Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Prakrit Vyakarnam
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पिनापन
M
गूनरातपुरातत्त्वमनिरनी प्रनय समितिना सवत १९७९
ना भारवा वर १३ नी बेठक्ना ठगव १ ( परिशिष्ट १) मुजन
आ पम्तक प्रसिद्ध करवामा आवे छे
गुजरात विद्यापीठ कार्यालय,
प्रसाशक
अमदावाद
भासा वद १२ स. १९८१
प्रवेश प्राकृतव्याकरणना शिक्षक अने शिष्य माटे आ पुस्तकना परिचय पूरती थोडी माहिती आ प्रमाणे छे अहीं नीचेना चार मुद्दाओ विपे क्रमवार लखवानुं छे- १ रननाशैली २ प्राकृतभाषा ३ अर्धमागधी भाषा ४ प्राकृतभापाना व्याकरणो १ रचनाशैली आचार्य हेमचद्रना प्राकृतव्याकरणने सामे राखीने आ पुस्तक लखवामा आव्यु छे पण क्रमने फेरववामा आव्यो छे. हेमचद्रना प्राकृतव्याकरणमा सोधी पहेला प्राकृतभाषानु व्याकरण आपेलु छ अने पछी क्रमे शौरसेनी, मागधी, पैशाची-चूलिफा पैशाची अने छेले अपभ्रशनु व्याकरण आपवामा आवेलु छे त्यारे प्रस्तुत पुस्तकमा ए बधा व्याकरणोने साथे साये समाववामा आव्या छे एटले आ पुस्तकमा प्राकृतनु व्याकरण आपताजे ने नियममा शौरसेनी, मागधी, पैशाची-चूलिका पैशाची अने अपभ्रशनी विशेषता होय ते पण साथे साये-प्राकृतभापाना नियममी साये-ज आपवामा आवी छे. नेमके, प्राकृनमा साधारण रीते क, ग, च, ज, त, द, प, ब, य अने व नो लोप थाय छे (जूओ पृ० १०) आ नियम आपवानी साधे न तुलना थइ शके ए घटिए एम पण जणाव्यं छे के, शौर- सेनीमा तनोद' याय छ, मागधीमा 'ज' नोय' थाय छे, पैशाचीमा 'द'नो' थाय छे अने अपभ्रंशमा 'ग' थाय छे ( जूमो पृ० १२ अने १३) - ८ आ रीते वर्णविकारने लगता वधा नियमाने आपवामा आव्या के नियमोमा साथी पहेला सर्व सावारण नियमोने आपवामा आव्या छे अने पछी विशेष (आपवादिक) नियमोने मूकयामा , आव्या छे नाम अने आख्यातना प्रकरणमा प्राकृत, शौरसेनी वगेरेना रूपोनी साधना बताव्या पड़ी क्रमवार प्राकृत, शौरसेनी वगेरेना रूपोने मूक्वामा आव्या के अने केटलेक ठेकाणे ए वधा रूपोने साथे साये एक न ओळमा पण मूकेश छे (ओ पृ० १२५-१२६-१२८-- १२९-१३०-१३२-१३३ नामप्रसरण अने पृ० १४१ सया पृ० २५१ आख्यात प्रकरण) खास विशेषता (विशेषताओने टिप्पणमा मूकेली छे) (१) पालिनी साधे सरखामणी प्राकृतभापाना वर्गविकारमा नियमोने पालिभापाना वर्णविमारना नियमानी साथे सरम्बाववामा आव्या छे अने केटले स्थळे तो पालि शब्गोने पण मूकनामा आव्या छे ( पारिशब्दो माटे जूओ पृ० /- १५-१८ वोरे) नामना, धातु ना, कृढतना अने तद्धितना पौने पालिम्पोनी साथे मूत्रामा आया रे अने केली जग्याए पालिना प्रत्ययो आपीने पग सरमामणी ननावी छे (प्रत्ययो माटे जूओ पृ० २४८ अने ३२४ ) साधेप्रकरणमा अने पाने पण समवित स्थळे सरखा- मगी मार पालना नियमोने आपवामा आव्या छे. एकदर रीते पालिनी अने प्राकृतनी सरखामणी मविस्तर दर्शायामा आवी छे अने ते एटान माटे के, प्राकृतनो अभ्यामी साये साथै पालिने पण सर्वाशे शशिशि
(२) वैदिक संस्कृत अने प्राकृतनो संबंध
जूनामा जना वररुचियर्थी छेर छेला मार्कंडेय सुधीना बधा
प्राकृतव्याकरणकारोए माकृतरूपोनी साधना माटे लौकिक (वैदिकेतर)
सस्कृतनो न उपयोग करेलो छे, तदनुसार आ पुस्तकमा पण एज
शैलीने मान्य राखयामा आवी छे. परंतु अत्यारना विपुल साधनोथी
एम नणाय छे के, प्राकृतभापानो सबध वैदिर सत्कृतनी साये पण
(भूओ आर्यविद्याव्याख्यानमाळा पृ०१९४-२०९) तेथी प्राकृत
रूपोनी साधना माटे वैदिक शब्दोने पण मूळभूत राखवा ए, सर
खामणीनी दृष्टिए विशेष अगत्यनु छे आ वातने सूचवका वैदिक
सस्कृतने मुळभूत राखीने पण सरखामणी करवामा आवी छे. (जो
पृ०४९-९५-३०९)
प्राकृतना एवा तो घणा य नियमो छे ने वैदिक सस्कृतना रूपो
साये मळता आवे छे,
अत्यव्यसनरोप (जुओ पृ० १०नि०१)
वैदिकरूपो
पश्या ( पश्चात् )
उच्चा (उच्चात् )
नीचा (नीचात् )
युप्मा (युप्मा)
देवकर्मभिः (देवकमि)
आ यथा वैदिक रूपोमा अयव्यजननो रोप यएलो
'र' 'य'नो लेप
(ओपृ. १९ नि० ५ तथा पृ. १५ नि०४)
अरगल्भ अपगल्म)
(स)
पेरा रूपमा 'नो अने बीमा ''मेलोप पएलोले
[जेमके,
संयुक्तनी, पूर्वे एरय ( जुओ पृ० ४ नि. १)
रोदसिमा (रोदसीमा)
अमन (अमान)
क'नो 'उ' (जूओ पृ० ७ नि०८)
बुन्द (वृन्द)
''नो 'दुर (जओ पृ० १८-६९ द-विकार)
दुदम, दूडम
पृरोदारा, पूगेद्वान
वगेरे.
उपर्युक्त उदाहरणोना वैदिक स्थळो माटे अने विशेष उदाहरणों
माटे जूओ आर्यविद्याव्याख्यानमाळा पृ० २०३ थी २०८]
पण पुस्तक वधी जाय अने प्रवेश करनारने कठण लागे एथी
ए रवा नियमोने अहीं नथी आपवामा आव्या.
(३) आदेशो करवा करतां मूळ शब्द उपरथी न
विकृत शब्दने बताववो
जूना वैयाकरणोए संस्कृत शब्दोना आदेशो करीने माकृत
शळो भनाववानी रीत म्वीशरी छे पण भापानुं ऐतिहासिक अने
शास्त्रीय दृष्टिए निरूपण कर होय तो जे ने शब्दोनी सरमामणी
करी शशाती होय त्या आदेशो करवा करता ए मूळ शब्दोना न
उचारणजन्य वर्णविरारोने यतावा जोइए. नेमने,
• ओळ ' सूना प्राकृत ओलि' शब्दनी साधना माटे
नका, आळसु, निरर्थक, प्रामाणिक, वांछी, मधमाखी,ससी, श्रेणि,
लीग, रको अने कुल एटला अर्थमा (अों माटे भूओ आप्टेनो
पोर) वपराता
'आलि' शब्द उपरथी 'पत्ति' अर्गमा
आदि बनापवानी मगमण करवी ए करता पंक्ति' अर्थवाला
पुल,
.
ज आवलि
शब्दना
। आउलि ओलिरूपो बतावीने
ओलि' शब्द बमाववानी रीत ऐतिहासिक अने भाषाशास्त्रनी
दृष्टिए वधारे मुसंगत लागे छे.
सूक्ष्म ' नाऊ' नो 'अ' करीने सह ' रूप बनाववा
करतां । श्लक्ष्ण' न सहन भावे थतु 'सह' रूप न अधिक
संगत लागे छे.
आम करवाथी उच्चारणोथी यता क्रमिक वर्णविकारो कळी
शकाय छे अने व्याकरणमा आवतो गौरवदोप पण अटकी शके छे.
आ हकीकत अहीं मात्र एक उदाहरण द्वारा ज दर्शाववामां
आवी छे ( जओ पृ० ५४)
(४) आगमोनां नहि सधाएलां रूपोनी साधना
जैन आगमोना केटलांक रूपो जे अत्यार सुधी अणसाध्यां
हतां तेने पालिमापाना रूपो द्वारा साधवानो प्रयत्न करवामा आन्यो
छे (जूओ पृ० १३६ अने २६४)
२ प्राकृतभापा
शौरसेनी अने मागधीन क्षेत्र एना नाम उपरथी न जाणितुं
छे. पैशाचीन क्षेत्र--
" पाण्ड्य-कैकय-बाल्हीक-सिंह-नेपाल-कुन्तलाः ।
सुधेप्ण-भोज--गान्धार-हैव-कन्नोजनास्तथा ॥
एते पिशाचदेशाः स्युस्तद्देश्यस्तद्गणो भवेत् ।
( पड्मापाचंद्रिका पृ० ४ श्लो० २९-३०)
आ श्लोकमां जणावेलुं छे. साधारण प्राकृत अने अपभ्रंशन
क्षेत्र व्यापक छे एटले ए माटे कोई देशने निर्देशी शकाय नहि.
१२ वैयाकरणोए शळशास्त्रनी दृष्टिए प्राकृतना ऋण प्रकार जणावेला छे १ सस्कृतजन्यप्राकृत, २ सस्कृतसममाकृत अने ३ देश्यप्राकृत. [१ जेनी व्युत्पत्तिमो यधारे सबध बने प्रकारना संस्कृत साथै छे से सस्कृतजन्यप्राकृत. २ सस्कृतनी जेबु प्राकृत ते समतस्कृतमाकृत. नीचेना एक अ श्लोक द्वारा सरसृतसमप्रापृतनो परिचय थई जाय छे. "चारुसमीरणरमणे हरिणकरकिरणावलीसविरासा । आयसराममोहा वेल्मूले विभावरी परिहीणा" ॥१॥ (भट्टिकाव्य १३ मो सर्ग) ३ देश्यमातनो नमूनो आ प्रमाणे छे "रे ग्वेआलु अ सोसल इमाण सोहीण मज्झमावडिओ। हिस्समि क्रय नुम अकुडियो रक्राहि पुरे"। (देशीनाममाला पृ. ९८ श्लो० ६५] प्रस्तुत व्याकरण पेला प्रकारने लगतुं छे. बीजो प्रकार तो संस्कृत व्याकरणथी न सिद्ध छे अने श्रीना प्रकारनुं प्राकृत हनु सुधी शास्त्रीय गवेपणानो विषय न बनेलु होवाथी आमा तेनु निरू- पण करघु योग्य घायु नपी एना बोध माटे देशीनाममाला वगेरे देशी भाषाना कोशोथी न चलावी लेबु पडे एम छे. ३ अर्धमागधी भाषा प्राकृत, शौरसेनी वगेरे भाषाओनु व्याकरण लखता आमा क्याय अर्धमागधी विषे लखवामा नथी आन्यु, एपी कोइ एम तो नन समनी ल्ये के, अर्धमागधी कोई भापान नथी, • महिकाव्यना आ सर्गमा समसस्कृतप्राकृतना आयो भनेव पान्यो छे, आ सर्गनु नाम ज 'भाषासनिवेश', .
" " भासाए मासंति ? नसूमोमा केटोटेक ठेकाणे अर्धमागधीने भाषा तरीके जणावी छ अने साथे एम पण क्हेवामा आयु छ के, भगवान महावीर अर्धमागधी भाषामा उपदेश परता हता.' अर्धमागधीने लगता जैनसूत्रोना उल्लेखो आ प्रमाणे छे .. भगवं च ण भगवान् अर्धमागधीमापा- अद्धमागहीए भासाए द्वारा धर्मने कहे छे." धम्ममाइक्खा (समवाय-अगसूत्र ०६० समिति) प्र.- देवा णं भंते कयगए "हे भगवन् । देवो वह भाषामा बोले छ ? कपरा का भासा अथवा बोलाली भाषामा. भासिजमाणी कइ भाषा विशिष्ट विसिस्सति -गोयमा 1 देवाणं अद्ध- हे गौतम ! देवो अर्ध- मागहाए भासाए भासति, मागधीभापामा बोले सा विय णं अद्धमागही मासा भासिज्जमाण पण तेज भाषा-अर्थ- मागधीभाषा-विशिष्ट छे." ( भगवती---अंगसूत्र श०५ उ०४ गृ. १८१ प्रश्न- २० राय० अने समिति पृ० २३१ सू. १९) अने बोलाती भाषामा विसिरम" " वैयाकरणोए शब्दशास्त्रनी दृष्टिए प्राकृतना त्रण प्रकार जणावेला छे १ संस्कृतनन्यप्राकृत, २ संस्कृतसमप्राकृत अने ३ देश्यप्राकृत. [१ जेनी व्युत्पत्तिनो बघारे संबंध बन्ने प्रकारना संस्कृत साये छे ते संस्कृतजन्यप्राकृत. २ संस्कृतनी जे प्राकृत ते समसंस्कृतप्राकृत. नोचेना एक अ श्लोक द्वारा संस्कृतसमप्राकृतनो परिचय थर्द जाय छे. "चारुसमारणरमणे हरिणकलङ्ककिरणायलीसविलासा । थाबद्धराममोहा वेलमूले विमावरी परिहोणा" ॥१॥ (महिकाव्य १३ मो सर्ग) ३ देश्यप्राकृतनो नमूनो या प्रमाणे : रे ग्वेआलुप सोसल इमाण खोहीण मझमावटियो। छुटिरससि कह घ तुम अहियो टकराहि पुहं"। (देशीनाममाला पृ. ९८ श्लो• ६५] प्रस्तुत व्याकरण पेला प्रकारने लगतुं छे. वीजो प्रकार तो संस्कृत व्याकरणथी ज सिद्ध छे अने श्रीना प्रकारचं प्राकृत हनु मुधी शास्त्रीय गवेपणानो विषय न वनेलं होवायी आमां तेनुं निरू- पण करवु योग्य घायु नथी. एना बोध माटे देशीनाममाला बगेरे देशी भाषाना कोशोथी न चलावी लेबु पडे एम छे. ३ अर्धमागधी भाषा प्राकृत, शौरसेनी वगेरे भाषाओगें व्याकरण लखतां मामां क्यांय अर्धमागधी विषे लखवामां नथी आन्यु, एपी कोइ एम तो न न समनी ल्ये के, अर्धमागधी कोई भाषा ज नथी. * महिकाव्यना आ सर्गमा समसंस्कृतप्राइतनां भावां. अनेक माथ्यो . आ सगंठें नाम उ'भाषासंनिवेय'. .
जैनसूत्रोमा केटरेक ठेकाणे अर्धमागधीने मापा तरी नणायी छे अने साये एम पण क्हेवामा आन्युं छे के, ' भगवान् महावीर अर्धमागधी भाषामा उपदेश करता हता.' अर्धमागधीने लगता नसूनोना उल्लेखो आ प्रमाणे छे " भगवं नण " भगवान् अर्धमागधीमापा- अद्धमागहीए भासाए द्वारा धर्मने कहे छे." धम्ममाइनखद (समवाय-अगसूत्र पृ०६० समिति) प्र०-" देवाणं भते क्यगए हे भगवन् । देवो वह भासाए मासंति । भापामा गोले छ। क्परा वा भासा अथवा बोलाती भाषामा. मासिवमाणी कइ मापा विशिष्ट दे। विसिस्सति । -गोयमा ! देवा ण अद्ध हे गौतम । टेवो अर्थ मागहाए भासाए भासति, मागधीभाषामा बोले छे साविय ण अद्धमागही भासा भासिजमाण पण ते न भाषा-अर्थ- विसिम्म मागधीमापा-विशिष्ट छे." (भगवती-~-अगसूत्र श०६ उ. ४ पृ. १८१ प्रश्न- २० राप. अने अने बोलाती भापामा समिति पृ० २३१ २० १९१) " "त्यार पछौ भगवान महावीर भंभसारपुन कोणिकने अर्ध- मागधीभाषामा धर्म क्हे छे" तए णं समणे भगवं महावीरे ऋणिअस्स भंभसारपुत्तस्स अद्धमागहाए भासाए भासति" (औपपातिक-उपाग- सून पृ० ७७ समिति) प्र०.-" से किं तं भासारिया: " भापानी दृष्टिए आर्यों कोने कहना। 30--भामारिया जे प्रा ओ अर्धमागमा अद्धमागहाए वोले छे तेओने भापानी मासाए माति" दृष्टिए आर्यो सममवा" (प्रज्ञापना-उपामसूत्र पृ० १६ समिति) आ उपरथी अर्धमागधी' ने भापा तरीके अने । महावीर अर्धमागधीमापामा उपदेश करता हता' ए वन्ने वातो स्वीकारी शवाय एवी छे पण · अर्धमागधी' ना मापा तरीवेना उल्लेख मात्रयो ग काइ एवं व्याकरण रखी शराय नहि. व्याकरण लसवा माटे तो एना विपुल साहित्यने मामे रामवं जोइए, जेपी चीनी भाषाओ करता अर्धमागधीनी ने मास खास विशेषताओ होय ते वधी साधी शराय. याइ वे नार रूपोली विशे. पताने लीधे कोइ एक भाषाने बीनी भाषायी नदी पाढी काय नहि तेम न ये चार रूपोने साथवा माटे जुदु व्यारण पण wal शकाय नहि, नौ फक्त से नार रूपोनी न विशेषताने लंधे एक भापाने वीनी भाषायी जुदी गणावी शकाती होय अने एर्नु व्याकरण पण लसी शमातुं होय तो भाषाओनो अने व्याकरणोनो अंत न केम आवत । आ संबंधमा आचार्य हेमचद्रनुंज उदाहरण बस छेः श्री हेमचंद्रे प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभ्रंशना व्याकरणो लख्यां छे तेम साथे साथे आर्पप्राकृतने पण लीधुं छे. साधारण प्राकृत करता आर्पप्राकृतमा काइक विशेषता जरुर छे पण ते एटली नीवी छे के, तेनुं जुदुं व्याकरण करई तेमने योग्य नधी नणायं. आ न कारणथी साधारण प्राकृतना पेटामा आर्यमाकृतने पण एमणे भेळवी दाधुं छे. हेमनद नेवा जैन वैयाकरण शौरसेनी, मागधी अने पैशात्री जेवी प्रायः नेतर ग्रंथोमा वपराएली के नाटकीय भाषाओर्नु व्याकरण लखवा प्रेराय अने जैनागमोनी भाषानुं व्याकरण न लखे ए काइ अर्थविनानी वात नथी. जैनपरंपरामा अर्धमागधीना साहित्य तरीके प्रसिद्धि पामेलु समस्त -आगमसाहित्य एमनी सामेज हतुं, ए विषेनो भाषानों अने भावनो एमनो अभ्यास पण गंभीर हतो छता य एमणे ए साहित्यने लातुं एक जुटुं व्याकरण केम न लख्यु र ए प्रश्न एभने माटे थवो सहज छे. ए प्रश्नको उत्तर आचार्य हेमचंद्रे पोतानी कृतिद्वारा न आपी दोघेलो छ. आपणे नेम आगळ जोइ गया. के, आपणाकृतमा जुई व्याकरण करवा नेवी खास विशेषता न नणायायी जेम् एने साधा. रण प्राकृतना पेटामा समावी दीधुं छे तेम आगमसाहित्यनी भाषामा पण ए बन्ने प्राकृतो करतो एवी विशिष्ट विशेषता न नगायायी एमणे ए भाषाने ए बन्ने प्राकृतोमा भेळवी दीधी छे अने एज कार- गयी एर्नु जुदु व्याकरण करवा तेओ प्रेराया पण नथी. एमना समयनुं वातावरण जोतां तो जरुर ए पाणिनिमा वैदिक व्याकरणनी पेठे जैनागमोनी भाषानुं पण व्याकरण ललवाने प्रेराया होत. जैनपरंपरामा आचार्य हेमचंद्र ज एक एवा प्रतिष्ठापक पुरुप छे जेमणे जैनोनी साहित्यने लगती प्रतिष्ठा साचववानो भगीरथ प्रयत्न सेव्यो छे. नवु व्याकरण, नवु छंदःशास्त्र, नवु अलंकारशास्त्र, नवं धातुपारायण, नवा कोशो, नवो निघंटु, नर्बु पुराण अने नबुं योग- शास्त्र वगेरे ए वधुं नैनोनी विशेषताने सातर नर्बु नवु लख्या छतां आगमोनी भाषाना ज प्रसंगमां एमणे वृद्धप्रवादनी सामे पण जे मान रताव्यं छे तेज आपणा ए प्रश्नना पूर्वोक्त उत्तर माटे पूरतुं छे. वळी, आचार्य हेमचंद्र पोते एम पण मानता लागे छे के, आगमोनी भापा अर्धमागधी तो जरुर कही शकाय पण जो एमां अर्धमागधी' नामने योग्य केटलीक विशेषताओ मागधी भापानी पण भळेली होय.आ विशेषताओ तपासतां एमने तो फक्त मागधीनी एक न विशेषता मुम्व्यपणे जणाणी छे. ते विशेषता-प्रथमाना एकवचनमां मागधीना 'ए' प्रत्ययनो प्रयोग. नेमकै; नीदे, अनीवे, लोए, अलोए, आसवे, संवरे, बंधे, मोक्से वगेरे. पण आ एक न विशेषताने लोधे तेओ आगमोनी भाषाने अर्धमागधी कहेवी योग्य घारता नथी अने प्राकृत के आर्पप्राकृतथी जुदी पण गणी शकता नथी. माटे न एमणे आगमोनी भाषाने माटे पोताना व्याकरणमां कोई सास म्यान आपे नथी. साये साये एटलं पण गणावी देवू जोइए के, हेमचंद्रना , ७ (प्रा. ध्यानमा आवेली ए एक विशेषता पण काइ आगमोनी भाषामा व्यापक रीते आवेली नथी, एमा तो 'ए'ना प्रयोगनी पेठे प्राकृतना 'ओ' प्रत्ययवाळा पण वणा रूपोते पण आचाराग जेवा प्राचीन सूत्रमा य-मळी आवे छे नेमके निक्खतो, उद्देसो, अप्पमाओ, निरामगधी, उवरओ, उवेहमाणो, आलीणगुनो, सहिओ, नाणागमो, सथवो, दोसो, हव्ववाहो, दुरणुचरो, मगो वगरे (आचाराग सूत्र पृ०४१-१२४-१२७-१३०-१६५-१६८-१८३-१८४- १८५-१९०-१९२ समितिनु) एमणे ज आ सबधमा एम जणाव्यु छे के, " प्रायोऽस्यैव विधानात् न वक्ष्यमाणलक्षणस्य न्या० पृ० १५९ सू० २८७) अर्थात् " आप प्रवचनमा प्राय मागधीना 'ए' प्रत्ययनु ज विधान छे, पण मागधीना बीना बीना लक्षणोनु नयी" आ उल्लेखमा वपराएलो ‘प्राय ' शब्द आग मोमा 'ए' प्रत्ययनी वपराशनो पण सकोच बतावे छे अने एथी न एम जणाय छे के उपर्युक्त 'ओ' प्रत्ययनी वपराशनु आगमिक क्षे पण काइ हेमचद्रना ध्यान बहार छे एम नथी सार आ छे के, आचार्य हेमचद्रे पोताने उद्भवेला जैन आग मोनी भापाने लगता प्रश्ननो खुलासो आम वे रीते करी वताव्यो छे एक तो जैन आगमोनी कहेवाती अर्धमागधीने पोतानी कृतिमा खास जुदु स्थान नहि आपीने वीजु, एमा जोइए तेटला प्रमाणमा मागवीनी विशेषताओ न होवानु जणावीने आ आगमोनी भाषा अर्धमागधी नथी पण प्राकृत के आर्म- प्राकृत छे' एम स्पष्ट शन्नोमा कहेवा जेवु जैन समाजनु वातावरण अत्यारे पण नथी तो सप्राय भक्तिना बारमा सैकामा तो शी रीते होय छता य एक जवाबदार अने प्रामाणिक वैयाकरण तरीके आचार्य " हेमचंद्रे उपर्युक्त सादी हकीकतने पण आगळ जणावेली भगिए आबाद रीते जणावेली छे अने साथे वृद्धप्रवादना अनुसंधाननी युक्ति पण वतावली छे. आ संबंधमा एमनो आसो उदेख आ प्रमाणे छः " यदपि पोराणमद्धमागहमासानियय हवइ मुवं" इत्यादिना आर्पस्य अर्धमागधभापानियतत्वमाम्नायि वृद्धस्तदपि प्रायोऽस्यैव विधानात् न वक्ष्यमाणलक्षणस्य (प्राकृत व्या० पृ० १५९ सू० २२७) १. आ उल्लेस निशीथचूर्णिमा छे. जुओ लिखित प्रति पा० ३.० पूना भा० प्रा० वि०म० स०. ए उलेसमाना 'अद्धमागह' शब्दनी व्याख्या करता श्रीजिनदास महत्तरे जगाव्यु छ के; "मगहरवि सयमासानिवद्धं अद्धमागह" अथवा "अहारसदेसीभासाणियत अद्धमागध" अर्थात् एमणे 'अर्धमागध' शब्दनी व्याख्या करी छः पहेली- मगध देशनी अडधी भाषामा नियत ते अर्धमागध. बीजी-ढार जातनी देशी भापामा नियत ते अर्धमागध वर्तमान आगमोनी भाषामा पहेली व्याख्या तो घटती नयी एम हेमचद्र पोते कहे छे. बीजी व्याख्या पण जो आगमोनी भाषामा घटी शके तेवी होत तो जरुर तेने प्रधानपद आपी आचार्य हेमचद्र ए विषे काइक जुहूँ ल्सत भने ए रीते गृद्धप्रवादनु ज समर्थन करत. पण ए प्रसर वैया परण ए व्याख्या तरफ उदासीन रह्या छे, एथी जणाय छे के, ए व्याख्या पण आगमोनी भाषामा घटती नहि होय अथवा ए व्याख्यामा कहेला अढार देश क्या समजवा ? ए प्रभज गुंचवाळो छे, राजकुमायेना विद्याभ्ययनना प्रसगमा 'अट्ठारसदेशीमासाविसारए' शब्द जैन सूत्रप्रथोमा मळे छे, त्या तेनो अर्थ ' अढार (आतमी) देशी भाषामा विशारद' थाय छे. ए शव्दमा संबंधमा ए सिपाय पीजी . कशी पीगत टीकाकारोए आपी नथी तेम अदार जातनी देशी भापाने अर्धमागधी तरीके ओळसावी पण नथी. अट्ठारसदेसीभासाविसारए 'नो उल्लेख भातामनमा अने औप- पातिक सूत्रमा मळे छः "तते णं से मेहे कुमारे न्यार पठी ते मेघ कुमार वायत्तरिकलापंडिए*अट्ठारसवि योतेर कळामा प्रवीण थयो अने हिप्पगारदेसीभासाविसारए" अदार प्रकारनी देशी भापामा " निपुण थयो" शातासून पृ० ३८ समिति ठीका पृ० ४२ [टीकाकारना मत प्रमाणे 'अदार जातनी भापामा नहि पण अदार जातनी लिपिमा' प्रवीण थयो. आ अढार जातनी लिपिनो उल्लेख प्रशापना सूत्रमा अने नंदी. सूनमा मळे छे। त्यार पछी ते दृढप्रतिज्ञ नामनो कुमार बोतेर कळामा प्रवीण थयो अने अढार प्रकारनी देशी भाषामा निपुण थयो" " “ तए णं से दढपहण्णे दारए यावत्तरिक्लापंडिए* अट्ठारसदेसीभासाविसारए" औपपातिक सून पृ०९८ समिति सूचना ए उल्लेखो जोता अढार देशने रगती आपणी ए गुच उकली शकती नथी पण एटलं कल्पी शकाय छे के, कदाच आ उल्ले खोने जॉइने ज श्रीजिनदास महत्तरे पोतानी चूर्णिमा अढार जातनी देशी भाषाने 'अर्धमागधी' नु नाम आग्यु होय. श्रीहरिभद्रना विद्यार्थी भने समसमयी तथा श्रीशीलाक अपरनाम तत्त्वादित्यना शिष्य श्रीदाक्षिण्यचिह्नसरिए बनावेली 'प्राकृत कुवल्य माला' ने जोता अढार देशने लगती आपणी ए गुंच कदाच उकली शके, २० पण याद राखा जोइए के प्रस्तुत अर्धमागधीनी चर्चा साये कुवलय- मालामा आवता अदार देशने हगता ए उल्लेसनो कशोज संबंध नथी. युथलयमालामां ए देगोनी गणना आ प्रमाणे करेली छे: "लाडा कनाडा विय " लाटदेश, कर्णाटकदेश, मालविया कन्नुन्न-गोल्लया । मालवदेश, कनोनदेश, गोलदेश, करय मरहट्ट य सोरट्टा ढका करय (कारवाड ?) देश, महा. किरि संग सघवया ॥" राष्ट्रदेश, सोरठदेश, दरदेश, कु. लि. प्रति पृ०७५ किरदेश, अंगदेश अने सिंघदेश" पेली याजु पं० ५ पूना भा० प्रा० वि० मं० स० आ उल्लेसमां मान यार देशोने गणाववामां आव्या छे परंतु आ पछीना एक बीना उल्लेगमां (पृ. ७६) एयी वधारे देशोने मूकेला छे. आ नीचेना उल्लेखमां देशोना नामो माथे तेने देशना मनुष्योनो स्वभाव अंने मापाना एक वे दाब्दोने पण मूकवामा आव्यां छे अने छेवटे उपसंहारमा जणावेहुँ छे के, . इय अट्ठारतदेसी- ए प्रमाणे श्रीदत्त नामनो मासाउ पुलइऊण सिरिदत्ते । बोद गृहस्थ अढार देशनी भाषा- भन्ने इ य पुलएती जवस-पारस. ओने जोइने (सांभळीने) बीजा- बब्बरातीए ॥" ओनी पण-एटले अनार्यो पैकी जवस, पारस अने वर लोकोनी पण-मापाने जुए छे (साभळे छे)" ग्रंथकारे उपसहारमा आम अदार देशी भाषानो उल्लेस क्यों है अने देशोनो गणनाना प्रसंगमा मान सोळ देशो ज णायेला छे तेनु कारण समजातुं नथी. जे उल्लेखमा ए देशोने जणावेल हे ते उल्लेस आ प्रमाणे छ।
तत्थ य पविसमाषण दिध अणेयदेमभासालकिपए देसवणिप | त जहा- फसिणा निट्टरवयणे बहुकसमर (२) भुजए अल्जे य। 'अरडे' ति उलवते अह पेच्छह गोलए तत्थ ॥ णयनीइसधिविग्गहपटुए महज पर य पयर्दए। 'तेरे मेरे आउ' त्ति जगिरे मझदेसे य॥ त्या प्रवेश करता श्रीदत्ते अनेक देशनी भाषणना जाणकार ते ते देशना वणिकोने जोया. ते जमके, प्रथम गोल्ल देशना लोकोने जोया, ए लोको निष्टुर भाषी, काळा, समरभोगी (१) अने निर्लज होय छे था 'परदे' एवु घोलनारा होय छे. पछी मध्यदेशना लोकोने जोया, ए लोको नय, नीति, सधि अने विग्रहमा चतुर, बहुबोला अने 'तेरे मेरे आउ' एवु बोलनारा होय छे. पछी मगधना लोकोने जोया, ए लोको दुर्वर्ण, वधेला पेटवाळा, ठिंगणा, सुरतप्रिय अने 'एसेले' ए० गोलनारा होय छे. पछी अतवदिना एटले गगा जमनानी बच्चेना प्रदेशमा रहे नारा लोकोने जोया, ए लोको वर्णे कपिल, माजरी आसवाळा अने' किं ते कि मो' एधु बोल नारा होय छे . नीहरियपोट्ट-दुवन्न- महए सुरयकेलितल्लिने। 'एसेले' जपुले अह पेच्छा मागहे कुमरो॥ कविले पिंगल्नयणे रोयण- कहदिन्नमेत्तवावारे (१)। कि ते किमो 'पिय जपिरे य अंतवेए य॥ उत्तुगथलयोणे कणयवने य पछी कीरदेशना लोकोने जोया, ए लोको क्णे कनकवर्णा, उंची भारवाहे य ।
सरि पारि जंपिरे कोरे कुमारो पलोएद ॥ दक्खिन्नदाणपारेस-विज्ञाण- दयाविवज्जियसरीरे । 'एहं तेह' चवंते दके उण पेच्छइ कुमरो । . अने जाडी नासिकायाळा, भार यहनारा अने 'सरि पारि' एवं बोलनारा होय छे. पछी उक्क देशना लोकोने जोया, ए लोको दाक्षिण्य, दान, पौरुप, विज्ञान अने दया विनाना होय छे अने 'एह तेई । एम बोलनारा होय छे. पछी सिंधना लोकोने जोया, ए लोको ललित, मृदु, गाधर्वप्रिय, स्वदेशपरायण, हसमुसा अने 'वसे ददणो' एम बोलनारा होय छे. पछी कारुदेशना लोकोने जोया, एलेको कपिजल (8) जड्डू, बहु- भोजी, कठण अने पुष्ट अंगवाळा तथा 'अप्पा तुप्पा' एम बोल- सललियमिउमद्दवए गंधव्य- पिए सएसगयचित्ते 1. 'बसे दइणो' मणिरे मुह से अह संधी दिद्वे ॥ कजडे (?) य जड्डे बहु भोई कढिणपीणरूणगे। 'अप्पां तुप्पा' भणिरे अह पेच्छइ कारुए तत्तो । नारा होय छे. • घयोणियपुटुंगे धम्मपरे संधिविम्गहे निउणे। 'न उरे भलउं' मणिरे अह पेच्छइ गुज्जरे अवरे ॥ पछी गूर्जरोकोने जोया, ए सेको घी अने मागणथी पुष्ट शरीरवाळा, धर्मपरायण, 'संधि विग्रहमा निपुण अने नउरे मल्ल' एम बोलनारा होय छे. पछी लोकोने जोया, एलेको (माथामां) संयो पटना म्हाओलित्तविलित्ते कयसीमंते सोहियंगत्ते ।
भगिरे हेपन करनारा, सशो. अम्ह काउं तुम्ह अह पेच्छह लाडे । तणुसाममडदेहे कोवणए माणजीवणे रोहे। 'भाइ य महणी भे' मणिरे अह माल्वे दिहे॥ वाळा, उक्कडदप्पे पियमोहणे य रोद्दे पयगवित्तीय। 'अडिपाडि रमरे' भणिरे पेच्छइ कनाडए अण्णे ।। पाडनाय, मित शरीरवाळा यने 'अहं काउं तुम्ह' एम बोल्नारा होय छे. पठी माळवाना रोकोने जोया, ए लोको, काळा अने नाना शरीर क्रोधी, अभिमानी, रौद्र अने 'भाइ य भदणी तुम्भे' एम बोलनारा होय छे. पछी कर्णाटक्ना लोकोने जोया, ए लोको दर्पवाळा, मोह- वाळा, चंद्र, चचळ अने 'आडि- पादि रमरे एम बोलनारा होय छे. पछी ताइ लोकोने जोया, ए लोको कचुक पहेरनारा अने 'असि किसि मणि एम बोलनारा होय छे. पछी कोशल्देशना लोकोने जोया, ए लोको सर्वक्लाहीन, मानी, कोपी अने 'जर तसले, एम बोल्नारा होय छे. पछी महाराष्ट्रना लोकोने कुप्पासपाउयगे मासणः (१) पाणमयणतहिच्छे। 'असि किसि मणि' भण माणे अह पेच्छह ताइए अवरे ॥ सव्वकलापमहे माणी पिय कोवणे कविणदेहे। 'जल तल ले' भणमाणे कोसलए पुलहए अवरे ॥ दढमडहसामलगे सहिए यह माणकलहसीले या 'दिन्नरले गहियल्ले' उल्ल विरे तत्य मरहहे। . जोया, ए राको शरीरे दृढ, नाना अने काळा होय छे तया स्वहितमा मान-कल्हशील अने
हवे । वर्तमान जे7 आगमोने महावीर भापित समजीने कोई
ए आगमोनी ज भापाने अर्धमागधी कहे अने ए उपरथी न एना
व्याकरण अने कोष बनावे तो न बनी शके ।
ए प्रश्ननु समाधान
आचार्य हेमचद्रे पोतानी कृतिद्वारा अने उपर्युक्त उलेखद्वारा पण
करी नाख्यु छे एपी आ आगमोनी भाषाने अर्धमागधी समजवी के
एम समजी ए विपेना पुस्तको लखवा ए भाषाना इतिहासमा गोटाळो
करवा सिवाय बीज शुं होई शके ?
आचार्य हेमचगना पूर्ववर्ती अने अगसूत्रोना टीकाकार आचर्य
अभयदेवे पण अर्धमागधी नाम धरावती भापाने प्राकृत लक्षणनी
बहुलतावाळी जणावी छे तेमणे लख्यु छे के
'दिन्नल्ले गहियल्ले' एम बोल
नारा होय छे
पियमहिलासगामे सुदरगोचे य पछी आध्रना लोकोने जोया,
भायणे रोदे।
ए लोकोने स्त्री अने सम्रास बन्ने
'आदि मदि' भणति अवरे
प्रिय होय छे, एमना गोत्रो मुदर
अर्ध कुमारो पोए॥ होय छ, अने ए लोको रौद्र तया
भयकर अने 'अदि माहे' एम
पालनारा होय छे.
उपरना उलेसमा गोल (गौर), मध्यदेश, मगघ अन्तदि,
कार, ढक, सिंध, कारु (कारवाड), गूर्जर, लार, माव्य, कर्णात्य,
ताइअ(१) कोशल, महाराष्ट्र अने आध्र एम सोळ देशोने जणावेला हे
अवलगमालानो आ उलेय अहीं एटा मारे आप्यो छेके, एमा
ए देशोनी गणना ए रीते करेलाठे (पाचाय जिनयिायजीनी एक
नधिद्वारा मा उल्लेसने हु'कुपथ्यमा 'माथी मेळवी शक्यों हु)
२५ , "र-सो-लशौ मागध्याम्' इत्यादि यत् मागधभाषालक्षण तेन अपरिपूर्णा प्राकृतभापारक्षणबहुला अर्धमागधी" ( औपपातिक टीका पृ० ७८ समिति) अभयदेवे आगमोनी भाषा उपरथी नक्की करेलु अर्धमाग- धान स्वरूप जोता तो अर्धमागधी' नाम 'देवादार 'ना (रण छोड' (मणने छोडनार ) नाम जेवु लागे छे. तेओ साफ साफ कहे छे के, आगमोनी भाषा प्राकृतलक्षणनी बहुलतावाळी छे अने एक लक्षण सिवाय मागधीना बीना खास लक्षणोने एमा काइ स्थान नथी, एथी न वाचनार समजी शकशे के, वर्तमान आगमोनी भाषाने अर्धमागधी कहेवी के प्राकृत कहेवी ? आगमो प्राकृत छे' ए मत तो आज घणा समयथी चाल्यो आवे छे अने हेमचद्र अने अभयदेव करता य प्राचीन अने प्रामाणिक आचार्योए ए मतने स्वीकारेलो छे. ए सबधमा आचार्य हरिभद्र जणावे छे के, '" प्राकृतनिबन्योऽपि बालादिसाधारण " इति १ दशकालिकनी टीकामा जे प्रसग आचाय हरिभद्रे आ उल्लेख कयों ते प्रसग आ छे "दर्शनाचारना आठ प्रकार छे, तेमा पेहेलो कार नियाकत रहेतु ते, 'नि गकित 'नु विवरण परता का छे के, शबाना ये प्रकार छ-सर्वशका अने देशका. सर्वशका एटले सर्व प्रकारे शका अने दश दाका एटले अशथी शका तेमा 'सर्वशका'नु स्वरूप बतावता तणाव्यु - . "सर्वशङ्का तु प्राकृतनियदत्वात् सर्वमवेद परिकल्पित भविष्यतीति !" अर्थात् 'प्राकृत भाषामा रचेलु होवायी आ रधु य बनावटीम न होय" यावी जे जिनागम प्रत्ये शका करतो ते सया, आनु समाधान करता हरिमद्रे उपयुक्त उन्हेगो टाकी रतायो २६ . . आटलं लख्या . पी ए आचार्यवर - "उक्तं च" कहोने 'पोताना उल्लेखना पोषणमा एक जूना संवादने टाकी बतावे छे- नालस्त्रीमूहमूर्खाणां नृणां चारित्रकाशिणाम्। अनुग्रहार्य तत्त्वज्ञैः सिद्धान्तः प्राकृतः कृतः॥" (दशवकालिक टोका ऐ० ११३ बानु.). आ उपरथी आपणे जोइ सकीए छीए के आपणो आ मत हरिभद्र करता य ननो उरे छे. जे प्रसंगमा हरिभद्रे उपर्युक्त उल्लेखने मूकेलो छे ते न प्रसंगमा वादिदेवमूरिना गुरु आचार्य मुनिचंद्र पण एन उल्लेखने ( हरिभद्रना धर्मबिंदुनी टीकामा ) मूके छे. धर्मबिंदु १० ७७, द्वितीय अन्याय आत्मानद समानी आत्ति. आचार्य मलयगिरि पण प्रज्ञापनानी पोतानी टीकामां एवा न प्रसगमा एज वातने नणावे छे-प्रज्ञापनासून टीका समिति १०६०. हेमचंद्रनी पड़ी थयेला आचार्यों द्वारा पण ए न मतने टेरो आपवामा आन्यो छे-- आचार्य प्रमाचंद्रे मनावेला अने श्रीप्रद्युम्न सूरिए शोघेला प्रमा. परुचरित्रमा (पृ० ९८-९९) नणान्यु छ के, अन्यदा लोकताक्येन नातिप्रत्ययतलया । आ पाल्यात् संम्झनाम्याप्ती कर्मदोपात् प्रयो(ना)पितः||१०९ १ उपरना या उल्लेगोमा पपगएगे 'प्रायत शन्द प्राात. मानो सूचक , अनुयोगद्वाराषर्गा प्राव' शन्द मानमापाना अर्थमा पराएल. (पृ. १३१ १.) वैयाकरण पररविना गम- पथी तोर पर ए.पा पररातो माम्यो , अनेए पीना आपापाए पाए गएने ए अपमा पारेले . मारे फोरए भी एरिने भरस्मोति. - सिद्धान्तं संस्कृतं कर्तुमिच्छन् संघ व्यनिज्ञपत् । । भाकृते केवलज्ञानिभापितेऽपि निरादरः ॥ ११० + + + यदि (इदं ) विश्रुतमम्माभिः पूर्वेषा संप्रदायतः । चतुर्दशापि पूर्वाणि संस्कृतानि पुराऽभवन् ॥ ११४ प्रज्ञातिशयसाध्यानि तान्युच्छिन्नानि कालतः । अधुनेबादशाङ्गयस्ति मुधर्मस्वामिमापिता ॥ ११५ बालश्रीमूढमूर्खादिननानुग्रहणाय स । माहतां तामिहाकाटनास्थाऽत्र क्यं हि वः" ॥ ११६ अर्थात् “ सिद्धसेन दिवार नामना सुप्रसिद्ध जैनाचार्य प्राकृत जैन आगमोने संस्कृतमा करवानी इच्छा करी" आटलं जणाबी ग्रंयकार पोताना तरफथी वधु जणावता कहे छे के, " बाल, स्त्री, अने मूर्ख वगैरेनी सगवडताने माटे पूर्व पुरुषोए-सुधर्मस्वामिए- आगमोने प्राकृतमा रच्या , तो एमा आपणे शामाटे अनास्था करवी" यत उक्तमागमे " अर्थात् · आगममा क्यु छे के ' एम लखीने श्रीविनयानदसूरि पोताना तत्त्वनिर्णयप्रासादमा नणावे छे के मुतण दिठिवाय कालिय-उक्कालियंगसिद्धतं । थीवालवायगत्य पाययमुइयं निणवरेहि ॥ भने साथै हरिभद्रे उद्धरेलो लोक पण टाके छे. ( खरी रीते तो आ प्राकृत गायाने हरिभद्रनी पहेला ज मूकवी जोइए पण मने एनु मूळ स्थान न जड़वायी एना उध्धृत करनारना काळम्ममा एने मूकवामा आवी छे.) अनुयोगद्वार सूरमा जणाव्यु छ के, सक्या पायया चेव भणिइओ होति दोणि वा " " . . (पृ. १३१ समिति) २८ अर्थात् संस्कृत अने प्राकृत बे भाषाओछ. आ उल्लेख गीतनी भापाना प्रसगमा छे. आ उपरथी एटलु तो जरर तारवी शफाय के, अनुयोगद्वारना संमयमा अर्धमागधीने प्राकृतथी जुदी न गणवामा आवती होत तो सूत्रकारमाकृतनी साथे ज पोतानी प्रिय अने देवभाषा तरीके प्रसिद्धि पामेली अर्धमागधीने पण सूचववी भूले खरा ? आ प्रमाणे एक नहि पण अनेक जैनाचार्योए वर्तमान आग- मोनी भापाने स्पष्ट शब्दमा प्राकृत कहेली छ माटे अमे पण अहीं एज मतने स्वीकारेलो छ, अने तेथी ज प्रस्तुत व्याकरणमा पण जैन आगमोना केटलाक विशिष्ट रूपोने प्राकृतना व्याकरण साथै ज नोंधेला छे. आ तो नैनाचार्योनी न घटिए आगमोमा आवेली मापाना संबंधमा चर्चा थइ, तदुपरात बीजी रण दृष्टिए पण अर्धमागधी भापानी चर्चा यह शके छे. तेमा- पहेली दृष्टि भरतना नात्यशास्त्रनी, वीनी दृष्टि प्राकृत भाषाना व्याररणोनी अने जीनी हाटे अशोकनी धर्मलिपिओनी. भरतना नात्यशास्त्रमा का छे के, " चेटाना राजपुत्राणा श्रेष्ठिना चार्धमागधी" भरतना० अध्याय १७ लो०५० नाटकोमा पान तरीके आवता चेटो, राजपुत्रो अने शेठियाओ अर्मपागभी भाषा बोले छे, भरतना आ उल्लेखथी आपणे नाटकोना ते ते पात्रोनी मापाद्वारा अर्धमागधीना म्वरूपने कळी शशं. नाटकोनी भाषामा नमूना--- २९ भट. (भासने प्रतिज्ञायोगंधरायण) .-को काळो अह भट्टिदारिभाए वासवदचाए उदए कीलिदु- कामाए भद्दवदीपरिचारसं गरसेवा ण पेसामि । भाव पुप्फ- दंत गत्तसेवाण पेक्खामि । किं भणासि एसो गत्तसेवओ कण्डिळमुडिगिणीए गेहं पविसिअ सुर पिपदि ति। पृ० १०२ भट - सव्वं दाव चिटु राभउळे मद्दपीठियं ण णिकमिभ कुदो अभं आहिण्डदि पि । पृ० १०६ भट --कि णु तु एवं + होटु, इमं वुतंत्त अमघस्स णिवेदेमि । (भासनुं चारुदत्त) चेट -अम्मो अय्यमेतेओ । चेट -अम्मो भट्टिदारओ। ०६७ चेट -सुहीदेषु पादेषु भूमीए पळेहिदव्य । पृ०६८ (भासनु स्वप्नवासवदत्त) भटी-उस्सरह उम्सरह अय्या उस्सरह । ए० ८ घेटी-एटु एद मट्टिदारआ इद अस्समपद परिसदु । पृ० १५ चेटी-अस्थि राओ पजादो णाम उज्जइपीए सो दारअस कारणादो दूदासपाद करेदि पृ० १७ (शूदानु मृच्छकटिक) चेट -अज्नुए चिश्ट, चिश्ट। उचाशिता गच्छशि अतिका मे शंपुण्णपुच्छा विज गिम्हमोरी। ओवगदी शामिअ भश्टके मे। वणे गहे कुरशावके व्व ॥ ८० २७
३०
चेटःलामेहि अलाअवलहं तो साहिशि मच्छमंशका
एदेहि मच्छमशाहिं शुणआ मडण शेवदि ॥ ० ३१
आ वधी भाषा चेटोनी छे.
राजपुननी भापा आ प्रमाणे :
(काळीदासर्नु शाकुंतल)
वाल.-निंभ निंभ दंदाणि ते गणइस पृ० २९५
बाल-वळिअ भीद म्हि ०२२६
वाल -इमिणा एव्व दाव काळिम् पृ० २९८
हवे शेठियाओनी भाषानो नमुनो-
(शूद्रकनुं मृच्छकटिक)
चन्दनदास.-नेदु अज्मो
चन्दनदास.--किं ण जाणाटि अग्नो जह अणुचिदो उवआरो
परिहवादो वि महंत दुःख उप्पादेदि। ता इह य्येक
उचिदाए भूमीए उवविसामि ।
चन्दनदास---अह इअग्नस्स प्पसाएण अग्वण्डिदा वणिज्जा । पृ०१४
चन्दनदास:-आणवेदु अज्नो किं केविरं इमादो नणादो इच्छी-
अदि ति।
चन्दनदास.-अग्न अलिअं एदं केणवि अणज्नेण अग्नस्स
निवेदिदं । पृ० १५
चन्दनदास -फलेण संवादिदं सोहदि दे विकत्यिदं । पृ० १७
नाट्यशास्त्रकार भरतना उल्लेख प्रमाणे चंट, रानपुन अने शेठनी
भापाने अर्धमागधी कहवामा आवे छे. एना नमुना उपर आपवामा
आन्या के उपरान्ता नमुनप्ती पा साक्षे आपण जगभीनी भाषाने
सरखावीए तो केवळ सामळवा मात्रथी न शुं नथी जणातु के,
ए नाटकोना पात्रोनी भाषामा अने आगमोनी भाषामा केटलो बधो तफावत छ। हवे आपणे नोईए के, प्राकृत व्याकरणोनी दृष्टिए आगमोनी भाषाने अर्धमागधीनें नाम आपी शकाय के केम' प्राकृत व्याकरणो तो घणा छे, ए बधाना नामो पण हवे पछी आफ्वानां छे बघा प्राकृत व्याकरणोमा वररुचिनो प्राकृतप्रकाश वधारे प्राचीन छे. एमा 'मागधी' नी प्रकृति तरीके शौरसेनीने वही छे अने शौरसेनी करता ने विशेषता छे ते आ प्रमाणे बतावी छ- ४ " १ मागधीमा 'प' अने 'स' ने बदले 'श' बोलवो. ज' ने बदले प्राय 'य' बोलको चवर्गना कोई अक्षरनो लोप न करता नेम होय. तेम न बोलवु र्य' अने 'ध'नो' थ्य' बोलवो. क्ष' ने बदले 'क' बोलको अकारात शब्दना प्रथमाना एक वचनमा इ" अने 'ए' प्रत्यय वापरवो. मागर्धामा अकारान्त भूतकदतना प्रथमाना एक वचनमा उपरना बे प्रत्ययो उपरात 'उ' प्रत्यय ६ " " ७ " पण वापरवो ८ ९ " पष्ठीना एकवचनमा 'ह' प्रत्यय वापरखो. सबोधनना एकवचनमा अन्त्य 'अ' नो 'आ' करखो स्था' ने बदले प्राकृतमा वपराता :चिना स्थानमा 'चिष्ठ' धातु वापरवो
३२
२१ १६
"
'कृत' ने बदले कड। मृत' ने बदले मर्ड'
अने गत' ने बदले : गड' रूपो वापरवा.
संबधक भूतकृदंतने सूचववा 'त्या' प्रत्ययने
बदले दाणि' प्रत्यय वापरवो.
१३ 'हृदय' ने बदले ' हडक,' 'अह' ने बदले
'हके' 'हो' 'अहक ' अने शृगाल' ने
बदले शिआल' तथा 'शिआलक' शब्दो वापरवा.
वररुचिए बतावेलु मागधीनु स्वरूप उपर प्रमाणे छ, आ सिवाय
शौरसेनीना ने नियमो वररुपिए आपेला छे तेमाना निरपवाद नियमों
मागधीमा पण उमेरी लेवानाछे आगमोनी भाषाने जोता तेमा फक्त
वररुत्रिए बतावेली ६ वी विशेषतानो य अमुक अश ('ए'नी
चपराश) जोवामा आवे छे, तो मागधीना एक ज अशनी वपराशने
लोधे आगमोनी भाषा अर्धमागधी क्हेवाय के नहि ए साक्षरोज
विचारी ले.
'वर्तमान आगमोनी भाषामा मागर्घामापानु म्वरूप केटले अंशे
देखाय छे।। ए प्रश्ननी परीक्षा करता आपणे भास वगेरेना नाटको
जोया, प्राचीन वैयाकरण वररुचिने तपास्यो. हवे अशोक्नी धर्म
लिपिओनी मापाने पण आपणे जोइ नइए ए लिपिओनी भाषाने
'कई भाषा कहेवी ए प्रश्न हनी विवादग्रस्त छे तो पण एने
'प्राचीनमागधी' कहेवामा काड दोष जणातो नथी-बौद्धोना त्रिपि.
१ मागधीने लगतु स्वरूप अने उदाहरणो माटे जुओ प्राकृत.
प्रकाश पृ. १२८ थी १३२ तथा १३२ थी १३७ अयवा ११ मो
परिच्छेद अने बारमो परिच्छेद.
२ आगमोनी भाषाना उदाहरणो माटे जूओ “जैन आगम
साहित्यनी मूळ भाषा कइ' ए लेस (डन साहित्यसोधक पु.१ १०१
पृ. ३१ थी ३७)
. टकनी भाषा ए लिपिओनी साये सरसामणीमा आवी शके एवी छ. त्रिपिटकमा पग मागधी' भाषानो उपयोग थयार्नु नीचेनी गाया जणावे . अशोकनी धर्मलिपिओमा वपराएली भाषानु बधारण तपासता आ नीचे जणावेला मुख्य नियमो उपनी शके छ: १ अद्विर्भाव ( वर्णनुं नहि बेवडाएँ) संयुक्त अक्षर अनादिमा होय भने संयुक्त अक्षरमानों एक अक्षर लोपाय त्यारे जे शेष अक्षर होय छे ते बेवडाय के अथवा सयुक्त असरनी पहेलानो हस्व स्वर दीर्थ थाय छे' प्राकृत भाषाओनो आ एक साधारण नियम छे. अशोक्नी धर्मलिपिओनी भाषामा ए नियम कचित् ज सचवाएलो जोवाय छे पण जैन आगमानी भाषामा प्राकृतना नियम प्रमाणे ए नियम नरा- बर सवाएलो छे. लिपिओनी भाषामा वपराएला एवा द्विर्भाव विनाना अने दीस्वर विनाना रूपो' आ प्रमाणे छे आगमभाषा सस्कृतरूप अस्प लिपिओनी भापा अप अप्प . कम्प १ " सा मागधी मूरमामा नरा यायाऽऽदिकप्पिका । ब्रझुना चस्मुवालापा संबुद्धा चापि भासरे" ॥ २ आमा अशोकनी धम्मलिपिमाथी जे रूपो आप्या छे से उदा हरण से छे, एने मळता बोजा अनेक सो छे. पण या यही विस्तार भयथा आया नयो, बीजी ए एक बार लक्ष्यमा राखपानी जरुर छे के, अशोकना मानीय पाउ मेद पण केटलेक ठेकाणे छे, जो के में बने त्या सुधी सर्व साधारण रूपो लेवानो प्रयत्न कयों के.
३० लि. }. . युत युक्त निखम निक्खम निष्कम कलाण कल्याण कल्याण २.र'नो वैकल्पिक अशोकनी लिपिओमारना स्थाने सर्वत्र 'ल' नो प्रयोग वैकल्पिक रोते थएलो देखाय छे त्यारे जैन आगमोमां प्राकृत भापाना घोरणनी पेठे र' नो न प्रयोग कायम रहेलो छ। आ. सं० आदिकले आइकरे आदिकरः आदिकरे आइगरे. परिसा परिसा पर्पत पलिसा .चरणं चरणं चरणम् चलन हिलंन हिरण हिरण्य हिरण মস मरणं मरणम् मलने ३ अनादि-असंयुक्त व्यंजननो लोप अशोकनी धमलिपिभोमां अनादि-अमंयुक क, ग, घ, न, त, द, प, 4, म अने व लोपाता नयी त्यारे आगमोनी भापामा प्राकृत मानी पेठे ए नया अक्षरो स्रोपाएला के . मा. सुमतं मिगे मुमयं मिर मुकतम् मृगः उचावुचउँदो उच्चावयच्छंदो उच्चावचच्छन्दः समाजसि समायम्मि समाने एते एते विवादे विवाओ विवादः पापुनाति पाउण प्राप्नोति वगेरे ४ श, स, प नो उपयोग अशोकनी धर्मलिपिओमां श, प, अने स नो उपयोग थएलो छे त्यारे आगमनी भाषामा प्राकृत भापानी पेठे मात्र एक 'स' नो ज उपयोग थएलो छः लि. सं० पशु पसु पशु पसु आ० सय शत शत सत दोस दोष दोस दोष ओपदिनि ओसघानि ओसहाणि औषधानि सार सार शाल पंचसु पञ्चसु' पंचसु पंचषु -- प्राण } ५ विजातीय संयुक्त व्यंजननी वपराश अशोकनी धर्मलिपिओमा विजातीय संयुक्त व्यजनोनी वै- कल्पिक चपराश घणी छे त्यारे नैनं आगमोनी भाषामा प्राकृत भाषाना नंधारण प्रमाणे ए वपराश ज नथी. लि. आ. सं० प्राण पाण पान दिव्यानि दिव्वाई दिव्यानि दिवियानि सेठे सेटे श्रेष्ठः सेस्टे अस्ति अस्थि अस्ति अस्थि सहसानि सहस्साई सहस्राणि सहस्रानि . पुत्र पुत्त पुत्र प मित मित मित्र मित्र नास्ति नत्यि नास्ति नाय समण समण श्रमण श्रमण वगेरे ६ 'ख' 'य' 'ध' म' नोह अशोकनी धर्मलिपिओमां 'ख'या' अने 'म कायम } ३७ आ. वध साहु रहे छे त्यारे जैन आगमोनी भाषामा प्राकृत भाषा प्रमाणे ए चारेने स्थाने 'ह' थएलो छः लि. सं० लिखित लिहि लिखित मुख सुख यथा जहा यथा तथा तहा तथा बहुविध बहुविह बहुविध वह वध साधु साधु आलभितु आलहिउ आलभताम् वगेरे ७'न'नो' अशोकनी धर्मलिपिओमा 'न' नो 'ण' नथी थएलो त्यारे जैन आगमोनी भाषामा प्राकृतना नियम प्रमाणे ननो. 'ण' थएलो छेः लि. आ. सं० देवानं देवाणं देवानाम् पियेन पियेण प्रियेण अनुदिवस अणुदिवस अनुदिवस बहूनि बहूणि वहूनि दानं दाणं दानम् महानससि महाणससि महानसे ८ 'ण' नोन . .
} आ. अशोक्नी धर्मलिपिओमा •ण ने म्याने 'न' पण वपराएलगे के त्यारे आगमोनी भाषामा तेम नयी जणातु लि. সা गननास गणने गणने गणनसि ९ 'त'नोट अशोकनी धर्मलिपिओमा एकला 'त'. नो के सयुक्त 'त' नोट' थएलो छे त्यारे जैन आगमोनी भाषमा एस्थळे प्राकृतनी प्रक्रिया प्रमाणे एक्ला 'त' नो 'ड' यएलो के अने सयुक्त 'त नोत'थएलो छे लि. स० पदिवेदना पडिविअणा प्रतिवेदना पटिपाति पडिवति प्रतिपत्ति क्ड, क्य कृत मट मड, मय मृत क्टव कायन कर्तव्य कटविय किति मिति कीर्ति क्टिी वगेरे १० ५' नोव अशोकनी धर्मलिपिओमा 'प'नो 'व' नयी थएलो पण जैन आगमोनी मापामा प्राकृतनी पेठे 'प' नोव' थएलो छे लि० आ० स० लिपि लिवि लिपि व्वा कूपा पाप पापम् क्ट } कूपा पाव १९ सामीप प्रेरक प्रक्रिया आप आव ना प्रत्ययो आपे आवे सामीव समीपम् वगेरे २१' 'नोय अशोकनी धर्मलिपिओमा 'च' नोय' थपलो छे त्यारे जैन आगमोनी भाषामा प्राकृतनी पद्धति प्रमाणे 'य' नोज' करवामा आवेलोछे लि. आ. स० उयान उजाण उद्यान उयाम उज्जम उद्यम १२ 'अ'नो उपयोग अशोक्नी धर्मलिपिओमा न्य, एय' अने ज्ञ' ने स्थाने मानो पण उपयोग थएलो छे त्यारे जैन आगमोनी भाषामा ए त्रणेने स्थान प्राकृतनी प्रमाणे 'न' 'ण' के भणनो न व्यवहार यएलो छे आ. सं० हमति हणति, हन्नति घन्ति मन्नति मन्यते मननि सि० मन्नई अण्ण, अन्न अन्य अञ अन हिरन पुन पुन हिरण्ण पुन्न, पुण्ण हिरण्य पुण्य नाइ ज्ञाति नाति লান रनो रण्णो राज्ञः वगरे वरेइ १३ ति अने तु अशोकनी धर्मलिपिओना क्रियापदोमा ‘ति' भने 'तु प्रत्यया वपराएला छे त्यारे आगमोनी भाषामा प्राकृतनी शैली प्रमा 'इ' अने 'उ' प्रत्ययो वपराएला छे आ. सं० भोतु भवतु होतु होति होइ भवति भाति क्लेति करोति वोरे १४ त्य नोच अशोरनी धर्मलिपिभोमा । त्य' नो 'च' वैगल्पिक रोते वपराएलो छ त्यारे आगमोनी भाषामा प्राकृतना धोरण प्रमाणे त्य' नो 'च' न करवामा आवेली छः लि. आ. सं० सातिय- सच सत्य सतिय- आचायिर अच्च आत्यायिक अतियायिक निच निच्च नित्य ४१ य ए २ चज चय त्यन तिन वगैरे १५ नामने लाता प्रत्ययो प्रथमाना लि० आ. एक्वचननो ए प्रत्यय-- ओ ओ चतुर्थीना एक्वचननो प्रत्यय-- ये स्त्रीलिंगी नामने लगता तृतीयाधी सप्तमी सुधीना प्रत्ययो- य या ये ए १६ 'रानन् ' ना रूपो अशोकनी धर्मलिपिभोमा · रानन् ' शब्दना ने जातना रूपो मळे छे तेमानु एक रूा पण आगमोनी भाप मा मळनु नयी. ने मळे छे ते वा प्राकृतना धोरणे सघाएला छे लि. आ० सं० लाजा राया राजा लाजानो रायाणो राजानः राजानो .
४२
रण्णा
लाजिना
राजा
राज्ञा
रणो
राजे
लाजाने
स्नो
रामो
रणो
रान
आउपरात---
ए धर्मलिपिओमा अनादि 'नो दिन रहेलो छे
(घनिते) त्यारे नैन आगमोनी भाषामा प्राकृत प्रमाणे ' ने
बदले 'ड' थएो छ (घडिए)
ए धर्मलिपिओमा 'अह' ने बदले हक' रूप पण यपरा
एलु छे त्यारे आगमोनी भापामा क्याय ए रूपनो उपयोग न
नयी थएलो
आ रीते अशोकनी धर्मलिपिओनी प्राचीन मागधीनु स्वरूप
पण वर्तमान आगमोनो भाषामा एने अर्धमागधी क्हेबराववा पूरतु
य घटी शतु नथी, ए हकीकत उपर नणावेला उदाहरणायी ज
जाणी काय एम छे
ए आगमोनी छेली सकलना यया पहेला, एमा भेदी भाषा
अत्यारे छे तेवी नहि होग ए हकीकत तो आगमोमा रहेला केटाक
भूना लो उपरथी न नाणी शकाय एवी छ।
आगमोनी रचनासमयनी मापाना अने देवर्धिगणिनी सकलना
समयनी भापाना अंतरने समजवा माटे गूजराती भाषानु नीचेनु
उदाहरण बस के
--
४३ सं. १७३९ नी भापा समवसरणर्नु हुउं रे मडाण, माणिक हेम रजत सुप्रमाण । सिंहासनी बईठा मिनवीर, दिइ देशना अरथ गभीर ॥ विद्युनमाली सुर निहा आवइ, निन यादी आनद बहु पावद। चरम केवली कुण प्रभुथास्यद, श्रेणिक पूछइ मन उल्लासइ॥ प्रभु कहइ सुणि श्रेणिक नृपचद, ब्रह्मलोक सामानिक इद । चउदेवीयुत विद्युनमाली, सातमेइ दिनि एचवी शुभशाली।। ऋषभदतसुत तुज पुर ठामई, चरम केवली जब नामइ। होस्पइ ते सुणि देव अनाढी, हरपइपरखइ निन कुल आढी।" (यशोविनयनीए रचेली अने तेमनी हस्तलिखित प्रतिमाथी उतारेली) सं. १९४४ नी भाषा समवसरणनो हुओ रे मडाण, माणिक हेम रजत सुप्रमाण । सिंहासन पेग जिन वीर, दीए देशना अर्थ गभीर ॥ विद्युन्माली सुर तीदा आवे, जिन बंदी आनट बहु पावे। चरमकेवली कुण ग्रुभ था, श्रेणिक पूछे मन उल्लासे ॥ प्रभ कहे सुण श्रेणिक नृपचद, ब्रह्मलोक सामानिक इट। चउदेवीयुत विद्युन्माली, सातमे दिने एचवी शुभशाली। ऋपभदतसुत तुज पुर ठामे, चरम केवली जब नामे । होस्ये ते सुणी देव अनाढी, हरखे परखी निजकुल आढी (यशोविजयनाए रचेली अने नवुम्वामिना रासनी चोपडी माथी उतारेली) १ जूओ छट्ठी गूजराती साहित्यपरिषदना रिपोर्ट पृ. मुनि पल्याणविजयजीनो निवध १६ छ उपर आपेली कविता एक न कर्तानी छे, छतां एमा काळभेदने लधि केवो फेरफार थएलो छे, ए, जाडा अक्षरोमा मूलां रूपो उप- रथी जगाइ आवे छे. जो के २० मा कानी असरथी रूपातर पामेली ए कवितामा १८ मा सैकानी कविनी भाषाना केटला य रूपो जव्हवाइ रह्या तो पण रूपांतर पामेली ए कवितानी भाषाने काइ १८ मा मेवानी नहिं कहेवाय तेम १८ मा सैकानी भाषाथी मिश्रित पण नहि कहे. वाय ते ज रीते श्री वीरना १००० मा सैकामा रूपातरने पामेला ए आगमोमां भगवान महावीरना समये रचाएलाआगमोनी भायानां केट- लाय रूपोजळपाइ रह्या होय तोपण एवरिना १०६० मा संकामार रूपांतरने पामेला आगमोनी भाषाने काइ वीरना समपनी भाषा नहि कहेवाय नेम वीरना समयनी भाषायी मिश्रित पण पहि कहेवाय. तात्पर्य ए छे के, भास वगेरे प्राचीन कविओनी, वचिनी अने छेक्ट अशोकनी धर्मलिपिओनी मागधी भाषानु योर्दु धणुं पण स्वरूप वर्तमान आगममा रहेलु होय नेम जगातु नपी तो पड़ी आगमोनी भागाने अर्धमागधी' नाम कह रीते अपाय ? अत्यार सुशी तो आपणे · अर्धमागधो ' मा संघमा पुरातन ग्रंथ, रेख अने व्याकरणने आधारे विचार कयों, पण हवे ए - धमा आधुनिक ग्रंथकारोनो अभिप्राय पण जोइ लइए फक्त मार्कडेयं अने क्रमदीश्वर सिवाय वीना कोइ अर्वाचीन वैयाकरणे अर्धमागधीना स्वरूपने लगतो कार उल्लेख कर्थो भगातो नी माऊंडेय कहे छे के:- 'शौरसेन्या अदूरत्वाद् इयमेवार्धमागयो ।। . प्राकृतसर्वस्व पृ० १०१ आम लखीने एज ग्रंथकार अर्धमागधीना उदाहरण रीके आ वाक्य आपे छे--- A " अन वि णो शामिणीए हिलिम्बादेवीए पुश्तवडक अशोए , ण उवशमदि" (वेणीसंहार तृतीय अंक) अने साथे-- " राक्षसी-प्रेष्ठि-चेटाऽनुकादरर्धमागधी" ए भरतनु वाक्य पण टाकी पतावे छे. कमदीधर पोताना सक्षिप्तसारप्राकृतपादमा जणावे छे के. " महाराष्ट्रीमिश्राऽर्धमागधी " ५-९८ आ उल्लेवनी व्याख्या करता आचार्य विधुशेखर भट्टाचार्य आ प्रमाणे जणावे छे-- " अर्धमागधी शब्द टि द्वाराई जानिते पारा याईने छे ये, ए भापार शब्दप्रभृतिर अर्थ अंश ठीक मागधी अर्थात् प्राकृतपागधी । तो ताहार अरर अपर अर्ध अंश कि ? क्रमदीश्वर बलियान ताहा महाराष्ट्री-प्राकृतमागधी महाराष्ट्री सहित मिश्रित हईया अर्धमागधी नाम धारण करे। ताहार उदाहरण- लभशवशनमिलशुलशिलविभलिदमंदाललानिटहिनुगे । चौलमिने परग्वालदु मम शयलमवजनवालं ॥ पालिप्रकाशनी प्रस्तावना पृ० १६-१७ उपर्युक बने वेयाकरणोए जणावेल अर्धमागधीन स्वरूप आगमोनी भाषामा घटी शके बरु ! आ प्रभनो उचर आ, विधु- शेखरनीए नणावेली उपर्युक्त गाथा न आपी रही छे.
४६ आ उपरथी याचो जाणी शक्या हशे के, वैयाकरणोए अर्धमागधीन ने लक्षण नक्की कर्य छे ते आगमोनी भाषामा घटे छे के नहि मार्कंडेय वगेरेए नको करेलु अर्धमागधोनु स्वरूप आ पुस्तरमा शौरसेनीमा अने मागधीमा आवो जाय छ, एथी पण अहीं अर्ध मागधीने माटे जुट प्रकरण राखवामा नथी आन्य प्रसिद्ध छे माकृतना केटलाफ व्याकरणोना अने तेनी वृत्तिओना नामो नाम का सवाद १ प्राकृतप्राश वररुवि २ प्राकृतरक्षण चड ३ प्राकृतव्याकरण हेमनद्र ४ प्राकृतसजीवनी वसतरान आनो उल्लेख मार्कडेयना प्राकृत सर्वस्व'माछे पृ०१ " " लो० ३. ७ "" ५ प्राकृतकामधेनु लकेवर ६ प्राकृत याकरण समतमद्र वृति विविक्रमदेव ८ प्राकृत प्रक्रियावृत्ति उदयसामाग्य (दुढिका ) ९ महतोष १० प्राकृताल्पतरु रामतर्कवागीश प्रसिद्ध छे ४७ " ११ प्राकृतचंद्रिका कृष्णपंडित (शेपकृष्ण) १२ वामनाचार्य १३ प्राकृतमनोरमा मामह मानो उल्लेख मार्क- डेयना 'प्राकृत सर्वस्व 'मां छे पृ० १ श्लो० ३. १४ प्राकृरूतपावतार सिंहराज प्रसिद्ध छे १५ प्राकृतदीपिका चंडीवरशर्मा १६ प्राकृतमंजरी कात्यायन प्रासद्ध छे १७ प्राकृतसर्वस्व मार्कडेय १८ प्राकृतानद रघुनाथशर्मा १९ प्राकृतप्रदीपिका नरसिंह २० प्राकृतमणिदीपिका चिन्नवोन्मभूपाल 'पड्भापाचंद्रिका'नी प्रस्तावना पृ०१७ टि० पृ० १८टि० २१ प्राकृतमणिदीप अप्पयज्वन् २२ पड्भापामंजरी २३ पड्भापावार्तिक २४ पड्मापाचंद्रिका लक्ष्मधिर प्रसिद्ध छे २५ पड्मापाचंद्रिका मामकवि २६ पड्भापासुबतादर्श २७ पड्मापारूपमालिका दुर्गणाचार्य पड्भापाचंद्रिका ४० २२-२-२-९ सूत्रनी वृत्ति. " ।
२८ संक्षिप्तसारपाकृतपाद कमटीश्वर
आ० विधुशेखरनीना
पालिप्रकाशनी प्रस्ता-
पना पृ० ११ टि.
२९ पाकृतव्याकरण शुमचंद्र जोएलु के
आ उपरात शाकल्य, भरत, कोहल (मारंडेयनु प्राकृत सर्वत्र
पृ० १ श्लो० ३) भोग अने पुष्पवननाथ (पभाषानंदिकानी
प्रस्तावना पृ० १७ टि.) आ पडितोए पण प्राकृत व्याकरणो
लखेला छे.
ने व्याकरणोना नाम अहीं आप्या छ एमाना फक्त १ के ५
जोवामा आव्या छे. नामो तो वधावंगीय विधकोश' अने । केट
लोगस् केटलोगोरम'मायी लईने मूकेला छे.
आ पुस्तम्मा पालिप्रकाशनो उपयोग बहु करवामा आव्यो छे
तेथी
एना कर्ता आचार्य विधुशेखरजी तरफ मारी पूरी कृतज्ञता छ।
ए सिवाय ने सज्जनोए मने बहु मूल्य सूचनो की छे तेभो क्या
तरफ पण हु पूर्ण कृतज्ञ छु.
आ पुस्तकमा खास करीने प्राकृतभाषा सबधे ज सविशेप लख.
वामा आन्यु छे अने बानी बीजी भाषाओने लगता मान विशेष
नियमो ज दर्शाच्या छे, उदाहरणो दर्शाया छे खरा पण ते प्राकृत
जेटला नहि. अपभ्रशने समनवा माटे सविशेष शब्दो अने उदा-
हरणो जहर मूकवा जोइए पण म्यानामावने लीधे अहीं तेम नथी
বর্তী
प्राकृत भापाना प्रथम अभ्यासीए प्रथम माकृत भाषा-
नाज नियमो तरफ विशेष लक्ष्य राखg अने पछी चीजा
वाचन वखते पीजी वीनी भाषाओने साये लेची.
आभार बनारसमा अभ्यास करती वखते प्राकृतना प्राथमिक अभ्यास माटे प्राकृतमार्गोपदेशिका' नामे एक पुस्तक में आजथी १५ वर्ष पूर्वे लख्यु हतु ते पुस्तक करता वधारे विगतवाळु अने विस्तृत व्याकरण लखवा माटे सुबइनो जनश्वेतावर कॉन्फरन्स ऑफीसे मने प्रेरणा करी, तेथी स० १९७७-७८ मा मैं कॉन्फरन्स ऑफीस माटे आचार्य हेम- चद्रनाज क्रम प्रमाणे मूळ आ व्याकरण तैयार कयु हतु पाठळयी ए पुस्तक रा० रा केशवलाल प्रेमनद मोदी तरफभी पुरातत्वमदिरने छापवा माटे आपव'मा आव्यु मदिरे एने छपाववानो निर्णय क्यो अने 'आरतु पुस्तक हु फरी एकवार जोइ जाउ अने साये तुलनात्मत्र पद्धतिनो पण एमा उपयोग करु' एवी सूचना मने मदिरना मत्री भाइ श्रीरसिकलाल परीख तरफथी करवामा आवी, जे मने एक रीते विशेष उपयोगी लागी अने तेना परिणाने पूर्वे लखेलु आखु पुस्तक फरी तपासी तेमा आवश्यक सुधारा वधारा करी हालना रूपमा ए प्रकट करवामा आवे छे. ए माटे ए बधा प्रेरकोने साभार धन्यवाद घटे . धेचरदास जीवराज दोशी विषयानुक्रम प्रकरण १ लु पृ०१-३ वर्णपरिचय प्रकरण २ जुं पृ० ४-९ सामान्य स्वरविकार नियमांक उद्देश्य विधेय दीर्घस्वर हूस्वस्वर दीर्घम्वर इस्वस्वर (पालि) टि०१५ २ हस्वस्वर दोस्वर हुस्वस्वर दीर्घस्वर (पालि) टि०२ ३ आ ४ ४ ४ ४ 11 . ५ 444 many ॥ ए (पालि) टि० १ ऊ ओ ओ (पालि) टि०२ २ ६ ७ ॐ (पालि) टि० ३ ८ ९ रि रि (पालि) टि०१ +'रि० 'रले टिप्पण ७ १० इलि %3D ७ ऐ ऐ ७ ७ १२ ए (पालि) टि०३ ओ ओ (पालि) टि० ३ इ (अपभ्रंश) औ ७ अ " ई उ " ॥ " आ D " अ 11 " - आ " ॥ " hy by ८ AAAAHHHH 44 ॥ " ८ hw इ इलि ॥ " % 3D on MMo D . अउ " 11 D 00 १५ " प्प टूफ फ(,) दि०४ दू - ग (,)टि० ५ = त (,) टि.६ = च्छ (पालि) दि०१ म(,) टि०२ = ? ()टि० ३ छ क(,) प्प (,)"" ख (1) टि०६ स्क = क (,) - प्प (ग) = थ (,)" " स्थ = त्थ (,) सयुक्त मादि लोप स्म स्स ( पालि) टि०७ - ग (,) टि०२ (,) टि०३ सयुक्त लादि' लोप ह = क ( पालि ) टिक ४ - घ (,) टि. " " " १५ १५ १५ १५ १५ १५ १५. " ४ D १६ १६ ध्व टि०६ के = क (1) दि. १ टि०२ 22 * जूओ आगला पृष्ठनु टिप्पण.
: १८ . क ९ लोप ( अपभ्रश) 'द्र लोप र लोप (पालि) टि०२ अंत्ययजननो'अ' 'काटिनोय' = य (पालि ) टि०५ य (पालि ) टि०५ खादिमोह = ह ( पालि ) टि. ३ - ह (,) टि. ४ = ह (1) टि.५ (१) थ = ध ( शौरसेनी) (२) - ख ( चूलिकॉपशाची) = 4 (..) = फ(,) (३) म - छ (1) घ घ १९ १९ १९ १९ २० . २० २. २० २१ २१ . = ड (पालि ) टि०१ = तु (पेशाची) (१) by thNw to the N 6 २१ २२ २२ २२ (१)ड (२) (10" - (पालि ) टि०१ - ट ( लियापशाची) -3 (.) == (पैशाची) २३ ण - न (पालि ) टि०१ २३ २३ १३ न ण न =ण (पालि । टि०२ १५ प प = व ( पालि ) टि०३ २३ २३ २३ २४ २४ प = ब ( अपभ्रश) (१) प १७ २४ २४ (१) व = भ ( अपभ्रश) - प ( चूलिकापैशाची) - प (पालि) टि०१ २५ २५ व १८ ब २५ = व (पालि) टि०२ २५ ब (१) म व (अपनश) १ ९ य य = न (पालि) टि०१ २६ = य (मागधी) २६ - ल (मागधी, पेशाची) २६ = ळ (पैशाची) (१)र २० श -स प श = स ( पालि) टि०१ २७ प = स ( ") " २७ क्ष स स - श (मागधी) २७ २८ प्रकरण ४ धुं पृ० २९-४३ संयुक्त व्यजनोना सामान्य फेरफारी नियमाक उद्देश्य विधेय पृष्ठ २२ क्ष -ख, क्स २९-३० क्ष २९-३० क्ष २९-३० क्ष = ख, क्ख (पालि) टि०१२९-३० क्ष = छ, च्छ (" ) २९-३० = श, ज्झ (")" २९-३० (") टि०२ २९ (१)क्ष -- के (मागधी) २३ व -ख, क्स क - ख, ख ३० = ख, रख (पालि) टि. ३ स्क - ख, क्ख (पालि) टि. ३ "प - स (मागधी) ३२ (पालि) टि०१ = स ( मागधी) " (पालि) टि०१ २४ च, च = च, च (पालि) टि०४ त्व ३२ च (पालि ) टि. (१) संयुक्त " * सयुक्त 'स' त्य ५७ द्व -अ, ज्झ ३२ ३२ २६ थ्य थ्य = च्छ (पालि ) टि० ३ = च्छ ( पालि) टि. ३ त्स ३२ ३२ .३२ त्स = च्छ (पालि) टि० ३ प्स ३२ ३२ प्स (२) च्छ = च्छ (पालि ) टि० ३ = श्च (मागधी) - ज,ज ३३ २७ थ्य र्य " " ३३ (१) ये (१) द्य = ज, ज (पालि ) टि०१ ३३ (,) यिर, य्य, रिय (5) टि२ ३३ = य्य ( शोरसेनी) ३४ = य्य (पालि (टि.१ = य्य ( मागधी) = य्य (पालि) दि.२ ३४ = श, ज्झ (पालि) टि० ३ ३४ झ, ज्झ यह ( पालि ) टि०५ ध २८. ध्य झ, ज्झ ब - २९ त ३५ ३५ त (१) न्त म्र ३० न = ट (पालि) टि०२ = न्द (शौरसेनी) ०ण, ण = न (पालि) टि. १ = ण, पण =ण (पालि) टि.१ = न (मागधी) = ब्न (पालि) टि०४ = न (मागधी) ज्ञ ज्ञ (१) ण्य ण्य (१) न्य न्य ३१ य, त्य (१) र्थ स्प = म्ञ (पालि) टि०४ = ज्ञ (मागधी) - न (पालि) टि.४ ३७ - य त्य (पालि) टि. १ ३७ = स्त (मागधी) - स्त (,) = ठ, (पालि) टि०३ १ (पालि) टि.४ = स्ट (मागधी) = स्ट " " (१) ट Paraa = सट (पैशाची) ३३ -प,प क्म -फ, प जुम (पालि) टि. ड्म कम " कम ३४ स्प प्प १-२ ३८ कुम (")" = च्म (पालि) टि०३ = फीफ = फ, फ = प्फ (पालि) टि०१ ३९ - फ, फ (ो " ३९ -प्प टि.२ ३९ -प्प ३९ = प (पालि) टि०२ ३९ - प (") "" " प्प टि०२ प्प स्प - म, म = म (पालि) टि०३ न्म ३९ ३९ ३९ ३९ = म्म (पालि) टि०४ ग्म ३७ ८ 2 गुम (पालि) टि०५ श्म म्ह १० ४० - म्ह (पालि) दि.१ " = म्ह (" = म्ह (.) " ४० . = म्म (अपभ्रश) बह (१) म्ह ०० ३० ४० ४० ४० - व्ह पह ४० -= ण्ह, ह (पालि )टि० ३४० (,), = ण्ह (पालि) टि. ३ = ण्ह (,) टि. ३ = ण्ह (,), ४० ४० " ४० - " ४ 24th me and I ARTHATANJAL सिन (पैशाची) सिन (पालि ) टि० १ ४१ ४१ = ल (पालि ) टि. २ ४१ ४० - न ( पालि) टि. ३ - १४३ - रह, रिह (पालि) टि०४४१ रिस ४२ रिस -रिस ( पाटि)टि०१ रिस (.) . " ६२ 'आ' विकार ४७-४२ (क) आ (ख) आ (ग) आ (च) आ उ (छ) आ =ऊ (ज) आ (म) आ आ = अ (पालि) टि. २ आ टि०२ 'इ' विकार ४९-५१ (क) (स) " ५० (a) (च)नि ओ ओं = अ (पालि) टि.६ ) टि०२ ए" ) टि. ओ (,) टि०२ ' विकार इ म ११ क (ग) .
(च)ई - म (पालि) टि०१ ५१ 'उ' विकार ५२-१४ आ (क) (ख)उ (ग)उ (घ)उ %3D ३ wis 4 उ (च) उ ओ - अ (पालि) टि०१ उ इ (पालि) टि०२ ओ (पालि) टि०१ '' विकार (क) ऊ ५५ = (ग) - (च) ऊ = ए ओ = अ (पालि) टि०२ ५४ - अ (संस्कृत) टि०२ ५४ = ओ (पालि) टि०२ が的 ६४ ५४ ऋविकार = आ ६५-५९ । (क) ऋ (ख) ऋ (ग) ऋ (घ) ऋ (3) (च) (छ) (ज)म (झ) (१) ऋ ऋ - ओ अरि -दि ५९ -३(पैशाची) = (पालि) टि. ३ = 3 (पालि) टि०१ --ए (पालि) टि. २ 'ए' विकार . ५९ (क)ए ५९ ए भो (पालि) टि. २ 'ऐ'विकार ५९-६० -अभ (ग) ऐ (घ) ऐ - इ (पालि) दि.१ २ 'ओ' विकार (क) ओ (ख) ओ (ग) ओ - अउ, आअ १८ . औ' विकार = अउ (क) औ (ख) ओ (ग) औ (घ) औ -उ औ औ आव - अ (पालि) टि० १ आ ( १ = उ (,) टि. १ زرو भकरण ६ पृ० १३-७४ असंयुक्त व्यंजनोना विशेष फेरफारो नियमाक उद्देश्य विधेय पृष्ठ ५९ 'क'"विकार क ख क -ग क -भ -म क -व क - ख (पालि) टि०१ - ग (,) टि०३ क 'ख' विकार 'विकार १४ ग म ग ग द 'च' विकार . ट च जल - ज (पालि) टि. ३ च 'ज' विकार . १३ 8 , 'ट' विकार १५ ट ट ट = ल, ळ (पालि) टि०१,६५ '' विकार ठ ६५ ठ 'ण' विकार ण ण " ळ (पालि) टि. ३ ६५ १७ ७ 'त' विकार त त त त. =ण त त त त . है = ट (पालि) टि. १ १६ त 'य' विकार थ थ थ = 3 (पालि) टि०३ 'द' विकार ट -घ द (क)द (ख) द द द - ड (पालि) टि०१ =ळ (पालि) टि०५ ७० 'घ' विकार- घ ढ ७१ न' विकार न न ल न ७२ - ल (पालि) टि. १ 'प' विकार प प प प ७३ - फ (पालि ) टि. २ '' विकार सम म व ब -म (पालि) टि. 'भ' विकार म . म'. विकार ७० म - म .स म' 'म' अनुनासिक । यू: विकार ७७ - आह य = य य य ७. य = र टि.१ = ल (पालि) टि० ३ = व ( ) ७० य ४ य " ७ ७८ . र' विकार -डा र 'ल' विकार ७२ ल कम ल ल न (पालि) दि.१ ७२ 'व' विकार ८० वा म ७. 'श' विकार ७२-७३ श श ७२ = छ (पालि) टि.५ 'प' विकार ६ प ण्ड प - य = छ (पालि) टि.१ 'स' विकार ७३ स ८४ 'ह'विकार है र ७३-७४ . लोप 'क' छोप 'ग' लोप ज' लोप 'द लोप 'य' लोप व लोप प्रकरण ७ मुं संयुक्त व्यंजनोना विशेष फेरफार उमेश्य विधेय निपमाफ पृष्ठ ८६ क (क)क्त (ख) ग्ण (६) ग्ण मक - क (पारि) टि. १ = (पालि) टि०२ पख, ख - क्ख ८७ ७५-७६ ख (क) क्ष्ण (ख) स्त (ग) स्प (घ) स्फ म्ग, ग ७६ (क)क (ख)क ल्क - (पालि) टि०२ च (स) थ्य छ १० (क) स्थ (स)स (ग) स ૭૨ ज्न (पालि) टि.२ ९२ ७७ न्ध D ९ ३ ७७ धि न्नु ९४ ६ ७८ (ग) स्त त ७७ = ट (पालि) टि. २ ठ (स) स्त (ग) स्थ मा -: (पादि). ३ = (पाति) टि०४ -3).. २९ (क) (स) - (क)
-
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प
त्म तुम (पालि) टि.४
भारम्भ
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(क) श्म
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२०७
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(स)
(ग)
प्म-ह (च) (छ) विर्भाव जुदा जुदा शब्दोमा विर्भाव (ख) सामासिक शब्दोमा द्विर्भाव शब्द-विशेषविकार ८४-८६ (पालि) टि०१ (पालि) टि. १ शब्द-पर्वधाविकार ८६-१७ " (पालि ) टि. ३ " " " " अन्त स्वरवृद्धि ८८-९० " (पालि ) टि. १ ३५-६-७ " (पालि ) टि.१२ " ११२ १-८-९ (पालि) टि०२-३ अक्षर-व्यत्यय ९०-९१ अपभ्रश-आदेशो अपभ्रशना उमेरणो ''नो वधारो 'अ'नो वधारो र'नो धारो (१) - संधि प्रकरण ८ मुं ९२-१०१ स्वरसंधि ९२-९३ (पालि) टि० २ ९२ " २ " (पालि) टिल हस्व-दीर्वविधान हस्व 'नो दीर्घ 1 ९३-९५ " " " (वैदिकसं०) टि०१ ९४ (संस्कृत) टि. १ ९४ (पालि) टि०१ दीर्घ । नो ह्रस्व (वैदिक सं०) टि०२ ९४ (संस्कृत) टि०२ ९४ संधिनिषेध स्वरलोप (पालि)टि०१-२ " ६-9-८-९-१० ." . " " ११-१९ विसर्ग १२-१३ म " व्यंजनसांधे ९७-१.१ - ओ - अनुस्वार (पालि) टि.३ ९७ - अनुस्वार अनुस्वार = अनुसार अनुत्तार आमम (चौरसेनी) (पालिटि०१ ९८ ज ण न - (1) 'ग' ७७ ९९ अनुस्वारआगम (पालि) टि. १ आगम अनुनासिकविधान (पालि) टि०२ अनुस्वार' लोप. (पालि) टि०३ (संस्कृत)टि०४ " १९ " १०० " प्रकरण ९ मुं १०२-१२२ उपसर्ग-अव्यय-निपात उपसर्ग १०२-१०३. अव्यय १०३-११९ निपात ११९-१२१ अपभ्रंशमा आवता केटलाक निपानो १२१-१२२ १२३-२३८ नामप्रकरण१० मुं नामना प्रकारो नामना अन्यस्वरनो फेरफार नामनी भातिओ वचन-विभक्तिओ प्राकृत भाषाना प्रत्ययो शोरसेनी भाषाना प्रत्ययो । मागधी भाषाना प्रत्ययो पेशाची भाषाना प्रत्ययों १२३ १२३ १२४ १२५ . " " १ अपभ्रंश मापाना प्रत्ययो १२६ प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो १२६ प्रत्ययो लागतां नामना मूळ अंगमा यता फेरफारो १२७ शौरसेनी प्रत्ययने लगता नियमो १२८ मागधी प्रत्ययने लगता नियमो १२८ पैशाची १२८ अपभ्रंश १२९ अपभ्रंश प्रत्यय लागतां अंगमा यता फेरफागे १२९ स्वरांतशब्दो १३०-१८१ अकारांत शब्दना रूपाख्यानो प्राकृत (पुलिंग) (पालिरूपाख्यानो पुलिंग) टि. १ १३० वध' शब्दनी विशेषता चतुर्थीनुं आर्पशकृतरूप १३१ वीर (शौरसेनीरूपो) वील (मागधीरूपो) १३२ पीर (पैशाचारूपो) वीर (अपभ्रशरूपो) अकारात शब्दनां प्राकृत रूपाख्यानो ( नपुंमरुलिंग) १३३ फुल शतरूपरों फुल (पालिरूपो) टि० २ मणसा' वगेरे आर्परुपो (टि०१) १३५ मनसा 'कम्मुगा' वगरे आर्परुपो (दि०) कम्मुना' । पालिरूपो () . , पालिरूपो (1) - त्यद्' १३९ १३९ कुल (अपभ्रशरूपो) कुलभ ( अपभ्रशरूपो) अकारात-सर्वादि-शब्द उवह (टि०२) , सर्वनाम (पालि) टि०४ सब प्राकृतरूपो सव्व (पालिरूपो) टि०३ सव्व ( शौरसेनीरूपो) शव ( मागधीरूपो) सत्व (पेशाचीरूपो) सव, साह (अपभ्रशरूपो) त, ण प्राकृतरूपो त, न (पालिरूपो) टि०१ त (अपभ्रंशरूपो) जप्राकृतरूपो न ( पालिरूपो) टि. ३ ज ( अपभ्रशरूपो) क प्राकृतरूमो क ( पालिरूपो) टि०३ क, क्वण, काइ (अपभ्रररूपो) इम प्राकृतरूपो इम (पालिरूपो) टि.१ आय ( अपभ्रशरूपो) एअ प्राकृतरूपो एअ (पालिरूपो) टि०१ १४१ २४१ २४२ १४२ १४२ १४५ १४६ एद, एअ ( अपभ्रशरूपो) अकारात सर्वादि ( नपुंसकलिंग) २४८-१५१ तुम्ह प्राकृतरूपो तुम्ह ( पालिरूपो) दि. ३ अम्ह प्राकृतरूपो १५३ अम्ह ( पालिरूगो) टि.३ तुम्ह ( अपभ्रंश) १५५ अम्ह (अपभ्रश) आकारात शदना रूपाख्यानो (पुंलिग) २५५ हाहा पड्भापाचंद्रिकानो मत टि०१ १५६ इकारात, उकारात शब्दना रूपाख्यानो ( पुलिंग ) १५७ प्राकृत भापाना प्रत्ययो प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो इसि प्राकृतरूपो इसि ( पालिरूपो) टि.१ २५९ ) टि. . १५७ . अमिग ( " मुनि (" आदि ( " टि. ) " " " गिरि ( रसि ( " N " सति । " २६०-१६१ " गामनी ) कुच्छिसि आर्षरूप टि०१ LIABA " ) अभिभू ( ॥ " 'इन् छेडावाळा नामोनी विशेषता (शोरमेनी वगेरेर दंडि दंडि ( पालिरूपो) टि०१ भाणु प्राकृतरूपो भानु (पालिरूपो) टि. २ हेतु । ) " जतु ( • २६४-२६५ ) " सन्वन् . अमु प्राकृतरूपो अमु ( पालिरूपो) टि०२ इकारात उकारात शब्दने लागता अपभ्रश प्रत्ययो १६७ दसि ( अपभ्रंशरूपो) ) इकारात, उकारात शब्दना रूपाख्यानो (नपुसकलिंग) १६९ दहि माकृतरूपो दाधि ( पालिरूपो) टि०२ " ) टि०२ महु प्राकृतरूपो म (पालिरूपो) टि०१ गोत्रभु (पालिरूपो) टि. १ अमु प्राकृतरूपी अमु (पालिरूपो) टि०१ १७१ रह (अपवंशो) महु ( भाणु ( गामनी ( ~ ऋकारात शब्दनां रूपाख्यानो (पुंलिंग) विशेष्यवाचक ऋकारात १७२ पिउ, पिअर प्राकृतरूपो पितु (पालिरूपो) टि०१ विशेषणवाचक ऋकारात १७४ दाउ, दायार प्राकृतरूपो दातु (पालिरूपो) टि०१ पि पिद पिड पिदि पिउ अपभ्रंश १७६-१७७ पिदु पिअर पिदर ऋकारात शब्दना रूपाख्यानो (नपुंसकलिंग) सुपिअर प्राकृतरूपो दायार १७८ एकारांत अने ओकारात शब्दना रूपाख्यानो १७९ गो ( पालिरूपो) टि०१ १७९-१८० सुरेअ प्राकृतरूपो १८० 'गो' अने नौ'मा आर्षरूपो टि. गिलोअ प्राकृनरूपो व्यजनांत शब्दो १८१-२०३ पड्भापाचंद्रिकानो मत टि०१ १८?
८३ " ) " " " 'अत्' छेडाबाळा नामो नामोना आपरूपो नामानी शौरसेनीमा विशेषता १८२ भगवंत भयवंत प्राकृतरूपो १८३ भगवंत (पालिरूपो) टि. १ १८३ भवंत प्राकृतरूपो भवत (पालिरूपो) टि.१ संत भवत (वर्तमान कृदत) १८५ गच्छत (पारिरूपो) टि०१ १८५ महत अरहंत ( भवमाण प्राकृतरूपो भविस्समाण १८६ 'अत्' छेडावाळा नामो (नपुसकलिंग) भावत प्राकृतरूपो (पालिरूपो) टि०१ गच्छत ( ), 'अत्' छेडावाळा नामो ( अपभ्रशरूपो) १८८ भगवत (लिंग) भगवत (नपुंसकलिंग) 'अन्' छेडावाळा नामो (पुंलिंग) अद्धाण प्रातरूपो १८९ रायाण सुकम्माण प्राकृतरूपो " " " १९.
८४ ) टि. " " 'अन्' डावाळा नामोने लागता विशेष प्रत्ययो १९० पूस प्राकृतरूपो महव अप्प १९२ अत, आतुम (पालिरूपो) टि. १९२ 'राय' शनी प्रक्रिया अने विशेषता १९३-२९१ रान (पालिरूपो) टि० (२) २९३ ब्रह्म १९४ अद्ध ( ). १९४ युव ( ). १९५ मुद्ध ( ) टि. सा ( नि. २९६ राय प्राकृतरूपो १९७ राय (पेशाचीरूपो) नुपूस प्राकृतरूपो (नपुंसकलिंग) २९२ मुअप्प १९९ सुअप्पाण" मुराय पूम, पूमाण (अपभ्रशरूपो) मुपूस नपुसमलिंग) मुपूताण ( • अस्' छेडावाला नामो पुम (पालिम्पो) टि. ३ स्त्रीलिंग २०३-२२८ आकारात शब्दोनी परिया २०३ " " " " ) २०१ २०१ " २०६ ईकारात स्त्रीलिंगी नामोने लागता प्राकृत प्रत्ययो प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो विशेषता अपभ्रशना प्रत्ययो अपभ्रशना प्रत्ययोने लगता नियमो माला प्राकृतरूपो (पालिरूपो) टि. वाया प्राकृतरूपो २०७ २०७ २०७ २०९ २०९ गड़ प्राकृतरूपो रति (पालिरूपो) पि०१ घेणु प्राकृतरूपो यागु (पालिरूपो) टि.१ नई प्राकृतरूपो नदी (पालिरूपो) टि. १ वढू प्राकृतरूपो वधू ( पालिरूपो) टि. २ माला (अपभ्रंशरूपो) मह पडी । २१३ २१३, २१५ ) घेणु (,) यहू (") सर्वादि (खालिग) सन्चा (पालिरूपो) टि.१ २११ २१७ २१८ } प्राकृतरूपो २१९ ती, ता गी, णा ता (पालिरूपो) टि. ३ नी, जा प्राकृतरूपो की, का इमा, इमी" " इमा (पाटिरूपो) टि०२ एआ, एई प्राकृतरूपो एता (पालिरूपो) टि०१ अमु प्राकृतरूपो अमु (पालिरूपो) टि०२ सकारात स्त्रीलिंग माआ, मायरा प्राकृतरूपो मातु (पालिरूपो) टि. २ पड्भापाचदिकानो मत (टि. १) धूआ प्राकृतरूपो धातु (पाटिरूपो) टि. २ गउ प्राकृतरूपो २१९ २२० २२१ २२१ २२१ २२३ २२३ २२३ २२३ २२४ २२१ २२४ २२६ २२६ २२६ २२७ २२७ " गाई गोणी गो (पालिरूगे) टि.१ २२७ २२७ २२८ २२९-२३८ २२९ नावा प्रायो सख्यावानरु शन्दो इफ मान रूपो २२९ उम " २२९ उभ (पाटिरूपो टि.१ दु प्राकृतरूप द्वि ( पालिरूपो) टि०१ ति प्राकृतरूपो ति (पाटिरूपो) टि. १ पर प्राकृतरूपो पतु (पाटिरूपो) टि०१ पत्र प्राकृतरूपो पच (पाटिरूपो)टि. १ पद प्राकृतरूपो अति (पानिरूपो) टि०१ सख्यावाचक शब्दोनी यादी २३१ २३१ २३२ २३२ २३३ २३३ २३४ २३४ २३४-२४८ " " कारफ-विभक्त्यर्थ प्रकरण ११ मु १० २३९-२४१ १ जुदा जुदा अर्थमा पष्ठी विभक्तिनो प्रयोग २३९ " (सस्कृत) टि.१ २३९ प्रयोग २३९ ३ पचीने बदले तृतीया अने सक्षमीनो प्रयोग २४० . सक्षमीने बदले द्वितीयानो प्रयोग २४० तेण कालेणं तेण समएण' नी विभफिनो विचार नि०५ २४०-२४१ २ समी ८८ २ ३ ४ " आख्यात प्रकरण १२ मु २४२-२९८ सस्कृत, पाल अने प्राकृतमा यातुना प्रकार २४२ विभक्तिओ कर्तरिरूप २४४ व्यननात धातुनी प्रक्रिया २४४ स्वरान धातुनी प्रक्रिया उवर्णात २४९ क्रवर्णीत २४६ ५-१० धातुओने लगता केटलाक कार्या २४६-२८ वर्तमानकाळ ११ वर्तमानकालना प्रत्ययो प्राकृत (पालि) टि०२ १-२-३ प्रत्ययोने लगतुं कार्य ०४९ शौरसेनी-मागधी २५० पैशाची २५० अपभ्रश व्यननात धातुना रूपाख्यानो २५२-२५४ ०४८ हस् प्राकृतरूपो " (शौरसेनीरूपो) , (मागधी ") (पैशाची) " (अपभ्रश, सरांत धातुना रूपाख्यानो प्राकृटरूपो ) ०५१-२६१ (शौरसेनी) (मागधी ग) (पैशाची " (अपभ्रश ,) भूतकाळ खरात अने व्यननात धानुने लागता प्रत्यय पालि प्रत्ययो (टि०२-३) हेम् प्राकृतरूपो ०१२ " पा " ने " " " हो (पालिरूपो) नि. २६३ आप प्रयोगोमा आवता त्या, इत्प, इत्या, इस भने असु प्रत्ययोनो पालिप्रत्ययो साथे सवधरि ०१ २६४ गम् } (पालिरूपो) टि. २६४ , केटलाक आर्यरूरो सकृत जन्य केटलाफ आपरपो भविष्यकाळ प्राकृत प्रत्ययों २१५ २६६-२७४ ए प्राकृत प्रत्ययोवाळा पालियो (दि. १) २६६, शौरसेनी अनेमागवीना भविष्यत्कापना प्रत्ययो २९७ + " पलिना प्रत्ययो टि०२ पैशाचीना भविष्यकाळना प्रत्ययो २६८ अपभ्रंशना भण् प्राकृतरूपो २६९-२७३ (शौरसेनी रूपो) (मागधी) (पेशाची) (अपभ्रंश) हो प्राकृतरूपो अने शौरसेनी वगेरेना रूपी २७३-०७४ तस्कृतनन्य केटलाक आपरूपो क्रियातिपत्ति प्राकृत वगेरेना प्रत्ययो आज्ञार्थ-विध्यर्थ २७६-०७९ प्राकृत वगेरेना प्रत्ययो २७५-२७६ आज्ञार्थ (पालि प्रत्ययो ) टि०६ कियर्थ २७६ हो २७७ शौरसेनी, मागधी अने पैशापीना हो २७७ अपभ्रशना रूपी . " " हम् प्राकृतरूपो केटलाफ आपलपा अनियमित रूपो नए (पतमान) " (शिर्ष, आदार्थ अने भक्विनाल) १८० " " अस् ( पालिरूपो) टि. २८० कृ (भूतकाळ) २८१ (भविष्यत्काळ) २८२ " ( पालिरूपो) टि०२ २८१ दा (भविष्यत्काळ) २८१ केटलाक आदेशो (भविष्यत्काळ) २८२ पालिअगो टि०१ २८२ प्रेरकरूपो २८३-२८७ प्रेरक बनाववानी रीत २८३ प्रेरक अंगो २८४ पालिना प्रेरक अगो (टि.१) २८३-२८४ उपात्यम्वरवाळा प्रेरक अंगो २८५ वर्तमानकाळ २८६ भूतकाळ भविष्यकाळ क्रियातिपत्ति २८७ वि यर्थ-आज्ञार्थ २८७ २८८-२९० मनन वगेरेना पालिरूपो (टि०१) सह्यभेद २९०-२९८ मद्यभेट (पालि टि. १) २९० पैशाचीनी विशेषता २९१ अपभ्रशनी २९१ सयभेदी अगो २१२ वर्तमानकाळ २९२ " 1 नामधातु वगेरे विध्यर्थ आज्ञार्थ भूत (ह्यम्तन) प्रेरक सह्यभेद २९३ २९३ २९४ २९४ ना रूपो " २९६ अनियमित सद्यभेदी अगो कृदंत प्रकरण १३ मुं २९९-३२३ वर्तमानकृदंत २९९-३०४ वतरिवर्तमानरुदत २९९ कतरिवर्तमानढत (पालि ) टि० २ २९९ प्रेरक वर्तस्विर्तमानवृदत सह्यभेदी वर्तमानकृढ़त ३०३ प्रेरक सहाभेदी ३०४ भूतकदंत ३०४-३०७ स्तरिभूतम्दत . ३०४ सह्यभेदी भूतरूदत भूतदत (पालि) टि. १ ३०६ प्रेरक्भूतहदत केटलाक सस्कृतनन्य भूतदंतो भविष्यत्कृदत भविष्यत्दत मारत मविष्यत्कदत (पालि) टि०१ 3०७ तु-दु-चए प्रत्ययो हेत्वर्थकदत ३०७-३११ हेत्वर्थकृदंत प्राकृत ३०७ हेत्वर्थकृदत (पालि) टि०२ ३०७ अनियमित हेत्वर्थ कृदंत 'तए' प्रत्ययात रूपो 'तवे' अने 'तए' प्रत्यय (टि०१) ३०९ देवकुढत (अपभ्रश) ३१०-३११ संबंधकभूतकृदत ३११-३२८ मवधकभूतकृटत माकृत तु-अ-तूण-तुआण-इत्ता-इत्ताण-आय- } २१२ आए प्रत्ययो मनधभूतकृदन्त (शौरसेनी-मागधी) ३१२ (पालि) टि०२ (पैशाची) (अपनश) अपवाद-शौरसेनी अपवाद-पैशाची अपवाद-अपभ्रश भाषावार उदाहरणो ३१३ ३१३ ३१४-३१७ प्राकृत शौरसेनी-मागधी पैशाची अपभ्रश अनियमित सबधकभूतहदत प्राकृत ३१९-३२१ ३१९ केटलाफ सस्कृतजन्य सवधरभूतकृदतो विध्यर्थदंत वियर्थटत प्राकृत (पालि) रि०२ रेटलाफ सस्कृतजन्य विभ्यर्थटत तय अणित, अणी ३२० ३२० ३२० य ३२१ ३००-३२३ अनियमित वियर्थदत वि यर्थदत (अपनश) कर्तरिकदंत स्तरिमृदत प्राप्त (पालि) नि? (अपभ्रश) " ३२. " " " . तन्दित प्रकरण १४ मुं ३२३-३१ इटमर्थक 'कर' प्रत्यय (अपन) १२३ " (पाठि) टि०१ २२३ भवाक इल (पालि) टि. ३ ३२३ () टि०१ नत्सरशासक भावार्थक इमा, त, तण ३२० प्पग (भात्रा) ३२४
वारार्थक हुत
३२५
नसत्तु (पालि) टि०२
खुतो आप (टि०२)
मलीय प्रत्ययो
तो, दो प्रत्यय
हि, हा त्य"
३२६
"
३२८
पाकि प्रत्यय
म्याथिक (पशानी)
माथिक ( अपभ्रंश)
অনিযামন বনানী
फेटलाफ सम्पृतनन्य नदिनांनभ्यो
चातुराट
३२८
३२९
३३०-३२१
२३१-३५३
शुद्धिपत्र पंक्ति- অন্তর- शुद्ध- व्यञ्जनम् व्यजनम् त २४ न-धृष्टद्युम्न. धट्टज्जुणो आ उदाहरण १६ अने ए उपरनुं टिप्पण पृ०३६मा २१ १ अपभ्रंशमा उदाहरणमां मूको लोप ५ मी पंक्ति पछी मथाळु वधारवं. (१) अपभ्रंशमा ध्य, श्व, सप्स-च्छ ३२ १० मी पक्ति पछी मथाळु वधार. ४० टिप्पण३ ४७ २८ - टिप्पण ४७ २८ पृ०४५ १० ६ ३ उ-आ विद्रुत विद्दाओ ५३ २१ मी पंक्ति पठी वधार. . दश न्त न्ध २०१न्त न्ध ८० १२ आ पछी बधा अंको सुधारीने वाचवा- अर्थात् ९२ अर्थात् 'ण उत्तिष्टविश आ निज्ञानी उत्तिष्ठोपविश १०६ १६ * आ निशानी १२० १२८ २२ मी पक्ति 931 x x x xx न जोइए. शौ० २ गामनी २२ थइ २०४ तव्व १२ ३गामना यद तय ३३७ अफ ७४ " २०० पम्हह अग्ध विमुर उसिक हववव लोह पन्ह अग्य विसूर उम्सिक हक्खुव आयत्र ३४३ ३४४ १४४ ३१४ " " O आ. आ पुस्तकमा वपराएला ग्रंथो अने तेना संकेतोनो मुलासो (१) अजितशातिम्तव अमरकोश अमरको आचारागसूत्र उत्तराध्ययनसूत्र उपासकदशागसूत्रटीका काशित चतुर्विशतिस्तव जीवविचार पाणिनीय अष्टान्यायी पाणि. पाणिनि- पाणिनीय वेदिक प्रक्रिया वैदिक पालिकोश पालिप्रकाश पालीप्र० का० . पालिप्र० पा०प्र० पालिच्याकरण (कात्यायन) प्राकृतकथासंग्रह प्राकृतरूपावतार भगवतीसूत्र भगव० भग. रालितविक मुनिवंदनसूत्र सरितविस्तर (बौद्धप्रथ) विमुद्धिमा श्रमणसूत्र
पड्भापाचदिका
सूत्रकृनागसूत्र
सूत्र०
सूचकृ.
मूर्यप्रज्ञप्तिीका
हेमचन्द्र प्राकृत व्याररण
हे० प्रा० या.
हे. १०
हेमचन्द्र सम्मत याचरण
(२)
अ०
अध्ययन, अयाय
उद्देश
उ.
गाथा
गा०
द्वि०
निक
पालि० स०
द्वितीय
नियम
पालिप्रकाश सविकल्प
पृष्ठ
प्रथम
रायचद्र निनागमप्तप्रह
रा०नि
राय०
शु.
श्रुतस्कर
मूत्र
प्राकृत-व्याकरण. प्रकरण १ । . वर्णपरिचय प्राकृत भाषाओमा नीचे प्रमाणे स्वरो अने व्यजनो वपराय छे. 'म्वर- अ, इ, उ (इस्व) आ, ई, ऊ, ए, ओ, ( दीर्थ ) १ प्रातमा 'x' नो विकार अ, इ, के उ थाय छे अन 'लु' नो सिकार ' इलि' थाय छे माटे एबे स्वतन खर नथी 'ऐ' नो विकार ए' के ' अइ थाय के अने ' औ'नो विकार 'ओ' के 'अउ' पाय के तेथी ए वे पण स्वतत्र स्वर नथी २ 'एको' 'सेया सोतसो चिअ'योरे शादोमा आवेला '' अने 'ओ' एकमात्रिक छे एम आचार्य शुभचद्र जणाये छे ( -गुभचद्रनु प्राकृत व्याकरण अ० १ ०-४०-लिसित पृ. ४) आ उपरथी 'ए' अने 'ओ'नी एक्मारिकता पण व्याजबी जणाय छे उच्चारणनी दृष्टिए तो विर्भाधने पामेला व्यजननी पूर्वनो विमात्रिक स्वर एकमाविक ज होवो जोइए, अयथा एवे ठेकाणे आवेला द्विमात्रिय नो उचार ज द्विमालिक्नी रीते थइ सतो नी आचार्य हेमचद्र जगावे छ के, कोइ वैयाकरणो प्रातमा पण 'ऐ' अने 'औ'ना उपयोगने दष्ट गणे छे (८-१-१) आचार्य हमचद्र पण 'अयि ना प्राकृतरूप '' ने सम्मत गये थे (८-१-१६९) तो पण तेमने ए सिवाय क्याय 'ऐ'अने 'औ'नो व्यवहार इश नथी,
पडभापाचद्रिका
मूत्रकृनागसूत्र
सू०
सूत्र
सूनह.
मर्यप्रज्ञप्तिीश
हेमचन्द्र प्राकृत व्याकरण
हे० प्रा० था.
हेमचन्द्र सम्मृत व्याकरण
अ०
(२)
अध्ययन,अयाय
उद्देश
गाथा
उ.
द्वि०
निक
पालिस
द्वितीय
नियम
पालिप्रकाश सचिरल्स
पृष्ठ
प्रथम
रायचद्र जिनागमसग्रह
रा० नि
राय०
शु०
श्रुतस्कर
सूत्र
प्राकृत-व्याकरण.
प्रकरण १
वर्णपरिचय
प्राकृत भाषाओमा नीचे प्रमाणे म्वरो अने व्यजनो वपराय छे.
अ, इ, उ. (हस्व)
आ, ई, ऊ, ए, ओ, ( दीर्थ)
१ प्राकृतमा 'र' नो विकार अ, इ, के उ थाय छे अने 'टु'
नो शिकार ' दलि' थाय छे माटे एबे स्वतन स्वर नधी. 'ऐ'नो विकार
'ए' के ' अ ' थाय छे अने ' औ' नो विकार 'ओ' के 'अउ'
थार के तेथी ए वे पण स्वतत्र स्वर नथी
'एको' 'सेव्या' 'सोत्त' 'सो चिस' वगेरे शब्दोमा आवेला
'' अने 'ओ' एकमात्रिक छे एम आचार्य शुभचन्द्र जणाये छे
(-शुभचद्रनु प्राकृत व्याकरण अ० १-२-१०-लिखित पृ. ४) आ
उपरथी 'ए' अने 'ओ नी एकमानिस्ता पण व्याजी जणाय के
उच्चारणनी दृष्टिए तो द्विर्भावने पामेरा व्यजननी पूर्वनो दिमानिक स्वर
एसमाविक ज होयो जोइप, अन्यथा एवे ठेकाणे जावेरा दिमात्रिन्नो
उचार ज दिनानिस्नी रीते यह शस्तो नथी. आचार्य हेमचद्र जपावेल
के, कोइ वैयाकरणो प्राकृतमा पण 'ऐ' अने 'जो ना उपयोगने
इष्ट गणे छ (1-१-१) आचार्य हमचद्र पण 'अयि ना प्रारूप
'ने सम्मत गणे छे (1-१-१६९) तो पण तेमने ए सिपाय
क्याय 'ऐ' अने 'ओ'नो व्यवहार इष्ट नथी,
प्रा.
[ २ ] 'व्यजन- क, ख, ग, घ, ङ (वर्ग) च, छ, ज, झ, ( चवर्ग) १ जाचार्य हेमचद्रना तणाव्या प्रमाणे प्राकृतमा स्वररहित व्यजननो एटले साना व्यजननो के रे तद्दन विजातीयसयुक्त व्यजननो-त, क्न, स्म वगेरेनो प्रयोग यतो नथी तो पण म्ह व्ह' जने 'ल्ह'नो प्रयोग होवानु तो हेमचद्रे पण स्वीकायु छे (जूओ ८-२-७४- ७ -७६)' अकस्मात् ' शन्दने मगधदेशीय होवानु आचाय शीके नणावे छे (ओ-' इत्थ वि जाणह अकस्मात् " मू. आ० पृ. २५५ तथा एनी टीका पृ. २५७ स०) एथी प्राकृतमा ए ए स्थळे खोदो व्यजन पण आवे छे म्ह ह अने ह' उपरात मागधीमा 'स्त' 'स्म' वगेरे सयुक्त व्यजनो पण वपराय छे ए विपे सयुक्त व्यजनना विकारोने नणावता आगळ पणावीगु ए सिवाय जेने शौरसेनी वगेरे भाषाओमा व्यजननी वपराशमा प्राकृत करता विशेष फेरफार छे ते विपे पण आ पुस्तस्मा ते ते ठेकाणे तणावगु दुनो ल' यतो होबाथी एने मूधर पण कहेवामा जावे हे पालामा ए 'ल' ने 7 नूदो गणीने ३३ व्यननोने गणाववामा आध्या छे (ओ कच्चा पा० न्या. सू. १) २ 'प्राद प्रत्यद् 'प्रह''उद -वगेरेनी पठे प्रारमा कोर पण शन्दमा स्वतत्र ते 'द् वणनो उधार यता नथी, किंतु ससो, सड्यो पको, पडका जगण, नइ गण ग्धण, रर घण- वगरे शन्दोमा स्वबग्यमगर '६ नो प्रयाग शिसमत सस्तानी पठे प्राकृतमा 'द' प्रयोग अनुक रागमा ज ग्वा हाथी र बन्ने भापामा स्ववर र नो पराग पिरत कहेगार ३ भागना ('पुदुर वगरे) परा। रूपोसिवाय सात मा स्या सता '7'नो प्रयोग मळतो नयी नेम प्रापमा
[३]
ट, ठ, ड, ढ, ण (टवर्ग)
स, थ, द, ध, न ( तवर्ग)
प, फ, ब, भ, म (
य, र, ल, व (अत स्थ)
पवर्ग)
स, ह (ऊप्माक्षर )
अनुम्बार
.
पण क्याय स्वतन'' प्रयोजातो नयी क चुक , लाउनम् , जज
पूक -वगेरे प्रयोगोनी पेठे प्राकृतमा कञ्चुओ, ल्छण, जन्जवूओ
वगेरे प्रयोगो मुव्यवहत छे मात्र पालीमा नाति ( शाति ),
भात (ज्ञात ), नाण ( शन) वगेरे प्रयोगो सस्कृतना 'झुडु ये
जेया पण मळी आवे छे सस्कृतमा अने प्राकृतमा एकला 'अ' करता
स्ववयंसयुक्त 'न' नो प्रयोग विशेष प्रचलित छे अहिमन्च (अभिमन्यु)
पुन (पुष्प), अवमा (अवज्ञा), अञ्जली ( अञ्जलि )-मागधी
अने भान (ज्ञान) विधान (विज्ञान)-पैशाची ' 'ना
प्रयोगमा पाली, मागधी अने पैशाची विशेष समानता धरावे छे-
(८-४-२९३ तथा ३०३) तथा (पालिप्र०पृ० २३-२४)
१ पालीमा ' अनुस्वार 'ने व्यजनमा गणावीने 'निगृति भी
सज्ञा आपेली छे अने ललितविस्तरमहापुराणमा तो एने (अनुस्वारने )
अने विसगने स्वरोनी साये ज गणावेला छे आ प्रथमा वर्णवेरी
पाराक्षरी आपणी गूतगती बारासदीजेपी छे (जूओ ललितवि०पृ० १२७)
[४]
प्रकरण २
सामान्य स्वगविकार.
--
हगी।
।
दीर्घस्वर-हस्वस्वर'
१. संस्कृतना संयुक्त व्यनननी पूर्वे आवेला दीर्घस्वरो प्राकृतमा
प्राय, इस्व थई नाय छे अर्थात् संयुक्त न्यजननी पूर्व आवेला
• आ'नो अ, 'ई' नो इ, 'ऊ'नो उ, ए' नो इ भने
'ओ' नो उ थई जाय छे. जेमके:-
आ अ-आम्रम् अम्बं । आस्यम् अस्सं । ताम्रम् तम्ब ।
दाग्निः
ई-इ- तीर्थम् तित्यं । मुनीन्द्रः मुर्णिदो ।
ऊ-उ-गुरुल्लापाः गुरुलावा । चूर्णः चुण्णो ।
ए-इ- नरेन्द्रः नरिंदो । म्लेच्छः मिलिच्छो ।
ओ-उ-अधरोष्ठ अहरुट । नीलोत्पलम् नीलुप्पलं ।
इस्वस्वर-दीर्घस्वर.
२. सस्कृतना श्य, श, र्श, श्व, श्श; प्य, पू, र्प, व, प्प; स्य,
स्त्र, से, स्व, अने स्सनी पूर्व रहेलो दूस्वस्वर प्राकृतमा प्रायः
दीर्धभाव पामे छे. उदाहरणो नीचे प्रमाणे छे:-
श्य-~आवश्यकम् आवाप्तय । कश्यपः कासवो। पश्यति पास।
श-मिश्रम् मसिं । विश्राम. वीसामो। विधान्यति वीसमइ ।
--संस्पर्शः संफासो।
१ जूमो पालप्रकाश पृ० ८, नियम-११ (दीर्घस्वर=स्वस्वर)
तथा पृ०५५ (एइ) जने (ओ) अने पृ० ५(ओ)
२ जूओ पालीप्र. पृ. ११-(परामर्श गमासो)टिपण.
१
जब मामी । विसतिनि माया पासासो।
श-दुरशासन दमासगो । मनस्शिाग मणामिग।
प्य-प्य मो। मनुप्य मणमो । शिष्य मीमो ।
- सभो। शाम।। पां वासा ।
ध-परीपाण --बीमाणो ।
--निप्पित्त नीतिगे।
यति कामह । मम्यम् साम ।
म-उय उमो । रियम मभो।
म-नि नीम र रो।
म्स-निम्सह नीसहो।
भाभ
३ सम्नना भापक भारान्त पुलिगी शब्दमा भादिना
• मानो प्रारतमा भाग नमो
प्रसार पयारो, पयरो । मार पयाग, पयगे । प्रहार पहारो,
पहरो । माह पवाहो, पबहो । प्रातार पधारो पथयो।
४ सतना सयुक्त व्यनननी पूर आला 'नो विरलले
याय डे मो-
दिण्डिम-डण्डिमा, डिण्डिमो। धम्मिलम् धम्मल, पम्मिन्छ ।
पिटम् पेट्ठ, पिट्ठ। पिण्डम् पट, पिंड । विल्यम् वेल, विल।
विष्णु चेह, पिम्ह । सिन्दरम् संदूर, सिंदूर ।
1ो पागय . ३-(ह-ए)
[६]
उ.ऊ.
५. सस्कृत शब्दोमा रहेला 'त्स अने च्छ नी पूर्वना 'उ'नो 'क'
-
थाय छे.
न्म-उत्सरति उसरइ
उत्सव. उसयो ।
उसिक्तः उसित्तो । उत्सुकः असुओ।
च्छ-उच्छ्वासति उससइ । उच्छ्वासः उसामो ।
उच्छुकः उमुओ।
उ-ओ.
६. संस्कृतना सयुक्त व्यंजननी पूर्व रहेला 'उ' नो प्राकृतमा
'ओ' थाय छे. जेमके
'कुट्टिमम् कोट्टिमं । कुण्ठ' कोदो । कुन्त कोंतो ।
तुण्डम् तोडं । पुद्गलम् पोग्गल ! पुष्करम् पोक्खरं ।
पुस्तक. पोत्यओ। मुण्डम् मोडं। मुद्गर• मोग्गरो। मुस्ता मोत्या।
लुब्धकः लोद्धओ । व्युत्क्रान्तम् वोकंतं ।
'ऋ-अ
७. सस्कृत शब्दना आदिभागमा आवला 'ऋ'नो प्राकृतमा
'अ' थाय छे.
कृतम् कयं । घृतम् घय । घृष्टः घट्ठो ।
तृणम् तणं । मृगः मओ। मृष्टम् मटुं । वृपभः वसहो ।
१ आ नियम आ ये शब्दामा लागतोनथीः-उत्सन्नः उच्छन्नो।
उत्साहः उच्छाहो।
२ जूओ पालीप्र. पृ० ५४-(उओ)
३ जूओ पालीप पृ० १-(R)
[७]
८ सामासिक अने गौण संस्कृत शळना भत्य 'क'
प्राकृतमा 'उ' थाय छे.
पितृगृहम् पिउघर । पितृपति पिउवई ।
पितृवनम् पिउवण । पितृप्वसा पिउसिआ। मातृगृहम् माउघर ।
मातृप्वसा माउसिआ । मातृमण्डलम् माउमडल ।
'ऋरि
९ सस्कृतना केवल-व्यजन वगरना-'म' नो प्राकृतमा • रि'
थाय
मक्ष रिच्छो । मद्धि रिद्धी। मपम रिसहो।
ल-इलि.
१० सस्कृतना ल'नो प्राकृतमा · इलि' थाय छे -
क्लन्न किलिन्नो । क्लप्त सिलितो।
११ मस्कृतना ऐ 'नो प्राकृतमा 'ए' थाय छे
ऐरावण एरावणो । कैटभ पेढवो । क्लास केलासो।
प्रैलोक्यम् तेलुके । वेद्य वेज्जो । वैधव्यम् वेहव्व ।
शैला सेला।
औ ओ.
१२. सम्कृतना औ'नो प्राकृतमा 'ओ' थइ नाय के
१ जूओ पालीप्र. पृ. ३-(करि) टिप्पण
२ जूओ पालीप्र०. ३- (ऐ-ए)
३ जुओ पालीप्र. पृ० -(औ=ओ)
काञ्चः कोचो । कौमुदी कोमुई । कौशाम्बी कोसम्बी । कौशिक. कोसिओ । कोम्तुभ. कोत्युहो । योवनम् नोव्वण । उपर जणावला वधा म्वरविकारो शोरमेनी, मागधी, पैशाची अने चूलिकपिशाचीमा पण एक सरखी रीते लागु थाय छे, अपभ्रंशमा ए नियमोनु पनि नियत रीते एटले ने रीते जणान्युं छे ते रीते थतुं नयी. तेमा क्याय क्याय 'अ'नो इ, ई, उ; 'उ'नो अ, आ, 'म' नो अ, आ, इ, उ, म 'ल 'नो इ, इलि; 'ए'नो इ, ई, अने ओ'नो अउ अने ओ याय छ [स्वरविकारनी दृष्टिए आ प्रवर्तन सरख के, पण अनियतताने लीधे एने प्राकृतथी नदु पाडी शकाय छे.] - . प्रा. स० वचनम् वअण (वडणं) वेण । ( वईण ) वीण । शयनम् सभण (सइन) सेनं'। नयनम् नभण नइण ( नइनं ) नेन । नवनीतम् नभणी ( नउणीअ ) लोणी । { वस्तुत. आ रूप में अने 'ब' ना मप्रसारणथी बनेग दे] बाहु.-वाहा (नी०) वाहा, वाह, वाह । -अ, आ, इ, उ,र- हत्यम् किच , ओ रिमुदिमा पा....
१ तृणम् तण तिणु, तणु, तृणु। सुकृतम् सुकय मुकिउ, सरिदु, सुकृद । ल-3, इलि--- क्लन्न विलिनो किन्नो, किल्निओ रेवा लेहा लिह, लीह, लेह । औ-अउ, ओ- गोरी गोरी गउरी गोरी। । न्यननविकारोना प्रसंगमा तो ज्या ज्या प्राकृत करता शारसेनी, मागधी, पंशाची, चूलिकापशाची अने अपभ्रशमा विशे- पता छेतेने ते ते म्थळे जणाववाना छाए - । क-नीर्थकर तित्ययरो। लोक लेओ। ग-ना नओ। नगरम् नयर। मृगाङ्क भयो। च-कचग्रह क्यग्गहो। शची सई। न-गन गओ । प्रजापति पयावई। रजतम् रयय । 7-धात्री धाती-धाई । यति नई । रसातलम् रमायल । राति रातिराई। वितानम् आिण। द्र-गदा गया । मदन मयणो। प-रिपु रिऊ । सुपुरुष मुउरिमो । व-विवुध विरहो। य-वियोग विओओ। व-वडवानल वलयाणलो। लावण्यम् लायाण। ( आ बीनो नियम अने एका वीमा अमयुक्त व्यनननां विरारने लगता सामान्य के विशेष नियमो पशाची भाषामा लागता नथी जेमके, स० मकरकेतु मयरऊ मकरसेतू । सगरपुत्रवचनम्-मयरपृत्तवयण- सगरपुत्तवचना विनयसेनेन लपिनम् विनयसेणेण लविय- विनयसेनेन लपित । पापम्- पाव- पाप- आयुधम्- आउह-- जायुव।) पूवात नियम द्वारा प्राकृतमा 'क' 'त' अनेद' नो लोप जणावेले छे तो पण प्राकृतना पेगभेदरूप शौरसेनी, मागधी, पैशाची, चूलियपिशाची अने अपभ्रशमा ते वां लोपाता नी, किंतु वीना बीना वणाना कपमा फेरवाइ नाय के ग्रा० (१) शौरसेनीमा अने क्याय अपभ्रंशमा 'नोद' - थाय छे प्रा० शी, अप० स० प्रा शोक, अप० कथितम् यहि तत तओ पूरित पूरिओ वधिट । प्रतिज्ञा पहष्णा पदिण्णा । तदो। मारुति मारुई मारुटी। पूरिदो। मन्त्रित मतिओ मतिदो। (२) मागीमा आदिम्बित के अनादिस्थित जनोय" थाय छे प्रा. मा स० मा. जनपद जणवो यणवदे। टुर्नन दुव्रणो दुय्यणे। जानाति जाण याणदि । वजित पनिओ वस्यिदे । गनित गाजओ गय्यिते । (३) पेशानीमा अने नलिकापैशाचीमा 'त' कायम रहे रे भने 'नो पण 'त' धाय छे १ जूओ पा. . . २ गौरसनीन उगता दरेक नियमो माग ी, पैशाची, पाल्कामाची जा अरशमा बज गुथा के छ 3 मापा (61) ४ भा.प्र ... (पन्न) .
पदेसो पततो। मतनो। पवती। सं० प्रा० पै०,-५० ५० सं० ग्रा० ०,-च० ० भगवती भगवई भगवती। प्रदेश पार्वती पवई मदनः मदगो शतम सतं) वदनकम् उदणयं वतन। दामोदर. दामोदरो तामोतरो। मदनम् सदणं सतन। 'ग-क, ज-च.' ( ४ ) चूलिकांपैशाचीमा 'ग' नो 'क' धाय छे अने 'ज' नोव' थाय छे. मं० चू० १० गिरितटम् गिरितडं किरितई । जर्नरम् नजर चच्चर । नगरम् नयर नकर। नीमूत. जामओ चीमूतो । সাল मगणो मकनो। नियोनितम् नियोनिभ . प्रा० राजा राया राचा। नियोचित । (५) अपभ्रंशमा क्यायक' नो 'ग' थाय छे. ग्रा० अ० विक्षोभकर. विच्छोहयरो विच्छोहगरो। १ जूभो .प्र. पृ. ५६ (ग-क) २ जूमों पा.म. पृ. ५७ (ब) ६ जूओ ग. प्र. पृ. ५५ (कन्ग)
-
,
संयुक्त · कादि' लोप
३ सयुक्त व्यननमा पूर्ववर्ता क, म, द, इ, त, द, प,
श, ष अने स-एटा व्यननानो प्राकृतमा प्राय रोप थई
जाय छे अने लोप यया पठी बाकी रहेला अनादिना पनननो
द्विर्भाव थाय छे नेमके,
क-भुक्तम् भुत-भुत्त ।
ड-वड्ग खो-खगो।
मुक्त मुत-मुतो।
पड्न सनो सज्जो।
शक्त सत-सतो। त-उत्पलम् उपल-उप्पल।
'सिक्थम् सिम्य-सित्य। उत्पाद उपाओ-उप्पा
ग--दुग्धम् दुध-दुद्ध। द-मदगु मगु-मम्मू ।
मुग्धम् मुध-मुद्र । 'मुगर --मुगरो-मुग्गरो।
ट-फल्म् कफफल-प्पल। प-'गुप्त गुन-गुतो ।
पम्पट उपओ-उप्पओ।
सुप्त -सुत-मुतो।
-
१ जूआ पारीप्र० पृ. १ (प-त) (क्य-4)
२ रत्व, छछ, , म अने फ्फ ना स्थानमा अनुत्रम उव, च्छ, ह,
स्थ तथा एफ थाय छ
३ थ, इस, ३, ५ जने भ ना स्थानमा जनप्रम न्य, साह
अनेभ थाय छ
४ जूओ पालीप पृ. २४ (नियम-३०)
३. पा०प्र०५०२. (नियम-३)
..या०० पृ. "-(पन्त
.
योतति भइ । श-आश्लिष्ट आलिदो। निप्दुर निठुर---निहुरो। 'निश्चल निचल-निश्चलो । निप्पुप्तनम् निपुसन-निसण । 'शुष्कम् सुर-मुक्क। 'श्मधु मम्म् । पष्ठ छठ-छ8ो। श्मशानम् मसाण | स--'निगृह निपह-निप्पहो । हरिश्चन्द्र हरिअन्दो। 'फन्द करो। लणम् लण्ह । म्वलित सलिओ। 4- गोष्ठी गाठी-गोही। म्तव. तवो। तुष्ट तुठ---तुट्ठो! म्नेह नेहो । संयुक्त मादि' लोग. ४. सयुक्त व्यननमा परवी म, न भने य नो प्राकृतमा . प्राय लोप भई नाय छे. अने लोप यया पी वाकी रहेगा अनादिना यनननो द्विर्भाव थाय रे. नेमके - म्मर सरो। म-युग्मम् युग-युग्ग । रश्मि रमि-रम्मी। मेरम सेर । . .म.पू. ३८-("3%च्छ) निन्छ। २ मश्रु मम्म १००० "टिपण ३ . पा. प्र.प्र. 05-नि. ३.-(-) ५. ३० (क-F-नि. " ) प्र. ३. (पन नि ४८) ' शुष्कम् मुक्य (पा. प्र. पृ. ३.) " जू. पा. ३६ (सम्प) ० ३७ (एक) पृ. ३९ (स= - न० 1 ). २. (म्य= २५=4) २ सन्द पदो, ग्यबो-पागप • पृ. ३ . *टिप्पण. ज. पा.प्र.पृ. . -(म्म = रस) प्र० प्र० वाहो। 기 न~-धृष्टद्युम्न धइगुणो'। 'य-कुड्यम् कुड मुड्ड । नग्न नग-नागो। न्याय लग---लगो। श्यामा सामा। सयक्त गदि' लोप २ सयुक्त व्यननना पूर्ववर्ती वा परवर्ती र, व, र, विसर्ग अने र नो प्राय लोप ध नाय के अने लोप यया पछी नाकी रहेला अनातिना प्यनननो द्विर्भाव थाय छे उदाहरण ल-उल्का उका- उका। - अन अर वल्कलम् कलपकन। लभर धम-लद्धओ। ल-विक्लव विश्व-विक्कयो। शब्द सर-- • सदो। सम्णम् मण्ह । म्ता -य-यो। -- नस्ल ध.1-~-त्यो। विर्मा-वित टुग्विभ-क्खिो। पावम् पिकपिक। द सह दुमह-उम्सहो । वेद खेरओ। नि सहम् निसह-निम्सह । वोटक खोडभो। नि मरति निमरह-निम्सरह । पन धओ। -अहो। ) १ आमदमा ण नो दिभाव योनी २ जूद पा०प्र०१. (नि. ५१) ३. पा. प्र..." (. '. पा. प्र. ५० 30~३' (नि. ३५-३०) 1. पा..3.3 -३३ (नि ३८-३.) ५१. पा. प्र. १. ३ (नि...)
--अर्क अक-- --अको। -क्रिया दिया । वर्ग वग-वम्गो। ग्रह गहो। नीर्घ दिघ-दिग्यो। चकम् चक-चक्क । वार्ता वता-बचा। रात्रि रति-रत्ती। सामर्थ्यम् तामथ्य-सामत्थ। धात्री धति-धत्ती। अपभ्रशमा प्राय परवर्ती 'नो लेप विक्ल्पे थाय के प्रिय पिओ प्रिट, पिउन [सूचना- i-~-ज्या पूर्ववर्ती अने परवर्ती एम वे जातना न्यनननो लोप प्राप्त होय त्या प्रयोगो प्रमाणे लोपनु विधान करवु जोईए. नेमरे, पूर्ववर्तीनो लोप- परवानी रोप- --उद्विग्न उविग-उविग्गो। य-कायम् क्व-पन्न । द्विगुण विउणो। माल्यम् मल-मल्ल । द्वितीय वीओ। व-द्विनाति दुआई। ल-चल्मपम् कमस-कम्मस । द्विप दिओ। शुल्वम् सुव-सुव्व । र-सर्वम् सव-सव्व । पूर्ववर्ती अने परवतीनो वारा फरती लोप- न-उद्विग्न -उविग-उन्विग्गो । दद्वारम्वार । ग-उद्विग्न-उत्रिण-उलिण्णो 1 व-द्वारम् दार- आ वधा उदाहरणोमा त्रीजो, बोथो अने पाचमो, ए त्रणमाथी कोइ एक नियम द्वारा रोपनो सभव छ । 'जूपा. प्र. पृ. १० (नि. १०) २ जू. पा. प्र..."-१३ (0 . 2 -१५) hr .
'लोप'
१. 'द्रवाळा संस्कृत शब्दना ''नारनो लोप
प्राकृतमा विकल्पे याय के
चन्द्रः चन्द्रो, चंदो । द्रव.'देवो, दवो । द्रहः द्रहो,
दहो । द्रुम. द्रुमो, दुमो । भद्रम् भद्रं, भदं ।
रुद्रः रुद्रो, रुहो । समुद्रः समुद्रो, समुहो ।
'अंत्यव्यंजन' नो 'अ'
७. केटलाक संस्कृत शब्दोना छेवटना व्यंजननो 'अ' थाय -
शरत् सरओ । भिषा' भिसभो । इत्यादि.
कादि' नोय
अवर्णधी पर आवेला, एक न पदमा रहेला, असंयुक्त अने
अवर्णान्त क, ग, च, ज, त, ट, ब, य अने व-एटला
व्यंननोनो प्राकृतमा सामान्य रीते 'य' थाय छे. उदाहरणो
८.
आ प्रमाणे छे.
के-तीर्थकर. तित्ययरो । शकटम् सयट ।
ग-नगरम् नयरं । मृगाङ्कः मयंको।
च-कधग्रहः कयाहो । काचमणिः कायमणी ।
जे-अनापतिः पयावई । रजतम् स्ययं ।
१ आ नियम एक 'यन्द्र शन्दने रागतो नयोः चन्द्रम् पन्द्र।
२ ज. पा.प्र.पू. १२ (नि. १५)
३ मिनभिसको (लोकोप)
४ भूओ पा.प्र.पृ. ५६-(पन्य)
५० १०.१०५७-(अन्य)
त-पातालम् पायालं | रसातलम् रसायल ।
द-गदा गया । मदनः मयणो।
ये-
-नयनम् नयणं । दयालु दयाल ।
वं-लावण्यम लायणं।
खादिनो ह'
स्वरथी पर आवेला, एक न पदमा रहेला अने असंयुक्त
ख, घ, थ, ध, अने भ-एटला व्यंजनोनो प्राकृतमा 'ह'
थाय छे. नेमके.
ख-मुखम् मुहं । मेखला मेहला । लिखति लिहइ। शाखा साहा
घं-जयनम् नहण । माघः माहो । मेघ मेहो । श्लाघने लाहइ ।
4-कथयति कहइ । आवसथ आवसहो । नाथ. नाही ।
मिथुनम् मिहुणं ।
धैं-इन्द्रधनुः इन्दहणू । वपिर. बहिरो । बाधते बाहह । व्याध.
वाहो । साधुः साह ।
भ-स्तनभरः यणहरो । नभस् नह । सभा सहा
सहावो । शोभते सोहइ ।
स्वभाव:
१ आ विधान ('य' नो पण 'य' परवानु विधान) बाजा
नियमनो बाध रे छे.
२ क्याय कोई एकाद शब्दमा इकारथी पर भावेला 'वनो
पण 'य' यई जाय छ:--पिरति पियद्द ।
३ जू० पा०प्र० पृ. ५६ (घ-ह)
Y
"
"
" ६२ (भन्द)
"
२० [प्राकृतमा स, प, ध जने भनो हि धवानु जगाव्यु छे तो पण शौरसेनी, चूलिकांपैशाची अने अपभ्रशमा तेम यतुं नथी.] स० प्रा० वह (१) शौरसेनीमा विक्ल्पे अने अपभ्रशमा याय क्याय शल म यस्थित स्थानो' थाय छे. शो०-० कथम् ध, कहं। स्थयति रहेइ कटि, कोइ कहेइ रथितम् रहि धिद, रहिम । नाहो - नाधा नाही -राजपथ रायपहो, राजपधो राजपहो । -ख, ध-य, भ-फ' (२) चूलियापैशाचीमा घ' नो 'ख', 'ध' नो '4' अने 'भ' नोकापाय नाथ म० प्रा. नृ० पै. सम्मो। मेवो। चम्यो । मथुर। धर्म घमो मेर मेहो वयो मधुरम् महर वापर व.नो पावो। भूली। १ करया कारणाने मवे गदनी नादिमा या नियम लागतो नधी
२१
रफो।
११० ५००
रहतो
रम्भा रभा रंफा।
भगवती भगवई फकवती
(३) रेटलाक्ने मते नलिकांपैशानीमा सानो छ' भाय ने
हार्मर झज्झरो
निर निझरो
इच्छरो।
निच्छरो।
१०. स्वाधी पर आवेला, एक ज पदमा रहेला भने असयुक्त
iz नो प्राकृतमा इ पाय
ट-घट पडो । घग्ने घडइ । नट नडो । भट भदो।
(१) पेशाचीमा 'टु' नो 'तु' पण धाय छे.
स० प्रा. पैशाची
कुटुम्बाम् कुना कुतुवक, कुटुक्क ।
पटुकम्
स्तुम, कटु
पतु।
१. स्वरथी पर आवेला, एक्पदस्थित अने असयुक्त ?
नो प्राकृतमा टु थायले
१ पारीमा जो श्याय भयुक्त 'ट' नो पण '' यायले.
| निघण्ट्र निघण्टु ] पाम.. "
..(2)
२२ 8-कमंठः कमदो । कुठारः कुढारो। पठति पदइ । मटः महो। शठः सदो। - ई-ल. १२. स्वरथी पर आवेला, एकपदस्थित अने असंयुक्त र नो'ल' थाय छे -क्रीडति कीलइ । गरुडः गरुलो । तडागम् तलायं । वडवामुखम् वलयामुहं। (१) चलिकांपैशाचीमा 'ड'नोट'शाय छे एम केटलाक वैयाकरणो माने छः सं० प्रा. पे० डमरुकः डमरुओ तडागम् तलायं प्रतिमा पडिमा मण्डलम् मडल टमरुको। तटाकं । पटिमा। मटलं । (२) केटाकने मते चूलिकापशाचीमा 'नोट' थाय : ०१० सं. प्रा० नू०१० प्रा० गाढम् गाई काठं। दका ठका। दंदा दादा दाठा पद, संदो सगे। १. पालीभाषामा प्रायः सर्वत्र है नो ळ याय :-('ज. ११. प्र. पृ. ४३ (इळ)
२३
'ण-न
(३) पेशाचीमा ण'
नोथाय छे
प्रा. पै.
गण गणो
गुण गुणो
गुनो।
गनो।
भण
१३ स्वरपरवर्ती, एक्पदस्थित अने असयुक्त न' मोग'
थाय के
कनकम् कणय । नयनम् नयणं । मदन मयणो । मानते
माणद । वचनम् ययण ! वदनम् वयण ।
न-ण
१४. सस्कृतमा शब्दनी आदिमा रहेला असयुक्त । न नो
विकरण थाय छे
नदी गई, नई । नर गरो, नरो । नयति गेइ, नेइ।
T
१५. स्वरपरवर्ती, असयुक्त भने एकपदस्थित 'नो
माकृतमा छ थाय छे
उपमा उपमा । उपसर्ग उवप्तमो । गोपति गोवई ।
प्रदीप पईयो । महिपाल महिवालो।
1 जूओ. पा. प्र. पृ. ५८ (णन)
२ न. पा. प्र.१.११ (न)
३
.
१६. अवर्णथी पर आवेला, असंयुक्त अने एक्पदस्थित प' नो प्राकृतमा छ ज थाय रे कलाप कलावो । कपालम् क्वाल । कपिलम् कविल। काश्यप कासवो। कुणपम् कुणव। तपति तथइ । पापम् पाव । शपथ तवहो । शाप सावो । प-ब (१) अपभ्रशमा तो प' ने स्थाने 'ब' पण बोलाय छे प्रा. अ० शपथ सवहो सबधु, सवधु। . १७. म्वरथी पर आवेला, असयुक्त अने एकपदस्थित 'फ' नो प्रयोगानुसार 'भ' अने 'ह' थाय छे फ-भ-रेफ रेभो । शिक्षा सिभा। फ-ह-मुक्काफ्लम् मुताहल । फ-भ, ह-गुफति गुभइ, गुहइ । शफरी समरा, सहरी । सफलम् सभल, सहल। शेफालिका सेभालिआ सेहालिआ। - फ-भ (१) अपभ्रशमा पण फ' नो 'भ' थाय छे स० प्रा. अ० मफलम् मभल } सभल महल. १ आ नियम पनग्मा नियमनो जमवाटगे (१) केटलाक वैयाकरणोने मते चूलिकापशापीमा म ने स्थाने प' पाय : सं० चुपै. बालो नन्धवो प्रा. याला पालओ। पन्धवो । १८ स्वरपरक्ती, एक पटस्थित अने अमयुक्त बनो' पाय छे अलावू अला५ । शनलम् सवल । (२) अपभ्रशमा म ने बदले '' पण बोलायचे प्रा. कमल। तिमा कमलम् कमल तथा तह सहा, तिवें, भ्रमर भमरो, भसलो, भरु, यथा जह जहा निर्व, भमरा जिम। १ जू. पा. प्र. पृ. ६२ (पम्प) २ " अलग अलाए। , " - " " २६ १२, संस्कृत शब्दती आदिमा आवेला यांनी प्राकृतमा जथाय छे.' यमः नमो। यशः जसो । याति जाइ । य-य (१) मागीमा 'क' को 'ज' न यता 'य' ज रहे छः सं० प्रा. मा. ग्राति जाई यथास्वरूपम् जहासरूवं यधाशलूवं । यानपात्रम् जागवतं याणवतं । यादि। प्रा. (१) मागधीमा 'र' नो 'ल' थाय छे; अने पैशाचीमा तो ए विकसे थाय छः सं० मा० पै. करः करो कलो करो कलो। नरः नरो नलो नरो नलो। .विचारः विआरो विआलो विनालो विचारो। कमळ। . (१) पैशाचीमा 'ल' नो ,' थाय छः कमलम् कुलम् कुळं । १ गवयः मवजो भवयो पालीप्रपृ. ६२. २ आ नियम केटलेक ठेकाणे तो रागतो पण नयीः यथास्यातम् असराय। यपाजातम् अहाजाय 1पृ. १०मा जगालो बीजो नियम क्याय शदनी आदिमा पण टाो छ एथी अहीं 'यथारयात अने 'यथाजाव'नो आदिनो 'य"लोपाएलो छे. ३ जूओ पा. प्र. पृ. ४३ (८) जलम् शीलम् सलिलम् सील सलिल जळा साल। सकिळ 'श-स प-स २०. सस्कृतमा वपराता 'श' अने 'प' नो प्राकृतमा 'स' पाय छे श-कुश कुस। । दश दप्त । नृशस निससो। विशति विसइ। वश वसो । शब्द सहो । श्यामा सामा। शुद्धम् सुद्ध | शोभते सोहह। 4-कपाय कप्तायो । घोपति घोसह । निक्प निहसो । पण्ड सहो। श, प-विशेष विसेसो। शेप सेसो । (१) मागीमा तो स नो 'शर थाय छे अने पैशाचीमा तो प्राकृतनी प्रमाणे स. प्रा० मा. पुलिशे। पुरुष सारस पुरिसो सारसो शालशे। शुद। शोभण। शोभनम् हस सोहण हसो हशे। १० पा३. पृ. ६ (शस, प-स)
२८
२१. साकृतमा अनुस्वारथी पर आवेला ह'नो प्राकृतमा विकल्प
'घ' थाय के
सहार-सघारो, सहारो। सिंह -सिंघो, सीहो।
१ एवो पण एकाद प्रयाग मळे , च्या स्वरथी पर आपला ''
नो पण 'ध' याय र दाह -दापो, दाो।
प्रकरण
संयुक्त व्यजनोना सामान्य फेरफारो
२२. सम्कृतना 'क्ष' नो विशेपे करीने प्राकृतमा 'ख' थाय छे अने
क्याय नयाय तो प्रयोगानुसारे 'क्ष'नो 'छ' अने 'म' पण थाय
तथा पदमध्यस्थित 'क्ष' नो 'ख' छ' अने 'जसथाय छे
'क्षस क्ष-3'क्ष-श
क्षय खओ। क्षीणम् खीण । क्षीरम् खीर । श्वेटय खेडओ।
स्वोटक खोडओ।
'छणो, खिणो] । क्षतम् छय । "क्षमा छमा (खमा] ।
क्षार छारो। क्षीणम् छीण । क्षीरम् धीर । क्षुण्ण छुण्णो । सुतम्
छीभ । सुध् छुहा । रुर छुरो । क्षेत्रम् छेत्त ।
क्षीयते शिज्जइ । क्षीणम् झीणं ।
क्षण
१ जू० पा. प्र. पृ. १७ (अ-ख, श) क्ष-श-टिपण
२ पालीभाषामा '' ना 'च' पण थाय छ -(. पा.प्र.
पृ० १०-च)
३ 'क्षण' शन्दना 'उत्सव' अर्थ होय त्यारे तेनु का 'छण याय
अने समय अयं होय तो 'सण' रूप थाय छे ज. पा.म.पृ १७.
(क्षम्, क्षण खणो छणो)
पक्षमा' शन्दनो 'पृथिवी' अर्थ होय त्यारे तेनु 'छमा' रूप
पाय छ भने खमबु-क्षमाकरवी-अर्थमा तो 'ग्यमा' म्प जवपराय छे,
-
'क्ष-क्ख, क्षछ, क्ष-श
इक्षुः इक्ख । ऋक्षः रिक्खो। ऋक्षम् रिक्खं । मक्षिका मक्खिआ।
लक्षणम् लक्खणं । प्रक्षीणम् पक्वाण.। प्रक्षेपः पक्सेवो । सादृश्यम्
सारिक्वं।
अति अछि । इक्षुः उच्छ् । उक्षा उच्छा । ऋक्षः रिच्छो ।
ऋक्षम् रिच्छं । कक्षः कच्छो । कक्षा कच्छा। कुक्षिः कुच्छी ।
कोक्षेयकम् कुच्छेश्य । दक्षः दच्छो । प्रक्षीणम् पच्छीणं । मक्षिका
मच्छिा । लक्ष्मीः लच्छी। वक्षः वच्छं। वृक्षः वच्छो ।.सदृक्षः
सरिच्छो । सादृश्यम् सारिच्छं।
प्रतीणम् पझीणं ।
क्ष-xक
(१) मागधीमा तोक्ष' नोक थाय छः
नक्खो
राक्षसः रक्खसो
लाकशे।
२३. संस्कृतना वस्तुवाचक शब्दना 'क' अने 'एक' नो प्राकृतमा
"ख' थाय छे तथा पदमध्यस्थित क अने 'स्क' नो क्ख'
यक्षः
य:के।
थाय छः
'क-ख, क्ख स्क-ख, क्ख
निष्कम् निस्सं! पुष्करम् पोश्वरं । पुष्करिणी पोक्खरिणी।
अवस्कन्दः अवक्खंदो। स्कन्द. खंदो। स्कन्धो संधो।
स्कन्वाधारः संधावा।।
१ जू० पा०प्र० १० १७-(क्ष-ख, १-छ, क्ष-ज्मा-टिप्पण)
२ नमः अच्छो, इको । वासः धको । लाक्षा राखा । पा.
प्र.१० १८
३१. पा. घपृ. ३६-३७ (१ कप, रक-स्व, स्कन्चन्य)
सयुक्त प, सम्स' निस्फलं। पम्खलदि। (१) मागधीमा संयुक्त प' के 'स' ने स्थाने 'स' थाय छे.. उप्मा उम्हा उम्मा। कष्टम् क्व धनुप्खण्डम् वणुकवड धनुस्वंडं। निष्फलम् निष्फलं विष्णु. विण्ह विस्नु । शप्पम् सप्फ सम्प। शुष्कम् सुस्कं। प्रसवलति पक्खलइ बृहस्पति बुहष्फई बुहम्पटी। मम्फरी मस्वरी विस्मय विम्हयो हम्ती हत्यी २४ संस्कृत शब्दना त्य' नो प्राकृतमा 'च' थाय छे अने पदमव्य- थित 'त्य नोच थाय है। त्य-च' त्याग चाओ। त्यागी चाई । त्यति चयइ । त्यच प्रत्ययः पञ्चओ। प्रत्यूष पच्चूसो। सत्यम् सच्च । १ जूओ.पा.प्र.पृ. नि०६८. २ एक 'ग्राम' शदने आ नियम नथी लागतो ३ आ नियम 'चैत्य' शब्दने लागतो नथी चैत्यम चहत्त, पेइब-(पे-अह भने अन्त स्वरवृद्धि.) । जू० पा० प्र० १० २०-(त्य=च, त्यञ्च) मम्बरी। विस्मये । हस्ती। ।
३२
२५. प्रयोगानुसारे क्याय 'स्व' नो 'च, नो 'छ,' 'द' नो
न' अनेच नोझ थाय छे तथा पदमध्यस्थित त्वि' नोच,
iva नो,'नो 'ज' अने 'नो 'म' थाय छे.
कृत्वा किचा। चत्वरम् चचर। ज्ञात्वा पञ्चा। दत्त्वा दया।
भुक्त्वा भोचा। श्रुत्वा सोचा।
ध्व-च्छ
श्वनः मओ।
पृथ्वी पिच्छी।
विद्वान् विजं । बुना बुज्मा । सा-वसम् सन्मस ।
२६. सस्कृतमा ह्रस्व म्वरथी पर आवेला थिय', 'श्व', 'स' अने
'स' नो प्राकृतमा 'छ' थाय' .
श्य-पच्यम् पच्छ । पथ्या पच्छा । मिथ्या मिच्छा।
मामयम् सामध्य-सामच्छ ।
'श्च-आश्चर्यम् अच्छेर । पश्चात् पच्छा । पश्चिमम् पच्छिम ।
वृश्चिक: विछिओ।
• नृ. पा. प्र. पृ० ३८ (टिप्पण-चत्वरम् चघर)
२ चज धजो-(पा० प्र० पृ. ३२-नि० ३८)
३ जू० प. प्र. पृ० २१ (छ) पृ. ३८-( श्रमच्य)
पृ. २९-(स] पृ० ३८-(प्स-3)
। एक मात्र 'निश्चल शन्दने नियम रागतो नीः
निभल निचलो, पाली-निचगे
रस-उत्सव उच्छनो। उत्साह उच्छाहो। उत्सुक उच्छुओ। चिकित्सति चिच्छइ । मत्सर मच्छरो। सवत्सर सवच्छरो। प्स-अप्सरा अच्छरा | जुगुप्सति जुगुच्छइ । लिप्सति लिच्छइ । उचलाद। (१) प्राकृतमा '' नोच्छ थाय छे त्यारे मागधीमा तो एषी उलटु थाय छे एटलेच्छ' नो 'श्च' थाय छे उच्छलति गच्छ गच्छ गधा तिर्यक् तिरिच्छि रिच्छिल पिच्छिलो गच्छति पुच्छह वत्सल बच्छरो तिरिश्थि। रिचिले। पुश्चदि। वश्चले। २७ पदनी आदिमा रहेला द्य', 'प्य' अने 4' नो 'ज' थाय छे तथा पदमध्यस्थित 'य' ग्य' अने 'Z' नो 'ज' थाय के ध-द्युति -जुई । द्योत -जोओ। घ-भवद्यम् अवज 1 मघम् मज्ज । वैद्य वेजो ग्य-जय्य नजो । शय्या सेज्जा । र्य-कार्यम् यज । पर्याप्तम् पजत्त । पर्याग पञ्जाओ। भार्या भज्जा । मर्यादा मज्जाया । वर्यम् वज । १ जू० पा० प्र० पृ. १८ (य-ज, य-ब) पालीमा टल्क काणे 'य' को 'ग्य पण थाय छे-पृ० १९-( द्य-व्य, टिप्पण ) २ पालीमा ले 'र्य नो यर प्य के रिय थाय छे-तिक पा. म. पृ. १५-१५) ३५ छे (१) शौरसेनीमा 'यं नो विक्रुपे प्य' पाय आर्यपुत्र अजउत्तो अय्यरत्तो, अजउत्तो। कार्यम् बजे कय्य, कजा पर्यावल पज्जाउरो इय्याकुरो, पन्नाकुलो । सूर्य मुजो सुय्यो, सुनो। द्य-ग्य (१) मागीमा 'ध' नो प्य' थाय छे अय्य 1 मद्यम् मज्ज मय्या विद्याधर विजाहरो विय्याहले। अद्य अज 'ध्य, ह्य-झ २८. पदादिभूत व्य' अने ह्य' नो 'म' थाय छे अने परमध्यस्थित व्य' तथा 'ह्य' नो 'झ' थाय छे ध्य-ध्यानम् आण । ध्यायति झायइ । उपाध्याय उवज्मायो । वध्यते नज्मइ । विन्ध्य विझो। साध्यम् सज्झ । स्वाध्याय समाओ। -गुह्यम् गुज्म । नयति नज्मइ । मह्यम् मन्न । सह्य सझो। । १ जूओ टिपण २ जु पृ. ३३ । २ जूओ टिप्पण 'लु पृ. ३३ । ३ जू. पा. प्र. पृ. १.-(पश, स्य-स) ४ अनुस्वारथी अने गुरु के दीधघरधी पर आवेग कोर पण न्यजनना स्थानमा अहीं जगावेला दिसत(र, सयमेरे) विधानो पानी भाटे ज विभ्य 'नु 'विमो' नहि पण 'विशो' पयु सभा पा.प्र.१.१.रि. सध्या समा। ५ पालोमा में नो र पार के-(... २२-7-5) , ते-ट २९ संस्कृतनात' नो प्राकृतमा सामान्य रीते "थाय छे कैवर्त केवट्टो। नर्त जट्टो । नती नहई। प्रवर्तते पयट्टा । राजवर्तकम् रायवट्टय। वर्ती वट्टो । वर्तुलम् वठ्ठल । वार्ता वट्टा । सवतितम् सवट्टि। (१) शौरसेनीमा क्याय क्याय त' नो न्द' थाय छे अन्त पुरम् अन्तेउर अन्देउर। निश्चिन्त निञ्चितो निञ्चिदो। महान् महतो महदो। १२९मो नियम नीचे जणावेला शब्दोमा लागतो नथी अर्थात् नीना शब्दोमा'त नो 'दृ' यतो नयी आवतक आपत्तओ। प्रवर्तक स्वत्तओ। आवर्तनम् आवत्तण । प्रवर्तनम् पयत्तण । उकर्तितम् उक्कत्ति। मुहूर्त मुहुत्तो। कतरी कत्तरी। मूर्त मुत्तो। कार्तिक कत्तिओ। मृति मुचा। कीति किती। वर्तिका वनिआ। चातिकम् वत्ति। निवर्तक नवताओ। सवतक सपत्तओ। सघर्तनम् सवत्तण । नववक निवाओ! (ओ पृ. १५ नि. ५, सयुक्त 'शाद लाप) २ जू. पा. प्र. पृ. ५८ (त-ट) धूत धुत्तो। निरन्नम् निवत्तण।
'म्न, ज्ञ-ण शवम् । अमली। ३० सस्कृतना 'न' अने 'ज्ञ' नो प्राकृतमा 'ण' थाय छे अने पदमध्यस्थित । म्न अने ज्ञ' नो पण ' थाय छे म्न-निम्नम् निण्ण। प्रद्युम्नः पज्जुण्णो। ज्ञ-प्रज्ञा पण्णा । विज्ञानम् विण्णाण । आज्ञा अग्णा'। ज्ञानम् णाण । सज्ञा सणा। ज्ञ, ञ, ण्य, न्य--अ (१) प्राकृतमा 'ज्ञ' नो '' याय छे त्यारे मागधीमा 'ज्ञ नो 'ञ' थाय हे अने ज, 'य' अने 'न्य नो पण 'ब' थाय छे -अवज्ञा अवण्णा अवन्जा। प्रज्ञा पण्णा पन्ना। सर्वज्ञ सवण्णू -अजलि अन्जली धनन्जय धणजयो चणभ्याए। प्राजल पनलो ---अब्रह्मण्यम् अबम्हण्ण अत्रम्हज्ञ। पुण्यम् पुण्ण पुन्न। पुण्यवान् पुण्णवतो पुजवते । न्य--अभिमन्यु अहिम अहिम। कन्या उन्नया कन्या सामान्यम् शामन्त्र। १० पा. प्र...८ (म्नन्न) पिण 1. पा.प्र.पृ. २८ (ग)पग २-३ ३४ रिपम 'ओ पा०प्र० प्र० २३-२८ ( शल, पल, न्य-ल) पञले । सामन ३७ रे । ३१ सस्कृतना 'स्त'नो प्राकृतमा '' थाय छे अने पदमध्यस्थित 'स्त' नो यथाय छे म्तव थवो । स्तम्भ थभो । स्तब्ध पद्धो [उद्धो] स्तुति थुई । स्तोकम् थोअ । स्तोत्रम् थोच । स्त्यानम् णि । अस्ति अस्थि । पर्यस्त पलत्यो । प्रशस्त पसत्यो । प्रस्तर पत्थरो । स्वस्ति सत्थि । हस्त हत्यो । र्थ, स्थ-स्त (१) '' अने 'स्थ नो मागधीमा 'स्त' थाय छे अर्थपति अथवई अस्तवदी। सार्थवाह सत्यवाहो उपस्थित उवडिओ उवस्तिदे। सुम्थित मुम्तिदे। ट- ३२ सस्कृतना 'ट' नो प्राकृतमा 'ठ' थाय छे अने पदमध्यस्थित शस्तवाहे। सुडिओ नो 'टु' थाय छे. १. पा. प्र. पृ. २७-(स्त=य, स्त-त्य) २ 'समस्त' अने 'स्तम्म' शब्दना 'स्त' नो 'य' यतो नथी समस्तम् समत्त । साम्न तम्यो। ३ . पा. प्र.2. २६ () ४ इष्टा, उप अने सदर शब्दना को 'ड' थतो नयी इस इसा । उ उद्दो । सदष्टम् सदट्ट । जूझो पा०प्र० पृ. २६ टिप्पण।
अनिष्टम् अणि? । इष्ट इष्टो । कष्टम् कट्ठे । काष्टम् क । दष्टः दट्ठो । दृष्टिः दिली । पुष्ट. पुढो । मुष्टि. मुट्ठी। यष्टिः लट्ठी । सुराष्ट्रा- सुरहा । सृष्टि. सिट्टी। है,8--स्ट (१)'' अने 8 नो मागधीमा 'स्ट' थाय छे. इ-पट्ट पट्टो पस्टे। भट्टारिका भहारिया भस्टालिका भाटिनी भाहणी भस्टिणी। 8--कोठागारम् कोठागार कोस्टागालं । शुस्टु। ए-सट (१) पैशाचीमा '' ना स्थाने 'सट' बोलाय छे. कष्टम् कसट। दृष्टम् दिसट। 'इम, कम- ३३ सस्कृतना ड्म' अने 'म'नो' प्राकृतमा पयाय छे अने पदम. व्यस्थित 'इम' अने 'बम' नो 'प' याय छे. "कुड्मलम् कुपल। रुक्मिणी रुप्पिणी। १-२ पागमा तो 'दम' नो 'इम' अन 'म नो 'म' याय - (जू. पा० पू० ८१) ३ कोर एक काणे 'म' नो 'म' पण याय 8-मी -मी, रुप्पी. कमलम् -बहुमन्य (पा... (३ पत्र )
'प्प, स-फ
३४ सस्कृतनाप' अने 'स' नो "फ' थाय छे अने पदमध्यस्थित ।
प्प' तथा 'स' नो 'एफ' याय छे
प्प--निप्पाव निप्फावो । निप्पेप निफेसो । पुप्पम् पुप्फ ।
शप्पम् सप्फ।
स्प-स्पन्दनम् फदण। प्रतिम्पर्धी पडिप्फद्धी ।
वृहस्पति बुहप्फई।
२५ प्राकृतमा 'नो भ' अने पदमध्यस्थित 'ह'नो भ'
विक्से थाय छे
निह्वा निभा नीहा । विठ्ठल विभलो, विहलो ।
'न्म-म्म
३६ सस्कृतना 'म' नो म' थाय छे
जन्म जम्मो । म मथ वम्महो । मन्मन मम्मण ।
प्प पण थाय छे
१७ सस्कृतना 'म' नो म' विकले थाय छे
तिम्मम् तिम्म, तिम्ग । युग्मम् नुम्म, जुम्ग ।
१ जूओ पा. प्र. पृ. ३९ ( स्प-फ, स्प-प्फ, पफ)
२ पदमध्यस्थित 'रस' अन 'ए' नो प्राय
निष्पु सनम् निप्पुसण ।
परस्परम् पराप्पर ।
निपम निप्प।
निस्पृह निप्निहो।
जू. पाली प्र. पृ०३९
३ जूओ पा०प्र० पृ. ३५-(ग रम्भर ) टिप्पण तथा
.६४-हभ)
। जूओ पा.प्र.पृ० ४५-( मम्म)
५ पालीमा प्राय ग्म' को 'गुम' थाय छे -(जू० पा० प्र० पृ०४९)
बृहस्पति बुहप्पई।
'म, म, स्म, ह्य, हर-ह
३८ संस्कृतमा प्रयोनाता इम', 'म', 'स', 'म' अने पक्ष्मना
मानो प्राकृतमा म्ह पाय :
इस----कश्मीराः कम्हारा । कुश्मानः कुम्हाणो।
म-उमा उम्हा । ग्रीष्म. गिम्हो ।
स्म-अस्मादृशः अम्हारियो । विस्मय. विम्हओ ।
झ---असा वन्हा । बामणः रम्हणो । ब्रमचर्यम् लम्होर
मुलाः सुम्हा।
क्षम-~-१क्ष्मलम् पम्हलं । पक्ष्माणि परहाइ ।
(1) अपभ्रंशमा स्म' ना स्थान म' पण बोलाय छे.
गिम्हो।
सिम्हो ।
,
-प्लेमा
सिम्भो,
'इन, ण, स्न, हा हू, क्ष्ण, क्ष्म-ह
३९ संस्कृतमा प्रयोनाता 'इन', 'न', 'ह', 'ह', 'ण' अने
सूक्ष्मना मनो राह' थाय के
स-प्रश्नः पाहो । शिश्न सिहो ।
ण-उगीषम् उल्हास । कृष्ण. कण्हो । निष्णु. निगह
विष्णुः विण्ह
म्न-ज्योत्स्ना जोहा । प्रस्तुत पहुओ। स्नात: हाओ।
जाह। बहिनः वही।
१जओ पा. प्र.१.५५-( सम्म, म, स्म)
२ आनियम केटलेक कामे रागतो नी:-मि: एसी।
समरः मये--ो पालीम.. ५०-(म)
३ जूभो पा.. पृ. ४६ (नियम-६३) तथापन
-ह. पृ. ४८ र तीमा तिस्निो, तिमी, दि...
टिप्पन पूर्वाह. पुनो।
अपराहः अवर हो । पूर्वाह. अहो । ६- तांदणम् लिहं। लक्षणम् साह । म- सूक्ष्मम् स रन--सिन (१) प्राकृतमा स्न' नो एह थाय छे त्यारे पंशाचीमा तो क्यांय क्याय स्त' ने बदले सिन' वोलाय , स्नातम् व्हाय स्तुप सुहा, हुसा सिनुसा सनुसा । सिनाता ४. संस्कृतना हल'नो प्राकृतमा 'ल्ह' पाय छः पहलारम् क्ल्हार । प्रहलाद पल्हाओ ज्ञ-ज ४। संस्कृतना ज्ञानो प्राकृतमा म विश्लप धाय छे अने पदम- ध्यस्थित 'स' नो 'ज' यायचे अभिन अहिजो, अहिण । आज्ञा अजा, आणा । आत्मत. अप्पजो, अप्पण्णू । इशितज्ञ इगि भने, शिजणू । देवज्ञ देवता, देवष्णू । प्रज्ञा पजा, पण्णा । प्राज्ञ पजो, पण। मनोजर मणोज, मगुण । सर्वज्ञ सम्बजो, सव्यष्णू । सज्ञा संना, सणा। ४२ ही व्यंनननो प्राकृतमा रिह' थाय छे अर्हति अरिहह । अर्ह अरिहो । गर्दा गरिहा। वह परिहो। १ जूओ प्रा०प्र० पृ. ४६ (नि० ६३) स्नानम् विनान । स्नुपा मुणिमा, सुरहा, (हुम) २पारीमा 'इल'को 'हिल' धाय के घद हिरादो-६० A ३१. पारी.पृ. २४ टिपण-प्रज्ञानम् पजान । ४ ओ . प्र. १० ११ ( नियम १३ )
शप-रिस
४३ संस्कृनना 'श' अने ६ नो प्राकृतमा रिस विधाय
श-आदर्श: आयरिसो, आयमो । दर्शनम् दरिसणं, दसणं ।
सुदर्शन. सुदरिसको, सुदंसगो।
4-वर्षग वरिसं, वासं । वर्षशनम् वरिसतयं, वासस्य ।
वर्या वरिसा, धामा।
ल-इल
४४ संस्कृतना संयुक्त 'ल' नो इल' पाय छः
अम्लम् अविलं । लाम्यति किरम्मइ । लाम्यत् विलंत ।
क्लिएम् विलिटुं । विलनम् किलिन्न । कटेश. किलेसो । महायति
गिलाइ । टानम् गिलाणं । एम् पिलुटुं । पोप पिरोसो ।
म्लायनि मिलाइ । म्लानम् मिलाणं । लेप सिलेसो। श्लेष्मा सिलि-
म्हा । लोक. सिरोओ। श्लिष्टम् सिलिट्ट । शुनलम् मुलं ।
-रिभ
४५ सम्मतना' व्यंजननो प्राकृतमा रिना थाय ले
आचार्य: आयरिओ । गाम्भीर्यम् गंभीरि गाभार्यम् गहीरिया
चौर्यम् चोरिभ । धैर्यम् धोरिमं । ब्रह्मचर्यम् बम्हनारि । भार्या
भारिभा । वयम् वरिभ । वीर्यम् वीरिमं । स्थर्यम् थेग्मिं । मर्थः
सुरिभो । सौन्दर्यम् मुदरिभ । शीर्यम् सोरिभ ।
" टिपण-अय. अरिसो।
आपम् आसि।
३१ (नि. ३७)
३ आनियम क्याय क्याय गगतो पण नभी.-लम. कमो।
श्व पगे।
‘गो पृ. ३३-२७ मा नियम उबरनं टिपण
जू. पा.
२
र्य-रिष
(१) प्राकृतनी पेठे पैशाचीमा पण क्यांय क्याय ने बदले
रिय' बोलाय ः
भार्या भन्जी भारिया,
-
-
सह्यः
राजमो।
४६ 'ह्य ' नो यह ' प्राकृतमा विकल्ले थाय छे:
गुह्यम्। गुरह, गुज्छ।
सहो,
'वी-उवी
४७ स्त्रीलिङ्गि पदने अंते वर्तता संयुक्त 'वी'नो प्राकृतमा । उवी'
थाय छः
गुर्वा गुरुखी । तन्वी तणुवी । पृथ्वी पुहुवी । बही बहुवी ।
मृदी मउवी ।
१ जूओ पृ. ३८- मुं टिपण।
२ जभो नि. २८-पृ. ३४
३ पटुः पदनी (पालि प्र. ० २६२ स्त्रीपयर).
प्रकरण ५ , उपर रटले प्रकरण २-३-४मा आपेला नियमो सामान्य नियमो कई राय के एटले ज्या कोई बीमो खास नियम न लागतो होय त्या पज नियमो लागू थाय छे आ नीने ने नियमो आपामा आवे छे ते विशेष नियमो छ एटले ज्या आ नियमोनी प्राठि यतो होय या सामान्य नियमो न लगाडता प्रथम आ न नियमो लगावताना छे. स्वरना विशेष शिकारो ४८ 'अ' विकार 'अ-आ- नीचे जगावेला शब्दोमा आदिना ' अ 'नो विश्लप आ' थाय छे अभियाति आहिआई, अहिआई प्रतिस्पर्धी पाडिफदी, पार्डिफदी। अपर्श आफसो, अफहो। प्राननम् पावयण, पापण ! चतुरन्तम् चाउरत, चउरत । प्ररोह पारोहो, परोहों। दक्षिण दाहिणो, दविखणो । प्रवासी पावाम्, पाम् । परसीयन् पारकर, परवेर। प्रसिद्धि पासिद्धी, पसिद्धी । परसीयम् पारक, परक। प्रसुप्त पामुत्तो, पमुखो। इन एगा, पुण। मनन्यो माणमी, मणमी। प्रकट पायड, पगा। मनमिनी माणसिनी, मणमिणी । प्रतिगत् पाडिया, पडिवभा। समृद्धि सामिद्धी, समिनी । प्रतिसिद्धि पाडिसिद्धी परिसिद्धी सक्ष साच्छिो, सरिच्छो इत्यादि । १ली. 7. ५२-( अन्ना) - नीचे नणावला शब्दोमा चिनिन 'अ' नो 'इ' थाय छे-ते क्याय नित्ये थाय छे भने क्याय विकलले थाय छे ईपत् इति । उत्तम उत्तिमो । कतम कइगो । कृपण फिविणो। दत्तम् दिण्ण । मरिनम् मिरिअ मध्यम मज्झिमो । मृदङ्ग मुइगो। येतस वेडिसो । व्यननम् विभण । व्यलीयम् विलीअारवान सिविणो। वैकल्पिा उदाहरणो 1 अङ्गार गारो, अगारो । ललाटम् पिडाल, डाल। पक्वम् पिक, पक। सप्तपर्ण छतिपण्णो, उत्तवष्णो । (ग) अ-ई- नीचे आपेला शन्दना आद्य 'अ' नो विकल्पे ई थाय छे हीरो, हरो। (घ) 'अ-3- नीचे सूचवेला शब्दोमां चिह्नित 'अ' नो 'उ' पाय ठे-ते क्याय नित्य पाय छे अने क्याय विकल्पे थाय छे अभिज्ञ अहिण्णू । गवय आगमन आगमण्ण। कृतज्ञ कयण्णू । ध्वनि मुणी। विज्ञ विण्णू । विषक् सर्वज्ञ सवण्णू। १ पाली प्र. पृ. ५२ (अ) २ पाली म. पृ. ५२-(-3) ३ पीजा पण प्रयोगानुसारी सक्दो 'आदि' शब्दयी समजवाना , गउओ । गवया गउआ वीसु 'इत्यादि।
सडिओ वैकल्पिक उदाहरणो खण्डित खुडिओ, चण्डम् चुड, प्रथमम् पुदम, पटुम, इदम, चड। परम। स्वपिति सुवइ, सोपह। अत्र अन्त पुरम् नीचे नणारेला शब्दोमा निह्नित 'अ' नो 'ए' थाय उ-ते क्याय नित्ये थाय अने क्याय विकल्पे थाय छे एत्य । चमचर्यम् बम्होर। 'शय्या सेजा। अन्तश्चारी सौन्दर्यम् मुन्दर। गेन्दु । धेकल्पिक उदाहरणो- आश्चर्यम् अच्छेर, अच्छरिभ । पर्यन्तः पेरतो, पञ्चतो । उत्कर उकेरो, उकरो। वाही छी, पाही। अन्तर अतारी । (१) अमो--- नीन नणावला शब्दोमा चिह्नित * नो 'ओ' यार उते याय नित्ये थाय छ भने क्याय तिाले थाय नमम्भार नमोकारो। पमम् पौम्म । परम्परम् परोप्पर । काल उदाहरणो- अपयति ओप्पर, अपर। स्वपिनि सोर, सुई। अर्पितम् आषिस, अपिना १पाली 4.2, २-(32) समास (ग) (1) भइ- 'मय' प्रत्ययात शब्दमा आवेला म नानो विकल्पे ।' पाय छे विसपरभ, विसमा गलमयम् जल मदन, जल्दमय। विषमयम् दुखमयम् दुहमइ, टुहमय। मुम्बमया सहमदन सुहमय। (ज) -भाइ- न पुन -न 'उणाइन उणो । पुन -पुणाइ, पुणो। (स) 'अ' लोप- अरण्यम्-रण, औरण । अलावू-टाऊ, अलाऊ। ४९ 'आ' विकार-- (क) --- नीचे सूनवेला शब्गोमा भने अ ययोमा चिनिन 'आ' नो •' थाय ते न्याय नित्ये अने यार विकलये गाय छे 'आचार्थ आयरिओ। महाराष्ट्र मरहट्टी। पातिक मिओ। मांसम् मस । कांस्यम दम पांशिर वसिओ। पाण्डव पायो। श्यामा सामा। पांसन पसणो। सांयात्रिक सनतिओ। पामु पमू। सांसिद्धिक, ससिद्धिओ 'इत्यादि । १ नहीं 'पुन' गदना आदि 'प नो लोप थएगे छे-ओ पृ. २६ मि पण २ । २ पानी प्र. पृ० ५२ [ पा=] ३ जा पृ. नि. १
वैकल्पिक उदाहरणो-
उत्खातम् उस्वय, उनसाय। पूर्वाण्ड पुनाहो, 'दुवाण्डो।
कालरू क्लो, कालो। बलामा बलया, बलाया।
कुमार मरो पुमारो। ब्रामण वम्हणो, वाम्हणो ।
खादिरम् खबर, खाइर।
स्थापित ठपिओ, ठाविभो ।
चामर चमरो, गमरो। (परिठापित परिविओ, परिठ्ठापिओ।
तालमृतम् तलवेट, तालवेट । सस्थापित सठविभो, साविओ।)
नाराव नराओ, नाराओ। हालिक हलिओ, हारिओ इत्यादि
प्राकृतम् पयय, पायय।
अध्ययो-
अथवा अहव, अहरा । तथा तह, तहाँ ।
यथा नह, नहा । वा २, वा । हा है, हा इत्यादि।
(ख) आ-३
नीचेना शब्गेमा चिह्नित आ नो विपद' थाय
आचार्य आइरिजो आयरिओ।
पूस प्पिसो, कुप्पासो।
निशाकर. निसिअरो, निसारो।
--
खल्वाट खलीडो।
म्त्यानम् टोण (याण)।
आर्द्रम् र । सास्ना सुण्हा । रतावक थुवओ।
१न्न रूपा चार्य इमचद्रने सगा नधी प्रा. व्या.
२ जुआ पृ. ३७ नि. ३१
जहिडिलो। वैकल्पिक- युधिष्ठिर द्विगुण द्वितीय जहुढिलो, दुउणो, दुइभो, विउणो। विभो। मिरा मेरा वैगल्पिक- विशुकम् केसुअ, विसुभ। दुहा। द्विवचनम् दोवयण । वाल्पिक- द्विधा 'दोहा, (च) नि-ओ- वैकल्पिक- निर्झर ओझरो, निमरो ५१ ई-विकार हरीतकी १ पाली प्र० पृ. ५३-(-) २ पाली प्र. पृ. ७३-(यो) ३ साधारण रीते आ पन्ने शन्दो प्रयोग '' धानुनी पूर्व थाय द्विधा क्रियते दुहा किजर, दोहा विजद । द्विधा इतम् दुहा इ(कि), दोहा इ(कि)भ। ४ पाली म. पृ. ५३- ईन) ५ हरीतकी इरीटमी (पाली) - शुतम् छी। (घ) उ-3-- दुर्भग दृहयो, दुहओ। मुसलम् मूसल मुसल। टु-सह दूसहो, दुस्सहो। मुभग सूहवो, महओ। कुतूहनम् कोउहल, कुल ५३ 3-विकार (क) --- दुकूलम दुअल्ल, दुउल । सूक्ष्मम् 'सह, सुव्ह । (ग्व) ऊ=--- नूपुरम् निउर, नूउर। (ग) उ-ई-~- उद्यूतम् उन्धी, उव्यूढ । (घ) ऊ-3--- नीचेना शब्दोमा 'अ' नो 'उ' थाय छे-ते क्याय नित्ये अने क्याय विकल्पे थाय छे *ण्डूयते कडुअइ। 5 भुमया। कण्डूया पंडुया। कण्डूयनम् कडयण। हनूमान् हणुमतो। १ पाली प्र. पृ. ५४ ( उम्भो) २ पाली प्र. पु. ५५ (अ) ससायो भूपुस भ्रपुस । भ्रूटि भ्रानि ३ 'सूक्ष्म ' अथने सूक्यता ' ल ' शब्द उरथी रूपने उरई विशेष सरत गगे छे-("लण सूक्ष्म दभ्र ग तनु' ५१ समरको. तायमण्ड) ४ अहीं 'कण्ड्य' धानुना म्घा रुपो लमजवाना छ, वातूल वाउलो। सण्ड' .
वैकल्पिक- कुतूहलम् कोउहलं, कोउहल। मधूरम् महुआ, मह। (ड) ऊ-ए- नूपुरम् नेउर, मूउरं। (च)-ओ नीना शलोमा 'नो 'ओ' थाय छे-ते क्याय नित्ये अने क्याय विपरले थाय 'परम् कोप्पर । ताम्बूलम् तयोल । कूष्माण्डी कोहण्डी। तूणीरम् तोणीरें। 'गुरी गलोई। - मूल्यम् मोल्ल। स्थूलम् थोर । वैकल्पिक--- तृणम् तोण, तूण । स्थूणा थोणा, यूणा। ५४ मर-रिकार (स) नर-आ- कृशा कासा, किसा। मृदुवम् माउक, मउत्तण । मृदुक्म् माउक, मउ। नाना शलोमा 'ऋ'नो । इ' थाय डे-ते न्याय नित्ये अने क्याय विपरपे पाय छे. उन्टम् उफिट । ऋद्धिः इन्द्री। कपि इसी । १ कर यपरो (पाल) २ गुहवी गोव्या-ग...। (उ-यो) ३ पागप्र. 7. २ (Rt) कृच्छ्म् किच्छं । कृतिः किई! कृत्तिः किची । कृत्या किया। कृपः शिवो । कृपणः किविणो । कृपा किवा । कृपाणम् किवा । कृशः किसो । कृशानुः किसाणू। कृपितः किमि भो । कसरा किसरा । शृष्टिः गिट्टी। मृद्धि गिद्धी । घुसृणम् अमिण । घृणा धिणा । तृप्तम् तिवं ! दृष्टम् दिदै । दृष्टिः दिही । धृति. पिई । मप्तरुः नतिओ । नृप नियो । नृशंस. निससो। पृथक् पिहं । पृथ्वी पिच्छी । वहित. विहिो । भृङ्गः भिंगो । भृङ्गार. भिंगारो । भृगुः मिऊ । मातृ माई (मातृणाम् माईण) मृदङ्गः मिगो । मृष्टम् 'मि । वितृष्णः विइहो । वृश्चिक. विचओ । वृचम् वित्त । वृत्तिः वित्ती । वृद्धकविः विद्कई । वृष्ट. विट्ठो । वृष्टिः विट्टी । वृसी विसी । व्याहृतम् वाहिरं (च) । शृगाल. रिभालो। शृङ्गारः सिंगारो । सकृत् सइ । समृद्धिः समिद्धी । सृष्टम् सिद्धं । सृष्टिः सिट्ठी । गृहा लिहा । हनम् हिम । हृदयम् हिअय । कषिक- धृष्ट: विट्ठो, धटो । पृष्टम् पिटुं, पढ़ । [ पृष्टिः पिट्टी, पट्टी ] बृहस्पति. बिहफई, वहफई । मक्षणम् मसिणं, मसण । 'मातृगृहम् माइहर, माउहर । मातृमण्डलम् माइमंडलं, माउमंडलं । मातृवमा माहामिआ, माउसिआ । मृगाङ्क. मिश्रको । मयको । . १ आ शब्द, रसने सूचो मीठो रस रस सिचार पांजा अर्थमा ए रूप वपगनु नथी, २ आ रून समासमा मह तरिके वराय , उत्तरपद रिके नदी वरगनु' महिपम्-महिर(१) । ३ शारे 'मातृ' शब्द गौण होय त्यारे नेत्री बने धारूनामा तेना' नो 'उ''' थार छे.
मृत्यु मिच्चू, मच्चू । वृद्ध विद्धो, वुड्दो । वृन्तम् विंद, वेंट शृङ्गम् सिंग, सग। (ग) 'ऋ-उ-- नीचेना शब्दोमा 'ऋ'नो 'उ' थाय छे मनु उजू । ऋतु उऊ । पभ उसहो । जामातृक जामाउओ । नप्तक नतुओ। निभृतम् निहुआ । निवृतम निउअ । निर्वृतम् निव्वुअ । निर्वृति निवुई । परभृत परहुओ । परामृष्ट परामुट्ठो । पितृक पिउओ। पृथर इह । पृथिवी पुहई । पृथ्वी पुहुवी । प्रभृति पहुडि । प्रवृत्ति पउती । प्रवृष्ट पउद्यो । प्राभृतम् पाहुड । प्रावृत पाउओ । प्रावृप् पाउसो । भृति भुई । भ्रातृक भाउओ । मातृक माउओ।. मातृका मा.आ। मृणालम् मुणाल। मृटङ्ग मुइगो। वृत्तान्त वुत्ततो। वृद्ध वुड्डो। वृद्धि बुड़ी ।वृन्दम् वुद । वृदावन वुनाणो। विवृतम् विउअ । वृष्ट वुहो। वृष्टि वुट्ठी। स्पृष्ट पट्टो । संवृतम् सवुअ । इत्यादि। वैकल्पिक- निवृत्तम् निउत्त, निअत्त । वृहस्पति वुहप्फई, वहप्पई । मृपा मुसा, मोसा | वृन्दारका वुढारया, वारया । वृपभ उसहो, वसहो। मृषा मूसा, मुसा। (०) वृन्तम् वेंट, विंट () १ पाली प्र• पृ. २ (-3) २ पाली प्र• पृ. ३ (सम्ए) टिप्पण .
. (च) -ओ- मृपा मोसा, मुसा । वृन्तम् बाट विंट । (वै०) (छ) अरि- दृत दरिओ। (ज) -दि-- आहत आदिओ। (A) ऋ-रि-- नीचेना शब्गेमा ऋोरि' थाय छे-ते क्याय नित्ये अने क्याय विकल्प थाय छे 'अन्यादृश अन्नारिसो। अन्यादृक्ष अन्नारिच्छो। अयाहर अन्नारि। अमूदृश अमरिसो । अमूहक्ष अमूरिच्छो । अमूहक् अमूरि । अस्मादृश अम्हारिसो। अस्मादृक्ष अम्हारिच्छो । असा- हदू अम्हारि । ईदृश एरिसो। ईदृक्ष परिच्छो। ईदृक् एरि। एतादृश एरिसो । एतादृक्ष एआरिच्छो। एतादृक् एआरि । कीदृश केरिसो। कक्ष केरिच्छो। कहि केरि । तादृश तारिस । ताक्ष तारिन्छो । तादृक् तारि। भवाश भवारिसो। भवाक्ष भवारिच्छो । भवाहर भवारि। यादृश जारिसो। याक्ष नारिच्छो । यादृक् जारि। युप्मादृश तुम्हारिसो । युष्मादृक्ष तुम्हारिलो। युप्मादृक् तुम्हारि । सदृश सरिसो। सदृक्ष सरिच्छो। सदृक् सरि। पारिप- मनु रिज्जू, उज्जू । ऋणम् रिण, अण। ऋतु रिड, उउ । ऋपभ रिसहो, उसहो । ऋपि रिसी, इसी । १ अही'अन्याश' वगरे शब्दोमा स्वतन र नधी दिन्नु ४' मा छे, '६ रोए मारे से पृ. १.नि.२।
केतिसो। तातिसो। भवातिसो। जानिसो। २ पालीमा फोह ठेकाणे 'ए' नो 'मो' थाय छे द्वेष-दोसो- (१) उपर्युक्त अस्मादृश' या माडी 'सहक्' सुधीना वसा शब्दोना ''ना नो पेशाचीमा 'इ' थाय छे: अस्मादृशः अम्हारिसो अम्हादिसो-अम्हातिसो । अन्याशः अन्नारिसो अन्मातिस।। ईश. एरिसो एतिसो। कीदृशः केरिसो तादृशः तारिसो भवाहशः भवारिसो यादृशः जारिसो युप्मादृशः तुम्हारिसो तुम्हातिमो सहशा सरिसो सतिलो ५५ एविकार केसरन् किसरं, केसर । चपेटा चविडा, चवेडा । देवर. दिअरो, देवरो । वेदना विअणा, वेअगा। (वै०) (ख) ए-3- स्तेन धूणो, येणो । (वै०) ५६ ऐ-विकार- (क) ऐ-अअ- उच्चैम् उचा नचित् १ जूओ पृ०१२ (त, द-त) । नीच। (पा०प्र० पृ. ५५-ए-भो) शनैश्चरः सणिच्छरो । सैन्धवम् सिंधवं । सैन्यम् सिन्नं, सेन्न । (३०) धीरं । धैर्यम् चैत्यवन्दनम् चीवंदणं, चेहयवंदणं । (वै०) नीचेना शब्दोमा 'ऐ नो 'अ' थाय छः ऐश्वर्यम् अइसरिअं। केतवम् कइअवं । चैत्यम् चड्त। दैत्यः दइचो । दैन्यम् दइन्न । देवतम् दइअव । भैरवः भइरहो। वैजवनः वइनवणो । वैतालीयम् वइआलीअं । वैदर्भः वेड्दन्भो। वदेशः वइएसो । वैदेहः वइएहो । वैशाखः वइसाहो । वैशाल: वइसालो । वैश्वानरः वइस्सागरो । स्वैरम् सहर । इत्यादि. वैकल्पिक- कैरवम् कहरवं, केरवं । कैलास. कालासो, केलासो। चैत्रः चइतो, चेयो।देवम् दइन्व, देव्वं । वैतालिका वइआलिओ, वेआलिओ। वरम् वदर, वैर । वैशम्पायनः वइसंपायणो, वेसंपा- यणो । वैश्रवण. वइसवणो, वेसवणो । शिवम् वइसिअं, वेसि इत्यादि. ५७ ओ-विकार--- (क) ओ-में- अकल्पिक- अन्योन्यम् भन्न्न, अनुग्नं । आतोयम् आवज, आउ । प्रकोष्ठः पवट्टो, पंउटो, । मनोहरम् मणहर, मणोहर । १ पाली म. पृ. ४ (0-1) २ पारी म. पृ. ४ (ऐ) इज्यारे आदमानो 'अ'थाय छे त्यारे जना त' अने 'क' नो 'व' पण याय छे.
। शिरोवेदना सिरविभणा सिरोविमणा। सरोरुहम् सरोरुह । (ख) ओ=3- सोच्छवास सूसासो। (ग) ओ=अ3, आअ- ओ-उ-गोक गउओ। गो। गउआ । गो गउ-गऊ। ओमाज-गो गाभ-गाओ (पुलिंग) गो गाअ-गाई (स्त्रीलिंग) ५८ औ-विकार- (क) औ अउ- नीचेना शब्दोना ' नो 'अउ' थाय छे कौक्षेयकम् कउच्छेअय। पौर कौरव कउरवो। पौरुपम् पारिस । कील कउलो। मोनम् मउण। कौशलम् मौलि गौडा गउडो। सौधम् सउह । गौरवम् गउरखें। सौरा: सउरा। पउरो। मउली। कउसला (ख) 'आमा-- गौरवम् गारवम् १ पाली प्र० पृ० ५ (भा) टिप्पण पालीमा कोई काई ठकाणे 'ओ' नो 'अ' पण थाप छे (औ=)-पाली पृ. ५ टिप्पण, नीचेना शब्दोमा 'ओ नो उपाय के. दोवारिकः दुवारिओ। पौलोमी पुलोभी । मौनायनः मुंजायणो । शौण्ड. सुंडो । शौद्धोटनिः मुद्धोअणी । सौगन्यम् सुगन्धतणं । सौन्दर्यम् सुदेर । सौर्णिक सुवाणिो । कुच्छेअयं, कोच्छेअयं । (३०) (ध) औ=आर- ना: कॉलेयकन् नावा। ofer- १ पारी २.५-(भो-३) प्रकरण ६ असंयुक्त व्यंजनोना विशेष फेरफारो ५९ क-विकार--- M कर्परम् खप्परं । फील. खीलो। कीलकः खीलभो। कुन्नः खुजो । -- अमुकः अमुगो। अपुकः अगो। आकर्षः आगरिसो। आफार आगारो। उपासक उवासगो। एक. एगो। एकत्वम् एगत्त। फन्दुक्म् गेंदु। तीर्थकरः तित्थगरो। दुकुलम् दुगुल्ल । मदाल मयगलो। मरकतम् मरगयं । श्रावक साक्गो। लोक लोगो। "किरातः चिलाओ। कभ- शीकरः सीभरो, सीअरो। (वै०) चन्द्रिका चदिमा। १पाली प्र० पृ. ५५ (क) २'मुज' शब्द 'कुबडा' अर्थमा ज वपराय छे. ३ पाली प्र. पृ० ५५ (क-ग) ४ "चिलाम' शब्द 'भिल्ल' अर्थमा ज वपराय छे, .
'प्रकोष्ठ पट्टो, पउद्यो। चिकुर चिहुरो। निरुप निहसो । स्फटिक फलिहो। शीकर सीहरो, सीरो 1 (40) ६. ख-विवार- शृङ्खलम् सकल । शृङ्खला सकला। ६१ ग-विकार- ग-म- नागानि पुनामाइ । भागिनी भामिणी । छग छालो । छागी डाली। गन्न- दुर्भग 'दूहवो । मुभग मूहको। ६२ च-विकार- च-में- पिशाची पिसानी, पिसाई । (३०) आकुञ्चनम् आउटण। पिशाच पिसल्लो, पिसाओ। (३०) १ जूओ पृ. ५०-निप्पण ३॥ २ पारे 'दु'नो' अने 'मु नो 'सू' यो नगै पारे ।' नो 'व' पण यतो धी-ओ उ-विचार (1) उ-ऊ १० ५. ३ पारी प्र. पृ. (च) चम्म- खचित खसिओ, खइओ। (वे.) ६३ ज-विकार चपेटा चविला, फालेइ । जटिल झाडिलो, जडिलो। ६४ ट-विकार ट--बैटम केदवो । शकटः सयढो । सग सदा । 'ट-ल-स्फटिक पलिहो। चविडा । (१०) 'पादयति फालेइ, ६५ ठ विकार रल---अकोट अपोलो। अकोटतरम अमोलतेल। ट-इ-पिटर पिटो, पिटरो (३०) ६६ ण-विकार 'णल-वेणु वेद, वेणू । (३०) ६७ त-विकार तुच्छम् त-7- तु उम् त-र-- तगर टगरो। तूबर ट्वरो । प्रसर टसरो । १पारी प्र. ० ०८-(-3) पातमा केरेक माणेनो ''47 पाय --(ट- पृ. ५.) . ही पाहि पाना थारू समयाना . ३पारीप्र०० ८ (ग-3) येणु =वेटु- .
नाचना शब्दमा तनो 'ड' पाय ठे-ते पर्याय गत्ये अने क्याय विकल्पे यायचे पताका पाया। 'प्रति पडि। [प्रतिक रीति पडिकरइ । प्रतिनिवृत्तम् पटिनिच तिपत् पडिवया । प्रतिपन्नम् पडिएन । प्रतिभाप्त पडिहासो । प्रतिमा पडिमा । प्रतिश्रुत् पसुआ । प्रतिसारः पहिसारो। तिम्धी पाडिपद्धी । प्रतिहासः पडिहासो । प्रतिहार पडिरारो।] प्रभृति पहुडि । मृतरम् मडय। पामृतम पारा व्यात वावडो। विमानर बहेडगे। सूत्रकृतम् सुत (मूअ) गा! हरीतकी हरडई। इत्यादि पल्पिक- रहता जवट, अहिया अाहृतम् जोहड, आहनम् आहर, आया कृतम् कड, क्या दुष्टतन उधेय। मृतम् मड, वडिसो, सुरतम् मुण्ड 'मा ए (').८ ओहय। मया असा । वेतम मुगा १७ सतरी। त--- अतितकम् अणिउँतय । गर्मित गरिभणो। तर--- सप्ततिः तम्ल- अतसी अलसी । सातवाहन सालवाहणो। सातवाहनी सालआहणी- सालाहणी। वैकल्पिा-- पलितम् पलिलं, त=1- आतोयम् पीतलम् पीवल, पीभल । त-ह- मिहत्थी। कल्पिका- काar काहलो भरत भरहो, मातुलिङ्गम् माहुलिग, वसति वाही, वप्लई। ६८ प-विकार पलिस आउज। आवज, कायरो। भरओ। माउरिंग। । निसीहो। प्रथम पटमो । मेयि मेढी । शिविर (ल.) सिडिलो मालिक- निशीथ निमीदो, "पृथिवी इटी, १ जूयो पृ.६५, ३ टिपण । २रिस्ति विदाय-(-२) पा-पु.." ३ पृथिवी मनी-(23) पान पू. ५९
पिह।
हो
थर
पिधं
६९ द-विकार
'ट-ड---
दंश
डस
इत्यादि.
दह
इत्यादि.
वैकल्पिक-क्दनम् कडण, क्यण। टम्म उड्डो, टड्डो। दण्ड इडो,
दडो। दम्भ दुम्भो, टम्भो। दर्भ डभो, दभो। दष्ट
दवा । दर इरो, दरो। दशनम् डसण, दसण। दाह डाहो,
टाहो । दोला डोला, टोला । दोहट डोहलो, दोहलो।
द--टीपू धीप, दीप् । दीप्यते धिप्पड़, दिप्पइ । (4.)
(क) दर--सख्यावाचक शब्दना अनादिभूत, असयुक्त अने
एकपदस्थित एवा 'ट'मोर' थाय
एकादश एआरह । द्वादश बारह । त्रयोदश तेरह ।
(ख) द-र-बदली करली । गद्दम् गग्गर ।
"-7--प्रदीपयति पलीवेई । प्रदीप्तम् पलित दोहद टोहलो।
क्टव फ्लम्बो, कयम्बो। (३०)
ढ---पटर्थित स्वहिओ।
द-ह-कुदम् करहे।
१ पारी प्र. पृ. ५९-(द)
२ अझ आ बन्न धानुना सधा रूपी समजाना ,
३ अही 'दी' धानुना या रूपा समजगना छे.
भनी शब्दको अर्थ 'ळ' तो नयी.
पाली प्र० पृ. ६.-(ळदोहद दोहयो)
६ अही प्राप्' धानुना था सो समनवाना है,
७० ध-विकार
घ-2-निपध निसदो।
औपधम् ओमद, ओसह । (०)
७१ न-विकार
न-ह-नापित पहाविओ, नाविओ। (३०)
'म-ल-निम्ब लियो, निंबो।
७२ प-विकार
'प-कपनातः फणसो । परिघ फलिहो । परिखा फलिहा ।
परुष फाले । पाटि फाडि ] [ पादयति फाडेइ
इत्यादि पारिभद्र फालिहहो ।
4=म-~आपीड आमेलो, आवेडो । नप नीमो, नीवो । (२०)
4-4--भूतम् पहुक्त।
प-र-पापद्धि पारखी।
७३ व-विकार
"ब-भ-बिसिनी भिमिणी ।
-मदेवय कमन्धो।
ब-य-मन कयन्धो । (३०)
७४ भ-विकार.
भ-4--टभ केयो।
१. पा. प्र. 2. ५१-(7)
२ साली प्र० पृ. ४०-(कफ) परुप -फ्रुसो (पारी)
३ अहीं 'पाट' धानुना या रूपा समजाना है
४ माली माघ ५२-(म)
६८
इस
थ-1.--
प्रथा पिधं, पिन ।
६९ ढ-रिकार
'ट-3--
इत्यादि.
इत्यादि.
वैकल्पिा-पदनम् कडण, क्यण । टम्म उड्डो, दड्डो। दण्ड इडो,
टडो। दम्भ इम्भो, दम्भो। दर्भ इन्भो, दम्भो। दष्ट डहो
दहो । दर डरो, दरो। दशनम् इसण, दसण। दाह डाहो,
दाहो । दोला डोग, दोला। दोहद बोहलो, दोहलो।
दस-दीपू धीप, दीप । दीप्यते विपद, टिप्पइ ।
(क) दर-सख्यावाचक शलना अनादिभूत, असयुक्त अने
एरपटस्थित एवा 'द'नो र थाय
एकादश एभारह । द्वादश बारह । योदश तेरह ।
(ख) दर-बदली करली । गद्गदम् गम्गर ।
---प्रदीपयति पलीवेई । प्रदीप्तम् पलित्त दोहद दोहलो।
क्रम्ब स्लम्बो, क्यम्यो। (प.)
द-4-क्टर्थित काहिभो।
दह-परदम उह।
१ का प्र....-()
२नही आ बनानुना या रूपा समजाना
३ नहीं 'दीप' धानुना यथा रूपी समजा छे.
४ा शन्दनो अर्थ 'क' को नयी
कालीप्र. पृ. ५०-(र-मोहर दाइलो)
मही 'मी' भानुना या समनगना
६६
७० प-विकार
घ--निषध निसदो।
औषधम् ओमद, ओमह । (वै०)
७१ न-सिर
न=हनापित पहाविओ, नाविओ। (३०)
'न-ल-निम्ब लियो, मित्रो।
७२ प-विकार
पकपनसः फणतो । परिच फलिहो। परिवा फल्हिा ।
परुप फरुसो । "पाटि फाडि। [ पाटयति फाडेइ
इत्यादि ] पारिभद्र फालिहहो।
प-म-~आपीड आमेलो, आवेटो। नी नीमो, नीवो 1 (40)
प-व-मभूतम् बहुत
प-र-पापद्धि पारखी।
७३ य-विकार
"व-भ-पिसिनी मिसिणी।
व-म-पन्ध वमन्धो।
बयरवन्ध कयन्यो । (२०)
७४ भ-विकार.
भ-4--भ यो।
१पालप्रपृ० ५१-(17)
२ वाले प्र० पृ० ४०-(-) परुर -सौ(पास)
३ अही 'पार' पानुना वा रु.पो समनमाना रे
पालम १०६२-(१)
6
७५ म-विकार
म=T-~-विपम विमदो, विसमो। (३०)
म-व--मन्म ३ बम्महो।
अभिमन्यु जहिबन्नु , अहिमन्नू । (वे. )
म-म --भ्रमर भसलो, भमरो। (वे.)
७६ म-अनुनासिक
नाना शब्दोमा 'मु' ना म' नो लोपथार छे अने 'म'नो लोप
थया पती शेष रहेल ( मुना) 'उ ने म्याने अनुनासिक 'उ' (3)
थायले
अतिमुचवम अणिउँतय । कामुक काउँओ।
चामुण्टा चाउण्डा । यमुना जउँणा ।
७७ 'य-विकार
यम् आह--कतिपयम् इवाह ।
यःज--उत्तरीयम् उत्तरिज, उत्तरीभ। (वै०)
तृतीय तइजो, तइओ । द्वितीय विइज्जो, वीओ । (वै०)
य-त--युप्मीया तुम्हरो । युप्मादृश -तुम्हारियो । 'यु.
प्मद-तुम्ह । इत्यादि।
'य-ल-यष्टि लठ्ठी।
यें-व--कतिपयम्-दिन (३०)
१ कोइ एकादश दम 7 नो पण यह नाय छे
स्न यु-दारु- [पाला-सिनर]
२ अ ' गुमद् सदना धी कानाम्याने पण समनवाना रे
गुमरपुत्र -नुत्ता इत्यादि
३ पाल प्र० पृ. १३-(17)
४ मारी.. ६३-(य)
र
--आया 'छाही, छाया । सायम् सच्चाई। सच्छाय (40) ७८ र-विकार र-र-शिरि बिडी। पिटर हिडो। भेर भेडो। र-डा-पर्याणम् पायाण, पल्लाण । रण-करवीर रणवीरी। 'र --नाचना शब्दोम र नो लयाय डे-ने क्याय नित्ये अने न्याय विक्से थाय रे अपद्वारम् अवद्दालं। भ्रमर भसलो। अङ्गार गालो। मुम्वर मुहलो। का ग्लुणो। यधिष्ठिर नहुट्टिलो। कातर काहलो। रम्ण लक्को। किरात चिलाओ। यरणः वलुणो। चरणः चरणो। शिविर मिडिलो। दरिद्र दलिदो। मत्कार सका। रिद्राति दलिदाद। सुकुमार सोमाली। रिद्रयम् दारिदं । म्यूर यूलगे। परिग्वा पलिहा। म्यूरभद्र थूलभद्दो परि फलिहो। हरिद्र हलिहो। पारिभद्र फालिद्दो । हरिद्रा हल्दिा । इत्यादि , आ गयनोपयोथायरे २ 'चिर गदा 'पिद, य, पण पिढदनु गथी-माए ३ सम्यारो मागधी र-7 (पृ २६) ४ 'नमर' दनु भसल' थाय पण 'भमल' न थाय, । ६. ।
७२ वटरो। - 'मङ्गल, लगूल । वैकल्पिा- जठरम् जदर । निष्ठुर निठुलो, निहुरो। वर वटले ७९ ल-विशार 'रण-नाचेना शब्गेमा आदिना । ल नोनित्ये अने विकल्प . थाय छे ललाम् णलाड, 'णिलाड । वरलिपर- लागल्म् गल। लाइगम् णइगूल, लाहल णाहलो, हो। र-र-म्थूलम् थोर । ८० व-विकार वन्भ-पिहल भिन्मलो, विभो, विहगे । (वै.) व-म-शवर समगे। श्रवण वेसमणो नीवी नीमी, नीवी । स्वप्न सिमिणो, सिविणो (वै० ) ८१ श-विकार श-3--शमी उमी। शार गावो । शिरा घिरा, सिरा (वे०) १ पाला प्र.प्र. ५३ (-न)-लाम नगट | २ | पृ. ८ (द) ३ रागलम नाहग पाली [पृ० ३९ ४ बावल शटनु भिहर रूप थतु या -ओन-म ५ पाली प्र० पृ. ५३-(D) शाव छायो।
७३
श-ह-एकादश एआरह, एआरस। दश दह, दश । दरबलः
दहवलो, दसवलो। दशमुख. दहहो, दसमूहो। दशरथः
दहरहो, दसरहो । द्वादश वारद, पारस । प्रयोदश
तरह, तेरस इत्यादि।
८२ प-विकार.
'प-छ-'षट् छ {पट्पदः छप्पो । षण्मही छंमुहो। पष्ठः
छहो । पठी छही]
पह-नुपा सुण्डा, सुसा । (५०)
पह-पापाण. पाहाणो पासाणो । प्रत्यूप. पञ्चूहो,पच्चूसो (१०)
८३ स-विकार
स--सप्तपर्ण. छत्तिवण्णो । सुधा छुहा।
स-ह-दिवस दिवहो, दिवसो । (वे०)
८४ ह-विकार
ह-र-उत्साह उत्थारो, उच्छाहो ।
८५ लोप
नाना शब्दोमा नीचे जणावला व्यजनोनो लोप पिसे
थाय छः
'क' लोप-प्रारार. पारो, पायारो।
व्याकरणम् वारण, वायरण !
ग' लोप-आगत आओ, आगओ
५ पाली प्र. पृ०६४-(प-3) पट्छ ।
२ अहीं 'पद' शब्दना या रूपो समजवाना छे.
३ जूओ पृ० ४१ 'ल-सिन' अने एनु टिप्पण।
४ ' उत्साइ' शब्दनु 'उच्चार' रूप थाय नदि,
tr.
ઉછે ज' लोप-- दनुज दणू, दणु से । दनुजवध रणुदहो, दगु अनहो । भाजनम् भाण, भायण । राजकुलम् राल, शयल । 'द लोप-उदुम्बर उम्बरो, वरो । टुगीवी दुगावी, दुग्गाने (ए) वी | पादपतनम् पाण, पायद । । पादपीठम् पादि, पायवाट । ज्य लोप-क्सिल्यम् क्सिल स्मिल्य। कालायमम् नालाम, रालयस । हृदयम् हि , हिअय। सहृत्य सहिओ, सहियो । वोप- अवट अनो, अवडो । आवर्तमान अत्तमाणो आवतमणे । एवमेव एमेव, एवमेव । जीवितम् नीर, जीविशनारत् ता, तात्र । देवकुलम् देउल, देवरल । प्रावारस पारओ, पावार भो । यावत् जा, जाव। लोप---- पेटलेक ठेकाणे शना पानि यन्ननो पण रोप थई जाय च अ । चिह्नम् इथ | गन उणो इ यानि ।
प्रकरण ७ [सूचना संयुक्त व्यंजनोना विशेष फेरफार -आ नीचे सयुक्त व्यजनोना विशेष फेरफ रोने आफ्नामा आछे जने साये जे जे शब्दोना वैकल्पिक कन्वे रूपो थाय छे तेओनु बीज रूप लक्ष्यमा रहे ए माटे तेने पग अहीं आया [ ] चौसमा जणावी दीधु ] (क)क्त-- मुत्त मुको [ मुतो । गत सको [ सतो । (ख) ग्ण-के- 'करण रशे [लुग्गो]। (ग) वक- मृदुत्वम् माउक [ माउत्तण । [ उद्यो। दए इको ८७ वख, ख (क) क्ष्ण-ख-- ताशम् निकग्व, [ लिण्ह । (ख) मत-स-- स्तम्भ सभो [थभो] १ पा.. १ (टिप्पण) २ रुग्ण राग (प.प्र. ९ गिपन माग) ३यो पृ-३ टपण (ग) स्थ-व--- स्थाणुः खाण। स्फेटकः सैटिक. स्कोटकः खेइओ। खडिओ। खोडओ। ८८ग (क) क्त-ग- रक्त. [ रो] शुल्कम् (मुंगी-हिं.) [स] किची। कृत्तिः (ख) थ्य-च- तथ्यम् तचं [3] ९०च्छ, छ (क) स्थ:-स्थगितम् उ [] (ख)-प-3-पृहा उिहा। (ग) म्प-छ--निस्पृहः निच्छिहो । निपिहो]। ९१जाज ९२ ज्या न्ध-सा- (मा) इन्धु इन्सा (समिन्य समिसाइ । यि+इन् विन्साइ) धिनु-- 'मृधिसः विन्नुभो, [विडिओ] यहा। (क) Hz-परनम् पट्टणं। मृत्तिरा महिमा । वृत (स) 4-कदर्धित कहिओ। (ग) म्त-द-पर्यन पत्तहो। ९५४ (क) 4g- 'अर्थः [अन्यो गई पो [पउत्यो] (ब) स्त-3- स्तम्भ्यते ठभिन्न टो [पद्रो] १ अभिमः विष्टको (पाल) २ पाली :..५८-(दर) ३ मा अयो, अहो, महा-(416....) ४ 'g' पदमा प्रयोग 'प्रयोग' अर्थमा पाय छाय शल्दनो 'धन' अर्थमा धाप से ५ सम्म थलो ! सम्भा भो-म-प पारी १. १०)
Ge
ठभो।
'सम्भ ठंभ (चातु)
'स्तम्भः ।
स्त्यानम् ठीण । [थीणं]
(ग) 'स्थ=3–विसस्थुलम् विसठुलं ।
स्थ8-- अम्बि'
अदि।
ना
गते.
गड्डो ।
कवड्डो।
कपदः
गर्दभः गडहो [गद्दहो]
छंद
(धातु)
छर्दयति
छर्दिः छड्डी।
मदितः
मडिओ।
विच्छ
विच्छड्डो ।
वितर्दिः विभड्डी।
समर्टः समड्डो।
१ आ ' म ' धातुने नहीं असदार्थक ज लेवानो छे.
२ 'स्तम्भ ' शब्दनो अर्थ पण 'स्तम्भ ' धानुनी को ज
समजवानो छ
३ पाली प्र.१० २८-(स्था)
४ अस्थि और (पारी प्र. पृ. २९-३५-४)
९७ 'इद, द नीचे जणावेला शब्दोमा सयुक्त 'ध' नो ड्द अने द थाय के (क) ध, द्ध, म, व्ध-द- अम् [ अद्ध ] ऋद्धि इन्दी, [इद्धी ] दरव टड्ढो । विदग्ध विभड्दो वृद्ध बुड्ढो, [विद्धो] वृद्धि बुड्दी । श्रद्धा सड्ढा, [सद्धा] म्तव्यः (म्ब) 4-d-मी मुढा, { मुद्धा ] ९८ पट, ण्ड, पण ठडढे। वृन्तम् वेण्ट ( तालवृन्तम् ताल्वेण्ट) कन्दरिस कपलिआ। भिन्दिपार भिण्टिवालो। (1)-ग- पन्नश पण्णरहा पञ्चाशत् एण्णासा। १ पान पृ. ४-(त, 4-इह, ग्धन्द) २ नम - गम १० =) ८० (ख) सण- 'दत्तम् दिण्ण। (ग) ह्र-गण- म याह्न मन्अण्णो, [ ममहो] ९९ त्य (क) सत्य- उत्साहः उत्थारो। (व) त्म-स्थ- अयात्म अज्मत्थ [ अज्मप्पं ] टद्ध-आश्लिष्ट आलिद्धो। न्त,न्ध मन्यु मन्तू । [ मन्न ] नय- चिह्नम् चिन्य [ चिह? १०१ प्प, फ, फ आत्मा अप्पा । [ अत्ता] आत्मान अप्पाणो [ अत्ताणो] १ 'दच' शदनु 'द 'क'दत्त'रूप तु नथी २ उत्साह -उस्साहो-(काला य० पृ. ३०) ३ जूझो पृ. ३५, ने एनु चाथु रिप्पण। ४पालीमापामा 'म'नो तुम' पते जणाय छे-आत्मा आनुमा, अत्ता-(पाली प. पृ...)
८म-काफ- भीम मिले। सेमा सेको [ सिलिम्हो स्म-प्प- भम्म भप्पो [ भामो] १०२ भ, मम्म जर्वम् उभ [ उद्ध] -- जाम्रम् जग। ताम्रम् त। (क) इसम- रश्मीरा यम्भारा [वम्हारा] (ख) क्ष-ग्भ--- बामण यम्भगो [ बम्हणो] ब्रह्मचर्यम् वम्भनेर बम्हचेर ] (२) यर--- आश्चर्याम् अच्छेर । यम् तूर । धर्यम् धार, दिन] पर्यन्त पेरतो। [ प.तो ] ब्रह्मचर्यम् सम्हचेर। शौण्डीर्यम् सोडार । सौन्दर्यम् मुन्देर । दशाह दसारो। (ग)-र-- धात्री धारी। लेमा सिर मुमा, सेम्हो-(पारी प्र० पृ. ४१, मरम्) २ पारी प्र० पृ. १५-(अन्य नि०१८) प्रा. ११ ८२ १०४ लाल ण्ड:- कूष्माण्डी कोहली [कोहण्डी] थैल- 'पर्यस्तम् पल्लट्ट, [ पल्लत्यं] पर्याणम् पल्लाणं । सौकुमार्यम् सोअमछ। बृहस्पतिः वहस्सई ( बहफई ] वनस्पतिः वणस्सई [वणप्फई ] (क) क्ष-ह- दक्षिणः दाहिणो [ दक्खिणो] (ख) ख-ह- दु.खम् दुह [दुक्ख ] टु खितः दुहिओ [ दुविखओ] (ग) र्थ-ह- तीर्थम् तूह [ तित्यं ] (घ) र्घ-ह- दीर्घः दीहो, [ दिग्यो ] (ङ) पंह- कापिणः काहावणो। (च) प्प-ह- 'बाप्पः वाहो १ पर्यस्तिका पलस्थिया-(पाली ३.० १६-टिप्पण) २ वनस्पति वनमाति-(पाली प्र.पृ०३:-सप) ३ पाली य० पृ. ८-नियम १० (प) ४ आ अन्द, ये अर्थमा प्रसिद्ध छे-एक नो आमु अने बीजो याफ; मा ज्यारे ए वाफ-गरमी-लो यात्रा होय वारे तेनु गद ने बदले यफ 'रूप थार थे। ।
- (B) म-है- कुष्माण्डी कोहण्डी। कुप्माण्डम् कोहण्डं। १०७ द्विर्भाव (क) नीचे जणाच्या प्रमाणे चिह्नित व्यंजनोनो द्विर्भाव थाय छे- ते क्यांय नित्ये अने क्याय विकल्पे थाय छे:- मजः उज्नू। यौवनम् जुवणं । तेलम् तेलं। विचकिलम् वेइलं। प्रभूतम् बहुतं । जीडा विड्डा इत्यादि। प्रेम पेम्म । मण्डूकः मंडूको। वैकल्पिक:-असदीयम् अम्होरं अम्हकेर, एक: एको, कर्णिकारः कण्णिआरो कुतूहलम् कोरहलं, चि चे तूणीकः तुहिको, तुहिओ। देवम् दइन्वं, दइव। नखः नक्लो, निहितम् निहितं, नेहुँ, १'वि' भने 'अ' ए बन्ने अवधारण सूचक अव्यय (हे. ८-२-१८४) अने संस्कृतमा पराता 'चैय' साथे वि. समानता धराये ठे-उधारना कारणने सँधे ए वन्ने चित्र' माथी पण यावे, अम्हके। एओ। कणिआरो। कोउहलं। चिअ (एव) चेअ (एव) 'चिअ, नहो। निहि। नीडम् नीडं। - 1 ८ 'सेवा, खाणू। मूकः मओ। मृदुकम् माउकं, माउI न्याकुल: वाउलो, वाउरो। व्याहृतः वाहितो, वाहिओ। सेवा सेवा । स्रोतस् सोनं, सो। स्त्यानम् थिण्णं, थींणं । थुटो, थोरो। म्थाणुः खण. हूतम् हूअं इत्यादि। (ख) समासमा आवेला उत्तरपदना आदिना व्यंजननो द्विर्भाव विकल्पे थाय छे- आलान-स्तम्भः आगाल-खंभो, आणाल-वरवंभो। कुसुम-प्रकरः कुसुम-पयरो, कुसुम-प्पयरो। दु-सहो, दु सहो। देव-स्तुति. देव-धुई, देव-त्थई । नदी ग्राम नइ गामो। नि.-सहम् नि सह, नि-रसहं । हर-स्कन्दा. हर-वधा, हर-वखंदा। १०८ शब्द-विशेप विकार शब्दोमा कोई पण सामान्य के विशेष नियम न लागु पडतां चिह्नित भागना केटलास विशेष विकारो पाय छ, ते आना आपवामा आवे छे.- अयस्कारः एकारो। आश्चर्यम् अउ अरं, अच्चरिश्र, अच्छरिवं अच्छरी। १ जूओ पृ. १-टिप्पण २३ २ आश्रयम् अन्धरियं, अन्सविरं, अच्छेर-(पाली . T.6 टिपा) नइ गामो, - कदली ओहलो [उहले उखलः उलूगलम् ओक्सल [उल्हलं] केलं, { कयलं कदलम् केली, [ कयली] फर्णिकारः कण्गेरो, [कणिमारो] कोहल, [ कोउहाउ] कुतूहलम् . चतुर्गुणः चोगुणो [ नउम्गुणो] चतुर्थः पोत्यो, [पउत्यो] नती चोत्यी, [ नउत्थी] 'चतुर्दश चोदह, [उपह] चतुर्दशी चोदसी, [चउद्दसी चतुर्वारः पोवारो, [पउन्नारो] प्रियस्त्रिंशत् तेवीसा। प्रयोदश तेरह । प्रयोविंशतिः तेवीसा। प्रिंशत् तीसा। नवनीतम् नोणीअं, लोणी 'नयफलिका नोहलिमा। नवमालिका नोमालिआ। निपणः शुमण्णो, [णिसण्या] पूगफलम् पोफलें। पूंगफली पोप्फली। पूतरः मावरणम् परणं, पाउरण, [पावरण] १-ो-राप्ती. ४४ नि.. पोरो।
बोर । बोरी। मोहो, [ मउहो] चदरम् पदरी मयूख रुदितम् लवणम् विचरिरम् विंशति सुकुमार 'स्थविर लोणं [रवण] वेइल। वीता। सोमालो [सुकुमारो] धेरो। १०९ शब्द-सर्वथारिकार- आ नीचे ते शब्दो आपवामा आवे छे जे केटले अशे के सर्वथा (पोताना मूळ रूपथी ) अन्य रूपवाळा थई नाय छे अधस् हेतु। त्रस्तम् हित्य, तह [तत्य] अप ओ. [ अब] दिश दिसा। अप्सरस अच्छरसा, अच्छरा । दुहिता धूआ, [दुहिआ] अथि ऐ। दमा दाहा। अब ओ, [ अब ] आयुः आउसा[आऊ] दहक हरओ। आरब्ध आढलो, [ आरो] धनुप् वणुह, [ धणू] इदानीम् एहि, एत्ताहे, टाणि[इआणि धृति दिही, (धि] दह, हरो। सौ. टाणि। १ स्थविर मेरो-(पाली) २ आ सियार बीजे राय 'ए' मा प्रयोग र यी-(ना ३०१-दिग)
'ईपत् कूर, [ इति ] पहिस् बाहिं, बाहिर।
उत ओ, [ उस] बृहत्पति भयम्सई [ वहम्सई)
उप उ, ओ, [उव] भगिनी वहिणी, [ भणी ]
उभयम् अवह, उवह, [उभय] मलिनम् मइल[ मलिण ]
का कहा।
मातृप्वसामाउच्छा, माउसिआ।
क्षिप्तम् छुट [खित ]
मार्गरः मनरो, वनरो [मजारो]
क्षुथ् उहा।
वनिता विल्या, विणिआ]
गृहम् पर।
वित विनाओ।
छुप्त छिको [ छतो] वृक्षः रुखो, [वच्छो]
तिर्यक तिरिआ, तिरिच्छि। वैडुर्यम् वेरलिभ, वेउज्ज ।
पदाति पाइको [पयाई] शुक्ति सिप्पी, [ सुत्ती]
स्तोक्म् थेव, योव, थोक थोत्र
'पितृवसा पिच्छा, पिउसिआ। मी इत्यी [थी
पूर्वम् पुरिम पुल्य । शी० पुरव । 'मशानम् सीआग, मुसाण [मसाण]
हृद्यम हिअयप० हितप, हितम।
पाप पाउसो।
सूपक 7 गुदनु जर म्प थार ,
झिनु
शिष्यगूनम्नु नहि
२'गृहप17 सदनु घर-१ न रदल गया रूप भाय
३पि स्यो-(परा) पा.प्र.३.१.नि...
पिसा गुग (पा... ३८ पिप)
. सोरन धोक-(-4-1010 ...)
• भगानम मर 7 मान (१०३. . ५1-7)
८८ - ११. अन्त स्वरद्धि- नीचेना शब्दोमा चिह्नित सयुक्त व्यजननी वञ्च नीचे जणाच्या प्रमाणे स्वरो उमराय छे उमेरातो म्वर 'अग्नि अगणी [अग्गी ] अहन् अरहन्तो अरिहतो, अस्हतो । अ, इ, उ 'अई अरह. अरिह, अरह । " कसिणो । ३ the चेइ । ई Mm कृष्ण सणो, कतिको । विहो ] अ, इ क्रिया किरिया [पिया क्ष्मा छमा। अ चैत्यम् उद्य छउम [ उम्म] उ ज्या जीआ। तप्त तविओ (तत्तो] 'द्वारम् दुवार [ दार] उ द्वादश दिष्टचा दिद्विआ। ३ पद्मम् पउम [पोम्म ] उ १ अग्नि अग्गि, अग्गिनि, गिीन-(पा. प्र. पृ०४९) २ अहीं 'मह' धातुना रथा रूपा समजवाना छे. ३ कृत्स्न कसिणो, किहो, सिप्णो-(१० प्र० पृ. ४७) ४ आ पन्ने पो वर्ण क रग अर्थमा ज बसराय छ . ज्या जिया-(पा०प्र० ० ४४-य-इ) ६ द्वार दुवार, द्वार (पा. म. पृ. ३२ टिप्पण) ७ पा. प्र. पृ० ४९-(म-उम्-पद्मम् पदुम) दुवालसा " उमेरातो स्वरः अ पलक्खो। भविओ। [ मुक्खो] . रयणं । "श्व अ अ भव्यः [भवो] इ मूर्खः मुरुक्खो, उ रत्नं वजम् वरं [व] शाईम् सारंग। सिरी। ३ सुवे। "श्लाघा सलाहा। 'स्निग्धम् सणिद्ध, सिणिद्धं, [निद्ध ] अ, इ स्नुषा "सुनुसा [सुण्हा, "हुसा सुसा ] उ सुहुम, सुहम । उ, अ रनेहः सणेहो नेहो। स्याद् सिआ १ प्लक्ष. पिलक्सो-(प्रा०प्र० पृ० ३१ नि. ३७) २ वज्र वजिरो-(पा. पृ० १३ टिपण ) ३ श्री. सिरी-(पा. पृ० १३ टिप्पण) ४ श्व: मुवे, स्वे-(पा० पृ० ३३ टिप्पण) श्वः मुव मुवे- जओपृ. ४६ अ-ए ५ श्लाघा सिलाधा-(पा. १० ३१) ६ स्निग्धम् सिनिधो, निदो-(पा० पृ० ४६ नि० ५३) ७ जूओ पृ० ७३ तथा ४१ ८ सूक्ष्मम्= सुखुम-(पा० पृ० १८ टिप्पफ) ९ स्नेह. सिनेहो, स्नेहो, सनेहो-(पा० पृ० ४६ नि० ५३) प्रा. १२ - उमरातो स्वर सिआवाभो। सुरुष । स्याद्वादः सुन्नम् hr उ सुवो। " स्वे सुवे। स्वप्न ई सिविणो। हिओ [ रहो ] " क्णेरू। ही हिरी इ १११ अक्षर-व्यत्यय- आ नीचे जे शब्दोमा चिह्नित अक्षरोनो परस्पर व्यत्यय- पूर्वापरभाव-थइ जाय छे ते आपवामा आवे छे . अचलपुरम् अलचपुर। आलान आगालो करेणू महाराष्ट्रम् मरहट्टा लघुकम् [लहुअ] ललाटम् णडाल [णराड] वाराणसी वाणारसी। हरिताल हलिआरो [ हरिआलो] द्रहो [ हरो] १ समासातगत 'स्व श दनु सुव' ने बदले 'स' रूप याय छे स्वजन सजणो २ य हीयो, हिय्यो-(२०४० २२ टिप्पण) ३ ही हिरी (पा० पृ० १३ टिप्पण) ४ जूओपृ०७२-म अपभ्रश-आदेशो (१) नीचे जणावेशा शब्दोना अपभ्रश रूपो आ प्रमाणे छे. अन्याश ('अन्नादि (इ) स) अन्नाइस। 'अवराइस । ईदृश (ईदि (इ) स) अइप्त कीहरु केह। कीश (कीदि (इ) स) कास। ताहा तेह। तादृश (तादि (इ)स) तइस। याहर जेह । यादश (जादि (इ) स) जइस । वर्म विच। विषण्ण वुन । अपभ्रशना उमेरणो (१) अपभ्रशमा कोइ कोइ शब्दमा कोई कोई अक्षरनो वधारा तरीके उमेरो थइ नाय छे उक्तम् उत्त वुत्त (व' नो वधारो) परस्पर परोप्पर अपरोप्पर ('अ' नो वधारो) व्यास: वासो बासु, वासु ('र' नो वधारो) १ आ ( ) काउसमा आपला को अपभ्रशरूयोनी पूर्वाव. स्थाना सूचक छे. आ शब्दोना प्रारूपो जोवा माटे नूओ पृ. ५८ ऋर पृ. ५९ ऋद। २ जेम'अन्य' शब्दनु 'अन्याहश' स थाय छे तेम आ अवराइस ' शन्द जोता तेना मूळरूप तरीके 'अपराहश' रूप पण फलीशकाय। .
२ संधि प्रकरण.८ -१ प्राकृतमा जूदा जूदा ये 'पदोना स्वरोनो सधि थाय छे अने ते पण प्रयोगानुसारे विकल्प थाय है.- स्वरसचि- अ+अ आ-~मगह+अहिवई-मगहाहिवई, मगहअहिवई [ मग- धाधिपति.] दंट अहीसोदडाहीसो, दण्डअहीसो [दण्डाशि:] अ==आ-विसम+आयवो-विसमायवो,विसमआयवो विपमातपः आ+आ-रमा+अहीणो-रमाहीणो, रमाअहीणो [ रमाधीनः ] आ+आ-आ-रमा+आरामो-रमारामो, रमाआरामो [ रमारामः ] इ+इ=ई -मुणि+इणो-मुणीणो, मुणिइणो [ मुनीन.] इ+ई-ई-मुणि+ईसरो-मुणीसरो, मुणिइसरो [ मुनीश्वर ] दहि+ईसरो-दहीसरो, दहिईसरो [ दधी-धर ] १ जे रे पदोना स्वरोमा सघि थवानो छे, ते घेपदो सामासिफ । होय के असामासिक होय अर्थात् कोई प्रकारे जूदा जुदा होघा जोइए, जेमके, सामासिक-द+अहाँसो दहाहीसो, ५अहीसो । असामासिक-दडरस+ईसो डरलेसो, दडस ईसो । प्राकृत साहित्यमा विशेपे करीने सामासिक पदोना स्वरोमा सधि थएलो जणाय छे अने असामासिक पोमा तो तेनो प्रयोग घणो ज चिरल यएरो छे. असामासिक पदोमा सधि करवा जना घणे ठेकाणे अर्यबोध दुर्लभ थई जाय छे मारे ज असामासिक करता सामासिक पदोंमा सधि-प्रयोगनो प्रचार पधु थएलले लागे भने एअनुसारे अही उदाहरणोमा पण सामासिक पदोनी जमाघ विशेष करेली छे. कोई ठेकाणे तो फक्त एक ज पदमा पण सधि थएो छ,-- काहि+इ-काही, काहिद [ फरिष्यति ] बिहओ-वीओ विएमओ [ द्वितीय.] २ जूओ पालिपा सधिकल्प नि: ३-०५८ ई+इ-ई-गामणी+इइहासो-गामणीइहासो, गामणी इइहासो [ग्रामणीतिहास ] ई। ई-ई---गामणी+ईसरो-गामणीसरो, गामणीईसरो [ग्रामणीश्वर ] उ+3=ऊ-भाणु+उवज्झायो-माणूवज्यो, भाणुउवआयो [ भानूपा याय ] साउ+उअय-साउअय, साउउअय [ स्वादूदक्म् ] उ+ज-~-साहु+ऊसवो,-साहसवो, साहुउसवो [ साधूत्सवः ] ऊ+उ-ऊ-वहू+उअर-वहूअर, वहूउअर [वधूदरम्] उ+उ-ज-कणेरू+ऊसिअ-कणेरूसिवणेरूउसिभ[करेणूच्छृितम्] अद-ए-वास इसी-वासेसी, वासइसी [व्यामा ] आ+इ=ए-रामा+इअरो,-रामेअरो रामाइअरो [ रामेतर.) अ+ई-ए-~-वासरईसरो-वासरेसरो, वासरईसरो [वासरेश्वर ] आ+इ=ए-विलया+ईसो-विलयेसो, विल्याईसो [वनितेश ] -ओ- गूढ+उअर-गूढोअर, गूढउअर [गूढोदरम्] आ+3-ओ--रमा उचिअ-रमोवचिअरमाउवधिअ [रमोपचित्तम् ] अऊ-ओ-सास+ऊसासा-सासोसासा,सासऊ.सासा,[श्वासोच्छवासी) आ+3-मो-विगुला+ऊसुभिभ-विजुलोमुभिभ,वि मुलाऊ.सुभिभ अ+उ विधुदुल्लसितम्] हस्व-दीर्घ विधान- २ प्राकृतमा सामासिक शब्दोमा प्रयोगानुसारे (क्याय नित्ये अने क्याय विकल्पे) हूस्व म्वरनो दीर्घ स्वर पाय छे अने दीर्घ स्वानो ह्रस्व स्वर थाय छे १जूओ पालि म. मधिक नि.२ पृ. ५७ पईहर, पइहर 'हस्वनो टीप-अन्तवई-अन्तावेई [अन्तर्वदि ] सत्तस्वीसा-सवावीसा [सप्तविंशति ] पइ हर- • [ पतिगृहम् ] भुअभ्यत-भुआयतं, भुभयत [ भुनायन्त्रम् ] वारि+मई-वारीमई, वारिमई [वारिमती] वेलु+वण-नेलूवण, बेलुवण [वेणुवनम् ] दीर्घनो हस्व-गोरी-हर-गोरिहर, गोराहर [गौरीगृहम् ] १ सरखावो वैदिक प्रयोग- अष्ट+कपालम्-अटाकपालम् । अट+हिरण्या-अष्टाहिरण्या। अष्ट+पदी--अष्टापदी (काशिका-६-३-१२६) सरसावो सस्कृत प्रयोग- दार कर्ण -दानाकर्ण । उप+नत्-उपानत् । केश+केशि-केशाकेशि । वगेरे(काशिका-६-३-११५ थी १३९) सरसायो पाली प्रयोग- सम्म+धम्मो-सम्माधम्मो । सम्म+सबुद्धो-सम्मा सबुद्धो । (पा. प्र.० ७४ सधिकल्स, नि० ११ तथा आ नियमनु टिप्पण) २ सरसावो वैदिक प्रयोग- अजा+क्षीरेण-अजक्षीरेण । ऊर्णा+प्रदा-ऊर्णम्रदा। अजा+त्वम्-अजत्वम् 1-( का० ६-३-६३-६४) सरसावो सस्कृत प्रयोग-- शिला+यहम् -शिलवहम् मामणी+पुन-प्रामणिपुत्र । बझन्ध+पुत्र-प्रायन्धुपुन | (का० ६-३-६१ थी ६६ तथा ४३-४५) .
जउँणा+यह-जउणयड, जउणायद [ यमुनातटम् ]
नई-सोत्त-नइसोच, नईसोच [नदीश्रोत ]
मणा+सिला-मणसिला, मणासिल [मन शिला]
वहू-मुह-बहुमुह, वहुमूह [वधूमुखम् ]
सिला+खलिअ-सिलसलिभ, सिलासलिभ
[शिरास्खलितम् ]
सधिनिषेध---
३.इईके उ''ऊ पछी कोई विजातीय स्वर आवे तो
साधि थतो नयी अने 'C' के 'ओ' पछी कोई पण स्वर आवे
तो सधि थतो नथी.
पहावलि अरुणो-पहायलिअरणो [ प्रभापत्यरण]
वहू+अवजडो-बहुअवउदो [व-वगूढ ]
वणे+भइ-वणे अइ
[ वनेऽटति]
अहो अच्छरिअ-~अहो अच्छरिअ [अहो आश्चर्यम्].
४ स्तर पर रहेता क्रियापदमा स्वरनो सघि थतो नधी -
होइ+इह-होइ इह [ भवति इह भवतीह ]
५ उदृत्री स्वर पर रहेता प्रायः पूर्वना स्वरनो संधि यतो नथी
निसा अरो-निसारो [निशाक (च) र ]
१ खरनी साधे हेलो जन रोपाया पछी जे पर रेप रहे छे
तेनु नाम उवृत्त स्वर छ -(असयुक्त 'कादि' लार-पृ. १०)
२ फेटलेक ठेकाणे तो उत्त स्वर पर रहवा पप्प पधि थई
गएमेडे-
कुम्भारोम्भारो (युग्मकार )
चक आओ=चकाओ (चक्रवाक )
सार+माइपो-साराहणो (मतवाहन )
भु उरिशोन्मुरिमो (मएस )इत्यादि
'स्वरलोप- ६ स्वर पर रहेता पूर्ववती स्वरनो प्रयोगानुसारे लोप थाय छे तिअस+ईसो-तिअसांसो [ त्रिदशेश ] नीसास+उसासा-नीसासूसासा [ निश्श्वासोच्छ्वासी ] ७ पदी पर आवेला 'अपि' शब्दना 'अ' नो लोप विकल्प थाय छे केण+अविणवि, केणावि [ वेनापि.] पह+अपि-क्हपि, कहमति [क्थमपि ] कि+अर्पि-किं पि, क्मिवि [ किमपि ] त+अपि-त पि, तमवि [तदपि] .८ स्वरात पदधी पर आवेला 'इति' शब्दना 'इ' नो लोप थइ 'ति' ने स्थाने ति थाय छे तहा+इति-तहात्ति, तहति [ तथेति ] पिओ+इति-पिओ त्ति, पिउति [प्रिय इति ] पुरिसो इति पुरिसोत्ति, पुरिसुति [ पुरप इति ] ९ व्यननात पदवी पर आवेरा इति' शब्दना इ'नो लोपथाय छे किं+उति-किंति [ किमिति] इति-जति [ यदिति ] दिव+इति-दिट्ठति [दृष्टमिति] न जुत्त+इति-न नुत्त ति [न युक्तमिति] १० त्यदादि अने अव्ययथी पर आवेला त्यदादि अने अन्ययना आदि स्वरनो प्राय लोप थई नाय छे त्यदादि-त्यदादि पस+इमो-एसमो [एपोऽयम् ] १ जूओ पालि. स. नि. १ (क) पृ. ७५1 - २ जूओ "
त्यदादि-अव्यय अम्हे' एत्य अम्हेत्य । वयमत ]
अव्यय-अव्यय जइ एत्य जइत्य [यदन]
अल्यय-त्यदादि जइ अह जइह ( यद्यहम् ]
जड़ इमा नइमा [ यदीयम् ]
व्यजनसथि
विसर्ग-ओ
११ अकारथी पर आवेला विसर्ग 'नो भो थाय ---
अग्रत =अगओ।
अन्त +वित्रम्भ अतोवीसभो।
पुरत =पुरओ।
मन शिला गणोसिला।
मार्गत मग्गओ
सर्वत-सव्वओ।
म-अनुरवार
१२ पदने अते रहेला मारनो अनुम्वार घाय
गिरिम-गिरि । नरम-जल । फलम्=क्ल । वृक्षम्-वच्छ ।
१३ स्वर पर रहेता अन्त्य म नो अनुम्वार विकल्पे थाय के
उसभम् + अनि उसभ अनिअ, उसभमनिअ ऋषयमनितम
१ पालि प्र. स. नि. १-(प) पृ० १५-२+ ह
२ काई ठेकाणे डाल 'मनी नादिमा रहला 'म'नो पण
अनुस्वार भई जाय के जेमक वर्णाम्म वाम (पने)
३ जूओ पालि प्र० स० पृ. ७७-यौराहु-यमार (दाह)
धनर-नमेव।
प्रा १३
% 3D -- ङ, ब, ण, नअनुस्वार १४ व्यंजन पर रहेतां 'ड', 'ब', 'ण' अने 'न' ने स्थाने अनुस्वार थाय छ इ-पति-पति-पंती । पराङ्मुख परमुह-परनुहो। न-कञ्चुक-कचुक-कंचुओ । लान्छन-लंग-लंबणं । ण-पण्मुख छंमुख-छंमुहो । उत्कण्ठा-उकटा । न-विन्ध्य-विंझ-विझो । सन्ध्या संझा। (१) शौरसेनीमा 'इ' अने 'ए' पर रहेता अन्त्य 'म' पछी विकल्पे ।'ण' उमेराय छः जुत्ताहणं युक्तम् इदम् जुतं णिणं, जुत्तं इणं। जुवमिणं सरिस+इणं सहक्षम् इदम् - सरिस णिण, सरिस इणं । सरिसमिणं फि+ एअं किंणेदं फिमेद। किमे एव + एक एवम् एतत् - एवं णेदं, एवमे। एवमे अनुस्वार आगम. १५ नीचे जणावेला शब्दोमा अन्त्य व्यंनननो लोप थइ अंत्य स्पर उपर अनुम्वार थाय छः ऋधर इह । धान इहय । तत् तं। या पिहं । यत् नं । विष्वक् वीमुं । मम्यक् सम्मं । साक्षात् सागं। १ जूओ पा. प्र. सं. नि. २. पृ० ८.-भर भापति-चिर नामगि चिस्नायति। %3D किम् एतत् %3D ८ - । १६ नीचे जगावेला शब्दोना प्रथम स्वर उपर, द्वितीय स्वर उपर अने तृतीय स्वर उपर प्रयोगानुसारे (विकल्से के नित्ये) अनुस्वार थाय छः प्रथम स्वर उपर-अश्रु अंसु । कटिः ककोडो । कुड्मलम् कुंपलं । गुच्छम् गुंछं । गृष्टिः गिंठी, गिट्ठी। व्यस्रम् तंस । दर्शनम् दसणं। पुच्छम् पुंछ। पशुः पंसू । वुघ्नम् बुधं । मानीरः मनारो, मजारो। मूर्धा मुंदा । वक्रम्-वंकं । वृश्चिकः-विछिओ । श्मश्रु मंसू । द्वितीय स्वर उपर-इह इहं [इहमेगेसि ] प्रतिश्रुत् पडंसुआ । मनस्वी-मणसी । मनस्विनी मणंसिणी । मनःशिला मणसिला, मणासिला। वयस्यः वयंसो। तृतीय स्वर उपर-अतिमुक्तकम्-अणिउतयं, अइमुंतय, अइमुत्तयं। उपरि-अवरि । कोइ स्थळे मात्र छंदनी पूरवणी माटे पण अनुस्वार थाय छः देवनागसुवन्नकिन्नरगणसभूअभावच्चिए- देवनागसुवन्नकिन्नरगणस्सन्भूअभावच्चिए'। [ देवनागसुवर्णकिन्नरगणसद्भूतभावार्षिते ] १७ जे स्थळे स्वरथी शरु यतुं पद वेवडायुं होय त्या वच्चे 'म विकल्प उमेराय छः एका+एक एकमेकं, एकेक ( एकैकम् ) एक+एक्केण एकमेकेण, एकवण ( एककेन) अग+अगम्मि अंगमंगम्मि, अंगभगम्मि ( अङ्गेअङ्गे ) इत्यादि। १ जूओ पा०प्र० स० नि० १८ पृ. ७८, नि० २४-पृ०८१ २'श्रुतस्तव'ना छेल्ला कनु ची चरण है-, जयी पुक्खरयर ३-(मसिकमा) D - । अनुनासिरुविधान- १८ कार्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग अने पवर्ग पर रहेता अनुस्वारने स्थाने अनुक्रमे ड, न, ण, न अने म विकल्पे थाय छे' कार्ग-अङ्गणम् अंगण, अङ्गण । पक पको, पड्को । लड्नम् लपण, लङ्गण । शङ्ख सखो, सङ्खो । उपग---कञ्चुर पत्रुओ, कन्चुओ। रान्छनम् लछण, लन्छण। अजितम् अनिभ, अजिस । स या सझा, सम्झा वर्ग- F-कोक पाओ, इण्टओ । उत्कण्ठा उक्कठा, उक्कण्ठा । काण्डम् काड, काण्ड । पण्डः सढो, सण्दो । वर्ग--अन्तरम् अतर, अन्तर । पन्य पथो, पन्यो । चन्द्र चदो, चन्दो । वान्धव वधवो, बन्धवो । पवर्ग---म्पते क्पइ, कम्पह । वफइ, वम्फइ [ कासति ] क्दम्ब क्लयो, कलम्बो । आरम्भः आरभो, आरम्भो । 'अनुस्वार' लोप 0 १९ नीचे जणावेला शब्दोमा प्रयोगानुसारे (विक्ल्पे के नित्ये) अनुस्वारनो लोप' थाय छ त्रिंशत् नीसा । विंशति वीसा । सस्कृतम्-सक्कय । सस्कार --सकोरो । इत्यादि। वैकल्पिक- इदानी इआणि, इआणि । एक एव एव । १ म नियमने कोइ नित्य वाधरूपे स्वामारे छ २ ओ पा०प्र० म०नि०१३-पृ. ७। ३ नूझोपा. प्र. स. 17. २५-१० ८२ ॥ ४ सुरसायो किना-का।
कथम् कह कह ।
गत्यम् कास, कसं ।
किं कि, किं।
किंशुकम् केमुअ, किंसुभ।
दाणि दाणि, दाणिं [इदानीम्]
नून नूग, नूण।
MAHA
पासू पासू, पम् ।
मासलम् मासल, मसल।
मासम् मास, मस।
समुखम् समुह, समुह।
सिंह -सीहो, सिंघो।
इत्यादि।
प्रकरण ९
उपसर्ग-अव्यय निपात
उवसग्गा-
-परूवेइ (प्ररूपयति) पभासेइ (प्रभापते)
परा-परा--पराधाओ (पराघात.) परामिणइ (परानयते)
ओ, अव-अप-- ओसरइ, अवसरह (अपसरति)
ओसरिअं, आसरिअं (अपमृतम्)
सं-सम्----संखिवद (संक्षिपति) सखित्त (संक्षिप्तम्)
अण, अनु-अनु-अगुनाणद (अनुजानाति) अनुमई (अनुमति )
ओ, अव-अव–ओभरइ (अवतरति) ओआरो ( अवतारः)
ओआसो, अवयासो (अवकाश.)
.ओ नि, नी-निरओमलं, निम्मलं (निर्माल्यम् )
निग्गओ (निर्गतः) नीसहो (निस्सहः)
दु, दू-दुर-दुन्नयो (दुर्नयः) दूहवो (दुर्भग )
अभि, अहि-अमि-अभिहणइ (अभिहन्ति) अहिप्पाओ (अभिप्रायः)
वि-वि -सिन्ध(विर्वति)विणओ ( विनयः) वेणइआ (वैनयिकी)
अधि, अहि-अधि-अज्झायो ( अ याय.) अहीइ (अधीते)
सु, सू-सु-सुकरं (सुकरम् ) सूहवो (सुभगः)
उ-उत्-उग्गच्छइ (उद्गच्छति ) उग्गओ ( उदगतः ) उप्प.
विआ (आत्पविकी)
अइ, अति-अति-अईओ (अतीतः ) वइम्तो (व्यनिकान्तः)
अतिसओ (अतिशय.) असन्त (अत्यन्तम्)
गि, नि-नि-गिसो (निवेश.) सनिवेसो (सनिवेश.) निवि.
सह (निविशते)
१ फन् 'म' मानी पूर्वनाम 'निर' नो 'ओ'
पडि, पति, परि-प्रति-पडिमा (प्रतिमा), पतिहा (प्रतिष्ठा) परिहा (प्रतिष्ठा) परि, पलि-परि-परिवुडो (परिवृत ) पल्हिो (परिघ ) इ, पि, वि, अपि अवि-अपि--पिहेइ (पिदधाति) पिहिता (पिधाय) किंपि, स्मिवि, रिमपि (किमपि) कोइ. कोवि (कोऽपि) ऊ, ओ, उव-उप-आयो, ओज्झायो, उपायो (उपाध्याय:) -भावासो (आवास ) आयतो (आघान्त । धात्वर्थ वाघते कश्चित् कश्चित् तमनुवर्तते । तमेव विशिनष्ट्यन्योऽनर्थोऽन्य प्रयुज्यते ॥ अन्वयाइ (अन्ययानि) अहो, हहो, हा, है, नाम, अहह, हीसि,अहह अने अरिरिहो विगेरे अनेक अन्ययो छे अने ते वधानो प्रयोग सस्कृतनी पेठे प्राकृ- तमा पण थाय छे तो पण अहीं नीचे केटलाक विशेप अव्ययोनी नोध करीए छीए - अति अतिशय. अयि सभावना अईव अतीव विशेष अओ आधी, एथी. अक्टु अकृत्वा नहि परीने. अग्गओ आगळथी. अम्गे अग्रे आधे, आगळ. अङ्ग सोधन आज , अत अग्रत अग अज्ज अद्य १फा 'रका' पानी पूर्वना न 'पति' को 'परि' याय छे, प्रकरण ९ उपसर्ग- -अव्यय निपात उवसग्गा- प-प्र-पख्वेइ (प्ररूपयति) पभासेइ (प्रभायते) परा-परा--पराघाओ (पराघात.) परामिणइ (पराजयते) भो, अव-अप- ओसरइ, अवसरह (अपसरति) ओसरिअं, अवमरिक्षं (अपसृतम्) सं-सम्—संखिवइ (संक्षिपति) सखित्त (संक्षिप्तम्) अणु, अनु-अनु-अगुजाणद (अनुजानाति) अनुमई (अनुमति) ओ, अव-अव–ओभरइ (अवतरति) ओआरो (अवतारः) ओआसो, अवयासो (अवकाशः) .ओ नि, नी-नि-ओमलं, निम्मळ (निर्माल्यम् ) निग्गओ (निर्गतः) नीसहो (निस्सहः) दु, दू-दुर्-दुन्नयो (दुर्नयः) दूहवो (दुर्भग.) अभि, अहि-अभि- अभिहणइ (अभिहन्ति) अहिप्पाओ (अभिप्राय) वि-वि -विकुम्बइ(विकुर्वति)विणओ (विनयः) वेणइआ (वैनयिकी) अधि, अहि-अधि-अज्झायो ( अ यायः) अहीइ (अधीते) सु, सू-सु-सुकर (सुकरम् ) सूहवो (सुभगः) उ-उत्-उग्गच्छइ (उद्गच्छति ) उग्गओ (उद्गतः) उप- तिआ (आत्पतिकी) अइ, अति-अति-अईओ (अतीतः ) वइकंतो (व्यतिकान्तः) अतिसओ (अतिशय ) अनन्त (अत्यन्तम् ) गि, नि-नि-णिवेसो (निवेशः) सनिवेसो (सनिवेश.) निवि- सइ (निविशने) १ फक 'माय' शब्दनी पूर्वमा ज 'निर्' नो 'ओ' गाय छ,
१७
त्यदादि -अन्ययः अम्हे' एत्य अम्हेत्य (वयमत ]
अव्यय-अन्ययः जइ एत्य जइत्थ [यद्यत्र]
अन्यय-त्यदादिः जइ अह जइहं [ यद्यहम् ]
नइ इमा नइमा [ यदीयम् ]
व्यंजनसंधि
विसर्गो
११ अकारथी पर आवेला विसर्ग 'नो ओ थाय छ:-
अग्रत अग्गओ।
अन्त +विसम्भ. अंतोवीसंभो।
पुरतः-पुरओ।
मन.शिलामणोसिला।
मार्गत.-मम्गओ।
सर्वत सव्वओ।
म अनुरवार
१२ पदने अते रहेला मकारनो अनुम्वार याय छे -
गिरिम्-गिरिं । जलमू-जल । फलम्=फलं । वृक्षग-वच्छ ।
१३ स्वर पर रहेता अन्त्य 'म' नो अनुस्वार विवल्पे धाय :
उसभम् अनि उसभ अनिअं,उसममनिअं[पभमजितम्]
२ पालि प्र० स० नि. १-(ग) पृ. ६५-त+अह-तेह ।
२ कोई ठेकाणे डबल 'म्म नी आदिमा रहेरा 'म्' नो पण
अनुस्वार थई जाय छे. जेमके-वम्मि वणमि (धन)
३ जूओ पालि प्र० स० पृ० ७७-या पाहु-यमा (यदाहुः)
धन एव-नमेव ।
. 'स्वरलोप- १ स्वर पर रहेतां पूर्ववर्ती स्वरनो प्रयोगानुसार लोप थाय छः तिअस+ईसो-तिअसांसो [ त्रिदशेशः] नीसास उसासा-नीसासूसासा [ निश्श्वासोच्छ्वासौ ] ७ पदधी पर आवेला 'अपि' शब्दना 'अ' नो लोप विकल्प थाय छेः केण+अवि-केणवि, केणावि [ केनापि.] कह+अपि-'कहंपि, बह्मवि [कथमपि ].. कि+अपिं-किं पि, किमवि [ किमपि ] तं+भपि-तं पि, तमवि [ तदपि] .८ स्वरांत पदों पर आवेला 'इति' शब्दना । इ' नो लोप थइ 'ति' ने स्थाने ति' थाय छः तहा+इति-तहात्ति, तहति [ तथेति ] पिओ+इति-पिओ त्ति, पिउति [प्रिय इति] पुरिसो इति पुरिसोत्ति, पुरिसुति [ पुरुष इति ] ९ व्यंननांत पदों पर आवेला इति' शब्दना 'नो लोप थाय छेः किं+इति-किंति [ किमिति] *+इति–जति [ यदिति ] दिलु+इति-दिवति [इष्टमिति] न जुत्तं+इति-न जुतं ति [न युक्तमिति] १० त्यदादि अने अव्ययथी पर आवेला त्यदादि अने अन्ययना आदि स्वरनो प्रायः लोप थई नाय छ: त्यदादि-त्यदादिः एस+इमो-एसमो [ एपोऽयम् ] १जओ पालि. सं. नि. १ (क)पृ. ५५ । २जओ २६ पृ०८३1 1 " अरे अरति ( अरइ) रतिररह. अलम् साम, निषेध, पूरतु अलाहि अलहि निवारण, निषेध १३म् अवश्य अवसे । (अप०) अवशेन जवस अश्यम् अवरि उपरि उपर. अवो सूचना, पश्चाताप, सभापण, विम्मय,सताप, आदर, भय, अपराध, खेद, दुख, आनद. असड अमकृत् अनेस्वार. अथ आरभ. नीने पक्षातर अहता अधम्तान् अहवइ (अप०) अथवा अहव । अथवा अहवा जहा या अहो आम आवि ओहो (आश्चर्य) स्वीसार अहो ओम् आवि माहत्य प्रकर . आहछ आहरनाहर(अप०) पहिरेयाहिरे बलात्कार आवरोजावरो पादपूरक. आधी, एगी, वानयारभ. इ इभो इत - सप्रति. इक्कसरि इत्थत इच्चत्यो इयाणि एम्वहि(अप०) एस्मृतम् (१) इत्थत्वम् इत्यर्थ इदानीम ए प्रकारे. ए अर्थ, हमणा. " " निश्चय अही. सत्य. इह ऋषक ऋषर इतरथा विम् ईपत् अन्यथा or प्रश्न, गही. थोट इस " " उ तो. तु उत पक्ष्य-मो. उठ्बइप्स (अप०) उत्तिष्टविश उत्तरओ उत्तरत उत्तरसुवे उत्तरच उत उदाहु उदाहो उपि उपरि उरि उपरि ऊठवेश. उत्तरथी, उत्तरमा. आवती काल पछी. विकल्प, अपि. विकल्प. उपर. " " गहीं, क्षेप, विम्मय, सूचना . स एनन् ए.
१०७ एकदा एक वखत सप्रति एक आ एक्टर एक्रया एकमरिम एरसृतम् () इकसि (अप०)एक्श एकसि। एकवार एकसि। एक वसत , " एम यवत एक एक एक तरफी ऐक यम् एकप्रकार इक्कसि। एकसि इकसि एगइआ एक्दा एगया एगयो एक्रत एगततो एकान्तत एगज्म एतावता एतावता एयावया एत्थ अन एत्थ एत्यु एतह ( अप० )अत्र एतहे (अप०) इत एवं एटले अहीं " आथी, एथी, बाक्यारम एवं नकी, एज प्रमाणे व्येव' (शा०) । " १ ओ पा.प्र.पृ० ७८ नि: १७ वा+एव%3 वा यष। मु+ एक-तमु येव । न+एवन येय। ते + एवम्ले येर। घोषि+एकचोधि येव। सो+एव-सा यक १०८ न "तासु नि" तेनोन एम, एप्रमाणे एवम् जि (अप०) एवं एम्ब (अप०) एवमेव एभेर एम्बर (अप. एवमेव " एमन " ) अयि सभावना आ सनना, पश्चात्ताप क्याथी. कआ (अप) उ कहतिहु (अप०) उत्थई कुत्रचित् फल रल्यम् रहा क्यम् कोइ ठेकाणे काले केम, केवी रीते , " रहि । क्या रेम, रेव, किप, किम्व किह फिर )(अप०) कुत्र कहि । केतु ( अप०) सारत काहे काह (1) जि किंचि मिनिन् सालओ राठे राने, वखते क्यारे प्रश्न, गहा, पाई.
१०९ विन्नु प्रश्न. कृिणा पिण्णा विणो किर विल नक्की. . " पेटला रावा समय सुधी रियचिरम् स्यिचिरेण केवचिर केवञ्चिरेण केवल केहि (०) खलु खाइम (1) खाइ (अप०) एम तादर्यसूचन "ग्गहो केहि" स्वर्गने माटे नकी वळी अनर्थ-स्थलपूरणे. क्षेत्रमा, क्षेत्री नक्की गो गुणे खेत्तओ क्षेत्रत गायत गुणत गपभो गुणो घइ (अप०) धुर (अप०) अनर्थक-स्थलपूरक. घुघु-चेष्टानु अनुकरण, अने. नक्की. च चि घे चव यदि जा छुड्डु (अप.) जओ जेथी कारण के यत ११० जणि (अप०). जाण्ये, 'इव'नुं सूचन. (a). जत्थ यत्र ज्या-जेमा, यत्र ज्या-जेमां. जो. यदि यदि यथा नेम, जे रीते. जत्तु । (अप०) जति जदि जह जहा जेम, जेम्प, निम, निम्ब, (अप०) निह, निध) जहब नं . " " यथैव यत् यावत् जे, के. ज्यासुधी. जाम " " मामहिं )(अप०) नावजी “जुअंनुभं नेण ने मगिति प्रति यावजीवम् युतंयुतम् (१) येन ये जीवता सुधी. पृथक्पथर-जूदुजदं. जे तरफ. पादपूरक. संप्रति. झटिति शीघ्र-झट, न निषेध, गई अवधारण, ननु नम वाक्यालंकार, वितर्क, नमस्कार, केवल. अनतर. नवरम् विशेष, विपरीतता, ण ण (शौ०) णमो णवर गरि णवर णति णाइ णाई আসা पिच णूण गुण गो नेव (१) निषेध, " " नाना नित्यम् नित्य. नूनम् नको. तर्क. " नो तत् तद्यथा त निषेध, वाक्यारम, ते. नेमके. त्यारे, त्यारपठी, तेथी तदा तत " " - " तनहा तए तओ तनो ततो तणेण (१०) तत्य तेनहे (अप०) तप्पभिड तह नहा तादर्यसूचन. तत्र ला, तेमा. १ तत्प्रभृति तथा त्यारथी. तेम, नेवी रीते.
(अप०) तथा तेम, तेवी रोते नेम, तेम्व. तिम. तिम्व, तिह, विध तहेर तहि तहि तव तन तैम, तेवी रीने त्या-तेमा. " तावत् त्यामधी, वाश्यारभ, ताव ताउ ताम अप०) तावत् तामहिं) तिर्यक् तिरिय तिरो तीस तिर अतीनम् वाक. पाव अतीत तो. ते तरफ. त्या-तेमा. तादर्य सूचन तो (अप०) तेण तेन ते थु तत्र तत्तु (अप०) (अप०) तो तन,ता थू थूत् दर दिवारत दिवारात्रम् दिवा, दिआ, दिवा दिवा (अप०) तेथी, त्यारे. तिरस्सार, अधु, ओ. गत-दिवस, दिवस " दृष्ट, खराव, दुहओ द्विपा बने बानी बन्ने रीते, वे भागे. समुखीकरण, सत्रोधन. पणिय गुव ध्रुवम् ध्रुव, चौकस ध्रुवु (अप) " " न निषेध गू० नो नाण्ये, इव (अप०) नउ नाइ अर्थनु सूचन हि. नाइ. नावह ज्ञायते (1) नपी. निषेध , नित्य वित नत्थि नास्ति नहि नहि नाहिं (अप०) निच नित्यम नून ननम् नून नेव नव नो नो प्रत्युत पञ्चलिउ (अप) पगे प्रगे " नहि ज निषेध " भात मळे पड़ी पराइ (अप) " प्रतिरूपम् सरग्वं. पडित पतिरूव (पं) परिरूव ( परेयुः परम दिवसे. परम् परतु. " पर पर ( अप०) परमहं परसवे परितो परामुख, विमुख. परामवम् परन्धः परितः आवता परम दिवसे. चारे बाजु. परोप्परं। परम्परम् परम्पर. परुप्पर अवरोप्पर }अप (अप०) " अवरुष्पर पसरह प्रसा हटान्. पाडिक । प्रत्येक " प्रात सवारे. प्राय पाडिएक पानो पायो पाओ प्राउ प्राइव प्राइव पग्गिन प्राय , वणुं करीने. , (अप०) " अपिउन पि पुण सरनु, नेबु. पण. फरीने, वळी.
"कृतकरण. पुनरुक्तम् पुन. फरीने, वळी. पुणरुत्त पुणो पुणु (अप०) पुणरवि " फरीपण, वळीपण. आगळ. पुरओ पुरत्था पुरा पुर पिह पुनरपि पुरत पुरम्तात् पुरा पृथक पहेला, भूतकाळ. " प्रेत्य बले परलोके. निर्धारण--चुटी काढवु, निश्चय. वहार. बहिर्धा बहिद्धा बहिया " बहि फरीने. आमन्त्रण. मार्गत. मनाक् पाछळ. थोडु. भुजो भो! मगतो मणय मणारं (अप०) मणे माइ नामि मिव " मने माऽति विमर्श. निषेध. सखीनु सबोपन. नेबु बोड. मा+इव मृपा -- ११७ वे निश्चय, आमत्रण. वेव भय, वारण, विषाद, आमंत्रण सदा सदा. एक्वार सत् साक्षात् सद्य शन प्रत्यक्ष शीघ्र वीरे साथे सई सइ सम्व सजो सणिय सद्धि सपक्खि सपडिदिति सम समाणु ( अप. सम्म साम् बराबर सामे साथे सपक्षम् सप्रतिदिग् समम् समानम् सम्यक् म्वयम् " ठीक, सानु सय सया सदा जाते, पोने सटा बधे, बधेथी धे. सव्वओ सर्वत सर्वत्र " - सह साथे सम्वत्य सवेत्तहे ( अप०) सह सहु ( अप०) सहसा साय " अविमर्श, शीघ, त्वरी सहसा सायम् म्यान सया, सान दिाच मिय (अ) " सिया (आ) सुवत्थि मुवे स्वस्ति कल्याण. आवती काले. अब, वाक्यारभ. समाप्ति, म्बीकार. दासीनु आमत्रण. कोमलामंत्रण-हा. सेव हले (शो०) हता हन्त हन्त हन्त गृहाण-ले. हापिक् हार हाऽऽले ! हत्यम् हाहा हाहा खेद, विकल्प, पश्चाताप, निश्चय, मत्य, गृहाण. ग्वेद, निर्वद. क्षेप, सभापण, रतिफलह. एला-सग्वीनुं सकोग्न. एली-., शीघ्र- मेट. निश्चय. विम्मय, निद. खीखी (विदूषकनुं हसबु) निश्चय, वितर्क, विम्मय, मभावना. 'पुरुर' के 'मरर' अवा- जनु अनुसरण, तान, न्ठा, निवारण ना. हीमाणहे (शो.) हीही (शौ०) ह WE आ उपरात ते बीना सर्वादिशजन्य ( यता, कना विगैरे) अययो छे, तेगो उल्लेख तद्धित प्रकरणमा आवनारो छे. खरु विचारिए तो- " इयन्त इति सख्यान निपाताना न विद्यते निपात आगळ नणा या प्रमाणे देश्यप्राकृत ए, प्रस्तुत प्राकृतन एक अग तेमा जे जे शब्दोनो प्रयोग थएो छे ते वा शब्दा निपात' ने नामे ओळखाय छे. कारण के, ए शब्दोनी रचना, कोई नातनी व्युत्पत्ति के वर्णविवारनी अपेक्षा राखती नथी. लौकिक संस्त अने उच्चारण उपर निर्भर छे अहीं एवा-देश्यग्राकृतमा वाराता केलार-निपातो आपीए छीए: वितु, . अप-- अमुरा अगया अन्न (23) के अमाण्डम् अकाले दिन, पाणी आशिष *आऊ *आप्तीसा *उज्ज आप आशी उबर -बरी बलवान् रोड *त्यि उत्पल क्वचित् सन्टोत्यम् कुदम इमशानम मुध परसी मेम - कीदा *घायणो नपुमक हीजनो वयश्चत्वारिंशत् तेंतानीश *गोणो *गावी गायन चच्चिक म्यासा कुभारनुं एक जातनु उपररण गिति विधि उद पुश्वरी रिनार *जम्मण जन्म झसुर ताम्बूरम् णामुकसिम कार्यम् णेलच्छो पण्टर *तेआलीसा *तेवण्णा निपञ्चाशत् ते () पन तिमिच्छि पुष्पनी रज *द्विद्धि पिपिर धिरत्यु धिगम्तु निहेलण नियनम् पर. पक्लो पतरल ममर्थ पञ्चावण्णा पञ्चपञ्चाशत् पचावन. पणपना परही कर्पास सपास *१डिसिद्धी॥ प्रतिस्पर्धा पाडिसिद्धी * भिमोरो हिमोर *बदलो बलीवर्ड बळद *भट्टिओ भर्तृतः विष्णु *मा निगानीवाल्यान्दो सम्मा शन्दो माये समानना नगर के पाप्प रजः " युत्सर्ग भवतो भवान् तमे बहिद्धा बहिर्धा मैथुन, बहि মী मावा महन्तो महान् मुवहइ उद्वहति लज्जालुइणी लज्जावती राजवतीनो छोड, विउसग्गो त्याग वोसिरण व्युत्सर्जनम् वम्हलो अपस्मार रोगविशेष-वाई वडयर बृहत्तरम् वढेरु वदो वर सक्खियो साक्षी साहुली शाखा अपभ्रशमा आवता केटलाफ निपातो- देश्य शब्दो अप्पण आत्मीय आपण. कोड्ड कौतुक कोड. खेड्ड कीडा जाइडिआ यष्टिका अकट दफरि অস্তন दडवड अवम्वन्द दडपड द्रवछ भय दृष्टि खेर, रमत में ने जोयु. मा. १६
१२२
नवख
नवक
नोखु, नबु. हि. अनोखा.
नालिस
मूद
निचट्ट (नित्यस्थ-निचट्ठ) गाढ.
मभीस
मा भैषी मा वीश-भय न पाम.
रखण्ण
रमण
रम्य.
(वट')
विद्याल'
असाधारण
(हे आल1) हे सखी.
आ उपरात बीजा पण देश्यप्राकृत शब्दो छे अने ते अनेक
छ. ते माटेनी विशेष माहिती, हेमचद्रकृत 'देशीनाममाला' ने
जोवाथी मळी शके तेम के आवा पेटला शक्दो पड्भापाचद्रिका'
मा पण नोंधाएला छे.
वटाळ, वावु.
१ जा गन्दनो विशेष माघ स. विपरिवर्त' के परिवत' साथे
हाइ सके यदगा, पलगत्रु जने वटगबु ए त्रणेनो उत्पत्ति एक
सरवी लागे छे,
नाम प्रकरण १०
नामना प्रकारो
संस्कृत भाषामा नामोना बे विभाग के. जेमके-स्वरांत नाम
अने व्यजनात नाम. पण प्राकृतभाषामा तेम नथी. कारण के, व्यं-
जनात नाममात्र कोइ रीते म्वरात थया सिवाय प्राकृतभाषामा
प्रयोनातुंज नथी, एथी प्राकृतमा वधा नामो स्वरात होय छे माटे
प्राकृत नामोनो विभाग आ प्रमाणे छे.
अकारात, आकारात, इकारात. ईकारात, उकारात, उकारात,
एकारात अने ओकारात. [ संस्कृत ऋकारान नामो प्राकृतमा रूपा-
ख्यानने प्रसंगे अकारात, आवारात, इकारात के उकारात थता
होवार्थी एने उपरनी गणत्रीमा जूटा गण्या नथी. ]
नामना अन्त्यस्वरनो फेरफार.
१ • ग्रामणी,' 'खलप' एन प्रकारना बीना अनेक शब्दो
(सेनानी, सुधी; कारभू, कटपू वगेरे ) नो अन्त्य स्वर रूपाल्यानने
प्रप्तगे हूस्व थाय छे.
२ नान्यतरजातिमा वपराता नामोनो अन्त्य दीर्घ स्वर
हूस्व थाय छे.
नामनी जातिओ
प्राकृत नामोनी नातिओ सस्कृत नामोनी नेवी छे. ने विशेषता
छे ते आ प्रमाणे छः
१ नकारात अने सकारात नामो प्राकृनमा नरनातिना गणाय छे.
२ तरणि, प्राप् अने शरत् एत्रण नामो प्राकृतमा नजातिमा
३ नेत्रवाचक शब्दो तेनी खास जाति उपरात नरजातिमां पण वपराय छे. ४ वचन, विद्युत्, कुल, उन्दस् माहात्म्य, दुःख अने भाजन वगेरे शब्दो पोत पोतानी सास जाति उपरात नरनातिमा पण रहे छे. ५ गुण. देव, विंदु, खड्ग, मण्डलाय, कररुह अने वृक्ष वगेरे शब्दो पोतानी जाति उपरात नान्यतरजातिमा पण वपराय छे. ६ गरिमन्, महिमन् वगेरे इमन् ' छेडावाळा नामोने अने पीणिमा (पीनत्व), पुप्फिमा ( पुप्पत्व ) वगेरे ‘इमा ' छेडावाळा नामोने तेओनी खास जाति उपरात नारीजातिमा पण समजवाना के. ७ अञ्जलि, पृष्ठ, अक्षि, प्रश्न, चौर्य, कुक्षि, बलि, निधि, विधि, रश्मि अने ग्रन्थि वगेरे नामों पोत पोतानी जाति उपरात नारी- जातिमा पण वपराय छे. वचन-विभक्तिओ १ गूजरातीनी पेठे प्राकृतमा द्विवचननो प्रयोग न नथी, तेने बदले सर्वत्र बहुवचनधी काम चलावाय छे अने द्वित्व' अर्थनी विशेष स्पष्टता माटे बहुवचनात नामनी साथे तेना विशेषणरूपे विभक्त्यत द्वि' शलनो व्यवहार थाय के. २ चतुर्थी अने पष्ठी , बने विभक्तिना प्रत्ययो एक सरखा होवाथी चतुर्थी विभक्ति, पष्ठी विभक्तिमा समाई जाय छे तो पण कोइ स्थळे अर्थविशेपमा नाममाननु चतुर्थीनुं एकवचन संस्कृतनी नेवु पण यतुं होवाथी ए बने विभक्तिओने न्दी जदी गगावेली छे एपी विभक्तिओनी सख्यामा मारुत अने सस्कृतनी समानता छ.
१२७ प्रत्ययो नीचे जणावेला प्रत्ययो नरजातिना अने नान्यतरजातिना दरेक अकारात नामोथी योजी शवाय छे. प्राकृत भाषाना प्रत्ययो विभक्ति, एकवचन. बहुवचन. पदमा बीआ म् . ० ण } तइआ चउत्पी ण छठ्ठी पचमी तो. ओ, उ, हि, तो, ओ, उहि, हिंतो, हिंतो, सुतो. सत्तमी सि, म्मि, सु सत्रोहण ( सबोधन) . ० शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभ्रंशमा प्रत्ययोनी विशे पता आ प्रमाणे शौरसेनी दो, दु. पचमी मागधी . पदमा पउत्थी ह पसाची पचमी तो, तु अपभ्रश उ, ० पटमा ० बीआ 0 उ, ० ण, म हिं सु, स्मु, हो, . तइआ चउत्थी छट्ठी पचमी सत्तमी सबोहण tho 2 d०५ . उ, ० प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो ज्या ज्या प्राकृत प्रत्ययोमा • छे त्या आ प्रमाणे समजवान के पढमा---पुलिंगी प्रत्येक अकारात नामनु प्रथमानु एकवचन ओका रात थाय छे, अने वहुवचन आकारात थाय छे बीआ--पुलिंगी अकारात नामनु द्वितीयानु बहुवचन आगारात अने एकारात थाय छे. पउत्थी--मात्र तादीने सूचववा माटे अारात नामनु चोथीनु एक्वचन मस्कृतनी जेबु पण थाय छे मात्र एक विध शब्दथी तादर्थ्य अर्थमा सस्कृतना आय' प्रत्ययनी नेवो वधारानो आइ' प्रत्यय पण लागे छे. आपप्राकृतमा तो केटलेक स्थळे आ आइ' प्रत्ययने बदले आए प्रत्यय पण वपराय छे अने ते हरकोई शब्दने लागी , . - . एके छे.
१२७
पनी-अकारात नामनु पचमीनु एक्वचन आकारात पण थाय छे,
सत्तमी-अारात नामनु सप्तमीनु एकवचन एकारात पण थाय छे.
सबोहण-पुलिंगी अवागत नामनु सवोधननु एकवचन आकारात
अने ओकारात थाय छे तथा सोधनमा विभक्ति
विनानु ए अकारात नाम पण वपराय छे अने सबोधनना
बहुवचनना रूपो प्रथमा (पढमा) नी जेवा थाय छे.
प्रत्ययो लागता नामना मूळ अगमा यता फेरफारो
तइया-तृतीया विभक्तिना प्रत्ययो पर रहेता अकारात नामना
अन्त्य ''नो'ए'थाय छे
पंचमी-पचमीना एक्वचनन पूर्वना अकारात नामना अन्त्य
अपनो आ थाय छे अने बहुवचनना स्वरादि
प्रत्ययो पर रहेता पण अत्य 'अ'नो 'आ' थाय छे.
पचमीना बहुवचनना 'स' अने 'ह' थी शर थता प्रत्ययो
पर रहेता अकारात नामना अन्त्य 'अ' नो 'आ। अने
'ए' थाय छे.
तइया
तृतीयाना एकवचनना 'ण' उपर अने पष्ठीना
सत्तमी
तथा सप्तमीना बहुवचन उपर अनुम्वार विकल्प थाय छे
उठी-उछीना बहुवचननो प्रत्यय पर रहेता पूर्वना नामनो कोइ
पण अन्त्य स्वर दीर्घ थाय के
मत्तमी--सप्तमीना एक्वचननो सि' प्रत्यय लगता मूळ अगना
छेक्टना स्वर उपर अनुस्वार याय के आसि ' प्रत्ययवालु
रूप विशेषे करीने 'आपप्राकृतमा वपरायु के
"एयानता सध्यावती रोगसि"-बा. प्र. शु. प्र. ज.
"लोगास परमदसी' आ० प्र० • तू ब.उ. २,
' सप्तर्माना बहुवचननो प्रत्यय पर रहेता अकारात नामना अन्त्य 'अ'नो'ए'माय छे शौरसेनी-प्रत्ययने लगता नियमो पचमी-प्राकृतमा पचमीना एक्वचनना प्रत्ययो लागता मूळ अगनो जे फेरफार जणाव्यो छे ते शौरसेनीमा पण लागु थाय छे बाकी बधा शौरसेनीना रूपास्यानो प्राकृतनी प्रमाणे . मागधी-प्रत्ययने लगता नियमो पढमा-ज्या शून्य छे त्या मागधीमा पुलिगी अकारात नामनु प्रथमानुजने सरोधननु एकवचन 'एकारात' थाय छे माग- धीनु आ एकारात रूप आपनाकृतमा पण वपराएलु छे अने आ एक ज रूपनी वपराशने लीधे ए आर्पप्राकृतने पण । अर्धमागधी तरीके भणाववामा आवेलु छे' चउत्थी मागधीमा चोथी अने छी विभक्तिमा अारात के छठी , आकारात नामथी एकवचनमा 'ह' अने बहुवचनमा हैं। प्रत्यय विक्ल्पे लागे छे अन ते बन्ने प्रत्ययो रागता पूर्वना म्वरनो दीय थाय छे वा ना बधा मागधी रूपो शौरसेनी प्रमाणे समनी लेवाना छे उपर जणावेलो बहुवचनने ' हैं ' प्रत्यय माकृतमा पण वापरी शकाय रे पैशाची-प्रत्ययन लगता नियमो पचमी---शौरसेनीमा पचमीना एक्वचनमा ने फेरफार जणान्यो के ते पैशाचीमा पण समजवानो छे वाकी बधा पैशाचीना x x x रूपान्यानो शौरसेनी प्रमाणे समनवाना रे १ भो हेमा मा. अ.1, पा., १.
पदमा
अपभ्रंश-प्रत्ययने लगता नियमो
ज्यां शून्य छे त्या अपभ्रंशमा प्रथमा अने द्वितीया
'बीआ । विभक्तिमा । एकवचन अने बहुवचनमा ) अकाराव नाम
आकारात थइने वपराय छे अने एमने एम पण वपराय
छे. तथा प्रथमाना एकवचनमा पुंलिंगी अकारांत नाम
मारुतनी पेठे ओकारात थइने पण वपराय छे.
चउत्थी, ज्या शून्य छे त्या मूळ अंग जेमनु तेम वपराय
छठी छे अने दीर्घात थइने पण वपराय छे.
सतमी-ज्या शून्य छे त्या मूळ अग इकारात अने एकारात थहने
वपराय छे.
.
संमोहण-ज्या शून्य छे त्या संबोधनना बधा रूपाख्यानो प्रथमा
विभक्ति वा समनवाना छे.
अपभ्रंश-प्रत्यय लागतां अंगमा थता फेरफारो
तइया-तृतीया विभक्तिना प्राकृत प्रत्ययो लागता मूळ अंगमा के
प्रत्ययोमा ने फेरफार थाय छे ते ज फेरफार अपभ्रंशना ए
प्रत्ययो लागता पण समजवानो छे अने ए उपरात तृतीयाना
बहुवचननो प्रत्यय लागता मूळ अंग आकारात थाय छे
अने एमनु एम पण वपराय छे.
पउत्थी । चोथी, पाचमी अने उट्ठी विभक्तिना एकवचनना
पंचमी (अने बहुवचनना प्रत्ययो लागता मूळ अगना अत्यस्वरनो
दीर्घ विकल्पे थाय छे तथा सातमीना बहुवचननो न
सत्चमी
प्रत्यय लागता पण मूळ अगमा पूर्वोक्त फेरफार थाय छे.
सबोहण-अपभ्रंशन ( एकवचन अने वहुवचनर्नु) संवोधनी रूप
प्रथमानी पेठे समनवानुं के अने बहुवचननो 'हो' प्रत्यय
लागता मूळ अगना अत्य म्वरनो ढीर्घ विकरूपे थाय ने
पुलिग अने नपुसकलिंग अकारांत गन्दनां प्राकृत रूपाख्यानो (पलिग-नरजाति). वीर एकव० बहुव० १० वीरो, (वीरे) वीरा. बी. वीर वीरे, वीरा. त० वीरेण, वरेणं वीरेहि, वीरेहि, वीरेहि. २०३० वीरस्स वाराण,वीराण, (वीराहे.) ता. २० वीराय, वीरस " " १ २ ४ 'वीर मां पालिरूप वीरो वीरा ( वीरसे). वीर धीरे. वारेन चाहि, चौरभि वागय बीयन. नारस योग, वीरस्मा, धीरोद, बोरोभि. वीरम्दा रस्स पोरान. वीरे, वारेसु. धारिम, ५ ८ म. गौर, गि बाग. मोपाय नायकल वायत 'युद्ध' मन्द मन रूपी उपरना रिमो. ()ना निशानमो नारा स्पो गरिक, २ + - वार (7प्रारण ८, म-अस्मार-१२) औरतो, वीराओ, वीराउ वीरादि, वीराहितो वारा म. वीरसि, वीरम्मि, वीरे 'सबो० वीरो, (वीरे) वीर, पीरा वीरत्तो, वीराओ, वीराड, वीराहि, वीरेहि, वीराहितो, वीरेहितो, वीरामुतो, वीरेसुतो वीरेमु, वीरेन २ वीरा. • वह ' ( वध) शब्दना रूपो वीर' शब्दनी नवाज समनी रेवा जे विशेष ते आ प्रमाणे ता. च० वहाय, वहाइ, वहम्स (एकवचन) आर्पप्राकृतमा जे शब्दने ता० चतुर्थीनो सूचा । आप प्रत्यय लागेलो तेनु रूप आ प्रमाणे छः ता. च० मोक्स-मोक्खाए,' मोक्खाय, मोक्रवम्स ( एक्वचन ) हिअय--हियाए' हिअयाय, हिअयम्म " १ चूओ प्रकरण २, दीर्घस्वर-हे स्वस्वर- २ यो प्रकरण , म अनुस्वार १२ (रिपण) ३ ओ मूरतागपूर प्र. शु. १० १० न. उ० गा...- "उयसम्गे नियामित्ता आमोक्साप परिश्वए ना दत्वादि हो नाचारागसूत्र प्र. प्र० जायेगे अनिणाए वहात, मसार साणियार दिययाए" इत्यादि
"
ना० न० मस---मसाए मसाय, मसम्स (एकवचन)
अनिण--अजिणाए, आजिणाय, अनिणस्स
ए प्रमाणे अरिहत (अर्हत् ), धम्म (धर्म), गधव्व (गन्धर्व),
मणुस्स (मनुप्य), पिसाअ (पिशाच), नायपुत्त ( ज्ञातपुर ) सुगत,
गोण, गउअ, गाअ (गो), मिसअ (भिपक ), सरज (शरत् ),
सघ, नर, सुर, असुर, उरग (-य), नाग (-2), जक्ख (यक्ष),
किंनर वगेरे बधा अकारात पुलिंग शटोना रूपो समजी लेवा,
वीर (शौरसेनीरूपों।
वीरादो, वीरादु
बाकी वधा प्राकृत प्रमाणे.
प० ए.
वील' ( वीर ) ( मागधीरूपो)
वीले
वीलाह वोल्म्स वोलाह, वीलाण, वीलाण
बारी या शौरसेनी प्रमाणे
वीर (पैशाचीरूपों)
५० ए० वीरातो, वीरातु
बानी वधा शौरसेनी प्रमाणे.
१ शौरसेनी, मागवा बगेरेना रूपो प्रायाधी जूदा थाय के
तेन अहीला
२ जूनो पृ० २५ र-ल
३ पैशाचामा प्रत्यना उपया । कर [ यग्यते (पृ. २३)
ण ननयमने जो ३ योग्+ण-वाग्न
६ वीर ण रागन
वहुव० वीर, वारा १ ३ . सपळी प्रक्यिा उपर प्रमाणे छे जे काइखास भेट ते आमनने १३३ वीर (अपभ्रशम्पो) एक्व० वीर, वीरो, वीर, वीरा वीरु, वीर, वीर, वीरा. वीरा, वीरेण, वीरेण, वीरेहि, वीराहि, वीरें. वीरहिं वीरस्तु, वीरासु, वीराह, वीरह, वीरसु वीर, वीरा वीराहो, वीरहो वीर, वीरा वीराहु, वीरहु, वीराहु, वीरहु वीराहे, वीरहे वीरि वीरे वीराहि, वीरहिं ८ (स.) वीरु । वीरा वीराहो । वीरहो। वीर । वीरा! वीर । वीरा। । वीर ' शब्दना उपर जणावेला वधी जातना रूपो प्रमाणे प्रत्येक पुलिंगी अकारात शब्दना शौरसेनी रूपो, मागधीरूपो, पेशाची रूपो अने अपभ्रश रूपो समनी लेवाना छे अकारात शब्दना प्राकृत रूपारयानो ( नपुसकलिंग- ना-पतरजाति) आरात नपुसर नामोना वधी नातना रूपान्यानो बनावगना १ वार+-बीक-नो स्वरलाप-पृ. ..
प्रत्ययो णि, दै.इ. ५० बी० " "" . १ अकारात नान्यतरजातिना नामने लागता उपर जणावेला बधा प्रत्ययो कोई पण नान्यतरजातिना नामने लगाडवाना रे २ शौरसेनी', मागधी अने पेशानीमा पण ए ज प्रत्ययोनो उपयोग . याय छे ३ 'णि, इ, इ ' प्रत्ययोनी पूर्वना अगनो अन्त्य म्वर दी थाय छे. ४ सवोधनमा-ज्या शून्य छे त्या-एकवचनमा नान्यतर नामोनु मूळ रूप न वपराय छे अने बहुवचन, प्रथमानी जेबु थाय छे. एकव० बहुव० प० बी० कुलाणि, कुलाइ, कुलाइ. " " " १ शौरसेनी, मागधी, पैशाची जने अपभ्रशना रूपाख्याना करती बखते ते ते भापाना स्वरविकार जने व्यजनविकारना नियमो तरफ लक्ष्य राखवु जोईए. २ नपुसकलिंगी अकारातना पालिरूपो कुल ला, न बी० ल, कुलान रोष 'वीर' ना पालयोना या-ओ पालिप्र. प्र. ११२, कीलिंग 'चिन' ३ उल+म्त-1ो म पनुवार - १. 3. 3.
बाकी बधा रूपो ते ते भाषा प्रमाणे वीर'नी जेषा थाय छे. ए रीते गुण, देव, सोमव (सोमपा), गोव (गोपा), कररुह, 'सिर (शिरस् ), नभ, नह (नभस्), दाम (दामन्), सेय (श्रेयस्), वय (वचस्-वयस् ), सुमण ( सुमनस् ), सम्म (शर्मन् ), चम्म (चर्मन् ) वगेरे शब्दोना रूपो नाणी लेवाना छे १ अपभ्रश नान्यतरजातिना रूपाख्यानोनी अपभ्रशमा जे खास विशेषता छे ते आ प्रमाणे प्रथमा अने द्वितीयाना बहुवचनमा प्राकृतनी पठे प्रण प्रत्ययो न लागता मात्र एक 'इ' प्रत्यय लागे छे अने एनी पूर्वनो स्वर विकल्पे दीर्घ थाय छे २ जे नान्यतर शब्दने छेडे 'क' प्रत्यय लागेलो होय तेने प्रथमा अने द्वितीयाना एकवचनमा 'उ' प्रत्यय लागे छे. १ने शब्दो 'अस् भने जन्' छेडायाला छे ते प्रातमा नरजातिना गणाय छे (पृ. १२३-नामनी जातिओ) पण पालिमा एवा अम् छेडावाळा गु-दोने (मनोगणने) नरजातिना अने मान्यतरजातिना गणवामा आव्या छ पाल्प. पृ० १३३-१३४ अने तेनु पिण प्राकृतभा भने पारिमा ए 'स् भने 'भन्' छेडावाला गुब्दोना उधा रूपा 'वीर' अने कुल 'नी का थाय में तो पण आपप्राकृतमा अने पालिमा ए शब्दोना केटलाफ रूमो 'वीर' भने 'कुल' थी उदा पाय छे जमक मण, मन (मनम् ) " . आषा. पाल नृ. ५. ए. मनसा त० ए० मणसा ५. ए. मणमा सस्कृत (मना) (मनस) रूपाख्यानो १ 'कुल, कुल, कुला कुलाई, कुलई. - " " च.छ. ए. मनसो स. ए. मनसि च.छ. ए. मनसो स. ए. मणांस (मनसः) (मनसि) आर्षमा. कम्म (कर्मन्) पालि संस्कृत नृ० ए० कम्मना, कम्मुना तृ. ए. कम्मणा, कम्मुणा (कर्षणा) च. छ० ए० कम्मुनो च. छ. ए. कम्मुणो (कर्मणः) पं. ए. कम्मना, कम्मुना ५० ए० कम्मणा, कम्मुणो (कर्मणः) स. ए. कम्मनि स. ए. कम्मणि (कमर्माण) उदाहरण-" सिरसा, मणमा मत्थरण दामि "-मुनिवदनसूध. "मणास काट गुलियं खाइ " प्राकृतकथासग्रह-उदायननी कथा पृ. १२,५० २२. कम्मुणा बभगो होइ कम्मुणा होइगतिओ"- उत्तयध्ययन अ०२५, गा० ३३. आ आप स्पोनी सिदिने माटे आ. हेमचंद्रे "शेष समृतवत् सिदम् " (८-1-.४८) ए सूबने रचेलु के. 'स्थामन्' वगेरे शब्दना पालिरूमानी विशेषता माटे जूयो पालि. म.पृ. १३५, ०९१-९२. आपपारतमा पन केटलेक स्थळे 'स्थामन् ' यारे शन्दना रूपी ए पारिम्पोनी या वरराएला के. सासर-I-ARE मी--पदमारी - १२९. ॥
१३७ कुलों (कुलक) १ कुलआई, कुलअइ. १ " २ " बाकी बधों रूपो वीर' ना अपभ्रंश रूपोनी पेठे समजी लेवाना छे. " अकारांत-सर्वादि-शब्द नांचना शब्दोने । सर्वादि' तरीके गणवामा आवे छेः सव्व-अप० साहु, सव्व (सर्व), वीस ( विश्व ), उह, उभ (उभ), अवह, उवह, उभय (उभय), अण्ण, अन्न (अन्य), अण्ण (न) यर (अन्यतर), इअर (इतर), कयर (कतर), कइम (कतम), गेम, नेम (नेम), सम, सिम, 'पुरिम, पुव्व (पूर्व) अवर (अपर), दाहिण, दक्खिण (दक्षिण), उचर, अवर, अहर (अधर), स,मुव (स्व), अंतर, ते (तद्), ज ( यद् ) अमु ( अदस् ), इम (इदम् ), एत १ कुल्थ +उ = कुलउ-जूओ स्वरलोप-६ पृ. ९६. २'उवह' रूप आ. हेमचद्रने समत नथी-हे. प्रा. व्या. ८-२-१३८ पृ. ६५. आपप्राकृतमा 'उभयोकाल' प्रयोगमा 'उभय' ने बदले 'उभयो' के 'उभओ' ("उभयोकाल पि अजिअसतिथय"- अजितशातिस्तवन गा० ३९) रूप पण वपराएलु छे. ३ जूओ पृ० ८७ शब्द-सर्वथा विकार. ४ जेम सस्कृतमा 'तद्' नी जेबु 'त्यद् ' पण एक सर्वनाम छ तेम ए सर्घनाम पारिमा पण छे, एना रूपो 'त'नी जेवा थाय छे त्यो त्ये ये निपण. प्रास्तमा तो आ 'त्य' सर्वनाम मळनु नथी ५ ाा शब्दमा रूपा उमगत शब्दोगा प्रसग जावनाराज पारिप्र० पृ. १४३ नु छेस्ट, (एतद् ), इक, एक, एग, एअ (एक), ई (द्वि) तुम्ह (युप्मद्), अम्ह (अस्मद् )कि, अप० काई, कवण (किम् ), भवन्त ( भवतु). १ सर्वादि शब्दो विशेषणरूप होवाथी प्रणे लिंगे वापरी शकाय छे. २ 'अमु' अने 'दु' शब्द सिवाय ए वधा सर्वादि शब्दो अकारात छे, तेथी तेना वधी जातना वधा रूपाख्यानो पुंलिंगमा 'वीर' अने नपुसकमा 'कुल' नी नेवा समजवाना छे. ज्या जे विशेषता छे ते आ प्रमाणे छ ३ प्रथमाना बहुवचनमा सर्वादि शब्दोना अन्त्य 'अ'नो 'ए' थाय छ अने ए एक ज रूप प्रथमाना बहुवचनमा वपराय छे. ४ सर्वादि शब्दोने छट्ठीना बहुवचनमा । एसि' प्रत्यय विकल्पे लागे छे. ५ सर्वादि शब्दोने सहमीना एकवचनमा त्य' 'सि' 'हि' अने 'म्मि' प्रत्यय लागे छे. रूपाख्यानो (नरजाति) 'सब (प्राकृत) सव्वे, सव्वा. एकव० वहुव० १०-सव्यो (सव्वे) सके. बी०-सव्वं १ सख्यावाचक शब्दोना प्ररणमा 'उभ' अने 'दुशन्दना रूपो आवदो. २ जूलो पृ० १२१ भवतो। ३ सय ' शब्दना पालि रूपो मारे मी पृ. १३. उपरनु पेटु टिप्पण, सास भेजा है ५. तथा स. रहुरसवे. सम्वेस, सध्यमान. तथा पवमीना एकवचनमा ' वाग'नी पेठे 'सच्या' ने सपामाना एक- यमनमा वीरनी 'धेस यता नथी. " त०-सवेण, सव्वेण च००-सव्वस्त प०-सव्वत्तो, सवाउ. सन्याओ, सव्वाहि सव्वाहितो, सवेहि, सव्वेहि, सव्वेहि. सन्वेसिं, सव्वाण, सव्वाण, (सव्वाह) सव्वत्तो, सव्वाउ, सव्वाओ, सव्वाहि, सव्वेहि, सव्वाहितो, सव्वेहितो सव्वामुतो, सव्वेसुतो सव्वेसु, सव्वेसु. सव्वा स०-सव्वत्थ, सव्वस्सि, सव्वहिं, सव्वम्मि - सव्व (शौरसेनी) शौरसेनीमा · सव' शब्दना बघा रूपो ‘सव्व ' ना प्राकृत रूपो वा छे पचाना एकवचनमा विशेषता छे ते 'वीर' ना शौरसेनीरूप प्रमाणे समजवी. शव्य (मागधी) प्रथमाना एक्वचनमा अने छट्ठी विभक्तिमा 'शव' ना मागधी रूपो 'वीर'मा मागधी रूपो नेवा जाणवा अने बाकी बधा सन्च' ना शौरसेनी रूपो प्रमाणे समनवा. २ जूओ १० १३२ १ ओपृ. १३२.
सच (पैशाची) पंचमीनू एकाचन : वीर' ना पैशाचीरूप प्रमाणे अने वाकी बधा सत्व' ना शारसेनी रूपो प्रमाणे. सबु, सलो, २ ३ सब, साह (अपभ्रश) एकव० वहुव० सव्वे, सन्व. सव्वा सत्व, सन्वा सव्वु, सच, सव्व, सव्वा. सवा मवेण, सवेण, सव्वेहि, सवें मन्नाहि. सव्वहिं. सवम्सु, सन्नासु, सव्वेसिं, सव्वसु, सव्वह, स वाह, मन्वहो, सव्वाहो, मव्व, सन्या. सव्व, सव्वा सव्वहा. सन्वाहा सन्वहु, सब्वाहु. सवहि, सवाहिं सव्वहिं, सव्वाहि. वाकी बीना वधा सर्वादिओना रूपो पण ए सव' (प्राकृत, शौरसेनी) शव्व ( मागधी) अने सब ( अपभ्रश ) नी पेठे करी लेवानां छे. तो पण केटराक प्रसिद्ध प्रसिद्ध सर्वाढिना रूपो नीचे प्रमाणे आपीए डीए १ जूओ पृ० १३२. २ अपभ्रगमा 'सन्च' ने स्थान 'मार' पद पण पगय छे जने पना रथा स्पो'मर' नर उपप्रा मनी पेठेशाय रे, १४१ णं (तत्) or ७ ताओ, ताउ, न, स, सो ( मा० शे) ते, णे २ ते, ता, णे, णा ३ तेण तेण, तिणा तेहि, तेहि, तेहि जेण, ण णेहि हिं, णेहि (पे० नेन) ४-६ तस्स, तास (मा० ताह) तास, तेसिं, ताण, ताण, णम्स सि, णाण, णाण, से सिं (मा० ताह) तो, तम्हा, ततो ततो, ताओ, तार ताहि, ताहि तेहि, ताहितो ताहिंतो, तेहितो नामतो तेमुतो ता १० मा० तादो, तादु) (पै० तातो, तातु) १ केटाक प्रयागाने जनुसारे त न बदले छे हे० प्रा० च्या०८-३-७०-पृ० ९ ना पालिरूपा माटे नो पालप्र. पृ० १४१-१४२ त (तद् ) शब्द सो त,न ते, ने तेन नन तोह, ताभ, नाह, नाम इत्याद • ा तास' न बदले ' से ' रूप पण कोइ वैयाकरण वापरे हे० प्रा० च्या०८-३-11-पृ. २७ (शो ण पण चपराय त त मा. त० णत्तो, णत्तो, जाओ, णार, णाओ, गाउ, णाहि, णाहितो, णा ७ ताहे, ताला, तइआ तम्मि, तस्ति, तहि, तत्थ, णम्मि, गम्सि, हिं, णत्य जाहि, णेहि, णाहितो, हितो, णासुंतो, णेसुंतो. तेसु, तेमुं, J णेसु, णेमु. • त ' शब्दना प्राकृतरूपो साथे शौरसेनी, मागधी अने पैशाचीनां पण विशेष रूपो जणावेला छे. सव्व ना अपभ्रंशरूपोनी पेठे 'त' शब्दना अपभ्रंशरूपो पण समजी लेवा, जे फेर छे ते आ प्रमाणे: प० ए० सु, सो, स, सा, जं.' सु, स, सा, त्र, वी०ए० नं ( यत् ) प० जो (मा० जे) जे. बी० ज जे. त. मेण, मेणं, निणा मेहि, जेहि, जेहिं. च० छ. नस्स, नास (मा० नाह) जेसिं, जाण, नाण, (मा० जाहँ). १ आ रणे पोतदा'मा अर्थमा ज वपराय छे. २ आ''रूपणे लिममा काम आरे छे. ३ जना पालिरुपो माटे जो पारिय.. १४. य (य) द. .
१४३ प० जम्हा, जत्तो, जाओ जाउ जाहि, जाहिंतो, जा (शो० मा० जादो, जादु) (पे० जातो, जातु) जम्मि, जस्सि, जहि, जत्य जाहे जाला, जइआ, जत्तो, जाओ, जाउ, जाहि, जेहि, जाहितो, जेहितो, जासुतो, जेसुतो. म० जेसु, जेसु.' ज' ना अपभ्रंशरूपो · सव' ना अपभ्रंशरूपोनी पेठे करी लेवा. विशेषता आ प्रमाणे. ५० ए०-जु, जो, ज, जा, ध्रु बी० ए०-" -- " '(क) किम् ५०-को (मा० के) बी०-क काका. त०-केण, केण, किणा केहि, केहिं, केहि. च० ०-कम्स, कास कास, कैसि, काण, काण. (मा० काह) (मा० काह) १ आ चणे रूपो' यदा'ना अर्थमा ज वपराय छे. २ आ रूप त्रणे लिगमा सरखु छे. ३ जेवा' सव्य' ना पालिरूपो छे तेवा 'क' ना पण छे. विशेषता एटली छे के, च. छ० ए० किस्स. स० ए० किस्मि, किम्हि-आ रूपो धागना थाय छ-पारण.० १४९
पं०-कम्हा, किणो, कीस, कत्तो,
कतो,
काओ, कार,
काओ, काउ,
काहि, काहिंतो, का
(शा० मा० कादो, कादु)
(पै० कातो, कातु)
स० कम्मि, कस्सि, कहि, कत्थ
'काहे, काला, कइआ
काहि, केहि,
काहितो, केहितो,
कासुतो, केमुंतो.
केस, केमुं.
क, कवण, काई (किम् ) अपभ्रंश
पभ्रंश रूपाख्यानने प्रसंगे 'क'ने स्थाने 'कवण' अने
काइ' शब्द पण वपराय छे.
'क'ना अपभ्रंशरूपो अने । सव्व' ना अपभ्रंशम्पो बन्ने
सरखा . जे विशेषता छे ते आ प्रमाणे
५० ए० कु, को, क, का
कवणु, कवणो, कवण, कवणा
बी.
[० ए० कु, क, का
कवणु, कवण, कवणा
५० ए० किहे कहा, काहा
कवणिह, कवणहा, कवणाहा
१. आ त्रण रूपी 'कदा ना अर्थमा ज पगा.
२'फाइ' (गाइ )ना पाख्यानो दकागर नामना अपभ्रश
रूपोनी जेरा जापाना है.
'इम ( इदम् ) प०-अय, इमो (मा० इमे) इमे बी०-इम, इणं, ण इमे, इमा, णे, गा. त०-इमेण, इमेण, इमिणा इमेहि, इमेहिं, इमेहि. मेण, णेणं (एहि, एहि, एहि ) (पै० नेन) णेहि, हिं, हिं. च० छ०-इमस्स, अस्स, से सिं, इमोसि, (मा० इमाह) इमाण, इमाण. (मा० इमाहँ) इमचो, इमाउ, इमाओ इमनो, इमाउ, इमाओ, इमाहि, इमाहितो माहि, इमेहि, इमा इमाहितो, इमेहितो • मा० इमादो, इमादु) इमासुतो, इमेसुतो. (पै० इमातो, इमातु) इमस्सि, इमम्मि, अम्सि, इह इमेमु, इमेसु, , प.- (शौ० or इम'ना पालिरूपो 'सव्व' ना पालिरूपो जेया छे.. 'सव्व'ना रूपो करता जे विशेष छे ते आ के प-अय त०-अनेन, इमिना एहि, एभि, इमेह, इमेभि. च. छ.--अस्स, इमस्स एस, एसान, इमेस, इमेसान, प०-अस्मा, अम्हा एहि, एभि, इमेहि, इमेभि. इमरमा, दमम्हा १०-अस्मि, अम्हि एम, इमेमु इमस्मि, इमम्हि -पालिय. पृ. १४४-१४५ इम (इदम् ) शब्द प्रा० १९ आय (इदम् ) अपभ्रंश सव्वना अपभ्रश रूपीनी पेठे 'आय' ना अपभ्रश रूपो समजी लेवा. प०-आयु, आयो आये, आय, आया आय, आया बी०-आयु, आय, आया आय, आया. आयेण, आयेण, आयेहि, आयहिं, आयाहिं आयें वगेरे. 'एअ (एतद् ) एए (शौ० मा० एदे) प.-एस, एसो, इण, इणमो (मा० एशे, एश') (पै० एते) बी०-एअ एए, एआ (शो० मा० एद) (शौ० मा० एदे, एदा) (पै० एत) (पै० एते, एता) त०-एएण, एएण, एइणा एएहि, एएहिं, एएहि १ आ'एअ' शन्दने शौरसेनी अने मागीमा रूपाख्यानने प्रसगे एद' शब्द समजवाना के अने पैशाचीमा । एत समजवानो छे ना पाररूपो 'सव्य' ना पारिरूपोनी जेया छे ५० एसो एते एते वगेरे जेम सस्कृतमा अन्वादेशने सूचववा 'एत ने पदले 'एन रूप वपराय छे तेम पालिमा पण छे-जओ पालिप्र० पृ. १४४ एत (एतद् ) शब्द अने ए उपरनु टिप्पण २ एस-ए-यो स-श पृ. २७ , बी० एत
१४७
.
(शो० मा० एदेण, एदेण, (शौ० मा० एदेहि, एदेहि,
एदिणा)
एदेहि)
(पै० एतेन, एतिना) (पै० एतेहि, एतेहि, एतेहि)
च० छ०-से, एअस्स सिं, एएसिं, एआण, एआण.
(शी० एदस्स) (शो० एदेसि, एदाण, एदाण)
(मा० शे, एदाह) (मा० शिं, एदाह,
(पे० एतस्स) एदाण, एदाण)
(पै० एतेसि, एतान)
प०-एतो, एचाहे, एअनो एअचो,
एआउ, एआओ,
एआहि, एआहितो, एआ एआहि, एएहि,
(शौ० मा० एदादु, एदादो) एआर्हितो, एएहितो,
(पै.
० एतातु, एतातो)
एआसुतो, एएसुतो.
स०-एत्थ, अयम्भि, ईअम्मि
एआम्म, एअस्ति
एआउ, एआओ,
एद, एअ (एतत् ) अपभ्रश
'सव्व 'ना अपभ्रश रूपोनी पेठे । एद' के एअ' ना अप
भ्रश रूपो करी लेवा. जे फेरफार छे ते आ प्रमाणे
प०-एहो
वी०-,
"
१४८ . 4- " " अकारात -सादि- -शब्द (नान्यतर जाति) सर्वादि शब्दना कधी नातना नपुसकलिंगी रूपाख्यानो पुलिंगी सर्वादि प्रमाणे छे. मात्र प्रथमा अने द्वितीयामा ने विशेष छे ते कुल' नी पेठे समजी लेवानो छे, जेमके, सव्व (सर्व) सन्व सव्वाणि, मन्वाइँ, सव्वाइ. बी०- बाकीना, ''सव' ना प्राकृत, शौरसेनी, मागधी अने पेशाची रूपो प्रमाणे. सव्व (अपभ्रश). प०- सव्वु, सव्व, सव्वा सन्बाइ, सव्वइं. बी०- सव्वा (सर्वक-अपभ्रश) प०- सवआइ, सम्बअइ. बी०- चाकीना, 'सव 'ना अपभ्रश रूपो प्रमाणे त (तत्) त, ण णाणि, णा, णाइ. " " " " सव्वउ, , प०- ताणि, ता, ताइ. , " बी० तण बाशी वधा पुलिगी त' प्रमाणे. १ जूओ पृ० १३४. २ लूओ पृ० १३०-१४० ३ जूओ पृ. १४०, ओपृ० १४१, त (अपभ्रश) 'न, तु, त, ता ताइ, तइ. " " बी०- " " तअ (तक-अपभ्रश) तआइ, तअइ वी- बाकी था, त' ना अपभ्रश रूपो प्रमाणे. " " ज ( यत्) ज प०- वी जाणि, नाइँ, जाइ जाणि, जाइ, जाइ. बाकीना, पुलिंगी 'न' प्रमाणे ज (अपभ्रश) प०- ध्रु, जु, ज, जा जाइ, जह बी.- जअ जआइ, जअ ५०- , जउ बी०- " " " नाकीना, ज'ना अपभ्रश रूपो प्रमाणे २ओ पृ. १४२. ३ जूओ . १ जूओ पृ. १४२ १४२-१४३ । ओ पृ. १४३ . जूओ पृ. १४३.
कि काणि, का, काइ. प०- कि " . " वाकीना, पुंलिंगी'क'नी पेठे किं (अपभ्रंश) प० किं, 'काइ, कवणु, कवण, कवणा काई, कई, कवणाई, कवणइ. काईइ, काइइ, की, बी०- किं, काइ, कवणु, करण, कवणा 1 " " " " " बाकी वधा, 'क' मा 'अपभ्रंश रूपो प्रमाणे. " " " " " ५०- इणं, इणमो, इट इमाण, इमा, इमाई. बी०- शेप, पुलिंगी 'इम' नी जेवा. इम, दम (अपभ्रंश) आयाई, आयई. बी०- वामीना, 'रम 'ना 'अपभ्रश रूपोनी पेठे. " १ जो पृ० १४३-१४.. २ जूओ०१४४. ३ का + कीई-जूमो पृ. ९६ स्वरोप.. ओ पृ० १४४, ५ ओ. १४.ओ. ४६.
एम (एतत्) एस, एअं, इणं, इणमो एआणि, एआइँ, एआई. ५०- बी०- एअ " शेप, पुलिंगी एअनी पेठे. एद, एअ (अपभ्रश) एईई, एइइ. ५०- बी०- " " 1 शेष 'एअ'ना अपभ्रश रूपोनी पेठे. युष्मद् अने 'अस्मद् ' ना रूपो प्रणे लिंगमा एक सरखा पाय छे अने ए आ प्रमाणे के. तुम्ह (युप्मद् ) प- एकव० -त, तु, तुव, तुह, तुम (त्वम्) १ ओ पृ० १४६ २ जूओ पृ. १४७. ३ तुम्ह (युप्मद् )-पालिरूपो तुम्हे (को) नुव २ ख (तुम्ह) तुम्हे, तुम्हाक (तुम्ह) (को) ता तुम्हेहि, तुम्हेभि (त०-वो) ३-५ त्वया, तया (प-त्वम्हा) (त.-ते) ४-६ तय, नुग्द, तुम्ह (ते) ७ त्वयि, तमि -जूमो पालिय.. १५१. तुम्हाक (ो) तुम्हेनु
१५२
बहुव०--भे, 'तुभे, तुझ, तुम्ह, तुम्हे, उरहे ( यूयम् )
दु- एकव०-~-तं, तुं, तुम, तुवं, तुह, तुमे, तुए (त्वाम् )
बहुव०-~-वो, तुझ, तुन्भे, तुम्हे, उरहे, भे (युप्मान्-वः)
त- एकव०~~-भे, दि, दे, ते, तइ, तए, तुमं, तुमइ, तुमए, तुमे,
तुमाइ (त्वया)
वहुव०-भे, तुमेहि, उज्ोहि, उन्हेहिं, तुम्हेहिं,
उय्हेहिं-(युप्माभिः)
पं-- एकव०-तुम्ह, तुम, तहितो,
(त्वत्)
तइत्तो, तइओ, तइउ, तईहितो.
तुवतो, तुवाओ, तुवाउ, तुवाहि, तुवाहितो, तुवा.
तुमचो, तुमाओ, तुमाउ, तुमाहि, तुमाहितो, तुमा.
तुहतो, तुहाओ, तुहाउ, तुहाहि, तुहाहितो, तुहा.
तुम्भतो, तुभाओ, तुम्भाउ, तुम्भाहि,
तुम्भाहितो, तुम्भा.
बहुव०-तुभयो, तुम्माओ, तुम्भार, तुम्भाहि,
तुम्भेहि, तुम्भाहितो, तुम्भेहितो, तुम्भासुतो,
तुभेमुतो.
(युप्मत् )
तुम्हतो, तुम्हाओ, तुम्हाउ, तुम्हाहि, तुम्हेहि,
तुम्हाहितो, तुम्हेहितो, तुम्हामुतो, तुम्हेसुतो.
उय्हतो, उहाओ, उहाउ, उहाहि, उव्हेहि,
उव्हाहितो, उन्हेहिती, उरहामतो, उव्हेमुतो.
उम्हतो, उम्हाओ, उन्हाउ, उम्हाहि, उम्हेहि,
उम्हाहितो, उम्हेहितो. उम्हामुनो, उन्हमुतो.
१ युपर-शदना रूपोमा जावरा 'म'नो विषसे।
अनेर' साप . भ, तुल्से, यदि
।
च० छ०-एकव० -तइ. तु, ते तुम्ह, तुह, तुह, तुव, तुम, तुमे,
तुमो, तुमाइ, दि, दे, इ, ए, तुम्भ, उन्भ, उयह
(तुम्यम् तव ते)
बहुव०---तु, वो, भे, तुम्भ, तुम्भ, तुब्भाण, तुम्भाण,
तुवाण, तुवाण, तुमाण, तुमाण, तुहाण, तुहाण,
उम्हाण, उम्हाण तुम्हा]
(युप्मभ्यम्-युप्माकम्-व )
स०- एक्व० -तुमे, तुमए, तुमाइ, तह, तए (त्वयि)
तुम्मि, तुवम्मि, तुमम्मि, तुहम्मि, तुम्भम्मि
वहुव०--तुसु, तुवेसु, तुमेसु, तुहेसु, तुम्भेसु (युष्मासु)
'तुवसु, तुमसु, तुहसु, तुभम, 'तुम्भासु.
'अम्ह ( अस्मद् )
प-- एक्व०-म्मि, अम्मि, अम्हि, ह, अह, अहय (अहम् )
(मा० हगे)
१२ आ रूपो आ. हमचद्रना मते थता नथी-हे. प्रा.
न्या. ८-३-२०३, पृ. १०२.
३ अम्ह (अस्मद)-पालिरूपो
मय अम्हे (अरमा) (नो)
२ म, मम (अम्ह) अम्हाक, अम्हे ( अम्द) (जस्मा)
(नो)
३-५-मया (तमे)
अम्हाह, अम्हभि (त-नो)
४-६-मम, मम (मे)
अरमाक, अम्हाक (च.-नो)
मयद, यह
७ मचि
अम्इमु (जस्मानु)
-जूओ पानिप्र. प्र.
मो. २०
वहुव०-अम्ह, अम्हे, अम्हो, मो, वयं, मे (वयम्)
(मा० हगे)
दु- एकव०-णे, णं, मि, अम्मि, अम्ह, मम्ह, में, ममं, मिम,
अहं-(माम्-मा)
बहुव०-अम्हे, अम्हो, अम्ह, णे (अस्मान्-नः)
त- एकव०-मि, मे, ममं, ममए, ममाइ, मइ, मए, मयाइ,णे (मया)
बहुव०-अम्हेहि, अम्हाहि, अम्ह, अम्हे, णे (अस्माभिः)
५- एकव०-मइचो, मइओ, मइउ, मईहितो. (मत्)
ममचो, ममाओ, ममाउ, ममाहि, ममाहितो, ममा.
महत्तो, महाओ, महाउ, महाहि, महाहितो, महा.
मज्झत्तो, मज्झाओ, मज्झाउ, मज्झाहि, मज्यमाहितो,
मज्झा.
बहुव०-ममतो, ममाओ, ममाउ, ममाहि, ममेहि,-(अस्मत् )
ममाहिंनो, ममेहितो, ममासुतो, ममेसुंतो.
अम्हत्तो, अम्हाउ, अम्हाओ, अम्हाहि, अम्हेहि,
अम्हाहितो, अम्हेहितो, अम्हासुतो, अम्हेसुंतो.
च, छ- एकव०-मे, मह, मम, मह, मज्झ, मझ, अम्ह, अम्ह
(मह्यम्-मे-मम)
बहुव०-णे, णो, मज्झ, अम्ह, अम्हं अम्हे, अहो,
अम्हाण,-गं, ममाण,-णं, महाण, णं, मज्झाण-गं,
अम्हाहँ (अस्मभ्यम्-अस्माकम्-नः)
स- एकव..-मि, मइ, ममाइ, मए, मे (मयि)
अम्हाम्मि, ममम्मि, महम्भि, मज्झाम्भि.
.
.
बहुव०--'अम्हेसु, ममेसु, महेसु, मझेसु (अस्मासु) 'अम्हसु, ममसु, महसु, मज्झसु, अम्हासु. गुम (युप्मद ) भपभ्रा तुम्हा, तुम्हे बी०-पई, तब " तुम्हेहिं. तुम्हह च० छ०-तउ, तुज्झ, तुध्र प०-" " स०-पइ, तइ तुम्हासु, तुम्हासु अम्ह (अस्मद् ) अपभ्रश अम्हइ अम्हे. प०-हउ बी. -मद " " अम्हेहिं. अम्हह -महु, मझु " स०--मइ, अम्हासु, अम्हासु आकारात शब्दनां प्राकृत रूपाख्यानो (नरजाति) आकारात नामोना रूपाख्यानोनो प्रयोग विशेष विरल छे तो पण प्रसगवशे तेना रूपाख्यानोनी प्रक्रिया नगावीए छीए १ जूओ पृ० १२७-तइया छ । सचमी. २-३ जूओ पृ. १५३ नु टिप्पप हैप्रा० च्या० ८-३- १९७पृ. १०४ १ अकारात नामने लागता प्रत्ययो आसरात नामने लगाडवाथी तेना रूपाख्यानो तैयार थाय छे २ मात्र एक पचीनो 'हि' प्रत्यय , आकारात नामने ভবন বন্ধ, ३ प्रत्यय विनाने स्थळे एटले ज्या शून्य छे त्या मूळ अगने ज रूपाख्यान तरीके समजदु सोधनना रूपी प्रथमानी जेवा पाय छ ४ हाहा " प०-हाहा हाहा. -हाहा त०-हाहाण, हाहाण हाहाहिं, हाहाहिं, हाहाहि" च० छ०-हाहस्स हाहाण, हाहाण [ना. घ. हाहे, हाहस्स ५०-हाहचो, हाहाओ, हाहतो, हाहाओ, हाहाउ, हाहाहितो हाहाउ, हाहाहितो हाहामुतो. स०-हाहा (ह) मि हाहासु, हाहासु स०-हे हाहा । हे हाहा ! ए रीते फिरालवा ('क्लिाल्पा) मोवा (गोपा) अने सोमवा (सोमपा) वगेरे शब्दोना रूपो समनवा १ पभाषाद्रिकाने मते वृदतया इनला नामनो अत्य सर इस थाय । श्या "क्लिारपा 'गोरा' अने ' सोमपा' न मारत , नान्यतर जातिमा तो कोइ शब्द आकारात होतो न नथी (जूओ पृ० १२३-नामना अन्त्यस्वरनो फेरफार-नि० २) आकारात शब्दना शौरसेनी, मागधी अने पेशाचीना रूपो हाहा' मा प्राकृत रूपो मेवा थाय छे, ज्या ने विशेष के ते 'वीर'नी पेठे समजवानो छे आकारात शब्दना अपभ्रशना रूपो 'वीर' ना अपभ्रश रूपोनी जेवा प्राय बनाववाना है इकारात, उकारात शब्दना प्राकृत रूपाख्यानो (नरजाति) प्रत्ययो. नरमातिना अने नान्यतरजातिना टरेक इकारात अने उका रात नामोने नीचे नणावेला प्रत्ययो लगाडवाना छे प्राकृत भापाना प्रत्ययो. एकवचन बहुवचन अउ अओ, मो. बी०-- णो, . प०- . + , बने छ भने आम यतु वीर'नी नवा थाय हे रूप 'किलाल्प' 'गोप' अन 'साम' होबाथी ए प्रणे शब्दोना रूपो परावर "क्विप " २-२-४७, पृ. ८५ पड्भापाच. पभा. प. ए.किल्लाल्यो प. ए.किसाल्वा गावो सामो 1 गाचा सोमपा 12 पापाना उपयुत् नियमने पदले आ० हेमचन्द्र जानवम करे छ त माटे ओ १० १२३-नामना अत्यवस्नो फेरफार-नि० १.
त०-- + णो, + णो, + + - च०छ०- पं०- स०- सं०- + + अउ, अओ, गो, प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो. १ ज्या ज्या • छे त्या मूळ अंगने, अते दीर्घ करीने वाप- खानु छे. २ ज्या ज्या + छे त्या अकारात नामने लागता 'प्रत्ययो पण समनवाना छे. मात्र पचीनो एक 'हि' प्रत्यय लेवानो नथी. ३ ज्या * छे त्यां (संबोधनना एकवचनमा) मूळ अंगने अंते विकल्पे दीर्घ करवानो छे. ४ पंचमीना स्वरादि, सकारादि अने हकारादि प्रत्ययो पर रहेता अंत्य 'इ' अने '3' नो दीर्घ थाय छे, ५ तृतीया, पष्ठी अने सप्तमीना बहुवचनमा प्रत्ययो पर रहेता अंत्य 'इ' अने 'उ'नो दीर्घ थाय छे. ६ उकारात नामोने प्रथमाना बहुवचनमा एक अवो' प्रत्यय पण वधारे लागे छे:-भाणु + अवो-भाणवो (सं० मानवः) -- १ जूमओ पृ. १२५. प्राकृत प्रत्ययोने रगता नियमोना मयाला नीचे (पृ. १२६ मा) जगावेलु कार्य अहि-रकारात अने उसयतमा-या नथी.
, प० बी० रूपाख्यानो इसि (ऋषि) 'इसी इसउ, इसओ, इसिणो, इसी. इसिं इसिणो, इसी. इसिणा इसीहि, इसीहिं, इसीहिं. इसिणो, इसिस इसीण, इसीण. . तक च०, छ० १ कोईने मते इकारात अने उकारात शब्दोन प्रथमार्नु एक वचन द्वितीयाना एकवचननी जेवु पण थाय छे-जेमके-इसी, इसि । पिहू, विहु । हे० प्रा० व्या० ८-३-१९, पृ०८४. इकारांतनां पालिरूपो. इसी, इसयो. इसी, इसयो. इसीहि, इसीमि. इसीन. २ इसिं ३ इसिना ४-६ इसिनो, इसिस्स ५ इसिना, इसिस्मा, इसिम्हा ७ इसिस्मि, इसिम्हि स. इति !, इसे! इसीही, इसीभि. इसिमु, इसीसु. इसी ', इस्यो। मातना 'गो' प्रत्ययनी पेठे पालिमा पण प्रथमाना अने द्विती याना बहुवचनमा 'नो' प्रत्यय वपराएलो छे. " सारमतिनो, सम्मदि- छिनो, मिच्छादिछिनो, यजिखुद्धिनो, अधिपतिनो, जानिपतिनो" वगेरे. पालिमा अग्गि (अग्नि), मुनि, आदि, गिरि, रसि (रश्मि) सख (ससि) भने गाममि (प्रामणी) शरदौना रूपोमा विशेषता ते आ प्रमाणे एकव० " [ता . इसये, इसिणो, इसिस इप्सीण, इसणि ] (माग० इशिह) (मा० इशिह) इसिगो, इसित्तो, इसीओ, इसित्तो, इसीओ, इसीउ, इसीउ, इसीहिन्तो इसीहिन्तो, इसीसुतो. अग्गिा बहुव० १०-अग्गिनि, गिनि अग्गियो (वधाराना रूपो) स०-थग्गिनि स०--अगि मुनि ३०-मुने (मुने ) (वधाराना रूपो) आदि स.-आदो (आदौ) ( वधाराना रूपो) आदु आदि आदिनि गिरि १०- गिरे (वधारामा रू) । त.- रसन (वघाराना रूपो) सखि प.-सरसा ससायो, सयानो, सचिनो, ससा. बी०-सगार सरपान सम्बानो, मसिनो, सखायो, सपी. सदाय
स०-भाणुसि, भाणुम्मि भाणूमु, भाणूस
सं0---भाणु ! भाणू ! माणुणो । भाणवो । भाणो।
भाणउ ! भाणू !
ए प्रमाणे जउ (यदु) धम्मष्णु (धर्मज्ञ), सव्वष्णु (सर्वज्ञ ),
दइवण्णु (दैवज्ञ), गुरु, गउ (गो), साहु (साभु), बन्धु, वपु
(वपुप् ), मेरु, कारु, धणु (धनुष्), सिंधु, केउ (केतु ), विजु
(विद्युत् ), राहु, सकु (शकु), उच्छु (३), पवासु ( प्रवासिन्),
वेलु (वेणु), सेउ (सेतु), मच्चु (मृत्यु), 'खलपु
खलपू),
गोतभु (गोत्रभू ), सरभु ( शरभू ), अभिभु (अभिभू), अने सयभु
(स्वयभू) वगेरे शब्दोना प्राकृत, शौरसेनी, मागधी अने पेशाचीना
रूपो समजवाना छे
स.
५ अभिभुना
आभभू ' अभिभूवो।
पाकीना 'भानु प्रमाणे
सहभू, सव्यञ्यू
(वधाराना)
१-२-स० बहुवचन
सहभुनो
१-२-स०
सम्वन्नू, सम्यन्नना
-पालिप्र० पृ. ९२-९३
काना 'अभिभू' प्रमाणे
"
१ आ छल्ला पाच शब्दोना सोधनना एकवचनमा ते त
शब्दनु एकलु मूळ जग ज वपराय छ हे करपु ' हे गात्तमु । हे
सरभु
। वगेरे,
'अमु ( अदस्) [आ शब्द सर्वादिमा छे छता एना रूपों विशेपे करीने 'भाणु' ना रूपो साथे मळता आवे छे माटे एने । भाणु' ना रूपो पछी मूकवामा आव्यो छे. ] प०- अह, अमू, असो अमुणो, अमवो, अमउ, अमओ, अमू. वी०- अमुं स०- अयम्मि, अमूसु, अमूसु इअम्मि, अमुम्मि शेष रूपो ' भाणु ' नी नेवा अमुणो, अमू. अमु (अदस्) नां पालिरूपो १ अमु अमू, अमुयो २ अमु " " ५ अमुना, ३ अमुना अमूहि, अभि. ४-६ जमुनो अमूस, अमूसान. अनुस्स ( स० अमुष्य) अमूहि, अमूभि. अमुस्मा (स० अनुप्मात्) अनुम्हा ७ अनुस्मि (स० अमुप्मिन्) अमूमु- अमुन्दि ओ पारिप० पृ. १४७. २ आ जापम्प स. 'असो' उपरथी थयेलु छ-ओ पृ. ७ नि० १२ औ-ओ. "असो उत्तमकासीय 'सूत्रकृ० अ० १,०३, गा. ८. .
१६७ 'इसि' अने ' भाणु' शब्दना प्राकृत रूपोनी साये ज शौर- सेनी, मागधी अने पैशाचीना वधाराना रूपो जणावेला छे. अपभ्रशमा जे विशेषता ले ते आ प्रमाणे अपभ्रंशभापाना प्रत्ययो. एक्व० बहुव० प०- ०. . ० बी०- त० ण, ए, म् हिं. च० छ०-० १०- हे स०- हि स०- हो, .. ज्या ज्या छे त्या मूळ अगने ज अते विकल्पे दीर्घ करीने वापरवानु छे. अपभ्रशना वधा प्रत्ययो पर रहेता मूळ अगने अते विकल्प दीर्घ थाय छे अपभ्रंश-रूपाख्यानो इसि १०- इसि, इसी इप्ति, इसी बी०- त०- इसिण, इसिण, इसिहिं, इसीहिं. इसीण, इसीण, इसिए, इसीए, " " इसि, इप्सी " च० छ०-इसि, इसी इसिह, इसkि, इसिहं, इसीहं. पं०-- इसिहे, इसीहे इसिहु, इसीहु. स०- इसिहि, इसीहि इसिहिं, इसीहि (इसिहु, इसीह) स०- इसि ! इसी इसिहो । इसीहो ! इति । इसी ए प्रमाणे दरेक इकारात पुलिंगी शब्दना अपभ्रश रूपो समनवाना छे. " " " भाणु. १०- भाणु, भाणू भाणु, भाणू बी०- भाणुण, भागुण, भागृहि, भागृहि. भाणूण, भाणूण, भाणूए, भाणूए, भाणु, भाष च० छ०-भाणु, भाणू भाणुहु, भागृह भागृह, भागृह. १०-- भाणुहे, भागृहे Ho- भाणुहि, भाणूहि भाणुहि, भाहि, (भाणुहु, भागूहु) भाणु ! माणू! भाणुहो ! भाणूहो! भागु ' भागू ए प्रमाणे दरेक उकारात पुलिंगी शब्दना अपभ्रश रूपो समनवानां छे.
पं०-(शोर० इसिदो, इसिदु) (माग० इशिदो, इशिदु) (पैशा० इसितो, इसितु) स. 'इसिसि, इसिम्मि इसीसु, इसी स० हे इसि ! हे उसी । हे इसउ । हे इसओ । हे इसिणो । हे इसी । सी। त० १०-ससिना (१०-सपारा, ससारस्मा) सखेहि, सखभि सखारेहि, सखारेभि. च.छ.-सखिस्स सरसान, ससारान सखिनो स.-सखे सरोमु, सखारे स-सख !, सर', सवायो। ससा, सास ससाना , सासनो। गामनी प० गामनी गामना, गामाननी बी. गामनीन, गामान ५०-गामनिना स.- गामनामु स.- गामान। याकीना 'इसि' प्रमाणे ए राधा रूपो माटे ओ पाल्मि० पृ० ८७-९, अने ते उपरना टिप्पणो १ शे पृ० १२७, " तिसलाए सत्तियाणीए कुच्छिसि गभ ' आचाराग सूत्र, आता चूलिका-महावीरनो अधिकार " गामनी, गामनिनो। सत्समीना 'सि' प्रत्ययन रग रखाण-
-
खास विशेपताः
[शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभ्रंशमा 'इन् । छेडा-
वाळा ' इकारात' नामोना अंत्य 'न् ' नो संबोधनना एकवचनमा
विकल्पे । आ' थाय छः
हे दडिआ ! हे दंडि !
हे सुहिआ ! हे सुहि ( सुखिन् )
हे तवस्सिआ। हे तवस्ति ।
हे कंचुइआ। हे कचुइ ! ( कञ्चुकिन् )
हे मणस्सिआ ! हे मणस्सि ! (मनस्विन्) ]
ए प्रमाणे अग्गि ( अग्नि), मुणि (मुनि), वोहि (बोधि ),
सधि, रासि (राशि), गिरि, रवि, कद (कवि) कवि, (कपि कवि),
अरि, तिमि, समाहि (समाधि), निहि (निधि), विहि (विधि),
'दहि (दण्डिन् ), करि ( करिन् , तवस्सि (तपस्विन् ),
१ प्राकृतमा अने पालिमा 'दडि' वगेरे. 'इन् ' छेडावाळा
शब्दोना रूपो साधारण इकारात शमदनी पेठे थाय छे. तो पण पालिमा
ए'इन्' छेदावाळा शब्दरोना केटलाक वधाराना रूपो साधारण इकारात
करता बुदा पड़े छे अने ते वधा आ प्रमाणे छे (जे रूपो जुदा पडे
तेने वधारे मोटा अक्षरोमा मूकेा छे).
१दंडी
दडी, देडियो, दडिनो.
२ दंडिय, दडिनं, दाडि दही, दंडिये, देडिने, दडिनी.
३ दहिना
दीहि, दामि.
४ दहिनो, दहिस्स दडान
५ दहिना, दडिम्हा, दाहि, दडीभि.
वडिरमा
६ देटिनो, दडिरस दडान
. 'गामणि (ग्रामणी), पणि (प्रणी), सेणाणि (सेनानी), पहि (मधी) अने सुहि (सुधी ) वगैरे शब्दोना प्राकृत, शौरसेनी, मागधी अने पैशाचीन रूपो समजवाना छे. बी०-भाणु भाणु (भानु) प०-भाणू भागुणो, भागवो, भाणओ, भाणउ, माणू भाणुणो, भाणू त०-माणुणा भाणूहि, भाणूहि, भागृहि च० छ०- o-माणूणो, माणुस्स মা, মাল ७ देडिनि दडिने दडीसु दडिनेसु दडिस्मि, दगिहि स० दाड ! दडी । दैडिनो। -पालिप्र० पृ. १३२ 'दडी अने तेनु टिप्पण १ आ छेल्ला पाच शहदाना सयोधनना एकवचनमा ते ते शब्दनु एकलु मूळ अग ज पपराय छे हे गामणि ! हे पणि । है सेणाणि । बगेरे २ उकारातना पालिरूपी भानु १ भानु भान्, भानवो भानु भानहि, भाभि ३-५ भानुना ५ भानुस्मा, भानुम्हा ४-६ भानुनो, भानुस्स भानून १६४ . भाणूउ, भाणहितो [ता० च०-माणवे भागुणो, भाणुस्स] (माग० भाणुह) (माग० भाणुहे) प.-भाणुणो, भाणुतो, भागूओ, भाणुनो, माणूओ भाणूउ, भाणहितो भाणूसुतो (शौर० भाणुदो, भाणुटु) (माग० भाणुदो, भाणुदु ) (पेशा० भानुतो, भानुतु) भानुस्मि, भानुम्हि भानूम स. भानु ! भानू ! भानवे | भानवो। प्राकृवना 'णो' प्रत्ययनी पेठे पारिमा पण प्रथमाना अने द्वितीयाना बहुवचनमा 'नो प्रत्यय वपराएलो छे 'हेतुनो, जन्तुनो, गरुनो" वगेरे पालिमा हेद, जन्तु अभिभू, सहन, सम्पन्नू शहदाना रूपोमा विशेषता छे ने नाप्रमाणे - हेतु, जतु बह रचन १ हेतुयो, नुयो (यधाराना रूपो) २ एकवचन ७ हेतो . (हेतो) (वधापना रूपो) अभिम् (यधाराना रूपो) १ अभिन् अभिन, अभिभुको २ अभिy इकारात अने उकारात शब्दना प्राकृत रूपाख्यानो (नान्यतर जाति) 'दहि (दधि) दहीणि, दही, दहीइ २ " " स०-दहि । , " " बाकी बधा तेते भाषा प्रमाणे इकारात पुलिंगी इसि' नी जेवा १ जूओ थकारात नपुसक नामोनु प्रकरण अने तने लगता प्रत्ययो तथा नियमो--पृ. १३३-१३४ २ पाइने मते इकारात अने उकारात नपुसक नामोना प्रथमाना अने द्वितीयाना एक्पचनमा जावा रूपो थाय छे दहि, दहि (स० दधि, दधि) मह, महु (स. मधु, मधु) -हे.ग्रा. व्या०-८-३-२०, पृ०८५ तादर्य अर्थमा सस्कृतवा रूपने मळतु 'दहिणे' (दप्न) अने 'महुण' (मवुने ) रूप पण वपराय छे नपुसकलिंगी इकारातना अने उकारातना पालिरूपो " १ दधि (दधिं) दधी, दधीनि २ दधि एप, इकारात पुल्गिी' इसि 'प्रमाणे, ३ गामनी'मा पारिरूप गामनि गामान शेप इवारात पुलिंगी 'गामनी'प्रमाणे गामनी, गामनान " " - प्रा०२२
१७०
ए प्रमाणे सत्यि (सक्थि), वारि, अच्छि (अक्षि), सुरि
(सुरि), अइरि ( अतिरि ) अने गामणि (ग्रामणी) वगेरे शब्दोना
रूपो पण समजवा.
"
.
"
महु (मधु)
१ महु
महूणि, महू , महूई
२
स० महु ।
बाकी वधा ते ते भाषा प्रमाणे उकारात पुलिंगी
नी मेवा
ए प्रमाणे दारु, वत्यु (वस्तु), चित्तगु (चित्रगु), सुगु,
वसु. अबु, असु-अस्तु (अश्रु) नउ (जतु), बहु अने लहु
(लघु) वगैरे शब्दोना रूपो पण समनवा.
भाणु'
१ 'मधु'
मधू, मधूनि
२ मधु
शेष, उकारात भूलिंगी 'भानु' प्रमाणे
"
"
'गाय' ना पारिरूपी
गात्रभु गोत्रम्, गोरभूनि
गोत्रभु गोत्रभू, मोत्रभूनि
शेष, उकारात पुरिगी 'नाम' प्रमाण --
जूओ पारिता पृ० ११३-११८ जने एना टिप्पण
.
१७१ , 'अमु (अदस्) प.- अह, अमु अमूह, अमू, अमणि बी०- अमुं बाकी बधा पुलिंगी · अमु' नी पेठे. " " दहि (अपभ्रश) १ दहि दहीइ, दहिद २ बाकी बधा ' इसि'ना अपभ्रश रूपोनी जेवा. " " महु ( अपभ्रश) महूइ महुई १ महु " " वाकी बधा 'भाणु' ना अपभ्रश रूपोनी जेवा. ऋकारांत शब्दनां प्राकृत रूपाख्यानो (नरजाति) ऋकारात नामोनी बे जात छे-केटलाक ऋकारात नाम विशेष्यरूपे वपराय छे अने केटलाक ऋकारात नाम विशेषणरूपे वपराय छे १ 'अमु' ना पालिरूपो १ अमु अमू २ " शेप पुलिंगी । 'अमु' पेठे-जूओ पालिप्र० पृ. १४८ २ जूओ पृ. १६६ ३ जूओ पृ० १२१ नामना प्रकाये.
विशेप्यरूप--जामायर (जामात ), पियर (पितृ), भायर
(भ्रातृ) वगेरे।
विशेषणरूप-कहार (कर्तृ), दायार (दातृ), भतार (भर्तृ)
वोरे।
[आ भेदने लीवे एक जातना पण ए बन्ने नामोना रूपोमा
विशेष अंतर छे.]
ऋकारात ( विशेष्यवाचक).
१. प्रथमानुं अने द्वितीयानु एकवचन बाद करता वधी विभक्ति-
ओमा विशेष्यवाचक ऋचारात नामना अन्त्य 'ऋ'नो
विकल्पे 'उ' थाय छे.
२. प्रथमाथी लइने वधी विभक्तिओमा विशेष्यवाचक मकारात
नामना अत्य 'ऋ'नो' अर' थाय छे.
३. प्रथमाना एकवचनमा विशेष्याचक सकारात नामनु आगारात
रूस पग विकल्पे वपराय छे.
१. संबोधनना एकवचनमा विशेष्यवाचक मकारात नामना अत्य
ऋनो 'अ' भने 'अर' विकल्पे थाय छे.
[सूचना -उपर जणाव्या प्रमाणे प्रथमाथी लइने वषी विभक्तिओमा
अकारात नाम अारात अने उमारात वने छे माटे तेना
रूपाख्यानोनी प्रक्रिया, 'जिण' अने 'भाणु' ना रूपा.
ख्यानोनी प्रक्रिया जेवी समजवानी छे. अहीं तो मात्र
सगळा माटे तेना रूपाख्यानो आपीए छोए.]
८
(मा० पिअले) "पिट, पिअर (पितृ) १०- पिआ, पिअरो पिअरा, पिउणा, पिअवो, पिअओ, पिअउ, पिऊ. बी०- पिअर पिअरे, पिअरा, पिउणो, पिऊ. त०- पिअरेण, पिणं, पिअरेहि, पिअरेहिं, पिअरेहि, पिउणा पिउहि, पिऊहिं, पिऊहि" च०,छ०-पिअरस्स (मा० पिअलाह) पिअराण, पिअराणं, (मा० पिअलाहँ) पिउणो, पिउम्स पिऊण, पिऊणं. पं०-- पिउणो, पिउत्तो, पिऊओ, पिउचो, पिऊओ, पिउउ, पिउउ, पिऊहितो, पिऊहितो, पिऊसुंतो. १ ऋकारांतनां पालिरूपो पितु पिता पितरो (पिता). पितर पितरो, पितरे. पितरा (पित्या, पेत्या) पितरोहि, पितभि. पितुना पितृहि, पिभि. ४-६ पितु, पितुनो, पितुम्त पितरान, पितान. पिनून, पितुन्न, ५ पितरा (पित्या, पेल्या) रितरेहि, पितरेभि. पितुना पितूहि, पिभि. पितरि पितरेनु, १ ૨ ३ ७ पिनुमु, पितूमु. पितये! स.- पित! पिता! -ओ पानिप्र पृ० ९४ अने एनु टिप्पण, २७४ पिअरचो, पिअराओ, पिअरतो, पिअराओ, पिअराउ, पिअराउ पिअराहि, पिअराहि, पिअरेहि, पिअराहितो, पिअराहिंतो, पिअरेहितो, पिअरा पिअरामुतो, पिअरेसुतो (शो० पिअराटो, पिअरादु) (मा० पिअठादो, पिअलादु) (पै० पिभरातो, पिअरातु) पिअरे, पिअरेसु, पिअरेसु, पिअरसि, पिअरम्भि, पिऊसु, पिऊन्तु पिउसि पिउम्मि, स०-- हे पिअ । पिअर । पिअरो। पिअरा ! पिडणो । पिअवो, पिअरा । पिअर । पिअओ, पिअउ, पिऊ । ए राते जामायर, जामाउ (जामातृ), भायर, भार, (भ्रातृ) वगेरे शलोना रूपो समजयाना छे मकारान (विशेषणवाचक) १. प्रथमानु अने द्वितीयानु एक्वचन वाट करता वधी विभक्ति ओमा विशेषणवाचक ऋकारात नामना अत्य मनो विकल्प उ'थाय छे प्रथमाथी लइने बधी विभक्तिओमा ऋमारात नामना अन्त्य 'ऋ'नो आर थाय छे प्रथमाना एक्वचनमा विशेषणवाचक ऋकारात नामनु आका रात रूप पण विक्से बन के सबोधनना एकवचनमा विशेषणवाचक ककारात नामना आय 'ऋ' नो विक्ल्पे 'अ' थाय छे २ 'दाउ, दायार (दात) दायारा, दाउणो, दायवो, ५०- दाया, दायारो (मा० • दायाले) दायओ, दायउ, दाऊ. बी०- दायार दायारे, दायारा, दाउणो, दाऊ. त०- दायारेण, दायारेण, दायारेहि, दायारेहि, दायारेहिँ दाउणा दाऊहि, दाऊहिं, दाऊहि च०, छ०-दायारस्स, दायाराण, दायाराण, (मा० दायालाह) (मा० दायालाह) दाउणो, दाउस्स. दाऊण, दाऊण. ५०- दायारतो, दायाराओ, दायारलो, दायाराओ, दायाराउ, दायाराउ, दायाराहि, दायाराहि, दायारेहि, दायाराहिंतो, दायाराहितो, दायारेहितो. दायारा, दायारासुतो, दायारेसतो, १ सकारात विशेषणना पालिरूपी दातु १ दाता दातारो, दातारे. ३ दातारा, दानुना दातारदि, दातारेभि. ४-६ दातु, दानुनो, दानुस्स दातारा तारेहि, वातारेभि. दातर साहेदात ! दातारो! दातारो. दातार दातापन, दावन, दानून, ५ दातारेसु, दामु दाता! -~ओ पालिय. पृ० ९५ बने एन टिप्पण, १७६ दाउणो, दाउत्तो, दाउत्तो, दाऊओ, दाऊउ, दाऊओ, दाऊ3, दाऊहिंतो दाहिंतो, दाउसुतो. (शो० दायाराटो, दायारादु) (मा० दायालादो, दायालादु) (पै० तायारातो, तायारातु) दायारे, ढायारसि, दायारम्मि, दायारेमु, दायारे, दाउसि दाउम्मि दाऊमु, दाउमु. स०- हे दाय, दायार, दायारा, दाउणो, दायको दायारो, दायारा। दायओ, दायउ, दाऊ. ए रीते क्त्तार, क्तु, (कर्तृ ), भत्तार, भत्तु (भन ) वगेरे शब्दोना रूपो समनवाना छे. ऋकारातना प्राकृत रूपाख्यानोनी साधेज (तेना) शौरसेनी, मागधी अने पैशाचीना पण विशेषतावाळा रूपाख्यानो आपेला छे वारातना अपभ्रशरूपाख्यानो आ प्रमाणे छे आगळ कह्या प्रमाणे टरेक संसारात अग, अगरात अने उकारात थया पछौज प्राकृतमा वापरी शकाय के तो ए-मुळ ऋका गतना-आरात अगना अपभ्रशरूपी 'वीर' ना अपभ्रशरूपो नेवा करवाना के अने उकारात अगना, भाणु 'ना अपभ्रशरूपो जेवा समजवाना छे म्दाच कोई मूळ नकारात अग प्राकृतमा आवता इकारात यतु होय तो तेना अपभ्रशरूपो ' इसि' ना अप- भ्रशरूपो वा जाणी लेवा.
१७७ . उदाहरण तरीके एक 'पितृ ' शब्दना नीचे नणाव्या प्रमाणे आठ अगो सभवी शके छे - पिस, पिदः पिइ, पिदिः पिउ, पिदुः पिअर, पिदर. ए आठमाना · पि' अने : पिद' तथा 'पिअर' अने 'पिदर' ना अपभ्रशरूपो । वीर 'ना अपभ्रश रूपो नेवा जाणवा. 'पिइ । पिदि 'ना अपभ्रशरूपो 'इसि' ना अपभ्रंशरूपो नेवा समजपा अने 'पिउ' ने 'पिदु' ना अपभ्रशरूपो । भाणु' ना अपभ्रशरूपो जेवा करी लेवा (कोइ पण 'ऋकारात शब्दना अपभ्रशअगो करती वखते तेना प्राकृत अगो तरफ अने प्रयोगो तरफ लक्ष्य राखवु ) नेतृ- १ फेटलाक कवारात शन्दोना अपभ्रश अगोने अही भापीए डीए कर्तृ= कत्त, कत्ति, कत्तु कट्ट, कहि, कडु नेअ, नेइ, नेउ. नेद, नेदि, नेदु. पोद, पोदु पोज, पोउ भर्तृ- भन, भात, भन्तु भट्ट, महि, म. भ्रातृ- भाष, भाइ, भाउ भाद, भादि, भाट पोत होतृ-- होद, हादु होगा शेउ Hts
ऋकारांत शब्दनां प्राकृत रूपाख्यानो (नान्यतरजाति)
सुपिअर, मुपिउ (सुपितृ)
प०- सुपिअर सुपिअराइ, सुपिअराइँ, सुपिअराणि,
सुपिउद, सुपिउ, सुपिऊणि
बी०- सुपिअर सुपिअराइ, मुपिअराइँ, सुपिअराणि,
सुपिऊइ, सुपिऊ., सुपिऊणि
स०- सुपिअर । सुपिअ! सुपिअराइ, सुपिभराइँ, सुपिअराणि,
सुपिअर। मुपिउद, सुपिउ, सुपिऊणि.
शेष रूपो, ते ते भाषा प्रमाणे पुलिंगी पिउ, पिअर (पितृ)नी
जेवा छे.
दायार, दाउ (दातृ)
दायार
दायाराइ, दायारा, दायाराणि,
दाऊर, दाइँ, दाऊणि.
बी०- दायार
दायाराइ, दायाराइ, दायाराणि,
दाउद, दाउइँ, मणि.
स.- हेटाय!
दायाराइ, दायारा, दायाराणि,
हे ढायार! दाउइ, दाउइँ, दाउणि.
शेष रूपो, ते ते भाषा प्रमाणे पुरिंगी दायार, दाउ (दातृ)नी
वा.
प०-
नपुमकालगी सारातना अपभ्रवारूपो • कुल', 'दहि',
अने • महु ' ना अपभ्रंशरूपो नेवा माणगना छे (नओ पुलिगी
मगरातनो अपभ्रशसो विषेनु लखाण).
.
२७९ - एकारांत अने 'ओकारातना प्राकृत रूपाख्यानो एकारात अने ओकाराप्त नामोना रूपाख्यानो प्राकृतमा उपलब्ध थता नथी, तो पण ए शब्दोने दे अपस्वार्थिक-क) लगाडी तेना रूपाख्यानो वनावायचे समे ते ते भापा प्रमाणे ते वधा रूपाख्यानो पुलिंगमा अभाव (निण' ) नौ मेवा के, नासकमा अकारात ('कुल' ) नी जेषां छे अने स्त्रीलिंगमा स्त्रीलिंगनी प्रक्रिया प्रमाणे बने छे. . - एवा १ प्राकृतमा 'गो' शब्दना 'गोण' 'गा' 'गउ'एगा नण जगो बने छ (जूओ पृ. १२०५० १ तथा पृ०६१ ओ-अउ, आअ ) अने रूपाख्यानने प्रसगे पण ए नण भगो वपराय छे तेम पालिमा 'गो' शब्दना 'गोण' (गोन)'गु' अने 'गषय अगो बने छे (जओ पालिप्र. पृ० ९८ अ० ३२ अने तेनु टिप्पण) अने रूपाख्यानने प्रसगे वपराय छे प्राकृतमा रूपाख्यानने प्रसग मूळ 'गो' अग नथी वपरातु आर्पप्राकृतमा मूळ 'सो' अग अने ते द्वारा थएला रूपो पण ( जूमो पृ० १३६ ' कम्म 'ना आर्परूपो माटेनु टिप्पण) मळी आवे छेतेम पालिमा ए मूळ 'गो' अगना पण रूपो-जे रूपो आर्पप्राकृतमा वपराएला छे-छे जने ते आ प्रमाणे गो गावो, गयो गावो, २ गाव गयो गय गा ग ३ गावेन गोहि, गोभि. गवेन गवा जेमके-स० सुरे-प्रा० सुरे। स० ग्लो-प्रा. गिलोभ । इत्यादि । मुरे मुरेओ मुरेआ। मुरेअ, सुरेए, सुरेआ। सुरेषण, सुरेएण सुरेएहि, मुरेपह, सरेएहि। शेष रूपो, ते ते भाषा प्रमाणे वीर' नी समान छे. ४-५ गावस्स गोन, गुन्न, ७ गवरह गव. गावा, गावस्मा, गोहि, गोभ. गारम्हा गवा, गवस्मा, गवम्हा गहि, गवाम. गावे. गावस्मि, गावम्हि गावेमु गवे, गवस्मि, गवम्हि गये गोमु. स.-गौ। गायो, गवो- जूओ पारिप्र. पृ. ९७-१८ जापंप्रातर्ने उदाहरण-"अपने होइ गव पचोइए "- सूच०.ध्रु० अ०२,३०३ गा.५. " गो-महिस-गवेलयापभूया "- भार सत. २, उ. ५ तुगियानो अधिकार.(पृ. २७७ रा. जि.) औगरात 'नो' शब्दनु प्रारत अग 'नाव' बने (जूओ. १२ नोभाय) " एग मह नार सयाव *मा (ना) तेहि'- भगव० २० १,३०६ (प्रनार-२२७ पृ० १७१ • मि.) २ भो पड्झायन. पृ. १५,
गिलोय
गिलोआ)
गिलोओ
गिलो
गिलोए, गिलोआ।
गिलोएण, गिलोएण, गिलोएहि, गिरोएहिं
गिलोएहिं ।
शेप रूपो, ते ते भाषा प्रमाणे 'वीर' नी समान के.
केटलेक ठेकाणे एकारात अने ओकारात भामोनु
प्राकृतरूप, सस्कृतना सिद्धरूप उपरथी पण वनावदामा आवे
छे सुराहि (स० सुराभि ) सुरासु ( स० मुरासु)
इत्यादि
व्यजनात शब्दो
प्राकृतमा रूपाख्यानने प्रसगे कोई शब्द व्यजनात सभवी
शस्तो नथी, एपी एना ते ते भाषाना वधा पो पूर्वोच्च स्वरात
शब्दनी पेठे समजवाना छे फक्त 'अत् ' अने • अन् ' हावाळा
नामोना रूपोमा विशेषता छे अने ए आ प्रमाणे छे
१ जूमो प्रकरण ३-अत्यव्यजनलार पड्भापाचद्रिकाने मते
ठेडे धानुवाळा व्यजनात नामोना छेवटना व्यननमा 'अ' उमेराय है
अने बीजा व्यननात नामोन छेडे स्वार्षिक 'अ' (क) प्रत्यय उमेराय
छ एथी ए पधा नामोना रूपो अकारात नामनी या थाय छ (पृ.
११६ “हलोऽक् ") धातु-गोदुङ् + अगोदुर अधातु-मुगिर् +
अ = मुगिर मादयतमु (मुक)
-
. अत्' छेडावाळा नामो (नरजाति) जे नामो 'मत्वयि भित्' छेडावाळा छे के वर्तमानकदत तरीके वा भविष्यत्कृढत तरीके ' अ ' छेडावाळा हे ते नामोना अत्य ' अत् ' नो प्राकृतमा 'मत' पाय छे, तेथी एना वश रूपो ते ते भाषा प्रमाणे अकारात वीर मी जेवा बने छे फक्त आपप्राकृतमा एवा पेटलाक नामोना रूपो सम्कृतना सिद्धरूपो उपरथी पण बनाववामा आवेला छे भगवन्त: भगवतो भगवता- भगवया भगवत- भगवओ इत्यादि. 'शौरसेनी शौरसेनीमा कृतवत् , भवत् , भगवत् अने सपादितवत् शब्दना अत्य व्यजननो मात्र प्रथमाना एकवचनमा अनुस्वार थाय छः कयव (कृतवान्) भव (भवान् ) भगव (भगवान्) १ आ'अत' उपरात मत्वर्थीय बीजा पण अनक आदगो थाय छे ते मारे जूओ ताद्धतप्रकरणमा 'मतु 'ना आदशो भगवया महावीरेण" "भगवओ महा वारस "-(भगव० राय० पृ० २३९-२४१-२४५) ३ शौरसनीने रगती जपवाद विनाना बधी प्रक्रिया मागधी, पैशाची जने अपभ्रगमा पण समनी लेवी. ४ आ रूप आपंप्राकृतमा प्रथमामा अने द्वितीयामा ण चप भगव महावीरे" "भगव गोयम"-(भगव• राय पृ. २३२) २ थरा भगवतो, सपाइअव (सपादितवान् ) सपादिदवं रूपाख्यानो 'भगवत (भगवत्) भयवत १ भगवतो भगवता १० मा०० भगव) (मा० भगवते) भगवत भगवते, भगवता भत्' छडावाळा नामना पालिरूपो. (शौ० २ १ भगवत भगवताइ, १ भगवा भगवतो, भगवता २ भगवत भगवते. ३ भगवता भगवतहि, भगवतभि भगवतन ४-१ भगवतो भगवत, भगवतान भगवतस्स ५ भगवता, भगवता भगवतेभि भगवतस्मा, भगवतमा भगवति, भगवत भगवतेभु भगवतलि, भगवताह स. भगव, भगव भगवतो भगवा (भगवा) भगवता [जूनो पृ० १८२ 'भगवत' ना आपरूपो] -चूओ पारियल पृ० ११६-११७-११८ अने एना रिपा ३ भगवतेण, भगवतेण भगवतेहि, भगवतेहिं- भगवतेहि स०- भगवत!, भगवता भगवता !, भगवतो। ( शौ० मा० पै० भगव, भगव ! ) ए प्रमाणे वधा, ते ते भाषा प्रमाणे 'वीर'नी प्रमाणे १ भक्तो 'भवत (भवतु) भवले (शौ० मा० पै० भव) (मा० भवते) २ भषत ३ भषतेण, भवतेग भवते, भवता भवतेहि, भवतेहि भवतेहि. स. भवन्त भरता! भवता, भक्तो १ पालिमा 'भवत' शदना विशेष रूपो आ प्रमाणे छे १ भक्तो, मातो, भरता (बहुवचन) ३ भवता, भोता, भवन (एक्यचन) ४-५ भक्तो, भातो, भक्ताछ सा-मा !, मत' भात | " भवतो, भातो भवता, भाता (यहुवचन) 'स' वादनु पारमा (स. सद्धि ' उपरथी)' साम कर स वस्राय 3 लो मासिक २०१८-१९-१२० बने ना । ) , १८५ (शौ० मा० पै० भव, भव) (मा० मवंते, मते) ए प्रमाणे वधा, ते ते भाषा प्रमाणे : सन्न' नी पेठे. . 'भवंत ( भवतृ- मानकृदंत) १ भवंतो भवता. (मा० भवते) २ भवंत मवंते, भवंता ३ भवतेण, भवतेणं भवंतेहि, भवतेहिं, भवतेहि. सं. भयन्त ! भक्तो! भवता. भवंता ! (मा० भवंते !) प्रमाणे वधा ते ते भापा प्रमाणे · वीर नी नेवा. अत्'छेसाषाळां धर्तमानकृदंतनां पालिरूपो. गछत (गच्छत्-वर्तमानादत) १ गच्छं, गच्छतो गण्डतो (गच्छं) गच्छता. २ गछतं गच्छते. शेष बधा'भगवत' प्रमाणे, ए १ केटलाक 'अत्' छेडाबाळा नामोना पालिरूपोनी विशेषता भी प्रमागे छः . - महत ' (महत्) अने अरहंत (अईन् ) शब्दना प्रथमाना एकवचनमा 'महा' अने 'अरहा' (आपंप्रा० अरहा) रूम वारे याय छे.—पालि प्र. पृ. ११८-११९, .. मा० १४ 'भवमाण (भवतृ-वर्तमानकृदत) १ भवमाणो, मवमाणा. (मा० भवमाणे) २ भवमाण भवमाणे, भवमाणा. ३ भवमाणेण, मवमाणेहि, भवाणेहि भवमाणेण भवमाणेहि शेष, ते ते भाषा प्रमाणे । वीर' नी नेवा. १ भविस्सतो भविस्सतेहि ३ भविस्संत ( भविष्यत्-भविष्यत्कृदत) माविस्तता. (मा० मविस्सते) २ भविस्सत भविस्सते, भविस्संता. भविस्सतेण, भविस्सतेण भविस्सतेहि, भविस्सतेहि. स० भविस्संत ! भविस्सतो। भास्सिता. भविस्सतो! (मा० भविसते) (शौ० मा० पै० भविसं ! भविस्स ! ) ए प्रमाणे बधा 'वीर' प्रमाणे. भविस्समाण (भविष्यत्-भविष्यत्कृदत) भविस्समाणो भविस्समाणा. १ कुदतना आ 'अतृ' ने स्थाने 'अत' अने 'माण' एवा घे आदेशो थाय छे-जुओ कृदतप्रकरण २. संस्कृत 'भविष्यत् ।। उपरथी.
(मा० भविससमाणे) भविस्समाण भविस्समाणे, भविस्समागा. माविस्समाणेण, भाविसमाणेहि भावस्समाणेण भविस्समाणहि, भविस्समाणेहि. शेष, ते ते भाषा प्रमाणे · वीर 'नी पेठे, नान्यतरजाति उपर जणावेला नामोना क्लीवलिंगी रूपो प्रथमा अने द्विती यामा बराबर 'कुल' नी जेवा थाय छे अने वाकी बधा ते ते भाषा प्रमाणे पुलिंगी रूपोनी जेवा थाय छे, जेमके, 'भगवंत भगवत भगवताणि, भगवता, भगवताइ. १ 'भगवत'ना पालिरूपो (नान्यतरजाति) १ भगव, भगवत भगवता, भगवतानि. भगवति २ भगवत भगवते, भगवतानि, भगवति शेष, 'भगवत'नी पेठे 'गच्छत' (गच्छत्) ना पालिरुषो १ गच्छता, गच्छतानि. गच्छत गच्छते, गच्छतानि शेष, पुलिंगी 'गच्छत 'नी पेठे --जूओ पारिप्र. पृ० १३८ अने एना टिप्पण, गच्छ, गच्छत १८८ - . २ भगवंतं भगवंताणि, भगवंता, भगवंताइ. सं० भगवंत! भगवंताणि, भगवंताई, भगवताई. वाकी वधा पुंलिंगी 'भगवंत'नी पेठे. अपभ्रंशरूपो अपभ्रंशरूपो पण 'वीर' भने 'कुल' नी वा थाय छे. नेमके, भगवंत (नरजाति) १ भगवंतु, भगवतो भगवंत, भगवंता. भगवंत, भगवता २ भगवतु, भगवत, भगवंत, भगवंता. भगवता ३ भगवतेण, भगवतेणं भगवंतेहिं, भगवताहिं, भगवते भगपतहिं. ४-६ भगवंतामु, भगवतसु, भगवताह, भगवंतह, भगवतस्सु भगवताहो, भगवतहो, भगवत, भगवता भगन्त, भगवता. ५ भगवताहु, भगवतहु, भगवताहु, भगवतहुं. भगवंताहे, भगवतहे ७ भगवंति, भगवते भगवताहिं, भगवतहिं. सं० भगवतु, भगवतो, भगवताहो, भगवतहो, भगवत, भगवता भगवत, भगवता.
भगवंत ( नान्यतरजाति)
१ भगवतु, भागवत, भगवंताइ, भगवंत.
भगवंता
२ भगवंतु, भगवंत, भगवताई, भगवतई.
भगवता
बाकी बधां भगवंत' नां अपभ्रशरूपो प्रमाणे.
'अन् ' छेडावाळां नामो (नरजाति)
१ . अन् ' छेडावाळां नामोना नकारांत अंगना छेवटना
अन्
नो आण' विकल्पे थाय :
अद्धाण, अद्ध (अध्वन् ), अप्पाण,
अप्प (आत्मन्),
उच्छाण, उच्छ (उक्षन् ), गावाण, गाव (ग्रावन् ) जुवाण, जुव
(युवन् ) तक्खाण, तक्ख (तक्षन् ) पूसाण, पूस (पूपन् ) वम्हाण,
बम्ह (ब्रह्मन् ), महवाण, महब (मघवन् ), मुद्धाण, मुद्ध (मूर्द्धन्)
रायाण, राय (राजन् ) साण, स (श्वन् ), सुकम्माण, सुकम्म
(सुकर्मन् ) इत्यादि.
२ . अन् 'नो आण' थया पछी ए ' आण' छेडावाळां
नामोनां रूपो ते ते भाषा प्रमाणे ' वीर' नी नेवा जाणवानां छे. नेमके
अद्धाण
१ अद्धाणो
अद्धाणा.
(मा० अदाणे)
२ अद्धाणं
.
-
अद्धाणे, अद्धाणा. इत्यादि.
रायाण १ रायाणो रायाणा (मा० लायाणे) २ रायाण रायाणे, रायाणा. इत्यादि. सुकम्माण १ मुकम्माणो सुकम्माणा (मा० शुक्म्माणे) २ सुकम्माण मुकम्माणे, सुकम्माणा. इत्यादि . ३ ज्यारे । आण' यतो नथी त्यारे ए ' अन् ' छेडावाळा नामोना रूपो बनाववानी रीत आ प्रमाणे छ प्रत्ययो प.- णो, बी० इण, जो, त० णा,. च०, छ०- णो, इण, ० प० णो, - . . . +.. . णो . १. ज्या शून्य छे त्या अफारात वीर 'नी जेवी प्रक्रिया समजवानी छे २ ज्या + आ निशान छे त्या 'अन्' छेडावाळा नामना अत्यन्नो आ! विक्से थाय छे.
, घा ३. 'गो' प्रत्यय पर रहेता पूर्वना स्वरनो दीर्घ थाय छे. ४. 'इणं' प्रत्यय पर रहेता पूर्वनो स्वर लोपाय छे. पूस (पूसन् ) १०- पूसा, पो पूसाणो, पूसा। {मा०-पूशे) नी०- पूसिणं, पूस पूसाणो, पूसे, पूसा। त०- पूसणा, पूरेण, पूमेणं सेहि, पूसेहि, पूसेहि। -पूसाणो, पूसस्स पूसिणं, पूसाण, पूसाणं । (मा० पूशाह) (मा० पूशाह) पं०-- प्रमाणो, पूसतो, पूसतो, पूसाओ, पूसाउ, पूसाहिः पूसाहि, पूसेहि, पूसाहितो, पुसेहितो, पूसा पूसासुतो, पूससुतो। (शौ० पूसादो, पूसादु) (मा० प्रशादो, पूशादु) (पै० पूसातो. पूसातु) स०- पूसे, पूसम्मि पूसेमु, पसे। पसंसि म०- हे पूसा ! हे पसो, हे पूताणो, हे पूसा । पूसाओ, पूसाउ, पूसाहितो, महवाणो, महवा. महद १ महवा, महवो (शो० 'महत) (मा० महवे) मपर्व' पण याय छे. या रूप आपातमा पण वाराएलु मधव पागसासणे" कल्पसूत्र.
२ महविण, महर्व महवाणो, महवे, महवा. ३ महवणा, महवेण, महदेहि, मवेहि, महवेण महवेहि ५-६ महवाणो, महवस्स महविण, महवाण, महवाण. (मा० महवाह) (मा० महवाह) वाकी वधा ' पूस' प्रमाणे अत्ता, 'अप्प (आत्मन्) आत्मन् ' शब्दने तृतीयाना एकवचनमा णिआ' अने णइआ' प्रत्यय वधारे लागे छे. अन् ' छेदावाळा नामोना पालिरूपो [ अन् ' छेडावाला नामोना पालिरूपो विशेष अनियमित होवाथी अहीं जरा वीगवथी आपेला छे-] अत्त, आतुम ( आत्मन्) अत्ता, अत्तानो, आतुमा आनुमानो. २ अत्तान, अत्तानो, अत्त अत्ते, आनुमान, आनुम जातुमानो. अत्तना उत्तनेहि, अत्तनेभि, अत्तेन अत्तेहि, अभि, आतुमेन आमेहि, आनुमेमि ४-६ अचनो अत्तान अत्तरस आनुमान. आनुमरस अप्पा, अप्पो अप्पाणो, अपा। त० अप्पेहि । प० ( मा० अप्पे) बी० अप्पिण, अप्पं अप्पाणो, अप्पे, अप्पा। अप्पणिआ, अप्पणइआ, अप्पेहि, अप्पेहिं, अप्पणा, अप्पेण, अप्पेण १०-छ०-अप्पाणो, अप्पस्स अप्पिणं, अप्पाण, अप्पाण। (मा० अप्पाह) (मा० अप्पाह) इत्यादि वधा रूपो ते ते भाषा प्रमाणे 'पूस' नी समान है. २ राय (राजन) १. तृतीया, पचमी, षष्ठी अने सप्तमीना बहुवचनमा ‘रानन्' शब्दनो राई ' आदेश विक्ल्पे थाय छे अत्तनेहि, अत्तनम, अचस्मा, अत्तम्हा, अत्तेहि, अत्तेभि, आतुमस्मा, आतुमम्हा आतुमेहि, आतुमेभि अचनि, अत्ते, अचनेमु अत्तरिम, अत्तन्हि आतुमेमु आतुमे, आतुमस्मि, आतुमहि अत्तानो ! अत्ता! आतुमानो! २ राज (पनन् ) राजा राजानो, गजा. राजानराज राजानो. गरि, पनि, राजिना राजेदि, गभ. ५ अत्तना ७ ८ स. यत अत्ता। भातुम! आतुमा! २ ३ रन्ना, राजेन, प्रा. २५ . २. णा' अने पचमी तथा पष्ठीनाणो' प्रत्यय पर रहेता 'राजन् ' शब्दनो ' र ' आदेश विक्ल्पे थाय छे ४-५ रनो (लस्स) राजिनो, राजस्स गजून, राजान যমুহি, যদি, राजस्मा, राजन्दा राजहि, राजेभि. ७ रञ्ले, राजिनि, राजुम राजस्मि, राजम्हि राजेसु ८ स. रान, राजा ८ रना राजानो, राजा " ब्रह्म (ब्रह्मन् प्रा. बम्ह) ब्रह्मा ब्रह्मानो (ब्रह्मा) २ ब्रह्मान, ब्रह्म ३-५ व्रझुना (ब्रह्मना) ब्रह्महि, ब्रह्मभि (ब्रह्महि, ब्रह्ममि) ब्रह्मस्स ब्रह्मान ब्रह्मना ब्रह्मन ब्रझनि ब्रझे ८ स. ब्रह्म (ब्रह्मा) ब्रह्मानो (ब्रह्मा) अद्धा, अद्धानो अद्र (अध्वन्) १ अदा ૨ अद्धान अद्धाने ३-५ अद्धना अद्धानहि, अद्धानभि ४-५ अदुनो अद्धान अद्धनि अदाने अदानेमु ८ स. अद्ध। अद्धा यदानो।
३ 'गो', 'णा' अने ससमीना एकवचनमा । राजन् ' शब्दनी • राइ' आदेश विक्से थाय छे. विशेषताः शिौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभ्रशमा । अन् । छेडा- वाळा नामोना अत्य 'न् । नो सवोधनना एरवचनमा विकल्प अनुस्वार थाय छे युर (युवन्मा. ब) युरा (यूनो) युवा, युवानो युपाना २ युवान, युव युवाने, युवे ३ युवाना, युवानेन, युवानहि युवानभि युवेन युचहि, युधेभि ४-६ युवानस्स, युरस्स युवानान, युवान युवाना, युवानस्मा, युचानेदि युवानभि युवानम्हा युवाह, युवमि ७ युवाने, युवानम्भि, युवाने युवानम्हि, पुरे, युवस्मि, युगम्हि युवामु, युवतु ८ स. युप, युवा, युधानो युवान, युवाना युवाना ['मएप' (मघवन् )ना रूपो 'युष' जेवा भने 'मघवत' (मघवन् ) ना रूपो 'गुणवत'मी जेग] मुद (मूर्धन्या. सुदा) मुसा, मुद्धानो. १ मुना २ ख हे अप्पं , अप्प ! (स० भवन् ) मव, भव ।] (स० भगवन् ) हे भयव!, भयव !, हे राय !, राय 1. हे सुकम्म !, सुकम्म!. मुद्धना मुद्धनि ७ मुद्धानेसु शेप 'वीर'नी जेवा. सानो सा (वन्या. स, साण) १ सा, सा, २ स, सान से, साने ३ सेन, साना सेहि, सेभि. (माहि, साभि) सानेहि, सानभि. सान सस्स ४-साय सेहि, सेमि सानेहि, सानेमि ५ सा, सरमा, सम्हा, साना ७ से, सस्मि, सम्हि, साने सासु ८ सस सा, सानो आ उपरात दळ्धम्म (ददधम्म), पचासधम्म, गाडीवधन्य, विस्सकम्म, विवचच्छद्द (विवृत्तछद्म-विअछउम), पृथुलोम, अथव्वन ( अहव्वण) अने वत्तह (वृत्रहन्) वगेरे अनेक शब्दो 'अन्' छेडावाळा छे. तेमा'पञ्चसधम्म' अने 'गाडीवधन 'ना रूपो'सा' १९७ प०- राया, रायाणो. राइणो, रायो गया. (मा० लाये) बी०- राइण, रायाणो, 'राइयो, राय राये, राया. राइणा, रण्णा राईहि, राईहिं, राईहि. रायेण, रायेणं रायेहि, रायहि, रायेहि च० छ०-रग्णो, राइणो राईण, राईणं. रायस्स रायाण, रायाणं. (ता०-रण्णे) (मा० लायाह ) (मा० लायाह) पं0- रणो, राइणो, राइचो, राईओ, रायतो, सयाओ, राईउ, राईहि, रायाउ, रायाहि, राईहितो, राईमुंतो, रायाहितो, राया रायचो, रायाओ, रायाउ, रायाहि, रायहि, रायाहितो, रायेहितो, रायासुतो, रायसुतो. (श्वन) नी का याय छे. 'विस्सकम्म' थी शन्दोन रूपो 'यार' नी जेवा थाय छे अने बाकी रहेला 'दहधम्म' अने 'वत्तह' ना रूपोमा थोडी विशेषता छे ते पालिप्रकाशयी समजी लेवी-जूश्री पालिप्र. पृ. १२१-१२९ अने एना टिप्पणो. १ सं० 'राम' उपरथी 'रणो' रूप पण याय ठे-जलो म्न, श- पृ. ३६ तथा पृ. ९७ विसर्ग-ओ. - यहन्वन' मुधीना
( शो० रायादो, रायाटु)
(मा० लायाटो, रायादु)
(पै० रायातो, रायातु)
स०- राइसि, राइम्मि
राईमु, राईम.
रायप्ति, रायम्मि, राय रायेमु, रायेमु.
राया, रायो, राय
रायाणो, राइणो, राया.
( शौ० पै० राय, राय, राया, रायो )
(मा० लाय, राय, लाया, लाये)
अन् ' छेडावाळा नामोना प्राकृत रूपोनी साथे न शौरसेनी,
मागधी अने पैशाचीना साधारण रूपो आपेला छे फक्त ।
शब्दना पेशाचीरूपोमा आ एक खास विशेषता छे
पैशाची
एक्वचन
बहुवचन
त०-'राचिना, रमा' (राज्ञा) बी०-राचिनो, रमओ (राक्ष)
च०७०-रानियो, रो (राज्ञ)
राजन्'
"
स०- राचिनि, रब्जि (राज्ञि)
नान्यतरजाति
उपर जणावेला ' अन् ' छेडावाळा नामोना क्लीवलिंगी रूपो
प्रथमा अने द्वितीयामा वरावर 'कुल' नी जेवा थाय छे अने
वाकी वधा ते ते भाषा प्रमागे पुलिंगी रूपोनी जेवा थाय छे.
जेमके
१ सरसावा 'राजन् ' ना पालिरूपो-पृ. १९३
२ जूओ इन मागधी (पृ. ३६) मागधीमी पेठ पैशाचामा
पण 'श,
'य' अने 'न्य'मा 'माथाय छे.
सुपूस, सुपूसाण (सुपूपन्)
सुपूसाणि, सुपूसा
सुपूसाइ
सुपूसाण
मुपसाणाणि, सुपूसाणा
सुपूसाणाइ
सुपूत,
मुपसाणि, सुपूसा
सुपूसाइ
सुपूसाण
सुपसाणाणि, सुपूसाणा
सुपसाणाइ
शेष रूपो, ते ते भाषा प्रमाणे · पूस ' नी पेठे,
सुअप्प सुअप्पाण (सुआत्मन्)
१ सुअप्प'
सुअप्पाणि, सुभप्पा,
सुअप्पाई
सुअप्पाण सुअप्पाणाणि, सुभप्पाणा,
सुअप्पाणाइ.
२ सुअप्प
सुअप्पाणि, सुअप्पाइँ,
सुअप्पाइ
সবা
सुअप्पाणाणि, सुअप्पाणा,
सुअप्पाणाइ.
शेप, पुलिंगी ' अप्प' नी पेठे
१ मुस गयण,
२ मुअप्प मुल,
२०० सुराय, सुरायाण (सुराजन् ) १ मुराय' सुरायाणि, सुराया, सुरायाइ सुरायाण सुरायाणाणि, सुरायाणा, सुरायाणाइ. २ सुगय मुरायाणि, सुराया, मुरायाइ मुरायाण सुरायाणाणि, सुरायाणा, सुरायाणाइ. शेप बधा पुलिंगी ' राजन् ' नी नेवा अपभ्रंशरूपो ए नामोना अपभ्रशरूपो पण 'वीर' अने 'कुल' नी नेव थाय छे. नेमके, पूस, पूसाण (पूपन्-नरजाति) १ पूसु, पसो, पूस, पूस, पूसा पूसा, पुसाण पसाणा. पूताणु, पूसाणो, पूसाण, पूसाणा २ पूम, पूम, पूसा पूस, पूसा पूसाणु, पूसाण, पूसाणा पूसाण, माणा ३ पूसेण, पूसण, पूमें पूसेहि, पूसाहि, पूसहि पूमाणेण, पूसाणेण पूमाणेहि, पूमाणाहिं पूसाणे पुसागाहिं. १ मुखमनार २०१ ५ ४-६ पूसासु, पूससु, सस्तु पूसाह, पूसह पूसाहो, पूसहो, पूस, पूप्ता पूम, पूसा, पूसाणासु, पूसाणा पूसाणाह, पूसाणह पूसाणस्सु, पूसाणाहो, पूसाणहो, पूसाण, पूसाणा पूसाण, पूसाणा पूसाहु, पूसहु, पृसाहु, पूसह पूसाहे, पूसहे पूसाणाहु, पूसाणह पूसाणाहु, पूसाणहु, प्साणाहे, पूसाणहे पूसाहि, पूसहिं पूसाणि, पूसाणे पूसाणाहि, पूसाणहिं ८ (१०) पुसु, पूसो, पूसाहो, पूसहो पूस, पूसा पूस, पूसा पूसाणाहो, पूसाणहो, पूसाण पूसाणा पूसाण, पूसागा पूसि, पूसे पूसाणु, पुसाणो, सुपूस, सुपूसाण (नायतरजाति) सुपूसाइ, मुसह सुपूस, सुप्सा सुपूसाइ, सुपूसइ सुपस, सुपूसा वाफी बघा, ' पूस' ना अपभ्रश बपो प्रमाणे प्रा० २८ ए न प्रमाणे राय, अप्प वगेरे । अन् ' छेडावाळा नामोना बधा अपभ्रश रूपो करी लेवाना छे [पूस, अप्प, राय वगेरे शब्दोना शौरसेनीरूपोनो पण भाभ्रशमा उपयोग थइ शके छे] अस्' छेडावाल नामो ('नरजाति) प्राकृतमा अने पालिमा 'अस्' छेडावाव्य नामोना रूपो अकारात शब्दोनी वा थाय छे' नेमके, सुमण (सुमनस्) १ सुमणो सुमणा २ सुमण सुमणे, सुमणा ३ मपणेय, मुमण मुमणेहि, मुमणेहि, सुमणहिँ इत्यादि वधा ते ते भापा प्रमाणे · वीर'नी जेवा समजवा १ भूयो पृ. १२३ ( मानी जावियो) २०१०चत्यव्यजनरोप ३ शरिमा 'पुमस्' (स, पुमु) शब्दना रूपोमा विशेषता छ । नाममा पुम (पुमस्) १ पुमा पुमा पुमा पुमानो पुमान पुमानो म पुमान, पुभे पुमानेडि, सुमुना पुमानेनि, पुमेन पुमेहि, पुमि २ ३ पुमाना प्रमाणे सुक्य (सुवचस्) सुमेह (घ) (सुमेधस् ) विमण (विमनस् ) पक्य (प्रवयम् ) अने दुव्वय ( दुर्वचस् ) वगेरे शब्दोना रूपो ममजवा स्त्रीलिंग स्त्रीलिंग नामो पाच प्रभारना छे, जेमके-आकारात, इकारात, ईकारात, उकारात, उबारात । आकारात १ प्राकृतमा आकारात नामो वे जातना छे, नेमके-केटलाक आकारात नामोनु मूळरूप ( सस्कृतमा) अकारात होय छे ते अने केटलाक आकारात नामोनु मूळरूप (सस्कृतमा) अारात नथी ४-६ पुमुनो पुमान पुमरस पुमाना पुमानाह, पुमानभि पुमुना पुमा, पुमरमा पुमेहि पुमभि पुमम्हा पुमाने पुमानमु पुमामु, पुमे पुमरिम, पुमम्हि ८ स.--पुम, पुमानो पुम पुमा ५ ७ - चिद्रमस्' शब्दनु प्रथमाना एकवचनमा 'चदिमा' रूप पाय छे अने साकीना रूपो अकारातनी या थाय जे-जा पारिया पृ० १३०-१६१ अने एना टिप्पणी
०
.
-
३ ज्या शन्य (०) अ त्या शब्दोनु मूळम्स पण वपराय
छे अने जो मूळरूप हवान होय तो तेने दीगत करीने वापरवानु
२०५
ओपगवी, ओपगवा (औपगी ), वेई, वेआ (वेदी),
सुप्पणेयी, सुप्पणेया (सापर्णी), अक्सिई, अविस्खआ (आशिकी),
धेगी, थेगा (खणी ) पुण्ही, पुण्डा (पोम्नी), सारणी, माहणा
(साधनी) कुरुचरी, गुरुनरा (कुरनरी) इत्यादि ।
३ छाया अने हरिद्रा शब्द प्राकृतमा ईकागत पण वनेछ
शाही, छाया (छाया), हल्दी, हरदा ( हरिद्रा)
सीलिंगी नामोने लागता प्राकृत प्रत्ययो
'आ, उ, ओ, .
वी.- म्
'आ, उ, जो
त०-
१०, छ.- अ, आ, इए
५०- अ, आ, इ, ए, तो,
तो. ओ, उ, हितो,
ओ, उ, हितो मुतो
स० अ, आ, इ, ए
प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो
१ 'तो' अने म्' सिकायना प्रत्ययो पर रहेता पूर्वनो
हस्व स्वर दीर्य याय २.
म्' प्रत्यय पर रहेता पूर्वनो दीर्घ म्वर इस धाय के
१ आ प्रत्यय ईकारात नाभने जE
२ मा प्रत्ययने आकारात नामने नहाने नथी.
ण,ण
२
२०६
४ सवोधनना एक्वचनमा ईकारात अने उकारात नामोनो
अत्य स्वर हस्व, थाय छे अने बहुवचन, प्रथमानी जेवु थाय छे
५ सबोधनना एकवचनमा इकारात अने उकारात नामोना
अत्य स्वरनो दीर्घ विक्से थाय छे अने बहुवचन प्रथमानी सरख
थाय छे
६ जे आकारात शब्टोनु मूळ (संस्कृत) रूप अकारात
होय छे, ते शब्दोना अत्य । आ'कारनो, सबोवनना एक्यचनमा
'ए' विकल्पे थाय छे अने बहुवचन प्रथमानी सरग्वु थाय छे
७ सोबनना एक्वचनमा, बीना 'आकारात शब्दोनु मूळ
रूप न वपराय छे अने बहुवचन प्रथमानी सरखु थाय छे
विशेपत्ता
शौरसेनी, पैशाची अने मागधीमा पण स्त्रीलिंगी नामोने
प्राकृतनाज प्रत्ययो लगाडवाना छे मात्र मागधीमा उट्ठी विभक्तिमा
फेर छे अने ए आ प्रमाणे छे
फक्त आकारात नामोने मागर्धामा छट्टोना क्वचनमा 'ह'
प्रत्यय अने बहुवचनमा ' हैं ' प्रत्यय लागे छे जेमा ,
मालाह
मालाह
स्त्रीलिंगी नामोने लागता अपभ्रश इत्ययो
एकव.
बहुवा
उ, ओ,०
बी०-
१ जो पृ० २०४ मि० ५,
.
.
.
उ, भो,०
२०७ त०- ए च० छ०- हे, . eShree स० हि हो, . स.- . अपभ्रश प्रत्ययने लगता नियमोः १ अपभ्रशना प्रत्ययो लागता नामनो अत्य स्वर इस्व अने दीर्घ थाय छे. छे त्या पण उपरनो नियम लागु थाय छे. २ ज्या शून्य माकृत रूपाख्यानो 'माला मालाउ, मालाओ, माला मालाउ, मालाओ, माला माला प०- बी० ०- माल ९ आकारात स्त्रीलिंगी शब्दना पालिरूपो मालान. माल माला माला, मालायो. २ माल माला, मालायो. ३-५ मालाय मालाहि, मालाभि. मालाय ७ माराय मलय ८ स-माले माला, मारायो. --चूलो पीरिय० पृ. ९९-१००-१०१ मागमु. -- ૨૦૮ तः मालाअ, मालाइ, मादाए च००- मालाअ, मालाइ, मालाए मालाहि, मालाहिं, मालाहि मालाणं 'मालाण, (मा० मालाह) मालतो, मालाओ, मालाउ, मालाहिंतो मालामुंतो (मा० मालाह) पं.- मालाअ, मालाइ, मालाए, मालतो, मालाओ, मालाउ, मालाहिंतो मालाअ, मालाइ, मालाए सं०- मालासु, मालासुं माले !, माला ! मालाउ !, मालाओ !, माला। ए रीते नावा (ना) गउआ (गोका) सदा (श्रद्धा), मेहा (मेधा) पण्णा (प्रज्ञा ), तण्हा (तृष्णा), विजा (विद्या), पुच्छा (पृच्छा) चिंता. टुहा (क्षुध-चुह ) कउहा (कसुभ् कउह), निसा (निशा ) अने दिसा (दिशा) वगेरे आकारात शब्दोन रूपाख्यानो 'माला'नी पेठे छे. १ आकारात स्त्रीलिंगी शहशेने पपीना पहुवचनमा मागधीनो प्रत्यर पण रागे छे. जेमके-सरिआ+ सरिआणं, सरिआऊँ। माग मालाण, मारा। २ जम्मा' रान सर्वोधन एकवचन अम्मो पा थाय.
૨૦૨ प०- स०- वाया वाया ( वाचा) वाया वायाउ, वायाओ, वाया. वायाउ, वायाओ, वाया शेष रूपो माला नी जेवा. ए रीते अच्छरसा (अप्सरम् ), आसिप्ला (आशिष् ), धूआ, दुहिआ (( दुहित), नणदा (नना-ह), नावा (नौ), पिउच्छा, पिउसिआ (पितृप्वत), बाहा (बाहु), माआ,माअ (य) रा, (मात) माउसिआ, माउच्छा ( मातृप्वस्) अने ससा (स्वस) वगेरे आकारात शब्दोना रूपाख्यानो समनवाना छे ५०- गई 'गइ (गति) गईउ, गईओ, गई गईउ, गईओ, गई बी०- गई १ इकारात स्त्रीलिंगी शब्दना पालिरूपो रति (गति) रत्ति रत्ती, रत्तियो २ रति ३-५ रत्तिया रत्तीहि, रत्तीभि ४-१ रतिया रत्तीन रत्तिर रत्तीमु रत्तिव रचि रत्ती, रचियो ओ पाल्मि० ५० १०१-१०२ प्रा०२७ ७ २१० ty गईहि, गहि. गईहिं गईण, गईण त०- गईअ, गईआ गईइ, गईए ५०,३०- गर्दअ, गईआ, गईइ, गईए गईअ, गईआ, गईई, गईए गइत्तो, गईओ, गईउ, गईहितो गईअ, गईआ, गईइ, गईए गई ! गई ! ~ स०- गइतो, गईओ, गई, गईहिंतो, गर्डसुतो गईसु, गई ('गइसु, गइमु) गईड, गईओ, गई ए प्रमाणे जुनि (युक्ति) माइ (मातृ) भूमि, जुवइ (युवति) धूलि, रइ (रति), बुद्धि, मइ (मति), दिहि, घिइ (धृति) अने सिप्पि, सुति (शुक्ति ) वगेरे इकारात शब्दोना रूपाख्यानो समनवाना छे । [स. गन्य 'उपरथी पालिमा 'रत्यो, 'राम्या' अमे राच्या उपरथी रत्या, रात्र्याम् उपरथी रत्य यो 'र' तथा 'रानी' उपरथी 'रत्तो' रूपा पण बने छे] १ ओ हे. प्रा. व्या. ८-३-१६ प०- . घेणु (धेनु) धेणू घेणूज, घेणूओ, घेणू बी०- धेणु धेणूउ, घेणूओ, घेणू त०- घेणूअ, घेणूआ, घेणूहि, घेणूहि, धेहि धेणूइ, घेणूए च०,छ०- घेणूअ, घेणूआ, घेणूण, घेणूण घेणूइ, धेगूए ५०- घेणूअ, घेणूआ, घेणूइ, घेणूए घेणूचो, घेणूओ, धेणूती, घेणूओ, घेणूउ, घेणूउ, घेणूहितो घेणूहितो, घेणूमुतो स० घेणूअ, घेणूआ, घेणूस. घेणूस घेणूइ, घेणूए स- घेणू । घेणु ! धेणूउ, घेणूओ, घेणू १ उकारात स्त्रीलिंगी शब्दना पारिरूपो यागु (यागू) १ यागु यागू, यागुयो यागु ३-५ यागुया यामूहि, यामि ४-६ यागुया यागून यागुया या गूसु. यागुय ८ सं० यागु यागू, यागुयो, -जूओ पालिप्र० पृ० १०५-१०५ " " २१२ ए प्रमाणे गउ, कच्छु, विजु (विद्युत् ), उजु (ऋजु), पिया (प्रियङ्गु) माउ (मातृ) दगु (दडु) पडु (प१), गुरु, लहु (लघु) अने क्ण्ड वगैरे उकारात शब्दोना रूपो धेणु' नी पेठे समजवानाछे वी०- नइ 'नई (नदी) प०- नई नईआ, नईउ, नईओ, नई नईआ, नईड, नईओ, नई त०- नईअ, नईआ, नईहि, नईहिं, नईहि नईइ, नईए १ ईकारात स्त्रीलिंगी शब्दना पालिरूपो नदी १ नदी नदी, नदियो (नजो) २ नदि, नदिय ३-५ नदिया (नजा) नदीहि, नदामि ४-६ नदिया (नजा) नदीन मदिया नदीसु (नजा) (नन्ज) ८ स. नदि नदी, नदियो (नजो) -जूओ पालिय. पृ० १०३-१०४-१०५-१०६ तथा " " एना टिप्पणो [स. नद्य , नद्या, नया अने नद्याम् उपरथी पालिमा उपर्युक्त नज्जो, मज्जा, मजा अन नब्ज रूपो वनेला छे-नुओ पृ. ३३ अ० २७ ज्य, य्य, र्य-न ] २१३ च०, छ०- नईअ, नईआ, नईण, नईण नईइ, नईए. प.- नई अ, नईआ. नईइ, नईए, नईतो, नईओ, नइचो, नईओ, नईउ, नईड, नईहितो नईहितो, नईमुनो स०- नईअ, नईआ, नईम, नई नईई, नईए नईआ, नईउ, नईओ, नई ए प्रमाणे गाई (गो) वावी (पापी), क्यली (क्दली), नारी, कुमारी, तरुणी, समणी (श्रमणी), साहुवी, 'साहुणी( साध्वी), पुहवी ( पृथ्वी ), वाराणसी तणुवी (तन्वी) इ थी थी (स्त्री) अने बहिणी (भगिनी) वगैरे ईकारात शब्दोना रूपाख्यानो । नई नी स०- बी०- वहू (वधू) वहू वहउ, वहूओ, वह वहु वहूउ, वहूओ, वहू १ जूआ पृ० ४३-वी-उवी अने ते उपरनु टप्पण २ऊकारात स्त्रालिंगी । दना परिरूपो वधू (प्रा० वटू) १ वधू वधू वधुयो २ घधु ३-५ वधुया वाह, वधूमि, ४-६ वधुया ३ वधून " त०- वहू, बहूआ, वहूहि, वहहिं, वहूहि वहूई वहुए च०७०-- वहू, वहआ, वहूण, हूण वहूइ, वहुए प०- वहभ, वहआ, वहूइ, वहूए वहुत्तो, बहूओ, वहुत्तो, वहूओ, बहूउ, वहूहितो, पहसुतो स०- वहूअ, वहूआत वहूम, वहूसु वहूई। वहए बहु । वहूआ, वहूउ, वहओ, वहू ए प्रमाणे अज्जू (आर्या ) पङ्ग, कणेरू, वामोरू, कद्दू (क्द) पीणोरू (पीनोरू) अने कधू (कर्कन्धू) वगेरे ऊकारात शब्दोना रूपाख्यानो समजवाना छे वहूउ वाहितो प्राकृतना स्त्रीलिंगी रूपारयानोनी पेठे शौरसेनी, मागधी अने पैशाचीना पण रूपाख्यानो समजवाना छे-शौरसेनीमा, मागधीमा अने अपभ्रशमा पचमीना एक्वचनमा (प्राकृतना · ओ' अने 'उ' ने बदले) 'दो' अने 'दु' प्रत्यय वापरवाना छे, पेशाचीमा एने वदले 'तो' अने 'तु' वापरवाना छे अने मागधीनी जे खास विशेषता छे ते जणावी छे १ वधुवा वधूम वधुय ८ स०-वधु -~-नूओ पारिन. पृ० १०७-१०८ १जयो पृ० २०९ वधू, वधुयो अपभ्रशरूपारयानो माला १ माला, माल मालाउ, मालउ, मालाओ, मालओ माल, माला २ मालामाल ३ मालाए, मालए ४-६ मालाहे, मालहे माला, माल ५ मालाहे, मालहे मालतो, मालाढो मालादु, मालाहितो, ७ मालाहि, मालहि स० माला, माल मालराउ, माल, मालाओ, मालओ माल, माला. मालाहि, मालहिं. मालाह, मालहु, मारा, माल मालाहु, मालहु मालतो, मालादो मालादु मालाहितो, मालामुतो मालाहि, मालहिं माराहो, मालहो माल, माला मई मड, मई मइर, मईउ मइआ, मईओ मइ, मई मदउ, मईड मइ, मई मइओ मईओ -- मद, मई ३ मइए, मईए महहि महि ५-६ मइहे, मईहै मइ, मई मइहु, मईहु, मइ, मई. मइहु, मई. ५ 'मइहे. मईहे ७ महि, मईहि र स० मइ, मई महि, मईहिं. मइहो, मईहो, पइट्टी (प्रविष्टा-पविट्ठा) १ पइट्टी, पइट्टि पइडिउ, पाटील, पइटिओ, पइट्ठीओ, पइट्ठी, पइदि. २ पइट्टी, पट्टि पइटिउ, पट्टीउ, पइटिओ, पाट्ठीओ, पट्टी, पइदि. ३ पइहिए, पइट्टीए पइद्विहि, पट्टीहिं. ४-६ पइट्ठिदे, पइट्टीहे पइट्टिहु, पट्ठीहु, पइट्टी, पइटि पइट्टी, पइडि. ५ पदष्ठिह, पइटीहै पइट्टिहु, पट्ठीहु. पइडिहि, पट्टीहि पइद्विहिं, पट्टीहिं ८ स० पइटि, पइट्टी पइट्ठिहो, पइट्ठीहो पइट्टी, पट्टि धेणु १ घेणु, घेणू घेणुउ, घेणूउ धेणुओ, घेणा माला 'ना पचमीना रूपानी पठ ही महत्तो, पहिलो यमेरे रूपो पण समजा-जओ पृ. २१५ .
२१७ २ घेणु, घेणू २ धेणुए. घेणूए ४-६ धेगुहे, धे]हे घेणु, धे ५ धेणुहे, घेगृहे वेणुहि, धेहि ८ स०-घेणु, घेणू घेणु, धेणू. घेणुउ, घेणूड वेणुओ, घेणूओ. धेणु, घेणू. धेगुहि, धेगहि. धेणुहु, वेहु, धेणु, घेणू . घेणुहु, धेगूहु. घेणुहि, धेहि धेणुहो, हो, घेणु, पेण वह वह, पहु २ वह, यह वहुउ, वहउ बहुओ, बरओ, वह, यह वहुउ, वह बहुओ, नही, रह, ह वादि, पहि यहह, यह ह. इ, वह ३ पहुए, पहा ५-६ यहुहे, म्हहे. वहु, यह ५ गहे, पररे प्रा०२८
२१८
७ वहुहि, वहूहि
८ स०-वहु, वह
वहुहिं, वहूहि.
वहुहो, वहूहो
बहु, वहू,
ए प्रमाणे वधा आसरात, इकारात, ईकारात, उकारात अने
ऊगारात शब्दोना अपभ्रशरूपो वनावी लेवाना ले
-
'सर्यादि (स्त्रीलिंग)
स्त्रीलिंगी सर्वादि शब्दोना प्राकृतरूपो, शौरसेनीरूओ, माग
धीरूपो, पेशाचीम्पो, अने अपभ्रशरूपों पूर्व जणावेला साधारण
स्त्रीलिंगी शब्दो प्रमाणे समजवाना छे
रेटलाक स्त्रीलिंगी सर्वादि शब्दोना प्राकृत रूपोनी विशेषता
आप्रमाणे छे
[बालिगी सवाटि शब्दोना आकारात' अगना रूपो
'माला'नी जेवा करवाना छ. ईकारात अगना रूपो नई नी
नेवा करवाना छे भने उकारात अगना रूपणे घेणु' नी जेवा
रवाना छे ].
१ रनारंगी समादि शब्दोना पालिस्पो--
स्था (सळ) ना वधाराना रूपा
४-५ सध्यस्सा (म. सर्वस्या) सध्यास ( स० सर्वासाम्)
सव्यासानं
७ सयस (म० सवस्थाम)-लो पारप्र. पृ० १४० अने टिप्पण.
की था 'मारा'मा पालिरूपो जना
१ नी, ता, 'णी, णा (तत्) सा तीआ, तीउ, तीओ, ती ताउ, ताओ, ता १ पली अने नीजना एकरचनमा तथा छट्ठीना पहुपचनमा आ ईकारात जगनो प्रयोग थतो नथी २ नूला पृ० १४१ नु ण उपरनु टिप्पण ३ ता (तद्) ना वधाराना रूपो १ तस्सा (स० तस्या ) ताहि ताभि ताय नाहि, नाभि नस्सा नाय } सान ७ जस्सा तस्साय, तस्सा स० तस्यै । तास ( स० त साम् ) ताय तस्या तासान नस्साय, नरसा नास नासान नाय अस्साय जस्ता आस आसन तिस्साय, तिस्सा तस्स (स० तस्याम्) तस्सा नस्स, नस्सा अस्स, यस्सा तिस्स, तिस्सा ताय, ताय नाय, नाय पासी बधा मालाना पेठ जूओ पालिए० १० १०३ अने [टप्पण २२० २ त तीआ, तीड, तोओ, ती, ण ताउ, ताओ, ता ३ ती, तीआ तीइ तीए, तीहि, तीहिं, तीहि, ताअ, ताइ, ताए ताहि, ताहि, ताहि. (पै० नाए) सिं, (तास) तिम्सा, तासे (तेसिं) तीअ, तीआ, ताइ, तीए, ताअ, ताइ, ताए ताण, ताण स०-(ताहि) तीअ, तीआ, तीइ, ताए, ताम, ताड, नाए शेष रूपोनई। अन माला 'नो पेठे ['णी अने या' अगना रूपो पण 'नई' अने मालानी पेठे थाय छे] v १ . 'जी, जा । (यत्) जीआ, जीउ, जीओ, जी, गाउ जाओ, जा जीआ, जोर, जीओ, जी, जाउ, जाआ, जा जिम्सा, जीते, जाण, जाण जाअ, जाआ, जीह, जाए नाज, जाई, जाए १ मा पृ. २१९ परनु टिप्पण १ ૨૨ (माहि), जीभ, नीना, जीइ, जीए, जाअाजाई, जाए शेष पो। नई नी अने • मालानी जेवा. मा , 'की, का (किम् ) कीआ, कीउ, कीओ, की, . काउ, कांओ, का. कीआ, कीउ, कीओ, की, काउ, काओ, का. ४-६ क्रिस्सा, कीसे, (कास) कीअ, कीआ, कीइ, कोए काअ, काइ.काए ७ (काहि), कीअ, कोआ, कीइ, कीए, कास, काइ, काए शेष रूपो • नई । अने 'माला'नी मेवा. काण, काणं. इमा, 'दमी (इदम् ) १ इगिआ, इमा, उमी उमीआ, इमीउ, इमीओ, इमी, १ जूमो पृ० २१९ उपरनु टिप्पण १. २ इम (इदम् ) ना पालिरूपोः १ अयं इमा, इमायो. २ इमं "
२२२
इमाउ, इमाओ,
इमा
३ दमीअ, इमीभा, इमीइ,
इमीए,
इमाअ, इमाइ, इमाए
(पै० नाए)
इमीहि, इमीहि,
इमीहि
इमाहि, इमाहि,
इमाहि
(आहि, आहि,
आहि)
दमीअ, इमीभा, इमीइ, इमीण, इमीण, इमीण,
इमाअ, इमाइ, इमाए इमाण, इमाण,
शेष रूपो 'नई' अने • माला 'नी जेवा
इमाय
इमाहि, इमामि
इमास, दमासान
इमार,
हामेरमा, इमिस्सार
अरसा, (म० जस्या )
अस्साय (स. अस्य)
७
इमाय,
इमामु
दामरम,
घरस (स, अम्गाम् )
-ओ पानिप.पु. १..-१९५
२२३ . एआ, 'एई १ एसा, एस: इण, इणमो एईआ, एईउ, एईओ, एई, एआउ, एआनो, एआ एई एईआ, एईइ, एईए एईण, एईण, एआअ, एआइ, एआए एआण, एआण शेप रूपो - नई' अने 'माला' नी जेवा १ 'अह, अमू 'अमु (अदस्) अमूङ, अमूओ, अमू शेप घेणु' वत् . ७ १ एता (एतद्) ना पाठिरूपो एसा एताय, एतिस्सा ( स० एतस्या ) एताय, एतिस्सा निस्साय स० एतस्यै एतस्या एताय एवाय एतिस्स, एतस्स (स० एतस्याम) वाकी बधा मागनी पठे -नो पारिप पृ० १४४ [जा पृ० १४५ १ टप्पण ] अमुना परिरूपा अमु, अमु, अमू, यमुया अगु ३-५ अमुया अमुया, अमुस्सा । ૨ २ अमू, जमुया अमूाइ, अमूभि अमूसा जमूसान २२४ ऋकारात (बीलिंग) सारात स्त्रीलिंगी 'मातृ' शळना · माआ' अने मायरा आवा वे रूपो जूटा जूदा अर्थमा थाय छे ए'आगळ जणावेलु छे, एथी एना शौरसेनी वगेरेना वधा रूपो वाया नी जेवा समनवाना छे, जेमके, माआ, मायरा (मातृ) प० माआ, माआओ, माआ, मायरा मायराउ, मायराओ, मायरा माआउ, ७ थमुय अमूमु थमुस्स -~ -ओ पारिप पृ० १४८ ixc १ ओ पृ० २०४, नि०५-'मायर' ने बदले 'मायर' पण यह शके छे. माता, मातरे मातहि, मानाम २ सकारात स्त्रीलिंगा 'मातृ' शब्दना पालिरूपो मातु (मातृ) १ माता माता, मातर। २ मातर मातरा मातरेहि, मातरेभि. मानुया मत्या मातु मातरान, मातान, माना मातून मत्या तार मावरम, मानुरा मानम्. मत्या मानुय, मस्य ८1०-मा, माता माना, मारा, -भो पारिय. १० १०८-१०९-११. न एन टिप्पा. - २२५ बी०- माअ माआउ, माआओ, माआ, मायर मायराउ, मायराओ, मायरा त०- माआअ, माआइ, माआहि, माआहि, माआहि, माआए, मायराहि, मायराहि, मायराहिं. मायराअ, मायराइ, मायराए न०,०-माआअ, माआइ, माआण, माआण माआए ('माईण) मायराज, मायराइ, मायराए मायराण, मायराण १०- माआअ, माआइ, माआए, माअत्तो, माआओ, माअतो, माआओ, माआउ, माआहितो, माआउ, माआहितो माआसुतो, मायराअ, मायराइ मायरत्तो, मायराओ, मायराए, मायराउ, मायरतो, मायराओ, मायराउ, मायराहितो, मायराहितो मायरासुतो म०- माआअ, माआइमाआए, माआसु, माआसु मायराअ,मायराइ, मायराए मायरासु, मायराम स.- माआ, माआउ, माआओ, माआ, मायरा [ माआ (मातृ-माता+माआ) नु । माया' बनावीने पण 'माआ' नी जेवा ज रूपो वनावी शकाय छे ] १ ओ पृ० ५६ मातृ-माइ माइण (स० मातृणाम् ) २ जूओ पृ० १८ ' कादि' नो ''यार मायराउ, मायराओ,मायरा. मा०२९ .
२२६ [ 'मातृ' शब्दना माइ' अने 'माउ' एवा पण अंगो बने थे, पण रूपाख्यानने प्रसंगे ते वन्नेनो प्रयोग विरल जणाय छै'. सं० 'दुहित 'र्नु प्राकृत रूप 'धूआ' थाय छे ए आगळ जगावेलुं छे एथी एनां वध रूपो 'माला' नी नेवा थाय छे. . "" . ओकारात 'गो' शब्दना स्त्रीलिंगी अंगो त्रण थाय छे जेमके 'गोणी, गाई अने गउ, एमाना 'गड' ना शौरसेनी वगेरेना बधा १ जूओ हे० प्रा० व्या०८-३-४६-“माईण" "माऊए समनिशं बंदे पभागचंद्रिका'मा तो ५ बरे अंगोने रूमा- म्यानने प्रसंगे वधी विभक्तिओमा वापरला छे-" इदु मातुः १-२-८३ पृ० १.८. 'माइ ना रूपो 'गर' नी जेवा भने माउ'मा रूपो 'घेणु मी जेवा थाय छे. २ धीनु (दुहित) ना पालिरूपो १ धीता धीता, धीतरी. २ धीवर, धी धीतये, धीवरे. ३-५ धीवरा, धीतह, धीतरेभि, धातुया धीतूहि, धीतूभि. ४-६ पीतु, धीतून धीतानं, धोतरानं ७ धातरि, पीतूम, पीनुया धीतरेम. धोनुयं जूझो पारिप पृ. ११०-१११ ३ जना १०.२.४ नि ५. . ४. गोदना प्राकृत रुलातयेमा 'गावी' 'गोषी' 'गोवा' भने 'गोरोवलिकाने पपगनादेला के.-महाभाम्य . ५० धौनुया - प०- गऊ रूपो बराबर ' धेणु' नी नेवा थाय छे अने • गोणी' 'गाई' ना पण शौरसेनी वगेरेना वधा रूपो बराबर · नई ' नी नेवा बने है, नेमके, गउ (गो) गऊउ, गऊओ, गऊ. बी०- गउ गऊड, गउओ, गऊ. त. गऊज, गऊआ गऊहि, गऊहिं, गउहि. गऊ, गऊए च०,०- गऊअ, गऊआ. गण, गऊण. गऊ, गऊए प० गऊअ, गऊआ गऊइ, गऊए गडहिंतो, गउसुतो. गऊत्तो, गऊओ गऊउ, गडहितो स० गऊअ, गऊआ गऊचो, गऊओ, गऊउ, , गऊस, गउमु. गऊ, गऊए गऊ, गउ, स०- गउउ. गऊओ, गर. 'गाई, गोगी प.- गाई, गाईआ, गाईड, गाईओ, गाई. १ त्रीलिंगी 'गो' शब्दना पारिरूपो. गो १ गो, गरी २ गावि, गर, गत्र गाची, गायो, गको. गाची, गारो, गयो
૨૨૮
गोणी
गोणीमा गोणीउ,
गोणीमा, गोणी
बी- गाइ,
गाईभा, गाईउ,
गाईओ, गाई
गोणि
गोणीआ, गोणीउ,
गोणीओ, गोणी.
१०- गाई, गाईभा, गाईहि, गाईहिं,
गाईड, गाईग गाइहि
गोणीअ, गोर्णाभा, गोणीहि, गोणीहि,
गोणीइ, गोणीए गोणीहि
इत्यादि था नई नी नेता
२२९
.
संख्यावाचक शब्दो
विशेषता:
१ अट्ठारस (अष्टादश) सुधीना सख्यावाचक शब्दोने षष्ठीना
बहुवननमा 'ह' अने ' व्ह' प्रत्यय लागे रे पगण्ह, एगण्ह ।
दुण्ह, दुह । उभयण्ह, उभयण्ड वगेरे.
इक, एक, एग, एअ (एक)
आ शब्दना ते ते मापाना पुलिगी रूपो 'सव्व' नावा थाय
3, नीलिंगी सो 'माला'नी जेवा याय छे अने नपुसकलिंगी रूपो
नपुसकी 'सन्च' नी वा थाय छे. ए प्रमाणे बधा सख्यावाचक
शब्दोमा यथासंभव समजवानु
'उभ, उह (उभ)
आ शब्दना रूपो बहुवचनमा ज थाय ले अने पसव्व । नी
पेठे छे.
१ मख्याधाचकशब्दना पालिरूपो
(पालिप्रकाशमा पृ० १५५ थी १६८ मुचीमा सख्यावाचक
शब्दोना रूपो आपेला छे)
'उभ 'ना पालिरूमो
छे
१-२ उभो ।
उभे।
३-५ उभोहि, उभोभि,
उभेहि, उभेभि।
४-५ उभिन्नं।
उभोमु, उभेम् ।
७
ओ पालिप० ५० १५.
२३०
५०- उभे।
वी०- उभे, उभा ।
त०- उभेहि, उभेहिं, उभेहि ।
च० छ०-उभण्ह, उभण्ह ।
उभतो, उभाओ, उभाउ,
उभाहि, उभेहि,
उभाहितो, उभेहितो,
उभासुतो, उभेतो।
स० उभेसु, उभे ।
ना अपभ्रश रूपो ‘सव 'ना अपभ्रश रूपोनी पेठे छे.
'दु (द्वि) णे लिंगना, रूपो
आ शब्दना रूपो बहुवचनमा न थाय छे
१०- दुवे, दोष्णि, दुष्णि, वेणि, विण्णि, दो, वे ।
वी०- दुवे, दोण्णि, दुण्णि, पेणि, विप्णि, दो, वे ।
दोहि, दोहिं, दोहि,
वेहि, वेहिं, वेहि।
१ 'दिना पारिम्पो
१-२ दुवे,
त०-
दीहि, दीभि ।
४-५ नविन, दिन ।
द्वीम् ।
-~ओ पारिप्र. १. १५६
३
है
च०,०-दोन्ह, दोण्ह, दुण्ह, दुण्ह, वेण्ह, वेण्ह, विण्ड, विण्हं। ५०- दुनो, दोओ, दोड, दोहितो, दोसुतो, वितो, वेओ, वेउ, वेहितो, वेसुंतो ।। स०-- दोसु, टोमु, वेसु, वे। दु' मा अपभ्रश वगेरेना रूपो ' भाणु' मा बहुवचनांत रूपो जेवा छे. - 'ति (त्रि) प्रणे लिंगना म्पो प०- बी०- तिण्ह, तिण्ह । शेष रूपो ते ते भाषा प्रमाणे · इसि' ना बहुवचन रूपो नेवा छे. } तिष्णि। तयो। १ पालिमा तो 'ति' (वि) शब्दना रूपो पुलिंगमा, स्त्रीलिंगमा अने नपुंसकलिंगमा शुदा जुदा थाय छे, जमके ति (पुलिंग) ति (स्त्रीलिंग) ति (नपुंसकलिंग) तिस्सो। तीणि तोहि, वीहि, तीभि। वीमि। तिण (तिस्स) तिम तिण्णन तिरसन्न । तिण्णन । तीम। तीम। -जूओ पारिमा पृ० १५७ सीमि। M
२३२
'चउ (चतुर् ) त्रणे लिंगना रूपो
तृतीया, पचमी अने सप्तमीना प्रत्ययो पर रहेता आ शब्दना
अत्य 'उ'नो दीर्घ विक्ल्पे थाय छे.
प.-
चत्तारो, चउरो, चत्तारि ।
बी०-
त०- चऊहि, चउहि, चऊहिं,
घउहि, चउहिं, चउहि ।
च० छ०-चउण्ह, चउण्ह.
शेष रूपो ते ते भाषा प्रमाणे ' भाणु 'ना बहुवचनात रूपो
नेवा छे
१ पालिमा 'चतु' (चतुर्) शब्दना पण पणे लिंगमा रूपा
उदा जुदा थाय छे, जमके
चतु (पुलिंग) चतु (स्त्रीलिंग) चतु (नपुसकलिंग)
चनाये,
चतस्सो।
चत्तारि।
चतुरो।
বনুষ্টি,
चतूह,
चन्मि।
चभि । चतूभि ।
चतस्सन्न।
४-६
धनुन
चन्न।
चन्मु।
चहि,
-यो पारिया पृ० १५७-१५८
'पंच (पञ्च) नगे लिगना रूपो } - पचा बी०- त०- पचेहि, पचेहि, पचेहि, पंचहि, पहि, पचेहिँ। च० छ०-पंचण्ह, पचण्हं। शेष रूपो ते ते भापा प्रमाणे 'निग 'ना बहुवननात रूपो जेवा. . ए रीते छ (पट), सत्त (सप्तन् ), अट्ठ (अष्टन् ),नव (नवन् ), दह, दस (दशन्), एआरह, एगारह, एआरस (एकादश), दुवालस, बारह, बारस (द्वादश), तेरह, तेरस (त्रयोदश), चोहह, चोद्दस, चउद्दह, चउद्दस (चतुर्दश), पण्णरह, पण्णरस (पञ्चदश). १ पच (त्रपे गेि सरखा) पचन ३- पहि, पचभि। ४-१ पचन। पचमु। --ओशल्पि. पृ० १५८ २ व्याकरणनो नियम जोता तो 'पवेहि ' वगेरे 'ए'कार याळा रूपोज यह शके छे, आपप्राकृतमा पचहि वगेरे 'ए'कार विनाना पण रूपो पराएला छे जेमके, [" पचहिँ कामगुणेहि "पचहिं महब्बएहि ॥ "पचहि किरिआहि" "पचहि समईहिं "--बमणसूत्र ] माटे अहीं ए बन्ने रूमो साये देखाटेला छे, प्रा०३० - .
२३५
सोल्स, सोलह (पोटश), सत्तरस, सत्तरह (सप्तदश) अने अहा-
रस, अट्ठारह (अष्टादश) ए वधा शब्दाना रूपो पिचनी पेट
समजवाना छे.
प०-
का (कति)
( आ शब्दना रूपो बहुवचनमा न थाय छे)
जी-
} कई
२०७०-इव्ह, रुदण्हं
शेषरूपो. ते ते भाया प्रमाणे 'इसिना बहुवचनात रूपो
जेवा छे.
-
नीचे नणावेला शलोमा ने शब्दो आकारात छे तैना रूपो
माला' नी नेवा जाणवाना छे अने जे शब्दो इकारात छे तेना रूपो
'गइनी नेवा जाणवाना छे.
एगणवीसा ( एकोनविंशति ) | एगवीसा
वीसा (विशति)
इक्कवीसा (एकविंशति)
एकवीसा
१ 'कति 'ना पाररूपो (कणे गि)
कात।
कताह,
कताभि।
पतीन,
कतिन्ना
कती।
-जो पालिया पृ. १५६.
२ ओ पारिय. पृ. १५९-१६.
चतुत्रिशत्) बावीसा (द्वाविंशति) तेतीसा } (सयस्त्रिंशत् ) तेवीसा (त्रयोविंशति) तितीसा 'चउवीसा चउत्तीसा। चोवीसा } (चतुर्विंशति) नोत्तीसा पणवीसा (पचविंशति) पणतीसा (पत्रिशत्) छन्वीसा (पड्विंशति) उत्तीसा (पत्रिशत्) सत्तावीसा (सप्तविंशति) सततीसा (सप्तत्रिशत) अट्ठावीसा अद्रुतीसा अट्ठवीसा (अष्टाविंशति) (अष्टत्रिंशत्) अडतीसा अडवीसा एगूणतीसा (एकोनविंशत्) एगूणचत्तालिसा(एकोनचत्वारिंशत) तीसा (शत्) चत्तालिसा (चत्वारिंशत) एगतीसा एगचत्तारिसा एकतीसा (एकत्रिशत्) इक्कचत्तालिसा एकतीसा एकनत्तालिमा (एक्चत्वारिंशत्) बतीसा (द्वात्रिंशत् ) इगयाला , १ पालिभाषामा 'चउर्वासा' गन्दनु प्रथमानु एकवचन 'चउवीस' थाय छे (ओ पाणिः पृ० १५०नि० १२७) ने ए रूप प्राकृतसाहित्यमा पण वपराएल के नेमके, 'नउवीस पिणवा (चतुर्विशतिस्तव) आचार्य हमचद्र ए 'चउबीस' रूपन द्विताया विभातपाद्ध समजे के जने उपथुन घास्यमा 'द्वितीया ना नथ घटतो नथी पण 'प्रथमा 'ना अर्थ घटे छ तेथी "क्याय प्रथमा न बदल द्वितीया' पण वपराय छ-' एम ए वाक्य पापीने 7 7णावे 7-7. मा व्या० ८-३-१३७ पृ० १०८) । चोवण्णा - आलिसा वेआला (द्विचत्वारिंशत्) चउपण्णासा (चतुप्पश्चाशत्) दुनत्तालिसा) पणपण्णा तिचत्तालिसा) पणपण्णासा (पचपश्चाशत्) तेआलिसा (त्रिचत्वारिंशत्) ' पंचावण्णा तेआला छप्पण्णा चउचतालिसा (पट्पञ्चाशत्) छप्पणासा चोआलिसा चतुश्चत्वारिशत्) चोआला सत्तावना सत्तपुण्णासा (सप्तपञ्चाशत्) चउआला पणचत्तालिसा (पञ्चचत्वारिंशत्) अट्ठावन्ना पण्याय अडवन्ना (अष्टपञ्चाशन्) उचत्तालिसा अट्ठपण्णासा (षट्चत्वारिंशत्) छायाला एगूणसहि (एकोनपष्टि) सतचत्तालिसा (मधचत्वारिंशत्) महि (पष्टि) सगयाला एगमट्टि अट्ठचवालिसा (एकपष्टि) (अष्टचत्वारिंशत्) इगसहि. अइयाला बासहि (द्विपष्टि) एगूणपण्णाम्सा (एकोनपश्चाशत्) सहि (त्रिषष्टि) पण्णासा (पञ्चाशत्) चउसहि एगपण्णामा नोसहि (चतुप्पष्टि) इकरण्गासा (एस्पश्चाशत्) | पणसट्टि (पञ्चपष्टि) एकपण्णासा छामट्टि (पल्पष्टि) "गावण्णा (सप्तपष्टि) नावण्णा } (द्विपमानन्) टुप्पण्णासा अहमट्टि (अष्टपष्टि) नेवण्णा निपण्णामा (त्रिपक्षाशत) । गृणमतरि (एकोनसप्तति) । सतमहि (द्विसप्तति) -- } सरि (सप्तति) सत्तासीद (सप्ताशीति) एग'सत्तरि अहामीइ (अष्टाशीति) (एकसप्तति) नवासीट (नवाशीति) बा(वि)सत्तरि एगणनवद (एफोननवति) बावत्तरि नवइ (नवति) तिसतरि (निसप्तति) एगणव (एकनवति) पोसरि इगणव (चतुम्सप्तति) उसत्तर | बाणवइ (द्विनवति) पण्णसत्तरि (पञ्चप्तप्तति) | तेणवई (निनवति) चउणव छसत्तरि (पट्सप्तति) चतुर्नवति) चोणवइ सतसचरि (सप्तसप्तति) पण्णणवइ (पश्चनवति) अद्वसरि (अष्टसप्तति) । पचणवइ एगूणासीइ (एकोनाऽशीति) । उण्णवड 'पण्णवति) असीह (अशीति) सन(ना)गवइ (सनवति) एगासीह (एकाशीति) अट्ठ(ड)गवड (अष्टनवति) (द्वयशीति) ग(न)वणवद बासीह (नवनवति) एगृणमय (एकोनशत) तेसीइ (ज्योति) मय (शत) नउरासीइ (चतुरशीनि) नोरासोर दुसय (द्विशत) पणसी तिसय (पनाशीति) (त्रिशत) लासीह (पडशीति) चे सयाइ-बम- (द्विशत) १ भित्तार 1 ' 'रि' पद पम प्रयोगानुसार वरगा .
तिम्णि सपाई-त्रणसे ( विशत), लक्ख
पचारि सयार-नारसे (नतुदशत) दस(होलक्सव
इत्यादि.
पयुभ(त)
(सहय)
सहम्स
दर(स)सहस्स (दशसहस्र)
रोडि
भयुभ(त) (अयुत)
बोराकोटि
(भुलक्ष)
(प्रयुत)
(कोटि)
(कोटाकोटि)
.
२३९ प्रकरण ११ कारक-विभक्त्यर्थ जैम सस्कृतमा छ कारक छे तेम अही प्राकृतमा पगछे अने तेनी बधी व्यवस्था सस्कृतने अनुसारे समजी लेवानी छे. परतु मे केरा खास विभक्त्यथा छे तेने अहीं जणावी दईए डीए प्राकृतमा केटलेक ठेकाणे द्वितीया, तृतीया, पचमी अने सप्तमीने स्थाने पण षष्ठी 'विभक्ति वपराय छे - सीमाधरस्स वदे [ सीमाधर वन्दे] धणम्स लद्धो [यनेन लब्ध ] चौरस्स बीहइ [चौराद् विभेति ] अतेउरस्स रमिउ आओ [ अन्त पुरे रन्तुमागत ] २ कोई कोई ठेकाणे द्वितीया अने तृतीयाने बदले सप्तमी वप रायछे- मातर स्मरति अन्ननो देहि ' १ सस्कृतमा पण पष्ठा विभक्तिनो आयो ज उपयोग यएलो के ने बदले मातु स्मरणी। अन्नस्य नो दहि। फलेरात फराना तृत। अर्थदीव्यति पक्षाणा दाव्यति । वृक्षस्य पण पठात । महता विभापत। -जो " पठी शष" (पाप• २-३-५०) क्या "पे' (हे. स. २-२-११) २ ओ पहभाशाचादया स्याचदखाई" " धात् पण पति महत्तु विभापत " ६. १९२।
२३०
'नयरे न जामि [नगर न यामि ]
तेसु अलकिआ पुहवी [तरलता प्रवी]
३ क्याय क्याय पचमीने बदले तृतीया अने सप्तमी वपराय छे.
चोरेण वीहइ [चौराद विभेति ]
अतेउरे रमिउ आगओ राया [अन्त पुराद् रन्वा
आगतो राजा
४ कोई ठेकाणे तो सप्तमाने म्धाने द्विताया पण वपराय
विज्जुज्जोय भरइ रतिं । विद्युदुद्द्योते सरति रात्रिम् ]
१ सस्कृतनी रान पण या वाक्यमा 'नगर' ने 'कम'
कही शकाय अने 'आधार' पण कही काय एटर 'नगर न याम
जने 'नगर न याम' ए बन वाक्यो शिष्टसमत छ.
२ आ वाक्यमा जा 'ठपु सत्म' ( मोनी विद्यमानतामा')
एका अथ विवाश्रत हाय ता सस्कृतमा पण 'त अपना प्रथ्या' आ
वाक्यन, रदले 'तेयु लता पृथ्वी' आयु सप्तमावाळु वाक्य थइ
शक छे
३-४ अहाँ जो 'चोर'न 'भयना करण' तरीक अने
अत पुर'ने रमनारना 'आधार' तरीके कहवानो आशय हाय तो
सस्कृतमा पम धारण रिति' जन 'अन्त पुर रस्त्या' वगर वाक्य
यह राम
थाय ,
५ जापप्राकृतमा ठेकउकाणे जा 'तण कारण तण समएण'
प्रयाग वपराएला छ, एना यय 'त काल अने ते समये'
तथीपा अन आवा याना प्रयोगोमा
'ससमी' वित्तिने बदल
'तृतीया' विभनि पराएला छे एम आचार्य हमचद्र जगावे हे
-(जओ हे० प्रा० च्या ८-३-१३७ १०८) परि आ प्रयोग
२४१-
विवरण करतां नवांगी टीकाकार आचार्य अभयदेव ए प्रयोगमा आवेला
'ण'ने वाक्यालकाररूपे मानी ए प्रयोगने 'सप्तमी' विभक्तिवाळो पण
जणावे छे. आचार्य अभयदेवनी दृष्टिए ए पदोनो पदच्छेद आ प्रमाणे छः
'ते णं काले ण, ते णं समए पं'- 'ते' इति प्राकृतशैलीवशात्
'तस्मिन' xxx'ण' कारोऽन्यत्रापि वाक्यालकारार्थः, xx
काले * अवसर्पिणीचतुर्थविभागलक्षणे, xxx समये कालस्यैव
विशिष्ट भागे"-जूओ भगवती सूत्र रा० पृ० १८ टीका, शाता. सूत्र
टीका पृ० १ समिति, उपासकदशासूत्र टीका पृ० १ समिति.
ए प्रयोगर्नु विवरण करता आचार्य मलयगिरि पण आचार्य
'यमयदेवनी पेठे पूर्व प्रमाणे जणावे छे:-जूओ सूर्यप्रशसिनी टीका पृ०
१ समिति.
आचार्य अभयदेव ए पदोन संस्कृत 'तेन कालेन तेन समयेन'
पण करे थे अने आ पक्षमा तेओ आ वाक्यमा तृवीयानो अर्थ घटाचे
'छे पण 'तृतीया ' ने स्थाने 'सप्तमी' होवानी सूचना करता नथी
'अथवा. तृतीयैवेयम्, ततः
समयेन हेतुभूतेनेव"-जूओ भगवतीसूत्र १०-पृ० १८ टीका..
'तेन कालंन हेतुभूतेन, तेन
प्रा०३१
२४४ . क्रियापदरूपे वपराता धातुना रूपाख्याननु नाम 'आख्यात छे अने कृदंतरूपे वपराता धातुना रूपाख्यानने 'नाम' कहेवामा आवे छे. आख्यातरूपे वपराता धातुमा रूपाख्याननी विविधता आ प्रमाणे छे. कर्तरिरूप, कर्मणिरूप, भावरूप (साभेद ), प्रेरककर्तरिरूप, प्रेरककर्मणिरूप, प्रेरकभावेरूप (प्रेरक सह्यभेद) इत्यादि । कृदंतरूपे वपराता वातुना रूपाख्यानना अनेक प्रकार आ रीते छः वर्तमानकृदत, प्रेरकवर्तमानकृदत, कर्तृसूचकरूप, कतरि भविष्यत्कृत, प्रेरकभविष्यत्कृदन । कर्मणि अने) वर्षमानकृदंत. भविष्यत्कृदंत, प्रेरकवर्तमानकृदंत, प्रेरकभविष्यत्कृढत, भूतकृदत, विध्यर्थकृदंत, प्रेरक- भूतकृदंत, प्रेरकविध्यर्थकृदंत । भावेरूप } हेत्वर्धकृदंत अने संबंधकभूतकृदंत । आ प्रकरणमा अही जणावेला क्रम प्रमाणे रूपाख्यानोनी सम- जूती आपवानी छे. कर्तरिरूप प्राकृतमा धातुओनी वे जात छे व्यंजनात धातु अने स्व. रात धातु १ व्यंजनात धातुना छेवटना व्यंजनमा कार उमेराया पछी न तेना रूपाख्यानो थाय के अने ए उमेरातो अकार विकरण- रूप लेखाय । भावे-समभेद
भग् + अ-भण-भणइ (भणति)
कह् + अ-बह-कहइ (कथयति)
सम् + अ-समइ (शाम्यति)
हस् + अ-हस-हसह ( हसति)
आव् + अ-आव-आवइ (आमोति)
सिंच + अ-सिंच--सिंचइ (सिथति)
स्थ् + अरुन्धरुन्धइ (रुणद्धि),
मुस्+अ-मुस-मुसह (मुष्णाति)
तण् + अ-तण-तणइ (तनोति)
१ अकारान सिवाय बाकीना स्वरात धातुओने पण विकरण 'अ'
विकल्पे लागे छे
पा+ अ-पास-पाअइ, पाइ (पाति)
जा + अ-जाअ-जाअइ, जाइ (याति)
धा + अ-धाअ-धाअइ, धाइ (धयति, धावति, दधाति)
शा + अ-झाअ-माअइ, झाइ (ध्यायति)
जम्मा + अ-जम्माअ-जम्भाइ (जृम्भते )
वा+ अ-वाअ-वाअइ, वाइ (वाति)
मिला + अ-मिलाअ-मिलाअइ, मिलाइ-( म्लायति)
विकी विके + विकेअ-विक्केअइ, विक्केइ (विक्रीणाति)
हो+अ-होम-होअइ, होइ (भवति)
हो + अ-हो-होइउण, होऊण ( भूत्वा)
५३. उवर्णीत धातुना अत्य उवर्णनो । अव थाय छ।
पहु-हव+अ-हव-हवइ ( हनुते )
निण्हवइ (निहनुते)
क्रियापदरूपे वपराता धातुना रूपाख्याननु नाम 'आख्यात छे अने कृदंतरूपे वपराता धातुना रूपाख्यानने 'नाम' कहेवामां आवे छे. आरब्यातरूपे वपराता धातुना रूपाख्याननी विविधता आ प्रमाणे छः कर्तरिरूप, कर्मणिरूप, भावेरूप (सह्यभेद ), प्रेरककर्तरिरूप, प्रेरककर्मणिरूप, प्रेरकभावेरूप (प्रेरक सह्यभेद ) इत्यादि । कृदंतरूपे वपराता वातुना रूपाख्यानना अनेक प्रकार आ रीते छः । वर्तमानकृदंत, प्रेरकवर्तमानकृदत, कर्तृसूनकरूप, कतरि भविष्यत्कृत, प्रेरकभविष्यत्कृदंन । कर्मणि अने वर्तमानकृदंत. भविष्यत्कृदंत, प्रेरकवर्तमानकृदंत, भावे-सह्यभेद प्रेरकभविष्यत्कृदत, भूतकृदंत, विध्यर्थकृदंत, प्रेरक- भूतरुदंत, प्रेरकविध्यर्थकृदंत । भावरूप } हेत्वर्थकृदंत अने संबंधकभूतकृदंत ।" आ प्रकरणमा अही जणावेला क्रम प्रमाणे रूपाख्यानोनी सम. नूती आपवानी छे. कर्तरिरूप प्राकृतमा धातुओनी वे जात छः व्यंजनात धातु अने स्व. रात धातु १ व्यंजनात धातुना छेक्टना व्यंजनमा 'अकार उमेराया पछीन तेनां रूपाख्यानो थाय छे अने ए उमेरातो अकार विकरण- रूस लेखाय हे .
न
भग् + अ-भण-मणइ (भणति)
क्ह् + अ-कह-कहइ (कथयति)
सम् + अ-समइ (शाम्यति)
हम् + अ-हस-हसइ ( हसति)
आव् + अ-आव-आवड (आमोति),
सिंच + अ-सिंच-सिंचड़ (सिञ्चति )
सन्ध् + अ-रु-ध-रुन्धर ( रुणद्धि),
मुह+अ-मुस-मुसइ (मुष्णाति)
तण् + अ-तण-तगइ ( तनोति)
२ अकारात सिवाय बाकीना स्वरात धातुओने पण विकरण 'अ'
विकल्पे लागे छे
पा+ अ-पाज-पाअइ, पाइ (पाति)
जा + अ-जाअ-जाअइ, जाइ (यावि)
धा+ अ-धाअ-धाअइ, धाइ (धयति धावति, दधाति)
मा+ अ-झाम-झाअइ, साइ (ध्यायति)
जम्मा + अ-लम्भाअ-जम्भाइ (जृम्भते )
वाअ+ अ-याअ-वाअइ, वाइ (वाति)
मिला + अ-मिलाभ-मिलाअइ, मिलाइ-(म्लायति )
विकी-विक्के + विकेअ-विक्के अइ, विकेर (विीणाति)
हो+अ-होम-होअइ, होइ (भवति)
हो + अ-होम-होइउण, होऊण (मृत्वा)
• ३. उवर्णीत धातुमा अत्य उवर्णनो अव' थाय रे.
पहु-पह+अ-हव-हवइ (हनुते)
निव्हवर (निह्नते)
.
हु-हन्- हव-हवा (जुहोति)
निहवइ (निनुहोति)
धु-च-चव-पवइ (च्यवते)
रु-रव-रव-वह (रौति)
कु-क-कव-कषद (कौति)
स-स-सव-सवइ (सूते)
पसवर (प्रसूते)
१ वर्णात धातुना अंत्य ऋवर्णनो 'अर्' पाय छः
फ-कर-कर-करइ (करोति)
धु-घर-घर-घरइ (धरति)
मृ-मर-मर-मरइ (म्रियते)
-वर-वर-वरह (वृणोति, वृणुते)
स-सर-सर-सरह (सरति)
ह-हर-हर-हरइ (हरति)
है-तर-तर-तरह ( तरति)
नृ-जर-नर-जरद (जीर्यति)
५ उपात्यमा ऋवर्णवाळा वातुना ऋवर्णनो भरि' थाय छे.
क-करिस्-करिस-करिसइ (कपति)
मप्-मरिस-मरिसह (मृप्यते)
दृष्-वरिस–वरिसइ (वर्षति)
इ-इरिस-हरिसइ (हृप्यति)
६ धातुमा 'इवर्ग' भने 'उवर्णनो अनुक्रमे 'ए' अने ओपाय .
नी-नेह (नयति)
नेवि (नयन्ति)
२४७
उडी-उलेह (उड्डयते)
उडेंति (उड्यन्ते)
जि-जेऊण (नित्वा)
नी-नेजण (नीत्वा)
७ केटलाक धातुना उपात्य स्वरनो दीर्घ थाय छे
रुप-रूस्-रूस-रूसइ (रुप्यति )
तुष्-तू-तूस-तूसइ (तुष्यति)
शुष्-सस्-सूस-ससइ (शुध्यति)
दुष्-दूर-दूस-दूसइ (दुप्यति )
पुष्-पू-पूस-पूसइ (पुप्यति)
सीसइ (शिप्यते) इत्यादि ।
र धातुना नियत स्वरने स्थाने प्रयोगानुसारे बीजो सर पण
थाय :
वि०-हवा-हिवइ । भवति)
चिणइ-नुणइ (चिनोति)
सदहण-सदहाण (श्रद्धानम्)
पावर-धुवइ (धावति)
रुपइ-नोपह (रोदीति) इत्यादि।
नि०-दा-देन्देइ (ददाति, दाति, इति)
ला-ले-लेइ (लाति)
विहा-विहे-विहेह (विदधाति, विभाति)
-ने-बेमि (बवीमि) इत्यादि ।
९ केटराक धातुओनो अत्य न्यनन प्रयोगानुसारे बेवडो थाय है।
वि०-फुड, फुटइ (फुटति)
चला बल्लइ (पति)
२४८
पमीलइ पमिल्लइ (प्रमीलति)
निमीलइ, निमिल्लइ (निमीलति)
समीलइ, समिल्लइ, (समीलति)-
उम्मीलइ, उम्मिलइ (उन्मीलति) इत्यादि।
नि०-निम्मद (पति) परिअड (पर्यटति)
सकइ ( शक्नोति) पलोट्टई (प्रलोटति)
लग्गइ (लगति) तुइ (श्रुटति)
मग्गइ (मृगयते)। नहइ (नटति)
नस्सइ (नश्यति) सिम्बइ (सीव्यति.)
कुप्पड़ (कुप्यति)
इत्यादि।
१. केटलाक धातुओना (प्राय सस्कृतनो विकरण उमेराया पछी
• छेडावान धातुओना ) अत्य व्यनननो प्रयोगानुरारे
'ज' थाय छे
सपज्जइ ('सपद्यते)
सिजइ (स्विधति)
खिजइ (सिद्यते) सिजिरी (स्वेत्री, खेदयित्री)
इत्यादि।
११ उपरना नियमोथी तैयार थएला धातुना अगने वर्तमानमा
नांचे जणावेरा कर्तृवोधक प्रत्ययो लागे छे
- नहुव०- मो, मु, म. इत्था, ह . एकव०- "मि, २ पुरुप न्ति, न्ते, हरे सर्वपुरुष-सर्ववचन-ज, जा १ 'मि' प्रत्यय पर रहेता धातुना अकारात आना अत्य अ.नो विकल्पे आ' थाय छे मो', 'मु' अने 'म' प्रत्यय पर रहेता धातुना अकारात अगना अत्य 'अ' नो विक्ल्पे 'आ' अने 'इ' थाय छे ३ उपर मणावेला बधा प्रत्ययो पर रहेता धातुना अकारात अगना अत्य 'अ'नो विकल्पे 'ए' थाय छे [नामना रूपोमा पालमा अने प्राकृतमा सविशेष समानता छ तेथी नामना प्रकरणमा स्थळे स्थळे समानता बतायवा पालिना रूपा सविस्तर मूकेला छे पण धातुना रूपोमा तम नथी, तेथी ना प्रकरणमा ज्या ज्या जेटली समानता छे तेटलो उल्लेय करवामा जावशे पण धानुना पालिरूपोनी वीगतथी नाध नहि करवामा आवे] १ कटलेक ठेकाण 'मि प्रययने बदले में प्रत्यय पण वर राएलो छे -मर, मरामि (मिये) । सक्क, सक्कामि ( शनाम)। से अने 'ए' तमा शौरसेनीनो 'हे' अन पैशाचीना ते प्रत्यय, धानुना सकारात भगनेन -गाटवाना छे अथात अकारात सिवायना धानुना अगनेए पन्ने प्रत्ययो लगता नयी पा+सि-शसिपा+इ-पाइ (पासे, अने पाए, रूप थाय नार) ३ कोद ठकाणे आ'इथा प्रत्यय वीजा पुरुषना पकवचनमा पण पराएगेछ -हथा, रोयइ, गयर-(रोचत) -------हरे-प्रत्यय क्याचत् स्वचित् श्रीजा पुरुषना एकस्व- ना पण वपराएलो के. जेमक-सूसइ, सूराहरे-(शुष्यति) --- ૨ प्रा०३२ ४ - '' अने 'जा' प्रत्यय पर रहेता तो धातुना अकारात अगना अत्यनो 'ए' थाय छे शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभ्रशमापामा वर्तमान- काळने लगती विशेषतावाळी प्रक्रिया आ प्रमाणे छे. शारसनी-मागधी मि मो, मु, म । २ पु० सि, से इत्या, ध, ह। न्ति, न्ते, इरे। पैशाची गोरसेनी प्रमाणे २.पु. २ पु० ति, ते शौरसेनी प्रमाणे 7 . अपभ्रश १ प० , मि हु, मो, मु, म । -२ सु० हि, सि, से हु, ह, ध, इत्या। ३ पु० दि, दे, इ ए हिं, न्ति, न्ते, रे। प्राकृतमा.वर्तमानकादना प्रत्ययो लागता धातुना अगमा जे जे थवानु नणाव्यु छे ते वधु शारसेना, नागधी, पैशाची अने पभ्रशना वर्तमानकाळना प्रत्ययो लागता पण समजी लेवानु छे पासुने लागता कोई पण प्रत्ययो लगाड्या पढ़ेग पण प्राक तमा धातुने लाती जें में प्रक्रिया (विकरण वगैरेनी प्रक्रिया) १ जूयो पृ. २७ सय २ ओ पृ० २४९, २ टिप्पण नणावी छे ते बधी शौरसेनी, पैशाची, मागधी अने अपभ्रंशमा समजी लेवानी छे. व्यंजनांन पातुना रूपाण्यानो अपभ्रशरू.- एकवचन प्राकृतरूः- शौरसेनीरु- पैशाची.. 'मागधीरू- १ पुरुष-हसमि, प्राकृत प्रमाणे प्राकृत प्रमाणे हसामि, हसउ, हसेमि, हसे, हसमि, हसामि, हसेज, हसेज्जा । हसेमि : इसेज, हसेजा। प्राकृत प्रमाणे २ पुरुष-हससि, प्राकृत हसेसि. प्रमाणे हससे, हसेसे, हसहि, हसेहि, हससि, हसेसि, हसते, हसेसे, हसेज, हसेजा। हसेजा। ३ पुरुष-हसइ, हसदि, हसति, हसदि, हसेइ, हसेदि, हसेति, हसेदि, मोसम पृ० २७ नि० (१)-हामि वगैरे.
हसंटे, हसदे, हसर, हसेए, हसेज, हसेच, हसेवा। हसेज्जा। हसते, होते, हसेज, हाइ, हसेइ, हसेजा। 0- हसेज, हसेजा। वहुवचन प्राकृतरू- शौरसेनीक०- पैशाचीरू०- अपभ्रंशरू. मागधीरू०-- १ पुरुष-हसमो, प्राकृत प्राकृत हसामो, स्पो সমানী हसिमो, प्रमाणे हसमो हसेमो, हसामो, हसमु, हसिमो, हसामु, हसेमो; हप्तिमु, हसमा हासिमु, हसमु, हसमा हमाम, हसिम, हमेमः हसमा हसामा २५३ हतेज, हज्जा। हसिम, हसेमा हसेज, हसेजा। हसइत्या, हसिस्था, हसेत्था, शौरसेनी प्रमाणे हसेइत्या, हसष, २ पुरुप हसइत्या, हसइत्या, हसित्या, हसिस्था, हसेत्या, हसह, हसध, हसेह, हसेघ, हसेज, हसह, हसेजा। हसेह, हसेज, हसेजा। हसेध, हसह, हसेह, हसह, हसेह, हसेज्जा। ३ पुरुप-हसन्ति, प्राकृत शौरसेनी हसहि, हसेंति, रूपो हसेहि, 'हसिंति, प्रमाणे प्रमाणे हसंति, होते, ३ जूओ पृ० ९६ स्वरलोप नि० ६-इस + इत्थ्यन्दसिया । २ प्राकृतना हसति, हसते वगेरे रूपो उपरथी शौरसेनीमा इमरि, वगेरे रूपो पण प्रायः यथासंभव यह शके छे-जूओ पृ० ३५ नि. (१) तन्द। ३ जूमो पृ. ४ नि० १-इसेंति + इसिति ।
“२५४ हर्सिति, हसते, होते. हसिते, हसरे, हसिरे, 'हसेइरे हसइरे. 1 हसेज, 'हसेजा। हसेइरे, हसेज, 'हसेना। आ रीते आगळ जणावेल वधां व्यंजनांत (धातुना ) अंगोनां वर्तमानकाळनां रूपो समनवानां छे. स्वरांत धावुना रूपाख्यानो हो (भ). 'स्वरांत धातुओनी प्रक्रिया व्यंजनांत धातुनी ('हस्' नी ) सरसी छे. मात्र फेर आ छ स्वरांत धातु अने पुरुषत्रोधक प्रत्यय-ए बेनी-बच्चे पण 'ज' 'जा' विकसे उमेराय है. एकवचन प्राकृतरू.- शौरसेनीरू०- पेशाची०- अपभ्रंशरू०~ मागधीरू.. प्राकृन: होअर्ड होआमि, पो रूपो होएउं होएमि, प्रमाणे : प्रमाणे होमि - . १ पुरुष-'होअमि, प्राकृत १ पदेयी नव रूपो विरणवाळांचे अने वाली बघा विकरम दिनानां थे. विकरण माटे ओ पृ० २४५ नि. २ 1 । (a) होएज्नमि, होएज्जामि, होएज्जेमि, होएज्ज, (जा) होएज्नामि, होएज्ना, होमि, (ज) होज्नमि, (हुज्नमि) होजामि, होज्नेमिः होज्न (हुज्न) (जा) होज्जामि होना (हुज्ना) होआमि होएमि होएनउ, होए जमि होएग्जामि होएज्जेउ, होएज्जेमि } होएज्ज होएनाउ, होएनामि होएग्ना होमत, होग्नमि होज्जामि हो जेउ, होग्नेमि होज्न होज्नाउ, होज्जामि होना। २ पुरुष-होअसि एकवचन पाकृतरू- शौरसेनोल०- पेशागरू--- अपभ्रश.. मागधीरू- प्राकृत प्राकृद. होअहि. होएसि रूपो रूसो होपहि, प्रमाणे प्रमाणे हामि होरसे होएसि होपन्ममि होम होएल्मे होएसे .
होएनसे होएज्जाहे होएज्जेसे होएज्नेहि होएज्जासि होएजति होएज्जेसि होज्नसि होएजसे होज्नेसि होएज्जेसे होज्नसे होएज्नाहि होज्जेसे होएनासि होमाप्ति होहि होसि होना होज्नहि, होज्नास होज्नेहि, होज्नति होउनसे होज्नेसे होनाहि, होनासि होग्न होना। ३ पुरुप- प-होअइ होअदि होति होअइ, होअदि होएड होएदि होएति होएइ, होएदि होअर होयदे होते होभए, होअदे होएए होएदे होएते होएए, होएदे होएज्नइ होएग्नदि होएज्नति होएज्नर, होएनदि होएज्नइ होगग्नदि होएग्नेति होएज्नेइ, होएजेदि होएनए होगग्नदे होएग्जत होएग्जए, होएग्नदे होएग्नेद होएग्जेदे होपनते होएज्जए, होएज्जैदे २५७ . होएज्जाइ होएनादि होएनाति होएग्लाइ, होएग्जादि होदि होति होइ, होज्नइ होज्नदि होज्नति होज्नइ, होज्नदि होज्जेइ होज्नेदि होज्नेति होज्नेह, होज्नेदि होज्नए होज्नदे होज्नते होज्नए, होज्जदे होज्नेए होज्नेदे होज्जेते होज्नेए, होज्नेदे होनाइ होनादि होजाति होज्नाइ, होज्नादि होज्ज होज्ज होज्न होज्न होज्जा होज्जा होज्मा होज्जा बहुवचन प्राकृतरू०- शौरसेनीरू०- पैशाचीरू०- अपभ्रंशरू.. मागधीरू०- १ पुरुष होअमु प्राकृत प्राकृत होअहं होआमु रूपो रूपो होए होइमु, होएमु प्रमाणे प्रमाणे होअमु होभमो होआमु होआमो होइमु होइमो, होएमो होएमु होअम होभमो होआम होआमो होइमो होएज्जमु होएमो होएज्नामु होअम होएनिमु होआम प्रा.३३ होरम, होएम २५८ हाइम होएम होएज्नेमु होएज्जमो होएज्नामो होएज्जिमो होएग्नेमो होएज्नम होएग्जाम होएज्जिम होएजेम होमु होमो होम होजमु होजामु होज्निमु होग्नेम होज्नमो होज्नामो होज्निमो होज्नेमो होउनम होज्नाम होग्निम होग्नेम होन्न होएज्ने होएज्जमु होएग्जामु होएज्जिमु होएज्नेम होएजमो होएज्जामो होएजिमो होएग्जेमो होएवम होएज्जाम होएज्मिम होएज्नेम होई होमु होमो होम होनहुँ होग्नेहुं होज्नयु होन्नामु होग्निमु । होज्जा होज्नेनु होज्नमो होनामो होज्जिमो होज्नेमो होज्नम होज्जाम होजिम होज्जेम होनाहु होज्ज होज्जा बहुवचन प्राकृतरू०- शौरसेनीरू.- पेशाचीरू अपभ्रशरू०- मागधीरू०- २ पुरुष-होअह होअह, होअध शौरसेनी होअहु होएह होएह, होएध प्रमाणे होहु होएजह होएज्नह, होएज्नध होएज्जहु, होएग्जेहु होएज्नेह होएज्नेह, होएजेध होएज्जाहु होएजाह होएज्जाह, होएज्नाध होज्नहु, होज्नेहु होज्जह होज्जह, होज्जध होज्नेह होज्जेह, होज्जेध होज्जाह होनाह, होजाध होह होह, होष होअइत्या होअइत्या ०- होज्जाहु होहु होअह, होअध होएह, होएष होएजह, होएजय . २६० होएइत्या होएइत्या होएजेह, होएजेध होएजइत्या होएज्जइत्या होएज्जाह, होएजाध होएज्जेइत्या होएज्नेहत्या होज्जह, होज्नध होएज्नाइत्या होएज्जाइत्या होज्नेह, होज्जेध होज्जइत्या होज्नेइत्या होज्नाह, होज्जाय होज्नेइत्या होज्नइत्या होह, होध होज्जाइत्या होज्नाइत्या होअइत्या होइत्या (होत्या') होइत्या होएइत्या होज्न होज्ज, होना होएज्जइत्या होना होएज्नेहत्या होएज्नाइत्था होज्नेइत्या होज्नइत्या होजाइत्या होइत्या ३ पुरुष-होअंति प्राकृत शौरसेनी होअहिं. होएंति प्रमाणे होएहि होअते प्रमाणे होएज्नहिं होएते होएज्नेहिं होअहरे होएनाहि होज्नहिं होएम्नति होज्नेहि १ आ प्रयोग आपप्रथोमा 'अभूत् ' अर्थमा यपराएलगे डे- नमो भूतकाळ प्रकरण पृ. २६४, -.२ ओ पृ. २५३, २ टिप्पण, ५ रूपो • होएडरे २६१ होएजेंति होजाहिं होएज्नते होहिं होएजेते होति होएंति होएज्जहरे होते, होएते होएज्नेहरे होअइरे, होएइरे होएज्जाति होएज्नंति, होएजेंति होएज्जाते होएज्नते, होएज्जेते होएज्नाइरे होएज्नदरे, होएग्मेहरे होंति (हुति) होएज्जाति होते (हुते) होएज्जाते होइरे होएज्जाइरे होज्नति, होजेति होति (हुति) होते, होज्जेते होते (हुंते) होज्नइरे, होज्नेहरे होहरे होज्नाति होज्नंति, होज्नति होज्जाते होउनते, होज्जेते होनाइरे होज्जहरे, होज्नेहरे होज्न होज्जाति होज्जा। होनाते होज्जाइरे होज्ज होना ए रीते दरेक स्वरात धातुनी (दा, पा, नी, ना, वू वगैरेनी) वर्तमानकाळनी वधी प्रक्रिया · हो नी पेठे समनवानी छे. -
भूतकाळ
(स्वरात अने व्यजनात धातुने लागता प्रत्ययो)
१ सस्कृतमा भूतकाळना त्रण प्रकार छ, नेमके-ह्यस्तनभूत,
अद्यतनभूत अने परोक्षभूत. ए त्रणे काळना प्रत्ययो अने प्रक्रिया
पण सस्कृतमा तन जूदा जूदा छे. परतु प्राकृत, शौरसेनी, मागधी,
पैशाची के अपभ्रश भाषामा तेम नथी. तेा तो ते त्रणे काळ माटे
एक सरखान प्रत्ययो छे. एटलु न नहि पण ते त्रणे काळना, त्रणे
पुरुषोना अने त्रणे वचनोना पण एक सरखा ज प्रत्ययो छे अर्थात्
भूतकाळनी प्रक्रिया के रूपमा प्राकृत, शौरसेनी वगेरे भाषामा क्याय
कशो भेद जणातो नथी.
प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पेशाची
भूतकाळना ए प्रत्ययो आ प्रमाणे छ -
अने अपनशमा
२ पु०
(व्यजनात धातुने लागतो प्रत्यय)
"
-
} 'सी, ही, हीअ ( स्वरात धातुने लागता प्रत्ययो )
१ कोईनो मत एवो छ के, वर्तमानकाळनी पेठे भूतकालमा
पण 'ज' अने जा' प्रत्यय वपराय छ -होज, होजा-(अभूत्)
२ पालिमा त्रीजा पुरुषना एकवचनमा 'ई' अने 'इ' एम
रे परस्मैपदी प्रत्ययो छे अने ए, प्राकृतना 'ई' प्रत्यय साथै मळता
आवे छे पारिप० पृ. २१७ नि. १७६
३ पालिमा श्रीना पुरुपना भने वीजा पुरुपना एकवचनमा पर
स्मैपदी 'सि' प्रत्यय वपराएलो छ अने ए, प्राकृतना 'सी' प्रत्यय
साये मळतो आवे छे नेम प्राकृतमा नण पुरुषमा एक सरसो 'सी
प्रत्यय वरात धातुने रगाडयामा आवे छे तेम पारिमा त्रणे पुरुषमा
एक सरखो 'सि' प्रत्यय स्परात धानुने रगाडयामा आवे छे मात्र
पालिनो ए 'सि' प्रत्यय प्रथम पुरुषना एकाचनमा अनुस्वारवालो
(सिं) वपराय छे एटाणे जे भद छे पारिप० २१८ नि० १७९
२६३
व्यननात धातु-हस + ईअ-हसीभ ।
कर + ईअ-करी।
भण् + ईअ-भणी।
ए रीते व्यजनात धातुना भूतकाळना
रूपो साधवाना छे
म्वरात धातु-हो+ सी-होसी हो+ही-होही ] हो+हीअ-होहीअ]
होअसी हो होअही
पा+सी-मासी) पा+ही-पाही ] पा + हीअ-पाही)
पाअसी पा
पाअही
ठा + सी-ठासी] ठा+ही-ठाही | ठा + हीअ-ठाही
ठाअसी ठाअही ठाअहीम
ने + सी-नेसी | ने + ही-नेही ] ने+ हीअ-नेहीअ ]
नेअसी नेअही
लासी, लाही, लाहीअ, लाअसी, लाअही, लाअही।
उड्डे + सी-उड्डेसी, उड्डेअसी, उड्डेही, उड्डेअही, उड्डेहीअ,
उद्धेअही।
ए रीते स्वरात धातुना भूतकाळना रूपो साधवाना छे
[उपर नणावेला भूतकाळना प्रत्ययो करता केटलाक जूदा
प्रत्ययो पण आपग्रथोमा वपराएला छे, आपरूपोमा विशेषे करीने
पालिरूपो
नेअही
एकव.
१ अहोसि
२ अहासि
३ यहोसि
-जूओ पालिप्र० पृ० २१८ नि० १८०-१० २१९निक १८१
- - २६४ त्या, इत्य, इत्या, इंसु अने अंस, ए चार प्रत्ययो वपराएला छे. तेमा 'त्या' अने ' इत्या,' घणे ठेकाणे एकवचनमा वपराया छे अने ' इंसु' तथा · असु' घणे ठेकाणे बहुवचनमा वपराया छे. ए जातना केटलाएक आपरूपो जोवाथी एवं अनुमान बाधी शुकाय छे के, बीना पुरुषना एकवचनमा 'त्या' अने : इत्या' वपराया छे अने बहुवचनमा — इंसु ' अने · असु' वपराया छे. नेमकेः- 'हो + त्या होत्या ( अमवत्, अभूत्, बभूव) भुञ्ज + इत्या-भुजित्या (मुक्तवान् ) १ आ ' होत्या' 'पहारित्य' 'विहरित्था ' वगेरे एकवचनी रूपोनी अने 'करिमु“ पुल्छिन ''आसु' वगेरे बहुवचनी रूपोनी साधना पालिव्याकरण द्वारा शोधी काय छे. पालिभापामा जीजा पुरु. पना एक्वचनमा आत्मनेपदी 'इत्य' अने रहुवचनमा परस्मैपदी 'इंसु,''इमुं,' अने 'अमु' प्रत्ययो वपराएलाछे. उपर्युक्त आपरूपोमा वपराएलो 'इत्था' पालिना ए 'इत्थ 'नु रूपातर जणाय छे, 'पहा रित्य' रूपमा तो पालिनो जेवोने तेवो 'इत्य' प्रत्यय ज वपराएलो छ अने पालिना 'इंसु' अने 'अनु' ए ये प्रत्ययो एमने एम ए आई- रूपोमा चपराया के. जेम सस्कृतमा यस्तनी, अद्यतनी अने क्रियातिपत्तिना रूपाख्यानोमा पानी पूर्वे 'अ' उमेराय छे तेम पाटिमा छे पण प्रातमा नथी. पादिरूपो मू एकव. ३ अभवत्थ ('इत्य' प्रत्ययवाछु) बहुव० ३ अगर्मिमु, अगममु ('इमु' अने 'मु' प्रत्ययवालु) -भूओ पारिप पृ. २१० नि. १७४-१७७ तथा पृ. २१. 'गम 'नो रुषो अने टिपण.
. री + इत्या-रीइत्या (अरयिष्ट) विहरु + इत्या-विहरित्या ( विहृतवान् ) सेव् + इत्या-सेवित्या (सेवितवान् ) पहार + इत्य-पक्षारेत्व (प्रधारितवान् ) बम्-वच्छ + इसु-गछिसु (अगच्छन् , अगमन्, जग्मुः) प्रच्छ-पुच्छ + इंसु-पुच्छिसु (पृष्टवन्तः) कृ-कर + इसु-करिसु ( अकुर्वन् , अकार्षु', चक्रु ) नृत्य-नच + इंसु-नचिंसु (नृतवन्तः) -आह + असु-आहंसु (आहुः) संस्कृतमा भूतकाळना ने रूपाख्यानो तैयार थाय छे, ते उप- रथी नीधी रीते पण वर्णविकारना नियमो द्वारा प्राकृतरूपाख्यानो बनावी शकाप छे. जेमके:-- सं0- अब्रवीत्- अबवी (प्रा.) अकापीत् अकासी.(,) अभूत- अहू () अवोचत्- अवोच (,) अद्राक्षु अदक्खू (,) अकार्पम् अकरिस्स (.) इत्यादि. प्राचीन प्राकृतमा-आग्रथोमा-आवा रूपाख्यानो घणा वप- - राएका छे. - आ आर्परूपो १ श्रीहेमचद्रे पोताना प्राक्त-व्याकरणमा माटे कोई जातनो उल्लेख कर्या जणातो नथी. ०३४ भविष्यत्काळ सस्कृतमा भविष्यत्काळना व्रण प्रकार के नेमके-स्तन- भविष्य, अद्यतनमविष्य अने परोक्षभविष्य (क्रियातिपत्ति). ए त्रणे भविष्यना पुरुषबोधक प्रत्ययो अने प्रक्रिया पण जूदा जूदा छे. परतु प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाची के अपभ्रशमा तेम नर्थी-तेमा तो मात्र परोक्षभविष्यना न प्रत्ययो अने प्रक्रिया नोखा नोखा छे अने बस्तन तथा अद्यतन भविष्यनी प्रक्रिया, प्रत्ययो तो तद्दन सरवा छे. प्राकृतना भविष्यकाळना प्रत्ययोः १ पु० स्स, सामि, हामि, हिमि' स्सामो, हामो, हिमो, स्सामु, हामु, हिमु, स्साम, हाम, हिम, हिस्सा, हित्था १ भविष्यत्काळना उपर जणावेला प्रत्ययो धानुमानने रागे छे त्यारे पालिमा तो एवा प्रत्ययो मान 'भू' धातुनेज गेला छे - भू पालिरूपो ( भविष्यकाळ) १ होहामि, होहाम, होहिस्सामि होहिस्साम. २ होहिसि, होहिय, हाहिस्सास होहिस्सथ ३ होहिति, हाति, हाहासात शाहिस्सति वगेरे पूलो पारिप्र० पृ. २०६ 'होहिति' वगेरे रूपो.
२६७ . २ पु० हिसि, हिते' हित्या, हिह ३ पु० हिइ, हिप हिंति, हिते, हिइरे सर्वपुरुष ज्ज, जा सर्ववचन शौरसेनी अने मागधीना भविष्यकाळना प्रत्ययोः शौरसेनीना वर्तमानकाळना प्रत्ययोनी आदिमा 'सि' उमे- रवाथी ते बधा प्रत्ययो भविष्यकाळना थाय छे. ए उपरात पहेला पुरुषना एकवचनमा एक 'सं ' प्रत्यय जुदो पण छे. नेमके; १ पु० सं, सिमि' सिमो, स्तिमु, सिम। २ पु० सिसि, सिससे स्सिह, स्सिध, सिइत्था । ३ पु० सिदि, स्सिदे स्सिति, सिते, स्सिइरे। १ प्राकृत, शौरसेनी वगेरेना से । ए' तथा 'दे' प्रत्ययो माटे जूओ पृ. २४९, २ टिप्पण २ संस्कृतना भविष्यकाना प्रत्ययो अने पालिना भविभत्काळना प्रत्ययो एक रखा छे, मान सस्कृतना ‘स्य' ने बदले पालिमा 'स' चपराय छ। स्साम स्सथ परस्मैपद २ स्ससि ३ रसति सति स्साम्हे आत्मनेपद स्सव्हे ३ स्सते स्संते शौरसेनीना उपर जणावेला प्रत्ययो साथै पालिना आ प्रत्ययो मळता आवे छे:- २ स्ससे जलो पालिप्र० २०४ नि० १३० २६८ पैशाचीना भविष्यत्काळना प्रत्ययोः १ पु० शौरसेनी प्रमाणे २ पु० एय्य शौरसेनी प्रमाणे " अपभ्रंशना भविष्यकाळमा प्रत्ययोः अपभ्रशना वर्तमानकाळना प्रत्ययोनी आदिमा 'स' अने 'सिस' उमेरवाथी ते बधा प्रत्ययो भविष्यकाळना थाय छे. जेमके, सउ, सिसउ, समि, सिमि २ पु सहि, सिसहि, ससि, स्तिसि, सते, स्सिसे सहु, सिहं, समो, सिमो, समु, सिमु, सम, स्सिम । सहु, सिहु, सह, सिसह, सध, सिध, सइत्या, सिइत्या। सहि, सति, सते, सहरे । स्सिहि, सिते, सिते, स्विहरे, सदि, सदे, सइ, सए सिदि, स्सिदे, स्सिइ, स्सिए उपर नणावेला भविष्यकाळनां वधा प्रत्ययो पर रहेता पूर्वना 'अ'नो'' अने 'ए' थाय छे. .
रूपाख्यानो- भण एकवचन प्रारूतरू.- शौरसेनीरू०- पैशाचीरू.- अपभ्रंशरू.- मागधीरू.- १ पुरुप-भगिसं, भणिसं शौरसेनी भाणिसउं, भणेस्सं, भणेयं प्रमाणे भगेसउं, भणिस्सामि, भणिसिसमि मणिसिउं मगेस्सामि, भगेसिमि भणेस्सि मणिहामि, मणिसमि मोहामि, भणेसमि भागिहिमि, भणिस्सिमि भणेहिमि भणेस्सिमि भन्न भणेजा २ पुरुप-भागिहिसि मणिस्सिसि . शौरसेनी भणिसहित मोहिसि भणेस्सिसि प्रमाणे भणेसहि, भणिहिसे भणिस्मिते भणिस्सिहि भणेहिसे भगेसिसे मणिससि भणेससि भणिस्सिसि भणेस्सिसि भणिससे सर्व पुरूष भने सर्व वचन भणेस्सिहि मणेसते २७० भणिस्सिसे भणेस्सिसे 'भनेय्य भणिसदि ३ पुरुष-मणिहिड भणिस्सिदि भणेहि भणेस्सिदि भणेसदि भणिहिए भणिस्सिदे भणिसदे भणेहिए भणेस्सिदे भणेसदे भणिसइ भणेसह भणिसए भणेसए भणिस्सिदि भणेस्सिदि भणिस्सिदे भणेस्सिदे मणिस्सिद भणेस्सिइ भणिस्सिए भणेस्सिए बहुवचन प्राकृतरू०- शौरसेनीरू०-- पेशाचीरू०- अपभ्रंशरू.. मागधीरू०- १ पुरुष-मणिस्सामो भणिस्सिमो शौरसेनी मणिसहु मणेस्सामो मणेस्सिमो प्रमाणे भणेसहु मणिहामो मणिसिमु भणिस्सिहु भणेहामो भणेस्सिमु भणेस्सिाहु १ जुओ पृ. २३ नि० (१) भणिसमो भणेसमो मणिसिमो भणेस्सिमो भणिसमु भणेसमु मणिस्सिमु भणस्सिमु मणिसम भणेसम भणिस्सम भणेस्सिम भणिहिमो भणिस्सिम महिमो भणेस्सिम भणिस्सामु भणेस्सामु भणिहामु भणेहामु भणिहिमु भणहिमु भणिस्ताम भगेस्साम भणिहाम भगेहाम भणिहिम भणेहिम भणिहिस्सा भणेहिस्सा भणिहित्या भणेहित्या २ पुरुष-मणिहित्था भणिस्तिह भणेहित्या भणेस्सिह भणिहिह भणिस्सिध भणेहिह भणेस्सिध भणिस्सिइत्या भणेस्सिइत्या शौरसेनी प्रमाणे भणिसहु भणेसहु भणिसिहु भणेस्सिहु मणिसह भणेसह मणिसिंह २७२ शौरसेनी प्रमाणे ३ पुरुष-भणिहिति भणिमिति भोहिंति भणेस्सिति भणिहिते भणिसिते भणेहिते भगेसिंसते भणिहिहरे भणिस्सिरे भगेहिहरे भणेस्सिइरे भगेस्सिह भणिसध भणेसष भणिसिध भणेसिध भणिसरत्या भणेसइत्या मणिस्सिरत्या भजेस्सिइत्या भणिसहि भणेसहिं भणिस्सिाह भस्थिहि भणिसति भग्रेसति भणिम्मिति मणमिति भगिसते भणेसते भणिस्मिते भगेरिसत भणितहरे भजमारे मगिम्सिर मोहिमारे રકરે न' अने 'जा' नो उपयोग प्राकृतनी पेठे शौरसेनी वगेरे वधी भाषाओमा करवानो के] ए रीते, व्यजनात धातुना भविष्यकाळनां वधी नातना रूपो समनवाना छे अने प्राकृतरूपोनो (भणिहिइ वगेरेनो) उपयोग अपभ्रशमा यथासभव था शके के हो (भू) स्वरांत धातु अने पुरुषबोधक प्रत्यय-ए वेनी-बच्चे भविष्यत्वा- ळमा पण 'ज' अने जा' विकल्पे आवे छे. आगळ जणावेला नियमो प्रमाणे 'हो' धातुना (वधा स्वरात वातुना) छ अगो थाय छे अने ते छ अंगोने भविष्यकाळना पुरुपनोधक प्रत्ययो लगाडवाथी अने ए प्रत्ययनिमित्तक थतो फेरफार ए अगोमा करवायी स्वरात धातुना वधा रूपाख्यानो तैयार थाय छे. छ आगो हो-हो, होअ, होएज, होएज्जा, होज, होज्जा. पा-पा, पाअ, पाएन, पाएज्जा. पाज, पाजा नी-नी, नीम, नीएज, नीएज्जा, निज, निजा. [वधा स्वरात धातुना छ छ अगो उपर्युक्त रीते करी लेवाना छ ने रीते ' भण् 'ना नधी जानना रूपो आगळ बताववामा आन्या छे ते ज रीते आ छ ए अगना प्रत्येकना वधी जातना रूपो बनावी लेवाना छे. जेमके, एकवचन प्राकृतरू०- शौरसेनीरू०- पैशाचीरू०- अपभ्रशरू.- मागधीरू०- १ पुरुष-होस् होस्सिमि शौरसेनी होइस्स होइसिसमि प्रमाणे मा०३५ होसड होइसउ २७४ होएसस होएसिमि होएसड होएनिम्स होएग्जिस्सिमि होएजिप्तउ | होएजेस्स होएनेस्सिमि होएजसउ होएज्जास्स (अस्स) होएज्जा(ज)स्सिमि होएबाप्तड होजिम्स हाजिस्सिमि होजिसउ होजेस्स होजेस्सिमि होजेसउ होजास्स (जस) होजा (ज) सिसमि होजासर [प्राकृत, शोरसेना, मागधी, पैशाची अने अपभ्रशनो मान एष न प्रत्यय लगाडीने नमूनारूपे 'हो' ना ए उए अगना रूपो उपर आपेला छे, एज प्रकारे दरेक प्रत्यय लगाडीने 'हो ना (म्वरान धातुना) वधा रूपो समजी लेवाना छे ] एज रीते 'हो'नी पेठ पा, ला, टा, मिला, गिला अने वा वगरे स्वरात धातुओना टरेक्ना छ छ अगो करी बधा रूपाख्यानो बनावी लेवाना छे - भविष्यत्काळना सस्कृत सिद्धरूपोन पण वर्णविकारना नियमो रगाडी प्राकृतभा वापरी शाय छे नेमके - Ho- मोश्याम =भोक्खामा (मा.) भविष्यति भविम्स (.) परिप्यति-करिम्सइ (,) चरिष्यति चरिस्मद भविष्यामि भविस्सामि (,) इत्यानि आपप्रयोमा केटलार रूपो तो आ न प्रशारना वपराएला छे.
२७५ कियातिपत्ति-(परोक्षभविष्य) ज्यारे शरतवाळा बे वाक्योनु एक संयुक्त वाक्य बनेल होय अने तेमा देखाती बन्ने क्रियाओ कोइ साकेतिक निया जेवी जणाती होय त्यारे आ 'क्रियातिपति' नो प्रयोग थाय छे. प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभ्रशना प्रत्ययोः सर्व पुरुष, सर्व दचन } ज, जा, अन्त, माण धातुने 'न्त, माण' प्रत्यय लाग्या परी तेयार थएल अकारात आना ते ते भाषा प्रमाणे नामनी प्रथमा विभक्ति जेवाज रूपाख्यानो थाय छे. व्यजनात-भगेज, भणेज्जा, भणतो, भणमाणो सर्व पुरुष, सर्ववचन, स्वरात -होज्ज, होज्ना, होतो, होमाणो } 'आज्ञार्थ १ पुरुष- मु मो १ पालिमा वपराता आज्ञार्थ अने विध्यर्थ प्रत्ययो आ प्रमाणे के आज्ञार्थ विध्यर्थ १मि म एथ्यामि (पा० एज्जामि) ए, एय्याम(प्राण्जाम). परस्मैपदहि एग्यासि (प्रा० एग्जासि)ए एय्याथ(मा० एजाद) ३नु अतु. एय्य (मा० एज ) ए, एग्यु एव्य, ए एय्याम्हे. भात्मनेपदरस्नु हो. एयो एग्यहो .३त अत. -जो पालिप पृ० १९१ पचमी ना पृ० १९४ मतमी. " - १ए आमसे. एथ २ पुरुष- सु, *इग्नसु, *इज्नहि, *इज्ने, हि (अप० इ, उ, ए) ३ पुरुष- उ (शौ० दु) सर्व पुरुष, सर्व वचन-ज, जा उपरना वधा प्रत्ययो पर रहेता धातुना अकारात अंगना अंत्य 'अ'नो ए' थाय छे. 'मु' अने • मो' प्रत्यय पर रहेता धातुना अकारात अंगना अंत्य 'अ'नो आ' अने 'इ' विकल्पे थाय छे. अकारात अगने लगेला 'हि' प्रत्ययनो लोप थाय छे, हसेमु, हसयु. हसह, हरेह. १ पु०- हसामु, हसिमु, हसामो, हसिमो, हसेमो, हसमो. २ पु०- हससु, हसे, हसेज्जसु, हसेग्नहि, हसेज्जे, हस. ३ पु०- हसर, हसेउ. हसंतु, हसेंतु. सर्व पु. सर्व वचन-हसेज्न, हसेज्ना. पारिता विध्यर्थप्रत्ययो योडा रूपातर साये प्रास्तमा यपराया है। प्रावृतमा धानुना विध्यर्थक रूपोमा जे 'एज्ज' अने 'एज्जा'नो अंश आरे के ते पारिना 'एय्य' अने 'एथ्या'नु जकारवादं रूपातरमात्र हे अने ए पारिप्रत्ययो साथे बवावेलु के. • आ णे प्रत्ययो धानुना अग्ररात यानेब लागे छे. , कोई ठेकाणे तो 'ए'ने बदले 'या' पण यई जाय छे. जमके-सुम-'मुपेउ' ने पहले मुगाउ (भृणोतु) हो- १ पु०- होआमु, होइमु. होआमो, होइमो, होएमु, होअमु, होएमो, होअमो, 'होएज्जामु, होएज्निम, होएज्नामो, होएज्जिमो, होएग्जेमु, होएज्नमु, होएज्नेमो, होएज्जमो, होज्नामु, होज्जिमु, होज्नामो, होज्जिमो, होज्नेनु, होज्जमु, होज्जेमो. होज्जमो, होमु, होज्न, होज्ना. होमो, होज्न, होज्जा. पूर्व प्रमाणे ' हो ' ना छ अगो बनावी आज्ञार्थना बधा रूपा- ख्यानो हसनी पेठे साधवाना छे. अने ए रीते बधा स्वरात धातुना (दा, ला, पा वगेरेना) रूपाख्यानो समजवाना छे. [शौरसेनीनो प्रत्यय मागधी, पैशाची अने अपभ्रशमा पण वापरवानो छे] शौरसेनी, मागधी अने पैशाचीनां रूपाख्यानो हस् १ पु० हसामु वगैरे प्राकृत प्रमाणे हप्तामो वगेरे प्राकृत प्रमाणे. . " " हसह वगेरे २ पु० हसमु वगेरे हसतु वगेरे " ३ पु. हसद, हसेदु अपभ्रशना रूपाख्यानो १ पु० हसामु वगेरे प्राकृत प्रमणे हसामो वगेरे प्राकृत प्रमाणे २ पु० हसि, हसु, हसे, हससु हसह वगेरे वगैरे प्राकृत प्रमाणे " , १ नूओ पृ. २५४ 'ज' भने 'जानी वराग,
२७८
३ पु० 'हसदु, हसेतु
हसतु वगेरे
माकृत प्रमाणे
हसऊ, हसेउ
पाकृत प्रमाणे
हो
१ पु० होआमु वगेरे
होआमो वगेरे
प्राकृत प्रमाणे
होइ, होउ, होए,
२ पु० होअसु मेरे
हो अह वगेरे
प्राकृत प्रमाणे
प्राकृत प्रमाणे
३ पु० होअदु, होएदु होअतु वगेरे
होअउ, होएउ
पाहत प्रमाणे
ए रीते दरेक व्यननात अने रात चातुओना रूपो परी
रेवाना छे.
विध्यर्थनी बधी प्रक्रिया आज्ञार्थना नेवी , विशेप ए के,
सर्वपुरुष अने मर्ववचनमा एक 'नइ ' प्रत्यय वधारे लागे छे, ए.
* उनइ ' प्रत्यय पर रहेता पूर्वना भए' थाय छ
सर्वपुरुष ( होज्नइ, होज्न, होज्ना ( भवेत् )
सर्ववनन । हसेन्नइ, हसेग्न, हसेग्ना (हसेत् )
आर्पग्रथोमा वियर्थमना रेटलाक सास न्पो मळी आवे
चे, ते आहे.
{
टो. १. अध्युन दि' गेष-दछटः-६८
१ मा ..याद .(
२७१ सिया (स्यात्) 'चरे (चरेत्) पदे (पठेत्) अच्छे (आच्छिन्द्यात्) अन्भे (आभिन्द्यात् ) आ रूपो विध्यर्धसूचक सस्कृत सिद्ध रूपो उपरथी सीधी रीते वर्णविकारना नियमो द्वारा सधाएला छे. ते हकीकत तेने पडखे ( ) आ निशानमा आपेला रूपो उपरथी जणाइ आवे छे ए रीते बीजा सस्कृतरूपो उपरथी पण प्राकृतरूपो साधी शकाय छे ] अनियमित रूपाख्यान अस्-यवु वर्तमानकाळ अस्थि, म्हि, 'असि अस्थि, म्हो, म्ह. अस्थि. अस्थि अत्थि. १ पुरुप २ पुरुष ३ पुरुप अत्थि, सि १ पारिमा पण नणे पुरुपना यकवचनमा विध्यर्थसूचक 'ए' प्रत्यय वपराएला छे (ओ पृ. २७५ १ टिप्पण) ए अनुसारे पण आ आपरूपो साधी शकाय छे २ प्राकृतमा 'अस' धानुना घणा थोडा रूपो थाय छे, भूतकाळ सिवाय बीजा अर्थमा एक मात्र 'अस्थि' रूपथी पण काम पाली शके छ पालिमा 'अस्' ना दरेक काळवार नोखा नोखा रूपो याय के अने पालिना ए रूपो, सस्कृत रूपो साथे पणा मळतो आवे के, भूतकाळ सर्व पुरुष, सर्व वचन-} आसि, अहेसि। विध्यर्थ, आज्ञार्य, भविष्यत्काळ सर्व पुरुष, सर्व वचन } अत्यि। (पालिरूपो) वर्तमाना-१ अस्मि, अम्हि अस्म, अम्ह (अम्हस) २ असि, जहि अत्य ३ अस्थि सात सप्तमी-१ अस्त अस्साम (विभ्यय) २ अस्स अस्सथ ३ अस्स, सिया सियु. पचमी-१ अस्मि, अम्दि अस्म, बम्ह. (आसार्थ)२ जाहि, अत्थ. ३ जत्थु, सतु अद्यतनी-१ आसि आसिम्ह (भूतकाळ)२ आसि आसित्य आमु, आभिमु (आम) -ओ पालिप. पृ. १७८-१९८-१९२-२२३ अस्' ना रूपो ३ जूओ आचारोगगुरनो आरम-- "पुरीत्यमाओ या दिसामो आगलो अह असि" इत्यादि. जा वापरूप ससद्धना'चस्मि' पर्नु रूपातर अगाय से. ३ आसि
૨૮૪
.
मात्र भूतकाळ अने भविष्यत्काळमा 'कृ' धातुनो । का।
आदेश थाय छेः
भूतकाळ
कासी, काही, काहीअ, काअसी, काअही, काअहीस.
भविष्यत्काळ
फक्त प्रथम पुरुपना एकवचनमा ' काहं ' रूप वधारे थाय छे,
बाकी बधा रूपो हो। धातुनी सरखा छे
'काहिद, काहिसि, काहिमि इत्यादि ।
दा-देवु.
मात्र भविष्यकाळमा प्रथम पुरुपना एकवचनमा 'दा' धातुनु
* दाह' रूप वधारे थाय छे, वाकी वधा रूपो 'हो' धातुनी
सरखा छे.
दाह, दाहिमि, दाहिसि, दाहिद, इत्यादि ।
१ 'कृ' न भूतकाळसूचक 'अकासि' अने 'अकासि (बीजा
पुम्पनु एकवचन अने प्रथम पुरुषनु एकवचन ) रूप पालिमा याय छे,
ए, प्राकृतना 'कासी' रूप साथे मळनु गणाय खर.-जूओ पाहिए।
१० २२५ 'कृ'ना रूपो.
२ प्राकृतरूपो साथे मळा आवता 'कृ' ना भविष्यकाळना
पाटिरूपो आ प्रमाणे छे
१ काशमि
२ काहिसि
३ काहिति
काहाम.
काहिय.
काहिति.
ओ पालिप्र० पृ. २०९ 'कृ' ना रूपो.
प्रा०३६
૨૮૨ मात्र भविन्यत्काळमा नीचेना धातुओना नीचे प्रमाणे आदेशो थाय छ गम- 'श्रु- सोच्छ । दृश-दच्छा मिद्-भेच्छ। गम- गच्छ। मुच-मोच्छ । भुज-भोच्छ । रुद- रोच्छ। वन-वोच्छ । विद- वेच्छ । छिद-छेच्छ। आ धातुओना भविष्यपाळ सवधी रूपाख्यानो भग' धातुनी नेवा थाय छे विशेषता ए छे के, आ धातुओने लागता भविष्यत्वा- 'प्राकृतमा 'ध्रु' वगैरे धातुओना 'साच्छ' वोरे अगो ने छ तेम पालिमा पण बने छ पारिअगो सोस्स प्रथम पुरुपनु एकवचन- सोस्स गच्छ- गच्चिस्सामि सच्चिरसामि च तृतीय पुरुपनु एकवचन-दिलीत. मुच मोक्त मोक्पति वध वर चस्पति. ऐन्छ ऐन्नति भोस्त मोक्सति जूनो पायि. पृ. २०६-२०७ [परिवतनना नियमाय 'भु' यगरेना ससा स्लोमाधी पन उपर अनारेला भाव अने पालगनीरजाती समायहे. दापति, मोस्पति, मोसते, मसात, ऐति, क्षति (मलत) बोप्याति- एस, श, नि. २२ पृ०३.स. नि० २६, १. १२ भने सयुट 'मादि' पृ० १५] " छिद " "
२८३
ढना जेटला प्रत्ययो हि' आदिवाळा हे तेमाना 'हि'नो लोप
विकल्पे याय छे तथा प्रथम पुस्पना एकवचनमा ए क्या धातुओनु
एक अनुस्वारात रूप पण पधारे थाय के
१ पुरुप-सोच्छ, सोच्छिमि, सोच्छेमि, सोच्छिहिमि, सोच्छेहिमि,
सोच्छिस्स, सोच्छेम्स, सोच्छिस्सामि, सोच्छेस्सामि,
सोच्छिहामि, सोच्छेहामि ।
२ पुरप-सोच्छिसि, सोच्छेसि, सोच्छिहिसि, सोच्छेहिसि,
सोच्छिसे, सोच्छेसे, सोच्छिहिसे, सोच्छेहिसे ।
३ पुरुष-सोच्छिइ, सोच्छेद, सोच्छिहिद, सोच्छेहिइ ।
सोच्छिए, सोच्छेए, सोच्छिहिए, सोच्छेहिए । इत्यादि ।
[सूचना-आख्यातने लगता वधी भापाना (प्राकृत, शौरमेनी,
मागधी, पशाची अने अपभ्रशना) प्रत्ययो आगळ जणावला छे, आ
चालु प्रकरणमा प्रेरकभेदी, सह्यभेदी वगेरे आख्यातने लगती हकी-
क्त नणाववानी छ, तेमा मात्र प्राकृतना ज एक एक प्रत्ययद्वारा
वधा उदाहरणो देखाडेला छे तो अभ्यासीए पोतानी मेळे प्रेरकभेदी,
सह्यभेदी वगेरे अगोने शौरसेनी, मागधी, पैशानी अने अपभ्रश
भाषाना प्रत्ययो लगाडी ते ते भापाना रूपो बनावी लेवा ]
प्रेरकरूप
प्रेरक अग बनाववानी रीत
१ धातुने अ, ए, आव अने आवे 'प्रत्यय लगाडवाथी तेनु प्रेस
अग तैयार थाय के
१ पारिमा पण साधारण रीते प्रेरणाना अर्थमा '4,' 'ए,
आप' अने 'आपे' लगाइवाथी धानुमानना चार अगो ने छ
२ 'अ' अने 'ए' प्रत्यय पर रहेता धातुना उपात्य 'अ'नो आ' थाय छे १ श्राव, करावे धातु प्रेरक अगो कृ-वर कार, कारे, हस् हास, हासे, हसाव, हसावे । शम्-सम् साम, सामे, समाव, समावे। दृश-रिस् दरिस, दरिसे, दरिसाव, दरिसावे । भ्रम्-मम् भाम, भामे, ममाव, ममावे। क्षम्-खम् खाम, सामे, खमाव, समावे। इत्यादि। (क) कार, कारे, काराप, कारापे पाच, पाचे, पाचाप, पाचामे, (हर) घात, पाते, घाताप, घातापे. (गम्) गाम, गामे, गच्छाप, गच्छापे (ग्रह) माह, गाह, गाहाप, माहासे (चिन्त्) चिंताप, चिंता चोराप, चोराप (बुध्) योध, साधे, बुझाप, उझापे. पारिमा वपराता आप' अने'बापेज प्राकृतमा थपराता आय' अने 'आरे'छ (जूना पृ० २४ पन्च, ब. १५) -श्रो पारिय० प्र० २२७-२२९. १ 'आवि' अने 'आरे' प्रत्यय पर रहेता पण ना नियम लगे के एम कोइनो माछे कोद- हेमचंद्र- कारावदा मसानिया। इसावओ। , कराह।
२८५ ए प्रकारे धातुमात्रना प्रेरक अंगो तैयार करी लेवाना छे. ३ उपात्यमा गुरु स्वरवाळा (स्वरादि वा व्यजनादि) धातुने उपर जणावेल प्रत्ययो उपरात विकल्पे । अवि' प्रत्यय लगा- डवाथी पण तेनु प्रेरक अग तैयार थाय है। धातु- प्रेरक अगो- तुप्-तोपि-तोसि- तोसवि, तोस, तोसे, तोसाव, तोसावे । घुप्-घोपि-घोसि घोसवि, घोस, घोसे, घोसाव, घोसावे । मुप्-मोपि-मोसि मोसवि, मोस, मोसे, मोसाव, मोसावे । दुप्-दूपि-दूसि दूसवि, दूस, दूसे, दूसाव, दूसावे ।। दोसि दोसवि, दोस, दोसे, दोसाव, दोसावे । दोहवि, दोह, दोहे, दोहाव, दोहावे । मोहवि, मोह, मोहे, मोहाव, मोहावे । भक्ष-भाक्ष-भक्ति- भक्खवि, मक्ख, भक्खे, भक्खाव, भक्खावे । तक्ष्-तक्षि-तक्खि तक्खवि, तम्व, तक्खे, तक्खाव, तक्खावे । पार--पारि पारवि, पार, पारे, पाराव, पारावे । चिल्ल-चिल्लि चिल्लवि, चिल्ल, चिल्ले, चिल्लाव, चिल्लावे । जीव-जीवि जीववि, जीव, जीवे, जीवाव, जीवावे । लुब्च्-सुच्चि-लुधि- लुचवि, लुच, लुंचे, लुचाव, हुंचावे । सोसवि, सोस, सोसे, सोसाव, सोसावे. चूप-चूषि-सि- चुप्तवि, चूस, चूसे, चूसाव, चूसावे । इत्यादि ए रीते उपात्यगुरुवाळा धातुओनें प्रेरक अग वनावी लेवानु छे. भम (भ्रम) धातुनु प्रेरक अग 'भमाड' पण यायचे. भम-भमाड, भाम, भामे, भमाव, ममावे। शुप्-शोपि-सोसि .
૨૮૬
ए रीते तैयार थएल प्रेरक अंगोने ते ते पुरुपबोधक प्रत्ययो
लगाडवाथी तेना टरेक प्रकारना रूपाख्यानो तैयार थाय छे-६
रूपाख्यानो बनाववानी प्रक्रिया आगळ आवेल वर्तरिरूपाधिकारमा
आवी गई छे..तो पण अहीं उदाहरण तरीके केटलाक रूपान्यानो
दविवामा आवे छे.
वर्तमानकाळ
१ पु०-खामेमि, खामामि, खामामो,-'मु, म, खामिमो, म,
खाममि, खामेमि, खामेमो, मु, म, खाममो, मु, म ।
खामेमो-मु,म,
खमावेमि, खमावामि, खमावामो, मु, म, खमाविमो, मु,-म,
खमावमि, समावेमि खमावेमो,-मु, म, खमावमो, मु,-म,
खमावेमो, मु, म. इत्यादि ।
ग्वामेज, खामेजा, समावेज, खमावेजा।
,
भूतकाळ
सर्वपुस्प, सर्ववचन-तोसवि-सी, ही, हीअ, तोस-सी,-ही-हीअ,
तोसे-सी,-ही-हीअ, तोसाव-सी,-ही-हीअ,
तोसावेसी,-ही-ही। इत्यादि ।
भविष्यत्काल
३ पु०--भक्सवि-हिइ, भक्स हिइ, भक्खे-हिइ, भरखाव-हिइ,
भक्खावे हिइ
इत्यादि ।
१-मु'-म' वगैरे प्रत्ययो मूकेला , तो मूळ अंगने "
प्रत्ययो रगाडी 'खामामो' नी पेठे 'सामामु' 'समाम' बगेरे रूणे
पोतानी मेले रनावी लेवा अने हवे पड़ी ज्या आव आये त्या पण जा
जेब समजी ऐश
.
२८७
क्रियातिपत्ति-
सर्वपुरुष, सर्ववचन--भक्खवितो-विमाणो,-विन-विजा ।
भक्खतो,-क्खमाणो, खज्ज,-क्खज्जा ।
भक्खेतो,-खेमाणो,-खेज,-क्खेज्जा ।
भक्खावतो,-क्खावमाणो,-क्खावज्ज,-वखावज ।
भक्खावेतो, वेमाणो, -वेज, -वेजा। इत्यादि।
विध्यर्थ-आज्ञार्थ
२. पु०-हाससु, -सेसु, हासेजसु, हासेजहि, हासेन्जे, हास ।
हासेसु, हासेहि।
हसा-वस्तु,-वेसु,-वेज्जसु, वेजहि,-वेज्जे, हसाव ।
हसावेसु, हसावेहि।
हासेज्जइ, हासेज, हासेजा, हप्तावेज्नइ हसावेज, हसावेजा।
इत्यादि।
ए रीते प्रत्येक प्रेरक अगने वधी नातना पुरुषबोधक प्रत्ययो
लगाडी तेना रूपाख्यानो समनी लेवाना छे.
ज्यारे प्रेरकसह्यभेद, प्रेरकवर्तमानकृदत, प्रेरकभूनकृदत अने
प्रेरकभविष्यत्कृत वनाववु होय त्यारे पण प्रेरकअगने ज ते सबभेद
वगेरेना प्रत्ययो लगाडी तेना रूपाख्यानो बनावी लेवाना छे. (आ
सवनी विशेष माहिती सह्यभेदाधिकार अने कृढताधिकारमा
नगाववानी छे).
૨૮૮ सन्नत- नामधातु प्रेरक्पकिया सिवाय सस्कृतमा वीजी पण अनेक प्रक्रियाओ छे, नेमके-'सन्नतप्रक्रिया, यडतप्रक्रिया, यड्लुवतप्रक्रिया अने नाम धातुप्रक्रिया. परतु प्राकृतमा ए प्रक्रियाओ माटे कोई खास विशेष १ पालिमा पण समत, यडन्त, यड्डात अने नामधानुनी प्रक्रिया सस्कृतनी पेठे थाय छे बुभुक्षति (बुभुक्षते) विपच्छति (जिधसति) पिवासति (पिपासति) जिगिसति (जिगीपति) (जिपिति) चिकिच्छात तिक्च्छिति (चिकित्सति) वीमसते (मीमासते) सन्नतप्रेत- उभुस्वति (बुभुक्षयति) यडत सरप्पति (रालप्यते) दादालति (जाज्वल्यत) हिदुबत नकमति (चमाति) जगमति (बममाति) रापति (सरपीति) नानधाा- पव्वदापति (पर्वतायते-पवत स्वजापति) उत्तीयति (जनीयति पुप्रम्) यविहत्यति (अविहस्तपति-दस्तिना पतिकामति) उपवीणति (पीपया उपगायति) हस्पति (कुपल पृति) मारित्र. पृ. २२९-२३३
२८९
विधान तो नथी अने प्राकृत साहित्यमा ए प्रक्रियाना रूपाख्यानो
उपलब्ध थाय छे एथी कल्पी शकाय छे के, ते ते प्रक्रियाना(संस्कृत)
सिद्ध रूपोमा, आगळ जणावेल वर्णविकारना नियमानुसार फेरफार
करी ते रूपोनो प्रयोग करवामा आवे (ल) छे नेमके-
संस्कृत
प्राकृत
शुश्रूपति-
सुस्सूसइ । (सन्नत)
लालप्यते-
लालप्पइ । ( यांत)
चकमइ । (यङ्लुबत)
चक्रमीति-
चक्मण । ( चकमणम्)
इत्यादि ।
मात्र नामधातु माटे विशेषता आ छे
नामधातुओने लागेल — य' प्रत्ययनो लोप विकल्पे थाय छे
गुरुकायते--गरुआइ, गरुआअइ (गुरुरिव आचरति-गुरुनी नेवू
आचरण करे छे)
दमदमायते-दमदमाइ दमदमाअइ ( दम दम थाय छे)
लोहितायते- लोहिआए-इ, लोहिआअए-इ। ( लाल थाय )
हसायते-. हसाए-इ, हसाभए,-इ। (हसनी जेम आचरे छे)
तमायते तमाए-इ, तमाअए-इ । (अपारा नेवु छे)
अप्सरायते अच्छराए-इ, अच्छाअए-इ ।
(अप्सरानी जेम आचरे छे)
उन्मनायते- उम्मणाए-इ, उम्मणाअए,-३ (उन्मना थाय छे)
कष्टायते क्वाए,-इ, कट्ठाअए-३॥
(कप्टने माटे क्रमण करे छे)
प्रा० ३७
धूमायने सुखायते शब्दायते धूमाए-३, धूमाअए-इ । (धूमने उद्वमे छे) सुहाए-३, सुहाअए,-इ। (सुखने अनुभवे छे) सदाए, इ, सद्दाअए-इ। (शब्द करे ये-वोलावे ) इत्यादि. साभेद वर्तमानकाळ, विध्यर्थ, आज्ञार्थ अने (स्तन) भूतकाळमा यातुने । 'ई' अने ' इज्ज' प्रत्यय लगाडवाथी तेनु सह्यभेदी अंग . १पालिमा सह्यभेदी अग बनाववा माटे 'य ' अने ईय' तथा क्याय इय्य' (प्रा. ईश्र, इज) प्रत्ययनो व्यवहार थाय छे पच्चते, पञ्चति (पच्यते) बुझते, बुज्झति (बुध्यते) वुच्चते, बुन्वति (उच्यते) य अने इय-- तुस्सते, तुसियति (तुष्यते) पुच्छते, पुन्छियति (पृच्छयते) मजियति (मज्यते) परियति, करिय्यते (क्रियते) महीयति (मह्यते) मथीयति (मथ्यते) करीयति (क्रियते) कय्यति कपिरति -यो पारिप पृ० २३४-२३७ २९१ बने छे अने ते अगने प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अप. भ्रश भाषाना ते ते पुरुषत्रोधक प्रत्ययो लगाडवाथी तेना रूपाख्यानो थाय . पैशाचीनी विशेषता पेशाचीमा धातुनु सह्यभेटी अग बनाववु होय तो पुरुषबोधक प्रत्ययो लगाडता पहेला धातुने 'इभ' 'इज्ज' ने बदले । इय्य प्रत्यय लगाडवो जोईए. जेमो, , शो० मा० स० गीयते दीयते रम्यते पठ्यते मा० गिजए दिजए रमिज्जए पढिन्जए गिज्नदे दिनदे रमिज्जो पढिज्नदे गिय्यते दिय्यते रमिय्यते पढिय्यते . 'कृ' धातुनु सह्यभेदी अग बनावयु होय तो पुरुषबोधक प्रत्ययो लगाडता पहेला एने ('कृ धातुने )ज · इय्य ' ने बदले ईर' प्रत्यय लगाइयो जोईए स० क्रियते मा० करिज्मए शी०मा० 'करिज्नदे ० कीरते करीअए करीअदे अपभ्रशनी विशेपता सस्कृतमा थता प्रथम पुरुषना क्रिये' रूपने बदले अपभ्रशमा कीसु' रूप पण वपराय छे अने पक्षे ययाप्राप्त . १ कलिज्जदे, कलीअदे-जूओ पृ. २६ र-ले
साधारण सह्यभेदी अंगो
धातु
सह्यभेदी अंग धातु सह्यभेदी अंग
भण् भणीअ, भणिज्ज ।
पाईअ, पाइन्न।
हसीअ, हसिज्ज। दा-
दाईभ्र, दाइज्न ।
कथ्-कह- कहीअ, कहिन ।
लाईभ, लाइज्न ।
पत्-पड्- पडीअ, पडिज्न । ध्या-झा- झाईम, झाइज्न ।
कथ्-बोल्ल- बोल्लीअ, वोल्लिज्न । हो होईअ, होइन ।
सूईअ, सूइज्ज ।
इत्यादि।
ए रीते धातुमात्रना सबभेदी अंगो बनावी लेवानां छे. आ
अंगोना रूपाख्यानो बनाववानी प्रक्रिया, कर्तरिरूपाधिकारमा जणावेल
प्रक्रिया मेवी छे. नेमके-
वर्तमानकाळ
( भण्यते ग्रन्थः)
३ पु०-(गयो) भणीअइ,-एड, अए, एए, एज, एज्जा
भाणिजइ, बेइ, ज्जए, जेए, जेन, जेना।
(भण्यन्ते ग्रन्था.)
(गया) भणीअंति, ते, एति, एते, भणीअइरे, एइरे
भाणिवति, ते, जेति, जैते, जइरे, जेइरे,
भणीएन, एजा, भणिजेच, बेजा।
इत्यादि।
(कायो त्वम्)
२ पु०-(तुम) बोलीअसि, एसि, असे, एसे,
बोलिसि, बेसि, जसे, बोले
(स्थ्यध्वे यूयम् ) (तुम्हे) बोल्लीअह, पह, बोलीएइत्था, अइत्या ! (त्वया अह सूये) त्वया वय सूमहे १ पु०-(अह) सूई आमि, एमि, अमि, (अम्हे) मईआमो, मु, म, सुइन्जामि, जेमि, जमि सूईइमो, मु, म, सूईएज्न, एना सूईएमो, मु, म, सूइजेज, जेज्ज। सूईअमी, मु, म, सूइज्जामो, मु, म, सूइज्जिमो, मु, म, सूइज्जेमो, मु, म, मूइजमो, मु, म, सूईएन, ना, सूइजेज, ज्जा। विध्यर्थ भणीअउ, पउ भणीभतु एतु । भाणिज्जत, जेज माणिजतु, जेतु । भणीएज, जा भगीएज्ज, जा, जय। भणीएजइ भणिजेज, जा माणिज्जेज, जा, जई। माणिजेज्ज आनार्थ भणीअउ, एउ भणीमत, एतु। भाणिज्नतु, ज्जेंतु। भणीएज्न, ज्ना भगीएज्न, ऊना। भाणिज्जेन, जा भाणिज्जउ, जेउ भणिज्जेन, ना।
"
भूत-(बस्तनभूत)
भणीअसी, ही, ही।
भणिज्जती, ही, ही।
१ मे काळमा सह्यभेदसूचक 'ई' अने 'इज्ज' प्रत्यय धातुने
नथी लागता ते काळमा तेना सह्यभेदी रूपो कर्तरिरूपो जेवा
समनवाना छ, नेमके-
(अद्यतन ) भूतकाळ-भण-भणीअ ।
भविष्यत्काळ भण-मणिहिइ, भणिहिए, इत्यादि ।
कियातिपत्ति-भण--भणेज्न, ज्ना, भणतो, भणमाणो, इत्यादि।
मेरक सहभेद
१ धातुर्नु प्रेरक सह्यभेदी रूप कर, होय त्यारे धातुने प्रेरणा-
सूचक एक मात्र ' आवि ' प्रत्यय लगाडी, ते तैयार थएल अंगने
सह्यभेदसूचक 'ईअ' अने 'इज्ज' प्रत्यय पूर्वोक्त काळमा लगाडी
प्रत्येक धातुनुं प्रेरक सह्यभेदी अग बनाववानुं छे.
२ प्रेरणासूचक कोइ पण प्रत्यय लगाड्या विना मात्र उपात्य
'नो दीर्घ करी अने सह्यभेदसूचक ईअ' अने 'इज्न' प्रत्यय पूर्वोक्त
काळमा टगाडीने पण प्रत्येक धातुनुं प्रेरक सह्यभेदी अग तैयार
थाय छे.
(आ सिवाय वीनी रीते प्रेरक सबभेदी भग बनी शकतुं नथी)
ए रीते तैयार थएल प्रेरक सह्यभेदी अगना रूपाख्यानोनी
प्रक्रिया कर्तरि रूपाख्यानोनी प्रक्रिया मेवी छे.
प्रे० सह्य प्रे०स०अग-- कर+आवि-करावि + ईअ- करावीअ- करावीअइ, ए, सि, से, इत्यादि. कर- कार + ईअ- कारीअ- कारीअइ, ए, सि, से, इत्यादि. कर+आवि करावि+ इज्ज-कराविज्न कराविज्जइ, ए, सि, से, इत्यादि. कर- कार + इज्न- कारिज्ज- कारिज्जइ, ए, सि, से, इत्यादि. हस+आवि-हसावि+ईअ- हसावीअ- हसावीअइ, ए, सि, से, इत्यादि. हस+ हास + ईअ- हासीअ- हासीअमि, आमि, एमि इत्यादि. हस+ हसावि+इज्ज-हप्ताविज्ज-हसाविजित्था, विन्नेह, ज्जह, इत्यादि. हस+ हास + इज्ज-हासिज्न-हासिज्जति, न्ते, जइरे, इत्यादि. ए रीते धातु मात्रना प्रेरक सह्यभेदी अंगो तैयार करी सर्व काळना रूपाख्यानो समजी लेवाना छे. ज्या प्रेरक अंगने 'ई' अने 'इज्ज'प्रत्यय नधी लागता त्या प्रेरक अगथी सीधा पुरुषबोधक प्रत्ययो लगाडी कर्तरिरूपाख्यानोनी पेठे प्रेरक सह्यभेदी रूपाख्यानो समनवाना छे. जेमके भविष्यत्काळ प्रे० कर + आवि-करावि-कराविहि-इ, ए, सि, से, मि, विहामि, विस्सामि, विस
२९६
कर कार -कारहि-इ, ए, सि, से, मि,
रेहामि, रेस्सामि, रेस्स
हस+आवि-हसावि-हसाविहि-न्ति, न्ते, -इरे-स्था, है,
विसामो, विहामो, विस्सामु, विहामु,
विस्साम, विहाम, विहिमो, विहिमु,
विहिम, विहिस्सा, विहित्या
हस हास -हासेहि-इ, ए, सि, से, मि,
सेहामि, सेस्सामि, सेस्सं । इत्यादि.
क्रियातिपति
कराविज्ज, ज्जा, करावंतो, करावमाणो ।
कारिज्न, कारिज्ना, कारंतो, कारमाणो। इत्यादि.
प्रे. भ.
अनियमित सह्यभेदी अंगो
दृश- 'दीस- दीसह, दीसिज्जइ, दीसउ, दीससी, ही, ही ।
वच- 'वुञ्च- वुच्चइ, वुच्चिज्जइ. वुच्चउ, बुच्चसी, ही, ही ।
सह्य
प्रे०
चि- चिव- चिव्वइ, निविहिइ, चिन्वाविइ, चिन्वाविहिह, इत्यादि.
चि- चिम्म-चिम्मइ, चिम्मिहिइ, चिम्माविइ, चिम्माविहिद, इत्यादि.
हन्- हम्म हम्मइ, हम्मिहिइ, हम्माविइ, हम्माविहिद, इत्यादि.
खन्- खम्म- खम्मइ, खम्मिहिइ, खम्माविइ, खम्माविहिइ, इत्यादि.
दुह- दुभ-दुमइ, दुभिहिह, दुभाविद, दुब्भाविहिद, इत्यादि.
१ वर्तमानमां, विध्यर्थमा, आशार्यमां अने हस्तनभूतमा ज आ
ये आदेशो वपराय छे.
२ आ बघा आदेशो वैकलिला छे अने मात्र सहभेदनी ज गमे
जातनी रचनामा वपराय छे.
२९७ . लिङ्- लिभ-लिव्भइ, लिभिहिइ, लिब्भाविइ, लिभाविहिद इत्यादि, वह- वुभ-वुठभइ, बुभिहिइ, वुभाविइ, बुम्भाविहिह, इत्यादि. रुध्- रुब्भ-रब्भइ, रुभिहिइ, रुब्भाविइ, रम्भाविहिह, इत्यादि. दह- उज्झ-डज्झइ, डज्झिहिइ, उज्झाविइ, उज्झाविहिह, इत्यादि. कध-बन्झ-बज्झइ, बज्झिहिइ, वज्झाविइ, वज्झाविहिह, इत्यादि. स+रुध् सरुज्झ-सरुज्झाइ,सरुज्झिहिइ, सरुज्झाविइसरुज्झाविहिद,इत्यादि अणु+रुध् अणुरुज्झ-अणुरुज्झइ, अणुरुमिहिह, अणुरुज्झाविइ, अणुरुज्झाविहिइ, इत्यादि. उपकरुध्-उवरुज्झ-उवरुज्अइ, उवरुज्झिहिइ, उवरुज्झाविड, उवरुज्झाविहिइ, इत्यादि गम्- गम्म-गम्मइ, गम्मिहिइ, गम्माविइ, गम्माविहिइ, इत्यादि, हस्- हस्स-हस्सइ, हस्सिहिइ, हरसाविइ, हस्साविहिइ, इत्यादि. भण्-भण्ण-भण्णर, भण्णिहिह, भण्णाविइ, भण्णाविहिद, इत्यादि छुप-छुप्प-छुप्पइ, छुप्पिहिइ, छुप्पाविइ. छुप्पापिहिइ, इत्यादि. रुद्-रुत्व-रुवइ, रुविहिद, रुव्वाविइ, रुब्वाविहिद, इत्यादि, 'लभ्-भ-२०भइ, 'हिइ, लब्भाविइ, लभाविहिइ, इत्यादि कथ्-कत्थ-वत्थइ, कत्यिहिइ, क्याविइ, क्त्याविहिह, इत्यादि भुन-भुज-भुजइ, भुज्निहिइ, भुज्जाविइ, भुज्जाविहिइ, इत्यादि. ह- हीर-हीरद, होरिहिह, हीराविइ, हीराविहिद, इत्यादि. तृ- तीर-तीरइ, तीरिहिइ, तीराविइ, तीराविहिइ, इत्यादि. ह-वीर-वीरइ, कीहिइ. कीराविइ, कीराविहिए, इत्यादि. [प्राकृतमा 'कृ' ना सह्यभेदी अंगो वे थाय छे-Z- कीर अने री करिज्ज,' त्यारे पैशाचीमा तो 'कृ'नु कोर ' अग ज वपराय छे कीरत, कीरति । , प्रा०३८ . नृ-जीर-जीरइ, जीरेहिह, जीराविड़, जौराविहिद, इत्यादि. अर्ज विढप्प विढप्पइ,विढप्पेहिइ, विदप्पाविइ, विढप्पाविहिइ, इत्यादि. ज्ञा-णव्व-णव्वइ, णव्वेहिइ, णव्वाविइ, णत्वाविहिइ, इत्यादि, ज्ञा-णज्न गज्जइ, गज्जेहिइ, णज्जाविइ, णज्जाविहिद, इत्यादि. वि+आ-व्या+ह-वाहिप्प-वाहिप्पड़, वाहिप्पेहिइ, वाहिप्पाविइ, वाहिप्पाविहिद, इत्यादि. ग्रह- ह-घेप्प-चुप्पइ, घेप्पेहिइ, घेप्पाविइ, घेप्पाविहिइ, इत्यादि, स्पृश-छिप्प-छिप्पइ, छिप्पेहिइ, छिप्पाविइ, छिप्पाविहिइ, इत्यादि, सिन् सिप्प सिप्पए, सिप्पेहिए, सिप्पाविड़, सिप्पाविहिड़, इत्यादि, स्निह आरभ्--आटप्प-आढप्पेइ, आदप्पेहिए, आदप्पाविइ, आढप्पाविहिद, इत्यादि. नि--निव्व-निव्वए, जिन्वेहिए, जिव्वाविइ निव्वाविहिइ इत्यादि. शु-मुव्व-- सुब्बए, मुव्वेहिए, सुव्वाविइ, मुत्वाविहिइ, इत्यादि हु- हुव्व- हुव्वए, हुव्वेहिह, हुल्वाविइ, हुव्वाविहिइ, इत्यादि. स्तु-थुब्व-थुव्वइ, थुब्वेहिह, थुव्वाविइ, थुत्वावहिद, इत्यादि. लु -लुव्व-लुब्वइ, लुब्वेहिइ, लुल्वाविइ, लुब्वाविहिद, इत्यादि. पू-पुब्ब- पुवइ, पुवेहिद, पुवाविइ, पुवाविहिइ, इत्यादि. धू-धुन्व-धुव्वए, धुविहिइ, धुव्वाविइ, बुवाविहिद, इत्यादि.
. . - प्रकरण १३ कृदंत 'वर्तमानकृदंत १ धातुना अंगने न्त' 'माण' अने । १६' प्रत्यय लगाडवाथी तेनु कतरि-वर्तमान-कृदंत बने छे. २ धातुना प्रेरक अगने ‘न्त माण' अने ई' प्रत्यय लगाडवाथी तेनु प्रेरक-कर्तरि-वर्तमान-कृदंत बने छे. ३ धातुना सह्यभेदी अगने ‘न्त गाण' अने 'ई' प्रत्यय लगाडवाथी तेनु सह्यभेदी-वर्तमान-कृदंत बने छे. ४ धातुना प्रेरक सह्यभेदी अगने ‘न्त' माण' अने ।ई। प्रत्यय लगाडवाथी तेनु प्रेरफ-सह्यभेदी-वर्तमान-कदंत बने छे. ५ वर्तमान कृदतना 'त' 'माण' अने 'ई' प्रत्यय पर रहेता पूर्वना 'अ' नो विकल्पे 'ए' थाय छे कर्तरि वर्तमान कदंत पु० स्त्री. भण-भणतो, भणमागो । भणत, भणमाण । भणती, भणता । (शौ० मा० भणदो) १ कृदनना रूपाख्यानोनी प्रक्रिया नामनी जेवी छ २ पालिम पण वर्तमान कृदत बनायवा माटे सर्वत्र 'अत' अने 'मान' प्रत्ययनो उपयोग थाय छे गच्छमानो न० गच्छतो, स्त्री० गती, गच्छती. करोतो, कुन्वतो, कुरुमानो, करानो सादतो, सादमानो -पारिप्र० पृ. २४८-२४९, ३ आ प्रत्ययवालु रूप स्त्रीलिंगमा न वपराय है,
"
३००
'भणतो, भणेमाणो। भणेतं, भणेमाण। भणेती, भणेता |
भणमाणी,भणमाणा।
भणेमाणी,भणेमाणा।
भणई, भणेई ।
पा- पाअंतो, पाप्रमाणो। पाअत, पाअमाण । पाअती, पाता।
(शो० मा० पाअटो)
पाएंतो, पाएमाणो। पाएत, पाएमाण। पाएती, पाएता ।
पातो, पामाणो। पातं, पामाण । पाती, पाता ।
पाअमाणी,पाअमाणा।
पाएमाणी,पाएमाणा।
पामाणी, पामाणा।
पाअई, पाएई।
पाई।
रु-रवतो. (शौ० मा० 'रवदो) रवमाणो रवतं,रवमाणावती,रवता ।
खेतो, रवेमाणो । रवंत, रवेमाणं । वेती, वेता ।
रखमाणी, रवमाणा।
खेमाणी, रवेमाणा।
रई, रवेई ।
हृ० हरतो (शौर
०मा० हरदो)हरमागो।हरत, हरमाणं । हरती, हरता।
हरेंतो हरेमागो । हरेत हरेमाग । हरेती, हरता ।
हरमाणी, हरमाणा।
हरेमाणी, हरमाणा।
हरेई ।
१ मणितो-जूओ दीर्घस्वर स्वस्वर पृ०४
२ खतो + खदो जूओ पृ. ३५ न्त-न्द,
३०१
वृप्-वरिसंतो, (शौ०मा० परिसदो) वरिसमाणो । वरिसंत, वरिसमाणं।
वरिसंती,वरिसंता।
वरिसतो,वरिसेमाणो । वरिसेंत,वरिसेमाणं । वरिसती,वरिसेंता।
वरिसमाणी,
परिसमाणा।
परिसेमाणी,
वरिसेमाणा।
वरिसई, वरिसेई ।
नी-नेतो, (नेदो शौ०मा०) नेमाणो। नेतं,नेमाणं । नैती, नेता ।
नेमाणी, नेमाणा।
नेई ।
तूस-तूसंतो, (शी०मा०तूसंदो) तूसमागो । तूसंतं, तूसमागं ।
तूसंती, तृसंता।
तूसतो, तूसेमाणो । तूसेंत, तूसेमागं । तूसेंती, तूसेंता ।
तूसमाणी, तूसमाणा।
तूसेमाणी, तूसेमाणा।
तूसई, तूसेई ।
दा-'देतो (शौ०मा०-दो ) देमाणो । दंत, देमागं । देती, देता।
देमाणी, देमाणा।
१ परिसतो+ परिशंदो- जूओ पृ. २७ स-शा.
ए प्रमाणे तूपदो,
गुरशूशंदो,
शोधाविदो यगेरे।
२ जूओ पृ. २४६ नि.६
३ दा+अ+अंतोदा+ए-तो-देतो।
दा++माणो दा+ए+मागोन्देमालो।
चल्-चल्लतो, चल्लमाणो । चल्त, चल्लमाणं । चलती, चल्लता ।
(शो० मा० चलदो)
चलंतो, चल्लेमाणो । चालत, चाहेमाण | चल्लेती, चलता।
चल्लमाणी,चल्लमाणा।
चल्लेमाणी,चल्लेमाणा।
चलई, चहेई।
खिद-खिज्जतो, खिजमाणो। खिज्जत, खिजमाण । खिज्जती, विजता।
(शो०मा०सिजदो)
खिजेतो, खिजेमाणो | खिजेत, सिनेमाण। सिजेती, खिजेता।
खिजमाणी, खिन्नमाणा।
खिजेमाणी, खिज्नेमाणा।
खिजई, खिजेई ।
वर तुर-'तुरंतो, तुरमाणो । तुरतं, तुरमाण । तुरती, तुरता ।
तूर (शौ०मा० तुरदो)
तुरतो, तुरेमाणो। तुरेत, तुरेमाण । तुरेती, तुरता ।
तुरमाणी,तुरमाणा।
तुरेमाणी,तुरेमाणा।
तुरई, तुरेई।
शुश्रूष्--सुस्मूसतो, (शो० मा० सुस्सूसंदो) 'गुस्सूसमाणो।
लालप्य्-लालप्पतो, (शो० मा० लालप्पंदो) लालप्पमाणो ।
(पै० 'ळाळप्पतो)
गुरुकाय-गरुअतो, (शौ० मा० गरुभदो) गरुअमाणो ।
१ 'तुरतो'नी पेठे 'तूतो' वगैरे रूपो पण करी लेवा.
२ मुस्सूरत, मुस्यूसंती वगेरे रूपो पण करी लेवा.
३ जूओ पृ० २६ ल.
४ 'गुरुकायते' नामघाउनु रूप छे, ए उपरथी 'गुरुकाय'ए
वर्तमान कृदवन अग वन्य छे.
-
-
प्रेरक कर्तरि वर्तमान कृदंत
पर-कारतो', (शौ० मा० कारदो) कारमाणो ।
कारतो,
कारेमाणो।
करावतो,
करावमाणो।
करावेतो,
करावेमाणो।
शुप-सोसवितो, (शौ० मा० सोसविंदो ) सोसतो, सोसतो,
सोसावतो, सोसावतो
सोसविमाणो, सोसमाणो, सोसेमाणो, सोसावमाणो,
सोसावेमाणो इत्यादि.
न०-
सह्यभेदी वर्तमान कृदत
भण-भणिज्जतो, भणिजमाणो, भणीअतो, भणीअमाणो । पु०-
(शौ० मा० भणिजदो) ('प० भनिग्यतो)
भणिज्जत,-जमाण, भणीअतं,-अमाण ।
भणिज्जती, ता, जाई, भणीअती, ता, –णीअई ।
स्त्री-
भणिज्जमाणी-णा, भणीअमाणी, भणीअमाणा।
स्त्री
हन्-हम्मतो, हम्ममाणो, हम्मत, हम्ममाण, हम्मती, ता,
हम्ममाणी,गा,हम्मई।
.
.
१ 'कार' अग उपरथी कारती, कारेई, कारमापी, कारत वगरे
रूसो उपजावी लेवा.
२ ओपृ. २९१ पाचोनी विश्वा.
३ तलो पृ. २३ ए-न
३०४
प्रेरक सबभेदी कृदंत
(प्रेरक सह्यभेदी अंग बनावधानी प्रक्रिया 'प्रेरकसह्यभेद ' ने
जणावता जणावी छे.')
कर-करावि +ईअकरावीअंतो, अमाणो, इत्यादि।
(शो० मा० करावीअंदो) (पै० कराविय्यंतो )
कर--करावि + इज्ज-- कराविनंतो, कराविजमाणो, इत्यादि ।
कर-कार + ईअ- कारीअंतो, कारीअमाणो, इत्यादि ।
कर-कार + इज्ज- कारिजंतो, कारिजमाणो, इत्यादि ।
चि- चिव्व + आवि- चिच्वावतो, चिच्वाविजमाणो, इत्यादि ।
प्राकृत अने पैशाचीमा वर्तमान कृदंतना रूपो सरखा थाय
छ, शौरसेनी अने मागधीमां ने विशेषता छे ते उदाहरणो साथे
जणावी छे, अपभ्रंशमा शौरसेनी अने प्राकृत प्रमाणे समजवानु छे.
शौरसेनी, मागधी के पैशाचीना उदाहरणो मात्र एक न
लिगमा मूकेला छे पण अभ्यासिए एना त्रणे लिगी रूपो पोतानी
मेळे समजी लेवा.
पैशाबीना सह्यभेदी वर्तमान कृदंतनी विशेषता जणावेली छे.
( कोइ पण भाषानुं रूप करतो वखते ' वर्ग-विकार ' ना
नियमो लक्ष्यमा राखवा)
भूतकृदंत
क्त्तरि भूतकृदंत सहभेटी भूतकृदंत
१ जूओ ई. २९४ प्रेरकसहभैद,
२ अ , १ धातुना अंगने । अद' अने 'त' लागवाथी तेनुं ( बन्ने जातनुं ) भूतदंत वने छे. 'अने 'त' प्रत्यय पर रहेता पूर्वना 'अ' नो 'इ' थाय छे. ('द' शौरसेनी, मागधी अने अपभ्रंशमां वप- राय छे अने त' पैशाचीमां वपराय छे. कर्तरि भू० कृ०-गम+अ गमिओ गमिदो, गमितो (गतः) चल+अ चलिओ चलिदो, चलितो(चलितः)इत्यादि. सह्यभेदी भू० कृ०-कर+अ-करिओ करिदो, करितो कडो (कृतः कटः) पढ+अपढिओ पदिदो, पढितो गयो (पठितो ग्रन्थः) इत्यादि. हप्स+अ हसिअ हसिदं, हसितं (हसितम्) लस+अलसिअ लसिदं, लसितं ( लसितम् ) तुर+अ-तुरिअं तुरिदं, तुरितं (त्वरितम्) इत्यादि. सुस्सूस+अ=सुस्सूसिअं सुरससिदं, सस्सूसितं (शुश्रूपितम्) चंकम+अ=चकमिअं चंकमिदं, चकमितं (चक्रमितम्) झा +अ-झाय झाद, झात (ध्यातम् ) १ प्राकृतमा भूतदतने माटे मात्र 'त (अ)' प्रत्यय वपराय छे, पालिमा ए 'त' उपरात संस्कृतना 'क्तवतु' नी पेठे यांनो 'तनु' प्रत्यय पण वपराय डे. -हुतो (हुतः) ववनु हुतबा (हुतवार) स्त्री. हुतवती (हुतक्ती) -भूतकदलने लगती पारिनी प्रक्रिया संरकृतनी प्रक्रिया माये मळती आवे छे-पालि प्र.पृ० २५१-२५३ प्रा० ३९
भू० कृ०-
लु +अ लुअं लुदं, लुतं (लूनम् )
हू +अ-हू हूदं, हृतं (भूतम् )
प्रेरक
१ धातुने प्रेरणासूचक ' आवि' प्रत्यय लगाडया पछी
अथवा धानुना उपान्त्य 'अ' नो दीर्घ कर्या पछी भूतकृदंतनो 'अ'
प्रत्यय लगाडवाधी तेनु प्रेरक भूतकृदंत वने छे.
कर- कराषि+अकराविरं कराविदं, करावितं (कारितम् )
कारि+अ-कारिअं कारिदं, कारितं
हस- हसावि+अ-हसाविअंहसाविद, हसावित ( हासितम्)
हासि+ अ-हासिअ हासिद, हासितं इत्यादि
आप ग्रंथोमा के अर्वाचीन प्राकृतमा केटलेक स्थळे संस्कृतना
सिद्धरूपो उपरथी पण भूतकृदतना रूपो वनाववामा आन्या छः
गतम्-
गर्य।
मतम्-
मयं ।
कृतम्-
जिन
मृतम्--
मर्ड।
जिनम् -
तहम् तते । वगेरे
भविष्यत्कृत--
धातुना अंगने 'संत' 'समाण' अने 'सई' प्रत्यय लगा-
१ जूओ पार्नु ६६-त-द.
२ स्स+अंत-सत । स्स+माण - समाण।
स्स + ई-सई. ओ पृ० २९९ वर्तमानप्रदत.
३०७ डवाथी तेनुं भविष्यत्कृदंत' बने छेः करिष्यन्-करिस्सतो (शी० मा० करित्संटो) इत्यादि । करिष्यमाणः-करिस्समाणो इत्यादि । हेत्वर्थकृदंत १ धातुना अंगने 'तुं९' अने ' त्तए ' प्रत्यय लगाडवाथी तेनुं हेत्वर्थकृदंत' बने छे. २ उपर जणावेला त्रणे प्रत्ययो ('तुं''हूं' अने 'ए') पर रहेता पूर्वना · अ'नो 'इ' अने 'ए' थाय छे. ('दुं' शौरसेनी, मागभी अने अपभ्रंशमा वपराय छे अने प्राकृत तया पैशाचीमा 'तुं' वपराय छे.) १ भविष्यत्कृदंतना पालिरूपो आ प्रमाणे छे. गमिस्स ( गमिष्यन् ) स्त्री-गमिस्सती गमिस्संती करित्सं (परिष्यन्) चरित (चरिष्यन्) 'गमिष्यन् ' वगेरे सिद्धरूपोने छेडे रहेला 'न्'नो अनुस्वार कर- वाथी पालिना 'गमिरस' वगेरे स्पो तैयार ययेला रे-पारित पृ. २४८-२४ २ मालिभाषामा हेत्वर्थदंत करवाने माटे धानुने 'मुंतचे' ताये' अने 'तुये प्रत्ययो लगाइवामा आवे छे: मर्नु । कातवे ( कम्) नेतके (नेवम् ) दक्सिताये (द्रष्टुम् ) गणेतुये (गपयितुम् ) वगेरे. ओ पालिप्र. पृ. २५७-२५८० ३०८ भण्-भण+तु-भणिउ भणेउ, मणिदु, भनितु (भणितुम्-भगवाने माटे) हस-हस+-तुं-हसिउं, हसेउ हसिद्ध, हसितु (हसितुम्-हमवाने माटे) हो-होअ-तु-होइउ, होएउ होइदु, होइतु (भवितुम्-धवाने माटे) भण भणाविनतु भणाविउ भणाविद्, मनावितु ( भणाववा माटे) कर करावि+तु-कराविउ कराविदु, करावितु (क्रावका माटे) कर कार+तु कारिजे, कारेउ कारिदु, कारितु ( कराववा माटे) हस् हास+तु हासिउ, हासेउ हासिदु, हाप्सितु ( इसाक्वा माटे) शुश्रूप् मस्सूस+तु-सुस्सूसिउ, सुस्सूसेउ मुस्मृसिद्, सुस्मसितु (शुपा करवा माटे) चम्य चत्रमातु-चकमिउ, चक्मेड चकमिदु, चकमितु (चरमण परवा माटे) इत्यादि. अनियमित हेत्वर्थकदंत कृ+तु - (कर्तुम् ) (ग्रहीतुम्) ग्रह + तु का +33 काउ घेत् + तु - घेतुं तुर् + इ = तुरिउ - - तुर् + एउ = तुरेउ } (त्वरितुम्) - . दृश् + तु (द्रष्टुम् ) भुज् + तु मौत+ तु = भोत्तु (भोक्तुम् ) मुन्+ तु मोत् - (मोक्तुम् ) रोत् + तु = रोतु (रोदितुम) वन् + तु वोत्तु (वाम् ) १ प्रेरकहेल्वयादतनी रचना प्रेरक भूतदननी जेवी ज छे. तु = मोतु वोत् + तु = } ( कर्तुम् ) - - उववज % 3D - 'त्तए कर करेत्तए करितए सिज्झ् सिझ + ए = सिज्झितए (सेद्धम्) उववज + तए - उववजित्तए (उपपतुम्) विहर् विहर + तए = विहरितए (विहर्तुम् ) 'पास् पास + तए 3 पासित्तए (द्रष्टुम् ) गम् गम + तए गमित्तए (गन्तुम् ) "पव्वन् पव्वज + तए 3 पन्वइत्तए (प्रबजितुम्) आहर आहार + नए आहारित्तए (आहर्तुम् ) + इत्तए = 'दलइत्तए ( दातुम् ) "अच्चासाद- अचासाद + ए = अञ्चासादेत्तए ( अत्याशात- यितुम् ) १ विशेषे करीने आ प्रत्ययनो उपयोग आपग्रथोमा थएलो के वैदिक संस्कृतना अने पालिना तुमर्थक 'तो' प्रत्ययनी साये आ । प्रत्ययनी विशेष समानता छ (जूओ पाणिनि-३-४-९ वैदिक म. तथा पृ. ३०७नी १ टिप्पणा. " देवचाए उववजित्तए" ૨ अत करेत्तए " "सिज्झित्तए " भुजमाणे विहरित्तए "-भगवतीसू० २० ७, उ०७ पृ० ३११ स० ३ स्वाइ पासित्तए" देवरोग गमित्तए '-भगवतीसू० श. . " ७, उ०७० ३१२ स. ४ पवजाए पब्वइत्तए अपणा आहारिराए ""-सुण याण दलझाए "-भगवतीसू० श० ३, उ० २ पृ० १७१ स.. ५ आषताने लीधे 'हर्नो 'हार' थयो छे आर्पताने सीधे अहीं 'इ' आगमरूपे थयो छ " सयमेव मासादत्तर' -भगवतीस्० २० उ०२ १ पृ. १७२ स.
सिमभिलोर- समभिनेक + ए = सममिलोएतए (सममिलो दितुम् ) अपभ्रश “अण धातुना अगने । + + - + %3D अणह 'अणहि एप्पि एप्पिणु एवि ' अने ' एविणु' प्रत्यय लगाडवाथी अपभ्रशनु हेत्वर्थकदत वने छे एवं- चय एवं चएव ( त्यत्तुम्) एवं देव ( दातुम् ) अण- + अण भुजण ( मोक्तुम् ) कर अण करण ( कर्तुम् ) अणह- से अणह सेवणह (सेवितुम् ) अणह भुनणह ( भोक्तम्) अणहिं- अहिं मुचणहिं (मोक्तुम् ) भन् अणहिं भुजणहिं ( भोक्तुम् ) एप्पि- कर रेप्पि ( कर्तुम) नि + एप्पि भोप्पि (जेतुम् ) सपडिदिसिं समभिलोएत्तए "-भगवतीसू. श. उ. २ पृ० १६८ स.. + + %3D + + + एप्पि ८ पाल एप्पिणु- कर + एप्पिणु करेप्पिणु (कर्तुम् ) चय् + एप्पिणु चएप्पिणु ( त्यक्तुम् ) एवि- कर + एवि करेवि ( कर्तुम् ) + एवि पालेवि (पालयितुम् ) एविणु- कर + एविणु करेविणु (कर्तुम् ) + एविणु लेविणु (लातुम् ) केटलेक स्थळे सस्कृतना सिद्ध रूपो उपरथी पण हेत्वर्थकद- तना रूपोने बनावेला छे: लब्धुम् रोद्धम् रोळ्। योद्धम् जोद्ध। कर्तुम् वोरे संबंधकभूतकदत- तु तूण तुआण ला अ.. पता १ धातुना अगने । १ जूओ पानु ३५ त- नि० २९ २ 'इत्ता', 'इत्ताण', 'आय' अने' आए' प्रत्ययनो उपयोग सास करीने आप॑प्राकृतमा यएलो छे. पालिमा या अर्थमा 'त्या' (क्याय 'हत्वा' (आर्पप्रा०-' इत्ता) त्यान 'इत्वान') (आपंप्रा०--' इत्ताण') अने 'के 'ऊण') प्रत्ययनो उपयोग थाय छ- त्वा-कत्या, करित्वा (आर्यप्रा० करिता ) (वृत्त्या ) (क्याय 'तून (प्रा० (गला) गत्वा , पण રૂરિ इत्ताण' • आय ' अने आए ' प्रत्यय लगाडवाथी तेनु संबंधक भूतकृदत बने छे. शौरसेनी अने मागधीमा संबंधकभूतकृदत करवा माटे धातुने ' इय' अने टूण ' प्रत्यय लागे छे तथा प्राकृतना त 'कारादि प्रत्ययो द'कारादि करीने ल्गाडाय छे अने ' इत्ता (हत्वा) जहित्वा, (हित्या) (हात्या) बिंदित्वा (आईना. किंदित्ता) (छित्त्या) मुणित्ता) (श्रुत्वा) जिणित्ता) (जित्वा) पापुणित्या (आर्थप्रा. पापुणित्ता) (प्राप्य) हत्या चहत्त्वा मुणित्वा । जिनित्वा (" त्वान- कन्वान गत्वान हत्वान जहियान ( आपप्रा. जहिताण) तून- कत्तून गतून हंतून सस्कृतमा जम उपसर्गवाळा धातुने माटे 'क्या' ने बदते 'य' वपराय छ तेम पारिमा (पारिमा उपसर्ग होवानों का नियम नधी ) पण चमेलुछे उपनीय (मी + त्या) जभिवदिव (वन्द + इत्या) अभिचाप (भा + त्या) आमाकृतमा पण 'आय'न'भाए' छेदावाळा सब. धक भूतरदतो मळ छे त आ पारिमा 'य' छेडावाळा रूपो साथ मळता जावे पारि प्रा०प० २५५-२५६ .
- . . इताण' प्रत्ययो पण वपराय छे पैशाचीमा ए अर्थमा ' तून ' प्रत्यय वपराय छे. अपभ्रशमा ए अर्थमा 'इ'इउ ''इवि' अने । अवि' तथा ' एप्पि, एप्पिणु,' एवि' अने एविणु' प्रत्ययनो व्यव- हार थाय छे. २ अपभ्रश सिवायना उपर जणावेला बीना प्रत्ययो पर रहेता प्रयोगानुसारे पूर्वना ' अ ' नो 'इ' अने 'ए' थाय छे ३ केटलेक ठेकाणे प्राकृतना त 'कारादि प्रत्ययोना त नो लोप पण थइ जाय छे (जओ असयुक्त — कादि ' लोप पृ० १०नि०२) ४ उपर जणावेला प्रत्ययोमा जे प्रत्ययो 'ण' छेडावाळा छे तेने अते विकल्पे अनुस्वार थाय छे द-शौरसेनी शौरसेनीमा 'कृ' अने 'गम्' धातुनु संवधक भूतकृदत कडुअ' अने गडम' बने छे ( + अडअक्डुअ-कृत्वा (गम् + अटुअ = गडुअ-गत्वा) अपवाद-पैशाची वा' छेडावाळा सस्कृत रूपोनु सबंधक भूतकृदत करखा माटे पैशाचर्चामा ए 'या' ने बदले 'खून' अने 'त्यून ' वाप रवामा आवे छे नदून, नत्थून ( स० नष्ट्वा) तळून, तत्यून ( सं० तवा ) वगेरे अपवाद-अपभ्रंश मार एक गम्' धातुनु सवधा भूतकृत वरवा माटे अप- अपवाद- . . - - मा०४० ३१४ %3D गम् + प्पि S भ्रंशना उपयुक्त प्रत्ययो लगाडवा उपरात 'पि' अने प्पिणु' प्रत्ययो पण लगाडवाना छः गम्पि गत्वा । गम् + प्पिणु = गम्प्पिणु– गत्वा । भाषावार उदाहरणो प्राकृत हस- हस + तुं = हसिउं, होउं, (हसित्वा) हो- होअ +तुं होइउं, होएउं, ( भूत्वा) हस्- हस + अ = हसिअ, हसेअ, (हसित्वा ) हो- होअ + अ = होइअ, होएअ, (भूत्वा) हस्- हस + तूण = हसिऊण, हसिऊण,, हसेऊण, हसेऊणं ( हसित्वा) हो- होम + तूण = होइऊण, होइऊण, होएऊण, होएऊणं ( भूत्वा) हम्- हस + तुआण-हसिउआण, हसिउआणं, हसेउआण, हसेउआणं ( हसित्वा) हो- होअ + तुआणन्होइउआण, होइउआण, होएउआण,होएउआणं (भूत्वा) भण्-भणापि + तुं = भणाविर ( भाणयित्ता) भणाविष + तूण = भणाविऊण, भगाविउगं तुआण भणारिउआण, भगाविउआणं १भा प्रेरक प्रबंधक भूताव भने एनी रचना प्रेरक भूत- रदानी बरी. . " " " + तूण = चामिउण, चरमिउण, चकमेउण, चक्मेऊण " +तुआण-चकमिउआण, चकमिउआण, चक्मेउआण, भाणेउ +अ- भाणि, भाणे भण्-भाण + तु = माणिउ, " + तूण= भाणिऊण, माणिजण, भाणेऊण, भागेउण + तुआग, - भाणिउआण, भाणिउआण, भाणेउआण, " भाणेउआण " + " " " " कर-रावि+ तु = क्राविउ (कारयित्वा) + अ = क्रावि तूण- क्राविऊण, क्राविजण + तुआण, कराविउआण, कराविउआण " कार +तु : कारि, कारेउ + अ = कारिअ, कारे +तूण = कारिऊण,कारिऊण, कारेऊण, कारेऊण तुआण,कारिउआण कारिउआण,कारेउआण,कारेउआण शुश्रूष-सुस्सूस + तु = सुस्मृसिउ, सुस्मसेउ + अ = सुस्मृसिम, सुस्सूसे + तूण- सुस्सूसिउण सुसूसिउण, सुम्सूसउण, मुस्स्सेऊण +तुआण-मुस्सूसिउआण, सुस्मृसिउआण, मुस्मूसेउआण सुस्सूलेउआण चक्रम्य-चक्म+तु चकमिउ, चक्मेउ चकमिअ, चक्मे " " %3D " चक्मेउआण.
३१६ %D कर-इत्ता करिता ( कृत्वा) कर- इत्ताण = करिताण, करित्ताणं कह- इत्ता कहित्ता, (कथायित्वा) कह- इत्ताण = कहिताण, कहिताणं गम- इत्ता = गमिता, (गत्वा) गम- इत्ताण = गमित्ताण, गमिवाण गह+ आय = 'गहाय (गृहीत्वा) संपेह+आए = संपेहाए (संप्रेक्ष्य) आया+आए = आयाए ( आदाय) शौरसेनी, मागधी- हो + इय हविय, होचा (भूत्वा) + दूण होदूण पट पदिय, पदित्ता (पटित्वा) पदिदण इय रमिय, रंता (रन्त्वा) रंदूण पेशाची- गम् + तून = गंतून ( गत्वा) रम् + तून - हसितून (इसित्वा ) + तून - पदितून (पदित्वा) रुप + तून - कधितून (कथायित्वा) १ मारतीमूत्र० रा. शु. ३,०२-" पगानि गहाय "पहिगास महार"-. १७०-१०१, " " +इय + टूण पट " + * दूण " - + - %D ( " ) " काउ, ३१७ अपभ्रंश- इ = लहि (लब्ध्वा) कर + इउ करिउ (कृत्वा) कर + इवि करिवि कर + अवि करवि कर + एप्पि करोप्पि कर + एप्पिणु- रेप्पिणु । कर + एविणु = करेविणु (" कर + एवि = क्रेवि (" अनियमित सबंधक भूतकृदत (प्राकृत) कृ + तु + तूण %3 काउण, काऊण, + तुआणन्काउआण, काउआण ग्रह +तु घेत्तु, + तूण घेतूग, घेत्तूण, तुआण - घेत्तुआण, घेत्तुआण त्वर् +तु तुरिउ, तुरेउ, तुरिअ, तुरेअ, +उण + ऊण - तुरिउण, तुरिऊण, तुरेऊण, तुरेऊण +उआण +उआण- तुरिउआण, तुरिउआण, तुरेउ. आण, तुरेउआण दृश् + तु ट्ठ 3 * तूण - द + ऊण- दण, दहण " , " + + अ " " .
" + + - " " + रोत् + तूण " + तुआण 1- दठ्ठ + उआणददुआण, ददुआण. भुन् तु भोत् + तुं भो, तूण " + तूण = मोत्तूण, भोतूणं, " +तुआण = , +तुआण- भोत्तुआण, भोत्तुआण. मुच + तुं मोत् + तुं मोतु तूण + तूण - मोत्तूण, मोतूण + तुआण= " + तुआण = मोतुआण, मोतुआण. रुद् + तुं रोत् + तुं रोतुं तूण रोतूण, रोतूण " +तुआण - रोत् + तुआण- रोतुआण, रोतुआण. वच् + तुं वोत् + तुं वोत्तुं, तूण = वोत् + तूण = वोत्तूण, वोत्तूण, + तुआण- वोत् + तुआण = वोनुआण, वोत्तुआण. वन्द +तु वंदितु, वदित्तु. [ संस्कृतना सिद्ध संबधक भूतकृदतो पण थोडा फेरफार साथे प्राकृतमा वपराया छः आदाय-आयाय वन्दित्वा--वंदिता. गत्वा-गता, गच्चा. विप्रनहाय-विष्पनहाय. ज्ञात्वा-नचा. श्रुत्वा-सोचा. सुत्प्वा-सुना. बुद्दा-बुजा. सहत्य-साहटु हत्वा-हता मत्वा-मचा, मचा. + " नत्वा-नचा. भुक्त्वा-मोचा. इत्यादि।
, या . 'विध्यर्थ-कृदंत- विध्यर्थ कृदंतनी साधना विध्यर्थ कृदंतना संस्कृत सिद्ध रूपो उपरथी करवानी छे, तो पण तेने लगता केटलाक प्राकृत प्रत्ययो आ रीते छः १ धातुने तव्व' (शो० दन') अणिज' अने 'अणीअ' प्रत्यय लगाडवाथी तेनु विध्यर्थ-कृदंत बने छे. २ तव्व ' अने ' व्व' प्रत्यय पर रहेतां प्रायः पूर्वना 'अ' नो 'इ' तथा 'ए' थाय छे. १ विध्यर्थ वृदतो सह्यभेदी होय छे. २ विध्यर्थ कदत माटे पालिमा । तव्य, 'सय्य,' अने ' अनीय' प्रत्यय वपराय छे:-- भवितव्य (भवितव्यम्) बुज्झितव्य (बोद्धव्यम्) सयितब्य (शयितव्यम्) जातय्य (शातव्यम्) (प्राप्तव्यम्) दट्ठय्य (द्रष्टव्यम् ) देय्य ( देयम् ) ( मेयम् ) ( कृत्यम्) भच्चो (भृत्यः) वृद्धिवाळो य कारिय (कार्यम्) हारिय अनीय- भवनीयं सयनीयं पापणीयं तव्य- तय्य- पत्तथ्य य- मेय्य (हार्यम्) (मापणीयम् ) -पालिप्र. पृ. २५४ कृत्यम् - किच्च। भजा। अजो। ३२० ३ विध्यर्थ-कृदंतने लागेल संस्कृत • य' प्रत्ययने स्थाने प्राकृ- तमान' पण लागे छे. सिद्ध रूपो उपरथी बनतां विध्यर्थ-कृदंतो-~ कार्यम् - कने। वाच्यम् - वचं। वाक्यम् - वक। प्राथम् - गेझं। जन्यम् - जन्न । गुह्यम् - गुन्झं। भृत्यः - भिचो। वय॑म् – वर्क। भार्या वद्यम् - वनं । अर्यः भन्यम् - भव्वं । आर्यम् -- अर्ज। अवद्यम्- अवचं। पाच्यम् - पचं । इत्यादि। तव्य-हस-हसिअव्वं, हसेअन्च, हसितवं, हमेत । हसाविअन्वं, हसावितव्वं । शॉ० हसिव्वं, हसेदर, हसाविदव्वं । गुस्सूसितव्यं, मुस्मसतवं, मुस्मसिअन्वं, मुस्सूअन्न । चंकमितव्यं, कमेतम्ब, चकमिअन्वं, चंकमेअन्वं । हो-होत, हो। पि-निविभव, विवेभवं, ज्ञा-नातन्त्र, नायब। चिनितम्व, निन्येतलं। अणिन हसणिज, रसणीअं, हसावणिज, हसावी, अगी सरणिज, करणीम मुस्मसणिज, सुस्मसी, पंकमणिन, पामणी पच-क्याणित, वगगी । इत्यादि। य-पेयम् पेज, पंा पेया-पेना, पंा। गेपर-ज, गे । इत्यादि।
- -अनियमित विध्यर्थ कृदत- ग्रह-तव्व-घेवव्व । रुद्-तव्व-रोत्तव्य । भुन्-तव्य-भोचव्व। कृ-तव्व-यातव्व वच्-तब्व-वोतन्व। कारव मुच्-तन्व-मोचन्न । स्वर-तन्व-तुरिअन्व, तुरेभव्य । श-तव्व-दट्ठन्व । तुरितव्य, तुरेतब्य । विध्यर्थ कृदत (अपभ्रश)- प्राकृतमा वपराता 'तव्य' प्रत्ययने बदले अपभ्रशमा 'इएव्वउ,' एन्वउ' ।' एवा' प्रत्यय चपराय छे करिए वउ कर रेल्वउ कर + एवा रेवा मर + इएव्वउ मरिएन्वट मर मरेव्वउ मर मरेवा सह इएवउ सहिएन्वउ सह एवउ सहेबउ एवा सहेवा सो एवा सोएवा स्वतन्यम् । जमा + एवा कर्तव्यम् । + इएव्वउ + एउ - - - मर्तन्यम् । + एपउ + एवा + सोढव्यम् । + + + - = नग्गेवा जागरितव्यम् । मा०४१
कतरिकदंत'
धातुने 'इर' प्रत्यय लगाडवाथी तेनुं कर्तृसूचक कृदंत बने छः
हस-दर-हसिरो (हसनार ), हतिरा, री (हसनारी), हसिरं
(हसनारु)।
हसाव-इर-हसाविरो (हसावनार)-रा, री (हसावनारी), र
(हसावनाएं)।
त्वर-हर-तुरिरो (त्वरा करनार) इत्यादि.
कर्तृसूचक कृदंतनी साधना, कर्तृसूचक कृदंतना संस्कृत सिद्ध
रूपो उपरथी पण थाय छः
पाचक -पायगो, पायओ । नायकः-नायगो, मायओ। नेता-नेआ।
कर्ता -कता । वक्ता-वत्ता । भर्ता-भला । कुम्भकार. कुंभआरो।
कर्मकर.-कम्मगरो । स्तनंधयः-धणघयो । परंतप -परंतवो।
लेखक:-लेहओ इत्यादि।
कतरिकृदंत (अपभ्रंश)
प्राकृतमा पपराएला 'इर' ने बदले अपभ्रंशमा । अण
प्रत्यय लगाडवाथी कर्तृसूचक कृदंत बने छ :
मार + अणों% मारणों = मारणउ मारक:
बोल्ल अग - बोलण = बोल्लगड
वाचकः
-
.
-
१ फरिवर्नु रूप रनावया माटे पालिमा प्रारतना 'घर'ने
बदले केटलाक सास धानुथी 'अ' प्रत्यय यपयय छे अने एज अर्थन
नूतकाळनु र साधवा माटे साधारण रीते 'तापी' प्रत्यय यपाय -
रितु (वेचा) स्त्री पिदुनी,
गानी- भुत्तानी (भुनवान्) पी. मुत्ताग्निी
-परिप्र. पृ. २५०-२५१,
-- ३ 'तनिश्रित' अर्थमा पालिमाल' प्रत्यय वपराय छे. ३२३ वज्ज + अणअ% वजणअ - वज्जणउ वादक: भस + अणअ% भसणअ = भसणउ भपफ: + अणक्ष- जाणअ = जाणउ ज्ञायक: प्रकरण १४ तद्धित १. 'तेनुं आए अर्थमा नामने केर' प्रत्यय लागे छे अने अपभ्रंशमा : 'आर' प्रत्यय लागे छे. अस्मद् + केर = अम्हकर (अस्माकमिदम् अस्मदीयम् ) अप० अम्हारु, महारु, युप्मद् + केर = तुम्हकेर (युष्माकमिदम् युष्मदीयम् ) अप० तुम्हारु, तुहारु, पर + केर - परकर (परस्य इदम् परकीयम्) रान + केर - रायकरें (राज्ञः इदम् राजकीयम् ) २ . 'तेमा यएल' ए अर्थमा नामने · इल' अने उल्ल, प्रत्यय लागे छ: इल-गाम + इल्ल गामिलं (ग्रामे भवम् ) स्त्री० गामिल्ली। १ सस्कृतनी पेठे पालिमा आ अर्थमा 'ईय ' प्रत्यय वपराय छे. मदनीय (मदनस्य रथानम्) २ आ'आर' प्रत्यय प्राय: । अने. मत् ' शब्दोने लगे छे. पालिप्र० पृ. २६० 'युष्मद् 'अस्मद् ' ' त्वत्' दुष्ठ निश्रितम् = दुदुल्ल वेदनिश्रितम् = वेदल्ल पालिप्र. पृ० २६.
उपरि + इल ३२४ पुर +इल - 'पुरिलं (पुरे भवम् ) स्त्री० पुरिष्टी । अधस् +इल = हेहिल (अधो भवम् ) खी० हेहिटी । उवरिलं (उपरि भयम्) उल्ल----आत्म+उल्ल%D अप्पुलं (आत्मनि भवम्) तरु + उल = तरलं (तरी भवम् ) नगर+उल्ल नयरलं (नगरे माम् ) इत्यादि। ३ तेनी जेवू ' ए अर्थमा नामने 'ब' प्रत्यय लागे छः महुरल पाइलिपुले पासाया (मधुरावत् पाटलिपुत्रे प्रासादाः) ४ पणुं' अर्थमां नामने 'इमा'' अने तण' प्रत्यय लागे अने अपभ्रंशमा 'पण' प्रत्यय पण लागे छः पीण + इमा - पीणिमा (पीनत्यम् ) पीण + त्तण - पीणतणं, पीण + 1 = पीणतं । पुष्क + इमा - पुफिमा ( पुप्पत्यम् ) पुक + पण - वर्ण, पुष्फ + 1- पुप्फच । अप० व + पण - पहप्पण, वडत्तणु वगेरे (वृद्धत्तम् ) मिहु + पण - विहुप्पणु, पित्तणु वगरे (विभुत्यम् ) १ 'जात' अर्थमा पाटिमा 'म' प्रत्यय आये है:- पानाव:- परिभो। उपरि अत: उपरिमो। पुग गर. - रिमो अधो जानः = देटियो। गंभिमा- परिय. पृ. २५९-२९०. २ मा ममा निमा 'मन'(पा. सन) भा. ५yम मागे मगन (नयन) पाभिया ० २६१ प्रोप्रातः . "पत्तो अमतम्खुत्तो" जीवविवारनी बेटी गाथा. ३२५ ५ 'वार' अर्थमा नामने 'हुत्त ' (आप-खुत्त) प्रत्यय लागे छे: एक + हुत्त एगहुतं (एककृत्व -एक्वारम् ) द्वि + हुत्त ( द्विवारम् ) तिहुत (त्रिवारम् ) शत + हुत - सयहुतं (शतवारम् ) सहस्र + हुत्त = सहस्सहुत्त ( सहस्रवारम् ) ६ वालु' अर्थमा आवत! नामने लागता : मतु ' प्रत्ययने स्थाने 'आल ''आलु' इत्त ''इर' 'इल्ल' 'उल्ल' 'मण' 'मत' अने वत' प्रत्यय वपराय छे आल- रस + आल : रसारो (रसवान् ) जटा + आल = जडालो (नटावान) ज्योत्स्ना+ आल - जोहालो ( ज्योत्स्नावान्) शब्द + आल - सद्दालो (शळवान् ) फडालो (फटावान् ) फटा + आल - १ स० कृत्वस्-कुत्त-खुत-हुत्त-जओ सादिनो 'द' पृ० १९. २ 'वार' अर्थमा पालिमा 'क्सत्तुं' (स० कृत्यस) प्रत्यय वपराय छे एकत्यत्तु (एकवारम् ) द्विक्सत्तु (विवारम्) तिक्सनु (विवारम्) पालिप्र. पृ. २६१ आपप्राकृतमा आ अर्थमा 'युत्त' (पालि-क्यनु) प्रत्यय पण आये छे तिसुत्तो- तिमपुत्तो आपाहिणपाहणं करेह "- "महावीर तिरसुचो आयादिपपयादिम करे- (२०नि० भु० अ०७१०४२५ २० २ स०) " भग. रा.१० २३५ ५.२ + आलु - छाया + + आलु- इा + आलु - ईसालू (`वान् ) दया + आलु - दयाल (दयावान् ) नेह नेहालू (स्नेहवान् ) लन्ना + आलु - लचालू (लमावान्) खी० लबाला ( लज्जावती) काव्य + इच कन्नड़तो (काव्यवान् ) मान माणइतो (मानवान् ) गन्चिरो (गर्ववान्) रेखा + हर रोहरो ( रेखावान) इल्ल- शोमा + इल सोहिल्लो (शोभावान्) छाइलो (छायावान्) याम जामइलो ( यामवान् ) उल्ल- विचार + उल्ल वियाख्लो (विचारवान्) विकार + उल्ल वियारुल्लो (विकारवान्) श्मश्रु मंसुलो (श्मश्रुमान् ) दर्प दम्पुट्टो (दर्पवान् ) मण धन + मण धणमणो (धनवान्) शोभा + मण सोहामणो ( शोभावान्) बीहामणो ( भीमान् ) मंत- हनु + मंत हणुमतो (हनुमान् ) श्री * मंत सिरिमंतो (श्रीमान् ) पुण्य + मंत पुण्यमतो (पुण्यवान् ) वंत- धन + वंत धणवतो (धनवान्) भक्ति + वंत भत्तिवतो ( भक्तिमान ) ७ संस्कृतमा आवता 'तस्' प्रत्ययने स्थाने 'हो' 'दो' विकसे वपराप । द + + मण - D 5 -- D - - + तस् . सर्व + तम् सवतो, सव्वदो, सव्वओ (सर्वतः) एक + तस् एकचो, एक्दो, एकओ (एकतः) अन्य + तस् अन्नत्तो, अन्नदो, अन्नओ (अन्यतः) किम् • तस् कचो, कुदो, कुओ (कुतः) यत् + तत् जत्तो, जदो, जओ (यतः) तत् + तस् तची तदो, तओ (तत ) इदम् इचो, इदो, इओ इतः) ८ संस्कृतमा वपराता अप्' प्रत्ययने स्थाने प्राकृतमा 'हि', 'ह' अने त्य' प्रत्यय वपराय छः यत् + H = जहि, जह, (यत्र) तहि, तत्थ (तच ) किम् + = कहि, कह, कत्थ (कुत्र) अन्य + = अन्नहि, अन्नह, अन्नत्थ अन्या) ९ अङ्कोठ' शब्द सिवाय वीजा शब्दने लागता तेल, प्रत्ययने स्थाने 'एल' प्रत्यय वपराय छः + तेल कडुएलं ( कटुतैलम् । [ अोठ + तेल अकोलतेलं (अकोठतेलम् )] १. नामने स्वार्थमा 'अ, 'इल' अने उल्ल' प्रत्यय विकल्प जत्थ तत् + त्र- तह, . लागे छे: चन्द्र + अ 3 हृदय + अ = बहुक + अ =3 पल्लव + इल्ल = पल्लविल्लो, पुरा + इल चंदओ, चदो (चन्द्रका ) हिअयअ, हिअयं (हृदयकम्) बहुअयं, बो (बहुकम् ) पल्लवो (पल्लवः) पुरिल्लो, पुरा (पुरा) ३२८ पितृ + उल - पिउल्लो, पिआ (पिता) हस्त + उल्ल = हत्युल्लो, हत्यो (हस्तः ) विशेपता पैशाचीमा स्वार्थिक 'अ' ने बदले संस्कृतनी पेठे क वपरायः . अड, D सं० वदनकम्- प्रा० वयणय-१० वतनक । " वतनके वतन समप्पेत्तून प्रा० च्या० पा० २ ० १६४ पृ० ७० अपभ्रंशमा स्वार्थमा । अ. 'उल्ल' अइम', उल्ल' अने । उल्लड' प्रत्ययो वपराय छः दिट्ट + अ दिवउ ( दृष्टः) दोस + अड - दोसड ( दोषकः) कुटी + उल्ल - कुडल्ली (कुटिका) हिअय + अड% हिअडउ (हृदयकम् ) + उल्ल मूलओ (चूडक ) बाहुनल + उघड-बाहुबलुडउ (बाहुबलकः) ११ संस्कृतमा वपराता 'पणु' अर्थवाळा (त्व, तल्ट्) प्रत्ययो नामने लाग्या पड़ी तेयार यएल ए न नामने स्वार्थमा एना ए न प्रत्ययो फरीवार पण लागे छे.- मउअवता मृदुक + त्व - मरअत ता: मउवया (मृदुकत्यता) १ प्रारूपायवारमा यहा ''बदुख "दुराम' "शा' 'The 'm' 'सार' 'सा' "सभःren'थ' भागने पार प्रत्ययो पप सारेग.. १५-११-यू. ५. .
= एफ.इआ - अनियमित तद्धितांत रूपो एक+सि = एकसि एक+सि एकगि (एकदा) एक + इआ + मया - भुमया } (5) ममया शनैः। + इअ = सणि (शनैः ) उपरि + ल - अवरिलो (उपरि) ज + एति जेतिरं ज+ एत्तिल जेचिल ( यावत्) ज + एदह जेद्दह अप० नेवडु, नेतुलो त + एति तेचिों त + एतिल तेत्तिल ( तावत् ) त + एदह तदहं अप० तेवडु, तेत्तुलो एत्तिा - एति (एतावत्) एत + एपिल - एत्तिल (इयत्) एदह - एदहं अप० एवडु, एलो क + एति केति क + एतिल - वेतिल (कियत् ) क + एदह - केदहं अप० केवडु, केतुलो %3D मा०४२ आरिस ! भिक्ख। । भेक्षम् आस्तिक अत्यिओ । आपम् कानीन काणीणो मदीयम् मईय । वाड्मयम् - वम्मय। पीनता -गणिया(शो०पणिदा) कोशेयम् = कोसेय । (पै०पीनता) पितामह पिआमहो । यदा - मया। मतया । क्दा -क्या। अन्यदा%3 अण्णया। सर्वदा = सव्वया। सर्वथा -सनहा । इत्यादि. धातुपाठ (परिशिष्ट) आठमा अध्यायना चोथा पान्मा आचार्य हेमनद्र प्राकृत धातु- ओने आ रीते आपे छे सूत्राक अर्थनी दृष्टिए हेमनद्रे मूळ रूपना मूकेलु मूळ रूप आदेशो २ कथ् प्रा० क्ह् वज्जर पज्जर उप्पाल पिमुण सर बोल णिवर (दुमस्थने) ३३२ जगप्स् प्रा० जुउच्छ झुण दगुच्छ ढग णीरव वोज ५ बुभुक्ष् प्रा० बुहुक्स वाज शा व्यापा० झा ग गा झा जाण ८ उत् + ध्मा धन्+धा १० पा प्रा. पि मुग उद्धमा सदह पिज्ज ११ उत् + वा प्रा० उन्या { पट्ट घोह ओरुम्मा वसुआ ओहीर १२ नि + द्रा प्रा० निदा आ+घा प्रा० अग्गा म्नाग्रा. पहा सम् +म्त्या आइप अभुत्त सना टा NE नि? तिष्ठ (मा०विध) निरप्प ३३३ १७ उत् + स्या उकुकर वा १८ म्ले प्रा० मिग पब्वाय १९ निर् + मा निम्माण निम्मव णिज्मर गुम २० क्षिप्रा० द्विी २१. छाद प्रा० डाय नूम, म सन्नुम टक ओम्वाल पव्वाल णिहोड २२ नि + वृ-निवार प्रा० निवार पातप्रा० पाड " २३ दू २४ ववत्र २५ तुल २६ विरेन प्रा० विरम दूम दुम, दूम ओहाम ओलुंड उल्लंड पल्हत्य आहोड विहोड वीसाल मेलव ताड २८ मिश्र प्रा० मीस मिस्स ३३० २९ उत् + धूल प्रा० उद्धृल गुंठ भ्राम प्रा० भाम तालिमट तमाड नाशमा० नाम विउड नासव हारव विप्पगाम पार ३२ दर्श प्रा० दरिस दाव दंस दाखव ३३ उत् + घाटमा० उग्गड उन्ग ४ सिह ३५ सम् + भाव आसंर ३६ उत् + नम् मा० उन्नार उत्यंत उटात उप्पन प्र स्थापना० पट्टव पेण्डर रोम २८ विज्ञाप्रा. विष्ण अवृष ३९ अप प्रा० अप्प अल्लिन चच्चुप्प पणाम जव ४० यापमा० जाव आम्वाल प्लाव प्रा० पाव पव्वाल पक्खोड ४२ विकोश प्रा० विसोस ४३ रोमन्य ओग्गाल वग्गोल णिहुव गुव्व विच्छोल ४४ क्म प्रा०काम प्रवाशप्रा० पयास वल आ+रोप प्रा. आरोव ४८ दोल रखोल घटमा० घड ५१ वेष्ट प्रा० वेद ५२ मी विकसीमाविकी राव परिवाड परिआल विण विकिण ५३ भी बीह अल्ली आली ५५ निकली णिली मिलक णिरिग्य लिहक चिरा ५६ विकली रुप्रा. रख रुट ५८ शुमा० मुण ५९ धू प्रा० गुण हण गुव १२ हुव (शा० भ, भुव) भव) णिव्वड (पृथग्भवने, स्पष्टभवने च) " हुप्प ( प्रभवने) रूमाल कर ह गिभार ( साक्षित- करणे) गिह (निट) सटाण (अष्टम्भे) वावक (अमकरण) णिनोट (फ्रोषपूर्ण ओष्ठमालिन्ये) पर्यछ (शैथिल्यकरणे, ७७ लम्बने च) णीलुछ (निप्पाते आच्छोटने च) कृ क्ष्म (क्षुरकरणे) गुलल ( चाटुकरणे) " झर ७४ स्मरप्रा० सर भर भल विम्हर सुमर पयर पम्हह पम्हुस विम्हर वीसर ७५ वि+स्मृ कोक, कुछ ७६ व्याह प्रा० बाहर पोक प्र प्रा० पसर . पयल्ल उल्ल महमह (गन्धप्रसरणे) णीहर नील धाड वरहाड नि+ प्रा० नीसर प्रा० ४३ जागृ प्रा० जागर जग्ग आअड व्या+2 प्रा० वावर ८२ सं+ वृ प्रा० संवर साहर साधन ८३ आ+ह प्रा. सन्नाम आदर प्रहप्रा० पहर त + ओअर' अव + तृ+ सार ओह ओरस चय शक तीर पार फक थक्क मलाप सलह खच . वेअड सोल्ल पच पउल्ल ९१ मुच -- अवहेड उस्सिक रेअव गिलंछ धंसाड ९२ वञ्च णिव्वल (दु खमोचने) वेहव वेल्थ नूरव उमच्छ १४ रच उम्गह अवह विडविड्ड २५ समा+रच उवहत्थ सारव समार केलाय सिंच ९६ सिच सिंप पुच्छ ९७ प्रच्छ ९८ गर्न बुक्क ढिक (वृषगर्जने) ९९ अब सह रीर रेह मस्न --- आउड्ड णिउड्ड दुप्प
१.०२ पुन
१०३ रस्न
.
आरोल
क्माल
जीह
ओमुक्क
उग्घुस
लुंछ
१०४ तिन
१०५ मृज प्रा० मज्ज
पुस
भन्न
रोसाण
वेमय
मुसुमूर
मूर
विर
पविरन
करज
नीरज
पडिअग्ग
१०७ अनु + बन
प्रा० अणुवञ्च
१०८ अर्म
विढव
१०९ युज
जुन
जप्प
३४१
११० भुग
भुग
निम
जेम
कम्म
अण्ह
समाण
चमद
उम्म
१११ उप + भुभ
गढ
घट
साल
११३ सम् + बट
मुर (हासस्फुटिते)
११५
मण्ट
चिच
निच
चिचिल्ल
रीड
टिविडिक
तोड
खुट्ट
उक्खुड
उल्लुक
शिलुक
રૂકર ११७ घूर्ण घोल घुम्म पद्र ११८ वि + वृत् प्रा. विषट्ट ११९ क्वथ प्रा० कट १२० ग्रन्थ १२१ मन्थ मष्ठ उसल पिसेल अवअच्छ १२२ हाद १२३ नि + सद १२४ छिद प्रा० छिंद णुमज दुहाव णित णिज्झोड णिधर गिल्लूर आ + छिद" ओअंद उदाल मल १२६ मह परिहट्ट पन्नाड १२७ सन्द प्रा० फद १२८ निर + पद प्रा० निप्पन्न १२९ विस+वद चुलचुल निव्वल विअट्ट विलोट्ट झड १३० शद पक्खोड णीहर आ+कन्द १३२ खिद जूर विसुर उत्थष हैक १३३ रुध प्रा० रुप १३४ मि+पेध १३५ क्रुध प्रा० कुज्झ जर जम्म तड तड्ड तड्डव विरल्ल १३९ उप + सूप १४० स+तप १४१ वि + आप १४२ सम् + आप थिप्प अल्लिम झख ओअग समाण ३५४ गलत्य अडक्स सोल पेल्ल परी घत उत् + सिप १४५ १४१ आ+क्षिष स्वप गुलगुच्छ उत्थष अल्लत्य उन्भुत उसिक हक्खा णीरव कमवस लिम लोह लोह आयझ मंख वडवड १४७ वेप १४८ वि + लप १४९ लिए लिप दिर पड १५१ कृप १५२ प्र+दीप प्रा० पलीव ३४५ अवहाव तेअव सदुम संधुक्क अन्भुत समाव खउर १५४ क्षुभ आरभ १५५ आ+रम {आदव (सख १५६ उपा+ लभ पञ्चार पेलव जम्मा १५७ जृम्भ विनृम्भ (वअभ) १५८ नम णिसुढ (भारपूर्वकनमने) शिव्वा . वि+श्रम प्रा० वीसाम ओहाव उत्थार आ+क्रम मा० दश
भ्रम
टिरिदिल्ल
ददल्ल
चकम
मम्मड
भमड
भमाड
तल अट
झट
अप
गुम
पुम
पुस
दुम
तुम
परी
पर
गम्
अइच्छ
अणुवन
अवन्नस
काम
अरस
पचा
पच्छद
हिम्मत
गी
गीण
णीलुक्क
पट
रम
परिअल
वोल
परिअल
णिरिणास
शिवह
अवसेह
अवहर
अहिपच्चुअ
१६३ आ + गम्
अभिड
सम् + गम्
उम्मत्थ
अभ्या+गम्
प्रत्या+गम्
पलोट्ट
पडिसा
परिसाम
१६७ शम
१६८ रम
सम्खड्ड
खेड्डु
उन्भाव
किलिकिंच
कोटुम
मोद्याय
णीसर
स्वर
अग्याड
अग्वव
उद्भूमा
अंगुम
अहिरेम
तुवर
जअड
सिर
झर
पज्झर
पचड
पिचल
गिट्ठभ
उत्थ
थिप्प
क्षर
१७४ उत् + छल
१७५ नि+गल
मह
विसट्ट
वंफ
फिड
फिट्ट
नश
गिरणास
णिवह
आप्तेह
पडिसा
अपहर
ओवास १७९ १८० १८१ अव+काश सं+ दिश दश अप्पाह [ निअच्छ पेच्छ अवयच्छ अवयज्म वज्ज सव्वव देख ओअस्ख अवक्ख अवअक्ख पुलो पुल नि अवपास पास १८२ সূর্য फास फस फरिस वि उिह आल्ख । आलिह रिअ प्रविश प्रमश प्र+मुष ३५० १८५ पिप [ गिवह णिरिणाम णिरिणज रोच भप भुक कड़ १८७ कृष् साअड अच अणच्छ अयश्च आइल्छ अक्खोड ( असिर्पणे) १८८ १८९ गवेष १९० श्लिप प्रा० सिलेस ढदोल गमेस घत सामग्ग अवयास परिअत चोप्पड आह अहिल्य अहिल्ख म्रक्ष १९२ काई वफ मह सिह विलुप १९३ प्रति + ई सामय विहीर विरमाल १९४ तक्ष तच्छ चच्छ रम्प रम्फ १९५ वि+क्स १९६ १९७ हस स्वस { १९८ त्रस कोआस वोसट्ट गुज हिहस डिभ डर वोज वज णिम गुम पलोट्ट पलोट्ट पल्हत्य १९९ नि+अस २०० परि + अस् झत २०१ नि + श्वस २०२ उत् + लस उमल उसुम णिलस पुलआम गुमोल आरो २०३ भास ग्रत भिस घिस ओवाह २०५ अव+गाह आ+रुह वलग २०७ { २०८ दह २०९ ग्रह गुम्म गुम्मड अहिउल आलुख वल गेह हर पग निरुवार । আবলুস छिन्द २१६ छिद भिन्द भिद २१७ युध बुध गृध जुन्य बुज्म गिज्झ कुज्झ सिज्झ मुज्म सिघ मुह २१८ रुप { सट १९ सद पड पत ० क्वथ वर्ध वट्ट वेद R२१ वेष्ट स+ वेष्ट स+वेल २२ मागधीना धातु प्र + ईश = प्रेक्ष प्रा० पेक्ख मा० पेस्क आ+नक्ष प्रा. आयव मा० आचस्क केटलाफ अपभ्रश धातुओ हुच्च (पर्याप्ती ) ब्रुव वुन भू न ३९३ दृश २९४ ग्रह २९५ तक्ष गृह गेल देश्य धातुओ गू० खटक " धडकवु "झळकवु , चापवु धुडुक्क झलक चप સ ગુજરાત વિદ્યાપીઠ તરફથી પ્રકાશિત પુરાતત્ત્વ મંદિર ગ્રંથાવલી પ્રાકૃત અને પાલી ભાષાના અભ્યાસ માટે પ્રાકૃત વ્યાકરણું લે ૫ બેચરદાસ છ દેશી ૪-૦-૦ ૨ પ્રકથાત ગ્રહ સ મુનિ જિનવિજય ૦-૧૨-૦ ૩ પાનાપાડાવતી સ ૦-૧૪-૦ « અભિધાનપદીપિ (પાવાનો શબ્દકેલ) ૫. અભિધમ્મસ ગો સ આ ધર્માનદ કેસ બી ધમ્મપ(મૂળ, અનુવાદ કવિ ઈ.) આ ધર્માનદ સંબી અને અ ર વિ. પાઠક ૭ ઉપનિષત પાઠાવલી સ અ દ બા કાલેલકર ૦૧૪-૦ ૮ સમ્મતિતપકરણ તત્વબોધિની સાથે ભા. ૧ સ૫ સુખલાલજી તથા ૫, બેચરદાસ જી દોશી ગૂજરાતી પુસ્તકો આર્યવિદ્યાવ્યાખ્યાનમાળા. ચામડાની પી અનુવાદકે શ્રીમહાદેવ દેસાઈ તથા નરહરિ દા પરીખ. ૧૧ આર્યોના હેવારોને ઈતિહાસ લે કa. ૧૨ બુહલવાસાસર. લે આ ધર્માનદ સબી. ૧૦-૦ ૦ ૨-૮૦ ૧૦ પ્રાચીન સાહિત્ય. ૦-૧૨-૯ ૧૩ બૌદસનો પરિચય, ૧૪ સમાધિમાં ૧૫ કાવ્યપ્રકાશ ૨. વિ અનુવાદ ઉ – અનુવાકે, પાઠક આ છે પરીખ * ---
છપાય છે.
વૈદિક પાઠાવલી. { અનુવાદ સાથે) સ. અ, , છે પર
પ્રાચીન ગૂજરાતી ગધ સંદર્ભ સ. મુનિ જિનવિજય
સમ્મતિત. ભા ૨. સ ૫ સુખનીજી તયા
૫ બેચરદાસ
તૈયાર છે.
પુરાતત્વ પુસ્તક. ૧ લું
પુરાતત્વ પુસ્તક ૨ જુ
પુરાના, પુસ્તક, ૩ જી
૫-૧૦-
૫-૧૨-૦