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Achrya Shri Santi Sagar · 2010/08

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सदांना
प्रकाशित
भारतीय
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प्राचार्य श्री शांतिसागर जैन ग्रंथमाला।
श्रीमद्-देवसेनाचार्यविरचित
अाराधनासार।
स्वर्गीय न्यायतीर्थ-६० गजाधरलाल जैन
पड़ावतीपुरवाल कृत हिंदी अनुवादसहित
形容陶瓷
जिसको
शोलापुरवासी गांधी-हरिभाईदेवकरण एंड संस द्वारा संरक्षित
श्री शांति सागर जैनसिद्धांतप्रकाशिनी संस्थाके महामंत्री
ब्रह्मचारी पं० श्रीलाल काव्यतीर्थ ने
ब्रह्मचारिणी मलकूवाई नागौर के प्रदत्तद्रव्य से
संस्था के पवित्र प्रेस श्रीमहावीर जी (राजस्थान) में
मुद्रक-सेठ हीरालालजी पाटणी निवाई वालों के
मंत्रित्व में छपाकर प्रकाशित किया।
कार्तिक वीर संवत् २४८४
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श्रीशांतिसागर जैन सिद्धांत प्रकाशिनी संस्था
श्री महावीरजी (राजस्थान) के
पवित्र प्रेस में छपा

. 4. .. 'ता आराधनासार ग्रंथ आज से लगभम ३५ पैंतीस साल पहले संस्था से प्रकाशित हुआ था ।बहुतं वर्षों से इसकी पहली आवृत्ति खतम हो चुकी थी और लोगों की इच्छा इसके स्वाध्याय करने की थी। इसलिये ब्रह्मचारी पं० सूरजमलजी (श्रीमदाचार्य वीरसागर संघस्थ ) ने सप्तम प्रतिमाधारिणी ब. मलकूवाईसे प्रेरणा की और उन्होंने अपनी द्रव्यको इस सत्कार्य में लगाना स्वीकार कर लिया जिससे यह ग्रंथ फिर स्वाध्यायार्थ सुलभ होगया । अतः उक्त दोनों महानुभाव प्रशंसा के पात्र हैं। संस्था का एक नियम है कि जो महाशय एक वार ग्रंथ प्रकाशन में द्रव्य देते हैं उनके नाम से दाता का परिचय सहित ग्रंथ छाप दिया जाता है। इस ग्रंथकी विक्री से जब द्रव्य वापिस प्राजाता है तब दूसरा ग्रंथ उन ही दाता के नाम से छाप दिया जाता है । दाता की इच्छा होने से चित्र भी साथ में लगा दिया जाता है इस तरह एक बार द्रव्य प्रदान करने से सदा जिनवाणी का प्रकाशन होता रहता है। इसी नियम से व्र. मलकूवाई का द्रव्य सदा जिनवाणी का प्रचार करता रहेगा । अतः जिनकी इच्छा हो वे भी इसका अनुकरण कर ज्ञान प्रचार करने में सहायक हो सकते हैं। भारतीय जैन सिद्धान्त प्रकाशिनी संस्था बनारस में ईस्वी

( २ )
सन् १९९३ में स्थापित हुई थी तबसे अन तक बनारस,
कलकत्ता और श्रीमहावीर जी अतिशयक्षेत्र ( राजस्थान ) में
स्थित होकर जिनवाणी का प्रचार करती रही है। गतसाल
श्रीमदाचार्य शांतिसागरजी महाराज का प्रथम वार्षिक समाथि
उत्सव श्रीमदाचार्य के पट्टाधीश श्री आचार्य वीरसागरजी
महाराज के समक्ष मनाया गया तब पट्टाधीश आचार्य की प्राज्ञा
से संस्था का नाम श्री शांतिसागर जैन सिद्धान्त प्रकाशिनी
संस्था कर दिया गया और उनके नामसे एक ग्रंथमाला का
प्रकाशन करना भी निशचित किया गया।
यह ग्रन्थ उसी ग्रन्थमाला का पहला पुष्प है श्राशा है
स्वाध्याय प्रेमी और आचार्य भक्त लोग इसको अधिकाधिक
संख्या में लेकर अथवा वितीर्ण कर स्वपर कल्याण करेंगे।
कार्तिक वदी ८ ]
पीर नि० सं० २४५३
श्रीलाल जैन
( गृहविरत ब्रह्मचारी)

श्रा मूल्य प्रस्तावुता बाग 6 ५० संकट यह मूल ग्रन्थ माणिक चंद्र जैन ग्रंथमालामें-उम पं. नाथूरामजी प्रेमीके प्रबंधसे प्रकाशित हो चुका है उससे पहिले यह अश्रुतपूर्व था क्योंकि इसकी एकमात्र प्रति ब्रह्मचारी शीतलप्रसाद जी की कृपा से उक्त ग्रंथमालाके मंत्रीको प्राप्त हुई थी ऐसा उनके कृतज्ञता प्रकाशसे प्रकट है अस्तु । किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह ग्रंथ बडे महत्व का है जैसा इस ग्रंथका विषय जटिल है वैसी इसकी कविता भी हृदय- हारिणी सरल है। जटिल विपयके वर्णन करनेमें इसकी हृदयहारिणी सरल कविता इस ग्रंथके कर्ता कविका अनुपम पांडित्य और अध्यात्मसंबंधी अनुपम अनुभव प्रकट करती है। ग्रंथकी गाथा पढते ही आत्मामें अलौकिक आनंदकी छटा छटकने लगती है । जैनसिद्धांतमें सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप ये चार आराधनायें मानी हैं आत्माका असली स्वरूप जिसे मोक्ष कहते हैं इन्हीं पारा- धनाओंकी कृपापर निर्भर है इसलिये मोक्षकी प्राप्तिमें ये असा- धारण कारण हैं उन्हीं आराधनाओंका बडी स्फुटतासे किन्तु संक्षेपमें यहां वर्णन किया गया है। जैन समाजमें भगवती भाराधना ग्रंथ प्रसिद्ध है धर्मप्रेमी उससे बखूवी आराधनाके स्वरूपका ज्ञान करलेते हैं किंतु आराधनाका स्वरूप किंवा सार ( २ ). को समझाने में यह ग्रंथ भी अनुपम है यह ग्रंथ उक्त ग्रंथ- मालामें काष्ठासंगके श्राचार्य क्षेमकीर्तिके शिष्य श्री रत्नकीर्ति- देव विरचित संस्कृत टीकाके साथ प्रकाशित हुआ है इसलिये संस्कृत प्राकृतज्ञ विद्वान तो इस ग्रंथ का रसास्वादन कर सकते हैं किंतु अन्य महाशय भी इस ग्रन्थका रसास्वादन और लाभ उठा सके इसलिये हिंदीभाषामें यह पुनः अनु- वादसहित प्रकाशित किया गया है और संस्कृत टीकामें जो श्लोक किंवा नये नये भाव उल्लिखित किये गये हैं उन्हें भी अनुवादमें लिखा गया है । ग्रन्थके अंत में ग्रन्थकारने सिवाय अपने नामके और कुछ भी नहिं लिखा इसलिये यह निश्चयरूपसे नहिं कहा जा- सकता कि कौन देवसेन इस ग्रन्थके कर्ता हैं क्योंकि दिगंवर- जैन ग्रन्थकर्ता और उनके ग्रन्थ इस पुस्तकके लेखानुसार देव- सेन नामके कई ग्रन्थकार होगये हैं एक तौ नयचक्र आलाप- पद्धति ज्ञानसार आदिके कर्ता वि० 880 में नंदिसंधीय देव- सेन । दूसरे चंदनपष्ट्युद्यापनके कर्ता देवसेन भट्टारक । तीसरे सुलोचनाचरित्रके कर्ता देवसेन ब्रह्मचारी और चौथे संस्कृत आराधनासारके कर्ता काष्ठासंगी देवसेन । परन्तु हमारा अनुमान है कि इस ग्रन्थके कर्ता वि० सं० ६६० में होने वाले नंदिसंघीय देवसेन ही होने चाहिये क्योंकि जिसप्रकार उनके ज्ञानसार दर्शनसार ग्रन्थ प्राकृतके हैं उसीप्रकार उनका यह आराधनासार ग्रन्थ भी प्राकृतका हो सकता है. यद्यपि । दिगम्बर जैनग्रन्थकर्ता और उनके ग्रन्थ इस पुस्तकम इन देव- सेनके ग्रन्थों में आराधनासारका नाम नहीं परन्तु भूलसे वह छूट भी सकता है। चतुर्थ देवसेन जो काष्ठासंगीय हो गये हैं उनका भी आराधनासार ग्रन्थ है परन्तु वह संस्कृतका है। क्या करें सामिग्री का अभाव यथार्थ निर्णयमें बाधक है। हमने जो यह अनुवाद किया है यह मुद्रित ग्रन्थके आधारसे ही किया है तथा टीकाके श्लोकोंके संशोधनमें जिन जिन ग्रन्थोंके ये श्लोक हैं उन ग्रन्थोंको देखकर विशेष सावधानी रक्खी है तथापि प्रसादवश कहीं स्खलना जान पडे तो वह हमैं अवश्य सूचित करें यह विद्वानोंकी सेवामें प्रार्थना है। । कलकत्ता १९२१ इस्वो वशंवद-. गजाधरलाल । द्रव्य दात्रीका परिचय। इस आराधनासार ग्रन्थ के प्रकाशन का व्यय श्री ब्र० मलकूबाई ने दिया है । आप बहुत ही सरल शांत हृदय की हैं । आपको जन्म नागौर (मारवाड) में पहाडे गोत्रोत्पन श्रीमान् सेठ स्व० भेरुदानजी, स्व० माता श्रीमती धापावाई के यहां हुआ था। आप अपने माता पिता की अत्यन्त लाडली पुत्री थीं । ११ वर्ष की उम्र में आपकी शादी डेह ( मारवाड) निवासी श्रीमान् सेट वसूलाल जी पाटनी से हो गई थी, किन्तु एक वर्ष के बाद ही दैवयोग से श्रीमान् ववसूलाल जी स्वर्ग- स्थ हो गये । कन बडे बलवान हैं उन्हीं दिनों में माता पिता सासू ( ४ ) । ससुर का भी स्वर्गवास हो गया सिर्फ देवर था सो भी शादी होने के १ वर्ष बाद ही स्वर्गस्थ हो गया, तब ये दोनों देवराणी गोपीवाई जिठानी मलकू वाई दोनों ही अत्यन्त दुःखी होगई आपत्ति के समय नहीं घबडाना और अपने व्रत शीलादिक की रक्षा करना यही मनुष्य का कर्तव्य है। दोनों बाल विधवा वाई अपने धार्मिक कार्यों में सलग्न रहीं । आपकी लगन अत्यन्त धार्मिक थी। दोनों ही वाई सीना कपड़ों पर गोटा किनारियों का काम अच्छा जानती थीं इस काम में आपने पैसे अच्छे कमा लिये थे। इसी तरह अपना सादगी जीवन विताती हुई ५० वर्ष की उम्र में परम पूज्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज के दर्शनार्थ सं० २००५ में आई और दर्शन करने के बाद ही आपके 'भाव सप्तम प्रतिमा के व्रत लेने के हुए, तदनुसार दोनों ने ही सप्तम प्रतिमा के व्रत ग्रहण किये तभी से आप पूज्य आचार्य श्री के संघ में ही धर्म साधन करती हुई रहती हैं। जब सं० २००७ में पू० आचार्य श्री बोर सागर जी महाराज का संघ श्री सम्मेदाचल की बंदनार्थ निकला तब रास्ते में बनारस के आगे देवरानो गोपीवाई का स्वर्गवास हो गया तब आपने कुटुम्ब परिवार धन धान्यादि को नाशवान जान कर अपने निजी कमाई के रुपये सदुपयोग में लगे ऐसा समझ कर अपने ज्ञानावरणी कर्म क्षयार्थ इस उपयोगी आराधनासार ग्रन्थ का प्रकाशन कराया। शक्ति नहीं होते हुए भी इस ग्रन्थ का प्रकाशन कराया एतदर्थ ३० मलवाई को कोटिशः धन्यवाद है । आशा है उक्त वाई का अनुकरण करते हुए मन्थ का अवश्य मनन करेंगे। जयपुर वः सूरजमल जैन आचार्य श्री वीर मागर जी संघ सन १६५७

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ब्रह्मचारिणी मलकू बाई जैन

ॐ वस्मान समारोप राजस्व श्रीशांतिसागर जेनग्रंथ माला । श्रीमद्देवसेनाचार्यविरचित आराधनासार। स्वर्गीय पं० गजाधरलालजी न्यायतीर्थ पद्मावतीपुरवालकृत हिंदीटीकासहित मलयरगुण समिद्ध सिद्ध सुरसेणवंदियं सिरसा मिऊण महावीरं वोच्छं आराहणासारं ॥ १ ॥ छाया-विमलतरगुणसमृद्धं सिद्धं सुरसेनवंदितं (द्विज) शिरसा। नत्वा महावीरं वक्ष्ये आरावनासारं ॥१॥ अर्थ-जो वर्धमान भगवान अगणित उत्तमोत्तम निर्मलगुणों दीप्यमान हैं। सिद्ध-प्रसिद्ध है और लोधर्म अादि इंद्रोंद्वा क्तिभावसे वंदित हैं उन्हें मस्तक नमाकर मैं (मंथकार) पाराधा रथका प्रारंभ करता हूं। भावार्थ-इस श्लोजमें 'विमलन णमृद्ध' इस पदसे नथकारने यह बतलाया है कि वैसे २ आराधनासार हिंदी टीका सहित शुद्धनिश्चयनयकी अपेक्षा समस्त जीव समान हैं-सवोंमें समान गुण मोजूद हैं परंतु जिसमें वे गुण अपने स्वच्छस्वरूपको धारणकर प्रकट होगये हैं वह जीव माननीय पूज्य और हितकारी होता है । भगवान महावीरमें वे गुण सर्वथा निर्मल और प्रकट हैं इसलिये वे अादरणीय और नमस्कारके योग्य हैं । सिद्ध इस विशेषणसे यह बतलाया है कि भगवान महावीर कल्पित नहीं प्रसिद्ध हैं समस्त विद्वान, भगवान महावीरकी उत्पत्तिको स्वीकार करते हैं। यद्यपि सिद्ध शब्दका अर्थ कृतकृत्य अष्ट गुणसहित नि-मल परमात्मा है परंतु यहां पर भगवानकी जीवन्मुक्त- अर्हन्त अवस्थाका ग्रहण है क्योंकि सिद्ध अवस्था से अहंत अवस्था हमारेलिये अधिक प्रयोजनीय है । सुरसेन वंदित विशेषणसे ग्रंथकारने भगवान भगवान महावीर की अचित्य विभूति वतलाई है अर्थात् साधारण पुरुषोंकी तो क्या वात ? बडे २ इंद्र भी उनके सेवक हैं । सुरसेनका अर्थ देवसेन भी है इसलिये ग्रंथकारने अपना नाम भी प्रकट किया है और यह मलकाया है कि भगवानमें मेरी पूरी २ भक्ति है-मैं उनको परमपूज्य समझता हूं। यहां पर गाथाके तीन चरणोंसे तो ग्रंथकारने नमस्कारात्मक मंगलाचरण प्रकट किया है और चौथे चरणसे अाराधनासार अंथ करनेकी प्रतिज्ञा सूचित की है। सिद्ध इस पदको रिशेप्य मानकर अन्य पदोंको विशेषण मान लिया जाय तो 'अनंतकवलज्ञान आदि गुणोंसे भूपित एवं ii आराधनासार हिंदी टीका सहित wom कर्मरूपी बलवान शत्रुओंके नाश करनेवाले प्रवल सुभट सिद्ध- परमात्माको मस्तक झुका नमस्कार कर सम्यग्दर्शन आदि चारों आरावनाओंको कहूंगा' यह अर्थ होता है ॥ १ ॥ सुरसेनवंदिरं इस पदका'सुरसे नवं द्विजं यह पदच्छेद करें तो 'जिसप्रकार ब्राह्मण गंगा श्रादिक जल में स्नान करते हैं उसीप्रकार सिद्ध भगवान स्वस्वभावरूप अमृत-जलमें स्नान करनेवाले हैं उन्हें नमस्कारकर' यह अथ हो जाता है । अथवा 'नवं' की जगह नवं यह पद मानले तो जो सिद्ध भगवान द्रव्याधिक नयी अपेक्षा अनादिकालसे स्वभावरूप जल में गन्न हैं उनको नमस्कार करें यह भी अर्थ हो जाता है। अथवा द्विज शब्दका अर्थ पक्षी भी होता है नवका अर्थ उत्तम है इसलिये 'सुरसे नवं द्विज' इसी पदच्छेदसे-जिसप्रकार सुरसे-मानस सरोवरमें हंस पक्षी किलोल करता है उसी प्रकार जो सिद्ध भगवान भोक्षरूप सरोवरमें सुखानुभव करते हैं उनको नमस्कारकर, यह भी अर्थ है। अथवा रस शब्दका अर्थ वीर्य भी है और जिसमें शोभन वीर्य- बल हो वह सुरस है इस अर्थसे रौद्रध्यानी सुलटोंका ग्रहण न कर कर्मरूप शत्रुओंके जीतनेवाले मुनिसमूहका ग्रहण किया है इसलिये जो सिद्ध भगवान - मुनि समुदायसे वंदित हैं उन्हें नमस्कारकर, यह भी अर्थ है । अथवा सुरसका अर्थ राग भी है और जिनके ग्रास्तिम ४. आराधनासार हिंदी टीका सहित अनुकंपा आदि रूप शोभन राग हो वे सुराग अर्थात् सराग सम्यग्दृष्टि हैं इसलिये जो सिद्ध भगवान सराग सम्यग्दृष्टियोंसे बंदित हैं उन्हें नमस्कारकर, यह भी अर्थ है। अथवा 'सुरसेण चंदियं' इसका सुरसेन वंदितं यह पद- च्छेदकर तथा सुरसका अर्थ हलाहल विप-कर्म 'दित' का अर्थ रहित और '' का अर्थ मुक्तिका स्वामी मानलें तो जो सिद्ध भगवान समस्त कर्मों से रहित मोक्षके स्वामी हैं उन्हें नमस्कारकर, यह भी अर्थ है। अथवा रसका अर्थ धातु भी है और जिसमें शोभन वातुयें हो वह उत्तम शरीर कहा जाता है इसलिये जो सिद्ध भगवान मुरस-शरीरसे दित रहित और व-मोत्तलक्ष्मीके स्वामी हैं उन्हें नमस्कारकर, यह भी अर्थ है। अथवा-रस शब्दके प्राण और तिक्त आदि रस भी अर्थ हैं इसलिये जो सिद्ध भगवान सुरस इंद्रिय आदि दश प्राणों और तिक्त आदि इंद्रियोंके विषयोंसे दित-पराङ मुख हैं और व-मोक्ष लक्ष्मीके स्वामी हैं उन्हें नमस्कारकर, यह भी अर्थ है। अथवा-रसका अर्थ द्रव्य परिणाम भी है इसलिये जो सिद्ध भगवान शुद्धद्रव्यके गुणपर्यायोंके परिणमन स्वभावसे समृद्ध हैं अर्थात् जिनके गुण पर्यायोंका सहा परिणमन होता रहता है उन्हें नमस्कारकर यह भी ग्रंथ है। अथवा-रस शब्दका पारद (पारा और पारको देनेवाला)मी आराधनासार हिंदी टीका सहित अर्थ है और संसार समुद्रसे पार करनेवाला चारित्र है इस लिये जो सिद्ध भगवान शोभन चारित्रके धारण करनेवाले आचार्योंसे वंदित हैं उन्हें नमस्कारकर, यह भी अर्थ है । आराहणाइसारो तवदंसणणाणचरणसमवायो। सो दुब्भेश्रो उत्तो ववहारो चेव परमट्ठो ॥२॥ आराधनादिसारस्तपोदर्शनज्ञानचरणसमवायः । स द्विभेद उक्तो व्यवहारश्चैव परमार्थः ॥२॥ अर्थ-सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्रचारित्र और तप इनका जो समूह है वही आराधनासार है और वह निश्चय और व्यवहारके भेदसे दो प्रकारका है । भावार्थ-यहां पर आराधनासार लक्ष्य, तप सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्रका समुदाय लक्षण है अर्थात् जो पदार्थ तप सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रस्वरूप हो वही आराधनासार है और उसके व्यवहार आराधनासार और निश्चय आराधनासार ये दो भेद हैं ॥ २॥ अव व्यवहार आराधनासारका स्वरूप कहते हैं- ववहारेण य सारो भणिो अाराहणाचउकस्स । दंसणणाणचरित्तं तवा य जिणभासियं णूणं ॥३॥ व्यवहारेण च सारो भणित आराधनाचतुष्कस्य । दर्शनज्ञानचारिनं तपश्च जिनभापितं नूनं ॥ ३॥ अर्थ-भगवान जिनेंद्रने चारोबाराधनाओंका सार व्यवहार नयसे सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र और सम्यक् तर आराधनासार हिंदी टीका सहित बतलाया है। भावार्थ-जवतक परम शुद्ध परमब्रह्मस्वरूप वीतराग अवस्थाकी प्रकटता न हो-सराग अवस्था बनी रहै तबतक जैन शास्त्रमें जिसमकार जीव अजीव आदि पदार्थों का स्वरूप वत- लाया गया है उनका वैसा ही श्रद्धान और ज्ञान करना तथा राग द्वेप यानिकी निवृत्तिका उपाय करना और अनसन अादि तपोंका आचरण करना सन्यग्दर्शन सन्यज्ञान सम्बयारित्र और तप स्वरूप व्यवहार अाराधनालार है किंतु जिस समय परमब्रह्म परमात्मा अवस्था प्रकट हो जाय उससमय सम्यग्दर्शन आदिमें तन्मय होजाना निश्चय सम्यग्दर्शन आदि स्वरूप ही अाराधनासार है इसलिये भगवान् जिनेंद्रका मत है कि व्यवहार नयसे जीव अजीव आदिका यथार्थरूपसे श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन आराधना, उनका भलेप्रकार ज्ञान होना सम्यग्ज्ञान, राग द्वेष आरिकी निवृत्तिका उपाय करना सम्यक्चास्त्रि और अनशन अवमोदर्य आदि तपोंका आचरण करना तप आराधना है। कहा भी है- ज्ञानदर्शनचारित्रतपोभिर्जिनभापितैः । आराधनाचतुप्कस्य व्यवहारेण सारता ॥ अर्थात् जिन ज्ञानं दर्शन चारित्र और तपका भगवान जिनेंद्रने प्रतिपादन किया है वही चारो प्रकारका आराधनाकार है। भगवान जिनेंद्रके वचन असत्य नहीं माने जासकते क्योंकि वे राग द्वेप रहित हैं-और गगह परहित मनुष्य कभी मिथ्या नहिं बोल सकता जैसाकि कहा है- आराधनासार हिंदी टीका सहित ANNY - रागाद्वा द्वेषाद्वामोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्यनृतं । यस्य तु नैते दोपास्तस्यानृतकारणं नास्ति । अर्थात्-राग द्वप और मोह, झूठके वलानेमें कारण हैं इसलिये जिनके राग द्वप और मोह नहीं उनके झूठ बोलनेका कोई कारण भी विद्यमान नहीं कभी झूठ नहीं बोल सकते ॥३॥अत्र व्यवहार सम्यग्दर्शन आराधनाका स्वरूप कहते हैं- भावाणं सहहणं कीरइ जं सुत्तउत्तजुत्तीहि । अाराहणा हु भणिया सन्मते सा मुणिं देहिं ॥४॥ भावानां श्रद्धानं क्रियते यत्सूत्रोक्तयुक्तिभिः । आराधना हि भणिता सम्यक्त्वे सा मुनींद्रः॥४॥ अर्थ-शास्त्रमें बतलाई गई युक्तियोंसे जो जीव अजीव आदि भावों-पदार्थो का निश्चल-रूपसे श्रद्धान करना है वह सम्यक्त्व-सम्म ग्दर्शन आराधना है । भावार्थ-जीव अजीव प्रास्रव बंध संवर निर्जरा मोक्ष पुण्य और पाप के भेइसे भाव-पदार्थ नौ प्रकार हैं। जिनमें जानने और देखनेकी शक्ति विद्यमान हो वह जीव होते हैं जिमें यह शक्ति विद्यमान न हो वह अजीव, मन वचन और काय से कर्मों का आना यात्रा, जी। और कर्म के प्रदेशोंका आपसो नीरक्षीर के समान मिल जाना बंध: आषाका निरोध संघर, एकदेशरूपसे कर्मों का क्षय होना नि; काँका सर्वथा नारा हो जाना मोक्ष, शुभ अायु साता वेदनीय नाम और गोत्र ये पुण्य और इनसे भिन्न पाप कहे जाते हैं। ये जीप आदि पदार्थ जिसप्रकार भगवान जिनेंद्रने प्रतिपादन किये उनका आराधनासार हिंदी टीका सहित उसीप्रकारसे श्रद्धान-विश्वास करना सम्यग्दर्शन कहा जाता है। सम्यग्दर्शन विरोधी मिथ्यात्व-मिथ्यादर्शन है उसके उदयसे जीव के परिणाम सदा विपरीत रहते हैं और वह अगृहीत एवं गृहीतके भेदसे दो प्रकारका है । जो मिथ्यात्व गृहीत नहीं है-स्वभावसे ही हो उसे अगृहीत मिथ्यात्व कहते हैं और वह एकेंद्रियसे लेकर पंचेंद्रियपयंत जीवमात्रक होता है । तथा जो मिथ्यात्व मिथ्या शास्त्रोंके अध्ययनसे व मिथात्वी गुरूत्रोंके संसर्गसे हो वह गृहीत मिथ्यात्व है और वह हरएक पंचेंद्रिय के न हो कर विशिष्ट पंचेंद्रिय के होता है । गृहीत मिथ्यात्वके एकांत विपरीत विनय संशय और अज्ञान ये पांच भेद हैं। वस्तुमें अनेक धर्मोके रहनेपर भी किसी एक धर्मको मुख्य मानकर उसीका श्रद्धान करना एकांत मिथ्यात्व है। सग्रंथको निग्रंथ, धर्मी को पापी, केवलीको कवलाहारी और स्त्री को मोक्ष मानना आदि विपरीत मिथ्यात्व है । कोई सर्वज्ञ हुये हैं या नहीं, मोक्ष कोई पदार्थ है या नहीं? इसप्रकारका संदेहरूप श्रद्धान करना संशय मिथ्यात्व है। सब प्रकारके देव कुदेवोंको और सम- स्तप्रकारके दर्शनोंको एक मानना विनय मिध्यात्व है एवं हित अहित की परीक्षारहित श्रद्धान करना अज्ञान मिथ्यात्व है । सम्यग्दर्शन निसर्ग और अविगम दो कारणों से होता है। काललब्धि आदि के प्राप्त हो जाने पर जो सम्यकदर्शन स्वभाव से ही प्राप्त हो जाय वह निसर्गज और जो गुरु आदिके उपदेश वा शास्त्र के स्वाध्याय अध्ययन आदि से हो वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है। वास्तव में निसर्गज सम्यग्दर्शन में भी पूर्वजन्म .

आराधनासार हिंदी टिका सहित है का गुरु आदिका उपदेश वा शास्त्र स्वाध्याय आदि ही कारणा हैं इसलिये अधिगम ही सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिमें मुख्य निमित्त है। जब तक चारित्रमोहनीय कर्म की अनन्तानुवन्धी क्रोष अनन्तानुबन्धी मान, अनन्तानुवन्धी माया; अनन्तानुवन्धी लोभ ये चार प्रकृतियों और दर्शन मोहनीय की सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यक मिथ्यात्व इन तीन प्रकृतियोंको मिलाकर सात प्रकृतियों का उदय रहता है तबतक कैसा भी सम्यक्त्व प्रकट नहीं होता किंतु जिस प्रकार गदले जलमें फिटकरी आदि द्रव्य के डालने से मिट्टी का उपशम हो जाता है वह नीचे बैठ जाती है; पानी स्वच्छ हो जाता है उसी प्रकार जिससमय उक्त सातों मोहनीय कर्म की प्रकृतियोंका उपशम हो जाता है उस समय आत्मामें औपरामिक सम्यकत्वकी प्रगटता होती है। जिस प्रकार फिटकरी आदि पदार्थ के सम्बन्ध से मिट्टी के सर्वथा नीचे बैठ जाने पर उस वर्तन का जल दूसरे बर्तन में लेनेसे मिट्टी सर्वथा नष्ट हो जाती है और पानी सर्वथा स्वच्छ हो जाता है उसी प्रकार जिस समय उक्त प्रकृतियों का सर्वथा नय होजाता है उस समय क्षाषिक सम्परत्व का उदय होता है । और जिस प्रकार अध गइले जल में कुछ मिट्टी का उपशम और कुछ का क्षय रहता है उसी प्रकार जिससमय कुछ उक्त प्रकृतियों का उपशम और कुछ का क्षय हो उस समय क्षायोपशमिक सम्यकत्व होता है इसलिये सात प्रकृतियोंके उपशम क्षय किंवा क्षयोपशम अवस्थायों १० आराधनासार हिंदी टीका सहित ameranian से सम्यक्त्व के औपशमिक क्षायिक और क्षायोपशमिक ये तीन भेद हो जाते हैं। यदि यहां पर यह शंका हो कि जब अनन्तानुवन्धी चौकडीं और सख्यकत्व, मिथ्यात्व और मिश्र इन तीन प्रकृतियोंक उपशम से औपरामिक सम्यक्त्व होता है तब जो जीव अनादि मिथ्या- दृष्टि भव्य है और जिसकी आत्मापर भरपूर कर्म की कालिमा जम रही है उसके कैसे तो प्रकृतियोंका उपशम होता है ? और कैसे वह औपशमिक सम्यक्त्व का धारक बनता है ? तो उसी का उत्तर यह है कि औपरामिक सम्यक्त्व के दो भेद हैं एकप्रथम औपशमिक सम्यक्त्व और दूसरा द्वितीय औपशमिक सम्यक्त्व । उनमें काल लब्धि आदि निमित्त कारणोंके मिल जानेपर अनादि मिथ्यादृष्टि भव्य ोपारिक सम्यक्त्व का लाभ कर सकता है काललब्धि के कई भेद हैं उनमें जिस समय कर्मसहित भव्य जीव के अर्धपुद्गल परावर्तन परिमाण काल संसार में घूमने का वाकी रह जाता है अधिक नहीं उस समय वह प्रथमोपशमिक सम्यक्त्व को ग्रहण कर सकता है और यह एक काललब्धि है । दूसरी काल 'लब्धि कर्मों की स्थितिके अधीन है अर्थात् जिस जीवके उत्कृष्ट कर्मा की स्थिति बंधती हो और इनकी सत्ता अवश्य हो तथा कर्मों की जघन्य स्थिति भी वन्धती हो और उनकी सत्ता भी हो तो उसके प्रथमोपशम सम्यक्त्व का लाभ नहीं होता किंतु जिस समय अन्तःकोडाकोडी सागरके भीतर की स्थितिवाले कर्मों का अन्ध हो और परिणामोंकी विशुद्धता से कोडाकोडी सागर के आराधनासार हिंदी टीका सहित भीतर स्थिति बन्धवाले कर्मों की भी सत्ता संख्यातं हजार सागर और भी कम रह जाय उस समय प्रथमोपशम सम्यस्त्वके ग्रहण की योग्यता होती है। यह काललब्धि भव्यशी अपेक्षा है अर्थात् जो जीव भव्य पंचेन्द्रिय पर्याप्तक और संज्ञी प्रबुद्ध होगा वही प्रथम सम्यक्त्व प्राप्त कर सकता है अन्य नहीं। इसके सिवा प्रयापशमिक संम्परत्व की उत्पत्ति में जालिस्मरण जिनविम्ब दर्शन और वेदना आदि भी कारण हैं तथा अनादि मिथ्या दृष्टि भव्यके उपर्युक्त सात प्रकृतियों से सम्यक्त्व और सभ्यमिथ्या- त्वके सिवा पांच प्रकृत्तियोंके उपशमसे प्रथमोपशम सम्यकत्व होता है और सादि मिथ्याष्टिके सातों प्रकृत्तियोंके उपशमसे होता है। समस्त नरकोंकी भूमियों में पर्याप्तक नारकीयाँके क्षायिक और क्षायोपशमिक दोनों प्रकारका सम्यक्त्व होता है । प्रथम नरक में पर्याप्त अपर्याप्तक दोनों प्रकार के नारकियोंके क्षायिक और क्षायोपरामिक दोनों प्रकारका सम्यक्त्व होता है। तिर्यंच गतिमें पर्याप्तक तिर्यंच पुरुषोंके औपशमिक सम्यक्त्व और पर्या- प्तक अपर्याप्तक दोनों नियंच पुरुषोंके क्षाधिक और क्षायशेषशमिक सम्यक्त्व होता है किंतु तिर्यंच स्त्रियों के क्षायिक न होब र औपशामिक और क्षायोपशमिक ही होता है और यह भी पर्याप्तकाके ही होता है अपर्याप्तकों के नहीं। मनुष्य में पर्याप्त अपर्याप्तक दोनों प्रकारके मनुष्यों में क्षायिक और क्षायोपशमिक दोनों प्रका- रका सम्यक्त्व होता है किंतु औपशमिक सम्यक्त्व पर्याप्तकों के १२ आराधनासार हिंदी टीका सहित. . ही होता है अपर्याप्तकों को नहीं। तथा पर्याप्तक मानुषी स्त्रियों में दोनों प्रकारका सम्यक्त होता है अपर्याप्तक में नहीं, उनमें क्षायिक सम्यक्त्व का होना भाव वेदसे माना है द्रव्यवेदसे नहीं। देवगतिमें पर्याप्तक अपर्याप्तक दोनों प्रकारके देवी के तीनों सम्यक्त्व होते हैं यदि कहो कि अपर्याप्तकोंके औपशमिक कैसे होता है तो ठीक नहीं क्यों कि जो चारित्र मोहनीयके उपशम के साथ उत्पन्न होते हैं उनकी अपेक्षा वचन है तथा भवनवासी व्यंतर और ज्योतिषी देव और उनकी देवांगनाओं के तथा सौधर्म और ईशान स्वर्गों के देवियोंके क्षायिकसम्यक्त्व नहीं होता केवल पर्याप्तकोंके ही औपशामिक और क्षायोपश- मिक दोनों प्रकारका सम्यक्त्व होता है। सम्यग्दर्शनकी उत्पत्ति में अभ्यंतर और बाह्य दो कारण हैं उनमें अभ्यंतर कारण तो दर्शन मोहनीयका उपशम क्षय किंवा क्षयोपशम है और वाह्य कारण चौथे से पहिले नरकों में रहनेवाले नारकियोंके जातिस्मरण धर्म श्रवण और वेदना आदि हैं । एवं नरककी चौथी पृथ्वीसे सातवीं पृथ्वीतकके नारकियोंके जोति स्मरण और वेदनासे सम्यक्त्व होता है। मनुष्य और तियंचामें किन्हींको जातिस्मरण किन्हींको जिनवित्र दर्शन और किन्हींको वेदनासे सम्यक्त्व होता है। बानत स्वर्गसे पहिले २ स्वगामें रहने वाले देवोंको जातिस्मरणसे, धर्मश्वणसे, जिनेन्द्रकी महिमा के देखनसे और अन्यदेवोंकी ऋद्धिक देखनेसे सम्यक्त्व होता है । आनत प्राणत पारण और अच्युत स्वर्गके देवोंके दूसरे देवों .

आराधनासार हिंदी टीका सहित १३ की ऋद्धिदशनके बिना जातिस्मरण धर्मश्रवण और जिनेंद्रकी महिमाके देखनेसे सम्यग्दर्शन होता है। नव ग्रेवेयकोंमें रहने बाले देवोंमें किसीको जाति स्मरणसे सम्यक्त्व होता है तो किसीको धर्मश्रवण से होता है । अनुदिश और अनुत्तर विमानमें देव सम्यक्त्वसहित ही उत्पन्न होते हैं इसलिये वहां सम्यक्त्वकी उत्पत्तिमें कोई कारण नहीं। सम्यक्त्वका आधार भी बाह्य और अभ्यंतरके भेद से दो प्रकारका है उसमें सम्यक्त्वका अभ्यंतर आधार तो उसका स्वामी आत्मा ही है और वाह्य आधार एक राजू चौडी और चौदह राजू लंबी लोकनाडी है। औपशमिक सम्यक्त्वकी जघन्य उत्कृष्ट स्थिति अंतर्मुहूर्त की है। क्षायिकी संसारी जीवके जघन्य तो अंतर्मुहर्तकी है उत्कृष्ट अंतर्मुहर्त सहित आठ वर्षकम दो पूर्व कोटि अधिक तेतीस सागरकी है और सिद्ध जीवके क्षायिक सम्यक्त्वकी स्थिति सादि अनंत है एवं पायोपशामिककी जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट छयासठ सागर प्रमाण है। स्वभावसे तो सभ्यग्दर्शन एक ही प्रकारका है तो भी निसर्गज और अविगमजके भेदसे उसके दो भेद और औपशमिक क्षायिक और क्षायोपशमिकके भेदसे तीन भेद हो जाते हैं इसीप्रकार श्रद्धाता पुरुष सर श्रद्धातव्य पदार्थके भेदसे सम्यग्दर्शन के संख्यात - ख्यात और अनंत भेद भी होसक्ते हैं। पच्चीस मलासे रहित जीवादि तवांका श्रद्धान ही पय-

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आराधनासार हिंदी टीका सहित
हार सम्यग्दर्शन नामकी यथार्थ आराधना कही जाती है इसलिये
जबतक लोकमूढता देवमूढता और गुरुमूढता ये तीन मूढता,
शंका कांक्षा विचिकित्सा मूढदृष्टिता अनुपहनता अस्थिति-
करण अवात्सल्य और अनभावना ये आठ दोष; ज्ञानमद पूजा-
मन कुलमद जातिमद वलमद ऋद्धिमद तपमद और शरीरमद
ये आठमद, मिथ्यादेव, मिथ्यादेवोंके आराधक, मिथ्यातप,
मिथ्यातपस्वी, मिया आगम और मिथ्याागमके ज्ञाताओंकी
सेना करना ये है अनायतन इसप्रकार पचीस मलोंशी सत्ता
रहती है तब तक निर्दोष सम्यक्त्म नहिं पल सकता।
लोगोंकी देखा देखी सुना सुनी धर्म मानकर नदी समुद्रोंमें
स्नान करना, बालू आदिके ढेर बनाकर उन्हें पूजना, पर्वतसे
गिरना और अग्नि में कूदकर जलना आदि लोक मूढता है। मुझ
पुत्रकी प्राप्ति हो; धन पुत्र उत्तम स्त्री मिले ग्रादि अाशासे रागी
द्वपी देव देवियोंकी भक्ति भावसे उपासना करना देवमूहता
और प्रारंभ परिग्रहोंसे सहित, जीवोंको संसार चक्रमें घुमानवाले
पाखंडी गुरुयोंकी सेवा शुश्रूपा करना गुरुमूढता है !
सवज्ञप्रतिपादित आगममें संदेह करना शंका, पापकी
कारण राजविभूति देव विभूति आदि विभूतियोंकी अभिलापा
करना कांक्षा, रत्नत्रयके धारक मुनियोंके वा अन्य जीवोंके फोडा
फुसी श्रादिसे बहते हुये पीव आदिको देखकर घृणा करना
विचिकित्सा, जो लोग कुमार्गगामी हैं उनकी कीर्ति वा प्रशंसा
करना किंवा उनसे संबंध रखना मूढदृष्टिता, पवित्र धर्म मार्गके

आराधनासार हिदी टोका सहित १५ min अनुसार अपने चलनेकी सामर्थ्य न होनेसे उसकी निंदा करना, हंसी उडाना किंवा उसके आराधकोंके दोष प्रगट करना अनु- पगृहन, जो मनुष्य किसी खास कारणसे सम्यग्दर्शन वा चारित्र आदिसे विमुख हों उन्हें और भी पवित्र धर्मके दोप सुझाकर विमुख करना अस्थिति करण, धर्मात्माओं में प्रीति न करना उन्हें घृणाकी दृष्टिसे देखना अवात्सल्य और जिन कार्यासे धर्म की प्रभावना होती हो उनकायका बंद करदेना अप्रभावना है। ज्ञानका अहंकार करना ज्ञानमद, पूजाका अहंकार करना पूजामद, अपने कुलका अहंकार करना कुलमद, जातिका अहं- कार करना जातिमइ, बलका अहंकार करना बलमद, ऋद्धि-धन आदिका अहंकार करना ऋद्धिमद, तपका अहंकार करना तप- मद और शरीरका अहंकार करना शरीरमद है। जो सम्यक्त्व आदि गुणोंका आयतन-स्थान न होकर उससे विपरीत मिथ्यात्व आदि दोपोंका स्थान हो वह अनायतन कहा जाता है। रागदप आदि से परिपूर्ण देव मिथ्यादेव, उनकी सेवा शुश्रूपा करनेवाले मिथ्यादेवाराधक, पंचाग्नि श्रादि हिसार कारण तप मिथ्यातप, उसके करनेवाले निथ्यातपस्वी, हितकारी मार्गस भ्रष्टकरनेवाले मिथ्याशास्त्र और उनके भक्त मिथ्या- शास्त्राराधक हैं । इनकी सेवाशुश्रूया करना वा इन्, उत्तम मानना अनायतनसेवा है । इन पच्चीस दोपोंके करनेसे सम्यग्दर्शन दुपित होता है ॥ अव संस्कृतटीकाकार व्यवहार सम्यग्दर्शन आराधना का फल. बतलाते हैं-- - --- १६ आराधनासार हिंदी टीका सहित ---MA... येनेदं त्रिजगद्वरेण्यविभुना प्रोक्तं जिनेन स्वयं सम्यक्त्वाद्भुतरत्नमेतदमलं चाभ्यस्तमत्यादरात् । भक्त्वा स प्रसभं कुकर्मनिचयं शक्त्या च सम्यग् पर- ब्रह्माराधनमद्भुतोदितचिदानंदं पदं विंदते ॥ अर्थात्-तीन जगतमें महापुरुष भगवान जिनेंद्रद्वारा प्रतिपादित सम्यक्त्व रूप अद्भुत रत्नका जो मनुष्य बडे आदरसे अभ्यास करता है वह वलपूर्वक कमों का सर्वथा नाशकर विलक्षण आनंदप्रदान करनेवाले परनाराधन-निश्चय सम्यग्दर्शन नामकी आराधनाको प्राप्त करलेता है अर्थात्-इस व्यवहार सम्यग्दर्शन आराधनासे उसे निश्चय सम्यग्दर्शन आराधना की प्राप्ति हो जाती है ।। ४ ।। अब व्यवहार ज्ञान आराधनाका स्वरूप कहते हैं- सुत्तत्थभावणावा तेसिं भावाणमहिगमोजोवा। णाणस्स हवदि एसा उत्ता पाराहणा सुत्ते ॥५॥ सूत्रार्थभावना वा तेषां भावानामधिगमो वा । ज्ञानस्य भवत्येपा उक्ता आराधना सूत्रे ॥ ५॥ अर्थ- परमागमके अर्थकी भावना अथवा उपयुक्त जीव आदि भावोंका भले प्रकार ज्ञान करना व्यवहार ज्ञानाराधना है भावार्थ-संशय विपर्यय और अनध्यवसाय ये तीन मिथ्याज्ञान सम्यग्ज्ञान आराधना के बाधक हैं अर्थात् जबतक यह जीव या अजीव है इसप्रकार विरुद्ध अनेक कोटियों का अवगाहन करनेवाला ज्ञान संशयज्ञान, जीवको अजीव मानना वा अजीवको जीव ही मानना इसप्रकार विपरीत एक को टिका निश्चय करानेवाला ज्ञान .

आराधनासार हिंदी टीका सहित १७ विपर्यय और यह कुछ है इसप्रकारका ज्ञान अनध्यवसाय' इनकी सत्ता आत्मामें विद्यमान रहती है तब तक जीव जीव ही है अजीव आदि अजीव आदि ही है इसप्रकारकी सम्यग्ज्ञान आराधनाका उदय नही हो पाता किंतु जब संशय आदि मिथ्याज्ञान सर्वथा दूर हो जाते हैं उससमय सम्यग्ज्ञान आराधनाका उदय होता है इस- लिये जो पदार्थ जैसे हैं उन्हें वैसे ही मानना सम्यग्ज्ञान आराधना है। मूलकारने परमागमकी भावना व उक्त जीवादि पदार्थों का अधि- गम इसप्रकार सम्यग्ज्ञान आराधनाके दो स्वरूप रतलाये हैं सो ठीक हैं क्योंकि जीव आदि पदार्थों का स्वरूप इतना गहन है कि बिना परमागमका अवलंबन किये, सिवाय सर्वज्ञके दूसरा कोई जान ही नहीं सकता इसलिये मूलकारने यह स्पष्ट करदिया है कि सर्वज्ञ प्रतिपादित आगमके अनुसार जीवादि पदार्थों का निश्चयात्मक ज्ञान सम्यग्ज्ञान आराधना है अल्पज्ञानियों द्वारा रचेगये शास्त्रोंके अनुसार जीव आदि पदार्थों का ज्ञान सम्यग्ज्ञान आराधना नहिं बन सकता । अथवा जो ही परमागमकी भावना है वही जीवादि पदार्थों का अधिगम है दोनों एक हैं क्योंकि जीवादि पदार्थों के वर्णनसे भिन्न अन्य . कोई पदार्थ नहीं और उसकी भावना जीवादि पदार्थोंके सम्यक अधिगमसे भिन्न नहीं है । इसलिये परमाग- भकी भावनासे ही सम्यग्ज्ञान अाराधनाका स्वरूप मालूम पड जाता है तथापि मूलकारने जो पुनः जीव आदि पदार्थो का अविगम राम्यग्ज्ञान भावना है यह लिखा है वह स्पष्टताकेलिये ही निस १८ minim माराधनासार हिंदी टीका सहित ~~~ है यह समझना चाहिये। अब संस्कृतटीकाकार व्यवहार सम्यग्ज्ञान श्राराथनाका फल कहते हैं- सिद्धांते जिनभापिते नवलसत्तत्त्वार्थभावाद्भुते भावं यो विदधीत वाधिगमनं कुर्वीत तस्यानिशं । भक्त्वा स प्रसभं कुकर्मनिचयं भक्त्या च सम्यक्पर- ब्रह्माराधनमद्भुतोदितचिदानंदं पदं विंदते ।। अर्थात्-जो मनुष्य भगवान जिनेंद्रद्वारा प्रतिपादित और नव पदार्थोके वर्णनसे देदीप्यमान अद्भुत जैनसिद्धांतकी भक्तिपूर्वक भावना करता है अथवा सदा जीव आदि पदार्थोंकाभले प्रकार शान करता है वह निदित कर्मों का त्यागकर अद्भुत अनंतसुख प्रदान करनेवाली निश्चय सम्यग्ज्ञान आराधनाको प्राप्त कर- लेता है ॥ ५ ॥ अव ग्रंथकार व्यवहार सम्यक्चारित्र पाराधनाका स्वरूप कहते हैं- तेरहविहस्स चरणं चारित्ररसेह भावसुद्धीए । दुविहअसंजमचाओ चारित्ताराहणा एसा ॥६॥ गयोदशविधस्य चरणं चारित्रास्येह भावशुद्धया । द्विविधासंयमत्यागश्चारित्राराधना.एपा ॥६॥ अर्य-भावोंकी विशुद्धतापूर्वक तेरहं प्रकारके चारित्रका आचरण करना और दो प्रकारके असंयमका सर्वथा त्याग करदेना व्यवहार सम्यक्चारित्र अाराधना है । भावार्थ-१ अहिंसामहाव्रत २ सत्य- महाव्रत ३ अचार्यमहाव्रत ४ ब्रह्मचर्यमहाव्रत और ५ निष्परिग्रह .

आराधनासार हिंदी टीका सहित १८ vie बत ये पांच महावत, १ ईर्या २ भाषा ३ एपणा ४ अादाननिक्षेप और ५ उत्सर्ग ये पांच समितियां और १ कायगुप्ति २ वचनगुष्ठि ३ मनोगुप्ति ये तीन गुप्तियां इसप्रकार सब मिलकर चारित्रके तेरह भेद हैं। मन वचन काय कृत कारित अनुमोदनासे सर्वथा हिंसाका त्यागना अहिंसामहाबत, सर्वथा झूठका त्याग करना सत्यमहा- व्रत, सर्वथा चोरीका त्याग करना अचौर्यमहाव्रत, स्वस्त्री और परस्त्रीका सर्वथा त्याग करना ब्रह्मचर्यमहाव्रत और किसी प्रकारके परिवहन लालसा न रखना निष्परिग्रहमहावत है । सूर्यो- दयके पश्चात् जभ कि नेत्र भले प्रकार पदार्योको देख सकें और तिर्यंच आदिके आवागमनसे मार्ग प्रासुक हो जाय उस समय जूडाप्रमाण जमीन शोधकर चलना ईर्यासमिति, हितकारी और परिमित संदेहरहित प्रिय वचनोंका कहना भापासमिति, दिनसे एकवार निर्दोष आहार ग्रहण करना एपणा समिति, शरीर पुस्तक कमंडलु आदि उपकरणोंको नेत्रोंसे और पीछीसे शोधकर ग्रहरा करने स्थापन करनेरूप प्रवृत्ति रखना आदाननिक्षेपण और बस स्थावर जीवोंको पीडाःन हो ऐसी शुद्ध जंतु रहित भूमिपर मलमूत्र आदि क्षेपणकर प्रासुक जलमे शौच क्रिया करना उत्ल- र्ग समिति है । तथा कायकी प्रवृत्ति रोकना कायगुप्ति, चचनकी प्रवृत्ति रोकना वचनगुप्ति और मनकी प्रवृत्ति रोकना मनोगुप्ति है। कहा भी है.

११ आराधनामार हिंदी टीका सहित महाघ्रतानि पंचैव पंचैव समितीस्तथा। गुप्तीस्तिस्रश्च चारित्रे त्रयोदशविधे विदुः ।। अर्थात्-पांच प्रकारका महाव्रत, पांचप्रकारकी समितियां और तीनप्रकारकी गुप्तियां सब मिलकर चारित्रके तेरह भेद हैं। ग्रंथकारने तेरह प्रकारके चारित्रके आचरण करनेमें भावशुद्धि को प्रधान रक्खा है अर्थात् जब तक विशुद्धभावोंसे तेरह प्रकार फे चारित्रका आचरण न किया जायगा तबतक पूर्णरूपसे व्यव- हार सम्यक चारित्र पाराधना नहि हो सकती। कहा भी है... भावशुद्धिमविभ्राणाश्चारित्रं कलयन्ति ये । त्यक्त्वा नावं भुजाभ्यां ते तितीर्पति महार्णवं ॥ अर्थात्-जो मनुष्य विना भावविशुद्धिके चारित्रका आचरण करना चाहते हैं वे नावकी कुछ भी पर्वा न कर भुजाओंसे विशाल समुद्रको तैरकर पार करना चाहते हैं । इसलिये भव्योंको चाहिये कि वे शीत यात आतप आदि के घोर उपसर्गके उपस्थित हो जानेपर भी परिणामोंसें किसीप्रकारकी ग्लानि न लावें और उन्हें विशुद्ध रखकर चारित्रका आचरण करें । केवल तैरह प्रकार के चारित्र का आचरण करना व्यवहार चारित्रका धारावना नहीं किन्तु दो प्रकारके असंयमोंका त्याग करना भी चारित्र पारावना है। इंदियासंयम और प्राणोसंयमके भेदसे असंयम दो प्रकारका है। स्पर्शन जीभ नाक आंख कान और एन इन छै इन्द्रियों की सर्श रस गंध वस शब्द विषयों में जो स्वेच्छाचार प्रवृति है उसे इन्द्रिपासंयम कहते हैं और पृथिवी आराधनासार हिंदी टीका सहित जल तेज वायु बनस्पति ये पांच प्रकारके एकेंद्रिय स्थावर जीद एवं दो इन्द्रिय ते इन्द्रिय चौ इन्द्रिय और पंचेंद्रिय नामक त्रस जीवोंके प्राणोंको कोधादि प्रमादां से जो पीडा पहुंचाना है वह प्राण असंयम है। जैसा कि कहा है- मनसश्चेद्रियाणां च यत्स्वस्वार्थे प्रवर्तनं यदृच्छयेव तत्तज्ज्ञा इन्द्रियासंयम विदुः॥ स्थावराणां त्रसाणां च जीवानां हि प्रमादतः । जीवितव्यपरोपो यः स प्राणासंयमः स्मृतः ॥ अर्थात्-मन और पांचों इन्द्रियोंकी अपने विषयमें स्वेच्छा- चार प्रवृत्तिको इन्द्रियासंयम स एवं स्थावर जीवों के प्राणों को प्रमाद पूर्वक पीडा पहुचाने को प्राणासंयम कहते हैं । इसप्रकार दोनों प्रकारके असंयमोंका त्याग और तेरह प्रकारके चरित्रका परिणामों से पालन करना व्यवहार चारित्र आराधना है । अब व्यवहार चारित्र आराधना का संस्कृत टीकाकार फल बत लाते हैं- द्वधासंयमवर्जितं गुरुपदद्वन्द्वाजसंसेवना- बाप्तं यश्चिनुते त्रयोदशविध चारित्रमत्त्य॒र्जितम् । भंक्वास प्रसंभ कुकर्म निचयं भक्त्या च सम्यकपर~ ब्रह्माराधनमद्भुतोदितचिदानंद पदं विंदते:: अर्थात्-जो मनुष्य इन्द्रियासंयम और प्राणासंयम दोनों प्रकार के असंयमों से रहित गुरुके चरण कमलोंके सेक्नसे प्राप्त दैदीप्यमान तेरह प्रकारके चारित्रका भरसक आचरण करता है २२ आराधनासार हिंदी टोका सहित. वह पुरुप निंदित कर्मों का सर्वथा नाश कर अद्भुत आनन्द प्राप्त करनेवाली. परब्रह्माराधना-निश्चय चारित्र आराधनाको प्राप्त करता है ॥६॥ अब व्यवहार तप अाराधना का स्वरूप बतलाते हैं- चारहविहतवयरंणे कीरइ जो उनमो ससत्ताए। सा भणिया जिणमुत्ते तवम्मि पाराहणा णूणं ।७ दादशविधतपश्चरणे क्रियते य उद्यनःस्वशाया । सा भणिता जिनसूत्र तपास आराधना नूनम् ।।णा i. अर्थ- शक्तिके अनुसार जो बारह प्रकारके तपके पाच- रण करनेमें उद्यम करना है वह व्यवहार तप अाराधना है। भावार्थ वाह्य और अभ्यंतर के भेदसे तय दो प्रकारका है। अनशन २ अवमोदर्य ३ वृत्तिपरिसंख्यान ४ रसपरित्याग ५ विविक्त शव्यासन और काय क्लेश ये छह बाह्य तपके भेद है १ प्रायश्चित्त २ विनय ३ वैश्यावृत्य ४ स्वाध्याय ५ व्युत्सर्ग और ६ ध्यान यह छह भेद अभ्यंार तपके हैं कीनि लाभ आदिकी इच्छा न कर संयमती सिद्धि रागभाव का उच्छेद कर्माका नाश ध्यान स्वाध्यायकी सिद्धि और इन्द्रियोंका दमन किंवा उनके जीतनके लिये भोजन का त्याग करना अनशन तप है। सँयम आदिके लिये वा ध्यानकी निश्चलता आदिके लिये अल्पभोजन करना अवनोदर्य है ऐसी प्रतिज्ञा कि एक वा पांच वा सात घर जाऊंगा अथवा एक वा दोही मुहल्लोंमें जाऊंगा वा मार्ग और आराधनासार हिंदी टीका सहित मैंदानमें ही भोजन मिलेगा तो लूंगा नगरौं न जाऊंगा आहारके लिये वनसे निकलना और नियमानुसार अाहार न मिलने पर पुनः वनमें आकर उपवास धारण करना वृत्तिपरिसंख्यान तप है । इद्रि- योंके दमन संयम की रक्षा और लालसा के दूर करने के लिये घृत दुग्ध तेल गुड लवण श्रादि रसोंका त्यागकरना रसपरित्याग तप है । जीवोंकी रक्षार्थ प्रासुक क्षेत्र में और पर्वत गुफा मठ वन खंड आदि स्थानों में जहां कि ब्रह्मचर्य स्वाध्याय ध्यान अध्ययन आदिमें विघ्न न आवे शयन वा आसन करना विविक्तशय्या सन और शरीरमें ममत्व न रखकर कोयको क्लेश पहुचानेवाले तपोंका करना कायक्लेश तप है। प्रमादसे लगे हुए दोपोंकी शुद्धि करना प्रायश्चित्त तप है । आर्य पुरुषोंका आदर सत्कार विनय तप मुनियों की सेवा टहल करना वैय्यावृत्त तप है। ज्ञानाराधन में आलस्यको त्यागकर ज्ञानाध्ययन करना करावना वा अन्य को उपदेशदेना स्वाध्याय तप है, बाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रहका त्याग करना व्युत्सर्गप है । चित्तविक्षेप अादि का त्याग करना ध्यान है। इन छ प्रकार के तपों के आचरण करनेमें मूलकारने 'स्वशक्त्या' पद दिया है उसका तात्पर्य यह है कि जितनी शक्ति हो उसीके अनुसार तपोंका याचरण करें शक्तिसे अधिक तप आचरण की आवश्यता नही क्यों कि उससे हानी हो जाती है जैसा कि कहा है- तं चि तबो कायव्वो जेण मणोऽम गलॅ ण चिंतेई । जेण ण इन्दियहाणी जेण व जोगा ण हायति ।।

आराधनासार हिंदी टीका सहित in अर्थात्-तप उतनाही करना उचित है-जिससे मन वश रहे अमंगल चितवन न कर सके। इन्द्रिया भी समर्थ बनी रहें और शरीर मन एवं वचन पूर्णरूपसे अपना कार्य कर सकें। सम्य ग्दर्शन आदि आराधनाओंके समान तप आराधना भी परम कार्यकारिणी है क्यों कि जबतक इसका आराधन न किया जायगा तबतक कदापि कर्मों का नाश नहीं हो सकता और विना कर्मके नाशके मोनकी प्राप्ति नही हो सकती । कहाभी है- निकाचितानि कर्माणि तावद् भस्मीभवति न । यावत प्रवचनमोक्तस्तपोवह्निन दीप्यते ॥२॥ अर्थात्- जबतक शास्त्रानुसार तपरूपी अग्नि प्रदीप्त नहीं होती अपनी उग्र ज्वालासे नही लहलहाती तवतक कर्मों का समूह भस्म नहीं हो सकता । तथा जो पाक्षिक श्रावक निश्चयन- यके जिज्ञासु हैं उन्हें भी अप्रमत्त होकर चारों प्रकारकी व्यवहार पारांधना अवश्य आराधनी चाहिये क्योकि विना व्यवहार आराधनाके निश्चय आराधना में प्रवृत्ति नहीं हो सकती। जैसा कि कहा गया है- जीवोऽप्रविश्य व्यवहार मार्ग न निश्चयम् ज्ञातुमुपैति शक्ति । प्रभाविकाशेक्षणमन्तरेण भानूदगं को वदत्ते विवेकी ।। अर्थात्-जिसप्रकार प्रकाश युक्त दिशाओंके देखनेके बिना कोई विद्वान सूर्यके उदयका निश्चय नहीं कर सकता उसीप्र- कार दिना व्यवहार मार्ग को अवलंबन किये निश्चयके जाननेकी आराधनासार हिंदी टीका सहित भी सामर्थ्य नही प्राप्त हो सकती। अब संस्कृत टीकाकार आराधनाका फल कहते हैं- घोडाभ्यांतरपड्विधोत्तरतपस्यहरै पिते शक्तिं स्वामनपेक्ष्य यो वितनुते चारिपानोदम्मम् । भक्त्या स प्रसभं कुकर्म निचणं भक्त्वा च सम्यकपर- ब्रह्माराधनमद्भुतोदितचिदानंदम पदम् विंदते ।। अर्थात्-भगवान जिनेन्द्र द्वारा प्रतिपादित छ प्रकार के अभ्यंतर और छै प्रकारके वाय इसप्रकार वारहप्रकारके तप का जो महानुभाव अपनी शक्ति के अनुसार आचरण करता है वह निंद्यकर्मों का नाशकर अद्भुत आनन्द प्रदान करने वाली परब्रह्माराधना-निश्चय सम्यक् तप आराधना को प्राप्त कर लेता है।॥७॥ अब निश्चय आराधना का स्वरूप कहते हैं- सुद्धणये चउखधं उत्ताराहणाइ एरिसियं । सव्ववियप्पविमुक्को सुद्धो अप्पा णिरालंबो। शुद्धनये चतुस्कँधमुक्त; आराधनाया ईदृशम् । सर्वविकल्पविमुक्तः शुद्ध आत्मा निरालँचः ।।८।। अर्थ-शुद्धनिश्चयनयसे समस्त प्रकारके विकन्पास रहित, शुद्ध और निरालंब आत्मा ही सम्यग्दर्शन आदि चारों धारा- धना आदि स्वरूप कहा गया है। भावार्थ-स्थूलरूपसे व्यवहार और निश्चयके भेदसे नय दो प्रकारके हैं । व्यवहारनय भेद को विषय करता है और निश्चय नयका विषय अभेद है । व्यवहार नयसे आत्मा के सम्यग्दर्शन आदि भेद हैं और निश्चयनयसे आराधनासार हिंदी टीका महित अर्थ- समस्त प्रकार भेदोंसे रहित विशुद्ध और निरालंब आत्मा ही सम्यग्दर्शन श्रादि चारो आराधनाये है। निश्चय नयसे सम्य- ग्दर्शन आदि याराधनाके भेद नहिं हो सकते ॥८॥ निश्चय आराधनाका और भी विशेष स्वरूप कहते हैं-.. सदहइ संस्सहावं जाणइ अप्पाणमप्पणो सुद्ध। तं चिय अणुचरइ पुणो इदियविसये णिरोहिता ॥ श्रद्दधाति स्वस्वभाव जानाति आत्मानमात्मनः शुद्ध । तमेवानुचरति पुनरिद्रियविपयान्निरुध्य ।। ६ ।। -स्वस्वभावका श्रद्धान करना, अपने से ही अपना निष्क- लंक स्वरूप जानना और इंद्रियोंके विपयोंको रोककर अपने स्वरूपका ही अनुचरण करना निश्चयसम्यग्दर्शन आदि चारो अाराधना हैं। भावार्थ-ऊपर कह दिया गया है कि निश्चय सम्बग्दर्शन आदि आराधनायें निर्दोष आत्मस्वरूप हैं-निश्चय नयसे उनके भेद नहीं है । यहांपर कुछ विशेप बतलाया है अर्थात् स्वस्वरूपका श्रद्धान निश्चय सम्यग्दर्शन आराधना है । अरनेसे अपने स्वरूपका जानना निश्चय सम्यग्ज्ञान आराधना और १ हलका २ भारी ३ चिकना ४ खुरखुरा ५ ठंडा ६ गरम ७ कोमल और ८ कठोर पाठ प्रकारका स्पर्श, १ कडुअा २ तीता ३ मीठा ४ अम्ल और ५ खारा पांच प्रकारका रस, १ सुगंध २ दुर्गध दोपकारके गंव, १ सफेद २ पीला ३ लाल ४ नीला और ५ काला पांच प्रकारका रूप और १ निपाद २ ऋषभ , 'आराधनासार हिंदी टीका सहित ३ गांधार ३ पड्ज ५ मध्यम ६ धैवत और ७ पंचम ये सात स्वर इसप्रकार क्रमसे स्पर्शन आदि पांचों इंद्रियोंके सत्ताईस विपयोंका निरोधकर निजस्वरूपका आचरण करना निश्चय सम्यक् चारित्र आराधना है और इंद्रियों के विषयोंको रोककर स्वस्वरूपमें लीन रहना निश्चयतप अाराधना है ॥ ६॥ अव निश्चय सम्यग्दर्शन आदि बाराधनाओंका सार खींचकर ग्रंथकार कहते हैं- - तम्हा देसण गाणं चारितं तह तवो य सो अप्पा। चइऊण रायदोसे पाराहउ सुद्धमप्पाणं ॥ १० ॥ तस्माद्दर्शनँ ज्ञान चारित्रं तथा तपश्च स आत्मा । त्यक्त्वा रागद्वेपो आराधयतु शुद्धमात्मानम् ।। १० ।। अर्थ-इसलिये निश्चयनयसे सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्र और सम्यक्तप चारो आराधनायें आत्मा ही हैं अतः राग और द्वपका सर्वथा त्यागकर शुद्ध आत्माका ही श्राराधन करना चाहिये । भावार्थ-आत्मा ही सम्यग्दर्शन आदि चारो आराधनास्वरूप है इसका आशय यह है कि-जिससमय यह आत्मा अपने परमात्मस्वरूपका श्रद्धान करता है उससमय यही निश्चय सम्यग्दर्शन आराधना कहा जाता है। जिससमय अपने परमात्मस्वरूपको जानता है उससमय यही निश्चय सम्यग्ज्ञान, जिससमय अपने परमात्मस्वरूपका आचरण करता है उससमय यही निश्चय चारित्र और जिससमय परद्रव्यकी अभिलाषा - आराधनासार हिंदी टीका सहित com त्यागकर स्वस्वरूपमें संतुष्ट रहता है उससमय यही सम्यक्तप आराधना कहा जाता है। जैसा कि कहा है- विशुद्धे स्वस्वभावे यच्चद्धान शुद्धथुद्धितः । तन्निश्चयनये सम्यग्दर्शन मोक्षसादनम् ।। ५ ।। आत्मानमात्मसँभूतं रागादिमलवर्जित । यो जानाति भवेत्तस्य ज्ञान निश्चयहेतुजम् ।। तमेव परमात्मान पौनः पुन्यादय यदा । अनुतिष्ठेत्तदा त्वस्य ज्ञान चारित्रमुत्तम ।।३।। परद्रव्येषु सर्वेषु यदिच्छाया निवर्तनं । तपः परममात्मानं तनिश्चयनयस्थितं ॥४॥ अर्थात्-शुद्धबुद्धि स्वस्वभावज्ञानसे विशुद्ध स्वस्वभावका श्रद्धान करना मोक्षका कारण निश्चय सम्यग्दर्शन है । राग द्वेप आदि मलोंसे रहित, और आत्मासे ही प्रादुर्भूत जो परमात्म- स्वरूपका जानना है वह निश्चय सम्यग्ज्ञान है । बार बार पर- मात्मस्वरूपका आचरण करना निश्चयचारित्र और समस्त पर पदार्थासे निरभिलाप हो स्वस्वरूपमें संतुष्ट रहना तप है ॥१०॥ शंका होती है कि जिसप्रकार व्यवहार अाराधनामें आराधन आराध्य आराधक और फल चारी बातें स्पष्टरूपसे जान पड़ती हैं उसप्रकार आत्मस्वरूप निश्चय आराधनामें ये बातें कैसे मालूम हों ? तो इसवातका खुलासा ग्रंथकार करते हैं- अाराहणमाराहं पाराहय तह फलं च ज भणियं। तं सव्वं जाणिज्जो अप्पाणं चेव णिच्छयदो ॥११ आराधनमाराध्यं आराधकस्तथा फलं च यद् भणितं । तत्सर्व जानीहि आत्मानं चैव निश्चयतः ।। ११ ।। - - --- आराधनासार हिंदी टीका सहित ." अर्थ-आराधन आराध्य आराधक और फल जो चार बातें वतलाई हैं वे निश्चय नयसे प्रात्मा ही है आत्मासे भिन्न नहीं। भावार्थ-व्यवहारसम्यग्दर्शन आदि चारो आराधनाओंकी प्रक- टताका उपाय अाराधन है सम्यग्दर्शन श्रादि आराध्य, आत्मा आराधक और सकलकर्मोंका नाश वा संवर निर्जरा फल है इसप्रकार चारों भिन्न हैं परंतु निश्चयनयसे वे सब अात्मस्वरूप ही हैं क्योंकि आराध्य पदार्थके प्राप्त होने के उपायको आराधन कहते हैं सो यहाँपर आराध्य जो शुद्धात्मस्वरूप है उसके प्रगट होनेका उपाय शुद्धात्मस्वरूपका चितवन होनेसे आराधन शुद्धां- त्मस्वरूप ही है। श्राराधना करने के योग्य पदार्थको आराध्य कहते हैं सो याराधना करने योग्य भी शुद्धआत्मस्वरूप ही है। आराधना करनेवालेको आराधक कहते हैं सो वह भी आत्मा ही । और आराध्यकी प्राप्तिको फल कहते हैं सो अंतमें शुद्धात्मा की प्राप्ति होनेसे वह भी शुद्धात्मस्वरूप ही है इसलिये आराधन आदि आत्माके ही स्वरूप होनेसे निश्चयनयमें भी आराधन आराध्य आदि घट जाते हैं । इसी माशयको संस्कृत टीककार नीचे लिखे श्लोकसे स्फुट करते हैं- आराध्यश्चित्स्वरूपो यदयमयमुपायायितस्तस्य सन्य- ग्बोधे चाराधनं च स्फुरतदनुचरीभूत माराधकोऽयं । कर्मप्रध्यसभावाच्छिषपदमयितोयं च काम्यं फलं त प्याराष्ाराधनाराधकफलमखिलं प्रोक्त आन्मक एव || अर्थात-उपायसे प्राप्त करने-जानने योग्य आप चैन्य- आराधनासार हिदी टोका-सहित स्वरूप प्रात्मा ही आराध्य, अपनाही भलेप्रकार ज्ञान होना आ- राधन अपनेही को जानने वाला आराधक और समस्त काँसे रहित हो यापही का मोक्ष स्थानमें प्राप्त हो जाना फल है इस रीतिसे जव चित्स्वरूपही आराध्य आराधक अाराधन और फल स्वरूप है तब निश्चयनय में आराध्य आराधन आराधक और उसके फलके घटने में किसी प्रकारकी अडचन नही ।।११।। अब निश्चय आराधनाकी.मोजूदगीमें व्यवहार आराधना की क्या आवश्यकता है ? इसका उत्तर ग्रन्थकार देते हैं- पज्जयणयेण भणिया वाविहाराहणा हु जा सुत्ते। सा पुणु कारणभूदा णिच्छयणयदो चउकस्स॥१२॥ पर्यायनयेन भणिता चतुर्विधाराधना हि या सूत्रे । सा..पुनः कारणभूता निश्चयनयतश्चतुष्कस्य.॥ अर्थ-जो चारप्रकारको व्यवहार आराधना बतलाई है वह निश्चय आराधनामें कारण है क्योंकि बिना व्यवहार आराधनाके निश्चय आराधना में प्रवृत्ति नहीं हो सकती । भावार्थ-जिसन- कार कोई पुरुष केवलं म्लेछ भापा जानता है यदि उसको विशु- द्धतत्त्वज्ञानका किसी अन्य भाषामें उपदेश दीया जाता है तो वह समझ नहीं सकता किंतु उसे ही जिस समय म्लेछ भाषा बोलकर तत्वज्ञानका स्वरूप समझाया जाता है तो वह बहुत जब्दी समझ जाता है उसीप्रकार जबतक व्यवहार नयसे सम्यग्दर्शन आदिका स्वरूप नहीं जाना जाता तबतक निश्चय सम्यग्दर्शन यादि का स्वरूप नहिं जान सकते किंतु जिस समय व्यवहार सम्यग्दर्शन

ܚ ܚܕ
आराधनासार हिंदी टीका सहित
आदिका स्वरूप जान लिया जाता है उस समय निश्चय सम्यग्द-
र्शन आदिका स्वरूप बहुत जल्दी समझमें आजाता है । इसलिये
केवल म्लेछभाषाके जानकार मनुष्य को तत्वज्ञानका रहस्य सम-
झाने के लिये जिसप्रकार म्लेछभाषा उपयोगिनी है विना म्लेछ
भाषाका अवलंबन किये तत्त्वज्ञानका स्वरूप नहीं समझाया जा
सकता उसीप्रकार निश्चय सम्यग्दर्शन आदिके स्वरूपके समझनेकी
शक्ति न रखनेवाले मनुष्यके लिये व्यवहार सम्यग्दर्शन आदिका
स्वरूप जानना उपयोगी है विना व्यवहार सम्यग्दर्शन आदिका
स्वरूप जाने निश्चय सम्यग्दर्शन आदिका स्वरूप नही जाना जा
सकता । हां ! जब निश्चय सम्यग्दर्शन अादिके स्वरूपका पूर्णज्ञान
हो. जाय उस समय व्यवहार सम्यग्दर्शन आदिके स्वरूप ज्ञानकी
कोई आवश्यकता नहीं उस समय तो व्यवहारनयका सहारा
सर्वथा छोड देनाही योग्य है इसलिये निश्चय सम्यग्दर्शन
आदि. आराधना में व्यवहार सम्यग्दर्शन आदि अाराधना
कारण होनेसे उनका आचरण करना प्रयोजनीय है ॥१२॥
अब मुनि संसारका किसप्रकार नाश करता है इस बातको
ग्रन्थकार बतलाते हैं-
कारणकजविभागं मुणिऊणं कालपहुदिलद्धीए ।
लहिऊण तहा खवनो आराहउ जह भवं मुचड्॥१३॥
कारणकार्यविभाग मत्वा कालप्रभृतिलब्धीः ।
लटध्वा तथा क्षपक आराधयतु यथा भवं मुचति ॥१३॥

माराधनासार हिंदी टीका सहित अर्थ-मुनि कारण और कार्य के विभागको जानकर एवं काल ग्रादि लब्धियों को प्राप्त होकर उस रीतिसे परमात्माका अाराधन करे जिससे उसका संसार छूट जाय । भावार्थ- व्यव- हार आरावना कारण है निश्चय आराधना कार्य है क्योंकि व्यवहार आराधना के अवलंबनसे निश्चय आराधना की प्राप्ति होती है। निश्चय आराधना कारण है और मोक्ष कार्य है क्यों कि निश्चय आराधनासे मोक्ष की प्राप्ति होती है। तथा मोक्ष कारण है और अनन्त चतुष्टयरूप शुद्ध परमात्मा से उत्पन्न अनन्त सुख कार्य है क्योंकि इस सुखकी मोन में प्रग- टता होती है इत्यादि कार्य कारण के भेदका जिस जीवको पूर्ण रूपसे ज्ञान है और काल आदि लब्धियां भी जिसने प्राप्त करली हैं ऐसा जीव जिस समय परमात्माका आराधन करता है उस समय उसका संसार सर्वथा छूट जाता है इसलिये भव्य मुनि के संसारके छूटने में कार्यकारण का ज्ञान और का- लादि लब्धिपूर्वक परमात्माका आराधन कारण है। यहां पर यह शंका न करनी चाहिये कि कार्यकारणके ज्ञानसेही मोक्ष प्राप्ति हो जायगी काल आदि लब्धियोंकी प्राप्ति से क्या प्रयोजन ? क्योंकि कार्यकारण के विभाग का ज्ञान और काल आदि लब्धियां दोनोंही मोक्षकी प्राप्तिमें कारण हैं एकसे मोनरूप कार्यकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसा कि कहा है- कारणद्वयसाध्यं न कार्यमेकेन जोयते । द्वंद्योपाद्यमपत्वं किमेकनोत्पद्यते कचित् ।। -- - - आराधनासार हिंदी टीका सहित पर्थात्-जिसप्रकार स्त्री और पुरुष दोनोंसे उत्पन्न होने- वाली संतान केवल स्त्री वा केरल पुरुप से उत्पन्न नहीं होती उसीप्रकार कार्य दो कारणांसे उत्पन्न होता है वह एक कारणले कभी उत्पन्न नहीं हो सकता । मोक्षरूप कार्य, कारण कार्य के विभाग का ज्ञान और काल आदि लब्धियोंकी प्राप्नि दोनों कारणों होता है इसलिये वह केवल कार्य कारण विभागान रूपकारणसे नहीं प्राप्त हो सकता.॥१३॥ यदि जीव परमाला का अाराधन न कर सके तो उसे क्या करना पडता है ? इस प्रश्न का समाधान ग्रन्थकार करते हैं- जीवो भाइ भमिस्सइ भमियो पुव्वं तु णरयणतिरियं । अलहंतो णाणमई अप्पा पाराहणा णाउ ॥१४॥ जीयो भ्रमति भ्रमिष्यति भ्रांतः पूर्वं तु नरकनरतिर्यक् । अलभमानो ज्ञानमयीमात्माराधनां ज्ञातु ॥ अर्थ-चैतन्यमयी आराधना के ज्ञानको न प्राप्त कर जीव नरक मनुष्य तियं च और देव गतिमें भ्रमण करता है भ्रमण करेगा और भ्रमण किया है। नरक मनुष्य तिर्यच और देवगतिके भेद से गति चार प्रकारकी है। जातक जीत चैतन्यमयी यात्मारा- धनाका अनुभव नहीं करता तबतक उक्त चारों गतियों में भ्रमण करता रहता है अर्थात् किसी समय मनुष्य गतिमें भ्रमणा कर उसके दुख भोगता है तो पीछे वहां की आयु लमाण कर देवगंतिमें जाकर दुख सुख भोगता है। वहां की यात्रु ३४ आराधनासार हिंदी टीका सहित . समाप्त कर तिर्यचगतिमें आकर दुख भोगता है फिर वहांसे नरक जाकर नाना प्रकार के क्लेश भोगता है किंतु जिस समय चैतन्यमयी आत्माराधना प्राप्त हो जाती है उस समय जीवको किसी गतिमें नहीं घूमना पडता वह सीधा मोक्ष चला जाता है और वहांपर अव्याबाध सुखका आनंद भोग करता है इसलिये जो पुरुष यह चाहते हैं कि हमारा संसारका घूमना छूट जाय उन्हें चाहिये कि वे अनंत ज्ञानमय निश्चय आराधनाके स्वरूपकी अव- श्य प्राप्ति करें ॥१४॥अब पहिले क्या कार्यकर निश्चय आरा- धना आराथनी चहिये । इसका समाधान ग्रंथकार करते हैं- संसारकारणाई अत्थि हु बालंबणाई वहुयाई। चइऊण ताई खवनी भाराहउ अप्पयं सुद्धं ॥१५॥ संसारकारणानि संति हि आलंबनानि वहुकानि । त्यक्त्वा तानि क्षपक आराधयतु आत्मानं शुद्धं ॥ १५॥ अर्थ-जो पदार्थ संसारके कारण हैं उन सबका त्यागकर अपक को आत्मा निश्चय आराधनाका अाराधन करना चाहिये। भावार्थ-माला चंदन स्त्री पुत्र धन धान्य गीत नृत्य वादिनः आदि नानाप्रकारके इंद्रियोंके विपय संसारके कारण हैं। यह मूह जीव आत्मिक शुद्ध अतींद्रिय सुखसे पराउ मुख हो उनही पदार्थोंको अपनाता है और संसारमें भ्रमण कर नानाप्रकारके. दुःखोंको भोगता है। किंतु जिससमय इस जीवका पदार्थासे ममत्व छूट जाता है उस समय शुद्ध आरमा-निश्चय बारा- आराधनासार हिंदी टीका सहित ३५ धनाका अाराधन हो निकलता है इसलिये मुनिको चाहिये कि वह चंदन स्त्री पुत्र आदि संसार के कारण पदार्थीका सर्वथा त्यागकर विशुद्ध अात्माका अाराधन करै ॥१५॥ निश्चय आराधनाके आराधनसे तो मोक्षसुखकी प्राप्ति होती है इसलिये उसका याराधन करना तो उचित है परंतु चार प्रकारकी व्यव- हार आराधनासे किसघातकी प्राप्ति होती है जिससे उसका आराधन किया जाता है ? इस प्रश्नका समाधान ग्रंथकार . भेयगया जा उत्ता चउबिहाराहणा मुणिंदेहि । पारंपरेण सावि ह मोक्खस्स य कारणं हवइ ॥१६॥ भेदगता या उक्ता चतुर्विधाराधना मुद्रः । पारंपर्येण सापि हि मोक्षस्य च कोरणं भवति ॥१६॥ अर्थ-चार प्रकारकी जो व्यवहार आराधना वतलाई गई है परंपरासे वह भी मोक्षकी कारण है । भावार्थ-कारण दो प्रकार के होते हैं एक साक्षात् दूसरे परंपरासे । यत्रकी उत्पत्तिमें यद्यपि साक्षात् कारण तंतु हैं तथापि परंपरासे कारण विनोलाभी है क्योंकि बिना विनालेके कपाम विना कपासके तंतु नहिं चन सकते और बिना तंतुओंके वस्त्र तैयार नहिं हो सकता उसीप्रकार यद्यपि निश्चय आराधना मोक्षकी प्राप्तिमें साक्षात् कारण है परंतु परंपरासे व्यवहार आराधना भी मोक्षकी प्राप्तिमें कारण है क्योंकि विना व्यवहार आराधनाके निश्चय आराधनाकी प्राप्ति AU आराधनासार हिंदी टीका सहित नहीं होती और बिना निश्चय आराधनाके मोक्षकी प्राप्ति होना असंभव है अर्थात् भव्य जीव काल लब्धिको प्राप्तकर, कर्मके क्षयोपशमसे गुरुके समीप जाकर और उनका उपदेश श्रवणकर जिसयमय आराधनाके ओराधनके लिये प्रवृत्त होता है उस समय पहिले व्यवहार आराधना करता है पश्चात् सम्यग्दर्शन आदि चारो म्वरूप निश्चय आराधना रूप परमात्माका पारा- धनकर वातिया कर्माका नाश और केवल ज्ञानको प्राप्त कर मोक्ष चला जाता है इसलिये जिसप्रकार विना निश्चय आराधना के मोक्षकी प्राप्ति नहिं हो सकती उसीप्रकार विना व्यवहार श्रारावनाके भी मोक्षकी प्राप्ति नहिं हो सकती ॥१६॥ अद श्राराधनाओंके आराधन करनेवाले पुरुपके कैसे लक्षण होने चाहिये और उसे कवतक पारापनाका आराधन करना चाहिये। इसबातको ग्रंथकार बतलाते हैं--- णिहयकमायो भन्बो दंपणवतो हु गाणसंपण्णो। दुविहपरिग्गहचतो मरणे पाराहो हवइ ॥१७॥ निहतकपायो भन्यो दर्शनवान् हि ज्ञानसंपन्नः । द्विविधपरिग्रहत्यक्तो मरण आराधको भवति ॥१५॥ अर्थ-यो पुरुष कपायोंसे रहित हो, भन्ग सम्यग्दृष्टि, सम्यग्ज्ञानका धारक और वाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रह से रहित है वह पुरुष आराधक कहा जाता है और मरणपर्यंत वह आराधनाओंका आराधन कर सकता है 1. भावार्थ-जो पुरुप आराधनासार हिंदी टीका सहित ३७ कपायविशिष्ट, अभव्य; मिथ्यादृष्टि; मिथ्याज्ञानी और दोनों प्रकारके परिग्रहांसे युक्त होगा वह आराधक नहिं बन सकता किंतु जिसके क्रोष मान माया लोभ चारो कपाय विद्यमान न होंगे। जो शीघ्र ही सिद्ध होनेवाला भव्य होगा। तत्वार्थ- श्रद्धानी सम्यग्दृष्टि होगा। संशय श्रादिसे रहित सम्यग्ज्ञानका धारक होगा। धन धान्य दानी दास आदि वाह्य और रागद्वप आदि अंतरंग परिग्रहका त्यागी होगा वही आराधक हो सकता है तथा आराधनाके आराधनका कोई निश्चित समय नहीं जन्मसे लेकर मरणपर्यंत उसका आराधन किया जा सकता है ॥१७॥ और भी याराधकके लक्षण ग्रंथकार वतलाते हैं- संसारसुहविरत्तो वेग्गं परम उवसमं पत्तो। विविहतवतवियदेहो मरणे अाराहो एसो ॥१८॥ संसारसुखविरक्तरे घेराग्यं परमोपशमं प्राप्तः । विविधतपस्तप्तदेहो मरणे आराधक एपः ॥ १८ ॥ अर्थ-जो महानुभाव संसारके सुखसे पराङ मुख, विरागी, राग ऑदि का उपराम वा औपशमिक सम्यग्दर्शन का धारक हो और अनशन आदि नाना प्रकारके तपों का तपने वाला हो वह पुरुष आराधक कहा जाता है । भावार्थ- जो सुख निर्मल चिदानन्द अनुभवसे उत्पन्न अतींद्रिय सुखमे भिन्न, केवल आकु- लताका कारण होनेसे दुःखरूप और स्पर्श यादि इन्द्रियों के विपयों से जन्य हो उस सुखमें जिसकी अभिलापा न हो, आराधनांसार हिदी टोका सहित जिसके शरीर स्त्री पुत्र प्रादि पदार्शमें प्रीति न हो- वैराग्य हो । राग आदिका उपशम किंवा अनन्तानुवन्धी क्रोध. मान माया लोभ ये चार चरित्र मोहनोयकी प्रकृतियों और सम्यक्त्व मिथ्यात्व और सम्यक् मिथ्यात्व ये तीन दर्शन मोहनीय कर्म का प्रकृतियों के उपरामः प्राप्त. परभोयशन सम्यग्दर्शनकाधारक तथा भगवान सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित मूल गुण उत्तर गुण आदि बाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारके तपोंका तपनवाला हो वह पारा- धक कहा जाता है अन्य नहीं ॥ १८ ॥ स्पष्टताके लिये और भी ग्रन्थकार पाराधकके लक्षण बतलाते हैं- अप्पसहावे णिरयो बज्जियपरदव्वसंगसुक्खरसो। णिम्महियरायदोसो हवई श्राराहनो मरणे ॥ १६ ॥ आत्मस्वभावे निरतो वर्जितपरद्रव्यसंगसौख्यरसः। निर्मथितरागद्वेपो भवत्याराधको मरणं ।। १६ ।। अर्थ- जो महानुभाव प्रात्म स्वभाव में लीन है पर पदा- थासे जायमान सुखसे रहित है और राग द्वपमे भी विनिर्मुक्त है वह मरणपर्यंत आराधक कहा जाता है । भावार्थ- आन्मा का स्वभाव समस्त कालिना रहित निर्मल नाचेदानन्द चैत य स्वरूप है जो महानुभाव ऐसे परम पवित्र आत्मस्वभावमें लीन है समस्त प्रकारके परिग्रहों से रहित है और राग द्वप से विमुक्त है वह महापुरुष आराधनाओंका आराधक समझा जाता है और वह मरणपर्यंत आराधनाओं का पारावन कर सकता है ।। १६ । जो आराधनासार हिंदी टीका सहित ३६ जीव सम्बग्दर्शन आदि सत्रम स्वरूप आत्माको छोडकर पर- पदार्थ का चितवन करता है वह कैसा होता है इस बात को ग्रन्थकार बतलाते हैं- जो रयणतयमइनो मुलणं अप्पणो विनुद्धप्पा । चिोइ य परदवं विशनो णिच्छयं भणिनो। यरनाम मा विशद्धात्मानं । चिंतयांत च परद्रयं विराधको निश्चितं भणितः ।। २० ।। अर्थ- जो पुरुष रत्नावसरूअपनी विशुद्ध आत्माको छोडकर परपदार्थोकी चिता करता है वह पुरुष आराधना ग्रीका आराधक न समझा जाफर विराधक समझा जाता है। भावार्थ- सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक चारित्रस्वरूप विशुद् अात्मा अपना है और स्त्री पुत्र आदि परपदार्थ अन्य हैं। जो पुरु माहसे मूह हो सदा यह विचार करता रहता है कि स्त्री पुत्र धन आदि पार्थ गेले हैं और सम्पादन आदिस्वरूप परमात्मा को नहीं अपनाता वह पुरुष विराधक कहा जाता है। वह प्रा. राधनाओंका आराधन नहिं कर सकता । शंका होती है कि जब अपनी आन्मासे भिन्न परपदार्थाका बाराधन करनेवाला पुरुष गिराधक समझा जाता है तब जो पुरुा अहं सिद्ध प्राचार्य उपाध्याय साधु इन पांच परमेष्ठियों का भारावन करने वाला है वह भी विराधक होना चाहिये क्यों कि अहंत आदि भी तो अपनी आत्मासे भिन्न है सो नहीं क्यों कि जो पुरुष वास्तविक आराधनासार हिंदी टीका सहित पदार्थोंके स्वरूपका नाता है और अपने विशुद्ध आत्माके आरा- धन करने के लिये प्रवृत्त हुआ है वह याद किसी कारणवश अपने विशुद्ध आत्मस्वरूपमें स्थिति न करसके तो उसमें निश्चल स्थिति होने के लिये वा विपय कपायों के नाश के लिये यदि भिन्न स्वरूप के धारक भी पंच परमेष्टियोंका आराधन करता है तो वह विराधक नही समझा जाता क्योंकि वह आत्मिकस्वरूप को साधना चाहता है और उसको संसार के परिम्रनणमें कारण इस लोकसम्बन्धी परलोक सम्बन्धी ख्याति पूजा लाभ भोग और इन्द्रियजन्य सुखमें किसी प्रकारकी अभिलाषा नहीं । हां ! यदि कोई पुरुष अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्तिकी श्रमिलापा न कर नवग्रेवेयक पयंत विशिष्ट सुखके प्रदान करनेवाले विशि- टपुन्य के कारण परमेष्ठीके स्वरूपका पाराधन करता है तो वह विराधक (आराधनाओंका न आराधन करनेवाला) समझा जाता है क्यों कि उसकी यह भावना रहती है कि मुझे नवनवेयक त की विशिष्ट ऋद्धि प्राप्त हो जाय इसलिये विशिष्ट पुण्य के लिये वह परमेष्ठियोंके स्वरूपका अाराधन करता है और पुन्यकी प्राप्तिके लिये परमेष्टिके स्वरूपका आराधन करना उत्तम नहिं गिना जाता क्यों कि जो पदार्थ संसारके कारण हैं वे शांति प्रदान नहीं कर सकते । पुण्य संसारका कारण है इसलिये उससे भी वस्तविक सुख शांति नहीं मिल सकती । कहा भी है-- तेनापि पुण्येन कृतं कृतं यज्जंतोभवेत्संसतिवृद्धिहेतु । २ आराधनासार हिंदी टीका सहित ४१ तच्चापीच्छेन्ननु हेम को वा क्षिप्तं श्रुती त्रोटयते यदाशु ।। अर्थात्-सुन्दर भी सोना यदि वह कानोंको तोड़ देता है तो जिसप्रकार वह दुखदाई गिना जाना है और लोग दुखके भपसे उसे कानों में नहीं पहनते उसीप्रकार जो पुण्य संसारका कारण है जिससे सदा संसार में घूमना पडता है वह पुन्य भी दुखदाई है विद्वान लोग दुःखके भयसे उस पुन्य का उपार्जन नहीं करते हैं।॥ २० ॥ जो आत्माको और परको भी नहीं समझता उसके अाराधनाओं का आराधन होता है या नही ? ग्रन्थकार इस प्रश्नका समाधान कहते हैं- जो णवि वुझइ अप्पा णेय परं णिच्छयं समासिज्ज तस्स ण वोही भणिया सुसमाही राहणा णेय ॥२१ यो नैव बुध्यते आत्मानं नैव परं निश्चयं समारमृत्त्व । तस्य न वोधिर्भणिता सुसमाधिराराधना नैव ।।२।। अर्थ-जो पुरुप निश्चयनयका अवलंबन कर न आत्माको जानता है और न परपदार्थको जानता है उस पुरुपके न तो चोधि-सम्यग्दर्शन आदिकी प्राप्ति होती है और न समाधि और आराधना ही उसके हो सकती है । भावार्थ--अप्राप्त सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्रकी प्राप्तिको बोधि कहते हैं । निवितरूपमे बोधि का दूपरे भरमें भी विद्यमान रहना यहां समाधि ली गई है और आराधनाका स्वरूप ऊपर कह दिया जा चुका है । जबतक मनुष्य केवल व्यवहारनयका अव- :४२ आराधनासार हिंदी टीका सहित लंबन किये रहता है और निश्चयनयके अवलंबन से नश्तक उसे स्वपरका भेदविज्ञान नहिं होता अर्थात् न आत्माको समझता है और न परपदार्थोतो समझता है तबतक उसे बोधिसमाधि और श्राराधनाकी प्राप्ति नहिं होनी किंतु वह जिससमय व्यवहार- नयका अवलंबन छोड भेदविज्ञानकी ओर दृष्टिको लगाता है भेदविज्ञानी बन जाता है उससमय उसे बोधि समाधि और आराधनाकी खंडपसे प्राप्ति हो जाती है । जैसा कि समय- ‘सार कलशमें कहा भी है- भेदविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धा ये किल केचन । तस्यैवाभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन ॥ अर्थात्-जो कोई सिद्ध परमात्मा हुये हैं वे भेदविज्ञान- स्वपरविज्ञानसे ही निश्चयसे हुये हैं और जो कोसे बंधे हैं- संसारमें घूये हैं वे भेदविज्ञानके अभावसे ही बंधे हैं । इसलिये जो पुरुप बोधि समाधि और आराधनाकी प्राप्तिके अभिलापी हैं उन्हें चाहिये कि वे अवश्य भेदविज्ञानी-आत्मा और पर- पहार्योक जानो का । और इस बातको समझ कि आत्म ज्ञान से डित और पर पदार्थों के ज्ञानसे अहित होता है जिससे उन्हें वोधि समाधि और आराधनाकी प्राप्तिमें किसी प्रकारकी बाधा न पडे ॥२शा इसप्रकार अाराधक और निराधकका म्वरूप प्रतिपादनवार ग्रंथकार कौके नाश के कारण सात स्थानोंका नाम बतलाते है- अरिहो संगच्चायो कसायसल्लेहणा य कायव्वाः।

आराधनासार हिंदी टीका सहित '४३ परिसहवाग विजयो उवमग्गाणं तहासहणं ।२२ इंदियमल्लाण जो मणगयासरस्स तह य संजमणं काऊण हणउ खवओ चिरभववद्धाइ कम्माइं॥२३ अहः संगत्यागं क.पायमल्लेखनां च कर्तव्यां । परिपहचमूनों विजयमुपसर्गाणां तथा सानं ॥२२॥ इंद्रियमल्लानां अगं मनोगतप्रमरस्य तथा च म पमनं । कृत्वा हंतु क्षपकः चिरभववद्वानि कर्माणि ॥२॥ अर्थ-क्षाक जिमसमग मंन्यासके योग्य होजा। उसममय वह परिग्रहका त्याग, क्रोधादि कपायोंका कृश करना, परिपहों का विजय; उपसगीका सहन; इंद्रियोंका विजय और मनकी गतिको वशकर चिरकालसे संचित कांश नाश करे। भावार्थ- पहिले कहे हुये दोनोंप्रकारके परित्रहांका त्याग क्रोधादि चार प्रकारके कपायों का नाश १ क्षुधा २ पिपामा ३ शीत ४ उन्ण ५ दंशमशक ६ ननमा ७ अरति स्त्री । चर्या १०नि- पद्या ११ शय्या १२ आक्रोश १३ वध १४ यांचा १५ अलाम १६ रोग १७ तृणस्पर्श १८ मल १६ सत्कार पुरस्कार २० प्रज्ञा २१ अज्ञान और २२ प्रदर्शन इन बाईस प्रकारकी परिप- हों का त्याग; चेतनकृत अचेतनका उपमगों का सहना, इद्रिर मलोंका जीतना और मनका वश करना नहीं होता तबतक रिकाल से संचित कनौका भक्षर नहिं हो सकता, इसलिये क्षाक को चाहिये कि वह परिग्रहोंका त्याग आदि कर सदस्य • पूर्वोपार्जित कोका नाश करे ।। २२-२३ ॥ अम प्रत्यकार आराधनासार हिंदी टीका सहित सात स्थानोंमें बतलाये हुये अर्ह शब्दका स्पष्ट भाव बतलाते हैं- छंडिय गिहवावारो विमुक्कपुत्ताइसयणसंबंधो । जीवियधणासमुक्को अरिहो सो होइ सरणासे ॥२४ त्वक्तगृहव्यापारो विमुक्तपुत्रादिस्वजनसंबंधः । जीवितधनाशामुक्तः अहः म भवति सन्यासे ॥ २४ ॥ अर्थ- जो महानुभाव गृहव्यापार से, पुत्र आदि आ- त्मिक जनोंके साथ संबन्ध से और जीवन एवं धनकी प्राशासे रहित है वह सन्यास के योग्य होता है। भावार्थ-अयोग्य प- दार्थाचा त्याग और योग्य पदार्थीका ग्रहण करना सन्यास है जो महानुभाव सबसे पहले 'संसारमें घूमने वाले समस्त प्रकार के व्यापारोंसे भिन्न जो चिदानन्दचैतन्यका चमत्कार रूप रस का अास्वादस्वरूप विशेष व्यापार उससे युक्त जो परमात्मा पदार्थ उससे विलक्षण' असि मपि कृषि पशुपालन और वाणिज्य आदि व्यापारोंका त्याग करता है पश्चात् स्त्री पुत्र आदि अात्मिक जनोंसे संबन्ध छोडता है और उसके बाद 'यह शरीर मेरा है इसलिये कभी भी मेरा इसके साथ वियोग न हो इस प्रकार की अभिलापा जीविताशा' और नित्य निरंजन शुद्ध बुद्ध एक स्वभाव स्वसंवेदन ज्ञानरूपी धन से भिन्न धन धान्य सुवर्ण श्रादि परिग्रहोंके संचयकी अभिलापा रूप धनाशासे रहित हो जाता है वह महात्मा संन्यासके अहं योग्य होता है ॥ २४ ॥ बालक युवा और वृद्ध तीनों अवस्थाओंमें से किस अवस्थामें उत्तम रूपसे सन्यासकी योग्यता होती है इस यातको खुलासा

आराधनासार हिंदी टीका सहित
४५
रूपसे ग्रन्थकार बतलाते हैं-
जरवग्विणी ण चंपइ जाम ण वियलाइ हुँति अक्साई
बुद्धी जाम ण णासइ भाउजलं जाम ण परिगलई
आहारासणणिहाविजो जावस्थि अप्पणो णणं ।
अप्पाणमप्रणो ण य तरइ य णिजावो जाम २६
जाम ण सिढिलायंति य अंगोवंगाइ संधिबंधाई।
जाम ण देहो कंपइ मिच्चुस्स भएण भीउव्व ॥२७
जा उज्जमोग वियलइ संजमतवणाणझाणजोएसु
तावरिहो सो पुरिसो उत्तमठाणस्त संभवई । कलाव
जरा व्याधी न चंपते यावन्न विकलानि भवंति अक्षाणि ।
बुद्धिर्यावन्न नश्यति आयुर्जलं यावन्न परिगलति ।। २५ ।।
आहारासननिद्राविजयो यावदस्ति आत्मनो नूनं ।
आत्मानसात्मना च तरति च निर्यापको यावत् ।। २६ ।।
यावन्नाशथिलायंते गोपागानि संधिबंधाश्च ।
सावन देहः कंपते मृत्योर्भयेन भीत इव ।। २७ ।।
यापदुद्यमो न विगलति संयमतपोशानध्यानगेगेपु ।
तापदहः स पुरुषः, उत्तमस्थानस्य संभवति । कलापकं ।
अर्थ--- जया वृद्ध अवस्थारूपी व्याघ्री आक्रमण नहीं
करती, जबतक इन्द्रियां विकल नहीं होती जबतक बुद्धि का नान
नहिं होता, जबतक आयुरूपी जल नहिं गलता, जबतक मामा
में निश्चयसे आहार प्रासन और निद्राका विजय विद्यमान है

४६
आराधनासार हिंदी टीका सहित
जबतक अपनेसे स्वयं आप निर्धापक है; जवनक अंग उपांग
और संन्धीवन्ध शिथिल नहिं होते जबतक मरणके भयसे डरे
हुए के समान शरीर नहिं कांपता, जबतक संयम तप ज्ञान ध्यान
और योगों में उद्यम नष्ट नहिं होता तभीतक पुरुष उत्तम स्थान
सन्यास के योग्य रहता है फिर नहीं। भावार्थ- जिसप्रकार
व्याघ्री मदोन्मत्त हाथीको निर्मद कर देती है उसीग्रकार वृद्धा
अवस्था भी यौवनरूप हाथीका मद नष्ट करनेवाली है इसलिये
जबतक ये वृद्धअवस्थारूपी वाधिनी पुरुष पर आक्रमण नहीं.
करती जबतक स्पर्श रस गंध वर्ण और शब्दस्वरूप अपने
विपयोंको स्पष्ट रूपसे देखनेवाली इन्द्रियां विकल-उन्हें अस्पष्ट
देखनेवाली नहीं होती । जबतक अवस्थाके विशेपसे इन्द्रिय
और मनके विकल हो जाने के कारण बुद्धि हेय उपादेय पदा-
योंके ज्ञानसे शून्य नहिं होती। जिसप्रकार छिद्रयुक्त अंजुलीमें
मराहुअा जल बूंद बूंदकर खिर जाता है उसीप्रकार पचास
वा सौ वर्ष अादिके परिमाण से परिमित आयु जबतक वर्ष छ
मास ऋतु मास पक्ष दिन घडी और समय आदिसे धीरे धीरे
नष्ट नहिं होती । जबतक यात्मामें आहार आसन और निद्रा
का विजय विद्यमान है अर्थात् स्वसंवेदन ज्ञानामृत रसके योहार
से विलक्षण असाता वेदनीय के उदय से तीन भूख के
कारण भोजन ग्रादि करना याहार, अनेक प्रकारके तपश्चरण
के भारको सहन करने वाले यात्म स्वरूप की स्थितिमें कारग
और आलस्य म्लानिके नाशक पर्यक अर्धपयंक वीर वनं

आराधनासार हिंदी टीका सहित
स्वस्तिक एमक आदि आसन औरनिद्रा का विजय नहीं होता
शास्त्र में जो अमालीस प्रकारके निर्यापक बतलाये हैं उनकी
अपेक्षा न कर जबनक अात्मा स्वयं निर्यापक नहिं हो पाता
जवतक चरण भुजा पृष्ठ भाग कमर मस्तक और वक्षस्थल ये
पाठ अंग; इनसे भिन्न नाक कान आदि उपांग और संधिबंध
हड्डियों का नस और स्नायूसे जिकडना शिथिल नहिं होता
जबतक क्रूर वाघ अादिसे भीत मनुष्य के समान मृत्यु के भयसे
शरीर नहिं कांपता औरजबतक इन्द्रिय संयम और प्राणसंयमके
करनेमें, अनशन आदि तप श्रुतज्ञान धर्म्य ध्यान शुक्लध्यान
और यम नियम आसन प्रत्याहार धारणां ध्यान और समाधि
रूप योगके आचरण करनेमें उद्यम नष्ट नहीं होता तभीतक पुरुप
उत्तम स्थान सन्यास के योग्य हो सकता है अन्यथा नहीं, क्यों
कि कहा है---
यावतस्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच दूरे जरा
यावञ्च द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत् नयो नायुषः ।
आत्मयसि तावदेव विदुपा कार्यः प्रयत्नो महान्
संदीप्त भुवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ।।
अर्थत्-जवतक शरीररूपी घर स्वस्थ है जबतक वृद्धावस्था
का आनमण नहीं होता,जबतक इंद्रियोंका सामर्थ्य अप्रतिहत है
जबतक आयुका नाश नहीं, तबतक आत्मकल्याण के लिये विद्वा-
नको पूर्ण प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि घर में अग्नि लगनेपर कृया
खोदना व्यर्थ है शरीरके अस्वस्थ आदि हो जानेपर आत्मकल्या-
.

४ आराधनासार हिंदी टोका सहित - णकेलिये प्रयत्न करना निरर्थक है । २८ ॥ व्यवहारसे संन्यासकी योग्यता वतलाकर अब ग्रंथकार निश्चयनयसे संन्यासकी योग्यता बतलाते हैं- सो सरणासे उत्तो णिच्छयवाईहिं णिच्छयणयेण । ससहावे विरणासो समणस्स वियप्परहियस्स ॥२६॥ स सन्यासे उक्तो निश्चयवादिभिनिश्चयनयेन । स्वस्वभावे विन्यासः श्रमणस्य विकल्परहितस्य ।। २६॥ अर्थ-समस्त प्रकारके विकल्पोंसे रहित मुनि जब स्वस्वभाव में स्थिति करता है तब वह निश्चयनगसे सन्यासके योग्य है । भा- वार्थ-जबतक मुनिकी देह आदि विभाव परिणामों में स्थिति रहती है और जबतक उसके मन में स्त्री पुत्र प्रादि परसदार्थ मेरे हैं इसप्र- कारके विकल्प विद्यमान रहते हैं तबतक वह मुनि निश्चय सन्यास के योग्य नहीं होता किंतु जिससमय उनकी देह आदि विभाव परिणामोंसे रहित स्वाभाविक चिदानंद चैतन्य स्वरूपमें स्थिति होती है और स्त्री पुत्र आदि परपदार्थ मेरे हैं इसप्रकारके विकल्पों का मर्वथा नाश हो जाता है उससमय वह मुनि निश्चय सन्यास के योग्य कहाजाता है इसलिये निश्चय सन्यासके योग्य होने के अभिलापी मुनिको चाहिये कि वह समस्त प्रकारके विकल्पोंसे रहित होकर स्वस्वरूप-चिदानंद चैनन्य स्वरूप में स्थिति करें ॥ २६ ॥ संन्यासके योग्य मनुष्यको और क्या कार्य करना चाहिये जिससे वह निरालंब आत्माकी भावना कर सके इसवातको.ग्रंथ-, आराधनासार हिंदी टीका सहित कार वतलाते हैं खित्ताइवाहिराणं अभितरमिच्छपहुदिगंथाणं । चाए काऊण पुणो भावह अप्पा णिरालंबो ॥३०॥ क्षेत्रादिवाह्यानामभ्यंतरमिथ्यात्वप्रभृतियथानां । त्यागं कृत्वा पुनर्भावयतात्मानं निरालंबं ॥ ३० ॥ अर्थ-क्षेत्र श्रादि चाह्य और मिथ्यात्व आदि अंतरंग परिग्रहका त्यागकरमुनिको निरालंब आत्माका ध्यान करना चाहिये भावार्थ-परिग्रहके दो भेद हैं एक वाह्य दूसरा अभ्यंतर । १ क्षेत्र २ वास्तु ३ हिरण्य ४ सुवर्ण ५ धन ६ धान्य ७ दासी ८ दास ६ कुप्य और .१० भांड ये दश वोह्य परिग्रहके भेद हैं । धान्य आदि उत्तन होनेके स्थानका नाम क्षेत्र है। रहने के घर मकान आदि वास्तु हैं। रुपया चांदी वगरेहको हिरण्य कहते हैं। सोना. व सोनेके गहने को सुवर्ण कहते हैं । गो वैल भैस आदिको धन कहते हैं । शाली गेहुँ श्रादि धान्य हैं। शरीर व घरकी सेवा. करनेवाली स्त्रियां और पुरुष दासी दास हैं । कपास तिल चंदन आदि कुप्य, और थाली लोटा श्रादि वर्तन भांड कहे जाते हैं। कहीं पर- सपणानणघरछित्तं सुवरणधण धरणकुप्पभंडा। दुपयचउपय जाणसु एदे दम वाहिरा गंधा ।। अर्थ-१ शयन २ श्रासन ३ घर ४ क्षेत्र ५ सुवर्ण ६ धन ७ धान्य ८ कुप्य ह भांड और १० दुपाये चौपाए इसप्रकार भी . ४ आराधनासार हिदी टोका सहित दशपरिग्रह पतलाये हैं और यहां थनसे चांदी वा उसके गहने आदि लिये गये हैं । तथा १ मिथ्यात्व २ वेद ३ राग ४ हास्य रति ६ अरति ७ शोक ८ भय 8 जुगुप्सा १० क्रोष ११ मान १२ माया १३ लोभ और १४ द्वषये चौदह अभ्यतर परिग्रहके भेद हैं। तत्त्वोंमें श्रद्धान न होना मिथ्यात्व है । वेदका अर्थ लिंग है और उसके स्त्री, पुरुष और नपुंसक ये तीन भेद हैं पुरुपसे रमनेकी इच्छा स्त्रीवेद और स्त्रीसे रमनेकी इच्छा पुरु- पवंद और स्त्री पुरुष दोनोसे रमनेकी इच्छा नपुसकवेद है स्त्री पुत्र आदि में ममता राग हैं । हंसी करना हास्य है । विप- यों में उत्सुकता और आसक्तता होना रति है। रतिसे विपरीत अरति है। शोक वा चिंता करना शोक है । चित्तमें घबराहट होना भय है। अपने दोपोंको आच्छादन करना दूसरे के कुल शील आदि में दोष प्रगट करना अथवा अवज्ञा तिरस्कार वा ग्लानि रूप भावोंका करना जुगुप्सा है । गुस्सा होना क्रोध, धमंड करना मान, छल कपट करना माया, और लोभ करना लोम है एवं दूसरों से वैर रखना दोप कहा जाता है। कहा भी है मिच्छत्तवेयराया हामादीयाय तह स छद्दोसा । चतारि तह कसाया अभंतरचउदसा गंथा : ।। अर्थात्-मिथ्यात्व वेद राग द्वेष हास्य रति अरति शोक मय जुगुप्सा क्रोध मान माया लोभ ये चौदह अभ्यंतर परिग्रह के भेद हैं । इस रातिसे दोनों प्रकारके परिग्रहको त्याग कर गुनि समस्त पर द्रव्यांसे उत्पन्न विकल्पोंसे रहित अथवा पदस्थ + नाराधनासार हिंदी टीका सहित पिंटस्थ रूपस्य और रूपातीत स्वरूप प्रालंबनांसे रहित निरालंब परमात्माकी भावना करता है ॥३०॥ परिग्रहके त्यागसे आत्मा को किस फलकी प्राप्ति होती है इस वातको ग्रन्थकार कहते हैं संगचाएण फुडं जीवो परिणवइ उवसमो परमो। उवसमगो हु जीवो अप्पसरूवे थिरोहवइ ॥३१॥ संगत्यागेन स्फुटं ज.वः परिणमति उपशम परम । उपशमगतस्तु जीवः आत्मस्वरूपे स्थिरो भवति ॥ ३१ ॥ अर्थ-परिग्रहके त्यागसे जीव सर्वोत्कृष्ट उपशम-राग आदिके नाशको प्राप्त कर लेता है । और जिस समय इसे परम उपशम प्राप्त हो जाता है उस समय यह स्वस्वरूपमें स्थिर हो जाता है। भावार्थ-जबतक यह जीव वाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकार के परिग्रह का त्याग नहीं करता तबतक सदा इसके राग द्वप आदि दुर्भाव विद्यमान रहते और उनसे सदा इसके शुम अशुभ कर्मों का बंध हुआ करता है किंतु जिससमय यह दोनों प्रकार परिग्रहका सर्वथा त्याग कर देता है उससमय इसके राग द्वाप आदिका सर्वथा नाशस्वरूप उत्कृष्ट उपशम प्राप्त हो जाता है और उत्कृष्ट उपशमकी प्राप्तिसे यह स्वस्वरूप-विशुद्ध चिदानंद चैतन्य स्वरूपमें निश्चल हो जाता है ॥३१॥ यदि परिणाम निर्मल हैं तो परिग्रहोंका धारक भी श्रात्माका अाराधन कर सकता है परिग्रहों के त्यागसे क्या प्रयोजन ? इन संकाया ग्रंथकार समाधान करते हैं-

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आराधनासार हिंदी टीका सहित
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जामण गंथं छंडइ ताम ण चित्तस्स मलिणिमा मुचइ
दुविहपरिग्गहचाए णिम्मलचित्तो हवइ खरो॥३२॥
• यावन्न ग्रंथं त्यजति तावन्न चित्तस्य मलिनिमानं मुचति ।
द्विविधपरिग्रह त्यागे निर्मलचित्तो भवति क्षपकः ॥ ३२ ॥
अर्थ-
जबतक क्षपक परिग्रहका त्याग नहिं करता तबतक
उसके चित्तका मालिन्य भी नहिं छूटता किंतु जिससमय दोनों
प्रकारके परिग्रहोंका त्याग हो जाता है उससमय उसका चिस
निर्मल हो जाता है । भावार्थ-जबतक परिग्रहका संबंध रहता है
तवतक चिसमें मालिन्य बना रहता है अर्थात् स्त्री पुत्र आदि मेरे
प्रिय हैं, विष कंटक वैरी आदि अप्रिय हैं इसप्रकारके राग द्वेष
आदि भावोंकी सदा मोजूदगी रहती है किंतु जिससमय दोनों
प्रकारके परिग्रहका सर्वथा नाश होजाता है उससमय चित्तमें किसी
प्रकारकी मलिनता नहिं रहती, सर्वथा चित्त निर्मल हो जाता है
इसलिये क्षपकको चाहिये कि वह चित्तकी निर्मलताके लिये दोनों
प्रकारके परिग्रहका सर्वथा त्याग करदे ॥ ३२ ॥ सामान्यरूपसे
निग्रंथका स्वरूप प्रतिपादनकर अव ग्रंथकार परमार्थ निग्रंथका
स्वरूप प्रतिपादन करते हैं---
देहो वाहिरगंथो अपणो अक्खाण विसयमहिलासो।
तेसिं चाए खवनो परमत्थे हवइ णिग्गंथो ॥ ३३ ॥
देहो वाह्यग्रन्थः अन्यः अक्षाणां विपयाभिलायः ।
तयोस्त्यागे क्षपक: परमार्थेन भवति निर्मथः ॥ ३३ ॥

आराधनासार हिंदी टीका सहित १३ - : अर्थ-जिंपसमा रूपक वाह्य परिग्रह शरीर और अभ्यन्तर परिग्रह इंद्रिोंके लिप की अभिलापाका त्याग करदेता है उस- समय वह परमार्थ निग्रंथ-स्वस्वरूपका आराधक होता है। भावार्थ-शरीरको सब लोग स्पष्टरूपसे देख सकते हैं इसलिये वह वाह्य परिग्रह है और म्पर्श आदि इंद्रियोंके विपयोंकी अभि- लापा दीखती नहीं इसलिये वह अभ्यंतर परिग्रह है जो महानुभाव दोनों प्रकारके परिग्रहका सर्वथा त्याग कर देता है और- एको मे शाश्वतश्चात्मा ज्ञानदर्शनलक्षणः । शेषा बहिर्भवा भावाः सर्वे संयोगलक्षणाः ।। अर्थात्-अकेला अविनाशी और ज्ञान दर्शनस्वरूप लक्षणका धारक श्रात्मा मेरा है और शेष पदार्थ मेरे नहीं वाह्य हैं क्योंकि उनकी उत्पत्ति कर्म और आत्माके संयोगसे है, ऐसा सदा विचार करता है वह पुरुष परमार्थ निग्रंथ हो स्वस्वरूपका पाराधन करनेवाला होता है ।। ३३ । कपायसल्लेखनाका धारक क्षपक कैसा होता है इस बातको ग्रंथकार कहते हैं- इंदियमयं सरीरं णियणियविसएसु तेसु गमणिच्छा। ताणुवरि हयमोहो मंदकसाई हवइ खवरो ॥३४॥ इंद्रियमयं शरीरं निजनिजविपयेषु तेषु गमनेरठं । तपामुपरि हतमोहों मंदकपायो भवनि तपकः ॥ ३४ ॥ अर्थ-इंद्रियोंका समुदायस्वरूप शरीर अपने अपने विषयों में गमनशील है जिससमय क्षएक इंद्रियोंके ऊपर हनमोह-ममत्व- -- .

माराधनासार हिंदी टीका सहित रहित हो जाता है उससमय वह मंदकपायी कहा जाता है । भावार्थ-स्पर्शन रसना घाण चक्षु और श्रोत्र इन पांच इंद्रिय- स्वरूप शरीर है और इंद्रियां अपने २ विषयके ग्रहण करनेकेलिये सदा लालायित रहती हैं किन्तु जिससमय क्षपक इन्द्रियस्वरूप शरीरको वश करलेता है अर्थात् स्पर्शन · आदि इन्द्रियोंकी ओर ऋजु नहिं होने देता उससमय उसके क्रोध आदि कपाय मंद हो जाते हैं तथा वह परमात्माका अाराधन कर सकता है ॥ ३४ ॥ जिसने कपायोंको नहिं जीता और जो वाह्य योगसे ही शरीरके सन्यासको करनेवाला है उस मुनिके सल्लेखना रिफल होती है इस बातको ग्रन्थकार. बतलाते हैं- .. सल्लेहणा सरीरे वाहिरजोएहिं जा कया मुणिणा। सयलावि साणिरत्था जाम कसाए ण सल्लिहदि ३५ सल्लेखना शरीरे वाघ योगैः या कृता मुनिना । सकलापि सा निरर्था यावत्कंपायान्न सल्लिखति ।। ३५ ॥ अर्थ-कपायोंका त्याग न कर जो मुनि वाह्य योगोंसे शरीरमें सल्लेखना-कृशता करता है उस मुनिकी समस्त सल्ले- खना निरर्थक जाती है । भावार्थ-स्वस्वरूपके आराधनमें कपायोंका सर्वथा नाश अत्यंत श्रावस्यक है क्योंकि जबतक कपायोंकी विद्यमानता रहती है जबतक चित्त सदा वाह्य पदार्शमें भटकना फिरता है और वाह्य पदार्थों में चित्तके भटकनसे स्वस्वरूपका आराधना नहि हो सक्ता। जो. मुनि शरीरकी कृशताके लिये माराधनासार हिंदी टीका सहित शरदी-गामी आदि घोर क्ले गोंको सहना है परंतु कपायोंकी सल्लेखना नहिं करता उस मुनिकी समप्त सल्लेखना व्यर्थ है इसलिये जिस मुनिको स्वस्वरूपके आराधनकी अभिलापा है उसे चाहिये कि वह पहिले कपायोंकी सल्लेखना-सर्वथा नाश कर पश्चात् शरीरको कृश करनेका उद्योग करें ॥ ३५॥ कपायोंमें क्या शक्ति है ? और जगतका ये क्या अपकार करते है ? इस- बातको ग्रन्थकार वतलाते हैं- अयि कसाया वलिया सुदुज्जया जेहिं तिहुअणं सयलं भमइ भमाडिज्जंतो चउगइभवसायरे भीमे ॥ ३६॥ अस्ति (संति ) कपाया बालनः सुदुर्जया यस्त्रिंभुवनं सकलं । भ्रमति भ्राम्यमानं चतुर्गतिभवसागरे भीमे ।। ३६ ।। अर्थ-ये कपाय महा बलवान हैं। बडे दुःखने जीते जासक- नेके योग्य हैं और कपायोंके द्वारा चतुर्गतिरूप भयंकर संमारमें घुमाये हुये ये जीव तीनोंलोकमें सदा घूमते हैं । भावार्थ- अात्मा अनंत शक्तिका धारक है परंतु इन कपायोंने अनादिकालसे कर्मों- का संबंध कराकर और स्वाभाविक चैतन्यस्वरूपको ओच्छन्न कर आत्माको अग्ने आधीन बना लिया है इसलिये ये महावल- चान हैं । ग्यारहवे गुणस्थानाक इनका मद्भाव रहता है। मुनि- यों को भी ये अपने प्राचीन किये रहते हैं और देखते २ मुनि गे मनको विक्षित बना देते हैं इसलिये सुदुर्जर हैं-गु नभतासे इनका जीतना नहिं हो सकता तथा इनके चक्रमें पडकर ये तीनों लोक आराधनासार हिंदी टीका सहित . :.. इस चतुर्गतिरूप भयंकर संसार में घूमते फिरते हैं इसलिये क्षपक- को चाहिये कि वह ऐसे दुष्ट कषायोंका सवथा त्याग करदे ॥ ३६ ॥ जबतक क्षपकके कपाय नष्ट नहिं होते तबतक उसकी कैसी दशा रहती है इसवातको ग्रन्थकार खुलासा रूपसे बतलाते हैं- जाम ण हणइ कसाए स कसाई णेव संजमी होइ । संजमरहियस्स गुणा ण हुंति सव्वे विसुद्धियरा ॥३७॥ यावन्न हंति कंपायान् स कपायीं नैव संयमी भवति । संयमरहितस्य गुणा न भवति स विशद्धिकराः ॥ ३७ ।। अर्थ-जवत्तक क्षपक क्रोध आदि कषायोंका नाश नहि करता तबतक वह कपायी गिना जाता है जो कपायी रहता यह संयमी:नहि हो सकता और संयमके अभावमें आत्माको विशुद्ध बनानेवाले गुण भी उत्पन्न नहिं हो सकते। भावार्थ- जिसके क्रोध आदि कषाय विद्यमान रहते हैं वह कपायी कहा नाता है। जबतक कपायोंकी विद्यमानता रहती है तबतक कायके जीवोंकी रक्षारूप संयमकी प्राप्ति नहिं होती अर्थात् क्रोध आदिके संबंधसे सदा जीवोंको पीडा पहुंचानेके ही परिणाम बने रहते हैं तथा जबतक संयमका उदय नहिं होता तबतक जो गुण आत्माको विशुद्ध बनानेवाले हैं वे गुण भी प्रकट नहि होते इस- लिये यदि क्षपक यह चाहता है कि मेरी आत्मामें वास्तविक गुण प्रकट होजांय-मुझे मेरे असली स्वरूपकी प्राप्ति होजाय है

आराधनासार हिंदी टीका सहित
तो उमै चाहिये कि वह कपायोंका सर्वथा त्यागकर संयमी वन
॥ ३७ ॥ यदि कपाय मोजूद हों तो उनका क्या करना चाहिये
और वैसा करनेसे क्या लाभ होता है इसवातको ग्रन्थकार
वतलाते हैं-
तम्हा पाणीहि मया किसियरणं हवइ तेसु कायध्वं ।
किसिएसु कसाएसु य सवणो भाणे थिरो हवइ ।३८१
तस्माज् ज्ञानिभिः सदा कृपीकरणं भवति तेषु कर्तव्यं ।
पितेपु कपायेषु च श्रमणो ध्याने स्थिरी भवति ॥ ३८ ॥
अर्थ-इसलिये ज्ञानियोंका कर्तव्य है कि वे सदा कषायोंको
कृप करते रहैं क्योंकि जिससमय कपाय कृप हो जाते हैं उससमय
मुनि ध्यानमें स्थिर हो जाता है । भावार्थ-जबतक ध्यानमें
स्थिरता नहिं होती तबतक परमात्माका चितवन नहिं होता और
ध्यानमें स्थिरता उसीसमय होती है जिससमय कपाय कृश हो
जाते हैं इसलिये जो मुनि परमात्माके स्वरूपके चितवनके अभि-
लापी हैं उन्हें चाहिये कि वे ध्यानकी स्थिरताके लिये अवश्य
कपायोंको कृश करें ॥३८॥ जिससमय कपाय मन्यस्त हो
जाते हैं उससमय क्या फल प्राप्त होता है ?-
सल्लेहिया कपाया करंति मुणिणो ण चित्तसंखोहं ।
चित्तक्खोहेण विणा पडिवज्जदि उत्तमं धम्मं ॥३६॥
संल्लेखिताः कषायाः कुर्वति मुनेर्न चित्तरांक्षोभं ।
चित्तक्षोभेण विना प्रतिपाते उत्तमं धर्म ॥६॥

माराधनासार हिंदी टीका सहित अर्थ-जिससमय कपाय संन्यस्त-कृशताको प्राप्त हो जाते हैं उससमय मुनिके चित्तको किसीप्रकारका क्षोभ नहिं होता और जिमसमय चित्तका क्षोभ नष्ट हो जाता है उससमय उत्तम धर्मकी प्राप्ति होती है। भावार्थ-जवतक मुनिके चित्तमें कपायों- की विद्यमानता रहती है तबतक कभी उसके चित्तमें क्रोध, तो कभी मान, कभी माया और कभी लोभका सदा क्षोभ बना रहता है चणभरकेलिये भी मुनिका चित्त शांत नहिं रहने पाता किंतु जिससमय मन शांत हो जाता है उससमय उत्तम धर्मकी प्राप्ति होती है इसलिये जो उत्तम धर्म-म्वस्त्रभावक्री प्राप्तिके अभिलापी हैं उन्हें चाहिये कि वे चित्त क्षोभके विनाशार्थ क्रोध आदि कपा- योका सर्वथा परिहार करदें ॥३६॥ अब ग्रन्थकार परीपहोंकी संख्या और उनका स्वरूप बतलाते हैं- सीयाई वावीसं परिसहसुहडा हवंति णायव्वा । जेयव्वा ते मुणिणा वरउवसमणाखग्गेण ॥४०॥ शीतादयो द्वाविंशतिः परीपहसुभटा भवंति ज्ञातव्याः । जेतव्यास्ते मुनिना वरोपशमज्ञानखड़गेन ।। ४० ॥ अर्थ-शीत आदि वावीम परीपह हैं । मुनिको चाहिये कि वह उत्कृष्ट उपशग ज्ञान-राग द्वेपका अभावरूप तीक्ष्ण खड्गले उनका विजय कर । भावार्थ -सुधा तृपा आदि परीषहोंके पहिले नाम कह दिये गये हैं-प्रामुक ग्राहारको ग्रहण करनेवाले, 'भोजन न मिलेगा या थोडा मिलेगा तो यह वेदना कैसे नष्ट होगी, बहुत समयसे भोजन नहिं मिला है' इसप्रकार विषाद न करने- आराधनासार हिंदी टीका सहित YE . वाले, भोजनकी वेलासे भिन्न वेला और निंदित देशमें आहार न ग्रहण करनेवाले आवश्यकोंमें किसीप्रकारकी हानि न करने- वाले, स्वाध्याय और ध्यानमें दत्तचित्त, और भूखकी तीव- वेदनाक रहने पर भी भोजनके लाभसे उसके अलाभको उत्तम माननेवाले मुनिका जो क्षुधाजन्य वाधाका सहलेना है वह सुधा परीपहका विजय है ॥१॥ प्यासकी तीव्र वेदनाके होनेपर भी उसकी शांतिये लिये चेष्टा न करनेवाले मुनिका जो प्यासी बाधा सहलेना है वह पिपासा परीपहका जीतना है ।।२।। अधिक ठंडी पड़नेपर भी उसकं दूर करनेका उपाय न करना, शरीरगें ममता, पूर्वकालमें अनुभूत उष्णताका स्मरण और किमीप्रकारका विपाद न करना सो संयमके पालनमें सहायता पहुंचानेवाला शीत परीपहका जीतना है ॥३॥ सूर्य प्रादिके संतापको दूर करनेकेलिये उपाय न करना और शीतपदार्थकी प्रार्थना न करना उष्णपरीपहका जीतना है ॥ ४॥ दंश मशक आदिके डसनपर भी चित्तका चंचल न करना; कर्मके फलका स्मरण कर दंश मशककी निवृत्तिका उपाय न करना दंशमशक परीपहका जीतना है ॥ ५ ॥ स्त्रिया रूपकी पवित्रता और निदितपनेकी भावना वरना, नन्न मुद्रा रहनेपरभी चित्तमें किली- प्रकारका शिकार न लाना नग्नपरीपहका जीतना है ॥६॥ या तृषा आदिसे उत्पन्न अरति-अरुचिका न होने देना, धीरतापूर्वक संयमी भावनासे प्रेम रखना. विषयसुखवा विपर्द. मान मोनना, और पहिले अनुभव की हुई रतिका स्मरण न करना

भाराधनासार हिंदी टीका सहित :, :..
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अरति परीपहका जीतना है ॥ ७॥ स्त्रियों के देखने स्पर्श करने
और उनके साथ बातचीत करनेकी अभिलाषा न रखना उनके
नेत्र मुख भौंह श्रृंगार प्राकृति रूप गति हास्य पीनस्तन जांघ
आदिका न देखना और रसपरिपूर्ण गीत आदिका न सुनना
स्त्री परीपहका जीतना है ॥८॥ भयंकर भी वनोमें गुरुकी
श्राज्ञानुसार देव आदिकी वंदनाकेलिये संयममें किसीप्रकारकी
बाधा न आये इसरूपसे गमन करना, मार्गमें कंकर पत्थरोंके
पैरमें चुभ जानेपर भी खेद न करना और पूर्वकालके रथ घोडे
आदि सवारियोंका स्मरण न करना चर्या परिपहका जीतना है
॥ ६॥ श्मशान आदि स्थानोंपर माढे हुये वीरासन आदि
श्रासनोंसे घोर उपसर्गके उपस्थित होनेपर भी न चिगना, मंत्र
आदिसे उपसर्गोके नाशका उपाय न करना और पहिले अनु-
भव किये कोमल श्रासन आदिका भी स्मरण न करना निपद्या
परीपहका जीतना है ॥ १० ॥स्वाध्याय आदिसे खिन्न होनेपर
विषम भूमिपर मुहूर्तपर्यंत निद्राका लेना, तिसपर भी एक पार्श्व
करवटसे सोना बाधाके उपस्थित होनेपर वा व्यंतर आदि जन्य
भयके उपस्थित हो जानेपर न अपने करवटसे चिगना और न
भग देना 'यह प्रदेश सिंह आदि क्रूर जीवोंसे पूर्ण है यहांसे
चलदेना ही अच्छा, कब रात पूरी होगी ? ऐसा विषाद न
करना और पूर्णकालमें अनुभूत कोमल सेजोंका स्मरण न
करना शय्या परीपहका जीतना है ॥११॥ जिसको दृष्टिमात्रसे

आराधनासार हिंदी टीका सहित ६१ चलना, तप और ही भस्म कर सकते हैं ऐसे निर्मल मनुष्यके भी कुवचनोंका सहलेना और निर्मल मनुष्यके कुवचनोंसे उसका दोष न मानकर अपने पूर्वोपार्जित कमौका दाप समझना आक्रोशपरीपहका सहन करना है ॥ १२ ।। क्रुद्ध चोर बदमाशों द्वारा मारेजानेपर वैर न करना और मनमें यह सोचना कि यह मेरे पूर्वोपार्जित कर्मोंका फल है ये विचारे मेरा क्या कर सकते हैं, विनाशीक और दुःखदेनेवाले इस शरीरका विगाड़ कर सकते हैं वध परीपहका जीतना है ।। १३ ।। क्षुधा, मार्गका रोग आदिसे शक्तिके नष्ट हो जानेपर भी मुख आदिकी चेप्टा. मादिसे भी आहार स्थान और औपचकी याचना न कर केवल शरीरमात्रका दिखाना याचना परीपहका जीतना है।॥ १४ ॥ एकवार भोजन करनेवाले, केवल शरीरके दिखानेवाले, एक गांवमें भोजनके न मिलनेपर भी दूसरे गांवमें उसकेलिये प्रयत्न न करनेवाले, पाणिरूप पात्रके धारक; बहुत दिन पर्यंत आहारके न मिलनेपर भी किसीप्रकारका खेद न करनेवाले, यह दाता गुणी है वा अगुणी इसबातकी भी परीक्षा न करनेवाले और लामो अलाभ ही उत्तम है इसप्रकार संतुष्ट चित्तके धारक मुनिको जो भोजनका लाभ नहिं होना है वह अलाभ परीपहका जीतना है ॥ १५ ॥ अपने शरीरको दारेके समान मानना जल्लोपत्र आदि अनेक प्रद्वियोंके प्राप्त हो जानेपर भी किलीप्रकारका ममत्व न रखकर रोगके दूर करनेको अभिलाषा न करना और सदा ६२ आराधनासार हिंदी टीका सहित यह भावना करना कि यह पूर्वोपार्जित कर्मका फल है कर्मसे मैं इसीप्रकार निवृत्त हूंगा, रोग परीपहका सहना है ॥ १६ ॥ रोग मार्गकी थकावट वा शीत आदिके श्रमको दूर करने लिये प्रासुक असंस्कृत भूमिपर बैठना वा शयन करनेपर वहांके शुष्क तृण कठिन वालू कंटक वा कडी भूमिके स्पर्शनका संहना तृण म्पर्शन आदिसे उत्पन्न खुजलीसे भी चित्तमें किसीप्रकारकी ग्लानि न लाना तुणस्पर्शपरीपहका जीतना है ॥१७॥ सूर्य आदिकी गरमीस उत्पन्न हुये पसीनेके आनेसे; धूलि आदिसे मलिन होने- से; और खाज आदिके उत्पन्न होनेसे भी उनके प्रतीकारकी इच्छा न करना, पहिले किये गये स्नान आदिका स्मरण न. करना; मलपरीपह है ॥ १८ ॥ मैं चिरकालसे ब्रह्मचारी हूं, महातपस्वी स्वपर आगमका ज्ञाता पूर्णरूपसे हितकारी उपदेश देनेवाला और परवादियोंका विजयी हूं तो भी लोग मुझ प्रणाम भक्ति आसन प्रदान नहि करते इसरीतिसे तो मिथ्यादृष्टि ही उत्तम हैं क्योंकि वे अपने मतके मूर्खभी मनुष्यको सर्वज्ञ मानकर उसका पूर्ण आदर सत्कार करते हैं उत्कट तपस्वियोंका पहिले व्यंतर आदि पूर्ण सत्कार वा सन्मान करते थे यह शास्त्रका कथन मिश्या है क्योंकि इससमय वे मेरी पूजा प्रतिष्ठा नहिं करते इसप्रकार चित्तमें किसीप्रकारकी ग्लानि न कर मान अपमानमें समभाव रखना सत्कारपुरस्कार परीपका जीतना है ॥१६॥ मैं न्यारह अंग चौदह पूर्वका धारक हूं सूर्य रामान - मार नासार हिंदी टीका सहित ६३ मेरे सामने अन्य मनुष्य जुगुनूं के समान हैं। इसप्रकार ज्ञानमद न करना प्रज्ञा परीपहका जीतना, है ॥ २० ॥ यह मूर्ख पशुके समान है कुछ भी नहिं समझता इत्यादि दुर्वचनोंका सहना, सदा अध्ययनमें दत्त चित्त रहना, वचन कायकी अनिष्ट चेष्टा न करना महा उपवास श्रादिके करनेपर भी अभीतक मुझे क्यों विशिष्ट ज्ञानका लाभ न हुआ इसप्रकारका विचार न करना अज्ञानपरीपह है ॥ २१ ॥ और दुष्कर तपोंका आचरण करने- वाले परम वैरागी समस्त शास्त्रके वेत्ता और चिरकालसे व्रती मेरे अभीतक अतिशय ज्ञान प्रकट न हुआ इसलिये मुनिवृत्ति थारण करना और व्रतोंका पालन करना निरर्थक है इसप्रकार दर्शनविशुद्धिके योगसे मनमें विचार न करना प्रदर्शन परीपहका जीतना है ॥ २२ ॥ इसप्रकार ये भयंकर वाईस प्रकारके परीपह सुभट राग द्वैपके अभावस्वरूप उपशम ज्ञानरूपी रूमसे मुनि- को अवश्य जीतने चाहिये ॥ ४० ॥ वहुतसे निर्वल गनुष्य संन्यास अवस्थामें परीपहांको न सह सक्नेके कारण पुनः शारी- रिक सुख लिये लालायित होजाते हैं इसवातको बतलान है- परिसहसुहडेहिं जिया केई सरणासत्राचे भग्गा । सरणं पइसंति पुणो शरीरपडियारसुरस रन ॥४॥ परीपहसुभर्जिताः केचित् सन्यासास्वादनाः। शरणं प्रविशंति पुनः शरीरप्रतीकारनुखर५ ।। ४ ।। अर्थ-न्यासःपी संपामसे भगे हु और परापद स्पी ६४. आराधनासार हिंदी टीका सहित सुभटोंसे जीते हुये बहुतसे लोग वस्त्र भोजन आदिस्वरूप शरीर सुखका शरण लेते हैं | भावार्थ-ससस्तप्रकारके परिग्रहका त्याग करना संन्यास है । ऋषभ आदि तीर्थकरोंने इसका आश्रय किया था, उनके साथ दीक्षित चार हजार राजा इसे. छोड भगे थे। सामान्य मनुष्योंको श्रवणमात्रसे यह त्रास देनेवाला है और अनशन रसपरित्याग आदि तीक्ष्णवाणोंसे यह शरीरको छिन्न. भिन्न करने वाला है इसलिये संन्यासका सत्र स्वरूप संग्राम वत. लाया है। पहिले रुद्र श्रादिक बहुत से ऐसे मुनि होगये हैं जिनको किसी कारण से वैराग्य होगया था औद देह विषय सुख पुत्र मित्र स्त्री आदिसे विरक्त होकर ख्याति पूजा लाभ आदि ऐहिकसुख एवं स्वर्ग मोक्ष आदि परलोकसंबंधी सुख प्रदान करनेवाली दिगंवर दीक्षा थारण करली थी किंतु 'जिससनय उन्होंने उपर्युक्त संन्यासरूपी संग्राममें दुर्धर्ष तपकार्यका अनुष्ठान देखा और परीपहरूपी योधाोंने उनपर वार किया तो वे एक दम डर गये एवं हम ऐसे चारित्रका आचरण नहिं कर सकते मनमें ऐसी भावनाकर और संसारके अनंत भी दुःखका कुछ भी ध्यान न कर उन्होंने देव शास्त्र गुरु और चारप्रकारके संघके सा मने प्रतिज्ञाकी थी उस प्रतिज्ञाको तिलांजलि देदी। वस्त्र और भोजनका अवलंबन कर लिया और निरंतर विषय सुखकी प्राप्तिके लिये वाणिज्य आदि व्यापारभी करने प्रारंभ कर दिये इसलिये इस संन्यासरूपी भयंकर संग्रामसे छिन्न भिन्न और आगधनासार हिंदी टीका सहित ६५ परीपहरूपी पलवान सुभटोंसे हारकर बहुतसे मनुष्य तपकी प्रतिज्ञा च्युत होगये हैं और उन्होंने वस्त्र भोजन आदि शरीरसंबंधी सुखका अवलंबन कर लिया है । अतः जो मनुष्य परमात्माके आराधनके अभिलापी हैं उन्हें चाहिये कि वे संन्या- सरूपी संग्राममें अड़कर परीपह सुभटोंका निर्भय हो वार सह और. भयभीत हो शरीर सुखका शरण न लेकर शुद्ध, यात्मान शरण लें। ४१ ॥ परीपहोंसे तिरस्कृत सुनि किस भावनासे परीप का विय नर.सकता है उसकाम्वरूप बतलाते हैं- दुक्लाइ . अणेयाई सहियाई एरवरण संसारे। इरह सबसो विमाह अप्पमहावं मणा किचा ॥४२॥ दुःखान्यनेकानि मोढानि परवशेन समारे । इदानी स्ववशोपि पहस्व आत्मम्वभावे मनः कृत्वा ।। ४२ ।। अर्थ-हं आत्मन् : पराधीन-कौ अधीन हो तून संसारमें अनेक दुःख सहे हैं अब आनादभावमै चित्त लगाकर. स्वाधीन हो. इन दःखोंको सह । भानाथ-जिससभ्य सुधा प्यास शीत उप्ण दिया तीव्र परीपह सहना बरर मिलजाय उससमय मुनिको यह भावना करनी चाहिये दि.-हे भात्मन् : जन्म जरा मरणसे व्याप्त इस चतुर्गनिरूप संनारमें कनाक साधीन हो तुने तिल तिल भर शरीर शिदना कटजाना, तेलसे भरे हु तात कालाहांमे पडना, गिपत्रांस शरीरके खंड २ हो जाना, गरम २ बालू : नृत्य करना, सारसमें लडकार ए. दूसव शसरे कट ५ ६६ आराधनासार हिंदी टीका सहित नाना आरा आदिसे चिरजाना; अत्यंत भारका ढोना, बंधना; जलना, शीत उष्णकी वाथा सहना, दरिद्र होना; पुत्र प्रियाका वियोग सहना, राजासे तिरस्कार और जूश्रा आदि दुर्व्यसन- जन्य पीडाका सहना, दूसरेकी विपुल द्धिसे मनमें क्लेश होना भादि अनेक धोरसे घोर क्लेश सहे हैं इससमय यद्यपि तेरे ऊपर घोर आपत्ति पाकर पड़ी है तथापि यह तेरे अधीन है क्योंकि स्त्री पुत्र आदिसे विरक्त होकर संन्यास धारण कर इन परीपहोंको स्वयं तेने अपने ऊपर प्रानकी आज्ञा दी है इसलिये शुद्ध आत्मा में मनको लगाकर प्रसन्नतासे उन्हें सहना चाहिये ॥ ४२ ॥ परीपहोंके तीव्र दुःखसे दुखित मुनि जिससमय परम उपशमसं-- बंधी भावना भाता है उससमय उसके काँका नाश होता है एह अव कहते हैं- इतिव्ववेयणाए अक्तो कुणसि भावणा सुसमा। जह तो णिहणसि कम्मं असुहं सव्वं खणद्वेण ॥४३॥ अतितीवेदनया आनांतः करोपि भावनां सुसमां । यदि तदा निहंसि कर्म अशुभं सर्व क्षणार्धन ।। ४३ ।। अर्थ-हे पात्मन् ! परीपहोंकी तीव्र वेदनासे दुःखित हो कर जिससमय तू परम उपशम भावना करेगा उससमय अर्ध क्षणमें तेरे समस्त अशुभ कर्म नष्ट हो जायगे । मावार्थ-शरीर आदि मेरे हैं, मैं इनका हूं; इत्यादि विचारीका निग्रह करना, जिसप्रकार मेघसे आकाश विकृत नहिं होता उसीप्रकार जन्म आराधनासार हिंदी टीका सहित ६७ जरा रोग आदि विकार भी मेरे विशुद्ध आत्माको विकृत नहिं बना सकते, उनसे शरीर विकृत वन सकता है इस प्रकारका विचार करना तथा मोहजनित और भी नानाप्रकारके संकल्पों- को नष्ट कर शुद्धचिद्रूपमें स्थिति करना सुसमा भावना है जो मुनि भूख प्यास शीत उष्ण दंश मशक आदिकी तीन वेदनासे आक्रांत होकर विशुद्ध भावोंसे उपयुक्त भावनाको भाता है उसके देखते २ समस्त अशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं किंतु जबतक उपर्युक्त भावनाका अवलंबन नहि किया जाता तबतक अशुभ कर्मोका नाश नहिं हो सकता इसलिये मुनिको चाहिये कि वह परीपहोंकी तीन वेदनाके उपस्थित हो जाने पर भी परमात्माकी मावना अवश्य करै ।। ४३ ॥ परीपहोंके महने में असमर्थ हो यदि फोई मुनि चारित्रका त्याग कर देता है तो उसे इस लोक पर- लोकमें क्या फल मिलता है ? इसवातको कहते हैं- परिसहभडाण भीया पुरिसा छंडंति चरणरणभूमी। भुवि उवहासं पविया दुक्खाणं हुंति तेणिलया॥४४॥ परीपहभटेभ्यो भीताः पुरुषास्त्यजति घरपरणभूमि । मुवि ऽपहासं प्राता दुःखानां भवंति पे निलयाः॥४४ ।। अर्थ-जो पुरुप परीपह सुभटोंसे भयभीत होकर चारित्ररूपी संग्राम भूमिको छोड भगते हैं वे संसारमें हास्यपात्र पन्ने है और अनेक प्रकारके दुखोंका उन्हें सामना करना पड़ता है । भावार्थ- जिसप्रकार शूरवीरोंसे भयभीत होकर नंग्रामने पीठ ६९ ६ आराधनासार हिंदी टीका सहित दिखानेवाला पुरुष संसारमें हंसीका पात्र बनता है और राजदंड निंदा. आदि अनेक प्रकारके दुखोंको सहता है उसीप्रकार, जो पुरुष चारित्ररूपी विस्तीर्ण संग्राम भूमिमेंसे यह जानकर भी कि व्रत समिति गुप्ति:आदि विशाल योधाओंके सामने किसी की दाल नहिं गल सकती, निर्बल हो परीपहरूपी न कुछ सुभदोंसे भयकर उसे पीठ दिखाकर भग जाता है-चारित्रका पालन करना छोडदेता है उस पुरुषकी सब लोग हंसी करते हैं चारित्र से भ्रष्ट होजानेपर उसे नर नारक आदि गतियोंमें भ्रमणकर तीब दुःख भोगने पहते हैं इसलिये जो पुरुप संसारमें हंसीसे भय करनेवाले हैं और संसारके दुखोंको भोगना नहिं चाहते उन्हें चाहिये कि वे चारित्रको प्राप्त होकर परीपहोंके भयसे उनसे विमुख न हो किंतु परीपहरूपी सुभटोंकी. कठिन मार झेलते हुये भी आगे ही वढते चले जाय । अखंड अविनाशी मोक्ष राज्यको पाकर कीर्तिका उपार्जन करें एवं समस्त प्रकारके दुखोंसे छूटे ॥ ४४ ॥ परीपहांसे भयकर तीनों गुप्तियोंका आश्रय करना चाहिये और मनको मोक्षमें लगाना चाहिये अब यह ग्रंथकार बतलाते हैं- परिसंहपरिचकभित्रो जइ तो पइसेहि गुत्तितयति। ठाणं कुण सुलहावे मोक्तगयं कुणसु मणवाणं ॥४५॥ परापहपरचक्रभीतो यदि तदा प्रविश गुप्तित्रयगुप्ति । स्थानं कुरुप्व स्वस्वभावे मोक्षगतं कुरुष्व मनोवाणं ।। ४५ !!

आराधनासार हिंटी टीका संहित ६६ अर्थ-जिससमय परीषहरूपी शत्रुसेनासे मुनिको मय हो उससमय उसे तीनों गुप्तिरूपी अगम्य दुर्ग-किलेमें प्रवेश करना चाहिये और वाणके समान चंचल मनको स्वस्वरूप-मोक्षमें लगाना चाहिये । भावार्थ-योग-मन वचन कायका भलेप्रकार निरोध करना गुप्ति है और वह मनोगुप्ति वचनगुप्ति और कायगुप्तिके भेदसे तीन प्रकारकी हैं इस गुप्तित्रयको ही परिपहरूपी शत्रुमा- केलिये अगम्य किला चित्चमत्कारमान परब्रह्मस्वरूप बतलाया है अर्थात् आत्माकी चिञ्चमत्कारमात्र परमब्रह्मस्वरूप अवस्थामें ही भलेप्रकार मतोगुप्ति आदि गुप्तियां होती है इसलिये निथय- नयसे ये चिचमत्कारमात्र परमब्रह्मस्वरूप ही है तथा मन पचन कायकी गुप्तिमें कारण परमसमयसार-परब्रह्म परमात्माकी भावना प्रधान कारण है क्योंकि जबतक परमब्रह्म परमात्माकी विशुद्ध भावोंसे भावना नहिं की जाती तबतक गुप्तियांकी प्राप्ति नहिं होती । समयसार कलशमें भी यह ही कहा है- अलमलमतिजल्पविकल्परनपैरामह परमार्थश्चित्यतां नित्यमेकः स्वरमा घसरपूर्णतानविस्फूर्तिमात्रान्न खलु समयसारादुत्तरं किंचन्ति ।। सर्थात्-अधिक बोलने और अनेक प्रकार के दुर्विकल्प-संकल्प विकल्पोंकी आवश्यकता नहीं। यहांपर कर्ममलोंसे रहित एक और परम समयमार विद्यमान है सदा इसीकी भावना करो क्योंकि आत्मिक रमस्वरूप पूर्णविज्ञानकी प्रगटताके धारक समपसारसे भिन्न कोई भी पदार्थ उत्तम नहिं । जब मुनिको यह ५. आराधनासार हिंदी टीका सहित मालूम पड़े कि परीपहरूपी शत्रु सेनाका मुझपर भयंकर. चार होरहा है-भूख प्यासकी वेदना मुझे बुरी तरह सतारही है उस- समय उसे परमंत्रा परमात्माकी भावना कर इस गुप्तिरूपी सुरक्षित किलेका अवलंबन करना चाहिये । सहज शुद्ध चिदा- नंद चैतन्यस्वरूपमें स्थिति और इंद्रिय विषयोंमें घूमनेवाले वाण- के समान चंचल मनको समस्त :कमौके अभावस्वरूप मोक्षमें स्थिर करना चाहिये. अन्यथा परिवह सुभट चारित्ररूपी संग्रा- ममें पायलकर संसाररूपी कैदखानेमें पटक देंगे और वहांपर अनंते दुःख सहने पडेंगें ॥ ४५ ॥. परीपहोंकी वेदनासे तप्त पुरुप. यदि ज्ञानरूपी शीतल सरोवर में प्रविष्ट होता है तो क्या प्राप्त करता है इसवातको श्राचार्य कहते हैं- परिसहदवग्गिततो पइसइ जइ णाणसरवरे जीवो। ससहाव जलपसित्तो णिव्वाणं लहइ अवियप्पो॥४६॥ परिपहदवाग्नितप्तः प्रविशति यदि ज्ञानसरोवरे जीवः । स्वस्वभावजलपसिको निर्वाणं लभते अविकल्पः ॥ ४६॥ अर्थ-परीपहरूपी दावानलसे संतप्त हुआ जीव जब निर्वि- कल्प हो ज्ञानरूपी शीतल स्वच्छ सरोवरमें प्रवेश करता है और स्वस्वभावरूपी जलमें स्नान करता है उससमय इसे निर्वाण-मोक्ष- धामन्त्री प्राप्ति होती है। भावार्थ-जिसप्रकार दावानलसे संतप्त मनुष्य शीतल जलसे भरे हुये सरोवर में प्रवेश कर और मनमानी .

चाराधनासार हिंदी टीका सहित ७१ डुबकी मार मार स्नानकर शांतिलाभ करता है उसीप्रकार जो मनुष्य शरीरसंतापके कारण भूख प्यास शीत उष्ण आदि परीपहोंसे खिन्न होकर जिससमय ज्ञान अर्थात् परीपह जिसे दुःख पहुंचा सकते हैं वह मैं नहीं हूँ शरीर है, मैं चिदानंद चैत- न्यस्वरूपका धारण करनेवाला हूं मेरे पास परीपहोंका लेश भी नहिं फटक सकता इसप्रकारके भेदविज्ञानरूपी सरोवरमें प्रवेश करता है और वहां सहजशुद्ध निर्विकार परमात्मस्वरूप मेवसे उत्पन्न यात्मिक शुद्ध परमानंदमयी स्वभावमें मनमाना अवगाहन स्नान करता है उससमय वह संसारसंबंधी समस्त संकल्प विक- ल्पोंका सर्वथा त्याग करदेता है एवं परमशांतिस्वरूपको प्राप्त होता है जहां कि उसे संसारका कोई भी दुःख नहिं सहना पडता इसलिये परमात्मपदके अभिलापी मुनिको चाहिये कि जब वह अपने चित्तको परीपहरूपी दावानलसे संतप्त देखे उससमय भेदविज्ञानरूप सरोवर में प्रवेशकर स्वस्वभाव जलमें गोते लगाये ॥३३॥ की कदाचित मुनेको योर उपसौंफा सामना करना पडे तो उससमय उसे क्या करना चाहिये ? यह बात कहते हैं- जइ हुंति कहवि जइणा उवसग्गा वहुविहा हु दुहजणया ते साहेयव्वा णूणं समभावणणाणचित्तेण ॥४७॥ यदि भते करमापे यतेरुपसर्गा वहुविधाः खलु दुःखजानकाः ते सोढया नून समभावनज्ञानाचतेन ।। ४ ।। अर्थ-यदि किसीतरह नानाप्रकारके दुःख देनवाले उपनर्ग

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आराधनासार हिंदी टीका सहित
सनिलिये श्राकर उपस्थित हो जाय तो उसे चाहिये कि वह
संमभावोंसे उन्हें अवश्य सह-उपसंगाँसे भयभीत हो चारित्रसे
न चिगे। भावार्थ-राग द्वप न कर दुःख सुख शत्रु मित्र वन
भवन अलाम लाम मात्र सुवर्ण आदिको समान मानना किसी-
को अच्छा बुरा न विचारना समभावना है सोही (ज्ञानार्णवमें)
कहा भी है-
सौधोत्संगे श्मशाने स्तुतिशयनविधौ कर्दमे कुकुमे वा
पल्यंके कंटकामे हंपदि शशिमणौ चर्मचीनांशुःषु ।
शीर्णागे दिव्यनार्यामसमशमवशाद्यस्य चित्तं विकल्प
नालीद सोयमेकः कलयति कुशलः सान्यलीलाविलास।
अर्थात्-उत्तम समता के स्थान जिस महात्माका मन महल
मरघट स्तुति निंदा, कीचड केसर, सेज ककरीली भूमि, पत्थर
चंद्रकांतमणि चाम चीन देशके वस्त्र शीर्ण शरीर और देवांगना.
में ऊंच नीचका विकल्प नहिं करता सबको समान रूपसे समझ
ता है वह मुनि साम्यभावका धारक गिना जाता है अर्थात् महल
मरघट आदि उत्तम हीन दोनों पदार्थों को समानरूपसे मानना
साम्यभावना है यदि किसी कारणसे नानाप्रकारकं दुःख देनेवाले
घर उपद्रव आकर उपस्थित हो जाय तो मुनिको चाहिये कि वह
समभावसे समस्त उपद्रवोंको सहनकर घार वेदनाके होनेपर भी
अपने शुद्धस्वरूपसे विचलित न हो ॥४७॥ क्योंकि-
णाणमयभावणाए भाविय चित्तेहिं पुरिससीहेहिं

आराधनासार हिंदी टीका सहित सहिया महोवसग्गा अंचेणादीय चउभेया ॥४८॥ ज्ञानमयभावनया भावितचित्तैः पुरुषसि है: । सोदा महोपसर्गा अचेतनादिकाश्चतुर्भेदाः ॥४८॥ अर्थ-जिन पुरुषोंके चित्तमें सदा ज्ञानस्वरूप भावना रहती है ऐसे उत्तम पुरुषोंने अचेतनश्रादि चारो प्रकारके घोर उपसर्गोको सहा है भावार्थ-देवकृत मनुष्यकृत तियंचकृत और अचेतनकृत ये चार प्रकारके उपसर्ग हैं जिससमय मुनिगण ध्यानमें लीन होते हैं उसरामय उनमें बहुतोंको देव आदि द्वारा घोर उपद्रव सहने पडते हैं किंतु पुरुषोंमें सिंहके समान वे मुनि अपने चित्तको ज्ञानमय मावनामें लीनकर उन उपसर्गोको सहते हैं और अपनं शुद्धात्म- ध्यानसे जरा भी नहिं चलित होते ॥४८॥ किन किनने कौन कौनसे उपसर्ग सहे हैं ? प्रश्नके उत्तर में ग्रंथकार अचेतनन्त उपसर्ग और तिर्यचकृत उपसाँके सहने वाले महानुभावोंके नामका उल्लेख करते हैं- सिवभूणा विसहियो महोवसग्गो हु चेयणारहियो। सुकुमालकोसलेहि य तिरियंचकत्रो महाभामो ॥४॥ शिवभूतिना विपोटो महोपसर्गः खलु चेतनारहितः । सुबुमालपोसलाभ्यां च तिर्यक्यतो महाभागः ॥ १० ॥ अर्थ-राजकुमार शिवभूतिने अचेतनन घोर उप रग और सुदुमाल पीर कोमल मुनियोंने तियंचकृत भयंकर उपद्रव महा था। कुमार शिवभृतिको क्या पर कैसे बचेतनात उपसर्ग औरावनासार हिंदी टीका सहित सहना पड़ा था इसवातका यहां उल्लेख करते हैं -- चंपापुरीमें प्रचंड पराक्रमका थारक विक्रमनामका राजा राज्य करता था। उसके शिवभूति नामका पुत्र था जो विभूतिमें ईश्वरकी तुलना करता था। एक दिन राजकुमार शिवभूति सानंद बैठे थे कि अचानक ही उनकी दृष्टि श्राकाशकी ओर गई और उसीकालमें उत्पन्न हुई अांधीसे जल परिपूर्ण मेघको पल- भरमें खंड रूपमें छिन्न भिन्न देख सहसा उनके मन में ये विचार तरंगे उछलने लगीं-अहा इस संसारको सर्वथा धिक्कार है। जहां पर जरा भी सुख दृष्टिगोचर नहीं होता परंतु ये मूह जीव क्यों इस बातको नहि समझने । हाय !!! मोहसे अंध ये जीव क्षण- विनाशीक और दुष्ट शरीरकेलिये अनेक प्रकारके प्रारंभ करते रहते हैं बस इसप्रकार वैराग्यरंग रंजिन कुमार शिवभूतिने देखते देखते तुणके समान समस्त भोगोंको जलांजलि देदी और वनमें वाकर दिगंबर दीक्षासे दीक्षित हो गये। कदाचित् योगाभ्यास और दुश्वर तपका आचरण करनेवाले मुनिराज शिवभूति वनमें किसी वृक्षके नीचे प्रतिमायोगसे मिराजमान थे अचानक ही बांसोंक विसनेसे उत्पन्न जाज्वल्यमान दावानल जलते हुये दारु वृक्ष और फटते हुये वांसांके टूटनेसे महा भयंकर हो अमानरूपसे समन्त बनको भम्म करने लगा और उस निर्दयीने मुनिराजकों भी घोर पीडा पहुंचानी प्रारंभ करदी । मुनिश्रेष्ठ शिवभृति परम विद्वान और संसारके विचित्र चरित्र से वास्तव में भयभीत थे ।

आराधनासार हिंदी टीका सहित भला ऐसा भयंकर भी दावानल उनका क्या वाल वांका कर सकता था ? वे धीरवीर मुनिराज जलते हुये वृक्षके नीचे बरावर विराजमान रहे । तेजीसे वृक्षक खंडोंने अंगारका रूप धारणकर मुनिका सारा शरीर कदर्थित कर डाला परंतु वे अपने ध्यानसे न चिगे दृढरूपसे घोर उपद्रव सहते रहे। ऐसे ही वीर मुनियोंकी प्रशंसामें समयसारकलशमें कहा है- सम्यग्दृष्टय एव साहसमिदं कर्तुं क्षमंते परं यद्वीप पतत्यमी भयचललेलोक्यमुक्तावनि । सर्वामेव निसर्गनिर्भयतया शकां विहाय स्वयं जानंतः स्वमवध्यंबोधवपुपं वोधाच्च्यवंते नहिं ।। अर्थात्-ऐसा साहस करनेकेलिये सम्यग्दृष्टि पुरुष ही समर्थ हो सकते हैं जहांपर कि वन गिर रहा है और भयसे कंपायमान तीनोंलोकनने जहांका मार्ग छोड दिया है वहांपर स्वभावसे ही समस्त शंकाको छोडव.र और अपनको अखंड ज्ञानग्दरूप शरीर का धारक जानकर कभी भी मापने ज्ञान-ध्यानसे विचलित नहिं होते । वस इस घोर पसर्गके समय मुनिराज शिवभूतिने परम- व्रम्ह परमात्माकी भावना की कमोंके सर्वधा नाशसे कंवलज्ञान प्राप्तकर अविनाशी मोक्षसुखका अनुभन किया। अब तिर्यचकृत उपसर्गके सहन करनेवाले महात्मा मुमाल और सुकोसलकी कथाका कुछ उल्लेख किया जाता है-जहीप के भरत क्षेत्रकी कौशांबी नगरीका शासन करनेवाला राजा अतिवल था जिसको अनेक राजा मस्तक झुलासर नमस्कार .

७६ आराधनासार हिंदी टीका सहित काते थे । राजा अतिवनका.पुरोहित जी अत्यंत प्रतिष्ठित था सारों वेदोंका वेत्ता था, व्याकरण न्याय काव्यशास्त्र में पूर्ण निष्णात था और विष्णुका भक्त सोमशर्मा था। पुरोहित सोम. शर्माके अग्निभूति और वायुभूति नामके दो पुत्र थे । जब ये दोनों पुत्र विद्या पढनेके योग्य हुये तो एक दिन सोमशर्माने उनसे कहा-रे पुत्रो! अब तुम्हें शास्त्राभ्यास करना चाहिये क्योंकि-जो पुरुष शास्त्रोंका ज्ञाता बुद्धिशाली होता है सब लोग उसका सन्कार करते हैं। जो विषय नेत्रोंके गोचर नहीं उसविषयके जनाने के लिये शास्त्र तीसरा नेत्र है नत्रधारी भी पुरुप यदि विद्वान्-शास्त्रोंका ज्ञाता नहीं तो सब लोग उस अंधा ही कहते हैं इसलिये तुम्हारे लिये शास्त्रास्यास करना आवश्यक हैं। परंतु दोनों पुत्रों ने उसकी वातपर जरा भी ध्यान न दिया। उल्टा पिता माताको और दुःखी करने लगे। ठीक भी है- प्रायो मूर्खस्य कोपाय मन्मार्गस्योपदेशनं । निलू ननासिकस्येवं विशुद्धादर्शदर्शनं ।। अर्थात्-जिसप्रकार कटी नाकवाले पुरुषको निर्मल भी दर्प- णका दिखाना क्रोधका कारण होता है दर्पणको देखते ही उसे क्रोध छूटता है उसीप्रकार जो पुरुष मूर्ख है उसै सन्मार्गका भी उपदेश क्रोध उत्पन्न करता है । पुत्रोंकी दुष्ट चेयासे सोमशर्माको बडा क्लेश हुप्रा। अधिक विषय भोग करनेसे थोडे दिन बाद उसके भयंकर रोग हो गया जिससे वह अकालमें ही यमराजके वरका अतिथि बन गया। पिताके मरजानेपर बहुत दिनतक

आराधनासार हिंदी टीका सहित
शग्निभूति वायुभूतिने सुखके गुलछौं उडाये । एक दिन राजाने
उन्हें सभामें बुलाया और इन्है पुरोहितके पुत्र होनेसे विद्वानं
समझकर किसी वेदकी ऋचालाअर्थ पूछा ये दोनों भाई शाम्बसे
विलकुल कोर थे भला । वेदकीऋचाको क्या जान । भखमार
उन्हें उसगमय यही कहना पड़ा कि-
"देव ! हम इस वातको नहिं जानते । पुरोहित पुत्रोंका
यह बत्रा सुन राजाको वडा क्रोध आया। उसन
" ब्रामणों-
का अध्ययन तथा देवोंका पूजन न करना परम अनिष्ट कारक है
इस नीतिका स्मरण कर उन दोनों कुमारासे रोहितका पद
छीन लिया । जब पुरोहितानीको यह पता लगा कि मेरे पुत्रोंसे
पुरोहित पद छीन लिया गया है तो उौ बडा दुःख हुप्रा । वह
सीधी राजा प्रतिवलके पास पहुंची और नित्र हो बोली-
'राजन् ! मेरे पुत्रोंकी आजीविका क्यों जप्त करली गई ?,
उत्तरमें राजाने कहा-
"तेरे पुत्र निरधारभट्टाचार्य हैं इसलिये राज भामें उनकी
किंसीप्रकार की भी अभीप्या-इच्छा पूरण नहिं की जा सत्ती ।
क्योंकि-
बिद्वज्जनानां खलुभटलीपु मूग्र्यो मनुष्योलमने न शांभां।
मणपु क नाम मिाानां कांको वरा बनानन त ।।
सर्थात-जिगप्रहार हंसोही मंडलीमें हाकशोना नहि
पाता उसी प्रकार विद्वानोंक मंडल में पूर्ख मनुष्की भी होना
नहिं होती। यह सुन ब्राह्मणी निरत्तर हो राजदरवारो लोट
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मारांधनासार हिंदी टीका सरित भाई और अपने दोनों पुत्रोंको बुलाकर उनसे इसप्रकार कहने खगी- अरे मेरे यौवनको छिन्नभिन्न करनेवाले कुठारस्वरूप पुत्रो ? राजसभामें तुम लोगोंका पूर्णरूपसे मान खंडित हो चुका है. तुम्हें अब मरणका ही शरण लेना उचित है। क्योंकि मा जीवन् यः परावज्ञादुःखदग्धोऽपि जीवति । तस्याजननिरेवास्तु जननिक्लेशकारिणः ॥ अर्थात् जो पर पुरुषसे प्राप्त अवज्ञारूपी दुःखसे दुखित हो बीता है उसका न जीना ही उत्तम है अथवा उसकी उत्पत्ति ही व्यर्थ है क्योंकि वह अपनी माको सुख न देकर सदा दुःख दिया फरता है। उत्तरमें पुत्रोंने कहा- 'खैर ! मा हुओ सो हुआ । अप अपने कोषको शांतकर और पतला हम किस उपायसे विद्या प्राप्त कर सकते हैं? पुरोहितानीने कहा-राजगृह नगरमें तुम्हारा काका-जो व्याकरण न्याय काव्य शास्त्रोंका पूर्ण ज्ञाता है, परवादियोंका मान मर्दन करनेवाला और समस्त विद्वानोंका शिरोमणि है,रहता है इसलिये तुम लोग यहांसे जाकर उसकी सेवा शुश्रूषा करो और विद्या भ्यासकर विद्वान बनो।" वस दोनों द्विज पुत्रोंने माताके वचन स्वीकार करलिये और तत्काल राजगृह नगर आये और सूर्य- मित्र उपाध्याय के घरमें प्रवेश कर उसे भक्तिपूर्वक नमस्कार कर विनम्र हो उसके सामने बैठ गये। ये दोनो भाई परम सुन्दर हष्ट पुष्ट थे, ज्योंही सूर्यमित्रने उन्हें दोवा आश्रय विशिष्ट हो

आराधनासार हिंदी टीका सहित
इसप्रकार पूछा-तुम लोग कौन हो ? और यहां किसलिये आये
हो ? उत्तरमें द्विजपुत्रोंने कहा-
"भगवान् ! हमलोग कोशांचीसे आये हैं। पुरोहित
सोमशर्माके पुत्र हैं अग्निभृति और वायुभूति हमारे नाम है। हम
आपकी सेवाशुश्रूषाकर विद्याभ्यास करना चाहते हैं। यद्यपि
सूर्यमित्रको यह मालूम हो गया कि ये मेरे भाईके पुत्र--भतीजे हैं
परंतु यह समझकर कि " यदि मैं इनको अपना संबंध वतला
दूंगा तो ये लाड प्यारमें फंसकर कुछ भी न पढ सकेंगे
उससमय सब बात छिपाली और रूक्षस्वरसे यह कहा कि.-
यदि तुम लोग विद्या पढना चाहते हो तो व्यसनोंका
सर्वथा स्याग करदो क्योंकि व्यसनीको विद्या नहिं पाती जैसा
कि कहा है-
स्तब्धस्य नश्यति यशो विपमस्य मैत्री
नष्टक्रियस्य कुलमर्थपरस्य धर्मः ।
वियाफलं व्यसनिनः कृपणस्य सौख्यं
राज्यं प्रणष्टसचिवस्य नराधिपस्य ।।
अर्थात-जडपुरुपका यश, विषम कुटिल पुरुषकी मिन्नता,
चारित्रभ्रष्टका वंश, सदा द्रव्य ही उपार्जन करनेवालेका धर्म,
व्यसनीका विद्याका फल, कृपणका सुख और मंत्री विना
राजाका राज्य नष्ट हो जाता है । इसलिये यदि तुम भिक्षाहत्ति में
उदरनिर्वाह करोगे, गुरुकी सेवा और भूमिपर सोयोग तो दम
शास्त्रज्ञानका लाभ मिल सकता है । उपराप्यायके ये वचन दोनों
कुमारोंने स्वीकार करलिये उसने भी प्रसन्न हो उन दोनोंको उन
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आराधनासार हिंदी टीका सहित, दिनसे विद्या पढाना प्रारंभ करदिया। प्रथमही प्रथम सूर्यमित्रने उन दोनोंको सभाष्य व्याकरण पढाया पश्चात् सांगवेद और न्याय शास्त्रोंका भी अध्ययन कराया जिससे वे थोडेही दिनोंमें प्रवल विद्वान हो गये । यो ठीक ही है गुरुके प्रसन्न होनेपर शिष्यः अवश्य पूर्ण विद्वान् होजाता है जैसा कि कहा है- गुरोः प्रप्तादाद्धि सदा सुखेन प्रागल्भ्यमायाति विनेयबुद्धिः। ।, माधुर्यमासोद्भयमंजरीणामास्वादनारकोकिलवाांगेवाशु ॥ अर्थात्--आम्र वृक्षसे उत्पन्न मंजरी-चौरको चखकर कोयल जिसप्रकार मीठे मीठे वचन बोत निकलनी है उसीप्रकार गुरुकी प्रसन्नता से शिष्यको बुद्धि भी उन्नत हो जाती है वह सुख पूर्वक समस्त शास्त्रोंमें विद्वान हो जाता है । इसतरह जब अग्निभृति और वायुभूनि शास्त्रोंमें पूर्ण विद्वान होगय तो उपाध्याय सूर्य मित्रको परमानंद हुआ उसने अनेक वस्त्र और आभरणोंसे उनका सन्मान किया और आप लोग मेरे भतीजे हैं ऐसा संबंध प्रकाशितकर वडे आदरसे उन्हें कौशांबी भेज दिया। दोनों कुमारोंने कौशांबी जाकर अपनी प्रखर विद्वत्तासे राजाको राजी कर लिया और फिरसे अपने पदपर स्थिर हो सुखपूर्वक रहने लगे। एक दिन उपाध्याय सूर्यमित्र किसीजलाशयमें स्नानकरसूर्य को अर्व दे रहे थे कि अचानक ही उनके हाथसे मुद्रिका जो उन्हें राजाने दी थी अंगुलीसे निकलकर कमलपत्रके भीतर पड गई और वे सीधे घर चले आये । आकर जब उन्होंने मुद्रिका आराधनासार हिंदी टीका सहित . - अपनी अंगुली में न देखी तो उन्हें बडा रंज हुया में रजिाकों क्या उत्तर दूगा ऐसी बार बार चिंता कर व्याकुल होने लगे । उसीसमय एक सुधर्म नामके मुनि राज जो यम नियम श्रादिसे भूपित अष्टांग निमित्त शास्त्रके पूर्ण ज्ञाता थे, राजगृह नंगरमें विराजमान थे । उपाध्याय सूर्यमित्र उनके पास गये और मुदरीकर पता पूछा उत्तर में मुनिराजने कहा- "उपाध्याय ! किसीप्रकारकी चिंता न करो जहांपर तुमने सूर्यकेलिय अर्घ प्रदान किया था वहींपर वह मुद्रिका अंगुलीस निकलकर कमलपत्रके भीतर गिर गई है कल प्रातःकाल ही जाकर तुम उसे ले याना वह तुम्हें मिल जायगी । उपाध्याय भी यह गाह श्रद्धानकर कि मुनिराजके वचन अन्यथा नहिं होते अपने घर लोट प्राय और प्रातः काल वहां पहुंचने ही कमलपत्र के भीतर उन्है मुदरी मिल गई। मुदरीके प्राप्त होजानसे सूर्यामत्र को बडी खु.गी हुई परंतु साथ ही उन्होंने यह भी सोचा कि- अहा ! दिगंबर मुनियों में विलक्षण सामथ्र्य होती है। भूत भरिप्यत वर्तमान तीनों कालीक वे ज्ञाता हात है । मुनिराज भुधर्म त्रिकालज्ञ है । मुकं भी त्रिकालाताशी प्रार्मिक लिये कपटसे उनकी सेवा करनी चाहिये । विद्यापलियं हर एक मनुष्य की सेवा की जा सकती है। जद में विकालत हो जाउंगा उससमय मुझे किसीकी सेवा प्रोजन नहीं रहेगा। वन ऐना मनमें रद्ध विचार कर नति श्रुति और अवधिज्ञान रूपी नत्रास ६ आराधनासार हिंदी टीका सहित बारक मुनिराजः सुधर्मके पास. वे पहुंचे उन्हें मायाचारीसे :- भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और- रोहणं सूक्तिरलानां वंदे वृदं विपश्चिता। यन्मध्ये पतितो नीचकाचोऽप्युच्चमणीयते ।। अर्थात्-जिसप्रकार रत्नोंके मध्यमें जडा हुआ कांच भी बहुमूल्य रत हो जाता है उसी प्रकार विद्वानोंके मध्यमें नीच भी प्रतिष्ठाका भाजन बन जाता है इसलिये सूक्ति रूपी रत्नोंके स्थान विद्वानोंको मैं नमस्कार करता हूं । यह श्लोक पढकर भगवन् ! मैं भी आपके प्रभावसे ज्ञानी होना चाहता हूं इस- प्रकारकी प्रार्थना की।" मुनिराज तो सब वात जानते ही थे वे यह जानकर कि यह सूर्यमित्र आसन्न भव्य है तो इसप्रकार वोले- "सूर्यमित्र ! यदि तुम हमारे समान दिगंबर मुद्रा थारण करो तो ज्ञानी हो सकते हो।" सूर्यमित्रने भी यह विचार कर कि 'अपना क्या हर्ज है दिगंबर होकर भी जब मुझे त्रिकालज्ञता प्राप्त हो जायगी तब घर लौट आऊंगा और पुनः वैसाका वैसा होजाऊंगा । यह उत्तर दिया- "स्वामिन् ! यदि आपकी यही राय है तो मुझ दिगंवर मुद्रा धारण करनेमें कोई हानि नहीं। कृपया आप दिगंवर दीक्षा प्रदान करें और मुझपर प्रसन्न होवें।'' मुनिराज सुधर्मने सूर्यमित्रको दिगंबर दीक्षा देदी जिससे वे मुनि हो गये और शास्त्राभ्यासके माहात्म्यसे मिथ्यात्वका सर्वथा त्यागकर सम्यग्दृष्टि हो दृढरूपसे व्रतोंका परिपालन करने लगे। तीत्र तपोंको तपनेवाले मुनिराज सूर्यमित्र गुरुकी आज्ञासे.

आराधनासार हिंदी टीका सहित ८३. एक दिन कौशांबी आये और कई उपवासोंके बाद पारणाकेलिये अग्निभूति और वायुभृतिके घर में प्रवेश किया । दाताके गुणोंसे भूपित पुरोहित अग्निभूतिने नवधाभक्तिले मुनिराजको विशुद्ध आहार दिया । क्षणभरकेलिये मुनिराज वहीं विराजमान होगये। समस्त ब्राह्मणोंने मुनिराजको नमस्कार किया परंतु वार वार कहनेपर भी वायुभूति उन्हें नमस्कारकेलिये राजी न हुआ । उल्टी मुनिराजकी निंदा करने लगा । वायुभूतिका यह निघृण वाय देख अग्निभूतिने कहा- अरे ! इस महात्माने तुझे, पढाया और इस महिमाको प्राप्त कराया अव तु इस क्यों नमस्कार नहीं करता ? श्रोह ! अक्षरस्यापि चैकस्य पदार्थस्य पदस्य च । दातारं विस्मरन् पापी किं पुनर्धमदेशिनं ।। अर्थात्--जो पुरुप एक भी अक्षर पदार्थ श्रीर पदका ज्ञान देनेवालेको भृलजाता है वह पापी फहाजाता है फिर धर्मके उपदेश देनेवालेको भूलने वाला न मालूम क्या कहलावेगा। इसलिये मुनिराज सूर्यमित्रके साथ तेरा वर्ताय प्रयुक्त है। उत्तरमें वायुभूतिने कहा- "इस दुटने मुझे जमीनपर मुलाया था । भीम मंगवाई थी और अत्यंत दुःख दिया था । नमस्कार करना तो दूर रहो. में इसके साथ बोलना भी नहीं चाहता। इमरीतिले दृष्ट वायुभूनिने मुनिराजो दोप ही ग्रहण किये। जैसाशि (चंद्रप्रभवस्लिम) बड़ा .. पर आराधनासार हिंदी टीका सहित mma min धारक मुनिराज सुधर्मके पास वे पहुंचे उन्हें मायाचारीसे भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और रोहणं सूक्तिरलानां वंदे वृदं विपश्चितां । यन्मध्ये पतितो नीचकाचोऽप्युच्चमणीयते ।। अर्थात्-जिसप्रकार रनोंके मध्यमें जडा हुआ कांच भी बहुमूल्य रत्न हो जाता है उसी प्रकार विद्वानोंके मध्यमें नीच भी प्रतिष्ठाका भाजन बन जाता है इसलिये सूक्ति रूपी रत्नोंके स्थान विद्वानोंको मैं नमस्कार करता हूं। यह श्लोक पढकर भगवन् ! मैं भी आपके प्रभावसे ज्ञानी होना चाहता हूं इस- प्रकारकी प्रार्थना की।" मुनिराज तो सब बात जानते ही थे वे यह जानकर कि यह सूर्यमित्र आसन्न भव्य है तो इसप्रकार बोले- "सूर्यमित्र ! यदि तुम हमारे समान दिगंबर मुद्रा थारण करो तो ज्ञानी हो सकते हो।" सूर्यमित्रने भी यह विचार कर कि 'अपना क्या हर्ज है दिगंबर होकर भी जव मुझ त्रिकालज्ञता प्राप्त हो जायगी तब घर लौट आऊंगा और पुनः वैसाका वैसा होजाऊंगा। यह उत्तर दिया- "स्वामिन् ! यदि आपकी यही राय है तो मुझ दिगंवर मुद्रा धारण करने में कोई हानि नहीं। कृपया आप दिगंबर दीक्षा प्रदान करें और मुझपर प्रसन्न होवें।' मुनिराज सुधर्मने सूर्यमित्रको दिगंवर दीक्षा देदी जिससे वे मुनि हो गये और शास्त्राभ्यासके माहात्म्यसे मिथ्यात्वका सर्वथा त्यागकर सम्यग्दृष्टि हो दृढरूपसे व्रतोंका परिपालन करने लगे। तीन तपोंको तपनेवाले मुनिराज सूर्यमित्र गुरुकी आज्ञासे. A -

आराधनासार हिंदी टीका सहित
८३.:
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एक दिन कौशांबी आये और कई उपवासोंके बाद पारणाकेलिये
अग्निभूति और वायुभूतिके घर में प्रवेश किया। दाताके गुणोंसे
भूषित पुरोहित अग्निभूतिने नवधाभक्तिसे मुनिराजको विशुद्ध
आहार दिया। क्षणभरकेलिये मुनिराज वहीं विराजमान होगये।
समस्त ब्राह्मणोंने मुनिराजको नमस्कार किया परंतु वार वार
कहनेपर भी वायुभूति उन्हें नमस्कारकेलिये राजी न हुआ । उल्टी
मुनिराजकी निंदा करने लगा | वायुभूतिका यह निघृण वर्ताव
देख अग्निभूतिने कहा-
अरे ! इस महात्माने तुझे, पढाया और इस महिमाको प्राप्त :
कराया अब तू इस क्यों नमस्कार नहीं करता ? ओह !
अक्षरस्यापि चैकस्य पदार्थस्य पदस्य च ।
दातारं विस्मरन् पापी किं पुनर्घम देशिनं ।।
अर्थात्--जो पुरुष एक भी अक्षर पदार्थ और पदका ज्ञान
देनेवालेको भूलजाता है वह पापी कहाजाता है फिर धर्मके उपदेश
देनेवालेको भूलने वाला न मालूम क्या कहलावेगा। इसलिये
मुनिराज सूर्यमित्रके साथ तेरा वर्ताव अयुक्त है। उत्तरमें
वायुभूतिने कहा-
"इस दुष्टने मुझे जमीनपर सुलाया था। भीख मंगवाई थी
और अत्यंत दुःख दिया था । नमस्कार करना तो दूर रहो,
इसके साथ बोलना भी नहीं चाहता। इसरीतिसे दुष्ट वायुभूतिने
मुनिराजके दोप ही ग्रहण किये । जैसाकि (चंद्रप्रभचरितमें) कहा
मैं
mic

४
आराधनासार हिदी टोका सहित
गुणानगृह्णन् सुजनो न निर्वृति प्रयाति दोपानवदन्न दुर्जनः ।
चिरंतनाभ्यासनिबंधनेरिता गुणेषु दोयेपु च जायते मतिः ।।
अर्थात्-सज्जन पुरुष जब तक गुण नहिं ग्रहण करता तंवतक
उसै संतोष नहिं होता और दुर्जन जबतक दोप ग्रहण नहि
करता तबतक उसे सुख नहिं मिलता। यहां पर सज्जनोंकी
प्रवृत्ति जो गुणोंमें होती है और दुर्जनोंकी दोपोंमें होती है उसमें ,
चिरंतन अभ्यास ही कारण है । मुनिराज स्तुति और निंदाको
समान समझते थे शत्रु मित्रका उनके भाव ही न था इसलिये वे
वहांसे तपोवनको चले गये । अग्निभूति भी यह विचारकर कि-
वायुभूति मुझसे छोटा है उसे मेरी आज्ञा और मेरा कहना करना
चाहिये सो वह न मेरी आज्ञा मानना है और न मेरा कहना
करता है इसलिये अब उसके साथ रहना क्षणभरभी उचित नहीं ।
मुनिराजके साथ साथ तपोवनको चला गया और दिगंबर
दीक्षासे दीक्षित होगया।
जब अग्निभूतिने मुनिमुद्रा धारणकरली तो उसकी स्त्री
को बडा दुःख हुआ वह शीघ्र ही वायुभूतिके पास आई और
उससे इसप्रकार कहने लगी-
"अरे दुरात्मा ! तूने मुनिराजको नमस्कार नहि किया
इसलिये तेरे भाईने घर वारसे विरक्त हो दिगंबर दीक्षा धारण
करली । तू सींग पूछसे रहित दो पैरवाला पशु है। अरे!
जिसने विद्या पढाकर तुझे इस लोको बंदनीय पदपर पहुंचाया
उसकी अवज्ञा करनेसे तुझ न मालुम क्या निदित गति मिली
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.५ आराधनासार हिंदी टीक्ता सहित गुरुनिंदासे कभी तुझी, कल्याण नहिं प्राप्त हो सकता।" अग्निभूतिकी पत्नीके ऐसे कटोर वचन सुन वायुभूतिसे न रहा गया और क्रुद्ध हो उसने बडे जोरसे उसमें एक लात जमाई। इस तीव्र अपमानसे अग्निभूतिकी पत्नीको और भी दुःख हुआ क्रोधकी तीव्रतासे उसने उसी समय यह निंदान वांधा कि जा ! जिस पैरसे तूने मुझे मारा है तिर्यचनी होकर भी मैं पहिले उस पैरको. खाकर फिर तेरा समस्त शरीर नणभर में चट कर जाऊंगी। वायुभूति कुछ दिन तक जीया पश्चात् किसी रोगसे पीडित हो मरकर गधी सूअरी अतिया आदि निंदित योनियोंमें भ्रमणकर चांडालपुत्री दुर्गंधा हुआ । कदाचित् मुनिराज अग्निभूतिकी उसपर दृष्टि पडगई । दयाह्न हो उसै संवोधा और मद्य मांस मधुका त्याग और अहिंसा आदि पांच अणुव्रत धारण कराये । जिससे मरकर वह ब्राह्मणपुत्री नागश्री हुआ। मुनिराज अग्निभूति और सूर्यमित्रने उसे उस पर्यायमें भी संबोधा, पढाया शास्त्रोंका रहस्य जानकार उसने मुनिराजोंको नमस्कार कर जैनी दीक्षा धारण करली । नानाप्रकारके घोर तप तपे और मृत्युसमयमें चार प्रकारके आहारका त्यागकर स्त्रीलिंगको छेदकर वह सोलहवें स्वर्ग में जाकर अच्युतेंद्र हुई । जैसा कि तपका माहात्म्य वर्णन करते हुये कहा भी है-- यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच दूरे व्यवस्थितं । तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमं ।।

६.१६ आराधनासार हिंदी टीका सहित .. , . अर्थात्-जो पदार्थ सूक्ष्म हैं कठिनतासे आराधनके योग्य हैं और । अत्यांत दूर हैं वे सब तपसे साध्य हैं तपके द्वारा वे सुगमतासे । प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि तप दुरतिक्रम है कोई भी पदार्थ तपको नहिं उलंघ सकता। नागश्रीका जीव अच्युतेंद्र सोलहवें स्वर्गके भोग भोगकर " और अपनी श्रीयु समाप्तकर अवंती देशकी उज्जयिनी नगरीमें सुकुमाल नामकोष्ठिपुत्र हुआ और पूर्वोपार्जित पुण्यके माहात्म्य से वहां भी उसे राज्य आदिकी प्राप्ति हुई । क्योंकि- राज्यं च संपदो भोगः कुले जन्म सुरूपता । पांडित्यमायुरारोग्यं धर्मस्यैतत्फलं विदुः ॥ अर्थात् राज्य संपत्तियां भोग उत्तमकुलमें जन्म सुन्दरता विद्वत्ता आयु और नीरोगता सब धर्मके फल हैं जो पुरुष धर्मा- 'त्मा हैं उन्हें ये सुलभ रीतिसे प्राप्त हो जाते हैं। नैमित्तिक से इस बातका पता लग चुका था कि सुकुमाल मुनिदर्शनसे ही दिगंबर दीक्षा धारण करलेगा इसलिये सुकुमाल की माकी यह कडी आज्ञा थी कि कोई मुनि उसके घरमें आहारकेलिये न श्रावे तथा सुकु- मालको भी वह धरके भीतर ही रखनी थी कभी भी वाहर नहि निकलने देती थी । एक दिन मुनिराज गुणधराचार्य जो सुकुमाल के मामा थे, उनके महलके पश्चिमभागके क्रीडा उद्यानमें आकर विराजमान होगये । सुकुमालकी माको जिससमय मुनिराज गुण- धरका पता लगा वह शीघ्र ही उनके पास पहुंची और बोली- "मुनिराज ! आपको यहां न रहना चाहिये।" परंतु मुनि- + आराधनासार हिंदी टीका सहित राजने उसके वचनोंपर कुछ ध्यान न दिया । वे मौन साधकर वहीं विराजमान रहे आये । ज्योंही प्रातःकाल हुआ मुनिराज चडे उच्च स्वरसे-जिससे समस्त ऊर्ध्वलोकका ज्ञान होता था ऐसी ऊर्ध्व प्रज्ञप्तिका पाठ पढने लगे। मुनिराजकी वह गंभीर ध्वनि सुकुमालके कानोंमें भी पडी । उन्हें शीघ्रही इसवातका जातिस्मरण हो गया कि मैने पूर्व भवमें अच्युतस्वर्गमें ऐसे ही और ये ही सुख भोगे थे । वस ! उन्हें एकदम भोगोंसे वैराग्य हो गया और अपना साक्षात् समस्त. वृत्तांत जान वे शीघ्र ही मुनिराजके पास आगये । मुनिराज ने भी उन्हें धर्मोपदेशरूपी अमृतसे तृप्त- कर इसप्रकार कहा- "वत्स ! अब तुम्हारी आयुमें केवल तीन दिन ही बाकी रहे हैं। अब तुम्हें अपने परलोकके सुधारनेका उपाय करना चाहिये ।" वस महात्मा सुकुमाल भी आसन्न भव्य थे । मुनि- राजका उपदेश सुनते ही उन्होंने समस्त परिग्रहका त्याग करदिया पुनिराजको नमस्कार कर दिगंवर दीक्षा धारण करली और नगरके वाद्य उद्यानमें तीन दिनका संन्यास धारणकर ध्यानमें नीन होगये । जिसवनमें मुनिराज सुकुमालने योग धारण किया था उसीवनमें अग्निभूति की स्त्री भी अनेक भवोंमें भ्रमण कर भृगाली हुई । ज्योंही उस दुष्टिनीने मुनिराजको देखा पूर्नसंस्का- से उसै शीघ्र ही जातिस्मरण होगया। 'अहा इस दुष्टने वायुभूतिके भव में मुझे लानसे मारा था' ऐसा स्मरणकर कोपसे कपने लगी.और जिस लातसे मारा था उसी

माराधनासार हिंदी टीका सहित
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लातसे मुनिराजको खाना प्रारंभ कर दिया। मुनिराज सुकुमाल
भी संसारके चरित्रसे सच्चे भयभीत थे । मनमें पूर्ण समता धारण
कर वे सर्वथा ध्यानमें लीन होगये और सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान
एवं सम्यकचारित्रके अविनाभावी चिदानंद ध्यानकी सामर्थ्यसे
सर्वार्थसिद्धि विमानमें जाकर अहमिंद्र होगये ।
अयोध्यापुरीमें एक सिद्धार्थ नामका सेठ रहता था वह
धर्मात्मा और लक्ष्मीवान था एवं उसकी प्राणप्यारी भार्या
जयावती थी । सर्वार्थसिद्धि विमानकी आयु समाप्तकर सुकुमालक
जीव उन सेठ सेठानीके अनेक कलाओंका भंडार पुत्र हुया और
उसका नाम सुकोशल रक्खा गया । कुमार सुकोशल पुत्रमें जो
गुण होने चाहिये उन गुणोंका भंडार था उसकी उत्पत्ति व्यर्थ
थी। क्योंकि-
किं तेन जातु जातेन मातुर्योवनहारिणा ।
स जातो येन जातेन थाति वंशः समुन्नतिं ।।
अर्थात्-जो पुत्र माता पिताको सुख न कर उनका यौवन
नष्ट करनेवाला है उस पुत्रकी कोई आवश्यकता नहीं-उसका
होना ही अच्छा किंतु जिस पुत्रकी उत्पत्तिसे वंश समुन्नत हो
उसी पुत्रका जन्म सार्थक है। जिससमय सेठ सिद्धार्थ ने प्र.
के कारण पुत्र सुकोशलका मुंह देखा वह एकदम सं
उदासीन हो गया और मुनिराज समाविगुप्तके चरणोंमें जा.
दिगंवर दीक्षा धारण करली.] ठीक भी है
विरज्य कामभोगेषु विमुच्य वपुपि स्पृहां
-

आराधनासार हिंदी टीका सहित
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भीतः संसारतो भव्यस्तपश्चरति दुश्वरं ।
अर्थात्--काम भोगोंसे विरक्त होकर शरीर में निस्पृह और
संसारसे भयभीत भव्य पुरुष दुश्चर तपका आराधन करते हैं।
जिससमय सेठानी जयावतीको यह समाचार मिला कि मेरे पति
सिद्धार्थने घरवार छोड दिगंबर दीक्षा धारण करली है वह एक
दम क्रोधसे अंधी होगई और बनमें जाकर मुनि सिद्धार्थके सामने
खडी होकर इस प्रकार तर्जना करने लगी-
रे दुराचारी पापी ! बालक पुनको बोडकर तूने यह दिगंबर
वृत्ति धारण की है ? अरे बालक पुत्रका पालना सर्वथा
कष्टसाध्य है । वता! अव उसका पालन कैसे हो ? क्या जो पुरुप
विवेकशून्य हैं वे दिगंबर वृत्तिको धारण कर भी इष्ट पदार्थ पा
सकते हैं ! क्योंकि नग्न तो सांड भी फिरते रहते हैं परंतु उन्हें
कोई इष्टसिद्धि नहि मिलती। उत्तम पुरुष वे ही कहे जाते हैं जो
निंदित भी सैकड़ों कार्यकर वाल पुत्रका पालन करते हैं क्योंकि
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कहा भी है-
:
वृद्धौ च मातापितरौ साध्वो भर्या सुत : शिशुः।
अपकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुरब्रवीत् ।।
यात-मनुका सिद्धांत है कि यदि माता पिता वृद्ध हों,
स्त्री पतिव्रता हो और पुत्र बालक हो तो सैकडों निंदित कार्य
करनेपर भी उनका पालन करना चाहिये उन्हें छोड न देना
चाहिये। बताओ आपने दिगंवर मुद्रा धारणकर क्या इष्ट लाभ
किया " इसप्रकार मुनि सिद्धार्थपर वचनवाणवर्षा कर वह उनके

10 आराधनासार हिंदी टीका सहित गुरुको भी इसप्रकार उपालंभ देनेलगी-- मुने ! स्त्री और पुत्रके इकलोते पालक सेठको दीक्षा देकर आपने बिना विचारे कार्य करडाला। इससे आपको पछताना होगा। क्योंकि अपरीक्षित न कर्तव्यं कर्तव्य सुपरीक्षित । पश्चाद्भवति संतापो ब्राह्मणी नकुलं यथा ।। अर्थात्-काय विना विचार न करना चाहिये । खूब विचारकर करना चाहिये अन्यथा पीछे संताप भोगना पड़ता है जिसप्रकार सर्पको मारकर पुत्रकी रक्षा करनेवाले नोलेको अपने पुत्रका मारनेवाला जान उसे मारकर ब्राह्मणीने संताप भोगा था। इस प्रकार सेठानी जयावतीने क्रोधसे अपनेको न संभालकर दोनों गुरु शिष्योंको मेरे घर और नगरमें प्रवेश न करना चाहिये ऐसा भी कह डाला । यद्यपि उसके वचन बड़े भारी कठोर थे। संभव था मुनियोंका चित्त तुब्ध हो जाता । परंतु परम धीर वीर उन मुनिराजोंको जरा भी मनमें क्षोभ न हुआ उनका चित्त शांत ही रहा आया। ठीक भी है- लोक एप बहुभावभावितः स्वार्जितेन विविधन कर्मणा । पश्यतोऽम्य विकृतीजडात्मनः क्षोभमेति हृदयं न योगिनः ।। अर्थात्-पूर्वोपार्जित नानाप्रकारके कर्मोंकी कृपासे यह लोक नानाप्रकारकी चेष्टा किया करता है। लोग कभी निंदितभाव तो कमी उत्तम भावोंका अवलंबन करते हैं यद्यपि इससे नानाप्रका- के विकारोंको देखकर मुर्ख मनुष्यके हृदयमें क्षोभ हो जाता है - आराधनासार हिंदी टीका सहित है? - परंतु योगीका मन जरा भी चुन्ध नहिं होता। इसतरह परमो- पशमकी कृपासे किसीप्रकारके क्रोध और संतापको न कर दे दोनो मुनिराज दूसरे देशको चलेगये । मुनि सिद्धार्थने अपने गुरुसे बहुतसा शास्त्राभ्यास किया जिससे उनका अज्ञानरूपी अंधकार सर्वथा विलीन होगया। बहुत वर्षके बाद मुनिराज सिद्धार्थ गुरुकी आज्ञानुसार पुनः अयोध्या आये । पुरवासी नर नारियोंने उनकी भक्तिभावसे पूजा बंदना की। कुमार सुकोशल भी मुनिराजके दर्शनोंको आये मुनिराजके दर्शन मात्रसे मारे आनंदके उनका सारा शरीर पुल- कित होगया । अपने हृदयके आनंदको वे जरा भी गुप्त न रखसके और अपनी मातासे इसप्रकार पूछने लगे- "मा ! इन मुनिराजके दर्शनसे मन अत्यंत प्रसन्न होता है नेत्रोंको भी परम आनंद प्राप्त होता है यह महात्मा कौन और कहांसे आये हैं ?" सुकोशलकी मा मुनिराज सिद्धार्थके दीक्षा कालसे ही अपने हृदयमें पूरी कलुपता रखती थी एवं इससमय उनके साक्षात् दर्शनसे और भी उसकी क्रोध कालिमाकी मात्रा बढवारीपर थी इसलिये जब उसने कुछ भी जवाव न दिया तब थायने कहां- पुत्र ! मुनि तुम्हारे पिता हैं इनके प्रतिज्ञा थी कि जिस समय पुत्रका मुंह देखूगा उसीसमय दिगंबर दीक्षा धारण कर- लूगा इसलिये तुम्हारे जन्मते ही ये मुनि होगये थे । बुद्धिमान मनुष्य संसारमें अधिक लिप्त रहना नहीं चाहते | "जिम समय ६२ आराधनासार हिंदी टीका सहित . कुमार मुकौशलने अपने पिताका चरित्र सुना वे भी एक दम विषय भोगोंसे विरक्त हो गये । ठीक भी है- विपयविरतिः संगत्यागः कपायविनिग्रहः शमदमयमास्तत्त्वाभ्यासत्तपश्चरणोद्यमः । नियमितमनोवृत्तिर्भक्तिर्जिनपु दयालुता भवति कृतिनः संसाराब्धेस्तटे निकटे सति ।। अर्थात्-जिस पुण्यवान् पुरुपका संसाररूपी समुद्रका तट निकट है, जो शीघही संसारका नाशकर मोक्ष सुख का अनुभव करने वाला है उस महानुभावमें विषयोंसे वैराग्य समस्त परिग्रहका त्याग कपायोंका जीतना,शांति दांति और यम नियम आदिका धारण, तत्त्वोंके अभ्यास, तप आचरणका उद्यम, चित्तके व्यापारका रो- कना, भगवान जिनेंद्र में भक्ति और दयालुपना आपसे आप आ- कर प्रकट होजाते हैं । वस जिस समय कुमार सुकोशलको संसार शरीर भोगोंसे वैराग्य होगया वे माताको विना ही पूछे मुनिराज सिद्धार्थके चरण कमलोंमें दिगंबर दीक्षासे दीक्षित होगये। पुत्रको दीक्षित देख सुकोशलकी माको तीव्र दुःख हुआ। जिससे पुत्रशोक के बार्तध्यानसे शीघ्रही उसके प्राण पखेरू उडगये और मगध देश के भयंकर वनके मंगलनामक पर्वत पर वह व्याघ्री हुई। सो यह वात सर्वथा सत्य है कि जो जीव पुत्र आदि अभीष्ट पदार्थके मर- जाने या नाश हो जानेपर शोक करता है वह अवश्य दुर्गतिका दुःख भोगता है क्योंकि कहा भी है- मृत्योर्गोचरमागते निजजने मोहेन यः शोककृ- -

आराधनासार हिंदी टीका सहित
नो गंधो पि गुणस्य तस्य बहवो दोषा पुनर्निश्चितं ।
दुःखं वर्धत एव नश्यति चतुर्वर्गो मतविभ्रमः
पापं रुक् च मृतिश्च दुर्गतिरथ स्यादीर्घसंसारिता ।।
अर्थात-जो जीव अपने इष्टजनके मरजानेसे शोक करता है
उसे कोई गुण प्राप्त नहिं होता उन्टा वह दोपोंका स्थान वन
जाता है, अनेक प्रकारके दुःखोंका सामना करना पडता है, धर्म
अर्थ काम मोक्ष चारो पुरुषार्थ उसके नष्ट होजाते हैं, बुद्धि भ्रष्ट
होजाती है और पाप रोग मरण दुर्गति संसारभ्रमण आदिकी
प्राप्ति होती है।
कुछ दिन बाद सिद्धार्थ और सुकोशल दोनों मुनिराज भी
उसी वनके मंगल पर्वतपर जहां कि वह व्याघ्री रहती थी आये
और चार मासका अनशन धारण कर वहीं विराजमान, होगये
जिससमय उनके चार मास बीत गये तो उन्होंने अपना योग
संकोच लिया और पारणाके लिये जाते थे कि वीचमें ही उन्हें
सामने वह व्याघ्री दीख गई। इधर तो यह विचार कर कि यह
पापिनी अवश्य कुछ अनिट करेंगी ये दोनों सन्यान धारण कर
शुलध्यानमें मग्न हुये और उधर पूर्वजन्मके संस्कारसे क्रोधकी
भयंकर ज्यालासे विकराल वह वाधिनी देखते २ दोनों मुनिराजों
को भक्षण करगई। दोनो मुनिराज शुक्रव्यानमें लीन थे इसलिये
उसके माहात्म्यते-चिदानंद चैतन्यस्वरूप अपनी आत्माकी
ओर अभिमुख होनेके करण दोनों सर्वार्थसिद्धि में जाकर
अहमिंद्र होगये॥ ४६॥ अब मनुष्यकृत उपसर्ग किन माहा-

a४ आराधनासार हिंदो टीका सहित माओंने सहा था सो बताते हैं- गुरुदत्तपंडवेहिं य गयवरकुमरेंहि तह य अवरहि । माणुसकइ उवसग्गो सहिश्रो हु महाणुभावेहिं ॥५०॥ गुरुदत्तपांडवैश्च गजवरकुमारेण तथा चापरः। मनुष्यकृत उपसर्गः सोढ हि महानुभावैः ॥५०॥ अर्थ-राजा गुरुदत्त, युधिष्ठिर आदि पांच पांडव, यदुवंशी गजकुमार तथा अन्य महानुभावोंने भी मनुष्यकृत उपसर्ग सहन किया था। राजा गुरुदत्त हस्तिनापुरका स्वामी था जो न्यायपूर्वक प्र- जासे कर लेकर धनसंचय करता था। एक दिन प्रजासे यह सुनकर कि एक व्याघ्र प्रतिदिन नगरमें आता है और जीवोंका विध्वंसकर बडा दुःख देता है, राजा गुरुदत्तको वडा कोष आया । वह शीघ्रही सेना लेकर द्रोणीमान पर्वतपर जहां कि: वह व्याघ्र रहता था, पहुंचा और जीवोंके विध्वंसक व्याघ्रको चारो ओरसे घेर लिया। जब वाघने यह दृश्य देखा तो वह मारे भयके गुफामें घुस गया । राजाको और भी उसपर क्रोध आया उसने शीघ्रही गुफाके भीतर लकडी भरवादी और आग लगादी। जिससे अग्नि की प्रचंड ज्वालासे वाघ गुफाके भीतर ही भीतर जलकर मरगया और अकामनिर्जराके बलसे चंद्रपुरी .. नगरीमें कपिल नामक ब्राह्मण हुआ । इसके बाद एकदिन राजाको भी संसारसे वैराग्य होगया उसने पुत्रको राज्य दे मुनिव्रत धारण कर लिये । विहार करता

आराधनासार हिंदी टीका सहित
करता किसीसमय वह चंद्रपुरीमें आ पहुँचा और कपिल
ब्राह्मणके खेतके समीप कायोत्सर्गमुद्रा धारण कर विराजमान
हो गया । कपिल वालण अपनी स्त्रीको यह आज्ञा देकर कि तू.
भोजन लेकर जल्दी आना खेतपर चल दिया। वह खेत उस
दिन जोतनेके अयोग्य था इसलिये कपिल दूसरे खेतपर चला
गया । कपिल जिस खेत पर आनेको अपनी स्त्रीसे कह पाया
था वह उसीपर आई और वहां अपने पतिको न पा पासमें
विराजमान मुनिसे उसने पूछा-
"मुने! इस खेतपरसे ब्राह्मण कहां गया ? मुनिराजको भला
ऐसी वातोंके उत्तर प्रत्युत्तरसे क्या प्रयोजन था । उन्होंने
ब्राह्मणीके प्रश्नका कुछ भी उत्तर न देकर मौन धारण कर लिया
जब वालणीने देखा कि मुनिराज कुछ भी जवाव नहिं देते तो
वह अपने घर लौट आई । जब दिन बहुत चढ गया और
ब्राह्मणी भोजन लेकर खेतपर न पहुंची तो कपिलको वडा
क्रोध आया वह जोतना बंदकर शीघ्र ही घर वाया और ताडना
पूर्वक अपनी स्त्रीसे इसप्रकार कहने लगा--
री रांड ! यदि तुझ मेरा पता नहिं मालूम हुआ तो तू
मुनिको पूछकर क्यों न मेरे पास आई ? उत्तरमें ब्राह्मणीने
कहा-
मैंने तो मुनिको पूछा था परंतु उन्होंने कुछ भी जवार नहि
दिया था इसलिये मैं आपके पास न पहुंच पाई। वस ! दुष्ट
ब्राहाण स्त्रीसे तो कुछ न कह सका, विना कारण मुनिराज पर
--

आराधनासार हिंदी टीका सहित कुपित हो वह शीघ्र ही उनके पास पहुँचा और सेमरकी रुईसे उनका सारा शरीर वेष्टित कर आग लगा शांत हुआ । मुनि- राज गुरुदत्त परम उपशमी थे उन्होंने अग्निकी वेदनांकी पोर: जरा भी विचार न कर शुक्लध्यानमें उपयोग लगाया जिससे उन्हें शीघ्रही केवलज्ञान प्राप्त हो गया । इसीसमय केवली मुनि- राज गुरुदत्तकी पूजाके लिये मुर असुर शीघ्र ही वहां आगये । जव ब्राह्मणने सुर असुरोंको मुनिराजकी पूजा करते देखा तो उसे बडा आश्चर्य हुआ । उसने मनमें अपने कृत्यकी बार बार निंदाकी और मुनिराजके पैरोंमें गिरकर कहा- हे दयासागर स्वामी ! मेरा पाप तीत्र है । प्रार्थना है इस वोर पापसे मैं नारकी न होऊं ऐसा उपायकर रक्षा कीजिये । मुनि परम दयालु थे उन्होंने उसे आसन्न भव्य जान दिगंबर दीक्षा देदी । इसप्रकार यह गुरुदत्तकी कथा हुई । अव पांडवोंकी कथा कहते हैं- युधिष्ठिर भीम अर्जुन नकुल और सहदेव ये पांचों पांडव हस्तिनापुरकं स्वामी राजा पांडुके पुत्र थे। पूर्वोपार्जित शुभ पुण्यके उदयसे ये दुर्जय पराक्रमी दुर्योधन आदिको एवं अन्य भी शत्रुओकों जीत कर अपनी कीर्ति ध्वजाको फेराते हुये सानंद दक्षिण मथुरा का राज्य करते थे। कदाचित भगवान नेमि- नाथका निर्वाण सुन इन्हें एकदम संसारशरीरभोगोंसे विरक्ति हो गई। अपने पुत्रको राज्य दे तत्काल दिगंबर दीक्षा धारण करली और घोर तप वपते हुये शत्रु जय पर्वतकी सिखरपर - भाराधनासार हिंदी ..ठीका सहित ६७ आरूढ हो - पर्वतमें उकीलेके समान प्रतिमायोगसे विराजमान होगये । जिससमय दुर्योधनके वंशके राजपुत्रों को पांडव शत्रु- जय पर्वतपर विराजमान हैं, यह पता लगा वे पूर्व वैरका स्मरण कर शीघ्र ही वहां आये और उन्हें बुरी तरह सताने लगे। उन दुष्टोंने लोहके मुकुट कुंडल हार कर्णभूषण और कडे बनाकर जाज्वल्यमान अग्निमें तपाकर पांडवोंक भुजा आदि अवयवोंमें पहिनाये, अग्निसे जाज्वल्यमान लोहके सिंहासनोंपर जवरन उठा उठाकर बिठाया । युधिष्ठिर भीम और अर्जुन ये तीनों मुनिराज तो यह सब हमारे किये कोंका ही फल है इस बातको जानकर कोंके फलसे भिन्न किंतु ज्ञानोपयोग दर्शनोपयोगसे अभिन्न- स्वरूप आत्माकी भावनाकर शुक्लध्यानके क्लसे घातिया कमाको जडमूलसे उखाडकर केवलज्ञान पाकर एवं उसीसमय शेष अघ- तिया कमोंका भी नाशकर अंतकृत् कंवली हो अचिंत्य अवि- नाशी अध्यावाधमय पोत सुखका अनुभव करने लगे परंतु नकुल और सहदेयके चित्त में कुछ अशांतिका प्रसार होगया । सहसा उनके मन में ये विकल्प उठ गया कि इस समय महा- राज युधिष्ठिर आज्ञा दें तो इन दुष्टोंको अभी हम बाहुबलसे पछाड़ मारें किंतु उसीसमय अपनेको मुनि जान उन्होंने विक- ल्पोको सर्वथा छोड़ दिग-मुनिमुद्राके स्मरण होते ही वे क्रोधा- दिमय अपनी आत्माकी निंदा करने लगे और परम धर्म्यध्यान के माहात्म्यसे सर्वार्थसिद्धि में जाकर अहमिंद्र होगये । गजकुमार की कथा- है आराधनासार हिंदी टीका सहित किसीसमय द्वारिकापुरीमें कृष्णके पिता राजा. वसुदेव निवास करते थे उनका समस्त राजकुमारोंमें पराक्रमी पुत्र गज- कुमार था एक दिन राजा कृष्णने यह घोपणां जारी की कि जो महानुभाव पोदनपुरके अधिपति राजा अपराजितको संग्राममें जीतकर और बांधकर यहां ले आवेगा उसे मनोवांछित पदार्थ दियाजावेगा । कुमारगजने जब यह घोषणा सुनी तो वह शीघ्र ही अपराजितसे युद्ध करने चलदिया । संग्राममें जीतकर उसे बांध लाया और राजा कृष्णके चरणकमलोंमें लाकर पटक दिया कुछ दिन वाद गजकुमारको काम सेवनका बुरा व्यसन पड़गया यद्यपि उसके बहुतसी स्त्रियां थीं तथापि वह द्वारिकापुरीकी स्त्रियोंका सेवन करता हुआ पांसुल सेठकी स्त्रीमें आसक्त हो गया सो ठीक भी है- स्वाधीनेपि कलत्रे नीचः परदारलपटो भवति । परिपूर्णेपि तडागे काकः कुम्भोदकं पिबति ।। अर्थात्-जिसप्रकार निर्मल जलसे लबालब भरे हुये तालाद के मोजूदा रहनेपर भी काक घड़ेमें चोंच डालकर पानी पीता है उसीप्रकार अपनी अनेक स्त्रियोंके रहनेपर भी नीच मनुष्य पराई स्त्रियोंमें ही लालसा करता रहता है ; कदाचित् वह भगवान नेमिनाथकी वंदनार्थ उनके समवस- रणमें गया। भगवान उसममय परस्त्रियांके त्यागका उपदेश दे रहे थे ज्योंही कुमार गजने भगवानके मुखसे चिंताव्याकुलतामयारतिमतिभ्रंशातिताहभ्रम- . % 3

६६
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आराधनासार हिंदी टीका सहित
क्षुत्तृष्णाहतिरोगदुःखमरणान्येतान्यहो आसतां ।
थान्यत्रैव परांगनाहितमतेस्तद्भरि दुःखं चिरं
श्वभ्रभापि यदग्निदीपित तनुर्लाहांगनालिंगनात् ॥
अर्थात्-जो मनुष्य परस्त्रीलंपट हैं उन्हें चिंता व्याकुलपना
भय द्वेप बुद्धिका नाश अत्यंतदाह भ्रांति क्षुधा प्यास पीड़ा रोग
दुःख और मरणका क्लेश भोगना पड़ता है यह तो दूर रहो और
भी चिरकालतक अनेक दुःख भोगने पड़ते हैं और नरकमें गरम
लोहेकी पुतलियोंसे आलिंगन करना पडता है। यह उपदेश सुन
उसे एक दग संसार शरीर भोगोंसे विरक्ति होगई । भगवान
जिनेन्द्रके चरणों में दिगंवर दीक्षा धारण करली और गुरुकी.
सेवासे शास्त्रोंका अभ्यास किया। कुछ दिन बाद मुनि गजकुमार
तो गिरनार पर्वतकी विकट अटवीमें संन्यासमरण स्वीकारकर
विराजमान होगये और उधर उस सेठको लव यह स्मरण आया,
कि इस गजकुमारने मेरी स्त्रीके साथ व्यभिचार किया था वह
एकदम क्रोधसे उवल उठा वह शीघ्र ही मुनिराज गजकुमारके
पास आया और लोहेकी कीलोंसे कीलितकर उन्हें पीड़ा दे दूर
भगगया । मुनि गजकुसार परम ध्यानी थे धर्म्यध्यानमें लीन
होकर उन्होंने समस्त दुःखको सह लिया और शुभ परिणामोंकी
कृपासे स्वर्गमें जाकर देव होगये ॥ ५० ॥ जिन महानुभावोंने
देवकृत उपसर्गसहा अव उनके नाम बतलाते हैं-
अमरको उवसम्गो सिरिदत्तमुवण्णभइमाईहिं ।
समभावणाए सहिओ अप्पाणं झायमाणेहिं ॥५१॥.
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१०० राधनांसार हिंदी टीका सहित . अमरकृत उपसर्गः श्रीदत्तसुवर्णभद्रादिभिः । समभावनया सोढ आत्मानं ध्यायद्भिः ।। ५१ ।। अर्थ-यात्माका भले प्रकार ध्यान करनेवाले श्रीदत्त सुवर्णभद्र आदि महामुनियोंने शत्रु मित्र काच कंचनमें समान भावना रखकर देवकृत बोर उपसर्ग सहा था । किसीसमय इलावर्धन नगरके प्रतिपालक राजा श्रीदत्त थे। उनकी स्त्रीका नाम अंशुमली था और ये दोनों दंपति प्रतिदिन जूआ खेला करते थे। एक दिन राजा श्रीदत्त रानी अंशुमतीसे जूनामें हार गये । रानी अंशुमतीके पास एक शुक था जिससमय राजा हार गये उससमय उस शुक्रने जमीनपरं यादगारीके लिये यह कह कर कि एक बार राजा हार गये, एक रेखा खींच दी। तोतेके उस असभ्य वर्तावपर राजा को वडा क्रोध आयांक्रोध- वश दीन भी उस तोतेको दुष्ट श्रीदत्तने गला घोंट कर शीघ्र ही मार डाला। ध्यान विशेषके माहात्म्यसे उधर तोताका जीव तो जाकर व्यंतर जातिका देव हो गया और इधर राजा श्रीदत्त एक दिन अपने सुन्दर महलकी छतपर बैठे थे अचानक ही मेधके महलको नष्ट हुअा देख उन्हें वैराग्य हो गया। राज्यभार पुत्रको सापकर दिगंवर दीक्षासे दीक्षित हो गये और अनेक प्रकारके शास्त्रोंका अभ्यास और घोर तप आचरण करते हुये काल व्यतीत करने लगे। एकदिन मुनिराज श्रीदत्त शीत ऋतुमे कायोत्सर्ग मुद्रा धा- रण कर नगरके बाह्य उद्यानमें विराजमान थे। पूर्वभवके तोतेके भाराघनासार हिंदी टीका सहित . - जीव व्यंतरको अपने पूर्वभवका स्मरण होयायौं । क्रोधसे भ्रष्टम- ति हो वह शीघ्र ही मुनिराज श्रीदत्तका पता लगा उनके पास आया और शीतल जलकी वर्षा करने लगा जिससे मुनिराजको परम कष्ट हुआ परंतु वे महा धीर वीर थे। अपने सहज शुक्ला- म ध्यानसे विचलित न होकर उन्होंने समस्त परीपहोंको सहलिया और केवलज्ञान प्राप्तकर अचिंत्य अव्यावाध निर्माण सुखका अनुभव करने लगे ॥५१॥ हे आत्मन् ! जैसा इन महामुनियोंने उपसर्ग सहा था वैसा तू भी सह अब इसप्रकार आत्माको परी- पहोंके सहन करनेकेलिये उत्साहित करते हैं- एपहिं अवरहिं य जह सहिया थिरमणेहिं उवसग्गा। विसहसु तुमंपि मुणिवर अप्पसहावे मणं काऊ ॥५२॥ एतैरपरैश्च यथा सोढा स्थिरमनोभिरुपमः। विपहस्व त्वमपि मुनिवर आत्मस्वभावे मनः कृत्वा ॥३२॥ अर्थ-हे मुनि ! सुकुमाल आदि महामुनि एवं अन्य भी महामुनियोंने निश्चलरूपसे उपसगौंको सहा है इसलिये मनको आत्मस्वरूप के चितवनमें लगाकर तुझ भी उपसर्ग सहलेने चाहिये । भावार्थ-प्रशुभकर्मके उदय से मुनियोंको उपसौंका सामना करना पड़ता है। जो मुनि कोंका फल भलेप्रकार वि- चार कर उपसर्ग सहलेते हैं उन्हें निराकुलतामय सुखकी प्राप्ति होती है । सुकमाल आदि महामुनियोंको भी अशुभकर्मके उदयसे घोर उपसगाँका सामना करना पड़ा था और उपसगाके भयसे ध्यानले विचलित न हो उन्होंने परम अतींद्रिय सुखका रसास्वा- - “१०२ आराधनासार हिंदी टीका सहित दन किया है । ग्रंथकार यहां मुनियोंको उपदेश देते हैं कि हे पु- 'नियो ! आत्मस्वरूप में लीन हो जिसप्रकार सुकुमाल आदि म- हामुनियोंने घोर उपसर्ग सहा और अतींद्रिय सुखका रसास्वादन किया उसीप्रकार तुमभी आत्मस्वरूप में लीन होकर उपसगों को सह डालो और अतींद्रिय सुखका लाभ करो ॥५२॥ इंदियवाहेहिं हया सरपीडापीडियंगचलचित्ता। 'कथपि ण कुणंति रई विसयवणं जंति जणहरिणा ॥ ५.३॥ इंद्रियव्याधैर्हताः शरपीडापीडितांगचलचित्ताः । कुत्रापि न कुर्वति रतिं विपयवनं यांति जनहरिणाः ।। ५३ ॥ अर्थ-ये जीवरूपी हरिण इंद्रियरूपी व्याधोंसे पीडित ओर उनके तीक्ष्ण बाणोंकी तीनवेदनासे चंचल हो किसी पदार्थ में प्रेम नहिं करते सीधे विपयरूपी वनकी ओर दौडते हैं । भावार्थ- जिसप्रकार व्याओंके तीत्र वाणोंसे पीडित और उनकी वेदना न सहार सकनेके कारण महाजयभीत हरिण अन्य किसी भी पदा- र्थमें प्रेम न कर वनको दौडते हैं उसीप्रकार इंद्रियां व्याध हैं, कामदेव आदि उनके तीव्र वाण हैं, इंद्रियों के विषय वन हैं और मनुष्य हरिण हैं इमलिये जिससमय ये जीवरूपी हरिण इंद्रिय- रूपी व्याघोंके काम उत्तमोत्तम शब्द श्रवण आदि तीव्र वाणों से विद्ध होते हैं और भयभीत हो चंचल बन जाते हैं उससमय वि- ना विचार विषयरूपी वनकी ओर दोड निकलते है । उत्तमोत्तम माला स्त्री आदि पदार्थोके भोगोंमें जो कि परिणाममें महादुःख आराधनासार हिंदी टीका सहित १०३ 1. देनेवाले हैं, मग्न हो जाते हैं । जिससमय उनका वियोग हो जाता है उससमय इसलोकमें महादुःख पाते हैं और परलोकमें नरक तिथंच आदि गतियोंमें जाकर भी तीव्र दुःखोंका सामना करते हैं इसलिये विद्वानोंको चाहिये कि दुःखोंसे भयभीत हो इंद्रियोंको वशकर वे परमात्माके ध्यानमें लीन हों॥ ५३ ॥ जो मुनि सन्यस्त हैं यदि उनके चित्तमें विषयोंकी अभिलापा हो जाय तो उन्हें क्या फल होता है यह वात बतलाते हैं- सव्वं चायं काऊ विसए अहिलससि गहियसरणासे जह तो सब्बं अहलं दंसण णाणं तवं कुणसि ।५४॥ सर्वं त्यागं कृत्वा विपयानभिलपास गृहीतसन्यासे । यदि तदा सर्वमफलं दर्शनं ज्ञानं तपः करोपि ।। ५४ ।। अर्थ-समस्त परिग्रहोंका त्यागकर और सन्यास धारणकर यदि विषयोंमें अभिलाषा हो जाती है तो सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्तपका पाराधन विफल हो जाता हैं । भावार्थ-सम्य- ग्दर्शन सम्यग्ज्ञान आदिका फल संवर निर्जरा और मोक्षकी प्राप्ति है। मुनिगण संसारको विनाशीक दुःखदायी समझ और मोक्ष यादि फलको हितकारी एवं अविनाशीक समझकर वाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारकै परिग्रहका त्याग करदेते हैं और मुनिवृति धारण कर घोर परीपह सहन करने की मनमें ठान लेते हैं। यदि उसस- भय किसी कारणवश साक्षात् विषयभोग न कर उनको भोगनेकी लालसा ही मुनियों के चित्तमें हो जाय तो सम्यग्दर्शन आदि के मोन आदि फलोंका लाभ नहीं होता उल्टा उस निंदित

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आराधनासार हिंदी टीका सहित
अमिलापासे अनंत कालपर्यन्त संसारमें घूमना पडता है और
घोरसे घोर दुःखोंका सामना करना पड़ता है । जैसा कि कहा है-
पठतु सकलशास्त्रं सेवत्तां सूरिसंघान्
दृढयतु च तपश्चाभ्यस्यतु स्फीतयोगं ।
चरतु विनयवृत्तिं बुध्यतां विश्वतत्त्वं
यदि विषयांवलासः मर्वमेतन्न किंचित् ॥
अर्थात्-समस्त शास्त्रों को भी पढजाओ, मुनियोंके संघ
की भी पूर्ण सेवा करो, दृढरूपसे तपका भी आराधन करो,
प्रचंड भ्यानका भी अभ्यास करो, विनयी भी बनो और समस्त
तत्त्वोंके ज्ञाता भी बन जाओ यदि चिनमें विषयों की अभि-
लापा है तो शास्त्रज्ञान आदिका कुछ भी फल नहीं होता।
अन्यत्र अभिलापाकी तो बात क्या ? यदि 'मुझे मोक्ष
मिलजाय' यह मोक्षमें भी अभिलापा होजाय तो वह तप आदि
कार्यकारी नहीं। क्योंकि
स्पृहा मोक्षेपि मोहोत्या तन्निधाय जायते ।
अन्यस्मिन् तत्कय शांताः स्पृहयति मनीपिणः ।।
अर्थात्-मोहनीय कर्मकी प्रबलतासे यदि मोक्ष में भी
इसप्रकारकी इच्छा हो जाय कि 'हमें मोक्षकी प्राप्ति होजाय' तब
मोक्षकी प्राप्ति नहिं होती अर्थात् जब इच्छा मोक्षकी प्राप्तिमें भी
बाधक होजाती है तब अन्य पदार्थों में की हुई वह कैसे शुभकल्या-
रणको प्रदान करसकती है ? इसलिये जो पुरुप शान्त और
विद्वान हैं वे कभी भी किसी वातकी अभिलापा नहिं करते ।

माराधनासार हिंदी टीका सहित - फिन्तु शुद्ध परमात्माका ही आराधन करते रहते हैं ॥ ५४॥ जब मुनि समस्त दोषोंको दूर करना चाहता है तब वह उन्हें दूर क्यों नहिं कर सकता। यह बतलाते हैं- इंदियविसयवियारा जाम ण तुटूंति मणगया खवरो ताव ण सका काउं परिहारो णिहिलदोसाणं ।।५।। इंद्रियविषयविकारा यावन्न त्रुट्यांत मनोगताः आपकः । तावन्न शक्नोति कतु परिहारं निखिलदोषाणां ॥ ५५ ॥ अर्थ-जवतक मुनि मनमें उठे हुये इंद्रिय विकारोंको दूर नहिं करता तबतक वह समस्त दोपोंको भी दूर नहिं कर सकता । भावार्थ-इंद्रिय विषयों के विकारका अभाव कारण है और समस्त दोपोंका नाश कार्य है । जबतक इंद्रियोंके लि. षयोंका त्याग न होगा तबतक कभी समस्त दोषोंका नाश न होसकैगा। इंद्रियोंके विषय स्पर्श रस गंव आदि ऊपर बतला दिये गये हैं। जबतक मनमें इसवातकी अभिलापा बनी रहती है कि अमुक स्पर्श वा अमुक उत्तम गंध की मुझे प्राप्ति होजावे तबतक कभी परिणाम निर्मल नहि रहसकते सदा कर्मों का आस्रव हुआ करता है । जिससे अनेक दोपोंका सामना करना पडता है। किन्तु जिससमय किसीप्रकार स्पर्श ग्रादिकी लालसा विकार नए हो जाते हैं। मन शांत होजाता है उससमय किसी प्रकारकी समलता नहिं होती। समलता न होनेसे कर्मबंध और उनके कार्य दोपोंका भी सामना नहिं करना पडता । इसलिये जो मुनि यह चाहते है कि समस्त दोपका नाश होजाय उन्हें १०६ आराधनासार हिदी टोका सहित चाहिये कि वे मनमें किसीप्रकारके इंद्रियों के विकारोंको न फटकने दें ॥५५॥ इंद्रियोंसे पीडित मनुष्य किनका शरण लेते हैं ? यह बतलाते हैं- इंदियमल्लैहिं जिया अमरानुरणरवराण -संधायां । सरणं विसयाण गया तत्थवि मण्णंति सुक्खाई ।। इंद्रियमल्लर्जिता अमरासुरनरवराणां संघाताः । शरणं विषयाणां गतास्तत्रापि मन्यते सौख्यानि ॥ ५६ ॥ अर्थ-देवेंद्र असुरेंद्र और नरेंद्र जिस समय इंद्रियरूपी मल्लों से हार जाते हैं इंद्रियोंके वश हो जाते हैं उससमय वे विषयोंका शरण लेते हैं और उनही में सुख मानते हैं । भावार्थ-वास्तविक सुख अव्यावाश्रमय है और वह इंद्रियोंका सर्वथा विजयकर मोक्षस्थानकं शरण लेनेपर ही प्राप्त होता है परंतु जिससमय असुरेंद्र सुरेंद्र नरेंद्र ग्रादि पुरुप अपनी आत्माकी शक्तिका जरा भी विचार न कर इंद्रियोंके आधीन हो जाते हैं उससमय वे चि- पयवनको शरण समझ लेते हैं और विपयजन्य सुखको ही मुख मान निकलते हैं परंतु यह उनकी बडी भारी भूल है क्योंकि इंद्रियोंके विषय महादुःखदायी हैं। पांचों इंद्रियोंकी तो क्या बात एक एक इंद्रियका विषय सेनन ही जीवोंका प्राणघातक हो जाता है जैसा कि कहा है- मीना मृत्यु प्रयाता रसनवशमिता दंतिनः स्पर्शकद्धा नद्धास्ते वारिमध्ये ज्वलनमुपगताः पत्रिणश्चाक्षिदोपात् । भृगा गंधोद्धताशाः प्रलयमुपगता गीतलोलाः कुरँगाः ..: जाराधनासार हिंदी टीका सहित १०७ कालव्यालेन दृष्टास्तदपि तनुधियामिद्रियार्थेषु रागः ।। अर्थात जिह्वा इंद्रियके वश होकर मछलियां जान गमा देती हैं। स्पर्शन इंद्रियके आधीन हो हाथी फंदमें फस जाता है । चक्षु इंद्रियसे पतंगा दीपक जलकर नष्ट हो जाता है। गंधसे भोरा प्राण गमा बैठना है और कर्ण इंद्रियकी आधीनता स्वीकार कर जानेके सुनने में मस्त हो हरिणं अपनी जिंदगीसे हाथ धो बैठता है तब भी न मालूम इन मूह जीवोंका क्यों इंद्रियोंके विषयोंमें तीवराग होता है ? क्यों इंद्रियोंके विषयों में सुख मानते हैं ? और भी कहा है- न तदरिरिभराजः केशरी केतुरुयो नरपतिरतिरुष्टः कालकूटोतिरौद्रः । अतिकुपेतकृतांतः पन्नगेंद्रोपि रुटः दिह विपयशत्रुदु:खमुद्द् करोति । अर्थात्-यद्यपि हस्ती सिंह राहु कुपित राजा विप यमराज और क्रुद्ध सर्प भी दुःखदायी हैं परंतु जितना उग्र दुःख विपयशत्रु देता है उतना न मत्त हाथी देमकता है, न सिंह राहु कुपितराजा विप यमराज और सर्प ही प्रदान कर सकते हैं इसलिये यदि क्षपक महानुभाव इंद्रिगोंके जालमें फस भी जाय तो उसे चाहिये कि इंद्रिय विषयोंको सुखकारी न समझकर उनका शरण न ले किंतु परम हितकारी परमब्रह्म परमात्माका शरण ले और विप- योंमें सदा ऐसा विचार करता रहे- "अवश्यं यातारश्चिरतरमुपित्वापि विषया वियोगे को भेदत्यजति न जनो यत्त्वयममृन । व्रजंतः स्वातम्यादतुलपरितापाय मनसः १०८ माराधनासार हिंदी टीका सहित 4 स्वयं त्यक्ता. येते शमसुखमनंतं विदधति ।। अर्थात्-चिरकाल रहकर भी जब विषय नष्ट ही होनेवाले हैं जरा भी फिर नहिं ठहर सकते तब स्वयं उन्हें छोडकर उनसे वियोग कर लेना क्या हानिकारक है ? अर्थात् जिससमय वे अपनेसे नष्ट होंगे तब भी वियोग होगा और यदि अपनेसे छोड दिये जायगे तब भी वियोग होगा तब फिर यह जीव स्वयं इन्हें क्यों छोडना नहिं चाहता क्योंकि यह नियम है कि जिससमय ये विपय चिरकाल ठहरकर जब अपने आप जाते. नष्ट होते, हैं उससमय चित्तको महा संताप देते हैं और जिससमय अपनेस छोड दिये जाते हैं उससमय अव्यायाधमय अचिंत्य सुख प्रदान करते हैं ॥५६॥ इन्द्रिय सुख सुख नही, यह बात बतलाते हैं- इंदियगयं ण सुक्खं परदव्वसमागमे हवे जमा। तमा इंदियविरई सुणाणि गो होइ कायब्वा ॥५७॥ इंद्रियगतं न सौख्यं परद्रव्यसमागमे भवेद्यस्मात् । तस्मादिद्रियविरतिः सुज्ञा नो भवति कर्तव्या ।। ५७ ।। अर्थ--इंद्रियजन्य सुख सुख नही क्योंकि वह परपदार्थोके संबंधसे उत्पन्न होता है इसलिये जो पुरुष ज्ञानवान हैं उन्है इंद्रिय विषयोंसे सर्वथा विमुख रहना चाहिये । भावार्थ-अन्न पान वस्त्र तांबूल चंदन स्त्री आदि परपदार्थ हैं और इंद्रियजन्य मुख इन्हीं पदार्थाके संबंधसे उत्पन्न होता है अर्थात् जिससमय अन्न पान आदि इष्ट पदार्थाकी प्राप्ति हो जाती है उससमय मुख मालूम

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आराधनासार हिंदी टीका सहित
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पड़ने लगता है परंतु यह सुख विनाशीक है और परिणाममें
दुःखदायी है इसलिये दुःख ही स्वरूप है जैसा कि कहा भी है-
सुखमायति दुःखमक्षजं भजते मंदमतिर्न बुद्धिमान ।
मधुलिप्तमुखाममंदीरसिधारां खलु को लिलिक्षति ।।
अर्थात जिसप्रकार शहदसे लिपटी हुई तलवारकी धारको
कोई भी बुद्धिमान चाटनेकी इच्छा नहिं करता क्योंकि वह सम-
झता है कि पहिले ही पहिले अवश्य मिठास मिलेगा रतु यदि
जीभ कट गई तो घोर वेदना भोगनो पडेगी उसीप्रकार बुद्धिमान
पुरुष इंद्रियजन्य सुखको भी अच्छा नहिं मानता क्योंकि वह सम-
झता है कि यद्यपि विषय प्रारंभमें भीठे हैं परंतु अंतमें महादुःख-
दायी हैं परंतु जो मूढबुद्धि हैं वे तो जान बूझकर भी विपयोंका
सेवन करते रहते हैं । इमलिये यह बात निश्चित है कि इंद्रियजन्य
सुख कभी सुख नहिं कहा जा सकता किंतु वास्तविक सुख
अव्यायाधमय है और परपदार्थासे उत्पन्न न होकर केवल
अत्मिक है-आत्मासे जायभान है । जो पुरुष विद्वान हैं-स्व परके
स्वरूपका पूर्ण ज्ञान रखते हैं और आत्मिक सुख की प्राप्तिके
अभिलापी हैं उन्हें चाहिये कि वे इंद्रियविषयोंमेंसे सर्वथा विमुखता
धारण करें-उनकी ओर जरा भी लालायित न हो ॥ ५७॥
इंदियसेणा पसरइ मणण स्वइपेरिया ण संदेहो।
तमा मणसंजमणं खवएण य हवदि कायच्वं ॥५॥
इन्द्रियसेना प्रसरति मनोनरपतिप्रेरिता न संदेहः ।
तस्मान्मनःसंयमन आपण च भवात कर्तव्यं ॥ ५८ ॥

११० आराधनासार हिंदी टीका सहित अर्थ-जिससमय मनरूपी राजा इंद्रियसेनाको प्रेरणा करता है उससमय वह अपने २ विषयोंमें प्रवृत्त होती है इसलिये क्षप- कको चाहिये कि वह अपने मनको पूर्णरूपसे वशम रक्खे। भावार्थ--जिसप्रकार सेनाका नायक राजा होता है और वह जिस ओर जानेकी सेनाको आज्ञा देता है उसी ओर सेना प्रवृत्त हो जाती है उसीप्रकार इंद्रियसेनाका स्वामी राजा मन है वह जिस ओर जानेकी इंद्रियोंको आज्ञा देता है उसी ओर इंद्रियां प्रवृत्त हो जाती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं और यह बात सभीके अनुभवमें आसकती है कि स्पर्शन आदि इन्द्रियां जो स्पर्श आदि विषयों की ओर रोकनेपर भी मुकजाती हैं वह सब मनकी ही कृपा है-उसीकी प्रेरणासे वे अपने विषयों में प्रवृत्ति करती हैं इसलिये यदि क्षपक यह चाहता है कि कि मैं इन्द्रिय विषयोंका सर्वथा त्यागकर आत्मिक सुख प्राप्त करू तो उसे चाहिये कि वह पूर्णरूपसे मनको वश करे जरा भी उसे विषय भोगनेकेलिये लालायित न होने दे।। ५८॥ मणणरवइ सुहुभुजइ अमरासुरखगणरिंद्रसंजुत्तं । णिमिसेणेकण जयं तस्सत्थि ण पडिभडो कोई ॥५६॥ मनोनरपतिः संभुक्ते अमरासुरनरखगेंद्रसयुक्त। निमिषेणकेन जगत्तस्यास्ति न प्रतिभटः कोपि ।। ५६ ॥ अर्थ-यह मनरूपी राजा, अमर असुर विद्याधर और नरेंद्रों. से संयुक्त तीनों लोकको अपने भोगके योग्य बना लेता है अर्थात् ऐसा कोई स्थान नहीं जहांपर राजा मन दोडकर, न --

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जाता हो इसलिये इसके बराबर संसारमें कोई सुभट नहीं।
भावार्थ-अमरेंद्र-कल्पवासी देवोंका इंद्र, असुरेंद्र दैत्योंका इन्द्र
खगेंद्र-विद्याधरोंका इंद्र और नरेंद्र--चक्रवर्ती कहे जाते हैं तथा
अपने २ पदोंके इच्छानुसार भोगनेसे ये भी महान और वीर
गिने जाते हैं परंतु मनकी बरावर कोई भी बलवान वीर नहीं
क्योंकि वह क्षणभरमें ही देवेंद्र आदिसे युक्त तीनों लोकके भोगों
का आस्वादन करलेता है जहां देखो वहीं पर मन तयार मिलता
है। ज्ञानार्णवमें कहा भी है-
दिकच दैत्यधिष्ण्य त्रिदशपतिपुराण्यबुवाहांतराल
द्वीपांभोधिप्रकांड खचरनरसराहीद्रवासं समय।
एतत्त्रैलोक्यनीडं पवनचयचितं चापलेन क्षणार्धे-
नाश्रांतो चित्तदैत्यो भ्रमति तनुमतां दुर्विचिंत्यप्रभाव.::
अर्थात पूर्व पश्चिम श्रादि दिशायें, दैत्यका मंदिर, हे
नगर, मेघमंडल, द्वीप, समुद्र, विद्याधर मनुष्य देव को कई
इंद्रोंके निवासस्थानका समुदाय तीन लोग है और कोले
ये वातोंसे वेष्टित हैं यद्यपि ऐसी किसी में मानम हरितीनों
लोकमें कोई एकसाथ सर्वत्र घृन भाई
बहिनीय
सुभट है कि यह क्षणभरमें सर्वत्र
और
निमारनी
यह विचित्रता है कि जरा भी शक की जनता
अचिंत्य है सहसा कोई भी नई जान
अतः विद्वानोंको चाहि नः बनाते
परमात्माकी भावना ले बत
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११२ आराधनासार हिंदी टीका सहित श्रात्मामें निश्चलरूपसे ठहरावें ॥५६॥ मणणरवइणो मरणे मरंति सेणाई इंदियमयाइ। ताणं मरणण पुणो मरंति णिस्सेसकम्माइ ॥६०॥ तेसि मरणे मुक्खो मुक्खे पावइ सासयं सुक्खं । इंदियविसयविमुकं तमा मणमारणं कुणइ ॥ ६१॥ मनोनरपतमरणे म्रियते सैन्यानि इंद्रियमयानि । तेषां मरणेन पुनम्रियते निश्शंपकर्माणि ॥ ६० ॥ तेपां मरणे मोक्षो मोक्ष प्राप्नोति शाश्वतं सौख्यं । इंद्रियविषयविमुक्तं तस्मान्मोंमारणं कुरुत ॥ ६१ ॥ अर्थ-जिससमय मन नष्ट हो जाता है उससमय उसकी सेना इंद्रिय भी नष्ट हो जाती हैं । इंद्रिय के नष्ट होजानेपर समस्त क का अभाव हो जाता है। जहांपर कर्मोंका अभाव है वही मोक्ष है और मोक्षमें अनुपम सुख प्राप्त होता है जो शाश्वत-सदा रह- नेवाला है और इंद्रियोंके विषयोंसे उत्पन्न नहि है इसलिये विद्वानोंको मनके नाश करनेमें घोर प्रयत्न करना चाहिये । भावार्थ-मनको संकल्प विकल्प स्वरूप माना है और संकल्प विकल्पोंका न होना मनका नाश है इसलिये जिससमय संकल्प विकल्पोंका नाश अर्थात् मनका अभाव हो जाता है उससमय इंद्रिय भी नष्ट हो जाती हैं अपने स्वामी मनकी प्रेरणाके विना वे स्पर्श ग्रादि अपने शिपयोंकी ओर प्रवृत्त नहिं होती और इंद्रियोंके नाशसे कर्मों का नाश होजाता है अर्थात् इंद्रियोंके नाश होजानेपर (पश रखनेपर) कर्मों का बंध नहिं होता। बंधके अमावसे आराधनासार हिंदी टीका सहित नवीन पासवका अभाव और प्राचीन कर्मोंकी निर्जरा होती है। आसवका अभाव मन वचन काय स्वरूप योगके अभावसे होता है इसलिये योगके अवयवस्वरूप मनके नष्ट हो जानेपर कायस्वरूप इंद्रियोंकी प्रवृत्तिके निपेधसे संवर और निर्जरा होती है और संवर निर्जराके द्वारा समस्त काँका नाश हो जाता है कर्मोके नाशसे अनंतज्ञान आदि गुणोंके समुदायम्वरूप मोक्षकी प्राप्ति होती है और अतींद्रिय अव्यावाधमय सुख प्राप्त होता है इस- लिये जब केवल मनके निरोध करनेसे इसप्रकारका अतींद्रिय , सुख मिलता है तब विद्वानों को चाहिये कि वे जिसरूपमे वने उस रूपसे मनका अवश्य निरोध वारै-उसे विषयोंकी ओर न दोडने दें॥६०-६१ ॥ मणकरहो धावंतो णाणवरत्ताइ जेहिं ण हु बद्धो। ते पुरिसा संसारे हिंडंति दुहाई भुजता ॥ ६२॥ मनःकरभो धावन ज्ञा-वरत्रया यैर्न खलु बद्धः । पुरुषाः संसारे हिंडते दुःखानि भुंजतः ।। ६२ ।। अर्थ-जिन पुरुषोंने विषयोंकी ओर तीव्ररूपसे दोडते हुये मनरूपी उष्ट्रको सम्यग्ज्ञानरूपी संकल्से नहिं बांधा वे पुरुप इस संसारमें सदा घूनते और नाना प्रकारके दुःख पाते रहते हैं। भावार्थ-जिप्रकार उत्तम बनके उजाडनेकेलिये छोडनेवाले उष्ट्रको यदि उसकी रक्षा करनेवाला मनुष्य रस्सी आदिकी सहा- यतासे उसे नहिं रोकता तो वनका स्वामी राजा कुपित होकर उसै कैदखानेमें पटक देता है और वहांपर वह घोर दुःख भोगता ते ८ ११४ आसधनासार हिंदी टीका सहित. है उसीप्रकार सदा विषयोंकी ओर दोडनेवाले मनको जो महानु- माव भगवान सर्वज्ञके वचनोंपर गाढ श्रद्धानी होकर सम्यग्ज्ञान की भावनासे नहिं रोकता वह चौरासी लाख योनियोंके अंदर भटकता फिरता है और नानाप्रकारके घोरसे घोर दुःखोंको भोगता है इसलिये विद्वानोंको चाहिये कि वे ज्ञानाभ्यास में मनको निश्चलकर परमात्मामें स्थिर करें। कहा भी है- अनेकांतात्मार्थप्रसवफलभारातिविनते वचः पर्णाकीर्णे विपुलनयशाखाशतयुते समुत्तुंग सम्यक् प्रततमतिमूले प्रतिदिन श्रु तस्कँधे धीमान् रमयतु मनोमर्कटममुं ।। अर्थात यह मन मर्कट-चंदरके समान चंचल है इसलिये इस अनेकांतस्वरूप पुप्प अोर फलोंके भारसे नम्र वचनरूपी पत्तोंसे व्याप्त सैकडों नयरूपी शाखाओंसे शोभित अतिशय ऊचे और सम्यग्ज्ञानरूपी विस्तृत मूल जडके धारकं श्रुतज्ञानरूपी वृत्त पर रमाना चाहिये शास्त्राभ्यासमें लगाना चाहियें ॥ ६२ ।। पिच्छह णरयं पत्तो मणकयदोसेहिं सालिसित्थक्खो। इम जाणिऊण मुणिणा मण राहो हवा कायव्यो ।। प्रेक्षध्वं नरकं प्राप्तो मनःकृतदोपः शालिसिक्थाल्यः। इति ज्ञात्वा मुनिना मनोनिरोधो भवति कर्तव्यः ॥ ६३ ॥ अर्थ-शास्त्रका वचन है कि शालिसिक्थ नामका मत्स्य केवल मनके ही अपराधसे नरक गया था इसलिये ऐसा जानकर सनियोंको चाहिये कि वे पूर्णरूपसे मनका निरोथ करें । भावार्य A .

"आराधनासोर हिंदी टीका सहित शालिसिक्थ· नामका एक मत्स्य था जो बडें मत्स्यांसे व्याप्त समुद्रमें किसी विशाल मत्स्यके कानमें रहताथा जिससमय वडा मत्स्य 'जिसके कि कानमें शालिमत्स्य रहता था' सोता था उससमय उसके विशाल मुहमें अनेक छोटे २ मत्स्य आदि जीव घुसते निकलते खेलते और इच्छानुसार बैठते थे । वडे मत्स्यके मुखमें इसप्रकार छोटे मत्स्य आदि जीवोकी विचित्र दशा देख शालिसिक्थको बडी चिंता होती और वह मनही मन इसप्रकार विचार करने लगता- 'यह बडा ही मूर्ख है । क्यों नहिं यह अपने मुखको बंद करलेता ? जिससे सब जीव इसके पेटमें चले जांय । यदि मैं ऐसा होता तो सब जीवोंको लील जाता' यद्यपि शालिसिक्थको खाने केलिये जीवोंकी प्राप्ति न हुई तथापि मनमें वैसा विचार करनसे रौद्रध्यानी हो घोर पापका उपार्जनकर वह मरकर नरक चलागया इसलिये आत्मिक सुखके अभिलाषी मुनियोंको चाहिये कि वे मन का सर्वथा निरोध करें. जरा भी उसे विषयोंकी ओर लालायित न होने दें ॥६३॥ सिक्खह मणवसियरणं सबसोभूएण जण मणुयाणं णासंति रायदोसे तेसिं पासे समो परमो ॥६४ ॥ उवसमवंतो जीवो मणसस सक्केइ णिग्गहं काउं। णिग्गहिए मणपसरे अप्पा परमप्पो हवइ ॥६५॥ शिक्षों मनोवशीकरणं स्ववशीभूतेन चेन मनुजानां; -नरसनषो तलोनार समः परमः ॥ ३४ ॥ '..

११६ १ आराधनासार हिंदी टीका सहित उपशमवान् जीवो मनसः शक्नोति निग्रहं कतु । निगृहीते मनःप्रसरे आत्मा परमात्मा भवति ॥ ६५।। अर्थ-ग्रंथकार शिक्षा देते हैं कि हे भव्यो ! तुम अपने मनके वशकरनेका अभ्यास करो क्योंकि जिससमय मन आधीन हो जायगा उससमय जीवोंके रागद्वेष नष्ट हो जायगे । रागद्वेषके नष्ट हो जानेपर परम उपशमकी प्राप्ति होगी । परम उपशमकी प्राप्तिसे मनको निग्रह होगा-वह विषयों की ओर न दोडेगा और जिससमय मनका पूर्णरूपसे निग्रह हो जायगा उससमय प्रात्मा परमात्मा बन जायगा । भावार्थ-जो व्यक्ति धाति अधाति समस्त काँका नाशकर अपने अखंड सम्यग्दर्शन आदि गुणोंसे विरा- जमान है वह परमात्मा है तथा यही आत्मा जिससमय समस्त- काँका नाश कर देता है उससमय परमात्मा कहा जाता है इस- लिये ग्रंथकार उपदेश देते हैं कि हे भन्यो ! तुम अपने मनको दश करो क्योंकि मनके वश रखनेसे ज्ञानावरण श्रादि कौके कारण रागद्वेष छादिकी उत्पत्ति नहिं होती। रागद्वपके अभा- बसे परम उपशमकी प्राप्ति होती है। परम उपशमकी प्राप्तिसे मनका निरोध होता है और मनके सर्वथा वश करनेसे आत्मा पर- मात्मा हो जाता है इसलिये जो पुरुप मोक्षके अभिलापी हैं उन्हें अवश्य मनका निरोध करना चाहिये ॥६४-६५ ॥ जह जहविसएसुरई पसमइ पुरिसस्त णाणमासिज्ज तह तह मणस्त पसरो भजइ अालवणारहिओ। यथायथा विषयेषु रतिः प्रशमति पुरुषस्य ज्ञानमाश्रित्य ।

माराधनासार हिंदी टीका सहित ११७ तथा तथा मनसः प्रसरो भज्यते आलंबनारहितः ।। ६६ ॥ अर्थ-ज्ञानका आलंबन करनेसे ज्यों ज्यों मनुष्यका विषयोंसे प्रेम हटता जाता है त्यों त्यों आश्रयके अभावसे मनका विस्तार भी नष्ट होता चला जाता है। भावार्थ--मनका आधार विषयों में रति है, जब तक विषयों में रति रहती है तबतक वह जरा भी वश नहिं रह सकता और भी अधिक चंचल हो उठता है किंतु जिस समय सम्यग्ज्ञान का श्रालंबन करलिया जाता है और विषयोंसे प्रेम हट जाता है उससमय आश्रयके अभावसे मनका प्रसार नष्ट हो जाता है इसलिये मनका निरोधकर अनुपम सुखके अभिलापी मनुष्योंको चाहिये कि वे विषयोंसे सर्वथा मुख मोडें- जरा भी उन्हें प्रेमकी दृष्टिसे न देखें ॥६६॥ क्योंकि- सयालवणरहिनो णाणसहावेण भावित्री संतो। कीलइ अप्पसहावे तकाले मोक्खसुक्खे सो ॥६७॥ विपयालंबनरहितं ज्ञानस्वभावेन भावितं सत् । क्रीडति आत्मस्वभावे तत्काले मोक्षसौख्ये तत् ।। ६७ ।। अर्थ --जिससमय मनके आधार विषय नष्ट हो जाते हैं और उसमें सम्यग्ज्ञानकी भावना हो निकलती है उससमय वह परमा- त्मास्वरूप मोक्षसुख में क्रीडा करने लगता है । भावार्थ-जबतक मनमें सम्यग्ज्ञानकी भावना नहिं भाई जाती और उसके अाधार विषय नष्ट नहिं होते तबतक वह आत्मस्वरूपके ध्यानमें लीन नहिं होता किंतु जिससमय वह सम्यग्ज्ञानके अभ्यासमें लीन होता है और उसके आधार विषय नष्ट हो जाते हैं उससमय वह श्रा- :११ भासवतासार हिंदी टीका सहितः . त्मस्वरूपमें अनुराग करने लगता है इसलिये विद्वानोंको चाहिये "कि विषयोंसे प्रम हटाचें और सम्यग्ज्ञानका अभ्यासकर मनको आत्मस्वरूपमें लीन बनावें ॥६७॥ पिल्लूरह मणवच्छो खंडह साहाउ रायदोसा जे। अहलो करेइ पच्छा मा सिंचह मोहसलिलेण ६८ निलू यत मनोवृक्षां खंडयत शाखे रागढ पौ ये। अफल कुरुध्वं पश्चात् मा सिंचत मोहसाललेन ॥ ६ ॥ अर्थ--इस मनरूपी वृत्तको काट डालो । राग द्वपरूपी इसकी दोनों शाखाओंके खंड २ करडालो, इसे फलरहित करदो और फिर इस मोहरूपी जलसे मन सींचो । भावार्थ-जिस- प्रकार. वृक्षको काटकर यदि उसमें जल सींचा ना जाय तो वह सूख जाता है उसीप्रकार यह मन भी विशाल वृक्ष है और इसकी राग द्वेषरूपी विस्तीर्ण शाखायें हैं क्योंकि राग और उपकी उत्पत्तिमें मन ही प्रधान कारण है इसलिये इस मनको सर्वथा काट डालना चाहिये, राग द्वेष रूप इसकी दोनों शाखाओंको खंड खंड कर डालना चाहिये, इसे सर्वथा फलरहित कर देना चाहिये और यह मेरा है मैं इसका हूं इत्यादि मोहरूपी जलसे इसे न सींचना चाहिये जिससे फिर इसका उदय न हो और मोतमुख की प्राप्तिमें बाधा न डाले ॥ ६८ ॥ गटे मणवावारे विसएसु ण जंति इंदिया सव्वे । छिरणे तरुस्स मूले कत्तो पुण पल्लवा हुंति ॥६६॥ नष्टे मनोव्यापारे विपयेपु न यांति इंद्रियाणि सर्वाणि । छिन्ने तर्रो मूले कुतः पुनः पल्लवा भवति ॥ ६ ॥ यह :. आराधनासार हिंदी दीका सहित १९३ aanaaa.. अर्थ-जिसप्रकार वृतके नष्ट हो जानेपर पल्लवों की उत्पत्ति नहिं होती उसीप्रकार जिससमय मनका व्यापार नट हो जाता है उसलमय इंद्रियां भी विषयों में प्रवृत्त नहिं होती। भावार्थ-जिस प्रकार वृक्ष खडा रहता है नो पल्लव ऊगते हैं और वृक्ष के अभाव में पल्लव उदित नहिं होते उसीप्रकार यदि मनका व्यापार कसरत रूपसे जारी रहता है तब तो इंद्रियां अपने अपने विषयों की ओर भुकतीं हैं और जिससमय मनका व्यापार नष्ट हो जाता है उस समय इंद्रियां अपने विपयोंमें प्रवृत्त नहिं होती तथा विप पोंकी और इंद्रियों की प्रवृत्ति के समापसे कवि नहिं होता और कर्मबंधक अभावसे अव्यावाधमय सुखकी प्राप्ति होती है इसलिये इंद्रियोंकी विपयोंमें प्रवृत्ति रोकनेकेलिये मनका व्यापार रोकना चाहिये । मणमिते वावारे णटुप्पण्णे य वे गुणा हुंति । पठे अासवरोहो उप्पणणे कम्नबंधो य ॥ ७० ॥ मनोमात्रे व्यापारेनष्टे उत्पन्ने च द्वौ गुणौ भवतः । नष्टे आस्रवरोधः, उत्पन्न कर्मबंधश्च ॥७॥ अर्थ- केवल मनके व्यापारके नए होनेपर या उसके उत्पन्न होनेपर दो गुणों की प्रालि होती है एक तो जिननमय मनका व्यापार नष्ट होता है उससमय कर्मों का आना बंद हो जाता है और दूसरा जिसपमय मनका मापार उत्पन्न होता है उमसनय काँका बंध होता है। भावार्थ-काँश बंध संसारका और कनों के आस्रवका निरोध अर्थात् संवर मोनका कारण हैं क्योंकि जब- तक कोंका आत्माके साथ संबंध रहता है तबतक नरक आदि १२० आराधनासार हिंदी टीका महित कुगतियोंमें घूमना पडता है और नानाप्रकारके क्लेश भोगने पड़ते हैं किंतु जिससमय कर्मोका आगमन बंद होजाता है और पूर्वसंचित कर्म क्रमसे जीर्ण होते जाते हैं उससमय अव्याबाधमय मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है परंतु ये दोनों बातें मनके व्यापारके माधीन हैं अर्थात् जबतक मनका व्यापार उत्पन्न होता रहता तबतक कर्मोका बंध होता रहता है और कर्मबंधकी कृपासे संसा- रमें घूमकर महाभयंकर दुःखोंका सामना करना पड़ता है एवं जिससमय उसका व्यापार नष्ट होजाता है उससमय नवीन कर्मोका आगमन बंद होजाता है, नवीन कर्मोंके आगमनके नंद होजा- नेपर पूर्वसंचित कर्मोंकी निर्जरा होती है पश्चात् अव्यायाधमय मोक्षसुखकी प्राप्ति होती है । इसलिये विद्वानोंको चाहिये कि वे विषयोंकी ओर जरा भी मनको न फटकने दें-उसे सर्वथा वशमें रक्खें ॥ ७० ॥ परिहरिय रायदोंसे सुरणं काउ.ण णियमणं सहसा। अत्थइ जाव ण कालं ताव ण णिहणेइ कम्माइ.७१ परिहत्य रागद्वघौ शन्य कृत्वा निजमनः सहसा । तिष्टति यावन्न कालँ नावन्न निहति कर्माणि ॥ ७१ ।। अर्थ-जबतक राग द्वपको नष्टकर मनको शून्य-विषयोंसे विमुख न कियाजायगा तबतक कर्मीका नाशनहि हो सकता । भावार्य जबतक मनको विषयोंसे विमुख नहिं किया जाता और शुद्धा- त्माके ध्यानकी ओर नहि झुकाया जाता तबतक विषयोंमें लालसा रहनेसे सदा रागद्वपकी उत्पत्ति होती रहती है तथा जब तक -- आराधनासार हिंदी टीका सहित आत्मामें राग द्वेष विद्यमान रहते हैं तबतक सदा कर्मोंका आस्रव हुआ करता है इसलिये जो पुरुष यह चाहते हैं कि हमें अव्यावाधमय सुख मिले और कौके कारण राग द्वप आदि नष्ट हो जाय उन्हें चाहिये कि वे मनको सर्वथा वश करै । कहा भी है- रागद्वेषादिकल्लोलैरलोलं यन्मनोजलँ। स पश्यत्यात्मनस्तत्त्वं तत्तत्त्वं नेतरो जनः । अविक्षिप्त मनस्तत्वं विक्षिप्त भ्रांतिरात्मनः । धारयेत्तदविक्षिप्त विक्षिप्त नाश्रयेत्ततः ।। अर्थात्-जिस महानुभावका मनरूपी जल राग द्वेपरूर कन्लोलोंसे अलोल है -चंचलतारहित है वही मनुष्य आत्मस्व- रूपका भलेप्रकार साक्षात्कार कर सकता है अन्य चंचलचित्तका घारक मनुष्य उसके स्वरूपको नहिं देख सकता। तथा मनमें किसी प्रकारकी चंचलताका न होना विषयोंकी ओर न झुकना आत्म- स्वरूपकी प्राप्ति है और मनका चंचल रहना श्रात्मस्वरूपकी प्राप्ति की भ्रांति है इसलिये विद्वानोंको चाहिये कि मनको सदा निश्चल रक्खें-विषय वासनाकी ओर झुकाकर चंचल न होन दें ॥७१॥ तणुवयणरोहणेहिं रुझंति ण पासवा सकम्माएं । जाव ण णिफंदकत्रो समणा मुणिणा सणाणेण७२ तनुवचनरोधनाभ्यां रुध्यांते न आस्रवाः स्वकर्मणां । यावन्न निप्पंदीकृतं स्वमनो मुनिना स्वज्ञानेन ॥७२॥ अर्थ-जबतक मुनि आत्मिकज्ञानसे अपने मनको निश्चल १२२ आराधनासार हिंदी टीका-सहित:::: नहिं बनाता-वश नहिं करता तवतक शरीर और वचनके निरोध करनेपर भी कर्माका पासव हुआ करता है । भावार्थ-मन वचन कायकी क्रियाका नाम ही प्रास्रव है-जबतक मन वचन काय यश नहिं होते तबतक सदा काँका आस्रव हुआ करता है। तथा इन नीनोंमें सबसे प्रथम मन वश करना आवश्यक है क्योंकि शरीर और वचनके वश रहनेपर भी यदि मन वश नहिं किया जाता तो ज्ञानावरण आदि कर्माका सदा आस्रव होता ही रहता है इसलिये जो मुनिगण इसवानके अभिलापी हैं कि हमारी श्रात्मामें क्रिसीप्रकार के कर्माका पासव न हो उन्हें चाहिये कि वे अपनं विशुद्ध ज्ञानके वलसे मनको अवश्य वश रक्खें ॥७२।। खीणे मणसंचारे तुढे तह पासवे य दुवियप्पे । गलइ पुराणं कम्म केवलणाणं पयासेइ ॥ ७३ ॥ क्षीणे मनःसंचारे त्रुटिते तथास्रवे द्विविकल्पे । गलात पुरातनं कर्म केवलज्ञानं प्रकाशयति ।। ७३ ॥ अर्थ-मनके संचारके क्षीण हो जाने पर जिससमय दोनोंप्रकारकं पासवका अभाव होजाता है उस समय प्राचीन कर्म सर्वथा नष्ट होजाते हैं और केवलज्ञानका उदय होजाता है। भावार्थ---शुभ और अशुभके भेदसे प्रास्त्रव दो प्रकार का है शुभ काँका आना शुभ यात्रव और अशुभ काँका थाना अशुभ प्रास्रव है अथवा द्रव्यास्त्र और भावासबके भेद से भी प्रास्रवके दो भेद हैं । ज्ञानावरण दर्शनावरण आदि द्रव्य काँका आना द्रव्यास्रव और रागद्वेप ग्रादि भाव काँका आना ..

आराधनासार हिंदो टीका सहित:::. ::
१२२
भावास्रव कहलाता है । जबतक मनको वश नहिं किया जाता
विषयोंकी ओर उसके झुकावको नहिं रोका जाता तबतक
सदा दोनों प्रकारका आस्रव हुआ करता है जिससमय वह
वश करलिया जाता है उससमय दोनों प्रकारके कमांसोका
भी निरोध होजाती है। तथा दोनों प्रकार आस्रबोके रुक जाने
पर पूर्वसंचित कर्म नष्ट हो जाते हैं और पूर्वसंचित कर्मोंके नाशसे
केवलज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है इसलिये जो महानुभाव दोनों
प्रकारके भासवोंका और पूर्वसंचित काका नाश करना चाहते
हैं उन्हें चाहिये वे मनको सर्वदा वश रक्खें, इंद्रिय विपयोंकी
ओर उसे न झुकने दें।
जड् इच्छहि कम्मखयं सुण्णं धारेहि णियमणो मत्ति
सुगणोकयम्मि चित्ते णूणं अप्पा पयासेड़ ॥ ७४ ॥ .
यदीच्छसि कर्मक्षयं शून्यं धारय निजमनो झटिति ।
शून्याकृते चित्ते नूनमात्मा प्रकाशयति ।। ७४ ।।
अर्थ- ग्रंथकार उपदेश देते हैं कि हे क्षपक ! यदि तू,
समस्तकोका क्षय करना चाहता है तो तू अपने मनको शीघ्र
ही शून्य बना चित्तमें किसी प्रकारकी लाभ पूजा भोगोंकी आमां-
क्षा न कर । क्योंकि जिससमय मन शून्य हो जायगा उसममय
तेरी शुद्धस्वरूप आत्मा प्रकाशमान हो जायगी । भावार्थ -निम
प्रकार सेघसे ढका हुआ सूर्य स्पष्टरूपसे प्रकाशमान नहिं होता
किंतु जिससमय मेघका आवरण नष्ट हो जाता है उस समय वह
पूर्णरूपसे प्रकाशमान हो जाता है उसीप्रकार जबतक आलापर

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माराधनासार हिंदी टीका सहित
कर्मोंका आवरण पड़ा रहता है तबतक इसका विशुद्ध स्वरूप नहि
उदित होता किंतु जिससमय वह आवरण सनथा नष्ट हो जाता
है उससमय सर्वथा आत्माका विशुद्ध स्वरूप उदित हो जाता है
तथा कर्माका आवरण तभीतक बना रहता है जबतक मनमें लाभ
पूजा और भोग आदिको आकांक्षा बनी रहती है इसलिये जो
महानुभाव विशुद्ध आत्मस्वरूपके अभिलापी हैं उन्हें चाहिये कि
वे लाभ ख्याति और भोग आदिकी सर्वथा आकांक्षा छोड़
मनको शुन्य बनाने । कहा भी है--
सर्वभावविलये विभाति यत्सत्समाधिभरनिर्भरात्मनः ।
चित्स्वरूपमभितः प्रकाशकं शर्मधाम नमताद्भुतं महः ।।
अर्थात् समस्त विभाव भावोंके नष्ट हो जानेपर समीचीन
समाधिके भारसे नम्रीभृत आत्मामें जो अद्भुत तेज प्रकाशमान
नान पडता है वह तेज चैतन्यस्वरूप है चारो ओरसे पदार्थोंका
प्रकाश करनेवाला और परम कल्याणका धाम है इसलिये वह
नमस्कार करनेके योग्य है ।। ७४ ॥
उद्यामहि णियचित्तं वसहि सहावे सुणिम्मले गंतु।
जह तो पिच्छांस अप्पा सरणाणा केवलो सुद्धो ७५
उद्वासर्यास निचित्तं वसास स्वभाव सुनिर्मले गंतु।
यदि तदा पश्य स्वात्मानं संज्ञानं केवलं शुद्धं ।। ७५.।।
अर्थ-हे नपक ! यदि तू अपने मनको इंद्रियों के विपयोंकी
और न भुकने देगा और विशुद्ध दर्शन ज्ञानस्वरूप परमात्मामें
उसीकी प्राप्तिकेलिये निवास करेंगा तो तुम समीचीन ज्ञानके

. आराधनासार हिंदी टीका सहित १२५ -- मंडार असहाय और विशुद्ध आत्मस्वरूपकी अवश्य प्राप्ति हो जा यगी । भावार्थ-निश्चयनयसे आत्मा संशय विपर्यय और अन- ध्यवसाय रूप मिथ्याज्ञानासे रहित समीचीन ज्ञानका भंडार है उस किमी पदार्थकी सहायताकी अपेक्षा नहि करनी पडती इसलिये केवल-असहाय है और समस्त कर्मावरणासे रहित होनेके कारण विशुद्ध है तथा ऐसे अनुपम यात्माकी प्राप्ति चित्तको इंद्रिय विप गोंसे हटानेपर और विशुद्ध आत्मस्वरूपकी प्राप्तिकेलिये उसीमें स्थिति करनेपर होती है इसलिये ग्रंथकारका उपदेश है कि हे-क्षपक ! यदि तू विशुद्ध आत्मस्वरूपका साक्षात्कार करना चाहता है तो तू अपने चित्तको इंद्रियविपयोंसे रोक और विशुद्ध आत्मम्वरूपमें स्थिरकर तुझ अवश्य विशुद्ध आत्मस्वरूपका साक्षात्कार होगा । जैसा कि कहा है- यदि विषयपिशाची निर्गता देहगेहात सपांद यदि विशीर्णो मोहनिद्रातिरेकः । यदि युवतिकरके निर्ममलं प्रपन्नो भागिति ननु विधेहि ब्रह्मवीथीविहारं ।। अर्थात् यदि विपयरूप पिशाचिनी देहरूप घरसे बाहर निकलगई हो यदि मोहनींद सर्वथा नष्ट होगई हो और यदि युवतियोंमें भी निर्ममता होगई हो तो हे क्षएक! तू शीघ्र ही ब्रह्म रूपी गलीमें विहार कर-विशुद्ध आत्मस्वरूपका व्यानकर ॥ ७५ ॥ तणुमणवयणे सुराणो ण य सुरणो अप्पसुद्धसम्भावे । - : आराधनासार हिदी टोका सहित ससहावे जो सुगणो हवइ य सो गयणकुसुमणिहो ७६ तनुमनोवचने शून्यो न च शून्य आत्मशुद्धसद्भावे । स्वसद्भावे यः शून्यो भवति च स गगनकुसुमनिभः ।।६।। अर्थ-क्षपकको चाहिये कि वह शरीर मन वचन की क्रियाओंमें शून्य रहै आत्माके विशुद्धस्वरूपकी प्राप्तिमें शून्य न बने क्योंकि आत्मस्वरूपमें शून्य मनुष्य आकाशक फूलके समान निरर्थक होता है। भावार्थ-क्रियायें दो प्रकारकी हैं शुभरूप और अशुभ रूप, देवपूजन पात्रदान आदि शरीरकी शुभ क्रियायें है, हिंसा करना मारना पीटना आदि अशुभ क्रियायें हैं । देव गुरुओंके गुणोंका स्मरण करना शास्त्रके अर्थका मनन करना आदि मनकी शुभ क्रियायें हैं और मारने वांधने और चोरी आदिकं करनेका विचार करना अशुभ क्रियायें हैं। देव गुरु शास्त्रकी स्तुति आदि करना वचनकी शुभ क्रियाय हैं और गाली गलौज करना आदि अशुभ क्रियायें हैं । जो पुरुष मुमुक्षु हैं मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें चाहिये कि वे काय मन वचन तीनोंकी शुभ अशुभ दोनों प्रकारकी क्रियाओंमें शून्य रहैं किसी भी क्रियाके करनेका उद्योग न करें क्योंकि इन क्रियाओंके करनेसे शुभ अशुभ कर्मोका बंध होता है और उस बंधसे संसारमें घूमनके कारण अनंते दुःख भोगने पड़ते हैं । क्योंकि- आस्तां वहिरूपधि [धि-च] यस्तनुवचनविकल्पजालमप्यपरं। कर्मकृतत्वान्मत्तः कुतो विशुद्धस्य मम किंचित् ।। अर्थात् मेरी आत्मा निश्यनयसे विशुद्ध है इसलिये :

आराधनासार हिंदी टीका सहित १२.. धान्य आदि वाह्य परिग्रह तो दूर रहैं शरीर वचन मन भी मेरे नहीं क्योंकि ये कर्मोंके विकार हैं इसलिये मुझसे सर्वथा भिन्न हैं कभी ये मेरे निज नहिं हो सकते । और भी कहा है- कर्मणो यथा स्वरूपं न तथा तत्कर्म कल्पनाजालं। तत्रात्ममतिविहीनो मुमुक्षुरात्मा सुखी भवति ।। अर्थात्-कर्मका जैसा स्वरूप दीखता है योग्य सामग्रीके मिलनेसे कुछ सुखसा प्रतीत होता है कर्म वैसा नहीं है, वहांपर दुःखमें सुखकी कल्पना है इसलिये जो मोक्षाभिलापी मनुष्य काम आत्मबुद्धि नहि करते उन्हें भिन्न समझते हैं वे ही सुखी कहे जाते हैं संसारमें घूमकर उन्हें दुःख नहिं भोगना पड़ता परंतु राग आदि मलोंसे रहित आत्माको स्वरूप प्राप्हिसे शून्य न बनाना चाहिये। विशुद्ध आत्मस्वरूपकी प्राप्तिकेलिये तो सदा उबुद्ध रहना चाहिये क्योंकि- अस्पृष्ठमबद्धमनन्यमयुतमविशेपमभ्रमोपेतः । यः पश्यत्यात्मानं स पुमान् खजु शुद्धनयनिष्ठः ।। अर्थात्-निश्चयनयसे यात्मा अस्पृष्ट कर्माके स्पर्शसे रहित है, अबद्ध कर्मबंधसे रिमुक्त है, अनन्य सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शनादि निजगुणस्वरूप है अयुत कर्मस्वरूप नहीं हैं अविशेष सम्यग्ज्ञान आदि गुणोंसे अभिन्न है और भ्रमज्ञानसे रहित है । जो महा- नुभाव इसप्रकारके आत्मस्वरूपका साक्षात्कार करता है वह पुरुष शुद्ध निश्चयावलंबी गिना जाता है संसारमें उस दुःख नहि मोगने पडते ।

आराधनासार हिंदी टीका सहित किंतु जो मनुष्य विशुद्र आत्मस्वरूपकी प्राप्ति में शल्य है आत्मस्वरूपकी प्राप्तिकेलिये प्रयत्न करना अनुचित समझता है वह पुरुष आकाराके फुलके समान निरर्थक है संसारमें उसका जीवन जरा भी कार्यकारी नहीं इसलिये विद्वानोंको चाहिये कि वे मन वचन कायकी क्रिया प्रोंकी ओर न झुककर अात्मस्वरूपकी मानिलिये अवश्य प्रयत्न करें ॥ ७६ ॥ सुणझाणपइट्टो जोई समहावसुक्खसंपण्णो । परमाणंदे थको भरियावत्थो फुड हवई ॥ ७७ ॥ शून्यध्यानप्रविष्टो योगी स्वसद्धावसौख्यसंपन्नः । परमानंदस्थितो भृतावस्थः स्फुट भवति ।। ७७ ॥ अर्थ-जो योगी निर्विकल्पक समाधिमें स्थित है पर- मात्माके अनंतज्ञानादि लक्षण स्वभावसे उत्पन्न सुखसे संयुक्त है और विशुद्ध परमब्रह्मके अाराधनसे उत्पन्न जो आनन्दा- मृतका रस उससे तृप्त है वह योगी निश्चयसे भृतावस्थ अर्थात् पूर्ण कलशके समान अविनश्वर अनुपम मुक्तिके आनन्दसे परिपूर्ण हो जाता है। क्योंकि---- जायते विरसा रसा विघटते गोष्ठी कथा कौतुकं शीर्यंत विषयास्तथा विरमति प्रीतिः शरीरेऽपि च । जोपं वागपि धारयत्यविरतानंदात्मनः स्वात्मन- श्चितायामपि यातुमिच्छति मनो दोपैः समं पंचतां ।। अर्थात्-निरन्तर आनंद स्वरूप शुद्ध यात्माकी चिंता करने मात्रसे विपयरस विरस हो जाते हैं, उनम गोष्ठी और आराधनासार हिंदी टीका संहित १२ः कथा वातीका कुतूहल नष्ट होजाता है । समस्त विषय एक ओर किनारा कर जाते हैं । शरीरसेभी प्रीति हट जाती है, वचन बोलना भी बंद हो जाता है और समस्त दोषोंके साथ मनभी नष्ट हो जाता है। तो जो मनुष्य इसप्रकारकी निर्वि- कल्पक समाधिमें स्थित है परमानंद स्वरूप आत्मिक सुखसे संपन्न है और विशुद्ध परब्रह्म परमात्माके आराधनसे उत्पन्न हुये आनंदरूपी अमृतरसमें मगन है वह पुरुप अमृतरससे परिपूर्ण घडेके समान परमानंदरूपी रससे परिपूर्ण हो जाता है उमे परम आनंददायिनी मोजकी प्राप्ति होजाती है ॥ ७८ । जत्थ ण झाणं झयं झायारो व चिंतणं किंपि। ण य धारणा वियप्पो तं सुरणं सुठु भाविज ॥७॥ यत्र न ध्यानं ध्येयं ध्यातारो नैव चिंतनं किमपि । न च धारणा विकल्पस्तत् शून्यं सुष्ठु भावयेः ।। ७८ ॥ अर्थ-जहांपर न ध्यान है न ध्धेय है न ध्याना है न चिंता है न धारणा और न विकल्प है वही शूगध्यान-निर्विकल्पक समाधि समझना चाहिये । भावार्थ-आर्त रौद्र धर्य श्रीर शुक्लके मेरसे वा पदस्थ विंडस्थ रूपस्थ और रूपातीतके भेदसे ध्यान चार प्रकारका है । भावान जिनेंद्र बुद्ध महादेव ब्रह्मा आदि अनेक प्रकारके ध्येय हैं। तथा- शचिः प्रसन्नो गुरुदेवभक्तः सत्यवतःशीलदयासमेतः । दक्षः पटु/जपदावधारी ध्याता भवंदीदृश एव लोके। अर्थात्-जो पवित्र हो, सदा प्रसन्न रहता हो, गुरू और - & २३०. आराधनासार हिंदी टीका सहित देवमें भक्ति रखने वाला हो, सत्यवक्ता शील और दयाका भंडार चतुर और वीजाक्षर किंवा चीज पदोंका पूर्ण ज्ञाता हो वह वास्तविक ध्याता ध्यान करनेवाला है। शत्रुका मरण, स्त्री, राज्य मादिकी प्राप्तिका विचार करना चिंता, एकवार जानकर उस पदार्थको कालांतरमें न भूलना थारणा और असंख्यात लोक- प्रमाण नानाप्रकारके विकल्प करना विकल्प हैं तो जबतक निर्विकल्प समाधिका अवलंबन नहिं किया जाता तबतक ध्यान ध्येय ध्याता आदिका विकल्प विद्यमान रहता है और जिससमय निर्विकल्पक समाधिमें लीन हो जाना पड़ता है उससमय कोई भी भेद दृष्टिगोचर नहीं होता, इसलिये जहां पर ध्यान ध्येय आदि का विकल्प नहीं वहीं शू-यध्यान वा निर्विकल्प समाधि है। तथा इसप्रकारको निर्विकल्प समाधिका धारण करनेवाला और जयोंके पक्षपातसे रहित महानुभाव स्वरूपमें गुप्त स्वस्वरूपमें लीन होता है एवं परमानंदरूप अमृतका रसास्वादन करता है। जैसा कि कहा है- य एव मुक्त्वा नयपक्षपातं स्वरूपगुप्ता निवसंति नित्यं ।। विकल्पजालच्युतशांतचित्तास्त एव साक्षादमृतं पिवति ।। अर्थात्-जो ज्ञानवान मनुष्य नयोंके पक्षपातको छोडकर स्वस्वरूपमें लीन रहते हैं और समस्त प्रकारके विकल्पोंसे रहित होनेसे जिनका चित शांत हैं वे मनुष्य साचात् अमृतका पान करते हैं । और भी कहा है- अखंडितमनाकुलं वलदनंतमंतर्वहि- आराधनासौर हिंदी टीका सहित १३० . महः परममस्तु नः सहजमुदिला सदाः। चिदुच्छ पलननिर्भरं सकलकालमालंवते यदेकरसमुल्लसल्लवणाखल्यलीलायितं ।। अर्थात-जो परम तेज अखंडित है शेय पदार्थों के जैसे भा- कार हैं वैसे ही जहां प्रतिभासित रहते हैं आकार खंडित नहि होते, अनाकुल है-कर्मके द्वारा उत्पन्न हुई आकुलतासे रहित है, अविना रूपसे अंतरंग और बहिरंगमें जाज्वल्यमान है, स्वाभाविक है, उन्नत विलाससे युक्त है,सदा चैतन्यके उच्छलन से परिपूर्ण है और जिसप्रकार लवणकी डली सदा एक क्षाररस- स्वरूप रहती है उसीप्रकार यह तेज भी सदा एक चान्य स्वरूप है उस परम तजकी हमें प्राप्ति हो हम स्वस्वरूपमें लोन होवं ऐसी भावना हे ॥ ७ ॥ जो खलु सुद्धो भावो सो जोवो चेयणावि सा उत्ता तं चैव हवदि गाणं दंसणवारित्तयं चेव।। ७६ ॥ यः खलु शुद्धो भावः स जीवश्च तेनापि सा उक्ता । तव भवति ज्ञानं दर्शनचारित्रं चैव ।।७६ ॥ अर्थ- राग द्वप मोह आदि दोपोंसे रहित जो चैतन्य भाव है वह जीव है उसीको चेतना कहते हैं और वही ज्ञान दर्शन चारित्र कहा जाता है । भावार्थ-व्यवहार और निश्चयके भेदने नय दो प्रकारके हैं यद्यपि व्यवहारनयसे शुद्धभाव चेतना ज्ञान दर्शन और चारित्र भिन्न हैं तथापि निश्चय नयने उनमें कोई भेद नहीं अर्थात् राग द्वेष मोह आदि दोपोंसे रहित जो चैतन्यभार धाराधनासार हिंदी टीका सहित है वही जीव है उसीका दूसरा नाम चेतना है और वही ज्ञान दर्शन और चारित्र है जैसा कि कहा है-- तदेक परमं ज्ञानं तदेकं शुचि दर्शनं । चारित्र च तदेक स्यात्तदेकं निर्मलं तपः ।। अर्थात् -वह अात्मा ही परम ज्ञान है । वही दर्शन सम्यग्द- शन है । वही सम्यक् चारित्र और वही निर्मल तप है। और मी कहा है-- नमस्यं च तदेवेकं तदेवकं च मंगलं । उत्तमं च तदेवकं तदेव शरणं सतां ॥२॥ अर्थात्-वह आत्मा ही नमस्कार करने योग्य है वही परममंगल स्वरूप है वही समस्त पदार्थों में उत्तम है और वही सज्जनोंका शरण है । समयसारकलशमें भी कहा है-- आक्रामन्नविकल्पभावमचलं पक्षैर्नयानां विना सारो यः समयस्य भाति निभृतैरास्वाद्यमानः स्वयं । विज्ञानकरसः स एप भगवान् पुण्यः पुराणः पुमान झान दर्शनमप्ययं किमथवा यत्किंचनकोप्य ।। भर्थात्-नयोंके पक्षपातसे रहित, निश्चल और निर्विकल्पक स्वभावको धारण करनेवाला जो समयका सार है विशुद्ध परमा- स्माका स्वरूप है वह उसके स्वरूप में मान विद्वानोंये स्वयं यास्वा- दन किया हुआ देवीप्यमान है-उसके स्वरूपमें मग्न हुए विद्वा- न स्वयं उसका सदा रसास्वादन किया करते हैं तथा वह समय- सार भगवान विज्ञानरूपी रसस्वरूप है, पवित्र है, पुरातन आराधनासार हिंदी टीका सहित १३६ भान और दर्शनस्वरूप है, विशेष कहां तक कहा जाय ? सम्प. ग्दर्शन अनंत सुख आदि भी जो पदार्थ अनुभवमें आते हैं वे मी समयसार-परमात्मस्वरूप ही हैं-परमात्मवरूपसे भिन्न नहीं। दंगणणाण परित्ता णिच्छयवाएण हुँति ण हु भिण्णा जो खलु सुद्धो भावो तमेव रयण जयं जाण ॥ ८० दर्शनज्ञानचारित्राणि निश्चयवादेन नहिं भिनानि। यः खलु शुद्धो भावस्तमेव रत्नत्रयं नानीहि ।। ८० ।। अर्थ-निश्चयनयसे सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यकचारित्र आत्मासे भिन्न नहीं अात्मस्वरूप ही है इसलिये कर्ममलसे रहित जो आत्माका विशुद्ध भाव है वह रत्नत्रय ही है । भावार्थ- सम्यग्दर्शन सम्परज्ञान और सम्यक चारित्रके लक्षण जुदे जुदे हैं श्रात्माके नामसे इनके नाम भी भिन्न २ हैं इसलिये यो लक्षण संज्ञा श्रादिके भेदसे व्यवहार नयसे सम्यग्दर्शन सम्य- रज्ञान सम्यक चारित्र भिन्न हैं तो भी निश्चयनयसे उनमें कोई भेद नहीं जो सम्पग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र हैं चे ही आत्मा हैं और जो आत्मा हैं वही सम्यग्दर्शन सम्यग्नान सम्यक् चारित्र है कहा भी है- आत्मनि निश्चयबोधस्थितयो रलत्रयं भवततये। भूतार्थपथप्रस्थितबुद्धरात्रीव तत्रितयं ।। अर्थात्- आत्माका निश्चय, उसका भले प्रकार ज्ञान और उसमें स्थिति करना रत्नत्रय सम्बग्दर्शन सम्पन्ज्ञान और सम्यक् चारित्र है और इस रत्नत्रयसे संसारका नाश होता है २३४ आराधनासार हिंदी टीका सहित:: तथा निश्चयनयसे आत्मा ही तीनों स्वरूप है सम्यग्ज्ञानं आदि पदार्थ आत्मासे भिन्न नहीं। समयसारकलशमें भी कहा है- कथमपि समुपात्तत्रित्वमप्येकताया अपति मदमात्मज्योतिरुद् गच्छदच्छं। सततमनुभवामोनंतचैतन्यचिहनं न खलु न खलु यस्मादन्यथा साध्यसिद्धिः ।। अर्थात्-यद्यपि किसी प्रकारसे व्यवहार नयसे यह आत्म- स्वरूप तेज सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यरुचारित्र तीन स्वरूप है परंतु निश्च पनयसे एक स्वरूप ही है स्वाभाविक निर्मजनारूपसे सदा उदयको प्राप्त है और अनंत चैतन्यस्वरूप लक्षणका धारक है इसलिये हम ऐसे विशुद्ध आत्माका ही अनुभव करना चाहते हैं क्योंकि विशुद्ध आत्मा स्वरूपके अनुभव करनेसे ही हमें आत्म- स्वरूपकी प्राप्ति हो सकती है और प्रकारसे विशुद्ध' आत्मस्वरूप की प्राप्ति असंभव है ॥८० ॥ तत्तियमो हु अप्पा अवसेसालंवहिं परिमुक्को। उत्तो स तेण सुराणा गणोहि ण सव्वदा सुगणा ।। तन्त्रिकमयो हिं त्मिा अवशेपालंबनै परिमुक्तः । उक्तः स तेन शून्यो ज्ञानिभिर्न सर्वदा शुन्यः ॥८१ ॥ अर्थ-सम्यग्दर्शन आदि तीनों स्वरूप यात्मा राग क्रोध आदि विभाव भावोंके अवलंबनसे रहित है इसलिये वह शून्य कहा है सर्वथा शुन्य नहीं । भावार्थ-लोग आत्माको शून्य वत- लाते हैं परंतु वह सर्वथा शून्य नहीं क्योंकि वह सम्यग्दर्शन प्रा- आराधनासार हिंदी टीका सहित १३५ - दि स्वरूप है इसलिये काम क्रोध मान माया आदि विभाव परिणा- मोंसे रहित होनेके कारण तो वह कथंचित् शून्य है परंतु सभ्य- ग्दर्शन सम्यग्ज्ञान आदि गुण स्वरूप होनेसे अशून्य है। इसी बात को समयसारकलशमें भी कहा है-- अद्वैतापि हि चेतना जगति चेद् हग्ज्ञप्तिरूपं त्यजे- तत्सामान्यविशेषरूपविरहात्सास्तित्वमेव त्यजेत् । तत्त्यागे जडता चितोपि भवति व्याप्यो विना व्यापका- दात्मा चांतमुपैति तेन नियतं दृग्ज्ञप्रिरूपास्तु चिन् ।। अर्थात्-यदि चेतनाको सर्वथा अत-एक म्वरूप स्वीकार किया जायगा तो वह दर्शन ज्ञान स्वरूप न सिद्ध हो सकेगी। दर्शन ज्ञानरूप सिद्ध न होनेपर सामान्य और विशेष रूपताके 'अभावसे चेतनाका अस्तित्व ही न बन सकेगा तथा चेतनाके अभावमें आत्मा जड सिद्ध होगा क्योंकि विना व्यापक चेानाके न्य प्य आत्मा सिद्ध नहिं हो सकता एवं इसरूपसे आत्माका अंत ही हो जायगा-आत्मा पदार्थ ही सिद्ध न हो सकेगा इसलिये यह निश्चय है कि प्रात्मा दर्शन ज्ञान चारित्रस्वरूप है-दर्शन प्रादि गुणोंसे शून्य नहीं । और भी कहा है- ववहारेणुवदिस्मादि णाणिस्म चरित्त दमणं जाएं। णविणाणं ण चरित्तंण देसणं जाणगो सुद्धो॥ अर्थात् यद्यप व्यवहारसे आत्मामें सम्यग्दर्शन सम्यग्नोन सम्यचारित्र हैं परंतु निश्चयनयसे न ज्ञान है न दर्शन है और न चारित्र है। किंतु वह सम्पग्दर्शन श्रादि तीनों स्वरूप है और १३६ माराधनासार.हिंदी टीका सहित सम्यग्दर्शन आदि तीनों स्वरूप होनेसे सर्वथा शून्य नहीं। और भी कहा है- सम्यक्सुखबोधदृशां त्रितयमखंड परात्मनो रूपं ॥ तत्रितयतत्परो यः स एव तल्लव्धिकृतकृत्यः ।। ३ ।। अर्थात्--निश्चयनयसे सम्यक सुख, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्द- र्शन तीनों ही अखंड परमात्माके स्वरूप हैं तथा जो महानुभाव सम्यग्दर्शन आदि स्वरूप परमात्मामें लीन होता है वह उसे प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाता है फिर उसे संसारके किसी प्रकार के दुःख का सामना नहिं करना पड़ता ॥ ८१ ।। एवं गुणो हु अप्पा जो सो भणिश्रो हु मोक्खमग्गोत्तिा अहवा स एव मोक्खो असेसकम्मवखए हवई ॥२॥ एवंगुणो ह्यात्मा स भणितो हि मोक्षमार्ग इति । अथवा स एव मोक्षः, अशेषकर्मक्षये भवति ॥२॥ अर्थ -इसप्रकार सम्यग्दर्शन आदि गुणस्वरूप आत्मा ही मोक्षका मार्ग है अथवा समस्त कर्मोके सर्वथा क्षय होनेपर वही आत्मा साक्षात् मोक्ष है । भावार्थ-समस्तकर्मीका जो सर्वथा नाश होजाता है वह मोक्ष है और सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र उस मोक्षके मार्ग हैं इसलिये सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्य- चारित्रस्वरूप आत्मा ही मोक्षका मार्ग है अथवा जिससमय समस्त कर्म नष्ट होजाते हैं और आत्मा अखंड सम्यग्दर्शन सम्य- ग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र स्वरूप हो जाता है वही अवस्था मोक्ष है.इसलिये समस्त कॉक सर्वथा. नाश होजानेपर अखंड सम्यग्द- ..

आराधनासार हिंदी टीका सहित wa " - शन आदि स्वरूप आत्मा ही. साक्षात् मोक्ष कहा जाता है।। ८२॥ जाम वियप्पो कोई जायइ जोइस्स झाणजुत्तस्स। तामण सुराण झाण चिंता वा भावणा अहबा ८१ यावद्विकल्पः कश्चिदपि जायते योगिनो ध्यानयुक्तस्य । तावन्न शून्यं ध्यान चिंता वा भावना अथग (८२|| अर्थ-ध्यानशील योगीके चिसमें जबतक किसीप्रकारका विकल्प विद्यमान रहता है तबतक उसके शून्य ध्यान-निर्विकल्प समाधि नहिं होती किंतु परमात्माके गुणोंकी चिंता स्मरण, भावना पुनः पुनः स्मरण बना रहता है। भावार्थ-उपर कह दिया जा चुका है कि.जिसमें ध्याता ध्यान ध्येय आदिका विकल्प न हो वह शून्य ध्यान है। यदि ध्यानी मनुष्यके ध्यानके समय ध्याता ध्येय ध्यान यादिका किसी कारण वश विकल्प उठ खडा हुआ तो उसके शुन्य ध्यान न बन सकेगा। यहांपर यह शंका न करनी चाहिये कि जो पुरुष निर्विकल्पक समाधिका धारक है उसके चिर में कैसे विकल्प उठ सकता है ? क्योंकि पहिल विभ्रम आत्मामें मोजूद था इसलिये उस पूर्व विभ्रम संस्कारसे जबरन वियल्प उठ सकते हैं। जैसा कि कहा है- जानन्नयात्मनस्तत्त्वं विविक्तं भावयन्नपि । पूर्वविभ्रमसंस्काराद् भ्रांति भूयोप गच्छात ॥ अर्थात् आत्माके स्वरूपको भलेप्रकार जाननेवाले और समस्त परपदाथोंसे रहित हो उसके विशुद्धस्वरूपकी भावना करh आराधनासार हिंदी टीका सहित नेवाले भी मनुष्यके पूर्व विभ्रम संस्कारके उदयसे भ्रांति उठ खडी होती है उसके चित्तमें भी विकल्पोंका संचार हो निकलता है। किंतु उस अवस्थामें उम योगीके परमात्माके गुणोंका स्मरण रूप चिंता और उसके गुणोंका पुनः पुनः चितवनरूप भावना होती है। वास्तवमें शून्य ध्यान ही परम हितकारी है क्योंकि जो योगी आत्मप्वभावका अवलंबन करनेवाला संकल्प विकल्पोंको दलित करनेवाला है उसै परम कल्याणकारी शुद्ध जयकी प्राप्ति होती है । समयमारकलश में कहा भी है.... आत्मस्वभाव परभावभिन्नसापूर्णमाद्यंतांवमुक्तमेकं । विलीनसंकल्पविकल्पजालं प्रकाशयन् शुद्धनयोभ्युदेति ।। अर्थात्-परपदार्थ और उनके विभाव भावोंसे भिन्न, समस्त लोक अलोकके पदार्थोंके जाननेवाले, अनादि अविनाशी पर पदार्थोंसे रहित एक और समस्तप्रकारके संकल्प विकल्पोंसे रहित आत्मस्वभावको प्रकाशित करनेवाले विशुद्धनयका उदय होता है, सकल्प विकल्प अवस्थामें विशुद्धनय का उदय नहिं हो सकता इसलिये विद्वानोंको चहिये कि वे बडी दृढतासे निर्विकल्पक समाधिका आराधन करें जिससे उन्हें शुद्धनयकी प्राप्ति होजाय d८३ ॥ लवणव्व सलिलजोए भाणे चित्तं विलीयए जस्त। तस्स सुहासुहडहणो अप्पाअणयो पयासेड़ ॥४॥ लवर्णामय सलिलयोगे ध्याने चित्त विलीयते यस्य । तस्य शुभाशुभदहन आत्मानलः प्रकाशयति ॥८४ ॥ ...

माराधनासार हिंदी टीका-सहित १३६ अर्थ-जिसप्रकार जलके संबंधसे लवण विलीन हो जाता है उसीप्रकार जिस मनुष्य का मन विलीन हो जाता है निर्विकल्पक समाधि वा धर्य ध्यान शुक्लध्यानके माहात्म्यसे नष्ट हो जाता है उस मनुष्यके शुभ अशुभ दोनोंप्रकारके कर्मोंका नाश करनेवाली आत्मारूपी अग्नि प्रकाशमान होने लगती है। भावार्थ जिसके द्वारा सुरेंद्र नरेंद्र धरणेद्र आदिकी संपत्तिकी प्राप्ति हो वह शुभ कर्म और जिससे नरक आदिके दुःख भोगने पडें वह अशुभ कर्म है। जबतक इन शुभ अशुभ कर्मों का आत्माके साथ संबंध रहता है तबतक कभी भी आता सुखानुभव नहिं कर सकता और न उसका वास्तविक स्वरूप हो प्रकट होता है । तथा जबतक निर्विकल्पक समाधि वा शुक्ल ध्यानके द्वारा मन विलीन नहिं होता--इंद्रियविपयोंकी ओर न झुककर अात्मामें लीन नहिं होता वा मर्वथा नष्ट नहिं होता तबतक अवश्य शुभ अशुभ कर्मोंका आत्माके साथ संबंध बना रहता है किंतु जिन समय जितेंद्रिय और शुभ आत्माके स्वरूपमें लीन मनुष्यका चिच जिसप्रकार जलके संबंधसे लवण नष्ट हो जाता है उसी प्रकार निर्विकल्पक समाधिसे नष्ट हो जाता है उससमय शुभ अशुभ कर्म भी सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और उनके नष्ट हो जाने यात्मा अपने ज्वलंत विशुद्धस्तरूपसे चमचमा निकलता है । परमात्म- स्वरूपमें लगाया हुआ मन नष्ट नहिं होता यह बात नहीं है क्योंकि यदि वह परमात्मस्वरूपमें जीवित रहता, वा वह वहां रहना अच्छा समझता तो उसे छोड वाह्य पदार्थों में क्यों भट- माराधनासार हिंदी-टीका.सहित कता फिरता। जैसा कि कहा है- नूनमत्र परमात्मनि स्थितं स्वांतमंतमुपयाति तद्वहिः । तं विहाय सततं भ्रमत्वरः को विभेति मरणान्न भूतले ॥ अर्थात्-परमात्मामें लीन हुआ मन अवश्य नष्ट होता है इसलिये वह परमात्माको छोडकर जहां तहां वाद्य पदार्थों में भटकता किरता है। ठीक भी है संसार में मरणका किस भय नहि होता? तथा यह बात निश्चित है कि जिसका मन शुद्ध आत्मस्वरूप में विलीन हो जाता है उसकी आत्मामें अनुपम चिदानंद छटकने लगता है और म्नके विलीन हो जाने पर सकल्प नष्ट हो जाते हैं इसलिये उससमय अव तस्वरूप ही प्रकाश दृष्टिगोचर हो निकलता है। कहा भी है- उदयति न नयश्रीरस्तमेति प्रमाणं कचिद च न विद्मो याति निक्षेपचक्र । किंमपरमभिदध्मो धाम्नि सर्वंकपेस्मि- अनुभवमुपयाते भाति न तमेव ।। अर्थात् -समस्त परद्रव्य और पर्यायोंसे रहित विशुद्ध आत्म- स्वरूपके अनुभव होनेपर द्रव्यांर्थिक आदि नयोंका उदय नहिं होता। प्रत्यक्ष परोन आदि प्रमाण नष्ट हो जाते हैं नाम स्था- पना आदि निक्षेपोंका समुदाय न मालून कहां लापता हो जाता है और अन्य (निर्देश स्वामित्व आदि) को क्या कहैं उससमय द्वैत ही नहीं मालूम होता अब त केवल चैतन्यवमत्कारस्वरूप • - आराधनासार हिंदी टीका सहित १४१ मात्मा ही सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है ॥५४॥ उव्वसिए मणगेहे पट्टे पीसेसकरणवावारे । विप्फुरिए ससहावे अप्पा परमप्पत्रो हवई ॥५॥ उद्धसिते मनोगेहे नष्ट निश्शेषकरणव्यापारे । विस्कुरितस्वसद्धावं आत्मा परमात्मा भवति ।। ८५॥ अथ-इन्द्रियोंके विषयोंसे मनके पराऊ मुख हो जानेपर और समस्त इंद्रिय व्यापारोंके नष्ट हो जानेपर जिससमय स्वस्वभाव' स्फुरायमान हो निकलता है उसममय जीवात्मा परमात्मा बन जाता है। भावार्थ-बहुतसे मनष्यों का यह सिद्धांत है कि परमात्मा ईश्वर पदार्थ भिन्न है उसीकी आज्ञानुयार जीवोंको सुख दुःख भोगना पड़ता है और यह आत्मा परमात्मा नहिं हो सकता परंतु जैनसिद्धांत इस वातको स्वीकार नहिं करना उसका यह अभिमत है कि समस्त कर्मोके नाश हो जानेपर जिससमय आत्मा के आत्मिक सम्यग्दर्शन आदि गुण स्फुरायमान हो निकलते हैं उससमय यह जीवात्मा ही परमात्मा हो जाता है तथा प्रात्माके सम्यग्दर्शन आदि यात्मिक गुण उसीसमय स्फुरायमान होते है जिससमय समस्त स्पर्शन आदि इंद्रियोंके व्यापार नष्ट हो जाते हैं और इ द्रयोंके व्यापार उसीतमय नष्ट होते है जब कि मन इंद्रियविषयोंकी अोर नहिं झुकता सदा पराङ मुख रहता हैं इस- लिये जो महानुभाव इसवातके अभिलाषी हैं कि हमारी आत्मा परमात्मा बन जाय उन्हें चाहिये कि वे मनको इन्द्रियविषयोंस विमुख रक्खें जिससे इंद्रियों के व्यापार नष्ट हो जाय और उनके tha १४२. माराधनासार हिदी टोकासहित - नाशसे आत्माके सम्यग्दर्शन आदि आत्मिक गुण प्रकाशमान हो निकलें । आत्मा परमात्मा हो जाता है इसमें प्रमाण भी है- उपास्यात्मानमेवात्मा जायते परमोथवा । मथित्वात्मानमात्मैव जायतेग्निर्यथा तरुः ॥ अर्थात्-जिसप्रकार वृक्ष स्वयं घिट्टकर अग्निस्वरूप परिणत हो जाता है उसीप्रकार आत्मा भी स्वयं अपनी उपासनाकर परमात्मा बन जाता है अन्य कोई उसे परमात्मा नहिं बनाता। हरएक मनुष्यकी यह सामर्थ्य नहीं कि वह इंद्रियोंके व्या- पारको नष्ट कर मकै और आत्मिक गुणोंकी संपत्तिको प्राप्त करसके क्योंकि यह अनुभवसिद्ध है कि अज्ञानी वहिरात्मा इंद्रिय व्या- पारोंको नष्ट न कर उन्हींमें लिप्त रहता है जैसा कि कहा है- न तदस्तींद्रियार्थेषु यत्क्षेमंकरमात्मनः । तथापि रमते बालस्तत्रैवाज्ञानभावनात् ।। अर्थात्- इंद्रियविषयों में रमण करनेसे यद्यपि कुछ कल्याण प्राप्त नहिं हो सकता तो भी मूर्ख मनुष्य अज्ञानके माहात्म्यसे सदा उनमें रमण करता रहता है और आनंद मानता है। परंतु हां ! जो मनुष्य इंद्रियोंको वश करलेता है उसै परम- तत्त्वकी प्राप्ति होती है। कहा भी है- संहृतेषु स्वमनोगजेषु यद्भाति तत्त्वममलात्मनः परं । तद्गतं परमनिस्तरंगतामग्निरुप इव जन्मकानने ॥ अर्थात्-इंद्रिय और मनरूपी हाथियोंके वश करनेपर जो आत्माका परम विशुद्ध स्वरूप स्फुरायमान होता है वह किसी आराधनासार हिंदी टीका सहित बाह्य उपाधिसे चल विचल नहिं होता उस समय वह वनमें लगी हुई अग्निके समान संसारको सर्वथा नष्ट करदेता है । ८५ ॥ इय एरिसम्मि सुगणे झाणे झाणिस्स वट्टमाणस्स । चिरबद्धाण विणासो हवइ सकम्माण सव्वाणं ८६ इत्येतादृशेशून्ये घ्याने ध्यानिनो वर्तमानस्य । चिरवद्धानां विनाशो भवति रवकर्मणां सर्वेपां॥८६॥ अर्थ-ऊपर जो शून्य ध्यानका स्वरूप बतलाया गया है जो योगी उस शून्य ध्यानमें सदा विद्यमान रहता है उसका आरा- धन करता रहता है उसके चिरकालसे संचित भी कर्म सर्वथा नष्ट हो जाते हैं किसी भी कर्मका आस्रव और बंध नहिं होता। भावार्थ-यह नियम है कि जबतक समस्त कर्मोका नारा नहिं होता तबतक कभी भी अनुपम अव्यायाधमय सुख नहिं मिलता और जवतक शून्य ध्यान--निर्विकल्पक समाधिका अवलंबन नहिं किया जाता तबतक समस्त काँका नाश होना असंभव है। जो योगी अव्यावाधमय सुखकी अभिलापासे समस्त कर्मोंका नाश करना चाहते हैं उन्हें चाहिये कि वे सदा शून्यध्यानका पाराधन करते रहैं । शून्यध्यानकी प्रशंसामें कहा है- चितमत्तकरिणा न चेद्धतो दुष्टबोधवनवन्हिनायवा। योगकल्पतरुरेप निश्चितं वांछित फलात मोनसतलं ।। अर्थात्-यदि यह निर्विकल्पक ममाधिरपी कल्पवृक्ष चित्त- रूपी मदोन्मत्त हाथीसे नष्ट न किया जाय और दुष्ट ज्ञानरूपी अग्निसे न जलाया जाय तो इसम कोई संदेह नहीं यह मोचरी माराधनासार हिंदी टीका सहितः वांछित और सर्वोत्तम फलको प्रदान करता हैं ॥८६॥ एणीसेसकम्मणासे पयडेइ अणतणाणचउखंध । अरणेवि गुणा य तहा माणस्थ ण दुल्लहं किंपि ८७ निश्शेपकर्मनाशे प्रकटयत्यनतज्ञानच स्कंध । अन्यपि गुणाश्च तथा ध्यानस्य न दुर्ल. किंचिदपि ॥२७॥ अर्थ-समस्त ज्ञानावरण आदि काँके नष्ट हो जानेपर अनंत ज्ञान अनतसौख्य और अनंतदर्शनरूप अनंत चतुष्टयका उदय हो जाता है और अन्य सूक्ष्मत्व अव्यावाध आदि गुण भी प्रकट हो जाते हैं क्योंकि ध्यानलिये कोई पदार्थ दुर्लभ नहीं । भावार्थ-ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनीय मोहनीय आयु नाम गोत्र और अंतराय ये कौके आठ भेद हैं | जिससमय इन समस्त कर्मोका नाश होजाता है उससमय जीवात्मा परमात्मा बन जाता है और उसके अनंतविज्ञान आदि गुण प्रकट हो जाते हैं। अर्थात् ज्ञानावरण कर्मके सर्वथा क्षयसे अनंत ज्ञान, दर्शना- वरण कर्मके सर्वथा दायसे अनंतदशन, मोहनीय कर्मो सर्वशा क्षयसे निराकुलतामय सुख, अंतराय कर्मके वायसे अनंतवीर्य, वेदनीयके दायसे अन्यायाधमय सुख, आयुकर्म चायसे अस्मा- हनत्व, नाम कर्मके क्षयस सूक्ष्मत्व और गोत्रकर्मके सर्वथा क्षयसे अनुरुलधुत्व गुण प्रकट होता है। कहा भी है.. हग्वाधो परमौ तदावृतिहतेः सौख्यं च मोहक्षयात् वीर्यं विन्नविधाततो प्रतिहतं मूतिर्न नामशतेः । आयुर्नाशवशान जन्ममरणे गोत्रेण गोगं विना .

आराधनासार हिंदी टीका सहित १४५ - सिद्धानां न च वेदनीयविरहाद् दुःखं सुखं चाक्षयं ॥ अर्थात् -दर्शनावरण और ज्ञानावरण कर्मों के सर्नथा क्षयसे अनंतदर्शन अनंतज्ञान प्रकट होते हैं मोहनीयकर्मके क्षयसे निरा- कुलतामय सुख, अंतरायकर्मके क्षयसे अनंतवीर्य, नामकर्मके सर्वथा क्षयसे सूक्ष्मत्व, आयुकर्मके अभावसे जन्म मरणका अभाव प्रवगा- हनत्व, गोत्रकर्मके क्षयसे गोत्रका अभाव अगुरुल घुन्च, और वेदनीय कर्मके अभावसे दुःखका अभाव अव्यावाधमय मुखरूप गुण सिद्धोंके प्रकट होते हैं और भी कहा है- यैदुःखानि समाप्नुगति विधिवज्जानंति पश्यति नो वीर्यं नैन निजं भजत्यसुभृतो नित्यं स्थिताः संमृती । कर्माणि प्रहतानि तानि महता योगेन यैस्ते सदा सिद्धानन्तचतुष्टयामृतसरिन्नाथा भवेयुन किं ।। अर्थात्-संसारमें स्थित प्राणिगण जिन कर्मों के द्वारा नाना प्रकारके दुःखोंको प्राप्त होते हैं पदार्थों के वास्तविक स्वरूपको न जान ही सकते हैं न देख ही सकते हैं और अपनी सामर्थ्यको मी प्राप्त नहिं करसकते वे कर्म जिन महानुभावोंने अपने प्रचंड ध्यानके द्वारा सर्वथा नष्ट करदिये हैं वे अवश्य सिद्धोंकी अनंत- चतुष्टयरूप नदीके स्वामी बनते हैं अर्थात् कमों के नाश करनेवाले महाशयोंको अवश्य अनंतविज्ञान आदि गुणोंकी प्राप्ति होती है। इसलिये यह वात निश्चित है कि ध्यानके अंदर अवश्य यह सामर्थ्य है कि वह समस्त कोको नाराकर अनंत विज्ञान आदि गुणोंकी प्राप्ति करा सकता है अतः विद्वानोंको अवश्य भ्यानका १० १४६ आराधनासार हिंदी टीका सहित अवलंबन करना चाहिये ॥८॥ जाणइ. पस्सइ सव्वं लोयालोयं च दवगुणजुत्तं । एयसमयस्स मज्झ सिद्धो सुद्धो सहावत्यो ॥८॥ जानाति पश्यति सर्व लोकालोकं च द्रव्यगुणयुक्त । एकसमयस्य मध्ये सिद्धः शुद्धः स्वभावस्थः ।।८।। अर्थ. शुद्ध और स्वभावमें लीन सिद्ध परमेष्ठी एक ही समयमें सर्वद्रव्य और उनके गुण पर्यायोंसे युक्त समस्त लोक और अलोकको एक साथ देखते जानते हैं । भावार्थ-जिसमें जीव आदि पदार्थ दीखे उसे लोक और जहांपर सिवाय आकाश के अन्य कोई भी द्रव्य दृष्टिगोचर न हो उसे अलो- काकाश कहते है । भगवान सिद्ध परमेष्ठी ज्ञानावरण आदि कोसे रहित शुद्ध और स्वस्वभावमें लीन होचुके हैं इसलिये जिसप्रकार सूर्यका प्रताप और प्रकाश एकसाथ पृथ्वी पर पड़ता है उसीप्रकार भगवान परमेष्ठी समस्त लोक अलोकके पदार्थोंको मय उनकी गुण और पयायोंके एकसाथ जानते और देखते हैं उन्हें लोक और अलोकके पदार्थोके देखनेमें किसी प्रकारका प्रावरण नहीं होता। कहा भी है- विश्वं पश्यति वेत्ति शर्म लभते स्वोत्पन्नमात्यंतिक नाशोत्पत्तियुतं तथाप्यचलकं मुक्त्यर्थिनां मानसे । एकीभूतमिदं वसत्यविरतं संसारभारोभित शांतं जीवधनं द्वितीयरहितं मुक्तात्मरूपं मह : ॥ अर्थात् यह सिद्धात्मारूप तेज समस्त पदार्थोको देखता और - आराधनांसार हिंदी टीका सहित १४५ जानता है,आत्मिक अविनाशी सुखका अनुभव करता है । मोक्षा- भिलापी मनुष्योंके चित्ता, यद्यपि वह उत्पाद और विनाराशील है तथापि द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा ध्रुव अविनाशी है, सहा एक स्वरूप रहता है, संसारसंबंधी भारस बहिर्भूत है, शांत है, चैत- न्यचमत्कारस्वरूप और कमी से रहित है।॥ ८ ॥ कालमणंतं जीवो अणुहवइ सहायसुक्खसंभूई। इंदयविसयातीदं अणोवमं देहपरिमुको ॥ ८ ॥ कालमनंतं जीवानुभवति स्वभावसुखसंभृति । इंद्रियविषयातीतां अनुपमा देहपरिमुक्तां || अर्थ-तथा वह शरीररहित सिद्ध परमेष्ठी अनंतकालपर्यंत अती. द्रिय अनुपम स्वाभाविक सुखका अनुभव करते हैं । भावार्थ-सिद्ध परमेष्ठा औदारिक आदि शरीर और जन्म मरण आदिकी वेद- नासे रहित हो गये हैं इसलिये वे सदा स्वाभाविक अतींद्रिय अनु- पम सुखमें मग्न बने रहते हैं। कहा भी है- येपां कर्मनिदानजन्मविविधत्तपमुखा व्यावर- स्तेपामन्नजलादिकोपधगणस्तच्चांतये युज्यते । सिद्धानां तु न कर्न तत्कृतरुजो नातः फिमन्नादिभि- नित्यात्मोत्यसुखामृतांबुधिगतास्तृप्तारत एव ध्रुवं । अर्थात्-जिन मनुष्योंके कर्मसे जायमान क्षुधा प्यास आदि नानाप्रकारकी व्याधियां विद्यमान हैं उन्हें उन व्याधियोंके दूर करनेकेलिये अन्न जल आदि सोपधियांकी अावश्यकता पडती है सिद्धोंको अन्न आदिकी श्रावश्यकता नहीं क्योंकि उनके कर्म t १४८ आराधनासार हिंदी टीका सहित और उनसे उत्पन्न होनेवाली व्याधियां नहीं किंतु वे तो सदा 'नित्य और आत्मिक सुखरूपी अंमृतसमुद्रमें सदा : मग्न रहते हैं ॥८६॥ इय एवं णाऊणं धाराहउ परयणस्स जं सारं । आराहणचउखंधं सवत्रो संसारमोक्खट्ठ॥१०॥ इति एवं ज्ञात्वा आगधयतु प्रवचनस्य यत्सार। आराधनाचतुल्क क्षपकः संसारमोक्षार्थ ॥१०॥ अर्थ-इसप्रकार उपर्युक्त चारो प्रकारकी आराधना ही समस्त आगमका सार हैं ऐसा जानकर क्षपकको चाहिये कि वह संसारके नाशार्थ उनका अवश्य आराधन करै । भावार्थ-यह संसाररूपी समुद्र भांति भांतिसे दुःखरूप जलसे परिपूर्ण, दुर्गति- रूसी वड़वानलसे व्याप्त, क्रोधरूपी वृक्षोंसे युक्त पुलिनोंका धारक अहंकाररूपी नाके और मगरोंके समूहसे भयंकर, मायो- रूपी मछलियोंसे विशिष्ट और लोभरूपी वालुका धारक है तथा ऊपर जो ज्ञान दर्शन चारित्र और तप चार प्रकारकी आराधना- रूप जहाज है उसके अवलंवनसे यह तिरा जाता है इसलिये आराधनाओंको सबका सार वतलाया है अतः क्षपकको चाहिये कि वह संसारके नाशमें आगमकी सारभूत चारो आराधनाको कारण जानकर अवश्य उनका आराधन कर ॥१०॥ धण्णा ते भयवंता अवसाणे सबसंगपरिचाए। काऊण उत्तमटुं सुसाहियं णाणवंतहि ॥ १॥ वन्यास्ते भगवंतः अवसाने सनयंगपरिलाग। t- ३ -- K बारावनासार हिंदी टीका सहित १४६ कृत्वा उत्तमार्थ सुसाधितं ज्ञानवद्भिः ॥ १ ॥ अर्थ-वे ज्ञानके भंडार भगवान धन्य हैं जिन्होंने अपने जीव- नमें समस्तप्रकारके परिग्रहका त्यागार उत्तम पदार्थ मोक्षको साधा। भावार्थ-जो मनुष्य विशुद्ध ज्ञान दर्शन स्वभाव परमा- त्माके ज्ञानसे संपन्न हैं ऐसे विरले ही हैं। प्रात्मप्रवोधमें भी कहा है- -- विद्यते कति नात्मबोधविमुखा संदेहिनो देहिनः प्राप्यते कतिचित्कदाचन पुनर्जिशासमाना कचित्- आत्मज्ञाः परमात्ममोदसुखिनः प्रोन्मीलतई शो द्वित्राः स्युबहवो यदि त्रिचतुरास्ते पंचपा दुर्लभाः ॥ अर्थात्-इस संसार में प्रायः सब जीव आत्मबोधले विमुख हैं यदि कोई कदाचित् आत्माको जानते भी हैं तो वे आत्मा क्या है : किसै आत्मा कहते हैं ? इसी संदेहमें उलझ रहे हैं इसलिये उनको भी यह स्पष्ट ज्ञान नहीं कि वास्तविक यात्मा क्या पदार्थ है ? परंतु जो वास्तविक आत्माके स्वरूपके जानकार हैं आत्मज्ञान से उत्पन्न हुये प्रमोदसे हर्षायमान हैं और जिनकी दृष्टि वाह्य पदा- र्थो से सर्वथा हटकर निज प्रात्माकी ओर झुक गई है ऐसे महानुभाव एक दो ही हैं और बहुत हैं तो तीन चार से पांच या के तो मिलने अत्यंत दुर्लभ हैं। इसलिये जिन विशुद्ध बोयके धारक महात्मायाने वाघ अभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रहोंका त्यागकर मोक्ष पदार्थको साध लिया है वे धन्य हैं।

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माराधनासार हिंदी टीका सहित
परिग्रहकी छूटना अत्यन्त कठिन है इसलिये निम्नलिखित
उपायोंसे उसका त्याग करना चाहिये---
स्नेहं नैरं संघ परिग्रहँ चापहाय शुद्धमनाः।
स्वजनं परिजनमपि च क्षात्वा शमयेत्प्रियर्वचनैः ।।
आलोच्य सर्वमनः कृतकारितमनुमतं च निर्व्याज ।
आरोपयेन्महाव्रतमामरणाथायि निश्शणं ।।
अर्थात्-राग द्वष संघ परिग्रह स्वजन और परिजनोंकों
सर्वथा छोड़कर शुद्ध मन हो उन्हें क्षमा करें और स्वयं भी प्रिय
वचनोंसे क्षमा कराये । तथा कृत कारित और अनुमोदनासे
संचित समस्तकर्मोकी विना छलके आलोचना कर मरणपर्यंत
समस्त महाव्रतोंको धारण कर तथा कर्मोकी आलोचना इसप्रकार
करना चाहिये-
कृतकारितानुमननैस्त्रिकालविषयं मनोवचःकायैः ।
परिहृत्य कर्म सर्वं परमं नष्कर्ममवलंबे ।।
मोहाद्यदहमका समस्ताप कर्म तत्प्रतिक्रम्य ।
आत्मनि चैतन्यात्मनि नित्यमात्मना वर्ते।
मोहविलासविजृ भितमिदमुदयत्कर्म सकलमालोच्य ।
आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्ते ।।
प्रत्याख्याय भविष्यत्कर्म समस्तं निरस्तसंमोहः ।
आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्ते ।।
समस्तमित्येवमपास्य कर्म कालिकं शुद्धनयावलंयी।
विलीनमोहो रहितं विकारैश्चिन्मात्रमात्मानमथावलंबे ।।
विगलंतु कर्मविषतरुफलानि मम भुक्तिमंतरेणैव ।
संचेतयेमचलं चैतन्यात्मानमात्मानं ।।
.

आराधनासार हिंदी टीका सहित अर्थात्-मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदनसे जो मैंने तीन कालोंमें कर्म उपार्जन किये हैं उन समस्त कर्मों का त्यागकर मैं अब परम निष्कर्म अवस्था का अवलंबन करता हूँ। मोहसे जो कुछ भी मैंने भूतकालमें कर्म किये हैं उन सबका प्रत्याख्यान त्यागकर मैं चैतन्य स्वरूप और निश्चल अपनी आत्मामें स्थिति करता हूँ। मोहके विलाससे उदित और वृद्धिको प्राप्त वर्तमान कालके समस्त कर्मोकी आलोचनाकर चैतन्यस्वर निश्चल अपनी आत्मामें मैं स्थिति करता हूं। मोहसे सर्वथा रहित होकर भविष्यत् आगे उदयमें आनेवाले काँका प्रत्याख्यान त्यागकर चैतन्यस्वरूप निश्चल आत्मामें सदा स्थिति करता हूं। इसप्रकार तीनों कालोंके समस्त कर्मोको नष्टकर परम शुद्धनयका अवलंबन करनेवाला मोह और उसके विकारोंसे रहित में चेतन स्वरूप आत्माका अवलंबन करता हूं । अतमें विना फल दिये मेरे कर्मरूपी विपवृक्षके फल नष्ट होजाय इस कामनासे मैं निश्चल चैतन्यस्वरूप आत्माका ध्यान करता हूँ । तथा इस आलोचनाके पीछे- शोक भयमवसादं क्लेशं कालुप्यमरतिमपि हित्वा । सत्त्वोत्साहमुदीर्य च मनः प्रसाचं श्रु तेग्मृतः ।। आहार परिहाप्य क्रमशः स्निग्धं विवर्धयेत्या.म। स्निग्धं च हापयित्वा खरपानं पूरयेनमशः ।। खरपानहापनामपि एत्वा कृत्वोपवासमपि शरत्या ।

जारायनातार ९दादा सात पंचनमस्कारमनास्तनु त्यजेत्सर्वयत्नेन । अर्थात्-शोक भय खेद क्लेश कालिमा और अरतिका सर्वथा त्यागकर और आत्मिक उत्साहको प्रकटकर शास्त्ररूपी अमृतसे मन प्रसन्न रखना चाहिये । तथा आहारका त्यागकर स्निग्ध दूध आदि पान करना चाहिये और पीछे स्निग्ध पानको भी छोडकर छाछ पान करना चाहिये । तथा सरपानका भी त्यागकर शक्तिपूर्वक उपवास कर पंचनमस्कार मंत्रमें लीन हो बड़े यत्नसे शरीरका त्याग करना चाहिये । विद्वानोंको चाहिये कि इस उपायसे अवश्य उत्तम गतिको सिद्ध करें ॥६॥ जिससमय क्षपक तीव्र वेदनासे युक्त जान पड़े उससमय उसे इसरीतिसे उत्साहित करना चाहिये- धण्णोसि तुमं सुज्जस लहिऊणं माणसं भवं सारं। कयसंजमेण लद्धं सपणासे उत्तम मरणं ।। १२ ॥ धन्यासि त्वं सद्यशो लब्ध्वा मानुणं भवं सारं । कृतसंयमेन लब्धं सन्यासे उत्तम मरणं ।। ६२ ।। अर्थ-चंद्रमाके समान पवित्र कीर्तिके धारक क्षपक ! तू. धन्य है क्योंकि भवोंमें सार मनुष्य भव प्राप्तकर तूने संयमपूर्वक उत्तम सन्यास मरण प्राप्त किया-तेरा शरीर सन्यास मरणसे छूट रहा है । भावार्थ-मन बडा चंचल है जरासे दुःख पाजानेपर ही यह चंचल हो उठता है इसलिये ग्रंथकारकी शिक्षा है कि जिस- समय क्षपक तीव्र वेदनासे युक्त जान-पडे उससमय उसे इसरूपसे उत्साहित करना चाहिये कि हे क्षपक! तूही संसारमें थन्य है आराधनासार हिंदी टीका सहित : १५६ min और प्रशंसाके योग्य है क्योंकि संयमको आराधकर संन्यास- पूर्वक मरण करना उत्तम तप है। सो तूने उत्तम मनुष्य भव पाकर और संयमको आराधनकर संन्यासके आलंबनसे उत्तन मरण पाया है । ठीक भी है जो पुरुष आत्माराधनपूर्वक तप तपता है वह अति उत्तम गिना जाता है। क्योंकि- लध्वा जन्म कुले शुचौ वरवपुर्बुद्ध्वा श्रुतं पुण्यतो वैराग्यं च करोति यः शुचि तपो लोके स एकः कृती। तेनैवोज्झितगौरवेण यदि वा ध्यान समापीयते प्रासादे कलशस्तदा मणिमयेहेमेस्तदारोपितः ।। अर्थात्-पवित्र कुलमें जन्म और मनोज्ञ शरीर पाकर एवं शास्त्रके रहस्यको जानकर जो पुरुप वैराग्य धारण करता है और पवित्र तप तपता है वह मनुष्य संसारमें एक ही पुण्यवान गिना जाता है तथा यदि वही पुरुष अपने वढप्पनका कुछ भी खयाल न कर ध्यानका अवलंबन करता है तो समझना चाहिये उसने मनोज्ञ प्रासादके ऊपर मणिजडित सुवर्णमयी कलशोंका आरोपण कर दिया अर्थात् उसकी बरावर कोई भी अन्य पुरुष भाग्यशाली नहीं। इसलिये आत्मारायनपूर्वक सन्यासमरए आदि तपोंका विद्वानोंको अवलंबन करना चहिये ।। ६३ ।। क्षपकको शारीरिक और मानसिक दुःख अवश्य होता है यह अब बतलाते हैं- किसिए तणुसंघाए चिट्ठारहियस्स विगयधामस्स । खवयस्स हवइ दुःखं तकाले कायमणुहूयं ।। ६३ ।।

-आराधनासार हिंदी टीका सहित कृपिते तनुसंघाते चेष्टारहितस्य विगतंधाम्नः । क्षपकस्य भवति दुःखं तत्काले कायमन उद्भूतं ॥ १३ ॥ अर्थ-उपवाससे वा तीव्र वेदनाके कारण जिससमय शरीर कृश होजाता है उससमय चेष्टारहित और निर्बल क्षपकको अवश्य शारीरिक और मानसिक दुःख भोगना पडता है । भावार्थ-शिर कान नेत्र आदिमें तीव्रवेदना वा ज्वरके आवेशसे शरीर जलना आदि शारीरिक दुःख और यह घर मेरा है स्त्री भाई लक्ष्मी,आदि मेरे हैं इसप्रकारके संकल्प विकल्प मानसिक दुःख हैं । जिससमय उपवास वा तीव्र वेदनाके कारण क्षपकका शरीर कृश होजाता है उससमय उसे शारीरिक मानसिक दोनों प्रकारके दुःख सताने लगते हैं कोंकि उसप्तमय वह क्षपक शक्ति हीन हो जाता है और शरीरकी निर्बलनाके कारण हलन चलन आदि चेष्टा भी उसकी नष्ट हो जाती है इसलिये क्षपकको चाहि- ये कि वह विशुद्ध परमात्माकी भावनासे वचन मन काय आदि कर्माको भिन्न माने जिससे उसे दुःख न मालूम पडे। कहा भी है- कर्मभिन्नमनिशं स्वतोखिलं पश्यतो विशदबोधचक्षुपा। तत्कृतेपि परमार्थवेदिनो योगिनो न सुखदुःखकल्पना ।। अर्थात्-जो योगी परमार्थवेदी है विशुद्ध परमात्मस्वरूपका पूर्ण जानकार है उसे चाहिये कि वह अपने विशुद्ध ज्ञानरूपी वतुसे समस्त नोंको सदा भिन्न देखे क्योंकि वैसा करनेपर उसके सुख दुःखकी कल्पना नहिं उठती । कर्म और आत्माके भेद- ... आराधनासार हिंदी-टीका सहित विज्ञानसे शारीरिक मानसिक किसी प्रकारका उसे दुःख नहिं सहना पडता ।। ६३॥ कठिन स्थानपर सोनेसे यदि किसीप्र- कारका दुःख मालूम पड़े तो उसे समभावोंसे सहन करलेना चाहिये यह बतलाते हैं- जइ उप्पज्जइ दुःखं ककससंथारगहणदोसेण । खीणसरीरस्स तुम सहतं समभावसंजुत्तो॥ ६४.॥ यद्युत्पद्यते दुःखं कर्कशसंस्तरग्रहणदोपण। ज्ञीणशरीरस्य त्वं सहस्व समभाव संयुक्तः ॥ ४ ॥ अर्थ-क्षीणशरीरके धारक क्षपकको यदि सोनेके स्थानकी कठोरतासे यदि किसी प्रकारका क्लेश उत्पन्न हो तो उसे सम- भावोंसे सहन करलेना चाहिये। भावार्थ-सर्प हार मित्र शत्रु तृण स्त्रियोंके समूहमें समानभाव रखना उन्हें एकसा मानना समभावना है। जिससमय क्षुधा तृपा आदिकी तीव्र वेदनासे अत्यंत क्षीण शरीरके धारक क्षपकको कठिन शिलापर सोनेसे किसीप्रकारका दुःख मालूम पड़े उसका शरीर कठिन स्थानके दुःखको न सहसकै तो उसे चाहिये कि उससमय वह समभावना से उसे सहले दुःखसे भयभीत हो अपने कार्यसे विचलित न होने क्योंकि जो मुनि शत्रु मित्र ओदिमें समभावना रखता है उसे अवश्य परमात्मस्वरूपकी प्राप्ति होती है। कहा भी है- एकस्यापि ममत्वमात्मवपुषः स्यात्ससृतेः कारणं फा वाहमार्थकथा प्रथीर्यास तपस्याराध्यमानेपि च। तद्वात्यां हरिचंदनाप च समः संश्लिहतोप्पंगतो- - माराधनासाराहदाटाका साहत. भिन्न स्वयमेकमात्मनि धृतं पश्यत्यजन मुहुः । अर्थात् -प्रसिद्ध और सर्वोत्तम तपके पाराषन करनेपर भी जव अकेले अपने शरीरका ही ममत्व संसारका कारण हो जाता हैं केवल अपने शरीरमें मनत्व रखनेसे ही संसारमें घूमना पडता है तब न मालूम वाह्यार्थ स्त्रो पुत्र आदि पदार्थोकी कथा से उनमें रागद्वप आदि करनेसे क्या हानि न होगी? इसलिये जो मुनि कुल्हाड़ी और चंदन समान मानते हैं कुल्हाडीको बुरा और चंदनको मला नहिं मानते वे शरीरसे युक्त रहनेपर भी स्वयं काँसे भिन्न अपनेको अपने में स्पष्टरूपसे देख लेते हैं । आत्मस्वरूपके ज्ञानी निम्रय तो अवश्य ही समभावना भाते हैं यह वतलाते हैं- तृणं वा रत्नँ वा रिपुरथ पर मित्रमथ वा सुखं व दुःख वा पितृवनमहो सौधमथ वा। स्तुतिर्वा निंदा वा मरणमथवा जीवितमथ स्फुट निग्रंथानां द्वयमपि समं शांतमनसां ।। अर्थात्- जो निग्रंथ शांत चित्तके धारक हैं उनके तुण रत्न, शत्रु मित्र, सुख दुःख, मसानभूमि महल, स्तुति निंदा, मरना और जीना समान हैं अर्थात् तृण शत्रु आदिको वे चुरा नहिं कहते और रत्न मित्र श्रादिको अच्छा नहिं मानते। इस- लिये विद्वान मुनियोंको चाहिये कि वे अवश्य समताका अवलंबन करें ॥ १४ ॥ हे क्षयक ! परीपहोंको महन करता हुआ यदि तू विस्तर पर पड़ा रहेगा तो आत्मध्यानमें लीन होनेके कारण तेरे .

माराधनासार हिंदी टोका सहित १५७ काँकी निर्जरा होगी यह बतलाते हैं- तं सुगहियसरणासे जायकालँ तु वससि सँथारे। तरहाइदुक्खतत्तो णियकम् ताव णिज्जसि ॥६५॥ त्व सुगृहीतसन्यासो यावत्कालं तु वमसि संस्तरे। तृष्णा दिदुःखतप्तो निजलन तावनिर्जरयसि ।। ६५ ॥ अर्थ-हे क्षपक ! तृष्णा आदिसे संतप्त भी जब तक र संन्यस्त संन्यासयुक्त रहेगा तबतक अवश्य तेरे कर्मोकी निर्जरा होती रहेगी। भावार्थ-संन्यासमरणके समय क्षुधा प्यास आदि की तीव्र वेदना पाकर उपस्थित हो जाती है और उससमय तीन वेदनाके न सहसकनेके कारण चित्त चंनल हो उठता है इस- लिये क्षपकको उत्साहित करनेकेलिये ग्रंथकार उपदेश देते हैं कि हे पपक ! यद्यपि संन्यासमरणके समय नुधा तृपा आदिकी तीम वेदना भोगनी पड़ती है परंतु उसवेदनासे संतप्त होनेपर भी जब- तक तू सन्यासमें दृढ़ होकर विस्तरपर पड़ा रहेगा और आत्म- ध्यानमें लीन बना रहेगा तबतक अवश्य तेरे काकी निर्जरी होती रहेगी क्योंकि आत्मज्ञानी मनुष्यके बहुत जल्दी कोकी निर्जरा होती है जैसे कि कहा है- अज्ञो यदरकोटिभिः तपयति च कर्ग तस्माता- स्वीकुवन् कृतसंवरः स्थिरमना नानी तु त्तत्मात् । तीक्ष्क्लेशहयारितोपि हिं पदेन तपःलंदनः नीपंतं नयति प्रभुं कुटतरसानफस्नोन्मितः ।। अर्थात्-जो पुरुष अज्ञानी है वह वर्तमान कालमें सपनी डा.

आराधनासार हिंदी टीका सहित स्मासे संबद्ध कर्मोको भी करोडों भवोंमें नष्ट कर सकता है किंतु संवर और निश्चल चित्तका धारक ज्ञानवान मनुष्य अज्ञानीके कमांसे भी अधिक कर्माको क्षणभरमें नष्ट कर सकता है क्योंकि अपने स्वामीको इटस्थानपर लेजानेवाला तपरूपी रथ तीक्ष्ण क्लेशरूपी घोडासे युक्त रहनेपर भी यदि विशद ज्ञानरूपी सार- थिसे रहित है तो वह कभी भी अपने स्वामीको इष्ट स्थानपर नहिं पहुंचा सकता अर्थात्-तीव्र तपको तपनेवाला पुरुष यदि अज्ञानी है तो वह कभी भी अपनी आत्माको काँसे रहित नहि बना सकता । इसलिये लो पुरुष कर्मोंकी निर्जरा करना चाहते हैं उन्हें चाहिये कि विस्तरपर पडे २ यदि क्षुधा तृपा आदि का कट आकर उपस्थित हो जाय तो संन्यास और आत्म- च्यानसे विचलित न होवे ॥ १५॥ तृष्णा आदिकी बाधा उप- स्थित होजानपर यदि क्षपक उसे समभावनासे संहलेता है तो उसके कर्मोंकी निर्जरा ही होती है यह बतलाते हैं- जह जह पोडा जायइ भुक्खाइपरीसहेहि देहस्स तह तह गलति पूर्ण चिरभववद्धाइँ कम्माइँ ॥६६॥ यथा यथा पीडा जायते सुधादिपरीपहर्देहस्य । तथा तथा गलॅति नून चिरभववद्धानि कम्माणि ॥६६॥ अर्थ-ज्ञानवान क्षपकके जैसी जैसी क्षुधा ग्रादि परीपहोंसे शरीरको पीटा होती चली जाती है वैसे वैसे चिरकालसे संचि- त कर्म भी नष्ट होते चले जाते हैं । भावार्थ-यद्यपि 'तपसा निर्जरा च ' इस आगमानुसार निर्जरामें तप कारण है और मारांधतासार हिंदी टीका सहित १५८ - - - यहां पर उसमें समभावना भेदविज्ञान कारण बतलाया है परंतु विना भेदविज्ञान के निर्जरा हो नहिं सकती इसलिये भेदविज्ञान का क्षपकको आवश्य अवलंबन करना चाहिये कहा भी है- कर्मशुष्कतृणराशिरुन्नतोप्युद्गते शुचिसमाधिमारुतात् । मेदबोधदहने हृदि स्थिते योगिनी झटिति भस्मसाद्भवत् ।। अर्थात् -जिससमय हृदयमें पवित्र समाधिरूपी पवनके द्वारा भेदविज्ञान रूपी जाज्वल्यमान अग्नि लह लहा निकलती है उससमय कर्मरूपी सूखे तृणोंका समूह बातकी यानमें जलकर नष्ट हो जाता है अर्थात भेदविज्ञानसे कौकी निर्जराहो जाती है ।। ६६ ॥ मैं अग्निके संसर्गसे जलके समान दुःखोंसे संचप्त हूँ ऐसा क्षपकको विचारना चाहिये यह बतलाते हैं- तत्तोहं तणुजोए दुक्खेहिं अणोवमेहिं तिव्वेहिं । परसुरणारयतिरिये जहा जलं अग्गजोएण ॥६॥ तप्तोहँ तनुयोगे दुःखैरनुपमैस्ती। नरसुरनारकतिरश्विं यथा जलमन्नियोगेन । १७ ॥ अर्थ--जिसप्रकार शीतल भी जल अग्निके संयोगस संतप्त होजाता है उसीप्रकार शांतिस्वरूप भी मै शरीरके संयो- गस मनुष्य देव गतियोंमें तीन दुःखोंस संतप्त होता है । भावार्थ--यदि वास्तविक र पसे देखा जाय तो पानीका स्वभार शीतल है परंतु अग्निके संबंधस वह विकृत-उप्ण हो जाता है उसीप्रकार याद शुद्ध निक्ष्यनयस देखा जाय तो मेरा श्राम अनंत ज्ञानर पी अमृतस भरी हुई वावटीमें गोता मारनेवाला

१६०
आराधनासार हिंदी टोका सहित
और अनंत सुखस्वर प है परंतु व्यवहारसे मुझे मनुष्य देव
मारकी और तिर्यंचोंके अनुपम और घोर दुःख भोगने पडते है
अर्थात् जिससमय मैं मनुष्य गतिमें विद्यमान रहता हूँ उससमय
मुझे इष्टवियोग अनिष्टसंयोग नानाप्रकारकी विपत्तियां और
आधि व्याधिजन्य क्लेश भोगने पड़ते हैं। देवगतिमें इंद्र आदि
की संपत्ति देख मानसिक दुःख भोगने पड़ते हैं । नरकमें असुर
कुमार जातिके देवोंके द्वारा दिये गये खंड २ होकर फिर जुर
जाना भयंकर दुर्गधि सहना आदि वहांके क्षेत्रके और आपसमें
लडने भिडनेसे उत्पन्न हुये दुःख सहने पड़ते हैं तथा तिर्यचगति
में अधिक भार ढोना पिटना छिदना आदि दुःख भोगने पड़ते
हैं ऐसा क्षपकको विचारना चाहिये । तथा-
जानासि त्वं मम भव भवे यश्च यादृक् च दुःखं
जातं यस्य स्मरणमपि मे शस्त्रवनिष्पिनाष्टि।
त्व सर्वेशः सकृप इति च त्वामुपेतोस्मि भक्त्या
यत्कर्तव्यं तदिह विषये देव एव प्रमाणं ॥
अर्थात्- हे भगवन् ! भव भ में जो कुछ और जितना दुःख
जिसका कि स्मरण करना भी शस्त्रके समान पीडा देता है मेरे उत्पश्य
हुआ है मुझे भोगना पडा है उस सवको श्राप जानते हैं. और
श्राप सबके ईश और कृपालु हैं इसलिये मैं भक्तिभावसे तुम्हारे
चरणोंमें आपडा हूँ अब इस विषयमें जो कुछ करना हो आप
करें क्योंकि आप ही प्रमाण हैं आपको ही अधिकार है जो
बाद आप करसकते हैं।

आराधनासार हिंदी टीका सहित ६६१ . ऐसे परम कल्याणकारी परमात्माकी शरण लेनी चाहिये ॥ ७॥ क्योंकि- ण गणेइ दुक्खसल्ल इयभावणभावित्रो फुडं खवओ। .. पडिवज्जइ ससहावं हवइ सुही णाणसुक्खेण ॥६८ न गणयति दुःखशल्य इति भावनाभावितः सुटू नानी । प्रतिपद्यते स्वस्वभाव भवति सुखी ज्ञानसौख्यन ॥ ६॥ अर्थ -इसप्रकार उपयुक्त भावनाका निद्वंद्व हो भावनेवाला तपक दुःखरूपी शल्यको नहिं गिनता, स्वस्वभावको प्राप्त हो जाता है और अनंतज्ञानरूपी सुखसे सदा सुखी रहता है। भावार्थ- मैं अनादि कालसे इस पंचपरावर्तनरूप संसारमें घूमरहा हूँ मैंने घोरसे घोर दुःख सहे हैं इसलिये ये तुधा तृपा आदिके दुःख उनके सामने कुछ भी चीज नहिं । अथवा शुद्ध निश्चयनयसे मैं जन्म जरा मरण आदिसे रहित हूँ इसलिये मेरी यात्माको किसी प्रकारका कष्ट नहिं हो सकता इसप्रकारकी विशुद्ध बुद्धिसे भावना भानेवाले क्षपकको क्षुधा तुपा आदिका कैसा भी दुःख नहिं मताता वह स्वस्वभावमें लीन और अनंतजानरूपी सुखसे सुखी हो जाता है। कहा भी है-- इत्यालोच्य विवेच्य तत्किल परद्रव्य मानवला- तन्मूलां पहुभावसंततिमिमामुद्धर्तुकामः मनं । आत्मानं ममुपैति निर्भरवहन् पूर्णफसवितुते पेनोन्मीलितबंध एप भगवानात्मात्मनि न् नि ।। अर्थान् इसप्रकार समस्त परपदार्थोसो देखकर और उनरी १ ११२ आराधनासार हिंदी टीका सहित : . विवेचनाकर जो पुरुष परद्रव्यके संबंधों कारणरूप रागद्वेष श्रादि के समुदायको समूल नष्ट करना चाहता है वह पुरुष परिपूर्ण और पुष्ट विज्ञानसे युक्त विशुद्ध आत्माको प्राप्त करलेता है क्यों कि कर्ममलोंसे रहित विशुद्ध आत्मा ही विशुद्ध आत्मामें स्फुराय- भान हो सकता है अविशुद्ध विशुद्धमें नहीं इसलिये ज्ञानवान् क्षप- कको चाहिये कि वह अवश्य उपयुक्त भावना भावे ॥ १८ ॥ क्षपकको चाहिये कि वह दुर्धर भी काँको तृणके समान मानकर अपनी आत्माकी आराधना करै यह बतलाते हैं- भित्तूण रायदोसे छित्तूण य विसयसंभवे सुक्खे। : अगणंतो तणुदु:खं झायस्स णिजप्पयं खवया ॥६॥ भित्वा राग द्वापो छित्वा च विपरसंभवानि सुखानि । अगणयंस्तनुदुःखं ध्यायस्व निजात्मानं क्षपकः ।। II : अर्थ-हे क्षपक ! रागद्वपको भेदकर विपयजन्य सुखोंको छेदकर और शरीर संबंधी दुःखको न गिनकर तू अपनी आत्मा, का ध्यानकर। भावार्थ-आत्मध्यानके समय रागद्वेष, विषयजन्य मुख और शरीरके दुःखोंका अवश्य सामना करना पड़ता है परंतु विद्वानोंको इन्हें न कुछ समझकर आत्मध्यानसे विचलित न होना चाहिये क्योंकि जो पुरुष राग द्वेप संयुक्त रहता है वह निज आत्मा का अनुभव नहिं कर सकता-राग द्वपसे रहित ही निज आत्माका स्पष्ट अनुभव करसकता है। कहा भी है- रायदोसा दहया दुहुलिज्जइणव जस्स मण सलिलं । सोणियतच्च पिच्छा पर पिच्छंह तम विवरीयो ! .

आराधनासार हिंदी टीका सहित : १६३ •... अर्थात-जिसके राग द्वंप आदि तुरंग चित्तरूपी जलको नहि खलवलाते थे ही अपने आत्मिक स्वरूपका साक्षात्कार अनुभव कर सकते हैं किंतु राग और द्वपके द्वारा जिनका मन चंचल हो जाता है उन्हें आत्मस्वरूपका साक्षात्कार नहिं होता। तथा राग द्वेपके समान विपयजन्य सुखोंसे भी मुंह मोड़लेना चाहिये क्योंकि इंद्रियविषयोंसे विमुखता होनेपर आत्मध्यान ब्रह्मस्वरूपकी प्राप्ति होती है जैसा कि कहा है- थक्के मृणसंकप्पे रुढे अवखाण विसययावारे । पयडइ वभसरस्व अप्पामागेण जोइंग ।। अर्थात्-मनके संकल्प विकल्पोंके स्थगित हो जानेपर और इंद्रियविपयोंके रुकजानेपर यात्माध्यानसे योगियोंकी ब्रह्मस्वरूपकी प्राप्ति होती है। तथा शरीर ज्वर आदि दुःख उत्पन्न होनेपर. उसकी और ध्यान न देना चाहिये किंतु उससमय- नमे मृत्युः कुतो भीतिन में व्याधिः पुतो व्यथा । तथा वालो न वृद्धाहँ युवा चैतानि पुद्गले ।। अर्थात-री मृत्यु नहीं इसलिये मुन्ने भय नहीं, मेरे व्याधि नहीं इसलिये मुलं दुःख नहीं तथा में बाल वृद्ध युवा भी नहीं यिं तु ये बातें पुद्गलमें होती है ऐसा प्रगिसमय विचार रखना चाहिये ।। ६६ ।। जबतक आत्मारूपी नुवर्ण पापी अनि न तपाया जाता नयनर कामरूपी कालिमा रहित नाहि. होता यह वतलाले- .

१६४ : आरावनासार हिदी टोका सहित जाव ण तवग्गितत्तं सदेहमूसाइं णाणपवणेण । ताव ण चत्तकलकं जीवसुवगणं खु णिव्वडइ १०० यावन्न तपोग्नितप्तं स्वदेहमूपायां ज्ञानपवनेन । तावन्न त्यक्तकलंक जीवसुवर्णं हि निर्व्यक्तीभवति ॥ १० ॥ अर्थ-शरीररूपी मूषामें ज्ञानर पी पवनके द्वारा जवतक यह जीवर पी सुवर्ण तपरूपी अग्निसे नहिं तपाया जाता तबतक कर्मर पी कलंकोंसे रहित जाज्वल्यमान नहिं होता। भावार्थ-यह स्पष्ट देखनेमें आता है कि जिससमय कालिमायुक्त सुवर्ण मूषामें रखकर धोंकनीकी पवनके द्वारा अग्निमे तपाया जाता है उसस- 'मय वह कीट कालिमा आदिसे रहित होकर जगमगा निकलता है उसीप्रकार यह कर्मोंसे मलिन आत्मा सम्यग्ज्ञानरपी पवनके द्वारा तपरूपी अग्निसे तपाया जाता है उससमय कर्मकालिमासे रहित होकर यह जगमगा निकलता है इसलिये विशुद्ध आत्मस्वरूप के अभिलापी विद्वानोंको चाहिये कि वे सम्यग्ज्ञानके धारक हो तपरपी विशुद्ध अग्निसे अवश्य आत्माको शुद्ध बनावें । कहा भो है- तपोभिस्ताडिता एव जीवा शिवसुखस्पृशः । मुसलैः खलु सिद्धय तितंडुलास्ताडिता भृशं ।। अर्थात्-जिसप्रकार मूगलसे वार वार छरे कूटे हुये धान चावल बन जाते हैं उसीप्रकार तपके आराधन करनेवाले जीव ही मोक्षसुखके आस्वादी सिद्ध होने हैं । तथा- सपः सर्वाक्षसारंगवशीकरणवागुरा। ..

माराधनासार हिंदी टीका सहित १६१ - कपायतापमृद्वीका कर्मजीर्णहरीतकी । अर्थात्--यह तप इंद्रियरूपी हरिणोंको वशकरनेकेलिये वागुरा-जाल है कपायरूपी संतापकी शांतिके लिये अंगूर और कर्मर पी अजीर्णके नाशकरनेकेलिये हरड है ॥ १०० ।। दुःख शरीरको होता है और मैं शरीर स्वर प नहीं है ऐसी भावनासे समस्त दुःखोंको सहलेना चाहिये यह बतलाते हैं- णाहं देहो ण मणो ण तेण मे अस्थि इत्थ दुक्खाई समभावणाइ जुत्तो विसहसु दुक्खं ग्रहो खवय १०१ नाहं देहो न मनो न तेन मे अस्ति अत्र दुःखानि । समभावनया युक्तः विपहस्त्र दुःखमहो क्षपक ॥ १०॥ अर्थ-ई क्षपक ! न मैं देहस्वर प हूं और न मनस्वरूप हूं इसलिये संसारमें मुझे कोई दुःख नहीं ऐसी समभावनासे तुझे समस्त दुःख सहलेने चाहिये । भावार्थ-दुःख शरीर और मनको होता है तथा शरीर और मनको अपना माननसे आत्माको दुःख भोगना पडता है परंतु जिससमय हृदय में यह समभावना भेदवि- ज्ञान होजाता है कि शरीर और मन मेरे नहीं इसलिये मुझ संसारमें किसीप्रकारका दुःख भी नहिं होता उससमय किनीन- कारका दुःख नहिं मालूम पडता । वास्तवमें मन वचन सादि, कमौके विकार हैं और आत्मा चिदानंद चैतन्यस्वप है इसलिये वह मन वचन आदिका विषय ही नहीं हो सकता । जैसा कि. कहा है- नो विकल्परहित चिदात्म वन्तु जानु मनमोऽभिगोन।

१६६
आरामनासार हिंदी टीका सहित
...
-
कर्मजाश्रितविकल्परूपिणः का कथा तु वचसो जडात्मनः ।।
. अर्थात्-चिदानंदचैतन्यस्वरूप आत्मा विकल्पोंसे रहित
है और मन कर्मजन्यविकल्पोंसे युक्त वा स्वयं भी कर्मोका विकार
है इसलिये आत्माको विषय नहिं कर सकता तथा वचन भी
जड़ स्वर प कौंका विकार है इसलिये आत्मा उसका भी विषय
नहिं हो सकता । तथा-
:: स्वसंवेदनसुव्यक्तस्तनुमात्री निरत्ययः । :
अत्यंतसौख्यवानात्मा लोकालोकविलोकनः ।।
अर्थात्--वह चिदानंद चैतन्य स्वर प ात्मा स्वानुभव
प्रत्यक्षके गम्य है शरीरप्रमाण व अविनाशी अनंत अनुपम सुखका
भंडार और समस्त लोक अलोकका देखनेवाला है इसलिये
क्षपकको चहिये कि व्यवहारनयकी अपेक्षा शरीरमें रहने वाला
भी आत्मा अखंड अविनाशी अनंतज्ञान आदिका पिंड है उसके
जन्म मरण आदि व्याधियां नहिं हो सकती. ऐसा जानकर.
यदि संन्यासके समय किसीप्रकारकी व्याधि पाकर उपस्थित हो
जाय तो उसके प्रतीकारकेलिये कभी चिंता न करें क्योंकि प्रती.
कारकी चिंतासे वेदनाभव नामका आर्तध्यान होता है और
उससे नरक आदि गतियोंके भयंकर क्लेशका सामना करना
पडता है ॥ १०१ ।। मैं असंत अविनाशी सम्यग्ज्ञान आदि
संपत्तिका स्वामी हूँ और राग श्रादिकी उत्पत्ति शरीरमें होती है
ऐसी क्षपकको सदा भावना भानी चाहिये यह बतलाते हैं-
ण य अस्थि कोवि वाही ण य मरणं अस्थि मे

माराधनासार हिंदी टीका सहित विसुद्धस्स । वाही मरणं काये तम्हा दुःखं ण मे अत्यि न चास्ति कापि व्याधिन च मरण, अस्ति मे विशुद्धस्य । व्याधिरणं काये यस्माद् दुःखं न मे अस्ति ।। १०२ ॥ अर्थ-मैं काँकी कालिमासे रहित विशुद्ध चिदानंद चैत- न्यस्वरूप हूं इसलिये न मेरे कोई व्याधि है, न मरण है; व्याधि और मरण तो शरीरका धर्म है इसलिये मुझे कोई दुःख नहिं । भावार्थ- दुःख संसारमें व्याधि और मरण आदिसे होता है और वे पुद्गलके धर्म हैं शरीर में होते हैं मेरी आत्मामें किसीप्रकार की व्याधि और मरण नहिं होते क्योंकि मैं चिदानंद चैतन्य- स्वरूप परम विशुद्ध हूँ इसलिये मुझ संसारमें किसीप्रकारका कष्ट नहिं । कहा भी है- रुग्जरादिविकृतिर्न मेंजसा सा तनोरहमितः सदा पृथक् । मेलनेपि सांत खे विकारिता जायते न जलविकारिभिः ।। अर्थ-रोग जरा आदि जितने विकार हैं ये मेरे नहिं निध- यनयसे वे शरीरके हैं और वह मुझसे सर्वथा भिन्न है तथा जिस- प्रकार विकार करनेवाले मेघोंका संबंध होनेपर भी भाकाशमें किसीप्रकारका विकार नहिं होता उसीप्रकार छात्माक नाय शरीरका संबंध होनपर भी आत्मामें किसीप्रकारका विकार नहि हो सकता । इसलिये ज्ञानवान आपकको चाहिये कि वह समभा- वनाके बलसे रोग यादिकं उपस्थित होने परभी किनीप्रकारका दुःख न माने ॥ १०२॥ कोई ऐसी शंका कर कि व्याधि आदि धर्म यदि शरीरके हैं तो शत्मा कैसा है ? यह बदलाते हैं- बारावनासार हिंदी टीका सहित सुक्खमश्रो अहमेक्को सुद्धप्पा पाणदंसणसमग्गो अराणे जे परभावा ते सव्वे कम्मणा जणिया॥१०३ सुखमयोहमेकः शुद्धात्मा ज्ञानदर्शनसममः । अन्ये ये परभावास्तं सर्वे कर्मणा जनिताः ॥ १०३ ।। अर्थ-मैं सुखस्वरूप एकाकी अखंड ज्ञान और दर्शनका भंडार विशुद्ध प्रात्मा हूँ और ज्ञान दर्शन आदि मेरे स्वरूपसे भिन्न जितने भर पदार्थ हैं वे सब मुझसे भिन्न परपदार्थ हैं और वे कर्मोंके कार्य हैं। भावार्थ-मैं तो मोहनीय कर्मके अभावमें सुख स्वरूप हूँ । राग आदिके सर्वथा नष्ट हो जानेसे एकाकी हूँ, ज्ञानावरण दर्शनावरणके सर्वथा नाशसे अखंड ज्ञान दर्शनका मंडार हूँ और विशुद्ध हूं। मुझसे भिन्न स्त्री पुत्र आदि जितनेभर भी पदार्थ हैं सब परपदार्थ हैं और कर्मजनित हैं इसलिये वे मेरे नहीं तथा शुद्ध निश्चयनयसे शरीरसे युक्त होने पर भी मैं पर- मात्मा हूँ। कहा भी है- यः परात्मा स एवाह योहं स परमस्ततः । अहमेव मयोपास्यो नान्यः कश्चिदिति स्थितिः ॥ अर्थ-जो परमात्मा है वही मैं हूँ और जो मैं हूं वही पर- मात्मा है इसलिये मैं ही अपना उपास्य हूँ अन्य कोई उपास्य नहीं। ऐसा सपकको सदा विचार करना चाहिये क्योंकि ऐसी भावना भानेसे कर्मोकी निर्जरा होती है जैसा कि कहा है-- परीपहाद्यविज्ञानदास्रवस्य निरोधिनी । जायतें ध्यानयोगेन कर्मणामाशु निर्जरा ॥

. धाराधनासार हिंदी टीका सहित १६६ अर्थात्-विशुद्ध अात्मांके ध्यानसे जिससमय भूख प्यास आदि परीपहोंका ज्ञान नहिं होता उससमय कर्मासंवका निरोध करनेवाली अर्थात् अविपाक निर्जरा होती है ॥ १०३ ॥ फिर भी श्रात्माका स्वरूप वतलाते हैं- णिचो सुक्खसहावा जरमरणविवज्जिो सयारुवी। पाणी जम्मणरहिलो इक्कोहं केवलो सुद्धो॥१०॥ नित्यः सुखस्वभावः जरामरणविवजितः सदारूपी । ज्ञानी जन्मरहितः एकोहं केवलः शुद्धः ॥१०४|| अर्थ-वह आत्मा नित्य है, सुखस्वभाव है जरा मरणसे रहित है, अरूपी है, ज्ञानी है, जन्मस रहित एक केवल और शुद्ध है। भावार्थ-यद्यपि व्यवहारनयस अात्मा अनित्य विनाशीक है पर निश्चयनयस नित्य अविनाशी है । व्यवहार नयस अनादि अशुभ कर्मके कारण कभी दुःखी और अनादि शुभ कर्मके कारण सुखी है पर'तु शुद्ध निश्चयनयस परमानंदस्वरुप अनंत चैतन्यका पिंड है । व्यवहार नयस पंचभूतमय शरीरके धारण करनेके कारण जरा मरणसे युक्त है परंतु निश्चयनयम जरा मरणस रहित है । व्यवहार नयर्स स्पर्श रस गंध वर्ग स्वरूप पुद्गलके आश्रयस मूर्तम्बर प है परंतु निश्चयनयन मूर्तिरहित अर पी है । व्यवहार नयस मतितान श्रुतज्ञान आदि से युक्त होने के कारण अज्ञानी है परंतु निम्नयनयन वेवल- ज्ञान स्वभाव होनेस ज्ञानी है । व्यवहारनपने चौगनी लाल योनियों में उत्पन्न होनेके कारण जन्म युक्त है परंतु निश्चपनय २००१ आराधनासार हिंदी टीका सहित से यह जन्मरहित है । व्यवहारनयस नर नारक आदि र पस अनेक है परंतु निश्चयनयस टांकीस उकीले हुयेके समान चैतन्यस्वभावसे युक्त होनेके कारण एक है । व्यवहारनयस ज्ञानावरण आदि द्रव्योंके संबंध केवल नहीं परंतु, निश्चयनय से कर्मोंस सर्वथा रहित होनेके कारण केवल है । और व्यवहार नियस राग आदि उपाधिस युक्त होनेके कारण अशुद्ध है परतु निश्चयनयस शुद्ध है । इसलिये विद्वानोंको ऐसे ही अात्माका स्वरूप विचारना चाहिये किंतु जो सर्वथा नित्य किं या सर्वथा अनित्य आदि आत्माका स्वर प बतलाया है. वैसे आत्माका स्वर प न विचारना चाहिये । अन्यत्र भी आत्माका स्वर प वतलाया है- नो शून्यो न जडो न भूतजनितो नो कर्तृभानं गतो नैको न क्षणिको न विश्व विततो नित्यो न चैकांततः । आत्मा कायमितिश्चिदेकनिलयः कर्ता च भोका स्वयं संयुक्तः स्थिरताविनाशजननैः प्रत्येकमेकःक्षणे ॥ अर्थात्-एकांतनयसे आत्मा न शून्य है, न जड है, पंचभूतोंसे उत्पन्न है, न कर्ता है, न एक है, न क्षणिक है, नं व्यापक है और न नित्य है किंतु शरीरपरिमाण है अखंड चैत- न्यका पिंड है स्वयं कर्ता और स्वयं भोक्ता है और एकही क्षणमें उत्पाद व्यय और धौव्य तीनों अवस्थायोंसे युक्त है॥ १०४॥ इय भावणाइ जुत्तो अवगणिय देहदुःखसंघायं । .. .

आराधनासार हिंदी टीका सहितः १.३२ जीवो देहाउ तुमं कड्डसु खग्गुव्व कोसानो ॥१०५॥ इति भावनायुक्तः अवगणय्य देहदुःखसंघातं । जीवो देहात् ल निष्कासय खड्गमिव कोशात् ।। १०५ ।। अर्थ-ग्रंथकार उपदेश देते हैं कि हे क्षपक ! उपर्युक्त भावनाके बलसे शरीर संबंधी दुःखकी जरा भी पर्वाह न कर तू म्यानसे तलवारके समान शरीरसे जीवको जुदा करदे । भावार्थ यद्यपि कोपमें तलवार रहती है परंतु है कोप और तलवार दोनों जुदे पदार्थ-कभी वे दोनों एकस्वरूप नहिं होसकते उसीग्रकार संमारावस्थामें शरीरमें आत्मा रहता है परंतु आत्मा और शरीर है दोनों भिन्न पदार्थ कभी दोनों एक नहिं होसकते। आत्मा तथा इस शरीरकी भिन्नताका ज्ञान समभावनासे होता है इन- लिये क्षपकको चाहिये कि आत्मा और शरीरके भेद जानने के लिये वह अवश्य इमप्रकार भावना करें - शरीरतः फतु भनंतशक्तिं विभिन्नमात्मानमपातदोपं । जिनेंद्रकोणादव खट्गयष्टिं तय प्रमादन ममान्तु शनिः ।। अर्थात्-हे जिनेंद्र ! आपके प्रसादसे मुझ म्यानमें नलवार के समान अनंत शक्तिके धारक निदाप यात्माको शरीर भिन्न करनेकी शक्ति प्राप्त हो ऐसी प्रार्थना है॥ १० ॥ हणिऊण अट्टरुद्दे अप्पा परमप्पयम्मि ठविऊण । भावियसहाउ जीवो कडसु देहाउ मलमुत्तो ॥१०॥ हत्वार्तगद्री जात्मानं परमानन न्यापयित्वा । भावितत्वभावजी निष्कामय देवानलमा ।।।

१५२ - १3५३/65 आराधनाचार हिंदी टीका सहित min अर्थ-ग्रंथकार कहते हैं कि भावनासे अपने श्राधीन किये हुये स्वभावके धारक और निष्कलंक हे क्षपक ! आर्त और रौद्रध्यानका सर्वथा त्यागकर और अपनी आत्माको परमात्मामें स्थापित कर तुझे अपनी आत्माको शरीरसे जुदा कर देना चाहिये परमात्मा बना देना चाहिये । भावार्थ--जबतक आत्मामें आर्त और रौंद्रध्यानोंकी सत्ता विद्यमान रहेगी और जबतक वह परमात्माके स्वरूपमें लीन न होगा तबतक कभी भी वह शरीर रहित सिद्ध परमात्मा नहिं हो सकता इसलिये जो पुरुष दृढ़रूपसे समभावना भानेवाला है उसे चाहिये कि वह आर्त रौद्र दोनों ध्यानोंका सर्वथा त्याग कर दे और अपनी आत्माको परमात्मामें स्थापित करे और शरीरसे रहित कर परमात्मा वना दे। क्योंकि यह वात युक्तियुक्त है कि आर्त रौद्र ध्यानोंसे रहित होकर जिस समय परमात्माके विषयमें यह भावना हो निकलती हैं कि सोह, अर्थात मैं परमात्मास्वरूप हूँ उससमय अवश्य आत्मा परमात्मा बन जाता है । जैसा कि कहा है- सोहमित्यात्तसंस्कारस्तस्मिन् भावनया पुनः । तत्रैव दृढसंस्काराल्लभते हयात्मनः स्थितिं ।। अर्थात्-जिस मनुष्यकी आत्मामें, 'सोऽहं' मैं परम ब्रह्म परमात्मस्वरूप हूँ ऐसा संस्कार विद्यमान है वह पुरुप यदि उसी की भावना करता है और संस्कारको और भी दृढ बनाता तो उसे आत्माकी स्थिति अर्थात् परमात्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है ॥१०६ ॥ जो भव्य आराधनाओंका आराथन करते है माराधनासार हिंदी टीका सहित १७३ है वे काल आदि लब्धियोंकी कृपासे उसी भवमें सिद्ध अवस्था प्राप्त करलेते हैं यह बतलाते हैं- कालाई लहिऊणं छित्तण य अट्टकम्मसंखलयं । केवलणाणपहाणा भविया सिझति तम्हि भवे १०७ कालादिकलटना छित्त्वा च अष्टकर्मशृखला । केवलज्ञानप्रधाना भन्या सिद्ध्यति तस्मिन्भवे ॥१०७ ॥ अर्थ-भव्य जीव काल आदि सामग्रीको प्राप्तकर पाठी कर्मरूपीसांकलको तोडकर और केवलज्ञानसे संयुक्त होकर उसी भवमें सिद्ध परमात्मा होजाते हैं । भावार्थ-द्रव्य क्षेत्र काल भव मावरूर सामग्री और श्रष्ट कर्मों का नाश सिद्ध अवस्थामें प्रधान कारण हैं अर्थात् जबतक द्रव्य क्षेत्र आदि सामग्री प्राप्त नहिं होती तबतक अष्ट कर्मों का नाश नहिं होता और जक्तक अष्ट कर्मोका नाश नहिं होता तबतक केवलज्ञानके साथ साथ सिद्धि परमात्मस्वरूपकी प्राप्ति नहिं हो सकती इसलिये भव्योंको चाहिए कि वे उक्त सामग्रीको प्राप्तकर अष्ट कर्मों का नाश करें और चमचमाते हुये अखंडज्ञान केवलज्ञानसे युक्त हो सिद्ध अवस्थाके अनुपम सुखका अनुभव कर । सिद्धिकी प्राप्तिमें द्रव्य आदि सामग्री प्रधान कारण है यह बात अन्यत्र भी बतलाई है। योग्योपादानयोगेन पदः स्वर्णता मता। द्रव्यादिस्वातमरांपत्तावात्मनोप्यात्मतो मता ।। अर्थात्-जिसरकार योग्य सामग्री मिल जाने से मुबलका पापास सुवर्स स्वरूप हो जाता है उसीप्रकार साध्य रेट आराधनामार हिंदी टीका सहित आदि उचित खामग्रीके मिलजानेपर अंशुद्ध आत्मा-परमात्मा वन जाता है। संसारी आत्माको मोक्षस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है ॥ १०७ ॥ आराधनाओंके आराधन करनेवाले भव्यजीव सर्वार्थसिद्धिक सुखका भी प्रास्वादन करते हैं यह बतलाते हैं- प्राराहिऊण केई वउविहाराहणाइ जं सारं । उबरियसेसपुरणा सन्वट्ठणिवासिणो हुँति ॥१०॥ आराध्य केचित् चतुर्विधाराधनायां यत्सारं . उद्वृत्तशेषपुण्याः सर्वार्थनिवासिनो भवति ॥१८॥ अर्थ-कईएक भव्यजीव चारो प्रकारकी आराधनाओंमें जो सार परमात्मा है उसका आराधनकर कुछ पुण्य प्रकृतियों के अवशिष्ट रहने के कारण सर्वार्थसिद्धिक सुखका अनुभव करते हैं। भावार्थ-कर्मोंकी प्रकृतियां दो प्रकारको है एक पुण्य दूसरी पाय । जिससमय जीव मुक्त अवस्थाको प्राप्त हो जाता है उससमय सब प्रकारकी प्रकृतियोंका नाश होजाता और यदि कुछ प्रकृतियां अवशिष्ट रह जाती हैं तो सर्वा- थसिद्धिक सुखकी प्राप्ति होजाती है इसी आशयको लेकर ग्रंथकारने यहां यह बात बतलाई है कि कोई कोई भव्यजीव चारो प्रकारकी आराधनाओंमें सार स्वरूप परमात्माका अारा- वन करते हैं वे कुछ प्रकृतियोंके अवशिष्ट रहनाने पर सर्वा- थसिद्धि जाते हैं और वहाक मुखोंका आस्वादन, करते हैं ॥ १८ ॥ अथ अाराधनाओंके जघन्य आराधक भी कुछ भवोंके बाद 'मोक्ष चले जाते हैं यह बतलाते . है- ::आराधनासार हिंदी टीका सहित १७५. - जेसिं हुंति जहराणा चउविहाराहणा हु खवयाणं सत्तट्ठभवे गंतु तेवि य पावंति णिव्वाणं ॥१०॥ येपां भवंति जघन्या चतुर्विधाराधना क्षपकाणां । सप्ताष्टंभवान् गत्वा तेऽपि च प्राप्नुवंति निर्वास ।।१०।। अर्थ-जिन आपकोंके चारप्रकारकी आराधनाओंका जघन्य भी आराधन होता है वे भी सात बाट भवके वाद निर्वाण धामको प्राप्त होजाते हैं। भावार्थ-मनके चंचल होजाने पर जो महानुभाव सहज शुद्ध चिदानंद चैतन्यस्वरूप आत्मा-निश्चय अाराधना में थोड़ी स्थिति करते हैं और दर्शन ज्ञान चरित्र तपम्वरूप व्यवहार आराधनाका भी मन वचन कायकी परिपूर्ण सामर्थ्यके अभावसे परिपूर्ण पारा- थन नहिं करते वे मनुष्य भी सात आट भवोंमें निर्वाण स्थानके अनंत सुखमा आस्वादन करते हैं इसलिये जघन्यरूप से भी आराधनाओं का आराधन कार्यकारी है ॥१०६ ।। उत्तमदेवमणुस्से सुक्खाई अणोवमाई भुत्तुंग अाराहणउवजुत्ता भविया सिझति भाणट्टा ? १० उत्तमदेवमातुरे सुखान्यनुपमानि भुक्त्वा । आराधनोपन ता भव्याः सियानि प्यानरथाः ।।१०।। 1. अर्थ----जो भव्यजीव उपर्युक्त भराधनाघोंके शाराधन वारनेवाले हैं और ध्यानशील हैं उचमदेव और उत्तम मनुष्यों के अनुपम सयोंको भोगकर मिल परमात्मा होजाने हैं ! भावार्थ १७६, • आराधनासार हिंदी टीका सहित संसारमें उत्तमदेव इंद्र आदि और उत्तम पुरुप चक्रवर्ती आदिके सुख भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त होते हैं परंतु जो पुरुष सम्यग्दर्शन आदि आराधनायोंके आराधन करनेवाले और ध्यानशील हैं उन्हें अनायास ही उन सुखोंकी प्राप्ति हो जाती है और पश्चात् वे सिद्ध अवस्थाको प्राप्त कर लेते हैं इसलिये आराधनाओंका आराधन करना कभी निरर्थक नहिं जाता ॥ ११० ॥ अत्यंत तपस्वी रहनेपर जो मनुष्य आत्मध्यानसे बहिर्भूत है वह कमी भी मोक्षको प्राप्त नहि होता यह वतलाते हैं- अाइकुणउ तवं पालेउ संजमं पढउ सयलसत्थाई। जाम ण झावइ अप्पा तामण मोक्खो जिणो भगाइ अतिकरोतु तपः पालयतु संयम पठतु सफलशास्त्राणि । यावन्न ध्यायत्यात्मानँ तावन्न मोक्षो जिनो भणति ॥ ११६ ।। अर्थ-अन्यंत तप भी आचरण करो, ऊंचे दर्जेके संयमको भी पालो, समस्त शास्त्रोंका भी अभ्यास करो परंतु जयतक आत्माका ध्यान नही तबतक कभी मोक्षकी प्राप्ति नहि हो सकती ऐसा भगवान जिनेंद्रका उपदेश है। भावार्थ-मोक्षकी प्राप्ति में बलवान कारण आत्मध्यान-भेद विज्ञान है क्योंकि चाहे कितना मी तप आचरण करो, घोर संयमको भी पोलो और समस्त शास्रोंका भी पूर्णरूपसे अभ्यास करो जबतक आत्मध्यान न किया जायगा तबतक कदापि मोक्ष नहीं हो सक्ती इसलिये मोक्ष प्राप्तिमें भेदविज्ञानको प्रधान कारण समझना चाहिये । कहा भी निथ आदि लिंगोंको धारणकर विशुद्ध आत्माका धान करते पदमिदं ननु कर्मदुरासदं सहजबोधकलासुलभं किल । तत इदं निजबोधकलाबलात्कलयितु यततां सततं जगत्।। अर्थात्-मोक्षपद कर्मोंसे दुरासद है-कर्मोंकी सहायतासे भी प्राप्त नहिं हो सकता परन्तु स्वाभाविक बोधकला-भेद- विज्ञानसे वह सुलभ है इसलिये जगत्के जीवोंको चाहिये कि वे स्वाभाविक बोधकी कलासे ही मोक्षपदकी प्राप्ति के लिये पूर्ण उद्योग करें। तथा और भी कहा है-- यो न वेत्ति परं देहे देवमात्मानमव्ययं । लभते न स निर्वाणं तप्त्वापि परमं तपः॥ अर्थाद-जो महानभाव शरीरमें उत्कृष्ट अविनाशी देव परमात्माको नहि जानता यह घोर तप तपकर भी कभी मोक्षको प्राप्त नहिं हो सकता॥ १११ ।।. चइजण सव्वसंगं लिंगं धरिऊण जिणवरिंदाणं । अप्पाणं झाऊणं भविया सिझति णियमेण १११२ त्यस्त्वा सर्वसंगं लिंगं धृत्वा जिनवरेंद्राणां । आत्मानं ध्यात्वा भव्याः सिद्ध्यांति नियसेन ॥ ११२ ।। अर्थ--जो भव्यजीव वाद्य अभ्यंतर दोनों प्रसारक परिग्रहों- का सर्वथा त्याग कर देते हैं और भगवान जिनेंद्र द्वारा उपदिष्ट ई उन्हें अवश्य मोजकी प्राप्ति होती है। भावार्थ- १२ आराधनासार हिंदी टीका सहित -- . 4342/तेनं वास्तु धनं धान्यं द्विपदं च चतुष्पदं । आसनं शयनं कुष्यं भांडं चेति घहिर्दशः।। अर्थात्-क्षेत्र वस्तु धन धान्य दासी दास चौपाये आसन शय्या कुप्य और भांड ये दशप्रकारके वाह्यपरिग्रह हैं और--- मिथ्यात्ववेदरागाहासप्रमुखास्तथा च पड् दोषाः । चत्वारश्च कपायाश्चतुर्दशाभ्यन्तरा ग्रन्थाः ।। अर्थात् मिथ्यात्व वेद राग द्वेष हास्य रति अरति भय जुगु- प्सा शोक और क्रोध मान माया लोभ ये चौदह अभ्यंतर परिग्रह हैं मोक्षप्राप्तिके लिये इन दोनों प्रकारके परिग्रहोंका त्याग कर देना चाहिये । तथा भगवान जिनेंद्रने जिन निग्रंथ आदि लिंगों का उपदेश दिया है यथाशक्ति वे लिंग भी धारण करने चाहिये। कदाचित् यहां यह शंका हो कि पहले मोक्ष की प्राप्ति में लिंगकी कारणताका निपेध कर आये हैं तथा अन्यत्र भी यही कहा है- लिंगं देहाश्रितं दृष्टं देह एव आत्मनो भवः । न मुच्यते भवात्तस्माद्ये ते लिंगकृताग्रहाः ॥ अर्थात् लिंग शरीरके आश्रित है और शरीर में ही आत्माकी विद्यमानता है इसलिये जिन पुरुपोंका यह हठ है कि लिंगसे मोक्ष होती है वे कर्मोंसे नहिं छूट सक्ते कभी उन्हें मोक्षकी प्राप्ति नहिं हो सकती। परन्तु यहांपर उसे कारण बतलाया इसलिये वचनोंमें पूर्वापरविरोध आता है ? सो नहीं । व्यवहारसे जिनलिंगको भी मोक्षकी प्राप्तिमें कारगा बतलाया है क्योंकि विना जिनलिंगके मोक्ष की प्राप्ति नहिं होसकती अतः मोक्ष के आराधनासार हिंदी टीका सहित १७६. लिये जिनलिंग भी धारण करना परम आवश्यक है तथा विशुद्ध श्रात्माका ध्यान भी अवश्य करना चाहिये क्योंकि विशुद्ध आत्मस्वरूपके ध्यानी मनुष्यको ही मोक्षकी प्राप्ति हो सक्ती है। - कहा भी है- संयम्य करणग्राममेकाग्रत्वेन चेतसा। आत्मानमात्मवान् ध्यायेदात्मनैवात्मनि स्थितं ॥ अर्थात् ज्ञानवान मनुष्य इंद्रियोंके समूहको वशकर एकान मनसे यात्माका ध्यान धरै इसलिये जो मनुष्य मोक्षकी प्राप्तिके श्रमिलापी हैं उन्हें चाहिये कि वे समस्त परिग्रहों का त्यागकर भगवान जिनेंद्र द्वारा उपदिष्ट लिंगको धारणकर विशुद्ध आत्मा से स्वरूपका ध्यान करें जिससे उन्हें मोनकी प्राप्ति हो जाय ॥ ११२ ॥ श्राराहणाइ सारं उवइट्ट जेहिं मुणिवरिदेहि । बाराहियं च जेहिं ते सव्नेहं प्रवंदामि ॥ ११३ ।।। आराधनानां सारमुपदिष्ट चैमुनिवरेंद्रः। आराधितं च यैस्तान सर्शनहं प्रवंदे ॥ ६१६ ॥ अर्थ-जिन मुनीश्वरोंने आराधनाचोंके सारःपरमात्मारा कथन किया है और जिन महानुभावोंने उसकी आराधना की है उन सरको मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ॥ ११३॥ ग्रंथकार सपनी लघुता बतलाते हैं- ।

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आराधनासार हिंदी टीका सहित
innin
गाय में अस्थि कवित्तं ण मुणमोछंदलक
णियभावपाणिमित्त रइयं पाराहणार
न च मे अस्ति कवित्वं न जाने छंदोलक्षणं
निजभावनानिमित्तं रचितमाराधनासारं ॥
अर्थ-न में कोई बड़ा भारी कवि हूं और
ही पूर्णरूपसे ज्ञान है इसलिये यह जो मैने अाराध
है वह अपनी भावनाके लिये रचा है अर्थात् इस :
मेरी आत्मामें विशुद्ध आत्माकी भावना होवे यह
किंवा लाभ मैं नहिं चाहता ।। ११४ ॥
अमुणियतच्चेण इमं भणियं जंकिंपि देव
सोहंतु तं मुणिंद। अत्थि हुजइ पवयणदि
अज्ञाततत्त्वेनेदं भणितं यत्किंचिदेवसेनेन ।
शोधयंतु तं मुनींद्रा अस्ति हि यदि प्रवचनविरु
अर्थ-अंतमें ग्रंथकार लघुता बतलाते हुये
तत्त्वोंके वास्तविक ज्ञान से शून्य जो मुझ देवसेनने
वर्णन किया है यदि वह किसीप्रकारसे शास्त्र विरुद्ध
विद्वान मुनियोंसे प्रार्थना है कि वे इस ग्रन्थको शुद्ध का
इस प्रकार श्रीदेवसेनाचार्य विरचित आराधनासा
स्वर्गीय पंडित गजाधरलालजी न्यायतीर्थ कृत
भापाटीकासहित सम्माप्त हुना ॥

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Aradhna Sagar

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Achrya Shri Santi Sagar
Title
Aradhna Sagar
File name
Aradhna Sagar
Text
OCR done
Citation
1958
Published
2010/08
Publisher
Muluk Bhai Nagor
Language
Sanskrit
Pages
194
Library
Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
Classification
Literature
DLI number
539620
Barcode
99999990070371.00
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Banasthali University
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