Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Dehantar
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देहान्तर नन्दकिशोर आचाय के दो नाटक वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर देहान्तर नन्दकिशोर आचार्य
वाग्देवी प्रकाशन
मुगन निवास चन्न सागर
वीकानेर 334 001
नाटया की रगमचीय प्रस्तुति के लिए
लेखर से पूर्व अनुमति लेना अनिवाय है।
नदक्तिोर आचाय
सुथारो की बडी गुवाड,
बीकानेर 334001
नगर आचाय
प्रथम सस्करण 1987
नितीय सस्सरण 1990
मूल्य पचास रुपये मात्र
मावरण ममित भारती
मुल सविसा प्रिंट
गुणन निरास चन्दन सागर
पीकानेर 331001
ISBY8185127247
Rs5000
DEITANTAR by and hishore Acharya
मरी माग्मानी परम पाना-7 ।
मगर
'-शामरागुम सीगगोain
कारि गुम गण मग
गुम गुम होगा-
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१
तिमि
31
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তভাঙি
देहातरी प्रथम प्रस्तुति प्रसिद्ध नाटय मण्डली अभिनेत द्वारा
28 फरवरी, 1986 को चडीगढ मे हुई।
निर्देशक
पहलाद अग्रवाल
वीरेद्र महदीरता
पात्र
गमिष्ठा गोरडी मल्होत्रा
ययाति
अररित नदा
पुर टप्णकुमार वातिया
विदुगती रापना महोत्रा
मग। गीता शर्मा
रक्षय
रवि मदाना
एक अविस्मरणीय स्मृति किसी भी नाटक यो प्रस्तुत करने से पहले रगमण्डली अभिनेत के सदस्यो के सम्मुस नाट्यकृति का पढा जाना मात्र औपचारिकता नही है- एक पूरा अनुभव है। इस तरह की समाआ मे हुई चर्चा परिचर्चा दौरान हमेशा नाटक की रग-सरचना के बारे म ज्ञान बढा है और नाटय की समझ मे भी वृद्धि हुई है। असल म इस मण्डली मे विविध क्षेत्रो के ममज हैं प्रोफेसर हैं, इजीनियर और आक्टेिक्ट हैं, व्यवसायी हैं और चित्रकार भी, प्रशासर और छात्र-छात्राएं भी। इसलिए हमारी इम मण्डली मे जिस दिन चया की दृष्टि से शाटक का पाठ होता है, उसी दिन से ताटक ये विविध पक्षा और उसकी परता की पहचान की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। विशेष रप रो जब नाटक कुछ सदस्यो को पस द आये और कुछ को न आये- तब तो केवल परतें ही नहीं खुलती, बरिये भी उघडने लगते हैं। कितु देहातर ये पाठ ये बाद ऐसा कुछ नही हुआ और सभी सदस्या ने मुक्त कण्ठ से इसकी प्रशसा की और इसे अभिनेत द्वारा प्रस्तुत करने के लिए स्वीकार कर लिया गया। दहा तर याह्य एव भीतरी तनावपूण स्थितियो से भरपूर अपने मे पूर्ण सश्रिप्ट नाटभवृति है और इसका सुसगठित रूपावार एव रगशिप या सौष्ठव इम वृति का आयपण के 7 माना गया। इस नाटक म तायपूण नाटकीय स्थितिया का समुचित सयोजन है और इतनी दिप्रता भी है कि प्रेक्षक या निर तर उलझाय रखे, आकार म छाटा है पात्रो की सस्या कम है तथा चिना विसी रगमचीय तामझाम के मेला जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों के रगकम के बाद मेरा यह विश्वास बनता जा रहा हनि निदेव की प्रतिमा से चमत्कारी रगतन्त्र के सहयाग से स्परावाली नाटय प्रस्तुति मरे पितनी ही प्रभावपूण क्या न हो, उससे विमी मी भाषा ये रग आदोलन पो शक्ति नहीं मिलती। ऐमी प्रस्तुतिया रगमच या स्तर भले ही , गति नहीं देती। ठीक इसी तरह से एमे नाटक ना जटिल रगना का आश्रय लकर ही प्रस्तुत किये जा सर्वे- रग आदाला पो गति नहीं देते। रग-आदालन को गति मिलती है साहित्यिक गरिमाण्डित रग पाटका से । मोहन रातभा सुरद्र वर्मा के नाटर इसी कोटि के मानता है। हिनी शायरोनार पात मागणी अवश्य रपना गरिए गि यह रोगामि मागीय रग स्थिति । अनुहा और मुविधा माप मापार-यन हर तरहराम गल जासरे-याशि IT M सामूहिर गपिया है और मारी गायरता च्यापर प्रदानाम निFिT* गारन माही IIT माना जायगा जिसको चार प्रदाना मही उगरे ग सामया या अनुमा जाय और पतम्याप अपने आप ही उरावा अन्य गारतीय भाषा म अनुरादहान उग। आप अपूर, हयपदन, रापी इतिहास, यामीराम पावाल पुर इसी प्रकार ये नाटय है । दहा तर म भी इसी प्रकार य पाटया की यहुत-सोनियां ।। इस नाटक का हमा ए एम हा मसलामा पाविया जहाँ प्रकाश याना सरी थाडी मुविधा थी। दृश्यर प ये नाम पर दीपापार, marयन शैया और बैठन एप आरान ये जगवा पिसी रंग उपकरण या प्रयोग नहीं दिया। नया दमाम बनती जिह उठावर आसानी स TT Tगह स दूमरी जगह रचा जासर । मच पर उम पाया पर नीले लाल और पी गयी चादरा तथा स्थान परिपतन गे उग शमिष्ठाने निजी का, ययानि यिन की, तथा पुर के वक्ष म परिवर्तित लिया गया। इम रम परिपतन न अरग जला कमा सक्त इतन प्रभाची ढग सदिय कि म्वय का भी आश्चय हुआ। पह-श्य म तथा मिष्ठा म दीपाधार पा प्रमुख स्थान पूर रश्य की गवेदना प्रकट परा तथा सम्प्रेषित करत म गहायर मिद्ध हुआ। दीपाधार को मच म बायी भार अग्रभाग म मा था। नाटक जनक सबदनपूण स्थला की योजना वायी आर में अप्रमाग में करना उपयोगी रामझा गया। पाना के पाय यापार की दृष्टि से बदल उपयागी र गराभा द्वारा दृश्यर घ की योजना का सिद्धात हमारी मण्डली के अध्यक्ष नवीनच टाकुर का ही नती रगसग्नाकार जाहित्य प्रकाश का भी है। रगमच गए राजसी स्वम्प टेन में लिए बहुत मावन पर भी विशेष कुछ नहीं दिया। मैन अनुभव दिया कि अमिताभ की बामपा गजमी स्वरुप दन म पर्याप्त है। चादग गावे अनुरूप प्रकाश योजना म प्रनीवात्मर रगा पाप्रयाग उपयात मिद हुआ। देगार नारय की मबस टी विशेषता ह तनावपूर्ण नाटस्पितिया की चुगर याना और उसने परिणाम स्वरूप गमिष्ठा, ययानि, विदुमती तथा पुर या मा सब । इस प्रस्तुति म ययानि की भूमिका म अरविन्द नदा उपयुक्त ये भार बड़ी महात वे माघ महान भूमिका की बारीवियों का गगया। प्रत्यार सवार व पी छिपाका उत्तरात्तर जस जम गमयते 12 गय, ययाति का व्यक्तित्व जधिक उभर कर सामने आने रगा। नाटककार न ययाति के जीवन की विडम्बना का बहुत ही कुशलता सस्प दिया ह । जीवन के पूण उपभाग म विश्वास रखने वाला ययाति मदा ही विनम्वनापूण ाि को जीता ह। दवयानी म विवाह किया, वितु दवयानी कच ये प्रेम म कमी मुक्त नहीं हो पायी--- इसलिए पूणरूप से उस प्राप्त नहीं कर पाया। शमिष्ठा म गुप्त विवाह किया, वितु शुभाचाय का डर बना रहा और इस रहस्य के प्रक्ट होते ही पाप झेलना पडा। गमिष्ठा को उमुक्त रूप से पाने के लिए शाप मुक्ति मिली और अपन पुत्र मे योवन उधार लिया वितु वह मिला शर्मिष्ठा वे ही पुत्र पुर म । इस म शर्मिष्ठा की स्थिति और भी विडम्बनापूण हो गयी। पति मे पुत्र के पास्प तथा यावा वे कारण अव भी उ मुक्त समागम सम्भव नहीं हुआ। शर्मिष्ठा का लगताह जैम उम का पुत्र ही उम का उपभाग कर रहा है और उस गारी स्थिति स वितृष्णा हाने लगी। वह ययाति मे वचने लगी। नाटक्वार | बहुत थोडे सवादी द्वारा यम पूरी स्थिति निरूपण क्यिा है । कुशल अभिनता अथवा अभिनेत्री के सम्मुग यह एक बहुत बडी चुनाती हाती है जब नाटकसार गहरे मानसिक द्वद्व की बात कम गन्दा द्वारा व्यक्त करना चाहता है। इस चुनौती का सम्म अधिक सामाा परता पडा शर्मिष्ठा की भूमिका म गादी मत्हाना को। म चुनाती को उहान स्वीकार किया और कहीचही बहुत ही मामिा अभिनय किया। पति की देह मे पुन वे पारप वा महसूस करन व दद्व और दुविधा का व्यक्त रन मे उह पर्याप्त सफलता मिली। जिस वगत्मा मयम स मार्मिक स्थलावी सवेदना को प्रक्षेपित किया, उसग इस प्रस्तुति का प्राण मिर। प्रेम नही, वेवल रमण करा वाली देवलाक के महाराज इंद्र की पुत्री विदुमती का क्या म्प दिया जाय? मा पर उसवा प्रवा क्मे कराया जाय? उसकी मगिमाओ जार चर्चाआ द्वारा उसने दवलोक्वामिनी हा का आमास वम दिया जाय? इम भूमिया को निभाने वाली सपना महाना नृत्य म रचि रखती थी। इसलिए नृत्य मुद्राआ, नत्य गतियो एव नत्र भगिमामा द्वारा विदुमती वे व्यक्तित्व की विशिष्टता को साकार दन का प्रयास किया। उस की उ मुक्त हमीम उम के व्यनि व पीडामाव का व्यक्त किया। नाटककार ने विदुमती के द्वद्व का मी स्वम्प दिया-17 वीरता और गाय के प्रति जाकृष्ट होकर उमे पान में गिा दिदुमदार स मृत्युलोक आती है। तब तर पुरु वा यौवन पानि मगा। इमलिए ययाति वा वरण कर लेता है। स्तुिमर्गः नही हाती और यह भी वही टूटती - । दिनना fuTI नाrt मागार पराती। अपनी यति को स्वीपरपरलमही प्रत्येक व्यति की गुति है। "स आत्म-साक्षात्कार के पश्चात् ही ययाति उ मुक्त भाव में आप का स्वीकार पर सपा तथा पुरु की याया दूर कर गाा। ययाति जैगा भी है पुरमा पिता है, पुर का सहाग यमानि वा जीवन ? और लाग चारने । भो यह उस स मुक्त ही हा गमता हम अपो माता पिता के धुपाय मे स्वताव नहीं है। हमार अस्तित्व की शुरुआ यही स हाती है और रियति स्वीकार का पहला पाठ यही स्थिति देती है। परमस्थिति का यह विदु बहुत महत्त्वपूर्ण है, रितु मान दा छाउ-छोट सवादा से इस पूण प्रक्षेपण मिलता नहीं लगता। बहुत रावत और जागरण प्रक्षर ही इम विदु को पड पाता है। निर्देश किस प्रकार इस विचार का राम्प्रेषित करें, यह बहुत बड़ी समस्या है। यहाँ नाटरवार का किसी व्यायात्मव सवाद या विसी नाटकीय स्पिति को माजना करनी चाहिए था जिसमे सामाय प्रेपर भी विचार करने पर विवश हा । निर्देशन में काम मे मुझ से वही अधिक सक्रिय थे मेरे परम मित्र और सहयोगी पहलाद अग्रवाल । सादा के सहयोग से हो दृश्य बिम्ब और नाटकीय गतिया का रूप देन मे उन्होने बहुत ही सूझबूझ का परिचम दिया। निर्देशन गम्बधी ममी प्रवार चाय का स्वय झलकर जिस उदारता ये माय मुझे उस का मार दिया उसके लिए कम उनका पायदाद व समप! नहीं पाता । निर्देशन की यह प्रक्रिया ममी रग-कमियो के लिए सुखद रही अनजान ही नाटक का मूल स्वर सभी रग-कमियो तक भली भाति पहुँच गया था। सब ने अपनी नियति स्वीकार कर ली थी और इस स्वीकार ना परिणाम या एक सुखद अनुभूति, एक अविस्मरणीय स्मृति । चन्डोगद -वीरे द्र मेहदीरता 14 देहान्तर
अक प्रथम
पहला प्रवेश
राजमहल में शर्मिष्ठा का निजी कक्ष । अंधेरा मा। शर्मिष्ठा
एक ओर बठो है । मगला का प्रवेश । उस की पदचाप
सुनकर शर्मिष्ठा उठकर देखती है । दोनों को बातचीत
के दौरान मगला कोनों मे दीपक जलान का अभिनय करती
है। मच पर धीरे धीरे प्रकाश होता है ।
मिष्ठा कौन? मगला?
मगला दासी प्रणाम निवदन करती है । क्षमा करें, किसी न बमा
तब दीपक नही जलाये।
शर्मिष्ठा विसी का कोइदाप नही है, मगला। मैं न ही रोक दिया था।
मगा ऐसा क्या, देवी? सयाकाल मे दीपन न जलाना अशुम
माना गया है।
शमिष्ठा
शुभ अशुभ तो मन के भ्रम हैं।
मगला ऐसा न कहें । राजमहल मे ही अंधेरा हा तो प्रजा को प्रकारा
वी प्रेरणा वस होगी, देवी
शमिष्ठा अन्त पुर का उजाला मन के अंधेर का तो नहीं मिटा सक्ता
न?
मगला देव राब गुम करेगा। चद्रवश का पुण्य इतना क्षीण नही हा
गया है।
मिष्ठा पुण्य क्षीण न हो तो शुक्र कुपित ही क्या हाते।
मगला लेकिन उहोंने ता शाप लोटा लिया है न?
नमिष्ठा भोली हो तुम । एव की लौ से दूसरा दीपर ता कोई भी
जला देगा वितु
मगला किन्तु क्या, देवी?
सामिष्ठा अपना दीपर चुप्तावर उसना तल दूसरे दीपक म कौन डाल
देगा, मगर?
मगग नमिष्ठा मगस्त वामिष्ठा मगर। सामिष्ठा मगला नमिष्ठा दासी समनी नहीं। चप्रवर्ती ने यल-गौरुष या दीप सभी जल सरगा, जब बाई अपना यौवन उह देकर उनका बुरापा स्वैच्छा मर । तभी ता हताश होकी वाई यात नहीं है, देवी। नहीं, मगला । इतना सरल हाता यह गर ता गुनाचायन यह घट नहीं दी हाती। तोक्या हो । प्राचाय अमुरा ये गुरु है । प्रतिरोध की आग अपन गिप्यास कम नहीं ह उनमें । तव उदारता का यह ढोग क्या ? तादि अमुर पतुष्ट रह । यह शाप असुरो दामाद का दिया है उहाने । अब वे बह सकेंगे कि अपना शाप लोटा लिया है उहाने ता! ओह यह शाप धुन न मुझे क्या नहीं दे दिया? आप' मर ही कारण ता चक्रवर्ती का यह दिन देखना पडा। चक वर्ती पौरप का यह पराभव' यह अपमान तुझे धिक्कार है, शमिष्ठे। ओह मुझ पापिन ने अपने सुग के लिए अक्सर चक्रवर्ती के या और प्रताप को घूल म मिला दिया। अपन को सेंमाले देवी। समालन का रह ही क्या गया है अव? आपने ही धय खा दिया ता चरवर्ती क्स सैमलेंग दयो? उह कोई नही सॅमाल सक्गा, मगला । ऐसा न कहे देवी। तुम नही समझती। चक्रवर्ती पौरुप के पुजारी हैं। व जीवन के पूण उपभोग मे विश्वास करते हैं । उस इद्रोपम पौरुष मगला नमिष्ठा मगला गमिष्ठा मगला शर्मिष्ठा नांमठा अचानक ययाति या प्रश। ययाति शमिष्ठा मगला ययाति गमिष्ठा ययाति का पौरुप आज भी इद्रापम ही है, शर्मिष्ठे। (आश्वय एव सम्भ्रमपूवक) चक्रवर्ती। आश्चय हो रहा है न तुम्ह आश्चय ता है, दव अपने मौमाग्य पर। 7 16 देहातर ययाति म ने वहा था तुम्हे । ययाति के लिए यौवन ता क्या, प्राणो राग करने वाला का भी अभाव नहीं होगा। मगा। मंगला आगरा, देव। ययाति मगला, इस अत पुर को हमारे हृदय की भाति जगमगा दो, हमारे सपनो की तरह सजा दो अपनी स्वामिनी को। यह राति हमारे मुक्त प्रेम की प्रथम रावि होगी। समिप्ठा लेकिन ययाति तुम नही समयोगी, शमिष्ठे। देवयानी के रहते हम व भी मुक्त मन से नहीं मिल पाये। किसो अपशकुन-मी धेरे रहती यी उम की छाया। अब न उस का भय है, न उस के पिता का। जाओ, मगा। देगो कोई कमी न रहे। हमारे मिलन की एक और प्रथम राति है यह । जो आज्ञा, देव । मगता मगला जाती है। ययाति शर्मिष्ठा की ओर बढता है । उसके नगनों गधों पर हाथ रसना है । शमिप्ठा कुछ सपोच मे है । १ ? ययाति क्या बात है, शमिप्ठे? मकोच क्या शमिष्ठा जाने वसा लग रहा है, आर्य । ययाति बसा 7 नमिष्ठा मेरे कारण कितना सहा आपने देवयानी का बाप शुभा- नाय का पाप मुख-सरीखी एक साधारण स्त्री के कारण चत्रवर्ती का अपमान औह में क्या चली आयी उस दिन आप पास। ययाति नहीं ता मैं वैरा जानता विप्रेम क्या हाता ह शमिष्ठा देवयानी ययाति राम ना उसका। गमिष्टा दो पुत्र दिय हैं उसने आप को। ययाति हाँ । कि तु देवयानी पमी एषान्त मेरी नहीं हो सकी। सामिष्टा क्या क्या वह रह है आप? ययाति वही जा सत्य है । उम की देह मेरी थी, पर नेता वच के रग म रगी थी। एक पल पे लिए भी उसे नहीं भुला सकी वह । (कुछ पलों की चुप्पी) जाननी हो प्रेम के घन क्षणा म सभी उम न आँख भर नेवा मी नहीं मुपे। मैं मगपता था देहातर 17 3 जिवर मेरे प्रेम ग सुघ गा देती है रेविन वह दम देह म विमी और का योजती रही। चर्ती ययाति की देह में मिशु कच का। गर्मिष्ठा नहीं, देव । श्रम भी हा सकता है यह आप का। ययाति नही। ययाति वच्चा नहीं है। सामरम पीकर मेरी दह से चेसुध लिपटे वर का नाम शर्मिष्ठा परी आर्य ययाति हा, शर्मिष्ठे। इसीलिए मैं स्वय को अपराधी नही मानता। मैंन कोई विश्वासघात नहीं दिया किसी से । (ठहरकर) अयथा क्या अपने ही पति कोई स्त्री इतना भयकर शाप दिलवा सकती है शर्मिष्ठा आह रितगी दारण वेदना सहते रहे आप मुझे मी नहीं बताया कमी। ययाति तुम्ही ने तो प्रम का अनुभव दिया मुझे । नहीं तो क्या शुभा चाय के गोधपी उपेक्षा करतुम्हारपारा आनासम्मय होता शमिष्ठा ओ । मह्न नही कर पा रही हूँ मैं। ययाति जब उस अतीत को भूल जाश्रा, शमिष्ठे। दवयानी मेरे जीवन का अँधेरा थी। इस स्वणिम प्रकाश में उन स्मृतिया पी पारिमा क्या घोलें ? (अचानक जसे तेज हवा से दीपक चुा जाते है।) अरे, यह आँधी सी? मगला' मगला (मगला आती है ।) यातायन वद कर दीपक जला दो। (पातायन वद करने और दीपक जलान का जमिनम करती है । धीरे धीरे प्रकाश हो जाता है ।) तुम इतनी धवराई-सी क्या हा मगला? मगला वह बाहर ययाति आह हाँ हा मैं तो अपने उत्साह म भूल ही गया था, शमिप्ठे। शमिष्टा ययाति मगला उह भीतर लाभा।(मगता जाती है। कुछ ठहसर) नमिष्ठे तुम्हारी कोय न आत चद्रा यो घम कर दिया क्या देव? दामिप्टा ययानि मरीकायन तुम्हार पुन ने अपने अद्भुत त्याग से जा या अजित किया ह 18 दहातर वृद्ध वश म यशक्त पुरा प्रवेश । मगता उसे सॅमाले है। नमिष्ठा पुरा नहीं तुम महाराज ययाति हो, गमिष्ठा । एसी पितृभक्त सनान निवाल म नही हागी।हमा पुरा ही आना उत्तराधिकारी पापित किया पुर यह रही गमिष्ठा रेविन पुम पुर ही क्या' इतनी प्रजा अनुचर जाह में जानती थी मैं ने कहा था ययाति बया ? यया रहा था तुम ने शामिष्ठा मैं ने रहा था मगला से गुमानाय अगुरा वे गुरु है । ये मा नही परते। ययाति पेरिन चिता क्या है, शमिप्ठे? यह यौवन तो मी गा है। समय आन पर लाटा देंगे इसे। नमिष्ठा युछ समय म नहीं आ रहा। यह इतना वडा त्याग ययाति अचानक कुपित होता है। ययाति तुम्हार पुत्र का यावन रेकर कुछ अपराध कर दिया हम न? शमिष्टा पुन आप पा है, चक्रर्ती। मेरी ता पेवल काम है। ययाति तुम्ह गव नही पुर पर नमिष्ठा रमम वडा गव रिसी 1 जाना नहीं होगा। रेपिन इतनी वेदना भी क्या पिसी न जानी हागी ? (अचाार जस मॅमलपर) मगला, युवराज वा आराम मे पलग पर लिटा दा। चक्रवर्ती, आज से पुर यही रह मेरे महल में । ययानि जैमा तुम चाहो रेरिन वैम शमिष्ठा मगा। प्रामाद वे पिछले हिस्से को युवराज के लिए सजा दा1 (मगला जाती है) आप भी अब विश्राम करें, आय । मं कुछ ममय पुर व पास हूँ। ययाति हाँ हाँ, क्या नहीं। पुर की सारी दस मार अब तुम्ह ही करनी हागी। रद्धावस्था भी एक प्रकार का वचपन ही तो ? पास जाती ययाति जाता है। शर्मिष्ठा घोरे धीरे पुरु है। पुर उठने की कोशिश करता है। शर्मिष्ठा उसे सहारा दार उठाती है और परग व सिरहान ठिा देती है। गौर से उमगी ओर दखती है। नेहा तर 19
गमिष्ठा तुम्ह मेरे दूध की सौग पह, पुर । सच कहा, इतन लागावे
हाते तुम्ही ने यह त्याग क्या किया?
पुर कोई तैयार नहीं था, मौ। प्रजाजन
अनुचर मत्री। यहा
तक कि सब भाई यदु अनु
1 मैं ही बचा था। पिताजी
की वेदना मुझ से देखी नही गयो।
शर्मिष्ठा ओह पुर, मेरे बेटे हमारे सुख के लिए
पुर नही, मा। अपनी ऋणमुक्ति के लिए।
शर्मिष्ठा उस की ओर देखती रहती है। मच पर धीरे धीरे
अँधेरा हो जाता है।
दूसरा प्रवेश
शर्मिष्ठा का शयन कक्ष । पलग पर उदास मी अघलेटी है।
अचानक ययाति या प्रवेश।
ययाति शमिष्ठे। प्रिय।
शमिष्ठा हडबडावर उठने का उपक्रम करती है।
शर्मिष्ठा आप चापर्ती लविन आप तो
ययाति लेटी रहा । ऐसे ही रेटी रहा । हां, बस एसे ही
शर्मिष्ठा को पहले की हो तरह तकिय के सहारे बिठावर
पलग के पास घुटनों के बल बैठता हुआ उसके पाय चूम
लेता है।
शमिष्ठा यह क्या कर रहे हैं आप?
बहती हुई दूसरी ओर से पलग स उतर जाती है।
ययाति लेटी
रहा न
शमिष्ठा लेकिन आप ता आखेट यात्रा पर
ययाति रह न सका तुम्हारे बिना। और उस मृग को देखकर तो
शमिष्ठा मृग को
ययाति हो । अपनी मृगी के सग रमण कर रहा था।
मिष्ठा तो?
ययाति मृगी विद्ध हा गयी मेरे बाण से आह मृग का वह
विलाप मैं तुम्हारे लिए व्याकुल हा उठा।
मिष्ठा मृग के विलाप से मेरा स्मरण
ययाति हा, मृगी के लिए या न वह । आह, शमिप्ठे।
शर्मिष्ठा की ओर बढता है।
शमिष्ठा
आप विश्राम कर लें । म जलपान की व्यवस्था करती हूँ।
देहातर 21
ययाति नहीं। तुम यही रहो मर पाम जार मुये अपन म डूब जान दा! ? उस पहल अपा जालिगन म ते लता है। मिष्ठा होले स पितु दढनापूवक अपन को उस स अलगवर मुंह फर सडी हो जाती है । ययाति कुछ पल उस की ओर दयता है । ययाति यह तुम्ह क्या होता जा रहा ह, शमिप्ठे । शर्मिष्ठा कुछ भी तो नहीं, आय । ययाति नहीं कुछ ता है। तुम कुछ छुपा रही हा हम म । शर्मिष्ठा आप स छुपाने का हा ही क्या सकता है मेर पास ययाति ता ता एमा क्या है। शर्मिष्ठा वैरा ही मन कुछ उदास-सा ह भी। ययाति में जमी की बात नहीं कर रहा। शर्मिष्ठा ता? ययाति तुम जैस वही शर्मिष्ठा नहीं हा, वल्लि कमी-कभी तो अपरिचित-सी लगा लग जाती हा । क्या ऐसा क्या है ? शर्मिष्ठा मैं क्या रह सकती हूँ, देव । ययाति जव यही तो । पहले कभी राम नही वाली तुम हम स । शमिष्ठा मुझे ता नहीं लगता कुछ। ययाति तो मुझे ही क्यो लगता है शर्मिष्ठा मेरा दुर्भाग्य । (कुछ देर मौन।) ययाति तुम्ह पुरु का बहुत दुस है ? शर्मिष्ठा नही देव । उमने मेरे मातृत्व का गौरव दिया है। कितन ह ऐस जा जपने पिता के सुसरे लिए ऐसा त्याग कर सके। ययाति देवल पिता का सुख शमिष्ठा जाप का सुप ही तो मेरा सुस है। ययाति तव मेरे प्रति यह उदासीनता क्या शमिष्ठा यह आराप है, आय। ययाति नहीं, यह मेरे अतर की वेदना है । कई दिन स तुम्हारे सामन प्रक्ट करना चाहता था-पर साहस नहीं जुटा पाया। शमिष्ठा चक्रवर्ती और साहस नहीं जुटा पाय । ययाति हो, शमिष्ठे। रामस्त जम्बूद्वीप वा चरवर्ती सम्राट ययाति तुम स विजित है जाधित ह तुम्हारा। मुझे अपने म छुपा ला, शमिप्ठे। ? 1 माता का नहीं? 7 22 देहातर शमिष्ठा चक्रवर्ती। ययाति क्हन दो मुये। देवयानी से भागकर तुम्हारे प्यार के आश्रय मे ही आता था मैं । उसकी ईर्ष्या निर तर डराती रहती थी मुझे उसके पिता का श्रोध अस्तित्व का कँपा दता था फिर भी शर्मिष्ठा नही-उम सब का म्मरण नही करायें, देव । ययाति फिर भी फिर भी तुम्हारा आलिंगन ही मरा एक्माव आश्रय था । तुम्हारी मुम्बान म उपाकाल की स्फूर्ति थी' जार अब (शर्मिष्ठा की आर देखता है। वह नीचे की ओर दखने लगती है।) तुम्हारे प्यार की वह उद्दामता वहा गयो, शमिप्ठे? तुम्हार अगा को एक कुठा-सी घर रहती ह जसे । लगता है जैसे जैसे तुम वह शर्मिष्ठा हो ही नहीं। शर्मिष्ठा चप्रवर्ती भूल रह है कि व स्वय वही नहीं रह है। ययाति में नही। शमिठा मैं सत्य कहती हूँ। ययाति किंतु उम को झिझय तुम म क्या? तुम्हार प्रेम म वह उद्दामता क्या नहीं जा मुझे आलोडित पर देती थी? अब तो देवयानी की छाया से भी मुक्त है हमारा प्यार। शमिष्ठा यदि ऐसा हो पाता। ययाति क्या कहती हो? शर्मिष्ठा हमारा जीवन उस छाया से कभी मुक्त नहीं हो सकता। ययाति नही । अव कहा है वह काली छाया? शर्मिष्ठा है-मुझ पर आप पर और ययाति और पुरु पर मी। यही न? शमिष्ठा हो । पुरु पर भी। ययाति ही, गमिष्ठा ! वह चिन्ता छोड दा तुम । अब हम दवयानी से पूर्णतया मुक्त है। पुर वा यौवन उघार है हम पर । एव दिन उरो मिरेगा ही साथ ही यह चत्रवर्ती राज्य भी। शर्मिष्ठा यह चिता नहीं है मरी। ययाति तोपिर या बात है? क्यों पहल सी लिपट नही जाती तुम जब मैं तुम्हा हूँ ? पहाडी नदी-सी जावुल देह काप्ठ-मो जड क्या हो जाती है ? वाला 4 Mar. देहान्तर 23 शमिष्ठा कुछ कठार मी हाती है । शर्मिष्ठा वह दूतो सुन मकग आप? ययाति हां, हा, कहो बोलो। शमिष्ठा नही । आप नही सुन सकेग । सहन नही होगा जाप स । ययाति तुम्हारी उपक्षा से अधिक असहनीय क्या हो सकता है मेर लिए? बाला। शमिष्ठा आप जब मुझे तो लगता है जैसे जैसे मैं (अचानक रक जाती है।) ययाति जैस क्या? बोलो, शर्मिष्ठा। शर्मिष्ठा आय | आप एक और विवाह क्या नही कर लेते ? ययाति शर्मिष्ठा। शर्मिष्ठा मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी बल्कि मेरा आग्रह ह । ययाति नहीं। शमिष्ठा मैं आपको वह सुस कमी नहीं दे सकूगी जव । ययाति लेकिन क्यो? शमिष्ठा आपके इस नये यीवन के कारण। ययाति नये यौवन के कारण? शर्मिष्ठा हाँ। मरी ढल रही देह के साथ आपके नये पारुप का मेल सम्भव नहीं है। आर जब ऐसा सोचती हूँ तो और अधिक अनमनी हो जाती हूँ। ययाति गौर से उसकी ओर देखता है । अचानक परिचारिका का प्रवेश। परिचारिका इन्द्रसरोक से कोइ अतिथि आये है, देवी। मिलना चाहते हैं । ययाति इदलाव से कान हैं ? परिचारिका एक स्त्री है, देव । साय एक अनुचर ह स्यात् । ययाति यही भेज दा उह परिचारिखा वाहर जाती है । ययाति आश्चय स शर्मिष्ठा को और दखता है। ययाति रदलोर से कान हा सकता है? वह भी स्त्री ? समाचार ता है कि वहाँ सब कुशल ह । . 24 देहातर परिमारिपाय साथ विदुमती और एक दूत का प्रया। । ययाति विदुमती, तुम विदुमती अभिवादन स्वीपार करें, चक्रवर्ती। ययाति स्वागा है, वि दुमती । य महारानी शर्मिष्ठा है। दोनों एप-दूसरे का अभिवादन करती हैं। ययाति यह साथ म कौर है। विदुमति रक्षा है । मरे साथ आया है। रक्षक अभिवादा करता है। ययानि दवराज कुशल से तो हैं 1 कैसे आना हुआ। विदुमती सिर झुगाराती है। रक्षय देवराज इन्द्र अपनी यह क्या आप की मवा ग भेजी है, चक्रवर्ती। ययाति मरी सेवा म । पया रक्षक हां, दव । अपने जन्त पुर मे इस प या वा स्वीकार कर उन्ह वृताथ करें। ? ययाति वि दुमती की आर ध्यानपूवर दखता है। उस क योवा और सौदय के प्रति मन-ही मन आपण अनुभव करता है। शर्मिष्ठा विदुमती के पास जाती है। ययाति रेविन अचानक यह क्या । पिछले युद्ध मे आप न अपन पुन पुर के साथ दवा की जा सहायता की, उस स देवराज कृमन अनुभव करत है। इस मैनी को दृढ करने लिए उहोने यह प्रस्ताव दिया है। शमिष्ठा हमे देवराज का यह प्रस्ताव स्वीकार है। उहे हमारा अभिवादन । च द्रवरा देवराज यी इस मैत्री का सम्मान करता है । आलो, विदुमती। विदुमती को आगे बढवर गले लगाती है। रक्षक प्रणाम कर मुड पर चला जाता है। शर्मिष्ठा वि दुमती को लेकर धीरे- देहान्तर 25
घोरे चली जाती है। ययाति विदुमती की ओर आकर्षित
अनुभव करता है।
ययाति
क्या हो गया यह और शर्मिष्ठा ने स्वय उसी ने विदु
को स्वीकार कर लिया। कही मैं भी तो यही नहीं चाहता
थारोका क्यो नही मैंने समिष्ठा को? क्यो विदु की ओर
खिंच गया मैं भी उस की देह से वही गध क्यो आती
लगती है जो पहली बार मिष्ठा की देह से आती लगी थी।
कुछ समय मे नहीं आ रहा। शर्मिष्ठा के साथ प्रेम के लिए
लिया था यह योवन । लेकिन जान क्या एक विचित्र-सा
तनाव बना रहा हम दोनो के बीच । जैसे कोई ग्रन्थि है जा
खुल नही पा रही। और अब विदुः यह आकपण जैसे
उसका अग-अग बुला रहा है मुझे । पहले भी देखा है उसे-
तब तो इस तरह नही लगा कमी। तो अब क्या ? इस नय
यौवन के कारण?
।
मच पर धीरे धीरे अंधेरा हो जाता है।
26 देहातर
अक द्वितीय
पहला प्रवेश
मच पर हलका-सा प्रकाश होता है। पुरु का पक्ष । पाश्व
स वृद्ध पुर मर्मिष्ठावे मय वा सहारा लिये आता है। दूसर
हाथ म लाठी है। मगला आपर पलग को दुरस्त करती है।
पुर वठ जाता है, यका हारा। मिष्ठा वपन हो औचल से
उसका ललाट और चेहरा पोंछती है। धीरे धीरे मच पर
प्रकाश फल जाता है। मगला चली जाती है।
मिष्ठा
थक गय हा ता थोडाधिधाम पर ला।
विश्राम भी वही पर राक्ता है जो पूर्ण रवस्थ हा, सवल हो।
मेर लिए ता विधाम मी एव श्रम है, माँ।
देह बल तो अधम बल है, पुरु । आत्मनल ही वास्तविक
बल।
शर्मिष्ठा
सच, मा।
-
शमिष्ठा
प्यारा स शर्मिष्ठा की ओर दखता है।
हो, रे। और उस म तुझ से श्रेष्ठ कौन हागा
यह वाक्य कहत हुए वह गुरु की ओर दसती है। पर उसे
अपनी ओर देखता पारर आँस नहीं मिला पाती। दूसरी
ओर दखने लगती है। मगला दोनों को गौर से देखती रहती
लेक्नि दहधारी के लिए देह-वल भी अनिवार्य है। बाई
इतना निवल भी न हो कि कम से उद्यान तक मी स्वय न
जा सके। कभी-कभी सोचता हूँ
शमिष्ठा गोर रा उसकी आर देखती है।
दहा तर 27
शर्मिष्ठा पुरु। कोई पश्चाताप ता नही तुम्ह पुर पश्चाताप? शर्मिष्ठा हो, कि अपना यौवन पिता का देकर पुर मा। शर्मिष्ठा तो अपनी अशक्यता को लेकर इतना दुख क्या? पुरु अपने लिए काई दुख नहीं है, मां । शर्मिष्ठा तो स्वर इतना करुण क्यो? तुम चक्रवर्ती के उत्तराधिकारी हो। अचानक विदुमती का प्रवेश। 7 विदु उत्तराधिकार म यह बुडापा ही तो मिला है इमे शमिष्ठा विदु तुम पुरु आप' प्रणाम स्वीकार करें। विदु सि का प्रणाम ? इस बुढापे का जा चक्रवर्ती का है ? मैं इसका प्रणाम कसे स्वीकार करूं? (अथपूर्ण दृष्टि से शर्मिष्ठा की ओर देखती है। गमिष्ठा दूसरी ओर नज़र फर लेती है।) क्यो, शर्मिष्ठा बहिन? शर्मिष्ठा बुढापा चक्रवर्ती का सही, पुरु तो पुत्र ही है। विदु हाँ, इसी बुढापे का पुन । शर्मिष्ठा कैसी बात करती हो? विदु क्यो? तुम्ह नही लगता शमिष्ठा मुझे? मुझे पैसा पुरु विदु पुरु की ही कह रही हूँ। शर्मिष्ठा पुत्र ही तो है। विदु हां, लेकिन पिता के बुढापे को ढोता हुआ पुत्र । शर्मिष्ठा इम से क्या यह तो स्वेच्छा से लिया है इसने । विदु तभी तो। शर्मिष्ठा तभी तो क्या? विदु तमो तो देखने आयो हूँ कि चश्वर्ती का बुढापा सा है। मैंन तो यौवन ही दखा है न उन का? (मुस्कराती है।) बुढ़ापा तो तुम्हारे पास है। शर्मिष्ठा विदुमती विदु कुछ असत्य वह दिया मैंने? 28 देहान्तर आप दोराहीमा हैं मेरी। शामिप्ठा हो। पुए तो विवाद गया है? विदु यही वि यौवन पी मा यौन है और पुढाप की कौन? नमिष्ठा जाने पया यह रही हा तुम विदु यही जो तुम सोचती हो, यहिन । पामिष्टा मैं? में क्या' मैं तो कुछ भी नहीं' (अचान विदु से मांस मिलने पर चुप हो जाती है। एक पल रक पर भोगे धीमे बात पूरी परती है।) सोचना क्या है अब ? विन्दु सोचना तो चाहिये था चक्रवर्ती को। पुरु मा। - विदु बहू यह कर पुकारो तो अधिर उचित नहीं होगा? खिला पर हंसती है। गमिष्ठा विदु क्या हो गया है तुम्ह' विदु मरा तो स्वभाव है विनोद का । तुम जानती हो। नर्मिष्ठा लेकिन हर अवसर पर विदु भूख हूँ न? चत्रवर्ती ने पहा मी या शामिष्ठा चत्रवर्ती ने भेजा है तुम्हें ? ययो? विदु विहार-यात्रा पर जा रहे हैं हम । जाने से पूर्व तुम्हारा आशीर्वाद रेने। गमिष्ठा आशीर्वाद। विदु हाँ, मरी तो सास के स्थान पर भी तुम्ही हो न पुर की ओर देखती है। गमिष्ठा तुम तुम मैं (पुर की ओर देखती है। उसे अपगी ओर दखता पार विदु की ओर देखती है । उससे भी आँखें ही मिला पाती। तीसरी ओर देसने लगती है।) तुम भी जाने क्या विदु मेरा ता स्वभाव ही ऐसा है। अच्छा, अब चलू । चक्रवर्ती प्रतीक्षा कर रहे होगे। विदुमती जाती है। पुरु और शर्मिष्ठा उसे जाते हुए देखते रहते हैं। फिर दोनों एक-दूसरे की ओर देखत है। शर्मिष्ठा आंखें झुका लेती है। पुरु उस की ओर देखता रहता है। मच पर धीरे धीरे अंधरा हो जाता है। देहातर 29 सरा प्रवेश शर्मिष्ठा का शयन पभा बंपरा मा। मिष्ठा बठी है। मगला या प्रयेशा धीरे धीरे प्रयाश हाना है। मगठा ? मगला दी घर बैठी है । प्रसाधन नही करेंगी? शर्मिष्ठा रहने दे, मगला । यया हागा प्रसाधन का ? मगला यह तो भाव पुरवी रीति है । नापयो पमिष्ठा अत पुर। बतपुर क्या विमी भवन मा राम है? मगला नही, देवी। वह रानी बाहदय है । तमी ता शर्मिष्ठा तभी तो क्या मगला अत पुर म उगालाहा तो माना जाता है वि पत्नी शमिष्ठा पति से नहीं मिलना चाहती। यही न' जी गमिष्टा और इसलिए पत्नी को चाहिए कि वह हर रात दीपक लाकर प्रतीक्षा वरती रहै। जागती रहे रात की अविम पडी र विजावर पनि उम की प्रतीमा पर अनुयह पर द? मगरा អុញ हर रात जभिसारिका सी शृगार घर बैठी रह वह और भोर तब सेज रे पुष्प अनछुए ही कुम्हरा जायें। दीपक किसी की पूर्व से नहीं थे, उनका तेल भी चुक जाय? यही न? यही है न अत पुर की गैति? मगला अपगप क्षमा हा, देवी । एक बात पहूं। शर्मिष्ठा तुम दामी नहीं हो मगला । मरी सनी हो। मगला यह मेरा सौमाग्य है । वितु चक्रवर्ती का यह विवाह ता शर्मिष्ठा मन ही करवाया। यही, न तुम चकवर्ती को अच्छी तरह जान ही पायी, मगला। मगरा वेता आज ही मुयम पूछ रहे थ शमिष्टा तू मिली उन स? मगल भोर म जव पुष्प चुनने गयी तो उद्यान म टहल र य । दवी 30 देहातर मगला गमिष्ठा इतने सवैरे गीद टूट गयी उन वी! विदुमती मी होगी साप म? यह भी कर रही थी पुण्? नहीं। ये नहीं थी। अकेले ही पेपरवर्ती। गमिष्ठा असेले। मगला मुझे मी पाश्चय सो हुआ। समिष्ठा पया पूछ रहे थे तुम से? क्या मेरे मगला हो, आप के लिए ही यह भी कि वि आजपल रात यो अतपुर ये दीपर क्यो नहीं जलाये जाते? स्वामिनी आजा देता ? आमिष्ठा नही । मेरे का में आने के लिए उन्हें यदि शिमत्रण पी आवश्यकता है तो मगला यह तो रीति है, देवी। शमिष्ठा दिन पे समय ही आ सरते ये? मगला दिन के समय 7 गमिष्ठा हो। लेकिन वे नहीं आयेंगे। उह शमिष्ठा मे ही उग की देह से लगाव है। मगरा देवी। शामिप्ठा सत्य पटु हो पर उसे समझ ऐना चाहिए। मगरा रेविन वह भी स्वाभाविक है, देवी । आपने पति है धे। गमिष्ठा पति लेविन पौरुपहीन । मगला क्या कह रही हैं आप नमिष्ठा हो, मगरा। यह पौरुप यया चक्रवर्ती या है ? किस पे लिए दीपर जलाऊँ ? विसे आमन्त्रण दू? अपने ही पुत्र वे यौवा को वियह आय और अपनी मां को मोगे? मगला शामिप्ठे। सपी पर्मिष्ठा में वृद्ध और अरायत चक्रवर्ती की सेज पर जा सकती थी। उसे ही अपना प्राप्य समझ कर स तोप वर लेती। लेकिन कोई घोर व्यभिचारिणी भी अपने ही पुत्र की सज पर नही जायेगी। मगला तो क्या चक्रवर्ती ? शर्मिष्ठा नहीं समझते इतना। वे भोग को ही प्रेम मानते हैं। उन का भी क्या दाप? मैं भी तो ऐसा ही मानती थी। रेक्नि अब देहान्तर 31 गया, दयी? मगला शामिष्ठा जर पुनर्युवा चश्वती न मुझे मुद्दो ता लगा जैस ये वाह वह उद्दामता वह अकुलाट चत्रवर्ती की नहीं है। व पना भी नहीं कर सकोगी तुम उस दारण वेदना की जय मुझे अचानक रमा वि वि यह तो मेरी ही काख म पला मेरे ही रक्त मास से पुष्ट हुआ पारप है जसे मैं अपने ही पुत्र के माथ ओह पुरु शमिष्ठे। सनी । आह! इतना दारुण दुख पीती रही चुप चाप । पहाड मी दूर जाये इस बोझ म तो। (स्तब्धता । मगला अपने को संभालती है।) कुछ पल विश्राम कर लें। अगन का म्यम्य परें, देवी। - যায়। शर्मिष्ठा को ले जा कर पलग पर बिठा देती है। अचानन परिचारिकाप्रवश। परिचारिका चनवर्ती घर आ रह है, दवी। शामिष्टा परग म उठ रडी हाती है। गमिस्टर गया? ची। यहाँ है ? चलो, मैं चलती हूँ। परिचारिसरार माथ बाहर की ओर जाती है। मगला इरा धीच सात मना ठोर परती है। शमिश के साथ ययाति प्रदेश। ययाति यह क्या कर रहा है मिले? मगता का दस पर अचानक चुप हो जाता है। मगला अभि पान करती है। ययाति उम को जार अभिप्रायपूण निस रेखता है। यह प्रणाम र पनी जाती है। शर्मिष्ठा ममी कुछ ठीक तारे, आय । यमाति नही, देवी ! चन्द्रवा की राजमहिपी का बतपुर इस नवर म गमिष्ठा दीपर जलता रह है, चमवर्ती । ययाति बनने गे कि ठोवर न ग घरत हुए। ? 32 दहातर गोल्डी मल्होत्रा शर्मिष्ठा को भूमिका मे सपना मल्होत्रा (विदुमती) और अरविद नवा (ययाति)।
when गोल्डो मल्होत्रा (मार्मिष्ठा) और कृष्णकुमार वालिया (पुर)। गोल्डी मल्होत्रा (शर्मिष्ठा) और अरविद न दा (यपाति)।
शर्मिष्ठा उजाले का यही ता प्रयाजन है। ययाति नहीं, इतना ही नहीं। उजाला इसलिए है कि हम उस में उजागर हो सरें। एप दूसर के सामने अपने को खाल दे स। वह प्रकाश एक दूसरे के अतर तक पहुँच जाये। (शर्मिष्ठा सिर झुका लेती है।) क्या हम जान सकते हैं कि वि दुमती से विवाह के पश्चात इस अन्त पुर में दीपमालिका क्यो नही मनायी जाती? गमिष्ठा आप चाप विहार-यात्रा पर थे । ययाति विहार यात्रा से लौटे पूरा मास बीत गया । छ मास पश्चात लौटे ये हम। महादेवी न पति से मिलना भी नहीं चाहा प्रजाजन क्या सोचते हागे किसम्राट देवी शर्मिष्ठा की उपक्षा कर रहे हैं। गमिष्ठा लेकिन ययाति लेकिन इस म दाप किसका है? आपके आमत्रण के विना ? ? शर्मिष्ठा अचानक उत्तजित हो जाती है। ? गमिष्ठा दिन के समय भी तो आ सरते ये आप ययाति रेविज रात्रि को नही? क्या ? तीखी दृष्टि स ययाति शर्मिष्ठा की ओर रखता है। शर्मिष्ठा उस दष्टि को सहन नहीं कर पाती। पाश्व की ओर देखकर जरा क्मिी का पुजारना चाहती है । ययाति हम आप में कुछ पूछ रह है, देवी (कुछ स्तब्धता) हम उत्तर चाहिए। गमिष्ठा विदुमती नववधू है देव । उस का अधिकार अधिक है। ययाति छ मास की विहार यात्रा के पश्चात कमी-कमी तुम्हारे पाग आना जाना उसके अधिकार का आघात नही पहुँचाता। गमिष्ठा नही देव। यह स्त्रीत्व का अपमान होता। ययाति ता क्या अन पुर मे अंधेग पर आप हमाग सम्मान कर रही हैं? मिष्ठा मेरा दुर्भाग्य है कि चीन' देहातर 35 ययाति बीच में ही बात काट देता है। ययाति विदुमती का स्वीकार कर लिया? शर्मिष्ठा नही, स्वामी । अन्यथा न ले। यह मरा मरण होगा। कुछ दर चुप। ययाति हम तुम्हारे बिना नहीं रह सकते, शमिप्ठे। शर्मिष्ठा लेकिन विदुमती ययाति नही । शर्मिष्ठा का स्थान कोई नहीं ले सकता । विदु ने हमारे यौवन का तुष्ट किया है, लेकिन तुम्हारे विना कही शाति नही ह, शमिप्ठे। शर्मिष्ठा माग मे शाति कही नहीं है व । ययाति यह दा आमाओवा मिलन है, भाग नहीं। शर्मिष्ठा को अपनी बाहों में लेने का प्रयत्न करता है। शर्मिष्ठा छिटककर दूर खड़ी हो जाती है। गमिष्ठा नहीं आय । मुये क्षमा कर। ययाति शर्मिष्ठा । यह हमारा तिरस्कार है। शर्मिष्ठा नहीं, दव। यह मरा अधिकार है। ययाति अधिकार पति के तिरस्कार का अधिकार गमिष्ठा यह आपका तिरस्कार नहीं, मेरी विवाता है, चक्रवर्ती । आपका यौवन आपका पौरुप मैं सहन नही कर पाती। ययानि कुछ पर उस को और देखना है। मयाति नुम कही डाह से जल तो नहा रही हो, गर्मिष्ठा' শণিকা डाह ? डाह किमस ययाति मुझस विदुमती में । हमे अपनी देह की सीमा स्वीकार परनी चाहिए, मिष्ठा। পমিকা देह की सीमा । (व्यग्य से मुकराती है।) वही तो पर रही हूँ, परवर्ती। मानों समरे को और देखते खडे रहत हैं। मर पर धारे धीरे अपराहा जाता है। 36 देहातर अक तीसरा पहला प्रवेश मच पर धीरे धीर प्रकाश होता है । पलग पर ययाति और विदुमती सोये है। विदुमती उठ कर वातायन खोलने का अभिनय करती है। अंगडाई लेती है। ययाति पलग पर जध-लेटामा हो कर यह सब देखता रहता है। विदुमती उम अपनी ओर देखते पाकर मुसराती है । १ 7 विदु पया सोच रहे है ययाति हर प्रमात तुम्हार यौवन का नित-नूतन करता जाता है, विदु! तुम्हारा सौदय और खिल उठता है। यह योगन, यह सौ दय कभी न रहगा तव विदु निश्चिन्त रह, चक्रवर्ती । मैं देवयोनि हूँ। हम चिरयुवा हात है। मत्यरोप वे प्राणी निरन्तर युटाप की ओर वढते है फ्याकि उह मरना होता है। हमारा यौवन निरन्तर नित नूतन होता जाता ह-देवत्व के चरम शिखर की ओर। किन आप दवयोनि नहीं है। ययाति जानता हूँ। एक दिन में पिर वृद्ध हा जाऊँगा। वृद्ध और और तुम एसी ही बनी रहागी चिरयुवा चिरसुदर विदु प्रवृति का यही विधान है। ययाति और और एक दिन मैं नही रहूँगा। तय भी तुम इमी तरह विदु मुपे तो इद्रलोक लीगा है। मत्यलार मारा स्थायी भावाम नही हा मक्ता। ययाति विवाह वो जमजमा तरों का सम्व घ कहा गया है । विदुमती खिलखिला कर हमती है। अगरत देहा तर 37 विदु मन नगराहा ता अगोजम म पिरलोट माऊँ आप के तय तस्य प्रतीक्षा पर लगी में। ठिठोली कर रही हा मेरी ययाति विदु अचानय गम्भीर हो जाती ह। विदु नही, चत्रवर्ती। मर जीवन का सत्य यही है । (अचानक स्वर वल्लर) मैं दवयोनि है। एक ही वा को कई पीडियो स सम्बप रप सकती है। ययाति यह पाप है। विदु मृत्युलोक मे। हम व्यक्ति का नही पौरप का मागती है। पोरुप सनातन तन्वह व्यक्ति म उसकी आशिक अमि व्यक्ति है वेवल । प्रत्येक नारी सनातन कामना पुरुप उसी सनातन पौरुष वा माध्यम है। ययाति कामपणा पाप नहीं है तब विदु नहीं। वह सनातन ह, धम ह । ? ययाति उठ कर आलिंगन के लिए बांह पलाता है। अब ययाति आओ, सनातन नारि । लो, मुये अपने में समेट लो। न छोडो मुझे। एक पल के लिए भी नही। प्रिये । विदु इतनी उद्दामता इतना पौरप तुम न होती तो समझा देवराज ने तुम्ह क्यो भेजा मेर पास । अन्यथा विश्व की समस्त नारियां मिलपर भी इस पौरुप का वेग नही सह मक्ती थी। ओह ! शर्मिष्ठा शायद ठीक कहती थी विदु क्या कहती यो गमिष्ठा देवी? आप उघर गय थे? ययाति हा, गया था कुछ दिन पूर्व । रहा नही गया । विदु क्या रहती थी? ययाति कि वह मेर पौरुष को सहन नहीं कर पायगी। विदु तो उहोने आप को स्वीकार नहीं क्यिा? ययाति विदुमनी। विदु “यग्य नही पर रही, देव । देवल जानना चाहती थी। ययाति हा। मरा आग्रह उन्हें स्वीकार नहीं हुआ। मैंने तो समझा कि उन्हें ईर्या हो रही है। 38 देहातर इप्या? ? विदु ययाति हां, मुझ से, तुम स। विदु नही, चक्रवर्ती। शर्मिष्ठा देवी इन वृत्तिया से ऊपर है। ययाति देव को उन से अधिक किसी ने प्यार नहीं किया। ययाति तुम भी एसा समझती हो विदु निस्स देह । ययाति तुम ने भी नहीं । विदु हम केवल रमण करती है, प्रेम नहीं। ययाति विदु विदु कटु सत्य कहने के लिए क्षमा गरेंगे, देव । ययाति नहीं, यह सत्य नहीं है। तुम विनोद कर रही हो। लेकिन तुम्हारे इस कथन से मुझे क्तिनी पीडा पहुंची है, जानती विदु नहीं, राजन् । आपका पीडा देना मेरा अभीष्ट नहीं है। ययाति फिर एसा क्या कहती हो? विदु क्योकि यही सत्य है। ययाति यह सत्य मेरे हृदय को चीर दगा। विदु सत्य सदैव शुभ होता है। ययाति यह सत्य भी? विदु हाँ, यह भी । पीडा आपके प्टिवाण की है। ययाति नहीं, विदु । मुझे दशन मे मत उलझाओ। मैं तुम्हारे प्रेम का विदु क्षमा करें, दव । आप केवल मर यौवन के, मेरी देह के प्यासे है । प्रेम देवी शमिष्ठा वे पास है । ययाति तो वह मुझे स्वीकार क्या नहीं करती? विदु आपने उनसे प्रेम मागा ही कब? जाप ता सदैव देह की ही मांग परत रहे । ययाति मरा अधिकार है यह । मैं उसका पति हूँ। विदु अधिकार की भापालालमा की होती है, प्रेम की नहीं। ययाति लालसा भी हो ता क्या अनुचित है ? वह मरी विन्दु पत्नी है। यही न? (मुस्कराती है।) ययाति निस्सनेह । उस की देह मेरी है। विदु आप भूलते है, परवर्ती। अपन पुत्र की सेज पर जाने की अपना कोई भी मा मृत्यु पा वरण करना पसन्द करगी। देहातर 39 ययाति में शर्मिष्ठा या पति है। विदु लेकिन माप का यह मौयन, यह पौरुष देवी शमिष्ठा का पुन है। ययाति विन्दुमती' विदु शुभाचाय का शाप लाटा रना शाप देने से भी भारी पडा है, चमवर्ती। सारा प्रम उरट गया। ययाति प्रम? साम? विदु मानवी सृष्टि का गम । ययानि मैं समझा नहीं। विदु ममझ लेन तो इस दुप्वन स मुक्त न हो जात ययाति दुप्चक विदु विधान यही ह कि पुत्र म पिता का ही जम होता है। लेकिन आप म पुरु का पुनजम हुआ है। ययाति पुरुबा पुनज म 7 पहेलियां मन बुझाा। तुम बहना क्या 7 चाहती हो? विदु यही पि आम के इस पौरुप न शर्मिष्ठा की दह स ज म लिया है । शर्मिष्ठा देवी अपने ही पुत्र के पौरुप को भोगना से स्वीकार करती? ययाति तुम विक्षिप्त हो गयी हो, विदुमती' विदु अनुकूल न हो ता सम्पूण सृष्टि विक्षिप्त सान लगती है । लागो र सूय कर को, ईश्वर तय को विभिन्न कहा है। ययाति मैंने उधार लिया ह पुरु का यौवन । अन्य ममी कुछ तो मेरा ही है। यह दह, ये इद्रिया सब मेरी ही ता है। विदु इस दह का यल, इस का लावण्य पुरु का है। अ यथा इस देह मरगा ही क्या हे २ ययाति नि तु वह मैं उस लाटा दगा। विदु पर অয়ারি समय आन पर। विद्र तब वह वैसे भी वृद्ध हो रहा होगा। जा यौवन उस न आप को दिया है, यह अक्षय नही है । ययाति तुम कहना क्या चाहती हो। विदु अच्छा। इस बीच यति उस को प्राणशक्ति चुक जाय ता? ययाति विस को १ 40 दहान्तर ? 7 विदु उस बुढाप की जा वह अपने पर ढो रहा है । ययाति नहीं। विदु तो वह मृत्यु किस की होगी ययाति मृत्यु विदु ययाति की या पुरु की? (स्तब्धता) मौन क्या हो गये, चक्रवर्ती ? बतायें, पिस की मृत्यु होगी वह ययाति कुछ समझ में नही आ रहा । विदु ययाकि आप समयना चाहत नही। ययाति मैं नहीं समझना चाहता? विदु हो। यह देह अव पुरु की है। ययाति नही, विदु। मैं ययाति ही हूँ। मेरी मुखावृति, इस देह की गठन-सव ययाति वा है। विदु यह सभी परिवतनशील है। यह मुसाकृति वालपन म क्या ऐसी ही थी। देह के कोप निरतर परिवतनशील हैं और ययाति और क्या ? चुप क्या हो गयी। विदु और इस देह म यह परिवतन पुरु के यौवन से हो रहा है उस बुटाप से नही जो ययाति का है। ययाति लेकिन मैं ययाति हूँ। इसी नाम से जानते हैं मुझे सब । विदु वह एक नाम है । जब चाह उस मे परिवतन कर सकते है। ययाति रेकिन मेरी आत्मा? विदु उसका कोई नाम नही हाता। वह न पति होती है, न पुन । पिछले जम मे यह आत्मा क्या ययाति कहलाती थी? ययाति तुम उलझा रही हो विदु नही, सीधी बात है। ययाति किसी आत्मा का नही, देह का पाम है, और उस देह का सब कुछ अब पुरु का है। अयथा (अचानक चुप हो जाती है।) ययाति ययथा यया विदु कुछ नहीं। ययाति नहीं, कुछ मत छुपाआ जब इतना कहा है तो । विदु अयथा मुझे भी आपके साथ रहना क्यो स्वीकार होता? ययाति नही, विदु नही। विदु (कुछ चुप रहकर) सत्य अनुबूल न हो तो क्टु लगता है- लेकिन इस से वह असत्य नहीं हो जाता। ययाति तो मुझे क्यो स्वीकार किया तुमने? क्या विवशता थी ? तुम देवराज की पुत्री थी, अप्सरा नही । देहान्तर 41 विदु 7 विन्दु मैं पुर पर आसक्त थी। ययाति विदुमती विदु यही सत्य है, चरवर्ती। ययाति ता तो मेरे साथ क्यावि यह यौवन पुर का था जिस पर मैं आसनत थी। ययाति लक्नि देवराज' विदु वे जाते थ मेरी आसरित वे सम्बध म । ययाति तो भी उहान मरे पास भेजा तुम्ह? विदु भेजा था पुरु वे लिए। मोही महा था उन से । लगिन' ययाति लेविन क्या? विदु तब तक उस वा यौवा आप पे पास आ गया था। ययाति मै पिता हूँ उसका। विन्दु आपका बुढापा उस पे यौवन वा पिता है। ययाति विन्तु तुम पुरु पर आसक्त थी। विदु उस के पौरुप पर तज पर, यौवन पर। और यह सब उसी देह म था गिरो आप ययाति यह रहे हैं । लेपिन (चुप हो जाती है।) ययाति लेकिन क्या? विदु लेविन पुर भी तो नहीं मिला इस मय में। ययाति विदु। विदु हो, इस पारण, इस यावा, इरा तारा भी बाहर रह जाता था कुछ जो मरी बाहो म नहीं सिमट पासा था मानो। यह सब पुरुवा था-पुर नही था रेक्नि। ययाति मुझ में पुर या तलाश करती रही तुम विदु आप में नहीं, इस यावन म। मैन समया था-यही ता है पुरु लिस मुझे पाना है। मरा भ्रम था लवित। यह सब पुर का था, पुरु नहीं था कि उस ही पासपी में! (ययाति देखता रहता है।) समय आ गया है मुझे अब गोट जाता चाहिए। (ययाति पौंपता है।) ययाति वहाँ। विदु इद्रलोय । पर मर उदर म जो चीज पल रहा ह उस विसपा नाम दूगी म। ययाति ओह ! यह क्या दिया तुमने वसा जप य मृत्य गुग के लिए पुरु की आसक्ति म मरे साथ 42 देहान्तर अपा
7
विदु आपन भी क्या इसीलिए नहीं लिया था पुरु या यावन
विदु चली जाती है। ययाति उसे जाते हुए देखता है।
फिर सिर झुका कर वठ जाता है। कुछ पल की चुप्पी ।
फिर सिर उठाता है।
ययाति यह क्या कर बैठा मैं ? पुरे पर आसक्त थी वह और मेर
साथ' में पुरु' शर्मिष्ठा, कितना सहा है तुमने ! मैं ने क्या
नही समझा यह सब? लेकिन मैं तो प्रेम चाहता था,
निश्छाय प्रेम-वह मेर भाग्य मे नही ह स्यात् । कही कच,
कही देवयानी, और अब अपना ही अश पुरु' कही मुक्ति
नहीं । सब कुछ ले ला मुझ से । सब कुछ। छाड दूगा मैं यह
चक्रवर्तित्व-वस एव पल' निश्छाय, मुक्त प्रेम एक
पल'
मच पर धीरे धीरे अँघरा हो जाता है।
देहासर 43
दूसरा प्रवेश पलग पर पुर अपलेटा है। पर पान म पिसी चीज यो दस पर उठान के लिए बिना लाठी उठ कर जाने की कोशिश परता है। हाफ जाता है। बीच में ही लौट कर पलग की पाटी पर बठ जाता है। इसी बीच शर्मिष्ठा माती है और दोडपर उसे संभालती है। उस में ललाट पर से पसीना पोछती है। २ इसीलिए कहता हूँ कि दुबलता अभिशाप है। कमी कमी मोचता हूँ (अचानक चुप हो जाता है।) नमिष्ठा क्या सोचते हो पुरु पुरु यही वि वि यदि शाप लौटान की विधि न बतायी हाती शुर ने तो चमवर्ती से सहन करते यह सब। वे तो बहुत अधीर है शमिष्ठा और आत्मकेन्द्रित भी। क्या कह रही हो? नहीं, यह तुम्ह शोभा नहीं देता। शर्मिष्ठा अपमानित नहीं कर रही उह, पर साय यही है । चुप हो जाती है। वाला। सपथ कैसी? पुरु मां, मरी ओर देखो, मा (शमिष्ठा उसकी ओर दखती है।) एक बात पूछू ? सच सच कहोगी न ? शमिष्ठा एसी भी क्या बात है ? पुरु कहूंगा । पर उस स पहले तुम्ह शपथ लनी होगी। शमिष्ठा पुरु मरी शपथ कि तुम कुछ छुपाआगी नहीं। दशमिष्ठा ऐसा भी क्या प्रश्न है तरा? पुर है, मा। वह मरे अस्तित्व का प्रश्न है। मिष्ठा तुम्हारे अस्तित्व का? एसी क्या बात है? बोला। शपथ लेती होन? देहातर . गमिष्ठा हां, हो । कुछ बालो ता सही अव । पुरु चक्रवर्ती से अलग क्या रहन लगी तुम शर्मिष्ठा यह तुम्हारे अस्तित्व का प्रश्न कंस हो गया पुरु' यह प्रश्न क्या तुम्ह पूछना चाहिए? पुर मेरी दृष्टि में यह मेरे अस्तित्व का ही प्रश्न है । शमिष्ठा वैसे यह प्रश्न तुम्हारी मर्यादा ये वाहर है । मैं इसका उत्तर देन को वाध्य नही हूँ। पुर मुझ पर विश्वास नहीं है, मा? शमिष्ठा वात विश्वास नविश्वास मी नहीं, मर्यादा की है। पुरु वही ता मैं यह रहा हूँ। तुम क्या मुझ स मर्यादाहीन आचरण को अपक्षा वर सक्ती हो? शमिठा इसीलिए मुझे आश्चय है, पुर । यह बात तुम्हारे मन मे उठी ही क्या मरा प्रश्न निरूपण ठीक नहीं रहा, माँ। मरा मतव्य था कि शर्मिष्ठा रही । हम दाना के बीच झाक्ने की तुम्हारी इच्छा अनुचित ? क्या? पुर दोप नलगाओ, मां । मरा प्रश्न केवल मुयसे सम्बधित था। शर्मिष्ठा तुम्हारा इससे क्या सम्बध? पुर वही ता जानना चाहता था म। वही इस का कारण यह ता नही कि (चुप हो जाता है।) शमिष्ठा पुरु सम्भव है तुम्ह चक्रवर्ती की यह बात सहन न हुई हो- शर्मिष्ठा कौन-सी बात ? विदुमती? पुर नहीं। शमिष्ठा तो? पुर कि उ हाने जिस का यावन लिया वह तुम्हारा ही पुत्र ह । शर्मिष्ठा पुरु पुरु तुमने मेरी शपथ ली ह, मा। शर्मिष्ठा मने वहा था न चक्रवर्ती जात्मकेंद्रित है। पुरु वह तो तुम पहले भी जानती थी। लेकिन अब तुम उह सहन नहीं कर सकीन? मरा योवन लेने के शर्मिष्ठा अचानक उत्तजित हो जाती है। देहान्तर 45 ? ? तभी तो मामिष्ठा पोई मां नहीं सह रावनी यह । पुर बीच में ही बात पाटता हुआ लाठो का सहारा र पर गलग से उठ राडा होता है। पुर योई पुव मी सहन नहीं कर सकता यह गप्ठा निरादह ता मुझे मगला व मरास छाड दा, मौ । बरसे तुम मरी परिचर्या नही करोगी। सामिष्ठा क्या इस अमागिन मां को यह दह क्यो, पुरु पुर अमागा यह पुत्र है जो मां से परिचर्या परवाता है। समिष्ठा लदिन पुन यदि दुवारा हो पुर शर्मिष्ठा पुरु भऔर वह धुढापा अपने ही पति वा हो। दशमिष्ठा पुर क्षमा करो, मां । जो भी हूँ तुम्हारा पुन ही रहूँगा। परमिष्ठा मैंने सब पुरु तुम्हारी परिचर्या मे पात्सल्य नहीं है, माँ । एक लगाव हे जा असहाय और वृद्ध पति के लिए होता है। तुम्ह लगता है कि यह बुझापा चक्रवर्ती का है इसलिए तुम्हें इसकी सेवा करना गहिए । नही मां तुम्ह चपवर्ती के साथ होना चाहिए। ययानि का प्रदेश। ययाति इसीलिए तो ययाति आया है यहां। मब आश्चयक्ति हो जाते हैं। अतत शर्मिष्ठा मौन भग करती है। गमिष्ठा चमवर्ती । आप यहाँ। ययाति हाँ गमिष्ठे। (ययाति का स्वर अत्यत कोमल है।) मिष्ठा लकिन आप तो यात्रा पर जाने वाले थे विदुमती ययाति चली गई अपनी यात्रा पर। हमारी याबा तुम्हारे साथ होगी। गमिष्ठा मेरे साथ ययाति क्यो। हम तुम्हारे सहयात्री होने के योग्य नहीं गमिष्ठा क्या कहते हैं, देव? लेकिन यहां पुरु 46 देहातर ?
पुरु वीच म ही वात पार देता है। पुर पुरु की देख-भाल मगला कर लेगी। तुम्ह चश्वर्ती के साथ जाना चाहिए, मा। ययाति पुरु को तो स्वय सारे राज्य की देख-माल करनी है । मुझे? लेकिन ययाति हां, पुरु । हमे इस ऋण से भी मुक्त करदो अब । पुर लेकिन, चक्रवर्ती ययाति अब हम नहीं, तुम चक्रवर्ती हो। नहीं। मुझ से नहीं हो सकेगा यह । ययाति यह राजाज्ञा है, पुरु । पिता या आदेश मी। शमिष्ठा पुर ठीक कहता है, आय | ऐसी अवस्था मे ययाति यह अवस्था ता हमारी है, शर्मिष्ठा । हम अपना बुरापाल्ने आये हैं-पुर को उसका यौवन लौटा दने । सब कुछ देर चुप रह जाते हैं। शमिष्ठा अकस्मात् यह ययाति बहुत सोच विचार कर निणय लिया है यह । वितु इतनी त्वरा क्या ? अभी तो एक वप भी नहीं हुआ। ययाति अपनी नियति से पलायन कायरता है। ययाति जा चुछ हो, कायर नहीं है। यह बुढापा मेरी नियति है तो में ही मे वहा भी करेगा। पुरु अचानक मुह फर पर चित्लाता है। नहीं, यह नहीं होगा अब ? यह यौवन चनयती ही रगें। मैं बुटापे से सतुष्ट है। ययाति लेकिन क्यो? मैंने अपना यौवन देकर यह बुढापा लिया है। इस मैं ही लौटाऊँगा। गमिष्ठा ययाति बुढाप से इतनी आमक्ति। गमिष्ठा वोलो, पुन पुर चुप रहता है ययाति ऐसी भी क्या विवाता है तुम्हारी? दहातर 47 मगह नही मागा उस योयन या। यह मर लिए नहीं है भव। ययाति यिम में लिए है? पुर आप लिए। शर्मिष्ठा अपायो से माला पुर। तुम चरवर्ती के सामन सडे हो। ययाति नहीं, यह एन दा उम । उसका राप स्वाभाविक है। पुरु यह रोप नहीं है, चश्यी। मेरी विवशता । शमिष्ठा विवशता गी? ययाति वही ता जागना पाहत है हम । क्या? क्या जाना चाहत है आप? मरा योवन आप का है । मुमे नहीं 'ना है म । यह क्या पयाप्त नहीं है ? ययाति अपा पुन पर इतना भी अधिकार नहीं हम 7 पुरु पुन की हर बात क्या पिता का जाननी ही चाहिए? ययाति यह तुम्हारी निजी बात यही है । टम से हमारा मम्मथ है। हमारी भी नियति जुही है इस स । चनयता। ययाति यह चयवर्ती ययाति नहीं, तुम्हारा पिता कह रहा है। उस उपना बुढापा क्या नहीं मिल सकता पुर पुत्र के यौवन से विनिमय जो हो गया है उसका। ययाति दिन हम उस यौवन का महप लौटा देना चाहत है । आप भूल रहे है यह यौवन अव वही नहीं है। ययाति क्या? जाप ने मोगा है इम मेरे लिगा त्याज्य है यह। याति पुरे २ प कोई पुन उस यौवन को स्वीकार नहीं कर सकेगा जिम न उमपी मापा शर्मिष्ठा मर्यातम रहा, पुरु। पुर वही ता कर रहा हूँ माँ । मर्यादा की ही ता बान है। ययाति यह यौवन तुम्हारा ही है पुरे । मुझ पर तो ऋण था। पर यौवन कोई वस्व नहीं है चक्रवर्ती। वह एक अनुमबह । मरे लिए अब वह अनुमव एक स्मृति रागा~-एक असहनीय स्मृति। मरी चेतना "स वाय का नहीं झेल पायेगी टूट जायगी। 48 देहातर
पलों का मौन।
ययाति
हम तुम से सहानुभूति है, पुरु । लेकिन हर किसी को अपनी
नियति से स्वय ही साक्षात्कार वरना होता है। मैं उस रो
आतक्ति जितना मागता रहा, वह काल छाया सी मुझे
ग्रसती ही गयी। अब उस के समक्ष गडा हो गया हूँता लगता
है मुक्त हो गया हूँ-निश्छाय ।
पुरु लेकिन मैं
मत,
ययाति तुम्हारी वेदना को समझ सकता हूँ। लेकिन उम से भागा
उस से साक्षात्कार परा। उमी म मुक्ति है।
पुरु रितु
ययाति जानता हूँ, यह नियति मरे कारण है। लविन मै पिता हूँ,
इतिहास हूँ तुम्हारा। तुम न इतिहास के दायित्व मा ममाला
है तो उसके परिणामा से कस वचोग?
पुर नही, चक्रवर्ती।
ययानि निणय यही हुआ था, पुर, कि मैं जब चाहू तुम्हारा यौवन
लौटा सकता है । यह लो, मैं तुम्हारा यौवा लीटाता हूँ।
अपना मुकुट उतार कर पुरु के मस्तक पर रख देता है।
पुरु नहीं, नहीं तात । मुय से नहीं हागा आह जात गाप
के इस नरक मे
धीरे-धीरे पुरु युवावस्था म जाता दीखता है। लेकिन उस के
चेहरे पर पीडा या भाव बहुत स्पष्ट है। ययाति वृद्ध होता
जा रहा है। पुर के हाथ से लाठी लेता है। शर्मिष्ठा आगे
वढ कर उसे सहारा देती है। दृश्य निश्चल हो जाता है।
भच पर जघरा हो जाता है।
देहातर 49
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ডিজিজ্ঞেক্তি
किमिदम यक्षम वा प्रथम मचन रगन नाटयदल द्वारा 13 सितम्बर'85
को बीकानेर म हुआ।
निर्देशन
कलाश भारद्वाज
पात्र
घाय स्पा पारीक
प्रोफेसर राकेश मूथा
मां युवती व गूगी-बहरी उडकी नीलम शर्मा
अघी लडकी शीलम शर्मा
शरद सक्सेना
युवर
सतीश शर्मा
मूर्तिकार प्रहलाद राय
लडका निधिर फबियन टिक्का
नवागतुक
एक जटिल नाट्यानुभव किमिदम यक्षम पापान जब नाविशारजी पहली बार रगन ये सभी मित्रा र सम्मुस विगा तो नाटा रे गहरे अयों वे अधिक स्पष्ट न हान ये वारसद य जरिल सरचना का शुभव याचन ये राा वार-बार होता रहा। याचन र दारान कुछ दृश्य जरी गिते गये घाय का लगातार देसत रहना गूगी-बहरी रडी का दर्द भरा गहरा यण्डहर म प्रोफेसर की माना अपने वोही गोजतो ये न जाये कुछ धुधला, कुछ ग्पष्ट झिलमिलाता गया-एक दूजे में पुरा मिला । वामन गमाप्त हुआ-बची रही ये सब तस्वीरें और एक बेचैनी। नाटा या फिर पिर पढ़ा-साधिया के सग और अलग मभी-और प्म करने की वेचनी वढती गयी। रेविन धाय ? इम गटिल चरित्र को निभान के लिए अभिनेत्री वी तलाश शुरू हुई ता लगा रि यह नाटप हम स नही हा सवेगा-चीयाार मे याई अभिनेत्री नहीं दिखी जा इस भूमिका के साथ याय कर पाती। फिर भी एव जिद दि पहली प्रस्तुनि रगन ही करेगा भार नाटककार भी इस जिद आगे राजवार । मारे प्रयत्ना के वारजूद पाटय एक अर्से तब पड़ा रहा। एक दिन अचानक स्पा पारीक म बात हुई, उम न नाटक पढा। फिर गव ये माय वैठार वाचन हुना । लगानि हो सकता है। पहली बार नाटक जब सुना तर साथ ही साथ एर बडे मच पर उसे हाते हुए भी दय रहा या। रेलवे प्रेक्षागृह ही इस आवश्यक्ता की कुछ पूर्ति कर सरता था। उभी का ध्यान मे रपकर मचन की तैयारी की गयी। मच को तीन भागा मे वाटा। दशा की दृष्टि से वायें गण्डहर मध्य और दाहिनी जार घर या भाग। तीना भागापर पोटफाम वा उपयाग वर अलग अलग स्तर बनाये गये। मच पर यूनतम वस्तुजा का उपयोग किया गया ताकि एक मूनैपन आर रहस्यमयता का वातावरण वरावर बना रहे । वाचन और पूर्वाभ्यास चलता रहा । नाटा की जटिल सरचना अधिकाधिक चुनौतीपूर्ण होती गयी। अथ के यः स्तर एक साथ झिलमिलान लगे-फैटेमो आर यथाथ एक साथ स्पायित बम हा। इस बीच मैंन खुद का अर स कमजार होत दगा, लेविन जमिनताआ और अन्य महामियो की लगन म विश्वास रावल मिला। जानना मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है और जानने का सर्वोच्च लक्ष्य है खुद का जानना। रोपिन खुद को जानने के क्या मानी है ? क्या अपन इतिहास को, जतीत को जानना ही सुद का जानना ह? इतिहास है क्या? जानना तो मुक्ति है-~~पर इतिहास क्या कभी मुक्त करता है? या दि अपन का जानना अपने होने का वोध है और इतिशास वह अभिशाप है जो इस बोध को होने नहीं देता? मिमिदम याम को केंद्रीय समस्या आखिर क्या है ? बचपन से ही घर से भागा प्रोफैसर (पुरातत्त्ववेता) इस सवाल का लेकर परेशान है कि उसका इतिहास क्या है ? अपने पिता को अपने इतिहास के मूल की खोज जारी रखने के लिए हो वह बीस साल बाद घर लौट आता है। घर आन पर मां की जगह धाय है। यह मान, घुछ बताती ही नहीं- रहस्यमयी-सी धाम जो लगातार देयती आ रही है शायद देराती रहेगी भी। इस रहस्य को और गहरा और तरलीपदेह बनाती है गूगी-बहरा लडको। 'यह तुम्हारी वहिन है , धाय कहती है। परेशान प्रोफेसर चारपाई पर बैठ जाता है ये शब्द सुन कर। बचपन में मा से किया पश्न कोष जाता ह-~-मेरे पिता कहा है ? महा स शुरू होता है नाटक का पहला फ्लैश बैव । स्थिर बैठा अपलक ताक्ता प्राफ्सर बीस साल पीछे पहुंच जाता है लडक का प्रश्न, 'म मरे बापू कहा है ?' 'मदिर नही गया आज तू?'-प्रश उत्तर मे प्रश्न| क्या प्रापसर पो उत्तर मिल गया? यह नाटक की मापा पाही कमाल है कि माधारण सदा और सहज बोलचाल वे पाक्य विन्यास म गहरे दाशनिक अथ पलपते रहते हैं। इस दृश्य में प्रोफेसर साक्षा भाव म अपने अतीत को देखता है, घटनाएँ उस इद गिद घटती हैं, लेकिन दूसरे अभिनेताआ के लिए उसकी उपस्थिति का कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया था। N पण्डहरा म प्राफेमर का एक मूत्र मिलता है पत्थर की मूर्ति, एक युवा स्त्री पर युवा एक वृद्ध पुरुपदाना साप की कुण्डली मे बद। साप की पुतार और प्रोफेसर या बदहवास भागना। यह सांप क्या है? मन का ब्रम या भय? बासना या शैतान या रक्षाविस सम्पदावा रक्षक ? क्या उस का दूसरा लिए जानना आवश्यक नही पूरा नाटन पंटसी और यथाध तमा अतीत और वतमा ताने-बान की जटिल भुनायट मे बुना हमा है। 54 फ्लैश वक र दृश्य हल्ला नौला प्रकाश लिए हुए शुरु हाते। उसी मे साधारण प्रराश मिला दिया जाता। यह व्यवस्था सभी श्याम थी। नाटक म सभी दृश्य शीघ्रता स आग पढत-फिर अतीत म लौटते। लेकिन इन सब म मूर्तिकार का दृश्य क्वल चौथाई मिनट का था पर प्रस्तुति की दृष्टि स चुनौती मरा क्यापि शाटर यहां चरम सीमा की आर अग्रसर है। अगर यह दृश्य हल्या होता है तो पूर नाटक के प्रभाव का हल्का कर देता है। इसीलिए जम ही धाय अँधेर मच की जोर देगना शुरु करती ह मि छैनी की ठक ठक शुरू होती है---प्रकाश-युवक युवती की बातचीत-ठय ठव धीरे धीरे बढती जाती ह-अचानक मूर्तिकार या प्रवेश-चावू का यार-चीख के साथ युवक का गिरना-याझ यो आवाज-ठप ठप यद-तवला गुरू तेजी स आर मूर्तिकार का अपनी ही पुत्री का दवाचना। दृश्य में चाकू स वार के साथ ही प्रकाश झटपे मे धीमा हाता ह और गैस ही मूर्तिवार युवती को दबोचता ह वम ही फेड आउट। जैधरे म बचाव का सघप-तरला वद। सितार की दद भरी आवाज के साथ-साथ धाय पर प्रकाश-जम आवाज धाय वे काना म आज भी गूज रही है । धाय जोर दशक साथ-साथ वतमान मे आत ह । प्रोफेसर की लगातार तलाश के दारान आशा निराशा के वीच वा अंकुर है अघी-गूगी-बहरी लडकी जा चरम हताशा के क्षणा म प्रोफेसर और गूगी-वहरी लडकी के रिश्त वा पल है-उस रिश्त का जिस के घटित होने के साथ ही प्राफेसर खण्डहर के साप रा हैसा जाता है-धाय जिसकी चतावनी पहले ही दे चुकी थी। यह अधी गूगी-बहरी लडकी क्सि का सकेत है ? यह किस अत की ओर ले जाता है हम यह पाय मो क्यो लगातार देयती आ रही है ? क्या देखते रहना ही उस की नियति है? क्या वाल भी देखत रहने को विवश है? अगर धाय जानती है सब कुछ तो बताती क्या नही? रेक्नि यया वह सचमुच कुछ जानती है या जानन का केवल भ्रम ह जिस बनाये रखना उस की नियति है । 'हुँह बताना होगा कौन सह पायेगा वह गव रेगा फिर मो? हर कोई अपनी तकलीफ भुगत रहा है। कोई नही जानता मैं क्या भुगत रही हूँ जा देसता है वह भी ता भोगता है वह जानना चाहता है समाता है, मैं जानती हूँ। कौन क्या जानता है? जिम न दखा उस ने भी कुछ नही जाना, न उस न जिस ने भागा।' 'जा देसता है, वह भी ता मागता है।' ता क्या पाल भी भागता ह जो सब कुछ कारप्टा है। क्या हम सबकी यही नियति नहीं है ? क्या नाटक देखते पिमिदम् यक्षम् 55 ? जार क्या जान हुए दशक भी घाय नही हा जाता? आर धाय हा जाना क्या एक माथ प्राफसर, गूगी-बहरी लडकी और उही स उत्पन्न अंधी गूगी वहरी लडकी हा जाना ? नहीं है। नाटक का अ त हाता ह ावाग तु स जिम प्राफ्मर के अधूर वाम का पूरा करााह-निस के माँ बाप यानी इतिहास का काइ पता नहीं है। धाय यह सुन कर अधी-गगी नहरी लडकी की आर देखती आर पागला की तरह हंसती है। क्या भूत, वतमान आर भविष्य सब एक साथ मिलकर हँस रहे है ? किस पर? क्या वतमान का अतीत स जुडे रहना जनिवाय है ? क्या जतीत स कोई छुटकारा नही-पर उस छुटकार के बिना मुक्ति कहा है? अपनी जमिशप्त नियति स मुक्ति । हम है यह जानना क्या काफी नही? नाटक के अभिनता ही नही रगन के सभी सदस्य जैस नाटक + अहसास को जी रहे थ। यही कारण रहा कि प्रदशन के दौरान दाना दिन में तीन बार बिजली गुल हा जाा के वावजुद दशक दम साध वैठे रह । बिजली आन पर नाटक उसी रिदम के साथ जारी होता रहा-पान जार दशक जैस एक हा गय हा। बेहद उत्तेजक प्रतिक्रिया हुई। लम्ब समय तक चचा हाती रही- अधिकाशत आरख को रबर। ऐम नाटक क्या होने चाहिए। कहना क्या चाहता है आखिर नाटयवार ? क्या हम सब का अतीत नाजायज है--पूरी मनुष्य जाति का। आर उमी मात्रा म प्रशसक भी थे जो कह रहे थपि नाटक उह जपन जपन 'मन व पण्डहरा मर गया, कि इस नाटक को वे कभी नहीं भूल पायेंग। बहुत-सी कमिया के बावजूद यह प्रस्तुति की सफलता है कि दशक एक वचनी रकर लौटे। कोई भी श्रष्ठ रचना एक वार पढने या करन स पूरी तरह सम्प्रपित नहीं हाती-उस बार-बार पढ़ना-करना जरूरी है। पर आज रगर्मिया का इतनी सुविधा वहीं फिर भी एक लम्ब अतरार वाद हिदी म एक मालिब वृति मिली जा बहुत ही गहर कुरदती ह मन का, वचन करतीह साचा का-दस के लिए हिटी रगमच रचनासारका ? ऋणी है। बीकानेर। -लाश भारद्वाज 56 दहान्तर
अक प्रथम
पहला प्रवेश
एक कमरा । हल्का ॲपरा है। एक ओर एक खाट पर एक
छाया-सी दिखाई देती है। एक आदमी है। उम्र यही कोई
वत्तीस-तैतीस साल । पाश्व भाग में स रोशनी यो कुछ पाई-सी
आती है। घोर घोरे एक लडकी का प्रवेश। उम फरीय बीस
वष । चेहरा गम्भीर । हाथ म लम्प लिये है। आदमी चीर पर
उस की ओर देखता है। एक ओर रखी मज या ऐसी ही किसी
चीज पर लम्प रस देतो है-इस तरह मि आदमी पा चेहरा
साफ दिखाई देने लगे।
?
प्राफेसर पौन हा तुम? मां यहाँ ह
?
लडको लम्प रख कर उस को ओर एकटक दसती रहती है। कोई
जवार नहीं देती।
मैं पूछ रहा हूँ मा वहाँ है ? कहाँ गया है ? अभी लाटी क्या
नहीं ? उस चिट्ठी नहीं मिली थी मेरी? (कुछ पल ठहर पर)
और तुम? तुम कौन हा
लडको चुप रहती है। प्रोफेसर कुछ देर उस को ओर देखता
रहता है। फिर एक ओर पड़े सूटकेस को घसीट कर अपन
सामने रख लेता है। साल कर सामान निकालता है। कुछ
कपडे, विताउँ, खुदयीन आदि । सामान चारपाई पर रखता
है। इधर-उधर देखता है और एक ओर रखो मज से लम्प को
उठा कर फिर इधर-उधर देखता है। लड़की फुर्ती से आग
बढ़कर सम्प उसके हाथ से लेती है और एक ओर खड़ी हो जाती
है। प्रोफेसर एव पल उस को मोर देखता है और फिर किता
साट से उठा कर मेज पर रखने लगता है।
तुम दाइ यी नागरानी लगती हा । तर ता तुम नही थी। (गौर से उसकी ओर देखकर) पिशायद पदा भी नही हुई हागी। यही की रहने वाली हा क्या? मुझे जानती हा ? उडकी स कोई जवाब नहीं पान पर पीछ मुड कर दसना है। सडको वस हा लम्प हार म लिय सडी उसो वा ओर देख रहो है। कुछ युझलान का सा भाव प्राफ्सर वे चेहरे पर आता है। वह अचानक चीख कर जसे कुछ कहना चाहता है पर यर-वयर रक जाता है और पिताव पाठ कर मेज पर बन स सजान लगता है। मरी चिटठी ना मिल ही जानी चाहिए थी। मिल गयी थी न ? फिर भी मा बाहर क्या चली गयी। लडकी चुप ही रहती है। प्रोफसर अचानक हाथ की किताब जोर से जमीन पर फकता है। प्रोफसर का जस अचानक समझ में आता है कि उसे इतना उत्तजित नहीं होना चाहिए। किताव की पुरानी जिल्ल फकने की वजह से टूट गयी है और कुछ पन बाहर निक्ल आय हैं। यह किताब और बिखरे पषों की और सता है । उह उठाने के लिए वह युर इस से पूव ही लडकी लम्प पग पर रख कर वितार क रिसर पने इक्ट्ठ करन लगती है। प्रोफेसर लडकी की ओर देखता रहता है। लडी पाने एकमित पर उस देती है। वह उस को ओर गौर स दखता हुआ पने ले लेता है । सडको वापिस लप हाथ में लेकर खडा हो जाती है। मरा मतलव हरि तुम तुम जाब क्या नहीं ती? स्तिनी देर हुई मुझे आप कुछ पता ताचा 7 राहकी फिर भी बसराय सी रानी चुप है। प्राफसर अचानक जार सचिल्लाता है । वालती क्या नहीं ? जवान नही? गुनाइ नही दता मैं क्या यह रहा हूँ ? बहरीहा क्या? 58 दहातर
सडको क चहर पर परेशानी और भय क चिह्न दिखने लगे हैं।
प्रोफसर परेशान-सा एक कोने स दूसरे कोन तक चहलकदगी
करता है । अचानक बीच म पड सूटकेस से ठोकर साता है-कुछ
फिसलता साह।
ओह ! क्या रग्य छाडा हे बीच में यह सव
7
पाव उठा पर सीतारता हुआ अंगूठ को दबाता ह। फिर पाव
का जमीन पर टिका कर साट की आर जाता है। साट पर
बठ जाता ह। लडकी लम्प को बीच की ओर ले जा कर पाय
की ओर देखती ह और घबरायो-सी सडी हो जाती ह । प्रोफसर
उस को घवगये दस कर कुछ नरम पडता है।
लेकिन तुम मरी वाता का उत्तर क्या नहीं देती? बोलने
सखा तो नही जाऊँगा म तुम्ह । क्तिनी देर हुई ह मुझे आये।
माँ का भी पता नहीं । और तुम कुछ बताती ही नहीं ।
लडकी लम्प मेज पर रस कर अटची से विखरी चीजें उस म
डालती है और अटची को चारपाई के नीचे सरका देती है । फिर
लम्प उठान मेज़ की ओर जाती है।
नाम क्या ह तुम्हारा
?
पूछता हुआ प्राफ्सर चारपाइ स उठ वर लडकी क पाछे जा कर
खडा हो जाता है। लडको लम्म उठा कर पीछे मुडती है तो उसे
सामने ही खडा पावर डर सी जाती है और लम्प मेज पर रस
देती है । उमे चुप हो पामर प्रोफसर फिर उत्तजित हो जाता है।
नाम पूछ रहा हूँ तुम्हारा । तुम स कह रहा है, दीवार स
नही।
तहको चिल्कुल भयमीत हा गयी है। प्रोफेसर और शोपित होता
है और लडकी को परे घरल दता है।
मरा नहीं तो यही जाार (लडकी गिरते गिरते बचती है।)
मो मी न पहा मर गयी?
विमिदम् यशम् 59
अचानक धाय का प्रवेश। घाय प्रोफेमर मर गयी तमी तो चिल्ला रहे हा यहां आपर । वह थी तब वहाँ थे? कभी सवर भी ली? क्या? मां मरगयी। ब? वसे? तुम? तुम कान हा' धाय लडको की ओर देखती है। चल कर उसके पास जातोह। सर पर हाथ फिराती है। इस के पैदा होते ही। वीस वप हान यो आय। तुम्ह घर से गये भी तो इतना ही नर्सा हुना होगा न? तुम्हार जाने से परीब साल भर बाद ही तो हुई यह । धाय लडकी धाय से लिपट-सी जाती है। प्राफेसर य रुडी ये तुम तुम धाय हो न? धाय हाँ । और ये तुम्हारी बहिन । प्राफेसर बहिा। पर पर यह वैस? मा मर पिता धाय क्या? तुम कैस पैदा हो गये थे? बाकी सब कसे पैदा हा ? 7 जाते है मैं ? ओह प्रासर खाट पर परेशान सा मुह छिपाकर बठ जाता ह। घाय व लडकी उस की ओर देखती रहती है। तो क्या सचमुच लडकी लम्प को उठा कर देखती ह और उस लेकर पाश्व म चली जाती है । मच पर हल्का अपरा हो जाता है। एक कोने म तीन प्रकाशवृत्त । एक औरत वठी कुछ घरेलू काम कर रही है । उम्र यही कोइ तीस वरस के आसपास । करीव ग्यारह-वारह वप का एक लडका अचानक आता ह । चिल्लाता हुआ। उडवा मां मां मा क्या है ? चिल्ला क्या रहे हो? समा मां, मेरे पिताजी कहां है? 60 देहातर माँ कुछ दर उस की ओर देखती है। मा 7 लडका 2 मा तडका मा मदिर नही गया आज तू कही नहीं जाना मुझे। पहले बताआ वापू कहाँ है तुझे बताया न वाहर गये हैं। कितनी बार तो बता चुकी हूँ। नहीं। तुम झूठ बोलती हो । सभी के वापू घर आते है तो वे क्या नहीं आते' बताआ। मुझे नहीं मालूम। लेकिन तुझे तरलीफ क्या ह वापू के बिना ? मैं क्या प्यार नहीं करती तुम्ह? मुये वापू चाहिए । वताती क्या नहीं ? कहा है वा तग गत करो । जाजा, मदिर जाओ। आरती का वक्त हो रहा है। नहीं। तुम झूठी हो । ठीक यहते है वे सब । 7 तडका मा लडका । मा चौंकतो है। मा कान वे सब 7 वस्ती वार। लडका उत्तजित होती है। मा क्या कहत ह व ? लड़का गदो है तू । हा, ठार कहत है गदी गदी मां तू तू भी। एडका हा, गदी है तू गदी माँ या चेहरा अचानक कठोर और विकृत हो जाता है । वह जसे जावेश म आवर बोलती है। और नू मां आरतू क्या है पिर? उसी गद स पैदा हुआ कीटा। तू और 4 सव ममीने | कौन जानता है विस का बाप कौन ह' वमोने । कुत्ता की औलाद । खून पिला पर पैदा पिया तुझे खून पिलाारपाल रही हूँ और आरतू चल निरल यहाँ से मूअर रडवा हां, हो ना जाऊँगा नहीं रहूँगातुगदी युतिया पे साथ। रिमिदम् याम् 61 गुस्से में आकर पाश्व में चला जाता है। मां और भी उत्तजित होकर चित्लाती हुई दूसरे पाश्व में जाती है। मा हो, चला जा। वापिस मत आना असल बाप का है ता। यमीना। पाय प्रकाशवृत्त धीरे धीरे मिट जाता है। लडकी लम्प ले कर फिर पाश्व से आती है । वाकी लोग फिर साफ दिसने लगते हैं। प्रोपेसर तो क्या सचमुच माँ हाँ, एक तरह से लोग ठीक कहते थ । पर इतना जानती हूँ तुम्हारी माँ बहुत प्यार करती थी तुम्ह । बहुत ढूढा तुम्हे पर तुम नहीं मिले। दिन रात रोती रहती थी। तुम्हार चले जाने की वजह से पागल-सी हो गयी। पता नही उस बीच कैसे यह पेट मे आ गयी। कमजोर हो गयी थी नहीं सह सकी बसी। यह सुनता हुआ प्रोफेसर उदास हो जाता है। प्रोफेसर यही है वह लडकी । घाय हाँ, यही । तुम्हारी बहिन। प्रोफेसर बहिन धाय क्यो? एक ही पेट से तो पैदा हुए 7 प्रोफसर कुछ पल चुप रहता है। प्रोफेसर धाय पर यह जवाब क्यो नही देती मेरी वाता का? पैसे देगी? जाम से ही तो गूगी बहरी है। प्रोफसर कुछ खो सा जाता है । उनासो कुछ और धनी हो जाती क्या सोचने लगे ? सुन तो रह हो न? गोफेसर रो हाँ लडको की ओर देखता है। लड़की की आखें गीली सी हो रही है। 62 देहातर
घाय
यह जानती है में कौन हूँ?
हो तुम्हारी चिठ्ठी मिली तो मैं ने समझा दिया था। इशारा मे
काफी वातें समझ लेती है।
प्रोफसर धीरे-धीरे लडकी की ओर जाता है। लड़की की आँखों
से आंसू गिरते हैं। प्रोफसर के चेहरे पर उदासी, करणा और
असमजस का मिलाजुला भाव है। धाय देखती रहती है। लकी
अचानक पाश्व मे चली जाती है। पीछे पीछे घाय। मच पर
अघरा हो जाता है।
विमिदम् या 63
अक प्रथम
द्वारा प्रवेश
मच पर घोरे धीरे प्रकाश हा है। प्रोफसर एक कोने म मेज
पर पागजों सदर सामने रपे वठाह ।
अलग-अरग उठा पर आईग्लाग या मुदयीन यो सहायता से
पुछ पढन यी पोशिश करता है । कमरे म एप को पत्थर की
पुरानी मूर्तियां रसी है।
मेज पर एर गिलास मे पाय रखी ह एक ओर । लेकिन प्रोफमर
पा ध्यान उस ओर नहीं है। यह अपन पाम म डूबा हुआ है।
रडको पाश्व म मे आकर देखती है। यह एक उडती सी नजर
उस पर डाल कर फिर अपने काम म डूब जाता। लडको एक
ओर रमी चारपाई पर पडे पडों को नीचे पडी अटची को
निकाल पर उस म रखती है-इस बात का ध्या रखते हुए
कि प्रोफसर की एकाग्रता मे सलर न पड़ । अचानक उस पीनार
गाय के गिलास पर पडतो ह । जा पर गिरास छूकर देखती ह
पि चाय ठण्डी हो गयी है। गिलास उठा कर पाश्व म ची
जाती है। प्रोफमर चार चोर कर उस की ओर देखताह ।
प्रोफेमर अरे, ठहरा । जभी पी नहीं मर्द सुनायी ही नही देगा तो क्स
रुकेगी।
फिर अपने कागजों की ओर नजर डालता है तो चौंक कर उन
में से एक फाटो उठाना है। यह किसी पुराो शिलालेख की फोटो
प्रति है। माईग्लास म स उसे गौर से देखता है। लडकी एक
दूसरे गिरास मे चाय लेकर आती है और उस के हाथ से फोटो
ल लेती है। प्रोफसर चौक कर देसता है। रडकी चाय का
गिलाम उस के हाथ मे पकडा दती है । वह चुस्की लेता है।
वाह ! क्या चाय है । गर्मागम । क्तिना खयाल करती हो तुम
मेरा ।
64 देहातर
लडको प्रोफसर को खुश देख कर प्रसन नज़र आती ह। प्रोफ्सर चाय का गिलास मुह तक ले जाता है। लडको हाथ का फोटो मेज पर रख कर जमीन पर वठ जाती ह और मुग्ध भाव से उम की ओर देखती रहती है। लाजवाव चाय बनायी है तुम ने। लेकिन मेरे ऐसा कह दने से तुम समझोगी कैसे? इशारों से समयाता ह कि चाय बहुत ही अच्छी बनी है। अपाय धाय का प्रवेश। घाय प्रोफेमर बहुत खुश दिख रहे हो दोना। क्या बात है। ऐसा क्या मिर गया है। हाँ, लाजवाब चाय मिली है घाय मां। यह लकी तो दिा रात मेरे ही काम में लगी रहती है। बहिन जो है तुम्हारी । तुम्हारे सिवा इस पाहै ही वोन। धाय प्रोफ्सर 'बहिन' श द सुनते ही अचानक चुप हो जाता है । चाय का गिलास मेज पर रख देता है। प्रोफेसर क्यो? चाय रख क्या दी? वस, अब इच्छा नहीं है। अब मैं जाऊँगा-हो सकता है मुझे देर हो जाय। पाय प्रोफेसर कहाँ? पाय । प्रोफेसर घाय प्राफ्सर ? पुराने मदिरो की ओर। क्या? अभी परसा देर रात तर वही तो थे तुम । क्या है उन गण्डहरो मे जो वार-चार तुम वहीं जाते हो? वह सब तुम नही समयोगी पाय मां। मैं पता लगा पर रदंगा। विस बात का पता राण्डहरा ये रहस्य का । क्सि ने बनाया उहें विस के मदिर थे वहीं पयो ? । मदिर कोई हो, रिमी सविसी देवता पाही सो होगा । और इस माथापच्ची से पायदा भी यया? मुनो, तुम कुछ जानती हो इन के बारे में? पाप वेवार बात प्रोमर पाय विमिदम् यसम् 65 घाय प्राफेरार क्या? क्या जाती हो तुग। पताओ मुये। मुखे लगता था वि वरूर कुछ जानती हो। यही वि सदा से ऐसे ही है। में एसा ही देगती आयो है यह हमेशा हमेशा से। प्रोफमर तुम कभी गयी हो वहाँ ? अजीव-सा लगता है वहा जाकर। अजीरा गिचाव' अजीय घाय साडर। प्राफेसर थाय हर हर सा? नही मालूम । पर डर सा लगने लगता है वहां जाकर । मन पमा तो हो जाता है। दोनों शहरों को हस कर रडको भी डरी भी उन को और देखती रहती है। प्रोफेसर मैं नहीं भरता लकिन सब कुछ खोज निकालना है मुझे । घाम क्या याम निवाला है ? खोज निकालना है ! क्या कर लोगे पाज शिवाल पर? प्रोफेसर नही ममयोगी । तुम ही समझोगी। धाय क्या ? मैं धान ही खातो? मैं पूछती हूँ तुम जात ही क्या हो वहा उन पत्थरो से सरपोडने कुछ नही मिलेगा वहाँ से । कमी किसी पत्थर के पीछे से कोई साप वैशर मिल जाय फुपसरताहुआ। प्रोफेसर सा? घाय हो, साप । गड़े रहस्या के रक्षर हवे। पउनाओगे कमी बहे प्रोफेसर माना हो जाने से पछताना बेहतर है। अपने इतिहास का जालना उतना ही जरूती है जिता माग रेना। यह सव नहीं जानती मैं । मुझे रगा, मैंने घेता दिया। आगे तुम जानो। प्रोफगर यह सब कहने की जरात नही, धाय मा घाय लडमी की ओर नगर जाती है। अचानक उसाह मगर जाता है। 66 देहान्तर
रूपा पारीफ धाय को भूमिका मे।
पारीक (धाय) और नीलम शर्मा (गूगी बहरी लडको)।
N
रूपा पारीक (चाय) और राकेश मूथा (प्रोफेसर) ।
राग भूया (प्रोफेसर), सपा पारीक (धाप) और नीलम शर्मा (गूगो बहरी सडको) ।
लकिन म गोज निकालगा। सब कुछ मालूम हामा एक दिन।
सच कहता हूँ, धाय मा।
घाय ये चेहरे पर मुम्बराहट दस पर उत्तजित हा जाता है।
तुम हम रही हो । विश्वास नही हातान तुम्ह । दसो, मै देवा ।
मज पर स कुछ पाटो प्रतिया ज्ठा पर दिसाता है।
देपो स पता नहीं चलेगा।
घाय एक पाटा हाथ म लेकर दयती है। एमा भाव प्रदर्शित
परती है जस कुछ समय में नहीं आ रहा ।
कुछ मीता नहीं है। य सब क्या तिमार चापोरवन है माण्डणा
की तरह । यह इधर तो साप जैसा कुछ वना लगता ह ।
प्राफेसर तभी ता पहा वि तुम नही समयागी।
धाय
उसाहाय स पाटोरवर निताता।
।
य देवा, य । य साराय शिक्षालग है पुराना । मण्डहरा म ही
मिलाह मुये । उसी का फोटो है यह ।
धाय एस तो कई हाग वहां।
प्रासर सब को पोज निकालूगा।
घाय क्या लिया है इस पर?
प्राफेसर वही ना। वही ता समस्या है। यही मभय म नहीं ला रहा।
धाय क्या तुम तो पढे लिम हा?
प्राफेसर उस स क्या? इन शिलारे वा की लिपि और मापा बुछ अजीव
किस्म की है। प ही नहीं जा रह । वोई नहीं पढ़ पाया अब
तक । लकिन मै पढमर रहूँगा इस बार। इसीलिए तो लोट
जाया हूँ फिर यहाँ।
धाय इसीलिए आय हो? मन ता समझा था कि मा की याद खीच
लाई ह तुम्ह।
मोफेसर ए वजह यह भी है । मन यह भी सापा कि शायद अब माँ
बतादा
धाय क्या बता दे?
प्रोफेसर यही वि पि मैं म विस या बटा है? घाय कुछ पल चुप रहती है। घाय विस से पूछू क्या यह काफी नही कि तुम अपनी मां के वट हो। मां का कोद महत्त्व नहीं? प्राफेसर वह सब ठीक है अपनी जगह । लेकिरा लेकिन मा अकेली ता पैदा नहीं कर सकती थी न ? पर क्या नहीं बताया उस यव म कहाँ जाऊँ? ? तुम हो तुम । तुम जरूर जानती हा सब कुछ। तुम शुरू से उमके साथ रही बताओ बताओ न विस वा वेटाहूँ मैं मुझे इस आग से निवालो घायमा धाय चुप और कठोर हो जाती है। प्रोफसर अचानक धाय क चेहरे की ओर देखकर उत्तजित हो जाता है। योला मा बोला। प्रोफेसर अपना चेहरा दानों हथलियों स छुपा लता ह । धाय वस ही खडी एकटक देखती रहती है। प्रोफमर फिर घाय की आर देसता है । अचानर उतजित होकर उस का गला परड लता क्या नहीं बताती? मार डालूगा तुम्ह । बोला जर जानती हो तुम बोला। गला दबाने का अभिनय करता ह। लडवी, जो अब तक डरी-सी देखती रही थी, दोडकर चाय को वाह पकड लेती है। प्रोफेसर की आंखें लडकी की आँखों से मिलती हैं। प्रोफेसर गला छोड दता ह और दूसरी ओर मुह कर खड़ा हो जाता है । बताती क्यो नही मुझे? घाय मैं मां नही हूँ तुम्हारी। प्रोफेसर लेकिन मां ने जहर बताया होगा तुम्ह? घाय नहीं। प्रोफेसर तुम हमेशा उस के साथ रही। 70 देहातर
१
घाय
हा।
प्रोफेसर वह हर बात तुम से पहती थी।
घाय हा।
प्रोफेसर तो पिर?
घाप
तो फिर क्या
प्रोफेसर तो फिर तुम्ह क्या नहीं मालूम कि
घाय कि तुम कैसे पैदा हुए।
प्रोफेसर हो।
घाय क्या पता स्वय उगे ही मालूम हो ।
प्रोफेसर यह कस हो सकता है ?
धाय यहत सी याता के बारे मे पता नहीं चलता कि वे कसे हो
जाती हैं।
प्रामर रैशीन खुद मां को नही तुम यूठ बोलती हो। वहयाना
चाहती हो मुझे मैं मैं पता लगाकर रहुंगा सब कुछ।
मेज के पास जाकर इधर उधर देखता है । कुर्मी को पीठ पर
लटका एक मोला उठा कर कंधे पर टाग लेता है। धाय और
लडकी उस की ओर देखती रहती है। अगन लडकी से आखें
मिलती है। लड़की के चेहरे पर महानुभूति और अपनत्व ये
भान हैं। प्रोफेसर लडकी की ओर देखता रहता है। धाय दोनों
यो दखती रहती है। मच पर धीरे धीरे अंधरा हो जाता है।
विमिदम् यक्षम् 71
अक द्वितीय
पहला प्रवेश
मच पर धीरे धीरे ण फोने ग प्रकाश होता है। पाय एक
फोो म वठी अनाम वी7 रही है। एडयो बार-बार पारव की
ओर जाफर पाती है और निराश हो कर वापस लौट आती
है । घाय वार-यार उरो आते जाते देखती ह । लडकी घाय से आंखें
बचाती है। अचानक लडकी फिर पाश्व की ओर जा कर
पोक्ती है। घाय जनाज बीनना छोडकर उसके पीछे जा खडी
होती हैं। रडकी के पीछे मुडते ही उसकी आँसें धाय से मिलनी
हैं तो वह खडी ही रह जाती है। घाय गौर से उसी आखों मे
-
देखती है।
यही नही जायेगा। यही आयेगा लौट कर।
धाय
लडकी चाय की ओर देखती रहती ह। धाय इशारे से उसे
समयाती है। लडकी कृतनता से उस की ओर देखती ह । पाय
उस चारपाई पर ले जा कर वठा देता है।
रितनी ही वार तो गया है इस तरह-पर यही आया है लौट
इस घर से खण्डहरो और खण्डहरो से इस घर तक
निकालते रहो चक्कर दया आ जाती है कभी-कभी तडपता
पर उपाय ही क्या है यही मिला है उसे विरासत
देख कर
मे।
अचानक पाश्व मे से प्रोफ्सर का प्रवेश। हाफ रहा है बुरी
तरह । घवराया हुआ। लडकी घबरा कर उठ खडी होती है।
प्रोफसर सीधा जा कर चारपाई पर वठ जाता है। हांफना
जारी रहता है। लड़की की और देस कर पानी का इशारा
72 देहातर
करता है। लड़की दौड कर पास में से पानी लेकर आती है। आदमी गटगट पी जाता है। इधर-उधर गौर से देखता है। अमी परराहट मिटी नहीं है। घाय यह सब गौर से देखती रहती है। धाय प्रोफेसर क्या बात ह? इतने घबराय क्यो हो ? यो वो सांप साप । कहाँ? घाय ? प्रोफेसर वाहर की ओर इशारा करता है। वाहर? प्रोफेसर स्वीकार मे सर हिलाता ह । धाय बाहर की ओर जाती है। प्रोफसर आगकित सा चारपाई से उठ जाता है । राडकी को मोर दसता है। घाय लौट कर आती है। कहा था? वाहर तो नहीं दिखाई दिया। तर तक प्रोफसर सभल-सा जाता है। ? ? प्रामर आया था पीछा करता हुला घाय पिर? प्रोफेमर नही मालूम । मैं तो सीधा यहा चला आया। धाय यहाँ मिल गया तुम्ह प्राफेसर गहरा म । पुराने मदिर का तहगाना है शायद वहाँ पाय बहुतेर माप , मण्डहरा म । छेड दिया होगा तुमने । प्राफेसर नही, मैंने युछ नहीं किया। रिसी मिल पाता नहीं कुरेदा? प्रोफ़गर नहीं ता। ता फिर? मुला घूम रहा था क्या? पाव पड गया हागा प्राफेसर नहीं। ता पिर यम प्राफेमर में दिन मर पण्डहरा म घूमता रहा । नाम ये पुटपुटे म पुराने माटर के पिछवाई बी आर पा गया। मुछ सवाना-सा धाप घाय 7 घाय विमिदम् यदाम् 73
बना हुआ है वहा । टूटी फूटी सीढियां भी बनी है नीचे उतरने
के लिए। वही एक तिकोने पत्थर पर एक मूर्ति खुदी हुई थी
अनगट पर अजीव, बहुत अजीय । गोचा, इसे उठा कर घर ले
चलू । पत्थर को दोगा हाथो स पक्ड कर हिलाने की कोशिश
करने लगा कि अचानक फुकार सुनाई दी। एक दम सामने
पडा या साप पण ताने घराकर उलटे पावा भागा
कुछ देर बाद मुड कर देखा तो वही साप वैसे ही पण ताने।
भागता रहा मैं जव भी पीछे देखू तो वही सांप वैसे ही पण
तान । घर म आन पर वह देखो वह साप
घबराया सा उछल कर लडकी के पीछे चला जाता है।
वह फ्ण वचाओ वह
लडकी को पकड लेता है। घिध्यो-सी बँध जाती है। आखें
फट सी जाती है। घाय लडकी की ओर देखती ह । वह भी
घबराइ सी इधर उधर देस रही ह । धाय मी चारों ओर गौर
से देखती ह। लडकी चाय की ओर देखने लगती है। एक
अजीव मी चुप्पी छा जाती है । धाय अचारा आगे बढ कर
प्रोफसर के गात पर थप्पड मारती ह ।
कहाँ है साप? अव भी दिस रहा है?
घाय
पोफैसर सहमा हुआ सा इधर उधर देखकर सिर हिलाता है ।
मैंने पहले ही कह दिया पा। तुम नहीं माने। किसी का कुछ
नही मिला इन खण्डहरा से आज तर सिवा इन सांपों के
डेंस ही लेता तो
प्रोफेसर अब भी कुछ घबराया सा दिखता है।
नहीं, अब डरने की कोई वात नहीं।
प्रोफेसर को ले जाकर चारपाई पर बिठा देती है।
कुछ देर आराम पर लो। मन ठीक हो जायेगा।
74 देहातर
प्रोफसर घबराया मा चारपाई पर लेट जाता है।
चाय पियाग।
लडकी को इशार स कुछ समगती है। फिर अचानक उस वहीं
स्कने का इशारा करती है।
ठहरो, मैं खुद बना लाती है।
घाय पाइव म चलो पाती ह । लडरी अर धीरे धीरे चारपाई
ये पास जा पर खडी हाती है। नीचे वठ कर प्राफ्सर के सर पर
हाय फिरान लगती ह । प्रोफसर उस का हाथ पकड कर उद
पर बैठ जाता है । चाय या गिलास लिप पाय या प्रवश ।
ला, गर्मागम पीला। थान मिट जायेगी।
प्रोफसर गिलास हाय म पड वर चाय को चुस्कियां लन लगता
है। एक-दो बार चौक पर इधर-उधर देखता है।
नहीं डरो नहीं यह घर भी क्या तुम्ह राण्डहर लग रहा है?
प्रोफरार चौप कर उस की ओर देखता है। वह उसी की ओर
देख रही है । यह नजरें घुमा लेता है।
पिया, चाय पियो।
प्रोफसर चाय की चुस्की भरता है ।
सुना, ये वही मूर्ति थी न एक छोट पत्थर पर खुदी हुई एर
जवान-सी औरत लेटी है और उस पर एक धूढा-सा आदमी
?
झुका हुआ है ?
प्रोफसर सडा हो जाता है।
प्राफ्सर तुम्ह पसे मालूम
धाप वही है न? दाना या एक सांप को कुण्डली म बद दिखाया
गया है?
?
विमिदम् यक्षम् 75
प्राफेमर तुम्ह कम मालूम हुआ उस वे वार म? घाय उस की आर दसती यग्यात्मर' गाव स मुस्कराता है। पोफ्सर स जसे सह्न नहीं होता। गिलास एक ओर पटक कर धाय को पद लता है। वोलो। तुम्ह बस मालूम हुआ तुमने क्व दसी वह मूर्ति ? धाय एक्टर उस की आखों में दसती ह । वह कुछ कमजोर सा । धारे धीरे अपने हाय कां पर मे हटा नेता हैं । पडतात धाय मुये क्या धमकाते हा साप दिखा तो क्या हा गया? भाग क्योपडे हुए 7 7 घाय ? धाय प्रोफ्मर तुम जरूर जानती हो उस मूति के बारे मे मेर बारे मे, मेरे जम के बारे मे सत्र के वार म बताती क्या नहीं आखिर क्या मिल जायगा तुम्ह यह सब छुपान स । तुम्ह ही क्या मिल जायेगा यह सब जान कर? तुम हो, यह वाघ स्या काफी ही प्रोफेसर नही, मैं जिंदा नहीं रह सवगा वर्ना मर लिए यह मब जान रेना जरूरी है। जिदा रहने के लिए कुछ भी जानना जरूरी नही। जा जान लेता है वह कई वार जिदा ही मर जाता है। देखा इम देखो यह नही जानती थी कुछ भी तुम्हारे जान से पहर-क्तिती सुश रहती थी तव । प्राफ्सर अव क्या यह दुखी रहती है ? हा। प्राप्सर तुम्हार कारण। प्रोफेसर मेर कारण । तुम्हार दुस से दुग्णी हा गर्द यह भी। धाय क्या? धाप क्या 7 घाय अपार उत्तजित हो जाती है। मैं पूछती हू तम आय ही यया यहां लाट बर? प्राफेमर में नहीं जानता । पर मैं आर कही नहा जा सकता था। 76 देहातर घाय तागय पाथमाकर प्रागर तब लगता था यहाँ ही रह रागा। यही भी चले जाना पाहता था हाँ पाई यह पूछे विम स्मि या बेटा हूँ। पाय फिर? प्रोफेमर पिसी नहीं पूछा। एक निरस तान न अपना म दिया मुझे। पढाया रियाया भी। घाय सापिर यापम क्या चले आय? प्राफ्सर एप रात मी सो नहीं सका फिर भी। वाप वा नाम मिर गया था रति नाम से क्या होता है? कार जैम गीच पर चुलाता धा। घाय मोवीपाद? प्रापेसर यह भी पर पाता था एक न एक दिए यही बात सगा अपने पिता के बारे में अपन जाम ये बार मे। ये पण्डहर मा दर, यह घर सब बुगते या पुरातत्त्व म रुचि है मरी कुछ मान भी है । एक दिन म गण्डहर की बहुत याद बायी । चला आया साचा अब शायद मां भी कुछ यता है। घाय मैं न तुम स पहरे भी कहा था। हो सकता है तुम्हारी मां का भी न मालूम हो। प्राफेमर ता किरो मालूम है ' तुम बताती ययो नही? धाय तुम चर पया ही जाते यहा स । अपनी इस बहिन वा भी र जाआ। प्राफेरार वहिन को? हो, उम भोरे जाआ अपने साथ । पाई पाइदा नही यहां रहने से । बर्वाद हा जाआगे यहाँ रहागे ता । प्राफेसर क्यो? वदि च्या हा जाऊँगा? धाय कभी डेंस लगा कोई सांप इन सण्टहरा म तड़प-तड़प कर मराग पानी भी नही देगा पाई। प्रासर ऐसा क्या कहती हो? तुगो ता अपना दूध पिलाया है हम तभी तो वहती हूँ। प्राफेमर तुम्हारा कुछ भी समझ म नहीं आता। कभी तुम संभालती हो, भी डराती हा । क्या चाहती हो तुम घाय धाय 7 अचानक उत्तजित हो जाती है। किमिदम् यथम् 77 घाय प्रोफेसर घाय प्राफेसर 7 7 धाय प्राफेसर घाय भाफेसर धाय प्रासर यही कि तुम लोग पोछा गाहा मरा पिसी तरह अब । क्च तक सहती र यह सव। या राय? समझत क्या ? वा पतरनाव ह यह मल जा तुम सल रह हो। कोई गल नहीं गा रहा म । उपता गयी हा ता तुम ही क्या नही चली जाती हम अडवर निकाल देगा पाहत हा नही रविशतुमही परगान हा गयी हा हम म तो पिर क्या? नहीं । म यही गा सक्ती वही जब तक तुम लोग यहाँ हा। क्या ऐसी क्या मजब्रो है तुम्हारी सब कुछ देयते रहा होगा मुगे । तुग नहीं समझाग । क्या नहीं समझूगा मैं ? क्या बात है एसी' तुम कुछ छुपा रही हो तुम जरूरपुछुपा रही हो तुम तुम देख लूगा पर तब बताना होगा तुम्ह बताता ही हागा सव । युझलाता हुआ माफेसर पाश्व ग चला जाता है । लहकी घबरायो हुई सो पोछे पीछे जाती है। सिफ घाय बची रहती है। चेहरे ? पर तनाव। धाय GTTT हुई बताना होगा। कौन सह पायेगा वह सब और क्या जान लेगा फिर भी हर कोई अपनी तकलीफ भुगत रहा है । कोई नहीं जानता मैं क्या भुगत रही हैं। जो दखता है यह भी तो भागता है। वह जानना चाहता है समझता है मैं जानती हूँ कौन क्या जानता है ? जिस ने देया उस ने भी कुछ नहीं न उस ने जिस ने भोगा। धाय धीरे धीरे एक कोने की ओर बढती जाती है। वाको मव पर अंधरा होता जाता है। कान में पहुँच पर धाय घठ जाती है। ॲघरे मच की ओर ताकती है। इस कोने म अँघरा हो जाता है और दूसरी ओर एक हल्का प्रकाश वृत्त जिस मे एक युवक और युवतो लेटे हुए दिखते हैं । युवती प्रथम अक के प्रथम प्रवेश वाली मा ह पर अभी उम्र करोव उनीस-बीस बरस को दिख रही है। प्रकाश वत धीरे धीरे कुछ स्पष्ट होने के साथ ल्डको उठ पर मघ की ओर पीट कर कपडे ठीच परने का अभिनय करती है । युवर मी वैसा ही करता है । 78 देहान्तर युवर किन यह ठीर नहीं हमा। रमे एसा ही पता पाहिए था। पुवती बया? युवक पहले विवाह हाना चाहिए था। युवती मुझे न जाने क्या हर-सा लग रहा था। युवर डर रिस बात का आखिर युक्ती पही मिनायद में बगम पाहनी थी कि सुद का तुम्ह अपित पर दू चिलगुल मेरही जरो रगत तुम मुझे । युवर तो विवाह तो हाता हो। युवती मैंन बहा कि गुपे डर लग रहा था। युवर विसयाताडर युवती गायद यह विवाह हो सर या और कोई मंझट युवर झमट क्या? युवती तुम समपते क्या नहीं पुवा तुम बताओ तर TI पही ता कि शायद ? १ ? युवती पुछ दर उलान म रहती है। फिर एकाएर अपने पर निय प्रण करती है। युवती आजकल पिताजी जिस तरह मुझे दगते है युवा क्या कह रही हो दिमाग चल गया ह तुम्हारा युवती नहीं । ठीक पह रही है । तुम्हार गुरु ह य पर मेरे तो पिता है । युवप' लेकिन लेकिन यह पस युवती व पई दिना समय मूर्ति बना रह ह मुझे सामन रिठापर। युवर' हो, मुझे मालूम है। युवती पर शायद तुम्ह यह नहीं मालूम कि मरी शक्ल मेरी मां न बहुत गिरती है। युवक वे तो तुम्हार वचपन म ही युवती हाँ मूर्ति बनाते हुए जर ये मरी ओर दसत हैं तो कई देर देखते ही रह जाते है जरा व मुझ मे मा को देरा रह हा । युवा क्या उहाने कुछ युवती नहीं पर मुणे दगते हुए मि तरह सहलाते है मूर्ति यो युवक अरे मिटटी की मूर्ति (दोना कुछ पल चुप हो जाते है।) युवती सुना, ऐसी पुछ कथा भी ता है? पिमिदम् यक्षम् 79 7 ? युवक क्या युवती कि किस तरह पिता ने पुत्री से युवर मुझे लगता है यह सब तुम्हारा वहम है। गुवती रही। युवर तो फिर हम यह जगह छोड देनी चाहिए। चलो कही और चले। युपतो कहा युवक कही भी। चल सकोगी? युवती हा। अचानक मूर्तिकार का प्रवेश । हाथ मे चाकू लिए है । 'गुरुद्रोही चांडाल' कहता हुआ अपर पर युवक पर पार कर देता है। एक ददना चोख के साथ युवर दम तोड देता है । लडकी 'नहा नहीं चीखती हुई युवक के पास जाती ह । मूर्तिकार तीवी उजरों रो लडकी की ओर देखता है और यपट कर उस दबोच लता। युवती अपने का छुडान के लिए संघप परती है पर सप नहीं हो पाती। मव पर अंधरा हो जाता ह । थानी सी र बाद एक कोने मै प्रकाश वृत्त जिस मे पाय बठी ह । जसरे मर पो तारती हुई। घाय मो चेता दिया था उरो। पर वह वट जसे शिष्य का गुरन ही जार फिर पुत्री के साथ पिता पागल हो गया तो जाश्चय क्या जाने यहा चला गया कुछ ही दिन बाद तो पवर मिली थी उस लावारिशला की आत्महत्या की, पहले है। हुलिया मिलता था उस मूर्तिकार से क्या पता अचानक पाश्व समाफसर और लदोवाप्रवेश। प्रापैगर अभी तक यही बैठी हो। क्या कर रही हो इस अंधर म 1 वत्ती ता कर ली हाती।चुप व्या हा ? पाय प्रोफसर को जार देखती ह-फिर उडकी की आर। पिर दोनों की ओर देश पर मुस्कुराती है। तीनों उस देखते रहते हैं। मच पर धीरे धीरे अंपरा हो जाता है। 30
अक तृतीय
पहला प्रवेश
मच पर धीरे धीरे रोशनी होती है । एक ओर वही लडकी बठी
कोई फटा हुआ कपडा सो रही है । उम कुछ बढ गयी ह ।
उसके पास वठी एक अंधी लडकी ऊँघ रही ह । उम्र करीब
पद्रह वप । धाय वा प्रवेश । हाथ मे कुछ पोटली सी लिये ह ।
वह काफी बुढिया गयी लगती है। ऊँघ रही लडकी को देस
वडबडाती है।
धाय
फिर पडी ऊँघ रही है। आर कुछ वाम नहीं है तर । दिन भर
पडे ऊँघते रहा वस।
पोटली एक ओर रख कर चारपाई पर वठ जाती ह । लडको
की ओर देख कर अचानक दयाद हो उठती है।
रेविन और कर भी क्या तू । किस का पाप मुगत कौन | अच्छा,
उठ। चल साले घुछ। दिन भर की भूखी होगी बैचारी। इस
मां के पास तो है ही क्या देने को नम दे दिया, यही क्या
कम है?
हाथ पकड कर सोयी हुई लडको को उठाती है । बच्ची चाक
कर जागती हाहाया को बढ़ा कर धाय के हाथ पर, चेहरे पर हार
फिरा कर पहचानने की कोशिश करती ह । स्पश परिचित सा
लगते ही लडकी क चेहरे पर मुस्कान फैल जाती है । धाय
पोटली अपनी आर सोच कर उस म से कुछ निकाल कर उरा
खाने को दती ह । उस सात देख कर खुश होती है। पहली
लड़की इस बीच यह सच गौर से देखती रहती है । उस की
मासे गीली हो जाती है । धाय उस दखते हो अथला जाती
रिमिदम् यनम् 81
रोती निसे हो? अभी तो जिदा हूँ म । सारी उम पडी है पिर रोने के ही लिये में भी पागल हूँ जो दीवारा से कह रही हूँ। सुनेगा कोर? माँ बेटी दोनो ही गूगी-बहरी। बेटी ऊपर से अंधी और। सुन, तू चूल्हा जला। फिर रात अधिक हो जायेगी। इशारे रो पहली लडको को चूल्हा जलान के लिए समझाती है। लडको उठकर पाश्व मे चली जाती ह । यह पोटली भी उधर ही रख दू । पोटली उठा कर पाश्व मे चली जाती ह । एक दो पल बाद अंघी लडकी फश पर थपथप करती है। एक दो पल ठहर कर घोरे से उठनी ह और राह टटोलती हुई चलती है। कोने मे पड स्टूल से टकराती है। स्टूल पर रखी अटची गिर जाती है। पाय जावाज सुन कर दौडी आती है। क्या जरूरत आ पडी थी उठने की। आ ही तो रही थी मैं हा, पर सुझे भी क्या पता कि यहां कोई नहीं है। राथ पकड कर पाश्व मै ले जाती है । लौट कर स्टूल से गिर पडा सामान उठा पर सहेजती है। इस कोने को छोड कर सारे मच पर अंघरा हो जाता है। सामान सहेजते हुए अचानक एक आइग्लास पर नजर पडती है । एक आस के आग लाकर देखती है । इस कोने म धरा और वासी मच पर हल्का प्रकाश पल जाता है जो धीरे धीरे थोडा तेज हो जाता है। प्रोफेसर एक ओर कुछ फोटोस्टेट देख रहा है। देखते दसते अचानक उत्तजित हो जाता है। प्रागगर मिल गया मिल गया चिल्लाना सुन कर धाय पारव से दौडी जाती है। पोछे पीछे लडकी है। धाय 7 क्या बात है' चिल्ला क्या रहे हो? क्या मिल गया 82 देहातर शादमी मी धाय को तोक्मी लडकी को पपड पर फिरसी की तरह नाचता है। प्रोफेसर मेरी खुशी वा अदाजा नही लगा सकती तुम, धाय मां 1 गिल गया। अब नहीं बच सकता। अब मैं यह लिपि पढ़ रही छोड़ गा। खुद भी परेशान होते हो और दूसरो को भी करते हो। गेो वितनी ही वार पड़ चुके हो तुम यह सव । प्रोफेसर नहीं, सचमुच। ऐसी बात ध्यान मे आ गयो है पि अब यह सब पढ सकूगा मैं । कुछ भी छुपा नहीं रहेगा मुझ से। धाय घाय को मुस्कुराता देसफर उत्तजित हो जाता है। कहा? धाय तुम समयती हो मैं पागल हो गया हू जो या ही चित्ला रहा हूँ। देखना मैं इस बार अभी जाऊँगा मैं अभी पढ भालूगा। अभी जाता हूँ। धाय प्रोफेसर खण्डहरो मे। घाय रात का खाना वही भिजवा दू। प्रोपेमर क्यो? घाय सुवह तर तो तुम फिर क्या हो लौट सकोगे ? थव जाओ तो वही सो जाना। प्राफेसर तुम मेरा मजा उग रही हो। नहीं । अब मुझे वह भी येकार लगता है। प्रोफेसर तुम | ओह, इरा खुशी के मौके पर तुम ठीर है मैं अभी जाता हूँ कम से कम मदिर के शिलालेस और उस मूर्ति का रहस्य तो आज ही खोज निवालूगा। देखना तब सारी दुनिया दौडी आयेगी यहाँ और इस रहस्य की खोज का सेहरा मेर सिर होगा सब को अपना सही इतिहास मुझ से मिलेगा। धाय प्रोफेसर क्यो? समझता हूँ सव समझता हूँ जो तुम कहना चाहती हो मैं जो अपना इतिहास भी नही जानता पर वह सवस अलग नहीं है नहीं अभी यक्त नहीं है मेरे पास तुम में उलझने का चला तुम मेरे साथ चलो। किमिदम् पक्षम् 83 तुम से?
डी को साथ चलने । इशारा करता है। पाश्व म जाता है। तहको पीछे पीछे जाती है। मच पर धीरे धीरे अंघरा होता है । फिर प्रकाश होता है । पास्य स निकल कर प्रोफेसर और लडयो मच पर आते हैं। एक कोने मे पूरा अंधेरा है। दोनों रोशनी वाले हिस्से म मच पर चाकर निकाल कर एक जगह ठहर जाते हैं । प्रोफेसर उत्साहपवर आइग्लास निकाल पर एक शिलालेस पढने का अभिनय करता है। लेकिन शीघ्र हो उस या उत्साह क्षीण होता जाता है । सिन हो जाता है। लडकी पारा यठ पर राहानुभूतिपूवर देखती हुई बंधे पर हाथ रसती है । प्रोफेसर उसकी ओर देखता है । प्रोफेमर ठीय कहती है वह ! कभी नही पर सकूगा मैं यह लिपि कभी नहीं जान सकूगा यह रहस्य यह राव रहस्य ही रहेगा हमेशा न भी सही हमेशा पर मेरे लिए तो रहेगा ही अब क्या करूं म? कोई नहीं समयता मेरी पीडा कौन जान सकता है जो खुद ऐसी तकलीफ मे होगा वही तो जानेगा न तुम भी नहीं समझती तुम ता समाती होगी? राडकी वडी आत्मीयता से उस की ओर देखती है । क्या थपथपाती है। प्रोफेसर उस का हाथ पकड कर उस की ओर देखता है। दोनों को आखें मिलती है। प्रोफेसर अचानक उसे अपने मे खींच लेता है। मच पर अंघरा हो जाता है । एक कोने में जिस मे धाय वठी है, प्रकाश होता है। घाय आइग्लास लिये देस रही है । लम्बी साम मर पर आइग्वान जोर अय सामान अटची म रख कर उसे वापिस स्टूल पर रख देती है। अचानक किसी के सटसटाने की आवाज पाश्व की ओर देखती है। सारे मच पर प्रकाश । पाश्व म से एक चेहरा याक्ता है। जी, यह म हूँ। अदर आ सकता हूँ? नवाग तुक यह कहता हुआ वह अदर आ जाता है। वह एक युवक है। पीठ पर सफारी वग वधा है। ग उतार कर नीचे रख देता ।पाय आश्चय से उस की ओर देखती है। 84 देहान्तर भाप मुझे नहीं पहचानती। यह पता प्रोफेमर साब के पसील से मिला। वाील से? बागर जी।पद्रह-सोलह वप पहले प्रोफमर यही नाये ये न? कहा वे? मुझे रामे मिलना है। पाय इसी बीच लडकी और घो पाश्व से आते हैं। लडपी अघी फा हाप पर हैं। घाय ये रह । (गंधी यो योर इशारा परतीह।) बाग तुर जी। पाय ओह, ये प्राफेगर । ये नहीं रर। परह पप हुए MT गाँप | काट लिया उह। बाग तुर सापोवाट लिया। से? पार गहरों म गाय छ गोजा। वागम याप उन पो मा हैं? में पाप उग की। पाप तुर राय तो गां ही हुई। मागे पर पर पाय है पर Tरता, पागमा रा पर मुम हो यौन उम म तुम्हारा पारिता ? मुरे ही मादम तापद रिता गुछ भी 11 माग पावापराrया है। पीगगापा AT आपण समीयागी यो। गमोपाट गुपित IT Ir m सदर गनिमी मागीमा मा ument पाम पाउनासग भागना। भर गीत Tum Jril १ fair
वागता पण्डहरो के रम्य पोजने । (कुछ म कर) में यहाँ रह
सरताहूँ न?
घाय
यहां?
नवागन्तुक यहा और कोई जगह नहीं है जहा रहा जा सकता हो । और
पिर आप तो प्रोफेसर साह्य ती मा है।
धाय मां ही, धाय। मैर रहा, चाहा तो। प्राफेसर के ही धमर में
रहो । अच्छा ही है। कोई वात करने को तो मिरेगा। लेकिन
तुम हो कौन ? तुम्हारे माता पिता, परिवार?
नवाग तुर कुछ पता नही । अनाथालय मे पला कोई टाल गया था वहा ।
मां कौा वाप पौन ? कुछ नहीं मालूम।
उदाम हो जाता है। धाय उस का ओर देख कर जंधी की ओर
दरती है। फिर उस को ओर । फिर घी की ओर । अचानक
जोर जोर म पागला-मी हसने लगती है। नवाग तुक कुछ
समय ही पा रहा है। साश्चयचकित सा घाय पी आर
देख पर लडको और अंधी की ओर देखता है। फिर हमनी
हुई धाय की ओर। अचानक दृश्य स्थिर हो जाता है । मय
अंधरा छा जाता है।
86 देना
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