Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Aparbarns Kavyadara
Front matter
प्रकाशक:
प्रकाशन-विभाग
कल्याणमल एण्ड सन्स
त्रिपोलिया वाजार, जयपुर-२
मूल्य : रु०६.००
मुद्रक :
अजन्ता प्रिण्टर्स,
जयपुर
प्रास्ताविक अपभ्रंश अब न तो एक अनजानी भापा है, और न उसका साहित्य अप्राप्य । गत चार दशकों की खोज से जो साहित्य प्रकाश में आया है, वह यह उजागर करने करने के लिए काफी है कि अपभ्रंश-एक जीवित लोक भाषा थी और यह कि उसका क्षेत्र, किसी भी आधुनिक भारतीय भाषा से बड़ा था। . अपभ्रंश का युग (ईसवी ७ से १२वीं तक) ऐतिहासिक संदर्भ में सांस्कृतिक मूल्यों के ह्रास और राजनीतिक विखराव का युग था । विखराव की यह प्रक्रिया भापा के क्षेत्र में और भी तेज थी। अपभ्रंश कवि के सम्मुख दुहरा दायित्व था, एक तो उसे नये पुराने के बीच सेतु बनना था और दूसरे युगीन यथार्थ के संदर्भ में प्राध्यात्मिक मूल्यों की प्रतिष्ठा करनी थी। और यह अभी भी शोध की अपेक्षा रखता है कि वह अपने दायित्व के प्रति कितना सजग और सक्रिय रह सका ? प्रस्तुत संकलन का अपना विशिष्ट संदर्भ और उद्देश्य है ? भारतीय विश्व- विद्यालयों में एम० ए० स्तर पर वैकल्पिक प्रश्न-पत्र के रूप में 'अपभ्रंश' का अध्ययन लोकप्रिय होता जा रहा है; यह इसलिए भी क्योंकि उसमें शोध के नए क्षितिज और दिशाएं हैं; परन्तु प्रामाणिक और अधुनातन संकलन न होने से नए अध्येता को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है ? यह प्रयास इसी कठिनाई को हल करने की दिशा में एक प्रयास है। विपय को सरल बनाने के लिए समकालीन परिवेश टिप्परिणयाँ और अवतरित अंशों के संदर्भ दे दिए गए हैं। चयन में यह सावधानी बरती गई है कि 'संदर्भित काव्य' की बहुरंगी झलक सामान्य पाठक को भी मिल जाये । पाठ्यक्रम की दृष्टि से पुस्तक कुछ बड़ी है; परन्तु संग्रह को बड़ा बनाने में दृष्टिकोण यह रहा है कि विभिन्न विश्वविद्यालयों में अपनी अपेक्षा और आवश्यकता के अनुसार पाठ्यक्रम निर्धारित किया जा सके; और कुछ समय बाद, दूसरे कवियों को भी पाठ्यक्रम में में रखने के विकल्प की सुविधा रहे। अतिरिक्त इसके; सामान्य पाठक के, जो परीक्षार्थी नहीं हैं, उपयोग में पा सके ? 'पांडुलिपि' तैयार करने में जिस मनोयोग से सुश्री महेशी कपूर ने काम किया है उसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। साथ ही कल्याणमल एण्ड संस भी कम
धन्यवाद के अधिकारी नहीं कि जिन्होंने-सत्रीय प्रकाशनों की व्यस्तताओं के बावजूद
अपेक्षित साज सज्जा के साथ 'पुस्तक' उपलब्ध कर दी।
पिछले पौने दो दशकों से मैं आलोच्यकाव्य से सम्बद्ध हूँ; और यह सम्बद्धता
यह विश्वास करने के लिए पर्याप्त है कि पुस्तक निश्चय ही उनका अपनापन पायेगी
जिनके लिए यह समर्पित है।
देवेन्द्रकुमार
अध्यक्ष-हिन्दी विभाग
इन्दौर विश्वविद्यालय, इन्दौर
ऐतिहासिक संदर्भ में 'अपभ्रंश' प्राचीन भारतीय आर्यभापा की अंतिम कड़ी है; ऐसी कड़ी जो न केवल प्राचीन भारतीय आर्यभापा को आधुनिक भारतीय आर्यभापात्रों और उनके साहित्य से जोड़ती है वरन् दक्षिणभारत की भापागों और उनके साहित्य को भी किसी हद तक जोड़ती है । अपभ्रंश और दक्षिणी मापायों का साहित्य-सर्जन समकालीन साहित्य-सर्जन है और अपभ्रंश में आर्यभाषा के शब्दों की तुलना में आतर भापायों के शब्द कम नहीं हैं। इस प्रकार भारतीय साहित्य धारा के नैरन्तर्य और नानाप्रवाहों को समझने का सूत्र, सचमुच अपभ्रंश के हाथ में है। (२) जहाँ तक अपभ्रंश के, एक भापा रूप में विकसित होने का प्रश्न है। इसका उत्तर स्पष्ट है ? अपभ्रंश के विकास में वही तत्व और प्रभाव काम करते हैं जो किसी दूसरी भाषा में कर सकते हैं । अपभ्रंश का सबसे बड़ा महत्व यह है कि आर्यभापा एक से अनेक कैसे वनी-इसकी व्याख्या अपभ्रंश के माध्यम से सही अर्थ में की जा सकती है ? व्याकरण की दृष्टि से भी अपभ्रंश का अपना एक व्यक्तित्व और प्राकृति है। उसका एक रूपात्मक अस्तित्व है । अभी तक के प्राप्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अपभ्रंश अपने मूल रूप में उत्तर-पश्चिम भारत की एक बोली थी; जिसे भरत मुनि ने 'प्राभीरोक्ति' कहा है और जिसकी प्रकृति-थी 'उकारान्त' जैसे 'मोरउ नच्चन्तउ'-'नाचता हुअा मोर' । आभोरी अपभ्रंश कैसे बनी-इसकी कहानी लम्बी और उलझनभरी है । वैसे अपभ्रंश शब्द का प्रयोग पतञ्जलि ने अपने भाष्य में किया है, परन्तु वह संस्कृत से भिन्न शब्द के लिए है जैसे गौ के लिए—गावी, गोणी, गोपोतलिका इत्यादि । सबसे पहले संस्कृत साहित्यालोचक दंडी ने यह बताया कि बोलचाल की भाभीरी साहित्यमापा के रूप में न केवल अपभ्रंश कहलाती है. प्रत्युत उसकी अपनी साहित्यिक शैलियाँ हैं, जिनका उसने संस्कृत और प्राकृत साहित्य के साथ, उन्हींके समानान्तर उल्लेख किया है । भरतमुनि और दंडी के बीच दो तीन सौ वर्षों का अन्तर तो सहज ही था । आभीरी को अपभ्रंश कहलाने में इतना समय लग जाना कोई बड़ी वात नहीं । प्रसिद्ध संस्कृत गद्यकार कवि बाणभट्ट के समय 'अपभ्रंश' भापा के नाम से जानी जाती थी। इसके 'हर्षचरित' में प्राकृत कवि वायुकुमार के साथ भापा कवि ईशान का भी उल्लेख है। यहाँ भाषा का प्राशय अपभ्रंश रो है; ईशान अपभ्रंश कवि थे इसमें सन्देह ४ , इसलिए भी नहीं रह जाता क्योंकि पुष्पदंत ने महापुराण में उसका अपभ्रंश कवि के रूप में उल्लेख किया है “चौमुह सयम्भु सिरिहरिसु दोणु' णालोइउ कइ ईसाणु वाण ।” ईसान वाणु का परम मित्र था। इससे स्पष्ट है कि सातवीं सदी के पूर्वार्ध में अपभ्रंश में कविता लिखी ही नहीं जाने लगी थी, परन्तु उसमें ईसान जैसे प्रसिद्ध कवि भी हो चुके थे। इस प्रकार मोटे तौर पर ईसवी सातवीं सदी से १२वीं सदी तक अपभ्रंश काव्य का युग स्वीकारा जा सकता है। स्वयंम्भूच्छंद के अवतरणों से भी यह तथ्य प्रमाणित है कि स्वयम्भू के बहुत पहले कई अपभ्रंश कवि हो चुके थे । इनमें प्रवन्ध और मुक्तक दोनों प्रकार के कवि सम्मिलित हैं ! (४) अपभ्रंश के युग की समाप्ति १२वीं ईसवीं सदी तक मानना उचित और तर्कसंगत है, यद्यपि अपभ्रंश में, इसके बाद (१६वीं-१७वीं तक) काव्य रचना होती रही। १२वीं के बाद वस्तुतः अवहट्ट और आधुनिक बोलियों के साहित्य का युग है; राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से इस युग का प्रतिनिधित्व नई बोलियों का साहित्य करता है न कि अपभ्रंश का ! राजनीतिक संदर्भ में यह भारतीय इतिहास का राजपूत युग है: जिस प्रकार आर्य और आर्येतर प्रजानों के संगम में संस्कृत परिष्कृत होकर अभिव्यक्ति का माध्यम बनी; बुद्ध और महावीर की क्रांति से पालि और प्राकृतों को मान्यता मिली उसी प्रकार; हर्पोत्तरकालीन राजनीतिक उयलपुथल में अपभ्रंश महत्व पा गई । सुदीर्घ शासन (६०६ से ६४८) करने के बाद सम्राट हर्प का जब निधन हुआ तो देश टुकड़ों में बँट गया। अगले सौ वर्ष का समय अराजकता और राजनीतिक अस्थिरता का युग था । ६४६ से ८३६ ईसवी तक, उत्तरी गंगा घाटी बाह्य अाक्रमण और आन्तरिक संघर्ष की भूमि बनी रही। हर्ष के निधन के कोई सौ साल बाद भारत में तीन महाशक्तियां अपनी स्वतन्य सत्ता स्थापित करने में सफल हो सकी-(i) दक्षिणापथ के राष्ट्रकूट (ii) राजपूताने के भिन्नमाल या श्रीमाल के गुर्जर प्रतिहार (iii) पूर्वी भारत का प्रसिद्ध पाल वंश। महोदयश्री (कन्नौज) को हथियाने के लिए इनमें कठोर संघर्ष हृया । अंत में प्रतिहारों ने उस पर कब्जा कर लिया। इस समय कन्नौज का वही महत्व था, जो मुगलकाल में इसके अतिरिक्त छोटी मोटी दूसरी राजनीतिक इकाइयां भी थी जैसे गुजरात के नानुगव, अजमेर के नौहान, चेदि के शासक, गहड़वाल के चंदेल और परमार, ग कान की दूसरी अप्रत्यागिन मिनु महत्वपूर्ण घटना है, अरब अाक्रमण ! ७११ ईगयों में मुहम्मद बिन कानिम की चढ़ाई में यह प्रक्रिया प्रारम्भ होती है और ११७८ में जानन्द के पतन के माथ ममाप्त । मालोजा युग के गजा प्रायः लहान होते थे। मल्लयुद्ध मे मिया अमली पपो मे गड मारना से विशेष प्रिय था। कला पोर विद्या के प्रति अनुराग गंदा भावना उपची. गजनीतिः नि, हामः लिग कि दिल्ली का ।
सम्बन्धों पर विशेप जोर दिया जाता था। सामाजिक स्थिति में परिवर्तन तेजी से हो रहा था। ब्राह्मण और किसान सेना में भरती होते थे । उच्च कुल की स्त्रियां शासन में भाग लेती थीं। राजन्यवर्ग और साधारणवर्ग के रहन-सहन में काफी अन्तर था। ऊँची शिक्षा के प्रवन्ध के उदाहरण मिलते हैं, परन्तु ग्राम्य स्तर पर शिक्षा की व्यवस्था का कोई उल्लेख नहीं है । व्यक्तिगत रूप से गांवों में पढ़ाई होती थी। दस्तकारी या अर्थकरी दूसरी विद्याएं, बेटा वाप से ही सीखता था । पुरानी धर्म साधनागों और देवी देवताओं की उपासना के साथ नये धार्मिक विचार भी विकसित हो रहे थे। इस नयी आस्तिक भक्ति चेतना का केन्द्र तमिल देश था। यह विचार चेतना शीघ्र सारे देश में फैल गयी। ऐसा लगता है कि साधनात्मक और वैराग्य प्रधावे प्राध्यात्मिक साधनाओं के विरुद्ध प्रवत्सात्मक शिव या विष्णु भक्ति का प्रचार करना इनका उद्देश्य था । १०वीं सदी से अासपास अंदार ने उनके गीतों का संकलन 'तैवारम' के नाम से किया जो तामिल शैव धर्म के लिए 'वेद' है। (६) नयी भक्ति फैलने के अघोलिखित कारण थे- (i) राज्याश्रय के कारण जनता में प्रचार (ii) जनभापा में गीतों की रचना (iii) शिव विष्णु के लोकोत्तर व्यक्तित्व द्वारा जनता में विश्वास की भावना पैदा करना (iv) सुन्दर रागों में गीतों को गाकर प्रचार करना । संदभित युग में उत्तर भारत की तुलना में दक्षिणभारत में धार्मिक विचार- धारामों का संघर्ष अधिक सनिय था। ये सारी विचारधाराएं भारतीय थीं। विष्णुमत की अपेक्षा शवमत अधिक सुगठित था। जैन धर्म और शैवमत में संघर्ष बौद्ध धर्म अवनति पर था । कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि ईसवी सदी ६३६ में अरव जहाज भारतीय समुद्र के किनारे पहुँचे । तव से अरव व्यापारियों का सम्बन्ध इस देश से रहा है; एक संदिग्ध धारणा यह भी है कि ईसाइयों का दक्षिण भारत में वसना इस समय तक प्रारम्भ हो गया था और इसलिए नई उठती हुई अद्ध तात्मक भक्ति, आत्मसमर्पण, सामाजिक समानता और गुरु की आवश्यकता पर जोर दिये जाने आदि बातों को उक्तधारणा मुस्लिम या ईसाई प्रभाव मानती है; परन्तु यह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टि से गलत है। साम्प्रदायिक मतभेद के वावजूद सहपिगुता का भाव था । मत-परिवर्तन वैवाहिक सम्बन्धों में बाधक नहीं था । धर्म की शक्ति बढ़ना न बढ़ना राज्य के आश्रय पर निर्भर करता था। यह युग मन्दिरों के ठाठ-बाट का युग था । अालोच्य युग के उत्तरार्ध में उग्र अध्यात्म, सिद्ध साधना हठयोग भक्ति आदि साधनाओं को था। - ६ था। 1 जड़ जम चुकी थीं। दार्शनिक चिंतन और साहित्य-साधना की दृष्टि से यह युग स्वर्णयुग. माना जा सकता है। संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंश के साथ द्रविड़ भाषाओं में भी साहित्य की रचना हुई। ८५० से १२०० तक तमिल भाषा का स्वर्णकाल उसके बाद कन्नड़ में साहित्य की रचना हुई। उसके बाद तेलुगु:का नम्बर प्रोता है । कुल मिलाकर देखें तो 'गीत और प्रबन्ध' काव्य इस युग को विशेषता है । (७)अपभ्रंश साहित्य के प्रेरणा स्रोतों को देखना चाहिए उन कारणों में जो राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में गिनाए हैं । इसमें संदेह नहीं कि अपनी प्रेरणा और उद्देश्य में अपभ्रंश साहित्य धार्मिक और पौराणिक है । फिर भी युग के शासकों के स्वभाव रुचि रीति नीति और धार्मिकवृत्ति आदि की झलक उसमें देखी जा सकती है। इतिहास और साहित्य-इस तथ्य से सहमत हैं कि इस युग में धर्म प्राडम्बरपूर्ण था । धर्म राज्य से विस्तार चाहता था और राज्य धर्म से शक्ति । साधारणतया-अपभ्रंश साहित्य के दो युग हैं । पूर्व अपभ्रंश युग (स्वयम्भूत्तर); उत्तर अपभ्रंशयुग पुष्पदंत और उसके बाद । यह उल्लेख किया जा चुका है कि संस्कृत कवि बारण ने भाषा कवि ईसान का उल्लेख किया है जो अपभ्रश कवि था ! श्री राहुल सरहपाद को अपभ्रंश का प्रादि कवि मानते हैं। स्वयम्भू आठवीं और नवीं सदियों के मध्यबिन्दु पर हुए । उनके स्वयम्भूच्छंद में इस बात के प्रमाण हैं कि उनके बहुत पहले अपभ्रंश में कविता होने लगी थी; स्वयम्भूच्छंद में चतुर्मुख भाउरदेव शुद्धशील जिनदास अज्जदेव धुत्त छइल्ल विपढ्ढ और गोइन्द । इतना ही नहीं विषयवस्तु की दृष्टि से इसमें विभिन्नता है। इन अवतरणों में रामायण महाभारत रोमांस प्रकृतिचित्रण ग्रादि से सम्बन्धित विषय है। प्रतः स्वयम्भू और सरहपाद क्रमशः प्रवन्ध और मुक्तक काव्यधारा के इसी अर्थ में ग्रादि कवि हैं क्योंकि उनकी रचनाएँ उपलब्ध हैं। गोइन्द ने राधाकृष्ण की प्रणयलीला पर अवश्य कोई काव्य लिखा होगा; स्वयम्भूच्छंद में उद्धृत 'सव्य गोविउ जइवि जोएइ' पद हेमचंद्राचार्य ने अपने व्याकरण में दिया है । (६) विविधता के मान से अपना साहित्य सीमित है। विधागत विशेषता और खण्ड काव्य । जहाँ तक प्रवन्ध काव्य का सम्बन्ध है यह धारा परम्परागत पौराणिक काव्यों से प्रारम्भ हुई। बहुत सी प्रवृत्तियों में समानधर्मी होते हुए भी, • पुराण काव्य की तुलना में चरित काव्य की अपनी विशेषताएँ हैं, जैसे चरित काव्य में अप्राकृत तत्व का संकोच, वस्तु विकास में यथा संभव धारावाहिकता, धार्मिकता, लौकिकता और संक्षिप्तता। चरित काव्य और कथा काव्य एक ही बात है-और इनकी सबसे बड़ी विशेषता है लौकिक और शास्त्रीय परम्परा का समन्वय । चरित काव्य की अपनी टेकनीक है; गीततत्व युक्त द्विपदी के आधार पर छंद की लयात्मक "तुकान्त रचना; कड़वक की योजना, इसी टेकनीक के परिणाम हैं। वस्तु वर्णन को दृष्टि से काव्य समृद्ध है, विवाह गोकुल शबरबस्तियों कृष्णलीला स्वयम्बर और जल क्रीड़ा का वर्णन विशेष महत्व रखता है । रूप चित्रण में वे कवि वेजोड़ हैं, वह भी भाव के अनुरूप रूप चित्रण करने में । स्त्रियों की रूपात्मक प्रतिक्रिया भी ये खूब चिंत्रित करते हैं। प्रकृति चित्रण और अलंकार योजना भी इनमें मौलिकता को लिए हुए है। चरित काव्य की तुलना में पुराण काव्य एक प्रकार से चरित्रों का संग्रह ग्रन्थ है । इनमें काव्य और कथानक दोनों से संबंधित रूढ़ियाँ देखी जाती हैं । चरित काव्य की दो उपधाराएँ हैं चरित काव्य (धार्मिक) और रोमांटिक काव्य । चरित काव्यों की एक विशेषता यह है इनके अन्तर्गत गीति तत्व भी है। राम और कृष्ण के इतिवृत्त पर लिखित चरित काव्य की धाराएं अालोच्य काव्य में देखने परखने की वस्तु है। (९) खंड काव्य भी दो चार उपलब्ध हैं उदाहरण के लिए 'संदेश रासक' सुखान्त खण्डकाव्य है, कुछ अालोचक पहले इसे गीतिकाव्य मानते थे और अब कहते हैं कि वह क्षीणधर्मा प्रवन्धकाव्य है ? वस्तुतः इस काव्य में घटनाक्रम कम और प्रति- क्रिया अधिक है। मुक्तक काव्य की परिभापा के बारे में अभी तक यह कहा जाता रहा है कि उसे इतिवृत्तविहीन होना चाहिए ! परन्तु यह ठीक नहीं । मुक्तक का अर्थ है जो पूर्वापर संदर्भविहीन हो, वह अपने आप में मुक्त हो । अतः भावना के अतिरिक्त घटना या इतिवृत्त का खंड भी मुक्तक काव्य का विषय बन सकता है। संस्कृत पालोचक राजेश्वर ने इसका विस्तार से विवेचन किया है। अपभ्रंश में इतिवृत्तात्मक मुक्तकों के काफी उदाहरण मिलते हैं। गेयमुक्तकों से रूप में जो रचनाएँ मिलती हैं उनमें से अधिकांश गीतनृत्यात्मक रचनाएँ हैं। अपभ्रश में इतिवृत्तात्मक की परम्परा अधिक लोकप्रिय रही हैं, इसके अतिरिक्त कुछ गेयमुक्तक अपभ्रंश काव्यधारा के भीतर मिलते हैं। यह कहा जा चुका है कि अपभ्रंश प्रवन्ध काव्य के स्वरूप गठन में गीत के कई तत्वों को ले लिया गया है। मुक्तक के रूप में दोहा काव्य बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध है : जैसा कि पाठक देखेंगे कि यह प्राध्या- त्मिक और लोक दोनों रूप में उपलब्ध है। गहराई से देखने पर यह साफ जायगा . और खण्ड काव्य । जहाँ तक प्रवन्ध काव्य का सम्बन्ध है यह धारा परम्परागत पौराणिक काव्यों से प्रारम्भ हुई। बहुत सी प्रवृत्तियों में समानधर्मी होते हुए भी, · पुराण काव्य की तुलना में चरित काव्य की अपनी विशेषताएं हैं, जैसे चरित काव्य में अप्राकृत तत्व का संकोच, वस्तु विकास में यथा संभव धारावाहिकता, धार्मिकता, लौकिकता और संक्षिप्तता। चरित काव्य और कथा काव्य एक ही बात है और इनकी सबसे बड़ी विशेपता है लौकिक और शास्त्रीय परम्परा का समन्वय । चरित काव्य की अपनी टेकनीक है; गीततत्व युक्त द्विपदी के आधार पर छंद की लयात्मक "तुकान्त रचना; कड़वक की योजना, इसी टेकनीक के परिणाम हैं। वस्तु वर्णन को दृष्टि से काव्य समृद्ध है, विवाह गोकुल शवरबस्तियों कृष्णलीला स्वयम्बर और जल क्रीड़ा का वर्णन विशेष महत्व रखता है । रूप चित्रण में वे कवि वेजोड़ हैं, वह भी भाव के अनुरूप रूप चित्रण करने में । स्त्रियों की रूपात्मक प्रतिक्रिया भी ये खूब चिंत्रित करते हैं। प्रकृति चित्रण और अलंकार योजना भी इनमें मौलिकता को लिए हुए है। चरित काव्य की तुलना में पुराण काव्य एक प्रकार से चरित्रों का संग्रह ग्रन्थ है। इनमें काव्य और कथानक दोनों से संबंधित रूढ़ियाँ देखी जाती हैं। चरित काव्य की दो उपधाराएँ हैं चरित काव्य (धार्मिक) और रोमांटिक काव्य । चरित काव्यों की एक विशेपता यह है इनके अन्तर्गत गीति तत्व भी है । राम और कृष्ण के इतिवृत्त पर लिखित चरित काव्य की धाराएँ अालोच्य काव्य में देखने परखने की वस्तु है। (६) खंड काव्य भी दो चार उपलब्ध हैं उदाहरण के लिए 'संदेश रासक' सुखान्त खण्डकाव्य है, कुछ अालोचक पहले इसे गीतिकाव्य मानते थे और अब कहते हूँ कि वह क्षीणधर्मा प्रवन्धकाव्य है ? वस्तुतः इस काव्य में घटनाक्रम कम और प्रति- क्रिया अधिक है। मुक्तक काव्य की परिभाषा के बारे में अभी तक यह कहा जाता रहा है कि उसे इतिवृत्तविहीन होना चाहिए ! परन्तु यह ठीक नहीं। मुक्तक का अर्थ है जो पूर्वापर संदर्भविहीन हो, वह अपने प्राप में मुक्त हो । अतः भावना के अतिरिक्त घटना या इतिवृत्त का खंड भी मुक्तक काव्य का विषय बन सकता है.। संस्कृत अालोचक राजेश्वर ने इसका विस्तार से विवेचन किया है। अपभ्रश में इतिवृत्तात्मक मुक्तकों के काफी उदाहरण मिलते हैं। गेयमुक्तकों से रूप में जो रचनाएँ मिलती हैं उनमें से अधिकांश गीतनृत्यात्मक रचनाएं हैं। अपभ्रंश में इतिवृत्तात्मक की परम्परा अधिक लोकप्रिय रही हैं, इसके अतिरिक्त कुछ गेयमुक्तक अपभ्रश काव्यधारा के भीतर मिलते हैं। यह कहा जा चुका है कि अपभ्रंश प्रवन्ध काव्य के स्वरूप गठन में गीत के कई तत्वों को ले लिया गया है। मुक्तक के रूप में दोहा काव्य बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध है : जना कि पाठक देखेंगे कि यह प्राध्या- त्मिक और लोक दोनों रूप में उपलब्ध है। गहराई से देखने पर यह साफ हो जायगा (२६) यालाच्य साहित्य समाज प्रारमगात का जापिय प्रारत है वह यथार्थ से अधिक दूर नहीं है । भारतीय जीवन का यह यथार्थ क्या है ? यह यथार्थ है कि भारत में प्राध्यात्मिक विचारधारागों में जितने परिवर्तन हुए, उतने समाज व्यवस्था और प्रार्थिक जीवन में नहीं। इसलिए पालोच्य साहित्य में युगीन समाज का जो चित्र अंकित है वह इतना रूढ़ है कि किसी भी युग के बारे में 'फिट' किया जा सकता है ? उदाहरण के लिए अपभ्रंश कवियों ने कलियुग का जो चिय स्वींचा है वह तुलसीदास के कलियुगीन चित्र से बहुत कुछ मिलता-जुलता है इसका कारण है कि मध्ययुग में भारतीय समाज के मूल्यों में जो ठहराव पा गया था, उसने अपनी सीमाएं और अभिव्यक्तियां एकदम स्थिर कर ली थी। यथार्थवादीकोण से देखा जाय तो पालोच्य साहित्य में राजन्य वर्ग और घोष्ठि वर्ग का बोलवाला है; दूसरा कोई वर्ग है, तो दरिद्र गरीब निम्न निम्नवर्गीय जनता--जो अपने ही पाप, कर्मों से अभिशप्त जीवन विताने के लिए विवश है । संयुक्त परिवार के शीतयुद्ध, बहुपत्नी प्रथा, राजनैतिक युद्ध, कन्यापहरण स्त्रियों की दयनीय स्थिति का वास्तविक चित्रण इस साहित्य में है। समाज जाति उपजातियों और कुरीतियों में बँट फैस .
है उस युग चुका था। राज समाज-विशेष रौव दीव रखता था । जुना और मल्लयुद्ध विशेप पसन्द किये जाते थे। हिंसक पूजाविवान भी थे। भक्ति का उदय हो रहा था तन्त्र मन्त्र की भी पाक थी । सवसे बड़ी बात तो यह है कि चीजों में मिलावट में भी होती थी। दार्शनिक वरविरोध भी अपने उग्रतम विन्दु पर था । धर्म आडम्बरपूर्ण था, साधना से अधिक वह प्रदर्शन की वस्तु था । इस प्रकार, इस साहित्य की सबसे बड़ी देन यह है कि उसमें काव्य की शास्त्रीय और लौकिक परम्परात्रों का निभाव है, पुरानी और नयी काव्य विधाओं के बीच एक सेतु है और यह कि उसने युग की चिंता, भापा काव्य रूप और अन्य सावनाओं का, धूमिल पर तथ्यपूर्ण चित्र हमें दिया है। चाहे हम यह न जाने कि भारतीय साहित्य का उद्गम, आदर्श की किस गंगोत्री या यथार्थ की चट्टान से हुआ, पर यह हम जानते हैं कि वह जो अपनी नाना धारामों में वहता है, वह इसी अपभ्रश के धरातल से ।
११ महाकवि पुष्पदंत अपभ्रंश काव्य का सबसे निराला और प्रतिभासम्पन्न हस्ताक्षर । कश्यप- गोत्रीय ब्राह्मण । पिता केशवभट्ट और माँ मुग्धा देवी । शैव धर्म छोड़कर जैन धर्म में दीक्षित । एकान्तप्रेमी, उन और भावुक । पंडितों में विवाद है कि वह दक्षिण के थे या उत्तर के। प्राचीन कवियों के बारे में, इस प्रकार के विवाद अर्थहीन हैं । क्योंकि ये कवि किसी प्रान्त के कवि नहीं थे, अपभ्रंश एक व्यापक काव्यभापा थी, उसमें किसी भी प्रांत का कवि लिख सकता था यह कहना भी गलत है कि 'पुष्पदंत' के काव्य में द्रविड़ भाषा के शब्द नहीं हैं। अन्तः और वाह्य साक्ष्यों से यह सिद्ध है कि पुष्पदंत ईसा की दसवीं सदी में हुए और प्रसिद्ध राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण ३ के सम- कालीन थे। कृष्ण ने चोलराज पर विजय प्राप्त की थी। पुष्पदंत ने भी इसका उल्लेख किया है "तोड़ेप्पणु चोडहो तणउ सीसु" । महापुराण और दूसरी कृतियाँ रचने की कहानी स्वयं कवि के शब्दों में यह है, "एक साँझ वह थका मादा 'मलखेड' (मान्यखेट) राष्ट्रकूट राज्य की राजधानी पहुँचता है (शक् सं० ८६६); वहाँ मन्त्री भरत से उसकी भेंट होती है, उसी के अनुरोध पर कवि पुराण रचना में लगता है। बीच-बीच में-उसका मन उदास हो उठता, परन्तु मन्त्री भरत उसे मना लेते ।" एक जगह कवि लिखता है कि पहले मैंने भैरव नामक शैव राजा की प्रशंसा की थी, उससे उत्पन्न मिथ्यात्व को धोने के लिए मैं इस काम में लगा। वह कहता है-लो भरत, तुम्हारी अभ्यर्थना पर मैं जिनगुणों से भरित कविता करता हूँ; धन के लिए नहीं; केवल तुम्हारे अकारण स्नेह के कारण, जिनपद भक्ति से मेरा कवित्व वैसे ही फूट पड़ता है, जैसे आम के दौरों पर, मधुमास में कोयल कूक उठती है; कानन में भ्रमर गूजने लगते हैं और शुक सुख से भर उठता है कवि सरस्वती की वंदना के संदर्भ में जो कुछ कहता है उससे उसकी काव्य सम्बन्धी मान्यताएँ जानी जा सकती हैं; भापा प्रसन्न और गम्भीर; छंद और अलंकार काव्य की गति और शोभा हैं । कवि ने वार-बार अलंकृता और रसभरी कथा की उपमा दी है; वह काव्य में सबसे बड़ी वस्तु गहन अनुभूति को मानता है । कवि का वरेलू नाम 'खण्ड' 'खण्डू जो' था। उनके साहित्यिक नाम थे अभिमानचिन्ह, कविकुलतिलक, सरस्वतीनिलय, काव्यपिसल्ल आदि । उनके व्यक्तित्व में विरोधी बातों का विचित्र सम्मिलन था । एक ओर वह अपने को कुक्षि मूर्ख कहते हैं और दूसरी ओर ताव में प्राकर सरस्वती को यह चुनौती भी देते हैं कि वह जायगी कहाँ ? अपनी इस विरोधी प्रकृति के कारण, उन्होंने विरोधाभास और श्लिष्ट शैली का अधिक प्रयोग किया है। उनके काव्य में श्लिष्ट सरल, समस्त व्यस्त, सभी प्रकार की शैलियाँ प्रयुक्त हैं; दर्शन और अनुभूति का मुन्दर समन्वय है। मात्रिक और वगिक छंदों का कृत्रिम भेद इन्होंने अपने काव्य में दूर कर दिया है। महापुराण, जसहर चरिउ, और गाय कुमार चरिउ उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं।
कवि धाहिल 'पउम सिरि चरिउ' के रचयिता श्री धाहिल-अपने को संस्कृत महाकवि बाघ का वंशज मानते हैं। वह श्रीमाल वंशीय गुर्जर वैश्य थे। पिता का नाम पार्व पौर माता का महासती सुराइ। कवि के व्यक्तिगत जीवन की कुछ भी जानकारी नहीं मिलती। अनुमानतः वह १०वीं के अासपास हुए। 'पउम सिरि चरिउ' छोटी रचना होते हुए भी-धाहिल के कवि होने का अहसास ही नहीं कराती-वल्कि पाठक के अन्तर्मन पर एक छाप छोड़ती है। धाहिल ने प्रस्तावना में स्वीकार किया है कि महासती दुर्लभा की प्रेरणा से इस काव्य की रचना की गई। कवि की वर्णन -क्षमता, भापाशक्ति और प्रकृति के रंग में मानवी भावनाओं के उतार-चढ़ाव को रंग देने में जो सफलता मिली है वह वहुत कम कवियों को मिल सकी है। 'पउम सिरि चरिउ' की रचना का केन्द्रीय उद्देश्य जैन कर्म सिद्धांत का परिपाक दिखाना है। कथावस्तु, सम्मिलित जैन परिवार से सम्बन्धित है शैली रम्य और रोचक है, कवि के शब्दों में : 'मैंने ललित शब्दों में अर्थसार दिया है, और मेरा काव्य तरुणी- जन की तरह बहुविकार वाला है ।” कवि का महत्व यह नहीं है कि वह पारिवारिक समस्या का धार्मिक हल खोजने का प्रयास करता है; वरन्, यह है कि समस्या को रखते समय, वह मनुष्य स्वभाव का यथार्थवादी दृष्टि से चित्रण करता है । एक धनी परि- वार में विधवा लड़की की स्थिति का, गृह कलह, घरेलू कूटनीति, और नारी की स्थिति का चित्रण करता है, तो दूसरी ओर, वियोगिनी पद्मश्री को वियोग व्यंजना में प्रकृति का तादात्म्य भी दिखाता है। घाहिल का नाम दिव्य दृष्टि उचित था। उसे मनुष्य की अन्तर्भावनाओं को अच्छी पकड़ थी। वह अपनी कथा को 'कर्ण-रसायन' धर्मकथा कहता है। 'पउम सिरि चरिउ' में पद्मश्री के दो दो जन्मों की कहानी है, एक जन्म में वह जो बोती है, दूसरे जन्म में, वही करती है। पहले जन्म में वह धनश्री है और असमय में विधवा हो जाने पर अपने भाइयों के पास रहती है, वह घर की मालकिन है और कुछ भी करने के लिए स्वतन्त्र है । वह सोचती है कहीं भाभियां मेरे खिलाफ भाइयों के कान न भर दें जिससे मेरे दान पुण्य पर अंकुश लग जाय । वह अपना रंग गाठना चाहती है। बारी बारी से दोनों भाभियों को क्रमशः शील पालने और चोरी न करने का ऐसा कपट-उपदेश देती है कि भाई समझते हैं कि उनकी पत्नियां ऐसी हैं; वे उन्हें पीटते हैं, बाद में धनश्री भाइयों से कहती है कि- “मैं तो उपदेश दे रही थी तुम सच मान बैठे ।' वह उनका मेल करा देती है। इस प्रकार उसका रौब बढ़ता है । भाभियां उसकी गुलाम हैं। दूसरे जन्म में-वह पद्मश्री बनती है और न केवल पति वियोग उसे राहना पड़ता है; वरन् कुगील और चोरी का कलंक भी, अन्त में तप फर मुक्ति प्राप्त करती है । . - १४ अब्दुलरहमान (अद्दहमान) 'संदेश रासक' की उत्थानिका के अनुसार, वह, पश्चिम देश मे म्लेच्छ देश के मीरसेन नामक जुलाहा के घर के कुलकमल थे। यह प्राकृतकाव्य और गीत विपयों में विशेष प्रसिद्ध था। ग्लेच्छ देश रो कवि का अभिप्राय, पश्चिमी भारत की किसी मुसलमान बस्ती रो है क्योंकि उस समय तक मुसलमान सिंध पर कब्जा कर चुके थे । ऐतिहासिक तथ्यों के सन्दर्भ में, शहाबुदीन गोरो के अभ्युदय की पूर्व संध्या में इनका जन्म हुअा था । डॉ० हजारीप्रसाद का विचार है कि अब्दुल रहमान के पिता गेरसेन मुसलमानी धर्म अंगीकार कर, पश्चिम से पूर्व भारत में चले पाये थे; वही अब्दुल रहमान का जन्म हुग्रा । ऐसा उन्होंने 'पारद्ध पच्चाएसि अद्धहमाण और मिच्छ' शब्दों के अर्थ को खींचतान पर से किया है। द्विवेदी जी का विचार इसीलिए मान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि समूची रचना में पूर्वीपन कहीं भी नहीं है । इसमें संदेह नहीं कि 'संदेश रासक' की रचना मध्यम श्रेणी के पाठक के लिए है, जो मुक्तक शृंगार को अधिक पसन्द करते थे। कवि की वर्णन पद्धति कहीं-कहीं शास्त्रीय है अतः उसे विशुद्ध लोक कवि स्वीकार नहीं किया जा सकता। कवि रहमान का सबसे बड़ा महत्व यह है कि वह संधिकाल में जन्में, मुसल- मान होकर भी अपभ्रश में लिखने वाले वह प्रथम मुसलमान कवि हैं। उनकी काव्य रचना के माध्यम भारतीय हैं । उसमें साहित्यिकता और लौकिकता का सुन्दर मेल है। प्रकृति का उद्दीपक चित्रण है कुछ सूक्तियां भी हैं। उनका प्रेम सांसारिक और सम है। 'संदेश रासक'-वस्तुतः एक सुखांत विप्रलंभ काव्य है। यह एक प्रतिक्रिया- त्मक काव्य है जिसमें विक्रमपुर की एक वियोगिनी, एक पथिक से अपने विरह के उद्गार व्यक्त करती है। पथिक से कहने का अर्थ यह है क्योंकि वह एक लेख पत्र लेकर, मुलतान से खंभायत जा रहा था। तीन प्रकाश के खंड काव्य में भी कथा की काव्य की रूढ़ियों का परिपालन है। संदेश कथन से अधिक उसमें प्रतिक्रिया अधिक है, बीच-बीच में वह उद्धरण भी देती है। डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी-रासक होने से गेय समझते हैं (हिन्दी सात्यि)। 'रासक' नाम को लेकर हिन्दी आलोचकों के मन में इस प्रकार की विधा वाले काव्यों की जो भ्रांत धारणा घर कर चुकी है, यह उसी का परिणाम है। अब्दुर्ररहमान यदि पूर्व के होते, तो उनकी भाषा में कुछ पूर्वीपन होता। संदेश रासक का वातावरण भारतीय है, उसमें विदेशी प्रभाव कुछ भी नहीं है, उनकी अपभ्रश पश्चिमी अपभ्रंश है। जिस रूप में 'संदेश रासक' है- उसमें उसका महत्व कम नहीं होता। वह एक ऐसे मुसलमान कवि की रचना है, जिसने हाल ही में धर्म परिवर्तन किया होगा, इसमें शुद्ध रोमांस है; लोकोक्तियों के साथ, ऊहात्मक उक्तियाँ भी है; प्रकृति चित्रण में जीवन के नित्य व्यापारों का समावेश हैं। पर है यह 'पाठ्य काव्य' ही।
१५ सरहपाद 'सरहपाद' नई भापायों और छंदों के युग के आदि कवि हैं, संत सिद्ध परम्परा के प्रादि सिद्ध होकर भी प्राध्यात्मिक तौर पर वह नई दिशा देने वाले हैं; उन्हें द्वितीय बौद्ध कहकर लोग अतिशयोक्ति से काम नहीं लेते।" यह कथन है स्व० महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन का। इससे स्पष्ट है कि सरहपाद का व्यक्तित्व असाधारण व्यक्तित्व था। कहा जाता है कि पूर्वीप्रदेश के किसी राज्ञा कसवे में एक ब्राह्मण परिवार में उन्होंने जन्म लिया । यह कहना कठिन है कि वह परिवार बौद्ध था या ब्राह्मण । सरहपाद स्पष्टत: जातिवाद और साम्प्रदायिक कट्टरता के घोर विरोधी थे। वह पाठवीं सदी के उत्तरार्ध के सबसे प्रवल व्यक्तित्व के व्यक्ति थे। सरहपाद के थे-हरिभद्र, जो प्रसिद्ध पालवंशी राजा धर्मपाल (७७०-८१३) के समकालीन थे। राजा धर्मपाल के अन्तिम समय शवरपाद के शिष्य लुईपाद के प्रमुख शिष्य के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था। वह धर्मपाल का सचिव था और उन्हीं की अनुमति से उसने घर-बार छोड़ा था। इनसे सिद्ध है कि सरहपाद उससे दो पीढ़ी पहले चल बसे होंगे । इस प्रकार उनकी असाधारणप्रवृत्तियों का काल पाठवीं सदी का उत्तरार्ध ठहरता है। सरहपाद, का पहला नाम राहुलभद्र था और तब वह नालंदा विश्वविद्यालय में थे; वज्रयान के प्रथम सिद्ध होने के कारण वह सरहपाद कहलाए। इनके पहले इस परम्परा में कई सिद्ध हो चुके थे परन्तु सरह ने सिद्ध विचाराधारा को एक नया मोड़ दिया। उनके समय नालंदा में दूसरी धाराओं के साथ अशोक के समय की विनय परम्परा भी थी जिसमें भिक्षु को स्त्री छूना वजित था, वह मद्यपान नहीं कर सकता था, शरीर पर चीवर पहनना पड़ता था ।" राहुल ने इसका खुला विद्रोह किया, उन्होंने एक शरकार की कन्या को रख लिया। वह, महाशूद्रा (शरकार कन्या) के साथ खुलेआम घूमते थे । सरहपाद ने ध्यान के साथ करुणा पर जोर दिया। करुणा के विना ध्यान (शून्यता-योग) व्यर्थ है । उनको अपनश रचनाओं को दोहा कोश या दोहागीति कहते हैं। उनकी प्रसिद्ध रचना दोहा चर्या गोति' में दोहों की अपेक्षा चौपाइयाँ अधिक हैं। सांकृत्यायन के अनुसार 'दोहा कोश' का उस समय अर्थ था 'दो पंक्ति वाले छंदों की कविता।' 'सात दोहा कोश-सिद्धचर्या पोर वज्रयानो योग का वेद माने जाते सरह की कविता में उलटवारियाँ और व्यंग्योक्तियाँ हैं । असाधारण प्रतिभा वाले इस महाकवि की कविता का संग्रह इनके शिष्यों ने किया। सरह मूलतः रहस्यवादी कवि हैं और उनके श्लिप्ट पदों में--प्राध्यात्मिकता के साथ कामुकता भी प्रकट होती है, बाद में इस प्रकार को गाविता वामाचार में सहायक हुई। एक उदाहरण है:
योगीन्द्र (जोइन्दु) - शांत, उदार और विशुद्ध अध्यात्मवादी कवि थे। इन्होंने अपने विषय में कुछ नहीं लिखा, जोइन्दु के समय के बारे में भी मतभेद है। कुछ विद्वान इन्हें ई० पू० सदी का मानते हैं जब कि कुछ ईसवी छठी सदी का और यह मानने का मुख्य कारण है जोइन्दु के एक दोहे 'काल लहेप्पिणु' का चंड के 'प्राकृत लक्षण' में उद्धृत होना । चूंकि चंड सातवीं के उत्तरार्ध में हुए-अतः जोइन्दु को इसके पूर्व होना चाहिए । परन्तु भाषा के विचार से जोइन्दू का समय, प्रस्तावित समय से बाद में होना चाहिए, जो भी हो अपभ्रंश के विशुद्ध अध्यात्मवादियों में जोइन्दु सबसे पुराने हैं; उनकी रचनाएं उनकी प्राध्यात्मिक अनुभूतियों की अभिव्यक्तियाँ हैं; एक विशुद्ध अध्यात्मवाद के एक छोर पर जोइन्दु हैं और दूसरे पर सरहपाद । जोइन्दु वाह्य आडम्बर के घोर विरोधी हैं, वह पारिभाषिक शब्दों का अध्यात्मपरक अर्थ करते हैं । "परमात्म प्रकाश" और "योगसार" इनके प्रामाणिक उपलब्ध ग्रन्थ हैं। , मुनि रामसिंह जोइन्दु की परम्परा के हैं। यह भावुक और उग्र अध्यात्मवादी थे । इनका अनुमानित समय १०वीं और ११वीं के मध्य है । शैव धर्म और तांत्रिक पारिभाषिक शब्दों का इन्होंने खुलकर प्रयोग किया है। रूढ़ियों, धार्मिक आडम्बर और पाखंड के यह कटु आलोचक थे। अपभ्रंश साहित्य के कुछ समीक्षक इस धारा को जैन रहस्य- वादी धारा कहते हैं। असल में भारतीय चिंताधारा के विकास के बारे में जो 'थीसिसें' प्रस्तुत की जाती रही हैं, वे ही गलत हैं । वह एक ही चिन्ता का स्वाभाविक विकास न होकर नाना चिन्ता प्रतिचिन्ता की क्रिया-प्रतिक्रिया का परिणाम है । ऐसा समझा जाता है कि रामसिंह राजस्थानी थे परन्तु विशुद्ध अध्यात्मवादी कहीं के नहीं होते। विशुद्ध प्राध्यात्मवाद का एक रूप उपनिषदों में देखा जा सकता है, परन्तु उसमें चिंतन प्रबल है जबकि मध्ययुगीन अध्यात्मवाद में अनुभूति । 'पाहुड़ दोहा' का अर्थ है-'दोहों का उपहार' या दोहों में प्रतिपादित प्राध्यात्मिक विचार। इसमें शैलियाँ है उपदेश, अन्योक्ति और प्रतीक । और समग्र प्रतिपाद्य है अनुभूति के माध्यम से प्रात्मा का साक्षात्कार करना। हिन्दी के कुछ विद्वान 'पालोच्य युग' को अंतर्विरोधों का युग मानते हैं और कुछ दो विरोधी काव्य प्रवृत्तियों का । कुछ इसमें दो संस्कृतियों १८ के मिला गा गुग मानते है। मेरे विनार गाः, सो व्यवमानों गा गंग्गृतियों गे: संग ना गुग ग सोगार-योगिोगों में गंग का प्रयोग गाय ।। या गंधा विगी भी संस्कृति और किसी भी युग में गाय । गदर परवर्ती संतव्य साधना के संदर्भ में-विशुद्ध अध्यात्मवादियों का प्रदेश यह है कि उन्होंने पालोनगातगक दृष्टि- कोण दिया, परलोक की बजाय जीवन में मुगिता की कल्पना की; पागक्ति से ऊपर उठने गा घरग तमागा दिखाया, प्रात्मा-परमात्मा के मिलन के लिए प्रेमी प्रेयसी की कल्पना को, सम्प्रदायवाद घोर धार्मिग प्रावम्बरों का गुला विरोध किया । - देवसेन असली सवयधम्म दोहहाकार कौन है ? यह निर्णय नहीं किया सकता । कुछ विद्वान इसका लेखक देवसेन को मानते हैं जव कि कुछ लक्ष्मीचन्द्र को। देवसेन- जैसा कि कृति के नाम से ही जाना जा सकता है कि श्रावक धर्म का उल्लेख करते हैं। वह धर्म के प्राचरण पक्ष के कवि हैं और धर्म का उद्देश्य, उनके लिए लौकिक समृद्धि और प्रेयता प्राप्त करना है। यही कारण है कि पुण्य और दान का बड़ा अाकर्षक महत्व उन्होंने प्रतिपादित किया है।
दोहा कोश-गीति सिद्ध सरहपाद सरह भणइ जग वाहिय आलें । णित्र सहाव ण लक्खिअ दालें ॥ करुणा सहित भावना अहवा करुणा केवल साहअ । सो जमन्तरे मोक्ख ण पावत्र ।। जइ पुण वेण्णवि जो जण साक्का । णउ भव णउ णित्र्याणे थाक्कथ ॥२॥ जइ पच्चक्ख कि भाणे कीअइ । अहवा भाण अन्धार साधिअ॥ सरह भणइ मइ कढि राव । सहज सहाउ गउ भावाभात्र ॥३॥ चित्त चित्तेक चित्त सअल बीय भव-णित्राण जम्म विफुरति । तं चिन्तामणिरूअं पणमह इच्छाफलन्देइ ||४|| वझइ कम्मेण जणो कम्मविमुक्केण होइ मणमुक्को । मणमोक्खेण अणुअरं पाविन्जइ परम (णि) वाणें ॥५!! १. सरह कहते हैं कि दुनिया भूमें वह रही । मूर्ख अपना स्वभाव नहीं जानता। २. जो केवल करुणा की साधना करता है वह जन्मांतर में भी सुख नहीं पाता। जो जन दोनों को साध सकता है, वह न निर्वाण में थकता है, और न संसार में । ३. यदि वह प्रत्यक्ष है तो ध्यान से क्या करिए ! अथवा व्यानांधकार को साविए। सरह कहते हैं मैं पुकार कर कहता हूं कि सहज स्वभाव न भावरूप है न प्रभाव रूप। ४. चित्त एक है, वह सबका कारण है; जन्म और निर्वाण दोनों उसमें चमकते हैं । इच्छाफल स्वल्प उसे नमन करो, व इच्छाफल देता है । कर्म मे जन बंधता है, कर्ममुक्त होने पर, मन मुक्त होता है; और मन को मुक्ति से ही पाता है जन मोक्ष ! ५.
२० अवखर बाड़ा सवाल जगु, नादि गिरवखर कोइ । ताव ताबसे प्रकवर घोलिग्रह, जाब गिरवर छोड़ ||६|| बद्धो धावः दस दिमदि, म्गुषको गिचचल हाय। एमइ करहा पेक्ख सहि, विवरिय मा पडिहाय ॥७॥ परमपद इन्दी जत्थ विलीय गठ, पाट्टो अप्प सहाय । सो हले सहजानन्द तणु, फुड पुच्छह गुरु पाव III जहि म्मण मरइ, पवणद्दो तहि खय जाइ। एहु सो परममहासुह, सरह कहिहउ जाइ || शिअ मण साच्चे सोहि जव्यें । गुरु-गुण हिअहि म्पइसइ तव्ये ॥ एव मुणेवि गु सरहें गाइव । मन्त ण तन्त ण एक्कवि गाहिब ||१०|| सइज महासुख गुरु-वअण-अमिअ-रस, धवहिं ण पिविअउ जेहिं। बहु-सात्थात्थ-मरुत्थलिहिं, तिसिअ मरियो त्तेहिं ।।११|| जिम लोण विलिज्जइ पाणिएहिं, तिम जइ चित्तवि हाइ । अप्पा दीसइ परहिं सम, तत्थ समाहिए काइ ॥१२॥ ६. ७. जग में अक्षर वढ़ा हुआ, निरक्षर कोई नहीं है; अक्षरों को तब मिटाइए जबकि निरक्षर न हो जाय । जहाँ इन्द्रिय विलीन है । प्रात्म स्वभाव नष्ट है, वहां शरीर में सहजानंद है, उसे गुरु से पूछ लो। ६. जहाँ मन भर जाता है, पवन भी नष्ट होता हैं; वही परम महासुख है; सरह यह कहता है। .१०. सच्चाई से अपने मन को शुद्ध करो। गुरु के गुणों को हृदय में प्रवेश दो । मन को ऐसा बना लो, सरह गाता है कि दूसरा मंत्र तंत्र कुछ भी नहीं है । ११. गुरुवचन के अमृत रस को जिसने दौड़कर नहीं पिया, वह बहुत से शास्त्रार्थों के मरुस्थल में प्यासा ही मरा । १२. जिस प्रकार नमक पानी में मिल जाता है, उसी प्रकार यदि चित्त मिल जाय तब आत्मा पर के समान दिखाई देने लगती है, फिर समाधि से क्या ?
२१ . परमपद जहि मण पवण ण संचरइ, रवि-ससि णाहिं पवेस । तहिं बढ़ चित्त विसाम करु, सर हे कहिअ उएस ।।१३।। एक्क करु मा वेरिण करु, मा करु विरिण विसेस । एक्के रंगें रजिआ, तिहुअण सअलासेस ॥१४॥ अग्गे पच्छे दसदिसें, जं जं जोअमि सोवि । ऐव्वें तु दीठन्तडी, णाह ण पुच्छमि कोवि ॥१५॥ अप्पा परहिं ण मेलविउ, गमणागमण ण भागग । तुस कुटुंते काल गउ, चाउल हत्थ ण लाग्ग ।।१६।। शून्यता सुरणावि अप्पा सुण्ण जगु, घर-घरें एहु अक्खाण । तरुअर-मूल ण जाणिश्रा, सरहे हिं किस वक्खाण ॥१७॥ जइ रसाअलु पइसरहु, अह दुग्गमहु आआस । भिएणा आर मुण तुह, कह मोक्ख-हब्बासु ॥१८॥ भोग में योग चित्ताचित्त त्रि परिहरहु, तिम अच्छहु जिमवाल । गुरु-वअणेंदिढ भत्ति करु, होइहइ सहज उल्लाल ।।१६।। १३. १४. १५. जहाँ मन और पवन का संचार नहीं, रवि चन्द्र का प्रवेश नहीं। मूर्ख वहाँ विश्राम कर । सरह ने यही उपदेश दिया है। एक से लौ लगा, दो से नहीं; दो विशेष मत कर । एक ही रंग में रंगा है अशेष त्रिभुवन । आगे पीछे दस दिशाओं में, जहाँ जहाँ देखता हूँ वही है; तुम्हें इस प्रकार देख लेने पर; अब मुझे किसी से नहीं पूछना । अपना परायापन छोड़ा नहीं; आवागमन भी रोका नहीं; तुस कूटते समय गया, चावल हाथ नहीं लगा। आत्मा शून्य, जग भी सुना, घर-घर यही ग्राख्यान है; तरुवर के मूल को जाना नहीं : सरह खुले प्राम यह कहता है । यदि रसातल जानो या दुर्गम आकाश में । तुम्हारा मन भिन्नाकार है मोक्ष किस प्रकार हो ! चित्त अचित्त को भी छोड़ो, बालक की तरह रहो; गुरु के वचन में भक्ति करो सहज प्रकाश हो जायगा। १७. १६.
२२ ताव कि जाव ण अप्पर पर परियाणसि । देहाणुत्तर पावसि ॥ एमइ कहिउ भान्ति ण भावा । अप्पउ अप्पा बुज्झहि तावा ॥२०॥ विसथ रमन्ते ण विसअहिं लिप्पइ । उअल हरन्ते ण पासुीच्छप्पइ ॥ एमइ जोइ मूल सगत्तो । विसश्रण बाज्झइ विसअरमन्तो ।।२।। पंडिल सबल सत्थ वखाण । देहहिं बुद्ध वसन्त ण जाअण ।। अमणागमण ण एक्क वि खाण्डिअ। तउ णिलज्ज भणइ हउं पाण्डिअ ।।२२।। सपज-अवस्था जत्तई चित्तहु विफुरइ, तत्तइ णाहु सरूअ । अण्ण तरंग कि अण्ण जलु, भव-सम ख-सम सरूप ॥२३॥ ण तम वाएं गुरु कहइ, उ तं बुज्झइ सीस । सहज सहावा हलें अमिअरस, कासु कहिज्जइ कीस ||२४|| २०. जब तक नहीं जानते अपने पर को, तब तक क्या अनुत्तर देहा को पा सकता है ! ऐसा कहा गया है, इसमें भ्रांति नहीं; तब आत्मा अात्मा को पहचान लेता है। २१. २२. विपय का भोग करता है विषयों में लिप्त नहीं होता; कमल तोड़ता परन्तु पानी को नहीं छूता; इस प्रकार योगी मूल का सगोत्री है; विपय में रमता हुआ भी, उसमें आसक्त नहीं होता। पंडित सब शास्त्रों का व्याख्यान करता है परन्तु देह में बसते बुद्ध को नहीं जानता, इसी में आना जाना नहीं मिटा, फिर भी निर्लज्ज अपने को पंडित कहता है सहज-अवस्था--जब तक चित्त चमकता है तब तक स्वरूप नहीं जाना जा सकता; क्या तरंग अलग है और पानी अलग है; स्वरूप संसार और शून्य दोनों के समान है। न उसे गुरु वचन से कहता है और न ही शिष्य उसे समझ सकता है। हे सखी ! सहज स्वभाव अमृत रस है, वह किससे कहा जाय । । २३. २४.
२३ से जत्तइ पइसइ जलेंहि जलु, तत्तइ समरसु होइ । दोस गुणाअर चित्तता, बढ पडिवक्ख ण होइ ।।५।। रिद्धि-सिद्धि इलें वेरिण न काज्ज । पाप-पुण्ण तहिं पाडहु बाज्ज । सो अ ()गुत्तर वुज्झहिं जव्वें । सरह भणइ जग सिज्झइ तव्वें ॥२६॥ ऐहिकतावादी कोण एत्थु सरसइ सोवणाह, एथु से गङ्गासाअरु । वाराणसि पाग एथु, से चान्द-दिवाअरु ॥२७॥ खेत्त पिट्ठ उअपिट्ठ, एथु मइ भमित्र समिट्ठउ । देहासरिस तित्थ, मइ सुणउ ण दिट्ठउ ॥२८॥ जग उपपात्रणे दुक्ख बहु, उप्पएणउ तहिं सुहसार । उप्पण उपाय ण हिं, लोत्र ण जाणइ सार ॥२६॥ बुद्ध वि वअणे एत्तवि धम्म । लोआचारें एत्तवि कम्म । सअल तत्त सहावें देखह । लोआचार जे तहिं उएक्खह ॥३०॥ २५. जितना जल जल में समा जाता है, उतना ही समरस होना चाहिए; दोष और गुणों का आकर चित्त तव विपरीथ नहीं होता। २६. हे सखी, ऋद्धि और सिद्धि दोनों से काम नहीं। पाप पुण्य पर वज्र पड़े । वही अनुत्तर को समझ सकता है और वही तव सिद्ध हो सकता है-ऐसा कहते हैं। २७. यही (देह) सरस्वती है, यही सोमनाथ है, यही है वह गंगासागर; यही है वाराणसी और प्रयाग, चन्द्रमा और सूरज । २८. यह क्षेत्र, पीठ उपठीठ, मैं समाधि पर भटका। देह के समान तीर्थ, न मैंने देखा और न मैंने सुना । जग में उत्पन्न होने में बहुत दुःख है; उत्पन्न होने पर ही सुखसार हैं; उत्पन्न और उत्पाद कुछ नहीं है, दुनिया यह तत्व सार नहीं समझती । ३०. शब्दों में बाँध लो यही धर्म है, लोकाचार में यही कर्म है; जो समस्त तत्वों को अपने स्वभाव में देखता हैं, तब वह लोकाचार की उपेक्षा करता है । '२६.
पासें पास भमन्ते अच्छह । सरह भणअ तसु घरिणी णेच्छ अ॥ साह के खाद्धउ सअल जगु। सङ का ण केणवि खाद्ध ॥३६॥ ३६. पास पास रहते हुए घूमते हुए भी सरह कहते हैं, उस घरनी को नहीं चाहते । शंका ने ही सब जग खा लिया, शंका को कोई नहीं खा सका ।
२७ देउ ण - मेल्लिवि सयला अवक्खड़ी, जिय, णिञ्चितउ होइ । चित्तु णिवेसहि परम-पए, देउ णिरंजणु जोइ ॥७॥ जोइय, णिय-मणि णिम्मलए पर दीसइ संतु । अंबरि हिम्मलि धण-रहिर भाणु जि जेम फुरंतु ॥८॥ राए रंगिए हिंयवडए दीसइ संतु । दप्पणि मइलए बिबु जिम, अहउ जाणि णिभंतु || जहिं भावइ तहिं जाइ, जिय, जं भावइ करि तं-जि । केम्वहि मोक्खु ण अत्थि पर, चित्तहं सुद्धि ण जं-जि ॥१०।। सिद्धिहं केरा पंथडा, भाउ विसद्धउ एक्कु । जो तसु भावहं मुणि चलइ, सो किम होइ विमुक्कु ॥११॥ बुज्झइ सत्थई, तउ चरइ, पर परमत्थु ण वेइ। ताव रण मुचइ जाम णवि इहु परमत्थु मुणेइ ॥१२|| चेल्ला-चेल्ली-पेत्थियहिं तूसइ मूदु भिंतु । एयहिं लज्जइ णाणियउ बंधहं हेढ मुणंतु ॥१३॥ संता विसय जु परिहरइ, बलि किज्जलं हउं तासु । सो दइवेण जि मुडियउ, सीसु खडिल्लउ जासु ॥१४॥ मोक्खु म चिंतहि? जोइया, मोक्खु न चिंतउ होइ। जेण णिबद्वउ जीवडउ, मोक्खु करेसइ सोइ ॥१५॥ 'परमप्पयास' णिम्मलु णिक्कलु सुद्ध जिणु विण्हु वुद्ध सिव संतु । सो परमप्पा जिण भणिउ, एहउ जाणि णिभंतु ॥१॥ अवक्खड़ी-झंझट । रिणच्चिंतउ-निश्चित । धरण रहिए-धन रहित, अंवरि-ग्राकाश में, फुरन्तु-चमकता है । १०. केम्वहि-किसी भी तरह, चित्तहं-चित्त की । ११. सिद्धहं केरा-सिद्धों का, विमुक्कु-विमुक्त । १२. सत्यई- शास्त्रों को । वेइ-जानता है । (वेत्ति) तूसइ--संतुष्ट रहा है, णा रिणयउ-ज्ञानी, हेउ-हेतु, कारण । १४. संता-विद्यमान । वलि किज्जर-बलिहारी करता हूं। १५. करेसइ-करेगा।
हो मी : ,,? मी | :: infeny. I. An famil माया, ... it महार। माम hit fit ru. fa मा दिला? ||३|| पर? मग मी . . " म अगाधु । जाग:: : प. म.? भार पनि । नाम निमा परिममः, fमा परे । गुमा; 'पमा जाम गति, ना? गणेः ॥१॥ giri पाय: गा , पाय-यामु। व प्रा मुगः, are मिय-याम् ||६|| देवा देवलि रेट जिगण. जगा दयादि fring! धासर मा परिदा , मिदं भिार भट 115|| पार गल:. गाय मग गला, गायि श्यामा गलेः। मोट फुरः, गावि प्राप-f3, म संमार भमे ।।८।। जाउ मा विमगई रमाइ, निगु ज अप्प गुगणेः । जोइउ भगः, हो जोइया. लहु गिव्यारा लहेइ ।।३।। धंधइ पदियउ सयल जगि, गवि अप्पा गुगंनि । तहि कारणि जीव फुल, गण हुरिगव्यागा लहंनि ।।१०।। जह लोहाम्मिय ग्गिय उ. बुह, नह सुग्णांम्मिय जाणि । जे सुह असुह परिच्चयहि, ते-वि हवंति हु गणागि ।।११।। २. ५, ६. । सो जि हउँ-वहीं मै हूँ, जागेविरणु-जानकर, वियप्पु-विकल्प । अप्प सहाउ-यात्म स्वभाव, लग्भ:- पाया जाता है । वउ--व्रत, तउ-तप । धुत्तिम-धूर्तता, पसाएँ-प्रसाद से । पुषिण-पुण्य से । छंडिवि ~छोड़कर । देहा-देवलि-देहरूपी मन्दिर, पडिहाइ~-प्रतिभासित होता है, भिक्खं-~-भीख, भमेइ-भ्रमण करता है । अप्प हिउ-अात्महित, फुरइ-चमकता है। विसयहं-विपयों मे । गिव्वाणु-निर्वाण । लोहम्मिय-लोह मय, सुणम्मिय--स्वर्णमय, परिच्चयहि-छोड़ देते है । ७. 8. ११. .
२६ जं वड-मज्झइं बीउ फुड, बीयहं बडु वि हु जाणु। तं देहहं देउ वि सुणहि, जो तइ-लोय-पहाणु ॥१२॥ जो जिण सो हउ, सो जि हउ, एहउ णिभंतु । मोक्खहं कारण जोइया, अप्पु ण तंतु ण मंतु ॥१३।। १२. तइलोय-त्रिलोक । १३. णिभंत-निर्धान्त, तंतु मंत्रु-तंत्र मंत्र ।
- - मुनि रामसिंह गुरु दिणयरु, गुरु हिम-किरणु, गुरु दीवउ, गुरु देउ । अप्पा-परहं परंपरहं, जो दरिसावइ भेउ ॥१॥ उज्वलि चोप्पडि चिट्ठ करि, देहि सु-मिट्ठाहार । सयल वि देह णिरत्थ गय, जिह दुज्जणि उवयार ॥२॥ मणु मिलियउ परमेसरहो, परमेसरु जि मणस्स । बिरिण वि सम-रस हुइ रहिय, पुज्ज चडावउ कस्स ॥३॥ भिंतर-चित्ति वि मइलियई, बाहिरि काइं तवेण ? चित्ति णिरंजणु को वि धरि, मुच्चहि जेम मलेण ॥४॥ हत्थ अहुट्ठहं देवली, बालहं पाहि पवेसु । संतुणिरंजणु तहिं बसइ, णिम्मलु होइ गवेसु ॥५॥ हउँ सगुणी, पिउ णिग्गुणउ, णिल्लक्खणु णीसंगु । एक्कहिं अंगि वसंतयह, सिलिउ ण अंगहि अंगु ॥६॥ देह गलंतहं सवु गलइ, मइ सुइ धारणा घेउ । तहिं तेहई, वढ, अवसरहिं विरला सुमरहिं देउ ॥७॥ छह-दसण-धंधय पडिय, मणहं ण फिट्टिय भंति । एक्कु देउ छह भेउ किय, तेण ण सोक्खह जति || . मुनि रामसिंहः-२. उव्वलि--- चोप्पडि-चुपड़कर । चिट्ठकरि–बैठाकर । उवयार-उपकार । ३. विण्णि-दोनों। पुज्ज--पूजा । ४. भितर चित्ति-भीतर चित्त में । ५. हत्य पहुट्ठहं-साढ़े तीन हाथ का । मइ-बुद्धि । सुइ-श्रुति, शास्त्र । तेहइं—वैसे । अवसरहि-अवसरों वर । धेउ-ध्येय । छइ दसरग-धंधय पडिय-६: दर्शनों के धंधे में पड़ा हुग्रा । ८.
पोत्था पढणं मोक्ख कहं मणु वि असुद्धउ जासु। वहु-यारउ लुध्धउ णवइ मूल विउ हरिणासु ॥६॥ तित्थई नित्थ भसेइ, वढ, धोयउ चम्मु जलेण । एहु मणु किम धोसि तुहुँ मइलउ पाव-मलेण ॥१०॥ अग्गई पच्छइं दह-दिहहिं नहिं जोवउं त है सोइ। ता महु फिट्टिय भंतडी, अवसु ण पुच्छइ कोइ ॥११॥ जोइउं, जोइया, तित्थई तित्थ सिउ पई सहुँ हिंहिडियउ लहिवि ण सक्किउ,तोइ ॥१२॥ मढा जोवइ देवलइ, लोयहिं जाई कियाई। देह ण पिच्छइ अप्पणिय, जहिं सिउ संतु ठियाइ ॥१३॥ जइ लद्धउ माणिक्कडउ, जोइय, पुहुवि भमंत । बंधिज्जइ णिय-कप्पडई जोइज्जइ एक्कंत ॥१४॥ जो पई भमेइ। देवसेन दुज्जणु सुहियउ होउ जगि, सुयणु पयासिउ जेण । अमिउ विसें, वासरु, तमिण, जिम मरगउ कच्चेण ॥१॥ इक्कु वि तारइ भव-जलहि बहु दायार सुपत्त । सु-परोहणु एक्कु वि बहुय दीसइ पारहु णिंतु ॥२॥ है. पोत्था परिण-पोथी पढ़के से । वहुयारउ-वधकार । लुब्धउ- लुब्धक–शिकारी । मूलट्ठिउ -मूल स्थित । हरिणासु-हरिणों के । १०. तित्थई तित्थ-तीर्थो से तीर्थ, मइलउ-मैला, भंतडी-भ्रान्ति । १२. पई सहु-तुम्हारे जैसा । हिहिंडियउ-धूमता फिरा । लहिवि रण सक्किउ- पा नहीं सका। १३. मूढा-मूर्ख, लोयहिं--लोगों ने जिन्हें बनाया, पिच्छ इ-पहचानता । अप्प- रिणय-अपनी । ठियाई-स्थित हैं। १. सुहियउ-सुहित कल्याण । सुयणु-सुजन, सज्जन । अमिउ-अमृत । वासरु दिन । मरगउमरकत । कच्चेन-कांच से । वहुदायार-बहु देने वाला, दाता । सु-परोहण--नाव । . २.
६.
पानियद-पाया जाता है, गा:-गाय, em:-देनी है, गट मुगाई-पास
भूसा। पमच्या-तो है, वष्णु-दूग ।
जाहि-यानों में, जंति-जाते है, पा-आप से, यहति-ले जाते हैं,
बहन फरते हैं।
बहु भरप-बहुतों गो तारता है, सई-स्वयं, पशु-पट, बहुयहं-बहुतो फो।
छाया करह-छाया करता है, पम्मु-धाम ।
मोक्कलउ-मुक्त, दुपातसया---संकड़ों दुःस, पुच्छिज्जई काई-पूछना
क्या?
काई वहुत्तई जंपियई-बहुत कहने से क्या ?
विषय-विवज्जहिं--विनय से रहितों के । केम रहंति-कसे रहते हैं।
६.
१०.
शरद् सोहा सलिनु सरिदि सयनिहि. विविद तरंग तरंगगि जतिहि । जं हय द्दीय गिभि गाव सर यह. तं पुगण सोइ चडी रणव सरयह ॥१०॥ ४. लोग, शरीर को कपूर और चन्दन से व्यथं चित करते; क्योंकि विरहाग्नि तो प्रिय ही बुझा सकता है ? वर्पाः-५, बगुले सरोवर छोड़कर तर शिखरों पर चढ़ गए; नाचते हुए मोर शिखरों पर बोल उठे; मेंढक तालाबों में कठोर आवाज कर रहे हैं; आम्रवृक्षों पर कोयलें बोल रही हैं । ६. मच्छरों के डर से गायों का भुण्ड ऊंची टेकरी पर चढ़ गया है; गोपियाँ अपने पतियों के साथ सुन्दर गीत गा रही हैं; कदम्बों से हरीभरी धरती महक उठी है ? कामदेव अंग अंग को चूर कर रहा है । ७. नव मेघमालाओं से गुफित आकाश और लाल लाल दिशा में इन्द्रधनुप का प्रसार! और बहुटियों से अत्यन्त ढका हुआ पावस एकदम असह्म है । शरदः-१०. समयत्तिही-शतपत्रों, कमलनियों से । बहती हुई नदी, विविध तरंगों से । ग्रीष्म ने नवशरद् की जो शोमा, आहत कर छीन ली थी, वह नव शरद् पर फिर चढ़ गई।
मंदिगण नमणमा महिनिय विनिमय falli ||१६|| ofम निधि कति करत संपनिय, मा पुगण गि गमिग चिनिय। अनः परि परि गीदरबनर. धमा समग्गु कट्ठ म. दिनार ॥१॥ कि नदि देम गगा, परन्द गिमि गिम्मल चंदा, अटकल उन गुणनि हंस फल मेवि रविंदद । ग्रह पायर गगन पर कोई सुललिय पुगण राहगा, प्रहपंचमु गा कुमार कोइ कावालिय भाइण, महमहः श्रय पञ्चमि गाः श्रीससित घग्ण कुसुमभरू, अह मुरिण उ पहिय । अगारमित पिउ साइ समइ जुन सरह घर ॥१८॥ हेमन्त दीह उसासिहि दीह रयणि मह गइय गिरक्खर । याइ गा णिदय ! णिंद तुम सुयरंतिय तक्खर । अंगिहिं तुह अलहत धिट्ठ ! करयल फरिसु । संसोसिउ तण हिमिण हाम हेमह सरिसु । हेमंति कंत । विलवंतियह, जइ पलुट्टि नासासिहसि, तं तइय मुक्ख ! पाइ मइ मुइय विज्ज किं आविहसि ॥१६॥ । ! खल १८. दीवाली में रात में दीपदान करती हैं; नयी चन्द्र रेखा के समान हाथ में लेकर; दोनों से संसार को पालोकित करती है। महिलाएं आँखों में सलाई से काजल लगाती हैं । १७. इस प्रकार कोई पुण्यवती कोड़ा करती हैं, मै दुःख में रात बिताती हूं; घर घर सुन्दर गीत है, एक अकेली मुझे सारा दुख दिया । हेमन्तः---१६. हे मूर्ख, लम्बी उसांसों में लम्बी रात बीत गई, हे निर्दय चोर, तुम्हारी याद करते हुए नींद नहीं आई; रे ढीठ, तुम्हारे हाथों का स्पर्श न पाने से, हेमन्त ने मेरे अंग अंग सुखा डाले; जैसे धूप ठंड को। हे प्रिय यदि हेमन्त में भी नहीं पाते और विलाप करती हुई मुझे आश्वासन नहीं देते; तो क्या रे दुष्ट मेरे मरने पर प्रायोगे?
३ -- शिशिर छायफुल्लफन्तरहिय असेविय सरणियण, तिमिरंतरिय दिसा य तुहिण धूइण मरिण । मग भग पंथियह ण पवसिहि हिम डरिण, उज्जाणिहि ढंरबरिय असोसिय कुसुमवण ।।२०।। तरुणिहि कंत पमुक्किय णिय केली हरिहि, सिसरि भइण किउ जलणु, सरण अन्गीहरिहि । उवभुजहि केलीरसु अम्भितर सुयण, . उज्जाणह दुम्मिहिवि ण कीरइ किवि सयण ।।२१।' वसन्त महम हिउ अंगि बहु गंधमोउ, णं तरणि (तरुणि) पमुक्कउ सिसिर सोउ । तं पिक्विवि मइ मज्झहि सहीय, लंकोडउ पढ़ियर वल्लहीय !!२२।। निवडत रेणु धरपिंजरीहि, अहिययर तविय णवमंजरीहि । मरु सियल वाइ महि सीयालंतु, गहु जणइ सीउ णं खिवइ तंतु ।।२३।। शिशिर-२०. उज्जाविहि-उद्यान में जो कुसुम वन अभी तक नहीं सूखा था, वह भी झाड़-झंखाड़ रह गया है। २१. पत्नियां पतियों को केलिवर में छोड़कर, शीत के डर से अग्निघर में आग की शरण में है; भीतर ही भुजाओं से क्रीड़ारस का प्रानन्द ले रही है। उद्यानों में पेड़ों के नीचे अब कोई नहीं सोता । वसंतः-२२ बहुत से गंध प्रामोद से अंग अंग महकने लगे मानो तरुणी (तरणि) मूर्य ने शिविर का शोक छोड़ दिया हो, यह देखकर मैंने प्रिय सखियों के बीच, यह श्लोक पढ़ा। २०. नयी मंजरियों से धरती पर पराग गिरता है, वह अधिक तप उठता है, ठण्डी हवा धरती को गोतल करती हुई बहती है, वह ठंडक पैदा नहीं करती, वरन संताप फैलाती है। -
२७.
२८.
-
जिसका नाम लोगों ने झूठमूठ रख छोड़ा है, वह अशोक भी एक क्षण भी
शोक दूर नहीं करता; कामदेव दर्प से अंगों को जलाता है । सहकार (ग्रामवृक्ष)
भी अंगों को सहारा नहीं देता ।
उसके शिखर पर प्रेम से सराबोर काली कोयलें बोल रही हैं, मानों भरत
मुनि के विविध भावों को गा रही हों, अत्यन्त सुन्दर वसंत ऋतु प्रागई: मधुकर
भी अत्यन्त सुन्दर स्वर में बोल रहे हैं ।
वसंत में चांचर खेल में ताली की ध्वनि कर गीत गाया जा रहा है और
अपूर्व नाच हो रहा है, मजबूती से गहने पहने हुए खेलती हुई जिनकी करधनी
किंकणियों की रुनझुन हो रही है ?
नवयौवना तरुणियाँ गरज रही हैं,--उसे सुनकर प्रिय की आकांक्षा रखने
वाली उसने एक गाथा पढ़ी।
२६.
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३०.
दोहा संग्रह हेमचन्द्र :) वीर एइ ति घोड़ा,, एह थलि, एइ ति निसि आ खग्ग । एत्थु मुणीसिम जाणिअइ, जो नवि बालइ बग्ग ॥१॥ पुत्तें जाने कवणु गुणु, अवगुणु कवण मुश्रेण । जा वप्पी की भूहडी चंप्पिज्जइ अवरेण ॥२॥ हिअडा जइ वेरिअ घणा, तो किं अभि चडाहुँ, अम्हाहिं वे हत्थडा, जइ पुणु मारि मराहुँ ॥३॥ अम्हे थोवा, रिउ बहुअ, कायर एम्ब भणंति मुद्धि, निहालहि गयण-यलु, कइ जण जोन्ह करंति ॥४|| पई मई वेहिं वि रण-गयहिं को जय-सिरि तक्केइ । केसहिं लेप्पिण जम-घरिणि, भण, सुहु को थक्केइ ॥५॥ तुम्हेहि अम्हे हि जं किस दिठ्ठ बहुअ जणेण । तं तेवंड्डउ समरःभरु निजिउ एक्क-खणेण ॥६॥ जाम न निवडइ कुभ-यडि सीह-चवेड-चडक्क । ताम समत्तह मय-गलह पइ-पइ वज्जइ ढक्क ॥७॥ " १. एइ ति घोड़ा=यही वे घोड़े । एइ ति निसिया खग्ग=ये ही वे पनी तलवारें। मुगीसिम मनुप्यत्व । वालइ वग्ग मोड़ता है लगाम । २. भूहडी-भूमि धरती । चंपिज्जइ-चांप ली गई । अवरेण-दूसरे के द्वारा । अभि-आकाश में । चढाजढ़ जाऊँ । अम्हा हि-हमारे भी। वे हत्थड़ा ४. । -दो हाथ । ५. जोन्ह-ज्योत्स्ना । ६. रण गहिरण में जाने पर । जयश्री विजय श्री। को तबके कोई कल्पना करता है । तं तेवड्डउ वह उतना बड़ा । समरभर-युद्ध भार ।
४० । कंत जु सीहहो उब मि अइ. तं महु खंडिउ माण । सीह णिरक्खय गय हणइ, पिउ पय-रक्ख-समाण !!|८|| भग्गउ देविखवि नियय-बलु, बलु पसरिअउं परस्सु । उम्मिलइ ससि-रेह जिंब करि करवालु पियस्सु । ॥६|| जहिं कपिज्जइ सरेण सरु, छिज्जइ खग्गेण खग्गु । तहिं तेहइ भड घड निवहि-कंतु पयासइ सग्गु ॥११॥ संगर-सयेहिं जु वरिणअइ-देवखु अम्हारा कंतु । अइ-मत्तह चत्त कुसह गय कुभई दारन्तु ॥१२॥ कंतु महारउ, इलि सहिए, निच्छई रूसइ जासु । अथिहि सस्थिहिं हस्थिहि वि ठाउ वि फेडइ तासु ॥१३॥ महु कंतहो गोठ-ठिअहो, कउ झुपडा वलंति । अह रिउ-रूहिरें उल्हवइ-अह अप्पणे, न भंति ॥१४।' महु कंतहो वे दोसडा, हेल्लि, म, झखहि आलु । देतहो हउ पर वरिअ, जुज्झतहो करबालु ॥१५॥ प्रिय एम्बहिं करे सेल्लु करि, छडुहि तुहु करवालु । जं काबालिय बप्पुडा लेहिं अभग्गु कवालु ॥१६।। जइ भग्गा पारक्कडा तों, सहि मझु पिश्रेण । अह भग्गा अम्हहतणा, तो तें सारिअडेण ॥१७॥ पाइ विलग्गी अंबडी, सिरू ल्हसिउ खंधस्सु । तो वि कटारइ, हत्थडउ बलिकिज्जउ कंतस्सु ॥१८॥ भल्ला हुआ जु मारिआ, बहिणि, महारा कंतु । लज्जेज्जतु वसिअहु, जइ भग्गा घरु एतु ॥१६॥ कुंभडि-कुंभ तट पर । सीह बवेड-चडक-सिंह की चपेट की तड़क समत्तहमयगलह-मतवाले हाथियों का । वज्जइ ढक्कम्बजता है नगाड़ा उमिग्रइ-उपमीयते । विरक्खयः अरक्षित । पय रक्ख पद रक्षित । उम्मिल्लइ ससि-रेह-चन्द्र रेखा के समान चमकता है। कप्पिज्जइ-काटा जाता है । निवहि-रामूह में । पयासइ प्रकाशित करत है । १२. चत्तसह त्यक्तांकुश गय अंकुश रहित गज । १३. अत्यिहि- अस्त्र-शस्त्र और हाथियों सहित । पालु म झयहि-भूठ मत बोलो। उल्हबाइ~-गांत करता है । १७. पारवाड़ा-~पराए । प्रभगु-अभग्न ।
४१ आयहिं जम्महिं अन्नहिं वि, गोरि, सु दिज्जहि कंतु । गय मत्तह चत्त कुसहं, जो अभिडइ हसंतु ॥२०॥ खग्ग-विसाहिउ जहिं लहहु, पिय, तहिं देसहिं जाहु । रण-दुभिक्खे भग्गाई, विणु जुज्मे न बलाहुँ ॥२१॥ बिहवि पणट्ठा वंकुडउ, रिद्धिहि जण-सामन्नु । किंपि मणा महु पिअहो ससि अणुहरइ न अन्नु ॥२२ः। विहि विणडउ, पीडंतु गह, मं धणि, करहि विसाउ । संपइ कडढउ वेस जिवं, छुडु अग्घइ ववसाउ ॥२३॥ एहु जम्मु नगाहं गयउ, भडसिरि खग्गु न भग्गु । तिक्खा तुरय न बालिया गोरी गलि न लग्गु ॥२४॥ (२) अन्योक्ति भमर, म रुणझुणि रएणइ सा दिसि जोइ म रोइ । सा मालइ देसंतरित्र, जसु तुहुँ मरहि विओइ ॥१॥ भमरा-ऐत्थु-वि लिंबडइ के-वि दिअहडा विलंबु । घण-पत्तलु छाया-बहुलु फुल्लइ जाम कयंबु ।।२॥ बप्पीहा, कइ बोल्लिएण निग्विण. वार-इ-बार । सायरि भरिअइ त्रिमल-जलिं लहइ न एक्कइ धार ।।३।। जरु अन्नह तरुअरह कोड्डेण घल्लइ हत्थु । मणु पुणु एक्काहिं सल्लइहिं, जइ पुच्छह परमत्थु ।।४।। २०. प्रायहि जम्मिहि-इस जन्म में दूसरेजन्म में जो अभिडइ हसतु-भिड़ जाय हंसताहुना । २१. खग्ग-विसाहिउ-खग्ग व्यवसाय । जहिं लहरें-जहां प्राप्त करू। २२. विहवि परगढ़ वंकुडउ-धन के नष्ट होने पर वांका । रिद्धिहिं-ऋद्धि में। जन-सामन्तु-जन सामान्य । २२. कि पि मगाउ- कुछ थोड़ा। महु-पिय-हो- मेरे प्रिय से। ससि अनुहरई-चन्द्रमा समा- नता करता है। २३. विहि विण्डउ-भाग्य नाचे । पीडन्तु गह-ग्रह सताए । वेस जिवं-वैश्य की तरह । छुड अग्घइ वबसाउ-जरा व्यव-- साय तो चल जाय । २४. व्यर्थ गया मेरा यह जन्म । न योद्धा की श्री मिली, न तलवार भग्न की, व तीखे घोड़ों पर चढा, और न गोरी के गले लगा। १. खाइ-अरण्य-जंगल में । देस तरि अ-देशान्तरित कर दी गई। २. लिबडइनीम पर । कयंवु-कदम्ब । ३. वप्पीहा-पपीहा । निग्धिरण- निर्दय । ४. कोडण -कौतुक से । हत्यु घल्लइ-हाथ डालता है। एक्कहिं सल्लइहिं-- एक सल्लकी लता में । पुच्छर-पूछते हो ।
४२ . कुंजर, सुमहिम सल्लहउ, सरला मास म मेल्लि । कवल जि पाविय विहि-बनेगा, ते चरि, मागा-म मेलिल ||२|| मइ बुत्ता, नई शुरु घहि, कसरेहिं विग्गुनाई ! पई विगण, धवल, न चढइ भा, पम्बह चुन्न र काई ॥६॥ धवलु विसूरइ सामिग्रहो गया भर पिकववि । हउं किं न जुत्तउ दुइ दिसिहि खंडर्ड दोरिण करेवि |७|| गयउ सो केसरि, पिग्रहु जलु, निञ्चितह रिणाइ । जसु केरााँ हुकार उगा मुद्दढ़ पति तिणाई ॥८॥ तणहतइज्जी भंगि न वि तें अवड-डि वसति । अह जणु लग्गवि उत्तरइ अह सह सई मज्जन्ति ||६|| सिरि चडिया खंति फलई, पुणु डालई मोडति । तो-वि महदम सउणाह अबराहिउ न करंति ॥१०॥ पई मुक्काह वि वरतरु फिट्टइ पत्तत्तणं न पत्ताणं । तुह पुण छाया जइ होज्ज कह-वि ता तेहिं पत्तेहिं ।।११।। जे छडडेविणु रयण-णिहि अप्पउ तडि घल्लंति । तह संखह विट्टालु परु, फुक्किजंत भमंति ॥१२॥ एत्तहे मेह पिअंति जलु, एत्तहे वडवानल बावट्टइ। पेक्खु गहीरिम सायरहो, एक्क-वि कणि नाहिं ओहट्टइ ॥१३|| सास म मेल्लि-सांस मत छोड़ो। विधि-वसि-भाग्य के वश से । ६, कसरेहिं विगुत्ताई-कसर-गरियाल वैल से खिन्न । काई बुन्नउ-इस समय खिन्न क्यों ? हउ दुई दिसि-दोनों दिशाओं में मुझे क्यों नहीं जोत दिया । जसु केरए हुंकारडएँ-जिसकी हुंकार से । तइज्जी भंगिण वि-तीसरी गति नहीं । तें अवड तडि पडन्ति-चूकि प्रोघट घाट पर पड़ते हैं १ १०, सउसाह-पक्षियों का । १२. अघड यडि घल्लंति-अपने को तट पर डाल लेते हैं । विट्ठालु-नीच । फुक्किजंत भमंति- फूके जाते हुए घूमते है । १३. पावट्टइ-विद्यमान है। गहीरइ-गंभीर । सायर हो-समुद्र का । कविन नाहिं प्रोहट्टइ-एक कण भी कम नहीं होता। 8.
४३ सोसउ म सोसउ चित्र उअही, वडवानलस्य किं तेण । जं जलइ जले जलणो आएण व किं न पज्जत्त ॥१४॥ तं तेत्तिउ जलु सायरहो, सो तेवड्डु वित्थारु । तिसहे निवारणु पलु वि न-वि, पर धुठुअइ असारु ॥१५॥ वच्छहे गृहइ फलई जगु, कडु. पल्लव वज्जेइ । तो-वि महददुमु सुअणु जिवं ते उच्छंगि धरेइ ॥१६॥ (३) नीति सरिहि न सरेहिं न सर-वरेहिं न-वि उज्जाण-वणेहिं । देस रवण्णा होति, वढ, निवसंतेहिं सु अणेहिं ।। १ ।। सत्थावत्थहं आलवणु साहु वि लोउ करेइ । आदन्नहं मभीसडी जो सज्जणु सो देइ ॥२॥ जो गुण गोवइ अप्पणा, पयडा करेइ परस्सु । तसु हंउ कलि-जुगि दुल्लहहो बलि किज्जंउ सुअणस्सु ॥३॥ सु-पुरिस कंगुहे अणुहरहिं, भण कज्जें कवणेण । जिवं वड्डुत्तणु लहहिं, तिवं तिवं नवहिं सिरेण ॥४॥ दूरूड्डाणे पडिउ खलु अप्पणु जण मारेइ । जिह गिरि-सिंगहु पडिअ सिल अन्तु वि चूरू करेइ ।।५।। १४. चिन-चेत्-शायद । उहयो-उदधि-समुद्र । अाएण व किं न पज्जन्तं- क्या इतना पर्याप्त नहीं है । १५. सो ते बडु-वित्थारु-वह उतना बड़ा विस्तार । तिसहे निवारणु-प्यास का निवारण । धुठ्ठाइ असार--- व्यर्थ गरजता है । १६. वच्छहे गृहइ-वृक्ष ऐ ग्रहण करते है । फलई जनु -लोग फल । कडुपल्लव-कड़वे पत्ते । वज्जइ-छोड़ देते हैं। उच्छेगे घरेइ-उत्संग-गोद में धारण करते हैं । सरिहि-नदियों से । सरेहि-सरों से । सरवरेहि-सरोवरों से । देस र वण्ण होति देश सुन्दर होते हैं । वढ=मूर्ख । २. सत्या.......मालवणु= स्वस्थ अवस्था वालों से पालाप । अादन्नहं पीड़ितों को। मभोसड़ी डरोमत यह अभयदान ३. वलि किज्जवलिहारि करता हूँ ४. कवरोण कज्जें-किस काम से ५. दूर......दूर भी स्थान में । पडिउ पड़ा हुना अप्पणु जगु भारे इ-अपने जन को मारता है । सिल-शिला । १.
४३ सोसउ म सोसउ चित्र उअही, वडवानलस्य किं तेण । जं जलइ जले जलयो आएण व किं न पज्जत्त ॥१४॥ तं तेत्तिउ जलु सायरहो, सो तेबडु वित्थारु । तिसहे निवारणु पलु वि न-वि, पर धुठुअइ असारु ॥१५॥ वच्छहे गृण्हइ फलई जणु, कडु. पल्लव वज्जेइ । तो-वि महददुमु सुअणु जिवं ते उच्छंगि धरेइ ॥१६॥ (३) नीति सरिहि न सरेहिं न सर-वरेहिं न-वि उज्जाण-वणेहिं । देस रवएणा होति, वढ, निवसंतेहिं सु अणेहिं ॥ १ ॥ सत्थावत्थहं आलवणु साहु वि लोउ करेइ । आदन्नहं मन्भीसडी जो सज्जणु सो देइ ॥२॥ जो गुण गोवइ अप्पणा, तसु हंउ कलि-जुगि दुल्लहहो वलि किज्जंउ सुअणस्सु ॥३॥ सु-पुरिस कंगुहे अणुहरहिं, भण कज्जे कवणेण । जिवं वड्डत्तण लहहिं, तिवं तिवं नवहिं सिरेण ॥४॥ दूरूड्डाणे पडिउ खलु अप्पणु जण मारेइ । जिह गिरि-सिंगहु पडिअ सिल अन्तु वि चूरू पयडा करेइ परस्सु । करेइ ॥२॥ १४. च्चिन-चेत्-शायद । उहयो-उदधि-समुद्र । आएण व किं न पज्जन्तं- क्या इतना पर्याप्त नहीं है । १५. सो ते वड-वित्थारु-वह उतना बड़ा विस्तार । तिसहे निवारणु-प्यास का निवारण । घुर्छाइ असारु- व्यर्थ गरजता है । १६. वच्छहे गृहइ-वृक्ष ऐ ग्रहण करते है । फलई जनु-लोग फल । कडुपल्लव-कड़वे पत्ते । वज्जइ-छोड़ देते हैं। उच्छेगे घरेइ-उत्संग-गोद में धारण करते हैं । सरिहि-नदियों से । सरेहि-सरों से । परवरेहि-सरोवरों से । देस र वण होति-देश सुन्दर होते हैं । चढ =मूर्ख । २. सत्या.......मालवणु= स्वस्थ अवस्था वालों से पालाप । यादन्नहं-पीड़ितों को। मन्भीसड़ी- डरोमत यह अभयदान ३. वलि किज्जउं वलिहारि करता हूँ ४. कवणेरण वाज्जें-किस काम से ५. दूर......दूर भी स्थान में । पहिउ पड़ा हुना अप्परणु जणु भारेइ-अपने जन को मारता है । सिल-शिला । १.
४८ तगोगा। वनपणा परि - साह वि लोर तपफाइ बढ़त्ता हो पाविग्रह हले मोक्कल डेगा ॥६॥ गुणहिं न संपः कित्ति पर, फल लिहिया भुजंति । केसरि न लहद बोशिश वि गय लकवेदि पति ।।७।। सायरू उपरि तग धरह, तलि घललाइ रयणाइ । सामि सुभिच्चु वि परिहरइ, संमाणेइ खलाई ।।८।। जीविउ कासु न बल्लहंउ ? धगा पुगा कासु न इटु । दोगिण वि अवसर-नियडि तिण सम गणइ विसिटु ।।६।। कमल इमेल्लिवि अलि-उलई करि-गंडाई महंति । असुलह-मेच्छण जाहं भलि, ते ण-वि दूर गणंति ।।१०।। माणि पणटुइ जइ न तणु, तो देसडा चइज्ज । मा दुज्जण-कर--पल्लवेहिं दंसिज्जंतु भमिज ॥११।। जामहिं विसमी कज्ज-गइ जीवहं मझे एइ । तामहिं अच्छउ इयरु जगु, सुअणु वि अंतरु देइ ।।१२।। दइवु घडावइ वणि तमहु सउणिहं पक्क फलाइ। सो बरि सुक्खु पइट्ट ण-वि कएगणहिंखल-त्रयणाई ।।१३।। तरहुं वि वक्कलु फलु मुणि वि परिहणु असणु लहंति । सामिहुं एत्तिउ अग्गल उं आयरु भिच्चु गृहति ।।१४।। गिरिहे सिला-यलु, तरुहे फलु घेप्पइ नीसावन्नु । घरू मेले प्पिणु माणुसहं तो-वि न रुच्चइ रन्नु ॥१५॥ विहवे कस्सु थिरत्तणउ, जोव्वणि कस्सु मरटु ? । सो लेखडउ पठाविअइ, जो लग्गइ निच्चटु ।।१६।। एत्तहे-तेत्तहे वारि-घरि लच्छि विलंठुल धाइ । पिअ-पन्भट व गोरडी गच्चल कहि-वि न ठाइ ।।१७।। ७. लिहिया=लिखा हुआ । वोड्डि वि=कौड़ी में भी । घेप्पंति खरीदे जाते है । सुभिच्चु विसुभृत्य को ६ दोपिण....किवउदोनों अवसर प्रा पड़ने पर ११. देसड़ा चइज्ज=देश छोड़ दो । या.......दुष्टों के अंगुलियों द्वारा संकेतित न घूमे । १२. सुअणु वि=सज्जन भी किनारा काटता है । १३. सउनिहं पक्षियों के लिए । १४. अग्गल-अलग विशेप । १५. नीसावन्तु=निःसामान्य । रन्नु न रुच्चइ-वन अच्छा नहीं लगता । १६. निच्चट्ट = नीचट, पक्का १७. वारिधरि-घरद्वार । विसंठुल-विसंस्थुल-अस्तव्यस्त । घाइ-दौड़ती है। पिअपमट्ठ-प्रिय से भ्रष्ट गौरी ।
४६ श्रायहो दह-कलेवरही जं वाहिउ तं सार । जइ उदभइ तो कुहइ, ग्रह उज्मद तो छार ॥२५॥ . (१) सेहरू खा, विरिणम्मविदु, (४) शृङ्गार रूप-चित्रण सीसि खणि कंटि पालवु किदु रदिने । विहिदु खणु मुडमालिये जं पणश्रेण, तं नमहु कुसुम-दाम- कोदंडु कामहो ॥१॥ साव सलोणी गोरडी, नवक्खी क-वि विस-गंठि । भडु पच्चलियो सो मरइ, जासु न लग्गइ कठि ॥२॥ जइ सो घडदि प्रयावदी केत्थु-वि लेप्पिणु सिक्खु । जेत्थु-वि तेत्थु-वि जगि, भण तो सहि सारिक्खु ।।३।। मुह-कवरि बंध तहे सोह धरहिं । नं मल्ल-जुज्भु ससि-राहु करहिं तहे सहहिं कुरल भमर-उलःतुलिअ । नं तिमिर-डिंभ खेल्लंति मिलिअ ॥४॥ चलेहि चलतेहिं लोअणेहिं जे तई दिहां, बालि । तहिं मयरद्धय-दडवडउ पडइ अपूरइ-कालि ॥शा आयई, लोअहो, लोअणई जाई'सरई, न भंति । अप्पिए दिट ठइ मउलि अहिं पिएदिट्ठइ विहसंति ॥६॥ जिवं-जिवं बंकिम लोअणहणिरु सामलि सिक्खेइ । तिवं-तिवं वम्म निय-सर खर पारि तिक्खेइ ।।७।। इस दग्ध देह से जो सध जाय, वही सार है । यदि सम्हालो तो नष्ट होता है, यदि जलता है तो छार छार होता है । ॥ २५. १. .... .... ... २. . सलोणी=सलोनी, गोरडी-गोरी, नवक्खी=अनोखी, विसगंठी विष की गांठ ४. सोह=शोभा । धरइ-धारण करती है। तिमिर डिम्भ%3D अंधकार के बच्चे । ५. जाई-सरई जाति-स्मृति । अप्पिए दिट्ठइ-अप्रिय के देखने पर। ७. जिवं जिवं-जिस जिस प्रकार । सामलि-श्यामला । सिक्खेइ -सिखाती है। खर पत्थरि-तीखे पत्थर । तिक्खेइ-तीखा करती है ।
४७ विट्टी, मई भणिय, तुहुमा करु वंकी दिछि । पुत्ति, सकरणी भल्लि जिवं मारइ हिअइ पइछि ॥८॥ अंसु जेल-आइम्ब गोरिअहे, सहि, उव्यत्ता नयण सर । ते संमुह संपेसिया देति तिरिच्छी चत्त पर ॥६॥ उन कणिरु पफुल्लिअउ कंचण-कंति-पयासु । गोरी-वयण-विणिज्जिअउ णं सेवइ वण-वासु ॥१०॥ श्रो गोरी-मुह णिज्जिअउ बदलि लुक्कु मियंकु । अन्नु वि जो परिहविय-तणु, सोकिं व भवंइ निसंकु ॥११॥ निअ-मुह-करहिं वि मुद्ध कर अंधारइ पडिपेक्खइ । ससि-मंडल-चंदिमए पुणु काइन दूरे देक्खइ ॥१॥ जिवं तिवं तिक्खा लेवि कर जइ ससि छोल्लिज्जंतु । जो जइ गोरिहे मुह-कमलिं सरिसिम का-विलहंतु ॥१३|| फोडेंति जे हिअड अप्पणंउ, ताह पराई कवण घण ? रक्खेज्जड, लोअहो, अप्पणा, बालहे जाया विसम थण ॥१४॥ अन्नु जु तुच्छ तहे धणहे, तं अक्खणह न जाइ । कटरिथणतंरु मुद्धब्हे, जे मणु विच्चि ण माइ ॥१५॥ अन्ने ते दीहर लोअण, अन्तु तं भुअ-जुअलु । अन्नु सु घण-थण-हारु, तं अन्नु जि मुद्द-कमलु ।। अन्नु जि केस-कलावु, सुअन्नु जि प्राउ विहि । जेण णिश्रविरिण घडिअ स गुण-लावण्ण-णिहि ॥१६|| वंको दिट्टीचौकी नजर । सकण्णी भल्लिसकर्ण भोली की तरह । ६. अंसुजले-ग्रासुनों के जल में । प्राइम्व-प्रायः, उन्बत्ता-गीले या भोगे हुए । नयण-सर-नेत्ररूपी बाण । १०. उग्र-देखो । करिणयार-कनेर । ११. वलि वादल में । मियकु =मृगांक । १३. सरिसमः समानता । लइन्तु-प्राप्त करती है । १४. धरण-दया । अप्पणा-अपनी । १५. धनंह- धन्या का । अक्खणह न जाइ-कहा नहीं जा सकता । कटरि-आश्चर्य हैं ? विच्चि-बीच में । " माइ नहीं समाती । १६. गुण लायण्ण रिगइि-गुणलावण्य निधि ।
८८ । - (२) प्रेम काहिं ससहरू कहि मयर हम, काहिं वरिहिगा कहि मेहु । दुर-ठिाह वि सज्जगह होइ असइदलु नेहु ।।१७।। देसुच्चाउगु सिदि-कठाण, घग्ण-कुटा, जं लोइ । मंजिट्ठए अइ-रत्तिा सव्वु सहेव्य होइ ।।१८।। अगलिश्र-णेह-णिवट्टाह जोपण-लक्खु वि जाउ । रिस-सएगा वि जो मिलइ. सहि, सोक्खह सो-टाउ ।।१।। सुमरिज्जइ तं वल्लह उ, जं वीसरह मणा जहिं पुणु सुमरणु जाउ गउ, तहो नेहो कई ना ॥२०॥ तिलहं तिलत्तणु ताउ पर, जाउ न नेह गलति । नेहि पणइ ते-ज्जि तिल तिल फिट्टवि खल होति ॥२१॥ (३) संयोग शृंगार विबाहरि तणु रयण-वगु किह टिउ सिरिआणंद । णिरूवम-रसु पिएँ पिअवि जणु सेसहो दिएणी, मुद्द ।।२२।। अइ-तुगत्तणु जं थणह , सो छेयउ, न हु लाहु । सहि, जइ केम्बइ तुडि-बसेण अहरि पहुच्चइ नाहु ॥२३।। भण सहि, निहुअउ तेवं मई, जइ पिउ दिठ्ठ सदोसु । जेवं न जाणइ मज्झ मणु पक्खावडिअ तासु ॥२४॥ जइ न सु आवइ दुइ घरु, काइ अहो मुहु तुझु वयणु जु खंडइ तउ सहिए, सो पिउ होइ न मज्झ ॥२॥ केम सभप्पउ दुटठु दिणु, किध रयणी छुडु होइ । नव-बहु-दंसण-लालसउ वहइ मणोरह सोइ ॥२६।। १७. वरिहिणु बहि मयूर । दूररुठिनाई-दूरस्थितों का । असड्ढलु = असाधारण १८. देसुच्चाडशु=देश से उच्चाटन । सिहि कढरा-आग सेनिकलना । धण कुट्टणु-धन से पीटा जाना । सव्वु सब कुछ सहन पड़ता है । १६. अगलिग्र......अगलित स्नेह से भरपूर । रयणवणु-रदन वरण-दांत का घाव । मुद्द-मुद्रा मुहर । २३. तुडिवसेण= त्रुटि से भूले से । पहुच्चइ-पहुंचता है । २४. पक्खा वडिग्र पक्षपाती है । तासु-उसका । २५. वयगु-वचन मुख । २६. किध = किस प्रकार । रयरणो छुड होइ-रात शीघ्र हो । ? २२.
४६ अम्मी,एं सत्थावत्थेहिं सुधिं चिंतिज्जइ माणु । पिएं, विट्ठे हल्लोहलेण को चेअइ अप्पाणु ॥२७॥ अंगहिं अंगु न मिलिउ, हलि, अहरें अहरू न पत्तु । पिअं जोअंतिहे मुह-कमलु एम्बइ सुरउ सचत्त ॥२८॥ मान ढोल्ला, मई तुहुँ बारिआ, मा कुरु दीहा माणु । निदहे गमिही रत्तडी, दडबड होइ विहाणु ॥२६।। चंचलु जीविउ, ध्रुवु मरणु, पित्र, रसिज्जइ काई । होसहिं दिअहा रूसणा दिवई बरस-सयाइ ॥३०|| अम्मडि, पच्छायावडा, पिउ कलहिअउ विआलि। घई विवरीरी वुद्धडी होइ विणासहो कालि ।।३१।। वियोग शृंगार मई जाणिउं बुड्डोसु हड पेम्स-द्रहि हुहुरुत्ति । नवरि अचिंतिय सपडिय विप्पिय-नाव भडत्ति ।।३।। ढोल्ला, एहे परिहासडी, अइ भण, कवणहिं देसि ? । हउँ भिज्सउं तउ केहि, पित्र, तुहु पुणु अन्नहि रेसि ।।३३।। महु हिअउं तई, ताए तुहुँ, स-वि अन्ने विनडिज्जइ । पिन, काई कर हड़, काई तहु, मच्छे मच्छु गिलिज्जइ ।।३४।। एक्कु कइअह-वि आवही, अन्नु बहिल्लउ जाहि । मई', मित्तडा, पमाणियड, पई जेहान खलु नाहि ॥३५।। विप्पिथ प्रारउ जइ-वि-पिउ तो वि तं आणहि अज्जु । अग्गिण दड्ढा जइ-वि घरु, तो ते अग्गि कज्जु ।।३६।। . २७. सत्मा स्वस्थ अवस्था वाले । सुधि=सुखसे । २८. एम्बई-इस समय । सुरउ= सुरति समात्त समाप्त है । २६. दडवउ-शीघ्र । विहारगु-सवेरा । रत्तडी= रात । निद-नींद में । ३०. कांइ रूसिज्जइ क्यों रुसता है । बरस सयाई -सौकड़ों वी तक ३१. पच्छायावडा - पश्चात्ताप । विद्यालि-विकाल संध्या समय । घई-प्रायः विवरीरी-उल्टी । विनाश काले विपरीत बुद्धि ३२. युउडीमु-डूब जाऊंगी । पेद्रहि-प्रेम समुद्र में । हुहुरत्ति-हह हहर कर । विप्पिय नाव =वियोग की नौका । ३३. अन्नहि रेमि-दूसरे के लिए। ३४. पहिल्लउ-शीघ्र ही । पमारिणयउ-प्रभावित कर दिया ।
जइ नहे तुहर नेहडा, मई सहुँ न-वि निल-तार । तं किहे चंकेहिं लोगोहिं जोइज्ज सय-बार ॥३७॥ पई मेल्लंगहो ? महु मरण, मई मेनहो नुज्नु । सारस जसु जो वेग्गला, सो-वि कदंत हो सज्मु ॥३८॥ अज्ज वि नाहु महु जिज घरि सिद्धत्था चंदेह । ताजि बरहु गवक्रेहि मक्कड-धुग्घिर देइ ।।३६।। जाउ, म जंत उ पल्लवह, देवख कइ पय देइ । हिअइ तिरिच्छी ह जि पर, पिउ डंबरइ करेइ ।।४०॥ रवि-अत्थमणि समाउलेण कंठि विइएणु न छिएणु । चक्के खंडु मुणालि अहे नउ जीवग्गनु दिएणु ॥४१।। बाह विछोडवि जाहि तुहु, हउ तेवइ को दोसु । हिअअ-ट्ठिर जइ नीसरहि, जाण, मुंज, सरोसु ।।४।। विरहाणल-जाल-करालि अउ पहिउ को-वि वुडिडवि ठिअउ | अण सिसिर-कालि सीअल-जलहु ॥४३॥ धूमु कह तिहु उठ्ठिअउ ? ॥४३।। विरहाणल-जाल-करालिअउ पहिउ पथि जं दिठ्ठर । तं मेलवि सम्वहिं पंथिअहिं सो जि किअउ अग्गिट्ठउ ॥४४॥ हिअइ खुडुक्कइ गोडो, गयणि घुडुक्कइ मेहुँ । वासा-रत्ति-पवासुअह', विसमा संकडु एहु ? ।।४५।। पहिला, दिट्टी गोरडी, दिट्टी मग्गु नियंत ? । अंसू-सासेहिं कंचुआ तिंतुव्वाण करंत ॥४६॥ तिल-तार तिलों की तरह स्वच्छ 1. जोइज्जउ देखा. जाता है । ३८. वेगला-जोड़ी । कदन्त हो सझु-कृतान्त का साध्य है । ३६. मक्कड़ घुग्घिउ वंदर धुड़की । ४०. डम्बरइयाडम्बर । ४१. विइण्णु-देदी । जीवग्गलु-जीवार्ग दे दी। वाह-वाह । ४४. अग्मिट्ठउ-अग्नि स्थित । ४५. वासा रत्ति वर्षा की रात में । पवासु ग्रह-प्रवास करने वालों का ४६. कंचुग्रा कंचुकी । वितुवाण-गीला । करंत करती हुई।
- - जइ स-सणेही तो मुइअ, अप जीवइ निन्नेह । विहिं वि पयारे हिं गइअ घण, कि गज्जइ, खलमेह ॥४॥ अम्मा लग्गा डुगरिहिं, पहिउ रडतउ जाइ । जो श्रेहा गिरि-गिलण-मथु, सो किं घणहे धणाइ ॥४८॥ लोणु विलिज्जइ पाणिश्रेण, अरे खल मेह, म गज्जु । वालिउ गलइ सु झुपडा, गोरी तिम्मइ अज्जु ॥४६॥ जउ पवसंतें सहुन गय, न मुत्र विश्रोतस्सु । लज्जिज्णइ संदेसडा देंतेहिं सुहय-जणस्सु ५०|| एक्कहिं अक्खिहिं सावणु, अन्नहिं भदबउ । माह महि-अल-सत्थरि, गंडत्थले सरउ ।। अंगिहिं गिम्ह, सुहच्छी-तिल-णि मग्गसिरु । तहे मुद्धहे मुह-पंकइ आवासिउ सिसिरु ॥५१।। वलयावलि-निवडण-भश्रेण धण उद्धभुअ जाइ। वल्लह-विरह-महा-दहहो थाह गवेसइ नाइ ॥५२।। बप्पीहा पिउ-पिउ भणवि केत्तिउ रुअहि, हयास । तुइ जलि, महु पुणु वल्लहइ, बिहुवि न पूरिअ पास ॥५३॥ हिअडा, फुट्टि तडत्ति कर, काल-खेवें काई ? देक्ख हय-विहि कहि ठवइ पइविणु दुक्ख-सयाई ॥५४॥ हिअडा, पई एहु बोल्लिअो महु अग्गइ सर-बार । फुट्टिसु पिर पवसंनि हउ, भंडय ढक्कर-सार ॥५५।। जे महु दिएणा दिअहडा दइवें पेवसंतेन ताण गणंति अंगुलिउ जज्जरिआउ नहेण ॥५६॥ मई जाणिउ, पिय विरहिअहं क-वि धर होइ विअलि । णवर मिअंकु वि तिहि तवइ जिह दिणमरु खय-गालि ॥५७।। ४७ तिम्मइ-गीली होती है । ५१. भद्ववउ मादों । ५२. उद्धभुग्र=ऊंची भुजाए करके जाई जाती है । गवसइ खोजाती है । ५३ बिहंविदोनों की । ५४ काल-बगो काई गमग विनाने मे क्या ? ठयह = रखता है । दुक्ख समागहों वालों को । रायवार=शतबार ५७. विग्रालि-विवाल- संध्या समय ।
५.२ अंबा लाइवि जे गया पदिय पराया के-धि । श्रावस न सुअदि सुहच्छिादि जिवं ग्राम्हः तिवं ते-वि ॥५८।। रक्खा सा विस हारिणी में कर चुविवि जीउ । पडिविविध-गुजालु-जलु जेहिं अडोहिउ पीउ ॥५६ ।। चूडुल्ल 3 चुएणी-होइसइ, मुद्धि, कवोलि निहत्तउ । सासानल-जाल-मालक्कियउ वाह-सलिल-संसित्तउ ।।६०|| जाइज्जइ तहि देसडइ, लम्भइ पिअहो पमाण । जइ श्रावइ तो आणिअइ, अहवा तं जि निवाणु ॥६१।। संदेसे काई तुहारेण, जं संगहो न मिलिज्जइ ? | सुइणतरि पियें पाणिश्रेण, पित्र, पियास किं छिज्जइ ॥३२॥ जइ केवइ पावीसु पिउ, अकिआ कोड्ड् करीसु । पाणि उ नवइ सरावि जिवं सव्यंगें पइसीसु ॥६३।। एसी पिउ, रुसेसु हउ', रुट्ठी मइ अणणेइ । पग्गिम्ब एइ मणोरहई दुक्कर दइउ करेइ ॥६४।। पिअ-संगमि कउ निद्दडी, पिग्रहो परोक्खहो केम् । मइ विन्नि-वि विन्नासिआ, गिद्द न अम्ब न तेम्व ॥६॥ एड गृण्हे प्पिणु ६ मई, जइ पिउ उव्वारिज्जइ । महु करिएव्यउ किंपि ण-वि, मरिअव्यउ पर देज्जइ ॥६६।। अब्भड-बंचिउ वे पयइ पेम्मु निअत्तइ जावं । सव्वासण-रिउ-संभवहो कर परिअत्ता तावं ॥६७।। ५६. जेहिं....जिन हाथों से लाकर पिया ६०. निहित्तउ-निहित रखा हुआ । वाह... ......वाष्पजल से गीला । सासा.... ...श्वास की अग्नि ज्वाला से प्रदीप्त । ६१. निवाणु निर्वाण । ६२. सुइण तरि =स्वप्नांतर में । ६३. ....
मेरु तुगाचार्य द्वारा संकलितः अम्मीणर सन्देसडर नारय कन्ह कहिज्ज । जगु दालिदिहिं दुत्थियउ बलिवन्धणह मुइज्ज ||१|| सउ चित्तह सट्टी मणह बत्तीसडा हियांह । अम्मी ते नर ढड्ढसी जे वीससई तियांह ॥२॥ भोली तुझवि किं न मूर किं ह.उ न छारह पुञ्ज । हिण्डइ दोरी दोरियउ जिम मङ्कडु तिम मुर्ख ॥३॥ चित्ति विसाउ न चिंतीयइ रयणायर गुण पुज । जिम जिम वायइ विहि पडहु तिम नच्चिाइ मुज ॥४|| सायरु पा (खा) इ लंक गदु गढवइ दस शिरु राउ । भग्गपा (ख) इ सो भजि गउ मुंज म करति विसाउ ॥१॥ गय गय रह गय तुरय गय पायक्कडा निभि । सग्गट्टिय करि मंतडऊ मुहुता रुदाइच्च ॥६॥ च्यारि वइल्ला धेनु दुइ मिट्ठा बुल्ली नारि । काहुँ मुज कुडवियाहं गयवर वज्झई वारि ॥७॥ जे थक्का गोला नई ह बलि की ताह । मुज न दिट्ठ विहलउ रिद्धि न दिट्ठ खलाह ।।८।। १. २. ३. अम्मीणउ-हमारा । सन्देसडउ-संदेसा । कहिज्ज-कहिए । मुइज्ज=छोड़ दो। स्त्रियों के सौ चित्त साठ मन और बत्तीस हृदय होते हैं, वे नर नष्ट हो जाते हैं जो स्त्रियों का विश्वास करते हैं । भोली=शरीर । दोरी दोरिमउ-डोरी से बंधा हुआ । छारउ पुजु-चूल का ढेर। मुज, मन में खेद न कर, विधाता जैसा २ नगाड़ा जाता है वैसा २ तुझे नाचना है। भंजि गउ भग्न होगया। विमाउ म करगि:-विपादमत करो। पायवटानि-पद न मिपाई । मिच्न मृत्य नौगार । गग्गट्टियम्वर्ग स्थित । महाइच्च-पद्रादित्य । वारिद्वार पर । बज्म-बांधना है। . ७.
५.४ सठि । जा मति पच्छद मरपतना सा मनि पहिली घोह । गुज भणइ गुग्णालयन विवन न चढह कोई ॥६॥ जईयह रावा जाइयउ दहगुः इबकु सरीम् । जणि वियम्भी चिन्तबह कवा पियाव खीम ॥१०॥ सइरु नहीं स गण न कु लाईट नकु लाईइ । सउ पंगारिहिं प्रागण कि न बक्सानारि होमीई ।।११।। राणा सव्वे वाणिया जेसलु बदर काह, वाणिजई माण्डीय अम्मीणा गढ हेटि ।।१२।। तइ गरुया गिरनार काह, मणि मत्सरु धरिउ । मारीतां पगार एक सिहरु न ढालियां ॥१३॥ जेसल मोडि म बांह वलि बलि विरुप भावियइ । नइ जिम नवा प्रवाह नवधण विणु प्रावइ नहीं ॥१४॥ वाढी त वढवाण वीसारतां न वीसरइ । सूना समा पराण भोगावह तई भोगवइ ॥१५॥ जा मति जो बुद्धि । पच्छइ =पीछे वाद में । सम्पज्जइ = उत्पन्न होती है । वेढइ-थेरता है । १२. पियावउ पिलाऊ । खीरु खीर-दूध । १५. गढहेठि = गढ़ के नीचे । माण्डीयउ मांडारचा बनाया । वपिजहु-वाणिज्य । मत्सर ईर्ष्या । मारीतां पगारखंगार के भरने पर । न ढालियां नहीं ढाल दिया।
स्वयंभूच्छंद
मिन, मक्कड़ मत्त दयवगा
स्य माममः दुपगमु
सो वि बंधु पाहाण-खंडहिं
जह रामहो तह, लच्छि ववसायवन्त हो ।
भाई-वियोग जिद्द जिह करइ विहीसगु सोयो
तिह तिह दु.ग्वेण रुबइ वाणर लोयो ।
सव्य गोविउ जवि जोपड़ ।
हरि मुद्रवि पायरेगा,
देई दिट्ठी जहि कहिं राही
को सक्कवि मंवरेवि
नवयण रणेहें पलोट्टर,
टाम टाम हिं वान संतट रत्तिहिं परिसंठिया
रोमंयगायम चलिअगडिया
दोसन्नि धवलुजला
जोन्दा-निहाय गोहना
पा नकदमु गाहु सोय
महि नरम, सलिल सरस
सरय मेह दिमि यद्दल विजुल
पटिय-जग्ग-मग मोह-अम मबरिचारू पाउनु
स्वयंभुदेव १ रॉमकथा का उद्गम और कवि को प्रात्मलघुता (१) रामकथा और नदी वद्धमाण-मुह-कुहर-विग्गि गय रामकहा--गइ एह कमागय ।। अक्खर-बास–जलोह-मणोहर सु-अलङ्कार-छन्द-मच्छोहर । दीह-समास-पवाहावकिय । सकाय-पायय-पुलिणालविय ।। देसीभासा-उभय-तडुज्जल क वि दुकर-वण-सद्द-सिलाय ॥ अत्थ-वहल-कल्लोलाणिटिठय आसासय-समतह-परिटिठय ।। एह रामकह-सरि सोहन्ती गणहर-देवहिं ट्ठि वहन्ती ।। पच्छइ इन्दभूइ---आयरिए पुणु धम्मेण गुणालङ्करिए । कवि, अपने प्रसिद्ध काव्य 'पउम चरिउ' में स्वीकृत रामकथा को नदी का रूपक देता है, और हर प्रकार अपनी रामकथा की परम्परा को चौबीसवें तीर्थंकर महावीर से जोड़ता है । (२) वद्धमारण-वर्द्धमान, महावीर का नाम । मुहकुहर-मुखकुहर । कमागय- क्रमागत । अक्खरवास-अक्षर-व्यास । जलोह-जलोध-जल का समूह । मच्छोहर-मत्स्यधर, मछली धारण करने वाली । सक्कय-स्संकृत प्राध पामय-घन शब्द शिलातल ।
पण
पहवें संमागग
किनिहरेण गुनाचा ॥
पुण रविने गायरिय-चमा
बुद्धिा वनाहिय कडरा ।।
परमिजि-जगणि-गम्भमा
मान्याय--भय-गु ॥
ग्रह-नगाएगा
पर्टहर-गतं
हिवरगान पविरल-दन्त ।।
घत्ता
निगमल-पु-पवित-बाद-किलागु यादृपः।
जा समातिना थिर किति विसापा।
रण उ संधिद्दे उप्परि बुद्धि थिय ।।
रण उ णि सुश्रउ सत्त वित्तिय
छबिद्दउ समास-पत्तियः ।।
छफारय दस-लयारण सुय
घीसोवसग पच्चय घटुय ॥
ण वलायल धाउ रिणवाय-गगु
ए उ लिङ्ग, उणा व वयगु ।।
णउ णि सुणिउ पञ्च-महाय कव्वु
रण उ भरहु गेउ लक्खणु वि सव्वु ॥
ए उ वुझिउ पिङ्गल-पत्थारु
णउ भम्मह-दण्डि-अलङ्कार ॥
यवसाउ तो वि गउ परिहरमि
परि रहावद्ध कव्वु करमि
सामरण भास छुडु सावडड
छडु आगम-जुत्ति का वि वघड ॥
छडु होन्तु सुहासिय-वयणाई
गामिल्ल-भास-परिहरणाई॥
पंहु सज्जण-लोयहाँ किउ विणउ
जं अवुहु पदरिसिउ अप्पणउ ।।
जइ एम विरूसइ को वि खलु
तहों हत्थुत्थल्लिउ लेउ छलु ॥
घन्ता
पिसुणे किं अमथिएण जसु को विण रुच्चइ ।
किं छण-चन्दु महागहेंण कम्पन्तु वि मुच्चइ ।।
सत्त विहत्तिय-सात विभक्तियां । छविहउ-छ विध । छक्कारय-छ कारक ।
वीसोवसग्ग-बीस-उपसर्ग । पच्चय-प्रत्यय । उणाइ-वक्कु-उरणादि वाक्य ।
महाय कन्वु-महाकाव्य । पत्थारु-प्रस्तार। सामण्णभास-सामान्य भाषा।
गामिल्ल-भास- ग्रामीण भाषा। पिसुरण-पिशुन, दुष्ट ।
५६ . हनूमान सीता संवाद- प्रस्तुत सन्धि, पउम चरिउ के 'सुन्दर कांड' से है। पउम चरित-पद्मचरित- रामचरित्र, राम का सम्बन्ध सूर्य वंश से है, पद्म-कमल का भी सम्बन्ध सूर्य से है, शायद प्रतीक भाषा में रामचरित्र को पद्म चरित्र इसीलिए कहा गया ? स्वयंभू के पउम चरिउ में कांड हैं । विद्याधर, अयोध्या, सुंदर, युद्ध और उत्तर काण्ड । सीता का अपहरण अयोध्या कांड में हो चुकता है । विराधित और सुग्रीव के सहयोग से हनूमान को दूत बनाकर सीता के पास भेजा जाता है । प्रस्तुत पाठ में उन दोनों की बातचीत है; हनूमान से राम के मति प्राश्वस्त होकर सीता भोजन ग्रहण कर लेती है, इसके पूर्व वह भोजन से विरत थी। विजय का स्वप्न देखती है, जिसका फल है रावण को ग्रामन्न मौत । गय मन्दोयरि णिय-घरहों हणुवन्तु वि सोयहें सम्मुइउ । अग्गए थिउ अहिसेय-करु णं सुरवर-लच्छि, मत्त-ाउ ।। (३) मालूर-~पवर--पीवर--थणाएं कुवलय-दल-दीहर-लोयणाए । पप्फुल्लिय--वर-कमलाणणाए हगुवन्तु पपुच्छिउ दिढ-मणाए।' (पद्धडिया दुवई) सीता कुशल वार्ता पूछ रही हैं- 'कहें कहे वच्छ यच्छ बहु-णामही कुसल-बत्त किं अकुसलु रामहों ।। कहें कहें वच्छ वच्छ कमलेखगु कि विणिहउ किं जीवइ लक्खगु ।। (2) मानूर-बैल का फल । ये लव मीता देवी के विशेषण है। गरे गाहे-कहो महो । पुनलया-गुदगल वार्ता । विणिहत विनिहत ।
६० तं गिणमुगावि मिरसा पगमन्ते अविखय कुसल-बत्त हावन्तं ॥ माए मार करें धीरउ णिय-मगु जीवइ रामचन्द्र स-नगाहण गरि परिट्टि लीद-विसेसउ तसि व सत्र्य-सङ्ग-परि सेस उ ।। घन्यु बहुल-परख-खय-खीर णिवइ व रज्ज-विदो य-विहीगाउ ।। रक्ख पत्त-रिद्धि-परिचत्त सुकइ व दुक्कर कह चिन्तन्तः ।। तरणि व रिणय-फिरगों हिं परिवजिजउ जलगु व तोय-तुसार-पर जिउ ।। च व घत्ता- इन्दु व चवण-काले ल्हसिउ दस मिहे श्रागमणे जेम जलहि खाम-खामु परिझीण-तण तिह तुम्ह विनोए दासरहि ।। ( ४ ) लक्ष्मण आपकी बहुत याद करता है- - अण्ण वि मयरहरावत्त-धरु सिर--सिहर--चडाविय उभय-करु णिय-जराणि वि एव ण अणुसरइ सोमित्ति जेम पई संभरइ ।। (पद्धडिया दुवई) परिवज्जिउ-परिवजित | चवरण-कालें चयनकाल, प्रस्थान के समय । परिझरण तणु परिक्षीण तनु । (४) मयर हरावत्त-धरु । अणुसरइ अनुसरति; अनुसरण करता है । सुमरह-स्मरति-याद करता है ६१ व सुनरइ णिय-णन्दण माया इत्र सुमरइ सिहि पाउस-छाया इव ।। सुमरइ जण पहु-मज्जाया इत्र ॥ सुमरइ भिच्चु सु-सामि-दया इव सुमरइ करहु करीर-लया इव ।। सुमरइ मत्त-हत्थि वणराइ इव सुमरइ मुणिवरु गइ-पवरा इव ॥ सुनरइ णिद्धण धण-संपत्ति सुमरइ सुरवरु जम्मुप्पत्ति व ।। सुमरइ भविउ जिणेसर-भत्ति व सुमरइ वइयाकरण विहत्ति व ॥ संपुरण पहा इत्र सुमरइ वुढ्यणु सुकर कहा इव तिह पई समरइ देवि जणदण रामहों पासिउ सो दूमिय-मण ।। घत्ता एक्कु तुहारउ परम-दुहु, अएणक्कु विरहु-तणयहों तणउ एक्कु रत्ति अणेक्कु दिणु सोमित्तिहें सोक्ख कहिं तणउ ।। ( ५ ) सीता की प्रतिक्रिया और अपहरण की कहानी- तो गुण-गण-सलिल महाणइहें रोमञ्चु पदिउ जागाहें । सुमरइ ससि - - पाउस छाया इव-पावस की छाया की तरह । पहु मज्जाया प्रभु मर्यादा राजा की मर्यादा । भिच्चु भृत्य-ग्रनुचर । मत्त-हत्यि= मत्त हस्ति, मतवाला हाथी। वनराइ इव =धनराजी-बनमाता के समान । जिणेसर भत्तिा- जिनेश्वर भक्ति । वड्याकरगु-वैयाकरण । वित्ति-विभक्ति । पहा इव प्रभा के समान । सुकइ-कहा= सुकवि कथा । सोमित्ति-सौमित्री लक्ष्मण । (५) पढिउ = प्रबंधित; बढ़ गया । जापाइहें जानकी का। फाञ्च-पंचुक.
।
कच्चुउ फु वि सय-खन्दु गउ
णं खलु अलहन्तु विसिट्ठ-मउ ।।'
(पद्धडिया दुवई)
पढमु सरीक ताहे रोमचिउ
पच्छए रणवर विसाए खञ्चिः ।।
दुक्करु राम-दूउ एहु आइउ
मञ्छुडु अण्णु को वि संपाइउ ॥
अस्थि अणेय एत्थु विज्जाहर
जे णाणाविह-रूव-भयंकर
सव्वहं मई सव्भाव णिरिक्खिय
चन्दणहि वि चिरु णाहिं परिक्खिय ।।
णं वण-देवय थाणहों चुक्की
"मई परिणहों" पभणन्ति पढुक्की ।
णवर णियाणे हूअ विज्जाहरि
किलकिलन्ति थिय अम्ह उप्परि ।।
लक्खण-खग्गु
णिएवि पणही
हरिणि व वाह-सिलीमुह-ट्ठी ।।
अण्णेक्कएं किउ गाउ भयंकर
हउ मि छलिय विच्छोइउ हलहरु ।
घत्ता
कहिं लक्खणु कहिं दासरहि आयहों दूअत्तणु कहिं तणउ ।
माया-रूवें पिउ करें वि मणु जोअइ को चि महु त्तणइ ॥
चोली (अंगिया)। फुट्टवि = फूट कर । दुक्कर दुष्कर, कठिन । मञ्छड्डु-
शायद । संपाइउ-पंप्राप्तः पाया है । एत्थु यहां । विज्जाहर-विद्याधर ।
मई मैने । वण देवय-वन देवता । थारण हो चुक्की-स्थान से चूक गई।
पढुक्की पहुँची । णियाण-निदान में, अन्त में । खग्गु खड्ग-तलवार ।
तट्ठी व्याघ्र के मुंह के त्रस्त । विच्छोइउ-विक्षुब्ध किया । कहिं तण
किसका कसा ।
( ६ ) हनूमान की कूट परीक्षा- - ॥ आढवमि खेड्डु वरि एण सहुँ पेक्खहुं कवणुत्तर देइ महु । माणवेण होवि आसद्धियउ किह लवण-महोबहि लंघिय ॥ पच्चारिउ णिय-मणे चिन्तन्तिए 'जइ तुहु राम-दूउ विगु भन्तिए । तो किह कमिउ वच्छ पई सायरु जो सो पक्क-गाह-भयङ्कर ॥ कच्छव-मच्छ-दच्छ- पुच्छाहउ संसुमार-करि-मयर-सणाहउ जोयण-सयई सत्त जल-वित्थरु पिच्च-णिगोउ जेम अइ-दुत्तर ॥ एक्कु महोबहि अण्णु वि पासाली-पायारो ॥ सो सव्वहुँ दुलङ्घ संसार व अवुहहु विसमउ पच्चाहार व ॥ तहों पडिवलु परिवद्धिय-हरिसर वज्जाउहु वज्जाउह-सरिसर अण्णु विप्फुरियाहरि केम परज्जिय लङ्कासुन्दरि ॥ दुप्पइसारो ॥ महाहवें (६) प्राढवमि= प्रारम्भ करता हूं । खेड्=खेल । अासङ्घियउम्पूया । नक्कनगाह- नक ग्राह=मगर मच्छ । संमुमार शिशुमार, एक जलचर । रिणच्च-णिगोउ नित्य निगोद। ग्रामाली-पायारो प्राथाली विद्या का परकोटा । पच्चाहारः व-प्रत्याहार के समान । परिवद्धिय हरिस उपरिवचित हपं । वज्जाउह = पघायुध । महाहवें महायुद्ध में। पटठु-प्रविष्ट ।
६४ घत्ता श्रायई सयइ पहिरावि तुई लडा-गायरि पट्छु किट । अट्ट वि कम्मणिदलावि वर-सिद्धि-महापुरि सिद्ध जिद्द ।' ( ७ ) हनुमान का प्रत्युत्तर--- तं णिसुरणेंवि वयगु महन्धविउ विसेप्पिणु अंजणे उ चविउ । परमेसरि अज्ज वि भान्त तर जायेंहि वज्जाउहु समरे हउ ॥१॥ जोवेंहिं वसिकिय लङ्कासुन्दरि 'लाइयं सावि चुजरण व कुज़रि ॥ णियासालि महोवहि लङ्घिउ एवहिं रावणो वि प्रासद्धिउ ।। एव वि जइण देवि पत्तिज्जहि तो राहव-सङ्कउ सुणेज्जहि ।। जइयहु वण-वासहों णीसरियई दसउर-कुम्वर-पर पइसरियई ॥ णम्मय विसु ताचि अहिणाणइ अरुणगाम-रामउरि-पयाणई॥ जय उर-णन्दावत्त-णिबाणाई खेमजलि-वंसत्थल-थाणई ॥ गुत्त-सुगुत्त-जडाइ-णिवेसई खग्गु सम्वु चन्दणहि पएसई॥ .. (७). महग्धविउ = महापित-पूज्यनीय या मूल्यवान् । अंजरणेउप्रांजनेय । चविउ बोला। पत्तिज्जहि-विश्वास करती . हो । जइयहु जब । वनवास हो = वनवास के लिए। दसउर-कुल्वर-दसपुर-कूबडपुर । गम्मय नर्मदा ।
पर-तिय मज्जु मंसु महु यचहां जे चुक्कहीं संसार-पवञ्चहों ।। घत्ता मं जाणेज्जहाँ पहरू गउ जमरायहो केरउ पाण-करु । तिखोहिं णाडि-फुढारपहिं दिवे दिवे छिन्देवउ पाउ-तरू (१० ) स्वप्न दर्शन- रिणसि-पहरे चउत्थए ताडियाए णं जग-कवाडे उग्वाडियए । नहिं तेहए काले पगासियत तियडए सिविणउ विण्णासियउ ।। 'हले इले लवलिए लइए लवङ्गिए सुमणे सुबुद्धिए तारे तरङ्गिाऐ ।। इले कक्कोलिए कुवलय-लोयणे हले गन्धारि गोरि गोरोयणें ।। हले विज्जुप्पहे जालामालिणि हले हयमुहि गयमुहि कङ्कालिणि ।। सिविणउ अज्जु माए म दिउ एक्कु जोहु उज्जाणे पइट्ठउ ।। तरु तरु सम्वु तेण आकरिसिउ वज्जे जिह वण-भङ्ग पदरिसिउ ।। सो वि णिवद्धउ इन्दइ-राएं पाव-पिण्डु ण गरुअ-कसाए । पट्टणे पइसाहिउ वेढेप्पिणु -- ८. रयणकेसि-रत्नकेशी एक विद्याधर । सहसगइ-सहस्त्रगति । वइसा तारियउ- बैठाया । अंगुत्थलउ=अंगूठी। पइद्धउ प्रवर्धित । चउत्थउ-चौथा । जम-पडहउ यम पटह-यम का नगड़ा । छिन्देवउ काटा जाता है। आउ-तरु-प्रायुरूपी वृक्ष ।.. १० . उग्घाडियए-उद्घाटित होने पर । पगासियउ-प्रकाशित हुआ। तियडए- विजदा । वेढेप्पिरण-घेर कर । तावडोक्तब एक और ने । प्रावट्टिय= आवर्तित कर दी घुमा दी। -- -- ६८ घत्ता एहु सिविणउ सीयहें सहलु जसुरामहो विजार जणदणहो । सहु परिवारे सटु चलेण खय काल पढ़क्कु दसाणण हो ।। (१२ ) लंका सुन्दरी का प्रवेश- तहि अवसरे पीण-पोहरिए अरुणुग्गमे लङ्कासुन्दरिए । इर-अइरउ विरिण मि पेसियउ हणुवन्तहो पासु गवेसियउ । जहिं उब्जाणे परिउ पावणि सयल-णरिन्द-विन्द-चूडामणि ।। तहिं संपत्तउ घिरिण वि जुबइउ एं सिव-सासए तवसिरि-सुगइउ ।। णं खम-दयउ जिणागमे दिट्ठ जयकारेप्पिणु पासे णिविदउ ।। तेण वि ताहिं समउ रिउ जम्पेवि कएठउ कञ्ची-दामु समम्पेवि ।। पुण विएणत्त हलीस-मणोहरि 'भोअण तुम्ह केम परमेसरि ॥' अक्खइ सीय समीरण-पुत्तहों 'वासर एक्कवीस मई भुत्तहो । जाम ण पत्त वत्त भत्तारहो ताम णिवित्ति मज् आहारहो ।। अज्जु णवर परिपुरण मणोहर तं जे भोज्जु जं सुअ रामहो कह ॥' घत्ता तं णिसुणेवि पत्रणहो सुएण अवलोइउ मुहुअइरहे तणउ "गम्पिण अक्खु विहीसणहो वुच्चइसीयहें करि पारणउ ।। ११. पीण-पनोहरिए पोन पयोधरा । अरुणुग्गमे अरुण-उद्गमे सूर्योदय होने पर । इर-अइरउ-चिरा, अचिरा । तवसिरि-तपश्री । शिविछउ--बैठा । विण्णत्त-विज्ञप्तः, निवेदित किया । पत्तप्राप्ता-पायी ।
( १५ ) हनुमान की वापसी और प्रतिवेदन- अएण यि श्रालिङ्ग वि गुण-घण सन्देसउ अक्ख महत्तणः । "चल तुज्य विश्रोप जय-सुय थिय लीह-विसेस ण कह विमुश्र ।' झीण मय-लेह गह-गहिय व झीण सुरन्द-रिद्धि तव-रहिय च । झीण कुदेस-मज्में वासारिण व मीणाऽवुह-मुहें सुकइ-सुवाणि च ।। मीण-दिवायरस-दसणे रत्ति व झीण कु-जणवर जिणवर-भत्ति व ॥ झीण दुभिक्खें अत्थ-सपत्ति व मीण वुढत्तणेण वल-सत्ति व झीण, चरित्त-विहूणहों कित्ति व झीण कु-कुलहरें कुलवहु णित्ति व ।" अण्णु वि दसरह-बंस-पगासहो वच्छत्थले जय-लच्छि-णिवासहो । रणे दुव्वार-वई रि-विणिवारहो तहो स-देस उणेहि कुमारहो।। बुच्चइ “पइँ होन्तेण वि लक्खण अच्छइ सीय रुयन्ति अलक्खण ॥', पत्ता रणउ देगेहिं उ दाणहि एउ रामेवइरि-वियारएण । पर मारेव्वउ दहवयण सइ भुअ-जुअलेण तुहारएण ।।
७२ गिरजइ कमाझ सुसियाणा। णं करिणि विरहे यगा घारगाउ । जउ जाउ सीमतिगि संचरइ । तउ त उ चद्यार-सयंद करइ ।। सककहिं दिणि ग यणादणिए । णिभच्छिउ दुमयहो गंदणिये ।। एत्थु कति पुरि गंधव्य पंच महु पेसण । जइ जाणंति पई ते गति, पाय जम-सासण ॥१॥ जोएप्पिणु दोवइ-मुइ-कमलु । पभणइ णव-गाय-सहास-बलु। हसुहड-सएहिं पडिवज्जियउ । पई, सुदरि, गवर परज्जियउ ।। पडिमल्ल ण हरि-हर-चउवयण। पंचहिं गंधविहिं का गणण ।। छुडु करि पसाउ जीवाधि मई। भुजावमि वसुमइ-अघ्घु पई ।। अवहेरि करिवि गय दुमय-सुय । तहो णवमी कामावत्थ हुय ।। णिय-ससहे कहिज्जइ कइकइहे । मणु रंजहि आयहे तीमइहे ।। जहिं अच्छमि हउ एयंग्ग-मणु । तहिं पठ्ठवि लेवि समालहणु ॥ को पज्जलइ-प्रज्वलित =जलता है । अणंग-सिहि काम की ज्वाला झिज्जइ=क्षीण होता है । सुसियाणणड =शोषित मुख वाला । वण-वरणउ%D जंगली हाथी । चडुयार-सयई-सैकड़ों चाटुकारताए । एक्कहिं दिरिण-एक दिन । णयणंदरिणए नेत्रों को आनंद देने वाली ने विभच्छिउ=डांटा पेसण-प्रेषण-सेवा, प्राज्ञा । जोए प्पणु- देखकर । प्रभरणइ प्रभणति कहता है । णव-गाय-सहास-वर हजारों नवनागों (गज) के बल वाला । सुहड-संएहि-सैकड़ों सुभटों द्वारा उ-मैं । वर- केवल । गणण-गणना-गिनती । पसाउ-प्रसाद । छुड- शीघ्र । जोवावि=जिलाप्रो । पई -तुम्हें । अवहेरि अवहेलनाः उपेक्षा । " - - विणण विउमाविउ संगुष्ट । णं सी-किसोयरि पंच गु ॥ रोवद दुमय-सुय दरिसंति किणं किय-इत्या । पई जीवंतश्रेण मह ही भक्ष्य अवत्था ॥३॥ माग्य की आलोचना- तो भणइ वियोयर अरि-दमणु । कहि, काई, मारे, किउ अागमणु ।। परिभविय केगा, कहो तणउं दुहु । पक्खालहि लोयण, लुइहि मुहु ।। तं णिसुणिवि दुमय -राय-दुहिय । पभणइ दण-छुद्ध-हीर-मुदिय ।। महु कवणु सुह अच्छइ कवण दिहि । वि वट्टइ एह विहि॥ जो साम-सालु महि-मडल हो। थिउ हरिवि लच्छि श्राइंडलहो ।। सो विहि-परिणामें संचरइ। घरिमच्छ हो णिच सेव करइ ।। जो मुट्ठि-पहारें दलइ गिरि । जं खणु वि ण मेल्लइ सुइड-सिरि ॥ जहिं तुम्ह -दिशामों के अन्तराल को काला बनाने में समर्थ । किम्मीर-एक राक्षस। विनोरहो वृक्कोदर के । विउज्झावि-समझाया । पंचम हुँ-सिंह । किणंकिय-हत्थ्या कलकित हस्त । भयइ-हुई । अवत्थ अवस्था । ४. परिभाविय-अपमानित किया। कहो तरणकौन सा । पक्खालहि-प्रक्षालयति-- पौंछ लो । छरण-छुद्ध-हीर मुहिय-उत्सव मे चमकते होने के समान मुखवाली । दिहिभाग्य । वहइ-तते है । सामि-सालु-स्वामि श्रेष्ठ । विहि परिणामें- भाज्य के परिणाम से। मच्छहो-मत्स्य (गज) के । मुठि पहारें-मुठी के कीचक की कूट स्वीकृति एवं कीचक का भीम के पंज में फंसना- पदियणगण मन्यु जे दोषः। दुव्यार-जार-मारणा-महिए। श्राविज्नइ नच्च साल तु। तं माग बिपिणा-वि सु-रय-सुह ।। गय तेत्थहो कहिउ विभोयरहो । विडु रिणवडिउ दिट टी-गोयरहो । भीमेण वि तं पडियण्गु रगु । अ-हिम-यरु ताम गउ अत्यवगु ।। सेणा-यइ लेवि पसाहरण उ । संकेय-भवणु गउ अप्पणउ । जहिं भीमसेणु थिउ पइसरिवि । जहि सीहु कुरंगहो कमु करिवि ।। तहिं घघु घिसत्थु पइट विडु । ण-उ जाणइ मंडिउ मरण-पिडु ।। रायाणु श्रेण चिहु हिंघरिउ । णं काले पढम कवलु भरिउ चिंतिउ कीयश्रेण, लइ, ह गंधव्वे मारिउ । ए-उ सइलिधि-करु एहु काले हत्थु पसारिउ || ॥ ८. दुब्बार-जार मारण-महिए दुर्वार जार को मारने की गरज से । सेणावइ- सेनापति । पसाहणउ-प्रसाधन । घंघु-घोंघा रयारगुएण-राजा के अनुगामी ने । चिहुरेहि-बालों से । पसारिउ फला लिया ।
कीचक की कूट स्वीकृति एवं कीचक का भीम के पंजे में फंसना- पडिवण्णु सन्चु जं दोवइये। दुबार-जार-मारण-महिए ।। आविज्जइ नच्चण-साल तुहु । तं माणहुविपिण-वि सु-रय-सुहु ।। गय तेत्थहो कहिउ विभोयरहो। विडु णिवडिउ दिट ठी-गोयरहो । भीमेण वि तं पडिवण्णु रणु । अ-हिम-यरु ताम गउ अत्यवां ।। सेणा-यइ लेवि पसाहरणउ । संकेय-भवणु गउ अप्पणउ ।। जहिं भीमसेणु थिउ पइसरिवि । जहि सीहु कुरंगहो कमु करिवि ।। तहिं घघु विसत्थु पइ विडु । ण-उ जाणइ मंडिउ मरण-पिडु ।। रायाणुश्रेण चिहुर हि धरिउ । णं कालें पढम कवलु भरिउ ।। चिंतिउ कीयण, लइ, हा गंघव्वे मारिउ । ण-उ सइलिधि-कर एहु काले हत्थु पसारिउ ॥८॥ S. दुव्वार-जार मारण-महिए=दुर्वार जार को मारने की गरज से । सेरणावइ- सेनापति । पसाहराउ-प्रसाधन । घंधु-घोंघा रयारपुएणराजा के अनुगामी ने । चिहुरेहिं बालों से । पसारिउ फैला लिया।
७६ द्वंद युद्ध- तो भिडिय परोप्परु रण-कुसल । विण्णि-वि रणव-णाय-सहास-बल ।। विषिण-वि गिरि-तुंग-लिंग-सिहर । विष्णि-वि जल-हर-रव-गहिर-गिर ।। विपिणा-वि दटो रुट्ठ-बयण । बिपिण-वि गुजा-हल-सम-गयण ॥ विष्णि-वि णद-यल-णिह बच्छ-यल । विणि विपरिहोत्रम-भुय-जयल ॥ विण्णि-वि तणु-तेयाहय-तिमिर । विण्णि-वि जिण-चरण-कमल-णमिर । बिण्णि-वि मंदर-परिसमण-चल । बिणि-वि विण्णाय-करण-कुसल ।। बिण्णि-वि पहरंति पहर-खभिहिं । भय-दंडिहिं वज्ज-दंड-समिहिं ।। पय-भारिहिं भारिय बिहि-मि-महि । महि-पडण-पेल्लिणाहित्थ महि ।। भीमु समाहयउ वच्छ-न्थलि मुठ्ठि-पहारें कह-वि ण णिवडिउ महि-यलि सहु रुहिग्गारें ॥६॥ . - गुजाहल-सम-नयण-मूगों के समान लाल अखिों वाले । परिहौवम भुय. जुयल-परिखा के समान वक्षस्थल वाले । तणुतेरणाहय-तिमिर-शरीर के तेज से अन्धकार को नष्ट करने वाले। जिन चरण कमल पमिर-जिनके चरण कमलों को नमस्कार करने वाले ।
कीचक वध- सेणावइ पेक्खिवि अ-तुल-बलु । श्रोहुल्लिउ भीमहो मुह-कमलु ।। किय होसइ महु जस-हाणि रणि । वज्जेसइ अ-यस-पडहु भुवणि ।। किय होसइ जण-वये जपण। कह-कहव-वि धीरवि श्रापण उ॥ श्रायासु करिवि णिय-भुय-जुयलि । हउ मुठ्ठि-पहारिं वच्छ-यलि ॥ घाएण जि वइवस-णयरु णिउ || सो कीयउ कुम्मागारु किउ ।। पइसारिय हत्थ-पाय डयरि । णं पुजिउ आमिस-पुंज घरि । णीसारिवि भीमु महा-भुयो। जाणाविउ दुमय-राय-सुयो॥ गंधविहिं विड-भडु रिणविउ । पेयाहिव पथिं पविउ ।। धाइय पवर भड, मरु-मारिउ कोयउकेण । पंच-जणाहिश्रण घर वेढिउ भाय-सश्रेण ।।१०।। १०. पेक्खिव-देखकर । प्रोहुल्लिउ-नीचे झुक गया । वज्जेसइ बजेगा । अयस- पडहु-अपयश का डंका। जंपराउ-निन्दा । कुम्मागारु-कूर्माकार । उयरि- पेट में।
८१ भाइयों द्वारा हत्यारे की खोज एवं द्रौपदी की विकराल मुद्रा- उज्जोउ करिवि णिज्झाइयउ । सच्च 3 गंधव्यिहिं घाइयर ।। एवर सरीरि गण कहिं मियणु । ण-उ श्रेक्यु-वि करु पशु विचरणु ।। अएणेत्तरे दीस इ दुमय-सुय । पाहु-लयालिगिय-सिहिण जुय ।। रणं काल रत्तिदुद सणिय । णं असणि सहारें भीसणिय ।। रणं विसहरियालीविस-भरिय । णं रपखसि भुषण-भयंकरिय॥ णं परम-हिणि जम-सासणहो। आसंक जाय सत्रहो जणहो ।। मयर-द्धय-बाणोबदधिध। श्रेहु प्राय: कार णि विविध ।। लइ वहिं काई विक्षणश्रेण । परिपुच्छिश्रेण किं राणश्रेण ॥ दोबइ 'सवेण साह थावि उपरि मडयानाणहो । फीन्यय-गाउ-सउ समलंगुटु चलिउ मसाणहो ॥११॥ ११. पशु प्रण:-गान । प्रायोत्तो-एकदुगरी जगह । फाल-रतिगाल रात्रि। पुराणिग-गुरगीग । अरापिपा । रामायणगाव रो। प्राशीचिरा-मरिय= विपासांत गाली । रगणारि-राक्षासी। गुक्षिणी-गनी गन्दी । रापेण-गय गोराण। नोगri-गोली । गंगिगिगा । गुगलिय मे.सु-सुले ए पाल । उपसाग-उत्खात ।
द्रौपदी का चीत्कार और भीम का प्रकट होना-
णिज्जंती कंद दुमय-सुय ।
गंधवहु, धायहु, काईमुय ।।
अहो जय जयंत विजयंत-धरि ।
जयसेंण जयावह-रक्ख करि ।
तो भी मुण कुहिरिणहिं माइयउ ।।
भजिवि पायारु पधाइयउ ।
प्रणेत्तहे जेत्तहे वहरि ण-वि ।।
उप्पाइय नोक्खी भांग कवि।
मुक्कलिय-केसु उक्खाय-तरु ।।
पच्चक्खु णाई थिउ र यरिण-यरु ।
सवडंमुहुदीसइ की यहिं ।।
जमु दंड-पाणि णं भीयोहिं ।
इडिज्जइ मडया-जाणु सहि ।।
एउ-रणाय पणट्ठ, पइट्ट कहि ।
पल्लट्ट विओयरु णिय-भवणु ।।
पडिवण्णु दिवायरु उग्गमणु ।।
संकप्प उट्ट मणि तहो मच्छद्दो अणिय-मल्लहो ।
कइकइ सिक्खावइ, सयलिधि णिवासहो घल्लहो ॥१२।।
सरडंमुह-सामने मुख । छड्डज्जइ छोड़ दी गई । पणठ्ठ-नष्ट हो गए ।
पट्ट-कहीं चले गए । पल्लहु-पलटा ।
८३
राजा की प्रतिक्रिया-
तहि अवसरि दुमय-गरिद-सुय ।
पक्वालिय-अगोवंग-भुय ।।
लक्खिज्जइ सबल जणेण किह ।
पट्टणि पइसति भवित्ति जिह ।।
सिय वलयालकिय-कर-यलहो।
गय स-रहसु पास विहंदलहो ।
पच्छपण-उत्तिहिं वारिवि ।
उत्तरइ समाणु खेडु करिवि ॥
अप्पणउ णिहेलगु जाइ किर ।
उच्छलइ सुजेठहो तम गिर ॥
जा-जाहि भडारिए काह-मितुहु।
राग्लहो स-एयरहो देहि सुहु ।।
धज्जुण-समए सम्मुणएण ।
वोल्लिज्जइ रोस-वसं-गण ।।
जइ एवहिंघल्लिय कह-वि पई।
तो
पुरु घाएवउ सयलु मई॥
घरि तेह दिवसउ देसहु ।
पुरण-मणोरहि य तो रज्जु सई भंजस हु ।।१३।।
जइ पुगु
थत्ति महु
१३. भवित्ति-भवितव्यता होनहार । स रहसु-सहपं । विहंदलहो-अर्जुन के।
पच्यण्ण-पउत्तिहि-प्रच्छन्न उक्तियों से । सुजेव्हो - जेठे के (युधिष्ठिर के)
र.उलहो राजकुल के | स-एयरहो-नगर-सहित । धजुरण-ससए; घृष्ट
अर्जुन को वहन से । सम्मुगएण-समुन्नत । एवहि-इस समय । घाएवा:-
घात करूंगा । मुजेसहु-भोगोगे।
महाकवि
[२]
पुष्पदन्त
यात्मलघुता
और दुर्जननिंदा
( १ )
अकलंक कात्रिल करणयर मयाई
दियसुगय पुरंदरणयस याई ।
दत्तिल विसाहिलुद्धा रियाई
ण णायइ भरहवियारियाई।
एउ पीयईपायंजल जलाई
अइदासपुराणइणिम्मलाई ।
भावाहिउ भारवि भासु वासु
कोहलु कोमलगिरु कालि यासु ।
चउमुहु सयंभु सिरिहरिसु दोणु
णालोइ3 कइ ईसाणु वाणु ।
गउ धाउ ण लिंगुण गण समासु
एउ कम्मु करगु किरियाणिवेसु ।
१.
अकलंक कविल-ताचार्य अलंक, करिन, सांख्य, दार्शनिक, कणयए.
वैशेषिक दार्शनिक. दिय द्विज वेद पाठक; सुगनबौद्ध, पुरदरणय-चकिमत के
संस्थापक पुरंदर) के मिद्वान्त । दनिन-दत्तिन और विमाहिल संगीतकारों
की रचनाएं भरह भरत के रचे शास्त्र । पयंजल जल-पतञ्जालि का
शास्त्र; इतिहास और निर्मल पुगण । भावाधिक भारवि, नाटककार भास,
महाभारत कार व्यास कवि कोरल; चर्तुमुख, पद्धड़िय वद्ध काव्य का
रचयिता स्वयंभू. कोमल वाणी कालिदास; श्री हप, द्रोण, ईशान और वाण
प्रायमुः -प्रागम।
६५ गाउ संधि ण कारउ पयसमत्ति णउ जाणिय मई एक्क वि विहत्ति । गाउ बुझिर आयमुमद्दयामु सिद्धन्तु धवल जयधवल णामु । पडु रुद्दड जडणिण्णा मयारु परियच्छिउ णालंकारमा । पिंगल पत्थारु समुदि पडिउ ण कया वि महारइ चित्ति चडिउ । जसईधु सिंधु कल्लोलसित्त ण कलाको सलि हियवउ णिहित्तु । हउ बप्प णिरक्खा कुक्खिमुक्खु परवेसे हिंडमि चम्मरुक्खु । अइदुग्गमु होइ महापुगणु कुडएण मवइ को जलणिहागु । अमरासुर गुरुयण मणहरेहि जं आमि कियउ मुरिणगणडरेहिं । त हउ मि कहमि भत्तीभरेण किं णहि ण भभिज्जइ महुयरेण । एहु विणउ पयासिउ सज्जणाई मुहि मसिकुचउ कउ दुज्जणाह । घत्ता घरे घरे ममउ असारउ दुएणयगारउ विवगेक्खए किं अक्खइ । लइ मई सो मोक्कल्लिउ खलु दुबोल्लि उ ले उ दोसु जइ पेक्खइ । १. धवल जब धवल-जैनों के सिद्धान्त शास्त्र; रुद्द रुद्रट जड जड़त्व का नाशक । पिंगल का प्रस्तार । कुक्खि मुक्खु-प्रक्षिमूर्ख । हिंडमि-घूमता हूं। अइ दुग्गमु अत्यन्त दुर्गम । मवइ = माप सकता है । कुडएड-कुडव-छोटी नाव । जलरिणहागु-समुद्र । भत्तीभरेण = भक्ति से भर कर । मसि कुचउ मसी कूची । असारउ-सारहीन । दुण्णयसारउ-दुर्नय कारक, बुरा मोकल्लि उ-छोड़ दिया। । करने वाला; ܕ ܢ " ८६ - भरत वाहुवलि युद्ध 'यादि पुराण'-प्रादि तीर्थ कर पभ का जीवन चरित्र है; यह महापुरुषों का एक महत्वपूर्ण चरित्र रहा है । अपभ देव १४ ३ कुलकर नाभिराय के पुत्र थे उनका युग-देवभूमि की समाप्ति और कर्मभूमि (कृषि सम्यता) के प्रारम्भ का युग था ।पभ की दो पुत्रियां थीं; यशोवती और सुनन्दा ! यशोवती से १०० पुत्र और एक कन्या ब्राम्ही: भरत उनमें बड़ा था । सुनन्दा से सुन्दरी और वाहुबलि । अपभ राज्य का बेटों में बटवारा कर, कैलाश पर तपस्या करते हैं । भरत, दिग्विजय के बाद, अयोध्या लौटता है, उसका चक्र नगर सीमा में प्रवेश नहीं करता; इसका कारण था–बाहुबलि का अभी तक उसकी अधीनता नहीं स्वीकारना । भरत, सूत द्वारा अधीनता का प्रस्ताव भेजता है जिसे बाहुबलि ठुकरा देता है; फलस्वरूप, सेनाएं आमने सामने प्रा डटती हैं । लेकिन वृद्ध मन्त्री, पिता की प्रान के नाम पर दोनों भाइयों को द्वंद्व युद्ध के लिए प्राव्हान करते हैं । दृष्टिजल और मल्लयुद्ध में भरत को हराकर बाहुबलि दीक्षा ग्रहण कर लेता है । जबकि, भरत को मन्त्री अयोध्या ले जाते हैं। (२) आरणालं रविणिहकरणकुंडला रयणमेहला मउडपट्टधारा । चलिया मंडलेसरा खयरसुरणरा कंठ बद्धहारा । भरत की सेना के कूच का वर्णन- होइ गिरित्थलु णिपिसें समथलु किं ण किं ण किर कदमियउ जलु। २. रविरिणहकण्णकुडला-रवि निभ कर्ण कुडलः सूर्य के समान कानों के
किण किंण फिर संचूरिउ वणु
किं ण किं ण धूली जायउ तसु ।
करण्यइंडमडिय पडिहारें
आयतें पहुसंधाबारें।
अयोध्या में स्वागत की तैयारी--
पुरणारिहि आदरणु लइज्जइ
मउ देवंगवत्थु परिहिज्जइ ।
कुंकुमेण छडल्ल उ दिज्जइ
कापूरे रंगावलि किज्जइ।
विप्पइ कुसुमकरंबु ससडयणु
वझइ सुग्नरु पल्लवतोरणु।
घरि घरि गाइजइ जिगणंदणु
दोवाहिय सिद्धत्थयचंदणु ।
दप्पणु कलसु धरिज्जइ अएणहिं
उग्धोसिउ मंगलु सुरकरणहिं ।
सलहिज्जंतु महंतु सुरिंदहिं
सहुजविखद ग्लगिंदणदिहिं ।
कग्विर कंधरत्थु मणटारिहिं
विज्जिज्जतउ चामरधारहि।
घत्ता
महि सयल वि खग्गे णिज्जिणिवि कयदिन्त्रिजयविलासहिं ।
उज्झहि भरहाहिउ पइसरइ सहिहिं परिससहासहि ॥
कुंडल वाले । रयण मेहला रत्न मेखला वाले ! मउडपट्टधारा-पुकुट पट्ट
धारण करने वाले । कद्दमियउ कदमित कीचड़ भरा कर दिया । पह
खंधावारें प्रभु-खंधाबार । देवंगवत्थु-दिव्य वस्त्र। छडउल्लउ-छड़काव ।
रंगाबलि-रांगोली । छिप्पइ ग्रहण की जाती है । कुसुम करत्रु-कुसुम धूलि ।
वज्झइ बांया जाता है । दोवदहिय सिद्धत्यय चंदण-दूब दही सिद्धार्थ
चक्र का अवरोध- ( ३ ) थपकः चक्कु ण पुरि परिसककह कुकाहि क वुत्र ण : चिम्मककइ । णं कोवालणु जाला मंडलु णं पुरलच्छिइ परिदिउ कुडल । भरपया कायरिजाय श्रारणालं एउपइसरइ पुरउरे रयणमयहरे जयसिरीवरंगं । भंगुर भासरारयं णिमियधारयं राइणो रहंग ।। भाणुविंबु णं छज्जइ आय उ । इंदचंद पडिकूलग सीलउ धगधगंतु खयहूयवहलीलउ । सहु जि चक्कवट्टि अवलोयह रणयरे दीवु धरिउ णं लोयहु मणिमऊमाला वेलाउलु रायदिवायरि परणयरुज्जल । (चांवल) चंदन । जक्खिद=यक्षेन्द्र; लिज्जिज्जतउ डुलाए जाते हैं। उज्झहि-अयोध्या में । सहि साठ सालों में । परिहिउ पहन लिया है। जयसिरीवरंग-विजयश्री के रंग वाला । भंगुर भासुरारयं-चंचल किरणों का समूह । णिसियवारयं-पनी धार वाला। राइणो राजा का । रहंग-चक्र । खयहुय वह लोलउ-क्षयकाल की प्राग के समान लीला वाला । जि-ही । मरिण यऊह = मणिमयूख । समसलु-भ्रमर सहित । गहसरि=नभरूपी नदी से । विइसिउ खिल गया । रत्तप्पलु लाल कमल । सच्चायहु-सुन्दर कीति वाला । अवसें अवश्य हो । प्रायहु- इसको । रिगराइणा-नृराज ने। रूढराइणा-प्रसिद्ध राजा ने । रहंगयं- ८६ सुरहिगंधु सिरिसेविउ सभसलु णं णहसरि विहसिउ रत्तप्पलु । वलयायारहु णिरु सच्छायहु अवसें देइ धरणि कर आयहु । घत्ता तं चक्कु ण णयरिहि पइसरइ वेसहि जणियवियारउ । हियउल्लय कवडसहयं भरिउ णावइ धुत्तहं केरउ ।। ( ४ ) आरणालं - ता भणियं णिराइणा रूढराइणा चंडवाउवेयं । किं थियमिह रहंगयं णिच्चलंगयं तरुणतरणितेयं ।। मंत्रियों का सुझाव- तं णिसुणेप्पिणु भणइ पुरोहिउ जेणेयहु गइपसरु णिरोहिउ । अक्खमि तं णिसुणहि परमेसर देवदेव दुज्जय भरहेसर । भुयजुयवलपडिबलविदवणहं पयभ रथिरमहियलंकंपवणहं । तेश्रोहामियचंददिणेसहं ४. रिणराइणा==नृराज ने । रूढराइणा==प्रसिद्ध राजा ने । रहंगयं- चक्र । णिच्च लंगयं-निश्चलांग । गइ-पसरु-गति प्रसार । पुरोहउ= पुरोहित मन्त्री । तेसोहामियचंददिणेसह-अपने तेज से चन्द्रमा और सूर्य झुका देने वाले । कित्तिसत्ति जणमेत्ति-सहायई-कीर्ति शक्ति और को ६० जणणदिएणमहिलच्छिविलासह। कित्तिसत्तिजणमेत्ति सहायह को पडिमलु एत्थु तुह भायहं । सेव करंति ण णहभाईवई रणउ रणवंति तुह पयराईबई। देति णि करभरु केसरिकंधर पर मुहियइ भुंजंति वमुधर । अज्ज वि ते सिझति ण जेण जि पइसइ पट्टणि चक्कु ण तेण जि । घत्ता रइवरु परमेस रु उच्छुधणु धरणिहरणरणपरिया। कासवतगुरूहु रणवणलिणमुहु भुवशुद्धरणधुरंधरु । (५) आरणालं दतों से भाइयों का निवेदन- ता विगया बहुयरा जणमणोहरा णिवकुमारवासं । दुमदलललियतोरणं रसियवारणं छिण्णभूमिदेसं ॥ तेहिं भगिय ते विणउ करेप्पिणु सामिसालतगुरुह पणवेप्पिणु । लोगों की सीमित संख्या की सहायता पर निर्भर रहने वाले । गह-भाई वईनख चन्द्र की। पथराईवई-चरण कमलों की (सेवा नहीं करते ।) ण तेण जि=इसी कारण से । विगया चले गए । ता-तब । वहुयरा बहुत से चर । रसियवारणं-दरवाजे पर हाथी गरज रहे हैं। छिण्णभूमिदेसंजिसका भूभाग ढका हुआ है । ५,
६१
सरणर विसहरभयई जणेरी
करहु केर णरणाहहु केरी।
पणवहु किं बहुवेण पलावें
पुहइण लव्भइ मिच्छागावें।
तं णिसुणेवि कुमारगणु घोसइ
तो पणवहु जइ बाहिण दीसइ ।
तो पणवहु जइ सुसुइ कलेवरु
तो पणवहु जइ जीविउ सुदरु ।
तो पणवहु जइ जरइ ण झिज्जइ
तो
पणवहु जइ पुठ्ठि ण भज्जइ ।
तो पणवहु जइ बलु णोहट्टइ
तो
पणवहु जइ सुइण विहट्टइ ।
तो
पणवहु जइ मयणु ण तुट्टई
तो पणवहु जइ कालु ण खुट्टइ ।
कंठि कयंतवासु ण चुहट्टइ
तो पणवहु जइ रिद्धि ण तुट्टइ ।
घत्ता
जइ जम्मजरामरणइ हरइ चउगइदुक्खु णिवारइ ।
तो पणवहु तामु णरेसहो जइ संसारहु तारइ ।।
जणेरी-उत्पन्न करने वाली। केर-आज्ञा । रणरण हहु केरी-राजा की।
मिच्छागावें मिथ्यागान से । णोहट्टइ-नष्ट नहीं होता । विहट्टइ-नष्ट नहीं
होता । वृट्टइ-टूट्टता है । खुट्टइ=नहीं खुटता ! चुहुट्टइ-नहीं पहुँचता, नहीं
लगता।
१२
आरणालं
पण रवि तेहिं गहिरयं सवणमहरयं परिसं पउत्त ।
आणापसरधारणे धरणिकारणे पणविउ ण जत्त ।।
पारतंत्र्य की आलोचना-
पिंडिखडु महिखंडु महेप्पिणु
किह पण विज्जइ माणु मुएप्पिणु ।
वक्कलणिवसणु कंदरमंदिर
वणहलभोयणु वर तं सुदरु ।
वर दालिद सरीरहु दंडणु
एउ पुरिसह अहिमाणविहंडणु ।
परपयरयधूसर किंकरसरि
असुहाविणि णं पाउससिरिहरि।
णिवपडिहारदंडसंघट्टणु
को विसहइ करेण उरलोट्टण ।
को जोयइ मुहुँ भूभगालउ
किं हरिसिउ कि रोसें कालउ ।
पहु आसण्णु लहइ धिटुत्तणु
६.
सवण महुरयं-श्रवण को मधुर । पउत्त-प्रोक्त, कथन । प्राणापसरघारणे
प्राज्ञा के प्रसार को धारण करने के लिए। महेप्पिणु प्रादर करके ।
वक्कलरिणवसणु =वक्कलों का पहनना । कंदरुमंदिस-गुफा का घर ।
वरणहलभोयणु-बनफल का भोजन । परपयरय घूसर दूसरों को पदरज
से धूसरित । किंकरसरि=सेवक रूपी नदी । पाउससिरिहरि-पावस की
शोभा धारण करने वाली । मोरों-मौन से । खंतिइ-शान्ति से । अज्जवु=
ऋजु=सरल सीधा । पलाविरु=प्रलाप करने वाला । महुर पयंपिरु-मीठा
६३
पविरत्नदंसणु णिण्णोहत्तणु
मोण जडु भडु खतिइ कायरु
अज्जवु पसु पंडियउ पलाविरु ।
अमुणियहिययचारुगरुयत्तें
कलहसीलु भण्णइ सुहडत्ते।
महुरपयंपिरु चाडुयगारउ
केम वि गुणि ण होइ सेवारउ ।
घत्ता
अइतिक्खहं धम्मगुणुझियहं वम्मवियारणवसणहं ।
को वाणहं संमुहु थाइ रणे को महिवइघरि पिसुणहं ।।
( ७ )
आरणालं
अहवा तेहिं कि हयं जं समागयं दुल्लहं णरत्त ।
तं जो विसयविसरसे चित्र परवसे तस्स कि बुहत्तं ।।
कंचणकंडे जंबुर विधइ
मोत्तियदामें मंकडु वंघइ ।
खीलयकारणि देउलु मोडइ
सुत्तणिमित्तु दित्तु मणि झोडइ ।
कप्पूरायरुरुक्खु रिणसुभइ
बोलने वाला । धम्म गुणज्झियई धर्म को डोरी या गुणों से रहित ।
वम्मवियारण-वसगह मर्म और कवच के विदारण के स्वभाव वाला।
महिवइ धरि राजा के घर में। संमु हुणाइ सामने खड़ा हो सकता है ।
घिवइ-क्षिप्पेत व्यतीत करता है । मंकडु-बंदर । खीलय कारगि- खोल
७.
६४
भोए णासह
कोद्दवछेत्तहु वह पारंभइ।
तिलखलु पयह डहिवि चंदणता
विसु गेण्डइ सप्पटु ढोयधिकरु।
पीयइ कसणई लोहियसुक्कई
तक्के विक्कह सो माणिक्क्रई।
जो
मणुयत्तणु
तेण समाणु हीणु को सीसइ ।
चित्तु समत्तणि णेय णियत्तइ
पत्त कलत्तु वित्त संचितई ।
मरइ रसणफंसणरसदढ्डउ
मे मे मे करंतु जिह मेंढउ ।
खज्जइ पलयकालसद्द लें
डज्झइ दुक्खहुयासणजालें ।
मंजरु कुंजरु महिसउ मंडलु
होइ जीउ मक्कडु माहुडलु ।
धत्ता
केलासहु जाइवि तवयरगु ताए भासिउ किज्जइ।
जेणेह सुदूसहतापवरि संसारिणि तिस छिज्जइ ।।
के लिए । सुत्तरिणमित्त-सुक्ति के लिए, दिए हुए मणि को झोटता है ।
कप्पूरायरुरुषखु-कपूर और अगरु के वृक्षों को नष्ट करता है ।
६५ (८) - आरणालं जं दिएणं महेसिणा दुरियणासिणा णयर देसमेत्तं । तं मह लिहियसासणं कुल विहूसणं हरइ को पहुत्तं ।। बलि का उत्तर- केसरि केसरु वरसइ थणयलु सुइडहु सरणु मज् धरणीयल । जो हत्थेण लिवइ सो केहउ किं कयंतु कालाणलु जेहउ । हउ सो पणवमि को सो भएणइ महिखंडेण कवरण परमुण्णइ । कि जम्मणि देवहिं अहिसिंचिउ किं मंदरगिरिसिहरि समच्चिउ । किं तहु प्रग्गइ सुरवइ णच्चि: सिरिसइ रिणियइकिं रोमंचिउ । चक्कु दंडु तं तासु जि महु पुणु णं कुंभारहु केरउ । करिसूयररहवरुडिंभयरहं सारउ . दिण्णं =दत्तं दिया । दुरियरणासिणा=दुरित नाशी-पाप का नाश करने वाले । वरसइ थरणयलु-वर सती का स्तनतल । सुहडहु-सरणु = सुभट की शरण । केहउ कैसा । जेहउ जैसा । मायंगु-गज । ६. खज्जोएखद्योत से जुगनू से अण्णाणे-अज्ञान से । वायसेग- कौए से । विज्झइ-वैधा जा सकता है ? वसहेण वृषम-बल से । वग्घु- णर णिहणमि रणि जे वि महारइ । भरहु हरइ कि मज्मु भयाभरु तइ चुक्का जइ सुयरद जिणवर । पत्ता तहु मेइणि मेइणि महु पोयणणयरु श्राइजिणिदे दिए । अभिइउ पडउ असि सिहिसिहहिं जइ रण सरइ घडि पवण्णां ।। (६) आरणालं ता दूएण जंपियं किं सुविप्पियं भणसि भो कुमारा। बाणा भरहपेसिया पिंछभूसिया होति दुरिणवार।।। दूत को फटकार- पत्थरेण किं मेरु दलिज्जइ किं खरेण मायंगु खलिज्जइ। खज्जोए रवि णित्ते इज्जइ कि घुट्टेण जलहि सोसिज्जह । गोप्पएण किं णहु माणिज्जइ अण्णाणे किं जिणु जाणिज्जइ । वायसेण किं गरुडु णिरुज्झाइ णवकमलेण कुलिसु किं विज्झइ । करिणा किं मयारि मारिज्जइ किं वसहेण वाघु दारिज्जइ। वाघ । ससंकु-शशांक-चन्द्रमा; डेंडुहेण-सांप से । जिप्पइ-जीया जा सकता है।
६८ माणु ण छंडइ छडइ भयासु दयवु ण चिंतइ चिंतइ पोरिसु । संति ण मण्णइ मगाइ कुलकलि पुहइ ण देह देइ वाणावलि । तुज्झु ण णवइ णवइ मुणतंडउ अंगु ण कड्ढइ कड्ढइ खंडउ । देव ण देइ भाइ तुह पोयणु पर जाणमि देसइ रणभोयगु । ढोयइ रयणइण उ करिरयणाई ढोएसइ ध्रवु णरउररयणई। घत्ता संतागु कुलकम्मु गुरुकहिउ खत्तधम्मु णउ बुझाइ । मज्जायविवज्जिड सामरिसु अवसें दाइउ जुज्झइ ।। ( १३ ) आरणालं आसोसियखमारसो खवियतावसो तरुणिदंसणाओ । णं णरमणि ण माइओ दिसहिं धाइओ सहइ मयणरायो । संध्या का चित्रण- संझारायजलणु जो भमियउ सो तमजलकल्लोलहिं समियउ । १३. संझाराय जलणु-संध्याराग ज्वलन । संझारायधुसिणु-संध्याराग रूपी केशर । संझाराय विडवि = संध्याराग रूपी जो वृक्ष खिला है । तमोह
६६
संझारायघुसिणु जं संकिउ
तं तमोहमयणाहें ढंकिउ ।
संझारायविडवि जो फुल्लिउ
सो तमतंवेरमवइपेल्लिउ ।
चंदमई दें तमकरि भग्गज
किं जाणः सो तासु जि लगाउ ।
मयणि हेण दीसइ सुयारउ
तप्पवेसु बइरिहिं भल्लारउ ।
विसइ गवक्वहिं थणयलि घोल इ
वहुदार व ससितेउ णिहालइ ।
रंधायार थियर अंधारइ
दुहसंक पयगइ मज्जारइ ।
रासेयबिंदु तंगगुज्जलु
दिठ्ठ भुयंगहि णं मुत्ताहलु ।
दिट्ठर कन्थाइ दीहायारर
घरि पाइसंत्तउ किर गुक्करउ ।
मोर पंडरू सप्पु विधिवि
मुद्धे कद्द व रण गवि मडपिबि ।
घत्ता
गंगामरि ईमपावलई पियविरहि गिगंडयलई॥
नायई समियरममावान्दिवः धवलाई जि शिन घवलाई।
मयमा =दम ममद की मृगेन्द्र । दलंबेग्नव अधिकार को
माग । चंद्रम चन्द्र मन्ट । मरि अन्धकार की गई 1. बागाई
घुटनों से । नवम अभय । गहिवाओं, गोनों में ।
..
( १४ ) दृष्टि युद्ध में भरत की पराजय- इय चितिवि इच्छिउ मंतिमं तु चुड्ढाणुगामि णीसेसु संतु । अवलंबिउ रोसु ण परियणेहिं आयंबकसण सियलोयणेहिं। सकसायभाव आसण्णु हुक्कु दोहिं मि अवलोइउ एक्कमेक्कु । उद्धाणणु पहु भयवलि हिं तोडु पेच्छइ रविनिंबु व किरणचंडु । हेद्विल्ल दिट्ठि उवरिल्लियाइ। णिज्जिय दिठिइ अविहाल्लियाइ णं होंति कुगइ पचमगईइ विसयासा इव मुणिवरमईइ । णं तावसि भग्गी विडरईइ णं सेलभित्ति गंगाणईइ। १४. वुड्ढाणुगामी-वृद्धानुगामी । परियणेहि--परिजनों ने । आयंब कसण-सिय लोवणेहि लाद सफेद प्रांखों वाले । उद्घाणणु-ऊचा मुख पेच्छइ- प्रेक्ष्यते दिखाई देता है । हेट्ठिल-दिठ्ठि=नीची दृष्टि । उरिल्लियाइ= ऊपर की हप्टि; । अवइल्लियाइ-अविचलित । पंचम गईइ-पंचम गति= मोक्ष । विडरईइ-विटरत्या; दुष्ट के प्रेम से। सेल भित्ति शैल भित्ति = हिमालय रूपी दीवाल । ससियरतईइ-चन्द्र संतति-चन्द्रमा की किरणों द्वारा। उपमा बाहुबलि ने अपनी अविचलित दृष्टि से भरत की दृष्टि को वैसे ही जीत लिया जैसे मोक्षगति कुगति को, मुनि की बुद्धि विषयाशा को; दुष्ट का प्रेम तपस्वी की, गंगानदी हिमालय की दीवार को जीतले, इत्यादि । ससी छाहिसारंग डेवंतसीहं-चन्द्रमा के प्रतिविम्ब में हरिण को देखकर, जिसमें १०१ णं कमलपंति ससियरतईइ कुमुोलि व मउलिय रविरुई।। -- घत्ता ठिउ हेट्ठामुहूं चक्कवइ णिज्जिउ पडभडदिपिहावहिं । घल्लियणवकुसुमंजलिहिं णंदातगुरुहु संथुउ देवहिं ॥ ( १५ ) सरोवर का वर्णन- मोमत्तमायंगलीलावह 'रा रमावासवच्छत्थलोलंतहारा। फणिंदेण चंदेण इदे ग दिहा पुणो दो वि राया सरते पइट्ठा । सरंतेहि आलोइयं सच्छणारं विसालं गहीरं तुसारोहतारं । महापोमसुत्ताहिमाणिक्कदित्तं मरुध्दूयतिं गिच्छिधूली विलितं । महीरंगर गंतंकल्लोलमाल मरालीपहालग्गलीलामरालं । सिरीणेउरालावणच्चंत मोर मिसाहारपूर तांचूचऊर। तरंतामर रोयरारद्ध कील सिंह दौड़ रहा है । समुत्तु ग-ऊंची उछलती हुई फेनराशि से जिसके किनारे ढक गए हैं: गुजन करते भ्रमरों का जिसमें कोलाहल हो रहा है; सारसों से भरा हुआ । सूर्य को मुक्त किरणों से फूल, जिसमें खिले हुए हैं; जिसमें, पक्षीन्द्र और यक्षेन्द्रों के शब्द सुनाई दे रहे हैं; नहाते हुए हाथियों की सूड़ों से, जिसका पानी मथा जा चुका है ? (सरोवर का वर्णन): सुन्दरासु-सुन्दर के । दोसइ-दृश्यते दिखाई देती है। ताराली-तारावली १५.
१०२
जलुभतमीणं लयापत्तणीलं ।
ससीचाहिसार गडवंतसीहं
समुत्तुगफेणा वलीछएणतृहं ।
झुणंतालिकोलाहलं सारसिल्लं
इगुम्मुक्कपायावली फुल्लकुल्ल ।
सुयाणेय पक्खिद जक्खिदसद
पमज्जत हत्थिदसोडाविम।
घत्ता
रहिं विणि वि जण प्रोयरिय पहुणा वित्त जलंजलि भायहु ।
वियलइ उप्परि मेहलहे णं मंदाइणि हिमइरिरायहु ।।
( १६ )
जल युद्ध
कडियल धावंती सुदरासु
दीसइ तारालि व मंदरासु
णं मरगय महिहरि चंदकंति
णं णील महोरुहि हंसपंति
डेवंती दीसइ सलिलधार
णं कंट्ठभद्द कंठिय सुतार
णं सुरसरि चवल तरग फार
गयणुल्ललंत झससुसुमार
आलसिवि पुण भरहहु विमुक्क
णंदा तणए गुरुजल झलक्क
मरगय महिहरि मरकत महीधर; गुरुजल का झुलम्म=भारी जल की धारा;
तो-तदा-तब । भुयमंडरिण-वाहुयुद्ध में । मारण-महल्ल-मान में श्रेष्ठ ।
१६.
१०३
सलिलें वसोत्तई पूरियाई
वहु परियण सयणइ जूरियाई
उग्बोसिउ विण र महासरेहि
बाहुबलि णराधिध किंकरहिं
घत्ता
सीसु धुरगंतु मुयंतु छलु सरवर वारि पवाहे सित्तउ ।
पडि ओसारियउ पुहइबइ णाई करिंदु करिंदें जित्तउ ।।
( १७ )
ल्ल युद्धः
तो भुयभंडणि भायर लग
णरिंदसिरोमणि घट्टपयग्ग ।
कुलीण कुकारणि माणमहल्ल
पहाण महावल विरिण वि सल्ल ।
सुकंचण कुडल मंडियगंड
पसारियवाह सरोसपयंड ।
चिराउस चंदचडावियणाम
सुविक्कमवंत राहिवकाम ।
समत्थ सिरीण रईण णिकेय
महारह भारह भक्खरतेय ।
मिलंति मिलेपिणु हत्थि धरंति
धरेपिणु देह घडेवि पडंति ।
१७. बड़े भाई भरत को वाहुबोल ने उठा लिया; इस पर कवि की उपेक्षाएं हैं:
मानो
शुम परिणाम ने जीव का उद्धार किया हो, सज्जन समूह ने सुकवि को
काय का, मुनिवर व्रत विशेप का; किसी महान् राजा ने देश का; इत्यादि ।
णिय कुल पईउ-निज
प्रदीप । सूख धुत्ति चित्ताणुवट्टिकाम की धूर्तता
१०४
पहत जि गाह णिबंधणु देति
कडीयलु कंठु णिरु भिवि ठंति ।
विरुद्ध विगाह वलेण मुयंति
मुएप्पिणु : ड्डिवि झत्ति वलंति ।
अलंभुयजुज्झ विहाणसयाई
पचप्पणकड्ढणवेढणयाइ ।
करंति वि धीर अविदवियंग
रिणरंकुस णाई मयंध मयंग ।
तो हयमाणिणिमाणमएण
णरामरसंगरलद्धजएण ।
सुरिंदकरी करथोर भएण
अणिजिणिंद सुणंद सुएण ।
पहुस्स करेण करा परतावि
परेण थिरेण धरेण कमावि ।
घत्ता
कुअरें राउ समुद्धरिउ णायणियबिणिसेवियकंदरु ।
कयइच्छा कोउहलेण किं ण पुरदरेण गिरि मंदरु ।।
( १८ )
उद्धरिउ सुपुत्ते णं सुवंसु
कमलायरेण णं रायहंसु ।
में अपने चित्त का अनुगमन कौन कर सकता है ?
हिमालय कायउ-हिमालय शरीर; जैसे कमल-सरोवर को पाला मार हुय%3D
हो । दव दड ढउ रुक्खु-दावानल से जला हुआ पेड़ । प्रोहुल्लिय मुग
१०५
बाहुबलि ने भरत को उठा लिया-
णं सुहपरिणामें जीव भव्यु
णं सुयणसमूहें सुकड़कन्छ ।
गणं मुरिणवरणाहें वयविसेसु
गंगरवरिंदणाएण देसु।
णं गमणवियारे बालभाणु
रणं बाप चपयकुसुमरेणु ।
रण कामुयसत्थे कामचारु
रणं सो जि तेण संसारसार ।
खयरामरमाणविमदणेण
पढमेण पढमजिणणंदणेण।
अइलुढे बहुमणियधणेण
कुद्ध अवगरिणयसज्जणेण ।
परिपालियसयल वसुधरेण
ता चिंतिउ चक्कु सुकंधरेण ।
जमदाढावलयहु अणुहरंतु
उद्धाइउ चंचलु विप्फुरतु ।
रविविवेण व जियविसमवेउ
तें परियंचिउ बाहुबलिदेउ ।
थिउ दाहिणभुयदडहु समीउ
को एहइ किर पियकुलपईउ ।
१०६
को सुरयधुत्तिचित्तागुट्टि
को एम जिण इ जगि चक्कयट्टि।
घत्ता
विमिउ भरहणराहिवइ बाहुबलीसु जगेण पसंसिउ ।
गयणभाउ सुरमुक्कियहिं पुष्पदंतपंतिहिं णं पहसिंउ ।।
( १२ )
बाहुबलि की आत्मग्लानि-
णं कमलसरु हिमायकायउ
दवदड्ढउ रुक्खु व विच्छायउ ।
जं श्रोहुल्लियमुहु पहु दिइ
तं वलि भणइ ह जि णिविकटउ ।
चक्कवट्टि णियगोत्तहु सामिउ
जेण महंत भाइ ओहामिउ ।
हा कि किज्कइ भुयबलु मेरउ
जं जायउ सुहिदुएणयगारउ ।
महि पुण्णालि य केण ण भत्ती
रज्जहु पडउ बज्जु समसुत्ती।
रज्जहुकारणि पिउ मारिज्जइ
बंधवहुमि विसु संचारिज्जइ ।
अधोमुख । हङ जि=में ही । णिविकउ निकृष्ट | सामिउ-स्वामी ।
श्रोहामिउम्पराजित किया । सुहिदुण्णयगारउ सुधियों के मति दुर्नमा
करने वाला । पुण्णालि-पुश्चली = वेश्या । भुत्ती-भोगी । समसुत्ति
समीचीन सूक्ति । रज्जहु पड़हु वज्जु-राज्य पर वज्र पड़े । तंवारहु-नाश को
१०७
जिह अलि गंधे गउ संघारहु
तिह रज्जेण जीउ तंवारहु ।
भडसामतमंतिकयभायउ
चिंतिज्जंतउ सव्वु परायउ ।
तंडुलपसयहु कारणि राणा
गरइ पडंति काई अवियाणा।
डज्झउ रज्जु जि दुक्खु गुरुक्कउ
जइ सुहु तो किं ताए मुक्कउ ।
सुहरिणहि भोयभूमि संपययर
कहिं सुरतरु कहिं गय ते
कुलयर।
घत्ता
दुल्लंघहु दुक्कियलंकणहो दूसहदुक्खदुरंतहो ।
भणु दाढापंजरि पडिउ णरु को डब्यरिउ कयंतहो ।
(१३)
भरत की प्रतिक्रिया-
सज्जणकरुणें सज्जणु कंपइ
तं णिसुणिवि भरहाणुउ जंपइ ।
जइयतुं हसिसुत्ति सहकीलिउ
तइयपई वि किं ण परितोलिउ ।
मझ वि तुझ वि कवसु पराहर
मझु वि तुझु वि कवणु महाहउ ।
प्राप्त होता है । दाइपिजरिदंष्ट्रां पंजर में । उबरिउ-उबर सका ।
सज्जनकल्यणे-सज्जन को करुणा से । भरहाणुउ-भरतानुज । पराहत
१३.
१००
जे गय ते सयल विमगिवि मिमु
भावइ भोउ ताहं णावइ विसु ।
तेत्थु ण काईवि दोसु तुहारउ
वंदणिज्जु तुहु जगि गरुयारउ ।
जइ एवहिं धरित्ति ण समिच्छहि
ता में दिण्णी तहु जि पयच्छहि ।
तहिं अवसरि वयणेहिं णिरोहिउ
मतिहि भमिणाहु संबोहिउ ।
सुउ संताणि थवेवि महाबलि
गउ केलासु परायउ भुयबलि ।
वणु जंतु मुयंतु गरिदसिरि महि महंतु अहिमाणिउ ।
साकेयह राउ विसरणमणु संतिहिं मड्डइ आणिउ ।।
पराभव ! महाइउ-महाहव । पयच्छइ-दो । गिरोहिउ निरोधित, रोका।
संबोहिउ संबोधितःसंबोधित किया । परायउपरायात पहुँचा । मड्डइ=
बलपूर्वक । मंतिहि मन्त्रियों के द्वारा।
महाकवि पुष्पदन्त 'श्रीकृष्ण का चरित्र, पुष्पदंत के महापुराण का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण चरित्र है; पांडवों यौर कृष्ण से सम्बन्धित घटनागों में कुछ भिन्नता होते हुए भी जहां तक कृष्ण बाल यौवन लीलाग्री का सम्बन्ध है, हिन्दू परम्परा से; बहुत समानता है; काव्य और मार्मिकता की दृष्टि से भी यह बेजोड़ है; इसमें कृष्ण चरिश के कई नए संदर्भो की सूचना है; उदाहरण के लिए, कृष्ण के 'ग्वाल रूप' का वर्णन, राधा का उल्लेख, उपालभ इत्यादि ।' कृष्ण की बाल लीलाए (१) दुवई णं हरिवंसवंसणवजलहरु णं रिउणयणतिमिरओ। जोइर दीवएण हरि मायइ णं जगकमलमिहिरयो । रात में चुपचाप बालक कृष्ण को ले जा रहे हैं- कण्हुमासि सत्तमि संजायउ मारण कंखिर कंसु ण आयउ । हजाणसि सो दइवें मोहिउ महिवइलक्खणलक्खपसाहिउ । लइयउ वासुएउ वसुएन धरि वारिवारणु बलए । १, हरिवंस वंस एवजलहरु हरिवंश रूपी वंश (बांस) के लिए-नए मेघ की तरह । रिउ गयण तिमिरो शत्रु की प्रांखों के लिए अन्धकार । जोइर-
११०
णिसि संचलिय छत्ततमणियरें
णं वियाणिय णिरु करें इयरें ।
अग्गइ दरिसिय तिमिरविहंगिहि
वच्चइ वसहु फुरतहिं सिंगहि ।
को वि पराइउ अमरविसेसउ
कालहि कालिहि मग्गपयासउ :
देवइ चोइइ आवयकुठइ
लग्गइ माहवचरणंगुट्ठइ ।
जमलकवाड गाढविइण्णइ
विहडियाई ण वइरिहि पुण्णइ ।
कुलिसायसवलयंकियपाए
बोल्लिउ सुमहुरु महुराराएं।
छत्तालंकिउ का किर णिग्गइ
को णिसिसमइ दुवारहु लग्गइ ।
भासर सीरि ससि य सुहदसणु
जो तुह णिविडणियलविद्धसणु ।
जो जीवंजसवइविदावणु ।
पोमावइकरमरिमेल्लावणु।
देखा । दीवएव-दीपक से । जग कभल मिहिरमोजगरूपो कमल के लिए
सूर्य । कण्हु-कृष्ण । सत्तभिसातवें । मारण कंखिरु मारने की प्राकांक्षा
रखने वाला । महिवइ पसाहिउ--महीपति के लक्षणों से प्रसाधित । वारि
वारणु-महागज । बलएवं-बलराम ने । छत्ततमरिण्यरें-क्षत्र के अंधकार
के
समूह से । इयरें-इतर = दूसरा । अग्गइ-पागे । पराइउ==परायातः-
पाया । मग पयासउ = मार्गप्रकाशक । प्रावय कुठइ-आपत्ति को
कुठित करने वाला । माहव चरणंगुइ-माधव के चरण का अंगूठा ।
महुराराए मथुराराज ने (उग्रसेन)। रिणसि समइ-निशा के समय । सुह दंसगु=
शुभ दर्शन । णिविरण-णियल विद्धंसनु निविड निगड विध्वंसक सधन वेड़ियों
सो णिग्गउ तुह सोक्खजणेरउ उग्गसेण नव प्रच्छहि सेरउ । घत्ता एवं भणंत गय ते हरिसें कहिं मि ण माइय । एयरहु णोसरिवि जउणाणइझ त्ति पराइय ॥१॥ (२) यमुना का वर्णन- दुवई ता कालिंदि तेहिं अवलोइय मंथरवारिगामिणी । रणं सरिरूवु रिविथिय महियलि घणतमजोणि जामिणी ।। रणारायणतणुपहपंती विव अंजणगिरिवरिंदकंती विव । महिमयणाहिरइयरेहा इव बहुतरंग जरहयदेहा इव । महिहरदंति दाणरेहा इत्र कंसरायजीवियमेरा इव । वसुहणिलीणमेहमाला इव साम समुत्ताहल बाला इव । णं सेवालवाल दक्खालइ फेणुप्परियणु णं तहि घोलइ । को काटने वाला । जीवंजस वइ-विद्दावणु-जीवंससा पति विद्रावक- जीवंजसा के पति (कंस) को मारने वाला । सोक्खजणेरउ-सुख उत्पन्न करने वाला। कालिंदीच्यमुना । मंथर वारि गामिणी-जिमका जल धीरे धीरे वह रहा था। झत्ति-शीष । जउण नदी-यमुना नदी । सरि स्व धरि=नदी का रूप २.
११२ गेरुयरत्तु तोउ रत्तंबरु गणं परिहइ चुयकुसुमहिं कन्युन । किंणरिथणसिहरणं दावइ किन्भमेहिं णं संसउ भावइ । फणिमणिकिरणहिं णं उज्जोयइ कमलच्छिहिं ण कण्हु पलोयइ । भिसिणिपन्तथालेहिं सुणिम्मल उच्चाइय णं जलकणतंदुल । खलखलंति णं मंगलु घोसइ रणं माहबहु पक्खु सा पोसइ । गउ का वि सामरणहु अण्णहु अवसे तूसइ जवण सवण्णहु बिहिं भाइहिं थक्कउ तीरिणिजलु णं धरणारिविहत्त कज्जलु । घत्ता दरिसिउ ताइ तलु किं जाणहु गाहहु रत्ती । पेक्खिवि महुमहशु मयणे णं सरि वि विगुत्तो ॥२॥ ( ३ ) दुबई रणइ उत्तरिणि जांबथोतरु जति समीहियासए । दिउ दु तेहि सो पुच्छिइ णिक्कुडिलं समासए ।
११३
नन्द की पुत्री का श्रीकृष्ण से विनिमय--
महु कंतइ देवय ओलग्गिय
धूय ण सुदरु पुत्तु जि मगिय ।
देविड दिण्णी सुय किं किज्जइ
तहि केरी लइ ताहि जि दिज्जा
जड़ सा तणुरुहु पडि महु देसई
तो पण इणिहि आस पूरेसइ ।
णं तो गंधधूवचरुफुल्लइ
चारुभक्खरूवाइ रसिल्लई।
देमि ताम जा देवि रिपरिक्खमि
ता हलहेइ भणइ सुणि अक्खमि ।
लइ लइ लच्छिविलासरवरणउ
एहु पुत्तु तुह देविइ दिण्णउ ।
भंति स करहि काई मुहंजोवहि
मेरइ करि तेरी सुय ढोयहि ।
ता हियउल्लइ णंदु विगप्पइ
परवेसेण भडारी जंपइ।
लेमि पुत्तु किं पउरपलावें
ओलग्गिय सेवा की। मग्गिय मांगी। धूय-लड़की, कन्या । दिण्णिी-दी।
तहि केरी-उसकी । पडिमहुँ देसइ-प्रति दास्यति=फिर देगा । पणइरिणहि=
प्रणयिनी की। चारु=सुन्दर खाद्य रूपों से । रसिल्लईरसीले । हलहेइ =
बलराम । अक्खमि कहता हूं । लच्छि-लक्ष्मी के विलासों से रमणीय ।
देविइ-देवी ने दिया । जोवहि-देखते हो । मेरइ=मेरी । तेरी सुय-तुम्हारी
कन्या । हियउल्लइ-हृदय में । रणंदु-नन्द । वियप्पइ-विकल्पयति= विकल्प
करता है । पउर पलावें-प्रवर प्रलाप से क्या । चप्पिणु-कह कर । कमन्न
११४ परिपालमि सणेहसम्भाने । एम चवेप्पिणु अप्पिय बाली बलकर कमलि कमलसोमाली । लइउ विठु साणदें गांदें मेहु व आलिंगियउ गिरिंदें। हुउ सकयत्थउ गउ सो गोउलु जणय तणय अडिआया राउलु । चत्ता सुय छणससिवयण देवइयहि पुरउ णिवेसिय । केण वि किंकरिण णरणाहहु वत्त समासिय ।।३।। बाल लीलाए- दुवई धलीधूसरेण वरमुक्कसरेणु तिणा मुरारिणा । कोलारसबसेण गोवालयगोवीहिययहारिणा ।। रंगतेण रमंतरमंते मंथउ धरिउ भमंतु अणंतें। मंदीरउ तोडिवि आवट्टिउ अद्धविरोलिउ दहि पलोट्टिइ। का वि गोवि गोविंदहु लग्गी सोमाली कमल की तरह सुन्दर । विठु-विष्णु । सकयत्थउसकृतार्थ । गोउलु-गोकुल । छणससिवयण पूर्णचन्द्रके समान मुखवाली । वत्त वार्ता बात । समासिय = कहदी । ४. तिण मुरारिणरणा-उन मुरारी ने 1 गोवालयगोवीहिययहारिणा-गोपालक
११५
एण महारी मंथणि भग्गी।
एयहि मोल्लु देउ आलिंगणु
णं तो मा मेल्लहु मे प्रगणु
काहि वि गोविहि पंडरु चेल
हरितणुतेए जाय काल।
मूढ
जलेण काई पक्खालइ
णियजडत्तु सहियहिं दक्खालइ ।
थएणरसिच्छिरु छायानंतर
मायहि संमुहु परिधानंतउ ।
महिससिलंबउ हरिणा धरियउ
ण करणिबंधणाउ णीसरियउ ।
दोहउ दोहणहत्थु समीरइ
मुइ मुइ माहव कीलि पूरइ ।
कत्थई अंगणभवणालुद्धउ
वालबच्छु वालेण णिरुद्धउ ।
गुजाझंदुयरइयपओए
मेल्लाविउ दुक्खेहिं जसोए ।
कत्थइ लोणियपिंडु णिरिक्खउ
करहे कंसहु णं जसु भक्खि ।
।
की गोपी का हृदय चुराने वाले । रंगतेण रेंगते हुए । अद्ध विरोलिङ%D
प्राधा विलोया हुआ । दहिउ दही । पलोट्टिउ पलोट दिया-उलट दिया ।
मा मेल्लहुमत छोड़ो । हरितगुतेए' =कृष्ण के शरीर के तेज से। पंडर
चेल सफेद कपड़ा । थारसिच्छिरु-थन के
दूध को इच्छा रखने वाला।
दोइउ-दुहने वाला । वाल वच्छु-छोटे बछड़े को । महिससिलवणु-मेंस के
बच्चे को । गुंजा-मूगों की। मेल्लाविउ-छुड़ाया । लोरिणयपिडु-नवनीत का
-
११६ घत्ता . - पसरियकरयलेसितिहिं सुइसुहकारिणि भदिइ णियडिथिए घरयम्मु ण लग्गइणारिहिं दुबई णउ भुजंति गोव कयसंसय णिज्जियणीलमेहई। केसवकार्यकतिपविलित्तइ दहियइ अंजणाहइ ।। गोपियों से बाल लीलाएं- - घयभायणि अवलोइवि भावइ णियपडिबिंबु विठु बोल्लावइ । हसइ णंदु लेप्पिणु अवरुडइ तहु उरयलु परमेसरु मंडइ । अम्माहीरएण तंदिज्जइ णि धइयउ परियदिज्जइ । हल्लरु हल्लरु जो जो भएणइ तुझु पसाए होसइ उण्णइ । हलहरभायर वेरिअगोयर तुहु सुहसुयहि देव दामोयर । तहु घोरंतहु णहयलु गज्जइ सुत्तविउद्ध ए केण लइज्जइ । + पिंड । भदि-कृष्ण के । गियडिथिए-समीप रहने पर ! केसव “लित्तइ-कृष्ण के शरीर की कांन्ति से लिप्त । घयभायवि-घृतभाजन । रिणय पडिविबु अपने प्रतिविम्ब को । वोल्लावइ=बुलाता है । हल्लरु हल्लरु- धीरे धीरे । उण्णइ.-उन्नति । वेरि अगोयर-शत्रु के लिए अदृश्य । महुर्राह-
११७
पुहइणाहु किर कासु ण बल्लहु
अच्छउ णरु सुरहं मि सो दुल्लहु ।
वियलियपथकिलेससंतावें
पसरते तहु पुरणपहावें।
णंदहु केर उ गोलु गंदा
महुरहि णारि मसाणइ कंदइ।
महि कंपइ पडंति णक्खत्तई
सिविणंतरि भग्गइ नृवछत्तई
घत्ता
णियवि जलंति दिस कंसें विणएण णियच्छिउ ।
जोइससत्थरिणहि दिउ वरुणु णाम आउच्छिउ ।।५।।
दुवई
कहियं देवयाहिं जो दणिहेलणि वसइ वालो।
सो पई नृवण भति कं दिवसु विमारइमच्छरालो ।।
पूतना वध--
जाणिइ अरिवरि
कंसाएसें
बल मायाविणि
वच्छरवाउलु
ता तहिं अवसरि ।
मायावेसें।
धाइय जोइणि।
गय तं गोउलु ।
मथुरा में । मसाणइ-मरघट में । एक्खत्तई नक्षत्र । सिविणंतरि स्वप्न में ।
नृवछत्तई-नृपछत्र । णियच्छिउ-पूछा।
मच्छरालयो मत्स्यराज को । जोइणि-योगिनी । वच्छरवाउलु-बछड़ों के
शब्द से व्याकुल । पवण्णी=पहुंची । पूयण-पूतना । दुद्धरसिल्ल उ-दूध से
६.
११८ नयसिरितण्डहु पासि पवरणी पभणइ पूयण पियगरुडद्धय दुद्धरसिल्लउ तं आर्याण्णवि चुयपथपंडरि हरिणा णिहिया णं ससिमंडलु सुरहियपरिमलु सियकलसुप्परि कडुए खीरें जणणि ण मेरी जीवियहारिणी अज्जु जि मारमि पत्रमहु कण्ठहु । कत्ति णिसणी। हे महुसूयण । याउथगद्धय। पियहि थणुल्लउ। चंग मरिणवि। वयगु पोहरि । राहुं गहिय। सोहइ थणयतु । णं णीलुप्पलु। विभिउ मणिहरि । जाणिय वीरें। विपियगारी रक्खसि वइरिणि । पलउ समारमि। रोसु वहंतें। भिउडि करते। देवि अणंते । मुट्टिइ ताडिय। थामें णिज्जिय । गहहिं विलुक्की। सुण्णु हसंतहि । इय चिंतंते माणमहंतें लच्छीकते दंतहिं पीडिय दिटिइ तज्जिय अणु वि ण मुक्की खलहि रसंतहि रिसते । चंगचंगा-भला समझ कर । चुयपयपंडरि-रिसते दूध से सफेद । गिहियउ-पकड़ लिया। कडुए खीरें-कड़वे दूध से। विप्पियगारीबुरा करने वाली । भिउडि करते-भौहें चढ़ाते हुए । लच्छीकतें लक्ष्मीकान्त ने, तज्जिय-डांटा । थामें स्पैर्य से । राहहिं विलुक्की अाकाश में छिप गई ।
११६ कयकल्लोलें। पलु आकरिसिउ। भणइ भडारी। मुइ मुइ केसव । भीमें वाले लोहिउ सोसि दाणवसारी हियरुहिरासव णंदाणंदणु कंसु ण सेवमि जहि तुहु अच्छदि तहिं । उ पइसमि मेल्लि जणदण । रोसु ण दावमि । कील समिच्छहि। छलु ण गवेसमि। घत्ता इय रुयंति कलुगु कह कह व गोविंदें मुक्की । गव देवय कहिं मि पुणु णंद णिवासिण दुक्की ।।६।। दुवई L वरकाहलियवंसखबहिरिए गाइयगेयरससए । रोमंथंतथक्कगोमहिसिउलसोहियपएसए अण्णहिं पुणु दिणि तहिं णियपंगणि जणमणहारी रमइमुरारी। घोदृश्वीर लोट्टइणीरं। भजइ कुंभ पेल्लइ डिंभ। पलु-मांस । आकरसिउ-खींच लिया । मुइ मुइ छोड़ो छोड़ो। छलु ण गवेसमि-अब कोइ छल नहीं करूंगी । ढुक्की-पहुंची। ७. वरकाह-काहल वांसुरी से बहरे । गाइय"ससए सैकड़ों गीत रस गाए जा रहे थे डिभपजण बच्चे को। चलचिजलती प्राग द वालि दुष्काल, खोटा समय । राहे लोगों की शोभा ले । को।
१२० छंड महियं कढइ चिच्चिं चक्खइ दहियं । धरइ चलच्चि। करइ दुवालिं। इच्छइ केलिं तहिं अवसरए कीलाणिरए । शकटा का पड्यन्त्र- कयजगराहे रिउणासिठ्ठा अवरा घोरा पत्ता गोठं चक्कचलंगी उप्परिएती दिट्ठा तेणं पाएं पहया रविकिरणावहि इंदाइणिए दिहिचोरेणं पबलबलालो उद्द खलए सीयसमीर सिसुकयछाया ता सो दिव्यो पंकयणाहे। देवीदुट्ठा। सयडायारा। गोवइइट्ठ। दलियभुयंगी। पलउ करती। महुमहणेणं । णासिवि विगया। अवरदिणावहिं । पियचारिणिए । दढडोरेणं । बद्धो बालो। णिहियउ णिलए। तीरिणितीर । विगयगामाया । अन्यो अव्यो। परियड्ढंतों। इय सतो १२१ तमुदूहलयं गयकयकण्हु जाणियमग्गो अरिविजजाए ता परिमुक मारुयचवलं अंगेधुलियं कीलंतेणं बलवंतेणं पणियपुलयं । जयजसतरहहु। पच्छइलग्गो। गयगयराए। णियडे दुक्कं । तरुवरजुयलं । भुयपडिखलियं। विसंतेणं । सिरिकतेणं । पत्ता होइवि तालतरु रंगतहु परि तडितरलई । रक्खसि केसबहु सिरि घिवइकढिणतालहलई ।।७।। (८) राक्षसी का तालफल गिराना- दुवई - सिरिरमणीविलासकीलावरिवच्छयले घडंतई णं अरिवरसिराई विहिलक्कई दसदिसिवहि पडतई ।। ताइ इच्छए सो पडिच्छए। पंजलीयरो कीलणायरो। गयणसंचुए णाइ भिंदुए। हुई । उद्खलए-उलूखल से । रिगलए वेड़ी में । तडितरलई-विजली की तरह कड़कते हुए । घिवइ डालता है । तालतलई-तालफल । रक्तसि= राक्षसी। सिरिरमणी..."वच्छयते लक्ष्मी रूपी रमणी के लिए, जिनका वक्ष, विलास का ८.
१२२ ता महारवा पुछलालिरी धाइया खरी उल्ललंतिया वेयांतिया उवरि एतिया णंदवासिणा तिव्यभेरया। कण्णचालिरी। विभियो हरी । गहि मिलतिया । दीह दतिया। घाउदतिया । जाइकोसिणा। धारिया खुरे । भामिया णहे। आहया उरे मेहसंगहे गधी का उत्पात-- -- सुठ्ठचावरी तीइ ताडिओ तालुरुक्खो जगि णमाइओ कंसकिंकरी। महिहि पाडिओ। पुणुविवक्खयो। तुरउ धाइयो। तालवृक्ष के रूप में राक्षस का आना- गहिरहिंसिरो वकिंयाणणो हिलिहिलंतो कालचोइओ लच्छिधारिणा जीवहिंसिरो। गाइ दुज्जणो। महि दलंतो। ए तु जोइओ। चित्तारिणा । घर था। दस दिसिवहि-दशों दिशाओं के पथ में। कीलगायरो-क्रीड़ा में नागर, चतुर । झिदुए गेंद से । पुछलालिरी-पू छ हिलाने वाला । कण्णचालिर- कान हिलाती हुई । धाइया खरोगधी दौड़ी । ककिंकरी-कंस की दासी।
१२३ घुसिणपिंजरे छुहिवि पीलिओ मोडायो गलो रणि हो हो बाहुपंजरे। गयणि चालियो। पत्तपच्छलो। णिग्गियो गयो। घत्ता ताजमोय भणिय णइपुलिणइ पाणियहारिहिं । णंदणु कहिं जियइ जायउ तुम्हारिसणारिहिं ।।।। (६ ) उद् खल से बांधा जाना- दुवई मरुहयमदिरुहेहिं पहिचप्पिउ गदह तुरय चूरिओ। अवरु उदूहलन्मि पई वद्धउ जाणहु वालु मारिओ ।। धाइय तासु जसोय विसंठुल। करयलजुयलपिहियचलथणयल । वद्धः उक्खल मेल्लिव घल्लिउ । महु जीविएण जियहि सिसु बोल्लिउ । फणिणरसुरहं मि अइअइसइयउ हरि मुहि चुंबुधि कडियलिउ । कि खरेण कि तुरए दर छुहवि छूकर । पीलियो पीड़ित । मोडियो-मोड़ दिया। इ-पुलिराइ नदी के किनारे । पारिणय-हारिहि-पनहारिनों ने । तुम्हारिस णारिहि- तुम्हारी जैसी स्त्रियों से । जायउ उत्पन्न हुआ । ६. विसंठुल-अस्तव्यस्त । अइअइसइयउ अति-अतिशयित=अत्यन्त बढ़ चढ़ कर । परियउ टटोले: छुए । अरिठ्ठदेउ अरिष्ट देवता । विपवेसे वृष के १२४ मायइ सयल अंगु परिमट्टर। अण्णहिं दिणि रच्छहि कीलंतहु बालहु बालकील दरिसंतहु । दुठ्ठ अरिदेउ विसवेसे। श्राइउ महुरावइ आएसें । वृषभ रूप में अरिष्ट देव का अागमन- सिंगजुयल संचालिय गिरिसलु । खरखुरग्ग उक्खयधरणीयल । सरवरनेल्लिजालविलुलियगलु कमणिवायकंपावियजलथलु । गज्जियरवपूरियभुवणंतरु । हरवरवसहणिवहकयभयजरु। ससहरकिरणणियरपंडुरयरु । गुरुकेलाससिहरसोहाहरु। किर झड णिविड देइ आरोप्पिणु ता कण्हे भयदंडे लेप्पिणु। मोडिउ कंठु कड त्ति विसुिदहु को पडिमल्लु तिजगि गोविदहु । घन्ता ओहामियधवलु हरि गोउलि धवलहिं गिज्जइ । धवलाण वि धवलु कुलधवलु केण ण थुणिज्जइ ।।६।। रूप में । उक्खय-उखाड़ लिया है । कमरिणवाय " थलु-पैरों की चोट से जल थल को कंपा देने वाला । ग्रोहामियधवलु -बैल को पराजित करने वाले । धवलहि-धवल गीतों से । थुपिज्जइ-प्रस्तुत की जाती है ।
१२५
(१०)
मां यशोदा की प्रतिक्रिया-
दु
ई
दुवई
ता कलयलु सुणंति गोवालह पणयजलोहवाहिणी ।
सुयविलसिउ मुणंति णिग्गय णियगेहहु णंदगेहिणी ।।
भणइ जण णि ण दुआलिहि धायउ
पुत्तु ण रक्खसु कुच्छिहि जायउ।
किह वलद्द मोडिउ ओत्थरियउ
दइववसें सिसु सई उच्चरियउ ।
हरिखरवसहहिं सहुँ सुउ जुज्झइ
जणु जोवइ महु हियव डझइ ।
केत्तिउ मई कुमार संतावहि
आउ जाहुं घरु बोल्लि भावहि ।
तेयवंतु तुहुपुत्त णिरुत्तर
रक्खहि अप्पाण करि वुत्तउ ।
परमहि भडकोडिहि आरूढउ
बाहुबलेण वालु जणि रूढउ ।
महुरापुरि घरि धरि वणिज्जइ
णंदगोट्ठि पत्थिवहु कहिज्जइ ।
तहुदेवइमायरि उक्कंठिय
पुत्तसिणेहें खणु
विणसंठिय ।
गोमुहकूबउ सहउ वउत्थी
१०. रिंगशुगेहहु-अपने घर से । दुअआलिहि-दुष्काल में । कुच्छिहि-कोख में ।
वलद्ध-वैल। गंदगोठ्ठि-नन्द की गोठ में । देवइमायरि-मां देवकी।
१२६ लोयहु मिसु मंडिवि वीसत्थी। चलिय गंदगोउलि सहूं णाहे. सहं रोहिणिसुएण चंदाहें . घत्ता मायइ महुमणु बहुगोवई मज्झि णिरिक्खिउ । वयपरिनेढियउ कलहंसु जेम श्रोलक्खिइ ॥१०॥ कृष्ण की गोपमंडली का देवकी और बलराम द्वारा रवागत- (११) दुवई हरि भुयजुक्लदलियदाणवबलु णवजोवणविराइयो । उग्गइपउरपुलय पडहच्छे बसुएवेण जोइओ ॥ भायर सिसुकीलारयरंगिउ हलहरेण दिठिइ प्रालिंगिउ । भुयजुयल पसरंतु णिरुद्ध जायउ हरिसे अंगु सिणिद्धउ । चिंतिव तेण कंसपेसुण्णउ आलिंगगु देंतेण ण दिएणउं । गादसिणेहवसेण णतइ उक्कंठिय उत्कंठा से भर गई । गोमहुकूवउ-गोमुख कूप नाम का प्रत । वउत्थी-व्रतस्था । ११. सिसुकीलारयरंगिउ-शिशु क्रीड़ा की धूल से रंगे हुए। सिरिणद्धउ स्निग्ध । कंस पंसुण्ण कंस की दुष्टता | प्राणाविय ले आई। अल्लय-खाद्य चीजों १२७ आणाविध रसोइ गुणवंत । गंधफल्लदीवउ संजोइस भोयणु मिट्ठ मायइ ढोइउ । अल्लयदलदहिंओल्लियकूरहिं मंडयपूरणेहिं घियपरहि । णाणाभक्खविसेसहिं जुत्त सरसु भाविभूणाहे भुत्त। सिरि णिवद्धवेल्लीदलमालहं कंचणदंड दिएण गोवालहं। सुण्हइ मउदेवंगई वत्थई भसणाई मणिकिरणपसत्थई । पुणु जणणिइ तिपयाहिण देतिइ तणयहु उप्परि खीरु सर्वतिइ । पोरिसरयणणिहि गुणगण विभावियवासउ । कुलहरलच्छियइ णं सई अहिसित्तउ केसउ ॥११॥ के नाम । सुण्हई-सूक्ष्म । मउदेवंगई-रेशमो दिव्य वस्त्र । तिपयाहिरा तीन प्रदिक्षणाएं।
१२८ ( १२ ) गोवर्धन उठाना- - दुवई ता सुरखेयरेहि दामोयर यासारत्त धणो । गोवद्धणु भणेवि हक्कारिउ कयगोजुद्दबद्धरणो । कण्हें बाहुदंडपरियरिडउ गिरि छत्तु व उच्चाइवि धरियउ । जल पवहंतु जंतु ण उिवक्खर धारावरिसे गोउलु रक्खि । परउवयारि सजीविउ देतहं दीशुद्धरणु विहूसणु संतह । पविमल कित्ति भमिय महिमंडलि। हरिगुणकह हुई आइंडलि । कालि गलतइ कतिइ अहियइ कलिमलपंकपडलपविरहियई । महुरापुरबरि अमरहिं महिया अरहंतालइ रयणइणिहियई। तिण्णिा ताई तेलोक्कपसिद्धई खटकारदेहसुहणिद्धई । तं रयणत्त कहिं मि णिरिक्खउ' पुच्छिउ कंसें वरुणे अक्खि। १२. वासा-वर्पा को रात को रोकने वाले । गोवद्धणु-गोवर्धन । हुई हुई । अक्खि उ कहा । वरुण-कंस के ज्योतिषी ने । पाऊरइ-आपूरति । दाव- १२६ णायामिज्जइ विसहरसयणे जो जलयर आऊरइ वयणे । जो सारंगकोडि गुणुपाव सो तुझु वि जमपुरि पहुदावइ । घत्ता उग्गसेणसुयणु विहुरंधरासि तारिव्वउ । तेण णराहिवइ जरसिंधु समरि मारिव्वउ ॥१२॥ (१३ ) दुवई भाणु सुभाणु णाम विसकंधर वरजरसिंध णंदणा। संपत्ता तुरंत जउणायडि थिय खंचिय ससंदणा ।। मथुरा के लिए कूच- अरिकरिदंतमुसलहयकलुसिय जइ वि तो वि अरविंदहिं वियसिय । काली कंतिइ जइ वि सुहावइ तो वि तंब जणधुसिणे भावइ । जइ वि तुरंगहि चवलहि वच्चइ तो वि तुरंगहं साण पहुच्चइ । जइ वि तीरि वेल्लीहर दावइ तो वि ण दूसहं संपय पावइ । पविउलु दिउ सिविरु पमुक्क देता है । सारंगकोडि-घनुष्कोटि । तारिव्वउतारेगा। मारिन्वउ मारेगा। १३. सिविस शिविर ।
१३० गोविंदु साणंदु पटुक्कर। तरणकयवलयचिसियथिरकर चाणकारण्यारि कुसुमरयापिंजरू । ससुसिरवेगुसहमोहियजणु, काणग्ण धरणिधार मंडियता। फूरणिवंधणोढियकंदलु कंदलदलपोसियमहिनीउल । घत्ता गुंजाइलजडियदंडयविहत्थु संचल्लिउ । महिवइतणुरुहेण आसण्णु पदुक्कउ बोल्लिउ ॥१३|| ( १४) दुबई भो आया किमत्थु किं जोयह दीसह पवर दुज्जया । पभणइ णंदपुत्त के तुम्हई कहिंगंतु समुज्जया । नन्द गोप का आत्म परिचय- अम्हई णंदगोव फुडु वुत्त आया पुच्छहुँ भणहुणिरुत्त । भणइ सुभाणु जणणु अम्हारउ अद्धमहीसरु रिउसंघारउ। ससुसिर""जगुः-सस्वर वेणु के स्वर से मोहित जन । काणण'''तशु-वनभूमि की धातुओं से मंडित शरीर । गुजाहल""विहत्थु-मूगों से जड़े हुए दंडें अपने हाथ में लिए हुए । १४. वृत्त-कहा । सुमाणु-जरासन्ध का बेटा । हालिउ-अहीर । तट पर । वच्चइब्रजति जाता है । वणं करिणयार वन कर कुसुमों की रज से रंजित शरीर। यमुना के वढ जाएसहु महुरापट्टणु संखाऊरणु फणिदलवट्टणु ! तहिं विरएवि सरासणचप्पणु कण्णारयणु लएसडं घणथणु । पुलयवसेणुग्गयरोमंचुय तं णिसुणिवि जोयंते णियभुय । हमि जामि गोविंदें भासिउ करमि तिविहु जं पईणि सि। तरुणि ण लहामि लहमि विहि जाणइ हालिउ कि नपधीयउ माणइ । तंणिसुणेप्पिणु वाले बालउ जोय कंसह अयसु व कालउ । माहवपयजुयल उदिछ सुभाणु रत्त । दिसकरिकुभयलु सिंदूरं णावइ छित्तरं ॥१४।। ( १५ ) दुबई णंदें णंदणिज्जु णियणंदणु ससणेहें णिहालियो । पाहुणयाइ जाहु सुयबंधुहु इय बजरिवि चालियो । अलौलिक सफलताए- तावग्गइ पारद्ध णिहेलणु तहिं मि परिट्टिः महिवइरक्वणु । मिलिय जुवाण अगोय महाबल पायपदरकंपाविद्यमद्दियल ।
को विरण संचालहजे था ते महमहणे जयसिरिकामें। उच्चाधि सुरकरिकरचंदादि पत्थरखंभरिगछिय भुयदंतहि । थरिवरगारपियरे परिमाणित दगोउ लहु जग्णरिणइ रणीणिउ । आउ जाहु हो पुत्त पहुच्चइ गोउलु सुण्ण सुइरु ण मुच्चइ । एव भरणेप्पिणु कण्हपयावें परिमुक्काइ ताइ भयभावें । मलवज्जिइ महिदेसि समाणइ पुणरवि तेत्थु जि ठाणि चिराणइ । आणिवि गोविंदु वि गोविंदु वि थियइ ताई दइउ जि अहिरादिवि । घत्ता सुपसिद्धउ भरहि सो गंदगोठ गुणराहहिं । पष्फयंत समहिं वरिणज्जइ वरणरणाहहिं ॥१५॥ १५. थामें स्थैर्य । उच्चाइवि-उठाकर । सुइरु-सुचिर ।
१३३३
(.१६ )
कृष्ण का प्रशस्ति-
कण्हेण समाणउ को वि पुत्तु
संजण उ जणणि विदवियसत्तु ।
दुद्धरभररणधुरदिएणखंधु
उद्धरिय जेण णिवढंत वंधु ।
भजिवि णियलइ गयवरगईइ
सह मारिगणीइ पोमावईइ ।
अहिणंदिय जिणवरपायरेणु
महुरहि संणिहियउ उग्गसेणु ।
कइवयदियहहिंरइ कीलिरीहिं
वोल्लाविउ
पहु
गोवालिणीहिं ।
पंगुत्तउपई माहव सुहिल्लु
कालिंदितीरि मेरउ कडिल्लु ।
एवहिं महुराकामिणिहिं रत्त
महु उप्परि दीसहि अथिरचित्त ।
क वि भणइ दहिउ मथंतियाइ
तहु मइ धरियउ उन्भंतियाइ।
लवणीयलित्त करु तुझ लग्ग
कवि भणइ पलोयइ मझु मग्ग ।
१६. कण्हेण समारणउ-कृष्ण के समान | विद्दवियसत्तु शत्रु का नष्ट करने
वाले । दुद्धरभ ररण कठोर भार वाले युद्ध की धुरी अपने कंधे पर उठाने
वाले । महुरहि-मथुरा में । कश्वइ-कितने ही दिनों तक । रइकोलिरीहि-
रत क्रीड़ा करने वाले ।गोवालरिणहि बोल्लाविउ पहु-ग्वालिनों ने प्रभु कृपण से
[३] धनपाल कुरुजांगल के गजपुर का नगर सेठ धनवइ । उसका पुत्र भविस, अकारण परित्यक्ता मां. कमला के साथ मामा के घर रहता है । सयाना होने पर वह, सौतेले भाई बंधुदत्त के साथ द्वीपान्तर में वाणिज्य के लिए जाता है; भाई उसे अकेला छोड़ कर साथियों के साथ बढ़ लेता है। कुमार भटक कर तिलकद्वीप जा पहुंचता है । जहां उसे प्रचुर सम्पत्ति के साथ भविस्यांनुरूपा मिलती है; लौटते में उन्हें फिर वंधुदत्त का काफिला मिलता है । वह उसका सत्कार करता है । वंधुदत्त फिर धोखा देकर, भविष्यानुरूपा को उड़ाकर, गजपुर जाकर, उससे विवाह करना चाहता है । दुःख का मारा भविस, मणिभद्र यक्ष की सहायता से गजपुर पहुंचने में सफल हो हो जाता है, वह दरबार में जाकर, अपनी फरियाद करता है । प्रस्तुत सन्धि में यही वर्णन है । दरबार में कुमार भविस का प्रतिवेदन रायंगणि गंपि पयडिवि गंपि पयडिवि दुट्ठहो दुच्चरिउ । तं निसुणहु जेम भविसयत्ति जसु वित्थरिउ । भविस का राजभवन के लिए कूच- दाइय दप्पुवंचु आयन्निवि माणकसायसल्लु मणि मन्निवि। हरियत्तहो संकेउ समासिवि कमलदलच्छि लच्छि संवासिवि । निययजरणेरिवयण संपेसिवि पुवावरसंकेउ गवेसिवि। वहु नवल्ल पाहुडई समारिवि १. रायंगरिग-राजा के प्रांगण में गंपि-जाकर । दाइय=दुण्ट सोत पुत्र ।
१३७ चंदप्पहु जिणवरु जयकारिवि । निग्गउ वणिवरिन्दु हहुवारहो भडथडनिवह विसमसंचारहो। जहिं गय गुलगलंति पिहु जंगम हिलिहिलंति तुक्खार तुरंगम । जहिं मंडलियसक्कसामंत निवडइ कणयदंडु पइसंतहं । गलइ माणु अहिमाणु न पुज्जइ नियसच्छंदलील नउ जुज्जइ । जहिं अमोहजट्टजालंधर मारुअटक्ककीररववधर । मरुवेयंगकुंगोराडवि 7 ज्जरगोडलाडकन्नाडवि । इयएमाइ अउव्व वसुधर अवसरु पडिवालंति.महानर। घत्ता सामंतसएहि जंसेवन्जइ रत्तिदिणु । तं रायदुवारु पिक्खिवि कासु न खुइइमणु ॥१॥ पाहुडइयाभृतञ्उपहार । पहुवारहो-राजा के द्वार से 1 पिहु-पृथु-विशाल नियमच्छंदलील-निज स्वच्छंद लोला । प्रमोट्ट-जट्ट-जालंधर-माख्य टक्क प्रादि प्रदेशों के नाम ।
'१३८ ( २ ) दरबार में उपहार देकर स्थान ग्रहण करना- तं भडथडवमालु आसंधिवि तन्निवि सीदवार गउ लंधिवि । दिछ नरिंदत्थाणु दुसंचरु साबलेवनरनिवह निरंतरु । नरवइ सव्वावसरपरिदिउ दिठ्ठ कणयसिंहासणि संठिउ । परिमिउ निविडतिविहपरिवारि जहिं ओसासु वि नउ सिगारि।. तं अत्थाणु अलीढइ लंघिउ पुणु पहुपायमूल आसंधिउ । करिवि पणाउ पणयसिरकमलिं पाहुडु पुरउ समप्पिउ अमलिं । किउ सम्माणदाणु संभासणु सइ राइ देवाविउ आसणु । चामरगाहिणीउ अवलोइड पहुपरिवारु सयलु आमोइउ। घत्ता तो भणइ नरिंदु करहिं वयणु संखेवगउ । सो आणमि इत्थु जेण समउ संबंधु तउ ॥२॥ २. कासु भणु न खुट्टइकिसका मन क्षुब्ध नहीं होता। नरिदत्यागु-राजा का स्थान । पाहुड-प्राभृत- उपहार । अमलि-स्वच्छ । सई-स्वयं । देवाविउ- दिलाया। पामोइउ-ग्रामोदित-प्रसन्नः।
१३६
(. ३ )
धनबइ को बुलाए जाने की राजा से प्रार्थना और विवाह के कारण
धनवइ की आने की असमर्थता--
तो करकमलकयंजलि हत्थे
पहु विन्नविउ विणयसुकयत्थे ।
पुर पउरालंकारनियत्तें
धणवइ कुक्कावहो सिउ पुत्त ।
तं निसुणेविणु वयणु कुमारहो
लहु आएसु दिन्नु पडिहारहो।
पहुआएसिं सोवि पधाइउ
धणवइ पुत्तसहिउ निज्माइउ ।
आवहु पउरु लएविणु सारउ
राउलि अस्थि तुम्ह हक्कारउ ।
वाइउ कोवि आउ सुनिवद्धउ
तहु तुम्दहं समाणु संबंधउ ।
पभणइ रायसिटिठ अविसन्न
अम्हहं निरु विवाहु आसन्न ।
राउलि पउरकम्म संखेव्बउ
वित्तइ पाणिग्गहरिण करिव्वउ ।
तिं वयणि विणियत्त अखेइउ
वयण गंपि नरवइहिं निवेइउ ।
सिठ्ठि विवाहारंभि समाउलु
न सरइ खणु वि सरंतहो राउलु ।
३.. निझाइउ देखा । राउलि राजकुल । हक्कारउ-बुलाया । वाइउ वादी ।
सम्बंध-सम्बन्धी । पउरकम्म-प्रवर कर्म। समाउल-समाकुल ।
. १४० धत्ता तो क्यणु फुरंतु भविसयत्तु विन्नवइ पहु । पइसंतहो इत्थु फुसमि . विवाहारंभु तहु ॥३॥ धनवइ को दरवार में उपस्थित होने के कठोर आदेश (४) तं णिसुणेवि चमक्किउ राण पहु आएसु सकक्खडमाण । पेसिउ कुरुडु समच्छरु दूवउ सोवि ताहं आसन्नीहूवउ धणवइ सयलु कज्जु आमिल्लहो। सहं पउरि राउलि संच्चलहो। तं निसुणेवि सिटिंठ आहल्लिउ कक्खडवयणवियपि सल्लिउ । सम्माणिवि दृवउ बइसारिउ अप्पुणु बंधयत्तु ओसारिउ । दीसइ कारणु किंपि असारउ अइकक्खडु राउलि हक्कारउ । जइ परएसि किंपि किउ कुच्छिउ तो कहि करहं कज्जु को रणच्छिउ । पइसिवि राउलि समउ सहायहो पहु परिओसहुँ लग्गिवि पायहो । ४. चमविकउ-चौंक गया । कुरुडु-कठोर । समच्छरु-समत्सर । आसन्नी हूवउ- सन्नी भूत । बइसारिउ बैठाया । अोसारिउ हटा दिया । कुच्छिउ== कुत्सित । फुड-स्फुट । ।
१४१ घत्ता फुडु कारण किंपि महु नियमणि उत्पन्नु भउ । एहइ दूएण नउ हक्कारिउ कहिंमि हउ ॥४॥ धनवइ की अपने पुत्र बंधुदत्त से पूछताछ तं निसुणिवि परिचिंतइ दाइउ पंचहं सयह मज्झि को वाइउ | जंपइ मम्मच्छेय सहुं राए करण गहण महु तेण वराए । दुक्काम तेण समउ इक्कंतर इउ चिंतंत दिन्नु पडिउत्तरु । चंगउ वयणु तुम्ह परिपुच्छिउ मई परएसि काई किउ कुच्छिउ । घरि अप्पणइ ताम कलि किज्जइ पच्छइ पुणि राउलि पइसिज्जइ । पंचहिं सयहिं समउ जंपतड तेण समाणु गणंति विढत्तउ। कोवि राउलि पइठ्ठ पहु रंजिवि चंछइ तं सम्माणु विहंजिवि । जइ तं ताहं विहंजिवि दिज्जइ तो वि राउलि वि नाहि पइसिज्जइ । ५. मम्मक्छेय-मर्म का रहस्य । वराए' वेचारे ।
१४२ कवणु गहणु किर एहिं वरायहिं काउरिसह अइठ्ठ पडिवायहिं । भजिवि पंचसयहिं जो पम्मुहु पइसिवि राउलि काहं परम्मुहुँ। घल्लिवि पंच वि सय दंडाबहु जो जंपइ तहो सिरु खंडाबहु । घत्ता तो भरणइ पुरेसु वट्टइ ताम एउ करहु ! रायंगणि गंपि पिसुणहो पिसणत्तणु हरहु ॥५॥ ( ६ ) निवड की पुत्र के साथ राज दरबार में उपस्थिति- तो नंदणपवंचमोहियमइ सयलु पवरु मेलावइ धणवइ । गउ राउलहो गस्यसंखोहिं अमुणिय कज्जाकज्ज विबोहिं । सहुं पुत्तिं पहुपुरउ परिट्ठिउ । साहंकारु विसारु अणिटि ठउ । थिउ नरवइ आवेसु धरेविणु भविसयत्त पच्छन्नु करेविणु । वणिव पण्यसगग्गिरु जंपइ प्रासंघइ राउलइ समप्पइ । प्रावेसु-ग्रावेश । प्रच्छन्नु करेविगु-पीछे करके, छिपाकर । विग्घु-विघ्न । पच्चवखु-प्रत्यक्ष ।
१४३
जइ अबराहु तोवि नउ जुज्जइ
जइ सुहि तो एहउ किं किज्जइ।
कज्जारंभि मणोरहवंतए
किज्जइ विग्घु पिसुणि पवहतए ।
विहसिवि बंधुयत्तु पडिवक्कइ
चंधुदत्त की चुनौती--
अम्ह रिद्धि जो सहिवि न सका।
सो पच्चरक्खु पुरउ वइसारहि
सुदिढवयणसंकडि पइसारहि ।
किउ पेसुन्नु जेण भयभीसिं
अंतर तुलमि अज्जु तहो सीसि ।
घत्ता
हुकार मुएवि भविसु परिट्ठिउ तहो समुहुँ ।
इहु सो पडिवक्खु करहि वयणु जइअस्थिमुहं ।।६।।
( ७ )
कुमार भविस की प्रति चुनौती--
--
-
तो हुंकारु करेवि सुनिभर
जोवइ समुहु जाम बहुमच्छरु ।
ताम्व कुमारहो वयणु नियच्छिउ
झत्ति विलीणु लहिवि नंपुच्छिउ ।
७. सुनिभरु:-सुनिर्भर ।
१४४ लज्जइ समुहं निवि न सक्किउ नियदुच्चरियई माणकलंकित नउ पडिवयणु करइ नउ पणवह मउलियवयणकमलु थिउ धणवइ । राएं पंच वि सय हक्कारिव कोक्किवि नियडि पुरउ वइसारिय। तेहिं वि भविसयत्तु अवलोइवि लज्जइ समुहुन सक्किउ जोइवि । पच्चारिय सयलवि भूवालिं अहो किं तुन्हि गिलिय कलिकालिं । मुहि सरलहं अभंतरि घोरह दीसइ तुम्ह चरिउ जं चोरहं । पहुवयणि अणि प्रोयणिउत्तहं पासेइउ सरीरु वणिउत्तहं । घत्ता छायाभंगि थोरपलंबुभियभुइण पियवयणु चवेवि मं भीसिवि घपवइसुइण ॥७॥ (६) पांच सौ वनिय पुत्रों का बयान- देव देव एयहं अविहावहं न करिव्वउ अवराहु वरायहं । कोक्किव=बुलाकर । कलिछलि कलिकाल से । अणियोयणि उत्तहं अनियोग में नियुक्त; बुरे काम में फंसे हुए । पासेइउ-प्रस्वेदित-पसीवा पसीना हो गया । छायाभंगिः-छायाभंग-कांति भंग । हु हुइ हो गयी । बुच्चइ- उच्चते-कहा जाता है । पुनहि-पुण्य से, भाग्य से । हुअ-हुए।
१४५ जामहिं पहु अवहिए परिसक्का तामहिं भिच्चु धरेवि न सक्कइ । तो पुच्छिय पियवायए राए तेहिंमि कहिउ सयलु अणुराए । पुरउ परिट्ठिउ बिन्नि महंतर तेहिं निवेइय वाय निरंतर । अहो रायाहिराय परमेसर सम्हई कुलि जाणिज्जहं वणिवर । सुअउ न सुणहं न दिट्ठउ देक्खह किम एवड्डु वयणु तउ अक्खहं । जं किय एण कम्मु अवियारिउ तं जणवइ लज्जणउ निरारिउ । पियरितुल्लु जो बंधउ वुच्चइ । सो किम्ब वणि वंचेविणु मुच्चइ । ताहिंमि एहु पुन्नहिं न समत्तउ हुउ सकलत्तु महासियवंतउ । घत्ता अम्हइमि भवंत निद्धण निव्ववसाय हुआ। गय तं जि पएसु दुम्मण दुम्मारुएण धुत्र ।। ( ६ ) पांच सौ वणिक् पुत्रों का बयान- - तं पियवयणु चवंतहो आयहो खमि एण बहुविणयसहायहो ।
। १४६ णियसज्जणसमिद्धि दरिसाविय पंचवि सय भोयणु भुजाविय । सम्माणिवि परिहाचिय वत्थई निययधणहो भरियई वोहित्थई । पुणरवि सअणु तहिं जि घल्लेविणु आयउ अतुलु महाधणु लेविणु। अह पहु परउ एउ किम्व सीसइ छेयंतरि पेसुन्न होसइ। बिन्नवि तुहं मणनयणाणंदण कमलाएविसरूवहि नंदण । होसई तं जि तेम घरि तुम्हई वज्जदंडु निवडेसइ अम्हहं। तं निसुणिवि विहसिउ नरनारि पियसुदरि वरविलयहिं अवलोइउ सों पहुपरिवारिं जोइउ । घत्ता आलिंगिउ लेवि राए नेहनिरंतरिण । अद्धासणु दिन्नु पुब्बसणह गुणंतरिण ॥६॥ (१०) राजा की भविस से बचपन की पहचान- पुणु पुणु पहु दरिसइ नियलोयहो अहो नवल्लु पडिवाइउ जोअहु । • -
१४७
एह सु धरणवइ पुत्त महंत
कमलहितगउ सुटु गुणवंतउ ।
मई कालंतरेण नउ नायउ
अहो लोयणहो दिन्तु अणुरायउ ।
बालउ इत्थु एहु कीलतउ
चरियई सुठ्ठ सुहावउ होतउ ।
पोढविलासिणीहं रुज्झतउ।
एक्किक्कई समाणु जुझत
बहुसिहारतार तोडतउ
सुनियत्थई वत्थई मोडतउ ।
सिंहासणसिहरोवरि थंतर
चुब्बिजंतु कवोलई खंतउ।
वड्ढिउ मामहं सालि असंगमु
बहुकालहो संजाउ समागमु।
एम्वहिं करमि तेम सविसेसणु
जेम कयावि न होइ अदसणु ।
तो पियसुदरीहिं अवलोइवि
थियनियदुहियहिं वयणु पलोइवि ।
धत्ता
तहिं काले सुमित्त राए तासु परिविय ।
सम्माणिवि लोय नियनियनिलयहं रछविय ।।१०।।
१०. पोढ विलासिनोई-प्रौढ़ विलासिनियों को । वहुसिर
हार तार ।
१४८ (११) घणवइ बंधुत्त रक्खाविय जणि गरुयावराह लक्खाविय । मंदिरि कडयमुद्ध संचारिय विहडपफड सरूव ओसारिय । भविसहो सयणबिंदि दिहि दरिसिवि परमुच्छवि घणु हियई परिसिवि । राए पउरूप मुहु वोल्लाविउ तुम्हहं एउ कन्जु संभाविउ । एहु सिटिठ पुरपउरि महंतरि आयउ चोरु छुहिवि कक्खंतरि । दिट्ट, तुम्हि धिद ठत्तणु आयहो तंपि करेवि चडिउ परिछेयहो। मंडिवि अंगु अतुलु भयभीसहो दरिसिय विहिमि संधि नियसीसहो । एवहिं थिय अयहेरि करेविणु जं किज्जइ तं भणह मिलेविणु। घत्ता तो भणिउ समूहु सिर विहुणइ धुम्मइ चवइ । अहो देखहो तुम्हि कम्महंतणिय विचित्तगइ ॥११॥ कम्महंतरिणय कर्मों की । विचित्तगइ = विचित्र गति ।
१४६ ( १२) तो भविस का सम्मान- कारणु परिचिंतिवि भारित मइवंतेहिं समुहुं ओसारित। करइ वयणु समवायसमुच्चई एडई कालि काई पहु बुच्चइ । जंपइ कोवि पुराइयकम्म अझ्यारिं पहु जाउ परम्मुह । भविसयत्त अहिए सम्मणि सद्धिवि छायाभंगहो आरिण। कोवि भगाई अविद्याणियखते अह अजुत्त कीवर वधुयन्ते । परिण विद्वत्त हरवि असारत किम बुच्च घणु गहु महार। अन्ने वृत्त पर माह अइकम्मदो किर बाई विवष्य । रिपित वृच्च जेण सिदिल मई पुचि मुन्न। एचहि वाणू परिचितित्रि कनु एक्कायाम, करत्रि लहु । पढिगादिवि सिदिन पुरा परि विनत्त पट्ट ॥१२॥ १२. योसारिटाया। पदयारि-प्रनिचार, प्रनिया, प्रावण । पणि वित्त मरेका कमाया ।
१५००
( १३ )
थाइवि पउरपमुहु पडिजंपद
देव देव पउरि विन्नपद।
धणवइ कुरुजंगलि विपहाणउ
तउ धरि सुटु, समुन्नयमाण।
सो अन्नायकारि जं वुच्चइ
तं पउरहो न मणाउ विरुच्चइ ।
जइ अन्नाउ तासु मणि भावइ
ता किं पुर पउरहो वि पहावइ ।
एक्कु सरीरु विभायहि हुत्तउ
तिहिमि ताहं सामन्तु
वंधुयत्तु चोरत्तणु पावइ
जइ अन्नहो धणु लेविणु आवइ ।
भाइहु पुगु अविहत्थु हरंतहं
दाइयमच्छरु हियइ धरंतहं ।
निग्गहु तुम्हि ताहं न करिव्वउ
परजीवावहारि जीवेव्वउ ।
विढत्तउ।
घत्ता.
परियाणिवि लेउ भविसयत्त अप्पणघण ।
आमिल्लहि सिट्ठि करउ पुत्तु पाणिग्गहु ॥१३||
१३. निग्गहु-निग्रह ।
(१४) पौर प्रबरों का निर्णय- जं विनत्त पउरसंघाए तंजि तेम पडिजिजउ राएं। वइसहु भविसयत्त बोल्लाबहु अवरुप्पर संतोसु करावहु । तो संगिलिउ पउरु अप्पाहिति घणवइ पत्तसहिउ पडिगाहिवि। अहो अहो भविसयत्त वहुमाण तुई अम्हहं भवालसमाग। वंधुयत्त जं लेविरण आय ते धणु धरि संवरिंभ विहायउ। जवणगहणि खित्त अणिोयहो तं अवराहु खमहिं पुरलोयहो। भाई कुमार कर्वजलि हप्थउ नहु निवजम्मु अज्जु सकयत्यउ। जं पुरलोए वयषु कराविउ करहु किंपि ज मयरहो भाविक जे गय तह सहाय ते पुच्छिवि पाणिग्गहणु करह पडियच्छिवि। पत्ता पुरु पुच्छ तेवि करहु कन्जुई लो नेदि मिलेवि तजिवि दिदीका ११४॥
१५२
( १५ )
गुज्झाचरण सीलसुनिउत्तहिं
दिढु समवाउ करिवि वणिउत्तिहिं।
सुअणत्तण गुणेण जं रक्खिउ
तंपि अभउ मग्गेविण अक्खिउ ।
अहो परपउरि केम साहारिउ
अज्जवि
एहु कज्जु निरु भारिउ ।
कहि विवाहु कहिं सुबंधुत्तहो ।
कहिं निव्वुइ समवाए गोत्तहो
एह वर जुबइ थाइ जा सारी
सा गेहिणि भविसयत्तहो केरी।
अहो परमेसरि माय महासइ
नामग्गहणि ताहि दुहु नासइ ।
काइन वृत्त एण दुवियप्
तोवि न चलिय सीलमाहप्पे ।
वुच्चइ तेही तारि पइव्वय
हुअ पच्चक्ख महाजयदेवय ।
धयवडु भग्गु भरिवि दुव्वायहो
हल्लोहसिउ चित्त संघायहो ।
झल्लोझल्लिउ सलिलु रयणायरि
सयलु वि जणु बुड्डतउ सायरि ।
ताहि सनासि एण साहारिउ
जामहिं बंधुयत्तु ओसारिउ ।
घत्ता
पणवंतइ लोइ जइ उवसमु न करंतिसइ ।
तो वुड्डई आसि हुअ सव्वहं खयकालगइ ।।१।।
गुज्झाचरण-गुत्थाचरण । सइ-सती ।
१५३ पांच सौ वणिक पुत्रों द्वारा-शोला अपहरण का गंभीर आरोप- बाप बेटे को हथकड़ियां जेल- एहावत्थजाय जणविंदहो वेलाउलि उत्तरिवि समुदहो। आए अम्हि धरिवि निरुतज्जिय थिय कुलक्रित्ति कलंकहो लज्जिम कहिंमि को वि काइमि न पयासइ । थिय भोयणु परिहरिवि महासई अम्हइ दुक्खु दुक्खु तन्हाविय । ओसहमित्त गासु गिन्हाविय आणेविणु सुहिसहयणहिं दक्खिय कन्नुकुमारि भणिवि जणि अक्खिय । पइसारिय घरि गरुय विहोए थिय संघट्ट करिवि पइसोए गंभीरत्तणेणं नउ अक्खइ अइहरि कुलहो कलंकर रक्खइ । एचड्डतरेण जा अच्छइ सा जि एहु परिणवइ वंछइ। सयरिणहिं तह विवाहु पारंभिड एत्थंतरि एरिसर वियंभिउ । तिलमित्तुवि जइ अलियउपायहो तो अम्हइ मिच्छित्त परायहो । निसुणेविणु वरिणउत्तहो वयणई थियईकन्त मंपिवि सहिसयाई ।
१५४ वड्ढिउ गरुआवेसु नरिंदहो जोइउ समुहु कुरुडभडविंदहो। ओसारेवि वेवि दिदु वंधहो अणुहवंतु फलु दुन्नयरंधहो। घत्ता गयउरु सविलक्खु अंसुजलोल्लियलोयणइ । सुहिसयणसएहिं घरि घरि कियई अभोयणइ ॥१६॥ . ( १७ ) प्रजा में प्रतिक्रिया- घरि घरि हट्टि हट्टि जणु जूरिउ भग्ग मडफ्फरु हियइ विसूरिउ । हा विहि जाउ सुछ विच्छायउ जं जम्महोवि न केणवि नायउ । हो राउलि पुरपउरे महायउ तासु मलित्त केम घरि अायंउ । जंपइ कोवि न एयहों अग्गें एउ सव्वु दुप्पुत्तहो सग्गें। कोवि चवइ परिड्डिय खेरउ एउ पवंचु सरूवहि केरउ । भविसयत्तु वुल्लाविउराएं सहु माणिं वढिय अणुराए। करहि किंपि जं जुज्जइ आयह दुन्तयदोस विढंवियकायह। तं निसुणेविणु वृत्तुः कुमारि १५५ इउ लज्जावणिज्जु अइयारिं । अह अम्हहमि एउ किं जुज्जइ जं इउ एवड्डतरु किज्जइ। . घत्ता असमंजसु कज्जु... एहउ... किंपि समावडई । जं थोइलयंपि दुत्तरि दुप्पवंसिपडड ॥१७॥ .(-१८) निर्णय में परिवर्तन- मणमलित्त किं कासुवि भावइ अह पुवकिउ कम्मु करावइ । जामहिं कज्जु दुसंकडि आवइ तामहिं सुअणत्तणु न पहावइ । दुक्करु कज्जाकज्ज वियारह राउलि दप्पसाडु दुव्वारहं । जं पहुपुरउ वियारि न भंजइ तं इहरत्ति परत्तिवि छिज्जइ। एवहिं महु सम्माणिं जुज्जइ निक्कउ पुरपरिवाडिए किज्जइ । जइवि तुम्ह पहुसत्तिए छज्जइ तोवि सुरु जं पुरु पडिवज्जइ । तउ सम्माणु जइवि मईपाविउ पुरुअवराहि जइवि संभाविउ । तोवि मझु मणु एउ न माणइ नउ सोहइ विणु पउरपो आणई। न लहमि सुद्धि देहजणिगारिय
१५६
विमुहिं पउरि जणणि बंधारिय ।
हसइ नरिंदु पलंबियसाडई
सुहियउ होइ पगंचु किराडह
न चवहिं किंपि अणज्जु अवित्तहिं
न चलहिं एउवि इक्कु विण नित्तिहिं ।
घत्ता
।
सुणिवद्धनिओइ इहपरलोय विसुद्धमइ ।
धणवालवि होवि न करहि खणुविपमायमई ॥१८॥
१५८
विज्जिज्जमाणु चलचामरेहिं ।
लीलाविलास सुहसा मिणीहिं
गाइज्जमाणु वरकामिणीहि ।
कलयंठिराबकयहीलणेहिं
संथुब्वमाणु वंदीजणेहिं ।
गुणपउररायतग्गयमणेहि
सेविज्जमाणु णायरजणेहिं ।
परलोयकज्जे उज्जुवगई हिं
सलहिज्जमाणु सज्जणमईहिं
अवरेहिं वि लोयहिं कलियमाणु
गउ सुदरु पुरवरे जणसमाणु।
घत्ता
सो पुरवरणारिहिं गुणरिणलउ पइसंतउ दिउ णयरेकह ।
णं दसरहणंदणु तेयणिहि उज्झहिं सुरणारीहिं जह ।।
(२)
पुर वनिताओं की प्रतिक्रिया-
तहिं पुरवरि खुहियउ रमणियाउ
झाणद्वियमुणिमणदमणियाउ ।
क वि रहसई तरलिय चलिय चलिय रणारि
विहडफ्फड संठिय का विवारि ।
किया जाता हुआ, चंचल चामरों से जिस पर हवा की जा रही है ।
संथुन्वमाणु प्रत्युत, चारण, जिसको स्तुति कर रहे हैं। उज्जुवगईहि-सीधी
गति वाले ।
२. झारगठ्ठियमुरिण " याउ-ध्यान ये स्थित मुनियों के मन का दमन करने वाले ।
१५६ क वि धावइ णवणिवण हलुद्ध परिहाणु रण गलियउ गणइ मुद्ध । क वि कज्जलु बहलंउ अहरे देइ णयगुल्लए लक्खारसु करेइ । णिग्गंथवित्ति क वि कडिहिं लेइ । कवि णेउरु करयलि करइ बाल यिवरीउ डिंभु कवि कडिहिं लेइ सिरु छंडिवि कडियले धरइ माल । णियणंदणु मष्णिवि क वि वराय मज्जारु ण मेल्लइ साणुरायः । क विधावइ णत्रणिउ मणे धरंति विहलंघल मोहइ धर सरंति । घत्ता क वि माणमहल्ली मयणभर करकंडहो समुहिय चलिय । थिरथोरपओहरि मयणयण उत्तत्तकणयछवि उज्जलिय ।। ( ३ ) राजप्रसाद का वर्णन और स्वाकत- रणवरज्जलेभरंजियहिएण करकंडईपरे पइसंतएण। गयरबंधे चडिन्णय जंतएण णिउ राउलु लीलए पत्तएण । तें दिट्ठउ रायणिकेउ तुगु रहसई हपं से । परिहाणु-परिधान ! ३. तुण = ऊंचा । हिमवतुसिगु-हिमालय का शिखर । घयवडवमालु-ध्वजपों
१६०
अइमणहरु णं हिमवंतसिंगु ।
मुत्ताहलमालातोरणेहिं
णं विहसइ सियदंतहिं घणेहिं ।
किंकिणिरणतु धयवडवमालु
णं णच्चइ पणयिणि विहियतालु ।
चामीयरमगिरयणेहिं घडिउ
णं सग्गहो अमर विमाणु पडिउ ।
तहिं पइसइ णवणिउ विमलबुद्धि।
पारंभिय गुरुयण मणविसुद्धि ।।
करहेमकुभु मंगलु करंति
कवि माणिणि णिग्गय ता तुरंति ।
परिमंगलु किउ वरदीवएहिं
जय कारिउ पणु णारीसएहिं ।
सोवण्णकलसकय उच्छवम्मि
पइसाहिउ सो शिवमंदिरम्मि ।
घत्ता
सो सयलगुणायरु सीलणिहि विणयभावसंजुत्तउ ।
सामंतमंतिजणपरियरिउ पुरिअच्छइरज्जु करतउ ॥
( ११)
ताह तेण वि
रज्जु करतएण
आणाविय वंस तुरंतएण ।
से व्याकुल । सग्गहो स्वर्ग से ।
१६१ - सुशासन और लीलावती के पट चित्र का दर्शन पूर्वराग- आएसबसेण व जे धरिय धयअंकुसछत्तहं दंड किय। आसावसेण जो तहिं जि ठिउ पुणु आणिवि दियवरु मंति किउ । ता एक्कहिं दिणि करकंडएण वरलीलए णयरे भमंतएण । देसंतरु जो हिंडंतु पत्तु . तहिं दिट्ठउ सो णरु ललियगत्तु । पुणु दिट्ठउ तहो करे पडु विचित्त जो मोहइ लोयह तणउ चित्तु । सो भणियउ करकंडईणिवेण पडु अप्पहि देक्खहुँ सहुँ हिएण । ता तेण समप्पिउ पत्थिवासु जणु रत्तउ अणुराएण जासु। सो पंचवएणु गुणगणसहंतु करकडइ जोयिउ पडु महंतु । तहिं रूउ सलक्खणु तेण दिट्ठ णं मयणवाणु हियवएं पइट्ठ ।. मुहकमलु सउण्हउदीहसासु जरु दाहु अरोचक हुयउ तासु । घत्ता करकडइ जोइउ पड़ पवरु थिउ हियवए विभिउ एक्कु खणु । जणे पुलयई कहियउ तहो विरहु तें मडजिउ णवणि उ विमणमणु ॥ ४. ललियगत्त ललितगात्र । दीहसासु-दीर्घ श्वास ।
१६२ ( ५ ) मदनावली से विवाह का प्रस्ताव- णिव हियउ मुणिउ पडधरणरेण वरु होइइ कएणहे एहु भरेण । इय मुणिवि तो वि पडिलविउ भाय पडु अप्पहि अम्हहं जाहुं राय । णउ छंडइ सो पड उल्लसंतु पुणु भणइ गरेसरु णीससंतु । महो सहयर अक्खु पयत्तएण पडु लेवि भमहि कज्जेण केण । आयरिणवि ते वयणाणुसारु तहो रायहो कहियउ पडिवियारु । एत्थत्थि देव सोरठ्ठ देसु सुरलोउ विडंबिउ जें असेसु। तहिं ण्यरु अत्थि गिरिणयरू णामु सुरखेयरणरणयणाहिरामु । तहि राउ अस्थि अरिसिरकयंतु । अजवम्मु गाउ अजियंगिकंतु । घत्ता तहे रूवकरंडी कलसरिय जा णयणपियारी णरवरहं । मयणावलि णामइ तेयणिहि सा हूई धीय मणोहरहं ।। सुनकर । पडिलविउ प्रतिलपित-प्रत्युत्तर दिया । प्रायपण वि-पाकर्ण्य पयत्तएण-प्रयत्न से । पडिवियार-प्रति विचार । सोरठ-सौराष्ट्र देश | रूप करंडी-रूप को खान ।
( ६ )
गीतों में करकंडु की प्रशंसा सुनकर मदनावली का उस पर अनुरुक्त
हो उठना--
मयणावलि सा एक्कहिं दिणम्मि
गय सहियहिं सहुणंदणवणम्मि ।
तहिं खेयर जणमणणयणइट्ठ
दोल्लहरि चडीरणा ताईदिट्ठ ।
गायंता गेयई मणहराई
कागलियई करकंडहो किराई।
गेयाइ मणोज्जईसा सुणेवि
धरणीयले णिवडिय तणु धुणेवि ।
विहलंघल गयकल झीणदेह
कसणम्मि पक्खि णं चंदलेह ।
वायाहयकेलि व कंपमाण
णिय सहियहिं घर सोएं समाण ।
समसीलहिं जणमणदुहहरीहिं
परिपुच्छिय विणए सहयरीहिं ।
विहलंबल किं हूई सहीए
अम्हहं कहि वहिणिए वच्छलीए ।
मोहेण वि सहियहिं सरलियाए
विरहाणलु अक्खिउ वालियाए।
६. दोल्लहरि दोलगृह । चडीणा-चढ़ी हुई। दिट्ठ दिखाई दी । गेयाई गीत ।
मणोज्जई = मनोज सुंदर । धुरणेवि-धुन कर । झोरादेइ-क्षीण देह ।
कसणम्मि पक्खि-कृष्ण पक्ष में । चंदलेह-चन्द्रलेखा वायाहय केलि व
१६४
घत्ता
जो गीयउ गायउ खेयरहिं मई सूव उ करकंडहो तणउ ।
तो तेण वियंभिउ महो हियउ पुणु चउदिसु लायउ रणरणाउ ।।
(७)
विवाह की स्वीकृति-
मई तुज्झ सहिए पायडिय वित्ति
जइ सक्कहि ता महो करि परित्ति !
विरहग्गिजालपज्जलियमाण
महोणासहिं जाव ण सहिए पाण ।
ता दुक्खु वहतिए णरवरासु
संखेवें अक्खिय वत्त तासु ।
करकंडगेयआयएणणेण
मयणावलि पीडिय कामएण ।
आयएणेवि बाल हे तणिय वत्त
राएण लिहाविय हरिणणेत्त ।
जयभूसण कुलगयणम्मि चंद
पडु अप्पिउ राए महो रणरिंद।
अरिदूसहमोडणमडसहाउ
हतुझ णयरे पड लेवि आउ ।
पडु पेक्खिवि गच्छइ मोह जो वि
बरु होइ णरेसर ताहे सो वि ।
घत्ता
मई एहउ पिसुणि उ तुम गिव एउ इत्तिउ तम्हामहो सरउ ।
सा कमलदलच्छी ससिवयण तउ करयलु करपल्लवे धरउ ।।
(८)
विवाह--
तही सुरिणवि वयणु पडधरणरासु
पडिवरिणउ राएं सयलु तासु ।
तें सरिसा कुलणहससहरेण
संपेसिय णियणर णिववरेण ।
दिवहम्मि पसरणए कयसहाय
मयणावलि लेविणु ते वि आय ।
किय हट्टसोह घरि तोरणाइ
संवद्धई तहो करकंकणाइ।
णाणाविह वज्जई वाइयाइ
गीयाई रसालईगाइयाई।
भावड्ढ णच्चई णच्चियाइ
गयतुरयह थट्टई खंचियाइ।
उग्घाडिउ मुहबडु विहिं जणाई
णं मोहपडलु तग्गयमणाहं ।
घयजलिअजलण भामरिउ सत्त
देवाविय भट्टहिं पढिविं मंत ।
करु वालहे अप्पिउ णववरेण
संपेसिय=भेजा । हट्टोह हट्टशोभा । वाइयाई चाय । भावड्ढई =भावार्ष।
थट्टई-समूह । उग्घादिउ-उघाड़ दिया । घय जलिय"सत्त-धो से जलती नाग की
१६६ किय सवहणाई दाहिणकरेण । भउ तारामेलउ णिविडु तेम जम्मे वि ण विहडइ णेहु जेम । पहिलारउ मिलियउमणुपसत्थु किउ लोयचारु जणरंजणत्थु । सुविसुद्धदिणहिं रंजियमणाई सामंतहिं कियउ विवाहु ताहं । घत्ता णरणाहहो हुयउ विवाहु तहिं सुर खेयर देक्खिविउल्लसिय । णियभोयहो उबरि विरत्तमणु तहोतणिय रिद्धिमणिअहिलसिय ।। (६) साध्वी रूप में मां का आगमन और आशीर्वाद- तहिं अवसरि पोमावइ वि माय णियणंदणु देक्खहु तुरिय आय । सा दिली करकंडे णिवेण पुणु पणमिय भावे णवणवेण । णियपुत्तविवाहें हरिसियाए आसीस पदिएणीतुरिउ ताए । चिरु जीवहि णंदण पुहइणाह कालिदी सुरसरि जाव वाह । वइसारिय विणए सा णवेवि दिगु अज्जु सहल एहउ भणेवि । । देवाविय-दिलाकर । सात भावरें (फेरे) सवहरणाई-शपथें । अप्पिउ-अपित करदी ।
१६७ सम्माणिय वयणहिं कोमलेहिं परिहाविय वत्थहिं उज्जलेहिं । आसीस देवि सा गय तुरंति करकंडकित्ति णं विप्फुरंति । ता एत्तहिं जणमणजणियराउ करकंड पुरउ पडिहारु आउ । घत्ता करकमल णिवेसिवि सिरकमले पडिहारु पयंपइ पुटुसरु । चंपाहिवरायहो दूर णिव सो अच्छइ सिंहवारम्मिवरु ॥ (१०) चंपा नरेश के दूत का संदेश- तं सुणिवि वयणु करकंडएण पडिहारु पउत्तउ तुरियएण । लइ जाहि तुरिउ सो सुहहु जेत्थु चांपाहिवदूवउ आणि एत्थु । तं रायहो वयणु सुणेवि तेण लहु आणिउ सो पडिहारएण । सो देक्खिवि दूवउ राणएण संमाणिउ दाणई आसणेण । संसिद्धी मेइणि सयल जासु भणु कुसलु दूव चंपाहिवासु । ६. तुरिय शीघ्र । प्राय-याई । परिहाविव=पहनाए । १०. सिंहवारिम्म=सिंह द्वार पर । प्रणवरउ-अनवरत । विहियसेव-विहित १६८ दूवेण भणिउ तहो कुसलु राय पई जेहा अच्छहिं जसु सहाय । अणवरउ गरिंदहिं विहियसेव सो सुमरइ तुम्हहं देवदेव । जह जलहं ण भिण्णउ सीयलत्तु तह चांपणरिंदहो तुहुणिरुत्तु । घत्ता लइ पालहि णिव करकंड तुहु चंपाहिवरायहो केर वर । होएविणु एक्कई वे वि जण अणुहुजहु तुम्हहं भोय धर ।। ( ११ ) करकंड का प्रत्युत्तर- विणु केरइ लभइ णाहि मित्त एह मेइणि भुजहुँ हप्थमेत्त। ण वि पालहि जइ पुणु सेत्र तासु तो ठाउ करहिं अह कहिं मिणासु । तं सुणिवि वयणु करकंडएण तें हियवए कोहु धरंतएण। आयबरायण भालयले णीय णं चंददिवायर सरिग ठीय । . जाजाहि दूव तउ सामि जेत्थु तखणु वि एक्कु मा वसहि एत्थु । सेव । सीयलत्त = शीतलता । केर=आज्ञा । पायंवरणयंव=आताम्र नेत्र । संखे--संक्षेप । भडावलेउ-याह का अहंकार । ।
१६६ वें कहि पाहिवासु हउ आयउ तुरियउ तुज्झ पासु । जइ संगरि अस्थि भडावलेउ संगासु मज्झु ता तुरिउ देउ । इउ सुरिणवि वयणु गउ दूउ तेत्थु सिरिधाडीवाहणु वसइ जेत्थु । घत्ता तें कहियउ दंतीपुरिणिवई सो वई देव ण वि णवइ । संगामरंगि तुम्हेंहिं सहुँ अइजुज्झइ धीरउ इउ लबइ ।। ( १२ ) चंपा नरेश की तैयारी और करकंडु का कूच- तं सुणिवि वयणु पाहिराउ सण्णज्झइ ता किर बद्धराउ । तावेतहिं दंतीपुरिणिवेण कंपाविय मेइणि मंदरेण । णिण्णासिय अरियणजीवएण उड्डाविय दहदिसि रय रणेण । गहु छायउ खलियउ रवि रएण लहु दिण्णु पयाणउ कुद्धएण । गंगापएसु संपत्तएण गंगाणइ दिट्ठी जंतएण। १२. सण्णभइसनंद्ध होता है । बद्धराउ बद्धराग । उड्डादिय-उड़ाया। खलियउ स्खलित हो गया। पयाणु दिण्णु-प्रस्थान किया । प्राइच्वहो १६८ दूवेण भणिउ तहो कुसलु राय पई जेहा अच्छहिं जसु सहाय । अणवरउ गरिंदहिं विहियसेव सो सुमरइ तुम्हहं देवदेव । जह जलहं ण भिण्णउ सीयलत्त तह चांपणरिंदहो तुहुणिरुत्तु । घत्ता लइ पालहि णिव करकंड तुहु चंपाहिवरायहो केर वर । होएविणु एक्कई वे वि जण अणुहुजहु तुम्हहं भोय धर ।। ( ११ ) करकंड का प्रत्युत्तर- - विगु केरइ लभइ णाहि मित्त एह मेइणि भुजहुँ हप्थमेत्त। ण वि पालहि जइ पुणु सेव तासु तो ठाउ करहिं अह कहिं मिणासु । तं सुणिवि वयणु करकंडएण तें हियवए कोहु धरंतएण। आयंबरायण भालयले णीय णं चंददिवायर सगि ठीय । जाजाहि दूव तउ सामि जेत्थु तहु खणु वि एक्कु मा वसहि एत्थु । सेव । सीयलत्तु = शीतलता । केर=आज्ञा । ११. प्रायबरणयंव-प्राताम्र नेत्र । संखेवें-संक्षेप । भडावलेउ-याह का अहंकार ।
१६६ कहि नराहिवासु दई प्रायः तुरियः नुमन्न पातु ! जइ संगरि अस्थि भावले संगासु नम्भू ता तुरित दे। इन सुणिवि वयगु गर दून तेत्यू सिरियाडीवाणु वसइ जेत्यु । घचा त कहिया वंतीपुरिल्बिई सो वई देव रण वि णबड़। संगानरंगि तुम्हेंहिं सहुँ अन्तः वीरः इत्र लवइ ।। चंपा नरेश की तैयारी और करकंड का कृच- तं सुशिवि वयगु चांनाहिरात सुण्ण ना किर वट्टरा। नावेतहिं नीपुरिणिवेण कंपात्रिय नेइणि मंदरेण । गिण्णासिय अरिचणजीवएना उहाविय हदिसि रच रणेण । गदु कायर खलियर रवि रएण लट्ठ विष्णु पयाणउ कुपण । गंगापरसु संपत्तएण गंगागइ विट्ठी जंतरण। १२. गाई-मुन्द्र होता है । बार-बद्धराग । उहाविय-उड़ाया। वलियर-स्खनित हो गया। पावित्अन्यान किया । ग्राइचहो= आइच्चहो सा सोहइ सियजल कुडिलवंति णं सेयभुवंगहो महिल जंति । दूराउ वहंती अइविहाइ हिमवंत गिरिंदहो कित्ति णाई। विहिं कूलहिं लोयहिं ण्हतएहिं जलु परिदितएहिं। दभंकियउढहिं करयलेहि गइ भणइ णाई एयहिं छलेहिं। हउ सुद्धिय णियमग्गेण जामि सां रूसहि अम्महो उवरि सामि । एइ पेक्खिवि णिउ करकंडणामु गउ जणणणयरु गुणगणियधामु । घत्ता ने संगरि सुरवरखेयरहं भउ जणियउ धणुहरमुसरहिं । ते नेढिउ पट्टणु चउदिसिहिं गयतुरयणरिंदहिं दुद्धरहिं ।। ( १३ ) चंपा नगरी का घिराव- तं नदिउ जा राएण तेशु ता आउलि पुरयणु हुउ खणेण । णरणाहहो कहिउ परेण केण उवरुद्धउ परवलु सयलु जेण । हे णरवइ परवलवणहुआस आदित्य का-सूर्य का । दंभंकिय= दूब से अंकित और उठे हुए । सुद्धियः-शुद्ध । १३. वेढिउ-घेर लिया। उपरुद्ध रोक लिया ।
१७१ वंदीयणसज्जण परियास। उदंडसुड गय गुलुगुलंत कुडिलाणण वरय हिलिहिलंत । संचल्लिय रहवर घरहरंत फारक्कहिं फुरियहिं फरहरंत । करवालकिरण रविकरहरंत नंकुडिय कउत्तल थरहरंत । छुरिएहिं कोत अइ विप्फुरंत पवणा इव ए संचरंत । सीहोर मदुद्धरु अइपयडु तुह उवरि पराइउ वहरिदंडु । घत्ता तं सुणिवि णरिंदहो सुहकमलु संजायउ रत्तप्पलसरिसु । डसियाहरु भूभंगुरणयणु कोहाणल वडिढउ गउ हरिसु ॥ ( १४ ) सैनिक प्रतिक्रियाए- ताव सो उडिओ धाइया किंकरा संगरे जे वि देवाण भीयंकरा । वाउवेया या सज्जिया कुंजरा चक्कचिक्कार संचल्लिया रहवरा । हक्क डक्कार हुँकार मेल्लंतया धाविया के वि कुताई गेण्हतया । के वि सम्माणु सामिस्स मरणतया पायपोमाण रायस्स जे भत्तया ।
चावहत्था पसत्था रणे दुद्धरा धाविया ते णरा चारचित्तावरा । के वि कोवेण धावंत कप्पंतया के वि उग्गिण्णखग्गहिं दिप्पंतया । के वि रोमंचकंचेण संजुत्तया के वि सरणाहसंबद्धसंगत्तया । के वि संगामभूमीरसे रत्तया सग्गिणी छंदमग्गेण संपत्तया । घत्ता चपाहिउ णिग्गउ पुरवरहो हरिकरिरहवर परियरिउ । उडचंडपीवरकरहिं भणु केहिं ण अणुसरिउ ।। (१५) द्वंद युद्ध- ता हयईतूराइ भुवणयलपूराइ। वज्जंति वज्जाइ सज्जति सेण्णाई। आरणाए घडियाए परबलइ भिडियाई। कुताइ भज्जति कुंजरई गज्जति । रहसेण वग्गंति करिदसणे लग्गंति । गत्ताईतुति मुडाइ फुट्टति ।
रुडाई धावंति अरिथाणु पाति । अंताई गुप्पंति रुहिरेण थिप्पति। हड्डाई मोडति गीवाई तोडंति ॥ घत्ता के वि भग्गा कायर जे वि णर के वि भिडिया के वि पुणु । खग्गुग्गामिय के वि भड मंडेविणु थक्का के वि रणु ॥ (१६) प वेटे का युद्ध- ता रोसें चपाहिउ गरिंदु रह चडिवि पधायउ रणं सुरिंदु । सो तुरिय गयउ परवलणिवासु अभिडियउ करकंडहो णिवासु । ता कलयलु वढिउ विहिं बलाई बाणावलिछाइयणहयलाहं । करकंडे कोहालणजुएण अइरावइ करदीहरभुएण। ता तुरियई चंपणराहिवासु ५. मंडेविण मांडकर, रचकर ।
१७४ सहसत्ति पमेल्लिय सत्ति तासु । रहु छिपिणउ चिण्हद्धउ खणेण पुरशु सारहि पाडिउ तुरिउ तेण । ता खेवें चंपणराहिवेण संपेसिय बाण तुरंतएण। सर पेसिय जा चंपाहिोण करकंडहो बलु भग्गउ खणेण । घत्ता करकडए पेच्छिवि बलु चलिउ मणि रोसु महंतउ विफरिउ । जा विज्ज पइण्णी खेयरई तहे पेसणु दिण्णउ तें तुरिउ ।। ( १७ ) विद्याओं का प्रयोग- - ताव तेणदुद्धरेण मुक्क विज्ज मच्छरेण । ता खणण विज्ज धिट्ठ धाविया तुरंत दिट्ट । फे क्करंति हक्कांति वाउनेय संचरंति । रक्खसी व वावरांति भासुरा विखे मिलति । कुभिकुंभ णिलंति रहवरेण रह दलंति । संग्गरम्मि जे वि दिट्ठ दसणेण ताहे णटठ। १६. अभिडियउ भिड़ गया ।
१७५
के वि मुच्छमोहियाई
के वि जोह जोहियाई।
के वि घायखंडियाई
के वि जीव छंडियाई।
घत्ता
ता कुवियईचंपणरेसरई तुरिएण वि असिलियकरे घरिय ।
जा विज्ज गिलंती गरसयई वलसत्ति खणद्ध तहे हरिय।।
(१८)
युद्ध की विश्वव्यापी प्रतिक्रिया-
-
गय विज्ज तट्ठीय
करकंडे दिट्ठीय ।
रोसं वहंतेण
करे धणुहु किउतेण ।
तहो चप्पे गुणु दिण्णु
तं पेक्खि जणु खिण्णु ।
ता गयणे गुणसेव
खोहं गया देव ।
टंकारसदेण
धोरें रउद्दे ण ।
धरणियलु तडयडिउ
तस कुम्मु कडयडिउ
भुवणयलु खलमलिउ ।
१८. तट्ठीय नष्ट हो गई।
D
१७६
गिरिपवरु टलटलिउ
मयरहरु झलझलिउ।
धरणिंदु सलवलिउ
खगणाहु परिसरिउ
सुरराउ थरहरिउ।
घत्ता
सो सह, सुणेविणुधणुगुणहो रह भग्गा णा गयपवर ।
मउगलियउ चंपणाराहिवहो भयभीय ण चल्लहिंकहिंखयर ।।
(१६)
मां का हस्तक्षेप
सुरलोयहं छुडु हियवउ विभिएणु
छुडु परबलु भयभीयउ णिसएणु।
संबद्धउ छुडु वइसाहथाणु
छुडु भग्गए चंपणरिंदमाणु ।
छुडु चाउ खणद्धे सज्जियाउ
छुडु सेयजलें गुणु मज्जियाउ ।
करकंडें गुणें किउ बाणु पवर
चंपाहिवेण ता मुक्कु अवर ।
हुउ बाणु णिरत्थउ सोहु जाव
पोमावइ संगरे पत्त ताव ।
सा दिट्ठीय तेण णरेसरेण
पुणु पणमिय दूरहोणयसिरेण ।
हे माए माए संगरे असन्झ
१६.
असज्झे-असाव्य ।
१७७ किं आइय तुहुँ भडनियरमज्झे । सा भणइ पुत्त संवरहि चाउ एहु धाडीवाणु तुझ ताउ घत्ता कहि माए महासइ गणणिलउ किमु ताउ महारउ विउ हवइ । ता ताई तुरंतई तहो कहिउ सुणि पुत्त महावल धरणिवइ ।। (६०) मिलन- चंपाउरिरायहो घरे रमणी हां होती जणवयमणदमणी । संजायउ जइयहु गम्भे तु उप्पण्ण उ तइ यहुदुक्खु महु । हां हरिवि णीय ता करिबराई दंतीपुरि बाहिरि दुद्धराई। तहिं जायउ भीममसाणि तुहु पईपेक्खिवि जायउ मज्झु सुहु। करकंडु णरेसरु एक्कु खणु तं सुणिवि वयणु थिउ विमणमणु । णियपुत्तहो अक्खिवि चत्तभया पुणु तुरियउ कंतहो पासेगया। सा दिट्ठीय चंपणरेसरेण गंगारगइणं रयणायरेण । २०. थुइ करेइ-स्तुति करता है ।
१७८
जाणतें एह पोमावइया
तो वि तेण सहावें सा णमिया ।
अह गरुवउ
जो
तें राणउ कंतहे थुइ करेइ ।
वयभरु धरेइ
घत्ता
परिपुच्छिय जपणराहिवई कह छुट्टिय तुहु तहो गयवरहो ।
ता कहियउ ताइ तुरंतियए णिवगयए पमुक्की तडे सरहो ।।
( २१ )
पद्मावती धाड़ीवाहन को पूर्व कथा सुनाती है--
तहो पासे ससाणए महो सुयउ
कुलमंडणु णंदणु सो हुयउ ।
परिपालिउ केण वि खेयराई
वउ लइयउ तहिं मईणिव भराई।
दंतीपुरिराणउ ता मुबउ
तहिं णयरे णराहिउ सो कियउ ।
सो जाणहि एवहिं तुह भिडिउ
तुहु कोह पिसाए परिणडिउ ।
मा मुज्झहि छंडहि एहु गहु
णिव णंदणु तेरउ एहु पहु ।
तं वयण सुणिवि चंपाहिवइ
संतुळउ तक्खणे सो हियई।
हूउ धण्णउ जसु एहउ सुयउ
२१. पज्जुरण = प्रद्युम्न । दामोयरिण-कृष्ण से । गिण्हहि मानो ग्रहण करो।
१७६ जो संगरे धीरउ दिढभुयउ । परिछंडिवि धणुहरु गालियसर करकंडपासु गउ णिवपवरु । घत्ता धाडीवाहणइ प्रालिंगिउ णंदणु सो खणिण । जह संगरे जाइवि तेयणिहि पज्जुएणु कुमुरु दामोयरिण ।। पुणु जाइवि ( २२ ) क्षमा याचना उपसंहार- करकंडइ वुत्तउणियजणणु पई सरिसउ जं मई कियउ रणु । मा गिण्हहि मेरउ देव छलु तं खमहि भडारा महो सयलु । तं सुणिवि वयणु चपाहिवई उल्लसियउ तक्खणे सो हियई। गउ लेविणु णयरहो सहुणिवेहिं पइसारिउ णाणाउच्छवेहिं । सा णयरी करकंडे सहेइ अमराउरि लज्जा तहो वहेइ । रणर रयणई लेविगु साणुराय शिवमंदिरे वद्धावणहुआय ।। ता दुद्धररायहं जो घरट्ट करकंडहो बद्धउ रायपटु । २२. खमहि-क्षमा करो । अमराउरि=अमरपुरी । बद्धावण बधाई हिययगंठि = हृदय की गांठ ।
१८०
पुणु अप्पणु राए तक्खणेण ।
तणु मंडिउ तवसिरिभूसणेण
कम्मट्ठठिणिगंठ्ठवणसारु ।
तउ चरिवि सुदुद्धरु काममारु
तणु छंडिवि खंडिवि हिययगंठि
सो लग्ग सिववहुतणए कठि ।
घत्ता
गउ धाडीवाहणु सिवणिलउ करणयामरवण्णउ गुणहं घरु ।
करकंडु करंतउ रज्जु पुरि सो अच्छइ माणिरिणहिययहरु ।।
[५] कवि धाहिल 'पूर्व जन्म की घनश्री ही वर्तमान जन्म में हस्तिनापुर के सार्थवाह प्रशोकदत्त की पुत्री पद्मश्री है। साकेतपुर के कुमार समुद्रदत्त से उसका विवाह होता है । विवाह के बाद, वह कुछ दिन, ससुराल में हो रहता है। फिर मां की बीमारी को खबर पाकर अपने घर जाता है। यहां पद्मश्री को भूल जाता है । वह वियोग में व्याकुल हो उठती है । एक सांझ, कुमार को वियोग में दुखी 'चकबी' को देखकर अपनी पत्नी की याद आती है; वह ससुराल पहुंच जाता है । शाम को पद्मश्री सजधज कर प्रिय से मिलने के लिये जाती है। ठीक इसी समय, पूर्व जन्म के अंतराय से एक व्यंतर देव चिल्ला उठता है, 'पद्मश्री तूने मुझे संकेत दिया था यह दूसरा कोन है।' यह सुनना था कि कुमार संदेह, क्रोध और धृणा से जल उठता है । पद्गश्री को मिलता है-भर्त्सना, अपमान के धूट और परित्यक्त जीवन । वह शेष जीवन धामिक पाचरण में विताने के लिये वाध्य है । 'उज्जोइउ भुयणु असेसु इ गरुय-राय-रंजिय-हियउ । अत्थवण-सिहरि रवि संठियउ संझा-बहु-उक्कंठियउ॥ (१) संध्या का चित्रण पद्मश्री का वासगृह में प्रवेश- अत्थमिउ दिवायरु संझ जाय लिय कणय-धडिय नं भुयण-भाय । कमलिणि कमलुन्निय-महुयरेहि अंसुएहि रुएइ सकज्जलेहिं । घत्ता--गरुय.राय ...... भारी राग से रंजित हुग्रा ।
१५२
सोआउरु मणि चक्काउ होइ
कउ मित्त-विनोउ न दुक्खु देइ ।
अंधारिय सयल-वि दिसि विहाइ
किलिकिलिय-भूय-रक्खस पिसाय ।।
तमु पसरिउ किंपि न जणु विहाइ
जगु गम्भ वासि निक्खित्त नाइ ॥
वोहंत कुमुय-वणु उडउ चंदु
कंदप्प-महोसहि-रुद-कंदु ।।
वणि जेम मदहु हत्थि-जूडु
नासेइ मियंकह तिम्ब तमोहु ।
हिरणंक-किरण-विप्फुरिउ भाइ
गयणंगणु धवलिउ नं छुहाइ ।।
निसि-पढम-पहरि उद्दाम-कामि
वासहरि कुमार मणभिरामि ।।
महमहिय-वहल-बरधय-गंधि
पंचन्न-कुसुममाला-सुगंधि ॥
रुणुरुणिय महुर-रवि भमर-लीवि
पज्जालिय-मणि-मंगल-पईवि ।
पउमसिरि सहिउ पल्लंकि ठाइ
सहियणु आणंदिउ घरहु जाइ ।।
घत्ता
नाणाविह-करण-विसेसेहि
सुर सोक्खई माणेउ कुमरु ।
१. अत्थवरणसिहरि-अस्ताचल के शिखर पर । संझ-संध्या
संध्या का चित्रण ।
। जाय-हो गई।
१८३ आलिंगिउ कंत पसुत्तउ नाइ स-विग्गहु पंचसरु ॥ (२) प्रभात का चित्रण- परिगलिय रयणि उग्गमिउ भाणु उज्जोइउ मज्झिम-भु यण-भाणु ।। विच्छाय-कंति ससि अत्थमेइ सकलंकह किं थिरु उदउ होइ ।। सूरह भएण नासेवि निहीणु गिरि-कंदरि विविर तमोहु लीणु ।। रेहहिं कमलायर पयड-कोस विलसंति मित्त किर विगय-दोस ।। मउलंति कुमुय महुयर मुयंति थिर नेह मलिण किं कह वि हुंति । मुणिवर करंति सज्झाउ माणु कुरलंति हंस निम्मलु विहाण ॥ नवकारु पढंति थुरणंति सिद्ध पउमसिरि कुमारि सहुं विउद्ध । गोसग्ग कज्जु सयलु इ करेवि गुरु-चलण-कमलु पणमंति वे वि ।। गउ सत्थवाहु निय-पुरि स-बंधु ठिउ कुमरु-तहि वरवसुहगंधु ।। २. प्रभात का चित्रण । गो सग्ग-कज्जु-सवेरे के सब काम । वेवि = दोनों । सोहग्गउ सौभाग्य । लावन्न लावण्य । विम्हिय मरणेहि-विस्मित मन से।
१८४
गाढाणराय पउमसिरि तासु
छाया व न मेल्लइ खणु वि पासु ॥
हरि-हियइ जेम्ब निवसेइ लच्छि
तिह सा वि कुमारह दीहरच्छि ।
पुवज्जिय जण-मण-हरण-दक्खु
माणंति जहिच्छइ विसय-सोक्खु ।।
घत्ता
सोहग्गउ लावन्नतं
पेक्खेविण विम्हिय-मणेहि।
सलहिज्जइ अणुदिणु लोएहि
हरिसुप्फुल्लिय-लोयणेंहि ।
( ३ )
ससुराल में पद्मश्री और समुद्रदत्त की दिनचर्या-
गुरु विविह-विणोई दियह जंति
अवरोप्परु राउसवई करंति ।।
कइय वि निय-अंग-पसाहणेण
कइय वि गुरु-चलणाराहणेण ।।
कइय वि जिणिंद-गुण-कित्तणेण
कइय
वि
साहूण
नमंसणेण ।।
कइय वि जिणधम्म-कहाणएहि
कइय वि रमंति उज्जाणएहि ।
३. पसाहणेग-प्रसाधन से । पेच्छणय पलोरणेग-प्रेक्षण-नाटक देखकर ।
साहम्मिय-भोयणेण-साथमि भोजन से । पन्होत्तराई प्रश्नोतर । बहुभेयइ'
१८५
कइय वि करति जल-केलि रम्मु
कइय वि लिहंति बर-चित्त-कम्मु ।।
कइय विपेच्छयाय-पलोयरोण
कइय वि साहम्मिय-भोयोण ।।
कइय वि पढन्ति पन्दोत्तराई
वहु भेयइ गूढ-घणक्खराई॥
भुजंतह मणहर विसय लट्ठ
संबच्छर वोलिय ताम अट्ट ।।
अह अन्न-दियहि नामि वराहु
साएयहि अविउ लेवाहु ॥
तिं चित्त लेहु वायइ कुमार
तहिं लेहि लिहिउ किर एउ सारु ।।
"लहु एहिं कुमार समुददत्त
तुहु विरहि विसंतुल जणणि पुत्त ।।
गुरु-सोय-सेल्ल-निभिज्जमाण
कंठ-ट्ठिय दुक्खि धरइपाण ।।
घत्ता
रच्छामुहि गेहि घरगणि
खणि रुग्रंति न वि थक्कइ ।
सरि नलिणि जेम जल-बज्जिय
रत्ति-दियह परिसुक्कइ ॥"
बहुत भेद वाले । गूढ-धरणक्खराई-गूढ घनाक्षरों से । वोलिय-चले गए।
-
मां की बीमारी का लेखपत्र और समुद्रदत्त का प्रस्थान, पद्मश्री की
वियोग वेदना-
पउमसिरिहि साहिय लेह-वत्त
"महु दुक्खि अच्छइ जणणि तत्त ।।
ता जामि कतें पेक्खेमि ताउ
अत्रणेमि जणेरिहि हियय-सोउ ॥"
सा पभणइ अंसु-जलोल्ल-नेत्त
"हउ जामि तई सहुं अज्जउत्त ।"
"लग्गति दियह पिय दुग्गु देसु
पिउ मंदिरि अच्छहि तुरियउ एसु ॥"
गउ दिट्ठ जणणि पणमिउ असोउ
आलिंगिण विहिं तिं पण सोउ ।।
आणंदिय-बंधव-सयण-मित्त
अच्छइ कुमार कुइ कालु तेत्थु ।
पउमसिरि विरह-सिहि-सोसियगि
निरु झूरइ रयणिहि जिह रहंगि ।।
नेमित्तिय पुच्छइ भणइ साहु
कइयहुआवेसइ मज्झ नाहु ॥
वलि-महु-भक्खण महुर-वाय
लहु उरिउरेहि काय ॥
आवेइ कंतु जइ म अज्जु
दहि-सालि भत्तु तो देमि तुज्झु ।।
आवेउ कंतु लोयण-सलूणु
तुहु देमि जक्ख लड्डुयइ हूणु ।
४. अज्जउत्त-आर्यपुत्र ।
१८
आठोर तुरिट मह जीप
श्रोबार नुन्हई विदेसु॥
नयन्मु-मनिल गंडयन-यन
दिणि दिगि जिम मान्न विद।
लावन्न-नि-परिवजिय
मिन्द-मस्ति निरंद दिद।
(५.)
कुमार का चकवी को देखकर पद्मश्री का याद अाना और मासुगन्न के
लिए कूच करना-
अह एदि दियदि ममुदन
निसि समइ सरोवन नेण पत्तु ।।
पिय-रदिय दिदनि चलवाइ
कदंत कलुगु बुकितय वराह ।
उन्नेह मंस जल-मनिम देवि
तीरहिं ठिय पंखउ पुगा धुणेवि ।।
पंकय-वणु लोलड़ गयरिण ठाइ
तड-तरुयरि लगइ दिसिदि धाइ।।
"चक्काय-परिणि सरि एक जेन्त्र
विरहाउर मज्म वि दइय
तेस्त्र
जिह राय-कीरि पलरि निरुद्ध
अच्छइ महु मग्गु नियन्त मुद्ध॥"
उक्कंट-विसंतुल भट्-चार
विरहानल सोसिय नियवि जाउ ।।
॥
१८८ । गुरुयणेण वुत्तु स "सहाव-सच्छ निय कंत लएविणु आउवच्छ ॥" आरूढ तुरंगि समुद्ददत्त हत्थिणउरि सहुं सत्येण पत्त, पमुइय-मण सो अवरन्ह-कालि पइसरइ संख-मंदिरि विसालि ।। आवद्ध वेणि सिय-दसण-सेणि ।। कर-गलिय वलय लवंत-अलय ॥ मल-मइल-वेस लीहावसेस ।। इय-गुण-विसिट्ठ पउमसिरि दिछ ।। पत्ता पेक्खेवि कुमरु तहि वालहि नठ्ठ खणद्धिं सोगु किह ॥ दुव्विसह लोय-संतावणु कय पुन्नह दालिद्द जिह ।। - (६) मिलन की पूर्व तैयारी और अन्तराय- न्हाविय सुयंध-न्हाणिय-जलेण भुजिउ विलित्तु हरियंदणेण ॥ तंबोलु दिन्नु किय उचिय-वित्ति
१८६
परिपुच्छिय कुसलाइय-पउत्ति ।।
एत्वंतरि मउलिउ गुरु-पयाउ
वारुणि-पसंग-जणियाणुराउ ।।
कहावि य अथवणु न होइ लोइ
नं अभमुक्कुर वि अत्थवेइ॥
पउमसिरिइ सज्जिय वास-भवणु
विणिवेसिउ कोमल-तूलि सयणु ।।
निम्मल पईड नियंधारु
सेज्जहि ठिउ अच्छइ तहिं कुमार ।।
जं वद्ध अग्नहि जस्मि श्रासि
धणसिरिए कम्मु बहु-दुक्ख-रासि ||
तं उदयगर भोगंतराउ
केलिप्पिर थाइर तहि पिसार ।।
पउमसिरि नियवि श्रावंत गेह
चिंतवि "विदायर विहि मि नहु'
सो अन्न-भिनि-यषि भगाइ
फुडु क्योंदि जिद ना कुमरु सुणइ ।।
"अत्यमिद मृति परिद तमोहि
श्रावेजमु श्रादि पन्यु गेदि ।
पटमिति
मम्म
संकर देव
श्रागिर पन्थु पई अन्नु कोइ ।'
"की बात पहअनु प"
जोबदमान ना नि नछ ।।
१६०
घन्ता
मायाविउ
दुठ्ठ
पिसाउ
मुठ्ठ कुमरि अवलोइयउ ।
पवणाहउ जेग्व पईवउ
झत्ति न नज्जइ कहि ठियउ ।।
(७)
कुमार द्वारा नारी जाति की निन्दा-
--
चिंतइ कुमारु "दुस्सील एह
"कलत्तु महु भिन्न-नेह ।।
अइविम्हउ निम्मल-कुल-पसूय
दुच्चारिणी कह हुय संख-धूय ।।
उम्मग्ग-लग्ग हुय दुट्ठ-सील
उद्दाम-वियम्भिय-कामलील ।।
सच्छंद अणज्ज निराणुकंप
अन्नाणिय मोहिय विगय-संक ॥
न गणइ माइ-चप्पु स-सहोयरु
न गणइ इह-परलोय-भयावणु ।।
न गणइ मरणु लज्ज अउ मेल्लइ
करइ अकज्जई ढढसु खेल्लइ ॥
कवडु करेवि कंतु मारावइ
दूसरी दीवाल के अन्तर से । प्रावेज्जसु-पायेगा । अरगज्ज-अनार्य । नछु-.
नष्ट हो गया । पिसाउ=पिचाश ।
अइ-विम्हउ अत्यन्त विस्मित । संख-घूय-शंख की बेटी। उम्मग-लग्ग-खोटे
मार्ग में लग गई । सच्छंद-स्वच्छंद । अन्नाविय-प्रज्ञानी। भयावरण%3D
७.
१६१ खइ अन्नु पुणु सो जि गा भावह ॥ पलक्किय पह नारि बह-भंगंधि चंदण-लय जिद भूत भुयंगेहि ।। छिन्तिवि नक्कु कन्न-सहं बालहि दंसमि अज्जु कयंतु दुसीलहि ।। तोडमि कमलु जेम्व सिरु दुढ़ि फलउ अणंग-संगु पाविहि ।। घत्ता चिंतइ एउ कुमार कोवाणल-जालिय-मरण उ । "परिहारु डंडु खल-नारिदि" सुमरिय नीइ वियखणहु ॥ (3) पद्मश्री का शयनकक्ष में प्रवेश, प्रताड़ना और अपमान- आइय पउमसिरि अलंकरेवि करि कमलु पउर तंबोलु लेवि ।। पसरंत-बहल-मुहवास-गध उभिन्न-निविड-रोमंच-बंध ॥ उठभड-भिडि-भंग-भीसावणु कुविउ कयंतु नाइ दुईसणु ।। डसियाहरु कोय-फरंत-नासु . भयानक । ढढ्ढसु खोल्लइ-आग से खेलता है । पलक्किय-प्रलया । अलंकरेवि =अलंकार करके । पउर प्रवर । दुइसणु दुर्दशनीय । डसियाउरु-
१६२
कुरुल-दिट्ठि नं पयडु सणिच्छर ॥
संकिय वण-लय जिह करि-रायहु
संकिय मंजरि जेस्व दुवायहु ॥
संकिय कमलिणि जेम्व मियंकहु
संकिय कुलबहुजेम्व कलंकहु ।।
संकिय गरुडह जेम्व भुयंगी
संकिय वग्घह जेम्व कुरंगी ।।
संकिय सेल-मुत्ति जह वजह
संकिय मुणिवइ जेम्व अकज्जह ।।
संकिय जिह सइ असइ-पसंगह
संकिय जिह चक्काइ वियालह ।।
संकिय रायहंसि जिह जलयह
संकिय जेम्त्र वसुधरि पणयह ।।
घन्ता
जिम्य करिणि विझि आसंकिय
खर-णहरह पंचाणणहु ।
तह भीसणु रूउ निए विणु
वाल चमक्किय-चित्त तहु ॥
दशिताघर । कुरुल-दिट्टिकर दृष्टि । वरणलव-वनलता । सालूरि-मेंढकी
चक्काइ-चक्रवाह । जलय-जलदह से । विडालह-विठाल से । विभि-
विन्ध्याचल ।
१६४ आसा इव दीहउ दिसउ होति ॥ उग्गमइ अरणु संताउ नाइ रविवुद्धि जेम्ब निसि खयह जाइ ।। घत्ता हरिसो इव निग्गउ कुमरु संदेसह पट्ठियउ। दोहग्गु जेम्व वर-वालहि उयलि महीयति संठियउ॥ ( १०) पद्मश्री का आत्म चिन्तन- "दुव्वयण-सल्लु मणि पक्खिवेवि कलुणं रुयंति मई परिहरेवि । पिउ गेहि गयउ गलियारणुराउ मईकाई हयासइ कियउ पाउ ।। आनसि नाह ति धरियपाण कइया वि न खंडिय तुम्ह आण ॥ तुहं सामिय केण इ अलि उ अज्जु संभालिउ जिह मईकिउ अकज्जु । हसुक्क विरह-संताव-तत्त करणवीर-माल जिह न वि विरत्त ॥ दुव्वाइय मंजरि जिह मिलाण कपि-वरतणु व्व उक्खय विसाण ।। उप्पाडिय-फणि-मणि जिह भुयंगि गतियारगुराउ गलितानुराग ।
विच्छाय दोण भय-नोविरंगि।।"
वासहरह निग्गइ सीलवंति
वशंचलेण नयणई लुहंति ।।
चिंतंतु एह गरुयण सिछु
जोयाविउ कुमरु न कहि विं दिट्ट ।।
अइभीम-सोय-सायरि निहित
दोहग्ग-सल्ल-सल्लिय-विचित्त ॥
बज्जिय विस-मंजरि जइ भमरेहि
वन्जिय सर-दिटि ठ जिह तिमरेंहि ।।
वज्जिय सुयण-गोटिठ जिह पिसुगहि
वज्जिय सीह दिठि जिह हरिणेहि ।।
तिह सयल-सोक्ख-परिवज्जिय
निष्फल इव तारुन्न-सिरि ।।
जिगु दिव्य दिठि मणि मायई
कति पउत्थइ पउयसिरि।।
शुद्धि पत्र पृष्ठ अशुद्ध रूप शुद्ध रूप सपज-प्रवस्था सङ वडमझई नित्थ तह पढ़के से सहज-अवस्था साङ वडमझहं तित्थ तहिं पढ़ने से वसत यालु वसंत भालु ते तेवंड्डउ सुमहि उटभ वड्डउ सुमरि उभइ २२ शीर्षक २५-२६ ३६/१२ ३१/१० ३१/११ ३१/६ टिप्पणी ३८/२६ ३६/६ ४२/५ ४६/२५ ४७/६ ४८/१८ ४६/३३ ४६/३५ ४६/३५ ५०/४५ ५०/३७ टि० ५१/४७ ५१/४८ ५१/५० ५१/५५ जेल-भाइम्ब जले प्राइम्ब देसुच्चाउणु एहे आवही पमारिणयड गोड़ो जीवार्ग देसुच्चाइगु एह आवहि पमावियइ गोरड़ी जीवार्गल ग्रह मणु ললিল पवसंति पवसंतेन अरगुरणेइ अप मथु लज्जिज्याइ पवसंनि पे वसंतेन अगणेइ ५२/६४ ५२/६६ ५३/६ शिरा निभि मंतडऊ सिरु निभिच्च मंतडउ १६७ पृष्ठ श्रशुद्ध शुद्ध ५४/8 विवन रोमंयरगवस सिलाय विघन रोमंथरणवस सिलायल ५६/१ ५६/२ टि० ५७/२ ५८/१४, १५ प० पामय घन कि पायय घन किउ सावडड वघड ६३/टि० सावड घड प्रासाली विहसेप्पिणु प्राया ६४/७ ६७/टि० ६९/१४ ७१/१ प० ७५/५ प्राथाली विसं हप्पिणु श्रावा चड रिट्ठगेभि मरेणु जिल्लोल्लिय चट्ठ रिट्ठणेभि मरा जलोल्लिय मुहि उयरि सयलिघि वज्जारिवि पत्तियाँ थीं ७६/६ ७७/६ ८०/१० ८१/११ ८२/१२ ८३/१३ ८६/भूमिका ६१/प० १ ६२/६ ६३/६ ६७/१२ १००/१४ १०१/१५ १०१/१५ १०२/१५ १०२/टि० १०३/टि० १०७/१६ मु डरि श्रेहु सयलिघि वज्जारिवि पुत्रियां थीं सरनर परणरवि पविरत्ने यवलु भयवलिहि मरुध्दूति गिच्छिधूलि कुल्लं मुलम्म सुर्खधुत्ति डव्वरिउ सुरगर पुरणरवि पविरल भुयवलु भूयवलिहि मरुद्ध्य तिगिच्छधूलि फुल्लं झल्लक सुरतिधुत्ति उठवरिउ १६८ पृष्ठ अशुद्ध शुद्ध शीघ विगप्प स्पर्य गंदवु वंसख शीघ्र वियप्प स्थैर्य गंदरण वैस रव सकटा देतिया १११/टि० ११३/४ ११८/टि० ११६/६ ११६/७ ११०/श्री० १२२/प० ५ १२५/१० १२५/१२ १३३/१६ १३८/२ १४४/ १४४/ १४४/श्री १४६/टि० १४८/११ १५१/१४ शकट दंतिया रगंद अक्खिउ रगद उिवक्खउ कृष्ण का प्रासंधिवि हक्कारिव कृष्ण की वप्रिय पुत्रों पिथुनता अयहेरि प्रासंघिवि हक्कारिवि 8 वणिक् पुत्रों पिसुनता अवहेरि भुवाल हत्थउ लज्जिय भवाल हप्पउ लज्जिम १५३/ १६८ पृष्ठ अशुद्ध शुद्ध शीघ विगप्प स्पैर्य रणंदवु वंसख शीघ्र वियप्पड़ स्थैर्य रणंदण वैस रव सकटा देतिया शकट दतिया १११/टि० ११३/४ ११८/टि० ११६/६ ११९/७ ११०/श्री० १२२/५० ५ १२५/१० १२५/१२ १३३/१६ १३८/२ १४४/ १४४/ १४४/श्री गंद अक्खिउ गद उिवखउ कृष्ण का प्रासंधिवि हक्कारिव कृष्ण की ८ १४६/टि. वप्रिय पुत्रों पिथुनता अयहेरि भवाल प्रासंघिवि हक्कारिवि 8 वणिक् पुत्रों पिसुनता अवहेरि भुवाल हत्थउ लज्जिय १४८/११ १५१/१४ हप्पउ लज्जिम १५३/