृत्रिम हो सकती। जीवन का अतिवाद दोनों ही छोड़ना चाहिये । उत्तर- रास्ते में अगर पहाड आ जाय तो प्रश्न-प्रकृति हमारी माता है हम उसके उससे सिर फोड़ लेना बहादुरी नहीं है । बहादुरी है, अंग या अंश हैं इसलिये अगर उसी पर अवल उसके ऊपर से या दायबायें से पार हो जाना। आग ग्बित रहे तो क्या बुराई है ? लग गई तो उसे वुझा डालना या विना घबराये उससे उत्तर- इस तरह हम प्रकृति के कार्य मे बच निकलना बहादुरी है न कि उसमें जल मरना। अडंगा ही लगायँगे । जो बच्चा भूख लगने पर हाँ, किसी महान कर्तव्य के लिये पहाड़ से टकरा रोता न हो, स्तनों मे से दूध न चूसता हो, मुँह कर मरना पड़े, अग्नि मे जलना पड़े तो यह भी मे डालने पर पेट के भीतर न खींच ले जाता हो बहादुरी है पर जलने के लिये जलना बहादुरी वह माता के कार्य में अडंगा लगाकर आत्महानि नहीं है । बहादुरी विश्व-सुख-वर्धन में है । मूढ़ता- ही करता है उसी प्रकार प्राकृतिक शक्तियो का पूर्ण हठमें नहीं । कर्तव्य-मार्ग से भागने का सद्बुद्धि द्वारा उपयोग न करनेवाले प्राणी भी नाम कायरता है पर मार्ग में आये हुए प्रकृति के कार्य में बाधा डालकर अपनी हानि से बचने का नाम कायरता नहीं है । दुःखो करते है । प्रकृति शक्तियों का भंडार है पर उन से बचने के लिये हमे यही नीति रखना चाहिये । शक्तियो का उपयोग करने के लिये हमें कुछ न कुछ इस प्रकार प्राकृतिक दुःखों पर विजय पाने के प्रयत्न करना ही होगा। प्राकृतिक जीवन का तीन उपाय है । सहिष्णुता, रोध और चिकित्सा । मतलब पशु के समान बुद्धि-शून्य जीवन बनाना परात्मद्वार से आनेवाले दुःखोपर विजय पाने काँटों - मार्ग-दृष्टि L . के लिये निम्न लिखित गुणों या कार्यों की आत्र ३ चिकित्सा-रोध में तो चोट होने ही श्यकता है । १ महिष्णुता २ रोष ३ चिकित्सा नहीं पाती पर जब चोट हो जाती है तब उमे ४ प्रेम ५ दंड ! दूर करना या कम करना चिकित्सा है। जैसे १ सहिष्णुता-सहिष्णुता से दुःखों पर चोरी का माल ढूंढ़ निकालना चिकित्सा है। और भी जितनी तरह की क्षतिपूर्ति है वह विजयं मिलती है और कभी कमी दुःख दूर भी चिकित्मा है। हो जाते हैं । जब पीडक प्राणी देखता है कि इस ये तीन उपाय तो प्राकृतिक और परान्मकृत पर अत्याचार का प्रभाव नहीं पड़ता तब वह हट जाता है । वह हंटे या न हटे पर दुःख पर दुःखों मे बराबर हैं पर प्रेम और दंड ये दो विजय तो मिलती है। उपाय प्राकृतिक दुःखों में उपयोगी नहीं है। ये पगत्मकृत दुःखों के विजय में ही उपयोगी हैं । प्रश्न-सहिष्णुता का क्या अर्थ है ? कोड ? प्रेम-दृसर प्राणियों के द्वारा हमें जो प्राणी दुःख नहीं चाहता और जब जिसके सिर पर जो दुःख आ जाता है तब वह उसे सहना दुःख महना पड़ते हैं इसमे उनका स्वार्थ और अहंकार कारण होता है । प्रेम के द्वारा उनकी ये ही पड़ता है ? इस प्रकार प्रत्येक प्राणी सहिष्णु ही है फिर सहिष्णुता की अलग दोनों प्रवृत्तियों दूर हो जाती है। प्रेम अहंकार आवश्यकता बताने से क्या लाभ ? को धो डालता है, शत्रुता का भ्रम दूर कर देता है, स्वार्थ-भेद की वासना को कम कर देता है । उत्तर-किसी न किसी तरह दुःख भोग प्रेम के बिना बात बात मे संशय, खेद, , अपमान लेने का नाम सहिष्णुता नहीं है । किन्तु विच- आदि मालूम होने लगता है और प्रेम होने पर लित हुए विना सहलेने का नाम सहिष्णुता है। बुराई उपेक्षणीय हो जाती है और बात बात में दीन वन कर रो रो कर मोगा जाता और भलाई दिवाई देने लगती है। मनुष्यों की तो वीर बनकर हँस हँस कर महा जाता है। दुःख वात ही क्या है हमारी प्रेम-मुद्रा या अन्य व्यव- में जो जितना धीर-अविचलित और अविकृत है हार म जब पशुओं को प्रेम का पता लग जाता वह उतना ही सहिष्णु है । है तब व भी मित्र बन जाते है । प्राणि-समाज २ रोध-आघात आदि को रोक रखना के कल्याण के लिये यह सर्वश्रेष्ठ औषध है । राध है, जैसे छत्त से हम वर्षा की बूंदों को हमें दूसरों के दिल को प्रेम से ( भक्ति, वात्सल्य रोकते है, दाल से तलवार की चोटों को रोकते मेवा उपकार दान क्षमा सहानुभूति आदि सब हैं, उसी प्रकार शत्रु की चोट अपने पर न हान प्रेम के ही रूप या कार्य हैं.) जीतना चाहिये । देना रोध है । किसीने फँसाने के लिये जाल इससे पर-प्राणिकृत दुःख बहुभाग मे दूर हो बनाया पर हम न फंसे, या और किसी तरह जाँयेंगे । जो विश्वप्रेमी है उसके शत्रु अपेक्षाकृत से आक्रमण किया पर अपने को बचा लिया यह कम होंगे और जो होंगे उनकी चोटो के सहने गेव है । चारी से बचने के लिये मकान बनाना, में उसकी सहिष्णुता वहुत बढ़ जायगी । ताले लगाना, पहरेदार गवना आदि सब रोध है | , प्रश्न-विश्वप्रेम की क्या जरूरत है ? हम राष्ट्र- . 2 ४२ ] सत्यामृत प्रेमी या अधिक से अधिक मनुष्य-प्रेमी बने तो शरीर या वचन की चीज नहीं है, वह मनकी यही बहुत है और यही सम्भव है । कीट पतंग चीज है इसलिये अवसर पर मीठा बोल देन से तथा अन्य क्षुद्र प्राणियों से हम प्रेम कहां तक या कुछ शारीरिक शिष्टाचार प्रगट कर देने संप्रेम कर सकते हैं ? जिनसे हमे मतलब है उन्हीं से नहीं आ जाता । मनकी चीन मन में हो तभी हमें प्रेम करना चाहिये। सफल है । प्रेम को स्वाभाविक हो जाना चाहिये। कृत्रिम प्रेम अपनी कृत्रिमता दिग्बटा ही देता है उत्तर-राष्ट्र या ऐसे ही किसी क्षेत्र में प्रेम और उनसे प्रतिक्रिया हाती है, वैर पहिले को सीमित करने से अमुक समय के लिये अमुक की अपेक्षा बढ़ जाता है । अंश में लाभ हो सकता है परन्तु अन्त में इस का परिणाम भयंकर होता है । एक राष्ट्र दृसंग प्रेम जब स्वभाव बन जाता है तब राष्ट्र पर अत्याचार करने लगता है और इससे उसकी सीमा नहीं रहती, वह सूर्य के प्रकाश ऐसी अशान्ति और दुःख होता है कि उसके की तरह चारो ओर फैलता है। यह बात दुसरी चक्कर में सभी राष्ट्र पिसने लगते है। इसलिये है कि जिस पढार्थ में जैसी योग्यता होती है वह समान -कोटिके प्राणी में प्रेम की ऐसी सीमा न पदार्थ उम प्रकाश से उतना ही चमकता है । होना चाहिये । हां अन्याय के प्रतीकार के लिये पर वह प्रकाश किसी पदार्थ पर उपेक्षा नहीं अमुक समूह का पक्ष लेना पड़े तो इसमे बुराई करता । स्वाभाविक प्रेम भी इसी तरह सब के नहीं है क्यों कि ऐसा पक्ष-ग्रहण मनुष्यता या सुख-वर्धन का ग्वयाल रखता है । विश्वप्रेम के अनुकूल ही है । मनुष्य-मात्र मे प्रेम स्वाभाविक प्रेम या विश्व-प्रेम में एक बड़ा को सीमित करना भी ठीक नहीं है क्योंकि मनुष्य लाभ यह है कि हम अपने को सदा सर्वत्र सुर- से भिन्न प्राणियो में भी मनुष्य के बराबर क्षित और सहाययुक्त समझते है । हर एक प्राणी न सही पर काफी चैतन्य (सुख-दुःख ) रहता को इसी जीवन में या नाना जीवनों में अनेक है। बल्कि बहुत से प्राणियो मे समझदारी, जान अच्छी धुरी परिस्थिनियो में से गुजरना पड़ता है । पहिचान, प्रेम, कृतज्ञता आदि गुण पाये जाते हैं अगर प्राणियो मे म्वाभाविक प्रेम हो तो एक परि- तरह से सामाजिकता बतात स्थिति मे वह दूसरो का प्रम पा सकेगा इसलिये है । यद्यपि चैतन्य की न्यूनाधिकता से अधिक यह विश्व-प्रेम का अद्वैत ही प्राणिममाज के कल्याण रक्षा या अल्प-रक्षा का विचार करना पड़ता है, के लिये--सुखवर्धन के लिये सर्वोत्तम औषध है । अधिक चैतन्यवाले की रक्षा पहिले करना पड़ती ५ दंड----कल्याण-विरोधी मनोवृत्तियों या है फिर भी जिसमें जितनी मात्रा है उसके अनुसार उनके कार्यों को बलपूर्वक हटाना दंड है । जिन खयाल रखना आवश्यक है । छोटे प्राणी का कम प्राणियों पर प्रेम का उचित प्रभाव नहीं पड़ता विचार भले ही करो पर विचार अवश्य करो उन्हे दंड देकर व्यवस्थित करना पडता है । उसे भुलाओ नही । इस प्रकार विश्व-प्रेम की समाज-व्यवस्था के मूल सीमा में सब प्राणी आ जाते है । में दो बातें है---एक संयम दूसरा भय । संयम प्रेम का अनुशासन मानता है यह बात ध्यान में रखना चाहिये कि प्रेम और भय दंड का । प्रायः प्रत्येक समझदार प्राणी -- जोकि एक मार्ग-दृष्टि [ ४३ में न्यूनाधिक रूपमें ये दोनों वृत्तियाँ रहती हैं। उत्तर-अवश्य ही उनपर दया करना चाहिये। जो उत्तम. श्रेणी के प्राणी हैं उनमें संयम इतना किस परिस्थिति में उसने अपराध किया ? क्या वह रहता है कि उसके आगे भय दब जाता है । जो दूर की जा सकती है ? उस पर प्रेम का क्या प्रभाव अधम श्रेणी के प्राणी हैं. वे भय की ही पर्वाह पड़ सकता है ? आदि बातों का विचार करके करत हैं। भय के आगे संयम दव जाता है। मध्यम जितनी दया की जाय उतनी अच्छी है पर व्यक्ति श्रेणी में दोनों पर्याप्त मात्रा में रहते हैं। उत्तम की दया मे समष्टि की दया न भूल जाना चाहिये। श्रेणी के लिये दंड की आवश्यकता नहीं होती। रावण को बीमार कहकर दया करने की उदारता मध्यम श्रेणी के लिये दंड-शक्ति की सत्ता दिखाते समय सीताओं के ऊपर दया करना न या प्रदर्शन ही काफी है पर अधम श्रेणी के लिये भूल जाना चाहिये । माना कि शैतान के भीतर दंड का प्रयोग आवश्यक है , पर यह कह सकना भी हृदय है और वह भी पिघल सकता है पर कठिन है कि कौन प्राणी कब किस श्रेणी में रहेगा? उसके पिघलने की आशा में जीवनभर उसका आततायीपन नहीं सहा जा सकता । पागल कुत्ता साधारणतः उत्तम श्रेणी के मालूम होनेवाले प्राणी परीक्षा के अवसर पर अधम श्रेणी के निकल जब दूसरो को काटता है और उसके काटने से पड़ते हैं इसलिये व्यवस्था के लिंय दंड का रहना मनुष्य मर जाता है तो इसमें उस बेचारे कुत्ते का कोई अपराध नहीं, वह तो बीमार है पर अल्यावश्यक है। इसीलिये उसे पुचकारने की मूर्खता उचित नही प्रश्न-दंड-नीति पशुता का चिह्न हैं है । वह काटने आवे तो उसे मार भगाना या उसका समर्थन करना पशुता का समर्थन करना है। मार डालना ही उचित है । वृक्ष के लिये यदि उत्तर-~निःसन्देह दंड-नीति पशुता का पानी आवश्यक है तो ताप भी आवश्यक है। विश्व- चिह्न है पर चिह्न को नष्ट कर देने से पशुता कल्याण के लिये प्रेम-जल के साथ दंड-ताप भी न चली जायगी । बैल का सींग तोड़ देने स अवश्य चाहिये। बैल आदमी नहीं बन जाता । जब तक हमम प्रश्न-दंड सुधार के लिये होना चाहिये पर पशुता है तब तक तदनुरूप दंड-नीति का होना जब किसी मनुष्य को मृत्युदंड दे दिया जाय तो भी आवश्यक है। हाँ, उसका प्रयोग सँभलकर उनका सुधार क्या होगा ? करना चाहिये और न्याय की हत्या न होने देना उत्तर-मृत्युदंड का भय आजतक उस चाहिये । साथ ही यह भी देख लेना चाहिये कि उतने बड़े अपराध से रोके रहा और दूसरे यहाँ प्रेम-नीति से काम चल सकता है या नहीं? सैंकड़ो हजारों आदमियों को रोके हुए है यही जब पशुता चली जायगी तब दंड-नीति विधान समाज-सुधारमें उसकी उपयोगिता है। कभी कभी रूपमें रहने पर भी निरुपयोगी हो जायगी । ऐसे अवसर आते है जब शरीर के अमुक भाग प्रश्न-अपराध मी एक तरह की मानसिक को [ मवाद आदि को ] शरीर से बाहर निकाल बीमारी है और वीमार आदमी. दया का पात्र है कर फेंक देना पड़ता है उसी प्रकार समाज स दंड का नहीं। भी बड़े बड़े आततायियों को फेंक देना पड़ता ४४ ] सत्यामृत PAN है। स्त्रियों के ऊपर बलात्कार करके उनके प्राण कि इसके साथ कही मोहान्धता न आ जाय । लेने वाले, मतभेद के कारण साधु पुरुषो का खून मोहान्ध व्यक्ति विवेक-भ्रष्ट होकर कल्याण-मार्ग करनेवाले, अपनी ऐयाशी के लिये दूसरों का घर से विचलित हो जाता है इसमें वह स्वयं दुःख या देश लूटने मे बाधक होने से प्राण लेनेवाले उठाता है और दलरों को भी दुख देने लगता मृत्युदण्ड के पात्र है चाहे वे डाकू कहलात हो है । इसलिये ग्रेमानन्द में मोहान्धता से बचे रहने गुंडा कहलाते हों या राजा कहलाने हो । का सुदा प्रयत्न होते रहना चाहिये । पर किसी भी तरह का दंड क्यो न हो जीवनानन्द भी निदोष और उपादेय है हमारे मनमे समाजरक्षा या न्यायरक्षा का ध्यान परन्तु इसमे इस बात का ख्याल रखना चाहिये रहना चाहिये । अपराधी से द्वेप न हो तो सिर्फ कि यह अन्याय्य न हो जाय, अपने जीवनानन्द अपराध को नष्ट करने मे अगर अपराधी नष्ट के लिये दृमरा के उचिन जीवनानन्द का नाम न हो रहा है तो इसे अपनी विवशता समझना हो जाय । स्वास्थ्य का भी ख्याल रखना चाहिये चाहिये । अगर प्रेम-नीति से काम चल सकता जीवनानंद यदि स्वारथ्य-नाशक हो जाय तो वह हो तो ई-नीति का उपयोग न करना चाहिये । जीवनानंद ही न रहेगा। विषयानंद निदोष हो सकता है पर बहुत स्वात्मद्वार से आने वाले दुःखो को दूर करने के लिये कर्मयोगी मनोवृत्ति सर्वोत्तम उपाय जल्दी विकृत या सढोप होने की पूरी सम्भावना है । साधु-जीवन व्यतीत करना अर्थात् दूसरो से है । इसके लिये विषयानंद में तीन बानो का कम से कम से लेकर अधिक से अधिक देने की अवश्य खयाल रखना चाहिये । १ निव्यमनता इच्छा करना और जीवन को एक नाटक समझ २ परिमितता ३ न्याय्यता । कर भीतर से निर्लिप्त रहना, इन दो बातो से विषय का आनन्द लो पर उसे व्यसन या कर्मयोगी जीवन बन जाता है और सब कर्तव्य आदत मत बनाओ कि उसके बिना जी तड़पता करते हुए भी क्रोध अहंकार छल लोभ ईर्ष्या रहे । इरासे बेचैनी तो होती ही है साथ ही आलस्य आदि दुवृत्तियाँ जोर नहीं पकड़ने पाती । मात्रा भी नहीं रहती, न्याय-अन्याय का विचार इस विषय का विशेष वर्णन जीबन-दृष्टि भी नहीं रहता इसलिय नियसनता आवश्यक है । अध्याय मे किया जायगा । विषय मात्रा से अधिक होने पर शक्ति क्षीण इस प्रकार तीन द्वारों से आनेवाले सब करने लगते है और न्याय-अन्याय का विचार प्रकार के दुःख दूर हो जाते है । रही सुखोपार्जन भी नष्ट कर देते है इसलिये परिमितता आवश्यक है। की वात, सो पहिले जो छः प्रकार के आनन्द विषय-सेवन इस प्रकार मत करो कि उससे बतलाये गये है उनमे से रौद्रानन्द का तो सदा दूसरों के साथ अन्याय होने लगे नही तो विश्व- त्याग ही करना चाहिये । प्रेमानन्द सदा हित- सुख-वर्धन मे बाधा पड़ेगी तथा अन्त में अन्याय कारी है । परमपुरुषार्थ मोक्ष भी इस आनन्द में है। का फल अपने को भी भोगना पड़ेगा। इसलिये फिर भी इसमे एक बात का ग्वयाल रखना चाहिये न्याय्यता आवश्यक है।
[ ४५ है मार्ग-दृष्टि - , सेवा । महत्त्वानन्द की आकांक्षा हरएक को होती का महत्त्व है । अथवा मैं महाराष्ट्री, बंगाली, है । पर यह याद रखना चाहिये कि महत्त्व गुजराती, पंजाबी आदि हूं या में अंग्रेज अमेरिकन अन्याय्य विश्व-दुःख-वर्धक . या सुख-नाशक जापानी या भारतीय हूं.आदि प्रान्त या राष्ट्र का न हो । सभी तरह के महत्त्व समग्र उपादेय नहीं महत्त्व भी कुल का महत्त्व है । यह महत्त्व अच्छा हैं । विषय भेद से महत्त्व चौदह हैं। १-अधि- महत्त्व नहीं है इसका उपयोग न करना चाहिये । कार, २ विभव, ३ संघ, ४ कुल, ५. यश, अगर कभी करना हो तो बुराई से बचने के लिये ६ तप, ७ कला, ८ शक्ति, ९ ज्ञान, १० सौंदर्य ही करना चाहिये । 'मैं अमुक का बेटा हूं, अमुक ११ असाधारणता, १२ दान, १३ त्याग, १४ प्रान्त या राष्ट्र का हूं फिर क्यों ऐसा पतित काम करूँ इस प्रकार पाप से बचने के लिये इसका उप- १-अधिकार, समाज के द्वारा दी हुई या योग उचित है पर अहंकार आदि के लिये कुल स्वीकृत की हुई निग्रह-अनुग्रह शक्ति है । इस का महत्त्व न बताना चाहिये । की प्राप्ति सेवाके लिये करना चाहिये, अहंकार ५--लोगों के हृदय मे अपने विषय में जो के लिये नहीं, और उसका उपयोग मुव्यवस्था क आदरभाव है वह यश है। यश का आनन्द ( लिये करना चाहिये अपना अधिकारीपन बताने बुरा नहीं है पर यश-प्राप्ति की कला और उस के लिये नहीं। के लिये आवश्यक संयम कठिन है। मलिन और २-जीवन के लिये उपयोगी अपन अधि- क्षणिक यश--चार दिन की वाहवाही--की बात कार की सामग्री का नाम विभव है । इसका दृसरी है पर निर्मल और स्थायी यश इन चार अतिसंग्रह न करना चाहिये । विभव का महत्त्व वातों पर निर्भर है । [१] असाधारण योग्यता जगत में जितना कम होगा, सुख शान्ति उतनी [२] उसका समाज-हित में उपयोग ३] ही अधिक होगी। उस उपयोग के लिये किया गया त्याग [४] ३--अपने समर्थक सहायक या समूह यशो -लाभ की गौणता । यश मार. के समान है का नाम संघ है । मेरे इतने अनुयायी हैं इतने जो बंदर की तरह गले में रस्सी बाँध कर नचाया मित्र रिश्तेदार या कुटुंबी हैं, अमुक राजा, नेता, नहीं जा सकता। वह वर्षा देखकर आप ही तांडव पदाधिकारी, श्रीमान या विद्वान से मेरी दोस्ती या करता है । जो लोग यश के लिये ही कोई काम परिचय है, मेरे इतने नौकर हैं आदि सब संघ करते है उन्हें सच्चा यश नहीं मिल सकता । इस का महत्त्व है । साधारणतः इस महत्त्व का आनंद लिये यश को गोण रखना आवश्यक है । अपन कुछ बुरा नहीं हैं सिर्फ इसके दुरुपयोग से बचना नाम का प्रदर्शन कभी इस तरह न होना चाहिये जिससे यह मालूम हो कि यह प्रदर्शन के लिये ४--जन्म से सन्बन्ध रखने वाले परिवार का अर्थात् यश के लिये हो रहा है। इस बात का नाम कुल है । मैं अमुक कुटुम्ब में पैदा हुआ हूं, सदा खयाल रहे कि हमारा काम सेवा या समाज- मेरे वाप माँ मामा चाचा आदि इतने महान हैं, सुख के लिये हो । उस की ओट में अगर नाम का मेरी जाति मेरा गोत्र इतना महान है आदि कुल प्रदर्शन हो जाय तो भले ही हो जाय । आत्म चाहिये।
४६ ] सत्यामृत AIIRAL IN AHA .. श्लाघा न होने पाये । इस विषय का शिष्टाचार भी की गन्ध, स्पर्श आदि की आकर्षकता भी यहां कुछ होता है उसका भी ख़याल रखना चाहिये । लेना चाहिये । इसका वमंड भी न करना चाहिये। ६-स्वपर-कल्याण के लिये विशेष साधना यह विद्या बुद्धि, आदि से कम स्थायी है । इससे का नाम तप है । तपसे भी महत्व बढ़ता है और विषयानन्द की मात्रा में भी अतिरूप होने की उससे आनन्द मिलता है। यह आदर सत्कार सम्भावना है इसलिये सतर्क रहना चाहिये । हां, आदि के ध्येय से न होना चाहिये । विश्वकल्याण विनय और संयम का ख्याल रखते हुए इसका के ध्येय से होना चाहिये । आनन्द बुरा नहीं है । स्वच्छता, सौन्दर्य की सहा- ७-मन और इन्द्रियों के विषयों को आक- यक या अंग है उस अपनाना चाहिये । पक ढंग से बनाना कला है, थोड़े खर्च मे अधिक ११ आवश्यकता, अनावश्यकता रचित अनु- आकर्षकता लाना इस की कसौटी है । कलाके चित का विचार न करते हुए किसी भी तरह द्वारा अच्छी अच्छी कल्याणकर चीजें लोगो के की अद्भुतता का नाम असाधारणता है। विद्या पास पहुंचाई जा सकती है । इस प्रकार यह बुद्धि, सौन्दर्य आदि का महत्व उनकी उपयोगिता जन-सेवा में बहुत उपयोगी हो सकती है । पर के पीछे है पर इस असाधारणता मे उपयोगिता विषयानन्द को मात्राधिक करने मे इस का बहुत का विचार ही नहीं है । किसी ने अपने नाखून उपयोग होता है इससे बचना और बचाना खूब बढ़ा लिये, किसी ने अपनी मूंछे ग्वब बहाली, चाहिये । अपनी कला का उपयोग विषयान्धता कोई ऊँचाई में असाधारण है, कोई निचाई मे इन बढ़ाने के लिये कभी न करना चाहिये । इस सब असाधारणताओं में लोग महत्त्व का अनुभव संयम के साथ कलावान होने का महत्त्व मिले तो करके प्रसन्न होते हैं । एक तरह से यह व्यर्थ है। उसका आनन्द लेना चाहिये। सिर के बाल लम्बे होने से सौन्दर्य बढ़ता ८--जिस योग्यता के द्वारा हम इच्छानु- हो, शरीर लम्बा होने से शक्ति बढ़ती हो तो यह सार विशेष परिवर्तन कर सकें या परिवर्तन को असाधारणता का महत्त्व न कहलायगा, सौन्दर्य रोक सकें वह शक्ति है। शक्ति शरीर की भी और शक्ति का महत्त्व कहलायगा । असाधारणता होती है मन की भी होती है और वचन की भी तो सिर्फ वहीं समझना चाहिये जहाँ अन्य किस होती है । इसका महत्त्व भी अच्छा है पर उस दृष्टि से उपयोगिता न हो उससे सिर्फ अद्भुत की सच्ची कसौटी अच्छा बुरा उपयोग है । ही प्रगट होती हो। ९ शास्त्र, विचार, या अनुभव से पाये हुए ज्ञान का नाम विद्या है और समझने या विचार १२ परोपकार के लिये अपने प्राप्त विभव के करने की शक्ति का नाम बुद्धि है, ये दोनों ही खर्च करना या देना दान है । ज्ञान हैं । इनका महत्त्व बुरा नही है । हां, मद १३-स्वपर-कल्याण के लिये प्राप्त या अपार न होना चाहिये। विभव और सुविधाओं का छोड़ना त्याग है । १० शरीर की आकर्षक रचना का नाम दान की अपेक्षा त्याग व्यापक और श्रेष्ठ है सौंदर्य है । सौन्दर्य यहां उपलक्षण है । शरीर दान भी एक तरह का त्याग ही है फिर भी दोने मार्ग-दृष्टि [४७ में मात्रा का अन्तर है । (१) दान में अपनी उपर्युक्त सूचनाओं के अनुसार ही महत्त्वानन्द लेना आवश्यक सुविधाएँ बहुत अंशों में सुरक्षित रहती चाहिये । हैं और त्याग में आवश्यक सुविधाएँ बहुत अंशों मोक्षानन्द एक श्रेष्ठ आनन्द है। इसका में छोड़ना पड़ती हैं । (२) दानी के लिये अर्थो- श्रेष्ठ रूप है-दुर्व्यसनों, कुरूढ़ियों और दुर्वासनाओं से पार्जन के द्वार बहुत अंशों में खुले रहते हैं छूट जाना । परन्तु और भी अनेक तरह की पर- जब कि त्यागी के अर्थोपार्जन के द्वार बहुत तन्त्रताएँ जीवन में सिर पर पड़ जाती हैं उनके अंशों में बन्द हो जाते हैं । (३) दानी संग्रह- जालको तोड़ने का सदा उद्योग करना चाहिये । शील भी हो सकता है और अति-संग्रह भी कर पर कुछ बन्धन ऐसे भी होते हैं जो स्त्रपर-कल्याण सकता है पर त्यागी अति-संग्रह नहीं कर सकता के लिये आवश्यक हैं । जैसे-नौति, भक्ति और और संग्रह--शीलता उसकी आवश्यक और प्रेम का बन्धन । ये बन्धन जीवन के सौन्दर्य सीमित रहती है । इन कारणों से दानी से त्यागी और स्वास्थ्य के लिये आवश्यक हैं। भिन्न और श्रेष्ठ हैं। इस प्रकार दुःख दूर करने और सुख पाने १४ परोपकार के लिये अपनी योग्यता का के मार्ग पर दृष्टि डालकर आगे बढ़ना चाहिये । उपयोग करना मेवा है । दुःख दूर करने और सुख पाने का मार्ग बताने इन तीनों बातों का महत्वानन्द अधिक से के लिये तो यह सारा ग्रंथ ही है। इस अध्याय में अधिक प्राप्त करना चाहिये । इनमें से बहुत सी तो मार्ग पर दृष्टि डालने के लिये सुख-दुःख के बातों का विशेष विवेचन तो आगे किया जायगा। विषय में विविध विचार किया गया है । इस मार्ग- यहाँ इतनी बात कहना आवश्यक है कि अहंकार दृष्टि से सुखी होने के कार्य का विचार करने में किसी भी महत्व का न करना चाहिये । और काफी मदद मिलेगी।
४८ ] सत्यामृत ------ lds दृष्टिकांड, चौथा अध्याय ( योगदृष्टि ) (चार योग) - m योग का अर्थ है समाधि या तल्लीनता । सकती है परन्तु जिस में जिस बात की मुख्यता दृष्टि-प्राप्त मनुष्य मार्ग देखकर उस मे तल्लीन हो है उस का योग उसी नाम से पुकारा जाता है । जाता है अर्थात् उस में वह एक तरह से सारी भक्त मनुष्य दुनिया के झगड़ों से निवृत्त होकर शक्ति लगा देता है । कल्याण के मार्ग में इस प्रकार संन्यासी भी हो सकता है, विद्या-व्यसनी भी हो तल्लीन हो जाने का नाम है योग। मकता है और अपने जीवन के दायित्व को पूरा ऐसा योगी अपने विषय में ऐहिक फलाफल करने वाला भी हो सकता है, परन्तु यदि उसके जीवन में प्रधानता भक्ति की हो तो वह भक्ति-योगी या सुखदुःख की विशेष चिन्ता नहीं करता। कहलायगा ! इसी प्रकार अन्य योगियों की भी उसका जीवन मोक्ष-सुख-प्रधान होता जाता है । बात है । योग कोई भी हो उसके दो कार्य काम-सुख गौण हो जाता है । मुख्य है, निष्पाप जीवन और कष्ट-माहिष्णुता । निष्पाप योग दो तरह का है-ध्यान-योग और जीवन मे दुःग्वा की उत्पत्ति रुक जाती है और कर्मयोग । जिस योग में समाज का संघर्ष कम कष्टसहिष्णुता मे दुःख असर नहीं कर पाते । इन हो, जीवन मे एक तरह की एकान्तता आ जाय, दोनों बातो से कल्याण के साथ मनुष्य का संबंध समाज-सेवा गौण हो और निष्पाप आत्म-संतोप अथवा योग हो जाता है । मुख्य हो इस प्रकार कर्महीन एकाग्रता का भक्ति योग नाम ध्यान-योग है । जिस मे समाज-सेवा मुख्य हो ऐसी निष्पाप क्रिया-शीलता का जिस का अर्थ नाम कर्मयोग है । जनता के लिये आदर्श तो है सेवा करना । पर चिरकाल से भक्ति शब्द कर्मयोग है परन्तु परिस्थिति विशेष मे व्यक्ति-विशेष अपने मूल अर्थ से कुछ संकुचित हो गया है। को ध्यान योग की आवश्यकता हो सकती है । अब तो इस का अर्थ रह गया है अपने से महान ऐसे समय में ध्यान-योग भी उचित है। की पूजा प्रार्थना सेवा आदि । किसी आदर्श या आदर्श व्यक्ति की शरण ले लेने से प्राणी अपने दुःख-हानि और सुख प्राप्ति के लिये मनुष्य को सुरक्षित समझने लगता | अनाथता से घब- उक्त चार चीज़ों में से किसी एक का मुख्य रूप राये हुए प्राणी को सनाथता का अनुभव होता सहारा लेता है। चारो मे कोई परस्पर विरोध है । इसलिये जो जो कष्ट उस पर आते हैं उनको नहीं है । एक ही मनुष्य में चारों बातें पाई जा वह अपने इष्ट देव गुरु के भरोसे सह जाता है । भक्ति का मूल रूप भज है है में योग-दृष्टि [.४१ - यह तो हुई दुःख-सहिष्णुता ! निष्पापता के लिये न कहलायगा क्योंकि यहां पर वैद्य की विश्वसनी- इष्ट देव गुरु का आदर्श और उसकी आज्ञा का यता जाँच ली गई है और समय समय पर रोग पालन सहायक होता है । इस प्रकार भक्तियोगी की अवस्था जान कर उसका फलाफल भी जाँच निष्पाप जीवन और कष्ट-महिष्णुता के सहारे लिया जाता है । इसी प्रकार धर्म, गुरु आदि के अपना कल्याण कर लेता है। विषय में भी है। अगर कोई ऐसा गुरु मिल भक्ति भय से भी होती है पर भक्तियोगी जाय जो अपनी अपेक्षा अधिक ज्ञानी-अनुभवी की भक्ति भय से नहीं होती। इसलिये साधारण और वीतराग हो, जिसकी आज्ञाएँ सत्पथ पर ले भक्त बनने और भक्तियोगी बनने में अन्तर है। जानेवाली हो तो उसकी यथाशक्ति जाँच कर लेने भक्ति नीन तरह की है-१ ज्ञान-भक्ति के बाद उसे आत्मसमर्पण कर देना ज्ञानभक्ति ही २ स्वार्थ-भक्ति ३ अन्ध-भक्ति । है । अन्ध-भक्ति वहां होगी जहां सिर्फ वेष देख ज्ञानभक्ति-ज्ञान-भक्ति में गुणानुगग की कर या परम्परा देख कर आत्मसमर्पण किया मुख्यता होती है, म्वार्थ की नहीं । जो जीवन का जाय या श्रद्धा रक्खी जाय । भक्तियोगी इस. प्रकार आदर्श प्रभु, अथवा कल्याण-पथ में अपने से अन्ध-समर्पण नहीं करता वह ज्ञान-समर्पण करता है आगे माना गया हो उसकी गुणानुगग की मुख्यता स्वार्थ-भक्ति-जिंस भक्ति की उत्पत्ति और से या आत्म-समर्पण की दृष्टि से जो भक्ति की स्थिति का कारण वैयक्तिक स्वार्थ है उसे स्वार्थ- जाती है वह ज्ञान-भक्ति है। भक्ति कहते हैं । नौकरों और मजदूरों के मनमें ज्ञान-भक्ति में भी स्वार्थ हो सकता है जो मालिक की भक्ति होती है वह स्थार्थभक्ति हैं। पर इतनी मात्रा में नहीं कि दूसरों के उचित जहां पर व्यक्ति की योग्यता और कृति का विचार अधिकार नष्ट कर दे। मुख्य न हो किन्तु अपना ग्वार्थ मुख्य हो वहाँ म्वार्थ-भक्ति समझना चाहिये । प्रश्न-ज्ञान-भक्ति में भी जब' आत्मसमर्पण है तब वह भी अन्ध-भक्ति हो गई । क्योंकि प्रश्न-विद्यार्थी के द्वारा अध्यापक की भक्ति जहां पर आत्मसमर्पण है वहां अपनी- विचार-शक्ति स्थार्थ-भक्ति है या ज्ञान भक्ति ? गौण हो जाती है | विचार-शक्ति का गौण होना .: उत्तर-गुण-परक्षिण और गुणानुराग-झे तो ही अन्धता है। ज्ञामभक्ति है । यदि यह दृष्टि हो कि अध्यापक उत्तर-जीवन में बड़े से बड़े ज्ञानी को भी मुफ्त में पढ़ा देते हैं. या- कम. फीस लेते हैं मेरे किसी न किसी क्षेत्र में प्रायः आत्मसमर्पण करना अपराधों पर ध्यान नहीं देते. आदि, तो यह स्वार्थ- ही पड़ता है । आत्मसमर्पण ज्ञान से. भी होता. भक्ति कहलायगी । है और अन्धता से भी होता है । जब हम अनेक :: प्रश्न--भक्तिमात्र स्वार्थ मूलक हैं। मनुष्य यों अनुभवों से यह जान लेते हैं कि अमुक वैद्य- ही, किसी की भक्ति नहीं करता, कुछ मतलब निक- सुयोग्य और ईमानदार है.. तब- बीमारी में उस लता है तभी भक्ति करता है । ईश्वर की भी वैद्य-को आत्म-समर्पण कर देना अन्धना का फल भाक्ति हम इसलिये करते हैं कि उसकी दया से ५० ] मत्यामृत mapm- -- -- हमारा कोई न कोई स्वार्थ निकलता है । दानी जगत का उपकार किया हो । स्वार्थ-भक्ति ऐसे परोपकारी तथा समाज-सेवकों, साधुओं की भी पात्र की उपेक्षा करेगी। भक्ति इसीलिये की जाती है कि उनसे हमारा ईश्वर या देवी देवताओं की भक्ति ज्ञानभक्ति कोई न कोई स्वार्थ सिद्ध होता है । संकट से भी हो सकती है और अन्धभक्ति भी हो सकता है । हमारा कोई उद्धार करे और हम उसकी भक्ति ईश्वर को आदर्श मानकर उस आदर्श की ओर करें तो ऐसे उद्धारक की भक्ति को स्वार्थ-भक्ति बढ़ने के लिये भक्ति की जाय, उसे नियंता मान- क्यों कहना चाहिये ? यह तो ज्ञानभक्ति है । कर पाप से बचने के लिये भक्ति की जाय, उसे उत्तर--स्वार्थ रहने पर भी ज्ञानभक्ति हो हितोपदेष्टा मानकर उसकी आज्ञा का पालन करके सकती है । उपर्युक्त अवसरों पर स्वार्थ-भक्ति भी पवित्र जीवन बनाने के लिये भक्ति की जाय, अपने मनको पापों--प्रलोभनो--विपत्तियों से हो सकती है और ज्ञानभाक्त भी। संकट में से किसी ने हमारा उद्धार किया। इससे हमारे मनम हटाने के लिये आत्म-समर्पण के लिय भक्ति की यह विचार आया कि यह आदमी बहुत परो- जाय तो ज्ञानभक्ति है । दिनरात पाप करके उस पकारी है। इसने बिना किसी स्वार्थ या जानप- पर माफ़ी की मुहर लगवाने के लिये भक्ति हिचान के मेरा उद्वार किया, यह पूज्य है । इस की जाय तो स्वार्थ-भक्ति है । विना समझे रूढि या प्रकार परोपकारी मानकर अगर हम भक्ति करेंगे संस्कारवश भक्ति की जाय नो अन्ध-भक्ति है। तो वह भक्ति स्थिर होगी और कोई अनर्थ पैदा प्रश्न-जैस स्वार्थ से भक्ति होती है उसी न करेगी । अब कल्पना करो वह उद्धारक प्रकार भय से भी होती है । साधारण जनता बडे आदमी हमारा निरीक्षक या न्यायाधीश बना और बड़े अफसरों की जो भक्ति करती है वह इसलिये उसने हमारे अपराध का उचित दंड दिया तो नहीं कि अफ़सरो से वह किसी भलाई की आशा उससे दंड पाकर भी हम उसकी भक्ति रख सकेगे। करती है किन्तु इमलिये कि नाराज होकर कुल भक्तिनाश का भय न्याय करने में बाधक न होगा। बुराई न कर दे । इस प्रकार धर्म के नाम पर अगर स्वार्थ-भक्ति होगी तो भक्ति थोड़े से भी भी शनैश्चर आदि की पूजा की जाती हैं यह सब अप्रिय प्रसंग से नष्ट हो जायगी । वह न्याय भयभक्ति है । भय-भक्ति भी स्वार्थभक्ति के समान अन्याय की पर्वाह न करेगी। आज स्वार्थ सिद्ध एक अलग भक्ति है। हुआ भले ही वह अन्याय हो-तो भक्ति हो गई, उत्तर-भय-भक्ति भी स्वार्थ-भक्ति है। स्वार्थ- कल स्वार्थ-सिद्ध न हुआ-भले ही यह कार्य वासना दो तरह की होती है एक आशा पूरक दूसरी न्यायोचित हो-तो भक्ति नष्ट हो गई ऐसी भक्ति स्वार्थ- ध्वंस-रोधक । आशा पूरक में कुछ पाने की इच्छा भक्ति है । स्वार्थ-भक्ति में पात्रा-पात्र का विचार नहीं रहती है और ध्वंस-रोधक मे नाश न होने की रहता सिर्फ अपने स्वार्थका विचार रहता है। ज्ञानभक्ति चिन्ता रहती है । भय-भाक्तमें यही ध्वंस-रोधक स्वार्थ- ऐसी चचल नहीं होती न उससे अन्याय को उत्ते वासना होने से भय-भक्ति भी स्वार्थ-भक्ति है। जन मिलता है। ज्ञानभक्ति उस व्यक्ति की होगी प्रश्न-भय-भक्ति या स्वार्थ-भक्ति को भक्ति जिमने हमारा भले ही उपकार न किया हो पर क्यों कहना चाहिये ? यह तो एक तरह का छल योग-दृष्टि [ ५१ mments कपट या भागाचार है। अच्छ शब्द में इसे शिष्टा कर लता है तब यदि कोई अपनी दुहाई देकर चार भी कह सकते हैं पर यह भक्ति तो नहीं है। अथवा युक्तिशून्य या अनुभवशून्य बातें कह कर उत्तर-स्वार्थ-भक्ति, शिष्टाचार और चापलूसी उसके विश्वास को डिगाना चाहता है तब ज्ञान- भक्त उनकी पर्वाह नहीं करता है । अथवा एक के बहुत पास है फिर भी उसमें अन्तर है । जहाँ भक्ति है वहाँ मन तक विनय का प्रवेश है, शिष्टा- दो बार विचार करता है किन्तु जब वे या वैसे ही विचार उसंक सामने आते हैं तब वह ला. चार और चापलूसी मन की पर्वाह नहीं करते । बल्कि इनमें वंचना भी हो सकती है। स्वार्थ-भक्ति पर्वाही करने लगता है । इस लापर्वाही के मूल या भय-भक्ति में यह बात नहीं है | उस में मन में अन्धता या अज्ञान नहीं, किन्तु ज्ञान की विशा- लता है । इसलिये अन्ध-भक्त की लापर्वाही और रंग जाता है । एक ईमानदार नोकर अपने गुण- ज्ञान-भक्त की लापर्वाही में वड़ा अन्तर है । हीन मालिक का भी भक्त बन जाता है। स्वार्थ में उसके मन पर मालिक की महत्ता की छाप बैठ भक्ति-ये.गी न तो अन्ध-भक्त होता है न जाती है । और उसमें अनुराग की मात्रा भी पैदा स्वार्थ-भक्त, वह ज्ञान-भक्त होता है । हो जाती है । जहाँ मन पर महत्ता की छाप प्रश्न-भक्ति-योगी ज्ञान-भक्त भले ही रहे हो और प्रेम हा वहाँ भक्ति समझना चाहिये । परन्तु भक्ति में किसी को योगी मानना क्या उचित जहाँ ये दोनों या दो में से कोई एक न हो हैं ? भक्ति तो एक तरह का मोह है। मोही को वहाँ सिर्फ शिष्टाचार रह सकेगा भक्ति नहीं। योगी कहना कहाँ तक ठीक है अन्धभक्ति-परम्परा की रूढ़ि के कारण उत्तर-जिसने मोक्ष-पुरुषार्थ पालिया वह या और किसी तरह के अज्ञान के कारण जो योगी है । मोक्ष का अर्थ मनोविकारों से यथा- विचारहीन भक्ति होती है वह अन्ध-भक्ति है इस मम्भव छूट जाना है, ज्ञानभक्ति जहां होती है वहाँ भक्ति में विवेक नहीं होता । और दृढ़ता मात्रा से पूर्ण आत्म-समर्पण होने से अहंकार नष्ट हो जाता अधिक होती है । अन्ध-भक्त युक्ति और अनुभव है, जोकि पापों की जड़ है | पूरा भक्त अपने की पर्वाह नहीं करता। इष्ट के ध्यान मे इतना लीन हो जाता है कि दुनिया की चोटं उसके दिल पर घाव नहीं कर पाती, दुर्वा- प्रश्न-कभी कभी ज्ञान-भक्त भी दुनिया के सनाएँ दब जाती हैं, यही मोक्ष है और मोक्ष प्राप्त बकवाद की पर्वाह नहीं करता तब क्या उसे भी होने से वह योगी हैं । ज्ञानभक्ति मोह नहीं अन्ध- अन्धभक्त कहना चाहिये । भक्ति मोह है। ज्ञानभक्ति में विवेक जंगता रहता उत्तर-अन्ध-भक्त और ज्ञान-भक्त की है । जहाँ विवेक है वहाँ मोह कहाँ ? लापर्वाही में अन्तर है । अन्ध-भक्त विना विचारे लापर्वाही करता है पर ज्ञान-भक्त अनेक बार के संन्यास-योग विचार के बाद लापर्वाही करता है । ज्ञान-भक्त वृद्धता आदि शारीरिक अशक्ति अथवा जब युक्ति अनुभव से गम्भीर विचार कर लेता है मानसिक थकावट या 'समाज-सेवा के और उसका विचार जब श्रद्धा का रूप धारण कार्य में अपनी विशेष उपयोगिता न रहने के ।
५४ ] सत्यामृत PARI- - Mann. ramdaan bhARARdA नहीं होता । कुछ शारीरिक असुविधाएं ही उसे सारस्वत-योग उठाना पड़ती है पर समाज की दृष्टि में वे भी सरस्वती की उपासना में लीन होकर आत्म- उसके लिये भूपण होती हैं। लेकिन गृहस्थ को यह सुविधा नहीं होती । गृहस्थ-योगी को संतोष की मुख्यता से निभाप जीवन बनाना सारस्वत--योग है । यह भी भक्ति की तरह ध्यान- योगी की सारी जिम्मेदारियाँ तो उठाना ही पड़ती योग है क्योंकि इसमें कर्म की प्रधानता नहीं है। हैं साथ ही समाज के द्वारा अयोगी को मिलने पुस्तक पढ़ने में तथा अनेक तरह के अनुभव वाली जितनी विपत्तियाँ है वे सब भी सहना एकत्रित करने में जो सेवा-हनि शान्तिमय निप्याप पड़ती हैं इसलिये संन्यासी की अपेक्षा गृहस्थ जीवन बिताते हैं वे मारस्वत येोगी है ! को योगी बनने में अधिक कठिनाई है। फिर संन्यासी समाज के लिये कुछ न कुछ बोझल प्रश्न-सरस्वती की उपासना तो एक प्रकार होता है इसलिये भी सब के अनुकरणीय नहीं की भक्ति कहलाई इमलिये इसे भक्तिमांग ही है । अगरं गृहस्थ-रूप में सारा जगत कर्मयोगी क्यो न कहा जाय ? हो जाय तो जगत स्वर्गकी कल्पना से भी उत्तर--सरस्वती की मृत्ति चित्र या कोई अच्छा बन जाय परन्तु अगर सब संन्यासी हो स्मारक रख कर अथवा बिना किसी स्मारक के जायँ तो जगत तीन दिन भी न चले इसलिये सरस्वती का गुणगान किया जाय तो यह भक्ति- संन्यासी समाज के लिये अनुकरणीय भी नहीं योग कहा जा सकेगा परन्तु सारस्वत-योग का है। संन्यासी की सेवाएं इकरंगी होती है जब यह मतलब नहीं है। वहां सरस्वती की उपासना कि गृहस्थ की सेवाएँ नाना तरह की होती हैं का मतलब है ज्ञान का उपार्जन करना और इसलिये कर्मयोग का व्यापक और उच्च रूप ज्ञान-प्राप्ति में ही आनन्दित रहना । इस प्रकार गृहस्थ में दिखाई देता है, संन्यास में नहीं । पवित्र जीवन बिताने वाला विद्या-सनी सार- स्वत योगी है। आदर्श कर्मयोगी गृहस्थ होगा संन्यासी प्रश्न-विद्योपार्जन करता ग्रंथ-निर्माण करना नहीं । इन सब कारणों से कर्मयोगियों की नाम- कविता वगैरह बनाना भी एक बडी समाज-सेवा गृहस्थ योगी ही मुख्य--रूप मे बताये है इसलिये विद्याव्यसनी को कर्मयोगी कहना जाते हैं । खैर, प्रसिद्धि, व्यापकता आदि की दृष्टि से किसी का भी नाम लिया जाय परन्तु चाहिये । सारस्वत-योग एक तरह का कर्म- योग ही है। इसका मतलब यह नहीं कि संन्यासी, कर्मयोगी नहीं होते हैं। कभी कभी 'असाधारण जनसेवा उत्तर--सरस्वती की उपासना अगर जगत के लिये संन्यास लेना अनिवार्य हो जाता है उस की सेवा के लिये है तब तो वह कर्मयोग ही समय संन्यासी-कर्मयोगी बनना ही उचित है। अगर वह निवृत्तिमय जीवन बिताने का एक जैसे म. महावीर, म. बुद्ध म., ईसा आदि तरीका ही है तो वह कर्मयोग नहीं है इसलिये उसे अलग नाम देना उचित है। माला में बने थे।
m योग-दृष्टि [ ५५ dar ArA आदमी -- क प्रश्न-विद्याव्यसन के समान और भी प्रधान अंग बन जाय तो जीवन इतना, पवित्र न निर्दोष व्यसन हैं इसलिये उनका अवलम्बन लेकर रह जायगा कि उसे योगी जीवन कहा जा सके। योग साधन करने वाले योगियों का भी अलग प्रश्न-काम भी तो एक पुरुषार्थ है. अगर उल्लेख होना चाहिये। एक प्राचीन वह जीवन चर्या का मुख्य अंग बन जाय तो स्थानों के दर्शनों में पवित्र जीवन विताता है पवित्रता क्यों नष्ट हो जायगी ? कोई पुरानी खोज में लगा रहता है इन को उत्तर--काम, मोक्ष की तरह अपने में किस में शामिल किया जायगा ? पूर्ण नहीं है उसका असर दूसरों पर अधिक उत्तर-देशाटन यदि जनसेवा के लिये हैं पड़ना है । बलिक अधिकांशतः अपना काम दूसरों तो कर्मयोग है, अगर सिर्फ नये नये अनुभवों का के काम में बाधक हो जाता है ऐसी हालत में आनन्द लेने को है तो मारम्बत योग है । प्राचीन काम प्रधान जीवन पर-विघातक हुए विना नहीं चीजों की खोज जनहित के लिये है तो कर्म- रह सकता । काम को पवित्र जीवन में स्थान है योग है सिर्फ आत्म-संतुष्टि के लिये है तो पर धर्म अर्थ और मोक्ष के साथ अकेला काम- सारस्वत-योग है। कविता आदि के विषय में हिंसक और पापमय हो जायगा । इसलिये काम- भी यही बात समझना चाहिये । योग नाम का भेद नहीं बनाया जा सकता । -सारस्वत · योग को प्रश्न संन्यास-योग योगी के पास काम रहता है और पर्याप्त मात्रा में क्यों न कहा जाय ? दुनियादारी को भूलकर रहता हैं पर, वह भाक्त तपः विद्या. आदि की तरह अध्ययन आदि में ही लीन हो जाना एक तरह प्रधानता नहीं पाने पाता । अन्य पुरुषार्थों के का संन्यास ही है। साथ रहता है ऐसी हालत में योगी काम- योगी नहीं किन्तु कर्मयोगी बन जाता है । उत्तर-~-एक तरह का संन्यास तो भक्ति- प्रश्न-चित्र संगीत आदि काम के किसी योग भी है । सभी ध्यान योग एक तरह के संन्यास ऐसे रूप को-जो विघातक नहीं है-अपनाकर पवित्र फिर भी ध्यान योग के जो तीन भेद किये जीवन वितानवाला योगी वि.स नाम से पुकारा जाय ? गये हैं वे ऐसे निमित्तो के भेद से किये गये हैं जो कि पवित्र और निद्वंद जीवन में सहायक उत्तर-कलाओं की शुद्ध उपासना में ईश्वर हैं। भक्ति और तप के समान विद्या भी निर्दोष के साथ, और ईश्वर न मानते हों तो प्रकृति के जीवन में सहायक है इसलिये उसका अलग योग साथ तन्मयता होती है इसलिये साधारणतः कलो- पासक योगी, भक्ति-योगी है। अगर कलोपासना बतलाया गया। में नये नये विचार और अनुभवों का आनन्द प्रश्न---ध्यान-योग में काम-योग क्यों नहीं मिलता है तो वह सरस्वती की उपासना हो जाती माना गया? है जैसे कविता कला । ऐसा आदमी अगर योगी उत्तर ----योग के साथ कोई नाम तभी हो तो सारस्वत योगी होगा । यदि उसका कला- लगाया जा सकता है जब वह जीवन-चर्या का प्रेम लोकहित के काम में आता होगा तो वह प्रधान अंग बन जाय काम यदि जीवनचर्या का कर्मयोगी बन जायगा । . M - सत्यामृत AON- A- 1 प्रश्न--यदि विद्या, कला आदि आराम के वे अपनी आत्मशुद्धि के कारण योगी अवश्य कह- कामों-से मनुष्य कर्मयोगी कहला सकता है तो लायेंगे । समाज सेवा के लिये सर्वस्व देने वाले, उसके इन तीनों प्रकार के योग में कर्म की प्रधा- कल्याण के लिये दिनरात चोटें खाने वाले क्या नता नहीं है किन्तु एकाग्र मनोवृत्ति की प्रधानता कहलायंगे ? और जो लोग समाजहित की पर्वाह है इसलिये ये तीनों ध्यान योग है ! नहीं करते उनको भी आप योगी कहें-तो यह भी कर्मयोग अंधेर ही है ? समाज के प्रति शक्त्यनुसार उचित कर्तव्य उत्तर--योगी के जो चार भेद बताये गये है वे रूप-भेद हैं, श्रेणी-भेद नहीं, प्रत्येक योग के करते हुए भीतर से पूर्ण समभावी रहकर निप्पाप पालन में तरतमता होती है । कर्मयोगी हजारों जीवन विताना कर्मयोग है। चारो योगो मे कर्म- हो सकते हैं पर वे सब बराबर होंगे यह बात योग श्रेष्ठ और व्यापक है। ध्यान योग तो एक तरह नहीं है । इसलिये विद्या, कला आदि के साथ से अपवाद है पर कर्मयोग सत्र के लिये है। कर्मयोगी बननेवाले और सर्वस्व देकर क्रान्ति करके ध्यानयोगी अगर बहुत आधिक कर्मयोगी बनानेवाले समान नहीं है । उनका, हो जाँय तो समाज उनके बोझ से परेशान हो तो योग्यता, त्याग और फलपर निर्भर है। मूल्य जाय पर कर्मयोगी सारा संसार हो जाय तो भी परेशानी नहीं होगी। इसलिये अधिक सेवा का महत्त्व नष्ट नहीं होता । इसके अतिरिक्त एक बात यह भी न भूल जाना प्रश्न-म. महावीर म. बुद्ध आदि गृहत्या- चाहिये कि भक्ति करने से ही कोई भक्ति-येगी गियों और भिक्षाजीवियों को भी आप कर्मयोगी नहीं हो जाता, न विद्या कला से सारस्वत-योगी, कहते है अगर ऐसे कर्मयोगी अधिक हो जाय तो न गृह-त्याग से संन्यास-योगी और न कम करने से समाज के ऊपर उनका भी बोझ हो जायगा फिर कर्मयोगी । ये काम तो हर एक आदमी करता ध्यान योग में ही बोझ होने की सम्भावना क्यो? ही रहता है पर इन कामों के करते हुए योगी उचर-गृह त्यागी कर्मयोगी अगर मर्यादा से होना बात दूसरी है । योगी होने के लिये निष्पाप अर्थात्-आवश्यकता से अधिक हो जायेंगे तो कर्म- जीवन तत्वदर्शीपन और समभाव आवश्यक है। योगी ही न रह जायेंगे । क्योकि कर्मयोगी तो रही समाजहित की बात, सो समाजहित अपनी उचित और और आवश्यक आवश्यक कर्म करता है । भीतरी. और - बाहिरी परिस्थिति पर निर्भर है। अब अगर किसी कर्म की समाज को आवश्यकता कभी कभी इच्छा रहते हुए भी समाजहित नहीं नहीं है अथवा आवश्यकता जितनी है उसकी हो पाता ऐसी हालत में समाज का अहित न पूर्ति अधिक हो रही है इसलिये अधिक पूर्ति किया जाय यही काफी है । ध्यान-योगी कम से करने वाले बोझ हो रहे है तो ऐसी अवस्था में वे कम इतना तो करते ही हैं। अगर किसी कारण बोझ बनने वाले कर्म करते हुए भी कर्मयोगी न वे समाजहित नहीं कर पाते तो उनका स्थान कहलायेगे । इसलिये म. महावीर म. बुद्ध आदि समाजहितकारियों-कर्मयोगियों से नीचा रहेगा पर के श्रमण संघ में उतने ही श्रमण कर्मयोगी रह - - - योग-दृष्टि [५७ सकते हैं जितने समाज के लिये जरूरी हो । तरह के योगी का बोझ उठाने के लिये हम वैधे और उस आवश्यकता के कारण समाज पर बोझ नहीं हैं फिर कर्मयोगी के लिये तो हम और भी न बन सके। अधिक निश्चित हैं। कर्मयोगी, तो अपना मार्ग आप बना लेता है। समाज उसका अपमान करे. प्रश्न- उस आवश्यकता का निर्णय कौन उपेक्षा करे तो भी बह भीतर मुसकराता ही करना रहता है वह अपनी पूजा कराने के लिये आतुर उत्तर-आवश्यकता का निर्णय कर्मयोगी नहीं होता । निकम्मे और दंभी अपने को कर्म- की सदसदविवेक बुद्धि करेगी क्योंकि क्रान्तिकारी योगी भले ही कह पर विपत्तियों के सामने भीतर कर्म योगियों की सेवा का मूल्य समाज समझ की मुसकराहट उन में न होगी और वे उस पर- नहीं पाता। उनके जीवन-काल में वह उन्हें मानन्द से वंचित ही रहेंगे । इस प्रकार चाहे वे सताता ही रहता है और उनके जाने के बाद कागज काला करें, चाहे गाल बजायें चाहे रूप वह उनकी पूजा करता है ! क्या धर्म क्या समाज दिखावे, अगर वे कर्मयोगी नहीं हैं तो उसका क्या राजनीति सत्र में प्रायः सब महापुरुषों के आनन्द उन्हें न मिलेगा । और दुनिया तो सच्चे जीवन ऐसी परिस्थिति में से गुजरे हैं। इसलिये कर्मयोगियों को भी नहीं मानती रही है फिर इन्हें बहुत सी आवश्यकताओं का निर्णय उस समाज- मानने के लिये उसे कौन बिवश कर सकता -सेवी को ही करना पड़ता है। है ? मतलब यह है कि अपनी समाज-सेवा की प्रश्न-ऐसी हालत में हरएक निकम्मा कर्म- आवश्यकता का निर्णय करने का अधिकार तो योगी बन जानगा । दुनिया माने या न माने, कर्मयोगी को ही है, इससे वह कर्मयोगी बन आवश्यकता हो या न हो पर वह अपनी सेवा जायगा उसका आनन्द उसे मिलेगा; और समय की उपयोगिता के गीत गाता ही रहेगा । व्यर्थ आने पर उसका फल भी होगा कदाचित् न हुआ गाल बजाने को या · कागज काला करने को तो इस की वह पर्वाह न करेगा, परन्तु उसे सेवा कहेगा कदाचित् अपना वेष दिखाने को भी कर्मयोगी मानने न मानने कहने न कहने का वह संवा कहे । नाटक के पात्र अगर नाना वेप अधिकार समाज को है। दोनो अपने अपने दिग्वा कर समाज का मनोरंजन आदि करते हैं अधिकार का उपयोग करें इसमें कोई बाधा. तो वह साधु वेप से कुछ न कुछ रंजन करेगा नहीं है। और उसको महान सेवा कहेगा। इस प्रकार :: प्रनं-कर्मयोगी गृह-योगी भी हो सकता कर्मयोग की तो दुर्दशा हो जायेगी। है और गही भी हो सकता है, पर दोनों में अच्छा उत्तर--सेवा की आवश्यकता का निर्णय कौन ? . विवेक से होगा इसलिये हरएक निकम्मा उचर-अच्छे तो दोनों हैं पर किसी एक कर्मयोगी न वन जायगा हाँ, वह कह सकेगा। से अधिक अच्छेपन का निर्णय देश काल की सो कहा करे उसके कहने से हम उसे कर्मयोगी- परिस्थिति पर निर्भर है। थोड़ी बहुत आवश्यकता मानले ऐसी विवशता तो है नहीं। किसी भी तो हर समय दोनों तरह के कर्मयोगियों की रहती , ६० ] सत्यामृत तरह का वैराग्य हमारे मन पर छा जाता है जो उत्तर-गमी गड़बड़ी होना समन्त्र है पर इस कि घर आने पर कुछ समय बाद दूर हो जाता गड़बड़ी की परेशानी से बचने के दो उपाय है है यह वैराग्य अपरामनोवृत्ति का है और जब पहिली बात तो यह कि परामनोवृत्ति के विषय में बुढ़ापे में किसी का जवान बेटा मर जाता है शाब्दिक दृहाई का कोट मूल्य न किया जाय । जिसके शोक में वह दिनरात रोया करता है समाज के प्रनि मनाय अपनी अपग मनावर्ति तो यह शोक परा मनोवृत्ति का है। हमारे मन के लिये जिम्मेदार है। पगमनानि का मजा में क्रोध आया परन्तु थोड़ी देर बादः क्रोध की उसे दना है तो लेना रहे. समाज को इन निःसारता का विचार भी आया, जिस पर क्रोध कोई मतलब नहीं । एक मात्रा समय बीत जाने हुआ था उस पर द्वेप न रहा तो कहा जा पर अगर उसकी प्रगति की निपिता के सच सकता है कि यहां अपरामनोवृति क्षुब्ध हुई परा प्रमाण मिलेंगे तब दग्या जायगा । दूसरी बात यह नहीं । जैसे नाटक का खिलाड़ी रोते हँसते भी कि परा-मनावृत्ति के मुचक नीन चिट है उन भीतर से न रोता है न हँसता है उसी प्रकार उमकी पहिचान की जा सकती है । योगी की परा मनोवृत्ति न रोती है न हमती १.. न्याय-विनय, २ विम्मत-ऋत्र व्यवहार ३ है । नाटक के खिलाड़ी दो तरह के होते है पापी-पाप-भेद । एक तो वे जो सिर्फ गाल बजाते है, हाथ मटकाते हैं पर गन पर कुछ भी प्रभाव नहीं न्याय-विनय- योगी तभी ऋोति प्रगट करेगा पड़ता । उिनकी अपरामनोवृत्ति भी नहीं भीगती जब किसी अन्याय का विगध करना पडेस- वे सफल खिलाड़ी नहीं लिये उसमें निष्पक्ष विचारकता तो होना ही सफल खिलाड़ी वही हो सकता है जिसकी चाहिये । वह अपनी गलती समाने और सुधारने अपरामनोवृत्ति भी भींगती है । वह सचमुच रोता को हर समय तैयार रहेगा और पश्रात्ताप भी करेगा। है, हँसता है फिर भी इस रोने हँसने के भीतर अगर न्याय के सामने वह झुंक नहीं सकता नत्र भी एक स्थायीभाव है जो न रोता है न हँसता समझना चाहिये कि उसका पग-मनोवृत्ति भी है वह सिर्फ इतना विचार करता है कि मेरा खेल दृपित है । अच्छा हो रहा है या नहीं। यही परामनोवृत्ति है । २-विस्मृत-वत्-व्यवहार- घटनाके हो जाने प्रश्न-इस प्रकार अपनी परावृत्ति और पर या उसके फलाफल का कार्य हो जाने पर अपरावृत्ति का भेद समझा जा सकता है पर इस तरह व्यवहार करना मानो वह घटना हुई ही दृसरे की परावृत्ति और अपरावृत्ति का भेद कैसे नहीं है, हम वह घटना बिलकुल भूल गये है । इस समझ मे आवे ? यो तो हरएक आदमी कहने प्रकार का व्यवहार अकपाय वृतिका सूचक है । लगेगा कि मैं प्रमशान्त हूं, योगी हूँ और जो अशांति इससे भी परामनोवृत्ति का अक्षोभ मालम होता है। या कपाय दिख रही है वह अपरावृत्ति की है प्रश्न-किसी दुर्जन की दुर्जनता के बाद भी इस प्रकार योगी-अयोगी मे बड़ी गडबड़ी हो हम उसकी दुर्जनता कैसे भूल सकते हैं ? अगर भूल जायें तो हमारी और दूसरो की परेशानी hc जायगी। + - योग-दृष्टि [६१ PAR- बढ़ जायगी । इसलिये कम से कम उसकी दुर्ज- क्षतिपूर्ति ( मानसिक आर्थिक आदि ) न करें तो नता का स्मरण करके हमें उससे बचते रहने की समाज में बड़ी अव्यवस्था पैदा होगी । सताये हुए कोशिश तो करते ही रहना चाहिये और अगर लोग न्याय न मिलने के कारण कानून को अपने समाज-व्यवस्था के लिये दंड देना अनिवार्य हो हाथ में ले लेंगे एक खूनी को आप प्राण. दंड न तो दंड भी देना चाहिये विस्मृत-वत-व्यवहार देकर सुधार करने के लिये छोड़ दें तो खून करने से कैंस चलेगा। करने की भीषणता - लोगों के दिल से निकल उत्तर-विस्मृत-बत् व्यवहार के लिये घटना जायगी इसलिये अपराध बढ़ जायेंगे। दूसरे वे लोग का हो जाना ही आवश्यक नहीं है किन्तु उसका कानून को हाथ में लेकर ग्वूनी का या उसके फलाफल-कार्य हो जाना भी आवश्यक है । एक मम्वन्धी का बन करेंगे जिनके आदमी का पहिले चार ने चारी की है तो जब तक उसका दंड बन किया गया है । कानून से निराश होकर वह न भागले तब तक हम उसकी बात नहीं भल जब मनुष्य खुद वदला लेने लगता है तब वह सकते । दंड देने का कार्य हम करेंगे । फिर भी वदले की मात्रा भूल जाता है | जितनी ताकत उस पर दया रक्खगे, उसको सहज वैरी न वना- होती है उतना लेता है । इस प्रकार समाज में येगे, तथा जब और जहाँ चोरी की बात नहीं अंधाधुंधी मच जायगी । परन्तु अगर ग्वनी को है वहाँ उससे प्रेमल व्यवहार रक्खेंगे । मतलब प्राण-दंड दे दिया जाय तो उसका सुधार कब यह है कि मुव्यवस्था रखने के लिये जितना दंड और कैसे होगा, उस पर हमारी दया कैसे होगी ? अनिवार्य है उतना ना देंगे लेकिन उस प्रकरण इस प्रकार पापी और पाप के भेद को जीवन में के बाहर उस घटना को भले हुए के समान व्यवहार उतारना योगी को भी असंभव है। करेंगे। उत्तर-पापी और पाप के भेद का मतलब ३-पापी-पाप-भेद-जिसकी परावृत्ति अक्षुब्ध यह है कि पापी से व्यक्तिगत द्वेष न रखना और है वह पाप से घृणा करता है पापी से नहीं । उससे बदला लेने की अपेक्षा निष्पाप बनाने का पापी पर वह दया करता है उसे एक तरह का प्रयत्न करना । मूल में तो सभी एक से हैं। परि- रागी समझता है | पाप को रोग समझ कर उसे स्थितियों ने या भीतरी मलने अगर किसी व्यक्ति पाप से छुड़ाने की चेष्टा करता है । उसका ध्येय का पतन कर दिया हैं तो हमें उसके पतन पर दंड नहीं होता मुधार होता है और दंड भी दयापूर्ण दुःख होना चाहिये न कि द्वेप । सुधार का अंग बन जाता है । पर अधिक सुग्व की नीति के अनुसार जब प्रश्न--पने पाप या बुगई के लिये, जिसका व्यक्ति और समाज का प्रश्न आता है तव समाज असर दृसगे पर नहीं पड़ता अर्थात् दृसरों के का अधिकार-रक्षण पहली बात है व्यक्ति का नतिक अधिकार को बाधा नहीं पहुंचती अगर इलाज अगर समाज का नाइलाज बन रहा हो अपराधी को दंड न दिया जाय, मिर्फ सुधार की तो हमें व्यक्ति के इलाज पर उपेक्षा करना पड़ेगी। दृष्टि से उसकी चिकित्सा ही की जाय तो ठीक है । इसीलिये ग्वनी आदि को प्राणदंड की ज़रू- परन्तु उस पर दया करने के लिये दृमगे की रत है क्योंकि इससे उस व्यक्ति का इलाज भले 1 २] सत्यामृत , न हो पर समाज का इलाज होता है। जैसे परा मनोवृत्ति शान्त थी, अपरा मनोवृत्ति क्षुब्ध भी कभी हमें रोगी को भी प्राणदंड देना पड़ता है होती थी। उनका सीता-प्रेम और रावण-द्वेष से कभी कभी पापीको भी प्राणदंड देना पड़ता ऐसा ही था। फिर भी उनका सीता प्रेम बंचना । पागल कुत्ता काटता है और उसके काटने नहीं था क्योकि सीता के लिये जान जोखम में { आदमी मर जाता है, इसमें उस कुत्ते का क्या डालकर वे रावण से लडे । यद्यपि वह प्रेम प्रजा- अपराध है ? फिर भी समाज-रक्षण के लिये उसे सेवा में बाधा न डाल सका, प्रजा के लिये उन पाणदंड देना पड़ता है। संक्रामक रोगियों से ने सीता का त्याग भी किया, फिर भी उनका इप न होने पर भी बच कर रहा जाता है सीता-प्रेम फीका न पड़ा, रिवाज़ के अनुसार इस प्रकार व्यक्ति-द्वेष न होने पर भी दंडादि आवश्यक होने पर भी उनने दूसरी शादी नहीं व्यवस्था चल सकती है। की-विश्वासघात नहीं किया । इस प्रकार परा इन तीन चिह्नों मे परा-मनोवृत्ति की पहि- मनोवृत्ति शांत थी इसलिये वे सीता का त्याग कर चान हो सकती है । जिसकी यह परा-मनोवृत्ति सके पर उनका प्रेम, वंचना नही था इसीलिये क्षुब्ध न हो उसे योगी समझना चाहिये । वे रावण से लड़ सके और जीवन भर सीता के प्रश्न-योगी का द्वेष जैसे भीतर से नहीं विषय मे विश्वासी रहे । परा और अपरा मनो- रहता उसी प्रकार राग भी भीतर से नहीं रहता । वृत्ति का यह सुंदर दृष्टान्त है। हां, प्रेम परा- ऐसी हालत में योगी किसी से प्रेम भी सच्चा न मनोवृत्ति मे भी पहुँच कर मनुष्य को योगी बना करेगा । इस प्रकार उसका प्रेम एक प्रकार की सकता है । इस का कारण यह है कि द्वेप के वंचना हो जायगा । भक्ति आदि भी इसी समान प्रेम अधर्म नहीं है । द्वेप.विभाव हे प्रेम स्वभाव प्रकार वंचना बन जायगी तब भक्तियोग असंभव है क्योकि यह विश्वसुख-वर्धक है। हां, प्रेम जहां हो जायगा। भक्ति से होनेवाला क्षोभ योगी के पर अज्ञान या स्वार्थ के साथ मिल कर मोह बन भीतरी मन तक कैसे जायगी और जब भक्ति जाता है-विश्वसुख-वर्धन रूप कर्तव्य मे बाधक परामनोवृत्ति में है ही नहीं तब उससे योग बन जाता है वहां पाप है। भक्तियोगी की भक्ति क्या होगा? परा मनोवृत्ति तक जाती है फिर भी उस की परा- उत्तर--परामनोवृत्ति अगर प्रेम से न भी मनोवृत्ति दूषित नहीं होती क्योंकि उसकी भक्ति भीगी हो तो भी वंचना न होगी । वंचना के ज्ञान-भक्ति है, स्वार्थभक्ति या अन्धभक्ति नहीं । लिये तीन बाते जरूरी है। एक तो यह कि ज्ञान-भक्ति स्वपर-कल्याण की बाधक नहीं है बल्कि अपर। मनोवृत्ति भी न भींगी हो दूसरी यह साधक है इससे वह दोप नही है जिससे परा- कि जो विचार प्रगट किये जाय उनके पालन . मनोवृत्ति दूषित हो जाय । करने का विचार न हो । तीसरी बात यह कि प्रश्न-बहुत से लोगों ने तो वीतरागता को दृसरे के हिताहित की पर्वाह न करके अपना ध्येय माना है-प्रेम भक्ति आदि को राग माना स्वार्थ सिद्ध करने की इच्छा हो । योगी का प्रेम है । हां, इन्हे शुभराग माना है फिर भी योगी एसा नहीं होता । म. राम कर्मयोगी थे उनकी जीवन के लिये तो यह शुभराग भी बाधक है योग-दृष्टि [६ Fal . उत्तर-प्रेम और भक्ति भी शुद्ध न्याय आदि योगी न हुए। इससे मालूम होता है कि में बाधक हो जाते हैं इसलिये वे भी अशुद्ध रूप भी एक तरह का राग हैं जो वीतरागता में बाधक है में हय है। पर शुद्ध प्रेम और शुद्ध भक्ति उत्तर-गौतम कर्म-योगी थे फिर भी .' न्याय या कर्तव्य में बाधक नहीं होते इसलिये भर म. महावीर के भक्त रहे । केवल ज्ञान । बे उपादेय हैं । वीतरागता सिर्फ कपायों का जाने पर भी वह भक्ति नष्ट न हो गई सि अभाव नहीं है, क्योंकि अगर वह अभावरूप ही म. महावीर के विषय में जो उनका मोह या आ हो तो वस्तु ही क्या रहे, इस प्रकार की अभावा सक्ति थी वह नष्ट हो गई। इस आसक्ति के ।। स्मक वीतरागता या अरागता तो मिट्टी पत्थर आदि मे गौतम में आत्मनिर्भरता का अभाव था, म. भी होती है। मनुष्य की वीतरागता इस प्रकार के वियोग में वे दुःखी और निवल हो जाते। जड़ता रूप नहीं है वह चैतन्य रूप है, प्रेम रुप केवलज्ञान हो जाने पर यह बात न रही । । है, विश्व-प्रेम रूप है इसलिये वह भाव-रूप है । महावीर ने जो जगत् का उपकार किया था प्रेम वहीं निंदनीय है जहाँ अपने साथ द्वेप की उपकार किया था उमे इन्द्रभूति न भूले, छाया लगाये रहे । कहा जाता है कि देवों के भर उनका गुणगान करते रहे उनके विषय छाया नहीं होती, यह कल्पना इस रूप में इन्द्र-भूति का आचरण विनय-युक्त रहा इस सत्य कही जा सकती है कि योगी अर्थात् दिव्या- वे योगी होकर भी उनके भक्त बने रहे । त्माओं का प्रेम छाया-हीन होता है अर्थात् उनके प्रेम में काली बाजू नहीं होती । अगर योगी लोग भक्ति हो गुणानुराग हो कृतज्ञता हो या प्रेम प्रेम-हीन हो तो अकर्मण्य हो जाय । म. महावीर कोई दूसरा रूप हो जो दूसरों के अधिकार २. बाधा नहीं डालता और न कर्तव्य का म. बुद्ध यदि प्रेम-हीन होते तो जगत् को सुधार. ने का प्रयत्न ही क्यों करते ? वास्तव में ये महान बनाता है वह आत्मशुद्धि या योग का नाशक न. है । अपने सम्पर्क में आये हुए लोगों से ७५. प्रेमी या विश्व-प्रेमी थे इसीलिये परम वीतराग थे । वीतरागता प्रेम के विरुद्ध नहीं है । वह मोह, लोभ, मात्रा में कुछ विशेष-प्रेम योगी को खास : कर्मयोगी को होता ही है । गुणानुराग ..त.. लालच, तृष्णा आदि के विरुद्ध है। भक्ति में भी स्वार्थ-भक्ति और अन्ध-भक्ति वीतरागता के दीन-वात्सल्य भी योगी के लिये आवश्यक है । विरुद्ध है ज्ञान-भक्ति नहीं । भक्ति-योगी तो ज्ञान प्रश्न-योग के भेदों में हठयोग आदि भक्त होता है। वर्णन क्यों नहीं किया ? इन्हें ध्यान योग कर जाय या कर्मयोग ? ध्यान योग कहा जाय तो प्रश्न-कहा जाता है कि म. महावीर के संन्यास या सारस्वत ? मुख्य शिष्य इन्द्रभूति गौतम म. महावीर के अत्य- धिक भक्त थे इसलिये प्रारम्भ में इस भक्ति-वश उत्तर--हठ योग आदि का योग-दृष्टि उनका उत्थान तो हुआ परन्तु आगे इस भक्तिने स्थान नहीं है। योग आदि तो एक तरह + उनका विकास रोक दिया। जब तक वे भक्त बन कसरतें हैं जो अपनी भौतिक अवस्थाओं रहे तब तक उनने केवलज्ञान न पाया अर्थात् विशेष प्रभाव डालती हैं। ऐसा योगी ६४ ] सत्यामृत तरह का चैद्य है । आत्मशुद्धि ( संयम आदि) है। भक्ति और सारस्वत योग अलग गिनाये का उससे कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। पर इस का कारण यह है कि ये सयम के रानेमे योगदृष्टि में जो योग है वह तो , संयम का एक आगे बढ़ान के विशेष साधन है । संयम निष्पाप विशाल उत्कर्ष है जिसे पाकर मनुष्य अर्हत, बुद्ध प्रेममय है । उसे मन और बुद्धि दोनों रास्तों से वीतराग या समभावी बनता है। पाया जा सकता है । मन के रास्तम जब हम प्रश्न-ध्यान--योगी जैसे नाना अवलम्बन पाते हैं तब भक्ति योग बन जाता है उसमें मन लेते है जिनके तीन भेद किये गये हैं-भक्ति की शक्ति प्रवन्ट हो जाती है । जब बुद्धि के रास्त संन्यास और सारस्वत, उसी प्रकार हठयोग से पाते हैं तब सारम्बत योग बन जाता है इस में आदि में भी मन एक तरफ लगाया जाता है इस बुद्धि की शक्ति प्रकट हो जाती है । जब बुद्धि और लिये ध्यान योग के भेदों में इसका भी एक स्थान मन शिथिल होकर समन्वित होते है ना मंन्यान होना चाहिये । जैसे सिर्फ भक्ति से कोई भक्ति- योग हो जाता है । इसमें विशुद्ध प्रेम, भक्ति योगी नहीं होता उसी प्रकार हठयोग आदि से की तरह किसी एक जगह गाढ़ा न होकर प्रायः ही आप उसे योगी न माने पर संयम की सीमा समानरूप में सब जगह फैलकर इतना सूक्ष्म पर पहुंचा हुआ कोई योगी भक्ति आदि की बन जाता है कि उसे चिराग कहने लगते है। तरह इस भौतिक योग का अवलम्बन ले तो ( कर्मयोग में बुद्धि और मन दोनो की शक्ति ध्यान योग में एक भेद और क्यों न हो जाय ? प्रबल होकर समन्वित होती है । इस प्रकार ये उत्तर-सब तरह के ध्यान योग एक तरह चारों योग मन और बुद्धि के विविध स्पा से बने के संन्यास योग है । संन्यासी एकाग्रता के लिये हैं । इन में व्यायाम का-फिर चाहे उसका नाम कोई न कोई अवलंबन लेता ही है इसलिये हठ योग ही क्यों न हो-कोई स्थान नहीं है । योगी ( भौतिक योगी ) अगर संयम की दृष्टि से भी योगी-आध्यात्मिक योगी-हो तो वह संन्यास प्रत्येक प्राणी को योगी बनना चाहिये । योगी कहलायगा। अगर वह अपनी चित्तवृत्ति ध्यान योगी की आवश्यकता अल्प है कर्मयोगी को रोक कर किसी विचार, 'अन्वेषण आदि में की आवश्यकता अपरिमित है । विश्व मे जितने स्थिर करता है तो वह सारस्वत-योगी है । इस अधिक कर्मयोयोगी होंगे विश्व उतना ही अधिक लिये उसका अलग भेद बनाने की जरूरत नहीं विकसित और सुग्वी, होगा । .
लक्षण-दृष्टि [६५ AM- दृष्टिकांड पाँचवाँ अध्याय ( लक्षण-दृष्टि ) जो योगी बन गया है वहीं पूर्णमुखी है। हैं । अर्धसाधक तीन अंशों की [ विवेक, धर्म- पूर्ण सुखी बनने के लिये हरएक आदमी को समभाव, जाति-समभाव ] साधना करनेवाला योगी बनने की चेष्टा करना चाहिये | जो चार है, बाकी दो अंशों की साधना गौण है। बहुसाधक तरह के योगी बताये गये हैं उनमे से किसी पांचों अंशों की साधना करता है पर कहीं कोई भी तरह का योगी हो उसमें निम्न--लिखित पाँच त्रुटि रह जाती है । सिद्धयोगी में यह त्रुटि नहीं चिह्न अवश्य होना चाहिये । अथवा योगी के ये रहती । जो मनुष्य लवसाधक भी नहीं है उस अवश्य होते हैं । १ विवेक (अमृढ़ता)२ धर्म-सम- की मनुप्यता बहुत अंशों मे निष्फल है। इसलिये समभाव ३ जाति-समभाव ४ व्यक्ति-समभाव कम से कम लवसाधक तो हरएक को बनना चाहिये। ५ अवस्था-समभाव प्रश्न--विवेक के बिना भी धर्म--समभाव और जाति-समभाव हो सकता है। कोई कोई योगी की दो श्रेणियाँ है, सिद्ध और समाज ऐसे हैं जिन में जाति-पाँति का विचार साधक । सिद्ध-योगी के पांचों चिह्न पर्याप्त मात्रा- होता ही नहीं है, वे किसी भी जाति के हाथ का में होते हैं। साधक योगी के सब नहीं रहते या खाते हैं, कहीं भी शादी करते हैं पर विवेकी पर्याप्त मात्रा में नहीं रहते । अपूर्णता या अप- बिलकुल नहीं होते। रिवाज के कारण या अच्छे याप्तता की दृष्टि से साधक-योगी की असंख्य बुरे की अक्ल न होने के कारण वे जाति-सम श्रेणियाँ हैं पर उन सब श्रेणियों को तीन भागों भावी या धर्मसमभावी बन गये हैं। वंश--परम्परा में विभक्त कर सकते हैं ( १ ) लवसाधक (२) से सत्यसमाजी बननेवाला विवेकहीन होकर भी अवसाधक (३) बहुसाधक । धर्म-जाति-समभावी होगा। ऐसे व्यक्तियों को लव- लवसाधक अर्थात् एक अंश [प्रथमअंश ] साधक कहा जाय या अर्ध-साधक ? विवेक ( अमूढ़ता ) की साधना करने वाला। उसमें उत्तर--विवेकहीन व्यक्ति न तो लवसाधक वाकी चार अंशों की साधना नाम मात्र की रहती होता है न अर्थसाधक । वह साधक ही नहीं है ।
सत्यामृत - । वंशपरम्परा से कोई प्रमाणित सत्यसमाजी नहीं गया है । विवेकी में तीन बातें होना चाहिये बन सकता । प्रमाणित वह तभी होगा जब सम निःपक्षता, परीक्षकता, और समन्वय-शीलता । झदार होने पर समझपूर्वक सत्यसमाज के तत्त्वों भगवान सत्य के दर्शन करने के लिये इन तीन को स्वीकार करेगा । रूढ़ि-वश जो समभावी गुणों की आवश्यकता है । भगवान सत्य के दर्शन बनते हैं उनके समभान का व्यावहारिक मूल्य तो हो जाने का अर्थ है विवेकी हो जाना । इसलिये है पर आध्यात्मिक मूल्य बिलकुल नहीं है, वे कोई उक्त तीन गुण विवेकी होने के लिये जरूरी हैं । भी समाजी हों साधक की पहिली श्रेणी में भी उक्त तीन गुणों के प्राप्त हो जाने पर मनुप्य नही आ सकते । दूसरी बात यह है कि विवेक- हीन अवस्था में उनके भीतर जाति-समभाव या लव-साधक योगी हो जाता है और किसी भी धर्म-समभाव आ भी नहीं सकता। अधिक से तरह की मढ़ता कर्तव्याकर्तव्य के निर्णय में अधिक इतना ही होगा कि विषमभाव को प्रगट बाधक नहीं रहती । फिर भी चार तरह की करनेवाले कुछ कार्य न हों । सब के साथ रोटी मूढ़ताओं का कुछ स्पष्ट विवेचन करना ज़रूरी है। बेटी व्यवहार करने पर भी विषमभाव रह सकता क्योकि योगी बनने के लिये इस प्रकार की है । विषमभाव के चिह घृणा और अभिमान मूढ़ताओं का त्याग आवश्यक है । हैं । रोटी-बेटी-व्यवहार का बन्धन न होने पर चार मदनाएँ निम्न लिग्विन है--१ गुरु-मृदना भी राष्ट्र, प्रान्त, रंग आदि के नामपर जातिमद २-शास्त्र मृढता, ३--देव-मृढ़ता १ न्टोक मृदुता । आ सकता है। धार्मिक सम्प्रदायों में समभाव १--गुरु मढ़ता--पूर्ण योगी के लिये रहने पर भी सामाजिक सम्प्रदायों में रीति रिवाज़ो गुरु की आवश्यकता नहीं होता । शिष्टाचार और में विपमभाव आ सकता है । इसलिये जहां विवेक कृतज्ञता के कारण वह पूर्व अवस्था के गुरु को नहीं है वहां वास्तविक समभाव की अति हो गुरु मानता है पर योगी अवस्था में मनुष्य अपना जायगी । धर्म-समभाव में धर्म के नाम पर चलते गुरु आप हो जाता है । साधक अवस्था में प्रायः हुए बुरेसे बुरे क्रियाकाण्ड आदि भी वह मानने गुरु की आवश्यकता होती है पर अधिकांश लोग लगेगा मनुष्य और पशु के बीच जो उचित भेद गुरु मूढ़ता के शिकार बनकर गुरु के लाभ से है वह भी नष्ट हो जायगा इस प्रकार के अति- बञ्चित रहते है और समाज पर कुगुरुओं का वादी समभाव से कोई साधक योगी नही बन बोझ बढ़ाते हैं। सकता । योगी होने के लिये निरतिवादी समभाव चाहिये जो कि विवेक के बिना नहीं हो सकता। कल्याण के मार्ग में जो अपने से आगे है और अपने को आगे खींचने का प्रयत्न योगी होने के लिये विवेक पहिली शर्त है। करता है वह गुरु है । साधुता के बिना कोई सच्चा १ विवेक गुरु नहीं हो सकता साधुता का अर्थ है निःस्वार्थ अच्छे बुरे का --कल्याण अकल्याण का ठीक परोपकार अथवा स्वार्थ से अधिक परोपकार । ठीक निर्णय करना विवेक है । एक तरह से ऐसा साधु को होना ही चाहिये । पहिले सत्यदृष्टि अध्याय मे इसका विवेचन हो गुरु की तीन श्रेणियाँ है--स्वगुरु, संघगुरु २ लक्षण-दृष्टि [६७ . विश्वगुरु । दुनिया के लिये वह कैसा भी हो परन्तु अमुक मानव-समूह का कोई पक्षपात न था। जो हमारा उद्धारक हैं वह स्वगुरु है । परोपकार विश्वहित के नियमों को जीवन में उतार कर बताना आदि तो उसमें भी होना चाहिये इतना ही है कि उस इनका ध्येय था इसलिये ये विश्व-गुरु थे । का उपकार एक व्यक्ति तक ही सीमित रहता है। पर इनके बाद जो साम्प्रदायिक लोग इनके जिसका उपकार किसी एक दल या समाज अनुयायी कहलाये उनके लिये विश्वहित गौण था पर है वह संघ-गुरु है । हिन्दू मुसलमान, ईसाई, अमुक परम्परा या अमुक नाम मुख्य था जिनको जैन, बौद्ध आदि सम्प्रदायों की सेवा करनेवाले अपना मान लिया था उनके लिये वे दूसरों की गुरु भी संघ-गुरु हैं । इसी प्रकार राष्ट्र, प्रान्त पर्वाह नहीं करते थे इसलिये वे नेता अधिक से आदि की सेवा करने वाले भी संघ-गुरु हैं । अधिक संघ-गुरु कहे जा सकते हैं, विश्वगुरु नहीं। प्रश्न-मनुष्य कितना भी शक्तिशाली हो पर प्रश्न-क्या कोई हिन्दू मुसलमान जैन बौद्ध वह सारे जगत के प्रत्येक व्यक्ति की सेवा नहीं या ईसाई आदि रहकर विश्वगुरु नहीं हो सकता ? कर सकता इसलिये बड़ा से बड़ा गुरु भी संव उत्तर-हो सकता है, पर वह हिन्दू या मुस- गुरु कहलायगा फिर विश्व गुरु भेद किस लिये लमान आदि अपने वर्ग के लिये दूसरों का नुक. किया ? सानं न करेगा । नाम की छाप रहेगी . पर काम उत्तर--विश्व-गुरु होने के लिये प्रत्येक व्यक्ति की व्यापक होगा । इसलिये वह विश्वमात्र की सेवा सेवा करने की ज़रूरत नहीं है किन्तु उस उदारता करने की नीति के कारण विश्व-गुरु कहलायगा । की जरूरत है जिस में प्रत्येक व्यक्ति समा सके प्रश्न-इस प्रकार उदारता रखने से ही अगर जिसकी सेवा--नीति मनुष्यमात्र या प्राणिमात्र कोई विश्वगुरु कहलाने लगे तब जिसको पड़ोसी के कल्याण की हो । फैलने के विशाल साधन न भी नहीं जानता वह भी अपने को विश्व-गुरु होने से वह थोड़े क्षेत्र में भले ही काम करे पर कहेगा । विश्व-गुरुत्व बड़ी सस्ती चीज़ हो जायगी। जिसका मन संकुचित न हो वह विश्व-गुरु हैं । उत्तर--विश्व-गुरु को पहिले गुरु होना ही प्रश्न-राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा, मुहम्मद चाहिये, वह सिर्फ उदार नीति रखता है पर उस आदि महात्माओं ने किसी एक जाति या सम्प्रदाय नीति पर दूसरों को चलाने की शक्ति नहीं रखता के लिये काम किया था तो इन्हें संघ-गुरु माना तो वह गुरु ही नहीं है विश्वगुरु क्या होगा ? जाय या विश्वगुरु ? इस प्रकार उदार और गुरु होने के साथ उसका उत्तर--विश्वगुरु । क्योकि इनकी नीति प्रभाव इतना व्यापक होना चाहिये जो ज़माने को मनुष्यमात्र की सेवा करने की थी । उनने जो देखते हुए विश्वव्यापी कहा जा सके। जब जाने सम्प्रदाय भी बनाये व मनुष्यमात्र की सेवा करने आने के साधन थोड़े थे, छापाखाना, समाचार- के लिये स्वयंसेवको के संगठन के समान थे। पत्र, तार आदि न होने से मनुष्य अपना प्र वे जगत्कल्याण की प्रत्येक बात ग्रहण करने बहुत नहीं फैला पाता था तब अरब या मगध को तैयार थे इन्हें कोई पुरानी परम्परा का या ही प्रभाव फैला सकना विश्वगुरुत्व होने के ८ ] सत्यामृत र्याप्त प्रभाव था । आज उतने से काम नहीं चल बहुत लाभ है । उनके पद-चिह्नो से हमे कल्याण- सकता । आज विश्वगुरु होने के लिये कई राष्ट्रों मार्ग पर चलने मे सुभीता होता है। की जनता पर थोड़ा बहुत प्रभाव चाहिये । कल प्रश्न--विश्वगुरु तो हर हालत में आवश्यक गृह नक्षत्र आदि में मनुष्य की गति हो जाय तो मालूम होता है पर संघ-गुरु तो कुगुरु है क्योंकि केवल पृथ्वीपर प्रभाव होने से ही कोई विश्वगुरु न वह अपने संघ की जितनी भलाई करता है कहलायगा । उसे उससे भी अधिक प्रभाव फैलाना उससे अधिक दूसरे संघो की बुराई करता है । पड़ेगा । इसलिये विश्वगुरु होने के लिये उदार नीति, गुरुत्व और व्यापक प्रभाव चाहिये । उत्तर-जैसे स्वगुरु का यह अर्थ नहीं है कि पर की बुराई करे उसी प्रकार संघगुरु का प्रश्न--ऐसा भी देखा गया है कि गुरुत्व और भी यह अर्थ नहीं है कि वह संघ की बुराई करे । उदारता होने पर भी जीवन में किसी का प्रभाव भलाई का सेवा-क्षेत्र परिमित है और बाकी क्षेत्र नहीं फैला और मरने के बाद वह अपेक्षाकृत पर काफी उपक्षा है यही उसका संघ--गुरुत्व है, विश्वव्यापी हो गया। जैसे म. ईसा को लीजिये, पर अगर विश्वका अहित करे तो वह एक प्रकार उनके जीवन मे उनके अनुयायी इनेगिने थे पर आज करोड़ों की संख्या में है तो उनका गुरुत्व का कुगुरु हो जायगा । एक आदमी धर्म-मद उनके जीवन-काल की दृष्टि से लगाया जाय या के वश में होकर जगत की निन्दा करता है, सत्र को मिध्यात्वी या नास्तिक बताता है तो वह आज की दृष्टि से । उत्तर--ऐसे व्यक्ति मरने के बाद गुरु नहीं रहते, वे देव-व्यक्तिदेव-बन जाते हैं । यह स्थान प्रश्न-पर-निन्दा से अगर गुरु कुगुरु वन विश्वगुरु से भी ऊँचा है । पर मानलो कोई देव जाय तो सत्य-असत्य की परीक्षा करना कठिन नहीं बन सका, वह मनुष्यमात्र का सेवक या हो जायगा क्योंकि असत्य की निंदा करने से गुरु था पर अपने जीवन मे नहीं फैला तो भी वह आप उसका गुरुत्व छीनते है | विश्वगुरु कहा जायगा। क्योंकि विश्वगुरु होने का उत्तर-असत्य की निंदा करना बुरा नहीं बीज उसके जीवन में था जो कि 'समय पाकर है, निप्पक्ष आलोचना आवश्यक है और कल्याण- फल गया । जीवन में फले' या जीवन के बाद फले कर को कल्याणकर और अकल्याणकर को अक- वह विश्वगुरु कहलाया । जो लोग बीज से ही ल्याणकर भी कहना ही पड़ता है पर यह कार्य फल का अनुमान कर सकते है उस की दृष्टि में निष्पक्ष आलोचक बन कर करना चाहिये और वह पहिले ही विश्वगुरु था-बाकी जगत की दृष्टि धर्ममद आदि मद के कारण पर-निन्दा कभी न में फलने पर हो गया। करना चाहिये। प्रश्न-इस प्रकार स्वर्गीय लोगों को विश्वगुरु प्रश्न-निप्पक्षता से क्या मतलब है ? हर- ठहराने से उन्हें क्या लाभ ? और अपने को एक मनुष्य कुछ न कुछ अपने विचार रखता क्या लाभ? ही है-आलोचना करते समय वह उन्हें कहाँ फेक उत्तर-उनको तो कोई लाभ नहीं पर हमें देगा ? कुगुरु है। -- . 13 [६९ लक्षण-दृष्टि वह कुगुरु है - उत्तर-अपने विचार होना ही चाहिये पर चिपके न रहना चाहिये। अगर कोई गुरु ऐसा उनके अनुसार सिर्फ मन को ही बनाकर रक्यो पक्षपाती हैं तो वह कुगुरु है । जो स्वयं सत्य को जिससे उनके अनुसार काम कर सको। दृढ़ नहीं पा सकता वह दूसरों को कैसे सत्य प्राप्त निश्चय होना भी अच्छा है पर मनके समान करायगा और कैसे सत्पथ पर चलायगा ? बुद्धि को भी उनका गुलाम बनाकर मत रक्खो प्रश्न-कुगुरु किसे कहना चाहिये ? आलोचना करते समय बुद्धिको बिलकुल स्वतंत्र रक्खो, उत्तर-जो गुरु नहीं है किन्तु शब्द-भापा अनुभव और तर्कका निर्णय माननेको तैयार रहो। या मौन-भाषा द्वारा गुरु होने का दावा करता है प्रश्न--घटना-विशेष पर कभी कभी ऐसा अनुभव होता है कि वह पुराने अनुभवों को प्रश्न-शब्द-भाषा और मौन-भाषा का क्या नष्ट सा कर देता है। जो जीवनभर हितैषी होने से मतलब? प्रिय रहा है वह अप्रिय सा मालूम होने लगता उत्तर-शब्दो से बोलकर या किसी प्रकार है, चिकित्सा के कष्ट से घबरा कर रोगी वैद्य को लिख कर विचार प्रकट करना शब्द-भाषा है। भी बुरा समझने लगता है । इसी प्रकार कोई कोई विद्वान अपने बुद्धि-वैभव से सत्य को भी असन्य तार आदि में जो स्वर-व्यञ्जन-संकेत होते है वह भी शब्द-भाषा है पर वेष से या किसी तरह के सिद्ध कर देता है, अगर ऐसे समय में बुद्धि को स्वतंत्र छोड़ दिया जाय तो वैद्य को शत्रु मानना व्यवहार से अभिप्राय प्रगट करना मौन-भाषा है । पडेगा और सत्य को असत्य मानना पड़ेगा । किसी भी तरह से जो गुरु होने का दावा करे किन्तु गुरु न हो वह कुगुरु है । उत्तर-यह बुद्धि का नहीं मनका दोष है । प्रश्न-जो गुरु नहीं है उसे अगुरु कहना क्षुब्ध हो उस समय चाहिये कुगुरु क्यो ? मनुष्य सन्यासत्य का निर्णय नहीं कर सकता, कम से कम जिस विषय में क्षोम है उस विषय में नहीं उत्तर-अगुरु तो प्रायः सभी हैं । पर जो कर सकता या कदाचित् ही कर सकता हैं । गुरु न होने पर भी गुरु. होने का दावा करे वह इसलिये रोगी के क्षुब्ध मन के निर्णय का कुछ वंचक है इसलिये कुगुरु है । मूल्य नहीं; रही बुद्धि के विमोहित होने की बात प्रश्न-हो सकता है कि कोई गुरु न हो पर सो विचारणीय विषय जैसा गंभीर हो उसके लिये अपने से अच्छा हो तो उसे गुरु मानने में क्या उतना समय देना चाहिये और निप्पक्ष विचारक बुराई है ? के नाम पर इतना कहना चाहिये कि अभी तो उत्तर-अपने से अच्छा हो तो इतना ही इस बात का उत्तर नहीं सूझा है पर कुछ समय मानना चाहिये कि वह अपने से अच्छा है । अगर बाद भी अगर न सूझेगा-दूसरों से चर्चा करने पर वह अच्छापन हमें भी अच्छा बनाने के काम भी अगर न मिलेगा तो अवश्य विचार बदल दूंगा। आता हो तो स्वगुरु मानना भी ठीक है पर अमुक काफ़ी समय लगाने पर भी अगर अपने विचार आदमी से अच्छा होने के कारण कोई गुरुत्व का परीक्षा में न ठहरें तो मोहवश या मद-वश उनसे दावा करे तब वह कुगुरु ही, है । वह अपने से जिस समय मन ७० ] सत्यामृत जितना अच्छा है उतना उसका आदर आदि जैनमुनि, बौद्ध श्रमण, हिन्दु संन्यासी, पाढरी या होना चाहिये पर गुरु मान कर नहीं । खोटा फकीर आया तो जबतक उसके विशेष गुणो का रुपया पैसे की अपेक्षा अधिक कीमती होने पर परिचय नहीं मिला है तबतक वह एक सभ्य भी बाजार में नहीं चलता क्योकि वह रुपया बन गृहस्थ के समान आदर पायगा । बाद मे परिचय कर चलना चहता है इसी प्रकार अगुरु हमसे होने पर उस समाजसेवी की अपेक्षा साधुवधी सिर्फ कुछ अच्छा होने पर जब गुरु बन कर की सेवा आदि जैसी कम--ज्यादा होगी उसके चलना चाहता है तब खोटे रुपये की तरह निद अनुसार आदर पायगा । नीय है। प्रश्न-वेप की उपयोगिता कहाँ तक है नियत वेष रखना चाहिये या नहीं? सब को परन्तु यह भी ख़याल चाहिये कि अच्छेपन की निशानी १ वेप, २ पद, ३ व्यर्थ क्रिया, और कैसा वेप रखना चाहिये ? ४ व्यर्थ विद्या नहीं । बहुत से लोग इनको उत्तर-वेप भी एक तरह की भाषा है इस गुरुत्व का चिह्न समझते है पर यह गुरु-मूढ़ता लिये अपने व्यक्तित्व का परिचय इस मान मापा का परिणाम है में दिया जाता है। पर भापा तो यही बता सकती नग्नता, पीले वस्त्र, सफेद वस्त्र, भगवा है कि यह आदमी यह वात प्रगट करना चाहता तो है नही वस्त्र, जटा, मुँहपत्ति आदि अनेक तरह के जो . है यह बात इसमे है ही ऐमा नियम साधुवेष है उन्हे गुरुता का या साधुता का चिह्न इसलिये जैसे कहने मात्र से हम किसी को साधु न समझना चाहिये । वेष तो सिर्फ अमुक संस्था या महापुरुष नहीं मान लेते-उसके अन्य कार्यों के प्रमाणित या अप्रमाणित सदस्य होने की का विचार करते हैं उसी प्रकार वेप-मात्र से निशानी है पर किसी संस्था के सदस्य हो जाने किसी को साधु न मान लेना चाहिये। किसी से गुरुत्व या साधुता नहीं आती। संस्था की सदस्यता बताने के लिये नियत-वेष भी उचित है फिर भी वेप ऐसा रखना चाहिये प्रश्न-दुनिया के बहुत से काम वेष से ही जो वीभन्स या भयंकर न हो। नग्न वेप लेकर चलते है । खास कर अपरिचित जगह में कौन नगर मे घूमना, खोपड़ियाँ पहिनना आदि अनु- मनुष्य कितना आदरणीय है. इसका निर्णय उसके चित है । साथ ही वेष अपनी सुविधा, जलवायु वेप से ही करना पड़ता है। तथा आर्थिक स्थिति के अनुसार होना चाहिये । उत्तर-वेप के ऊपर पूर्ण उपेक्षा करने की वेप के द्वारा जनता मे भ्रम पैदा न करना आवयकता नही है किन्तु उसकी उपयोगिता चाहिये और न अपने से भिन्न वेप देखकर घृणा । मामूली शिष्टाचार तक ही रहना चाहिये । विनय वेप को लेकर साधुता में काफ़ी भ्रम पैदा के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। शिष्टा किया जाता है क्योकि साधुता सबसे अधिक पूज्य चार में भी साधुता या अन्य गुणो की अवहेलना न और वंदनीय है और गुरुता तो उससे भी अधिक । होना चाहिये । उदाहरणार्थ एक समाजसेवी गुरुता का तो हमारे जीवन की उन्नति-अवनति निदान या श्रीमान है. इतने में एक साधुवेपी से बहुतसा सम्बन्ध है, इसलिये इस विषय मे । - लक्षण-दृष्टि [ ७१ हो रहा हो या बहुत सतर्क रहने की जरूरत है। सिर्फ वेप संस्था की व्यवस्था के लिये बनाये थे । हरएक देख कर किसी को गुरु या साधु न मानना चीज़ का दुरुपयोग होता है--पद का तो कुछ चाहिये । विशेष मात्रा में। फिर भी जो उस संस्था के अंग प्रश्न-जो साधु-संस्था जगत का कल्याण हैं उन्हें पद का सन्मान रखना चाहिये । उसका करती हो उसमें अगर घोखे से कोई निर्वल या दुरुपयोग अनावट्यक चालाक आदमी घुस जाय और अपने दोप से हो तो भले ही वह नष्ट कर दिया जाय पर उस साधु-संस्था की बदनामी करे तो साधु व्यवस्था के लिये पद का सन्मान करना उचित संस्था की बदनामी रोकने के लिये उस साधु है। इतना होने पर भी पद गुरुता की निशानी वेपी के दोष छिपाये रखना और माधु-संस्था नहीं है और पद का दुरुपयोग हो रहा हो तो के सन्मान करने के लिये उस साधु का सन्मान उसको निभाते जाना भी उचित नहीं है । साधक करना क्या अनुचित है ? किसी पद के कारण किसी को गुरु नहीं बनाता। उत्तर-अनुचित हैं । साधु-संस्था को बद क्रियाकाण्ड भी गुरुता की निशानी नहीं नामी से बचाने के लिये दोपी के दोष दूर करने है । एक आदमी अनेक तरह के आसन लगाता की या उसे अलग कर देने की जरूरत है न कि है, अनेक बार स्नान करता है या बिलकुल छिपाने की । छिपाने की नीति में साधु-संस्था स्नान नहीं करता, धूप में तपता है या अग्नि बदमाशो का अड्डा बन जानी है और नपता हैं, सिर के बाल हाथ से उखाड़ लेता है, सबसे पवित्र संस्था सबसे अधिक घंटे पूजा करता है, जाप जपता है, एकान्त में अपवित्र होकर जनता नाश करती बैठता है, मौन रखता है या दिन भर नाम आदि है और साधु-संस्था की बदनामी सदा के लिये जपता रहता है, उपवास करता है या एक ही वार हो जाती है । दुराचारी और बदमाश लोगों को खाता है, अनेक घरों से मांगकर- खाता है या उससे अलग कर दिया जाय तो जनतापर इस एक ही घर में खाता है इत्यादि बहुतसा क्रिया- का अच्छा प्रभाव पड़ता है। जनता समझने काण्ड भी गुरुता की निशानी नहीं है। उनमें लगती है कि इस साधु-संस्था मे खराब आदमी बहुतसा निरर्थक है, बहुतसा सिर्फ व्यायाम के की गुजर नहीं है, खराब आदमी यहां से समान उपयोगी है वह भी किसी खास समय के निकाल दिया जाता है, । वेप की इज्जत रखना लिये-पर गुरुता की निशानी कोई नहीं है। हो तो वेप का दुरुपयोग न करने देना चाहिये । क्रियाकाण्ड वही उपयोगी है जिससे जगत फिर भी यह तो हर हालत मे आवश्यक है कि की सेवा होती की सेवा होती हो, जगत का कुछ लाभ होता वेप की इज्जत साधुता आदि से अधिक न हो। हो । किसी तरह से असाधारणतावतला कर वेप के समान पद भी गुरुता की निशानी लोगों को चमकाना, उनका ध्यान अपनी तरफ़ नहीं है । पद का सम्बन्ध किसी संस्था की खींचना प्रकार व्यवस्था से है--गुरुता से नहीं । आचार्य, पोप कराना एक प्रकार का दंभ है । इस का गुरुता खलीफा आदि मंद समय समय पर लोगों ने धर्म- से कोई सम्बन्ध नहीं । इसलिये . गुरुता के लिये का . और इस अपनी पूजा १] सत्यामृत , व्यर्थ क्रियाकाण्ड है। अंकुश है उन्हें गुरु की कोई जरूरत नहीं । कष्ट-सहन भी पर-सेवा मे उपयोगी होना गुरु मिल जाय तो अच्छा, न मिले तो गुरुहीन हिये । निरर्थक कष्ट-सहन का कोई मूल्य नहीं जीवन अच्छा, पर कुगुरु-सेवा अच्छी नहीं । भूख य हाय, ये कितना कष्ट सहते है अपन तो से आदमी इतनी जल्दी नहीं मरता जितनी जल्दी तना नहीं सह सकते, ऐसा आश्चर्य निरर्थक विष खाकर मरता है । गुरुहीन से कुगुरु-सेवक कष्ट-सहन के विषय मे नही करना चाहिये । की हानि कई गुणी है। प्रश्न-गुरु का तो नाश ही करना चाहिये। कोई कोई सार्थक क्रियाएं भी होती है, जैसे गुरु के होने से गुरुडम फैलता है, धर्म के नाम सेवा, विनय आदि । ये साधुता के चिह्न है अपने पर अत्याचार शुरू होते है, समाज का बोझ से अधिक मात्रा मे हों तो गुरुता के चिह्न बन बढ़ता है । आखिर गुरु की जरुरत ही क्या है ? सकते है। उत्तर-वैधानिक आवश्यकता नहीं है। विद्वत्ता भी गुरुता का चिह्न नहीं है । अमुक आदमी को गुरु मानना ही चाहिये या अनेक भाषाओ का ज्ञान वक्तृत्व, लेखन, कवित्व, गुरु का पद होना ही च हिये यह नियम भी नहीं धर्म दर्शन इतिहास पदार्थ विज्ञान गणित ज्योतिष है । । गुरुडम फैला है वेप और पद को अधिक आदि का पांडित्य यश और सन्मान की चीज़ महत्त्व देने से। सो नहीं देना चाहिये। जब गुरु है पर इसका गुरुत्व से सम्बन्ध नहीं है। इससे के योग्य गुण दिखे तभी गुरु मानना चाहिये । मनुष्य शिक्षक हो सकेगा-गुरु नही । गुरुता का हमारे सम्प्रदाय का आचार्य है, मुनि है, अमुक सम्बन्ध सदाचार और सेवा से है। वेष में रहता है इसलिये हमारा गुरु है जब यह पर इसका यह मतलब नहीं है कि गुरु नियम टूट जायगा तब गुरुडम न फैल पायगा । मे विद्वत्ता न होना चाहिये । विद्वत्ता तो होना गुरुडम शब्द ऐसे गुरुवाद के लिये प्रचलित है चाहिये । भले ही वह विद्वत्ता पुस्तक पढ़कर न जिस में गुरु पद-वेप आदि के कारण भक्तोपर आई हो-प्रकृति को पढ़कर आई हो। बिना ज्ञानके अनुचित अधिकार रखता है या उस अधिकार गुरुत्व मिल नहीं सकता-न टिक सकता है । का दुरुपयोग करता है, साधताहीन जीवन बिताता अपना असली गुरु तो मनुष्य स्वयं है पर है, छलकर लोगो की सम्पत्ति लूटता है और उससे मौज करता है, उन्हे अन्धश्रद्धालु बनाता हरएक को कल्याण-मार्ग का पूरा परिचय नहीं होता कभी कभी जटिल समस्याएँ आकर किंकर्तव्य- है । ऐसे गुरुडम का नाश अवश्य करना विमूढ़ बना देती है, कभी कभी समझते हुए भी चाहिये । पर जहाँ ज्ञान, त्याग, सेवा, विवेक हैं खुद पर अंकुश रखना कठिन होता है इसके वहाँ गुरुत्व माना जाय तो कोई हानि नही लिये अधिकांश मनुष्यो को गुरु की आवश्यकता बल्कि लाभ है। होती है पर गुरु बनाना ही चाहिये-ऐसा प्रश्न-लाभ क्या है ? कोई नियम नहीं है। जिन में सदसद्विवेक उत्तर--अज्ञान के कारण कोई अच्छी बात काफी है और मनकी उद्दाम वृत्तियों पर भी हमारी समझमे नहीं आती तो वह समझाता है, , है लक्षण-दृष्टि - . कुमार्ग में जाने से रोकता है, प्रमाद दूर करता वनना जरूरी है। इस प्रकार गुरु की पूर्ण है, साहस देता है, धैर्य की रक्षा करता है, विपत्ति परीक्षा कर गुरु-मूढ़ता का हर प्रकार त्याग करना में सहायक होता है और भी जो उचित सेवाएँ चाहिये । साधक गुरु-मूढ़ता से सदा दूर रहता है । हो. सकती हैं-करता है। शास्त्र-मूढता-साधक में शास्त्र--मूढ़ता भी प्रश्न-गुरु, और शिष्य में अन्तिम निर्णय नहीं होती । परम गुरुओं या गुरुओं के वचन ). कौन करे ? अगर शिष्य की चलती हैं तो गुरु शास्त्र हैं । जब हम गुरुओं की परीक्षा करते हैं गुलाम बन जाता है फिर वह उद्धार क्या करेगा और तो शास्त्र की भी परीक्षा करना आवश्यक है। गुरु की चलती है तो गुरुडम फैलता है । प्रश्न-गुरुओं की परीक्षा करने से काम उत्तर-यह तो राजी राजी का सौदा हैं । चल जाता है फिर शास्त्रों की परीक्षा करने की दोनों अपनी अपनी जगह स्वतन्त्र हैं, शिप्य को गुरु क्या ज़रूरत है ? खासकर परम गुरुओं के की परीक्षा करने का पूर्ण अधिकार है इसलिये . वचनो की परीक्षा करना तो और भी अना- गुरुडम फैलने की बहुत कम सम्भावना है और वश्यक है। सच्चा गुरु शिष्य की पर्वाह नहीं करता वह उसके उत्तर-इसके पांच कारण हैं । १ गुरु- हित की पर्वाह करता है। इसलिये गुरु के गुलाम परोक्षता, २ परिस्थिति-परिवर्तन, ३ शब्द-परिव- होने की सम्भावना नहीं है। तन, ४ अर्थ-परिवर्तन, ५ अंविकास । प्रश्न-गुरु की परीक्षा कैसे होगी ! जो दोप शास्त्र के समय गुरु या तो स्वर्गीय हो जाते अपने में हैं उन्हें दूसरे में निकालना कहाँ तक हैं या बहुत दूर हो जाते हैं। जब गुरु नहीं उचित हैं ? मिलते तब हम उनके वचनों से काम चलाते उत्तर-ई द्वेष आदि के वश होकर किसी हैं । ऐसी हालत में गुरु की परीक्षा करने का के दोप न निकालना चाहिये पर किसी पर कोई ठीक ठीक अवसर ही नहीं मिल पाता तब जिग्मेदारी डालना है तो उसमें उस जिम्मेदारी सत्यासत्य की जाँच करने के लिये उनके वचनों को सँभालने की योग्यता है या नहीं इसकी जाँच की परीक्षा करना आवश्यक है। परम गुरु का तो करना ही चाहिय । हो सकता है कि जो दोप मतलब है ऐसा महान विश्वगुरुं जो देव कोटि मे उसमें है वह दोप अपने में उससे अधिक हो जा पहुंचा है अर्थात् व्यक्तिदेव । व्यक्तिंदव की और अपने दोपों की संख्या भी अधिक हो फिर भी परीक्षा करना ज़रूरी है क्योंकि ऐसा भी हो भी हम उसके दोप निकालेंगे क्योंकि उससे हमें सकता है कि अयोग्य व्याक्त भी कारणवश व्यक्ति- अमुक योग्यताका काम लेना है, अध्यापक अगर देव मान लिया गया हो। इस प्रकार किसी के अध्यापक के योग्य नहीं है तो इतने से ही वह भी वचन हों उनकी यथासम्भव जाँच तो होना संतोष नहीं हो सकता कि विद्यार्थी तो और कम ही चाहिये । परोक्ष होने के कारण गुरु की जाँच जानता है । गुरु को गुरु के योग्य बनना चाहिये। नहीं हो सकती तो उसके वचन की जाँच जो जिस पद पर है उसे उस पद के योग्य आवश्यक है।
७४ ] सत्यामृत है परिस्थिति के बदलने से भी शास्त्र की बहुत अगर ज्ञान का विकास हो जाने से पुरानी मान्य- सी बातें आग्रह्य हो जाती है। जो बात एक. ताएं अतथ्य हो गई है तो उन्हें बदल देना समय के लिये जनकल्याणकर होती है वही दूसरे चाहिये । शास्त्रकार जितना कर सकते थे किया, समय के लिये हानिकर या अनावश्यक हो जाती अब हमे कुछ आगे बढ़ना चाहिये और शास्त्र- है। इस में शास्त्र का दोष नहीं है यह प्रकृति कारो ने जितनी सामग्री दी उसके लिये उनका का ही परिणाम है। उस परिस्थिति के विचार कृतज्ञ होना चाहिये और कृतज्ञतापूर्वक उनके से भी शास्त्र की परीक्षा आवश्यक वचनों की परीक्षा करना चाहिये । याद रखने में या कागज आदि पर नकल जहां परीक्षकता है वहां शास्त्र-मूढता नहीं करने या छापने में शास्त्रों के शब्द बदल जाते रहती, परीक्षकता के विषय में और शास्त्र के उप- है इस प्रकार शास्त्र ज्यों के त्यों नहीं रह पाते योग के विषय में पहिले अयाय में जो कुछ इसलिये शास्त्र की परीक्षा आवश्यक है । लिखा गया है उस पर ध्यान देने से और उसे कभी कभी शब्द तो नहीं बदलते पर अर्थ जीवन में उतारने से शास्त्र-मूढता दूर हो जाती बदल जाता है । कुछ तो बहुत समय बीत जाने है फिर भी स्पष्टता के लिये कुछ कहना से शब्दों का वास्तविक अर्थ मालूम नहीं रहता ज़रूरी है। जैसा कि वेदों के विषय मे है । और कुछ लक्षण शास्त्र मूढ़ता के कारण नाना- तरह के मोह व्यंजना आदि से अर्थ बदल दिया जाता है। यही है। १ स्वत्वमोह, २ प्राचीनता-मोह, ३ भाषा- कारण है कि एक ही पाठ के नाना अर्थ हो मोह ४ वेष-मोह आदि । जाते हैं और उन अर्थो के सम्प्रदाय भी चल अपने सम्प्रदाय के, जाति के, प्रान्त के और जाते हैं इसलिये भी शास्त्र की परीक्षा आवश्यक है । देश के आदमी की बनाई यह पुस्तक है इसलिये शास्त्रकार-फिर वे गुरु या परम गुरु कोई सत्य है यह स्वत्व-मोह है। स्वर्गीय विद्वान की भी हो-ऐसे सर्वज्ञ नहीं हो सकते कि बनाई यह पुस्तक है इसलिये सत्य है यह प्राची- जिनके ज्ञान को ज्ञान की सीमा कहा जा सके। नता-मोह है । यह पुस्तक संस्कृत प्राकृत अरबी ऐसा सर्वज्ञ कोई भी नहीं हो सकता। वह अपने फारसी 'लेटिन भाषा की है इसलिये सत्य है यह जमाने के अनुरूप महान ज्ञानी हो सकता है । भाषा-मोह है। यह पुस्तक जिसने बनाई है वह पर उसके बाद जगत ज्ञान की वृद्धिः स्वाभा संन्यासी था मुनि था फकीर था इसलिये सत्य है विक है । संयम का विकास भले ही न हो पर यह वेष-मोह है । ये सब मोह शास्त्र-मूढ़ता के ज्ञान का विकास सहज ही होता है और हो रहा है। चिह्न है । बहुत से लोग किसी पुस्तक को इसी- इसलिये शास्त्रों में ऐसी बहुत सी बातें आ जाती' लिये शास्त्र कह देते है कि वह पुस्तक संस्कृत हैं जो आज तथ्यशून्य कही जा सकती है। आदि किसी प्राचीन भाषा मे बनी है, अपने इस में शास्त्रकारों का अपराध नहीं होता क्यों सम्प्रदाय की है और बनाने वाला मर गया कि उनने तो अपने ज़माने में जितना तथ्य मिल यह मान्यता शास्त्र-मूढ़ता का परिणाम है । सकता था उतना तथ्य लिख दिया। अब आज प्रकार शास्त्रमूढ़ता के और भी रूप हैं उन सब में 4 -- है - -- । इस - 1 लक्षण-दृष्टि - सकता है ? - । का त्याग करना चाहिये और शास्त्र की यथा करके माने, इतना ही नहीं किन्तु माँ साध्य परीक्षा करके उसका उपयोग करना भी परीक्षा करे ? जब सरस्वती माता की चाहिये। की जाती है, गुरु की परीक्षा की जाती प्रश्न-परीक्षा करके ही अगर शास्त्र माने माँ बाप की परीक्षा क्यों नहीं ? पर इस जाय तो शास्त्र की उपयोगिता ही नष्ट, हो जायगी परीक्षकताऽद्वैत से क्या जगत का ५ शास्त्र की परीक्षा का अर्थ है उसमें लिखे हुए विषयों की परीक्षा । जिज्ञासु उनकी परीक्षा कैसे उत्तर-दुनिया दुरंगी है, भीतर करे ? जाने तो परीक्षा करे परीक्षा करे तो जाने, तथा वाहर कुछ और इसलिये परीक्षक फिर पहिले क्या हो? मनुष्य की गुजर नहीं हो सकती? उत्तर--यहाँ एक तीसरी चीज़ भी है-मानना। जन्म से विश्वासी होता है, दूसरों से 4 पहिले जाने, फिर अपने अनुभव तथा अन्य ज्ञान पर वह परीक्षक बनना सीखता है । इस के आधार से परीक्षा करे फिर माने । परीक्षा के अनुभव ज्यों ज्यों बढ़ते जाते हैं त्यों .. करके मानने की ज़रूरत है--जानने की नहीं। परक्षिक बनता जाता है और जहाँ । जानना तो पहिले भी हो सकता है । बन पाता वहां विश्वास से काम लेता है। म जीवन व्यवहार विश्वास और परीक्षा के . प्रश्न-जो शास्त्र की परीक्षा कर सकता चलता है जहां अपनी गति हो वहां है उसे शास्त्र की जरूरत क्या है ? जिस बुद्धि. करना चाहिये, बालक माँ बाप की बात की वैभव से वह शास्त्र की परीक्षा कर सकता है करते हैं और माँ बाप की भी परीक्षा उसी से वह शास्त्र में वर्णित विषय क्यों न जाने ? जब बालक माँ बाप की बात का भी उत्तर--परीक्षा में उतने बुद्धि-विभव की नहीं करता है। तब समझना चाहिये कि जरूरत नहीं होती जितनी शास्त्र के निर्माण में । परीक्षकता है हरएक आदमी निर्माता को अप्राप्त वस्तु प्राप्त करना पड़ती है, माँ बाप नहीं कहता, विशेष आकृति स्वर परीक्षक को प्राप्त वस्तु की सिर्फ जाँच. करना माँ बाप को- पहिचानता है-यह माँ पड़ती है । प्राप्त वस्तु को जाँचना सरल है पर परीक्षा है। जैसी उसकी योग्यता है वैसी उसका निर्माण या अर्जन कठिन है इसलिये हर कता है । प्रारंभिक शिक्षण में विश्वास एक आदमी शास्त्र-निर्माता नहीं हो सकता पर लेना ही पड़ता है और परीक्षकता- का परीक्षक हो सकता है। भी कुछ नियमों के अनुसार करना इ. प्रश्न--परीक्षक बनने के लिये कुछ विशेप परीक्षा करने में तीन बातों का विचार ज्ञान की आवश्यकता है पर बिना परीक्षा किये चाहियेः किसी की कोई बात मानना ही न चाहिये ऐसी १ वस्तु का मूल्य २ परीक्षा की हालत में विशेष ज्ञान कैसे मिलेगा ? बालक का वना की मात्रा, ३ परीक्षा न करने से भी कर्तव्य होगा कि वह माँ बाप की बात परीक्षा की मर्यादा . A ६] सत्यामृत --- १ सोना चाँदी आदि की जितनी परीक्षा सम्भव है या नहीं ? जब विरोध समझ में आ की जाती है उतनी साधारण पत्थरों की नहीं। जाये तब मोहवश असत्य को अपनाये न रहे। उसी प्रकार गुरु शास्त्र देव आदि की जितनी इस प्रकार शास्त्रों की परीक्षा करके शास्त्र- परीक्षा की जाती है उतनी अन्य सम्बंधियों की मूढ़ता का त्याग करना चाहिये । नहीं, क्योंकि गुरु शास्त्र आदि पर लोक-पर- देव मूढता-जीवन का आदर्श देव है। लोक का कल्याण निर्भर है। जीवन के आदर्शरूप में जब हम किसी तत्त्व २ शास्त्र गुरु आदि की परीक्षा जितनी को अपनाते हैं तब वह गुणदेव कहलाता है, सुसम्भव है उतनी माता पिता आदि की नहीं । जब किसी व्यक्ति को अपनाते है तब उसे व्यक्ति- सम्भव है माता पिता कहलानेवाले माता पिता देव कहते है । सत्य अहिंसा आदि गुणदेव हैं, न हो कुछ संकरता हो, शैशव में उनने राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा मुहम्मद, जरथुम्त अपना लिया हो, तो हमारे पास ऐसे चिह्न नहीं. आदि व्यक्तिदेव हैं। गुणदेवों को जीवन मे उता- है कि उनकी ठीक ठीक जाँच कर सके । इस रना व्यक्ति-देवों के जीवन से शिक्षा लेकर उन लिये माता पिता की असलियत की जाँच कम का उचित अनुकरण करना, उनके विषय में की जाती है। अपनी भक्ति बताने के लिये आदर, पूजा, सत्कार ३ माता पिता अगर असली न हो तो भी स्तुति करना, यह सब देवों की उपासना है । उससे कोई विशेष हानि नहीं है पर गुरु शास्त्र साधक ऐसी देवोपासना तो करता है पर वह देव- आदि के विषय में ऐसी उपेक्षा नहीं की जा मूढ़ता का परिचय नहीं देता । देव-मूढ़ता सकती । उनके असत्य होन से जीवन नष्ट हो पाँच तरह की है १ देव-भ्रम अदेव को देव सकता है। मानना २ रूप-भ्रम देव का स्वरूप विकृत या शास्त्र की परीक्षा में सरस्वती माता का असत्य कल्पित करना ३ कुयाचना अनुचित अपमान न समझना चाहिये। सरस्वती तो सत्य मांग पेश करना ५ परनिंदा एक देव की पूजा मयी है और शास्त्र के नाम पर तो सत्य-असत्य के लिये दूसरे देव की निन्दा करना । सभी चलता है, उसकी परीक्षा करके सत्य को १-भय से, मोह से और अन्ध-श्रद्धा से किसी खोज निकालना सरस्वती की खोज करना है को देव मानना देवभ्रम है। जैसे भूत पिशाच उसकी परीक्षा करके उसका अपमान नहीं । शीतला आदि को देव मानना उनकी पूजा करना । सत्य की खोज करना भगवान सत्य का अपमान पहिले तो भूत पिशाच आदि कल्पना रूप हैं । नहीं सन्मान है। परीक्षा को अपमान नहीं सम एक तरह के शारीरिक विकारो को लोग भतावेश झना चाहिये । इसलिये शास्त्र-परीक्षा अवश्य कहने लगते है पर अगर ये हो भी, तो भी. इन्हें करना चाहिये । हां, जहां अपना बुद्धि-वैभव देव मानना देवभ्रम है । क्योकि ये आततायी काम न दे वहां विश्वास से काम लें फिर भी है-आदर्श नहीं । अगर ये उपद्रव करें तो इन्हें इतना तो समझ ही लेना चाहिये कि वह प्रमाण दंड देना चाहिये । दंड नहीं दे सकते तो इसका विरुद्ध तो नहीं है, देशकाल को देखते हुए यह मतलब नहीं है कि इन्हे देव माना जाय ।
प स लक्षण-दृष्टि [७७ m- शनैश्रर आदि ग्रहों को देव मानना भी. देवभ्रम है और सत्य भी है इसलिये ईश्वर की मान्यता है । अनन्त आकाश में घूमनेवाले ये भौतिक पिंड देव-मूढ़ता नहीं है । कोई प्राणी नहीं हैं कि इन्हें देव माना जाय । प्रश्न-मूर्ति को देव मानना तो देवभ्रम इनकी गतिका जीवन पर ऐसा प्रभाव नहीं पड़ता अवश्य है । क्योंकि मूर्ति तो पत्थर आदि का पिंड जैसा कि लोग समझते हैं । वायुमण्डल आदि. पर है । वह देव कैसे हो सकता है ? कोई प्रभाव पड़ता भी हो तो भी इन्हें देव मानने उत्तर-मूर्ति को देव मानना देवभ्रम है पर की जरूरत नहीं है । अगर इनका कोई दुष्प्रभाव मूर्ति में देव होता हो तो उससे बचने के लिये हमें कोई नहीं है । अपनी भावना को व्यक्त करने के लिये की स्थापना करना देवभ्रम चिकित्सा करना चाहिये, इनकी पूजा करना और कोई न कोई प्रतीक रखना उचित हैं । जैसे इन्हें ग्वन करने की कल्पना से इनके दुष्प्रभाव कागज और स्याही को (पुस्तकों को) ज्ञान समझना से बचने की आशा करना मूढ़ता है । इस मूढ़ता भ्रम है पर उसमें ज्ञान की स्थापना करके उसके से बड़ी भारी हानि यह है कि मनुष्य योग्य चिकित्सा द्वारा ज्ञानोपार्जन करना भ्रम नहीं हैं। हाँ, जब से वञ्चित हो जाता है और अयोग्य चिकित्सा में हम कला आदि का विचार न करके अन्ध-श्रद्धा- अपव्यय करता हैं इस प्रकार दुहरी हानि उठाता है । वश किसी मृत्तिविशेष में अतिशय मानते हैं, उसे प्रश्न-ईश्वर भी एक कल्पना है तो क्या देव को पढ़ने की पुस्तक न समझ कर देव ही उसे मानना भी देवभ्रम समझा जाय ? समझन लगते हैं तब यह देवभ्रम हो जाता है । उत्तर-भय से, मोह से और अन्ध श्रद्धा से ईश्वर कोई मूर्ति मुन्दर और कलापूर्ण है तो उस दृष्टि मानना देवभ्रम है पर विचारपूर्वक ईश्वर मानना से उसका महत्त्व समझो, अगर उसका कोई अच्छा और किसी तरह की अनुचित आशा नहीं रखना इतिहास है तो ऐतिहासिक दृष्टि से उसे महत्त्व देवभ्रम नहीं है । जगत्का ईश्वर कल्पित भी हो - दो पर उसमें दिव्यता की कल्पना मत करो, उसे तो भी यदि उसका दुरुपयोग न किया जाय, तो देव मत समझो देवमूर्ति समझो । देवभ्रम नहीं है। जैसे पाप करना और ईश्वर प्रश्न-मूर्ति द्वारा देव की उपासना करते की पूजा करके पाप के फल से छुटकारा मानना यह समय अगर हम मूर्ति को न भुला सकें तो देव ईश्वर का दुरुपयोग है । पर उसे पूर्ण न्यायी मान की उपासना ही न हो सकेगी। मूर्ति को भुला कर पाप से वचते रहना ईश्वर का सदुपयोग है। देने पर देवत्व ही देवत्व रह जायगा पर मूर्ति इससे मनुष्य का कल्याण- है इसलिये अगर ईश्वर की जगह देवत्व को आप भ्रम कहते हैं । कल्पित भी हो तो भी उसकी मान्यता सिर्फ उत्तर-मूर्ति द्वारा देव की अतथ्य होगी-असत्य नहीं । करते समय मूर्ति को भुला देना ही ठीक उ५ दूसरी बात यह है कि गुणमय ईश्वर कल्पित सना है मूर्ति को याद रखना उपासना की का मी नहीं है । सत्य अहिंसा आदि गुणों का पिंड है । देव की उपासना में देव ही याद ईश्वर विश्वव्यापी है, घट घट वासी है, अनुभव में चाहिये उसका आधार नहीं जितने अंश आता है, बुद्धि-सिद्ध भी है उसे मानना तथ्य भी अवलम्बन । मूर्ति वगैरह ] याद आता है उन ७८ ] सत्यामृत अर . अंश में वह देवोपासना नहीं है। जिस प्रकार प्रश्न-आलंकारिक वर्णन में थोड़ी अति- अक्षरों की आड़ी टेढ़ी आकृतियों को देखते हुए शयोक्ति हो ही जाती है । अगर उन्हें देव-मूढ़ता और उनका उपयोग करते हुए भी उन्हें भुलाकर कहा जायगा तब तो काव्य की इति-श्री ही अर्थ पर विचार करना पड़ता है उसी प्रकार हो जायगी। मूर्ति के सामने मूर्ति के रूप को भुलाकर देव उचर-अलंकार अलंकाररूप में काम में का रूप याद करना पड़ता है । इस में आवे तो कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि उससे अदेव को देव नहीं माना गया है जिससे देवभ्रम अर्थ में कोई कमी नहीं होती बल्कि अर्थ स्पष्ट कहा जा सके। होता है । मुख को चन्द्रमा कहने से सुन्दरता २ देव के वास्तविक और मुख्य गुणों को ही मालूम होती है उसे प्रकाश समझ कर रात भुलाकर कल्पित निरुपयोगी गुणों को मुख्यता में दीपक नहीं बुझाये जाते । दुःख का पहाड़ देना उनका रूप बदल कर उसका वास्तविक उठा लिया, विपत्ति के समुद्र को पी गया या पार उपयोग न होने देना आदि रूपभ्रम है । जैसे कर गया आदि अलंकार वाक्य के अर्थ को सुन्दर अमुक महात्मा के शरीर मे दूध सरीखा खून और साफ़ बनाते है इसलिये अलंकार के उपयोग था, ब्रह्मा विष्णु महेश उसका धात्री कर्म करने में मूढ़ता नहीं है । मूढ़ता है अलंकार को इति- आये थे, वह बैठे बैठे अधर चला जाता था, वह हास या विज्ञान समझने में । पुराणों में आये हुए समुद्र को हुक्म देकर शान्त करता था, वह बहुत से वर्णन इसी प्रकार के आलंकारिक हैं उँगलीपर पहाड़ उठाता था, उसके चार मुँह उनका वास्तविक अर्थ पहिचान लेने पर मूढ़ता दिखते थे, ये एक प्रकार के सब रूप-भ्रम है । नहीं रहती। दूसरे प्रकार के रूपभ्रम वे हैं जिनमें सम्भव किंतु ३ तीसरी देव-मूढ़ता है क्रुयाचना । देवो- महत्त्वशून्य बातों को महत्त्व दिया जाता है। पासना का मतलब उनके गुणों को या आज्ञाओं जैसे महात्माओं की लोकोपकारकता आदि को को अपने जीवन में उतारना है जिससे हमारा गौण करके उनके असाधारण सौन्दर्य आदि को उद्धार हो ! भक्ति-मय भाषा में हम यह भी कह महत्त्व देना। हो सकता है कि वे सुन्दर हो सकते है कि तुम हमारा उद्धार करो, जगत में पर वे महात्मा, होने के कारण सुन्दर थे यह बात शान्ति करो, हमारे पापों को दूर करो आदि इसका नहीं है। भक्ति के आवेश में ऐसी बातों को मतलब यही कि हम आप' का अनुसरण करें इतना महत्त्व न देना चाहिये कि उनके महात्मा जिससे हमारा उद्धार हो आदि । यह कुयाचना पन के चिह्न दब जायँ । तीसरे प्रकार का रूप नहीं है। पर जहां अपने कर्तव्य की भावना तो भ्रम वह है जिस में महात्माओं को उनके जीवन है नही, सिर्फ देव को खुश करके धन की से बिलकुल उल्टा चित्रित किया जाता है जैसे स्वास्थ्य की, सन्तान की, विजय की, शत्रु-क्षय की किसी निष्परिग्रह साधु की मूर्ति को-जो नग्न याचना है वह कुयाचना है । देव--पूजा अपने तक रहा हो-गहने पहिनाना आदि । ये सब कर्तव्य को समझने और उसका पालन करने और रूपभ्रम देव-मुढ़ता के ही एक रूप हैं । उसपर दृढ़ रहने के लिये होना चाहिये, मुफ्त- - , EN लक्षण-दृष्टि [ ७९ the खोरी के लिये नहीं ! कुयाचना करने से वह की याचना सुयाचना है वह माँगना चाहिये । पूरी नहीं होती, सिर्फ अपनी क्षुद्रता और असंयम ईश्वर के आगे इतना ही मिखारीपन सार्थक है । का पता लगता है । कुयाचना देव-मृढ़ता का प्रश्न-धन सम्पत्ति आदि की याचना परिणाम है । भी देवोपासना से सफल होती है। देवोपासना प्रश्न-व्यक्तिदेवों की उपासना में उनके से पुण्य होता है और पुण्य से ऐहिक लाभ जीवन का अनुकरण लक्ष्य हो सकता है पर मिलत हैं फिर मनुष्य वह याचना क्यों न करे ? ईश्वर की उपासना में क्या ध्येय होगा ? ईश्वर अथवा उसे कुयाचना क्या कहा जाय ? का अनुकरण तो किया नहीं जा सकता। उससे उचर-देवोपासना से पुण्य होगा तो उस छोटी बड़ी सभी चीजों की याचना ही की जा का फल आगे मिलेगा इससे पुराने पाप का फल सकती है । प्राणी तो ईश्वर के आगे सदा भिखारी कैसे नष्ट हो जायगा ? दूसरी बात यह है कि है | उससे याचना क्या और कुयाचना क्या ? देवापासना से ही पुण्य नहीं हो जाता, पुण्य उत्तर-जगदीश्वर एक ही हो सकता है होता है देवोपासना के सत्प्रभाव--नीति सदाचार इसलिये हरएक आदमी जगदीश्वर नहीं बन आदि को जीवन में उतारने से, प्रतिक्रमण आदि सकता फिर भी उसका अनुकरण कर सकता तप करने से । ये न हो तो देव--पूजा क्षणिक है। ईश्वर सर्वगुण-भंडार है इसलिये जिस गुण आनन्द देने के सिवाय और कुछ नहीं कर का जितने अंशों में अनुकरण हो उतना ही सकता । तीसरी बात यह है कि हरएक कारण अच्छा है। उसके सामने सिर झुकान में उसके से हरएक कार्य नहीं हो सकता इसलिये देव- शासन के विषय में श्रद्धा प्रगट होती है और पूजा शारीरिक चिकित्सा का काम नहीं कर इससे उसकी व्यवस्था-नीति धर्म को बनाय सकती । बीमारी में या संकट में देव-पूजा से सहने रखने की इच्छा पैदा और प्रगट होती है उससे की ताकत आ सकती है, मन को बल मिल अपने विकास की या आत्मबल की ही याचना सकता है पर वैद्य का काम पूरा नहीं हो जाता । करना चाहिये--दया क्षमा की नहीं । प्रार्थना में देव-पूजा से निःसन्तानता का कष्ट सहा जायगा अगर भक्तिवश दया क्षमा के शब्द आ भी जाय विश्व-बन्धुत्व पैदा होकर संतान--मोह दूर हो तो इतना ही समझना चाहिये कि हम अपने जायगा पर सन्तान पैदा न हो जायगी । इसलिये पापों को स्वीकार कर रहे हैं और पश्चात्ताप कुयाचना. न करना चाहिये । प्रकट कर रहे हैं। ईश्वरीय न्याय को बदलना ४ चौथी देव-मूढता दुरुपासना है । संयम नहीं चाहते । वास्तव में कोई मनुष्य ईश्वर का को नष्ट करनेवाली' उपासना दुरुपासना है। अपराध नहीं करता, नहीं कर सकता, वह अप जैस देवता के नाम पर पशुवध करना मद्यपान राध करता है उसकी सन्तान का अर्थात् हमारा करना मांस-भोजन , करना, व्यभिचार करना, तुम्हारा, उसका न्याय होना ही चाहिये । इसलिये आत्मघात करना [ पहाड़ से गिर पड़ना - जल में न्याय से बचने की याचना, कुयाचना है । हाँ डूब मरना आदि ] नरमेध यज्ञ आदि भी इसी पाप करने से दूर रहने की और संकट सहने मूढ़ता में शामिल हैं। .
८० ] सत्यामृत प्रश्न-कोई कोई देव ऐसी तामस प्रकृति के बीमारी भी न होना चाहिये । जब विशेष आवश्य- होते है जो ऐसे ही कार्यों से खुश होते है । कता हो तब ही तुलना करना चाहिये फिर उनकी उपासना के लिये ये कार्य करना ही परनिन्दा का दोष नहीं रहता । पड़ते है-अन्यथा वे परेशान करते है । लोकमूढता-विना समझे या बिना पर्याप्त उत्तर-पहिले तो ऐसे कोई देव हैं ही नहीं कारण के लोकाचार का पक्षपात होना लोक- जो माँस आदि चाहते हों । यह सब हमारी लोलु- मूढ़ता है। रीतिरिवाज़ किसी अवसर पर किसी पता का परिणाम है । अगर हों तो उन्हें पूजना कारण से बन जाते है अगर कोई हानि न हो न चाहिये । देव तो प्राणिमात्र के देव है वे तो उनके पालन करने में बुराई नहीं है पर उन पशुओ के भी देव हैं | जगदम्बा पशुओं की भी का पक्षपात न होना चाहिये। हमारे यहां ऐसे अम्बा है वह अपने लिये अपने पुत्रों का बलि- कपड़े पहिनते है, ऐसे बाल कटाते है ऐसा भोजन दान कैसे चाहेगी ? सच्चे देव पाप नहीं कराते । बनाते हैं, इस प्रकार सजाते हैं इस प्रकार अभि- पाप करानेवाले देव कुदेव हैं । जो अपने लिये वादन करते है, विवाह विधि ऐसी होती है, जन्म आदर्श नही है और देवरूप में माने जाते है के मरण पर ऐसा करते हैं ऐसी बातों का पक्षपात कुदेव हैं। उनकी उपासना न करना चाहिये । प्रबल होना उसकी बुराई को न देख सकना ५ पाँचत्री देवमूढ़ता है परनिन्दा । सम्प्र- उससे भिन्न लोकाचार की भलाई न देख सकना दाय आदि के मोहवश दूसरे सुदेवों की निन्दा लोक-मूढता है । करना-पर-निन्दा है। अगर किसी देव के विषय वेषभूषा मे स्वच्छता सुविधा आदि का में तुम्हारा खास आकर्षण है तो उस की खूब विचार करना चाहिये। जिस में हमें सुविधा है उपासना करो पर दूसरे देवो की निन्दा न उसमे दूसरों को असुविधा हो तो चिढ़ना न करना चाहिये और न ऐसी प्रार्थना पढ़ना चाहिये चाहिये । इसी प्रकार खानपान में रुचि, स्वास्थ्य, जिससे उनकी निन्दा होती हो । स्वच्छता, निर्दोषता आदि का विचार करना चाहिये प्रश्न-इस तरह तो दो व्यक्ति-देवों में इसी प्रकार हरएक लोकाचार को बुद्धि-संगत तुलना करना कठिन हो जायगा क्योंकि तुलना बनाकर पालन करना चाहिये । तरतमता सिद्ध होना स्वाभाविक है। जिसका प्रश्न- लोकाचार को बुद्धि-संगत बनाया स्थान कुछ नीचा बनाया जायगा उसी की निदा जाय तो बड़ी परेशानी हो जायगी। आज दिल हो जायगी और इसे आप देव-मूढ़ता कह डालेगे। चला यूरोपीय पोषाक पहिन ली, कल लँगोटी उत्तर-निष्पक्ष आलोचना में परनिंदा नहीं लगा ली, परसो मारवाड़ी बन गये, किसी दिन .. होती । परनिन्दा मोह का परिणाम है, आलोचना महाराष्ट्री बन गये, किसी दिन पंजाबी बन गये। इस मोह का परिणाम नहीं है । तुलना करना चाहिये तरह का बहुरूपियापन क्या अच्छा है ? आखिर पर . वह मोह और अहंकार का कारण या फल आदत भी कोई चीज़ है । उसके साथ बलात्कार न होना चाहिये । साथ ही तुलना करने की करना कहाँ तक उचित है ? में । है ३ लक्षण-दृष्टि [८१ . उत्तर-लोक-मढ़ता के त्याग के लिये बहु- सुधारकों ने जब अपने समय के अनुसार रिवाज़ रूपिया बनने की जरूरत नहीं है न आदत के बनाते समय अपने पुरखों की पर्वाह नहीं की तो साथ बलात्कार करने की जरूरत है। जरूरत उनकी दुहाई देकर हमें क्यों करना चाहिये ? इतनी ही है कि रूढ़ियों की गुलामी छोड़ी जाय प्रश्न-बहुत से लोकाचार ऐसे हैं जिन के और सकारणक परिवर्तन के लिये तैयार रहा लाभ शीघ्र नहीं मालूम होते पर उनसे लाभ हैं जाय । आज हमारे पास पैसा नहीं है, ठंड भी ज़रूर ! हर एक लोकाचार के विषय में छानबीन नहीं लगती तब कोट न पहिना तो अच्छा ही करने की हर एक आदमी को फुरसत भी नहीं है, चादर ही ओढ़ लिया तो क्या बुराई है ? रहती इसलिये बहुत से लोकाचारों का बिना अधिक भूषणों से शरीर मलिन रहता है असु- विचारे पालन करना पड़ता है । इसमें लाभ हो विधा होती है तो रिवाज़ होने पर भी आभूपण तो ठीक ही है नहीं तो हानि तो कुछ है ही नहीं। न पहिने या कम पहिने तो अच्छा ही है। ऐसी हालत में इस लोकमूढ़ता कैसे कह सकते हैं ? शरीर की ज़रूरत जैसी हो वैसी पोशाक कर उत्तर-लोकाचार का पालन करना लोक- लेना चाहिये । एक जमाने में ब्राह्मण-वर्ण के मूढ़ता नहीं है पर विवेक छोड़कर हानिकर निर्वाह के लिये जन्म मृत्यु के अवसर पर दान लोकाचार का पालन करना लोकमूढ़ता है । जिस दक्षिणा भोजन आदि उचित था आज आवश्य विषय पर विचार नहीं किया है उसका पक्षपात कता नहीं है तो उस रूढ़ि का किसी न किसी न होना चाहिये और लोकाचार के दोपों पर रूप में पालन होना ही चाहिये यह गुलामी क्यों ? जानबूझकर उपेक्षाभी न करना चाहिये । अवसर न रही आदत की वात सो आदत बुरी मिलने से विशेष विचार न किया हो पर इतना विचार ( स्वपर-दुःखकारक ) न होना चाहिये फिर तो आवश्यक है कि इस लोकाचार से सत्य और आदत के अनुसार कार्य करने में कोई बुराई अहिंसा में बाधा तो नहीं पड़ती । लौकिक हानि दूसरों नहीं है । अगर आदत बुरी है तब तो धीरे धीरे की प्रसन्नता के लिये भले ही सहन करली जाय उसक त्याग करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये। पर वह हानि ऐसी न होना चाहिये जिससे समाज 'हमारे बाप दादा क्या मूर्ख थे उनने रिवाज़ के दूसरे लोगों को भी हानि का शिकार होना चलाया तो अच्छा ही होना चाहिये' इस प्रकार पड़े | जहां तक बने: लोकाचार के संशोधन का का आग्रह भी लोक-मूढ़ता है । क्योंकि वाप प्रयत्न तो होते ही रहना चाहिये । दादे हमारे उपकारी हो सकते हैं पर हमसे अधिक प्रश्न-मनुष्यता की उत्पत्ति का कारण बुद्धि विद्वान थे ऐसा कोई नियम नहीं है। पर इससे भले ही हो पर उसकी स्थिरता का कारण संस्कार' भी अधिक महत्त्व की बात तो यह है कि ' बाप हैं । हम माँ बहिन बेटी को पवित्रता की दृष्टि से दादे विद्वान भी हों पर उनका कार्य उनके समय देखते हैं इसका कारण हमारे बौद्धिक विचार नहीं के लिये ही उपयोगी हो सकता है आज के लिये संस्कार हैं और इन संस्कारों का कारण लोका- आज का युग देखना चाहिये । आज के रिवाज़ चार है । संस्कार समझने से नहीं पड़ते किन्तु किसी न किसी दिन नये सुधार थे उन पुराने आसपास के लोगों के आचार से पड़ते हैं । और 4 ८२ ] सत्यामृत । यही लोकाचार है। इसलिये लोकाचार को कम कारी थे, और आज भी उनका बहुभाग जगत महत्त्व देना ठीक नहीं। के लिये हितकारी है, उनकी विविधता परस्पर उत्तर – लोकाचार की उपयोगिता अस्वी- विरोधिनी नहीं है । इन धर्मो को पूर्ण सत्य सम- कार नहीं की जा सकती परन्तु उसका जितना झना अथवा पूर्ण असत्य समझना भूल है । हर- महत्त्व है उतना ही उसका संशोधन आवश्यक एक धर्म सामयिक सत्य है--सत्य का अंश है। है। जिस लोकाचार पर मनुप्यता-निर्मापक उस मे से अरात्य का अंश निकाल देना चाहिये संस्कार तक अबलम्बित हों उसमे विवेक को आज के लिये आवश्यक सत्य जोड़ देना चाहिये स्थान न होना मनुष्यता को पशुता की तरफ़ और आदर के साथ उसका उपयोग करना चाहिये ले जाना है । अच्छे अर्थात कल्याणकारी लोका- इस प्रकार का धर्म-समभाव पाये बिना धर्म का चार को नष्ट करने की ज़रूरत नहीं है, ज़रूरत मर्म समझ में नहीं आ सकता । धर्म-समभाव तीन है देशकाल विरुद्ध अकल्याण-कर लोकाचार को तरह का होता है १ भक्तिमय २ उपेक्षामय बदलने की जिससे संस्कार अच्छे पड़ें। ३ घणामय । लोकमूढ़ता का त्यागी रूढ़ियो का गुलाम १-भक्तिमय-- ब धी की अच्छी अच्छी बाते न होकर उचित रूढ़ियो का पालन करेगा, देश ग्रहण करके धमी के विषय मे आदर, प्रेम, भक्ति- काल के अनुसार सुधार करने को तैयार रहेगा । रूप भाव रखना। इस प्रकार चारो तरह की मूढ़ताओं का त्यागी २-उपेक्षामय-सब धर्म--संस्थाओ को निर- और निःपक्ष विचारक बनकर मनुष्य विवेकी र्थक संस्था समझना । बनता है जो कि योगी जीवन की पहिली शर्त है। ३--घृणामय- सभी धर्म-संस्थाओं को अनर्थ २ धर्म-समभाव का मूल समझना और उनके नाश हुए बिना जगत का अकल्याण समझना । योगी का दूसरा. चिह्न है धर्म-समभाव । धर्म तो जगत में एक ही है, उसे सत्य कहें, अहिंसा इन तीन में से पहिला समभाव श्रेष्ठ है । योगी को यही समभाव रखना चाहिये । कहें, नीति सदाचार आदि कुछ भी कहें, पर उसके व्यावहारिक रूप असंख्य हैं। धर्म को पालन प्रश्न-धर्म के नाम पर जगत मे जितने करने के लिये देश काल के अनुसार कुछ नियम अत्याचार हुए है शायद ही उतने अत्याचार किसी बनाये जाते है उनको भी धर्म कहते है उनकी दूसरी चीज़ के नाम पर हुए हो। इसलिये धर्म परम्परा भी चलती है इसलिये उन्हें सम्प्रदाय कहते से घृणा पैदा हो जाय तो क्या आश्चर्य है ? क्रांति हैं । धर्म, सम्प्रदाय, मत, मजहब, रिलीजन आदि के चक्र में जब दुनियाभर के पाप पिमेगे तब ये शब्द उस नित्यधर्म-सत्य और अहिंसा के सामयिक धर्म-नामक पाप भी पिसना ही चाहिये । दैशिक रूप के लिये प्रयुक्त होते है । हिन्दू धर्म, उत्तर-आज जो क्रान्ति है इस्लाम मजहब, क्रिश्चियानिटी, जैन धर्म, बौद्ध धर्म सम्प्रदाय आदि कहला सकती है । आज जो धर्म आदि अनेक धर्म जगत में फैले है जो अपने कहलाते है वे भी एक ज़माने की सफल क्रान्ति है। अपने समय और अपने अपने देश के लिये हित- जैसे आज की क्रान्ति पाप नहीं है इसी प्रकार N -- 1 कल. वहीं धर्म -- लक्षण-दृष्टि -- L. , . एक समय की क्रान्ति ये धर्म भी पाप नहीं हैं। उसके पास ऐसी आस्तिकता अवश्य है। रही दुरुपयोग की बात- सो दुरुपयोग किसका मन्दिर, मसजिद, चर्च, कब, शिला वजा, नहीं हुआ है ? कलम से लिखने की बजाय कोई मूर्ति, नंदी, पहाड़, वृक्ष आदि प्रतीकों में । कीड़े मारा करे तो इसमें कलम बेचारी क्या करे? वर्तन भले ही होता रहे पर इनमें से कोई न के अति-भोजन या विकृत भोजन से कोई बीमार किसी रूप में रह कर आस्तिकता को । हो जाय या मर जाय तो - भोजन घृणास्पद नहीं रहता है । आस्तिकता इतनी प्रचंड है कि हो सकता सिर्फ उसकी 'अति' वृणास्पद हो सकती नास्तिकता को भी अपना भोजन बना लेती है है । सच पूछो तो धर्म के लिये लड़ाई नहीं होती जब तक हृदय है तब तक आस्तिकता है । धर्म के नाम पर होती है। धर्म का नाम अपनी को कोई नष्ट नहीं कर सकता । सिर्फ . पाप-वासनाओं के लिये ओट बना लिया जाता है। समय के लिये सुला सकता है । पर उ. प्रश्न-पाप के लिये जो ओट का काम दे वह जागरण हुए बिना नहीं रहता । इसलिये उस क्यों न नष्ट कर दिया जाय.? नष्ट करने की चेष्टा व्यर्थ है । उसका न होने पावे सिर्फ इतनी ही चेष्टा करना चाहिये उत्तर-मकान अगर चोरों के लिये आट का काम दे तो मकान गिराया नहीं जाता चोर ही प्रश्न-दुरुपयोग हर एक चीज़ का होता ढूँढा जाता है । अगर कभी गिराने की आवश्यकता यह ठीक है, पर धर्म का दुरुपयोग अधिक ही पड़ जाय तो फिर बनाना पड़ता है । आवश्य- अधिक होता है । धन, बल, सौन्दर्य, आदि कतानुसार पुनर्निर्माण करना उचित है पर सर्वथा अहंकार की अपेक्षा धर्म का अहंकार प्रबल ध्वंस नहीं । सच पूछा जाय तो धर्म का ध्वंस हो है । झगड़े आदि भी धर्म के लिये बहुत होते नहीं सकता । ध्वंस ध्वंस चिल्लाकर, हम सिर्फ इन सब का असली कारण क्या है ? हानि-कर क्षोभ पैदा करते है । हम धर्म के उत्तर- धर्म तो जगत में शान्ति प्रेम, विषय में कितनी ही नास्तिकता का परिचय दे आनन्द ही फैलाता रहा है । परन्तु. मनुष्य अगर हमारी नास्तिकता सबल है तो उसी के जानवर है, वुद्धि अधिक होने से इस. में । नाम पर विराट आस्तिकता पैदा हो जायगी । करने की, पाप को छिपाये रखने या टिकाये । महावीर और बुद्ध ने ईश्वरवाद के विषय में नास्ति की शक्ति अधिक आगई है । अहंकार- इस कता का जो सफल प्रचार, किया उसका फल सब से अधिक है । महत्त्वानन्द के लिये यह : यह हुआ कि उनके सम्प्रदायों में महावीर, बुद्ध, कुछ छोड़ने को तैयार हो जाता है । पर हर ईश्वर के आसन पर विठला दिये गये । जिन देशों एक आदमी को यह आनन्द पर्याप्त मात्रा में में धर्म की नास्तिकता सफल हुई है उन देशों में मिलसकता जब कि लालसा तीव्र रहती वे नास्तिकता के तीर्थंकर आज देवता की तरह इसलिये मनुष्य अनुचित कल्पनाओं से . पुज रहे हैं । उनकी कोपर हजारों आदमी प्रति लालसा को सन्तुष्ट करने की चेष्टा करता है दिन सिर झुकाते हैं और नास्तिकता के गीत गाते उसी का फल है धर्म-मद । धन, है । मनुष्य के पास जब तक हृदय है तब तक आदि का मद न तो अक्षुण्ण है. न स्थिर। । 4 ।
८४ ] सत्यामृत -- Hour -~- 4 he वह नाम में और तुलना में मानव-समाज धन है कल नहीं है, आज बल है कल बीमारी क्या चाहिये ? बुढ़ापा आदि से नहीं है इस प्रकार इन के मदों उत्तर-- सब धर्म समान नहीं हो सकते, से मनुष्य को सन्तोष नहीं होता । तब वह धर्म होना भी नहीं चाहिये क्योंकि वेता देशकाल के और ईश्वर के नामपर मद करता है । हमारा अनुसार बने हैं, देशकाल के भेद से उन में भेद धर्म सब से अच्छा, हमारा देव सब से अच्छा भी है इसलिये विविधता से घबराना न चाहिये । आदि । धर्म और देव बीमार नहीं होते, बुढे नहीं रही तरतमता, सो थोड़े बहुत अंशों में होते और छिनते भी नहीं. अर्थात् इन का रहेगी ही। तरतमता तो माता पिता में भी है पर नहीं छिनता ( अर्थ से तो ऐसे अहंकारियो के दोनों गुरुजन है दोनों पूज्य हैं इसी प्रकार धर्मो पास ये फटकते भी नहीं हैं फिर मिलेंगे क्या ? ) पर पूज्यता-भाव रखना चाहिये । तरतमता इसलिये इन का अभिमान सदा बना रहता है उपेक्षा करना चाहिये । तरतमता का भाव दो क्षुण्ण भी नहीं होता । धन में तरह का होता है-१ कासिक और २ भ्रमजन्य तो लखपति का घमंड करोड़पति के आगे क्षुण्ण क्रम-क्रम से विकासित होता हो जाता है, बल आदि में भी यही बात है। जारहा है यद्यपि बीच बीच में मनुष्य अवनति पर ईश्वर और धर्म में तो तुलना करने की ज़रूरत की ओर भी झुकजाता है पर सब मिलकर यह ही नहीं है अन्धश्रद्धा के अंधेरे के कारण' दूसग विकसित ही होता जाता है । इसलिये अति दिखता ही नहीं फिर तुलना क्या ? तुलना तो प्राचीन काल में मनुष्यकी. धार्मिक भावना सिर्फ कल्पना से की जाती है कि हम अच्छे सब खराब, क्योंकि हम हम है । इस प्रकार संकुचित थी । मूसा के समय में मनुष्यकी नैति- कता अपने समाज तक सीमित थी जब कि महत्त्वानन्द की अनुचित लालसा के कारण जो हमारे दिल में शैतान घुसा है वह ईश्वर और ईसा के समय मे वह मनुष्य-मात्र तक फैलगई धर्म की ओट में ताण्डव कर रहा है। वास्तव थी। यह विकास सम्बन्धी चैकासिक तरतमता में यह शैतान ( पाप ) का उपद्रव है धर्म या ईश्वर है । इस मे हम उस महापुरुषको दोपी नहीं कह सकते । क्योंकि महापुरुष समाज के आगे का नहीं। प्रश्न-- धर्म का अपराध भले ही न हो पर चलता है । समाज की परिस्थिति की अपेक्षा ही उसके आगेपन का निश्चय किया जायगा । समभाव नहीं रक्खा जा सकता क्योंकि एक से नहीं हैं, सब धर्मो के इसलिये हमें यही देखना चाहिये कि उस धर्म ने संस्थापक भी एक से नहीं है, सब शास्त्र भी एक या धर्म-संग्थापक इस समय के जन-समाज नहीं हैं, किसी किसी धर्म में तो मनुष्यमात्र के को आगे बढ़ाया या नहीं ? इतनेसे ही वह प्रति प्रेम भी नहीं है. कुछ पुराने धर्म तो जिन में हमारे लिये आदरणीय हो जाता है । वैकासिक नीति सदाचार आदि अपने गिरोह तक ही सीमित तरताता में अगर कोई धर्म या धर्म-संस्थापक है, दूसरे गिरोहवालों को लूट लेना मार डालना भी दूसरे धर्मो की या धर्म संस्थापकों की अपेक्षा कर्तव्य समझते है ऐसी हालत में सर्व-धर्म हीन भी मालूम हो तो भी हमें तीन कारणो से समभाव कैसे रक्खा जासकता है और रखना भी उनका आदर करना चाहिये १ -पारिस्थितिक मे में - उन मे सब धर्म ने है लक्षण-दृष्टि [८५ mom- स महान् है। पहचा,. २-सामूहिक कृतज्ञता, ३ बन्धु हैं उनका आदर क्यों नहीं कर सकते ? पूज्य-समादर । प्रश्न-यदि वन्धुता के लिये दूसरों के देवों १- पारिस्थितिक महत्ता का विवेचन ऊपर हो या गुरुओं का आदर करना कर्तव्य है तब तो बड़ी चुका है कि वह महापुरुष आज के लिये भले ही परेशानी हो जायगी । हमें उनका भी आदर महान् न हो पर वह अपने ज़माने के लिये महान् करना पड़ेगा जिनको हम पाप समझते हैं । किसी था । वह अपने जमाने में उस समय के ले.गों के शाक्त मनु य के साथ बन्धुता रखनी है तो बकरों आगे बढ़ सका। यदि आज होता तो आज के का वलिदान लेनेवाली काली का आदर करना साधन पाकर आज के लोगों के आगे भी बढ़ भी हमारा कर्तव्य हो जायगा । बहुत से चालाक जाता । इसलिये परिस्थिति को देखते हुए वह धूर्त लोग भोले लोगों को बहकाकर गुरु बन जाते हैं अगर उन भोले लोगों का आदर करना हो तो २-सामूहिक कृतज्ञता का मतलब यह है उन धूर्त गुरुओं का भी आदर करना चाहिये । कि हमारा जो आज विकास हुआ है उसके इस प्रकार हमें देव-नढ़ता गुरु-मूढ़ता आदि मूल में पूर्वजों की काफ़ी पूँजी है इसलिये आज के मृढ़ताओं का शिकार हो जाना पड़ेगा युग को पिछले युग का कृतज्ञ होना चाहिये आज उत्तर-इस प्रकार के अपवाद धर्म में ही के महापुरुप को पहिले के महापुरुषों का कृतज्ञ नहीं साधारण लोक-व्यवहार में भी उपस्थित होते होना चाहिये । इस सामूहिक कृतज्ञता के कारण हैं। हम पासी के पिता को सन्मान की दृष्टि भी हमें पहिले महापुरुषों का आदर करना चाहिये। से देखते हैं इस साधारण नीति के रहते हुए भी ३-बन्धु-पूज्य-समादर का मतलब उस व्याव यदि पड़ौसी का पिता बदमाश हो, क्रूर हो और हारिकता से हैं जो हम पड़ोसियों के गुरुजनों के अत्याचारी हो तो न्याय के संरक्षण के लिये हम उसका विषय में रखते हैं । यदि हम किसी को मित्र निरादर भी करते है पाएका आदर नहीं करते । कहते हैं तो हमारा कर्तव्य हो जाता है कि उसके धर्म के विषय में भी हमें इस नीति से काम लेना माता पिता का योचित आदर करें । जो हमारे बन्धु चाहिये । फिर भी इसमें निम्न लिखित सूचनाओं के लिये पूज्य है. वह हमारे लिये काफी आदरणीय का ध्यान रखना चाहिये। है । यही बन्धु-पृज्य-समादर है। धर्म के विषय १--गुणदेवों का तिरस्कार न करना चाहिये में भी हमें इसी नीति से काम लेना चाहिये । सिर्फ उनके दुरुपयोग दुरुपासना आदि का तिर- मानलो हज़रत मूसा का जीवन आज हमारे लिये स्कार करना चाहिये । जैसे काली, जगदम्बा आदि आदर्श नहीं है पर वे यहूदियों के गुरुजन हैं नामों से प्रसिद्ध शक्ति-देवी को शक्ति नामक गुण इसलिये यहूदियों के साथ बन्धुता प्रदर्शन करने की मूर्ति समझ कर उसका . सन्मान ही करना के लिये हमे हजरत मूसा का आदर करना चाहिये । चाहिये । परन्तु शक्ति का जो विकराल रूप है यदि हम किसी यहूदी मित्र के बाप का-गुणदोष पशु-बलि आदि जो उसकी उपासना का बुरा का विशेष विचार किये विना आदर कर सकते तरीका है उसका विरोध करना चाहिये । हाँ, हैं तो समस्त यहूदियों के लिये जो पिता के समान विरोध में भी दूसरों को समझाने की भावना हो का ८] सत्यामृत ++Anime इगे । हां, कोई कोई सम्प्रदाय सामयिक सुधार न उस शारत्र की दुहाई दी जाती है अपना । कारण भी बन जाते है। जैसे प्रोटेस्टेन्ट स्वतन्त्र सन्देश दिया जाता है वह धर्म है । जैसे म्प्रदाय । ऐसे सम्प्रदाय मे यह देखना चाहिये शेव और वैष्णव आर्य समाज आदि वेद की के वह सुधार आज के लिये कितना उपयोगी दुहाई देते हैं इसलिये वैदिक धर्म है, शैव वैष्णव । जिस सम्प्रदाय का जो अंश आज उपयोगी आर्य समाज आदि सम्प्रदाय है । दिगंबर श्वेतांबर हो उसके उस अंश वा समर्थन करना चाहिये आदि म. महावीर की दुहाई देते हैं इसन्दिये जैन पाकी पर उपेक्षा या अत्यावश्यक हो तो संयत धर्म है, दिगंबर श्वेताम्बर आदि संप्रदाय है । मतलब विरोध । जो सम्प्रदाय किसी सिद्धान्त पर नहीं, यह कि धर्मप्रणेता अपने अनुभव वी दुहाई घटना-विशेष पर टिके हो उन पर उपेक्षा करना देकर जगत को देशकाल के अनुसार क्रान्ति- चाहिये । जैसे खलीफो की नामावली के झगड़े मय सन्देश देता है। सम्प्रदाय-प्रणेता किसी पर टिके हुए मुसलमानों के सम्प्रदाय । ऐस देव या शास्त्र के गूल मानकर उसकी टीका के सम्प्रदायो को अमान्य करना चाहिये और उपेक्षा रूप में अपना सन्देश देता है । परिस्थिति के रखना चाहिये । और जो सम्प्रदाय धूर्त गुरुओ अनुसार वह भी सुधार करता है पर वह सुधार ने स्वार्थवश बना लिये है उनका तो यथासम्भव मल की व्याख्या के रूप में होता है । इसका विरोध करना चाहिये । और उनके अनुयायिओं यह मतलब नहीं है कि मृल धर्म में दूसरे को मूल धर्म की ओर खीचना चाहिये । हाँ, धर्मों को निन्दा रहती है या दूसरे शास्त्रो से विरोध का काम बहुत संयम और चतुराई का है घृणा रहती है । मूल धर्म इन बातों से बहुत हरएक के वश का नहीं है। अवसर देख कर दूर रहते है । जैसे इसलाम में म. ईसा आदि समझावट के लिये ही विरोध होना चाहिये । की खूब तारीफ़ है बाइबिल तोरात आदि की प्रामाणिकता भी स्वीकृत की गई है पर हजरत अगर यह मालूम हो कि विरोध का परिणाम धार्मिक कटुता पैदा करेगा तो जबतक उचित मुहम्मद को जो सन्देश जगत के सामने देना था वह उनने अपने या ईश्वर के नाम से दिया, अवसर न आ जाय तबतक मौन रखना चाहिये । सम्प्रदायों के विषय में साधारणनीति यह है कि किसी पुस्तक की पर्वाह नहीं की। हाँ, साधारण उन्हे गौण करके मूल धर्म की तरफ झुकाया दृष्टिसे इतना समर्थन आवश्य कराया कि मेरे द्वारा जो सन्देश जगत को मिल रहा है वह सत्य जाय। है पहिले सन्देश भी सत्य थे इसलिये सब एक प्रश्न-मूल धर्म किसे कहना चाहिये और है। पुराने ग्रंथ विकृत हो गये इसलिये मेरे द्वारा सम्प्रदाय किसे कहना चाहिये ? उनका नया संस्करण भेजा जा रहा है। मतलब उत्तर-जो किसी धर्म के देव या शास्त्र को उनने अपनी बात का दूसरों से पूर्ण प्रमाण मानकर उनकी दुहाई देकर कोई समर्थन कराया पर किसी पुस्तक के शब्दो के संगठन करते है वे सम्प्रदाय है। जिन में किसी या देव या स्थान के गुलाम न बने । मूल धर्म दूसरे धर्म के देव या शास्त्र को पूर्ण प्रमाण नहीं सम्प्रदायों की अपेक्षा अधिक मौलिक उदार माना जाता [ आदर भले ही रक्खा जाता हो] और क्रान्तिमय होते है । वे सम्प्रदायो की यह कि लक्षण- -दृष्टि [ ८९ MARW- अपेक्षा जनहित की अधिक पर्वाह करते हैं इसलिये धर्मशास्त्र का काम सिर्फ नैतिक पुराने देव और शास्त्रों की कम । . नियम, उन के पालन का उपाय, उनके न प्रश्न- सिक्ख पंथ कवीर पंथ आदि को पालने पालने से होनेवाले हानि किस श्रेणी में डालना चाहिये। लाभ बताना है। अगर सभी धर्मशास्त्र उत्तर- यह एक वीचकी चीज हैं। ये इतना ही काम करते तो उन में जो परस्पर सम्प्रदायों के समान नहीं हैं इन में मूल धर्म अन्तर है वह रुपये में बारह आना घटजाता, की विशेषता बहुत अंशों में पाई जाती है । पर आज धर्मशास्त्र में इतिहास भूगोल ज्योतिप अगर धर्म और सम्प्रदाय इन भागों में सब को पदार्थ विज्ञान दर्शन आदि नाना शास्त्र मिल गये विभक्त करना हो तो उन्हें धर्म की श्रेणी में ले हैं इसलिये एक धर्म दूसरे धर्म से जुड़ा मालूम होने लगा है। जाना पड़ेगा भले ही इन के पीछे विशाल अगर तुम से कोई पूछे-दो और दो कितने इतिहास न हो या बहुत संख्या न हो । अथवा होते है ? तुम कहोगे चार | फिर पूछे हिन्दू धर्म दोनों के बीचका पंथ शब्द इनके लिये के अनुसार कितने होते हैं इसलाम के अनुसार है ही। कितने होते हैं जैनधर्म के अनुसार कितने इन सब धर्मों के भीतर अधिक से अधिक होते हैं ईसाई धर्म के अनुसार कितने होते हैं. भक्तिमय समभाव की आवश्यकता है । इन मे जो तो तुम कहोगे-यह क्या सवाल है ? धी से विशेष तरतमता मालूम होती है उस भ्रम के पाँच कारण हैं। १ धर्मशास्त्र के स्थान का भ्रम, इस का क्या सम्बन्ध, यह तो गणित का सवाल २ परिवर्तन पर उपेक्षा, ३ दृष्टि की विकलता, है ? इसी प्रकार तुम से कोई पूछे कलकत्ता से बम्बई कितनी दूर है एशिया कितना बड़ा है ४ अनुदारता के संस्कार, ५ सर्वज्ञता की असंगत और फिर इनका उत्तर हिंदू मुसलमान आदि मान्यता। धी की अपेक्षा चाहे तो उससे भी यही कहना धर्मशास्त्र का स्थान-सगी धर्म अहिंसा शील त्याग सेवा आदि का उपदेश देते होगा कि यह धर्मशास्त्र का सवाल नहीं और सभी धर्मों का ध्येय जन समाज को सदा- भूगोल का सवाल है । इसी तरह सूर्य चन्द्र तारे पृथ्वी आदि के सवाल [ भूगोल खगोल ] युग चार में आगे बढ़ाना है । अगर सारा जगत सदा- युगान्तर के सवाल ( इतिहास) द्रव्यो या पदार्थों चारी प्रेमी सेवाप्रिय हो जाय तो जगत में दुःख के और आत्मअनात्म लोक परलोक आदि के ही न रहे । प्राकृतिक दुःख भी घट जाँय और सवाल ( विज्ञान और दर्शन ) धर्म शास्त्र के जो रहे भी, वे परस्पर सेवा सहानुभूति से मालूम विपय नहीं है । पर इन्हीं बातों को लेकर धर्म- भी न पड़ें । बीमारी का कष्ट इतना नहीं खटकता हुआ है और कल्पनाओ जितना अकेले पड़े पड़े तड़पने का। मनुष्य के द्वारा अंधेरे में टटोलने के कारण इतना मत- दूसरों पर जो अपना बोझ लादता है अत्याचार' भेद रहा है कि ऐसा मालूम होता है कि एक करता है सेवा नहीं देता यही कष्ट सबसे अधिक धर्म दुसरे धर्म से मिल ही नहीं सकता । अगर है सभी धर्म इसको हटाने का प्रयत्न करते हैं धर्म शास्त्र के स्थान का ठीक ठीक ज्ञान हो जाय सत्य शास्त्रों में इतना विवेचन ९. ] सत्यामृत पद पद ठोकर और धर्म शास्त्र के सिर पर लदा हुआ बोझ दूर के विकास रुकने और धर्म धर्म में भेद बढ़ने का हो जाय तो धर्मों में इतना भेद ही न रहे । धर्म नुकसान भी काफी हुआ । शास्त्र पर लदे हुए इस बोझ से बड़ी भारी हानि धर्मशास्त्र मे इन विषयों के आने का दूसरा हुई है । धर्मे मे अन्तर तो बढ़ ही गया है साथ कारण है धर्म के ऊपर श्रद्धा जमाने का और ही इन विषयों का विकास भी रुक गया है। धर्म लोगो की अधिक से अधिक जिज्ञासाओं को शास्त्र के ऊपर श्रद्धा रखना तो जरूरी था और किसी तरह शान्त करने का प्रयत्न । उससे लाभ भी था पर उसमे आये हुए सभी धर्मगुरुने नीति सदाचार का उपदेश दिया विषयों पर श्रद्धा रखने से सभी विषयो में मनुष्य लेकिन शिष्य तो कोई भी काम करने के स्थिर हो गया । सदाचार आदि के नियम इतने लिये तभी तैयार होता जब उससे सुख की आशा परिवर्तनशील या विकासशील नहीं होते जितने होती । परन्तु दुनिया का अनुभव कुछ उल्टा था। भौतिक विज्ञान आदि । सदाचार मे मनुष्य हजार उसने कहा-दुनिया मे तो दुराचरी विश्वास- वर्ष पहिले के मनुष्य से बढ़ा नहीं है कदाचित घाती दंभी लोग वैभवशाली तथा आनन्दी देखे घट ही गया है पर भौतिक विज्ञान आदि मे कई जाते है और जो सच्चे त्यागी हैं परोपकारी हैं गुणी तरक्की हुई है। अब अगर धर्मशास्त्र के नीतिमान है सदाचारी है वे साथ भौतिक विज्ञान आदि भी चले तो जगत खाते हैं तब धर्म का पालन क्यों किया जाय ? की बड़ी भारी हानि हो, और धार्मिक समाज शिष्य का यह प्रश्न निर्मूल नहीं था। शिष्य को प्रगति के मार्ग में बड़ा भारी अडंगा बन जाय, यह समझना कठिन था कि असत्य भी सत्यकी जैसा कि वह बनता रहा है और बहुत जगह ओट मे चल पाता है इसलिये सत्य महान है ? आज भी बना है। इसलिये सब से पहिली बात धर्म के पालन में जो असली आनन्द है वह यह है कि धर्मशास्त्र में से दर्शन इतिहास अधर्मी नही पासकता । ऐसे समाधानो से बुद्धि भूगोल खगोल आदि विषय अलग कर दिये जाय। को थोडासा संतोप मिल सकता था पर हृदय को फिर धर्मो का अन्तर बहुत मिट जायगा । सन्तोप नहीं मिल सकता था । हृदय तो धर्म के प्रश्न-धर्मशास्त्र मे ये विषय आये क्यों? फल मे भीतरी सुख ही नहीं, बाहरी फल भी उत्तर-पुराने समय मे शिक्षण का इतना चाहता था । जब गुरुने कहा-हमारा जीवन पूरा प्रबन्ध नहीं था। धर्मगुरु के पास ही हरएक नाटक नही है--नाटक का एक अंक है । नाटक विषय की शिक्षा लेना पड़ती थी। धर्मगुरुओ का एक अंक देखने से पूरे नाटक का परिणाम पर अचल श्रद्धा होने से हरएक विषय पर अचल नहीं मालूम होता । रामके नाटक में कोई सीता- श्रद्धा होने लगी | गुरु लोग भी शिक्षण के सुभीते हरण तक खेल देखकर निर्णय करे कि पुण्य का के लिये धर्मशास्त्र मे ही हरएक विषय खीचतान फल गृह-निर्वासन और नारीहरण है तो उसका यह कर भरने लगे इस प्रकार धर्मशास्त्र सर्व-विद्या- ' निर्णय ठीक न होगा इसी प्रकार एक जीवन से भंडार बन गये । शिक्षण की दृष्टि से तो उस पुण्य पाप के फल का निर्णय करना अनुचित है । जमाने मे अवश्य सुभीता हुआ पर इन विद्याओ धर्म का असली फल तो परलोक में मिलता है। , - लक्षण-दृष्टि [ ९१ - ~ बीज से फल आने तक जैसे महीनों और वी अंग न माना जाय तो भले ही न माना जाय पर लगनाते हैं उसी तरह पुण्य पाप फल के बीज दर्शन शास्त्र को अगर अलग कर दिया जायगा भी वो युगों और जन्म जन्मन्तरों में अपना तो- धर्म की जड़ ही उखड़ जायगी। धर्म का फल देते हैं ! कार्य सदाचार दुराचार का प्रदर्शन कराना तो ही, साथ ही यह बताना भी है कि वह फल इस उत्तर से शिष्य के मनका बहुतसा कैसे मिलता है । इसके उत्तर में दर्शन शास्त्र समाधान होगया पर जिज्ञासा और भी बढ़गई । पर लाक क्या है वहाँ कौन जाता है शरीर तो का बड़ा भाग आ जाता है इसलिये दर्शन को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता । यही पड़ा रह जाता है परलोक कैसा है फल कौन देता है पहिले कब किन को कैसा फल उत्तर-धर्मशास्त्र दर्शन शास्त्र का ही नहीं मिला है ? इन प्रश्नों के उत्तरों में गुरुको ईश्वर हरएक शास्त्र का सहारा लेता है फिर भी वह " स्वर्ग नरक युग युगान्तर उनके महापुरुष आदि उन सब से जुदा है। इस की परीक्षा यों हो- का वर्णन करना पड़ा, इसके लिये जो कुछ तर्क- सकती है कि दर्शन के मिथ्या होने पर भी धर्म सिद्ध मिला वह किया बाकी कल्पना से भरागया। सत्य हो सकता है और दर्शन के सत्य होने पर इस प्रकार धर्मशास्त्र में बहुत से विषय आगये भी धर्म मिथ्या हो सकता है। इसके अतिरिक्त और उन में कल्पना का भाग काफी होने से दर्शन की बहुत सी बातों से धर्म का कोई संबंध विभिन्नता भी हुई, क्यों कि हरएक धर्म-प्रवर्तक ही नहीं जुड़ता। दर्शन शास्त्र के मुख्य मुख्य की कल्पना एकसी नहीं हो सकती थी। प्रश्न ये हैं। आज हमें इतना ही समझना चाहिये कि ईश्वरवाद, परलोकवाद या आत्मवाद, धर्म के फल को समझाने लिने ये उदाहरण मात्र सर्वज्ञवाद, मुक्तिवाद, द्वैताद्वैत, नित्यानित्यवाद, आदि हैं । भिन्न भिन्न धर्मों के जुदे जदे वर्णन भी सिर्फ ईश्वरवाद- जगत का सृष्टा या नियन्ता इस बात को बताते हैं कि अच्छ कर्म का फल कोई एक आत्मा है जो पुण्य पाप का फल देता अच्छा और बुरे कर्म का फल बुरा है । यह ईश्वर-बाद । कर्मफल दाता-नियन्ता- अगर कोई कहानी आज तथ्यहीन मालूम सृष्टा-कोई एक नहीं है यह हो तो हमें दूसरी कहानी बना लेना चाहिये निरीश्वरवाद है । दर्शन शास्त्र की दृष्टि से इन या खोज लेना चाहिये । धर्मशास्त्र में आये हए दो में से कोई एक सच्चा है। पर धर्मशास्त्र विषयों को विज्ञान की दृष्टि से न देखना चाहिये दोनों को सच्चा और दोनों को झूठा कर सकता धर्म के स्पष्टीकरण की दृष्टि से देखना चाहिये। है। धर्मशास्त्र की दृष्टि में ईश्वरवाद की सचाई. ईश्वर का दार्शनिक वर्णन धर्मशास्त्र के भीतर यह है कि हमारे पुण्य पाप निरर्थक नहीं हैं। कर्मफल प्रदान के रूप में ही रहेगा। इस दृष्टि अगर हम जगत के कल्याण के लिये दिनरात- से परस्पर विरोधी वर्णनों की भी संगति बैठ . परिश्रम करते हैं फिर भी जगत् हमारी अवहेलना जायगी। करता है तो हमारा यह गुप्त पुण्य व्यर्थ न जायगा प्रश्न-इतिहास आदि को धर्मशास्त्र को क्यों कि जगत देखे या न देखें पर ईश्वर अवश्य ato आत्मा . ] सत्यामृत प मे ता है । इसलिये वह अवश्य किसी न किसी स्वार्थ सिद्ध करना जीवन का ध्येय है, सामूहिक सत्फल देगा । इसी प्रकार अगर हम कोई स्वार्थ की या नैतिक नियमों की पर्वाह करना प करते है पर दुनिया की आँख मे धूल झोंक व्यर्थ है । इस प्रकार का अनीश्वरवाद तर्क-सिद्ध र उस के अपयश से बचे रहते है तो भी वह भी हो तो भी धर्मशास्त्र की दृष्टि में मिथ्या है। प निरर्थक न जायगा क्यो कि ईश्वर की आँखों इस प्रकार धर्मशास्त्र ईश्वरवाद सम्बन्धी दार्शनिक म धूल नहीं झोंकी जासकती । वह पाप का फल चर्चा का उपयोग करके भी उससे भिन्न है क्यो कभी न कभी अवश्य देगा । इस प्रकार गुप्त पाप कि दार्शनिक पद्धतिसे सिद्ध किये हुए ईश्वरवाद से भी भय और गुप्त पुण्य से भी संतोष पैदा अनीश्वरवाद की उसे पर्वाह नहीं है। उसकी होना ईश्वरवाद का फल है । ऐसा ईश्वरवाद धर्म दृष्टि स्वतन्त्र है की दृष्टि में सत्य है, भले ही ईश्वर हो या न हो परलोकवाद या आत्मवाद-आत्मा तो अथवा सिद्ध होता हो या न होता हो । पर अगर हरएक मानता है पर आत्मा कोई मूलवस्तु ईश्वरवाद का यह अर्थ है कि ईश्वर दयालु है [ तत्त्व ] है या नहीं, इसी पर विवाद है । आत्मा प्रार्थनाओं से खुश होने पर वह पाप माफ कर को नित्य मानने से परलोक तो सिद्ध हो ही देता है इसलिये पाप की चिन्ता न करना जाता है क्योंकि आत्मा जब नित्य है तब मरने चाहिये ईश्वर को खुश करने की चिन्ता करना के बाद कहीं न कहीं जायगा और कही न चाहिये तो यह ईश्वरवाद धर्मशास्त्र की दृष्टि मे कहीं से मरकर आया भी होगा वहीं परलोक मिथ्या है भले ही दर्शन शास्त्र ईश्वरवाद को है। यद्यपि आत्मा को अनित्य या अतत्त्व मान सिद्ध कर देता हो । कर भी परलोक बन सकता है पर धर्म की दृष्टि इसी प्रकार अनीश्वरवाद के विषय में भी मे इससे कोई अन्तर नहीं होता । जैसे पानी है। अगर अनीश्वरवाद का यह अर्थ है कि आक्सिजन आदि के संयोग से बना हैं फिर भी ईश्वर युक्ति तर्क से सिद्ध नहीं होता पुण्य पाप फल उस का यह रासायनिक आकर्षण भाफ बनने पर की व्यवस्था प्राकृतिक नियम के अनुसार ही होती भी नहीं टूटता इस प्रकार संयोगज होने पर भी है। जैसे छुप कर भी विष खाया जाय और उससे भाफ और पानी के रूप मे अनेकवार पुनर्जन्म अपराध की क्षमा याचना की जाय तो विष के करता रहता है उसी प्रकार आत्मा संयोगज हो- ऊपर इसका कुछ प्रभाव न पड़ेगा, विप खाने का कर भी पुनर्जन्म कर सकता है। इस प्रकार निश्चित दंड प्राकृतिक नियम के अनुसार मिलेगा । आत्मवाद और परलोकवाद मे अन्तर है । आत्म-- इसी प्रकार हम जो पाप करते हैं उस का फल वाद आत्मा को नित्य सिद्ध करता है और पर- भी प्राकृतिक नियम के अनुसार अवश्य मिलता है। लोकवाद आत्मा को अनेक भवस्थायी सिद्ध इस प्रकार का अनीश्वरवाद--कर्मवाद तर्क-सिद्ध हो करता है । पर इन दोनों का धर्मशास्त्र में एकसा या न हो धर्म शास्त्र की दृष्टि में सत्य है । पर उपयोग है क्योकि धर्मशास्त्र आत्मा की नित्यता अगर अनीश्वरवाद का अर्थ पुण्य पाप के फल की और परलोक से एक ही बात सिद्ध करना चाहता अव्यवस्था है इसलिये किसी न किसी तरह अपना है कि पुण्य पाप का फल इस जन्म में यदि लक्षण-दृष्टि [ ९३ . Janamanna में अवश्य मिलेगा 1 आत्मा अनन्त सुख में लीन है सदा - न मिल सके तो पर जन्न दृष्टि से उसने सर्वज्ञ विषयक सत्य पा लिया । गुण्यपाप व्यर्थ नहीं जायगा । यह बात आत्मवाद पर दर्शनशास्त्र इस बात पर उपेक्षा करता है । और परलोकवाद में एक सरीखी है। दर्शनशास्त्र वह तो सर्वज्ञता के रूप का तथ्य जानना चाहता अगर अपनी युक्तियों से परलोक या आत्मा का है । यही इन दोनों में अन्तर है । खण्डन भी करदे तो भी पुण्यपाप फल की दृष्टि मुक्तिवाद-मुक्तिवाद के विषय में भी दर्शन- से धर्मशास्त्र परलोक या आत्मवाद को सत्य शास्त्र में अनेक मत हैं। कोई मानता है मुक्ति में मानेगा। ज्ञान अनन्त यदि आत्मवाद का यह अर्थ हो कि आत्मा अनन्त काल तक रहता है, कोई कहता है वहाँ ता अमर है किसी की हत्या कर देने पर भी ज्ञान और सुख नहीं रहता उसके विशेष गुण नष्ट आत्मा मर नहीं सकता इसलिये हिंसा अहिंसा हो जाते हैं, कोई कहता है मुक्ति में आत्मा का का विचार व्यर्थ है, ऐसी हालत मे दर्शनशास्त्र नाश हो जाता है, कोई कहता है वहाँ बिना की दृष्टि में आत्मवाद सत्य होने पर भी धर्मशास्त्र इन्द्रियों के सब भोगों को भोगता है, कोई कहता की दृष्टि में असत्य हो जायगा । आत्मवाद के है उसका पृथक अस्तित्व मिट जाता है, कोई विषय में दर्शनशास्त्र बदलता रहे तो भी धर्म- कहता है के लिये ईश्वर के पास पहुँच जाता शास्त्रा न वदलेगा उसकी दृष्टि पुण्यपाप की सार्थ. है, कोई कहता है मुक्ति नित्य नहीं है जीव वहाँ कता पर है । यही आत्मवाद के विषय में धर्मशास्त्र से लौट आता है, इस प्रकार नाना मत हैं । धर्म- और दर्शनशास्त्र की जुदाई है । शास्त्र इस विषय में बिलकुल तटस्थ है । धर्मशास्त्र सर्वज्ञवाद--सर्वज्ञ हो सकता है या नहीं, के लिये तो स्वर्ग नरक मोक्ष आदि का इतना ही या हो सकता है ता कैसा हो सकता है दर्शन- अर्थ है कि पुण्य पाप-अच्छे बुरे कार्यो-का शास्त्र के इस विषय में अनेक मत हो सकते हैं फल अवश्य मिलता है । जिसने इस बात पर और हैं, पर धर्मशास्त्र को इससे कोई मतलब नहीं। विश्वास कर लिया फिर मुक्ति पर विश्वास किया धर्मशास्त्र तो सिर्फ यही चाहता है कि मनुष्य या न किया, उसको धर्मशास्त्र मिथ्या नहीं कहता। नैतिक नियमों पर पूर्ण विश्वास करे और तदनुसार प्रश्न-अगर मुक्ति न मानी जाय तो मनप्य चले । अत्र इसके लिये बहुदी सर्वज्ञ माना जाय धर्म क्यों करेगा ? मुक्ति हो या न हो, पर मुक्ति या श्रेष्ठ विद्वान सर्वज्ञ माना जाय, धर्मशास्त्र इसमें का आकर्षण तो नष्ट न होना चाहिये । कुछ आपत्ति न करेगा। सिर्फ सर्वज्ञता के उस उत्तर-मुक्ति पर विश्वास होना उचित है रूप पर आपत्ति करेगा जो धर्मसमभाव का उसमें कोई बुराई नहीं है, पर इस के लिये बुद्धि विघातक है और विकास का रोकनेवाला है । इस के हाथों में हथकड़ी नहीं डाली जा सकती, बुद्धि सर्वज्ञवाद के विषय मे दर्शनशास्त्र परस्पर में तो अपना काम करेगी ही, इसलिये अगर किसी जितना विरोधी है उतना धर्मशास्त्र नहीं है । कोई को मुक्ति तर्क-संगत न मालूम हुई तो इसीलिये सर्वज्ञ माने या न माने यदि नैतिक नियमों की उसे धर्म न छोड़ देना चाहिये, न छोड़ने की प्रामाणिकता में उसका विश्वास है तो धर्मशास्त्र की जरूरत है । स्वर्ग की मान्यता से भी या परलोक - - ९४ ] सत्यामृत है की मान्यता से भी धर्म के लिये आकर्षण रह मन आदि ये सब द्वैतवाद हैं। अद्वैत का अर्थ सकता है। है जगत का मूल एक है जैस ब्रह्म । दर्शनशास्त्र प्रश्न--परिमित सुख की आशा मे मनुष्य की यह गुत्थी अभी तक नहीं सुलझी । भौतिक जीवनोत्सर्ग क्यों करेगा। विज्ञान भी इस विषय मे काफी प्रयत्न कर रहा उत्तर-मनुष्य सरखा हिसाबी प्राणी दिन- है। बहुत से वैज्ञानिक सोचने लगे हैं कि तत्त्व वान। रात जितने लाभ से सन्तुष्ट रहता स्वर्ग में नहीं हैं एक है फिर भले ही वह ईथर हो उससे कही अधिक लाभ है। मनुष्य यह जानता या और कुछ । अद्वैत की मान्यता में मूल तत्त्व है कि अच्छी रोटी खाने पर भी शामको फिर चेतन है या अचेतन, यह प्रश्न ही व्यर्थ है । भूख लगेगी फिर भी रोटी खाता है और उस रोटी चेतन का अर्थ अगर ज्ञान-जानना -विचार करना के लिये दुनिया भर की विपदा मोल लेता है । आदि है तो उस मूल अवस्था में यह सब असं- मनुष्य दिनरात कोल्हू के बैल की तरह घर और भव है इसलिये अद्वैत की मान्यता में मूलतत्त्व बाजार में चक्कर काटता है और सब तरह की अचेतन ही रहेगा। अथवा बीजरूप में चतन परेशानियाँ उठाता है तब वह स्वर्ग के लिये यह हट और अचेतन दोनों ही उसमें मौजूद है इसलिये करके क्यो बैठ जायगा कि मैं तो तभी धर्म करूंगा उसे चैतन्याचतन्यातीत कह सकते हैं । द्वैत जब मुझे मोक्ष मिलेगा, स्वर्ग के लिये मै कुछ नहीं अद्वैत की यह समरया सरलता से नहीं सुलझ करता । सच तो यह है कि जो तत्त्वदर्शी है सकती पर धर्मशास्त्र को इसकी जरा भी चिन्ता उसको सदाचार का फल ढूढ़ने के लिये स्वर्ग गोक्ष नहीं है । यह समस्या सुलझ जाय तो धर्मशास्त्र की भी जरूरत नहीं होती, वह तो सदाचार का कुछ लाभ नहीं और न सुलझ तो कुछ हानि का सुफल यहीं देख लेता है, जब बाहर नहीं नही । जगत मूल मे एक हो या दो, सदाचार दिखाई देता तब भीतर देख लेता है। और जो की आवश्यकता और रूप में इससे कोई अन्तर तत्त्वदर्शी नहीं है वह मोक्ष के आनन्द को समझ नही पड़ता । अगर जगत मूल एक ही नहीं सकता । उसे स्वर्ग और मोक्ष में से का यह अर्थ नहीं कि हम किसी को तमाचा किसी एक चीज़ को चुनने को कहा जाय तो वह मारे तो उसे न लगेगा अथवा हमें ही लगेगा। स्वर्ग ही चुनेगा । हाँ, मोक्ष के अर्थ को ठीक न द्वैत हो या अद्वैत, हिंसा अहिंसा आदि विवेक समझकर साम्प्रदायिक छाप के मारे कुछ भी कहे। उसी तरह रखना होगा जैसा आज रक्खा जाता मतलब यह है कि मुक्ति के मानने से सदाचार है । इसलिये द्वैत अद्वैत के दार्शनिक प्रश्न का का आवर्षण नष्ट नहीं होता इसलिये धर्मशास्त्र धर्मशास्त्र से कोई सम्बध नहीं है। द्वैत या मुक्ति के विषय में तटस्थ है। अद्वैत मानने से मनुष्य धर्मात्मा सम्यग्दृष्टि आस्तिक द्वैताद्वैत-द्वैत का अर्थ है जगत दो या दो से और ईमानदार नहीं बनता अधिक तत्त्वों से बना हुआ है । जैसे पुरुष और हां, द्वैत या अद्वैत जो कुछ भी बुद्धि को प्रकृति, जीव पुद्गल धर्म अधर्म काल आकाश, जच जाय उसका उपयोग धर्मशास्त्रा अच्छी तरह पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश काल दिशा आत्मा कर सकता है। अद्वैत का उपयोग धर्मशास्त्रा मे है तो इस 1- लक्षण-दृष्टि [ ९५ सकता हैं - में विश्वप्रेम के रूप में हो सकता है। द्वैत का सत्य पर अवलम्बित न करने से धी का पारस्परिक उपयोग आत्मा और शरीर को भिन्न मानकर विरोध बहुत शान्त हो जाता है । इसलिये धर्म- शारीरिक सुखों को गौण बनाने में किया जा शास्त्र का स्थान समझलेना चाहिये । और इस विषय का भ्रम दूर कर देना चाहिये । दर्शन के दो परस्पर विरोधी सिद्धान्त प्रश्न-धर्मशास्त्र का स्थान समझ लेने से धर्मशास्त्र में एक सरीखे उपयोगी हो सकते है और दर्शनशास्त्र तथा और दूसरे शास्त्रों से सम्बन्ध सत्य अहिंसा की पूजा के काम में आ सकते हैं रखनेवाले झगड़े अवश्य शान्त हो जायगे, पर यह धर्म शास्त्र से दर्शन शास्त्र की भिन्नता का धर्मों में इतना ही विरोध नहीं है। प्रवृत्ति निवृत्ति, सूचक है। हिंसा अहिंसा-वर्ण अवर्ण तथा और भी आचार नित्यानित्यवाद- वस्तु नित्य है या अनित्य, शास्त्र सम्बन्धी भेद हैं । इस बातों में प्रायः सभी यह वाद भी धर्म के लिये निरुपयोगी है। अगर परस्पर विरुद्ध है तब धर्मसमभाव कैसे रह नित्यवाद सत्य है तो भी हत्या करना हिंसा है। सकता है ? अगर अनित्यबाद या क्षणिकवाद सत्य है तो भी उत्तर इन बातो को लेकर जो धी में यह कहकर खून माफ नहीं किया जा सकता कि विरोध मालूम होता है उसके कारण है परिवर्तन, वह तो हर समय नष्ट हो रहा था मैंने उसका खून पर उपेक्षा और दृष्टि की विकलता । पहिले धर्म- किया तो क्या विगड़ गया, इसलिये नित्यवाद विरोध-भ्रम के पांच कारण बताये हैं उनमें से ये अनित्यवाद का आत्म शुद्धि या सदाचार के साथ कोई दूसरे तीसरे हैं जो कि आचार-विषयक भ्रम के सम्बन्ध नहीं बैठता | हां, भावना के रूप में दोनों कारण हैं। का उपयोग किया जा सकता है । नित्यवाद से २ परिवर्तन पर उपेक्षा--ऋतु के अनु- हम आत्मा के अमरत्व की भावना से मृत्यु से निर्भय सार जैसे हमें अपने रहन सहन भोजन आदि में हो सकते है और अनित्यवाद से भोगों की या कुछ परिवर्तन करना पड़ता है उसी प्रकार जीवन की क्षणभंगुरता के कारण इससे निर्मोह देशकाल बदलने पर सामाजिक विधानों में परि- हो सकते हैं । इस प्रकार धर्म शास्त्र तो नित्यवाद वर्तन करना पड़ता है । इसलिये एक जमाने में का और अनित्यवाद का समान रूप में उपयोग जो विधान सत्य होता है दूसरे जमाने में वही करता है । दर्शन शास्त्र तो नित्यवाद या अनित्य- विधान असत्य बन जाता है इसलिये एक जमाने वाद को-दो में से किसी एक को मिथ्या अवश्य का धर्म दूसरे जमाने के धर्म से अलग हो जाता कहेगा परन्तु धर्म शास्त्र दोनों का सत्य के समान है । परन्तु अपने अपने समय में दोनों ही समाज उपयोग कर सकेगा यह धर्म शास्त्र और दर्शन के लिये हितकारी होते हैं । जो लोग परिवर्तन : शास्त्र का भेद है। इस मर्म को समझजाते हैं उन्हें धी में विरो इस प्रकार धर्म शास्त्र. और दर्शन शास्त्र नहीं मालूम होता वे परस्पर विरुद्ध मालूम हो । आदि को अलग कर देने से, अर्थात् धर्मशास्त्र आचारो में समन्वय करके उनसे लाभ उठा . के सत्य को दर्शन शास्त्र या अन्य किसी शास्त्र के हैं । परन्तु जो परिवर्तन पर. उपेक्षा करते हैं । -- - - १६ ] सत्यामृत - हर बात में विरोध ही नजर आता है, वे इस विषय अहिंसा में भी हिंसा का झार हो जाती है । श्री में विपमता और विरोध के अन्तर को ही नहीं में जो अहिंसा की तरतमता दिवाई देती है उसपर समझते । विषमता तो नर और नारी में भी काफी अगर पूरी तरह विचार किया जाय तो उसकी है पर इस से उनमे विरोध सिद्ध नहीं होता । आवश्यकता हम समझ जायगे और फिर वर्गों में व्यवहार भी यह साधारण बात धर्म के विषय में विरोध न रहेगा। भी अगर काम में लाई जाय तो सुधारक और अहिंसा का पूरा पालन तो असंभव है। उदार बनने के मार्ग में कठिताई न रहे । इसलिये उसका सम्भव और व्यवहार्य रूप ही एक जमाने मे समाज की आर्थिक व्यवस्था दुनिया के आगे रखा जाता है। जहां का के लिये वर्ण-व्यवस्था की जरूरत पड़ी तो धर्म में समाज जितना विकसित होता है अहिंसा का वर्ण-व्यवस्था को स्थान मिलगया। उससे समाज पालन उतना ही अधिक होता है। पर धर्म की ने काफी लाभ उठाया, लोग आजीविका की चिन्ता दृष्टि तो अहिंसा की ओर ही होती है। से मुक्त हो गये, परन्तु इस के बाद वर्ण-व्यवस्था जैनधर्म मे अहिंसा का पालन अधिक है इसलाम ने जातीयता का रूप धारण करके खान पान में कम है, पर दृष्टि दोनों की अहिंसा की तरफ विवाहादि सम्बन्ध में अनुचित बाधाएँ डालना शुरु है । इसलाम मे पशुबलि आदि जो विधान पाये कर दिया, जाति के कारण गुणहीनो की पूजा होने जाते है वे अधिक प्राणि हिंसा के बदले में कम लगी, उन के अधिकारों से गुणी और निरपराध प्राणि हिंसा के लिये होने से अहिंसा राप है। पिसने लगे, तब वर्ण-व्यवस्था को नष्ट कर देने की जो मनुष्य-हत्या करता हो उसे पशुहत्या तक आवश्यकता हुई। इस समयानुसार परिवर्तन में सीमित करना, जो अधिक पशुहत्या करता हो विरोध किस बात का ? वैदिक धर्म की वर्ण- उसे कम पशुहत्या तक सीमित करना, जो प्रति- व्यवस्था और जैन धर्म बौद्ध धर्म का वर्णव्यवस्था- दिन पशुहत्या करता हो उससे कभी कभी पशु विरोध, ये दोनों ही अपने अपने समय में स..।ज हत्या बंद कराना, जो अन्न मिलने पर भी स्वाद के लिये कल्याणकरी रहे है। इसलिये वर्भ-समभावी के लिये पशुहत्या करता हो उसे सिर्फ पेट भरने को उचित परिवर्तन के लिये सदा तैयार रहना के लिये अनिवार्य प्रसंगो पर पशुहत्या करने-देना चाहिये और परिवर्तन पर उपेक्षा कमी न आदि हिंसारूप कार्य अहिंसा की दिशा तरफ करना चाहिये। होने से अहिंसात्मक है। इसलिये सभी धर्म ३ दृष्टि की विकलता- दृष्टि की विकलता अहिंसा का सन्देश देनेवाले है । से किसी चीज का पूरा रूप या पर्याप्तरूप नहीं प्रश्न-यह ठीक है कि सभी धर्म अहिंसा दिखता, इसी से हिंसा अहिंसा और प्रवृत्ति निवृत्ति की तरफ दृष्टि रखते है उनमें जो हिंसा-विधान के विरोध पैदा होते है । सभी धर्म अहिंसा के पाये जाते है उनमे उन धर्मों का कोई अपराध प्रचारक है परन्तु अहिंसा का पूर्णरूप हरएक, नहीं है इसलिये सभी धर्म आदरणीय है। यहां आदमी नहीं पालसकता और न हर समय अहिंसा तक ठीक है, पर सभी धर्म समानरूप से पाल- का बाह्यरूप एकसा होता है । इसलिये कभी कभी नीय नहीं हो सकते । जो धर्म कम विकसित , 1 लक्षण-दृष्टि [ ९७ - गंगों में पैदा हुआ है उसका दर्जा कुछ न कुछ है किसी भी धर्म-संस्था में जन्म हो गया । तीचा अवश्य है । ऐसी हालत में सभी धर्मों में चौथी बात यह है कि धर्म-संस्था की समभाव कैसे पैदा होगा। और जो लोग छोटी महत्ता से धर्म-संस्थापक की महत्ता का माप नहीं श्रेणी के धर्म को मानते हैं उनके कार्य का सम- लगाया जा सकता। जैसे एक ही योग्यता के थन कैसे किया जा सकेगा ? या उन्हें धर्म के चार पाठक छोटी बड़ी चार कक्षाओं को ऊँचा विषय में समान कैसे माना जा सकेगा ? नीचा पाठ्य विषय पढ़ायेंगे पर उनकी कक्षा की उत्तर-धर्म को अभिमान का विषय बनाना तरतमता उनके ज्ञान की तरतमता की सूचक चन्दन को ईंधन बनाने के समान है इसलिये नहीं है । पहिली कक्षा पढ़ाने वाला और चौथी अमुक का धर्म छोटा और हमारा धर्म बड़ा यह कक्षा पढ़ानेवाली, ये दोनों समान योग्यता रखकर भी अभिमान न रखना चाहिये । कक्षा के छात्रों की योग्यता के अनुसार ऊँचा दूसरी बात यह है कि हरएक धर्म में कोई नीचा कोर्स पढ़ावेंगे । इसी प्रकार दो धर्मो के ऐसी बात निकल आती हैं जो दूसरे धर्मो में संस्थापक समान योग्यता रख कर भी परिस्थिति उतनी मात्रा में नहीं पाई जाती इसलिये किसी के अनुसार उँचा नीचा कोर्स पढ़ावेंगे। यह बहुत एक दृष्टि से बड़ेपन का विचार न करना चाहिये । सम्भव है कि हजरत मुहम्मद अगर ढाई हजार अहिंसा की दृष्टि से यदि जैनधर्म महान है तो वर्ष पहिले भारतवर्ष में पैदा होते तो महात्मा ' दीन-सेवा की दृष्टि से ईसाई धर्म महान है, भातृ महावीर और महात्मा बुद्ध से बहुत कुछ मिलते भाव और व्याज न खान ( अपरिग्रह ) की दृष्टि जुलते होते । और महात्मा महावीर या महात्मा बुद्ध से इसलाम प्रधान है । बौद्धधर्म में इसलाम और डेढ़ हजार वर्ष पहिले अरब में पैदा होते तो ईसाई धर्म की दोनों विशेपताएँ काफी मात्रा में है हजरत मुहम्मद से मिलते जुलते होते । इसलिये हिन्दूधर्म की सर्वांग-पूर्णता असाधारण है। इसलिये धर्म संस्थाओं की तुलना से धर्म संस्थापकों की सब दृष्टियों से किसी को बड़ा नहीं कहा जा तुलना न करना चाहिये । सकता और एक एक दृष्टि से तो प्रायः सभी पांचवी बात यह है कि सभी धर्म अपूर्ण बड़े हैं। हैं अथवा यह कहना चाहिये कि वे अमुक देश- तीसरी बात यह कि अभिमान की चीज़ काल व्यक्ति के लिये पूर्ण हैं इसलिये किसी युग धर्म नहीं हैं धर्माचरण है । यद्यपि धर्माचरण का में सभी धर्म समान पालनीय नहीं हो सकते । भी अभिमान न करना चाहिये फिर भी महत्ता उनमें से अनावश्यक बातें निकाल देना चाहिये धर्माचरण की है। कोई बड़े शहर में भिखारी या गौण कराना चाहिये । और आवश्यक वातें और मूर्ख हो सकते हैं और छोटे शहर में लख- जोड़ देना चाहिये । पति और चतुर हो सकते हैं। महत्ता अपनी जैसे--हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था आज योग्यता से है शहर से नहीं। इसी प्रकार महत्ता विकृत होगई है, वह मुर्दा होकर सड़ रही है, उसे धर्माचरण [नैतिक जीवन ] से हैं धर्म संस्था मूल लाना चाहिये या नष्ट कर की सदस्यता से नहीं । यह तो जन्म की बात , देना चाहिये । इस समय नष्ट करना ही सम्भव A [ या तो के रूप में ९८ ] सत्यामृत ARE सत्र में । है इसलिये वहीं करना चाहिये । वर्ण व्यवस्था कर लेना चाहिये। नष्ट हो जाने से शूद्राधिकार की समस्या हल हो ये तो नमूने हैं सुधार करने की सब जगह जायगी । रही स्त्रियो की बात, सो हिन्दु शाखा मे काफी जरूरत है। इसलिये धमी की पालनीयता नारी के अधिकारों में जो कमी है वह पूरी करना समान नहीं है । पर सब में इतनी समा- चाहिये । जैन धर्म की साधु संस्था आज अव्यवहार्य नता जार है कि देशकाल के अनुसार उनमें या निरुपयोगी हो गई है । आज ऐसी एकान्त सुधार कर लिया जाय और उनकी नीति व्यापक निवृत्तिमय साधु संस्था गुप्तप्रवृत्तिमय होकर पाप और उदार बनाई जाय । बन गई है उसे नष्ट करना चाहिये और सांख्ययोग इन पाँच बातों का विचार कर लेने पर धी के स्थान में कर्मयोग को मुख्यता देना चाहिये । की तरतमता पर दृष्टि न जाय और तरतमता बौद्ध धर्म में अहिंसा का रूप विकृत हो गया है के नाम से पैदा होनेवाला मद दूर हो जायगा । मृतमांस-भक्षण का विधान दूर करना चाहिये । सभी धमी में भगवनी अहिंसा की छत्र छाया दिग्व मांस-भक्षण-निषेध को जोरदार बनाना चाहिये। पड़ेगी। यह दृष्टि की विकलता का ही परिणाम है महायान सम्प्रदाय के द्वारा आये हुए अनेक कल्पित कि हमे सब धर्मों में विराजमान भगवती अहिंसा देव देवी दूर होना चाहिये । ईसाई धर्म का पोपडम के दर्शन नहीं होते। तो नष्ट हो ही चुका है। बाइबिल में ऐसे अधिक दृष्टि की विफलता के कारण प्रवृत्ति निवृत्ति विधिविधान नहीं हैं जिन पर कुछ विशेष कहा आदि का रहस्य समझ में नहीं आपाता है। अन्यथा जा सके । जो अव्यवहार्य बाते थी वे सब तोडी सभी धर्मों में पाप से निवृत्ति और विश्वकल्या जा चुकी है बल्कि उनकी प्रतिक्रिया हो चुकी मे प्रवृत्ति का विधान है। साधु-संस्था आदि के है। धनियों को स्वर्ग में प्रवेश न मिलने की बात रूप मे कहीं निवृत्तिप्रधानता या प्रवृत्तिप्रधानता की प्रतिक्रिया आज भयंकर साम्राज्यवाद के रूप पाई जाती है वह देशकाल के अनुसार थी उसमें में हो रही है । ईसाई राष्ट्र अपने साम्राज्यवाद के आज के देशकाल के अनुसार सुधार कर लेना कारण आज जगत के लिये अभिशाप बन रहे हैं चाहिये । मूर्तिपूजा अमूर्तिपूजा आदि का विरोध इन सब में सुधार होने की ज़रूरत है । और भी दृष्टि की विकलता का परिणाम है । साधारणतः जो बाइबिल में नैतिक उपदेश है वे ठीक है। मूर्तिपूजा किसी न किसी रूप में रहती ही है महात्मा ईसा के जीवन में जो अतिशयो की कल्पना उसके किसी एक रूप का विरोध देशकाल को है वह जाना चाहिये । अन्य धर्मी में भी यह देखकर करना पड़ता है, जैसे इसलाम को करना बीमारी है वह वहाँ से भी जाना चाहिये। मांस पड़ा । देवदेवियों की मूर्तियाँ दलवन्दी का भक्षण आदि का जो कम प्रतिबंध है वह अधिक कारण थीं इसलिये वे हटादी गई। पर मक्का की होना चाहिये । इसलाम में जो पशुवलि आदि के पवित्रता, अमुक पत्थर का आदर ( जो कि एक विधान है जो उस समय अधिक हिंसा रोकने के तरह की मूर्तिपूजा है.) रहा, क्यो कि इससे दल लिये बनाये गये थे-वे आज अनुचित है। मूर्तिपूजा बन्दी नहीं होती थी बल्कि एकता होती थी। का विरोध भी अब आवश्यक नहीं है ये सुधार. मूर्तिपूजा के अमुकरूप के विरोध को देखकर किसी - लक्षण- -दृष्टि [ ९९ mind [ . धर्म को मूर्तिपूजा का विरोधी समझलेना दृष्टि की देना है उसमें अनेक रसवाले भोजन की तरह विकलता का परिणाम है। दृष्टि की विकलता विविधता का आनन्द आने लगे । इसलिये वाल- दूर होजाने से इन सब विरोधों का समन्वय सरलता कों के ऊपर ऐसे ही समभावी संस्कार डालना से हो सकता है। चाहिये जिससे वे एकरूपता के गुलाम न ४ अनुदारता के संस्कार-भक्तिमय सम- हो एकता के प्रेमी हों । इस प्रकार के संस्कारों भाव में बाधा डालनेवाले कारणों में चौथा से धर्मों का पारस्परिक विरोध दूर हो जायगा । कारण है अनुदारता के संस्कार । हमारा धर्म ५-सर्वज्ञता का अनुचित रूप- प्रायः हर- ही सच्चा है बाकी सब धर्म झूठे है मिथ्यात्व हैं एक धर्मवाले ने यह मानलिया है कि हमारे धर्म नास्तिक है इस प्रकार के संस्कार वाल्यावस्था से का प्रणेता सर्वज्ञ था। किसी ने मनुप्य को ही डाले जाते हैं इसका फल यह होता है कि सर्वज्ञ माना, किसी ने ईश्वर को सर्वज्ञ मानकर अपने उसे अपनी हरएक बात में सच्चाई और अच्छाई धर्म की जड़ वहाँ बताई। किसी ने अपने धर्म को दिखाई देने लगती है और दूसरों की बातों में अपौरुसपेय-प्राकृतिक-मानकर प्राणिमात्र की शक्ति बुराई ही बुराई । हिन्दू सोचता है नमाज भी से परे वताया। मतलब यह कि प्रायः हर एक धर्म का कोई प्रार्थना है ! न काई स्वर-संगीत न कोई अनुयायी यह दावा करता है कि जो कुछ जानने आकर्षण । मुसलमान सोचता है गलाफाड़- का था वह सब जानलिया गया ।उससे अधिक फाड़ कर चिल्लाना भी क्या कोई प्रार्थना है : जाना नहीं जासकता । इससे अधिक जानने का दिशा की बुराई करता है एक पश्चिम जो दावा करते हैं वे झूठे हैं । सर्वज्ञता के इस की । एक संस्कृत की बुराई करता है एक अरबी अनुचितरूपने सुधार का और विकास का शास्त्र तो की। कुसंस्कारों के कारण वह यह नहीं सोच बन्द कर ही दिया, साथ ही अपने ही धर्म के सकता कि कभी किसी को स्वर संगीत की जरू समान जगकल्याण करनेवाले अन्य ‘धी का स्त होती है कभी शान्ति और निस्तब्धता की। तिरस्कार कराया, घृणा कराई । जिसकी जैसी रुचि जैसी रुचि हो. उसको उसी सर्वज्ञता की मान्यता अनेक तरह की है। ढंग से काम करने देना चाहिये । खेद तो इस १- अनंतकाल और- अनंतक्षेत्र के समस्त बात का है कि परनिन्दा आदि के संस्कार जितने पदार्थो का प्रतिसमय युगपत् प्रत्यक्ष । डाले जाते हैं उतने असली धर्म के ( सत्य २- उपर्युक्त पदार्थो का क्रमसे प्रत्यक्ष । अहिंसा सेवा शील त्याग ईमानदारी आदि के) ६- किसी भी समय के किसी भी क्षेत्र के नहीं डाले जाते | अगर असली धर्म की तरफ पदार्थ का इच्छानुसार प्रत्यक्ष । हमारा ध्यान आकर्पित किया जाय तो सभी ४- समस्त शास्त्रों का ज्ञान । धर्मों में हमें असली धर्म दिखाई देने लगे। और ५- धर्मशास्त्र का परिपूर्ण ज्ञान । धर्म के नाम पर हम सब से प्रेम करने लगें, एक ६- अपने जमाने की सबसे बड़ी विद्वत्ता । दूसरे के घर के समान एक दूसरे के धर्मस्थानो ७- लोगों की - जिज्ञासाओं' को शान्त में जाने लगे, जिस विविधता में हमें विरोध दिखाई. करने योग्य ज्ञान । " 1 - - - ०० ० ] सत्यामृत ८-- आत्मज्ञान । नहीं हो सकता। जब पदार्थ किसी माध्यम के ९-- कल्याण मार्ग के लिये उपयोगी बातों का द्वारा हमारी इन्द्रिय और मन पर प्रभाव डालता है तब उसका प्रत्यक्ष होता है जो पदार्थ नष्ट हो नुभवमूलक पर्याप्त ज्ञान । हो चुके या पैदा ही नहीं हुए वे क्या प्रभाव १-- यह मान्यता असंभव और अनर्थकर है। समें बहुतसी बाधाएँ है । पहिली बाधा यह है डालेंगे तब उनका प्रत्यक्ष कैसे होगा इसलिये भी त्रिकाल त्रिलोक के पदार्थो का प्रत्यक्ष नहीं के पदार्थ की अवस्थाएँ अनन्त हैं उन सबका हो सकता। प्रत्यक्ष करने क लिये एक अंतिम अवस्था का जानना जरूरी है परन्तु वस्तु की कोई अंतिम २-क्रम से प्रत्यक्ष भी असंभव है। क्योंकि अवस्था ही नहीं है। तब उसका पूर्ण प्रत्यक्ष अनन्त क्षेत्र और अनंत काल का क्रम से प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है । अंतिम अवस्था जान लेने पर किया जाय तो अनंत काल लग जायगा । और वस्तु का अन्त आजायगा जोकि असंभव है । दूसरी मनुष्य का जीवन तो बहुत थोड़ा है । इसलिये बाधा यह है कि एक समय मे एक ही उपयोग अनंत का क्रम से भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । हो सकता है अगर हम दस मनुष्यों को एक साथ दूसरी बात यह है कि क्रम से प्रत्यक्ष में देखें तो हमें सामान्य मनुष्यज्ञान होगा दस मनु'यों का पहिले जानी हुई बातों की धारणा करना पड़ती जुदा जुदा विशेषज्ञान नहीं । इसलिये अगर कोई है । जब मर्यादा से अधिक धारणा की जायगी त्रिकाल त्रिलोक का युगपत् प्रत्यक्ष करे तो उसे तब पुरानी बातों की धारणा मिटने लगेगी। इस पदार्थों की अवस्थाओं प्रकार क्रम से प्रत्यक्ष मे न तो सभी पदार्थ जाने में होनेवाली समानता का ज्ञान होगा। सब वस्तु जा सकते है और अगर किसी तरह जाने भी और सब अवस्थाओं का ज्ञान नहीं । जाँय तो-न उनका धारण करना सम्भव है। प्रश्न-बहुत से लोग एक ही समय में अनेक ३-यह भी असम्भव है क्योकि असत् तरफ़ उपयोग लगा सकते हैं | साधारण लोग भी पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । विना माध्यम एक ही समय में बहुत सी चीजो का प्रत्यक्ष कर के हम किसी पदार्थ को नहीं जान सकते । लेते हैं तब युगपत् प्रत्यक्ष में क्या आपत्ति है ? ४ शास्त्र रचना की प्रारम्भिक अवस्था में उत्तर-अग्नि की एक छोटी सी मशाल अगर ऐसी सर्वज्ञता सम्भव थी। अब शास्त्र नाम का जोर से घुमाई जाय तो वह मशाल जितनी जगह वृक्ष इतना महान और शाखाप्रशाखा-बहुल हो में घूमेगी उतनी जगह में सब जगह एक साथ गया है कि उन सब को छू सकना एक मनुष्य दिखाई देगी पर एक समय में वह रहती है एक की शक्ति के बाहर है। ही जगह । इसी प्रकार जब बहुत जल्दी जल्दी पांच से आठ तक की परिभाषाएँ साधारणतः उपयोग बदलता है तब वह ऐसा मालूम होता है ठीक है । भूतकाल में इन परिभाषाओं का उप- मानों सब जगह एक साथ है । यह एक भ्रम है योग भी काफी हुआ है । अन्तिम अर्थात् नवमी जो शीघ्रता के कारण हो जाता है । अधिक अच्छी है | तीर्थकर पैगम्बर आदि इसी तीसरी बाधा यह है कि असत् का प्रत्यक्ष परिभाषा के अनुसार सर्वज्ञ होते है। इसलिये उनके सब सब लक्षण-दृष्टि [ १०१ ---- । आशा बचन काफी विश्वसनीय हैं बहुत वर्गीकरण भी हो सकता है परन्तु उन वर्गो इन सर्वज्ञों से अन्य विषयों के ज्ञान की को जातिभेद का कारण नहीं कह सकते । करना चाहिये, और न अन्य जातिभेद के लिये सहज दाम्पत्य का अभाव और विषयों में इनके बचन प्रमाण मानना चाहिये । धर्म आकृति की अधिक विषमता आवश्यक है । मनुष्यों के विषय में भी यही कहा जा सकता है कि वह में ऐसी विषमता नहीं पाई जाती और उन में अपन जमाने का सर्वज्ञ था। देवाकाल पात्र के दाम्पत्य स्वाभाविक और सन्तानोत्यदक होता है। बदलने से जो जो परिस्थितियां पैदा हो सकती किसी भी जाति के पुरुष का सम्बन्ध किसी भी हैं और भविष्य में होनायगी उन सब का पूर्ण- जाति की स्त्री से होने पर सन्तानोत्पत्ति होगी । ज्ञान उसे नहीं था, इसलिये आज अगर एसी शरीरपरिमाण या लिंगपरिणाम के अन्तर की परिस्थिति पैदा हो गई है जिसके लिये पुराने बात दूसरी है । इससे मालूम होता है कि मनुष्य विधान काम नहीं देसकत तो हम जमाने के अनुकूल मात्र एक जाति है। विधान बना लना चाहिये, दुसरे धी में अगर प्रायः सभी धर्मशास्त्रों में इस बात का कोई विशेष वात पाई जाती है तो उसे अपना- उल्लेख मिलता है कि सभी मनुष्यों की एक जाति लेना चाहिये, इस प्रकार सुधार के लिये सदा है आज जो इनके भेद प्रभेद दिखाई देते हैं वे तयार रहना चाहिये । अपने धर्म को परिपूर्ण और मौलिक नहीं हैं। वातावरण आदि के कारण अपरिवर्तनीय न समझना चाहिये । पैदा होने वाले भेद मनुष्य की एक जातीयता धमी में जो हमें विरोध या उच्चनीचता मालूम को नष्ट नहीं कर सकते । होती है उसके ये पाँच कारण हैं। इन पाँच कारणों के वैदिक शास्त्रों में मनुष्यों को मनुसन्तान दूर कर देने पर हमारे हृदय में विवेकपूर्ण सर्वधर्म-सम- कहा है इसस उनमें एकजातीयता ही नहीं एक भाव आ सकता है । यह योगी का दूसरा चिह्न है, जो मानव समाज की एकता प्रेम के लिये और कौटुम्बिकता भी सिद्ध होती है। इसलाम और ईसाई भगवान सत्य के दर्शन के लिये आवश्यक हैं । धर्म के अनुसार सब मनुष्य आदम की सन्तान हैं इसलिये भी उनमें भाईचारा सिद्ध होता है। ३ जाति-मपभाव जैनशास्त्रों के भोगभूमि युग के वर्णन से मनुष्य योगी का तीसरा चिह्न जातिममभाव है । मात्रा की एक जाति सिद्ध होती है । इस प्रकार हाथी घोड़ा सिंह ऊंट आदि. जिस प्रकार एक प्राकृतिक दृष्टि से और शास्त्रों की मान्यता से सव एक तरह के प्राणी हैं उसीप्रकार मनुष्य भी मनुष्यों की एक जाति सिद्ध होती है । एक तरह का प्राणी है मनुष्य शब्द इतना होने पर भी आज मनुष्य जाति पशु शब्द की तरह नाना तरह के प्राणियों के अनेक भागों में विभक्त है। इसके कारण कुछ समुदाय का वाचक नहीं है, किन्तु सिंहादि भी हो, परन्तु इससे जो अबर्म हो रहा है, जो शब्दों की तरह, एक ही तरह के विनाश हो रहा है, दुःख और अशान्ति का जो प्राणी का वाचक है । यों तो व्यक्ति व्यक्ति में विस्तार हो रहा है, वह मनुष्य सरीखे बुद्धिमान भेद हुआ करता है और उन भेदी का थोड़ा प्राणी के लिये लन्ना की बात है। बुद्धि तो १०२ ] सत्यामृत NA 4- monwer- पशुओ मे भी होती है, परन्तु मनुष्य की बुद्धि अन्त में न्याय के पराजय और अन्याय के विजय कुछ दूर तककी बात विचार सकती है। लेकिन का जो फल हो सकता है, वह मनुष्य-जाति को इस विषय मे उसकी विचारकता व्यर्थ जाती ही भागना पड़ता है। देखकर आश्चर्य और खेद होता है। ५-विवश होकर मनुष्य को कूपमंडूक मनुष्य भी एक सामाजिक प्राणी है, बल्कि बनना पड़ता है, क्योंकि वह घरके बाहिर निकल अन्य प्राणियो की अपेक्षा वह बहुत अधिक कर सजातीयों के अभाव से वहां टिक नहीं सामाजिक है । इसलिये सहयोग और प्रेम उसमें सकता । जब सारी जाति की जाति इस विषय कुछ अधिक मात्रा मे और विशाल रूप में होना मे विशेष उद्योग करती है, तब कही थोड़ा बहुत चाहिये । परन्तु जाति भेद की कल्पना करके क्षेत्र बढ़ता है । परन्तु इस कार्य मे शताब्दियाँ मनुष्य ने सहयोग के तत्त्वका नाश सा कर दिया लग जाती है तथा बाहिर निकलने पर भी कूप- है; इससे अन्य अनेक अन्यायों और दुःखोकी मंडूकता दूर नहीं होती। सृष्टि कर डाली है । जाति की कल्पना से जो ६-अपना क्षेत्र बढ़ाने के लिये दूसरी कुछ हानियाँ हुई है और होती है उन में मुख्य जातियों का नाश करना पड़ता है। इससे दोनों मुख्य ये है। तरफ के मनुष्यो का नाश और धन-नाश होता है १--विवाह का क्षेत्र संकुचित हो जाता है। तथा चिरकाल के लिये वैर बन जाता है । इस से योग्य चुनाव में कठिनाई होने लगती है। ७--एक ऐसा अहकार पैदा होता है जिसे और अल्पसंख्यक होने पर जाति का नाश हो मनुष्य पाप नहीं समझता जब कि द्वेपात्मक तथा जाता है। अनेक पापो का कारण होने से वह महापार है । २-कभी कभी जब युवक-युवति में आपस ८ ईमानदार मनुष्यों मे भी जातिभेद के मे प्रेम हो जाता है, और वह दाम्पत्य-रूप धारण कारण अविश्वास रहता है । इससे सहयोग नही करना चाहता है, तब यह जातिभेद की दीवाल होने पाता । इससे उन्नति रुकती है। लोकोप- उनके जीवन का नाश कर देती है । या तो कारक संस्थाएँ भी पारस्परिक उपेक्षा और वैर उनको आत्महत्या करना पड़ती है अथवा बहि- के कारण सारहीन तथा अकिञ्चित्कर हो ष्कृत जीवन व्यतीत करने से अनेक प्रकार की दुर्दशा भोगना पड़ती है। इस प्रकार की अनेक हानियाँ है । यदि ३-जाति के नामपर बने हुए दल लड़- जातिभेद की दुर्वासना को नष्ट कर दिया जाय झगड़ कर एक दूसरे का नाश करते हैं । न खुद तो इसमें सन्देह नहीं कि मनुष्यजाति के कष्टो चैनसे बैठते है, न दूसरो को चैनसे बैठने देते है। का एक बड़ा भारी भाग नष्ट हो जाय । हाँ, ४-जातीय पक्षपात के कारण मनुष्य अपनी सुविधा के लिये कुटुम्बी, सम्बन्धी तथा मित्र वर्ग जाति के अन्याय का भी पोषण करता है, और की आवश्यकता प्रत्येक व्यक्ति को होती है, सो दूसरी जाति के न्याय का भी विरोध करता उसकी रचना हुआ करे । ये सब रचनाएँ तो जाती है।
लक्षण-दृष्टि [१०३ , जगह फैला है सके। वैयक्तिक जीवन में समाजाती हैं। इनमें कोई अब वहुत थोड़ी है । यूरोपीय लोग, वे यूरोप में आनिगत बुराई नहीं है । सम्बन्ध तो चाहे जिस हों या अन्यत्र, भूरी जाति के लोग कहलाते है। मनुप्य के साथ किया जा सकता है और उसे यह जातिभेद व्यक्त या अव्यक्त, रूप में बहुत मित्र भी बनाया जा सकता है। इसलिये इसमें हुआ जन्मगत या उसके समान करता नहीं है और इसी रंग भेद की जातीयता का फल है कि न इसका क्षेत्र इतना विशाल हो सकता है कि एक रंगवाले लोगों ने दूसरी जातियो के, खासकर समाज को क्षुब्ध करनेवाला बुरा असर डाल आफ्रिका की काली जाति के लोगों को पशु की तरह वेचा सताया और मौत के घाट उतारा । कानून जातिभेद की कल्पना के द्वार अगणित हैं में उनकी हत्या का कोई दंड नहीं था। अभी अहंकार का पुजारी यह मनुष्य-प्राणी न जाने कितने ढंग से जातिमद की पूजा किया करता भी यह रोग गया नहीं है पहिले से कम, फिर हैं । उन सब का गिनाना तो कठिन हैं और भी काफी मात्रा में यह भेद बना हुआ है । उनको गिनाने की इतनी जरुरत भी नहीं है, आज भी लोग जिन्दे जलाये जाते हैं आज भी क्योंकि जातिमद के दूर हो जाने से उसके रंगभेद के अनुसार कानून में विषमता मौजूद है । विविधरूप दूर हो जाते हैं । फिर भी स्पष्टता के यह वर्णभेद मौलिक है, यह बात कोई सिद्ध लिये उदाहरण के तौर पर उनपर विचार कर नहीं कर सकता | जहां हम रहते हैं, वहाँ के लेना उचित है, जिससे यह मालूम हो जाय कि जलवायु का जो प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता किस तरह का जातिभेद किस तरह की हानि है, उससे हम काले गोरे आदि बन जाते हैं । का रहा है, और उसे हटाने के लिये हमें क्या वही रंग सन्तान प्रति सन्तान से आगे की पीढ़ी करना चाहिये। को मिलता जाता है। परन्तु अगर जलवायु प्रति- वर्ण भेद-वर्णभेद शब्द ब्राह्मण, क्षत्रिय कूल हो तो कई पीढ़ियों मे- वह बिलकुल बदल आदि भेदों के लिये प्रसिद्ध है । परन्तु यहाँ वर्ण जाता है । हाँ, इसमें सैकड़ों वर्ष अवश्य लग शब्द का यह अर्थ नहीं है, उसका सीधा अर्थ जाते हैं क्योकि जलवायु का प्रभाव वाहिरी होता रंग है । जिन लोगों के यहाँ छोटा छोटा जाति- है और माता-पिता के रजवीर्य का प्रभाव भीतरी। भेद नहीं है, उनके यहाँ भी भूरी, पीली, काली परन्तु मौलिक रूप यह रंग-भेद शीत उप्ण लाल जातियो का भेद बना हुआ है । चीन आदि वातावरण के भेद का ही फल हैं। गोरी- और जापान पीली जाति के लोग माने जाते है । जातियाँ अगर गरम देशों में बस जाँय तो कुछ इससे अवशिष्ट एशिया के अन्य दक्षिणी प्रदेशो शताब्दियों के बाद वे काली हो जायगी। और का बहुभाग तथा आफ्रिका के मूल निवासी काली काली जातियाँ अगर ठंडे देशो में बस जाय तो जाति के माने जाते है । अमेरिका में भी ये लोग वे कुछ शताब्दियों के बाद गोरी हो जायगी । बसे हुए हैं । अमेरिकाके मूलनिवासी लाल जाति इसलिये काले गोरे आदि भेदों से मनुष्य-जाति के के [ रेड इंडियन ] कहलाते हैं जिनकी संख्या टुकड़े कर डालना, न्याय की पर्वाह न करके मे १०४ । सत्यामृत Madam- More Ans- P- उसका यो । में , एक रंग का दूसरे रंग पर अत्याचार करना मनु- उपयोग कर सके तो मनुष्य में जो पशुत्व है प्यता का दिवाला निकाल देना है। अधिकांश जाय मनुष्य की जो 'मौलिक विशेषताएँ है, वे ईर्ष्या, अशान्ति आदि का तांडव कम हो जाय सभी रंग के मनुष्योंमें पाई जाती हैं । गोरे मनुष्य अगर ऐसा न होगा तो एक दिन ऐसा आयगा दयालु भी होते हैं और क्रूर भी, ईमानदार भी जब दुनियां के मनुष्य रंगों के नामपर दो दल होते हैं, और बेईमान भी। यही हाल कालो, बँटकर राक्षसी-युद्ध करेंगे और जिसकी परम्परा पीलों आदि का भी है । एक काला आदमी गोरे सैकड़ों वर्षों तक जायगी और उस अग्नि में की सेवा करे, सहायता दे और दूसरा गोरा गनुष्य जानि स्वाहा हो जायगी । आदमी उसे धोखा दे, लूटले, तो उस गोरे को जातिभेद को तोड़ने का उपाय ता हृदय वह काला आदमी अच्छा मालूम होगा और वह की उदारता ही है। परन्तु इसका एक मुख्य गोरा बुरा । मनुष्यता की, हृदय की, न्यायकी निमित्त पारस्परिक विवाह सम्बन्ध है । जाति के आवाज यही है । मनुष्य पशुओं तक से मित्रता नामपर मनुष्य मात्र में वैवाहिक-क्षेत्र की कैद न रखता है । एक गोरा मनुष्य काले घोड़े से प्रेम होना चाहिये । अगर अधिक परिमाण में ऐसे कर सकता है, और एक काला आदमी सफेद विवाह सम्बन्ध होने लगे तो दोनों के बीचको घोड़े से, तब रंगभेद के कारण मनुष्य मनुष्य से अन्तर अवश्य ही कम हो सकता है। हाँ, इस भी प्रेम न कर सके, यह कैसी आश्चर्यजनक काम मे विवाह-सम्बन्धी समस्त सुविधाओं का खयाल अवश्य रखना चाहिये। सभी के दिन एकसे नह। जाते । कभी एक रंगवालों का प्रभुत्व होता है, कभी दूसरे रंगवालो कहा जाता है कि काली, गोरी आदि जातियों के शरीर में गन्धकी एक विशेषता होती का । उन्नत अवस्था में दूसरों को उन्नत बनाना है जो एक दूसरे को दुर्गंध मालूम होती है । मनुष्यता है, उनको पीस डालने की चेष्टा करना यह ठीक है । मैं पहिले ही कह चुका हूँ कि मनुष्यता का नाश है । इससे वंश परम्परा के लिये वैर ही बढ़ता है, और बारी बारी से सभी यह रंगभेद जलवायु, भोजन आदि के भेदसे सम्बन्ध रखता है । इसलिये वर्णके समान गंध का नाश होता है। और वर्तमान मे भी हम चैन से नहीं रहने पाते। ईमानदारी प्रेम आदि भी थोडा बहुत भेद हो, यह स्वाभाविक है। सद्गुण ही एक दूसरे को सुख देनेवाले हैं । परन्तु यह तो व्यक्तिगत बात है। अगर विभिन्न ये जिनमें हों उन्हें ही अपना मित्र, बन्धु और वर्णके दम्पति में प्रेम है, शारीरिक मिलन में भी सजातीय समझना चाहिये, भले ही वे किसी भी उन्हें कष्ट नहीं मालूम होता तो इसमें किसी तीसरेको रंग के हो । जिन मे ये न हों उन्हें ही विजातीय या समाजको कुछ कहने की क्या जरूरत है ? इसमें समझना चाहिये फिर भले ही वह अपना सगा दोनोंको ही अपना अपना खयाल कर लेनाचाहिये। भाई ही क्यो न हो। इस प्रकार की निःपक्षता जिनमें यह वर्णाभिमान अच्छी तरह घुसा हुआ है, किन्तु नैतिक दृष्टि से जब वे इस जाति मूदता है ! , . को अगर हम रख सके और उसका उदारता से लक्षण-दृष्टि [ १०५ मद का सहारा नहीं लेपाते, तब इस प्रकार की कोई शारीरिक विकार ऐसा हो जिस का दूसरे के छोटी छोटी बातों को अनुचित महत्त्व देने लगते शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता हो तो बात दूसरी हैं। अगर गंधभेद की यह बात इतनी भयंकर है, उसका बचाव अवश्य करना चाहिये । परन्तु होती तो भारत में यूरेशियन-जो कि अपने को ऐसे शारीरिक विकार एक जाति उपजाति के भीतर एंग्लोइंडियन कहते हैं--क्यों बनते ? अमेरिका भी पाये जा सकते हैं और दूर के जातिभेद में भी आदि देशों में इतना विरोध रहने पर भी ऐसे नहीं पाये जा सकते हैं। इसलिये जातिभेद के सन्बन्ध होते ही हैं । भारतीयों के पूर्वज भी ऐसे नाम पर इन बातों पर ध्यान देने की जरूरत सम्बन्ध कर चुके हैं, इसलिये आज भी उनमें नहीं है । काले गोरे का भेद बना हुआ है, और यह भेद इस जातिभेद के नाम पर एक आक्षेप यह छोटी छोटी उपजातियों में भी पाया जाता है । भी किया जाता है कि इस प्रकार के वर्णान्तर- फिर जातियो में ही क्यों ? प्रत्येक व्यक्ति के विवाहों से मन्तान ठीक नहीं होती । अमुक जगह शरीर की गंध जुदी होती है, परन्तु इसीसे वैवा कुछ गोरोंने हब्शी स्त्रियों से शादी की परन्तु उन हिक सन्बन्ध का विस्तार नहीं रुकता। बल्कि की सन्तान गोरों के समान वीर, साहसी और वैवाहिक सम्बन्ध के लिये अमुक परिमाण में शारी- बुद्धिमान न निकली । यह आक्षेप भी शताब्दियों रिक विषमता आवश्यक और लाभकर मानी जाती के अंध-संस्कार का फल है। ऐसे आक्षेप करते है; इसीलिय बहिन भाई का विवाह शारीरिक समय वे उसके असली कारणों को भूल जाते दृष्टि से भी बुरा समझा जाता है । स्त्री-पुरुप के है । वे यह भूल जाते है कि जिस बालकको शरीर में ही रूप, रस, गंध, स्पर्श की विषमता समाज में लोग बराबरीकी दृष्टि से नहीं देखते अमुक परिमाण में पाई जाती है। इसलिये एसी उसे नीच पतित और विजातीय समझकर थोड़ी विषमताओं की दुहाई देकर मनुष्यजाति के टुकड़े बहुत घणा रखते हैं, उसमें उस समाजके गुण नहीं करना चाहिये । अगर इस विषय पर कुछ नहीं उतरते । बच्चे को यदि समाज से बाहर कर विचार भी करना हो तो यह विचार व्यक्ति पर दिया जाय तो पशु में और उसमें कुछ अन्तर छोड़ना चाहिये । विवाह करनेवाला व्यक्ति इस न होगा। अभी भी मनुष्य में जातिमद इतना बात को विचार ले कि जिसके साथ मैं सम्बन्ध अधिक है कि वर्णान्तर विवाह होने पर भी जोड़ रहा हूँ उसकी गंध और रंग स्पर्श आदि साधारण मनुष्य उससे घृणा ही करता है । फल मुझे सह्य है कि नहीं। यदि उसे कोई आपत्ति यह होता है कि ऐसे विवाह की सन्तान को एक न हो तो फिर क्या चिन्ता है ? एक बात और है प्रकार का असहयोग सहन करना पड़ता है। कि कोई भी गंध हो, जिसके संसर्ग में हम आते इसलिये समाज के गुण बालकको अच्छी तरह रहते हैं उसकी उग्रता या कटुता चली जाती है। नहीं मिलते । दूसरा कारण यह है कि संतान एक शाकभोजी, मछलियों के बाजार में वमन कर के ऊपर माता और पिता दोनों का थोड़ा थोड़ा देगा, परन्तु मछुओं को वहां सुगन्ध ही आती है प्रभाव पड़ता है । अब अगर उसमें से एक पक्ष इसलिये गंधादि की दुहाई देना व्यर्थ है। हां, अच्छा हो और दूसरा पक्ष हीन हो तो यह स्वाभा- १०६ ] सत्यामृत ra भारी अनर्थ 3 विक है कि संतति मध्यम श्रेणी की हो । इस समान और अनुकूल हो जाय तो भी हम उमे लिये अपने अनुरूप व्यक्ति से सम्बन्ध जोड़ना जुदा ही समझग। इस प्रकार हमाग भेदभाव चाहिये । ऐसी हालत में संतति अवश्य ही अपने सदाके लिय होगा । यही एक बड़ा अनुरूप होगी । वीरता, बुद्धिमत्ता सदाचार आदि है । इमलिय जातिमद को दूर करने के लिए हम गुण ऐसे नहीं है कि उनका ठेका किसी जाति- इस बात का दृढ़ निश्चय करलें कि अगर हमें विशेष ने लिया हो । सभी जातियों में इन गुणों किसीके माथ सम्बन्ध नहीं जोड़ना है तो इसके का सद्भाव पाया जाता है | अगर कहीं किसी कारण म हजार बात कहे परन्तु उनमें जातिगेट बात की बहुलता देखी जाती है तो उसका का नाम न आना चाहिये। संचे दिल से इस कारण परिस्थिति है, जाति नहीं। परिस्थिति के बान का पालन करना चाहिये बदलने से बुरी से बुरी जाति का मनुष्य अन्छ। गभेद जातिभेत के अन्य स्या में राष्ट्र ने से अच्छा हो जाता है । आफ्रिका के जो हब्शी नाम पर बने हुए जातिभेद में एक बड़ा भारी मंद है। अभी जंगली अवस्था में रहते है, सदाचार और अन्य जातिभेद राजनीति से परम्पग-सम्बन्ध सभ्यताका विचार जिनमें बहुत ही कम पाया रखने है और वहात नी जगह नहीं रखते हैं। परन्तु जाता है, उन्हीं में से बहुत से हब्शी अमेरिका में राष्ट्र के नाम पर बना हुआ जाति राजनीति बसने पर अमेरिकनो सरीखे सभ्य सुशिक्षित हो गये है, हालाँकि उनको जैसे चाहिये वैसे साधन के साथ साक्षात् सम्बन्ध रखता है। और इसके नहीं मिले। इससे मालूम होता है कि किसी भी नामपर बात की बात में तलवार निकल आती है, मनुप्य भाजी-तरकारी की तरह काटा जाने लगता गुण का ठेका किसी जाति विशेष-वर्णविशेष-ने नही लिया है है, और इसे कहते हैं देशप्रेम, देशभक्ति, देश- इसका यह मतलब नहीं है कि एक सुसभ्य सेवा आदि । नागरिकको जंगली लोगो से वैवाहिक सम्बन्ध राष्ट्र या देश आखिर है क्या वस्तु ? पर्वत, अवश्य स्थापित करना चाहिये। उदारता के नाम समुद्र आदि प्राकृतिक सीमा से रुद्ध मनुष्यों के पर अनमेल विवाह करने की कोई जरूरत नहीं निवासस्थान ही तो है । परन्तु क्या ये सीमाएँ है जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हम जातिभेद मनुष्यों के हृदय को कैद कर सकती हैं ? क्या के नाम पर किसी को वैवाहिक सम्बन्ध जुदा न ये मिट्टी के ढेर और पानी की राशि मनुष्यता के समझें । एक जंगली व्यक्ति के साथ हम सम्बन्ध टुकड़े टुकड़े करने के लिये है ? इन सीमाओ को नही करते इसका कारण यह न होना चाहिये तो मनुष्य ने इतिहासातीत काल से पार कर लिया कि उसकी जाति जुदी है किन्तु यह होना चाहिये है। न पहाड़ों के अभ्रङ्कश शिखर उसकी गति को कि उसकी शिक्षा, सभ्यता, स्वभाव आदि से मेल रोक सके है, न अगाध जलराशि । और आज नहीं खाता । जाति के नामपर · जब हम किसी तो मनुप्यजाति ने इन पर इतनी अधिक विजय के साथ सम्बन्ध नहीं करते, तब उसका अर्थ पाई है कि मानो ये सीमाएँ- उसके लिये हैं ही यह होता है कि अगर वह सब बातो में हमारे नहीं। फिर समझमे नहीं आता कि मनुष्य सीमाओ मे ३ लक्षण-दृष्टि [ १०७ से घिरे हुए इन स्थानों के नामपर क्यों अहंकार इस पागल मनुष्यजाति ने. मनुष्यजाति को नष्ट करता है ? क्यों लड़ता है ? क्यों मनुष्यता का करना अपना ध्येय वनालिया हो, आत्महत्या या नाश करता है ? नरककी सृष्टि करना ही इसका उद्देश्य बन गया हो। राष्ट्रीयता का जब यह नशा मनुष्य के सिर यदि ये ही शक्तियाँ प्रकृति पर विजय पाने पर भूत की तरह सवार होता है, और जब मनुष्य मे, उसका रहस्योद्घाटन करने में, उसके स्तनोंसे हुंकार हुंकार कर दूसरे राष्ट्र को चबा डालना अमृतोपम दृध पीने में, मनुष्य की मनुष्यता चाहता है, तब नक्कारखाने मे तूती की आवाज़ अर्थात मनुष्योचित गुणोके विकास करने में लगाई की तरह मनुष्यता का यह संदेश उसके कानो में जाती तो सबल और निर्वल सभी राष्ट्र आजकी नहीं पहुँचता । परन्तु नशा उतरने के बाद जब अपेक्षा बहुत अधिक सुखी होते । जो आज. उसके अंग अंग ढीले हो जाते हैं, तब वह अपनी असभ्य, अर्धसभ्य तथा निर्बल है, वे सबल और मूर्खता का अनुभव करता है। परन्तु शराबी इतन सभ्य बने होते और जो सवल है, सभ्य ही अनुभव से शराब नहीं छोड़ता। यही दशा कहलाते है, वे घृणापात्र होने के बदले आदर- राष्ट्रीयता के नशेबाजो की है। वे नशेके कटु पात्र बने होते इस प्रकार उन्हें भी शान्ति मिली अनुभव को शीघ्र ही भूलकर फिर वही नशा करते होती, तथा दूसरो को भी शान्ति मिली होती। हैं । इस प्रकार राष्ट्रीयता के नशेसे चिरकाल से एक न एक दिन मनुष्य को यह बात समझना मनुष्यजाति का ध्वंस होता आ रहा है । पड़ेगी । इस राष्ट्रीयता के उन्माद के कारण बड़े बड़े साम्राज्य खड़े हुए, जिनने मनुष्य प्रत्येक राष्ट्र की प्रजा तबाह हो रही है। जिस जाति के अस्थि-पञ्जरों से अपना सिंहासन बनाया प्रकार लुटेरे बड़ी बड़ी लूटे करके भी चैन' से कराहती हुई मनुष्यता की छाती पर जिनने रत्न रोटी नहीं खा सकते, और आपस में ही एक जटित सिंहासन जनाये; पर कुछ समय का उन्मादी दूसरे से डरते हैं, यही हालत साम्राज्यवादी अत्याचारी-जीवन व्यतीत करके अंत मे धगशायी लुटेरे राष्ट्रोंकी हो रही है । हरएक देशकी प्रजा- हो गये । पर लड़ाई के करका बोझ इतना भारी है कि साम्राज्यवाद की यह भयंकर प्यास और उसकी कमर टूटी जा रही है, और भय तथा राष्ट्रीयता का उन्माद प्रायः समस्त स्वतंत्र राष्ट्रों को चिन्ता के मारे चनसे नींद नहीं आती । मनुष्य अशान्त और पागल बनाये हुए है। राज्य की जो आज अपनी ही छाया से डरकर काँप रहा है, शक्तियाँ मनुष्य की सुख-शान्ति के बढ़ाने में काम मनुष्य जाति अपने ही अंगो से अपने अंग तोड़ आ सकती हैं, उनका अधिकांश मनुष्य के संहार रही है । प्राचीन युग में जिस प्रकार छोटे छोटे में लगा हुआ है । राज्य की आमदनी का बहुभाग सरदार दल बाँधकर आपस में लड़ने में अपना सेना और लड़ाई की तैयारी में खर्च होता है, जीवन लगा देते थे, इस प्रकार कभी दूसरो. को मशीनें मनुष्य संहार की सामग्री तैयार करने में सताते थे, और कभी दूसरों से सताये जाते थे, लगी हुई हैं, वैज्ञानिकों की अधिकांश शक्तियाँ इसी प्रकार आज मनुष्य जाति राष्ट्रीयता के क्षुद्र मनुष्य-संहार के आविष्कार में डटी हुई हैं, मानों स्वार्थो के नाम पर लड़ रही है। पुराने सरदारों , सत्यामृत उन्माद । मनोवृत्ति पर आज का मनुष्य हँसता है, से भी छोटी छोटी दलबन्दियो के चक्कर में पड़ ॥ वही मनोवृत्ति कुछ विशालरूप में कर राष्ट्रीयता से भी अधिक मनुप्यता का नाश के में नहीं है ? क्या वह भी कर रहे हैं, उनके लिये राष्ट्रीयता आगे की गयक नहीं है ? क्या मनुष्य किसी दिन मंजिल है । इसलिये वे अभी राष्ट्रीयता की पूजा इस मूर्खता और क्षुद्रताको न समझेगा ? करके मनुष्यता की ही पूजा करगे । उनकी हाँ कभी कभी मनुष्य मे राष्ट्रीयता पवित्र राष्ट्रोपासना दूसरों के कट्टर राष्ट्रीयतारूपी पाप भी आती है, वह तब, जबकि वह मनु- को दूर करने के लिये होगी । की दासी-पुत्री-अंग बन जाती है । उस राष्ट्रीयता के ऐसे अपवादों को छोड़कर वह मनुष्यता का विरोध नहीं करती, सेवा अन्य किसी ढंग से राष्ट्रीयता की उपासना करना । है । सिपाही यदि सरकार का सेवक बन मनुष्य जाति के टुकड़े करके उसे विनाश के हमारे पास आवे तो हम उसका आदर करेगे पथपर आगे बढ़ाना है । राष्ट्र को जाति का रूप तु यदि वह स्वयं सरकार बनकर हमारे सिर दे देना तो एक मूर्खता ही है । मनुष्य में कोई सवारी गाँठना चाहे तो वह हमारा शत्रु है। जाति तो है ही नहीं, परन्तु जिनको मनुष्यने । प्रकार जब राष्ट्रीयता, मनुष्यता की दासी जाति समझ रक्खा है, उनका मिश्रण प्रत्येक किर, मनुष्यता के रक्षणके लिये आती है तब जाति में हुआ है । भारतवर्ष में आर्य और द्रविड़ देवी की तरह पूज्य है। परन्तु जब वह मिलकर बहुत कुछ एक हो गये है । शक, हूण नुष्यता का भक्षण करने के लिये हमारे पास आदि भी मिल गये है । मुसलमानों के साथ भी साती है तब वह शत्रुके समान है। मनुष्यताके रक्त-मिश्रण हो गया है। अमेरिका तो अभी कल क्षण के लिये, जीवन की शांति के लिये, हमें ही अनेक राष्ट्रो के लोगो से मिलकर एक राष्ट्र उसका परित्याग करना चाहिये । बना है । इसी प्रकार दुनियाँ के अन्य किसी भी देशके इतिहास को देखो तो पता लगेगा कि उस यदि एक राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र के ऊपर में अनेक तरह के लोगो का मिश्रण हुआ है । आक्रमण करता है, उसे पराधीन बनाता है, या बनाये हुए है, इसलिये पीड़ित राष्ट्र अगर राष्ट्री- इससे मालूम होता है कि राष्ट्र-भेद से भी जाति- यता की उपासना करता है, तो यह मनुष्यता भेद का कोई सम्बन्ध नही है । इस दृष्टि से भी की ही उपासना है, क्योंकि इसमे अत्याचार या मनुष्य-जाति एक है। अत्याचारीका ही विरोध किया जाता है, मनुष्यता अहंकार का पुजारी यह मनुष्य कभी कभी का नहीं । जिस प्रकार हिंसा पाप होने पर भी पूजा को भी धर्मपूजा का रूप देता है आत्मरक्षण [ अन्याय्य आक्रमण से अपने को शैतान को खुदा के वेष में सजाता है और स्तुति बचाना ] में होनेवाली हिंसा पाप नहीं है, उसी के लिये अच्छे शब्दों की रचना करता है। वह प्रकार राष्ट्रीयता पाप होने पर भी आत्मरक्षण अहंकारपूर्ण कट्टर राष्ट्रीयता की पूजा के लिये के लिये-- अत्याचार के विरोध के लिये-राष्ट्री सभ्यता संस्कृति आदि की दुहाई देता है। परन्तु यता की उपासना पाप नहीं है । बल्कि जो राष्ट्र जुदे जुदे देशोंकी सभ्यता संस्कृति आदि आखिर पाप की लक्षण-दृष्टि [१०९ mom है क्या बला है ? और उसकी उपासना का क्या अर्थ सभ्यता और संस्कृतियों के नाम पर एक भारत- है ? वेषभूषा और भाषा को अगर किसी राष्ट्रकी वासी अंग्रेज गर्मी के दिनों में भी जब अपनी चुस्त सभ्यता और संस्कृति कहा जाय तव तो उसकी पोशाक से अपने शरीर को बंडलकी तरह कसे दुहाई देना व्यर्थ है । प्रत्येक देशकी भाषा कुछ डालता है, तब उसका यह पागलपन अजायबघर शताब्दियों के बाद बदलती रही है। जो प्राकृत की चीज़ होता है। परन्तु यह पागलपन सभी भापार दो हजार वर्ष पहिले भारत में प्रायः देशों में पाया जाता है, इसलिये अजायबघर में सर्वत्र बोली जाती थीं और जो अपभ्रंश भापाएँ कहाँ तक रखा जा सकता है ? संगमर्मरको भी हजार वर्ष पहिले ही प्राकृत की तरह बोली जाती थीं, गोबर से लीपना, बिजली के उजेले में भी समाई आज इनेगिने पंडितों को छोड़कर उन्हें कोई जलाना शायद संस्कृति और सभ्यता का रक्षण है ! समझता भी नहीं है, फिर बोलने की तो बात ही वास्तव में इस प्रकार के अंधअनुकरणों को संस्कृति दूर | अगर भाषा का नाम संस्कृति हो तब और सभ्यता की रक्षा कहना उन अच्छे शब्दों तो हम उसका त्याग ही कर चुके हैं । यह बात की मिट्टी पलीत करना हैं । दूसरी है कि अहंकार की पूजा करने के लिये मनुष्य, जन्म के समय पशु के समान होता हम उन मृत भाषाओं के नाम के गीत गाते हो, है | उसको युग के अनुरूप अच्छा से अच्छा परन्तु हमारे जीवन में उनका कोई व्यावहारिक मनुष्य बनाने के लिये जो प्रभावशाली प्रयत्न किया स्थान नहीं रह गया है। लेटिन, संस्कृत आदि जाता है उसका नाम है संस्कृति, और दूसरे को सभी भाषाओं की यही दशा है। इसलिये वह कष्ट न हो इस प्रकार के व्यवहारका नाम है सभ्यता तो गई । सभ्यता । इस प्रकार की सभ्यता और संस्कृति का वेप भूपा बदलने के लिये तो शताब्दियाँ रूढ़ियों के अंध-अनुकरण के साथ कोई सम्बंध नहीं, दशाब्दियाँ ही बहुत हैं। भारत के आर्य नहीं हैं । जो पोशाक पहिना करते थे, उसका कहीं पता यदि किसी जमाने में चोर डाकुओं के डरके भी नहीं है। उसके आगे की न जाने कितनी मारे हम मकानों में अधिक खिडकियाँ नहीं रखते पीढ़ियाँ गुजर गई ? उत्तरीय वन के पीछे अंगरखा, थे, और अब परिस्थिति बदल जाने से रखते हैं कुरता, कोट, कमीज़ आदि पीढ़ियाँ चली आती तो इसका अर्थ सभ्यता और संस्कृति का त्यांग हैं । वही बात नारियों की पोशाक के विषय में नहीं है । समयानुसार स्वपरसुखवर्द्धक परिवर्तन 1 वाहन, नगर-रचना आदि सभी बातों में करने से संस्कृति का नाश नहीं होता, बल्किा, विचित्र परिवर्तन होगये हैं। संसार के सभी देशों संस्कृति का नाश होता है रूढ़ियों की गुलामी से । की यह दशा है । पुराने युग के चित्र तो अब क्योंकि रूढ़ियों की गुलामी से बुद्धि-विवेक की अजायबवरों और नाटक-सिनेमा के ऐतिहासिक कमी मालूम होती है जोकि मनुष्यत्व की कमी है, चित्रणों में ही देखने मिलते हैं। सभ्यता और और जड़ता की वृद्धि मालूम होती है जोकि संस्कृति के नाम पर उन पुरानी चीजों को छाती पशुत्व की वृद्धि है । संस्कृति का काम से चिपटाए रहने की ज़रूरत नहीं रही है । प्राणी को पशुत्व से मनुष्यत्व की ओर ले जाना + है ११० ] सत्यामृत , है, न कि मनुष्यत्व से पशुत्व की ओर पशुत्व की ओर लौटाना । सुव्यवस्था पर होना चाहिये, न कि प्राचीनता पर, यदि कोई देश अपनी पुरानी अनावश्यक चीजो इनका प्रचार संस्कृति और सभ्यता के रक्षण के से चिपट रहा है और दूसरों के अच्छे तत्वों को लिये नहीं, किन्तु समाज को रोटी देने के लिये ग्रहण नहीं कर रहा है या ग्रहण करने में अपमान होना चाहिये। समझ रहा है तो वह संस्कृति की रक्षा नहीं, नाश कोई भाई कहेंगे कि “जो नवयुवक मौज कर रहा है। शौक में जीवन बिताकर सादगी छोड़कर अपने भोगोपभोग की पुरानी चीजों के रक्षण में साहिवी खर्च से माँबाप को परेशान करते है, तो सभ्यता और संस्कृति नहीं रहती । यदि पुराने क्या उनको न रोकना चाहिये ? इसीप्रकार अपने ज़माने में हमारे पास शंख से अच्छा वाजा नहीं देश की बंपभूषा छोड़कर विदेशी वेशभूषा अपना- था तो इसका यह अर्थ नहीं है कि हमारी सभ्यता कर अपनी एक नई जाति बना लेते हैं, क्या और संस्कृति शंख में जा बैठी है। यदि किसी उनका यह कार्य उचित है ?" देश में आम नहीं थे, खजूर थे, तो इसका भी निःसन्देह ये कार्य अनुचित है; परन्तु इस यह मतलब नहीं है कि उसकी सभ्यता खजूर पर लिये नहीं कि वे विदेशी सभ्यता को अपनाते लटक रही है । मनुष्य एक समझदार प्राणी है, हैं, किन्तु इसलिये कि उनमें मॉबाप को परेशान इसलिये उसका काम है कि उसके वर्तमान युग में किया जाता है, अपने को अनुचित रूप में बड़ा जो जो अच्छी, सुलभ और दूसरो को हानि न या विशेष समझकर अभिमान का परिचय दिया पहुँचानेवाली वस्तुएँ हों उनका उपयोग करे । जाता है, दूसरों का अपमान किया जाता है , इसी बुद्धिमत्ता में उसकी संस्कृति और सभ्यता है । उन्हें रोको, परन्तु प्राचीन संस्कृति या सभ्यता पुराने जमाने की अविकसित वस्तुओं को अपनाये की दुहाई देकर नहीं, किन्तु आर्थिक सुविधा रहने में सभ्यता और संस्कृति की रक्षा नहीं है । की दुहाई देकर, विनय और प्रेमकी दुहाई देकर । इसके विरोध में यह बात अवश्य कही जा इस प्रकार गोपभोग की सामग्री की दृष्टि सकती है कि-" कोई देश यंत्रों के द्वारा फैली हुई से सभ्यता का ज प बताया जाता है वह तो बेकारी को दूर करने के लिये चरखा-युग का विलकुल व्यर्थ है | अब रह गया सभ्यता का सहारा ले, दूसरों के आर्थिक आक्रमण से बचने मानसिक और कौटुबिक रूप । कहा जाता है के लिये पुरानी चीज़ों के उपयोग करने की ही कि “प्रत्येक देशकी एक विशेप मनोवृत्ति होती कोशिश करे तो क्या इसको अनुचित कहा जायगा?" । इंग्लेंड का मनुष्य मात्रासे कुछ अधिक गंभीर है, जब कि फान्स का आदमी मात्रा से कुछ आर्थिक आक्रमण से बचने के लिये यह अधिक बातूनी । भारतके वायव्य कोण का मार्ग कहाँ तक ठीक है यह बात दूसरी है, परन्तु मनुष्य या एक पठान स्वभावतः अधिक उग्र और अगर कोई इसी दृष्टि से पुरानी चीजों का उपयोग असहिष्णु होगा, जब कि भारत का मनुष्य मात्रा करना चाहे तो इसमें मुझे बिलकुल विरोध नही से अधिक शान्त होगा। मनुष्य-स्वभाव की ये है। उसकी दृष्टि उपयोगिता, सुविधा, सुखप्रदता, विशेषताएँ एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र को जुदा , लक्षण-दृष्टि [१११ 1 करती हैं | अगर राष्ट्रीय-भेद न माना जाय तो हैं दुःखकर हैं, उनको तो नाश करके मिटा देना य विशेषताएं नष्ट हो जाँय । क्या इनका नष्ट चाहिये परन्तु जो विशेषताएँ सुखकर हैं अच्छी हैं करना उचित है ?" उनको विना नाश किये मिटादेना चाहिये अर्थात इसके उत्तर में दो बातें कहीं जा सकती उन का सभी राष्ट्रों में प्रचार कर देना चाहिये हैं । पहिली तो यह कि मनुष्य की ये विशेषताएँ जिससे वे विशेषरूप छोड़कर सा स्वाभाविक नहीं हैं-वे राजनैतिक, आर्थिक आदि रूप धारण करलें। परिस्थितियों का फल हैं । वीस वर्ष पहिले टर्की ऊपर जो वात स्वभाव के विषय में का और रूस के साधारण जनकी जो मनोवृत्ति थी गई है, वहीं वात कौटुम्बिक रीतिनीति के 74 और आज उसकी जो मनोवृत्ति है, अब्राहमलिं- में कही जा सकती है । जिन देशोंकी कौटु कन के पहिले अमेरिका के हब्शी की जो मनो व्यवस्था खराव है, वे अपनी वह कौटुम्विक दुर्व्य वृत्ति थी और आज जो मनोवृत्ति है, रोमनसाम्राज्य वस्था छोडदें और किसी देशकी अच्छी से अच्छ के नीचे कचड़ाते हुए इंग्लेण्ड की जो मनोवृत्ति कौटुम्बिक व्यवस्था अपना ले । अगर कोई सितं थी और आज जो मनोवृत्ति है, उनमें जमीन- रहे भी तो परिस्थिति की दुहाई देकर रहना चाहि आसमान से भी अधिक अन्तर हैं। आर्थिक, राष्ट्रीयता सभ्यता आदि की दुहाई देकर नहीं राजनैतिक आदि परिस्थितियों के बदल जाने से इस प्रकार किसी भी प्रकार की सभ्यता 4 मनुष्य के स्वभाव में जो परिवर्तन हो जाता है, संस्कृति की दुहाई देकर मनुष्य जाति के दुक उसे राष्ट्रीयता न रोक सकती है, न रोकना करने की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि चाहिये । इसलिये राष्ट्रीयता का इसके साथ कोई करना पाप है । सभ्यता और, संस्कृति मनुष्य सम्बन्ध नहीं है। टुकड़े करने के लिये नहीं किन्तु उसके प्रेम दूसरी बात यह है कि राष्ट्रीय विशेषता क्षेत्रको विशालतम बनाने के लिये हैं, उन्नति में होने से ही कोई वस्तु अच्छी नहीं हो जाती । लिये हैं, पारस्परिक सहयोग के लिये हैं । इसलि अफीम खाना अगर किसी देशकी विशेषता हो, राष्ट्र के नामपर चलता हुआ यह , जातिभेद भ बात बात में उखड़ वैठना, मार बैठना, हत्या नष्ट होना चाहिये। कर डालना अगर किसी दशकी विशेषता हो, कोई भाई कहगे कि 'यदि राष्ट्रीयता अथवा स्त्रियों को पददलित करना अगर किसी करदी जायगी तब तो सबल राष्ट्र निर्वल र ट्र देशकी विशेषता हो, तो उसे अपनाये रहना पाप को पीस डालेंगे, लूट डालेंगे और आपका हैं। ऐसी विशेषता का जितनी जल्दी नाश हो वक्तव्य उनके कार्योको नैतिक बल प्रदान करेगा उतना ही अच्छा है । हमें विशेषता नहीं किन्तु निर्बल राष्ट्र अगर सबल राष्ट्र के मालपर इसलि उन गुणों का पुजारी होना चाहिये जो मानव कर लगायगा कि उसका व्यापार सुरक्षित जीवन को सुखमय बनाते हैं। इसलिये हमारा और उसकी आर्थिक अवस्था खराब न हो जा यह महान कर्त्तव्य है कि हम राष्ट्रों की सव बेकारी न बढ़ जाय तो आपके शब्दों में विशेषनाओं को मिटा दें । जो विशेषताएँ खराव राष्ट्रीयता की पूजा होने से पापरूप होगी । २ २ ] सत्यामृत KALPHun द्वान्त से तो सबल राष्ट्र सबल होते जायगे रक्षा करने में, अपनी सुखशान्ति बढ़ाने में नो र निर्बल पिसते जाँयगे।" मनुष्यता की ही पूजा है इस प्रश्न का कुछ उत्तर दिया जा चुका है। इस विषय मे एक बात यह कही जा सकती क राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर अगर आर्थिक आक्रमण है कि “यदि मनुष्यता के नामपर भी आयात रता है तो आयात पर प्रतिबंध लगाकर उस निर्यात का प्रतिबंध बना ही रहा तत्र राष्ट्रीय [[क्रमण को रोकना अनुचित नहीं है । दूसरे कट्टरता का नाश कैसे होगा ? प्रत्येक राष्ट्र की राष्ट्र में अगर राष्ट्रीय कट्टरता है और वह किसी कठिनाइयाँ बढ़ जायगी। मानलो कि एक राष्ट्र ऐसा राष्ट्र पर आर्थिक आक्रमण करता है तो उसका है जिसमें लोहा और कोयला बहुत है. परन्तु उसी तरह सामना करना चाहिये; इसमें कोई कृषिके योग्य स्थान नहीं है; और दूसरा देश पाप नहीं है। इतना ही नहीं किन्तु प्रत्येक ऐसा है कि जो हमसे उलटा है। अब यदि राष्ट्र को-जबाके उसका शासनतंत्र जुदा है- दूसरा देश पहिले के मालपर प्रतिबंध लगाये तो कर्तव्य है कि वह आर्थिक योजना के रक्षण के पहिला देश भावो मर जायगा। ऐमी अवस्था में लिये आयात निर्यात पर नियंत्रण रक्खे । इस मनुष्यता की भावना कैसे रह सकती है ?" आर्थिक योजना का प्रभाव समाज की सुख-शांति यदि मनुष्य की भावना हो, अहंकार और पर भी निर्भर है । मानलो एक राष्ट्र ऐसा है जो आक्रमणका दुर्विचार न हो तो यह समस्या कठिन मजदूरोंसे दस घंटे काम लेती है और ऐसे यंत्रों का नहीं है । जिस राष्ट्र के पास अनाज नहीं है, वह उपयोग करता है जिससे थोड़े आदमी बहुत अनाज के आयात पर प्रतिबन्ध क्यों लगायगा ? और काम कर सकते है, इससे बहुत से आदमी जिसके पास लोहा नहीं है वह लोहे के आयात पर बेकार हो जाते है अथवा मजदूरो को सख्त मजूरी प्रतिबन्ध क्यो लगायगा ? इस प्रकारका माल तो आपस करना पड़ती है । परन्तु दूसरा राष्ट्र ऐसा है कि मे बदल लेना चाहिये । एक मालले दूसेर मालका वह ऐसे यंत्रों का उपयोग करता है जिससे बदला लेना चाहिये । एक माल से दूसरे माल का ) बेकारी न बढ़े, तथा वह मजदूरो से सख्त मिहनत बदला स्वेच्छा और मुविधा से करने में कोई आपत्ति भी नहीं लेना चाहता । ऐसी हालत में उसका नहीं है । अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहार मे जो सम्पत्ति का माल मँहगा पड़ेगा। इसलिये आर्थिक दृष्टि से माध्यम हो उसे खींचने की कोशिश न करना जीवित रहने के उसके सामने दो ही मार्ग होगे- चाहिये । मानलो कि सोना माध्यम है, या चाँदी या तो वह आयात पर प्रतिबंध लगावे, या मजदूरोसे माध्यम है तो अपना माल अधिक से अधिक देने ज्यादा मिहनत ले । मनुष्य का सुख शांति की कोशिश करना और बदले में माल न लेकर के लिये पहिला मार्ग ही ठीक है। इसलिये सोना चाँदी लेना आक्रमण है। आक्रमण का आयात पर कर लगाना उचित है। वास्तव में विचार छोड़ दिया जाय और फिर जो अदला यह राष्ट्रीयता की पूजा नहीं, मनुष्यता की पूजा बदली हो उससे दानो राष्ट्रों को लाभ होगा। । दूसरे देश पर आक्रमण करने में कट्टर इतने पर भी अगर किसी ऐसे देश की-जो प्राकृ. राष्ट्रीयता है; परन्तु दूसरे के आक्रमण से अपनी तिक सम्पत्ति से गरीब है-समस्या हल नहीं होती M लक्षण-दृष्टि [ ११३ . तो उसका काम है कि वह किसी ऐसे देश से गुलामी दूर कर देने पर कानून की वह विषमता जुड़ जाय जो प्राकृतिक सम्पत्ति से अधिक पूर्ण दूर हो जायगी और जो कुछ थोड़ी बहुत रह हो । परन्तु दोनों में शास्य-शासक भाव न होना जायगी उमे सहन कर लिया जायगा । विवाह के चाहिये, क्योंकि दो राष्ट्रों में शास्य-शासक भाव पात्रों को यह वात पहिलेही समझ लेना चाहिये। होना मनुप्यता की दिनदहाड़े हत्या करना है । कहा जा सकता है कि यों ही तो नारी-, जिन राष्ट्रों के पास जीवन-निर्वाह की पूरी सामग्री अपहरण की घटनाएँ बहुत होती हैं। एक राष्ट्र नहीं है, वे जनसंख्या का नियन्त्रण करें अथवा की युवतियों को फुसला कर दूसरे राष्ट्र में ले बड़ी हुई जनसंख्या को किसी ऐसी जगह बसाने जाना और वहाँ उन्हें असहाय पाकर वेश्या बना का प्रयत्न करें जहाँ जनसंख्या कम हो। परन्तु देना और उनकी शारीरिक शक्ति का क्षय होने पर वहाँ जाकर अगर अपनी कोई विशेषता की रक्षा उन्हें भिखारिन बनाकर छोड़ देना, ये सब घटनाएँ करने की कोशिश की जायगी, उसके लिये कोई दिल दहलादेने वाली हैं । अन्तर्राष्ट्रीय विवाहो से विशेष सुविधा माँगी जायगी तो यह नीति सफल ये घटनाएँ और बढ़जायगी, । यह भूल हैं, यह न होगी। इसलिये आवश्यक यह है कि जिस पाप एकही देश के भीतर भी हो रहा है | इसका राष्ट्र में हम जाकर वसं वहाँ के निवासियों में अन्तर्राष्ट्रीय विवाह-पद्धति के प्रचार से कोई हम मिल जावें । इसके लिये मनुप्योचित सद्गुणों सम्बन्ध नहीं है । इसके हटाने के लिये सब को छोड़ने की या वहाँ के दुर्गुणों को अपनाने सरकारों को मिलकर सम्मिलित प्रयत्न करना की जरूरत नहीं है। सिर्फ आत्मीयता प्रकट करने चाहिये, तथा इस प्रकार के लोगों के दमन के लिये की, भाषा आदि को अपनाने की तथा अपनी विशेष कानून और विशेष प्रयत्न जातीय कट्टरता का त्याग करदेने की जरूरत है। इस नीति से न तो किसी राष्ट्र को भूखों मरना पड़ेगा राष्ट्रीय संस्कृति की विभिन्नता के कारण दाम्पत्य जीवन के अशान्तिमय हो जाने की बाधा न किसी को दूसरे राष्ट्र का बोझ उठाना पड़ेगा । भी बताई जा सकती है। परन्तु इसका उत्तर वर्ण- विश्वशान्ति और मनुप्य की उन्नति के लिये भेद के प्रकरण में दे चुका हूँ| यहाँ इतनी बात इस प्रकार की व्यवस्था आवश्यक है। जब तक फिर कही जाती है कि राष्ट्रीय जातिभेद मिटजाने मनुप्य राष्ट्र के नाम पर जातिभेद की कल्पना पर एक तो संस्कृति की विभिन्नता भी कम हो लिय रहेगा, तब तक वह एक दूसरे पर दूसरी बात यह है कि यह सब व्यक्ति- अत्याचार करता ही रहेगा। इसलिये एक न एक- गत प्रश्न है । दोनों को पारस्परिक अनुरूपता का दिन राष्ट्र के नाम पर फैले हुए जातिभेद को विचार कर लेना चाहिये, तथा एक दूसर की तोड़ना ही पड़ेगा । नभी वह चन से बैठ सकेगा। मनोवृत्ति से परिचित हो जाना चाहिये । इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय विवाह का रिवाज भी इसके लिये राष्ट्रीयता की दीवालों को गिराने के लिये यह बहुत कुछ उपयोगी हो सकता है इसलिये उसका वैवाहिक सम्बन्ध भी अधिक उपयोगी हो सकता भी अधिक से अधिक प्रचार करना चाहिये । इस है, और इससे मनुष्यजाति एक दूसरे के गुणों को विषय में कानून का अन्तर है, परन्तु रूड़िकी शीघ्रता से प्राप्त कर सकती है . की जरूरत है। m जायगी, ११४ ] सत्यामृत इस प्रकार विश्वकी शान्ति तथा उन्नति के प्रतियोगिता से धन्धों को नुकसान न पहुँचे और लिये आवश्यक है कि राष्ट्रीयता के नामपर फैले न बेकारी की समस्या लोगों के सामने आये हुए जातिभेद का नाश करके मनुष्य जाति की सैकडों वर्षातक इस व्यवस्था से भारतीयोने लाभ एकता सिद्ध की जाय और व्यवहार में लाई जाय । उठाया । परन्तु पीछे से जब अकर्मण्य और बड़े बड़े देशों में प्रान्तीयता का भी विष राष्ट्री- अयोग्य व्यक्तियों की अधिकता होगई तथा इस यता के विष के समान फैलता है यह तो और व्यवस्थाने अन्य धार्मिक सामाजिक अधिकारो को भी बुरा है । इस मे कट्टर राष्ट्रीयता का पाप तो है ही कैद कर लिया, तब इससे सर्वनाश होने लगा। । साथ ही मनुष्यता के साथ राष्ट्रीयता का नाशक वर्णभेद के नाम से प्रचलित इस वृत्तिभेद होने से यह दुहरा पाप है। का जाति के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, और वृत्तिभेद-अभी तक जो जातिभेद के रूप बत- न मनुष्य जाति के विभाग करने का इसमें कोई लाये गये है, उनके विषय में धर्मशास्त्रों में कोई गुण है । रंग-भेद से तो फिर भी कुछ शारीरिक विधिविधान न होने से वे धर्म के बाहर की चीज़ भेद मालूम होता है, तथा देशभेद मे भापाभेद समझे जाते हैं । परन्तु आजीविका के भेद से आदि हो जाते है ----यद्यपि इससे भी मनुष्य- जो जातिभेद बना, उसके विषय में धर्मशास्त्रों में जाति के भेद नहीं हो सकते--परन्तु वृत्तिभेद से बहुत से विधिविधान मिलते है, इसलिये बहुत से तो इतना भी भेद नहीं होता । एक ही वंशमें लोग धर्म के समान इसे भी समझने लगे हैं। पैदा होने वाले अनेक मनुष्यों की योग्यता में सच पूछा जाय तो धर्म के साथ इनका कोई इतना अन्तर होता है कि उनमें कोई ब्राह्मण सम्बन्ध नहीं है । वृत्तिभेद से बना हुआ जाति- कोई क्षत्रिय कोई वैश्य और कोई शूद्र कहा जा भेद एक समय की आर्थिक योजना है। सकता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार भेद इस वर्णभेद का मुख्य प्राण था आजीवि- सभी देशो मे पाये जाते है; क्योकि शिक्षण, काकी व्यवस्था, सो इस दृष्टि से तो उसका सर्व- रक्षण, वाणिज्य और सेवा की आवश्यकता सभी नाश हो गया है । आज ब्राह्मण कहलाने वाले देशो को है । परन्तु इनके नागपर जैसा जाति- रोटी पकाते हैं, झाडू लगाते है, दूकानदारी करते भेद भारतवर्ष मे बना वैसा अन्यत्र नहीं । यहाँ है; क्षत्रिय कहलाने वाले खेती व्यापार करते है, आर्थिक योजना की दृष्टि से बनाये गये इन संघों अथवा कोई कोई अध्यापन आदि ब्राह्मण-वृत्ति का सम्बन्ध रोटी-बेटी व्यवहार से भी हो गया करते है । वैश्य और , शूद्र कहलाने वाले भी है, धार्मिक क्रियाकांडो से भी हो गया है, पर चारो वर्णकी आजीविका करते हैं। और जो लोक की ठेकेदारी से भी भी हो गया है । लोग इस वर्णव्यवस्था में नहीं मानते वे भी सब जिस समय यह वर्णव्यवस्था की गई थी, कुछ करते है । इस प्रकार वर्णव्यवस्था का जो उस समय इसका यही लक्ष्य था कि समाज मे असली ध्येय था, वह तो शताब्दियों ले नष्ट हो आर्थिक सुव्यवस्था और शान्ति हो । जो जिस गया है । इस अवस्था में वर्णव्यवस्था की दुहाई कार्य के योग्य है वह वही कार्य करे तथा अनुचित देना व्यर्थ ही है। पुराने जमाने मे इस प्रकार लक्षण-दृष्टि [ ११५ 1 ar - का नियम बनाने की कोशिश की गई थी कि पर ही निर्भर है । तीसरी बात है स्वच्छता । सो "प्रत्येक मनुष्य को अपनी अपनी आजीविका स्वच्छता भी हर एक के हाथ से बने हुए भोजन करना चाहिये; अगर न करे तो शासकों से वह में हो सकती है । हाँ, यह हो सकता है कि अगर दण्डनीय हो, क्योंकि ऐसा न करने से वर्णसंक अपने को मालूम हो जाय कि अमुक व्यक्ति के रता फैल जायगी अर्थात् वर्णव्यवस्था गड़बड़ हो यहाँ स्वच्छता नहीं रहती तो हम उसके यहाँ जायगी। भोजन न करेंगे। परन्तु अपने घर आकर अगर वह स्वच्छता से भोजन तैयार करदे तो हमारी आज इस प्रकार की वर्णसंकरता निर्विवाद क्या हानि है ? अथवा अपने घर या अन्यत्र वह और निर्विरोध फैली हुई है। ऐसी अवस्था में हमारे साथ बैठकर भोजन करले तो इसमें क्या वर्णव्यवस्था की दुहाई देकर अहंकार और मूढ़ता अस्वच्छता हो जायगी ? इसलिये स्वच्छताके की उपासना क्यों करना चाहिये ? और अगर नामपर भी वर्णभेद में सहभोजका विरोध करना करना भी हो तो उसे कर्म से मानना चाहिये । निरर्थक है। कर्मसे वर्णव्यवस्था मानने की आवाज पुरानी है। इस प्रकार सहभोजका विरोधी कोई भी खैर, वर्णव्यवस्था को जन्म से मानो या कारण न होने पर भी लोगों के मनमें एक अन्ध- कर्मसे मानो, परन्तु उसका सम्बन्ध आर्थिक योज- विश्वास जमा हुआ है कि अगर हम शूद्रके हाथ नासे ही है, खानपान और बेटीव्यवहार से नहीं । का खा लेगे तो शूद्र हो जायेंगे | अमुकके हाथ खानपान के विषय में हमें तीन बातों का का ख,लेंगे तो जाति चली जायगी। अगेर विचार करना चाहिये-- अहिंसा, आरोग्य, और सचसुच यह बात होती तो अभीतक हमारी स्वच्छता । भोजन ऐसा न हो जिसके तैयार मनुष्यता कमी की चली गई होती । भैंस का करने में बहुत हिंसा हुई हो । इस दृष्टि से मांसा- दूध पीते पीते हम भैस हो गये होते और गाय दिक का त्याग करना चाहिये । इसका वर्णव्य- का दूध पीते पीते गाय. हो गये होते । अगर वस्था से कोई सम्बन्ध नहीं; क्योंकि प्रत्येक वर्ण पशुओं का दूध पीने पर भी हम पशु नहीं होते का आदमी इस प्रकार हिंसारहित भोजन कर तो किसी मनुष्य के हाथ का खा लेनसे हम सकता है । प्रकृति का कुछ ऐसा नियम नहीं है उसकी जातिके कैसे हो जायगे ? हमारी जाति कि अमुक वर्ण के आदमी के हाथ लगने से ही कैसे चली जायगी ? भोजन मे अनुक परिमाण में हिंसा हो जाय । आश्चर्य तो यह है कि जो लोग मांसभक्षी शरीर तो जैसा ब्राह्मण का होता है वैसा शूद्रका हैं, वे भी भोजन में जाति-पाँति का खयाल करते होता है, इसलिये एक दुसरे के हाथ को भोजन है । वे यह नहीं सोचते कि जो कुछ वे खाते करने में हिंसा अहिंसा की दृष्टि से कोई अन्तर हैं वह इतना अपवित्र है कि उससे अधिक नहीं आ सकता। अपवित्र दूसरी वस्तु नहीं हो सकती। इस प्रकार आरोग्य का तो वर्णव्यवस्था से बिलकुल संबंध कहाँ तो वर्णव्यवस्था जो कि एक. आर्थिक योजना नहीं है । वह भोजन की जाति और अपनी प्रकृति रूप थी ? और कहाँ ये खानपान के नियम ?
१६ ] सत्यामृत किन्तु वे छुआछूत के में , न दोनों में कोई सम्बन्ध न होने पर भी इनका ऐसे बचाव की आवश्यकता नहीं है । खैर, सा विचित्र सम्बन्ध जोड़ लिया गया है ! सच अछूतताके साथ तो इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। त तो यह है कि इस मे अहंकारकी पूजा के स्वच्छता की रक्षा का भाव भी अछूतपनका सेवाय और कुछ नहीं है । मनुष्य धर्मके नामपर समर्थक नहीं है। इस दृष्टि से अगर किसी को मदोन्मत्तता की या खुदा के नामपर शैतान की अछूत माना जाय तो सिर्फ उतने समय के लिये ही पूजा कर रहे हैं। माना जाना चाहिये जितने समय वे अछूता का काम मनुष्य-जाति की एकता को नष्ट करने वाले करते हों । स्नानादिसे शुद्ध होनेपर उनको अछूत ये आत्मघाती प्रयत्न यहीं समाप्त नहीं हो जाते; मानना मूढता है । फिर जो अछूतता का काम करे वही रूप एक और भयंकर अछूत है न कि सारा कुटुम्ब या जाति। आज तो रूप बतलाते है । अछूतता के लिये अगर बहाने होता यह है कि जिसकी जाति अछूत नहीं बनाये जायें तो वे ये ही हो सकते है-एकतो कहलाती, वह कैसा भी घृणित क्यों न हो वह आचार-शुद्धि के लिये दुःसंगति का बचाव, अछूत न कहलायगा; और जिसकी जाति अछूत दृसरा स्वच्छता की रक्षा का भाव । पहिला कारण कहलाती है वह कैसा भी स्वच्छ हो वह अछूत यहाँ बिलकुल नहीं है, क्योंकि जिन मद्यमांस- कहलायगा ----वह किसी भी हालत मे स्पृश्य नहीं भक्षण आदि दुष्कार्यों से बचने के लिये अछूतता हो सकता। इस अंधेरशाही का स्वच्छता के का समर्थन किया जाता है, उनका सेवन अस्पृश्य साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । कहलाने वालों के समान स्पृश्य कहलाने वालों कुछ लोग अछूत कहलानेवालों के शरीर में भी है । अनेक प्रान्तो में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य को ही अशुद्ध बता दिया करते है। परन्तु शरीर इन वस्तुओ का सेवन करते है । फिर भी ये मे शुद्धिअशुद्धि का विचार करना ही व्यर्थ हैं। अछूत नहीं समझे जाते ! और आश्चर्य तो यह सभी मनुष्यों के शरीर में हाड़ मस रक्त होता है है कि ये मांसभक्षी भी अछूत कहलाने वालो को और ये चीजे कभी शुद्ध नहीं होती। हाँ, रोगियो उतना ही अछूत समझते है जितना कि अन्य का शरीर अमुक दृष्टि से अशुद्ध और स्वस्थ मनु- शाकभोजी समझते है इसलिये मांसभक्षण आदि ष्योंका शरीर अमुक दृष्टि से शुद्ध कहा जाता है आचार की खराबियोंसे बचने के लिये यह परन्तु उस दृष्टि से तो अछूत कहलाने वाले भी अछूतता नहीं है। अगर होती तो भी उचित न परम शुद्ध हो सकते है और उच्च कहलाने वाले कहलाती, क्योकि मांसभक्षीका स्पर्श करने से भी परम अशुद्ध हो सकते हैं । उसका दोष नहीं लगता, और न उससे पाँच अगर मानसिक अशुद्धि की बात कही जाय पापो में से कोई पाप होता है। हाँ, जो लोग तो वह भी व्यर्थ है, क्योकि उच्च कहलानेवालो हृदयसे दुर्बल है वे खानपान मे ऐसे लोगोकी की मानसिक अशुद्धि अछूत कहलाने वालो की संगतिका बचाव कर सकते है। परंतु बड़े बड़े मानसिक अशुद्धि से कम नहीं होती । प्रेम, दया भोजों में अथवा और भी ऐसे स्थानों में जहाँ भक्ति, विश्वसनीयता आदि में स्पृश्य और अस्पृश्यों मांस भक्षण के उत्तेजन की सम्भावना नहीं है, की जाति जुदी जुदी नहीं होती। 1 .
v है - लक्षण-दृष्टि [ ११७ . - + + कन्या कई लोग अछूत कहलाने वालों के साथ किये जाति के टुकड़े करना, स्पृश्यास्पृश्य की पापमय गये दुर्व्यवहार को पूर्व जन्म का पाप कहकर स्वयं वासना का संरक्षण करना महान अपराध है संतोप करते हैं तथा उनको भी सन्तुष्ट करना वर्ण-व्यवस्था का जिस प्रकार धार्मिक अधि- चाहते हैं । यदि इसे पूर्वजन्म के पाप का फल भी कारों से, छूने न छूने से, असहभोज आदि से मानलिया जाय तो इस तरह अज्ञात पापफल देनेका कोई सम्बन्ध नहीं है, उसी प्रकार विवाह से भी हमें कोई अधिकार नहीं है। यों तो हम बीमार कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तो आजीविका की पड़ते हैं तो यह भी पाय-फल है परन्तु इसीलिये सुव्यवस्था के लिये थी, इसलिये विवाह की कैद बीमार की चिकित्सा न की जाय; एक सतीके का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है। परन्तु जब ऊपर गुंडे आक्रमण करें तो यह विपत्ति भी सतीके आजीविका के भेद से पूज्यापृश्यता का सम्बन्ध पूर्वजन्म के पाप का फल हैं, फल है, इसीलिये जुड़ गया तब एक जटिल समस्या खड़ी हो गई । गुंडों को न रोका जाय; हमारी चोरी होती ब्राह्मण कुल में पैदा होनेवाली, ' एक है, खून होता है तो यह भी पूर्वजन्म के पाप का अगर ऐसे कुल में विवाह हो जो लोक का फल है इसीलिये चोरो और खूनियो को न में सन्मान की दृष्टि से न देखा जाता हो तो रोका जाय तो समाज की क्या दुर्दशा हो ? अछूत इससे उसके चित्त को क्षोभ होना स्वाभाविक है कहलानेवालों के साथ जो दुर्व्यवहार किया जाता इसलिये अनुलोम विवाह का रिवाज बन गया । है वह अत्याचार है, इस पाप-फल कहकर नहीं इसके अनुसार पहिले वर्ण की कन्या दूसरे वर्ण- टाला जा सकता । अन्यथा मनुष्य को न्याय, बाले को नहीं दी जा सकती थी; किन्तु दूसरे भलाई, सुव्यवस्था करने का कोई अवसर ही न वर्ण की कन्या पहिले वर्ण को दी जा सकती थी। रह जायगा; मनुष्य की अवस्था पशुओ से भी परन्तु यह रिवाज भी बहुत समय चल नहीं सकता भयंकर हो जायगी। था क्योंकि इससे शूद्र वर्ण को बहुत आपत्ति का धार्मिक अधिकारों की अधिकारों की दृष्टि से भी सामना करना पड़ता था । शूद्र कन्याओं को छूतो अठूतो में कोई जातिभेद नहीं है । अहिंसा, अन्य वर्ण के लोग ले तो लेते थे, परन्तु देते सत्य, ब्रह्मचर्य आदि महान् धर्म है । धर्म के नाम नहीं थे, इसलिये शूद्रों को कन्याओं की कमी पर चलनेवाले अन्य आचार तो सब इन्हीं के होना स्वाभाविक था । अमुक अंश में वैश्यों को साधन मात्र हैं । अहिंसा, सत्य आदि के पालन भी इस कठिनाई का सामना करना पड़ता था । का ठेका किसी भी जातिविशेष को नहीं दिया जा इसलिये एक दूसरा रिवाज़ चल पड़ा कि ब्राह्मण सकता । अछूत कहलानेवालों को यह नहीं कह क्षत्रिय, वैश्य तो अनुलोम प्रतिलोम रूपमें विवाह सकते कि तुम सत्य मत बोलो, ब्रह्मचर्य से मत सम्बन्ध करें, और शूद्र शूद्र के साथ ही करे । रहो, अहिंसा का पालन मत करो । जव अहिंसा, प्रारम्भ के तीन वी के जीवन के माध्यम सत्य आदि का अधिकार सब को है तब धर्म का में इतना अन्तर नहीं था कि एक वर्ण की कन्या ऐसा कोई अंग नहीं है जिसका अधिकार सबको दूसरे वर्ण के कुटुम्ब को सहन न कर सके । न हो। इस प्रकार वर्ण-व्यवस्था के नामपर मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कुटुम्बों में स्त्रियों का - -- ११८ ] सत्यामृत वार्यक्षेत्र करीब करीब एक सरीखा ही रहता है; होता है । इस मनोवृत्ति की गृढ़ता इतनी स्पष्ट है जब कि शूद्र वर्ण की स्त्रियों को अन्य वर्ण की कि उसे अधिक स्पष्ट करने की ज़रूरत नहीं है। स्त्रियो की सेवा करने को जाना पड़ता है। इस असवर्ण विवाह में अगर कोई आपत्ति खड़ी की विषमता के कारण अन्य वर्ण की स्त्रियाँ शूद्र वर्ण जा सकती है तो उसका सम्बन्ध कर्म से ही होगा में नहीं आती थी। जन्म से नहीं । क्योंकि एक ती ब्राह्मण कुल में इससे यह तो मालूम होता ही है कि पुराने पैदा हुई हो तो उसे शूद्र या व्यापार करनेवाल के समय में असवर्ण विवाह का निषेध नहीं था। हाँ, घर जाने में संकोच हो सकता है; परन्तु भद्र स्त्रियों को मानसिक कष्ट न हो, इस खयाल से कुल में पैदा होनेवाले किन्तु विद्यापीठ में अध्यापकी शूद्रो के साथ प्रतिलोम विवाह नहीं होता था । करनेवाले के घर जाने में क्या आपत्ति हो सकती फिर भी स्वयंवर मे इस नियम का पालन नहीं है ? असवर्ण विवाह का अगर विरोध भी किया किया जाता था, क्योंकि स्वयंवर में वरका चुनाव जाय तो कर्म से असवर्ण विवाहों का विरोध करना कन्या ही करती थी। दूसरे लोग इस विषय चाहिये न कि जन्म से, और कर्म से असवर्ण सलाह रूपम भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे । विवाह का विरोध भी वहीं करना चाहिये जहाँ असवर्ण विवाह का विधान और रिवाज़ होने कन्या का विरोध हो। पर भी ऐसे विवाह अल्पसंख्या में हो, यह स्वाभा- बहुत से लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों विक है; क्योंकि विवाह सम्बन्ध मैत्री का एक को जाति का रूप देकर असवर्ण विवाहा का उत्कृष्ट रूप है। इसीलिये 'मैत्री प्रायः समान स्वभाव विरोध करते हैं; परन्तु इन वी को जाति का समान रहन सहन वालों में होती है। इस कहावत के रूप देना ठीक नहीं; क्योंकि जाति की दृष्टि से अनुसार सवर्ण विवाह अधिक होते थे, असवर्ण तो मनुष्य एक ही जाति है । वर्ण-व्यवस्था तो आर्थिक विवाह कम । धीरे धीरे असवर्ण विवाहों की संख्या व्यवस्था के लिये बनाई गई है । जाति का सम्बन्ध घटने लगी और घटते घटते यहाँ तक घटी कि वे बाते आकृति आदि के भेद से है। जैसे हाथी, घोड़ा, ऊँट इतिहास की हो गई । परन्तु असवर्ण विवाह के आदि में आकृति भेद से जातिभेद माना जाता विरोध मे कोई नैतिक बात नहीं कही जा सकती। वैसा मनुष्यो के भीतर कही नही माना जाता । आजकल भी अवसर्ण विवाह होते हैं, परन्तु जहाँ जातिभेद होता है वहाँ लैङ्गिक सम्बन्ध उनका रूप बदल गया है । जो लोग कर्म से कठिन होता है। अगर होता है तो सन्तान की जुदे जुदे वर्ण के है उनमे आपस मे शादी हो विपमाकृति दिखलाई देती है, और कहीं कहीं आगे जाती है । एक अध्यापक एक व्यापारी की पुत्री संतति नहीं चलती । असवर्ण विवाह में यह बात से शादी कर लेगा; एक व्यापारी अध्यापक की बिलकुल नहीं देखी जाती। जिन देशों मे वर्णव्यव- पुत्री से शादी कर लेगा । ये सब असवर्ण विवाह स्थाका ऐसा कट्टर रूप नहीं है और अबाधरूप हैं; परन्तु इनका विरोध नहीं होता । परन्तु जो मे असवर्ण विवाह होते है, वहाँ सन्तान-परम्परा लोग जन्म से दूसरे वर्ण के है और कर्म से एक बराबर अच्छे ढंग से चलती है । ब्राह्मणी का शूद्र ही वर्ण के हैं उनमें अगर शादी हो तो विरोध के साथ भी सम्बन्ध किया जाय तो भी सन्तान- । !
लक्षण-दृष्टि [११९ - r । परम्परा अबाध रूप में चलेगी । इसलिये वर्णों को अपभ्रंश रूप है, जो इसी अर्थ में प्रचलित हैं। जाति का रूप दना ठीक नहीं। वास्तव में ये उपजातियाँ एक बड़े कुटुम्बके समान हाँ, जाति शब्द का साधारण अर्थ समानता हैं । इनकी उत्पत्ति की जो किवदन्तियाँ प्रचलित है, । वर्णो में अर्थोपार्जन के ढंगकी समानता पाई हैं, उनसे भी यही बात मालूम होती है। जैसे जाती है, इसलिये इन्हें इस दृष्टि से जाति भले ही अग्रवालों की उत्पत्ति राजा अग्रसेन से मानी जाती है, उनके अठारह पुत्रों से अठारह गोत्र कहा जाय; परन्तु इस ढंग से तो टोपीवालों की एक जाति और पगड़ीवालों की दूसरी जाति बने, इस दृष्टि से अग्रवाल एक बड़ा कुटुम्ब ही कही जा सकती है। इसलिये विवाह सम्बन्ध कहलाया । इस प्रकार ये उपजातियाँ बड़े बड़े अर्थात् लैंगिक सम्बन्ध के लिये जो जातिभेद कुटुम्ब ही हैं । मित्रावर्ग नातेदार-वर्ग भी इसमें हानिकर है, वैसा जातिभेद ही वास्तव में जाति- शामिल हुआ है। भेद शब्द से कहना चाहिये, जोकि वर्णभेद में नहीं ये उपजातियाँ मतभेद स्थानभेद आदि के है । इसलिये जातिभेद की दुहाई देकर असवर्ण कारण बनी हैं । इनके गोत्र भी इन्हीं कारणों से विवाह का निषेध नहीं किया जा सकता। बने हैं, जिनमें आजीविका वगैरह के भेद भी कारण हैं। जिस जमाने में आने जाने के साधन आज तो वर्णव्यवस्था है ही नहीं, अगर हो तो उसका क्षेत्र बाजार में हैं, रोटी-बेटी-व्यवहार में बहुत कम थे और लोग दूसरे प्रान्तों में बस जाते नहीं । इसलिये उसके नाम पर मनुष्य जाति के थे, तब अपने मूलग्राम या प्रान्त के नाम से टुकड़े करने की कोई जरूरत नहीं हैं । घृणा और प्रसिद्ध होते थे। ये ही नाम गोत्र या उपजाति- बन जाते थे। कभी कभी प्रधान पुरुषों के नामसे अहंकार की पूजा करना मनुष्य सरीखे समझदार ये गोत्र बन जाते थे। प्राणी को शोभा नहीं देता । इसलिये इस दृष्टि से भी हमे मनुप्यब्रह्म की उपासना करना चाहिये । सरयू के उस पार बसने वाले सरयूपारि आदि के समान भारत में सैकडों टुकड़ियाँ बनी उपजाति कल्पना-देश, रंग और आजीविका है और य जाति नामसे प्रचलित है, यदि सबका के भेद से मनुष्यने जिन जातियों की कल्पना की, उन इतिहास खोजा जाय तो एक बड़ा पोथा बनेगा। सबसे अद्भुत और संकुचितता-पूर्ण इन उप- सवका विधिवद्ध इतिहास उपलब्ध नहीं है। जातियों की कल्पना है । कहीं कहीं इनको जाति परन्तु उनके नामही इतिहास की बड़ी भारी कहते है । परन्तु इनको जाति समझना जाति सामग्री हैं। साथ ही कुछ इतिहास मिलता भी शब्द का मखौल उड़ाना है । हाँ, रूद्ध शब्द के है, उस परसे बाकी का अनुमान किया जा समान इसका उपयोग किया जाय तो वात सकता है। धर्मग्रन्यों में भी इन जातियों की दृसरी है। उत्पत्ति के विषय में बहुत कुछ लिखा है। अनेक प्रान्तों में इन उपजातियों को 'ज्ञाति' इन जातियों के भीतर शारीरिक, मानसिक या कहते हैं । इसका अर्थ है कुटुम्ब । इस दृष्टि से व्यापारिक ऐसी कोई विशेषता नहीं है जो इन यह उपयुक्त है । 'न्यात' शब्द भी इसी शब्द का की सीमा कही जा सके। अवसर पड़ने पर ।
२०] सत्यामृत - फसी सुविधा के लिये कुछ लोगोने अपना संघ छोटी छोटी उपजातियों का संगठन रामग्र हिंदुओ ना लिया और उसीके भीतर सारे व्यवहारो को के संगठन में बाधा पैदा करता है । फिर राष्ट्र द कर लिया। आज इस प्रकार की उपजा का संगठन तो और भी दूर है । इस प्रकार यह तेयो मे ऐसी अनेक उपजातियाँ है जिनकी जन छोटा छोटा संगठन दृढ़ता ता पैदा करता ही संख्या कुछ सैकड़ों या हजारों में है। ऐसे छोटे नहीं है परन्तु विशाल संगठन के मार्ग में रोड़ छोटे क्षेत्रो मे विवाह-सम्बन्ध के लिये बड़ी अड़ अटकाता है । अगर यह दृढ़ता पैदा भी करता चन पड़ती है और चुनाव के लिये इतना छोटा तो भी विशाल संगठन को रोकने के कारण यह क्षत्रा मिलता है कि योग्य चुनाव करना बडा हेय ही होता । दूसरी बात यह है कि छोटी कठिन है। फिर जो लोग व्यापारिक आदि छोटी जातियों के संगठन का आखिर मतलब सुविधा के कारण दूर बस जाते है, उनको क्या है ? क्या इनका कोई ऐसा स्वार्थ है जिस दूरस्थ देशो में विवाह-सम्बन्ध की सुविधा होना का संगठन के द्वारा रक्षण करना हो ? आर्थिक चाहिये । अन्यथा उनकी वैवाहिक कठिनाइयाँ स्वार्थ तो विशेप प्रकार की राजनैतिक सीमा के और बढ़ जायँगी । साथ बँधा हुआ है। उसका इन टुकड़ियों से इस प्रकार उपजाति विवाह के विषय में कोई सम्बन्ध नहीं है | एक राष्ट्र के आर्थिक तथा अन्य प्रकार के विजातीय विवाहो के विषय और राजनैतिक स्वार्थ रक्षण के लिये एक संगठन मे लोग अनेक प्रकार की शंका करने लगते हैं, की बात कही जाय तो किसी प्रकार. ठीक भी संकुचित क्षेत्रा में विवाह-सम्बन्ध करने के लाभ लाभ है; परन्तु जाति नामक टुकड़ियों का ऐसा विशेष बतलाने लगते है । उन पर विचार करना आव- स्वार्थ नहीं है जो एक जाति का हो और दूसरी श्यक है । इसलिये संक्षेप मे शंका समाधान के का न हो । धार्मिक स्वार्थ की दुहाई दी जाय रूप मे विचार किया जाता है। तो भी ठीक नहीं है । पहिले तो धी के स्वार्थ शंका-विजातीय विवाह से जातीय संग ही क्या है ?--एक धर्मवाले दूसरे धर्म पर आक्र- ठन नष्ट हो जायगा । संगठन जितने छोटे क्षेत्र मण करें तो धर्म के नाम पर संगठन होना में रहे उतना ही दृढ़ होता है। उसमें व्यवस्था चाहिये, न कि जाति के नामपर--फिर इन भी बड़ी सरलता से बनाई जा सकती है उपजातियों का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है समाधान--संगठन की दृढ़ता क्षेत्र की एक उपजातिके भीतर अनेक धर्म पाये जाते है लघुता पर नहीं, भावना की विशेषता पर है । और एक ही धर्म के भीतर अनेक उपजातियाँ पाई मुसलमान लोग भारत में आठ करोड़ है, परन्तु जाती है । इस प्रकार धर्मरक्षण के लिये भी ये उप- उनका जो संगठन है वह हिंदुओं की किसी जातियाँ कुछ नही कर सकती। जाति का नहीं है । संख्या मे छोटी होने पर भी कहा जा सकता है कि थोड़ासा दान कर- वह संगठन में मुसलमानो की बराबरी नहीं कर के या शक्ति खर्च करके छोटी जाति को लाभ सकती। इधर इन छोटे छोटे संगठनों को महत्त्व पहुंचाया जा सकता है बड़ी जाति मे यह काम देने से बड़ा संगठन रुकता है। हिंदुओं की नहीं किया जा सकता; अगर समग्र भारत की ,