Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Deshi Shabdkosh
Front matter
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देशी शब्दकोश
रमच्छीय
बानमा दर, पयपुर
प्रधान सम्पादक
वाचना-प्रमुख
आचार्य तुलसी
--
युवाचार्य महाप्रज्ञ
सपादक
मुनि दुलहाज
सहयोगो
साध्वी अशोकधी साध्वी सिद्धमना
साध्वी विमलप्रज्ञा
समणी कुसुमप्रता
जैन विश्व भारती
सारन (राजस्थान)
प्रकाशक:
जैन विश्व भारती
लाडनू-३४१ ३०६
प्रवन्ध-सम्पादक:
श्रीचन्द रामपुरिया
प्रकाशन वर्ष :
विक्रम सम्वत् २०४५
मार्च १९८८
पृष्ठाक ५७०+६८
मूल्य १००-०० रुपये
१२ डालर (U.S A)
DEŠŤ SABDAKOŚA
Vacană Pramukha
ACĂRYA TULSI
Chief Editor
YUVĀCĀRYA MAHAPRAJNA
Edator
Munu Dulaharaj
A8818 tants
Sidhy Asokaset
Sadhvi Vimalpraják
Sadhvi Siddhapraji:
Samanl kusumprajdu
JAIN VISHVA BHARATI
LADNUN (RAJASTHAN)
Publisher
JAIN VISHVA BHARATI
Ladnunm-341 306
Managing Editor :
Shrichand Rampuria,
Year of Publication:
Vikram Samyat 2045
March 1988
Pages : 570+68
Price : Rs. 100
$ 12
आशीर्वचन शब्द कोश का निर्माण जितना कठिन है, उसका उपयोग उतना ही महत्वपूर्ण है। सस्कृत, प्राकृत, अग्रेजी, हिंदी, राजस्थानी आदि सभी भाषाओ के दशल्लकोश उपल ध हैं । आचाय हेमचद्र ने सस्कृत शब् कोश अभिधान- चितामणि के साथ देशी नाममाला की भी रचना की। इसके अतिरिक्त देशी पशब्दो का कोई स्वता कोश प्राप्त नहीं है। आगम और उसके व्यास्या साहित्य म प्राकृत के साथ देशी शनी का प्रचुर मात्रा में प्रयोग मिलता है । उस साहित्य के दशी शब्दो का चयन करना और उनके प्रामाणिक अथ का निणय करना कापी दुरूह काम था। पर हमारे आगम सम्पादन काय मे सलग्न साधु-माध्विया कठिन काम करने के अभ्यस्त हो चुके हैं । इस काम के लिए हमने विशेष रूप से साध्विया को निर्देश दिया । लगभग पाच वप के बाद उनके श्रम ने एक रूप लिया और 'देशी शब्को सुसम्पादित होकर मामने आ गया। इस काय में प्रवत माध्वी अशोक श्री, विमलप्रज्ञा, और सिद्धप्रना तथा समणी कुसुमग्रना के श्रम वो सवारने म मुनि दुलहराज ने पूरा समय लगाया । वह इस काम के साथ नहीं जुड़ता तो सभव है इसकी निप्पत्ति म कुछ और अवरोध आ जाता। मुझे प्रसनता है कि हमारे विनीत साधु माध्विया पूरे मनोयोग ये साय साहित्य-सेवा अथवा धम पासन की सेवा में सलग्न हैं। उनकी वायजाशक्ति निरन्तर विकसित होती रहे, इस शुभागमा के माय में इस प्रथ की समीक्षा का काम विद्वानो को सौंपता १६ फरवरी, १९८८ भिवानी (हरियाणा) -आचाय तुलसी
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पुरोवाक् भगवान महावीर ने अघमागधी प्राकृत मे प्रवचन किया था। जनता सरलता से उनकी बात समझ सके-यही प्रयोजन था। जनता के लिए जनता की भाषा मे बोलना एक नया काम था। उस समय के अधिकाश धर्माचाय पडितो की भाषा में ही बोलते और लिखते थे। उनकी बात बडे लोगों तक पहुच पाती थी। पाद विहार और जनता की भाषा में प्रवचन--इन दोनो प्रवत्तियो के कारण महावीर जनता के बन गए थे। उनके शिष्य भारत के अनेक प्रान्तो म विहार करते थे और अनेक प्रान्तो के मुमुक्षु उनके शिष्य बनते थे। आगम साहित्य मे एक अथबोध के लिए अनेक शब्दो एव धातु-पदो का प्रयोग मिलता है। व्यारयाकारो ने उसका कारण बताया है कि अनेक देशो के शिष्यो को समझाने के लिए अनेक शब्दो और क्रिया-पदो का प्रयोग किया गया। सस्कृत की एक सीमा बन चुकी थी। उसमे विभिन्न देशो में प्रचलित शो के समावेश के लिए अवकाश नहीं रहा। प्राकृत जन-भापा थी । उसका नचीलापन बना रहा । वह किसी घेरे म नही वधी, इसलिए उसका सम्पक दशी शब्दो से बना रहा । देशी श द व्याकरण से वघे हुए नहीं हैं। उनके लिए गेप सस्कृतवत'-- इस सूत्र की कोई अपेक्षा नहीं है। उनके लिए "प्रकृति सस्कृतम' इस विधि की भी अपेक्षा नहीं है । निविक्रम देव ने प्राकृत के तीन प्रकार बताए है-तत्सम, तदभव और देश्य । संस्कृत के समान शब्द 'तत्सम' और सस्कृत की प्रवत्ति स सिद्ध श द 'तदभव' कहलाते हैं । देश्य और जाप शब्द इन दोनो से भिन है- प्राकृत तत्सम देश्य, तदभव चेत्यस्त्रिया। तत्सम सस्कृतसम नेय सस्कृतलक्ष्मणा । देश्यमाप च एढत्वात स्वतमत्वाच्च भूयसा। लक्ष्म नापेक्षते तस्य सप्रदायो हि बोधक ॥ प्रकृते सस्कृतात साध्यमानात सिद्धाच्च यद भवेत् । प्राकृतस्यास्य लक्ष्यानुरोघि लक्ष्म प्रचक्ष्महे ॥ आचाय हमचद्र न देशी शर की बहुत सुदर परिभाषा की है। यह परिभापा बहुत साथ और ध्यापक है- १ श्रोषिविरमदेव, प्राकृतशब्दानुशासनम, श्लोक ६-८ ।
८ जे लक्खणे ण सिद्धा ण पसिद्धा सक्कयाहिहाणेसु । ण य गउणलक्पणासत्तिसंभवा ते इह णिवहा ।। देस विसेमपसिद्धीइ भण्णमाणा अणंतया हंति । नम्हा अणाइपाइअपयट्टमासाविसेसओ देमी ॥' प्राकृत के अध्ययन के लिए देशी शब्दो का अध्ययन बहुत आवश्यक है । उनके विना प्राकृत भाषा मस्कृत आश्रित बन जाती है । इसी आधार पर मस्कृत मे अर्वाचीन बतलाया। प्राकृत का विशाल स्वरूप देशी शब्दो का भण्डार है। उनका सम्बन्ध प्राचीनतम जनभाषा में है । प्रस्तुत देशी शब्दकोश मे कुछ शब्द कान्नट और तमिल के भी हैं, मराठी आदि भापाओ के तो हैं ही । उत्तर और दक्षिण की सभी भापायो के गन्द आगम साहित्य मे मिलते हैं । कुछ शब्द यूनान आदि विदेशी भाषाओ के भी सदृच्च कुछ विद्वानो ने प्राकृत को । प्रस्तुत देशी शब्दकोश मे आगम, नियुक्ति, भाप्य, चूणि और टीका आदि में प्रयुक्त देशी शब्दो का सम्लन किया गया है । आगम के व्याख्याकारो ने स्थान-स्थान पर देशी शब्दो का प्रयोग किया है और वे किम अर्थ में देगी है, इसका उल्लेख भिन्न-भिन्न शब्दावलियो मे किया है। कुछ उदाहरण उन प्रकार है- अतिराउल इति देशीपदं स्वामीकुलमित्यर्थः । अविहाड–देशोनाषया वालक । आइंति (अव्यय) देशमापायाम् । आरनाल-कंजियं देसीभासाए मारनाल भण्णाति । उअपोते-देशीपदत्वात् आकीर्णे । उंड देशीवयणतो उंडं मुहं । उग्गह-इति जोणिटुवारस्स सामइको संज्ञा । उग्घाडपोरिसि-समयभाषया पादोनप्रहरे । अमाघाय-अमारिरूढिशब्दत्वात् । प्रस्तुत ग्रन्थ मे आचार्य हेमचन्द्र की देशी नाममाला का भी अविकल सकलन किया गया है। अगविज्जा आदि अन्य स्रोतो से भी देशी शब्दो का सग्रहण किया है । इसके मूल मे लगभग दस हजार से भी अधिक शब्द सगृहीत है । आगम सपादन के साथ शब्दकोश की जो योजना है, उसके अन्तर्गत तीन कोश पहले प्रकाशित हो चुके है- १ आगम शब्दकोश २ एकार्थक कोश ३ निरुक्त कोश १ देशी नाममाला, आचार्य हेमचन्द्र, ११३,४ ।
६ यह देशी शब्दकोश चतुथ कोश है । यह बागम तथा प्राकृत भाषा के अध्ययन के लिए अत्य त महत्वपूण और उपयोगी है। इसमे आगमकारो के व्यापक दृष्टिकोण सग्राही मनोवत्ति और अभियक्ति के लिए सक्षम शब्दो के चयन की प्रवत्ति का निदशन मिलता है । मुनि दुलहराजजी ने इस काय म अत्यधिक निष्ठापूण अम किया है। इस काय म साध्वी अशोकश्री, साध्वी विमलप्रज्ञा और साध्वी सिद्धप्रना तथा समणी कुसुमप्रना ने पूण योगदान किया है। श्रद्धासिक्त भाव से किया गया यह थम दूसरो के लिए अनुसरणीय बनेगा। वहद आगम शत्कोश का विशाल काय आचायश्री तुलसी के वाचना प्रमुखत्व म हो रहा है । उनके माग दशन मे अनेक साधु-साध्विया इस काय मे सलग्न हैं । देशी शब्दकोश उसी काय का एक मग है । मैं आचायवर के प्रति कृतज्ञता पापित कर उनके ऋण से उऋण होने का प्रयत्न नहीं कर रहा हूँ। यह प्रयत्न उनसे शक्ति-मबल पाने का प्रयत्न है। प्रस्तुत ग्र य मे जिन साधु साध्विया का योग है, उन सबको साधुवाद देता हू और मगलकामना करता हूं कि उनका श्रम इस काय की प्रगति मे निर तर नियोजित रहे । एक लक्ष्य के लिए समान गति से चलने वालो की सम प्रवत्ति म योगदान की परम्परा का उल्लेख व्यवहारपूर्ति मात्र है। वास्तव म यह हम सबका पवित्र कतव्य है और उसी का हम सबने पालन किया है । १७ फरवरी १९८८ भिवानी (हरियाणा) -युवाचाय महाप्रज्ञ
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भूमिका देशी शब्दो का प्रयोग वैदिक युग की भाषा से होता आ रहा है। ग्रामीण या जनभाषा का प्रभाव वदिक भाषा पर परिलक्षित होता है। ब्राह्मणकाल की आय भाषा के तीन रूप देखे जा सकते हैं-उदीच्या, मध्य- देशीया एव प्राच्या । उदीच्या परिनिष्ठित भाषा थी। प्राच्या भाषा पूर्व में रहने वाले बवर असुरवग के लोगो की भाषा थी। मध्यदेशीया भापा का स्वरूप उदीच्या और प्राच्या के बीचोवीच था। प्राचीन आयभाषा के इन तीना रूपो के उदाहरण स्वरूप श्रीर, श्रील एव श्लील- ये तीन शल लिए जा सकते हैं । ये तीनो शब्द प्रमश उदीच्या, मध्यदशीया एव प्राच्या आयभाषा में माने जा मक्ते हैं। प्राकृत भाषामा के अन्तर्गत पालि भाषा का भी एक विशिष्ट स्थान है। यह अवश्य एक बालचाल की भाषा थी। इमे पूर्णरूपेण अवृत्रिम प्रत कहा जा सकता है, यद्यपि श्रीलका एवं वर्मा जमे देशो म इमम कुछ कृषिमता भी आ गई थी, जो वर्मा मे अपने प्रकर्ष को पहुच गई थी। इसी प्रकार 'आयारो' जसे जन आगमा मे हम अकृत्रिम प्राकृतभाषा उपल प हाती है जबकि उत्तरवर्ती प्राकृतमाहित्य में कृत्रिमता भी दिखाई पडती है । मस्कृत म शनों के दो विभाग किए गए हैं-व्युत्पन्न एव अय्युत्पन्न । ध्याकरण के नियमो म सिद्ध होने वाले पन व्युत्पन कहलाते हैं । जिनकी मिदि प्यारण सम्मत न होकर लोक-परम्परा या ध्याहार स होती है, ये अय्युत्पन्न पार पहलात हैं। प्राक्त धयाररणा द्वारा प्राकृत शम तीन भागो में बांटे गए है-- तत्सम, तदभय एवं देय या देशी। इनम देश्य र प्युत्पत्ति मिट नहीं होत। देशी गामे निरिण म आचार्य हेमपद न कुछ मौटियां प्रस्तुत की है। वियित्रम न देशी शमा छह विभागा म वर्गीशरण पिया है। याधुनिर मापा-यनागिरा दी दृष्टि में ये यमौटियां एव वर्गीकरण गही नहीं है। न freोने देगीगरेरणा पाहापोह लिया है। इन विपार पिगों में जान प्रीयमन का मसम्म पापी माश्यपूण प्रतीत होता है। ये देगीगासवप आयों द्वारा पनि शाम पर से ही वारी जान पाली सामाा पाते हैं। गर अनिरिक वे देगी में पा गए १२ प्रातीय बोलियो से भी बताते है। वे देशी शब्दो को आर्यों और यार्येतर जातियो के आपमी आदान-प्रदान से विकसित शब्द मानते है । उनका यह सुदृढ मत है कि देशी शब्दो में अधिकतर शब्द आर्यों की ही प्रारभिक वोलियो से लिए गए है । इनमे कुछ शब्द निश्चित रूप से द्रविड भाषाओ के है। द्रविड भाषाओ के शब्द किस रूप में देश की विभिन्न आधुनिक भाषाओ मे उपलब्ध होते है एव आर्य भाषा के शब्दो मे कैसे परिवर्तन होते हैं इसके दो दृष्टात हम यहा प्रस्तुत करते है- अड् धातु (बाधा देना) से उत्पन्न शब्द तमिल-~-अटइ कन्नड-अड, अड्ड तुलु-अटक, अडक कुड ~अड ब्राहूई अड् लह,न्दा- अडण् , अडक पजावी-अड्ना, अड्कणा कुमौनी-अड्णो हिन्दी-अड़ना गुजराती-अड्ड, अड्कवु मराठी-अणें; अडणे प्सा धातु (खाना, भूखा रहना) से उत्पन्न शब्द शतपथ-ब्राह्मण-प्सात (मुक्त) पालि~छात, छातक (भूखा), छातता (भूख) प्राकृत-छाय (भूखा) मिहली-सय, सा, साय (भूख, सूखा)।' इस प्रकार के अनेक शब्द उद्धृत किए जा सकते हैं जिनके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि प्राचीन, मध्यकालीन एव आधुनिक आर्यभाषाओं में देशी शब्द विभिन्न रूपो मे प्रवेश पा गए, जिनका निर्धारण श्रम एवं गवेपणा साध्य है। प्रस्तुत कोश की मपादन मडली को हम हादिक धन्यवाद देते हैं जिन्होने अथाह परिश्रम पूर्वक इस विषय पर उपलब्ध सारी सामग्री का विद्वत्तापूर्ण उपयोग किया है तथा आचार्य हेमचन्द्र विरचित प्राकृत व्याकरण १. देखें~~आर एन. टर्नर : ए कोम्परेटिव डिक्शनरी ऑफ द इण्डो-आर्यन लेंग्वेजिज।
- एव देशीनाममाला और इसके अतिरिक्त अय प्राकृन घ्यावरण एव कोशप्रथों का यथेष्ट अनुशीलन किया है । समग्र जन आगम तया उन पर लिखे हुए ध्याख्या ग्रथ -नियुक्ति, भाष्य, चूणि, टीकाओ का सूक्ष्म एव व्यापक परिशीलन द्वारा प्राप्त देशीश भी इस वोप मे सगहीत हैं। 'अगविज्जा' जैसे पारिभाषिक शलो मे परिपूण अथ से भी देशी शब्द का इसमे चयन हुआ है। स्थान स्थान पर ध्यास्या-प्रयो मे 'देशीपदत्वात' 'देशीवचनत्वात 'देशीपद'- ऐसे उल्लेख मिलते हैं, जिनका अविक्ल उल्लेख इस कोप में किया गया है । यह इसकी एक नवीन विशेषता है । आधुनिक विद्वानो द्वारा वज्ञानिक ढग से सम्पादित प्राकृत एव अपभ्रश साहित्य मे प्राप्त देशील का सक्लन भी ध्यानपूर्वक किया गया है । देशी शब्दो के सग्रह का एसा सर्वाङ्गीण उपश्रम पहली बार ही हुआ है। एक ही कोश मे इतनी सामग्री का उपलब्ध होना भविष्य के शोधाथियो के लिए देशी शब्गे पर गवेपणा के क्षेत्र मे एक ठोम आधार प्रदान करेगा। हमारे सघ के प्रबुद्ध साघु-साध्वियो एव समणियो के सम्मिलित प्रयाम से ही यह महान काय सम्पन्न हो सका है। सम्मिलित प्रयत्न के बिना ऐम प्रयो का निर्माण होना सभव नहीं है। विविध योश निर्माण की मौलिक कल्पना परमाराध्य आचायश्री एवं धुवाचायश्री की प्रतिभा की देन है । फ्तस्वरूप तीन महत्त्वपूण कोश हमारे सामने आ चुके हैं। उसी क्रम मे यह देशी शन्कोश चतुय है। यह धारा अविच्छिन्न है, एव भविष्य म कई और अधिक उपयोगी कोश विद्वानो के समक्ष माएगे । परमाराध्य आचायश्री की आध्यात्मिक प्रेरणा से कई दुमाध्य काय आमानी स सम्पन्न हो जाते हैं । उनकी आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रभाव हम पुन पुन अपने जीवन म अनुभव करते हैं, जिसका शो म यणन करना समय नही है । हमारे मप में जो माहिरियर एव बचारिक प्रति आई है उमा उद्भय-स्थान परमागप्य आचायथी वी आध्यात्मियता ही है। प्रस्तुत पोश घी मर्वागीण गमायोजना म पनि दुलहराजजी का मयिक र योग रहा है । मुनिश्री परम श्रदेय युवापायश्री मी साहित्यिर एव दानिय रचनायो के सम्मान म सतत महयोग प्रदान करते रहे हैं । युवाचार्यश्री रे सुदीप पानिप्प के पतस्यम्प मुनिश्री ने जो दक्षता प्राप्न पी है उममा प्रतिपनन प्रस्तुा कोश म दृष्टिगोचर होता है। मूम प्रयो मे दगी गगे ये पयन था गाय मावी गोषत्रीजी सावी विमलप्रमाजी गायी मिलप्रमाजी एवं मायी निर्वाश्रीजी तपा ममणी मुमप्रणाली न समाजापूवर सम्पन्न किया। यह गुग्मार-वहन उनकी विडता एव स्पिर अभ्यवसाय का ही परिणाम है। गोग में दो परिपिट गमग दिए गए है। पहले परिगिष्ट में मागम गाहित्य निरित अनर प्रान प्रपो सपा विचित्रमारे मान
शब्दानुशासन से देशीशब्द चुने गए हैं। दूसरे परिशिष्ट मे देणीधातुएं तथा
धात्वादेश सकलित है।
प्राकृत एव अपभ्रश के अध्ययन-अध्यापन का क्षेत्र उत्तरोनर प्रमार
लाभ कर रहा है। कई विश्वविद्यालयो एव स्वतन्य शोघ-सस्थानो में
शोधछात्र एव अध्यापकगण इस क्षेत्र को समृद्ध बना रहे है । हमे पूर्ण विश्वास
है, प्राकृत एव जैन शास्त्री के अध्येताओ के लिए यह कोश लाभप्रद होगा
एव और भी अधिक शोधपूर्ण ऐसे कोशो के निर्माण की दिशा में उन्हें प्रेरित
करेगा।
.
लाडनू (राजस्थान)
६-३-८८
नयमल टाटिया
निदेशक, अनेकात शोधपीठ,
जैन विश्व भारती
,
सपादकीय
मापा
भाषा विचारो के आदान-प्रदान का माध्यम है। संसार के कोने-कोने
में निवास करने वाले मनुष्य किसी न किमी भाषा के माध्यम से अपने
विचारो का आदान प्रदान करते हैं। भौगोलिक कारणो से मनुष्यो की भाति
भापा के भी अनेक भेद पाए जाते हैं । महाभारत में इसका स्पष्ट उल्लेख है।'
विद्वानो के मत स वतमान म १००० से अधिक जीवित भाषाए प्रचलित हैं।
इम विषय म मकही पुस्तकें भी प्रकाश में आ चुकी हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय आय भाषाओं को तीन कालों में विभक्त
किया जा सकता है-
१ प्राचीन भारतीय मायभापा काल-इसमे वैदिव एव लौकिक सस्कृत
माती है।
२ मध्य भारतीय बाय मापा काल-इसम पालि, प्रायत एवं अपना
भाषा का समावेश होता है।
३ आधुनिक भारतीय आयमापा वाल-इसम हिन्दी, गुजराती, मराठी,
उहिमा, बगला, असमिया, तेलगू, कनर, तमिल आदि भाषाए आती हैं ।
प्राकृत--
प्रकृति पर दो अप है--स्वभाव और जनसाधारण । इन अयों
के आधार पर प्राकृत श फे भी दो अर्थ समझे जा सकते हैं-
१ जो प्रकृति/स्वभाव मे ही सिद्ध है यह प्रारत है।
२ ओ प्राषि/साधारण लोगों की भाषा है यह प्राप्त है।
महापयि पापतिराज रा अभिमत है रि जसे पानी ममुर में प्रवेश
पला है और ममु से ही वाण के रूप में पाहर निरसता है। ठीर से
ही गय भाषाए प्रायन म प्रवेश करती है और इसी प्राशन से मब भापाए
निमलती है। इस स्पष्ट है कि प्राप्त रे मापार पर ही मरान आदिमा
१ महाभारत, शल्यपद ४७.९८
मानापमभिराना, मानामापार भारत ।
पुगता भाषागु जपतोम्योपभीरा ॥
२ गरायो ६३ समतामोमा पापा विराति एतो पति वापानी।
एति समुह पिप रिमापरामो स्विप नमा।।
१६ १ - १ पालि विकास हुआ है। प्राकृत भाषा के भेदो के विषय मे विद्वानो के विभिन्न मत मिलते हैं। भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में प्राकृत की सात भापामओ का उल्लेख किया है- १ मागधी ५ अर्धमागधी २ अवन्तिजा ६ वाह्नीकी ३. प्राच्या ७. दाक्षिणात्या ४ शोरमेनी सस्कृत नाटको मे विभिन्न प्राकृत भाषा की वोलिया मिलती हैं । प्रसिद्ध वैयाकरण वररुचि ने महाराष्ट्री, पैशाची, मागधी और शौरसेनी- इन चार भापाओ को प्राकृत के अन्तर्गत माना है। हेमचन्द्र ने इन चारो के अतिरिक्त चूलिका पैशाची, मार्ष, अर्घ- मागधी और अपभ्रग का उल्लेख भी किया है । त्रिविक्रम, लक्ष्मीधर, सिंहराज, नरसिंह आदि वैयाकरणो ने हेमचन्द्र का अनुसरण किया है । प्राकृत भाषा के दस भेद भी मिलते है- ६ अशोकलिपि २ पैशाची ७ शौरसेनी ३ चूलिका पैशाची ८ मागधी ४ अर्घ मागधी ९ महाराष्ट्री ५. जैन महाराष्ट्री १०. अपभ्रश मार्कण्डेय ने प्राकृत की सोलह भापामो का उल्लेख किया है। प्राकृत मे तीन प्रकार के शब्दो का समावेश है—१ तत्सम २. तद्भव ३. देशी। सस्कृत-निष्ठ शब्द तत्सम है । ये विना किसी रूप परिवर्तन के प्राकृत मे प्रयुक्त है । जैसे-जल, कमल, देव आदि । सस्कृतसम', तत्तुल्य और समान शब्द भी तत्सम के वाचक हैं । संस्कृत के जो शब्द वर्णागम, वर्णविकार या ध्वनि-परिवर्तन से अपना स्वरूप बदल लेते हैं, वे तद्भव हैं। जैसे-कार्य-कज्ज, ऋषभ-उसभ, १. नाट्यशास्त्र १७१४८: मागध्यवन्तिजा प्राच्या, शौरसेन्यर्धमागधी। वालीका दाक्षिणात्याश्च सप्त भाषा. प्रकोतिताः ।। २ नाट्यशास्त्र १७१३ : त्रिविधं तच्च विज्ञेयं नाट्ययोगे समासतः। समानशब्दं विभ्रष्टं देशागतमथापि च ॥ ३. प्राकृतलक्षण १११ । ४ वाग्भटालंकार २१२ । ५ नाट्यशास्त्र १७१३ ।
१५ वधमान-वह ढमाण नादि । इसके लिए आचाय हमचद्र ने सस्कृतयोनि' 'वाग्भट ने तज्ज तथा भरत ने विभ्रष्ट' शब्द का प्रयाग किया है। देशी शन्न मामा यतया ग्राम्य या प्रान्तीय अय का वाचन है । नियन पार यास' तथा पाणिनि ने देशी शन का प्रयोग प्रान्त अथ मे किया है। वात्स्यायन ने सामसूत्र विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस वाण ने बादवरी तथा धनञ्जय ने दशस्पक मनाना देशा म बोली जाने वाली भाषाओं का दशी भापा महा है । रामसूत्र महाभारत नाटयशास्त्र आदि प्रयो में देशभाषा शट म देशी भाषा का अथ ग्रहण किया गया है । वयाकरण चण न देगीमापा १ अथ म देशीप्रमिद्ध, भरत ने देशीमत तथा देशागत राम का प्रयोग किया है। अनुयोगद्वार मे शनों को पाच भागा म विभक्त किया गया है । उनम नपानिव गन्नों को देशी के अन्तगत माना जा सकता है।' सस्थत म तीन प्रकार की शट सम्पदा है - रूद, योगिर और मिश्र । नम म् देशी के अन्तगत आत हैं। पलियाल सवन हमचद्रन देशीनाममाला मदशी गम्न को परिभा. पित परत हुए लिया है. जो व्याकरण प्रयो म प्रकृति प्रत्यय द्वारा सिद्ध नहीं है ज्यावरण म मिद्ध होने पर भी सस्कृत योगो म प्रमिट नहीं हैं तथा जो शर सक्षणा मादि दान-शक्तिया द्वारा दुर्बोध हैं और अनादि काल म लोपभापा म प्रचलित हैं व गव दशो हैं । महाराष्ट्र विदम आदि नाना दगा म बोली जाने वाली गाना भापाए होन गदगी पर बनत हैं। इस विशाल दृष्टिकोण के बावजूर भी उहोंने इन अतहीन सगे ये सवरण की दुल्हता मो ध्यान म रगते हुए मयल प्रायन भाषा ग मम्मपित सोयाबीदगी मानकर उनरा अविरल मरलन पिया है। वियित्रम में अनुगार आप और रेश्य विभिन्न भाषामा प्रयोग। अत नर सियाण मी भावापना नहीं है। उहान घर विभिन मूषों दागदगी पायपोछह विभागों में विभा पिया है- १ या प्राप्यापा-गरे भाग म्बर आनि पीवित आयोजना में उत्पन्न १ प्रारत ध्याररण । ५ अप्राप्पापा ११1३५ २ पामगार ॥२॥ ६ मपोगहार २७०। . माग्यरत्र १७॥ जीनाममाला १०३४। ४ निरक। ८ मालानुन ७ रोयमाप पात मायाप भूपा। एम मारपत साय गरायोचिोपर ॥ २१.
२० ओदन शब्द के लिए निम्न पंक्तिया हनीय हैं--- 'पुव्वदेसयाणं पुग्गलि ओदणो भण्णइ, लाउमरहट्ठाणं कुरो, द्रविटाणं चोरो, आध्राणं कनायु ।" वृहत्कल्प भाप्य मे आचार्यपद के योग्य शिष्य के लिए स्पष्ट निर्देश है कि वह देशी भाषाओ के परिनान के लिए बारह वर्ष तक देशाटन करे। देशाटन का प्रयोजन और उमसे होने वाली निप्पत्तियो पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि शास्त्रो में प्रसिद्ध शब्द जिन-जिन देशो और प्रान्लो मे व्यवहृत होते है, देशभ्रमण के समय उन-उन देशो मे उनका प्रत्यक्षीकरण हो जाता है-~- पय पिच्च नीरमित्यादयश्च शास्त्र प्रमिद्धा गास्तेषु तेषु देशेषु लोकेन तया तथा व्यवह्रियमाणा रेशदर्शन कुर्वता प्रत्यक्षत उपलभ्यन्ते । दूसरी वडी उपलब्धि यह होती है कि मतत परिवजन करने वाला परिव्राजक मगध, मालव, महाराष्ट्र, लाट, कर्णाट, द्रविड, गौड, विदर्भ आदि नाना देशो की देशीभापाओ में कुशलता प्राप्त कर लेता है । इसमें एक बडी सुविधा यह हो जाती है कि वह नाना देशीभाषाओ मे निवद्ध सूत्रो के उच्चारण और उनके यथार्थ अर्थक यन में दक्ष बन जाता है और जब वह आचार्यपद को अलकृत करता है तो समस्त देशीभाषाओ मे निष्णात होने से अभाषिको (केवल अपने ही प्रदेश की भाषा जानने वालो) को भी उनकी अपनी भाषा मे प्रतिवोघ देकर प्रवजित कर लेता है।' देशीभाषाओ के भेद आगमो मे अनेक स्थलो पर अठारह प्रकार की देशीभापाओ का उल्लेख मिलता है। राजकुमारो को भी अठारह भापाओ का ज्ञान कराया जात था। गणिकाए भी इन भाषाओ मै निष्णात होती थी। ये अठारह १ दशवकालिक, जिनदासणि, पृष्ठ २३६ । २. वृहत्कल्पमाप्य, १२२३, टीका पृष्ठ ३८० । ३ वृहत्कल्पभाज्य, १२२६, १२३० : नाणादेसीकुसलो, नाणादेसीकयस्स सुत्तस्स । अभिलावअत्यकुसलो, होइ तओ णेण गंतव्वं ॥ कयति अभासियाण वि, अभासिए आवि पव्वयावेइ। मन्ने वि तत्य पोइं, बंधति सभासिओ णे ति ॥ ४. औपपातिक १४६; राजप्रश्नीय, ८०६ । ५. ज्ञाताधर्मकथा, २०५८: एते णं से मेहे कुमारे' अवारसविहदेसिप्पगारभासाविसारए। ६ वही, २३८ देवदत्ता नाम गणिया अवारसदेसीभासाविसारया । , N २१ अय भापाए कौन सी थी-आगमो म इसका स्पष्ट उल्लेख नही मिनता। वहत्कल्प भाध्य की टीका म मगध, मालव, महाराष्ट्र, लाट कर्णाट, द्रविड, गौड और विदम आदि देशो म बोली जान वाली भाषामा को देशी कहा गया है।' कुवलयमाला मे विजयपुरी के बाजार म एकत्रित अठारह दशा के व्यापारियों के मुह से अपने अपन देश की भाषा के शब्द कहलवाये है। उनके उदाहरण इम प्रकार हैं- देश भापा शब्द अहह पशुओ को हाकने का शन्द २ मध्यप्रदेश तेरे मेरे आउ तेरे, मरे आओ ३ मगध एगे ले' ऐसे ले (१) ४ अतर्वेद कित्तो किम्मो ५ कीर (कश्मीर) सरि पारि ६ ढक्क (पजाब) यहान्वहा, यह वह चउडयम सुदर (?) १ गोल्ल एह तेह' ७ सिप १ बृहत्कल्पमाप्य, टीका ५३८२ नानाप्रकारा-मगध मानव-महाराष्ट-लाट-कर्णाट-द्रविड-गोड विदर्भादि देशमया या देशीमापा २ पुवलयमाला, पप्ठ १५२, १५३ १ फसिणे गिटठरययणे बहुक्-समर मजए अलग्जे य । मड? ति उल्लयते अह पेच्छड़ गो लए तत्य ।। २ गय णीह-सधि विग्ग-पड़ए बहुजपए प पयईए। तेरे मेरे आउ' ति जपिरे मजादेसे य॥ ३ गोहरिप-पोटट-दुय्य माहए-मुरय-वेलि-सल्लिच्छे । एगेन' जपुल्ले मह मैच्छइ मगहे कुमरो॥ ४ पयिले पिंगलणपणे मोपणहीतदिग्गयायारे । रित्तो रिम्मो पिय जपिरे म अह अतयेए य॥ ५ उत्तुग-स्यूल घोणे क्णयरवणे प भार-याहे य । 'सरि पारि' जपिरे रे पोरे पुमरो पलोए ।। ६ दविण-दाप पोरस पिणाण-या यियग्निप-सरीरे। 'एर तेर धपते परे उण पेस दुपरा॥ ७ सासिय मिउ-माहवए गयाय पिए सदेसगचित । 'पउप मे भपिरे गुरए मा मधये दिटटे।
२४ --. णायकुमारचरिय आदि के रचयिताओ ने अपने-अपने ग्रन्थो को देशी भापा के प्रयोगो से युक्त बताया है । यद्यपि ये ग्रन्थ महाराष्ट्री प्राकृत या अपभ्रंश मे रचित हैं, किन्तु इनमे देशी शब्दो की प्रचुरता है । अपभ्रश तथा महाराष्ट्री प्राकृत को भी अनेक विद्वानो ने देशी भापा माना है। लीलावई कहा' तथा कुवलयमाला मे कवि महाराष्ट्री प्राकृत को देशी के रूप मे स्वीकार करते है। महाराष्ट्र के सत कवि ज्ञानेश्वर ने भी देशी शब्द का प्रयोग मराठी के लिए किया है। शावरभाष्य मे देशी भापा के सदर्भ मे अपभ्रंश का उल्लेख हुआ है । इसके अतिरिक्त और भी अनेक उल्लेख इन भाषाओ को देशी मानने के सन्दर्भ मे मिलते है। इनसे स्पष्ट है कि देशी शब्द का प्रयोग अपभ्रश, महाराष्ट्री तथा जनपदीय बोलियो के लिए भी होता रहा है। ये दोनो अपभ्रश और महाराष्ट्री भापाए देशी है या नही -- इसके विषय मे विद्वानो ने पर्याप्त चिन्तन किया है। अधिक सभव लगता है कि यहा देशी या देशीशब्द का प्रयोग प्रान्त या उस देशविशेप के लिए किया हो। प्रसिद्ध भाषाविद् जूलब्लाक तथा डा० कीथ ने यह सिद्ध किया है कि अपभ्रश देशीभाषा नही थी किन्तु आभीर एव गूजरो की भापा थी। अपभ्रंश के आज अनेको ग्रन्थ मिलते है जिनमे प्रचुर देशी शब्दो का प्रयोग हुआ है । उदाहरण के लिए डा० देवेन्द्रकुमार शास्त्री द्वारा सम्पादित 'भविसयत्तकहा तथा अपभ्रश कथाकाव्य' पुस्तक मे उल्लिखित कुछ देशी शब्दो एव धातुओ का नीचे निर्देश किया जा रहा है--- तलाय (तलाव), हसि (हसिनी), संड (साड), धीवर, अट्ठारह, चउदह, चउसट्ठि, पासु (पास), आजु (आज), मंदलु, कायरा (कायर). गवार (गवार), अगवाणिय (अगवानी), वणिजारिय (वनजारा) आदि । इसी प्रकार इसमे देशी क्रिया-रूपो तथा सर्वनामो की भी प्रचुरता है। सर्वनाम के कुछ शब्द-रूप इस प्रकार है-जो, सो, ए, को, हउ, हउ, (ही), कवणु (कौन), मइ (मैं), हमारे, अम्हारिय, इह, यहि, विह (कैसे) इस, जिह (जैसे), जे, ता और ज इत्यादि । देशी क्रियापदो के कुछ रूप--पूछिय, मायउ, तोडिय, देखेवि, लग्ग (लगे हुए) घल्लिय, ढोइय, छोडड, पडिउ, छूटउ, हक्क दिति (हांक देते है), १ णायकुमारचरिय, १११ : णीसेसदेसभासउ • चवंति । २ लीलावई कहा, गाहा १३३० भणियं च पियय भाए, रइयं मरहट्ठ देसी भासाए । ३ कुवलयमाला, पृष्ठ ४ : पाइयभासारइया मरहट्ठय-देसि-वण्णय-णिवद्धा। ४. भविसयत्तकहा तथा अपभ्रंश कथाकाव्य, पृष्ठ ३११ । ८ २५ . चालावहि (चलवाये), चलु (चलो), फिरइ, गइय, देइ, बुलावइ, खायइ, खुल्लय (खुला हुआ) इत्यादि । देशी कोशकार आज तक कितने देशी कोशकार हुए हैं, इसका ठीक-ठीक सकलन करना इतिहास की दष्टि से अत्य त दुरूह काय है । वतमान मे देशी शब्दो का सबसे बडा कोश आचाय हेमचन्द्र का मिलता है। निवित्रम ने अपने प्राकृत पशब्दानुशासन मे लगभग १६०० देशी शब्दो का उल्लेख किया है । धनपाल ने पाइयलच्छीनाममाला म प्राकृत शब्दो के साथ कुछ देशी शब्दो का सग्रहण भी किया है । आचाय हेमचन्द्र ने अनेक देशी कोशकारी का नामोल्लेख अपने अय-देशी नाममाला में स्थान-स्थान पर किया है । उनका सक्षिप्त परिचय इम प्रकार है- अभिमानचिह-इनका देशीकोश सूत्रात्मक था। इन्होंने शब्दसूची और उदा- हरणो से शब्दो के अथ को स्पप्ट करने का प्रयास किया। इन सूत्रा की व्याख्या विद्वान उद्खल ने की थी। अतिसुदरी--यह भी कोई विदूपी महिला थी, जिसने प्राकृत मे काव्य रचना कर, उमम अनेर देशी शन्गे को प्रयुक्त किया था। इसके विषय मे पर्याप्त जानकारी नहीं है। गोपाल-इहाने देशी शकोश की श्लोकबद्ध रचना पर सस्कृन म उन शब्दा का अथ किया था। अनेक देशीकारा ने इनका उल्लेख किया है। देवराज-इहोंने छ दवद्ध दशीकोश की रचना की और शब्दो के अथ प्राकृत म दिये । इनका सम्पूण कोश शब्दा की प्रकृति के आधार पर प्रकरणो म विभाजित था। द्रोण-इहोंने देशीकोश की रचना अवश्य की थी और गा का अथ प्राकृत भाषा मे प्रस्तुत किया था। परन्तु उम ग्रय का स्वरूप अज्ञात है । धनपाल-सभवत पाइअलच्छीनाममाला के कर्ता धनपाल से ये भिन थे। इनका देशी पोश हेमचन्द्र के समय मे प्रचलित रहा हो-ऐमी सभावना है । इनका विशेप परिचय नात नहीं है। पादलिप्ताचाय-हेमचन्द्र के अनुसार ये भी दशीकोश के रचयिता थे। यह मन्भावना की जाती है वि इनके योशगन विवरण में हेमचद्र . पूण महमत थे। राहलय-इनके द्वारा रचित देशीररोश की कोई विश्वस्त जानकारी प्राप्त नहीं है । 'टोन' श के मदम मे हमचद्र इनके मत को स्वीकार बर, अ याय कोशकारा ये अय का प्रतिषेध करते हैं । सभवत इनका कोई पोश रहा हो।
- २६ शाम्व-हेमचन्द्र. इनके मत का उल्लेख करते है, पर इनके द्वारा रचित कोई देशीकोश था, यह स्पष्ट नहीं है। शीलांक-हेमचन्द्र ने इनके मत का उल्लेख तीन स्थानो पर किया है। सभवतः इन्होने देशीकोश की रचना की थी। इन सभी देशी - कोशकारी का इतिवृत्त और काल ज्ञात नही है । संभवत. इन सभी कोशकारो के देशीकोश हेमचन्द्र को प्राप्त थे और उन्होंने इन सभी कोशो मे रही अपर्याप्तताओ को निकालकर देशीनाममाला को समृद्ध बनाने का प्रयत्न किया है। यह तो सुनिश्चित है कि हेमचन्द्र से पूर्व प्रणीत देशी कोशो से हेमचन्द्र का प्रस्तुत देशीकोश विशिष्ट, व्यवस्थित और शब्द के सही अर्थ को प्रकट करने में सक्षम है। देशीनाममाला : एक परिचय देशीनाममाला देशी शब्दो का विशिष्ट कोश है। आचार्य हेमचन्द्र ने इसके प्रारम्भ मे लिखा है- देशी दु.सन्दर्भा प्रायः संदर्भिताऽपि दुर्वाधा। आचार्यहेमचन्द्रस्तत् तां संदृभति विभजति च ॥ देशी शब्दो का चयन करना, उनके सन्दर्भो की समीचीनता को ढूढना तथा उनके अर्थों के अववोध को निश्चित करना दुल्ह कार्य है । इसकी रचना आचार्य हेमचन्द्र ने अपने व्याकरण सिद्धहेमशब्द नुशासन के अष्टम अध्याय की पूर्ति के लिए की। आचार्य हेमचन्द्र ने इन कोश के दो नामो का उल्लेख किया है- देसीसहसगहो, रयणावली । किन्तु इन दोनो नामो के अतिरिक्त प्रत्येक अध्याय के बाद पुष्पिका मे 'देशीताममाला' नाम भी मिलता है। इमके रचनाकाल के बारे में भी भिन्न-भिन्न मान्यताएं है। यह तो स्पष्ट है कि इसकी रचना आचार्य हेमचन्द्र ने सिद्ध हेमशब्दानुशासन तथा सस्कृत के कोशो-अभिधान चिंतामणि, अनेकार्थ सत्रह आदि के पश्चात् की। डा० वूलर के अनुसार देशीनाममाला की रचना वि० सं० १२१४-१५ मे होनी चाहिए। यह मत विद्वानो मे मान्य भी है। डॉ. भयाणी ने अपने लेख में देशीनाममाला के अनेक शब्दो की मस्कृत छाया करके उनको तद्भव या तत्सम माना है। १. देशीनाममाला, ८७७ . इय रयणावलोणामो, देसीसहाण संगहो एसो। वायरणसेसलेसो, रइओ सिरिहेमचन्दमुणिवइणा ।। २ कालूगणि स्मृति ग्रंथ, संस्कृत प्राकृत जैन व्याकरण कोश की परम्परा, ८३-१०७। प्रथ २७ प्रस्तुत कोश ग्रथ में ८ मध्याय तथा ७८३ गाथाए हैं। इसमें ३९७८ शब्गे का मक्लन है । मभी शब्द अकागदि क्रम मे सगहीन हैं। इस पर उनकी स्वोपन टीका भी है। शब्दो के अर्थावबोध के लिए उन्होंने ६३४ उदाहरण गाथाए भी दी हैं। आचाय हेमच द्र ने शब्दो को दशी मानने की कुछेक क्मोटिया दी हैं । इन क्सौटियो पर सभी शब्द खरे नहीं उतरते-यह अवधारणा व्याख्यासार रामानुज, पिरोल और बनर्जी आदि विद्वानो की है। अनेक ऐसे शब्द भी हैं जिन्हें शब्गनुशासन में सस्कृत मानकर सिद्ध किया गया है तथा जा इम काश में भी समाविष्ट कर दिये गये हैं। डॉ शिवमूति शर्मा ने इसके तत्सम तदभव एव देशीशा का लेखा इस प्रकार प्रस्तुत किया है' तत्सम शब्द १००। संशययुक्त तदभव ५२८ । गभित तदभव १८५० । देशीशब्द १५०० । इन १५०० तशीशग म से ८०० शब्द भारतीय आयभापाआ में प्राप्त हात हैं तथा ७०० शब्द आर्येतर भापामा म मवधित वताये जाते हैं । विद्वाना का मन य है कि हेमचद्र द्वारा दी गइ नमोटियो पर केवल १५०० शटर खरे उतरते हैं । वि तु आचाय हेमचद्र न प्राय प्रत्येक शब्द को देशी मानने मे तर प्रस्तुत रिया है तथा अनेक आचार्यों के मतो का उल्लेख भी किया है। देशीनाममाला के कई गट सस्कृत से व्युत्पन किये जा सकते हैं, वितु अथ की दृष्टि से वे पूणत देशी हैं । स्वय आचाय हेमचद्र ने अपनी स्वापन वृत्ति में स्थान स्थान पर स्सप्टीकरण दिया है तथा उन शन्ना वो देशी मानने का कारण युक्तिपुरम्मर ममझाया है । जमे- व्यभिचारी अथ पा द्योतक 'अविणयवर' । सस्कृत के 'अविनयवर' शक से महज व्युत्पन्न किया जा मक्ता है, किन्तु मस्कृत काशो म इम अथ म अप्रमिद्ध होन म इस देशी म सगहीत किया है। अगुज्महर-अगुह्यपर, अधिरजुवइ अचिरयुवति आदि शठा वी भी यही स्थिति है।' 'अण्ण' र तप्त जय का वाचन है। इसे सस्कृत के 'अन्नचित' परन से निष्पन्न किया जा सकता है किन्तु उमया लय तृप्त न होकर अन्न से पुष्ट' होता है । अत तृप्न अय या वाचर अणइ दगी है।' १ देशोनाममाता का भाषा यज्ञानिए अध्ययन, पप्ठ ५६ । २ देशानाममाला, १११८ यति । ३ पहो, १११६ यत्ति।
२८ - - निमीलन अर्थवाची 'मच्छिवटण' शब्द सस्कृत के 'अक्षिपतन' शब्द में निष्पन्न हो सकता है, तथापि सस्कृत मे इस अर्थ में अप्रसिद्ध होने मे इमे देशी मे निवद्ध किया है। 'अहिहाण' का अर्थ है-वर्णना, प्रशसा । यह सस्कृत के अभिधान शब्द से व्युत्पन्न किया जा सकता है, किन्तु जो व्यक्ति संस्कृत से अनभिज्ञ हैं, स्वय को प्राकृत के पडित मानते है उनका ध्यान आकृष्ट करने के लिए ऐसे अनेक शब्दो का सग्रहण किया है। संस्कृत मे 'अभिधान' शब्द वर्णना---प्रगमा के अर्थ मे प्राप्त नही है। उल्लिखित सदों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देशी शब्दो के सग्रहण मे आचार्य हेमचद्र बडे सतर्क एव जागरुक रहे है। इस विषय मे उनकी दृष्टि बहुत स्पष्ट एव विशाल थी, चितन युक्तियुक्त एव गभीर था । अन्य आचार्यों द्वारा देगी रूप मे स्वीकृत होने पर भी जहा आचार्य हेमचन्द्र को कोई शब्द युक्ति सगत नही लगा उसे सस्कृतमम या सस्कृतभव कह कर छोड दिया है । जैसे - 'अच्छलं अनपराध इति संस्कृतसमः ।' 'अच्छोडण मृगया, अलिंजर कुण्डम्, अमिलाय कुरण्टककुसुमन्, अच्छभल्लो ऋक्षः' इत्यपि सगृहन्ति । तत् सस्कृतभवत्वादस्माभिर्नोक्तम् । शब्दो के यथार्थ अर्थ को पकडना एक कठिन कार्य है। उसमे देशी शब्दो का सही ढग से निर्णय तथा अर्थ-निर्धारण तो और भी कठिन कार्य है। देशीनाममाला मे आचार्य हेमचन्द्र ने देशी शब्दो के वाचक जिन सस्कृत शब्दो का प्रयोग किया है, उनके अनेक अर्थ होते हे, हो सकते है । उनको कौनसा अर्थ अभिप्रेत था—इसका प्रसग या सदर्भ के विना निर्णय करना अत्यत कठिन है। यही कारण है कि देशीनाममाला के अनेक शब्दो का भ्रम- पूर्ण एव अयथार्थ अर्थ भी कर दिया गया है। उदाहरण के लिए रामानुज स्वामी की शव्द सूची द्रष्टव्य है । उसमे कई शब्दो के अर्थ विमर्शणीय एव सशोधनीय है । जैसे- आचार्य हेमचन्द्र ने 'आउस' शब्द का सस्कृत अर्थ 'कूर्च' दिया है। कूर्च शब्द के दाढी और कूची-दो अर्थ होते है । रामानुज ने इसका अर्थ कूँची (Brusb) किया है, किन्तु इसका वास्तविक अर्थ दाढी होना चाहिए । इसके सही या गलत अर्थ का निर्णय आचार्य हेमचद्र द्वारा प्रस्तुत इस उदाहरण गाथा से हो सकता है- १ देशीनाममाला, ११३६ वृत्ति । २ वही, ११२१ वृत्ति । ३ वही, श२० वृत्ति। ४ वही, ११३७ वृत्ति ।
२६ "सआयाम-आसयसेन तुह पेच्छिप जाय-आउर-आलोला। आलस्यपिच्छच्छत्ते छडिडय रिउणो अणाउसा जति ॥ ११५३।६५ । इसमे शत्रुनो की पराजय का सुदर चित्रण करते हुए कहा गया है कि हे राजन | तुम्हारी शक्तिशाली सेना को निक्ट आयी जानकर युद्ध के निकटवर्ती भय से भयभीत तुम्हारे शत्रु मयूरपिच्छीनिष्पन छत्री को छोडकर विना दाढी-मूछ वाले मद बनकर युद्ध-क्षेत्र से पनायन कर रहे हैं। इस वण्य प्रसग के आधार पर यह स्पष्ट है कि यहा 'आउस' का जय कूची नही, दाढी मूछ ही होना चाहिए । इसी प्रकार जाहुदुर' (१९६६) शब्द का अर्थ हमचन्द्र ने 'वाल' किया है । रामानुजस्वामी ने 'बाल' का अथ पूछ (Til) क्यिा है, जो ठीक नहीं है । निम्न उदाहरण गाथा के मदम मे इसका 'बालक' जथ उचित प्रतीत होता है- आमोरय ! सिरिआसग । तए आहुदुरा फरि हरीण । मित्त-आसवण-अमित्तालयण-दुवारेसु सघटिया ॥१॥५४॥६६॥ 'हे विशेषन । लक्ष्मी के वासगह । तुमने मित्रो के गहद्वारो पर हाथी के बच्चो का तथा शत्रुआ के गहद्वारा पर बदर के बच्चो का मघटन/ निमाण किया है। हो भयाणी का देशी शो पर किया गया अनुमधान अत्यत महत्व- पूर्ण है । —होंने देशीनाममाला के शब्द-अनुपम म रामानुजस्वामी द्वारा दिये गए इग्निस अर्थों की ममालोचना करते हुए १७५ शब्नो की नोघ प्रस्तुत पर उनके द्वारा कृत अर्थों को भ्रामर और अनभिप्रेत बताया है। इन्होंने इन शनाका अथ जा हेमचद्र को अभिप्रेत था उसका निर्देश भी दिया है। उनमे से उछे श द सही-गलत अर्थों के माय इस प्रकार हैं सही अय रामानुजक्त गलत अप अच्छिविमच्छी परस्पर आक्पण, आपसी खाचतान Mutual attraction अजगर उष्ण Heat नूपुर गह नूपुर रखन की पेटी Dressing room आरदर १ अनेरान्न, जनसवुन Not alone २ मरट, मीण Difficulty आलीवण प्रदीपनक, प्रदीप्त अग्नि Illuminating इदरल इद्रात्यान इद्रध्वज का हटाना Awakening Indra परमदिर A young clephcot उपहारी भोग्नी, दूध दुहने वाली स्त्री A milch cow १स्टरीज इन ऐमच द्वाज देशीनाममाला, प ५७-६२ । मूल शद बामलय चण्डी, ओरपिय कोट्टिव गणणाइआ चिच्च दोद्धि माणसी आक्रान्त द्रोणी, नोका पार्वती कटिभाग चर्मकूप, दृति चद्रवधू , वीरवहूटी कीट Sciged A Wooden tub An angry woman Charming A porc of the skin The wife of the moon साहजण गोखरू, एक पौधा A cow's hoof देशी शब्दो का भाषाशास्त्रीय अध्ययन आगम-साहित्य शब्दो का विपुल भडार है। धार्मिक, ऐतिहामिका, सामाजिक, भौगोलिक एव सास्कृतिक दृष्टि से तो इसका महत्व है ही, किन्तु भापाविज्ञान की दृष्टि से भी इसके अनेक शब्द तुलनीय एव विमर्गणीय है । आगम मे समागत अनेक देशी शब्द अर्वाचीन हिंदी, राजस्थानी, गुजगती, मराठी, कन्नड, तमिल, तेलगु भापा के शब्दो से तुलनीय है। भापाविज्ञान की दृष्टि से प्रत्येक शब्द के अर्थ का उत्कर्ष एव अपकर्ष होता रहा है। डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी के भापा-विज्ञान सम्बन्धी ये विचार उल्लेख- नीय है-'शब्दो के अर्थ की ह्रास और विकास की कथा दीर्घकाल से चली आ रही है । कुछेक शब्दो के अर्थ मे विकास होता है, कुछेक का ह्रास और कुछेक के अर्थ मे विकार आ जाता है । 'वश' शब्द का विकाम 'वाम' अर्थ मे हुआ, किन्तु कुल के अर्थ मे विकास न होकर 'वश' शब्द ही बना रहा । इसी प्रकार 'पृष्ठ' शब्द का विकास/विकार 'पीठ' अर्थ के रूप मे हुआ, पर पृष्ठ (पन्ने) के अर्थ मे नही हुआ । 'पन्ने' के अर्थ मे पृष्ठ शब्द ही प्रयुक्त होगा, पीठ नही। अमुक पुस्तक का पृष्ठ कहा जाएगा, पीठ नही । 'सूची' शब्द वस्त्र सीने के उपकरण के रूप मे 'सूई' बन गया, किन्तु 'विपय सूची' के लिए 'विपय सूई' नहीं बन सका । इसी प्रकार शताधिक शब्दो की कहानी है।' किन्तु कुछ शब्द सैकडो-हजारो वर्षों के बाद भी अपने मूल अर्थ को सुरक्षित रखते है। आगमो मे 'तुप्प' शब्द का अर्थ है-चुपडा हुआ, घी और स्निग्ध । कन्नड भापा मे आज भी 'तुप्प' घी का वाचक है तथा मराठी मे घी के लिए 'तूप' शब्द का प्रयोग होता है। इसी प्रकार चिकनाहट या तेल का वाचक 'चोप्पड' शब्द राजस्थानी एव हिन्दी मे आज भी प्रसिद्ध है। यद्यपि सभी शब्दो का भाषाशास्त्रीय अध्ययन करना सभव नही था कि अमुक शब्द किस भापा से आया है, किन्तु जहा भी हमे वर्तमान में प्रचलित अन्य भापा से सवधित शब्दो की जानकारी मिली वहा उन शब्दो के आगे कोष्ठक मे हमने उस भापा का उल्लेख किया है। नीचे कुछेक ऐसे शब्दो के उदाहरण हैं जो अय भाषाओ मे कुछ परिवतन से या मूल रूप में आज भी प्रयुक्त होते हैं- अक्का-वहिन (क नड) अच्चाइय-व्यथित (अच्चिग-व्यथा कानड) अज्जिा-दादी (अज्जी क नड, आजी मराठी) कण्ण-गोल (कण्णे- नड) गय्याल-जिद्दी (मूख-क नह) डग्गल-घर के ऊपर का भूमितल (डागला-राजस्थानी) पत्यारी-शैया विछौना (पत्यारी-गुजराती, पथरणा-राजस्थानी) भग्गओ-पीछे (मग मराठी) हडप्प-ताम्बूलपान (हडप-नाम्बूल रखने की छाटी थली-कन्नड) अनेक स्थलो पर तो स्वय यारयाकार भी देशविशेप की भापा या शब्द का उल्लेख करते है । जसे- अण्ण इति मरहट्ठाण आमतणवयण । अवसावण लाडाण कजिय भण्णई। महागष्ट्रमवोगिल्लमवाचालम । उण्ण त्ति लाडाण गड्डरा भण्ण ति । एआवती सव्वावती ति एतौ द्वौ अपि शब्दो मागधदेशीभाषा- प्रसिद्ध या एतावत लाहाण कच्छा सा मरहट्ठयाण भोयडा भण्णति । पेलुकरणादि लाटविपये रूतप्राणिका (पूणिका') महाराष्ट्रविषये सैव पेलुरित्युच्यते । किसी भी भाषा के विकास का महत्वपूर्ण सूत्र ग्रहणशीलता होता है । सस्कृत आदि भाषाओ के कोशग्रथ माय भापाओ के श दो को ग्रहण करके ही समृद्ध बने हैं । आप्टे, मोनियर विलियम्स आदि विद्वानो ने अपने सस्कृत कोशो म अनेक देशी शब्दो का सग्रहण किया है । आप्टे के सस्कृत-इग्लिा कोश मे बबरीक, चकर, चिखल, लडडू आदि शब्द सगहीत हैं । ये शब्द देशी कोशों म इस प्रकार है-बबरी, वक्कर, चिक्खिल्ल (चिवखल्ल), लडडग(लडहुय) आदि । अथ दोनो कोशो म समान है। यहां डा० शिवमूर्ति का यह मतव्य भी उल्लेखनीय है-'कोई भी साहित्यिक भापा लोक भाषा के स्तर से उठकर ही साहित्यिक भाषा बनती है। ऐमी स्थिति सस्कृत की भी रही है। पाणिनि जम वैयाकरणो ने इसका सस्कार दिया। इस प्रक्रिया मे कितनी ही देश्य शावलि सस्कृत हो उठी। अष्टाध्यायी ये उणादि प्रत्यय इसी तथ्य की ओर समेत करते हैं। पाणिनि के समय म भी शिक्षितो की भाषा से अलग हटकर कुछ भाषाए यी जिह - .
। अडना कडा वाढ । ३२ अधिकृत विद्वानो ने प्राकृत (अशिक्षितो की) भाषा कहा है । इस बात का समर्थन पतजलि और भरत भी करते है । पाणिनि के धातु पाठ मे कई धातुए ऐसी आई है जिनका प्रयोग उनके पूर्व की माहित्यिक भाषा मे नहीं मिलता। इनका विकास आश्चर्यजनक रूप से आधुनिक आर्यभापायो, विगेपतया हिंदी मे मिलता है। जैसे- मस्कृत हिंदी अडु कटु बाड जिमु जीमना, भोजन करना सस्कृत मे घोडे के लिए घोटक और नव-ये दो शब्द मिलते है । स्थिति के अनुसार प्रथम लोकभाषा से आया हुआ शव्द रहा होगा और द्वितीय गिक्षितो की भाषा का शब्द रहा होगा। शिक्षितो का अश्व शब्द आज हिंदी मे भी उमी वर्ग के लोगो का शब्द है, जबकि घोटक-घोडअ-घोटा आदि रूपो मे परिवर्तित होता हुआ सामान्यजनो द्वारा व्यवहृत होता है । इसी प्रकार कुत्ते के लिए कुक्कुर और श्वान, विल्ली के लिए विलाडी और मार्जारी गन्द व्यवहृत होते रहे है। वामन के मतानुसार 'जो देशी शब्द वहुत व्यापृत हो, उन्हे संस्कृत काव्यो में प्रयुक्त किया जा सकता है। यही कारण है कि संकटो शब्द संस्कृत कोशो एव देशी कोशो-दोनो में हैं। जैसे- अमरकोश अभिधानचिन्तामणि देशीनाममाला कोल्लि ११३५ अल्लि १७ ककेल्लि २०१२ गोस १३८ टी गोस २०६६ गोसर्ग १२४१३ गोसर्ग १३८ टी गोसग्ग २९६ जलनीली १२१०१३८ जलनीलिका ११६७ जलणीली ३२४२ डुलि १।१०।२४ दुलि १३५३ दुलि ५२४२ तम्पा, तवा १२६६ तवा ५१ तरस २।६।६३ तरस ६२२ तरस ५४ तुझी २।४।१३६ तुङ्गी १४३ टी तुगी ५।१४ दाक्षाय्य २।५।२१ दाक्षाय्य १३३५ दक्खज्ज ५/३४ प्रखर, प्रक्षर १२५१ पक्खरा ६१० प्रतिसीरा २।६।१२० प्रतिमीरा ६८० पडिसारी ६०२२ १. देशी नाममाला का भापा वैज्ञानिक अध्ययन, पृष्ठ १७०-१७४ । २ काव्यालंकार ५३१११३ । - । अभिधानचितामणि कोश की स्वोपज्ञवृत्ति मे कही-कही शब्दो के देशी और सस्कृत-दोनो होने का स्पष्ट निर्देश भी दिया गया है । यया- गोसो दे याम, सस्कतऽप्येके (१३८ टो)। तुङ्गी देश्याम, सस्कृतेऽपि (१४३ टी) । विस्कल्लो देश्याम, सस्कृतेऽपि (१०६० टो)। इसी प्रार दोहनपान के अथ म पारी शब्द का प्रयोग शिशुपालवघ (१२।४०) और देशीनाममाला (६।३७)-दोनो मे है । कृश अथ के वाचव' 'छात' गट की भी यही स्थिति है। इस शब्द के बारे मे हेमच द्राचाय ने स्वय प्रश्न उपस्थित कर उस पर पयाप्त विमश किया है । वे लिखते हैं- 'महाकवि माघ ने अपने मस्कृत महाकव्य शिशुपालवध में 'छात शब्द का प्रयोग कृश अथ में किया है। प्रश्न होता है फिर यह शत देशी कैसे ? मस्कृत में छोच' धातु अनकम या छेदन अय में प्रयुक्त है और लोक-व्यवहार में भी इसी अय में प्रचलित है। इस गातु म निप्पन 'छात शब् कृश अथ का वाचक नही वन मन्ना। यद्यपि धातुए अनेकायक होती हैं, किंतु उनका प्रयाग लाक व्यवहार या नाक प्रमिति पनिभर है। कृश अथ में 'छात' शब्द का प्रयोग माघकवि ने ही किया है। अन्यत्र छन्न अथ के अतिरिक्त मका द्मर अय में प्रयोग देखन में नहीं आया।' देशीनाममाला मे दुल्ल' शद वस्त्र के अथ में प्रयुक्त है । दुकूल पाठ भी वक्ष तथा वक्ष की छाल से निप्पन वस्त्र के अथ में दशी होना चाहिये। बाद में सस्कृत कोशो मे यह शब्द सूक्ष्म रेशमी वस्त्र के अथ में प्रयुक्त होने लगा हो-यह अधिक सभर लगता है। नालिर, ताम्बूल आदि शक्ट भी दशी हान चाहिये । वाद में य श मस्कृत माहित्य में स्वीकृत कर लिए गये। एसे अनेक देशी एव रुढ शन सस्कृत भाषा की सम्पत्ति बन चुके हैं जि हें आज दशी कहना करिन लगता है । दशी धातुए इम काश में जनक देशो धातुए परिगिप्ट २ (देशी धातु चयनिका) में तगहीन हैं । पाठक की सुविधा को दष्टि से हमने इन धातुआ को मूल देशी १ देशीनाममाला ३१३३ यति 'छाओ युभक्षित कृशश्च । ननु 'हातोदरी पुयदशा क्षणमुत्मयोऽभूत' (माघ सग ५ श्लोक २३) इत्यादौ 'छात' शब्दस्य शापस्य दशनात श्यमय देश्य ? नवम, ऐदनापस्यय 'पात' शरतस्य साधुत्यात । न च धात्वनेसायता उत्तरमत्र । अनेरायता हि धातूना लोकप्रसिदया। तो च 'छात' पदस्य पेदनाय मुक्त्या अस्थय पये प्रयोग नायेषाम-इत्यल बहुना।'
- शब्दो के माय न देकर इनका पृथक् संग्रहण किया है। उन धातुयो को दो भागो में विभक्त किया जा सकता है १. देशी धातुए। २ आदेश प्राप्त चातुए। प्रथम कोटि की धातुओ मे कहीं-कही व्यायाकारी ने यह देशी वत्रन है, यह देगी पट है-ऐमा स्पष्ट निर्देश किया है। जैमे- खलाहि देशीपदमपसरेत्यस्यार्थे । जूहंति त्ति देशीशब्दत्वाद् यानयन्ति । णिपणाइति देशोपदत्वादधोगच्छति । फुराविति ति देशीपदमेतद् अपहारयन्ति । रूसेह त्ति देगीवच नत्वाद् गवेषयत । वाडइत्ति देशीवचनमेतत नश्यतीत्यर्थः । विष्फालेड देशीवचनमेतत् पृच्छतीत्यर्थः । आदेश प्राप्त धातुओ को कुछ विद्वानो ने तद्भव के रूप में स्वीकार किया है । हेमचन्द्राचार्य ने पूर्वाचार्यों की देशी अवधारणा को उल्लिखित कर इन्हे धात्वादेश प्रकरण में ममाविष्ट किया है। वे लिखते हैं-~-एते चान्यदेशीपु पठिता अपि अस्माभिर्धात्वादेशीकृता' हमारे पूर्ववर्ती देणीकारो ने इन धातुमो को देशीधातुी के रूप मे मंगृहीत किया है, पर हमने इन्हे आदेश प्राप्त धातुओं के रूप में ग्रहण किया है। किंतु आचार्य हेमचन्द्र देशीनाममाला मे स्थान-स्थान पर सकेत करते है कि अमुक धातु हमने पात्वादेश मे बता दी है, इसलिए यहा उमका कथन नहीं किया है। जैमे-- मइच्छइ, अक्कुसइ-गच्छति । अवक्खइ-पश्यति । अप्पाहइ-संदिशति । बल्लत्या-उलिपति । एते धात्वादेशेषु शब्दानुशासने अस्माभिरक्ता इति नेहोपात्ता। (११३७ ) उम्फालइ-कथयति उद्घमाइ-पूर्यते इत्यादयो धात्वादेशेष्वस्माभिरक्ता इति नोच्यन्ते । (११११७ वृ) चुलुचुलइ~स्पन्दते इति धात्वादेशेषक्तमिति नोक्तम् । (३।१८ वृ) चोप्पडइ~म्रक्षति इति धात्वादेशेषुक्तमिति । (३११६ वृ) जूरड खिद्यते बुध्यति च इति धात्वादेशेपूक्तमिति नोक्तम् । (३१५२ वृ) टिविडिक्कइ भण्डयत्ति, टिरिटिल्लइ भ्राम्यति धात्वादेशेषूक्ताविति नोक्तो । (४१३ वृ) इन निर्देशो से यह सम्भावना की जा सकती है कि हेमशब्दानुशासन के १. प्राकृत व्याकरण ४२ टीका । ।
धात्वादेश प्रकरण मे इन घातुओ का आन्यान यदि पहले नहीं किया हाता तो वे अवश्य इह देशीनाममाला मे दशीरूप म स्वतत्र स्थान देते। और यह वास्तविक्ता भी है कि टिविडिक्क, टिरिटिल आदि सैक्दो शब्द ऐस हैं जिनकी समानता/तुल्यता का वहन करने वाले शब्द संस्कृत म उपलब्ध नहीं हैं। आगम-व्याच्या ग्रथो म आचाय हरिभद्र आचाय मलयगिरि आदि व्यान्याकारों ने कई स्याना पर आदेश प्राप्त धातुआ के देशी हाने का स्पष्ट निर्देश भी किया है। जसे-माहइ ति देशीवचनत क्थयति (जावहाटी १ पृ १६०) । 'साह धातु 'क्थ' धातु के आदेशरूप म प्राप्त है। कुछ अ य उदाहरण इस प्रकार हैं- जाअ (दृश्) जोएडत्ति देशीवचनमतद निम्पयति । झाम (गवेपय्) झामह त्ति देशीवचनत्वाद गवपयत । दुरुह (आ+रह ) आराहणे देशी। पवीह (लम्) फव्वीहामो ति देशीपत्त्याद लभामह । इसी आधार पर मन मभी आदेश प्राप्त धातुओ का दशी धातु के अन्तगत रखा है। यद्यपि अनेक आदश एम हैं जिनका मस्कृत म्प सभव है, वे देशी जस प्रतीत भी नहीं होते, जस- भ को 'सूह आदेश होता है । सूदन विनाश के अथ म सस्कृत म भी प्रमिद्ध है, रितु आदाप्राप्त होने स इसे दशी वे अन्तगत रखा है। इसी प्रकार 'दुमण' श दून् धातु का बादा- प्राप्त रूप है। दशी धातुओ के पृथर सग्रहण | मदम म आचाय हमाद्र का अभिमत विशेष मातव्य है । उनका मन्तव्य है पि दशी शामग्रह म धात्यादेश प्रकरण का मग्रह उचित नहीं है, क्योरि दशीमग्रह म उन्ही मनाया ग्रहण सचित है जिनका अय सिद्ध या प्रसिद्ध है, जा साध्यमान नहीं है। धात्यादती पा अय साध्य है, गिद्ध नही। दूमरी यात, त्यादि, तुम् तव्य आदि प्रत्ययो पी बहुलता ऐ कारण धातुओ के अनेष ए धनते हैं जिनका सग्रहण मम्भय नहीं है। शीनाममाला म अनेक पातुमूल मत का प्रयोग हुया है। पपा--- भाराग्गिय माहुश्यि, मारातिय, आगमि । 'परवाना' अथ का पर "पि' प्ररपय लगाने ग नामपातु यन मरता है। यपा--आरोग पनि आरोग्गः । नाहर परोति माहुरः । मारमानि पराति माहामा रयालि। १ प्राहत प्यारण, ४२ । २ देशीनाममाता, १७ पति नप पायादेगाना देगोषु सप्टो पुष्ट । गिदापारागनुपादपरारि देगा माध्यापपराग पापादेगा। सेप रसारि-तुमसम्यारिभरपपारा मण्डीतुमर या इति।
३६ - - करते ४ इस प्रकार इन नामो से धातु तथा धातु से भूतकृदन्त आदि क्रियावाचक शब्द बनाये जा सकते है। सर्वत्र त्रियावाची शब्दो मे यह नियम लागू किया जा सकता है। उदाहरण के लिए कुछ अन्य शब्दो को लिया जा सकता है। अविय (कथित), अट्ट (गत), अज्झत्य (आगत)-~-यद्यपि ये तीनो शब्द क्रियावाचक भूतकृदन्त के रूप मे हैं, तथापि त्यादि के रूप मे इनका प्रयोग ग्रन्यो मे उपलब्ध नही हुआ इसलिए धात्वादेश मे हेमचन्द्राचार्य ने इन्हे निवद्ध नहीं किया। अवरुडिय शब्द आलिंगन अर्थ मे देशी है। इसके मूल मे धातु है- अवरुड । अवरुडड, अवरुडिज्जड, अवरुडिऊण इत्यादि क्रियापदो का प्रयोग मिलने पर भी आचार्य हेमचन्द्र ने इसे धात्वादेश प्रकरण मे समाविष्ट नही किया, क्योकि उनके पूर्ववर्ती आचार्यों ने भी इसे धात्वादेश मे स्थान नही दिया। आचार्य हेमचन्द्र अपना तर्क प्रस्तुत हुए कहते है कि अज्झस्सइ, अज्झसिय इत्यादि प्रयोगो के आधार पर अज्भस्स शब्द को धात्वादेश मे ग्रहण करना चाहिए था। प्राचीन देशीमग्रहकारो का अनुसरण करते हुए हमने इसे धात्वादेश मे न लेकर अज्भस्म (आक्रुष्ट) शब्द के रूप मे देगीसग्रह मे सगृहीत किया है। इन शब्दो एव धातुओ को आधार मानकर इस कोश मे हमने कुछ ऐसी धातुओ का ग्रहण किया है जो अन्य शब्दकोशो मे नही है । जैसे- आलक-लगडा करना, पगु करना । आसगल-आकात करना, प्राप्त करना। आसर--सम्मुख आना । इंघ - मूघना। इग्ध-तिरस्कृत करना। इल्ल~आसिक्त करना, मीचना। इन धातुओ का निर्माण सग्रहण सर्वथा मनगढत या निराधार नही है। हेमचन्द्राचार्य के निम्नाकित सदर्भो को इनकी आधारशिना कहा जा सकता है । 'उग्गहिय' शब्द का अर्थ है रचित, जो ‘रचि' धात्वादेश से ही सिद्ध है । अर्थात् रच् धातु को 'उग्गह' आदेश हुआ है। उस उग्गह धातु से ही 'उग्गहिय' शब्द रचित अर्थ में निष्पन्न हुआ है। १. देशो नाममाला, २६६ वृत्ति । २. वही, १११० वृत्ति। ३ वही, ११११ वृत्ति । ४ वही, ११३ वृत्ति। ५. प्राकृत व्याकरण, ४१६४; देशीनाममाला, १११०४ वृत्ति । - रम् धातु को उम्भाव यादश होता है। इसी उन्माव स निप्पल हुआ है---उन्भाविय (सुरत, रतिक्रीडा)। इसी प्रकार ऊमलिय, जमुभिय (उल्लसित) श० उल्लस् धात्वादेश द्वारा सिद्ध है । पच्चुधार और पञ्चोवणी -ये दोनो क्रियाशल है। पच्चुरिअ और पच्चोवणिज इही प्रियागनगे से निप्पन हुए हैं। कुछ धातुमूल पाटन एव धातुए स्वरूप की दष्टि मे तदभव प्रतीत होती हैं, पर अय की दृष्टि से पूर्णतया देशी हैं । जम--- आसग्मि का अर्थ है-सम्मुग आया हुआ न पि आयित । आलक्यि का अय है-लगडा, न नि अलवत । गुज का अथ है-हसना, न कि गूजना । हण का अर्थ है-सुनना, 7 वि हिंसा करना । प्रस्तुत कोश के सकलन की प्रक्रिया अनव स्थला पर आगमता आगमतर ग्रथो मे पाग्यापारान यह 'ती है एगा निर्देश दिया है। यह निर्देग विभिन म्पा में मिलता पहरो ति देशोशनोऽप समूहयाची । पादाभरण लोगे पागहा इति प्रसिद्धा । पप्पटठ समयपरिभाषया गातर उच्यते । उत्तूइओ ति देशीपदमेतद गयें यतत । इगमपि देशीपद पयापि प्रदेशायें यतते । गोरपारम्मि देशपुपरया अपारे । अचियत्त दगीयचन अप्रोत्पामिधायरम । उपित्यगावस्त्रम्तप्यालयाची देशीति पयचित । पोल देगीगावात पोटरम। सोरमापायां ययाती इति प्रगिटा। पिघाम ति देशापचनत तिमिरपुष्पन । घोर दगीमापमा भामुम्पन । जगारीगादेशममममाया रायन । मारो गाय पापपूरण । गनिमीपपनाद शायमानामि। पगाय सम्पाय । पायो । Pारप... MHARI. afri २मारा सरल।
निहुयं ति आर्षत्वाद् निह नुतम् । प्राकृते पुष्परजः शब्दस्य तिगिछ इति निपातः देशीशन्दो वा । तुंडियं थिग्गलं देसीभासाए सामयिगी वा एस पडिभासा । दिगिछ त्ति देशीवचनेन बुभुक्षोच्यते । दुवग्ग त्ति देशीवचनत्वाद् द्वावपि । अमाघातो रूढिशब्दत्वाद् अमारिरित्यर्थः । मरहट्ठविसयभासाए वा इत्थी माउग्गामो भण्णति । सहणं ति देसीभासा सहेत्यर्थ । वाउप्पइय त्ति वातोत्पतिका रूढ्यावसेया। वालग्गपोइयातो त्ति देशीपदं वलभीवाचकम् अन्ये त्वाकाशतडागमध्य- स्थितं क्षुल्लकप्रासादमेव वालग्गपोइया य त्ति देशीपदाभिधेयमाहुः । संघाडिय त्ति देशीपदमव्युत्पन्नमेव मित्राभिधायि । वियडिशन्देन लोके अटवी उच्यते । विसालिसेहि ति मागधदेशीयभाषया विसदृशैः। संगेल्ली समुदायः देश्योऽयं शब्दः। सासेरा देशीपदत्वाद् यंत्रमयी नर्तकी । साहिशन्दो राजमार्गे देशी । सुत्तं मदिराखोलः देशविशेषप्रसिद्धो वा कश्चिद् द्रव्यः । सुरुची रूढिगम्या आभरणविशेषः इति केचित् । हुरत्या नाम देसीभासातो बहिद्धा । होले त्ति निठुरमामंतणं देसीए भविलवचनमिव । होला इति देशीभाषातः समवया आमन्त्र्यते । प्रारम्भ मे हमने प्राय उन्ही शब्दो का सकलन किया जहा देशी आदि का उल्लेख था, किन्तु जब आचार्य हेमचद्र की देशीनाममाला का पारायण किया तब अनेक दृष्टियां स्पप्ट हुईं। इसलिए सभी आगम एव व्याख्याग्रथो का पुन अवलोकन किया। इससे हजारो शब्द इस कोश मे और जुड गए । यहां कुछ ऐसे उदाहरण प्रस्तुत है जहा हमने देशीनाममाला को आदर्श मानकर शब्दो का चयन किया है- यद्यपि कोश मे नञ् समास वाले शब्दो का संग्रहण प्राय नहीं किया जाता, किन्तु देशीनाममाला मे कुछ ऐसे शब्द भी मिलते है। जैसे- अणच्छिमार (अच्छिन्न), अभिखिय (अनिंदनीय) । इस आधार पर हमने भी ऐसे गन्दो का मकलन किया है। जैसे-अतितिण, अचोक्ख, अच्छिश्क, अजहर आदि। आचार्य हेमचद्र ने ऐसे अनेक शब्दो को देशी माना है जिनकी संस्कृत छाया सभव है, किन्तु सस्कृत मे वे प्रसिद्ध नही हैं । जैसे- ३६ - अक (अ) निक्ट। अक्सलिय (अस्खलित) आकुल-व्याकुल । अदसण (अदान) चोर। यमप (अमृत) चाद। इसी आधार पर प्रस्तुत कोश में भी अनेक शब्दो का समावेश किया गया है। जैसे- अच्चिय (अचित) मूल्यवान । अवतस (अवतस) पुरुपव्याधि नामक रोग। आयस (आदा) घाडे का आभूषण । तरमल्लिहायण (तरोमल्लिहायन) युवा । पइरिक्क (प्रतिरिक्त) एवात । देशीनाममाला मे इरल और इर प्रत्यय वाले कुछ शब्दो का सग्रहण है । जैस-अविर (आम), सच्चिल्लय (सत्य), तत्तिल्ल (तत्पर), लोहिल्ल (लोभी), पच्चिर (रमणशील) । इसी आधार पर दिट्ठिल्लिय, गतिल्लिय आदि शब्दो को हमने भी देशी यी पोटि म रखा है। आचार्य मलयगिरि ने पटमेल्लुग शट के लिए देशी का निर्देश दिया है। इसलिए समय लगता है कि किमी क्षेत्र विशेष म इल्लादि प्रधान श वा व्यवहार अघिय प्रचलित रहा हो, उमी के आधार पर इमे देशी माना हो । 'इर', 'इरल' प्रत्यय स सम्बधित हजारों शब बागम एव ध्याश्याग्रथो मे मिलते हैं। बिन्तु विना समावेश इमम नहीं हो मना है । प्राया गली से गिन शा या रूप परिवर्तित हो गया है, वसे अनेक शब्द दगीनाममाला म सगहीत हैं। हमने भी पुछ गत इस मम्मिलित किए हैं जमे-आविय', तिगिछ' आदि । दशीनाममाना म राजा तया गाव पि ये नाम भी देशी रूपम लिए गए हैं। राजा मातवाह्न पे लिए तीन गल आए हैं-~युतल, चउरचिप और हाल तया गुजरात के एप गाय 'मोर' के लिए भयाग्गाम' पर प्रयुक्त हुआ है। इसी आधार पर हमने भी पुछ व्यक्तिया देगों तथा नगरी नामा को दी ये अनगत लिया है। जमगोबर, पुरस, पोराम तुरपर आदि। पापाप हमचट नै मापावाची गाणे यो पीदमी अनर्गत समाविष्ट १ आपरयर, मलयगिरि दौरा पत्र ११६ प्रथमा एव प्रपमेल्नुपा देशी- परमेतत । २ भापपिप ति प्रातराया हरिमरवाच गुरो समागारागहीतम । ३ प्राा पुपरजगारय तिगिर इति नियत देगीगोपा। म ४० । । - किया है। जैसे—पचावण्ण, पणवण्ण (पचपन) आदि । इसी आधार पर हमने भी पण, चालीस, पणयाल, अडयाल, पणपण्ण आदि सख्यावाची शब्द लिए है । सख्यावाची शब्दो के अतर्गत अडड, अडडग, हुहुय, हुहुयग, अवव, अववग आदि शब्द भी महत्त्वपूर्ण है । ये शब्द संस्कृत कोशो मे तो अप्राप्त है ही, अन्य परम्पराओ मे भी नही मिलते । ये जैन गणित के विशेप पारिभाषिक शब्द है । अत इन्हे देशीशब्दो के रूप मे स्वीकृत किया है। सामान्य कोशो मे क्त्वा प्रत्ययात शब्द नही मिलते । किन्तु हमने मूल- रूप में प्रत्यय के साथ ही उन शब्दो का इस कोश मे समावेश किया है। जैसे-अगोहलेऊण, अप्पाहटु आदि । ऐसे शब्दो को लेने का कारण यह कि कही-कही मूल शब्द का प्रयोग आगमो मे नही मिलने से इन शब्दो द्वारा उन अर्थो का ज्ञान हो जाता है। अनुकरणवाची शब्दो के विषय मे विद्वानो मे मतभेद है । कुछ इन्हे देशी मानते है तथा कुछ इन्हे देशी रूप में स्वीकार नहीं करते । किन्तु हमने इस कोश मे अनेक अनुकरणवाची शब्दो को देशी रूप में स्वीकार किया है। जैसे-घणघणाइय, चवचव, छडछडा, छु, छुक्कारण, थिविथिविंत, दुहदुहग। वाक्यालकार के रूप में प्रयुक्त अव्यय भी देशी शब्दो के अतर्गत समा- विष्ट है । क्योकि कही-कही टीकाकारो ने भी इन्हे देशी रूप मे स्वीकार किया है,। जैसे-'आइ ति देशीभाषाया', 'खाइण' ति देशीभापया वाक्यालकारे । प्राकृत के पादपूरक अव्ययो को भी देशी के रूप मे स्वीकार किया है । जैसे - जे, मो, र, से, अदुत्तर, बले। इनके देशी होने के कुछ प्रमाण इस प्रकार है- १ से शब्द मागघदेशीप्रसिद्धो निपातस्तच्छब्दार्थः । २ ऊति णाम मरहट्ठादिसु णादि दुगु छिज्जति । ३ णगारो देसिवयणेण पायपूरणे । ४. वाणमिति पूरणार्थो निपात । यद्यपि 'क' प्रत्यय स्वार्थ मे होता है किन्तु इस कोश मे मूलशब्द के साथ जहा भी स्वार्थ का द्योतक क, अ, य, ग और त आदि जुड गए है उन्हे अर्थ भिन्न न होने पर भी पृथक् रूप से ग्रहण किया है । जैसे- अछण, अछणय विस्तार । कडच्छु, कडच्छुत, कडच्छ्य-चम्मच । इन्हे स्वतत्र रूप से ग्रहण करने के दो कारण है--- १ इन शब्दो का ग्रथो मे ऐसा प्रयोग मिलता है। अत पाठक की सुविधा की दृष्टि से उनको अलग-अलग ग्रहण किया है। यदि साहित्य में 'कुड' शब्द की अपेक्षा 'कुडग' का प्रयोग है तो पाठक 'कुडग' शब्द ही देखना चाहेगा। आचार्य हेमचद्र ने देशीनाममाला मे कही-कही ऐसे शब्दो का निर्देश भी किया है। जैसे- -- । ong उवकयय कप्रत्ययाभावे उवक्य सज्जितम् (१।११६ वृत्ति)। जच्छदओ स्वच्छ द कप्रत्ययाभावे जच्छदो (३३४३ वृत्ति)। इसी प्रकार कही-कही दीघ-हस्व मात्रा के अतर वाले, अ/आ/5/3/ग/ घ/ह के अतर वाले तथा व्यञ्जन-द्वित्त्व वाले शब्द समानार्थक होने पर भी पृथक् रुप से ग्रहण किए गए हैं। जैसे- चुडलय, चुडलि, चुडलिय, चुडली, चुडल्लि, चुडिलीय-जलती हुई लकड़ी। गुम्मी, गुम्ही, गोमी, गोम्मी, गोम्ही कनखजूरा। उयरिणिया, करणिया, करणीया-जतु विशेष । भिलुगा, भिलुघा, भिलुहा- भूमि की रेखा । २ इहें भिन ग्रहण करने का दूसरा कारण-कभी-भी शब्द में अ/ आ/क/य/ग आदि जुडने से अथ में बहुत भिनता आ जाती है । जैसे- ० अवल्ल-बल । अवल्लय-नौका खेने का एक उपकरण । ० उद्धच्छवि विपरीत । उद्धन्छविम-सज्जित । • उड-१ मुख, २ कडा । उडम-पाव में पिंड रूप में लगे उतना गहरा कीचड । उडग--स्थण्डिल । ० पयल-नीड । पयला-निद्रा । पयला सप । पयल्ल प्रसृत । ० पडिसारिअ-~स्मृत । पडिसारी-यवनिका । इस कोश के मूलभाग में आदि नकार वाले शब्दो को नही रखा गया है। आगमो में जहा कही आदि नकार वाले शब्द प्राप्त हुए उनके स्थान में 'ण' कर दिया गया है। क्योकि देशी शब्दो की आदि में नकार का सर्वथा अभाव है। हेमचद्राचाय के मतानुसार देश्य प्राकृत में आदि नकार असभव ही है। प्राकृत व्याकरण में 'वा आदो सूत्र के द्वारा जो वैकल्पिक आदि ण का विधान किया गया है, वह तो मात्र सस्कृत शब्दो से निप्पन्न प्राकृत शब्दो की अपेक्षा से है।" सामा यत सस्कृत या प्राकृत में उपसग जुडने पर अथ परिवर्तित हो जाता है। हेमचद्राचाय के अभिमत में देशी शब्द का उपसग ये साय कोई स्वतत्र सम्बध नहीं है । जैसे-उच्छिल-छिद्र (दै १/६५)। छिल्ल-छिद्र (दै ३/३५)। यहा उत्पूवक छिल्ल शल नहीं है, लेकिन छिल्ल और १ देशीनाममाला, ५१६३ यति नकार आदयस्तु देश्याम असम्भयिन एवेति न निबद्धा । यच्च या आदौ' (मा १२२२६) इति सूप्रितम अस्माभि तत सस्कृतमयमाटतसादापेपपा न देशी अपेक्षया इति सयमवदातम ।
४२ , रूप मे उच्छिल्ल-दोनो स्वतत्र शब्द है। दोनो का अर्थ एक ही है-छिद्र । इसी प्रकार फेस-उप्फेस, उज्झिखिय-झिखिय आदि शब्दो की स्थिति है।' साहित्य मे हमे जो शब्द जिस रूप में प्रयुक्त मिला उसका संकलन हमने उसी रूप मे किया है। जैसे-बौद्ध भिक्षु के लिए तच्चण्णिय पाठ प्रसिद्ध है, किंतु कही-कही ग्रथो मे तव्वण्णिय पाठ भी मिलता है । यहा बहुत अधिक सभावना है कि प्राचीन लिपि मे च और व की समानता में तच्चण्णिय के स्थान पर तव्वण्णिय शब्द पढ़ा गया हो। हमे दोनो रूप प्राप्त हुए है । अत. दोनो का सकलन कर दिया है। यह भी बहुत सभव है कि 'तबणिय' शब्द बौद्ध भिक्षु के अर्थ मे अनेक स्थानो पर प्रचलित रहा हो। आचार्य हेमचद्र ने 'च', 'व', 'ब' के व्यत्यय के अनेक शब्द देशीनाममाला मे सगृहीत किए है । जैसे - चालवास-बालवास, चिद्दविअ-विद्दविक्ष, चुक्क-बुक्क, चुक्कड-बोक्कड आदि। इसी प्रकार मगदतिया मालती के लिए प्रसिद्ध है किंतु मदगतिया पाठ भी मिलता है । सभव है लिपिकार द्वारा वर्ण-व्यत्यय हो गया हो या इमी यह प्रचलित रहा हो। कल्पसूत्र मे 'अवामसा' शब्द अमावस्या के अर्थ मे प्रयुक्त है । प्रथम दृष्टिपात मे लगता है कि यह 'अमावस' शब्द मे वर्णव्यत्यय होने से या लिपि- दोष होने के कारण 'अवामसा' रूप बन गया होगा। किंतु कल्पसूत्र की चूर्णि तथा टिप्पणक की सभी प्रतियो मे 'अवामसा' शब्द मिलने से लगता है कि उस समय अमावस के लिए अवामसा शब्द ही प्रचलित रहा होगा। मुनि 'पुण्यविजयजी ने इस पर पर्याप्त विमर्श किया है । 'उत्तुहिय' के स्थान पर उड्डुहिय शब्द भी कही-कही मिलता है जो कि हेमचद्राचार्य की दृष्टि मे लिपिभ्रम ही है। इसी प्रकार अइरिप-अइरिप्प, अंबसमी-अबमसी, उत्तम्पिअ-उत्तम्मिअ, झरक-झरंत इन शब्दो मे भी लिपिभ्रम की सभावना की जा सकती है । इस विषय मे आचार्य हेमचद्र अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए कहते है कि हो सकता है लिपिभ्रम न भी हो । १. देशीनाममाला, ११६५ वृत्ति : न हि देशीशब्दानामुपसर्गसम्बन्धो भवति । २ कल्पसूत्र टिप्पनक, पृष्ठ १६ : विश्वेष्वपि चूादशेषु टिप्पणकादशेषु च अवामंसा। इत्येव पाठो वरीवृत्यते इति सम्भाव्यते तत्कालीनभाषाविदा अमावसाऽर्थको अवामंसा- शब्दोऽपि सम्मत. इति नात्राशुद्धपाठाशका विधेयेति । ३. देशीनाममाला, १११०५ वृत्ति : उत्तुहियं तकारसंयोगस्थाने डकारसंयोगं केचित् पठन्ति । स च लिपिभ्रम एव इति।
दोनो रूपो मे ही शब्दों का प्रचलन रहा हो। इसम बहुश्रुत या सवज्ञ ही प्रमाण लिपिभ्रम के कारण कही-यही अथ का आमूलचूल परिवतन भी परिलक्षित होता है । 'पडीर' शब्द का अर्थ है-चोरणिवह अर्थात् चोरो का समूह । लिपिभ्रम के कारण क्मिी ने 'चोरणिवह' के स्थान पर 'बोरणिवह पढ लिया और इस सत्म म 'पडीर' का अय वरो (वदरी फल) का समूह हो गया। देशीनाममाला की वत्ति म आचाय हेमचद्र ने अय आचार्यों के अथ भेद, शब्भेद तथा उनके मतो का भी उल्लेख किया है। जसे- केचित प्रिपे कायरो इत्याहु । अलमलवसहो सप्ताक्षर नामेति गोपान । कसाइअ उत्क्षिप्तमिति धनपाल । जवुल मद्यभाजनमिति सातवाहन । टोल पिशाचमाहु सर्वे शलभ तु राहुलफ । खेआल नि सह, असहन इत्यये। पेढाल यतुलमिति द्रोण । पेंडारो महिपोपाल इति देवराज । हमने इन मववा ममावेश कोश के मूलभाग म किया है । कही-वही आचाय हेमचद्र ने पूर्वज देशी कोशकारी द्वारा माय या प्रयुक्त दशी शब्द सघटना के विषय म ऊहापोह दिया है। जमे- अच्छिपरल्ल, अच्छिहरिल्ल तथा अन्छिहरुल्ल -इन तीन शब्द प्रयोगो मे उन्होंने येवल रुल्ल' का अपने प्रथम स्थान दिया है। दोप दो के लिए 'बहुना प्रमाणम्' कहकर छोड दिया है। हमने ऐसे मभी शो या मरलन किया है। दशी शर विभिन्न प्रथो म भिन्न भिन्न प स प्रयुक्त हुए हैं। प्याम्यापारी ने किमी एव रूप यो मुख्य मानपर दूसरे रूपो को पाटभेद में उल्लिसिन दिया है। यत्र-तत्र हमने उन पाठभेदों में प्रयुक्त युधेर देशी स्पो पो टि और पाये उल्लेत ये माय इस योग म समाविष्ट किया है । जगे- उस्मृतग-उच्ट्रसग । टिल्लग-इल्लिग। फुग्गफुग्ग-फुग्गपुग्ग । ममामूप ममामूय । मुमर मुमल-रामल । कहीं-कही मूमा सो हमे जमा मिला वसा ही रहा है, रिन्तु काप्टर १शोनाममाला, ११३७ पति पौषिद भ्रमो भ्रमो वेति यहुदश्यान एवं प्रमाणम् । २ यही, ६८ वृत्ति।
४४ ? मे उसका सभावित शुद्ध रूप भी दे दिया है । जैसे- ओट्टिय (दोट्टिय, दौद्धिय ?) गोमाणसिया (गोमासणिया ?) तल्लकट्ट (तल्लवत्त ?) तूमणय (णूमणय ?) जो गन्द आगम एव आगमेतर ग्रथो तथा देशीनाममाला दोनो मे मिले है, उन शब्दो के दोनो प्रमाण-स्थलो का उल्लेख किया है । जैसे- अइराणी (अंवि पृ २२३; दे ११५८) अंगुट्ठी (उसुटी प ५४; दे ११६) अणह (जा १।१८।२४; दे १११३) इसी प्रकार अणुय, पक्खरा, पडिहत्य, पणवण्ण आदि आदि । अनेक स्थलो पर मूलपाठ मे प्रसग से शब्द का अर्थ भिन्न प्रतीत होता है तथा व्याख्याकार उसका भिन्न अर्थ करते है। ऐसी स्थिति मे हमने दोनो अर्थो का सप्रमाण उल्लेख किया है। जैसे--आडोलिया। टीकाकार ने इसका अर्थ रुद्ध किया है जबकि प्रमग से उसका अर्थ खिलौना होना चाहिए।' कन्नड हिन्दी कोश मे आदु-आडु शब्द खेलने के अर्थ मे गृहीत है । इसी प्रकार सपादको द्वारा किए गए अर्थो पर भी हमने विमर्श किया । निशीथचूणि का एक शब्द है अत्यभिल्ल । पादटिप्पण मे इसका अर्थ शस्त्र- विशेष किया गया है। शब्द के आधार पर यह अर्थ ठीक भी लगता है - अत्य अर्थात्-अस्त्र, भिल्ल अर्थात्-भाला। वहा जगली जानवरो के प्रसग मे यह शब्द आया है, अत. अत्यभिल्ल का अर्थ भालू होना चाहिए। जिस किसी शब्द के एकाधिक अर्थ हैं उनमे से हमारे द्वारा निरीक्षित ग्रथो मे प्राप्त अर्थो के प्रमाण प्रस्तुत किए गये हैं। शेष अर्थ हमने 'पाइयसमण्णवो' से बिना प्रमाण के ग्रहण किए है, क्योकि प्रमाण हमने उन्ही ग्रथो के प्रस्तुत किए है, जिनका हमने स्व्य निरीक्षण किया है। इस कोश में अनेक ऐसे शब्दो का भी सग्रहण है जो देशी हैं या नही, इस दृष्टि ने विमर्शणीय हो सकते है। किन्तु अन्यान्य विद्वानो तथा कोशकारो द्वारा वे देशी रूप में मान्य रहे हैं, अत हमने उनका उसी रूप मे सकलन किया है। इस सकलन का एकमात्र उद्देश्य है कि विभिन्न विद्वानो द्वारा देशील्प मे स्वीकृत सभी शब्दो की उपलब्धि एक ही ग्रन्थ मे हो जाए। १. ज्ञाताधर्मकथा, १११८१८ : अप्पेगइयाणं आडोलियाओ अवहरइ, अप्पेगइ- । टीका पत्र २४४ : आडोलियाओ-रुद्धाः । २. निशीयणि २, पृष्ठ ६३ : अदेसिको वा अडविपहेण गच्छति, तत्थ वि तरच्छ-वाघ-अत्यभिल्लादिभयं । याणं तिदुसए अवहरइ . प्रस्तुत कोश को विशेषता एक ही अथ के वाचक भिन्न शब्दो के सटभ में अयोशो की भाति 'देखो' का निर्देश न कर पाठक की सुविधा के लिए उम शक का अथ वहीं दे दिया गया है। वही रही शब् के अथ की विस्तृत जानकारी तथा तुलना की दृष्टि से दो चार स्थानो पर देखा' का निर्देश भी किया है। जमे- आणदवड-देखें वहपोति । उक्कोडमग- देखें खोडमग । कोशो में कही-वही एक शर का अथ देखने के लिए तीन-चार शब्द देखने पर भी अथ नहीं मिलता। पाइयमद्दमहण्णवो में अनेक स्थलो पर ऐमा हुवा है । जसे - पग्जुमवणा देखो पज्जुमणा । पज्जुमणा देसो पज्जोमवणा । पलोह्यि देखो पलोभिम । पलोभिभ देखो पलोभविअ । रम्ह देवो रफ । रफ देखो रप । अनेक स्थलो पर शब्दी के पाम-पाम आने से पुनरक्ति दोप-मा प्रतीत हो सकता है रितु सुविधा की दृष्टि से हमने सभी शो का अथ प्राय उनके सामने ही दे दिया है। जहा दो समस्त शत एक अथ ने याचक हैं वहा देशी गट को अलग से प्रदर्शित करने के लिए चिह्न लगा दिया है जमे-'कन्न'लइय', 'अट्टण' साला आदि। घम कोश में अनेक एम श है जो अर्थ की दष्टि मे बहुत ममृद्ध हैं । भिन्न भिन्न प्रसगो में उन शो के भिन्न भिन्न अर्थ मिलत हैं। जमे - अयो, पहिल्न, मह, वल्लर आदि। प्रस्तुन पोश में प्रयुक्त प्रथो में कुछ पय देशी शो की दृष्टि से अस्पन्त महत्त्वपूर्ण हैं। जस-अगविज्जा भगवती आवश्यक णि, कुवलय. माना, नीणि निशीयभाप्य एव चूणि व्यवहार भाप्य महत्वल्पमाप्य मादि-आदि। इनमें नवीन एव अप्रतित देशी शलो या प्रयोग हुआ है । जस-अवसज्ज, अवयु 'द घोप्प पागनि तह वियतामय आदि । इम काम वनम्पति, जीवजतु आपण गायपदाप मे मषित अनेस एमे गल है जो भिन्न भिन्न क्षेत्रो मरषित है। अनर म्यता पर स्वय पाग्यापार क्षेत्र पिया उन्लेप भी बरते हैं। जम- भूपग-पग ति भेदपाटप्रसिद्धस्तणविशेष । पिरामिया-गो रयिराए पनी। घर--मगधर घराक्ष दिगम्यम । दायिम प्रचरित एय स्याहा होन यासे पर दाय पी रोटि मे आते है। वर्षोपि नरा मृउम्प न मगन म मि और 7 प्रात मा मा भी आरोपमा ममाया मम पिया जा क्षेत्र दिगमे मपिता- पिम साप्त पाटग मासिपि ये सन ४६ - . साहित्य एव कोशो मे भी मिलते है, किन्तु ये शब्द क्षेत्र-विशेप मे प्रचलित भापाओ के है । बाद मे इनका सस्कृत साहित्य मे प्रयोग होने लगा। इसी प्रकार वारक/वारग शव्द सस्कृत मे घडे के लिए प्रसिद्ध है किन्तु यह शब्द मरुधर देश मे मगलघट के अर्थ मे प्रसिद्ध था-'वारकः मरदेशप्रसिद्धनाम्ना मांगल्यघटः।' पण्णवणा सूत्र मे अनेक जीव-जतुओ एव बनस्पतियो का नामोल्लेख हुआ है । उनकी पहचान को कठिन बताते हुए स्वय टीकाकार कहते है- देशतोऽवसेयाः। सम्प्रदायादवसेयः । लोकप्रतीतः। रूढिगम्यम् आदि । जहा हमे नाम के बारे मे निश्चित जानकारी मिली उसका नामोल्लेख किया है । अन्यथा वनस्पति-विशेप, लता-विशेप, पुष्प-विशेष का उल्लेख किया है। इसी प्रकार आभूषणो के बारे मे भी आभूपण-विशेष का उल्लेख किया है। इस कोश मे ऐसे अनेक देशी शब्द सकलित है जो प्राचीन भारत की सभ्यता एव सस्कृति पर प्रकाश डालते है । जैसे- आवाह, विवाह, आहेणग, पहेणग, गिरिजन, करडुयभत्त, मडगगिह, एमिणिआ, अण्णाण, आणदवड, वहूपोत्ति, भोयडा आदि आदि शब्द सामाजिक रीति-रिवाजो एव परम्पराओ के सवाहक है । अधिक्कमणक, अवयार, इदड्ढलय आदि शब्द उत्सवो तथा अइराणी, इदियाली, उत, उयणिसय, कोटल, विटल आदि शब्द विशेष अनुष्ठानो एव मत्रो के वाचक है । अप्पसत्यभ, आपुरायण, आमोसल, कडूसी, ककितजाण, गल्लोल आदि अनेक शब्द विविध गोत्रो के वाचक है । इसी प्रकार नानाप्रकार के शिल्पकर्म, पुस्तके, जातिया, सिक्के, यान- वाहन, शस्त्र, रोग, खेल, जाल, वाद्य, वेशभूषा, खानपान, घर के अवयव, घरेलु उपकरण, पारिवारिक सम्बध आदि के स सूचक सैकडो शब्द इस कोप मे सगृहीत है। अमोसली, कडजुम्म, उग्गह, अमुदग्ग, किट्टि, णिगोद, फड्डग, पउट्ट- परिहार आदि पारिभाषिक शब्द भी इसमे सगृहीत है। इस कोश मे अनेक एकार्थक देशी शब्दो का संकलन है। जैसे-छोटी तलाई के वाचक तीन शब्द है-~~खल्लर खिल्लूर छिल्लर शब्दा देश्या एकार्थका.। इसी प्रकार और भी उदाहरण द्रष्टव्य है- १ विदग्ध-छलिआ छइल्ल छप्पण्ण । २. मा. अल्ला अव्वा अम्मा । ३ दुष्टघोडा-तडीति वा गलीति वा मरालीति वा एगट्ठा । ४. पबद-पडियाणिया थिग्गलय छदतो य एगट्ठ । - ४७ कोश परम्परा में प्राय यह देखा जाता है कि पुल्लिग शब्द लेने के वाद उसी का स्त्रीलिंग शब्द स्वतत्ररूप म नहीं लिया जाता। किंतु हमने स्त्रीलिंग एव पुल्लिग दोनो प्रकार के शब्दो को सगृहीत किया है । जम- पिल्लक-पिल्लिका, सिंगर सिंगिका, कन्चटठ-कन्वट्ठी आदि आदि । इनको सगहीत करने का एक विशेष उद्देश्य यह भी था कि कही कही शब्द मे लिंग- परिवतन के साथ अथ-परिवतन भी हो जाता है । जैसे—हालाहल-स्वामी । हालाहला--ब्राह्मणी (कीट-विशेष) । ओवासण, उवासणा और उपासना- ये तीनो एकाथक हैं । इनका अथ है-- क्षुरकम । उपासना टीकाकारो द्वारा प्रयुक्त मस्कृतनिष्ठ शब्द है, किन्तु सस्कृत से अथ भिन होने के कारण यह देशी है। ऐसे अनेक संस्कृत- निष्ठ देशी शब्द इस कोश मे सगहीत हैं । जैसे - छेलापनक, परिपूर्णक आदि। कोश का वाह्य स्वरूप प्रस्तुत ग्रथ के मूल भाग मे लगभग दस हजार देशी शब्दो का सकलन है। प्राय शब्दा के साथ सदभ-स्थल भी निर्दिष्ट हैं जिससे पाठक उस अथ को भली भाति हृदयगम कर सके । जसे- १ अतोवगठा नाम उवस्सयस्स अम्मतर अगण । २ एरडइए माणे त्ति हडककायित श्वा । ३ पुब्बति निम्न क्षाममित्यथ । ४ रज्ज कागिणी भण्णति । जहा अथ की स्पष्टता के लिए सदम स्थल अपेक्षित या अत्यावश्यक नही समझे गय वहा केवल शब्द का अथ और प्रमाण मा उल्लेख मान दिया गया है। इम देशी शदकोश का उद्देश्य मागम एव उसके व्यारया-प्र थो के देशी शब्ा को सकलित करना था किन्तु कुवलयमाना, पाइयलच्छीनाममाता, प्राकृत व्याररण एव सतुवध के दशी शक भी मूल भाग में सवलित हैं । प्रस्तुत योश के माथ दो परिशिष्ट भी सलग्न हैं। प्रथम परिशिष्ट अवशिष्ट देशी शब्दो का है । इमम आगमेतर प्राकृत तथा अपभ्रश प्रथा के ३३८१ देशी शटो का ममावेश है । प्राय के मूनभाग में हमने मूत्र प्रयो का दो या तीन बार पारायण दिया तया अय-निधारण की दृष्टि से भी मूलग्रयो का अनेक वार अवलोकन किया। इम परिशिष्ट मे हमने मूलग्रथ को नहीं देखा, किन्तु उनवे मपादको ने जहा अन्त म देशी शो की सूची दी है, अथवा शल- सूची म जिन दो को दशीचिह्न स चिह्नित किया है, उन दो का इमम सरनन कर दिया है। पाइअमद्दमहष्णवो के साडा शट जा योग व मून भाग में नहीं आए उनको भी इनी ये अन्तगत रखा है। त्रिविक्रम के प्रावृन- ४८ - शब्दानुशासन के अन्त मे १६०० देशी शब्दो की सूची है। उनमे से कुछ गन्द हेमचन्द्र के देशी सग्रह मे आ चुके है। गेप सभी शब्द इम परिशिष्ट में समाविष्ट है । यह अथ हमे वहुत बाद में प्राप्त हुमा अत. हम उनके शब्दो को ग्रन्थ के मूल भाग मे समाविष्ट नही कर सके । समीक्षात्मक एव आलोचनात्मक ग्रन्यो मे भी यदि कहीं देगी गब्दो की सूची मिली है, उन शब्दो को भी हमने इस परिशिष्ट मे मम्मिलित किया है। जैसे--- 'हरिभद्र के प्राकृत कथा माहित्य का आलोचनात्मक परिशीलन" मे लेखक 'भाषा शैली और उद्देश्य'-- अध्याय के अन्तर्गत कुछ देशी शब्दो का मकेत करते है । वे कहते है- 'यहा कुछ देणी शब्दो की तालिका दी जाती है । यद्यपि इन गब्दो मे कुछ शब्दो को सस्कृत से व्युत्पन्न किया जा सकता है पर मूलत इन शब्दो को देशी कहा गया है।' ऐमा कह कर लेखक ने लगभग १६३ गब्दो का अर्थ सहित उल्लेख किया है, जिनमे कुछ शब्द देशीनाममाला के भी है । इस प्रकार जहा भी हमे देशी शब्द मिले, उनका विना सदर्भ एवं प्रमाण के अर्थ महित सकलन कर दिया है। इस परिगिप्ट में प्रयुक्त ग्रन्यो के नाम इस प्रकार हैं-- १. मुणिचन्द कहाणय, २ कसवहो, ३. बज्जालग्ग, ४. हरिभद्र के प्राकृत कथा साहित्य का आलोचनात्मक परिशीलन, ५ जवूमामिचरिउ, ६. पउमचरिय, ७, आख्यानकमणिकोग, ८ अपभ्रश काव्यधारा, ९ चउप्प- न्नमहापुरिमचग्यि, १० गउडवहो, ११ वड्ढमाणचरिउं, १२. सुदमणचरिउ, १३ रावणवह-महाकाग्यम्, १४ महापुराणम्, १५. णायकुमारचरिउ, १६ पउमचरिउ-भाग १ से ३, १७ पुह विचदचरिय, १८ करकडुचरिउ, १६ मयणपराजयचरिउ, २० जमहरचरिउ, २१ मिरिवालचरिउ, २२ प्राकृतशब्दानुगामन । इम परिगिप्ट में एकत्रित कुछेक देगीशब्द विमर्शणीय है । किन्तु हमने तत् तत् ग्रन्थ के विद्वान् सपादको के चिन्तन को मान्य कर उन शब्दो का यहा अविकल सकलन कर दिया है । अधिक से अधिक देशी शब्द एक ही ग्रन्य में प्राप्त हो, यह इस सक्लन का उद्देश्य है । प्रत्येक शब्द की ममीक्षा हमें अभिप्रेत नही रही । मुधी पाठक इस वात को ध्यान में रखें। दूसरा परिशिष्ट देगी धातुओ से सम्बन्धित है । इसमें १७४५ धातुएं हैं । हमने सन्दर्भ सहित तथा विना सन्दर्भ वाली- दोनो प्रकार की धातुओ को साथ में ही रखा है । इनमें प्राकृत व्याकरण की सभी आदेशप्राप्त धातुओ का समावेश है तथा आगम तथा आगमेतर साहित्य में अन्य विद्वानो द्वारा मान्य देशी धातुओ का भी सकलन है । जिस सस्कृत धातु को आदेश हुआ है उसे भी कोप्ठक में दिया गया है । यह परिशिष्ट छोटा होते हुए भी व्याकरण एवं धातुनान की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
४६ पचाग प्रणति विक्रम सवत २०४० । नाथद्वारा की ऐतिहासिक भूमि। मर्यादा महोत्सव की सम्पनता । एक गोष्ठी का आयोजन । इसका उद्देश्य था आगम के काय को गति देना। उसी समय आचाय श्री ने मुझे तथा कुछ साध्वियो को लाडनू भेजा। एक दिन प्रथागार में जब मैंने साध्वियो समणिया एव मुमुक्षु वहिना द्वारा किए गए आगम-काय के विविध पहलुओं को देखा तो चितन उभरा कि इस विमरे काय को समेटना आवश्यक है । उस समय तीन कोशो को सम्पन करने का निश्चय किया। एकाथक कोश और निरुक्तको तो उसी वप प्रकाश में आ गए। देशी शब्-कोश का काय चालू था । देशी शब्ा के चयन और अथ निर्धारण के लिए शताधिक ग्रयो का अवलोकन नावश्यक था । अया य बाधाओ के कारण काय में गति नहीं आ सकी । काय स्थगित कर दिया गया । वि० स० २०४३ के लाडनू चातुर्मास में फिर काय प्रारम्भ क्यिा, पर उमका नर तय नहीं रहा । वि० स० २०४५ का पूरा वप (२०४४ चय शुक्ला १ से २०४५ चैत्र शुक्ला १ तक) इम काय की फलश्रुति/ निष्पत्ति का वप रहा । इसमें काय की निरतरता और सधनता भी रही। साध्वी अशोकश्री तथा माध्वी विमलप्रना इम काय में प्रारम्भ से ही सलग्न रही हैं । कुछेक अनिवाय कारणा से इन दो वर्षों में इनकी सलग्नता व्यवहित रही, वितु इन टोगो की सपूर्ति कर दी माध्वी मिद्धप्रनाने । इहोंने जिस निष्ठा, उत्साह और आन दप्रवणता से काय क्यिा वह स्तुत्य है । शारीरिक अस्वास्थ्य के वावजूद भी इनका पूरा ममय इमी कार्य में नियोजित रहा । ये त मना होर कोश काय के प्रत्येक अवयव की सपूर्ति में सलग्न रही। इम काय से इहोंने अपनी उपादेयता को बरकरार रखा। विधि विधान के अनुमार आन जाने में इहे एक माध्वी का महयोग अपेक्षित था और वह अपेक्षा पूरी की माध्वी सूरजकुमारी ने । व प्रम नता से इनके माय आती और अपना पूरा समय आगम-स्वाध्याय में बिताती। इनकी अनुपस्थिति में पूर्ण उत्साह एव प्रसन्नता से सहयोग दिया अस्मी वर्षीया साध्वी मूवटाजी ने । माध्वी निर्वाणश्री ने भी प्रारम्भ में कुछेक प्रथा के दशी पर चयन में मह्याग दिया है। समणी कुसुमप्रना प्रारम्भ में ही देशी शब्-मक्लन में मलग्न रही हैं । इम बार लगभग ८-१० माह का अधिकारी ममय इम देगी शलपोश को सवारने में लगाया । कोश की ममायोजना में इनका महयोग बहुत मूल्यवान है । ममणी नियोजिका मधुरप्रभा ने समणी श्रुतप्रभा को इन माय नियोजित पर इनके पाय या सुगम बना डाला। समणी श्रुतप्रना ने अपने समय का पूरा उपयोग किया और पूर्ण प्रसन्नता और उत्माह से मह्याग दिया । इनर्व अनुपस्थिति में अयाय समणियो का नियोजन भी रहा और सभी ने क्तव्य ५० भावना से मयोग किया। मुमुक्षु वहिन निरजना, इदु, अमिता, मधु, आशा, जतन, गुलाव आदि- आदि ने देशीकोश के कार्डो की प्रतिलिपि करने तथा अन्यान्य कार्यों में पूर्ण महयोग दिया। यह सारा कोग कार्य के सहभागियो का स्मरणमात्र है। इन सबके महयोग का स्मरण आत्मतोष की अनुभूति कराता है । मैं श्रुत-परम्परा के सवाहक और सवर्धक प्राचीन आचार्यों तथा मुनिजनो के प्रति प्रणत हू, जिन्होने श्रुतपरम्परा को अविच्छिन्न रखने का मतत प्रयास किया है और उम अपने ज्ञानकणो से मीचा है, विकसित किया है । उन मवकी श्रुतोपासना की ही यह फलश्रुति है कि जैन साहित्य भडार उनके मारस्वत अवदान से भरा रहा है । उन्होने श्रुतमागर का जो मथन किया, वह अपूर्व है । उनकी ग्रन्यराशि से कुछेक ग्रन्यो का अवलोकन कर हमने इम कोग ग्रन्थ का निर्माण किया है । मैं सभी श्रुतसमृद्ध आचार्यों को श्रद्धामिक्त भाव से नमन करता हूँ। इसी श्रुतपरम्परा के वर्तमान सवाहक तथा त्रिविध स्थविर भूमिकाओ के धनी अक्षर पुरुप है--आचार्य तुलसी और युवाचार्य महाप्रज्ञ । तेरापथ धर्मसघ को इनका मारस्वत अवदान अपूर्व है। आगम-सम्पादन इनका शलाका-कार्य है और है साहित्यिक प्रसाद जो तन-मन का कायाकल्प करने में समर्थ है । उमी आगम-सम्पादन महाकार्य का यह कोशकार्य एक स्फुलिंग है। ऐसे स्फुलिंग अनेक है । आचार्य श्री ने उन स्फुलिंगो के सवाहक अनेक मुनियो, मावियो और समणियो को तैयार किया है और अपने इन सहस्रकरो से कार्य करवा रहे है । नए-नए आयामो का सर्जन, पोपण और सरक्षण इन्ही घटको पर नावृत है । दोनो युगपुरुपो के मार्गदर्शन ने इस बहु आयामी आगम कार्य को सुगम बनाया है और कार्य की मथरता मे भी नई निप्पत्तियो की सर्जना की है। मैं उनके इस शाग्वतिक अवदान को सहस्त्रशः नमन करता हू। तीन साचियो को इस कोश-कार्य मे नियोजित करने और उन्हे निरतर प्रोत्साहित करने मे साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभाजी का महान् योग रहा है । कोश के यात्रापथ की निविघ्न सपूर्ति मे उनकी मगलभावना बहुत ही कार्यकर रही है । मैं उनके इस भावना-योग के प्रति प्रणत हू । मैं उन सभी ग्रन्यकर्ताओ, व्याख्याकारो तथा कोशकारो के प्रति अपना आभार व्यक्त करता है, जिनके ग्रन्थो के अवलोकन से हमारा दुल्ह कार्य सुगम वना, दृष्टि परिमार्जित हुई और नए-नए उन्मेष आते रहे ! बनेकात गोधपीठ के डाइरेक्टर डॉ० नथमल टाटिया ने इस ग्रन्थ की भूमिका लिखकर हमें उत्साहित किया है । अभी-अभी एक मेजर आपरेशन - ।
से गुजरने के बावजूद भी उन्होंने समय निकाल कर भूमिका लिखी, यह उनका श्रुत-सेवा के प्रति बनी हुई श्रद्धा का ही परिणाम है। ध्रुत की उपासना उनका जीवनमत्र है । इसी मत्र ने उन्हें अतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर लाकर खडा किया है । मैं उनकी प्रेरणा का बहुत मूल्याकन करता है। मुनि प्रमोदकुमारजी मेरे सहयोगी हैं। वे अपने कतव्य-पालन के प्रति जागरूक हैं । उहांने मुझे अ यान्य कार्यों से मुक्त रखकर, निरतर इसी काय में सलग्न रहन का अवकाश दिया। उनका सहयोग भी स्मरणीय है । इसी प्रकार मुनि सुदशनजी, मुनि श्रीच दजी 'कमल', मुनि राजेन्द्र कुमारजी, मुनि प्रशातकुमारजी आदि का सहयोग भी स्मृति-पटल पर अकित है। उन सवको प्रणाम । अन्त में पचाग प्रणति उन सबको जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग मुझे मिला है/मिल रहा है । -~मुनि दुलहराज वि० स० २०४५, नूतन वप का पहला दिन चन शुक्ला १/२, ता० १६-३-८८ जन विश्व भारती, लाडनू (राजस्थान)
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प्रयुक्त ग्रन्थ सूची - अगविज्जा--(प्राकृत टेक्स्ट सोसायटी, बनारस, सन् १९५७) । अतकृद्दशा-(अगसुत्ताणि भाग ३, जन विश्व भारती, लाहनू, सन् १९७४) । अतकृद्दशा टीका-(भागमोदय समिति, बम्बई, सन १९२०)। अनुत्तरोपपातिकदशा-(अगसुत्ताणि भाग ३, जैन विश्व भारती, लाडनू, सन् १९७४)। अनुत्तरोपपातिकदशा टीका-(आगमोदय समिति, बम्बई, सन् १९२०) । अनुयोगद्वार-(नवसुत्ताणि (५), जन विश्व भारती, लाडनू, सन् १९८६) । अनुयोगद्वार चूणि-(श्री ऋषभदेव केशरीमल श्वेताम्बर सस्था, रतलाम, मन् १६२८)। अनुयोगद्वार मलधारीया टीका-(श्री केशरवाई नानमार, पाटण, सन् १९३६)। अनुयोगद्वार हारिभद्रीया टीका-(सेठ देवच द लालभाई जन पुस्तकोद्धार, बम्बई,मवत् १९७३)। अपभ्रश काव्यधारा-(सपादक डॉ प्रेमसुख जन, डा कृष्णकुमार शर्मा, सरस्वती पुस्तक भण्डार, अहमदावाद, सन् १९७४) । अभिधानचिंतामणि नाममाला- (श्री जनसाहित्यवधक सभा, अहमदावाद, वि स २०३२)। अमरकोश-(चोखम्बा सस्कृत सिरीज, वाराणसी, सन् १९६८) । अल्पपरिचित सन्कोश---(सपा आचाय मान सागर मूरि, देवच दलालमाई जन पुस्तयोद्धार, सूरत, प्रथम मसरण, १६७४) । अप्टाध्यायी-(पणिनि'ज ग्रेमटिव, १९७७, जाज ओल्म्म यरलेग, हिलशियम, यूयार)। आम्यानक-मणिकोश - (सपा मुनि पुण्यविजय प्रायन ग्रय परिषद, वाराणसी, सन् १९६२)। आपासंग (अगसुत्ताणि भाग १, जन विश्व भारती, लाडनू, मन् १९७०) । आपारोग पूणि-(श्री ऋपभदेव पेशरीमल व मस्या, रतनाम, गन् १९४१)।
५४ आचारागचूला- (अगसुत्ताणि भाग १, जैन विश्व भारती, नाडन, सन् १९७४)। आचाराग टीका-(मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, मन् १९७८) । आचाराग नियुक्ति- (मोतीलाल बनारमीदास, दिल्ली, सन् १९७८) । आवश्यक- (नवसुत्ताणि (५), जैन विश्व भारती, लाडनू, मन् १९८६) । आवश्यक चूणि १- (श्री ऋषभदेव केशरीमल श्वे मस्था, रतलाम, मन् १६२८)। आवश्यक चूणि २-- (श्री ऋपभदेव केशरीमल श्वे सम्था, रतलाम, मन् १९२६)। आवश्यक टिप्पणकम्--- (शाह नगीनभाई घेलाभाई जवेरी, बम्बई)। आवश्यक नियुक्ति-(भैरुलाल कन्हैयालाल कोठारी धार्मिक ट्रस्ट, बम्बई, सवत् २०३८)। आवश्यक नियुक्तिदीपिका-(श्री विजयदानसूरीश्वर जैनग्नथमाल, सूरत, मन् १६३६)। आवश्यक मलयगिरि टीका--(आगमोदय ममिति, बम्बई, मन् १९२८)। आवश्यक हारिभद्रीया टीका १ (भम्लाल कन्हैयालाल कोठारी धार्मिक ट्रस्ट, बम्बई, सवत् २०३८) । आवश्यक हारिभद्रीया टीका २-(भैरुलाल कन्हैयालाल कोठारी धार्मिक ट्रस्ट, वम्बई, सवत् २०३८) । इन्ट्रोडक्शन टु कम्पेरेटिव फिलोलोजी-(मम्पा पी डी गुणे) । इसिभामियाइ~(सुधर्मा ज्ञान मन्दिर, बम्बई, मन् १९६३, श्री महावीर जैन विद्यालय, बम्बई, प्रथम सस्करण, मन् १९८४) । (नवसुत्ताणि (५), जैन विश्व भारती, लाडनू, द्वितीय सस्करण, सन् १९८६) । उत्तराध्ययन चूर्णि--(देवचन्द लालभाई, जैन पुस्तकोद्धार, वम्बई, स १६६३)। उत्तराध्ययन नियुक्ति--(देवचन्द लालभाई जैन पुस्तकोद्धार, भाडागार सस्था, वम्बई, स १९७२, ७३) । उत्तराध्ययन शान्त्याचार्य टीका-(देवचन्द लालभाई जैन पुस्तकोद्धार, भाडागार सस्था, बम्बई, स १९७२) । उत्तराध्ययन सुखवोधा टीका - (पृप्पचन्द्र खेमचन्द्र, वलाद, वीर स. २४६७) । उपासकदशा-(अंगसुत्ताणि भाग ३, जैन विश्व भारती, लाडनू, सन् १९७४)। उत्तराध्ययन-- - ५५ पासकदशा टीका-(श्री हिदी जैनागम प्रकाशक सुमति कार्यालय, कोटा, सन् १९४६)। र्दू हिंदी शब्द कोश-(अजुमन तरक्की उर्दू (हिंद), नई दिल्ली, सन् १९५५) । गोपनियुक्ति-(मागमोदय समिति, वम्बई, सन् १९१६, देवच द लालभाई जन पुस्तकोदार, सूरत, स० १९८४) । आधनियुक्ति टीका- (भागमोदय समिति, बम्बई, सन १९१६, देवच द लालभाई जैन पुस्तकोदार, सूरत, स० १९८४) । मोपनियुक्तिमाप्य-(मागमोदय समिति, बम्बई, सन् १९१६ देवचन्द लालभाई, जन पुस्तकोद्धार, सूरत, सन १९८४) । ओब्जर्वेशस आन हेमच द्राज देशीनाममाला--(सम्पा पी एल वैद्य एनेल्म ऑफ भण्डारकर ओरिएण्टल रिसच इन्स्टीटयूट)। औपपातिक--(उवगसुत्ताणि (४) खण्ड १, जन विश्व भारती, लाडनू मन १९८७)। औपपातिक टीका-(पण्डित दयाविमलजी ग्रयमाला, द्वितीय सस्करण, स १९६४)। कमवहो- (सम्पा डॉ ए एन उपाध्याय, मोतीलाल बनारसीदास, द्वितीय सस्करण, १९६६)। क नह हिदी शब्कोश-(सम्पा डॉ एन एस दक्षिणामूर्ति हिदी माहित्य सम्मेलन, प्रयाग, प्रथम सस्करण, सन १९७१) । कानडीज वईज इन देशी लेक्मिर स-(सम्पा ए एन उपाध्ये, एनेल्स ऑफ भण्डारकर ओरिएण्टल रिसच इन्स्टीटयूट)। कम्परेटिव ग्रामर ऑफ गौडियन लेंग्वेजिज-(सम्मा हानले)। सम्परेटिव ग्रामर ऑफ मॉडन आयन लेंग्वेजिज-(सम्पा जान बीम्स)" करवडचरिउ-(ले मुनि वनकामर सम्पा डॉ हीरालाल जैन, भारतीय नानपीठ, सन १६६४) । कल्पसूत्र-(मम्पा मुनि पुण्यविजयजी, माराभाई मणिलाल नवाब, अहमदावाद, सन १९५२) । बुवलयमाला भाग १, २-(मम्पा आदिनाथ नेमिनाय उपाध्ये, भारतीय विद्या भवन, बम्बई, सन् १९५६)। नुवलयमालापहा या मास्कृतिक अध्ययन -(सम्पा डॉ प्रेमसुमन जैन, प्रारत जन शास्त्र एव अहिमा पाप-सस्थान, वगाली, सन् १९७५)।
५६ - - गउडवहो--(वम्बई सस्कृत सिरीज, स० १८८७) । गच्छाचारपइण्णय-(श्री महावीर जैन विद्यालय, बम्बई, प्रथम मम्करण, मन् १९८४) । चउप्पन्नमहापुरिसचरिय-(सम्पा. पण्डित अमृतलाल मोहनलाल भोजना, प्राकृत ग्रन्थ परिपद्, अहमदावाद, मन् १९६१) । च दावेज्झयपइण्णय-(श्री महावीर जैन विद्यालय, बम्बई, प्रथम नम्करण, मन् १९८४) । चन्द्रप्रज्ञप्ति-(उवगसुत्ताणि (४) खण्ड-२, जैन विश्व भारती, लाउन , मन् १९८८)। जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति-(उवगसुत्ताणि (४), खण्ड-२, जैन विश्व भाग्नी, लाडनू, मन् १९८८)। जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति टीका-(नगीन भाई घेलाभाई भवेरी, बम्बई, सन् १९२०) । जम्बूमामिचरिउ-(मम्पादक डॉ विमलप्रकाश जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, सन् १९४४)। जसहरचरिउ-(ले महाकवि पुप्पदन्त मम्पा डॉ हीरालाल जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, मन् १९७२) । जीतकल्प- (वबलचन्द्र केशवलाल मोदी, अहमदाबाद, स. १९९४) । जीतकल्पभाष्य-(बबलचन्द्र केशवलाल मोदी, अहमदावाद, स १६६४) । जीतकल्प विपमपद व्याख्या । जीवाजीवाभिगम-(उव गसुत्ताणि (४), खण्ड १, जैन विश्व भारती, लाडनू, सन् १९८७) । जीवाजीवाभिगम टीका-(देवचन्द लालभाई जैन पुस्तकोद्धार, म १६६५) । जाताधर्मकथा-- (अगसुत्ताणि भाग ३, जैन विश्व भारती, लाडनू , सन् १६७४) । ज्ञाताधर्मकथा टीका-(श्री सिद्धचक्र साहित्य प्रचारक समिति, सूरत, सन् १९५२)। डिंगलकोश-(सम्पादक डॉ नारायणसिंह भाटी, राजस्थान शोघ सस्थान, जोधपुर, द्वितीय सस्करण, मन् १९७८) । णायकुमारचरिउ- (ले पुष्पदन्त, सम्पा डॉ हीरालाल जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, सन् १९७२) । तदुलवेयालियपइण्णय-(श्री महावीर जैन विद्यालय, बम्बई, प्रथम सस्करण, सन् १९८४)। - तित्योगालीपइण्णय-(श्री महावीर जैन विद्यालय, वम्बई, प्रथम सस्करण, सन १९८४)। तुलमी मञ्जरी--(जैन विश्व भारती, लाडनू, सन् १९८३) । तुलमीशब्दमागर--(सम्पा हरगोविद)। दावकालिक--(जैन विश्व भारती, लाडन, द्वितीय सस्करण, सन् १९७४) । दशवकालिक अगस्त्यसिंहचूणि-(प्राकृत प्रय परिषद, वाराणसी, सन् १९७३)। दशवकालिक चूलिका-(जन विश्व भारती, लाडनू, द्वितीय मस्करण, मन १६७४)। दशवकालिक जिनदासचूणि---(श्री भूपभदेव केशरीमल श्वेताम्बर सस्था, रतलाम, सन १६३३)। दशवकालिक नियुक्ति-(प्राकृत नथ परिपद, वाराणसी, मन् १९७३) । दशवकालिक हारिभद्रीया टीका-~-(देवच द लालभाई जन पुस्तकोद्धार, सूरत)। दशाश्रुतस्य घ---(नवसुत्ताणि (५), जन विश्व भारती, लाडनू, मन् १९८६)। दशाश्र्तस्व घ चूणि-~-(श्री मणिविजयजीगणिनयमाला, भावनगर, स २०११)। दशाश्रुतस्क प नियुक्ति-(श्री मणिविजयजीगणिनयमाला, भावनगर, स २०११)। देशीनाममाला- (सपा० आर पिशेल, बोम्बे मस्कृत सिरीज १७, सस्कृत विभाग, दूसरा सस्करण, मन् १९३८)। देशीनाममाला का भाषा वनानिक अध्ययन--(मम्पा शिवमूर्ति शर्मा, देवनागर प्रकाशन, जयपुर)। देशीराब्सग्रह- (मपा० वेचरदास दोशी, श्री पावम गुजराती ममा, मुबई, प्रथम मस्करण, मन् १९४७) । नदी-(नवसुत्ताणि (५), जन विश्व भारती, लाडनू, मन् १९८६) । नदी चूणि-(प्राकृत टेरस्ट मोमायटी, बनारम, मन् १९६६) । नदी टिप्पणर--(प्राकृत टेक्स्ट मोमायटी, बनारम, मन् १९६६) । नदी टीका-(प्राकृत टेक्स्ट मोमायटी, यनारम, गन् १९६६) । -(भरतमुनि) । निग्यायलिया-(उपगमुत्ताणि (४), घण्ड २, जन विश्व मारती, लाउनू गन् १९८८)। नाटयशास्त्र- निरयावलिका टीका-~(आगमोदय ममिति, बम्बई) । निरुक्तम्---(यास्क)। निशीथ-~(नवसुत्ताणि (५), जैन विश्व भारती, लाटन, गन् १९८६) । निशीथचूणि भाग १-४- (सन्मति ज्ञानपीठ, दूसरा सस्करण, मन् १९८२) । निशीथभाष्य--(मन्मति ज्ञानपीठ, दूसरा सस्करण, मन् १९८२) । पउमचरिउ भाग १ से ३-(ले स्वयम्भूदेव, मम्पा टॉ. हरिवल्लभ चुन्नीलाल भायाणी, सिंघी जैन णास्त्र शिक्षापेठ, भारतीय विद्या भवन, बम्बई-७, वि स २००६, २०१७)। पउमचरिय- (मम्पा डॉ मन जेकोबी, मुनि पुण्यविजयजी, पाकृत अन्य परिपद्, अहमदाबाद, सन् १९६८) । पचकल्पमाप्य-(भागमोद्धारक ग्रन्यमाला, पारटी, वि म २०२८) । पचवस्तु-हस्तलिखित । पाइयलच्छीनाममाला--(सम्पा. वंचरदाम दोशी, श्री शादीलाल जैन, वम्बई-३, मन् १९६०)। पाइयसद्दमण्णवो-(पण्डित हरगोविन्ददाम सेठ, प्राकृत ग्रन्य परिपद्, वाराणसी, द्वितीय सस्करण, ईस्वी सन् १९६३) । पिण्डनियुक्ति- (देवचन्द लालभाई जैन पुस्तकोद्धार, वम्बई, मन् १९१८) । पिण्डनियुक्ति टीका-(देवचन्द लालभाई जैन पुस्तकोद्धार, बम्बई, सन् १९१८) । पिण्डनियुक्ति भाप्य- (देवचन्द लालभाई जैन पुस्तकोद्धार, वम्बई, सन् १९१८)। पुहइचन्दचरिय-~(ले. आचार्य शान्तिसूरि, सम्पा मुनिश्री रमणीक विजय, प्राकृत ग्रन्थ परिपद्, अहमदावाद, सन् १९७२) । प्रजापना-~(उवगसुत्ताणि (४) खण्ड-२, जैन विश्व भारती, लाडनू, सन् १९८८)। प्रज्ञापना टीका-(आगमोदय ममिति, बम्बई, सन् १९१८) । प्रवचनमारोद्धार--(देवचन्द लालभाई जैन पुस्तकोद्धार, द्वितीय सस्करण, स १९८१)। प्रवचनमारोद्धार टीका-(देवचन्द लालभाई जैन पुस्तकोद्धार, द्वितीय सस्करण, स १९८१)।
५६ प्रश्नव्याकरण-~(अगसुत्ताणि भाग ३, जन विश्व भारती, लाडनू, सन १९७४) । प्रश्नव्याकरण टीका-(भागमोदय ममिति, बबई, मन १९१६) । प्राकृतलक्षण--(चण्ड)। प्राकृत वडस विद प्राकृत टर्मीनेश स--(सम्पा पी एल वैद्य)। प्राकृत यावरण- (हेमच द्र, जैन दिवाकर दिव्यज्योति कार्यालय, ब्यावर, स २०१६)। प्राकृत शबानुशामन--(त्रिविक्रमदेव, मम्पा पी एन वैद्य, जन मस्कृति सरक्षक मघ, शोलापुर, मन १९५४) । प्राचीनकमनाथ टीका- (जन आत्मान र मभा भावनगर वि म १९७२) । वृहत्कल्प-(नवमुत्ताणि (५), जन विश्व मारती, लाडनू, मन १९८६) । बृहत्कल्प चूर्णि-(हस्तलिखित, लाडनू मडार) । बृहत्यल्प टीप:- (जैन आत्मान द ममा, भावनगर सन् १९३६) । वृहत्कल्प माप्य-(जन मास्मान द समा भावनगर, गन् १९३६) । भगवती--(अगसुत्ताणि भाग २ जन विश्व भारती, लाडनू, मन १९७४) । भगवती टीस पत्र १-३२७ --(आगमोदय ममिति, बम्बई, मन् १९१८) । भगवती टीका, पृष्ठ ६०१-१२०८--(ऋषभदेर केशरीमल श्वेताम्बर मस्था, रतलाम, द्वितीय सस्करण, मन् १६४०)। भत्तपरिणापरणय- (श्री महावीर जन विद्यालय, वम्बई, द्वितीय मम्बरण, मन् १९८४)। भक्मियत्तकहा तथा अपभ्रश स्था काव्य-(मम्पादक देवेद्रकुमार शास्त्री, भारतीय मानपीठ, दिल्ली, मन् १९७०)। भारतीय भाषाए-(मम्पा क्लागवद भाटिया, दिल्ली, मन् १९८१)। भाषा विमान योग-(हो भोगानाय तिवारी)। भयणपराजयपरिउ--(से हरिदेव, गम्पा में हीरालार जन, भारतीय पानपीट, पापी मन् १९६२) । मरणविभरिपाणप-(धी महाधीर जन विद्यालय यम्बई प्रपम मम्मरण, मन् १९८४). महापापपरामपाय- (श्री महावीर जन विद्यालय, यम्बई प्रपम मस्सरण, गन् १९८४)। .
६० महापुराण-(ले. महाकवि पुष्पदन्त, मम्पा परशुराम शर्मा, माणिकचन्द्र दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला ममिति) । महाभारत-(भण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना, मन् १९६१) । मुणिचन्द कहाणय-(सम्पा के आर चन्द्र, जय भारत प्रकाशन एण्ड कं., अहमदाबाद, द्वितीय सस्करण, मन् १९७७) । यशस्तिलकचम्पू का सास्कृतिक अध्ययन- (सम्पा गोकुलचन्द्र जैन, अमृतनर)। राजप्रश्नीय-(उवगसुत्ताणि (४) खण्ड १, जैन विश्व भारती, लाडनू, सन् १९८७) । राजप्रश्नीय टीका-(गूर्जर ग्रन्थरत्न कार्यालय, अहमदावाद, वि. म. १९६४) । राजस्थानी शब्दकोप--(सम्पा सीताराम, राजस्थानी शोघ सस्थान, जोधपुर, प्रथम सस्करण, स. २०१८) । रावणवहमहाकाव्य---(सम्पा. डॉ राधागोविन्द, सस्कृत कॉलेज, कलकत्ता, सन् १९५६) । लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया-(सम्पा. ग्रियर्सन) । वज्जालग्गम्--- (सम्पा माधव वासुदेव पटवर्धन, प्राकृत ग्रन्थ परिषद्, अहमदावाद, प्रथम सस्करण, मन् १६६६)। वड्ढमाणचरिउ~(मम्पादक डॉ. राजाराम जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, मन् १९७५)। वाग्भटालकार--(चौखम्बा विद्या भवन, वाराणसी, सन् १६५७) । वाचस्पत्यम् भाग ६-(सम्पादक तारानाथ, चौखम्बा सस्कृत सिरीज, वाराणसी, तृतीय सस्करण, स. २०२५) । विपाकश्रुत-(अगसुत्ताणि भाग ३, जैन विश्व भारती, लाडनू, सन् १९७४) । विपाकश्रुत टीका-(आगमोदय समिति, बम्बई, सन् १९२०) । विलसन्स फिलोलोजिकल लेक्चर्स- (सम्पा. श्री आर जी भडारकर) । विशेषावश्यकभाष्य-(दिव्य दर्शन कार्यालय, अहमदावाद, वीर स. २४८६) । विशेपावश्यकभाष्य कोट्याचार्य टीका-(ऋषभदेव ऋषभदेव केशरीमल, रतलाम, सन् १६३६) । विशेषावश्यकभाष्य मलधारीहेमचन्द्र टीका-(दिव्य दर्शन कार्यालय, अहमदाबाद, वीर स. २४८६) । व्यवहार--(नवसुत्ताणि (५), जैन विश्व भारती, लाडनू, सन् १९८६)। ध्यवहारभाप्य टीका-(वकील केशवलाल प्रेमचन्द, अहमदावाद, सन् १९२६) " समवायाग- शकल्पद्रुम भाग १ से ५--(सम्पा राधाकातदेव, चौखम्बा सस्कृत मिरीज, वाराणमी, तृतीय ससरण, वि स २०२४) । पानाय कौस्तुभ--(रामनारायणलाल अग्रवाल, प्रयाग)। सक्षिप्त हिन्दी शब्दसागर--(सम्पा रामचद्र, हिदी साहित्य मम्मेलन, प्रयाग, प्रथम सस्करण, मन् १९६६) । सथारगपइण्णय-(श्री महावीर जैन विद्यालय, बम्बई, प्रथम संस्करण, सन १९८४)। संस्कृत इग्लिश डिक्शनरी-(मम्पा वी एम आप्टे, प्रसाद प्रकाशन, पूना) । सस्कृत इग्लिश डिक्शनरी-(सम्पा मानियर विलियम्स)। संस्कृत प्राकृत जन व्याकरण और कोश की परम्परा-~-(श्री कालूगणी जम शताब्दी ममाराह ममिति, छापर, सन् १९७७)। .(अगसुत्ताणि भाग ३, जैन विश्व भारती, लाडनू, मन् १६७४) । समवायाग टीका--(कातिलाल चुन्नीलाल, अहमदाबाद, सन् १९३८) । सारावलीपइण्णय-(श्री महावीर जैन विद्यालय, बम्बई, प्रथम सस्मरण, सन् १९८४)। मिरिवालचरित-(ले नरसेन देव, मम्पा डा देवेद्रकुमार जन, भारतीय नानपीठ, वाराणसी, सन १९४४) । सुदसणचरिउ-(ले नयनदी, मम्मा हों हीरालाल जन, प्राकृत शोष-सस्थान, यशाली, सन् १९७०)। सूत्रकृनाग--(अगसुत्ताणि भाग १, जैन विश्व भारती, लाडनू, सन् १६७४) । सूत्रकृनाग चूणि (प्रपमश्रुतस्व घ)-(प्रायन टेक्स्ट मोमायटी, वाराणसी, सन् १९७५)। सूत्रकृताग चूणि (द्वितीय श्रुतस्य)-(ऋषभदेव केशरीमल श्वेतांबर संस्था, रतलाम, गन् १९४१)। सूननांग टीका १ (प्रथम तस्वध)--(भागमोन्य ममिति, बम्बई, मन् १९१६)। सूत्रकृतांग टीरा २ (दिनीय तस्य प)-(श्री गाडी पानाप प्रथमाता, गन् १९५३) । मूत्रानांग नियुक्ति ~(मोतीलाल यनारमौतम, दिन्नी, मन् १९७८) । पूरमागर-(गम्मा हरदेव याहरी, स्मृति प्रागन, इलाहाबाद, प्रथम ससरण, मन् १९८१)। सूर्यप्राप्ति-(उपगमुतागि (), बन पिर मारती, मारन, गन् १९८८) ।
दिल्ली,
सूर्यप्रज्ञप्ति टीका-(आगमोदय समिति, बम्बई, मन् १९१६) ।
सेतुबन्ध- (सम्पा. पण्डित शिवदत्त, भारतीय विद्या प्रकाशन,
सन् १९८२) ।
स्टडीज इन हेमचन्द्राज देशीनाममाला- (मम्पा हरिवल्लम मी भयाणी,
पी वी. रिसर्च इस्टीट्यूट, जैनाश्रम हिन्दी यूनिवर्सिटी,
वनारम)।
स्थानाग-(अगसुत्ताणि भाग १, जैन विश्व भारती, लाडनू, मन् १९७४) ।
स्थानाग टीका-(सेठ माणेकलाल चुनीलाल, महमदावाद, मन् १९३७) ।
हरिभद्र के प्राकृत कथा माहित्य का आलोचनात्मक परिशीलन-(मम्पा. डॉ.
नेमीचद शास्त्री, प्राकृत शोध संस्थान, वैशाली, मन्
१९६५)।
हिन्दीशब्दमागर ११ माग-(मम्पा श्यामसुन्दर, शम्भुनाथ बाजपेयी, नागरी
'मुद्रण, वाराणसी, प्रथम मस्करण, वि मं.
२०२२)।
हिन्दी शब्दानुशासन-(सम्पा किशोरीदास वाजपेयी) ।
.
सकेत सूची अत अतटी अवि अचि अनु अनुटी अनुद्वा अनुद्वाचू अनुद्वामटी अनुद्वाहाटी आ आचू आचूला आटी आनि आव आवचू१ आव २ आवटि आवदी आवनि आवमटी आवहाटी १ आवहाटी २ अतकृद्दशा अतकृद्दशा टीका अगविज्जा अभिधानचितामणि नाममाला अनुत्तरोपपातिकदशा अनुत्तरोपपातिकदशा टीका अनुयोगद्वार अनुयोगद्वार चूणि अनुयोगद्वार मलघारीयटीका अनुयोगद्वार हारिभद्रीयटीका आचाराग आचारागणि आचारागचूला आचाराग टीका आचाराग नियुक्ति आवश्यरसून आवश्यक चूणि १ आवश्यक चूणि २ आवश्यक टिप्पणकम आवश्यक नियुक्तिीपिवा आवश्यक नियुक्ति आवश्यर मलयगिरीटीका आवश्यक हारिभद्रीयटीका १ नावश्यक हारिभद्रीयटीका २ इसिभामियाइ उत्तराध्ययन उत्तराध्ययन चूणि उत्तराध्ययन नियुक्ति उपासना उ उचू उनि ६४ उपाटी उशाटी उसुटी ओटी ओनि ओभा औप औपटी कु ग च चन्द्र जवू जबूटी जीत जीभा जीव जीवटी जीविप ज्ञा ज्ञाटी तदु ति उपासकदशा टीका उत्तराव्ययन शान्त्याचार्यटीका उत्तराध्ययन सुखवोघा टीका ओघनियुक्ति टीका ओघनियुक्ति ओधनियुक्तिभाप्य औपपातिक औपपातिक टीका कुवलयमाला गच्छाचारपइण्णय चदावे उभयपदण्णय चन्द्रप्रज्ञप्ति जवूद्वीपप्रजाप्ति जवूद्वीपप्रज्ञप्नि टीका जीतकल्प जीतकल्पभाप्य जीवाजीवाभिगम जीवाजीवाभिगम टीका जीतकरप विपमपदव्याख्या ज्ञाताधर्मकथा जाताधर्मकथा टीका तदुलवेयालियपइण्णय तित्वोगालीपइण्णय दशवकालिक दशकालिक अगस्त्यसिंहचूणि दशवकालिकचूलिका दशवकालिक जिनदासचूणि दशवकालिक नियुक्ति दशाश्रुतस्कन्ध दशाश्रुतस्कन्ध चूणि दशाश्रुतस्कन्ध नियुक्ति दशवकालिक हारिभद्रीया टीका देशीशब्दसग्रह द दअचू दचूला दजिचू दनि दश्रु दश्रुचू दश्रुनि दहाटी दे नदीचू नदीटि देशीनाममाला, नदी चूणि नदी टिप्पणक --- ३,४ नदीटी नि निचू १, निभा निर निरटी पक पव पा पिटी पिनि पिभा प्र प्रना प्रज्ञाटी प्रटी प्रसा प्रसाटी नदी टीका निशीथ निशीथचूणि भाग १ से ४ निशीयभाष्य निरयावलिका निरयावलिका टीका पचकल्पभाष्य पचवस्तु पाइयलच्छीनाममाला पिण्डनियुक्ति टीका पिण्डनियुक्ति पिण्डनियुक्ति भाष्य प्रश्नव्याकरण प्रज्ञापना प्रज्ञापना टीका प्रश्नव्याकरण टीका प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार टीका प्राकृतव्याकरण प्राचीनकमग्र य टीका वृहत्कल्प वृहत्कल्प चूणि वृहत्कल्प टीका वृहत्कल्प भाप्य भगवती भगवती टीका भत्तपरिण्णापइग्णय मरणविभत्तिपइण्णय महापच्चरखाणपइण्णय राजप्रश्नीय राजप्रश्नीय टीका विपाश्रुत विपाकश्रुत टीका विशेपावश्यक भाप्य विशेषावश्यकभाप्य कोटयाचायटीका प्रा प्राक व वृचू वृटी वृभा भटी भत्त म महा राज राजटी विपा विपाटी विभा विभागोटी विभामहेटी वृ व्य व्यभाटी १-१० सं सम समटी सा सूचू-१ सूचू-२ सूटी-१ सूटी-२ सूनि सूर्य सूर्यटी से विगेपावश्यकभाष्य मलधारीहेमचन्द्रटीका देशीनाममालावृत्ति व्यवहार व्यवहारभाप्य टीका भाग १-१० सवारगपइण्णय समवायाग समवायाग टीका सारावलीपइण्णय सूत्रकृताग सूत्रकृतांग चूणि, प्रथमधृतस्कर सूत्रकृताग चूणि, द्वितीयध्रुतस्कर सूत्रकृताग टीका प्रथमश्रुतस्कन्ध सूत्रकृतांग टीका द्वितीयश्रुतस्कध सूत्रकृताग नियुक्ति सूर्यप्रज्ञप्ति मूर्यप्रज्ञप्ति टीका सेतुबन्ध स्थानाग स्थानाग टीका स्या स्याटी ..
अनुक्रम
-आचाय तुलसी
- युवाचाय महाप्रज्ञ
--डॉ. नथमल टाटिया
-मुनि दुलहराज
१ आशीवचन
२ पुरोवाक
३ भूमिका
४ सपादकीय
५ प्रयुक्त अथ सूची
६ सकेत सूची
७ देशी शब्दकोश
परिशिष्ट
१ अवशिष्ट देशी शब्द
२ देशी धातु-चयनिका
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देशी शब्दकोश
अअख-नि स्नेह, स्नेह रहित (दे १११३) ।
अइगय-१ माग का पश्चाद भाग । २ समागत । ३ प्रविष्ट (दै ११५७) ।
अइण-गिरि-तट, तराई, पहाड का निम्न भाग (दे १।१०)।
अइणिस-लाया हुआ (दे ११२४) ।
अइर-१ अतिरोहित (पिनि ५६०) । २ गाव का मुखिया, राज्य द्वारा
नियुक्त गाव का अधिकारी (दे १२१६) ।
अइरजुवइ-नववधू (दे ११४८) ।
अइराउल-स्वामीकुल-'देशीपदमेतत् (प्रज्ञाटी प २५३) ।
अइराणी-१ इद्राणी (अवि पृ २२३ दे ११५८) । २ सौभाग्य प्राप्त
करने के लिए इद्राणी का व्रत करने वाली स्त्री (दे ११५८) ।
अईरिप-कथावध, कहानी (दे १।२६) ।
अइरिका-देवी विरोप, इद्राणी (अवि पृ ६६) ।
अइहारा--विद्युत, विजली (दे १३३४) ।
अक-निकट (दे ११५)।
अककरेलुप-जलज-वनस्पति (आचूला १०११३) ।
अकार-सहायता मदद (द १०६)।
अकिम-आलिंगन (दे १२११) ।
अकिल-नतक (ज्ञाटी १४४) ।
अकिल्ल --नट (औपटी ४)।
अकुसइम-अकुश के आकार वाला (दे ११३८) ।
अकेल्ल -नट (निचू २१४६८) ।
अकेल्लण-चायुक विशेष (जबू ३३१०६) ।
अकेल्लि-अशा वृक्ष (दे ११७)।
अकोल्ल-१ अकोठ वक्ष (प्रपा ११३।१) ! २ गुच्छ-विशेष
(प्रता १२३४५) । ३ नतक (पाटी प ४६) ।
अगवडण-रोग (द १०४७)।
अगलिज्ज-शरीर या मोडना (दे ११४२) ।
देशी शब्दकोश २ अंगारइय-घुण कीट द्वारा खाया हुमा---'घुणकाणिय अगारइय वा वुत्तय होति' (निचू ४ पृ ६६) । अंगालिअ-ईख का टुकडा, गडेरी (दे ११२८) । अंगुजट्ठ-अगूठा (आचू पृ ३५२) । अंगुट्ठी-१ घूघट-'रगम्मि नच्चियाए, अलाहि अगुट्टिकरणेण' (उसुटी प ५४, दे ११६) । २ अगूठा (प्रसा २००)। अंगुत्थल-अगूठी (दे १।३१) । अंगुलिणी-प्रियगु, वृक्ष-विशेप (दे १।३२) । अंगोहली-१ देश-स्नान, शरीर को पोछना, हाथ-मुह आदि धोना (नदीटि पृ १३४)। अंगोहलेऊण-देश-स्नान कराकर-'अगोहलेऊण दारग पेसेइ' (व्यभा १० टी प ५२) । अंघोलि-देश-स्नान, शरीर को पोछना, हाथ-मुह आदि धोना (आवचू १ पृ ५४५)। अंचित-दुभिक्ष-'अचित नाम दुभिक्षम्' (आवटि प ५३) । अंचिय-१ नाट्य का एक प्रकार-'नट्ट चउन्विह-अचिय रिभिय मारभड भसोल ति' (निचू ४ पृ २) । २ दुभिक्ष (निचू २ पृ ११६)। अंछण-विस्तार, फैलाव (निचू २ पृ २२३) । अंछणय–विस्तार, फैलाव (निभा १५२६)। अंछणिका-रज्जु-विशेष (अवि पृ ११५) । अंछिय-आकृष्ट, खीचा हुआ (प्र ११२६, दे १११४) । अंजणइसिआ-तमाल का वृक्ष (दे ११३७) । अंजणई-वल्ली-विशेष (प्रज्ञा ११४०१५) । अंजणईस-तमाल का वृक्ष (दे ११३७) । अंजणिआ-तमाल का वृक्ष (दे ११३७) । अंजणी-१ आभूषण-विशेष (अवि पृ १८३) । २. भाड-विशेष (अवि पृ २६०)। अंजणेकसक-वनस्पति-विशेष (अवि पृ७०)। अंजस-ऋतु (दे १३१४) । अंडअ-मत्स्य (दे १११६) । अंतरिज्ज-कटीसूत्र, करधनी (दे ११३५) ।
रेशी शब्दकोश अतरिया-पमाप्ति, अत (जवू २) । अतालुहण-प्रिय-अतालूहणा मम एम पुत्तो' (कु पृ ४७) । अतोहरी-~दूती (दे ११३५) । अतेल्ली-१ मध्य । २ जठर, पेट । ३ तरग (द ११५५) । अतोखरियत्ता-१ नगर मे रहन वाली वेश्या । २ विशिष्ट-वेश्या (भ १५।१८६)- जताखरियताए ति नगराभ्यन्तर- वेश्यात्वेन' विशिष्टश्यात्वेन याये (टी पृ १२७६) । अतोवगडा-धर का आगन (ब २।१)- अतोवगडा नाम उवस्मयस्स अभतर अगण' (चू प १४१)। अतोहुत-अधोमुख (दे १।२१) । अधधु-रूप, कुआ (दे १११८) । अधक-फल विरोप वृक्ष विशेष (जवि पृ २३८)। अधग-वक्ष (भ १८६५)। अधगवहि--स्थूल अग्नि (भ १८६५) । अधार- अ धकार (पव २५७)। अधारइअ-अधापन (आचू पृ ३७२) । अधिया-चतुरिद्रिय जतु विशेष (भ १५१८) । अबकधूवि -खाद्यपदाथ विशेष (अवि पृ ७१)। अबकूणग -आम्रफल (भटी पृ १२५७) । अबकोइलिया-१ आम्रविष्ठा । २ आम की छाल के टुकडे (दअचू पृ. २३)। अबखुज्ज-तलवे का मध्य भाग- यदान कुब्ज पादतलमध्यम' (बटी पृ १०६२)। अबटिक-भोज्य विशेष- अबढिकघतउण्हे पोवलिका (अवि पृ २४६)। अबड-कठिन (दे १११६) । अवपिडी-भोज्य विशेष (अवि पृ ७१)। अबप्पहार-प्रहार से दुखी (उशाटी प १९३)। अबमसी-गूदा हुआ वासी गीला आटा- अवसमीत्यत्र सकारमकारयोव्यत्यये अब मसोति केचित पति (दे ११३७ व)। अवर र--मत्स्य का मद- अम्वरश देनान मत्स्यमदोऽभिधीयते स हि किलात्यात सुग धो भवति (आवटि प ६५) ।
देणी शब्दकोश । अंवसमी-गूदा हुआ वासी गीला आटा (दे ११३७) । अंवाडग-बहुवीज वाला आम्रातक फल (प्रज्ञा ११३६) । अंबाडगधूवि-खाद्यपदार्थ-विगेप (अवि पृ ७१) । अंबाडिय-तिरस्कृत (बृटी पृ ५४) । अंविर-आम्र (दे १११५) । अंविलिका-इमली (अवि पृ ७०) । अंबुसु-सिंह से भी अति बलवान पशु, शरभ (दे १३११) । अंबेट्टिआ–मुष्टिद्यूत, वालको द्वारा मुट्ठी मे पेला जाने वाला जूमा-मा रम अवेट्टिआइ पुत्त | तुम' (दे ११७ वृ)। अंबेट्टी-मुष्टिद्यूत, बच्चो की क्रीडा-विशेष जो 'एकीवेफी' के रूप मे पेली जाती है. (दे ११७)। अंबेल्ली-खट्टी राव-'एहि किराइ सीतलीहोति अवेली' (आवचू १ पृ १११)। अंबेसी-घर का द्वार-फलक (दे श८) । अवोच्ची-फूलो को चुनने वाली स्त्री (दे ११६) । अकडतलिम-१ नि स्नेह । २ अविवाहित (दे ११६०) । अकरंडुय-मास के उपचित होने के कारण जिमके पीठ के पास की हड्डी दिखाई न पडे (प्र ४१७ टी प ८१)। अकारय-भोजन की अरुचि, रोग-विशेप (ज्ञा १।१३।२८) । अकासि-निषेध-सूचक अव्यय, पर्याप्त (दे ११८) । अकोप्प-रम्य (प्र ४१८)। अक्क-दूत (दे श६)। अक्कंत-प्रवृद्ध, बढा हुआ (दे ११६) । अक्कंद-परित्राता, रक्षा करने वाला (दे १११५) । अक्कबोंदि-वल्ली-विशेप (भ २२१६) । अक्कसाला-१ बलात्कार । २ उन्मत्त-सी स्त्री (दे ११५८) । अक्का-भगिनी, बहिन (दे ११६.) । अक्का (कन्नड)। अक्कुट्ठ–अध्यासित, अधिष्ठित (दे ११११) । अक्कोड-बकरा १।१२)। अक्कोडिय--चुभाना, घुमाना-तवियाओ सुईओ""वीससु वि अगुलीनहेसु अक्कोडियाओ' (वृटी पृ ५७) ।
देशी शब्दकोश ५ अक्ख-उत्कृष्ट उपकरण (वभा १५४५)। अक्खक-आभूषण विशेष (अवि पृ ६०)। अक्खणवेल-१ मैथुन ! २ मध्याकाल (दे ११५६)। अक्खणिया-विपरीत मैथुन (पा ४३२) । अक्खपूप [-खाद्यपदाथ-विशेष (अवि पृ १८२)। अक्खर-आख का रोग विशेष (आव २ पृ १०२) । अक्खरा-आख की पुतलो-- आसमक्खिया अक्खिमि अक्खरा उकडिढज्ज इ ति' (आयहाटी २ पृ६०)। अवखल- १ अखरोट वक्ष 1 २ अखरोट वक्ष का पल (प्रज्ञा १६) । अक्खलिम-१ प्रतिफलित, प्रतिविवित । २ आकुल-व्याकुल (दे ११२७) । अक्खवाया-दिशा (दे श३५) । अक्खिवण-अपहरण (वभा २०५४) । अक्खु-आम की छाल- अक्खु-अवमालमित्यय (निचू ३ ४८२) । अक्खुय --आम की छाल (निभा ४७००)। अक्खेवि-वशीकरण के द्वारा चोरी करने वाला (प्र ३१३) । अक्खोड-१ राजकुल म दात य द्रव्य वेगार तथा सैनिक आदि की भाजन व्यवस्था (व्यभा २ टी प १०) । २ वह भूभाग जो विना वाया हुआ तथा जनता मे अनाकात हा (बावटि प ६०)। अक्खोडमग-राजकुल म दात य द्रव्य को राजा द्वारा दी जान वाली छूट- 'खोडभगानि वा उक्कोटभगोत्ति वा अक्खाडभगोत्ति वा एगटठ' (निचू ४ प २८०) । देखें-खोडभग। अक्खोल-फल विप (अवि पृ ६४)। अक्सोला-वडी (अवि पृ ७१)। अखरय-भृत्य विशेष (पिनि ३६७) । अगअ-दानव (द ११६)। अगडिगेह-यौवन मे उ मत्त बना हुआ (दे १४०) । अगड-१ कप (स्था २३६०) १२ कूप के पास पशुआ ये जल पीन या गत्त। अगरिय-गुल्म विशेष (जीव ३१५८०)। भगय--अमुर (प्रा २११७४)। अगहण-मापालिय, वाममार्गी (दे ११३१) ।
देशी शब्दकोग ६ । अगिला अवगणना, अवज्ञा (दे १११७) । अगुज्झहर-रहस्यभेदी, गुप्त बात को प्रकाशित करने वाला (दे ११४३) । अग्ग-१ ताजा-'अग्गेहि वरेहिं पुप्फेहिं जक्समच्चे:' (उमुटी प ३५) । २ परिहास । ३ वर्णन । अग्गक्खंध-रणमुख, युद्ध का अग्रिम मोर्चा (दे ११२७) । अग्गवेअ-नदी का पूर (दे १।२६)। अग्गहण-अवगणना, अवज्ञा (दे १।१७) । अग्गाधमक -मत्स्य की एक जाति (अवि पृ६३) । अग्गाहार-१ उच्च जीविका, वहुमान-'दिट्ठो सक्कारिको भग्गाहागे य में दिन्नो' (उसुटी प २३) । २ छोटी बस्ती-मत्यि पाइदूरे मरल- पुर णाम बभणाण अग्गाहार' (कु पृ २५८) । अग्गिअ-१ इन्द्रगोप कीट । २ मन्द (दे ११५३) । अग्गिचुल्लक-अग्नि का स्थान (अवि पृ २४४) । अग्गिरस-गोत्र-विशेप (अवि पृ १५०) । अग्गिलिय-आगे, पहले (पवटी प ५६) । अग्गुमर-घर का प्रवेश द्वार-गिहमुह अग्गुमरो' (आचू पृ ३७०) । अग्घाड–अपामार्ग, लटजीरा (दे ११८) । अग्घाडग–अपामार्ग, लटजीरा (प्रजा ११३७।४) । अग्घाण-तृप्त (दे १११६) । अग्घातित-आख्यात (आचू पृ ३०३) अघ-१ गढा । २ ह्रद-'अघा गर्ता ह्रदो वा' (वृटी पृ २०२) । अचल-१ गृह । २ कहा हुआ । ३ घर का पिछला भाग। ४ निष्ठुर, निर्दय । ५ नीरस, विरस (दे ११५३) । अचाइ-अशक्त, असमर्थ (आ ६।३०) । अचिट्ठ-अप्रगाढ-'अचिट्ठ कूरेहिं कम्मेहिं, णो चिट्ठ परिचिट्ठति' (आ४।१८) अचियत्त-१ अप्रीतिकर (द ५११७) । २ अप्रीति-'मचियत्त देशीवचन अप्रीत्याभिधायकम्' (आवहाटी १ पृ १२७) । अचोक्ख–अपवित्र (आवचू १ पृ १२२) । अचोक्खलिणी-जल आदि से हाथ न धोने वाली (पिनि ६०२) । अच्चंकारिय-असत्कारित, अपूजित-'अच्चकारिओ उवघात करेस्सति' (निचू ३ पृ ४१८)। - देशी शब्दकोश ७ अच्चाइय-व्यथित- अच्चाइमो मागडिओ (दहाटी प ६१)। अच्चिग-व्यथा (कनड)। अच्छ-१ प्रचुर । २ शीघ्र (द १४६) । ३ वक्ष (से ६।४७) । अच्छत-आसीन (उ १६७८) । अच्छण-१ बैठना (अच्छणघर विश्रामगह) (ज्ञा १२३३१६) । २ अवस्थान, आसन (उ २६१७) । ३ अपसपण--'अच्छण ति आसक्कण' (निचू १ पृ.८३) । ४ अवलोकन (व्यमा ३ टी प १०२) । ५ सेवा, शुश्रूपा (ब ३)। अच्छभल्ल-यक्ष, देव-विशेप (दे ११३७) । अच्छराणिवात-१ चुटकी । २ चुटको वजान जितना समय (सूचू २ पृ ३५६)। अच्छरानिवाय--चुटकी (जीव ३८६)-'अप्सरोनिपातो नाम चप्पुटिका' (टीप १०६)। अच्छहल्ल-रोछ (पा ३०२) । अच्छारिय-नौकर कमचारी- तत्थ सरदकाले अच्छारियभत्ताणि दधि- कूरण णिमटठ दिज्जति' (आवचू ११ २६१)। अच्छिक्क-अस्पृष्ट (व्यमा ४।२ टी प २४) । अच्छिघरुल्ल-१ अप्रीतिकर । २ वेश, पाशाक (दे १४१ व) । अच्छिय-फल विशेष (आटी प ३४६)। छरोड-चतुर्गिद्रय जतु विशेष (प्रना ११५१)। मच्छिरोडय-चार इद्रिय वाला जीव विशेप (उ ३६।१४८) । अच्छिल-चार इद्रिय वाला जतु विशेप (उ ३६।१४८)। मच्छिवडण-निमीलन, आखो का मूदना (दे ११३६)। अच्छिविअच्छि 3-आपस की खींचतान, परस्पर माकपण (दे ११४१)। अच्छिवेह-चतुरिदिय जीव विशेष (प्रना ११५१) । अच्छिवेहय-चार इद्रिय वाला जतु विरोप (उ ३६।१४७) । अच्छिहरिल्ल~-१ अप्रीतिकर, दप्य । २ वेश पाशाप (दे ११४१ ५)। मच्छिहरुल्ल-१ अप्रीतिकर । २ वेग, पाशाप (दे ११४१)। अच्छुल्लूढ-निप्यामित बाहर निकाला हुमा (भा ५७५) । अज-मप की एक जाति (अवि पृ० ६३)। अजढर-नया, ताजा (मूचू २३१२) ।
देशी शब्दकोश ។ , अजराउर-उष्ण, गरम (दे ११४५) । अजिणविलाल-पर्वत की गुफा मे रहने वाले सिंह की एक जाति (अवि पृ २२७)। अजुअ-सप्तच्छद, सतौना का वृक्ष (दे १११७) । अजुअलवण्णा-इमली का वृक्ष (दे ११४८) । अजुअलवन्न—सप्तपर्ण, छितवन का पेड (पा ८६५) । अजुगित—शरीर तथा जाति से अजुगुप्सित (निचू ३ पृ ४५७) । अज्ज—जिन, अर्हत्, बुद्ध (दे १५)। अज्जअ-१ सुरस नामक तृण । २ गुरेटक नामक तृण (दे ११५४) । अज्जणी-भाड-विशेप (अवि पृ ६३) अज्जय-१ वनस्पति-विशेप, लघु तुलसी का पौधा (प्रज्ञा १४४१३) । २ दादा । ३ नाना (द ७१८) । अज्जा-१ वृक्ष विशेष (भ २१।२१) । २ दुर्गा देवी का प्रशात रूप-'दुर्गाया पूर्वरूप अत्र कुष्माडिवत् तधाठिता अज्जा भन्नति' (अनुद्वाचू पृ १२) । ३ यह स्त्री (पा ८४३) । अज्जिआ-१ दादी । २ नानी (द ७।१५) । आजी-दादी (मराठी)। अज्जी (कन्नड)। अज्जिड्डीय-दिया, प्रस्तुत किया-'आसेण हिसिय, पट्ठी अज्जिड्डीया' (व्यभा २ टी प.६४)। अज्जुण-तृण-विशेष (भ २१३१९) । अज्जोरुह-वनस्पति-विशेष (प्रज्ञा १) । अज्झ-यह (पुरुष) (दे ११५०) । अज्झअ-पडौसी (दे १११७) । अज्झत्थ--आगत (दे १११०) । अज्झवसिअ--मुडित मुख (दे ११४०) । अज्झसिअ—दृष्ट, देखा हुआ (दे १।३०) । अज्झस्स-आक्रुष्ट, जिस पर आक्रोश किया गया हो वह (दे १२१३) । अज्झा---१ असती, कुलटा । २ प्रशस्त स्त्री। ३ नववधू । ४ तरुणी । ५ यह (स्त्री) (दे १५०)। अज्झियक-उपयाचित, मागा हुआ (बृटी पृ १३२७) । अज्झियग-उपयाचित, मागा हुआ (वृभा ४६६२) । .
देशी शदकोश ६ अज्झीण-अध्ययन विभाग-'मज्भयण अज्यीण आमा झवणा य एगटठा' (निचू १ पृ५)। अज्झेल्ली-बार-बार दोहन-योग्य गाय (दे ११७)। अज्झोल्लिा-वक्षस्थल के आभूपण म को जात्ती मोतिया की रचना विशेष (दे २३३)। अज्झोस--अध्यवसाय भावना- अज्झोसो भावण त्ति एगटठ' (आचू पृ ३७३) । अझिखिय-अनि दनीय (दे ३१५५ वृ)। अटिट्टियाविज्जमाण-टिट टिट की आवाज नहीं करता हुआ (ना १२३।२६)। अट्ट-१ आकाश-'अटटे इ वा वियटटे इ वा आधारे इ वा (भ २०११६) । २ कृश ३ महान । ४ ताता। ५ सुख । ६ धृष्ट । ७आलमा । ८ ध्वनि । ६ अमत्य (द १२५०) । भट्टग-आटा (मूचू १ पृ १७८) । अट्ट -गया हुआ (दे १९१०)। अट्टहास-खिलखिलाकर हसना (पवटी प २३०)। 'अट्टण' साला-व्यायामशाला (म १११३८) । अट्टमट्ट-१ निरथक, ऊटपटाग- अट्टमटट च मिक्वेज्जा, सिविषय " णिरत्यय । अट्टमट्टपसाएण, भुजए गुडतुवय ।।' (उशाटी प २४५) । २ आलवाल, क्यारी (प्रा २११७४) । ३ अतुम मकल्प विकल्प । अट्टयकल्ली -कमर पर हाथ देकर सडा रहना (पा ७२८) । अट्टरसग-गुच्छ वनस्पति विशेष (प्रमा ११३७६४)। भट्टालग-प्राकार ये भीतर आठ हाथ चौडा माग (आधु पृ ३६६) । अटिमओ-पुन पुन -'अट्ठिमो पुणो पुणा' (निचू १ पृ १२४) । अहितो--पुन पुन (निभा ३५७) । अहिल्लय-विनौला (पिनि ६०३) । अट्ठोलय-विनौला (पिनि ६०३) । अड-१ लामपक्षी (जीवटी ५४१)। २ यूप, मा (पा ३०८)। में पाम म पशुआ के पानी पीने के लिए बनाया हुआ गठा (प्रा १२२७१) । अडज्झिम-विपरीत मंपन (२ १५४२) । मडवइल्ला-- विशेष (आवराटी १६६) मरपम्मिम-जागरस्पता, दसमास (१।४१)।
देशी शब्दकोण १० अडड-संख्या-विगेप (भ ५११८)। अडडंग-संख्या-विशेप (भ ५११८) । अडणि-धनुष्य का प्रातभाग (?) (से १५१५६) । अडणी-मार्ग (इ २६१३, दे १११६) । अडय-१ मात्मवान् । २ प्रशंसनीय (इ ११५) । अडयणा असती, कुलटा (दे १११८) 1 अडया-कुलटा (दे १११८) । अडयाल-१ अड़तालीस (निभा २१३२) । २ प्रशसा-'अडयालशब्दो देशी- वचनत्वात् प्रशसावाची' (प्रज्ञाटी प ८६)। अडयालग--प्राकार का एक भाग-'अडयालग त्ति अालक प्राकारावयवः सम्भाव्यते' (उपाटी पृ १००) । अडाड-बलात्, जवरदस्ती-'अडाडाए वला हरंतो अक्क्रतियो' (निचू ३ पृ २५६, दे १११६) । अडिल-चर्मपक्षी-विशेप (जीवटी प ४१) । अडिला-चतुप्पद प्राणी-विगेप (अवि पृ६६)। अडिल्ल-चर्मपक्षी का एक भेद (प्रजा ११७८) । अड्ड-- १ तिर्यक् (आवटि प ४६) । २ जो आडे आता हो, बीच में वाधक होता हो, वह । अड्डग-~जो आडे आता हो, बीच मे बाधक बनता हो-'गलए अड्डग ऑटुं वा कळं वा' (मूचू २ पृ ३५५) । अडुपलाण-यान-विशेप, थिल्लि (भटी पृ ७३०) । अड्डपल्ललाट देश मे प्रसिद्ध खच्चरो से वाह्य यान (जाटी प ४७) । अड्डपल्लाण-लाट देश मे प्रसिद्ध यान-विशेष (औपटी पृ ११२) । अडवियड्ड-~१ माडा-टेढा, अस्त-व्यस्त-वितिकिण्ण विप्रकोणं अणाणुपुवीए अडवियड्ड ति वुत्त भवति' (निचू ४ पृ ३७) । अडित-चढाया, आगेपित किया-'खवे य अहितो' (व्यभा २ टी प ६४) । अड्डिय-१ मिडने की क्रिया-विगेप (निच ३ पृ ३४८) । २ आरोपित (व्यभा २ टी प ६४)। अट्टपल्लाण-लाट देश मे प्रसिद्ध यान-विशेष (अनुद्वाहाटी पृ १४६) । अट्टयक्कली-कमर पर हाय रखना (दे १४५) । - देशी शब्दकोश अड्ढेऊण-रोककर-'अड्ढेकण सणिय विगिचइ, जह उज्जरा न जायति (आवहाटी २१८७)! अड्डोरुग-जन माध्वी के पह्नन का एक वस्त्र (पक १४८१) । अण (~याप (भटी प ३५)। अणगण-गुल्म विप (अवि पृ ६३)। अणत-१ अगूठी (अवि पृ६५)। २ निर्माल्य दवता को चढाया गया उपहार (द १।१०)। अणतग-वस्त्र (नि ११३) । अणतिक्क-जुलाहा बुनकर (आवचू ११ १५६) अणक्का .१ म्लच्छ जाति । २ म्लेच्छ देश विरोप (प्र १२२१) । अणघ-नीराग (निचू १पृ १२७) । अणच्छिार-अच्छिन, नहीं छेदा हुआ (द ११४४) । अणड-~-जार पुरप (दे ११) । अणत्त-निर्माल्य, देवोच्छिष्ट द्रव्य (दे १११०)। अणप्प-बडग, तलवार (दे १।१२) । अणप्पज्झ-१ पराधीन- देशीपदमना मवशवाचकम् (वटी पृ १०३३) । २ भूताविष्ट (निचू २ पृ २६)। अणफुण्ण-अव्याप्न, अस्पृष्ट (अनुद्वाचू पृ ५६) । अणप्फुस्न-अनापूण अस्पृष्ट (अनुदा ४३८) । अणफुण्ण-अपूण, अस्पृष्ट, अनानात (अनुद्वाहाटी पृ०६) । अणरामय–अरति, बचनी ( ११४५)। अणराह-गिर पर वाधी जान वानी ग विरगी पट्टी (दै १॥२४) । अणरिषक-१ असा रहित, व्यस्त (दै १०२०)। २ दमि, सीर आदि गारम भाज्य (निचू १६)। अणयवग्ग-१ अनन्त, निस्मीम-'अगवटा गमाररमार भापरिपट्टर' (म १५४५)२ अविनाशी (मू ।।२)। अणयमांग-अन त, अपरिमिा (माघ १५६)। अणयरिपक-अपसार गति (११२० )। अपह~१ मा, मुरक्षित परम मा गमागे' (गा ॥१८२४ ₹ १०१३) । २ नीराग (निए ११ १२७) । अपहप्पणय--अनष्ट विदमान (१४)।
देशी शब्दकोश १२ । अणहारअ-खल्ल, वह भूमी जिसका मध्यभाग नीचा हो (दे १३८) । अणागलिय—अपरिमित (उपा २१३४) । अणाड-जार पुरुष (दे १११८) । अणाडिया-१ कुचेप्टा, विक्रिया (आवचू १ पृ ४६७) । २ नटखटपन- 'एक्का वि मए पुत्तस्स अणाडिया न दिट्ठा' (वृटी पृ ५७) । अणाढायमाण-अस्मरण (आचू पृ ३०३) । अणादुआल-विना हिलाये (सूचू १ पृ १२२) । अणालिआ–कुचेष्टा, विक्रिया-'अणालिआ करेइ' (आवहाटी १ पृ २४७)। अणिठ्ठह-अविगलक, नही थूकने वाला (सू २।२।६६) । अणिठ्ठहअ-१ अनिष्ठीवक । २ सचेष्ट, जागरूक (भ २५१५७१) । अणिड्डगलित-अत्यधिक लिप्त-'अणिड्डगलिते अतीव लेयरिय' (निचू २ पृ ३०१)। अणिदा-अनुभव शून्य, ज्ञानशून्य-'सव्वे असण्णी असण्णीभूत अणिदाए वेदण वेदेति' (भ ११७८) । अणिदाय-ज्ञान का अभाव (भटी पृ १४१७) । अणिदोच्च-१ भय का होना । २ अस्वास्थ्य (व्यभा ६ टी प ५१) । अणिय—अग्रभाग (प्र ७१२) । अणियण-कल्पवृक्ष का एक प्रकार (प्रसाटी प ३१४) । अणिलुक्क-प्रकट, अतिरोहित-'अणिलुक्के णिलुक्कमिति अप्पाण मण्णइ' (भ १५।१०२)। अणिल्ल-प्रभात (दे ११६) । अणिह-१ सदृश । २ मुख (ढे ११५१) । अणु-चावल की एक जाति (दे १५) । अणुअल्ल-प्रभात (दे १११६) । अणुआ--यष्टि, लकडी (दे ११५२ वृ)। अणुइअ-चना (दे ११२१) । अणुज्जल-अचचल (अवि पृ ४) । अणुदवि-प्रभात (दे १११६) । अणुद्धरी-कुथु आदि कीट-विशेप (निचू ३ पृ १२४) । अणुवंधिअ-हिक्का रोग, हिचकी (दे ११४४) । अणुय-१ धान्य-विशेष (दनि १५५, दे १५२) । २ आकृति (दे ११५२) ।
देशी शब्दकोश . अणुरगा-गाडी-'अणुरगा गाम घसिमा' (निचू ४ पृ. १११) । अणुल्लय-दीद्रिय जतु विशेष (उ ३६।१२९)। अणुव-बलात्कार (दे १११६)। अणुवज्जण-सेवा-शुश्रूपा, देखभाल (दे १२४१ व)। अणुवज्जिअ-१ जागरूकता, देखभाल (दे ११४१) । २ गत (व) । अणुवहुआ~-नववधू (दे ०४८) । अणुसधिम-निरत्तर हिचकी आना (दै ११५९) । अणुसुत्ति-अनुकूल (दै ११२५) । अणुसूआ-शीघ्र ही प्रसव करने वाली स्त्री (दे ११२३)। अणेकज्झ -चचल (दे ११३०)। अणोभट्ठ-अप्राथित, अयाचित (ओनि १४८) । अणोयविय–अपरिकर्मित (निचू २ पृ ४२६) । अणोरपार-१ अनादि-अन त-'ससारे पोरम्मि अणोरपारे' (मू २।६।४६) प्रचुर- अणोरपारमिति देशीवचन प्रचुरायें (आवहाटी १ पृ २३०) । ३ अपार-'अणोरपारम्मि देशयुक्त्या अपार' (आवदी प १६१) । अणोलय-प्रभात (दे १११६)। अणोहट्टय-उच्छपल (पाटी प २४५) । अणोहट्टिय-स्वच्छद (मा १२१८३१७) । अणोहट्ठ-अनिच्छिन, अप्राषित- अणोहटठ अजाणिय' (निचू २ पृ. १६६) ।। अण्णः -१ पुरुष के लिए प्रयुक्त सम्बोधन (१९)-'अण्ण' इति मरहट्ठाण आमतणवयण' (दअचू ११६६) 1 २ मारोपित । ३ पण्डित । अण्णम-१ तरुण । २ घूत्त । ३ देवर (दे ११५५) । अण्णहम-तुप्त (दे १११६) । २ सर्याय नुप्त, सभी विपया म तुप्त (1)। अण्णति-अवज्ञा, अनादर (६ १।१७) । अण्णमय-पुनरुत्त, पुन महा हमा (द १०२८)। अण्णाण -१ विवाह-माल म यपू पो रिया जाने याला उपहार-दरन । २ विचार ये लिए यर या वधू पादान-पयाला (११७)। अण्णाय--आर गाला (ग ४६)। अप्णिा-१ दयगती। नाद । ३ पूषी (१९५१)। अती-१ दवगा, पर मी पानी 10 Tना पनि पा । पूरा पिला माहित (११)।
१४ देशी शब्दकोन अण्णे-१ महाराष्ट्र में प्रयुक्त तरुणी स्त्री के लिए मवोधन-शब्द-'अणे नि मरहट्ठेमु तरुणित्थीसामतण' (द ७।१६, अचूपृ १६८) । २ महागड मे वेश्याओ के लिए प्रयुक्त चाटु वचन-'मरहट्टविना आमतण दोमूलइखरगाण चाटवयण अण्णेत्ति (जिचू पृ २५०) । अण्णोसरिअ-अतिक्रान्त, उल्लषित (दे ११३६) । अण्हेअअ--भ्रान्त (दे ११२१) । अतितिण-बड-बड न करने वाला, बकवाल न करने वाला (द ८।२६)। अतिकिमण-अलस, मथर-अलसमभारो भीर अतिकिमणो मथगे नि वा' (अवि पृ २४१)। अतित्थित-अतिक्रान्त (व्यमा १० टी प६)। अतिप्पणया-अश्रु न वहाना (म ७११४) । अतिर-निरन्तर-'अतिर णिरतर भण्णति' (जीमा १६८०) । अतिराउल-स्वामीकुल-'अतिराउले इति देशीपद, स्वामिकुलमित्यर्थ.' (प्रजाटी प २५३) । अतिस-अप्रीति (अवि पृ १२) । अतीत्थित-अतिक्रान्त (व्यभा १० टी प ६) अत्ता-१ फूफी । २ सासू । ३ मखी (दे ११५१) । अत्य-अनवसर, अकस्मात् (दे १११४) । अत्थक्क-अकस्मात् (से ११।२४) । २ अखिन्न । ३ अनवरत । अत्थग्घ-१ मध्यवर्ती (ओनि ३४) । २ अगाध, गहरा । ३ आयाम, लवाई। ४ स्थान (दे ११५४) । अत्थणिउर--सख्या-विशेप (भ ५।१८)। अत्थणिउरंग-सख्या-विशेप (भ ५।१८)। अत्यभिल्ल—रीछ (निचू २ पृ ६३) । अत्थयारिआ -सखी, सहेली (दे १११६) । अत्याक्क-अकस्मात् (से ११।२४)। अत्थार--सहायता, सहयोग (दे १११६) । अत्यारिय-कर्मकर, मूल्य लेकर खेत मे धान आदि काटने वाला नौकर- 'अत्यारिएहिं तु ये मूल्यप्रदानेन शालिलवनाय कर्मकरा' (व्यभा ६ टी प ३८)। अत्याह-१ अगाध, गहरा, ऊडा । २ आयाम, लम्बाई । ३ स्थान । ४ मध्यवर्ती, वीच का (दे ११५४) ।
देशी शब्दकोश १५ अत्थिय-१ वक्ष विशेष । २ वहुत वीज वाला फल (भ २२॥३)। अत्थिल-क्षुद्र जतु (अवि पृ २५३) । अत्युड-लघु (दे ११६)। अत्युरण--आस्तरण (निचू ३ पृ ३२३) । अत्युरणग-~आस्तरण विशेप (निचू ३ पृ ५६८) । अत्युरिय-फलाया हुआ, विछाया हुआ (वभा ६१०) । अत्युवड-भल्लातक, भिलावा वृक्ष का फ्ल (दे ११२३)। अत्थेवक-आकस्मिक, मचितित (से १२।४७) । अथक्क-१ अकस्मात अनवसर (ओटी प ८७) २ प्रसरणशील, फलन वाला। अदतवणय-अदतत्रावन, दतोन का निषेध (स्था ६६२)। अदसण-चार (टे १।२६) । अदक्खेयव्य-ग्राह्य (ओनि)। अदिसल्ल--अधा (निचू ४ पृ १०६)। अदु-१ अब (आ ६।३।१०) । २ अथ इसलिए (सू १।२।२४) । ३ अथवा (उ २।२३) । ४ अधिकारान्तर का मूचक । ५ इससे । अदुत्तर--आन तय मूचक अव्यय, अव (मू २।२।१८)। अदुल-- आम आदि का रूछा (अनुद्वाहाटी पृ ७६) । अदुव-अथवा (द ६२)। अदुवा-अथवा (द ५७५) । अदूयालिय-मिथिन-'जत्तियाणि भरहे घण्णानि ताणिस वाणि अदूयालियाणि' (शाटो प १४६) । अद्द-१ अभिमुख (आवचू १ पृ २७८) १२ परिहास । ३ वणन। अद्दण-आकुल (दे १।१५) । अद्दण्ण-१ व्याकुल (पक ६६१, दे १११५) । २ असत्य (व्यमा ६ टी प ३)। अद्दन्न-आकुल याकुल (वभा ३६३३)। अद्दाइम-आदश, पवित्र आचरण वाला (व १)। अता--पण (स्या ४१४३११।
देशी शब्दकोश १६ विम्ब को पोंछने से रोगी नीरोग हो जाता है। (व्यभा ५ टी प २६)। अद्धत—१ पर्यन्त, अंतभाग (दे ११८) । २ कतिपय, कई एक । अद्धक्खण-१ प्रतीक्षा (दे ११३४) । २ परीक्षण-'परीक्षणमिति केचित्' (वृ)। अद्धक्खिअ-मंकेत करना (दे १३४) । अद्धजंघा-'मोचक' नाम का जूता-विगेप (दे ११३३)। अद्धजंघिया-पाद-रक्षक, जूता-विशेष (दे ११३३ वृ)। अद्धविआर-१ मडन, भूपण (दे ११४३) । २ मटल, गोल (वृ)। अद्धा-१ समय (स्था २।३६) । २ लब्धि, शक्ति-विशेष । ३ वस्तुतः । ४ साक्षात् । ५ दिन । ६ रात्रि । ७ नकेत । अद्धाण-महान् अटवी-'अद्धाण महता मडवी' (निच १ पृ८०) । अद्भुट्ठ-साढे तीन-'अछुट्ठणावि कुमारकोडीणं' (प्र ४१५) । अधंकण-अमायी (मूचू १ पृ १८६) । अधवण --अथवा (वृभा ४१६३) । अधिकरणिखोडि-बहरन को रखने का काप्ठ-विशेष (भ १६७)। अधिक्कमणक-उत्सव-विशेप (अवि पृ १२१) । अनिदोच्च-भयभीत, अस्वस्थ-'अणिदोच्चमित्यनिर्भयमस्वस्थमित्यर्थः (व्यभा ७ टी प ५१)। अन्न-पुरुप के लिए प्रयुक्त सवोधन-शब्द (द ७।१६)। अन्नइलाय-वासी भोजन करने वाला (प्रटी प ११०) । अन्नओहुत्त-पराङ्मुख-'रोसेण य अन्नओहुत्तो जामो राया' (उसुटी प २६)। अन्नतिलाय-वासी भोजन करने वाला (प्रटी प प०६) । अन्ना-१ तरुण स्त्री का सम्बोधन-शब्द (द ७११६) । २ माता। अपडिच्छिर-जड़-मति, मूर्ख (दे ११४३) । अपडिहत-भोज्य पदार्थ-विशेप-पूणे वा फेणके वा अक्खपूणे वा अपडिहते वा' (अंवि पृ १८२)। अपलोकणिक-सिर का आभरण-विशेप (अवि पृ १६२)। अपातय-अकाल (?)-'अपातयं सस्सवापत्ति' (अवि पृ ११२) । अपारमग्ग-विश्राम (दे ११४३) ।
देशी शब्दकोश १७ . मपुस्फिय-स्वच्छ, मुगधित (बमा ४३८)। अपोल-पोल रहिल, अपिर (पवटी प ६७) । अपोल्ल-अपिर, निविड (प्रमा ६७४) । अप्प-पिता (दै ११६)1 अप्पगुत्ता-पिक्च्यू, क्वाठ, (दे १।२६) । अप्पजहिम -पर हुए चावल मादि (बाटो प ३३४) । अप्पज्झ आत्मवन, स्वस्यचित्त (वमा ३७३२. दे १२१४) । अप्पत्तिय-~~१ सप्रीति । २ अविश्वास (दा ६।४) । अपहष्ण-आमरक्षा म तत्पर, स्वप का बचान म तत्पर (वमा ११५३) । अप्पसत्यम-गोत्र विरोप (अवि पृ १५०) । अप्पाह- मदेश (यमा ७ टी प २६) । अप्पाह१ जानवर, यहार (मू २११११२) । अप्पाहण-मदेश (भा २३६) । अप्पाहणी~गोश (पिनि ४३०) । अपाहित-मदिष्ट (बमा ३२८४) । अपाहिय~~मष्टि (वटी ७४) । अप्पोया-मास्फोता, बन्ली विशप (पना १९४०)। अप्पोल-पोल -हिन (निभा २१७०) । अपोल्ल-पोल रहित, निगर (आमा ३२२) । अफिचिय-अपरिचित (निचू ३ ४ ३३७) । मच्चित-अपरिचित (नि २ १ ११७)। अफापा-वनस्पनि विशेष (जीवटी प ३५१} } अाफुपण-१ पूम, भरा हुआ (विपा ११२१५३, ६ १।२०) १२ आत्रात, स्मृष्ट (अनुदाय ५६) । ३ माछारित (7२४) । अफगाण, प, आशन्न (अनुदा ४३६)। अप्पा-मारमा, या पिप (Pा १३५०)। अप्पोता-पतिपि (जोर ३१२६६) । अप्पोतिया-नापति विष (अपि पृ.) । सफोयय- (अपि १३) । अप्पोपा पनाति-रि (रान १९४)10 पन्नोfry (प्रा.)।
देशी शब्दकोश १८ अप्फोव-१ लता (उ १८१५) । २ वृक्ष आदि मे बाकीर्ण, गहन (उशाटी प ४३८)। अफुण्ण-परिपूर्ण (प्रज्ञा २६५६) । अफुन्न-स्पृष्ट (प्रसाटी प ३०४) । अबीय-दुर्भिक्ष (निचू ४ पृ १२८)। अवोट-अनाक्रमणीय (ओटी प ६२) । अन्बुद्धसिरी-इच्छा से भी अधिक फल की प्राप्ति (दे १।४२) । अन्भ-अध्यारोह वृक्ष, वृक्ष पर उत्पन्न होने वाला विजातीय वृक्ष- 'अन्भेति वृक्षे समुत्पन्नो विजातीयो वृक्षविशेषोऽध्यवरोहक' (भटी पृ १४७६)। अन्भंगिएल्लअ-घी आदि से चुपड़े हुए शरीर वाला (मोनि ८२) । अभक्खण-अकीति (दे ११३१) । अभड-आहत, टकराना (बावहाटी १ पृ २८८) । अभडवंचिउ-अनुगमन करके (प्रा ४१३६५)। अन्भपिसाअ-राहु (दे ११४२) । अब्भवालुय-अभ्रक का चूर्ण (उ ३६१७४) । अभाकारिय-कर्माजीवी (१) (अवि पृ ६७) । अन्भायत्त-प्रत्यागत, वापस आया हुआ (दे ११३१)-'अभायत्ता भमन्ति तुह रिउणो' (वृ)। अन्भायत्थ—पश्चाद्गत, फिर गया हुमा-'अन्भायत्यो पश्चाद् गत इति तु गोपाल' (दे ११३१ वृ) । अन्भिडिअ—१ सार, मजबूत । २ सगत, युक्त (दे ११७८)। अभिडिऊण-टकरा कर-'सो चक्के अभिडिऊण भग्गो' (उशाटी प १४६) । अन्भुट्टि–हिंसक-आउट्टि त्ति वा अन्भुट्टि त्ति वा एगट्ठा' (आचू पृ २७५) । अन्भुत्त-प्रदीप्त, चमकदार (निचू ३ पृ ३२१) । अन्भुत्तिअ-१ प्रदीप्त, प्रकाशित । २ उत्तेजित्त (से १५॥३८) । अन्भूआण-उफनता हुमा-'आकठा आदाणस्स भरिया, तो तप्पमाणी भरिया अभूआणा छड्डिज्जति, अरिंग पि विज्झावेति' (निचू ३ पृ८५)। अभिचार-उच्चाटन आदि (निचू १ पृ १६३)। अभिणूम-१ माया (सू १।२।७) । २ कर्म (सूचू पृ ५३) । । 5" दशी शब्दकोश १६ अभिण्णपुड-खाली पुडिया जिसको वच्चे लागा का ललचाने के लिए रास्ते पर रख देत हैं (दै ११४४)। अभिनिपिया--प्रत्येक का पृथक् पृयक चूहा (व्य ६:१०)। अभिनिव्वगड--१ अनक और निश्चित परिक्षेप वाला स्थान । २ पृथग् पृथग परिक्षेप वाला स्थान (व ११११ टी पृ. ६४६)। ३ वह परिक्षेप जिमम प्रवेश और निप्नमण का एक द्वार हो पर भीतर अनक घर हा (व्यमा ८ टी प ४)। अमगुल-~इप्ट (निचू ३ पृ १४२) । अमज्जाइल्ल-अमर्यादित अव्यवस्थित (निभा ४०३) । अमणाम- मन के लिए अप्रिय (स्था २ २३३) । अमय--१ च द्रमा, चाद (दे १११५) । २ असुर दत्य । अमयणिग्गम-च द्रमा (दे १३१५) । अमाघाय-अमारि-अमाघातो रुढिश तत्वात अमारिरित्यथ '(उपाटी पृ ६१)। अमिय -प्राप्त- अमिया गावीतो, जुज्य सपलग्ग (निचू ३ पृ १९७) । अमिल-१ मेप, भेड (ओनि ३६८) । २ भाड विशेष (अवि पृ ७२) । अमिला--१ भेड की ऊन से बना वस्त्र (आचूला ५।१४) । २ देश विशेष म सूक्ष्म रोआ से निर्मित वस्त्र (निचू २ पृ ३६६) । अमुदग्ग–अतीन्द्रिय मिय्यानान विशेप, जीव पुदगला से बना हुआ नही है- ऐसा पान (स्या ७२)। अमुय-अस्मत, अनात (म ११४२६)। अमोग्गतिया--मम्मुख जाना त्वरित गति से जाना- तस्सागमणवेलाए सव्वो परियणो पच्चावणीए णिग्गतो अमाग्गतिया एति (निचू ३ पृ ४११)। अमोसली-अप्रमादयुक्त प्रतियना का एक प्रकार (स्था ६।४६) । अम्मका-मा (आवदी प ८०) । अम्मगा-मा (भ ६।१४८) । अम्मणचिम-अनुगमन, पोछे पीछे जाना (द ११४६) । अम्मया-माता, अम्बा (मा ११४)। अम्मा~मा (अत ५११६ द १०५) । अम्माइआ अनुगमन परन वानी पीट-पीछे जाने वाली (दे १।२२)। अम्मिय-प्राप्न (बटी पृ ७७६)।
देशी शब्दकोश २० अम्मो-१ माता का सम्बोधन (ना १११४१२६)। २ आश्चर्यमूचक अव्यय (प्रा २।२०८)। अम्मोगइया- सम्मुख-गमन, स्वागत करने के लिए सामने जाना-'राया सयमेव अम्मोगइयाए निग्गओ' (उसुटी प २३) । अम्मोगतिया-सम्मुख-गमन (आवचू १ पृ ३६५) । अय----१ विस्मृत । २ आदरणीय । ३ परित्यक्त (दे ११४६)। अयक्क-दानव (दे ११६) । अयग-दानव (दे ११६) । अयड--कुआ, कूप (दे १।१८) । अयतंचिअ-हृष्ट-पुष्ट, मासल (दे ११४७) । अयसा-सुरा-विशेप (अवि पृ १८१)। अयालि-मेघाच्छन्न दिवस, आकाश मे वादलो के छा जाने से होने वाला अन्धकार, दुर्दिन (दे १११३) । अयोइल्ल - कारावास-'डड पुरस्कृत्य राया अयोडल्लए ठवेति' (दश्रुचू प ३६) । अरइय--१ अर्थ, मसा (आचूला १३।२८) । २ अजीर्ण (नि ३।३४) । अरंजरग- जलघट (सूचू १ पृ. ११७) । अरक–कृमि-विशेष (अवि पृ ६६) । अरतीअ-मसा, अर्श (आचू पृ ३७२) । अरबाग-१ एक अनार्य देश, अरव देश (प्रसा ८३) । २ अरब देश के वासी (कु पृ ४०)। अरल-१ कीट-विशेष, चीरी। २ मच्छर (दे ११५२) । अरलाया चीरी, चार इन्द्रिय वाला छोटा प्राणी जो रात को लयवद्ध ध्वनि करता है, पर दृष्टिगोचर नही होता (दे १२२६) । अरलूसा-अडूसा का वृक्ष (अवि पृ ७०)। अरविंदर-दीर्घ (दे ११४५) । अरहट्ठ-रहट (ओटी प १६) । अरिअल्लि-व्याघ्र (टे ११२४) । अरिज्ज–अग्र, परिमाण (आचू पृ ३३६) । अरिसिल्ल-बवासीर रोग वाला (विपा ११७७)। अरिहइ-निश्चित, अवश्य (दे १।२२) । अरुग-व्रण, फोडा (वृभा ६०२८) ।
देशी शब्दकोश २१ अरण-यमल (दे ११८)। अरुप-व्रण (वभा २२२५) । अलदक-बटारा (अवि पृ ६५) । अलदिका-याली पे आकार का पात्र (अवि पृ ७२) । अलदिग-पात्र विशेष (माचू पृ ३४५) । अलप-बुक्कुट (दे १३१३)। अलक्कडअपागल कुत्ता (वटी पृ ८२६)। अलग्ग-क्लक, आरोप (दै ११११)। अलमजुल- आलसी सुस्त (दे ११४६) । अलमल- दुर्दान वपम, दुष्ट बल (दे १२२५) । अलमलवसह-दुदान्त वपम दुप्ट बैल-बलमलवसहा सप्ताक्षर नामनि गापाल' (दै १०२५ व)। अलय-विद्रुम, प्रवाल (दे ११)। अलस-१ माम । २ युमभ रग म रगा हुमा (दे १३५२) । २ मद-मधुर ध्वनि (पा ६०२) अलसदक-अतसी, घाय- विप (अवि पृ २२०) । अलाहि- पर्याप्त, परिपूण (पा १११।६१) । अलिय-पिन्छू का हक, माटा (विपा ११६।२३)। अलिअल्ली- १ सस्तूरिया। २ व्याघ्र (दे ११५६) । अलिआ-सयी (२ १११६) । अलिआर-दुग्ध (दे १२३)। अलिजरम-रगन पा बहा पात्र (पा २३) । अतिद -गार विशेष (अनुदा ३७५) । अलिदिगा-एस प्रसार पा जलपान (मावच २१७०)। अलिण- पशिप मिळू (२ १११)। अलित्तय-ौरा गापा या यश-असित्तमा बाहिरिया पिट्टा माला यगा (मान ३५७)। मलियाणमगर (१४)। अतिमिद-पार गि- अनिमित पप गागरा (निष २११०६)। अलीपट्ट-सेटर भी भारति पानी मागी पूटी (पित १९२०) । मनोगम- -~र पर (0) २२ देशी शब्दकोश अलेभड-अस्थिर-'तत्य नवमो वासारत्तो कओ, मो य अनेभो जामो' (आवहाटी १ पृ १४१)। अल्ल-दिन (अवि पृ २४२, दे ११५) । अल्लअ--परिचित ( १।१२) । अल्लकम्म-१ दैनिक व्यवहार की कला । २ सिंचन-कला ( पृ २३३) । अल्लट्टपलट्ट-पावं का परिवर्तन (दे ११४८)। अल्लट्टपलट्टया--पाश्व का परिवर्तन (दे ११४८ बृ)। अल्लत्थ-१ पानी से भीगा हुआ। २ केयर, बाजूबद (दे ११५.४) । अल्लपल्ल-विच्छू के टक की आकृति वाली तीगी टिया (विपाटी प ७१)। अल्लमुत्था-कद-विगेप (प्रसा २३८) । अल्लल्ल-मयूर (दे १११३) । अल्लविय-उठाना, भार ढोना-'तेण तास सत्य कोत्यलमो मल्लवियो' (उसुटी प २७)। अल्ला १ जननी, माता (दे ११५) । २ अवमीलन, माख वद करना (से १३।४३)। अल्लिय-पास मे आना (पव ६३७) । अल्लियअ-समीप-'गतू साहूणमल्लियओ' (पक ६००) । अल्लियाव-१ छीना हुआ (पक ४६२) । २ प्रवेश (आवचू १ पृ ४४६) । अल्लीण--आया-'न कोइ कयगो अल्लीणो' (व्यभा २ टी प ४६)। अवअक्खिअ-मुडाया हुआ मुह (दे १४०) । अवअच्चिअ-मासल (दे ११४७ वृ)। अवअच्छ-१ कोपीन, कक्षावस्त्र (दे १२२६) । २ काख, बगल (वृ)। अवअच्छिअ--निवापित मुख, मुडाया हुआ मह (दे ११४०) । अवअणिअ-असघटित, अयुक्त (दे ११४४) । अवअण्ण-उदूखल, उलूखल (दे १।२६) । अवइ-अनतकाय वनस्पति-विशेप (भटी पृ १४८५)। अवउज्जिअ-नीचे झुककर-'अवउज्जियत्ति अधोऽवनम्य' (आटी प ३४२) । अवएज --पात्र-विशेप (नाटी प ४८) । अवएड---पात्र-विशेप (ज्ञाटी प ४७) । अवएडय-तापिकाहस्त, तवे का हाथा (भ ११११५६) ।
दशी शब्दकोश २३ अवओडय-गले का मरोडना (विपा १२२११४)। अवओडयवधणय-वह व्यक्ति जिसके गने और हाथो को मरोडकर उनको पृष्ठभाग के साथ रस्सी से वाघ दिया जाए (अत ६२२) । अवग-कटाक्ष (दे १११५) । अवगुणित्ता-खालकर (भ १५।१४२) । अवगुणेत्ता-खोलकर (ना १।१६।६५) । अवगुत-उद्घाटित (भा ४०७१)। अवगुय-उद्घाटित (भ २।६४) । अवकड्ढित–पराजित-'अवकड्ढित पराहूते पराजित परम्मुहे (अवि पृ १०८)। अवकीरिअ-विरहित (दे ११३८)। अवकोडक-गले को मरोडना, कृकाटिका-गले के पिछले भाग को नीचे ल जाना (प्र ३११२)। अवक्करस-मद्य मदिरा (दे ११४६) । अवग-जलीय वनस्पति विशेष (मू २।३।४३) । अवगद-विस्तीण, विशाल (दे ११३०) । अवगर----कूडा (भटी पृ७३०) । अवगूढ- -~-अपराध ( १०२०)। अवचुल्ल-छोटा चूल्हा (निचू ३ पृ १०६)। अवचुल्ली -छाटा चूल्हा-'चुल्लीए ममीव अवचुल्ली (निचू ३ पृ. १०६)। अवच्छुरण-पोप वे वशीभूत होकर मनगल बोलना- किमिह जुत्त पिअम्मि अवच्छरण (दे ११३६ )। अवछुरण-त्रोध के वशीभूत होकर अनगल बोलना (दे ११३६) । अवज्झर--निझर विरोप (पाटी प १०६)। अवज्क्षस १ पटि कमर । २ पठिन (दे ११५६) । अवठम-ताम्बूल (६ ११३६) । अवड-१ रुप । २ माराम बगीचा (दे ११५३) । अवहम-१ तृण पुम्प, पास की बनी हुई पुष्पाति (३ ११२०)। २ यूप। ३ बगीचा (दे १०५३ ५)। अपहरिकममप मादि में गिसर मग हमा, जिगन बारमह्त्या की हा यह (३ १३४७)।
देशी शब्दक"ग २४ अवडाहिम-१ अभिशप्त । (दे ११४७) । २ उत्कृष्ट । अवडिअ-खिन्न (दे १।२१)। अवडिच्छि—अनपेक्षित (से १०।४१) । अवडुअ-उलूखल, ऊखल (दे १।२६) । अवड्डा-कृकाटिका (भटी पृ १२५७) । अवण-१ पानी की तीव्र धारा जो नीचे से ऊपर की ओर निकलती है। २ घर का फलहक (दे ११५५) । अवण्ण-अवगणना, अवना (दे १११७) । अवतंस-'पुरुपव्याधि' नामक रोग-विशेप (बृभा ६३३६) । अवतासाविय—अवश्लिप्ट (विपा १११५५) । अवतासित-बलात् आलिगित-'वलामोटिकया आलिंगित' (वृटी पृ १५१०)। अवत्त-उपलिप्त (वृभा ५८४) । अवत्तय-विसस्युल, अव्यवस्थित (दे १.३४) । अवत्थरा-पाद-प्रहार (दे ११२२) । अवदुस-ऊखल, छाज आदि सामान्य उपकरण (दे ११३०) । अवधिका-उपदेहिका, दीमक (प्र ११३३) । अवपक्क-तवा (नाटी प ४७)। अवपुसिम-संघटित, सयुक्त (दे १.३६) । अवमद--भाजन-विशेप (जबूटी प १००) । अवमिय—जिसको घाव हो गया हो वह, जख्मी (वृ ३)। अवयक्का-कडाही (भ ११११५६) । अवयक्खिअ-- मुडित मुख (दे ११४०)। अवयग्ग-अत, अवसान-'अवयग्ग ति देशीवचनोऽन्तवाचक.' (भटी प ३५.) । अवयच्छिय-१ प्रसारित (ज्ञाटी प १४४) । २ मुण्डित मुख (दे ११४०) । अवयड्डिय --युद्ध-क्षेत्र मे अपहृत (दे ११४६) । अवयत्थिय–प्रसारित–'अवयत्यिय-महल्ल-विगय-बीभच्छरत्ततालुय' (ना ११८७२)। अवयरिअ-विरह, वियोग (दे ११३६) । अवयाण-आकर्षण-रज्जु, खीचने की डोरी (दे ११२४)।
देशी शब्दकोश २१ अवयार-माघ-पूर्णिमा का एक उत्सव विशेष, जिसमे इक्षु-खड से दतवन करना मादि क्रियाए की जाती हैं (दै १३३२) । अवयास-आलिंगन (पिनि ५८१)। अवयासण-आलिंगन (कु पृ १७३) । अवयासाविस-आलिगित (विपाटो प ६७) । अवयासिअ-आलिंगित (बृभा ५७१०) । अवयासिणी-नासा रज्जु, नाक म डाली जाती डोर (दे ११४६)। अवयि-रोग विशेप (अवि पृ २०३)। अवरज्ज-१ गत दिवस । २ आगामी दिवस । ३ प्रभात (दे ११५६) । अवरत्त-पश्चात्ताप (दे ११४५) । अवरत्तेअ- पश्चात्ताप अनुताप (दे ११४५ व)। अवरद्धिग-१ लूतास्फाट, मकडी के काटने से होने वाला फोडा। २ सपदश (पिनि १४)। अवराह-कटि, कमर (दे ११२८)। अवरिक्क-अवकाश रहित, व्यस्त (दे १।२०)। अवरिज्ज-अद्वितीय (दे ११३६) । अवरिद्धि-१ मक्डी के काटने से होने वाला फोडा । २ सपदश (पिटी प १६३)। अवरिहड्डपुसण-१ अकीति । २ असत्य । ३ दान (दे १०६०) । अवरु डण-परिरभण, आलिंगन (पा ४६२)। अवरु डिअ-आलिंगन (आवहाटी १पृ १८३, दे १११) । अवरेय-रिक्तता (उशाटी प ३०५)। अवरोह-कटि कमर (दे ११२८)। अवलय-धर, मकान (दे ११२३) । अलिब-१ बाहर के दरवाजे का प्रकोष्ठ (ओलिंद')।२ दीमक का ढूह (मोलिभा दे १११५३ १)। (स्था २।३६१)। अवलिच्छिम-अप्राप्त-अवलिच्छिअसेससामरो मगरहरो' (से ६७८) । अवलिय-असत्य (दै १।२२)। अवलुआ-कोप (दे ११३६) । अवल्ल-बल (आवचू २ पृ १५३) । अवल्लक-नौका सेन का उपकरण-विशेष (सूचू १ पृ ३६) ।
२६ देशी शब्दकोश अवल्लय-नौका खेने का उपकरण-विगेप (नाचूला ३।१६) । अवल्लाव-असत्य कथन, अपलाप (दे ११३८ वृ)। अवल्लावअ-अपलाप, असत्य कथन (दे ११३८) । अवव--संख्या-विशेप-'चतुरशीतिरववाड़ा शतसहस्राणि एकमववम्' (जीवटी प ३४५) । अववंग-सख्या-विशेष (भ ५।१८) । अवसंतुइय--वाहर निकालकर (दअचू पृ ११५) । अवसमिआ-गूदा हुआ बासी आटा (दे११३७) । अवसह--१ उत्सव । २ नियम (दे ११५८) अवसावण-१ काजिका-'अवमावणं लाडाण कजिय भणई (बृटी पृ ८७१) । २ भात वगैरह का पानी। अवह-शरीर का अवयव (अवि पृ ६६)। अवहट्ट-अभिमानी, अहंकारी (दे ११२३) । अवहड-मुसल (दे ११३२) । अवहण्ण-उलूखल (दे १२२६ वृ) । अवहत्यरा-पाद-प्रहार (दे १।२२ वृ) । अवहन्त ऊखल (वृभा २६३३)। अवहाअ-विरह (दे ११३६) । अवहित्था—मन की अस्त-व्यस्तता, बकुलाहट (से १११६ टो) । अवहेअ-दया-पात्र, अनुकपा का पात्र (दे श२२)। अवहेडग-आधासीसी रोग (उशाटी प १४३) । अवहेडय-आधासीसी रोग, आधे शिर का रोग (उनि १५०) । अवहेडिय-नीचे की तरफ मुडा हुआ, झुका हुआ-'अवहेडिय पिट्ठसउत्तमंगे (उ १२।२६)। अवहेरी–तिरस्कार, अवहेलना (उसुटी प १९२) । अवहोडय-बन्धन का एक प्रकार, हाथ और सिर को पीठ से वाधना- 'अवहोडएण जक्खस्सेव पुरजो वघेऊण' (उसुटी प ३५) । अवार—बाजार, दुकान (निचू २ पृ १६०, दे ११२) । अवारी-दुकान, वाजार (दे १११२)। अवालुआ-होठ का प्रान्त भाग (दे १२२८)-'अवालुआ फुड फुडई' (वृ)। अविअ-कहा हुमा (दे १३१०) । - दशी शब्दकाश २७ अविच्छिय-प्रसारित (ज्ञाटी प १४४)। अविणयवइ-जार-पुरुष (दे १११८ व)। अविणयवर-जार-पुरुप (दे १११८)। अवियत्त-अप्रीति (व्यभा २ टो प ३४) । अवियाउरी-१ प्रसव करन पर जिसकी सतान तत्काल मर जाती हो वह स्त्री (ज्ञा ११२।८) । २ वध्या (आवचू ११ २६४) । अविरल्ल-अविस्तारित, एकत्रित (व्यभा ४१४ टी प १०)। अविरल्लण-अविस्तारित एकत्रित (व्यभा ५ टी प १०) अविराय-अविध्वस्त (जी ३।११८) । अविरिक्क-अविभक्त (व्यमा ६ टी प ६) । अविल- १ पशु । २ कठिन (दे ११५२)। अविला-गड्डरिका (पिटी प २०) ! अविहाड-१ बालक, बच्चा--'देशीभापया वालक (वटी पृ. ६०८)। २ अप्रक्ट (यभा ७ टी प ५)। अविहाविअ-१ दीन । २ मौन (दे ११५६) । अवेलि-खाद्य पदाथ विशेष (अवि पृ ७१) । अवेसि-द्वार फलक (दे ११८)। अवेसिण-चौखट, द्वार फलिह (पा ७६१) । अवोगिल्ल–अवाचाल-'महाराष्ट्रकमवागिल्लमवाचाल (व्यभा ७ टी प २५)। अवोच्चत्य-अविपरीत (निचू २ पृ १२६) । अवोवच्छ अविपयस्त (व्यभा ८ टी प ६)। अव्वग-अक्षत (व्यमा ६ टी प ६६) ! अव्वा-जननी, माता (दे ११५) । अव्वो-मम्बोधन-सूचक अयय (उसुटी प २१) । अव्वोकड्ह-पीचा हुआ-'उक्क ड्ढमोक्डढे त्ति वा पुणो' (अवि पृ८६) । अन्वोगड--१ अविभक्त 'अ वोगडमविभत्त (वभा ४७६६) । २ अविकृत-- 'वोगड अविगड (व्यमा ७ टी प ६१)। असखड-वाचिक क्लह (निचू ११४६) । असखडिय-कलह करने वाला (ओभा २२६) । असखडी-कलह (प्रसाटी प २२८) ।
देशी शब्दकोश २८ असंगय-वस्त्र (दे ११३४) । असंगिय-१ अश्व । २ अनवस्थित, चचल (दे ११५५) । असंथड-असमर्थ (आचूला ४।३२) । असंथडिय-अतृप्त (वृचू प २०८) । असंथडी-अतृप्त (वृभा ५८१७) । असंथर-१ दुभिक्ष-'असथर दुभिक्ख' । २ असमर्थ (निचू १ पृ ११६) । ३ अप्राप्ति । ४ अतृप्ति (व्यभा ४ टी प ८)। असंथरंत-१ तृप्त न होता हुआ (ओनि १८३) । २ समर्थ न होता हुआ (ओनि २१०) । असंथरण-१ निर्वाह का अभाव (आचू पृ ३३७) । २ असमर्थता (निचू १) । ३ पर्याप्त लाभ का अभाव (पंव ३)। असंथरमाण-१ तृप्त न होता हुआ (नि १०।३२) । २ समर्थ न होता हुआ। ३ खोज न करता हुमा (व्यभा ४ टी प ७१)। असंफर-नग्न पैर (वृभा ३८६५) । असंफुर-ऐसा रोगी जिसकी शक्ति क्षीण होने के कारण पैर सकुचा जाते हैं और जो ठीक से सो नही पाता (वृभा ३६०७) । असण-वृक्ष विशेप, एकास्थिक वृक्ष (भ ८।२१६) । असधीण--प्रवास मे गए हुए (निचू २ पृ १४२) । असरमाण-अनिर्वाह (निचू १ पृ ४१) । असराल-प्रचुर-'असराललोहपडिबद्धो' (कु पृ ३७) । असरासअ-कठोर हृदय वाला, निष्ठुर (दे ११४०) । असवत्तअ-तृणविशेष-'दम्भो कुभीचक्को वा गोल्लविसए असवनओ भण्णति' (आचू पृ ३५७)। असहीण-परदेश-गमन (निचू २ पृ १६१)। असाढय-तृण-विशेष (प्रज्ञा १४२) । असारा--कदली-वृक्ष, केले का वृक्ष (दे १११२) । असारिय-निर्जन स्थान (वृटी पृ १३७१) । असिअय-दात्र, दाती (भ १४१८५) । असिय-दात्र, दांती-'असिएहिं लुणति' (ज्ञा ११७।१५, दे १११४) । असियग-शस्त्र-विशेष, दाती-'सत्य वा असियगमादी' (सूचू २ पृ ३४१) । असिया-मसा का रोग (आचू पृ ३७२) ।
देशी शब्दकोश २६ असीमालिका–ठ का आभूपण (अवि पृ १६२) । अह-दुख (द श६)। अहट्ट-आडम्बर, उपाधि (आवचू ११४४६) । अहर :-असमथ (दे २०१७)। अहवण-१ अथवा-'अहवण' त्ति अखण्डमव्यय अयवार्थे वत्तते' (वटी पृ ३०३) । २ वाक्यालवार म प्रयुक्त हान वाला अव्यय । अहव्वा-असती, कुलटा (द १।१८) । अहासयड-- निकम्प, निश्चल- अहासयड नाम णिप्पकप (निचू २१ १७०)। अहिअल-योप प्राध (द १२३६) । अहिझार-लायात्रा, लाकव्यवहार जीवन-यात्रा (द ११२६) । अहिवखण-१ उपालम (द ११३५) । २ बार-वार-अभीक्षणमित्य य (१)। अहिगर-अजगर (जीव १)। अहिगरणसाला-लोहवारशाला (मटी पृ १२८२) । अहिगरणिखोडि-अहरन को रयन या काष्ठ-विशप (भटी पृ १२८२) । अहिगरी-अजगरी (जीव २)। अहिड्डय–पीडित (पा ५४६) । अहिणुका -माप की एक जाति (अवि पृ २२६) अहिणूका-सर्पिणी (अवि पृ ६६) । अहिपच्चुइम-१ अनुगमन, पोछे-पीछे पलना (द ११४६) । २ आपात मागत। अहिमर-१ वधय (निचू ३ पृ ३७) । २ आघात परन बार घोर अश्य आदि या घुगन याल पार-'अहिमरा गाम ददरमारा, अम्गहरण पा मारण वा पाउयामा (निचू १ पृ ५३) । अहिमार-पुष्प पल याला पक्ष विशेष (अपि पृ २३२)। अहिमार-या विष- एग अहिमायग्य (उमाटी ५ १४३) । महिरिपक-उरलाग भय (व्यमा ३ टी प १०)। अहिरोम-निराज पीना ( १०२७) । अहिरेमहस-पूण भरा हुमा (पा १४२) । यत्तिाण-मुग पापा-पिप (मरी पृ८८२) ।
देशी शब्दकोश
अहिलिअ-१ अभिभव, पराभव । २ कोप (दे ११५७) ।
अहिलूका-चतुरिन्द्रिय जतु-विगेप (अवि पृ २३७) ।
अहिलोडिका-जीव-विगेप, गोपालिका (बृटी पृ १५४८) ।
अहिलोढी-सरटी, मादा गिरगिट-'महिलोढी मरडी वि भण्णति'
(दश्रुचू प ६८)।
अहिल्ल-ईश्वर, धनवान् (दे १।१०) ।
अहिवण्ण-पीले और लाल रग वाला (दे ११३३) ।
अहिविण्णा-उपपत्नी (दे १।२५) ।
अहिसंधि-वार-वार, पुन -पुन (दे ११३२) ।
अहिसाय-परिपूर्ण (दे १।२०) ।
अहिसिअ-१ अनिप्ट ग्रहो की नाशका से ग्वेद करना, रोना (दे ११३०) ।
२ अनिप्ट ग्रह से भयभीत ।
अहिहर–१ देवकुल, पुराना मन्दिर । २ वल्मीक (दे ११५७) ।
अहिहाण–प्रशसा, स्तुति (दे ११२१) ।
अहोरण-उत्तरीय वस्त्र (दे ११२५) ।
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आ
६
आअ-१ मध्ययन, परिच्छेद-'अज्झयणं अज्झीण आमो अवणा य एगट्टा'
(निचू १ पृ ५)। २ वहुत। ३ दीर्घ । ४ कठिन । ५ लोहा ।
मुसल (दे १७३)।
आअड्डिअ-दूसरे की प्रेरणा से चलित (दे ११६८) ।
आअड्डि-आकृप्ट (से १११६) ।
आअर-१ उदूखल । २ कूर्च, दाढी (दे ११७४) ।
आअल्ल-१ रोग । २ चंचल (दे ११७५) ।
आअल्लि-लताओं से सघन प्रदेश (दे ०६१) ।
आअल्ली-लतामो से सघन प्रदेश (दे ११६१) ।
आई-वाक्य की शोभा के लिए प्रयुक्त अव्यय-'आइ ति देशभापायाम्'
(नाटी प १६५) ।
देशी शब्दकोश आइखणा-कणपिशाची देवी (प्रमा ११३) । आइखणिया-१ कणपिशाचिका देवी। २ डोंबी, चाडाली-'माइखणिय त्ति इक्षणिका देवना आख्यात्री लाकसिद्धाडोबी (पवटी प २३२)। आइखिणिया-१ डामिनी, घडालिनी (वभा १३१२)। २ कण पिशाचिका देवी (निभा ४२६०)। आइण्ण-१ कुलीन घोडा (प्र ४१७)। २ पिरोना-'मोतिय आइण्णता आगासे उक्खिवित्ता (आवहाटी १ पृ २८५) । आइद्ध-प्रेरित (से ६१७)। आइप्पण-१ चूण, आटा । २ उत्सव म गह शोभा के लिए चूना आदि की पुताई (दे ११७८)। उत्सव के प्रसग पर गह गहद्वार का सजाने के लिए गीले चावल के आटे से विभिन्न आकृतिया का निर्माण करना (व)। भाइसण--उज्झित, त्यक्त (दे ११७१)। आउ-१ नक्षन दव विशेष (स्था २।३२४) । २ जल (सू २०१।२७, द ११६१)। आउवालिय-आप्लावित (पा १३६) । आउट्ट-१ आदर, सम्मान-~-'विं मम एदहण आउटटेण' (गाटी प १४६) । २ प्रणत (व्यमा ६ टी प १८) । ३ करना-'करणा आउट्ट शब्द (दयुचू प ६८)। माउट्टण-निवेदन (वमा २६३) । आउट्टणा-आराधना प्रसन्न करना (निघू २ पृ १०६) । आउट्टि-अमयम (य्यभा १ टी प २४) । भाउट्टित-आराधित- आउट्टिता इट्टदाण दहिति (निचू २ पृ १०६) । भाउट्टिया-जानबूभयर-'आउट्टिया णाम आभागा-जानान इत्पप' (निचू ३ पृ ३१७)। भाउडिज्जमाण-१ आमवध्यमान । २ परस्पर भायमान (भटी प २१६)। ३ पीटे जाते हुए (मू रा२।४०) । भाउरमप्राम (६ ११६५) । माउल-अरप्प (१ १६२) । माउलि-पग विशेष (गरी पृ८६, ६५१५)। माउस-गरम (नीति पृ १३०) । एमाली (८१५)। मारिस-ए मसी पान पानी प्रनिगा ( १९६६) ।
देशी शब्दकोश आधारिका-तापसो का चर्ममय 'थोकनउ' जो काख मे धारण किया जाता है (नदीटि पृ १०१)। आपुरायण-गोत्र-विशेप (अवि पृ १५०) । आफकी-वृक्ष-विशेप (अवि पृ ७०)। आफर-बूत, जुआ (दे श६३) । आभट्ठ-विज्ञप्त, सभापित (उशाटी प १७३) । आभोग-उपकरण-'एगाभोग पडिग्गह केई सव्वाणि न य पुरमो', आभोग उपकरणम्' (ओनि ३६, टी प ३३) । आभोगिणी-मानसिक निर्णय कराने वाली विद्या-विगेप (वृभा ४६३३) । आमंड-आवला (आवहाटी १ पृ २६१) । आमंडण-भाण्ड, पात्र (दे ११६८) । आमंथिय (ओमंथिय ?)-ओधा किया हुआ (कु पृ २७) । आमडाग-१ कच्चे पत्ते । २ अर्द्धपक्व या अपक्व मरणिक-तंदुलक (आटी प ३४८) । आमलक-बहुवीजक वनस्पति-विशेप-'नवरमिहामलकादयो न लोक- प्रसिद्धा प्रतिपत्तव्या, तेपामेकास्थिकत्वात्, किन्तु देशविशेप- प्रसिद्धा वहुवीजका एव केचन' (प्रज्ञाटी प ३१) । आमलय-१ नूपुर रखने की पेटी । २ सज्जागृह (दे ११६७) । आमलिता-पूपिका (१) (आचू पृ ३४२) । आमली-छोटे आंवलो का वृक्ष (अवि पृ ७०) । आमिल-समस्त प्रकार के रोम, केश-'आमिलं सव्वरोमजाति' (दनि १५८, अचू पृ १४१) । आमेल-केशो का एक प्रकार का जूडा, वालो को बाधने की एक पद्धति (दे ११६२) । आमेलअ-आमोडक, वालों को वाधने का पुष्प-निर्मित बंध-विशेष (उशाटी प १४३)। आमेलिस-आपीड, पुष्पमाला (से ६।२१)। आमोअ-हर्प (दे १६४) । आमोड-केशो का एक प्रकार का जूडा, वालो को बांधने की एक पद्धति (दे श६२)। आमोरम-विशेषज्ञ, दक्ष (दे ११६६)। आमोसल-गोत्र-विशेष (अंवि पृ १५०)।
देशी शदकोश आय-१ कुहन वनस्पति विप (प्रना ११४७) । २ वनस्पति विशेप से बना वस्त्र-'आय पाम तोमलिविमए मीयतलाए अयाण खुरेसु सेवालतरिया लग्गति तत्य वत्या कीरति' (निचू २ पृ ३६६) । ३ देश विशेष की जजा-बकरी के मूक्ष्म राम से निर्मित वस्त्र (माटी प ३६३) । आयचण-गामूत्र, गोवर, मगनी तथा खारी मिट्टी आदि(निचू ४ पृ ३५८)। आयचणिया-मुभकार का वह पात्र, जिसम वह घडा आदि बनाते समय मिट्टी का पानी रखता है (भटी पृ १२५७) । आयस-बल मादि के गन का आभूषण- आदशस्तु वपमादिग्रीवाभरण (अनुद्वामटी प ४३)। आयड्ढि–विस्तार (द ११६४) । आयल्ल-राग (पा ८०) । आयल्लय-वेचन करने वाला ददनाक-नायल्लयवत्ततो जइ वि तए साहियो' (कु पृ १८१)। आयावल-वाल आतप, प्रात कालीन सूय का आतप (द ११७०)। आयाम–१ बल । २ दीघ (द श६४) । मायावल-मुबह की धूप (द ११७०)। आयायलय-सुबह की धूप (पा ६०६)। आयासतल-प्रामाद का पिछला भाग (द ११७२)। आयासलव-पक्षिगह नीड (द ११७२)। आयुस-गुररुम, हजामत- पहाविता पुच्छिना-ण आउस कारित ' (नदीटि पृ १३६)। आयोइल्लाग-मंदी (दश्रुचू प ३९) । आरदर-१ जनमकुल । २ ममीण (द ११७८)। यारमिय-मालावार माली (द १७१)। थारपुड-धातु-विोप, पीतल (अवि पृ १६२)। वाडिस-१ विताप अन्दन । २ सचित्र (८ ११७५ )। भारण-अपर, हाट (- ११७६)। थारणाल-१ पमन (दे ११६७)। २ माबी (य) । आरद्ध-१ प्रवृट । २ उमुर । ३ पर म माया हुआ (२ ११७५)। आरनाल-माजी-रजिर दगीमागाए भासा IT' (निष ११७१)।२ समन (२०६७)। आरवी --भारी, मरर दामादागा (पा ११०८२)।
देशी शब्दकोश आराइस-१ स्वीकृत । २ प्राप्त (दे ११७०) । आराडि-क्रन्दन (आव २ पृ १६५) । आराडी-१ विलाप । २ चित्रो से मडित (दे ११७५.) । आरिग—आरी, शस्त्र-विशेप (पक २०२४) । आरिल्लतत्काल उत्पन्न (दे ११६३) । आरेइअ-१ मुकुलित । २ मुक्त । ३ भ्रान्त । ४ रोमाञ्चित, पुलकित (दे ११७७)। आरोग्गिअ-भक्षित, खाया हुआ (दे श६६)। आरोट्ट–१ 'अरोडा' जाति-विशेप । २ छात्रजाति का सवोधन ( पृ १५१)। आरोस-म्लेच्छ जाति-विगेप (प्र ११२०) । आरोह–स्तन (दे ११६३) । आल-१ व्यर्थ, निरर्थक-'मए आलो अन्भुवगमो, कि सक्का इयाणि निव्वहिउ ?' (बृटी पृ ५६) । २ कंलक, दोपारोपण (प्रमाटी प १४५) । ३ छोटा प्रवाह । ४ कोमल, मृदु (दे ११७३) । आलइअ-पहना हुआ, आविद्ध-'मालइअमालमउडो' (आवहाटी १ पृ १२३)। देखें-लइम। आलंकिअ-लगडा किया हुआ (दे ११६८)। आलंब-भूमिछत्र, वनस्पति-विगेप जो वर्षा में उत्पन्न होती है (दे ११६४) । आलक-चतुरिन्द्रिय जतु-विशेप (अवि पृ २३७) । आलजाल—ऊलजलूल, निरर्थक-'आलजाल अणेगविहाइ सदेसकहं तेसिं दूर' (निचू ३ पृ ३५५)। आलत्थ-मयूर (दे ११६५) । आलप्पाल-१ आल-जजाल-'एय आलप्पाल अव्वो दूर विसवयइ' (उसुटी प २१) । २ दुराचार, कलक-'आलप्पाल आढत्त' (कु पृ ४७)। आलयण-शय्यागृह (दे ११६६) । आलास-वृश्चिक, विच्छू (दे ११६१) । आलि-वनस्पति-विगेप (जवूटी प ४५) । आलिगिणी-१ जानु, कूपर आदि के नीचे रखने का तकिया (बृभा ३८२४) । २ रूई का वड़ा विछौना (व्यभा १० टी प ७१) ।
देशी शब्दकोश ३७ , आलिसद-धान्य विशेष (प्रना १४५१)। आलिसदग-धाय विशेप, चवला (भ ६।१३०) । आलीघरय-वनस्पति विशेष (ना श६।२०)। आलील-निकट भविष्य म होने वाला भय (दे ११६५)। आलोवण-प्रदीप्त अग्नि (दे ११७१) । पलेवणु (गुज)। आलु-आलू, क द विशेष (भ २३१२) । आलुका-कुण्डिका, छोटा घडा (अनुटी पृ ५) । आलुगा-छोटा घडा (मूचू १ पृ ११७) । आलुय-आलू, कद विशेष (भ २३११)। आलुया--कुडिका (अतटो पृ ५)। आवग 1- अपामाग का वक्ष (२०६२) । भावट्टिआ–१ नववधू । २ परतत्र स्त्री (दै ११७७) । आवडिअ-१ सबद्ध । २ सार (दे ११७८) । आवरेइम-कारिका, मद्य परोसन का पात्र (दै ११७१) । आवलिका -कठ का आभूपण-'हार अद्धहार-आवलिका' (अवि पृ १६२) । आवल्ल-बलीवद, बैल (उशाटी प १६२) । आवल्लक-१ नौका चलाने का एक माधन । २ वलयवाहा-नौका का लवा काष्ठ जिस पर ध्वजा वाघी जात है-दीघकाप्ठलक्षणवाहुपु आवल्लकेप्विति सम्भाव्यते (नाटी प १४३) । आवाडा-चिलात, एक अनाय जाति-'आवाडा नाम चिलाता परिवसति (मावचू ११ १९४)। आवाल-जल के निकट का प्रदेश (दे ११७० व)। मावालय-जल के निकट का प्रदेश (टे ११७०)। मावाह-१ वरपक्षमवधी भोज (व्यमा ६ टी प८)। २ नव विवाहित वर- वधू का लाना-'मावाह अभिनवपरणीतस्य वधूवरस्यानयनम् (प्रटी प १३६)। आवि-१ प्रसव पीडा । २ नित्य । ३ दप्ट, देखा हुमा (दे ११७३) । माविस-१८द्रगोप, क्षुद्र कीट विशेष । २ मथित (दे ११७६) । ३ पिरोया हुमा (पा ६५५)। माविमझा-१ नववधू । २ पराधीन स्त्री (द ११७७)। माविद्ध-प्रेरित (दे ६३) ।
३८ देशी शब्दकोण . आवेल्लक-नीका चलाने का साधन, दाट (नाटी प १४३) । आवेल्लय-यानपात्र चलाने का साधन-'चालियाईमावेलयाइ' (कु पृ ६७)। आसंग-शयनकक्ष, वामगृह (दे ११६६) । आसंघ-१ अध्यवसाय, परिणाम (से ११२५) । २ श्रद्धा । ३ भागमा । आसंघा-१ इच्छा (दे श६३) । २ आस्था (बृ) । ३ आमक्ति । आसंघिअ-१ मध्यवसित । २ अवधारित (से १०।६६) । ३ मभावित । आसक्खअ-पक्षि-विगेप (दे ११६७) । आसय-निकट (दे ११६५) । आस मिठ'-अश्व-प्रशिक्षक (नि ६।२५) । आसरिअ—सम्मुख आया हुआ (टे ११६६) । आसल-स्वादिष्ट (जीवटी प ३५१) । आसवण-गयनकक्ष, वासगृह ('दे १२६६) । आसातिका-कृमि-विशेप (अवि पृ २२६) । आसालिका-द्वीन्द्रिय जन्तु (अवि पृ २३७) । आसिअअ-लोहमय, लोह-निर्मित (टे श६७) । आसित्तिया-खाद्य-विगेप-विसाहाहिं आसित्तियामओ भोच्चा कज्ज साधेति' (सूर्य १०।१२०)। आसिय-जाना, निकलना-'आसिय ति णिग्गच्छति' (निचू २ पृ २७६) । आसियग--लोह निर्मित शस्त्र-विशेप (मूचू १ पृ ११६) । आसियावण अपहरण-'तुच्छलोभेण य आसियावणादी भवे दोसा' (निभा २४५२)। आसियावित-अपहृत (निचू ३ पृ २१) । आसीव-दरजी, वस्त्र सीने वाला (दे ११६६)। आसीसा आशीर्वाद (प्रा ३।१७४) । आसूणिय-उलाघा, प्रशसा-'आसूणिक णाम श्लाघा, येन परैः स्तूयमान' सुज्जति' (सूचू १ पृ १७८) । आसूय-औपयाचितक, मनौती (पिनि ४०५) । आसेक्क–नपुसक-विशेप (अवि पृ २२४) । आहच्च--१ आकर, उपस्थित होकर-'सति संपाइमा पाणा, आहच्च सपयतिय' (आ १११६४) । २ कदाचिद् (प्रज्ञा १७१२) ।
देशी शब्दकोश ३६ ३ अत्यधिर (दे श६२) । ४ गोघ्र । ५ व्यवस्था करखे । ६ छीनपर। ७ नयथा । ८ निवारण । बाहट्ट-प्रहेलिका, पहलिया-'तमु न विम्हयइ सय, बाहट्ट-यूहहएहि घ' (पमा १३०१)-'माह ति प्रहतिया (प्रसाटी प १८०)। माहरणा-परटि, घारण आहरणा पाग्यति घोरण पराति महता पम्देन' (आटी प२८)। थाहाडक-विलाशयो प्राणी (अवि पृ २२६) । थाहाडीय-वार-बार आना-जाना (आवटि प २४) । आहित्य-१ बाकुल-आहित्य उप्पिच्छ च पाउल रोसरिय च' (जीवटी प १९४, दे ११७६) १२ कुपित । ३ चरित (द ११७६)। माहिरिक्क--प्रतीपार (दयुचू प ४३) । माहु-उल्लू (दे १६६१)। आहुदुरयालक-बाहदुरा परि-हरीण (दै १६६) । आदुरु यालय (दे ११६६ व)। आहुड-१ अनुराग की बावाज, मीतार-रति म 'सी भी पो प्यनि । २ येचन योग्य वस्तु ( १७४) । आहुडिम-निपानित, गिराया हुआ (दे ६६) । आहेण-~१ वियाह ये याद यपू प्रयेग से समय दिया जान याला भोग । २ अन्य परा मे साइजान वाली भाजन-गामग्री।३ जामोग्य- पदाप वधू प पर से परदे पर म म जाया जाता है, यह । ४ परपक्ष और यपूपा पा पारस्परिप सा-देन-गमन्नगिहागो मापिग्मति न वाहप ज यागिहाला वर्ग पिग्मति माह मापा पग्य ज मामय परो र पिग्मति स गर मारल्य' (नि३१२२२२३)। महेपर----आप (निगू ३ १ २२३) । यारिय-गामिन, परमाणित (माम् १३६३) । सपन-रि frarentre देशी शब्दकोश चालिज्जति, तत्थ देवता काधिति, कहेतस्म पसिणापसिणं भवति, स एव इखिणि भण्णति' (निचू ३ पृ ३८३) । इंखिणिया-१ अवहेलना-'अदु इखिणिया उ पाविया' (मू १२।२४) । २ घुघरु, घटिका-इखिणियाओ-पटियामो' (आवचू १ पृ १५७)। इंखिणी-१ खिसणा, निन्दा-'अहऽसेयकरी अण्णेसि इखिणी' (मू श२।२३) -'इखिणी णाम खिसणा निन्दणा हीलणा' (मूचू १ पृ ५६) । २ किंकिणी, छोटी घटिका (आवदी प ६०)। इंगाली-इक्षुखण्ड (दे ११७९) । इंघिय-वात, सूघा हुआ (दे ११८०) । इंचक-मत्स्य-विशेप (अवि पृ २२८)-'इंचका कुडुकालक सित्यमच्छका....' इंदगाइ-वे कीट जो युक्त होकर एक के ऊपर एक चढकर घूमते हैं (दे ११५१)। इंदग्गि-हिम, वर्फ (दे ११८०) । इंदग्गिधूम-हिम, वर्फ (दे १।८०) । इंदट्ठलअ-'इन्द्रमह' उत्सव की सपन्नता पर विधिपूर्वक 'इन्द्रध्वज' को हटाना (दे ११६२) इंदडलय-'इन्द्रमह' उत्सव की सपन्नता पर विधिपूर्वक 'इन्द्रध्वज' को हटाना (दे ११८२)। इंदमह-१ कार्तिकेय । २ कुमारावस्था (दे ११८१)। इंदमहकामुय-कुत्ता (दे ११८२) । इंदिआलि-भूमीकर्म की विद्या का अभीष्ट शब्द, मत्र-विशेप का गब्द- 'इमा भूमीकम्मस्स विज्जा-इदिवाली इंदिनालि माहिदे मारुदि स्वाहा' (अवि पृ८)। इंदिआली-भूमिकर्म की विद्या का अभीष्ट शब्द, मत्र-विशेप का शब्द (अवि पृ८)। इंदिदिर-भ्रमर (दे ११७६)-'कैश्चित् इदिदिर शब्दोऽपि देश्य उक्त' । इंदोवत्त-इन्द्रगोपक, वर्षाऋतु मे होने वाला लाल या सफेद रंग का कीट- विशेप (दे श८१)। इक-प्रवेश-'इकमप्पए पवेसणमेय' (विभा ३४८३)-'इकशब्दो देशीवचनः क्वापि प्रवेशार्थे वर्तते' (टी पृ ३४३) । .
देशी शब्दकोश ४१ इक्कड-तृण विशेष-वणस्सतिभेदा इक्कडा लाडाण पसिद्धा' (निचू २ पृ४८१)। इक्कण-चोर (दे ११८०)। इक्कलिया-अकेली (उसुटी प १४५) । इक्कल्लय--अकेला (उसुटी प ११२) । 'इक्कास-१ रम विशेष (अवि पृ १३४) । २ भोज्य (अवि पृ १०१)। ३ गुग्गुल वृक्ष का गोद (अवि पृ २३२)। इक्कुस-नीलात्पल (दे ११७६) । इग--अवयव, प्रदेश-'इगमवि देशीपद क्वापि प्रदेशार्थ वतते' (आवहाटी १ पृ ३१६)। इग्ग-भयभीत (दे ११७६) । इग्घिम-भस्मित (दे ११८०) । इज्जा-१ मा । २ देवी । ३ देवपूजा-'इज्जत्ति वज्जा माया मज्जा भणिया देवपूया वा इज्जा (अनुद्वाचू पृ १३), 'देशीभापया इज्यति माता' (अनुद्वामटी प २६)। याद्य विशेप,सेवई (पिनि ४६१)। इट्टगा -खाद्य विशेप, सेवई (जीमा १३६७) । इट्टाल-इंट (द श६५)। इड्डकार-वधकी, वढई (अवि पृ १६१)। इडर-१ धाय रखने का काठा (अनुद्वा ३७५) । २ गाडी का एक अवयव (ओटी पृ ३७४) । ३ ढक्कन (भटी ५३१३) । इड्डरक-बडी पटी- इडहरक महत् पिटक येन समस्तापि रमवती स्थभ्यते' (राजटी पृ ३२५) । इड्डरग--क्कन-पईव इडरय अतो अतो ओभासेइ इहरगस्म बाहि (म ७१५६)। इड्डरय :-रान-त पईव रहरएण पोहज्जा (भ ७३१५६)। इड्डरिका-१ याविरोप, इडली-रात्रिपरिवसनन सम्पन्न हुरियादि, यतस्ता पयुपित पलनीता अम्मरमा भवन्ति (स्पाटी प २१३) । एष प्रकार की मिठाई(प्रमाटी १५१)। इनिगे-चावर या ग्वा और उदद से निषन याच पिरोप नो चेव इडिर-गाही का एव अवयव (मोनि ४७८)।
देशी शब्दकोश ४२ इड्ढिसिय-याचक-विशेप (भटी पृ८८४) । इणं---यह (दे ११७६ वृ)। इण्हि-अव (पिनि ६३४, दे १९७६ वृ) । इणमो~-यह (दे १७६ वृ)। इतिपिडि-भोज्य-विशेप-'सत्तुपिडि.......तप्पणपिंडि त्ति इतिपिडि ति' (अवि पृ ७१)। इत्ताहे-इस समय (व्यमा ४१३ टी प १६)। इत्तोप्पं-इत प्रभृति, यहा से लेकर (पा ४४८) । इत्थीदोस-व्यभिचारिणी-'इत्थीदोसो णाम व्यभिचारिणी' (सूचू १ पृ १०८)। इदूर-सूत आदि से वुना हुआ धान्य रखने का साधन-विशेप-सुम्बादिव्यूत ढञ्चनकादि तदिदूर' (अनुद्वामटी प १३६) । इदंड-भ्रमर (दे ११७६)। इद्ध-चित्त-'इद्ध चित्त भण्णति' (जीभा २५२६) । इन्भ-वणिक, व्यापारी (दे ११७६) । इय-१ इस प्रकार (वृभा २१५२) । २ प्रवेश । इर-किल-सभावना, निश्चय आदि अर्थो का सूचक अव्यय (प्रा २।१८६), इरमंदिर-करभ, ऊट (दे १२८१) । इरहा-अथवा--'जइ रायवसेण अन्ने ण सम वसेज्जा । इरहा वभचारिणी' (उसुटी प ३०)। इराव-हाथी (दे श८०) । इरिआ-कुटी, झोपडी (दे ११८०) । इरिकाक-पुप्प-विशेप-तधा चपगपुप्फ ति इरिकाक ति वा पुणो' (अवि पृ ६३)। इरिण-१ स्वर्ण (दे १७६) । २ सुन्दर-'रमणीयेसु इरिण वा' (अवि पृ १३४) । इरिमंदिर-लक्ष्मी-मदिर-'इरिमदिरि पत्तहारतोगततो मज्झ कतो वणिजारतो' (दअचू पृ २८) । इलअ-छुरिका-'इलएण छिहलि छिदित्ता भणति' (निचू १ पृ २१)। इलिका क्षुद्र जतु, इल्ली (अत्रि पृ २२६) । इलिया-क्षुद्र जन्तु (वृभा १२०) ।
इन्स-रिसामन। ३ प्रतीहार द्वारसान | ४ मचित्र
या पाना (१९८२)।
इन्लि~१ माघ । २f (VEDIY सामना
प्रारम (मयि ७१)।
इल्लीर-१ महारा, शशिरा माया।३ परागमन ।
गायन (₹ ११३).
इसिप-याम नारा (11)।
[अपपा (मादी ११६०) ।
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यिगर (एमा २१)।
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गिम- 'नार मा (१)।
ईसर- (iv)।
गिम-मर गिर र माग marti
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रंगी-IIIrfrre rrrrr (MT)।
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उ
देशी शब्दकोश उअचिय-परिकर्मित (औपटी पृ ३२) । उअट्टो–नीवी, स्त्री का कटिवस्त्र या कटिवस्त्र के दी जाने वाली रस्सी की गाठ, नाडा (नारा) (पा ४६१)। उअत्त-निष्क्रात, अतिकात-'जाहे जल वेलाए उअत्त भवति' (निचू ३ पृ. १४०)। उअपोत-आकीर्ण, व्याप्त-'उअपोते देगीपदत्वाद् आकीर्णे' (वृटी पृ ८८६)। उअरी-शाकिनी, देवी-विशेप (दे ११९८)-'उछयवाडे मज्जारित्वयाओ भमन्ति उअरीओ' (वृ)। उअह--देखो-'उअह त्ति पेच्छहत्थे' (दे ११९८) । उअहारी-दोहन करने वाली स्त्री (दे १११०८) । उआलि–अवतस, शिरोभूषण (दे श६०) । उइंतण-उत्तरीय वस्त्र, चादर (दे १११०३) । उंगुणी-वनस्पति-विशेप (अवि पृ ७०) । उंचहिमा-चक्रधारा (दे १११०६) । उंछ-१ गर्दा, जुगुप्सनीय (मूटी १ प १०८) । २ छीपा, कपडो को छापने वाला (पा ७७०)। उंछय-वस्त्र छापने का काम करने वाला (दे श६८)। उंजण-उत्सेचन (दजिचू पृ १५६) । उंड--१ मुख-'देसीवयणतो उड-मुह' (अनुद्वाचू पृ १३)। २ अडा, गहरा (औपटी पृ ५, दे ११८५)-'खणिा उड्डेहिं कूवया य अइउडा' (वृ)। उंडअ-पाव मे पिण्डरूप मे लग जाए उतना गहरा कीचड (ओभा ३३) -'उडका -पिण्डकास्तद्पो यो भवति, पादयोर्य पिण्डरूपतया लगति स पिण्डक इत्यर्थ' (टी प २६)। उडे-मिट्टी, गोवर (कन्नड)। उंडग-१ स्थण्डिल (द ४१२३) । २ पिण्ड, लोथडा-'बालाई मसउडग मज्जाराई विराहेज्जा' (ओभा २४६) । उंडणाही-अतरिक्ष मे होने वाले क्षुद्र जतु-'अतलिक्खेसु सताणका उंडणाही घुक्कभरधा वा वि विण्णेया' (अवि पृ २२६) । उंडय-मासपिण्ड-'तेसि जीवंतगाण चेव हिययउडए गिण्हावेइ' (विपा ११५।१४)। उंडरुक्क-मुह से वृषभ की भाति शब्द करना-'देसीवयणतो उड-मुह तेण देशी शब्दकोश ४५ रुक्कति मद्दकरण, त च वसभढिक्कियाई' (अनुद्वाचू पृ १३) । उडल-१ मच, मचान । २ समूह (दै १११२६) । उडि-~मुद्रा (व्यमा ६ टीप ३५) । उडिम-मुद्रा वाला (व्यभा ६ टी प ३५) । उडिय-~मास पिण्ड-'तेसि जीवतगाण चेव यियउडियामा गिण्हावेई' (विपा ११५४१५)। उडिया--मुद्रा-विशेष, पत्र पर लगाई जान वाला मुहर (भा १८६) - उदिया लेहस्स मुद्दा इति चूणो (टी पृ६१) । उडी-पिंड, गोलाकार वस्तु-तत्य ण एगा वणमयूरी दो पुटठे परियागए पिटुडीपडुरे निव्वणे निरुवहए भिण्णमुट्ठिप्पमाणे मयूरी-अडए पसवई' (ज्ञा १२३३५)। उडय-स्थान-सपिंडपायमागम्म उडुय पडिलहिया (द ५११९७) । उडेरग-एक प्रकार का धाय (आपचू २ पृ ३१७) । उडेरय-खाद्य वस्तु, वडा (भावचू २ पृ १६८) । उदिय-मकुचित-'जह वा उढियपादे पान काऊण हत्यमा पुरिसे' (व्यमा १० टी प ७३)। उत-मत्र का अभीष्ट शब्द देव विशेष (अवि पृ९) । उदर-चूहा (उशाटी प १६६) । उदु-मुख-'देशीवचन उदु-मुख (अनुद्वामटी प २६) । उदुक-स्थान-- उदुम् इति स्थानम्' (यटी पृ ३८०)। उदुयः -स्थान (भा १२२३) । उदुर -१ वक्ष पर रहन वाला प्राणी- विप (अवि पृ २२६) । २ पवत की पदरा म रहन वाला प्राणी-विरोप (अवि पृ २२७) 1 उदुरम-नम्बा दिल (दै ११०५) । उदुरी-पुहिया (अवि पृ.६६) । उदुरुषक-मुह म पन यो भाति पर परना-'उदुरपर ति देशीयपन उद-मुरा ता सर -- पभादिापरणमुटावर गवतादिपुग्नो यपमगजितारिपरपमित्यय' (अनुदामटी प २६) । उदोइया-पिया (यूटी ६०)। उयमरिया-एमाम्यिप यक्ष विशप (म ८१२१६०२) । उपर-प्रपुर (द ११९०) । उपरजाप- यी यातुल्य यपूय उनति (१९१९)।
४६ देशी शब्दकोश उंबा-बन्धन (दे ११८६) । उंवी —पका हुमा गेहू (दे ११८६)। उंवेभरिया-एकास्थिक वृक्ष-विगेप (प्रजा ११३५) । उकरड-कूडा-करकट डालने का स्थान-'भापायाम् उकुरडो इति प्रसिद्धं मलनिक्षेपणस्थानम्' (राजटी पृ २६) । उकुरटिका-अकुरड़ी, कूडा डालने का स्थान (ओटी प १६२) । उक्क-पाद-पतन, पैरो मे गिरना (दे ११८५)। उक्कंचण-१ वधन-'वंसग कडणोक्कचण छावण छेवण दुवार भूमी य' (वृभा ५८३) । २ माया (दश्रुचू प ४०) । ३ झूठी प्रशसा, चापलूसी, अगुणी के गुण बताना (ज्ञाटी प ८६) । ४ घूस, रिश्वत । ५ मूर्ख या भोले पुरुप को ठगने वाले धूर्त का, समीपस्थ विचक्षण व्यक्ति के भय से, कुछ समय के लिए निश्चेण्ट रहना (ज्ञाटी प २४५) । ६ मानोन्मान मे कुटिलता करने वाले ठग का, अधिकारी की उपस्थिति मे, कही यह राजा को मेरी शिकायत न कर दे, इस चिन्तन से छुप जाना (सूचू २ पृ ४६२) । उक्कंठुलय-उत्सुक (कु पृ १३४) । उक्कंडा-रिश्वत, लचा (दे श६२) । उक्कंति-कूपतुला, कुए से पानी खीचने का साधन (दे ११८७) । उक्कंती-कूपतुला (दे श८७) । उक्कंदि-कूपतुला, कूप से पानी खीचने का साधन (दे श८७) । उक्कंदी-कूपतुला (दे ११८७) । उक्कंपित-बास की खपचियो से बांधा हुआ (दश्रुचू प ६५)। उक्कंविय-वास की खपचियो से बाधा हुआ-'कडिए वा उक्कविए वा छन्ने वा लित्ते वा' (आचूला २।१०) । उक्कड-त्रीन्द्रिय जतु-विगेप (प्रज्ञा ११५०) । उक्कडिअ-तोड़ा हुआ, छिन्न (पा ४६६) । उक्कल-मकडी (उ ३६।१३७) । उक्कलिय-१ त्रीन्द्रिय जन्तु, मकडी (प्रज्ञा ११५०) । २ उवला हुमा । उक्कली-मकडी, लूता (दमचू पृ १८८) । उक्का-कूपतुला, कुए से पानी खीचने का साधन (दे ११८७)। उक्कारिका-खाद्य पदार्थ-विगेप (अवि पृ १८२) ।
दशी शब्दकोश ४७ उक्कारिग-अलग होने का भेद विशेप, जैसे एरड के बीज से छिलका बलग होता है (सूचू १ पृ १३०)। उक्कासिम-उत्थित, उठा हुआ (दे १११४)। उक्किट्ठि-निदा- पाणिए निव्वुडडो, उक्किट्ठी कया, एव डभएहि लागो खज्जइ ति' (आवहाटी १ पृ २७५) । उक्कुड-उमत्त (दे १०६१)। उक्कुट्ट-आनन्द की महाध्वनि-'उत्कृष्टिनाद-आन दमहाध्वनिरित्यय (प्रटी प ४६)। उपकुट्टि-१ खुशी की ध्वनि (ति १३५) । २ ऊचे स्वर मे पुकारना-'उक्कुट्ठी पुकारा' (जीभा १७२२) । ३ निंदा- य कोलाहल करे, ण उक्नुहिबोल वा वरेज्ज रायससारिय वा (मूचू १ पृ १८२) । उक्कुडनिक्कुडिया-बार बार उठ-बैठकर पाकना - उक्कुडनिवकुडियाहिं पलाएइ भिक्खा वेला हूया न व ति' (आवमटी प २८१) । उक्कुडिक-कूडा करक्ट डालने का स्थान (अवि पृ २०६) । उक्कुड़निउडिया -चार बार उठ-बठकर पाक्ना-'उक्कुडुनिउडियाहिं पलोएति क वेल देसकालो भविम्मइ ति' (आवचू १५ २८६) । उपकुरुड-१ इट काठ आदि का ढेर (वभा २६५३) 1 २ अकुरडी, पूरा, कचरा डालने का स्थान (यभा १९२५, दे २०११०) । ३ रत्ना की राशि--'उक्नुरुडा रत्नादीनामपि राशि (ब)। उपकुरुडय-ढेर, कूडा डालन का स्याा (अनुद्वा ३४६) । उक्कुरुडिक-पूरा, कडा डालन का स्थान (अवि पृ २०६) । उपकुरुडिया-चूड़ा डालन को जगह-एय तुम दारग एगत उपरडियाए उज्याहि (विपा ११११६५) । उपकुण्डी-पूरा, पचरा डालन वा स्यान (दे ११११०)-पच्चमि पडिल उपमुरडि (१)। उस्कुलिणो-गह उपकरण, मा. विशेष (अवि पृ ७२)। उपकर-१ समूह (मानि ७०४) । २ उपहार, भेट (दे १६६) । उपकलाविय-ठनाया हुमा गनवाया हुआ- गइणा उपनाविमार पातया निवियाइ समतमा (उगुरी प६५)। उपल्ल-उपेमना एक-एक कर उबारना (दजिए १२४) । उपयोड-१ गम्परर ( ३.११)।२रिपट (याच पृ २३७) ।
-- देशी शब्दकोश ४८ ३ राजकुल मे दातव्य द्रव्य, वेगार तथा सैनिक आदि की भोजन- व्यवस्था (निचू ४ पृ २८०) । उक्कोडभंग-राजकुल मे दातव्य की राजा द्वारा दी जाने वाली छूट, देखे- 'खोडभग' (निचू ४ पृ २८०) । उक्कोडा-रिश्वत, लचा (विपा ११११४६; दे ११६२) । उक्कोडी-प्रतिशब्द, प्रतिध्वनि (दे ११९४)। उक्कोल-घाम, गरमी (दे ११८७) । उक्कोस-अरुण रग का पक्षी-विशेप (अवि पृ २२५) । उक्ख-जैन साध्वियो के पहनने के वस्त्र-विशेप का एक अंग-परिघाण- वत्यस्स अभित रचूलाए उवरिकण्णो नाभिहेढा उक्खो भण्णई' (वृटी पृ ३३४) । उक्खंड-१ सघात । २ विपमोन्नत प्रदेश (दे २१२६) । उक्खंडिय-आक्रात (दे ११११२) । उक्खंद-छावनी, घेरा डालना (निचू २ पृ४२७) । उक्खडमड्डा-पुन पुन -'उक्खडमड्डा इति देशीपदमेतत् पुन. पुन शब्दार्थश्च' (व्यभा २ टी प ४७) । उक्खणण-खाडना, निस्तुपीकरण (दे ११११५ वृ)। उक्खणिअ-कडित, निस्तुषीकृत (दे ११११५) । उक्खल–ओखली (निचू ३ पृ ३७८) । उक्खलित-उन्मूलित, चलित (आचू पृ ३३६) । उक्खलिय-उन्मूलित, उत्पाटित (से ६।२६) । उक्खलिया-१ स्याली, पात्र-विशेप (पिनि २५०) २ उलूखल, ऊखल (आवचू २ पृ ३१७) । उक्खली-थाली, पिठर-अलिंदक त्ति पत्ति त्ति उक्खली थालिक त्ति वा' (अवि पृ ७२, दे ११८८)। उक्खलुंपिय-खुजला कर-'णो गाहावइ अगुलियाए उक्खलुपिम-उक्खलुपिय जाएज्जा'-(आचूला श६२) उक्खल्लय-अगूठे को आच्छादित करने वाला जूता (आचू पृ ३५२)। उक्खा-पिठर, स्थाली-'दोहिं उक्खाहिं परिएसिज्जमाणे पेहाए' (आचूला ११२१)। उक्खिण्ण-१ अवकीर्ण । २ गुप्त, आवृत। ३ पार्श्व मे शिथिल, एक तरफ से ढीला (दे १११३०)।
दशी शदकाश ४६ उक्खिन्ल-व्याप्न (वृचू ५ १४१) । उविखरण-दान, उपहार-रहमतो य विविधफले सज्जगे य कवडगवत्य- मादी य उक्खिरणे करेति' (निचू ४ पृ १३१) । उक्खिरणग-दान, उपहार (निभा ५७५४) । उक्खुड-१ उल्मुक, अलात । २ समूह । ३ वस्त्र का एक भाग, अचल (दे १११२५) । उक्खुडहुचिय-उल्लिन, उछाला हुआ (दे ११४ )। उक्खुरहुचिय-उत्पिप्त, उछाला हुआ (दे ११४ व) । उक्खुलपिय-खुजला कर (माटो प ३४०) । उक्खुलविय-सुजला कर (आचूला १०६२ पा) । उपखुलणियत्य-जिमके वस्त्र अस्त व्यस्त हो, वह (बृभा ४११२) । उक्खुलि-खली (अवि पृ. १९३) । उखड्डमड्डा-बार बार-'उखड्डमड ति वा बहुमो त्ति भूयो भूयो ति वा पुणा पुणा ति वा एगटठ (निचू ४ पृ ३०८) । उखलिका-बली (अवि पृ २२१)। उखली-उलूखल, कापली (आवहाटी २ पृ. २४३) । उसा--पालो (भटी प ३२६) । उपल 1-अस्तव्यस्त (वृटी पृ ११२१) । उगारिया-क्षुद्र जन्तु, दीमक (सूचू ११ १४५) । उगाल-नक (व्यमा ४१४ टीप १०२) । उगाली-फ्नर (य्यमा ४।४ टी प १०२) उग्गह ह-यानिद्वार-'उगह इति जोणिदुवारस्म सामइसी समा' (निघू २ पृ १८६)। उग्गहिय-अच्छे प्रकार से ग्रहण दिया हुआ (टे १११०४) । उग्गाल-पान का पिचकारी (पय ३८)। उग्गाहिय--१ गहीन । २ उलिप्त । ३ प्रपतित (दै १११३७) । ४ उच्चालित (पा ५४६)। उग्गुष्टिय-पूल से मना हुआ-पमुउधियगमगा' (म ५११६) । उणुतिय--उत्तेजिन-गिगाररमुगुनिया माहयितपरगा' (दलघू पृ५८)। उग्गुलुधिआ-दृदय रग का उपना-१ मापार । २ यमन गपादन पारण हान पाना उपन-युपन (३ १११८) ।
देशी शब्दकोश '५० उग्घट्टि–अवतस, शिरोभूषण (दे ११६०) । उग्घाडपोरिसि-प्रहर का तीन चौथाई भाग-'उद्घाटपौरुप्या समयभापया पादोनप्रहरे' (प्रसा ५६० टी प १६६) । उग्घाय-१ सघात । २ विपमोन्नत प्रदेश (दे १३१२६) । उग्घुट्ट-१ पौरुष, शूरता (दे १२६६) । २ लुप्त, विनष्ट । उचूलयालग-नीचा सिर और ऊपर पाव कर पानी मे डुबोना (विपाटी प ७२)। उच्च-नाभितल (दे १८६) । उच्चंतग-दतराग, दातों को रगने की मसी-'उच्चतगो दतरागो भन्नई' (प्रज्ञाटी प ३६२) । उच्चंपिअ-१ दवाया हुआ, रौंदा हुआ-'सीस उच्चपियं कवधम्मि' (नदु १४६) । २ दीर्घ (दे ११११६) । उच्चड्डिय-उत्क्षिप्त, ऊपर उछाला हुमा (दे १११०६) । उच्चत्त--निश्चित अवधि तक स्वामी के कथनानुसार कार्य करने वाला (भृतक)-'एच्चिरकालोच्चत्ते, कायव्वं कम्म ज वेंति' (निभा ३७२०)। उच्चत्तवरत्त-१ दोनो पार्श्व मे स्थूल । २ अनियत भ्रमण (दे १२१३९) । उच्चत्तवरत्तय-दोनो पार्यो को ऊचा-नीचा करना, इधर-उधर करना (पा ६६३)। उच्चत्य-दृढ, मजबूत (दे ११६७) । उच्चप्प-आरूढ, ऊपर बैठा हुआ (दे २१००)। उच्चरग–कमरा, कक्ष (निचू १ पृ ६७) । उच्चाड-विपुल (दे १९७)। उच्चाडिर-१ रोकनेवाला । २ अफसोस करने वाला (प्रा २।१९३) । उच्चात-परिश्रान्त (व्यभा ६ टी प २५) । उच्चाय-परिश्रान्त (मोनि ५१८) । २ आलिंगन, परिरम्भ । उच्चार-विमल, स्वच्छ (दे ११९७) । उच्चारिय-गृहीत (दे ११११४) । उच्चिइय-आभूपण-विशेप (जीवटी प १४७) । उच्चिवलय-गदा पानी (पा १५८) । उच्चिडिम-मर्यादा-रहित, निर्लज्ज–'उच्चिडिमं मुक्कमज्जाय' (पा ५११) । उच्चुंच-दृप्त, अभिमानी (दे श६६) ।
देशी शब्दकोश उच्चप्पिय--आरूढ (दे १११००) । उच्चुलउलिय-कुतूहलवश त्वरता से जाना (दे ११२१) । उच्चुल्ल-१ उदविग्न । २ अधिरूढ, चढा हुआ । ३ भयभीत (दे २०१२७) । उच्चूर-विविध प्रकार -'उच्चूरपउरलभे' (व्यमा ४१२ टी प ८२) । उच्चेल्लर-१ हल आदि से बिना जोती हुई भूमी । २ साथल के रोम (दे १११३६) । उच्चेव-प्रकट (दे ११९७) । उच्चोल-१ विश्रान्त । २ नीवी, स्त्री के अधोवस्त्र के दोना छोरो पर दी जाने वाली गाठ (दे १११३१) । ३ चुल्लू, चुलुक-'पाणिए उच्चाल- एहि मारिज्जइ' (मावहाटी २ पृ १२५) । उच्चोली-गठरी-'परिकरेण बधह चुण्णस्स उच्चोलीओ (सूचू १ पृ १९३ टि)। उच्छ-आतो का आवरण (दे १८५)। उच्छगिय–पुरस्कृत (दे १११०७)। उच्छट-जल्दी जल्दी चोरी करना (दे १११०१)। उच्छटअ-शीघ्र चोरी करना (पा ६७६) । उच्छद-छीला हुआ, तोडा हुआ (आचू पृ ३४४) । उच्छदण-मदन, अभ्यगन-'मक्खणऽभगण उच्छदण उव्वट्टण' (अवि पृ१९३)। उच्छट्ट-चोर, डाकू (द १०१०१)। उच्छडिय-चुराई हुई वस्तु (दे ११११२) । -याप्त-'देवेहि य देवीहि य समतओ उच्छय गयण (आवहाटी १ पृ १२३)। उच्छल्लिउ --एक ओर ले जाकर-'उच्छल्लिउ ति एक्पा नयित्वा (निघू १ पृ.६८). उच्छल्लित-एक ओर ले जाकर (निचू १ पृ.६८)। उच्छल्लिय-१एक ओर ले जाकर (निमा २८१) २ जिसकी छाल छोल दी गई हा वह (दै ११११) । उच्छविय-शय्या विछौना (दे १११०३) । उच्छाह-मूत का ततु (दै १६२) । उच्छिदण- १ व्याज पर लेना। २ उधार लेना (पिनि ३१७) । उच्छिपक-चोरा का एक प्रकार (प्र ३१३) । उच्छय देशी शब्दकोश ५२ उच्छित्त-१ विक्षिप्त । २ उत्क्षिप्त (दे १।१२४) । उच्छिल्ल-छिद्र (दे ११६५) । उच्छु–१ राई (उसुटी प ५६) । २ वायु, पवन (दे श८५) । उच्छुअ-भय से की हुई चोरी (दे ११६५) । उच्छुअरण-ईक्षु का खेत (दे ११११७) । उच्छुआर-संछन्न, ढका हुआ (दे ११११५) । उच्छुआरिअ-छादित, ढका हुमा (दे ११११५ वृ)। उच्छंडिअ-१ वाण आदि से अत्यन्त व्यथित । २ अपहृत (दे १११३५) । उच्छुच्छु–दृप्त, अभिमानी (दे श६६) । उच्छुड्ड-आहत-'ततो उच्छुड्ड फुमति रागो लग्गति' (निचू २ पृ २२०) । उच्छुद्ध--१ विक्षिप्त-'उच्छुद्धणयणकोसे' (अनु ३।५२) । २ रोगग्रस्त -'उच्छुद्धसरीरे वा, दुव्बलतवसोसिते व जो होज्जा' (बृभा ४५५८) । ३ परित्यक्त (वृभा ३१३२) । ४ विखरा हुआ (ओभा २२१) । उच्छुर–अविनश्वर (दे ११६०) । उच्छुरण-१ ईख का खेत (दे १।११७) । २ ईख–'उच्छ्रण इक्षुरिति केचित्' (वृ)। उच्छुल्ल-१ अनुवाद । २ विश्रान्त (दे १११३१) । उच्छूढ-चुराना, अपहरण करना-'साय एकल्लयाई जायाइ चोरेहिं उच्छूढाई' (वृटी पृ १०८)। उच्छूर-१ असमय, विलव-'रन्धनवेला तामुच्छूर एव करोति येन साधोरपि भक्त भवति' (ओटी प १४८) ! २ प्रचुर (निचू ३ पृ २०६) । उच्छूरिय-सुप्रावृत-'उच्छूरिया णडी विव दीसति कुप्पासगादीहिं' (वृभा ४१२५)। उच्छूलग-परिखा, शत्रु-सेना का नाश करने के लिए ऊपर से आच्छादित गत-विशेप (उ ६।१८ पा)। उच्छेव–१ छत का नीचे गिरना 'परिपेलवच्छातिते णेव्वे गलण उच्छेवो' (निचू २ पृ ३३८) । २ दीवार का छेद (व्यभा ४१४ टी प ६) । उच्छेवण-घृत (दे ११११६) । उच्छोलणा-प्रचुर जल (द ४१२६)-'उच्छोलणा-पभूओदगेण' (जिचू पृ १६४)। उजल्ल-बलवान् (प्रा २।१७४) ।
५३ देशी शब्दकोश - उज्जगल-१ वलात्कार । २ दीघ (दे १११३५) । उज्जग्गिर-जागृति, अनिद्रा (दे ११११७) । उज्जग्गुज्ज [-स्वच्छ (दे ११११३)। उज्जड-उजाड, वस्ती-रहित स्थान (दे ११६६) । उज्जणिज-टेढा, वक्र (दे १११११)। उज्जर -१ प्रवाह (आवहाटी २ पृ८७)। २ मध्यगत, भीतर का । ३ निजरण, क्षय। उज्जल-अत्यधिक-ग्वेयणा पाउन्भूया-उज्जला विउला कक्खडा (अत ३६०) उज्जला-छोटी सघाटी (व्यभा ७ टो प ४५)। उज्जल्ल-१ पसीने से लथपथ, मलिन-'मुडा कडू विणट्ठगा, उज्जल्ला असमाहिया' (सू ११३।१०) । २ हठ (प्रा २।१७४) उज्जल्ला-१ अत्यन्त मलिन (वृभा २४५७) । २ बलात्कार (दे १९७) । उज्जाण-प्रतिलामगामी नौका (निभा १८३)। उज्जाणिय-नीचा किया हुआ (दे ११११३) । उज्जात-(विवेक) गूय (सूचू १ पृ.६१)। उज्जीरिय-अपमानित, तिरस्कृत (दे ११११२) । उज्जुग-विल-उज्जुग विल (दश्रुचू प ६८) । उज्जूरिय-१ क्षीण (दे ११११२) । २ शुष्क (व) उज्जहिगा-जगल की ओर जाने वाली गार्यों का समूह-'गोसखडी उज्जू हिगा म नति' (निचू ३ पृ ३४८)। उज्जोमिमा-रस्मी, डारी (दे ११११५) । उज्जोवण-१ गायो को चरने के लिए खुला छोडना। २ गाडी आदि को चलान म प्रवत्त होना-उज्जावण ति गावीण पसरण सगहादीण वा पयट्टण (निचू २६) उज्झखणी-१ लोकापवाद (निमा ६५८) । २ फुहार, शीतल वायु- 'दगवातो सीतभरो, सा य उज्झखणी भण्णति (निचू २१३३८) उज्झमण-पलायन (दे १११०३)। उज्झरिय-१ टेढी नजर से देखा तुमा, कानी आख से देखा हुआ। २ विति पागत । ३ क्षिप्त, फेंका हुआ। ४ त्यक्त (दे १११३३)। उज्झस-उद्यम, प्रपल (ने ११६५)। +C0 .
५४ देशी शब्दकोश उज्झाइ–विरूप, मैला (वृभा ३६१३) ! उज्झाइग-विरूप (वृभा ३६६४) । उज्झिखिम–लोकापवाद, लोक-निन्दा (दे ३१५५ वृ)। उट्ट-१ जल-जतु विशेप । २ सिंधु देश के कोमल चमड़ी वाले मत्स्य-विशेष- 'उट्टा मच्छा सिंधुविसए, तेसिं चम्मयं मउय भवति' (आचू पृ ३६४) । ३ कुत्ते की आकृति वाले जलचर प्राणियों का चर्म (निचू २ पृ ४००)। देखें-'उद्द' । उट्टिक–बडा भाजन-विशेप (अवि पृ २१४) । उट्टिया-पात्र-विशेष (अवि पृ २२१) । उद्य-१ घड़े आदि का किनारा, कागरा-'बोडो जस्स उट्ठा णत्यि' (आवचू १ पृ १२२) । २ कुत्ते की आकृति वाले जलचर प्राणियो का चमडा-'सुणगागिती जलचरा सत्ता तेसिं अजिणा उट्ठा' (निचू २ पृ ४००)। उट्ठल-उल्लास (दे ११६१) । उछल्ल-उल्लास (दे ११६१) । उट्ठी-१ मुट्ठी । २ अंश-'महीए एका उट्ठी छुभई' (आवहाटी २ पृ६०) । उ8ोणा-उठकर-'उट्ठोणा (? उद्वित्ता) से ण इमं लोग तिरिय करेति' (सूचू १ पृ.२११)। उडद-उरद, माप (निरटी पृ २७) । उडिद-उरद, माप (दे श६८) । उडु-तृण का आच्छादन (दे ११८६) । उडुक्किय–दातो से काट कर दागी करना-'सव्वत उसाणि दतेहि उडुक्कियाणि' (दमचू पृ २६) । उडि-काटना, टुकड़े करना (कन्नड)। उडुरुक्क-मुह से वृपभ की भाति गव्द करना (अनुद्वाहाटी पृ १६) । उडुरुक्ख - मुह से वृपभ की भाति शब्द करना-'उडुरुक्खं ति देशीवचन वृषभर्जितकरणाद्यर्थम्' (अनुद्वाहाटी पृ १६) । उडुहिय-१ विवाहित स्त्री का कोप । २ जूठा, उच्छिष्ट (दे १११३७) । उड्ड-१ दीर्घ, वडा (सू ११५।३४) । २ उडीमा देश का वासी (प्र ११२१) । ३ कुआ आदि खादने वाला (निभा ३७२०, दे १।८५) । ओड्ड (कन्नड) । ४ तीब्र (आचू पृ १४३) । ५ कूप (आवटि प २४) । उड्डंचक-उड्डाह, उपहास-'देशीपदमेतत्' (बृटी पृ १६०) ।
देशी शब्दकोश उड्डचग-१ उपहास करने वाला (निभा १०६५) । २ याचा-'उदञ्चका याचका' (बटी पृ १६०)। उड्डचय-अवहेलना-'वदणादिसु उडडचये करेज्ज' (निचू २ पृ १७२) । उड्डडग-वे भिक्षु जो पाणिपात्र होते हैं (आच पृ १६६) । उड्डबालग-कोतवाल-'तत्य चारियत्ति काऊण उहडबालगा अगडे पक्खि- विज्जति (आवहाटी ११ १३६) । 'उड्डस 1-खटमर (उ ३६३१३७) । उड्डण-अगीकार- तत्योहण अप्पणो कुणति' (व्यमा ४१३ टी प १८) । २ दीघ । ३ बैल (दे १११२३) । उड्डष्ट्ठ-प्रद्विष्ट (आच पृ १४३) । उड्डस-खटमल (दे ११६६)। उड्डहण-१ लोकापवाद (निचू ३ पृ ४६८) । २ चोर (दै १।१०१)। उड्डाम-उद्गम, उदय (दे ११६१)। उड्डाण-१ प्रतिध्वनि । २ कुरर पक्षी । ३ विष्ठा । ४ अभिमानी । ५ मनोरय (दे १११२८). उड्डावणक-आकपण-तस्स कड्ढणढाए उड्डावणक करेति' (निचू ४ पृ७६)। उड्डास–सताप परिताप (दे शEE)। उड्डाह-निदा (पिनि ४१४) । उड्डिाहरण-छुरी के अग्रभाग पर रखे हुए फूल को पाव की अगुलियो से लेकर ऊपर उछलना (दे १११२१) । उड्डिय-१ उत्क्षिप्त, फेंका हुआ-'अस्सेण हेसिय पट्ठी च उड्डिया' (निचू ४ पृ ३४३) । २ वचन के लिए रखना (मावहाटी १ पृ २६४)। उड्डिहिम --ऊपर फका हुआ (पा ५१७)। उड्ड्य--डकार (आचूला ८।२६) । उड्डुयर-जो मलमूत्र का विसजन करते हुए चचलता के कारण हाथ आदि पर भी लेप लगा लेता है (बृटी पृ ५१४) । उड्डुहिम-छिन (दे १११०५ व) । उड्डोय-१ डकार (जीमा ६०८) । २ उवाक, आवाई (निचू ३ पृ८०)। उड्ढ-१ दीघ, बहा (सू ॥५॥३४) । २ वमन (बृटो पृ १५३६) । ३ पात्र मा किनारा (निचू ४ पृ १५७) ।
देशी शब्दकोश उड्ढल-उल्लास (दे श६१) । उड्ढल्ल-उल्लास (दे ११६१)। उणुयत्त-अवस्थित, ठहरा हुआ-'सावि तं पलोएंती तहेव उणुयत्तेति' (आवहाटी १ पृ १८२) । उण्णम-समुन्नत (दे ११८८) । उण्णलिय-१ कृग, दुर्बल । २ ऊंचा किया हुआ (दे १११३६) । उण्णुइअ-१ हुकार । २ आकाश की ओर मुह किए हुए कुत्ते की आवाज (दे १११३२) । ३ गर्वित (व्यभा ४१२ टी प ६६) । उण्हाली-चतुष्पद प्राणी-विशेष-'मज्जारी मुगसी व त्ति ठण्हाली मडिल त्ति वा' (अवि पृ ६६)। उण्हिआ-खिचडी (दे ११५८)। उण्हेला-कीट-विशेष, घृतपिपीलिका-'उण्हेला णाम तेल्लपाइयाओ, तातो तिक्खेहिं तुहिं अतीव दसति' (आवमटी प २८६) । उण्होदयमंड-भ्रमर (दे १।१२०) । उण्होलक-वृक्ष-विशेष (अंवि पृ ६३) । उण्होला क्षुद्र जन्तु-विशेष-'उण्होला-तेल्लपातियामो । तातो तिखेहि अतीव दसति' (मावचू १ पृ ३०४) । उतपोत-आकीर्ण (वृभा ३१७२)। उत्तइय- -उत्तेजित (दअचू पृ ५६ पा)। उत्तंपिअ-खिन्न, उद्विग्न (दे १११०२) । उत्तप्प-१ गर्वित । २ अधिक गुण वाला (दे १११३१) । उत्तम्मिअ—खिन्न (दे १११०२) । उत्तरणवरंडिआ-उडुप, नौका, जहाज आदि (दे १११२२)-'समुद्रनद्यादौ जलतरणोपकरण प्रवहणादि' (वृ.) । उत्तरणवरंडी-जलसतरण के साधन नौका आदि-'भवउत्तरणवरंडि सभर सवण्णुमण्णहा तुज्झ । णरगोत्तिरिविडिमझे होही उत्थल्ल- पत्थल्ला ।।' (दे १११२२ वृ)। उत्तरिविडि-एक के ऊपर एक रखे हुए भाजनो का ढेर (दे १११२२ पा)। उत्तलहस--वृक्ष (दे ११११६) । उत्ताणपत्त-एरण्ड से संवधित, एरण्ड के पत्ते (दे १।१२० वृ) । उत्ताणपत्तय-एरण्ड-सवधी, एरण्ड के पत्ते (दे १११२०) । - -- देशी शब्दवाश ५७ उत्ताणय-तत्पर (भावचू १)। उत्ताल-लगातार रुदन, अतर रहित कदन को मावाज (दे १११०१)। उत्तावल-१ उतावल, शीत्रता । २ शीघ्रकारी, याकुल-'उतावलो सहिसत्या' (कु पृ १८०)। उत्ताहिय-ऊपर उछाला हुआ (दे १११०६) । उत्तिग-१ चीटियो का विल (आ ८११०६) 1२ सपच्छा वनस्पति (द ८।११) । ३ छिद्र-'उत्तिगा पुण छिड्ड' (निभा ६०१८) । उत्तिरिविडि-एक के ऊपर एक रखे हुए भाजना का ढेर (दे १३१२२) । उतरड (गुज), उत्तरड (मराठी) । उत्तुइय-उत्तेजित (दनि १११ पा)। उत्तुण-अभिमानी, गवयुक्त (उसुटी प २३४, दे ११६६) । उत्तुपित-चिकना क्यिा हुआ (प्रटी प ५६) । उतुपिय-स्निग्ध, चिकना (प्र ३॥१६) । उत्तुयय-उत्तेजित (व्यमा ६ टी प ३२) । उत्तुरिद्धि-१ अभिमानी (दे १NEE) । २ दप गव (वृ) । उत्तुहिम-उत्याटित, छिन, नष्ट (दे १११०५) । उत्तइय-गव-'एव भणितो मता उत्तूटओ सा कहेइ सन्व-उत्तूइओ ति दशीपदमतद् गर्वे वतत' (व्यमा ४१२ टी प ६६) । उत्तह-जटशू प कूप (दे श६४) । उत्तेड-विदु-भटगपासवलग्गा उत्तेटा बुजुया न सम्मति' (पिनि १६)। उत्यघिय-उत्थापित (से श६०)। उत्यग्घ-ममद, उपमद (द १२६३)। उत्यरिय--१ उयित (द ७६२) । २ मात्रात (पा ५८५)। ३ निगत । उत्यलिम-१ गृह । २ ऊचा गया हुआ (दे १११०७) । उत्यल्ल-उपसना, पलटना (दमचू पृ ११५) । उत्यल्लण-धर्वलना, उछालना (प्र ३।१०)। उत्यल्लपत्यल्लण-उपल-पुथल-'उत्पल्ल अत्यल्लणेण मुक्तम्' (मोटी प १९२)। उत्यल्लपत्यल्ला-ना पायों से परिपतन, उथल-पुथल (दे ११११२) । उत्यल्ला-१परिवत्तन (दे ११६३) । २ उदतन । उत्याण अनिगार राग (प्पमा ७ टो प ८५)।
दशी शब्दकोश उदअ-गढा, अवपात-'ग विगेपेषु उदक इत्येवम्ढेपु' (प्रटी प २२)। उदंक -~~जल का पात्र-विगेप जिससे जल ऊंचा छिडका जाता है (जीवटी प १४६)। उदकघसर-नाली, मोरी (ओटी पृ ३६५) । उदग--अनतकायिक वनस्पति-तत्य उदग नाम मणंतवणप्फई, से भणिय च उदए अवए पणए सेवाले' (दजिचू पृ २७७) । उदरिय-१ आजीविका के लिए इधर उधर घूमने वाले । २ पाथेय युक्त यात्री-'उदरिया णाम जहिं गता तेहिं चेव स्वगावी छोटु समुटि- सति पच्छा गम्मति । गहियसवला उदरिया' (निचू ४ पृ ११०)। उदसी-छाछ-'तक्कं उदसी छासि ति एगट्ठ' (निचू १ पृ६२)। उदाण-वनस्पति का एक प्रकार (अवि पृ २६६) । उदूक्खल-मुशल-'मुगल उक्खलं वा' (आचू पृ ३३६) । उद्द-१ सिन्धु देश के मत्स्य-विगेप-'उद्रा सिन्धुविपये मत्स्या' । २ मत्स्य- चर्म का बना हुआ वस्त्र-विगेप (बाचूला ५॥१५, टी प ३६३) । -देखे- उट्ट' । ३ जल-मानुप । ४ ककुद, वैल के कधे का कूबड (दे १११२३)। उद्दसग- मत्कुण, त्रीन्द्रिय जन्तु-विगेप (प्रज्ञा ११५०) । उद्दद्दर-सुभिक्ष-'दुविधा दरा-धण्णदरा पोट्टदरा य, ते उद्द जाव भरिया तं उद्दद्दर भण्णति । पर्यायवचनेन सुभिक्षमित्यर्थः' (निचू ३ पृ८०)। उद्दरिम-१ उखाडा हुमा (दे १११००) । २ स्फुटित, विकसित (पा ५१३) । ३ उद्दर्पित (नदीटि पृ १०१)। ४ युद्ध से पलायित । उद्दा-कदविलाव, जलमार्जार (सू १२७।१५) । उद्दाइंत-शोभमान (ज्ञा २११३३) । उद्दाइय-दीमक, कीट (निचू १ पृ १५५) । उद्दाण-१ परित्यक्त (निचू । २ पृ १४) । २ मृत-'उद्दाणे भोइयम्मि चेडयाइ वदामि' (उसुटी प २) । ३ चुल्हा (दे श६७) । उद्दाणग-मृत-'उहाणग जायं त मए विगिचियं' (आवहाटी २ पृ १४०) । उद्दाणभत्तारा-पति के द्वारा परित्यक्त स्त्री-'उद्दाणभत्तारा भत्तारेण परिठविता' (निचू २ पृ १४) । उद्दाम-१ सघात । २ विपमोन्नत प्रदेश (दे श१२६) । उद्दाल-वृक्ष-विशेप (जीव ३१५८१) । उद्दालक-वृक्ष-विगेप (जीवटी प १४५) ।
देशी शदकोश उद्दिक-घट का एक प्रकार (अवि पृ २५५) । उद्दिट्ठा-अमावस्या (स्था ४३६२) । उद्दिसिम-उत्प्रेक्षित (दे १११०६) । उद्दीढ-भक्षित, खाया हुआ (निचू ३ पृ ५८७) । उदुडुग-उपहास का पात्र (वभा ४००२)। उद्ढ-१ चुराया हुआ, मुपित-'देशीवचनत्वाद मुपित (वटी पृ८२५) । २ पराजित (अवि पृ २५०) । उददेसग–जतु विशेप, दीमक (जीवटी ३२) । उद्देहि-उपदेहिका, दीमक (दे ११६३) । उद्देहिगा-१ दीमक । २ दीमक द्वारा कृत वल्मीक की मिट्टी (पिटी प २०)। उद्देहिया-दीमक-'उद्देहियाखइय वा कटठ दुवन' (आचू पृ २१२) । उद्धइय-आभ्यतर-'उद्धइयाहिं देसीभासातो ज अ भतर बुच्चति': (आचू पृ २१५)। उद्धच्छवि-विसवादित, विपरीत, अप्रमाणित (दे ११११४) । उद्धच्छविअ-सज्जित (दे १२११६) । उद्धच्छिम-निषिद्ध (दे १११११) । -ऊचा (सूचू १ पृ १०४)। उद्धट्टक-उपहास पैदा करने वाली भापा या आवाज (वटी पृ १६७०) । उद्धत्य-विप्रलव्य, वचित (दे श६६)। उद्धरण-उच्छिष्ट, जूठा (दे १११०६)। उद्धवम-उत्क्षिप्त, ऊपर फेंका हुआ (दे १३१०६) । उद्धविम-पूजित (दे २१०७) । उद्धास-१ ऊवड खावड प्रदेश, ऊचा-नीचा प्रदेश । २ श्रात, थका हुआ। ३ सघात, समूह (दे १२१२४)। उद्घाण-उदवसित, उजहा हुआ (व्यमा ४१४ टी प ७०) । उद्धाविय-समुद्रचारी डाकू आदि अत्यत क्रूर मनुप्य-'कि वा अह समग्गो त्ति चिंतयता च्चिय सहमा उसाविएहिं बद्धो (कु पृ६६)। उद्धि-गाडी पा एक अवयव (मूय १०३७) । उघ (गुज)। उद्धमात-व्याप्त (नतीचू पृ६)। उद्धमाय-पूण (पा १४२)।
देणी शब्दकोश ६० - उधेइ-दीमक (निचू ३ पृ १२४) । उदई (राज)। उन्नालिअ-उन्नामित, ऊचा किया हुमा (पा ५०८) । उपघसर-नाली, मोरी (ओटी पृ ३६५ पा) । उपासना-नापित-कर्म, हजामत-'उपासना नाम श्मश्रुकतनादित्पं नापित- कम' (आवमटी प १६६) । उप्पंक-१ कर्दम, पक । २ ऊचाई । ३ समूह । ४ अत्यधिक (दे १११३०)। उप्पर-ऊपर (जीभा १४६२) । उप्पल-संख्या-विशेप-'चतुरशीतिरुत्पलाङ्गा-गतमहत्राणि एकमुत्पलम्' (जीवटी प ३४५)। उप्पलंग-सख्या-विगेप (भ ५।१८) । उप्पल्लाणित-अश्व से पलाण उतारना-'उप्पत्लाणितो आमो। विस्मामितो राया' (उसुटी प २५१) । उप्पाडक-त्रीन्द्रिय जन्तु-विगेप (अवि पृ २६७) । उप्पातिका-मत्स्य की एक जाति (अवि पृ २२८) । उप्पायत्रीन्द्रिय जन्तु-विगेप (प्रजा ११५०) । उप्पाहल-उत्कण्ठा (पा ८०३) । उप्पि-ऊपर (अनु ३।६) । उप्पिगलिआ-करोत्सग, हाथ को गोदत्प वनाना (दे ११११८) । उप्पिजल-१ मैथुन । २ धूल । ३ अपकीति, अपयश (दे १११३५) । उप्पिच्छ-१ त्वरित । २ तीव्र श्वास-श्वासयुत त्वरित वा' (अनुद्वाचू पृ ४६) । ३ त्रस्त, भीत (नाटी प १६८) । ४ आकुल । ५ कुपित-'उप्पिच्छ नाम आकुलम् आहित्य उप्पिच्छं च आउल रोसभरिय च' (जीवटी प १६४) । उप्पित्थ-१ व्याकुल-'उप्पित्थगन्दस्वस्तव्याकुलवाची देशीति क्वचित्' (से १११४०) । २ लयवद्ध श्वास (राजटी पृ १८६) । ३ कुपित । ४ विधुर (दे ११०६)। उप्पियण-वार-बार श्वास लेना (व्यभा ४१४ टी प ५०)। उप्पीड समूह, राशि (से ४:३७) । उप्पील-१ सघात, समूह-'पसरिओ वहुलो धूमुप्पीलो' (कु पृ १०८, दे १११२६) । २ विपमोन्नत-प्रदेश (दे १११२६) । उप्पुय-उत्सुक (प्रटी प ५२) ।
देशी शादकोश - को खरतरगच्चीय उप्पेस-अभ्यग, तैल आदि से मालिस-'उप्पन देशोपदमेतत् अम्पङ्गम' (व्यमा ६ टी प १०)। उप्पेस-पास (से १०१६१)। उप्पेहड-१ उदभट, तीव्र (दे १३११६) १ २ आइबरयुक्त (पा ६०)। उप्फदोल-अस्थिर (दे १११०२) । उप्फल्ल-दुजन, खल (ति ६०१)। उफाल-दुजन (ति ६००, दे १९०)। उफिस--उपनना (वटी)। उप्फुकिमा-घोविन, कपडा धोने वाली (दे ११११४) । जान मदिर जयपुर उप्फुडिअ-बिछाया हुआ, आस्तृत (दे १२११३) । उप्फुण्ण-~~-आपूर्ण, मरा हुआ (द ११६२) । उप्फुन्न-स्कृष्ट, छुआ हुआ (प्रसाटी प ३०४)। उप्फुरुहसिगा-प्रज्वलित अगोठी (सूचू ११ १२५) । उप्फेणउप्पणिय-~~क्रोध से उपनते हुए-'उप्फेणउप्फेणिय सोहसेण राय एव क्यासी' (विपा १।६।१८)। उप्फेणोफेणीय-कोष से उपनते हुए (विपाटी १८३)। उप्फेस-१ मुकुट (स्था ५७२) । २ प्राम, भय (दे ११६४) । ३ अपवाद, निदा (ब)। उपफेसण-पास, भय (उसुटी प ५८) । उफेसया--निदा-'अमरिसजण उप्फेमया ण हु सहियन्दा वुले पसूएण' (दे ११६४ व)। उप्फोम-उद्गम, उदय (दै १७६१) । उम्फोस-१ पास (निभा १४८०) १२ प्रक्षालन (निभा ४०८५) । उस्फोसण-सिंचन, छिडपाव-'आवरिसण पाणिएण उफोसण' (निचू २ पृ १७५) । उबेड्डअन्त प्रविष्ट (मावचू २ पृ १६५) । उबिव-१खिन । २ पेय। ३ भयभीत । ४ उद्भट, उग्र । ५त्रात । ६ प्रक्ट वेप वाला (दै १११२७) । उबिवल-गुपित जल, मला पानी (दे १११११)। उन्बुक्क-१ प्रलपित । २ राफ्ट । ३ वलाचार (दे १३१२८)। उगुड - प्रविष्ट, गडी हुई 'उन्बुडणयपरोसे' (मनुटी ५७)।
देशी शब्दकोश ६२ उन्बर-१ अधिक । २ सघात, समूह । ३ स्थपुट, विपमोन्नत प्रदेश (दे १११२६)। उन्भ-१ खडा हुआ (निचू १पृ ५४) । २ अर्ध्व (दे ११८६ बृ)। उन्भंड-फूहड, अस्त-व्यस्त वेशभूपा (वृभा ६१५७) । उभंत-ग्लान (दे ११६५)। उभग्ग-व्याप्त (दे ११६५)-तिमिरोव्भग्गणिसाए' (वृ)। उभज्जी-क्षीरपेया-'कलमोतणो उ पयसा, उक्कोसो हाणि कोटभज्जी' (ओभा ३०७)। उभट्ठ-मागा हुमा-'उभट्टपरिन्नायं अन्न लद्ध पोयणे घेत्यी' (पिनि २८१)। उन्भाअ-शात (दे ११६६) । उभालण-१ धान्य को छाज आदि से साफ-सुथरा करना (दे १११०३)। २ अपूर्व (वृ)। उन्भालिअ-सूर्प आदि से साफ किया हुआ (पा ५३८) । उत्भावण-परिभव (ओनि १४८) । उन्भावणा-अपभ्राजना, तिरस्कार (उशाटी प १६६)। उन्भाविअ-मैथुन (दे ११११७ वृ) । उन्भासुअ-शोभा-हीन (दे ११११०) । उन्भुआइअ-उभरा हुआ (दे १३१०५ वृ)। उब्भुआण-उफनना हुआ, अग्नि से तप्त दूध आदि का उछलना (दे १११०५)। उन्भुग्ग-चल, अस्थिर (दे १११०२)। उन्भुत्तिअ-उद्दीपित, प्रदीपित (पा १६) । उन्भुभंड-भाड-विशेप (अवि पृ १६३) । उन्भे-तुम सव (दे श८६ वृ)। उभज्झी-क्षीरपेया (ओटी प १६६) । उमत्थिय-बाधकर-सव्वोवही (एगट्ठा कज्जति भायण उमत्थिए) एगट्ठाणे पुढो कज्जति' (निचू ३ पृ ३७४) । उमाण-प्रवेश-'उमाणं ति प्रवेशः' (आटी प ३२६) । उमुत्तिल्लय-१ बहु-मूत्र रोगवाला। २ मूत्राशय मे सुजनवाला-'जेण वा कट्ठाइणा सचालेति त सविसं उमुत्तिल्लयं वा खय वा कट्टैण हवेज्जा' (निचू २ पृ २८) । - देशी शब्दकाश उम्मइस-मूट, मूख (दे १११०२)। उम्मड-१ हठ, आग्रह ! २ उदवत्त, वचा हुआ (दे १११२४) । उम्मच्छ-१ यमबद्ध । २ भगयुक्त, विकल्प से कथित । ३ क्रोध (दे ॥१२५)। उम्मच्छविम-उदभट, तीव्र (दे २११६) । उम्मच्छिम-१ रप्ट । २ आकुल (दे १११३७) । उम्मड्डा-वलात्कार (दे १२६७) । उम्मत्त-१ धतूरा (दे ११८६) । २ एरण्ड (व)। उम्मत्य-अयोमुख, विपरीत (दे ११९३)। उम्मर-देहली (नाचू पृ ३६४, दे ११६) । उम्मरिम-उत्पात (द १०१००)। उम्मल-जमा हुजा, स्त्यान, कठिन (द श६१)। उम्मल्ल-१ नप । २ मेघ । ३ पुष्ट पोवर । ४ वलात्कार (दे १११३१)। उम्मल्ला-तृष्णा (द ११६४) । उम्माल-देवता का चटाई गई वस्तु निर्माय (पा ३५२) । उम्मुह-अभिमानी (द १६६)। उम्हाविस-मैथुन (द ११११७) । उचित-परिवमित, मस्कारित (नाटो प १७) । उयचिय--परिकर्मिन (माटी प १७) । उपट्टिणी-जधा- उयट्टिणीए णोणेऊण दरिमिला-जघापा निप्याश्य दर्शित' (उगाटी प ११८)। उपट्टी--१ पटी । २ जघा-'जेण घेत्तु उयट्टीए छूढो-येन गहीत्वा पटया (जपाया) क्षिप्त (उमाटो प ११८)। उणिसय-रहस्य-पला, जादू-टोना, मुगटनी पला ( पृ २२)। उयरिय-उतरस र-'मग्ने वा उयरिय पाणिय पियह (ओटा पृ ३६२). उपरी-गभवती ( पृ १६२) । उयल्ल-मृत-जाह अदिस्मा जा ना तहटिया चेव रागसमोहियमणा उपल्ला' (आपहाटी ११८२)। उपविय-जीत उन पर- उपविए प्रमाधिते अधमरत' (प्यमा ६ टी ५४४). उर-बारराम (१६)।
देशी शब्दकोश ६४ ? उरंउरेण-साक्षात् -'रहबलेण वा चाउरंगेण पि उरउरेणं गिण्हित्तए' (विपा १३५०) ! उरंमुह-ओधेमुह-'परंमुहा पडतु उरमुहा पासेल्लिया (वा)' (आवहाटी १ पृ. २८५)। उरच्छक-मद्य का वडा पात्र (अवि पृ २५६) । उरणा-वेणी मे गूथा जाने वाला ऊन का आभरण (अवि पृ ६४) । उरणि-जन्तु-विशेप (वृभा ५८८३) । उरणी—त्रीन्द्रिय जतु-विगेप (अवि पृ २३७) । उरत्त-खण्डित, विदारित (दे ११६०)। उरत्थय-कवच, वर्म (पा २७४) । उररि-पशु, बकरा (दे ११८८)। उरल-१ स्यूल, बडा । २ असघन, विरल-'उरल ति विरल न तु धनम्' (प्रनाटी प २६६) । उराल--१ सुन्दर-'अणुस्सुओ उरालेसु जयमाणो परिव्वए' (सू १।६।३०) । २ प्रधान (स्था १०११०३) । ३ भीपण-भीमा भय भेरवा उगला' (उ १५।१४) । ४ विशाल, विस्तृत-'भण्णड य तहोराल वित्थरवतवणस्सति पप्प । पयतीय णत्थि अण्णं एहमेत्तं विसालति ॥' (अनुद्वाहाटी पृ८७) । ५ हरित वनस्पति-विशेष (प्रज्ञा ११४४)। उरालक-धान्य-विशेप (अवि पृ ६६) । उरालिय-औदारिक शरीर-मंस टिहारबद्ध उरालियं समयपरिभासा' (अनुद्वाहाटी पृ८७)। उरिणण-कपास निकालना (मोटी पृ ३७३ पा)। उरुणण-कपास निकालना (ओटी पृ ३७३) । उरुणी-गृह-उपकरण (अवि पृ १४२) । उरुपुल्ल-१ अपूप, पूआ। २ धान्यो के मिश्रण से बना खाद्य, खिचड़ी आदि (दे १.१३४)। उरुमिल्ल-प्रेरित (दे १११०८) । उरुलुंचग-त्रोन्द्रिय जन्तु-विशेष (प्रजा ११५०) । उरुसोल्ल-प्रेरित (दे १११०८) । उलइय (ओलइय?)-लटका दिया (व्यभा १० टी प ८०)। उलग-हल चलाने वाला-'उलगादिभतओ भतीए घेप्पति' (दश्रुचू प ३८) । ।
देशी शब्दकाश "उलणादवी विरोप (अवि पृ २२३) । उलवी-पानी का सुगधित करनेवाला एक प्रकार का घास (पा ६२८)। उलाण-वाज पक्षी-उलाणसिंगतससयाण जालच्छाइयाए (निचू २ पृ २८१)। उलिम-निकणित आख वाला, टेढी माख वाला (देश)। उलित-ऊचा कुआ, ऊची भूमी पर स्थित कुमआ (दे शा)। उलुउडिम---१ प्रलुठिन । २ विरचित (दे १५११६) । उलुकसिम-~-पुलकित (दे ११११५) । उलुखड-उन्मुक, मलात (दे १११०७) । उलुफुटिअ-१ विनिपातित । २ प्रशान्त (दै १११३८) । उलुहतकार, कौआ (दे १३१०६) । "उलुहलिम -~~-जा कभी सप्त नहीं होता, मतृप्त (दै १३११७) । उल्लमण-अपण (से ११३५१) । उल्लकय-काप्ठपात्र-'उल्लकमो कट्ठमयो पत्तो (निमा ४११३)। उल्लचियबाली परना-सो तस्स कए समुह उल्लचिउमाढता' (आवहाटी १पृ २७६)। उल्लठ-उदत-'उल्लटवयणा विग्याणि करेंति (उसुटी प ६६)। उल्लडग-मिट्टी का गोला-'उल्लडगा परिवझति मदगोलबभित्यथ' (निचू ३ १ १६०)। उल्लडिसबाहर निकाला हुआ, रिक्त किया हुमा (पा ५९२) । उल्लग-कृश, क्षीणमा उल्लगसरोरा जाया' (उशादी प ३००)। उल्लढ-शुप्प, भूखा (ओटी ३५६ पा) । उल्लण-छाछ से गीला दिया हुषा ओदन, खाध विशेष (पिनि ६२४)। उल्लणिया-दारीर पाटने का वस्त्र, तोलिया (उपा ११२६) । उल्लत्यपल्लत्य--असमजस, उलट पलट, अव्यवस्थित-उल्लत्यपल्लन्या से मालावया दिज्जति (मावहाटी २६१)। उल्लद -उतार पर-तत्य यइल्ले उल्लदेता उवखति' (भावहाटी ११६४) उल्लरय कौटिया का माभूषण (दे ११११०) । उल्ललिम-शिथिल, ढोला (दे ॥१०४) । उल्लसिय-गुलरित (दे १।११५)। - देशी शब्दकोश उल्लाय-पाद-प्रहार (तदु १६२) । उल्लायक-कर्माजीवी (अंवि पृ ६०)। उल्लिअ-१ खीचा हुआ, छीला हुआ-'उल्लियो फालिमो गहिओ मारिओ य अणतसो' (उ १६६४) । २ उपागत (कु पृ १६१) । उल्ली-काई, शैवाल-'पणो उल्ली' (निचू २ पृ १६७) । २ दांत पर जमनेवाली पपडी-'उल्ली दतेसु दुग्गधा' (मावचू २ पृ ७२) । ३ चुल्हा,चुल्ली (दे ११८७) । उल्लुंटिअ--चूणित, चूरा-चूरा किया हुमा (दे १११०६) । उल्लुक्क-त्रुटित, टूटा हुआ (दे ११६२) । उल्लुग-विकृत, त्रुटित (प्रटी प २२) । उल्लुट्ट-मिथ्या (दे ११८६) । उल्लुरुह-छोटा शख (दे १३१०५) । उल्लूड-विध्वस (व्यभा ५ टी प ७) । उल्लूडित-विध्वसित, नप्ट (व्यमा ५ टी प ७) । उल्लूढ-१ मारूढ (दे १११००) । २ अकुरित (वृ) । उल्लूरधूविता-खाद्य-पदार्थ-विशेष (अवि पृ ७१) । उल्लूरिया-मिठाई (उसुटी प ८६) । उल्लूह-शुष्क, सूखा-'उल्लूह च नलवण हरियं जाय' (ओटी प ३५६) ।' उल्लेव-हास्य, हसी (दे १११०२) । उल्लेवअ-हसी, हास्य (दे १११०२ वृ) । उल्लेहड-लम्पट, लुब्ध (दे ११०४) । उल्लोइय-खड़ी आदि से भीत को पोतना (जंवू ११३७) । उल्लोग–थोडा, अल्प (बृभा १६०५) । उल्लोच-वितान, चदोवा (दे ११९८) । उल्लोट्ट-अपवर्तन, मुडना (प्रटी प ८६) । उल्लोपिक-भोज्य-पदार्थ-विशेप (अवि पृ १८२) । उल्लोय-चदोवा, वितान (बृभा ५६८१) । उल्लोल-१ शत्रु (ति ८८५; दे ११६६)। २ जलतरग (पा ५६), ३ कोलाहल। उल्लोहित -पुता हुआ-'उल्लोहित उव्वलित तधा उच्छाडितं ति वा' (अवि पृ १०६)। - देशी शदकोश उल्हक-छोटा चूल्हा (पिनि ५४)। उल्हसिम-उद्भट, तीव्र (दे ११११६) । उव-पक्षी-विरोप (अवि पृ ६२) । उवा-हाथी को पकड़ने के लिए बनाया गया गटा (पा ६००)। उवइक-दीमक (वटी पृ १६६६)। उवइग-दीमर (निचू ११६६) । उवइय-श्रीन्द्रिय जन्तु विशेष (जीव १९८)। उवउज्ज-उपकार (दे १।१०८)। उवएइआ -मद्य परोसने का पान (दे ११११८) ।' उवक- गढा, खातिका (यूटी पृ २२२)। उवकय-सज्जित (दे ११११९) । उवकयय-सज्जित (दे ११११६ वृ) । उवकसिम-१ सन्निहित, पास में पड़ा हुआ। २ परिसेवित । ३ सजित, मप्ट (दे १११३८)। उवक्खडाम-कारडू, ना धाय-कण पकान पर भी नहीं पक्ता-उवखडाम णाम जहा चणयातीण उक्खडियाण जे ण सिज्झति ते कपडया, त उवक्खडाम भण्णति' दयें-क्कडुय' (निचू ३ पृ ४८४) । उवग-१ याग्य-- उवगा नाम याग्या (सूचू ११४५) । २ गढा (निचू ४ पृ४८)। उवचिक-त्रीद्रिय जतु विप (अवि पृ २६७) । उवचुल्ल-छाटा चूल्हा (निचू १ पृ८२)। उवचुल्लग-छाटा चूल्हा (निचू ११८२) । उवजगल-दीप (दे ११११६) । उट्टिम-अनाथ, अशरण-'उट्टितो अणाहा असरणेत्यय (निचू १ पृ १२२)। उवतिग-दीमक-मचारोवतिगादी, मजम आयाऽहि विच्चुगादीया (यमा ६३२२)। उपत्यवण-अस्तमन (वेला) (निघू ११८७)। उवदीव-द्वीपानर, अन्यद्वीप (दे १११०६) । उपिय-त्रीष्ट्रिय जन्तु यिप (जीवटी १ २२) ।। उपर-श, पाठरी, तसपर (निभा १७३)।
देणी शब्दकोग उवरिग-माल का निरीक्षण करने वाला अधिकारी-'सामि पेमेह उवरिगो जो भड निस्वेइ' (उसुटी प ६५) । उवरिल्ल -ऊपर (पक १४१) । उवरिल्लअ-मजबूत वस्त्र, मोटा कपडा-'विरहओ उवरिलएण पातो, णिवद्धो य कीलए' (कु पृ ५३) । उवरेग-व्यापाररहित-'तत्थ वरिसमेत्त उवरंग गो' (उमुटी प ७६)। उवलभत्ता-कगन (दे १११२०) । उवलयभग्गा-कगन (दे १२१२०) । उवललय-मैथुन (दे ११११७) । उवलुअ-लज्जायुक्त, लज्जालु (दे १२१०७)। उवलेद्द-सन्तुष्ट-'तीमे महिलाए कप्पासमोलं दिन्न, मा य उवले हा' (उशाटी प १६२)। उवसग्ग-मद (दे ११११३) । उवसेर-रति-योग्य (दे १११०४) । उवहत्थिय-समारचित, मज्जित (दे १।११६ वृ)। उवहा–मच्छ (निभा ४२२३ पा)। उवहावण-परिभव (ओटी प १३१) । उवाई-पोताको' विद्या की प्रतिपक्षी विद्या (उसुटी प ७३) । उवातिय–खाद्य-विशेप (निचू ३ पृ ५२१) । उवारस-एक प्रकार का प्रावरण-'उवारसा कवला सरडगपारिगादि पावारगा' (निचू २ पृ४००) । उवासणा-क्षीरकम, हजामत (वृभा २०६७) । उविस-१ सस्कारित, परिकर्मित (ज्ञा ११११२४) । २ शीघ्र (दे ११८६) । उव्वक्क-धीत, दूध मे भिगोकर निकाला हुआ-'जह पुण ते चेव तिला उसिणोदगधोयखीरउव्वक्का' (व्यभा ३ टी प ११०) । उव्वट्ट-१ नीराग, रागरहित । २ गलित (दे १११२६ वृ) । उन्वट्टी-नीवी, स्त्री के कटिवस्त्र की नाडी (दे १११५१ पा)। उव्वण्ण-उत्कण्ठित (व्यभा ७ टी प ६)। उव्वत्त-१ रागरहित । गलित (दे १११२६) । उव्वर-१ कक्ष, तलघर-'पुन्वखो जो भूघरोव्वरो' (निचू १ पृ ६७) । २ धान्य रखने का कोठा (वृभा ३२६६) । ३ घाम, ऊष्मा (दे १८७)।
देशी शब्दकोश उव्वरअ-कोष्ठागार-'उन्धरमओ त्ति वा काटुंगो त्ति वा एगटठ विशेपचूर्णी' (वटी पृ ६२६)। उन्वरग-कोठरी-'सन्वोवगरण उव्वरगे छुभति, अह णत्यि उव्वरगा तो सवोवकरण एगकोणे करेंति' (निचू २ पृ १७८) । उव्वरिअ-१ अधिक । २ अनीप्सित । ३ निश्चित । ४ ताप । ५ अगणित (दे १२१३२)। ६ अतिकात, उल्लषित । उव्वविय-तीन इद्रिय वाला जतु विशेप (जीव श८८)। उव्वहण-महान् आवेश (दे १।११०) । उवा-धम, ताप (दे ११८७) । उव्वाअ-खिन (दे १२१०२)। उन्बाउल-१ गीत । २ उपवन (दे १३१३४) । उन्वाइअ-१ विपरीत मयुन । २ मयादा शूय मथुन (दे १११३३)। उवाढ-१ विस्तीण विशाल । २ दु खमुक्त (द २१२६)। उव्वात-पात, थका हुआ (निचू ४ पृ २८७)। उव्वाय-परिधात थका हुआ-धावतो उवामा मगनू किं न गच्छइ कमेण' (बभा ३२०)। उन्वाह-धम, ताप (दे ११८७)। उदाहिम-उत्क्षिप्त, ऊपर उछाला हुआ (दे १११०६) । उववाहुल-१ कामासक्ति से उत्पन्न उत्सुक्ता। २ द्वेप्य, द्वेप-पान (दे १११३६) । उबिडिम-१ यधिक प्रमाणवाला। २ मयादारहित स्वच्छद (द १११३४)। उब्वियार-भूकप-'उबिवारा जलोहता ततणाए मताहित (इ ४५॥१४) । उदिवव्व-१ उद्भट वेपयुक्त (पा ५६७) । २ क्रुद्ध । उन्वीढ-उत्सात, खादा हुआ (दे १२१००)। उवष्ण-१ उद्विग्न । २ समिक्त । ३ उद्भट, तीन । ४ गूय (दे १११२३)। उन्वेताल-निरतर दिन (दे १११०१)। उध्वेल्लयस्यरा-सा सो चेय ममा चल पल्लुवेन्सय परग (१८६)। उव्येल्लिर-१ साल, चचल (कु पृ७८) । २ गीघ्रगामी (२०१)।
देशी शब्दकोश ७० उन्वेहलिया-वनस्पति-विगेप (भ २३।४) । उन्हासित-ऊंचा किया हुआ (अवि पृ १४८) । उसणसेण-बलभद्र (दे ११११८) । उसणी—एक प्रकार का धान्य जिसमे से तेल निकलता है (अंवि पृ २३२) उसद्ध-उत्कृष्ट-'उसद्धं-उत्कृप्टं' (आचू पृ ३६२) । उसध-पुप्प-विगेप (अंवि पृ २३२) । उसीर-पद्मनाल, कमलनाल (दे १९४) । उसु-बालक का इपु के आकार का एक आभरण (पिनि ४२४) । २ तिलक-'उसू तिलगा' (निचू ३ पृ ४०७) । उसुअ-दूषण, भूल (दे ११८६) । उसुक-तिलक, आभरण-विशेप (निचू ३ पृ ४०७) । उसुकाल-उदूखल (निचू ३ पृ ३७८) । उसुयाल-ऊखल, उदूखल (आचूला ५।३६) । उस्स-ओस (स्था ४१६४०) । उस्सण्ण-१ प्राय (वृभा २०४) । २ प्रभूत (व्यभा २ टी प ६२)। उस्सन्न–प्राय (भ १५५१८६ वृ)। उस्सयण-अभिमान-'पलिउंचणं च भयणं च य डिल्लुस्सयणाणि च । (सू १।६।११)। उस्सरण-वपन, बुलाई-निच्चुदग नदी कुडंगमुस्सरणं' (बृभा ४०३५) । उस्सा-गाय (दे ११८६ वृ)। उस्सिघण-मर्दन-'उस्सिघण-मक्खणऽभगण उच्छंदण उव्वट्टण' (अंवि पृ १६३)। उस्सुग-मध्य-भाग (चूला ११११६ पा)। उस्सूलग-परिखा, खाई (उ ६१८) । देखे-'उच्छूलग' । उस्सूलय- १ परिखा । २ शत्रु सेना का नाश करने के लिए ऊपर से आच्छादित गर्त्त-विशेष (उशाटी प ३१०) । उस्सेल्लय-सर्पपनाल से निप्पन्न शाक-'एगेण साहुणा सासवणालुस्सेल्लयं मुसंभृतं लद्ध' (निचू ३ पृ २६४) । उहर–१ छोटा घर, उपगृह (प्र १२१२)-'उहर त्ति उपगृहाणि आश्रय- विगेपा.' (टी प ११) ।२ छोटा-'उहरग्गाममयंमी' (व्यमा ७ टी प ५६)।
देशी शब्दकोश
७१
उहरक-छोटा गाव (व्यभा ७ टी प ५६) ।
उहावणा-अपमान (व्यभा ६ टी प ५)।
3-१ गर्दा, निन्दा सूचक म यय-'कति णाम मरहट्टादिसु णादिदुगुच्छिन्जति'
(आचू पृ २३३) । २ प्रस्तुत वाक्य के विपरीत भय की आशका से उसे
उलटना। ३ विस्मय । ४ सूचना ।
ऊआ-यूवा, जू (द१११३६) ।
ऊदिअय-१ प्रावृत, आच्छादित । २ आच्छादन, प्रावरण (पा ६३७) ।
ऊणदिअ आनदित (दे १३१४१) ।
ऊणिमा-पूर्णिमा-'तो तीए चेव कणिमाए भरिऊण भहस्स पत्थिओ'
(उसुटी प ६४)।
अणिस-तक्यिा 'सामायति मुहाइ कणिसगयिाण व थणाण' ( पृ १७) ।
अमुत्तिम-दोनो पार्यो म आघात करना (दे १११४२) ।
ऊयरिणिया-जतु विशेप-पत्तगवघे कयरिणिया लग्गा' (निचू १ पृ६८)।
.१ ग्राम । २ सघ (दे १३१४३)।
करणिया-जन्तु विरोप (frमा २८१) ।
करणी-मेप, भेट (द १३१४०) !
करणीया-जतु विप। (निचू १६८)
कल-गतिभग, उतावल (दे १११३९)।
ऊसढ-येष्ठ यण आदि गुणों से युक्त, ताजा-'उसड रुसरे ति वा, रसिय
रसिए ति या (आपूला ११५७) ।
कसण-पामासक्ति से उत्पन्न उत्सुपता (द १११३६)।
ऊसत्य-१ जम्भाई । २ याकुल (६१।१४३)।
कसय-उपधान तरिया (६१।१४०) ।
कसल-पीन पुष (६१।१४०) ।
ममलिम-१ रामारित, पुषित (द १।१४१) । २ उन्नसिन (३) ।
कसयिम-उत । रुपा दिया मा (८ ॥१४३) ।
७२ देशी शब्दकोष ऊसाइअ-१ विक्षिप्त (दे १११४१) । २ उत्क्षिप्त-'ऊसाइअ उत्क्षिप्तमिति धनपाल' (वृ)। ऊसायंत-खेद होने पर शिथिल (दे १११४१) । ऊसार-विशेप प्रकार का गढा (दे १११४०) । ऊसिक्किअ-प्रदीप्त (पा १६)। ऊसिग-मध्यभाग (आचूला १।११६ पा)। ऊसुंभिअ-१ अवरुद्ध गले से रोना, धीरे रोना (दे १११४२) । २ उल्लसित (वृ)। ऊसुक्किअ-विमुक्त (दे १११४२) । ऊसुय-मध्य-भाग (आचूला १।११६) । ऊसुर-ताम्बूल, पान (प्रा २।१७४) । ऊसुरुसुंभिअ-अवरुद्ध गले से रोना, धीरे रोना (दे १।१४२) । ऊहह--उपहसित (दे १११४०) । । ए एआवंती-इतने–'एआवन्ती सव्वावन्ती ति एतौ द्वौ शब्दो' मगधदेशी भाषाप्रसिद्धया एतावन्तः सर्वेऽपीत्येतत्पर्यायौं' (आटी प २६) । एकल्ल- अकेला (ज्ञा १११।१५७) । एकहेला—एक साथ (प्रटी प ४६) । एकाणंसा-देवी-विशेष (अवि पृ २२३)। एकुडिया-तीतर आदि का मास पकाने की प्रक्रिया-'आतकाभिभूत रसगादिहेड वगतित्तिरादीहि य एकुडियाओ पकरेति' (आचू पृ १६)। एक्क- स्नेहिल (दे १११४४) । एक्कंग-चन्दन (दे १।१४४) । एक्कक्कम-परस्पर (से ५।५६) । एक्कघरिल्ल-देवर, पति का छोटा भाई (दे १११४६) । एक्कणड-कथिक, कथा कहने वाला (दे १११४५) । एक्कमुह-१ धर्म रहित ! २ दरिद्र । ३ प्रिय, इष्ट (दे १११४८) ।
देशी श दकोश ७३ एक्कमेक्क-परस्पर (प्र ४१६) । एक्कयाण-अकेला-किमगराय तुम हरिणजातीण एक्कयाण परिनिन्विट्ठो'. (व्यभा ४१३ टी ५८)। एक्कल्लग-एकाकी (अनुद्वाहाटी पृ३५) एक्कल्लपुडिंग-अल्प विदु वाली वष्टि (दे १११४७) । एक्कल्लय-अकेला (उसुटी प ८६) । एक्कल्लु -अकला (उसुटी ८०)। एक्कवई-रथ्या (दे १३१४५ व)। एक्कसरय-एक बार (व्यमा ६ टी प २)। एक्कसराए-१ एक साथ । २ एक बार (वटी पृ ४६६) । एक्कसरिज-१ शीघ्र (आवचू १ पृ २४६) । २ सप्रति, आजकल (प्रा २२२१३)। एक्कसाहिल्ल-एक स्थान में रहने वाला, स्थिरवासी (दे १११४६) । एक्कसि-एक पार (व्य मा १० टो प ६०)। एक्कासबली-शाल्मली पुष्पों के साथ नूतन फ्लो (दे १११४६) । एक्कसिय-एक वार (वचू १ २०८)। एक्कार-लोहकार (दे १११४४ च)। एक्कावण्ण [-इक्यावन (निचू ४ पृ ११३) । एकेक्कम-अयोय, परम्पर (द १।१४५) । एगओवत्त--दीन्द्रिय जतु विगेप (प्रज्ञा ११४६) । एगट्ठिया-नौका-एगट्ठियाए मग्गण-गवेमण करेंति' (ना १।१६।२८२)। एगल्ल-एकाकी (जीमा २१५) । एगसरग-एक वार- एगसरग ति एक वार दिज्जति' (निचू ४ पृ ३४६)। एगायत-अरेला-एगायता गुवक्मण पति (मू १२०४८) । एगाहच्च-एम ही प्रहार स मारना-'त पुरिम एगाहच्च यूडाहन्ध जीवियाआ ययरावेइ (म ७।२०२) । एगुणि [----उनीम (उगाटी पद)। एडण-उत्मजन-तए | सा नागसिरी निताताउयस्म घरममार- मभियस्म नहारगाउस्म एडपट्टयाए (गा १।१६।१४) । एडायण-उसन- जगमग-एटावपट्टयाए एगतमते रागार पुस्यति (म १४१३४)।
देशी शब्दकोश ७४ एडिज्जमाण-उत्सृज्यमान, उत्सर्जन करता हुमा (ना १।१६।७५.) । एडेत्ता-उत्सृज्य, उत्सर्जन करके (ज्ञा १११६१७३) । एणुवासिअ-मेढक (दे १।१४७) । एत्ताहे-अब (दे १११४४ वृ) । एत्तोप्पं-यहा से लेकर, यहा से (दे १।१४४) । एद्दह-इतना (दे १११४४ वृ)। एमाण-प्रवेश करता हुआ (दे १११४४) । एमिणिआ-वह स्त्री, जिसके शरीर को, किसी देश के रिवाज के अनुसार, सूत के धागे से नाप कर उस धागे को फैक दिया जाता है (दे १११४५)। एयावंति-इतना (मा ११७) । एरंडइअ—पागल-'एरडइए साणे त्ति हडक्कायित एवा' (वृटी पृ ८२६) । एरंडइत--पागल (दश्रुचू प ५१)। एग-नागरमोथा (वृभा १२२३) । एराणी-१ इन्द्राणी । २ इद्राणीव्रत का पालन करने वाली स्त्री (दे १११४७) । एरावण-गुच्छ-वनस्पति-विशेप (प्रज्ञा ११३७।४) । एल-कुशल (दे १११४४) । एलवालुंको-एक प्रकार की ककडी की वेल (प्रज्ञा १४०।१) । एलविल–१ धनाढ्य । २ वृषभ, बैल (दे १११४८) । एलालुय-आलू की एक जाति, कद-विशेप (अनु ३३५१) । एलालुग-ककडी-'एलालुग माउलिंग फलमादी' (बृभा २४४२) । एलावालुंकी-वनस्पति-विशेप (भ २२।६) । एवड्ड-इतना-'एवड्ड आलावग सक्केहिति गेण्हिर' (आवहाटी १ पृ ६६)। एवण्हं-वाक्यालकार-'एवण्हमिति वाक्य क्यालङ्कारे (बृटी पृ १४६१)। एक्वेल–अधुना, अभी-'एव्वेल पहामोत्ति नमोक्कारं घोसंतस्सेव' (आवहाटी १ पृ ३०३)।
देशी शदकोश ७५ पोखरतरगच्छीय ज्ञान गदर पर ओ ओअ--वार्ता, कहानी (दे १११४६)। ओअकगरिव, गजित (दे १११५४) । ओअग्गि-१ अभिभूत । २ केश आदि को एकनित करना (दे ११७२) । ओअग्घिअ--घात, सूघा हुआ (द १११६२) । ओअल्ल-१ पयस्त, प्रक्षिप्त । २ प्रकप थरथराहट । ३ गौमओ का वाडा । ४ लटकता हुआ (द १।१६५) 1 ५ खराव आचरण । ६ जिसकी आख निमोलित होती हो वह (से १३१४३) । ओआअ-१ गाव का स्वामी। २ अपहृत जिसका अपहरण कर लिया गया हा वह । ३ आज्ञा। ४ हाथी आदि को बाधने के लिए बनाया हुआ गत्त (दे १३१६६)। ओआअव 1-अस्त ममय, अस्तमन-वेला (दे १११६२) । मओआल-छोटा प्रवाह (दे १११५१) । ओमालित-द्रवित किया, पिघाला- रणो चित्त ओआलित (आवहाटी १ पृ २३४) । ओआली- १ खडग का एक दोप । २ पक्ति (दे १११६४) । ओआवल-बात-आतप, सुवह का सूय-ताप (दे १११६१) । ओइत्त-परिधान, वस्त्र (दे १११५५) । ओइत्तण-परिधान वस्त्र (दे १११५५) । ओइल्ल-आरुढ (दे १११५८)। ओउवालग-कोट्टपालक, आरक्षक (आवचू १ पृ २८६) । ओएल्ल-कुण्ठित- तत्थ दिय से धारा ओएल्ला (मा १३१४१७७) 1 मोडल-वेश रचना, धम्मिल (दे १२१५०) । ओडि-मुट्ठी (आव २ पृ १०१)। ओकड्ढक-१ घर से घन आदि ल जाने वान चोर । २ जो चोरो को बुला- कर चोरी करात हैं। ३ चोरो के पृष्ठवाह-राहायक (प्र ३।३)। मोकासक -कण का आभूपण जो नीचे लटकता रहता है (अवि पृ १६२) । मोक्कणी-यूया, जू (द १११५६) । मोक्कतल्लिय--चबाकर निकाला हुआ यमन किया हुआ-'अबकोइलियाओ पुयटएहिं यावयतल्लियामा हरिएरोहिं णिज्जाइयाता' (दअच पृ २३) । आवर रिशु (प नह) ।
देशी शब्दकोश ओक्किम-१ निवास, अवस्थान (दे १११५१) । २ वमन (वृ)। ओक्कुट्ठ--सचित्त वनस्पति का चूर्ण-'सचित्तवणस्सती चुण्णो ओक्कुट्ठो भण्णति' (निचू २ पृ २६०)। ओक्खंडिअ-आक्रान्त (दे ११११२) । ओक्खंद-शत्रु-सेना द्वारा नगर का घेराव-'कोसलेण रण्णा ओक्खद दाऊण भेल्लिय त सणिवेस' (कु पृ ६६) । ओक्खिण्ण-१ अवकीर्ण । २ आच्छादित । ३ जिसके दोनो पार्श्व अत्यत शिथिल हो, वह (ढे १११३० वृ)। ओखंद-१ सेना का पडाव या सेना का घेराव (निभा २४०१) । २ डाका, धाटी (वृभा ४८३८) । ओगुंठी-घूघट, मस्तक पर डाला हुआ वस्त्र-'कवलरयणोगुठि काउ रण्णो ठिमओ पुरतो' (ति ७६१) । ओग्गाल-जल का लघु प्रवाह (दे १११५१) । ओग्गिअ-अभिभूत, पराजित (दे १११५८) । ओग्गी-हिम, बर्फ (दे १११४६) । ओघसर-१ अनर्थ । २ घर से निकलने वाला जलप्रवाह (दे १११७०) । ओचार-धान्य रखने का कोठा या पात्र-विशेष-'अपचारि-दीर्घतरधान्य कोष्ठाकारविगेप' (अनुद्वामटी प १४०) । ओचिय-आरोपित (जीवटी प १६६)। ओचुल्ल—चुल्ली का एक भाग (दे १।१५३) । ओचूलयालग-नीचा सिर और ऊपर पाव कर पानी मे डुबोना (विपाटी प ७२)। ओच्चेल्लर-१ खिल भूमि, ऊपर भूमि, हल आदि से विना जोती हुई भूमि । २ साथल के रोम (दे १११३६) । ओच्छग-वस्त्र (आवहाटी २ पृ १२८) । ओच्छट्ट-चोर (दे १।१०१ वृ)। ओच्छत्त-दतीन, दतवन (दे १११५२) । ओच्छविय-आच्छादित (नाटी प ३१) । ओच्छाइय-आच्छादित (प्रटी प १३४) । ओच्छिअ—केशो को सवारना (दे १११५०)।
देशी शदकोश ७७ ओच्छुपीय-वीज, धाय-'एगत्य ओच्छुपीया गीणिज्जति' (आवचू १ पृ १११)। ओछाडित-बाच्छादित (अवि पृ २४४)। ओज्जल्ल-बलवान, प्रवल (दे ११५४) । ओज्जाय--गजित (दे १११५४) । ओज्झ-मला, अस्वच्छ (दे १११४८) । ओज्झमण--पलायन (दे १२१०३ वृ)। ओज्झर-निझर (से १३५६) । ओज्झरिय-१ टढी नजर मे देखा हुआ, कानी आय से देवा हुआ। २ विक्षिप्त, पागल । ३ क्षिप्त, पेंका हुआ। ४ व्यक्त (दै १११३३ वृ)। मोज्झरी-ओझ, आत का आवरण (दै १११५७) । ओज्झाय-दूसरे को धक्का देकर छीन तना (दे १११५६)। मोट्टिय (दोट्टिय, दोद्धिय ?) तुगा (यावहाटी १ पृ २८३) । मोड-१ भूमि सादन वाला (स्थाटी प १६६) 1 २ कूप (आवटि प २४) । मोडष्ट-अनुरक्त रागी (दे १३१५६) । ओडिका-श, गड (आवटि प ६७) । ओड्ड -वत्र शिल्पी (अवि पृ १६१)। ओड्डय-टिपाव, गुप्त-'तेसिं च पाताणि हीरति आहएण अच्छति' (आवघू १११११)। ओढण-ओठन, उत्तरीय यस्त्र (दे १११५५) । मोडिढय. |---आढा हुआ, धारण किया हुआ-परिझिमोडवणमाडिढममात्ति (दै १११५५ ५)। मोणियर-यन्मीर, मिगवत, चीटियों द्वारा गारी गइ मिट्टी पा र (३ १६१५१)। मोणीवी-नीव नपा प्रान भाग (दै १।१५०) । मोगुणमयभिभूा, पराभूत (दे १११५८) । भोज-साम माम मादिमा विभिन आानियों की रचना-माग्न माहिति विमेगा (प्रा.)। मोत्ततरम -परा (११११६ य)। धोत्यहम -~-व्याप्त (मे १९१५६)।
देशी शब्दकोश ७८ --- ओत्थय-१ पिहित, ढका हुआ-'अत्यरयमिउमसूरगोत्थय' (दश्रु ८।४२) । २ अवसन्न, खिन्न (दे १११५१) । ओत्थर–उत्साह (दे १।१५०) । ओत्थरिअ-१ आक्रात, जिम पर आक्रमण किया हो वह । २ आक्रमण करता हुमा (दे १११६६)। ओत्थल्लपत्थल्ला-उथल-पुथल, दोनो पावों से परिवर्तन (दे १११२२ वृ)। ओथुक्कित--अत्यत जुगुप्सित-'धिद्धि त्ति ओथुविकत-तालियस्सा' (वृभा ४११५)। ओदंपिअ-१ आक्रात । २ नप्ट (दे १११७१) । ओपल्ल-कुण्ठित, अपदीर्ण (नाटी प १९९) । ओपविका-- क्षुद्र जतु (अवि पृ २२६)। ओपित-सस्कारित, परिकर्मित (प्रटी प ७६) । ओपुप्फ-निष्फल, व्यर्थ-'जुण्ण ओपुप्फनि फल' (अवि पृ ८१) । ओपेसेज्जिक-धान्य पीस कर आजीविका चलाने वाला (अवि पृ १६०) । ओप्प-चमक-'तूवरिया सुवण्णस्स ओप्पकरणमट्टिया' (दअचू पृ ११०) । ओप्पा-शाण आदि पर मणि आदि रत्नो का घर्पण करना (दै १११४८) । ओप्पिअ—गाण पर -गाण पर घिसा हुआ (दे १११४८ वृ)। ओप्पील-समूह (पा १८) । ओप्फिट्ट-अलग होना, पृथक् होना-'ताहे सो (गोसालो) सामिस्स मूलओ ओप्फिट्टो' (आवचू १ पृ २६६) । ओभालण-१ सूर्प आदि से धान्य को साफ करना । २ अपूर्व (दे १११०३ वृ)। ओभंजलिया-चतुरिन्द्रिय जीव-विशेष (प्रज्ञा ११५१) । ओभट्ट-प्रार्थित, वाछित (ओनि १४७) । ओमंथ-नत, अधोमुख (वृभा ६६५) । ओमंथिय-नमाया हुआ, अधोमुख किया हुआ-'ओमथियवयणनयणकमला' (जा १२११३४)। ओमच्छग- अधोमुख (निचू २ पृ १२७) । ओमत्य-अधोमुख (अनुद्वाचू पृ ५०)। ओमत्थग- अन्तिम-'चरिमस्स आदिसमयातो आरभ ओमत्थग' (नदीचू पृ २५)।
देशी शन्दकोश ७६ ओमत्यिय-नत, अधोमुख किया हुमा (ओनि ३८६) । ओमालय-शोभित ( पृ २२८)। ओमालिय-पूजित (कु पृ २५) । ओमोदरिता-दुभिक्ष-'ओमोदरिता दुभिक्ख (निभा ३४२) । ओयड्ढिया-चादर, दुपट्टा (उसुटी प ४५) । ओयड्ढी-दुपट्टा, चादर-घेत्तु ओयड्ढोए छूढा (उसुटी प ४५) । ओयम-गोत्र विशेष (अवि पृ १५०) । ओयल्ल-मत (आवटि ३८)। ओयविय-१ परिकमित, मम्कारित-'मओयविय-खोमियदुगुल्लपट्टपडिच्छन्ने' (दश्रु ८।२०) 1 २ खेदन-'ओयविय सेदन (ओटी प ५१) । ओयाण- अनुस्रोत म चलन वाली नौका (निभा १८३) । ओयिषण-उपवहण, वद्धि (सूचू १ पृ ११५)। ओर--१ चारु, मुदर (दे १११४६) । २ समीप । ओरपिझ-१ आक्रान्त । २ नष्ट (दे १११७१) । ३ छिला हुआ (पा ५८१)। ओरत-१ विदारित । २ अभिमानी । ३ कुमुभ रग से रगा हुआ (दै १११६५)। ओरल्ली-दीघ और मधुर ध्वनि (दे १११५४) ! ओराणि-आभूपण विशेष (अवि पृ७१) । ओराल-१ उदार प्रधान (स्था ४१४५१)! २ भयफर-बाराले ति भीमो भयानक' (नाटी प ८)। ३ विस्तृत विशाल-- ओराल नाम वित्यराल विसाल ति भणिय हाई । ४ मास आदि से युक्त गरीर -'ममयपरिभापया '(प्रनाटी प २६६)। ओरालिय--१ व्याप्त । २ उपलिप्न-दिह्रो हिरागलियामरो' (उसुटी प ५) । ३ पाछा हुआ। ४ फेनाया हुआ। मोरिल्ल-अनिवार का, याहे समय का, नया (६ १११५५) । ओर ज-बहनोडा जिसम बार-बार 'नही-नी पहा जाता है (दे १११५६) । मोलम-१वाज पक्षी (दै १११६०) । २ अपलाप (व) । ओलमणी-नववधू, नवोदा (दे १३१६०) । मोल इणी-प्रिया प्रिय पनी (द १११६०) । मोलइप-१ गलग्न, लगा हुआ चिपा हुआ (जोमा ५३८) । २ छिपान हा-'आउहागि मोरयाणि (उगाटी प ११६) । शरीर म देशी शब्दकोश पढमस्स सटा हुआ, पहना हुआ-'अगपिणद्धम्मि ओलइअ' (टे १११६२) । ओलंडण-अवलंघन (ज्ञा १११११८६) । ओलंडिय–अवलघित-'तुम मेहा | राओ समणेहि..."अप्पेगइएहिं ओलडिए अप्पेगइएहिं पोलडिए' (ज्ञा १११११५५) । ओलंभ-उपालम्भ-भगवया महावीरेण " अप्पोलंभनिमित्त नायज्झयणस्स अयमठे पण्णत्ते' (ज्ञा १।१।२१३) । (राज० ओलंभा) ओलगय–सेवक (दजिचू पृ २६६) । ओलग्गअ--सेवक-'कुमारोलग्गएहिं सद्धि पव्वतितो' (उशाटी प ११५) । ओलग्गग-ग्रामवासी (दश्रुचू प ६५) । ओलवणी-छत-'कडण डडगोवरि ओलवणी' (पवटी प ११२) । ओलायग–वाज पक्षी-'वीरल्लो ओलायगो' (निचू २ पृ १३७) ओलावय-बाज पक्षी (दे १११६०)। ओलावी-मादा वाजपक्षी (आवचू १ पृ ४२५) । ओलिंप-खोलना-'ओलिंपमाणे वि तहा तहेव काया कवाडमि विभासियव्वा' (पिनि ३५४)। ओलिभा-दीमक (दे १११५३) । ओलित्ती-खड्ग आदि का एक दोष (दे १११५९) । ओलिप्प–हास, हसी-मजाक (दे १११५३) । ओलिप्पंती -खड्ग आदि का एक दोष (दे १११५६)। ओलिया–कुलपरिपाटी-'अहं ओलिया कहिज्जामि' (सूचू २ पृ४१४) । ओली-१ फली-'ओली सिगा' (आचू पृ ३४१) । २ कुलपरिपाटी, कुल का आचार (दे १११४८) । ३ पक्ति (वृ) । ओलंकी-१ वालको की क्रीडा-विशेष, लुकाछिपी का खेल (दे १११५३) । २ आखमिचौनी-'ओलुकी छन्नरमणम् । नप्ट्वा यत्र शिशव. क्रीडन्ति । चक्षु स्थगनक्रीडेति केचित्' (वृ) । ओलुपमतापिका-हस्त, तवे का हाथा (दे १११६३) । ओलुग्ग--१ जीर्ण, रुग्ण (ज्ञा १।११३४) । २ कृश, निर्वल (विपा १।२।२४) । ३ सेवक । ४ निस्तेज (दे १११६४) । ओलुट्ट-१ अघटमान, अनुचित । २ मिथ्या, असत्य (दे १।१६४) । मोलेहड-१ दूसरे मे आसक्त । २ तृप्णापर । ३ प्रवृद्ध, बूढा (दे १११७२) ।
देशी शब्दकोश ओल्ल–१ ओला, हिमपात (जीचू पृ६) । २ पति । ३ राजपुरुप विगेप । ओल्लणी-इलायची, दालचीनी आदि मसालो से सस्कारित दही श्रीखड (दे १११५४) । ओल्लरण-सोना, शयन (दे ११६३ व)। ओल्लरिअ-सुप्त (दे २१६३) । ओव-हाथी आदि को बाधने के लिए किया गया गत्त (दे १२१४६) । ओवइय-तीन इद्रियवाला क्षुद्र जन्तु विशेप (जीव ११८८) । ओवग-गढा- ओवग कूडे मगग, जइ घुट तसे य दुह्तो वि'। बृभा २३६०) ओवग्गिअ-आक्रात, अभिभूत (पा ५८५)। ओवट्टिम-खुशामद, चाटुकारिता (दे १११६२) । ओवट्टी-नीवी, स्त्री के कटि वस्त्र की नाडी (दे १११५१ पा)। ओवट्ठ-~-१ मेघ के पानी का सिंचन, छिडकाव (दे १३१५२) । २ वृष्टि, वारिश (से ६।२५)। ओवड-गढा, गत्त- ओवड ति खड्डातीत पडेज्ज (निचू ४ पृ.४८) । ओवड्ढी-पह्नने के वस्त्र का एक भाग (दे १११५१) । ओवयण-प्रोहणक (ना १११६६०)। ओवर-निकर, समूह (दै १११५७) । ओवरम--समूह (दे १२१५७ व) । ओवसेर-१ चदन । २ मथुन-योग्य (दे १११७३) । मोवात-आचाय निर्देश'-'ओवातो णाम आचायनिर्देश (सूचू ११२२१)। ओवातिका- जलचर प्राणी विरोप (अवि पृ ६६)। ओवारि--१ धाय भरन का कोठा । २ भीतरी कमरा (जवि पृ १६५) । ओगे (राजस्थानी)। मोवारिया--१ भीतरी अपवरम । २ धाय भरने का कोठा (व्यमा ७ टी प १०)। मोवास-मान का आभूषण विशेष- वतसक आवास वष्णपीलय कपणपूरर' (अवि पृ १८३)। ओवासण-नापित यम, हजामत (बावचू १११५६) । ओविय-१ परिवमित (पा १११।२४) । २ सुटर (पा १११०६.)। ३ प्रकाशित-ओपिताना-टर पलितानाम् (पाटी १२२६)।
। - देशी शब्दकोश ८२ ४ आरोपित (जवूटी प ४३ , दे १११६७) । ५ रुदित । ६ खुशामद । ७ मुक्त, परित्यक्त । ८ हृत, छीना हुआ (दे १११६७) । ६ व्याप्त, खचित (आवमटी) १० विभूषित । ओवुलीक-प्राणी-विशेप (अवि पृ ६६) । ओवरग-ओरी, भीतर का कमरा (दअचू पृ ४२) । ओस-ओस, निशाजल (भ १५।१८६) । ओसअ-ओस (से १३३५२) । ओसक्क—अपसृत, पीछे हटा हुआ (दे १११४६) । ओसट्ट-ऐसा भोजन, जिसमे फेकना अधिक होता है (निभा २४६४) । ओसण-उद्वेग, खेद (दे १११५५) । ओसण्ण--त्रुटित, खडित (दे १११५६) । ओसण्णं-१ अनेक बार-'ओसग्णति-अणेगसो एक्क्क पावायतण हिंसादि आयरति' (दश्रुचू प ४०) । २ प्राय (जीभा १९०) । ३ प्राचुर्य, वाहुल्य (स्थाटी प १८३) । ओसद्ध--पातित, गिराया हुआ (पा ५६५) । ओसन्न-१ प्राय –'ओमन्नदिट्ठाहडभत्तपाणे' (दचूला २।६) । २ खडित, अपूर्ण-'ओसन्नो खुतायागे सबलायारो' (दश्रुचू प ६)। ओसर–छोटो कमरा (अवि पृ १३६) । आसरा (राजस्थानी)। ओसरिअ—१ अधोमुख । २ आख को सकुचित कर देखना, कानी आख से देखना। ३ आकीर्ण, व्याप्त (दे १११७१) । ओसरिआ–अलिंदक, वाहर के दरवाजे का प्रकोष्ठ (दे १११६१)। ओसवि.--१ शोभा-रहित । २ अवसाद (दे १११६८)। ओसा-१ ओस, निशाजल (आव ४१४) । २ हिम (दे १११६४) । ओसाअ-प्रहार की पीडा (दे १११५२) । ओसाणिहाण-विधि-पूर्वक अनुष्ठित (दे १११६३) । ओसायंत-१ जभाई खाता हुआ आलसी । २ दुःख करता हुआ। ३ वेदना- युक्त (दे १११७०) । ओसार-गो-वाट, गो-बाडा (दे १११४६) । ओसिअ-१ वलरहित (दे ११ १५०) । २ अपूर्व । ओसिघिअ--घ्रात, सूघा हुआ (दे ११६२)-'ओसिंघिअशब्दोऽपि देश्य एवं (वृ)। ओसिक्खिअ-१ गमन मे व्याघात । २ अरति-निहित (दे १११७३)।
देशी शपोश ३ मोसित्त-उपलिप्त (दे १३१५८)। मोसीम-अधामुप, अवनत ( १३१५८) । ओसीस-अपवृत्त, दुश्चरित्र (दे १११५२) । मोसुखिम-उपेक्षित, कल्पित (दै १११६१) । मोसुद्ध-१ नीचे गिरा हुआ विनिपतित (दे १११५७) । २ विनाशित (स १३।२२)। ओस्स-आस, निशाजल (नि १३८)। ओहक-हास, हाम्य (दे १११५३) । मोहजलिया- चतुरिद्रिय जीव यी जाति विप (जीवटी १ ३२) । ओहस-१ चदन । २ चदन घिसन का शिलापट्ट (दे १११६८) । मोहट्ट-१ घूघट । २ वटि-वस्त्र । ३ अपमत (दे १:१६६) । ओट्टिम- दूमर का धक्का देवर छोन तना (दे १.१५६) । मोहट्ठ-१ प्राथित, वाछिन-'भाभट्ठमणाभटठ ल भइ ज जत्य पाउग (आटी प ६७) । २ हास्य (र १११५३) । मोहडणी 1-अगला (दे १११६०)। मोहत-अवनत (दै १३१५६) । ओहरण-१ विनाशन, हिंसा । २ अमभव जय की मभावना (दै १।१०४) । ३ अन्न।४ आघात। मोहरिय-१ प्रहत-'पुरधार अमी रासि आहरिए (मा १३१४१७७) । २ उत्तारित, उताग हुआ-मोहरियभारो व भारवह (उ २९।१३) । ३ प्रक्षिप्त, या हमा (से १३१३)। ४ नीच गिराया हुवा (से १३७)। ओहरिस-१ घात, मूषा हुआ। २ चपन घिसन को मिला पोटा (३ १३१६६)। मोहसिम पत्र । पम्पिन (१३१७३) । ओहाइम-~-यधामुग (दे १३१५८) । मोहराण-~१ प्रायशित मा एर प्रकार । २ पिधाना (निपू ४४२८)। ओहाडणी-पिधानप, उरनी (जीव ३ १ २६४ , ८ १११८१) । मोहारिम-~या मा-'मोहारियानिमितियागि ( १।१४) । मोहामिम-निरस्त (मोनि ६०) । २ तासा हुमा (पा ५३६) । ३ स्थगित । अभिभा।
देशी शब्दकोश ६४ ओहार-१ जलजंतु-विशेप, मत्स्य (प्र३।७) । २ कछुआ। ३ नदी आदि का अन्तर द्वीप, मध्यद्वीप। ४ अंश, विभाग ( दे१११६७) । ओहावण-अपभ्राजन, तिरस्कार (उशाटी प १६२) । ओहिंजलिया-चतुरिन्द्रिय जतु-विगेप (उ ३६।१४८ । ओहिज्जंत—अतीत, अतिकात, क्षीण (अंवि पृ ८१) । ओहित्थ-१ विपाद । २ वेग । ३ विचारित (दे १११६८) । ओहीरमाणी-नीद लेती हुई (जा १११११८) । ओहोरिअ—१ उद्गीत (दे १११६३) । २ अवसन्न,खिन्न-'ओहीरिअ उद्गीतम् । अवसन्नमित्यन्ये' (वृ)। ओहुअ-अभिभूत (दे १२१८) । ओहुड-विफल (दे १११५७) । ओहुप्पंत--जिस पर आक्रमण किया जाता हो, वह (से ३३१८) । ओहुर-१ खिन्न ( दे१११५७) । २ अवनत । ३ स्रस्त, खिसका हुआ-'ओहुर खिन्नम् । 'ओहुर अवनत स्रस्त चेत्यवन्तिसुन्दरी' (वृ) । क कइअंक-निकर, समूह (दे २।१३) । कइअंकसइ-निकर, समूह (दे २०१३) । कइउल्ल-थोडा, अल्प (दे २।२१)। कइक-कोई (अवि पृ २५१) । कइतविय-कृत्रिम (सूनि ५६) । कइलवइल्ल-स्वच्छन्दचारी वृषभ, चिन्हित साड (दे २।२५)- 'कइलवडल्लोव्व तुम घरा घरं किं भमेसि पिल्लज्ज कइल्लिय-कृत-'अणुकपा कइल्लिया होहित्ति' (उशाटी प ८६)। कइवाह-तत्काल, गीघ्र-सव्व ते पज्जत्त नणु कइवाह पडिच्छामि' (ति ६५६) । कइविया–पात्र-विगेप, पीकदान (जाटी प ४७) । कउस-१ प्रधान । २ चिह्न (दे २०५६) । कउल-१ करीष, कडा । २ कडे का चूरा (दे २१७) । (वृ)।
दशीशदकाश . कउह-नित्य (दे २१५)। ककडुय-~चना आदि धाय जा अग्नि से नहीं पकता, कारडू-'नगयादोग उववखडियाण जे प सिज्झति त काड्या' (निचू ३ ४४८४) । दखें-नवण्डाम ककण-~~चतुरिद्रिय जतु विशेष (उ ३६।१४७)। फक्दुय-कोरडू धान, वह धान जा पकाए जान पर भी नही पक्ता (कु पृ २१०)। ककिल्लि अशा वक्ष (प्रमा ४४०) । फकेल्लि-अशोक वृक्ष (औपटा पृ १७, द २११२) । फकोड--१ वनस्पति विगेप, ककरैल की म जी (द २१७) । २ साप की एक जाति । का-~१ धाय विशेष- वहच्छिरा क्गू (निचू • पृ १०६) । २ पीत तण्डुल (प्रसा ८६६) फगुलिया-मलमूत्र-वगुलिका सध्या मती च नीति विधत्ते (प्रमा ८३३)। फचणिका-भाजन विप (अवि पृ ७२) । गठीय कचणिया--राक्ष की माला (म २१३१) । कचिषक-नयुसर- भसेति यता इधेस कचिका (वमा ५१८३) । फची-मुसर ये मुग पर रहन वाला लाह-बलय (द २११)। मजुसिणोदेहिकाजिमाम जुसिगादहि ति ह च लाटदा श्रावण पारिजा मण्यत (बटी पृ८७१) । पटरिच-मष्टप्रात पाटा से बौधा हुआ (दे २०१७)। पटक-विच्छ या विप प्रधान पूछ- यश्विभ्य महाविषलागूत पटर उच्यन (ध्यमा ६ टी ५५७)। पटाती-यनम्मनि विशय सारिपा (२.)। पटासर -~पि, पना (२) (अपि६४)। पटिया-रपनी जमा पास शिवाजटिप तिजा यूपा' (मयि ७१। पदल्लपरम गरमी सम्वा ना वर्षा माहोगी। (पा ३८२)। पटेण-पशु-विप (मयि ६२) । पटोल-राम पनामिनीगरा (13)। पट-१ गार, गूमा म मा (1) . दर जयपुर ८६ देशी शब्दकोश कंठकप्पड-कधे पर रखी जाने वाली चादर-णिवलं च ण कंठकप्पले त पुट्ठलय' (कु पृ १०५)। कंठकुंची-१ वस्त्र आदि के अन्त में लगाई गई गांठ। २ कट के ऊपर उभरी नाडिग्रन्थि 'रसोली' (दे २०१८) । कंठदीणार-~बाड का छिद्र (दे २।२४)-'आवति कंठदीणारएण कुटिय- भमिरा भुयग त्ति (वृ)। कंठमल्ल-१ शव को वहन करने का माधन (दे २।२०) । २ यानपान, वाहन (वृ)। कंठमुखी-आभूपण-विशेप (भ ६।१६०)। कंठाकंठि-गले मिलना-'अब्भुठेत्ता कठाठिं अवयासेड' (ना ११२।६६) । कंठाकंठिय-गले मिलना (ज्ञा १२२१६०)। कंठाल-मोटे कठ वाला (कु पृ १३५) । कंठिअद्वारपाल, दीवारिक (दे २।१५) । कंड-१ दुर्वल । २ विपन्न । ३ फेन (दे २१५१) । कंडपडवा-यवनिका, परदा (दे २।२५) । कंडरा--शरीर का एक अवयव (अवि पृ ११६) । कंडरिय–अनतकाय वनस्पति-विशेष (भ २३११) । कंडु-पाव-विशेप (सूचू १ पृ १२४) । कंडूर-वगुला (दे २१६) । कंडूसग-रजोहरण का वचन-विशेप (नि ५१७०)-'कंडूसगवधो णाम जाहे रयहरणं तिभागपएसे खोमिएण उण्णिएण वा चीरेण वेढिय भवति' (निचू २ पृ ३६७) । कंडूसी-गोत्र-विशेष (अवि पृ १५०) । कतार---मार्ग-'कतार नाम अध्वान' (निचू १ पृ १६४) । कंतु-कन्दर्प, कामदेव (दे २११) । कंथा-टुकडा, अश-'कण्हेण भेरी जोयाविया जाव कया कया' (वृभा ३५६) । कंद-१ दृढ । २ उन्मत्त । ३ आच्छादन (दे २१५१) । कंदल-१ प्रत्यग्र लता (ज्ञा ११६।२०) २ कपाल (दे २१४) । ३ पुष्प-विशेष (अंवि पृ६३)। कंदी-मूला, कन्द-विशेप (दे २११) ।
देशी शब्दकोश ८७ कदुग्घुसिय-नील कमल (१) (कु पृ ३५) । कदुट्ट-नील कमल (पा ५७) । कदोट्ट-नील कमल (दे २।६) । कपड-पथिक (दे २१७) । कबर-विनान, प्रज्ञा, कलाकौशल (दे २११३) । कवलिक -धा य विशेष (अवि पृ २२०) । कबिया-पुस्तक का आवरण पृष्ठ (जीव ३।४३५) । कसार-सार, एक प्रकार की मिठाई (वटी पृ ४०३) । कसारिआ--त्रीन्द्रिय जतु विशेष (बटी पृ ८००) । कसारिका-सारी नीदिय जतु विशेष (बटी पृ ६६७) । कसारी--श्रीद्रिय जतु विशेष (जीत १८)। कसाल-वाद्य विशेप (भटी पृ८८३) । ककाणय-गरदन-'आरुस्स विज्झति ककाणमो से (मू ११५५४२) । ककितजाण-गोन विशेष (अवि पृ १५०) । ककी-पक्षी-विशेप (अवि १ २३६) । ककुलुडि-पात्र विशेष (अवि पृ २१४) । ककुह-१ राजचिह-अवहट्ट रायककुहाइ (प्रसाटी प १३) । २ प्रधान (नाटी प २४०)। कक्ककुरुय-माया (प्रसा ११५) । कक्कडग-तकशास्त्रगत हेतु का एक प्रकार- कक्कडगहेऊ जत्य भणित उभयहा वि दोसा भवति' (निचू ३ पृ ३८०) । कक्कडय--वायु विशेष जो पेट मे उत्पन्न हाती है-'कक्कडए नाम वाए समुच्छइ जेण (भ १०१३६)। करकडी-ककडी (वभा १०५१) । फक्कडीय -मत्स्य विशेष (अवि पृ १८३)। करकव--इक्षुरस का विकार, गुड की पूर्व अवस्था (पिनि २८३)। फक्कय-गुड की पूर्व अवस्या- गिल्लसनिही गुलक्क्यघयतेलाई (जीचू पृ १४)। फरफर-मपुर-पार नाम महुर (उचू पृ १६०) । पपकरपिंडग-वाद्य पदाय विशेष (मवि पृ २४६)। पपरी-घट विगप (जयूटी प १००)।
देशी शब्दकोश ८८ - कक्कस-दध्योदन, करवा (दे २११४) । कक्कसार-दध्योदन, करम्बा (दे २।१४)-'मयकरिस लहसि कक्कसार' (वृ)। कक्कावंस—पर्व वनस्पति, वास का एक प्रकार (भ २१११७) । कक्किड-कृकलास, गिरगिट (दे २१५) । कक्कुस-तुष-'तुस त्ति कोटको व त्ति कक्कुसो तप्पणो त्ति वा' (अवि पृ १०६) । कक्खड-पीन, पुष्ट (दे २।११) । कक्खडंगी-सखी, सहेली (दे २।१६) । कक्खल-कठोर, कर्कश-'कक्खलफासाहिं कमणीहिं' (निभा ६२६) । कक्खारुग-फल-विशेप (अवि पृ ६४) । कग्घाड-१ अपामार्ग, चिरचिरा, लटजीरा । २ किलाटी,मावा (दे २१५३) । कग्घायल-किलाटी, दूध का विकार (दे २१२२) । कचक्खी-गोत्र-विशेप (अवि पृ १५०) । कच्च-कार्य (दे २।२) । कच्चग-पात्र-विशेप (व्यभा ८ टी प २२)। कच्चाल-प्रवृत्ति या व्यापार का स्थान, कार्यालय (दे २१५२ पा) । कच्चोल-कलश, पात्र-विशेप (उसुटी प २८०) । कच्छ-गुठली का एक अवयव जो तुष रहित हो (आचू पृ ३४०)। कच्छभाणिया-साधारण वनस्पति-विशेष (सू २।३।४३) । कच्छभाणी-जलीय वनस्पति-विशेप (प्रजा ११४६) । कच्छभी -तापस का उपकरण-विशेप- -'हत्यकयकच्छभीए-कच्छपिका तदुप- करणविशेप' (ज्ञाटी प २२७) । कच्छर-पक, कीचड (दे २।२)। कच्छवी-पुस्तक का एक प्रकार जिसके दोनों किनारे छोटे तथा मध्यभाग मोटा हो-'कच्छवि अते तणुओ मज्झे पिहलो मुणेयन्वो' (प्रसा ६६५) । कच्छा-कच्छा, लाट देश मे पहना जाने वाला स्त्रियो का परिधान-विशेष- 'लाडाण कच्छा सा मरहट्ठयाण भोयडा भण्णति' (निचू १ पृ ५२) । कच्छुरिअ-ईपित, जिसकी ईर्ष्या की गई हो वह (दे २।१६) । कच्छुरी-कपिकच्छू, केंवाच (प्रज्ञा ११३७११, २।११)। दे देशी शब्दकोश 48 कच्छुल्ल-१ गुल्म विशेष (प्रज्ञा ११३८।२) । २ खाज रोग से ग्रस्त-'तत्य ण पासड एग पुरिम-कच्छुल्ल कोढिय दाओयरिय (विपा ११७७), कच्छोटक-लगोटी धारण करने वाला (भटी प ५०) । कच्छोट्टग-कच्छा, लगोटी (आवहाटी १ पृ २७६) । कज्ज-कचरा (मोटी प १६२) 1 कज्जउड-अनथ (दे २०१७) । कज्जत्थ-कूटा करवट डालने का स्थान, अकुरडी-कज्जत्योकुरटिकास्थानम् (मोटी प १६२)। कज्जलमाणी-डूबती हुई (नि १८।१६) । कज्जलावेमाणा-डूबती हुई-'णाव कज्जलावेमाण पेहाए (आचूला ३।२२)। कज्जव-१ तृण आदि का समूह (दे २।११) । २ विष्ठा (व)। कज्जवय-कूडा चरा (अनुद्वा ३४६)। कज्जूरी-खजूर का वक्ष (अवि पृ ७०) । कज्जोव (-उल्का (अवि पृ २४५) । कज्झाल-सेवाल, एक प्रकार की घास जो जलाशया मे हाती है (दे २८)। कटार-छरी (प्रा ४१४४५) । कट्ट-१ खड, टुकडा (अनुटी प ५) । २ काट, जग (यभा ५ टी प ६)। कट्टर-१ खड, अश-चित्तकट्टरे इ वा' (अनु ३।४०) । २ कढी मे डाला हुआ घी का बडा-"तीमनोमिश्रघृतवटिकारूपस्य देशविशेषप्रसिद्धस्य' (पिटी प १७२)। कट्टरिगा- -शस्त्र विशेष छुरी (निचू २ पृ ५६) । कट्टारिया-कटार छुरी (निचू २ पृ ५६) । कट्टारी-क्षुरिका, छुरी (दे २।४) । कट्टित-कटा हुआ (अवि पृ २५५) । कट्ठ-आभूषण विरोप, एक प्रकार का हार (अवि पृ ६५) । कट्ठसालुक- -कठ का रोग विशेष (अवि पृ २०३) । कट्ठकरण-खेत-वट्ठकरण गाम देत (बावहाटी १ पृ १५२)। फ्ट्ठखोड-आमन विरोप-'मद्दासण पीढग वा क्ट्ठयोडो नहट्टिका (जवि पृ १५)।
देशी शब्दकोश कटुगंध-नौका खेने का वडा वास (बाचू पृ ३५७) । कट्ठाहार-जीन्द्रिय जन्तु-विशेष (प्रज्ञा ११५०) । कट्ठिअ-द्वारपाल (दे २०१५) । कट्ठियव्वग-खाद्य-विशेष (निचू २ पृ २४१) । कठेवट्टक-कण्ठ का आभूषण (अवि पृ १६३) । कट्ठोरग-कटोरा (निचू १ पृ ५१) । कड-१ क्षीण । २ मृत (दे २।५१) । कडअल्ल द्वारपाल (दे २०१५) । कडअल्ली-कण्ठ, गला (दे २।१५) । कडइअ-स्थपति, वढई (दे २।२२)। कडइल्ल द्वारपाल (दे २०१५) । कडत-१ मूली का शाक । २ मुसल (दे २१५६) । कडंतर-पुराना छाज आदि उपकरण (दे २०१६) । कडंतरिअ-विदारित (दे २।२०) । कडंब-करटिका, वाद्य-विशेष (राज ७७) । कडंभुअ-१ कुम्भग्रीव नामक पात्र-विशेष (दे २।२०) । २ घड़े का कण्ठ- भाग-'कडंभुअ घटस्यैव कण्ठ इति शीलाक.' (वृ)। कडग-१ यवनिका, परदा (आवहाटी २ पृ १७८) । २ वास की चटाई से बना घर (व्यभा ४१४ टी प १०१)। कडच्छकी-कडछी-'दव्वी तध कवल्ली य दीविक त्ति कडच्छकी' (अवि पृ ७२) । कडच्छु-लोहे की कर्बी डोई (दे २७) । कडच्छुत-कर्णी (निचू २ पृ २५१) । कडच्छुय-चम्मच (ज्ञा ११८५५) । कडजुम्म-युग्म राशि जिसमे चार शेष रहते है-'सर्वासा दिशा प्रत्येकं ये प्रदेशास्ते चतुष्केनापह्रियमाणाश्चतुष्कावशेषा भवन्तीति कृत्वा तत्प्रदेशात्मिकाश्च दिश आगमसंज्ञया कडजुम्मत्ति शब्देनाभिधीयन्ते' (आटी प १३)। कडणा-१ छत (भ ८।२५७) । २ पट्टिका, वाड़ (भटी पृ ६६१) । कडतला-लोहे का वह हथियार जो एक ओर से धारवाला और वक्र होता १ है (दे २०१६) ।
देशी शब्दकोश ६१ कडपल्ल-धायशाला-कडपल्ल त्ति वा तणपल्ल त्ति वा धन्नसालत्ति वा वलय ति वा एगट्ठा' (वचू प १४१) । कडप्प-१ निकर, समूह (बटी पृ ५४, दे २११३) । २ वस्त्र का एक भाग (वृ)। कडयडाविस-कड-फड आवाज से चवा जाना (कु पृ६८)। फडला- पर का आभूपण (जवूटी प १०६) । कडवय-समूह (वटी पृ ५४)। फडवल्ल-१ वास की टोकरी (निचू ४ पृ १६२) । २ सूखे मास से बना भोज्य–'मसा सुक्खाविति सुक्यस्स वा कडवल्ला कता' (आचू पृ ३३५)। कडसक्करा-बास की शलाका- बहवे लाहखीलाण य क्डमक्कराण य चम्म- पट्टाण य (विपा १।६।२०)। फडसी- श्मशान (दे २१६) । कडार-नालियर, नारियल (दे २०१०)। कडाली-घोडे के मुख को वाघने का उपकरण विशेप (अनु ३३५२) । फडाहक-कडाही (अवि पृ २१४) । कडाहपल्हत्यिअ-दानो पावों को बदलना, दोनों पावों का अपवतन (दे २।२५) । कडिक-खिडकी (अवि पृ २६) । फडिखभ-१ कमर पर रया हुआ हाथ (दे २०१७) । २ कमर पर किया हुआ आघात-पडियमो पटी यस्ता हस्त । पटयाघात इति वेचित (ब)। कडिण --तण विरोप (सू २।२।४) । फडिल्ल -१ माड आदि पाने का बतन (उपा २१२१) । २ तवा- 'तत्तव डिल्ल व जह विंदु (पप १८७४) । ३ गहन (वृभा ५५६६, ८ २०५२) 1 ४ वटीवस्त्र (जीविप पृ५३, ६ २५२) १५ द्वारपाल । ६ शत्रु । ७ यागीर्वा । जगल । ६ निश्छिद्र (दे २०५२) १० गहन प्रदेश (व्यमा ४११ टी १६०)। पडिल्लप-मार या रसा पान (पिटी प १५८) । पडिल्लग-अटवी जगर'मा अभिमुनि मुसो गसारस हिन्लगम्मि अप्पाग (१२ २३७८)।
६२ देशी शब्दकोश कडिल्लय-कटि-वस्त्र-अहवा रज्जसि पावे एय पि कडिल्लय णत्यि' (कु पृ८१)। कडिल्हक-लोहे का वडा पात्र (प्रसाटी प १५३) । कडुआल-१ घण्टा । २ छोटी मछली (दे २१५७) । कडुइया-वल्ली-विशेप (प्रज्ञा ११४०) । कडुच्छ--चम्मच (भ ५।१८६) । कडुच्छय-चम्मच (भ १११५६) । कडुच्छिका-की डोई (ओटी प १६६) । कडुच्छुग-कर्णी (जवू ११४०) । कडुच्छुत-चम्मच- चम्मच-'कडुच्छुते घय ताविज्जति' (निचू २ पृ २५१) । कडुच्छ्य-चम्मच (अनुद्वा ३६२) । कडुभ-कूब, पीठ का उभरा हुमा भाग (निचू २ पृ १६१) । कडुभंड-मसाला-'वेसण कडुभड जीरय' (निचू २ पृ २५) । कडुमाय-पशु-विशेप (अवि पृ ६२) । कडुय-अपराधी को दड का निर्देश देनेवाला-'कडुओ उ दडकारी' (वृभा ३५७६)। कडुयाल-छोटी मछली (पा ३०१) । कडुयालय-छोटी मछली (कु पृ १६१) । कडुहुंड-भोजन में प्रयुक्त सामग्री-विशेप- तत्थ भोयणे उवउज्जति फडहुडाइ' (आवचू १ पृ २८०)। कडूकीका-वृक्ष-विशेप (अवि पृ ७०) । कडेवर-१ शरीर (भटी पृ १२६०) । २ निश्चेतन देह, शव । ३ द्वीन्द्रिय आदि जीव (भटी पृ १३७१) । कड्ढिण-तृण-विशेप (निचू २ पृ ४३०) । कढ-गोत्र-विशेप (अवि पृ १५०)। कढिआ-कढी-'तक्कोल्लणसूवकजिककढियाई' (पिनि ६२४, दे २१६७) । कढिण-तृण-विशेप (आवचू २ पृ १२७) । कढिणग-तृण-विशेप (प्र ८.१०)। कढिय-कढी, खाद्य पदार्थ विशेप (जीभा ३६४) । कणइअ-१ आर्द्र, गीला । २ किया हुआ। ३ चित्रित : ४ कण-धान्य से आकीर्ण (दे २१५७) ।