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मुहूर्तचिन्तामणि
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Prayasreetamacaryana gument
VARANAS
हेमबाज किरदास
अध्यक्ष श्रीवकटेपर" स्टीम-प्रेस,
* बम्बई.
संवत् २००६. शके १८७१.

- MOCa मुद्रक और प्रकाशक- रहेमराज किलादाल मालिक-"श्रीवेङ्क श्वर" टीम् प्रेस, बम्बई. पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षाधीन है। shururmerandareANMata BADMINISTRuaKAMARHUMRohitvelamaARIESTA श्री। प्रस्तावना सिद्धान्तसंहिताहोरारूपं स्कन्धत्रयात्मकम् । वेदस्य निर्मलं चक्षुज्योतिःशास्त्रमकल्मषम् ॥ ३॥ अप्रत्यक्षाणि शास्त्राणि विवादस्तेषु केवलम् । प्रत्यक्षं ज्योतिष शास्त्रं चन्द्राको यत्र साक्षिणौ ॥ २॥ विनैतदखिल श्रौतस्मातकर्म न सिद्ध्यति । तस्माज्जगद्धितायेदं ब्रह्मणा निर्मित पुरा ॥३॥ वेदके छः अंग-हैं शिक्षा,कल्प,व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष । इनमें से सर्वोत्तम अंग वसंज्ञक निर्मल निष्कलंक ज्योतिष ही है,जिसको प्राचीन ऋषियोंने सिद्धान्त( गणित-ग्रन्थ) संहिता ( मुहूर्त आदि ) होरा ( जातक, ताजिक आदि फलादेश ) इन तीन स्कन्धों में प्रगट किया। इसके बिना समस्त श्रौत स्मार्त ( वैदिक एवं धर्मशास्त्रोक्त ) कर्म सिद्ध नहीं हो सकते, इसलिये संसारके उपकारार्थ ब्रह्माजीने इसे वेदनेत्र करके कहा,इसी हेतु (यज्ञादि वैदि- कर्म करनेवाले ) द्विजों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों ) को इसे यत्नसे पढ़नेकी आज्ञा है। अन्य शास्त्रोंमें विवाद बहुत हैं, प्रत्यक्ष फलोदय ऐसा नहीं है जैसा प्रत्यक्ष चमत्कृत ज्योतिष है, जिसके साक्षी सूर्य, चन्द्रमा, उदयास्त, शृंगोन्नत्यादि हैं । शिक्षामें भी लिखा है कि--"शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् । ज्योतिषामयनं चक्षुनिरुक्त श्रोत्रमुच्यते ॥छन्दः पादौ सुवेवस्य हस्तौ कल्पान् प्रचक्षते ॥” इति । समस्त अंग प्रत्यंग परिपूण होते हुए भी जैसे नेत्रों के विना समस्त अन्धकार ज्ञात होता है वैसे ही इनके विना समस्त साधन निरर्थक है। वसिष्ठसिद्धान्तका भी वाक्य है कि वेदस्य चक्षुः किल शास्त्रमेतत् प्रधानताङ्गेषु ततोऽर्थजाता। बर्यतान्यैः परिपूर्णमूर्तिश्चक्षुर्विहीनः पुरुषो न किंचित् ॥ " इत्यादि बहुत प्रमाणवाक्य हैं पर वर्तमान समयमें बहुधा वर्तमानसामयिक महाशय कहते हैं कि, ज्योतिष कुछ वस्तु नहीं है, भूतकालमें ब्राह्मण ही विधावान् रहे. सुज्ञ होनेसे उन्होंने यह भारिणामिक दूरदर्श विचार किया. कि, यदि हमारी सन्तान विद्या पराक्रमादि. ..

(२) प्रस्तावना। " . .. कोसे अल्पसार हो जायगी तो क्या वृत्ति आजीवन करेगी ? इसलिये ज्योतिषशास्त्र बनाया कि, जिससे सबको प्रतीत हो एवं ब्राह्मणों को ही माने इत्यादि बहुतसे वाद प्रतिवाद करते हैं तथापि जानना चाहिये कि, यह शास्त्र किसने आरम्भमें बनाया और कब बना? यह तो सर्व- साधारण जानते ही हैं कि, जो खगोल: · भूमिमान (पैमायश ). सूर्य चन्द्रग्रहण आदि गणित एवं दिन रात्रि पक्ष, मास वर्ष आदि काल सब ज्योतिषहीसे तो प्रकट हैं, रहा कमलादेश पक्ष, सो यह प्राचीन ग्रन्थकर्ता आचार्योंकी बुद्धिमत्ता है कि, सब जीवमात्र अपने अपने कर्मानुसार फल पाते हैं, यह तो प्रगट ही है परन्तु वह कर्म एवम् उसका परिणाम अदृश्य है, इसे दृश्य करनेके लिये उन महात्माओंने ऐसे २ हिसाब (गणित) नियत किये कि, जिनकी संज्ञायें सूर्यादि ग्रह और तिथि वार नक्षत्र योग करण लग्न मुहूर्त मादि नियम कर दिये हैं। जिनके द्वारा सद्विचारशील पाठक भूत भविष्य वर्तमान फल कह सकते हैं; जैसे बहुतसे गणितादि कामोंमें कोई करण ( इष्ट ) मानके आगे कार्य संपादित होते हैं ऐसे ही ज्योतिष फलादेशमें करण इष्टकाल एवं मुहूर्त हैं इनसे सभी कार्य होते हैं तथा च यह वेद मति ईश्वरका एक मुख्य अंग नेत्र है. वेद इसको प्रमाण करता है, इसके विना कोई भी यज्ञादि कृत्य (श्रौत स्मार्त कर्म ) नहीं होते और प्रत्यक्ष चमत्कृत भी है। बेद प्रमाण-"विद्या हो वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवषिष्टेहमस्मि । असूयकायानृजवे यताय न मां बूया वीर्यवती तथा स्वाम् " इत्यादि है. इसमें ज्योतिषकी मुख्यता इसप्रकार है कि- "भन्यानि शास्त्राणि विनोदमानं न किंचिदेषां तु विशिष्टमस्ति । चिकित्सितं ज्योतिषमन्त्रवादा पदे पदे प्रत्ययमावहन्ति ॥ १॥" और शास्त्र तो विनोद ( दिलबहलाव वा मनोरंजक) मात्र हैं, वैद्यशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, मन्त्रशास्त्र, धर्मशास्त्र प्रत्येक पदपदमें प्रत्यय ( विश्वास ) देते हैं, जैसे ज्योतिषमें प्रत्यक्ष ग्रहगणित है कि,चन्द्रमाके शृंगोन्नति, ग्रहण, ग्रहयुति,तुरोयादि बन्त्र वा नलिकादियोंसे ग्रहच्छाया, ग्रहोंका उदयास्त ठीक समयपर मिल जाते हैं, तथा बन्म, वर्ष प्रश्न मादि विचारमें यदि इष्ट शुद्ध हो एवं विचारवाला भी सुपठिन, हो तो भूत भविष्य वर्तमान फल ठीक ही मिलते हैं। इसे संसारके शुभार्थ ब्रह्माजीने बेदविभागानन्तर अंगोंमें स्थापन किया, " अष्टवर्ष ब्रामणमुपनयीत १ दर्शपूर्णमासाभ्यां बबेत २” इत्यादि श्रुति हैं. आठ वर्षकी गणना सूर्यचारवश गणितहीसे है तथा दर्शपौर्णमासादि ज्ञान मी विना ज्योतिष होही नहीं सकता। लिखा भी कि, "वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्वा विहिताश्च यज्ञाः।

प्रस्तावना। कालात्मा तस्मादिदं कालविधानशास्त्र यो ज्योतिष वेद स वेद यज्ञान् ॥ १॥ यज्ञ ईश्वर ही है, इसके उपयोगी वेद हैं, कालनाम समयका है और कालस्वरूप परमात्मा होनेसे यज्ञपुरुष को ही कहते हैं, वही तो ज्योतिष है जिसके विना कालज्ञान नहीं होता । विना कालज्ञान यज्ञादि कुछ नहीं हो सकते । भन्यान्य प्रमाण भी बहुत हैं किन्तु इस समय बहुत व्याख्यानको छोडकर प्रयोजन लिखना ही मुख्य श्रुतिनेत्र ज्योतिषशास्त्र ऐसा अद्वितीय एवं प्रत्यक्ष चमत्कृत होनेपर भी सहसा सर्व साधारणके हृदयकमलों में विकासमान नहीं होता, परञ्च विपरीतताका आभास स्वतः कालानुसार उत्पन्न होने लगता है । इसका हेतु सामयिक महिमासे मूल भाषा संस्क- तका हास होना ही है । इसी कारण यह प्रत्यक्ष शास्त्र क्रमशः लुप्त होता जाता है, द्वितीय यह है कि, इस संस्कृताल्पपरिचयसमयमें बहुतसे मनुष्य कुछ सामान्य फला- देश देख सुनकर, यद्वा कियत्प्रकार भूतादि विद्याका अभ्यास करके तत्काल मनोहर बातें चमत्कारी दिखलाकर लोगोंके मनको मोहन करके अल्पश्रमसे अपना लाभ उठा लेते हैं । उस समय वे पाखण्डी पण्डितजी तो कहाते हैं परन्तु परिणाममें उनके फल अविश्वास्य प्रकट हो जाते हैं । इसपर जनश्रुति ही बैठती है कि ज्योतिष ही पाखण्डी हैं उन पाखण्डियोंके चातुर्य को कोई नहीं कहता । इत्यादि व्यवस्था होनेमें सर्व साधरणको ज्योतिषशास्त्रमें सुबोध होनेके निमित्त प्रचलित अन्थों (जिसका अर्थ सर्वसाधारणको बोध नहीं हो सकता) की भाषाटीका करना ही एक- मात्र उद्धार समझकर गढ़वालदेशाधीश माहामहिम क्षत्रियकुलभास्कर श्रोबदरीशमूर्ति श्रीमन्महाराजाधिराज प्रतापशहादेव बहादुरके आज्ञानुसार कुछ काल पहिले तथा उनके सत्पुत्र श्री ५ श्रीमन्महाराजाधिराज सत्कीर्तिमान् कीर्तिशाहदेव बहादुरकी आज्ञासे सांप्रतमें भी मैंने पूर्वश्लोकोक्त तीन स्कन्धोंमेंसे होरा फलादेश ग्रन्थ जातकोंमें मुख्य " बृहज्जातक " एवं ताजिकोंमें मुख्य तन्त्रत्रयात्मक नीलकण्ठी" समस्त प्रश्न विचार सहित और 'चमत्कारचिन्तामणि" " भावकुतूहल" आदि ग्रन्थोंकी भाषाटीका प्रकाशित करके कुछ संहिता वैशेषिक सारणी सदृश मुहूर्तग्रन्थों की भा० टो० प्रका- शित करनेका विचार हुआ कि मुहूर्त सभी कामोंमें सभीको आवश्यक होते हैं और 'अमुहूर्तका फल शुभ हि होता है । इसके संहिता आदि बड़े ग्रन्थों में पाठ बहुत हैं जो छोटे हैं उनके प्रयोजन भी स्वल्प ही हैं इसलिये यह मुहूर्तचिन्तामणि नामक ग्रन्थ जो पाठमें थोडा, सरस कविता, अनेक प्रकारके छन्दोंसे सुशोभित और अर्थ बहुत है तथा और भी विशेषता है कि अन्य मुहुर्तग्रन्थ — रत्नमाला ' आदिकोंमें तेथिवार नक्षत्र आदिकोंके पृथक् पृथक् प्रकरण हैं, एक कार्यके मुहूर्त देखनेमें मनेक पकरण देखने पड़ते हैं, इसमें जो कुछ कार्य देखना हो तो एक ही स्थलमें तिथ्यादि

(४)
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लम लमांशपर्यन्त एवं धर्मशास्त्रीय निर्णय भी मिल जाते हैं। इन ही शुभ लक्षणोंसे
इस आधुनिक ग्रन्थकी सिद्धि एवं सर्वत्र प्रमाणता हो रही है, परन्तु अर्थ इसका
स्कुरित नहीं होता इसलिये इसी भाषाटोका करना योग्य समझा, इसे देख पञ्चां-
गगात्र जाननेवाले भी मुहूर्तका विचार उत्तम प्रकारसे जान लेंगे तथा पाठकोंको भी
सुगमता हो जायगी।
यद्यपि इस ग्रंथकी भाषाटी० मुद्रित भी हो चुकी है तथापि पुनः प्रयास करनेका
प्रयोजन विद्विजन सुज्ञ पाठकवृन्द इस टीकाका सारांश देख विचारकर जान जायेंगे
कि कैसा सरल स्वच्छ एवं निरर्गल अर्थ ग्रन्थकर्ता आचार्यके आशयानुमत प्रकट
किया गया है, इससे विचारशील सज्जन इस परोपकारार्थ परिश्रमको प्रसन्नतासे
चरितार्थ करेंगे.
विदुषामनुचरः-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम्-प्रेस,
बम्बई.
--

अथ मुहूर्तचिन्तामणिस्थविषयानुक्रमणिका । विषयाः पृष्ठांकाः १ ... ३ १ 3 440 विषयाः पृष्ठांकाः सामान्यतोऽवश्यवानि पञ्चाङ्ग- दूषणादीनि पक्षरन्धतिथीनां वयंघटिकाः कुन्तिकादिदोषाः,कुनिकादि मुहूर्त च. यमार्धचक्रम् सूर्यादिवारे दुर्मुहूर्ताः विवाहादिशुभकृत्ये होलिकाष्टकनिषेधः मृत्युक्रकचादीनामपवादः भद्रानिषेधः, भद्राया मुखपुच्छविभाग: भद्रानिवासस्तत्फलञ्च कालशुद्ध गुरुशुक्रास्तादिके निषेध्यवस्तूनि सिंहमकरस्यगुर्वादौ वानि सिंहस्थगुरोः प्रकारत्रयेण परिहारः पूर्वोक्तवाक्यानां निर्गजितार्थः मकरस्थितगुरोः प्रकारद्वयेन परिहार:... लुतसंवत्सरदोषापवादः बारप्रवृत्तिः वारवृत्तिप्रयोजनपुरस्सरा होरा कालाहोराप्रयोजनम् मन्दादियुगादीनां निर्णयस्खनिषेधश्च ब . शुभाशुभप्रकरणम् मङ्गलाचरणम् तिथीशाः तिथीनां संज्ञा । सिद्धियोगाश्च ख्यादिवारेषु यथाक्रमनिषिद्धतिथिमानि तिथिचक्रम् क्रकचादिनिन्धयोगाः कृत्यविशेषे निषिद्धतिथयः दग्धादियोगचतुष्टयम् चैत्रादिशून्यतिथयः तिथिनक्षत्रसम्बन्धिदोपाः चैत्रादिमासेषु शून्यनक्षत्राणि चैत्रादिपु शून्यराशयः मासषु शून्यसंज्ञकचक्रम् विषमतिथिपु दग्धलग्नानि दुष्टयोगानां शुभकृत्यावश्यकत्वे परिहारः शुभकार्येषु सिद्धिदानामपि हस्वादियोगानां निन्द्यत्वम् आनन्दाद्यष्टाविंशतियोगा: आनन्दादियोगचक्रम् योगपरिज्ञानम् ... आनन्दादिषु दुष्टयोगानामावश्यककृत्ये परिहारः दोषापवादभूता रवियोगाः, सिद्धियोगाः बरपात -मृत्यु, काण-सिद्धियोगा: दुष्टयोगानां देशभेदेन परिहारः समखशुमकृष्ये वन्यपदार्थः प्रासमेदेन ग्रहणीयनक्षत्रनिषेधः ७. २१ 000 अथ नक्षत्रप्रकरणम् । OM 22 B%2 १२ नक्षत्रस्वामिनः नक्षत्राणां ध्रुवादि संज्ञा तस्कृत्यं च प्रवालदन्तशमुसुवर्णवस्त्रपरिधानमुहूर्ताः वस्त्रस्य दग्धादिदोषे शुभाशुभफलम् ;.... वचिद्दुष्टदिनेऽपि वस्त्रपरिधानम् 94 .. ago (२) मुहतचिन्तामणिस्थ- " ... १ ११ ... ... " " " विषयाः पृष्ठांका विषयाः पृष्टांकाः आतापादपरोपणादिमुहूर्ताः २८ मूलनिवासस्तत्फलं च दुष्टगण्डान्तादीनां परिहारः भर पशुनारक्षामुहूर्तः, औषधसूचीकर्मणोमुहूर्तः " कपविश्यनक्षत्राणि अश्विन्यादिताराणां स्वरूपा दिविचार: विक्रयविपणिमुहूर्तः नत्रचक्रम् अश्वहस्तित्रयादिमुहूर्तः जलाशयादिप्रतिष्ठामुहूर्तः भूषाघटनादिमुहूर्त्तः ३० देवप्रतिष्ठायां लग्नशुद्धिः मुद्रापातनवस्त्रक्षालनमुहूर्त- अथ संक्रांतिप्रकरणम्। सदादिधारणशय्याद्युपभोग मुहूर्तः अन्धादिनक्षत्राणि; अन्धा दिनक्षत्राणांफ० ३१ संक्रान्तिसंज्ञा फलं च, दिबारात्रिविभागेन धनप्रयोगे निषिद्धनक्षत्राणि संक्रांतिफलमू जलाशयखननन यारम्भमुहूर्तः ३२ षडशीतिमुखादिसंज्ञा, संक्रांतिपुण्य०... विकस्य स्वामिलवायांमुहूर्तः सायनसंक्रांतिस्तत्फलं च, जघन्यबृहत्समनक्ष- अन्यप्रयोगऋणग्रहण मुहतः त्राणि, संज्ञाप्रयोजनम् इलप्रवहणमुहूर्त:, हलचक्रम् , बीजोहि मुहूर्त ३३ कर्कसंक्रांतावब्दविंशोपकाः बरखोप्तिचक्रम्, शिरामोक्षादिमुहूर्तः ... संक्रांतिवाहनादिः धान्यछेदनमुहूर्वः, कणमर्दनसस्यारोपण संक्रांतिचक्रम् मुहूर्तः, धान्य स्थितिर्धान्यवृद्धिश्च संक्रांतिवशेन शुभाशुभफलम् शान्तिपौष्टिकादिकृत्यमुहूर्तः कार्यविशेषे ग्रहबलम् होमाहुतिमुहर्तः, वहिनिवासस्तत्फलंच अधिमासक्ष्यमासनिर्णयः मवानभक्षणमुहूर्तः, नौकापट्टनमुहुर्तः... अथगोचरप्रकरणम् ४॥ वीरसाधनादिमुहूर्तः रोगनिमुक्तिस्नाममुहूर्तः. शिल्पविद्यारम्भमुहूर्त, रख्यादीनां गोचरफलम् सन्धान (मैत्री) मुहूर्त: द्विविधवेधे मद्वयम् परीक्षामुहूर्तः वेधचक्रम्, जन्मराशेः सकाशात् प्र हफलम् , सामान्यतो नमशुद्धिः, ज्वरोल्पनौ चन्द्रबले विशेषः नक्षत्रानुसारेण फलविचारः ३८ प्रहदानचक्रम् शीघरोगिमरणे विशिष्टयोगा: दुष्टग्रहपरिहाराय रत्नधारणम् प्रेतदाहमुहूर्तः, काष्ठा दिसंग्रहः बहुमूल्य रत्नधारणासामध्ये प्रतिनिधि. काष्टादिसंग्रहचक्र, त्रिपुष्करयोगस्तत्फलंच रत्नानि, ताराबलम् शवप्रतिकृतिदाहे निषिकालादिः आवश्यकृत्ये दुष्टताराणां परिहारः प्रभुक्तमूलरवरूपम् चन्द्रावस्थागगनोपायः अवस्थानामानि मूलाश्लेषोपन्नरय शुभाशुभफलम् ग्रहवैकृतपरिहारोपायः, चन्द्रावस्था मूलवृक्षचक्रम् " " ३५ " " ૨ ... 39 ... " " है " ४१ ... ...

विषयानुक्रमाणका । (३) apne " " ७ मासाः 40. विषयाः. पृष्टांकाः. विषयाः, पृष्ठांकाः प्रहाणां गन्तव्यराशेः फलदानकाल: ५८, छुरिकाबन्धनमुहूर्तः तिथ्यादिदोषे दानम्, ग्रहाणां राश्य- केशान्तसमावर्तनमुहूतः शरागमफलम् अथ संस्कारप्रकरणम् ५। अथ विवाहप्रकरणम् ६। प्रथमरखोदर्शने मासादि अथ विवाहप्रयोजनम् रमोदर्शने निन्धकाल: प्रश्न लशाद्विवाहयोगज्ञानम् प्रथमरजस्यलास्नानमुहूर्वः, गर्भाधान- प्रजालनाद्वैधयादियोगज्ञानम् मुहूर्तः बालवैवव्ययोगपरीहारः सीमन्तोलयनमुहूर्तः पुत्रकन्याप्रश्नविचारः माहेश्वराः, स्त्रीणां चन्द्रबलं च कन्याहमुहूर्तः, बरवरण मुहूर्तः, वधू- पुंसवनमुहूर्तः, जातकर्मनामकरणयो- वरयोः प्रहशुद्धिः, विवाहयोग्य- मुहूर्तः सूतिकास्नानमुहूर्तः प्रथमादिमासोत्पन्न- इन्तफलम्, दोलाचक्रम्, ६२/ जन्ममासादिनिधः दोलारोहण--निष्क्रमण मुहतो ज्येष्ठमासविचारः, मण्डनमुण्डन विचारः प्रसूतिकायाः जलपूजामुहूर्तः १३ विवाहानन्तरं त्रिपुरुषे चूडादिनिषेधः গায়ালন अन्नप्राशनमहभावफलम् मूलाइलेपाविचारः भूम्युपवेशनमुहूर्तः जीविकापरीक्षा ६४ अष्टकूट विचारः ताम्बूलभक्षणमुहूर्तः मित्रामित्रसमचक्रम्, गणफलम् कर्णवेधमुहूर्तः, चूडाकर्मादीनां निषे- दुष्टभकूटपरिहारः, नाडी कूटं तदपवादश्च ... ६५ वर्णादिगुणचक्राणि गुरुशुक्रयो ल्यवाईकविचारः चौलमुहूर्तः ताराकाम्, गणगुणाः, योनिगुणा: मातरि सगर्भायां चौलमुहूर्तः ग्रहमैत्रीगुणाः, नाडीचक्रम्, भकूटगुणाः चौछे दुष्टतारापवादः चौलादिकृत्ये पूर्वमायापरभागचक्रम् निषिद्धकाल: प्राच्यसातवर्गकूटम् नक्षत्रराश्यक्ये क्षीरस्य विधिनिषेधौ, अक्षरारम्भमुहूर्तः विशेषः, स्वामिसेवकनत्र विशेष: व्रतबन्धकालः व्रतबन्धमुहूर्तः राशिस्वामिनः, नवांशविधि वर्णाधीशाः शाखेशान, गुरुबलविचार: गण्डान्तदोषः, कतरीदोषः, संग्रह दोषः प्रतबन्धे वाणि, तत्र रम्याशफलम् अनध्यायाः अष्टमलनदोषत्सापवादः, विषघटीदोषः बहवृचा ब्रह्मौदनप्रकारः, घेदपरस्व- नक्षत्र विषघटी, तिधिविषघटी, दिवा- ३ रात्रिमुहताः " " " " " " 442 " ७२ (i मुहूर्तचिन्तामणिस्थ- विषयाः. पृष्ठांकाः विषय. पृष्ठांका. । .. " " " ARE " " बारभेदन मुहूर्ताः, वेधविवार, भभिजिम्मान च, पञ्चशलाकावेधः पंचशलाकाचक्रम्, समशलाकावेधः, अनाकान्तादिनक्षत्रदोषस्सापवादः तापातादिदोषाः, एकार्गल (खर्जुर) दोषः क्रांतिसान्यम् सपमहदोषः, कुलिकदोषः मुहूर्त, वा दुर्मुहूर्त, दग्वसिथिदोषः यामित्रदोपः शुकागलादिदोषाणामपवादः इशदोषयोगानां फल तदपवाइश्च बाणदोषः पंचकाख्यः प्राच्यमतेन वारण: सापवादः समयभेदेन तत्परिहारत्रिविधः बाणचक्रम्, ग्रहाण इष्टिः उदयास्तशुद्विः सूर्यसंक्रमणाख्यलनदोषः सर्वग्रहाणां संक्रांतिवश्यघट्यः पंग्वन्धकाणबधिराख्यलनदोषः एषां प्रयोजनं सापवादम् विहितनवांशाः विहितनवांशे क्वचिनिषेधः सर्वथा लग्नभङ्गयोगः रेखामदग्रहाः अदादिमहादोषापवादः विवाहेअब्ददोषाधपवाहः उक्तानुक्तदोषपरिहारः सामान्येन दोषसहपरिहारः लप्राविंशोपकाः, प्रहवशेन श्वशुरादि- विभागज्ञानम् संकीर्णजातीनां विवाहे विशेष गान्धर्वादिविवाहे विशेषः ९३. विवाहात्प्राकृत्ये दिनशुद्धिः १०६ 'बदौलक्ष मण्डपोद्वासनं च ९४ तैज्ञादिलापने नियमः मण्डपादौ स्तम्भनिवेशनम् गोधूलीप्रशंसा, गोधूलीभेदा: तनावश्यवर्णदोषाः सूर्यस्पष्टगतिः, तत्तात्कालिकी करणम् ९६ इष्टका बिकलग्नानयनम् रविलग्नाश्यामिष्टवाटिकानयनम् घटिज्ञानयने विशेषः विवाहादौ अवश्यवः वधूप्रवेशप्रकरणम् ७ । ९९ वधूप्रवेशमुहूर्तः, वधूप्रवेशे नक्षत्रशुद्धिः विवाहप्रथमाब्दे वध्वाः पित्रादि- गृहवास मासदोषः द्विरागमनप्रकरणम् ८ ॥ द्विरागमनमुहूर्तः, संमुखशुक्रदोषः १०३ प्रतिशुकापवादः अथाग्न्याधानप्रकरणभू ९। अग्न्याधानमुहूर्तः यागकर्तृत्वयोगा राजाभिषेकप्रकरणम् १०॥ १०३ राजाभिषेकमुहूर्तः, अभिषेकनसत्राणि लग्नानि च, अभिषेके विशेष: १०४ यात्राप्रकरणम् १९॥ यात्राधिकारिणः यात्राप्रश्नादेः फलम् अशुभफलदः प्रश्न: यातृप्रश्ने न दिग्गमने सामानि १०५ यात्राकालविचारः वारशूल नक्षत्राती कानशुलः निषिद्धानां भावांजविला: 9. " .. " " " " " " विषयानुक्रमणिका । ५) विषयाः पृष्ठांका विषयाः पृष्ठांकाः " ... '. १४५ १ " .. जीवपक्षादीनां विशेषफलम् ११८ पात्राकर्तुर्नियमाः भकुलकुलाकुलचकफलम् अकालवृष्टिदोषः शकुन विचारः पथि राहुचक्रम् राचक्रमहफलम् प्रवेश: दोषसमुच्चयश्च तिधि पात्रायाम् अथवास्तुप्रकरणम् १२। पाडलभ्रमणदोषौ, हिम्बराख्ययोग: गृहनिर्माणविचारः धातचन्द्रादयः इष्टभूमे विस्तारायामादिविचारः बातचक्रम् योगिनीवासादिविचारः १२३ गृहारम्भे विशिष्टकालनिषेधः कालपाशापयोगी, कालपाशचक्रम् १२५ शालाध्रुवाहानयनम् परिषदंड: १२५ गृहस्यायादिनक्कम् विदिक्षु गमने नक्षत्राणि परिधापवादश्च गृहारम्भे वृषवास्तुचक्रम् अयनशुलः, विधा शुक्रसम्मुखता १२६ सूतिकागृहारम्भ-प्रवेशौ तद्वकासादिदोषः सापवादः तिथिपरत्वेन द्वारनिषेधः पतिशुक्रापवादः राहुमुखचक्रम् अनिष्टलग्नम् गृहकूपनिर्माणम्, उपकरणगृहावि गृहायुर्विचारः शुभनमानि, दिकस्वामिनः १२८ दिगीशप्रयोजनम्, बालाटिको योगः लक्ष्मीयुक्तगृहयोगत्रयम् पर्युषितयात्रायोगचतुष्यम्, समबलम् गृहस्यान्यदीयत्वम् द्वारचक्रम् समादिभावानां संज्ञा यात्रालग्ने लनाविद्वादशभावस्थितग्रह- गृहप्रवेशप्रकरणम् फलम्, योगयात्राविचारः १३० कालशुद्धयादिः, जीर्णगृहप्रवेशे विशेष: बाबालमवशाहहभावचक्रम् गृहप्रवेशात्माग्वास्तुपूजनम् विजयादशमीमुहूर्तः, पात्रायामवश्यामिषि- तिथिलग्नवारशुद्धयः निमित्तानि १३४ वामरविचक्रफलम्, वासरविचक्रम् एकदिनसाध्यगमनप्रदेशविशेषः कलशवास्तुचक्रम् "प्रथाने नवमदिनदोषः यात्रादिनियमविधि: प्रवेशोत्तरकर्तव्यता मक्षवादिदोहदः गममसमयविधिः, विश्वयानानि उपसंहाराग्यायः । १३७ ग्रन्थनिर्मातृपरिचयः :: " ३० 19 " इति विषयानुक्रमाणका समाप्ता

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इतिमुहुर्तचिन्तामणिविषयानुक्रमणिका समाप्ता ॥
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श्रीगणेशाय नमः । अथ मुहूर्तचिन्तामणिः। भाषाटीकासहितः। शुभाशुभप्रकरणम् १ ॥ मङ्गलाचरणम् । गौरीश्रवाकेतकपत्रभङ्गमारुष्य हस्तेन दधन्मुखाये। विघ्नं मुहूर्ताकलितद्वितीयदन्तप्ररोहो हरतु द्विपास्यः ॥ १ ॥ श्रीनाथपादाम्बुजदीर्घनौकामाश्रित्य तर्तु विबुधैरपार्यम् । श्रीरामदैवज्ञक कवित्वसिन्धुं प्रवृत्तोऽस्मि कियद्वराकः ॥ १ ॥ निजतातपदाम्बुजाप्तबोधो मौहूर्ते वितनोमि बालतुष्टय ! विवृतिं नृगिरां महीधराख्यः क्षन्तव्यं विबुधैर्यदत्र मेऽयम् ॥ २ ॥ भाषाकार विनविघातार्थ मंगलाचरणरूप निजगुरुको प्रणामपूर्वक भाषारचनाका प्रयोजन कहता है, कि सत्कवि रामदैवज्ञके कवितारूपी समुद्र जो कि विद्वानोंसे भी सहसा पार नहीं उतरा जाता अर्थात् एकाएक कविके आशयको बिना कुछ आधार नहीं पाते इसका मैं एक छोटासा (वराक ) अल्पसार (श्रीनाथ ) लक्ष्मीनाथ विष्णु अथवा (श्री) शोभायुक्त ( नाथ ) आदिनाथ शिव, विशेषतः आनन्दानन्दनाथ आदि गुरुपंक्तित्रिकमेंसे प्रथम श्रेण्यधीश श्रीनाथ परब्रह्मरूप सच्चिदानन्दमय गुरुके चरणकमल ही एक बडी ( नौका) नावके आश्रय पाके उक्त कवितासमुद्र तरनेको उद्यत हुआ हूँ, अपने जनकके करकमलोंके प्रसादसे पाया है मुहूर्तादिकका बोध ( ज्ञान ) जिसने ऐसा मैं महीधरनामा (ब्राह्मण राजधानी टौहरी जिला गढ़वाल निवासी ) मुहूर्तग्रन्थोंसे अनभिज्ञोंके प्रसन्नतार्थ इस "मुहूर्तचिन्तामणि" नामक ग्रन्थकी सरस हिन्दीभाषाटीका करता हूँ, तब प्रार्थना भी करता हूँ कि इसमें ( जो कुछ मेरी दुष्कृत ) अयोग्यता हो तो बिद्वज्जन क्षमा करें ॥ १ ॥२॥ आचार्य प्रथम मङ्गलाचरण इंद्रवज्रा छन्दसे करता है: श्रीगणेशजीने निजमाता (गौरी) पार्वतीके कानों पहिरे हुए केतकीके ( पत्र) पुष्पके एक भागको अपने शुण्डादण्डसे बाललीला अपनी माताको दिखलानेके लिये बलात्कारसे बैंच ( ग्रहण ) कर अपने मुखमें एक ओर भक्षण निमित्त धारण किया जितनेमें भक्षण न (२) मुहूतचिन्तामाण- हो सका इतने (मुहूर्त ) क्षणपर्यंत द्विदन्तकी शोभा देखनेमें आयी क्योंकि गणेशजी एकदन्त हैं दूसरे और थोडे समय केतकीपुष्पके टुकडे रखनेसे द्विदन्त जैसे प्रतीत हुए यह अद्भुतो- पमालङ्कार है और (द्विपास्य) एक बार शुण्डासे पुनः मुखसे पीनेवाले हाथीका है। मुख जिसका ऐसा गणेश विनको हरण करे ॥ १॥ क्रियाकलापप्रतिपत्तिहेतु संक्षिप्तसारार्थविलासगर्भम् । अनन्तदैवज्ञसुतः स रामो मुहूर्तचिन्तामणिमातनोति ॥ २ ॥ क्रिया (जातकर्म ) आदि समस्त कार्यसमूहकी प्रतिपत्ति (यह कार्य अमुक दिनमें शुभ अमुकमें अशुभ ) का हेतु ( कारणभूत ) एवं संक्षेप ( थोडे) शब्दोंमें सार ( निष्कर्ष) अर्थका विलास प्रकाश है गर्भ ( अन्तर ) में जिसके अर्थात् मुहूर्त ग्रन्थ प्राचीन अनेक हैं. परन्तु उनमें पाठ बहुत और तिथ्यादि विचारोंके पृथक् प्रकरण हैं इसमें समस्त कार्यनिर्वाह थोड़े ही शब्दोंसे एक ही स्थलमें हो जाता है इसलिये दिनशुद्धि विशेषके यद्वा "मुहूर्त' दिन के पंद्रहवें भाग ( दो घडी) उपलक्षित कालके चिन्ता शुभाशुभनिरूपण विचारका मणि, जैसे हीरा आदि समस्त कांतिमानोंके आधार हैं ऐसे ही समस्त मुहूर्त (दिनशुद्धि) के आधार इस मुहूर्तचिन्तामणि नामक ग्रन्थको जगद्विख्यात अनन्तनामा दैवज्ञ ( ज्योतिषी ) का पुत्र रामदैवज्ञ विस्तारित अर्थात् विधिनिषेधके सन्निवेश ( विधान) का निरूपण करता है॥ २ ॥ ( उ० जा० ) तिथीशाः। तिथीशा वह्निको गौरी गणेशोऽहिणुहो रविः । शिवो दुर्गाऽन्तको विश्वे हरिः कामः शिवः शशी ॥ ३ ॥ प्रथम पंचांगके शुभाशुभनिरूपणार्थ तिथियोंके स्वामी कहते हैं:-कि प्रतिपदाका स्वामी ममि, एवं द्वि० ब्रह्मा, तृ० पार्वती, च० गणेश, पं० सर्प, ५० कार्तिकेय, स० सूर्य, अ० शिव, न० दुर्गा, द० यम, ए० विश्वेदेव, द्वा० हरि, त्रयोद० कामदेव, चतुर्द० शिव. पू० मा० चन्द्रमा है। इनके कहनेका प्रयोजन यह है, कि तिथिका जो अधिपति उसका पूजन उसीमें होता है तथा उनके जैसे गुण एवं कर्म हैं वैसे ही प्रकार कर्तव्य कार्यका शुभाशुभ परिणाम देते हैं जैसे रत्नमाला आदिकोंके तिथिप्रकरणोक्त प्रयोजन हैं कि, प्रतिपदामें विवाह, बात्रा, व्रतबन्ध, प्रतिष्ठा, सीमन्त, चूडा, वास्तुकर्म, गृहप्रवेश आदि मंगल न करना, परन्तु यहां विशेषतः शुक्ल प्र० की है, कृष्णमें उक्त कार्यों मेंसे कुछ होते हैं उनकी स्पष्टता आगे लिखेंगे, द्वितीयामें राज-सम्बन्धी अङ्ग वा जिह्वाके कृत्य व्रतबन्ध, प्रतिष्ठा, विवाह, यात्रा, भूषणादि कर्म शुभ होते हैं ।

. ७ • प्रकरणम् १] भाषाटीकासमेतः। (३) तृतीयामें द्वितीयाके उक्त कर्म और गमनसम्बन्धी कृत्य, शिल्प, सीमन्त, चूहा, अन्नप्राशन, गृहप्रवेश भी शुभ होते हैं, रिक्ता ४।९। १४ में अग्निकर्म, मारणकर्म, बन्धन,- कृत्य, शस्त्र, विष, अग्निदाह, घात आदि विषयक कृत्य, शुभ और मंगलकृत्य अशुभ होते हैं। पञ्चमीमें समस्त शुभकृत्य सिद्धि देते हैं परन्तु ऋण ( कर्जा) इसमें न देना । देनेसे नाश हो जाता है । षष्ठीमें तैलाभ्यंग, पितृकर्म और दन्तकाष्ठोंके विना समी मंगल पौष्टिक कर्म करने तथा संग्रामोपयोगी शिल्प, वास्तु, भूषण, वस्त्र भी शुभ हैं, सप्तमीमें जो जो कृत्य द्वि० तृ. ५० ५० में कहे हैं वे सिद्ध होते हैं । अष्टमीमें रणोपयोगी कर्म, वास्तुकृस्य, शिल्प, राजकृत्य, लिखनेका काम, स्त्री, रत्न, भूषणकृत्य शुभ होते हैं। दशमीमें जो जो द्वि० त० पं० स०में कहे हैं वे सिद्ध होते हैं। एकादशी व्रत उपवासादि समस्त धर्मकृत्य, देवताका उत्सव, वास्तुकर्म, सांग्रामिक कर्म, शिल्प शुभ होते हैं । द्वादशीमें समस्त स्थावर जंगमके कर्म, पुष्टिकारक शुभकर्म सभी सिद्ध होते हैं । त्रयोदशीमें द्वि० तृ० पं० स० के उक्त कृत्य शुभदायक होते हैं । पूर्णिमामें यज्ञक्रिया, पौष्टिक, मङ्गल, संग्रामोपयोगी, वास्तुकर्म, विवाह, शिल्स, समस्तभूषणादि सिद्ध होते हैं । अमावस्यामें पितृकर्ममात्र होते हैं कहीं शाव- रोक्त उग्रकर्म भी कहे हैं । अन्य मंगल पौष्टिकोत्सवादि कृत्य न करने ॥ ३ ॥ ( अनुष्टुप् ) तिथीनां संज्ञा । सिद्धियोगाश्च । नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णेतितिथ्योऽशुभमध्यशस्ताः । सितेऽसिते शस्तसमाधमाः स्युः सितज्ञभौमार्किगुरौ च सिद्धाः ॥ ४॥ तिथियोंकी तीन आवृत्तिमें नन्दादि पंच संज्ञा क्रमसे हैं, जैसे-१६ ६ । ११ । नन्दा, २ । ७। १२ । भद्रा.३।८। १३ । जया. ४।९।१४। रिक्ता, ५। १० । १५ पूर्णा संज्ञक हैं । इनके जैसे नाम वैसे ही फल भी हैं तथा शुक्लपक्षमें पूर्व त्रिभाग ( प्रतिपदासे पंचमीपर्यंत ) अशुभ अर्थात् इनमें चन्द्रमा क्षीण ही रहता है । द्वितीय त्रिभाग ( पंचमीसे दशमीपर्यंत ) मध्य और अंतिम त्रिभाग ( दशमीसे पूर्णिमापर्यन्त) शुभ होते हैं तथा कृष्णपक्षमें धू० त्रि० ( पंचमीपर्यन्त ) शुभ, म० त्रि० (पंचमीसे दशमीपर्यन्त) मध्यम और अं० त्रि० (एकादशीसे अमा० पर्यन्त ) अधम होते हैं । चतुर्थपादका अर्थ यह है कि शुक्रवारके दिन नन्दा १।६। ११ । बुधको भद्रा । २। ७ । १२ मंगलको गया ३ । ८ । १३ । शनिवारको रिक्ता ४।९।१४ । गुरुवारके दिन पूर्णा ५ । १०। १५ । सिद्धि देनेवाली हैं । इसका प्रयोजन यह है कि "सिद्धा तिथिहति समस्तदोषान्" इत्यादि मासशून्य, मासदग्ध, दिनदग्ध आदि दोषोंको हटाकर कार्य सिद्ध कर देती है ॥ ४ ॥ ( उपजाति ) .

- (४) मुहूर्तचिन्तामणिः- [ शुभाशुभ- रव्यादिवारेषु यथाक्रमनिषिद्धतिथिभानि ! नन्दा भद्रा नन्दिकाख्या जया च रिक्ता भद्रा पूर्णसंज्ञामृतात् । याम्यं त्वाष्ट्र वैश्वदेवं धनिष्ठार्यम्णं ज्येष्ठान्यं रखेर्दग्धभं स्थात् ॥ ५॥ सूर्य दिवारों में नन्दादि उक्ततिथि क्रमसे अशुभ (घातक ) होती है । जैसे रविवारको नन्दा १ । ६।११। सोमवारको भद्रा २।७। १२ । मंगलको नन्दा १।६ १११ बुधको जया ३। ८ । १३ गुरुवारको रिक्ता ४ । ९ । १४ शुक्रवारको भद्रा २५७ १२ । शनिवारको पूर्णा ५। १० ! १५ । ऐसे ही नक्षत्र भी जैसे रविवारको भरणी, सोम- वारको चित्रा, मंगलको उत्तराषाढा, बुधको धनिष्ठा, गुरुवारको उत्तराफाल्गुनी, शुक्रको ज्येष्ठा शनिवारको रेवती दग्धनक्षत्र होते हैं । उक्त घातक तिथि तथा ये दग्धनक्षत्र शुभकृत्यमें वयं हैं ॥ ५ ॥ ५ शालिनीवृत्त्व ) तिथिचक्रम्। तिथि तिथे फ. स्वामी संज्ञा कृष्ण १ सिद्धि अग्नि नन्दा অগ্রম शुभ कोहडा कार्यसाधन । ब्रह्मा भदा স্বাম वनभंटा ३ आरोग्य गौरी जया अ. शुभ नोन हानि गणेश रिक्ता शुभ तिल शुभ सर्प গুম खडा अशुभ स्कंद नन्दा मध्यम मध्यम तेल शुभ सूर्य भद्रा म. आमला व्याधि शिव म० नारियल मृत्युदा दुर्गा रिक्ता म. लदुआ धनदा यम पूर्णा चिचेंडा शुभा विश्वे नन्दा शुभ अशुभ सेमदाना १२ सर्वसिद्धि हार भद्रा . शुभ अशुभ मसूर १३/ सर्वसिद्धि जया शुभ भंटा उग्रा शिव रिका शुभ १५ पुष्टिदा चन्द्र पूर्णा शुभ जुवा अशुभ पितर मैथन ३ अ. पूर्णा म. जया म० अ० प्रकरणम् १.J मापाटाकासमत.। क्रकचादिनिन्धयोगाः । षष्ठ्यादितिथयो मन्दाद्विलोम प्रतिपबुधे । सप्तम्यर्केऽधमाः षष्ठयायामाश्च रदधावने ॥६॥ शनिवारसे विपरीत तथा षष्ठीसे सीधे क्रमसे गिननेमें तथा प्रतिपदाको बुध, सप्तमीको रवि अधम ( शुभकार्यमें वर्जनीय) क्रकचयोग होता है. पंचांगों में इसे वारदग्ध लिखते हैं । इनकी सुगमता यह भी है कि, तिथिवार जोड़नेसे १३ जिस दिन हों वही वा० ६० जैसे शनिवारकी षष्ठी, शुक्रकी सप्तमी, बृहस्पतिवारकी अष्टमी, बुधकी नवमी, मंगलकी दशमी, चंद्रवारकी एकादशी, रविवारकी द्वादशी और बुधकी प्रतिपदा, रविकी सप्तमी ये पृथक् २ ही कहीं हैं। और षष्ठी, प्रतिपदा अमावस्याके दिन काष्ठ विशेष नीम आदिसे दंतधावन (दांतुन ) न करना किसी आचार्यकं मतसे नदमी तथा रविवारको भी बर्जित है ॥ ६ ॥ ( अनुष्टुपू) कृत्यविशेषे निषिद्धतिथयः। षष्ठयष्टमीभूतविधुक्षयेषु नो सेवेत ना तैलपले क्षुरंरतम् । नाभ्यञ्जन विश्वदशद्विके तिथौ धात्रीफलैः स्नानममादिगोष्वसत् ॥७॥ षष्ठीके दिन तैलाभ्यंग, अष्टमीको मांसभोजन, चतुर्दशीको क्षौर, अमावस्याके दिन स्त्रीसंभोग मनुष्य न करें। किसीका मत है कि, मैथुन सभी पर्वदिनोंमें न करना चतुर्दशी, कृष्णाष्टमी, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्यसंक्रांति ये पर्व होते हैं, उक्त कामोंमें तिथि बत्कालकी मानी जाती है, उदयव्यापिनी नहीं तथा त्रयोदशी, दशमी द्वितीयाके दिन तैलाभ्यंग ( उबटन ) न करना, यह नियम केवल मलापकर्षस्नानमात्रको ब्रामणरहित तीन वर्णोंको है और अमावास्या, सप्तमी, नवमीको आमलेके चूर्णसे स्रान न करना, करने से धन एवं संतति क्षीण होती अन्य हैं, दिनोंमें तिलकल्कसहित आमलोंसे स्नान पुण्य देता है, यह वैद्यक शास्त्रसे भी स्नानकी ओषधी वर्णकांतिकारक है ।। ७ ।। (इन्द्रवंशा) दग्धादियोगचतुष्टयम् । सूर्येशपञ्चाग्निरसाष्टनन्दा वेदाङ्गसप्ताश्चिगजांकशैलाः । सूर्याङ्गसप्तोरगगोदिगीशा दग्धा विषाख्याश्च हुताशनाश्च ।। ८ ॥ सूर्यवारकी द्वादशी, चं० एकादशी, मं० पंचमी, बु० तृतीया, बृ० षष्ठी, शु० अष्टमी शनिवारकी नवमीको दग्धयोग होता है। रविवारकी चतुर्थी , चं० षष्ठी, मंगलकी सप्तमी; बु० द्वितीया, बृ० अष्टमी, शु० नवमी, श० सप्तमीको विषयोग होता है। रविवार की -- ..

मुहर्तचिन्तामणि:- [शुभाशुभ- । ३ ८ ६ २ ८ ७ शदची. २० षष्ठी, मे० सप्तमी, बु० अष्टमी, बृ० नवमी, शु० दशमी, श० एकादशीको हुताशनयोग होता है। ये तीन योग नामसदृश फल देते हैं, शुभकार्य में वर्जित हैं ॥ ८ ॥ (इन्द्रवश्रा) सूर्यादिवारे तिथयो भवन्ति मघा विशाखा शिवमूलवह्निः ॥ बालं करोऽकायमघण्टकाश्च शुभे विवा गमने त्ववश्यम् ॥ ९ ॥ रविवारकी मघा, चं० विशाखा, मं० आर्द्रा, बु० मूल, बृ० कृत्तिका, शु० रोहिणी, श० हस्त यमचंटयोग होते हैं। इतने दग्ध, विषाख्य, हुताशन, यमवंटयोग शुभकार्य में वर्जित हैं । विशेषतः यात्रामें ही वर्ण्य हैं। आवश्यकमें इनके परिहार भी (रव्यादिवारेएतास्तिथयोदग्धाद्याः) अंबांतरों में हैं कि, विंध्याचल र. चं मं. बु. वृ. शु .. वारा: तथा हिमालयके बीच इनका १२ ११५ ९ | दग्धास्तिथयः विचार मुख्य है अन्य देशों में ७ विषाख्यास्ति. नहीं, तथा लमसे केंद्र त्रिकोण १०/११ हुताशनास्ति. में शुभ ग्रह हो इनका दोष मका विशाबादी मूळ कृत्ति रोहि. हस्त यमघण्टनक्ष. नहीं और किसीका मत है कि, स्मघंटकी ८ घरी वय हैं, वसिष्ठ मत है कि, ४ योग दिनमें अनिष्ट फल देते हैं रात्रिमें नहीं ॥ ९॥ ( उप०) चैत्रादिशून्यतिथयः । भाद्रे चन्द्रदृशौ नभस्यनलनेत्र माधवे द्वादशी पौषे वेदशरा इषे दश शिवा मार्गे द्विनागा मधौ । गोऽष्टौ चोभयपक्षगाश्च तिथयः शून्या बुधैः कीर्तिता ऊर्जाषाढतपस्यशुक्रतपसां कृष्ण शराङ्गाब्धयः ॥ १० ॥ शकाः पञ्च सिते शक्रायग्निविश्वरसाः क्रमात् । मासशून्य ( मासदग्ध ) तिथि कहते हैं, भाद्रपदको १ । २ तिथि, श्रावणकी ३।२ वैशाखकी १२, पौषकी ४।५ आश्विनकी १०११ मार्गशीर्षकी २ । ८ चैत्रकी ९।८ दोनोंही पक्षों में शून्य होती हैं तथा कार्तिककी ५ आषाढकी ६ फाल्गुनकी ४ ज्येष्ठकी १५ मायकी ५ कृष्णपक्षमें शून्य होती हैं और कार्तिककी १४ आषाढकी ७ फाल्गुनकी ३ ज्येष्ठकी १३ माघकी ६ शुक्लपक्षमें शून्य होती हैं, इनहीको मासदग्ध भी कहते हैं ।।-(शा० वि० १०) ( अनु० ) प्रकरणम् १] भाषाटीकासमेतः। (७) तिथिनक्षत्रसम्बन्धिदोषाः। तथा निन्यं शुभे सार्प द्वादश्यां वैश्वमादिमे ॥ ११ ॥ अनुराधा द्वितीयायां पंचम्यां पिच्यभं तथा । व्युत्तराश्च तृतीयायामेकादश्यां च रोहिणी ॥ १२॥ स्वातीचित्रे त्रयोदश्यां सप्तम्यां हस्तराक्षसौ । नवम्यां कत्तिकाष्टम्यां पूभा षष्ठयां च रोहिणी ॥ १३ ॥ तिथिनक्षत्रसम्बन्धी दोष कहते हैं-द्वादशीमें आश्लेषा, प्रतिपदामें उत्तराषाढा, द्वितीया में अनुराधा, तृतीयामें तीनों उत्तरा, एकादशीमें रोहिणी, त्रयोदशीमें स्वाती, चित्रा, सप्तमीमें हस्त, मूल, नवमीमें कृत्तिका, अष्टमीमें पूर्वाभाद्रपदा, पंचमीमें मघा शुभकार्यमें वर्न- नीय हैं ॥ ११--१३ ॥ चैत्रादिमासेषु शून्यनक्षत्राणि । कदासभे त्वाष्ट्रवायू विश्वेज्यौ भगवासवौ । वैश्वश्रुती पाशिपोष्णे अजपादग्निपित्र्यभे ॥ १४ ॥ चित्राद्वीशौ शिवाश्व्याः श्रुतिमूले यमेन्द्रभे । चैत्रादिमासे शून्याख्यास्तारा वित्तविनाशदाः ॥ १५॥ चैत्र महीनेने रोहिणी, अश्विनी, वैशाखमें चित्रा, स्वाती, ज्येष्ठमें उत्तराषाढा, पुष्य आषाढमें पूर्वाफाल्गुनी, धनिष्ठा, श्रावणमें उत्तराषाढा, श्रवण, भाद्रपदमें शतभिषा, रेवती, माश्विनमें पूर्वाभाद्रपदा, कार्तिकमें कृत्तिका, मघा, मागशीर्षमें चित्रा, विशाखा, पौषमें आर्द्रा, अश्विनी, हस्त, माघमें श्रवण, मूल, फाल्गुनमें भरणी, ज्येष्ठा नक्षत्र होते हैं, इनमें शुभकार्य करनेसे वित्त (धनादि ) नाश होते हैं ॥ १४ ॥ ॥ १५ ॥ ( अनुष्टुप्) चैत्रादिषु शून्यराशयः । घटो झपो गौमिथुनं मेषकन्यालितौलिनः। धनुः कर्को मृगः सिंहश्चैत्रादौ शून्यराशयः ॥ १६ ॥ शुन्यराशि कहते हैं-कि चैत्रमें कुम्भ, वैशाखमें मीन, ज्येष्ठमें वृष, आषाढमें मिथुन, श्रावण में मेष, भाद्रपदमें कन्या, आश्विनमें वृश्चिक; कार्तिकमें तुला, मार्गशीर्ष धन, पौषमें कर्क; माघमें मकर. फाल्गनमें सिंहराशि शुन्य होती हैं, इनका भी वही फल है ॥ १६ ॥ ( अनुष्टुप)

(८)
मुहूर्तचिन्तामणि:-
[ शुभाशुभ-
व
ख्य.
श्री.
भा.
मा.
मा.
का.
मासेषु शून्यसंज्ञकाः।
धन्य
क.
पौ.
तिथयः १/८ १२.१४ ३२ १२ १०/११/ क. ७८४/५ कृ.
उ. प. उ. प. उ.
५
पक्ष
शु.
शु. ९ शु. ३
शून्य रोहि. चित्रा उत्तरा प.फा. उ. पा. श्रत पू. भा. कृत्ति. चि. आी श्रव. भर.
अश्वि स्वामी बाढा धनि. श्रव, तारा
मघा वि. अश्वि. मल ज्ये,
आणि
पुष्य
रेवती
उम.
६
.
O
शु.१४
शून्यरा, ११
१२
२
३
१
६
९
१
शयः
विषमतिथिषु दग्धलग्नानि ।
पक्षादितस्त्वोजतिथौ धटैणी मृगेन्द्रनको मिथुनाङ्गने च ।
चापेन्दुभे कर्कहरी हयान्त्यौ गोऽन्त्यौ च नेष्टे तिथिशून्यलये ॥१७॥
(पक्षादि ) प्रतिपदासे लेकर विषम तिथियोंमें ये लग्न शून्य होते हैं । जैसे--प्रतिपदामें तुला
मकर, तृ० में मकर, सिंह, पं० मिथुन, कन्या, स० धन कर्क, न० सिंह, कर्क, ए० धन, मीन
ये शून्यलग्न शुभकार्यों में वर्ण्य हैं ॥ १७ ॥ ( इन्द्रवज्रा)
दुष्टयोगानां शुभकृत्यावश्यकत्वे परिहारः ।
नारदः-तिथयो मासशून्याश्च शून्यलग्नानि यान्यपि ।
मध्यदेशे विवानि न दूष्याणीतरेषु तु ॥ १८॥
पम्वन्धकाणलग्नानि मासशून्याश्च राशयः।
गौडमालवयोस्त्याज्या अन्यदेशे न गर्हिताः ॥ १९ ॥
जो मासशून्य तिथ्यादि कहे हैं इनके निमित्त विशेषता नारद कहते हैं कि, मासशून्य
तिथि तथा जो शून्य लग्न कहे हैं वे भी मध्यदेशहीमें वर्ण्य हैं और देशोंमें इनका दोष नहीं
तथा पंगु, अन्ध, काण लग्न ( जो विवाह--प्रकरणमें कहे हैं ) और मासशून्य राशि गौड-
देश (मालव), मलबार (केरल ) देशमें वर्जित करने और देशोंमें निंद्य नहीं हैं ॥ १८ ॥
॥ १९ ।। ( अनुष्टुप्)
शुभकायु सिद्धिदानामपि हस्तार्कादियोगानां निन्धत्वम् ।
वर्जयेत् सर्वकार्येषु हस्तार्क पंचमीतिथौ ।
भौमाश्विनी च सप्तम्यां षष्ठयां चन्दैन्दवं तथा ॥ २० ॥

IPUR भाषाटीकासमेतः । वर नक्षत्र योगसे वो अमृतसिद्धियोग होते हैं वे किसी तिथिक योगसे अनिष्ट भी हो जाते हैं जैसे- रविवारका हस्त सिद्धि है परन्तु पंचमी के दिन हो तो विरुद्ध है। ऐसे ही मंगल- शारकी अश्विनी ममीको, सोमवारक मृगशिर षष्ठोको । २०। ( अनु०) बुधानुमायामष्टम्यां दशम्यां भृगुरेवतीम् । नवभ्यां गुरुपुष्यं चकादश्यां शजिरोहिणीम् ॥ २१ ॥ बुधवार की अनुराधा अष्टमीको. शुक्रवारकी रेवती दशमीको, गुरुवारका पुष्य नक्मीको, शनिवारकी रोहिणी एकादशीको विरुद्ध होती है, इसे योग हों तो समस्त शुभकृत्समें वर्जित गृहप्रवेशे यात्रायां विवाहे च यथाक्रमम् । मौमाश्विनी शनी बाझै गुरौ पुष्यं तु वर्जयेत् ॥ २२ ॥ उक्त भौमानिनी आदि अमृतसिद्धि योग सभी कायौंन उक्त हैं तो भी गृहप्रवेशमै भौमा- देवनी, यात्रा, शनि हिणी, विवाहमें गुहाध्य वर्जित ही करना ।। २२ ।। ( अनु० ) आनन्दाद्यष्टाविंशतियोगाः । आनन्दास्यः कालदण्डश्च धूम्रो धाता सौम्यो श्वाङ्क्षकेतू क्रमेण । श्रीवत्सास्यो बजकं मुद्रश्च च्छत्रं मित्रं मानम पनलुम्बौ ॥ २३ ॥ उत्पात मृत्यू किल काणसिद्धी शुभोऽमृताख्यो मुशलं गदश्च । मातङ्गरक्षश्वर स्थिराख्यप्रवर्द्धमानाः फलदाः स्वनाम्ना ॥ २४ ॥ आनंदादियोगों के नान-आनन्द ? कालदण्ड २ धूम्र ३ प्रजापति ४ सौम्य ५ वांझ ६ ध्वज ७ श्रीवत्स ८ २ मुदर १० छत्र ११ मित्र १२ मानस १३ घा १४ लुम्दक १५५ उत्पात १६ मृत्यु १७ काण १८ सिद्धि १९ शुभ २० अमृत २१ मुसल २२ गद २३ मातंग २८ राक्षस २५ चर २६ स्थिर २७ बर्द्धमान २८ योग नक्षत्रवारके अनुसार होते हैं जैसे इनके नाम हैं वैसे फल भी देते हैं ।। २३ ॥ ॥ २४ ॥ (शालिनी २३) ई उपजाति २८ . . अ ? घ. 1 . श्र. . . mind अ अ. पू. मुहूताचन्तामाण:- [ शुभाशुभ- आनन्दादियोगचक्रम् । आनंदादिर. गु. फक आनंद अ. श. | सिद्धि २. काल म. आ. भ. चि. ज्ये. अ. पू. मृत्यु मू. असुख धाता वि. पू. . १. सौभाग्य सौम्य मृ. ह. भ. म. बहुमुख ६ धवांक्ष आ. म. चि, ज्ये. पू. भ. घनक्षय कृ. सौभाग्य श्रीवत्स ति. वि. प. ध. रो. सौख्यसंपत्ति अ. अ. मृ. क्षय चि. थे. आ. लक्ष्मीक्षय पू. पु. राजसम्मान १२ मित्र वि. घ. रो. ति. पुष्टि मान श. मृ. म. सौभाग्य उपम चि. ज्ये. भ. आ. धनागम ११ लुक्क स्वा. मू. श्र. धनक्षय २६ उत्पात लि, रे. रो. ति. उ.प्राणनाश मृत्यु अ. उ. श. अ. मृ. अ. ह. मृत्यु ज्ये. अ. भ. आ. चि. क्लेश १९/ सिद्धि मू. कृ. पु. पू. स्वा. कार्यसिद्धि शुभ पू. घ. रे. रो. पु. वि. कल्याण २१ अमृत . अ. मृ. आ. अ. राजसम्मान २२ मुशल आ. म. चि. ज्ये. धनक्षय गदा श्र. पु. स्वा. | मू. अक्षयविद्या २१] मातंग घ. रो. ति. वि. पू. कुलवृद्धि २ राक्षस श. अ. अ. उ. महाकष्ट २६४चर पू. भ. आ. चि. ज्ये. अ. कार्य सिद्धि रख स्थिर उ. पू. पू. स्वा. मू. गृहारम्भ वईमान रे. रो. वि. ध. विवाह योगपरिज्ञानम् । दास्राद। मृगादिन्दी सादिौमे कराबुधे । मैत्राद्गुरौ भृगौ वैश्वागण्या मन्दे च वारुणात् ॥ २५ ॥ उक्त २८ योगोंके जाननेकी विधि यह है कि, रबिवारको अश्विनीसे सोमवारको प. श. . पु. उ. अ.

प्रकरणम् १.] भाषाटीकासमेतः। (११) मृगशिरसे एवं मं० को आश्लेषासे बु० को हस्तसे वृ० को अनुराधासे शु० को उत्तराषाढासे श० को शतभिषासे गिनना, जितनी संख्या वर्तमान दिननक्षत्र हो इतनी संख्याका उक्त योगोंमेंसे योग जानना । जैसे रविवारको अश्विनी, आनन्द, भरणी, कालदंड तथा सोमवार को हस्त, मृगशिरसे गिनकर ९ हुआ तो नवमयोग वन्न हुआ, ऐसे ही अन्य भी जानने, यहां अभिजित् भी गिनना चाहिये तब २८ योग होंगे ॥ २५ ॥ ( अनुष्टुप् ) आनन्दादिषु दुष्टयोगानामावश्यककृत्ये परिहारः ! ध्वाक्षे वजे मुद्गरे चेषुनाड्यो वा वेदाः पमलुम्बे गदेऽश्वाः । धूने काणे मौशले भूयं दे रक्षोमृत्यूत्पातकालाश्च सर्वे ॥ २६ ॥ आवश्यकतामें दुष्टयोगोंकी वर्ण्यघटीसंख्या कहते हैं कि-ध्वांक्ष, वन मुद्गरकी २ षटी, पन, लुम्बककी ४ घटी, गदकी ७, धूम्रकी १, काणकी २, मुसलकी २ और राक्षस, मृत्यु, उत्पात, कालदण्डकी समस्त ६० घटी वर्जित हैं, अन्य ग्रन्थों में चरयोगकी तीन घटी बर्जित करनी लिखी हैं ॥ २६॥ (शालिनी) दोषापवादभूता रवियोगाः । सूयभावेदगातर्कदिग्विश्वनखसम्मिते । चन्द्रवॆ रवियोगाः स्युर्दोषसंघविनाशकाः ॥ २७ ॥ जिस नक्षत्र पर सूर्य हो उससे गिनकर ( दिननक्षत्र ) जिसपर चन्द्रमा है उस पर्यंत १।९।६।१०।१३।२० इनमेंसे कोई संख्या हो तो रवियोग होता है, यह सभी कार्यमें शुभ होता है, पर्वोक्त दोषोंके समूहका नाश करता है ॥ २७ ॥ सिद्धियोगाः । सूर्येऽर्कमृलोत्तरपुष्यदास्ने चन्द्रे श्रुतिबामशशीज्यमैत्रम् । भौमेऽश्व्यहिर्बुध्न्यकषानुसार्पज्ञबालमैत्रार्ककशानुचान्द्रम् ॥ २८ ॥ जीवेऽन्त्यमैत्राश्व्यदितिज्यधिष्ण्यशक्रेन्त्यमैत्रायदितिश्रवोभम् । शनौ श्रुतिब्राह्मसमीरभानि सर्वार्थसिद्धयै कथितानि पूर्वैः ॥ २९ ॥ सिद्धियोग कहते हैं कि- रविवारको हस्त, मूल, तीनों उत्तरा, पुष्य, अश्विनी । सोम- वारको श्रवण, रोहिणी, मृगशिर, तिष्य, अनुराधा. मंगलवारको अश्विनी उत्तरा भाद्रपदा, कृत्तिका, आश्लेषा. बुधवारको अनुराधा, हस्त, कृत्तिका, आश्लेषा. बृहस्पतिवारको रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, शुक्रवारको रेवती, पूर्वा फाल्गुनी, अश्विनी, पुनर्वसु, श्रवण, शनिवारको श्रवण, रोहिणी, स्वाती, सर्वार्थ सिद्धि होती है यह प्राचीन आचार्योंने है ॥ २८ ॥ २९ ॥ (इन्द्रवज्रा तथा उपजाति) - - कहा १ पू. स्वा. भ. २ ८ ३ ६ ८ ८.९ ५/ सिद्धियोग उत्पात--मृत्यु--काण--सिद्धियोगाः । द्वीशात्तीयावासवात्पौष्णभाच्च बायात्पुष्यादर्यमाच्चतुभैः । स्यादुत्पातो मृत्युकाणौ च सिद्धिारेऽर्कायेतत्फलं नामतुल्यम् ॥ ३०॥ रविवारको विशाखासे चार नक्षत्र क्रमशः उत्पात, मृत्यु, काण, सिद्धि योग होते हैं । जैसे- रविवारको विशाखा उत्पात, अनुराधा मृत्यु, ज्येष्ठा, काण, मूल सिद्धि होते हैं, ऐसे ही सोमवारको पूर्वाषाढासे, मंगलको धनिष्ठासे, बुधको रेवतीसे, गुरुवारको रोहिणी से, शुक्रको पुष्यसे, शनिको उत्तराफाल्गुनीसे उक्त ४ योग होते हैं इनके फल भी जैसे नाम वैसे ही हैं ॥ ३०॥ (शालिनी) याग. चं मं. बु. १ चरयोग आर्द्रा वि. रो. पुष्य मू. क्रकचयोग १२ ति. ११ १० ३ दग्धयोग १२ ति. ११ ति. भ. ९/ २१७३८५।१० मृत्युयोग २१७१३ १११६ १४ १२ ११ ३।८ ति. ति. ७॥२५॥१०१।६ १२ ११ उत्पातयोग वि. पू. घ. रो. पुष्य मृत्युयोग अनु. मृ. आश्ले. ह. कालयोग ज्य. भ. आर्दा म. चि. ९. सिद्धियोग कृ. पु. पू. स्वा. १० यमदंष्ट्रयोग पू. पा.उ.पा. म.घ. मू. वि. कृ.भ. रो. भ. श्र. श. पु. अ. वि. रो. है. १२ मुशलवज चि. उ.षा. व. उ. ज्ये. रो. ५३, अमृतसिद्धि है. अनु. पुष्य रे. रो. दुष्टयोगानां देशभेदेन परिहारः । कुयोगास्तिथिवारोत्थास्तिथिभोत्था भवारजाः । हूणवंगखशेष्वेव वाखितयजास्तथा ॥ ३१ ॥ दुष्टयोगोंके परिहार कहते हैं कि जो तिथि वारसे उत्पन्न क्रकच ( वारदग्ध ) आदि हैं तथा तिथि और वारसे उत्पन्न हैं। जैसे-" अनुराधा द्वितीयायाम्" इत्यादि तथा नक्षत्र वारसे उपन्न हैं जैसे--- याम्यं त्वाष्ट्रं वैश्वदेवं धनिष्ठार्यम्णं ज्येहान्त्य रे. उ. . भ. ११ यमघंट म. आ. म. श्र.

प्रकरणम् १.] भाषाटीकासमेतः। (१३) रवेर्दग्धभं स्यात्" इत्यादि और तिथिवार नक्षत्र तीनों हीसे उत्पन्न जैसे-''वर्जयेत् सर्वकार्येषु हस्ताकं पञ्चमीतिथौ” इत्यादि हैं, ये समस्त दोष इणदेश (बंग ), बंगाला और (खानदेश) उत्तरखंडमें वर्जित है और देशों में निषिद्ध नहीं हैं ॥ ३१ ॥ (अनुष्टुपू) समस्तशुभकृत्ये वयंपदार्थाः । सर्वस्मिन्विधुपापयुक्तनुलवावर्दै निशाहोर्घटी- त्र्यंश वै कुनवांशकं ग्रहणतः पूर्व दिनानां त्रयम् । उत्पातमहतोऽयहांश्च शुभदोत्पातैश्च दुष्टं दिन षण्मासं ग्रहभिन्नभं त्यज शुभे यौद्धं तथोत्पातभम् ।। ३२ ।। समस्त शुभकृत्यों में वर्जित पदार्थ कहते हैं, कि चन्द्रमा तथा ( पापग्रह ) सूत्रे, मंगल, शनि, राहु, केतुसे युक्त लग्न एवं नवांश भी सभी कार्यों में त्याज्य हैं तथा मध्याह्न एवम् अर्द्धरात्रिके मध्य १ घटी अभिजित् मुहूर्त उत्तम होता है, परन्तु इसके ठीक मध्यके ( वटी- त्र्यंश )२० पला (१० पूर्वकी १० परभागकी ) भी त्याज्य हैं, ऐसे ही सूर्य चन्द्रग्रहण से पूर्व तीन और ( उत्सात ) प्रकृतिसे विरुद्ध होनेको उत्पात कहते हैं। सो तीन प्रकारके हैं-(१) दिव्य---केतुदर्शन, ग्रहनक्षत्रवैकृत, उल्का, निर्घात, परिवेषादि (२) अन्त- रिक्ष- -गंधर्वनगर, इंद्रधनुषादि ( ३ ) भौम-पृथ्वीसंबंधी भूमिकंप, वृक्षवैकृत, पशुबैकृत, अग्निजलवैकृतादि हैं, जिस दिन ऐसा कोई उत्पात हो उससे तथा ग्रहण दिनसे ७ दिन पर्यन्त शुभ कृत्य न करना, ऐसे ही केतु ( पुच्छलतारा) के दर्शनमें भी जानना । और मतांतरसे ग्रहणका नियम सर्वग्रासमें ७ दिन, त्रिभागोंमें ६ दिन, अर्द्धग्रासमें ४ दिन, चौथाई ग्रासमें ३ दिन और १ ।२। ३ अंगुल ग्रासमें १ दिन मात्र वर्ण्य है ( शुभदोत्यातम) में १ दिन वय॑ । शुभदोत्पात--बिजली गिरना, भूकम्प सन्ध्यासमयमें, निर्घातशब्द, परि- वेष, रज बिना अग्निधूम, सूर्यबिम्ब रक्त उदयास्तमें, वृक्षोंमें आसव तेल, गोंद, फल, पुष्य निकलना, वसंतमें गौ तथा पक्षियोंकी मदवृद्धि, तारापतन; उल्कापतन, अग्निज्वलन, चटचटाना वायुमें धूमरेखा, रक्तकमल, सन्ध्यामें अरुण ( गुलाबी रङ्ग), आकाशमें क्षोम, बिन प्रीष्म नदी सूखना, अकस्मात् पृथ्वी फट जाना, जल-जीवोंका स्थलमें आना, अकस्मार पहाड़ उड जाना, दिव्य स्त्री, विमान, भूतगंधर्व नगर, अद्भुत दर्शन, दिनमें शुक्ररहित ताराचं का देखना, पर्वतों में बिना मनुष्य गीत तथा बाजे सुनना, ठण्ढे वायुमें शर्करा, मृग तर पक्षियोंका नाचना, यक्ष राक्षासादिकों का देखना, बिना मनुष्य मनुष्यकी वाणी सुनना, दिशाउ में धूमता, अन्धकार. अकाल हिमपात, आकाशका कृष्णरङ्ग होना, स्त्री तथा गौ पक्षी बक थोडा मृगपक्षियोंके अन्य रूप जीव उत्पन्न होना इत्यादि हैं। पापग्रहवेधित नक्ष - तथा जिस नक्षत्रमें प्रयुद्ध हुआ हो और जिस नक्षत्रमें दारुण उत्पात हुआ हो सब छः महीने पर्यन्त बये हैं ॥ ३२ ॥ ( शा० वि० ) ग्रासभेदेन ग्रहणीयनक्षत्रनिषेधः । नेष्टं ग्रहक्षं सकलाईपादनासे ऋमात्तगुणेन्दुमासान् । पूर्व परास्तादुभयोस्विघना बस्तेऽस्तगे वायुदितेऽईखण्डे ॥ ३३ ॥ आसपरत्वसे नक्षत्रकी वजनीयता कहते हैं कि, सर्वग्रास ग्रहण हो तो ग्रहणनक्षत्र छ: महीने, अर्द्धग्रासमें तीन महीने और चौथाई ग्रासमें एक महीने वर्जित करना और प्रस्तास्त हो तो पहलेके तीन दिन वर्ण्य हैं परके शुभ हैं । यदि यस्तोदय हो तो पीछेके तीन दिन नेष्ट, पूर्वके शुभ हैं, जो अर्द्धग्रास हो तो पूर्व तथा पीछे के भी ३ । ३ दिन । सर्वप्रासमें सात ही दिन हैं ॥ ३३ ॥ (इं० व०) सामान्यतोऽवश्यवानि पञ्चांगदूषणादीनि । जन्मक्षमासतिथयो व्यतिपातभाडा वैधृत्यमापितृदिनानि तिथिक्षयर्डी । न्यूनाधिमासकुलिकाहरार्धपातविष्कम्भवज्रघटिकात्रयमेव ॥ वय॑म् ३४॥ शुभकृत्योंमें जन्मके नक्षत्र, महीना, तिथि आदि वर्ण्य हैं । मासप्रमाण चान्द्र माससे जन्मतिथिसे ३० दिन पर्यन्तका कहा है, बिष्कम्भादि योगों में व्यतीपात तथा वैधृति सर्वकर्म में वर्जित हैं तथा भद्रा, अमावस्या (पितृदिन ) मातापिताका श्राद्धदिन (क्षयतिथि) जो एक बारमें तीन तिथि स्पर्श होती हैं, ( वृद्धितिथि ) जो एक तिथि तीन वारोंको स्पर्श करती हैं तथा ( क्षयमास) जिस चान्द्रग्रहीनेमें दो अभाओंके बीच सूर्यसंक्राति दो आवे ( अधिकमास) जो दो अमावस्याओंके वीच सूर्य संक्रांति न आवे, एवं कुलिक योग, प्रहरार्द्ध (ये आगे कहेंगे) तथा महापात महावैधृति ( ये योग गणितसे ज्ञात होते हैं) और विष्कम्भयोग वज्र- योगके आदि कितनी घटिका वर्जित करनी, उक्त दोषोंमें तिथि उपलक्षणसे नक्षत्रयोगोंमें भी क्षयवृद्धिके परिहार ग्रन्थान्तरों में हैं, कि बृहस्पति केन्द्रमें हो तो (क्षय) अवमका और बुध केन्द्र में हो तो ( वृद्धि ) त्रिस्पृशाका दोष नहीं होता ॥ ३४ ॥ (व० ति०) पक्षरन्घ्रतिथीनां वय॑धटिकाः। परिघार्ध पंच शूले षट् च गण्डातिपण्डयोः । व्याघाते नवनाउयश्च वाः सर्वेषु कर्मसु ॥ ३५ ॥ परिषयोगका पूर्वार्ष, शूलयोगकी प्रथम पांच घटी, गण्ड एवम् अतिगण्डकी छः घटी, आधातकी नौ घटी आदिकी सर्व कर्ममें बार्जित हैं ॥ ३५ ॥ (अनु०) - वेदाङ्गाष्टनवार्केन्द्रपक्षरन्ध्रतिथौ त्यजेत् । वस्वंकमनुतत्त्वाशाशरा नाडीः पराः शुभाः॥ ३६ ।। चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्दशी ये पक्षरन्ध्रतिथि हैं, आवश्यकतामें इनके ८॥ ९।१४।२५।१०।५। इतनी घटिका आदिकी वर्जित हैं जैसे चतुर्थीकी ८ षष्ठीकी ९ भष्टमीकी १४ नवमीकी २५ द्वादशीकी १० चतुदशीकी ५ घटी वर्जित करके शेष शुभ- कूत्यमें ग्राह्य हैं ॥ ३६॥ ( अनुष्टुपू) कुलिकादिदोषाः। कुलिकः कालवेला च यमघण्टश्च कण्टकः ॥ वाराद्विघ्ने क्रमान्मन्दे बुधे जीवे कुजे क्षणः ॥ ३७ ॥ वर्तमान वारसे गिनकर जितनी संख्यामें शनि हो उसे दूना कर जो अङ्क हो उस दिन उतना मुहूर्त कुलिक होता है, तथा वर्तमान वारसे जितनेमें बुध हो उसे दूनाकर जो अङ्क हो उतनी संख्याका मुहूर्त कालवेला होता है। ऐसे ही वर्तमान वारसे बृहस्पति जितनी संख्या में हो उसे दूनाकर यमघण्ट मुहूर्त होता है, तथा वर्तमान वारसे मङ्गल जिस संख्यामें हो उसे दूना कर वह कंटक मुहूर्त होता है। उदाहरण जैसे--रविवार के दिन रविसे शनि सातवां है इसे दूना कर १४ हुआ तो रविवारके दिन चौदहवां मुहूर्त कुलिक हुआ तथा रविसे बुध चौला है द्विगुण ८ हुआ इस दिन आठवां मुहूर्त कालवेला है । तथा इससे बृहस्पति पांचवा २ गुण १० इस दिन दशवां मुहूर्त यमघण्ट है, ऐसे ही रविसे मंगल तीसरा २ गुण ६ रवि- वारको छठा मुहूर्त कण्टक है, इसी प्रकार सभी वारोंके मुहूर्त जानने । ये मुहूर्त ४।४ घटीके होते हैं, शुभकृत्योंमें वार्जत हैं किन्तु किसी आचार्यका मत ऐसा भी है कि, इन मुहूर्तों का उत्तरार्द्ध निषिद्ध है, पूर्वार्द्ध दूषित नहीं और रात्रिमें इनका दोष नहीं, अर्धयाम सर्वदा त्याज्य है, इसको आगे कहेंगे ॥ ३७॥ यामार्धचक्रम् । कुलिक आदि मुहूर्तचक्रम्। रवि. चन्द्र. मंगल. बुध. | बृह. शुक्र. शनि. यामार्ध. संख्या. प्रहर. तिधि ८ ४ ૨ दुहर्त. काळवेग. पमघंट ४१२१ ७२४२८ भ. २.४ ६ ४ १२ १० १० . ४ २ ० ૨ १२ ८ १० ५ मर्दयाम. ७ ९ ३ २८/२२ क्षु.५/८ १२ २.६२०२४

मुहूर्तचिन्तामणिः-
[ शुभाशुभ-
सूर्यादिवारे दुर्मुहूर्ताः ।
सूर्ये षट्स्वरनागदिङ्मनुतिताश्चन्द्रेऽब्धिषट्कुञ्जरा-
कार्का विश्वपुरन्दराः क्षितिसुते व्यब्ध्यमितर्का दिशः।
सौम्ये इयब्धिगजाङ्कदिङ्मनुमिता जीवे द्विपडूभास्कराः
शक्राख्यास्तिथयः कलाश्च भृगुजे वेदेषुतर्कग्रहाः ॥ ३८ ॥
दिग्भास्करा मनुमिताश्च शनौ शशिदिनागा दिशोभवदिवाकरसंमिताश्च ।
दुष्टक्षणः कुलिककण्टककालबेलाः स्युश्वार्धयामयमघण्टगताः कलांशाः ॥३९॥
सुगमतासे दोष जाननेके हेतु दुर्मुहूर्तादि कहते हैं कि, रविवारको ६।७।८।१०।१४ ।
सोमवारको ४।६। ८ । ९ । १२ । १३ । १४ । मंगलको २ । ४ । ३ ६.१० । बुध
को २।४।८।९ । १० । १४ । वृहस्पतिवारको २ । ६ । १२ । १४ । १५ । १६॥
शुक्रको ४।५।६। ९ । १० । १२ । १४ । शनिवारको १।२।८ । १० । ११ ।
१२ । ये मुहूर्त निंद्य अर्थात् दुष्टक्षण, कुलिक, कण्टक, कालवेला अर्धयाम यमघण्ट नामक
यथावकाश होते हैं, जैसे--रविवारके दिन १० वा मुहूर्त दुर्मुहूर्त, एवं कुलिक भी ६ छठा,
कण्टक ७ सातवां ८ आठवां अर्धयाम तथा आठवां कालवेला भी और १० दशम यमघंट
संज्ञक होते हैं। ऐसे ही सोमवारादिमें भी उक्त संख्याओं में उक्त नामक जानने, मुहूर्त २
घटीका होता है परन्तु दिनमान- न्यूनाधिक होनेसे यहां दिनका षोडशांश लिया है, जिस दिन
जो दिनमान है उसमें १६ से भाग लेकर जो मिले उतनेका एक मुहूर्त जानना ॥३८॥३९॥
(शा० वि० वस० ति०)
विवाहादिशुभकृत्ये होलिकाष्टकनिषेधः।
विपाशेरावतीतीरे शुतुद्रयाश्च त्रिपुष्करे।
विवाहादिशुभे नेष्टं होलिकाप्राग्दिनाष्टकम् ॥४०॥
विपाशा (व्याशा ) एवम् इरावती नदी (पंजाब देशमें हैं ] के तीर तथा शुतुबु शत-
लज के तीर और त्रिपुष्कर देशमें [ होलाष्टक ] फाल्गुन शुद्ध अष्टमीसे फाल्गुन “हुताशनी"
पूर्णिमा पर्यंत विवाहादि शुभ कार्य शुभ नहीं, अन्य देशों में इनका दोष नहीं ॥ ४० ॥
मृत्युक्रकचादीनामपवादः।
मृत्युक्रकचदग्धादीनिन्दौ शस्ते शुभां जगुः ।
केचिद्यामोत्तरं चान्ये यात्रायामेव निन्दिताम् ॥४१॥

प्रकरणम् १.] भाषाटीकासमेत । (१७) आनन्दादि योगोंमें मृत्युयोग, क्रकच, वारदग्ध ( दग्धयोग ) "सूर्येशपञ्चाग्नीत्यादि" और विषयोग, हुताशन योगादि, पूर्वोक्त दुष्टयोग चन्द्रमाके गोचर प्रकरणोक्त प्रकारसे शुभ होनेमें शुभ अर्थात् उक्त दुष्टफल छोड़कर शुभ फल देनेवाले होते हैं। किसी आचार्यका मत ऐसा भी है कि, उक्त दुष्टयोगोंका एक प्रहरसे उपरान्त दोष नहीं है । और किसी किसीका मत है कि, उक्त योग यात्राहीमें वर्जित हैं और कार्यो में नहीं ॥ ४१ ॥ ( अनु० ) अयोगे सुयोगेऽपि चेत्स्यात्तदानीमयोगं निहत्यैष सिद्धिं तनोति । परे लग्नशुद्ध्या कुयोगादिनाशं दिनाङ्केत्तरं विष्टिपूर्व च शस्तम् ॥४२॥ जिस दिन मृत्यु क्रकचादि कोई दुष्ट योग हो तथा सिद्धि ( अमृतसिद्धि) योग भी हो तो दुष्टयोगके फलको नाश करके कार्य सद्धि देता है । अन्य आचार्योका मत है कि, (लग्नशुद्धि ) लग्न समीचीन बलवान् होने में मृत्युक्रकच दग्धादि योगोंका नाश होता है और भद्रा व्यतीपात आदिकोंका दोष मध्याह्नपर्यंत होता है, मध्याह्नोत्तर नहीं है। ऐसे ही भौमवार प्रत्यरि जन्मनक्षत्रका भी है।॥ ४२ ॥ ( भुजङ्गप्रयात ) भद्रानिषेधः । शुक्ल पूर्वार्देऽष्टमीपञ्चदश्योभद्रकादश्यां चतुर्थी पराई । कृष्णेऽन्त्याई स्यात् तृतीयादशम्योः पूर्वे भागे सप्तमीशम्भुतिथ्योः॥४३॥ शुक्लपक्षकी अष्टमी, पूर्णिमाके पूर्वार्ध एवं एकादशी, चतुर्थीके उत्तरार्धमें भद्रा होती है, कृष्णपक्षकी तृतीया दशमीके उत्तरार्धमें तथा सप्तमी, चतुर्दशीके पूर्वभाग (पूर्वार्ध ) में भद्रा होती है, यह भद्रा विष्टि करण है । करण गिननेकी रीतिसे उक्त तिथियोंके उक्त दलों में यह करण आता है, यह बड़ा दोष समस्त शुभ कृत्योंमें वर्जित है ॥ ४३ ॥ ( शालिनी) भद्राया मुखपुच्छविभागः । पञ्चद्व्यद्रिकताष्टरामरसभूयामादिषटयः शरा विष्टेरास्यमसद्गजेन्द्ररसरामायश्विबाणाब्धिषु । यामेष्वेन्त्यघटीत्रयं शुभकरं पुच्छ तथा वासरे विष्टिस्तिथ्यपराईजा शुभकरी रात्रौ तु पूर्वार्धजा ॥ ४४ ॥ भद्राक मुख पुच्छविभाग कहते हैं कि, चतुर्थ्यादि तिथियोंके पञ्चमादि प्रहरोंके आदिकी पांच ( ५) घटी भद्राका मुख होता है। जैसे-चतुर्थीके पञ्चम प्रहरके.

(१८) मुहूर्तचिन्तामाणि:- । शुभाशुभ- आदिकी ५ टी. अष्टमीके दूसरे प्रहरकी ५ घटी, एकादशीके सातवें प्रहरकी, पूर्णिमाके चौथे, तृतीयाके आठवें, सममीके तीसरे, चतुर्दशीके पहले प्रहरकी पांच घटी भद्राका मुख होता है । यह अति दोषद हैं । चतुर्थीके आठवें, अष्टमीके प्रथम, एकादशीके छठे, पूर्णिमाके तीसरे, तृतीयाके सातवें, सप्तमीके दूसरे, दशमीके पांचवें, चतुर्दशीके चौथे प्रहरकी अन्तिम ( पिछली ) तीन (३) घटी पुच्छसंज्ञक होती हैं । यह पुच्छभद्रा दुष्ट नहीं होती अर्थात् शुभ कार्य में ग्राह्य है, यहां प्रहरगणना तिथिके आरम्भसे है। तिथिका सर्व भोग्य के आठ भाग ८ प्रहर मानने चाहिये । भद्राके अंगविभाग प्रन्थान्तरों में ऐसे हैं-मुखमें ५, मलेमें १, हृदयमें ११, नाभिमें ४, कटिमें ६, पुच्छमें ३ घटी हैं, इनमेंसे पुच्छकी ३ घटी शुभ हैं ॥ श्रीपत्याचार्य कहते हैं कि, एक समय दैत्योंने देवताओंको जीत लिया तब महादेवजीने क्रोधसे भालनेत्र खोला, खोलते ही क्रोधामिका एक ऋण निकला दह खरमुखी, तीन पैरकी, लांगूल लिये, सात हाथवाली, सिंहसमान गला, कृशोदरी, प्रेतवाहिनी मूर्ति उत्पन्न होकर दैत्योंका संहार करती हुई । तब देवताओंने स्तुति करके इसका नाम भद्रा रक्खा और बवादि करणोंमें स्नान एवं भाग दिया । आवश्यक कृत्य, भद्राका परिहार कहते हैं कि, तिथि उत्तरार्धकी भद्रा दिनमें तथा तिथि पूर्वार्द्ध की रात्रिमें शुभ होती है और आचार्यान्तरमत ऐसा भी है कि, भद्रा, मंगळवार, व्यतीपात, वैधृति, मृत्युयोग ये मध्याहसे ऊपर दोष नहीं देते ॥ ४४ ॥ ( शा० वि०) भद्रानिवासस्तत्फलञ्च । कुम्भकर्कद्वये मत्र्ये स्वर्गेऽब्जेज्जात्रयेऽलिगे । खीधनंजूंकनकेऽधो भद्रा तत्रैव तत्फलम् ॥ ४५ ॥ भद्रावास कहते हैं कि कुम्भ, मीन, कर्क, सिंहके चन्द्रमामें भद्रा हो तो मृत्युलोकमें तथा मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिकमें स्वर्ग लोकमें और कन्या, धन, तुला, मकरमें पाताललोकमें भद्राका निवास है । जिस दिन जिस लोकमें भद्रा रहती है वहीं अपना फल देती है, अन्य लोकों में नहीं, यह भी परिहार ही है ॥ ४५ ॥ ( अनु०) कालशुद्धौ गुरुशुक्रास्तादिके निषेध्यवस्तूनि । वाप्यारामतडागकूपभवनारम्भप्रतिष्ठे व्रता- रम्भोत्सर्गवधूप्रवेशनमहादानानि सोमाष्टके । गोदानाप्रयणप्रपाप्रथमकोपाकर्मवेदव्रतं नीलोद्वाहमथातिपन्नशिशुसंस्कारान्सुरस्थापनम् ॥ १६ ॥ - प्रकरणम् १. ] भाषाटीकासमेतः। कूवा, गृह १ दीक्षामौञ्जिविवाहमुण्डनमपूर्व देवतीर्थक्षणं संन्यासाग्निपरिग्रही नृपतिसंदर्शाभिषेको गमम् । चातुर्मास्यसमावृती श्रवणयोर्वेध परीक्षा त्यजेद् वृद्धत्वास्तशिशुत्व इज्यसितयोयूंनाधिमासे तथा ॥ ४७॥ कालशुद्धि कहते हैं कि, नवीन बावडी बनाना, बगीचा, तालाब, कुवा, इनका आरम्भ, गृहप्रतिष्ठा (गृहप्रवेश ) व्रतोंका आरम्भ, व्रतोंका उद्यापन, तुलादि सोलह महादान, सोमयाग, अष्टकाश्राद्ध, गोदान ( केशान्तकर्म ), इष्टिसंचयन, जलशाला ( प्याऊ ), प्रथम उपाकर्म ( श्रावणी), वेदव्रत, उपनिषदब्रत, महानाम्न्यादि प्रत, काम्यवृषोत्सर्ग "न कि ग्यारहवें दिनवाला तथा बालकोंके जातकर्मादि संस्कार किंतु जिनका मुख्यकाल व्यतीत होगया हो, दीक्षा ( मन्त्रग्रहण ) चूडाकर्म, अपूर्व देवता एवं तीर्थका दर्शन, अग्निहोत्र, चातुर्मास्ययज्ञ, समावर्तन, कर्णवेव तप्तमाषादि परीक्षा ( जो दिव्य न्यायविषयमें होती है ) नववधूप्रवेश, देवताकी प्रतिष्ठा, व्रतबन्ध, विवाह, संन्यासग्रहण, प्रथम रजोदर्शन, राज्याभिषेक, यात्रा इतने कृत्य बृहस्पति शुक्रके अस्तमें, बालत्वमें, वृद्धत्वमें और अधिमास ( मलमास ) में क्षयमासमें न करे । इसमें ग्रंथांतरीय निर्णय है कि "सीमन्तजातकादीनि प्राशनान्तानि यानि वै । न दोषो मलमासस्य मौढ्यस्थगुरुशुक्रयोः ॥ १ " "अतीतकालान्यखिलानि तानि कार्याणि सौम्यायनगे दिनेशे। सिते गुरौ चापि हि दृश्यमाने तदुक्तपञ्चाङ्गदिनेऽन्यखण्डे ॥२॥" सीमन्त, जातकर्मसे लेकर अन्नप्राशनपर्यंत जितने शिशुसंस्कार हैं नियत कालपर होनेसे इनके लिये मलमास, क्षयमास, गुवस्त, शुक्रास्तका दोष नहीं! जब उक्त कृयौंका मुख्यकाल ( जैसे नामकर्म ११११२ दिनमें, अन्नप्राशन छठे महीनेमें नियत है) किसी कारण बीत जाय तो वह कृत्य उत्तरायणमें बृहस्पति शुक्रके उदयमें और उस कृत्यके पञ्चांग अखण्ड (समस्त शुद्ध ) में करना ॥ ४६॥ ४७ ॥ ( शा०वि०) सिंहमकरस्थ गुर्वादौ वानि ! अस्ते वयं सिंहनकस्थजीवे वज्र्य केचिदक्रगे जातिचारे । गुर्धादित्ये विश्वघोऽपि पक्षे प्रोचुस्तद्दद्दन्तरत्नादिभूषाम् ॥४८॥ जो जो कार्य बृहसतिके अस्तमें वर्जित कहे हैं वे ही कार्य सिंह तथा मकरके बृहस्पतिमें भी वर्जित हैं परन्तु आचार्यांतरमतसे गया, गोदावरी यात्रामें दोष नहीं । कितने ही आचार्यों का मत है कि, बृहस्पतिके वक्र एवम् आतेचारमें भी उक्त कृत्य वर्जित है परन्तु २८ दिन (२०) मुहूर्तचिन्तामणि:- [ शुभाशुभ- पर्वन्त । और ऐसा भी है कि गोचरसे ५/९/७।२।११ राशिमें बृहस्पति जिसका हो उसको बक्रातिचारमें भी उक्त कृत्योंका दोष नहीं; यह भी मतान्तर है । तथा ( गुर्वादित्य ) गुरु सूखके एकराशिगत होने में भी उक्त कृत्य वर्जित हैं। मतान्तरसे ( गुर्वादित्य ) बृहस्पतिके राशिमें सूर्यः सूर्यके राशिमें बृहस्पति होनेमें कहा है उसमें सब शुभ कर्म वर्जित हैं परन्तु मुख्य पक्ष पूर्वोक्त ही हैं तथा विश्वधनपक्ष जिस पक्षमें दो (२) तिथियोंका अवम होकर तेरह (१३) दिनका पक्ष हो इसमें भी उक्त कृत्य वर्जित हैं और हस्तिदन्तादि तथा रत्नादि- संबन्धी भूषणधारण भी उक्त दोष ( सिंहे गुरौ आदि ) में न करना ॥ ४८ ॥ ( शालि०) सिंहस्थगुरोः प्रकारत्रयेण परिहारः । सिंहे गुरौ सिंहलवे विवाहो नेष्टोऽथ गोदोत्तरतश्च यावत् । भागीरथीयाम्यतटे हि दोषो नान्यत्र देशे तपनेऽपि मेषे ॥ ४९ ॥ सिंहस्थ गुरुके परिहार तीन प्रकारसे कहते हैं, विवाह तथा मतांतरसे व्रतबन्ध मात्रमें सिंहस्थ शुरुका दोष है अन्य कार्यो में नहीं है वह भी सिंहराशिके सिंहांशक १३।२० अंशसे १६१४० अपर्यन्त समस्त सिंहराशिके गुरुमें नहीं, गोदावरीके उत्तर भागीरथीके दक्षिण अर्थात् गंगा गोदावरी नदियोंके बीच जो देश हैं उनमें उक्त दोष हैं अन्य देशोंमें नहीं और मेषके सूर्व (सौरमान ) के वैशाखमें भी उक्त दोष सर्वत्र नहीं है ॥ १९ ।। ( इ० व० ) पूर्वोक्तवाक्यानां निर्गलितार्थः । मघादिपञ्चपादेषु गुरुः सर्वत्र निन्दितः। गङ्गागोदान्तरं हित्वा शषाविषु न दोषकत् ।। ५०॥ मेषेऽर्के सवतोडाही गङ्गागोदान्तरेऽपि च । सर्वः सिंहगुरुर्वर्ण्यः कलिङ्गे गौडगुजरे ॥ ५ ॥ पूर्वोक्त मतको पुष्ट करते हैं कि, मघा आदि पांच चरण--मघाके चार (४) पूर्वा- काल्गुनीक (१) प्रथम पर्यन्त बृहस्पति जबतक रहे तबतक सभी देशोंमें निंद्य है, अन्य चरणों ( पूर्वार्क तीन उ०फा के प्रथम ) में गंगा गोदावरीके मध्यवर्ती देशों ही मात्रमें वर्जित है अन्य देशों में नहीं ॥ ५० ॥ और सिंहके बृहस्पतिमें मेषका हो तो गंगा गोदावरी के मध्यदेशोंमे भी विवाह व्रतबन्ध शुभ होते है। समस्त सिंहका गुरु कलिंग, गौड; गुर्जर देशोंमें वर्ण्य है, अन्यत्र नहीं ॥ ५१ ॥ (अनु०) -- प्रकरणम् १. भाषाटीकासमेतः। (२१) मकरस्थिरगुरोः प्रकारद्वयेन परिहारः । रेवापूर्वे गण्डकीपश्चिमे च शोणस्योदग्दक्षिण नीच इज्यः । वयों नायं कौङ्कणे मागधे च गौडे सिन्धौ वर्जनीयः शुभेषु ॥ ५२ ॥ ( नीच ) मकरके बृहस्पतिका दोषपरिहार दो प्रकारसे कहते हैं कि, रेवा (नर्मदा) दक्षिण अमरकंटकसे जबलपूर विध्वके पार्श्व २ होशणावाद, ओंकारनाथ, मण्डलेश्वरमहेसर भडोचके समीप खम्भातकी खाड़ीमें द्वारिकाके समीप पश्चिम समुद्रमें मिली है उसके पूर्व भाग के देशमें तथा ( गंडकी ) नेपाल जिलाके पश्चिम भाग हिमालय मुक्तिनाथसे पटना हरिहर क्षेत्र पर गंगामें मिली इससे लेकर मानपर्वत व सारस्वतदेश अर्थात द्वारिकाके उत्तर पश्चिम समुद्रपर्यंत गण्डकीका पश्चिम है, इन देशोंमें तथा शोणनद ( अमरकंटकसे विंध्याचल होकर जिला आरा और मनेरके बीच गंगामें मिला ) इसके दक्षिण उडेला, सिरगुजा, लोहारदमा, रहता, सगड, विहार आदि एवम् उत्तरमें बुंदेलखण्ड, प्रयागराज ( इलाहाबाद), अवध, रुहेलखंड, दिल्ली ( इन्द्रप्रस्थ ) आगरा, मथुरा, नदीनाथ, ज्वालामुखी आदि उतर हिमालयपर्यंत इन देशोंमें मकरगुरुका दोष नहीं तथा ( कोंकण ) मुंबईसे १४० मील दक्षिण समुद्रके तीर ( गौडदेश ) गौड, बंगाला, मालदह, पुरनियाँ ( लक्ष्मणावती), जन्नताबाद, ( मगधदेश ) जिला गया, पटना (सिंधुदेश ) अटक और झेमके बीच जिसको सिंधुसागर कहते हैं इन देशों में शुभकार्य वर्जित हैं । इन दोनों ही पक्षोंसे अतिरिक देशोंको ग्रन्थांतरीयमबसे ६० दिन वाजत हैं तथा मकरमें मकरांशमात्र वर्जित है समस्त मकरगुरु तथा सभी देशोंके लिये नहीं * || ५२ ॥ ( शालिनी) लुप्तसंवत्सरदोषापवादः। गोऽजान्त्यकुम्भेतरभेऽतिचारगो नो पूर्वराशिं गुरुरेति वक्रितः । तदा विलुप्ताब्द इहातिनिन्दितः शुभेषु रेवासुरनिम्नगान्तरे ॥ ५३ ॥ वृष, मेघ, मीन, कुम्भ, राशियोंके विना अन्य राशियों में बृहस्पति अतिचारसे ( दश भ्यारह महीने ) दूसरी राशिपर जाकर कुछ दिनों में वक्र होकर पुनः पूर्वराशिमें न आवे तो वह संवत्सर लुप्त कहाता है, यह शुभ कृत्योंमें अतिनिदित है। यदि १।२ । ११ । १२ राशियोंमें अतिचार करे तो लुप्तसंवत्सरका दोष नही होता । देशभेदसे * इस विषयमें संवत् १९४६ ईसवी सन् १८९० में कीम्ही २ मत्सरियोंके उत्तेजनपर मैंने समाचार पत्रोंमें इस विषपकी समालोचना की थी जिसपर काशीवासी ६४ पर्य विद्वान् शास्त्रियोंकी ओरसे एक निर्णयसम्बन्धी विजयपत्र मिला, जिसमें उपरोक्त अनेक प्रमागसे प्रतिपादित है।

(२२) मुहूर्तचिन्तामाणि:- [ शुभाशुभ- परिहार है कि रेवा ( नर्मदा) और (गङ्गा ) भागीरथीके बीचके देशोंमें लुप्त संवत्सरका दोष है अन्यत्र नहीं, आचार्यातरमतसे बृहस्पति शुक्रके सम सप्तम ( एकसे दूसरी सातवीं राशि) में होनेपर भी उक्त देशों में अस्तके तुल्य दोष है ।। ५३ ।। (वंशस्थवृ०) वारप्रवृत्तिः। पादोनरेखापरपूर्वयोजनैः पलैर्युतोनास्तिथयो दिनार्थतः । ऊनाधिकास्तदिवरोद्भवैः पलैसर्व तथाधोदिनपप्रवेशनम् ॥ ५४ ॥ लंकासे सुमेरुपर्यंत एक समसूत्र बांधकर उसके नीचे जो जो देश आवें वह मध्य रेखा है, जहांसे उस रेखागत कोई देश समीप हो वह जितने योजन (चारकोशका एक ) हो वे देशांतर योजन कहाते हैं, उन योजनोंमें चतुर्थांश घटाके पंद्रह, (१५) में (न्यूनाधिक ) पर योजन हो तौ जोडना, पूर्व हो तो घटाना, जिसदिन वारप्रवेश देखना है उस दिन के दिनाईमें (न्यूनाधिक ) पंद्रहमें न्यून वा अधिक किया गया जो देशांतर है वह (१५) से अधिक हो तो उसमें १५ घटाना, यदि १५ से न्यून हो तो पंद्रहमें उसे घटा देना यह वारप्रवृत्ति होती है, उसमें भी स्मरण चाहिये कि, दिनार्द्ध संस्कार विशिष्ट अंकसे यदि १५ न्यून हो तो सूर्योदयसे पीछे उक्त पलोंमें यदि १५ से न्यून वह गणितागत अंक हो तो सूर्योदयसे प्रथम ही वार प्रवेश जानना. उदाहरण-काशीपुरी प्राक् मध्यरेखा कुरुक्षेत्रसे-६३ योजन है चौथाई घटाया ४७।१५ प्राकूयोजना होनेसे १५ में पल ४७ घटाये तो १४ । १३ हुए, दिनाई १७ । २ से न्यून होनसे १४ । १३ घटाया २ । ४९ शेष रहा. दिनार्द्धसे न्यून गणितागतअंक होनेसे सूर्योदयसेपीछे २ । ४९ में वारप्रवेश होगा ।। ५४ ॥ (उपजा०) वारप्रवृत्तिप्रयोजनपुरस्सरा होराः । वारादेटिका विवाः स्वाक्षहच्छेषवर्जिताः । सैकास्तष्टा नगैः कालहोरेशा दिनपाक्रमात् ॥ ५५ ॥ वारप्रवृत्तिकी इष्ट घटी द्विगुण करके २ जगह स्थापन करना, एक जगे (५) से भाग लेकर लाभ छोड़के शेष द्वितीयस्थान स्थितमें घटा देना शेष जो रहे उसमें १ जोड़ना । सातसे अधिक हो तो (७) से भाग लेकर शेष कालहोरेश दिनके वारसे गिनकर जानना ! ऐसे ही एक दिनमें सभी ग्रहोंकी होरा जाननी. एक होरासे दूसरी होरा उससे छठे ग्रहकी होती है, जैसे रविवार प्रवेश इष्ट घटी ६ में हुआ द्विगुण (१२) दो जगे स्थापन किया एक जगे (५) से भाग लेकर २ पाया दूसरे स्थानके १२ में घटाया १० रहा इसमें ७ से भाग लेकर शेष ३ रहा एक और जोड़ दिया ४ हुए, रविवारके दिनकी होरा देखनी है इसलिये रविसे चौथी २३ ) प्रकरणम् १. भावाटीकासमेतः। बुधकी होरा हुई । यहां वारप्रवृत्ति केवल कालहोराके निमित है और कार्यो में वार सूर्योदयसे ही माना जाता है यह वसिष्ठ सद्धान्तमें लिखा है ।। ५'५ ।। ( अनु० ) कालहोराप्रयोजनन् । वारे प्रोक्तं कालहोरासु तस्य धिष्ण्ये प्रोक्तं स्वामितिथ्यंशकेऽस्य । कुर्यादिक्शूलादि चिन्त्य क्षणेषु नैवोल्लंघ्यः परिधश्चापि दण्डः ॥५६॥ कालहोरका प्रयोजन है कि, जो कार्य जिस वारमें करना कहा है वह उसके कालहोरामें हरएक वारमें कर लेना, जैसे रविवार के दिन प्रवेशका निषेध है परन्तु चंद्र बुध गुरु शुक्रके होरामें रविवारके दिन भी आवश्यकमें प्रवेश कर लेना, ऐसे ही जिस नक्षत्रमें जो कार्य नहीं करना कहा है उसमें यदि आवश्यक हो तो उस नक्षत्र में जिस मुहूर्त में पूर्वोक्त नक्षत्रके स्वामीकी कालहोरा हो उसमें वह कृत्य कर लेना । मुहूर्तके स्वामी विवाहप्रकरणमें कहे हैं. उक्त विषयके मुहूर्त में इतना अवश्य स्मरण चाहिये कि दिक्शूल तथा परिदण्डादि विचार लेने, इनका विचार यात्राप्रकरण में हैं ॥ ५६ ॥ ( शालिनी) मन्वादियुगादीनां निर्णयस्तनिषेधश्च । मन्वाद्यास्त्रितिथी मधो तिथिरवी ऊर्जे शुचौ दिक्तिथी- ज्येष्ठेऽन्त्ये च तिथिस्त्विषे नव तपस्यश्वाः सहस्ये शिवाः । भाद्रेऽग्निश्च सिते त्वमाटनभसः कृष्णे युगाद्याः सिते गोऽनी बाहुलराधयोर्मदनदर्शी भाद्रमाघासिते ॥ ५७ ॥ इति मुहूर्तचिन्तामणौ प्रथमं शुभाशुभप्रकरणम् ॥ १॥ चैत्र शुक्लपक्षकी ३। १५ कार्तिक शुक्लकी १५ । १२ आषाढशुक्लकी १० । १५ ज्येष्ठ तथा फाल्गुनकी १५ आश्विन शुक्लकी माघशुक्लकी ७ पौषशुक्लकी ११ भाद्रशुक्लकी ३ श्रावणकृष्णकी ३० ( अमा) ८ ( अष्टमो ) ये मन्वादि हैं और कार्तिकशुक्लकी ९ वैशाखशुक्लकी ३ भाद्रकृष्णकी १३ माघकी ३० ( अमा ) ये युगादि हैं, इतनी तिथियां पुण्यपर्व हैं, इनमें व्रतबंध विद्यारंभ व्रतोद्यापनमें अनध्याय मानते हैं तथा नित्य पढनेमें भी अनध्याय है और प्रकार तत्कालीन अनध्याय-सन्ध्यागर्जन होनेमें, निर्वातशब्द, भूकम्प, उल्कापतनमें तत्कालमात्र तथा और एक आरण्यक समाप्त करके एक दिनरात तथा पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी, राहुसूतक, ऋतुसन्धिमें, श्राद्धभोजन करके, श्राद्धमें दान लेके, (पशु) मेढक नेवला कुत्ता सर्प बिल्ली चूहा आदिके गुरु शिष्यों के बीच में आजानेमें एक दिनरात, वज (२४) मुहूर्तचिन्तामणिः- [ नक्षत्र-- पडनेमें, इन्द्रधनुषमें गधा ऊँट गीध उल्लू कौवाओंके अति दुःखित बडा शब्द करनेमें, प्रेत, शूद्र, चांडाल, श्मशान पतितके समीप जानेमें भोजनोत्तर गीले हाथपर्यंत, अर्द्धरात्रिमें, अति- प्रचण्ड वायु चलने में, रजवर्षणमें दिग्दाह, सन्ध्यामें, नीहार) भयस्थानमें, दौडनेमें, दुर्गन्धर्म, श्रेष्ठजनके अपने घर आनेमें, गवा ऊँट हाथी घोडेकी सवारीमें, वृक्षारोहणमें तात्कालिक अनध्याय होते हैं और भी अनध्याय धर्मशास्त्रोक्त सूतकादि भी हैं । ।। ५७ ।। ( शार्दूल वि० वृ०) इति महीधरकृतायां मुहर्तचिन्तामणिभाषाटीकायां प्रथम शुभाशुभप्रकरणं समाप्तम् ॥ १ ॥ अथ नक्षत्रप्रकरणम् । नक्षत्रस्वामिनः। नासत्यान्तकवह्निधातृशशभूद्रुद्रादितीज्योरगा ऋषेशाः पितरो भगोर्यमरवी त्वष्टा समीरः क्रमात् । शक्रानी खलु मित्र इन्द्रनिऋतिक्षीराणि विश्व विधि- गोविन्दो वसुतोयपाजचरणाहिर्बुध्न्यपूषाभिधाः ॥ १॥ नक्षत्रोंके स्वामी कहते हैं--अश्विनीके अश्विनीकुमार । भरणीके यम । ऐसे ही कृत्तिकाका अग्नि। रोहिणीका ब्रह्मा । मृशिराका चन्द्रमा । आर्द्राका शिव । पुनर्वसुका आदिति । पुष्य का बृहस्पति । आश्लेषाका सर्प । मधाका पितर । पूर्वाफाल्गुनीका भग । उत्तराफाल्गुनीका अर्यमा । हस्त का सूर्य । चित्राका विश्वकर्मा । स्वातीका वायु । विशाखाके इन्द्र एवं अग्नि । अनु- राधाका मित्र (सूर्य ) ज्येष्ठाका इन्द्र। मूलका निति । पूर्वाषाढाका जल । उत्तराषाढाका विश्वे- देव । अभिजित्का विधि । श्रवणका विष्णु । धनिष्ठाका वसु । शतभिषाका वरुण । पूर्वाभाद्र पदाका अजचरण । उत्तराभाद्रपदाका अहिर्बुदय । रेवतीका पूषा.यह नक्षत्रोंके स्वामी हैं । स्वस्वा- मिनामसे भी ग्रन्थों में प्रसिद्ध रहते हैं, जैसे जहां 'कर' नाम नक्षत्रसम्बन्ध हो वहां हस्त जानना ॥ १॥ ( शा० वि० ) जो नक्षत्र जिस कार्यके योग्य है इसका विस्तार ग्रन्थांतरोंसे कहते हैं-अश्विनीमें वस्त्र, उप- नयन, क्षौर, सीमंत, भूषण, स्थापना, हाथीका कृत्य, स्त्री, कृषि, विद्या आदि । भरणीमें बावडी, कूवा, तालाब, आदि विशस्त्रादि उग्र एवं दारुण कर्म, रन्ध्रप्रवेश, गणित, धरोहर वा खत्तेमें वस्तु रखना। कृत्तिकामें अग्न्याधान, अस्त्र, २.स्त्र, उग्रकर्म, मिलाप, विग्रह, दारुणकर्म, संग्राम, औषधि वादिन कर्म । रोहिणीमें सीमन्त, विवाह, वस्त्र, भूषण, स्थिरकर्म, हाथी घोडके कृत्य, अभिषेक, प्रतिष्ठा । मृगशिरमें प्रतिष्ठा. .

प्रकरणम् २.] भाषाटीकासमेतः। (२५) - भूषण, विवाह, सीमंत, क्षौर, वास्तुकृत्य, हाथी घोडे ऊंट सम्बन्धी कृत्य, यात्रा । आीमें ध्वजा, तोरण. संग्राम, दीवाल, अस्त्र शस्त्रक्रिया, संधि, विग्रह, वैर रसादिकृत्य । पुनर्वसुमें प्रतिष्ठा, सवारी, सीमन्त, वस्त्र, वास्तु. उपनयन, धान्यभक्षण, क्षौर । पुष्यमें विवाह बिना समस्त शुभ कृत्य । आश्लेषामें झूठ, व्यसन, छूत, धातुवाद, औषधि, संग्राम, विबाद, रस- क्रिया, व्यापार । मघामें कृषि. व्यापार. गौ, अन्न, रणोपयोगी कृत्य, विवाह, नृत्य, गीत । तीनों पूर्वामें कलह. विष. शस्त्र, अग्नि. दारुण, उग्र संग्राम, मांसविक्रय । तीनों उत्तराओंमें प्रतिष्ठा, विवाह, सीमत. अभिषेक, व्रतबन्ध. प्रवेश, स्थापना, वास्तुकर्म । हस्तमें प्रतिष्ठा, विवाह, सीमंत, सवारी, उपनयन, वस्त्र, क्षौर, वास्तु, अभिषेक, भूषण । चित्रामें क्षौर, प्रवेश, बस्त्र, सीमन्त, प्रतिष्ठा, व्रतबन्ध, वास्तु, विद्या भूषण। स्वातीमें प्रतिष्ठा, उपना यन, व्यापार, सीमन्त, भूषण, विवाद, हस्तिकृत्य, कृषि, क्षौर । विशाखामें वस्त्र, भूषण- व्यापार. रसधान्यसंग्रह, नृत्य, गीत. शिल्प. लिखना, आदि । अनुराधामें प्रवेश, स्थापना, विवाह, व्रतबन्ध, अष्ट प्रकार के मंगल, वस्त्र, भूषण, वास्तु, संधि, विग्रह । ज्येष्ठामें क्रूरकर्म, उग्रकर्म, शस्त्र. व्यापार, गौ भैसका कृत्य, जलकर्म, नृत्य, वादित्र, शिल्प, लोहाके काम, पत्थरका काम, लिखना । मूलमें कृषि, वाणिज्य, उग्र, दारुणसंग्राम, औषधि, नृत्य, शिल्प संधि, विग्रह, लेखन । श्रवण), प्रतिष्ठा, क्षौर, सीमंत, यात्रा, उपनयन, औषधि, पुरग्राम गृहका आरम्म, पट्टाभिषेक । धनिष्ठामें शस्त्र, उपगयन, क्षौर, प्रतिष्ठा. सवारी, भूषण, वास्तु सीमंत, प्रवेश, शतभिषामें प्रवेश, स्थापन. क्षौर, मौंजी, औषधि, अश्वकर्म, सीमन्त, वास्तु- कर्म । रेवतीमें विवाह, व्रतबन्ध, अश्वकर्म, प्रतिष्ठा. सवारी, भूषण, प्रवेश. वस्त्र, सीमन्त क्षौर औषधिके कृत्य करने ॥ नक्षत्राणां ध्रुवादिसंज्ञा तत्कृत्यं च । उत्तरात्रयरोहिण्यो भास्करश्च ध्रुवं स्थिरम् । तत्र स्थिरं बीजगेहशान्त्यारामादिसिद्धये ॥ २ ॥ स्वात्यादित्ये श्रुतेस्त्रीणि चन्द्रश्चापि चरं चलम् । तस्मिन्गजादिकारोहो वाटिकागमनादिकम् ॥३॥ पूर्वात्रयं याम्यमधे उग्रं क्रूरं कुजस्तथा । तस्मिन्धातानिशाठ्यानि विषशस्त्रादि सिद्ध्यति ॥४॥ विशाखाग्नेयभे सौम्यो मिश्रं साधारणं स्मृतम् । तत्राग्निकार्य मिश्रं च वृषोत्सर्गादि सिद्धयति ॥ ५ ॥ . ..

(२६) मुहूर्तचिन्तामणिः- [ नक्षत्र- हस्ताश्विपुष्याभिजितः क्षिप्र लघु गुरुस्तथा । तस्मिन्पण्यरतिज्ञानभूपाशिल्पकलादिकम् ॥ ६ ॥ मृगान्त्यचित्रामित्र मृदु मत्रं भृगुस्तथा । तत्र गीताम्बरक्रीयामित्रकार्य विभूषणम् ॥ ७ ॥ मूलेन्द्राभि सीरितीक्ष्णे दारुणसंज्ञकम् । तत्राभिचारघातोयभेदाः पशुदमादिकम् ॥ ८॥ नक्षत्रोंकी संज्ञा तथा कर्म भी कहते हैं:---तीनों उत्तरा, रोहिणी, रविवार, ध्रुव एवं स्थिर- संज्ञक हैं इनमें स्थिरकर्म, बीज बोना, गृहारम्भ, शांतिकर्म बगीचाका कार्य तथा मूदुन- क्षत्रोक्त कार्य भी सिद्ध होते हैं ॥ २ ॥स्वाती, पुनर्बसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और चन्द्रवार चर एवं चलसंज्ञक हैं, इनमें हाथी घोडे आदि सवारी, बावड़ी, यात्रादि तथा लघु नक्षत्रोक्त कर्म भी सिद्ध होते हैं ॥ ३ ॥ तीनों पूर्वा, भरणी, मधा और मौमवार उग्र एवं करसंज्ञक हैं, इनमें मारणकृत्य, अग्निकृत्य, विषसंबंधी कृत्य, शस्त्रकर्म अन्य अरिष्टकृत्य, और दारुण नक्षत्रोक्त कृत्य भी सिद्ध होते हैं ॥४॥ विशाखा, कृत्तिका और बुधबार मिश्र एवं साधारणसंज्ञक है, इनमें अग्निहोत्रादि, काम्यवृषोत्सर्गादि और उग्रनक्षत्रोक्त कर्म भी सिद्ध होते हैं ॥ ५ ॥ हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित् और गुरुवार क्षिप एवं लघुसंज्ञक हैं, इनमें दूकान, स्त्रीसंभोग, शास्त्रादिज्ञानारम्भ, भूषण, शिल्लविद्या, नृत्यादि ६४ कला और चरनक्षत्रोक्त कृत्य भी सिद्ध होते हैं ॥ ६ ॥ मृगशिर, रेवती, चित्रा, अनुराधा और शुक्रवार मूदु एवम् मैत्रसंज्ञक हैं, इनमें गीतकृत्य, वस्त्र, स्त्रीक्रोडा. मित्रसम्बन्धी कृत्य, आभूषण और ध्रुवनक्षत्रोक्त कृत्य भी सिद्ध होते हैं ॥ ७ ॥ मूल ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा और शनिवार तीक्ष्ण एवम् दारुणसंज्ञक हैं, इनमें अचिभार ( जादुगरी), मारणादि (भयानक- कर्म ; तथा विद्वेषण हाथी घोडे आदि पशुओंका ( दमन ) शिक्षा वा बन्धन यद्वा उन्हें नपुंसक बनाना और उग्रनक्षत्रोक्त कृत्य भी सिद्ध होते हैं ॥ ८॥ ( अनु० ) मूलाहिमिश्रोग्रमधोमुखं भवेदूवा॑स्यमाईज्यहरित्रयं ध्रुवम् । विर्यमुख मैत्रकरानिलादितिज्येष्ठश्विभानोदृशकत्यमेषु सत् ॥ ९॥ मूल, आश्लेषा, मिश्रनक्षत्र, उपनक्षत्र अधोमुखसंज्ञक हैं, इनमें वापी, कूप, खात आदि कृत्य शुभ होते हैं । आद्रा, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और ध्रुवनक्षत्र ऊर्ध्वमुख हैं, इनमें राज्याभिषेक, पट्टबंधन, इमारत आदि कृत्य शुभ होते हैं ।

प्रकरणम् २.] भाषाटीकासमेतः । (२७) मृदु नक्षत्र हस्त. स्वाती, पुनवेसु, ज्येष्ठा, अश्विनी (तियङ्मुख ) समदृष्टि संज्ञक है, इनमें चक्र, रथ, हल, बीज, पशुकृत्यादि सिद्ध होते हैं। ९ ।। (इं० व० ) प्रवालदन्तशङ्खसवर्णवस्त्रपरिधानमुहूर्ताः । पौष्णध्रुवाश्विकरपञ्चकवासवेज्यादित्ये प्रबालरदशंखसुवर्णवस्त्रम् । धार्य विरिक्तशनिचन्द्रकुजेऽह्नि रक्तं भौमे ध्रुवादिति युगे सुभगा न दध्यात १० रेवती, ध्रुवनक्षत्र, अश्विनी, हस्तसे अनुराधापर्यंत और पुष्य, पुनर्वसुमें मूंगा, मोती, हाथी दांतके एवं शङ्खके भूषण, चूडी आदि और सुवर्ण वस्त्र धारण करना परन्तु जिस दिन रिक्ततिथि शनि चन्द्र मंगलवार न हो तथा मंगलवारको लालरङ्ग वस्त्र सुवर्ण धारणका दोष नहीं और मंगलवार ध्रुवनक्षत्र पुनर्बसु तिष्यमें सौभाग्यवती उक्त वस्तु धारण न करे ॥ १० ॥ (वसन्ततालिका) वस्त्रस्य दग्धादिदोषे शुभाशुभफलम् । वस्त्राणां नवभागकेषु च चतुष्कोणेऽमरा राक्षसा मध्ययंशगता नरास्तु सदशे पार्वे च मध्यांशयोः । दग्धे वा स्फुटितेऽम्बरे नवतरे पङ्कादिलिप्ते न स- दशोऽशे नृसुराशयोः शुभमसत्सर्वाशके प्रान्ततः॥ १३ ॥ नवीनवस्त्र, उपलक्षणसे शयन, पादुका, छत्र, ध्वजादि भी यदि किसी स्थानमें अग्निसे दग्ध हों वा फटे वा कज्जल पंक आदिसे लिप्त हों तो उसके बराबर नव (९) भाग करनेसे चारों कोणोंमें देवता बीचके ऊर्ध्वाधः त्रिभागमें मनुष्य और पार्श्वके दो भागोंमें राक्षसोंके स्थान हैं, इनमेंसे दग्धादि भाग राक्षसोंका हो तो दुष्ट फल है, उस वस्त्रादिको त्यागके सुव, र्णादि दान करना । यदि उक्त भाग मनुष्य वा देवताओंका हो तो शुभ होता है. मतांतर है कि दग्धादिपर यदि श्रीवत्स सर्वतोभद्राद्रि शुभ चिह्न हों तो राक्षसभागमें भी शुभ होता है । यदि सर्पादि दुष्ट चिह्न शुभ भागोंमें हो तो भी अशुभ ही होता है ॥ ११ ॥ (शा०वि०) कचिदुष्टदिनेऽपि वस्त्रपरिधानम् । विप्राज्ञया तथोराहे राज्ञा प्रीत्यापितं च यत् । निन्द्येऽपि धिष्ण्ये वारादौ वस्त्रं धार्य जगुर्बुधाः ॥ १२ ॥ ब्राह्मणकी आज्ञासे, विवाहमें और राजा जब प्रसन्नतापूर्वक वस्त्रादि देवे तो बिना उक्त मुहर्त यद्वा निंद्य नक्षत्रवारादिमें भी धारण कर लेना ॥ १२ ॥ ( अनु० )

(२८)
मुहूत्तचिन्तामाणः ।
नक्षत्र-
लतापादपरोपणादिमुहूर्ताः।
राधामूलमृदुध्रुवक्षवरुणप्रैिलतापादपा-
रोपोऽथो नृपदर्शन धवक्षिप्रश्रवोवासवैः ।
तीक्ष्णोराम्बुपभेषु मद्यमुदित क्षिप्रान्त्यवह्वीन्द्रभा-
दित्येन्द्राम्बुपवासवेषु हि गवां शस्तः क्रयो विक्रयः ॥ १३ ॥
अनुराधा. मूल, ध्रुव. मृदु, क्षिप नक्षत्र, शतभिषा और शुभ वार तिथियोंमे लता, वृक्षा
अन्नादिरोपण, बीज वापन करना । ध्रुव, मृदु, झिप्र नक्षत्र एवं श्रवण, धनिष्ठामें प्रथम
राजदर्शन करना । तीक्ष्ण, उग्र, नक्षत्र और शतभिवामें मद्यका आरम्भ करना । क्षिप्र
नक्षत्र, रेवती, कृत्तिका, ज्येष्ठा, मृग'क्षर पुनर्वसु, शतभिषा. धनिष्ठाम गौ आदि पशुओंका
क्रय विक्रय ) लेना देना आदि व्यवहार करना ॥ १३ ॥ ( शा० वि० )
पशूनां रक्षामुहूर्तः।
लग्ने शुभे चाष्टमशुद्धिसंयुते रक्षा पशूनां निजयोनिभे चरे ।
रिक्ताष्टमीदशकुज श्रवोध्रुवत्वाष्ट्रेषु यानं स्थितिवेशनं न सत् ॥ १४ ॥
( शुभलग्न ) शुभग्रहकी राशि लग्न जिससे अष्टमस्थान भी ( शुद्ध) ग्रहरहित हो तथा
पशुयोनि नक्षत्रोंमें एवं चरनक्षत्रों में पशुओंके रक्षासम्बन्धी कार्य करने । पशुओंकी स्थिति
एवं प्रवेश न करना ॥ १४ ।। (६० व० )
औषधिसूचीकर्मणो मुहूर्तः ।
भैषज्यं सल्लघुमृदुचरे मूलभे व्यङ्गलग्ने शुक्रन्द्रीज्ये विदि च दिवसे
चापि तेषां, रवेश्च । शुद्धे रिःमधुनमृतिगृहे सत्तिथौ नो जने सूचीक-
माप्यदितिवसुभे त्वाष्ट्रमित्राश्विपुष्ये ॥ १५॥
लघु मृदु, चर नक्षत्र तथा, मूलमें द्विस्वभाव राशि ३।६।९। १२ के लग्न जिनसे
१२ । ७ । ८ भाव शुद्ध ग्रहरहित हो तथा शुक्र, चन्द्र, वृहस्पति, बुध, रविवारमें (सत्तिथी)
रिक्ता अमारहित तिथियों में औषधसेवन करना, परन्तु जन्मनक्षत्र तिथि उस दिन हों तो
न करना और पुनर्वसु, धनिष्ठा, चित्रा, अनुराधा, अश्विनी में (सूची-कर्म ) सिलाई कसीदा
आदि काम करना ॥ १५ ॥ ( मं० क्रां० )
क्रयविक्रयनक्षत्राणि ।
क्रयः विक्रयो नेष्टो विक्रयः ऋयोऽपि न ।
पौष्णाम्बुपाश्विनीवातश्रवश्चित्राःकये शुभाः ॥ १६ ॥

.प्रकरणम् २, भाषाटाकासमतः । जिन नक्षत्रों में वस्तु मोल लेना कहा है उनमें बेचनेका आरम्भ न करना, जिनमें बेचने का आरंभ कहा है उनमें खरीद न करना, यह नियम साधारण व्यवहार के आरंभ मात्रका है, सर्वदा नहीं। यदि सर्वदा यह नियम माना जाय तो व्यापार ही न हो जैसे किसी किसी दिन खरीदनेका नक्षत्र देखकर कोई खरीदने आया परन्तु बेचनेका नक्षत्र न होनेसे उस दिन न बेचेगा तो क्रेता कहा से उक्त मुहूर्तपर खरीद करेगा ? ऐसे ही वेचनेके मुहूर्तपर किसीने वेचना चाहा परन्तु खरीददार उस मुहू ते पर लेता नहीं तो किसको बेचना ? एसी शंकामें यह नियम प्रथमारम्भ मात्रका है, जैसे-कोठी, वाले आदि महाजन समय पर बहुत माल खरीदते है, पुनः विक्रीक समय पर बेचते हैं ऐसेमें यह मुहुर्त है। नित्यके व्यापारको नहीं, रेवती, शतभिषा, अश्विनी, स्वाती, श्रवण खरीदनेको शुभ हैं ॥ १६ ।। ( अनु० ) विक्रयविपणिमुहूर्तः । पूर्वाद्वीशकशानुसार्पयमभे केन्द्रत्रिकोणे शुभैः षट्च्यायेष्वशुभैविना घटतनुं सन्विक्रयः सत्तिथौ । रिक्ताभोमवटान्विना च विपणिमित्रध्रुवक्षिप्रभै- लग्ने चन्द्रसिते व्ययाष्टरहितैः पापैः शुभैायखे ॥ १७ ॥ तीनों पूर्वा, विशाल, कृत्तिका आश्लेषा, भरणी नक्षत्रमें तथा केन्द्र १।४।७।१० त्रिकोण ९१५ लग्नमें शुभ ग्रह हों ३।६।११ भावोंमें पापग्रह हों, कुम्भलग न हो एवं शुभ तिथियोंमें विक्रय बेचनेका आरम्भ करना और इसानक आरम्भके लिये रिक्ता तिथि मंगलवार कुम्भलग्न छोडके अनुराधा ध्रुव. क्षिप्र नक्षत्रोंमें तथा लग्नमें चन्द्रमा शुक्र हों, पापग्रह आठव बारहवें न हों शुभग्रह २।११।१९ भावोंमे हो, ऐसे मुहुर्तमें पण्यारम्भ करना लग्नका चन्द्रमा सर्व कार्योभे वर्जित हैं परन्तु ( वैश्यों ) दूकानदारोंके स्वामी होनेसे तथा शुक्र के साथ होनेसे लग्नका चन्द्रमा गुणी कहा है ॥ १७ ॥ (शा० वि० ) अश्वहस्तिक्रया दिमुहूर्तः । क्षिप्रान्त्यवस्विन्दुमरुज्जलेशादित्येष्वरिक्तारदिने प्रशस्तम् ।। स्याद्वाजिकत्यं त्वथ हस्तिकार्य कुर्यान्मृदुक्षिप्रचरेषु विद्वान् ॥१८॥ क्षिप्र नक्षत्र, रेवती. मृगशिर. स्वाती, शतभिषा. पुनर्वसुमें रिक्तातिथि भौमवार छोडक घोडोंका क्रय विक्रय आदि कृत्य करना: धोड़ोंकी सवारीके लिये ग्रन्थान्तरोंमें चक्र है कि धोडेका आकार बनाके सूर्यके नक्षत्रसे दिन नक्षत्रपर्यंत कन्धे ५ नक्षत्र लक्ष्मी ! पीठमें १० नक्षत्र अर्थसिद्धि । पुच्छमें २ स्त्रीनाश । पैरोंने ४ रण भंग । पेटमें ५ घोडानाश । मुखमें २ धनलाभ और विद्वान् मृदु, ध्रुव, क्षिप्र चर नक्षत्रोंमें ऐसे ही हाथीका कृत्य करे तथा शुभ

(३०)
मुहर्त चिन्तामणि:-
नक्षत्र--
लग्न अंगक नागमें और शनिवारमें एवं शनिलममें ही हाथीका अंकुशारम्भ
करना ॥ १८ । ( इन्द्रना)
भूषाघटनादिमुहूर्तः ।
म्याद्भपाश्टनं त्रिपुष्करचरक्षिप्रधुवे रत्नयुक्
तनीक्ष्णोपविहीनभे रविकुजे मेपालिसिंहेतनौ ।
तन्मुक्तासहितं चरध्रुवमृदुक्षिप्रे शुभे सत्तनौ
तीक्ष्णोपाश्विमृगे द्विदैवदहने शस्त्रं शुभं घट्टितम् ॥ १९ ॥
त्रिपुष्कर ( भद्रातिथिर विजेत्यादिकथित ) योग तथा चर क्षिप्र. ध्रुव नक्षत्रोमें भूषण गढने
जो भूषण रत्नसहित ( जडाऊ) हो तो तीक्ष्ण, उग्र नक्षत्र वर्जित नक्षत्र तथा रवि मंगलवार
मेष वृश्चिक, सिंह लग्नमें करना, यदि मोतियोंका भूषण हो तो चर. ध्रुव मृदु क्षिप्र नक्षत्र
चन्द्र. शुक्रवार ४।२।७ लग्नमें करना, यही चांदीके भूषणोंको भी जानना, तीक्ष्ण उग्र
नक्षत्र, अश्विनी. मृगशिर. विशाखा. कृत्तिकामें शस्त्र मढ़ना शुभ होता है ॥ १९ ॥
( शार्दूलविक्रीडित)
मुद्रापातनवस्त्रक्षालनमुहूर्तः ।
मुद्राणां पातनं सदू ध्रुवमृदुचरभक्षिप्रभैर्वीन्दुसौरे
बने पूर्णाजयाख्ये न च गुरुभृगुजास्ते विलग्ने शुभः स्यात् ।
वस्त्राणां क्षालनं मसुहयदिनकृत्पञ्चकादित्यपुष्ये
नो रिक्तापर्वषष्ठीपितृदिनरवियज्ञेषु कार्य कदापि ॥ २० ॥
ध्रुव, मृदु. चर क्षिप्र नक्षत्रोंमें सोम. शनिवार रहित पूर्णा, जया तिथियोंमें ५ !
१०।१५।३।८।१३ में शुभलग्नमें गुरु शुक्रास्तादिदोषरहित समयमें ( मुद्रापातन )
और धनिष्ठा, अश्विनी. हस्तसे पांच नक्षत्र, पुनर्वसु, पुष्य नक्षत्रोंमें स्वयं वस्त्रक्षालन
करना यद्वा । रजक ; धोबीको देना हो तो उक्त नक्षत्रोंमें देना, परन्तु रिक्ता तिथि
षष्ठी. पर्वदिन, अमावस्या और शनि बुधवारमें वस्त्रप्रक्षालन कदापि न करना ।
॥ २० ॥ (स्वग्धरा)
खड्गादिधारणशय्याद्युपभोगमुहूर्तः ।
संधार्याः कुन्तवर्मेष्वसनशरकृपाणासिपुत्र्यो विरित्ते
शुक्रेज्यार्केऽहिमैत्रध्रुवलघुसहितादित्यशाका द्विदैवे ।
स्युर्लभऽपि स्थिराख्ये शशिनि च शुभदृष्टे शुभैः केन्द्रगैः स्याद्
भोगः शय्यासनादेर्युवमृदुलघुहर्यन्तकादित्य इष्टः ॥ २१ ॥

प्रकरणम् २.]
भाषाटीकासमेतः ।
(३१)
रिक्तातिथि रहित शुक्र वृहस्पति रविवार. मैत्र, ध्रुव नक्षत्र तथा पुनर्वसु, ज्येष्ठा, विशाखा
में कुन्त (प्रास ) गात्रोंसहित तलवार वा खुखरी छुरी ( वर्म) कवच, बख्तर धारण करनेपर
तथा इस कृत्यमें स्थिर लग्न तथा चन्द्रमापर दृष्टि और शुभग्रह केन्द्रमें आवश्यक
हैं. ध्रुव, मृदु, लघु, श्रवण, भरणी, पुनर्वसु नक्षत्रोंमें शय्या ( चारपाई ) पलंग
पीठ मृगचर्म पादुका आदि बैठने तथा सोनेके उपयोगी वस्तु काममें लाना । ॥ २१ ॥
.
अन्धादिनक्षत्राणि ।
अन्धाक्षं वसुपुष्यधातृजलभद्दीशार्यमान्त्याभिध
मन्दाक्षं रविविश्वमित्रजलपाश्लेषाश्विचान्द्रं भवेत् ।
मध्याक्षं शिवपित्रजैकचरणत्याष्ट्रेन्द्रविध्यन्तकं
स्वक्षं सात्यदितिश्रवोदहन भाहिर्बुध्न्यरक्षोभगम् ॥ २२ ॥
रोहिणी, पूर्वाषाढा, धनिष्ठा. पुष्य. विशाला, उत्तराफाल्गुनी, रेवती ये अन्धाक्ष
संज्ञक हैं. हस्त. उत्तराषाढा, अनुराधा, शतभिषा, आश्लेषा, अश्विनी, मृगशिर ये
मन्दाक्षसंज्ञक हैं. आर्द्रा, मघा. पूर्वाभाद्रपदा, चित्रा, ज्येष्ठा, अभिजित्, भरणी ये
मध्याक्षसंज्ञक हैं. इनके गिनने की सुगम रीति यह भी है कि रोहिणीसे ४ । ४ नक्षत्र क्रमसे
अन्ध, मन्द, मध्य, सुलोचन होते हैं, जैसे रो अंध मृ० मन्द आ० मध्य, पु० सुलोचन
पुनः तिष्य अन्ध आश्लेषा मंद इत्यादि ।। २२ ॥ (शा० वि०)
अन्धादिनक्षत्राणां फलम् ।
विनष्टार्थस्य लाभोऽन्धे शीघ्रं मन्दे प्रयत्नतः।
स्याङ्करे श्रवणं मध्ये श्रुत्याप्ती न सुलोचने ॥ २३ ॥
नक्षत्रोंकी उक्त संज्ञाओंका प्रजोजन यह है कि, कोई वस्तु अंघलोचन नक्षत्रमें खो गई
हो तो शीघ्र मिले. मन्दलोचनमें यत्न करनेसे मिले, मध्यलोचनमें दूरतर पता मात्र लगे, वस्तु
हाथ न आवे; सुलोचनमें मिलना मिलना तो दूर रहा किंतु पता भी सुनायी न देवे, जब
वस्तु खो जानेका दिन वा नक्षत्र ज्ञात न हो तो प्रश्नसमय वर्तमान नक्षत्रसे फल
कहना ॥२३।। (अनु०)
धनप्रयोगे निषिद्धनक्षत्राणि ।
तीक्ष्णमिश्रध्रुवोये यद् द्रव्यं दत्तं निवेशितम् ।
प्रयुक्तं च विनष्टं च विष्टयां पाते च नाप्यते ॥ २४ ॥

.. (३२) मुहूर्तचिन्तामणिः- [ नक्षत्र- तीक्ष्ण, मिश्र, ध्रुव, उग्र नक्षत्र तथा भद्रा, व्यतीगतमें जो धनादि किसीको पुनः लेनेके हेतु दिया वा चोर ले गया वा खो गया वा कर्जा दिया तो पुनः मिलेगा नहीं ॥२५॥(अनु०) जलाशयखनननृत्यारंभमुहूर्तः । मित्रार्कधृववासवाम्बुपमघातोयान्त्यपुष्येन्दुभिः पा_नबलैस्तनौ सुरगुरौ ज्ञे वा भृगौ खे विधौ । आप्ये सर्व जलाशयस्य खननं व्यम्भो मधैः सेन्द्रभै- स्तैनृत्य हिबुके शुभे तनुगृहे जेऽब्जे ज्ञराशौ शुभम् ॥२५॥ अनुराधा, हस्त, ध्रुवनक्षत्र, धनिष्ठा, शतभिषा, मघा, पूर्वाषाढा, रेवती, पुष्य, मृगशिरमें तथा पापग्रह हीनबली हों. शुभलममें बुध बृहस्पति शुक्रमेंसे कोई हो, चंद्रमा दशम स्थानमें जलचर राशिका हो ऐसे समयमें बावड़ी कूप तालाब आदि जलाशय खनना वा बनाना । और पूर्वाषाढा-"मघारहित ज्येष्ठासहित उक्त नक्षत्र तथा लग्नसे चौथे शुभग्रह और लग्नमें बुध, बुधकी राशि ३ ६ के चन्द्रमामें "नृत्यारंभ" नाच खेल नाटिकादिकोंका आरम्भ करना ॥ २५॥ (शा०वि०) सेवकस्य स्वामिसेवायां मुहर्तः । क्षिप्रे मैत्रे वित्सितार्केज्यवारे सौम्ये लग्नेऽर्के कुजे वा खलाभे । योनमैत्र्यां राशिपोश्चापि मैत्र्यां सेवा कार्या स्वामिनः सेवकेन ॥२६॥ क्षिप्र, मैत्र नक्षत्र, बुध, शुक्र, रवि. गुरुवार तथा शुभग्रहयुक्त लग्नमें और सूर्य वा मंगल दशम वा ग्यारहवां हो ऐसे मुहूर्तमें सेवक ( नौकर ) स्वामीकी सेवाका आरंभ करे परन्तु स्वामिसेवककी योनियोंकी मैत्री तथा राशिपतियोंकी मैत्री मुख्य विचार्य है, यदि योनि एवं राशिपतियोंकी परस्पर मैत्री हो तो सेवा शुभ होती है ॥ २६ ॥ ( शालिनी) द्रव्यप्रयोगऋणग्रहणमुहूर्तः । स्वात्यादित्यमृदुविदैवगुरुभे कर्णत्रयाश्च चरे लग्ने धर्मसुताष्टशुद्धिसहिते द्रव्यप्रयोगः शुभः । नारे ग्राह्यमणं तु संक्रमदिने वृद्धौ करेऽऽह्नि यत् तदंश्येषु भवेणं न च बुधे देयं कदाचिद्धनम् ॥ २७ ॥ स्वाती, पुनर्वसु, मृदुनक्षत्र, विशाखा, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शततारा, अश्विनी नक्षत्र तथ चर उनमें एवं ९। ५ स्थानोंमें शुभग्रह हो पापग्रह न हों अष्टम भावमें .

प्रकरणम् २.] मापाटीकासमेतः। कोई ग्रह न हो ऐसे मुहूर्तमें (द्रव्यप्रयोग ) धनवृद्धिके लिये ऋणादि देना तथा मंगलवार संक्रांति और रविवारयुक्त हस्तमें ऋण न लेना । यदि ले तो उसके वंशसे भी ऋण न उतरे और बुधवारको कदाचित् भी ऋण न देना ॥ २७ ॥ हलप्रवहणमुहूर्तः । मूलद्वीशमघाचरध्रुवमृदुक्षिविनाकै शनि पापैहीनबलैविधौ जललवे शुक्रे विधौ मांसले । लग्ने देवगुरौ हलप्रवहणं शस्तं न सिंहे घटे कीजैणधटे तनौ सयकरं रिक्तासु षष्ठयां तथा ॥ २८ ॥ मूल, विशाखा, चर, ध्रुव, मृदु, क्षिप्र नक्षत्रोंमें रवि शनिरहित वारोंमें तथा पापग्रह होनवली, चन्द्रमा जलचरराशिके अंश तथा राशिमें हों और शुक्र चन्द्रमा (बलवान् ) उदय हो, बृहस्पति लममें हो, सिंह, कुम्भ, कर्क, मेष, मकर, धन लम रिक्ता षष्ठी तिथि न हों ऐसे मुहर्तमें जोतना आदि कृषिकर्मका आरम्भ करना, रिक्ता षष्ठी आदि वर्जितोंमें कृषि क्षय होती है ॥ २८ ॥ (शा० वि० ) हलचक्रम् । हलदण्डिकयूपानां दिद्विस्थाने त्रिकं त्रिकम् । योक्त्रयोः पञ्चकं मध्ये गणमाचक्रलाङ्गले ॥ दण्डस्थे च गवां हानि!पस्थे स्वामिनो भयम् । लक्ष्मीर्लाङ्गलयोक्त्रेषु क्षेत्रारम्भदिनक्षके ३ बीजोप्तिमुहूर्तः । एतेषु श्रुतिवारुणादितिविशाखोडूनि भौमं विना बीजोतिर्गदिता शुभा त्वगभतोऽष्टानीन्दुरामेन्दवः । रामेन्दमियुगान्यसच्छुभकराण्युप्तौ हलेऽर्कोज्झिता- भाद्रामाष्टनवाष्टभानि मुनिभिः प्रोक्तान्यसत्सन्ति च ॥ २९ ॥ ३ मुहूर्तचिन्तामणिः- [ नक्षत्र- श्रवण, शतभिषा,पुनर्वसु, विशाखा और मंगलवारर हित पूर्वश्लोकोक्त हलप्रवाह नक्षत्रों में बीजवापन करना. जब सूर्य आ के प्रथम चरणपर जाता है तो उस दिनसे तीन दिन पृथ्वीको रज उत्पन्न होता है. इन दिनों में पृथ्वीमें बीज न बोना ॥ बीज वापनमें विशेष बिचार फणि- चक्रका है कि राहुके नक्षत्रसे ८ नक्षत्र अशुभ, ३ शुभ, १ अशुभ, ३ शुभ, १ अशुभ, ३शुभ, १ अशुभ, ३ शुभ, ४ अशुभ । दिननक्षत्रपर्यंत गिनके जहां आवे ऐसा फल जानना। ऐसे ही हल प्रवाहके (खती जोतने) लिये हलचक्र है कि सूर्यके भुकनक्षत्रसे ३ अशुभ, ८ शुभ, ९ अशुभ, ८ शुभ इसमें २८ नक्षत्र अभिजित् सहित हैं, इन चक्रोंमें पूर्वोक्त नक्षत्र शुभ स्थानमें हों तो लेना, अशुभ स्थानमें हों तो न लेना, अनुक्त नक्षत्र चक्रो शुभ भी हो तो न लेना, ग्रन्थान्तरमतसे चक्र ऐसे हैं ॥ २९ ॥ (शा० वि० ) बीजोप्तिचक्रम् । भवद्भत्रितयं मूर्ध्नि धान्यनाशाय राहुभात् । गले त्रयं कजलाय वृद्धिर्भद्वादशोदरे ॥ निस्तण्डुलत्वं लागूले भचतुष्टयमारितम्। नाभावहिपञ्चकं च बीजोप्तावीतयः ऋमात् ॥ शिरामोक्षादिमुहूर्तः। खाष्ट्रान्मित्रकभावयेऽम्बुपलधुश्रोत्रे शिरामोक्षणं भौमार्केज्यदिने विरेकवमनायं स्याचुधार्की विना। मित्रक्षिपचरध्रुवे रविशुभाहे लग्नवर्गे विदो जीवस्यापि तनौ गुरौ निगदिता धर्मक्रिया तबले ॥३० ॥ चित्रा, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, रोहिणी, मृगशिर, शतभिषा, श्रवण और लघु नक्षत्रों में, गल, बृहसति, रविवारमें शिरामोक्षण । नसोंद्वारा रुधिर निकालना ) तथा उक्त नक्षत्रों में बुध शनि विना अन्य वारों में वमन विरेक ( औषधिसे रद्द दस्त लेने ) और मित्र, क्षिप्र, चर ध्रुव नक्षत्रोंमें, रवि, चन्द्र, बुध, बृहस्पतिवार बुध गुरुके ( वर्ग) नवांशादि किसी बाम तथा लमके बृहसति एवं कर्ताकी बृहस्पति शुद्धिमें धमक्रिया ( कोटिहोम रुद्रानुष्ठा- नादि ) करने ॥ ३० ॥ (शार्दू ० ) - प्रकरणम् २.] भाषाटांकासमेतः। ॥ मूल, धान्यच्छेदनमुहूर्तः । चीक्ष्णाजपादकरवह्निवसुश्रुतीन्दुस्वातीमधोत्तरजलान्वकतक्षपुष्ये । मन्दाररिक्तरहिते दिवसेऽतिशस्ता धान्यच्छिदा निगदिता स्थिरभे विल ३१ तीक्ष्ण नक्षत्र, पूर्वाभाद्रपदा, हस्त, कृत्तिका, धनिष्ठा, श्रवण, मृगशिर, स्वाती, मघा, तीनों उत्तरा, पूर्वाषाढा, भरणी, चित्रा पुष्यमें तथा शनि मंगलवार रिक्तः विधि रहित और स्थिरराशिके लग्नों में ( अन्न ) पकी खेती काटनी चाहिये ।। ३६ व ) कणमर्दनसस्यारोपणमुहूर्तः । भाग्यायमश्रुतिमचन्द्रविधातृमूलमैत्र्यान्त्यभेषु गदितं कणमर्दनं सत् । द्वीशाजपानिऋतिधातृशतार्यमझे सस्यस्य रोपणमिहार्किकुजौ विना सत३२ पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, श्रवण, मघा, ज्येष्ठा, रोहिणी, मूल, अनुराधा, रेवती नक्षत्रों में, शुभ तिथिवारोंमें अन्नमर्दन ( चना गेहूँ आदिका) भूसेसे अलग करना । विशाखा, पूर्वाभाद्रपदा, रोहिणी, शततारा, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रोंमें शनि मंगलवार वर्जित करके अन्न पौदेसे लेक दूसरे स्थल पानीके खतमें रोपण करना ॥ ३२ ॥ ( व० ति० ) धान्यस्थि तिर्धान्यवृद्धिश्च । मिश्रोधरौद्रभुजगेन्द्रबिभिन्नभेषु कर्काजतौलिरहिते च तनौ शुभाहे । धान्यस्थितिः शुभकरी गदिता ध्रुवेज्यद्दीशेन्द्रदनचरभेषु च धान्यवृद्धि ३३ मिश्र, उग्र आदा, आश्लेषा, ज्येष्ठारहित नक्षत्रों में कर्क, मेष, तुलारहित लममें, शुभ वारों में अन्नस्थिति ) खेतीको टार आदिमें स्थापन करना, ध्रुव, पुष्य, विशाखा, ज्येष्ठा, अश्विनी और चरनक्षत्रोंमें धान्यवृद्धि ( अन्न व्याजपर देना ) अर्थात् अन्न उधार देकर कुछ महीनों में सवाया या ड्योढा लेते हैं ॥ ३३ ॥ ( व० ति० ) शान्तिपौष्टिकादिकृत्यमुहूर्तः। क्षिप्रधुवान्त्यचरमैत्रमधासु शस्तं स्याच्छान्तिक सहच मङ्गलपौष्टिकाभ्याम् । खेऽकें विधौ सुखगते तनुगे गुरौ नो मौढ्यादिदुष्टसमयेशुभदं निमित्ते ॥३४॥ क्षिप्र, ध्रुव, रेवती, चर, मैत्र, मघा नक्षत्रोंमें तथा लग्नसे दशम सूर्य, चतुर्थ चन्द्र, लग्नके गुरु होनेमें मूल गण्डान्तादि वा केतु-उत्पातदशनादि शांतिक तथा पौष्टिक कर्म करने, नैमित्तिक शांते, गुवेस्त, शुक्रास्त बालवृद्धादि दुष्ट समयमें भी शुभ होती है ॥ ३४ ॥ (व० ति. - .

१
(३६)
मुहुर्तचिन्तामणि:-
होमाहुतिमुहर्चः ।
र्यभात् त्रित्रिभे चान्द्रे सूर्यविच्छुक्रपङ्गवः ।
चन्द्रारेज्यागुशिखिनो नेष्टा होमाहुतिः खले ॥ ३५ ॥
होमकी आहुति कहते हैं-शुभग्रहकी आहुतिमें होम करना । पापग्रहकीमें न करना । सूर्य के
बसनसे चन्द्रपर्यन्त ३ । ३ गिनके प्रथम ३ में सूर्यकी फिर ३ में बुधकी एवं शुक्र, शनि,
बदमा, मङ्गल, गुरु, राहु, केतुकी क्रमसे आहुति जानो ॥ ३५ ॥ (अ०)
वहिनिवासस्तत्फलम् ।
सैका तिथिरियुता कवामा शेषे गुणेऽने भुवि बहिवासः ।
सौख्याय होमे शशियुग्मशेषे प्राणार्थनाशौ दिवि भूतले च॥३६॥
वर्तमान तिथिमें १ बोडके वार जोडना, ४ से ( शेष ) तष्ट करना, जो शेष ० का ३ रहे तो
पृथ्वी में अमिका वास जानना, हवन करनेमें सुख होगा. यदि१।२ शेष रहें तो वहिवास क्रमसे
प्रकाश और पातालमें है। इसमें होम करनेसे प्राण, धन नष्ट होते हैं ॥ ३६ ॥ (इ० व.
नवान्नभक्षण मुहूर्तः ।
नवान्नं स्याच्चरक्षिप्रमृदुभे सत्तनौ शुभम् ।
विना नन्दाविषघटी मधुपौषाभूमि जान् ॥ ३७ ॥
पौष, चैत्र मास, शनि, मंगलवार नन्दा १ । ६ । ११ तिथि (विषघटी) विवाहप्रकरणोक
इन सबको छोडकर शुभयुक्त इष्टरुममें तथा चर, क्षिप्र, मृदु, नक्षत्रोंमें (नवान्न ) नई फसलका
असमाशन करना ॥ ३७ ॥ ( अनु० )
नौकाघट्टनमुहूर्तः ।
याम्यत्रयविशाखेन्द्रमा पित्र्येशभिन्नभे।
भृग्वीज्याकदिने नौकाघटनं सचनौ शुभम् ॥ ३८ ॥
भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, विशाखा, ज्येष्ठ, आश्लेषा, मघा, आर्द्रारहित नक्षत्रोंमें उथ
शुक गुरु रविवारमें नौका (नाव डोंग्गी) आदि गढनी ॥ ३८॥ ( अनु०)
वीरसाधनादिमुहूर्तः।
मूलाभिरणीपिञ्चमृगे सौम्यो घटे वनौ ।
सखे शुक्रेऽष्टम शुद्ध सिद्धिर्षीराभिचारयोः ॥ ३९ ॥

प्रकरणम् २.]
भाषाटीकासमेतः।
(३७)
मूल, आद्र, भरणी, मघा. मृगशिर नक्षत्रोंमें तथा कुम्भलग्नमें बुध अक्स
चतुर्थ शुक्र तथा अष्टम शुद्ध हो ऐसे मुहूर्तमें वीरसाधन एवं (अभिचार ) मारणाद
बादूगरी करनी । यहां लमके बुध, चतुर्थ शुक्र कहा यह असम्भव ह, इसस अवध
पद लिखा है ।। ३९ ॥ (अनु०)
रोगनिर्मुक्तिखानमुहूर्तः ।
व्यन्त्यादितिधुवमघानिलसार्पविष्ण्ये रक्ते तिथौ चरतनौ विकवीन्दुवारे।
स्नान रुजा विरहितस्य जनस्य शस्तं हीने विधौ खलखगैर्भवकेन्द्रकोणे४.
जब रोगी रोगसे निर्मुक्त होता है उसके स्नानका मुहूर्त है कि रेवती, पुनर्वसु, ध्रुवनक्षेत्र,
मधा, स्वाती, आश्लेषारहित अन्य नक्षत्रों में तथा रिक्ता तिथि चरलममें शुक्र चन्द्रवाररहित
वारोंमें पापग्रह ११ और केन्द्रकणों में हो तथा चन्द्रमा ( हीग ) जन्मराशिसे ४८।१२
स्थानमें हो ऐसेमें रोगमुक्त स्नान करना ॥ ४० ॥ ( व० ति०)
शिल्पविद्यारम्भमुहूर्तः ।
मृदुधुवक्षिप्रचरे से गुरौ वा खलग्नगे।
विधौ ज्ञजीववर्गस्थे शिल्पारम्भः प्रसिद्धयति ॥ ४१ ॥
मृदु, ध्रुव, क्षिप्र नक्षत्रोंमें बृहस्पति वा बुध, दशम वा लममें हो और चन्द्रमा बुध वा
गुरुके नवांशादि षड्वर्ग से किसीमें हो तो शिल्लविद्या ( कारीगरीके) .कामका भारत
करना ॥ ४१ । ( अनु० )
सन्धान ( मैत्री ) मुहूर्तः।
सुरेज्यमित्रभाग्येषु चाष्टम्यां तैतिले हरौ ।
शुक्रदृष्टे तनौ सौम्ये वारे सन्धानमिष्यते ॥ ४२ ।।
पुष्य अनुराधा पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र. अष्टमी द्वादशी तिथि, वा तैतिल करण,
नममें शुक्र हो वा शुक्रदृष्ट लय हो और शुभ वारमें (प्रोति ) मैत्री दोस्तानेका
बारम्भ करना ।।४२ ।। ( अनु० )
परीक्षामुहूर्तः ।
त्यक्त्वाष्टभूतशनिविष्टिकुजाअनुर्भमासौ मृतौ रविविधू अपि भानि नाड्यः ।
व्यङ्गे चरे तनुलवे शशिजीवताराशुद्धौ करादितिहरीन्द्रकपे परीक्षा ॥१३॥

(३८) मुहूर्तचिन्तामाणिः- [ नक्षत्र- अष्टमी, चतुर्दशी तिथि, शनि मंगलवार, भद्रा जन्मनक्षत्र जन्ममास गोचरसे अष्टम सूर्य चन्द्रमा और नाडीनक्षत्र ( जन्मनक्षत्रसे १०।१६।१८।२३।२५११ नाडी- संज्ञक हैं, ) इलने छोड़के द्विस्वभाव चर लग्न नवांशकों में चन्द्र गुरु ताराशुद्धिमें और हस्त पुनर्वसु श्रवण ज्येष्ठा शतभिषामें ( परीक्षा ) दिव्यादि करना ॥ ४३ ।। (व० ति०) सामान्यतो लमशुद्धिः। व्ययायशुद्धोपचये लमगे शुभहग्युते । चन्द्रे विषड्दशायस्थे सर्वारम्भः प्रसिद्धयति ॥ ४४ ॥ हासे १२:८ भाव शुद्ध ग्रहरहित तथा तत्काल लग्न जन्म राशिसे उपचय ( ३।६।१०. ११) और ? में शुभग्रह हों या उनकी दृष्टि हों तथा चन्द्रमा ३।६।१०।११। में हो ऐसी लमशुद्धिमें समस्त शुभ कार्योंका आरम्भ सिद्ध होता है ॥४४॥ ( अनु० ) ज्वरोत्पत्तौ नक्षत्रानुसारेण फलविचारः । स्वावीन्द्रपूर्वाशिवसार्पभे मृतिज्वरेऽन्त्यमैत्रे स्थिरता भवेद्रुजः। याम्यश्रवोवारुणतक्षभे शिवा घस्रा हि पक्षो व्यधिपार्कवासवे ।। ४५॥ मूलाग्निदाने नव पित्र्यभे नखा बुध्न्यायमेज्यादितिधातृभे नगाः । मासोऽब्जवैश्वेऽथ यमाहिमूलभे मिश्रेशपित्र्ये फणिदंशने मृतिः ॥ ४६ ॥ खाती ज्येष्ठा तीन पूर्वा आश्लेषामें ज्वरादिरोग उत्पन्न हो तो मृत्यु हो, रेवती अनुराधा, रोध ( स्थिर ) बहुत दिन रहे, भरणी श्रवण शाततारा चित्रामें ११ दिन पर्यन्त, विशाखा हस्त बनिष्ठामें १५ दिन, मूल कृत्तिका अश्विनीमें ९ दिन, मघामें ३० दिन, उत्तराभाद्रपदा उत्तराफाल्गुनी पुष्य पुनर्वसु रोहिणीमें ७ दिन, मृगशिर उत्तराषाढामें ३० दिन रोग रहता है गरणी आश्लेषा मूल मिश्र (कृत्तिका विशाखा ) मघा आ में सर्प काटे तो मृत्यु हो ॥ ४५ ॥ १६ ॥ ( उप०, तथा उपे०) शीघ्ररोगिमरणे विशिष्टयोगाः । रौद्राहिशाकाम्बुपयाम्यपूर्वाद्विदैववस्वनिषु पापबारे । रिक्ताहरिस्कन्ददिने च रोगे शीघ्रं भवेद्रोगिजनस्य मृत्युः ॥ ४७ ॥ आर्दा आष्लेषा ज्येष्ठा शततारा भरणी तीन पूर्वा, विषाखा धनिष्ठा कृत्तिका नक्षत्र तथा पापवारमें, रिता ४ । ९।१४ द्वादशी षष्ठि तिथिमें जो रोगी हो तो शीघ्र मृत्यु पावे, बन्द्रमा मोचरसे ४।८।१२ होनेमें विशेष है ।। ४७॥ ( उ० जा०)

प्रकरणम् २]
भाषाकासमेतः ।
( ३९
प्रेतदाहमुहूर्तः ।
क्षिप्राहिमूलेन्दुहरीशवायुभे प्रेतक्रिया स्याज्झषकुम्भगे विधौ ।
प्रेतस्य दाहं यमदिग्गमं त्यजेच्छय्यावितानं गृहगोपनादि च ॥४८॥
अश्विनी पुष्य हस्त आश्लेषा मूल मृग ज्येष्ठा श्रवण आर्द्रा स्वाती नक्षत्रों में (प्रेतक्रिया )
और्चीहिक क्रिया करनी । तथा मीन कुम्भके चन्द्रमामें पञ्चक होते हैं इनमें प्रेतका दाह,
दक्षिण दिशागमन, ( शय्या) बिस्तरका कृत्य, चांदनी, चन्दोया और धरकी लिपाई पोताई
आदि मरम्मत उालक्षणसे तृणकाष्ठादि संग्रह न करना, प्रेतदाह आवश्यकमें कुश तथा रुईकी ५
मूर्ति बनाकर प्रेत के साथ दाह करते हैं. पञ्चकशांति भी करते हैं ।। ४८ ।। (इ० व०)
काष्ठादिसंग्रहः ।
सूर्याइसभैरधः स्थलगतैः पाको रसैस्संयुतः शीर्षे युग्मगतैः शवस्य
दहनं मध्ये युगः सर्पभीः । प्रागाशादिष वेदभैः स्वसुहृदां स्यात्स-
गन्मो रोगभीः काथादेः करणं सुखं च गदितं काष्ठादिसंस्थापने ॥४९॥
सूर्यके नक्षत्रसे वर्तमान नक्षत्रतक गिने और यथाक्रमसे स्थापित करे, जैसे-कि,प्रथम ६ नक्षत्र
अधः (नीचे ) स्थापित करे उसका फल रससंयुक्त पाक ( भोजन) मिलता है और शीर्षपर२
उसमें शवका दहन अर्थात् निकृष्ट है तथा मध्यमें ४, उसमें सर्पसे भय होता है और पूर्व-
दिशामें ४, जिसमें मित्रोंका समागम होता है, दक्षिण में ४, उसमें रोगका भय,
उसमें क्वाथ करण अर्थात् उत्तम नहीं है और उत्तरमें ४, उसमें सुख होता है, इस प्रकार
काष्ठादि संग्रहमें फल समझना चाहिये ।। ४९ ॥ ( शा० वि०)
काष्ठादिसंग्रहचक्र।
-
पश्चिममें ४,
स्थान
अधः
शीर्ष
पूर्व
दक्षिण
पश्चिम
उत्तर
संख्या
६
२
...
पाकरस
सर्पसे
शददाह
मेत्र
संगम
क्वाथ
रोगभय
सुख
त्रिपुष्कररयोगस्तत्फलं च ।
भद्रातिथीरविजभूननयार्कवारे द्वीशार्यमाजचरणादितिवह्निवैखे ।
पुष्करो भवति मृत्युविनाशवृद्धौ त्रैगुण्यदो द्विगुणकवसुतक्षचान्द्रे ॥५०॥

७० (१०) मुहूर्तचिन्तामाणि:- [ नक्षत्र- भद्रा २। ७ । १२ तिथि, शनि मंगल रविवार, विशाखा उत्तराफाल्गुनी पूर्वाभाद्रपद पुनर्वसु कृत्तिका उत्तराषाढा इतने तिथि वार नक्षत्रों में एक ही समय होनेमें त्रिपुष्करयोग होता इसमें कोई मरे तो उस घरमें दो और मरे,कुछ वस्तु खोजाय तो दो और खो जावें, कुछ वस्तु मिले वा बढे तो दो और मिले; नक्षत्रके स्थानमें धनिष्ठा चित्रा वा मृगशिर हो तो उक्त फल द्विगुण होते हैं, यह द्विपुष्कर योग है ॥ ५० ॥ (व० ति०) शवप्रतिकृतिदाह निषिद्धकालादिः । शुकारार्किषु दर्शभूतमदने नन्दासु तीक्ष्णोग्रभे पौष्णे वारुणभे त्रिपुष्करदिने न्यूनाधिमासेऽयने । याम्येऽब्दात्परतश्च पातपरिधे देवेज्यशुक्रास्तके भद्रावैधृतयोः शवप्रतिकते हो न पक्षे सिते ॥ ५१ ॥ जन्मप्रत्यरितारयोमृतिसुखान्त्येऽज च कर्तुर्नस- न्मध्यो मैवभगादितिधुवविशाखादयधिभे जेऽपि च । श्रेष्ठोऽकज्यविधोदिने श्रुतिकरस्वात्यश्चिपुष्ये तथा त्वाशौचात्परतो विचाययमखिलं मध्ये यथासम्भवम् ॥५२ ॥ जब किती मरेका प्रेत नहीं मिले तो ( प्रतिकृति ) पर्णशर करनेका मुहूर्त कहते हैं कि, शुक्र मंगल शनिवारमें चतुर्दशो अमावास्या त्रयोदशी नंदा। १।६१११ में तीक्ष्ण उग्र रेवती शततारा त्रिपुष्करयोगमें मलमास क्षयमासमें कर्क मकर संक्रांतिमें एक वर्षसे अधिक मरेको होगया हो तो दक्षिणायनमें भी तथा व्यतीपात परिघ योगमें शुक्रास्त गुर्वस्तमें भगा वैधृतिमें शुक्लपक्षमें पर्णशरका दाह न करना ॥ ५५ ॥ क्रिया करनेवालेका उस दिन जन्म प्रत्यरि तारा, चौथा आठवां बारहवां चंद्रमा जन्मराशिसे न हो और अनुराधा पूर्वाफाल्गुनी पुनर्वसु ध्रुवनक्षत्र विशाखा मृगशिर चित्रा धनिष्ठा बुधवारमें उक्त कृत्य मध्यम कहा है तथा रवि गुरु चंद्र वार, श्रवण हस्त स्वाती पुष्य अश्विनी नक्षत्र शुभ होते हैं, (इतने विचार अशौचसे उपरांत ) यदि किसी कारण आशौचमें प्रेत क्रिया न हुई हो तो तब हैं, आशौचमें उक्त विचार कुछ नहीं ॥ ५२ ॥ शा० वि०) अभुक्तमूलस्वरूपम् । अभुक्तमूलं घटिकाचतुष्टयं ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं हि नारदः । वसिष्ठ एकदिवटीमित जगौ बृहस्पतिस्त्वेकघटीप्रमाणकम् ॥ ५३ ॥ अभुक्त मूलका प्रमाण नारदमतसे ज्येष्ठाके अंत्यकी ४ घटी और मूलके आदिकी ४ घटी मिलकै८ घटी अभुक्त मूल होता है । वसिष्ठ ज्येष्ठान्त्यकी एक, मूलादिकी दो कहता है। वृहस्पति एक ही घटी कहता है ॥५३ ॥ ( उ० जा०) प्रकरणम् २. भाषाटीकासमेतः । (४१) मुलाश्लषोत्पन्नस्य शुभाशुभफलम् । अथोचुरन्ये प्रथमाष्टघटयो मूलस्य शान्तिमपञ्चन डयः । जातं शिशुं तत्र परित्यजेदा मुखं पितास्याष्ट समा न पश्येत ॥ ५४ ॥ अन्य आचार्य कहते हैं कि, मूलादिकी ८ घटी ज्येष्ठान्त्यकी ५ घटी अभुक्त मूल है, यहां बहुमत होनेसे आचार्यने नारदमत ही प्रमाण किया है । इस अभुक्त मूलमें नो बालक उत्पन्न हो तो उसे त्याग करना अथवा पिता उस बालकका मुख आठ वर्ष पर्यंत न देखे तब शांति करके देखे । उपलक्षणसे आश्लेषांत्य मघादिमें भी ऐसा ही विचार है ॥ ५४ ॥ ( उ० जा आये पिता नाशमुपैति मूलपादे द्वितीये जननी तृतीये। धनं चतुर्थोऽस्य शुभोऽथ शान्त्या सर्वत्र सत्स्यादहिभे विलोमम् ॥५५॥ कन्या वा पुत्र मूलके प्रथम चरण में उत्पन्न हो तो पिता नष्ट हो, दूसरेमें हो तो माता मरे, तीसरेमें हो तो धननाश हो, चौथे चरणमें हो तो शांति करके शुभ हो, किसीको दोष नहीं, आश्लेषामें यही विचारविपरीत है. जैसे-चतुर्थ चरणमें पिता, तीसरेमें माता, दूसरेमें धननाश, प्रथम चरण शांति करके शुभ होता है, प्रकारांतर है कि १ वर्षमें पिताका ३ वर्ष में माताका २ वर्ष धनका ९ वर्षमें श्वशुरका ६ वर्षमें माईका ८ वर्ष में साले वा मामाका अन्य अनुक्त बांधवादिकोंका ७ वर्षमें नाश करता है, तस्मात् शांति करनी योग्य है, प्रकारांतरसे भूल तथा आश्लेषाका वृक्ष वा लतारूपसे चक्रन्यासपूर्वक विशेष विचार चक्रमें लिखा है ॥ ५५ ।। ( उपजा० मूलवृक्षवकं । मूलपुरुषचक्र कन्याजन्मानम् अन्लंयाचक्रम् सार्पवृक्षचक्रम् मूलनाशः मनिं ५ रामा शीर्षे ४ पशुनाशः शिरसि ५ पुत्रादि फले १० धनं स्तमे ८ वंशनाशः मुखे ७ पिमृत्यु मुरटे ६ इनहानिः मुखे ७ पितृक्षयः पुष्पे ५ धनं त्वचि १. मातृश स्कंधे ४ बली कंठे ५ धनागमः | नेत्र २ मातृनाशः दले १ राजमयं भशास्था ११ मातुन बाहौ ८ सरी हृदये ५ कुटिलता: ग्रीवा ३ स्त्रीलंपट शाखा • हानि: श-पत्रे ५मंत्रिपद हस्ते ३ दानी बाहौ ५ धनागमः स्कंधे ४ गुरुभक्तः त्वत्रा १३ मावहा फिले ४ विपुलाल हृदये ९ मंत्री हस्ते ४ दयाधौं दस्ते ८ बली बता १२ पिता शिखा अल्पबीची नाभी २ द्वानी मुझे ४ कामिनी ददये११ भास्महा स्कंध ४ अन्पापु: गुह्ये १० कामी जंधे ४ मातुलनी नामो १ भमः बानु ६ मतिमान जानु४ भावनाशः गुदे ८ तपस्वी पोहे ६ मतिमान् पादे १.वैधव्यं पादे ५ धनहा ६ मूलनिवासस्तत्फलं च । स्वर्गे शुचिपौष्ठपदेषमाघे भूमौ नभःकार्तिकचैत्रपौषे । मुलं ह्यवस्तात्तु तपस्यमार्गवैशाखशुकेष्वशुभं च तत्र ।। ५६ ॥

(४२) मुहूतचिन्तामणि:- [नक्षत्र- आषाढ़ भाद्रपद आश्विन माघ महीना में मूलका वास स्वर्गमें, श्रावण कार्तिक चैत्र पौषमें पृथ्वीमें, फाल्गुन मागशीर्ष वैशाख ज्येष्ठमें पाताल में रहता है, जिस महीने में जहां रहता है वहां ही अशुभ फल करता है अन्य लोगोंमें दोष नहीं ॥ ५६ ॥ (इं० २०) दुष्टाण्डान्तादीनां परिहारः । गण्डान्तेन्द्रभशूलपातपरिवव्याघातगण्डावमे संक्रान्तिव्यतिपातवै- धृतिसिनीवालीकुहूदर्शके । बजे कृष्णचतुर्दशीषु यमघण्टे दग्धयोगे मृतौ विष्टौ सोदरभे जनिन पितृभे शस्ता शुभा शान्तितः ॥ ५७॥ गंडांत, ज्येष्ठा, शूल, पात, परिष, व्याघात, अतिगण्ड. क्षयतिथि, संक्रांति, व्यतीपात, वैधृति, (सिनीवाली ) शुक्ल प्रतिपदाका पूर्वदल, ( कुहू ) कृष्णचतुर्दशीका उत्तरदल, (दर्श) अमावस्था, वज्रयोग, कृष्णचतुर्दशी, यमघंट, दग्धयोग, मृत्युयोग, भद्रा, सहोदर, भाई तथा मातापिताके जन्मनक्षत्र, इतने में पुत्रकन्याजन्म अनिष्ट होता है, इनकी शांतिसे शुभ है, उपलक्षणसे ग्रहणजन्म, (त्रिक ) तीन पुत्रोंके पीछे कन्या, तीन कन्याओंके पीछे पुत्रजन्म आदि भी ऐसे ही हैं ॥ ५७ ।। (शा० वि० ) अश्विन्यादिताराणां स्वरूपादिविचारः । त्रियङ्कपञ्चाग्निकुवेदवह्नयःशरेषुनेत्राश्विशरेन्दुभूकताः । वेदामिरुद्राश्वियमाग्निवह्नयोऽब्धयःशतं विद्विरदाभतारकाः ॥ ५८॥ अश्विन्यादि नक्षत्रोंके तारा कहते हैं कि, अश्विनीके ३ भरणीके ३ . एवं कृ० ६ रो० ५ मृ० ३ ० १ पु० ४ पु० ३ आ० ५ म० ५ पू० २ ० २ ० ५ चि० १ स्वा० वि० ४ अ० ४ ज्ये० ३ मू० ११ पू० २७० २ अभि० ३ ० ३ ० ४ २० १०० पू० २ उ० २ रेवतीके ३२ इन ताराओंकी गणना तथा वक्ष्यमाण रूपोंसे तारा पहिचाने जाते हैं ।। ५८ ॥ (२० जा अश्व्यादिरूपं तुरगास्ययोनी क्षुरोऽनएणास्यमणीगृहं च । पृषत्कचके भवनं च मञ्चः शय्या करो मौक्तिकविद्रुमं च ॥ ५५ ॥ वोरणं बलिनिभं च कुण्डलं सिंहपुच्छगजदन्तमञ्चकाः । यस्त्रिचत्रिचरणाभमर्दलौ वृत्तमञ्चयमलाभमर्दलाः॥ ६० ॥ अश्चिन्यादिकोंके रूप-अश्विनी घोडाकासा मुख, भरणी भग, कृ० (क्षुर) उस्तरा रो० गाडी, मृ० हरिणमुख, आ० मणि, पु० मकान, पु० बाण, आ० चक्र, म० मकान, पू० मच, उ० विस्तर. ह० हाथ, चि० मोती, स्वा० मूंगा, वि० तोरण, अ० भातका पुंज, ज्ये० कुण्डल, मू० शेरकी मूंछ, पू० हाथीदांत, उ० मञ्च, अ० प्रकरणम् २.] भाषाटीकासमेतः। (४३) त्रिकोण, श्र० वामन, ध० मृदंग, श० वृत्त, पू० मञ्चा. उ० यमल खेती मृदंग- स्वरूप हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥ ( उ० जा० ) ( रथोद्धता ६० ) नक्षत्रचक्र गण योनि नाडी दे. २ म. २ . ३ नाग १ दे. मार्जार १ बाण अंगिरा नक्षत्र वारा रूप देवता अवकडाचक्र अश्विनी ३ घोडा चूचेचोला कुमार ३ लीलूलेलो ६ छुरी | अग्नि आईजए रो. ५ गाडी ब्रह्मा ओवावी ३ हरिण चंद्र वेवोकाकी १ मणि शिव कूघंङछ मकान दिति केशाहाही ३ हूहेहोडा आ. सर्प डीडूडेडो घर पिता मामीमूने पू. मोटादाद २ विस्तर अर्यमा टेटोपापी हात सूर्य पूषाणाठा १ मोती त्वष्टा पेपोराशी १ । मूंगा वायु रूररोता वि. ५ तोरण इंद्राग्नी तीतुतेतो अ. भात मित्र नानीनून नोयायीयू मू. ११ सिंहपु राक्षस येयोभाभी प्राजार मूषक रा. २ ग्राइबी ३ २ व्यात्र स्वा. . महिषी व्यात्र ३ ज्ये. 1. भूग १ १ पू. म. कर्कट २ १ नेवला नेवला ३ दे. . भूधाफाढा २: मंजा विश्वदेव भेभोजाजी ३ विको विधि जूजेजोखा ३ वामन विष्णु खीखुखेखो ४ मृदंग गागीगूगे १०० वृत्त वरूण गोसासी २ मंजा अजपाद मेसोदादी यमल अहिर्नु० दूघझन ३२ मृदंग पूषा देदोचाची मर्कट सिंह २ १ गी २ S २.

मुहताचन्तामाण:- । नक्षत्र प्र०२. जलाशयादिप्रतिष्ठामुहूर्तः । जलाशयारामसुरप्रतिष्ठा सौम्यायने जीवशशाङ्कशुक्रे । दृश्यै मृदुक्षिपचरचवे स्यात्पक्षे सिते स्वःतिथिक्षणे वा ॥ ६१ ॥ जलस्थान, बगीचा और देवता आदि प्रतिष्ठाका मुहूर्त कहते हैं कि, उत्तरायणमें बृहस्पति, चन्द्रमा, शुक्रके उदयमें मृदु, ध्रुव, क्षिप, चर नक्षत्रमें, शुक्लपक्षमें शुभ नक्षत्र तिथि वार मुहूर्तमें सथा जिस देवताकी प्रतिष्ठा हो उसीके नक्षत्रमें जैसे विष्णुकी श्रवणमें, शिवकी आर्द्रामें, जलाशयकी पूर्वाषाढा शततारामें तथा रिक्ता तिथि मंगल वार रहितमें उक्त कृत्य करना ( इसमें अगले श्लोकले प्रथम चरणका नर्थ भी आ गया)॥ ६१ ।। ( उ० जा० ) देवप्रतिष्ठायां लगशुद्धिः। रिक्तारवज दिवसेऽतिशस्ता शशाङ्कपापविभवाङ्गसंस्थैः । व्यन्त्याष्टगैः सत्खचरैमंगेन्द्रे सूर्यो घंटे को युवतौ च विष्णुः ॥६२॥ शिवो नृयुग्मे द्वितनौ च देव्यः क्षुद्राश्चरे सर्व इमे स्थिरः । पुष्ये यहा विनपयक्षसपभूतादयोऽन्त्ये श्रवणे जिनश्च ॥ ६३ ॥ इति श्रीदैव रामविर मुहूतचिन्ता द्वि० नक्षत्र प्र० समातम् ॥ २॥ प्रथम पादका अर्थ पूर्व कहा गया, शेषका यह है कि, जलाशय एवं बगीचाकी प्रतिष्ठामें शुभलग्नमात्र विचार्य है, ग्रहयोगकी विशेषता नहीं, देवप्रतिष्ठामें चन्द्रमा तथा पापग्रह ३। ६ । ११ में शुभ ग्रह ८ । १२ भावरहित स्थानों में शुभ होते हैं, विशेषता यह है कि, सूर्यकी प्रतिष्ठा सिंहलग्नमें, ब्रह्माकी कुम्भमें, विष्णुकी कन्या, शिवकी मिथुनमें, देवीकी मिथुन कन्या धन मीनमें तथा दक्षिणामूर्त्यादिकोंको चरलग्नोंमें (क्षुद्र ) चतुःषष्टियोगिनी आदिकोंकी ( अनुक्त ) इन्द्रादिकी स्थिरलग्नों में स्थापना करनी तथा चन्द्रादि ग्रह पुष्य नक्षत्रमें, उपल- क्षणमें सूर्य हस्तमें, शिव ब्रह्मा पुष्य श्रवण अभिजित्में, कुबेर स्कन्द अनुराधामें, दुर्गा आदि मूलमें सप्तर्षि व्यास वाल्मीकि आदि जिन नक्षत्रों में सप्तर्षि देखे जाते हैं अथवा पुष्यमें । गणेश, वक्ष. नाग, भूत, विद्याधर अप्सरा, राक्षस, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, गुह्यक, सिद्धादि रेवतीमें । (बिन ) बुद्ध श्रवणमें । इन्द्र कुबेर वर्जित लोकपाल धनिष्ठामें, शेष देवता तीनों उत्तरा रोहिणीमें प्रतिष्ठायुक्त करने चाहिये ॥ ६२-६३ ॥ (उ० जा० ) इति श्रीदैवज्ञानन्तसुतरामविरचिते मुहूर्तचिन्तामणौ महीधरकृतायां माही- भाषाटीकायां द्वितीयं नक्षत्रप्रकरणं समाप्तम् ॥ २ ॥ .

अथ संक्रान्तिप्रकरणम् ३ । संक्रान्तिसंज्ञा फलं च। घोरार्कसङ्क्रमणमुपरवौ हि शूद्रान्ध्वाझी विशोलघुविधौ च चरक्षभौमे । चौरान्महोदरयुता नृपतीज्ञमैत्रे मन्दाकिनी स्थिरगुरौ सुखयेच्च मन्दा ॥१॥ विषांश्च मिश्रभभगौ तु पशंश्च मिश्रा तीक्ष्णार्कजेऽन्त्यजमुखान्खलु राक्षसी च । प्रहोंकी एकराशिसे दूसरी राशिमें जाना संक्रान्ति कहाती है, यह (१) मध्यमसे (२) स्पष्टसे है; यहां मध्यसंक्रमण छोड़कर स्पष्ट संक्रांति कहते हैं, इसके भी सायन निरयन दो प्रकार हैं. अन्य ग्रहोंकी संक्रांति घटी विवाहप्रकरणमें " देवद्वयकर्तव" इत्यादि कहेंगे, यहां मुख्यता सूर्यकी वारनक्षत्र भेदसे कहते हैं कि सूर्यकी निरयनांश संक्रांति यदि ( उपनक्षत्र) तीनों पूर्वा भरणी मघामें तथा रविवार में हो तो घोरा नामकी शूद्रोंको प्रसन्न करनेवाली होती लघुनक्षत्र चन्द्रवारमें हो तो ध्वांक्षी नामकी वैश्योंको सुख देती है, चरनक्षत्र मंगलवारमें हो तो महोदरानामकी चोरोंको सुख करती है. मैत्रनक्षत्र बुधवारमें हो तो मन्दाकिनी नाम्नी राजाओंको. सुख देती है, स्थिरनक्षत्र गुरुवार में हो तो मन्दानामकी ब्राह्मणोंको सुख देती है। मिश्रनक्षत्र शुक्रवारमें हो तो मिश्रानामकी पशुओंको सुख करती है, तीक्ष्ण नक्षत्र शनिवार में हो तो राक्षसीनामकी चाण्डालोंको सुख देती है ॥ १ ॥ (व० ति० ) दिवारात्रिविभागेन संक्रान्तिफलम् । त्र्यंशे दिनस्य नृपतीन्प्रथमे निहन्ति मध्ये विजानपि विशोऽपरके च शूद्रान् ॥२॥ अस्ते निशाप्रहरकेषु पिशाचकादीनतञ्चरानपि नयन्पशुपालकांश्च । सूर्योदये सकललिङ्गिजनं च सौम्य- याम्यायनं मकरकर्कटयोनिरुक्तम् ॥ ३ ॥ . दिनमानमें ३ से भाग लेके अंश होता है, यदि संक्रांति दिनके प्रथम अंशमें हो तो राजाओंको, (द्वितीय) मध्यव्यंशमें हों तो ब्राह्मणोंको, तीसरे में हो तो वैश्योंको, अस्तसमयमें हो तो शूद्रोंको (अनिष्ट) नाश फल कहा है, रात्रिके प्रथम प्रहरमें हो तो पिशाच भूतादिकोंको, दूसरेमें रात्रिचरोंको, तीसरेमें नाचनेवालोंको, चौथे पशुपालनेवालोंको और सूर्योदयसमयमें (लिंगिजन ) पाखण्डी वा कृत्रिमवेषधारियोंको नाश फल करती है और मकरसंक्रमणसे (सौम्य) उत्तरायण कर्क संक्रमणसे दक्षिणायन होता है । ग्रन्थान्तर मत है-मेष संक्रांति भरण्यादि ४ नक्षत्रमें हो तो अन्नवृद्धि, मघादि १० में हानि, अन्य नक्षत्रोंमें सौख्य होता है, बन्मनक्षत्रमें संक्रांति राजाओंको शुभ औरको क्लेश, वनक्षय करती है. संक्रांति वर्ष का फल १।६ । १२ ।। में.हो तो सुख, सुमिक्ष, ११ ॥ ९ ॥ ५ । ३ में रोग, युद्ध, २ । ८ १० रोग, चोर, मन्निभय होता है ॥ २ ॥ ३ ॥ षडशीतिमुखादिसंज्ञाः। षडशीत्याननं चापनृयुकन्याझषे भवेत् । तुलाजौ विषुवद्विष्णुपदं सिंहालिगोघटे ॥ ४ ॥ धन, मिथुन, कन्या, मीनकी संक्रांति षडशीतिमुखा नामकी तुला मेषकी विषुवती, सिंह, वृधिक, वृष, कुंभकी विष्णुपदा होती हैं. इनका प्रयोजन है कि दक्षिणायन विष्णुपदके आबकी ७। ८ के मध्यकी, षडशीत्यानन और मकरकी पीछेकी घटी अतिपुण्यदेनेवाली ॥ ४ ॥ ( अनु० ) संक्रान्तिपुण्यकालः । संक्रान्तिकालादुभवत्र नाडिकाः पुण्या मताः षोडश षोडशोष्णगोः । निशीथतोऽगिपरत्र संक्रमे पूर्वापराहान्तिमपूर्वभागयोः ॥ ५॥ संक्रांतिसमयसे १६ घटी पूर्व, १६ घटी परकी पुण्यकाल होता है, यदि संक्रमण रात्रिमें हो तो अर्द्धरात्रिके पूर्व होनेमें पूर्वदिनका उत्तरार्द्ध तथा अर्द्धरात्रिके उत्तर संक्रम होनेमें दूसरे दिनका पूर्वार्द्ध पुण्यकाल होता है ॥ ५॥ ( उ० जा० ) पूणे निशीथे यदि संक्रमः स्यादिनद्वयं पुण्यमथोदयास्तात् । पूर्व परस्ताद्यदि याम्यसौम्यायने दिने पूर्वपरे तु पुण्ये ॥ ६ ॥ यदि मध्यरात्रिमें संक्रमण हो तो पूर्व एवं परके दोनों ही दिन पुण्यकाल होता है. कसंक्रांति उदयसे पूर्व हो तो पूर्व दिन और मकरसंक्रांति सूर्यास्तसे ऊपर हो तो दूसरे दिन पुण्यकाल होता है ॥ ६ ॥ (उप० संध्या त्रिनाडीप्रमितार्कबिम्बादोदितास्तादध ऊर्ध्वमत्र । चेद्याम्यसौम्ये अयने कमात्स्तः पुण्यौ तदानी परपूर्वघस्रौ ॥ ७ ॥ सूर्योदयसे पूर्वकी तथा सूर्यास्तसे ऊपरकी ३ । ३ । घटी संध्यासमय होता है इसी हेतु कर्क मकर संक्रांतिके पूर्वपर दिन पुण्यकाल कहे हैं, सूर्योदय संध्यामें दक्षिणायन हो तो पूर्व दिन तथा सायं संध्या उत्तरायण हो तो उत्तर दिन पुण्यकाल स्नान दानादि योग्य होता है ॥ ७ ॥ ( इंद्र० व०) ..

याम्यायने विष्णुपदे चाद्या मध्यास्तुलाजयोः ।
षडशीत्यानने सौम्ये परा नाड्योऽतिपुण्यदाः ॥ ८॥
याम्यायन विष्णुपद ४ । २।५। ८ । ११ की संक्रांतियोंके पूर्वको १६ घटी तुला मेषके
मध्यकी षडशीत्यानन ३।६।९।१२ के तया मकर संक्रांतिके आगेकी १६ घटी
भतिपुण्य देनेवाली होती है ।। ८ ।। ( अनु० )
सायनसंक्रान्तिस्तत्फलं च ।
तथायनांशाः खरसाहताश्च स्पष्टार्कगत्या विहता दिनायैः ।
मेषादितः प्राक्चलसंक्रमाः स्युर्दाने जपादौ बहुपुण्यदास्ते ॥९॥
ऊपर निरयन संक्रांति कही, अब सायन संक्रांति कहते है कि, अयनांश ६० गुणा
कर सूर्यस्पष्टगतिसे भागलेकर दिनघटी पलात्मक ३ लब्धि लेना. मेषादि संक्रांतिकालसे पहिले
उतने दिनादि चलसंक्रम होता है, दानजपादिमें बहुत पुण्यदेनेवाला होता है ॥९॥(उ०जा.)
जघन्यबृहत्समनक्षत्राणि ।
समं मृदुक्षिप्रवाश्रवोऽग्निमघात्रिपूर्वानपभ बृहत्स्यात् ।
ध्रुवद्विदेवादितिभअधन्य सार्पाम्बुपार्दानिलशाकयाम्यम् ॥ १० ॥
मृदु, क्षिप्र, धनिष्ठा, श्रवण, कृत्तिका, मघा, तीनों पूर्वा और नूल ये १५ नक्षत्र समसंज्ञक
हैं, ध्रुव, विशाखा,पुनर्वसु ये ३ नक्षत्र बृहत्संज्ञक और आश्लेषा, शततारा, आर्द्रा, स्वाती, ज्येष्ठा,
भरणी ६ नक्षत्र जघन्यसंज्ञक हैं ॥ १० ॥ ( उ० जा० )
संज्ञाप्रयोजनम् ।
जघन्यभे संक्रमणे मुहूर्ताः शरेन्दवो बाणकृता बृहत्सु ।
खरामसंख्यासमभे महर्घ समर्घसाम्यं विधुदर्शनेऽपि ॥ ११ ॥
जघन्य नक्षत्रों में संक्रम हो तो १५ मुहूर्त, बृहत्में ४५, सम नक्षत्रोंमें ३० मुहूर्त जाने,
जो १५ मुहूर्तवाली संक्रांति होतो (महर्घ ) अन्नभाव तेज हो, ४५ मुहूर्तकी हो तो (सुलभ)
सस्ता हो, ३० मुहूर्तवाली हो तो ( सम ) न तेज न मन्दा, सामान्य रहे; ऐसा ही विचार
चन्द्रोदयमें भी जानना ॥ ११ ॥ ( उ० जा० )
कर्कसंक्रान्ताकविंशोपकाः।
अर्कादिवारे सक्रांती कर्कस्याब्दविशोपकाः।
दिशो नखा गजाः सूर्या धृत्योऽष्टादश सायकाः ॥ १२ ॥

(१८) मुहूर्तचिन्तामणि:- [ संक्रान्ति- कर्कसंक्रांति रविवार को हो तो १० सोमवारको २० मंगलको ८ बुधको १२ बृहमतिको १८ शुक्रनो १८ शनिको ५ अब्द विनायक होती हैं ॥ १२ ॥ ( अनु० ) स्यानविले नागचतुष्पदे रविःसुप्तो निविष्टस्तु गरादिपञ्चके । किंस्तुघ्न ऊर्भःशकुनौ सकौलवे नेष्टः समः श्रेष्ठ इहार्यवर्षणे ॥ १३ ॥ तैतिल नाग चतुःपइ करों में रवि सोकर संक्रम करते हैं वह अन्नक भाव (मूल्य ) वर्षाके लिये अनिष्ट होता है, (गरादि पांव ) पर वणिज विष्टि बन्न बालबमें बैठकर संक्रम करते हैं बह मध्यम होता है स्तुिम्न शकुनि और कौलवमें खडे होकर संक्रांति करते हैं वह श्रेष्ठ होता है इसको आगे प्रगट कहेंगे ॥ १३ ॥ (६० ब०) संक्रांतिवाहनादिः। सिंहव्याघबराहरासभगजा बाहविषड्योटकाः श्वाजौ गौश्चाणायुधश्च बवतो वाहा रवेः संक्रमे । वस्वं श्वेतसुपीतहास्तिकपाण्ड्वारक्तकालासितं चिंत्र कम्बल दिग्धनाभमय शस्त्रं स्याद्भुशुण्डी गदा ॥१४॥ खड्गो दण्डशरासितोमरमथो कुन्तश्च पाशोऽकुशो- ऽवं बाणस्त्वथ भक्ष्यमनपरमानं भैक्षपक्वान्नकम् । दुग्धं दध्यपि चित्रितानगडमध्वाज्यं तथा शर्करा- ऽयो लेगो मृगनाभिकुकुममथो पाटीरभृद्रोचनम् ॥ १५॥ यावश्चोतुमदो निशाञ्जनमथो कालागुरुश्चन्द्रको जातिदैवतभूतवर्षविहगाः पश्वणपिपास्ततः । क्षत्ता वैश्यकशूद्रसंकरभवाः व पुन्नागकं जातीवाकुलतकानि च कला बिल्वाम्बुजम् ॥ १६॥ स्यान्मल्लिका पाटलिका जपा च संक्रान्तिवनाशनवाहनादेः । नाशश्च त मनीषितां च स्थितोरविष्टत्वपवां च नाशः ॥१७॥ वक, बालव, कौलव, तै दल, गर, णित, विष्ट ये ७ करण चर और शकुनि किंस्तुम, बाग, चतुष्पद ये ४ स्थिर है, इनमें संक्रांति होनेसे क्रमसे वाहनादि कहते हैं कि, बव १ में सिंह । बालव २ में व्याघ्र । कौलव ३ में सूकर । तैतिल४ में गदहा । गर ५ में हाथी। वणिज ६ में महिः । विधि ७ में घोडा । शकुनि में प्रकरणम् ३] भाषाटीकासमेतः । (४९)) कुत्ता । चतुष्पद ९ में मेंढा । नाग १० में बैल । किंस्तुन्न ११ में मुर्गा । बवादि क्रमसे वस्त्र-१ में श्वेत २ पीत ३ नीला ४ गुलाबी ५ लाल ६ कृष्ण ७ स्याह ८ चित्र ९ कंबल १० नङ्गा ११ मेघवर्ण । एवं क्रमसे शस्त्र-१ (भुशुण्डी) दण्डविशेष २ गदा ३ खड्ग ४ लाठी ५ धनुष ६ बाण ७ मुद्गर ८ कुन्त ९ पाश १० अंकुश ११ बाण । भोजन-१ अन्न २ पायस ३ भिक्षा ४ पक्वान्न ५ दृध ६ दही ७ खिचडी ८ गुड ९ मध्वन्न १० थी ११ शर्करा । लेप-१ कस्तूरी २ कुंकुम ३ सुर्खचन्दन ४ मिट्टी ५ गोरोचन ६ हरिद्रा ७ ( यावक ) जौखार ८ ( ओतु) बिरालमद ९ सुर्मा १० अगरु ११ कर्पूर । जाति--१ देवता २ भूत ३ सर्ष ४ पक्षी ५ पशु ६ मृग ७ ब्राह्मण ८ क्षत्रिय ९ वैश्य १० शूद्र ११ ( मिश्र) संकर । पुष्प १ ( नागकेशर ) पुन्नाग २ जाती ३ बकुल ४ केतकी ५ बिल्व ६ आक ७ दूर्वा ८ कमल ९ बेला १० गुलाब ११जपा ( ऑडू)। अवस्था-१ शिशु २ कुमार ३ गतालका ४ युवा ५ प्रौढा ६ प्रगल्भा ७ वृद्धा ८ वन्ध्या ९ अतिवन्ध्या १० सुतार्थिनी ११ प्रवाजिका । १ पांच १२ भोग ३ रति ४ हास्य ५ दुर्मुखी ६ जरा ७ मुक्ता ८ कन्या ९ ध्याना १० कर्कशा ११ वृद्धा। इतने जो वाहनादि कहे हैं इनका प्रयोजन यह है कि, उन महीनोंमें उन वस्तुओंका अथवा उन वस्तुओंसे आजीवन करनेवालोंका ( जो कोई खडे, बैठे सोयेमें जैसे आजीवन करते हों ) नाश होता है ॥ १४--१७ ॥ (शा० वि० ।। १४--१७ ॥) (इ० व० १७) संक्रान्तिचक्रम् करण वाहन वस्त्र शस्त्र भोजन लेपन जाति पुष्प वय अवस्था बव | सिंह | श्वेत भुशुंडी अन्न | कस्तूरी देवता नाकेशर शिशु पंथा बालव| व्याघ्र | पीत गदा पायस) कुंकुम भूत जाती कुमार भोग कौलव बराह नील खड्ग भिक्षा सुर्खचंदन सर्प बकुल गतालका रति अशोक तैतिल गदहा गुलाबी लट्ठी पक्वान्न मिट्टी पक्षी केतकी युवा हास्य गर हाथी लाल धनुष दूध गोरोचन पशु बिल्व प्रौढ दुर्मुखी वणिज महिष कृष्ण बाण दही हरिद्रा आकगल्भा जरा विष्टि घोड़ा| श्याम सुन्दर खिचरी जाखार ब्राह्मण दूर्वा वृद्धा भुक्ता शकुनि कत्ता चित्र कुंत गुड़ विडालमद क्षत्रिय कमल वंध्या कंपा किंस्तुन मेंढा कंबल पाश मध्वनः सुर्मा वैश्य । वेला वंध्या ध्यान नाग | बैल नेगा अंकुश धी अगर সুমি गुलाव सुतार्थिनी कर्कशा चतुष्प मुर्गा बादल बाण शकर, कपुर संकर ओंडू परिवाजि वृद्धा रंग का - द

"
(५०) मुहूर्तचिन्तामणिः [ संक्रान्ति-प्र० ३].
संक्रान्तिवशेन शुभाशुभफलम् ।
संक्रान्तिधिष्ण्याधरधिष्ण् यतस्त्रिभे स्वभे निरुक्त गमनं ततोऽङ्गभे ।
सुख त्रिभे पीडनमङ्गभेऽशुकं त्रिभेऽथ हानी रसभे धनागमः ॥ १८ ॥
संक्रांति जिस नक्षत्रमें हो उसको पहिले नक्षत्रसे अपने जन्मनक्षत्रपर्यन्त गिनना ३ के
भीतर हो तो उस महीने में गमन हो, पर ६ हो तो सुख एवं ३ पीडन ६ वस्त्रादिलाभ ३
धनहानि ६ धनागम होता है ॥ १८ ॥ ( उ० जा० )
3
कार्यविशेषे ग्रहबलम् ।
नृपेक्षणं सर्वकृतिश्च सङ्गरः शास्त्र विवाहो गमदीक्षणे रवः ।
वीर्येऽथ ताराबलतः शुभो विधुर्विधोबलेऽर्कोऽर्कबले कुजादयः॥ १९ ॥
सूर्यका बल देखके अथवा रविवारको राजदर्शन, एवं चन्द्रको समस्त शुभ कृत्य, मंगलको
संग्राम, बुधको शास्त्र पढाना पढना, बृहस्पतिको विबाह, शुक्रको यात्रा, शनिको यज्ञदीक्षा शुभ
होती हैं तथा ताराबलसे चन्द्रमा शुभ जानना, चन्द्रसंक्रमणमें तारा शुभ हो तो अनिष्ट चन्द्र
भी शुभ होता है, ऐसे ही चन्द्रबलसे रविसंक्रम शुभ होता है, अन्य भौमादि ग्रहसंक्रमणमें
सूर्यके (बल) उपचयादि होनेमें शुभ होते हैं ॥ १९ ॥ ( उ० जा० )
'अधिमासक्षयमासनिर्णयः।
स्पष्टार्कसंक्रान्तिविहीन उक्तो मासोऽधिमासः क्षयमासकस्तु ।
द्विसंक्रमस्तत्र विभागयोस्त ितथेहि मासौ प्रथमान्त्यसंज्ञौ ॥ २० ॥
इति श्रीदैवज्ञानन्तसुतरामविरचिते मुहूर्त० संक्रान्तप्रकरणम् ॥ ३ ॥
शुक्लपतिपदासे अमावास्यापर्यन्त चान्द्रमास है, यदि यह मास सूर्यकी स्पष्ट संक्रांतिसे रहित
हो तो ( अधिमास ) मलमास वा लौंद कहते हैं, ऐसे ही उक्त मासमें सूर्यकी स्पष्टसंक्रांति
दो आवे तो क्षयमास होता है. उक्त मासकी शुक्ल कृष्ण भेदसे ( शुक्लान्त मास, कृष्णांत
मास ) क्षयमासमें जन्म वा मरणमें तिथिका पूर्वभाग हो तो पूर्वमास, उत्तरार्द्ध हो तो परमास
वर्धापनादिकोंके लिये मानते हैं ॥ २० ॥ ( उप० )
इति श्रीमुहूर्त्तचिन्तामणौ महीधरकृतायां भाषाटीकायां तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ३ ॥

गोचर प्रकरणम् ४.]
भाषाटीकासमेतः।
(५१)
अथ गोचरप्रकरणम् ४।
ख्यादीनां गोचरफलम् ।
सूर्यो रसान्त्ये खयुगेऽग्निनन्दे शिवाक्षयोभीमशनी तमश्च ।
रसाङ्कयो भशरे गुणान्त्ये चन्द्रोऽम्बराब्धौ गुणनन्दयोश्च ॥ १॥
लामाष्टमे चायशरे रसान्त्ये नगद्वये ज्ञो द्विशरेऽग्धिरामे ।
रसायो गविधौ खनागे लाभव्यये देवगुरुः शराब्धौ ॥ २॥
यन्त्ये नवांशेऽद्रिगुणे शिवाही शुक्रः कुनागे द्विनगेऽग्निरूपे ।
वेदाम्बरे पञ्चनिधौ गजेषौ नन्देशयोर्भानुरसे शिवानी ॥३॥
क्रमाच्छुभी विद्ध इति ग्रहः स्यापितुः सुतस्यात्र न वेधमाहुः ।
दुष्टोऽपि खेटो विपरीतवेधाच्छुभो द्विकोणे शुभदः सितेऽब्जः ॥ ४ ॥
जन्मराशिसे ग्रह-- भाव--फलको गोचर कहते हैं--सूर्य जन्मराशिसे ६ । १२ तथा १०१४
तथा ३ । ९ तथा ११ । ५ । स्थानोंमें शुभ तथा विद्ध भी होता है। जैसे छठा सूर्य
है बारहवां कोई ग्रह हो तो वेध हुआ। ऐसे ही दशमपर चतुर्थसे, ३ पर ९से, ११ पर ५से
वेध होता है, परंतु पितापुत्रका वेध नहीं होता । जैसे- सू० श० चं० बु० का परस्पर वेध
नहीं होता तथा मंगल शनि राहु ६ । ९ । ११ । ५। ३ । १२ । में चन्द्रमा १०१ ४ ।
३। ९ । ११ । ८।१।५।६। १२ । ७ १ २ स्थानोंमें पूर्वोक्त क्रमसे शुभ तथा विद्ध
भी होता है। बुध २।५ आदिमें गुरु ५। ४ । २ । १२ । ९ । १० । ७।३।११।८।
शुक्र १ । ८।२ । ७।३।१।४।१०।५।९।८।५।९।११।१२।६।
११ । ३ । ये ग्रह इन स्थानोंमें शुभ तथा विद्ध भी होते हैं, विना वेधके शुभ वेधसहित
अशुभ होते हैं अनुक्त स्थानोंमें अशुभ ही जानना, यह क्रमवेध कहा गया, इससे विपरीत
वामवेध होता है । जैसे,- छठे सूर्यपर बारहवें ग्रहका क्रमवेध है, जो सूर्य बारहवां छठे ग्रहसे
विद्ध हो तो यह वामवेध है, जो ग्रह दुष्टस्थानों में भी हों और उसपर वामवेध हो तो शुभ
होता है और चन्द्रमा शुक्लपक्षमें २।९। ५ स्थानमें यदि ६ । ८ । ४ स्थानस्थित ग्रहोंसे
षिद्ध न हो तो शुभ होता है ॥१-४॥ ( उप० १-२, इं० ३ उ० ४ )
द्विविधवेधे मतद्वयम् ।
स्वजन्मराशेरिह वेदमाहुरन्ये ग्रहाधिष्ठितराशितः सः ।
हिमाद्रिविन्ध्यान्तर एव वेधो न सर्वदेशेष्विति काश्यपोक्तिः ॥ ५॥

(५२) मुहूर्तचिन्तामणि:- [ गोचरur ३ वेधचक्रम् । रखे. ई. १.३ १६१३१.? ६ १५.९५१२४९८ ९/१२/२/५ मुरोः शुक्रस्य ..१११ ३ ८८ एक जन्मराशिसे, दूसरा ग्रहाधिष्ठित राशिसे वेध दो प्रकारका किसीक मतसे है । काश्यपादि आचार्याने जन्मराशिसे ही दो भेद कहे हैं। जैसे-छठा सूर्य स्वराशिसे द्वादशस्थ ग्रहसे, विद्ध न हो तो शुभ है १ तथा सूर्य जन्मराशिसे दादश नेष्ट है परन्तु स्वाक्रान्तराशिसे छठे भावगत ब्रहोंसे विद्ध ( वामवेध ) हो तो शुभ होता है यह दो प्रकारका बेध हिमालय और विघ्या- चलके मध्य (आर्यावर्त ) देशमें माना जाता है, सभी देशोंमें नहीं ॥ ५ ॥ ( उ० जा० ) जन्मराशेः सकाशात् ग्रहणफलम् । जन्मर्के निधन रहे जनिभतो धातः क्षतिः श्रीर्व्यथा चिन्तासौख्यकलप्रदौस्थ्यमृत्यः स्युर्माननाशः सुखम् । लाभोऽपाय इति कमात्तदशुभध्वस्त्यै जपः स्वर्णगो- दानं शान्तिरथो ग्रहं त्वशुभदं नो वीक्ष्यमाहुः परे ॥ ६॥ अहणका फल कहते हैं कि, जन्मनक्षत्रमें मरण, जन्मराशिपर शरीर पीडा, दूसरा हानि ३ वन ४ रोग ५ पुत्रकष्ट ६ सौख्य ७ स्त्री कष्ट ८ मृत्यु ९ माननाश :१० सुख ११ लाभ १२ नाश ये फल छः महीनेपर्यन्त होते हैं। अशुभ फल दूर करनेके लिये गायत्र्यादि मन्त्रोंका अप, गोदान, भूमि, सुवर्ण आदि यथाशक्ति दान और कल्पोक्त शांति करनी। किसीका मत है कि, अनिष्टफलसूचक ग्रहण देखना नहीं, यह भी उपाय है ॥ ६॥ (शा० वि० ) चन्द्रबले विशेषः । पापान्तः पापयुग्यने पापाचन्द्रः शुभोऽप्यसन् । शुभांशे चाधिमित्रांशे गुरुदृष्टोऽशुभोऽपि सन् ॥ ७ ॥ शुभफल देनेवाला (शुभावस्थ ) चन्द्रमा भी पापग्रहोंके बीच तथा पापयुक्त और पापग्रहोंसे सप्तम भावमें हो तो अशुभ फल देता है, यदि शुभग्रह वा अधिमित्रांशकमें हो और गुरुदृष्ट हो तो अशुभ भी शुभ फल देता है ॥ ७॥ ( अनु०) ग्रहदानचक्रम् । PREETTESCAREE THIS Atta aum -- ग्रह ० जप रवि माणिक माणिक गेहूं गेहूं सवत्सागो रक्तवस्त्र गुड ७००० सोना तांबा रक्तचंदन मजल चंद्र घृतकलश श्वेतवस्त्र दही शंख मोती सोना चांदी ११००० मंगल मूंगा गेहूं। मसुरी बैललाल कनेरफूल रक्तवस्त्र गुड सोना तांबा १०००० बुध नीलवस्त्र नीलवस्त्र मूंग मूंग | सोना दासी पन्ना घृत कांसी हाथिदांत ८०७० आनष्ट हो॥ ८॥ ( अनुष्टुप् ) प्रकरणम् ४.] शुक्ल.१ में चन्द्र अनिष्ट हो तो वह पक्ष अनिष्ट; कृष्ण प्रतिपदामें शुभ हो तो वह भी पक्ष प्रतिपदामें अनिष्ट हो तो सारा कृष्णपक्ष शुभ होता है. विपरीतमें विपरीत जानना अर्थात् शुक्लपक्षकी प्रतिपदामें यदि चन्द्रमा गोचरसे शुभ हो तो सारा शुक्लपक्ष शुभ और कृष्णपक्षकी व्यत्यासे चाशुभौ प्रोक्तौ संकटेऽब्जबलं त्विदम् ॥ ८॥ सितासितादौ सद्दष्टे चन्द्र पक्षौ शुभावुभौ । भाषाटीकासमेतः। पीतवस्त्र घोडा सहत पीलाअन्न नॉन पुष्पराज चीनी नोंन पुष्पराज चीनी हरिद्रा सोना गुरु १९००० शुक्र चित्रवस्त्र चावल घृत | सोना चांदी हीरा सुगंध शुभ्रधेनु यक्षकर्दम ११००० शनि उडद तेल | नीलम तिल कुलथी भैंस लोह कृष्ण कृष्णगौ . भैंसी २३००० राहु | गोमेद | घोडा नीलम कंबल तिल उडद लोहा । भेड सोना १८००० 4. केतु । वैडूर्य करतूरी | कंबल गेहूं धूखवर - .

- HARIRMWARI.. (५४) मुहूर्तचिन्तामणिः- [गोचर- दुष्टग्रहपरिहाराय स्त्नधारणम् । वजं शुक्रेऽब्जे सुमुक्ताप्रवालं भौमेऽगौगोमेदमार्को सुनीलम् । केतौ वैडूर्य गुरौ पुष्पकं ज्ञे पाचिः प्रामाणिक्यमर्के तु मध्ये ॥९॥ ग्रहोंके दुष्टफलपरिहारको प्रत्येकके मणि तथा उनके नवरत्न धारणकी विधि है कि, शुक्रका होरा अँगूठी वा बाजूके पूर्व किनारेपर, चन्द्रमाका मोती आग्नेयमें, मंगलका मूंगा दक्षिण में, राहुका गोमेद नैऋत्यमें, शनिका नीलम पश्चिममें, केतुका वैडूर्य वायव्यमें, बृहस्पतिका पुखराज उत्तरमें, बुधका पाचि ( पन्ना ) ईशानमें, सूर्यकी (माणिक्य ) चुनो मध्यमें रखना अथवा एक एक ग्रहक प्रीत्यर्थ उक्त एक एकका धारण वा दान करना ॥ ९ ॥ ( शालि० ) माणिक्यमुक्ताफलविठ्ठमाणि गारुत्मकं पुष्पकवजनीलम् । गोमेदवैडूर्यकमर्कतः स्यू रत्नान्यथो ज्ञस्य मुदे सुवर्णम् ॥१० ॥ धारण योग्य माणिक्य ये हैं कि रत्न, सूर्यका चुन्नी, चं० मोती, मं० मूंगा, बु० पन्ना, वृ० पुखराज, शु० हीरा, श० नीलम, रा. वैडूर्य, के० मस्कत और बुधके प्रीत्यर्थ सुवर्ण धारण भी कहा है ॥ १० ॥ (इ० व० ) बहुमूल्यरत्नधारणासामर्थ्य प्रतिनिधिरत्नानि । धार्य लाजावर्तकं राहुकेत्वो रौप्यं शुक्रेन्दोश्च मुक्तां गुरोस्तु । लोहं मन्दस्यारभान्वोः प्रवालं तारा जन्मात्रिरावृत्तितः स्यात्॥११॥ बहुमूल्य मणि धारणकी शक्ति न हो तो--बुधका सुवर्ण धारण करे. इस अर्थका प्रथम इलोकसे अन्वय है. तथा राहु केतुका (लाजावर्त ) चं० शु० की चांदी, बृ० मोती, श० लोहा, स० मं० मूंगा । ग्रन्थांतरोंमें जड़ी-धारण भी कहे हैं; सु० बेलकी, चं० दूषिया, मं० बोजिहा, बुधका विधारा, वृ० भारंगी, शु० सिंहपुच्छ, श० बिछली, रा० चन्दन, के. असगंध और जन्मनक्षत्रसे दिन नक्षत्रपर्यंत ९१९ करके ३ आवृत्ति गिननी जितनी हो उतनी तारा जाननी ॥ ११ ॥ (शालि०) ताराबलम् । जन्माख्यसम्पद्विपदः क्षेमप्रत्यरिसाधकाः । वधमैत्रातिमैत्रा स्युस्तारा नामसहक्फलाः ॥ १२ ॥ पूर्वलोकोक्त क्रमसे गिनके क्रमसे ये तारा होती हैं, जन्म १ संपत् २ विपत् ३ क्षेम ४ अपरि ५ साधक ६ वष ७ मित्र ८ परममित्र ९ जैसे इनके नाम हैं, वैसे ही फल भी हैं मसे ३।५। ७ तारा अनिष्ट हैं ॥ १२ ॥ ( अनुष्टुप् ) प्रकरणम् ४. भाषाटीकासमेतः। (५५) आवश्यककृत्ये दुष्टताराणां परिहारः। मृत्यौ स्वर्णतिलान्विपद्यपि गुडं शाकं त्रिजन्मस्वथो दद्यात्प्रत्यरितारकासु लवणं सर्वो विपत्प्रत्यरिः । मृत्युश्चादिमपर्यये न शुभदोऽथैषां द्वितीयेऽशका- नादिप्रान्त्यतृतीयका अथ शुभाः सर्वे तृतीये स्मृताः ॥ १३ ॥ आवश्यकता में दुष्ट ताराओंका परिहार है कि, वध ७ तारामें तिल, सुवर्ण, विपत् ३ में (गुड ) चीनी आदि, जन्म तारामें ( शाक) भाजी, प्रत्यरि ५ में लवण दान करना, दूसरे प्रकार परिहार है कि, पहिली आवृत्तिमें ३ । ५। ७ तारा पूरी ६० घटी पर्यन्त नेष्ट हैं, दूसरी आवृत्तिमें विपत्की आदिकी २० घटी. प्रत्यारके मध्यकी २० घटी, बधके अंत्यकी २० घटी छोडनी, तीसरी आवृत्तिमें सभी शुभ हैं, दोष नहीं करती ॥ १३ ॥ (शार्दू०) चन्द्रावस्थागणनोपायः । षष्टिनं गतभं मुक्तघटीयुक्तं युगाहतम् । शराब्धिहल्लब्धतोऽकशेषेऽवस्थाः क्रियाद्विधोः ॥ १४ ॥ प्रत्येक राशियोंमें चन्द्रमाकी १२ अवस्था होती हैं, नामसदृश फल समस्त कार्या-रंभमें देती हैं, अश्विनीसे लेकर जितने नक्षत्र हों उस संख्याको ६० से गुना कर वर्तमान नक्षत्रकी भुक्तघटी जोड़ देनी, ४ से गुनाकर ४५ से भाग लेना जो लाभ हुआ वह गत अवस्था, शेष वर्तमान अवस्था होती है । ४५ के भाग देनेसे लब्धि १२ से अधिक होते तो १२ से भाग लेकर शेष गत अवस्था जाननी, उसके आधेकी बत्तमान अवस्था होती है, मेषके चन्द्रमा प्रवासादि, वृष नाशादि. मिथुनमें मरणादि ऐसे ही सबका क्रम जानना, प्रकारांतरसे इन अवस्थाओंके गिरने का क्रम चक्रमें लिखा है ।। [चक्र-५५.५७ में देखो] ॥ १४ ॥ (अनु०) अवस्थानामानि । प्रवासनाशौ मरणं जयश्च हास्यारतिकोडितसुप्तभुक्ताः । ज्वराख्यकम्पस्थिरता अवस्था मेषात्क्रमान्नामसहफ़लाःस्युः ॥ १५॥ अवस्थाओंके नाम--प्रवास १ नाश २ मरण ३ जय ४ हास्य ५ अरति ६ क्रीडित ७. सुप्त ८ मुक्त ९ ज्वर १० कम्प ११ स्थिर १२ जैसे इनके नाम वैते ही फल हैं ॥ १५ ॥ ( उ० जा०) (५६) मुहूर्तचिन्तामणिः- [गोचर- ग्रहवैकृतपरिहारोपायः । लाजाकुष्ठवलाप्रियङ्गुधनसिद्धाथर्निशादारुभिः पुंखालोधयुतनलार्नगदितं स्नानं ग्रहोत्थाघहृत् । धेनुः कम्वरुणो वृषश्च कनकं पीताम्बरं घोटकाः श्वेतो गौरसिता महासिरज इत्येता रवेर्दक्षिणाः ॥ १६ ॥ दुष्ट ग्रहोंके परिहारार्थ स्नानकी औषधी (लाजा ) खील अथवा लज्जावती, कूठ (वला) भीमली, मालकांगनी, मुस्ता, सर्वप, देवदारु, हरिद्रा, शरपुंखा, लोघ इतने जलमें मिलाके स्नान करनेसे ग्रहोंका अरिष्ट दूर होता है । दक्षिणा कहते हैं कि, सूर्यके प्रीत्यर्थ गौ, चं शंख, मं० रक्त वृषभ, बु० सुवर्ण, बृ० पीतांबर, शु० घोडा, श० कृष्ण गौ, रा० खड्ग, केतुको बकरा दक्षिणामें देना ॥ १६ ॥ (शा० ) . . न० १ चक्र, चन्द्रावस्थाचक्रम् । म. ११॥ प्रवास हास्य रति २२॥ नाश १८॥ क्रीडित म. रति कंप सुप्त २६॥ प्रवास ४१॥ मुक्ति ३०॥ नाश ४८॥ कंप ११॥ हास्य जय ६० रो. स्थिर २२॥ रति १८।। कंप क्रीडा सुप्ति मृगशि. मरण ५६॥ मुक्ति ५२॥ नाश ४८॥ क्रीडा ६० मरण प्रवास स्थिर २६॥ हास्य आर्द्रा. रति मृति ११॥ भुक्त जय २२॥ पुन. कंप ३० तिष्य. १८॥ मरण सुप्ति ६० नाश ६० क्रीडा ६० स्थिर नाश आश्वे. स्थिरता प्रवास ४१॥ ५२॥ हास्य रति ४८॥ ज्वर कंप ४७ जय हास्य क्रीडा २६॥ भक्ति ३३॥ मरण सुप्ति प्रवास नाश एति प्रकरणम् ४.] भाषाटीकासमेतः। (५७) चन्द्रावस्थाचक्रम् नम्बर २. ७॥ पूर्वाफा. १८॥ क्रीडा भुक्ति ज्वर कंप ३० सुप्ति २६। प्रवास उ.फा. ४८॥ मरण नाग स्थिर २२॥ रति ११॥ हास्य हस्त. सुप्ति भुक्ति क्रीडित ३० स्थिर चि. मरण १८॥॥ कंप १५ जय प्रवास ३७॥ स्थिर स्वा. हास्य क्रीडा मृति ११॥ भुक्ति ६० सुप्ति ६० नाग वि. स्थिर प्रवास २२॥ ज्वर १८॥ मृति अ. नाश हास्य रति क्रीडा ६० स्थिर ४८111 कंप ज्ये. सुप्ति क्रीडा ११॥ प्रवास भुक्ति ३३॥ मृति मू. ६० राति जय हास्य पूर्वा. नाश १८॥ क्रीडा रति भुक्ति ज्वर कंप सुप्ति २६ प्रवास उत्तरा. ४८॥1 मरण कप स्थिर नाश जय श्रव. २२॥ रति ६० ज्वर हास्य कोडित ७॥ ज्वर धनि. १८॥ कंप भुक्ति ५२॥ नाश सुप्ति ४१॥ प्रवास ३७॥ रति स्थिर १५ जय शत. २६॥ हास्य मरण ६० सुप्ति ४८॥ क्रीडा मति ११॥ मुक्ति पूर्वा. २२॥ ज्वर कंप स्थिर नाश ५६॥ प्रवास ५२॥ रति डराभा. १८॥ मृति ४१॥ हास्य नाश जय क्रीडा रेवती. ३७॥ ज्वर ४८॥ कंप क्रीडा सप्त भक्ति स्थिर rapaHA Praceae

(५८)
मुहूचिन्तामणिः ।
[ गोचर-प्र० ४ ]
ग्रहाणां गन्तव्यराशेः फलदानकालः ।
सूर्यारसौम्यास्फुजितीक्षनागसप्ताद्रिधनान्विधुरनिनाडीः ।
तमोयमेज्यात्रिरसाश्चिमासान्गन्तव्यराशेः फलदाः पुरस्तात् ॥ १७ ॥
सूर्य जिस राशिपर जानेवाला है उसका फल ५ दिन पहलेसे ही देता है तथा मंगल ८
दिनसे, बुध ७ दिनसे, शु० ७ दिनसे, चं० ३ घटी, राड्ड ३ महीने, शनि ६ महीने, बृ०२
महीने अर्थात् २७ अंशसे ऊपर स्पष्ट जव हो तो सभीसे अग्रिम राशिका फल देता है॥१७॥
(उ० जा० )
तिथ्यादिदोषे दानम् ।
दुष्टे योगे हेम चन्द्रे च शंख धान्यं तिथ्यः तिथौ तण्डुलांश्च ।
वारे रत्नं भे च गां हेम नाड्यां दद्यासिन्धूत्थं च तारासु राजा ॥१८॥
आवश्यक कृत्यमें दुष्ट योगोंका दान कहते हैं, यहां राजा उपलक्षण है । व्यतिपातादिमें
सुवर्ण, चन्द्रदुष्टमें शंख, तिथिमें तण्डुल. वारमें उक्त रत्न, राशिमें गौ, दुर्मुहूर्त में सुवर्ण
तारामें कवण देना ॥ १८ ॥ (शालिनो)
ग्रहाणां राश्यन्तरागमफलम् ।
राश्यादिगौ रविकुजौ फलदौ सितेज्यौ मध्ये सदा शशिसुतश्चरमेऽजमन्दौ ।
अध्वान्नवह्निभयसन्मतिवस्त्रसौख्यदुःखानि मासि जनिभे रविवासरादौ ॥ १९॥
इति श्रीदैवज्ञानन्तसुतराम विरचिते मुहूर्त्तचिन्तामणौ चतुर्थ
गोचरप्रकरणं समाप्तम् ॥ ४ ॥
सूर्य मंगल राश्यादि १० अंशमें अपना फल पूर्ण देते हैं,अन्य अंशोंमें थोड़ा थोड़ा देते
हैं, एवं शुक्र बृहस्पति मध्यके१० अंशमें बुध पूरे ३० ही अंशोंमें चंद्रमा शनि अंत्य१० अंशमें
पूरा फल देते हैं, जिस महीने में जन्मनक्षत्र रविवारको हो तो सफर, चन्द्रवारको हो तो भोजन
पदार्थ मिले, एवं मंगरको अग्निमय, बु० धर्मबुद्धि बृ० वस्त्रप्राप्ति, शु० सौख्य, श० दुःख
होता है ॥ १९॥ (व० ति० )
इति महीवरकृतायां मुहूर्तचिन्तामणिभाषाटीकायां चतुर्थ
गोचरप्रकरणं समाप्तम् ॥ १॥

संस्कार-प्रकरणम् ५,] भाषाटीकासमेत (५९) अथ संस्कारप्रकरणम् ५। प्रथमरजोदर्शने मासादि । आयं रजः शुभं माघमार्गराधेयफाल्गुने । ज्येष्ठश्रावणयोः शुक्के सहारे सत्तनौ दिवा ॥ १ ॥ श्रुवित्रयमृदुक्षिप्रध्रुवस्वातौ सिताम्बरे । मध्यं च मूलादितिभे पितृमिश्रे परेष्वसत् ॥ २॥ संस्कार ४८ हैं, इनमें गर्भाधानोपयोगी रजोदर्शन मुख्य है. यह प्रथम ऋतु ( रजोदर्शन ) माघ मार्गशीर्ष वैशाख आश्विन फाल्गुन ज्येष्ठ श्रावण महीनों में, शुक्लपक्षमें, शुभग्रहोंके वारमें शुभलम तथा दिनमें और श्रवण, धनिष्ठा, शततारा, मृदु, क्षिप्र, ध्रुव, स्वाती नक्षत्रोंमें शुभ होता है, मूल पुनर्वसु मघा विशाखा कृत्तिका में मध्यम, अन्य नक्षत्रोंमें अशुभ होता है, तथा उस समय श्वेत वस्त्र शुभ होता है ॥ १ ॥२॥ ( अनु० ) रजोदर्शने निन्द्यकाल भद्रानिहासङ्कमे दर्शरिक्तासन्ध्याषष्ठीद्वादशीवैधृतेषु । रोगेऽष्टम्यां चन्द्रसूर्योपरागे पाते चायं नो रजोदर्शन सत् ॥ ३ ॥ प्रथम रजोदर्शन भद्रामें, सोयेमें संक्रांतिदिन, अमावस्या, रिक्तातिथि, संध्यासमय, षष्ठी, द्वादशी, वैधृतिमें तथा ज्वरादि रोंगमें, अष्टमीमें, सूर्यचंद्रग्रहणमें, व्यतीपातमें शुभ नहीं होता, नेष्ट फल है ॥ ३ ॥ (शालिनी) प्रथमरजस्वलास्नानमुहूर्तः। हस्तानिलाश्चिमृगमैत्रवसुधवाख्यैः शक्रान्वितैः शुभतिथौ शुभवासरे च । सायादथार्तववती मृगपोष्णवायुहस्ताश्विधातृभिररं लभते च गर्भम् ॥ ४ ॥ हस्त स्वाती अश्विनी मृगशिर अनुराधा धनिष्ठा ध्रुव ज्येष्ठा नक्षत्र, ( शुभतिथि) पूर्वोक्त भद्रादिरहित, शुभग्रहोंके वारमें प्रथम रजोवती स्नान करे और मृगशिर रेवती स्वाती हस्त अश्विनी रोहिणीमें स्नान करनेसे शीघ्र ही गर्भ धारण करती है ॥ ४ ॥ (व० ति०) गर्भाधानमुहूर्तः । गण्डान्तं त्रिविधं त्यजेन्निधनजन्मः च मूलान्तकं दास्रं पौष्णमथोपरागदिवसं पातं तथा वैधृतिम् । - (६०) मुहर्तचिन्तामाणिः- [ संस्कार- पित्रोः श्राइदिनं दिवा च परिघायर्ध स्वपत्नीगमे भान्युत्पातहतानि मृत्युभवनं जन्मक्षतः पापभम् ॥ ५॥ गर्भाधानका मुहूर्त कहते हैं-नक्षत्र तिथि लग्नगंडांत, जन्मनक्षत्र मूल भरणी अश्विनी रेवती मघा ग्रहणदिन व्यतीपात वैधृति मातापिताका श्राद्धदिन. दिनमें, परिघार्द्ध, दिव्य अन्तरिक्ष भूमिका उत्पात, जन्मलग्न जन्मराशिमें, अष्टम लम. पापयुक्त नक्षत्र लग्न इतने प्रथमऋतुस्नाता ( अपनी पत्नीके गमन ) गर्भाधानमें वर्जित करे ॥ ५ ॥ ( शार्दू० ) भद्राषष्ठीपर्वरिक्ताश्च सन्ध्या भौमार्कार्कीनाथरात्रीश्चतस्रः । गर्भाधान व्युत्तरेन्द्रकमैत्रब्राह्मस्वातीविष्णुवस्वम्बुपे सत् ॥ ६ ॥ भद्रा षष्ठी पर्वदिन रिक्तातिथि सन्ध्यासमय मंगल रवि शनिवार और रजोदर्शनसे लेकर ४ रात्रिवर्जित करके तीनों उत्तरा मृगशिर हस्त अनुराधा रोहिणी स्वाती श्रवण धनिष्ठा शतभिषामें भाधान करना ॥ ६ ॥ ( शालिनी) केन्द्रत्रिकोणेषु शुभश्च पापैख्यायारिगः पुंग्रहदृष्टलग्ने । ओजांशगेऽब्जपि च युग्मरात्रौ चित्रादितीज्याश्चिषु मध्यमं स्यात् ॥ ७॥ केंद्र १। ४ । ७ । त्रिकोण ९ । ५ में शुभग्रह, ३।६।११ भावों में पापग्रह हों तथा पुरुषग्रह (सू० मं० ६० ) लमको देखें, चन्द्रमा विषमराशिके अंशकमें हो ऐसे लग्नमें तथा समरात्रिमें गर्भाधान करना, स्त्रीग्रह बली चन्द्रमांशकमें तथा विशमरराशिमें आधान होतो कन्या होती है, पुंग्रह बली तथा समरात्रिमें पुत्र होता है, मिश्रयोगों में नपुंसक होता है और चित्रा पुनर्वसु पुष्य अश्विनी नक्षत्र गर्भाधानको मध्यम हैं, पूर्वोक्तोंके न मिलनेमें इनमें भी करते हैं ॥ ७ ॥ ( इ० व०) सीमन्तोन्नयनमुहूर्तः। जीवाकारादने मृगेज्यनितिश्रोत्रादितिबध्नभै- रिक्तामार्करसाष्टवयंतिथिभिर्मासाधिपे पीवरे । सीमन्तोऽष्टमषष्ठमासि शुभदैः केन्द्रत्रिकोणे खलै- लाभारित्रिषु वा धुवान्त्यसदहे लग्ने च पुम्भाशके ॥८॥ गर्भके :निश्चय हुएमें सीमन्तोन्नयन मुहूर्त कहते हैं कि, बृहस्पति मंगल सूर्य- बार । हस्त मृगशिर पुष्य मूल श्रवण पुनर्वसुमें सीमन्त संस्कार करना. रिक्ता ४ । ९ । .

. १४ अमा द्वादशी षष्ठी अष्टमी तिथि छोड़के छठे आठवें महीनेमें, जिसमें मासेश बलवान् हों तथा शुभग्रह केन्द्र त्रिकोणों में, पापग्रह ३ । ६। ११ भावोंमें हों, लमसे पुरुषराशिका अंशक हो. शुभवारके दिन, नक्षत्र विकल्पसे कहते हैं कि, ध्रुवनक्षत्र एवं रेवतीमें सीमन्त संस्कार करना ॥८॥ ( शार्दू) मासेश्वराः, स्त्रीणां चन्द्रबलं च । मासेश्वराः सितकुजेज्यरवीन्दुसौरिचन्द्रात्मजास्तनुपचन्द्रदिवाकराः स्युः । वीणां विधोबलमुशन्ति विवाहगर्भसंस्कारयोरितरकर्मसु भर्तुरेव ॥९॥ गर्भ रहेमें प्रथम मासका स्वामी शुक्र, २ का मंगल, ३ का बृहस्पति, ४ का सूर्य, ५ का चन्द्रमा, ६ का शनि, ७ का बुध, ८का लग्नेश, ९ का चन्द्रमा, १० का सूर्य है, इनके बलवान् होनेमें गर्म पुष्ट, निर्बलतासे अपने मासमें क्षीणादि करता है । विवाहमें एवं गर्भसंस्कार गर्भाधा- नादिकोंमें स्त्रियोंकी पृथक् (चन्द्रबल) चन्द्रशुद्धि आवश्यक है, अन्य समस्त कृत्योंमें सौभाग्यवतीको भकिी चन्द्रशुद्धि देखी जाती है स्त्रियोंकी पृथक् नहीं ॥९॥ (व०ति०) पुंसवनमुहूर्तः । पूर्वोदितैः पुंसवनं विधेयं मासे तृतीये त्वथ विष्णुपूजा । मासेष्टमे विष्णुविधातृजीचैर्लग्ने शुभे मृत्युगृहे च शुद्धे ॥ १० ॥ सीमन्तोक्त तिथि वार नक्षत्रोंमें तीसरे वा चौथे महीनेमें गर्भका पुंसवन संस्कार करना तथा पुंवार पुरुषलग्न और पुरुषनाम नक्षत्रोंमें पुंसवन करते हैं, एवं तीसरे महीने में विष्णुपूजा, आठवेमें विष्णु ब्रह्मा बृहस्पतिका यूजन करना, जितने गर्भसंस्कार कहे हैं इन सभीमें शुभ लम तथा अष्टम भाव शुद्ध चाहिये ॥१०॥ (इं०५०) जातकर्मनामकरणयोर्मुहूर्तः । तज्जातकर्मादि शिशोविधेयं पाख्यारक्तोनतिथौ शुभेऽह्नि । एकादशे द्वादशकेऽपि घले मृदुध्रुवक्षिप्रचरोडुषु स्यात् ॥ ११ ॥ पुत्र उत्पन्न होते ही नालच्छेदनके पहले जातकर्म करना, यदि वह समय किसी प्रकार व्यतीत हो जाय तो नामकर्मके साथ ही करना, इसलिये जातकर्मादिकोंका एक ही मुहूर्त कहते हैं कि, रिक्तातिथि पर्वदिन छोड़के शुभ वारमें ग्यारहवें अथवा बारहवें दिन मृदु ध्रुव क्षिप चर नक्षत्रोंमें करना शुभ है । ब्राह्मणका ११ दिनमें,क्षत्रियोंका १३ में, वैश्योंका १६ में, सूत्रधारका सूतकान्तमें करना, शूद्रोंका महीनेमें, मुख्य काल व्यतीत हुएमें उत्तरायणादि समयकी पूर्वोक्त अपेक्षा है, मुख्यकालमें विशेष विचार नहीं ॥११॥ ( उप० ) (६२) मुहूर्तचिन्तामणिः- {संस्कार- सूतिकास्नानमुहूर्तः । पौष्णध्रुवेन्दुकरवातहयेषु सूतीस्त्रानं समित्रभरवीज्यकुजेषु शस्तम् । नाईत्रियश्रुतिमधान्तकमिश्रमूलत्वाष्ट्रे ज्ञसौरिवसुषविरिक्ततिथ्याम् ॥१२॥ रेवती ध्रुव नक्षत्र मृगशिर हस्त स्वाती अश्विनीमें सूतिका स्नान करना । आर्द्रासे तीन श्रवण मघा भरणी मिश्रसंज्ञक एवं मूल चित्रा नक्षत्र बुध शनिवार ८ । ६ । १२ । ४ । ९। १४ । तिथि सूतिकाके स्नानमें न लेना ॥ १२ ॥ प्रथमादिमासोत्पन्नदन्तफलम् । मासे चेत्प्रथमे भवेत्सदशनो बालो विनश्येत्स्वयं हन्यात्स क्रमतोऽनुजातभगिनीमात्रग्रजान्व्यादिके। षष्ठादी लभते हि भोगमतुलं तातात्सुखं पुष्टतां । लक्ष्मी सौख्यमथो जनौ सदशनो बोर्श्व स्वपित्रादिहा ॥ १३ ॥ बालकके पहिले महीनेमें दांत उगे तो स्वयं नष्ट हो, दूसरेमें कनिष्ठ भाईको एवं ३ में भगिनी ४ में माता ५ में ज्येष्ठ माताको नष्ट करे, छठेमें बहुत भोग ७ में पितासे सुख, ८ में पुष्टता ९ में धन १० में सौख्य ११ में सुख हो, यदि जन्म ही दन्तसहित हो अथवा ऊप- रको पंक्तिके दाँत आवे तो पित्रादिकोंका नाश करता है ॥१३॥ ( शार्दू० ) दोलाचक्रम् । दोलारोहेऽकभात्पञ्चशरपञ्चेषुसप्तभैः । नैरुज्यं मरण कार्य व्याधिः सौख्य क्रमाच्छिशोः ॥ १४ ॥ बालकको ( दोला ) पालनेमें झुलानेके लिये दोलाचक्र है कि सूर्यके नक्षत्रसे ५ नमें निरोगी, उपरान्त ५ में मरण, फिर ५ में कृशता, ५ में रोगी, ७ में सौख्य होता है ॥ १४ ॥ अनु०) दोलारोहण--निष्क्रमणमुहूर्ती । दन्तार्कभूपधृतिदिमितवासरे स्याद्वारे शुभे मृदुलघुध्रुवभैः शिशूनाम् । दोलाधिरूढिरथ निष्क्रमणं चतुर्थमासे गमोक्तसमयेऽर्कमितेऽह्नि वा स्यात् १५ दोलारोहणका उक्त चक्रमें मुहूर्त है कि, ३२।१२। १६ । १८ । १० वें दिनोंमें शुभ वारमें मृदु लघु ध्रुव नक्षत्रोंमें बालकोंको दोलारोहण कराना और चौथे महीनेमें तथा यात्रोक्त तिथि वार नक्षत्रोंमें निष्क्रमण कराना ॥ १५ ॥ (व० ति०) १ -

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प्रकरणम् ५.
भाषाटीकासमतः।
प्रसूतिकायाः जलपूजामुहूर्तः ।
कवीज्यास्तचैत्राधिमासे न पौषे जलं पूजयेत्सतिका मासपूतौ ।
बुधेन्द्रिज्यवारे विरिक्ते तिथौ हि श्रुतीज्यादितीन्द्रर्कनैर्ऋत्यमैत्रे ॥ १६ ॥
शुक्रास्त, गुर्वस्त, चैत्र, पौष मास, रिक्ता तिथि, मलमास छोडके प्रसूतिसे एक मास पूरे
हुएमें बुध चन्द्र बृहस्पति वारमें श्रवण, पुष्य, पुनर्वसु, मृगशिर, हस्त, मूल, अनुराधा नक्षत्रों में
सूतिका जलपूजन करै ॥ १६ ॥ ( भुज०)
अन्नप्राशनमुहूर्तः।
रिक्तानन्दाष्टदर्श हरिदिवसमथो सौरिभौमार्कवास्-
ल्लनं जन्मलग्नाष्टमगृहलवगं मीनमेषालिंक च ।
हित्वा षष्ठात्समे मास्यथ च मृगदृशां पञ्चमादोजमासे
नक्षत्रैः स्यात्स्थिराख्यैः समृदुलघुचरैोलकान्नाशनं सत् ॥ १७ ॥
निष्क्रमणसे उपरांत पुत्रका छठे आदि सम मास ६।८।१०। १२ में तथा कन्याका
पांचवें आदि विषम ५। ७ । ९।११। मासमें अन्नप्राशन करना इसमें रिक्ता ४ । ९।१४
नन्दा १।६। ११ अष्ट ८ दर्श ३० हारे १२ तिथि, शनि मंगल सूर्यवार जन्मराशिसे
अष्टम लग्न एवं नवांशक और १२ । १ । ८ लग्न छोडके थिर मृदु लघु चर नक्षत्र लेने
॥१७॥ (स्रग्धरा)
केन्द्रत्रिकोणसहजेषु शुभः खशुद्दे लग्ने त्रिलाभरिपुगैश्च वदन्ति पापैः।
लग्राष्टषष्ठरहितं शशिन प्रशस्त मैत्राम्बुपानिलजनुर्भमसच्च केचित् ॥ १८॥
अन्नप्राशनमें लमशुद्धि कहते हैं कि, केन्द्र ११४।७।१० त्रिकोण ५।९ सहज ३ भावमें
शुभग्रह, ३।११। ६ भागोंमें पापग्रह हों, दशम १० भाव (शुद्धि) ग्रहरहित हो, चन्द्रमा
१।८। ६ स्थानोंसे अन्य भावमें हो ऐसे लममें अन्नप्राशन शुभ है तथा अनुराधा शततारा
स्वाती और जन्मनक्षत्रको कोई अशुभ कहते हैं ॥ १८ ॥ (व० ति०)
अन्नप्राशनग्रभावफलम् ।
क्षीणेन्दुपूर्णचन्द्रेज्यज्ञभौमार्काकिभार्गवैः ।
त्रिकोणव्ययकेन्द्राष्टस्थितैरुक्तं फलं ग्रहैः ॥ १९ ॥
भिक्षाशी यज्ञकदीर्घजीवी ज्ञानी च पित्तरुक् ।
कुष्ठी चान्नक्लेशवातव्याधिमान्भोगभागिति ॥ २० ॥

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।सस्कार-
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मुहूर्तचिन्तामाणिः-
अन्नप्राशनमें ग्रहभावका फल है कि, त्रिकोण ९ । ५ व्यय १२ केन्द्र १।४।७।१०
अष्ट ८ वें भावों से किसीमें क्षीण चन्द्रमा हो तो भिक्षाका अन्न खानेवाला हो एवं पूर्णचंद्रसे
यज्ञ करनेवाला, बृहस्पतिसे दीर्घायु, बुधसे ज्ञानी, मंगलसे पित्तरोगी, सूर्यसे ( कुष्ठी) रुधिर
संबंधी रोगी, शनिसे ( अन्नक्लेश ) अन्न पचे नहीं वा अन्न मिलना कठिन हो तथा वातरोगी
भी हो, शुक्रसे ( भोगी) सुख भोगनेवाला वह बालक हो ।। १९ ॥ २० ॥
भूम्युपवेशनमुहूर्तः ।
पृथ्वीं वराहमभिपूज्य कुजे विशुद्धे रिक्ते तिथौ ब्रजति पञ्चममासि बालम् ।
बद्धा शुभेऽह्नि कटिसूत्रमथ ध्रुवेन्दुज्येष्ठक्षमैत्रलवुभैरुपवेशयेत्कौ ॥ २१ ॥
पंचम मालमें (वा अन्नप्राशनसमयमें ) भूम्युपवेशन संस्कार कहते हैं कि, पृथ्वी और
वराहकी पूजा करके मंगलकी शुद्धिमें रिक्ता । ४। ९१४ तिथियोंको छोडके चर लग्नमें ध्रुव,
मैत्र, मृगशिर,ज्येष्ठा, लघुनक्षत्रों में बालकके ( कटिसूत्र ) तागडी'कन्धनी” बांधके उसे
पृथ्वीमें बिठलाना ॥ २१ ॥ (व० ति०)
जीविकापरीक्षा ।
तस्मिन्काले स्थापयेत्तत्पुरस्तादन शस्त्रं पुस्तकं लेखनी च ।
स्वर्ण रौप्यं यच्च गृह्णाति बालस्तैराजीवैस्तस्य वृत्तिः प्रदिष्टा ॥ २२ ॥
भूम्युपवेशन समयमें आजीविकाकी परीक्षा है कि, बालकके आगे वस्त्र, शस्त्र, पुस्तक
कलम, सोना, चांदी और आजीवनोपयोगी वस्तु रखनी, बालक जिस वस्तुको प्रथम ग्रहण
करे उस वस्तुसंबंधी कृत्यसे आजीवन हो, उसी वृत्तिसे प्रतिष्ठा पावे ॥ २२॥ (शालि०)
ताम्बूलभक्षणमुहूर्तः ।
बारे भौमार्किहीने ध्रुवमृदुलधुभविष्णुमूलादितीन्द्र-
स्वातीवस्वायुपेतैमिथुनमृगसुताकुम्भगोमीनलग्ने ।
सौम्यैः केन्द्रत्रिकोणैरशुभगगनगैः शत्रुलाभत्रिसंस्थै-
स्ताम्बूलं सार्धमासमयमितसमये प्रोक्तमन्नाशने वा ॥ २३ ॥
मंगल शनिरहित वारमें, श्रवण मूल पुनर्वसु ज्येष्ठा स्वाती धनिष्ठा ध्रुव मृदु नक्षत्रोंम, मिथुन
मकर कन्या कुंभ बृष मीन लग्नोंमें, केन्द्र (१।४।७।१०) त्रिकोण (९५) के शुभंग्रह
३।६। ११ के पापग्रहोंमें बालकको पान सुपारी खिलाना, यह कर्म ढाई महीनेमें
अथवा अन्नप्राशनके दिन करना ॥ २३ ॥

प्रकरणम् ५.] भाषाटीकासमेतः। कर्णवेधमुहूर्तः । हित्वैतांश्चैत्रपौषावमहरिशयनं जन्ममासं च रिक्तां युग्माब्दं जन्मतारामृतुमुनिवसुभिः सन्मिते मास्यथो वा। जन्माहात्सूर्यभूपैः परिमितदिवसे शेज्यशुक्रेन्दुबारे- ऽथौजाब्दे विष्णुयुग्मादितिमृदुलघुभैः कर्णवेधः प्रशस्तः ॥ २४ ॥ कर्णवेधका मुहूर्त-चैत्र पौष महीना सौर मानसे तथा क्षयतिथि ( जन्ममास ) जन्मदिनसे ३० दिन, रिक्ता ४ । ९ । १४ तिथि, युग्म २। ४ । ६ । ८ । १० । १२ वर्ष, जन्म- तारा, १ । १० । १२ वें नक्षत्र, जन्मनक्षत्रसे इतने वर्जित करके ६ । ७ । ८ वें महीने अथवा जन्मदिनसे १२ । १६ वें दिनमें, इनसे उपरांत विषम वर्ष में । बुध बृहस्पति शुक्र चन्द्रवार एवं श्रवण, धनिष्ठा, पुनर्वसु, मृदु, लघु नक्षत्रों में कर्णवेध शुभ होता है ॥ २४ (स्रग्धरा) संशुद्ध मृतिभवने त्रिकोणकेन्द्रघ्यायस्थः शुभखचरैः कवीज्यलग्ने । पापाख्यैररिसहजायगेहसंस्थैलग्रस्थे त्रिदशगुरौ शुभावहः स्यात् ॥ २५ ॥ कर्णवेधमें लमशुद्धि-अष्टमस्थान ग्रहरहित हो, त्रिकोण ( ९ । ५) केन्द्र (१। ४ । ७ १०) तथा ३ । ११ स्थानोंमें शुभग्रह, बृहस्पति शुक्रके लमों २ । ७ । ९ । १२ में तथा बृहस्पति लग्नमें हो ऐसे लग्नमें कर्णवेध शुभ होता है और जन्मोत्सव कृत्य सौरवर्ष पूर्ण हुएमें "जिस दिन सूर्य जन्मके राश्यादिमें आवे" करते हैं, दाक्षिणात्य जन्मतिथि भी मानते हैं ॥ २५ ॥ (प्रहर्षि०) चूडाकर्मादीनां निषेधकालः । गीर्वाणाम्बुप्रतिष्ठापरिणयदहनाधानगेहप्रवेशा- चौलं राजाभिषेको व्रतमपि शुभदं नैव याम्यायने स्यात् । नो वा बाल्यास्तवार्थे सुरगुरुसितयो वकेतूदये स्यात् पक्षे वार्ध च केचिज्जहति तमपरे यावदीक्षां तदुये ॥ २६ ॥ देवमन्दिर एवं जलायकी प्रतिष्ठा, विवाह, अग्न्याधान, गृहप्रवेश, चूडाकर्म, राज्याभिषेक, व्रतबन्ध, दक्षिणायनमें तथा बृहस्पति शुक्रके बाल्य वृद्धत्व अस्तमें ( केतु ) पुच्छलताराके उदवमें न करने, जब केतु अस्त हो जावे तो १५ वा ७ दिन और भी छोडने । किसीका मत है कि ( उम्र) द्विशिख तामस त्रिशिख कीलकादि संज्ञक धूमकेतु जबतक देखे जावें तबतक दोष है, उपरांत नहीं ॥ २६ ॥ ( स० ) ६ मुहर्तचिन्तामणि:- सस्कार- गुरुशुक्रयोल्यवाईकविचारः । पुरः पश्चाइ भृगोर्खाल्यं त्रिदशाहं च बाईकम् । पक्ष पश्चदिनं ते ३ गुरोः पक्षमुदाहृते ।। २७ ॥ ते दशा योः प्रोक्ते कैश्चित्सप्तदिनं परैः। ज्यहं त्वात्यायिकेऽप्यन्यैरर्धाहं च त्र्यहं विधोः ॥ २८ ॥ शुक्रके पूर्व उदय हे नेमें तीन दिन. पश्चिमोदयमें १० दिन बालत्व रहता है तथा पूर्वा- स्तमें १५ दिन पश्चिमा ५ दिन इत्व होता है. बृहस्पति १५ दिन बाल, १५ दिन वृद्ध होता है। किसीके नतसे बृहस्पति शुभके उदय तथा अस्तमें बाल्य वार्द्धक के १० । १० दिन हैं, किसीने ७ ही दिन कहें हैं और किसीका मत है कि आत्यायक्रम ( यदि कर्तव्य कृत्य की किर दिनशुद्धयादि न निले, समय निकल जाता है तथा उस समय के इस कार्यक न करने से पुनः वह का नाश होता हो तो) तीन ही दिन छोड़ने और चना वृद्धव ३ दिन, बालवका आधा दिन छोडना ॥ २७ ॥ २८ ॥ ( अनु० ) चौलमुहूर्तः । चूडा वर्षातृतीयात्प्रभवति विषमेऽष्टारिक्ताद्यषष्ठी- पर्बोनाहे विचत्रोदगयनसमये जेन्दुशुक्रेज्यकानाम् । धारे लगाशयोश्चास्वभनिधनतनों नैशने शुद्धिपक्ते शाक्रोपेलैर्विमैत्रै दुचरलघुभैरायत्रिस्थपापैः ।। २५ ॥ श्रीणचन्द्रकुजसौरिभास्रैर्मृत्युशवमृतिपगुताज्वराः। स्युः क्रमेण बुधजीवभार्गवैः केन्द्रगैश्च शुभमिष्टतारया ॥ ३० व्रतबंधसे पृथकू चूडाकर्म करना हो तो मुहूर्त है कि, तीसरे वर्षसे विषम ३ : ५७ वर्षांमें, रिक्ता ४ । ९ । १४ आद्य १ षष्ठी ६ पर्वदिन, चैत्रमास छडके उत्तरायणमें, बुध बृहस्पति शुक्र चन्द्रवार में, जन्मराशिलग्नसे अष्टम लम न हो, अष्टम स्थानमें शुक्रसे अन्य कोई अह न हो, जन्ममास छोडके और ज्येष्ठासहित अनुराधारहित मृद चा लघु नक्षत्र में, लग्नसे ११ ।। भावोंमें पापग्रह, केन्द्रकोणोंमें शुभग्रह होने में चूडाकर्म करना !! लम केन्द्रों १।४।७५ १० ) में क्षीण चंद्रमा हो तो मृत्यु, मंगल हो तो शस्त्राघात. शनिसे ( पंगुता) लंगडा, सूर्यसे ज्वर तथा बुध बृहस्पति शुक्रसे शुभ फल होता है, परन्तु इसमें वाराशुद्धि आवश्यक है, जन्म विपत् प्रत्यरि वध तारा न लेनी. यह विचार ( वैदिक मुण्डन) चौल ( अवैदिक मुंडन ) सुखार्थ क्षौरमें तुत्य है !! २९ ॥३० ॥ (स्रग्धरा २९ रथो ३०) । मकरणम् ५.. भाषाटीकासमेत मातरि सगर्भायां चौलमुहूर्तः । पञ्चनासाधिके मातुर्ग चौल शिशोर्न सत् । पञ्चवधिकस्येष्टं गर्भिण्यानपि मातरि ।। ३३ ।। बौलवाले बालकनी माताका गर्भ पांचमहीनेसे अरका हो तो पांच वर्षके भीतर अवस्था बालेका चूडाकर्म न करना, दि बालक पांच वर्ष से अधिक हो तो पांच महीनेसे अधिक गर्भवती माता होनेमें भी दोष नहीं ॥ ३१ ॥ ( अनु०) चौले दुष्टतारापवादः। तारादौष्टयेऽब्जे त्रिकोणोचगे वा और सत्स्यालोन्यमित्रस्ववर्गे । सौम्ये भेऽब्जे शोभने दुष्टतारा शस्ता ज्ञेया औरयावादिकृत्ये ॥ ३३ ॥ यदि चन्द्रमा त्रिकोण (५१२) वा उच्च राशिमें हो अथवा रवि बुध गुरु शुक्रके - अपने षड्वर्गमें तथा गोचासे शुभस्थानमें हो तो शुभ नक्षत्र में क्षौर एवं यात्रादि कृत्य दुष्ट ताराने भी कर लेना ॥ ३२ ॥ ( शार्दू वि० ) चौलादिकृत्ये निषिद्धकालः। ऋतुमत्याः सूविकायाः मनोश्चौलादि नाचरेत् । ज्येष्ठापत्यस्य न ज्येष्ठे कैश्चिन्मार्गेऽपि नेष्यते ॥ ३३॥ बालकको लाला रजोवती अश्रका प्रसूता हो तो ( चौलादि ) चूडा व्रतबन्धन विवाह न करै और आद्यगर्भ कन्या पुत्रके चौलवत विवाह ज्येष्ठके महीने में न करना । कोई मागशीर्ष में भी न करमा कहते हैं ।। ३३ ॥ ( अनुष्टुप् ) इन्वरनखक्रिया विहिता चौलोदिते बारभे पारसदाररतीन्दिताय वा वर च सन्ध्यां तथा । रितां वर्म निशा निरामनरणयामप्रयाणोचतः तैनातः कार्या हितोमुभिः ॥ ३४ ॥ सामान्य और, संत सी चौलोक्त नक्षत्र वारादिकोंमें करना परन्तु शनि, मंगल, सूर्यवार में स्था एक दिनने तथा सन्ध्याकालमें रिक्तातिथि, पर्व दिन्न, रात्रि- समयमें न करना और निरान अवा ग्रामांतरकी तैयारी में न्हायक नित्य वै मिचिनर्म करके तेल उक्टन लायक पार भूपण वस्त्रादि पहनके अपने तुमचा J और न (३८) मुहूतीचन्तामाण:- [ संस्कार- औरस्य विधिनिषेधौ। ऋतुपाणिपीडमृतिबन्धमोक्षणे क्षुरकर्म च द्विजनृपाज्ञया चरेत् । ववाहवीथंगमसिन्धुमज्जनक्षुरमाचरेन खलु गर्भिणीपतिः॥ ३५॥ यम, विवाहमें, गोदानसंस्कारमें, मातापिताके मरणमें, कैदसे :छूटनेमें, ब्राह्मणकी तथा रानाका आबासे क्षौर अनुक्तदिनमें भी करलेना और गर्भिणी स्त्रीका पति प्रेतके साथ न जाय, बीर्थयात्रा, समुद्रस्नान और क्षौर न करे ॥ ३५ ॥ ( मजुभाषिणी) नृपाणां हितं क्षौरभे श्मश्रुकर्म दिने पंचमे पञ्चमेस्योदये वा । पडनिस्निमैत्रोष्टकः पञ्चपित्र्योन्दतोऽन्ध्यर्यमाक्षौरकन्मृत्युमेति ॥ ३६॥ इमश्रुकर्म--शृंगारार्य क्षौर राजा क्षौरोत नक्षत्रमें अथवा पांचवें २ दिन करे, वा क्षौरन- अबम जैस मेष रूममें १३ । २० अंश पर्यंत अश्विनीका उदय २६ । ४०.पर्यन्त भरणीका, ३० पर्यंत कृत्तिकाका उदय होता है, जो कार्य क्षौरादि अश्विनीमें उक्त हैं वे मेषलमके १३ । २० अंशके भीतर करलेना, ऐसे भी नक्षत्र जानना और छः आवृत्ति कृत्तिकामें, ३ अनुराधामे, ८ रोहिणीमें, ५ मघामें, ४ उत्तराफाल्गुनीमें, मतांतरसे ४ आवृत्ति सभी उत्त- राओं में, जो एक ही वर्षमैं क्षौर करे तो मृत्यु पावे ॥३६॥ ( भु० प्र०) अक्षरारम्भमुहूर्तः। गणेशविष्णुवायमाः पूज्य पञ्चमाब्दके तिथौ शिवाकदिग्विष्ट- शरत्रिके रवावदक् । लघुश्रवोऽनिलान्त्यभादितीशतक्षमित्रभे चरो- नसत्तनौ शिशोलिपिग्रहः सतां दिने ॥ ३७ ॥ बाल पांच में वर्षमें गणेश, विष्णु, सरस्वती, लक्ष्मीका पूजन करके ११ । १२॥ १०॥ २१६।५। ३ तिथियों में, सूर्यके उत्तरायणमें, लघु नक्षत्र श्रवण स्वाती रेवती पुनर्वष्ट बर्दा चित्रा अनुराधा नक्षत्रोंमें, चंद्र बुध गुरु शुक्रवारमें, चर । १।४ । ७ । १० रहित शुभ सममें अक्षरारंभ करना ॥ ३७ ॥ (पञ्चचामर ) मृगात्कराच्छ्तेखयेऽश्चिमूलपूर्विकात्रये गुरुद्वयेऽर्कजीववित्सितेऽह्नि षटशरत्रिके । शिवार्कदिग्द्विके तिथौ ध्रुवान्त्यमित्रभे परैः शुभैरधी- तिरुत्तमा त्रिकोणकेन्द्रगैः स्मृता ॥ ३८॥ मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शततारा, अश्विनी,मूल, बीनों पूर्वा, पुष्य,आश्लेषा नक्षत्र, रवि गुरु बुध शुक्र वार एवं । ६ । ५ । ३ । ११ । १२ । १०।२ तिथियोंमें तथा शुभग्रह केंद्र (१ । ४ । ७।१०) त्रिको- ( ९ । ५ ) में ।

हों ऐसे मुहूर्तमें विद्या पढ़नेका आरम्भ करना, कोई ध्रुव, रेवती, अनुराधामें भी कहते हैं !
तथा अनध्याय भी विद्यारम्भमें न लेने ॥ ३८ ॥ ( पञ्चचामर )
ब्रतबन्धकालः ।
विप्राणां व्रतबन्धन निगदितं गर्भाजनेष्टिमे
वर्षे वाप्यथ पञ्चमे क्षितिभुजां षष्ठे तथकादशे ।
वैश्यानां पुनरष्टमेऽप्यथ पुनः स्याहादशे वत्सरे
कालेऽथ द्विगुणे गते निगदिते गौणं तदाहुर्बुधाः ॥ ३९ ॥
व्रतबन्धनके लिये मुख्य काल नित्य एवं ( काम्य ) ब्रह्मवर्चसादिके लिये दो प्रकारके है।
गर्भसे अथवा जन्मसे सौरवर्षप्रमाणसे ब्राह्मणका ८ वर्षमें, क्षत्रियका ११ । वैश्यका १२ में
मुख्य काल नित्यसंज्ञक है तथा ब्राह्मणका ५ वर्षमें, क्षत्रियका ६ में, वैश्यका ८ में काम्य
शक मुख्य दल है,तथा गर्भ वा जन्मसे नित्यसंज्ञक मुख्य काल द्विगुण पयत गौण काल होता
है, जैसे ब्राह्मणके १६, क्षत्रियके २२, वैश्यके २४ वर्षपर्यन्त गौणकाल है, इनसे ऊपर अकि
काल है ॥ ३९ ॥ ( शार्दू)
व्रतबन्धमुहूर्तः ।
क्षिपर्धवाहिचरमूलमृदुत्रिपूर्वारौद्रेऽविद्गुरुसितेन्दुदिने बतं सत् ।
वित्रीपुरुद्ररविदिक्प्रमिते तिथौ च कृष्णादिमत्रिलवकेऽपि न चापराह्ने४०॥
क्षिप, ध्रुव. चर, मृदु, आश्लेषा, मूल, तीनों पूर्वा, आर्द्रा नक्षत्रोंमें तथा सूर्य बुध गुरु
शुक्र चंद्र वारोंमें, २।३।५। ११ । १२ । १० तिथियोंमें तथा कृष्णपक्षके पूर्व त्रिमा
गमें व्रतबंध शुभ होता है, परंतु अपराहमें नहीं, महीनोंमें उत्तरायणके छः महीने उक्त हैं.
इसमें भी चैत्रका तो बडा ही माहात्म्य है ॥ ४० ॥ ( वसं० )
कवीज्यचन्द्रलनपा रिपो मृतौ वतेऽधमाः।
व्ययेऽब्जभार्गवौ तथा तनौ मृतो सुते खलाः ॥४१॥
व्रतबंधकी लमशुद्धि-शुक्र, बृहस्पति, चंद्रमा और लग्नेश छठे आठवें स्थानोंमें अधम
होते हैं, चंद्रमा, शुक्र बारहवें स्थानमें ऐसे ही फल देते हैं तथा लग्न पंचम अष्टम भावमें
पापग्रह भी अधम हैं ॥ ४१॥ (प्रमाणिका)
व्रतबन्धेऽष्टपडि फवार्जिताः शोभनाः शुभाः।
त्रिषडाये खलाः पूर्णो गोकर्कस्थो विधुस्तनौ ॥ ४२ ॥

१ ब्रतबंधमें शुभग्रह-८ ! ६ । १२ स्थानों में अशुभ, अन्यों में शुभ तथा ३ । ६।११ स्थानों में पायग्रह शुभ और वृष २ कर्क ४ राशियोंका चंद्रमा यदि पूर्ण हो तो लभमें शुभ होता हे ॥ ४२ ॥ ( अनु०) वर्णाधीशाः शाखेशाश्च । विषाधीशौ भार्गवेज्यो कुजार्को राजन्यानामोषधीशो विशाञ्च । शूद्राणां ज्ञश्चान्त्यजानां शनिः स्याच्छाखेशाः स्युर्जीवरक्रारसौम्याः॥४३॥ ब्राह्मणोंके स्वामी शुक्र, बृहस्पति, क्षत्रियोंके मंगल सूर्य, वैश्योंका चंद्रमा, शूद्रोंका बुध, चांडालों का शनि स्वामी है. तथा ऋग्वेदका वृहस्पति, यजुर्वेदका शुक्र, सामवेदका मंगल, अथक्क बुध शाखेश हैं ॥ ४३ ॥ ( शालिनी० ) शाखेशवारतनुवीर्यमतीव शस्तं शाखेशसूर्यशशिजीवबले व्रतं सत् । जीवे भृगौ रिपुगृहे विजिते च नीचे स्याद्वेदशास्त्रविधिना रहितो व्रतेन॥४४॥ प्रतबंधमें शाखेश ( वेदेश ) का वार तथा लम और (गोचरोक्त ) बल भी अतिउत्तम होता है, तथा शाखेश, सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति का बल व्रतबंधमें मुख्य है, इनके शुभ होनेमें शुभ, अशुभमें अशुभ होता है । यदि बृहस्पति शुक्र शत्रुराशि नीच राशिमें हो तथा (विजित) प्रहयुद्धमें पराजित हों तो व्रतबंधवाला वेद, शास्त्र और नित्य नैमित्तिक श्रौत स्मार्त काँसे रहित होवे, उपलक्षणसे इनके नीचांशकादिकोंका भी यही फल है ॥ ४४ ॥ (वसं० ) जन्मक्षमासलग्नादौ व्रते विद्याधिको व्रती । आद्यगर्भेऽपि विप्राणां क्षत्रादीनामनादिमे ॥ ४५ ॥ ब्रतबंध में जन्मनक्षत्र जन्ममास जन्मलग्नादिकोंका दोष ब्राह्मणके आद्यगर्भ तथा द्वितीयादि बर्मको और क्षत्रिय वैश्यके द्वितीयादि गर्भको नहीं है, केवल क्षत्रियादिकोंको आद्यगर्भमात्रको दोष है, द्वितीयादिकोंको किसीको भी दोष नहीं ॥ ४५ ॥ ( अनु० ) गुरुबलविचारः। बटुकन्याजन्मराशेखिकोणायद्विसप्तगः। श्रेष्ठो गुरुः खषट्च्याये पूजयान्यत्र निन्दितः ॥ ४६॥ बालकके प्रतबंधमें, कन्याके विवाहमें जन्मराशिसे ५ । ९ । ११ । २। ७ स्थानमें गोचरसे बृहस्पति श्रेष्ठ होता है, १०। ६ । ३ । १ में ( पूजा ) शांति करके लेना, अन्य ।८।१२ में निदित है ॥ ४६ ॥ ( अनु० ) स्वोचे स्वभे स्वमैत्रे द स्वाशे वर्गोत्तमे गुरुः । रिफाष्टतुयेगोऽपीष्टो नीचारिस्थः शुभोऽप्यसत् ।। ४७ ॥ बृहस्पति अपने उन्च ४ स्वभवन ९ । १२ स्वमैत्र ११८ स्वांश ९।१२ के और वगोत्तमांशमें अथा- उच्चादि अंशकोंम हो तो गोचरसे ४ । ८ १२ में भी हो तो भी दोष नहीं और नो १० और शत्रुराशि नवांशकोंमें गोचरका शुभ भी अशुभ होता है ॥४७॥ व्रतबन्धे वाणि। कृष्णानोऽनध्याये शनौ निश्यपराहके। प्राक्सन्ध्यागजिते नेष्टी ब्रतबन्धो गलग्रहे ॥४८॥ कृष्णपक्ष ( प्रथम भाग) प्रतिपदा से पंचमीपर्यन्त छोडके व्रतबंधमें आरोग्य हैं, द्वितीयास समस्त शुक्लपः तथा कृष्णपंचमीपर्यन्त उक्त है, और जिस दिन प्रदोष हो, अनध्याय शनिवार रात्रिमें ( अपराह्न ) दिनके पिछले त्रिभागमें ( प्राक्सन्ध्या , पूर्वोक्त लक्षणसे पहिली सन्ध्याके घार्जनमें तथा ( गलग्रह ) ४ । ७ । ८ १९ । १३ । १४ । १५१ तिथियोंमें व्रतवन्ध न करना ॥ ४८ ।। (जनु० : तत्र व्यायशफलन् । क्रूरो जडो भवेत्पापः पटुः षट्कर्मकवटुः ॥ यज्ञार्थभास्तथा मूर्यो रव्याशे तनौ क्रमात् ॥ ४ ॥ व्रतबन्धके लग्नमें सूर्य का नवांका हो तो बटु क्रूावुद्धि एवं चन्द्रमाके मूर्ख, मंगलके पापी. बुधके चतुर, बृहस्पतिके ( षटकर्मा ) यजन ५ याजन २ दान ३ प्रतिप्रह ४ अध्ययन ५ अध्यापन ६ करनेवाला, शुक्र अंशमें यज्ञ करनेवाला, धनवान्, शनिक अंशमें मूर्ख होवे ॥ ४९ ॥ ( अनु०) विद्यानिरतः शुभराशिलवे पापांशगते हि दरिद्रतरः । चन्द्रे स्वलवे बहुदुःखयुतः कर्णादितिभे धनवान्स्वलवे ॥ ५० ॥ व्रतबन्धमें चन्द्रमा शुभराशियोंके अंशकमें हो तो व्रतबन्धवाला विद्या में तत्पर रहे, पापग्रह राशियोंके अंशकमें हो तो अतिदरिद्र होवे, यदि कर्काशकमें हो तो बहुत दुःखोंसे युक्त होवै, परन्तु श्रवण एवं पुनर्वसु नक्षत्रमें स्वांशक धनान् करता है ॥ ५० ॥ ( मोटनक) राजसेवी वैश्यवृत्तिः शस्त्रवृत्तिश्च पाठकः । प्राज्ञोऽथवान्म्लेच्छ सेबी केन्द्रे सूर्यादिखेचरैः॥ ५१ ॥ केन्द्रमें सूर्य हो तो राजाकी सेवा करनेवाला, चन्द्रमा हो तो ( वैश्यवृत्ति ) दुकानदार, एवं मंगल० शस्त्रवृत्ति, बुध० पढाने वाला, बृह० (प्राज्ञ ) ज्ञानी, शुक्र० धनवान्, शनि० लेच्छोंकी सेवा करनेवाला होवे ॥ ५१ ॥ ( अनु०) शुक्रे जीवे तथा चन्द्रे सूर्यभौमार्किसंयुते । निर्गुणः क्रूर चेटः स्यान्निघृणः सद्युते पटुः ॥ ५२ ॥ शुक्र अथवा बृहसति वा चन्द्रमा सूर्य युक्त हो तो व्रती गुणरहित होवे,मङ्गल युक्त हो तो कुरचेष्टा और शनियुक्त हो तो हिंसक , शुभयुक्तसे चतुर होवे ॥ ५२ ।। ( अनु० ) विधौ सितांशगे सिते त्रिकोणगे गुरौ तनौ । समस्तवेदविद्वती यमांशगेऽतिनिघृणः ॥ ५३ ॥ यदि चन्द्रमा शुक्रके २७ अंशक, त्रिकोण (९ । ५) भावमें हो तथा बृहस्पति रूममें हो तो व्रती समस्त वेदका जाननेवाला होवे, यदि लमके बृहस्पति लग्नमें हो तो अती समस्त वेदका जाननेवाला होवे, यदि लग्नके बृहस्पतिमें चन्द्रमा शनिके अंशमें हो तो अतीव निर्लज्ज होवे ॥ ५३ ॥ ( प्रमाणिका) अनध्यायाः । शुचिशुक्रपौषतपसां दिगविरुद्रार्कसंख्यसिततिथयः । भूतादित्रितयाष्टमी संक्रमणं च व्रतेष्वनध्यायाः ॥ ५४ ॥ अनध्याय-नित्य नैमित्तक दो प्रकारके हैं, आषाढ शुक्ल दशमी ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया पौषशुक्ल एकादशी मन्वादि, माघशुक्ल द्वादशी इतने सोपपद होनेसे अनध्याय हैं, तथा चतुर्दशी पूर्णमासी प्रतिपदा. कृष्णपक्षमें अमा अष्टमी एवं सूर्यका निरयन संक्रांतिदिन और मन्वादि युगादि इतने व्रतबन्धमें अनध्यायत्वसे वर्जित हैं और अनध्याय पूर्व कहे हैं ।। ५४ ॥ (जघनचपला) अर्कतर्कत्रितिथिष प्रदोषः स्याचदग्रिमः । राज्यर्धसाईप्रहरयाममध्यस्थितैः क्रमात् ॥ ५५ ॥ द्वादशीके दिन अर्द्धर त्रिसे पूर्व; त्रयोदशी. षष्ठीके दिन डेढप्रहरसे पूर्व, सप्तमी तथा तृतीयाके दिन एक प्रहरसे पूर्व चतुर्थी प्रवृत्त हो तो उस दिन प्रदोष जानना सो व्रतबन्धमें नेष्ट है ॥ ५५ ॥ ( अनु० )

वढचां ब्रह्मौदनप्रकारः।
प्राग्ब्रह्मौदनपाकादुव्रतबन्धानन्तरं यदि चेत् ।
उत्पातानध्ययनोत्पत्तावपि शान्तिपूर्वकं तत्स्यात् ॥ ५६ ॥
प्रतबन्धके दिन बवृचोंका ब्रह्मौदनसंस्कार होता है, व्रतबन्धसे ऊपर ब्रह्मौदनसे पूर्व यदि
मेवगर्जन, भूकंप, उल्का, दिग्दाहादि उत्पात, अनध्याय हो तो शास्त्रोक्त शांति करनी,
बवृचोंसे अन्योंका उपनयनांग ब्राह्मणभोजन तथा वेदारंभांग ब्राह्मण-भोजनपर्यन्त मानते हैं,
(शांति )स्वस्तिवाचन पायसहोम गायत्री तथा बृहस्पतिसूक्त जप, गोदान, ब्राह्मणभोजन
है॥ ५६ ॥ ( आर्या)
वेदक्रमाच्छशिशिवाहिकरत्रिमूलपूर्वासु पोष्णकरमैत्रमृगादिवीज्ये।
धौवेषु चाश्चिवसुपुष्यकरोत्तरेशकणे मृगान्त्यलधुमैत्रधनादितौ सत् ॥ ५७ ॥
वेदक्रमसे व्रतबन्ध नक्षत्र- मृगशिर आर्द्रा आश्लेषा एस्त चित्रा स्वाती मूल तीनों
पूर्वा ऋग्वेदियोंको; रेवती, हस्त, धनुराधा, मृगशिर, पुनर्व, पुष्य यजुबदियोंको; अश्विनी,
बनिष्ठा, पुष्य, हस्त, उत्तरा, आर्द्रा, श्रवण सामवेदियोंको; मृगशिर, पुष्य अश्विनी, हस्त,
अनुराधा, पुनर्वसु अथर्ववेदियोंको उपनयनमें विहित हैं। ५७ ।। ( ३० वि०)
वेदपरत्व नक्षत्रम् ।
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद. अथर्ववेद.
मृ. रे. पाश्वि. मृ.
या.
घ.
रे.
वाले.
अनू.
पुष्य
इ.
अश्वि.
मृ.
ह.
चि.
مع امه
उ. ३ पुष्य
मा. अनू.
स्वा.
श्र.
घ.
रो.
नान्दीश्राद्धोत्तरं मातुः पुष्पे लपान्तरे नहि ।
शान्त्या चौलं व्रतं पाणिग्रहः कार्योऽन्यथा न सत् ॥ ५८ ॥

१
-
नांदीश्राद्धसे ऊपर यदि कार्यकालकी माता रजवा हो जाय तो चूडा, व्रतबन्ध, विवाह
अन्य लग्नमें करना । यदि और लग्न न मिले तो शांति करके निश्चित लग्नमें करना; ( शांति)
सुवर्णप्रतिमामें लक्ष्मीका पूजन, श्रीसूक्तपाठ प्रत्यूचा पायसहोम और अभिषेक करना
॥५८ ।। ( अनु०)
छुरिकाबन्धनाहूर्तः।
विचैत्रबतमासादौ विभौमास्ते विभूमिजे ।
छुरिकाबन्धनं शस्तं नृपाणां प्राम्बिवाहतः ॥ ५९ ।।
क्षत्रियोंका व्रतवन्धसे ऊपर विवाह के भीतर छुविशाबन्धन करते हैं, यह चैत्र छोडकर
ब्रतबन्धोक्त मासादिमें होता है, परन्तु इतना विशेष है कि, माल अस्त न हो तथा मंगलवार
न हो, यह तलवार बांधनेका मुहूर्त है । ५९ ॥ ( अनु० )
केशान्तसमावर्तनहूर्तः ।
केशान्तं षोडशे वर्षे चौलोतदिवसे शुभम् ।
व्रतोक्तदिवसादौ हि समावर्तनमिष्यते ॥ ६० ॥
इतिश्री रामदैवज्ञविरचिते मुहूर्तचिन्तामणौ पञ्चमं संस्कारप्रकरणम् ॥५॥
ब्राह्यणका १६ क्षत्रिय वैश्यका २२ वर्षमें चूडाकर्मोक्त मुहूर्त में केशांत कर्म करना, १३
वर्षमें महानाम्नी व्रत, १४ में महाव्रत, १५ में उपनिाना, १६ में केशांत तथा गोदान
व्रतसंस्कार होते हैं, इन सभी चौलो क मुहूर्त हैं और वेद तथा विद्या पढक गोदानांत
संस्कार करके ब्रतबन्धादि उक्त मुहूर्तमें समावर्तन संस्कार करना ॥ ६० ॥
इति श्रीदेवज्ञानन्तसुतरामविरचिते मुहूर्त चन्तामणौ महीधरकृतायां माहीपर्यो
भाषाटीकायां पञ्चमं संस्कारप्रकरणम् ॥ ५ ॥

अथ विवाहप्रकरणम् ६। समावर्तनानन्तर स्वकुलोद्धारकपुत्र प्राप्त्यर्थ विवाह करना कहा है, यह ८ प्रकारका है, वरको आप बुलायके उसकी कुछ हानि न करके जो कन्या यथाशक्ति अलंकारयुक्त दी जाती है, यह ब्रामविवाह है, इसन्ना पुत्र पूर्वानर २१ पुरुषोंका उद्धार करता है. (१), जो यज्ञ करके दक्षिणामें दी जाती है यह देव है, इसकी सन्तान पूर्वक १४ पश्चात्के ६ पुरुषोंको पवित्र करती है (२), धर्मसहायार्थ जो वरके ( याच्या करने ) मांगनेसे दी जाती है वह प्राजापत्य है. इसका पुत्र पूर्वावर ६ । ७ पुरुषोंको पवित्र करना है ( ३ ), जो १ गौ ? वृषम अथवा गौ यज्ञके लिये अथवा कन्याही के लिये वरसे लेकर कन्या दी जाती है. परंतु (शुल्क ) जूल्यबुद्धिसे न हो तो वह आष-ज्ञक है, यह भी दैवके तुल्य है ( ४ ), कन्याके पित्रादिकोंको धन देके अथवा कन्याको धनादिसे सन्तुष्ट करके जो विवाह है बह आसुर (५), प्रथम ही कन्यावरके प्रेम आलिंगनादि हुएमें उनके इच्छानुकूल विवाह होनेमें गांधर्व है (६), संग्राममें जोतके वा बलातकार से कन्या हरण करना राक्षस विवाह है (७), नथवा नशा आदिसे वेहोशीमें जो बलात्कारसे कन्याका धर्षण करता है वह अधन, पैशाच विवाह है ( ८ ), इनमें प्राजापत्य, ब्राह्म. देव, आर्य विवाह उक्त समयपर शुभ फल देते हैं, इनसे जो सन्तान हो वह देव पित्र्य कर्ममें पवित्र तथा धर्मात्मा ज्ञानी आस्तिक आदि गुणवान् होती है, आषविवाह भी विकल्पसे ऐसा ही है, आसुर, गांधर्व, राक्षस, पैशाच कनिष्ठ हैं, इनके सन्तान अधर्मी, पाखंडी, दूषक, नास्तिक अदि होते हैं ( संग्राममें कन्याहरण ) राक्षस तथा गान्धर्वका अंग स्वयंवर, ये राजाओंके धर्म हैं, अन्यके नहीं, द्रव्य देके जो विवाह ( आसुर ) होता है वह अतीव निंद्य है, इसको देवपितृकर्मोपयोगी धर्मपत्नी धर्मशास्त्र नहीं कहता, दासीकी गणनामें है, इसकी सन्तान भी शुद्ध नहीं होती, इसके आदि ४ विवाहोंमें कालनियम भो नहीं, जब चाहे तब विवाह करै " विवाहः सार्वकालिकः ” यह गृह्यकारवचन भी गांधर्गदि विवाहोंके लिये है ॥ अथ विवाहप्रयोजनम् । भार्या त्रिवर्गकरणं शुभसीलयुक्ता भी शुभं भवति लग्नवशेन तस्याः । तस्मादिवाहप्तमयः परिचिन्त्यते हि तन्निध्नतामुपगताःसुतशीलधर्माः॥१॥ ( शुभशीलयुक्त ) भादिकोको अनुकूर को भार्या है वह धर्मार्थकाम त्रिवर्गके साधन योग्य है, उसका शील लमके आधीन है, वह लम विवाहसमयके अधीन है. स्त्रियोंका विवाह और पुरुषोंका उपनयन दूसरा जन्म है तस्माद इन समयोंमें जैसा लग्न हो उसके सदृश संतान, स्वभाव और धर्म होते हैं । देव पित्र ऋषि ३ ऋण गृहस्थपर रहते हैं इनका १ उद्धार करनेवाली शुभसंतान होती है, यह संतान शुभलक्षण स्त्रीके अधीन हैं, उसके शुभगु- गवती होनेके हेतु विवाह मुहूर्त कहते हैं ॥ १॥ (व. ति.) प्रश्नलग्नाद्विवाहयोगज्ञानम् । आदौ संपूज्य रत्नादिभिरथ गणकं वेदय स्वस्थचित्तं कन्योहाहं दिगीशानलहयबिशिखे प्रश्नलग्नाबदीन्दुः । दृष्टो जीवेन सद्यः परिणयनकरो गोतुलाकर्कटाख्यं वा स्यात्प्रश्नस्य लग्नं शुभखचरयुवालोकितं तद्विदध्यात् ॥२॥ यहां अथ शब्द ग्रंथमध्य होनेसे मंगलार्थ है, प्रथम प्रश्न पूछनेके लिये स्वस्थचित्त ज्योतिषीको सुवर्ण वस्त्र फलादिकोंसे सुपूजित करके कन्याके विवाहके लिये पूछे । प्रश्नयोग कहते हैं कि, प्रश्नलग्नसे यदि १० । ११ । ३ । ७ । ५ स्थानमें चन्द्रमा गुरुदृष्ट हो तो शीघ्र विवाह होगा, तथा वृष, तुला, कर्क लग्न प्रश्नमें हो से शुभग्रह देखें वा शुभयुक्त हो तो विवाह शीघ्र होवे ॥ २ ॥ (स्रग्धरा ) विषममांशगतौ शशिभागवौ तनुग्रहं बलिनौ यदि पश्यतः । रचयतो वरलाभमिमौ यदा युगलभांशगतौ युवतिप्रदौ ॥३॥ प्रश्नमें चन्द्रमा शुक्र यदि विषमराशि विषमनवांशकमें हों बली हों तथा लमको देखें तो कन्याको वर मिले तथा वहीं चन्द्रमा शुक्र युग्मराशिके नवांशकमें हों तो वरको कन्या मिले, ये दोनों विवाहयोग एक ही प्रयोजनके हैं ॥ ३ ॥ ( द्रुतवि.) प्रश्नलग्नाद्वैधव्यादियोगज्ञानम् । षष्ठाष्टस्थः प्रश्नलग्नाबदीन्दुर्लग्ने क्रूरः सप्तमे वा कुजः स्यात् । मू विंदुः सप्तमे तस्य भौमो रण्डा सा स्यादष्टसंवत्सरेण ॥ ४ ॥ यदि प्रश्नलमसे चन्द्रमा छठा अठवां हो तो वह कन्या आठ वर्ष में विधवा हो ( आप भी मरे ) १, तथा लममें पापग्रह, सप्तममें मंगल हो तो वही फल २, और लममें चन्द्रमा सप्तममें मंगल हो तो भी वही फल है ३, ये वैधव्ययोग है ॥ ४ ॥ (उ.) प्रश्नतनोर्यदि पापनभोगः पञ्चमगो रिपुदृष्टशरीरः । नीचगतश्च तदा खलु कन्या स्यात्कुलटा त्वथवा मृतवत्सा ॥ ५॥ प्रश्नलग्नमें पंचम पापग्रह शत्रुग्रहसे दृष्ट, तथा नीचराशिगत हो तो व्यभिचारिणी (वेश्या ) अथवा ( मृतवत्सा ) मरे पुत्रवाली होवे ॥ ५ ॥ ( दोधक ) प्रकरणम् ६.J भाषाटांकासमेतः। (७७) यदि भवति सितातिरिक्तपक्षे तनुगृहतः समराशिगः शशाङ्क: अशुभखचरवीक्षितोऽरिरन्ध्र भवति विवाहविनाशकारकोऽयम् ॥ ६ ॥ यदि कृष्णपक्षका चन्द्रमा प्रश्नलग्नसे २ । ४ आदि राशियोंका ६ । ८ भावमें पापहष्ट हो तो (विवाहका विनाश हो ) वह विवाह न होने पावे ॥ ६ ॥ (पुष्पि०) बालवैधव्ययोगपरिहारः । जन्मोत्थं च विलोक्य बालविधवायोगं विधाय वतं सावित्र्या.उत पैप्पलं हि सुतया दद्यादिमां वा रहः । सल्लनेऽच्युतमूर्तिपिप्पलवटैः कृत्वा विवाह स्फुट दद्यात्तां चिरजीविनेऽत्र न भवेदोषः पुनर्भूभवः ॥ ७ ॥ यदि जन्मके बालवैधव्यकारक जातकोक्तादि योग कन्याके देखे जावें तो उसके पित्रादि (रहः) एकांतमें निश्चयतासे सावित्रीब्रत करावे तथा पिप्पलसंन्बधी व्रत करावे अथवा शुभ- म विवाहोक्त सद्गुणसौभाग्यकारक योगोंमें विष्णुप्रतिमा अश्वत्थ और घटके साथ विवाह- विधिसे विवाह करके यह कन्या चिरजीवीवर ( जिसके दीर्घायु योग हो) को देना, यह उपाय करनेमें वैधव्यदोष नहीं होता और ( पून ) दो वरोंके साथ विवाहका दोष भी नहीं होता ॥ ७ ॥ ( शार्दू०) पुत्रकन्या प्रश्न विचारः। प्रथलपक्षणे यादृशापत्ययुक्स्वेच्छया कामिनी तत्र चेदावजेत् । कन्यका वा सुतो वा तदा पण्डितैस्तादृशापत्यमस्या विनिर्दिश्यते ॥ ८ ।। प्रश्नसमयमें ज्योतिषीके समीप जैसी स्त्री आवे वैसा उत्तर प्रश्नका कहना, जैसे कोई स्त्री पुत्र लेके आवे तो विवाहवाली कन्याके पुत्र होंगे, कन्या लेके आवे तो कन्या होगी, दोन हों तो कन्या पुत्र सभी होंगे, उपलक्षणसे उस स्त्रीके जैसे लक्षण सुभगा दुर्भगा पुत्रवती बांझ भादि हों वैसे ही कन्याके कहना ८ ॥( स्रग्वि०) शसभेरी विपञ्चीरवैर्मजन्लं जायते वैपरीत्यं तदा लक्षयेत् । वायसो वा खरः श्वा शृगालोऽपि वा प्रश्नलनक्षणे रौति नादं यदि ॥९। प्रश्नसमयमें शकुन-- शंखभेरी तुरी वीणा आदि शुभ वाद्य सुननेमें देखनेमें आवे तो मङ्ग होगा। ऐसे ही हाथी घोड़े छत्र आदि तथा जिन वस्तुओंके देखनेसे चित्त प्रसन्न हो ऐ मंगलकारी होते हैं. ( वायस ) कौवा, गदहा, कुत्ता, स्यार यदि उस समय शब्द करें । अमंगल जानना, उल्लू भैंसे भी ऐसे ही हैं ॥ ९ ॥ त्रग्वि०)

बवाह-
wom
(७८)
मुहूताँचन्तामाण:-
कन्यावरणमुहूर्तः ।
विक्षस्वातीवैष्णवांचयनत्रैर्षयाग्नेयैर्वा करपीडोचितः ।
बबालङ्कारादिममेतैःफलपुष्पस तोम्याद लादनु कल्यावरणं हि॥३०॥
कन्यावरणहर्त्त--उतराषाढा, स्वाती, श्रवण, तीनों पूर्वा, अनुराधा, धनिष्ठा, वृत्तिकामें
तथा विवाहोत नक्षत्राडिकों वस्त्र, भूषण आदि वस्तुसहित फलपुष्पोंसे विधिपूर्वक दयावरण
(लगाई ) करना ॥ १० ।। (मत्तम०)
बरवरणमुहूर्तः ।
धरणिदेवोऽथवा कन्यासोदरः शुभदिने गीतवायादिभिः संयुतः ।
वरवृत्ति पञ्चयज्ञोपवीतादिना झुनगुतैः हिपूत्रिपैराचरेत् ।। १२ ।
(ब्राह्मण ) पुरोहित अथवा अन्याका सहोदरभाई शुभवारा दि दिन में तथा ध्रुवनक्षत्रों सहित
कृत्तिका, तीनों पूर्वाओं में गीत वाद्यादि मंगल पूर्वक वस्त्र भूषण यज्ञोपवीतादिकोंस वरका
चरण ( वाग्दान करें ॥ ११ ॥ ( मत्त० )
वधूवरयोः ग्रहशुद्धिः।
गुरुशदिवशेन कन्यकानां समवर्षेषु पडन्दकोएरिष्टात् ।
रविशुद्धिबशाच्छुभो वराणामुभयौश्चन्द्रविशुदितो विवाहः ॥ १२ ॥
कन्याकी गुरुशुद्धि ( पूर्वोक्त ) वरकी सूर्यशुद्ध तथा दोनोंकी चन्द्रशुद्धिमें कन्याकी अवस्था
को वर्ष ऊपर सनवर्ष, अरके विषम वाले वह शुभ होता है, यहां आचार्यांतर मत है
कि, जनसे विवादले तीन महीने अगर ९ नहीन तथा सनके तीन महीने पर्यंत विवाह शुभ
होता है ।। १२ ।। (२० मा०)
विवाहयोग्यनासाः ।
मिथुनकुम्भवृपालिनगाजी निभुन गेडीखौ विलये शुचे।
अलिमृगाजगते करपीडन् भवति कार्तिकोषलाप्यपि ॥ १३ ॥
निथुल, कुंभ, वृष, वृश्चिक, नकर, मेष राशियों के सूर्य में विवाह शुभ होता है, इनमें
आषाढले (त्रिलब ) शुक्लप्रतिपदासे दशनीपर्यंत मात्र शुभ है (हारेशयनी) एकादशीसे
योग्य नहीं तथा वृश्चिकके सूर्य, कार्तिक, महरके सूर्य, पौष, लेपके सूर्यमें चैत्र भी विवाहमें
लेते हैं ॥ १६ ॥ (द्रुतवि०)
जन्ममासादिनिषेधः।
आद्यगर्भपुतकन्ययोईयोर्जन्ममासभतिक्षा करमहः ।
नोचितोऽथ गिधैः प्रशस्यते चेहिती मजनु सुतपदः ॥ १४ ॥

प्रकरणम् ६.] भााकारतः। (७९) .. जन्मास ( जन्मतिथि से ३४ दिन ) जम्नक्षत्र जन्मतिथिमें आद्यगर्भक पुत्र कन्याका विवाह उचित नहीं है द्वितीयादि गर्भवालों पुत्र देनेवाले जन्ममासादि विवाहमें होते हैं १। १४ । ( रथोद्धता) ज्येष्ठमासविचारः । ज्येष्ठइन्दं मध्यमं संप्रदिष्टं त्रिज्येष्टं चेन्नैव युक्तं कदापि । केचित्सूर्य वह्निगं प्रोहा चहुबान्योन्यं ज्येष्ठयोः स्याद्विवाहः ॥ १५॥ ज्येष्ठपुत्र ज्येष्ट मास अथवा ज्येष्ठ कन्या ज्येष्ठ माम यह ज्येष्ठ द्वंद्व मध्यम होता है, ज्येष्ठ पुत्र ज्येष्ठ कन्या और ज्येष्ठ माझ विवाहमें यह ऋज्येष्ठ कदापि योग्य नहीं है. कोई कृत्तिकाके स्य यन्त त्रिज्येष्ठ वाला होष नहीं ऐ कहते हैं, और आद्यगर्भके कन्या पुत्रका परस्पर विवाह नहीं होता।। १२ ।। ( शालिनी मण्डनमुण्डन विचार सुतपरिणयात्पण्मासान्तः सुताकरपीडनं न च तिजकुले तहवा मण्डनादपि मुण्डलम् न च सहजयोध्ये भात्रोः सहोदरकन्यके न सहज तोदाहोदाई शुभे न पितृकिया ॥ १६ ॥ पुनविवाहसे छः महीने पर्यंत कन्याका विवाह न करना. तथा (मण्डन )विवाहसे (मुण्डन) चौल उपनयन और महानाम्न्यादि ४ व्रत छः महीनेपर्यन्त न करनें, यदि बीचमें संवत्सर बदल करके, जैसे- नुनमें मङ्गल अशा पुत्रोद्वाह हुआ तो वैशाखमें मुण्डन अथवा कन्योद्धाह हो सकता है, यह निधन (निजकुल) तीन पुरुष सापिंडचर्यन्तका है, तथा मङ्गलसे ६ महीने पबन्त (पितृक्रिया श्राद्धादि न करनी और सहोदर अइयोंको सहोदरकन्या न देनी, तथा सहोदरों विवाह भी ६ नहीने के भीतर एकसे दूसरा न करना, सन्याके विवाहसे ४ दिन पीछे पुत्रशा विवाह हो साता है कन्टु एकेडर प्रसृत कन्या पुत्र वा पुत्र पुत्र वा कन्या कन्याका छः महीने पर्यन्त ही जा १६ । ( ब० ति०) विवाहानन्तरं त्रिभुत चूडाविनिषेधः । वध्वा बरस्यापि कुले निपूरुषे नाश बजेपश्चन जियोनरन् । मासोत्तरं तत्र विवाह इप्यते शान्त्याचवा मृतकनिर्गमे परैः ॥ १७ ॥ यदि विवाहमुहूर्त बिक (विटा) हुए बर वा कन्या (भिपुरुष : सापिंडश तीन पुरुषके भीतर कोई भर जाने से एक नहोंने ऊपर शांति कर के विकास १ कोई आचार्य कहते हैं कि, सूतकोत्तर शांति करके कर लेना, परन्तु यह विषय तीन पुरुषवालोंका, माता पिताका नहीं जैसे-पिताका अशौच १ बर्ष, माताका ६ महीने स्वीका ३ महीने, भातृपुत्रादिकोंका १ महीना होता हैं, यही हेतु है, इसमें और विशेषता है दुर्भिक्षों, राज्यभ्रंशमें, पिताके प्राणसंकटमें तथा (प्रौढ )अतिकालकी कन्याके विवाहमें किसी प्रकारको प्रतिकूलता नहीं है ॥ १७ ॥ ( इन्द्र०) चूडा बवं चापि विवाहतो बवाच्चडा च नेष्टा पुरुषत्रयान्तरे। वधूप्रवेशाच्च सुताविनिर्गमः षण्मासतो नाब्दविभेदतः शुभः ॥ १८॥ तीन पुरुषके भीतरवालों के विवाहसे ऊपर छः महीनेपर्यन्त वा संवत्सर बदलने पर्यन्त चूडाकर्म प्रतबन्ध तथा अपिशब्दसे महानाम्न्यादि ४ ब्रत भी न करने, तथा वधूके प्रवेशसे उतने ही समयपर्यन्त कन्याका (निर्गम ) धरसे बाहर देना न करना(त्रिपुरुषी ) मूलपुरुषसे तीन पुरुष, पर्यन्त होता है, चौथे पुस्तको दोष नहीं ॥ १८॥ (उ• जा० ) मूलाश्लेषा विचारः । श्वश्रुविनाशमहिजो सुतरां विधत्तः कन्यासुतौ नितिजो श्वशुरं हतश्च । ज्येष्ठाभजाततनया स्वधवायजं च शक्रामिजा भवति देवरनाशक: ॥१९॥ आश्लेषाके उत्पन्न कन्या पुत्र साक्षात् सासका नाश करते हैं, नतु सौतिया सासको, तथा मूलके जन्मवाले श्वशुरका नाश करते हैं, तथा ज्येष्ठामें जन्मवाली कन्या अपने पतिके सहोदर के भाई ( ज्येष्ठ ) को, ऐसे ही विशाखाके जन्मवाली देवर भाके सहोदर छोटे भाईका नाश करती हैं अन्यांतरवाक्य ऐसे भी हैं कि, ज्येष्ठावाला पुरुष कन्याके ज्येष्ठ भाईका और विशाखावाला छोटे भाई ( शाले) का नाश करता है" पत्न्यग्रजामग्रजं वा हन्ति ज्येष्ठसंजः घुमान् । तथा भार्यास्वसारं वा शालकं वा द्विदैवजः । ॥ इति । यहां ज्येष्ठ कनिष्ठ भाइयोंके स्थानमें बहिन भी कही है,उक्तसे प्रथम वा पीछेके गर्भवाला कन्या वा पुत्र जो हो;यह भावार्थ है ॥ १९॥ (व० ति०) दीशायपादत्रयजा कन्या देवरसौख्यदा । मूलान्त्यपादसायपादजातो तयोः शुभौ ॥ २० ॥ पूर्वोक्त दोषों में विशेष विचार है कि,विशाखाके प्रथम तीन चरणवाली कन्या देवरको दोष नहीं करती प्रत्युत सुख देनेवाली होती है, केवल चतुर्थचरण निषिद्ध है, ऐसे ही मूलका चातुर्थचरणोत्पन्न वर तथा कन्या श्वशुरको, आश्लेषा प्रथमचरणोत्पन्न साप्तको शुभ होता है ॥२०॥ (अनु०) अष्टकूटविचारः । वर्णो वश्यं तथा तार योनिश्च ग्रहमैत्रकम् । गणमैत्रं भकूटं च नाडी चैते गुणाधिकाः ॥२१॥ विवाहका मेलक विचार कहते हैं कि, वर्गमैत्री हो तो (१) गुण, वश्यमें (२), तारामें ( ३ ), योनिमें ( ४ ), ग्रहमंत्रीमें ( ५ ). गणनेत्री में ( ६ ), भकूट मैत्रीमें (७), नाडीमें गुण ( ८ ) इन सब कोदा ( ३६) तुण होते हैं, अधिकमें मेलक शुभ हीनमें क्रमशः अशुभ होता है, इन प्रत्येकका विचार आगे कहते है ॥ २१ ॥ ( अनु० ) द्विजा झपालिकर्कटास्ततो नृपा विशोऽधिजाः । वरस्य वणतोऽधिका वधून शस्यते बुधैः ॥ २२ ॥ वर्ण-मीन, वृश्चिक, कर्कट ब्राह्मण तथा १ । ५ । ९ । क्षत्रिय, २ । ६ । १० वैश्य, ३ । ७ । ११ शूद्रवर्ण हैं, बरसे हीनवर्ण कन्या शुभ, कन्याके वर्णसे हीनवर्ण वर अच्छा नहीं होता, दोनोंका एक वर्ण अतिउत्तम होता है, वर्णाधिक वर होने में (१)गुण मिलता है, कन्या अधिक नहीं ।। २२ ॥ प्रमाणिका हित्वा मृगेन्द्रं नराशिवश्याः सर्वे तथैषां जलजाश्च भक्ष्याः । सर्वेऽपि सिंहस्य बशे विनालिं ज्ञेयं नराणां व्यवहारतोऽन्यत् ॥२३ ॥ वश्यकूट-मनुष्यराशि ३ । ६ । ७ । योंके वशवती सिंह विना सभी राशि हैं, जलचर राशि भी मनुष्यों के भक्ष्य होनेसे उनके वश्य ही हैं तथा सिंहके वश वृश्चिक छोड़के सभी राशि हैं अन्य परत्सर वसावन मानुष व्यवहार से जानना; यहां भी बरकी शशिके वश्य कन्याकी राशि होनेमें ( २ गुण मिलने हैं, विपरीतनें नहीं ॥ २३ ॥ (३०व०) कन्यादरभं यावत्कन्याभं वरभादपि । गणयेलबहृच्छेषे त्रीप्वभिमसत्स्मृतम् ॥ २४ ॥ तारा-याके न असे दरके नक्षत्र, बरनक्षत्रले कन्याके नक्षत्रपर्यंत गिनके जितने हों ९ से. भाग ले शेषको तारा जानती, ३।६।७ शेष रहे तो अशुभ अन्य शुभ होते हैं, शुभसे. (३) गुण मिलते हैं ॥ २४ ॥ ( अनु० ) अधिन्यम्बपदोहयो निगदितः स्यान्यकयोः कासरः सिंहो वस्वजया- द्भयोः समुदितो याम्यान्वयोः कुक्षरः । मेपो देवोहितानलंभयोः ६ । कणाम्बुनोकनरः त्यावाभिजितोस्तथैव नकुलब्यान्द्राजयोन्यो- रहिः ॥ २५ ॥ ज्येष्ठामैत्रभयोः कुरङ्ग उदितो भूलायोः श्वा तथा माजीरोऽदितिसापयोरथ मघायोन्योस्तथवोन्दुरुः । व्याघो द्वीशभ- चित्रयोरपि च गौरर्यम्णबुध्न्यायोयोनिः पादगयोः परस्परमहावैरं भयोन्योस्त्यजेत् ॥ २६ ॥ योनिकूट-अश्विनी, शतताराकी अश्वयोनि । स्वाती, हस्त महिष । धनिष्ठा पूर्वाभाद्रपदा सिंह । भरणी, रेवती हाथी । पुष्य, कृत्तिका मेष ( मेढा ) । श्रवण, पूर्वाषाढा वानर । उत्तराषाढा, अभिजित् नेवला । रोहिणी, मृगशिर सर्प । ज्येष्ठा अनुराधा हरिण । मूल, आर्द्रा कुत्ता । पुनर्वसु, आश्लेषा बिल्ली । मघा, पूर्वाफा० चूहा । विशाखा, चित्रा व्याघ्र । उत्तराफा० उत्तराभा० गौयोनि है । एक योनिके वर कन्या उत्तम मित्र; समयोनिके सामान्य और परस्पर योनिबैरमें अशुभ होता है । इनका वैर- गौ व्याघ्रका । गज सिंह । घोड़ा भैंसा । कुत्ता मृग । नेवला सर्प । वानर मेंढा । बिल्ली चूहा इत्यादि लोकव्यवहार में जानना. योनिमत्री होनेमें (४) गुण मिलते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥ (शा० वि० ) मित्राणि द्युमणेः कुजेज्यशशिनः शुक्रार्कजो वैरिणौ सौम्पश्चास्य समो विधोबुंधरवी मित्रे न चास्य द्विषत् । शेषाश्चास्य समाः कुजस्य सुहृदश्चन्द्रेज्यसूर्या बुधः शत्रुः शुक्रशनी समौ च शशभू- सूनोः सिताहस्करौ ॥ २७ ॥ मित्रे चास्य रिपुः शशी गुरुशनि- क्ष्माजाः समा गीष्पतेर्मित्राण्यर्ककुजेन्दवो बुधसितौ शत्रू समःसूर्यजः। मित्र सौम्यशनी कवेः शशिरवी शत्रू कुजेज्यौ समौ मित्रे शुक्रबुधौ शनेः शशिरविक्ष्माजा द्विषोऽन्यः समः ॥२८॥ प्रहकूट-सूर्यके मं० बृ० चं० मित्र, शु० श० शुत्रु, बु० सम है । चन्द्रमाके बु० सू० मित्र, अन्य सम; शत्रु कोई नहीं । मंगलके चं० गु० सू० मित्र, बु० शत्रु, शु० श० सम । बुधके शु० सू० मित्र, चं० शत्रु । बृ० श० मं० सम । बृहस्पतिके सू० मं० चं० मित्र, बु० शु० शत्रु, श० सम । शुक्रके बु० श० मित्र, चं० सू० शत्रु, बृ० मं० सम । शनिके शु० बु. मित्र, चं० २० मं० शत्रु, बु० सम है । वरकन्याके राशीश मित्र तथा एकाधिपत्यके हों तो ५ पुण, एवं सममित्रमें ४; सम सममें ३, मित्र शत्रुमें २, सम शत्रुमें १, शत्रु, शत्रुमें ( 0 ) मिलता है शत्रु शत्रुका मेल कहीं नहीं होता, मृत्युषदकाष्टक होता ॥ २७ ॥ २८ ॥ (शा०वि०)

मित्राभिनन्दमकाम्।
र.
चं. मं.
म. बु.
मित्र.
र.चं.
चं.मं.
गु.
गु.चं.
र.बु.
मं.
मं.गु.
मं..
सम.
शु.शः
श. म.गु. गु.
अ.स.
चं.
शत्रु. शु.श.
बु.
चं.
र.चं.
सं.
रक्षोनरामरगणाः क्रमतो मघाहिबस्चिन्द्रमूलवरुणानल तक्षराधाः ।
पूर्वोत्तरात्रयविधातृयमेशभानि मैत्रादितीन्दुहरिपौष्णमहलनि ॥ २९ ॥
गण-मघा, आश्लेषा, धनिष्ठा, ज्येष्ठा, मूल,शत मित्रा, कृत्तिका, चित्रा, विशाखा राक्षसगण ।
तीनों पूर्वा, तीनों उत्तरा, रोहिणो. भरणी, आद्री मनुष्यगण । और अनुराधा, पुनर्वसु,
मृगशिर, श्रवग, रेवती, माती, अश्विनी, पुष्य, हात दे वगग है ॥ २९ ॥ { वसं० )
गणफलम्।
निजनिजगणमध्ये प्रीतिरत्युत्तमा स्यादमरमनुजयोः मा मध्यमा संपदिष्टा ।
असुरमनुजयोश्चन्मृत्युरेव प्रदिष्टो दनुजविबुधयोःस्यादैरमेकान्ततोऽत्र ॥३०॥
वरकन्याका एक ही गण हो तो अत्यन्त प्रीति होती हैं, देव मनुष्यका मध्यम प्रीति,
राक्षस मनुष्यका मृत्यु, देव राक्षसका हो तो कलह होता है। मनुष्य राक्षसमें विशेष यह है
कि, वर राक्षस, कन्या मनुष्यगण हो तो वैर होता है, यदि वर मनुष्य कन्या राक्षसगण हो
तो वरकी मृत्यु, यह बहुत प्रमाणोंसे पुष्ट है, इस कूट में गणसाम्यमें ६ गुण, देव मनुष्यमें ५,
देव राक्षस एवं मनुष्य रामसमें गुण ( • ) है, कन्या राक्षसी वर देवमें २, कन्या देव वर
मनुष्यमें ४ गुण हैं ॥ ३० ॥ ( मालि० )
विषमात्कन्यकाराशेः षष्ठे षष्ठाष्टकं न सत् ।
समाषष्ठं शुभं ज्ञेयं विपरीतं तदष्टमम् ।
मृत्युः षट्काष्टके ज्ञेयोऽपत्यहानिर्नवात्मजे ।
द्विादशे निधनत्वं द्वयोरन्यत्र सौख्यकत् ॥ ३१॥

। --- विषमराशि शि तथा सनसे आठवी वहीं होती है, यह शत्रुषकाष्टक है, इनके स्वामी शत्रु होते हैं तथा सनराशिले छटो, विधनसे आठवों, मित्रषट्काष्टक है, इनके स्वामी मित्र होते हैं, यह दुभ होता है, इससे विपरीत अशुभ है शत्रुषट्काष्टक मृत्यु करता है, यदि बलकन्याकी ५९ एकले दृती पंच नवम राशि हो तो हानि, एवं दूसरी बारहवीं हो तो दरिद्रता होती है, अन्य स्थानों में शुभ होते हैं ॥ ३१ ( अनु०) यह श्लोक प्रक्षिप्त है। दुष्टभक्टपरिहारः । प्रोक्त दुष्टभटके परिणयस्त्वेकाधिपत्ये शुभी- ऽथो राशीश्वर मोहदेऽपि गदितो नाड्याशुद्धियदि । अन्यः शपयोलित्वसखिते नाड्यर्कशुद्धौ तथा ताराशुद्धिवशेन राशिवशताभावे निरुक्तो बुधैः ॥ ३२ ॥ उक्त प्रकारसे दुष्ट भकूट कहे हुएमें भी परिहार है कि, बरकन्याकी राशियों का स्वामी. एक ही हो, जैसा १। ८ । का ( मंगल ) २ । ७ : शुक्र ) हो तो विवाह शुभ होता है, त्था राशीशोंकी मैत्रीमें भी शुभ है, यदि नाडीशुद्धि और नक्षत्रशुद्धि हो, यदि उक्त राशीश अशेशोंकी परसर मैत्री हो तथा बलवान् भी हों और नाडीशुद्धि हो तथा ताराशुद्धि हो, एवं राशिवश्यता भी योग्य ही हो तो ग्रहोंके शत्रुभावका दोष नहीं होता , यहां ( ग्रहमैत्री) मित्रषट्काष्टक ( १ ) एकाधिपत्य ( २ ) सबलांशेश मैत्री) राशिवश्यता ४ लारशुद्धि, (५) प्रकार घटूकाटकों के परिहार हैं, इनमें से एकके होनेमें भी षट्काष्टकदोष नहीं होता, परन्तु नाडी सभीमें होनी चाहिये ॥ ३२॥ शालि०) मैत्र्यां राशिस्वामिनोरंशनाथइन्द्रस्यापि स्याणानां न दोषः ।। खेयरित्वं नाशयेत्सद्भकूट सेटप्रीतिश्चापि दुष्टं भकूटम् ॥ ३३ ॥ गणकूट भकूट ग्रहदूटोका परिहार--कन्या वरके गशिसे तथा अंशेशोंकी परस्पर मैंत्री, हो तो दुष्टगण (राक्षम मनुष्यादि) का दोष नहीं होता, तथा ( शुभ राशिकूट ) तीसरा स्वारहवाँ आदि हो तो ग्रहों की शत्रुताका दोष नहीं होता. एवं राशीशोंकी प्रीति षटकाष्ट कादि.. दोनोंका नाश करती है !!३३!! ( शालि०) नाडीकूटं तंदपपादय । ज्येष्टा रौद्रार्यमाम्भःपतिभयुगयुगं दास्नभं चैकनाडी पुष्येन्दुलाष्ट्रमित्रान्तकवसुजलमं योनिबुध्न्ये च मध्या।

अकरणन् ६.] भाषाटीकासमेतः। १८५) वाय्वग्निच्यालविश्वोयगयुगमथो पौष्णभश्चापरा स्याद्- दम्पत्यारेकनाड्यां परिणयनमसन्मध्यनाड्यां हि मृत्युः ।। ३४ ॥ येष्ठा, बद्री, उत्तराफाल्गुनी, शततारा इनले के दो नक्षत्रों की आय नाडी । पुष्य, सृगशिर, चित्रा, अनुनया, भरणी, धनिष्ठा, बोगाडा, पूर्व काल्गुनी, उत्समद्रपदाकी मध्य नाडी। बाती निका, अश्लेषा, उत्तरापाडा इनमें से दो दो नक्षत्रों की अंत्य नाडी होती १ वर कन्या काही विवाह हो तो अशुभ फल होता है, मध्य नाडीमें हो तो दोनही किरके सूर होती है, मन्मनाडी होडके प्रार्थनाडियों का दोष गोदायी के दक्षिण अथवा क्षत्रिय आदिकोंको नहीं। किसीका न्त है,कि, अद्य नाडी वरको अन्य कन्याको, मध्य दोन.को दोष करती है, इनने अन्यनाडीको परिहारांतर होनेनें लेते भी हैं "चनियज्रिभोथायाः कन्यायाः क्रमशो- ऽश्विभात् ॥ वहिभादिन्दुभानाडी त्रिचतुः पञ्चपर्वम् ॥१॥" प्रन्यांतरोंसे त्रिचतुःपंचनाडी कहते हैं- कन्याका नक्षत्र चार चरण एक ही राशिका हो तो पूर्वोक्त त्रिनाडी एवं तीन चरण एकराशिका हो तो चतुर्नाडी. द्विचरणमें पंचनाडी विचारना । त्रिनाडी अश्विनीसे, चतुनांडी कृत्तिकासे, पंचनाडी मृगशिरसे गिनते हैं, परन्तु चतुनाडी अहल्या देशमें, पंचनाडी पंजाबमें, त्रिनाडी सर्वत्र वर्जित है,कोई नाडीमें नक्षत्र के प्रथम, चतुर्थ और तीसरे दूसरे चरणमें विशेष दोष कहते हैं । नाडी विचार वरकन्या, स्वामी सेवक, नये मित्र, देश तथा नवीन देश, ग्राम; नगर, घरमें है, जहां नक्षत्र नाडी हुएमें चरणनाडो न हो तहां दोष अल्प है, पूर्वोक्तादि परिहार हुएमें नाडोकी शांती भी है कि, मृत्युंजयादि जप सुवर्णनाडी दान वथा वर्णादि कूटमें गौ. अन्न, वस्त्र, सुवर्ण देना ॥ ३४ ॥ ( सन्धरा ) वर्णादिगुणचक्राणि । कन्यायो वर्णगुण. वश्यगुण. . चतुष्प. २ १ १ . मनु. । क्षत्रि. वैश्य. ० १ १ १ . c शुद्र. १ १ १ वनचर. ० बा. वै. शू. कोट. १ वरपक्षे.

(८६) मुहूर्त चिन्तामणिः- [विवाह कम ९ ३ ३ ३ ३ %D9 ३ १॥ ३ ३ १॥ १॥ १॥ । २॥ ३ १॥ ३ (0 १॥ १॥ ३ १॥ १॥ - ३ ३ ३ ३ ३ योनिगुणाः। अ.ग. मे.स. श्वामी. मृगौ। मैं व्या ह. वा./न.सिं. . अश्व ४२/२/३/२/२२१० . | 0 | o मणगुणाः। 0 दे.म.रा. AR .म.४ गज १/२ मेष २३४२१ २ ३१ सर्प ३/३ २४ २ १/२ १ १ २ श्वान २२१२५/२/१२/२|१ २ मार्जार २२ २३ २४ २३३/२/२ मूषक २/२१ ११ ४।२/२/२ गो१२३२३ २२४/२० भैंस ० २३ २/२/२/२/३४.१२/३/२/२ व्याघ्र १२११/११/२०११४१/१/२ हरिण ३/३/२/२० ३/२/३/२.१४/२/२/२ वानर ३/३/०२/२३/२/२२|१|२४|३२ नकुल/२/३३ १२१२२२२ सिंह|१. १/२०११ ३ ० ६

प्रकरणम् ६.
भाषाटीकासमंतः।
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वरः।
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भकूटगुणा:
म. वृ.मि. क. सिं.क.तु./वृ.घ.म.कु.मी.
मेष.
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वृष.
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सिंह.
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७
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कुंभ. ७७०
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७
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०
०
पूर्वमध्यापरभागचक्रम् ।
पौष्णेशशाक्राइससूर्यनन्दाः पूर्वार्चमध्यापरभागयुग्मम् ।
भर्ता प्रियः प्राग्युजि भेनियाः स्यान्मध्ये द्वयोः प्रेमपरे प्रिया स्त्री ॥३५॥

विवाह-
६
चूहा ।
रेवती से द नक्षत्र पूर्वमान सनक हैं. आद्राले १२ नक्षत्र मध्यभाग संज्ञक हैं तथा
ज्येष्ठासे ९
नक्षत्र पर्यन्त अपर भाग है ।
संज्ञा वृर्वभाग मध्यभाग
पूर्व में स्त्रीको पति प्रिय होता है, मध्य
संख्या
१२
भागमें श्री पुरगों में परस्पर प्रीति होती है
और अम्मामें हो यो प्रिय होती
फलपतिप्रिय
श्री प्रिय
है । ३५ ।। (इ०३०
प्राच्यन्निलवर्ग कुटन् ।
अकवटतपथरावगीः सोमा ।
सपाखुगगावीनां निजपञ्चमौरिणामधौ ।। ३६ ॥
अवर्ग गरुड । कवर्ग माजी । वर्ग सिंह । वर्ग झुटा । तवर्ग स । वर्ग
यवर्ग मृग । शबर्ग ( अवि) बकरा ये ८ बाँकि मामी हैं, अरनेसे पांचवां शत्रु होता है,
जैसे-
- गरुड सर्प, मार्जार चूदा, सिंह नृग, कुत्ता, बग. मई गन्ड । स्त्रीपुरूषके नक्षत्र भक्ष्य-
अक्ष्यक हों तो शुभ नहीं होता। कोई नामाद्यक्षरसे भी वर कन्याका, स्वामो सेवक आदि
सभीका विचार करते हैं ॥ ३६॥ आयी)
नक्षत्रराश्यैक्ये विशेषः ।
राश्पैक्ये चेदिन्नमर्श योः स्यान्नमवैक्ये राशियुग्म तथैव ।
नाडीदोषो नो गणानां च दोषो नक्षत्रैश्ये पादभेदे शुभं स्यात् ।। ३७ ॥
यदि वरकन्याकी एक राशि हो और दो नक्षत्र हों वा एक नक्षत्र हो परन्तु राशि दोहों
और नक्षत्र तो एक हो परन्तु चरण भिन्न हों, एक ही चरण न हो तो नाडी दोष,
गणदोष, उपलक्षणसे तारादिदोष भी नहीं होते।व्यवहार.राजसेवा, संग्राम, मित्रतामें नामराशिसे
फल हैं ॥ ३७ ॥ ( शालि०)
स्वामीसेवकनक्षत्रे विशेषः ।
सेव्याधमर्णयुवतीनगरादिभं चेयूर्व हि भृत्यधनिभर्तृपुरादिसद्धात् ।
सेवाविनाशधननाशनभर्तृनाशग्रामदिसौख्यहदिदं क्रमशः प्रदिष्टम्॥ ३८ ॥
यदि सेवक, धनी, पति और ग्रामके नक्षत्रसे स्वामी, ऋगी, स्त्री तथा नगरका नक्षत्र पूर्व
हो तो क्रमसे सेवानाश,धननाश,पतिनाश और ग्रामसंबन्धी सुखका नाश जाननाचाहिये।॥३८॥
राशिस्वामिनः, नवांशविधिश्च ।
कुजशुक्सौम्यशशिसूर्यचन्द्रजाः कविभौमजीवशनिसौरयो गुरुः ।
बह राशिफा कियमृगास्यतौलिकेन्दुभतो नवांशविधिरुच्यते बुधैः ॥ ३९ ॥

प्रकरणम् ६.] भाषाटीकासमेतः । राशिस्वामी- मेव वृश्चिकका मंगल, तुला वृषका शुक्र, एवं ३ । ६ का बुध, ४ का चन्द्रमा, ५ का सूर्य, ९ ! १२ का वृहमति, १० । ११ का शनि राशीश हैं । नवांश कहते हैं कि एक राशिके ३७ अंश होते हैं इनके २ भाग, ३ अंश २० कलाका एक, ६ ! ४० पर्यन्त दो, १० । तृतीय, १३१२० चतुर्थ, १६। ४० पञ्चम. २० । ० छठा, २३ । २० सप्तम, २६ । ४० अष्टन, २०० नवम, इनकी गिनती ? ५। २को मेघसे, २१६। १० को मकरसे, ३ । ७ । ११ को तुलासे, ४ ! ८ १ १२ शो कसे, अर्थात् चरादि गणना है। जैसे- मेषके ३ ! २० तो मेषका, ६ ! ४० पर्यन्त वृाका नवांश इत्यादि, बृपमें ३ । २० हो तो मकरका ६८० में कुम्भन्ना इत्यादि सभीके जानने ::३९॥ (मं० भा० ) होरा विधिः। समगृहमध्ये शशिरविहोरा । विवनभमध्ये रविशशिनोः मा॥ ४० ॥ होरा--समराशिमें १५ अंश पर्यन्त चन्द्रमाकी, उपरांत ३० अंशपर्यन्त सूर्यकी, विषम राशिमें १५ अंश पर्यात सूर्यकी. उपरांत ३० अंश पर्यन्त चन्द्रमाकी होरा होती हैं । १० ॥ (शिवदना) त्रिंशांश द्रेष्काणांशाः । शुक्रज्ञजीवशनिभूतनयस्य बाणशैलाष्टपञ्चविशिखाः सनराशिमध्ये । त्रिंशांशको विषमभे विपरीतमस्माद् द्रेष्काणकाःप्रथमपश्चनवाधिपानाम् ४१॥ त्रिंशांशक-समराशिमें ५ अंशपर्यन्त शुक्रका और पांच अंगसे ७ अंश पर्यन्त बुधका, उपरांत ८ अंशपर्यन्त बृहस्पतिका, उपरांत ५ अंश शानेका और ५ अंश मंगलका, विषम राशिमें विपरीत ५ अंश मंगलका, एवं ५ शनि ६ बृहस्पति, ७ बुध, ५ शुक्रका त्रिंशांश होता है । द्रेष्काण-दश अंशपर्यन्त जो राशि हैं उसके स्वामीके ११ अंशसे २० अंशपर्यन्त उस सशिसे पंचम जो राशि है उस राशिके स्वामीका, २१ अंशसे ३० अंशपर्यन्त उस राशिसे नवम राशिके स्वामीका द्रेष्काण होता है || ४१ ॥ ( वसं०) द्वादशांशः, सकलवगों पसंहारश्च । स्याद्वादशांश इह राशित एव गेहं होराथ कनवमांशकसूर्यभागाः । त्रिंशांशकश्च पडिमे कथितास्तु वर्गाःसौम्यैःशुभं भवति चाशुभमेव पापैः॥४२॥ द्वादशांश--एकाराशिक ३० अशोंके १२ भाग ( अढाई )२ अंश ३० कला होता है अपनी राशिसे गिना जाता है । जैसे- मेषके २ अंश ३० कलामें मेषका द्वादशांश, - ..

(९०)
मुहूर्तचिन्तामणिः-
[विवाह-
५ अंशपर्यन्त ऋषका, ७ अंश ३० कला पर्यन्त मिथुनका इत्यादि सभीका जानना, होस
द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश, त्रिशांश राशि ये षड्वर्ग हैं, शुभ ग्रहोंके षड्वर्ग सभी कार्यों में शुभ,
पापका अशुभ होता है ।॥ ४२ ॥ (वसं )
गण्डान्तदोषः।
ज्येष्ठापौष्णभसार्पभान्त्यघटिका युग्मं च मूलाश्विनीपित्र्यादौ घटिकाद्वयं
निगदितं तद्भस्य गण्डान्तकम् । काल्यण्डजभान्ततोऽर्धघटिका सिंहा-
श्वमेषादिगा पूर्णान्ते घटिकात्मकं त्वशुभदं नन्दातिथेश्वादिमम् ॥ ४३ ।।
तिथ्यादि पंचांग तथा वर्षतु मासपदिनादि सभी संधि होती हैं, इनमें विशेषता तिथिनक्ष.
त्र लग्नको संधियोंकी गण्डांत संज्ञा है । वह ज्येष्ठा, रेवती, आश्लेषाके अत्यकी २ घटी, अश्विनी
मघा मूलके आदिकी २ घटी; समम्त ४ । ४ घटियोंका नक्षत्र गण्डांत होता है । तथा कर्क
वृश्चिक, मीनकी अंतिम आधी घटी; मेष, सिंह, धनके आदिकी आधी घटी समस्त घटी
लग्नगण्डांत होता है । एवं पूर्णा ५ । १०. १५ तिथियोंके अंतकी १ घटी, नंदा ११ । ६
११ के आदिकी १ घटी समस्त दो घटी तिथिगंडांत होता है; गण्डांतके उत्पन्न कन्या
पुत्र दोषद होते हैं इसका विस्तार नक्षत्रप्रकरणमें कह आये, शुभकार्यों में गण्डांत वर्जित है,
परन्तु तिथिगण्डांत लग्नगंडांतका ग्रन्थांतरों में सामान्य दोष कहा है कि, चन्द्रमाके बली होनेमें
तिथिगंडांत बृहस्पतिके बली होनमें लग्नगण्डांतका दोष नहीं ऐसे ही मासांतके ३ दिनवर्षान्तके
१९ दिन संधि गाण्डांतसंज्ञक हैं, योग करण संधि १ । १ घटी होती है, ऐसे ही दिन रात्रि
अद्धरात्रि मध्याहादि भी हैं ॥ ४३ ॥ ( शार्दू०)
कर्तरीदोषः ।
लग्नात्पापावृज्वनृजू व्ययार्थस्थौ यदा तदा।
कतरीनाम सा ज्ञेया मृत्युदारिद्रयशोकदा ॥ ४४ ॥
लग्नसे पापग्रह दूसरा वक्री तथा बारहवां मार्गी हो तो इसका नाम कर्तरी है, विवाहादिकोंमें
मृत्यु किंवा दरिद्रता शोक देती है, ऐसे ही सप्तम भावमें कर्तरी अशुभ कहते हैं तथा चन्द्रमापर
भी उक्तफलकारक है, जातकों में सभी भावों में अपने अपने उक्त वस्तुको अनिष्ट फल है ॥४४॥
(अनु०)
संग्रहदोषः ।
चन्द्रे सूर्यादिसंयुक्ते दारिद्रयं मरणं शुभम् ।
सौख्यं सापल्यवैराग्ये पाषद्वययुते मृतिः ॥ ४५ ॥

प्रकरणम् ६.]
भाषाटीकासमेत
(९१)
चन्द्रमा सूर्यके साथ हो तो दरिद्रता एवं मंगल के साथ मृत्यु, बुध के साथ शुभ, बृहसतिके
साथ सौख्य, शुक्र के साथ ( सापत्न्य) सौत, इनिके साथ (वैराज्य ) फर्करी, राहु केतु
भी ऐसे ही जानना, यदि चंद्रमा दो पापग्रहोसे युक्त हो तो मृत्यु होवे, परन्तु नित्र स्वक्षेत्र,
उच्चवर्गोत्तमादिगत चंद्रमा पापयुक्त दोष नहीं करता. यह ग्रंथातरमत है !! १५ ॥ ( अनु०)
अष्टमलग्नदोषम्सापवादः ।
जन्मलग्नभयोमृत्युराशो नेष्टः करग्रहः ।
एकाधिपत्ये राशीशे मैत्रे वा नैव दोषकत् ॥ ४६॥
जन्मलग्न--जन्मराशिसे अष्टम लग्न विवाहादि शुभ कार्य में शुभ नहीं होता परन्तु एकाधिपत्य
जैसे १ । ८ हो तथा राशीश मैत्री ( जैसे ५ । १२ हो तो लनाष्टक और राश्यष्टकका दोष
नहीं होता) ॥ ४६ ॥ ( अनु०)
मीनोक्षकालिमृगस्त्रियोऽष्टमं लग्नं यदा नाश्मगेहदोषकत् ।
अन्योन्यमित्रत्ववशेन सा वधूभवेत्सुतायुगुहसौख्यभागिनी ॥ ४७ ॥
यदि १२ । २ । ४ । ८ । १० । ६ ये राशि जन्मलग्न जन्मराशिसे अष्टम हों तो उक्त
अष्टकदोष नहीं होता. क्योंकि इनके स्वामी परम्पर मित्र हैं इससे इन राशियोंके अष्टम होनेमें
वधू पुत्र, आयु और घरके सुखयुक्त होती है। मतांतर है कि, जो अष्टमराशीश केन्द्रमें किंवर
स्वोच्चादिमें हो तो अष्टमोक्त दोष नहीं होता है ॥ ४७ ॥ ( उ०)
मृतिभवनांशो यदि च विलग्ने तदधिपतिर्वा न शुभकरः स्यात् ।
व्ययभवनं वा भवति तदंशस्तदधिपतिर्वा कलहकरः स्यात् ॥ ४८॥
उक्त अष्टमराशिका नवांश अथवा अष्टमेश लममें हो तो शुभ नहीं, यदि जन्मलग्न जन्मरा-
शिसे व्ययराशि वा उसका अंश अथवा तदीश लग्नमें हो तो कलहकारक होता है, कोई
धनहानिकारक कहते हैं ॥ ४८ ॥ (कुसुमविचित्रा)
विषघटीदोषः।
खरामतोऽन्त्यादितिवह्निपित्र्यभे खवेदतः के रदतश्च सार्पभे ।
खबाणतोऽश्वधृतितोय॒माम्बुपे कृतेर्भगत्वाष्ट्रभविश्वजीवभे ॥ ४९ ॥
मनोईिदैवानिलसौम्यशाक्रभे कुपक्षतः शैवकरऽष्टितोऽजभे ।
युगाश्चितो बुध्न्यभतोययाम्यभे खचन्द्रतो मित्रभवासवश्रुतौ ॥ ५० ॥

मुहूतांचन्तामणिः-
[विवाह-
मूले जन्माणाद्विपनाटिकाः कृता वाः शुभेऽथो विषनाडिका ध्रुवाः।
निना भभोगेन सतर्कभाजिताः स्पष्टा भवेयुर्विषनाडिकास्तथा ॥ ५ ॥
विषयटीमें दोष--रेवती, पुनर्वसु, कृत्तिका, मयाकी ३० वटीसे ऊपर 2 घटी विषनाडी
जानना. वह शुभकार्यमें त्याज्य हैं, एवं रो० ४० से, आश्लेषा ३२ से. अश्विनी ५० से,
भरणी शततारा १८ से, दूर्वाफाल्गुनी चित्रा उत्तराषाढा पुष्यकी २० से, विशाखा स्वाती
नृगशिर ज्येष्ठा १४ से. आद्री हानकी २१ से, पूर्वाभाद्रपदा १६ से, उत्तराभाद्रपदा पूर्वाषाढा
भरणी २४ से. अनुराधा धनिष्ठा श्रवण १० से, मूलकी ५६ से, ऊपर ४ घटी विषनाडी
सर्वत्र शुभकृत्यमें तथा जन्ममें भी ( वय ) अशुभफलकारक हैं, यह घटिका पष्टिप्रमाण भुक्तसे
जाननी । जैस-६० घटोके नक्षत्र में उक्त घटीसे विषघटी होती है तो अमुक सर्वभोग होनेने
कितनी घटीसे होंगी. उक्त ध्रुवक ६० से गुणा कर सर्वभोगसे भाग लिया जाय तो स्पष्ट
विषयटीका आरम्भ मिलता है. ग्रन्यांतरोंमें परिहार है कि. चन्द्रमा लग्न विना केन्द्र त्रिकोणम
बली हो, अथवा लग्नेश शुभयुक्त केंद्र में हो तो विषघटीका दोष नहीं होता
है ॥ ४९-५१ ।। ( वंशम्थ )
नक्षत्रविषघटी.
.
अ.
कृ.
। रो.
आ.
.
३२
म.
घू.
र
चि.स्वा.
वि.
अ.
ज्ये.
वारविषघटी.
२. म. दु..शु. श.
२/१२/१०/७/५/२५
३०
१४
१०
मू.
पू
.
पू.
१०
१०
३०
૮ :૨૪૨ લાખ
प
८७७ ११४
घ.
तिथिविषघटी.
३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२१३/१४/१५ ति.
८.७/१० ३ १३१४७/८
दिवारा त्रिमुहूर्ताः ।
गिरिशभुजगमित्राः पियवस्वम्धुविश्वऽभिजिदथ च विधातापीन्द्र
इन्द्रानलौ च । निर्ऋतिरुदकनाथोऽप्यर्यमाऽथो भगः स्युः क्रमश
इह मुहूर्तावासरे बाणचन्द्राः ॥ ५२ ॥

सारण ५. भाषाटाकाममतः। एक दिनके १५ मुहूतोंके स्वामी-महादेव १ सर्प २ 'नत्र ३ पितर 2 वसु '५ जल ६. विश्वेदेव ७ अभिजित् ८ ब्रह्मा ९ इंद्र १० इन्द्रामी ११ राक्षस १२ वरुण १३ अर्यमा १४ भग १५ । मुहूर्त २ घटीका होता है ।। ५२ ॥ । मालिनी ) शिवोऽजपादादष्टौं स्युभेशा अदितिजीवको । विष्ण्वकत्वाष्ट्रमरुतो मुहूर्त्ता निशि कीर्तिताः ॥ १३ ॥ रात्रिमुहूर्त--शिव १ अजचरण २ अहिर्बुध्न्य ३ पूषा ४ अश्वि ५ यम ६ अग्नि ७ ब्रह्मा ८ चन्द्रमा ९ अदिति १० बृहस्पति ११ विष्णु १२ सूर्य १३ त्याष्ट्र १४ वायु १५ ये रात्रि मुहूर्ताधीश हैं, इनका प्रयोग यह है कि; जो कार्य जिस नक्षत्रमें कहा है वह उसके स्वामीक मुहूर्त में करलेना , " धिष्ण्ये प्रोक्तं स्वामितिथ्यंशकऽय' यह ग्रंथकारने भी प्रकट कहा है ॥ ५३ ॥ (अनु०) वारभेदेन मुहूर्ताः । रवावर्यमा ब्रह्मरक्षश्च सोमे कुजे वह्निपित्र्ये बुधे चाभिजित्स्यात् । गुरौ तोयरक्षौ भृगौ ब्राह्मपित्र्ये शनावीशसापौ मुहूर्त्ता निषिद्धाः ॥ ५४॥ रविवारको अर्यमा, चंद्रवारमें ब्रह्मा राक्षस, मंगलको अग्नि पितर, शनिको अभिजित् , बृहस्पतिको जल राक्षस, शुक्रकं ब्रह्म पितर, शनिको शिव सर्व मुहूर्त निषिद्ध होते हैं ॥ ५४॥ (भुजङ्गप्र०) वेधविचारः अभिजिम्मानं च । निर्वेधैः शशिकरमूलमैत्र्यपित्र्यबाहान्त्योत्तरपवनः शुभो विवाहः । रिक्तामारहिततिथौ शुभेऽह्नि वैश्वप्रान्त्याद्मिश्रुतितिथिभागतोऽ- भिजित्स्यात् ॥ ५५ ॥ 'विवाहमुहूर्त वेधहित-मृगशिर, हस्त, मूल. अनुराधा, मघा, रोहिणी, रेवती तीनों उत्तरी, स्वाती ये नक्षत्र तथा शुभग्रहोंके वारमें विवाह शुभ होता है, रिक्ता ४।९। १४ अमा ३०. तिथि न लेनी । (विवाहसे ६ दिनके भीतर श्राद्धदिन वा अमा हो तो उस दिन . न करना, यह भी प्रमाण है ( उत्तराषाढाका चतुर्थचरण एवं श्रवणके आदि १ घटी अभिजित नक्षत्र होता है ॥ ५५ ॥ (प्रहार्षगी ) पञ्चशलाकावेधः । वेधोऽन्योन्यमसौ विरिश्च्यभिजितोयाम्यानुराधक्षयोविश्वेन्द्रोहरिपि- त्र्ययोहकतो हस्तोत्तराभाद्रयोः । स्वादीवारुणयोभवेनिऋतिभादि- त्योस्तश्लोपान्त्योः खेटे तब नसे तुरीयन्चर गायोर्या तृतीययोः ॥५६॥ ।

पञ्चशलाचक्रम् । AN- यू. पू. उ. #. th रचलावेव-रोहिणो अभिजिनकः । एवं भरणी अनुराधा उत्तरामाता । श्रवण मया । हस्त उत्तरभाद्रपदा : स्वाती शतभिषा । मुल पुनर्वनु । उत्तराफाल्गुनो रेवतीज्ञा परस्सर वेव ग्रहोंका होता है। शेष नक्षत्रोंका वैध अगले इलोकोक्त सप्तशलाकावाला जानना । चरणवेध-प्रथम पादका चतुर्थपर, द्विती- यका तृतीयपर, तृतीयका द्वितीयपर, चतुर्थका प्रथमपर होता है ॥ २६॥ (शार्दू) ६. पू. उ. " ८ सप्तशलाकावेधः । JkE । -- शाकेज्ये शतनानिले जलशिवे पौष्णार्यमझे वसुदीशे वैश्वसुधांशुभे हयभगे सापानुराधे मिथः । हस्तोपान्तिमभे विधातृविधिभे मूलादि- तित्वाष्ट्रभेऽजावी याम्यमधे कशानुहरिभे विद्धे कुभृदेखिके ॥ ५७ ॥ सप्तशलाका-ज्येष्ठा पुष्य । श० स्वा० । पूर्वाषा० आर्द्रा । रेवती उत्तराफा० । धनिष्ठा विशाखा । उत्तराषाढा मृगशिर : अश्विनो पूर्वाफाल्गुनी । आश्लेषा अनुराधा । हस्त उत्तराभाद्रपदा । रोहिणी अभिजित् । मूल पुन- ॥ सप्तशलाकाचक्रम् ॥ सु । चित्रा पूर्वाभाद्रपदा । भरणी मघा । कृतिका श्रवणका कृ रो मृ आ पु पु श्ले, परसर सप्तशलाका वेध ग्रहों का होता है, वेधका फल यह है कि" यस्याः शशी सप्त शलाकभित्रः पापैरपापैरयवा विवाहे । विवाहवस्त्रेग च सावृताङ्गो श्मशानभूमि रुदती प्रयाति उ ॥ १ ॥” जिस स्त्रीके विवाहमें चंद्रमा पापग्रहों के पू सप्तशलाकासे विद्ध हो तो वह विवाहके वस्त्रोंको लेकर रोती वि थ अ उ पू मूज्येस हुई स्मशान-भूभिमें जावे अर्थात् शीघ्रही बिधवा होकर सकाम न हो॥ ५७ ॥ (शार्दू०) कराक्रान्तादिनक्षत्रदोषस्सापवादः। ऋक्षाणि क्रूरविद्धानि क्रूरमुक्तादिकानि च । भुक्त्वा चन्द्रेण मुक्तानि शुभारंणि प्रचक्षते ॥ ५८ ॥ जो नक्षत्र पापविद्ध होकर छुटे तद्वत् क्रूरगंतव्य हों क्रूराक्रांत हो तो जब वह दोष उनका छूट जाय तब भी चन्द्रमाके मुक्त कियेमें वह नक्षत्र (शुद्ध) शुभकार्ययोग्य स्वा श होते हैं, ग्रन्थान्तरोंमें द्विराशिभोग नक्षत्रके लिये हैं कि, जिस राशिके भागमें पापग्रह हो वहीं भाग वर्जित है, दूसरा भाग शुभकार्य में ग्राह्य है ॥ ५८ ॥ लत्तापातादिदोषाः । ज्ञराहुपूर्णेन्दुसिताः स्वपृष्ठ भं सप्तगोजातिशरैमितं हि । संलत्तयन्तेऽकशनीज्यभौमाः सूर्याष्टतर्काग्निमितं पुरस्तात् ॥ ५९ ॥ लत्ता-बुध अपने अधिष्ठित नक्षत्रसे पीछे सातवें नक्षत्रपर लत्तादोष करता है, तथा राहु स्वपृष्ठके नववे पर; पूर्णचन्द्रमा बाईसवें नक्षत्रपर ( कृष्णपक्षके ६ । ७ । ८ । के बीच होता है) तथा शुक्र स्वपृष्ठपंचमनक्षत्रपर लत्तादोष करता है तथा सूर्य अपने आक्रांतनक्षत्र से आगे १२ वें शनिटवें बृहस्पति छठे भौम तीसरेपर उक्त दोष करता है वक्रीग्रहकी लत्ता भी उक्त क्रमसे विपरीत जाननी ।। ५९ ॥ (उ० जा० ) हर्षणवैधृतिसाध्यव्यतिपातकगण्डशूलयोगानाम् । अन्ते यन्नक्षत्रं पातेन निपातितं तत्स्यात् ॥ ६० ॥ पात-हर्षण, साध्य, व्यतिपात; गंड शूल योगोंका जिस नक्षत्रों (अंत ) समाप्ति हो उसपर पातदोष होता है शुभकार्यमें वज्र्य है (इसीका नाम चंडीश चंडायुध भी है)॥६०॥(पथ्या आर्या) पञ्चास्याजौ गोमृगौ तौलिकुम्भौ कन्यामीनौ कळली चापयुग्मे । तत्रान्योन्यं चन्द्रभान्वोर्निरुक्तं कान्तः माम्यं नो शुभं मङ्गले तत्॥३१॥ क्रांतिसाम्य-मेष सिंह। वृष मकर । तुला कुम्भ । कन्या क्रांति मौन ! कर्क वृश्चिक । धन मिथुन राशियोंमें सूर्य चन्द्रमा पर- ११ स्पर एक रेखामें हों तो क्रांतिसाम्य दोष होता है, शुभकृत्यमें वार्जेत है ( इसे महापात भी कहते हैं ) ॥६१ ॥शालिनी) ९ ५१० एकार्गल (खजूर ) दोषः। व्याघातगण्डव्यतिपातपूर्वशूलान्त्यबजे परिघातिगण्डे । योगे विरुद्ध त्वभिजित्समेतो दोषः शशी चेद्विपमझगोऽर्कात् ॥ ६२ ।। एकार्गल-व्याघात, गण्ड, व्यतिगत आदि विरुद्ध योग तथा शूल, वैधृति वज्र, परिघ, अतिगण्ड योग जिस दिन हों उस दिनका. नक्षत्र सूर्यके नक्षत्रसे विषम हो तो साम्य ६ एकागल दोष होता है, सूर्य नक्षत्रसे चंद्रा सम होनमें उक्त योगोंके हुएमें भी नहीं होता ( इसीको ख.र्जुर भी कहते हैं । ॥ ३२ ॥ (इं० २० ) उपग्रहदोषः । शराष्टदिक्छकनगातिवृत्यस्तिथिधृतिश्च प्रकृतेश्च पञ्च । चक्रम् उपग्रहाः सूर्यभतोऽजताराः शुभा न देशे कुरु- बालिकानाम् ॥ ६३॥ उपग्रह-जूर्यके नक्षत्रसे चन्द्रमाके नक्षत्र'५ ।८।१० । १४१७।१९ । १५ । १८ । २१ । २२ । २३ । २४ । २५ । वाँ हो तो उपग्रह दोष है, बाहिक तथा कुरु देशमें दोग करता है, कोई यहां भी परिहार कहते हैं, कि नक्षत्रके जिस चरणपर सूर्य है, उक्त संख्याके चंद्रके उस चरगपर दोर होता है अन्यपर नहीं, ये परिहार उपरोक्त (खाजूर ) एकाल के भी हैं ॥६३॥(उ०३०) २६ २५ २४. २३ २१. १८ १५ १६ पातोपग्रहलत्तासु नेष्टोऽनिः खेटवत्समः । वारस्त्रिन्नोऽष्टभिस्तष्टः सैकः स्यादईयामकः ॥ ६४ ॥ ( पात ) चंडीश, चण्डायुध, उपग्रह, लत्ता में भी चरणवेध दूषित हैं, जैसे पात एवं उप- ग्रह जिस चरणपर हो उतनेही चरण दूषित नक्षत्रका वज्र्य है तथा जिस ग्रहकी लत्ता हैं वह जिस चरणपर अपने स्थित नक्षत्रके हैं उतने संख्याके दिन नक्षत्रके चरणपर दोष होता है और घर नहीं अर्द्धयाम है कि वर्तमान चारको.३ से गुणाकार ८ से ( तष्ट ) शेष करे, जो शेष रहे उसमें १ जोडनेसे अद्धयाम दोष होता है, दिनमें यह शुभ कार्य में वर्ण्य है रात्रिको नहीं ।। ६४ ॥ ( अनु०.) कुलिकदोषः । शक्रार्कदिग्वसुरसाम्ध्यश्चिनः कुलिका रवे । रात्रौ निरकास्तिथ्यशाः शुनी चान्त्योऽपि निन्दिताः ॥ ५ ॥ कुलिक-दिनमें रविवारको १४ वां मूहूर्त, चन्द्रको १२ मंगलको १० बुधको ८ बृहस्पति ६ शुक्र शनिको २ मूहूर्त कुलिक होती हैं, तथा रात्रिमें उक्तोंमें १ घटायके जैसे सु० १३ चं० ११, मं? ९ बु. ७ : बृ ५ . शु० '३. श० .१० वा. मुहूर्त कुलिक होता है। तथा शनिवारको अन्त्यका मुहूर्त त्याज्य है, ये मुहूर्त विवाहमें प्रकरणम् ६,] भाषाटीकासमेतः। (९) वैधव्यकारक होनेसे अतिनिन्दित है इसी हेतु यहां दुबारे कहे हैं, प्रथम शुभाशुभ प्रकरणमें भी कह आये थे। वहां साधारण दोष गणना है. अन्य कार्यों में फल इनका दोषद नहीं ॥६५॥ (अनु०) m मुहूर्त. दिवा आ अ. अ. म. घ. पू.षा.उ. फा.श्र.रो.ज्ये वि.मू. श. उ. फा. पू. फा. मुहूर्त १२ ६ ८/९/१०/११/१२/१३ १४ रात्रि आपू.फा.उ फा. रे. अभि. भ. कु. रो. मृ.पु. पु. श्र.ह. चि. स्वा. मुहूर्त २ ८९/१०/१११२/१३ १४ १५ वादुर्मुहूर्त. चं. मं. बु. गु. श. उ.फा. मू. म. अभि. म्. रो. कृ. मृ. म. ३ ६ र. दग्धतिथिदोषः । चापान्त्यगे गोघटगे पतङ्गे कांजगे स्त्रीमिथुने स्थिते च। सिंहालिगे नघटे समाः स्युस्तिथ्यो द्वितीयाप्रमुखाश्च दग्धाः ॥६६॥ दग्धतिथि-धन मीनके सूर्यमें द्वितीया २, वृष कुम्भमें ४, कर्क मेषकेमें ६, मिथुन कन्यामें ८,'सिंह वृश्चिकमें १०, मकर तुलामें १२ दग्ध होती हैं, ये मासदग्ध तिथि मध्यदेशमें ही वर्जित हैं ॥ ६६ ॥ (इ० व० यामित्रदोषः। लगाञ्चन्द्रान्मदनभवन में खेटे न स्यादिह परिणयनम् । किंवा बाणाशुगमितलबगे याभित्रं स्वादशभकर विदा ।। ६० ।। लग्न तथा चन्द्रमासे सप्तम ग्रह होनेमें यामित्र दोष होता है, विवाहादिकोंमें अशुभ फल करता है, किंवा लग्न वा चन्द्रस्थित नवांशमें ५५ अंशपर हो तो विशेष दोष है, जैसे तुलाके अंशपर लग्न वा चन्द्रमा है तो मेषके ५ अंश ५५ हुए इसमें जो ग्रह हो उसकी यामित्री हुई, यह सूक्ष्म यामित्री है, इसमें शुभग्रहोंकी यामित्रीका फल ग्रन्थांतरोंमें शुभ भी है ॥ ६७ ॥ (भमरविल० ) - (९४८) एकागैलादिदोषाणामपवादः । एकार्गलोपग्रहपातलत्तायामित्रकर्तर्युक्यास्तदोषाः । नश्यन्ति चन्द्रार्कवलोपपन्ने लग्ने यथाको युदये तु दोषाः । ६८ ॥ एकार्गल ( खाजूर ) तथा उपग्रह. पात, लत्ता, यामित्री, कर्तरी, उदयास्त ( बक्ष्यमाण) इतने दोष विवाहलममें सूर्य चंद्रमाके बलवान होने में नष्ट हो जाते हैं, जैसे--सूर्यके उदय होनेमें रात्रिका अंधकार नष्ट होता हैं ॥ ६८ ॥ (ई० व०.) उपग्रहः कुरुबाहिकेषु कलिङ्गवङ्गेषु च पातितं भुम् । सौराष्ट्रशाल्वेषु च लेतित में त्यजेत्तु विद्धं किल सर्वदेशे ॥ ६९ ॥ कुरुदेश, वाहीकदेश (पश्चिममें है ) में उपग्रहनक्षत्र त्याज्य है अन्य देशों में नहीं, कलिंग, बंग ( पूर्वमें हैं ),मागधादिकों में पात दोष ( चन्डीश चन्डायुध ) त्याज्य है, सौराष्ट्र, शाल्व ( पश्चिममें है ) में लत्ता त्याज्य हैं और वेध सर्वत्र त्याज्य है। कहीं युतिदोष गौडमें, यामित्री यामुन प्रदेशमें कही है।। ६२ ।। 3 जी शशाङ्कसूर्यायुतर्भशेषे ख भूयुगाङ्गानि दशेशतिथ्यः । नागेन्दवोकेन्दुमिता नखाश्चेद्भवन्ति चैते दशयोगसंज्ञाः ॥ ७० ॥ सूर्य-चन्द्रमाकी नक्षत्र संख्या जोडके २७ से भाग लेना शेष० ।।४।६।१०।११। १५ । १८ ! १९ । २० । मेंसे कोई रहे तो दशयोग संज्ञा होती है ||७०॥ (उ०, जा०) दशदोषयोगानां फलं तदपवादश्च । वाताभानिमहीपचौरमरण रुग्वजवादाः क्षतियोगाके दलिते समे मनुयुतेऽथौजे तु सैकेऽधिते । भे दास्रादथ समितास्तु मनभी रेखाः क्रमात्संलिखेदेवोऽस्मिन्ग्रहचन्द्रयोर्न शुभदः स्यादेकरेखास्थयोः ॥ ७॥ दश योगका फल कि ० शेषमें वायुदोष १ में मेघभय ४ में अग्निभय ६ में राजभय १० में चौरभय ११ में मृत्यु १५ रोग :१८ वज्रभय १९ कलह २० धननाश उक्त अकोंमेंसे समका आधा करके १४ जोडना जितने ही अश्विन्यादि उतनवां नक्षत्र होता है, जैसे--( सम.) १० आधाः५ जुडे ( मनु ) १४ तो १९ वां मूल, हुआ, यदि विषम अंक हो तो..१ जोडके आधा करना, जैसे--विषमांक १५ एक जोडके १६ आधा ८ पुष्य नक्षत्र हुआ, चौदह आडी रेखाका एक चक्र करना उक्त क्रमसे जो नक्षत्र आया उसे आदिमें लिखकर चक्ररेखाओंके दोनों ओर अभिजित् सहित सर्व नक्षत्र लिखने, जिन जिन नक्षत्रों में जो उन्होंमें लिखने चन्द्रमाके साथ एकरेखामें कोई ग्रह हो तो दृष्टिरूप वेध है, अशुभ होता है। ग्रह है भकरणम् ६.J भाषाटाकासमतः। वृहस्रति लानेश, शुक्र, बलवान् एवं केंद्रगत हो तो इशद्रोत्रका दोष नहीं होता, यह ग्रंथांतरका लत है ।। १ ।। (शार्दू) बाणदोषः पञ्चकाख्यः । लनेनाव्या याततिथ्योऽतष्टाः शेषे नागद्वयब्धितर्केन्दुमख्थे । रोगो वही राजचौरौ च मृत्युबीणश्चायं दाक्षिणात्यप्रसिद्धः ।। ७२ ॥ लग्नमें शुक्लपक्ष प्रतिपदादिगत तिथि जोडके ९ से तष्ट करे शेष ८ रहे तो रोग बाण, २ शेषमें अग्नि, ४ . राजा, ६ में चोर, १ में नृत्युकाम होता है, यह दाक्षिणात्य (महारा,) देशों में प्रसिद्ध हैं अन्यत्र नहीं ॥ ७२॥ ( शालिनी) प्राच्यमतेन वाणः सापवादः । रमगुणशाशनागाब्याव्य संक्रान्तियाताशकमितिरथतधायदा पञ्च शेषाः। सानल मचौरा मृत्युनंज्ञश्च बाणो नवहन गरशेषे शेश्ये संशयः।।७३॥ नश्यनांश सूर्य संक्राति से गत अंशों में पृथक् पृथक् ६ ।३१ ८१.४ ! जोडके ९ से तट करके जिस अंक ५ शेष रहे वह बाग इस प्रकार जाननी । ६ में ५ शेष रहे तो रोग बाण, एवं ३ में अग्नि, १ में राज, ८. में चोर, ४ में मृत्यु बाण होता है, यह आष्टश- स्य बाण है । पूर्वोक्त प्रकारसे ६ आदि अंकों में सूर्यगतांश जोडके ९ से शेष करके जो जो अङ्क शेष है उन सबैको जोडके ९ ले शेष करना यदि शेष रहे तो ( शल्य .) लोह शल्यसहित जानना, अन्यांक शेषमें शयरहित होता है, सशल्य अति निन्ध हैं ।।७३॥ (मालिनी) समयभेदेन तत्परिहारस्त्रिविधः । .. रात्रौ चौरसैंजो दिवा नरपतिवह्निः सदा मन्ध्ययोर्मृत्युश्चाथ शनी नृपों विदि तिमीमेऽग्निचौरौ सौ । रोगोऽथ व्रतगेहगोपनृपसेवायानपाणि- घहे वाश्च क्रमतो बुधै रुगनलक्ष्मापालचौरा मृतिः ॥ ७४ ॥ चोर तथा रोगमाग रात्रिने, नृावाग दिनमें, बहिवाग सदा अर्थात् दिन रात्रि दोनों में, मृत्युवाण संध्यासनमें वय हैं, तथा शनिवार में राज, बुध नृत्यु, मंगलमें अग्नि चोर, सूर्य में रोगवाण वर्जित है और ब्रतबन्ध, रोगवाण गृहगोपनादि घरके कृत्यमें अग्निबाण, राजसवामें नृपबाण, यात्रामें चोर, विवाहमें मृत्युबाग त्याज्य है !! ७४ ॥ ( शार्दूलविक्रीडित ) (१००) मुदत्ताचन्तामाण। .पाए बाणचक्रम्. मे. वृ.मि. क.सि.क. तु. व. प. म. कुं.मी. रो. ६ रोगबाणमें ये तिथि १३/१२/११ १७१६/१५१४ १८१७१५१६/१५ २२/२१/२० निषिद्ध. २६२५२४२३३ ३०२९/२७२६२४२५२४ ९ अ. अ. बा. में. २०१९१८१७१६/१५१४/१३/१२१११६/१८ बा.२९२८२७२६२५२४/२३/२२२१२९२८२७ निषिद्ध ति. बा. २२२१२०१९१८१७१६/१५१४/१३/१२/१० निषिद्ध. ति. ६ चो. चौ. बा. में. १५१४१३२९/२०१९/१८/१७१६/१५/१४/१३ का. २४/२३२३३०२९२८२७२६/२५८४२३२२ निषिद्ध. ति ३ मृ. १० ९८ बा.१९/१८१७१६२५२४१३२१२० २८/२७२६२५२४/२३/२२/३०२९/२८२७/२६ निषिद्ध. ति. ७ . E . ० मृ. बा. में. ग्रहाणां दृष्टिः। त्र्यांशं त्रिकोणं चतुरस्रमस्तं पश्यन्ति खेटाश्चरणाभिवृदया। मन्दो गुरुभूमिसुतः परे च क्रमेण संपूर्णदृशो भवन्ति ॥ ७५॥ ग्रह अपने स्थित राशिसे ३ । १० । भावमें १ चरण दृष्टि,९ । ५ में २ चरण, ४ । ८ में ३ चरण, ७ में पूरे ४ चरण दृष्टिस देखते हैं, तथा शनि ३ । १० बृहस्पति ९ । ५ मङ्गल. ५।८ अन्यग्रह ७ सप्तमस्थानमें पूर्ण दृष्टिसे देखते हैं । ७५ ॥ ( उ० जा०) उदयास्तशुद्धिः । यदा लग्नांशेशो लवमथ तनुं पश्यति थुतो भवताय बो शुमाल मनल्पं रचयति । लवयनम्बामो लबमदनभं लग्नमदनं प्रपश्येवा वध्वाः शुभमितरथा ज्ञेयमशुभम् ॥ ७६ ॥ लवेशो लवं लग्नपो लग्नगेहं प्रपश्येन्मिथो वा शुभं स्याइरस्य । लवद्यूनपोऽश द्युनं लग्नपोऽस्तं मिथो वेक्षते स्याच्छुभं कन्यकायाः ॥ ७७ ॥ लवपतिशुभमित्रं

प्रकरणम् ६.]
भाषाटीकासमतः।
(१०१)
वीक्षतेऽश तर्नु बा परिणयनकरस्य स्याच्छुभ शास्त्रदृष्टम् । मदनलवप-
मित्रं सौम्यमंशं धुनं वा तनुमदनगृह चेदीक्षते शर्म वञ्चाः ॥ ७८ ॥
उदयास्तशुद्धि यदि लग्नेश अशेष लग्न तथा लग्नांशको देख, यद्वा उनमें युक्त हो तो वरको
बहुत ही शुभ फल होते हैं. जैसे- मेष लग्नमें मिथुनांशेश बुध तुलाका मिथुनको देखता है
इत्यादि लग्नशुद्धिका विचार है; बलवान् नवांशसे सप्तम नवांशका स्वामो अंशसे सप्तम भावको
"किंवा सप्तम भाव नवांशको देखे वा युक्त हो तथा सप्तमेश सप्तमभावांशेश सप्तमभाव तथा तन्न-
वांशको देखे वा युक्त हो तो कन्याको अतिशुभ फल देते हैं । यदि लग्नेश लग्नांशेश लग्न तथा
अंशको न देखें तो वरको अशुभ ( मृत्यु ), यदि सप्तमभावेश सप्तम भाव नवांशेश सप्तम-
भाव । वा तन्नवांशको न देखे वा युक्त न हो तो कन्याका अनिष्ट होवे।। ७६ ॥ (शिख०)
लग्नेश लगको अंशेश अंशको देखें अथवा परस्पर लग्नेश अंशको अंशेश लग्न को देखें तो वरको
शुभ होवे, तथा सप्तमेश सप्तमभावको सप्तमभावांशेश अंशको अथवा अशेश भावको भावेश
अंशको देखें तो कन्याको शुभ होवे । अथवा सप्तमेश लग्न सप्तमभावको तथा सप्तमेंशांशेश
लम सप्तमको देखें तो भी कन्याको शुभ होवे, एवं लग्नेश वा लग्ननवांशेश सातम तथा लग्नको
देखें तो दोनोंको शुभ होवे ॥ ७७ ॥ ( भु० प्र०) लग्ननवांशेशको कोई शुभ ग्रह मित्र
होकर अपने अंश वा लग्नको देखे तो विवाहमें पुत्रपौत्रादि शुभ फल करे, सप्तम भावांशेशका
भी मित्र शुभ ग्रह सप्तमभावको तथा लग्न नवांशको देखे अथवा लग्नसे सप्तमभावको देखे तो
वधूको शास्त्रोक्त शुभ ( पुत्रपौत्रादि ) होवे, पापग्रहों के उक्त प्रकार योग तथा दृष्टि से सर्वत्र
अशुभ जानना ॥ ७८ ॥ ( मा०)
सूर्यसंक्रमणाख्यलमदोषः।
विषुवायनेषु परपूर्वमध्यमान्दिवसांस्त्यजेदितरसंक्रमेषु हि ।
वटिकास्तु पोडश शुभक्रियाविधौ परतोऽपि पूर्वमपि सत्यजेद् बुधः ॥ ७९॥
विषुवत् (१। ७ ) संक्रांति, अयन ( ४ । १०) संक्रांतिका पूर्वदिन तथा दूसरा दिन
और संक्रांतिदिन तीनों दिन विवाह बन्धादि शुभकार्यमें वर्जित करने । अन्य ८ संक्रां-
तियोंके संक्रांतिकालसे १६ घटी पूर्व और १६ घटो पश्चात्की समस्त ३२ घटी वर्जित
हैं ॥ ७९ ॥ ( मञ्जुभाषिणी)
सर्वग्रहणां संक्रांतिवर्ण्यघटयः।
देवव्यङ्कर्तवोऽष्टाष्टौ नाड्योऽङ्काः खनृपाः क्रमात् ।
वाः संक्रमणेऽर्कादेः प्रायोऽर्कस्यातिनिन्दिताः ॥ ८०.॥

(१९२). मुहूतचिन्तामाणि:- [बिवाह सूर्यक संक्रमसे पूर्वापर के ३३ वटी एवं चन्द्रमाकी २ मंगल की ९ बुधकी ६ बृहस्पतिकी ८८ सुकर्म ९ शनिको १३० वटी संक्रमणको शुभकार्य में वर्जित हैं और रविग्रहका जो बटी कहा है वह अतिदिति है. इसका विशेष विचार संक्रांति प्रकारका में कह आये हैं । ८० ( अनु०) पंबन्धकाणबधिराख्यलमदोषः । घने तुलाली बधिरी मृगाश्ची रात्री च सिंहाजवृषा दिवान्धाः । कन्यानृयुक्कर्कटका निशान्धा दिने घटोऽन्त्यो निशि पङ्घसंज्ञः ॥ ८१ ॥ दिनमें ७ । ८ लग्न बधिर हैं, १०। ९ । रात्रिमें बधिर हैं, ५ ११ । २ दिनमें, ६३ ४ रात्रिमें अन्धे हैं, ११ दिनमें १२ रात्रिमें पंगु ( खोडे ) हैं ॥ ८१॥ ( उ० जा०) बधिरा धन्वितुलालयोऽपराह्ने मिथुन कर्कटकोऽजना निशान्धाः । दिवसान्धा हरिगोक्रियास्तु कुम्जा मृगकुम्भान्तिमभानि संध्ययोहि ॥ ८२॥ ९।७। ८ । लम ( अपराह्न ) दिनके पिछले त्रिभागमें बधिर हैं, ३ । ४।६ रात्रिमें अन्धे हैं, ५।९।१ दिनमें अन्धे हैं, १० । ११ । १२ संध्यामें कुब्ज हैं ॥ ८२ ॥ वसन्तमालिका) एषां प्रयोजनं सापवादम् । दारिय बधिरतनौ दिवान्धलग्ने वैधव्यं शिशुमरणं निशान्धलग्ने । पङ्ग्वङ्ग निखिल धनानि नाशमीयुः सर्वत्राधिपगुरुदृष्टिभिन दोषः॥८३॥ बधिरलग्नोंमें विवाहादि करनेमें दरिद्रता, दिवांध लग्नमें वैधव्य, रात्र्यंधलममें शिशुमरण, पंगुलममें समस्तधननाश होवे. यदि इनपर लग्नेश तथा बृहस्पतिकी दृष्टि हो तो इनका उक्त दोष नहीं है, और भी परिहार है । कि-' पबन्धकाणलग्नानि मासशून्याश्च राशयः । गौडमालवयोस्त्याज्या अन्यदेशे न गर्हिताः ॥" अर्थात् उक्त दोष तथा मासशून्यराशि. .. गौर देश मालवादेशमें त्याज्य हैं अन्यत्र नहीं ॥ ८३ ॥ (प्रहर्षिणी) विहितनवांशाः। कार्मुकतौलिककन्यायुग्मलबे झपगे वा। यहि भवेदुपयामस्तर्हि सती खलु कन्या ॥ ८४ ॥ विवाहलममें यदि ९ ७८.।६।३ । १२ राशियोंके नवांश हों तो विवाहिता कन्या मिसबसे पतिव्रता रहे ।। ८४ (चित्रपदा)

प्रकरणम् ६.]
भाषाटकासमेतः।
2
,
विहितनवांशे चिनिषेधः ।
अन्त्यनारा न च परिणेया काचन वर्गोचममिह हित्वा ।
नो वरल वरलक्योग तौलिगस्य शशति छुपीत ॥ ८५
लग्नमें ( अत्य) पिछला नवांशक जैसे मेपलम बननवांश, वृधमें कन्या न लेनां परन्तु
वर्गाचम हो तो लेना, जो बह वहीं बांशक भी हो उसे बगोत्तम कहते हैं, जैसे-३ १९ !
१२११० में वर्गोत्तम अत्यनवांशक ही होता है और तुला मकरका चन्द्रना हो तो चरलगनें
चर अंशक न लेना , चन्द्रमा अन्यराशिमें हो तो चरमें चरांश भी लेना ॥८५॥ (श्रीछन्द)
सर्वथा लगभङ्गयोगः ।
भये शनिः खेऽवनिजस्तृतीये भृगुस्तनौ चन्द्रखला न शस्ताः ॥
लग्नेटकविग्लौश्च रिपो मृतौ ग्लौलग्नट् शुभाराश्च मदे च सर्वे ॥ ८६ ॥
विवाहलमसे बारहवां शनि, दशम मंगल, तीसरा शुक्र, चन्द्रमा तथा पापग्रह लममें और
लग्नेश, शुक्र चन्द्रमा ६ स्थानमें तथा लग्नेश शुक्र, बुध, बृहस्पति, चन्द्रमा, मङ्गल अष्टमस्था-
नमें शुभ नहीं होते और सप्तम स्थानमें कोई भी ग्रह शुभ-नहीं होता, इनमें १२ शनिका
फल कन्या मद्यपा, दशम मङ्गलका (शाकिनी) मांस खानेवाली, तीसरे शुक्रका देवररता फल
है; औरका वैवव्य तथा मरणरूप फल है, सप्तम शुभग्रहोंके फल यामित्राप्रसंगमें कह आए
हैं। ८६ ॥ ( उ० जा०)
रेखापदग्रहा।
व्यायाष्टषट्स विकेतुममोऽर्कपुत्र्याख्यायारिगःक्षिातसुतो द्विगुणायगोन्जः ।
सप्तव्ययाष्टरहितौ ज्ञगुरू सितोऽष्टत्रियूनषड्व्ययगृहान्परिहृत्य शस्तः ॥८७॥
विवाहलग्नसे सूर्य, केतु, राहु, शनि ३॥ ११॥ ८ । ६ भावों में शुभ होते हैं, इनमें ही
विशोपक बल पाते हैं, तथा मङ्गल ३ । ११ । ६ में चन्द्रमा २ । ३।११ में बुध बृह-
स्पति ७ । १२ । ८. स्थान रहित सभी में, शुक्र ८ । ३ । ७।६ । १२ स्थानोंको छोडके
अन्य स्थानों में विशोपक बल पाता है ॥ ८७॥ (व० ति० )
कर्तर्यादिमहादोषापवादः।
पापो कतरिकारको रिपुगृहे नीचास्तगी कर्तरीदोषो नैव सितेऽरि-
नीचगृहगे तत्पष्ठदोषोऽपि न । भौमेऽस्ते रिपुनीचगे नहि भकेद्रोमो-
ऽष्टमो दोषकन्नीचे नीचनवांशके शशिीन रिः फाटारिदोषोऽपि न ॥१८॥

(१०४) मुहूतेचिन्तामणिः- [विवाह- कर्तरीकारक पापग्रह यदि शत्रुगृहमें और नीच तथा अस्तंगत हो ( तथा उनके बीच कोई शुभग्रह हो) तो लग्न वा सप्तममें कर्तरीका दोष नहीं तथा शुक्र नीच का शत्रुराशिका हो तो छठे हो तो भी दोष नहीं, मङ्गल यदि नीच राशिका वा अस्तंगत हो वा अष्टम हो तो भी दोष नहीं, और चन्द्रमा नीच राशि वा नीचनवांशका होकर ६।८। १२ स्थानों में हो तो भी इसका दोष नहीं ।। ८८ ॥ ( शा० ) विवाहेऽब्ददोषाद्यपवादः। अब्दायनर्तुतिथिमासभपक्षदग्धतिथ्यन्धकाणबधिराङ्गमुखाश्च दोषाः । नश्यन्ति विद्गुरुसितेष्विह केन्द्रकोणे तच्च पापविधुयुक्तनवांशदोषाः॥८९॥ अव्ददोष १ अयनदोष २ ऋतुदोष ३ तिथिदोष ४ मासदोष ५ नक्षत्रदोष ६ पक्षदोष ७ दग्धतिथि ८ अन्ध ९ काण १० बधिर ११ पंगु आदि लग्नदोष १२ अकाल वृष्टयादि १३ इतने दोषलग्नसे केंद्र, (१।४।७।१०) कोण (९ । ५) में बुध बृहस्पति शुक्रके बलवान् होकर स्थित होनेमें अनिष्ट फल नहीं करते, वैसा ही पापयुत चन्द्रमा वा पापयुत -नवांशदोष भी नष्ट हो जाता है ॥ ८९ ।। (व० ) उक्तानुक्तदोषपरिहारः । केन्द्रे कोणे जीव आये रवौ वा लग्ने चन्द्रे वापि वर्गोत्तमे वा । सर्वे दोषा नाशमायान्ति चन्द्र लाभे तहुमुहूर्ताशदोषाः ॥ १० ॥ केंद्र (१ । ४ । ७ । १०) कोण (५।९) में बृहस्पति, उपलक्षणसे बुध शुक्र भी तथा ११ में रवि, लग्नसे उपचय (३।६। १० । ११ । में अथवा वर्गोतमनवांशमें चन्द्रमा हो तो उक्त समस्त दोष नष्ट होते है, ऐसे ही चन्द्रमा ११ वें भावमें हो तो "रवावर्यमे त्यादि" दुर्मुहूर्त और पापग्रहनवांश दोप भी नष्ट होते हैं ॥ ९० ॥ (शा०) सामान्येन दोषसहपरिहारः । त्रिकोणे केन्द्रे वा मदनरहिते दोषशतकं हरेत्सौम्यः शुक्रो द्विगुणमपि लक्षं सुरगुरुः । भवेदाये केन्द्रेऽङ्गप उत लवेशो यदि तदा समूह दोषाणां दहन इव तूलं शमयति ॥ ९१ बुध विवाहलमसे सप्तमरहित केन्द्र (१।४।७।१० ) कोण ( ९१५) में हो तो एकसौ दोषोंको हरता है, शुक्र हो तो दोसौ और बृहस्पति एक लक्ष दोष दूर करता है तथा लग्नेश अथवा लम नवांशेश आय (११) केन्द्र (१।४।७।१०) में हों तो दोषोंके समूहको भूकते हैं, जैसे अमि रुईके ढेरको क्षणमात्रने फूंकती है. ॥ ९१ ॥.( शिखरिणी)

प्रकरणम् ६.]
भाषाटीकासमेतः
५१०५)
लग्नविंशोपकाः।
दौ द्वौ ज्ञभृग्वोः पश्चन्दौ रवौ साईत्रयो गुरौ ।
रामा मन्दागुकेत्वारे साईकक विशोपकाः ॥ ९२ ॥
पहिले जो " व्यायाष्टषट्सु” इत्यादि श्लोकमें ग्रहोंके शुभस्थान कहे हैं उन स्थानोंमें
बुध २, शुक्र २, चंद्रमा ५, सूर्य ३ । ३० साढे तीन, बृहस्पति ३, शनि १ । ३०, राहु
१। ३०, केतु १। ३० विंशोपका बल पाते हैं, यह जिसका जो स्थान शुभ कहा है वह
उसीमें पाता है अन्यमें नहीं; सभी ग्रह ( बलवान् ) अपने उक्त स्थानों में हों तो विंशोपका
बल २० पाते हैं। उक्त अंकोंका जोड २९ । ३० होता है इसमें रा० के० मेंसे
एकका १ । ३० घटता है, यतः एक शुभस्थानमें होगा, दूसरा अशुभमें रहेगा
॥ ९२ ॥ (अनु०)
ग्रहवशेन श्वशुरादि विभागज्ञानम् ।
श्वश्रः सितोऽर्कः श्वशुरस्तनुस्तनुयामित्रपः स्यादयितो मनः शशी ।
एतद्बलं सम्प्रतिभाव्य तान्त्रिकस्तेषां सुख सम्प्रवदेविवाहतः ॥१३॥
विवाहवाली कन्याका सास शुक्र । श्वसुर सूर्य । लम शरीर । सप्तमेश भर्ता । मन चन्द्रमा
होता है. ( तांत्रिक ) ज्योतिषी इन ग्रहोंका बल देखके उनका शुभाशुभ विचारके विवाहलम
निश्चय करे, जैसे उक्त ग्रह नीच, शत्रु, अस्त, त्रिक आदिमें हों तो उनको अशुभ, उच्चस्वगृहादि
(शुभस्थानों) भावोंमें हों तो उनको शुभ जानना ॥ ९३ ॥ उप०)
संकीर्णजातीनां विवाहे विशेषः ।
कृष्ण पक्षे सौरिकुजार्केपि वारे वज्र्ये नक्षत्रे यदि वा स्यात्करपीडा ।
सङ्कीर्णानां तर्हि सुतायुधनलाभप्रीतिप्राप्त्यै सा भवतीह स्थितिरेषा ॥१४॥
कृष्णपक्षमें शनि मङ्गल रविवार में तथा अनुक्त नक्षत्रोंमें यदि विवाह हो तो वही संकीणौँको
धन, पुत्र, आयु, लाभ देनेवाला होता है और मित्रताप्राप्ति करता है. इनको उक्त शुभ मुहू-
आदि विपरीत होते हैं, ( संकीर्ण ) वर्णसंकर तथा चाण्डालोंको कहते हैं ॥ ९४ ॥ (मत्तमयूर )
गान्धर्वादिविवाहे विशेषः।
गान्धर्वादिविवाहेऽकावदनेत्रगुणेन्दवः ।
कुयुगाङ्गाग्निभूरामाविपद्यामशुभाःशुभाः ॥ ९५ ॥

(१०६) मुहूताचन्तामाण नववाह- गांधर्वाडि विवाहमें सूर्यके नक्षत्रसे चन्द्रवियतः ४ अशुभ २ शुभ ३ अ० १ शु० १ अ० ४ सु. ६ अ ३ दु. १ अ. ३ जुल यही चक्रमात्र देखते हैं । पाठान्तर (त्रिपद्यां न) रेकी है अर्थात् यी चारपट्ट) सांया लिखनेको भी देखते हैं !! ९५ ॥ ( अनु० ) विवाहाप्राक्कल्ये दिलशुद्धिः । विधोपलनवश्व का दलनमण्डन धारकं गृहाणविभूषणान्यथ च वैदिकामण्डपान् । विवाहविहितोड्डभिविरचयेनयोराहतो न पूर्वमिद- माचरेविनयपषिमते वासरे ॥ ९६ ॥ विवाहाङ्ग कृत्य-गेहूँ, उरद आदिका दलन, चावल छांटना, मंगलकलशस्थापन, घरआंगन सम्भारना, भूषण, शृगारादि वस्तु, वेदी मण्डप रचना, तोरण वन्दनवार आदि सकलारम्भ चन्द्रमाका बल देखके विवाहोक्त नक्षत्रों में करना, परन्तु कार्य दिनके पूर्व ३ । ९ । ६ दिन न करना, यवांकुरार्पण तैललापन (वान ) गलगणेशार्चनमें भी यही विचार है ॥ ९६ ॥ (पृथ्वी) वेदीलक्षणं मण्डपोद्वासनं च । हस्तोच्छ्राया वेदहस्तैः समन्तात्तुल्या वेदी सम्झनो वामभागे । युग्मे घने षष्ठहीने च पञ्चसप्ताहे स्यान्मण्डपोदासनं सत ॥९७ ॥ घरके अन बायें ओर आंगनमें कन्याके हाथसे एक हाथ ऊंची तथा चारों ओरसे ४।४ हाथ चतुरस्त्र वेदी स्तभसोपानादियुत करनी, मण्डप उत्तम १६ हाथका, होता है, स्थानादि. संकटम १२ । १० । ८ भी मध्यम पक्षमें उक्त है. विवाहोत्तर मण्डपका उदासन छठे, छोडकर सम दिन तथा ५ । ७ वें दिनमें करना शुभ है ।। ९७ ॥ (शा० ) तैलादिलापने नियमः । मेषादिराशिजवधूवरयोर्बटोश्च तैलादिलापनाविधौ कथितात्र संख्या । शैला दिशः शरदिगक्षनगाक्षबाणबाणाक्षबाणगिरयो विबुधैस्तु कश्चित्९८ मेषादि राशिवाले वधू, वर तथा बटुके तैलादि लगानेमें मेषादि कमसे ७ । १०।५।। १०१५। ७।५।५ । ५। ५। ५। ७ इस प्रकार दिनसंख्या विद्वानोंने कहीं है॥ ९८ ॥ (व० ति०) रा. मे. वृ.मि. क. सिं तु .ध.कु.मी. त सं.डा०५१ ५ 10/1५1518/५८ बघूधर, वटु प्रकरणम् ६] भाषाटीकासमेतः । (१०७) मण्डपादो स्तम्भनिवेशनम् । सूर्येऽङ्गन्नासिंहघटेषु शैये स्तम्भोऽलिकोदण्डमन्युः पायो मीनाजकुछ निर्वती विवाह स्थाप्योजकोणे एमुग्मज ॥ १९ ।। मंडपमें प्रथम स्तम्भ निवेशन ६ ५। ७ ॐ सूर्य ईशान होजन, ८ ९ १० के वायव्य, १२ ॥ १। ११ । कमें नैऋत्य, २ ३ ४ क आग्नेयने जाना वही नियन गृहारम्भमें भी है ॥ ९९ ॥ ( इन्द्रवज्ञा) गोधूलीप्रशंसा । नास्यामृक्ष न तिथिकरणं नैव लभस्य चिन्ता नो वा वारो न च लव. विधिनों मुहूर्तस्य चर्चा । नोवा योगो न मृतिभवनं नैव यामित्रदोषो गोधूलिः सा मुनिभिरुदिता सर्वकार्येषु शस्ता ॥ १० ॥ गोधूलीमें नक्षत्र तिथि करणकी कुछ अपेक्षा नहीं, लमका विचार भी नहीं तथा वार मंशक मुहूर्तकी भी चर्चा नहीं, दुष्टयोग, अष्टमशुद्धि, यामित्रदोष कुछ नहीं होता, यह गोधूली मुनियोंने सब कार्योंमें शुभ कही है ।। १०० ॥ (मं० क्रा० ) गोधूलीभेदाः । पिण्डीभूते दिनकृति हेमन्तौ स्यादस्तेि तपसमये गोधूलिः । सम्पूर्णास्ते जलधरमालाकाले त्रेधा योज्या सकलशुभे कार्यादौ ॥१०॥ उक्त गोधूलीका समय कहते हैं कि ( हेमन्त ) शीतकाल मागशीर्षसे ४ महीने सूर्य जब सायंकालमें नीहारादिरहित किरणशून्य पिण्डाकार हो तथा ( तप ) उष्णकाल चैत्रसे ४ महीने ( अर्धास्त ) सूर्यबिंब आधा अस्त होनेमें ( जलधरमाला ) वर्षाकाल श्रावणसे ४ महीने सूर्यके सम्पूर्ण अस्त हूएमें गोधूली होती है, समस्त शुभ कृत्यादिमें गुणदाता है ॥ १०१ ॥ (जलधर माला) तत्रावश्यवयंदोषाः। अस्तं याते गुरुदिवसे सौरे सार्के लगान्मृत्यौ रिपुभवने लग्ने चेन्दौ । कन्यानाशस्तनुमदमृत्युस्थे भौमे वोडाभे धनसहजे चन्द्रे सोख्यम् ॥१०२॥ गोधूलीका और भी प्रकार है कि, गुरुवारके दिन सूर्यास्त होनेपर गोधूली होती है सूर्यास्तके पूर्व आधी घटी अर्द्धयाम होनेसे छोड दिया, शनिवारमें सूर्य दिखते ही हैं क्योंकि सूर्यास्तमें कुलिक हो जायगा तथा सार्यकालोन लमसे ८।६।१ वा लममें चंद्रमा हो तो मुहूतांचन्तामाणि:- [ विवाह- कन्याका नाश होवै । लग्न सप्तम अष्टममें मंगल हो तो वरका नाश होवे, ऐसे मुख्य दोष गोधूलीमें भी वर्जित हैं पंचांगशुद्धि भी मुख्य विचार्य है और ११ । २ । ३ । भावमें चन्द्रमा हो तो सुख देता है, गोधूली में हो तो और भी विशेषता है ॥ १०२ ॥ ( वैश्वदेवी) सूर्यस्पष्टगतिः । मेषादिगेऽर्केऽष्टशरा नगाक्षाः सप्तेषवः सप्त शरा गजाक्षाः । गोक्षाः खताः कुरसाः कुतकाः वङ्गानि षष्टिनवपञ्च भुक्तिः॥१०३॥ मेषादि राशियोंमें सूर्यकी गति स्थूलकालीन है कि, मेषके ५८, वृष० ५७, मि०५७, क. ५७, सिं० ५८, कन्यामें ५९, तु० ६०, वृ० ६०, ५० ६१, म० ६१, कुं० ६०. मी० ५९ है ॥ १०३ ॥ ( इन्द्रव० ) तत्तात्कालिकीकरणम् । संक्रान्तियातघनाद्यैगतिनिघ्नी खषड्हता । लब्धनांशादिना योज्यं यातक्ष स्पष्टभास्करः ॥ १०४ ।। सूर्य संक्रांतिके यात दिन घटीपलोंसे इष्टदिनादि जितने हों उनसे उक्त स्थूल गतिको गुणा करके ६० से भाग लेना । लब्ध अंशादि क्रमसे लेकर सूर्यकी भुक्तराशि राशिके स्थानमें रखना सूर्य स्पष्ट होता है ॥ १०४ ॥ ( अनु० ) इष्टकालिकलग्नानयनम् । तनोरिष्ठांशकातृर्व नवांशा दशसगुणाः । रामाता लब्धर्मशाद्य तनोवर्गादिसाधने ॥ १०५॥ जमीष्ट लग्नमें जो नवांश निश्चय किया उसके पूर्व जितने नवांश हों उन्हें १० से गुणाकर ३ से भाग लेना । लब्धि यथाक्रम ३ अंक लेके जो हो वह मुक्त लग्न सष्ट उस समयका होता है, इसीसे षडूवर्ग साधन करना ॥ १०५ ।। ( अनु०) अर्काल्लमात्सायनाद्धोग्यभुक्तैर्भागनिनात्स्वोदयात्खाग्निभक्तात् । भोग्यं भुक्तं चान्तरालोदयाढ्यं षष्ट्या भक्तं स्वेष्टनाड्यो भवेयुः ॥ १०६॥ सूर्यसायनस्पष्टके राशिभोग्यांशोंसे स्वदेशीय लग्न खंड पलात्मक गुनना ३० से भाग लेना, लब्धि भोग्य पला होती है, एवं भुक्तांशोंसे गुणाकर भुक्तपला मिलती है। इन भुक्तभोग्यप- लोको योग करना, इसमें सायन लग्न तथा सूर्यके अंतराल लग्नोंके पल जोडकर ६० से भाग लेकर सूर्योदयसे इष्टघटी होती हैं ॥ १०६ ॥ ( शालि०) प्रकरणम् ६.] भाषाटीकासमेत;। (१०९) रविलग्नाभ्यामिष्टपटिकानयनम् । चेल्लनार्को सायनावेकराशौ तद्विश्लेषनोदयः खामिभक्तः । स्वेष्टः कालो लग्नमूनं यदाद्रिात्रेः शेषोऽर्कात्सषड्भान्निशायाम् ॥१०७॥ यदि सायन लम तथा सूर्य एक ही राशिमें हों तो उनके अन्तर्गत अंशोंसे स्वदेशीय लग्नखंड गुनना ३० से भाग लेकर लब्ध उदयसे इष्टकाल होता है । रात्रिके लिये राशिमें ६ बोडके उक्त प्रकारसे करना ॥.१०७ ॥ (शालिनी) घटिकानयने विशेषः । उत्पातान्सह पातदग्धतिथिभिर्दुष्टांश्च योगांस्तथा चन्द्रज्योशनसाम- थास्तमयनं तिथ्याः क्षय तथा । गण्डान्तं च सविष्टिसंक्रमदिन तन्वंशपास्तं तथा तन्वंशेशबिधूनथाष्टरिपुगान्पापस्य वर्गास्तथा ॥१०८॥ उत्पात सेंदुक्र० क्रूराकांति इत्यादि, महापात, दग्धतिथि दुष्टयोग, चन्द्रमा गुरु शुक्रका मस्त, तिथिकी क्ष्यवृद्धि, गंडांत ३ प्रकारका, भद्रा, संक्रांतिदिन, लग्नेश अंशशका अस्त, लग्नेश अंशेक्ष चंद्रमाकी ६ । ८ स्थानमें स्थिति और पापग्रहोंके षड्वर्ग इत्यादि पूर्वोक्त दोष विवाहमें वर्ण्य हैं ।। १०८ ॥ (शार्दूल० ) विवाहादौ अवश्यवाः। सेन्दुतरखगोदयांशमुदयास्ताशुदिचण्डायुधान् खार्जूरं दशयोगयोग- सहित सावित्रलचाव्यधम् । बाणोपग्रहपापकर्तरि तथा तिथ्यक्ष- योगोत्थितं दुष्टुं योगमथाईयामकुलिकाद्यान्वारदोषानपि ॥ १०९ ॥ क्रूराकान्तिविमुक्तभं ग्रहणभं यत्क्रूरगन्तव्यभं धोत्पातहतं च केतु- हतभं सन्ध्योदितं भं तथा । तच्च ग्रहभिन्नयुद्धगतभं सर्वानिमान सन्त्यजेद्दाहे शुभकर्मसु ग्रहस्ताँटनस्य दोषानपि ॥३३०॥ इति श्रीदेव० रामवि० महूर्व० षष्ठं विवाहप्रकरणम् ॥ ६ ॥ यापयुक्त चन्द्रमा, पापरला लमनवांश, अस्तोदयशुद्धि, चंडोश, चंडायुध, खार्जूर दशयोग, जामित्री, लता, वेध, बाण, उपग्रह पापकर्तरी, तिथिवारोद्भव ( सूर्येशेयादि ), नक्षत्रवारोत्थ ( मृत्यु आदि), तिथिनक्षत्रदारोत्थ (हस्ताकपञ्चमी०) आदि दुष्ट योग, अर्द्धयाम कुलिकादि अन्य दोष, पापाक्रांत नक्षत्र, पापमुक्त तथा पारंगतव्य नक्षत्र, ग्रहणनक्षत्र,

४११०)
मुहूर्तचिन्तामाणि:-
[वधूप्रवेशप्र०.७.]
जोन प्रकारके उत्पातका नक्षत्र, केतूदयनक्षत्र( सन्ध्योदित सूर्य से १४ वां नक्षत्र, ग्रहभिन्न
नक्षत्र, युद्धनक्षत्र इतने समस्त दोष तथा ग्रहकृत लग्न के दोष भी विवाहमें तथा सभी शुभ
कर्ममें वर्जित हैं ॥ १०२ ॥ ११०॥ (शार्द० )
इति श्रीमहीवरकृतायां मुहूर्तचिंतामणिभाषाटीकायों षष्ठं विवाहप्रकरणम् ॥ ६ ॥
अथ वधूप्रवेशप्रकरणम् ७ ।
वधूप्रवेशमुहूर्तः।
समाद्रिपञ्चाङ्गदिने विवाहाइधप्रवेशोऽष्टदिनान्तराले ।
शुभः परस्ताद्विपमाब्दमासदिनेऽशवर्षात्परतो. मथेयम् ॥ ३ ॥
विवाह करके विवाहिता कन्याका वरके घरमें प्रवेश करमेकोवधूप्रवेश कहते हैं यह विवाहसे
१६ दिनके भीतर सम २ । ४ । ६ । ८ । १० । १२ । १४ । १६ । दिनमें तथा ५ ।
२. दिनोंमें करें तो शुभ है। यदि १६ दिक्के भीतर न हो तो विषम मास "विषम
वर्षों में उक्त दिन
में करना । यदि ५ वर्ष भी तीत हो जाय ती सम विषमका नियम नहीं,जब
इच्छा हो, शुभ पञ्चाङ्गमें करे ।।१॥ (3 Notif
वधूप्रवेशे नक्षेत्र
ध्रुवक्षिप्रमृदुश्रोत्रवसुमूलमपानिले ।
वधूप्रवेशः सन्नष्टों रिक्ताराक बुधे परैः ॥ २ ॥
ध्रुव, क्षिप्र, मृदु, श्रवण, धनिष्ठा, मूल, मघा, स्वाती नक्षत्र ही तथा ।
स्किा.४ ।..९.। १४
तिथि, मंगल, सूर्य बुध वार रहित दिनमें वधूप्रवेश शुभ होता है ॥२॥(अ)
विवाहप्रथमाब्दे वध्वाः पित्रादिगृहवासें मासदोषः । -
ज्येष्ठे पतिज्येष्ठमथाधिके पति हन्त्यादिम भर्तृगृहे व शुचौं ।
श्वश्रू सहस्ये श्वशुरं क्षये तनुं तातं मधी तातगृहे विवाहतः ॥ ३ ॥
इति मुहूर्तचिन्तामणौ सप्तमं वधूप्रवेशप्रकरणम् ॥ ७॥
विवाहसे ऊपर प्रथम ज्येष्ठ के महीनेमें बहू भोक या रहे तो पति के ज्येष्ठ भाई को मृत्यु
दोषहोवे, अधिमासमें पतिको, आषाढमें सासको, पौवमें श्वशुको क्षमासमें अपने शरीरको हरती
है तथा. विवाहसे प्रथम चैत्रमें पिताके घमें रहे तो पिता मरे । ३१ इंच व० )
' इति श्रीमुहूर्तचिन्तामणौ महीधरकृतभाषाटीकायां सप्तमं वधूप्रवेशप्रकरणम् ॥ ७ ॥

द्विरा प्रकरणम् ८.] भाषाटीकासमेतः। (१११) अथ विरागमनप्रकरणम् ८ द्विरारमनमुहूर्तः । चरेदोजहायने बटालिमेषगे रखो रवीज्यशुद्धियोगतः शुभग्रहस्य बासरे । नृयुग्ममीनकन्यकातुलावृपे विलमके विरागमें लघुधवे चरेऽसपे मृदृडुनि ॥ १ ॥ वधूप्रवेश करके यदि वधू पिताके बरमें जाकर घुनः पतिके धरमें आवे उसे द्विरागमन कहते हैं। वह विषभ १ ३ १५ वर्ष में ११ ! १ ! ८ के सूर्यमें विवाहोक्त सूर्यचद्धि, गुरुशुद्धि हुएमें शुभग्रहोंके वारमें ३ १ १२ । ३ । ७ ! २ इन लग्नों में लघु ध्रुब चर मूल मृदु नक्षत्रों में करना चाहिये ।। १ ।। (पञ्चचामर ) सम्मुखशुक्रदोषः । दैत्येज्यो ह्यभिमुखदक्षिणे यदि स्याङ्गच्छेयुनहि शिशुगर्भिगीनबोडाः । बालश्चेद्रजति विपद्यते नवोटा चेवन्ध्या भवति च गर्भिणी त्वगर्भा ॥२॥ विवाहम भताक घर जानेमें यात्रोक्त शुक्रसम्मुखादि शुद्धि नहीं देते इसलिये बिरामन मर्म दिखना आवश्यक होमसे शुक्रगुद्धि कहते हैं कि झुक सम्मुख तथा दक्षिण . हो तो गर्भवती नवविवाहिता गमन न करें। इस प्रतिशुक्रमें बालक मनन करे तो विपत्ति । मृत्यु ) पाव. नवोढा बांझ होवे, गर्भिणी गर्भ रहित होवे । " अन्नं गते गुरौ शुक्रे सिंहस्थे जा बृहस्पतौ ! दीपोत्संबदिने चैव कन्या भर्तृगृहं विशेष ॥ १ . किसीका मत है कि, गुरु अस्त हो वा शुक्र अस्त हो वा सम्मुख दक्षिण हो वासिंहस्थ गुरु हो, इन दोषोंमें भी आवश्यकता होनेमें ( कन्या ) नववधू ( दीपोत्सव ) दीपमालिकाके ( २ दिन प्रथम २ पीछेके ) दिनम भर्ताके घर जावे तो दोष नहीं ।। २ ।। ( प्रहर्षिणी) प्रतिशुक्रापवादः। नगरप्रवेशविषयाद्युपद्रवे करपीडने विधतीर्थयात्रयोः । नृपपीडने नववधूप्रवेशने प्रतिभार्गवो भवति दोषकन्नहि ॥ ३ ॥ परचक्रागम राजविद्रोह आदि उपद्रवसे वनगरप्रवेश किंवा दुर्भिक्षादि दुःबसे अन्दन गमनमें जथा विवाहमें एवं नामोटवाना, देवयात्रा तीर्थयात्रा में राजाके निकालने में और नवविवाहिता कन्याके भर्ताक घर प्रवेश करनेमें संमुख दक्षिण शुक्रका दोष नहीं होता ॥३॥ ( मन्जुभाषिणी) (११२) मुहर्तचिन्तामणिः- [ अग्न्याधानप्र० पित्र्ये गृहे चेकुचपुष्पसम्भवः स्त्रीणां न दोषः प्रतिशुक्रसम्भवः । भृग्वगिरोवत्सवसिष्ठकश्यपात्रीणां भरद्वाजमुनेः कुले तथा ॥ ४ ॥ इति मुहूर्वचिन्तामणावष्टमं द्विरागमनप्रकरणम् ॥ ८॥ यदि कन्याके पिताके ही घरमें ( कुच) स्तन उग आवें तथा रजोदर्शन हो जावे तो प्रतिशुका दोष नहीं, उपलक्षणसे सूर्य गुरुशुद्धि भी नहीं। और भृगु अंगिरा वत्स वसिष्ठ कश्यप अत्रि भरद्वाज इन ऋषियोंके वंशमें अर्थात् उक्त गोत्रवालोंको भी प्रतिशुक्रका दोष कमी नहीं हैं ॥ ४ ॥ (इ. व०). इति श्रीमुहूर्तचिन्तामणौ महीधरकृतभाषाटीकायामष्टमं प्रकरणम् ॥ ८ ॥ अथाग्न्याधानप्रकरणम् ९ । अग्न्याधानमुहूर्तः । स्यादग्निहोत्रविधिरुत्तरगे दिनेशे मिश्रध्रुवान्त्यशशिशकमरेज्यधिष्ण्ये । रिक्तासु नो शशिकुजेज्यभृगौ ननोचे नास्तंगते न विजिवे नरशोहे ॥३॥ अग्न्याधानमुहूर्त-श्रौत स्मार्त कर्मानुष्ठान अग्निधारणको अग्न्याधान कहते हैं, वह कोई तो विवाहमें, केई पिता व भाईसे पृथक् रहनेसे करते हैं ।। सूर्यके उत्तरायणमें तवा मिन, ध्रुव रेक्ती, मृगशिर, ज्येष्ठा, पुष्य नक्षत्रोंमें अग्निहोत्र करना, परन्तु रिका ४।९।१४। तिथि न लेनी और चंद्रमा मंगल बृहस्पति शुक्र नीच राशिमें अस्तंगत तथा ग्रहयुद्ध में पराजित न हों शत्रुराशियों में भी न हों तो अग्न्याधान शुभ होता है ॥ १ ॥ (वसंतति०) नौ कनझपकुम्भनशिलग्ने नोऽब्जे तनौ रविशशीज्यकुजे त्रिकोणे । केन्द्र पनिभव पशिलाभपतश्चि िधनशुधियुले पिलले ॥२॥ कर्क, मकर, मीन, कुम्भ, लग्न वा नवांशक तथा लमका चंद्रमा ये न लेने चाहिये और सूर्य चन्द्र गुरु मंगल त्रिकोण ( ५।९) में १ । ४ । ७ । १० । ६ । ३ । ११ स्थानोंमें अन्य बु० शु० रा० के० ३ । ११ । ६ । १० स्थानों में हों तथा लमसे अष्टमभाव ग्रहरहित हो जन्मलम जन्मराशि अष्टम लम न हो तो उक्त कृत्य शुभ होता है ॥ २ ॥ (4० ति०, [राजा०प्र० १०.] भाषाटोकासमेतः। (११३) यामकर्तृत्वयोगाः । चापे जीवे तनुस्थे वा मेषे भौमेऽम्बरे धुने । षट्छ्यायेऽब्जे रखो वा स्याजातानिर्यजति ध्रुवम् ॥ ३॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ नवममन्याधानप्रकरणम् ॥ ९ ॥ उक्त आधानलम बृहस्पति सहित धन हो (१) अथवा मंगल मेषका दशम यद्वा सप्तम हो (२)वा चंद्रमा ३।६।११ में हो (३) सूर्य ३।६।११ हो (४) इन योगोंमें कोई भी हो तो अग्निहोत्रकर्ता निश्चयसे ज्योतिष्टोमादि यज्ञ करनेवाला होगा ॥३॥ ( अनु० ) इति श्रीमुहूर्तचिन्तामणौ महीधरकृतभाषाटीकायां नवममग्न्याधानप्रकरणम् ॥ ९ ॥ राजाभिषेकप्रकरणम् १०। राजाभिषेकमुहूर्तः । राजाभिषेकः शुभ उत्तरायणे गुविन्दुशुकैरुदितैर्बलान्वितैः । भौमार्कलग्नेशदशेशजन्मपैनों चैत्ररितारनिशामलिम्लुचे ॥१॥ राजाभिषेकमुहूर्त-उत्तरायणमें, बृहस्सति चंद्रमा शुक्रके उदय तथा बलवान् हुएमें मंगल सूर्य लग्नेश दशमेश के बलवान् हुएमें तथा जन्मलग्नेशके भी तत्काल बलवान् हुएमें राजाभिषेक शुभ होता होता है, । चैत्रका महीना. रिक्ता (१९।१४ ) तिथि मंगलवार और मलिनमास वर्जित करना । रात्रिमें भी रानाभिषेक न करना ॥ १ ॥ (इ० व०) अभिषेकनक्षत्राणि लमानि च । शाश्वक्षिप्रमृदुधंवोडुभिः शीर्षोदये वोपचये शुभे तनौ । पापैखिषष्ठायगतैः शुभग्रहैः केन्द्रत्रिकोणायधनत्रिसंस्थैः ॥ २॥ ज्येष्ठा श्रवण क्षिप्र मृदु ध्रुव नक्षत्रोंमें शीर्षोदय ३ ५।६।७।८।११। लमोंमें अथवा जन्म लअसे उपचय ३।६।१०।११ लमोंमें (शुभग्रह युक्त दृष्टोंमें) अथवा जन्मराशिसे उपचय सनोंमें, शुभग्रह केंद्र (१।४।७।१० (त्रिकोण (९।५) तथा ११।२।३ स्थानों में हों, पापग्रह (३ । ६ । ११) में हों, ऐसे मुहूर्तमें राजाभिषेक शुभ होता है ॥२॥(इन्द्रवंशा) अभिषेके विशेषः। पापैस्तनौ रुङ्ङ्गिधने मृतिः सुते पुत्रातिरर्थव्ययग्दरिद्रता । स्याखेज्यसो भ्रष्टपदो गुनाम्बुगैः सर्व शुभं केन्द्रगतैः शुभग्रहैः ॥ ३ ॥ ८ + (११४) मुहूर्तचिन्तामणिः। [यात्रा- लममें पापग्रह हों तो रोग होवे, अष्टम हो तो मृत्यु, पंचा हों तो पुत्रक्लेश, २ । १२ में हों तो धननाश ( दारिद्रय ), दशममें हों तो (आलस ) निरुद्यमता, ४ । ७ में हों तो ऐधर्यसे भ्रष्ट हो जावे (.६।८।१२ में चंद्रमा भी मृत्यु देताहै ) यदि शुभग्रह केन्द्र (१॥ ।१०) में हों तो सब शुभ होता है ॥ ३ ॥ इन्द्रवंशा) गुरुर्लनकोणे कुजोऽरौ सितः खे स राजा सदा मोदते राजलक्ष्म्या । तृतीयायगौ सौरिसूखें खबन्ध्वोर्गुरुश्चेदरित्री स्थिरा स्यान्नृपस्य ॥ ४ ॥ इति श्रीमुहूर्त्तचिन्तामणौ दशमं राजाभिषेकप्रकरणम् ॥१०॥ बृहस्पति लममें वा त्रिकोणमें हो, मंगल छठा, शुक्र दशम हो तो राजा सर्वदा राज्य लक्ष्मीके भोगसहित प्रसन्न रहे । सूर्य ११, शनि ३ में बृहस्पति १० वा ४ में हो तो राजाकी पृथ्वी ( राज्य ) स्थिर सर्वदा हस्तगत रहे ॥ ४ ॥ (भु० प्र०) इति श्रीमुहूर्तचिन्तामणौ महीधरकृतायां भाषाटीकायां दशमं राजाभिषेकप्रकरणम् ॥१०॥ यात्राप्रकरणम् ११। यात्राधिकारिणः । यात्रायां प्रविहितजन्मनां नृपाणां दातव्यं दिवसमबुद्धजन्मनां च । प्रश्नाद्यैरुदयनिमित्तमूलभूतैर्विज्ञाते ह्यशुभशुभे बुधः प्रदद्यात् ॥ १॥ इस प्रकरणमें राजाका ही उपलक्षण है, यह राजा सकल लोकहितकारी होनेसे तथा सर्व- बन श्रेष्ठ होनेसे है, मुहूर्तादि तो राजा भादि सभीको हैं. जिन राजाओंका छायाघटिकादियोंके बमसमय तत्काल लग्न कुंडलीस्थ शुभाशुभप्रहफलज्ञान है उनको यात्रामुहूर्त देना । जैसे-शुभ- फल दशा अंतरामें यात्रा करनी, आरिष्टमारका दि समयमें न करनी इत्यादि जातकोंमें लिखा जिनका जन्मसमय ज्ञात नहीं है उनको प्रश्न, उपश्रुति, शकुन आदि लक्षणोंसे शुभाशुम समय जानकर शुभ समयमें यात्राकर देना अशुभ अरिष्टादिमें न देना ॥ १॥ (प्रहाणी) यात्राप्रश्नादेः फलम् । जननराशितनू यदि लग्नगे तदधिपौ यदि वा तत एव वा । त्रिरिपुखायगृहं यदि वोदयो विजय एवं भवेदसुधापतेः ॥ २ ॥ १-याचा देशांतरगमनको कहते हैं,यह भी २ प्रकारकी है, एक युद्धविजयार्थ दूसरे अन्य बावशाव, बुद्धमें योग लनादिविशेष, अन्यमें पंचांगशुद्धि विशेष हैं।

प्रकरणम् ११.] भाषाटीकासमेतः। (११५) प्रथम प्रश्न है कि, यदि यात्राप्रश्नमें जन्मराशि जन्मलम प्रश्नमें हो तो राजाका विजय होगा अथवा उनके स्वामी लममें हों तो भी विजय हो। मथवा जन्मराशिलमसे ३१६ १० । ११ वां प्रश्नलम हो तो भी विजय ही होगा ॥ २॥ (दु०वि० ) रिपुजन्मलगभमथाधिपो तयोस्तत एव वोपचयसम चेद्भवेत । हिबुके धनेऽथ शुभवर्गकस्तनौ यदि मस्तकोदयगृहं तदा जयः ॥ यदि शत्रुके जन्मराशि जन्मलग्न प्रश्नलमसे ४ । ७ भावोंमें हो तो राजाकी जय हो, उनके स्वामी भी ऐसे ही जानने, तथा शत्रुके जन्मराशि लमसे उपचय ३ । ६ । ११ राशिप्रश्नल- मसे ४ । ७ में हो तो भी विजय हो प्रश्नलप्नमें शुभग्रहोंका नवांशादि षड्वर्ग हो वा शीर्णोदय राशि लममें हों तो भी विजय हो ॥ ३॥ (मं० भा० ) यदि पृच्छितनौ वसुधा रुचिरा शुभवस्तु यदि श्रुतिदशनगम् । यदि पृच्छति चादरतश्च शुभग्रहदृष्टयुतं चरलग्नमपि ॥४॥ बदि प्रश्नसमयमें भूमि रमणीय हो तथा ( शुभ वस्तु ) मांगल्यवस्वाभरणादि सुनने देख- नेमें आवे अथ च पूछनेवाला आदरपूर्वक नम्रतासे पूछे तो राजा ( यात्रावाले ) का विजय हो और प्रश्नादि लम चर १ । ४ । ७।१० शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट हों तो भी वही फल है ॥४॥ (त्रोटक) , अशुभफलदः प्रश्नः । विधुकुजयुतलग्ने सौरिदृष्टेऽथ चन्द्रे मृतिभमदनसंस्थे लग्नगे भास्करेऽपि । हिबुकनिधनहोरायूनगे वापि पापे सपदि भवति भङ्गः प्रश्नकर्तुस्तदानीम् ॥५॥ प्रश्नलग्नमें यदि चंद्रमा व मंगल हों, शनिकी दृष्टिं लमपर हो तो प्रश्नकर्ताका ( भंग) पराजय होता है तथा चंद्रमा व सूर्य ७। ८ भावमें हो तो भी वही फल है अथवा लममें चंद्रमा ७८ में सूर्य हो तो भी भंग ही है तथा पापग्रह ( ४ । ८।१।७) में हो तो भी वही फल होगा ॥ ५॥ ( मालिनी) यातृप्रभेन दिग्गमने लगादि । त्रिकोणे कुजात्सौरिशुक्रज्ञजीवा यदकोऽपि वा नो गमोऽकांच्छशी वा। बलीयांस्तु मध्ये तयोर्यो ग्रहः स्यात्स्वकीयां दिशं प्रत्युतासौ नयेच्च ॥६॥ जानेवाला कौन दिशा जायगा-मंगलसे त्रिकोण ( ९१५) में शनि शुक्र बुध बृहसति हों अथवा इनमेंसे एक भी हो तो जिस दिशा में जाना चाहता है वहां न जाया

(११६)
मुहर्तचिन्तामाणि:-
[यात्रा-
अथवा सूर्गसे ५९ में हों तो अभीष्ट दिशा न जायगा, उक्त प्रतिबंधकर्ता ग्रहों से
बो बलवान हो.बह अपनी दिशाको ले जायगा ॥ ६ ॥ (भु० प्र०
प्रश्ने गम्यदिगीशात्सेटः पञ्चमगो यः।
बोभूयादलयुक्तः स्वामाशां नयतेऽसौ ॥ ७ ॥
दूसरा योग-प्रश्नमें ( गम्य ) गमनके लिये निश्चित दिशाके स्वामीसे पंचम जो ग्रह है
वह बलवान् हो तो गम्य दिशा छुटाकर अपनी दिशाको अवश्य ले जाता है। दिगीश पूर्वा-
दिक्रमसे २० शु० भ० रा० श० चं० बु०६० हैं. और भी योग हैं कि शनि मंगल परसर,
सम सप्तम हों अथवा शनिराशिका मंगल, मंगलकी राशिका शनि हो अथवां शुक्र मंगल त्रिको
अमें हों तो इनमेंसे जो बली हो वह गम्य दिशाको छुटाकर अपनी दिशामें ले जाता है
॥ ७ ॥ ( मदलेखा)
यात्राकालविचारः।
धनुषसिंहेषु यात्रा प्रशस्ता शनिज्ञोशनोराशिगे चैव मध्या ।
रवौ कर्कमीनालिसंस्थेऽतिदीर्घा जनुः पञ्चसप्तत्रिताराश्च नेष्टाः ॥ ८॥
सूर्यके ९ । १।५ राशियोंमें होनेमें यात्रा शुभ होती है तथा १० । ११। ३।६।
२।७ राशियोंमें मध्यम, ४ । १२ । ८ । क सूर्यमें दीर्घ यात्रा अशुभ, लघु यात्रा
मध्यम होती है. सूर्य ८ प्रहरोंमें ८ ही दिशाओंमें रहता है, यात्रासमयमें सूर्यका पीठकी
ओर होना उत्तम होता है, यह प्राच्यसंमत है और यात्रामें जन्म पंचम तृतीय सप्तम तारा
भौं अशुम होती है ॥ ८॥ (भुजङ्गप्रयात )
न षष्ठी न च द्वादशी नाष्टमी नो सिवाया तिथिः पूर्णिमामा न रिता ।
यादित्यामिवेन्दुजीवान्त्यहस्तश्रवोवासवैरेव यात्रा प्रशस्ता ॥ ९ ॥
षष्ठी द्वादशी अष्टमी शुक्लपक्षप्रतिपदा पूर्णिमा अमावास्या रिक्ता ४।९।१४ तिथि
यात्रामें वर्जित हैं, अश्विनी, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा, पुष्य, रेवती, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा
नक्षत्रों में यात्रा शुभ होती है तथा शुभ वार शुभ हैं ॥ ९ ॥ (भुजङ्गप्र०)
वारशूल नक्षत्रशूली।
न पूर्वदिशि शाक्रभे न विधुसौरिवारे तथा न चाजपदभे गुरौ यम-
दिशीनदैत्येज्ययोः । न पाशिदिशि धातृभे कुजबुधेढयमझे तथा न.
सौम्यककुभि बजेत्स्वजयजीवितार्थी बुधः॥१०॥

प्रकरणम् ११.]
भाषाटीकासमेतः।
(११७)
दिशाशूल-पूर्वदिशा ज्येष्ठा नक्षत्र शनि सोमवारमें, एवं दक्षिण पूर्वाभाद्रपदा बृहस्पति,
पश्चिमदिशा शुक्र रविवार रोहिणी नक्षत्र, उत्तरदिशा मंगल बुधवार भरणी नक्षत्रमें जानेवाला
यदि धन एवं शत्रुसे जय और जीवित ( आयु) चाहे तो न जावे. इन वार नक्षत्रों में इन
दिशाओंमें दिशाशूल होता है ॥ १० ॥ (पृथ्वी)
कालशूल: ।
पूर्वाह्ने ध्रुवमिश्रभैर्न नृपतेर्यात्रा न मध्याह्नके तीक्ष्णाख्यैरपराह्नके न
लघुभैनों पूर्वरात्रे तथा । मिश्राख्यैनं च मध्यरात्रिसमये चोयैस्तथा
नो चरै राज्यन्ते हरिहस्तपुष्यशशिभिः स्यात्सर्वकाले शुभा ॥ ११ ॥
ध्रुव मिश्र नक्षत्रोंमें दिनके पूर्वाहमें यात्रा न करना, एवं तीक्ष्ण नक्षत्रोंमें मध्याहमें, लधुमें
अपराहमें, मिश्र नक्षत्रोंमें, पूर्वरात्रिमें, उम्र नक्षत्रोंमें, मध्यरात्रिमें, चर नक्षत्रोंमें, पिछली
रात्रिमें यात्रा न करना और श्रवण, हस्त, पुष्य, मृगशिर नक्षत्रों में समी काल आठों पहरोंमें
यात्रा शुम होती है ॥१२॥
निषिद्धानां भानां वयंघटिकाः।
पूर्वाग्निपित्र्यान्तकतारकाणां भूपप्रकृत्युपतुरङ्गमाः स्युः।
स्वातीविशाखेन्द्रभुजङ्गमानां नाड्यों निषिद्धा मनुसंमिताश्च ॥ १२॥
तीनों पूर्वाओंके पूर्वकी १६ घटी एवं कृत्तिकाकी २१ मघाकी ११ भरणीकी ७
स्वाती विशाखा ज्येष्ठा आश्लेषा चारोंकी १४ घटी आदिकी यात्रामें निषिद्ध हैं और घटी
शुभ होती हैं ॥ १२ ॥ (इ० ० )
पूर्वाईमाग्नेयमघानिलानां त्यजेछि चित्राहियमोचराईम् ।
नृपः समस्तां गमने जयार्थी स्वाती मघां चोशनसो मतेन ॥ १३ ॥
एवं कृत्तिका मघा स्वातीका पूर्वार्द्ध, चित्रा आश्लेषा भरणीका उत्तरार्द्ध और उशनाका
मत है कि, जय चाहनेवाला राजा स्वाती तथा मधा समस्त त्याग करे ॥ १३॥ (इ० व०)
तमोभुक्ततारा स्मृता विश्वसंख्याः शुभो जीवपक्षों मृतश्चापि ओग्याः ।
वदाक्रान्तभं कर्तरीसंज्ञमुक्तं ततोऽक्षेन्दुसंख्यं सवेदू अस्तनामः ॥ १४ ॥

१
(११८)
मुहूर्तचिन्तामणिः-
[बात्रा-
राड्ड बक्रगति है इसके भुक्क १३ नक्षत्र जीवपक्षसंज्ञक शुभकार्यकारक हैं, भाग्छ
२-३ नाचत्र मृलपक्षसंज्ञक हैं, जिसमें राहु बैठा है वह कत्तरीसंजक है, उस नक्षत्रसे १५
का नक्षत्र प्रस्तसंशक पुच्छ है ।॥ १४ ॥ (भु० प्र०)
जीवपक्षादीनां विशेषफलम् ।
मार्तण्डे मृतपक्षगे हिमकरश्चज्जीवपक्ष शुभा यात्रा स्याद्विपरीवगे
क्षयकरी द्वौ जीवपक्षे शुभा। ग्रस्तर्दा मृतपक्षतः शुभकरं प्रस्ताचथा
कर्तरी यायीन्दुः स्थितिमान् रविर्जयकरौ तो द्वौ वयोर्जीवगौ ॥१५॥
सूर्य मृतपक्षमें, चंद्रमा जीवपक्षमें हो तो यात्रा शुभ होती है, (विपरीत) सूर्य जीवपक्ष
और चन्द्रमा मृतपक्षमें हो तो हानिकारक होती है, यदि सूर्य चन्द्रमा दोनों जीवपक्षमें हों वो
शुभ, मृतपक्षमें हों तो अशुभ जाननी. मृतपक्ष नक्षत्रोंकी अपेक्षा प्रस्तनक्षत्र तथा प्रस्तनक्षत्रकी
अपेक्षा कचरीनक्षत्र कुछ शुभ है (जैसे मरे हुए मनुष्यसे मरनेको तैयार हो रहा मनुष्य कडा
अच्छा ही है ) यहां यही उदाहरण योग्य है. जो राजा अपने किलेमें बैठा है वह स्थायी,
बो शत्रुकी ओर जाता है वह यायी संज्ञक है, सूर्य जीवपक्षमें हो तो स्थायीका बय, चन्द्रमा
जीवपक्षमें हो तो यायोका जय, यदि सूर्य चन्द्र दोनों जीवपक्षमें हों तो दोनोंका जय अर्थात्
मिलाप होगा. सूर्य चन्द्र मृतपक्षमें हों तो दोनोंहीका पराजय अर्थात् दोनों पक्षकी हानि, लाम
किसीका नहीं, तथा सूर्य मृतपक्षमें चन्द्रमा जीवपक्षमें हो तो यायोका जय, चन्द्रमा मृतपक्षाने
सूर्व जीवपक्षमें हो तो स्थायीका जय, सूर्य राहुके नक्षत्रमें चन्द्रमा उससे १५ वेमें हो तो
बायीका थोड़ा जय, यदि चन्द्रमा राहुनक्षत्रमें सूर्य उससे १५ वेंमें हो तो स्थायीका स्वल
बय, दोनों राहुके नक्षत्रमें हों तो दोनोंकाही पराजय ( हानि ), यदि १५ में हों तो दोनोंका
ही जय (संधि ) हो, यह विचार सभी यात्रामोंमें है ॥ १५ ॥ (शा. वि)
अकुलकुलाइलकुलचक्रफलम् ।
स्वात्यन्तकाहिवसुपौष्णकरानुराधादित्यधुवाणि विषमास्तिथयोऽ-
कुलाः स्युः । सूर्येन्दुमन्दगुरवश्च कुटाकुला झो मूलाम्बुपेशविधिर्भ
दशपद्वितिथ्यः ॥ १६ ॥ पूर्वाश्वीज्यमधेन्दुकर्णदहनदीशेन्द्रचित्रा-
स्तथा शुक्रारौ कुलसंज्ञकाश्च तिथयोऽर्काप्टेन्द्रवेदैर्मिताः। यायी
स्पादकुले जयी च समरे स्थायी च वत्कुले सन्धिः स्यादभयोः
कलाकलगणे भमीशयोयंध्यतोः ॥ १७ ॥

किरणम् ११.] भाषाटीकासमेतः। (११९) स्वाती भरणी मालेषा धनिष्ठा रेवती हस्त अनुराधा पुनर्वसु तीनों उत्तरा रोहिणी नक्षत्र विषम तिथि १।३।५।७।९।११। १३ । १५, सूर्य चन्द्रमा शनि वृहस्पति- बार अकुल संज्ञक हैं तथा बुधवार, मूल शततारा आर्द्रा अभिजित् नक्षत्र १० १६२ तिथि कुलाकुलसंज्ञक हैं. तथा तीनों पूर्वा अम्धिनी पुष्य मघा मृगशिर श्रवण कृत्तिका विशाखाज्येष्ठा चित्रा नक्षत्र, शुक्र, मंगलवार, १२।८।१४४४ तिथि कुलसंज्ञक हैं, भकुलसंज्ञकोंमें युद्धयात्रा हो तो यायीका जय, कुलसंज्ञकोंमें स्थायीका जय, कुलाकुलसंज्ञकोंमें दोनोंका जय (संघि) हो ॥ १६ ॥ १७ ।। (व० ति०, शार्दू) पथि राहुचक्रम्। स्युर्धर्मे दस्रपुष्योरगवसुजलपदीशमैत्राण्यथार्थे याम्याजावीन्द्रकर्णादिविपितृपवनोडून्यथो भानि कामे । वह्नयादबुध्न्यचित्रानिऋतिविधिभगाख्यानि मोक्षेऽथ रोहि- ण्यय॑म्णाप्येन्दुविश्वान्तिमभदिनकराणि पथ्यादिराहो ॥ १८॥ अश्विनी पुष्य माश्लेषा धनिष्ठा शततारा विशाखा अनुराधा इन नक्षत्रोंको धर्म स्थानमें कि- खना, तथा भरणी पूर्वाभाद्रपदा ज्येष्ठा श्रवण पुनर्वस मघा स्वाती अर्थस्थानमें, कृतिका आर्दा उत्तराभाद्रपदा चित्रा मूल अभिजित् पूर्वाफाल्गुनी कामस्थानमें, एवं रोहिणी उत्तराफा- सुनी पूर्वाषाढा मृगशिर उत्तराषाढा रेवती हस्त मोक्षमार्गमें स्थापन करना, यह पथिराहु- चक्र है ॥ १८ ॥ (संग्धरा) पु. आ./ वि. अनु. घ. म.स्वा. ज्ये. श्र. पू. का. कृ. आ. पू.फा. चि. मू. अ.उ.भा. मो. | रो. मुं. उ.फा. इ. पू. पा.उ. पा. . राहुचक्राइफलम् । धमगे भास्करे वित्तमोक्षे शशी वित्तगे धर्ममोक्षस्थितिः शस्यते । कामगे धममोक्षार्थगः शोभनो मोक्षगे केवलं धर्मगः प्रोच्यते ॥ १९ ॥ धर्ममार्गमें सूर्य बर्थमार्ग वा मोक्षमार्गमें चन्द्रमा हो तो शुभ(१). यदि सूर्य धर्ममार्गमें चन्द्रमा धर्म वा मोक्षमार्गमें हो तो भी शुभ (२),अथवा काममार्गमें सूर्य,धर्ममार्गमें वा मोक्षमा- में चन्द्रमा हो तो भी शुभ (३.), अथवा मोक्षमार्गमें सूर्य, धर्ममार्गमें चन्द्रमा हो तो भी शुभ होता है (४.) (विपरीत ) जिस मार्गमें सूर्य कहा उसमें चन्द्रमा जिसमें चन्द्रमा कहा उसमें सूर्य हो तो अशुभ जानना । धर्ममार्गमें सूर्य चन्द्रमा भी हों तो समयुद्ध हो परस्त गोडा बायो जीते, धर्ममें चन्द्रमा हो तो बायोकी जय । धर्ममें सूर्य काममें श. अ. भ. पु.

- । (१२०) मुहूर्तचिन्तामणिः- [यात्रा- चन्द्रमा हो तो बांधवोंके साथ विरोष, धर्ममें सूर्य मोक्षमें चन्द्रमा शुभयुक्त भूमि- लाभ करता है । कर्ममें सूर्य, धर्म में चन्द्रमा शुभयुक्त रत्नलाभ करता है । काममें सूर्य धर्ममें चन्द्रमा शुभयुक्त धनलाभ, मूर्य चन्द्रमा काममें शत्रुयुक्त दुःख देते हैं । काममें सूर्य मोक्षमें चन्द्रमा शुभयुक्त रत्नलाभ, मोक्षमें सूर्य धर्ममें चन्द्रमा शुभयुक्त महालाभ; मोक्षमें सूर्य धनमें चन्द्रमा यात्रा सफल, मोसमें सूर्य काममें चन्द्रमा यात्रामें दुःख, सूर्य चन्द्र मोक्षमार्गमें घोर विघ्नकारक । यह पथिराहुचक्र यात्रादि समस्त कार्यों में विचारना ॥ १९ ॥ ( स्नग्धरा० )। तिथिचक्रं मात्रायाम् । पौषे पक्षस्यादिकाद्वादशैवं तिथ्यो माघादौ द्वितीयादिकास्ताः । कामात्तिस्रः स्युस्तृतीयादिवच्च याने प्राच्यादौ फलं तत्र वक्ष्ये ॥ २० ॥ सौख्यं क्लेशो भीतिरागमश्च शून्यं नैस्वं निःस्वता मिश्रता च । द्रव्यक्लेशो दुःखमिष्टाप्तिरों लाभः सौख्यं मङ्गलं वित्तलाभः ॥२१॥ लाभो द्रव्यानिधनं सौख्यमुक्त भीतिलाभो मृत्युरर्थागमश्च । लाभः कष्टं द्रव्यलाभः सुखं च कष्टं सौख्यं क्लेशलाभः सुखं च ॥ २२ ॥ सौख्यं लाभः कार्यसिद्धिश्च कष्टं क्लेशः कष्टासिद्धिरर्थों धनं च । मृत्युलाभो द्रव्यलाभश्च शून्यं शून्यं सौख्यं मृत्युरत्यन्तकष्टम् ॥ २३ ॥ तिथिचक्रं यात्रायाम् । पौ.मा. फा चै.वै. ज्ये आ |श्र भा.आ का मा. पूर्व दक्षिण पश्चिम १२/३/४/५/६/७/८/९/१०/११/१२ सौख्य ८/९/१०/१२/१२/ सौख्य । क्लेश भीति. अर्थागम ८९/१०/११/१२१ शून्य नःस्व्यानिःस्व. मिश्रता ८९/१०/११/१२ १/२ द्रव्यक्लेश दुःख इ.प्रा. अर्थ. ८.९१० लाभ सौख्य मंगल वित्तलाम ८९/१०/११/१२.१ ३४) लाभ द्र.प्र. धनप्रा. सौख्य. ६/७/८/९/१०/११.१२.११२३४५ ५/ भीति लाभ | मृत्यु./अर्थलाभ द.ला. ८/९/२०११/१२/१.२.३४/५/६/७ कष्ट कष्ट सौख्य क्लेश., सुख ९१०/२२२२१२३४५६सौख्य, लभ का.सि १०११/१२/१२३४५६८७ साकेश कष्ट केश कष्ट अर्थसि ८९.१० मृत्य लाभ द.ला. अन्य. १० शुन्य सिौख्य. मृत्यु. -अतिकष्ट" लाभ १ प्रकरणम् ११.] भाषाटीकासमेतः। (१२१) इन चार इलोकोंका अर्थ चक्रसे प्रकट होता है। पौष महीनेकी प्रतिपदादि १२ तिथि क्रमसे लिखनी, माघकी द्वितीयादि एवं फाल्गुन ३ चैत्र ४ वैशाख ५ ज्येष्ठ ६ आषाढ ७ श्रावण ८ भाद्रपद -९ आश्विन १० कार्तिक ११ मार्गशीर्षकी १२ से लिखना, त्रयोदशी तृतीयाके तुल्य, चतुर्दशी चतुर्थीके, पंचदशी पंचमीके तुल्य जानना, फल इनके पूर्वादिक्रमसे चक्रमें लिखे हैं वहीं जानने ॥ २०.-२३ ॥ (शा० ) तिथ्यृक्षवारयुतिरदिगजाग्नितष्टा स्थानत्रयेऽत्र बियति प्रथमेऽतिदुःखी । मध्ये धनक्षतिरथो चरमे मतिः स्यात्स्थानत्रयेऽप्युजि सौख्यजयो निरुक्तौ ॥ तिथि यहां शुक्लपक्षादि ली जाती हैं, तिथि नक्षत्र वार जोड्के ३ जगह रखना, एक जगह ७ से, दूसरे ८ से भाग लेना, प्रथममें शुन्य हो तो यात्री दुःखी हो, दूसरेमें शून्य हो तो धनहानि, तीसरेमें शून्य हो तो मृत्यु हो, यदि तीनों स्थानों में अंक हों तो सौख्य तथा जय हो ॥ २४ ॥ (वसन्ततिलका आडलभमणदोषौ। रवेभतोऽब्जभोन्मितिर्नमावशेषिता व्यगाः। महाडलो न शस्यते त्रिषण्मिता भ्रमो भवेत् ॥ २५ ॥ सूर्यनक्षत्रसे चन्द्रनक्षत्रपर्यन्त गिगना जितना हो उसमें ७ से भाग. दे। यदि ७ शेष रहे तो महाडलनामा दोष होता है, यह अच्छा नहीं है, यदि ३.। ६ शेष रहे तो भमणनामा दोष अशुभ होता है। इसमें यात्रा न करनी और आडल दोषमें समस्त शुभकृत्य वर्जित हैं ॥ २५ ॥ (प्रमाणिका) हिम्बराख्ययोगः। शशाङ्कभ सूर्यभतोत्र गण्यं पक्षादितिथ्या दिनवासरण । युतं नवाप्तं नगशेषकं चेत्स्याद्धिम्बरं तगमनेऽतिशस्तम् ।। २६... सूर्यनक्षत्रसे चन्द्रमाके नक्षत्रपर्यंत जितने हों उनमें प्रतिपदादि वर्तमान तिथि तथा वार नक्षत्र जोड़ ९ से भाग लेना, ७ शेष रहें तो हिम्बराख्य योग होता है यह अतिशुभ है, ये गुण दोष दाक्षिणात्योंमें प्रसिद्ध हैं ॥ २६ ॥ (. उ.० जा०) घातचन्द्रादयः । भूपञ्चाङ्कव्यङ्गदिग्वह्निसप्तवेदाष्टेशार्काश्च घाताख्यचन्द्रः। मेषादीनां राजसेवाविवादे यात्रायुद्धाये च नान्यत्र वर्ण्य २७ ॥

(१२२)
মুলাভালাঃ-
यात्रा-
पातचन्द्रमा नेवको मेक्का, वृक्षको कन्याका, मिथुनको११का,कर्कको ५का, सिंहको१.
का, कन्बाको ३ का, तुलाको ९ का, वृश्चिकको २ का, धनको १२ का, मकरको ५ का,
कुंभको ९ का, मीनको ११ का, चन्द्रमा घात होता है, यह घातसंज्ञक राजसेवा, विवाद,
बात्रा एवं युद्धमें वर्ण्य है; अन्य कार्यों में नहीं ॥ २७ ॥ ( शा.)
आग्नेयत्वाष्ट्रजलपपित्र्यवासवरौद्रभे ।
मूलबालाजपादत्रे पित्र्यमूलाजभे क्रमात् ॥ २८ ॥
रूपयग्न्यग्निभूरामध्यभ्यजाब्धियुगाग्नयः ।
घातचन्द्रे धिष्ण्यपादा मेषाद्वा मनीषिभिः ॥ २९ ॥
किन्ही आचार्योंका मत है कि-मेष राशिको सम्पूर्ण मेषमें घात नहीं किन्तु कृत्तिकाका
एक चरण घातक है, इसी प्रकार वृषको चित्राका २ चरण, मिथुनको शतभिषाका ३ चरण,
कर्कको मषाका ३ चरण, सिंहको धनिष्ठाका एक चरण, कन्याको आर्द्राका ३ चरण, तुलाको
मुलका २ चरण, वृश्चिकको रोहिणीका ४ चरण, धनको पूर्वाभाद्रपदाके अन्त्यका १ चरण,
मकरको मघाका ४ चरण, कुम्भको मूलका ४ चरण और मीनको पूर्वाभाद्रपदाका ३ चरण,
घातक होता है ॥ २८ ॥ २९ ॥ ( अनु०)
गोषीझपे घावतिथिस्तु पूर्णा भदा नृयुक्कर्कटकेऽथ नन्दा ।
कौव्जयोन घटे च रिक्ता जया धनुः कुम्भहरौ न शस्ताः ॥ ३० ॥
पाततिथि-वृष कन्या मीन राशियोंको पूर्णा ५। १० १५ तिथि मिथुन कर्कको भन्दा
।२।७। १२ तिथि, वृश्चिक मेषको नन्दा१ । ६ ।। ११ तिथि, मकर तुलाको रिक्ता
।४।९।१४ तिथि, धन कुंम सिंहको जया । ३। ८ । १३ । पाततिथि होती हैं. यात्रा
मुहमें बवित हैं ॥३०॥ ( उपजाति )
नक भौमो गोहरिखीषु मन्दश्चन्द्रो द्वन्द्वेऽर्कोऽजभे ज्ञश्च कक।
शुक्रः कोदण्डालिमीनेषु कुम्भे जूके जीवो घातवारा न शस्ताः॥ ३१ ॥
मकरको मंगल. वृषभको सिंह, कन्याको शनि, मिथुनको चन्द्र, मेषको रवि, ककको बुध,
बन वृधिक मीनको शुक्र, तुला कुंमको बृहस्पति घातवार हैं, यह यात्रा युद्धमें वनित हैं
॥ ३१ ॥ (शालिनी)
मघाकरस्वाावमत्रमूलश्रुत्यम्बुपान्त्यभम् ।
याम्यबादेशसार्प प मेपादेर्यातभं न सत् ॥.३२ ॥

प्रकरणम् ११.] भाषाटीकासमेतः । (१२३) घात नक्षत्र-मेषादि राशियों के क्रमसे १ को मघा २ हस्त ३ स्वाती ४ अनुराधा ५ मूक ६ श्रवण ७ शततारा ८ रेवती ९ भरणी १० रोहिणी ११ आर्दा १२ को आश्लेषा के बातनक्षत्र हैं, यात्रा युद्ध में वर्जित हैं ॥ ३२ ॥ ( अनु०:). भूमिद्वयध्यद्रिदिक्सूर्याङ्गाष्टाङ्केशाग्निसायकाः । मेषादिघातलमानि यात्रायां वर्जयेत्सुधीः ॥ ३३ ॥ मेव मादि राशिवालोंको अपनी अपनी राशिसे ये लम क्रमसे यात्रामें वर्जित हैं, जैसे-मेरको १, वृषको २, मिथुनको ४, कर्कको ७, सिंहको १०. कन्याको १२, तुलाको ६, वृश्चिकको ८, धनको ९, मकरको ११, कुम्भको २, मीनको ५ वीं लम निषिद्ध है ॥ ३३ ॥ (मनुष्टुर) घातचकम्. राशि मे.कृ.मि.क.सि.क. तु. वृ.ध.म.कुं.मी बन्द्र ११५२६१० ७/४/८/११/१२ रा.चं..श. श. वृ. शु. शु. म. वृ.शु. नक्षत्र म.ह.स्वाअ.मू. श्र.श.रे.भ.रो.आ आ तिथि | ८६९०८/१२/१०/२/१२/४।२ कृ. विशमध. आमू. म.मू. ५ |भा चरण ||२३|३|१||४|१४|४|३ म./मिकाम../सिमी मिसिकृ./मे.क. भा योगिनीवासादिविचारः। नवभूम्यः शिववह्नयोऽशधिश्वेऽर्ककताः शकरसास्तुरङ्गतिथ्यः। द्विदिशोऽमावसवश्च पूर्वतः स्युस्तिथयः संमुखवामगा न शस्वाः ॥ ३४ ॥ पूर्वमें ९ । १; भामेयमें ११ । ३, दक्षिणमें ५। १३, नैऋत्यमें १२ । ४, पविमने १४ । ६, वायव्यमें ७ । १५, उत्तरमें २।१०, ईशानमें ३० । ८ तिथि रहती हैं, इनीको योगिनी भी कहते हैं । मनुष्योंको संमुख वाम अशुभ, दक्षिणपृष्ठमें शुभ, पशुबोंको वाम पृह उभ, संमुख दक्षिण भाशुभ यात्रामें होती हैं ॥ ३४ ॥ (वैतालि० ) 226L भ ari coda [याना- नयामाख्ययोगा। कोरीतो परायेन कालो बरिऽकांचे संमुखे तस्य पाशः । रात्रावेतो वैपरीत्येन गण्यौ यात्रायुद्धे संमुखे वजनीयौ ।। ३५ ॥ रविवारको उत्तर दिशा काल चं० बायज्य मं० पश्चिम बु० नैर्ऋत्यमें वृ० दक्षिण शुरु आमेय श० पूर्वमें काल होता है, जिस दिशा में काल हैं उसके संमुख पांचवीं दिशामें पाश होता है, जैसे-शनिको पूर्व में काल है तो पश्चिममें पाश होगा, रात्रिमें (विपरीत) जिस दिशामें काल उसमें पाश, पाशवाली में काल जानना, संमुख काल तथा पाश यात्रामें अशुभ होते हैं, दक्षिण शुभ होते हैं, कहा भी है कि, "दक्षिणस्थः शुभः कालः पाशो बामदिशि स्थितः शुभः" इत्यादि । और योगिनी राहुसहित दक्षिण तथा पृष्ठगत हो तो लक्ष शत्रुको मारता है, यह स्वरोदयमें लिखा है कि "दक्षे पृष्ठे योगिनी राहुयुक्ता गच्छेयुद्धे शत्रुलक्ष निहन्ति” खण्डरा भासराड्ड वारराहु यामार्द्धराहु ग्रन्थान्तरोंमें सविस्तर कहे हैं ॥ ३५ ॥ (शालिनी) कालपाशः । चं. मं. शु. श. वार. उ. वा. प. नै. आ. यू. काल आ. पू. ई. उ. वा. पूवादिषु चतुर्दिक्षु सप्त सप्तानलक्षतः। वायव्यानेयदिक्संस्थ परिषं न विलङघयेत् ॥ ३६ ॥ चतुष्कोण चक्रमें कृत्तिकादि ७ नक्षत्र पूर्वमें, मघादि ७ दक्षिणमें, अनुराधादि ७ पश्चिममें, धनिष्ठादि.७ उत्तरमें, आग्नेय वायव्यकोणगत एक रेखा देनी; यह परिघदंड है, इसका उल्लंघन न करना, जो नक्षत्र जिस दिशामें हैं उनमें उस दिशाकी यात्रा शुभ होती है, पूर्व उत्तरगत नक्षत्रोंमें दक्षिण पश्चिम यात्रा तथा दक्षिण पश्चिमस्थ नक्षत्रोंमें पूर्वोत्तर यात्रा न करनी, इसमें परिघदंडका उल्लंघन होता है ॥ ३६ ।। १ “भानि स्थाध्यान्यधिदिक्षु" इति पीयूषधारासम्मतः पाठः।

प्रकरणम् ११.] भाषाकासमेतः। (१२५) परिषदंड. ई. आ. पू. कृ. रो. मृ. आ. पु. पु. आ. स. द . ध. श. पू. उ. रे. अ. भ. म. पू. उ. ह. चि. स्वा. वि. 'Ye He Bhole वा. विदिक्षुगमने नक्षत्राणि परिघापवादश्च । अग्नेर्दिशं नृप इयात्पुरुहूतदिग्भैरेवं प्रदक्षिणगवा विदिशोऽथ कृत्ये । आवश्यकेऽपि परिचं प्रविलय गच्छेच्छूलं विहाय यदि दिक्तनुशु- डिरस्ति ॥ ३७ ॥ विदिशाओंके लिये कहते हैं कि-पूर्वदिशागमनोक्त नक्षत्रोंमें आनेय, दक्षिणोक्तोंमें नत्य, पश्चिमोक्तोंमें वायव्य, उत्तरोक्तोंमें ईशान-यात्रा राजा करे,आवश्यक कृत्यमें परिध- दंड-उल्लंघन करके भी यात्रा करनी परन्तु वारशूल, नक्षत्रशूल न हों और दिग्लप्मशुद्धि हो, १। ५ । ९ पूर्व, २।६।१० दक्षिण, ३ । ७ । ११ पश्चिम, ४ । ८ । १२ उत्तर गत राशि हैं, इनकी " शुद्धिः " संमुख दक्षिणादि तथा इनके अंशादिकोंकी भी होनी चाहिये ॥ ३७ ॥ (वसन्ततिलका) मैत्रार्कपुष्याश्चिनभैनिरुक्ता यात्रा शुभा सर्वदिशासु तज्जैः । वक्री ग्रहः केन्द्रगतोऽस्य वर्गो लग्ने दिनं चास्य गमे निषिद्धम् ॥ ३८॥ अनुराधा हस्त पुष्य अश्विनी नक्षत्र विम्द्वारिकसंज्ञक हैं, ज्योतिष जाननेवाले आचार्योने इनमें सभी दिशाओंकी यात्रा शुभ कही है. यात्रा लग्नसे वक्री ग्रह केंद्रमें हो तो न लेना ध्या वक्री ग्रहका लग्न, नवांशक और वार भी न लेना, यात्रा भंग करता है।॥३८॥(इन्द्रवजा)

( ११६)
গুবানা:-
[यात्रा-
जाना, इससे
॥
अयनशूलः।
सौम्यायने सूर्यविधूतदोत्तरां प्राची ब्रजेत्तौ यदि दक्षिणायने ।
प्रत्यग्यमायां च तयोर्दिवानिशं भिन्नायनत्वेऽथ वधोऽन्यथा भवेत् ॥ ३९॥
जब सूर्य चन्द्रमा उत्तरायणमें हों तो उत्तरपूर्वक दिग्यात्रा शुभ और दक्षिणायनमें हों तो
पश्चिम दक्षिणयात्रा शुभ होती है। यदि सूर्य चन्द्रमा भिन्न अयनोंमें हों तो जिस अयनमें
सूर्व है उसके उत्तर दक्षिण दिशामें दिनमें, जिस अयनमें चंद्रमा है उसकी उक्त दिशासें रात्रिमें
अन्यथा यात्राकरे तो मरण हो ३९ ॥ ( इ० )
त्रिधा शुक्रसम्मुखता।
उदेति यस्यां दिशि यत्र याति गोलभ्रमाद्वाथ ककुब्भसङ्के ।
त्रिधोच्यते संमुख एव शुक्रो यत्रोदितस्तां तु दिशं न यायात् ॥४०॥
मुनियोंने-शुक्र संमुख तीन प्रकारसे कहा है, जिस दिशामें पूर्व पश्चिम उदय होरहा है
उस दिशा जानेमें (१) अथवा गोलभमणसे दक्षिणगोल वा उत्तरगोल जहां हो उस दिशामें
सम्मुख होता है ॥ २ ॥ अथवा (ककुभचक्र ) पूर्वादि कृत्तिकादि पूर्वोक्त दिननक्षत्रों में
जिसमें शुक्र है वह नक्षत्र जहां है उधर संमुख होता है (३) इन ३ प्रकारोंमें उदयवाला
प्रकार मुख्य है, जिस दिशामें उदय हो उस दिशामें न जाना । आवश्यकमें सम्मुख शुक्रकी
शांति सविस्तर वसिष्ठसंहितामें है, उससे भी असमर्थोंको दीपिकामें दान लिखा है कि-
सितं वस्त्रं सितं छत्रं हेममौक्तिकसंयुतम् । ततो द्विजातये दद्यात्प्रतिशुक्रप्रशान्तये ॥ १॥
मर्थात् श्वेतवस्त्र श्वेवच्छत्र सुवर्ण मोती विधिपूर्वक ब्राह्मणको प्रतिशुक्रकी दोषशांतिके लिये दान
देव ॥ ४० ॥ ( उपजाति)
तद्वक्रास्तादिदोषः सापवादः।
वक्रास्तनीचोपगते भृगोः सुते राजा बजन यावि वशं हि विद्विषाम् ।
बुधोऽनुकुलो यदि तत्र सञ्चरन् रियूजयेन्नैव जयः प्रतीन्दुजे ॥ ४१ ॥
शुक्रके वक्र, अस्त, नीचत्वगत हुएमें ( तथा युद्धके पराजित हुएमें ) राजा जावें तों
अवश्य शत्रुके वश ( बंधन ) में हो जावे, परन्तु यदि शुक्रके वक्रादिमें बुध अनुकूल (पृष्ठ)
हो तो शत्रुको जीत लावे,एवं भौम बुध शुक्रके (पति) संमुखमें तुल्य फल है॥४१॥(उपजाति)
प्रतिशुक्रापवादः ।
यावच्चन्द्रः पूषभाकत्तिकाये पादे शुक्रोऽन्धो न दुष्टोऽयदक्षे ।
मध्येमार्ग भार्गवास्तेऽपि राजा तावत्तिष्ठेत्संमुखत्वेऽपि तस्य ॥ ४२ ॥

प्रकरणम् ११.] भाषाटीकासमेतः। (१२७) जब चन्द्रमा रेवतीसे कृत्तिकाके प्रथमचरणपर्यंत रहता है उन दिनों शुक्र अंधा कहाता है इसलिये (दृश्यफल ) संमुख दक्षिण होनेको दुष्ट फल नहीं करता और दीर्घ यात्रामें यात्रा करके यदि मार्गमें शुक्र अस्त हो जावे तो उसके उदयपर्यन्त उसी यात्रामें राजा रहे, जब उदय हो तब उसे पृष्ठदिशामें करके यात्रा पूर्ण करे, ऐसे दक्षिण संमुखमें भी है कि, यदि मुहूर्तमें प्रस्थान करके अनंतर सफर पूर्ण न होनेपर ही संमुख दक्षिण शुक्र हो जावे तबलों उसी सफरमें रहे जबलों वामपृष्ठ होता है, यदि ऐसे ही मार्गमें बुधास्त हो तो दोष नहीं, परंतु बुध उदय होके संमुख हो नावे तो दोष है, पुनः अस्तपर्वन्त मार्गमें रहे ॥ ४२ ॥ ( शालिनी) अनिष्टलयम् । कुम्भकुम्भांशको त्याज्यौ सर्वदा गमने बुधैः । वत्र प्रयातुनृपतेरर्थनाशः पदे पदे ॥४३॥ यात्रामें कुम्भलम कुंभांशक जाननेवालोंने सर्वदा त्याग किये हैं, यदि इनमें राजा यात्रा करे तो पद पद चलनेमें धन वा प्रयोजन नाश हों ॥ ४३ ॥ ( अनु० ) अथ मीनलग्न उत वा तदंशके चलितस्य वक्रमिह वर्म जायते। जनिलमजन्मभपती शुभग्रहौ भवतस्तदा तदुदये शुभी गमः ॥ ४४॥ मानलम मीनांशकमें राजा गमन करे तो मार्गसे लौट भाना हो, जन्मलग्नेश, जन्मरा- शीश शुभग्रह लग्नमें हों तो उस लग्नमें गमन शुभ होता है, जो वे पापग्रह भी हों तथापि गमनलग्नमें शुभ होते हैं और जन्मनक्षत्र जन्मराशि भी यात्रालग्नमें शुभ कही है॥ ११ ॥ (मन्जुभाषिणी) जन्मराशितनुतोष्टमेऽथवा स्वारिभाञ्च रिपुमे तनुस्थिते । लग्नगास्तदधिपा यदाथवा स्युर्गतं हि नृपतेर्मृतिप्रदम् ॥ ४५ ॥ जन्मराशि जन्मलग्नसे मष्टम राशि लममें तथा स्वकीय शत्रुकी जन्मराशि जन्मसे छठी राशि यात्रालग्नम हो अथवा अपने जन्मराशिलग्नसे अष्टममें शत्रुकी जन्मराशि लग्नोंसे छठे उनके स्वामी यात्रालग्नमें हों तो यात्रामें रानाकी मृत्यु हो, ग्रन्थान्तरों में जन्मराशि लमसे व्ययराशि भी अशुभ कही हैं ॥ १५ ॥ (रथोद्धता) लग्ने चन्द्रे वापि वर्गोत्तमस्थे यात्रा प्रोक्ता वाञ्छिताथकदात्री। अम्भोराशौ वा तदंशे प्रशस्तं नौकायानं सर्वसिद्धिप्रदायि ॥ ४६ ॥ मीन कुम्भको छोड़कर लम वर्गोत्तममें हो अथवा चन्द्रमा वर्गोत्तममें हो तो यात्रा मनोवांछित देनेवाली होती है । जलचरराशि लममें हो अथवा जलचर जन्मराशि , (१२८) मुहूतेचिन्तामाणे:- L:यात्रा- लानोंसे छठे उनके स्वामी यात्रालपमें हो तो आत्रामें राजाकी मृत्यु हो ग्रन्थांतरोंमें जन्मराशि लमसे व्ययगशि भी अशुभ कही है।॥ ४६॥ (शालिनी) दिग्द्वारभे लग्नगते प्रशस्ता यात्रार्थदात्री जयकारिणी च । हानि विनाश रिपुतो भयं च कुर्यात्तथादिक्प्रतिलोमलग्ने ॥ ४७ ॥ दिग्द्वारलमोंमें यात्रा शुभ धन एवं जय करती है, दिग्द्वार १ । ५ । ९ पूर्व, २ । ६। १० दक्षिण, ३ ! ७।११ पश्चिम, ४ । ८ । १२ उत्तरके हैं, जो प्रतिलोमलम जैसे १।५।९। पश्चिम, ४ । ८ । १२ दक्षिण इत्यादि हों तो हानि धननाश वा शत्रुसे भय हो ॥ ४७ ॥ (इन्द्रवज्रा) शुभलमानि । राशिः स्वजन्मसमये शुभसंयुतो यो यः स्वारिभानिधनगोऽपि च वेशिसंज्ञः । लग्नोपगः स गमने जयदोऽथ भूपयोगर्गमो विजयदो मुनिभिः प्रदिष्टः ॥४८॥ यात्रीके जन्मसमयमें जो राशि शुभग्रहोंसे युक्त हो वह यात्रालग्नमें जय देती है । अथवा शत्रुके राशिलग्नसे अष्टमराशि यात्रालग्नमें हो तथा जो राशि (वेशि ) सूर्यराशिसे दूसरी राशि : यात्राके लग्नमें हो तो विजय देती है। अथवा जातकोक्त राजयोग यात्रामें हो तो वह यात्रा जय देनेवाली मुनियोंने कही है ॥ ४८ ॥ ( व० ति०.) दिस्वामिनः। सूर्यः सितो भूमिसुतोऽथ राहुः शनिः शशी ज्ञश्च बृहस्पतिश्च । प्राच्यादितो दिक्षु विदिक्षु चापि दिशामधीशाः क्रमतः प्रदिष्टाः ॥४९॥ क्रमसे दिशा विदिशाओंके स्वामी कहते हैं कि,पूर्वका सूर्य, आग्नेयका शुक्र,दक्षिणकामंगल, नैर्ऋत्यका राहु, पश्चिमका शनि, वायव्यका चन्द्रमा, उत्तरका बुध, ईशानका बृहस्पति दिगीश हैं ॥ ४९ ॥ ( उपजाति) दिगीशप्रयोजनम् । केन्द्रे दिगधीशे गच्छेदवनीशालालादिनि तस्मिन्नेयादरिसेनाम् ॥ ५० ॥ दिगीश यात्रालासे केंद्रमें हो तो राजा यात्रा करे परंतु उस दिगधीशपर लालाटिक (वक्ष्यमाण) हो तो शत्रुसनामें न जावे ॥ ५० ॥ (तनुमच्या ) लालाटिको योगः। पाच्यादौ वरणिस्तनौ भृगसुतो लाभव्यये भूसुतः कर्मस्थोज्य तमो नवाष्टमगृहे सौरिस्तथा सप्तमे । चन्द्रः शत्रुगृहात्मजेऽपि च बुधः पातालगो गीष्पतिर्वितभ्रातृगृहे विलग्नसदनालालाटिकाः कीर्तिताः ५१॥..

chori शसस प्रकरणम् ११. भाषाटीकासमेत (१२९ लग्न के सूर्य में पूर्वको लाळाटिक तथा शुक्रके ११ भावम होनेसे आग्नेयको और दशम मंगल क्षिणको. ८ । भावमें राहु नम्रत्यको, शनि सप्तम पश्चिमको, चन्द्रमा ६ । में वायव्यको, बुध चतुर्थ उत्तरको, बृहस्पति २ । ३ में इश नको लालाटिक योग होता है. लालाटिक विकलवानीको वा छोड़क यात्रा करनी ॥५१॥ ( शादैले० ) पर्युधियात्रायोगचतुष्टयन् । मृगे गत्वा शिये स्थित्मादिता गच्छजयेनिन । मैत्रे प्रस्थाय शाके हि स्थित्वा नृले वजन्तथा ॥ १२ ॥ प्रस्थाय हस्तेऽनिलतक्षधिष्ण्ये स्थित्वा जयार्थी प्रवसेद्विदेवे । वस्वन्त्यपुष्ये निजसीम्नि चैकरात्रोषितः क्षमा लभतेऽवनीशः ॥५३॥ मृगशिरमें अपने घरसे दूसरे घरमें जाकर आमें वहीं हे तव पुनर्वसुमें ग्रामसे बाहर गमन करे तो शत्रुको जीतसा है ( १ ) अनुराबारे प्रस्थान; ज्येष्ठामें स्थिति मूल में गमन (२) हस्तमें प्रस्थान; चित्रा स्वातीमें स्थित रहकर विशाखा में गमन (३) ये तीन योग जय देनेवाले हैं तथा धनिष्ठा रेवती पुयां चलकर अपने नगरके अन्त्यमें एक रात्रि रहन आगे जाये तो सवा शत्रु भूनि जीते .. ५ ॥ ५३ ।। ( अनु० तथा इन्द्रवज्ञा) समयबलम् । उषःकालो विना पूर्वी गोधूलिः पश्चिमां विना । विनोत्तरां निशीथः सन् याने याचा विलाभिजिन् ॥ ५४॥ उषःकाल, पूर्व. गोधूलिमें पश्चिम, अर्द्धर त्रिने इत्ता, मध्य हमें दक्षिम यात्रा न करना । प्रयोजन यह है कि, सूर्य ८ दिशामों में आठौं प्रहम रहता है वह सम्मुरू न होना चाहिये ।। ५? ॥ ( अनु०) समादिभावानां संज्ञा लग्नाद्भावाः क्रमादेहकोशधानुष्कवाहनम् । मन्त्रोऽरिर्मार्ग आयुश्च हृव्यापारागमव्ययाः । '३'३ ।। क्रमसे १२ भावोंके नाम- देह १ कोश (धन)२ धानुक ३ वाहन ४ मन्त्र ५ अरि ६ मार्ग ७ आयु ८ अदय ९ व्यापार १० आगम ११ व्यय १२ भावोंकी संज्ञा ये हैं इनमें शुभयोग दृष्टिसे शुभफल यथासंज्ञकोंको होता है ॥ ५५ ॥ ( अनु० ) मुहूतेचिन्तामाणे:- [ यात्रा- यात्रालग्ने लमादिद्वादशभावस्थितग्रहफलम् । केन्द्रे कोणे सौम्यखेटाः शुभाः स्युर्याने पापाख्यायषट्खेषु चन्द्रः । नेष्टो लग्नान्त्यारिरंधे शनिःखेऽस्ते शुक्रो लग्नेड्नगान्त्यारिरन्ध्रे ॥५६॥ शुभग्रह केन्द्र (१। ४ । ७ । १०) कोण (५।९ ) में, पापग्रह ३।११।६।१० में, चन्द्रमा १ । १२ । ६ । ८ रहित स्थानमें. शनि १० रहित भावोंमें, शुक्र ७ रहित भावों में शुभ फल देते हैं. अन्योंमें अशुभ फल यात्रामें देते हैं तथा लग्नेश ७ । १२ ६ ! ८ भावोंमें मृत्यु फल देता है. प्रत्येक ग्रहोंके फल भावचक्रमें हैं ।। ५६ ॥ ( शा० ) योगयात्राविचारः। योगासिद्धिर्धरणिपतीनामृक्षगुणैरपि भूदेवानाम् । चौराणां शुभशकुनैरुक्ता भवति मुहूर्तादपि मनुजानाम् ॥ ५७ ॥ राजाओंके यात्रालग्नसे वक्ष्यमाण सहित योगोंसे तिथ्यादि अयोग्य हुएमें भी सिद्धि होती है, ब्राह्मणोंको ( नक्षत्रगुण) चन्द्रताराबलादिसे, चौरोंको केवल शुभा- शुभ शकुनसे ही तथा शिवालिखितसे भी, अन्य जनोंको ( मुहूर्त) शिवालिखित तथा उद्वेगादि वेलाओंमें सिद्धि होती है. यहां ब्राह्मण द्विजातिके अर्थ में है यह पद ब्राह्मणोंसे क्षत्रिय वैश्य तीनोंका बोधक है तथा जिनको जो सिद्धिद ( जैसे राजाओंको योग) कहे हैं इनमें भी दिक्शूलादि मुख्य दोष भद्रा रिक्ता आदि पंचांगदोष विचार सर्वथा मुख्य ही है ।। ५७ ।। ( पादाकुलकम् ) यात्रालग्नवशाद्रभावफलचक्रम्. बृहस्पति अने.कष्ट क्षुधादिरोग AUTOmanuman muPREntre चंद्रमा मंगल शुक्र शनि सूर्य २ अनेककष्ट भनहानि भनेककष्ट अनंककष्ट सुख सुख धर्माविलाभ सुख धर्मादिलाभ बंधन प्रियसंग मृत्यु उत्पात पुत्रलाभ कोर्सि Mardees लाम सौख्य आयु वृद्धि भोग भय मथ सिद्धि शत्रुनाश अर्थसिद्धि सदि शनाश सिद्धि शुम हानि भय ar लाभ शत्रुहानि धन हानि शत्रुहाना नाश মিয়াম siness सुख शत्रुदि शत्रुवृद्धि म नेमज्य शत्रुवृद्धि ९ अशम भशुभ धनश्री खीलाभ नाश रक्षा अर्थसिद्धि भय श्री (धनम) अतिसौख्य उपद्रव शुभ राम्य लाभी दीघरोग वैगनोद कीर्ति शत्रुक्षय सोकय धनहानि धनहानि मृत्य पुष्टि कामद ११ लाम १२ रात्रवृद्धि धनहानि

प्रकरणम् ११.
भाषाटीकासमेतः ।
(१३१)
सहजे रबिदेशमभे शशी तथा शनिमङ्गलौ रिपुगृहे सितः सुते ।
हिबुके बुधो गुरुरपीह लग्नगः स जयत्यरीन् प्रचलितोऽचिरान्नृपः॥५०॥
यात्रायोग लग्न-तीसरा सूर्य, दशम चन्द्रमा, छठे शनि मंगल, पंचम शुक्र, चतुर्थ बुध,
लममें वृहस्पति हों ऐसे योगमें राजा यात्रा करे तो थोड़े ही समयमें शत्रुको जीतता
है ॥ ५८ ॥ ( मन्जु०)
भातरि सौरिभूमिसुतो वैरिणि लग्ने देवगुरुः ।
आयगतेऽर्के शत्रुजयश्चेदनुकूलो दैत्यगुरुः ॥ ५९ ॥
तीसरा शनि, छठा मंगल, लग्नमें बृहस्पति, ग्यारहवां सूर्य हो ऐसे योगमें यदि शुक्र
अनुकूल (पृष्ठगत) हो तो यात्री शत्रुको जीते ॥ ५९ ॥ (गाथा)
तनौ जीव इन्दुमृतौ वैरिगोऽर्कः । प्रयातो महीन्द्रो जयत्येव शत्रून् ॥ ६०॥
लग्नमें बृहस्पति. आठवां चंद्रमा, छठा सूर्य हो तो राजा सभीको जीते ॥ ६० ॥ (गाथा )
लग्नगतः स्यादेवपुरोधाः । लाभधनस्थैः शेषनभोगैः ॥ ६॥
यात्रालग्नमें बृहस्पति हो, अन्य ग्रह ११ । २ मे हों तो राजाका विजय होवे ।।
॥ ६१ ॥ ( सुप्रतिष्ठायां पङ्क्ति छन्दः)
यूने चन्द्रे समुदयगेऽर्के जीवे शुक्रे विदि धनसंस्थे ।
ईदृग्योगे चलति नरेशो जेता शत्रून् गरुड इवाहीन् ॥ ६२ ॥
सप्तमस्थानमें चन्द्रमा, लग्नमें सूर्य और बृहस्पति बुध शुक्र दूसरे भावमें हों इस
प्रकारके योगमें राजा चले तो सर्पोको गरुड जैसा वैसा गजा शत्रुओंको जीते ॥
॥ ६२ ॥ ( पङ्क्तौ मत्ता)
वित्तगतः शशिपुत्रो भ्रातरि वासरनाथः
लग्नगतो भृगुसुतः स्युः शलभा इव सर्वे ॥ ६३ ॥
बुध धनस्थानमें सूर्य तीसरा, शुक्र लग्नमें हो ऐसे योगमें राजा यात्रा करे तो उसके
शत्रु (शम्भ ) टीड़ी जैसे आपही उडकर अग्निमें भम्म हो जाते हैं ऐसे उडजावें
युद्ध भी न करना पडे ।। ६३ ।। ( अनु० चित्रपदा)
उदये रवियदि सौरिररिगः शशी दशमेऽपि ।
वसुधापनियदि याति रिपुवाहिनी वशमेति ॥ ६४ ॥

-
।यात्रा-
(१३२)
मुर्तचिन्तामणिः-
लग्नमें लुये, छठा शनि, दशम चन्द्रमा हो ऐसे योगमें राजा गमन करे तो शत्रुसेनाको
अपने वशमें कर लेथे ॥ ६४ ।। (माथा)
तनौ शनिकुजौ रविर्दशमभे बुधो भृगुप्लुतोऽपि लाभदशमे ।
त्रिलाभरिपुभेषु भूतशनी गुरुज्ञभृगुजास्तथा बलयुताः ॥६५॥
लग्नमें-शनि मंगल, दशम सूर्य, १० । ११ में बुध शुक्र हो ३ । ११ । ६
इन स्थानों में मंगल शनि हों और पत्रकुत्र स्थित बृहस्पति बुध शुक्र बलयुत हों ऐसे
योगों में राजा यात्रा करे तो विनय भावे । ५ ( जगत्यां जलोद्धतगतिः )
समुदयगे विश्वगुरौ मदनगते हिनकिरणे ।
हिबुकगतौ बुधभृगुजौ सहजगताः खलखचराः ॥ ६६ ॥
लममें बृहमति, सप्तममें चंद्रमा, चतुर्थ बुध शुक्र, तीसरे पापग्रह हों ऐसे योगमें
राजा यात्रा करे तो विजय होवे ॥ ६६ ॥ (गाथा
त्रिदशगुरुस्तनुगो मदने हिमकिरणो रविरायगतः।
सिवशरािजावपि कर्मगती रविसुतभूमिमुतौ सहजे ॥ ६७
लग्नमें बृहस्पति, सप्तम चन्द्रमा, ११ में सूर्य, १० बुध शुक्र, तीसरे शनि मङ्गल
हों ऐसे योग भी वही फल है ।। ६७ ।। (त्रिष्टुम्, सुमुखी)
देवगुरौ या शशिनि तनुस्थे वासरनाथे रिपुभवनस्थे।
पञ्चमगेहे हिमकरपुत्रः कर्मणि सौरिः सुहृदि सितश्च ।। ६८ ॥
बृहस्पति अश्या चन्द्रमा लग्न, सूर्य काठः बुध पञ्चम, शनि दशम, शुक्र चतुर्थ हो
ऐसे योग याजा करनेवाले शाजाको जय होवे ॥ ६८ ॥ (श्रीछंदः
हिमकिरण तो बली चेत्तनौ त्रिदशपतिगुरुर्हि केन्द्रस्थितः ।
व्ययगृहसहजारिधर्मस्थितो यदि च भवति निर्जलश्चन्द्रमाः ॥ ६९ ॥
बलवान् बुध लग्न में, बृहस्पति केन्द्र तथा बलरहित चन्द्रमा १२ । ३ । ६ । ९ में
हो तो इस योगका भी यात्रा पूर्वोक्त ही फल हैं ।। ६० ॥ (ज० प्रमुदितवदना)
अशुभखगैरनवाष्टमदस्थैर्हिबुकसहोदरलाभगृहस्थः।
कविरिह केन्द्रगगीष्पतिदृष्टो वसुचयलाभकरः खलु योगः ॥ ७० ॥

१ प्रकरणम् ११. भाषाटीकासमेतः । पापग्रह ९ । ८ १७ रहित स्थानोंमें; शुक्र ४ । ३ । ११ में हो इसे केन्द्रस्थ बृहस्पति देखे ऐसे योगमें राजा यात्रा करे तो धनका समूह एवं विजय मी निले||७०६ (अभिनवतामरसा) रिपुलग्नकर्महिबुके शशिजे परिवीक्षिते शुभनभोगमनैः । व्ययलग्नमन्मथगृहेषु जयः परिवर्जितेष्वशुभनामधरैः ॥ १ ॥ बुध ६।१।१०।४में शुभ ग्रहोंसे दृष्ट हो १२:११७ भावोंसे रहित स्थानोंमें पापग्रह हों ऐसे योगमें राजा यात्रा करे तो विजय पावे ॥ ७१ ॥ (जगत्यां प्रमिताक्षरा) लग्ने यदि जीवः पापा यदि लाभे कर्मण्यपि वा चेद्राज्याधिगमः स्यात् । यूने बुधशुको चन्द्रो हिबुके वा तद्वत्फलमुक्तं सर्वैर्मुनिवर्यैः ।। ७२ ॥ लग्नमें बृहस्पति अथवा ११ । १० में पापग्रह हों तो राज्य मिले तथा ७ में बुध शुक्र, . ४ में चन्द्रमा हो तो मुनियोंने वही फल कहा है ॥ ७२ ॥ ( ज० मणिमाला रिपुतनुनिधने शुक्रजीवेन्दवो ह्यथ बुधभृगुजौ तुर्यगेहस्थितौ । मदनभवनगश्चन्द्रमा वाम्बुगः शशिसुतभृगुजान्तर्गतश्चन्द्रमाः ॥ ७३ ॥ छठां शुक्र, लग्नमें बृहस्पति, अष्टम चन्द्रमा हो तो यात्री राजाकी जय होवे अथवा बुध शुक्र चतुर्थमें चन्द्रमा सप्तम हो तो वही फल है तथा चतुर्थ चन्द्रमा बुध शुक्रके बीच हो तो भी वही फल है ।। ७३ ।। ( अतिजगत्यां चन्द्रिका) सितजीवभौमबुधभानुतनूजास्तनुमन्मथारिहिबुकत्रिगृहे चेत् । क्रमतोऽरिसोदरखशात्रवहोराहिबुकायगैर्गुरुदिनेऽखिलखेटैः ॥ ७४ ॥ लग्नमें शुक्र, सप्तममें बृहस्पति, छठा मंगल, चौथा बुध, तीसरा शनि यात्रालग्नसे हो तो यात्री राजाका विजय होवे, बृहस्पतिके दिनमें सूर्य छठा चन्द्रमा ३ में मंगल १० में बुध ६ में बृहस्पति १ में शुक्र ४ में शनि ११ में हों तो भी वही फल है ॥ ४ ॥ (गाथा) सहले कुजो निधनगश्च भागवो मदने बुधो रविररौ वनौ गुरुः । अथ चेत्स्युरीज्यसितभानवो जलत्रिगता हि सौरिरुधिरौ रिपुस्थितौ ॥७५।। तीसरा मङ्गल ८ में शुक ७ बुध ६ सूर्य लग्नमें बृहस्पति हो तो यात्री विजय पावे। अथवा बृहस्पति शुक्र सूर्य चतुर्थ तृतीयमें यथावकाश हों शनि मंगल छठे हों तो भी वहीं फल ॥ ७५ ॥ ( अतिजगत्यां मजुभाषिणी) .

मुहूतचिन्तामणिः-
[यात्रा-
एको जेज्यसितेषु पञ्चमतपःकेन्द्रेषु योमास्तथा
द्वौ चेत्तेष्वधियोग एषु सकला योगाधियोगः स्मतः ।
योगे क्षेममथाधियोगगमने क्षेमं रिपूणां वधं
चाथो क्षेमयशोऽवनीश्च लभते योगाधियोगे व्रजन् ॥ ७६ ॥
पंचम नवम (५९) कद्रो (१।४ । ७ । १० ) में बुध बृहस्पति शुक्रमें से एक हो
तो योग. तथा दो हों तो अधियोग, तीनों हों तो योगाधियोग होता है. यात्रालग्नसे योग
हो तो क्षम, अधियोग हो तो क्षेम तथा शत्रुवध हो और योगाधियोग हो तो यात्री राजा
शत्रुको मारकर राज्य पावे । उक्त ३ ग्रहोंके केन्द्रकोणों में पृथक संख्या नाभसयोगोंके सदृश
१०८ भेद है ।। ७६ ॥ अतिधृत्यां शार्दूलविक्रीडित )
विजयादशमीमुहूर्तः ।
इषमासि सिवादशमी विजया शुभकर्मसु सिद्धिकरी कथिता ।
श्रवणक्षयुता सुतरां शुभदा नृपतेस्तु गमे जयसन्धिकरी ॥ ७७ ॥
आश्विनमासकी शुक्लदशमी विजयासंज्ञक है । यह समस्त शुभ कार्यों में सिद्धि करनेवाली
है, श्रवण नक्षत्र भी इसमें हो तो अतिशय शुभ फल देती है, राजाकी यात्रामें बह विजय
तथा ( सन्धि ) मिलाप करती है अथवा 'सिद्धिकरी' भी पाठ है, कार्यसिद्धि करती है
॥ ७७ ।। (ज० ता०)
चेतोनिमित्तशकुनैरतिसुप्रशस्तैख़त्वा विलग्नबलमुळधिपः प्रयाति ।
सिद्धिर्भवेदथ पुनः शकुनादितोऽपि चेतोविशुद्धिरधिका न च तां
विनेयात् ॥ ७८॥
चित्तकी प्रसन्नता, शुभ शकुन, (निमित्त ) अंगस्फुरणादिकोंका शुभविचार जानके तथा
लग्नबल देखके यदि राजा यात्राकरे तो कार्यसिद्धि होते, अशुभ शकुन निमित्त लग्न तथा
चित्तकी अप्रसन्नतामें मरण व धनहानि होती है, शकुनादिकोंसे भी चित्तकी शुद्धि प्रबल है,
विना चितकी शुद्धि श्रद्धा व प्रसन्नताके शुभलक्षणोंमें भी न जावे ॥ ७८ ।। (व० तिलका )
यात्रायामवश्यनिषिद्धनिमित्तानि ।
बतबन्धनदेवताप्रतिष्ठाकरपीडोत्सबमृतकासमाप्तौ ।
न कदापि चलेदकालविद्युद्धनवर्षातुहिनेऽपि सप्तरात्रम् ॥ ७९॥

प्रकरणम् ११. भाषाटीकासमेतः । (१३५) व्रतवन्ध, देवप्रतिष्ठा, विवाह, होलिकादि उत्सव, दोनों प्रकारका सूतक इतने कामों में इनकी स्वतन्त्रोक्त अवधि पूरी हुए विना यात्रा न करनी, तथा विना समय बिजली वा वज्र, मेघगर्जन वर्षा ( नीहार ) बर्फ पड़े तो सात रात्रिपर्यंत यात्रा न करनी, समयोंपर इनका दोष नहीं ॥ ७९ ॥ ( विषमे बसन्तमालिका ) एकदिनसाध्यगमनप्रवेशविशेषः । महीपतेरेकदिने पुरात्पुरे यदा भवेतां गमनप्रवेशको । भवारशूलप्रतिशुक्रयोगिनीविचारयेत्नैव कदापि पण्डितः ॥ ८० ॥ यदि राजाका एक नगरसे दूसरे नगर में जाना व प्रवेश एक ही दिन होवे तो यथावकाश पञ्चांगशुद्धिमात्र देखनी चाहिये. नक्षत्रशुल, वारशूल, प्रतिशुक्र, योगिनी इतने दोष पण्डित न विचारे, यदि गमनदिनसे अन्य दिनमें गम्यस्थानमें प्रवेश हो तो उक्त सभी विचारना ।। ८० ॥ ( वंशस्थ० ) ययेकस्मिन्दिवसे महीपतेर्निर्गमप्रवेशौ स्तः । तर्हि विचार्य्यः सुधिया प्रवेशकालो न यात्रिकस्तत्र ॥ ८१ ॥ यदि राजाका एक ही दिनमें (निर्गम प्रवेश ) घरमें उठकर अभीष्ट स्थानमें प्रवेश हो तो बुद्धिमान् प्रशोक्त मुहूर्त देखे, यात्रोदित मुहूर्त न विचारे ॥ ८१ ॥ ( आर्या) प्रयाणे नवमदिनदोषः। प्रवेशानिर्गमं तस्मात्प्रवेश नवमे तिथौ । नक्षत्रेऽपि तथा वारे नैव कुर्यात कदाचन ।। ८२ ॥ गृहप्रवेशसे नवम तिथि नक्षत्र बारमें पुनर्गमन वा गमनसे पुनः प्रवेश न करना चाहिये । प्रथांतरोंमें नवम मास वर्षमें भी न करना कहा है ।। ८२ ॥ (आर्या) यात्रादिनियमविधिः। अमिं हुत्वा देवतां पूजयित्वा नत्वा विप्रानर्चयित्वा दिगीशम् । दत्त्वा दानं ब्राह्मणेभ्यो दिगीशं ध्यात्वा चित्ते भूमिपालोऽधिगच्छेत्।।८३॥ राजा होम करके इष्टदेवताको पूके ब्राह्मणोंको नमस्कार करके जिस दिशामें जाना है उसके स्वामीको पूजके अनेक प्रकार दान ब्राह्मणोंको देके दिगी का मनसे ध्यान करके यात्रा करे ।। ८३ ॥ ( शालिनी) नक्षत्रादिदोहदः। कुल्माषांस्तिलतण्डुलानपि तथा माषांश्च गव्यं दधि त्याज्यं दुग्धमयण- - में २.१३५) मुहूतांचन्तामणि:- [ यात्रा- मांसमय तत्याने तथा । तद्वत्पायसमेव चापपललं मार्ग च शाशं तथा पाष्ट्रिय च प्रियङ्जदयूपमथवा चित्राण्डजासत्तलम् ॥ ८४ ॥ कौम तारिकमाधिक च पललं शाल्यं हविष्य हया- हक्षे स्यात्कारान्नमृगमपि का पिष्टं यवानां तथा । मत्स्या न खलु चित्रितान्नमथवा दग्धानमेवं ऋमाद् भक्ष्याभक्ष्यामि विचार्य मतिमान भक्षेत्तथालोक्येत् ॥ ८५॥ अश्विन्यादि नक्षत्रों के दोहद कहते हैं-अश्विनी में उरद चावल, एवं २ में तिल चावल ३ में उरद, ४ में मौका दही, ५में गौका घी, ६ में दूध, ७ में हरिणका मांस ८ में हरिणका रुधिर, ९ में पायस, १० में चाषपक्षीका मांस, ११ में मृगमांस, १२ में शशेका मांस, १३ में (माठी) धान, १४ में (प्रियंगु ) कांगनी, १५ में पक्वान्न १६ में (चित्रपक्षी) तीतर, १७ में उत्तम फल, . १८ में कछुएका मांस, १९ ( सानिका ) मैनाका मांस, २० में गोधाका मांस, २१ में ( शाल्य ) शोलेका मांस, २२ में ( हविष्य ) मुद्गादि, २३ में खिचरी, २४ में ( मुद्ान्न ) मूंगकी खिचरी, २५ में जौका सतुवा, २६ में मच्छी मांस सहित भात, २७ में अनेक पक्वान्न, २८ में दही भात, इन वस्तुओंको देश कुल आचारके अनुसार खाना वा देखना सूंघना वा स्पर्श करना इस कृत्यसे नक्षत्रोक्त दोष नहीं होता। ८४ ॥ ८५ ॥ (शा० ) आज्वं बलौदनं मत्स्य पयश्चापि यथाक्रमम् । भक्षयेदोहदं दिश्यमाशां पूर्वा िकां व्रजेत् ॥ ८६ ॥ दिशाओंके दोहद पूर्वदिशा जानेमें घी, दक्षिण जानेमें तिलमिश्रित भात, पश्चिम जानेमें मछली, उत्तर जानेमें दूध खाकर जाना, इससे कोई भी दुष्ट फल नहीं होता ।। ८६ ॥ ( अनुष्टुप् ) रमालां पायसं काजी शृंत दुग्धं तथा दधि । पयोऽशृतं तिलान्नं च भक्षयेद्वारदोहदम् ॥ ८७॥ वारदोह-रविगरको शिखाण चन्द्रको मंगलको कांजिक, बुधको गर्म किया दूब, गुरुको दही, शुक्रको कच्चा दूध, शनिको तिलौदन खायके गमन करना ॥ ८७ ।। (अनुष्टुप् ) पक्षादितोऽर्कदलतण्डुलवारिसर्पिःश्राणाहविष्यमपि हेमजलंत्वपूपम् । भुक्त्वा व्रजेद्रुचकमम्बु च धेनुमत्रं यावान्नपायसगुडानमृगनमुद्ान् ।।८८॥ पायस.

प्रकरणम् ११.] भाषाटाकासमतः। (१३७ ) । तिथिदोहद-१ प्रतिपदाको आकके पत्र, २ को चावलोंका थोवन, ३ को भी, ४ को यवागू, ५ को हविष्यान्न, ६ को सोनेका धोवन, ७ को पुआ, ८ को विजौरा फल, को जल, १० को गोमूत्र, ११ को जौ. १२ को पायर, १३ को गुड़, १४ के रुधिर, १५ को मुद्भान्न खाके यात्रा करना । ८८ ॥ ( बसनः०) गमनसमयविविः। उद्धृत्य प्रथमत एव दक्षिणाधिं द्वात्रिंशत्पदमभिगम्य दिश्ययानम् । आरोहेत्तिलवृतहेमताम्रपात्रं दत्त्वादौ गणकवराय च प्रगच्छेत् ॥ ८९ ॥ राजा यात्रा समयमें प्रथम दाहिना पैर उठाके ३२ पैर पैदल चले, फिर वक्ष्यमाण सवा- रीमें आरोहण कर, उस समय ज्योतिषीको तिल, वी, सुवर्ण, तावेका पात्र दान दे, यथाशक्ति भूयसी दक्षिणा देने गमन करे । ८९ ।। ( प्रहर्षिणी) दिश्ययानानि । प्राच्यां गच्छेनजेनैव दक्षिणस्यां रथेन च । दिशि प्रतीच्यामश्वेन तथोदीच्यां नरैर्नृपः ॥ ९० ॥ पूर्वदिशाकी यात्रामें हाथी, दक्षिणको स्थ, पश्चिमको घोडा, उत्तरको मनुष्योंकी सवारोमें जाना ॥ ९० ॥ ( अनुष्टुप् ) प्रस्थान विचारः। देवगृहाहा गुरुसदनाद्दा स्वगृहान्मुख्यकलत्रगृहाहा । प्राश्य हविष्यं विप्रानुमतः पश्यञ्छृण्वन्मङ्गलमेयात् ।। ९१ ॥ यात्रासमयमें देवताका पूजन गृहसे अथवा गुरुस्थानसे अथवा अपने शयनस्थान (आवास) से अथवा बहुत स्त्री संभवमें मुख्य स्त्री ( पटरानी ) के घरसे ( हविष्य ) यनुभाग बनांतमें प्राशन करके (ब्राह्मणके अनुमत ) ब्राह्मण 'इदं विष्णु०' इत्यादि मन्त्रसे प्रथम पैर उठाकर जानेकी आज्ञा देता है तथा मंगलमन्द गीत वाद्य कलशादि सुनता देखता गमन करे ॥ ९१ ॥ (पादाकुल० कार्याथै रिह गमनस्य चेद्विलम्बो भूदेवादिभिरुपवीतमायुधं वा । क्षौद्रं चामलफलमाशु चालनीयं सर्वेषां भवति यदेव हृत्प्रियं वा ॥१२॥ यात्रामुहूर्त में यदि कार्यवशात् गमनमें विलम्ब हो तो ब्राह्मण यज्ञोपवीत, क्षत्रिय शस्त्र, वैश्य मधु, शूद्र नारिकेलादि फल तत्कालमें चलाय दे. इसे प्रस्थान कहते हैं, अथवा सभी अपने मनके प्रिय वस्तु प्रस्थान करे ॥ ९२ ॥ (प्रहर्षिणी)

(१३८)
मुहर्तचिन्तामाणि:-
[ यात्रा-
गेहारेहान्तरमपि गमस्तहि यात्रेति गर्गः
सीनः सीमान्तरमपि भृगुर्बाणविक्षेपमात्रम् ।
प्रस्थानं स्यादिति कथयतेऽथो भरद्वाज एवं
यात्रा कार्या बहिरपि पुरात्स्यावसिष्ठो ब्रवीति ॥ ९३ ॥
प्रस्थानका परिमाण कहते है कि अपने घरस समीपवती घरमें भी जानेको गर्गाचार्यने
यात्रा कही है, तथा अपनी सीमा ( सरहद ) से दूसरी सीमामें भृगुने कही है तथा बड़े जोरसे
फेंका हुआ बाण जितनी दूर जाता है उतने पर्यंत भरद्वाजने कही है, तथा नगरसे बाहर ही
यात्रा प्रस्थान करना वसिष्ठजीने कहा है, सभी ठीक है ॥ ९३ ॥ ( मन्दाक्रान्ता )
प्रस्थानमत्र धनुषां हि शतानि पञ्च केचिच्छतद्वयमुशन्ति दशैव चान्ये ।
सम्पस्थिती य इह मन्दिरतःप्रयातो गन्तव्यदिक्षु तदपि प्रयतेन कार्यम्॥९४॥
प्रस्थानको अन्य कोई ( ५०० धनुष ) २००० हाथ अपने घरसे कहते हैं, कोई(२०
धनुष ) ८०० हाथ कहते हैं; कोई १० ही धनुष कहते हैं, इससे कार्यवश समीप दूर मानना.
प्रस्थान-गन्तव्यदिशाकी ओर स्वयं प्रस्थान रखना उत्तम है, तदशक्तिमें वस्तुषस्थान है; गम-
नमें प्रथम दिन थोड़ा, दूसरे दिन कुछ अधिक एवं क्रमसे दीर्घ यात्रामें गमन करना।।९४॥
( वसन्ततिलका)
प्रस्थाने भूमिपालो दशदिवसमभिव्याप्य नैकत्र विष्ठेत
तामन्तः सप्तरात्रं तदितरमनुजः पञ्चरात्रं तथैव ।
ऊर्व गच्छेच्छुभाहेऽप्यथ गमनदिनात्सप्तरात्राणि पूर्व
चाशक्तौ तद्दिनेऽसौ रिपुविजयमना मैथुनं नैव कुर्यात् ॥ ९५ ॥
राजा प्रस्थान करके दश दिन एक जगह बैठा न रहे नहीं तो पुनः यात्रामुहूर्त पूर्ववत्
करना पड़ता है, ऐसे ही ( माण्डलिक ) थोड़े गांवोंका स्वामी ७ दिन, इससे इतर ब्राह्मण
आदि ५ दिन एकत्र न रहे, दैववशात् उक्त अवधि व्यतीत हो जाय तो पुनः घर आके शुभ
मुहूर्त में यात्राकरे और यात्राकदिनसे सात रात्रि पूर्व स्त्रीसङ्ग न करे यदि स्त्रीके ऋतुस्नातादि
विषयसे ७ रात्रि पूर्व बन्द न रह सके तो एक दिन:पूर्व तो भी स्त्रीसंग न करे ॥१५॥(सग्बरा)
यात्राकर्तुनियमाः ।
दुग्धं त्याज्यं पूर्वमेव त्रिरात्रं क्षौरं त्याज्यं पञ्चरात्रं च पूर्वम् ।
क्षौरं तैलं वासरेऽस्मिन्बमिश्च त्याज्यं यत्नाद्भूमिपालेन नूनम् ॥ ९६ ॥

प्रकरणम् ११.] भाषाटीकासमेतः। (१३९ । यात्रार्थी राजा यात्रादिनसे ३ रात्रि पूर्व दूध न पीवे तथा पांच रात्रि पूर्व (ौर ) मुण्डन श्मश्रुकर्म न करे और उस दिन शहद न खाय, तैलाभ्यंग न करे, शरीर शोधनार्थ औषधि- प्रयोगसे वमन भी न करे, इतने वस्तु यत्नसे निश्चय वर्जित करे ॥ ९६ ॥ भुक्त्वा गच्छति यदि चतैलगुडझारपक्वमांसानि । विनिवर्त्तते स रुग्णः स्त्रीदिजमवमान्य गच्छतो मरणम् ॥ ९७ ॥ यदि यात्री तैलपक्क पदार्थ गुड और दोहदसे अन्न प्रकार क्षार तथा पका मांस खाके गमन करे तो ( रोगी) बीमार होके लौट आवै, यदि स्त्री तथा ब्राह्मणका भर्सन ताडनादिसे अपमान करके जावे तो इस यात्रामें मृत्यु हो, मृत्यु ८ प्रकारकी होती है, केवल शरीर छोडना ही नहीं ॥ ९७ ॥ (गीतिः) अकालवृष्टिदोषः । यदि माःसु चतुर्पु पौषमासादिषु वृष्टिहिँ भवेदकालवृष्टिः । पशुमर्त्यपदाङ्किता न यावद्वसुधा स्यान्नहि तावदेव दोषः ॥ ९८ ।। पौषादि ४ महीने चैत्रपर्यंत यदि वृष्टि हो तो पर्वतातिरिक्त देशोंमें अकालवृष्टि कहाती है अथवा जिस देशमें जो समय वर्षाका नहीं उसमें यदि वर्षा हो तो यात्रादोष है परन्तु वर्षा पड़नेसे पशु तथा मनुष्योंके पैरोंका चिह्न पृथिवीमें न पड़े इतनी वर्षाका दोष नहीं, जब चरणचिह्न पडने योग्य हो तो दोष है ॥ ९८ ॥ ( वसन्तमाला) अल्पायां वृष्टौ दोषोऽल्पो भूयस्यां दोषो भूयान् जीमूतानां नि?षे वृष्टौ वा जातायां भूपः । सूर्येन्दोविम्बे सौवर्णे कृत्वा विप्रेयो दद्याद् दुश्शाकुन्ये साज्यस्वर्ण दत्त्वा गच्छेत्स्वेच्छाभिः ।। ९९ ॥ अल्पवृष्टि अकालमें हो तो दोष भी अल्प है, बहुत वर्षामें बहुत दोष होता है यात्रा न करनी, यदि प्रस्थान कियेमें वर्षा हो तो दोष नहीं । गर्जनसहित वर्षाका भी यात्री राजाको दोष है । इतने दोषोंमें में यदि आवश्यक यात्रा हो तो सुवर्णके सूर्य चन्द्रमाके बिंब दान करके ब्राह्मणोंको देवे । यदि यात्रासमयमें दुःशकुन हा तो धी सुवर्ण अन करके स्वेच्छासे गमन करे ॥ ९९ ॥ ( अतिशक्करी, गाथा) शकुनविचारः । विप्राश्वेभफलान्नदुग्धदाधगीसिद्धार्थपनाम्बरं वेश्यावाद्यमयूरचाष- नकुला बढेकपश्वामिषम् । सदाक्यं कुसुमेापूर्णकलशच्छत्राणि मृत्कन्यकारत्नोष्णोषासितोक्षमद्यसमुतस्वीदीप्तवैश्वानराः ॥ १०॥ .

पा मुलाचन्तामाण:- । यात्रा- . आदशाञ्जनधौतयनरजका मीनाज्यसिंहासनं शाब रोदनवर्जित ध्वजमधुच्छागास्त्रगोरोचनम् । भारद्वाजन्यानवेदनिनदा माङ्गल्य- गीताकुशा दृष्टाः सत्फलदाः प्रयाणसमये रिक्तो घटः स्वानुगः ॥१० यात्रा समयमें बहुत ब्राह्मण घोडा हाथी जो उन्नत्त न हो, फल अन्न दृध दही गौ स्त्री श्वेत सरसों कमल निर्मल वस्त्र वेश्या बाजे मृदंग आदि मोर चाष नेवला रस्सीसे बँधा हुआ एक पशु चौपाया (वृक्ष ) बैल, मांस अच्छे वाक्य फल ( ईख ) पौंडा गन्ना पूर्ण कलश छत्री गीली मिट्टी कन्या रत्न पगडी श्वतवृषभ मद्य पुत्रसहित स्त्री दीप्त अलि दर्पण सुर्मा धोया वस्त्र धोबी मछली घी सिंहासन (प्रेत ) जिसके साथी रोते न हों, पताका हद बकरा अस्त्र धनुषादि गोरोचन भरद्वाजपक्षी लुखारन वेदध्वनि मंगलगीत गायन अंकुश इतने वस्तु यात्राके समयमें यात्रीके सम्मुख शुभ होते हैं तथा खाली घट पीछेसे, परन्तु जो भरनेको जाता हो वह भी शुभ होता है ।। १०० ॥ १०१ ।। ( शादुल० ) बन्ध्याचर्मतुषास्थिसर्पलवणाङ्गारिन्धनक्लीबविट्रतलोन्मत्तवसौषधारि- जटिलप्रवाढणव्याधिताः । नग्नाव्यक्तविमुक्तकेशपतितव्यङ्गक्षुधार्ता असृक् स्त्रीपुष्पं सरटः स्वगेहदहनं मार्जारयुद्धं क्षुतम् ॥ १०२ ॥ काषायी गुडतक्रपङ्कविधवाकुब्जाः कुटुम्बे कलिर्वस्वादेः स्खलन लुलायसमरं कृष्णानि धान्यानि च । कार्पा वमनं च गर्दभरवो दक्षे- तिरुङ्गाभणीमुण्डाम्बरदुवचोऽन्धबधिरोदक्या न दृष्टाःशुभाः ॥३०३॥ बांझ स्त्री चर्म अन्नकी भूसी हड्डी सर्प निमक निघूम अग्नि ( काष्ठ ) जलानेकी लकडी हिजडा विष्ठा तेल ( उन्मत्त ) बावला चर्वी औषध शत्रु जटावाला संन्यासी घास व्याधिमान् ना तैलाभ्यंगवाला खुले केशवाला मद्यादिसे बेहोश पड़ा हुआ रंगहीन भूख रुधिर स्त्रियोंका ऋतुकुसुम कृकलास पक्षी अपने घरमें आग लगना, बिल्लियोंका युद्ध छिक्का भगवाँ वस्त्रवाला गुड ( तक) छाछ कर्दम विधवा स्त्री कुन कुटुम्बमें कलह वस्त्र छत्रादिकोंका अकस्मात् गिरमा भैंसानोंका युद्ध, कृष्णधान्य, माष आदि कपास वमन दाहिने गदहेका शब्द बडा क्रोध गर्भवती स्त्री मुण्डा हुआ गीले वस्त्रवाला दुष्टबचब अन्वा बहरा रजस्वला स्त्री इतने वस्तु यात्रीको यात्रासमयमें अशुभ हैं ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ ( शार्दूलवि० ) गोधाजाहकसूकराहिशशकानां कीर्तनं शोभनं नो शब्दो न विलोकनं , प्रकरणम् ११.] भाषाटीकासमेत च कपिपक्षाणामतो व्यत्ययः । नधुत्तारभयप्रवेशसमरे नष्टाथसंवीक्षणे व्यत्यस्ताः शकुना नृपेक्षणविधौ यात्रोदिताः शोमनाः॥ ४ ॥ गोहा (जाहक ) गात्र कोचन करनेशला एक जीत्र, शूकर, सर्प, शशा इनका नाम लेना सुनना यात्रासमय, शुभ और इनका शम लुनना इनका देखना अशुभ होता है और वानर तथा उल्लूका उलटे जैसे इनका नाम लेना अशुभ, देखना सुनना शब्द शुभ, नदी उतरनेमें भवसम्बन्धी कार्यने भागनेमें गृहप्रवेश ग्राममें नष्टवस्तुके ढूंढने में पूर्वोक्त शुभ शकुन अपशकुन और अशुभ शुभ जानना । राजाके दर्शनाई भी यात्रोक्त शुभ शकुन शुभ, अशुभ शकुन अशुभ होते हैं ।। १०४ ॥ (शार्दू० वामाले कोकिला पल्ली पोतही सूकरी रला ! लिङ्गला छुच्छुकाः श्रेष्ठाः शिवापुरुषामज्ञिताः ॥ १०५ : कोकिला छिपकली कबूती सकती लागली (मैना) (विला, भैरयो छुछु. न्दरी स्यारिन नर संज्ञक पात रञ्जन तिची हं: आदि गमलवालक वाये और शुभ होते हैं । १०५ ॥ ( अनु० ) छकरः पिचको भासः श्रीकण्ठी दाना रुतः। श्रीराम शाशानः स्युशिणाः शुभाः ।। १०६ ॥ छिकर, शिक्पाली भालमा श्रीमानरुरुमः इतने नतिज्ञक और कौवा ऋश कुत्ता इतने यात्रीके दाहिने और शुभ होते हैं ।। १०६ ॥ (अ) अदक्षिणगता श्रेष्ठ मानायां मृगपक्षिणः ओजा भूमा बजन्तोऽनिधन्यो पाने वदमनः ।। ३०७ ।। रुरुलिन बाधी मा पनि कारक जाये को शुभ, परंतु विषम संख्या र देख्ने अति को मुल होते हैं, ऐ. ही आये और उन शब्द भी धन्य हैं ॥१०७(अनु) आधेऽपशकुने हिसा भाणानेकादश बजेन् । द्वितीये गोडश माणास्तृताये का बजेदा॥ ३०८ ॥ साना पहिला अपशकुन हो तो ११ (बाण ) श्वास बाहर भीतर जाने आने पर्यत ठहाक पुनः शुभ शकुन दड-१२ जावे, दूसरा भी अपशकुन हो तो १६ प्राण ठहरना, तीसरा मा हो जाये तो नहीं जाना चाहिये ।। १८८ ॥ ( अनु० यात्रानिवृत्तौ शुभदं प्रवेशनं मृदुधवैः क्षिश्चरैः पुनर्गमः । द्वीशेऽनले दारुणभे तथोयभे स्त्रीगेहपुत्रात्मविनाशनं क्रमात् ॥ १०९ ॥ 25 ) - । थाना प्रक०९) (१४२) मुहूताचन्तामाण:- प्रवेश- नववधूप्रवेश सुपूर्व, अपूर्व, द्वंद्वाभय ४ प्रचारके हैं, यहां सुपूर्व संज्ञक है यह मृदु ध्रुव नक्षत्रोंमें करना, क्षिप्र चर नक्षत्रोंमें प्रवेश करे तो पुनः गमन होवे और विशाखामें स्त्रीनाश, कृत्तिकामें अग्न्यादिसे गृहनाश, दारुण नक्षत्रोंमें पुत्र नाश, उग्र नक्षत्रोंमें अपना नाश होवे ॥ १०९॥ (जगत्यां उपजातिः ) अयनर्भमासतिथिकालवासरोद्भवशूलसंमुखसितज्ञदिक्कपाः । भृगुवक्रतादिपरिघाख्यदण्डको युवतीरजोऽप्यशुचितोत्सवादिकम् ॥१३०॥ मृतपक्षरिक्तरवितर्कसंख्यकास्तिथयश्च सौरिरविभौमवासराः। अपि वामपृष्ठगविधुस्तथाडलो वसुपञ्चकाभिजिदथापि दक्षिणे ॥१३॥ लग्ने जन्मर्थतन्वोमतिगृहमहिताच्च षष्ठं तदीशा वा लग्ने कुम्भमीनळे- नवलवतनू चापि पृष्ठोदयं च । पृष्ठाशामृक्षसंस्थं दशमशनिरथो सप्तमे चापि काव्य केन्द्रे वक्राश्च वक्रिग्रहदिवसविवाहोक्तदोषाश्च नेष्टाः ॥११२॥ इति श्रीमुहूर्त्तचिन्तामणौ एकादशं यात्राप्रकरणम् ॥ ११॥ दोषसमुच्चय- अयनशूल — सौम्यायने सूर्य' इत्यादि । ( मासशूल २ प्रकार ) क्षादि ३ । ३ राशियोंके शूलमें पूर्वादिशूल १, कार्तिकादि ३ । ३ पूर्वादिशूल यह ऋपालकंटक २ हैं, नक्षत्र वार शूल न पूर्वदिशीत्यादि' तिथिशूल नवभूम्येति शुक्र बुध संमुख 'सितज्ञदिक्कपा ' इत्यादि वक्रास्तपराजितादि शुक्रवक्रास्तनीचेति' परिघदंड, पूर्वादिषु चतुरित्यादि स्वरत्नोरजोदर्शन., अशौच, विवाहादि प्रतिबन्ध, सूतपक्ष · तमोमुक्तता — इत्यादि रिक्ता ४ । ९ । १४ । से १२ तर्क ६ तथा १५ । ३० तिथि शनि सूर्य मङ्गल वार नाम पृष्ठगत चन्द्रमा ' रवेम' इत्यादि महाडल, अनिष्ठादि पंचक अभिजिन्मुहूर्त दक्षिणको तथा जन्मलग्न जन्मराशि अष्टमलम शत्रु राशिलमसे षष्ठस्थान तदीश, स्वजन्मराशि-लग्नसे अष्टमेश. शत्रुलग्न राशिसे वामी इतने लग्नमें कुम्भ मीन लगनवांश, पृष्ठोदय राशि दिक्प्रतिलोमलग्न दशम शनि सप्तम शुक्र केन्द्रमें वक्री ग्रह वा वक्री ग्रहका वार इतने पूर्वोक्त दोष यात्रामें अवश्य वर्ण्य है तथा विवाहोक्त दोष उत्पातासह पातदग्धेत्यादि सेन्दु क्रूर इत्यादि" पूर्वोक्त दोष भी दर्य हैं, इनमें मासदोष धनुरर्कादि यामित्रदोष शुक्ररहितादि मात्र दोष नहीं १९०.-११२ ॥ ( मजुभाषिणी तथा स्रग्धरा) इति श्रीमुहूर्तचिन्तामणौ महीधरकृतभाषाटीकायाम् एकादशं यात्राप्रकरणम् ॥ ११ ॥ , नाम तथा पष्ठ- [वास्तु प्र० १२.] भाषाटीकासमेतः । (१४३) अथ वास्तुप्रकरणम् १२॥ गृहस्थको श्रौत स्मात क्रिया समस्त अपने घरमें करनी चाहिये, परगृहमें करनेसे उसके फल भूमिका स्वामी ले लेता है। भविष्यपुराणे - 'परगेहकृताः सर्वाः श्रौत- स्मार्तक्रियाः शुभाः । निष्फ : स्युर्यतस्तासां भूमीशः फलमश्नुते ॥” इति । अतएव वास्तुशास्त्र कहते हैं- गृहनिर्माणविचारः । यद्भ व्यङ्कसुतेशदिमितमसौ ग्रामः शुभो नामभात्स्व वर्ग द्विगुण विधाय परवर्गाड्यं गजैः शेषितम् । काकिण्यस्त्वनयोश्च तद्विवरतो यस्याधिकाः सोऽर्थदोऽथ द्वारं द्विजवैश्यशूद्रनृपराशीनां हितं पूर्वतः ॥१॥ अवकहडाचक्रके अनुसार नामराशिसे नगर वा ग्रामराशि २ । ९ । ५। १ । ११ वीं हो तो वह वास करनेको शुभ होता है अन्यथा नहीं तथा जिसका नामाद्यक्षरसे जो गरुडादि वर्ग जितना है उसे दुगुणा करके ग्रामनामवर्ग संख्या जोड़ ८ से शेष करना जो शेष रहे वह पुरुषकी काकिणी ई, रेसे ही ग्रामकी वर्गसंख्या द्विगुण करके पुरुषनामकी वर्गसंख्या जोड़नी ८ से शेष करके जो शेष रहे वह ग्रामकी काकिणी हुई, जिसकी काकिणी अधिक हो वह धन देनेवाला होता है, इससे ग्रामकी काकिणी अधिक और नामकी न्यून अच्छी होती है। द्वार कहते हैं ब्राह्मण ४ । ८ । १२ राशिवालेको पूर्व, वैश्य २ । ६ । १० को दक्षिण, शुद्र ३ । ७ । ११ को पश्चिम, नृप १ । ५।९ को उत्तर घरका द्वार करे ॥ १ ॥ ( शार्द०) गोसिंहनक्रमिथुनं विवसेन्न मध्ये ग्रामस्य पूर्वककुभोऽलिझपाङ्गनाश्च । कर्को धनुस्तुलभमेषवटाश्च तवर्गाः स्वपञ्चमपरा बलिनः स्युरैन्द्रयाः ॥२॥ नवग्रामक बसनेमें विचार है कि, सारी सीमाके ९ भाग पूर्वोक्त वस्त्रकेसे करके मध्यभागमें २ । ५ । १०। ३. पूर्वमें ८. आग्नेयमें १२, दक्षिणमें ६, नैर्ऋ- त्यमें ४, पश्चिममें ९, वायत्यमें ७. उत्तर में १, ईशानमें ११ क्रमसे अकारादि वर्ग ८ आठों दिशाओंमें बलवान् हैं; जैसे--अ० पूर्व, १० आग्नेय, च० दक्षिण, ८० नैर्ऋत्य, त० पश्चिम. ५० वायव्य, य० उत्तर, श० ईशानमें, अपनेसे पंचम वैरी होता है, जैसे- पूर्व गरुडसे पंचम पश्चिम सर्प शत्रु इत्यादि, जिसका वर्ग पूर्वबली है उसको पश्चिम द्वारमें न वसना चाहिये ॥ २ ॥ ( वसन्ततिलका ) इष्टभूमविस्तारयामादिविचारः । एकोनितेष्टक्षहता द्वितिथ्यो रूपोनितेष्टायहतेन्दुनागैः । युक्ता घनैश्चापि युता विभक्ता भूपाश्चिभिः शेषमितो हि पिण्डः ।। ३ ॥ - (१४४) मुहूर्त चिन्तामणिः- [ वास्तु- भूमि गृहोपयोगी सम विषम त्र्यत्र चतुरस्त्र आदि अनेक भेदोंकी होती है, नाम नक्षत्रोंसे विवाहोत राशिकूटादि समस्त बरकन्याके सदृश देखना, नामके कल्पित नक्षत्रोंले १५२ गुनना घटाय देना जो ध्वजादि वास्तु अभीष्ट है उसमें १ घटा- यके ८१ मुलसे जोड देना १७ और जोडना २१६ से भाग लेना जो शेष रहे वह पिंड होता है, गृहकर्ताक अभीष्ट आयसे भी जैरेंस हो ( पिंडमें दैय॑से भाग लेके विस्तार और विस्तारसे भाग लेके दैव्ये होता है ) उदाहरण -नीलकण्ठनामका अनु- राधा नक्षत्र रोहिणीके साथ मिलापक देखने में इष्टनक्षत्र रोहिणी ४, वास्तुविषय ३ सिंह इष्टक्ष ४ में १ वटाया शेष ६ इससे १५२ गुना कि ४५६ इष्ट वास्तु ३ एक घटाया २ इससे ८१ गुण दिया ६६२ पूर्वोक्त ४५६ में जोड दिये ६१८ इनमें १७ और जोड दिला लो ६३५ हुआ इसमें २१६ से भाग लिया शेष २०३ पिण्ड हुआ अथ कल्पित वैर्य २९ से भाग लिया तो ७ विस्तार आया विस्तार ७ से भाग लिया तो २९ दैर्ध्व हुआ. महागृहके लिये इष्ट वास्तु सहित जो क्षेत्रफल है २१६ उसमें जोडक जो १ । २ । ३. आदि इट है उससे युक्त करके समाभोष्ट महागृहका क्षेत्रफल होता है ।। ३ ॥ (इन्द्रवजा ) स्पेठावनक्षनभोऽय दैर्घ्यपाहिल्लविस्तितिहच दीवा। आयो मजो धूमहरिवगोवरेभष्वाक्षका पिण्ड इहाटशेषिते ॥ ४॥ ध्वजादिकाः सर्वदिशि ध्वजे सुएवं कार्य हरौ पूर्वयमोत्तरे तथा । प्राच्यां वृष प्राग्यमयोजेऽपया पयादुदक्यूर्वयमे द्विजादितः ॥ ५॥ पिण्ड आठ शेष करके जो शेष रहे वह यादि वास्तु होता है, ध्वज १ धूम २ सिंह ३ कुत्ता ४ बृष ५ गदहा ६ बज ७ काक ८ ये वास्तु के नाम हैं, ध्वजमें वर्त्य हैं । विवाहोक्त दोष दिग्वार सिंह, पूर्व दक्षिण तर, वृषमें पूर्व यजमें पूर्व दक्षिण द्वार छाना, समजास्तु निषिद्ध विषम शुभ होते :: ५ ( इ००३०जा० ) गृहे वस्तीहरसवित्तनासोऽन्दीपशुके विषले स्वनीचे । कर्तुः स्थितिनों विधुवास्तुनामें पुरः स्थिते पृष्ठगते खनिः स्यात् ।। ६ ॥ गृहस्वामीके जन्मराशित सूर्य, चंद्रमा, गुरु, शुक्र निर्बल, अस्त, नीचगत हो तो क्रमसे ये फल हैं - सूर्यसे गृहेशका, चंद्रमासे उसकी स्त्रीका, बृहस्पतिसे सुखका, शुक्रसे धनका नाश । दिननक्षत्र तथा गृहनक्षत्र सम्मुख होनेमें गृहमें वास न करना, यदि ये नक्षत्र पृष्ठगत हों तो भी योग्य नहीं चोरी ( नकब आदि ) से भय फल है अर्थात् चिना नक्षत्रों के दिग्विभाग पूर्वोक्त प्रकारसे पार्श्वगत चाहिये । कृत्तिकादि ७ पूर्व, मघादि ७ दक्षिण, अनुराधादि ७ पश्चिम धनिष्ठादि उत्तर हैं ॥ ६ ॥ ( उ० जा० ) प्रकरणम् १२.1 भाषाटीकासमेतः। गृहारम्भे विशिष्टकालनिषेधः । में नागवष्टं व्यय ईरितोऽसौ ध्रुवादिनामाक्षरयुक्सपिण्डः । वष्टो गुणैरिन्द्रकतान्तभूपा ाशा भवेयुर्न शुभोऽन्तकोऽत्र ॥ ७ ॥ गृहनक्षत्र ८ से तष्ट करके जो शेष रहे वह व्यय होता है, जैसे-रोहिणी ८ से नष्ट करके ४ ही रहा यहीं व्यय हुआ, इसमें ध्रुवादि शालानामाक्षर संख्या जोडके पिंडमें बोड देना ३ से भाग लेके १ शेषमें चन्द्र, २ में यम, राजसंज्ञक अंश होते हैं. इनमें यमांशक शुभ नहीं ॥ ७ ॥ ( उ० जा० ) 1 शालाधुवाङ्कनयनम् । दिक्षु पूर्वादितः शाला ध्रुवा भदौँ कता गजाः। शालाचवाङ्कसयोगः सैको वेश्म ध्रवादिकम् ॥ ८॥ इवांकशालाविधिः-पूर्वद्वारमें शालाध्रुवांक १ दक्षिणमें २ पश्चिममें ४ उत्तरमें ८ जितनी दिशाओं में द्वार हों उतने ध्रुवांक जोडने एक और जोडना वह ध्रुवादि. (शाला) गृह जानना ।। ८ । ( अनु०) थ्यिर्काष्टाष्टिगोरुद्रशके नामाक्षरत्रयम् । भूयन्धीष्वङ्गदिग्वह्निविश्वेषु द्वौ नगाब्धयः ॥ ९ ॥ दिक्षुपूर्वादितइत्यादिसे जो ध्रुव आया उसका शालाध्रुवांक सैक करके १५ । १२ ॥ ८। १६ । ९ । ११ । १४ संख्यक तिथि संख्या भी हो तो गृहनाम अक्षरत्रयात्मक . होता है, यदि १ । २ । ४ ।५ । ६ ।१० । ३। १३ हो तो यक्षर नाम चतुरक्षर जानना. वह ध्रुव धान्यादि अक्षर गिननेमें काम आता है ॥९॥ (पथ्यावक्त्रम्) ध्रुवधान्ये जयनन्दौ खरकान्तमनोरमं सुमुखदुर्मुखोयं च । रिपुदं विचदं नाशं चाकन्दं विपुलविजयाख्यं स्यात् ॥ १० ॥ शालाओंके नाम-ध्रुव १ धान्य २ जय ३ नन्द ४ खर ५ कांत ६ मनोरम . सुमुख ८ दुर्मुख ९ उग्र १० रिपुद ११ वित्तद १२ नाश १३ आक्रन्द ११ विपुल १५ विजय १६ इनके नामसा फल हैं, शुभार्थ लेना, आक्रन्दादि अशुभ छोड़ना ॥ १० ॥ (आर्यागीतिः) ११४६) मुहूताचन्तामाण:- गृहस्यायादिनवकम् । पिण्डे नवाकाङ्गगजामिनागनागाब्धिनागर्गुणिते क्रमेण । विभाजितै गनगाङ्कसूर्ये नागक्षतिथ्यसंखभानुभिश्च ॥ ११ ॥ आयो वारोंऽशको द्रव्यमृणमृक्ष तिथियुतिः । आयुश्चाथ गृहेशर्स गृहभैक्यं मतिप्रदम् ॥ १२॥ पिंड ९ से गुणाकर ८ तष्ट किया शेष आय, एवं ९ से गुना कर ७ से भाग देके शेष वा, ६ से गु०९ भा० अंश, ८ गु० १२ भा० धन, ३ गु० ८ भा० ऋण, ८ गु० २७ भा० नक्षत्र, ८ गु० १५ भा० तिथि, ४ गु० २७ भा० योग ८ गु० १२ भा० आयु. होती है, विषम वास्तु शुभ, सम अशुभ, शुभ वार शुभ, पाप अशुभ, पाप अंश निंद्य, धनादिक शुभ, ऋणादिक अशुभ, ३ । ५। ७ तारा अशुभ, गृह तथा गृहस्वामीका एक नक्षत्र मृत्यु करता है तथा राशिकूटादि विवाह तुल्य विचारना, राशिगणना है कि, अश्विन्यादि ३ मेष, मघादि २ सिंह, मूलादि ३ धन अन्य नक्षत्र २ । २ की १ । १ राशि जाननी, गृहकार्य सेव्यसेवक मित्रमित्रकी एक नाडी शुभ होती है तिथि रिक्ता अमा अशुभ, १४, से पिंड गुणा कर ३० से तष्ट करके शे तिथि होती हैं, व्यतीपातादि दुष्टयोग अशुभ जहां हाथोंसे आयादि गुण शुभ न मिले तो उनमें अंगुल मिलाकर क्षेत्रफल करना, इसकी विधि लीलावतीसे जाननी ॥ ११ ॥ १२॥ ( अनु०) . आयादि. आ. वार अंश धन ऋ. नक्षत्र तिथि । योग आयु गुणक ९ भाजक १२८ २७ १५ १२ Neeti womamaraman गृहारम्भे वृषवास्तुचक्रम् । गेहायारम्भेऽर्कभावत्सशी रामैर्दाहो वेदभैरगपादे। शून्यं वैदैः पृष्ठपादे स्थिरत्वं रामैःपृष्ठे श्रीयुगेर्दक्षकुक्षौ ॥ १३ ॥ लाभो रामैः पुच्छगैः स्वामिनाशो वेदैःस्व्यं वामकुक्षौ मुखस्थैः । रामैः पीडा संततं चार्कधिष्ण्यादव रुद्रैर्दिग्भिरुक्तं ह्यसत्सत् ॥ १४ ॥ गृहादि प्रासाद ग्रामादिके आरंभमें सूर्यके नक्षत्रसे दिन नक्षत्र पर्यंत ३ नक्षत्र वृषके शिरमें दाह फल एवं ४ अग्रपाद शून्यफल, ४ पृष्ठपाद स्थिरता, ३ पृष्ठमें श्री; ४ दक्षिण कुक्षिमें लाभ, ३ पुच्छमें स्वामिनाश, ४ वामकुक्षिमें दरिद्रता, ३ मुखमें प्रकरणम् १२.] भाषाटोकासमेतः। (१४७) श्रवण. पीडा सर्वदा हो. यह वृषवास्तुचक्र है । प्रकारांतरसे है कि, सूर्यनक्षत्रसे दिननक्षत्र पर्यन्त ७ अशुभ ११ शुभ १० अशुभ होते हैं ॥ १३ ॥ १४ ॥ ( शालिनी कुम्भेऽके फाल्गुने प्रागपरमुखगृहं श्रावणं सिंहकयोः पौषे नक्रेऽथ याम्योत्तरमुखसदनं गोजगेऽर्केऽच राधे । मार्गे जूकालिगे सद्धृवमृदुवरुणस्वातिवस्वकपुष्यैः सूतीगेहं त्वदित्यां हरिभविधिभयोस्तत्र शस्तः प्रवेशः॥१५॥ कुम्भके सूर्ययुक्त फाल्गुन महीनेमें पूर्वपश्चिममुख गृह शुभ होता है, तथा ५ । ४ के सूर्यमें श्रावणमें भी पूर्वपश्चिममुख गृह शुभ है, तथा १० कमें पौषो भी पूर्व- पश्चिमद्वार शुभ और १ । २ के सूर्यस.हेत वैशाख में तथा ७ । ८ के सूर्य मार्गशीर्षमें दक्षिणोत्तरमुख गृह शुभ होता है. ध्रुव मृदु शततारा स्वाती धनिष्ठा हस्त पुष्य, नक्षत्र गृहारम्भको शुभ हैं परन्तु सूतिकाघरके लिये पुनर्वसुमें आरम्भ, अभिजितमें प्रवेश कहा है ॥ १५॥ (स्रग्धरा ) कैश्चिन्मेषरवौ मधौ वृषभगे ज्येष्ठ शुचौ कर्कटे भाडे सिंहगते घटेऽश्वयुजि चोजज्छौ मृगे पौषके । माघे नक्रघटे शुभ निगदितं गेहं तथोज न सत् कन्यायां च तथा धनुष्यपि न सत्कृष्णादिमासाद्भवेत् ॥ १६॥ मेषके सूर्यमें चैत्रमें भी गृहारम्भ शुभ है तथा वैशाख कथित ही है, वृषकेमें ज्येष्ठमें तथा कर्ककमें आषाढमें एवं सिंहकेमें भाद्रपदमें, एवं तुलाकमें आश्विनमें तथा वृश्चि- ककेमें कार्तिकमें मकरकमें पौषमें एवं मकर और कुम्भके सूर्यमे माघ मासमें भी गृहारम्भ शुभ है । कन्याके सूर्य में कार्तिकमें शुभ नहीं है। इसी तरहसे:धनुके सूर्यमें भी गृहारम्भ शुभ नहीं यहां कृष्णादि मास ग्रहण है ॥ १६ ॥ (शार्दूलवि०) तिथिपरत्वेन द्वारनिषेधः। पूर्णेन्दुतः प्राग्वदनं नवम्यादिषूत्तरास्यं त्वथ पश्चिमास्यम् । दर्शादितः शुक्लदले नवम्यादौ दक्षिणास्यं न शुभं वदन्ति ॥ १७ ॥ पूर्ण = शुक्ल १५-८ तक पूर्व मुख, ९-१४ तक उत्तर मुख, कृष्ण ३०-८ त... पश्चिम मुख ९-१४ तक दक्षिणाभिमुख गृहारम्भ शुभ नहीं होता । पश्चिम मुख (१४८) मुहूतचिन्तामणिः। [बास्तु- द्वारस्थान ८१ पक्ष्याले वास्तुचक्रसे जानना, शुभ भागमें शुभ अशुभमें अशुभ कहा है ॥ १७ ॥ ( उपजाति) भौमाकरितामायूने चरोनेऽङ्गे विपञ्चके । व्यन्त्यावस्थैः शुभैर्गेहारम्भस्यायारिगैः खलैः ॥१८॥ • मंगल सूर्य वार, रिक्ता ४ । ९ । १४ । तथा ३० । १। ८ तिथि, धनिष्ठादि ५ जक्षेत्र चरणलग्न छोडके गृहारम्भ करना, लग्नसे १२ । ८ रहित स्थानोंमें शुभ, ३ । ६ । ११ । में पापग्रह शुभ होते हैं ॥ १८ ॥ (मनुष्टुप् ) देवालये गेहविधौ जलाशये राहोर्मुखं शम्भुादशो विलोमतः । मीनार्कसिंहामृगार्कतखिभे खाते मुखात्पृष्ठविदिक्छुभा भवेत् ।। १९ ॥ देवलियारंभमें राहुका मुख मीनार्कसे ३ । ३ राशियोंके सूर्यमें ईशानादि विदि- शाओंमें विपरीतक्रमसे रहता है ऐसा जानना । गृहारंभमें सिंहार्कादि ३ । ३ तथा मलाशयारम्भमें मकराकर्कादि ३ । ३ राशियोंके सूर्यमें वैसे ही जानना , प्रकट चक्रमें लिखा है, इसका प्रयोजन यह है कि (सात) भूमिशोधन राहुके मुखमें न करना मुखस्य विदिशासे पंचम विदिशामें राहुकी पुच्छ होती है, मुखपुच्छके बीच पीठ होती है । पीठसे खात शुभ होता है. जैसे देवालय खातमें मीनादि ३ चैत्र वैशाख, ज्येष्ठमें राहुका मुख ईशान, पुच्छ नैऋत्य है तो विपरीत क्रमसे पीठ आग्नेयमें हुई इसीसे खातारम्भ करना ॥ १९ ॥ - रा. मु. प. मु. राहुमुखचक्रम्. दिशा ईशान्यां वायव्यां नैर्ऋत्यां भाग्नेय्यां १२।१२ ३४५ ६७८ ९।१०।११ देवालये के.मू.मे. | के.सू. मे. | के.सू. मे. | के.स.मे. रा. मु. ९।१० ११।१२।१ २०३४ गृहारंभे | के. सू.मे. | के.मू.मे. | के.सू. मे. के.सू.मे. रा. मु. रा. मु. रा. मु. २०११।१२ २।२।३ ४५६ ७८९ मलाशये| के.सू. मे. के.स.मे. के.सू.मे. | के.म्.मे. प. मु. मु.

.
प्रकरणम् १२.]
भाषाटीकासमेतः।
(१५९)
गृहकूननिर्माणम् ।
कूपे वास्तोर्मध्यदेशेऽर्थनाशस्त्वैशान्यादौ पुष्टिरैश्चयवृद्धिः ।
सूनो शः स्त्रीविनाशो मृतिश्च संपत्पीडा शत्रुतः स्याञ्च सौख्यम् ॥२०॥
कूप (कुआँ ) घरके मध्यमें अर्थनाश, ईशान्यादि सृष्टिमार्गसे पुष्टयादि,जैसे ईशानमें पुष्टि,
पूर्वमें ऐश्वर्यवृद्धि, आमयमें पुत्रनाश, दक्षिणमें स्त्रीनाश, नैर्ऋत्यमें गृहकर्ताकी मृत्यु,
पश्चिममें शुभ, वायव्यमें शत्रुसे पीडा, उत्तरमें सुख होता है ।। २० ॥ (शालि.)
उपकरणगृहाणि ।
खानस्य पाकशयनास्त्रभुजैश्च धान्यभाण्डारदैवतगृहाणि च पूर्वतः स्युः ।
तन्मध्यतस्तु मथनाज्यपुरीषविद्याभ्यासाख्यरोदनरतौषधिसर्वधाम ॥२१॥
(कोठे ) चतुरस्र घरके पूर्वमें स्नानका आग्नेयमें रसोईका दक्षिणमें (शयन) सोनेका नर्ऋत्वमें
(शब) हाथियारोंका पश्चिममें भोजनका वायव्य में अन्नका उत्तरमें धनका स्थान ईशानमें देव-
पृह करना, पशुमंदिर भी वायव्यमें शुभ होता है। दिशा विदिशाओंके मध्यमें कहते हैं कि,
पूर्वाग्नेयके बीच दही विलोनेका, आग्नेय दक्षिणके मध्य घृतका, दक्षिण नैर्ऋत्यके बीच (पुरीष)
पायलाना, नैर्ऋत्य पश्चिमके बीच पाठशाला, पश्चिमवायव्यके मध्य (रोदन ) शोकका स्थान,
उत्तरवायव्यके बीच स्त्रीसम्भोग, उत्तर ईशानके मध्यमें औषधिका, ईशानपूर्वके बीचमें अन्न
अन्य समस्त वस्तुमात्रका स्थान करना ॥ २१ ॥ ( वसन्ततिलका)
।
गृहायुर्विचारः ।
जीवाकविच्छुकशनैश्चरेषु लनारियामित्रसुखत्रिगेषु ।
स्थितिः शतं स्याच्छरदां सिताकारज्ये तनुश्यङ्गसुते शते वे ॥२२॥
गृहका आयुयोग-बृहस्पति लममें सूर्य छठा बुध सप्तम शुक्र चतुर्थ शनि तीसरे गृहा-
रम्भ लमसे हों तो १०० सौ वर्ष घरकी आयु होवे तथा शुक्र लममें सूर्य तीसरा
-मंगल छठा बृहस्पति पंचम हो तो घरकी आयु २०० वर्ष हो, यह योगायु है ॥ २२ ॥
उपनाति)
लग्राम्बरायेषु भृगुज्ञभानुभिः केन्द्रे गुरौ वर्षशतायुरालयः।
बन्धौ गुरुयाम्नि शशी कुजार्कजौ लाभे तदाशीतिसमायुरालयः ॥ २३ ॥

(१५०) मुहूताचन्तामाणः [ वास्तु- लममें शुक्र दशम बुध ग्यारहवां सूर्य लमरहित केन्द्रमें बृहस्पति हों तो १०० वर्ष तथा चतुर्थ गुरु, दशम चन्द्रमा, एकादशमें मंगल शनि हों तो ८० वर्ष घरकी आयु हो ॥ २३ ॥ (इन्द्रवज्रा) लक्ष्मीयुक्त गृहयोगत्रयम् । स्वोच्च शुक्रे लग्नगे वा गुरौ वेश्मगतेऽथवा । शनौ स्वोच्चे लाभगे वा लक्ष्म्या युक्तं चिरं गृहम् ॥ २४ ॥ उच्चका शुक्र लममें हो १ वा उच्चका बृहस्पति चतुर्थमें हो २ अथवा उच्च ७ का शनि लाभभावमें हो तो ३ वह घर लक्ष्मी सहित बहुत स्थिर रहे ॥ २४ ॥ ( अनु० ) गृहस्यान्यदीयत्वम् । यूनाम्बरे यदैकोऽपि परांशस्थो ग्रहो गृहम् । अब्दान्तः परहस्तस्थं कुर्य्याचेवर्णपोऽबलः ॥ २५ ॥ गृहारम्भ लग्नसे यदि एक भी कोई ग्रह शत्रुनवांशका सप्तम वा दशम भावमें हो तो यह घर एक वर्षके भीतर दूसरेके हाथमें चला जावे परन्तु यदि वर्णेश (विप्राधीशावित्यादि) निर्बल हो, वर्णेशके बलवान होनेमें ग्रह उक्त फल नहीं करता ॥ २५ ।। ( अनु० ) पुष्ये ध्रुवेन्दुहरिसार्पजलैः सजीवैस्तद्वासरेण च कृतं सुतराज्यदं स्यात् । द्वीशाश्चितक्षवसुपाशिशिवैसशुक्रवारे सितस्य च गृहं धनधान्यदं स्यात्२६ पुष्य ध्रुव मृगशिर श्रवण आश्लेषा पूर्वाषाढा इन नक्षत्रों में बृहस्पति जिसमें हो उस नक्ष- में तथा बृहस्पतिवारमें भो घर बने तो घरवालोंको पुत्र तथा राज्य हो तथा विशाखा अश्विनी चित्रा धनिष्ठा शततारा आद्रा इनमेंसे जिसमें शुक्र हो उस नक्षत्रमें और शुक्रवारखे दिन गृहारम्भ हो तो अन्न धन बहुत हो ॥ २६ ॥ ( वसन्ततिलका) सारैः करेज्यान्त्यमघाम्बुमूलैः कौजेऽह्नि वेश्मानिमुतार्तिदं स्यात् । सज्ञैः कदास्रार्यमतक्षहस्तैज्ञस्यैव वारे सुखपुत्रदं स्यात् ॥ २७ ॥ हस्त, पुष्य, रेवती, मघा, पूर्वाषाढा, मूल नक्षत्र मंगलयुक्त हों तथा मंगलबार भी.हो.तो घरमें अमिपीडा पुत्रपीडा हो और रोहिणी, अश्विनी, उत्तराफाल्गुनी, चित्रा, हस्तमेसे जिसमें बुध हो तथा बुधवार भी हो तो घर सुख तथा पुत्र देनेवाला हो ॥ २७॥ ('इन्द्र०) .

प्रकरणम् १२.
भाषाटीकासमेतः।
अजैकपादहिर्बुधन्यशक्रमित्रानिलान्तकः ।
समन्दैर्मन्दवारे स्याद्रक्षोभृतयुतं गृहम् ॥ २८ ॥
पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा, ज्येष्ठा, अनुराधा, स्वाती, रेवती, भरणीमेंसे जिसमें शनि हो
उस नक्षत्रमें तथा वार भी शनि हो तो वह घर राक्षसभूतादिकोंसे युक्त रहे ॥ २८ ॥ (अनु०)
द्वारचक्रम् ।
सूर्याधुगभैः शिरस्यथ फल लक्ष्मीस्ततः कोणभै-
नागैरुवसनं ततो गजमितः शाखासु सौख्यं भवेत् ।
देहल्यां गुणभैर्मृतिगृहपतेमध्यस्थितर्वेदभः
सौख्यं चक्रमिदं विलोक्य सुधिया द्वा विधेयं शुभम् ॥ २९ ॥
इति श्रीमदैवज्ञानन्तसुतरामविरचिते मुहूत्तीचन्तामणौ द्वादर्श
वास्तुप्रकरणम् ॥ १२॥
विसीके मतसे द्वारचक्र है कि, सूर्यके नक्षत्रसे चन्द्रमाके नक्षत्रपर्यन्त ४ नक्षत्र शिरपै लक्ष्मी-
प्राप्ति करते हैं, एवं ८ चारों कोणों में ( उद्वसन ) घर में कोई न रहने पावे, फिर ८ शाखाओंमें
सौख्य, ३ देहलीमें गृहपतिकी मृत्यु, फिर ४ मध्यमें सौख्य देते हैं (तथा ग्रन्थान्तरोंमें पंचांग
भी कहा है कि अश्विनी, चित्रा, उत्तरा, स्वाती,रेवती, रोहिणी ये द्वारशाखा, देहली आदिको
शुभ हैं तथा ५। ७ । ९ । ८ तिथि शुभ, ११ । १२ । १६ । १४ मध्यम, अन्य तिथि
अशुभ हैं, वारयोगदिभी शुभ ) इस चक्रको देखकर पंडितजन द्वार का विधान करें ॥ २९ ॥
इति श्रीमुहूर्त्तचिन्तामणौ महीधरकृतभाषाटोकायां द्वादशं वास्तुप्रकरणम् ॥ १२ ॥

(१५२)
मुहूर्तचिन्तामाणि:-
[गृहप्रवेश-
अथ गृहप्रवेशप्रकरणम् १३ ॥
कालशुद्धयादिः ।
सौम्यायने ज्येष्ठतपोऽन्त्यमाधवे यात्रानिवृत्तौ नृपतेर्न गृहे ।
स्याद्देशनं द्वाःस्थमृदुध्रुवोडुभिर्जन्मक्षलग्नोपचयोदये स्थिरे ॥ १ ॥
राजा आदिके यात्रासे निवृत्त होनेमें सुपूर्व तथा नवीन गृहादिमें अपूर्व प्रवेशके मुहूर्त ।
शुक्र गुरुके अस्तादि । 'वाप्यारामेत्यादि' दोषरहित उत्तरायणमें .ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन, वैशाख
महीनोंमें प्रवेश करना, (मध्यममें कार्तिक मार्गशीर्ष भी कहे हैं) द्वाःस्थनक्षत्र " भानि
स्थाप्यान्यब्धिदिक्षु ” इत्यादिमें कहे हैं, घरका द्वार जिस दिशामें है उस दिक्स्थनक्षत्रों से
सूद तथा ध्रुव नक्षत्रोंमें तथा जन्मलम जन्मराशिसे उपचय ३ । ६ । १० । ११ । वें तथा
स्थिरलग्नोंमें अपूर्व सुपूर्व गृहप्रवेश शुभ होता है, इसमें भी विवाहोक २१ महादोष वर्जित
हैं॥१॥ (इ०)
जीर्णगृहप्रवेशे विशेषः ।
जीर्णे गृहेऽन्यादिभयानवेऽपि मार्गोजयोः वणिकेऽपि सत्स्यात् ।
वेशोऽम्बपेज्यानिलवासवेषु नावश्यमस्तादिविचारणात्र ॥२॥
दुसरेके अथवा अपने बनाये पुराने घरमें तथा अग्नि जल राजा आदिकोंके कारण घर टूट
गया फिर नवीन बनानेमें प्रवेशके लिये पूर्वोक्त मासादि लेने और कार्तिक मार्गशीर्ष श्रावण
महीना, शततारा पुष्य स्वाती धनिष्ठा नक्षत्र भी शुभ होते हैं, तथा ऐसे प्रवेशमें शुक्र गुरुके
भावादिविचार भी नहीं है ॥ २ ॥ (इन्द्रवत्रा)
गृहप्रवेशात्प्राग्वास्तुपूजनम् ।
मृदुध्रुवक्षिपचरेषु मूलभे वास्त्वर्चनं भूतबलिं च कारयेत् ।
त्रिकोणकेन्द्रायधनत्रिगैः शुभैर्लयात्रिपछायगतैश्च पापकैः ॥ ३ ॥
मृदु, ध्रुव, क्षिप्र, चर, मूल नक्षत्रोंमें प्रवेशदिनसे पूर्व वास्तुका पूजन (भूतबलि) वास्तुपूजा--
प्रकारोक्त बाले भी करनी, लग्नशुद्धि कहते हैं कि, त्रिकोण (५१९) केन्द्र (१।४।७।१०)
पन (२) आय (११) त्रि (३) भावों में शुभग्रह हो तथा ३ । ६ । ११ में पापग्रह हों
॥ ३ ॥ ( उपजाति)
तिथिलग्नवारशुद्धयः ।
शुद्धाम्बुरन्ध्रे विजनुर्भमृत्यौ व्याकाररिक्ताचरदर्शचैत्रे ।
अग्रेऽम्बुपुर्ण कलशं द्विजांच कृत्वा विशेद्देश्म भकूटशुद्धम् ॥ ४ ॥

प्रकरणम् १३.] भाषाटीकासमेतः। (१५३) चतुर्थाष्टम भाव प्रहरहित हों और जन्मलम जन्मराशिसे अष्टम लम न हों तथा सूर्य मंगलवार रिता ४ । ९११४ । तिथि चर १।४ । ७ । १० लम इनके अंशक (दर्श) अमावास्या चैत्रका महीना उपलक्षणसे आषाढका भी इनको त्याग कर शुभ समयमें प्रवेश करना. उस समय आगे जलपूर्ण कलश एवं ब्राह्मणोंके लिये जाना तथा विवाहोक्त भकूट शुद्ध होना चाहिये ॥ ४ ॥ (इन्द्रवज्रा) वामरविचक्रफलम् । वामो रविमृत्युसुतार्थलाभतोऽकें पञ्चमे प्राग्वदनादिमन्दिरे । पूर्णातिथौ प्राग्वदने गृहे शुभो नन्दादिके याम्यजलोत्तरानने ॥ ५॥ प्रवेशलमसे जो अष्टम स्थान है उससे १२ पर्यन्त सूर्य स्थित हो तो पूर्वमुख गृह- प्रवेशको वामरवि होता है, तथा पंचम स्थानसे १ पर्यन्त दक्षिणमुख गृहमें प्रवेश को वामसूर्य; तथा दूसरे स्थानसे पांच स्थानों में हो तो पश्चिमद्वार घरमें, एवं ११ भावस ५ स्थानोंमें हो तो उत्तराभिमुख घरमें प्रवेशको वाससूर्य होता है और पूर्वद्वार घरमें प्रवेश को पूर्णा ५। १० । १५ । तिथि दक्षिगद्वारमें नन्दा १ । ६ ११ । पश्चिम- द्वारमें भद्रा २ । ७ ॥१२ उत्तरद्वारमें जया ३ । ८ । १३ । तिथि शुभ हैं ।।.५ ॥ (इन्द्रवत्रा) वामरविचक्रम् । द. मु. १. मु. उ. मु. सू. ११ १ सू, सु २ सू. ६ कलशवास्तुचक्रम् । बके भूरविभाप्रवेशसमये कुम्भेऽग्निदाहः कृतः प्राच्यामुदसनं कृता- यमगता लाभः कृताः पश्चिमे । श्रीर्वेदाः कलिरुत्तरे युगमिता गर्ने विनाशो गुदे रामाः स्थैर्यमतः स्थिरत्वमनलाकण्ठे भवेत्सर्वदा ॥ ६ ॥ कलशवास्तुचक्र-सूर्यके नक्षत्रसे चन्द्रनक्षत्रपर्यंत क्रमसे १ कलशके मुखमें अमि- दाह, पूर्वमें ( उद्वसन ) पश्चिममें धनलाम, ११ । बासशुन्य, ४ उत्तरमें कलह, ४ गर्ममें गर्भीका विनाश, ३ गुदामें स्थिरता, फिर ३ कण्ठमें स्थिरता फल है, प्रवेशमें यह चक्र विचारना चाहिये ॥६॥ ( शार्दूल.) प्रवेशोतरवर्तव्यता। एवं सुलग्ने स्वगृह प्रविश्य वितानपुष्पश्रुतिघोषयुक्तम् । शिल्पज्ञदैवज्ञविधिनपौरान राजार्चयेमिहिरण्यवः ॥ ७ ॥ इति श्रीमुहूर्तचिन्तामणौ त्रयोदशं गृहप्रवेशप्रकरणम् ॥ १३ ॥ उक्त प्रकारोंले निको लसमें राजा वितान ( चाँदनी) पुष्पादि शोभायुक्त अपने भर में वेदध्वनि के साथ मंगललक्षणों सहित प्रवेश करके शिल्पज्ञ ( राजा, बढ़ई आदि ) तथा ज्योतिषी ( मुर्तादि बतलानेवाले ), विधिज्ञ ( गृहनिर्माण एवं भूतबलि आदि विवान जाननेवाले और पुरोहित आदि नगरवासियों को भी यथाई भूमि सुवर्ण वनादि डेकर पूजन करे !! ७ ॥ ( उपजाति ) इति श्रीमुहूर्तचिन्तामणौ महीधरकुतभावाटीकायां त्रयोदशं गृहप्रवेशप्रकरणम् ॥ १३ ॥ अथ उपसंहाराध्यायः। ग्रन्थनिर्मातृपरिचयः । आसीधर्मपुरे षडङ्गनिगमाध्यतृद्विजैर्मण्डिते ज्योतिर्वित्तिलकः फणी- न्द्ररचिवे भाष्ये कतातिभमः । तत्तज्जावकसंहिवागणितकन्मान्यो महाभूभुजां तौलकतिवेदवाक्यविलसद्बुद्धिः स चिन्तामणिः ॥ ३ ॥ (षडंग ) शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष ये वेदके अंग हैं. इनके पढ़नेवाले तथा वेदादि पढ़ानेशले ब्राह्मणों के निवासभूत नर्मदासमीपवर्ती विदर्भ, देशांतर्गत धर्मपुरनाम नगरमें { ज्योतिर्विचिलकः ) ज्योति-ताराओंको जाननेवाले ज्योतिषियोंका तिलक (श्रेष्ठ) और जिसने व्याकरणके शेष छत महाभाष्यमें अतीव श्रम ( अभ्यास ) किया तथा छोटे बडे अनेक जातकशास्त्र, संहिताशास्त्र; गणितशास्त्र समस्त तीनों (होर, गणित, संहिता ) स्कंधात्मक ज्योतिषशास्त्र, अपनी ग्रंथरचनासे प्रकट किया तथा महाराजाओं का मान्य तथा न्यायशास्त्र, अलंकारशास्त्र, वेइविचार - प्रतिपादक मीमांसाशास्त्र, वेदांत शास्त्रों में विकासयुक्त है बुद्धि जिसकी ऐसा निन्ता- मणिनाम दैवज्ञ हुवा ।। १ ॥ ( शार्दूलविक्रीडित ) भाषाकिासमतः । ज्योतिर्विद्रणवन्दिताधिकमलस्तत्सनुरासीत्कृती नाम्नाऽनन्त इति प्रथामधिगतो भूमण्डलाहस्करः। यो रम्यां जनिपद्धति समकरोदुष्टा- शयध्वंसिनी टीकां चोत्तमकामधेनुगणितेऽकार्षीत्सतां प्रीतये ॥ २॥ उक्त चिन्तामणि दैवज्ञका पुत्र अनन्तनामा करके संपारमें विख्यात हुआ; ज्योति- षियोंके समूहसे जिसके चरणकमलोंकी वन्दना की जाती थी अर्थात् उस समयमें ज्योतिःशास्त्राध्यापक यही सर्वोपरि था, पृथ्वीमें ज्योतिषका प्रकाश करनेमें सूर्य जैसा एवम् अनेक ग्रन्थरचनामें , कुशल ( चतुर ) वा सुघड था, जिसने रमणीय ( जन्मपद्धति ) भावदशांतईशा गणित शुभाशुभफलोपदेशक जन्मपत्रीरचनाका क्रम एवं जन्मपत्रीके मार्ग न जाननेवालोंके दुष्ट आशयोंको बिनश करनेवाली बनायी और इसीने आर्यभटमतपंचांगसाधक कामधेनु गणितकी भी टोका बनायी इत्यादि कृत्य सजनोंकी प्रीतिके लिये अर्थात् परोपकारार्थ किये ॥ २ ॥ ( शार्दू० ) तदात्मज उदारधीविबुधनीलकण्ठानुजो गणेशपदपङ्कजं हृदि निधाय रामाभिधः । गिरीशनगरे वरे भुज जेषुचन्द्रमिते शके विनिरमादिम खलु मुहूर्त्तचिन्तामणिम् ॥ ३ ॥ उक्त अनंतनामा दैवज्ञका पुत्र ( उदार ) शिष्योंको विद्यादानकारी बुद्धिवाला राम दैवज्ञ ज्योतिष, व्याकरणादि अनेक विद्याओंमें पंडित नीलकंठ दैवज्ञका भाई था, इसने अपने कुलोपासित गणेशजीके चरणकमल अपने हृदयमें धारण करके मोक्षदायी काशी- पुरी, शालिवाहनीय १५२२: शककालमें यह मुहूर्त्तचिन्तामाणि नाम ग्रंथ बनाया, [ इसकी पीयूषधारानामक टीका रामज्योतिषीके भाई नीलकंठ ज्योतिषी पुत्र गोविंद- नामा ज्योतिषीने १५२५ शककालमें बनायी है ] ॥ ३ ॥ इति ग्रन्थकद्वंशानुकीर्तनम् ॥ निधाय हृदयेऽथ विक्रमदिवामणेर्वत्सरे नेवाब्धिनवे मिते गुरुपदाम्बुजे शाश्वते । धरान्तमहिशर्मणा टिहरिसंज्ञके पत्तने भगीरथरथानुगामरसारित्तटे शोभने ।

श्रीकृष्णदाससुतवैश्यकुलावतंस-- श्रीखेमराजकथनादिवृतिः प्रक्लप्ता । चिन्तामणावमललौकिकभाषया तां निमत्सराः श्रमविदः कलयन्तु कण्ठे ॥ भाषाकारका निवेदन है कि, श्रीगंगा भागीरथीके तीर स्थित राजधानी टिहरी नामक नगरमें महीधरशर्मा अपने हृदयकालमें अविनाशी परब्रह्मरूप श्रीगुरुके चरणकमलोंको ध्यानरूपसे धारण करके विक्रमादित्य संवत् १९४९ में पुण्यात्मा एवं सब बातको जाननेवाले खेमराज श्रीकृष्णदासजीकी आज्ञानुसार इस "मुहूर्त- चिन्तामणि " ग्रंथकी यह टीका ( सरल देशभाषामें ) सर्वसाधारणके समझने योग्य परोपकार दृष्टि करके सरल भावसे बनायी, सब इसे ( सरल बुद्धि ) मद मत्सर महङ्कार रहिततासे अपने कण्ट में धारण करें, अपने कण्ट में धारण करें, जिससे जब जब पढ़ें तभी तमी मुइतचिन्तामणि ( जो सहसा सबके बोधमें नहीं होती) में ( गति ) समझनेका सामर्म हो जाय ॥ इति भाषाटीकासमेत मुहूतचिन्तामाणि समाप्त ॥ . पुस्तकें मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, "श्रीधेङ्कटेश्वर "स्टीम्-प्रेस, "लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर"स्टीम्-प्रेस, बम्बई. कल्याण-बम्बई.

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Muhatri Chintamani

Author
Khemraj Shri Krishnadas
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Title
Muhatri Chintamani
File name
Muhatri Chintamani
Text
OCR done
Citation
1879
Publisher
Sri Venkatadra Stream Press
Language
Sanskrit
Pages
172
Library
Scl
DLI number
326312
Barcode
2020010006320.00
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City Central Library, Hyderabad
Digital publisher
par informatics, hyderabad
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3AwJxI2gf4r
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