Sanmati Library, Jaipur
Shruti Navratnabhasha
Front matter
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* समर्पण
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ग्रंथकार इस स्तोत्र को श्रीमती माजी महा-
रानी खुशहालकुंवरजी साहिवा इलाकेदार
रियासत वरौली जि. अलीगढ़ की सेवा में
श्रीमान् महाराज पं० परशुरामजीशा दीवान
तथा मैनेजर रियासत के द्वारा होली महोत्सव
के समय समर्पण करता है।
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LAAAAAA. 444AAAAALAAALAINAA444AAL ओस्मतत्सनः। यजुर्वेदीय LY" 11.AAD NE श्रुतिनवरत्न भाषा श्रमिक . HERE अचिंत्याव्यक्तिरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने । समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥ १ ॥ मन्दः कवियशःप्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम्। प्रांशुलभ्ये फलेलोभा दुबाहुरिववामनः ॥ रघु । दोहा-सुनह दास आरत विनय, पण्डित जन कवि मैंन । चूक सक सम निरख लखि, जिम सुत तोतल बैन ।। लिखनसकतमममतिअतिभोरी। विद्या बुद्धिहीन वय थोरी ॥ जानतछद भेद कुछ नाहीं । तृणसम काव्यकलामोमाहीं। चाहत में कविपद निज पावन । जिम बड़वृक्षसमस्याबामना। करतसोही चारतार्थ कहावत । लखिरखर वाज ख़रीबनबावत। नाहकुछ साधुसमागम कीना पापीसबविधि धर्मविहीना। दीन हीन मतिमंद गवार। चाहत करन माणिनव्यवहारू। चहत पंख बिन गगनउदाहीं चढ़त यथाविन पग गिर नाहीं॥ जोसमस्त निजलिखोंदिटाई।हो उपहास्य न मोर भलाई। दोहा-चाहत पीठ पिपीलिका, जिम पाथरकी भीत। तैसेही मतिमैंद मम, दृढ़ चित कीन्ह अनीति ॥ करहुँ छंद श्रुतिभाव प्रकाशा । निश्चय होय मोर उपहासा।। सब जग जानत वेद बड़ाई। कहा महत्व लिखोंमें भाई ॥
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यजुर्वेदीय
श्रुतिनवरत्न
कहाँ श्रुति नित्य पवित्र अनादी कहाँजड़मतिमममिथ्यावादी॥
कहँ श्रुतिसागर ज्ञान अथाहा। थकितभये ऋषिमुनिगुणगाहा॥
बहु चतुआश्रम व्रतमाचरिता । योगी योगअष्टविधि करता।
नारदादिब्रह्मादि मुनीशा । कपिलकणादि अत्रिबागीशा ॥
मुनि मनु पातंजलिभृगु ज्ञानी । जिनकरयशइतिहासवखानी॥
सिद्ध साधु ऋषिकविबुधजोई । अंतिम कहेउ नेतिश्रुतिसोई।।
सोरठा-मतिलघु काज महान, ऋपिमुनिगत नहिंअंत पथ।
मशशि बाल समान, करसाहसचाहत गहन ॥
तो कहा असविचारममनीको। हो अवश्य शंका सबहीको ॥
तदपि कहूं कुछ बिनय वहोरी। क्षमहु सुजन सुनविनतीमोरी।
है दृष्टांत सकल मम एहा । करतगाल सिंह प्रण जेहा ॥
कबहुं न मममन उरयह आई। होय लाभ या मिले भलाई।
पुनजोबालसमयअभिलाशा । अन्यग्रंथि लाख करत प्रकाशा॥
शब्द अशुद्धि दृष्टि कविपरहीं।क्षमाजान आपन सुत करहीं।।
खलउपहास्य अहितममकैसे । वोलतश्वान निरखशाशिजैसे।
सत. श्रुति भाष्यभाव अनुसरहों । उलथा तासु छंदप्रतिकरहों।
दोहा-यद्यपि नहिं बल बुद्धि कुछ, धर्म अर्थ सत नीति।
उलंट सीध श्रुति वचनकर, होत चित्त दृढ़ प्रीति।।
छंद जेहि सुजन गान कुगानं गावत सकल ते विसरावहीं,
सो छंद श्रुतिनवरत्न तेहिनर मुदित चित नित गावहीं ॥
सर्वत्र वेदप्रचारहो निज शाक्त पुनि निजमत यथा ।
उतसाह करें विशेषवुधि जिमि श्रवणशिशुमुखहरिकथा।।
यहमम काव्यवाटिका भाई. । है सर श्रुति नवरत्न सुहाई।
अक्षरलेखः धातु क्रम जोई नवघट मण-माणिकयुतसोई।
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यजुर्वेदीय
(३)
श्रुतिनदरन
दोहा छंद. सोरठा जे ते । नवपल्लव नाना तरु तेते ॥
शोभित ओम मंत्र प्रति कैसे । सुमन माल सुरसरितटजैसे।
अन्वय अर्थ विभाक्ति विधाना दीखत अटित रत्नसमनाना।
तैत्तरीय व्याहृति प्रतिपावन विकसताजमसरकमलसुहावन।।
छंद देव ऋषि स्वर यह भाँती।फूलत सर्व सुमन जिमपाँती॥
वरणों कहा मनोहरताई ।निगमागम सम्मति नहिपाई।
दोहा-अलंकार उपमा तथा, रौचिक व्यङ्ग प्रकार ।
मानों हंस मयूर वन शुककोकिला प्रसार ॥
लागत फल वहु भाँतिअनेका । धर्म आदि विज्ञान विवेका॥
परम पवित्र नीर सरनी को जिाहसम तुल्यसुधारसफीको।।
तेहिवनवास करतभट भारी । कामक्रोध प्रादिक भयकारी॥
हेष तथा आलस्य घनेरे । जान न देत पथिक वहु फेरे।।
जिनकर परम उग्रं तप होई । पहुँचत सतसहस में कोई ॥
यजुवन मग प्रातिशय कठिनाई । जहँयह मान सरोवर.जाई।
*योगश्चित्त वृत्ति निरोधा । आसअस हाय नष्टशठयोधा।
कर अभ्यास परम दृढ़ताई । पहुँचो मान सरोवर जाई॥
दोहा-कर्म वचन मनकर करें, जो यह मजन पान ।
विन प्रयास संतत महित,पावें पद निस्वान ॥
करें अनुग्रह सकल मिल, जो श्रोता वक्तादि ।
छंद वद्ध श्रुति को करों, भाष्य भाव अनुवाद।।
यह श्रुति भाव छंद पदमेरे । जिम छोटे मुख वचन बड़े।।
है यह मोहि प्रवल विश्वासा निहिंममभणितयोग्यउपहासा॥
नोट* योगश्चित्त वृत्तिनिरोधःपातञ्जलि योग ।। अर्थात् चित्तकी वृत्तियों को
सब प्रकारसे निरोध करने को योग कहतेहैं ।।
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AALLAALAALAALAAAAAAAAA81134AALULANTEATASARASAMALT यजुर्वेदयिः (४) श्रुतिनवरत्न जिनमिथ्या वकवाद विवादा । कीन असत्यग्रंथि अनुवादा॥ परकीरत . निंदा अपमानाकामानवंध रचे पद नाना॥ कीनन जिन श्रुति सिद्ध भलाई है तेहि हसन योग्यसवभाई। भणित मोरसविधिप्रतिफीकी केवल सत्यवचनकरनीकी ॥ हे यह मम गौरव कर कारण । समय कीन नहिनष्टकारण। जो पाठक मम श्रम सनमानों तोऋषिकतिगभाष्यपरवानो। सोरठा-कविता भेद अपार, लेशमात्र मम उरु नहीं । तेहि कारण वहुवार विनय महाशय करत में । दोहा नहीं बलवुद्धि विचारकुछ,नाहं विद्याधन धाम । भेंट करें कहा आपकी, यह दन बाबूराम ॥ काव्ग प्रेम वम भाव श्रुति, जोर गांठ जो दीन। सा अरिपित में पुष्प इन श्रुति नव रत्ननवान ।। आपका शुभचिंतक। सोरठा--शर्मा बाबूराम, विप्र गोत्र भारद्वनिय । चन्दौसी मम ग्राम, कक्षित्र में बांसमव । आरती-याविधि हरिको पावो ॥ रेसांधो। जीव पुजारी टहल करत मन मंदिर देहि वनादो। व्यापक ब्रह्म अखंड जोग सिंहासन ताहि चढायो ।। रे साधो । सत्य कर्म विज्ञान रूप सुरसार अस्नान करावो । धृतिः क्षमा दसधर्म रूप लक्षण शृंगार सजावा ॥रे. साधो ।। ब्रह्मचर्य वृति दीपक तामें धृते विद्यादि डरावो ।' श्रुति सिद्धांत बनाकर वाती चौ मुख दीप सरायो। रेसाघो । शांति प्रासनी में दृढ़ता पदमासन ध्यान लगावो.। शम दम आदिक इडा पिंगला क्रमकर नाद वजांवो।। रे साधो॥ श्रद्धा भक्ति ज्ञान ध्यानादिक उत्तम भोग मुंगावो। योगश्चित्तवृत्ति निरोधकर संबपट बंद करावो ॥रे साधों॥ ब्रह्म ज्ञानरूपी चरणामृति पी आनन्द मनायो। वावू या विधि करत भारती, जीवन मुक्ति कहावो । रे साधो या विधि हरिको पावो।। . SALAMALAYAN NAAMKARANAKAALAAAAAAAAAAAAAAAAAAAkki -- ओस् यजुर्वेदीय- श्रुतिनवरत्न मापार्थ AAAAAAAAAAAAANAMAkce . . श्री० कवि पं० वाबूरामजी शर्मा चन्दौसी वर्तमान कर्णक्षेत्र निवासी विरचित दोहा-सिद्धिसदन मंगलकरण, हरणदुःख भंगसूल । हे त्रिभुवन व्यापक प्रसू, सदारहो अनुकूल ।। देहु सतोगुण बुद्धिवल, दृढ़ताविविध प्रकार । करहुँजासु आरंभ में श्रुतिनवरत्न विचार ॥ ओ३म् ओ३म् विश्वानिदेव सवितर्दुरितानि परासुव । यद्रं तन्न आसुव॥ य० अध्याय ३० मंत्र ३ भावार्थ ओम् " यहं मुख्य परमेश्वर का नामहै जिसके साथ अन्य संब नाम लगजाते हैं और अकार उकार मकार इन तीन अक्षरोंसे मिलकर चना है जैसे प्रकार से विराट् अग्नि विश्व इत्यादि और उकारसे हिरण्यगर्भः वायु तैजसादि तथा. मकारसे ईश्वर आदित्य तथा प्राज्ञादिकोंका ग्रहण किया है यह सब नाम ईश्वर केही हैं ईश्वरके अनंत नामों में से यहां केवल नौ ९ नामोंकाही वर्णनं प्रोम्के अंतर्गत किया है जैसा कि भापाकाव्य से भली भाँति मंकटहोता है परंतु अव हम धातु क्रम भेद नीचे लिखते हैं और यथा- वसर भाषाकाव्य में भी दिखला दियाहै जिसके सहारे से प्रोम् शब्दार्थ ठीक २ हृदयमें जमजावेगा ॥ * इसके पनि अर्थहैं विराट् । अग्नि २ विश्व ३ राजुदीप्तौ धातुसे बिरानशब्द सिद्ध होताहै विविधन्नाम्नांचराचरञ्जगत्- रांजते नाम मकांशते सावराट्, बहु मकारके जगत् को जो मकार करे उसका नाम विराद है। .
LAAAAL aa RAMAIRAMA यजुर्वेदीय (६) श्रुतिनवरत भावाथ दोहा चौपाई में ॥ दोहा-मिले अकार उकारपुन अक्षर अंत मकार । होत विदित याशब्दसे ईश्वर नाम अपार ॥ अञ्चुगति,पूजनयोः धातुसे अग्नि शब्द सिद्ध होताहै नो ज्ञानस्वरूप सर्वस जानने प्राप्तहोने और पूजाके योग्य है उसका नाम अग्नि है। विशमवेशने,धातुसे विश्व शब्द सिद्ध होताहै मवेश करते हैं आकाशादिक भूत जिसमें उसका नाम विश्वहै इत्यादिक नाम अकार. से लियेजाते उ भी तनि अर्थोंका वाचकहै हिरण्यगर्भः वायु तैजैसादि . . : हिरण्यानां सर्यादीनांतेजसाङ्गर्भः सहिरण्यगर्भः जिससे सूर्यादिक नेजवाल पदार्थ उत्पन्न होके जिसके आधार रहते हैं उसका नाम हिरण्यगर्भः है। वागतगन्धनयो, धातुस वायु शब्द वनाई जो चराचर जगतको भलय करे अथवा धारण करे और सब बलवानों से भी बलवानहों उसको वायु कहते हैं। तिजनशाने,इस धातुसे तैजस शब्द वनाया जाताहै जो अपने श्रापही प्रकाशित होय और सूर्यादिक तेजों का भी मकाश करें उसको तैजस कहा गया इत्यादिक तीन नाम उकारसे ग्रहण किये जाते हैं। मकार ईश्वर आदित्य माज्ञादिका वाचकहै । ईश ऐश्वर्य, धातु से ईश्वर शब्द बनाया गयाहै जो सत्य विचार शील और जिसका ज्ञान सत्यह अथवा जो अनन्त ऐश्वर्यवान् है 'उसको ईश्वर कहते हैं। दोऽवखण्डने धातु से दिति शब्द बनायां अवखण्डनाम् उससे क्तिन् मत्यय लगाने से दिति सिद्ध होताहै और जिसका नाशहै, उस का नाम दिति है,इसकारण जिसका कभी नाश नहो उसको अदिति कहले है और उसका नाम आदित्यहै । .. 'ज्ञा अववोधने, धातु से माज्ञ बनाया जाताहै जो ज्ञानी और सम ज्ञानियों से उत्तम ज्ञानवान् है उसका नाम माज्ञहै अथवा जो सर्व पदार्थोंको यथावत जानता है उसको भी माज्ञ कहतेहैं। '. अत एव परमेश्वरका जैसा कि प्रोम नाम परम पवित्र है. वैसा और कोई नहीं है इसलिय इश्वर के अनंत नामांसे ओ३म् के अंतर्गत नौ ९. नामों की ही व्याख्या कीगई है। १ '२
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यजुर्वेदीय
( ७.)
श्रुतिनवरत्न
दोहा-(राज. दीप्तौ) धातुसे, भयो बिराट निकास ।
वहु प्रकार सब जगतको,जो हर करत प्रकाश ॥
जो वहु भाँत जगत उपजावे । सो जगदीश(विराट)कहावे।।
सर्व ज्ञानमय पूजन योगा (अग्निकीन)तेहि हेत प्रयोगा।
(विश प्रवेशने) धातु लगाई ।होत(विश्व)तेहि पदसमुदाई।
जामें सबनम सर्व प्रकारा होत प्रवेशत अर्थ अकारा ॥
रविशशि प्रादि प्रकाशकजोई। जेहिआधार विश्वसब सोई।
आदिअंत सर्वस सबकाहू । कहत(हिरण्यगर्भ)पद ताहू॥
(वागतगन्धनयो ) जोभ्राता ।सिद्धहोत (बायू)जग त्राता ॥
'जो चर अचर प्रलयकरनाना सर्व प्रकार प्रवलवल वाना॥
धातु (तिजनशाने) से भाई।होतासिद्ध (तैजस) प्रभुताई ॥
जो स्वयमेव प्रकाशक होई। सकलप्रकाश प्रकाशित सोई॥
ऋषि मुनिताहिउकारबतायो । करक्रम धातु बिचारलखायो।
सत्य बिचार शील सत ज्ञाना ।जो अनंत ऐश्वर्य विधाना॥
दोहा-अबिनाशी ( आदित्य) गुण, ज्ञानी सर्वाधार ।
सर्व पदारथ रहित तेहि, जानहुँ अर्थ मकार ।।
सो०-ईश्वर नाम अपार, होत बिदित नहिं योग बिनः ।
विरचेऊमति अनुसार, प्रणवाँतरगत नाम नव ॥
मंत्र संख्या (१).
नारायण ऋषिः सविता देवता गायत्रीछन्दः
पर्डज स्वर।
ओ३म् विश्वानि देव सवितरितानि परा
सुव॥ यद्भद्रं तन्न आसुवायजु अध्याय३०मंत्र
भाषाभावार्थ है ( सविता ) सकल जगत्के उत्पति कर्ता समग्र ऐश्वर्य
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4. MAHAL -- AAAAAE 1111AAAAAALAALALAAAALALLALALLA (८) H यजुर्वेदीय श्रुतिनवरत्न युक्त (देव ) शुद्ध स्वरूप सबसुखों के दाता परमेश्वर आपकृपा करके(न:) हमारे ( विश्वानि ) सम्पूर्ण (दुरितानि ) दुर्गुण दुर्व्यसन और दुःखों को ( परासुब )दूर कर दीजिये ( यत् ) जोकल्याणकारण गुण और कर्म स्वभाव और पदार्थ है ( ना ) वह सब हमको (मासुब) मास कीजिये । भावार्थ छैदबद्ध हे सप्तभनव खंडरवि शीश आदि आदि चराचरम । जगदादि कारण सर्व विधि ऐश्वर्ययुक्त गुणागरम ।। पुन( देवोदाता सुःख शुद्ध स्वरूप व्यापक सर्कर्म । सर्वत्र जानन हार स्वामिन भूत और भवस्यतम ॥१॥ करके अनुग्रह नाथ हमरे हे जगत तारण तरण । (दुरितानि )और (घरासुब) अथवा विथा कहिरण ॥ (यत) सत्य( भद्रं ) मुक्ति कारक कर्म गुणसंव दीजिये। (तत आसुब)वह सकल हमको प्राप्त सुख पद कीजिय॥२॥ मंत्र संख्या (२.) हिरण्यगर्भःऋषिः प्रजापतिदेवता आरक्षत्रिष्टुप छदावत स्वर। ओश्म हिरण्यगर्भः समवर्ततामृतस्यजात पतिरेक आसीत् ॥ सदा धार पृथिवीं यांमुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ यज अ०१३ मंत्र४ भावार्थभापा-सो (हिरण्यगर्भः) स्वप्रकाश स्वरूप और जिसने प्रकाश करने हारे सूर्यचन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये है जो (भूतस्य) उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत्का (जात:) प्रसिद्ध(पतिः) स्वामी (एक) एकही चैतन्य स्वरूप (आसीद ) था जो (अन्य )सदजगत् के उत्पन्न होने से पूर्व (समवर्तः वर्तमानया(तः) सो (इमाम् ) इस (पृथिवीम्) भूमि ( उत) और (चाम्)सूर्यादिको (दाधार)धारण कर रहाहै हम लोग उस ( कस्मै ) AAAA . यजुर्वेदीय (९) श्रुतिनवरत्न सुख स्वरूप (देवाय) शुद्धपरमात्मा के लिये(हविषा) ग्रहण करने योग्य यो:- गाभ्यास और अतिप्रेमसे ( विधेम) विशेष भक्ति किया करें ॥२॥ भावार्थ दोहा चौपाई में। जो (हिरण्यगर्भः) प्रभू, स्वयं प्रकाश स्वरूप । जिसने धारण कीन यह, रविशशिआदिअनूप॥ जो (भूतस्य) जगतका स्वामी। है प्रसिद्ध अद्वैत अकामी ॥ जो उत्पन्न सृष्टि से भाई । आगे (समवर्तत ) सुखदाई। वर्तमान जेहि रहेड गुसांई। काल भेद तेहिकर प्रतिनाहीं।। (स)तो ईश सत्य बुधिदायकाइस(एथिवीम)भूमिकरनायक॥ यथा (याम्)रविशशिनभ जेतोसकल खगोल लोक सबतेते। पुन(दाधार)करतजो धारण । हम अस सुखस्वरूपकेकारण। हविषा ग्रहणकरन विधिजोई । करें (विधेम)भक्ति हमसोई॥ बाढ़े नवविधि भक्ति तुम्हारी । हो- जेहिमम मुद मंगलकारी॥ मंत्र संख्या (३) प्रजापतिषिःपरमात्मा देवता निवृत्रिष्टुप्छंदः धैवत स्वर। ओ३म् य आत्मदा बलदायस्य विश्व उपासते प्रशिष यस्य देवायस्वच्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवार्य हविषाविधेमायज०अ०२५ म. १३ भावार्थभाषा-(यः) जो (आत्मदा) आत्मज्ञान का दाता (बलदा शरीर आत्मा और समाज के वलका देने हारा ( यस्य ) जिसकी (विश्व) सब (देवाः) विद्वान् लोग ( उपासो ) उपासना करतेहैं और (यस्य) जिसका (मशिषं.) मत्यक्ष सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं ( यस्य) जिसका छाया)आश्रयहीं (अमृतम् ) मोक्ष सुखदा यक है ( यस्स ) जिसका न मानना अर्थात् भाक्ति न करना ही ( मृत्युः) AA AARRA Hara यजुर्वेदीय. (१०.) श्रुतिनबरनं. मृत्यु आदि दुःखका हेतु है हमलोग उस ( कस्मै). सुखस्वरूप (देवाय ) सकल ज्ञान के देने हारे परमात्मांकी प्राप्ति के लिये : ( हविषा), आत्मा और अंतःकरण से (विधम) भाक्ति अर्थात् उसकी आज्ञा का पालन करने में तत्पर रहें ॥३॥ भावार्थ दोहा चौपाई में। दोहा-(यः) जो (आत्मदा) आत्माका दाता आत्म ज्ञान । (वलदां) देह समाजको, जो देता बलदान ।। (यस्य)जातु सुरविश्वउपासन।करत तत्य शासन अनुशासन। जेहि सतशिक्षा न्यायबखानत। सर्वदेवं निश्चय तेहि जानता। जाकी (छाया) आश्रय भाई। (अमृतम्)मुक्ती सुखदाई।। मन क्रमवचन ध्यान जो लावै । सो अर्थात मुक्तिपद पावें।। जाकर त्याग अमान न मानन निश्चय होतं मृत्यु उपजावना। (कस्म) अस संततुःश्वस्वरूपमा सर्व ज्ञानमय विश्व अनूपमा। तेहि कर हेत तकल हम भाई (हविपा) करें भक्ति चितलाई।। मन कर करहुँ जो आज्ञाहोई.। हों ततपर पालें हम सोई॥ मंत्र संख्या (४) प्रजापतिषिः परमेश्वरदेवता भुरगत जगतीछेदः धैवतस्वर। ओ३म् यः प्राणतो निमिषतामहित्वैकइ- द्राजाजगतोबभूव । यईशेऽअस्याडिपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।। यजु० अ०२३मं०३ भावार्थ भाषा-( यः) जो (प्राणतः.) प्राणवाले और ( निमिपतः । अमाण रूप (जगतः ) जगत्का १ महित्वा.) अपने अनंत महिमासे ( एक- इति ) एकही ( राजा.) विराजमान रांजां (वभूव ) हैं ( य:) जो (श्रस्य) इस ( द्विपदः) मनुप्यादि.और( चतुष्पदः ) गौ अदि माणियों के शरीर JALAL AAAA RBAAAAAAAAAAA . यजुर्वेदीय (११) श्रुतिनवरन की (ईशे) रचना करता है हम उस सुखस्वरूप (देवाय सकल ऐश्वर्य के देने होर परमामा कालिये ( इविपा.) अपनीः सकल उत्तम सामग्री से (विधेम ) विशेष भक्ति करें ।। ४॥ . भावार्थ दोहातथा सोरठायें। दोहा-पाणी पुन अपाणका, जो (जगतः) संसार । निज महिमाकर एकही, हे राजा करतार ॥ सोरठा-(विपदः)जोनरआदि, (चतुष्पदः)गौप्रतिजो। (ईशे) रचत अनादि,निज महिमासे एक इव ।। दोहा-(कस्म) मुःख स्वरूपजो, सतवैभव दातार । भक्ति करें हम ताहिकर, बहुविधि वारम्वार ॥ मंत्र संख्या (५) स्वयम्भूब्रह्मऋषि परमात्मादेवता निवृत्रिष्टुप् छंदः धैवतस्वर॥ ओश्मू येन द्योतया प्रथिवी चहदायेन स्वः स्ति- मितंयेन नाकः॥योअंतरिक्षेरजसोविमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ यजु० अ०३२मं०६ भावार्थमाषा-- (येन) जिस परमात्माने ( उग्रा) तीक्षणस्वभाव वाले चौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवीम् )भूमिको (दृढ़ा.) धारण (येम ) जिस ईश्वरने (स्वः) सुखको, शिमितम् ) धारण-और (येन) जिसईश्वरने (नाकः) दुःख रहित मोक्षको धारण कियाहै (या) जो (अन्तरिक्षे.) प्रकाश में (रजसः).सव लोक लोकान्तरों को (विमानः.). विशेष मानयुक्त (अर्थात् जैसे प्रकाश में पक्षी उड़तेहैं वैसे सब लोकों को निर्माण करता और भ्रमण कराता है) हमलोग उस (कस्मैः)सुखदायक( देवाय) कामना करने के योग्य परब्रह्मकी मासिक लिये (इविपा) सब सामाय से (विधेम.) विशेष भक्ति करें॥५॥ -- 1 मका .
SALALAA . naikaninana Anna यजुर्वेदीय (१२) श्रुतिनवरत्न भावार्थ दोहा चौपाई में दोहा-(येन.) जिस चिदानंदने, तीक्षण स्वभाववान । रविशशि आदि (च) औरभु, धारण कान महान ।। छंद-जेहि ब्रह्म सुख अथवा रहित दुख मुक्ति जिन धारणकरी। सतचित अनंद अनादि मुक्तिस्वरूप सर्वोपर हरी ।। जो सर्वसप्तलगोलमें सनमान कर धारणधरनि । नभ उड़त जिम विविध खगकरत सवलोक लोकाँतरभ्रमन सोरठा-(कस्मै) सुखदातार , सर्व मनोरथ ब्रह्मकी । हमशर्मा, बहुबार ,पुन (विधेम) भक्तीकरें । मंत्र संख्या (६) हिरण्यगर्भऋषिः प्रजापतिर्देवता विरात्रिष्टुप् छदः धैवत स्वर ॥ ओ३म् प्रजापते न त्वदेतान्यन्योविश्वाजाता- नि परिता वभूवायतकामास्तेजुहमस्तन्नोऽस्तुवयं स्याम् पतयोरयीणाम् ॥ ऋगमं०१०सू०१२१ भावार्थ भाषा हरेमजापते ) सब मजाके स्वामी जगदीश्वर (त्वत् ) आप. से ( अन्यः) भिन्न दूसरा कोई. ( ता.) उन (एतानि ) इन (विश्वाः) सव (जातानि) उत्पन्न हुए जड़ चेतनादिकों को (न:) नहीं (परिवमूव ) तिरस्कार करताहै अर्थात् आपसर्वोपर हैं ( यत्कामाः ) जिस २ पदार्थकी कामना वाले हमलोग (ते ) आपका ( जुहमः ) आश्रयलेवें और वाञ्छा करें (तत् । उस २ की कामना (न: हमारी सिद्ध (अस्तु ) होवे जिससे (वयम् ) हमलोग ( रयीणाम् ) धनश्वयों के (पतयः )स्वामी होवें ॥६॥ भावार्थ दोहा चौपाई। दोहा-(प्रजापते ) हेसंब मजा, स्वामीपरमपवित्र । (स्वतं)तुमसे(अन्यः) नहीं, भिन्नकोईसर्वत्र ।।
AAALAAAAAAA LATAAAAnal . AANA NA यजुर्वेदीय (१३), श्रुतिनवरक्ष उन इन युत(विश्वा)स.कोई । जग उत्पन्न चराचर जोई। जड़ चैतन्य सर्वजग जोहूं। परिवभू) त्यागतनहिंसोह। दीनदयाल अखिलगु गरूंपन । हैं सर्वोपर आप अनूपम।। जेहि जगवस्तु मनोरथ मेरे पुन जसकाम सत्यमन के॥ (ते )तुम्हार हम सब जगजात (जुहमः)लें बासस,विधाता हो सब अर्थ सुफल मनवानी । परिपूरण वैभव नमानी॥ होयजासु हम सब सुखदाई धनपरिवार कुटम अधिकाई। धनऐश्वर्य पदारथ भोगें ।(पतयः स्याम् )पतीहमहोवें।। हो नित नूतन वृद्धि हमारी । दिपंदचतुष्पद लवसुखकारी। मंत्र संख्या (७) स्वयम्भूब्रह्मऋषिः परमात्मा देवता निवृत्रिष्टुप छंदः धैवतस्वर ॥ ओ३म् सनो बन्धुजनिता सवि धाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यत्र देवा अमृतमानशाना स्तृतीये धामन्नध्यैरयत ॥ यजु०अ०३२०१० भाषाभावार्थ-हे सब मनुष्यो (सः) वह परमात्मा (नः) अपने लोगों को ( वन्धुः) भ्राताके सभान सुखदायक ( जनिता ) सकल जगत्के उत्पादक (सः) वह (विधाता) सवकामों के पूरण करने हारा (विश्वाः) सम्पूर्ण (भुवनानि ) लोकमात्र और (धामानि ) नाम स्थान जन्मोंको (वेद) जानता है और ( यत्र ) जिस (वतीये) सांसारिक सुख दुःखसे रहित नित्यानंदयुक्त ( धामन् ) मोक्षस्वरूप धारण करनेहारे परमात्मामें । अमृतम् : मोक्षको (आनशानाः) माप्त होके । देवाः) विद्वान्लाग (स. ध्यैरयंस ) स्वेच्छापूर्वक विचरते हैं वह ही परमात्मा अपना गुरु श्राचार्य राजा और न्यायाधीश है। अपने लोग मिलके सदा उसकी भक्ति किया करें भावार्थ दोहा चौपाई में। दोहा-हेपुरुपो(सः)वह प्रभू, निज जनको सुखदान। देता सर्वजगतपिता, (वन्ध)बन्धु समान ॥" AAAAA " IMARALAALELLAAAAAAAA AAALAILLAAAAA кела. यजुर्वेदीय (१४) श्रुतिनवरत्न (जनिता)लफलजगतउत्तपादक तेहिसमस्तजग कामसहायको (विश्वा)लबभुवनानिभुवनको। नाम धाम जन्मादिमरणको एक मेव सर्वान्तत्यामी जानतसबहिंसकलविधस्वामी जेहि लौकिक सुख दुखसेभाई। है सो राहत मुक्ति सुखदाई।। नित्यानंद युक्त, जो धामन । अथवा मोक्षरूप कर कारणा। तेहि में मुक्ति प्राप्त पद करते निजइच्छितसुरलोकविचरते।। सरे गुरु न्यायाधीश हमारा । है आचार्य सकल संसारा ॥ अपने जन मिल बैर विहाई । तासुकरें भक्ती सब भाई ॥ मंत्र संख्या (८) दीर्घात्माऋषिः आत्मा देवता निवृत्रिष्टुप्छदः धैवतस्वर। ओ३म् अग्ने नये सुपथा राये अस्मान् वि- श्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जहरा- णमेने भाविष्टान्ते नर्म उक्तिं विधमाय अ.४०म.१६ भाषाभावार्थ-हे (अग्ने) स्वप्रकाश ज्ञानस्वरूप सब जगत् के प्रकाश करने हारे (देव ) सकल मुख दाता परमेश्वर आप जिस से ( विद्वान् ) सम्पूर्ण विद्या युक्त हैं करा करके (अस्मान् ) हमलोगों को (राये ) विज्ञान व राज्यादि ऐश्वर्यकी प्राप्ति के लिये ( सुपथा ) अच्छे धर्मयुक्त आप्त लोगों के मार्ग से ( विश्वानि ) सम्पूर्ण (वयुनानि ) मज्ञान और उत्तमकर्म (नय) प्राप्ति करांइये और (अस्मत् ) हमसे ( जुइराणम् ) कुटिलंता युक्तं (एनः) पापहप कर्मको (युयोधि) दूर कीजिये इसकारण हमसबलोग (ते. आपकी (भूयिष्ठाम् ) बहुन मकारकी स्तुति रूप ( नम उक्तिम् ) नत्रता पूर्वक मशंसा (विधेम ) सदाकिया करें और सर्वदा आनन्द में रहै ॥८॥ भावार्थ दोहा चौपाई में। दोहा-हे (अग्ने) स्वप्रकाशवा,प्रकाशस्य प्रकाश। सकल सुःखदाता प्रभू. सर्व सुविद्या राश. ॥
41LLLLALAAAAAAAAA (१५) . ΑΔΔΑ ΔΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑΑ Mandidisialsasad यजुर्वेदीय श्रुतिनवरत्न हैं. जगदीश सुविद्यासागर । सर्व प्रकारश्नपार गुणागर ॥ हमको राज्य ज्ञान सुख ताई । प्राप्ति करावहु आप गुशाई।। (सुपथा.) मारग सतजन केरे शिष्ट भये जेहिपथिक घनेरे ॥ लब सत्ज्ञान कर्म शुभं जोई। (नय)अब प्राप्ति करावहुसोई॥ पापकर्म दुरगुण युत 'जेते । हमसे दूर करहु हरि तेते॥ यह कारण हम सब नर नारी बहुविधि प्रारत करें तुम्हारी॥ (नस उक्तिम् ) नन्नता विधाना। करें पतितपावन हम नाना। जेहि सदैव आनंद मनावें । परमलाभ मुंकी पद पावें ॥ विश्वामित्रऋषिः सवितादेवता देवीबहतीछन्दः मध्यमस्वरं ॥ भूः मुवः स्वः॥ भावार्थभाषा-जो सब जगत्के प्राणोंको जीवन कराताहै और प्राणों से भी परेहै इससे परमेश्वर का नाम माण है सोमाण भू का वाचकहै । और जो मुमुक्षुओंको और मुक्तों को सब दुःख छुड़ाके आनंदस्वरूप रहने इससे परमेश्वरका नाम अपान है सो अपान भुवः शब्द का वाचकहै । और जो सवजगत् के विविध सुख का हेतु है और सर्वचेष्टाधार है इससे पर. मेश्वर का नाम स्वः है सो स्वः व्यानशब्दका वाचक है। भावार्थ छंदबद्ध। (भुवरित्यपानः ) अर्थ यह जो स्वयम (भुवः) अपानहै । संबमुक्ति और सुमुक्षुओं को देत जो कल्यान है। नोट* भूः भुवः स्वः भूरितिवै प्राणाः भुवरित्यपानः स्वरितः व्यानः ।। माणंयति चराचरञ्जगत् स प्राणः। अपार्नयति सर्वदुःखं सोऽपानः। व्यानयति से व्यानः तैत्तरीय ।। LAAAAAAAAAAAAAALAAAA
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यजुर्वेदीय
(११)
श्रुतिनवरन
पुनशब्द (स्वः) अर्थात्लखि सुखंहत यह संसार. जो।
बहुभाँति सुख कारण तथा सर्वस्य चेष्टाधार जो॥
। तैत्तरीय ।।.
मंत्र संख्या (९)
नारायणपिः सवितादेवता निगायत्रीछन्दः
पड़जस्वर ।।
ओ३म् भूः सुवः स्वः ॥ तत्सवितुर्वरेण्यम्भर्गो
देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् ॥ यजु.
अ० ३६ मं०३॥
पाठकगण ! ओर त्या भूः भुवः स्वः व्याहृतियों का अर्थ लिखदिया
गया अब गायत्री मंत्रका शब्दार्थ लिखाजाना है।
भावार्थभाषा-उस सबै जगत्को उत्पत्तिकरदेवाले सूर्यादि प्रकाशकों के
भी प्रकाशक समग्नपेश्वर्य के दाता (देवस्य ) कामना करनेयोग्य सर्वत्र विजय
कराने हारे परमात्मा का जो (वरेस्यम् ) अतिश्रेष्ट ब्रहण और व्यानकरने
योग्य (भर्गः) सवलशों के भस्म करन हारा पवित्र शुइस्वरूप है ( तत् )
उसको हमलोग (धीमहि ) धारण करें (यः ) यह जो परमात्मा (न:)
हमारी (घियः ) बुद्धियों को उत्तम गुणकर्म स्वभावों में (प्रचोदयात् )
प्रेरणा करें।
भावार्थ दोहाचौपाई।
दोहा-सर्व जगत आधार जग, पालन पोपण हार।
द्रव्योत्तम दाता..पिता, त्रिकालज्ञ तिमर रि ॥
जोजगदीश सृष्टि कर धाता । सर्वप्रकाइसकलसुखदाता।
जो कासना योग्य संसारा । है सर्वस्व महेश सहारा।
ग्रहण ध्यान जेहि साध्य अनूपम । भस्मत दुरखशुद्धस्वरूपम॥
(तत् तेहिको हम(धीमहि)नाई। धारण करें प्रेमचित लाई॥
(यः) यह जो जगदीश हमारी ।करे बुद्धिशुभकर्म प्रचारी ॥
सामाख पुस्तका
।
यजुर्वेदीय
(१७)
श्रुतिनवरत्न
हो संतज्ञान बुद्धि अस दजे । (प्रचोदयात् ) प्रेरणाकीजे॥
विद्याधुद्धि मुक्ति विधि जोई। उपजे ममउर श्रद्धासोई॥
देहु नाथ अस बलबुधि मेरी । होहिय गतपथ सतजनकेरी॥
सोरठा-यह कारण बहुवार, करत प्रार्थना नाथ हम ।
कीजे अङ्गीकार, माँगत शर्मा बुद्धि शुभ ॥
विशाशवार पवित्र सुहावनापर्वदिवस तिथिऋतु मनभावन।
प्रतिदिन संस्कार दिन जोई। सर्व समय गावे सब कोई।
करउपवास यज्ञ सब भाई । होंध्यानावस्थित चित लाई।
प्रेमभाव दृढ़ सौच समीता । गाउँसबामिल. कथा पुनीता।
कहैं सुनें समझे समझावें । तेहि नर परम मुक्ति पदपावें॥
तो निश्चय आदर में पावों । पुनरपि जोर गांठ कुछलावों।
नहि मतिमोर लोभ चतुराई । कहूँ सत्य निज भुजा उठाई।
देय सहाय सुजनजन ऐसे । सुत चित चाह बढ़ावत जैसे।
सोरठा-जो यह पाठ विचार, करें नित्यसंध्यासमय ।
पावे सुःख अपार, लौकिक परलोकिक सकल ॥
सोरठा-अजग्रह रस युग विक्रमी,तर्क मास शशि हीन ।
तिथितिथ रसदिन इतिकरी, श्रुति नवरत्ननवीन ।।
- इतिश्री यजुर्वेदीय परमपवित्र स्तोत्र श्रुतिनवरत्न भाषार्थ
छन्द बद्ध श्री कवि पं० चाबूरामशर्मा चन्दौसी
वर्तमान कर्णक्षेत्र निवासी कृत सम्पूर्णम् ।।
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नंग,
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