Dr. Robert Heiling Library, S.m.s.medical College, Jaipur
Kumbi Pak
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परा एतच्छायनाभ्यासात्पौनःपुन्येन वीक्षणात् । नागरतोदेवि महत्वगुणशालिनी ॥१॥ योधस्यापि परं घोषं युद्धिरेति न संशयः । जीवन्मुक्तत्वमस्मिंस्तु श्रुते समनुभूयते ॥२॥ ( योगवासिष्ठ २।११३६,८; ३१४१३, १५) इस शास्त्रके धार धार पढ़नेसे और इसमें प्रतिपादित सिद्धान्तों भलीभाँति व्यवहारमें लानेसे मनुष्यमें महान गुणोंवाली नागरिपताका उदय होना है। इस प्रन्यके श्रवणसे बुद्धिमें परम ज्ञानका उदय हो जाता है और जीवन्मुक्तिका अनुभव होने लगता है।
( १० ) विचार किया। सन् १९२५ के दिसम्बर मासमें भारतीय दर्शन परिषद् (Indian Philosophical Congress) के फलमत्तेवाले प्रथम अधिवेशनमें लेखकने इस विषय सम्बन्धी प्रथम लेस: "दीफिला. सोफी ऑफ वसिष्ठ" (The Philosophy of Vasistha) नामकको पढ़ कर विद्वानोंका ध्यान इस ओर आफर्पित किया। तबसे लेकर तीन चार साल तक इस परिपद्के प्रत्येक अधिवेशनमें लेखकने योगवासिष्ठ सम्बन्धी चर्चा की। जुलाई सन् १९२८ में "दो फिलॉसोफी ऑफ वसिष्ठ ऐज प्रेजेण्टेड इन दो योगवासिष्ठ" (The Philosophy of Vasistha as Presented in the Yogarisistha) नामक एक निवन्ध ('hesis) लिखकर लेखकने हिन्दू विश्वविद्यालयको 'डाक्टर ऑफ लेटर्स (Doctor of Letters) नामकी सर्वोथ उपाधिके लिये दिया। उसकी परीक्षाके लिये विश्वविद्यालयने कई यूरोपियन और भारतीय विद्वानोंकी एक परीक्षासमिति नियुक्त की। उनकी सह- मविसे सन् १९३० के उपाधि-वितरणोत्सव पर लेसकको हिन्दू विश्व विद्यालयने डी. लिट् . (D. Litt ) को उपाधि प्रदान की। कई कारणों से इस नियन्धके प्रकाशित करानेका कोई प्रायोजन नहीं किया गया, और यह लेसकके पुस्तकालयमें परसो लापरवाहीसे पड़ा रहा। कुछ मित्रोके अनुरोधसे सन् १९३२ मे लेखकने 'काशी-तत्त्व-सभा' के अधिष्ठातृत्वमें थियोसोफिकल सोसाइटी, काशीके प्रसिद्ध भवन- में योगवासिष्ठ सम्बन्धी दस व्याख्यान दिये। सन् १९३२ में ही इनमेंसे प्रथम पाप व्याख्यान 'थियोसोको इन् इण्डिया' (Theosophy in India) नामक पत्रमें छपकर पुस्तकाकारमै प्रकाशित हुए। इस पुस्तकका नाम "योगवासिष्ठ ऐण्ड इट्स फिलॉसोको" (Yogavasisthus and Its Philosophy) पड़ा, और यह पुस्तक अल्प कालमें ही विद्वज्जन-सम्मानित और लोकप्रिय हो गई। इसको पढ़नेवालोंसे लेखकके पास अनेक प्रशंसापत्र माने लगे। उसी समय लेखक ने हिन्दी में एक छोटी सी पुस्तिका "यासिष्टदर्शनसार" नामक भी प्रकाशित कराई, जिसमें सारे योगवासिष्ठ का १५० श्लोकों में सार देकर उनका हिन्दी अनुवाद कर दिया था। इन दोनों पुस्तकों के छपते पर लेखक के पास ऐसे अनेक पर आये जिनमें योगवासिष्ठ पर कोई बड़ा अन्य प्रकाशित करने के लिये अनुरोध था । इसी बीच में सन् १९३४ में काशी उत्त समा में दिए हुए शेप पाँच व्याख्यान भी "योगवासिष्ट ऐण्ड मॉडर्न यो" (Togarasustha and Moders Lhought) नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो गये। विद्वानों और पत्र-पत्रिकाओं ने इस पुस्तक को मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की { आवागद रियासत के अधिपति श्री राजा सूर्यपालसिहजी साहब र यह पुस्तक इतनी पसन्द आई कि उन्होंने अपने श्री सुख- से पूज्य मालवीय जी के सामने इसको बहुत प्रशंसा की और उनके द्वारा लेखक के पास २००१ रुपये का चेरु पारितोपिक के रूप में भेजने की कृपा की । लेखक राजा साहब को इस कपा काजसको प्राप्त करने के लिये लेखक ने नाममात्रको भी ध्यान नहा किया था और जिसकी लेखाने सप्नमे भी कल्पना नहीं की थी-अपने सदाफे लिये अनु. प्रहीत मानता रहेगा। राजा मार के इस सात्त्विक दान को जितनी प्रशंसा की जाए उतनी ही थोड़ी है, क्योंकि उनसे लेखक का न कोई पूर्व परिचय था और न लेखक ने उनके पास पुरवक की कोई प्रति ही भेजी थी। इन दो पुस्तकों को अंग्रेजी में प्रकाशित होने से लेखक को कई ऐसे मिनोंके प्राप्त होने का सौभाग्य मिला जो लेसा के योगरासिटसम्बन्धी बड़े अन्य को प्रकाशित कराने के लिये बहुत उत्सुक हो गये। टन मिसे मद्रास प्रान्तके दक्षिण बनारा जिलेके एक रिटायर्ड कस्टम्स ऑफिसर श्री वी. मुघराब साहबका शुभनाम विशेषत उन्लेनीय है। उन्होंने मद्रास अमर वहाँपर थियोसोफिरल पब्लिशिंग हाउस, EUR ( Theosophical Publishing House, Adyar ) $ विचार किया। सन् १९२५ के दिसम्बर मासमे भारतीय दर्शन परिपद् (Indian Philosophtoil Congress) के फलात्तेवाले प्रथम अधिवेशनमे लेसकने इस विषय सम्बन्धी प्रथम लेख "दीफिलॉ. सोफी ऑफ वसिष्ठ" (The Philosophy of Vasistha) नामकरो पढ़ कर विद्वानोका ध्यान इस ओर आकर्षित किया। तबसे लेकर तीन चार साल तक इस परिपके प्रत्येक अधिवेशनमें लेसफने योगवासिष्ठ सम्बन्धी चर्चा की। जुलाई सन् १९२८ मे "दो किलोसोफी ऑफ वसिष्ठ ऐज प्रेजेण्टेड इन दो योगवासिष्ठ" (The Philosophy of Vasasth us Presented in the Yognisisthi) नामक एक निवन्ध (Phesis) लिखकर लेखस्ने हिन्दू विश्वविद्यालयको 'डाक्टर ऑफ लेटर्स' (Doolor of Lettons) नामकी सर्वोच उपाधिके लिये दिया। उसकी परीक्षाके लिये विश्वविद्यालयने कई यूरोपियन और भारतीय विद्वानोकी एक परीक्षासमिति नियुक्त की। उनकी सह- मविसे सन् १९३० के उपाधि-वितरणोत्सव पर लेखकको हिन्दू विश्व- विद्यालयने डी. लिट. (D. Litt ) को उपाधि प्रदान की। कई कारणों से इस नियन्धके प्रकाशित कराने का कोई प्रायोजन नहीं किया गया, और वह लेसकके पुस्तकालयमे यरसो लापरवाहीसे पड़ा रहा। कुछ मिनोके अनुरोधसे सन् १९३२ मे लेखकने 'काशी-वत्त्व-सभा' के अधिष्ठातृत्वमे थियोसोफिकल सोसाइटी, काशीके प्रसिद्ध भवन में योगवासिष्ठ सम्बन्धी दस व्याख्यान दिये। सन् १९३२ में ही इनमेंसे प्रथम पाप व्यारयान 'थियोसोको इन् इण्डिया' (Theosophy in India) नामक परमे छपकर पुस्वराकारमे प्रकाशित हुए। इस पुस्तकका नाम “योगवासिष्ठ ऐण्ड इट्स फिलॉसोको" (Yogarasisthn and Its Philosophy) पड़ा, और यह पुस्तक अल्प कालमें ही विद्वजन-सम्मानित और लोकप्रिय हो गई। इसको पदनेवालोंसे लेखकके पास अनेक प्रशंसापत्र भाने लगे। उसी पुस्तक "श्रीवासिष्ठदर्शनम्" नामक भी यू० पी० गवर्नमेण्टकी "प्रिन्सेस ऑफ वेल्स टेक्न्स" मालामें प्रकाशित हो गई। इस कृपाके लिये लेखक कविराज नी का बहुत कृतज्ञ हैं। राष्ट्र माषा हिन्दीमें मा योगवासिष्ट पर एक बड़ी पुस्तक प्रकाशित करनेकी अभिलाषा लेखकके मनमें बहुत दिनासे यी, ऐकिन अन्य कार्योंकी अधिकवासे अवकाश न मिलने के कारण यह अभिलापा बहुत दिनों तक पूरी न हो सकी। प्रस्तुत पुस्तके आरम्भ होनेका सबसे अधिक श्रेय काशीके पर "नावनधर्म" के सहकारी सम्पादक पण्डित गया प्रसाद ज्योतिषी जीको है। उनके अनुरोधसे हो यह पुस्तक "सनातनधर्म" में एक लेखमालाके रूपमें १ मार्च सन् १९३४ को भारम्म हुई थी। कुछ दिनों तक तो यह लेखमाला घलती रही, किन्तु फिर अवकाशके अभावसे चन्द हो गई। उस मालामें जिसने लेख छपे थे वे ज्ञानमण्डल प्रेस, काशी को कपासे साथ साय पुस्तका. कारम भी छप गये थे। टेखमाला स्थगित होनेसे पुस्तक मा स्थगित हो गई। इस बीच में मनातनधर्मवा टाइप भी यदल गया। पुस्तक कर प्रकाशित होगी इस सम्बध अनेक चिट्टियों आनेसे, और श्रीमतो आयके पुम्बकको पूरा कर देने वारवारके अनुरोधसे, जय जिसना I am now 47 years of age and have struggled through many fr ses in life But your hook has ginep me a new insight of life and I have found peace solace and rest which I could not sucteed it gett ag so long I therefore owe you a deep gratitude for opening up a new avenue in le Yogavasistka in Oug nal , as in itself incomprehensible a d its hugeness and constant repetitors nere bafting your book has cleared up everything and it is now possible for us to fathom its deep sea. Hence 1 although a stranger acknow ledge my gratitude. Jay I make one request ? Will you bring out a Hind Fdm of the host those teach now of yours satuse a ner i fe into the decaying gerses of India 1 Every step sho sld be taken to popularese this teaching headly excuse me for writing th s letter Yours fruly, and peace .... " ( १२ ) प्रवन्धकोंके सामने लेखककी प्रकाशित पुरतकोको बहुत प्रशंसा की, और उनसे उसकी बृहत् पुस्तकके प्रकाशित करनेका सफल अनुरोध किया । वहाँ के मैनेजर महोदयने तुरन्त ही लेखकसे उस पुस्तककी हस्तलिखित प्रति मॅगाई, और पुस्तकको प्रकाशित करनेकी स्वीकृति एक सप्ताहके भीतर ही भेज दी। लेसक श्री सुबराव साहबकी इस कृपाका जन्म भर ऋणी रहेगा। थियोसोफिकल पब्लिशिग हाउसका भी लेसक सदाके लिये कृतज्ञ है, क्योकि उसके मैनेजर महोदयने इस वृहत् पुस्तक फे छपवाने और प्रकाशित करानेमें विशेप कष्ट उठाया है, और इसको बहुत सुन्दर और शुद्ध रूपमे निकालनेका प्रयत्न किया है। दिसम्बर सन् १९३६ में यह वृहत् ग्रन्थ "दी फिलॉसोफी आँफ दी योगवासिष्ठ" ('The Philosophy of the Yogavisasthn ) नामसे प्रकाशित हुआ। पृथ्वी-मण्डलके प्रायः सबही सभ्य देशोमें इसको आशातीत सम्मान मिल रहा है। विद्वानो, समालोचको और पत्र-पत्रिकाओने इसकी दिल खोल कर प्रशंसा की है। इसके लिये वे सब लेखकके धन्यवादफे पान हैं । इस पुस्तक के अनेक पाठकोके पाससे लेखक के पास जो समय समयपर चिट्ठियों आती रहती हैं, उनसे ज्ञात होता है कि योगवासिष्ठके दार्शनिक सिद्धान्तोसे कुछ लोगोके संतप्त चित्तको बहुतशान्ति मिली है। अंग्रेजी पुस्तक "The Philosophy of the Yogaris-thr" के साथ साथ ही गवर्नमेण्ट फालेज पनारसके भूतपूर्व प्रिसिपल विद्वच्छिरोमणि पं० गोपीनाथ कविराज जीकी कृपासे लेसककी संस्कृत •त सी ऐसी चिठियोग से पयल एक्यो ही जैसीको सैसी (अंग्रेजी भाषा ) पाठकों के सामने प्रस्तुतार देना यहाँपर अनुचित नहीं जान परता:- "Dear Dr Atreya, Allow me a stranger to address you and to express my deep obligations that lone you for writing such a splendid book, "The Philosophy of the Yogasasisthan number of theosophical books, and also Krishnamurti, Trine, Marden, Jimes Ailen, Buddhism, a number of Commentaries on the Blugstadgata and Upanishads etc., but nowhere I got satiety I read a large योगवासिष्ठ और उसके सिद्धान्त विषय प्रस्तावना (७) १-योगवासिष्ठका भारतीय दार्शनिक साहित्यमें स्थान १ २--योगवासिष्ठ कर लिखा गया होगा योगवासिष्ठ शङ्कराचार्य से पूर्वका अन्ध है योगवासिष्ठ गौडपादाचार्य और भर्तृहरिके पूर्वका गन्य है वर्तमान योगवासिष्ठ वाल्मीकिकृत नहीं है ३~-योगवामिष्ठ साहित्य ३३ (१) योगवासिष्ठ के काल निर्णयके मन्यन्धम ૨૨ (२) योगवासिष्टके मिद्धान्तोके सम्राधमें (३) योगवासिष्ठके अनुवाद ३७ हिन्दी ३७ उर्दू अग्रेजी (४) मूलप्रन्ययोगवासिष्ठ, लघुयोगरासिष्ठ (५) योगवासिष्ठकी कुछ हस्तलिखित प्रतियाँ १-योगवासिष्ठ (सपूर्ण) २-संक्षिप्त योगवासिष्ठ ३-लघुयोगवासिष्ठका फारसी अनुवाद् ४-योगवासिष्ठ और कुछ उत्तरकालीन उपनिद् महा-उपनिषद् और योगवासिष्ट अन्नपूर्णोपनिपद् और योगवासिष्ठ मुक्तिमोपनिपद और योगवासिष्ठ वराहोपनिपद् और योगवासिष्ठ अत्युपनिषद् थौर योगवासिष्ठ ५७ संन्यासोपनिषद और योगवासिष्ट ४२ १५७७ अवकाश मिला उतना ही अंश इस पुस्तम्फा लिख कर छपवाया गया । इस रीतिसे आज इस पुस्तकका प्रथम भाग समाप्त हो पाया है। पहिले तो विचार यही था कि पूरा अन्य एक ही जिल्दमें छपे। लेकिन इस विचारसे कि ग्रन्थ बहुत बडा हो जाएगा, इसको दो भागोमे विभक्त फर दिया है। प्रथम भाग पाठको के सामने है। दूसरे भागमे योग वासिष्ठका तुलनात्मक और समालोचनात्मक अध्ययन होगा। सारी पुस्तक एक साथ न लिसे जाने और छपनेके कारण इस पुस्तकमें शैली, क्रम ओर व्यारयाके कुछ दोपोका आ जाना स्वाभाविक ही है। आशा है कि पाठक और समालोचक उनके लिये लेखकको क्षमा करगे। इस पुस्तकमे लेखकने योगवासिष्ठके संस्कृत शोकोका अक्षरश हिन्दी अनुवाद करनेका साहस नहीं किया, पर जहाँतक हो सका है योगवासिष्ठके भावाको ही हिन्दुस्तानी भापामें पाठकाके सामने रखनेमा प्रयन किया है। शोकोके अनुवादके साथ यदि लेसकने अपनी ओरसे कोई बात लिखी है, तो उसको कोठाके भीतर लिसा है। शोकोंके आगेवाले कोप्टोके भीतर निर्णयसागरप्रेस चम्बईसे प्रकाशित संस्कृत ग्रन्थ योगवासिष्ठके प्रकरण, सर्ग, और श्लोकोके अद्ध दिये गये हैं, ताकि पाठको यह ज्ञात हो जाए हि थमुन श्लाक मूलमन्यमें किस स्थानपर है। इस पुस्तकमा अनुक्रमणिराके बनानेमे लेसकके प्रिय शिष्य और मित्र, श्री श्यामसु दर सनी "सुन्दर" और उनकी सुयोग्य बहिन फुमारी सावित्रीने सहायता दी है। इसके लिये वे दोनी लेसक्के धन्यवादके पात्र हैं। पुस्तरके इस समय समाप्त हो जाने का यहुत सा श्रेय लेखककी धर्मपनी श्रीमती लक्ष्मी आनेयको है, इसलिये लेसा उनको भी धन्यवाद देकर इस प्ररवायनाको समाप्त करता है। काशी हि विषविद्यालय বিথী मी० ला० आनेय सम्बत् ...E.
११२ ११४ ११६ १२८ १२९ १३२ १३३ १३६ १४३ १४४ १४५ १४६ विपय (२३) हालकसी कया (२४) सुरघुकी कथा (२५) मास और विलासका संवाद (२६) वीवहव्यका वृत्तान्त (२७) काकभुशुण्डकी कथा (२) ईश्वरोपाख्यान (२९) अर्जुनोपाख्यान (३०) शवन्द्रोपाल्यान (३१) वेवाठोपाख्यान (३२) भगीरथोपाग्यान (३३) रानी चुडालाकी कथा (३४) किराटोपाप्यान (३५) मणिकाचोपाख्यान (३६) इस्तिकोपाख्यान (३७) कचोपाख्यान (४०) इक्ष्वाकुकी कथा (४१) तुर्यावस्था स्थित मुनिकी कथा (४२) एक विद्याधरकी कहानी (४३) इन्द्रकी कहानी (४४) मङ्कीकी कहानी (४५) मनो-हरिणका उपाख्यान (४६) पापाणोपारयान (४७ विपश्चित्को कथा (४८) यदधाना राजकुमारोंको कथा (४९) शवोपारयान (५०) शिलोपारयान (५१) ब्रह्माण्डोपाख्यान (५२) ऐन्दवोपाख्यान (५३) विल्योपाख्यान (५४) तापसोपाख्यान (५५) काष्ठवेवधिकोपाख्यान १४८ १४९ १५० પર १५४ २५६ १५७ १५७ पृष्ठ - ५९ ६० ६७ ७२ ( १६ ) विपय याज्ञवल्क्योपनिपद् और योगवासिष्ठ शाण्डिल्योपनिषद् और योगवासिष्ठ मैत्रेयुपनिषद् और योगवासिष्ठ योगकुण्डलमुपनिपद् और योगवासिष्ठ पैगलोपनिषद् और योगवासिष्ठ ५-योगवासिष्ठकी शैली ६-योगवासिष्ठ और भगवद्गीता ७--योगवासिष्ठके उपाख्यान (१) योगवासिष्ठ की कथा (२) वसिष्ठ-राम-संवादकी कथा (३) शुककी कथा (४) वसिष्ठनीकी उत्पत्ति और ज्ञानप्राप्तिकी कथा (५) आकाशजसी कथा (६) लीलारा उपाख्यान (७) फर्कटी राक्षसीकी कहानी (८) इन्दु ब्राह्मणके लड़कों की कथा (९) पहिल्या रानी और उसके प्रियतम इन्द्रकी कहानी (१०) चित्तोपाख्यान (११) घालारयायिका (१२) इन्द्रजालोपाख्यान (१३) शुक्रोपारयान (१४) दाम, व्याल और कटकी कहानी (१५) भीम, भास और दृढ़को कहानी (१६) दाशूरोपाख्यान (१७) कचगीता (१८) जनकके जीवन्मुक्त होनेकी क्या (१९) पुण्य और पापनकी क्या (२०) पलिकी क्या (२१) प्रहादकी कथा (२२) गाधीकी कथा ८६ ८९ ९० ९६ १०० १०० १०३ १०७ १०९ १७ १७९ १८० - १५१ १८२ विषय (२)पराधीनताकी निन्दा (३) देव ((माग्य ) कोई वस्तु नहीं है। (१) देव शब्दका यवार्य प्रयोग (५) वर्तमान कालके पुरुषार्यकी देव पर प्रपलता (६) सत्पुरुषार्थ (७) मालस्य-निन्दा- ४- साधकका जीवन (१) चित्तशुद्धि (२) मोतके चार द्वारपाल (म) शम (मा)सन्तोए (इ) साधुसङ्ग (ई) विचार ५-स्वानुभूति ही आत्मज्ञानका प्रमाण है । (१) प्रत्यक्ष ही.परम प्रमाण है (२) प्रत्यक्ष का स्वरूप (३) परमात्माका ज्ञान केवल इसी अनुभव द्वारा प्राप्त होता है (४) आत्मानुभव कम होता है (५) दृष्टान्तकी उपयोगिता (६) दृष्टान्तका सदा एकही अंश ध्यानमें रसना चाहिये -अद्वैत (१) द्रष्टा और दृश्यकी एकवा बिना द्रष्टाको दृश्यका अनुभव होना असम्भव है (२) शरय पदार्थ मी चिन्मय है -कल्पनावाद (१) 'सारके सब पदार्य कल्पनामय है (२)देश और काल मी कल्पित ही हैं १८३ १८३ १८४ १८४ १८५ १८६ १८७ १८८ १८९ १८९ १९१ १९१ १९३ १९५ पृष्ठ १५९ १६० १६१ १६३ १६३ १६५ १६५ १६६ १६७ ( १८ ) विषय ८ योगवासिष्ट के दार्शनिक सिद्धान्त १---जीवनमें दुःख और अशान्ति का साम्राज्य (अ) संसारमे सर्वत्र दोष ही दिखाई पड़ते हैं (आ) यहाँ पर कुछ भी स्थिर नहीं (इ) जीवनकी दुर्दशा (ई) कालका सब ओर साम्राज्य (उ) जीवनमें सुख कहाँ है ? (अ) मोहान्धता (ए) लक्ष्मीनिन्दा (ऐ) आयुनिन्दा (ओ) चित्तकी वञ्चलवा (श्री) तृष्णाको जलन (अ) देहकी अरम्यता (अ.) बाल्यावस्थाकी दुर्दशा (क) यौवनावस्थाके दोष (ख) स्त्रीनिन्दा (1) मोगोंकी निरसता (घ) चुदापेको निन्दा (ड) जीवनकी असारता (च) सब कार का अभ्युदय थसार है (छ) संसार जनित दुखको असहनीयता (२) रामचन्द्रके प्रश्न २-दुःसनिवृत्ति का उपाय (१)दुखका कारण संसारका राग (२) अज्ञानीको ही दुःख होता है (३) मानसेही दुःसकी निवृत्ति होती है (४) आत्मज्ञानसे ही परम शान्ति प्राप्त होती है (५) मा द्वारा प्राप्त जानका उपदेश ३-जीवनमें पुरुषार्थका महत्व (१) पुरुषार्थ द्वारा ही सब कुछ प्राप्त होवा है १६८ १६९ १६९ . १७० १७१ १७२ १७४ १७४ १७४ १७६ १७७ पृष्ठ विषय (१४) नियदि पुरपार्थ की विरोधी नहीं है (या एवल पुरुषार्थ कमी कमी नियतिको भी जीव रेता २२० २२३ २२३ (१) मनमा स्वरूप (२)मन और मारा भेद (३) मनके अनेक नाम और रूप (श्रो मन (आ)भुद्धि (इ) अहंकार (६। वित्त (1) कर्म २२५ २२६ २२६ (ऊ) फल्पना (ए) स्मृति (ऐ) वासना (ओ) अविद्या (मी) मल (माया (अ) प्रकृति (क) ब्रह्मा इत्यादि (खाजीव (ग। प्रतिपाहिक देह (घ) इन्द्रिय (ड) पुर्यष्टक (चा देह पदार्य आदि (छ.इस विषयमें योगवासिष्टका अन्य दर्शनासे मतभेद (४) और अमावको कैसे धारण करता है (५)बीव शरीर कैसे बनता है १६)जोपका बन्धन अपने आपका बनाया हुआ है (७)बीजनिर्णय रस २२९ २९ - पृह १९५ १९६ १९७ १९८ १९९ ( २० ) विपय (३) देश और कालका परिमाण मन के उपर निर्भर है (४) कल्पनाके अतिरिक्त पदार्थों में और कोई द्रव्य नहीं है (५) संसारके अटल नियम और स्थिरता भी फल्पित हैं (६) कल्पना ही जड़ताका रूप धारण कर लेती है (७) द्रष्टा और दृश्यका अनन्यत्व (८) द्रष्टाके भीतरसे ही दृश्यका उदय होता है (९) स्वप्न और जामत्में भेद नहीं है (१०) जगत्का अनुभव भी स्वप्न ही है (११) प्रत्येक जीवका विश्व अलग-अलग है और यह जीव ही उस विश्वकी सृष्टि करता है (१२) ब्रह्मा जगत्को सृष्टि करता है और सारे जीव प्रयासे उत्पन्न होते हैं (१३) ब्रह्माकृत विश्व और जीयकृत विश्वका सम्बन्ध ८-जगत् (१) जगत्के अनेक नाम (२) जीवपरम्परा (३) सष्टिके भीतर अनन्त सृष्टियोको परम्परा (४) अनन्त अरष्ट जगत् (५) सब फुछ सदा सय जगह है (६) नाना प्रकारकी विचिन सृष्टियाँ (७) जीवोंकी सृष्टि और प्रलयका पुन. २ होना (८) फल्पके भन्तमे सय युछ नष्ट हो जाता है (९) प्रलय कालमें फेवल प्राप्त ही शेप रहता है (१०) दृश्य जगत् की उत्पत्तिका मम (११) तीन श्राफाश २०३ २०६ २०६ २१० २११ २१२ २१२ २१६ २१७ ११२ नियति (१३) नियतिका आरम्म अकस्मात् पटनायासे ही होता है २१८ ( २३.) पृष्ठ २४१ २४१ २४२ २४३ २४४ २४४ २४४ २४५ २४६ विषय १४-दामसतामसी १५-अत्यन्ततामसी (१२) सय जीव ब्रह्मासे उत्पन्न होते हैं (१३) सर जीवोंकी उत्पत्ति और लय एक ही नियमसे होते हैं (१४) संसारफे सर पदार्यों के भीतर मन है १०-मनकी अद्भुत शक्तियाँ (१) मन सर्वशक्ति-सम्पन्न है (२) मनमें जगत्के रचनेकी शक्ति है (३) मन जगत्की रचनामें पूर्णतया स्वतन्त्र है (४) प्रत्येक मनमें इस प्रकारको शक्ति है (५)जीवमें सब कुछ प्राप्त करनेको अनन्त शकि है (६) विषयोंका रूप हमारे चिन्तनके श्राधीन है (७)जैसी घद जिसकी भावना वैसा ही पाल (८) अभ्यासका महत्त्व (९) मनके दृढ़ निश्चयकी शक्ति (१०) जैसा मन वैसी गति (११) दुःख मुख भी चित्तके आधीन है (१२) जीवकी परिस्थितियाँ उसके मनकी रची हुई हैं (१३) शरीर भी मनका ही बनाया हुआ है (१४) मानसी चिकित्सा (अ) आधि मौर व्याधि आ। प्राधिसे व्याधिकी उत्पत्ति (इ) आधिके क्षय होने पर व्याधि का क्षय (६) मन्त्रचिकित्सा (उ) मूलन्याधि (3) जीवनको सुसी और निरोग रखनेका उपाय (१५) मनके शान्त और महान होनेपर ही सर ओर आनन्द का अनुभव होता है २४९ २५१ २५१ २५२ २५२ २५३ २५४ २५५ २५६ २५७ ४ २३३ २३४ २३४ २३४ २३४ २३५ २३५ २३५ २३६ ( २२ ) विषय (5) जीवोंकी संख्या अनन्त है (९) जीवकी सात अवस्थायें (अ) बीजजामत् (आ) जापत् (इ) महाजाप्रत् (ई) जामत्स्वप्न (ज) स्वप्न (ऊ) स्वप्नजाप्रत् (ए) सुपुप्ति (१०) जीवोके सात प्रकार (अ) स्वप्नजागर (घा) संकल्पजागर (इ) केवलजागर (ई) चिरजागर (उ) धनजागर (ऊ) जामत्स्वप्न (ए) क्षीणजागर (११) जीवोंकी पन्द्रह जातियाँ १-इदंप्रथमता २-गुणपीवरी ३-ससत्वा ४-अधमसत्वा ५-अत्यन्ततामसी ६-राजसी -राजससात्विकी ९-रजसराजसी ९-राजसतामसी १०-राजस अत्यन्ततामसी ११-तामसी १२-तामससत्या १३-तमोराजसी २३६ २३७ २३७ २३७ २३६ २३८ २३८ २३८ २३८ २३९ २३९ २३९ २३९ २३९ २४० २४० २४० २४१ २४१ २४१ १३-मौत २२६ विषय पृष्ठ ३-में सर भावोंसे परे रहनेवाला सूक्ष्म आत्मा हूँ २८० (अ) मैं सर्वावीच कैसे हूँ २८० (आ) शरीर और आत्माम सम्बन्ध नहीं है २८२ (इ) श्रान्मा यद्यपि सब जगह है तो भी उसका प्राश फेवल पुर्यष्टक (सूक्ष्म शरीरमें ) हो होता है ४- सारा विश्व हूँ २८३ २८५ (१) मौत डरनेकी वस्तु नहीं है (अ) मौत यदि सर्वनाश है तो बहुत अच्छी बात है (आ) मौतके पीछे यदि दूसरा जीवन है । बहुत उत्सयकी बात है २८६ (२) मौत क्या है २८७ (३) मरनेके समयमा अनुभव (४) मोतके ममय अज्ञानीको हो लश होता है २९० (५) मीतके पीछेका अनुभव २९२ ( ६ ) मरनेके पश्चात् का अनुभव अपनी अपनी वासना और कांक अनुमार होता है २९४ (७) परलोकके अनुभवके पश्चात् फिर वही जीवनकी दशायें भुगतनी पड़ती हैं २९७ (८) योगमार्गपर चलने वालोंकी गति २९८ (९) एक शरीरको छोड़कर जीव दूसरेमें प्रवेश करता है २९८ (१०) जन्म-मरणारा अनुभव तब होता है जब तक कि आत्मज्ञान नहीं होता (११) मरनेके पीछे जीवन्मुक्तकी गति २९९ (१२) आत्माके लिये जीवन-मरण नहीं है (१३ आयुके थोड़े और अधिक होनेका कारण ३०१ (१४) कौन मौतके बससे बाहर है।
पृष्ठ २६० २६१ २६२ २६३ २६३ २६४ २६४ २६५ २६६ विषय (१६) शुद्ध मनमें ही आत्माका प्रतिविम्य पड़ता है (१७) जब तक मनमें अज्ञान है तभी तक जीव संसार रूपी अन्धकारमें पड़ा रहता है (१८) मन जगत् रूपी पहियेकी नाभि है ११-सिद्धियाँ (१) मनकी शुद्धि द्वारा प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ (अ) दूसरोके मनका ज्ञान (आ) सूक्ष्म लोकोमें प्रवेश करनेकी सिद्धि (इ) आधिभौतिकताकी भावनाके कारण जीवको सूक्ष्म लोकोंका दर्शन नहीं होता (ई) सूक्ष्मभाव ग्रहण करने की शक्ति (उ) ज्ञान द्वारा स्थूलभावनाकी निवृत्ति (२) कुण्डलिनी शक्तिके उद्बोधन द्वारा प्राप्त होने चाली सिद्धियाँ (अ) फुण्डलिनी (आ) कुण्डलिनीयोग द्वरा सिद्धियोंकी प्राप्ति (इ) सूक्ष्मता और स्थूलवाकी सिद्धि कैसे होती है (३) प्राणायाम द्वारा भी अनेक प्रकारको सिसिया प्रात हो जाती है १२--में क्या हूँ (१) जाप्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और चौथी अवस्था (अ) जामत् अयस्या (आ) सुपुप्ति (इ) स्वप्न (ई) चौथी अवस्था (२) चार प्रकार का अहंभाव १-देह है २-में चित्त हूँ २६७ २६७ २७० २७२ २७२ २७५ રદ્દ २७६ २७७ २७८ २८० विषय पृष्ठ ३-मैं सर भावोंसे परे रहनेवाला सूक्ष्म प्रात्मा हूँ २८० (अ) मैं सर्यातीव कैसे हूँ २८० (आ) शरीर और प्रात्मामें सम्बन्ध नहीं है ०८२ (5) श्रात्मा यद्यपि सब जगह है तो भी उसका प्रमाश फेवल पुर्यष्टक (सूक्ष्म शरीरमें ) ही होता है ०८२ ४-मैं सारा विश्व हूँ २८३ १३-मौत (१) मौत डरनेका यस्तु नहीं है २८६ (अ) मौत यदि सर्वनाश है तो बहुत अच्छी बात है (आ) मौत के पीछे यदि दूसरा जीवन है सो बहुत उत्सवकी बात है (२) मीत क्या है २८७ (३) मरने समयका अनुभम (४) मौतके समय अज्ञानीको हो लेश होता है (५) मोतके पीछेरा अनुभव २९२ ( ६ । भरनेके पश्चात् का अनुभव अपनी अपनी वासना और कांक अनुसार होता है (७) परलोकके अनुभवके पश्चात् फिर वही जीवनकी दशायें भुगतनी पड़ती है। १८) योगमार्गपर चलने वालॉकी गति (९) एक शरीरको छोडकर जीव दूसरेमे प्रवेश करता है २९० (१० जन्म-मरणा अनुभव तर तक होता है. जब तक कि आत्मज्ञान नहीं होता (११) मरनेके पीछे जीवन्मुक्तकी गति २९९ (१२) आत्माके लिये जीवन-मरण नहीं है (१३ आयुके थोडे और अधिक होनेका कारण (१४) कौन मौतके यससे बाहर है 300 कर लेता है हुआ रूप है विपय पृष्ठ १४-ब्रह्मा ३०४ (१) जगत्को उत्पति ब्रह्मासे हुई है ३०४ (२) ब्रह्माका स्वरूप मन है ३०४ (३) ब्रह्माकी उत्पत्ति परम ब्रह्मसे होती है (४) ब्रह्मका यह स्पन्दन स्वाभाविक है (५) ब्रह्ममें सन्दन होना उसकी अपनी लीला है ३८६ (६) ब्रह्मका स्पन्दन ब्रह्मसे अन्य सा रूप धारण ३०७ (७) ब्रह्मा ( मन ब्रह्मकी संकल्प शक्तिका रचा ३०७ (८) प्रामाकी उत्पत्तिका कोई विशेष हेतु नहीं है ३०८ (९) ब्रह्मा फर्म-बन्धनसे मुक्त है ३०८ (१०) ब्रह्माका शरीर केवल सूक्ष्म है, स्थूल नहीं (११) ब्रह्मा ही संसारकी रचना करता है ३०९ (१२) प्रहासे उत्पन्न जगत् मनोमय है. ३१० (१३) हरेक सृष्टि नई है ३१० १५-शक्ति ३११ ।१) ब्रह्मकी अनेक शक्तियाँ (२) अझकी स्पन्दनशक्ति ३१२ (३) प्रकृति ३१२ (४) शक्तिका प्रहके साथ सम्बन्ध १६--परम भक्ष ३१६ (१) प्रदा ३१६ (२) प्रहका वर्णन नहीं हो सकता (३) नेति नेवि ( ग्रझन यह है और न यह है) (४) ब्रह्मको एक अथवा अनेक भी नहीं कह सकते ३८ (५) ग्रह शून्य है अथवा कोई भावात्मक पदार्थ है यह भी कहना कठिन है ३१० (६) ब्रह्मविद्या (ज्ञान) और अविद्या ( अक्षान) ३२९ दोनोंसे परे है ४४ ३२० ३२१ ३२१ ३२१ ३२२ विपय (७) ब्रह्म वम और प्रकाश दोनोंसे परे है (८) ब्रह्म न जड़ है,न चेतन (९) ब्रह्मको "मात्मा" भी नहीं कह सकते (१०) ब्रह्मा क्या स्वभाव है यह कहना असम्भव है (११) ब्रह्मके कुछ कल्पित नाम (१२) ब्रह्मका वर्णव १७-प्रझका विकास (१) जगत् ब्रह्मका बृहण मात्र है (२) तीनों जगन् ब्रह्मके भीतर स्थित है (३) ब्रह्मही जगन्के रूपमें प्रकट होता है (४) जगन्फे रूपमें प्रकट होना अझरा स्वभाव ३३३ ३३३ ३३६ ३३७ ३३८ ३३८ ३३९ (५) सारा सृष्टिक्रम ब्रह्मके लिये निमेपका अंश मान है (६) एक ब्रह्ममें अनेक प्रकारको सृष्टि करनेको शक्ति है (७) स्वयं ब्रह्ममें नानाताका स्पर्श नहीं होता (८) सत्तामाप्रसे ही ब्रह्ममा कर्तृत्व है १८--अद्वैत (१) सब कुछ ब्रह्मसे अभिन्न है । २) प्रकृतिका यात्माके साथ तादात्म्य १३) मनका ब्रह्मके साथ तादाम्य ४ जगत्का ब्रह्मके साथ तादात्म्य (५) ईश्वरको सत्ता जगत्के बिना नहीं है ५६) सब कुछ ग्राम हीहै १९-जगत्का मिथ्यापन (१) सत्य और असत्यका निर्णय (२) जगत् न सत्य है, न असस्य (३) जगत् सत् और असत् दोनों ही है (४) जगन् केवल भ्रम है, वास्तव में सत्य नहीं है ३४२ २४२ ३४२ ३४३ ३४४ ३४६ ३४५ ३४८ ३४९ पृष्ठ ३५४ ३५५ (श्रा, ३५६ ३५७ ३५८ ३५९ ३६० ३६० ३६१ ३६२ विषय (५) जीवका मिथ्यापन (६ । अविद्या (घ) चित्त ही अविद्या है अविद्याकी असत्ता (७) माया (८) मूर्यो के लिये ही जगत् सत्य है (९) जयतक अज्ञान है तभीतक जगत्का अनुभव है (१०) ज्ञानसे अविद्याका नाश (१११ जगत्के भ्रमका क्षय (१२) अविद्याके विलीन होनेका नाम नाश नहीं है (१३) ज्ञान द्वारा जगत् आत्मामें विलीन हो जाता है २०-सबसे ऊँचा सिद्धान्त (१) भेदको मान लेना केवल प्रज्ञानियोंको प्रह्मज्ञानका उपदेश करनेके लिये है (२) परम सिद्धान्त । ३) ग्रहको जगत्का कर्ता नहीं कह सकते (४) महमें किसी प्रकारका विकार नहीं हो सकता (५) प्राको जगत्का कारण फहना ठीक नहीं है (६) प्रमको जगत्का बीज भी नहीं कह सकते (७) कारण रहित होनेसे जगत् भ्रममात्र है (८) जगत्का दृश्य स्वप्नके समान है (९) अजातवाद (१०) यह सिद्धान्त उसको नहीं बताना पाहिये जो इसका अधिकारी नहीं है २१-परमानन्द (१) विषयोके भोग दरसे देसने मात्र अच्छे लगते हैं (२) संसारके सब मुस दुःखदाई हैं (३) संसारका सारा व्यवहार असार है (४) सांसारिक अभ्युदय सुख देनेवाला नहीं है ३६२ ३६३ ३६५ ३६६ ३६७ ३६८ ३७० ३७१ ३७२ ३७३ ३७५ ૨૭૬ ३७७ ३७८ ( २९ ) विषय ३७० (५) मुख-दुःखका अनुभव कर होता है (६) आत्मानन्द ३८० २२--चन्धन और मोक्ष ३८१ (१) वन्धनका स्वरूप ३८१ (२) बन्धनके कारण (1) वासना ३८२ (आ) अपने आपको परिमित समझना ३८२ (इ) मिथ्या भावना ३८३ (ई) आत्माको भूलना ३८३ (उ) अहंभावना ३८३ (ऊ) अज्ञान ३८३ (३) मोक्षका स्वरूप (४) मोक्षका अनुभव कत्र होता है ३८९ (५) मोक्ष दो प्रकारका है (अ) सदेह मोक्ष ३८६ आ) विदेह मोक्ष ३८६ (६) सदेह और विदेह मुक्ति विशेष भेद नहीं है ३८६ १७ मुक्ति और जड़ स्थितिका भेद ३८६ (८) बन्धन और मोक्ष दोनों ही वास्तव में मिथ्या हैं ३८८ २३--मोक्षप्रामिका उपाय (१) ज्ञानके सिवाय मोक्षप्राप्तिका दूसरा और कोई उपाय नहीं है (२)ज्ञान ही मोक्षप्राप्तिका साधन है (३ मोक्षप्राप्तिके लिये किसी देवताकी भाराधना करनेकी जरूरत नहीं है ३९१ (थ) आमाके सिवाय किसी देवताको आराधना नहीं करनी चाहिये (आ) कोई देवता भी विचार-रहित पुरुषको आत्मज्ञान नहीं दे सकता ३९२ (इ ईश्वर सबके भीतर है ३९३ ३९० ( ३० ) विषय पृष्ठ (ई) ज्ञानसे ही ईश्वरको प्राति होती है ३९३ (उ) आत्मदेवकी पूजा करनेकी विधि ३९४ (क) ज्ञानी लोगोकी देव-पूजा (ए) याहरी देवताको पूजा मुख्य नहीं, गौण है ३९७ (४) जन्मभर पोका त्याग नहीं हो सकता इसलिये मोक्षप्राप्तिके लिये कर्मत्यागको आवश्यक्ता नहीं है ३९९ (५) सम्यग् ज्ञानका स्वरूप (६ ) आत्मतानकी उत्पत्ति अपने दो यत्न और विचार से होती है ४०१ (७ विचारफे लिये चित्तको शुद्ध करना चाहिये ४०१ । ८) विचारके युक्त विपय ४०२ (९) अविद्यासे ही अविद्याका नाश होता है ४०३ (१०) ज्ञानप्राप्तिमें शास्त्रका उपयोग ४०३ २४-शानप्रामिक साधन ४०६ (१) ज्ञानयन्धु ४०६ (२)ज्ञानी ४०७ (३) बिना अभ्यासफे ज्ञान सिद्ध नहीं होता ४०८ (४) संसारसे पार उतरनेके मार्गका नाम योग है ४८ (५) योगकी निष्ठा (प्राप्य अवस्था) ४०९ (६) तीन प्रकारका योगाभ्यास ४१० १-क तत्त्वका गहरा अभ्यास ४१० (अ) प्रामभावना ४१० (आ) पदार्थों के अभावकी भावना ४११ ४१२ २-पापोंकी गतिका निरोध ४१३ (अ) प्राण और मनका सम्बन्ध चित्त. फा ही यनाया हुआ है ४१३ (आ) प्राण-विद्या ४१४ () वाभाविक प्राणायाम (६) प्राणोंकी गतिको रोपनेशी युपियाँ ४२१ (इ) फेवलीभाव पृष्ठ ४२३ ४२३ ४२६ ४२८ ४२९ ४३२ ४३३ विषय ३-मनरालय (अ, मन संसारचक्रकी नामि है (आ) मन फैसे स्यूल होता है (इ) मन किस प्रकार ब्रह्म हो जाता है (ई) मनके निरोध करनेकी युक्तियाँ १-ज्ञानयुक्ति २-संकल्पाका उच्छेदन ३-भोगोंसे विरक्ति ४ इन्द्रियों का निमह ५-यासनाओंग त्याग (अ) कृष्णाकी बुराई (आ) इस संसारमें न कुछ प्राप्त करने योग्य है और न कुछ त्यागने योग्य है (इ) वासना त्यागके दो प्रकार ६१ध्येय त्यागका स्वरूप (२) नेय त्याग (3) वामनाको त्याग करनेकी तरकीय ६-अहवारका त्याग (अ अहंभावको मिटानेसी विधि (आ) ब्रममावका अभ्यास (इ। अहंभावके शोए हो जाने पर सव दोषोंसे निवृत्ति हो जाती है ७-असनका अभ्यास ९--समभावका अभ्यास अ) समताका आनन्द आओसरको अपना वधु सममाना चाहिये ૪૩૪ ४३४ ४३५ ४४१ पृष्ठ ४४६ ४४६ । ४५१ ४५४ ( ३२ ) विपय ९-कर्तृत्वका त्याग १०-सव वस्तुओं का त्याग (अ) सर्वत्यागका स्वरूप (आ) महात्यागीका स्वरूप (इ) त्यागका फल ११-समाधि (अ समाधिका सया स्वरूप (उ) मनके लीन होनेका आनन्द २५--ज्ञानकी सात भूमिकायें ज्ञानकी सात भूमिकायें (१) योगभूमिकाओंका प्रथम विवरण (२) ज्ञानकी भूमिकाओंका दूसरा विवरण (३) ज्ञानको सात भूमिकाओका तीसरा वर्णन १-प्रथम भूमिका २-दूसरी भूमिका ३-चीसरी भूमिका (अ) सामान्य असन (श्रा श्रेष्ठ प्रसङ्ग ४-चौथी भूमिका ५-पाँचवीं भूमिका ६-छठी भूमिका ७-सातवीं भूमिका २६-कर्मवन्धनसे छुटकारा (१) कर्मफलका अटल नियम (२) फर्मका वास्तविक स्वरूप ( ३ ) पुरुप (जीय ) और कर्ममें भेद नहीं है (४) उत्पत्तिसे पहिले जीयके पूर्व फर्म नहीं होते (५) वासना हो जोयको फर्मफे फलसे यांधती है (६) कर्मफे पन्धनसे मुक्त होने की विधि ४५८ ४५९ ४६० ४६२ ४६२ ४६३ ४६४ (७) कर्मयोग विपर ४७० (0) आर्यका लक्षण २७-आत्माका अनुभव ४७५ {१) आत्मानुभके उदय होने लगाए (२) आत्माका अनुभव (३) श्रात्माके अनुभवका वर्णन नहीं हो सस्ता (४) आत्मानुभव मना अस्तित्त्व नहीं रहता (५) एक बार जाकर अधिया फिर नहीं लौटती (६) परम तृप्तिा अनुभव १८२ २८-जीवन्मुक्ति ४८३ (१) जीरन्मुत्तोरे लक्षण (२) जीवन्मुक्तके लिये न कुछ प्राय है और न त्यान्य ४९० (३) जोन्मुक्त महारता है (४) संसारका व्यवहार करता हुआ भी जीवन्मुक्त समाधि में ही रहता है (५)जीवन्मुक्त महाभोता है। (६)जीरन्मुक्तको शरीरसे घृणा नहीं होती, यह शरीर नगरीपर राज्य करता है ४९६ (७) जीवन्मुक्त यथाप्रान अवस्थाके अनुसार व्यवहार {5 ) बाह्य व्यवहारम शानी और अज्ञानीगरी समानता ४९८ (१) जीवन्मुक्तमा चित्त ४९९ (१०) जीवन्मुक्त और सिद्धियाँ ५०० ११) जीवन्मुक्त सत्र आपत्तियोंसे छूट जाता है (१२) जोपन्मुषमा जीवन ही शोभायुक्त जीवन है (१३) शरीरके अन्त हो जानेपर जीवन्मुक्त विदेह- मुक्ति प्रवेश करता है ५०३ २९-स्त्रियाँ और योग ५०६ ३०~ उपसंहार
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परिच्छेद १ योगवासिष्ठ का भारतीय दार्शनिक साहित्य में स्थान श्री योगवासिष्ठ संस्कृत भाषा का एक बृहत् अन्य है जो योगवासिष्ठ महारामायण, महारामायण, आपरामायण, वामिष्टरामायण, ज्ञानवासिष्ठ और वासिष्ठ आदि नामों से भी ज्ञात है। भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक इसका पाठ, मूल ग्या भापानुवाद में, बहुत काल से होता चला पा रहा है। जो महत्त्व भगवद्भक्तों के लिए श्रीमद्भागवत और श्रीरामचरितमानस का, और फर्मयोगियों के लिये श्रीमद्भगवद्गीता का है, वही महत्त्व ज्ञानियों के लिये श्री योगासिष्ट की है। सहसों घी-पुरुष- राजा से लेकर रतुवक-इस विचित्र अन्य के अध्ययन से अपने जीवन में आनन्द और शान्ति प्राप्त करते हैं। प्रायः सर ही प्रकार के पाठकों के अनुमोद के लिये इस मन्य में सामग्री प्रस्तुत है। जहाँ थवोध बालक भी इसकी कहानियाँ सुनकर प्रसन्न होते है, वहाँ बड़े बड़े विद्वानी की समझ से बाहर की उलमनों और गहनतम दार्शनिक सिद्धान्तों का इसमें प्रतिपादन है। हमारी समझ में तो यह ग्रंथ महान् और विशाल हिमाचल के सदृश है। पृथ्वी वल पर स्थित होने से प्राय' सभी लोगों की पहुँच हिमालय वक है, लेकिन विरले ही साहसी और पुरुषार्थी सोजक उसके उत्तु यद्गों को स्पर्श करते हैं। यही हाल योगवासिष्ठ का है। यह ऐसा अद्भुत ग्रंय है कि इसमें काव्य, उपारयान तया दर्शन, सभी का आनन्द वर्तमान है। भारतीय मस्तिष्क की सर्वोत्तम कृतियों में से यह ग्रंप एक है। ब्रह्म मान प्राप्त करने और ब्रह्म माव में स्थित रह कर संसार में व्यवहार करने के निमित्त इस ग्रंथ का पाठ, मनन और निदिध्यासन सर्वोत्तम साधन है। ऐसा मत केवल हमारा ही नहीं है, परन् उन सर महापुरुषों फरते हुए उनकी नाई स्व-स्वरूप में सदा जागते हैं।" (योगवासिष्ठ का है जिन्होंने इस ग्रन्थ का अमृतरस पान किया है। आधुनिक समय के परमहंस ब्रह्मनिष्ठ श्री स्वामी रामतीर्थजी महाराज ने अमे- रिका में अपने एक व्याख्यान "भारत की प्राचीन आध्यात्मिकता" में योगवासिष्ठ के सम्बन्ध में कहा है, "भारत की सर्वोत्तम पुस्तकों में से एक-और मेरे मतानुसार तो संसार की सभी पुस्तकों से अद्भुततम पुस्तक-योगवासिष्ठ है। यह असम्भव है कि कोई इस ग्रन्थ का अध्ययन कर ले और उसको ब्रह्मभावना न हो और वह सबके साथ एकता का अनुभव न करे" ( इन दी वुड्स ऑफ गॉड-रिअलाइजेशन, वॉल्यूम ७, पश्चम संस्करण १६३२, पृ० ६५ )। फाशी के जगद्विख्यात विद्वान् श्री डाक्टर भगवानदास जी योगवासिष्ठ के सम्बन्ध में अपनी एक पुस्तक (मिस्टिक एमपीरिएन्सेज) की भूमिका में लिखते हैं-"संस्कृत के अन्य योगवासिष्ठ का-जिसमें कि ३२ सहस्र श्लोक हैं-भारतीय वेदान्तियों में, इसके दार्शनिक सिद्धान्त, आत्मानुभवप्राप्ति के साधनो तथा इसके साहित्यिक सौन्दर्य और काव्यमय होने के कारण बहुत ही आदर है। वेदान्तियों में तो यह उति प्रचलित है कि यह ग्रंथ सिद्धावस्थामें अध्ययन करने के योग्य है और दूसरे अन्य भगवद्गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र साधनावस्था में अध्ययन किए जाने योग्य हैं ।" योगवासिष्ठ के भापानुवाद की भूमिका में, प्रमा भ्यासियों में प्रसिद्ध स्व० लाला वैजनाथ जी ने लिखा है-"वेदान्त में कोई अन्य ऐसा विस्तृत और अद्वैत सिद्धान्त को इतने पाख्यानों और दृष्टान्तों और युक्तियों से ऐसा दृढ़ प्रतिपादन करनेवाला आजवक नहीं लिखा गया, इस विषय में सभी सहमत है कि इस एक अन्य के विचार से ही फैसा ही विपयासक्त और संसार में मान पुरुष हो यह भी वैराग्य-सम्पन्न होकर फमराः आत्मपथ में विश्रान्ति पाता है। यह यात प्रत्यक्ष देखने में आई है कि इस प्रन्य के सम्य विचार करनेवाले यथेन्छाचारी होने के स्थान में अपने कार्य को लोकोपकारार्थ, उसी दृष्टि से कि जिस दृष्टि से श्री रामचन्द्रजी करते थे, , महारामायण-भापानुवाद समेत-भाग २, भूमिफा, Yo, , - 'यह वेदान्त के सव ग्रंथों में शिरोमणि है और कोई मुमुटु उसको उपेक्षा नहीं कर सकता" (यो००, मा०, भाग १, भूमिका, पृ०७)। पंजाय के वर्तमान ब्रह्मनिष्ट उर्दू कवि मुन्शी सूर्यनारायण 'महर' ने लघु योगवासिष्ट के अपने उर्दू अनुवाद को भूमिका में लिखा है-"जो योगवासिष्ठ पता है यह जरूर ही ज्ञानी हो जाता है"। (योग- पासिष्ठसार (उर्दू) पृष्ठ ६)। योगवासिष्ठ का लेसक-यह चाहे जो कोई हो-स्वयं अपने प्रय के महत्त्व को अच्छी तरह जानता था। स्वयं वह कहता है, और ठीक ही कहता है:- शास्त्रं सुरोधमेवेदं सालङ्कारविभूषितम् । काव्य रसमयं चार दृष्टान्तः प्रतिपादितम् ॥१॥ (२।१८३३) अस्मिन्श्रुते मते ज्ञाते तपोध्यानजपादिकम् । मोक्षप्राप्ती नरस्येह न किंचिदुपयुज्यते ॥२।। (२।१८३३५) सर्वदुःसक्षयकरं परमाश्वासमं धियः। (२।१018) मुपदुराक्षयकरं महानन्देककारणम् ।।३।। (२०१७) य इदं शृणुयानित्यं तस्योदारचमत्कृतेः। बोधस्यापि पर योघं बुद्धिरेति न संशयः ॥४॥ (२८१३) अर्थात्- -यह शाम्ब सुबोध है। अलङ्कारों से विभूपित है। सुंदर और रसपूर्ण काव्य है। और इसके सिद्धान्त दृष्टान्तों द्वारा प्रतिपादित किए गए हैं ॥१॥ मोक्ष प्राप्ति के लिए इस पंथ का श्रवण, मनन और निदिध्यासन कर लेने पर तप, ध्यान और जप आदि किसी साधन की आवश्यकता नहीं रहती IRI यह ग्रंथ सब दुःसो का क्षय करने वाला, बुद्धि को अत्यन्त आश्वासन देने वाला, और महा आनन्द प्राप्ति का एकमात्र साधन है ।।३।। जो इसको नित्य श्रवण करता है उस प्रशशमयी घुद्धि वाले को बोध से भा परे का योध हो जाता है। इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥४॥ वेदान्त के प्रायः सभी मध्यकालीन लेखका के अपर इस ग्रंथ का किसी न किसी रूप से प्रभाव पड़ा है। योगवासिष्ठ के साथ साथ यदि भर्तृहरि के वैराग्यशतक और वाक्यपदीय, गौडपादा- धार्य की माण्डूक्यकारिका, श्री शंकराचार्य को विवेकचूडामणि आत्मबोध, स्वात्मनिरूपण, शतश्लोकी तथा अपरोक्षानुभूति और सुरेश्वराचार्य के मानसोल्लास का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय, तो भलीभाँति ज्ञात हो जायगा कि अद्वैत वेदान्त के मध्य कालीन आचार्यगण योगवासिष्ठ के कितने ऋणी हैं । इस विषय का प्रतिपादन आगे किया जायगा। नवीं शताब्दी के पूर्व भाग में ही-जब कि श्री शंकराचार्य वेदान्त के अद्वैत सिद्धान्त का पुनरुद्धार करने में सफल हो चुके थे-इस वृहत् ग्रन्थ का एक संक्षेप-लघु योगवासिष्ठ नामक-लगभग ६००० श्लोको में, कश्मीर के पण्डित अभिनन्दन गौड़ द्वारा किया गया ( टर्निट्ज-गेशिस्टे डेर इण्डिशेन लिट्राटुर वॉ. ३, पृ. ४४३) । उस समय से योग वासिष्ठ का -~जो कि पहले बृहत् होने के कारण कठिनता से उपलब्ध होता था-खूप प्रचार हो गया। वेदान्त के प्रसिद्ध लेखक विद्यारण्य स्वामी के जीवन्मुक्तिविवेक और पंचदशी, नारायण भट्ट के भक्ति-सागर, प्रकाशात्मा की वेदान्तसिधान्तमुक्तावली, और शिवसंहिता, हठ- योगप्रदीपिका तथा रामगीता इत्यादि ग्रंथों में योगवासिष्ठ की उक्तियाँ उद्धृत की गई है । फेवल जीवन्मुक्ति विवेक में ही योगवासिष्ठ के २५३ श्लोक उद्धृत हैं। केवफ इतना ही नहीं, गहरी सोज करने पर लेसक को यह भी पता चला है कि १०८ प्रसिद्ध उपनिपदों में से कुछ उपनिषद् ऐसे हैं जो कि-सय फे सय अथवा जिनके कुछ (प्रधान) भाग-योगवासिष्ठ में से चुने हुए श्लोकों से ही बने हैं, अथवा जिनमें कहीं कहीं पर योगवासिष्ठ के श्लोक भी पाए जाते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि प्राचीन फाल में हस्तलिखित पुस्तकें होने से योगवासिष्ठ जैसा बड़ा ग्रंथ आसानी से उपलब्ध न होने के कारण, लोगों ने इसमें से अपनी- अपनी रुचि के अनुसार श्लोकों को छाँट कर उनका संग्रह करके उसका नाम उपनिपत् रस लिया । लेखक के अनुसार निम्नलिखित उपनिपदों में योगवासिष्ठ के श्लोक पाए जाते हैं (देसिए सरस्वतीमचन स्टडीज १६३३ में हमारा लेस “योगवासिष्ठ और पुछ उपनिषद्) । ।
१ महा उपनिषद्-यल पहिला, छोटासा भूमिकामय अध्याय
छोड़ कर सारा उपनिषद् योगवासिष्ठ के ही (५१० के लगभग)
श्लोकों से बना है।
२ अन्नपूर्णा उपनिपद सम्पूर्ण। (प्रारम्भ के १७ श्लोक
छोड़ कर)
३ अक्षि उपनिषद्-सम्पूर्ण।
४ मुक्तिकोपनिषद्-दूसरा अध्याय जो कि मुख्य अध्याय है।
५ वराह उपनिपद्-चौथा अध्याय ।
६ वृहत्संन्यासोपनिषद्-५० श्लोक।
७ शांडिल्य उपनिषद्-१८ श्लोक ।
८ याज्ञवल्क्य उपनिषद्-१० श्लोक ।
९ योगकुण्डली उपनिषद्-~३ श्लोक ।
१० पैङ्गल उपनिषद्-१ श्लोक।
इनके अतिरिक्त दूसरे कुछ ऐसे उपनिपद भी हैं जिनमें योगवासिष्ठ
के श्लोक ती अक्षरशः नहीं पाये जाते लेकिन योगवासिष्ठ के सिद्धान्त
अवश्य ही मिलते हैं। अभी तक यह कहना कठिन है कि ये
योगवासिष्ठ के पहिले के हैं अथवा पीछे के। ये ये हैं :-
१ जाबाल उपनिपद्--समाधिखएड ।
२ योगशिखोपनिपद-११३४-३७; १।५६, ६२, ४ ( समस्त )
६५८, ५६-६४।
३ तेजोबिन्दुपनिषद्-
४ त्रिपुरतापिनी उपनिषद्-उपनिपद् ५, श्लोक १-१६ ।
५ सौभाग्यलक्ष्मी उपनिपद्-द्वितीयसण्ड, श्लोक १२-१६॥
६ मैत्रायण्युपनिषद् -प्रपाठक ४, श्लोक १-११।
७ अमृतबिन्दुपनिषद्-श्लोक १-५॥
इन सब बातों से यह सिद्ध होता है कि भारतीय दर्शन में
योगवासिष्ठ का बहुत ऊँचा स्थान है और भारतीय दर्शन के इतिहास
'-समस्त ।
में इसका महत्त्व उपनिषद् और भगवद्गीता से किसी प्रकार कम नहीं वरन् अधिक ही रहा है। किन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि भारतीय दर्शन के आधुनिक विद्वानों का इसकी ओर कम ध्यान गया है। हमारे दर्शन के इतिहास लेखको ने इसकी अक्षम्य अवहेलना की है। डा. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त के भारतीय दर्शन के इतिहास के प्रथम भाग में, जहाँ कि इस अन्य का उस स्थान होना चाहिए था, योगवासिष्ठ का नाम तक भी नहीं आया। हर्ष की बात है कि दूसरे भाग में उन्होंने अब इसको स्थान दे दिया है । प्रो. राधाकृष्णन् के भारतीय दर्शन में भी योगवासिष्ठ पर कुछ भी नहीं लिया गया। प्रो० हिरियण्य की पुस्तक आउटलाइन ऑफ इण्डियन फिलासोफी में भी योगवासिष्ठ का नाम तक नहीं पाता। प्रो० अभ्यङ्कर ने अपने सम्पादन किए हुए सर्व दर्शन संग्रह के अन्त में दी हुई भारत के दर्शन मन्थो की नामावली में भी योगवासिष्ठ का नाम नहीं दिया। यही सबसे बड़ा कारण है कि लेसक को इस विषय में अपनी लेसनी उठानी पड़ी। यही बात नहीं है कि योगवासिष्ठ की ओर भाधुनिक लेसको का ध्यान नहीं गया, वरन् कुछ लोगो ने इसका जिक्र करते हुए इसके प्रति अपनी विपरीत भावना का भी परिचय दिया है। डा. विण्टर्निज ने अपने 'भारतीय साहित्य के इतिहास', गेशिरुटे डेर इण्डिशेन लिदादर, वॉ, ३ के ४४३ पृष्ठ पर लिया है, "वेदान्त के कुछ ग्रंथों के सम्बन्ध मे यह शंका होती है कि वे दार्श- निक ग्रंथ हैं अथवा धार्मिक ( साम्प्रदायिक)। यही पात योगवासिष्ठ के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। यह अधिकतर साम्प्रदायिक ही पुस्तक है ।" इसी प्रकार डा० फर्वाहार साहय अपने मन्थ 'एन आउटलाइन ऑफ रिलीजस लिटरेचर ऑफ इण्डिया में २२ वें पृष्ठ पर कहते हैं- "योगवासिष्ठ रामायण १३ यी या १४ वीं शताब्दी में लिखी हुई उन पुरतको में से है जो कि किसी धार्मिक सम्प्रदाय के सिद्धान्तों को प्रतिपादन करने के निमित्त लिखी गई थीं, लेकिन यह अध्यात्मरामायण की टपर फी नहीं है।" प्रो.
राधाकृष्णन साहब को शायद यह मत मान्य है, क्योंकि उन्होंने मी अपने भारतीय दर्शन ( इंडियन फिलॉसोफी) के दूसरे भाग के ४५२ वें पृष्ट के फुट नोट में लिखा है-“पीछे लिखे हुए यहुत से उपनिषद्-यया महोपनिषद्-और योगवासिष्ठ सया अध्यात्म रामायण जैसे साम्प्रदायिक ग्रंय भी अद्वैतवाद का प्रतिपादन करते है।" ये विचार योगरासिष्ठ के भलीभाँति अध्ययन करने पर काफूर हो जाते हैं। योगरासिष्ट में सिी प्रकार की भी साम्प्रदायिकता नहीं है। वह सर्वथा एक दार्शनिक ग्रंथ है, किन्तु अन्य दार्शनिक प्रन्थों की नाई रूखी और सूरमयी भाषा में नहीं लिखा गया, यल्कि इस अन्य में रसमय काग्य के रूप में उपाख्यानों और दृष्टान्तों द्वारा उस से उन और गूढ से गूढ दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन है। यदि इसके गूढ़ दार्शनिक सिद्धान्तों के अपनाने थोर मानने के लिये नहीं, वो भी अद्वैत वेदान्त के इतिहास से मलीभांति परचित होने के लिए, निद्वानों को इसका अध्ययन करना आवश्यक ही है। क्योंकि लेसक का पूरा विश्वास है (जैसा कि आगे चल फर सिद्ध किया जायगा कि यह प्रत्य श्रीशङ्कराचार्य और श्रीगोड़पादाचार्य फे पहिले का है। हमारा यह विचार शरवाट्सरी, कीय, विएटर्निच और शरेटर आदि यूरोप के परिश्तों ने मान लिया है। जैसा कि शरेटर साहब ( कील, जर्मनी) ने हम को एक चिट्ठी में लिसा है, "यदि यह यात प्रायः मान ली गई, तो अवश्य ही इस प्रन्य का महत्त्व बहुत बढ़ जायगा और प्राच्य विद्या के विद्यार्थियों का ध्यान इमकी ओर अपरय ही जायगा।" यदि इस लेसमाला से पुछ विद्वानों की रुचि इस अद्भुत ग्रंथ का अमृत पान करने की ओर हो गई चो लेखक अपने को धन्य समझेगा।
यह निश्चय करना है कि यह प्रन्य कर लिया गया होगा। प्रथम परिच्छेद २ पढ़ें तो उसमें यह लिसा हुधा मिलता है कि "योगवासिष्ठ महा. रामायण उन संस्कृत काव्यों में से है जो १३वीं या १४वीं शताब्दियों में लिखे गये थे" (पृष्ठ २२८) प्रिय हमको यहाँ पर यथासंमय योगवासिष्ठ कत्र लिखा गया होगा। संस्कृत भाषा के अधिकतर ग्रन्थों का लेख-समय निर्धारित करना बहुत ही कठिन काम है क्योंकि लेखकों ने अपने और अपने समय के सम्बन्ध में अपने ग्रंथों में कुछ नहीं लिखा। आजकल के लेखकों की नाई वे लोग अपना नाम विख्यात करना इतना श्रावश्यक नहीं समझते थे जितना कि अपने ग्रंथ गौर तद्गत सिद्धान्तों का प्रचार। उनके इस उच्च कोटि के धात्मत्याग से भारत के ऐतिहासिक ज्ञान को अत्यन्त क्षति पहुंची है। इसी कारण से भारत का प्राचीन इतिहास बहुत अन्धकारमय है, और बड़े बड़े विद्वानों का समय और उनकी शक्ति भारत के प्राचीन इतिहास की खोज में व्यय होती है। कितने दुःग्य की बात है कि हमको महाकवि कालिदास और प्राचार्य शहर तक के समय का भी निश्चय नहीं है। यही हाल योगवासिष्ठ का भी है। जितना मतभेद इस ग्रंथ के लेसन-समय के सम्बन्ध में है उतना शायद ही और किसी ग्रंथ के सम्बन्ध में होगा। एक ओर तो यह मत प्रचलित है कि यह ग्रन्थ रामायण के रचयिता महर्पि आदि कवि श्री वाल्मीकि जी की कृति है, और दूसरी ओर आधुनिक विद्वान् समझते हैं कि यह प्रन्थ १३वीं अथवा १४वीं क्रिष्टीय शताब्दी में लिया गया होगा। निर्णय सागर प्रेस से जो अन्य छपा है उसके प्रारम्भ में लिया है "श्रीमद्वाल्मीकिमपिप्रणीतः योगवासिष्ठः" और प्रत्येक सर्ग के अन्त में "इत्याचे श्रीयासिष्ठमहा- रामायणे याल्मीकीये मोक्षोपायेपु” इत्यादि लिया रहता है। इण्डिया ऑफिस के पुस्तकालय में जो योगवासिष्ठ फी हस्तलिखित प्रतियों मौजूद हैं ( देखिये एगलिग को सूची भाग चौथा, पृष्ठ ११२, संरया २४०७-२४१४ ) उनमें भी ऐसा ही लिसा हुआ है। लेकिन यदि फर्जुहार साहय का अन्य रिलीजस लिटरेचर ऑफ इण्डिया हम आधुनिक विद्वानों के मतों की विवेचना करेंगे और पीछे उस मव की जो कि भारत में प्रायः प्रचलित है। पर्यहार साइव ने अपने मव के समर्थन में कोई भी युक्ति नहीं दी। किन्तु एक और विद्वान्-प्रो. शिवप्रसाद भट्टाचार्य ने योग. वासिष्ठ के लेखन काल पर मद्रास में हुई दूमरी ओरियण्टल काफ- रेन्स में एक पाण्डित्यपूर्ण लेख पढ़ा था। उसमें उन्होंने युक्तियाँ द्वारा यह सिद्ध किया था-"इन सय विचारी से यही सिद्ध होता है कि यह प्रन्य १०-१२वीं शताब्दियों में लिखा गया होगा" (रिपोर्ट पृष्ठ ५५४)। हमारी समझ में योगवासिष्ठ इतने पीछे का प्रन्म नहीं है क्योंकि :- (१) विद्यारण्य स्वामी के समय ( १४ वीं शताब्दी के पूर्व भाग) तक योगवासिष्ठ काफी प्रसिद्ध और आदरणीय मन्थ हो चुका था। उनके सर्वप्रिय प्रत्य पञ्चदशी में योगवासिष्ट से बहुत सी उक्तियाँ हैं और उना जीवन्मुक्तिविवेक अन्य तो योगवासिष्ठ के आधार पर ही लिया हुआ है। इसमें योगवासिष्ठ से कम से कम २५३ श्लोक अपने मत समर्थन के लिये उत किए गए हैं। प्रो. भट्टाचार्य जी को शायद यह पात मालूम नहीं थी क्योंकि उन्होंने अपने लेस में लिया है.-"विज्ञान मिनु से पहिले का कोई भी दार्शनिक लेसक या भाष्यकार इस प्रन्य को प्रमाण अन्य नहीं समझता मालूम पड़ता है" (प्रोसिडिङ्ग की रिपोर्ट पृष्ठ ५४६)। विज्ञान भिक्षु का समय १६ वीं शताब्दी समझा जाता है, लेकिन विद्यारण्य तो १४ वीं शताब्दी ही में माने जाते हैं। (२) नवीं शवाब्दी के पूर्व भाग में ही इस वृहत् अन्य योग- वासिष्ट का कश्मीर देश के पण्डित अमिनन्द गौड़ ने एक सार- लघु योगवासिष्ठ अथवा योगवासिष्ठमार-लोकोपकारार्थ ६००० श्लोकों में कर दिया था। यह घटना प्रायः सभी विद्वान् जानते हैं। इसका उल्लेख कोनो साहब की कर्पूरमंजरी ( पृष्ट १६७), कीथ साहय की थोडलियन पुस्तकालय की पुस्तकसूची (नं० ८४०), विण्टर्निज साय के भारतीय साहित्य के इतिहास ( जर्मन-गेशिएटे डेर २ (१०) इण्डिशेन लिट्राटुर, वॉ ३, पृष्ठ ४४४) और हाल साहब फी पिब्लियोग्राफी ( वेदान्त, नं० १४४ ) में है। यह प्रन्थ सन् १८८७ में निर्णय सागर प्रेस से छपा था और बाजार में मिलवा है। मालूम पड़ता है कि प्रो० भट्टाचार्य को इस ग्रन्थ की सत्ता का ज्ञान नहीं था फ्याफि वे लिखते हैं-'लघु योगवासिष्ठ अथवा मोक्षोपायसार, जिससे किसी पूर्व प्रन्य का होना सिद्ध होता है, एक घंगाली लेखक का लिखा हुआ ६२ श्लोकों का ग्रन्थ है। इस लेसक का नाम अभिनन्द है। लेकिन यह अभिनन्द कश्मीर के प्रसिद्ध गोड अभिनन्द से अतिरिक्त कोई दूसरा ही व्यक्ति है" (प्रोसीडिंग्स्- पृष्ठ ५५३ फुटनोट) डा० थिएटर्निज साहय ने अपने गेशिखटे डेर इण्डिशेन लिदाटुर (भारतीय साहित्य का इतिहास ) के तीसरे भाग के ४४४ वें पृष्ठ पर योगवासिष्ठ का समय निर्धारण करते हुए लिखा है- "योगवासिष्ठ का एक सार संस्करण-योगवासिष्ठसार मामफ-- गौड़ अभिनन्द फा किया हुआ है। अभिनन्द गौड़ ध्वीं शताब्दी के मध्य काल में हुए हैं। इसमें सन्देह नहीं है कि योगवासिष्ठ इस समय से पुराना है लेकिन शंकराचार्य ने इसका फहीं भी जिक्र नहीं किया। इस लिए योगवासिष्ठ शंकराचार्य के किसी समकालीन लेखक ने लिसा होगा।" यह युक्ति हमको ठीक नहीं मालूम पड़ती। शंकराचार्य का समय आजकल के विद्वानों के अनुसार-जो कि डा. विष्टर्निज को भी मान्य है ( गेशिस्टे डेर इण्डिशेन लिदादुर, भाग ३, पृष्ठ ४३४)-७८-२० क्रिष्टीय है, थोर गौड़ अभिनन्द फी यामत भी यह निश्चित सा ही है कि यह वीं शताब्दी के मध्य में हुए हैं देखिये फोनो की कर्पूरमजरी पृष्ठ १६७)। पपरा विचार फरना चाहिए कि शंकराचार्य के और गौड़ अभिनन्द के समय में कितना थोड़ा अन्तर है-एक तो वीं शताब्दी के प्रथम पाद में और दूसरे उसके मध्य में हुए हैं। यदि विएटर्निज साहय फी यात मान ले तो यह मानना पड़ता है कि इस थोड़े से समय में एक ३२००० श्लोको का अन्य ( यद्यपि आजकल इसमें केरल २७३५७ श्लोक ही है, निममें नाम कान्य के बहुत मे गुण वर्तमान हैं, इस समय में पन भी गया होगा और उस हस्त लेसन के समय में उसका खूप प्रचार भी हो गया होगा और वमका इतना श्रादर मी हो गया होगा कि गौह अमिनन्द जैसा पडित उसको अध्ययन करे, और उसको मली. माँति अध्ययन करके उन्होंने अपम मार भी इसी थोडे समय के मीवर तेसर करके ससार के समक्ष राप दिया होगा । हमको तो यह सब इतने थोडे से समय में उस जमाने में होना नितान्त ही असमव प्रतीत होता है। प्रो० शिवप्रसाद भट्टाचार्य ने मद्रास ओरियण्टल पा फरेन्स में पड़े हुए लेस में निसा है "योगवासिष्ठ में 'वेदान्तिन' और 'चेदान्त- वादिन से सम्प्रदाय का कयन करना इस बात का सूचक है कि योगवासिष्ध श्री शराचार्य के पहले का नहीं है" (रिपार्ट पृष्ठ ५५२) हमारी समझ में केवल 'वेदान्तिन" अथवा 'वेदान्तयादिन' शों के योगवासिष्य में होने से योगवासि का शराचार्य से पाछे काहाना सिद्ध नहीं होगा। 'वेदान्द' शद रामराचार्य के पाछे का नहीं है परन् बहुत पुराना है। मुण्डक उपनिषद् (३२६) और श्वेताश्वतर उपनिषद् ( ४१२२ ) में भी 'वेदान्त' शब्द उपनिषद् लिये प्रयुक्त हुआ है। 'वेदान्तिन' शद अवश्य ही शकर से पहिले मी रस सम्भदाय के अर्थ में प्रयुक्त दाता रहा होगा जो उपनिषदों के सिद्धान्तों को अध्ययन करते थे और उनको ही मानवे थे। गौडपादाचार्य को-तिनका शकर से पूर्व होना सिद्ध ही है-माहत्यकारिका (१३१) के पढ़ने से भी मालूम पड़ता है कि उनसे पूर्व भी अद्वैतवाद को अथवा 'वेदान्त' के सिद्धान्त को प्रतिपादन करनेवाला कोई सम्राय या} और शकराचार्य के ब्रह्मसूत्रमाष्य को पढ़ने से भी यहमिहात होता है कि वे किसी पूर्ववृत्त सम्प्रदाय के मतानुसार ही सिद्धान्दों की व्याख्या कर रहे हैं, अपना चैयक्तिक मत का सहन नहीं कर रहे हैं। कोई कारण नहीं है कि यह पूर्ववृत्त रहनाय नयाचे धाचार्य तिनका मत गोहपादाचार्य तया शवाचार्य विचारपादन किया है. 'वेदान्तिन' अथवा 'पेदान्तवादिन' के नाम से ।
इण्डिशेन लिहादुर, वा ३, पृष्ठ ४४४) और हाल साहब को पिब्लियोग्राफी (वेदान्त, नं० १४४ ) में है। यह प्रन्थ सन् १८८७ में निर्णय सागर प्रेस से छपा था और पाजार में मिलता है। मालूम पड़ता है कि प्रो० भट्टाचार्य को इस ग्रन्थ की सत्ता का मान नहीं था क्योंकि वे लिखते हैं-"लघु योगवासिष्ठ अथवा मोक्षोपायसार, जिससे किसी पूर्व अन्य का होना सिद्ध होता एक बंगाली लेखक का लिखा हुआ ६२ श्लोको का ग्रन्थ है। इस लेसा का नाम अभिनन्द है। लेकिन यह अभिनन्द कश्मीर के प्रसिद्ध गोड अभिनन्द से अतिरिक्त कोई दूसरा ही व्यक्ति है" (प्रोसीडिंग्स्- पृष्ठ ५५३ फुटनोट) डा० विएटर्निज साहब ने अपने गेशिस्टे डेर इण्डि शेन लिदाटुर (भारतीय साहित्य का इतिहास ) के तीसरे भाग के ४४४ वें पृष्ठ पर योगवासिष्ट का समय निर्धारण करते हुए लिखा है- "योगवासिष्ठ का एक सार संस्करण-योगवासिष्ठसार नामफ- गौड़ अभिनन्द का किया हुआ है। अभिनन्द गौड़ ध्वीं शताब्दी के मध्य काल में हुए हैं। इसमें सन्देह नहीं है कि योगवासिष्ठ इस समय से पुराना है लेकिन शंकराचार्य ने इसका कहीं भी जिक्र नहीं किया। इस लिए योगवासिष्ठ शंकराचार्यके किसी समकालीन लेखक ने लिखा होगा।" यह युक्ति हमको ठीक नहीं मालूम पड़ती। शंकराचार्य का समय आजकल के विद्वानों के अनुसार-जो कि डा० विष्टनिज को भी मान्य है (गेशिस्टे डेर इण्डिशेन लिदाहर, भाग ३, पृष्ठ ४३४)---२० मिष्ट्रीय है, और गौड़ अभिनन्द की बात भी यह निश्चित सा हो है कि यह ध्वीं शताब्दी के मध्य में देसिये फोनो की कर्पूरमञ्जरी पृष्ठ १६७)। परा विचार करना चाहिए कि शंकराचार्य के और गौड़ अभिनन्द के समय में कितना थोड़ा अन्तर है-एक ठो ६वीं शताब्दी के प्रथम पाद में और दूसरे उसके मध्य में हुए हैं। यदि पिएटर्निज साहय फी पात मान ले तो यह मानना पड़ता है कि इस थोड़े से समय में एक ३२००० लोको है ध्रुति प्रमाण द्वारा सिद्ध करने का यल किया है। श्रुति उन सब के लिये अद्वैत सिद्धान्ती का परम प्रमाण है। शिन्तु योगवामिष्ट में कहीं पर भी श्रुति की इतनी महानता नहीं मानी गई। सब प्रमाणों के उपर अनुभव ही को प्रधानता दो गई है। किसी स्थान पर भी अति की उक्ति के आधार पर किसी भी सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं दिया गया। लेकिन शहर के पश्चात् किसी भी अनयाद के समर्थक ने ऐसा नहीं किया। योगवासिष्ठ के अनुमार तो प्रत्यक्षानुभय ही एक परम प्रमाण है। यया.- सर्वप्रमाणसताना पदमधिरपामिय। प्रमाणमेक्मेवेद प्रत्यक्ष तदत शृणु ॥१॥ (२।१६) मर्गत्रयोपदेशो हि शाम्यादिति राघव । ब्रहमाहित्ययाव्यवासारिन तन्छासनेवापि॥२॥(11१६७११५) --चौथा कारण यह है रि शंाराचार्य से लेकर उनके सभी अनुयायियों नक ने अपने प्रन्यो में दूसरे मा का ययाकि सहन कर के अपने मत का प्रतिपादन और अपने मत को सब से तम सिद्ध करने का यत्न किया है। और जहाँ जहाँ युरियों सफल नहीं हो सकी वहाँ यहाँ पर श्रुति को परम प्रमाण मान कर उसका पूरा सहारा लिया है। योगवामिष्ट में ऐसा नहीं पाया जाता। टमके लेखक ने प्राय सभी अपने समय में वर्तमान मतों को आदरणीय दृष्टि से देखा और उनका अपने मत में समावेश किया है। शंकर का श्रद्वैत वेदान्त तो केरल उपनिषद् के ही सिद्धान्तों का समन्वय है, लेकिन योगवासिष्ठ अपने समय के सभी दर्शनी का समन्वय है। किसी मत के उपर भी योगवासिष्ठमार ने श्राक्षेप नहीं किया। ५-पाँचयाँ कारण इस विषय में यह है कि यद्यपि योगवासिष्ट में शङ्कराचार्य के विरोप सिद्धान्त, और उनकी विशेष सजाएँ नहीं पाई जाती, नथापि शङ्कराचार्य के छोटे छोटे पच मन्या में योग- चासिष्ठ के बहुत सिद्धान्त, बहुत सी विशेष समाएँ ही नहीं, बहुत से श्लोक भी मिलते हैं। भाप्यों में, जो कि गद्य में लिखे गए हैं, शङ्कराचार्य जी को भाष्य-कृत प्रयों के ही विचारों तक परिमित रहना श्रावश्यक था, किन्तु अपनी स्वतन्त्र पद्य रचनाओं में वे अपने विचारों तथा शब्दों में स्वतन्त्र थे। इस लिये इन प्रयों में कुछ विशेषता ( १२ ) न पुकारे जाते हो या योगवासिष्ठकार ने उनको इन नामो से न पुकारा हो। इसलिये प्रो० भट्टाचार्य की यह युक्ति योगवासिष्ट के शङ्कराचार्य के पीछे का ग्रन्थ होने को सिद्ध नहीं करती। योगवासिष्ठ शंकराचार्य से पूर्व का ग्रन्थ है १-एक विशेष कारण जिसकी वजह से हमको योगवासिष्ठ श्री शंकराचार्य के पश्चात् का ग्रन्थ नहीं जान पड़ता, यह है कि योगवासिष्ठ यद्यपि भद्वत सिद्धान्त और औपनिषद् अद्वैत सिद्धान्त का प्रतिपादक है, जिसका प्रतिपादन शङ्कराचार्य ने अपने ग्रन्थी में किया है-तथापि उसमे उन पारिभाषिक शब्दो का अभाव है जिनका श्री शंकराचार्य ने प्राय और विशेषतया प्रयोग किया है और जिनका प्रयोग शकराचार्य के पीछे के सभी अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादक लेखकों ने किया है, और जिनका प्रयोग योगवासिष्ठकार भी करता यदि उसको ये शब्द तात होते । और यदि यह शंकराचार्य के पीछे का लेखक होता तो कोई कारण ही नहीं कि श्री शंकराचार्य के शब्दों का उसको क्या ज्ञान न होता जय कि अद्वैत सिद्धान्त का प्रतिपादन ही वह अपने इस महान ग्रन्थ में कर रहा था। उदाहरणार्थ, शकराचार्य के प्रयोग किए हुए ऐसे शब्दो और संज्ञाओं में से कुछ हम यहाँ देते हैं-'अध्यास', 'साधन चतुष्टय-विवेक, विराग, पटसम्पत् (शम, दम तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा, समाधान ) तथा मुमुतुत्य', 'सगुण' तथा 'निर्गुण' प्रहा, 'अपर प्रह्म' 'सविशेष' और 'निविशेष ब्राम' 'उपाधि', 'ममुक्ति', 'प्रारब्ध' तथा 'संचित' पर्म 'याध', पञ्चकोश', ईश्वर की उपाधि रूप से 'माया' और 'अविद्या', अविद्या का 'अनादित्य', 'कर्म का अनादित्य', महल से जगत् का शराचार्य के अनुसार विकास जो कि सारय के अनुसार विकास से पन्न महापापयों का एक विशेष प्रकार से अर्थ लगाना इत्यादि । २--दूसरा फारण यह है कि योगवासिष्ट का प्रयाद तने मुसंशित शब्दो मे और इतनी निश्चितार्थ तथा दार्शनिक भाषा पर ही है जितना कि शंकराचार्य फा तथा उनके सप अनुयायियोनी तना। योगवासिष्ठ में प्रायः सभी दार्शनिक संज्ञाएँ पई फई अयों को या दूसरे। ३-तीसरा कारण यह है कि शहराचार्य जी और उपदा ले तो यायियों ने जितने दार्शनिक सिद्धान्त प्रतिपादन किए हैं परिलोकों। . है, श्रुति प्रमाण द्वारा सिद्ध करने का यल किया है। श्रुति न्न सब के लिये श्रद्वत सिद्धान्ता का परम प्रमाण है! किन्तु योगवासिष्ठ मे कहीं पर भी श्रुति की इवनी महानता नहीं मानी गई। सर प्रमाणा के ऊपर अनुभव ही को प्रधानता दी गई है। किसी स्थान पर मी प्रति की उक्ति के आधार पर किसी भी सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं किया गया। लेग्नि शङ्कर के पश्चात् किसी भी अवगाद के समर्थक ने ऐमा नहीं किया। योगासिष्ठ के अनुमार तो प्रत्यक्षानुभव ही एक परम प्रमाण है। यथा - सर्वप्रमाणसत्ताना पदमघिरपामिय। प्रमाएमेकमेवेह प्रत्यक्ष तदत शृणु ॥१॥ (१६) वर्गयोपदेशो हि शास्त्रादिप्वरित राघव । ब्रह्मप्रातिस्पयाज्यत्वान्नास्ति चन्छासनेवपिना (१९६७१५) ४-चौथा कारण यह है कि शराचार्य से लेकर उनके समी अनुयायियों तक ने अपने अन्यों में दूसरे का ययाशक्ति सहन कर के अपने मत का प्रतिपादन घऔर अपने मत को सब से इत्तम सिद्ध करने का यत्न किया है। और जहाँ जहाँ युक्तियाँ सफल नहीं हो सकी यहाँ वहाँ पर श्रुति को परम प्रमाण मान कर उसका पूरा सहारा लिया है। योगगासिष्ट में ऐसा नहीं पाया जाता। उसके लेखक ने प्राय सभी अपने समय में वर्तमान मनों को आदरणीय दृष्टि से देसा और उनका अपने मत में समावेश दिया है। शकर का अद्वैत वेदान्त तो केवल उपनिषद् के ही सिद्धान्तों का समन्वय है, लेकिन योगवासिष्ठ अपने समय के सभी दर्शनी का ममन्वय है। शिसा मत के ऊपर मी योगवासिष्टकार ने आक्षेप नहीं किया। ५-पाँचयों कारण इस विषय में यह है कि यद्यपि योगवासिष्ठ में शङ्कराचार्य के विशेष सिद्धान्त, और उनकी निशेप सजाएँ नहीं पाई जाती, तथापि शङ्कराचार्य के छोटे छोटे पद्य अन्यों में योग- वासिष्ठ के यहुत मिद्धान्त, बहुत सी विशेष सत्राएँ ही नहीं, बहुत से श्लोक भी मिलते हैं। भाप्यों में, जो कि गद्य में लिखे गए हैं, शङ्कराचार्य जी को भाष्य-वृत प्रथा के ही विचारों ता परिमित । रहना आवश्यक था, फिन्तु अपनी स्वतन्त्र पछ रचनाओं में वे अपने विचारों तया शदों में स्वतन्त्र थे। इसलिये इन प्रयो में कुछ विशेषता ( १४ .) है। यदि शङ्कराचार्य के विवेकचूडामणि, अपरोक्षानुभूति, शतश्लोकी श्रादि पद्य-ग्रंथों का योगवासिष्ट के साथ साथ अध्ययन किया जाय तो अवश्य ही यह निश्चित हो जायगा कि शङ्कराचार्य फो अवश्य ही योगवासिष्ठ के सिद्धान्त मालूम थे और उसके बहुत से श्लोक उनके स्मृति चित्र पर अंकित थे। इस विपय में यह कह देना भी उचित है कि यह सम्भव हो सकता है कि ये ग्रंथ शङ्कराचार्य के लिखे हुए शायद न हों। लेकिन विद्वान् लोग प्रायः इन अन्यों को उन्हीं के मानते चले आ रहे हैं ( देखिये अभ्यवर सम्पादित सर्पदर्शनसंग्रह के अन्त में दी हुई सूची तथा राधाकृष्णन् फी इण्डियन फिलासोफी, वा० २, पृष्ठ ४५०--जहाँ पर कि विवेक- चूडामणि शङ्कराचार्य का प्रन्थ मान लिया गया है ) । दूसरी धात यह भी कह देना उचित है कि शहराचार्य जी को योगवासिष्ठ के सिद्धान्त और श्लोक स्वयं योगवासिष्ठ से न प्राप्त होकर अपने आचार्यों या सम्प्रदाय द्वारा मौखिक पथ द्वारा प्राप्त हुए हों, और योगवासिष्ठ के पढ़ने का स्वयं उनको सौभाग्य और समय न प्राप्त हुआ हो, क्योंकि उस जमाने में पुस्तकें-विशेष कर बड़े प्रन्थ--सुलभतया नहीं मिलते थे। हम यहाँ पर पाठकों के निश्चय के लिये कुछ थोड़े से ऐसे श्लोक, वाक्य और सिद्धान्त यहाँ पर इन ग्रंथों से उद्धृत फरते हैं जो योगवासिष्ठ में प्रायः उसी रूप में पाए जाते हैं:- विवेकचूडामणि- शान्तसंसारफलनः फलावानपि निप्फलः। यस्य चित्तं विनिश्चिन्तं स जीवन्मुक इप्यते ।।४३०॥ योगवासिष्ठ- शान्तसंसारकलनः फलायानपि निष्फलः। यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुफ उच्यते ।।३।११॥ विवेकचूडामणि- लीनधीरपि नागर्ति जाप्रद्धर्मपिवर्जितः । योघो निर्वासनो यस्य स जीवन्मुफ इप्यते ॥४२॥ :- - योगवासिष्ठ- यो जागर्ति सुपुतस्यो यस्य जान्न विद्यते । यस्य निर्वासनो घोषः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥२॥ (३६४) विकचूढापणिया संमृतिभूमिजस्य । (१४५) योगवासिष्ठ--संसृतिवृत्त/जम् । (२) विवेकचूडामणि- नयत्यविद्या मनोऽतिरिक्ता मनोविद्या भवबन्धहेतुः । तस्मिन्यिनष्ठे सकलं विनष्ट विजृम्भितेऽस्मिन्सकलं विजृम्भते ।। (१६६) योगवासिष्ठ- चित्तमेव सकलभूवाऽडम्बरकारिणीमविद्या विद्धि । सा विचित्र केन्द्रजालवशादिदमुत्पादयति । (३६११६।१८) मनोविजृम्भणमिदं संसार इति संमतम् । (४।४७१४८) विवेकचूडामणि- स्वप्नेऽर्थशून्ये सूजति स्वशपत्या मोकनादि विश्वं मन एव सर्वम् । त्येच जाप्रत्यपि नो विशेषस्तत्सर्वमेतन्मनसो विजुम्मणम् ।। (१७०) योगवासिष्ठ- मिथ्यादृष्टय एवेमा. सृष्टयो मोहदृष्टय । मायामानशो भ्रान्तिः शून्याः स्वप्नानुभूतय ।। (३६२।५४) यथास्वप्नस्तथा जाप्रदिदं नास्त्यत्र संशय.। (३१५७/५०) मनोविजृम्भणमिदम् । (४/४७/४८) विवेकचूडामणि- मुक्तिप्राहुरतदिह मुनयो वासनावानव यत् । (२६६) योगवासिष्ठ-वासनातानवं राम मोक्ष इत्युच्यते बुधैः। (२।२।५) विवेकचूडामणि- सर्वत्र सर्वतः सर्वम् । (३१६) योगवासिष्ठ-~सर्वत्र सर्वथा सर्वम् । (१।१५६१) पिकचूडामणि- वासनाप्रक्षयो मोत सा जीवन्मुत्तिरिष्यते । (३१७) योगवासिष्ठ- प्रतीणवासना येह जीवतां जीवनस्थितिः। अमुक्तैरपरिज्ञाता सा जीवन्मुक्तितोच्यते ॥ (३२२८) विवेकचूडामणि-पृथइनास्ति जगत्परमात्मनः। (२३५) योगवासिष्ठ न जगत्पृथगीश्वरात् । (३३६१।४) विवेकचूडामणि-स्वयं विश्वमिदं सर्वम् । (३५) योगवासिष्ठ--आत्मैवेदं जगत्सर्यम् । (३३१००।३०) विवेकचूडामणि- बापाभ्यन्तरं शुन्यं पूर्ण"ब्रह्माद्वितीयमहम । (४६२) योगवासिष्ठ- अन्त:पूर्णो यहिः पूर्णः पूर्णकुम्भ इवार्णवे। (१२६३८) अन्तः शून्यो पहिः शून्यः शून्यकुम्भ इवाम्परे ।। (१२६१३६) विवेकचूडामणि-- अस्तीतिप्रत्ययोयश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि । बुद्धरेष गुणवतो न तु नित्यस्य वस्तुनः ।। (५७३) योगवासिष्ठ-- न च नास्तीति तद्वत्तु युज्यते चिद्वपुर्यदा । न चैवास्तीति तद्वक्तु युक्तं शान्तमलं तदा ॥ (३।१०:.३६) शतश्लोकी-अतो दृष्टिसृष्टं किलेदम् । (१) योगवासिष्ठ--दृष्टिसृष्टया पुनः पुनः (३३११४१५६) आत्मबोध- सदा सर्वगतोऽप्यात्मा न सर्वत्र भासते । बुद्धावेवावभासते स्वच्छपु प्रतियिम्पयत् ।। (१७) योगवासिष्ठ-- सर्वन स्थितमाकाशमादर्श प्रतियिम्नति । यथा तथामा सर्वत्र स्थितश्चेतसि दृश्यते ॥ (२७११३६) स्वात्मनिरूपण- व्यवहारदशेयं विद्याऽविदोति वेदपरिभाषा। नास्त्येव तत्त्वदृष्ट्या तत्त्वं ग्रहोर नान्यदस्यरमात् ॥ (१७) -- - - - योगवासिष्ट- अविद्येयमय जाय इत्यादिक्तनामम । अप्रवुद्धपयोधाय कल्पिको वाग्विदाम्बर ।। (४१) शास्त्रसज्यवहारार्थ न राम परमार्थठ । (४४०१ ) नाऽविद्यास्ति न विद्यास्ति कृत क पनयाऽनया(१७) शतश्लोकी- य कविसौरयदेवोखिनगति यतते नेव दु सस्य हेतो.। (१५) योगवासिष्ठ- आनन्दायैव भूतानि यतन्ते यानि कानि चित् । (१।१०।२०) शतश्लोकी- न चैक तदन्यद्वितीय कुत स्यात्, न वा केवलत्व न चावलत्वम् । न शून्य न चाशून्यमद्वतकत्वात् , कथ सर्ववेदान्तसिद्ध प्रवीमि ।। (१०) योगवासिष्ठ- एसमावादमागोऽस्त्वद्वितीयत्वयोयो । एकत्व विना न द्वितीय नद्वितीय रिनकता ।। (१३३१४) अशून्यापेक्षया शून्यराब्दार्थपरिकल्पना । अशून्यत्वात्समवत शुन्यताशून्यते कुन ॥ (३१०१४) दक्षिणामूर्तिस्तोत्र- निश्व दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्य नितान्तर्गतम् । पश्यन्नात्मनि मायया यदिरेवान्त यया निद्रया ॥१॥ 'गनासिष्ठ- रूपालोकमनस्कारैरन्नहिरिव स्थितम् । सृष्टिं पश्यति जीवोऽन्त सरसीमिव पर्वत ॥ (२२।२७ वाहमभ्यन्तर माति स्वमार्थोऽन निदर्शनम् । (३४४०२०) परोक्षानुभूति- भावित तीनवेगेन पन्नु निश्चयात्मना । पुमानरतद्धि भवेच्छीर शेय भ्रमरकीटवत् ।। (१४०) - ३ योगवासिष्ठ-- भावितं तीव्रवेगेन यदेवाशु तदेव हि । (२८३७) यथैव भावयत्यात्मा तथैव भवति स्वयम् ॥ (४।११।२६) अपरोक्षानुभूति-यथा फनके कुएलाभिधा। ( ६० ) योगवासिष्ठ-हेम्नीय फटकादित्वम् । (३।११४२) अपरोक्षानुभूति-यथा नीरं मरुस्थले । (६१) योगवासिष्ठ-यथा नास्ति मरी जलम् । (३।७।४३ ) अपरोक्षानुभूति-यथैव शून्ये वेतालः । (६२) योगवासिष्ठ -यथा नास्ति नभोयक्षः। ( ३७४४) अपरोक्षानुभूति-गन्धर्वाण पुरं यथा । ( ६२ ) योगवासिष्ठ --यथा गन्धर्वपत्तनम् । ( ३।३।३०) अपरोक्षानुभूति-सर्पत्वेन यथा रज्जुः । (७०) योगवासिष्ठ- यथा रज्ज्यामभ्रिान्तिः । ( २०१७।६ ) अपरोक्षानुभूति-फनकं फुण्डलत्वेन तरङ्गत्वेन ये जलम् । (७२ ) योगवासिष्ठ-फटकत्वं यथा हेम्नि वरङ्गत्वं यथांभसि । (३।२१।६५ अपरोक्षानुभूति--ययाऽकाशे द्विचन्द्रत्यम् । (६२) योगवासिष्ठ- यथा द्वित्वं शशासादौ पश्यत्यतिमलाविलम् । ( ३६६७) अपरोक्षानुभूति-जलस्वेन मरीचिका । (७३) योगवासिष्ठ---मृगतृष्णाम्ब्यियासत्यम् । (१७) ६-हमारे इस मत की पुष्टि कालीपुर प्राधम फामाता के स्वा भूमानन्दजी ने अपने, एक लेस 'Priority of Yogarasishtha Sankaracharya' में की है। उन्होंने शांफर भाप्य में से हो वाक्य उद्धृत करके यह पतलाया है कि श्री शंकराचार्य को योगयासि के अस्तित्व का ज्ञान था। उदाहरणार्थ दो वाक्य यहाँ दिये जाते है + (१) श्वेतायतर पनिषद् के अपर माण्य में(८.१) शंकराचार्यती ने लिया है तथा च वासिष्ठयोगशास्त्रे। (२) महाभारत के सनत सुजातीय भाग के ऊपर भाष्य करते हुए (१.१५ और १.३१) श्रीशंकराचार्यजी ने लिया है कि 'तया चाइ भगरान् वसिष्ठ' और 'तया पाह भगवान वसिष्ठः । योगवामिष्ट गौडपादाचार्य और महरि के पूर्व का ग्रन्थ है गौडपादाचार्य की माण्डस्यकारिका का मलीभाँति अध्ययन करने से यह प्रतीत होता है कि शङ्कराचार्य से पूर्व का अद्वैत वेदान्त- जो कि माण्डूक्यकारिका में प्रतिपादित है-योगवासिष्ठ प्रतिपादित अद्वैतवाद से शपयार्य और उनके अनुयायियों के अद्वैतवाद की अपेक्षा अधिक मिलता जुलता है । योगवासिष्ठ और माण्डूक्यकारिका के विचारों और भाषा में यहुत कुछ समानता है (देसिएयम्बई में हुई फिलासोफिकल कांग्रेस में पढ़ा हुआ हमारा लेस“गौडपाद ऐएड वसिष्ठ," रिपोर्ट पृष्ठ १८८)। यहाँ पर हम दोनों में से कुछ वाक्य उद्धृत करते हैं :- माण्डपकारिका- अव्यता एव येऽवस्तु मुन्टा एव च ये यहिः । कल्पिता एव ते सर्वे विशेपम्विन्द्रियान्तरे ।। (२०१५) योगवासिष्ठ-समरत कल्पनामानमिदम् । (१२१०११) माण्डूक्यकारिका- मनोदश्यमिद द्वैतं यत्किञ्चित्मघराचरम् । (३३१) योगवासिष्ठ- मनोमनननिर्माणमात्रमेवनगप्रयम् । (४१९२३) माण्ट्रक्यकारिका- सुजुक्क्रादिकामासमलावस्पन्दितं यथा । प्रहणप्राक्षामा विज्ञानस्पन्दित तया । (१४) - - (२५) ( २० ) योगवासिष्ठ-सस्पन्दे समुदेताप निस्पन्दान्तर्गतेन च । इयं यस्मिजगलक्ष्मीरलात् इव चकता ॥ (२६५८) माण्डूक्यकारिका- स्वप्नमाये यथा दृष्टे गन्धर्वनगरं यथा । तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणः ।। (२१३१) योगवासिष्ठ- मायामानं दशो भ्रान्तिः शून्या स्वप्नानुभूतयः । (३३५७१५४) यथा गन्धर्वनगरं तथा संसृतिविभ्रमः ।। (३३४५) माण्डूक्यकारिका- स्वप्नजागरितस्थाने होकमाहुर्मनीपिणः । भेदानां च समत्वेन प्रसिद्धनैव हेतुना ॥ ( योगवासिष्ठ- जामस्वप्नदशाभेदोन स्थिरास्थिरते विना । समः सदेव सर्वत्र समस्तोऽनुभयोऽनयोः॥ (४।१।११) माण्डक्यकारिका- आदावन्ते च यम्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। (२६) योगवासिष्ठ- पादावन्ते च यन्नारित वर्तमानेऽपि तत्तथा । ( ४।४।४५) माण्डूक्यकारिका- न किश्चिजायते जीवः संभयोऽस्य न विद्यते । एतदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥ (३।४८) योगवासिष्ठ- युद्धानामरमदादीनां न किधिनाम जायते । (३।१४६१८) जगन्नाम्ना न चोत्पन्नं न पास्ति न प दृश्यते ॥ (३४) माण्डूक्यकारिका- निश्चितायां यथा रजवां विफल्पोन निवर्तते । रज्जुरेवेति पाद्वैतं तद्वदात्मपिनिश्चयः ॥ (२०१८) - - । २१ ) योगवासिष्ठ- यया रज्ज्यामहिभ्रान्तिर्विनश्यत्यवलोकनात् । त्यवेवत्प्रेक्षणाच्छान्तिमेति संसारदुःसिता ।। (२२१७) माण्डूक्यकारिका-मनसोधमनीभावे द्वैतं नैचोपलभ्यते । (३।३१) योगवासिष्ठ- चित्तसत्तैव जगत्सचा" "एकामावाद्वयोनाशः। (१।१७।१६) माण्डक्पकारिका- मनसो निमहायचमभयं सर्वयोगिनाम् । दुसतयः प्रयोपश्चाप्यक्षया शान्तिरेव च ॥ (३।४०) योगवासिष्ट- संसारस्पास्य दुःखस्य सर्पोपद्रवदायिनः । उपाय एक एवास्ति मनसः स्वस्य निग्रहः ।। (४।३।२) कल्पनावाद, भ्रमवाद, अजाववाद तथा मनोनाशवाद योगवासिष्ठ- कार और गौडपाद दोनों ही को मान्य हैं। अय प्रश्न यह उठता है कि इन दोनों प्रन्यो-योगवासिष्ठ और माण्डूक्यकारिका--में कौनसा अन्य पूर्वकाल का है। हमारे विचार में, निम्नलिखित कारणों से, योगवासिष्ठ माण्डूक्यकारिका से पूर्व का प्रन्य है । १-माण्डूक्यकारिका अद्वैत सिद्धान्त का स्वतंत्र प्रन्य नहीं है। यह माण्डूक्य उपनिषद् के ऊपर एक प्रकार का वार्चिक है। उसमें माण्डूक्य उपनिषद् के सिद्धान्तों का किसी पूर्ववृत्त सम्प्रदाय के मतानुसार प्रतिपादन है । वे पूर्ववृत्त अद्वैतवादी लोग माण्ड्क्यकारिका में "वेदान्तेपु विचक्षणाग (२२३१) "उत्त्यविदः" ( २३३४ ) "नायका" (IEE) और "बुद्धाः" (४८) आदि शब्दों से संकेत किए गए हैं । इन लोगों के जो सिद्धान्त माण्डूक्यकारिका में प्रतिपादन किए गए है वे सब योगवासिष्ट में योगवासिष्ठकार के ही सिद्धान्तों के रूप में वर्चमान है। २-योगवासिष्टगत सिद्धान्त किसी पूर्ववृत्त सम्प्रदाय के सिद्धान्तों के रूप में नहीं है। वे 'वसिष्ठ सपि के सिद्धान्त है जो कि उन्होंने किसी उपनिषद् अथवा किसी पूर्ववृत्त सम्प्रदाय से प्राप्त नहीं किए बल्कि स्वयं ब्रह्मा से प्राप्त किए थे, और अपने आप ही उनका अनुभव किया था ( देखिए-मुमुनुपकरण का १० वाँ सर्ग) माण्डूक्यकारिका मे दूसरे मता का तिरस्कार और खण्डन तथा अद्वैतवाद का मण्डन है। योगवासिष्ठ में किसी मत का तिरस्कार अथवा खण्डन नहीं पाया जाता। सब ही मतो का समन्वय है, किसी मत के प्रति भी घृणा का लेश नहीं है। इससे यह प्रतीत होता है कि योगवासिष्ठ उपनिषद् और भगवद्गीता फी शैली का मन्थ है और माण्डूक्यकारिका शंकराचार्य और उनके अनुयायियों के प्रन्यों की शेली का है जिसमें अपने सम्प्रदाय का प्रतिपादन और दूसरे सम्प्रदाय तथा धर्मों के मतो का तिरस्कार और सण्डन है। योगवासिष्ठ के इस प्रकार के भाव के हम यहाँ पर कुछ उदाहरण देते हैं:- (१) 'विज्ञानवाद' और 'याहार्थवाद' की पविरोधिता का वर्णन फरते हुए योगवासिष्ठकार कहते हैं:- पाह्यार्थवादविज्ञानवादयोरैक्यमेव नः । वेदनात्मकरूपत्वात्सर्वदा सदसंस्थितेः ।। (३८४) (२) मन का स्वरूप न्याय, चौद्ध, वैशेपिफ, सांख्य, चार्वाक, जैमिनीय, आईत और पाश्चरान आदि दर्शनों के अनुसार पतला पर योगवासिष्ठकार कहता है- सर्वै रेव च गन्तव्यं तः पदं पारमार्थिफम् । विचित्रं देशकालोत्यैः पुरमेफमियाध्वगः ॥ (३६६५१) अज्ञानात्परमार्थस्य विपरीतावयोधतः। पेवलं विवदन्त्येते वियल्पैरारुरुक्षयः ।। (३६६।५२) स्वमार्गमभिशंसन्ति यादिनश्चिनया दृशा । विचित्रदेशकालोत्या मार्ग स्वं पथिका इय ।। (३१६६३५३) अर्थात् जिस प्रकार बहुत से यटोही नाना देशों से पले हुए नाना मार्गों द्वारा एफ हो नगरपो जाते हैं उसी प्रकार सय दर्शन एफ ही विचित्र परमार्थ पदफो नाना देश और फानमें सात दुए मागों द्वारा प्राप्त करते हैं। नाना प्रकारसे उस परम पदको पहुँचते हुए वे लोग, परमार्थ का किसीको भी ठीक धान न होनेके कारण और उसका विपरीत ज्ञान होनेसे मो-परस्पर विवाद करते हैं। जिस प्रकार माग चलने वाले लोग अपने अपने मार्ग को ही सर्वोत्तम समझते हैं उसी प्रकार वे भी अपने अपने दर्शनों की प्रशंसा करते हैं। (३) यही नहीं कि योगवासिष्ठकार या दूसरे दर्शनों के प्रति इस प्रकार की उदारता का भाव हो, यहिक वह तो यहाँ तक कहता है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने ही इस मार्ग पर चलना चाहिए जिस पर चलने से उसको किसी प्रकार की सफलता और सिद्धि प्राप्त होती हो। उस मार्ग को छोड़ कर दूसरे किसी मार्गपर चलना ठीक नहीं है- येनेवाभ्युदिता यस्य तस्य देन विना गविः । न शोमवे न सुखदा न हिताय न सत्रूला ॥ (१।१३०१२) (४) परमवत्त्व का वर्णन करते हुए योगवासिष्ठकार लिखता है. कि वही एक तत्त्व नाना दर्शनों में नाना नामों द्वारा वर्णित है- पच्छून्यवादिनां शून्यं ब्रह्म अझविदां वरम् । विज्ञानमा विज्ञानविदां यदमलं पदम् ।। (५८७६१८) पुरुषः सांख्यदृष्टीनामौरचरो योगवादिनाम् । शिवः शशिकलाङ्कानां कालः कालैकवादिनाम् ।। (१८७११८) आत्मात्मनस्तद्विदुपां नैरात्म्यं तादशात्मनाम् । मध्य माध्यमिकानां च सर्व सुसमचेतसाम् ।। (१८७१) प्रोफेसर शिवप्रसाद भट्टाचार्यजी का कहना है कि इस प्रकारके विचार और इस प्रकार का प्रादर्श बौद्धकाल में माल राजाश्री के समय से पहिले किसी हिन्दू लेखक के लिये सम्भव नहीं ये" (पद्रास फिलॉसोफिकल कांग्रेसकी रिपोर्ट, पृष्ठ ५५१)। पाल राय १० वी शताब्दी के करीव हुआ है। लेकिन हर्षचरित्र का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि ७ वीं शवाब्दी के पूर्वार्द्ध में ही मध्य देश में (जो आजकल यू० पी० कहलाता है। इस प्रकार के मादी और विचारों का होना संभव या। वाण ने उस समय की सभ्यता और विचारों को उदारता का अच्छा दिग्दर्शन कराया है। अपनी यात्रा में राजा क्ष दिवाकरमित्र नामक एक बौद्ध साधुके ही विचित्र परमार्थ पदको नाना देश और कालमें शात दुए मागा द्वारा ( २२ ) किसी उपनिषद् अथवा किसी पूर्ववृत्त सम्प्रदाय से प्राप्त नहीं किए बल्कि स्वयं ब्रह्मा से प्राप्त किए थे, और अपने आप ही उनका अनुभव किया था (देखिए-मुमुनुप्रकरण का १० वाँ सर्ग) माण्डक्यकारिका मे दुसरे मतो का तिरस्कार और सएडन तथा अद्वैतवाद का मण्डन है। योगवासिष्ठ में किसी मत का तिरस्कार अथवा खण्डन नहीं पाया जाता। सब ही मतो का समन्वय है, किसी मत के प्रति भी घृणा का लेश नहीं है। इससे यह प्रतीत होता है कि योगवासिष्ठ उपनिषद् और भगवदगीता की शैली का पन्ध है और माण्डूक्यकारिका शंकराचार्य और उनके अनुयायियों के अन्यों की शैली का है जिसमें अपने सम्प्रदाय का प्रतिपादन और दूसरे सम्प्रदाय तथा धर्मों के मतो का तिरस्कार और सण्डन है। योगवासिष्ठ के इस प्रकार के भाव के हम यहाँ पर कुछ उदाहरण देते हैं। (१) 'विज्ञानवाद' और 'बाह्यार्थवाद' की अविरोधिता का वर्णन करते हुए योगवासिष्ठकार कहते हैं थाह्यार्थवादविज्ञानवादयोरक्यमेव न. । वेदनात्मकरूपत्वात्सर्यदा सदसस्थिते ॥ (३८६४) (२) मन का स्वरूप न्याय, बौद्ध, वैशेपिफ, साख्य, चार्वाक, जैमिनीय, आईत और पाश्चरात्र आदि दर्शनी के अनुसार बतला पर योगवासिष्ठकार कहता है- सर्वं रेव च गन्तव्यं ते पद पारमार्थिकम् । विचित्र देशकालोत्यै पुरमेकमियाध्वगै ।। (३॥६६॥५१) अज्ञानात्परमार्थस्य विपरीतावयोधत । केवल विवदन्त्येते पिकल्पेरारुरुक्षय ॥ (३६६।५२) स्वमार्गमभिशसन्ति वादिनश्चिनया इशा। विचित्रदेशकालोत्या मार्ग स्व पथिका इय ॥ (३६६।५३) अर्थात् जिस प्रकार बहुत से घटोही नाना देशों से पले हुए नाना मागों द्वारा एक ही नगरको जाते हैं उसी प्रकार सय दर्शन एक प्राप्त करते हैं। नाना प्रकारसे उस परम पदको पहुँपते हुए ये लोग, परमार्थ का किसीको भी ठीक ज्ञान न होने के कारण और उसका रिपरीत ज्ञान होनेसे भी परस्पर विवाद करते हैं। जिस प्रकार मार्ग चलने वाले लोग भपने अपने मार्ग को ही सर्वोत्तम समझते हैं इसी प्रकार वे मी अपने अपने दर्शनों को प्रशंसा करते हैं। (३) यही नहीं कि योगवासिष्ठकार का दूसरे दर्शनों के प्रति इस प्रकार की उदारता का भाव हो, बल्कि वह तो यहाँ तक कहता है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने ही उस मार्ग पर चलना चाहिए उस पर चलने से उसको किसी प्रकार की सफलता और सिद्धि गत होती हो। उस मार्ग को छोड़ कर दूसरे किसी मार्गपर चलना ठीक नहीं है- येनेवाभ्युदिता यस्य तस्य तेन विना गतिः । न शोभते न सुखदा न हिताय न सत्फला ।। (११३०२) 1४) परमतत्व का वर्शन करते हुए योगवामिष्टकार लिखता है कि वही एक तत्त्व नाना दर्शनों में नाना नामों द्वारा वर्णित है-- यच्छ्न्यवादिनां शून्यं प्रम ब्रह्मविदां वरम् । विज्ञानमात्र विज्ञानविदां यमलं पदम् ।। (शESIRE) पुरुषः सांस्यदृष्टीनामीश्वरो योगवादिनाम् । शिवः शशिकलाङ्कानां कालः कालैकवादिनाम् ।। (११८) मामात्मनस्तद्विदुषां नैगम्यं वादशात्मनाम् । मध्यं माध्यमिकानां च सर्व सुसमचेतसाम् ॥ (श६७।११) प्रोसेसर शिवप्रसाद भट्टाचार्यजी का कहना है कि 'इस प्रारके विचार और इस प्रकार का श्रादर्श योद्धकाल में बनाल के पाल राजाओं के समय से पहिले किसी हिन्दू लेखक के लिये सम्भव नहीं ये (मद्रास फिलॉसोफिकल कांग्रेसकी रिपोर्ट पृष्ठ ५५१)। पाल राज्य १० वीं शताब्दी के करीब हुआ है। लेकिन इर्षचरित्र का अध्ययन करने से घात होता है कि ७ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही मध्य देश में (जो भाजल यू० पी० कहलाता है) इस प्रकार के भादशी और विचारों का होना संभव था। वाण ने उस समय की सध्या और विचारों को दक्षरता का अच्छा दिग्दर्शन कराया है। अपनी यात्रा में राजा हर्ष दिवाकरमित्र नामक एक पौद्ध साधुके .
( २६ ) मिलते जुलते हैं। जैसा कि आगे के वाक्यों से व्यक्त हो जायगा- वैराग्यशतक- भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचश्चला आयुर्वायुविघट्टिताम्रपटलीलीनाम्युवद्गुरम् । लोला यौवनलालनातनुभृतामित्याकलप्यद्रुतम् योगे धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धि विध्वं बुधाः ।। योगवासिष्ठ- घायुर्वायुविघहिताभ्रपटलीलाम्बाम्बुवगङ्गुरम् भोगामेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचञ्चला । लोला यौवनलालनाजलरयः कायः क्षणापायवान् पुत्र त्रासमुपेत्य संमृतिवशानिर्वाणमन्विष्यताम्॥ (३१३६३३३) पैराग्यशतक रात्रिः सैव पुनः स एव दिवसो मत्वा बुधा जन्तवो धावन्त्युद्यमिनरवधैव निभृवप्रारब्धतत्तत्कियाः । च्यापारः पुनरुकभुक्तविषयैरेवंविधनामुना संसारेण कर्थिताः फथमहो मोहान्न लजामहे ॥ (५८) योगवासिष्ठ- पुनर्दिनेकफलना शर्वरीसंस्थितिः पुनः । पुनस्तान्येष कर्माणि लज्जाये न प तुष्टये ॥ (१२२।३१) तमेव भुक्तविरसं व्यापारी पुनः पुनः । दियसे दिवसे फुर्वन्प्रातः फस्मान्न लजते ।। (॥२२॥३३) वाक्यपदीय-विवर्ततेऽर्थभावेन । ( १।१।१) योगवासिष्ठ-विवर्तेऽर्थभावेन । (९३४६) वाक्यपदीय- घोः क्षमा यायुरादित्यः सागराः सरिता दिशः। अन्तःकरणतत्त्वस्य भागा पहिरिय स्थिताः ।। (३३७१४१) योगवासिष्ठ- चौः समायायुराफाशं पर्वताः सरितो दिशः। अन्तःकरणतत्त्वस्य भागा यहिरिव स्थिताः ॥ (श५६।३५) । २७ ) वाक्यपदीय-मैकत्वमस्ति नानात्वं चिनकत्वेन नेतरत् । परमार्थ तयोरेप भेदोऽत्यन्तं न विद्यते ॥ (३६२८) योगरासिष्ठ-एक विना न द्वितीयं न द्वितीयं विनकता। एकामावादभावोऽस्त्वद्वित्ययोद्वयो. ॥ (३३५) वाक्यपदीय- न चैकर नापि नाना न सत्तं न च नास्तिता । श्रात्मतत्त्वेषु भावानामसंस्ष्टेषु विधये ॥ (३११२१) योगवासिष्ट- न च नास्तीति वक्तु युक्त ते तद्वपुर्यदा। नचैवास्तीति तद्वक्तु युक्त शान्तमलं वदा ।। (५३।६) वाक्यपदीय-सर्वशक्त्यात्मभूतत्वमेकस्यैवेति निर्णयः । (३।१।२२) योगवासिष्ठ-समस्तशक्तिचित ब्रह्म सर्वेश्वरं सदा । (२६७२) वाक्यपदीय :-यत्र द्रष्टा परश्यं च दर्शनं या विकल्पितम् । (३३३१७०) योगामिष्ट-द्रप्ट्टदर्शनदृश्यादिवजितं तदिद परम् । (३।१२।५३ ) वाक्यपदीय -न तदस्ति न वन्नास्ति। (४।२।१२) योगवासिष्ठ-न तदस्ति न तन्नास्ति । (६।३११३६ ) वाक्यपदीय- अत्यन्धमतयाभूते निमित्ते श्रुत्युपाश्रयात् । दृश्यतेऽलातयनादी यन्त्वाकारनिरूपणा ।। ( ११६९३१ ) योगसिष्ट-इयं यस्मिखगलक्ष्मीरलात इव चक्रता । ( ३१६५८ ) अब प्रश्न यह है कि इन दोनो-भर्तृहरिकृत अन्य और योग- वासिष्ट-में कौनसा पूर्व कालका है ? हमारा विचार तो यह है कि योग- वासिष्ठ ही पूर्वकालीन प्रन्य है क्योंकि इसमें मर्तृहरि के 'शब्द ब्रह्म' सिद्धान्त का नाम तक भी नहीं पाता और शब्द ब्रह्म' वाक्यपदीय का विशेषतया प्रतिपादित विषय है। यदि योगवासिष्ट वाक्यपदीय से पीछे लिखा गया होता तो अवश्य ही उसमें भी 'शब्द ग्रह' सिद्धान्त ---- ( २६ ) मिलते जुलते हैं। जैसा कि आगे के वाक्यों से व्यक्त हो जायगा- वैराग्यशतक- भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचञ्चला आयुर्वायुविघट्टिताम्रपटलीलीनाम्बुवइगुरम् । लोला यौवनलालनातनुभृतामित्याकलय्यद्रुतम् योगे धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धि विध्वं बुधाः ।। योगवासिष्ठ- आयुर्वायुविहिताभ्रपटलीलाम्बाम्बुवद्भगुरम् भोगामेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचला। लोला यौवनलालनाजलरय. कायः क्षणापायवान् पुन त्रासमुपेत्य ससूतिवशानिर्वाणमन्विप्यताम्।। (१।१३६२३३) वैराग्यशतक राविः सैव पुन स एव दिवसो मत्या बुधा जन्तवो धावन्त्युद्यमिनरवथैव निभृतप्रारब्धतत्तत्कियाः। ध्यापार. पुनरुकभुक्तविपयैरैयविनामुना संसारेण कदर्थिता फथमहो मोहान्न लज्जामहे ॥ (७८) योगवासिष्ठ- पुनर्दिनेकपलना शर्वरीसस्थिति पुन । पुनस्तान्येव कर्माणि लजाय न प तुष्टये ॥ (५।२२।३१) तमेव भुक्तविरस व्यापारीघ पुन पुन'। दिवसे दियसे कुर्वन्प्राज्ञः फरमान लजते ।। (१२२॥३३) वाक्यपदीय-वियतेऽर्थभावेन । ( १।११) योगवासिष्ठ--विवर्तऽर्थभावेन । (६६३।४६) वाक्यपदीय- योः क्षमा पायुरादित्य. सागराः सरितो दिश । अन्त करणतत्वस्य भागा यहिरिय स्थिता ।। (२७४१) योगवासिष्ठ- धौः पमाषायुराकाश पर्वता. सरितो दिश । अन्तररणवत्त्यस्य भागा यहिरिव स्थिता ॥ (२०५६।३५) - नानात्व विनैकत्वेन नेवरत् । परमार्थ तयोरप भेदोऽत्यन्तं न विद्यते ॥ ( ३८) , योगवासिष्ठ-एक विना न द्वितीयं न द्वितीय विनाता। एरामावादभावोऽस्त्वद्वित्ययोदयो ।। (३५) ,वाक्यपदीय- नकस्यं नापिनानात्वं न सत्त्व न च नास्विता । श्रात्मतत्त्वेषु भावानामसमशेषु विद्यते ।। (३११२१) योगवामिष्ठ- नभ नास्तीति तद्वक्तुं युक्तं ते तद्वपुर्यदा। नवावीवि तद्वस्तु युक्त शान्तमलं तदा ॥ (१५३६) पास्यपदीय-सर्वशक्त्यात्मभूतत्यमेकस्यैवैति निर्णय. । (३।१।२२) योगवासिष्ठ-समस्वशत्तिसचित ब्रह्म सर्वेश्वरं सदा । (३६६७१२) चाक्यपदीरया द्रष्टा च दृश्य च दर्शनं या विकल्पितम् । (३२३१७०) योगवासिष्टद्रप्टदर्शनदृश्यादिजित चदिद परम् । ( ३३१२६।५३) वाक्यपदीय -नदस्ति न वनास्ति । (४२११२) योगवासिष्ठन सदस्ति न तन्नास्ति । (६३११३६ ) चास्यपदीय- अत्यन्धमतथाभूते निमिते श्रुत्युपाश्रयात् । दृश्यतेऽलासचकादी यस्त्वाकारनिरूपणा ॥ (११११३१ ) योगवासिष्ठ-इयं यस्मिखगलदमीरलात इन चाता । ( ३१६६५८ ) अब प्रश्न यह है कि इन दोनो-भर्तृहरिकृत ग्रन्थ और योग- वासिध-में कौनसा पूर्व काला है ? हमारा विचार वो यह है कि योग- वासिष्ट ही पूर्वकालीन अन्य है क्योकि इसमें भर्तृहरि के 'शब्द ब्रह्मा' ।' सिद्धान्त का नाम तक भी नहीं पाता और शब्द ब्रह्म' वाक्यपदीय का विरोपतया प्रतिपादित विषय है। यदि योगवासिष्ट वाक्यपदीय से पाये लिखा गया होता वो अवश्य ही उसमें भी 'शब्द अझ सिद्धान्त - - मिलते जुलते हैं। जैसा कि आगे के वाक्यों से व्यक्त हो जायगा- वैराग्यशतक- भोगामेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचञ्चला आयुर्वायुविघट्टिताभ्रपटलीलीनाम्बुवद्गुरम् । लोला यौवनलालनातनुभृतामित्याकलय्यद्रुतम् योगे धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धि विध्व बुधा । योगवासिष्ठ- आयुर्वायुविहिता-पटलीलानाम्बुधद्भड्गुरम् भोगामेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचञ्चला। लोला यौवनलालनाजलरयः काय. क्षणापायवान् पुरमासमुपेत्य समृतिवशानिर्वाणमन्विप्यताम्॥ (६।१३६६३३) वैराग्यशतक रात्रि सैव पुन स एव दिवसो मत्या बुधा जन्तयो धावन्त्युधमिनस्तथैव निभूतपारस्वतत्तक्रियाः। व्यापार. पुनरुक्तभुक्तविपयरेवविघेनामुना ससारेण कदर्थिता फथमहो मोहान लज्जामहे ।। (७८) योगवासिष्ठ- पुनर्दिनेकरलना शर्वरीसस्थिति. पुन । पुनस्तान्येष कर्माणि लजाये न च तुष्टये ॥ (२२२।३१) तमेव भुक्तविरस व्यापारीच पुन पुन । दिवसे दिवसे फुर्वन्प्राज्ञः फरमान लज्जते ।। (१२२१३३) वाक्यपदीय-विवर्ततेऽर्थभावेन । (१।११) योगवासिष्ठ-विवर्तेऽर्थभावेन । (६३४६) चाक्यपदीय- घो क्षमा यायुरादित्य सागरा सरितो दिश । अन्त फरणतत्त्यस्य भागा पहिरिय स्थिता ॥ (३१७१४१) योगवासिष्ठ- चो. क्षमाषायुरापाशं पर्वता सरितो दिश । अन्त करणतत्त्वस्य मागा यहिरिय स्थिता ॥ (१५६३५) - श्री रामचन्द्रजी को सिसाए थे और जो कि उन्होंने सयं ब्रह्मा से सोसे थे। यह हमारा विश्वास निम्नलिखित दो कारणों पर निर्भर है:- १-महाभारत के अनुशासन पर्व के छठे अध्याय में युधिष्ठिर ने भीष्मपितामह से प्रश्न किया है: "श्राप महामाज्ञ और सब शालों के परिहत है। मुझे बतलाइये कि भाग्य (देव) प्रवल है अथवा पुरु- पार्थ ?" इस प्रश्न के उत्तर में भीम ने कहा "धर्मराज! इस विषय में प्रभा और वसिष्ठ का संवाद मुनो" इवना कह कर उन्होंने इस विषय में वे पाते कहीं जो कि ब्रह्मा ने वसिष्ठ को सुनाई थी। ये बातें प्राय वे ही हैं जो कि यसिजी ने रामचन्द्रजी को कही यों (देसिए योगवासिष्ठ- मुनुनु प्रकरणमा ४६)। रामचन्दजी को यह शिक्षा देकर वसिष्टनी ने उनसे यह भी कहा है कि यह ज्ञान उनको ब्रह्मा से प्राप्त हुधा था :- इदमुळं पुरा कल्प ब्रह्मणा परमेटिना। (२१०१६) इस प्रकार की शिक्षा देने से पहिले भी यसिष्ठत्रीने रामचन्द्रजीसे यह कहा था कि जो ज्ञान वे उनको देंगे वह ज्ञान उन्होंने स्वयं ब्रहार से प्राप्त किया था- पूर्वमुक्तं भगवता यज्ञानं पद्मजन्मना । सादी लोकशान्त्यर्थ तदिद पथयाम्यहम् ॥ (२०२१) २ वर्तमान योगवासिष्ट के सर्वप्रथम सर्ग-जो कि प्रस्तावना- रूप हे-पद्ने से भी यह निश्चित होवा है कि वाल्मीक्किन कोई एक ऐसा प्रय मौजूद था जिसमें कि उन्होंने रामचन्द्रजीको पसिष्टजी द्वारा किए हुए उपदेश का वर्णन रिया था। इस ग्रन्थ को बनाकर वाल्मीकिजी ने अपने शिष्य भरद्वाजको मुनाया था। और फिर बहुत काल पीछे उसी प्रन्यको उन्होंने राजा अरिएनेमी को सुनाया था- शृणु राजप्रवक्ष्यामि रामायणमसण्डितम् । श्रुत्वावधार्य यत्नेन जीवन्मुत्तो भविष्यसि ।। ( १११३५२) चतिष्धरामसंवाद मोक्षोपायकयां शुमाम । सावरकमावो राजेन्द्र वदामि भूयतां चुध ।। (१५११५३) एवास्तु प्रथम फुटरा पुराइमरिमर्दन । शिष्यायारयामि विनीताय भरद्वाजाय धीमते ॥ (शरा४५) इन दो प्रमाणे से यह सिद्ध होता है कि अवश्य ही वाल्मीकि कृत कोई (२८) का वर्णन होता। इसलिये हमारा खयाल है कि योगवासिष्ठ भर्तृहरि के समय में वर्तमान था। भर्तृहरि के मरण का साल ६५० मिष्ट्रीय समझा जाता है (देसिए-मैक्समूलर के सिक्स सिस्टम्स ऑफ इण्डियन फिलॉसोफी, पृष्ठ ६०, और कीथ का प्लासिकल संस्कृत लिट्रेचर पृ० ११८)। इससे यह निश्चय है कि क्रिप्टीय सप्तम शताब्दी के बारम्भ से पूर्व योगवासिष्ठ अवश्य ही वर्तमान रहा होगा। पाठक यह जान कर प्रसन्न होगे कि लेखक का यह मत कि योगवासिष्ठ शङ्कराचार्य से और सम्भवतः भर्तृहरि से प्राचीन मन्य है। प्रो० शिवप्रसाद भट्टाचार्य और डा० विएटर्निज ने भी जिनके मतो फा यहाँ पर सण्डन किया गया है मान लिया है। और शरयाटरको, शरडेर और कीथ प्रभृति यूरोप के बड़े बड़े पण्डितो ने हमारी इस सोज की भूरि भूरि प्रशंसा की है। प्रो० पीध ने एक चिट्ठी में लिसा है "आपने योगवासिष्ठ का शंकर से प्राचीनतर होना तो साफ तौर से सिद्ध कर दिया है और आपकी इसके भर्तृहरि से पूर्व फाल का होने की युक्तियाँ भी ठीक हो जान पड़ती हैं।" प्रो. शरेडर ने अपने एक पत्र में लिसा है "मैं अपनी ओर से आपको इस बात पर पधाई देना पाहता हूँ कि आपने योगवासिष्ठ का शंपर से धीर सम्भवतः गौडपाद से पूर्व का अन्य होना साबित कर दिया है।" वर्तमान योगवासिष्ठ पाल्मीकिकृत नहीं है यहाँ तक यह सिद्ध हो चुका है कि योगयासिष्ठ के निर्माणमल के सम्बन्ध में आधुनिक विद्वानो मे जो विचार प्रचलित हैं ये ठीक नहीं है। योगवासिष्ठ अवश्य ही वाक्यपदीय और वैराग्यशतक के रचयिता भर्तृहरि से पहिले फा है। अब इमको यह विचार करना है कि यह अन्य क्तिना प्राचीन है, और यह कहा तर सय है कि यह रामायण के रचयिता भी घाल्मीकि जी की मृति है जैसा कि प्रायः समझा जाता है। इस विषय में तनिक भी सन्देह नहीं है कि कोई प्राचीन मन्य ऐसा था जिसमें यसिष्टमी के ये सिद्धान्त पर्णित थे जो उन्होंने . (२६) श्री रामचन्द्रजी को सिखाए थे और जो कि उन्होंने स्वयं ब्रह्मा से सीसे ये। यह हमारा विश्वास निम्नलिसित दो कारणों पर निर्भर है १- महाभारत के अनुशासन पर्व के छठे अध्याय में युधिष्ठिर ने मीप्मपितामह से प्रश्न किया है: “आप महाप्राज्ञ और सब शास्त्रों के परिहत हैं। मुझे ववलाइये कि भाग्य ( देव ) प्रबल है अथवा पुरु पार्य ?" इस प्रश्न के उत्तर में भीम ने कहा "धर्मराज ! इस विषय में प्रझा और वसिष्ठ का संवाद सुनो" इतना कह कर उन्होंने इस विषय में वे यावें कहीं जो कि ब्रह्मा ने वसिष्ठ को सुनाई थी। ये बातें प्राय. वे ही - है जो कि वसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी को कही थों ( देखिए योगवासिष्ठ- मुमुनु प्रकरण सर्ग ४)। रामचन्द्रजी को यह शिक्षा देकर वसिष्टनी ने उनसे यह भी कहा है कि यह ज्ञान धनको प्रहमा से प्रात हुधा या :- इदमुक्कं पुरा फल्पे ब्रह्मणा परमेष्टिना ! (२०१६) इस प्रकार की शिक्षा देने से पहिले भी वसिप्टनीने रामचन्द्रजीसे यह कहा था कि जो जान वे उनको देंगे वह ज्ञान उन्होंने स्वयं ब्रह्मा से मात्र रिया था:- पूर्वमुक्तं भगवता यज्ञानं पद्मजन्मना । सर्गादौ लोकशान्त्यर्थ वदिदं कथयाम्यहम् ॥ (२।२१) २-वर्तमान योगवासिष्ट के सर्वप्रयम सर्ग-जो कि प्रस्तावना. रूप है-पढ़ने से भी यह निश्चित होता है कि वाल्मीकित कोई एक ऐसा प्रय मौजूद था जिसमें कि उन्होंने रामचन्द्रजीको यसिष्ठनी द्वारा किए हुए उपदेश का वर्णन किया था। इस अन्य को बनाकर वाल्मीकिजी ने अपने शिष्य भरद्वाजको सुनाया था। और फिर बहुत पाल पीछे उसी अन्यको उन्होंने राजा अरिष्टनेमी को सुनाया था:- राणु राजन्यवक्ष्यामि रामायणमसरिडतम् । श्रुत्वायधार्य यत्नेन जीवन्मुक्तो भविष्यसि ।। ( १२११५२) वसिष्ठरामसंवादं मोक्षोपायस्यां शुमाम । ज्ञातस्वभावो राजेन्द्र वदामि भूयतां युध ।। (१।११५३) एतांस्तु प्रथमं कृत्वा पुराहमरिमर्दन । शिष्यायास्यामि विनीताय भरद्वाजाय धीमते ॥ (ARI४५) इन दो प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि अवश्य ही वाल्मीकि कृत कोई (३०) ऐसा प्राचीन ग्रन्थ मौजूद रहा होगा जिसमें कि वसिष्ठ के दार्शनिक सिद्धान्तों का वर्णन हो। लेकिन जिस रूप में योगवासिष्ठ अन्य हमारे सामने उपस्थित है उस रूप में यह न बहुत प्राचीन ही है और न पाल्मीकि ऋपि फी कृति है। हमारा विचार यह है कि यह फो। प्राचीन ग्रन्थ, पुन. पुन आवृत्त होने से, और उसमें समय समयपर दूस लेसको द्वारा वृद्धि होने से, इस वृहत् रूप को प्राप्त हो गया है। योग वासिष्ठ के प्रस्तावनारूप प्रथम सर्गफा अध्ययन करने से ही यह विधान निश्चित हो जाता है कि इस ग्रन्थ की यहुत सी आवृत्तियाँ हो चुई हैं। (१) वाल्मीकिजी ने इसको रचकर भरद्वाज को सुनाया थ और फिर उन्होने ही इसको कुछ दिन पीछे अरिष्टनेमी राजा के सुनाया ( १।२।४, १२१५३ ) । (२) जो उपदेश वाल्मीकिजी ने अरिष्ट नेमी को दिया था उसका वर्णन इन्द्र के एक दूत ने सुरुचि नाम की एक अप्सरा के सामने किया था ( १११॥२३) । (३) यह पात अग्निवेश्य ने अपने पुत्र कारुण को सुनाई थी (१११।१८) और (४) अग्निवेश्य और कारुण का यह प्राचीन इतिहास अगस्ति ने सुतीक्ष्ण ब्राह्मण के सुनाया था ( १।१।६)। यार वार फेवल अपनी स्मृति से पुरानी कथायी और उपदेशो को दूसरी के प्रति सुनाने में अवश्य ही बहुत सी नई यातें कहने में आ जाया करती हैं और बहुत सी पुरानी बातें विस्मृत हो जाया करती हैं। वर्तमान योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण के पूर्वार्द्ध के ५२-५८ सा मे महाभारत के संग्राम और श्रीकृष्ण के गीता उपदेश का भी वर्णन मिलता है। इसलिये यह कहना ठीक नहीं जान पड़ता कि वर्तमान रूप भी योगवासिष्ठ पूणतया और यथार्थ ही श्री वाल्मीकिजी की कृति है। दूसरा बहुत महत्त्वपूर्ण पारण जिसकी वजह से हम वर्तमान योगवासिष्ठ को बहुत प्राचीन ग्रन्थ नहीं कह सकते यह है कि इसमें चौद्धमत के विज्ञानवाद', 'मध्यमवाद' और 'शून्यवाद' या पेयजा वर्णन ही नहीं पाता पल्कि इन मतो का वर्तमान योगवासिष्ठ मे बहुत सुन्दरता के साथ सम्मिश्रण और समन्वय है। (देग्गिए योगवासिष्ठ २० और १६ इत्यादि)। योगवासिष्ठ का अध्ययन करने पर यह पूरे तौर से निशित हो जाता है कि इसमें अश्वयोप, नागा- अर्जुन, असग और यमुरघु श्रादि यौद्ध दार्शनिको के सिद्धान्तों पे साथ - ( ३१ ) औपनिषद् अद्वैतवाद तथा आत्मवाद का बहुत ही उत्तम समन्वय है। नागार्जुन का समय आधुनिक विद्वानों के अनुसार द्वितीय विष्ट्रीय शतान्दी का पूर्वार्द्ध है, और विज्ञानवाद के प्रवर्तक मुषन्धुका समय ततनु के अनुसार ४२० से ५०० ईस्वी सन् मानना चाहिए । ( देखिए दी जर्नल ऑफ रुमआयल एशियाटिक सोसोइटी) १४०५ पृष्ठ १ श्रादि) । इसलिये चर्चमान योगवासिष्ट का पाँचवीं ईस्वी शताब्दी के पीछे काही मानना पड़ता है। इस विचार को पुष्टि इस कारण से भी होती है कि योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण के उत्तरार्द्ध के ११६ बैं सगे के १-६ श्लोकों में महा- फरि कालिदास के "मेघदूत" का बहुन हा सक्षेप में वर्णन है । फेवल मेघदूत का विचार ही नहीं बल्कि कवि कालिदास के शन्द भी इस सक्षिप्त वर्णन में मिलते हैं। पाठका निश्चय के लिये इन श्लोकों की हम यहाँ पर उद्धृत करते हैं कथयत्येप पथिक. पश्य मन्दरगुल्मके। प्रियायाचिरलगाया वृत्ता विरहसक्याम् ।। (१।११९३१) एस्त्र पृणु किं वृत्तमाश्चर्यमिदमुत्तमम् । दातु त्वन्निकटे दूनमहं चिन्तान्वितोऽवदम् ॥ (१।११६२) अस्मिन्महाप्रलयकालसमे नियोगे यो मा तयेह मम यावि गृह स क स्यात् । नैवात्यसौ जगवि य पादु सशान्त्यै प्रीत्या निरन्तरतर सरलं यतेत ॥ (१९१६३३) श्राप शिसरे मेघ स्मराक्ष इव सयुत्त । विद्युल्लता विलासिन्या वलितोरसिक स्थित ॥ (११६३४) भ्रातर्मेघ महेन्द्रचापमुचित व्यालन्थ्य कण्ठ गुण नीचा मुहूर्तक कुछ दया सा नाप्पपूर्णक्षणा) वाला बालमृणालकोमलतनुस्तम्वो न सो क्षमा ता गत्वा मुगते गलनललवेराश्वासयात्मानिले ॥ (१।११६३५) चित्ततूलिकया व्योम्नि लिसियालिङ्गिता सती। न जाने काघुनैवेत पयोद दयिता गता ॥ (३११६३६) आधुनिक विद्वानों के मतानुसार कालिदास पाँचवीं शताब्दी के ( ३२ ) पूर्वार्द्ध मे हुए हैं। वर्तमान योगवासिष्ठ इस समय के पीछे का ही होना चाहिये। ऐसा मालूम पड़ता है कि वर्तमान योगवासिष्ठ गुप्त साम्राज्य के पतन होने के समय लिसा गया था। इसके तीसरे और छठे प्रकरणों में बहुत सी लडाइयों और पानमणों का वर्णन है। उत्पत्ति प्रकरण में विदूरथ और सिन्धु का समाग और निर्माण प्रकरण में वर्णिव विपश्चित् के राज्य पर पारो ओर से प्राकमणो का उल्लेख इस यात के द्योतक हैं कि वह समय महा अशान्ति का था। टूणो और पारसीकों का भी जिक्र इन स्थानों पर पाता है । युद्ध का वर्णन बहुत ही विक्ट भाषा में है। इन सब बातो से यही सिद्ध होता है कि योगवासिष्ठ महाकवि कालीदास के पीछे और भर्तृहरि के पूर्व समय का मन्य है। यदि योगवासिष्ठ की भाषा और उसमें वर्णित ऐतिहासिफ घटनाओं का गहरा अध्ययन किया जाए तो हमें पूर्ण आशा है कि इस विचार की अधिकतर पुष्टि हो जायगी। विद्वानों से आशा है कि वे इस ओर ध्यान देकर इस विपय पर अपना मत प्रकट फरेंगे।
परिच्छेद ३ योगवासिष्ठ-साहित्य इस बीसौं शताब्दी में भी, जबकि पुस्तकों की प्रचुरता से पड़नेवालों का नाक में दम है, योगवासिष्ट के सम्बन्ध में पुस्तकों का सर्वया प्रभाव है। श्राजकल मारवीय साहित्य और दर्शन-सम्बन्धो पुस्तकें दिन पर दिन अधिकता से छपती जा रही हैं किन्तु अभी तक योगवासिष्ठ- सम्बन्धी कोई भी उत्तम पुस्तक हमारे देखने में नहीं आई । यहाँ तक कि संस्कृत मापा के योगवासिष्ठ की भी एक पावृति को छोड़कर कोई दूसरी नहीं दिसाई पड़ती । लेखक ने इस प्रत्य के विषय में सन् १२२५ ई० से लिखना आरम्भ किया है। इससे पहिले इस महान् अन्य पर प्रायः कुछ भी नहीं लिया गया था। केयल पावू ( अब डाक्टर) भगवान् दासजी ने शायद 'ल्यूसीकर" नामक अंग्रेजी पत्रिका में योगवासिष्ठ के सिद्धान्तों के उपर कोई लेस लिसा था। तब से लेकर अब तक मी । योगवासिष्ठ के सम्बन्ध में बहुत ही कम लेख छपे हैं । यहाँ पर हम उस समात साहित्य का बल्लेख करना चाहते हैं जो कि योगवासिष्ठ के सम्बन्ध में पाठकों को उपलब्ध हो सकता है। (१) योगासिष्ठ के काल-निर्णय के सम्बन्ध में- १-डा. जे. एन् फर्छहार के एन आउटलाइन ऑफ दी रिलीजस लिट्रेचर ऑफ इण्डिया में २२८ पृष्ठ पर कुछ पंक्तियाँ जिनमें योगवासिष्ट को १३-१४ शताब्दियों का रचा हुआ माना है। ९-डा. विष्टनिन के गेशिरटे डेर इण्डिशेन लिट्राटुर पा०३, पृष्ट ४४३-४४४ पर एक पैराग्राफ, जिसमें योगवासिष्ठ को श्री शङ्कराचार्य के किसी समकालीन व्यक्ति का लिसा हुआ माना है। :-पो. शिवप्रसाद भट्टाचार्य द्वारा मद्रास ओरियण्टल कान्फरेन्स में पड़ा हुआ और उसकी प्रोसीडिंग्स में छपा हुआ एक लेस- “योगवासिष्ठ रामायण, इसका समय और जिसने का स्थान"-जिसमें . ( ३४ ) कि उन्होंने योगवासिष्ठ को १०-१२ शताब्दियों में किसी पगाली लेसक के द्वारा लिखा हुआ सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। ४-डा० पी० एल० आत्रेय के योगवासिष्ठ एण्ड इट्! फिलासोफी में दूसरा लेक्चर जिसमें यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है कि योगवासिष्ठ कवि कालिदास से पीछे और भर्तृहरि से पहिले का लिसा हुआ अन्य है। ५-डा. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त के ए हिस्ट्री ऑफ इण्डियन फिलॉसोफ़ी, कॉ. २, में "फिलासोफी ऑफ दी योगवासिष्ठ" नामक अध्याय में उन्होंने अपना यह मत प्रकट किया है कि योगवासिष्ठ या तो आठवीं या सातवीं शताब्दी में लिखा गया होगा। यही मत उन्होंने अपने ग्रन्थ "इण्डियन आइडीयलिम" में भी पृष्ठ १५४ पर प्रक्ट किया है। वहाँ पर उन्होंने लिसा है "योगवासिष्ठ का काल निर्णय नहीं हो सकता, लेकिन मुझे ऐसा मालूम पड़ता है कि यह प्रन्थ सातवीं या आठवीं शताब्दि के पीछे का नहीं हो सकता।" ६-डा० बी० एल० श्रात्रेय का बड़ोदा ओरियण्टल फामरेन्स में भेजा हुआ लेस “दी प्रोविल डेट ऑफ कम्पोजीशन ऑफ योग- वासिष्ठ", जिसमें यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि योगवासिष्ठ छठी शताब्दी में लिसा गया होगा। ७-श्री प्रसाद सी० दीवानजी का बड़ोदा ओरियण्टल फाफ. रेन्स में पढ़ा हुआ लेस, "दी टेड एण्ड सेस ऑफ प्रोरिजिन ऑफ दो योगवासिष्ठ", जिसमें उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि योगवासिष्ठ दसवीं शताब्दी के मध्य में कश्मीर देश में लिया गया होगा। (२) योगवासिष्ठ के सिद्धान्तों के सम्बन्ध में- १-लाला वैजनाथ द्वारा फराए हुए योगवासिष्ठ के हिन्दी भापानुवाद में उनकी लिखी हुई भूमिफा, जिसमें उन्होंने योगयासि के छहाँ प्रकरणों के सिद्धान्तों का दिग्दर्शन मात्र फराया है। २-श्री नारायण स्वामी अइयर के इंगलिश ट्रांसलेशन ऑफ़ - लघु योगवासिष्ठ की भूमिका, जिसमें कि लघु योगवासिष्ट के सिद्धान्तों का दिग्दर्शन मात्र कराया गया है। ३-हा० पी० एल० आयका प्रयम ( कलकत्ता) इण्डियन पिलो. सोश्किल काग्रेस (१९२५) में पढ़ा हुआ लेख-"स्लिोसोको ऑफ योगवासिष्ठ" निममें योगवासिष्ट के सिद्धान्तों का उल्लेख किया गया है। यह लेप इस काप्रेस की प्रोसीडिंग्स में छपा है। ४-हावी० एल० आय का यनारस इण्डियन फिलोसोरिकल काप्रेस ( १९२६) में पढ़ा हुआ लेस--'डिवाइन इमेजिनिम ऑक वसिष्ठ"-निसमें योगरासिष्ट के कल्पनागद का वर्णन है । यह लेख वनारस निॉमोविज्ञ काप्रेस की प्रोसीडिंग्स में छपा है। ५-हा० वा० एल० पाय का परई इण्डियन पिज्ञोसोरिकन काप्रेस में पढ़ा हुआ लेख--"गौडपाद ऐएड पसिष्ठ - जिसमें गौड़- पादाचार्य और योगवासिष्ट के सिद्धान्तों की तुलना की है। यह लेख मी इस काग्रेस की नोमीडिंग्म में छपा है। ६--हा० वी० एल० आनेय का योगवासिष्ठ एण्ड इट्स पिलामोफी जो कि काशी तत्व सभा में योगवासिष्ठ पर दिए हुए १० व्यारयानों में से पाच का समह है। यह पुस्तक 'इण्डियन बुक शॉप', बनारस से मिल सकती है। इस पुस्तक में योगवासिष्ठ के सिद्धातों को सरल अग्रेजी भाषा में प्रतिपादन किया गया है। भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने इसकी मुक्त कण्ठ से प्रशसा की है । इस लेखक की अगरेजी में बड़ी पुस्तक (६०० पृष्ठ को) फिलासोफी ऑफ योगवासिष्ठ छप रही है। -हाक्टर वी० एल० पात्रेय की हिन्दी पुम्वक श्री वासिष्ठ दर्शनसार जिसमें योगवासिष्ठ का १५० श्लोकों में, जिनके नीचे पनका सरल हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है, सार सिद्धान्त रखने का प्रयत्न किया गया है। इसकी भूमिका में योगवासिष्ठ सम्बन्धी और बातों का भी वर्णन है। यह पुस्तक भी इडियन बुक शॉप, बनारस, से मिल सस्ती है।
-डा० पी० एल० आत्रेय का लिखा हुआ कल्याण शिवार में "शिव-शक्तिबाद" नामक लेख जिसमें योगवासिष्ठ के "शिवराति पाद" का, और मतो की दार्शनिक समालोचना के साथ, समर्थन किया गया है। १-डा० पी० एल० पात्रेय का कल्याण के भगवद्गीता में लिखा हुआ लेस-"योगवासिष्ठ मे भगवद्गीता"- जिसमें योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण में अर्जुन को दिए जाने वाले श्रीकृष्ण के गीता-उपदेश का वर्णन किया गया है। १०-डा० पी० एल० आत्रेय का यू० पी० गवर्नमेण्ट की प्रिंसेर ऑफ वेल्स सरस्वती भवन स्टडीज़ १६३३ में छपा हुआ एक लेर "योगवासिष्ठ एण्ड सम ऑफ दी माइनर उपनिषद्स", जिसमें कि यह सिद्ध किया गया है कि बहुत से उत्तर कालीन उपनिपद् योगगसिः के ही सार श्लोकों से बने हैं। ११- डा. सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त के ए हिस्टी आफ इंडिया फिलासोफी के दूसरे भाग मे योगवासिष्ठ के दर्शन के ऊपर एक ! पृष्ठो का अध्याय। १२-हा० सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त के इंडयन आयडीयलिज में योगवासिष्ठ के दार्शनिक सिद्धान्त का ५ पृष्ठो मे वर्णन । १३-डा० भगवान् दास की पुस्तक मिस्टिक एक्स्पीरियन्से जिसमें योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण में से चार कहानियो । अगरेजी में वर्णन है। इसमें कहाँ कहीं उपयोगी फुट नोट भी हैं। १४--डा० यी० एल० आत्रेय का संस्कृत मन्य वासिष्ठदर्श जिसको यू० पी० गयन्मएट अपने प्रिंस ऑफ वेल्स संस्कृत टेक्स्ट सोरीज में छपवा रही है। यह प्रन्य इस समय प्रेस में है। इसमें यो यासिष्ठ के समप्र दार्शनिक सिद्धान्त योगवासिष्ठ ही के परीय २५० इलोकों में संग्रह परसे प्रमबद्ध रीतिसे रपसे गए हैं। यह अन्य यो वासिष्ठ के सारे दार्शनिक सिद्धान्ता फो योगवासिष्ठ के प्रेमियों के सम रखने का प्रथम प्रयत्न है। इसके आदि में एक आगरेजी फी भूमि मी है जिसमें योगवासिष्ठ के समग्र पारयान सक्षेप रूप से दिए हैं। १५- हा. भी० ला आरेय का हिन्दी ग्रन्थ योगवासिष्ठ और * उसके सिद्धान्त जो आजकल प्रेस में है। इस प्रन्य में योगवासिष्ठ सम्बन्धी सभी प्रश्ना पर विवेचना की गई है। १६-कन्हैयालाल मास्टर की कल्याण में लिखी हुई 'योगवासिष्ठ सार' नामक लेग्यमाला। इसमें हिन्दी भाषा में योगवासिष्ठ के सिद्धान्तों का भली भाँति वर्णन है। १५-६० वी० एल० पात्रेय लिसित योगवासिष्ठ एण्ड मोडर्न "चॉट निसमें योगयासिष्ठ के सिद्धान्तों की प्राचीन वैज्ञानिक और दार्शनिक सिद्धान्ता के साथ तुलना की है और यह दिखलाया है कि अर्वाचीन विचार योगवासिष्ठ के विचारों से बहुत मिलते हैं। ३-योगवासिष्ठ के अनुवाद- हिन्दी-~- १-योगवासिष्ठ-मापा टीका सहित-श्रीठाकुर प्रसाद चार्यकृत भाषा अनुवाद सहित सम्मत योगवासिष्ठ। यह अन्य दो गों में सवत् १६६० में, ज्ञानसागर प्रेस यम्बई से छपा था। १ अनुवाद स्व. लाला पैजनाथजी की प्रेरणा से हुआ था और दोना गा के श्रादि में लाला घेजनाथजी की लिसी हुई उत्तम भूमिका है समें योगवासिष्ठ के सिद्धान्तों का दिग्दर्शन कराया गया है। हमको इ अनुपाद अच्छा नहीं मालूम पड़ता क्योंकि इसमें मनमाना अर्थ या गया है। जो यात योगवासिष्ठ के शोका में नहीं है वे भी अर्थ ‘लिस दी है। योगवासिष्ठ में अनुवादक ने शावर वेदान्त के बहुत | सिद्धान्त, जो कि योगासिष्ठकार को ज्ञाव नहीं थे, घुसेड़ दिए हैं। नुवादक को ऐसा कमी नहीं करना चाहिए। इस पुस्तक का कागज वना जल्द टूटने वाला है कि हम किसी को भी इस पुस्तक के खरी ने की राय नहीं देंगे। इसके दाम २२) २० हैं २-योगवासिष्ठ भाषा-नवलकिशोर प्रेस लसनऊ से छपा आ। दाम ८) रु। यह अन्य चम्बई के वेङ्कटेश्वर प्रेस से भी २५ छपा है। इसमे योगवासिष्ठ के संस्कृत श्लोक नहीं है। केवल भाषा में ही योगवासिष्ठ की कथा है। भाषा कुछ पुराने ढग की है। इस प्रन्थ की पावत यह कहा जाता है कि करीय १७५ वर्प के हुए कि पटियाला रियासत के महाराजा-साहेव सिंह की दो यहिने विधवा हो गई थीं। उन्होंने साधु रामप्रसाद निरखनी से योगवासिष्ठ सुनाने को प्रार्थना की। उन्होंने सारा ग्रन्थ उन देवियों को पापी भाषा मे उल्या करके सुना दिया। जो कुछ वे सुनाते थे दो गुप्त लेखक नोट करते जाते थे। जय प्रन्थ पूरा सुनाया जा चुका तो यह उल्था छपवा दिया गया। पीछे इस पजावी उल्था को सड़ी योली हिन्दी मे शुद्ध कराकर लोकोपकार के लिये नवलकिशोर प्रेस ने १६१४ ई० मे छाप दिया। इस ग्रन्थ का पाय और पश्चिमीय यू० पी० मे बहुत प्रचार है। प्रन्थ है भी बहुत ही उत्तम । इसमें योगवासिष्ठ के सिद्धान्त उसी प्रन्थ की भाषा मे वर्णित हैं। कुछ सर्ग, जिनका दार्शनिक सिद्धान्तो से कोई सम्बन्ध नहीं है, छोड़ दिये गए हैं। दोप इस प्रन्थ में यही है कि इसमें जिन श्लोकों का अनुवाद किया गया है उनका भक नहीं दिया गया। इसके सों के प्रद भी योगवासिष्ट के सगों के प्रष्टो से नहीं मिलते क्योकि कहीं २ पर वे सर्ग छोड़ दिए गए हैं जिनमें युद्ध, वन इत्यादिक वर्णन था। ३- योगवासिष्ठ भाषा-धैराग्य और मुमुक्षु प्रकरण- वेटेश्वर प्रेस यम्बई से प्रकाशित । इसमें योगवासिष्ठ के केवल प्रथम दो प्रकरणों का ही भाषा में अनुवाद है। इस पुस्तक का यहुत प्रचार है। अनुवाद भी अच्छा है। इसमें भी श्लोको के अष्ट नहीं दिये गये। उर्द- १-योगवासिष्ठसार-लघु योगवासिष्ठ का मुशी सूर्यनारायण मेहर का किया हुआ उर्दू अनुवाद, १६१३ में दिल्ली से प्रकाशित। यह लघु योगवासिष्ठ पा उर्दू भाषा में बहुत अन्धा अनुवाद है। २-योगवासिष्ठायन-म० शिषमतलाल द्वारा किया हुआ लाहोर से छपा हुआ लघु योगवासिष्ठ पा उर्दू अनुवाद । यह धनुयाद भी बहुत ही उत्तम है। इसमें विशेषता यह है कि किताप के किनारे पर हरएक पेरेसाक के सिद्धान्त दिए है।
अंग्रेजी- १-इग्लिश ट्रास्लेशन ऑफ योगवासिष्ठ महारामायण- बहारीलाल मित्र का ४ भागों में किया हुया अनुवाद सन् १८११ में कलकत्ते से छपा हुआ। इस अनुवाद के करने में अनुवादक ने चयन तो बहुत ही श्रेष्ठ किया है किन्तु खेद है कि अनुवाद किसी भी काम का नहीं है। इसको पढ़कर कोई भी योगवासिष्ठ के सिद्धान्तो को नहीं समझ सकता। यही कारण है कि अप्रेजी भाषामात्र जानने वालों को अभी तक योगवासिष्ठ के सिद्धान्तों का भली माँति ज्ञान नहीं हो सका। २-२ दरलेशन ऑफ (लघु) योगवासिष्ठ-मद्रास से १८८६ में छपा हुआ के नारायण स्वामी अइयर का किया हुआ लघु योगवासिष्ठ का अंग्रेजी अनुवाद । यह अनुवाद ऊपरवाले अनुवाद से दुछ अच्छा है, किन्तु इसमें भी बहुत जगहों पर ठोक अनुवाद नहीं है और इसमें भोकों का नम्बर नहीं दिया है। ४-~-मूल ग्रन्थ~संस्कृत योगवासिष्ठ १-भानन्द बोपेन्द्र कृत टीका सहित सम्पूर्ण योगवासिष्ठ- सवत् १९३६ वि० में गणपत कृष्णजी प्रेस बम्बई से प्रकाशित। यह खुले पत्रों के रूप में छपा है। टाइप भी उत्तम नहीं है और एक श्लोक दूसरे से अलहदा नहीं है । सब श्लोक लगातार एक ही साथ मिले हुए छपे हैं जिससे पढ्नेयाला को कष्ट होता है। २-श्रीमद्वाल्मीकि मर्पि प्रणीत योगवासिष्ठ-श्रीवासिष्ठ महारामायणतात्पर्यप्रकाशाख्यन्यारया सहित । यासुदेव लक्ष्मण शास्त्री पणशीकर द्वारा संपादित निर्णयसागर प्रेस बम्बई से सन् १९९८ में दो भागों में प्रकाशित। इसमें प्रानन्दवोघेन्द्र सरस्वती मिन की व्याख्या है। यह व्याख्या उत्तर कालीन शाकर वेदान्त के सिद्धान्ती के अनुसार है। यह ग्रन्थ अच्छा छपा है । पाठको को इसी का पाठ करना उचित है। यह केवल सरकत में ही है। इसका दाम १४) है।
संस्कृत लघु योगवासिष्ठ- १. लघु योगवासिष्ठ-गौड अभिनन्दकृत निर्णयसागर प्रेस थम्बई से संवत् १८४४ में खुले पत्रों में छपा हुआ। इसमें पहले तीन प्रकरणों ( वैराग्य, मुगुनु और उत्पत्ति) पर आत्मसुखकृत धासिष्ठ पन्द्रिका नामक व्याख्या है और पासरी तीन (स्थिति, उपशम और निर्वाण ) पर मिम्मदीदेव की संसारतारिणी नाम की व्याख्या है। इस लघुयोगवासिष्ठ में योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण के उत्तरार्द्ध पा सार नहीं है। यह प्रन्थ भी उत्तम है। योगवासिष्ठ की कुछ हस्तलिखित प्रतियाँ- यहाँ तक हमने पाठकों को योगवासिष्ठ सम्बन्धी प्रकाशित पुरतरों और लेखों का परिचय दे दिया। अब हम उनको योगवासिष्ठ और उसके संक्षेपों की कुछ हस्तलिसित प्रतियों से भी परिचित कराना चाहते हैं। वे ये हैं :- १-योगवासिष्ठ (सम्पूर्ण) (१) इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी, लण्डन में। देखिये ज्यूलियस ऐग्लिङ्ग रचित "दी फैटालोग ऑफ संस्कृत मैन्युस्कृप्ट्स इन दी लाइब्रेरी ऑफ़ इण्डिया ऑफिस" लण्डन, पार्ट (भाग) ४, पृष्ठ ७७२ आदि पर वर्णित :- योगवासिष्ठ- मानन्द चोपेन्द्र सरस्वती कृत वासिष्ठ-तात्पर्य प्रकाश नामक व्याख्या समेत । (नं० २४०४-२४१४) इस प्रति में १. वैराग्य प्रकरण में ( नं० ३०२ थ) ३३ सर्ग हैं और लगभग . ११३० श्लोक है। २. मुमुक्षुव्यवहार प्रकरण में २० सर्ग और उनमें ६००० लगभग स्टोक हैं। ३. उत्पत्ति प्रकरण में १२२ सर्ग और उनमें लगभग ६००० श्लोक है। स्थिति प्रकरण में ६२ सर्ग हैं जिनमें २४०० के लगभग . (४१ ) ५. सपशम प्रकरण में ६३ सर्ग हैं जिनमें ४२७२ के लगभग सोक है। ६. निर्वाण प्रकरण पूर्वार्द्ध मे १२६ सर्ग हैं जिनमे ५४६० के लगभग श्लोक हैं। ७. निर्माण प्रकरण उत्तरार्द्ध में २१६ सर्ग है जिनमें २०० के लगभग श्लोक हैं। यहाँ पर यह चित जान पड़ता है कि हम पाठकों को यह भी पतला दें कि निर्णय सागर बम्बई से प्रकाशिव मन्य में सों और श्लोको की संख्या क्या है। उसमें १. वैराग्य प्रकरण मे ३३ सर्ग, ११७६ श्लोक है। २. मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण में २० सर्ग, ०७ शोक हैं। ३. उत्पत्ति प्रकरण में १२२ सर्ग, ५२६५ सोक हैं। ४. स्थिति प्रकरण मे ६२ सर्ग, ४१५ श्लोक हैं। ५. उपशम प्रकरण में १३ सर्ग ४१६७ शोक हैं। ६ निर्वाण प्रकरण पूर्वार्द्ध में १२८ सर्ग, ५१११ शोक हैं। ७. निर्वाण प्रकरण उत्तरार्द्ध में २१६ सर्ग, ८७१६ श्लोक है। इस पुस्तकालय में योगवासिष्ठ की और भी प्रतियाँ हैं ( २४१५॥ २६४१: २४१६-२४२०, २४२१ और २४२२) किन्तु उनमें कोई भी सम्पूर्ण नहीं है। (२) ऑक्स्फोर्ड के योडलियन पुस्तकालय में-(देखिये आर- फेरेसट पा "केटालोगी कोडिकम मेन्युस्कृप्टोरम् यिब्लियोथी को बोडलियने" न०८४)। यहाँ पर जो प्रति वर्तमान है उसमें निर्वाण प्रकरण का उत्तरार्द्ध नहीं है। इस प्रति के प्रारम्भ के शन्द "दिति भूमी" है। (३) महाराजा बीकानेर के पुस्तकालय में ( देखिये राजेन्द्रलाल मित्र का बनाया हुआ सूचीपत्र, मं० १२१६ ) । इस प्रति में भी निर्वाण प्रकरण का उत्तराई नहीं है इसके आदि के शब्द है--"दिकालाध. नच्छिन्न"। (४) अल्पर नरेश के पुस्तकालय में ( देखिए पिटर्सन का पनाया हुआ सूचीपत्र, नं० ५४८,५४६) | इन प्रतियों पर योगवासिष्ट के नाम, . ( ४२ ) 'योगवासि', 'सार्परामायण', 'ज्ञानयासिष्ट', 'महारामायण', 'मासिष्ट रामायण' और 'यासिष्ठ' हैं। इनके साथ आनंद घोधेन्द्र सरस्वती की व्याख्या भी है। (५) सरस्वती-भवन पुस्तकालय, क्वीन्स कालिज, बनारस में ( देखिए-यहाँ की हस्तलिखित पुस्तको की सूची, नं० १८०८-१८१२, १८२० और ५०३७)। यहाँ पर ६ प्रतियाँ हैं किन्तु केवल एक ही, नं० १८२०, सम्पूर्ण है। (६) मद्रास के गवर्नमेण्ट ओरियण्टल मैन्युकृपट पुस्तकालय में। (देखिए रंगाचायं फी बनाई हुई पुस्तक सूची वॉ० ४, भाग १, नम्बर १६१०-१६१४ :- न० १६१०, वासिष्ठ रामायणम् सव्यारयानम्-देवनागरी लिपि । केवल वैराग्य प्रकरण, मुमुख प्रकरण और स्थिति प्रकरण । नं. १६११, वासिष्ठरामायणम् - सन्यारयानम्। प्रन्थ लिपि । उपशम प्रकरण, असम्पूर्ण । नं० १६१२, यासिष्ठ रामायणम्-सव्याख्यानम् । देवनागरी लिपि । इसमे निर्वाण प्रकरण के १२२ सर्ग तक ही हैं। नं० १६१३ वासिष्ठ रामायणम्-सव्याख्यानम् । इसमें निर्वाण प्रकरण के ३६ वें अध्याय से लेकर अन्त तक है। देवनागरी लिपि । (७) एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के धोरियण्टल पुस्तकालय में ( देसिये पुञ्जयिहारीकृत सूचीपन, पलकत्ता १६०४, पृष्ठ १५६) : १-प्रानन्द योघेन्द्र सरस्वती कृत व्यारया सहित वासिष्ठ रामायण, यग लिपि में। २-श्रद्वयरण्यात योगवासिष्ठ टीका (यासिष्ठ पददीपिका) देवनागरी लिपि। २-संक्षिम योगवासिष्ट १-लघु योगवासिष्ठ, योगवासिष्ठसार, मोक्षोपायसार- (१) इण्डिया ऑफिस लाइप्रेरी (पगलिगत सूची भाग ४, नं० २४२४।२१२० और २४२४१३४२) . (२) बोलियन लाइनेरी (ऑक्स्फोर्ड) कीथ कृत सूची- अपेरिडक्स । न ४० (एम० एस० करेजर ६)। इसके लेखक के सम्बन्ध में कीय साहन कहते हैं 'अभिनन्द के पितामह का पिता काश्मीर के मुतापीड राजा के समय (रीर ७२४ ईसी) में था। सिक कारमीर में पैदा हुआ था किन्तु यह गौड देश में विक्रमशील के पुत्र युररान हरवर्ष के यहाँ रहता था। देखिए पिटर्सन का मुभा पितावला " (३) अलवर पुस्तकालय में पिटर्मन की सूची न० ५५० । (५) सरस्वती सदन पुस्तकालय, क्वीन्सकालिन, वनारस में। हाल के सूरीपत्र 'कन्ट्रीब्यूशन टुबई एन इंडेक्स टू दी बिल्लियो मात्रा आफ इण्डियन पिनासोफिकल सिस्म्स" में वेदान्त, ना ११४में वर्णित योगवासिष्ट का सनेप "अभिनन्द आफ काश्मीर' द्वारा कृत। इसके साथ एक ससारतारिणी नाम की व्याख्या भी है। (५) मद्रास की गवर्नमेंट प्रॉरियरटल मैन्युस्कृप्ट लाइब्रेरी में- (रनाचार्य की सूची न. १८९०-१८१५ । इसका नाम लघु योगवासिष्ठ और ज्ञानव सिष्ठ है । "यह ४४ सर्गों में पडे वासिष्ठ-रामायण का सार है। सार करनेवाले का नाम तैलगी लिपि में 'काश्मीर पण्डित' दिया है। २-यागवासिष्ठसार यह पिना रचयिता के नाम का है। किसी किसी प्रति में बनारस के महीघर की व्याख्या है- (१) इण्डिया आफिस लाइनेरी में ऐग्लिङ्ग कृत सूची, भाग ४, २०२४२६.५३२ फ। इसमें २० श्लोक और १० प्रकरण हैं। इसके आदि की पक्ति है "दिछ लायनयच्छिन्नान चिन्माप्रमूर्तये । न.८८१५.१ २४०-११३६४ सा, और २४२२४३६ महीधर कृत यागवासिष्ठ सार वृति अथवा योगवासिष्ठ सार विवरण की प्रतियाँ हैं। यह वृत्ति बनारस के महीधर ने सवत् १६५४ (१५६७ ईस्वी) में लिखी थी। (२) योडलियन लाइब्रेरी (आक्सफोर्ड } में कीथकी सूची में न०१३८२ और पाउपरेट की सूची में न० ५६३ । इसके साथ भी .
- ( ४२ ) 'योगवासिष्ठ', 'आपरामायण', 'ज्ञानवासिष्ठ', 'महारामायण', 'वाधि रामायण' और 'वासिष्ठ' हैं। इनके साथ आनंद योधेन्द्र सरस्वती की व्याख्या भी है। (५) सरस्वती-भवन पुस्तकालय, क्वीन्स कालिज, धनारस में ( देखिए यहाँ की हस्तलिखित पुस्तकों की सूची, नं० १८०८-११, १८२० और ५०३७ ) । यहाँ पर ६ प्रतियाँ हैं किन्तु केवल एक ही, नं. १८२८, सम्पूर्ण है। (६) मद्रास के गवर्नमेण्ट ओरियण्टल मैन्युरकृपट पुस्तकालय में। ( देखिए रंगाचार्य की बनाई हुई पुस्तक सूची वॉ०४, भाग १, नम्बर १६१०-१६१४,:- नं० १६१०, वासिष्ठ रामायणम् सव्याख्यानम्-देवनागरी लिपि केवल वैराग्य प्रकरण, मुमुक्षु प्रकरण और स्थिति प्रकरण । नं. १६११, वासिष्ठरामायणम्-सव्यारयानम् । अन्य लिपि । उपशम प्रकरण, सम्पूर्ण। नं० १६१२, वासिष्ठ रामायणम्-सव्याख्यानम् । देवनागरी लिपि । इसमें निर्वाण प्रकरण के १२२ सर्ग तक ही हैं। नं० १६१३ वासिष्ठ रामायणम्-सव्याख्यानम् । इसमें निर्वाण प्रकरण के ३६ वें अध्याय से लेकर अन्त तक है। देवनागरी लिपि। (७) एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के प्रोरियण्टल पुस्तकालय में ( देसिये कुजविहारीकृत सूचीपत्र, कलकत्ता १६०४, पृष्ठ १५६ ):- १-प्रानन्द योघेन्द्र सरस्वती कृत व्यारया सहित वासिष्ठ रामायण, यङ्ग लिपि में। २-अद्वयरण्यकृत योगवासिष्ठ टीका ( पासिष्ठ पददीपिका) देवनागरी लिपि। २-संविन योगवासिष्ठ १-लघु योगवासिष्ठ, योगवासिष्ठसार, मोक्षोपायसार- (१) इण्डिया ऑफिस लाइनेरी ( एलिगकृत सूची भाग ४ नं० २४२४४२१२० और २४२४१३४२) (२) बोडलियन लाइब्रेरी (ऑक्स्फोर्ड) कीथ कृत सूची. अपेण्डिक्स । ८४० (एम० एस० फरेज़र ६)। इसके लेसफ के सम्बन्ध में कीथ साह्य कहते हैं 'अभिनन्द के पितामह का पिता काश्मीर के मुक्तापीड राजा के समय (करीव ७२४ ईसी) में था। सक कारमीर में पैदा हुआ था किन्तु यह गौड देश में विक्रमशील के पुत्र युवराज हरवप के यहाँ रहता था। देसिए पिटर्सन की मुभा. पितावली पृष्ठ १७॥ (३) अलपर पुस्तकालय में पिटर्सन को सूची नं. ४५० । (१) सरस्वती सदन पुस्तकालय, क्वीन्सकालिज, बनारस में । हाल के सूचीपत्र “कन्ट्रीब्यूशन टुवर्ड्स एन इंडेक्स टू दी बिल्लियो. माकी श्राफ इण्डियन फिलासोफिकल सिस्टम्स" में वेदान्त, नं० १४४ में वर्णित योगवासिष्ठ का संक्षेप "अभिनन्द आफ काश्मीर'' द्वारा कृत। इसके साथ एक संसारतारिणी नाम की व्याख्या भी है। १२) मद्रास की गर्नमेंट ओरियण्टल मेन्युरझपट लाइब्रेरी में-- (रगाचार्य की सूची नं. १८९२-१८६५) | इसका नाम लघु योगवासिष्ठ और जानकासिष्ठ है । "यह ४४ सगों में बड़े वासिष्ठ-रामायण का सार है। सार करनेवाले का नाम वैलगी लिपि में 'काश्मीर पण्डित' दिया है। २-योगवासिष्ठसार यह निना रचयिता के नाम का है। किसी किसी प्रति में वनारस के महीधर की व्याख्या है- (१) इण्डिया आफिस लाइब्रेरी में-ऐग्लिए कृत सूची, भाग ४, न० २४२६।२५३२ फ। इसमें २२० श्लोक और १० प्रकरण हैं। इसके आदि की पंक्ति है "दिकालाधनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये। २०२४२८1१५२१, २४२८११३६४ सी, ओर २४२६२४३६ महीधर कृत योगवासिष्ट सार वृति अथवा योगवासिष्ठ सार विवरण की प्रतियों । यह वृत्ति बनारस के महीधर ने संवत् १६५४ (१५६७ ईस्वी) में लिखी थी। (२) वोडलियन लाइब्रेरी (आक्सफोर्ड) कीयको सूची में नं० १३०२ और पाउफरेस्ट की सूची में नं० ५६३ । इसके साय भी परिच्छेद ४ योगवासिष्ठ और कुछ उत्तर कालोन उपनिषद् ऊपर कहा जा चुका है कि उत्तर कालीन उपनिपदो में से कुछ उपनिषद् ऐसे हैं जिनके सारे अथवा पुछ श्लोक योगवासिष्ठ में वर्तमान हैं। लेखक का मत यह है कि ये श्लोक योगवासिष्ठ ही के है और उनको योगवासिष्ठ में से बहुत से स्थलो से चुन कर एकत्र करके उस संग्रह का नाम संग्रहकर्ता ने उपनिपद् रख दिया। उस समय में पुरतको का, विशेषकर बड़ी पुस्तको फा, मिलना कठिन था क्योंकि सर ग्रंथ हाथ से ही लिसे जाते थे। इस कारण से योगवासिष्ठ जैसे अन्य फो पढकर लोगों ने अपनी अपनी रुचि के अनुसार इसमें से सार श्लोकों का संग्रह कर लिया, पीछे उसी संग्रह को उन्होंने उपनिषद् नाम से पुकारना प्रारम्भ कर दिया, और दूसरे लोगों ने इस उपनिषद् को अपने पाठ के लिये नाम कर लिया होगा। इस प्रकार से ये उपनिपद् विरयात हुए। आजतक इस घटनाका पता किसी विद्वान् को इस कारण से नहीं चला कि योगवासिष्ठ और उपनिषदा या तुलनात्मक गहन अध्ययन किसी ने नहीं किया। शायद ही कोई विद्वान् ऐसा होगा जो किसी श्लोक को पढ़कर यह कह सके कि यह श्लोक योगवासिष्ठ मे अमुक स्थलपर है। इस महान् ।प्रन्थ के श्लोकों की सूची भी अभीतक नहीं तैयार हुई। लेखक को ही यह सौभाग्य प्राप्त हुया कि उसने कई सालो के कठिन परिश्रम से बहुत से उपनिषदी के श्लोकों को योगयासिष्ठ में पाया है। यह गहरी और महत्त्यपूर्ण सोज पाठको के समक्ष रखने का यहाँ प्रयत्न किया जाता है। स्थाना- भाव से केवल उन श्लोकी का जो कि उपनिपदो और योगयासिष्ठ में पाए जाते हैं यहाँ पर अइमान दिया जाता है। जो पाठक अधिक उत्सुक हो ये इन नम्बरो के श्लोरो यो दोनो प्रन्यों में से देखकर केवल इस घटना से ही कि कोई रोक योगवासिष्ट और किप्ती उपनिषद् में पाया जाता है यह सिद्ध नहीं होता कि यह मूलतः योगवासिष्ठ का है और उपनिषद्-पता ने उसे योगवासिष्ट से मुशायला पर ले।
लिया है। कुछ और कारण ऐसे हैं जिनकी वजह से हमारा यह विश्वास है कि ये शोक जो कि उपनिषदों और योगवासिष्ठ दोनो में पाये जाते हैं योगवासिष्ठ के हैं और उनको संग्रह करके ही ये उपनिषद् यनाये हैं। उनमें से कुछ ये हैं। १-बहुत से श्लोक ऐसे हैं जो कि कई उपनिपदों में नाना स्थलों और नाना सम्बन्धों में मिलते हैं। इससे यह मालूम पड़ता है कि सग्रहकर्ताओंने ये श्लोक किसी एक ही जगह से लेकर अपनी अपनी रुचि के अनुसार सन्जित किए हैं। ये सर श्लोक ऐसे हैं जो कि योगवासिष्ट में मिलते है। यथा:- योगवासिष्ठ महोपनिषद् अनपूर्णपिनिषद् ५१७१।३३, ३६ ४७ २।२०२६ ६.९१८१ ३१४८ ४९ १५१०३२ ४११० ११४७ ४१८२ मुक्तिकोपनिषद् १९018 ३२ ४।१४ ६३९०१६ २१३४ (भाषा) ४१६ ६१९०१८ २॥३४ (प्राधा) ४११७ ६१९०१२० २१३५ (थापा) १९०२३ २॥३६ (भाधा) ४१. ६१९११३७ २१२९ १४८ १११।१४ ६१४१ ५११२९ १९२१० २११० १।८३ दा९२१२२ ४१०४ १९२३४ १३ ४१९० महोपनिषद् घराहोपनिषद् ३२११०१५-१६ ४११-१० मैत्रेय्युपनिपद् २१३० योगकुएडल्युपनिपद् ११४७ ३२४ ४१८ २११३ २४२ ६१७५ ( ४ ) यो घा० मुक्तिकोपनिषद् म० उ० पेगलोपनिपटु यो कुरा ३१११ ४।२३१५८ याज्ञवल्क्योपनिषद् १२१॥ १,२,५,६, ३१३९-४८ ५:१५ ११,१२,१८, २०,२३,३५ ४॥२४॥८-१० २।४०,४१ १९७७-७८ ४॥३१.१८ ५१९७-९८ वराहोपनिषद् अच्युपनिषद ११२६६०.६७ ४।१२.१७ २-यहुत से उपनिपदों में इन श्लोकों के आदि में "पत्र श्लोरा भवन्ति" ऐसा लिसा है जिससे साफ जाहिर है कि उपनिषत्कारों ने ये शोक किसी दूसरे स्थल से लिए हैं। ३-योगवासिष्ठ के सस स्थलपर जहाँ से कि उपनिपदो के शोक चुने गए हैं बहुत से धीर श्लोक उसी प्रकार के वर्तमान है जैसे कि वे जोकि चुने गए हैं। ४-उपनिषदों में योगवासिष्ठ से चुने हुए श्लोकी की तरतीय प्रायः ठीक नहीं है। पात से स्थलों पर तो योगवासिष्ठ की ही तरतीय ज्यों की त्यों रक्सी गई है, किन्तु धीच के बहुत से लोक भो देने पर वह तरतीय जोकि योगवासिष्ठ में ठीक जान पढ़ती है उपनि पदों में सराय हो गई। ५- इन उपनिषदों में से कोई भी उपनिषद् पुराना नहीं है। सर ही योगवासिष्ठ से पीछे के बने हुए हैं क्योंकि इनमें से कोई भी ओ शंकराचार्य से पूर्व का नहीं है और हमने उपर यह सिद्ध कर दिया है कि योगवासिष्ठ श्री शंकराचार्य से पूर्व का प्रन्य है। ६-इन शोकों में से जो कि योगवासिष्ठ और इन उपनिपदों में मिलते हैं कोई भी श्लोक ऐसा नहीं है जो लघुयोगवासिष्ट में न मिलवा हो। लेकिन योगयासिष्ठ के यष्टुत से उत्तम शोफ लघु योगवासिष्ठ में नहीं पाए जाते और ये दो रोका उपनिषदों में मी नहीं मिलते। इससे यह मालूम पड़ता है कि इन उपनिपदों के पनाने बालों को केरल लघुयोगवासिष्ट ही देखने में पाया होगा। महा-उपनिषद और योगवासिष्ट महा-उपनिषद् -जैसा कि इसके नाम से ही दाहिर है- बहूत बड़ा उपनिषद् है। इसमें ६ अध्याय है। प्रथम अध्याय एक छोटा सा भूमिका रूप गद्य में लिसा हुआ अध्याय है। याको ५ अध्याय पद्य में है और उनमें ५३५ भोक है। इन ५३५ श्लोकों में से हमको ५१० श्लोक योगरासिष्ठ में मिल गए। जैसा कि निम्नलिखित - अंकों से जाहिर है: महा-उपनपद् योगवासिष्ठ प्रकरण, सर्ग, लोक 1८,१० :- अध्याय १ ९,१०,११ ३1 ८१ ।२,३,३ १ ६. १६ ।१८,२१,११,११ . ११० ११२,१३.१५,३७,३८,२८ २५,३३,१६,३५,२०,२१ १२.१०,४७.५०,७६ १ १२ १४,१७.९,१६,२१,२६ . ३ ८ 1 १४ ।१,२,१०-१३ ७ (५० ) महा-उपनिषद् अभ्याय, श्लोक १८-२१ २३.२५ २६.३२ योगवासिष्ठ प्रकरण, सर्ग, श्लोक १ । १६ । ३,१५,२४,२५ १७ । २९,३१,३२ १८ । ४,१८,१९,३१,३०,६१ १। ३ ३४ ३७,३० ३९-४० २२ २३ २१ ३ । । ३,१९ । १,२,१,६,११,१२,१८, २०,२३,३६ 1 २३,२५,२९ । २१,३१.३५ ४९.५१ २६ २८ ३ ६६ ६७ लघुयोगवासिष्ठ १ फई श्लोकों का संक्षेप (देखिये) ३१ । ५९,६१,६७ १३ । २४ ४। ६ ६ ६७ . ४॥ 1३०.३१,३३ । १.३, ६-७, १२.१४, १६ ४॥ 2 । ३८.४०,९८,६१,६०,७१, ४।
महा-उपनिषद् योगवासिष्ठ प्रकरण, सर्ग, श्लोक अध्याय, लोक ४॥ ४. 1१,१०,११ । २९, ३१ ।१०,१२,१०,१९,२२,२३ १ am ४. ४२,४३ ४४-४९ ५० ५१,६२ ५३,५४ ६६.६७ . ४॥ ३॥ ४ । ३९,४२,४४ ४ । ४४,६८ ६ ।१०,१२,१३ २२ ३॥ ३. ३1 २० ४॥ ४। ६७ ३॥ ६८ ८९ १०३ । १४ ७ ८२ ८७ ३॥ ८८-१८ १११ । १,२,८,१३,१५,१९,२० २२,२३,३०,३६,४०,४२ ११२ । ६-७,११,१६,१७,१९-२९ ९१-१११ ११२ ११३-१३२ ११४ । ३-६,७,८,१२,१४,१५, ५१,२३.१०६१,५,६, ११ । ३,१६.१९,२१-२३,२६ ११८ । १-३,६-१९,२१-२३ ११८ । ३८.३० (संहित) लघुयोगवासिष्ठ, ४४१३३१३० लघुयोगवासिष्ठ, ३३१३३१३२,१३३ महा-उपनिपद् अभ्याय, श्लोक १८.२१ प्रकरण, सर्ग, योगवासिष्ठ श्लोक १६ । ३,१५,२५,२५ १७ । ८,२९,३१,३२ १८।४,१५,१६,३१,३८,६१ १ । १॥ ३ । ३॥ ३९.४८ । ३,१९ २१ । १,२,५,६,११,१२,१८, २०,२३,३५ । २३,२५,२१ । २१,३१.३५ १॥ ५२-५४ लघुयोगवासिष्ठ १ फई श्लोकों का संक्षेप ( देखिये) ६७ 1५१,६१,६७ ४॥ १३ १ ४। ४॥ १० ६१ । ३०,३१.३३ 1१.३, ५.७, १२०१४, १६ 1२० -- ४॥ ११ १३ 1 ३८.४०, ५८,६१,६,७, महा-उपनिषद अध्याय, श्लोक योगवासिष्ठ प्रकरण, सर्ग श्लोक १५,२२,३०३८ 1 २५,३४,३०,४१- २७ 1 २२-२५,२९,३७ १८ लघु योगवासिष्ठ ४६१८४० 1७,४० ११ १२-१५ २३-२७ १ २८-३४ ६। ३९-४० । ९-११,१३,१७ । २१,३३,३६,४१, ४४,५२,६० १ १३ १ ३१,२८,३१,३३, ३३,३१,३८ ५। १४ । ४६,४८,१०,१२ १६१ २३,२४,२७ ५ । १६ । ७-१२,१५,१८.२१ १७ । ५,७,९,१३ १७, १७,२०,२२,२५ १८ । ५९,१०,१८,२२,२४, १९,२१,६१ ५। १८ । ६१ ओर ५,२०,३७ ६ । २१ । ३,८,११,१५ २०.६२ ७२ ६॥ ६१ २६ । १३,१४ २७ । ३,२०,२५,३३,३३ अन्नपूर्णोपनिपद् और योगवासिष्ठ अन्नपूर्णा उपनिपद् में ३३७ श्लोक हैं, जिनमें से प्रयम १७ श्लोक भूमिका के हैं और पाकी रलोक उपनिषद् के सिद्धान्तों के हैं। प्रयम १७ श्लोकों को-जो कि भूमिकामान है-छोड़ कर इस उपनिपद के प्रायः सभी श्लोक योगवासिष्ठ के उपशम और निर्वाण (पूर्वार्द्ध) प्रकरण से संग्रह किए हुए है।
महा-उपनिषद् योगवासिष्ठ, अध्याय, श्लोक ५॥ ४८.५१ ६२-५३ ६४ प्रकरण, सर्ग, श्लोक ११९ । २१.२३ १२१ । ६३-६६,६८ १२२ । ५४,५३ ४। लघु योगवासिष्ठ, ४।१४।२,४-६ १४ १५ । २१,२५ २२ ।१-३,७-१०,३२ ४ । २३ । ४४,४१,४३,५६-१८ । १,८-१४,१८,१९ ४ । २७ । २१,३५ लघु योगवासिष्ठ, ४५१६७ । ६०-२७.११ ६०,६१ ६२-६९ ७०-७५ ७६-८२,८४ ८५,८६ ८८ ८९-१५ लघु योगवासिष्ठ, ४१५६ ४ । १९-१०३ १०४-१०७ १०८-११२ ११४,११७ ११३ । २३-२५,४३ ४,१३-१५,२०,३२ लघु योगवासिष्ठ ४।१७४० ४२ ११,१३-१६,२१ २३-२६,३१,३४, ३६-३८,४४,४५,५० ४ । ४३ । १,२,९,१-१२ ।१४-२८,३०,३१,४३-४९ । ४१,१४,२५,२६ । २,५,६,७,१४, १३-१४३ १४४-१६४ ४ । १६७-१७७ १८-१८५.४। ६४ । ३-६,१२,१३, योगवासिष्ठ महा-उपनिषद् अध्याय, सोक प्रकरण, सर्ग श्लोक ६। १८,२२,३७,३८ । २६,३४,३७,४१-४७ । २२-२६,२९,३७ ।७,४० लघु योगवासिष्ठ ४।११४० ६॥ १७.११ ८ २८-३४ । ९-११,१३.१७ । २५,३३,३६,४१, ४४,५२,६० ५। १३ । २१,२८,३९,३२, ३३,३५,३८ ५। १४ । ४६,४८,५०,५२ १६ । २३,२४,२७ ५। १६ । ७-१२,१५,१८.३१ ७२ १९,२०,२२,२७ १० । ५.९,१५,१५,२२,२४, ५। १८ । ६१ और ५,३०,३५ २१ । २,८,११,११ २२ । ३३ ५। २६ । १३,१४ २७ 1 २,२०,२५,३३,३३ अन्नपूर्णोपनिषद् और योगयासिष्ठ अन्नपूर्णा उपनिषद् में ३३७ श्लोक हैं, जिनमें से प्रथम १७ श्लोक भूमिका के हैं थोर वाकी रलोक उपनिषद् के सिद्धान्तों के हैं। प्रथम १७ श्लोकों को-जो कि भूमिकामात्र है-छोड़ कर इस उपनिषद् के प्रायः समी रलोक योगवासिष्ठ के उपशम और निर्वाण (पूर्वार्द्ध) प्रकरण से संग्रह किए हुए है।
अभपूर्णोपनिषद् योगवासिष्ठ प्रकरण, सर्ग, श्लोक अध्याय, श्लोक १। १८-१९ । ११७ । ९,१०,११ २३-२६ २८-३९ । १७.१९,३२,३०,३१,३३, ३४,४३,४९,५५,५६ । ३२,३३,३६,४१,४४,४७ ८८ ४७ १ । १ । ४८.५० ६४ । ४९-५१ ५१,५२ ५३ ६४,६५ ५६,५७ १-७ । १५,५४ ६४ ६७ । १,२,४,५,६,१९ । २,५-११ । १२,२६,३१-३३ १२-१६ १८ २०-२२ २३ २४.२६ ७२ । ४०,४१,३३,४३,४४ ५। ७३ । ३५॥३६ 1९,१०,३३,३५ २८-३१ १७,१३,१४,१६ ३४.४४ ८२ 1 २,८.१३,१५-१५,२० । १,११,१२,१५,१६,२१,२३ । ४३,४४ ८३ ८६ ८७ १३-१४ ।...११.१६,१८,१९,२१.१४ नपूर्णोपनिषद् ( ५५ । योगवासिष्ठ प्रकरण, सर्ग, श्लोक ८१ । १,१२-१४,२३,२७,३१, न्याय, अशोक १ १२-२४ ३१ लघु योगवासिष्ठ ४।२७१६६ ८१ ।६३ । १२,१४,४,५,१६,१८,२०, २३-२४३०३१ ३॥ 10,१०,१४,१५,२०,२१,२६ २७,२९,३६,३०,३१,४२,४३, ४६,४५,६६,७४-७५,८१- ८७,१०२,१०५,१०८,११०, १११-११३,११२ 1 ३-६,९,११-१७,२२,२५, २६,२५,२९,३०,३२,३४, ४९,५० ५। ९३ 1 ११,९५,५६,८३,८४,८५९१ २ । २४-२६,३१,४६,६६ ४ १५-१९ २०,२२,२३ ।१४,२०-२२,४४ ।७७,९९ २६-३२ ।। २९ । ३-६,७,३४,६३,६७,६८ ।४७,६८ २९ ।६७,१३४ 1 ३,१०,१४,१६-१८, २४-३६,३० ३५-४६ । १८-३०,४०,४५,४० ।३२-३४ अन्नपूर्णोपनिषद् अध्याय, श्लोक । ५६.) योगवासिष्ठ प्रकरण, सर्ग, श्लोक २६ । ८,१२,१४,१६,२० 1२६ ९३ । ४४ ६१,६६ । ३६, । ११८ ७१ ६। १२० ८१.१५ । १२० । १-१०, १२-१६, २२ ९६-१०१ । १२२ १०३-१०६ । १२३ । ६.८, १०, ११ १०७.१११ १२४ । २३.२७ ११२-११८ ३ । १२६ । १, २, ४.८ मुक्तिकोपनिषद् और योगवासिष्ठ मुक्तिकोपनिषद् में दो अध्याय हैं। प्रथम अध्याय भूमिका- मात्र है। इस अध्याय में १०८ उपनिषदों के नाम दिए हैं। दूसरे अध्याय में, जोकि उपनिषद् का मुख्य भाग है, ७६ श्लोक हैं। ये श्लोक सारे के सारे योगवासिष्ठ से चुने हुए हैं। लेकिन वे इस क्रम से संग्रह किए गए हैं कि उनको योगवासिष्ठ से ढूंढ निकालना बहुत फठिन है। इनमें से बहुत से श्लोकों का हमको पता चल गया है, जैसा कि नीचे के अंकों से प्रतीत होगा। उपनिपत्कार ने इन श्लोकों के पारम्भ में यह लिखकर "अत्र श्लोका भवन्ति" इस यात फो सूचित भी कर दिया है कि ये श्लोक फिसी दूसरे स्थान से लिए गए हैं। मुक्तिकोपनिषद् योगवासिष्ठ प्रकरण, सर्ग, श्लोक अध्याय २, श्लोक १ . 1 २६.२७,३०-३३,३५,३८ । १७,१६,१०,२३,२३ १०.१४ मुक्तिकोपनिषद् अध्याय २, श्लोक प्रकरण, १८२१ २६-२७ योगवासिष्ठ सर्ग, श्लोक ३४ । ३२,२८ । १९,२६,२८ । ३६,१३,६४,४८ ९१ ९ .४१३४२ ९० 1१,११,१६,१०,२०,२३ १ 1६५,५६ २४ ।८-१० ४२ ५७६० ५ । ११ ।१४ । २५ ।५,१६,१७ ५। ९१ ।२९-३२ ।११,१२ 1 १९,२०-२२ ३। ६८.७१ ७६ घराहोपनिषद् और योगवासिष्ठ वराहोपनिषद् में पाँच अध्याय हैं, जिनमें से चौथा अध्याय जिसमें कि ज्ञान की सात भूमिकाओं का वर्णन है, योगवासिष्ठ के श्लोकों से यना है। इन श्लोकों से पहले इस उपनिषद् में यह लिसा है "वते श्लोका भवन्ति', जिससे यह प्रक्ट है कि ये श्लोक उपनिषत्कार ने किसी दूसरे स्थान से लिए हैं। वे ये हैं - वराहोपनिषद् योगवासिष्ठ अध्याय ४. श्लोक प्रकरण, सर्ग श्लोक ११८ । १८.१५ २-४० वराहोपनिषद् योगवासिष्ठ अध्याय ४, श्लोक प्रकरण, सर्ग, श्लोक ११-१८ । १२६ । १२,६०.६९ २१-२७ अत्युपनिषद् और योगवासिष्ठ अक्षि-उपनिषद् एक छोटा सा उपनिपद् है। इसमें ज्ञान के सात भूमिकाओं का वर्णन है । छोटी सी प्रस्तावना को, जो कि गद्य में है, छोड़ कर इस उपनिषद् में ४८ श्लोक हैं । जिनमें से ३६ श्लोक योग वासिष्ठ के एक हो सर्ग में से, जिसमें कि ओर बहुत से श्लोक इस विपय के हैं, चुने हुए हैं। वे ये हैं :- अक्ष्युपनिपद् योगवासिष्ठ श्लोक प्रकरण, सर्ग, श्लोक १२६ / ९८,९९,८.३०,३२,३३,३६ ३०,४१,४२,६८-६८, ७०,७१ संन्यासोपनिपद् और योगवासिष्ठ संन्यासोपनिपद् में, जिसमें संन्यास का वर्णन है. १०४ श्लोक है। जिनमें से आधे के लगभग योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण में से चुने हुए हैं। वे ये है :- संन्यासोपनिषद् योगवासिष्ठ श्लोक प्रकरण, सर्ग, श्लोक ३४ । १,२०,६८,६१,१०,१००, १०१,१०४,११,११४ ३६१४,११,३८,३,५,७८,८१ ५। ३।४७,४८,४९ ४०।११ ४२ । १४,१५ ५० । २१,२२२,२९,३४ ३९,३९,५३ (४) चासोपनिषद् श्लोक योगवासिष्ठ सर्ग, श्लोक । ६७,७५,७८,७९ इवल्योपनिषद् और योगवासिष्ठ याज्ञवल्क्योपनिषद् में कुल २४ श्लोक हैं जिनमें से १० श्लोक गवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण के २१ ३ सर्ग में से चुने हुए हैं। . ज्ञवल्क्योपनिपद योगवासिष्ठ श्लोक प्रकरण, सर्ग, श्लोक २१ १,२,०,६,११, २,१८, २०,२३,३६ शाण्डिल्योपनिपद् और योगवासिष्ठ शाण्डिल्योपनिषद् में योगवासिष्ठ के १३ श्लोक हैं इनका अपय प्राणनिरोप द्वारा मनोनिरोध है । इनके आदि में "वदेते श्लोका विन्ति" लिखा है। वे मे हैं:- शाण्डिल्योपनिपद योगवासिष्ठ अध्याय, सएह श्लोक प्रकरण, सर्ग श्लोक 14,१५,१६,१८-२१,२९, २७.३१,३१ मैत्रेय्युपनिषद और योगवासिष्ठ मैत्रेय्युपनिपद में भी योगवासिष्ठ के बहुत से श्लोक मालूम पड़ते हैं। किन्तु हमको निम्नलिखित अड्डों वाले श्लोक मिल गये हैं। मैत्रेय्युपनिपद् योगवासिष्ठ अध्याय, रलोक प्रकरण, सर्ग, श्लोक ।२४-३६ १० ३७ 11 १२६ । ३८.३३ ३० वराहोपनिषद् योगवासिष्ठ अध्याय ४, श्लोक प्रकरण, सर्ग, श्लोक ११.१८ । १२६ । १२,६०-६१ २१-२७ अक्ष्युपनिषद् और योगवासिष्ठ अक्षि उपनिषद् एक छोटा सा उपनिषद् है। इसमें ज्ञान की सात भूमिकाओं का वर्णन है। छोटी सी प्रस्तावना को, जो कि गद्य में है, छोड़ कर इस उपनिषद् में ४८ श्लोक हैं। जिनमें से ३६ श्लोक योग. वासिष्ठ के एक ही सर्ग में से, जिसमें कि और बहुत से श्लोक इसी विषय के हैं, चुने हुए हैं। वे ये हैं :- अक्ष्युपनिषद् योगवासिष्ठ श्लोक प्रफरण, सर्ग, श्लोक १२६ । १८,९९,८.३०,३३,३३,३६ ३८,४१,४२,६८-६८, । संन्यासोपनिपद और योगवासिष्ठ संन्यासोपनिषद् में, जिसमें संन्यास का वर्णन है. १०४ श्लोक हैं। जिनमें से आधे के लगभग योगवासिष्ठ के उपशमप्रकरण में से चुने हुए हैं। वे ये हैं: संन्यासोपनिषद् योगवासिष्ठ श्लोक प्रफरण, सर्ग, श्लोक ३४ | १,२०,६८,६९,१०,१००, १०१,१०४,११०,११४ ३६१४,११,३८,३९,७५,७८,८१ ३११४५,४०,११ ४२ ११४,१५ ५० । २१,२२३,२९,३५ संन्यासोपनिषद् श्लोक योगवासिष्ट सर्ग, श्लोक । ३१,३३,३० 'याज्ञवल्क्योपनिषद् और योगवासिष्ठ याज्ञवल्योपनिषद् में कुल २४ श्लोक हैं जिनमें से १० श्लोक योगवामिष्ठ के वैराग्य प्रकरए के २१ वें सर्ग में से चुने हुए हैं। . राज्ञवल्योपनिषद् योगवासिष्ठ श्लोक प्रकरण, सर्ग, श्लोक २१ १,२,३,११, २,१८, २०,३३,३६ शाण्डिल्योपनिषद् और योगवासिष्ठ शाण्डिल्योपनिषद् में योगवासिष्ठ के १३ श्लोक हैं इनका पर प्राणनिरोप द्वारा मनोनिरोध है। इनके आदि में 'तदेते श्लोका विन्ति" लिसा है। वे ये हैं:- शाण्डिल्योपनिषद योगवामिष्ठ अध्याय, सरड श्लोक प्रकरण, सर्ग श्लोक । ५,१५,१६,१८-२१,२५, १२४-३६ मैत्रेय्युपनिषद् और योगवासिष्ठ पत्रेय्युपनिषद् में भी योगवासिष्ठ के बहुत से श्लोक मालूम पड़ते हैं। किन्तु हमको निम्नलिखित अटों वाले श्लोक मिल गये हैं। मंत्रेय्युपनिषद् योगवासिष्ठ प्रकरण, सर्ग, श्लोक १ । १२६ । ३८-३९ मध्याय, रलोक ३।
।
योगकृण्डल्युपनिपद् और योगवासिष्ठ
योगकुण्डल्युपनिषद् में हमको फेवल दो श्लोक योगवासिष्ठ के
मिले हैं। वे ये हैं:-
योगकुण्डल्युपनिषद् योगवासिष्ठ
अध्याय, श्लोक
प्रकरण, सर्ग, लोक
३ ।
३।
। १४
पैङ्गलोपनिपद् और योगवासिष्ठ
पैङ्गलोपनिषद् में हमको अभी तक केवल १ श्लोक योगवासिष्ठ
फा मिला है। यह श्लोक और कई उपनिपदों में भी पाया है।
२४
३४
६
ह
यह यह है:-
पैङ्गलोपनिपद्
अध्याय, श्लोक
३।
योगवासिष्ठ
प्रकरण, सर्ग, श्लोक
परिच्छेद ५ योगवासिष्ठ की शैली योगवासिष्ठ की दार्शनिक प्रन्यों में गणना में होने का विशेष कारए उसकी लेसरीली ही जान पड़ती है। इस मन्य में दार्शनिकों के वाल की साल निकालने वाले उकवितकों और नीरस और शुष्क सूत्रमयों मापा का सर्वधा अभाव है। न इसमें उत्तरकालीन लेखको की माई अनुमान की परिमाप का ही प्रयोग पाया जाता है, न प्रभाए प्रन्यों की नदिया। इस प्रन्य का लेखक जो कुछ पहना चाहता है, सरल और सीधी भाषा में कहता है, और इस दङ्ग से कहता है कि उसका कथन हृदय में वीर की नाई प्रवेश करके मन में पैठ जाता है, और फिर पढने अथवा मुननेवाले को न किसी प्रमाण की आवश्यकता रहती है और न किसी शान की शक्ति की। यह जो कुछ कहना है अपने अनुमय से कदवा और सरल और सुन्दर, सरस और काव्यमयी মায়া ম বা ই, আঁং ঢালী স্ত্রী প্রধানো রী গুণৰ জুৰ স্কা समर्थन करता है। यही कारण है कि यह अन्य और दार्शनिक मन्यों की नाई दार्शनिक विद्वानों को ही प्रिय नहीं बल्कि साहित्य के रसिकों को मी प्रिय है। दृष्टान्यों की प्रचुरता के कारण प्राय समी कसानों के पाठक इसका रस ले सकते हैं और इसके सिद्धान्तों को समझ सकते है। उपाख्यानों के कारण सर्वसाधारण मनुष्य भी इसमें भानन्द का अनुभव कर सकते हैं। इस कथन में फिझिन्मात्र मी पत्युक्ति नहीं है कि यह अन्य एक उत्तम और सरस कान्य है। योगवासिष्ठकार का यह कहना बिल्कुल ठीक है सास्त्र मुबोधमेवेद सालझारविभूषितम् । कान्य रसमय पार इष्टान्त प्रतिपादितम् ।। १२११८१३३) अर्यान् यह शास्त्र सुबोध है, अलङ्कारों से विभूषित है, रसमय सुन्दर काय है, और इसके सिद्धान्त हटान्तों द्वारा प्रतिपादित है। योगवासिष्ठर को रसहीन, स्सी और पठिन मापा पसन्द नहीं है, क्योंकि वह धोता के हदय में मतवेशही कर पाती है और न पहों पर जाकर प्रकाश करती है। - यत्कथ्यते हि हृदयंगमयोपमान- युक्त्या गिरा मधुरयुक्तपदार्थया च । श्रोतुस्तदङ्ग हृदयं परितो विसारि व्याप्नोति तेलमिव धारिणि पार्य शङ्काम् ॥ (३।४।४५) त्यक्तोपमानममनोज्ञपदं दुरापं नुब्धं धराविधुरितं विनिगीर्णवर्णम् । श्रोतुर्न याति हृदयं प्रविनाशमेति वाक्यं किलाज्यमिव भस्मनि हूयमानम् ।। ( ३८४४६ ) अर्थात् जो कुछ ऐसी भाषा में कहा जाता है जो कि मधुर शब्दों वाली और समझ में आने वाले दृष्टान्तों ( उपमाओं) और युक्तियों वाली हो, वह सुनने वाले के हृदय में प्रवेश करके वहाँ पर इस प्रकार फैल जाती है जिस प्रकार कि तेल की बूंद जल के ऊपर, और सुनने घाले की सव शंकाएँ दूर हो जाती हैं। इसके विपरीत वह भाषा जो कि फठिन, कठोर, कठिनाई से उचारण किए जाने वाली, सरस शब्दों और उपमाओं (दृष्टान्तों) से रहित है, यह सुनने वालो के हृदय में प्रवेश नहीं कर सकती और यह इस प्रकार नष्ट हो जाती है जिस प्रकार राख में पड़ा हुआ घृत । उचित दृष्टान्तों के द्वारा ही कठिन से कठिन विपय का हृदय में प्रवेश कराया जा सकता है। आरयानकानि भुवि यानि कथाच या या यद्यत्ममेयमुचितं परिपेलवं या। दृष्टान्तदृष्टिफयनेन वदेति साधो प्रकाश्यमाशु भुवनं सितरश्मिनेय ॥ (३।४।४७) अर्थात्-संसार में जितनी कथाएँ और पाख्यान हैं और जो जो विपय उचित और गहन हैं, वे सय दृष्टान्त रीति से कहने से ऐसे प्रकाशित होते हैं जैसे कि संसार सूर्य की किरणों द्वारा। इन विचारों को अपने हृदय में रख कर योगवासिष्ठकार ने ग्राम विद्या को काव्य के रूप में संसार के समक्ष रखने का प्रयत्न किया है। फाव्य, दर्शन और पाख्यायिका का यह सुन्दर सद्गम-त्रिवेणी के समान महत्त्व वाला है। तीर्थराज जिस प्रकार पापों का विनाश फरता है उसी प्रकार योगयासिष्ठ भी अविद्या का विनाश करता है।
इसका पाठ करने वाला यह अनुमव करता है कि यह किसी जीते जागते अात्मानुभव वाने महान व्यक्षि के सर्श में आ गया है, और उसके मन में आने वाली समीशंकात्रों का उचर वालोचित मुबोध, सुन्दर और सरस भाषा में मिलता जा रहा है, शान्तों द्वारा अठिन से कठिन विचारों और सिद्धान्तों का मन में प्रवेश होता जा रहा है, और कहानियों द्वारा यह निश्चय होता जाता है कि वे सिद्धान्त, जिनका इस प्रन्य में प्रतिपादन किया गया है. केवल सिद्धान्त मात्र और फत्सना मात्र ही नहीं है बल्कि जगत् और जीवन में अनुभूत होने वाली सच्ची रुची घटनाएं हैं। इस अन्य में किसी दूसरे मन अथवा सम्प्रदाय सिद्धान्तों का न खण्डन है और न किसी के ऊपर आक्षेप। क्योंकियोगवासिष्कार को दृष्टि इतनी उदार और विस्तृत है कि यह सब मतों में ही सत्य को वर्तमान पाता है। उसके विशाल दर्शन में समी मतों स्थान है। इसको किमी कर मी विरोध नहीं करना है। उधको तो वह सिद्धान्त प्रतिसदन करना है, जिसमें समी इतर सिद्धान्तों का समावेश है और जिसके विशाल मन्दिर में सभी मत और सम्प्रदाय अविरोधा- लक रूप से अपना अपना रचित स्थान प्राप्त कर समते हैं। मत्व तो सच ही है। प्रत्येक व्यक्ति और सम्प्रदाय को उसके प्राप्त करने का अधिकार है क्योंकि समी कोई सत्य की खोज में है। इसको कोई किमी एक दृष्टिकोण से देखता है कोई किसी दूसरे से। लड़ाई और विरोध क्यों होना चाहिए। योगवामिष्टकार के इस प्रकार के मावों के इद ददाहरण हम यहाँ पर देवे हैं। (१) वासार्थवादविज्ञानवादयारक्यमेव नः । (६३४) पान पानार्थवाद और विज्ञानवाद में हमको कोई भेद नहीं । जान पड़ा। अंची दृष्टि से देखने से दोनों एक ही है। (२) मन के बार के विषय में नाना दर्शनों के मतों का वन करके योगवानिटकार कहता है :- सर्वेरेव च गन्वय ते पद पारमार्थिकम् । विचित्र देशकातायः पुरनेमिवावर्गः ॥ (३६५१) अनानासरमायस्य शिरीवावशेषतः। केलं चिदन्यते विस्येवरवः।। (१६६०५२) यत्कथ्यते हि हृदयगमयोपमान- युक्त्या गिरा गधुरयुक्तपदार्थया घ। श्रोतुस्तदङ्ग हदयं परितो विसार व्याप्नोति तेलमिव पारिणि कार्य शक्षाम् ॥ (३४४५) त्यकोपमानममनोनपदं दुरापं सुन्ध धराविधुरित विनिगीर्णवर्णम् । श्रोतुर्न याति हृदयं प्रविनाशमेति वाक्यं फिलाज्यमिव भस्मनि हूयमानम् ॥ (३६४१४६) अर्थात् जो कुछ ऐसी भाषा में कहा जाता है जो कि मधुर शब्दो वाली और समझ में आने वाले दृष्टान्तो ( उपमानो) और युफिया वाली हो, यह सुनने वाले के हृदय में प्रवेश करके यहाँ पर इस प्रकार फैल जाती है जिस प्रकार कि तेल की धुंद जल के ऊपर, और सुनने वाले की सब शंकाएँ दूर हो जाती हैं। इसके विपरीत यह भाषा जो कि कठिन, कठोर, कठिनाई से उधारण किए जाने वाली, सरस शब्दों और उपमानो (दृष्टान्तो ) से रहित है, यद्द सुनने वालों के हृदय में प्रवेश नहीं कर सकती और यह इस प्रकार नष्ट हो जाती है जिस प्रकार राख में पड़ा हुआ घृत । उचित दृष्टान्तों के द्वारा ही कठिन से कठिन विषय का हृदय में प्रवेश कराया जा सकता है। पारयानकानि भुवि यानि कयाध या या यद्यत्प्रमेयमुचित परिपेलय या । दृष्टान्तष्टिक्यनेन तदेति साधो प्रकाश्यमाशु भुवनं सितरश्मिनेय ॥ (३४॥४७) अर्थात्-ससार में जितनी क्याएँ और पाप्यान है और जो जो विषय उचित और गहन हैं वे सब दृष्टान्त रीति से पहने से ऐसे प्रकाशित होते है जैसे कि ससार सूर्य की किरणों द्वारा। इन विचारों को अपने हृदय में रस पर योगयासिष्ठमार ने प्रश. विद्या को काव्य के रूप में ससार के समक्ष रपने का प्रयत्न किया है। फान्य, दर्शन और पाख्यायिका का यह मुन्दर सद्गम-त्रिवेणी के समान महत्त्व याला है। तीर्थराज जिस प्रकार पापो का विनाश करता है उसी प्रकार योगवासिष्ठ भी अविद्या का विनाश परता है।
योगवाले ईश्वर, शैव लोग शिव, फालवादो काल, आत्मवादी यात्मा का श्रात्मा, अनात्मवादी अनात्मा, माध्यमिक लोग मध्यम और सब ओर समानदृष्टि रसनेवाले सर्व कहते हैं। योगवासिष्ट में सब गुण होते हुए भी आधुनिक पाठकों की दृष्टि से एक दो बड़े भारी दोप हैं। इसमें पुनरुक्ति बहुत है और किसी प्रकार की भी विषय सम्बन्धी धरतीय नहीं है। सब बातें सत्र जगह मौजूद हैं। न कोई कम है और न कोई विषयों का उचित पान। इस कारण से पढ़नेवाला को इस अन्य के सिद्धान्तों का टीक-ठीक थोर साफ-साफ ज्ञान नहीं होने पाता। प्रकरण विभाग केवल नाममात्र है। प्रत्येक प्रकरण में प्रायः सभी प्रकरणों के सिद्धान्तों का वर्णन है-कितनी अच्छी बात होती कि प्रत्येक प्रकरण में उभी प्रकरण सम्बन्धी बातें होती। लेकिन ऐसा नहीं है। तीसरा दोप आजरत के पाठकों की दृष्टि से इस प्रत्य में यह है कि यह प्रन्य बहुव ही पड़ा है। बहुत सी बातें बार-बार कही गई है और उसी रूप में वही गई हैं। बहुत जगहों पर तो लेखक यही भूल गया है कि वह एक दार्शनिक अन्य लिख रहा है। उसको यही ध्यान रहा है कि यह एक कान्य लिस रहा है और काव्योचित सौन्दर्य की रचना करने में वह अपने आपको पूर्णतया भूल गया है। यह प्रन्थकार का गुप और दोप दोनों ही है। इन सब कारणों से हमने उन पाठकों के लाभ के लिये जो फेवल इस ग्रन्थ के दार्शनिक सिखान्त ही संपूर्णतया और क्रमबद्ध रीति से जानना चाह, इस वृहत् मन्थ में से २५०० श्लोकों के लगभग चुनकर सनको दार्शनिक दृष्टिकोण से तरतीब देकर और निको नाना विपयाँ में विभाजित करके एक अन्य वासिष्टदर्शन नामक वैय्यार किया है। यह अन्य “मिन्स घाफ वेल्स सरस्वती भवन टेक्स्ट सिरीज" में यू० पीगवर्नमेण्ट द्वारा प्रकाशित हो रहा है। इसमें योगवासिष्ठ के सर्वश्रेष्ठ, दार्शनिक सिद्धान्त सम्बन्धी २५०० श्लोकों का संग्रह किया गया है । यह संग्रह अपने ढग का प्रथम प्रयास है। इस संग्रह कर मी एक सार १५० श्लोकों में वर्तमान लेखक ने श्रीवासिप्टदर्शनसार नाम से किया है जो कि हिन्दी अनुवाद थोर भूमिका समेत प्रकाशित हो चुका है। योगगसिष्ठ के और भी अनेक संक्षेप किए जा चुके हैं। उनमें ५ स्वमार्गमभिशंसन्ति यादिनश्चिनया दशा । विचित्रदेशकालोत्यं मार्ग स्वं पथिका इव ।। (श६६५३) अर्थात् जिस प्रकार यहुत से मुसाफिर नाना देशो से पते आए हुए नाना मागों द्वारा एक ही नगर फो जाते हैं उसी प्रकार सा दर्शन एक ही विचित्र परमार्थ पद को नाना देश और काल में शार हुए मार्गों द्वारा प्राप्त करते हैं। नाना प्रकार से उस परमपद पं पहुँचते हुए वे लोग-परमार्थ का किसी को भी ठीक शान न होने से कारण, और उसका विपरीत ज्ञान होने से भी परस्पर विवाद करते हैं। जिस प्रकार वटोही लोग अपने अपने मार्ग को ही सर्वोत्तम समझते हैं उसी प्रकार वे भी अपने अपने सिद्धान्तों को ही प्रशंसा करते हैं। (३) यही नहीं कि योगवासिष्ठकार फा दूसरे दर्शनों के प्रति इस प्रकार की उदारता का भाव हो, बल्कि वह तो यहाँ तक फहता है फि प्रत्येक मनुष्य को थपने ही उस मार्ग पर चलना चाहिए जिस पर चलने से उसे किसी प्रकार की सफलता और सिद्धि प्राप्त होतो हो । उस मार्ग को छोड़कर किसी दूसरे मार्ग पर चलना ठीक नहीं है । येनेवाभ्युदिता यस्य तस्य तेन विना गति । न शोभते न मुसदा न हिताय न सरफला ॥ (१३०१२) अर्थात्-जिस मार्ग से जिस मनुष्य की उन्नति होती है उस मार्ग पर चले यिना उसकी गति न शोभा देती, न मुस देवी है. न उसके हित के लिये है और न शुभ फनवाली होती है। (४) परम फा वर्णन करते हुए योगवासिष्ठधार लिसवा दे:- यशून्ययादिनां शून्यं प्रम प्रमविदां परम् । विज्ञानमा विज्ञानयिदा यदगलं पदम् ।। (१८१८) पुन्पः सांस्यदृष्टीनामीश्वरो योगवादिनाम । शिव. शशिफलहानां पालः फालैफ्यादिनाम् ॥ (१६) अात्मात्मनस्तन्दुिषां नराम्यं तादृशात्मनाम । मध्यं माध्यमिफानां प सर्व मुसमचेतसाम् ।। (श६७।२०) अर्यात्-परम तत्व यही है जिससे शून्ययादी लोग शून्य, भासवादी अर, विशानयादी विशनमान, सांग्यदृष्टिपाले पुरुप, तत्त्व के सारे दार्शनिक सिद्धान्तों का वर्णन नहीं होता। और किसी प्रकार का ययोचित क्रम नहीं है। मुक्तिकोपनिषद् में योगवासिष्ठ के 'वासनात्याग' के सिद्धान्त का ही ७६ श्लोकों में सार है। वराहोपनिपद् में “योगकी सात भूमि- कायों" और "जीवन्मुक्त के लक्षणो" का ही ३० श्लोकों में वर्णन है। 'योगकी सात भूमिकाओं" सम्बन्धी योगवासिष्ठ के ४० श्लोकों को लेकर किसी पाठक ने उनका नाम अक्षि-उपनिषद् रख लिया । योगवासिष्ठ के इन सब संक्षेप में यही त्रुटियाँ हैं कि न तो उनमें कोई ठीक क्रम है और न उसके सारे सिद्धान्त उनमें रखने का प्रयत्न किया गया है। जो बातें जिसको पसन्द आई उनको उसने योगवासिष्ठ में से निकाल कर अलग कर दिया और उस संग्रह को कोई नाम दे दिया। इनसे भिन्न प्रकार का हमारा वासिष्टदर्शन और उसका सार हमार वासिष्ठदर्शनसार है। इन दोनों में योगवासिष्ठ के सिद्धांत समप्र, क्रमबद्ध, यथोचित शीर्षकयुक्त रूप में रसने का प्रयास है। इनके एक धार पाठ से ही पाठक को योगवासिष्ठ के दर्शन का ठीक ठीक शान हो जायगा।
कुछ के नाम हम यहाँ पर देते हैं। इन सब में आजकल के पाठकों फी दृष्टि से अनेक त्रुटियाँ हैं। सबसे उत्तम और सबसे प्रथम संक्षेप काश्मीर के गौड अभिनन्द द्वारा नवीं शताब्दी में किया हुआ लघु योगवासिष्ठ नामक है। इस में ४८२६ श्लोक हैं । ६००० श्लोक कहे जाते हैं। उन्हीं ६ प्रकरणों में जो कि योगवासिष्ठ में हैं, संक्षेपकार ने वृद्धत् मन्य की कहानियाँ और सिद्धान्तों का सार, ४२२६ श्लोकों में रसने का प्रयत्न किया है। प्रयत्न बहुत ही सराहनीय है, किन्तु इसमें योगपासिष्ठफे यहुतसे दार्शनिक विषय छूट गए हैं, और निर्वाण प्रकरण के उत्तरार्द्ध का सार बिल्कुल ही नहीं दिया गया। यह निर्वाण प्रकरण के पूर्वार्द्ध तक का ही सार है। इस प्रन्थ में भी यह दोप है कि विषयों का कोई उचित प्रम नहीं है। जो तरतीय वृहत् अन्य में है यही इसमें है। जो लोग योगवासिष्ठ के सिद्धान्त और पहानियाँ-दोनों-संक्षेप से जानना चाहें उनके लिये यह ग्रन्थ बहुत ही उत्तम है, किन्तु जो लोग योगवासिष्ठ के दार्शनिक सिद्धान्त ही पूर्णतया जानना चाहें उनके लिये यह पन्ध पर्याप्त नहीं है। प्रायः लोग इसी ग्रन्थ का पाठ करते हैं। एक और सार, जो कि दार्शनिक दृष्टि से लघु योगवासिष्ठ से उत्तम है फिसी अशात व्यक्ति का किया हुया है। उसका नाम योगवासिष्ठसार है। इसमें २२५ श्लोकों में निम्नलिसित शीर्षकों में वृहत् ग्रन्थ का सार किया गया है:-१-वैराग्य, २-जगन्मिथ्यात्य, ३-जीवन्मुफलक्षण, ४- मनोनाश,५-पासनालय, ६-प्रारमध्यान, ७-मात्माग, -श्रात्मस्वरूप, --जीवन्गुफि। यह भी एक उत्तम प्रयास है। लेकिन इसमें योगवासिष्ठ के दार्शनिक सिद्धान्तों फा अंश मात्र ही आता है। तरतीप भी ठीक नहीं है। यह अन्य विलायव फे फई हस्तलिसित पुस्तकों के पुस्तकालयों में मौजूद है, और पई वर्ष हुए मुरादायाद फे लक्ष्मीनारायण प्रेस से पा भी था। योगवासिष्ठ फे और संक्षेप-जिनका पता अभीतक किसी को भी नहीं था-महोपनिषद् और अन्नपूर्णोपनिपद् नामफ हैं। इनमें से प्रथम सार ५३५ श्लोकों में और द्वितीय ३३१ श्लोकों में है। इनमें भी ऊपरयाले सार की नाई कहानियों नहीं है, येयल दार्शनिक सिद्धान्तों का ही संग्रह है। फिन्तु दोनों में मिलाकर मी योगयासिष्ट के सारे दार्शनिक सिद्धान्तों का वर्णन नहीं होता। और किसी प्रकार का ययोचित कम नहीं है। मुक्तिकोपनिषद् में योगवासिष्ठ के 'यातनात्या के सिद्धान्त का हो ७६ श्लोको में सार है। वराहोपनिषद् में "योगकी सात भूमि काओं" और "जीवन्मुक के लक्षण" का ही ३० श्लोकों में वर्णन है। "योगकी सात भूमिकाओं" सम्बन्धी योगवासिष्ठ के ४० श्लोकों को लेकर किसी पाठक ने इनका नाम अक्षि-उपनिषद रस लिया ! योगवासिष्ठ के इन सब सत्तेपी में यही त्रुटियों हैं कि न तो उनमें कोई ठोक कम है और न उसके सारे सिद्धान्त उनमें सपने का प्रयल किया गया है। जो बात जिसको पसन्द भाई उनको उसने योगवासिष्ठ में से निकल कर अलग कर दिया और उस संग्रह को कोई नाम २दिया। इनसे भिन्न प्रकार का हमारा वासिष्ठदर्शन और उसका सार हमार वासिष्ठदर्शनसार है। इन दोनों में योगवासिष्ठ के सिद्धांत समय, क्रमपद्ध, ययोचित शीर्पफयुक्त रूप में रखने का प्रयास है। इनके एक बार पाठ से ही पाठक को योगवासिष्ठ के दर्शन का ठीक टीक ज्ञान हो जायगा।
कुछ के नाम हम यहाँ पर देते हैं। इन सब में आजकल के पाठकों फी दृष्टि से अनेक त्रुटियाँ हैं। सबसे उत्तम और सबसे प्रथम संक्षेप काश्मीर के गोड अभिनन्द द्वारा नवीं शताब्दी में फिया हुधा लघु योगवासिष्ठ नामक है। इस में ४८२६ श्लोक हैं । ६००० श्लोक कहे जाते हैं। उन्हीं ६ प्रकरणों में जो कि योगवासिष्ट में हैं, संक्षेपकार ने वृहत् अन्य की पहानियाँ और सिद्धान्तों का सार, १८२६ श्लोकों में रसने का प्रयन किया है। प्रयत्न बहुत ही सराहनीय है, किन्तु इसमें योगवासिष्ठके बहुतसे दार्शनिक विपय छूट गए हैं, और निर्वाण प्रकरण के उत्तरार्द्ध का सार विल्कुल ही नहीं दिया गया। यह निर्वाण प्रकरण के पूर्वाद्ध तक का ही सार है। इस प्रन्थ में भी यह दोप है कि विषयों का कोई उचित प्रम नहीं है। जो तरतीय बृहत् प्रन्थ में है वही इसमें है। जो लोग योगवासिष्ठ के सिद्धान्त और पहानियों-दोनी-संक्षेप से जानना चाहें उनके लिये यह ग्रन्थ बहुत ही उत्तम है, किन्तु जो लोग योगवासिष्ठ के दार्शनिक सिद्धान्त ही पूर्णतया जानना चाहें उनके लिये यह पन्ध पर्याय नहीं है। प्रायः लोग इसी मन्थ का पाठ करते हैं। एक और सार, जो कि दार्शनिक दृष्टि से लघु योगवासिष्ठ से उत्तम है. किसी अज्ञात व्यक्ति का किया हुआ है। उसका नाम योगवासिष्ठसार है। इसमें २२५ श्लोकों में निम्नलिखित शीर्षकों में वृहत् अन्य का सार किया गया है:-१-वैराग्य, २-जगन्मिध्यात्य, ३--जीवन्मुक्तलक्षण, ४- मनोनाश, ५-पासनाक्षय, ६-प्रात्मध्यान, -आत्मार्चन, -यात्मस्वरूप, ६-जीवन्मुक्ति। यह भी एक उत्तम प्रयास है। लेकिन इसमें योगवासिष्ठ फे दार्शनिक सिद्धान्तों फा अंश मात्र ही आता है। तरतीय भी ठीक नहीं है। यह प्रन्य विलायत के फई हस्तलिखित पुस्तकों के पुस्तकालयों में मौजूद है, और पई वर्ष हुए मुरादाबाद के लक्ष्मीनारायण प्रेस से छपा भी था। योगवासिष्ट के और संक्षेप-जिनका पता अभीतक किसी को भी नहीं था-महोपनिषद् और अन्नपूर्णोपनिषद् नामक है। इनमें से प्रथम सार ५३५ श्लोकों में और द्वितीय ३३१ श्लोकों में है। इनमें भी ऊपरयाले सार पी नाई पहानियों नहीं है, येयल दार्शनिक सिद्धान्तों का ही संमद है। फिन्तु दोनों में मिलाकर मी योगवासिष्ठ के सारे दार्शनिक सिद्धान्तों का वर्णन नहीं होता। और किसी प्रकार का ययोचित कम नहीं है। सक्तिकोपनिषद् में योगवासिष्ट के 'वासनात्याग' के सिद्धान्त का ही ७६ श्लोकों में सार है। वराहोपनिषद् में “योगी सात भूमि काया" और "जीवन्मुक के लक्षणों का ही ३० श्लोकों में वर्णन है। "योगकी सात भूमिकाओं" सम्बन्धी योगवासिष्ट के ५० श्लोकों को लेकर किसी पाठक ने उनका नाम अक्षि-उपनिषद् रख लिया। गोगडासिष्ठ के इस सब संक्षेपों में यही त्रुटियाँ हैं कि न तो उनमें कोई क क्रम है और न उसके सारे सिद्धान्त उनमें रखने का प्रयत्न किया गया है। जो बात जिसको पसन्द आई उनको उसने योगवासिष्ट में से निकाल कर अलग कर दिया और उस संमह को कोई नाम २दिया। इनसे भिन्न प्रकार का हमारा वासिष्टदर्शन और उसका सार इमार वामिष्ठदर्शनसार है। इन दोनों में योगवासिध के सिमांत समय, ऋमवद्ध, अयोचित शीर्षकयुक्त रूप में रखने का प्रयास है। इनके इस बार पाठ से ही पाठक को योगवासिष्ठ के दर्शन का ठीक ठीक धान हो जायगा।
कुछ के नाम हम यहाँ पर देते हैं। इन सब में आजकल के पाठकों फी दृष्टि से अनेक त्रुटियाँ हैं। सबसे उत्तम और सबसे प्रथम संक्षेप काश्मीर के गौड अभिनन्द द्वारा नवीं शताब्दी में किया हुआ लघु योगवासिष्ठ नामक है। इस में ४८२६ श्लोक है ( ६००० श्लोक कहे जाते हैं)। उन्हीं ६ प्रकरणों में जो कि योगवासिष्ठ में हैं, संक्षेपकार ने बृहत् मन्थ की कहानिये और सिद्धान्तों का सार, १८२६ श्लोकों में रसने का प्रयत्न किया है प्रयत्न बहुत ही सराहनीय है, किन्तु इसमें योगवासिष्ठके बहुतसे दार्शनि विपय छूट गए हैं, और निर्वाण प्रकरण के उत्तरार्द्ध का सार बिल्लुरु ही नहीं दिया गया। यह निर्वाण प्रकरण के पूर्वार्द्ध तक का ही सार है। इस ग्रन्थ में भी यह दोप है कि विपयों का कोई उचित का नहीं है। जो तरतीय बृहत् ग्रन्थ में है वही इसमें है। जो लोग योगवासिष्ठ के सिद्धान्त और फहानियों-दोनों-संक्षेप से जानना घाई उनके लिये यह अन्य बहुत ही उत्तम है, किन्तु जो लोग योगवासिष्ठ से दार्शनिक सिद्धान्त ही पूर्णतया जानना चाहे उनके लिये यह ग्रन्थ पयांन नहीं है। प्रायः लोग इसी अन्य का पाठ करते हैं । एक और सार, जो कि दार्शनिक दृष्टि से लघु योगवासिष्ठ से उत्तम है किसी अज्ञात व्यक्ति का किया हुआ है। उसका नाम योगवासिष्टसार है। इसमें २२५ श्लोकों में निम्नलिसित शीर्षकों में वृहत् अन्य का सार किया गया है:-१-वैराग्य, २-जगन्मिध्यान्न ३-जीवन्मुक्तलक्षण, ४- मनोनाश, ५-पासनाक्षय, ६-आत्मध्यान, ७-आत्मान, -श्रात्मस्वरूप, ६-जीवन्मुक्ति। यह भी एक उत्तम प्रयास है। लेकिन इसमें योगवासिष्ठ के दार्शनिक सिद्धान्ती फा अंश मात्र ही पाता है। तरतीय भी ठीक नहीं है। यह अन्य विलायत के कई हस्तलिखित पुस्तकों के पुस्तकालयों में मौजूद है, और पई वर्प हुए मुरादाबाद के लक्ष्मीनारायण प्रेस से छपा भी था। योगवासिष्ठ के और संक्षेप-जिनका पता अभीतक किसी को भी नहीं था-महोपनिषद् और अन्नपूर्णोपनिपद् नामक है। इनमें से प्रथम सार ५३५ श्लोकों में और द्वितीय ३३१ श्लोकों में है। इनमें भी ऊपरयाले सार पी नाई कहानियों नहीं है, येवल दार्शनिक सिद्धान्तों का ही संग्रह है। किन्तु दोनों में मिलाकर मी योगवासिष्ट के सारे दार्शनिक सिद्धान्तों का वर्णन नहीं होगा। और किसी प्रकार का यथोचित कम नहीं है। मुक्तिकोपनिपद में योगवासिष्ठ के 'यासनात्याग' के सिद्धान्त का ही ७६ श्लोकों में सार है। वराहोपनिषद् में "योगकी सात भूमि- काओं" और "जीवन्मुक्त के लक्षणो" का ही ३० श्लोकों में वर्णन है। "योगकी सात भूमिकाओं" सम्बन्धी योगवासिष्ठ के ४० श्लोकों को लेकर किसी पाठक ने उनका नाम अक्षि-उपनिषद् रस लिया । योगवासिष्ट के इन सम सोपों में यही त्रुटियाँ हैं कि न तो उनमें कोई ठौक कम है और न इसके सारे सिद्धान्त उनमें रखने का प्रयल किया गया है। ओ बातें जिसको पसन्द आई उनको उसने योगवासिष्ठ में से निकाल कर अलग कर दिया और उस संग्रह को कोई नाम दे दिया। इनसे भिन्न प्रकार का हमारा वासिष्टदर्शन और उसका सार हमार वासिष्ठदर्शनसार है। इन दोनों में योगवासिष्ट के सिद्धांत प्रमम, क्रमबद्ध, यथोचित शीर्षकयुक्त रूप में रसने का प्रयास है। इनके एक बार पाठ से हो पाठक को योगवासिष्ठ के दर्शन का ठीक डीक ज्ञान हो जायगा।
वसिष्ठजी ने उसे अपनी दिव्य दृष्टि द्वारा ही जानकर रामचन्द्रजीको पवलाया था जैसा कि योगवासिष्ठगत भविष्यकालीन भाषा से प्रकट है। किन्तु इतिहासज्ञ परिडत यह नहीं मानेंगे। वे शो यही कहेंगे कि भगवद्गीता योगवासिष्ठ के रचना काल में अवश्य ही वर्तमान रही होगी। यह सम्भव है कि उसमें आजकल प्राप्त होनेवाले सभी ७०० श्लोक न रहे हों। हमें यहाँ पर इस विषय में और कुछ नहीं फहना है। यह विषय भगवद्गीता के विद्वानों के लिए छोड़ते हैं। (1देखिये हमारा कल्याण के गीता में “योगवासिष्ठ में भगवद् गीता" नामक लेख)।
परिच्छेद ७ योगवासिष्ठ के उपाख्यान जैसा कि हम पहिले कह चुके हैं। योगवासिष्ठकार ने अपने दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन स्वानुभव, दृष्टान्त और उपाख्यानों द्वारा किया है। समरत अन्य में ५५ उपारयान है। इनमे से कुछ पास्यान तो यहुत ही अच्छे, रोचक और उपदेशप्रद है। वसिष्ठ और रामचन्द्रजी का संवाद भी एक उपारयान हो के रूप में है। योगवासिष्ठ की दृष्टान्ती और कहानियों द्वारा ब्रह्मज्ञान के उपदेश करने की इस रीति का गुजराती भाषा में चन्द्रकान्त, उर्दू मे चहल दरवेश और हिन्दी में ज्ञानवैराग्यप्रकाश नामक पुस्तकों में भली- भाँति अनुसरण किया गया है। यहाँ पर हम पाठकों को योगवासिष्ठ सय पारयानों का दिग्दर्श मात्र कराना चाहते हैं। (१) योगवासिष्ठ की कथा एक समय मुवीक्षण नामक एक ब्राह्मण के मनमें यह शंका उत्पन्न हुई कि मोक्ष प्राप्ति का साधन कर्म है अथवा बान, अथवा दोनों । इस संशय की निवृत्ति के लिये वह अगस्ति के श्रापम पर गया और इसने उनसे यही प्रश्न किया। अगस्ति ने उत्तर दिया : मोक्ष न केवल फर्म से प्राप्त होता है, न केवल ज्ञान से ही। पक्षी एक पंख से नहीं उड़ सकता । जैसे उसे श्राकाश में पड़ने के लिए दोनो पंखों की आवश्यकता है, ऐसे ही जान और कर्म दोनों ही मोक्ष प्राप्ति. के साधन हैं। मैं इस विषय में तुमको एक पुराना इतिहास सुनाता हूँ:-अग्निवेश्य का वेदवेदाङ्ग जानने वाला एक पुत्र गुरु के घर से विद्या पढ़कर लौट आने पर इसी प्रकार की शंका से व्यथित होकर सब नित्य नैमित्तिक फर्मों को त्याग कर चुपचाप रहने लगा। अग्निवेश्य ने अपने पुत्र को इस अकर्मण्य दशा में देखकर उससे कहा -पुर! तुम कर्म क्यों छोड़ बैठे ? कर्म किए बिना तुमको सिद्धि कैसे प्राप्त होगी। कारण ने फहा -पिताजी ! कुछ शास्त्र तो परमार्थ सिद्धि के लिए फर्म करने का उपदेश देते हैं और कुछ कर्म त्याग का। मेरी समझ में नहीं पाता कि कौन सा मार्ग ठीक है । आप ही इस विषय में मुझे मयोचित उपदेश दीजिए। अग्निवेश्य पोले :-इस सम्बन्ध में (७०) पसिष्ठजी ने उसे अपनी दिव्य दृष्टि द्वारा ही जानकर रामचन्द्रजीको मतलाया था जैसा कि योगवासिष्ठगत भविष्यकालीन भाषा से प्रकट है। किन्तु इतिहासज्ञ पण्डित यह नहीं मानेंगे। वे तो यही कहेंगे कि भगवद्गीता योगवासिष्ठ के रचना काल में अवश्य ही वर्तमान रही होगी। यह सम्भव है कि उसमें आजकल प्राप्त होनेवाले समी ७०० श्लोक न रहे हों। हमें यहाँ पर इस विषय में और कुछ नहीं फहना है। यह विषय भगवद्गीता के विद्वानों के लिए छोड़ते हैं। (देखिये हमारा कल्याण के गीताङ्क में "योगवासिष्ठ में भगवद्- गीता" नामक लेस)।
शपि! कृपया मुझे वह मार्ग पतलाइए जिसके द्वारा मैं संसार के पन्धन और दुयों से निवृत्त हो जाऊँ। ऋपि ने कहा हे राजन् ! मैं तुमको मोक्षप्राप्ति का यह सारा उपदेश सुनाता हूँ जो कि किसी समय पर पसिष्ठ ऋपि ने अपने शिष्य श्री रामचन्द्रजी को दिया था। उसको सुनसर तुमको आत्मनोध होगा और तुम जीवन्मुक्त हो जाओगे। इस मोक्षोपाय नामक पसिष्ठ-राम सवाद का मैंने बहुत दिन हुए सूप्रह किया था। इसकी रचना करने पर मैन इसे अपने विनीत शिष्य भरद्वाज को सुनाया था। भरद्वाज इसको सुनकर बहुत प्रसन्न हुए, और ब्रह्माजी के पास जाकर सन्होंने इसको ब्रह्माजी को सुनाया। ब्रह्माजी इसको सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने यह याशीर्वचन फा-श्री वाल्मीकिजी ने संसार के अपकार के लिये यह ऐसा नत्तम प्रत्य बनाया है कि इसके अयणमात्र से ही मनुष्य भवसागर से सहज मैं पार हो जायेंगे ! राजन् । वही अन्य मैं तुमको अन तुम्हारे हित के लिये सुनाता हूँ। दूत नै सुरुचि को वह सारी क्या कह सुनाई जो कि उसने वाल्मीकि ऋपि के मुँह से सुनी थी। (२) वसिष्ठ-राम-संवाद की कथा अरिष्टनेमी ने वाल्मीकिजी से पूछा .--हे भगवन् ! राम कौन थे थौर उनको पसिष्ठत्री ने क्यों और क्या उपदेश क्यिा ? ऋषि बोले- शाप के कारण अज्ञ मनुप्य का रूप धारण किए हुए श्री विष्णु भगवान् हो रामचन्द्र थे। एक समय विषणु भगवान ब्रह्मलोक में गए । सव लोगों ने उठकर उनको प्रयास किया, किन्तु सनकुमार शान्तचित्त रियरभार से मैठे रहे। यह देखकर विष्णु को उनपर शोध आ गया और उन्होंने उनको शाप दिया--हे सनत्कुमार | तुमको अपने निष्काम होने का गर्व है इसलिये इस गर्य को दूर करने को मैं तुमको शाप देना हूँ कि तुम शरजन्म नाम के कामी राजा के रूप से पृथ्वी- कोक में जन्म लोगे। समकुमार ने यह सुनकर विष्णु भगवान से कहा--में भी श्राप को शाप देता हूँ कि आप अपनी सर्वनता को छोड- पर, जिसका मिश्राप को गर्व है, कुछ दिनों व अज्ञानी जीव बनकर मुमण्डल पर पास करोगे। यही विष्णु अयोध्या के राजा दशरथ- के यहाँ रामचन्द्र नामक पुत्र के रूप में आए थे, और जयतक पसिष्टजी द्वारा उनको प्रारमशान का उपदेश नहीं हुआ था, अशनी ही रहे थे। इस उपदेश के दिए जाने की क्या इस प्रकार है: एक समय, - मैं तुमको एक पुरानी कथा सुनाता हूँ । उसको सुनकर तुम्हारी यह शंका पूर्णतया निवृत्त हो जावेगी : -एक समय सुरुचि नाम की एक सुन्दर अप्सरा हिमालय के शिसर पर बैठी हुई प्रकृति की शोभा या निरीक्षण कर रही थी। उसने इन्द्र के एक दूत को अन्तरिक्ष में जावे हुए देसफर बुलाया और उससे पूछा-हे दूत, तुम कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जानोगे? दूत ने उत्तर दिया :- सुभगे ! भूलोक में अरिष्टनेमी नामका एक राजा था। उसने अपने पुन को राज्य देवर अपने भविष्य कल्याण के लिये गन्धमादन पर्वत पर घोर तप करना आरम्भ कर दिया था। मेरे स्वामी इन्द्र को जब यह मालूम हुआ तो उन्होंने अपने दूतों को भेजकर उनको बड़े आदर और सत्तार के साथ अपने यहाँ बुलवा लिया और स्वर्ग में रहने के लिये उनको निमंमित किया। राजा ने इन्द्र से यह प्रार्थना की :-हे देव ! स्वर्ग में वास करने से पहिले मैं यह जानना चाहता हूँ कि स्वर्ग मे पास करने के गुण और दोप क्या हैं। इन्द्र ने कहा :-राजन, स्वर्ग में नाना प्रकार के भोग हैं, पर वे सब अपने-अपने शुभ कर्मा के अनुसार ही मिलते हैं। उत्तम फर्मावाली को उत्तम भोग, मध्यम फर्मोवालों को मध्यम, और फनिष्ठ प्रकार के पुण्य कौवालो को कनिष्ठ प्रकार के भोग स्वर्ग में प्राप्त होते हैं। ऊँची श्रेणी के व्यक्तियों को नीची श्रेणी वालो के प्रति अभिमान, नीची श्रेणीवाली को ऊंची श्रेणीयाला के प्रति ईयां और मन में वेदना होती है, वरावर श्रेणी के व्यक्तियों में एक को दूसरे के प्रति स्पर्धा होती है। पूर्वकृत पुण्य कमाँ का कल भोग द्वारा क्षीण हो जाने पर स्वर्गवासियों को फिर मर्त्यलोक में पापिस जाफर जन्म-मरण के चक्र में पड़ना पड़ता है। यह सुनकर राजा ने इन्द्र से यहा:-देव ! इस प्रकार के स्वर्ग मे रहने की मेरी इच्छा नहीं है। मुझे आप कृपया गन्धमादन पर्वत पर वापिस भेज दीजिए। यहीं पर में तप फरते-मरते किसी प्रकार की भोगेच्छा न रसते हुए अपने शरीर का त्याग पर दूंगा। हे देवि ! इन्द्र ने तय मुमसे यह पहा:-हे दूत ! यह राजपि को तत्यान का अधिकारी है। इस तुम याल्मीकि ऋषि के धाश्रम पर ले जायो वे इन्फो प्रात्मशान पा उपदेश देंगे, जिसके प्रयण परने से इनको गोत की प्राप्ति होगी। हे मुरचि! देवराज इन्द्र की यह बाशा पाते ही में राजा परिष्टनेमी को बाल्मीकि ऋपि आश्रम पर ले गया। वर्दी पर पहुंच फर राजा ने पाल्मीकिजी को साष्टाम प्रणाम करके एनसे यह प्रश्न किया है किस चीज़ का ध्यान करते हैं। हम केवल यही जानते हैं कि वे प्रति- दिन करा होने जाते हैं, पीले पड़ते जाते हैं, और ऐसे प्रभाहीन होते जा रहे हैं जैसे कि शरद ऋतु के अन्त में वृक्ष । उनको हालत को देखकर उनके और माई मी दुसी रहते हैं। माताओं को भी बड़ी चिन्ता लग रही है। हे राजन्, हम नहीं जानते कि उनके लिए क्या किया जाय । अत' थापको सूचित्त करने आए हैं। राता को रामचन्द्रजी की ऐसी दशा मुनकर बहुत शोक हुआ। राजसभा में विश्वामित्रजी, जो कि राजा दशरथ से अपनी यज्ञरक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को माँगने श्राए ये--और यसिष्ठजी जो कि उनके राजगुरु थे, बैठे हुए थे। यह सब बातें सुनकर और राजा को चिन्तित देखकर विश्वामित्रजी बोले-दे राजन्, यदि रामचन्द्रजी का ऐसा हाल है तो उनको यहाँ बुलवाओ-हम उनका दुख निवृत्त करेंगे। वसिष्ठजी उनको ऐसा उपदेश देंगे कि उनका सर शोक निवृत्त हो जावेगा, और उनको तत्त्वज्ञान प्राप्त होकर परमानन्द की प्राप्ति होगी। और चे ससार में एक आदर्श पुरुप होकर अपने जीवन को इस प्रकार बितायेंगे कि संसार उनका अनुकरण करेगा। यह सुनकर राजा दशरथ की चिन्ता कुछ कम हुई। उन्होंने रामचंद्रजी को बुलवा लिया। गमचन्द्र वहाँ आए और सनको यथायोग्य प्रणाम करके बैठ गए । यमिष्ठ और विश्वामित्र के पूछने पर उन्होंने अपने मन को व्यया विस्तारपूर्वक सुनाई । सक्षेपत उनका कथन यह था:- च्यों ज्यों मेरी शैशावावस्था व्यतीत हो रही है मेरे मन में यह विचार द होता जाता है कि संसार में कोई भी मार वस्तु नहीं है। जगत् में मुझे कुछ भी प्रास्या नहीं रही। मेरी समझ ही में नहीं पाता कि राज्य करनेसे, भोगों के पीछे दौड़ने से, लदमी का उपार्जन करने से, सुंदर स्त्रियों के सङ्ग से, मनुष्य को किस मुख की प्राप्ति होती है। रावदिन मैं देखता हूँ कि जिनको यह सम वस्तुएँ प्राप्त है वे भी महा दुखी हैं। संसार के भोगों से मुस की आशा करना भ्रम है, मृगतृष्णारूप है। इन्द्रियों के भोग विपले सर्प के फरण की नाईदुसदायी है। मनुष्य को इस जीवन में फमी और कहीं भी शान्ति प्राप्त नहीं होती। जीवन के पीछे क्या होता है हम नहीं जानते। हम कहाँ से आते हैं, कहाँ जाते हैं, कुछ मालूम नहीं है। यह ससार क्या है, क्या है और इसका क्या अन्त है, हम कुछ नहीं जानते ! मनुष्य को किसी अवस्था में चैन नहीं है। शैशवावस्या मोहपूर्ण और दुःपदायी है। युवा अवस्था पी रूपी जय कि रामचन्द्रजी शैशवावस्था को समाप्त करके युवावस्था में पदार्पण कर रहे थे, उनके मन में यह विचार उठा कि जीवन में क्या सार है, यहाँ मनुष्य सुसरूपी मृगतृष्णा के पीछे दौड़ते दौड़ते अपना सारा जीवन विता देते हैं, किन्तु किसी को दु स से रहिव सुख की प्राप्ति नहीं होती। रात दिन संसार की सलमनी में फंसे रहते हैं और कभी शान्ति का अनुभव नहीं करते। उत्पन्न होते हैं और कुछ दिन जीवित रहकर मर जाते हैं। कोई भी नहीं जानता कि कहाँ से आते हैं और कहो जाते हैं। यह संसार क्या यना, फैसे धना और क्य घना ? इससे छूटने का कोई उपाय है अथवा नहीं है ? इत्यादि प्रश्न रामचन्द्रजी के मन में उठे और वे इनको सोचने में इतने लीन हो गए कि उनको अपने नित्य को और अपने साने-पीने, शयन और विहार करने में किसी प्रकार की भी रुचि न रही। जा शिला की मूर्ति की नाई दिन रात वैठे हुए सोचते रहते थे। रामचन्द्रजी की यह दशा देखकर उनके नौकर-चाकरों ने बहुत ही घपराकर दरवार में आकर महाराज दशरथ के प्रति उनकी शोचनीय दशा का इस प्रकार वर्णन किया:-हे राजन् ! फुगर रामचन्द्रजी की दशा अत्यन्त ही शोचनीय हो गई है। हमारी समझ में ही नहीं याता कि उनको हो क्या गया है। बहुत बार याद दिलाने पर वे अपने नित्य कामो को करने में प्रवृत्त होते हैं, और उनको किसी प्रकारमा उत्साह नहीं है। सदा ही सिन्न वदन रहते हैं। स्नान, देवार्चन, पान, भोजन आदि भी करते हैं, पभी नहीं करते । पारा जरा सी पातो पर उनको प्रोध आ जाता है, क्योकि जो कुछ भी ननको करना पड़ता है वे मन से नहीं करते। कोई भूपण उनको पसन्द नहीं आता। जो युवतियों उनको प्रसन्न करने के लिये उनके पास छोडी गई हैं, उनसे उनको यहुत ही पृणा होती है। उनको नाचते गाते और मूने में मूलते देखकर उनसे उनका द्वेष होता है। जितने सुन्दर, स्वादु और मनोहर पदार्थ हैं उनको देसफा वे नाक पदा लेते हैं। सदा ही मौन रहते हैं। हास प्रहाम से चिढ़ते हैं। एकान्त पसन्द फरते हैं। यदि कभी उनको दम पोलते हुए सुनते हैं तो ऐसे शद हमारे कानों में पड़ते हैं:-सम्पत्ति से क्या! विपत्ति से क्या घर यार से क्या ! राग रग से फ्या! मप पुन व्यर्थ है; पिसी यस्तु से परमानन्द नहीं मिलवा । हम नहीं जानते फि ये क्या पाहते है।
किस चीज़ का ध्यान करते हैं। हम केवल यही जानते हैं कि चे प्रति- दिन पूरा हो जाते हैं, पोले पड़ते जाते हैं, और ऐसे प्रभाहान होते जा रहे हैं जैसे कि शरद ऋतु के अन्त में वृक्ष । उनको हालत को देसार उनके और माई भी दुसी रहते हैं। माताओं को भी बड़ी चिन्ता लग रही है। हे राजन्, हम नहीं जानते कि उनके लिए क्या किया जाय । मन भाएको सूचित करने आए हैं राजा को रामचन्द्रजी की ऐसी दशा सुनकर बहुत शोक हुश्रा। राजसभा में विश्वामित्रजी, जो कि राजा दशरथ से अपनी यज्ञरक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को माँगने आए थे--और यसिष्ठनी जो कि उनके राजगुरु थे, बैठे हुए थे। यह सब बातें सुनकर और राजा को चिन्तित देखकर विश्वामित्रजी बोलेन्दे राजन्, यदि रामचन्द्रभी का ऐसा हाल है तो उनको यहाँ बुनवाओ-हम उनका दुःस निव करगे। पसिनी उनको ऐसा उपदेश देंगे कि उनका सर शोक निच हो जायेगा, और उनको तत्त्वज्ञान प्राप्त होकर परमानन्द की प्राप्ति होगी। और वे संसार में एक आदर्श पुरुप होकर अपने जीवन को इस प्रकार विसावेंगे कि संसार उनका अनुकरण करेगा। यह सुनकर राजा दशरय की चिन्ता कुछ कम हुई। उन्होंने रामचंदनीको धुलवा लिया। गमचन्द्र वहाँ पाए और समको यथायोग्यर प्रणाम करके पेट गए । वसिष्ठ और विश्वामित्र के पूछने पर उन्होंने अपने मन की व्यया विस्तारपूर्वक सुनाई । सक्षेपतः उनका कथन यह था:- व्यों या मेरी शैशावावस्था व्यतीत हो रही है मेरे मन में यह विचार द होता जाता है कि संसार में कोई भी सार वस्तु नहीं है। जगत् में मुझे कुछ भी पास्या नहीं रही। मेरी समझ ही में नहीं आता कि राज्य करने से, भोगों के पीछे दौड़ने से, लक्ष्मी का उपार्जन करने से, सुंदर स्त्रियों के सङ्ग से, मनुष्य को किस मुख की प्राति होती है । रातदिन मैं देखता है कि जिनको यह सब वस्तुएँ प्राप्त है वे भी महा दुखी हैं। संसार के भोगों से मुख की प्राशा करना भ्रम है, मृगतृष्णारूप है । इन्द्रियों के भोग विपते सर्प के फाण को नाई दुखदायी है। मनुष्य को इस जीवन में कमी और कहीं भी शान्ति प्राप्त नहीं होतो। जीवन के पीछे क्या होता है हम नहीं जानते। हम कहाँ से आते हैं, कहाँ जाते हैं, कुछ मालूम नहीं है। यह संसार क्या है, क्यों है. और इसका क्या अन्त. हम कुछ नहीं जानते । मनुष्य को किसी अवस्था में पेन नहीं है। रोरावावस्या मोहपूर्ण और दुःसदायी है। युवा अवस्या स्त्री रूपी मृगतृष्णा के पीछे दौड़ने में नष्ट हो जाती है। वृद्धावस्था में सा शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। काल सबको सा जाता है। वर फिर किस लिये मनुष्य संसार के पीछे दौड़ता रहता है ? हे ब्राह्मन् , मुके तो संसार की किसी भी वस्तु की चान्छा नहीं है। न मुझे इस जीवन से कुछ प्रेम है क्योंकि मुझे इसमें कुछ भी सार नहीं दिसाई पड़वा । यदि आप जानते हों तो, कोई ऐसा मार्ग बताओ जिससे मुझे परम शान्ति और परम पद फी प्राप्ति हो। मुझे आप यह मार्ग यताओ जिस पर चलने से मुझे संसार रूपी गड्ढे में न गिरना पड़े, जिससे मैं संसार में रहते हुए भी संसार के दुःसों में न फं। यदि आप मुझे कोई ऐसा उपाय नहीं बतलायेंगे, तो मैं स्वयं अपने आप ही सोच कर किसी ऐसे उपाय को ढूंहूँगा । और यदि मैं अपने निज के प्रयत्न से भी संसार से बाहर न हो सका और परम पद और सत्य की प्राप्ति न कर सका, तो, मैंने यह निश्चय कर लिया है कि धन्न और जल का त्याग करके एक स्थान पर घेठ कर चिन्तन करते करते इस शरीर का त्याग कर दूंगा। वसिष्ठ और विश्वामित्र रामचन्द्रजी की इस तीन जिज्ञासा को देस फर बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजी ने रामचन्द्र को उस तत्वज्ञान का उपदेश दिया जिसका वर्णन हम आगे करेंगे। इस उपदेश को सुन कर रामचन्द्रजो को पात्मज्ञान की प्राप्ति हुई और वे जीवन्मुक्त हो कर परम आनन्द को प्राप्त हुए, और संसार में, जल में फमल की नाई रह कर आदर्श पुरुष बने। रामचन्द्रजी के जीवन को आदर्श बनानेवाला वसिष्ठनी का उपोश ही योगवासिष्ठ नामक ग्रंथ का विषय है। ३-शुक की कथा श्रीरामचन्द्रजी का विवेक और पैराग्य और तत्त्वज्ञान के लिये टनकी तीन जिज्ञासा देस फर विश्वामित्र राम से पोले - हे राम! तुम वो तत्त्वज्ञान के योग्य अधिकारी हो, तुम को शान प्राप्त करने में बुद्ध भी पायास और समय नहीं लगेगा। तुम्हारा अशान का परदा यहुव ही पतला हो गया है, पसिष्ठजी के उपदेश मात्र से ही तुम्हारा अशान नष्ट होकर आत्मज्ञान का प्रकारा होगा, और तुम जीवन्मुक्त हो कर हम संसारमंजीयन व्यतीव फरोगे। व्यास के पुत्र शुक्रकी नाई नुमशानके उत्तम अधिकारी हो और उनकी नाई ही घुमको क्षण भर में शान हो जायेगा। राम ने पूछा-हे मुने! शुफ के शान प्राप्त होने की फया पाप मुझे सुनाइये। विधामित्र योले- -सडे ? भगवान् व्यास के पुत्र शुरु सब शास्त्रों में निपुण थे। एक समय धनके मनमें यह विचार आया कि मैंने सब कुछ पढ़ लिया, किन्तु यमी वक मुझे न परमानन्द का ही अनुभव हुश्रा और न यही मालूम हुआ कि यह मसार कैसे उत्पन्न हुथा है और कैसे इसकी निवृत्ति होगी। यह सोच कर कि उनके पिता व्यासजी सर्वन हैं वे ही उनकी शङ्काओं को निवृत्ति करेंगे, शुक अपने पिता के पास गए और उनके सम्मुस उन्होंने अपनी निझासा प्रकट की। व्यासजी ने उनको फहा-पुत्र । मैं सर्वतत्व नहीं हूँ, राजा जनक सर्वतत्त्वज्ञ हैं। तुम उनके पास जायो। वे ही तुम्हारी शकाओं की निवृत्ति करेंगे। शुकदेवजी पिता की याज्ञा पाकर मिथिला नगरी पहुंचे, और राजा जनक के द्वार पर था कर उन्हाने द्वारपाल से राजा से मिलने का आशय प्रकट किया। द्वारपाल ने जा कर राता से कहा कि द्वार पर शुकदेवनी सड़े हैं और आप से मिलना चाहते हैं। जनक समझ गए कि शुरुदेवजी तत्त्वज्ञान प्राप्त करने के निमित्त आए हैं। कुछ सोच कर उन्होंने कहा- रहने दो। शुरुदेवजी सात दिन तक द्वार पर ही सडे रहे। आठवें दिन राना ने पूछा शुकदेवजी खडे हे या चले गए द्वारपाल ने कहा-महाराज चे तो उसी प्रकार निश्चल और निस्तन्य सड़े हैं जैसे कि आने वाले दिन थे। राजा ने कहा- उनको ले आयो और अन्नपुर में रानियों और सुदर स्त्रियों के मध्य में उनको रस कर उत्तम प्रकार के भोजन करायो और सब प्रकार के भोग भुगवानो। शुकदेवजी इस परिस्थिति में भी सात दिन रहे किन्तु उनको यहाँ रहने से हर्ष हुआ और न शोऊ न किसी वस्तु से उनको घृणा हुई, श्रीर न किसी के लिये इच्छा। राजा को उनके व्यवहार की सर सूचना मिलती रही। पाठय दिन फिर राजा ने उनको अपने पास बुलगाया। शुकदेवजी ने जनक को श्रादर के साथ प्रणाम किया। जनक ने कहा- शुकदेवजी, आप किस लिये यहाँ पर आए हैं। शुकदेवनी घोले - राजन , मैं यह जानना चाहता हूँ कि यह ससार कैसे उत्पन होता है और किस आधार पर स्थित है और पैसे इसका तय होता है। क्या इससे थाहर निकल कर शान्त और निश्चल अानन्द में स्थित रहने का भी कोई उपाय है ? राना पोले, हे शुक । यह ससार अपने चित्त में ही स्पन्न होता है और चित्त के नि सक्ल्प, निद, अथवा निसरण होने से क्षीण होता है। चित्त के सकार मे इसकी स्थिति है। हरय फे लिये जय-वस मन में वासना है तभी तक संसार का अनुभव होता है। वासना का सर्वथा तय होने से ही आत्मानुभव होकर परमानन्द में स्थिति होती है। यह सुनकर शुकदेवजी मिथिला से सुमेरु पर्वत पर चले गए और वहाँ जाकर निर्विकल्प समाधिका अनुभव करके निर्वाणपद में स्थित हुए। ४-यमिष्ठजीकी उत्पत्ति और ज्ञानप्रामि की कथा - शुकदेवजी की ज्ञानप्राप्ति की क्था मुनकर रामचन्द्रजी की तत्वज्ञान प्राप्ति की इच्छा और भी तीव्र हो गई। उन्होने वसिष्ठजी से हाय जोड़कर प्रार्थना की। पसिष्टनी ने कहा ! मे तुमको आज उस पूरा ज्ञान का उपदेश देना प्रारम्भ करूंगा जो कि मुझे सृष्टि के आदि में ब्रह्मा ने दिया था। उसकी कथा इस प्रकार है जय कमलयोनि ब्रह्मा इस जगत् फी सृष्टि कर चुके और संसार में मनुष्य फर्म के नियमानुसार मुग्वदु स भंवर में फंस गए, तो उनसे मनुप्यो फी इस दीन दशा को देखकर बहुत फणा उपजी। उन्होंने सोचा कि कोई ऐसा उपाय मनुष्यों को बताना चाहिए जिसके द्वारा वे इस संसार चक्र से निवृत्त होकर परमानन्द की प्राप्ति और अनुभव कर सकें। यह सोपफर उन्होंने तप, धर्म, दान, सत्य और वीर्थ इत्यादि नपायों को रचना की, किन्तु उनको यही जान पड़ा कि इनमें से कोई उपाय ऐसा नहीं है जिसके द्वारा मनुष्य निर्वाण नाम परम मुग्य की प्राप्ति कर सके। वे फिर सोचने लगे, और उनके ध्यान करते करते उनके संकल्प द्वारा उत्पन्न होकर पक्ष की माला और कमण्डलु धारए पिए हुए एक सर्वस देहधारी मनुष्य उनके सामने सड़ा होकर उनको प्रणाम करने लगा। उनका यह मानसपुर में ही वसिष्ठ था। मुझे देसते ही प्रामा यहुत प्रसन्न हुए। किन्तु उनको यह अन्या नहीं लगा फि में सर्वश था, क्योंकि मेरे सर्वस होने से मुझे अज्ञजनों के प्रति फरणा पैसे आती-जो अन रहकर सर्वतता को प्राप्त होता है पही अशजनों के दुसां से अनुदु पित हो सकता है इसलिये मुझे उन्होंने शाप दिया कि पर काल पे लिये मैं या दो जाउँ। में श दो गया, और पिता ब्रह्मा से मैंने पात्मनान घोर तत्त्वज्ञान देने की प्रार्थना की और कहा है भगवन । इस महादु गदायी ससाररूपी ग्याधिकी प्रोपधि यतायो। पैसे यह संस र उदय होता है और पैसे इसका तय होता है ? प्रमाजी ने मुझे इन सप प्रभो या विस्तारपूर्वक उत्तर , (७) दिया, और थोड़े ही समय में मुझे समस्त तत्वज्ञान प्राप्त हो गया। तब ब्रह्माजी ने मुझे यह आज्ञा दी कि मैं जम्बूद्वीप के भारतवर्ष नामक देश में जाकर वास करूँ, और संसार के लोगों के कल्याण के निमित्त रम तत्त्वज्ञान का प्रचार करूँ, जो कि मुझे ब्रह्मा ने दिया था, ताकि कुछ लोग जिनको संसार से विरक्ति हो गई है, आत्मज्ञान प्राप्त करके निर्वाण पद प्राप्त करें। मुझे आज्ञा मिली है कि जो पुरुप कर्मपरायण है और ससार के उत्तम उत्तम भोगों का भोग करना चाहते हैं, उनको में कर्मकाण्ड का मार्ग बतलाऊँ और जो संसार से विरक हो गए हैं और संमार-समुद्र के पार निर्वाण पद में स्थित होना चाहते हैं उनको शान का मार्ग बतलाकर जीवन्मुक्त बनाऊँ। इस प्रकार हे राम ! मैं परमपिता प्रझाजी का नियुक्त किया हुआ यहाँ पर स्थित हूँ। तुम जान के उत्तम अधिकारी हो, इसलिये तुम्हें में वह सम्पूर्ण ज्ञान जो कि पिता जी ने मुझे दिया था दूंगा। उसको सुनकर तुम परमानन्द को प्राप्त होगे और जीवन्मुक्त होर संसार में विचरोगे। ५-आकाशज की कथा रामचन्द्रजी ने वसिष्टमी के सम्मुख अपने वैराग्य की दशा को वर्णन करते हुए संसार में मृत्यु के साम्राज्य का वर्णन किया था, और यह यवलाया था कि कोई पुरप भी ऐसा नहीं है जिसको काल न खाता, हो। वसिष्ठ ने सनसे पहिले रामचन्द्रजी को यही बतलाया कि मृत्यु फेवल अज्ञानी तीव के लिये ही है जिसने कि अपने आप को मरणशील भौतिक देह ही मान रक्खा है। जो जीव वासनापूर्वक फर्म करवा है वही मृत्यु का भाजन है क्योंकि उसको अपनी वास- नाओं की पूर्ति करने और अपने कर्मों का फल भोगने के लिए ही दूसरी परिस्थितियों में जन्म लेना होता है। जो तत्वज्ञानी है, जिसके मनमें संसार के विषयों के लिये लेशमात्र भी वासना नहीं है, जो सकाम कर्म नहीं करता, अपने आपको सदा ही चिदाकाश में स्थित रसता है, और मौतिक शरीर का थभिमानी नहीं है, उसके लिए मृत्यु कोई चीज हो नहीं है । मृत्यु उसको स्पर्श करने में भी असमर्थ है । इस विषय में यसि पजी ने रामचन्द्रजी को आकाशज की कथा सुनाई जो इस प्रकार है:- आकाशज नामक एक ब्राह्मण था। उसकी उत्पत्ति शुद्ध चिदाकाश थे, बिना किसी पूर्व धर्म किए, लीला मात्र से हुई थी। उत्पन्न होकर भी यह सदा ही अपने चिदाकाश स्वरूप में - ( 7 ) के लिये जन-वक.सन में बासना हे तभी.तक संसार का अनुभव होता है । वासना का सर्वथा क्षय होने से ही प्रात्मानुभव होकर परमानद में स्थिति होती है। यह सुनकर शुकदेवजी मिथिला..से. सुमेरु पर्वत पर चले गए और वहाँ जाकर निर्विकल्प समाधिका अनुभव करके निर्वाणपद में स्थित हुए ४-वसिष्ठजोकी उत्पत्ति और ज्ञानप्राप्ति की कथा - शुकदेवजी फी ज्ञानप्राप्ति की कथा सुनकर रामचन्द्रजी की तत्त्वज्ञान प्राप्ति की इच्छा और भी तीव्र हो गई। उन्होंने वसिष्ठजी से हाय जोड़कर प्रार्थना की। वसिष्ठजी ने कहा ! मैं तुमको आज उस पूरा ज्ञान का उपदेश देना आरम्भ करूंगा जो कि मुझे सृष्टि के प्रादि में ब्रह्मा ने दिया था। उसकी कथा इस प्रकार है.- जय कमलयोनि ब्रह्मा इस जगत् फी सृष्टि कर चुके और संसार में मनुष्य फर्म के नियमानुसार मुखदुःस भँवर में फंस गए, तो उनको मनुष्यों की इस दीन दशा को देखकर बहुत फरणा उपजी। उन्होंने सोचा कि कोई ऐसा उपाय मनुष्यों को बताना चाहिए जिसके द्वारा वे इस संसार चक्र से निवृत्त होकर परमानन्द की प्राप्ति और अनुभव कर सके। यह सोचकर उन्होंने तप, धर्म, दान, सत्य और वीर्थ इत्यादि नपायों की रचना की, किन्तु उनको यही जान पड़ा कि इनमें से कोई उपाय ऐसा नहीं है जिसके द्वारा मनुष्य निर्वाण नाम परम मुस की प्राप्ति कर सके । वे फिर सोचने लगे, और उनके ध्यान करते करते उनके संकल्प द्वारा उत्पन्न होकर पक्ष की माला और कमण्डलु धारण किए हुए एक सर्वश देहधारी मनुष्य उनके सामने सड़ा होकर उनको प्रणाम करने लगा। उनका यह मानसपुत्र में ही वसिष्ठ था। मुझे देसते ही प्रत्मा यहुत प्रसन्न हुए। किन्तु उनको यह अच्छा नहीं लगा फि में सर्वज्ञ था, क्योंकि मेरे सर्वश होने से मुझे अशजनों के प्रति फरणा कैसे थाती-जो अत रहकर सर्वज्ञता को प्राप्त होता है यही अशजनों के दुःसों से अनुदुःसित हो सकता है इसलिये मुझे उन्होंने शाप दिया कि पुत्र काल के लिये मैं प्रा हो जाऊँ। में प्रश हो गया, और पिता ब्रह्मा से मैंने आत्मज्ञान और तत्त्वज्ञान देने की प्रार्थना की और कहा-हे भगवन ! इस मदादुल्यदायी संसाररूपी ग्याधिकी ओपधि बतायो। पैसे यह संसार उदय होता है और फैसे इसरा तय होता है ? प्रमाजी ने मुझे इन सय प्रभों का विस्तारपूर्वक उपार ( १ ) पारयानों में से है । इसके द्वारा वसिष्ठजी ने रामचन्द्र को बहुत सी गृह और विचित्र पार्टी का उपदेश दिया है। मृत्यु क्या है ? मृत्यु के पीछे क्या होता है ? सृष्टि के भीतर सृष्टि और उसके भीतर भी सृष्टि-प्रकार अनन्त सृष्टियों के होने का वृत्तान्त, वासना के अनु- सार आगामी जीवन का बनना-इत्यादि अनेक रहस्यों का इस उपा. स्यान में वर्णन है। उपाख्यान बहुत यड़ा है । प्रत्येक पाठक को यह आख्यान योगवासिष्ठ में से पढ़ना चाहिए। यहाँ पर हम इसका बहुत संक्षेप से ही वर्णन कर सकते हैं। पृथ्वीमण्डल पर किसी समय पद्म नाम का एक राजा राज्य- करता था। वह बहुत ही योग्य और सर्व गुण सम्पन्न था। उसके अनुरूप गुणशीलवाली उसकी रानी थी, जिसका नाम लीला था। लोला अपने स्वामी में बहुत अनुरक्त थी और कल्पना में भी कमी उससे जुदा होकर रहना नहीं चाहती थी। वह यही चाहती रहती थी कि उसका स्वामी सदा जीवित रहे, कभी उसकी मृत्यु न हो । लोला ने अपने नगर के सर्वोत्तम पण्डितों को बुलाकर यह पूछा कि कौन सा उपाय ऐसा है जिससे मनुष्य मृत्यु के मुख में न जाए। विद्वानों ने कहा-हे देवि! कोई उपाय ऐसा नहीं है जिससे संसारी मनुष्य उत्पन्न होकर मरे नहीं; जो उत्पन्न हुअा है यह अवश्य ही नाश को प्राप्त होता है। लीला निराश होकर सरस्वती देवी की उपासना करने लग गई। सरस्वती ने प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा । लीला ने सरस्वती से यह वर माँगा कि यदि उसके स्वामी की मृत्यु उससे पहिले हो जाए तो उनका जीव उसके कमरे में ही रहे, इससे पाहर न आने पाए। सरस्वती देवी यह वर देकर और यह महकर कि जब लीला उसको याद करेगी वह प्रकट हो जाया करेगी, अन्तयोंन हो गई। समय आने पर पद्म की मृत्यु हो गई। लीला बहुत दुसरी और शोकातुर होकर रोने लगी। एक आकाशवाणी ने उसको पतलाया कि पथराने की जरूरत नहीं है, राजा का जीव उसके कमरे में ही मौजूद है। राजा के शव को ययाविधि उस समय तक सुरक्षित रसने का प्रयत्न करना चाहिए जब तक कि वह उनके प्राण लीटने पर पुनर्जीवित न हो जाए। लीला को यह अाकाश राणी सुनकर बहुत पाश्चर्य हुआ। उसने सरस्वती का ध्यान किया, और सरस्वती देवी अपने वचन के अनुसार या उपस्थित हुई। लीला ने देवी से पूछा ६ स्थित रहता था, किसी विषय के लिये उसके हृदय में वासना नहीं थी, और न वह किसी फागना से प्रेरित होकर कोई गर्म करता था। इस प्रकार का जीवन बिताते हुए उसको जय बहुत समय चीत गया तो मृत्यु को खयाल पाया कि यह प्राहाण बहुत समय से जीवित है, अभी तक मरा नहीं, इसको अय मारना चाहिए। मृत्यु ने उसको मारने का वारंवार प्रयत्न किया, किन्तु यह असफल रही। अपने को अपने नित्य के धर्म का पालन करने में इतना असमर्थ पार मौत को आश्चर्य, सेद, और क्रोध, सभी कुछ हुमा! जय अपनी असफलता का कारण मृत्यु की समझ में न आया, तो यह अपने स्वामी यमराज के पास पहुंची, और उनके प्रति अपने विस्मय और अपनी असफलता का हाल यहा। उसको मुनकर यमराज बोले-हे मौत, तू तो निमित्तमात्र है। तू किसी को नहीं मार सफ्ती, केवल प्राणियों के कर्म ही उनको मारते हैं। जिसने पासना स्मक कर्म किए हैं वही तुम्हारा शिकार होता है। जाओ, पाश शज ब्राह्मण के कर्मों की तलाश करो। यदि तुमको उसका पोई भी कामनापूर्वक पिया हुआ फर्म मिल गया, तो तुम उसको मारने में समर्थ हो सकोगी, अन्यथा नहीं। मौत ने मुफिया पुलिस की नई ब्राह्मण के साथ गुम रूपसे रहकर उसके जीवन का भी निरीक्षण रिया, और उसके पूर्व कालीन जीवन का भी भलीभाँति हाल जाना, किन्तु उसको प्राकाशज प्रामण के जीवन में एक भी यासनात्मक कर्म नहीं मिला । उसको स्थिति सदा ही प्रात्मभाव में रहती थी। किसी विषय के प्रति उसकी वासना नहीं थी। उसके चित्त में कोई भी ऐसी कामना नहीं थी जिसकी सिद्धि के लिए यह कोई फर्म करता हो । उसके सारे फाम स्वभाव-प्रेरित थे। यह संसार को किसी परनु और प्राणी को भी अपने से भिन्न और याहर नहीं समझना था । उसको क्षणभंगुर देह और मनके साथ प्रात्मत्व का अभिमान नहीं होता था। अय मृत्युको समझ में आ गया कि श्राफाराज का जीवन क्यों उसके फायू से पाहर है । यह यमराज के पास गई और उनसे यह योलो कि जो आप कहते थे ठीक निकला। मैं किप्तो को नहीं मारती। प्राणियों के कर्म ही उनको मारते हैं। ६-लीला का उपारल्यान लीला का उपारपान योगवासिष्ट के सर्वश्रेष्ठ और सबसे लम्प ।
र रहे हैं। लीला को यह बात सुनकर वह स्थान देखनेकी बहुत सुरुवा हुई। सरस्वती लीला को उस सृष्टि में ले गई। वहाँ पर जाकर लीला ने वह झोपड़ी देसी जिसमें कि माझए सिष्ठ और उनकी पत्नी अरुन्धती रहते थे। एक दिन वसिष्ठ ने एक ना की सवारी बड़े ठाठबाट के साथ निकलती देखी । उसको देखकर नके मन में एक दोन वासना उस सुख और वैभव को भोगने की इजो कि राजाओं को प्राप्त होता है। उसी दिन ब्राह्मण का शरीर गया। अरुन्धती ने मो यह वर माँग रक्सा था कि यदि माझए पसे पहिले मर जाय दो उसका जीव उसकी झोपड़ी से बाहर न ने पाए, और सदा उसका और उसके पति का साथ रहे। ब्राझए के रने पर उसकी पत्नी को बहुत दुःस हुथा और उसकी चिता पर ठकर वह सती हो गई। सरस्वती ने लीला से कहा कि यह सब चांत केवल एक सप्ताह व्यतीत हुए हुआ था। वह ब्राह्मण तुम्हारे ति पल के रूप में और ब्राह्मणी तुम्हारे रूप में इस सृष्टि में राज्य का ख भोगने के लिये उत्पन्न हुए थे। तुम दोनों का जीव उस कुटिया से हर नहीं गया ! लीला को यहुत आश्चर्य हुधा और यह जानने की मुकना बढ़ी कि वह उससे पहिले के जन्मों में क्या थी और कहाँ iiसरस्वती की सहायता से उसको अपने सब पूर्व जन्मों का द्वान उदय हो गया। अब सरस्वती और लीला दोनो उस लोक में लौटी जहाँ पर पम वेदूरय राजा के रूप में राज्य कर रहा था। उनको यह देखकर बहुत वरमय हुआ कि अब राजा विदूरण ७० वर्ष की अवस्या के दिखाई ते है | उसकी वर्तमान स्त्री का नाम मी लीला है। क्योंकि वह लीला बहुत पाहता था, इसलिये उसको इस जन्म में भी लीला ही मिली। शीला पौर सरस्वती राजा विरप के एकान्तवास के समय उनके सामने गट हुई और उनको दनके पूर्व जन्म के पारूप को याद दिलाई। विदूरय के चित्त में पद्म होने की वासना उदय हो आई। इसी समय दूसरी लीला ने मी सरस्वती देवी से यह वर माँग लिया था कि भाले जन्म में यह अपने पति को पनो पने। कुछ समय के पीछे विदूरय के राज्य पर बाहर से आक्रमण होने लगे और एक वहा संग्राम सिंह गया। इस संग्राम में राजा विदूरय मारा गया। इसका जी जो कि लीला के कमरे से कभी बाहर नहीं गया था, वहाँ पर मुरदित पड़े हुए कि उसके स्वामी अब कहाँ हैं। देवी ने कहा कि वे इसी कमरे में है, किन्तु दूसरी सृष्टि में हैं, जो कि इस सृष्टि से सूक्ष्म है और जो इसके भीतर है । लीला को सरस्वती ने पतलाया कि एक जगत के भीतर दूसरा जगत और उसके भीतर एक तीसरा जगत-इस प्रकार यह सिलसिला अनंत तक जारी है। एक सृष्टि दूसरी सृष्टिवाले जीवों के लिये शून्य है। लेकिन यदि कोई जीव दूसरी सृष्टि के व्यवहार को देखना पाहे तो इस प्रकार की सिद्धि प्राप्त कर सकता है । लीला यह सुनकर अपने पति को उसकी वर्तमान सृष्टि में देखने को बहुत उत्सुक हो गई । यह देसकर सरस्वती देवी ने उसको वह रीति यतलाई जिसके द्वारा यह दूसरी और सूक्ष्मतर सृष्टियों में प्रवेश और वहाँ होनेवाले व्यवहारों का निरीक्षण कर सके। तब सरस्वती और लीला दोनों ने उस लोक में प्रवेश किया जिसमें कि पद्म उस समय अपने वासनायुक्त पूर्व फर्मों का भोग कर रहा था। पद्म को मरे हुए इस सृष्टि में कुछ क्षण ही हुए थे, किन्तु जिस सृष्टि में वह उस समय था जब कि लीला और सरस्वती उसने देखती है, वहाँ पर वह एक १६ वर्ष की अवस्था का राजा पना हुआ एक विशाल राज्य पर राज कर रहा था। लोला को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि इतने थोड़े समय में १६ वर्ष फैसे व्यतीत हो गए और उसके कमरे के भीतर ही सारी सृष्टि और बहुत यहा साम्राज्य कैसे दिखाई देता है। सरस्वती ने लीला को समझाया कि देश और काल के अणु अगु के भीतर महान् महान् जगत् हैं, और सारे जगतों के देश और फाल का हिसाब एक ही नहीं है। जो घटना एक सृष्टि के एक क्षण में हो जाती है वह दूसरी के एक फल्प में होती है। जिस प्रकार मनुष्य अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ एक क्षण में सालो तक होनेवाले स्वप्न के व्यवहारों का एक मनन्त संसारक्षेत्र में अनुभव कर लेवा है उसी प्रकार सप सपियों फा हाल है। सरस्वती ने लीला से कहा इसमें तुमको क्या भारपर्य होता है, इससे अधिक आश्चर्य की वो यह याद है कि कुल एक सप्ताह भी नहीं व्यतीत हुआ कि तुम्हारे स्वामी पन यनने से पहिले एक प्राह्मण थे और तुम उनकी पनी थी। यदि तुमको विश्वास न हो तो आमो में तुमको दिरालाती है कि उस मामण दम्पति की कुटिया प्रय खाली पड़ी है और उसके लड़के याले अमी उसकी मृत्यु का शोक मूद है और कौन ज्ञानी है प्रश्नों की एक सूची तैयार की। जो जीव से मिलता उसी से यह प्रश्न करती थी। उत्तर न पाने पर उसको मए कर जाती थी। ऐसा करते करते जब उसको कुछ समय हो गया दो एक दिन उसको एक वन में सैर करता हुआ एक किराच राजा दिखाई पड़ा। वह दौड़कर राजा के पास आई और उससे उसने अपने सय प्रश्न पूछे। राजा ब्रह्मज्ञानी था। उसने उसके सय प्रश्नों का संतोपजनक और यथोचित उत्तर दे दिया। इसलिये उसने राजा को साने से छोड़ दिया और उससे मित्रता करना और उसके संग रहना पादा। राजा की प्राशा से पसने अपना कुरूप वेप त्याग कर मुन्दर शरीर धारण किया और सुन्दर वस्त्र और भूषणों से अलंकृत होकर यह राजमहल में रहने लगी। राजा के राज्य में जो लोग पाप और अधर्म करते थे और जिनको राजदरवार से मृत्युदण्ड मिलता था, वे उसको साने के लिये दिये जाते थे। इस प्रकार वह कुछ दिन शान्ति से जीवन वितार उत्तम गति को प्राप्त हुई। ८. इन्दु ब्राह्मण के लड़कों की कथा जीव केवळ संयमय है। जो संकलर इसके प्रदय में दृढ़ हो आता है वह हो या प्राकार धारण कर लेता है। संकल्पमय चित्त अस प्रकार के जगत् की कल्पना करता है, वैसा ही समस्त जगत् क्षण iनिर्मित हो जाता है। सारा ब्रह्माण्ड मन की ही कल्पना है, और त्येक मन में जगत के रचने की सामथ्र्य है । इस सिद्धान्त को प्रतिपादन करते हुए यसिष्टजीने रामचन्द्रजी को ब्रह्मा के मुम्ब द्वारा सुनी हुई इन्दु गमण के लड़कों की कथा, जो सक्षेपतः इस प्रकार है, सुनाई। एक समय की बात है कि जगत्सष्टा प्रहा अपनी महाप्रलय को निद्रा से जागकर जब नई सृष्टि की रचना करने को ही थे तो उनको मालूम रहा कि सृष्टिको पहिले से रची हुई है। उनको बहुत ही आश्चर्य हुआ। जो सृष्टि उनको दिखाई पड़ी उसके सूर्ग से उन्होंने पूछा कि यह सृष्टि मेरे रनने से पहले ही कहाँ से आ गई । सूर्य ने कहा, हे देव, एक ही सृष्टि नहीं, ऐसी ऐसी दस सृष्टियाँ श्राप के रचे बिना ही रची गई है। ममा ने विस्मय के साथ पूछा कि इनके रचनेवाले कौन है ? सूर्य देव ने कहा- मगयन, आपकी पूर्वरचित सृष्टि में फैलाश पर्वत के नीचे जो जम्बूद्वीप या उसमें स्वर्णजट नाम का एक प्रान्त या! यहाँ पर इन्दु (८४ ) शव में प्रविष्ट हो गया, और पद्म नामक देह जाग उठी। पद्म ने ठते ही अपनी पुरानी दुनिया का अनुभव किया और अपने सामने दोनों लीलाबों को. जिनमें उसकी वासना थी, सड़े हुए पाया। अपनो दोनों पन्नियों के साथ सुग्व से फिर कुछ काल तक पाने जीवन व्यतीत किया। विसिष्ठ ने रामचन्द्र से कहा कि जो कुछ हमारे जीवन में होता है सब हमारी वासनाओं के अनुसार ही होता है। जीवन-मरण, साथी सङ्गी, लोक-लोकान्तर सब हमारी वासनाओं के पनाए यनते हैं। कर्कटी राक्षसी की कहानी मूख लोग दुःस भोगने और मरने के लिये हो जीते हैं। जिसने अपने आत्मा को नहीं जाना, उस मूर्स का जीवन ही मृत्यु है । ममा ने सृष्टि के आदि से यह नियम बना रक्खा है कि हिंस्र जीवों ( दरिन्दों) के भक्षण के लिए मूद प्राणी हैं, आत्मज्ञानी जन नहीं है। संसार में जो उदार गुणों वाले देहधारी हैं, वे इस पृथ्वीतल पर वर्तमान चन्द्रमा है। वे अपने सङ्ग से सबको शीतलता प्रदान करते हैं। सारे गुणों से सत्तम गुण अध्यात्मविद्या हैउसको जानने से ही राजा राजा होता है और मन्त्री मन्त्री होता है; अन्यथा नहीं। इन सिद्धान्तों को समझाने के लिये श्री पसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी फो कर्कटी (विपूचिका ) का उपाख्यान सुनाया, जो संक्षेपतः इस प्रकार है। हिमालय पहाड़ की उत्तरीय घाटी में कर्कटी नाम की एक राक्षसी रहती थी। यह अन्य जीवों को साकर अपना पेट भरती थी। किन्तु बहुत दीर्घकाय होने के कारण मदा ही भूसी रहती थी। इसलिये उसने उम्र तपस्या की और ब्रह्मा को प्रसन्न करफे यह घर माँगा कि उसका श्राकार सूई के समान हो जाय । ब्रह्मा ने एयमन्तु कहा और तभी से फर्कटी का प्राकार सूचि के समान हो गया और उसका नाम बम विचिका पड़ा । उसने इस विपिका रूप से बहुत से जीपों का हनन किया। किंतु उसको रह रहकर यह पछताया होता था कि बहुत बड़े यहे जन्तुओं को मारने पर भी उसके शरीर में फेयल एफ छोटी-सी पंद्र उसने फिर तपस्या की और ग्रमा को प्रसन्न करके यह पर माँगा कि उसका शरीर फिर उतना ही यड़ा हो जाए जितना कि पहले था। ब्रह्मा ने यह पर देने से पहले उससे यह वादा करा लिया कि यह केवल मूद जीयों को ही मारकर अपना पेट भरेगी, जानी को पनहीं कहेगी । करंटी ने यह मालूम करने के लिए कि कौन जीव खून जाता था दूसरे से मिलने की सदा हो चाह रहती थी। रानी जब कभी भवसर पाती इन्द्र को बुला लेती और उसके साथ आनन्द से समय बिताती । यह यात धीरे धीरे राजा को भी मालूम हो गई। राजा ने उन दोनों का विच्छेद कराने का यथाशक्ति यत्न किया किन्तु असफल रहा। उसने उन दोनों को हर एक प्रकार का शारीरिक दुःख दिया--मत्त हाथी के पैरों में डलवा दिया, कोड़ों से पिटवाया, अन्न-जल न मिलने दिया-पर उन दोनों का ध्यान एक दूसरे पर इवना लगा हुआ था कि शरीर के कड़े से कड़े दुःस का उनको भान नहीं हुआ। इन्द्र ने राजा से कहा कि मेरा जगत दो अहिल्यामय है। आपने जो सैकड़ों दुःस मुझे दिए हैं वे मुझे मालूम ही नहीं पड़े । और अहिल्या का जगत् मन्मय हे अर्थात् वह सब जगह मुझे ही देखती है, इसलिये उसको भी किसी दूसरे के दुःस देने से जरामी दुःस नहीं मालूम होता । राजा को बहुत सेद हुआ क्योंकि वह उन दोनों को सब प्रकार फा कष्ट देने पर भी उनको एक दूसरे के मन से दूर न करा सका। सब राजा ने मरत नाम के मुनि के पास जा कर और सर हाल कह कर उनसे यह प्रार्थना की कि वे उन दोनों को शाप दें। भरत ने उनको शाप दिया कि वे नष्ट हो जाएँ। उन दोनों ने भरत और राजा से कहा-इस शाप से हमारा कुछ नहीं बिगड़ता। ज्यादा से ज्यादा यह शाप हमारे शरीर ही को नष्ट कर देगा। शरीर की तो हमें कुछ मुघ युध ही नहीं। हमारे मनों को जो एक दूसरे के ध्यान में अचल हैं शाप मष्ट नहीं कर सकता। ये दोनों मन जहाँ भी रहेंगे शरीरों की पुनः रचना कर लेंगे। दोनों शरीर शाप के कारण भूमि पर सुसे वृत्तों की नाई गिर पड़े। दोनों मृग योनि में पैदा हो कर एक दूसरे से प्रेम करते रहे। इसके पीछे दोनों पक्षी हो कर एक दूसरे में रत रहे। फिर दोनों ब्राह्मण दम्पत्ति के रूप में आए। इसके पीछे भी उनके अनेक जन्म हो चुके है लेकिन हर जन्म में वे एक दूसरे को प्रेम करते हैं। ०-चित्तोपाख्यान संमार के जितने सुख-दुःख हैं.ये सब चिच के अधीन है। वन्य और मोक्ष भी चित्त को हो अवस्याएं हैं। जो चिच यासनाओं की पूर्ति के लिये सर पर दौड़ता रहता है उसको कर्मा चैन नहीं मिलती, जिसने घासनामों से निर्मुक्ति पा ली है वही चित्त शुद्ध ब्रह्म । ( ८६ ) नाम का एक बहुत पवित्र ब्राह्मण और उसकी सुयोग्य पत्नी वास करते थे। उनके यहाँ जब बहुत काल तक कोई सन्तान न हुई तो उन्होंने तप करके शिवजी महाराज से बर पाया कि उनके यहाँ १० महामना पालक होंगे। ऐसा ही हुआ। कुछ काल जीकर वह ब्राह्मण मर गया। पुत्रों को उसके मरने का बहुत दुःस हुआ। सपने इफट्ठा होकर यह सोचा कि पिताजी की यादगार कायम रसने के लिये कोई ऐसा था काम करना चाहिए जो आजतक किसी मनुष्य ने न किया हो । सोचते सोचते वे इस प्रस्ताव पर पाए कि उन दसो को १० ग्रामा बनकर दस सृष्टियों की रचना करनी चाहिए। यह धारणा फरफे वे लोग पद्मासन जमाकर समाधि में पेठकर यह संकल्प करने लगे कि वे ब्रह्मा है और सृष्टि की उत्पत्ति कर सकते हैं। यथोचित समय बीतने पर वह संकल्प द हो गया और १० सृष्टियों की रचना हो गई। यह सृष्टियों तब तक कायम रही जय तक कि उनके संकल्प की शक्ति क्षीण न हुई । ९. अहिल्या रानी और उसके प्रियतम इन्द्र की कहानी मन के किसी वस्तु पर थिर हो जाने में कितना आनन्द है और स्थिरचित्त पाले प्रेमी को शरीर के दुयो का फिस प्रकार मान जब होता-यह बात अहिल्या और इन्द्र की कथा से जाहिर है। कम संक्षेप से इस प्रकार है:- मगध देश में इन्द्रद्युम्न नाम का एक यदा प्रतापी राजा था उसकी स्त्री अहिल्या, बहुत रूपवती थी। उसी नगर में इन्द्र नामा एफ अत्यन्त बुद्धिमान प्रामण-कुमार रहता था। रानी ने उस पाझर घुमार की प्रशंसा सुनकर उसको देखना चाहा । किसी ससी द्वार प्राए-कुमार इन्द्र के दर्शन कराए जाने पर यह इसकी परम अनु रागिणी यन गई, और यह पाइने लगी कि इन्द्र प्रसपा होकर इस ही साय रहे। यह उसमें इसनी अनुरक्त दो गई कि सारे जगत् यह तन्मय ही देखने लगी--"वतस्तदनुरका सा परयन्ती सन्म जगत्"-किसी प्रकार से उसने अपने पास इन्ट यो बुलाया उससे अपने हृदय का प्रेम प्रकट किया। इन्द्र भी रानी में धनुर। हो गया, और सारे संसार को मूलपर उसी के ध्यान में रहने लगा। अहिल्या को इन्द्र का ध्यान करने में और इन्द्र को पहिल्या व पान करने में प्रलोरिक आनन्द या अनुमय होता था, और एफ 4 - .
(t) यन्न करने पर मैंने उसको अपने सामने बुलाया और एक दृष्टि उसके उपर डाली। देखते देखते ही उसके सहस्रो हाय और नेत्र क्षीण होने लगे। थोड़े ही समय में उसका सारा शरीर छिन्न भिन्न हो गया और यह मेरे हृदय में प्रविष्ट हो कर शान्त हो गया। मैंने तो यह जाना या कि उस पन में ऐसा उन्मत पुरुष एक ही था और उसको मेरा दर्शन होते ही मुक्ति मिल गई। लेकिन फिर मुझे ऐसे पुरुप उस चन में बहुत से मिले । जो जो मेरे सन्मुस थाप वे सब शान्त हो गए और जिन्होंने मुझमे मुंह छिपाया वे अभी तक इसी प्रकार भ्रमण कर रहे हैं। रामचन्द्रजी ने वसिष्ठजी से पूछा-हे ब्रान् ! वह वन कहाँ है. और यह पुरुप कौन है ? वसिष्ठजी वोले ! हे रामजी! बह बन यह संसार है और यह मत्त पुरुष मन है। सहस्रा नेत्र और हाथ.मन की अनन्त घासनाएँ हैं। यह अन्धकूप गृहस्थ है. करनवे का पुल नरक है और कदली वन स्वर्ग है । में जिसके सम्मुस होता हूँ वह मन शान्त और मुक्त हो जाता है । मैं विवेक हुँ । विचार और विवेक द्वारा ही-मन. घुमनीभाव को प्राप्त होकर निर्वाण और परमानन्द फी प्राप्ति करता है। ११-पालाख्यायिका जो कुच रश्य संसार है वह सय केवल दृष्टि मात्र है । कल्पना और भ्रम से अधिक इसकी सत्ता नहीं है। शून्य ब्रह्म की भित्ति पर मनरूपी चित्रकार ने ये सर चित्र बना रहे हैं। मन की कल्पना के अतिरिक्त इसमें कुछ भी सार नहीं है। जिस प्रकार स्वप्न में रचे हुए जगत् में फन्पना के सिवाय और कुछ भी नहीं है उस प्रकार ही इस संसार की स्थिति है। वस्तुतः तो जगत् है ही नहीं-मन ने अपने भीतर हो इसकी कल्पना कर रक्सी है, और उस कल्पना के वश होकर वह अपने आपको इतना भूल गया है कि उसको दृश्य पदार्थ ही सार और वास्तविक जान पड़ते हैं। यह ऐसे ही होता है जैसे कि कोई पालक सर्वथा मिथ्या कहानी को सुनकर उसको सच समझ कर उसमें सुख और दुःरा का अनुमव करने लगता है । इस विषय को समझाने के लिये वसिष्ठ ने रामचन्द्रजी को एक यह कहानी सुनाई जो किसी दाई ने एक बालक को मुनाई थी, और पालकने उसको सच्ची यात मान ली थी। यह कहानी इस प्रकार है- एक शुन्य नाम का नगर है। उसमें तीन राजपुत्र रहते थे, जिनमें से दो वो अमी पेक्षा ही नहीं हुए ये और एक गर्म में भी नहीं आया था।
.. (८) बन जाता है, और अनुपम परमानन्द का अनुभव करता है-इन माधों को समझाते समय वसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी को चित्तोपाख्यान (चित्त की कहानी ) सुनाया, जो इस प्रकार है: हे राम! एक बहुत बड़ा, शान्त और भयानक वन है। एक समय उसमें विचरते हुए मैंने एक विचित्र पुरुष देसा। वह पुरुप बहुत बड़े शरीर याला, सहस्रों पासों और हाथों वाला था। उसकी कियाएँ पागल की क्रियाओं फी नाई देस पड़ती थीं। यह फभी इधर दौड़ता था, कभी उधर; कभी रोता था, कभी हँसता था; कमी नाचता था, कभी शोकातुर हो कर गिर पड़ता था। उसकी सहसा आखें उसको सहस्रों विषयों का दर्शन कराती थी, जिनकी प्राप्ति के लिये वह अधीर हो कर चारों ओर दौड़ता रहता था, और किसी एक विषय पर स्थिर मति हो कर उसका पास्वादन नहीं कर पाता था। किसी विषय की प्राप्ति न होने पर अथवा उस विषय से वह आनन्द प्राम न होने पर जिसकी कि वह उस विषय से आशा करता था, यह इतना कुद्ध हो जाता था कि वह अपने सहस्रों हाथों से अपनी देह को सूब जोर से पीटने लगता था। ऐसा करते करते वह इतना भयभीत हो जाता था कि वह अपने को सुरक्षित रखने के लिये किसी एकान्य और घने फुञ्ज की शरण लेने के लिये उत्सुक होता था। फिन्तु रोते- रोते उसकी दृष्टि और विवेक बुद्धि इतनी मन्द पड़ जाती थी कि यह अन्धे फी नाई फरखुवे के घने कुल में प्रवेश करके उसके कांटों से विदीर्ण होता था और चिल्लाने लगता था। उसके शरीर में इतनी घेदना होती थी कि उसको मिटाने के लिए यह एक कुएँ में फूद पड़ता था। यह कुओं अन्धेरे और विषैले जन्तुओं से भरा हुआ था और उसमें से नाक को दुःम देने वाली दुर्गन्ध आती थी। रात भर उसमें किसी तरह रह कर प्रातःकाल फिर यह उस फूप से बाहर निकल कर अपने वेचैन जीवन का प्रारम्भ करता था। घूमते फिरते कमी कमी सको फेले का शीवल और मुगन्धित यन मिल जाता था जिसमें यद घड़ी दो घड़ी विश्राम और भर पेट भोजन पा लेता था। लेकिन यहां पर भी उसको शान्ति नहीं मिलती थी। यहां से भाग कर फिर इधर उधर मारा मारा फिरता था। मैंने यह भी विचित्र यात देवी कि मेरे यल करने पर भी वह मेरे सम्मुन्य नहीं होता था। दर समय यह मेरी निगाह से यच फर पलता था। एक समय ऐसा गुमा कि बहुत में यत्न करने पर मैंने उसको अपने सामने बुलाया और एक दृष्टि उसके ऊपर डाली। देखते देखते ही उसके सहस्रों हाथ और नेत्र घीण होने लगे। थोड़े ही समय में उसका सारा शरीर छिन्न भिन्न हो गया और वह मेरे हृदय में प्रविष्ट हो कर शान्त हो गया। मैंने तो यह जाना था कि उस वन में ऐसा उन्मत्त पुरुप एक ही था और उसको मेरा दर्शन होते ही मुक्ति मिल गई। लेकिन फिर मुझे ऐसे पुरुप उस यन बहुत से मिले जो जो मेरे सन्मुख आप वे सब शान्त हो गए और जिन्होंने मुझमे मुंह छिपाया वे अभी तक उसी प्रकार भ्रमण कर रहे हैं। रामचन्द्रजी ने वसिष्ठजी से पूछा है ब्रह्मन् ! वह वन कहाँ है और वह पुरुष कौन है ? वसिष्ठजी वोले ! हे रामजी! यह वन यह. संसार है और वह मत्त पुरुष मुन है। सहस्रा नेत्र और हाथ मन की अनन्त वासनाएँ हैं। वह अन्धकूप गृहस्य है. करवे का कुञ्ज नरक है और कदली पन वर्ग है 1 में जिसके सम्मुख होता हूँ यह मन शान्त और मुक्त हो जाता है । मैं विवेक हुँ। विचार और विवेक द्वारा ही मन. अमनीभाव को प्राप्त होकर निर्वाण और परमानन्द की प्राप्ति करता है। ११-यालाख्यायिका जो पुछ दृश्य संसार है यह सब केवल दृष्टि मात्र है। कल्पना और भ्रम से अधिक इसकी सत्ता नहीं है। शून्य ब्रह्म की भित्ति पर मनरूपी चित्रकार ने ये सब चित्र बना रक्खे हैं। मन की कल्पना के अतिरिक्त इसमें पुछ भी सार नहीं है। जिस प्रकार स्वप्न में रचे हुए जगत् में फल्पना के सिवाय और कुछ भी नहीं है इस प्रकार ही इस संसार की स्थिति है। वस्तुतः तो जगत् है ही नहीं--मन ने अपने भीतर ही इसपी कल्पना कर रक्सी है, और उस कल्पना के वश होकर वह अपने आपको इतना भूल गया है कि उसको दृश्य पदार्थ ही सार और वास्तविक जान पड़ते हैं। यह ऐसे ही होता है जैसे कि कोई पालक सर्वथा मिथ्या कहानी को सुनकर उसको सच समझ कर उसमें मुख और दुःस का धनुभव करने लगता है। इस विषय को समझाने के लिये पसिष्ठ ने रामपन्द्रजी को एक यह कहानी सुनाई जो किसी दाई ने एक बालक को सुनाई थो, और मालक ने उसको सधी वात मान ली थी। यह कहानी इस प्रकार है- एक शुन्य नामफा नगर है। उसमें तीन राजपुत्र रहते थे, जिनमें से दो वो अभी पैदा हो नहीं हुए थे और एक गर्भ में मी नहीं आया था।
वे विपत्ति में पड़ने के कारण दुःसी होकर सोचने लगे और उन्होंने यह निश्चय किया कि बाहर जाकर धनोपार्जन किया जाए। बाहर जाकर मार्ग में उनको बहुत कष्ट हुधा और मार्ग में चलते चलते थककर भूख और प्यास से तंग होकर वे एक तीन वृत्तों के कुंज को छाया में जा बैठे। वे तीन वृक्ष ऐसे थे जिनमें से दो तो उपजे ही नहीं थे और एक का बीज भी नहीं बोया गया था। वहाँ पर बैठ कर उन्होने विश्राम किया और अमृत के समान सुस्वादु फलों का भक्षण किया। थोड़ी देर बाद वहाँ से उठकर वे आगे पढ़े और बहुत सुन्दर, निर्मल और शीतल जल वाली तीन नदियाँ उन्हें दिखाई पड़ी। वे नदियाँ ऐसी थी कि दो तो जलरहित थी और एक सूस गई थी। दोनों ने उन नदियों में बड़े आनन्द के साथ स्नान क्रीड़ा की और जल पिया। फिर चलते चलते जय सायंकाल हो गया तो उनको एक भविष्यनगर दिसाई पड़ा। उन्होंने उसमें प्रवेश किया, और उनको रहने के लिये उस नगर में तीन मकान मिले-जिनमें से दो तो अभी धने ही नहीं ये और तीसरे में एक भी दीवार नहीं थी । वहाँ रहकर उन्होंने तीन प्रामणों को निमंत्रण दिया-जिनमें से दो के तो शरीर ही न थे और तीसरे के मुँह ही नहीं था। उन्होंने तीन थालियों में भोजन किया, जिसमें से दो में तो तली ही नहीं थी और तीसरी चूर्णरूप थी। उस भविष्य मगर में वे तोनी थालक आनन्दपूर्वक अपना जीवन बिताते रहे। यह कहानी मुनाकर वसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी से कहा कि यह संसार भी इस कहानीकी नाई है। फेवल कल्पनापर ही इसकी स्थिति है। सार वस्तु जो कि कल्पित नहीं इसमें कुछ नहीं है। १२-इन्द्रजालोपाख्यान इन्द्रजातोपाख्यान योगवासिष्ठ के सर्वश्रेष्ठ उपास्यानों में से है। इसके द्वारा यसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी को यह पतलाया कि सारा जगन् मत के भीतर है। मन इसको एक निमेष में उत्पन्न कर लेता है और एक निमेप में लीन फर देता है। सारा दृश्य संसार स्वप्न के सदृश है। क्षण भर के स्वप्न में ये सय पटनाएँ घटिव हो जाती है जो कि याप जगत् में, जो एक दूसरा स्वप्न है, युगों और फल्पों में होती है ! जो कुछ याहा जगत् में होता है यही पण भर में मन के अन्दर प्रवीत हो सकता है। संक्षेपतः इन्द्रजालोपास्यान इस प्रकार है :- इस पृथ्वी तल पर उत्तरपारस्य नाम का एक देश था, उस पर लपण समय, 1) नाम का एक बड़ा धर्मात्मा और प्रतापी राजा राज करता था। एक जय कि राजा अपने दरबार में बैठे हुए थे, वहाँ पर एक इन्द्र- जानी (बाजीगर भाया और राजा को यथोचित प्रणाम करके बैठ गया। राजा ने उसको अपना कौतुक दिखाने की आज्ञा दी। इन्द्र- जाली ने अपना पिटारा खोल कर उसमें से एक मोर की पूंछ का गुच्छा निकाल कर राजा के सामने घुमाया। उसके घुमाते घुमाते राजा को निद्रा भा गई और कोई दो घड़ी तक राजा मूर्छित से हो कर निद्रा में पड़े रहे। सब दरबारी लोग सोच में हो गए, और जादूगर को बुरा- भला कहने लगे। जागने पर राजा ने सब लोगों के सम्मुख वह पृचान्त मुनाया जिसका कि उन्होंने उस दो धड़ी के समय में अनुभव किया था। वह इस प्रकार था:- मोर की पूँछ का गुच्छा घूमते देखकर राजा का ध्यान उस ओर ऐसा लगा कि उसको अपनी अवस्था का विस्मरण हो गया और एक विचित्र दृश्य उसके सामने आया। उसने देखा कि एक दूसरे राजा का दूत एक बहुत तेज और सुन्दर घोड़ा लिए उसके सामने उप- स्थित है। दूत ने राजा से प्रार्थना की कि वह घोड़ा उनकी सवारी के लिए उसके राजा ने भेंट रूप से भेजा है। राजा बहुव प्रसन्न हुए और उस घोड़े पर सवार होकर बाहर निकले। घोड़ा बहुत तेज था। राजा को लेकर वह अति वेग से भागा और रोके न रुका। राजा बैठे-बैठे जप तंग आ गए और अपने राज्य से बहुत दूर दक्षिण दिशा में विन्ध्याचल के जंगल में पहुँच चुके, तव उन्होंने घोड़े पर बैठे हुए ही एक पेड़ की शारा को पकड़ लिया और घोड़े को छोड़ दिया। जय घोड़ा भाग गया तो वे पेड़ से नीचे उतर कर विश्राम करने के निमित्त बैठ गए। उनको इतनी भूस और प्यास लगी थी कि प्राण निळले जाते थे। चारों ओर देसा। कहीं से भी अन्न अथवा जल की प्राप्ति की सम्भावना न जान पड़ी। ये जीवन से निराश हो ही चुके ये कि एक मलिन वखां याली काली और कुरूपा चाण्डाल-कन्या एक धर्तन में जामुन का रस और दूसरे में पके हुए चावल मरे हुए मस्तानी चाल से जाती हुई उनको दिखाई पड़ी। राजा इतने भूखे थे किसप विचार छोड़कर उससे प्रार्थना करने लगे कि उस अन्न और रस में से कुछ उसको देकर उसके प्राणों की रक्षा करे । कन्या ने राजा से कहा कि वह चाण्डाल-कन्या है और वह अन्न भोर रस वे विपत्ति में पड़ने के कारण दुःसी होकर सोचने लगे और उन्होंने यह निश्चय किया कि बाहर जाकर धनोपार्जन किया जाए। बाहर जाकर मार्ग में उनको बहुत कष्ट हुआ और मार्ग में चलते चलते यककर भूख और प्यास से तंग होकर वे एक तीन पृतों के कुंज को छाया में जा बैठे। वे तीन घृत ऐसे थे जिनमें से दो तो उपजे हो नहीं थे और एक का बीज भी नहीं बोया गया था । यहाँ पर बैठ कर उन्होंने विश्राम किया और अमृत के समान सुस्वादु फलों का भक्षण किया। थोड़ी देर बाद वहाँ से उठकर वे आगे पढ़े और बहुत सुन्दर, निर्मल और शीतल जल वाली तीन नदियाँ उन्हें दिखाई पड़ी। वे नदियों ऐसी थी कि दो तो जलरहित थी और एक सूस गई थी। तीनों ने उन नदियों में बड़े आनन्द के साथ स्नान क्रीड़ा की और जल पिया। फिर चलते चलते जप सायंकाल हो गया तो उनको एक भविष्यनगर दिसाई पढ़ा। उन्होंने उसमें प्रवेश किया, और उनको रहने के लिये उस नगर में तीन मकान मिले-जिनमें से दो तो अभी चने ही नहीं थे और तीसरे में एक भी दीवार नहीं थी । वहाँ रहकर उन्होंने तीन प्रामणों को निमंत्रण दिया-जिनमें से दो के तो शरीर ही न थे और तीसरे के मुँह ही नहीं था। उन्होंने तीन थालियों में भोजन किया, जिसमें से दो में तो तली ही नहीं थी पोर तीसरी चूर्णरूप थी। उस भविष्य मगर में वे तीनों यालक आनन्दपूर्वक अपना जीवन बिताते रहे। यह कहानी मुनाकर वसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी से कहा कि यह संसार भी इस कहानीकी नाई है। फेयन फल्पनापर ही इसकी स्थिति है। सार षस्तु जो कि फल्पित नहीं इसमें कुछ नहीं है। १२-इन्द्रजालोपाख्यान इन्द्रजातोपाख्यान योगवासिष्ठ के सर्वश्रेष्ठ उपाख्यानों में से है। इसके द्वारा वसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी को यह पतलाया कि सारा जगत् मन के भीतर है। मन इसको एक निमेप में उत्पन्न कर लेता है और एक निमेप.मे.लीन फर देता है। सारा दृश्य संसार स्वप्न के सदृश है। क्षण भर के स्वप्न में वे सप घटनाएँ घटित हो जाती है जो कि 'पाह्य जगत् में, जो एक दूसरा स्थप्न है, युगों और फन्पों में होती है ! जो कुछ याहा जगत् में होता है यही पण भर मन के अन्दर प्रदीव हो सकता है। संक्षेपतः इन्द्रजालोपाम्यान इस प्रकार है :- इस परवी तल पर उत्तरपारव्य नाम का एक देश था, उम पर लपण नाम का एक पड़ा धर्मात्मा और प्रतापी राजा राज करता था। एक समय, जय कि राजा अपने दरबार में बैठे हुए थे, वहाँ पर एक इन्द्र. जानी ( घाजीगर माया और राजा को यथोचित प्रणाम करके बैठ गया। राजा ने उसको अपना कौतुक दिसाने की आधा दी । इन्द्र- जाली ने अपना पिटारा खोल कर उसमें से एक मोर की पूंछ का गुच्छा निकाल कर राजा के सामने घुमाया। उसके घुमाते घुमाते राजा को निद्रा पा गई और कोई दो घड़ी तक राजा मूर्छित से हो कर निद्रा में पड़े रहे। सब दरवारी लोग सोच में हो गए, और जादूगर को बुरा- मला फहने लगे। जागने पर राजाने सन लोगों के सम्मुख व वृत्तान्त सुनाया जिसका कि उन्होंने उस दो घड़ी के समय में अनुभव किया था। वह इस प्रकार था:- मोर की पूंछ का गुच्छा घूमते देखकर राजा का ध्यान उस ओर ऐसा लगा कि उसको अपनी अवस्था का विस्मरण हो गया और एक विचित्र दृश्य उसके सामने आया। उसने देखा कि एक दूसरे राजा का दूत एक बहुत तेज और सुन्दर घोड़ा लिए उसके सामने उप. स्थित है। दूत ने राजा से प्रार्थना की कि वह घोड़ा उनकी सवारी के लिए उसके राजा ने भेंट रूप से भेजा है। राजा बहुत प्रसन्न हुए और उस घोड़े पर सवार होकर बाहर निकले। घोड़ा बहुत तेज या। राजा को लेकर यह अति वेग से भागा और रोके न रुका। राजा बैठे-बैठे जर तग आ गए और अपने राज्य से बहुत दूर दक्षिण दिशा में विन्ध्याचल के जंगल में पहुँच चुके, तब उन्होंने घोड़े पर बैठे हुए ही एक पेड़ की शासा को पकड़ लिया और घोड़े को छोड़ दिया। जब घोड़ा भाग गया तो वे पेड़ से नीचे उतर कर विश्राम करने के निमित्त बैठ गए। उनको इतनी भूख और प्यास लगी थी कि प्राण निम्ले जाते थे। चारों ओर देखा। कहीं से भी अन्न अथवा जल की प्रानि की सम्भावना न ज्ञान पड़ी। वे जीवन से निराश हो ही धुके ये कि एक मलिन वनों वाली काली और कुरूपा चाण्डाल-कन्या एक बर्तन में जामुन का रस और दूसरे में पके हुए चावल मरे हुए मस्तानी चाल से जावी हुई उनको दिखाई पड़ी। राजा इतने भूसे थे कि सब विचार छोड़कर उससे प्रार्थना करने लगे कि उस अन्न और रस में से कुछ उमको देकर उसके प्राणों की रक्षा करे। कन्या ने कहा कि यह पाण्डान-कन्या है और वह मन और रस राता से अपने पिता के लिए ले जा रही है। बहुत प्रार्थना करने पर भी उनने राजा को कुछ न दिया। राजा ने उसका पीछा किया-वम उस कन्या ने राजा से पहा-यदि तुम मेरे पति बनना स्वीकार करो तो मैं अपने पिता के अन्न में से कुछ भाग तुमको दे दूंगी। राजा भूख प्यास से इतने पीड़ित हो रहे थे कि उन्होंने उसका पति घनना स्वीकार कर लिया । उसको थोड़ा सा भात सिलाकर और जामुन का रस पिला. फर यह घड़ी प्रसन्न होकर अपने पिता के पास गई और उससे बोली-मैने यह सुन्दर पुरुप अपना पति बना लिया है। पिता बहुत प्रसन्न हुए और बोले-बहुत अच्छा किया। जा इसको लेकर घर जा और सुस से जीवन यिता । राजा ने चाण्डाल के घर पाकर देखा कि चारों और अस्थि, मांस और रुधिर, कुत्ते, गधे और भैंस आदि जानवरों की साले पिसरी पड़ी हैं। एक बहुत ही गन्दी दुर्गन्धयुक्त झोपड़ी में उसको सास मांस पका रही थी। अपने नामाता को देखकर यह बहुत प्रसन्न हुई; रुधिर और मांस का भोजन राजा को परोसा। सारी पाएडाल बिरादरी को इकट्ठा करके चाण्डाल-दम्पति ने बड़े समारोह के साथ अपनी पुत्री का विवाह रचाया। थोड़े ही समय में राजा एक प्रतिष्टित चाण्डाल बन गया। कुछ वर्षों के भीतर उसको खी से उसके यहाँ तीन पुत्र और तीन फन्याएँ हुई । राजा अपने राजभाव को बिल्कुल ही भूता गया, और पाण्डालोचित सय फर्म करने लगा। यहुत मुस से अपने गृहस्थी में रहता रहा। एक समय ऐसा आया कि वर्षा न होने कारण यदुत पदा अकाल पड़ गया । उस देश में अन्न और जल का अभाव हो गया। सय लोग भूसे मरने लगे। तग श्राफर वह पाण्डाल अपनी सी और यशों को साथ लेकर दूसरे देश में भोजनोपार्जन करने के लिये धाहर निकला | रास्ते में चे सय भोजन के बिना तंग आ गए और चलने योग्य न रहकर एक वृक्ष के नीचे येठ गए। यहाँ पर पड़े-पड़े, सबसे छोटे पुत्र ने पिता से कहा कि भूस के मारे उसके प्राण निम्ल रहे हैं। पिता के पास और साधन पुछ नहीं था, इसलिए उसने अपने पुत्र की क्षुधा तृप्ति के लिए अपने आपको एक लकड़ी के जलते अम्बार पर रसते हुए कहा कि ले तू मेरा मांस साफर अपने प्राण की रक्षा कर ले! आग से जलने पर उस पाण्डाल को घेवना दूसरी स्थिति का अनुभव करने लगी--राजा लपण मून्दों से भाग गए और अपने आपको उन्होंने राजा के रूप में सिंहासन पर बैठा हुआ पाया। सामने इन्द्रजाली बैठा था और सब दरवारो चिन्ताकुल सामने खड़े थे। राजा को यह सब श्य केवल दो घड़ी के भीतर अनुभव करके बडा शाश्वर्य हुआ। इन्द्रजालीने उससे कहा-महाराज ये सब घटनाएँ सी है और यदि श्राप को विश्वास न हो तो आप स्वयं उस देश में जाकर देख लीजिये। राजा अपनी सेना को लेकर दक्षिण को रवाना हुए। चलते हुए रास्ते में उन्होंने वे सा देश, स्थान, और दृश्य देखें। किरात देश में पहुँचकर हूबहू वही सम स्थान देसे जिनमें उसने भ्रमण और धृत्युपार्जन किया था। यह स्थान भी देखा जहाँ पर कि उसने अपनी देह का अपने पुत्रों की क्षुधातृप्ति के लिए बलिदान रिया था। अकाल के सभी निशान उनको यहाँ पर दिखाई पड़े। पाण्डाल गृह में जाकर देखा तो उनकी सास पर में घेठी हुई अपने अमाई की मृत्यु के शोर में रो रही थीं। राजा ने उसके पास जाकर उसको सान्वना दी। उसफो धन देकर प्रसन्न किया, और आश्चर्य से पूरी होकर यात्रा से पर लौट आया । १३-शुक्रोपाख्यान शुक्रोपाख्यान द्वारा वसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी को यह बतलाया कि पासना और संकल्प के अनुमार ही मनुष्य की गति होती है, इसलिये नियोणपद प्रात करने की इन्छा वाले मनुप्य को संसार के विषयों के लिये वासना नहीं करनी चाहिए और किसी भी सांसारिक सुख भयवा भोग का अपने मन में सक्ल्प उदय न होने देना चाहिये। एक समय की बात है कि मन्दराचल पर्वत पर भृगुमुनि ने उन तप करना आरम्म किया। उनके समीप उनकी देसमाल और सेवा करने के लिये इनके प्रिय और सर्व गुण सम्पन्न पुत्र शुक रहने लगे। भृगु ऋपि ने निर्विकल्प समाधि लगाई तो शुक्रको सेवा कार्य से कुछ अवकाश मिला। एक समय जय कि शुक शान्तचित्त थैठे हुए प्रकृति की शोमा फा निरीक्षण कर रहे थे, उनको प्रामाश मार्ग से जाती हुई एक रूपलावण्य. सम्पन्ना अप्सरा दिखाई पड़ी। उसको देखते ही शु के मन में कामवासना उदय हो पाई। उसको माप्त करने की प्रबल इच्या उत्पन्न हुई। उनको यह खयाल आया कि यह अप्सरा देवलोक की है इसलिये देवलोक जाना चाहिए। यह संकल्स उदय होते ही दनका सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर को छोड़कर देवलोक पहुँचा । शुक ने अपने पापको इन्द्रलोक में पाया । वहाँ पर चारों ओर ऐश्वर्य और भोग, सौन्दर्य और मानन्द फा साम्राज्य दिसाई पड़ता था। इन्द्र ने शुक्र का आदर सत्कार किया और उनको स्वर्ग में रहकर वहाँ के आनन्द का भोग करने के लिये निमन्त्रण दिया। शुक्र का मन तो उसी अप्सरा के पीछे लगा था जिसको देसकर वे काम से परास्त हुए थे। स्वर्ग में उसकी तलाश में फिरने लगे। आखिर वह एक वाटिका में विहार करते हुए मिल ही गई। आँखें चार होते ही दोनों में परस्पर स्नेह का उदय हो गया, और आनन्द से एक दूसरे के साथ रहने लगे। इस प्रकार उस विश्वाची नाम की देवसुन्दरी के साथ आनन्द का उपभोग करते करते शुक्र को बहुत समय पीत गया। जय उसके पूर्वकृत पुण्यों का भोग द्वारा क्षय हो गया तो वह स्वग से गिरा । इसी प्रकार वह अप्सरा भी अपने पुण्य क्षीण होने के कारण स्वर्ग से गिरी। कुछ समय तक दोनों के सूक्ष्म शरीर चन्द्रमा को किरणों में रहे । फिर अनाज के पीदों में श्राफर रहे। उस पौदे के धान्य को जिसमें शुक्र का जीव था दशारण्य देश के एक प्रामण ने साया और उसके धान्य को जिसमें विश्वाची का जीय था मालव देश के राजा ने साया। ग्रामण के भोजन का वीर्य पनने पर शुक्र उसको स्त्री के गर्भ से उस प्राह्मण का पुत्र हुआ, और मालव नरेश के यहाँ विश्वाची का जीव उसकी फन्या पनकर उत्पन्न हुधा । जप फन्या पड़ी होकर रूपवती और विवाह योग्य हुई तो राजा ने उसको स्वयंवर द्वारा घर घुनने की आज्ञा दी। देवयोग से यह ब्राह्मण-मालक भी यहाँ पर आ निकला । पूर्व स्नेह अदृष्ट रूप से उदय हो पाया, और उस फन्या ने विवश होकर प्रामण के गरीय बालक को अपना पति पना लिया । कुछ दिन पीछे राजा अपने जामाता को राज्य सौंपकर पन पले गए। इस प्रकार पहुत दिनों तक राज और राजवनया का उपयोग करने पर शुक्र के जीव ने सस देह का त्याग किया। तप यह या देश में एक धीवर हुआ। फिर एक सूर्यवंशी राजा हुा। फिर एक पड़ा विद्वान् गुरु हुआ। फिर एक विद्याधर हुधा। फिर मद्रास में एक राजा हुआ। फिर यामुदेव नाम का एक तपस्यी पालक हुआ। फिर विन्ध्याचल में एक किरात हुधा। फिर सौवीर और पैवट देश में मंत्री हुआ। फिर त्रिगत देश में एक गधा हुआ, फिर दिरात देश में एक घाँस का पौदा हुआ। फिर पीन के जंगल में एक हरिण हुमा। फिर एक साड़ के वृत में पास करनेवाला सर्प दुधा। फिर एक पन में मुर्गा मैं हुआ। इस प्रकार अपनी वासना और कर्मनियमानुसार वह यहुत से रूपों को धारण करता हुआ एक ब्राह्मण कुमार होकर गहा तट पर वस्या करने लगा। एसका शुक्र शरीर विकृत होकर शीर्ण होने लगा। भूगु ऋषि की जय बहुत काल पीछे समाधि खुली तो उन्होंने शुक को अपने पास न पाया। तलाश करने पर जब उसके शरीर को अवस्या में पाया तो उनको काल के ऊपर बहुत मोघ पाया और काल को शाप देने के लिये तैयार हुए । इतने ही में काल ने स्थूल रूप धारण करके भूगुपि को प्रणाम किया, और कहा-महाराज आप क्या कर रहे हैं। मैं काल तो भगवान का नियत किया हुमा हूँ, और सदा अपने धर्म का पालन करता हूँ। मुझे आप शाप नहीं दे सकते। सत्र प्राणियों की वासना और कर्मों के अनुसार उनके स्थूल शरीर को तबदीली किया करता हूँ। श्रापका पुत्र शुक्र अपनी वासनाओं के और संकल्पों के अनुसार ही अगष्य योनियों में भ्रमण करता फिर रहा है। कालने उसके सब जन्मों का वृत्तान्त सुनाकर भृगु को पटनाया कि शुक्र का जीय इस समय प्रामए वालक बना हुषा गहा- वट पर तप कर रहा है। विश्वास न हो तो जाकर देख लिया जाए। भृगु मुनि काल को लेकर उसके समीप गए। नामए-यालक ने दोनों को देखा किन्तु पहचाना नहीं भूगु ने उसको ध्यान लगायर देखने को का । र उसको अपने पूर्व जन्मो का स्मरण हो आया। पिता की याज्ञानुसार सने फिर शुक्र होने की वीत्र वासना की और उसके फलरूप पाह्मण यालक के शरीर को छोडकर उसकी पुर्यष्टक (सूत्म देह) ने शुक्र शरीर में प्रवेश करके उसको जोविस किया। वसिष्ठजी ने राम से कहा कि शुक ने जो रूप धारण किया अपनी पासना के अनुसार किया हरएक जीव की हरएक वासना उसके लिये एक पाँधनेवाली डोरी है, जो कुछ काल के लिये अवश्य ही उसे उस विषय से पॉपेगी जिसकी वह चाह करता है। किसी उर्द कवि ने ठीक कहा है:- आर्जुये दीदे जानां यज्म में लाई मुझे। अर्जूये दीदे जानां यज्म से भी ले पली ॥ अर्यात् प्रिय वस्तु के दर्शन ( प्राप्ति) की अभिलाषा ( वासना ) ही मुझे संसार में लाता है और यही मुझे ससार से ले जाती है। कठोपनिपद में इसी कारण से यह कहा है- में पाया। वहाँ पर चारों ओर ऐश्वर्य और भोग, सौन्दर्य और आनन्द फा साम्राज्य दिसाई पड़ता था। इन्द्र ने शुक्र का आदर सत्कार किया और उनको स्वर्ग में रहकर वहाँ के आनन्द का भोग करने के लिये निमन्त्रण दिया। शुक्र का मन तो उसी अप्सरा के पीछे लगा या जिसको देखकर वे फाम से परास्त हुए थे। स्वर्ग में उसकी तलाश में फिरने लगे। आखिर वह एक वाटिका में विहार करते हुए मिल ही गई । आँखें चार होते ही दोनों में परस्पर स्नेह का उदय हो गया, और आनन्द से एक दूसरे के साथ रहने लगे। इस प्रकार उस विश्वाची नाम की देवसुन्दरी के साथ आनन्द का उपभोग करते करते शुक्र पो यहुत समय बीत गया। जब उसके पूर्वकृत पुण्यों का भोग द्वारा क्षय हो गया तो वह स्वग से गिरा । इसी प्रकार वह अप्सरा भी अपने पुष्प क्षीण होने के कारण स्वर्ग से गिरी। कुछ समय तक दोनों के सूक्ष्म शरीर चन्द्रमा की किरणों में रहे। फिर अनाज के पौदों में आकर रहे। उस पोदे के धान्य को जिसमें शुक्र का जीव था दशारण्य देश के एक प्रामण ने साया और उसके धान्य को जिसमें विश्वाची फा जीय या मालव देश के राजा ने साया। ब्राह्मण के भोजन का धीर्य पनने पर शुक्र उसकी स्त्री के गर्भ से उस प्रामण का पुत्र हुआ, और मालव नरेश के यहाँ विश्वाची का जीव उसकी कन्या पनकर स्पन्न हुआ । जय कन्या घड़ी होकर रूपवती और विवाह योग्य हुई तो राजा ने उसको स्ययंवर द्वारा यर चुनने की आज्ञा दी। देवयोग से यह प्रामण-पालक भी यहाँ पर आ निकला । पूर्व स्नेह अदृष्ट रूप से उदय हो पाया, कन्या ने विवश होकर प्रामण के गरीय बालक को अपना पवि धना लिया। कुछ दिन पीछे राजा अपने जामाता को राज्य सौंपकर धन पले गए। इस प्रकार पहुत दिनों तक राज और राजतनया फा उपभोग करने पर शुक के जीव ने उस देह का त्याग किया। तय यह या देश में एक धीवर हुआ। फिर एक सूर्यवंशी राजा हुआ। फिर एफ पढ़ा विद्वान् (गुरु हुआ। फिर एक विद्याधर हुधा । फिर मद्रास में एक राजा दुओ। फिर यासुदेव नाम का एक तपस्यी यालक हुआ। फिर विन्ध्याचल में एफ किरात हुआ। फिर सौवीर और फेवट देश में मंत्री हुआ। फिर निगर्व देश में एक गधा हुआ, फिर किरात देश में एक घाँस का पौदा हुआ। फिर पीन के जंगल में एक हरिण हुमा। फिर एक वाद के वृक्ष में पास फरनेपाला सर्प हुआ। फिर एफ पन में मुर्गा और उस हुआ। इस प्रकार अपनी वासना और कर्मनियमानुसार पह बहुत से रूपों को धारण करता हुआ एक ब्राह्मण कुमार होकर गङ्गा तट पर तपस्या करने लगा। उसका शुक्र शरीर विश्व होकर शीर्ण होने लगा। भृगु ऋषि की जय बहुत काल पीछे समाधि खुली तो उन्होंने शुक को अपने पास न पाया। तलाश करने पर जब उसके शरीर को मृत अवस्था में पाया तो उनको काल के ऊपर बहुत क्रोध आया और काल को शाप देने के लिये तैयार हुए। इतने ही में काल ने स्थूल रूप धारण करके भृगुऋषि को प्रणाम किया, और कहा-महाराज श्राप क्या कर रहे हैं। मैं काल तो भगवान का नियत किया हुमा हूँ, और सदा अपने धर्म का पालन करता हूँ। मुझे आप शाप नहीं दे सकते । मैं सब प्राणिया को वासना और कर्मी के अनुसार उनके स्थूल शरीर को दबदीली किया करता हूँ। आपका पुन शुक्र अपनी वासनाओं के धौर सकल्पों के अनुसार हो अगएय योनियों में भ्रमण करता फिर रहा है। कालने उसके सर जन्मा का वृत्तान्त सुनाकर भृगु को यतलाया कि शुक्र का जीव इस समय ब्राह्मण वालक धना हुआ गङ्गा- वट पर तप कर रहा है। विश्वास न हो तो जाकर देस लिया जाए । मृगु मुनि काल को लेकर उसके समीप गए। ब्राह्मण-बालक ने दोनों को दसा किन्तु पहचाना नहीं । भृगु ने उसको ध्यान लगाकर देखने को पहा । तर उसको अपने पूर्व जन्मों का स्मरण हो पाया। पिता की आज्ञानुसार उसने फिर शुक्र होने की वीर वासना की और उसके फतरूप प्राह्मण वालक के शरीर को छोडकर उसकी पुर्यष्टक (सूक्ष्म देह) ने शुक्र शरीर में प्रवेश करके उसको जीवित किया। वसितनी ने राम से कहा कि शुक्र ने जो रूप धारण किया अपनी वासना के अनुसार किया हरएक जीव की हरएक वासना उसके लिये एक बाँधनेवाली डोरी है, जो कुछ काल के लिये अवश्य ही उसे उस विषय से घाँधेगी जिसकी वह चाह करता है। किसी उर्दू कवि ने ठीक कहा है - आये दीदे जाना बज्म में लाई मुझे। अर्जुये दीदे जाना बज्म से भी ले चली। अर्थात् प्रिय वस्तु के दर्शन ( प्राप्ति) की अभिलापा ( वासना) ही मुझे ससार में लाती है और यही मुझे ससार से ले जाती है। कठोपनिषद में इसी कारण से यह कहा है- । में पाया । वहाँ पर चारों ओर ऐश्वर्य और भोग, सौन्दर्य और आनन्द का साम्राज्य दिसाई पड़ता था। इन्द्र ने शुक्र का आदर सत्कार किया और उनको स्वर्ग में रहकर वहाँ के आनन्द का भोग करने के लिये निमन्त्रण दिया। शुक्र का मन तो उसी अप्सरा के पीछे लगा था जिसको देखकर वे काम से परास्त हुए थे। स्वर्ग में उसकी तलाश में फिरने लगे। आखिर वह एक वाटिका में विहार करते हुए मिल ही गई। आँखें चार होते ही दोनों में परस्पर स्नेह का उदय हो गया, और आनन्द से एक दूसरे के साथ रहने लगे। इस प्रकार उस विश्वाची नाम की देवसुन्दरी के साथ भानन्द का उपभोग करते करते शुक्र को बहुत समय बीत गया। जब उसके पूर्वकृत पुण्यों का भोग द्वारा क्षय हो गया तो वह स्वग से गिरा । इसी प्रकार वह अप्सरा भी अपने पुश्य क्षीण होने के कारण स्वर्ग से गिरी। कुछ समय तक दोनों के सूक्ष्म शरीर चन्द्रमा की किरणों में रहे। फिर अनाज के पौदों में आकर रहे। इस पौधे के धान्य को जिसमें शुक्र का जीव था दशारण्य देश के एक प्राह्मण ने साया और उसके धान्य फो जिसमें विश्वाची का जीव था मालव देश के राजा ने साया। ब्राह्मण के भोजन का वीर्य पनने पर शुक्र उसकी त्री के गर्भ से उस ब्रामण का पुत्र हुआ, और मालव नरेश के यहाँ विश्वाची का जीव उसकी कन्या बनकर उत्पन्न हुना । जय कन्या बड़ी होफर रूपवती और विवाह योग्य हुई तो राजा ने उसको स्वयंवर द्वारा वर चुनने की आज्ञा दी। देवयोग से यह प्रामण-बालक मी यहाँ पर आ निकला । पूर्व स्नेह अदृष्ट रूप से उदय हो आया, और उस पन्या ने विवश होकर प्रामण के गरीय पालक को अपना पति धना लिया । कुछ दिन पीछे राजा अपने जामावा को राज्य सौंपकर पन पले गए। इस प्रकार यहुत दिनों तक राज और राजतनया का उपभोग करने पर शुफ के जीय ने उस देह का त्याग किया। तब यह पग देश में एक धीवर हुआ। फिर एक सूर्यवंशी राजा हुआ। फिर एफ यदा विद्वान गुरु हुआ। फिर एक विद्याधर हुधा। फिर मद्रास में एक राजा हुआ। फिर यासुदेव नाम का एक तपस्यी चालक हुआ। फिर विन्ध्याचल में एक किरात हया! फिर सौवीर और फेवट देश में मंत्री । फिर विगत देश में एक गधा हुश्रा, फिर किरात श में एक बॉस का पौदा हुआ। फिर चीन के जंगल में एक हरिण हुमा। फिर एक वाइ के वृक्ष में पास करनेवाला सर्प हुआ। फिर एक वन में मुर्गा हुआ। इस प्रकार अपनी वासना और कर्मनियमानुसार वह बहुत से বা যা খাবে নাে গা গু চা-শুনাৰ স্থীরা সঙ্গা প্রত্ন ঘ तपस्या करने लगा। उसका शुक शरीर विकत होकर शीर्ष होने लगा। भूगु ऋषि की नव बहुत काल पीछे समाधि सुली तो उन्होंने शुक को अपने पास न पाया। तलाश करने पर जब उसके शरीर को मृत अवस्या में पाया तो उनको काल के ऊपर बहुत क्रोष पाया और कार को शाप देने के लिये तैयार हुए। इतने ही में काल ने स्यूल ত্ব যাক্টে মূতি কী সত্যম কিয়া, গীব কাশদ্বার আব্দ स्या कर रहे हैं। मैं काल को भगवान का नियत किया हुभा हूँ, और सदा अपने धर्म का पालन करता हूँ। मुझे श्राप शाप नहीं दे सकते। सब प्राणियों की वासना और कमाँ के अनुसार उनके स्यूल शरीर को तबदीली किया करता हूँ। आपका पुत्र शुक्र अपनी वासनाओं के और संकल्पों के अनुसार हो अगएय योनियों में भ्रमण करता फिर रहा है। कालने उसके सर जन्मों का वृत्तान्त सुनाकर भूगु को पतलाया कि शुक्र का जोर इस समय ब्राह्मण पालक बना हुया गा- तट पर सप कर रहा है। विश्वास न हो तो जाकर देस लिया जाए। शशु मुनि काल को लेकर उसके समीप गए। माहाए-चालक ने दोनों कोसा किन्तु पहचाना नहीं भूगु ने उसको ध्यान लगाकर देखने को II र उसको अपने पूर्व जन्मों का स्मरण हो आया । पिता की भाशानुसार उसने फिर शुक्र होने की तीन वासना की और उसके स्लरूप प्राण-बालक के शरीर को छोड़कर उसकी पुर्यष्टक (सूक्ष्म हने शुक शरीर में प्रवेश करके उसको जीवित किया। पसिनी ने राम से कहा कि शुक्र ने जो रूप धारण किया अपनी वासना के अनुसार किया । हरएक जीव की हरएक वासना उसके लिये एक धाँधनेवाली डोरी है, जो कुछ काल के लिये अवश्य ही उसे उस विषय से पाँधेगी जिसकी वह शाह फरता है। किसी उर्दू कवि ने टोल कहा है। आर्जुये दीदे जानां यज्म में लाई मुझे। अ—ये दीदे जानां यन्म से भी ले पली! अर्थात् प्रिय वस्तु के दर्शन ( प्राप्ति) को अभिलाषा ( वासना ) ही मुझे संसार में लाती है और यही मुझे संसार से ले जाती है। कठोपनिषद् में इसी कारण से यह कहा है- में पाया । वहाँ पर चारों ओर ऐश्वर्य और भोग, सौन्दर्य और मानन्द का साम्राज्य दिसाई पड़ता था। इन्द्र ने शुक्र का आदर सत्कार किया और उनको स्वर्ग में रहकर वहाँ के आनन्द का भोग फरने के लिये निमन्त्रण दिया। शुक्र का मन तो उसी अप्सरा के पीछे लगा था जिसको देखकर चे काम से परास्त हुए थे। स्वर्ग में उसकी तलाश में फिरने लगे। आखिर वह एक वाटिका में विहार करते हुए मिल ही गई । ऑसे चार होते ही दोनों में परस्पर स्नेह का उदय हो गया, और श्रानन्द से एक दूसरे के साथ रहने लगे। इस प्रकार उस विश्वाची नाम की देवसुन्दरी के साथ आनन्द का उपभोग करते करते शुक्र को यहुत समय बीत गया। जय उसके पूर्वकृत पुण्यों का भोग द्वारा क्षय हो गया तो वह स्वग से गिरा । इसी प्रकार यह अप्सरा भी अपने पुरय क्षीण होने के कारण स्वर्ग से गिरी। कुछ समय तक दोनों के सूक्ष्म शरीर चन्द्रमा की किरणों मे रहे। फिर अनाज के पोदों में श्राफर रहे। उस पौदे के धान्य को जिसमें शुक्र का जीव था दशारण्य देश के एक प्रामण ने साया और उसके धान्य को जिसमें विश्वाची फा जीव था मालव देश के राजा ने साया। ब्राह्मण के भोजन का वीर्य मनने पर शुक्र उसकी स्त्री के गर्भ से उस ब्राह्मण का पुत्र हुश्रा, और मालव नरेश के यहाँ विश्वाची फा जीव उसकी कन्या यनफर उत्पन्न हुधा । जय कन्या पड़ी होकर रूपवती और विवाह योग्य हुई तो राजा ने उसफो स्वयंवर द्वारा वर चुनने की आज्ञा दी। देवयोग से यह ब्राह्मण-यालक भी यहाँ पर आ निकला । पूर्व स्नेह अदृष्ट रूप से उदय हो पाया, और उस फन्या ने विवश होकर ब्राह्मण के गरीब बालक को अपना पति धना लिया। कुछ दिन पीछे राजा अपने जामाता फो राज्य सौंपकर पन घले गए। इस प्रकार पहुत दिनों तक राज और राजतनया का उपभोग फरने पर शुक्र के जीय ने उस देह का त्याग किया। तप यह यद्न देश में एक घीवर हुआ। फिर एक सूर्यवंशी राजा हुआ। फिर एक पड़ा विद्वान् गुरु हुआ। फिर एक विद्याधर हुआ। फिर मद्रास में एक राजा हुआ। फिर पामुदेव नाम का एक तपस्यी यालक हुआ। फिर विन्ध्यापल में एक किरात हुआ। फिर सौवीर और केवट देश में मंत्री हुआ। फिर विगत देश में एक गधा हुआ. फिर पिरात देश में एक बाँस का पौदाहुघा। फिर चीन के जंगल में एक हरिण हुमा। फिर एक ताड़ के पक्ष में वास करनेवाला सर्प हुया। फिर एक पन में मुर्गा जाती है। पटी का भी देहान्त हो जाता है । वह बहुत रोता है और शोकातुर होकर अपना पेट पालने के वास्ते दूसरे देश को चला जाता है। रास्ते में उसको अचानक ही एक हाथी अपनी सूंड में उठाकर अपनी पीठ पर बैठा लेता है। यह हाथी एक राज्य का हाथी है जो कि उस राज्य के राजा की मृत्यु हो जाने पर इसलिये छोड़ा गया है कि जिसे यह बड़ा लेगा वही राजा बनाया जाएगा। हाथी के पीछे-पीछे राज्य के मंत्री और अन्य कर्मचारी है। उन्होंने उस चाण्डाल को प्रणाम किया और हाथी पर से उतारकर उसको स्नान कराया और नृपोचित राहार करार अपने राज्य स्थान पर ले जाकर गद्दी पर बैठा दिया। अब बह चाण्डाल राजा होकर सब प्रकार के भोगों का उपभोग करने लगा। उसके राज्य में किसी बात की कमी नहीं है। धन-धान्य अतुल है। अन्त पुर में एक से एक उत्तम और सुन्दर स्त्री उसकी सेवा के लिये मौजूद है। पूरे पाठ वर्ष उसने सब प्रकार के सुख भोगे और बड़ी अच्छी तरह से राज्य किया। दुर्भाग्यवश एक दिन वहाँ पर उसके यौवन के मित्र और सही कुछ चाण्डाल आ निकले। उनके सामने से राजा साहब की सवारी निकली तो उन चारडाला ने अपने पुराने मित्र कटच पाएडाल को राजा के रूप में देखकर पहचान लिया और वे प्रसन्न होकर चिल्लाए और उससे मिलने के लिये दौड़े। सिपाहियों के रोकने पर भी न रुके, क्योंकि जिनका मित्र राजा हो उन्हें सिपाहियों का क्या डर। यह रहस्य प्रजा को मालूम हो जाता है और सारं नगर में इस बात की सबर फैल जाती है कि वहाँ का राजाचाएडाल है। रानियों को और नगर के द्विजों को इसपर के पाते ही इतना दुःस और पश्चाताप हुआ कि नगर के लोगों ने प्रायश्चित करने के लिये एक स्थान पर पहु विस्तृत अग्निकुण्ड बनाकर अग्नि में प्रवेश किया। राजा को यह सब दृश्य असहा हो गया और उसने भी उसी अग्निकुण्ड में प्रवेश कर लिया। जब उसका शरीर अग्नि से जलने लगा तो वह अचेत हो गया। जय उसे चेतना आती है तो वह अपने आपको गाधी रूप में गंगा में गोता लगाकर ऊपर को सर उठाता हुआ पाता है। उसकी बुद्धि में ही नहीं आता कि क्या मामला है। तट की ओर जो देखा वो उमके कपड़े यहाँ पर मौजूद हैं, और चारों ओर की स्थिति पर गौर करने से यही मालूम हुआ कि उसने यह सब अनुभव उतने ही समय में कर लिया जितना कि यसको गंगा में एक गोता लगाने में हुआ था।
( ६ ) देवताओ के वश से बाहर की बात है। इसलिये वे स्वयं अपना सुदर्शन चक्र लेकर युद्ध-स्थानपर आए और उन तीनों को मारकर उनको अपने लोक में स्थान दिया और देवताओं को भय और दैत्याक्रमण से मुक किया । १६-दाशूरोपाख्यान मगध देश में शरलोमा नाम का एक मुनि रहता था। उसका एर. मात्र पुन दाशूर अपने पिता को बहुत प्यार करता था। समय भानेर जव शरलोमा की मृत्यु हो गई तो दाशूर को अत्यन्त शोक हुआ, और वह अधीर होकर रोने लगा। उसका तीव्र दुख देखफर एक यनदेवीको बहुत फरुणा आई और वह उसके समीप जाकर अदृष्ट रहते उसको समझाने लगी-हे साधो ! तू क्यों शोक करता है क्या तेरे लिये कोई ऐसी घटना हो गई है जो दूसरों के लिये नहीं होती ? संसार फा यह घटल नियम है कि यहाँपर जीव पैदा होकर कुछ दिन जीकर मर जाते हैं। ब्रह्मा तक को भी एक दिन नाश को प्राप्त होना है। तब फिर किसी के मरने पर शोक क्या किया जाए ? रोना वो यचों का काम है जिनको संसार के अटल नियमों का ज्ञान नहीं है। तुम तो परे नहीं हो। उठो और अपने जीवन के ध्येय की प्राप्ति में लगो।। दाशूर को होश आया और उसने विचार किया कि पिता में मरने पर शोक करना व्यर्थ है। शोक परने से पिताजी जीवित नहीं हो सकते। अब अपने जीवन को सुधारना पाहिए। यह सोचकर उसने तप करने का निश्चय किया। उप करने के लिये उसने एक अत्यन्त पवित्र स्थान की सोज करनी शुरू की, लेकिन उसको यहीपर भी कोई पवित्र स्थान न मिला। अन्त में उसकी समझ में यह आया कि यदि यह किसी प्रकार क्सिी वृक्ष को पुद्गल (अप्रभाग) पर स्थिर रह सके तो यह सबसे शुद्ध स्थान तप करने का होगा। यह इच्छा अपने मन में रखकर उसने फुप लाडियों एकत्रित करो भाग जलाई और अपना मौस पाट फाटफर अग्नि देवता को पनि देना भारम्भ पिया | प्रामण फे माँस की पली भाग में पढ़ते हो अग्नि देवता को घटुव दुरा हआ और वे प्रामण के सामने प्रत्यक्ष रूप से प्रकट हो गए और उससे पर भोगने को कहा। दाशूर ने अपनी इच्छा प्रकट की। अग्निदेव ने यर दिया कि उनसे पहॉपर खड़े हुए कदम्ब वृक्ष की शासा के अप मागपर रहने की शफि प्रान हो। -- जाती है । पत्री का भी देहान्त हो जाता है। वह बहुत रोता है और शोकातुर होकर अपना पेट पालने के वास्ते दूसरे देश को चला जावा है।रास्ते में उसको अचानक ही एक हाथी अपनी सूड में उठाकर अपनी पंठ पर बैठा लेता है। यह हाथी एक राज्य का हायी है जो कि उस सब के राजा की मृत्यु हो जाने पर इसलिये छोड़ा गया कि जिसे बद उठा लेगा वही राजा बनाया जाएगा। हाथी के पीछे-पीछे राज्य के मंत्री और अन्य कर्मचारी हैं। उन्होंने उस चायवाल को प्रणाम किया और हाथी पर से उतारकर उसको लान कराया और नृपोचित बार कराकर अपने राज्य स्थान पर ले जाकर गद्दी पर बैठा दिया। अब बद चाण्डाल राजा होकर सब प्रकार के मोगों का उपभोग करने लगा। दसके राज्य में किसी बात की कमी नहीं है। धन धान्य अतुन्न है। अन्द पुर में एक से एक उत्तम और सुन्दर स्त्री उसकी सेवा के लिये मौजूद हैं। पूरे आठ वर्ष उसने सत्र प्रकार के सुरस भोगे और बड़ी अली सरह से राज्य किया। दुर्भाग्यवश एक दिन यहाँ पर हमके यौवन के मित्र और सही कुछ चाण्डाल आ निकले। उनके सामने से राजा साहब की सवारी निकली तो उन चाहाली ने अपने पुराने मित्र कट पाएडाल को राजा के रूप में देखकर पहचान लिया और वे प्रसन्न होकर चिल्लाए और उससे मिलने के लिये दौड़े। सिपाहियों के रोकने पर भी न रके, क्योंकि जिनका मित्र राजा हो उन्हें सिपाहियों का क्या हर। यह रहस्य प्रजा को मालूम हो जाता है और सारे नगर में इस बात की सरर फैल जाती है कि वहाँ का राजा चाण्डाल रानियों को और नगर के द्विजों को इससर के पाते ही इतना दुख घोर पाचाप हुआ कि नगर के लोगों ने प्रायश्चित करने के लिये एक स्थान पर पहु विस्तृत अग्निकुण्ड बनाकर अग्नि में प्रवेश किया। राजा हो यह सब दृश्य असा हो गया और उसने भी उसी अग्निकुण्ड में प्रवेश कर लिया। जब उसका शरीर अग्नि से जलने लगा तो वह चेत हो गया। अब इसे चेतना आती है तो वह अपने आपको गाधी के रूप में गंगा में गोता लगाकर ऊपर को सर उठाता हुआ पाता है। उसकी बुद्धि में ही नहीं आता कि क्या मामला है। वट की ओर जो देखा तो रसके कपड़े वहाँ पर मौजूद हैं, और चारों ओर की स्थिति पर गौर करने से यही मालूम हुआ कि उसने यह सर अनुभव दत्तने ही समय में र निया जितना किसको गंगा में एक गोता लगाने में हुआ था।
( ११२ ) कुछ दिन पीछे उसके घर पर एक मुसाफिर अतिथि होकर, आता है। रात को उसको भोजन कराकर और पाराम के लिये योग्य श्रासन देकर गाधी ने उस यात्री से अपनी यात्रा का वृत्तान्त मुनाने फो प्रार्थना की। यात्री ने कहा-हे ब्राह्मण, मैंने बहुव देश में भ्रमए किया है पर एक देश में मैंने इतना हृदय विदारक दृश्य देखा है कि उसका ध्यान फरते ही रोंगटे सड़े हो जाते हैं और रोना आता है। यहाँ से बहुत दूर उत्तर दिशा में एक देश है। वहाँ सारी हिज-प्रजा और सारी रानियों इस कारण अग्नि में प्रवेश कर गई कि स्नको आठ वर्ष तक अज्ञाततया एक चाण्डाल के राज्य में जीयन विताना पड़ा। पाण्डाल राजा भी दुसी होरर उसी अग्नि में प्रविष्ट होकर नष्ट हो गया । वह दृश्य मैंने इन्हीं आँसों से देसा है। वहाँ से में प्रयाग गया और त्रिवेणी में स्नान करके सीधा यहाँ पा रहा हूँ। गाधी को यह बात सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ और उस घटना स्थान को देखने की प्रबल इच्छा हुई। यात्री को साथ लेकर वे उस राज्य में गए और वहाँ सय बातें उसी प्रकार पाई जैसे कि उन्होंने अनुभव की थी। फिर वे किरात देश में गए और वे सब पाते देखी जो उन्होंने अपने चाण्डाल जीवन में अनुभव की थीं। इन सब बातों पर विचार करने से उसे ज्ञान हुमा यही माया का स्वरूप है। २३-उद्दालक की कथा -मनुष्य को शान्ति और मानन्द का अनुमव तभी हो सकता है जय कि वह अपने आपको सत्ता-सामान्य में स्थित फर लेता है। जप सरू मनुष्य विकारवान् गाना पदार्थों में अपना अहंभाव रसता है तय तक उसे शान्ति और परमानन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती । इस विषय पर यसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी को उद्दालक मुनि का उपारयान सुनाया जो इस प्रकार है- गन्धमादन पर्वत पर उहालक नाम का एफ युया मुनि पार फरता था। एक समय उसके मन में यह विचार स्पन्न हुआ कि अभी तक उसको शान्ति चौर आनन्द का अनुभव नहीं हुआ। रामके लिये प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि मनुप्य-जीयन का परम रहश्य वही है। इन्द्रियों के भोग भोगने से मनुष्य को फमी तृप्ति नहीं हो सकती। मनुष्य को वो यह यस्तु प्राम फरनी चाहिए जिसको प्राप्त ( ११५ ) हिमालय पर्वतों में कैलाश के पास एक देश था जहाँ पर हेमजटा (मने बेसे बालोंवाली ) नामक एक जगली जाति रहती थी। इस जाति के लोग किरात भी कहलाते थे। उन किरावों के राजा का नाम सुरघु था। मुरघु महा प्रतापी और बुद्धिमान् राजा था। वह बहुन न्यारपूर्वक राज्य करता था। एक समय उसका इस प्रकार की वेदना हुई कि राज्य के कार्य न्यायपूर्वक करने से भी उसके हाथों से बहुत से लोगों ( अपराधियो ) को दुःस पहुँचता है, और इस दुसको देख कर उसका चित्त बहुत ही अनुदुखित होता है। यदि इस दुस से बचने के लिए वह राज्य छोड दे तो उसकी प्रजाअराजकता के कारण नाअट हो जायगी। यदि न्याय न किया जाए तो भी दुराचारी लागों के हाथ से सजना को कष्ट पहुंचेगा। इस प्रकार के असमञ्जस में पड़कर राजा सुरघु बहुत दुरसित हुए । इस अवसर पर माण्डव्य नामक मुनि उधर को आ निकले। मुरघु ने मुनि को प्रणाम करके उनसे अपनी मनोवेदना की चिकित्सा पूछी । मारय मुनि ने कहा-हे राजन् ! तुम्हारी यह वेदना वर तक शान्त नहीं होगी जय तक तुम आत्मज्ञानी होकर निष्काम भाव से राज्य नहीं करोगे। सांसारिक.आधि और व्याधि मनुष्य को उस समय तक. कष्ट देती है जब तक कि वह जीवन्मुक्त नहीं होता। जीवन्मुक्त हो जाने पर मनुष्य हर स्थिति में यानन्द और शान्ति का अनुभर करता है। यह कह कर माण्डव्य मुनि अपने स्थान पर चले गये, और मुरघु ने यह विचार करना प्रारम्भ किया कि आत्मा क्या है। विचार करते-करते वह इस निश्चय पर महुँचे फिशरीर, इन्द्रिय और मन आदि. में से कोई भी आत्मा नहीं हो सकता, क्योंकि ये सब श्रात्मा के विषय विकारवान हैं और सदा अनुभव में आने वाले नहीं हैं। आत्मा का अनुभव सदा अविच्छिन्न रूप से एकरस रहने वाला है। धात्मा का अमार कोई भी कभी अनुभव नहीं करता, लेकिन इन सब वस्तुओं के अमार का फ्भी न कभी अनुभव होता ही रहता है। इसलिये सदा स्वसवेद्य भात्मा का कभी कभी अनुभव में आने वाले विपय शरीर, इन्द्रियाँ और मन के साथ अहंभाव होना भ्रममान है। शरीर, इन्द्रियाँ भीर मन आदि सो परिन्छिन यातुएँ है, किन्तु भात्मा, जोकि चिन्मान है, अनन्द और सर्वव्यापक है। कोई वस्तु, देश काल कुछ दिन पीछे उसके घर पर एक मुसाफिर अतिथि होकर आता है। रात को उसको भोजन कराकर और आराम के लिये योग्य वासन देकर गाधी ने उस यानी से अपनी याना का वृत्तान्त मुनाने को प्रार्थना की। यात्री ने कहा- हे प्रामण, मेने बहुत देश में भ्रमण किया है पर एफ देश में मैंने इतना हृदय विदारक दृश्य देखा है कि उसका ध्यान करते ही रोंगटे सड़े हो जाते हैं और रोना पाता है। यहाँ से बहुत दूर उत्तर दिशा में एक देश है। यहाँ सारी दिनु प्रजा और सारी रानियों इस कारण अग्नि में प्रवेश कर गई कि उनकी पाठ वर्ष तक अज्ञाततया एक चाण्डाल के राज्य में जीयन वितान पड़ा। चाण्डाल राजा भी दुसी होकर उसी अग्नि में प्रविष्ट होकर नष्ट हो गया। वह दृश्य मैंने इन्हीं बोसों से देखा है। वहाँ से में प्रयाग गया और निवेणी में स्नान परके सीधा यहाँ पा रहा हूँ। गाधी को यह बात सुनकर बहुत पाश्चर्य हुआ और उस घटना स्थान को देखने की प्रमल इच्छा हुई। यात्री को साथ लेकर वे उस राज्य में गए और वहाँ सय बातें उसी प्रकार पाई जैसे कि उन्होंने अनुभव पी थी। फिर वे किरात देश में गए और वे सय यात देख जो उन्होंने अपने चाण्डाल जीवन में अनुभव की थी। इन सब याती पर विचार करने से उसे ज्ञान हुआ यही माया फ स्वरूप है। २३-उद्दाला की कथा मनुष्य को शान्ति और आनन्द का अनुमय वभी हो सकता है जा कि यह अपने आपको सत्ता-सामान्य में स्थित पर लेता है। जय हर मनुष्य विकारवान् नाना पदार्थों में अपना अहभाव रखता है तय तर इसे शान्ति और परमानन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती। इस विषय पर यसिष्टनी रामचन्द्रजी को उद्दालक मुनि पा उपारयान सुनाया जो इस प्रकार है- गन्धमादन पर्यत पर उहालफ नाम का एफ युया मुनि यार करता था। एक समय उसके मन में यह विचार उपन्न हुआ वि अभी तक उसको शान्ति और आनन्द का अनुभव नहीं गया, रस लिये प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य-जीयन या परम र वही है। इन्द्रियों के भोग भोगने से मनुष्य को फमी एप्ति नहीं है सकती। मनुष्य को तो यह यातु प्राप्त करनी पाहिए जिसको प्रार प्राप्त दानता हुआ भी प्रत्येक जीर उसी की तलाश में है। जब तक उसकी प्रमि नहीं होती तमो व संसार ममुद्र में गोते साने पड़ते हैं । अज्ञान वश जीर अनात्म पदायों को श्रात्मा समझता है, जहाँ भानन्द नहीं है वहाँ पर श्रानन्द की कल्पना करता है, और यह समझता रहता है कि अमुक वस्तु को प्राप्ति से उसे परमानन्द की प्रानि हो जाएगी, किन्तु उस वस्तु के प्राप्त कर लेने पर ही उसे यह मालूम हो जाता है कि ऐसा समझना रमकी भ्रान्ति थी। क्षण भर पीछे ही उसकी फिर वही दशा हावी है-किसी दूसरी अाप वस्तु की ओर उसका मन दौड जाता है और यह उसको प्राप्त करने में असर हो जाता है। हो जाने पर फिर उसे यही मालूम होता है कि उसका विचार ठीक नहीं था। जब तक उसको परमानन्द के यथार्थ स्वरूप का पता नहीं लग जाता और वह उसका अनुभव नहीं कर लेता, तब तक इस प्रकार को भ्रान्तियाँ बराबर होती रहती हैं। इस भ्रान्तिमय जीवन में कभी चैन नहीं मिलती-सदा ही अशान्ति रहती है। इस सम्बन्ध मे वसिष्ठ- जी ने रामचन्द्रजी की मास और विलास का उपारयान सुनाया जो इस प्रकार है। सहाचल पर्वत पर अनि मुनि के आश्रम के समीप दो मुनि रहते थे। उनके दो पुत्र भास और विलास नामक थे। उनमे एक दूसरे के प्रति निष्ट प्रेम या । एक दूसरे से कभी भी जुदा नहीं होता था। दोनों को हुना, साना, पीना और सोना एक साथ होता था। इम प्रमार रा 'हते उन दोनों के माता पिताओं की मृत्यु हो गई। मृतर सरकार पिया। कुछ समय के पीछे दोनों देश- देशान्तर में के लिए निकले। दोना भिन्न दिशाओं में गए और ससार मेंस और नाना प्रकार के अनुभव प्राप्त किये। कुछ फाल पीछे रमात् एक हो स्थान पर आ मिले । एक दूसरे को देसकर उनको यहुआ हो आनन्द हुआ। विलास ने भास से पूछा-भाई भास, आज आप बहुत दिन में मिले हो। आप को देखकर मुझे बहुत ही खुशी हुई है । कहो इतने दिनों तक गुशल से तो रहे ? मास ने उत्तर दिया-भाई विलास। इस ससार में कौन कुशल से है? सदा ही रिसी न किसी प्रकार का दुस लगा रहता है। जब तक मनुष्य को पात्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती तर तर कुशल यहाँ? जब तक पर. मानन्द की प्राप्ति नहीं होती तर तक कुराल कहाँ ? जय तक मनुष्य दोनों ने मिद ( ११६ ) और लोक-लोकान्तर ऐसा नहीं है जो प्रात्मा से बाहर हो। श्रात्मा सय में है और सब पदार्थ आत्मा में हैं। सर तुंः आत्मा का प्रकाश हैं। इस प्रकार सोचते २ सुरधु को अात्मानुभव होने लगा। उसको सब राज्यकार्य करते रहने पर भी मानन्द और शान्ति फा भान होने लगा, और सय स्थितियों में समान रहने का अभ्यास हो गया । यह जो कुछ भी करता था निप्पाम भाव से मार धर्म समझ के करता था । हानि और लाभ, यश और अपयश, माइ और शोक उसको किसी प्रकार भी स्पर्श नहीं करते थे। सय कार्य यथास्थिति और आवश्यकतानुसार करते रहने पर भी उसो चित्त में पूर्ण शान्ति रहती थी। एक समय उसके यहाँ उसका मित्र परिघ नामक एक पारसी राजा भ्रमण करता हुआ था पहुँचा। पारसी नरेश परिघ भी भाममानी था । दोनों मित्रों में पड़े प्रेम से प्रात्म-पर्चा हुई। सबसे उत्तम पात जो सुरघु ने परिघ से कही वह थो समाधि का स्वरूप । राजा परिघ ने सुरघु से पूछा कि क्या बाप को भी समाधि का अनुभव हुआ है। सुरघु ने उत्तर दिया कि कभी क्या उसको हर समय ही समाधि का अनुभव होता है । आत्मज्ञानी जन तो संसार के सय कार्य करते रहने पर भी.समाधि में ही रहते हैं. क्योंकि उनकी स्थिति सदा ही पात्मपर में है । उनको सारा जगत् आत्मरूप ही दिसाई पड़ता है, अगन् मी कोई पटना उनको प्रात्मपद से च्युत नहीं कर सरती । सारा जगा उनको प्रारमा का ही प्रकाश जान पड़ता है। कोई यस्तु ऐसो नहीं दिखाई पड़ती जो हेय अयवापादेय हो । ये जगन् में रहकर सय पान फरते हुए भी आत्मपद पर स्थित रहते हैं। यह ही सर्वोत्तम समाधि है। अमानी का मन किसी अवस्था में भी शान्त नहीं होता, हानी का मन सदा हो और सब प्रकार के कामों में लगे रहने पर भी शान्त और समाहित रहता है। निगम पर्म करने, शोक और माह में रहित रह पर संसार में विचरने और प्रात्मदृष्टि से.सम-यातुधों को दंसने का नाम समाधि है। प्रशानी सदा ही समाहित रहता है। २५--भास और विलास का संवाद जीव का परम उद्देश्य, जीयन पा अन्तिम प्राध्य भ्यान, मनुष्र का सर्वोत्तम पेय, आत्मानुभव-स्यरूप परमानन्दमय मुक्ति है। गफोन बानता हुआ भी प्रयेक जीव उसी की तलाश में है । जय तक उसकी भाति नहीं होती तभी तक ससार समुद्र में गोते साने पड़ते हैं। श्रज्ञान वरा जीन अनात्म पदार्थों को प्रात्मा समझता है, जहाँ आनन्द नहीं है वहाँ पर आनन्द की कल्पना करता है, और यह समझता रहता है कि अमुक वस्तु को प्राप्ति से उसे परमानन्द की प्राप्ति हो जाएगी, किन्तु इस यातु के प्राप्त कर लेने पर ही उसे यह मालूम हो जाता है कि ऐसा सममना उसरी भ्रान्ति थी । क्षण भर पीछे ही उसकी फिर वही दशा हाती है किसी दूसरी अप्राप्य वस्तु की और उसका मन दौड़ जाता है और यह उसको प्राप्त करने में अग्रसर हो जाता है। प्राप्त हो जाने पर फिर उसे यही मालूम होता है कि उसका विचार ठीक नहीं था। जब तक उसको परमानन्द के यथार्थ स्वरूप का पता नहीं लग जाता और वह उसका अनुभव नहीं कर लेता, तब तक इस प्रकार फो प्रान्तियों बराबर होती रहती हैं। इस भ्रान्तिमय जीवन में कभी चैन नहीं मिलती-मदा ही प्रशान्ति रहती है। इस सम्बन्ध में वसिष्ठ- जी ने रामचन्द्रजी को भास और विलास का उपारयान सुनाया जो इस प्रकार है। समाचल पर्वत पर अनि मुनि के श्राश्रम के समीप दो मुनि रहते थे। उनके दो पुत्र भास और विलास नामक थे। उनमे एक दूसरे के प्रति निष्ठ प्रेम था । एक दूसरे से कभी भी जुदा नहीं होता था। दोनों का हना, साना, पीना और सोना एक साथ होता था। इस प्रकार से हते उन दोनों के माता पिताओं की मृत्यु हो गई। दोनों ने मि मृतर सरकार किया। कुछ समय के पीछे दोनों देश- देशान्तर में के लिए निकले। दोनो भिन दिशायों में गए और , और नाना प्रकार के अनुभर प्राप्त किये। कुछ फाल पीछे स्मात् एक ही स्थान पर श्रा मिले । एक दूसरे को दंसकर उनको बहुत ही थानन्द हुा । विलास ने भास से पूछा-भाई भाम, आज थाप बहुत दिन में मिले हो। श्राप को देखार मुझे बहुत ही गुशी हुई है। पदो इतने दिनों तक कुशल से तो रहे ? मास ने उत्तर दिया-भाई ग्लिासइस सप्तार में कौन कुशल से है ? सदा ही रिसी न किमी प्रकार का दुस लगा रहता है । जर तक मनुष्य को प्रारमशान की प्राप्ति नहीं होती तर तर कुशल यहाँ ? जय तक पर- मानन्द की प्राप्ति नहीं होती तर तक कुशल कहाँ ? जब तक मनुष्य । ससार में ( ११८ ) इन्द्रियों के विषयों के पीछे सुरस की तलाश में दौड़ता रहता है, तब तक कुशल कहाँ ? जब तक मन में विषयों के सुसो की वासना रहती है तर तक कुशल कैसी ? जय तक बुद्धि सासारिक रहती और प्राम विचार नहीं करतो तब तक दुशल यहो ? जर तक मनुष्य जीवन्मुक्क होकर नहीं विचाता तर तक कुशल कैसी ? जर तक मनुष्य संसार में निष्काम भाव से अपनी स्थिति अनुसार धर्म का पालन नहीं करता तर तक कुशल कैसी ? जब तक अभाव है तब तक तुराल कैसे हो सकती है ? जब तक जीव ब्रह्मभाव को प्राप्त नहीं कर लेता सर तर कुशल कैसी? भास को विलास की यात ठीक जान पड़ी और दोनों भाइयों ने मिलकर प्रात्म विचार करना प्रारम्भ किश। २६-चीतहव्य का वृत्तान्त स्वयं विचार करने से चित्तं किस प्रकार शान्त हो जाता है यह घात वसिम्जी ने रामचन्द्रजी फो चीतहव्य की कथा द्वारा सममाई जो इस प्रकार है :- विन्ध्याचल की कन्दरा में बीतन्य नामफ एक तपस्वी रहता था। उसके मन में सांसारिक विषय-भोगों की घड़ी तीन कामना थी इसलिये उसने नाना प्रकार के काम्य कर्म किए और उनके फल भोगे, किन्तु उसके मन में किसी प्रकार तृप्ति न हुई। हमेशा ही किसी न किसी विषय के भोग करने की वासना उसके मन में रहती थी। अपनी इस स्थिति पर विचार करने पर उसे बहुत विपाद हुआ। उसने यह निशय किया कि पूर्ण तृप्ति और शान्ति प्राप्त करने का उपाय पेचल निर्विकल्प समाधि या अनुभर कर लेना है। यह अनुभव प्रान करने के लिये उसने एक पत्ती की धुटी बनाई और उसके भीतर पद्मासन लगाकर पेठ और इस प्रकार विचार करने लगा:- में विपयों के पीले क्यो दौड़ता हूँ? इसलिये कि मैं समझता हूँ कि अमुक विषय के भोग करने पर मुझे बहुत मानन्द मिलेगा। अनेक प्रयत्न करने पर जय किसी प्रकार यह विषय प्राम हो जाता है और उससे भोग किया जाता है तो थोड़े ही काल पीछे यह अनुभव होने लगता है कि हमारा यह गल गलत या उन विषय का भोग पर लेने पर हमरो परम आनन्द पा अनुभव और परम सृमि फी प्रामि होगी। यो हो ममय पोये हमको गया, ( ११६ ) बम विषय से घृणा होने लगती है और हम उसरा त्याग करना पाइने लगते हैं। यदि इस समय वह विषय हमसे दूर नहीं होता तो उसका सामीप्य ही हमको दुखदायी प्रतीत होने स्गवा है। फिनने अाश्चर्य की बात है कि जो विपर कुछ काल पहने हमको परम आनन्द का उद्गम दिखाई पडता था और निसको पार कर लेना हम अपने जीवन का ध्येय श्रीर. सौभाग्य सम- मते थे, वहा विषय प्राप्त हो जाने पर और भोग लेने पर प्रानन्द रहित ओर टुपदायी प्रतीत होने लगता है। इस अनुभव से यह साफ जाहिर है कि काभा विषय सय आनन्द अथवा दुस गुणगाला नहीं है, मा मममना हमारा भ्रम है। किसी रिपय में यदि श्रानन्द होता तो मुरे भाग करने पर अथवा प्राप्त कर लेने पर हम सदा ही श्रानन्द- का अनुभव हुआ करता। किन्तु ऐमा कहाँ पर भी देखने में नहीं प्राता। देखने में दो यह पाता है कि जो जो माग जिस मनुष्य को प्रचुरता से प्रश्न हैं उनमें उसे काई आनन्द महसूस नहीं होता। वह सदा ही रन विषयों के लिये तरसना रहता है कि जो दूमरों को प्राप्त चौर सके पास नहीं हैं। दूसरे लोग उन यस्तुश्रा का श्रानन्द- दायक सममने रहते हैं कि जा उमगे मुलभतया पात्र हैं रिन्तु दूमरा के पास नहीं है। इसी भ्रम में पड़कर सर जोर ससार-समुद्र में गाते ग्या रहे हैं। आज यह प्राप्त करना है, कल को इससे घृणा है; जवाद प्राप्त करना है, परसों उमसे पोटा छुडाना है। प्राम्बिर उम या योग से मिलता ही क्या है ? मनुष्य का इम अनमय मे अपने विचार द्वारा यी मीखना चाहिए कि श्रानन्द प्रामि के लिये विषयों के पीछे दौडना मूल है। आनन्द किमी विषय के भोग द्वारा प्राप्त नहीं होमकना। गेमा विचार करने पर पीनहत्य के मन में पियों के प्रति विरति नरम हो गई। अब उनका मन किमा विपर को श्रार नहीं दौडना या। यदधिनि हा जाने पर उसने इन्द्रियों की ओर ध्यान दिया और विचार काना प्रारम्भ किया कि इन्द्रियों का यात्मा सम- मना चोर उनकी आरश्याताया का अपनी श्रारम्याना सममाना, मनु की यडी मारी भूल है। मय इन्द्रियों मन और प्रारा के साय मम्बद्ध हुए बिना नि पय और उद है। मन यदि इन्द्रियों के माय मन्बद्ध उनके विषय-का मांग नहीं करना वो कोई मी इन्द्रिय ( १२० ) किसी भी विषय का ज्ञान और भोग नहीं प्राप्त कर सकती । ऐसे ही इन्द्रियों की सारी ग्रियाएँ प्राण के आधार पर हैं। यदि किसी इन्द्रिय का प्राण-शक्ति के साथ सम्पन्ध न रहे तो उस इन्द्रिय द्वारा कोई रिया नहीं हो सकती । मन और प्राण ही इन्द्रियो को चेतना...और रिया प्रदान करते हैं। स्वयं इन्द्रियां कुछ नही कर सकती। वे जद योर अशक्त हैं किन्तु मनुष्य भूल से उनको अपना प्रात्मा मान बैठता है और उनकी आवश्यकताप्रो को अपनी आवश्यकताएँ समझने लगता है। इस प्रकार विचार करने पर वीतहव्य फो इन्द्रियों से छुट्टी मिली । अब वह इन्द्रियों और उनके विपयो के वश में न रहा । उसने आपने आत्मभाव को इनसे ऊँचे उठाकर भागे विचारना प्रारम्भ किया। समन और प्राण भी पदापि आत्मा नहीं हो सफ्ते । मन तो चान है और प्राण जड़ है, किन्तु प्रात्मभाव तो सदा ही स्थिर और स्यय- प्रकाश मालूम पड़ता है। क्या कभी ऐसा हुआ है कि प्रात्मा के अनुभव में किसी प्रकार का भी विकार मालूम पड़े ? जितना विकार है यह सब शात्मा के विषयों में ही होता है। प्रात्मा जो सब विपयो का साक्षी हे सदा ही एक रूप और निर्विकार प्रतीत होता है। यदि वह मन होता तो मन का उसको शान न होता और उसको यह भी न मालूम पड़ता कि मन विकारयान और चश्चल है। विकारों पा ज्ञान तभी हो सकता है जप कि कोई निर्विकार द्रष्टा उन निरीक्षण करता हो। प्राण जड़ है । यह न "अपने श्राप का अनुभव करता है और न किसी दूसरे विषय था। श्रात्मा को प्राण का अनुभव होता है और प्राण की शक्ति भी पारमा फे अधीन है। इस प्रकार विचार करने पर वीतहव्य पो यह अनुभव होने लगा कि मन और प्राण से परे और इनका दृष्टा तथा संचालक आत्मतत्त्व है, इसमें ही स्थित होना ठीक है । बुद्धि भी, जो कि मन से पुछ अधिक स्थिर जान पड़ती है, प्रात्मा नहीं हो सकती क्योंकि बुद्धि में भी विकार होते हैं और श्रात्मा का बुद्धि का ज्ञान होता है। मन और बुद्धि दोनो ही गहरी निद्रा में शान्त हो जाते है, किन्तु प्रात्मा पा प्रनुभय वहाँ पर भी होता है। इसलिये पात्मा बुखि से अधिक स्थायी, बुद्धि पाटा, और गहनतम तत्त्य है। उसमें स्थिति प्राप्त पर लेने पर ही शान्ति या अनुभव हो सकता है। इस प्रकार विचार परते परये घोर प्रात्मात्त्य पा ध्यान परते ( १२१ ) करते वीवस्य को समाधि लग गई। उसकी बुद्धि, मन, प्राण, इन्द्रिय और शरीर सभी स्थिर हो गए और यह इस स्थिति में यहुत काल तक शिनावत् वैठा रहा । समाधि खुलने पर अव उसकी चेतना जापत् भवन्या में लौटी तो उसको यह मालूम हुआ कि उसके शरीर के ऊपर एक बड़ी भारी बाँची रची गई है और उसके शरीर और इन्द्रियो में इतनी जड़ता या गई है कि वह उसको तनिक भी नहीं चला सकता। व उसकी चेतना भीतर को लौर्टी और उसने अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा अपने पूर्व जीवन और लोकों का अनुभव किया। १०० वर्ष तक वह कैलाश पर्वत पर एक तपस्वी, १०० वर्ष तक एक विद्याधर, पवायुगों वक इन्द्र और फिर बहुत काल तक गणेश रहा था। वीतहव्य ने अब यह सोचा कि उसका जड़ और मिट्टी से दवा हुआ शरीर चेतन होकर मिट्टी से स्वतन्त्र हो जाए। इसलिये उसने काने सूक्ष्म शरीर को सूर्यमण्डल में भेजा और वहाँ से पिगला नामक सूर्य की कला को साथ लाकर उसके द्वारा मिट्टी साफ कराई, और शरीर और इन्द्रियों में पुनः चेतनता और संचलन की उत्पत्ति कराई। अब उसका शरीर पूर्व को नाई स्वस्थ और चेतन हो गया। जो अनुभव उसने निर्विकल्प समाधि में प्राप्त किया था उसमें अपनी स्थिति करके जापत् अवस्था में ही प्रात्मभाव से रहने लगा। अब सका जीवन एक जीवन्मुक्त का जीवन था। न कुछ उसके लिये सादेव था धोर न हेय । न किसी वस्तु के प्रति उसको राग-था, न शा। इन्द्रियों द्वारा इन्द्रियोधित और शरीर और मन द्वारा शरीर भोर मन के करने योग्य फर्म वह शान्त रहकर करता था। उसको घर यक्त परमानन्द का अनुभव होता रहता था। इस प्रकार जीवन्मुक्त अवन्या में बहुत समय तक रहकर वोतहव्य के मन में विदेद-मुक्ति की कैरन्य अवस्या में प्रवेश करने का विचार हुआ । यह सोचकर उसने विचार करना प्रारम्भ किया। अपने संसार और जीवन की एक- एक वस्तु को सम्योधन करके उसने उनको विदा किया और अपने भापको सबसे निर्मुक्त करके परम शान्त, सत्तासामान्य, तुर्यातीत निए स्थिति में स्थित करके सदा के लिये शान्त हो गया। २७--काकशुण्ड की कथा संसार से मुक्त होने के उपाय का नाम योग है । वह दो प्रकार का ३ (१२० ) किसी भी विषय का ज्ञान और भोग नहीं प्राप्त कर सकती । ऐसे ही इन्द्रियों की सारी क्रियाएँ प्राण के आधार पर हैं। यदि किसी इन्द्रिय का प्राण-शक्ति के साथ सम्बन्ध न रहे तो उस इन्द्रिय द्वारा कोई रिया नहीं हो सकती । मन और प्राण ही इन्द्रियों को-चेतना..और क्रिया प्रदान करते हैं। स्वयं इन्दियां कुछ नहीं कर सकती। वे जड़ और अशक्त है किन्तु मनुष्य भूल से उनको अपना यात्मा मान घेठता है और उनकी श्रावश्यकताप्रों को अपनी आवश्यकताएँ समझने लगता है। इस प्रकार विचार करने पर वीतव्य को इन्द्रियों से छुट्टी मिली । अब वह इन्द्रियों और उनके विपयों के यश मे न रहा। उसने अपने बात्मभाव को इनसे ऊचे उठाकर आगे विचारना प्रारम्भ किया छ मन और प्राण भी कदापि आत्मा नहीं हो सकते। मन तो पवन है और प्राण जड़ है, किन्तु श्रात्मभाव तो सदा ही स्थिर और स्वयं प्रकाश मालूम पड़ता है। क्या कभी ऐसा हुआ है कि प्रात्मा के अनुभव मे किसी प्रकार का भी विकार मालूम पड़े ? जितना विकार हे वह सब आत्मा के विषयों में ही होता है। प्रात्मा जो सब विपयों का साक्षी हे सदा ही एक रूप और निर्विकार प्रतीत होता है। यदि वह मन होता तो मन का उसको शान न होता और उसको यह भी न मालूम पड़ता कि मन विकारवान् और चन्चल है। विकारों का ज्ञान तभी हो सकता है जय कि कोई निर्विकार दृष्टा उनका निरीक्षण करता हो। प्राण जड़ है । यह न अपने श्राप का अनुभव करता है और न किसी दूसरे विषय था। प्रात्मा यो प्राण या अनुभव होता है और प्राण की शक्ति भी पारमा के अधीन है। इस प्रकार विचार करने पर बीतहल्य को यह अनुभव होने लगा कि मन और प्राण से परे और इनका द्रष्टा तथा मंचालक आत्मतत्य है। इसमें ही स्थित होना ठीक है । बुद्धि भी, जो कि गन से धुद्ध अधिक स्थिर जान पड़ती है, भात्मा नहीं हो सकती क्योंकि चुद्धि में भी विकार होते हैं और श्रात्मा को बुद्धि का मान होता है। मन और बुद्धि दोनों हो गहरी निद्रा में शान्त हो जाते हैं, किन्नु प्रात्मा का अनुभव यहाँ पर भी होता है। इसलिये पात्मा बुद्धि से अधिक स्थायी, बुद्धि पाटा, और गहनतम तत्त्य है। उसमें स्थिति प्राप्त पर लेने पर ही शान्ति का अनुगर हो सस्ता है। इस प्रकार विचार परते पररी और प्रात्मतस्य का ध्यान करते ।
( १२३ ) मुगुरहनी ने मुझे कभी नहीं देखा था तो भी वे अपने आप ही अपनी सर्वज्ञता के कारण समझ गए कि मैं वसिष्ठ हूँ और कुतूहलवश उनके दर्शन करने पाया हूं। उन्होंने उठकर मुझे प्रणाम किया और मेरा स्वागत किया। सङ्कल्प द्वारा उन्होंने हाथों की रचना करके वृक्ष के पत्र तोड़ कर मेरे लिये आसन पनाकर मुझ से बैठने की प्रार्थना की। पद्यपि वे सब कुछ समझ गए थे और जानते थे कि मैं किस निमित्त वहाँ पर गया था तो भी मुझ से बोले- हे भगवन् ! आपने हम सब को दर्शन देकर कृतार्थ किया। आप कृपा करके आज्ञा दीजिये कि आप की हम क्या सेवा करें? मैंने कहा कि इन्द्र की सभा में चिरञ्जीवियों का वृत्तान्त चलने पर मैंने सुना था कि आप सबसे अधिक चिरञ्जीवी हैं। इसलिए श्राप कृपया अपने जीवन का वृत्तान्त मुनाइये। काकभुशुण्डजी बोले-भगवान् शिव के अधिष्ठातृत्व में अनेक गए और शक्तियाँ हैं उनके अनेक नाम धीर रूप हैं। उन शक्तियो में से एक का नाम भलम्बुसा है। उसका वाहन चण्ड नामक काऊ है। और शक्तियों की वाहन हंसनियों हैं । एक समय सब शक्तियों ने मिल कर उत्सव मनाया। उनके वाहनों ने भी उत्सव मनाया। और मत्त होकर नाच थोर गाना किया। नाना प्रकार की क्रीड़ा करते करते यहाँ तक हुआ कि वे सब हंसनियाँ घएड काक द्वारा, जो कि अल- म्युधा का वाहन था, गर्भवती हो गई। मेरी माता ब्राह्मी शक्ति का वाहन थीं। जय शक्तियों को यह पता चला कि उनकी वाहन-हंस- नियों गर्भवती हो गई है तो उन्होंने उनको कुछ दिन के लिये छुट्टी दे दी और अपने आप समाधि में स्थित हो गई । समय प्राने पर प्रत्येक हंसनी ने तीन तीन अण्डे दिए। जब उनमें से बच्चे निकले तो हमारे पिता पण्ड हम सबको लेकर माझी शक्ति के पास गए और उससे हमको आशीर्वाद दिलाया। उसने हमको पाशीर्वाद दिया कि हम लोग कभी भी संसार के चक्र में नहीं पड़ेंगे; सदा आत्मभाव में स्थित रहकर जीवन्मुक्त रहेंगे; कभी भी अज्ञान के वश में नहीं होंगे। यह कहकर उस देवी ने हमको इस फत्पक्ष पर एकान्त वास करने की सलाह दी। हम लोग यहाँ आकर पास करने लगे। यहाँ पर हम लोग बहुत काल तक वास करते रहे। मेरे और सब माई अपने सङ्कल्प के कारण विदेहमुक्तता को प्राप्त हो । ( १२२ ) है। एक वित्तोपशम और दूसरा प्राणनिरोध । प्रागनिरोप आरा चित्त का निरोध हो जाता है। और चित्त के शान्त होने पर प्रारा का निरोध हो जाता है। चित्तोपशम होने पर आत्मानुभय पा उदय हो जाता है। कुछ लोग प्राणनिरोध के गार्ग पर चलकर आत्मानुभव प्राप्त करते और कुछ मनोनिरोध के मार्ग पर । पहिले साधकों को योगी और दूसरों को शानी कहते हैं । योगियों का वर्णन करते हुए, यसिप्तमी ने रामचन्द्रजी को महायोगी काकभुशुण्डजी की कथा सुनाई जो इस प्रकार है:- वसिष्ठनी ने कहा-एक समय में सूक्ष्म शरीर द्वारा इन्द्र फी सभा मे गया। वहाँ पर बड़े २ पि और मुनि पैठे थे और नाना प्रकार का वार्तालाप होरहा था। होते-होते चिरजीवी पुरुपो का वृतान्त छिड़ गया । शावातप नाम के मुनि ने पहा-संसार में सप से अधिक चिरजीवी काकभुशुण्ड मुनि हैं। सन ने उत्सुरता से पूछा- कौन है और कहाँ रहते हैं ? शातातप मुनि पोने :-सुमेरु पर्यत फी पाराग नाम वाली कन्दरा के शिखर पर एक पल्पवृक्ष है। उस पृन को दक्षिण दिशा की डाल पर पहुत से पती रहते हैं। उन पक्षियों में एक महा श्रीमान् कोया रहता है। उसका नाम भुशुण्ड है। यह पोतराग और महा बुद्धिमान् है । जितने काल से यह जीवित है उतने काल से फोई भी जीवित नहीं है । यह शान्त और जीवन्मुफ है, उसके साथ पातचीत करने से परम आनन्द का अनुभव होता है और चिशान हो जाता है। यह बात सुनकर मेरे (घसिष्ठ के वित्त काफभुशुण्ड के दर्शन करने की महती उत्कण्ठा हुई। इन्द्रसमा से उठकर मैं सीधा सुमेरु पर्यत की थोर पल दिया। सुमेरु पहाड़ को पारागनाम्नी फन्दरा के शिसर पर पहुंचते ही मुझे फल्पवृक्ष दिखाई पड़ा। महामुन्दर और सय रातुओं के फल पूल युफ पुरा के उपर नाना प्रकार के पनी पेठे भानन्द फे राग अलाप रहे थे। आगे पदफर मैंने देसा कि तप्त ग्रंश के एक टहने पर अनेक पोये पैठे हैं। ये सप के सथ अचल और शान्त माव से पैठे थे और उनके मध्य में एक मदामीमान् और फान्तिमान उंची गर्दन किए हुए यह फीया पिराजमान था जो जगत् में सय जीवों से अधिक चिरशीयो है, जिसने अनेक पर देसे है और जो सदा ही भामभाव में स्थित रहता है। मैं पापारा मे नीचे San1 मुझे देखते ही सप कोषों में रालयली मच गई। पचपि पाय- ( १२३ ) भुशुएडजी ने मुझे कभी नहीं देखा था तो भी वे अपने आप ही अपनी सर्वज्ञता के कारण समझ गए कि मैं वसिष्ठ हूँ और कुतूहलवश उनके दर्शन करने आया है। उन्होंने उठकर मुझे प्रणाम किया और मेरा स्वागत किया। सङ्कल्प द्वारा उन्होंने हाथों की रचना करके वृक्ष के पत्र वोह फर मेरे लिये आसन बनाकर मुम से बैठने की प्रार्थना की । यद्यपि वे सब कुछ समझ गए थे और जानते थे कि मैं किस निमित्त यहाँ पर गया था तो भी मुझ से पोले-हे भगवन् ! आपने हम सम को दर्शन देकर कृतार्थ किया। आप कृपा करके आज्ञा दीजिये कि माप की हम क्या सेवा करें? मैने कहा कि इन्द्र की सभा में चिरञ्जीवियों का धृतान्त चलने पर मैंने मुना था कि भाप सबसे अधिक चिरजीवी हैं। इसलिए आप कृपया अपने जीवन का वृत्तान्त सुनाइये। काकभुशुण्डजी बोले-भगवान् शिव के अधिष्ठातृत्व में अनेक गण और शक्तियाँ है उनके अनेक नाम और रूप हैं। उन शक्तियों में से एक का नाम भलम्बुमा है। उसका वाहन चएड नामक काक है। और शक्तियों की वाहन हसनियों हैं। एक समय सन शचिया ने मिल कर उत्सव मनाया। उनके वाहनों ने मा उत्सव मनाया। और मत्त होकर नाच और गाना किया। नाना प्रकार की क्रीडा करते करते यहाँ तक हुआ फि वे सय हसनियों चएड कार द्वारा, जो कि अन- म्बुमा का वाहन था, गर्भवती हो गई । मेरी माता व्र झा शक्ति का वाहन थीं। जब शक्तियों को यह पता चला कि उनकी वाइन-हस- नियों गर्भवती हो गई है तो उहाँने उनको फुछ दिन के लिये छुट्टी दे दी और अपने श्राप समाधि में स्थित हो गई। समय आने पर प्रत्येक हसनी ने तीन तीन अण्डे दिए। जब उनमें से यच्चे निकले तो हमारे पिता चाड हम सरको लेकर ब्राझी शक्ति के पास गए और उससे हमको श्राशीर्वाद दिलाया। उसने हमको आशीर्वाद दिया कि हम लोग कमी भी ससार के चक्र में नहीं पढ़ेगे, सदा प्रारममाव में स्थित रहकर जीवन्मुक्त रहेंगे, कभी भी के वश में नहीं हागे। यह कहकर उस देयो ने हमको इस फल्पयत पर एकान्त वास करने की सलाह दी। हम लोग यहाँ पाकर पास करने लगे। यहाँ पर हम लोग स्टुव काल तक वास करते रहे। मेरे और सब माई अपने सल्य के कारण विदेहमुक्तता को प्राप्त हो . यज्ञान यायु गए । मैं ही अकेला अभी तक जीवित हूँ। मुझे यहाँ पर रहते-रहते अनेक फल्प घीत गए । समय समय पर प्रलय आता हे और फिर सृष्टि की रचना होने लगती है । प्रलय के समय में अपना यह घोसला छोड़ कर धारणा द्वारा अति सूक्ष्म पन जाता हूँ। प्रलयफाल में जय कि १२ सूर्य तप कर भूमण्डल को जलाने लगते हैं, मैं पानी की धारणा फरके ऊपर आकाश में चला जाता हूँ। जब बहुत जोर फ आँधी चलती है और पृष्टि होती है तो में अग्नि की धारणा फरके आकाश में स्थित रहता हूँ | जय कि सारी पृथ्वी जलमय हो जाती है तो मैं की धारणा करके जल के उपर तैरता हूं। जब सारा प्रमाण्ड लय हो जाता है तो मैं सुपुप्ति अवस्था में ग्राम में प्रवेश कर जाता हूं, और मह्माण्ड की पुन' सृष्टि तक मैं उसी अवस्था में रहता हूँ । सृष्टि हो जाने पर मैं फिर अपने इसी घोसले में पाकर यास करने लगता। मेरे संकल्प के कारण यह पल्पवृक्ष प्रत्येक सृष्टि में उदय हो जाता है। पसिष्ठजी ने बड़ी उत्सुकता से पूछा-आपने इतने बड़े जीवन में क्या क्या देसा? भुशुण्डजी योले- मैने अनेक पाश्चर्य देसे हैं, उनमें से पुष पाप को सुनाता हूँ। एक समय पृथ्वी पर तृण और पृक्ष हो ये, और कुछ न था। एक समय ११ हजार वर्ष तक पथ्यी पर भस्म के सिवाय कुछ न था । वृक्ष और तृण सय जल गए थे।एक समय ऐसी सष्टि हुई फि जिसमें सूर्य और चन्द्रमा प्रादि प्रकारा मह नहीं उपजे थे। केरल मुमेरु पर्वत पर स्थित फुत्र रत्ना द्वारा दो प्रकाश होता था। उस समय दिन रात को गति कुछ नहीं जान पड़ती थी। एक समय ऐसा हुमा कि देवतामा थोर देत्यो या युस होकर देत्य लोगों की विजय हुई और केवल प्रमा, विष्णु और शिव को पोदकर सय देवता उनके अधीन हो गए और सारे संसार में घीस युग तक देत्या काही अचल राज्य रक्षा । एक यार दो युग तक पृथ्वी पर पूती फेसिवाय कुछ न था। एक समय पई युगो तक पृथ्वी पर पर्यता के सिवाय कुछ न था। एक पार सारे पृथ्वीमएटल पर जल के सिवाय पुछ नहीं था ! महामेरु ही जल में सम्भे पी नाई स्थित था। एक यार विन्ध्याचल पर्वत इतना पहा सि सय पर्वती से पहा दो गया और पृथ्योमरहल को दयाने लगा। एक समय मृष्टि में न गनुप्य ये पौर देषता आदि । एक समय सृष्टि में प्रामणों के पापरण सराप दो ( १२५ ) गए थे। वे मद्यपान और दुरावार करते थे और शूद्र लोग राज्य करते थे। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, इन्द्र, उपेन्द्र और लोकपाल मेरे सामने ही अनेक वार नष्ट हुए और उत्पन्न हुए। मैने भगवान् का हिरण्यकशिपु को मारना और देवताओं और दैत्यों द्वारा समुद्र का मन्यन अपनी आँसों से देखा है। मैंने ऐसी सृष्टियाँ देखी है जिनमें विष्णु का वाहन गरुह, शिव का वाहन बैल और ब्रह्मा का वाहन इस नहीं था। जब सृष्टि उत्पन्न हुई वो, हे वसिष्ठ, आप, भरद्वाज, पुलस्त्य आदि ऋपि उपजे । फिर सुमेरु आदि पर्वत उपजे । आपके आठ जन्म मुझे याद हैं। कभी पाप चाकाश से उपजे, कमी जल से, कभी अमिसे, कमी परन से। बारह बार मैंने समुद्र मन्थन देखा है। तीन बार हिरण्यकशिपु का पृथ्वीको पाताल में ले जाना देसा। छ. धार परशु- राम का जन्म देखा है। मैंने ऐसे ऐसे समय देसे हैं कि जब कि वेद और पुराणों के अर्थ सरी ही तरह लगाए जाते थे। प्रत्येक काल के उपास्य देवता और शास्त्र और शास्त्रप्रवर्तक मिन्न मित्र रूप के देसे। मुझे मालूम है कि वाल्मीकि जी ने १२ चार रामायण की रचना की है। व्यासनीने मेरे सामने ही सात यार अवतार लिया और कई थार महाभारत की रचना की। मैने विष्णु भगवान् को भत्तों की रक्षा के हेतु अनेक बार अपवार लेते देखा है। मुझे ११ वार राम- चन्द्र रूप से इनका अवतार लेना और १६ वार कृष्ण रूप से मली मौति याद है। १०० वार मेरे सामने कलियुग में बुद्ध भगवान् फा प्रथतार हुआ है। मेरी पासी के सामने ही दो यार दक्ष प्रजापति फा यज्ञ भङ्ग हुा । इस प्रकार की अनेक घटनाएँ मैंने देखी हैं । उनका मैं पापसे कहो तर वर्णन करूँ। सष्टि अनेक बार मेरे सामने रची गई और लय हो गई। कमी और और प्रकार की सृष्टि होती है, कमी इसी प्रकार की जैसी कि अर है। भी इसके सहश और कुछ भिन्न रूप की होती है। मेरे रहने स्थान कमी सुमेरु होता है, कमी मंदरापत, कभी हिमालय, और की मालपपर्यत । रिसी रिसी सृष्टि में युगों के नियम का भग हो जाता है। कलियुग में सतयुग भोर सतयुग में कलियुग यतने लगता है। नाना सृष्टियों में देश, काल, निया, मना, शास्त्र, राग्य, और धर्म नाना प्रकार के ही देसने में आते हैं। एक समय ऐसा हुआ प्रिझा अपना भायु के दो दिन पर्यन्त समाधि- में रहे और दो फ्ल्प तक सृष्टि की रचना ही नहीं हुई।
वशिष्ठजी को इस कथा को सुनकर यहा आनन्द हुमा। घात देर तक फिर काकभुशुण्डजी से उनका ज्ञान और योग सम्बन्धी वार्तालाप हुधा जिसका वर्णन आगे सिद्धान्त सएडमें रिया जाएगा। २८-ईश्वरोपाख्यान इस उपारयान द्वारा घसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी को ईश्वर के सोचम स्वरूप और उसकी सर्वश्रेष्ठ पूजा की विधि का उपदेश किया है। घसिष्ठजी ने कहा-हिमालय का एफ शिसर फैलाश नाम का है, वहाँ पर चन्द्रकलाधर भगवान शिय याम करते हैं। मैने यहाँ पर कुछ दिन यास करके तप और अध्ययन किया है। एक समय जय कि श्रावण यदी अष्टमी को थाधी रात को मैं समाधि से जागा यो घेखता है कि दशी दिशाएँ मौन और शान्त हैं। महान् अन्धेरा संसार को घेरे हुए है और मन्द मन्द पवन चल रहा है। उसी समय महा शीतल अमृतरूपी फिरणों से ओपधियों को पुष्ट करता हुधा चन्द्रमा उदय हो पाया। मैं आपनी कुटिया में धैठा हुषा प्रकृति को इस शोभा फा पानन्द से निरीक्षण कर रहा था कि यकायफ बड़ी रोज रोशनी हुई और सारी प्रकृति चमक उठी। मेरी समझ में नहीं पाया कि यह प्रकाश कहाँ से बारहा है। चारी भो निरीक्षण करने पर पता चला कि भगवान् शिय पार्वती के हाथ में हाथ डाले हुए मेरी कुटिया की ओर चले आ रहे हैं। मैने दूर से ही मन ही मन में उनका स्वागत दिया और उनको आदरपूर्वक प्रणाम किया। उनके निकट आ जाने पर उठकर उनको प्रणाम दिया और पाच और अर्य दिया और उनके पैठने के लिए श्रासन बिछाया। महादेव ने बैठते ही मुझसे पुशल पृछी और मुझे आशीर्याद दिया। मेरे मन में यह आनन्द हुया। मैने भगवान से पूछा-हे प्रभो, श्राप यदि मेरे उपर कृपा रसते हैं तो मुझे यतलाइये कि भगवान का स्वरूप और उसकी मर्षोत्तम प्रकार की पूजा क्या है ? शियनी योले :- न इन्द्र, न पयन, न मूर्य, न अग्नि। यह देव न देवाला और न चिरारूप । असली ऐप अनादि भोर अनन्त मंयिन् है; धाकारवान् , परिमिव और परिदिन कोई यान नहीं है।
बह देव सब जगह सत्ता और असचा रूप से वर्तमान है। उसी का नाम शिव है । उसरा हो तुम पूजन करो। थाकार का पूजन तो न लोगों के लिए है जो शिव तत्व को नहीं जानने । रुद्रादि देवों को पूजने से परिच्छिन्न और परिमित पदार्थों की हो प्राप्ति होती है. परन्तु अनादि और अनन्त श्रात्मरूप देव के पूजने से अलौकिक श्रानन्द की 'प्राप्ति होती है। जो लोग अलौकिक आनन्द को छोड़कर औपाधिक मुगों के पीछे पड़ते हैं वे मन्दार-वन को छोड़कर करखवन में प्रवेश करते हैं। यह ब्रह्म जो कि सारा विश्व है, देवों का देव है। उसी की पूजा करना श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है । न पद दूर है है और न दुम्माय यह सबके भीतर मौजा है। जो अमको जानते हुए आकारवाले देव की पूजा करते हैं ये बानोचित कोसा करते हैं। परमकारण भगवान् शिव प्रत्येक जीव के श्रात्मा है और उनके पूजने का तरीका केवल आत्मघोष है। पुष्प धूप दीप श्रादि वस्नुओं द्वारा भगवान की पूजा परना चाल-धुद्धिवाले पुरुषों को शोभा देता हे, हे वशिष्ठ! श्राप जैसे ज्ञानी पुरुषों को शोमा नहीं देता । यह देव नित्य और सर्वत्र यर्तमान है, उसके पूजने के लिए श्राद्वान और मन्त्र को आवश्यकता नहीं है। बोध के सिवाय उसको पूजने की और कोई विधि नहीं है। यह देव ध्यानद्वारा ही पूजा जाता है। ध्यान ही उसका। अय और ध्यान ही पाद्य ; ध्यान हो पुष्प है और ध्यान ही उपहार । ध्यान से ही यह प्रमन्न होता है। सब काम करते हुए, सय भोगों के भोपते हुप, सर स्थितियों में रहते हुए आत्मा का ध्यान करते रहने से ही आत्मा प्रसन्न होता है। आत्मा को अर्चना प्रत्येक मनुष्य हर स्थिति में रहते हुए कर सकता है। अपने देह में स्थित परम शिव मा सोते, जाने, चलवे,फिरते. उरते, बैठते, साते, पोते. सब प्रकार के मोगों का भोग करते हुए सदा ही ध्यान करना चाहिए। ऐसा करने से ही बीय का परम कल्याण है। इस प्रकार शिषी ने वसिष्टमी को देवपूजा का स्वरूप बताकर कहा कि श्रय में अपने स्थान पर जाना चाहता हूँ ! तुम्हारा कल्याए हो-यह कहकर ये पार्वती को लेकर अपने स्थान पर चले गए और मेरे मन में सदा के लिए घाँदना कर गये । हे राम! मसे मैं प्रकार की ही देवपूजा करता हूँ दूसरे और किसी प्रकार को नहीं।
( १२६ ) वशिष्ठजी को इस कथा को सुनकर पड़ा आनन्द हुमा। बहुत देर तक फिर काकभुशुण्डजी से उनका ज्ञान और योग सम्बन्धी वार्तालाप हुआ जिसका वर्णन आगे सिद्धान्त सण्डमें रिया जाएगा। २८-ईश्वरोपाख्यान इस उपाख्यान द्वारा वसिष्ठजी ने रामचन्द्रजी को ईश्वर के सर्वोचन स्वरूप और उसकी सर्वश्रेष्ठ पूजा की विधि का उपदेश रिया है । वसिष्ठजी ने कहा-हिमालय का एफ शिसर कैलाश नाम फा है, वहाँ पर चन्द्रकलाधर भगवान् शिष याम करते हैं। मेने वहाँ पर कुछ दिन चास परफे तप और अध्ययन किया है। एक समर जब कि श्रावण घदी अष्टमी को आधी रात को मैं समाधि से जागा तो देखता हूँ कि दशा दिशाएँ मौन और शान्त हैं। महान अन्धेरा संसार को घेरे हुए है और मन्द मन्द पवन चल रहा है। उमी समय महा शीतल अमृतरूपी किरणों से प्रोपधियों को पुष्ट करता हुआ चन्द्रमा उदय हो पाया। मैं अपनी मुटिया में बैठा हुआ प्रकृति की इस शोभा का पानन्द से निरीक्षण कर रहा था कि यफायफ पड़ी तेज रोशनी हुइ धौर सारी प्रकृति चमक उठी। मेरी समझ में नहीं पाया कि यह प्रकाश कहाँ से थारहा है। चारों ओर निरीक्षण करने पर पता चला कि भगवान् शिव पार्वती के हाथ में हाथ डाले हुए मेरो कुटिया की ओर चले था रहे हैं। मैने दूर से ही मन ही मन में उनका स्वागत दिया और उनको श्रादरपूर्वक प्रणाम किया। उनके निकट पा जाने पर उठकर उनको प्रणाम रिया और पाय और अर्य दिया और उनके बैठने के लिए प्रासन विद्याया। महादेव ने धैठते ही मुझसे पुशल पूछी और मुझे आशीर्याद दिया। मेरे मन में पड़ा आनन्द हुथा। मैंने भगवान से पूछा-हे प्रभो, आप यदि मेरे ऊपर रुपा रसते हैं तो मुझे पतलाइये कि भगवान का स्वरूप और उसकी मर्वोत्तम प्रकार की पूजा क्या है ? शिवजी योले : हे घसिष्ठ ! भगवान् पा सर्ययेष्ट रूप न विष्णु है, न शिय, न इन्द्र, न पयन, न मूर्य, न अग्नि । यह देव न देवाला है और न चित्तरूप । असती देय अनादि घोर अनन्त मंपिम् है। याकारवान् , परिमित और परिदिन कोई पस्तु नहीं है। - :- ( १२६ ) हुए उपदेश से अर्जुन का मोह दूर हो जाएगा और यह युद्ध में अपने रायुधो को परास्त करेगा। उस घोर सग्राम में बहुत सी प्रजा कट जाएगी और पृथ्वी का भार हलका होगा। ३०-शतरुद्रोपारन्यान मारा जगत् कल्पनामय है। जी भी अपनी-फल्पना द्वारा ही एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करता है और अपनी कल्पना द्वारा हो अपने इस यन्धन से मुक्त होता है । जो जैसी कल्पना करता है वैसा ही हो जाता है। वासना और कल्पना जगत् के प्रसार और जीव को मलो युरी गति के रहस्य हैं। इनके द्वारा हो सय कुन होवा है। इस विषय को धमनाते हुए वसिष्ठजी ने श्रीरामचन्द्रजी को शतरुद्रीपास्यान मुनाया जो इस प्रकार है: हे रामचन्द्र ! प्राचीनकाल में एक बड़ा विचारशील और शुद्ध पापरणनाला परवी रहता था। उसने अपने यत्न और अभ्यास द्वारा समाधि में स्थित होने की शक्ति प्राप्त कर ली थी। वह अपना सारा समय प्राय समाधि में ही विवावा या । एक दिन, जय कि वह समाधि से उठा ही था, उसके मन में यह कल्पना उदय हुई कि यह एक विश्व की रचना करे। यह कल्पना मनमें आते ही उसके सकल्प से एक विश्य की रचना हो गई, और इस विश्व में वह जीवट नामका पुरुप पुत्रा। अय वह अपनी अपनीरूम स्थिति को भूलकर अपने कल्पित विश्व में जीवट रूप से विचरने लगा। इस रूप में उसने खूब भोग भोगे, मद्यपान किया, और ग्रामगों की सेवा मो की। जीवट को एक दिन सोते समय सप्त पाया और इस स्वप्नजगत् में उसे अपने माझए होने का भान हुना। अब वह ब्रामण रूप में वेद का अध्ययन और पाठ करने लगा। जय ब्राह्मण रूप में उसको कुछ काल बीत गया हो से सन्न हुआ कि वह एक राजा है और उसके पास बहुत सो सेना और बहुत से नौकर पाकर हैं। उस राजा को एक समय ऐसा स्वप्न हुआ कि वह एक महाप्रतापी चक्रवर्ती गजा है। बहुत काल तक पश्यतो राजा के रूप में रहते हुए इसे एक दिन यह स्वप्न हुआ कि वह एक देवागना है और देवताओं के धारा में अपने पसन्द किए हुए देवतायों के साथ प्रानन्द से विहार कर रही है और सब प्रसन्न है। maram कि यह काम-योडा से थककर गहरी निद्रा में लीन थी २८--अर्जुनोपाख्यान रामचन्द्रजी को अनासक्त रहकर सय कमों को करने का उपदेश देते हुए वसिष्ठजी ने कहा :- हे राम! भगवान् कृष्ण जिस असक्तता का अर्जुन को उपदेश देंगे उसी प्रकार की असकता को प्राप्त करके तुम.भी संसार में अपना जीवन सुख से वितायो। रामचन्द्रजो ने वसिष्ठजी से पूषा-यह अर्जुन फय उत्पन्न होगा और भगवान उसको किस प्रकार की पसपना फा उपदेश देंगे? वशिष्ठनी चोले: भगवान् यम हर एक चतुर्युगी में सुध काल के लिए तप किया करते हैं। उस अवस्था में ये उदासीन भाव से रहते हैं। अतः यह भूमण्डल अधिक प्राणियों से व्याप्त हो जाता है और रहने योग्य नहीं रहता। उन दिनों पृथ्वी का भार दूर करने के लिए देवता लोग ही आवश्यकतानुसार प्राणियों को मारते हैं। इस समय पितरों का नायक वैवस्वत नामक यम है। इसको कुछ समय पीत जाने पर अपने पापनाश के निमित्त तप करना होगा। उस समय पृरको प्राणियों के भार से दयकर विष्णु भगवान् की शरण में जाएगी। पृथ्वी का भार उतारने के लिर विष्णु भगवान् दो शरीरों (फपण पोर पर्नुन) में अवतार लेंगे। इनमें एक यमुद्देव पुत्र वासुदेव और दूसरा पार- पुत्र अर्जुन के नाम से प्रसिद्ध होगा। पाएड का एक और पुत्र धर्मपुर युधिष्ठिर के नाम प्रसिद्ध होगा। उसके चचा पालएका दुर्योधन होगा। इन दोनों में प्रत्यी को एक दूसरे से छीनने के लिये घोर युद्ध होगा जिसमें १८ अक्षौहिणी सेना इपट्टी होगी। गाण्डीय धनुपधारी अर्जुन फा रूप धारण करके विष्णु भगवान् उस सेना का नारा करके पृथ्वी का भार उतारेंगे। विष्णु भगवान् का अर्जुन-रूप युद्ध के आरम्भ में हर्ष शोकादि मानर म्यामायिक दोषों से युक्त होगा और दोनों पोर से सेना में मम्मिलित अपने पन्धुओं और सम्यन्धियों को देखकर उनको मारने के लिए अनुपत होकर अपना धनुप नीचे रप देगा, और अपने मारथी प्रोकप्य रूपधारी विष्णु भगवान् से अपने मन की दशा का वर्णन करेगा। सोरण म समय अर्जुन को प्रात्मतान का उपदेश देकर उसके मोह फो दूर करेंगे और उसको असक्त होकर युद्ध करने की सलाह देंगे। धीर द्वारा किए ( १२६ ) हुए उपदेश से अर्जुन का मोह दूर हो जाएगा और वह युद्ध में अपने शत्रुभी को परास्त करेगा। उस घोर संग्राम में बहुत सी प्रजा कट जाएगी और पृथ्वी का भार हलका होगा। ३० -शतरुद्रोपाख्यान सारा जराव कल्पनामय है। जीय भी अपनी कल्पनाLद्वारा ही एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करता है और अपनी कल्पना द्वारा ही अपने इस यन्धन से मुक्त होता है। जो जैसी कल्पना करता है वैसा ही हो जाता है। वासना और कल्लना जगत् के प्रसार और जीव को भली दुरी गति के रहस्य हैं। इनके द्वारLदो सब कुछ होता है। इस विषय को समझाते हुए वसिष्ठजी ने श्रीरामचन्द्रजी को गावरद्रोपाख्यान सुनाया जो इस प्रकार है:- हे रामचन्द्र ! प्राचीनकाल में एक बड़ा विचारशील और शुद्ध भाचरएवाला वपरवी रहता था। उसने अपने यत्न और अभ्यास मारा समाधि में स्थित होने की शक्ति प्राप्त कर ली थी। यह अपना सारा समय प्रायः समाधि में ही विताता था । एक दिन, जब कि वह समाधि से उठा हो या, उसके मन में यह कल्पना उदय हुई कि वह एक विश्व की (चना करे। यह कल्पना मनमें पाते ही उसके संकल्प से एक विश्व की रचना हो गई, और इस विश्व में वह जीवट नामका पुरुप हा। अब वह अपनी तपस्वीरूप स्थिति को भूलकर अपने कल्पित विश्व में जीवट रूप से विचरने लगा। इस रूप में उसने खूब मोग मागे; मद्यान किया, और ब्राह्मणों को सेवा भी की। जीवट को एक दिन सोते समय स्वप्न आया और उस स्वप्नजगत् में उसे अपने अमर होने का भान हुआ। अब वह ब्राह्मण रूप में वेद का अध्ययन भोर पाठ करने लगा। जय ब्राह्मण रूप में उसको कुछ काल बीत गया दो उसे स्वप्न हुआ कि यह एक राजा है और उसके पास बहुत सी सेना और घहुन से नौकर चाकर है। राजा को एक समय ऐसा सन हुआ कि यह एक महाप्रतापी चक्रवर्ती राजा है। बहुत काल तक पानी राजा के रूप में रहते हुए उसे एक दिन यह स्वप्न हुआ कि पदक देवानना है और देवताओं के यारा में अपने पसन्द किए हुए माओं के साथ आनन्द से विहार कर रही है और स्वथ प्रसन्न है। अप कि यह काम-मोडा से यककर गहरी निद्रा में लीन थी २८-अर्जुनोपाख्यान रामचन्द्रजी को अनासक्त रहकर सब कमों को करने का सपदेश देते हुए वसिष्टनी ने कहा:-- हे राम ! भगवान कृष्ण जिस असक्तता का अर्जुन को उपदेश देंगे उसी प्रकार की असकता को प्राप्त करके तुम भी ससार में अपना जीवन मुस से बितायोरामचन्द्रजी ने यसिष्टनी से पूछा-यह अर्जुन फय उत्पन्न होगा और भगवान् उप्तको किस प्रकार की असपता का उपदेश देंगे? वशिष्ठनी बोले: भगवान् यम हर एक चतुर्युगी गे कुछ काल के लिए तप दिया करते हैं। उस अवस्था में वे उदासीन भाव से रहते हैं। अत. यह भूमण्डल अधिक प्राणियों से व्याप्त हो जाता है और रहने योग्य नहीं रहता। उन दिनो पृथ्वी का भार दूर करने के लिए देवता लोग ही आवश्यकतानुसार प्राणियों को मारते हैं। इस समय पितरा का नायक वेवायत नामक यम है। इसको पुछ समय यीत जाने पर अपने पापनाश के निमित्त तप करना होगा। उस समय पृथ्वी प्राणिय के भार से दयकर विष्णु भगवान की शरण में जागी। पृथ्वी भार उतारने के लिए विष्णु भगवान् दो शरीरी (कृष्ण पोर अर्जुन में अवतार लेंगे। उनमें एक यमुदेव पुरा वासुदेव और दूसरा पाएड. पुन अर्जुन के नाम से प्रसिद्ध होगा। पाएट का एक और पुत्र धर्मपुत्र युधिष्ठिर के नाम प्रसिद्ध होगा। उसके बचा पा लडका दुर्योधन होगा। इन दोनों में पृथ्वी को एक दूसरे से छीनने के लिये घोर युद्ध होगा जिसमें १८ अक्षौहिणी सेना इक्ट्ठी होगी। गाएडीघ धनुपधारी अर्जुन का रूप धारण करके विष्णु भगवान् उस सेना का मारा करके पृथ्वी का भार उतारेंगे। विष्णु भगवान् का अर्जुन-रूप युद्ध फे प्रारम्भ में हर्ष शोकादि मानर स्रामायिक दोपों से युफ होगा और दोनों ओर से सेना में सम्मिलित अपने पन्धुश्री और सम्यन्धियों को देवर उनको मारने के लिए अनुपत होकर अपना धनुप नीचे रम देगा, और अपने सारयी श्रीकृष्ण-रुपधारी विष्णु भगवान से अपने मन की दशा का वर्णन करेगा। श्रीकृष्ण उस समय अर्जुन को प्रात्मशान का उपदेश देकर उसके मोह को दूर करेंगे और उसको असक्त होरर युद्ध करने की सलाह देंगे। श्री राहिए .- ( १२६ ) हुए उपदेश से अर्जुन का मोह दूर हो जाएगा और यह युद्ध में अपने शत्रुधा को परास्त करेगा। उस घोर सग्राम में बहुत सी प्रजा कट जाएगी और पृषी का भार हलका होगा। ३०-शतरुद्रोपारयान मारा जगत कल्पनामय है। जीव भी अपनी कल्पना द्वारा ही एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करता है और अपनी कल्पना करा ही अपने इस बन्धन से मुक्त होता है। जो जैसी कल्पना करता है वैसा ही हो जाता है। वासना और कल्पना जगत् के प्रसार और जीर को मली धुरी गति के रहस्य हैं। इनके द्वाराही.सब कुछ होचा है। इस विषय को समझाते हुए वसिष्ठजी ने श्रीरामचन्द्रजी को शवरुद्रोपाख्यान सुनाया जो इस प्रकार है । हे रामचन्द्र प्राचीनकाल में एक बड़ा विचारशील और शुद्ध पाचरएकाला तपस्वी रहता था। उसने अपने यत्न और अभ्यास द्वारा समाधि में स्थित होने की शक्ति प्राप्त कर ली थी। वह अपना सारा समय प्राय समाधि में ही पिताता था। एक दिन, जय कि वह समाधि से घठा ही था, उसके मन में यह कल्पना उदय हुई कि वह एक विश्व की रचना करे। यह कल्पना मनमे पाते ही उसके सकल्प से एक विव की रचना हो गई, और इस विश्व में वह जीवट नामका पुरुष हुआ। अब वह अपनी तपस्वीरूप स्थिति को भूलकर अपने कल्पित विश्व में जीपट रूप से विचरने लगा। इस रूप में उसने खूब भोग मोरे, मद्यपान किया, और ब्राह्मणों की सेवा भी की। जीवट को एक दिन सोते समय पण पाया और उस स्वप्नजगत् में उसे अपने अभय होने का मान हुआ। अब वह ब्राह्मण रूप में वेद का अध्ययन और पाठ करने लगा। जब प्राण रूप में उसको कुछ काल बीत गया हो उसे स्वप्न हुआ कि यह एक राजा है और उसके पास बहुत सी सेना और बहुत से नौकर चाकर है। उस राजा को एक समय ऐसा मन हुआ कि वह एक महाप्रतापी चकनी राजा है। बहुत काल तक पवतो राजा के रूप में रहते हुए उसे एक दिन यह स्वप्न हुआ कि पर एक देवाशना है और देवत्ताधों के याग में अपने पसन्द किए हुए देवाओं के साथ आनन्द से विहार कर रही है और सब प्रसन्न है। जय कि वह काम-कोडा से यककर गहरी निद्रा में लीन थी ( १२८ ) २८-अर्जुनोपाख्यान रामचन्द्रजी को अनासक्त रहकर सय फर्मों को करने का उपदेश देते हुए वसिष्ठजी ने कहा :- राम! भगवान् कृष्ण जिस प्रसक्तता का अर्जुन को उपदेश देंगे उसी प्रकार की असकता को प्राप्त करके तुम भी ससार में अपना जीवन सुख से विवाघो। रामचन्द्रजी ने पसिष्ठनी से पूछा-यह पर्जुन फय उत्पन्न होगा और भगवान उसको किस प्रकार की प्रसस्ता फा उपदेश देंगे ? पशिष्ठजी योले:- भगवान् यम हर एक पतुर्युगी में गुर काल के लिए तप किया करते हैं। उस अवस्था मे वे उदासीन भाव से रहते हैं। अत. यह भूमण्डल अधिक प्राणियो से व्याप्त हो जाता है और रहने योग्य नहीं रहता । उन दिनों पृथ्वी का भार दूर करने के लिए देवता लोग ही आवश्यकतानुसार प्राणियों को मारते हैं। इस समय पितरों का नायक वैवस्वत नामक यग है। इमरो पुछ समय बीत जाने पर अपने पापनाश के निमित्त तप करना होगा। उस समय पृथ्वी प्राणियों के भार से दयकर विष्णु भगवान की शरण में जाएगी। पृथ्वी का भार उतारने के लिए विष्णु भगवान दो शरीरी (फपण पोर अर्जुन) में अवतार लेंगे। उनमें एक पसुदेव पुत्र वासुदेव और दूसरा पाएर पुन अर्जुन के नाम से प्रसिद्ध होगा। पाए फा एक और पुन धर्मपुत्र युधिष्ठिर के नाम प्रसित होगा। उसके चचा या लड़का दुर्योधन होगा। इन दोनों में पृथ्वी को एक दूमरे से छीनने के लिये घोर पुन होगा जिसमें १८ अक्षौहिणी सेना इक्ट्ठी होगी। गाण्डीय धनुपधारी अर्जुन का रूप धारण करके विष्णु भगयान उस सेना का नारा करके पृथ्वी का भार उतारेंगे। विष्णु भगवान् का अर्जुन रूप युद्ध के प्रारम्भ में हर्प शोकादि मानर सामायिक दोषों से युक्त होगा और दोनों पोर से सेना में मम्मिलित अपने पन्धुओं और सम्यन्धियों को देखरर उनको मारने के लिए अनुपत होकर अपना धनुप नीचे रख देगा, और अपने सारथी श्रीकृष्ण-रुपधारी विष्णु भगवान से अपने मन की दशा का वर्णन करेगा। श्रीरप्प उम समय अर्जुन को आत्मज्ञान का उपदेश देकर उसके मोह को दूर करेंगे और एसको असक होरर युद्ध परने की सलाह देंगे। श्रीकृष्ण द्वारा किए सब जीव रुद्र धने और कल्प का अन्त होनेपर सर को विदेह मोक्ष की प्राति हुई। रामचन्द्रजी ने पूछा- हे भगवन् ! यह आश्चर्य मय घटना कैसे हुई ? वसिष्ठजी ने कहा-हे राम! मन में जो संकल्प होता है वही Pamr .. + पदार्य मोसंकल्प करने लगते हैं। प्रज्ञानियों का संकल वाह्य वस्तुओं द्वारा नियमित होता है, शानियों का अपने विचार द्वारा। इस फया में प्रामण ने राजा का रूप इस लिये धारण किया था कि वह राज- भोगी की इच्छा करने लगा था। राजा चावर्ती राजा इसलिये ना रसने बस रूप में ज्यादा आनन्द समझर था। चक्रवर्ती राजा को मुन्दर त्रियों के भोग की कामना रहती थी, इसलिये वह देवागना ना र देवानना हरिणी इस यारले बनी कि उम में हरिणी की जैसी पाँखों की वासना थी। हरिणी येल इसलिये बनी कि उसको सदा दमों को पाइना थी। ये इस कारण भ्रमर बनी कि उस को वृत्ति भ्रमर रूप र स्थिर हो गई थी । भ्रमर कमलिनी इस वास्ते धना कि उसके मन सदा ही कमलिनी का ध्यान रहता था। कमलिनी हाथी इसलिये निी कि हाथी ने जब उस को तोहा तो उसकी वृत्ति में हायो का ही रिपर था। इसी प्रकार, हे राम, जो जिस रूप का.ध्यात करता है.यह उसी रूप को धारण करो। यह अटल नियम जो जिस पतु फो निस्तर पाइता है. या जिस वस्तु का जिस को ध्यान रहता है, यह बश्य ही यही हो जाता है। योगियों और शुद्ध मन वालों संकल्प-शीम ही सिद्ध होता है। योगी लोग अपने आप अपनी यवस्था में स्थित रहते हुए भी अनेक रूप धारण कर लेते हैं। विष्णु भगवान् क्षीर समुद्र में रहते हुए ही पृथ्वी मंडल पर अवतार लेकर भूमि का भार उतारते हैं। सहस्रराहु ने घर पर बैठे-बैठे यह कल्पना कि वह मेघ होकर बरसे। यहाँ पर हो वह राजा के रूप में रहा भौर दूसरी जगह मेघ रूप से परसने लगा। यह अपने घर बैठा हुआ अपने राज्य में पोरादि दुष्टजनों को पकड़ कर उनको दण्ड दे देता था।
( १३० । तो उसे स्वप्न में यह अनुभव हुआ कि वह एक हरिणी है। हरिणी रूप से यह वन में विचरने लगी। हरिणी ने एक दिन स्वर में अपने पापको एक हरी और कोमल वेल के रूप में पाया। बल्ली के मन में यह कल्पना उदय हुई कि वह एक भ्रमर है और भ्रमर रूप से नाना प्रकार के पुष्पों और बेलों का रस पान कर रही है। भ्रमर को एक समय स्थान पाया कि यह कमलिनी है। एक समय एक हाथी ने उस कमलिनी को तोड़कर सा लिया। उस कमलिनी के हृदय में उस समय यह कल्पना उदय हो आई कि यह एक हाथी है। इस प्रकार नाना रूप धारण करते हुए वह प्रक्षा का हंस यना । माझा ने उसको उपदेश दिया जिसके द्वारा उसे आत्मज्ञान हुआ। एक समय वह हंस सुमेरु पर्वत पर उड़ा हुआ जाता था वहाँ पर उसने रुद्राको देखा और उसके मन में यह फल्पना उदय हुई कि यह रुद्र पने। निदान यह एक रुद्र बन गया। रुद्र रूप में उसे प्रमशान हो गया और अपने पूर्ण ज्ञान के द्वारा उसको अपने पूर्व जन्मों का भी स्मरण हो पाया। उसे यह जानकर पड़ा आश्चर्य हुथा कि यह पर भी वापस रूप से उसी स्थान पर बैठा हुश्रा अपने फल्पना जगन् फा अनुभव कर रहा है। और इसी प्रकार यह अपने शत (सौ) रूपी में वर्तमान है। उसने सोचा कि अब वह अपने सय रूपों को, जो कि उसने नाना फल्पना-जगतों में प्रहण किए हैं, जगाए और उन समको तत्त्वज्ञानी धनार मुक्त कराए। यह सोचकर वह उस स्थान पर पहुँचा जहाँ कि वह तपस्वी के रूप में अपने फ्ल्पना जगत् की रचना पर रहा है। वहाँ पर पहूँचकर उसने तपस्वी को जगाया। तपरवी पो जागने पर ज्ञान हुआ कि अभी उसके फल्पित विश्य में उसफे अनेक रूप वर्तमान है। रुद्र और वपस्वी दोनों ने जीयट फो सोते से जगाया। तीनों ने मिलकर वेदपाठी प्रामाण फो। चारों ने मिलकर राना फो। पाँचों ने पकयी राजा फो। इस प्रकार होते होते रुद्र के समस्त १०० रूप जाग गए। रुद्र को अपने १०० रूप में वर्तमान होकर बड़ा आश्चर्य हुआ। तर न्द्र ने अपने सय रूपों की पहा कि तुम सब अपने अपने स्थान पो जायो और जय एक ये सप शरीर तम तक इन मय शरीरों के योग्य भोगों को पासना और फागनारहित होरर भोगी। शरीर-पार होने पर नुम मय मद्र रूप में या जाओगे। सन सपः शरीरों फा पन्त . रानेर ( १३३ ) बेताल की समझ में साधु को वात आ गई। उसने सोचा कि मनुष्य यदि सचमुच में मनुष्य अर्थात् मननशील और ज्ञानवान् जीव है, तो भवश्य ही उसे मारना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसे मनुष्य से किसी दूसरों को हानि नहीं पहुँचती, बल्कि उपकार होता है। लेकिन मूर्ख मनुष्य से वो पशु ही कहीं भले -क्योंकि उनसे दूसरे जीवों को इतनी हानि नहीं पहुँचती जितनी कि मूर्य मनुष्यों से। इसलिये देवाल ने यह सोचा कि अर वह अज्ञानी मनुष्यों का ही मतण करेगा ज्ञानी मनुष्यों का नहीं। कौन ज्ञानी हे कौन अन्जानी-इस बात को जानने के लिये उसने एक प्रश्नावली तय्यार की। एक समय कई दिन का भूस। वैवाल अपना पेट भरने के लिये रात्रि में बाहर निकला। उसकी उस देश के राजा से भेंट हो गई जो कि रात्रि को अपने राज्य में वीर- यात्रा कर रहा था। येताल ने राजा से ब्रह्मज्ञान सम्बन्धो कई प्रश्न इस बात की जाँच करने के लिये पूदे कि वह अज्ञानी है या ज्ञानी । राजा ब्रह्मज्ञानी था-उसने वेवाल के सब प्रश्नों का दृत्तिजनक उत्तर दे दिया। वेताल को बड़ा आनन्द हुआ और वह एकान्त में जाकर समाधि में स्थित हुआ, और आत्म-पद को प्राप्त करके वेताल शरीर को त्यागकर मुक्त हो गया। इस प्रकार ज्ञानीजन अपनी रक्षा और दूसरों का उद्धार करते हैं। ३२-मगीरथोपाख्यान संसार में किस प्रकार निर्मम, निरपेक्ष और अनासक्त भाव से मुक्त जीवन विताना और यथास्थिति संसार के समी काम करना चाहिए- इस सम्बन्ध में श्री वसिष्टनी ने श्री रामचन्द्रजी को भगीरय की कया सुनाई जो इस प्रकार है राजा भगीरथ की जय युवा अवस्था थी उसके मन में यह विचार उदय हुआ कि यह जीवन सर्वथा ही अमार है। दिन पर दिन वे ही भोग भोगे जाते हैं किन्तु फमी तृप्ति नहीं होती।/ फोई ऐसा मुप नहीं है जो दुसरहित हो। कोई ऐमा मोग का विषय नहीं है जो भोगने पर उतना हो अच्छा जान पड़े जितना कि वह प्राप्त होने से पूर्व प्रतीत होता है। संसार में कोई वस्तु मी सार नहीं दिग्पाई पड़ती। धन, दारा और पुन, जिनमें हमारी इतनी अधिक ममता है, कोई मी ऐमा पदार्य नहीं है जिसको प्राप्त कर लेने पर हमारे मन में शान्ति और - ( १३२ । योगिनीजन स्वर्ग लोक में रहती हैं तो भी पृथ्वी पर दिखाई पड़ती है। इन्द्र स्वर्ग के आसन पर स्थित रहते हुए भी पृथ्वी पर यश का भाग लेने के लिये भाते हुए दिसाई देते हैं। कृष्ण भगवान सहसों रूप से अपनी सहस्रों रानियों को प्रसन्न किया करते हैं। रामचन्द्रजी ने पूछा- हे भगवन् ! क्या धौर कोई पुरुप भी ऐसा है जो इस समय ही अनेक रूपों में वर्तमान हो। पसिनी पोले- आज रात को मैं समाधि में बैठकर देखूगा कि इस समय शतरद पी नाई किसी पुरुष का अनुभव हे अथवा नहीं। कल तुम को यतलाऊँगा। अगले दिन पसिष्ठजी ने कहा कि उत्तर दिशा में यहाँ से यहुत दूर जिन नामक एक देश है। यहाँ पर दीर्घटक नाम का एक सपरवी है। आज उसे २१ दिन समाधि में बैठे गए हैं। उसने इवने समय में सहस्री जन्मों का अनुभव कर लिया है और वे सम जन्म उसको एक साथ ही प्रत्यक्ष हो रहे हैं, और यह उन सय जन्मों में इस समय विचरण कर रहा है। इतना सुनकर राजा दशरथ ने कहा कि यदि ऐसा है तो मैं अपने दूत भेजफर उस देश में उस योगी का पता घलया फर उस को जगयाऊँ । यसिष्ठनी योले- राजन् ! इस समय यह योगी प्रहा का इस यनकर जीयन्गुफ हो गया है और उसका भौतिक देह मृतक हो गया है। यह बात उसके शिष्यों को भी अभी मालूम नहीं है। इसलिये अब उसको जगाया नहीं जा सकता। जम कुछ दिन याद उसके शिष्य उमका द्वार सोलेंगे तो उसको मरा हुमा पाएंगे। रामचन्द्रजो को यह सब सुनकर बड़ा आश्चर्य हुधा । ३१ चैतालोपाख्यान आत्मज्ञानी को संसार में कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकता--- इस पाव को समझाते हुए वसिष्टनी ने श्री रामचन्द्रजी को बेतालोपा. स्थान सुनाया जो इस प्रकार है:- दक्षिण दिशा में मन्दराचल पर्वत की एफ फन्दरा में महा भयानक आकार वाला एक वेताल रहता था। यह मनुष्यों को ग्या फर अपना पेट भरता था। एक समय उसके सामने एक साधु भा गया। उसको भी उसने मार कर पाना पाहा, किन्तु साधु ने इसे यह समझाया कि मनुष्यों को मार फर पेट भरना यदा भारी पाप है जिसका पुरा और दुःसदायी परिणाम उस फो भुगतना पड़ेगा।
। १३५ ) निकलकर वन में विचरने लगा। वहाँ पर विचरते-विचरते श्रात्म- चिन्तन और आत्मध्यान करते करते उसको प्रात्मज्ञान हो गया, और परम आनन्द और परम शान्त आत्मपद में उसकी अविचलित रूप से स्थिति हो गई। अब उसको न किसी वस्तु की इच्छा थी, और न किसी से पधासारे जगत को वह श्रात्ममय ही देखता था। किसी के प्रति न उसे मोह था थोर न घृणा। सनसे समता और प्रेम का व्यवहार था। अब उसको संसार में और वन में रहना एक सा ही था। उसने देश देशान्तर में भ्रमण करना आरम्भ किया। एक समय वह भ्रमण करता हुआ उस देश में गया जहाँ का वह कभी राजा था। वहाँ उसने भिक्षा माँगी, और ऐसा करने पर उसके मन में किसी प्रकार का भी विकार नहीं आया। लोगों के बहुत कहने पर भी उसने राज्य करने की ज़रा भी इच्छान की। भ्रमण करते करते एसकी अपने गुरु नितुल से भेंट हो गई और कुछ फालवक खून भात्म चर्चा हुई। स्वर्गलोक से सिद्धों ने आकर उसकी पूजा की और देवताओं ने सब प्रकार के ऐश्वर्य उसको देना चाहा किन्तु उसने किसी की भी इच्छा न की। बहुत सी अप्सराएँ उसके सामने श्राकर उसको प्रसन्न करने की चेष्टा करने लगी किन्तु उसके मन में किसी भी मोग की अभिलापा ददय न हुई, क्योंकि इसकी स्थिति उस परम आनन्द में थी जिसके आगे संसार के सर सुख लेशमान हैं। एक समय जब कि भगीरथ एक देश में भ्रमण कर रहा था, उस देश के राजा का देहान्त हो गया था। मन्त्री और प्रजा पिसी मुयोग्य राजा की वलाश में फिर रहे थे। साधु के वेप में भगीरथ को देखकर मंत्री ने उसके लक्षणों से पहिचान लिया कि यह पुरुष राजा बनाने योग्य है। मसने भगीरथ से राजा बनने की प्रार्थना की । भगीरथ ने लोकोपकार के लिये, अपनी किसी प्रकार की हानि या लाम न जानते हुए राजा होना स्वीकार कर लिया- और अति उत्तम रीति से राज्य किया। भगीरथ के राजा होने की मार दूर तक फैल गई । इस समय उम गग्य की जिस पर यह पहिले राज्य करते थे घड़ी सराय दशा थी। पारों ओर से शत्रुओं ने प्रारमण पर रक्सा था । यहाँ की प्रजा ने दुग्गी होकर भगीरथ के पास सयर भेनी। भगीरथ ने शत्रुओं को मगार मच्या समस्याप्त किया। दोनों रागों पर नि:मों और ( १३४ सुस का अनुभव होता हो। तय फिर किस लिये हमलोग इन यस्तुषों के पीछे पड़े रहते हैं ? क्या इनकी प्राप्ति में ही अपने जीवन की सय शक्ति लगाते हैं। इसलिये कि हमने कभी इनकी असारता पर विचार ही नहीं किया है। विचार उदय हो जाने पर ये सब पातुएँ असार और विपवत् जाग पड़ती हैं। भोगों में सुख और शान्ति जिनकी हम सबको चाह है-तलाश फरना ऐसा ही है जैसा कि मृगतृष्णा है जला से प्यास बुझा लेने की आशा। इस प्रकार विचार करते मरते राजा को संसार के भोगी ये प्रति घृणा हो गई और अपना परम और सत्य ध्येय जानने की इच्छा हुई। इस अवस्था में वे अपने गुरु नितुल ऋपि के पाश्रम पर गए । अपने मन के विचारों को भगीरथ ने गुरु के समक्ष रक्सा । जितुल भगीरथ के विवेक और वैराग्य को देखकर अत्यना प्रसन्न 0 योर पोले- परम आनन्द और परम शान्ति, जो कि मनुष्य-जीवन के उद्देश्य है, विपय भोगों के द्वारा प्राप्त नहीं हो सकते। उनके प्राप्त करने के लिये सब विपया या और उनके भागों का त्याग करना चाहिये। देह और इन्द्रियों में श्रात्माभिमान, स्त्री पुनादिक में सा, इष्ट फी इच्चा और अनिष्ट से द्वेप-ये सन त्यागकर यात्मचिन्तन, आत्मध्यान और प्रात्मपद में स्थिति के लिये प्रयत्न करने से ही परमानन्द और परम शान्ति की सिद्धि होती है। जो जिस पातु पी तीन यासना फरता है यह उसी को प्राप्त करता है. इसलिये भोगा ये विपया की पासना पा त्याग फरफे यात्म-पद प्राप्त परने की वासना परो। उस पद को प्राप्त कर लेने पर फिर पुत्र प्राप्त परना नहीं रहता। “स पद में स्थित होने पर कोई दुख नहीं रहता । उस पद में स्थित होने पर उस अक्षय और अनन्त आनन्द का अनुभव होता है जिसरे आगे समार सय मुग्न फुल भी नहीं। क्षण भर भी उस पानन्द का अनुभव पर लेने पर मनुष्य ससार पे सर मुरंग पो-जिनपा परिणाम सदा ही दुस हे- भूल जाता है। नितु पि की यस यात मुगार भगीरथ ने थारमपद प्राप्त परने फा पपा इरादा पर लिया। पर पार सय ओर से ध्यान दटापर प्रामचिन्तन परने लगा और धीरे-धीरे सय यातुधी पा त्याग करने लगा। बोदे ही ममय में उसने अपने सय धन, और राज्यपाट पा त्याग कर दिया। फेवन क पोती घोर अगोछा लेकर पर से ( १३७ ) लिये है कि सदा ही वह शरीर और इन्द्रियों सुसो के अनुभव करने में लगा रहे और फिर भी उसको किसी स्थायी मुस, किसी प्रकार की तृप्ति और शान्ति का अनुभव न हो ? विषयों के द्वारा उत्पन्न होनेवाले सभी सुरा क्षणिक और दुःस में परिणत होनेवाले हैं । कौन सा ऐसा सुन है जो चिरस्थायी हो? जो ओर प्राप्त नहीं हैं उनकी इच्छा होती रहती है, जो प्राप्त है उन में सुख का अनुभव नहीं होता, बल्कि उन से घृणा होने लगती है। क्या कोई ऐसा सुस नहीं है जो स्थायी हो, जिससे प्राप्त कर लेने पर वह सदा ही मना रहे और उस से कभी घृणा न हो ? क्या कोई ऐसी तृप्ति भी है- जिसको प्राप्त कर लेने पर फिर किसी विषय के भोग की वासना न रह जाए ? यह सोचकर उनको संसार के सर विपय और भोगी से विरक्ति हो गई, और उन्होंने अपने राज्य के बडे बडे विद्वानो को बुलाकर यह पूछा कि मनुष्यों के जीवन का क्या लक्ष्य है और उसको फैसे शान्ति और तृप्ति प्राप्त हो सकती हैं ? विद्वानों ने कहा-महाराज! श्रात्म- शान हो जाने पर मनुष्य को परम शान्ति और परम प्ति का अनुभव होता है, वही प्राप्त कर लेना मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है। आत्मज्ञान में स्थित हो जानेपर ही परमानन्द का अनुभव होता है। उस आनन्द के सामने ससार के सर विपयों के भोग के सुम्ब कुछ भी नहीं हैं। आत्म- पद में स्थित मनुष्य सदा ही दप्त और सुखी रहता है। वह न किसी यस्तु को प्राप्त करने की बाधा करता और न किसी से घृणा करता है। राजा और रानी दोनों ने श्रात्मज्ञान प्राप्त करने का निश्चय कर लिया। रानी राजा से अधिक बुद्धिमती, चतुर और उद्योगशील थी। उसका विचार सूक्ष्म और निश्चयात्मक था। थोड़े ही समय में उसे आत्मज्ञान हो गया। प्रात्मज्ञान होने पर उसके मुख पर प्रसन्नता और अलौकिक सौंदर्य फी मन गई। दिन पर दिन उसका सौंदर्य, तेज और आमन्द बढने लगा। अभी राजा को पात्मज्ञान नहीं हुषा था। यह न समझ सका कि रानी इतनी-अमन और प्रफुल्लित क्ष्यों रहती है। रानी ने राजा को यवलाया कि उसके हृदय में पली- किक आनन्द का प्रकाश हो गया है। घर उसे सारा जगन् आनन्द. भय ही दिखाई दे रहा है । राजा को समम में रानी की बात नहीं आती थी। पयोंकि जिसने आत्मानन्द फारसय अनुभव नहीं किया यह नहीं जान सकता कि प्रात्मानन्द क्या है। रानी ने अपने स्वामी को आत्मा- ( १३६ ) निर्मोह रूप से राज्य करता रहा। राज्य करते करते एक समय उसको यह ज्याल आया कि उसके साठ हजार पितर, कपिल प्रापि के भरम किए हुए, अभीतक सद्गति को प्राप्त नहीं हुए; उनको सद्गति सभी प्राप्त हो सकती है जब कि भूमण्डल पर गगा यहने लगे। यह सोचकर उसने तप किया और तप के प्रभाव से वह श्रीगगाजी को पृश्यीमण्डल पर ला सका जिसकी कथा संप लोग जानते हैं। प्रात्मस्थित पुरुप ही संसार में दुप्फर से दुप्फर फार्य कर सकते हैं। 1३३-रानी चुडाला की कथा चुडाला का उपारयान भी योगवासिष्ठ के सर्वश्रेष्ठ उपारयानों में से है। इसके द्वारा वसिष्ठजी ने श्री रामचन्द्रजी को यह यतलाया है कि पात्मज्ञान प्राप्त करने और योगाभ्यास करके सथ प्रफार फी सिद्धियाँ प्राप्त करने में स्त्रियों का उतना ही अधिकार है जिवना कि पुरुषों का। आध्यात्मिक सिद्धि फेवल पुरुपो फा ही ध्येय नहीं है बल्कि प्राणिमान का। यदि खो की यात्मशान में स्थिति हो जाए वो यह पुरुपा को उसी प्रकार आत्मज्ञान प्राप्त करा सकती है जैसे कि एक पुरुष दूसरे फो। इस सपारयान द्वारा रामचन्द्रजी को वसिष्ठजी ने आत्मपद प्राप्ति का सचा मार्ग और प्रात्मशानी के रहन सहन का डा भी दिसलाया है। उपाख्यान इस प्रकार है:-. पहले द्वापर युग में मालव देश में शिसिध्यज नाम फा एक यदुव सुन्दर, धनवान और प्रतापी राजा राज्य करता था। उसका विवाह सुराष्ट्र देश की एक राजकन्या से, जो कि यात मुन्दर, विदुषी और चतुर थी, हुआ था। रानी का नाम घुडाला था। राजा और रानी में एक दूसरे के प्रति घनिष्ट प्रेम और श्राफर्पण था। दोनों ही अपनी युवा अवस्था में थे। पिसी प्रकार के मुय पी पमी नहीं थी। सूर्य आनन्द से जीवन के सभी प्रकार के भोग भोगते थे। दोनों ही विचार शील थे। सय प्रकार भोग भोगते भोगते उनके मन में यह वियफ सत्पन्न हुआ कि हमारे पास संसार का सारा श्वयं और सारे भोगी यो भोगने के साधन है। हमलोग सर प्रकार के मोगा पा पार पार पारवादन फर चुके हैं। इनके भोगने में हमारा पहुवसा जीयन व्यतीत हो सका है और शरीर पी शक्ति भी क्षीण होती जा रही है, किन्तु हृदय में सृति और शान्ति नहीं है। क्या मनुष्यजीयन दमी चिमा हानी है, और मेरे शरीर में काम का येग इतना अधिक हो जाना है कि बिना पुगा मन कि मैं दानी रहती हूँ। राजा ने पहा-य तक शरीर और इन्दियाँ स्वाय , अवश्य ही शरीर और इन्द्रियों के स्यामाविक भोगों के मांगने का प्रायश्यकनाएँ रहती है। पानी मनुष्य को उनका विरोध करना और उनकी बलपूर्यफ थाना नही चाहिए। शरीर और इन्द्रियों के उचित श्रायश्ययनानुमार मांगों ६. मागने में पारमा की क्या हानि और न मांगने में यात्मा का क्या माम ! मनिये, हे कुम्मा! यदि म्री-म्प में आपका स्त्री-सम्बन्धी शादा होती है, तो यह सामायिक ही है। इसलिये नुम किमी अपने मन को पारद थाने याने योग्य पुरुष की तलाश कर लो और उसकी पानी पन जायो; नादि तुम्हारा मन शान्त रहे और शरीर का धेग पाको घमन पनाये । पम्मल बोला-महाराज आप मेरे गने प्रिय मित्र, यापकी और मेरे मन फी वृत्ति एक सी ही है पापको मेरा प्रेम है और मुझे आपका प्रेम है। विद्वान् लोग यह कहते है कि जो गुण ममान मनार्यात याल ग्री-पुरुषों के सह रहने में होता है या मंमार के मय यानन्दों में यदका है। इमलिये यदि मेरे लिये नगार में कोई भी चिन मती है नो पाप है। राजाने पर यदि तुममा ममगो हामी मुमे हममें कोई भारतिनही है। मेरी इसमें नपाई नि है और कोई गाम । ऐमा हाने गे यदि तुमयो सुन मिलता है सीमाही मही। पूर्णमामी को सार्यकाल में मदनिका (जो कि गम्मत के प्री-न्दर का नाम था) चौर राजाने थपना शाग्न की विधि में विवाह कर लिया और पय वे दोनों रात्री में पमि और पनी कप मे रहने लगे। लेकिन राजा के मन में किसी प्रकार का भी विकार नमसन्न हुआ। धात्मा में यही शान्ति और परम धानन्द राहना था। शरीर और इन्द्रियों अपने अपने स्यामाविक कार्य करते थे। पकी इन जा भी पारमामिमान नया रानी को यह देखकर कि राजा पी पायपद में नियनि है पदी प्रमानना हुई। पर दीप में भी यह अपने राज्य की देख भाल करनी रहती थी। गदग शरीर द्वारा या अपने राज को दबाया करती थी और मे. पारियों के मागीवी देखभाल कर लिया पानी थी। पच मने राजा के डीयन्मुक्त होने की एफ और परीक्षा ली। पानिपने योगयम से स्वर्गलोक के स्वामी इन्द्र की रचना की।
( १४० ) अनेक प्रकार की बाते सुनाई और साधन की विधियों यतलाई। राजा को धीरे धीरे पात्मज्ञान होने लगा। धात्मज्ञान के परिपफ हो जाने पर उसकी स्थिति आत्मभाव में हो गई, और यह जीवन्मुक्त हो गया। घय उसके मुख पर सदेव प्रसन्नता रहती थी। हर्प और शोक से यह परे था। किसी कारण से भी उसकी शान्ति भद्दा नहीं होती थी। हर हालत में वह सुशहाल रहता था। उसके लिये अयन पुचोय था और न उपादेय । वह सदा आत्मानन्द में मग्न रहता था । संसार के किसी सुस की न उसे वासना थी और न किसी दु.स से यह दुसी होता था) रानी ने अब उसकी परीक्षा परनी चाही। एक दिन युम्भज बडा दुःसी और शोकातुर होकर राजा के पास पाया। राजा ने पूछा, मित्रा आज आपका मन क्यों इतना उदास है ? आप तो आत्मज्ञानी हैं, भापको शोक क्यों हुआ? पुम्भन योले, महाराज | क्या कर मुझे कहते भी लाज मालूम पड़ती है । मैं जर देवलोक से आपके पास चला आ रहा था तो मुझे दुर्वासा प्रापि नाना प्रकार के भूपण और वस्त्र धारण किए हुए रास्ते में मिले। मुझे उनका विचित्र वेप देख- पर हंसी आ गई, और हास्य भाव से मैंने कहा कि महाराज श्राप वो आज स्त्री मालूम पडते हैं। यह सुनकर उनसे शोध आ गया, और उन्होंने मुझे शाप दे दिया कि में प्रत्येक रात को स्त्री धन जाया फरूंगा। मुझे इस बात से इतनी लना मालूम परती है कि मेरा चित्त अब देवलोक को भी जाने को नहीं करता। आज से शापयश रानी में मुझे स्त्री होना पडेगा। महाराज! यही कारण है जिससे मैं दुसी । राजा ने कहा, पे | इसमे क्या हानि है ? पुरुष हुआ तो क्या, और स्त्री हुई तो क्या ? दोनो दी एफ समान है। न कोई बुरा है और न कोई भला । शरीर हो तो स्त्री या पुरुष है, न कि प्रात्मा । जो जिस स्थिति में होता है उसको उसी में प्रसन्न रहना चाहिए। स्री और पुरुष दोनों ही पात्मज्ञानी हो सकते हैं। रानी को यह सुनकर यही प्रस. न्नता हुई। अय रात्री में यह एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री के रूप में राजा के पास रहती थी और दिन में पुमज फे रूप में। दोनों में इसनी गहरी मित्रता थी कि दोनो साय साते और साथ ही सोते थे, किन्तु राजा के मन में किसी प्रकार का विचार न होता था। एक दिन पुम्मन ने राना से कहा-महाराज जय मैराग्री के समय स्त्री होता तो मुझे स्त्रियों ।
( १४० ) अनेक प्रकार की बातें सुनाई और साधन की विधियाँ यतलाई। राजा को धीरे धीरे आत्मज्ञान होने लगा। आत्मज्ञान के परिपफ हो जाने पर उसकी स्थिति प्रात्मभाव में हो गई, और यह जीवन्मुक्त हो गया। अब उसके मुख पर सदैव प्रसन्नता रहती थी। हर्ष और शोक से यह परे था। किसी कारण से भी उसकी शान्ति भङ्ग नहीं होती थी। हर हालत में वह खुशहाल रहता था। उसके लिये अब न कुब हेय या और न उपादेय । वह सदा आत्मानन्द में मग्न रहता था। संसार के किसी सुस की न उसे वासना थी और न किसी दुःस से वह दुसी होता था) और रानी ने अव उसकी परीक्षा करनी चाही। एक दिन कुम्भज्ञ बड़ा दुःसी और शोकातुर होकर राजा के पास आया । राजा ने पूछा, मित्र! आज आपका मन क्यों इतना उदास है ? पाप तो पात्मज्ञानी हैं, भापको शोक क्या हुआ ? कुम्भज योले, महाराज! क्या करें. मुझे कहते भी लाज मालूम पड़ती है। मैं जब देवलोक से आपके पास चला आ रहा था वो मुझे दुर्वासा ऋपि नाना प्रकार के মুখ্য व धारण किए हुए रास्ते में मिले। मुझे उनका विचित्र वेप देस. फर हंसी या गई, और हास्य-भाव से मैंने कहा कि महाराज पाप तो आज स्त्री मालूम पड़ते हैं। यह सुनकर उनको शोध आ गया, और उन्होंने मुझे शाप दे दिया कि मैं प्रत्येक रात को स्त्री बन जाया करूँगा। मुझे इस बात से इतनी लना मालूम पड़ती है कि मेरा चित अब देवलोक को भी जाने को नहीं करता। प्याज से शापयश रात्री में मुझे स्त्री होना पड़ेगा। महाराज ! यही कारण है जिससे में दुःसी हू। राजा ने कहा, पे! इसमे क्या हानि है ? पुरुष हुआ तो क्या, और स्त्री हुई तो क्या ? दोनों ही एक समान है। न कोई बुरा है और न कोई भला । शरीर हो तो खो या पुरुप , न फि मागमा । जो जिस स्थिति में होता है उसको उसी में प्रसत रहना चाहिए- स्त्री और पुरुष दोनों ही आत्मज्ञानी हो सकते हैं। रानी को यह सुनकर यही प्रस. न्नवा हुई। अव रात्री में वह एक अत्यन्त सुन्दर खी के रूप में राजा के पास रहती थी और दिन में कुंभज के रूप मे । दोनों में इतनी गहरी मित्रता धी कि दोनों साध साते और साथ ही सोते थे, फिन्तु राजा फे मन में किसी प्रकार का विकार न होना था। एक दिन गुम्मा ने राना से कहा- महाराज! जय मैं रात्री के समय स्त्री होता हूँ तो मुझे स्त्रियां.
( १४१ ) चित इच्चाएँ होती है, और मेरे शरीर में काम का वेग इतना अधिक हो जाता है कि बिना पुरुष के सङ्ग कि? मैं दुःसी रहती हूँ। राजा ने कहा-जब तक शरीर है और इन्द्रियाँ स्वस्थ है, अवश्य ही शरीर और इन्द्रियों के स्वाभाविक भोगों के भोगने की आवश्यकताएँ रहती है। झानी मनुष्य को उनका विरोध करना और उनको बलपूर्वक दवाना नहीं चाहिए। शरीर और इन्द्रियों के उचित आवश्यकतानुसार भोगों के भोगने से यात्मा की क्या हानि और न भोगने से आत्मा का क्या लाम ? इसलिये, हे कुम्भज! यदि स्री रूप में आपको स्त्री-सम्बन्धी इच्छा होती है तो यह साभाविक ही है। इसलिये तुम किसी अपने मन को पसन्द आने वाले योग्य पुरुष को तलाश कर लो और उसकी पत्नी यन जानो; ताकि तुम्हारा मन शान्त रहे और शरीर का वेग उसको चंचल न बनाये। कुम्भज योला-महाराज श्राप मेरे इतने प्रिय मित्र हैं, आपकी और मेरे मन की वृत्ति एक सी ही है आपको मेरा प्रेम है और मुझे श्रापका प्रेम है। विद्वान् लोग यह कहते हैं कि जो सुख समान मनोवृत्ति वाले वी-पुरुपों के सङ्ग रहने में होता है यह संसार के सब आनन्दो से बढ़कर है। इसलिये यदि मेरे लिये संसार में कोई भी उचित भर्ता है वो श्राप हैं। राजा ने कहा यदि तुम ऐसा समझते हो वो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है। मेरी इसमें न कोई हानि है और न कोई लाभ। ऐसा होने से यदि तुमको मुग्न मिलता है तो ऐसा हो सही। पूर्णमासी को सायंकाल में मदनिका (जो कि कुम्भज के स्त्री-रूप का नाम था) और राजा ने अपना शास्त्र फी विधि से विवाह कर लिया; और श्रर वे दोनों रात्री में पति और पनी के रूप से रहने लगे। लेकिन राजा के मन में किसी प्रकार का भी विकार न उत्पन्न हुआ। श्रात्मा में यही शान्ति और परम आनन्द रहता था। शरीर और इन्द्रियाँ अपनेअपने स्वाभाविक कार्य करते थे। उसको इनमें जरा भी आत्माभिमान न था। रानी को यह देखकर कि अब राजा की प्रारमपद में निश्चल स्थिति है यही प्रसन्नता हुई। इस पीच में भी वह अपने राज्य की देखभाल करती रहती थी। सूक्ष्म शरीर द्वारा यह अपने राज को उड़ जाया करती थी और कर्म- पारियों के कामों की देखभाल कर लिया करती थी। अय उसने राजा के जीवन्मुक होने की एक और परीक्षा ली। उसने अपने योगवन से स्वर्गलोक के स्वामी इन्द्र की रचना की।
( १४० ) अनेक प्रकार की बातें सुनाई और साधन की विधियाँ घतलाई। राजा को धीरे धीरे आत्मज्ञान होने लगा। आत्मज्ञान के परिपक हो जाने पर उसकी स्थिति यात्मभाव में हो गई, और वह जीवन्मुक्त हो गया। अब उसके मुख पर सदैव प्रसन्नता रहती थी। हर्ष और शोक से यह परे था। किसी कारण से भी उसकी शान्ति भन्न नहीं होती थी। हर हालत में वह खुशहाल रहता था। उसके लिये अब न कुब हेय था और न उपादेय । वह सदा आत्मानन्द में मग्न रहता था। संसार के किसी सुस की न उसे वासना थी और न किसी दुःस से वह दुसी होता था। रानी ने अव उसकी परीक्षा करनी चाही। एक दिन कुम्भज बड़ा दुःसी और शोकातुर होकर राजा के पास आया। राजा ने पूछा, मित्र! आज आपका मन क्यों इतना उदास है? आप तो आत्मज्ञानी हैं, भापको शोक क्यों हुआ? पुम्भज योले, महाराज! क्या पहूँ। मुझे कहते भी लाज मालूम पड़ती है। मैं जब देवलोक से आपके पास चला आ रहा था तो मुझे दुर्वासा ऋपि नाना प्रकार के भूपण और वन धारण किए हुए रास्ते में मिले। मुझे उनका विचित्र वेप देस. कर हंसी आ गई, और दास्य-भाव से मैने कहा कि महाराज पाप तो आज स्त्री मालूम पड़ते हैं। यह सुनकर उनको ग्रोध आ गया, और उन्होंने मुझे शाप दे दिया कि में प्रत्येक रात को स्त्री वन जाया करूँगा। मुझे इस बात से इतनी लना मालूम पड़ती है कि मेरा चिरा अब देवलोक को भी जाने को नहीं करता। आज से शापयश रात्री में मुझे खी होना पड़ेगा। महाराज ! यही कारण है जिससे मैं दुःसी हूँ। राजा ने कहा, ऋपे! इसमें क्या हानि है ? पुरुष हुआ तो क्या, और स्त्री हुई वो क्या ? दोनों ही एक समान हैं। न कोई बुरा है और न कोई भला । शरीर हो तो खो या पुरुप.हे, न कि धागा । जोजिस स्थिति में होता है उसको उसी में प्रसन्न रहना चाहिए । श्री और पुरुष दोनों ही प्रात्मज्ञानी हो सकते हैं। रानी को यह सुनकर यही प्रस. अब रात्री में यह एक अत्यन्त सुन्दर सी के रूप में राजा के पास रहती थी और दिन में कुंभज के रूप में । दोनों में इतनी गहरी मित्रता थी कि दोनों साध सावे और साथ ही सोते थे, किन्तु राजा के मन में किसी प्रकार का विकार न होता था। एक दिन कुम्भज ने राजा से कहा-महाराज ! जव में रानी के समय स्त्री होता है तो मुझे रिवयो. न्नवा हुई।
( १४३ ) विश्वास हुआ। राजा उससे बहुत प्रसन्न हुए, और उसके प्रति अपनी फलता प्रकट की। रानी के कहने से भव राजा अपनी राजधानीको वापिस श्राफर बावन्मुक्त रहते हुए राज्य करने लगे। यहुत काल तक भली भौति राज्य करके, प्रजा को सुसी करके विदेह मुक हो गए। इस कथा को मुनकर रामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न हुए। पसिष्ठजी ने कहा-हे राम! खिरों का निरादर को दृष्टि से न देखो। जो अच्छे कल की निग होता है वे अपने पति को ससार-सागर से पार करने में मदद करती है मोहादनादिगहनादन्तगहनादी। पविवं यासायिनवारयन्ति उदय ॥१॥ सासार्थगुस्मयादि वरा नानाक्षम्। यता: दशानियो ग पुलोपित ॥२॥ सस्त भावा गुस् नृत्यो मिां धनं मुम्मम् । शासनापतन दाम मा भने उगना ॥३॥ मदा मयन पूजनीया अना। घोष सन्मा यात्रु प्रतिविम् ॥३॥ अर्थात्-अनादि, अनन्त माहसागर में गिरे हुए अपने पति को च्योगशालिनी इलागनाए पार उतारता है ॥१॥शाख, गुरु, मन भादि साधन उस मोहसागर से पार करने में इतने समर्थ नहीं हैं दिवनी कि स्नेह से भरी हुई कुगनाए । ॥ वे अपने पति की ससा, पन्धु, मिन, मृत्ल, गुरु, धन, मुर, साव, पर और दास सरकुत्र हैं।।३।। इसलिये सदा, सप प्रकार से, इनकी पूजा करनी चाहिए क्योंकि इनके ऊपर ही इस लोक और परलोक का सुस पूर्णतया निर्भर है ॥४॥ ३४-किराटोपारयान किराट फी पहानी द्वारा वसिष्ठजी ने रामचन्द्रनो को इस बात का उपदेश दिया कि मनुष्य को सदा और सब कामों में उद्योगशील होना पादिप । रिसा वस्तु को भी अवहेलना की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। छोटे छोटे कामो में भी थपनी पूरी शक्ति का उपयोग करना चाहिए। ऐसा करने से कभी-कभी छोटे दोटे कामों द्वारा बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाता है। विभ्यापल की घाटी में एक बहुत धनवान् छिन्तु कृपण किराद समय जय कि यह एक घने बगल के बीच से यही सुस ( १४२ ) इन्द्र अपने साथ देवताओं को लेकर राजा के सामने भाकर उपस्थित होकर कहने लगे-महाराज! आप स्वर्गलोक में चलिए और यहाँ पर नाना प्रकार के भोग और ऐश्वर्य भोगिए । राजा ने कहा, हे देवराज ! मुझे वो सब जोर स्वर्ग ही दिखाई पड़ता है ! मेरे मन में परम तृप्ति है और मेरे अात्मा में परम आनन्द है। मुझे स्वर्ग के किसी भी भोग की इच्छा नहीं है। कुछ दिन पीछे रानो ने राजा की एक और परीक्षा ली सायं. काल के समय, जब कि राजा संध्यापन्दन के लिये गड़ा के तौर पर गए थे, उसने अपने योगरल से एक यहुत सुन्दर और वेजवान् युवक की रचना की। राजा के वापिस होने के समय यह युवक और मदनिका दोनों एक दूसरे के साथ प्रेम व्यवहार कर रहे थे, और एक दूसरे के साथ गाद आलिगन में होकर संसार की और परिस्थिति को भूल गए थे। राजा ने अपनी कुटिया पर पाकर यह दृश्य देखा और और देखते ही याहर चले थाए जिससे कि युवक और मदनिका के प्रेमालिंगन के में किसी प्रकार का विघ्न न हो। मदनिका तुरन्त बठकर बाहर पाई और राजा के सामने दीन भाव से सड़ी होकर अपने आचरण की क्षमा माँगने लगी--महाराज, में पाराधिनी हूँ ! तमा कीजिए! मैं बी हूँ, 'पौर स्त्री में पुरुप से अष्टगुणा फाम होता है। इसलिये मेरी वृत्ति इस पुरुप को दसकर उसकी और सिंच गई। राजा बोले- मदनिके ! मेरे हृदय में तुम्हारे प्रति किसी प्रकार का भी क्रोध नहीं हैं। संसार के जितने प्राणी है वे सब सुख प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते हैं, और परस्पर इच्छित स्नेह से संसार में बहुत आनन्द मिलता है। इसलिये तुमने ऐसा किया तो उसमें कुछ पार्य नहीं है। मुझे कुछ शोक नहीं है। केवल प्राज से पीछे मैं तुम्हें अपनी वधूफी हैसियत से नहीं रक्खूगा। क्योंकि समाज में इस प्रकार का काम निन्ध समझा जाता है। पाज से तुम मेरे साथ पहिले को नाई मित्र की हैसियत मे मुखपूर्वक रहो। राजा के इस प्रकार के समभाव को देखकर रानी बहुत प्रसन्न हुई और उसी समय मदनिका के रूप का त्याग करके चुडाला के रूप में राजा के सामने प्रगट हो गई। राजा को चुढाला फो देखकर बहुत याश्चर्य हुआ। मुद काल तक तो उसे विश्वास ही न हुया और अपने शान फो भ्रम समन्ना रहा । चुडाला ने जब सब हाल कह सुनाया, वप रानाको उसके चुढाला होने का
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(१४४ ) जा रहा था। उसकी जेब से एक कौड़ी निकल पड़ी। उसे यह मालूम हुआ तो वह उस कौड़ी को ढूंढने लगा। चारों कौड़ो को ढूंढते-ढूंढते उसे तीन दिन बीत गए। जिन लोगों को मालूम हुआ कि एक कौड़ी के लिये फिराट इतना व्यग्र हो रहा है उसकी हँसी उड़ाने लगे। किन्तु उसने किसी के हंसने की परवाह की और अपनी सोई हुई कौड़ी को ढूंढता ही रहा। देवयोग उसकी निगाह एक चमकती हुई चिन्तामणि पर जा पड़ी। उस देखकर वह बहुत ही प्रसन्न हुआ। उसके कई दिनों के परिश्रम फल उसे चिन्तामणि पाने से मिल गया। यदि वह कौड़ी के र जाने को परवाह न करता और उसको तुच्छ समझ कर भागे पल होता, तो उसे चिन्तामणि को प्राप्ति न होती। ३५-मणिकाचोपाख्यान इस उपाख्यान द्वारा चुडाला रानी ने अपने स्वामी राजा शिवि ध्वज को यह समझाया था कि मनुष्य को जो-जो उत्तम पदार्थ श्रीः साधना अपने घर पर सुलभतया प्राप्त हो उन की अवहेलना करपे दूसरी जगहों पर और-पौर पदार्थों और साधनों के पीछे नहीं दौड़ना पाहिए। ऐसा करने से जो मनुष्य को प्राप्त है यह तो नष्ट दो ही जाता है, दूसरी यस्तुएँ और साधन भी नहीं मिलते। इसलिये बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह उन वस्तुघा और साधनी का जो उसे सुलभवया प्राप्त है, सदुपयोग करे और अमाप्त वस्तुओं और साधना की वलारा में मारा-मारा न फिरे एक बहुत उद्योगो और धनसम्पन्न पुरुप ने चिन्तामणि रल को प्रशंसा सुन रक्सी थी। उसके मन मे चिन्तामणि को प्राप्त करने की तीन वासना उदय हुई। वह चिन्तामणि की क्लाश में पर से पादर निकला। थोड़ी ही दूर जाने पर उसको चिन्तामपि नामक रत्न मिल गया। चूंकि वह रत्न उसे अपने घर के पास दो और बिना किसी प्रयत्न किए हुए मिला था, उसको उसके चिन्तामशिदोन का विधास । उसने तो यद मुन रकमा धाफि चिन्तामणि रत्न .पात प्रयत्न और सोज करने पर मिलता है, और यो भागगन मनुष्य को हो मिलता है। अवर सने उस वस्तु के चिन्तामणि दोने में सन्देह फिया और उसे चि समझ कर फेंक पर चिन्तामति को सोन में भागे नहीं हुआ
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