Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Komi Ekta Ki Talash Aur Anya Rachnain

Shiv Ratan Thanvi · 2011/03

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शिक्षक दिवस
1982
कौमी एकता की तलाश
और
अन्य रचनाएँ

शिक्षा विभाग राजस्थान
के लिए
चिन्मयप्रकाशन

लोमीएकता
কীমাহী
और अन्य रचनाएं
सं० शिवरतन थानवी

© शिक्षा विभाग राजस्थान, बीकानेर
for दिपम श्रमर पर
IN frenfrमाम राजामान, पोरानेर के लिए शिमर प्रागन,
in m. TT मुर : मानी निर्ण, स्मिी-1100321
अपमान , Sनिर, 1982/ भाषरण : पस। प्रम:
KOMIKIA KI TALASI AUR ASYARACHIWAIN
JAILSHRIRTEanxi
R) 9.0

आमुख शT- नि शिक्षण कार्य, को बह मृग पी रोड बनाना है और सके। लिए 14-उन्मएका रागको बुद्धि सदैव निवासी रखती है। अमर देना गया है कि बच्चे शिक्षकों को मानसिक चिंतन-पत्रिधा मोशा में महाले निगमपातु के अनुरूप शिक्षण विधियों का इनकार की है। उनकी रचनाशीलता का मन मिलता है। Tam- शिक्षक इसमें शिक्षकों का प्रतिन्य---उनका मोगदान अपरमेभावी मिन्नगा। जिसको ने मारवन मूल्यों को अमर रनमार की है। बात, ना पाहिए कि से-वर माहित्यको र साहित्यकार बाद में है कि पहने और नटे जर पर उमा रमाए जन शिक्षा का ही काम करती है तो कोई निरोगिनी होगी । जव माहित्यकार शिक्षा के कार्य में युज मरता है तो णिलेक साहिर से निखर जुड़ा हुशयों में हैं। कादिन नही बिधार मांगने अपडे शिक्षा विभाग ने राम भृजनधी शिक्षकों की सगाई हरायोजित करो कार के पार मने 17 में किया गया है कि मोनाह प्रकार की यह योजना बिना रुके नराबर चल रही है। गत वर्ष तक राज्य के शिक्षकों की हार पुरवो हम अगाशिनवर तुके है, और अगम मानिस कोरन भी बरामदन पिता, -

गुझाव दिये है। राज्य को एग मात्र उन विशिष्ट योजना पर हमें गर्व है।
उस बाई के पाच प्रकाशन पाटकों एवं विद्वज्जनों के हाथों में मारते हुए
मुझे आशा बनी है कि पिछले वर्षों में जो नये नषक प्रकाश में आये है, उनकी,
रचनाएँ उद्देश्यपूर्ण एन रोचफ होगी । पुस्तके हैं-
1. अपना अपना आकार (कविता) • सम्पादक : जगदीश चतुर्वेदी
2. धर्मक्षेत्रे कुरक्षेत्र (कहानी) मपादक मृगाल पार
कौमी एकता की नलाग और अन्य रचनाएँ (गद्य विविधा)
सम्पादक निवरतन थानयी
कपन (राजस्थानी विविध) सम्पादक कल्याणमिह पावन
फूलों के रंग (बाल साहित)
लक्ष्मी चन्द्र गुप्तः
इस अवनर पर 'कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ' पुस्तक के
सम्पादन हेतु मै श्री शिवरतन थानवी के प्रनि, इसे समय पर मुद्रित कराने के
लिए प्रकाजक यः प्रनि, मनन पर मुंद्रित करने के लिए मुद्रक के प्रति तथा
रचनाएँ भेजने के लिए शिक्षक-माहित्यारों के प्रति अपना आभार व्यक्त
करता हूँ।
'आगा है.इन पुस्तयों को मूल्यवत्ता की पहचान होगी।
-हरंप्रमाद अग्रवाल
निदेशक
प्राथमिक एच माध्यमिक शिक्षा,
राजस्थान, बीकानेर

शिक्षकों को अपनी संसार मुक्तक हम जब तिगत है तब. एक तरह से जाने अनुभव को याख्यायित करते है। व्यायापित करना भी एक तरह में देना है। कलम के माध्यम में नाशप पतीकि का प्रयास करना है। प्रलय का कारक बनता है। जो हम प्रनीशि हुने उनी को क पहुँचाना है । ज्ञान प्राप्त करना है। टम सगह में शिक्षक लेनकों की विविध रचनाएं नकलित हैं। करीब तीन सी रननाओं में में इनका चयन किया गया है। विपंच वन्नु और सैनी, नर औरतर, दोनों दृष्टियों में इनका अपने सुना है। किंग में विगय वस्तु प्रयग रही है और नियों में भी प्रबल रही है । नष्ट ऐमी भी हैं जिनमें दोनों प्रबंग रहे हैं। ऐगी एक 'रचना नहीं है जिनका कय कमजोर हो । कम-से-कम भरी कोशिश तो यही रही मुझे यह देखकर मन प्रसन्नता हुदै ति शिक्षक अपने शौक्षिक परिवग के पति भी मनग होने लगे हैं। शिक्षा-नगर्न का गहराईये देखने की प्रवृत्ति विकामिन हो रही है। वक्ष और विद्यालय सृजनात्मक रचनाओं में प्रेरक बनने लगे हैं। अभी इस दिशा म हमें और काम आने जाना है। सामाजिक दायित्य के प्रति जग शिक्षकों की रननाएं भी इस संग्रह गरेको, । रचनाओं में संस्मरण हैं। यात्रा यशन है. एकाकी है और नियध नधार रचनाएँ भी हैं। एकार ललित निबध भी है। रम्स रचना और ललित निश बने बारीक होता है। दोनों का अपना अलग अलग मत्व होता है। दोनो को सीमा रेया गया दूसरे को लो-यी जलगी है। कश्या को लावग्यकता और (vi) .. कांमार्जन भी सावया है। मुझे विग्यान न देशकों ने प्रेरणा नकर बन्द देवर भी अपनी अभिनयानी मानिने का जबर मार्जन को बिग और लिपने का अंगमा यो बान का नाश बिना बोपनीयता की शनि जित नहीं हो सकती। जिन नियमों को रचनाएँ यहाँ प्रमाणित हो रही है उनमें से कई लेखक शिक्षक दिवस प्रकारानों में पहले भी स्थान पान और मुझे उम्मीद है वे गांग भी अपनी सामाना जारी में उनकी कार से जो जनाएं सामने प्रायनी - उनके लेखन में और अधिक निमार आगामित्वभिलं नमादकों द्वारा समादत होन से उनका आत्मविमान बरामद होगा ! भिन्न-भिन्न दृस्टिंगों के सन्यादको है उनकी रचनाओं का बार-बार वयन पिल्ला है तो यह रंग तर का प्रमाण हैगि उमने हनीव लेखन क्षमता है। मेबाई शिर सामने न चुकता सदन और तनी आस्था नियों में महा. है कि "जहर पितु मेगाव-नाने कर्म के स्तर पर भी उन्मुशित होगा जा का नया अपने कर्म को लगान, कोई आत्मीय सरोकार नही रहा। इस पर अपना भी मान गया होगा, जो भीगा ही पन बहालही, उन्होंने को है। उन्होंने काही नामचीने माता-रफ्तार हमारी पल में ददती 'जा रही गार्भ यानि भाषामा लगाना में विशेन उनमें एक भी मिकता नगा रही है। पर यह है कि जगमो की हित संदन प्रान मारने की मशः पेजान और रोहित का पड़ा है। यदि हम धनत गरे भने । मान हो जाएँ तो न रिकतों को वेजोन और ऑलिन बनाने की दिशाम मनवार और दोनदा वा मने है। नामजिक परिक्षेत्र को बदन को दिया श्रीमान , नारा प्रति लगाया जो मनोमा म कोहराय पर का प्रमाणे एकवलेली होम में ममता के : को मौका Ar free

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. हमें दर्पण दिखाया है। भारत में अनुवाद भी होते हैं, तो अंग्रेजी मालमेरिका रविना में, हम देखते भी है तो बार-बार इंग्लैंड का जमेरिका की और अंग्रेजी भाषा- नायो देशों में भागे हमारी नजर नहीं पाती है। अंग्रेजी की दास्तों से मुक्त होने लिए अफ्रीकी, योरोपीय, एशियाई भाषाओ के अनुबाद होने आवश्यक है। अपने ही मा.को नापानी-बंगाली, उडिया: तमित,, मलयालेन आदि के भी अनुवाई होने आवश्यक है । नले अंग्रेजी के माध्यम से ही मही (प्रारम्भ में) अन्य भाषाभी अन्य देशों और देश के अन्न अंचलों को अनुभूति संपला का दर्गत साभ हुए बिना हमार विहान अधुर रहेगा। मिन्न-भिन्न जापानी और गस्थतियो को अंतराव: लेयन -दूसरे को समृद्ध करता है, दृष्टि यो संकीर्णता मिटाना है और मनुष्य भनय को गीर जाता है। हमारा देश आपनो फुट के कारण इतिहान में बहुत हानि दाता रहा है और भआज भी हमारेत्री रि कोई फैट के बीज डाल देता है तो उसे बीज को धारण मान्ने काली भूमि का अभाव नही रहता है । हने फूड के बीजों का पोषण करने को , तैयार मिलते है । राजधान ने गत वर्ष कौमी एकता की भाव-भूमि तैयार करने भाविक प्रदेल दिया था। मुख्यमंत्री से बीस का नाम के कार्यक्रम में "कौमी एकता को अलग विशेष स्थान दिया या कटपुतलियों के माध्यम में तमा रंगमंत्र के माध्यम में "कौमी एकता संधी कार्यक्रमों के लिए एक निरिता मामि भी अलग रखी गयी थी। सीपन ने मुक्त नहीं होगन के कारन : यश का भला उपलोग ने हुना हो, भन्न पारागन दा नअनती नाली यो गरची कादका बालो को मारोगन लिया जा सका ही मिनु बुलं बातावरण गरेर दना, कुर्ष काम गरेर यो और रिकामी कामी एकता", पर बिनाको जरिवार। म मंहगे लिए भी जाया, निबंध राज्य सामान्य प्राव हम से, उनमें से कुछ को यहां दिया जा रहा सीमावस्यकता है। यदि कोई मगार विमान *मनाने की तो वह आईलाजा मानही हो जाती को नीरजा को को साहित्य अपनी राजनीदना लोन बदली पर भी मैगनी कोन गिरीला जाना * नारी में

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.. (xii) • किया है । इसी रचना के नाम पर गुस्तक का नाम रखना उपयुक्त प्रतीत हुआ। इसलिए नहीं कि यह गुस्तक की सर्वश्रेष्ठ रचना है बल्कि इसलिए कि एक तो यह धेष्ठ रचनाओं में से एक है और दूसरे इसलिए कि "कौमी एकता" विषय पर लिखी रचनाओं में भी यह श्रेप्ट है। इसका शीर्षक हमें कौमी एकता के प्रयत्नों को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रेरित करता है। वह बताता है कि हमारे वचन और कर्म में बड़ा अंतर है । इस अंतर को मिटाकर वास्तव में जब तक निष्ठा से, प्रयत्न नहीं होग तब तक सही कौमी एकता या राष्ट्रीय एकता नहीं आ सकेगी। अंत में मैं उन लेग्यको का विशेष उल्लेख करना उचित समझता हूँ जिन्होंने अपने स्वयं के व्यावसायिक जीवन से जुड़े जगत की अनुभूतियों पर आधारित रचनाएं भी लिखी है। मोहन सिंह ने परीक्षा कार्य को कठिनाई को लिया है, अर्जुन काड़िया ने विद्यालय के उद्योग या कार्यानुभव कालाश का चित्रग किया है, बद्रीलाल शर्मा ने शिक्षार्थी के प्रति शिक्षा के नासमझीपूर्ण व्यवहार का शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है, निशांत ने ग्राम्पोचली विद्यालयों की पृष्ठभूमि में छिपे आर्थिक परिवेश को रेखांकित किया है, रामनिवास सोनी ने किमी प्रधानाध्यापक के भुलका इपन के कुछ पहल उकेरे है तथा सत्यपाल सिंह ने शिक्षकों को धूम्रान' की कुटेव पर कटाक्ष किया है । ये सभी रचनाएँ शिक्षकों के लिए जिलनी पठनीय है उतनी ही अन्य पाठकों के लिए भी । शिक्षक के मनाजगत के परिचय की दृष्टि मे भी और सरस साहित्य के अग होने के नाते भी। उम्मीद करनी चाहिए कि शिक्षक लेखक अपनी रचना शैली का विकास करने के माथ-मा शैक्षिक समक्ष के आयाम का भी विस्तार करेंगे । शिक्षा जगत की राजनीति को, बाला के मानस .को. अभिमानक की कठिनाइयों को और भक्षिक प्रक्रिया के पोर हो र -विराद मामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य को गममता भी नो लिए बहुत जरूरी है। निबंध हो, नाटक हो, सस्मरण हो या जनरभ्य रचना ही, साहित्य, कला, समाज, अर्थ, राजनीति, मनोनितान और उनको बानी शिक्षा जगत की व्यायसायिक माननियों को जनक महगई मे नही गमगे नब नक रचनाओं में उनका अपना संगार पाया महराई में प्रतिबिा कभी नहीं हो गया। शिक्षक की टनना में शिक्षक अपना संभार बोलना बहुत जरूरी है। कुंदन मह मजाल, कमर मेवाली, अर्जुन 'अविद और अदुल मलिक खान मुरारका नाम है। मत्था भार्गव, भगवतीप्रमा गौतम और रामवस शर्मा की तो भी गाता है । मुंज विधान है इनकी रचनाएं आम जहर पमद करेंगे। . Sim, मान, HE अनुक्रम निबंध: 4 रागाई सिंह शेवाना हपगारायण मामा विष्णुप्रसार गतुती श्यामलाल काशित १ 16 रागनियारा सोनी सवाई सिंह शेयावत 20 चुकता संवेदन रीतती आस्पाएँ अध्यापक फरिश्ता नहीं दंशान है गौरय्या अफ्रीकी कविता के कुछ छोटे गौभक्त स्व० सिपीजी- इतिहास का एक उज्वल पृष्ठ साहित्य शिक्षण और नाबोकोव आज परीक्षा परीक्षार्थी की या परिवीक्षक की, शिक्षार्थी की या शिक्षक की? भारतीय संस्कृति में सहिष्णुता पवाड़ा साहित्य लुई पेल : ग्रेल लिपि का आविष्कर्ता हमारी कौमी एकता राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में शिक्षक की भूमिरा 24 27 मोहन सिंह चुन्नीलाल भट्ट चन्द्रदान पारण वसंतीसामना मंग IN 4 (xiv) ललित निबंध : ममायत्ते तु पौरुपम्-पौरुष के प्रतीक ये विकलांग गौरीशंकर 'आर्य' 56 विचार कण : कालजयी श्रीकृष्ण विश्नोई 63 एकांकी: सवाल उठता है खामोश 66 70 प्रजा का भाग्य आनन्द कुरैशी आनन्द कुरैशी कुंदन सिंह सजल मोगजी पाटीदार जगदीश नागर 73 खरच 89 डायज्यो 151 संस्मरण : वेत की कुसियां मांगाव, थे ही तो किया छाक गूर्यास्त अलग-थलग पडे लोग पशुपतिनाय के देश में अर्जुन कावडिया 112 बद्रीलाल शर्मा 115 कमर मेवाड़ी 117 निशांत 121 रूपनारायणकावरा 125 81 रम्य रचना मनम, कागज और रिताय गाना मनगुपदाग का संगीन-प्रेम पाय मगर होनिपारी में कोगगमिरारा 85 भगवती प्रसाद गौतम अर्जुन 'अरविंद' यन्दुल मलिक यान रामदत्त शर्मा सत्या भार्गव 130 134 rerfrया, मनाऊमंगे? 137

(xv)
एक भुलक्कड़ प्रधानाध्यापक
मजावा, पानी के बिल का
बात एक शाम की
कौमी एकता की तलाश
रामनिवास सोनी 139
शिवकुमार शर्मा 142
सत्यपाल सिंह 148
भगवतीलाल व्यास
159

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Fa चुकता संवेदन रीतती आस्थाएं सवाई मिह मेगावत मला उन्म मनुष्य को माला पहनान के प्रम में, दूगरों के माप अपनी सरेना गोगामेदारी के में आप हमारी आत्मा का आना, हमारी मात्मीय भाया या मागे टोम और मुगर गगह रहा है। मेरिन नपा-आम नी मापंरता गो रहा है। अपनी गरत भूमिरा में मुकर गापामा अनिया ऊर्जा जमा होग रही है। प्रारमीय-अपना मग यह गुनगुना अमाम टा पा रहा है, जिसके विना बढे में बरामद अपना अपं, नीयता यो देता है। और यह गाली. पोती कर रह जाता-निर्जीव, गांगला। मर की मपूर्ण गरिन यस्नुत उमके पौदै निहित मधेदन में है। यदि यह भूपता है, तो यह गम के मानवीय गरोकार के विलाफ जाने जैगी बात होगी कि शब्द को चकती मवेदना, अतः रोतती-धरती मानवीय आरया पो पोक है। जो मम्पूर्ण स्तरों पर टा और निजीव बना देने के बाद, मनुप को एक कूर और निर्मम परिणति को जद में घोल देती है। जहां शन -शनः राय युज निशेष हो जाता है । क्या हम मौन-मूक भाव में उन कूर अभिशप्त आमरण को अनिवार्य "हरी दूब पर दो पल" जमा नम-नाजुक कासेप्ट आग एक दुर्मभ परतु पर कर रह गया है। लगता है, नम-नाजुक चीज रफ्ता-रपता हमारी पाड मे पूरती चली जा रही है । दूर...बहुत दूर। जिन्हें बड़े प्रयास के बाद भी भाज लोटाला मकना हमारे लिए दूभर ही नहीं, असभव जाग पड़ता है। पहले लगता या, मात्र वोला गया शम ही अपना रेस्पोस यो रहा है। लेकिन आज स्थिति साफ है-लिये शब्द को भी यही दुर्भाग्यपूर्ण परिणति है। लिया शब्द हमें किस मीमा तक छूता और उलित करता है, यह मुद्दा विचारणीय है ! बड़े से बड़ा हृदय विदारक समाचार हमारी आगों सले से यो गुजरता है, नियति को स्वीकार रहे हैं ?

2 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ गोया यह सव तो होता रहता है। ऐसा तो चलता है। चीजों और घटनाओ के प्रति हमारा यह ठंडा अहसास अंततः चीजों से जुड़ी हमारी समूची गभीरता को आहत करता है। हम चीजों को जिम्मेदार तरीके से ले ही नहीं पाते। एक उपेक्षा, अनवरत टालने का भाव, दर गुजर करने का रवैया हम में पनपने लगता घटनाएँ हमारे इर्द-गिर्द घटती है। अपने प्रखरतम स्वरूप में घटती है। लेकिन हमारी दृष्टि मे उनकी कोई अहमियत नहीं । बड़े से बड़ा हादमा हममे से नहीं, हमारे सिरो पर से गुजरता है । वह कोई चुभन, कोई खरोच हमारी स्मृति सतहों पर नहीं छोड़ पाता। हम मे कुछ हिलता-डोलता नहीं। हम अडोल बने रहते है और अबोल भी। इसी अनिष्टकारी दुप्परिणति के फलस्वरूप आज हर व्यक्ति शब्द के साथ- साथ कर्म के स्तर पर भी उन्मूलित होता जा रहा है। उसका अपने कर्म से कोई लगाव, कोई आत्मीय सरोकार नहीं रहा। बस करना भर है, इसलिए किये जा रहा है। करने-धरने का कोई आत्मीय औचित्य नही~जो कभी आदमी होने की अनिवार्य शतं हुआ करता था । कर्म के स्तर पर की यहस रोकारहीनता आदमी के कोणो को गडबडा रही है। कर्म के प्रति भावात्मक लगाव के विपरीत उसमें एक अंध यांत्रिकता पनप रही है। यही चीज एक रेडिकल दृष्टि और 'रेडीमेड सस्कृति' का निर्माण कर रही है। जहाँ हर आदमी एक अजीव उतावलेपन के बीच वनी-बनायी चीजों को बेहिचक भाव से ओढ़-अपना रहा है। किसी आत्म-विश्लेषण और आत्म-विवेचन की आवश्यकता दरपेश नही। सब कर रहे है, इसलिए हम भी कर रहे हैं । इसलिए हम भी करेंगे।' और इस अंधी दौड मे आदमी को अनुभव शक्ति का लगातार क्षय हो रहा है। समस्त मानवीय क्रियाएं और चिंतन एक यात्रिक ढांचे मे ढलते जान पडते है । यत्रबद्ध, इकहरे और इकरगे। सवेदना के इसी सकट के रहते-होते आदमी-आदमी के बीच को गुनगुनी गरमाहट चुक रही है। फलत आज आदमी को रिश्ते संवल प्रदान करने की अपेक्षा वेजान और बोझिल जान पड़ते है। वह जीत-जागते मानवीय सरोकारो मे युक्त रिश्तो को वस्तु के रूप में देखने लेने लगा है । वस्तु, जिसे हमेशा उपयो- गिता के तराजू में तोला जाता है। जैसे ही उपयोगिता का गणित गडबड़ाने लगता है, आदमी रिश्ते को इस तरह छोड़ देने के लिए वेताब हो जाता है, गोया कोई पुराना कोट या स्वेटर उतार कर फेंक रहा हो। जहाँ तजने और अलगाने की कोई पीड़ा नहीं मालती। इसके बरक्म मुक्ति पा लेने को ताजगीभरा अहसास ही महसूस होता है। यही चीज कालातर में उस (घोर) वैयक्तिकता को जन्म देती है, जो आदमी चुकता संवेदन रीतती आस्थाएँ : 3 के अलग-अलग द्वीपो का निर्माण करती है। जहाँ आदमी-आदमी के बीच किसी तरह को साझेदारी और शिरकत की वात मोची ही नही जा सकती। जहाँ हर आदमी अपने ही पोल में सिमटा है । सिमटे रहने को विवश है, अभिशप्त है । इस निममं अमानवीय स्थिति के कारण न केवल अलग-अलग द्वीप और दायरों का निर्माण होता है, बल्कि स्वयं मानवीय आत्मा में भी गहरी दरार पड़ जाती है। जहाँ जोडने और जुडने की हर कोशिश नाकाम और नाकारा हो जाती है। जहाँ हर आदमी आशंकित है, अकेला है, अभिशप्त है। संवेदना के इस गहराते संकट और उमको तरह देने वाली शक्तियो को रेखांकित करते हुए हम शिक्षको को सोचना होगा, कि मानवीय सवेदना का वाहक शब्द अपनी मशक्त भूमिका में क्यों मुकर रहा है ? क्योकि सदियों से संचित शान को भावी पीढियो को सौंपने की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी अपने सिर पर ओढ़ने वाला शिक्षक, मात्र शब्द के अर्थ का सम्प्रेपक ही नहीं, उसके पीछे निहित सम्पूर्ण प्रखर अहसास का सक्षम वाहक भी है।

निबंध अध्यापक फरिश्ता नहीं इन्सान है रूपनारायण काबरा चीन ने कई परमाणु विस्फोट किये पर विश्व में कहीं कोई विरोध नहीं, आलो- चना नही पर भारत के परमाणु विस्फोट पर तो सारी दुनिया ही बौखला उठी थी, और लोग कहने लगे थे, "भारत को ऐसा नहीं करना चाहिए था।" ठीक यही हालत हिंदुस्तान मे अध्यापक की है। तभी तो उससे यह आशा की जाती है कि वह अपने पर विशेष संयम रखे। खाने, पीने, पहिनने पर नियंत्रण रखे। "वे कत्ल कर दें चर्चा नहीं होती, हमने नजर भी उठा ली तो आसमान सिर पर उठा लिया ।" यदि मास्टरजी ने पान खा लिया तो लोग कहते है, "मास्टरजी, आप पान खाते हैं, तो भला लडके क्यों नहीं खायेंगे?" और अगर वै वेल-वौटम पहिन लें या लम्बे बाल रख लें तो, "अध्यापक को यह शोभा नहीं देता।" यह कह उठेंगे। यह सब नियमन, मर्यादा कालेज के प्रवक्ता के लिये न हो कर विशेषरूप से स्कूल के मास्टर के लिये है। "राष्ट्रनिर्माता", "नीव का पत्थर" वही तो है । गोया अध्यापक क्या हुये, इन्सान ही नहीं रहे, फरिश्ता हो गये। कोई तमन्ना नही, कोई इच्छा-आकाक्षा, शोक कुछ भी नहीं। सिनेमा देखो तो धुरा, पान खाओ, चाय पीओ तो बुरा । राष्ट्रनिर्माता (') के हर कदम पर हजारो निगाहे हैं। पर क्या किसी ने भी सोचा है कि राष्ट्रनिर्माता से जो अपेक्षायें है उनके वह योग्य है कि नहीं ? उतना योग्य बने रहने के साधन उनके पास है कि नहीं? उतने सक्षम एवं सशक्त व्यक्तित्व इस व्यवसाय में आते हैं कि नही ? उनको समाज से सम्मान एव अच्छे जीवन यापन की सुविधाएं उपलब्ध है कि नहीं ? हां, जब कभी अवमर आता है तो बडे-बडे लोग उद्बोधन कर देते हैं, "अध्यापक राष्ट्र निर्माता है उसी के हाथों में देश का भविष्य है। (जबकि उसके हाथों मे यह भी नही कि क्या पढाना है ? क्यों पढाना है ? कब पढाना है ? कैसे पढाना है ? वह तो पाठ्यक्रम के इर्द-गिर्द घूमता घटी से बंधा कितना वेवम है !) उमका महत्व महान है । यह मच है कि हम उन्हे ममुचित वेतन नही दे पाते । यह हमारी मजबूरी है, देश अध्यापक फरिश्ता नहीं इन्सान है : 5 की कमजोर आर्थिक स्थिति है, इत्यादि।" वह विचारा अध्यापक अपनी प्रशसा सुनकर "त्याग" की दिशा में प्रवृत्त होने में ही अपना कल्याण समझता है। अध्यापक की ट्यूशन लोगो को अखरती है और लोग विशेषत स्वय शिक्षा विभाग वाले ही ट्यूशन को शिक्षा का नासूर कहते है तो कोई कसर । हिन्दुस्तानी फिल्मी हीरो एक माधारण व्यक्तित्व नही होता है। वह सब- कुछ कर सकता है। मोटर साइकिल से लेकर वैलगाडी और हेलीकोप्टर तक चला मकता है । अकेला वीस गुण्डो से निहत्था लडकर भी साफ बच निकलता है। पर भारतीय अध्यापक भी तो कम नहीं। आपके जचे तो जनगणना करवा लीजिये, पशुगणना करवा लीजिये और चाहे, पचायत से लेकर लोकसभा तक के चुनाव । मास्टरजी से उत्तम" पीर, बबर्ची, भिश्ती, खर" कौन मिलेगा ! पर इतने बडे फरिश्ते को भी अपना अस्तित्व कायम रखने को जाने किस-किम की खुशामद करनी पड़ती है। लडका चाहे पढे, न पढे, दोप मास्टरजी का। पढ़ता क्यों नही, जरूर शिक्षण नीरस होगा, तभी तो छात्र बोर हो जाता है। और परीक्षा परिणाम कम रहने पर तुरन्त अध्यापक को ही मीधे रूप में दोपी मान लिया जाता है मानो कि माता-पिता का, समाज का, प्रशासन का, वातावरण का किसी का कोई दोष नहीं ! आखिर छात्र विद्यालय मे तो केवल चार-छह घन्टे ही तो रहता है और वह भी 365 दिन में 265 दिन ही (अधिकतम)। आज के युग में कितने और प्रभावी अभिकरण है यथा सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन और पत्र- पत्रिकायें इत्यादि । इस सवको कोई नजर मे नही लाता और हर कोई विचारे मास्टरजी पर सवार हो जाता है । और तो और अब तो छात्र भी सवार होने लगे हैं । ऐसे में शिक्षक अपना व्यक्तित्व बना सके यही तो व्यवस्था होनी है। पर इम तरफ ध्यान न देकर अध्यापक को फरिश्ता समझने में लगे रहते हैं और वह भी केवल शोषण हेतु। संसद एवं विधानसभायें सुसज्जित है, साधन-सुविधा संपन्न है। हमारे विधायकों एवं सांसदो को मोटी रकम भत्ते मे मिलती है और ऐश्वर्य के सभी साधन । मिले भी क्यों नहीं, भाग्य विधाता जो ठहरे ! पर हमारे 90% से ऊपर विद्यालय अत्यन्त ही साधनविहीन हैं। यही तो अन्तर है राष्ट्रनिर्माता और भाग्य-विधाता में! शिक्षक से यदि अपेक्षा करते है राष्ट्र के निर्माण की तो उसे मुक्त वातावरण देना होगा। उसे अभिनव साधन देने होंगे और उसे ही सामाजिक क्रान्ति का, परिवर्तन का अभिकर्ता स्वीकारना होगा। उसके स्वाध्याय, मुक्त-चिन्तन, प्रयोग- वाद को प्रोत्साहन देना होगा। कोई भी नदी अपने उद्गम से ऊपर नही वह सकती। शिक्षक के स्वय के व्यक्तित्व को एवं स्तर को मवारने का प्रयत्न किये विना मंजिल पर पहुंचने की आशा करना कितना बेबुनियाद है। केवल अध्यापक को फरिश्ता समझने से काम नही चलने का! U विज्ञान लेख गौरय्या विष्णुप्रसाद चतुर्वेदा घरो मे हमारे माथ रहने वाला चिर-परिचित एक छोटा-सा पक्षी है, गौरय्या। शायद यह मनुष्य के साथ रहने का ही असर है कि सभी पक्षियों में गौरय्या ही ऐमा पक्षी है जिसमे सर्वाधिक मानवीय गुण पाये जाते हैं। कुछ भागों को छोड़कर, गौरय्या, विश्व मे सर्वत्र पायी जाती है। हिमालय में भी यह 7000 फुट की ऊँचाई तक पायी जाती है। गौरय्या मानव बस्तियों से अलग नहीं रह सकती। खाली पड़े मकानों की अपेक्षा यह रहवास वाले मकानो मे रहना अधिक पसन्द करती है । घौसला यह जनन काल मे ही बनाती है। गौरय्या की लम्बाई 15 से० मी० व भार मात्र 26 ग्राम के लगभग होता है। मादा तया नर के रग-रूप में कुछ अतर होता है। मादा ऊपर राख की तरह धूसर भूरी होती है। उस पर गहरी काली तथा गहरी बादामी धारियां होती है। नर गौरय्या कुछ बड़ी तथा गहरे रंग की होती है। उसकी चोंच व नेत्रो चारो ओर काले पक्ष्माभ होते है । ठोड़ी तथा गर्दन के पक्ष्याभ भी काले होते हैं । गौरय्या एक चतुर व बुद्धिमान पक्षी है। इसका मस्तिष्क समान आकार के पक्षियों में सर्वाधिक विकसित होता है। गौरय्या पर किये गये परीक्षणो में यह पाया गया कि गौरय्या बहुत जल्दी सीख सकती है तथा इसकी स्मरण शक्ति चूहै व बन्दर जैसे उच्च जीवो के समान होती है। गौरय्या मे अपने साथियों को पहचानने की भी क्षमता होती है। गौरम्या का सामाजिक व पारिवारिक जीवन बहुत ही विकसित है । ये समूह में रहती है, समूह में गाती हैं, समूह में खाती है, समूह मे नहाती हैं, समूह में प्रेम करती है तथा शत्रु का मुकाबला भी सामूहिक स्तर पर करती है । गौरय्या अपने निवास के आसपास ही रहती है । यह अपने निवास स्थान से दो-तीन किलो- मीटर से अधिक दूर कभी भी नहीं जाती। पोपण की दृष्टि से गौरय्या सर्वाहारी है । अनाज के दाने, कीट, कलिया, - गौरय्या :7 फूलों का रस, रसोई की जूठन आदि सभी ग्राह्य है। परन्तु वाल्यकाल मे इन्हें कीट-पतंगो का भोजन ही प्रमुख रूप से दिया जाता है। गौरय्या एक बार विवाह बन्धन मे वन्धते हैं तो फिर जीवन भर साथ निभाते है। विना घर के पत्नी मिलना इनमे भी कठिन है। विवाह की औपचारिकता बहुत ही सरल होती है। वयस्क कुंवारी नर गौरय्या प्रजनन काल में रहने का स्थान ढूंढती है तथा फिर उस स्थान पर बैठकर निरन्तर 'प्रेमगान' गाने लगती है। इससे आकर्षित होकर कोई मादा गौरय्या वहां आकर घर का निरीक्षण करती है तथा घर पसन्द आने पर दोनों मे प्रेमालाप होता है तया यौन सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं। सुमर्स स्मिथ ने गौरय्या दम्पत्ति मे एक दूसरे के प्रति वफादारी का अध्ययन किया है। उनके द्वारा अध्ययन किये गये 100 जोडों मे से मात्र एक मे मादा गौरय्या ने एक से अधिक नर से यौन सम्बन्ध स्थापित किया तथा अन्य एक में वेवफाई का असफल प्रयास किया। विवाह बन्धन के बाद नव आगुन्तको के स्वागत के लिये घोमले तैयार किये जाते है । घोसले के लिए सामग्री दोनो ही जुटाते हैं परन्तु नर अधिक मेहनत करता है । घौंसले की आन्तरिक सतह कोमल पख, ऊन आदि से बनाई जाती है । यह भी देखने में आया है कि कबूतरो को नोच कर घौसले के लिए पख जुटाने से भी गौरय्या नही हिचकिचाती। गौरय्या वर्ष में दो या तीन वार अण्डे देती है । एक बार मे चार से पांच अण्डे दिये जाते हैं। अण्डो का रग हल्का हरा, भूरा या पीला होता है । इन पर गुलाबी या भूरे रंग के धब्बे या धारियां होती हैं । नर व मादा दोनो ही अण्डो को सेते हैं परन्तु प्रमुख भूमिका मादा की होती है। अण्डो से बच्चे निकलने मे 12 दिन का समय लग जाता है। अण्डे के चौड़े वाले भाग को फोडकर बच्चा बाहर आता है। जन्म के समय बच्चा पर-विहीन व अधा होता है। माता-पिता दोनो ही बच्चे को भोजन देते है। प्रारम्भिक काल में मामाहारी भोजन प्रमुख रूप से दिया जाता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ मासाहारी भोजन की मात्रा घटती जाती है । वच्चे के शरीर पर चौथे दिन से पर आने लगते है तथा सातवें दिन तक पूरा शरीर पंखों से ढक जाता है। शिशु के पंख आने के बाद उसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी नर अपने ऊपर ले लेता है। इस समय मादा और अण्डे देने की तैयारी में लग जाती है। गौरय्या मे पारिवारिक सम्बन्ध भी बड़े दृढ होते हैं। बच्चा यदि विकलांग हो तथा धौंसला छोड़ने में असमर्थ हो तो बडी उम्र तक भी माता-पिता उसका भरण-पोषण करते रहते हैं। गौरम्या अपनी सक्षिप्त भाषा मे अपने साथियों से बात कर भय, धमकी

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निबंध अफ्रीकी कविता के कुछ छींटे श्यामलाल कौशिक विगत काल में अफ्रीका में भी भारत के समान ग्राम राज्य होते थे। प्रत्येक गांव का अपना मुखिया होता था और अपना पुरोहित । मुखिया की सहायता के लिए बडे-बूढो को परामर्शदात्री परिषद् होती थी। गांव के अपने पहलवान होते थे जो गांव की रक्षा तथा मम्मान के लिए दूसरे गाँवो के पहलवानों से मल्लयुद्ध किया करते थे। इन पहलवानों का पोषण पूरा गांव किया करता था। मल्लयुद्ध मे विजय प्राप्त करने वाले पहलवानो को गांव की ओर से अनेक बहुमूल्य उपहार दिये जाते थे। गांव की सुन्दरतम किशोरियां उन्हें पत्नियो के रूप मे भेंट मे दी जाती थी। उपनिवेशकाल में शिक्षा के प्रति आकर्षण बढने पर गांव के प्रतिभावान वालको तथा किशोरो को पूरे गांव के व्यय पर शिक्षा दिलाई जाने लगी। कुछ को यूरोप मे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा जाने लगा। बाहर शिक्षा प्राप्त करने जाने वाले छात्रों को पूरा गांव गाजे-बाजे के साथ समारोहपूर्वक विदा करता और शिक्षा प्राप्त करके लौटने पर उनका भव्य स्वागत करने के लिए उमड़ पडता। ऐसे नवयुवको को पूरे गांव का गौरव समझा जाता और उनसे ग्राम की प्रगति में भारी योगदान की आशा की जाती। किन्तु प्रायः ऐसा होने लगा कि यह तथाकथित उच्च शिक्षा इन नवयुवकों को बिलकुल बदल डालती, और वे अपने खान-पान और वेश-भूषा मे ही नहीं, अपने आचार-विचार में भी पाश्चात्य रग में रंग जाते। मैकाले की आशा फली. भूत हो जाती। अत. जब वे गांव में लौटते तो गांव वाले उन्हे पूर्णतया विदेशी पाते । उनको गर्मजोशी शीघ्र समाप्त हो जाती और उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुंचने में देर न लगती कि उनके ये सपूत उनसे कट चुके है, उनका मार्ग भिन्न हो गया है। कीनिया के कवि खाडंबी असालाचे ने 'Parting of Ways' शीर्षक से लिखी 10. कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ अपनी कविता में ऐसी ही एक स्थिति का चित्रण किया है । भावार्थ इस प्रकार है। अलग अलग रास्ते उमके इगलण्ड से लौटने पर ममस्त ग्रामवामी उत्माह से भर उठे और उन्होंने उसे घेर लिया। किंतु विडवना तो देखिये कि उसने पहला काम यह किया कि उन्हे पेरेडाइज़ लॉस्ट की पंक्तियाँ पढकर सुनाई इसके बाद लोग फैलो पर भापण झाडा और पोप की प्रशमा के पुल बांधे। गांव वाले चौंक पर बोले कुछ नहीं किंतु वे अपना धैर्य वर्डस् वर्थ की कविताओ तक ही बनाए रख सके । इसके बाद उनकी आंखों से चमक गायब हो गयी और उन्हें ऑक्सफोर्ड लहजे मे धारा प्रवाह बोली जा रही अग्रेजी मे कोई आकर्पण नहीं रहा। उन्होने समझ लिया कि उन्ही के इस होनहार और मेधावी सपूत का गाँव से नाता टूट चुका है। और वे एक एक करके उठ खडे हुए। अपने स्टूल उठाए अपनी छड़ियाँ संभाली और फूट चले और गाँव के मध्य मे पुराने बुआव वृक्ष के नीचे जा आसन जमाए। तब सभी लोग इस तर्क से सहमत नहीं हो पाते कि ज्ञान-विज्ञान मे वृद्धि के साथ मानव सभ्यता भी विकसित हो रही है, पुरानी पीढी प्राय: यह विचार प्रकट करती रहती है कि जैसे-जैसे तथाकथित सभ्यता का विकास हो रहा है वैसे-वैसे मानवीय गुणो का लोप होता जा रहा है और ईमानदारी, स्पष्टवादिता, सच्चाई आदि का स्थान बनावट, छल-कपट, दिखावा, झूठ आदि लेते जा रहे है, किसी अफीकी कविता के कुछ छोटे 11 कवि ने तो सभ्यता के विकास पर चोट करने के लिए माप को इस प्रकार संबोधित कर डाला। सांप तुम मभ्य तो हुए नहीं शहर में बसना भी भी तुम्हे नहीं आया एक बात पूछू (उत्तर दोगे) तब कैसे सीखा डसना विष कहाँ से पाया। यह दृष्टिकोण सही हो अथवा गलत, पाया सब जगह जाता है। लीजिए अफ्रीकी कविता में इसकी बानगी देखिए। पहले पाल चिडयाउसिक की कविता 'Grand Pa' का भावार्थ जिसमे दादा जी नयी पीढी पर व्यग करते है। दादा जी वे कहते है कि वे मुझ से अधिक स्वस्थ है। यद्यपि वे एक मील भी पैदल नही चल सकते। उनकी आयु मे मै प्रात. युद्ध में भाग लेने के लिए रात्रि में चालीस मील चल लेता था। वे सोचते है कि वे मुझ मे अधिक स्वस्थ है। किंतु उनके मोजे गीले हो जाएँ तो उन्हें जुकाम लग जाती है। जव कि मेरे बिना मोजो के पर गीले होने पर मुझे छीक तक नहीं आती। तो भी वे सोचते है कि वे मुझ से अधिक स्वस्थ है। स्प्रिंगदार पलग पर विछे मुलायम गद्दे पर भी चे बिना नीद की गोली के नही सो सकते। और मैं, तीखी घास पर सिर के नीचे लकड़ी का टुकड़ा रखकर एक शिशु के समान मीठी नीद मे खुर्राटे ले लेता हूँ। अपने किसी प्रिय जन के मर जाने पर मैं फूट-फूट कर रोने में लज्जा का अनुभव नहीं करता और किसी मजाक पर खूब खुलकर हँसता हूँ। किंतु वे अपने आंसू रोक लेते हैं जैसे कि रोना कोई बुरा काम हो, पर वे अपनी हँसी भी तो रोक लेते हैं जैसे कि

12 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएं
हँसना भी कोई बुरा काम हो ।
तभी तो कोई आश्चर्य नहीं कि उन्हें
मनोचिकित्सको की आवश्यकता पड़ती है।
बोते समय में हमारी महिलाएं बहुत कम वस्त्र पहनती थी
कितु व्यभिचार होते कभी नही सुना
आज वे किसी हैगर पर टंगी चोली को देखकर पागल
हो उठते है
फिर भी वे सोचते है कि उनमे मुझ से अधिक प्रवल
इच्छा शक्ति है।
एक से अधिक पत्नियां रखने पर वे कहते है कि
मै नरक में पड़ने की तैयारी कर रहा हूँ।
लेकिन अनगिनत रखलें रख कर वे
दुनिया की आँखो में धूल क्यो झोकते है ।
उन्हे चाहिए कि मुझे अपने तौर तरीके बदलने की सलाह
देने से पूर्व
वे स्वय तो ईमानदार बन जाएँ।
मेरे दादा जी गर्व के साथ कहते है ।
और अब प्रस्तुत हैं नाइजीरियाई कवि जबराइल ओकारा की कविता 'Once
upon a time' का भावार्थ जिसमे एक पिता अपने शिशु-पुत्र को अपना कच्चा
चिट्ठा सुनाता है।
एक समय था
मेरे बेटे एक समय था
जब लोग हृदय और आँखों से हेंमते थे।
किंतु अब वे केवल दांतो से हंसते है ।
जबकि उनकी आँखें वर्फ जैसी ठण्डी बनी रहती है।
उस काल में वे हृदय से हाथ मिलाया करते थे।
लेकिन मेरे पुत्र वह समय बीत गया
अब हाथ मिलाते समय उनका हृदय कही दूर होता है

अफीकी कविता के कुछ छोटे : 13 और उनका वोपा हाप मेरी जेवें टटोलता है। जब मैं उनके घर जाता है तो वे कहते हैं इमे अपना ही घर समझिए। और मेरे विदा होते समय वे कहते हैं, फिर तशरीफ लाइए, बार-चार आइए। किंतु मुझे दूसरी बार के बाद का अवसर नहीं मिलता। तय वे मुझे आता देय द्वार बन्द कर लेते हैं। इस प्रकार मेरे वेटे मैंने बहुत-सी नई बातें सोय ली है। बल्कि बहुत मे चेहरे पहनने मी सोग लिए हैं। जिन्हें मैं वस्त्रों के ममान वदलता रहता हूँ। घर का चेहरा, दफ्तर का चेहरा, सड़क का चेहरा, मेजयान का चेहरा, पार्टी का चेहरा। जिनकी अपनी पूर्व निर्धारित मुस्कराहटें हैं। ।' और मैंने केवल दांतो से हँसना भी मीख लिया है। और हृदय को दूर रख कर हाथ मिलाना भी। मैंने वह विदा की नमस्ते भी कहना सीख लिया है जिसका अर्थ होता है 'चलो पिण्ड छूटा और 'आप से मिलकर बडी प्रसन्नता हुई' कहना भी जव कि प्रसन्नता कोसो दूर होती है। और चल-चख द्वारा पूर्णतया उवा दिये जाने पर यह कहना भी कि 'आप की बातो मे बडा रस आया।' मैं यह सब सील तो गया हूँ किंतु मेरे पुत्र मेरा विश्वास कगे कि में फिर वैसा ही हो जाना चाहता हूँ जैसा मैं पहले था अर्यात तुम्हारी तरह। मैं इन सब मारक बातों को भूल जाना चहता हूँ क्योकि अभी तो हेंमते हुए जब में दर्पण देखता हूँ तो मेरे दांत

14 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ
माप के विषदत के ममान दिखाई देते हैं।
और अब कुछ गीतों के नमूने।
पहले एक नाइजीरियाई युवक की यह कविता।
जब मैं अपने बिस्तर पर लेटता हूँ
तो मेरा मस्तिष्क तुम्हारे ख्यालो से भर जाता है।
और मैं सोचता हूं कि कहो तुमने
अपने निर्माण मे पूर्व
विधाता को रिश्वत तो नहीं दे दी थी।
अव प्रस्तुत है प्रेम का महत्व प्रदर्शित करने वाली घाना के कवि क्वेमी यू
की कविता 'The Mesh' का भावार्थ
उलझन
हम दोनो चौराहे पर आ पहुंचे हैं।
अव मुझे या तो तुम्हारे साथ चलना है
या फिर भिन्न मार्ग अपना लेना है।
एक बारगी मैं असमजम मे पड़ गया
किंकर्तव्यविमूढ हो गया।
तब मेरे संशयों के अधेरे में
तुमने प्रेम का दीपक जलाया
और मुझे तुम्हारे चेहरे मे
अपना मार्ग दिखाई दे गया।
और अब पढ़िये मालागासी गणराज्य के कवि फ्लेकियन कानाधो के प्रेम
गीत का भावार्थ जिसमे वह अपनी प्रियतमा से प्रणययाचना करता है।
मेरी प्रिय,
मुझे अपनी छाया के समान प्रेम मत करना
क्योंकि रात्रि मे छाया अदृश्य हो जाती है।
और तब मुझे प्रात.काल तक तुम्हारी इन्तजार करनी होगी।
मुझे मिर्च के समान भी प्रेम मत करना
क्योकि यह पेट मे उष्णता पैदा करती है

अफ्रीकी कविता के कुछ छोटे
15
जव कि मुझे भूख मिटाने की चीज़ चाहिए ।
मुझे अपने तकिये के समान भी प्रेम मत करना
क्योकि इससे दिन के समय तो भेट ही नही होगी।
मुझे चावल के समान भी प्रेम मत करना
जिसे इधर खाया और उधर हज़म
मुझे मीठे शब्दो के समान भी प्रेम न करना
जो तुरन्त हवा में उड़ जाते है।
और शहद के समान भी प्रेम न करना
जो मीठा तो होता है किंतु सहज सुलभ ।
मुझे एक मीठे स्वप्न के समान प्रेम करना
जो रात्रि मे जीवन्त होता है।
और दिन में आशा की किरण
और मुझे चांदी के टुकडे के समान प्रेम करना
जिसे देश रहते अपने मे अलग नहीं किया जाता
और जो यात्रा के समय वफादार साथी रहता है।
या फिर तूंचे के समान प्रेम करना
जो साबुत रहने पर पानी रखने के काम आता है
और टूट जाने पर सारगी बनाने के ।

गौभक्त स्व० सिंघीजी-इतिहास काएक उज्ज्वल पृष्ठ रामनिवास सोनी प्रत्येक समाज में कुछ ऐसे विरल व्यक्ति होते है जो अपनी धुन के धनी तथा निस्पृह समाज-सेवी के रूप में अपनी अग्रणी भूमिका सम्पादित कर अक्षय कीति का वरण करते है। ऐसे नर-पुगव देश, काल को सीमाओं को लॉधकर भावो पीढियो के लिए न केवल आदर्श प्रस्तुत करते है अपितु अपने महत् कृतित्व से नूतन इतिहास की सृष्टि कर जनमानस पर अपनी श्रद्धा की अमिट छाप छोड जाते है। ऐसे विरल व्यक्ति युगो के लम्बे अन्तराल के पश्चात् अवतरित होते है। उनकी विमल यशोगाथा से जनपदीय प्रान्तर पूर्णत: सुवासित एवम् सौरभमय बन जाता है । इस सदर्भ में एक कवि का कथन कितना सजीव व सटीक है-- है ममय नदी की वाढ कि जिसमें सब बह जाया करते है। है समय बडा तूफान प्रवल पर्वत झुक जाया करते है । अक्सर दुनिया के लोग समय मे चक्कर खाया करते है। लेकिन कुछ ऐसे होते है इतिहास बनाया करते है ।। परम गोभक्त सिंघीजी (स्व० श्री मूलचदजी सिंघी) नागौर जिले के लाडनूं करवे की दुर्लभ विभूति माने जाते थे। उनका नाम आज भी 'गाय' का पर्यायवाची माना जाता है । वे परम भागवत पुरुप थे। उनके जीवन पर वैष्णव धर्म की अमिट छाप थी। उनका जन्म वि० सं० 1952 मे डीडवाना तहमोल के एक छोटे ग्राम दौलतपुरा मे पिता श्री अगरचदजी सिंघो के घर हुआ । बाल्यावस्था मे मातृ-पितृ सुख जितना चाहिए था उतना उन्हे नही मिला और वि० सं० 1957 में ये लाडनू के सम्पन्न सेठ श्री सुलतानमलजी सिंघी के यहाँ गोद आ गये। तभी से लाडनूं इनका कार्य क्षेत्रवन गया । इस परिवार मे इन्हें धार्मिक संस्कार विरासत में मिले तथा समाज-सेवा का भाव जागृत हुआ। आज भी इस नगर के वञ्चे-बच्चे की जवान पर मिधीजी का नाम अमर है। स्व० मिधीनी सामान्य कद के, छरहरे, गेहुंआ रग के व्यक्ति थे । बिलकुल ।

गौभक्त स्व० सिंधीजी इतिहाम का एक उज्ज्वस पृष्ठ 17 1 निरभिमानी तथा आत्मलीन ! अधिकांश लोग इन्हें 'माधु' के नाम मे सम्बोधित किया करते थे क्योंकि माधुत्व इनमें कूट-कूटकर भरा हुआ था। इनके जीवन के प्रमुग दो पक्षथे। गौ सेवा तथा राम का नाम । दोनो काम एक-दूसरे के पूरक थे। वे गृहस्थ में रहते हुए भी संन्यासी की तरह जीते थे। रामायण, कथा, वार्ता, सत्सग ही आपका परम ध्येय था। साधुओ को महली तथा याचको की भरमार आपके द्वार पर रहती । निधनों को भोजन, कपड़ा, कवल आदि बांटना तथा सदा- वतं चलाना दैनन्दिन कर्म थे। वे मही अर्थों में रामस्नेही थे । सोते-जागते, उठते- बंठते, हर क्षण राममय था। उनके मकानो, मंस्थानो, धर्मशाला-सभी जगह रामनाम अंकित था। जैन कुल में जन्म लेने के बावजूद जैन संस्कार इन्हें छू तक नही गये । राम उनके आराध्यदेव थे तया वे हनुमानजी महाराज के पक्के भक्त थे। रामनाम को माला हरदम उनके हाथों में रहती तथा घट में फिरती रहती । उनके जीवन में बड़ी सादगी और मरलता थी। कही कोई आडम्बर अथवा कृत्रिमता नहीं थी। वे मनसा-वाचा-कर्मणा से अपने आराध्यदेव भगवान राम के प्रति सर्वथा भावेन समर्पित थे तथा प्राणी मात्र में उसी का स्वरूप निहारते । धार्मिक सहिष्णुता उनमे कूट-कूटकर भरी थी। हिन्दू, मुसलमान, मिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध सभी भाई ममान रूप से उनका आदर करते थे। वे सही अर्थों में सर्वधर्म समन्वय वादी थे। उनको कथनी-करनी में कोई अन्तर नहीं था। वे स्वदेशी के हिमायती थे। उनके करुणा-विगलित स्वरों में एक सच्चे भक्त हृदय की तड़पन छिपी थी। उन्हें पाकर यह कस्वा धन्य हो उठा तथा उन्हें खोकर कगाल। उनकी महानता को शब्दो का जामा नहीं पहनाया जा सकता। वे अपनी उपमा स्वयम् थे। यूं तो सिंधीजी स्वयम् एक सस्था बनकर जीये। उनके कर्मशील जीवन के अनेको किस्से जनश्रुति में व्याप्त हैं लेकिन कुछ विशिष्ट प्रामाणिक घटनाओ का आकलन ही मेरा इष्ट है । एक सफेद पालतू घोडी पर सफेद पोशाक और पगडी पहिनकर सिंघीजी जब बाजार अथवा गलियो में प्रवेश करते तो चारो तरफ आवाज आती-सिंधीजी! राम-राम। सिंघीजी हाय जोडकर राम-राम करते और सब हपित होते । भगवन्नाम की पवित्र गूंज से वातावरण पवित्र बन जाता। कई बार तो वे बच्चों को पैसे वाट-बाँटकर राम-राम बुलवाते । उनके पीछे बच्चो का समूह होता और वे आगे चलते रहते । एक वार पनिया सुनार नामक अधनगे, गदे, पागल-गे व्यक्ति को पीछे से आवाज आई-"सिंघीजो, मुझे भी घोडी पर चढ़ाओ।" इस बात को सुनकर सिंघीजी तुरन्त घोड़ी से नीचे उतरे, अपने स्थान पर पनिया को बैठाया। आप लगाम पकडे साथ-साथ चलते रहे । जनता देखती रही, आश्चर्य-भाव से। प्राणी मात्र के प्रति कितनी दया आपके हृदय में पूंजीभूत थी; इसका अंदाजा इस छोटी-सी घटना से लगाया जा सकता है।

18 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ स्व० श्री मूलचदजी सिंघी यूं तो अनेक सार्वजनिक कार्यों में न लेते थे परन्तु इनका सर्वोत्कृष्ट कार्य श्री रामानन्द गोशाला की स्थापना है । यह गौशाला आज इस कस्बे की शानदार सेवा कर रही है तथा अपने चरम विकाम पर है। इसके बीजारोपण में सिंघोजी का सर्वाधिक योगदान रहा। तभी सवंगम्मति मे जनता ने आपको संगमरमर की मूत्ति मरणोपरान्त गौशाला के बीचोचीच प्रति- प्ठित कराई। इम गौशाला को नोव वि० स० 1985 माघ सुदी 5 (वसत पचमी) की पावन वेला मे डाली गई। आपके माथ कंधे-मे-कधा मिलाकर कार्य करने वालो में श्री लक्ष्मीनारायणजी अग्रवाल, श्री श्रीकृष्णजी झवर, डॉ० राम- बहोरीजी टडन आदि सज्जनों ने अपनी विशिष्ट सेवाएं प्रदान की। सिंघीजी अपनी लगन के पक्के थे। अनेको तूफान आये, कठिनाइयां आई लेकिन ये अपने लक्ष्य से इंच-भर भी विचलित नहीं हुए। सच है-एक हजार मील की यात्रा एक कदम से ही तो शुरू होती है । आज इस गौशाला के पास मीठे पानी के कई कुंए, फार्म तथा सभी आधुनिक सुविधाएँ हैं तथा सबसे बढ़कर स्थानीय रामस्नेही सतप्रवर स्वामी रामनिवासजी महाराज का सबमे बड़ा वरदहस्त है। सैकडी गायों, बछडी, उत्तम नस्ल के सांड, उनकी उत्तम व्यवस्था, आज यह सारी उपलब्धि उस महान कर्मवीर (सिंधीजी) को स्मृति को तरोताजा बनाती है। एक बार ब्रह्ममुहूर्त में सिंघीजी अपनी घोड़ी पर मवार होकर जगल की तरफ जा रहे थे। भयंकर सर्दी का समय था । मार्ग मे उन्हें तीन टांग की एक घायल और मरणासन्न बछिया दिखाई दी। रक्त वह रहा था, इधर सिंघीजी के नेत्रो मे अश्रुधारा भी बह रही थी। घोड़ी से नीचे उतरे तथा अपना कीमती दुशाला उस पर ओढ़ा दिया। नौकरों को भेजकर घर लाये और उसकी सेवा में दिन-रात लग गये । वछिया ठीक हो गई और भक्त के सरक्षण मे रही । ऐसी भूखी, प्यासी, घायल अथवा कृश गायो को वे अपने निजी नोहरो मे ले आते और सेवा करते । वे दूसरे शब्दो मे इस नगरी के गोपाल थे । गौशाला की स्थापना से पूर्व अपने नोहरे या वाडे मे वे मैकडो गायो का निजी खचें से पालन-पोषण करते थे। दिन-प्रतिदिन अर्थ भार वढ रहा था तो उन्होंने जनता के विशिष्ट व्यक्तियो के समक्ष अपनी समस्या रखी । सम्पन्न महानुभावो ने एक-दो साल के लिए अपनी असमर्थता जाहिर की तो सिंघीजी हाथ जोड- कर बोले-"भाइयो! आप सब लोगो की मुझ पर बड़ी भारी कृपा है कि अभी एक-दो साल तक मुझे गौमाता की और सेवा का सुअवसर मिला है। इसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूँ।" बताइये कितनी महानता है इन शब्दो में ! गौ सेवा, रामनाम और सत-समागम के अतिरिक्त अन्य सार्वजनिक कायो के लिए भी सिंघीजी का प्रबल चिन्तन रहा। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि समाज में फाटका, जुआ आदि का बोलबाला है तथा नवयुवकों में सही दृष्टि का अभाव है गौभक्त स्व. सिंघीजी- इतिहास का एक उज्ज्वल पृष्ठ : 19 तो आपने स्थानीय ओसवाल सभा के निर्माण में सक्रिय रुचि ली। सभा के सदस्य रहे तथा लोक-हितपी कार्यों में योगदान देते। इस बडे कस्वे से करीब आठ मील की दूरी पर सुप्रसिद्ध डूंगर वाले हनुमानजी का मदिर है जहाँ उस जमाने में अधिकांश भक्तगण पैदल जाया करते थे। रास्ता रेतीला, शुष्क और टेढा था। पानी, आवास की विकट समस्या थी। आपने इस मार्ग में एक प्याऊ तथा धर्म- शाला बनवाकर अपनी परोपकार-वृत्ति का आदर्श प्रस्तुत किया। आज भी यह स्थान जनोपयोगी है। लेखक को ये पक्तियां लिखते वड़ा आघात पहुंचता है कि वि० स० 1986 . आश्विन कृष्णा 12 को केवल 34 वर्ष की अल्पायु में गौमाता का यह सच्चा सेवक, मरुधर मां का लाडला सपूत (सिंधीजी) इस असार संसार को छोड़कर अनत मे विलीन हो गया। आपके आकस्मिक देहावसान के समाचार से सारा बाजार बंद हो गया। हिन्दू, मुसलमान सबकी आंखें गीली थी और आपकी ऐति- हासिक शवयात्रा में सारा नगर उमड-उमड़ पड़ा था। कहा जाता है कि सिंघीजी के वियोग मे उनकी प्यारी घोड़ी ने भी तडप-तडप कर प्राण न्यौछावर कर दिये। उनकी जैसी शव-यात्रा आज तक यहां किसी को नहीं निकली। कठिन वीमारी की अवस्था में भी उन्हें इजेक्शन, दवा इत्यादि से भारी नफरत थी और एकमात्र रामनाम ही उनके लिए रामबाण औषधि थी। सर्व धर्म समन्वयवादी सिंधीजी जिन्होने इतनी अल्पायु मे कई महान सामाजिक हित के कार्य सम्पन्न किये उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके आदर्शों के अनुरूप चलकर समस्त दु.खी मानवता का कल्याण सभव हो। ऐसे इतिहाम-पुरुष को युग-युग तक युग का प्रणाम।

নিময় साहित्य शिक्षण और नाबोकोव सवाई सिंह शेखावत हम में से कितने ही शिक्षक, भाषा और साहित्यिक शिक्षक के रूप मे रोज- रोज, वाकायदा साहित्य शिक्षण का रुजगार करते हैं। यह बात अलग है कि यह रुजगार किन्ही पूर्व निर्धारित साहित्यिक एवं समाजशास्त्रीय मानदडो के अनुसार साहित्यिक कृतियों के विशिष्ट अर्थ को, छात्रों को सम्प्रेषण का है या एक तयशुदा नजरिये के तहत साहित्यिक-कृतित्व की जांच-परस, उस जांच-परख में छात्रों को शरीक करते हुए, जाने-अनजाने, उनमें साहित्य-आकलन की एक खास दृष्टि के विकास का । या फिर समय और समाज के परिप्रेक्ष्य में कृति को प्रासगि- कता, विशिष्ट मूल्यवत्ता, भाव-पक्ष की विधायी व्यंजना, कला-पक्ष की सुगढ- सरचना (भाषा-शैली का चमत्कार, शब्द-चयन का कौशल, अलकार, प्रतीक योजना) आदि अन्य अनेक मुद्दों को लेकर है। लेकिन सवाल इस बात का है कि इस समूचे 'सिर खपाऊ' प्रयास में कही हम कृति के उस जीवत मर्म को तो अनदेखा नहीं कर जाते है जो किसी कृति के धडकते-रपदित होते जीवन मे निहित है- अपने ही रूप, रग, रस और गध में रसा-बसा-जीवंत और गतिमान । ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण सवालो से हमारा माबका तब पडता है, जब हम "लोलिता" के विश्व प्रसिद्ध कृतिकार नावोकोच की पुस्तक "नाबोकोव' ज लेक्चर्म ऑन लिटरेचर" पर आधारित निर्मल वर्मा के लेख "नाबोकोवः साहित्य शिक्षक के रूप में" (कला का जोखिम) को पढते हैं। यह एक सुखद सयोग है, कि नावोकोव न केवल माहित्यकार थे, बल्कि शिक्षक भी थे--साहित्य शिक्षक | साहित्य को लेकर नाबोकोव अपने छात्रो को जो क्लास- नोट्स दिया करते थे, उनका परीक्षोपयोगी प्रयोजन तो था ही, लेकिन इस सबके माथ, उसका एक महति उद्देश्य साहित्यिक कृतियो के मर्म को उजागर करने का भी होता था तात्कालिक प्रयोजनो से इतर, कल्पना की चमकदार नोक से माहित्य शिक्षण और नावोकोय : 21 माहित्य के मर्म को कुरेदना। एक विरल और विशिष्ट साहित्य-आकलन की दृष्टि का विकास करना। नायोकोव लिगते हैं--"यह अपने आप में कितना मूर्खतापूर्ण प्रयास है, कि व्यावसायिक तर्क-मीमांसाओं के चक्कर में फंसकर हम किसी कृति में समय और समाज के आकड़े तलाशने लगते हैं। कृति के समूचे जीवत गोंदर्य को दर- किनार कर, एक व्यथं और वेहूदा-सी खोज। क्या जेन आस्टीन में हमें इंग्लंड की जमीदारी प्रथा का कोई निम मिल सकता है ? या फिर डिविन्म के अद्भुत, रहस्यमय लदन के रोमांस से हमे सौ साल पहले के लदन का कोई परिचय मिल गकता है ? सत्य यह है कि महान उपन्यास असल मे महान परिकथाए होती हैं। समय और स्थान, मौसम के बदलते रग, मस्तिष्क और पुछो के गतिमान स्पदन- एक महान लेखक के लिए इनके रहस्य ऐसे नहीं हैं, जिन्हें सार्वजनिक सत्यो को पब्लिक लायोरी मे उधार लिया जा सके। बल्कि ये ऐसे अद्भुत, विस्मयकारी चमत्कार है, जिन्हें एक कलाकार अपने ही अद्भुत, विम्मयकारी ढग से अभि- व्यक्त करता है।" बात सच भी है, साहित्य को लेकर यदि समय और समाज की आकड़े- वाजी ही अभिप्ट है, तो फिर इतिहास से इतर माहित्यिक कृतियो का अपना मूल्य भी क्या रह जाता है ? साथ ही समय, ममाज, या फिर उसके मूल्य-मान हा सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं तो साहित्य की 'क्लासिकिल' कृतियो से आज हमारा किस स्तर पर और क्या रिश्ता शेप रह जाता है ? क्योकि इन समस्त बातो के सदर्भ मे तो, वे कृतियों कभी की "आउट डेटेड" हो चुकी । आज और अब के समय, समाज तथा मूल्य-मानों के सदर्भ में हमारा उनसे कोई सरोकार शेप नहीं रह जाता। लेकिन इस सबके बावजूद, आज भी हम उन कृतियों को न केवल पढ़ते है, बरिक बड़े चाव से पढ़ते हैं, एक निपट निजता और आत्मीय अंतरगता से जुड़कर, उसमे रस-बस कर। समय और समाज की समस्त सीमाओं को लांधकर वे कृतियां आज भी हमारे अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है-हमारे भीतर मार्थक-सा काफी-कुछ बुन जाती है । ठीक इसी स्तर पर आकर, हमें यह सोचना होगा, कि आखिर वह कौन-सी चीज है जो समय, समाज, मूल्य, मानो के व्यवधान के बावजूद न केवल हमसे जुडती है, बल्कि जुड़ने को वाध्य भी करती है। नाबोकोव की दृष्टि में एक कृति के आकलन और शिक्षण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य रचना मे निहित इसी वैशिष्ट्य को व्यजित और रेखाकित करना है। उनकी राय में यह वैशिष्ट्य कृति के धड़कते-स्पंदित होते उस जीवन में निहित है, जो हर स्थिति मे, उस कृति का अपना, और केवल अपना होता है। 1 22 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ नावोंकोव के इस मंतव्य को निर्मल वर्मा के अपने ही एक अन्य लेख "रचना की जरूरत" के उदाहरण से भली प्रकार समझा जा सकता है । कृति के अंतरग जीवन को लेकर, निर्मल वर्मा लिखते हैं-एक सार्थक कृति बहते हुए ममय को अपने पृष्ठो पर रोककर 'फ्रीज' कर देती है। समय की सीमाओं और स्वयं कृतिकार से सर्वथा मुक्त और परे, वह समय, केवल उस कृति का अपना हो जाता है, अपना होकर रह जाता है। वाद मे जव-जब हम उस रचना को पढ़ते है तो रचना मे फ्रीज वह समय पुन पिघलकर हमारी अपनी अंतश्चेतना में बहने लगता है । और अनुभव के एक सीमित दायरे में ही सही, हम उस कृति के होकर रह जाते हैं। नावोकोव इस क्रम मे लिखते हैं--"हमें सदा याद रखना चाहिए, कि एक कला-कृति, स, एक सर्वथा नूतन विश्व की रचना करती है । इसीलिए पुस्तक को पढते हुए, हमे इस नये विश्व को बहुत गहरायी से देखना चाहिए, जिसका उन दुनियाओ से कोई नाता नही, जिनसे हम परिचित है। रचना जिस नयी दुनिया को जन्म देती है, उसका अध्ययन करने के बाद ही हम उसका रिश्ता अपनी जानी-पहचानी दुनिया मे जोड सकते है।" रचनाओ के प्रति नाबोकोव का यह अगाध, मांसल और चाक्षुप प्रेम नि संदेह माहित्य के प्रति एक नयी और सभावनाशील दृष्टि को जन्म देता है । वे लिखते हैं- "साहित्यिक कृतियो के मासल प्रेम को प्राय, हम रूखी ममाजशास्त्रीय टीकाओ तले दवा देते है।" नाबोकोव की स्पष्ट मान्यता है कि-समय और समाज या विशिष्ट मूल्य और सिद्धान्तो को लेकर की जाने वाली कृति-समीक्षा वस्तुतः हमारी "कामनसेंस" (वस्तुगत व्यावहारिकता--यह उचित है, यह अनुचित है), की उपज है । इसके जरिये हम कृति को एक विशेप कोण, एक विशेष चश्मे से देखने लगते है। उस स्थिति मे हमारे लिए कृति के भीतर स्पदित जीवन नहीं, अपितु हमारे अपने आग्रह महत्वपूर्ण हो जाते है।" नाबोकोव की राय मे-"महान साहित्य का आनद लेने के लिए एक ठडी, शात, निर्वैयक्तिक कल्पना की जरूरत है। जो अपने को तटस्थ और निसंग रख मके । तभी एक किताब पूरी मार्थकता के साथ, हमारी आत्मा मे कम्पन, रोढ़ की हड्डी के ऊपर फुरफुरी जगा सकती है । एक आदर्श पाठक के भीतर पागल मतवालापन और वैज्ञानिक विवेक-दोनो का समन्वय होना चाहिये।" तभी, और केवल तभी हम उस कृति के प्रति और स्वयं अपने प्रति (पाठक के रूप मे) भी न्याय कर पायेंगे [--उम कृति से जुड पायेंगे, उसमे शरीक हो पायेंगे। एक ऐमा नजरिया जो, न केवल किसी कृति के सौंदर्य पर रीझता-मुग्ध होता है, बल्कि ममझ के स्तर पर मीमाओ का अतिक्रमण भी करता है जो किसी बनी- , साहित्य शिक्षण और नाबोकोव : 23 बनाई दृष्टि की मोहताज नही । उपन्यास के मर्म को रेखांकित करते हुए नावोकोव लिखते है-"मेरे विचार से एक उपन्यास को जांचने की सबसे अच्छी कसौटी यह है, कि उसमें कविता की अत्यान्तिकता और विज्ञान की अतर्दृष्टि दोनो मौजूद हों। कला के जादू मे सराबोर होने के लिए एक बुद्धिमान पाठक किसी उत्कृष्ट पुस्तक को सिर्फ दिल से नहीं, सिर्फ दिमाग मे नहीं, बल्कि अपनी रीढ से छूता है। क्योकि कला का आनद यही स्पदित होता है।" नाबोकोव की राय मे एक समीक्षक, साथ ही शिक्षक का दायित्व इस स्पदन को महसूसने की सामर्थ्य का विकास करना, इस दृष्टि को विकसित करने में पाठक की मदद करना है। नाबोकोव लिखते हैं- - सौंदर्य और दया----शायद इनके जरिये हम कला की परिभापा के सबसे निकट आ सकते हैं। ठीक इसी स्तर पर आकर हमे भी साहित्य शिक्षण के अपने रोजमर्रा के रुजगार की जांच-पड़ताल करनी होगी। एक ढरेदार परिपाटी पर चलते हुए कही हम स्वयं साहित्य को ही तो अवमूलियत नही कर रहे हैं ? और इस सव के साथ ही भावी-पीढियो मे माहित्य-आकलन की एक एकागी और आधी अधूरी दृष्टि को तरह और तरजीह तो नहीं दे रहे है ?

लेख आज परीक्षा परीक्षार्थी की या परिवीक्षक की शिक्षार्थी की या शिक्षक की मोहन सिंह एक समय था, परीक्षार्थी परीक्षा देते थे, शिक्षक परीक्षा लेते थे। पर आज के इस रॉकेट युग की तो बात ही और है। छात्र विक्षोभ के, छात्र परिवेदन के इस युग मे परीक्षा को जैसे परिभापा ही बदल गई है। पहले परीक्षा का निकट आना छात्र के लिए चिंता का, अनथक परिश्रम करने का कारण बन जाता था । आज परीक्षा के निकट आने पर परीक्षार्थी चिंतित, भयभीत नहीं होता। परीक्षा मे उत्तीर्ण होने के लिए वितावी कीडे' का लेवल लगाना तो उमे कदापि स्वीकार नहीं। आज परीक्षा के निकट आने पर वे अध्यापक चिंतित हो उठते है, जिनको परीक्षा केन्द्र पर परिवीक्षक का उत्तरदायित्व सौंपा जाने वाला है, जिन्हे 'इन- विजीलेशन' करना है। कैसी विषम परिस्थिति है, कैसी दयत्तीय स्थिति है। परीक्षा परीक्षार्थी की हो, चिंतित, भयभीत, शिक्षक हो। अपने मान, सम्मान की रक्षा हेतु कुल देव की मनोतियाँ शिक्षक मनाये। शिक्षक चिंतित हो भी कैसे नही । उसकी, परीक्षा समय मे परीक्षा जो होनी है । उसे अपने ही छात्रो के तरह-तरह के अशोभन हलकंडो की करामात के कौशल पर पार जो पाना है। यह तथ्य, यह मत्य किस में छिपा है कि आज के परीक्षार्थी के लिए, परिवीक्षक को भयभीत करने हेतु चाकू, छुरा, पिस्तोल, परीक्षा कक्ष में ले जाना कितनी माधारण वात बन चुकी है। परिवीक्षक बनने वाला प्रत्येक शिक्षक यह जानता है कि ज्योही उसने परीक्षार्थी को नकल करने से रोका, त्योंही परीक्षार्थी की जानीमानी 'ग्रेटनिंग', 'गुरुजी बाहर चलिये आपको; देख लूंगा, प्राप्त हुई । शिक्षा देने वाला गुरु जमे उसका शत्रु नम्बर एक बन गया हो। शिक्षक, शिक्षक होता है। उसका काम है, सिखाना, छात्र को अधकार से २५ आज परीक्षा, परीक्षार्थी को या परिवीक्षक को .: 25 प्रकाश की ओर ले जाना, उसको सुपथ का पाथी बनाना। वह छात्र का मिय, दार्शनिक एवम् पथ प्रदर्शक होता है, इतना ही क्यो, वह सरस्वती भक्त होता है, कलम का पुजारी होता है । वह कलम उठा सकता है, चाकू, छुरा, खड्ग, उठाना उसके बूते की बात नहीं । और यह उममे, जिसे शिप्य कहता है, गहित प्रतिकार करे भी कैसे । ऐमा करने को न उसका हृदय मानता है, न हाय । प्रश्न उठ सकता है, परीक्षा के केन्द्र पर पुलिस का कडा प्रवध क्यो न किया जाय । पर भुक्तभोगी परिवीक्षय ही जानते हैं कि पुलिस की 'प्रजेन्स' से कटिनाई कहाँ तक दूर होती है, कल के पुजे कामाती-कारतूस' बाहर से आने कहां तक वद होते हैं, अध्यापक के विरुद्ध शक्ति के प्रदर्शन का स्वर कहाँ तक शात होता है? आज का परीक्षार्थी, परीक्षा में उत्तीर्ण होने हेतु, नित-नवीन साधन अप- नाता है, कमास की 'रिमोतं फलनेम' का प्रदर्शन करता है, जिसे देखकर विस्मय होता है, अतीव आश्चर्य होता है। बलिहारी है । आज के छात्र की बुद्धि की । पढा था प्रेमिकाएँ वियोग का मदेश ले जाने हेतु पक्षियो मे निवेदन करती थी, मेना में भी मदेश प्रदान करने के लिए कपोत अपनी करामात दिखाते आये हैं । पर आज तो परीक्षा के केन्द्रों पर भी इस कपोतो की करामात देखने को मिलती है। 3-4 वर्ष पूर्व 'टाइम्स आफ इंडिया' समाचार पत्र में नखनऊ का यह समाचार 'पीजन्स यूज्ड फार कॉपिंग' पढकर दंग रह जाना पड़ा। वहाँ के उन परिवीक्षक को मुक्त कठ से प्रशसा करनी पड़ी, जिन्होंने कपोत की करनून को कामयाब न होने दिया। वस्तुत बडी दयनीय दशा है आज के परिवीक्षक की। परीक्षार्थी की धमकियों पर परिवीक्षक साहस के मम्बल से पार पाले, पर, पर के धनी कपोतों की कलाबाजियो मे पार कैसे पायें ? कैसे निबटें? परीक्षार्थियों द्वारा, परीक्षा में उत्तीर्ण हेतु अशोभन साधनो, निंदनीय साधनो का प्रयोग करने की प्रवृत्ति वर्ष प्रति बढती जा रही है। यह कहना अंसगति युगत नही होगा कि ज्यो-पयो इस बीमारी को रोकने का प्रयास किया गया है त्यो त्यो यह बढ़ती गई है। इस प्रवृति को रोकने में उडनदस्ते भी कोई विशेष परिणाम नहीं दिखा पाये है। उड़नदस्ता परीक्षा केन्द्र पर छापा मारता है । 5-10 परीक्षार्थी चक्कर मे आते है । ये ही परीक्षार्थी केन्द्र अधीक्षक के लिए, परिवीक्षको के लिए बवाले जान बन जाते है। 'सद चलता है' सिद्धान्त के पक्षधर अभिभावकों के आक्रोश का भी परिवीक्षक को सामना करना पड़ता है। परिवीक्षक एक, धमकी देने वाले अनेक। ऐसी स्थिति में चालू, टालू नीति को मार्ग-दर्शक मानकर शिक्षक, परिवीक्षक अपना समय पार करता है । आज अच्छा, सफल परिवीक्षक उसे माना जाने -- 26 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ लगा है जो परीक्षा के दौरान अपनी ड्यूटी भी दे दे। अपने मान, सम्मान पर भी आच न आने दे। छात्रो मे इम वीमारी के पनपने के अनेकों कारण है । लेकिन सस्ती लोक- प्रियता प्राप्त करने के आकाक्षी अध्यापक बन्धुओं से भी इस प्रवृति को पन- पने में सहायता मिलती है। यह एक कटु मत्य है। आज जो परिवीक्षक छात्रों को नकल के कारतूस काम मे लेने दे, वह अच्छा अध्यापक, अच्छा गुरुजी कहलाये, छात्रो से मन चाहे जो पावे। जो अवैध, 'अनफेयर मीन्म' काम मे न लेने दे वह गंदा, बुरा,छात्रों का दुश्मन, हेकडी बाज कहलावै । छानी से धमकी पावे, अभिभावको का आक्रोश सहे। अगर इसी तरह परीक्षा केन्द्रो पर छात्रों की मनमानी चलती रही व शक्ति के बल पर , छुरे की छोर पर, पिस्टल के पाव पर वे परिवीक्षकों के साथ अशोभन व्यवहार करते रहे तो परीक्षा सिवाय प्रपच प्रमाणित होने के और कुछ नहीं रहेगी। अध्यापक भी परिवीक्षक बनना सहजता मे स्वीकार नहीं करेगा। परीक्षा प्रणाली में ममयानुकूल सुधार से ही इस समस्या का समीचीन, शोभन समाधान हो सकता है। पुलिस की 'प्रजेन्स' से, उडनदस्तो की अचानक उडान से इस समस्या का निराकरण कदापि नहीं हो सकता। यह एक सत्य है, तथ्य है, इसे महज मे ही झुठलाया नहीं जा गकता। - निबंध भारतीय संस्कृति में सहिष्णुता चुन्नीलाल भट्ट . जिम देश में विपले नागो की पूजा होती हो' ‘वर्ष मे एक दिन इनके पूजन का सुनिश्चित हो नाग पचमी के रूप में जो आराध्य शकर के गले का हार हो सच | उस सस्कृति में सहिष्णुता का भाव कितना गहन होगा? अपनत्व का दृष्टिकोण कितना व्यापक होगा? दुश्मन को गले से लगाना "उमे पूजन कर मम्मान देने का रिवाज हृदय की कितनी विशालता का द्योतक होगा? इस देश की संस्कृति सांप जैसे भयानक जहरीले जानवर की पूजा कर इम बात का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करती है जीता जागता उदाहरण है" इस सस्कृति में अपने में समा लेने की उसे अपने अनुरूप ढाल लेने की निभा लेने की क्षमा कर देने की हर तरह की घृणा, असहिष्णुता और हठधर्मिता के प्रत्येक अवशिष्ट अश को अपने अन्दर से बाहर निकाल फकने की शक्ति कितनी गहरी है। ऋग्वेद से लेकर आज तक, इस देश की सस्कृति हमे मिलजुल कर, समान आदर्शों और उद्देश्यो को प्राप्त करने का उपदेश देती रही है। "सगच्छध्व सवदध्व मवो मनामि जनाताम। समानो मन्य ममितिः समानी समानं मन सह चित्तमेपाम ॥ ममानि वः आकूतिः समाना हृदयानि वः । समान मस्तु वो मनोयथा वः सुसहामति ॥ अर्थात् साथ-गाय चलो, साथ-साथ वोलो, तुम्हारे मन परस्पर अनुकूल रहे, समान ही तुम्हारे कार्य और उपलब्धियां हों, समान ही तुम्हारे विचार और संकल्प हों, ममान हो तुम्हारे हृदय की इच्छाएँ हों "इस प्रकार तुम सबमे समानता हो। भारतीय संस्कृति में सहिष्णुता का उच्च स्थान इस देश के भौगोलिक "राज.

28 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ नैतिक और आध्यात्मिक सगठन से मुस्पष्ट है "। विश्व के सभी धर्मों के अनुयायी यहाँ रहते है । हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी आदि सभी धर्मों के लोग भारत के नागरिक है । सभी लोग शान्ति और भाई-चारे के साथ रहते हैं । इमका श्रेय इस देश की परम्परा को है । इस महान देश को महिष्णु सस्कृति को है। यहूदी हमारे यहाँ तब आए जब पहली शताब्दी मे येरूसलम के मन्दिरी को नष्ट किया गया। ईमाइयो का आगमन ईसाई युग की आरम्भिक शताब्दियों मे हुआ । इस्लाम द्वारा ईरान पर अधिकार किये जाने के बाद पारमी यहाँ आए और मुसलमान सातवी और आठवी शताब्दी में यहाँ आये और तबसे यही पर रहते आ रहे है। पिछली तीम या चालीस शताब्दियों से हमारी परम्परा यही रही है कि व्यक्ति किसी भी धर्म का अनुयायी क्यो न हो' 'हमने सदैव क्तित्व में ममन्वय स्थापित करने का लक्ष रखा "मदेव ऐमा ही महसूम किया है कि हम सब एक ही परिवार के सदस्य है "वसुधैव कुटुम्बकम्" के सूत्र को सदैव भारतीय सस्कृति ने अपना ध्येय रखा अन्तिम विन्दु माना। आज बडे-से-बडे नगर में एक ही मडक पर मन्दिर, मस्जिद, चर्च, अगियारा और यहूदियों के पूजागृह एक-दूसरे के साथ शान्ति- पूर्ण महयोग करते हुए हमे दिखाई देते है। यह वात यदाकदा जरूर दिखायी देती है कि राजनीति की दखलन्दाजी के कारण धार्मिक मतभेद उभरकर सामने आते है । अन्यथा हमारे देश में मभी धर्मों का स्वागत है, मभी धर्मों के मच्चे अनुयायियों की सराहना की जाती है । इतिहाम माक्षी है। भारतीय सस्कृति मे महिष्णुता के उच्च भाव के प्रति इसके पृष्ठ आज भी गवाही दे रहे है। अशोक ने अपने एक शिलालेख में कहा "धर्म को लेकर मत मगडो, समझौते की ही सराहना करो। यह मत समझो को तुमने पूर्ण सत्य पर अधिकार कर लिया है, किमी भी धर्म का सत्य पर एकाधिकार नहीं है । तुम्हें उम ईश्वर को जानने की कोशिश करनी चाहिए जो विभिन्न धार्मिक मागों और विभिन्न लोकोत्तर व्यक्तियों मे अभिव्यक्त सभी दिव्यताओ से ऊपर है।" आज देश के अलग-अलग हिस्सों में लगभग चौदह भापाएँ बोली जाती हैं । लेकिन भारत के सभी लोग मिल-जुल कर रहते है । इम महान मस्कृति मे महिष्णुता का मूत्र एक ऐमा मूत्र है, जिसमे अलग- अलग भाषाओं को बोलने वाले लोग परस्पर बंधे रहते हैं। देश के भाषा वार पुनगंटन से भय था कि इगगे देश की एकता छिन-भिन्न हो जायेगी, लेकिन ऐमा न हुआ । आज मम्पूर्ण राष्ट्र एक इकाई है "I गहिष्णुता के इसी भाव के कारण भारतीय संस्कृति मे सहिष्णुता : 29 ही सारा देश आज एक ही माला मे पिरोया हुआ है । भले ही माला का प्रत्येक मनका एक पृथक अस्तित्व रखता है लेकिन वावजूद इसके वह माला के चक्रव्यूह में इस तरह मे गुत्यम-गुत्थ है कि वह माला से अलग नहीं हो सकता। महान् दार्शनिक एवं शिक्षा शास्त्री सर्वपल्ली नॉ० राधाकृष्णन् ने ठीक ही लिया है-"हमारी संस्कृति ससार के लोगो मे साहम, सहानुभूति और परस्पर सम्मान और सहिष्णुता की भावना पैदा करना नाहती है; हम उन्हे यह महसूस करा देना चाहते है कि हम इस समार मे पैदा हुए हैं प्यार और निर्माण के लिए, न कि नफरत और विनाश के लिए।" अनेक शताब्दियो से इस देश पर होने वाले अनेक हमलो के बाद भी हमारा देश चार-पांच सहस्राब्दियों से जिंदा है तो एक विशिष्ट विचारधारा के कारण... इस महान् सस्कृति मे सहिष्णुता के भाव की प्रमुखता के कारण हमारा अस्तित्व बना रहा । यही भाव आज भी हमारे सामने है। मनुष्य के गौरव और लोगों में भाई चारे की उद्दात भावना से सारा ससार सिमटकर एक हो जाना चाहिए। सही अर्थों में तो प्रत्येक धर्म को "प्रत्येक सस्कृति को सहिष्णुता के इस महान गुण को अपने में धारण करना होगा, अन्यथा वह नष्ट हो जायेगी। यही वह धर्म है. संस्कृति है जिसे आज के परिवेश में स्वीकार किया जा सकता है। विदेशो में भारतीय संस्कृति का प्रभाव ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से कुछ समय पहले फैलना शुरू हुआ। आज भी वहां हमारी सस्कृति के अवशेष दिनाई पड़ते है, फिर भी हमारी राजनीतिक महत्वाकांक्षा नही रही कि हम इन राज्यो को जीत कर वहाँ अपना शासन स्थापित करें। हमारी संस्कृति तो सदैव अभयदान देती रही। लोभ और मोह से मानव को विमुक्त होने का सन्देश देती रही है, और सत्य की खोज के लिए उत्प्रेरित करती रही है। उपनिषद् में कहा है "अमतो मा मद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृत गमय .. आज ममार एक समान केन्द्र की ओर बढ़ता जा रहा है। विज्ञान और तक- नीको ज्ञान तथा परिवहन और सवार के माधनो ने मारे मसार को एक माय लाकर खड़ा कर दिया है। राजनीतिक रूप मे कही लोकतन्त्र है तो कही ताना- नाही। गहराई में उतर कर देखा जाय तो आज ममार भय युक्त है । भय मे विमुक्त नहीं। धर्मों और मरकृतियों में टकराव" विश्व विनाश के कगार पर आ लटक रहा है। इन मारी विषम परिस्थितियों में भारतीय मम्मति हमारा धर्म मानव ममाज के लिए वरदान सिद्ध हो सकता है। हमारी प्राचीन मस्कृति निमके गौरव से हम गौरवान्वित हैं जो सहिष्णुता, पारस्परिक गामंजस्य, भ्रातृभाव को गहन आध्यात्मिक विचारधारा मे ओतप्रोन है यह ममार का मार्गदर्शक वन मरनी है17 " निबंध पवाड़ा साहित्य चन्द्रदान चारण अपभ्र श-काल में एक ही जैसे अन्यों के नामो के अन्त में एक पद जोड़ कर उनका नामकरण किया जाना आरम्भ हो गया था। विभिन्न प्रदेशो में ऐसे 'नामान्त' विभिन्न पदो का काफी प्रचार हुआ। राजस्थान मे वेलि, फागु, सलोका, विवाहला, ख्याल, पवाड़ा, रास, मगल आदि नाम वाली रचनाएँ विपुल मात्रा में उपलब्ध होती है। राजस्थानी साहित्य में उपर्युक्त काव्यो की रूप-परम्परा काफी पुरानी है। पवाडा का इतिहास भी कम रोचक नहीं। गुजराती जोडणी कोश मे यद्यपि पवाडा को व्युत्पत्ति सस्कृत शब्द प्रवृद्ध से मानी गयी है-~-प्रवृद्ध>प्रवड्ढ> पवाडा---किन्तु अधिकाश विद्वान् इस बारे में सहमत है कि पवाडा की उत्पत्ति वास्तव में संस्कृत शब्द प्रवाद से हुई है। प्रवाद>पवाअ>पवाड़अ>पवाडो। एक दो विद्वानों ने इसे 'परमार' शब्द से सम्बन्धित करने का प्रयत्न किया है पर यह उचित प्रतीत नहीं होता। पवाडा शब्द का प्रयोग भारत के बहुत व्यापक क्षेत्र में होता है। पश्विम में राजस्थान से पूर्व में बगाल तक एवं उत्तर में पंजाब से दक्षिण में महाराष्ट्र तक यह शब्द अपने विविध रूपों में प्रचलित है। राजस्थान में पवाड़ो, पवाडा, प्रवाडा, बज ये पमारा, मालवा में पंवारा, पजाब में 'वार' वगाल में पयार, महाराष्ट्र में पोवाडा तथा कुछ प्राचीन रचनाओं में 'पपडो' 'पवाडु' 'पुवाडइ' आदि नाम भी मिलते है। किसी रचना के लिए 'पवाड़ो' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम संवत् 1485 में किया गया जबकि हीरानन्द सूरि ने अपने 'विद्याविलास चरित' को पवाडो की सज्ञा दी-- विद्याविलाम नारद पवाडो, हइडा भीतर जाणी। अतराइ विण पुण्य करोतुम्हि, भाव ओगरी आणी।

पवाडा साहित्य 31 इसके बाद सवत् 1565 मे रचित ज्ञानचन्द का वकचूल पवाडो है- पवाडउ पोढउ हवइ करवाछि कवि खति । वकचूल गुण वर्णवू, श्रवणि सुणउ इकचिति ।। पवाडो शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों में किया जाता रहा है। मामान्यत पवाड़ो से तात्पर्य ऐसी रचना से लिया जाता है जिसमे किसी वीर के शौर्यपूर्ण कार्यों-विशेषतः युद्धो-का ओजस्वी वर्णन हो । अगिनदास अपने 'अफजल खाँ- वध्र' नामक पवाडे मे कहते है-~-"यह मूर वीर पुरुषो का पवाडा शूरवीर ही सुनें।' लेकिन यह मत उचित नहीं। हीरानद भूरि रचित विद्याविलास पवाडो प्रेम और कौतुक प्रधान चरित काव्य है तथा ज्ञानचन्द का वकचूल पवाडो एक धार्मिक कथा है। परवर्ती राजस्थानी साहित्य में ऐसे पवाडे लिखे गये जिनका सम्बन्ध वीर पुरुषों से है । इनमें युद्धो के अतिरिक्त अन्य गौरवपूर्ण कार्यों का भी वर्णन है । फलस्वरूप पवाडो शब्द का प्रयोग एक काव्य रूप, गौरवपूर्ण कार्य, युद्ध, यशोगाथा आदि अर्थों में होने लगा। काव्य की एक विशिष्ट विधा के रूप में 'पवाडो' शब्द प्राचीन रचनाओं में कई जगह प्रयुक्त हुआ है । एक उदाहरण प्रस्तुत है-- इसो कीध अवसाण, जिसौ जाणत सयल जण । राउत्ता राउत्त माहा, मछरीक निर्भ मण || सामळ नै करमसी, चद जस नाभौ चाई। वागड़ छल वीरत्ति, विटे अरि थट्ट विभाई। हरि भुवणि गया वालणहरा, धामा तीरथ धरा छळ । कवि मेह प्रवाडो चीनियो, कळं नहीं कति ताई अकळ । [प्राचीन राजस्थानी गीत भाग 8, पृ० गौरवपूर्ण कार्य के अर्थ मे पवाडो शब्द का प्रयोग प्राचीन रचनाओं मे भी मिलता है। 'नागदमण' में डिंगल के प्रसिद्ध कवि साया झूला लिखते है- "पवाड़ो पन्नगा सिर, जदुपति कीधौ जाय" इसी प्रकार प्राचीन राजस्थानी गीत का एक अंश उल्लेखनीय है-- करे व सवा अतरे केशव, वधियो चीर द्रोपद वसेस। मो मुख गण्या न जावं माहव अमा प्रवाड़ा कोध अनेक। राजस्थान मे किसी वोर के पवाडे गिनने की परम्परा पुरानी है । गाडण 32. - कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ पमाइत ने 'गुण जोधायण' में जोधपुर के शासक जोधा जी राठौड़ के पवाडौं का उल्लेख करते हुए लिया है- याप तणो वर लयो, गैह लोतां उतवंग जोध प्रवाडा तेतला, जेता गंग तरंग जिता गग तारग, धू भार टारा जिता वीझ नागा, जिती मेघ धारा जिता आविया कपि, लका उजाडा तिता जोध कमंघज, तूझ प्रवाड़ा पवाडा राजस्थानी माहित्य की एक विशिष्ट विधा है। यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि राजस्थानी मे पचाडे केवल पद्य में ही नहीं लिये गये बल्कि गद्य में भी लिखे गये यथा -मनोहरदाम रा प्रवाडा, राव रा प्रवाडा, भीलड़ा रा प्रवाडा आदि। गोगादेजी की वीरता का उल्लेख करते हुए 'मुहता नैणसी री ख्यात' में (भाग 2 पृ० 319) लिखा है-"तितरै धीर दे जोईयो आयो । ताहरां गोगादेजी बोलियो-धीर दे, आव । तू बडो जोईयो छ। म्हारो पर वाड़ो ले। ताहरा धीर दे पिरियो। नेडा आय नै उतरियो। ताहरा गोगादेजी तर बार री झडप वाही, सु जोईयो कनै आय पड़ियो।" जिस प्रकार राजस्थान मे रणमल्लन शब्द व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ, उमी प्रकार उमी अर्थ में प्रवाडमल्ल शब्द का प्रयोग भी कई जगह मिलता है- (क) महि-पुड भीच प्रवाडमल, भूवल आपण भाव । मिध हुवो घणसूर २, रुपक बस इंदराव ।। --मुहता नंणसी री ख्यात, भाग 3 पृ० 169 पवाडो का नामकरण प्राय विजेता के आधार पर ही किया गया है यथा--- पाबूजी के पवाडे, निहालदे-सुलतान, बगडावत आदि। लेकिन कभी-कभी विजित व्यक्ति को लक्ष्य में रखकर भी पदाडो का शीर्षक निर्धारित किया गया है जैसे-- 'भीलडारा प्रवाडा'। राजस्थानी साहित्य मे पवाडों मे विपय वैविध्य प्राप्त होता है। कही भक्त भगवान को अनन्त महिमा का वर्णन करता है तो कही कवि किसी के अनुपम शौर्य अथवा उदारता का चित्रण करता है । कही यशोगाथा है तो कही वीरगाथा। पर अधिकाशतः उनमे विजययुक्त वीरतापूर्ण कार्यों का ही वर्णन है। राजस्थानी लोक साहित्य मे पाबूजी, निहालदे--सुलतान, बगडावत आदि पवाड़े बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । यद्यपि इनकी कोई प्राचीन हस्तलिखित प्रति नहीं मिलती पर इसमे कोई सन्देह नहीं कि ऐतिहासिक व्यक्तियों मे सम्बन्धित होने के कारण ये काफी पवाड़ा साहित्य : 33 प्रिय है। पुराने होंगे। ये जन-जीवन में काफी लोकप्रिय तथा मौखिक परम्परा में रहे हैं। अब ये तीनों ही लोक-काव्य सगृहीत किये जा चुके है और प्रकाशित हो गये हैं। पवाडों के गायक भोपे कहलाते है। ये पड अयवा फड़ बाँचते है। इनके पास पड़ो के रूप में लम्बी-लम्बी पट्टावलियां होती है। इन पर पवाडो के विषय से सम्बन्धित विभिन्न चित्र होते है। प्राय: पाबूजी की पड़ यांचने वाले नायक और देवजी को पड़ वांचने वाले गूजर होते हैं । इनके वाद्य भी अलग-अलग होते हैं । पावूजी की पड वाचने वाला रावण हत्या तथा देवजी की पड वांचने वाला जतर नाम के वाद्य का उपयोग करता है। ये पड़ें प्रायः रात्रि में ही यांची जाती हैं। यद्यपि आकार की दृष्टि से देवजी की पड सबसे बड़ी है और नौ-नो रात्रि तक बांची जाती है पर मान्यता की दृष्टि से पावूजी को पड सबसे अधिक लोक- इन पवाड़ों मे जीवन के अनेक मार्मिक प्रसग हैं। प्रेम के लिए सर्वस्व त्याग की भावना, वचन-पालन हेतु प्राणो का उत्सर्ग, अपने स्वत्व की रक्षार्थ युद्ध में शौर्य-प्रदर्शन, विपत्तिग्रस्त के उद्धार हेतु बड़े-से-बड़े संकट का सामना, भाई-बहन का निश्छल और निर्मल प्रेम, नायक-नायिका की वियोग-वेदना आदि से राज- स्थानी पवाड़ा साहित्य ओत-प्रोत है । सुलतान जब नरवरगढ़ में रहने लगा और लौटकर नहीं आया तो निहालदे ने मारू के नाम परवाने लिखे । तीसरे परवाने में उसने जो सांकेतिक विरहोद्गार प्रकट किये उनकी मार्मिकता असदिग्ध है। याग लगाकर वागों का भाली चला गया, पीछे से उमे कोई सीचने वाला न रहा। नीयू पक-पक कार रम से भर गये, शुक ने भी अपनी चोंच सुधार ली है पर निहालदे का प्रिय नहीं लौटा। पवाड़ो मे जहां लोक-जीवन के विभिन्न स्प मिलते हैं, यहां उनमें अलौकिक तत्त्व का समावेश भी असदिग्ध रूप में किया गया है । पक्षियो मे वार्तालाप, दानव से युद्ध, जादू का प्रयोग, परकाय प्रवेश, मृत का पुनर्जीवित होना, देवी-देवताओ द्वारा सहायता, दृष्टिपात से गर्भ-धारण, उवलते तेल के कडाह मे डाले जाने पर भी जीवित रहना आदि घटनाओं का वर्णन वास्तव मे कथानक रूढ़ियों के रूप में हुआ है। पपि कई पवाडों का मूल कथानक ऐतिहामिक आधार लिए हुए है पर लोक- मानम ने उन्हें विस्तार देकर उनमें अपनी रचि के अनुमार परिवर्तन कर लिया है । उदाहरण के लिए जमती के कारण पड़िहारों और गूजरो में जो युद्ध हुआ वह तो ऐतिहासिक सत्य है लेकिन 'देवजी री पड़' अथवा 'यगड़ावत' काव्य में युद्ध का जो कारण और स्वस्प दिया गया है वह लोक-मानम द्वारा परिवर्तित है। यही बात निहाल गुलतान और पाबूजी के पवादो के लिए मही जा मरती है। यों तो आज भी पयाड़े लिखे जा रहे हैं जैसे श्री गणपति स्यामी का "या के 34 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ जलम को पवाडों" । पर राजस्थानी पवाड़ा माहित्य अधिकाशतः मौपिक परम्परा मे ही प्राप्त है । अतः इनके रचनावाल तया इनकी भाषा के मूलरूप का पता लगाना बडा कठिन है । पर एक यात सष्ट है। ठेठ राजस्थानी भाषा होते हुए भी इन काव्यों में सरलता के अलावा पर्याप्त सरगता है। मुक्तियों का प्रयोग काव्य-सौन्दर्य की वृद्धि करने के साथ-साथ उसे स्पष्ट और गुग्राह्य बनाता है । 'देवजी री पड' अथवा 'वगड़ावत' काव्य के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं - (1) माया वादळ ज्यू भेळी पुरवाई मूंजाय (2) बड युगला सूं बीगडे, धान्दर सूं बनराय (3) भोम सपूतां वावड़े, वंश कपूतां जाय (4) ऊग्या नर वे आंथसी, जनम्या सो मर जाय इन पवाडों में हमारी लोक-संस्कृति संरक्षित है। लोक-जीवन को प्रभावित करने और सरस बनाने की अटूट क्षमता इनमें आज भी है। मशीनों के कर्ण-कट कोलाहल से दूर गांव को शान्त रजनी-वेला में जब कोई भोपा मधुर वाद्य-यन्त्रों के साथ अपनी सुरीली ध्वनि से पवाडे सुनाता है तो समस्त श्रोता मन्त्र-मुग्ध होकर रस की धारा मे डूब जाते हैं । मनुष्य यदि मशीन बनना नहीं चाहता और मानव के रूप मे रहना चाहता है तो उसे पुनः ऐसे साहित्य का समादर करना होगा और इस लोक-गंगा मे अवगाहन करना होगा। - निबंध लुई ब्रेल : ब्रेल लिपि का आविष्कर्ता वसंतीलाल सुराना फ्रांस को राजधानी पेरिस से 32 किलोमीटर पूर्व में, कूपवे नामक ग्राम साईमन रेने ग्रेल की घोड़े की जीन बनाने की दुकान थी। मालिक चमडे से घोड़े की जीन और फीते बनाया करता था । उसकी पत्नी का नाम मोनेका था। साढे तीन वर्ष का लुई ब्रेल, दो भाइयों और दो वहिनों में से सबसे छोटा था। एक दिन पिता फीता बनाने के अपने काम में व्यस्त था। नन्हा लुई चमड़े के टुकड़े के छेद मे से अपने पिता को निहारकर प्रसन्न हो रहा था, लेकिन-छेद इतना छोटा था कि वह अपने पिता के वाल पूरी तरह से नहीं देख पा रहा था। उसने लोहे का सुआ लेकर छेद बड़ा करना चाहा। पिता के विम्ब को छेद में से देखते हुए पूरी ताकत से सुआ छेद मे डाला कि वह छेद को पार कर, वायी आँख की गहराई तक जा लगा । लहू की धार ने चेहरे को तर किया। नन्हा लुई चिल्ला उठा। पिता ने उसे एकदम बांही में लेकर रोने और रक्त प्रवाह का कारण जाना । लुई की चीख सुनकर ऊपर की मजिल से मां दौड़ी हुई आयी। नन्हा लुई पिता की गोद मे था, उसका रक्त प्रवाह बजाय कम होने के तीव्र था। मां-बाप ने रक्त रोकने का असफल प्रयत्न किया। गांव मे मात्र एक ही डाक्टर था। वह भी पशुओ का, होरेस ड्यूक्लोज । उमने जैसे-तैसे आंख का रक्त प्रवाह रोककर आंख पर पट्टी बांध दी। और स्वय चिकित्मा न कर पाने की अपनी अममर्थता व्यक्त की। पिता के वकील मित्र ने बालक को पेरिम ले जाने तया अपने डाक्टर मित्र से चिकित्सा कराने की सलाह दी। अगले दिन नन्हे लुई को लेकर मां-बाप तथा वकील घोड़ों पर सवार होकर पेरिस के लिए निकल पडे । पेरिस मे वकील के मित्र डाक्टर आरमड फोन्टेन ने आंख की पट्टी खोलकर देखते ही कहा, "मुझे दुःख है, बाई आंख जाती रही है। अब एक हफ्ते वाद पट्टी खोलकर देखना शायद दायी आंख बच जाये। घर आकर पट्टी खोलने पर बालक को कुछ भी नही दिखाई दिया । बायी आँख ने दायी आंख को भी प्रभावित किया । सन् 1812 मे नन्हा लुई, - 1. 36.: कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ । जवकि वह मात्र साढे तीन वर्ष का था, अंधा हो गया। रोते हुए मा मोनेका ने कहा, "मेरा बेटा अधा हुआ नहीं अधा कर दिया गया है।" बालक बड़ा प्यारा, सुकुमार तथा धुंघराले बालो का था। पिता माईमन रेने गांव का मम्पन्न और प्रतिष्ठिन नागरिक था। वह अपने मियों को बड़े गर्व मे, नन्हे लुई को गोद में लेकर कहा करता था, "मेरा बेटा घोड़े को जीन थोडे ही बनायेगा, मेरा बेटा तो पादरी या प्रोफेसर बनेगा।" लेकिन वेटा तो अधा हो गया। याप मिर पीटकर रह गया। नियति का कितना कर मजाक था। लुई के अधा होने का सारा दोप अपना मानकर पिता दुयो रहने लगा। उसने एक बेत को सफेद करके हृदय पर पत्थर रखकर अपने बेटे को थमा दी। नन्हा लुई अब कुछ बडा होने पर घर पर ही भूगोल और अंकगणित मीपने लगा। वह बडा प्रतिभाशाली था। एक बार पिता के मित्र क्यूरे ने नन्हे नेल के बैठने के ढग से प्रभावित होकर कहा, "वालक कैसी अदा से बेंत को लेकर बैठा है, मुझे बालक मे मानमिक प्रौढ़ता के दर्शन होते हैं कि भविष्य में चलकर यह बालक महान बने।" अधा होने के पश्चात् ज्योज्यों ममय व्यतीत होता गया, वह वस्तुओं के रंगो को विस्मृत करने लगा, रंगो के प्रति अनजान होकर, उसमें रंग की अनुभूति विलुप्त हो गई। कुछेक वस्तुओं की मात्र शक्लें भर याद रही। उसके लिए तो "द सन टू मी इज डार्क" हो गया। एक दिन शाम को पिता रने, क्यूरे, वकील तथा अन्य लोग बैठे वार्तालाप कर रहे थे कि लुई ने अपने पिता से कहा, "पिताजी, मैं भी स्कूल जाऊँगा।" इस पर लुई वहिन और भाइयो की देखरेख में स्कूल जाने लगा। लेकिन पढाई को व्यवस्था बेल के अनुरूप नही होने से वह पिछड़ने लगा, तया एक शाम जिद करने लगा कि वह पढने के लिए दूसरे स्कूल जायेगा। निराश पिता, लुई की जिद से तग होकर आवेश मे कह उठा, "बेटे, तुम पागल तो नही हो गये हो, दृष्टिवानों तक के लिए पढ़ाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, तो फिर अधो की पढ़ाई को बात ही क्या?" अंधों के पढ़ने का स्कूल है कहाँ ? इस पर पिता के मित्र क्यूरे ने कहा, "पेरिस मे अंधो के पढ़ने का स्कूल है। सारे फ्रांस में वही एक विद्यालय है, जिसको ममाजमेवी वेलेन्ताइन हॉय ने "नेशनल स्कूल फोर दयग ब्लाईड्स" के नाम से चला रखा है। पिता ने पुत्र को आश्वस्त करते हुए कहा कि वे उसके लिए इतना धन छोडकर जायेंगे कि फास के अन्य अंधों की तरह उसे आजीविका के लिए भिक्षा- वृत्ति पर निर्भर नहीं रहना होगा। वह आजीवन बैठे-बैठे पा-पी मकेगा। ऐसी व्यवस्था ये कर जायेंगे। लुई को पढ़ने की जिद को पिता रैने नही टाल सका, और एक दिन भारी मन से पेरिम के लिए घोडा गाडी पर रवाना हुए। वे हॉप के अध विद्यालय में पहुँचे, वैलेन्ताइन हॉय ही उसके संचालक और निदेशक थे। उस समय विद्यालय - लुई ब्रेल · ब्रेल लिपि का आविष्कर्ता : 37 मे बारह बालक थे। वालक वही रहते थे, वही खाते-पीते तथा शिक्षा प्राप्त करते थे । वालको मे शिक्षण शुल्क लिया जाता था। दो सेवक बच्चो को देख-रेख के लिए थे। हॉय के कहने से एक सेवक लुई को उसके आवास गृह ले गया, पिता ने भारी मन से हॉय से कहा, ' 'मेरे बेटे को किसी भी बात की तकलीफ न हो, मैं उसकी सुख-सुविधा के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ।" निदेशक हॉय के आश्वासन पर वे लौट आये। नन्हे लुई के लिए विद्यालय आते समय मां ने बड़े प्यार से एक बडी पेस्ट्री तथा भुना मुर्ग एक गठरी मे बांध दिया था । लुई कमरे में कपडे बदल ही रहा था कि उसने कमरे में पांवो की आवाज सुनी-थोडी देर पश्चात् उसने देखा कि उसकी पेस्ट्री और भुना मुर्ग गायव है। इस घटना से उसके नन्हे दिल पर बडी चोट पहुंची। घर से बाहर वाह्य संसार का यह उसका प्रथम कटु अनुभव था। वह असहाय था । वह उसका कैसे प्रतिकार करता, अगर वह देखता तो रोकने का प्रयत्न करता। विद्यालय में उसने अपने मे दो वर्ष बड़े लडके, जीन से, जो नौ वर्ष की उम्र में अधा हो गया था, मित्रता कर ली। तीसरे दिन जीन ने लुई मे कहा, "चलो, वाहर घूमने चलें।" उमने लुई को आश्वस्त किया कि वह सडक पर, भीड़ में, दुकानों पर आने-जाने का अभ्यस्त है । वे एक बेकरी की दुकान पर गये, कुछ फेक्स उसके पास थे, जो कि लुई की मां ने उसको आते समय दिये थे । वे धेकरी वाली से रग-बिरगी केक्स एक कागज की थैली मे लेकर लौट ही रहे थे कि कुछ आवारा लडकों ने उनको छेडना शुरू कर दिया। एक ने लुई की पीठ पर, दूसरे ने सिर पर मुक्के मारे । कोई तीसरा हाथ की थैली ही लेकर चलता वना, कुछेक जो, अधे भिखारी ! ओ, अधे भिखारी ! कहकर उन्हे चिढा रहे थे। किसी ने गोवर तो किसी ने पत्थर उन पर फेंके । हॉय ने जब यह दृश्य देखा तो दौडते हुए आये और इन दोनो को उन दुष्टों से बचाया। नन्हा लुई हत्प्रभ रह गया । वह समझ नहीं सका कि क्या हो गया था। उन्हें किस अपराध को सजा दी जा रही थी। लुई ने जीन से पूछा, "हमारे साथ ऐसा बुरा व्यवहार क्यों किया जा रहा है ।" तो जीन ने कहा, "हम अधो के साथ इस प्रकार का व्यवहार कोई नयी बात नहीं है, ऐसा तो होता ही रहता है ।" वाह्य ससार का, यह लुई का दूसरा कटु अनुभव था। शाम को जब सभी खाने पर बैठे तो उसने महमूम किया कि सभी के कपो में सूप डाला जा रहा था। उसने अपने कप में भी सूप परोसे जाना महमूस किया, लेकिन जब उसने अपना हाथ कप मे डाला तो उसमे सूप नहीं था, कप खाली था। उसने जीन से कहा, "मुझे सूप नही परोसा गया" जीन ने वात को टालने के लिए। कहा, "तुम मेरा सूप ले लो।" लुई ने सूप लेने से इन्कार कर दिया तथा भूख नहीं 38 कौमी एकता को तलाश और अन्य रचना होने का बहाना बनाकर अपने कमरे में पना आमा । और फट-स्ट कर रोने लगा। वह अपने आपको गयन नहीं कर पा रहा था। वहाँ पर मा ममना भरा वातावरण, और कहाँ यह यात्रा रामार को कट यातविरता। समार कितना हृदय- हीन है। ऐगे वातावरण में वह वहां नित माला, गायाप मे दूर, पर की याद मन में गंजोये अफेला पंगे रहे, यहाँ पर की ममना य मंरक्षण को था। आवेग में आकर यह करी बाली में पाग गया और अपने पिता के नाम पर लिगने को पहा। प्रिय पिताजी, आप शीघ्र आयें, मुझे में जायें, मैं यहां नहीं रह गमता। में बहुत दुखी हूँ। पेरिग वालो के लिए अँधे व्यक्ति जानवरों में भी बदतर होते हैं, वे उनके गाय पूर मजा करके मनोरजन करते हैं। मैं भूगा हूँ, मुझे ठंड लग रही है । यहाँ नौकरीने मुझे लूटा, आवारा लड़को ने मेरे केय छीने, हमे पत्थर व हमारे ऊपर गोवर फेंका, अब में यहाँ नहीं रह गकता। आपका प्रिय तुई बेल कारण विशेप से पत्र डालने में विलम्ब हो गया। इसी बीच यह यहाँ रहने का अभ्यस्त हो गया । यहाँ का वातावरण अब उमे इतना बुरा नहीं लगने लगा। घर की याद भी कम होती गई। अत उसने वही रहने का निर्णय कर अध्ययन करना शुरू कर दिया। सस्था निदेशक वेलेन्ताइन हॉय वृक्षो को टहनियों को तरह-तरह से मोड़कर उनसे फेंच वर्णमाता के अक्षरो का निर्माण करते थे, तथा अधे बालकों की हाथ की अंगुलियां उनसे फिरवाकर, उन्हें अलग-अलग अक्षरों से परिचित कराते। टहनियों से बने ये अक्षर वहुत बड़े होते थे। इसके पश्चात् उनको उभरे अक्षरो से अभ्यास कराया जाता था, उभरे अक्षर हमारे आज के समाचार पत्रों के शीर्षकों के घडे. से-वडे अक्षरो जैसे होते थे, जो वहुत जगह घेरते थे। अधो के पढ़ाने के लिए कई प्रयत्न किये जा रहे थे तथा कई विधियां उस समय प्रचलन मे पी जैसे गाल प्रणाली, मून प्रणाली, डा० फेल प्रणाली आदि। इन पर विचार तथा इनका विकास किया जा रहा था ताकि दृष्टिहीन व्यक्ति पढ़ लिख सकें। सभी तरीके किसी न किसी प्रकार से उभरे अक्षरों के ही प्रकार थे, जो कि बैल के अनुसार दृष्टिवानो के लिए उपयुक्त थे। मूल समस्या थी दृष्टिहीनो के लिए ऐसी वर्णमाला का निर्माण, जिसको पढ़ने के साथ लिजा भी जा सके, अन्यथा उभरे अक्षरों से तो मात्र पढा ही जा सकता था, उनके द्वारा लिखा जाना तब तक असम्भव था। विद्यालय के पुस्तकालय में उभरे अक्षरो पर आधारित तीन पुस्तकें थीं। जिन्हे लुई ग्रेल : ग्रेल लिपि का आविष्कर्ता : 39 । लुई नै पढ़ लिया था। पिता को लिखने पर लुई को चमड़े में कटे अक्षरों का एक पासंल मिला। उन अक्षरों को मिलाकर जुई ने पहली बार अपना नाम "मेरा नाम लुई प्रैल है" पढा। साथ ही वह इतिहास, भूगोल, गणित आदि विषयो पर अध्ययन करता रहा। एक दिन लुई ने निदेशक हॉय से कहा, "सर, अब मैं ग्यारह वर्ष का हो गया हूँ.-"रेमण्ड द फोरम" ---पुस्तक में मेरी रुचि नही, कुछ ऊँचे ज्ञान की पुस्तकें पढ़ने के लिए दें।" वेलेन्ताइन हाय जो कि इस विद्यालय का खर्चा वहन कर रहे थे, अपना समय इसके संचालन में दे रहे थे, उनकी तीव्र इच्छा थी कि दृष्टिहीनी के पढ़ने लिपने की कोई सुगम विधि उन्हें मिल जाये। चिन्तित होते हुए लुई से कहा, "मेरी घडी इच्छा है कि तुम्हें किसी प्रकार लिखना आ जाये, वह लिखावट चाहे कितनी ही खराब ही क्यों न हो।" हॉय लुई की प्रतिभा को प्रशसा की नजर से देखते थे। वे लुई को संगीत प्रतिभा तथा उसके दृष्टिहीनों की सहायता के सकल्पों से बड़े प्रभावित थे। उनका दृढ विश्वास था कि लुई दृष्टिहीनों के लिए कुछ करेगा, जो नवीन होगा। तुई हपतों, महीनों व वर्षों तक दृष्टिहीनों के लिए- "लियना-सीखने" के लिए सोचता रहा । उसका यह विश्वास था कि दृष्टिवानों का लियने-पढ़ने का तरीका दृष्टिहीनो के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है। क्योकि हाथ को अंगुलियां आंख के बराबर तेज रफ्तार से बड़े उभरे अक्षारों पर फिराई नहीं जा सकती हैं, अत. अन्य तरीकों की उमे तलाश थी। हॉय ने लुई की संगीत प्रतिभा से प्रभावित होकर उसे यूरोप की प्रसिद्ध प्यानोवादिका "वॉन पेरेडिस" से प्यानो तथा आर्गन सीखना शुरू कराया। सन् 1821 तक शुरू-शुरू में विद्यालय कार्य को समाप्त कर, वह एक दिन में एक बार संगीत सीपने के लिए चर्च जाता था। लेकिन लुई की संगीत प्रतिभा से प्रभावित होकर, शिक्षिका अब नियमित दिन में दो बार बुलाने लगी। इस प्रकार लुई का जीवन व्यस्त हो चला। लुई को इस प्रकार प्रशंसा, तथा उसकी विशेष शिक्षा-दीक्षा देखकर उसके ही दृष्टिहीन साथी उमसे ईर्ष्या करने लगे। एक दिन संगीत शिक्षक को लेकर वह चर्च के होस्टल लौटा। उसके सभी साथी उसके आने का इन्तजार कर रहे थे। ज्याही उसने होस्टल में कदम रखा कि उन्होंने लुई को बड़ी भत्सना की और कहा, "वेटे, जमीन पर पांव रखकर चलो, यो ह्वा से मत उडो। यह मत भूलो कि तुम अंधे हो, फ्रांस के हर अंधे की तरह, तुम्हें भी भिखारी बनना होगा, यही तुम्हारा व्यवसाय होगा।" ईर्ष्या के आवेग में अनॅस्ट ने उसकी घेतों से इतनी पिटाई कर दी कि वह तीन दिन तक बिस्तर पर पड़ा रहा । वेलेन्ताइन हॉय जब इन बालकों से मिले तो उनको खूब फटकारा, "दुनिया की मार क्या कम है कि तुम आपस में एक-दूसरे को मारो।" लुई जब अकेले में हॉय से मिला तो उसने उनसे कहा, "आपने 40 • कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ । विद्यालय मे जानवरो को इकट्ठा कर रखा है, मैं अन्य अपंगों की तरह नही हूँ, मैं एक सगीतकार हूँ।" हॉय ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, "होस्टल मे बच्चे भी अन्य बच्चो की तरह थोड़े-बहुत शैतान है ही, लेकिन अधेपन ने उनमे एक आक्रोश भर दिया है जिसके कारण वे अधिक निर्दयता का व्यवहार करने लगते है, वनों उनका मकसद तुम्हे हानि पहुँचाने का कदापि नहीं था।" हॉय की बात का लुई पर विपरित प्रभाव पड़ा, उसमे प्रतिशोध की भावना प्रवल हो चली। रात को जबकि अर्नेस्ट सो रहा था, तो लूई ने उस पर तों की वर्षा की । शोर सुनकर होस्टल के सभी छात्र, कर्मचारी दौड़कर आये । हॉय ने डाटकर कहा, "तुमने ऐसा किया ?" साथ ही उसके दो-एक चप्पतें भी जमा दी । अब तो छात्र उसकी मजाक उडाने लगे। लुई, हॉय द्वारा पिटे जाने, तथा साथियो द्वारा उपहास का पात्र बनाये जाने का अपमान तथा प्रताडना को सहन नहीं कर सका और रात के अंधेरे मे जब कि सभी सो रहे थे वह चुपचाप विद्यालय से भाग निकला। लुई अभी बच्चा ही था, मात्र तेरह वर्ष का। सदं चेहरा, कृश शरीर, मां- बाप से बहुत दूर, नितान्त अकेला, पास मे कानी कौड़ी नहीं । घर की याद घनी हो आयी। रात कहाँ गुजार दी पता नहीं । "प्रात.काल हो चला था कि पीछे से एक जोर का मुक्का मुझ पर पड़ा।" सब्जी विक्रेता, युचई डांट कर उसे कह रहा था, "दूर हट, अधे भिखारी मुझे दूकान लगानी है।" भूखा, रातभर का जगा लुई अपनी संज्ञा खोने लगा। बड़ी मुश्किल से उठा, तथा वडे अनुनय-विनय से उसे समझाया कि वह भिखारी नहीं है, वह तो काम चाहता है । भाग्य से बुचर्ड को भी एक नौकर की आवश्यकता थी। उसने जुई को अपने सब्जी भडार में सोने और दिन के एक समय के भोजन पर नौकर रख लिया। काम था, मडी-गली तथा अच्छी सब्जियो को अलग करना, और रात को वही सब्जियों के ठेले पर सो जाना । रात को बड़े-बड़े चूहे उमको बडा परेशान करते थे, लेकिन वह विवश था, जाता तो कहाँ जाता। एक दिन मालकिन आयी। कंची लेकर, "हब्शी जैसा दिखता है" ऐसा कहकर उसने बढे हुए वालों को काट डाला, तथा कहा कि बड़े वालो के कारण सब्जी वित्री पर खराब असर पड़ रहा था। एक दिन बुचई ने कहा, "वडे मोटे हो रहे हो।" स्वाभिमानी लुई ने जवाब दिया, "तुम्हारे दिन में एक समय के खाने से नही।" मालिक प्रत्युत्तर से तिलमिला गया, उसने एक जोर का मुक्का लुई के मारा। लुई ने भी बेंत उठाकर उस पर वार किये और चलता बना। मामने दीवार मे जा टकराया; खून निकल आया। अपने स्कूल का पता पूछता-पूछना वह चार माह वाद वापस विद्यालय लौट आया। निदेशक हाय, उमके मा अर्नेस्ट तथा मभी ने आँखों में आंसू तया सुवकियो से स्वागत किया, और प्रत्येक ने अपने गले लगाया। अब लुई चौदह वर्ष का हो गया था, आर्गन पर खूब रियाज करने लगा। एक - लुई ब्रेल : ब्रेल लिपि का आविष्कर्ता : 41 - दिन मंगीत शिक्षक ने उससे कहा, "अब तुम्हे सिखाने को मेरे पास कुछ नहीं है।" अतः उसने दृष्टिहीनो को सगीत सिखाने का कार्य अपने हाथ में ले लिया। इसी बीच वेलेन्ताइन हॉय की दिल के दौरे से मृत्यु हो गयी । लुई के लिए यह वज्रपात- सा था, और नये डाइरेक्टर ने विद्यालय मम्हाला। फास युद्ध मे फैमा था। सरकार ने विद्यालय को पांच घटे तक बदूक की गोलियां बनाने का कार्य अनिवार्य रूप से सौपा । लुई आर्गन के लिए अधिक समय चाहता था, उसने नये निदेशक से प्रार्थना की कि उसे बदूक की गोलियां बनाने के कार्य से मुक्त कर दें तो बडी कृपा होगी । उमे आर्गन के रियाज के लिए समय चाहिए था। निदेशक महोदय ने कहा, "तुम मे संगीत प्रतिभा है, यह मुझे अच्छी तरह से मालूम है, लेकिन अन्य छात्रों से अधिक नहीं । जाओ, मुझे परेशान मत करो और जो कहा जाये वही करो।" हॉप की पुण्य तिथि पर उसने 'मृत्यु-गीत' नामक सगीत रचना को आर्गन पर वजाई। इसी बीच जीन, जो उसका मित्र था और पिता की मृत्यु हो गयी। वह अपने गांव गया। मां तथा भाइयो ने उसे गांव में ही रोकना चाहा, "तुम हमारे पास रहो, जिन्दगीभर आराम से रह सको इतनी सम्पत्ति है।" लेकिन वह उस गाँव मे क्या करे, वहां उसके लिए कुछ भी काम नहीं था। विधि का कुछ और ही सकेत था। और एक दिन वह आराम की जिन्दगी छोड़कर, मंघर्ष का जीवन जीने लौट आया। अभी होस्टल मे आये हुए कुछ ही दिन हुए कि सूचना मिली कि उसकी मां की कैसर से मृत्यु हो गयी है, और लुई अव विलकुल अनाथ हो गया था। विद्यालय निदेशक, रिचर्ड वेयोनट ने लुई की, विद्यालय छात्रो को आर्गन सिखाने के पद पर नियुक्ति कर दी थी। सेवा मे प्राप्त धन से वह सगीत रचनाकारो की प्रतियां खरीदता, सग्रहालय में जाकर अक्सर उन महान कलाकारी की मूर्तियों पर हाय फिराता, और कल्पना लोक में खो जाता। स्वप्न देखता कि, भविष्य की सतति के लिए, स्वय भी एक मूर्ति होगा। यही नहीं अतिरिक्त आमदनी मे वह दो गरीब छायो का शिक्षण शुल्क देने लगा। लुई अभी मोलह वर्ष का ही था कि विद्यालय मे आये नये निदेशक, जर्मनी के लियोरोल्ड, जो शराबी था, विद्यालय का कार्य लुई को सौपकर निश्चिन्त हो गया। इधर बैकरी व्यापारी की लड़की, डेनिज, लुई की संगीत प्रतिभा, उसके तथा कृश चेहरे, घुघराले बाल, उसके आँखों के विनीत भाव तया उसके नाटकीय ढंग से ऊपर देखने की अदाकारी पर रीझकर उससे खूब प्रेम करने लगी। लुई डेनिज को बुद्धिमान समझता था। अब दोनों का ही अधिकांश समय साथ-साय वीनने लगा। डेनिज लुई का सहारा बन गई थी। एक दिन उमने भावावेश में कह दिया था, "लुई, मैं तुम्हारी आंख हूं।" लुई उमे चचं से जाता, होटलों में पाना 42 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ खिलाता और उसे सगीत सुनाता । उसने वायलिनसेली खरीदकर डेनिज को सगीत मीखने के लिए भी दिया। स्थानीय शिक्षक थायब्रोड ने एक दिन लुई से कहा, "लुई ! तुम प्रतिभाशाली, बुद्धिमान तथा सम्पन्न हो । फास की इस नवजागरण की वेला में इन दृष्टिहीनों के लिए कुछ करो, ताकि तुम्हारे वताये हुए रास्ते से ये पढ़-लिख सकें-उम गई पद्धति को खोज तुम करो।" लुई ब्रेल ने प्रत्युत्तर में कहा, "हम अघे लोग दृष्टि- हीनो के लिए पढने-तिखने के लिए नये तरीके कैसे खोज निकालें, यह तो आँख वालो का कर्तव्य है, कि वे इस दिशा में सोचें, खोज करें।" और डेनिज की तरफ मुड करके कहा, "डेनिज तुम सच मानना, जो समाचार पत्र तुम मुझे पटकर सुनाती हो, उमका आधा भाग भी मेरी समझ में नहीं आता है। ये बदलते हुए रग, ये चेहरे की लाली क्या होती है ? मूर्योदय व सूर्यास्त पर सूर्य कैसा सुन्दर होता है ? हमारे से तो ये कोडे ही अच्छे हैं, जो रेंगते है लेकिन देखते तो है।" और आवेग मे वह रोने लगा, "मैं अधा हू, मैं कैसे देखू । दृष्टिवानों का ज्ञान, विज्ञान और कलाओ का जानना यदि मेरे लिए अमम्भव है, तो मैं स्वयं को मार डालूंगा, मैं जिन्दा नही रहूँगा–लेकिन जिस तेजी से आँखें अक्षरों को पढ़ती है, उस तेजी से अगुलियां उभरे अक्षरो पर कहाँ घूम पाती है" '--इस समस्या का हल उसे हर समय घेरे रहता था । छुट्टियो के दिन थे, लुई अपने गाँव कूपर्व गया। मां-बाप का पहले ही देहान्त हो चुका था, भाई दूकानें चला रहे थे। पिता के वकील मित्र लामन शार ने लुई को एक दिन अपने यहां खाने के लिए आमत्रित किया । जव वह खाने के लिए अपने घर से रवाना हुआ, तो रास्ते में एक अघा व्यक्ति मिल गया ) कुशल-क्षेम पूछने के पश्चात् लुई ने उससे कहा, वह वकील के घर खाना खाने जा रहा है, यदि वह चाहे तो वह भी चले, इस पर वह भी साथ हो गया, खाना खाने के बाद वकील ने लुई से नाराजगी प्रकट करते हुए कहा। "तुम उस अंधे को मेरे यहां क्यो लाये। वह तो भिखारी है, अंधा है, भीख उसका धंधा है, तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए था।" लुई क्षणभर को हत्प्रभ हो गया, वह सोचने लगा, यदि वह भिखारी है, मड़क पर मारा-मारा फिरता है, तो मैं यहाँ क्यों हूँ। मैं भी तो अंधा हूँ, उमी वर्ग का हूँ, उन्ही जैसा हूँ। वे कुत्ते के समान इधर-उधर मारे-मारे फिरें और मै मौज से शोक भोज उडाता फिरूँ, यह अंध समाज का क्रूर मजाक है, जिसका मैं भी एक अगहूँ। मेरा अन्त करण मुझे धिक्कार रहा है, मै स्वयं दोपी हूँ। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं अपने दृष्टिहीन भाइयों को अब कभी नही भूलूंगा, उनके अभाव अभियोगों को झेलूंगा।" इस प्रतिज्ञा को उमने जीवनभर निभाया। फ्रांस में नेपोलियन का पतन हो गया था। नवयुग का सूत्रपात हुआ जिसमे विज्ञान, दर्शन तथा कलाओ ने जन्म लिया। वह आठ वर्ष तक लगातार सगीत की लुई लेन देन लिपि का आविष्फर्ता : 43 माना करता रहा। नस्वरूप वह एक बहुत बडा जानिष्ट और वायलिन सैलो पादक बनवा. तो भी एक समीना के रूप में जमको मान्यता नहीं मिली। इसके विरोट कापीलोर बन्द कर दे, "मंगीतज्ञ बनने के लिए प्रतिभा चाहिए अधा- पन नहीं।" नुई ट्रेन के नामुद मुन मात्या यो-दृष्टिहीन कैने लिखना-पइना सीखे। दृष्टिवानों के ननको पर आधारित उभरे बार उनके लिए सर्वथा अनुपयुक्त थे। दृष्टिहीनों का राजा एक्दम अलग ही होना चाहिए, यह प्रश्न उसको हमेशा परगान बग्दा या। सन् 1826 में मात्र मत्रह वर्ष की आयु का होने पर, एक दिन निजींगा की तरह ममाचार पत्र पड़ कर मुना रही थी। वे एक कैफे मे बैठे थे। ननाचार था कि चाल्नं वारवियर, जो एक सैनिक टुकड़ी का कप्तान था रिम प्रकार उभरे मन काम में लाकर, दूसरे मैनिक शिविरों को संवाद भेजता पा, जो नत के अमरे में भी पडे जा सकते थे। असे उभरा त्रिभुज यह मत देता कि तीन ओर मे आक्रमण होने वाला है या कि दायें अयवा बायें से आक्रमण या मना आ रही है आदि । नुई ने डेनिज को उस ममाचार को वापस पड़ने के लिए कहा । क्षणभर में सारी ममस्या का हल जैसे उसको सूझ गया हो। वह जोर-जोर मे आदेश में आर्कमिडीज को तरह 'यूरेका', 'यूरेका' चिल्लाने लगा। कैफे के मालिक ने बड़ी कठिनाई से उमे शान्त किया। उसे क्या मालूम था कि उस क्षण विश्व में एक ऐनी खोज ने जन्म लिया, जो विश्व के दृष्टिहीनो को सदियों ता दृष्टि प्रदान करता रहेगा। लुई तथा डेनिज, बारवियर का पता लगाकर उसके यहां जा पहुँचे । लुई तीन वर्ष तक वारवियर विधि पर कठिन परिश्रम करता रहा। लुई नै डेनिज से कहा, "मात्र सात स्वरों से जव संगीत की सभी रचना गाई. बजाई जा सकती हैं तो क्यों नही कुछ उभरे विन्दुओं से दृष्टिहीनों की वर्णमाला बन सकती है और उनके लिए नये शब्दो का निर्माण किया जा सकता है। और लुई का पूर्व मत कि "दृष्टिहीनों को दृष्टिवानों के पढ़ने-लिखने के तरीके से शिक्षित नहीं किया जा सकता है, पूर्णतः सत्य निकला, और एक दिन उसने बेल सैल की रचना कर ही डाली। एक लकड़ी की पट्टी पर छ' छेद वाली टीन की पत्ती के बीच में एक मोटा कागज लगा दिया जाता है। एक नुकीली मुई से जिसे स्टाइलस कहते है के छ बिन्दुओं से भिन्न-भिन्न क्रम, समय और संयोग बनाकर, उभरे ग्रेल शब्दो की रचना की गई। लिखा दाय से बाये ओर, और पढ़ा वायें से दाहिने और । येल ने उस समय 43 चिह्नों को काम मे लिया था। जिसमें सभी अक्षर, संयुक्त अक्षर और विराम चिह्न थे। इसमे भी दस मुरुष चिह्न थे। इस लिपि को उसने 1829 मे पहली वार तथा कुछ सुधार करके 1831 में दूसरी वार प्रकाशित किया। 1832 तक यह दृष्टिहीनो मा युनिवर्सल ग्रेल कोड बन गया, लेकिन इमको राजकीय मान्यता तो नहीं मिल सकी।

44. कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ लुई ब्रेल ने कठोर माधना के पश्चात् दृष्टिहीनो के पढ़ने-लिखने की एक नई पद्धति को खोजकर, उमको विवामित कर ली थी। अब वह उम नई लिपि को प्रचारित, प्रकाशित और परीक्षण कराना चाहता था। इसके लिए अपने हो विद्यालय के निदेशक, डा. ला० पोर्ट में प्रार्थना की कि वे उस विद्यालय के छात्रो व शिक्षकों के सम्मुख दृष्टिहीनो के लिए नई लिपि का प्रदर्शन करने की आज्ञा दें। और एक दिन छात्र, शिक्षक और विद्यालय निदेशक सभी के सम्मुरा लुई ने इस प्रकार अपनी लिपि का प्रदर्शन किया। लुई ने अपने पाम बैठे व्यक्ति में कोई पुस्तक लेकर, कही से उस पुस्तक को खोल कर किसी पैराग्राफ को पढने के लिए और लुई अपने लकडी के चौखटे पर टीन की पत्ती के छेद से, नुकीले पिन से मोटे कागज पर पच करता रहा। ये यत्र वाद मे स्लेट व स्टाइलस कहलाये। वह पढता जाता था और लुई पच करता जाता था। पैराग्राफ के पूर्ण पंच कर लेने के पश्चात्, सभी के सम्मुख ब्रेल ने, उन उभरे सकेतो पर हाथ फिराकर पूरा पैराग्राफ पढ गया। टिप्पणी के लिए निदेशक को ओर देखा । डा० ला० पोर्ट ने कहा, "यह सब पाखड है, धोखा है । लुई ने इस पैराग्राफ को पहले से ही रट रखा था।" लुई ने बहुत अनुनय-विनय किया कि, अन्य किमी पुस्तक से कोई पैराग्राफ पढ़वाकर इस प्रयोग को वापस करवा कर देखें । लेकिन निदेशक ने उनकी एक नही सुनी, और हिदायत दे दी कि भविष्य मे ऐसा प्रयोग, इस विद्यालय मे कदापि कहा, न करे। लुई निजी रूप से इस विधि से दृष्टिहीन छात्रो को पढाने-लिखाने लगा। छात्र बडी सरलता और शीघ्रता से इस विधि से पढ़ने लिखने लगे। यह विधि उनको बड़ी सरल तथा सुगम लगी। सगीत के नोटेशन्स तो इस विधि से और भी सर- लता से व्यक्त किये जा सकते थे। अतः इस विधि की चर्चा होने लगी, और यह चर्चा डा० ला० पोर्ट तक पहुँची। उन्होंने लुई को बुलाकर डांटा, "हमारा विद्या- लय दृष्टिहीनों को उभरे अक्षरो पर आधारित पद्धति से शिक्षण देता रहा है, इसी पद्धति पर शिक्षण मामग्री है, इसी पद्धति से छात्र पढे है और पढ रहे हैं, और सरक्षको से इमी का हमने शिक्षण शुल्क लिया है। क्या तुम चाहते हो कि विद्यालय की सारी व्यवस्था उलट दूं, उभरे अक्षरो की पद्धति से सीखें हुओ को बिना सीखे हुओ में परिवर्तित करके, उन्हे तुम्हारी पद्धति से वापस शिक्षण दूं, एक जिम्मेदार व्यक्ति के लिए यह कैसे सभव है। तुम मेरी स्थिति समझो, एक विद्यालय निदेशक के लिए क्या यह संभव है। मैं एक विद्यालय प्रधान होने के नाते तुम्हे आज्ञा देता हूँ कि तुम भविष्य में इस प्रकार का बखेडा मेरे विद्यालय में कभी नहीं करोगे।" सभी तरफ से निराशा ही हाथ लगी। उमकी वर्षों की साधना निष्फल रही। अब उसके पास कुछ भी पैसा नहीं बचा था। धन एकत्रित करने के लिए उसने लुई ब्रेल : ब्रेल लिपि का आविष्कर्ता : 45 संगीत कन्सर्ट किये। कुछ पैमा इकट्ठा करके, एक बार फिर लिपि के कार्य में लग गया। । उसने पेरिस की रॉयल सोसायटी को लिखा कि दृष्टिहीनों के पढने-लिखने के लिए उसकी एक खोज है-कुछ समय पश्चात् रोयल मोसायटी ने उसको पत्र वाचन के लिए आमत्रित किया। निश्चित तिथि पर वह डेनिज के साथ बडे विश्वास के साथ वहाँ गया। एक बडे हॉल मे अध्यक्ष के सम्मुख कई सारे पत्र- वाचक वैठे थे, पत्रवाचन शुरू हुआ, उस समय एक वैज्ञानिक ने, पानी के गुण- धर्म पर पत्र पढा दूसरे ने, इग्लिश चेनल गुब्बारे से कैसे पार करें, तीसरे ने फ्रास मे शराब के खराब होने के कारणो पर, चौथे ने वाप्प शक्ति के उपयोग पर। कई पत्र पढे गये थे। कभी किसी पत्र पर चर्चा और शक निवारण भी होता । इस प्रकार प्रत्येक पयवाचक पत्र पढकर बैठ जाता था। अब लुई की बारी थी। अध्यक्ष के कहने से पास ही पडी जीव विज्ञान की पुस्तक को खोलकर, एक व्यक्ति ने धीरे- धीरे एक पैराग्राफ पढना शुरू किया। उसने सधे हाथो से पच करना शुरू किया। पूरा पैराग्राफ पढ़ जाने पर लुई ने उस पराग्राफ को ज्यो-का-त्यों वापस उभरे सकेतों पर अगुलियां फिरा कर, सभा के सामने वापस पढ दिया, और वह अपनी जगह आकर बैठ गया। किसी ने उसे धन्यवाद तक नहीं दिया, किसी से भी प्रेरणा का कोई शब्द तक नहीं निकला । और भारी मन से वह डेनिज के साथ घर लौट आया। उसकी वर्षों की साधना और खोज का कुछ भी परिणाम नही निकला । उसे सफलता नहीं मिली, जबकि वह डेनिज को बड़े उत्साह के साथ कहा करता था, "मै विश्व इतिहास का प्रथम दृष्टिहीन व्यक्ति हूँ, जो वास्तव मे पढ़ लिख सकता हूं, मैं इतिहास का दृष्टिहीनो में सबसे सभ्य और शिक्षित व्यक्ति हूँ।" लेकिन ये स्वप्न यथार्थ की भूमि पर टूट कर चकनाचूर हो गये। लुई का पोज का कार्य समाप्त हो गया । डेनिज, जो उसकी आंखें बन गई थी, उसको प्रेरित करती थी, जो मदेव उसके कार्य की सहयोगिनी थी। एक दिन जव लुई बैठा था. कहने लगी, "लुई, मैंने तुम्हारा बहुत इन्तजार किया है।" लुई ने प्रदर्शन हेतु उमका चुम्बन लेते हुए कहा, "डेनिज, में हमेशा तुम्हारा आभारी रहूँगा, मेरे जीवन मे स्त्रियों को कोई स्थान नहीं है, मुझे कुछ कार्य करने हैं, तुम किसी अन्य से शादी करलो।" वह चली गई। लेकिन लुई उसे जीवन भर नहीं भूल सका, क्योकि वह लुई के बहुत दिनों के सयपं की गायिन थी। कुछ दिनों तक उसकी याद इतनी तीन व घनी रही कि उमकी याद में लुई ने मोनेट लिगा और वायलिन सलो पर बनाया। डेनिज के चले जाने के थोडे ही दिन बाद वाइम वर्षीय पाउन्टेग लाफिया नामक धनाढ्य विधवा उमे प्रेम करने लगी। यह ग्रेल को घोडागाडी पर लाती और ने जाती थी। एक दिन उमो द्वारा प्रेम-प्रदर्शन पर डेनिज की तरह उगे भी यह 46. कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएं दिया कि स्त्रियों और मुख का उसके जीवन में कोई स्थान नहीं है। लाफिमा ने घोडागाडी रोककर उमे रास्ते में ही उतार दिया तया क्रोध से चपत लगाते हुए कहा, "तुम मूर्ख हो, अपने को खुदा गमझते हो, लेकिन खुदा तो एक ही है।" लुई ने विनम्र शब्दो में वाहा, "भूल जाओ।" और अफेला चला गया। कुछ दिन बाद तीसरी लडकी जोर्जीटा--जो उमको सगीत शिप्या भी थी उमसे प्रेम करने लगी। लेकिन हर बार उमने एक युग निर्माता, एक युग सृष्टा जैमा आचरण किया । वह सोचने लगा कि उसके जीवन मे आमोद-प्रमोद के लिए समय ही कहाँ है ? उमको तो दृष्टिहीनो के पढने-लिखने तथा संगीत शिक्षण के लिए बहुत कुछ करना था। लुई रॉयल एकादमी के अपने प्रदर्शन के बाद सन् 1839 में एक दृष्टि- हीन युवा लडकी, थेरेस वॉन क्लिन को वायलीन सेलो और आर्गन सिखाया करता था। कुछ वर्षों वाद पेरिस के सम्पन्न तथा विद्वद्जन के सम्मुख, वॉन क्लिनर्ट का संगीत प्रदर्शन हुआ। उसके संगीत प्रदर्शन ने सभी का मन मोहित कर लिया । अन्य दृष्टिहीन संगीतज्ञों से उसका अंगुली फिराकर किसी सगीत रचना को बजाने का तरीका भिन्न था। वह लुई ब्रेल की शिष्या थी। उसके संगीत कम्पोजीसन बजाने की विधि बेल के आधार पर थी। सभी श्रोताओ द्वारा प्रशसित होने पर वॉन क्लिनर्ट ने श्रोताओं से कहा, "मेरी प्रशंसा के बजाय उस लुई ब्रेल की प्रशसा करें, जो पेरिस में दूर किसी अज्ञात कमरे में अपने अंतिम दिन गिन रहा है। पेरिस के समाचार पत्रो मे वॉन क्लिनर्ट व लुई ब्रेल की धूम मच गयी । वास्तव में सन् 1835 के कठिन परिश्रम और निराशा के कारण वह टी.बी. मे आकान्त हो गया था। 1851 तक आते-आते उसका ससार सिकुडकर एक कमरा बन गया था। मृत्यु के एक दिन पूर्व पांच जनवरी को उससे मिलने, एक कम्पोजर, एक पत्रकार और एक दुकानदार आया, ऐमा गृह स्वामिनी ने कहा। वह देख रही थी कि पिछले कई दिनो से लुई की खांसी लगातार बढ़ती जा रही है, वह खाँमता ही रहता है । लेकिन 6 जनवरी की सुबह, जव बहुत देर तक खांसी की आवाज नही सुनाई दी तो गृहस्वामिनी उसके कमरे मे गयी। देवा वह मरा पड़ा था। शरीर खूब ऐंठा हुआ था। 6 जनवरी को 43वर्ष की आयु मे उसने संमार त्याग दिया। उसने अपना आधा धन, जो कुछ भी उसके पास था, अपनी गृहस्वामिनी के नाम लिख रखा था, क्योकि अतिम दिनो मे उसने ही तो उसकी देखरेख की थी। उसको अपने गाँव कूपये ले जाकर दफना दिया गया किसी को मालूम तक नही हुआ कि कोन दफनाया गया था। उसकी मृत्यु के दो वर्ष बाद उसके दृष्टिहीन शिप्यों ने पढने-लिखने के लिए डोट सिस्टम लागू करने की मांग की। दृष्टिहीनो की शिक्षा की वढती मांग के कारण लिपि के झगडे ने जोर पकड़ा। यूरोप, अमेरिका और इग्लेण्ड के नेत्रहीन शिक्षा के शिक्षा-शास्त्रियो ने दृष्टिहीनों की लिपि बेल के पक्ष में कई दलीलें रखी लुई ग्रेल : प्रैल लिपि का आविष्य : 47 नया जाने नकों में उमे उभरे अक्षरो से अधिक सुगम, वैज्ञानिक और अंध पित रिया--लिपि का यह सघर्ष यूरोप, इंग्लेण्ड और अमेरिका ने 30xi नक चलना बहा । अंत में ब्रेल लिपि की श्रेष्ठता पोपित कोर re प्रेल कोट की मान्यता मिली। उसके बाद तो विदा है, जहाँ दृष्टिहीनों को बेल लिपि में शिक्षण नहीं जाना हो। नुरोल की 30 वर्ष को श्रम साधना नाzarried हनना अधिक कल्याण किया कि शताब्दियों समarhar news भिक्षा नगण्य है । वह दृष्टिहीनों का पानाrokatha मादगी में यह मरा किसी ने उसको नहीं 17tter नहीं लिग । वह अतिम समय तक लोगों में rearrrrrrrrr. ऊँचाई को ये दृष्टिहीन भाई-बहन , terture- नियं हमारी कौमी एकता प्रेम 'खकरधन' काश्मीर के नौल धवल शिवरों से लेकर मनीपी विवेकानन्द को पावन साधना स्थली कन्याकुमारी तक, अरुणाचल के सघन वनों से भीमा के मजग प्रहरी थार के मकस्थल तक विस्तारित विस्तृत भूभाग मैदानी, पर्वतों, नद-नदियों, सपन जगली के रंग-बिरंगे वस्त्रो मे सन्जित मेरी भारतमाता, अनेक धर्मों, जातियो, भाषाओं, वर्गों, सम्प्रदायों का अनूठा संगम , आर्यावर्त, भारत, हिन्दुस्तान, इण्डिया। ममय की शिला पर अकित प्राचीनतम सस्कृति का शिलालेख, अनेक धर्मा, मम्प्रदायों और संस्कृतियो की साधना स्थली, भारत । सहस्राब्दियो पूर्व वैदिक ऋचाओ के उद्गाता ऋपियो ने ऋग्वेद के पुरुष भूक्त के मन्त्र द्वारा समाज को एक व्यवस्था दी। बाह्मणो मुखमामीद् बाहू राजन्यः कृतः । उर सदस्य यद् वैश्य पद्भ्याऽ शूद्रोरजायतः ॥ उस आदि पुरुप के मुख में ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और पैरो से शूद्रो ने जन्म लिया। अर्थ का वास्तविक भाव यह है । मानसिक शक्तियो से सम्पन्न वर्ग समाज रूपी पुरुष का मुख, वाहुबल से सम्पन्न वर्ग इसकी भुजाये, कर्मशील और धनार्जन में सक्षम वर्ग इसका उदर व सेवा के गुणों से युक्त वर्ग इसके पैर है । कितनी उदात्त और शाश्वत व्यवस्था है। किसी एक अग को अव- हेलना समाजरूपी शरीर को विकृत कर देगी। इस समाज रूपी शरीर रथ के सुसंचालन हेतु अंगों का परसर मामञ्जस्य परमावश्यक है। पंगे के बिना सम्पूर्ण शरीर विकलाग है । तो हरिजनो के विना समाज । न वे हेय है न अस्पृश्या कौमी एकता का अवलम्बन लेकर ही देश प्रगति के रथ को समृद्धि के स्वर्ण शिखर तक पहुंचाने में सफल होगा।

हमारी कौमी एकता : 49 सघशक्ति कलियुगे श्री प्रकाशवीर शास्त्री सभाओं में अपना प्रिय भजन गाया करते थे--- 'इन अछूतों को ओ हिन्द लगाले गले वर्ना ये लाल गरों के घर जायेंगे ये हैं अनमोल मोती बिखर जायेगे' इन विखरते हुए अनमोल मोतियों को सहेजना होगा। तभी हमारा और हमारे पावनदेश का गौरव सुरक्षित रह सकता है। भारत संस्कृति, धर्मों, जातियों का महासागर है। भारत विभिन्न धर्मों व सस्कृतियो का विश्व विद्यालय है। आज का भारतीय न हिन्दू है, न मुसलमान, न सिख, न पारसी, न वौद्ध, न हरिजन, न ब्राह्मण । आज का नागरिक केवल भारतीय है, हिन्दू है। मार हिन्दू ही है। आज तक अनेकों जातियों का आगमन हुआ है, औष्ट्रिक, आग्नेय, नीग्रो, द्रविड, आर्य, शक, हूण, मंगोल, मुगल, अंग्रेज । आज का भारतीय इन सबका समन्वित रूप है। अत. आधुनिक भारतीय विश्वमानव का स्वरूप है। वैसे आज भारत जितना एक है उतना पिछले आठ सौ वर्षों में नहीं रहा। आज सम्पूर्ण भारत (सिक्किम सहित) शौर्य, शान्ति, समृद्धि, गति के प्रतीक तिरगे ध्वज के नीचे है । गत तीन युद्धों में भारत ने अपनी कौमी एकता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत क्योंकि भारत किया है। कौमी एकता, धार्मिक महिष्णुता, भ्रातृत्व भाव के बीज बहुत गहरे है हमारी भारतीय संस्कृति में, जहाँ नीग्रो देवता शिव आर्यों के आराध्य बनते हैं। विश्वामित्र क्षत्रिय होते हुए ऋपि का पद प्राप्त करते हैं । अश्वपति ककय और जनक वेदज्ञ ऋपि याज्ञवल्क्य को ज्ञान प्रदान करते है। शबरी के बेर राम खाते हैं। वानर राजा सुग्रीव आर्य राजा राम की सहायता करते है। राम निषाद और केवट का आतिथ्य ग्रहण करते है। जहां राजरानी प्रेम दिवानी मीरां सन्त रदास की अभ्यर्थना करती है । मुस्लिम कवि 'क्या क्या कहूँ मैं कृष्ण कन्हैया का बालपन'कह जीवनभर रीझे रहे । रसखान लकुटी और कामरिया पर तीनों लोकों का राज्य न्यौछावर करने को तत्पर । नसीर, दीनदरवेश मुसलमान कवियों ने कहा- हिन्दू कहें कि हम बड़े मुमलमान कहें हम्म एक मूंग दो फाड़ है कुण्ण ज्यादा कुण कम्म कुण ज्यादा कुण कम्म कभी करना नहिं कजिया एके का है नाम दूना रहनमा सिरजिया। ना जाने कितनी सस्कृतियो को धारायें विभिन्न दिशाओं से आकर इस महा 50 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ । सागर में विलीन हो गई, अपनी समस्त विशेषताओ को अक्षुण्य रनते हुए । यह इस राष्ट्र की ही विशेषता है, जिसके सविधान में हर मम्प्रदाय को फलने, फूलने व विकसित होने के अवसर प्रदान किये गये हैं। जहां केवल साध्य को महत्व दिया है। साधन या मार्ग आप कोई भी निर्धारित करें। ब्राह्म मुहूर्त में मन्दिरो में घटा-घड़ियालो के घोष के बीच नीलाकाश की ओर वर्तुंलाकार मे उठता सुगन्धित धूम्र । गुरुद्वारे में गुरुग्रन्थ साहब का पाठ, मस्जिद मे होती अजान । गिरजाघर मे सलीव के सामने जलती मोमवती, जनों का प्रतिकमण, बौद्धों का धर्मचक्र प्रवर्तन । सम्पूर्ण विश्व के धर्मों का समाहारित सस्करण भारत । रात्रि को रामचरितमानस का पाठ, मीलाद शरीफ, गिरजाघरों में होती प्रार्थनायें । सूर्य को जल चढ़ाता पण्डित, नमाज पढता मुसलमान, संगत के जूते पौंछती सरदारनी। गौड ब्लैस मी प्रेयर करता पौटर, उत्तराध्ययन करते जैन मुनि, तो विनय पिटक का अध्ययन करते बौद्ध भिक्षु । जहाँ बशीर अहमद मयूख हिन्दी में वेदों का पद्यात्मक अनुवाद करते है । चमन लाल शर्मा अरवी का अध्ययन करते हैं। तो जहूर हुसैन संस्कृत में पी०एच- डी० करता है । कौन कहता है कि देश में कौमी एकता का अभाव है ? आज दक्षिण भारतीय गोपालन् नैयर जम्मू कशमीर में काम करता है । तो हिमाचल प्रदेश का प्रभुलाल केरल मे काम करता है। सरदार गुरवचन सिंह सकीना की अस्मत वचाने के लिए जान की बाजी लगा देता है। धर्म, प्रान्त, जाति को तग दीवारो से भारत ने बाहर निकलना प्रारम्भ कर दिया है । आज भारत भावनात्मक रूप से एक है । तो फिर कौमी एकता की आवाज इतने जोर- शोर से क्यों उभर रही है। क्या आग को लपटों मे मुरादाबाद, सम्भल, मुजफ्फर नगर, बरेली, लखनऊ, बेहमई, देहुली, साढूपुर के काण्ड ने हमारी कौमी एकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। यह आगजनी, लूटपाट, नरमहार मानव मात्र को उद्वेलित ही नहीं करता अपितु एक प्रश्न का उत्तर पाने को विवश करता है । क्या हम धीरे-धीरे पशु बनते जा रहे हैं ? कहां से आ गई हमारे अन्दर वर्वरता, क्रूरता, वहशीपन, दरिन्दगी। लेकिन कुछ प्रश्न फिर उठते हैं। मुरादाबाद आदि का काण्ड कौमी एकता के अभाव के कारण था या अन्य किसी कारण से ? देहुली,बेहमई, साढूपुर का नर सहार जातीय विद्वेष के कारण था या व्यक्तिगत कारणों से। गहराई में जाये तो कौमी एकता का अभाव किसी भी काण्ड का कारण नहीं था । अपितु उसके कारण अन्य ही थे। क्योकि यदि कौमी एकता का अभाव होता तो आज क्यों हिन्दू व्यापारियो के यहां मुसलमान शिल्पी काम करते । क्यों आज मुस्लिम होटलो पर सभी धर्मों के लोग चाय पीते । रहमान क्यो दशहरे के लिए रावण बनाता। क्यो नमाज भाषा - हमारी कौमी एकता : 51 पढते, नमाजियो को वर्षा आने पर जुगलकिशोर क्यो अपने बरामदे में विठाता। क्यो आज अलीगढ के तालो और तामचीनी के कारखानों में हिन्दू मुसलमान साथ- साथ काम करते और फिफ्टी-फिफ्टी कर चाय पोते । आज भी ईद पर बशीर चाचा के यहाँ से मीरनी आती है और क्यों होली पर इमाम डफ़ पर होली गाते- गाते झूम उठता है। तो मुहर्रम के जुलूम मे राम खिलाडी ढोल वजाते पमीने से तर हो जाता है। आखिर आज ये जहर कहां से आ गया कि आदमी शैतानियत की हदो को पार कर हैवानियत को चरममीमा पर पहुंच गया है, इसका कारण कही दूर है। आज संघर्ष सामाजिक कम आर्थिक अधिक है उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाव ही विशेतः इन समस्यओं से ग्रस्त क्यो है ? इसका कारण उत्तर प्रदेश और बिहार में बढ़ती आवादी, घटती जमीन, घटते साधन, बढ़ता भ्रष्टाचार, बेकारी, कम मजदूरी अधिक लाभ की प्रवृत्ति है । आज तोहर गांव की स्थिति यह है, कि नया घर केवल खेत मे बन सकता है । लेखक ने मुरादाबाद, अलीगढ़ का व्यक्तिगत रूप से दौरा किया है। इन दंगों का कारण कौमी एकता का अभाव नही अपितु गद्दारी है। कुछ सिरफिरों द्वारा पैसा लेकर अपनी सुख-सुविधाओं के लिए देश की अखण्डता और एकता को दांव पर लगाने की असफल साजिश है । अन्यथा मुरादाबाद में जिस सूअर के कारण दंगा हुआ उस सूअर को किसी ने नहीं देखा। दूसरा कारण राजनीति का निम्नतम स्तर पर उतर जाना है। जब एक उत्तरदायो पद पर प्रतिष्ठित व्यक्ति जाति, सम्प्रदाय, भापा के तग दायरों से बाहर निकलकर सम्पूर्ण देश के कल्याण की बात नहीं सोच पाता । अपने स्वार्थ साधन के लिए सिर कटाने, खून बहाने और घर जलाने से भी नहीं चूकता । उसको यह विचारहीनता भयंकर रूप से हानिकारक हो जाती है । मुझे सन् 1947 याद आता है। मेरे गांव मे धोबी, तेली, लुहार और फकीर मुमलमानों के केवल छ. घर है । हिन्दुओं के परिवार उनके लिए ढाल थे। मिनाजी कभी-कभी मजाक में कहते, "भैया खंराती, पाकिस्तान कब जा रहे हो?" -पण्डितजी आपका खैरातो तो केवल एक हिन्दुस्तान जानता है। ये गांव मुझे रोजी-रोटी दे रहा है । तो मेरा तो पाक-पवित्रस्थान-स्थान यही है । -अरे अपने भाइयों में जाकर रहो। ----पण्डितजी भाई न धर्म से, न जाति, न मां के पेट से पैदा होता है। भाई होता है, प्रेम से, त्याग से, महसूसात मे। छोटे-छोटे आदमी कभी-कभी कितनी बडी वात कह देते है। क्या हिन्दू क्या मुमलमा हम सब है भाई भाई प्यार बांटते चलो दुलार बांटते चलो।

निबंध राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में शिक्षक की भूमिका सोमनाथ शर्मा स्वातन्त्र्योत्तर भारत को अभावों में जिन प्रमुग आयामों में गुजरना पड़ रहा है उनमे राष्ट्रीय एकता की समस्या गर्वाधिक महत्वपूर्ण है। प्रश्न उपना है-- राष्ट्रीय एकता क्या है ? तथा उराको अग्रण्डता य अशुप्णता गे लिए उत्तरदायी कौन है ? राष्ट्रीय एकता से तात्पर्य राष्ट्र की स्यतया, राम्प्रभुता य एकता की सुदना से है । देश का प्रत्येक नागरिक आपसी भेदभाय य अगमानता की परिधि से पृथक यह अनुभव करे कि भारत उसका देश है, तथा देश की उन्नति का भार उसके कंधों पर है, सभी मिलकर उसे बनाये रग्रने में सहयोग दें, यह राष्ट्रीय एकता की कमौटी है। भारत एक विशाल देश है। बड़े क्षेत्रफल वाले इस देश की जनसंख्या सग- भग 68 करोड़ है। यह शम्य-श्यामला भूमि अपने अंक में विभिन्न धर्म, जाति, वर्ग व भापा-मापी गम्प्रदायों को समेटे हुए है। निश्चय ही ऐसी प्रतिकूल परि- स्थितियो मे उनमे एकता बनाये रखना दुष्कर है। फिर भी हमारे सविधान की यह सबसे बड़ी विशेषता रही है कि यहाँ अनेकता में एकता है । अर्थात हमारा घमं, जाति या आवास देश के किमी भी कोने में रहा हो, हम सब मिलकर भारत के नागरिक कहलाते है। यही राष्ट्रीय एकता की विचार शृंखला है। यदि हम अपने प्राचीन इतिहास का अध्ययन व अवलोकन करें तो ज्ञात होगा कि एकता के अभाव में राजपूत काल व मध्यकाल में देश को अमफलता के किन सोपानों से गुजरना पड़ा या राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान राष्ट्रीय एकता ने देश को कैसे प्रभावित किया, आदि आदि । आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो राष्ट्रीय एकता एक विचार-धारा है, देश के प्रति समर्पण की एक विशाल जन-भावना है, जिसमें देश-प्रेम व सम्मान के भाव महसूस होते हैं। अंग्रेजो ने "फूट डालो व राज्य करो" को नीति से देश को एकता को छिन्न-भिन्न कर दिया। जिसका परिणाम हडताल, दगे, तोडफोड राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में शिक्षक की भूमिका : 53 व क्रान्ति के रूप मे आज हमारे सामने है। भ्रष्टाचार ताइव कर रहा है। क्षेत्र- वाद, जातिवाद व भाषावाद के नाम पर अनेक आन्दोलन हुए, जिनमे धन व जन को अपार क्षति के साथ नैतिकता व आदर्शवाद का ह्रास भी हुआ है। हमारा देश भारत, हमारी जननी जन्मभूमि इस क्रूर अट्टहास के बीच पुकार रही है, किसी ऐसे राष्ट्रनिर्माता को, जो उसे इन परिस्थितियों से उबार सके।...और तब गामने आता है शिक्षक...एक फरिश्ता व राष्ट्र सुधारक के रूप में। अब देखना यह है कि राष्ट्रीयता या राष्ट्रीय एकता के निर्माण में शिक्षक अपनी क्या भूमिका अदा करता है। उत्तर के रूप में शिक्षक के दो पहलू हमारे सामने आते हैं। एक ओर वह जही देश को भावी पीढी का निर्माता है, वहीं दूसरी और समाज के लोगों में राष्ट्र-प्रेम के भाव भी जागृत करता है। प्राचीन काल से आज तक शिक्षक की प्रतिष्ठा वसुधा के कण-कण में व्याप्त है। चाहे वह कन्फ्युशियस का पुत्र हो, अरस्तु या मुकरात का। गुरु ने सदैव सच्चे मन से अपने शिष्यों को ज्ञानामृत का पान कराया है। जहाँ तलसी ने शिक्षक की महत्ता को स्वीकार करते-- "जे गुरु चरण रेणु सिर धरही, ते जन सकल विसव यस करही।" सराहा है, वहीं कबीर ने "बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दिया बताय।" कहकर अपने तानपूरे पर गुरु का पलड़ा भारी वताया है और "गुरुब्रह्मा, गुरुविष्णु गुरुर्देवो महेश्वरे" ने तो गुरु की महत्ता को चरम शिखर पर पहुंचा दिया है। भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ० राधाकृष्णन् को भी आज के शिक्षक वर्ग से कुछ ऐसी ही अपेक्षा थी। उन्होंने शिक्षक को उस उच्चासन पर बैठाया, जो कई पीढ़ियों का भविष्य-निर्माता कहलाया। उनके शब्दो मे-"एक इजीनियर की भूल नक्शे मे गुम हो जाती है, कारीगर की भूल दीवारों में चिन दी जाती है, वकील की भूल फाइलों में दव जाती है लेकिन अध्यापक की भूल एक नही, आगे आने वाली अनेक पीढ़ियों को पतन के गर्त में ढकेल देती है।" कितना ऊंचा आदर्श है शिक्षक का और कितना महान गौरव । शिक्षक जितना भावी पीढी का निर्माता है, राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने में उतना ही सक्षम भी। अत: अनादि काल से अध्यापक की समाज में प्रतिष्ठा रही है और उसके पवित्र कर्म का गौरवशाली इतिहास आज भी उसके गुणों का बखान कर रहा है । उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट है कि शिक्षक समाज का महत्वपूर्ण अंग है और राष्ट्र-निर्माता भी । यदि वह छात्रों में एकता व राष्ट्रीयता के बीज अकुरित करे तो निश्चय ही आगे आने वाली पीढ़ी राष्ट्रीय प्रेम के भावों से ओतप्रोत होगी।

34 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ शिक्षक वह कड़ी है, जो छात्रों में आपसी प्रेम, स्नेह, दया व सहानुभूति के मंस्कार कायम करता है । ममाज का अग होने के नाते उसका यह भी दायित्व है कि वह एक ऐसी नस्ल तैयार करे, जिसमें राष्ट्रीय एकता की भावना कूट-कूट कर भरी अध्यापक को चाहिए कि अपने इसी स्वरूप को चिरस्थायी रखने के लिए आज की उत्तेजित पीढी को स्नेह व प्रेम का मार्ग बताये। विद्यालय में नैतिक शिक्षा के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की ज्ञानवर्धक बातें बतायी जाये जिससे छात्रों का सर्वांगीण विकास सम्भव हो सके। राष्ट्रीय एकता कायम करने के लिए एन० सी० सी० तथा स्काउट, ए० सी० सी० जैसी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दें ताकि छात्री को देश-प्रेम व राष्ट्र- रक्षा का महत्व ज्ञात हो सके । शनिवारीय कार्यत्रम व अन्य उत्सवों पर शहीदो के वलिदान का स्मरण करायें व उन्हें भी ऐसे कार्य करने को प्रेरित करें। ऐसी कहा. नियाँ, गीत व सस्मरण उन्हें सुनायें, जिससे उनमे एकता व देश-प्रेम की भावना का मचार हो। उसन स्वय भी राष्ट्रीय-ध्वज व राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान की भावना होनी चाहिए, जिसे वह छात्रों को दे सकें। शिक्षक स्वय ऐसी एकता कायम करें जिससे हर आगे आने वाली पीढ़ी इसे पिछली पीढ़ी से बेहतर अपना सके और अपनी आने वाली पीढ़ी को इससे अधिक दे सके। काल व स्थान के नियामकों के रूप में अध्यापक की सही भूमिका यही है। अध्यापक को यह भी ज्ञात करना चाहिए कि उसके बताये मार्ग का छात्रों ने कहां तक अनुसरण किया है, कितना अजित किया है तथा उनमे राष्ट्रीय एकता की भावना का कहां तक विकास हो पाया है। विद्यालय के अहाते से निकलने के बाद शिक्षक का सम्पर्क समाज से भी होता है । अतः उसका यह भी दायित्व हो जाता है कि वह समाज व आस-पास के लोगो में भी राष्ट्रीय एकता व राष्ट्र प्रेम के भाव जागृत करें। जब देश मे किसी प्रकार का संकट हो या युद्ध के बादल मंडरा रहे हो, तव शिक्षक ही तन-मन-धन से राष्ट्र- सेवा कर सकता है तथा अन्य को भी इस ओर प्रेरित कर सकता है। उसे चाहिए कि गांव-गांव में जाकर एकता की भावना फैलायें, देशवासियो को राष्ट्र की समस्या से अवगत करायें, व उन्हें एकजुट होकर देश की रक्षा करने को प्रोत्साहित करें। शिक्षक स्वयं अपने नैतिक कर्तव्यों का निर्वाह कर आगे आने वाली पीढी को इस लायक बना सकें कि समय पड़ने पर वे अपनी अभूतपूर्व एकता व अखंडता का परिचय देने से न चूकें। पद-प्रतिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठता और प्रत्युत्पन्नमति से अहम् के अलगाव की यह विशृखलता शिक्षक के दायित्व का बोध कराती है।

राष्ट्रीय एकता के मदर्भ में शिक्षक की भूमिका 55 निष्कर्पत. आज का समाज शिक्षक से कई अपेक्षाएं रखता है। अपने व्यक्तित्व की तलाश के बीच उसे छात्रों के भविष्य को मद्देनजर रखते हुए व्यवसाय के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि समाज-मुधार व राष्ट्र-सेवा को लक्ष्य बनाकर निःस्वार्थ भाव से कार्यरत रहना चाहिए। इग प्रकार सामाजिक दायित्व को वहन कर देश में एवाता की भावधारा प्रवाहित करना ही उमको महान उपलब्धि होगी, इमने मन्देह नहीं ।

निबंध "ममायत्ते तु पौरुषम्-पौरुष के प्रतीक ये विकलांग गौरीशंकर आयं । इसमे सदेह नहीं कि वैदिक काल के मनीपी ने जब शतायु प्राप्त करने की कामना ईश्वर से की थी तो उसका ध्यान जीवन को स्वस्य प्रक्रिया पर अवश्य था। केवल जी लेना ही उमको कामना का उद्देश्य रहा होता तो 'जीवेम शरदः शतम्' के पूर्व 'पश्येम शरद शतम्' वह कभी नहीं कहना। निश्चय ही मात्र जीने के स्थान पर सम्पूर्ण आयु तक भली प्रकार देखते रहने की बात का मूल्य उसके सामने अधिक था। ससार में आकर ससार के रचयिता की रचना का दर्शन न हो सका तो ससार मे आना-न-आना बरावर ही है। माता के गर्भ की अंधियारी और जन्म के पश्चात् अंधेरे ससार में तब क्या अन्तर है। वैदिक ऋपि ने प्रार्थना के मध्य में 'शतमदीना' कहकर समस्त प्रापित जीवन प्ररिया के प्रति वरदायिनी महाशक्ति का ध्यान पुन. आकर्षित करने की चेष्टा की है। हम दीन बनकर न रहें । हे प्रभो, वरदान मिले तो इसी शर्त पर। और अन्त में नतमस्तक उस प्रार्थी ने उपसहार इन शब्दों में किया-भूयश्च शरदः शतात् । ससार के कल्याण के लिए यदि आगे भी आयु बढ़ सके तो वह 'अदीन' होकर ही। प्रश्न उठता है-ऐसी वात क्या थी कि उस ऋषि ने सौ वर्ष देखने की कामना जीने की इच्छा से पहले व्यक्त की? क्या उसे नेत्र ज्योति का महत्व जीवन के मूल्य से अधिक ज्ञात हो गया था। क्या अंधता के कारण कप्टों का अनुभव स्वय उसे था? अथवा किसी अध प्राणी के कप्टो को देखकर उसका नवनीत समान हृदय करुणा से द्रवित हो गया था? कोई कारण अवश्य ही रहा होगा। इस आधार पर इस सत्य का सहज आभास हो जाता है कि अंधता कम-से-कम वैदिक काल से अवश्य है और लगे हाथ यह भी स्वीकार करना ही होगा कि यह रोग उस समय भी असाध्य नही तो दुमाध्य तो अवश्य ही रहा होगा। महाभारत के अग्रगण्य सम्राट धृतराष्ट्र इसके प्रमाण हैं। उनकी अंधता असाध्य ही थी अन्यथा धन और साधन की कोई कमी उनके पास नही थी।

..'ममायत्ते तु पौरुपम्-पौरुष के प्रतीक ये विकलांग . 57 कितना अन्तपीड़ित मानस रहा होगा उस पराक्रमी चक्रवर्ती महाराज का। सुस्वादु व्यंजनों का आनन्द पाकर, सुरभित सुमनो की गध ग्रहण कर उनको देखने की कितनी बलवती इच्छा जन्म लेकर मर जाती होगी उस निर्वाक मन में ! प्रणयरता प्रिया का कोमल स्पर्श कर उसके सुन्दर मुख को देखने की उत्कण्ठा किस प्राण में नहीं होती! रूप का आधार और महत्व दर्शन ही तो है। पुत्र-जन्म पर अपने आत्मज को अक से लगाते समय उसके मुख को देखने की लालसा क्या रोकी जा सकती है ? नरपुगव धृतराष्ट्र इन सब कामनाओं को विवशता के नीचे नि शब्द दवाते जी रहे थे। और धन्य थी वह भारतीय नारी जिसने अपने स्वामी के अनकहे कप्टों का अनुमान करके पतिव्रत धर्म की वेदी पर अपने नेत्रो को भी पट्टी बाँधकर अधता की सज्ञा दे दी। कितना महान त्याग और समर्पण था उस महादेवी गान्धारी का। नेत्र मचमुच ही जीवन की महानतम उपलब्धि है। विश्व का सारा साहित्य नीरस हो गया होता यदि उनमें नेत्रों की रसिकता का रस नहीं मिला होता। महाकवियो ने नेत्रो को कमल की जो उपमा दी है उसमे सौन्दर्य और कोमलता, रंग, रूप, आकार आदि लो ममान धर्म है ही किन्तु एक बात और भी ध्यान देने योग्य है। जीवन और मृत्यु इन दोनो के सूक्ष्म आवर्तित सकेत दिन और रात हैं। कमल सूर्योदय (जन्म) के समय खिलकर मूर्यास्त (मृत्यु) तक खिला रहता है। उन महान वाणीपुरो ने भी प्रच्छन्न रूप से इस उपमा म यही भावना प्रकट की है कि जन्म से मृत्यु तक नेत्र-कमल खिले रहे। युग-पर-युग बीतते चले गये। यह नेत्रहीनता अभाव और अज्ञान के सहारे अपना अंधेरा माम्राज्य संसार के समस्त भागो पर फैलाती कलियुग तक चली आयी। सुरों को भी स्पृहणीय मानव शरीर की सुदरतम रचना नेत्रों को उसने नष्ट कर दिया । स्वनामधन्या महादेवी वर्मा ने सत्य ही तो कहा है कि स्वर्ग की उत्तुग ऊँचाई के पांवों से नरक की अतल गहराई बँधी रहती है । किंतु पता नहीं कब किसी एकलव्य की लगन ने महारथी कर्ण के प्रखर शब्दों को मूक स्वरों में दोहरा दिया--"देवायत्ते कुले जन्म ममायत्ते तु पौरपम्" । और दमन की पीड़ा से व्यथित ज्योतिहीनता ने अंधता के विशाल साम्राज्य को चुनौती दे दी । यह चुनौती उस वैदिक ऋषि की प्रार्थना की भी थी जिसने दर्शन, भापण और श्रवण शक्ति के प्रभावों से घबराकर उस ईश्वरीय महा- शक्ति को 'कल्याणकारी' चक्षु बताते हुए अतनिहित ठकुरसुहाती के स्वर में कहा था-"तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुफ्रमुच्चरत"। और 'अदीना' की याचना में अपनी विवशता तथा असमर्थता प्रकट कर दी थी। लगता है विज्ञान का बल पाते ही नेत्रहीन, बधिर और मूक मानवों ने दीनता को स्वीकार करने से माफ इंकार कर दिया है। अमरीका के अल्बामा राज्य में तस्कम्बिया एक गांव है। इसी गांव के निवासी 58 कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएँ एक प्रमुख दैनिक पत्र के संपादक कैप्टन आर्थर के घर मे सन् 1880 को 27 जून को एक कन्या ने जन्म लिया। बडी हृष्ट-पुष्ट और सुदर थी वह बच्ची हेलेन । अभी वह घुटनो के बल पर ही रेंगती थी कि एक तीव्र ज्वर ने उसकी नेव-ज्योति और श्रवण-शविन दोनो को उससे छीन लिया। बालिका हेलेन बधिर भी हो गयी। केवल गध्र का ही वह अनुभव कर सकती थी । सात वर्ष बीत गये । 18 मार्च सन् 1887 के दिन एक युवती अध्यापिका कुमारी एनी मैन्सफील्ड सुलिवान ने हेलेन के लिए 'दीनता' से मुक्ति के द्वार खोल दिये। उसने हैलेन की हथेली पर धीरे-धीरे D-O-L-L शब्द वार-बार लिखा और फिर एक गुड़िया उसके हाथो मे थमा दी। दूमरे दिन W-A-T-E-R लिकर उसके हाथ पर ठंडे पानी की धार डाल दी। हेलेन के बजर मन की धरती पर अकुर फूटे-~-यह WATER है। पानी द्रव है। पानी ठडा होता है। बस यही से उसको जिज्ञासा ने जन्म लिया और उसने धरती को छूकर प्रश्न भरी आँखों से जो अंधी थी, अध्यापिका की ओर देखा। कुमारी सुलिवान ने फौरन उसकी हथेली पर लिया~E-A-R-T-HI और इसके बाद दीनता का अर्थ हेलेन के लिए निरर्थक हो गया। बीस वर्षीया हेलेन, नेत्रहीन हेलेन ने रेडक्लिफ कॉलेज में प्रवेश लिया जहां से उसने स्नातक होकर ही विश्राम नहीं किया वरन् टेम्पल और हारवर्ड विश्वविद्यालयो मे शोधकार्य करके डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। इसके उपरात हेलेन ने अपनी जीवनी 'द स्टोरी ऑफ माइ लाइफ' लिखी जिसका अनुवाद विश्व को 60 भाषाओं में हुआ । हेलेन ने और भी कई उल्लेखनीय ग्रथ लिखे। उसके सामर्थ्य और अध्यवसाय का सम्मान करते हुए हेलेन को सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार "प्रेसिडेंशियल मैडल ऑर फोडम" प्रदान किया गया। प्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान मार्कट्वेन ने हेलेन की तुलना नेपोलियन बोनापार्ट से करते हुए लिखा है- There are two most interesting characters in the Nineteenth Century, Nepolion Bonapart and Miss Hellen Adom's Keller. (Hellen Keller Commemoration issue 1975. National Federation of the Blind, DELHI) केवल विदेशी नेत्रहीन ही इस सामथ्र्य और चुनौती के धनी हों ऐमा नहीं है । मध्य प्रदेश के एक छोटे-से कस्बे में एक मिडिल स्कूल के प्रधानाध्यापक के घर में अपने नाम को सार्थकता देती हुई एक बालिका ऊपा ने जन्म लिया। जीवन का अठारहवां माह चल ही रहा था कि ट्रेकोमा रोग से ऊपा भालेराव के नेत्र ज्योति- हीन हो गये। ऊपा का उदय और संमार अंधेरा। विनित्र विरोधाभास था। शिशुता ने बाल्यकाल का परिधान पहना। सनेत्रों के सामान्य विद्यालय में जब शिक्षा के लिए कुमारी ऊपा ने प्रवेश लिया तब तक उनके पिता माधव कॉलेज, - "ममायते तु पौरुषम्-पौरुष के प्रतीक ये विकलांग : 59 । उज्जैन में अंग्रेजी के प्रोफेसर होकर आ गये थे। नेत्रहीन ऊपा नेत्रवान छात्रों के समान प्रगति एकदम तो कैसे कर सकती थी। योझकर या गर्वोक्ति मे उपा भालेराव को अपने नये प्रधानाध्यापक ने कटु शब्द कह दिये कि उनका स्कूल अधी के लिए नहीं है। और एक वेदना को लेकर कुमारी भालेराव घर लौट आमी । चिन्तु ऊपा के मन में बैठा एकलव्य कब हार मानने वाला था। उन्होंने संगीत को कक्षा में प्रवेश लिया और उसमें स्नातिका बन गयी। फिर भी मामान्य शिक्षा की प्यास से उनका मानस तडप रहा था। सयोग से एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कुमारी ऊपा को मेल लिपि मीखने की प्रेरणा दी। किन्तु सिखाता कौन । उज्जैन मे उम समय तक ग्रेग लिपि का जानकार कोई नहीं था। फलत बम्बई से ग्रेल लिपि की एक पुस्तक "A Valley grows up" मगवाई गयी और बड़ी कठिनाइयों से जूझते अपने पिताश्री के सहारे 1967 में कुमारी ऊपा ने हायर सेकेण्डी परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद स्वनामधन्या कुमारी ममता नन्दी प्राचार्या बालिका महाविद्यालय, उज्जैन में कुमारी भालेराव को ममता और मार्ग- दर्शन दोनो एक साथ प्राप्त हुए और उन्होंने प्रशसनीय अको के माथ बी०ए० पास किया। इस पर मध्य प्रदेश नेत्रहीन सघ की ओर से, तत्कालीन उप राष्ट्रपति श्री गोपालस्वरूप पाठक की धर्मपत्नी श्रीमती प्रकाशवती पाठक के द्वारा ऊपा भालेराव को स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। इसके पश्चात कुमारी ऊपा ने संगीत और समाजशास्त्र में 'एम० ए० किया। नेत्रहीनों की दशा का अनुभव कुमारी ऊपा को हो चुका था। उन्होंने उनके लिए संगीत और उद्योग-शिक्षण का केन्द्र स्थापित किया। कुमारी भालेराव के साहस और परिश्रम के साथ प्रगति की ख्याति चारो ओर फैल चुकी थी और एक दिन उनको यह सूचना प्राप्त कर आश्चर्य हुआ कि-'नेत्रहीन महिलाओ की स्थिति' पर 18 से 20 नवम्बर (1975) तक होने वाली प्रथम ऐतिहासिक अतर्राष्ट्रीय कान्फ्रेंस मे भारतीय प्रतिनिधि के रूप में उन्हें बेलग्रेड (युगोस्लाविया) के लिए बिना किसी सहायक (एस्कोर्ट) के यात्रा करनी है। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री प्रकाशचन्द्र सेठी और नगर निगम उज्जैन ने सार्वजनिक समारोह मे कुमारी भालेराव को क्रमशः 4000१0 और 1000 रु० के चक भेंट किये। इससे उनकी मार्ग व्यय की कठिनाई दूर हो गई । 27 नवम्बर को स्वदेश लौटने पर टेलिविजन पर कुमारी ऊपा ने अपना इंटरव्यू दिया और समाज कल्याण सगठन तथा पंचा- यत मत्री मध्यप्रदेश द्वारा उन्हे रजत पदक प्रदान किया गया। इतनी उपलब्धियों के बीच भी एक अभिलापा कुमारी भालेराव के मन में और थी। और वह तब पूरी हुई जब उन्होंने अपना शोध प्रबंध--"ए सोश्योलॉजीकल स्टडी ऑव द ब्लाइंड इन मेजर अरवन सेंटर्स ऑव मध्यप्रदेश" लिखकर विक्रम विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ० शिवमंगल सिंह 'सुमन' के करकमलो से 11 जुलाई, 1976 60 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ को पी-एच. डी० की उपाधि प्राप्त की। डॉ. ऊपा ने सचमुच यह सिद्ध कर दिया कि, उनके गुरुजी का कहना सत्य था कि "उनका स्कूल (उन जैसे) अधों के लिए नहीं है।" [Personal Experiences as Recalled by Dr. Usha. NASEOH-- January, 77 Volume VII No. 1 BOMBAY] आज देश में कई प्रसिद्ध सस्थान है जहाँ अधता के अभिशाप से जमकर लडाई लड़ी जाती है । जहाँ से दोनता दुम दबाकर भाग खड़ी होती है । तमिलनाडु के त्रिचनापल्ली का---'विशप देहल रिहेविलिटेशन होम फॉर दि दलाइड' इम दृष्टि से प्रसिद्ध केन्द्र है, जहाँ अधजीवन की समस्त वाधाओं को ठोकर मारकर कई नेत्रहीन कपडा बुनना, फर्नीचर बनाना, साइकिल सुधारना आदि अनेक कार्य करके स्वाभिमानी जीवन जी रहे हैं। पेन्नादम निवामी मूथूस्वामी मशीन पर कपड़े सीने में दक्ष है तो तिरुमगलम् से आया हुआ युवक एस० शिवाजी "इलेक्ट्रिक वेट राइस ग्राइंडर" मशीन पर बखूवी काम करके अपने पूरे परिवार का पोषण करता है। 51, महात्मा गाधी रोड, फोर्ट, बम्बई-1 स्थित सस्था 'नेत्रहीन अतर्राष्ट्रीय मम' तो नेत्रहीनता को निरर्थक और नगण्य बना देने के लिए मानो ताल ठोक कर खड़ी हो गयी है। यहां प्रशिक्षक के निर्देशन में अध प्रशिक्षणार्थी ऊंचे झूले पर व्यायाम सीखते है, मशीनी हर गनी बेग बनाते है, बिजली की आरी से लकड़ी चीरते है, विजली से चलने वाली टनिंग लेथ (खराद मशीन) चलाते है, पेंडुलम पास पट मशीन से बडे-बड़े तस्ते काटते है और पकिंग करते है। इस सस्था के लाइट इंजीनियरिंग सेक्शन में विजली को आधुनिक मशीनों पर फुर्ती से काम करते हुए नेत्रहीनो को देखकर नेत्रवान व्यक्ति लग्जा से आखें शुकाकर दोनो तले उंगली दया लेते हैं । टेलिफोन कम्पनी, मेडिकल कम्पनी, इडस्ट्रियल ट्रेक्टर कम्पनी, रेलवे विभाग और टेक्सटाइल मिल्स आदिकई मस्थाओं से विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए इस मप को आईर मिलते हैं जिनकी पूर्ति अनगिनत नेत्रहीत परफे जन-जन को मंतोष देते हैं। भारत की एकमात्र गुलाबी नगरी जिसे कमरिया राजस्थान की राजधानी होने का मौभाग्य मिला है उस जयपुर ने भी नेत्रहीनों के प्रति बहुत कुछ किया है। प्रमाचा स्वामी शरणानन्दजी की प्रेरणा से 15 अगस्न सन् 1967 के पावन पदं पर "राजम्यान नेत्रहीन कल्याण मप" को स्थापना यहाँ हुई थी। 1016 नवर के भवन में नादाणियों के रास्ते पर यह संस्था घस रही है प्रिमी वाय- ""ममायत्ते तु पौरुषम्--पौरुप के प्रतीक ये विकलाग 61 कारिणी के अध्यक्ष प्रांत के प्रसिद्ध जोहरी और वयोवृद्ध देश-सेवी श्री राजरूपजी टाक है । इस सस्था में विशेषत: तीन प्रवृत्तियां गतिमान हैं - ब्रेल लिपि में शिक्षा विभाग के द्वारा मान्य पाठयक्रम से शिक्षण, सगीत और कुतियों की सीटों की बुनाई-रीनिंग (उद्योग) का प्रशिक्षण | नेत्रदान अभियान भी एक प्रवृत्ति है। न केवल राजस्थान अपितु उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के नेत्रहीन जन भी इस संस्था के सरक्षण में लिखना, पढना और उद्योग मीखकर निरर्थक जीवन को सार्थक रूप मे जीते हैं। अब तक लगभग 119 नेत्रहीनो को रोकेनिंग जीविको. पार्जन के लिए और संगीत सामाजिक सम्मान तथा मनोरजन के लिए सिखाकर यह संस्था यश प्राप्त कर सकी है। ब्रेललिपि के नेत्रहीन अध्यापक श्री गौरीदत्त शर्मा एम० ए० (संस्कृत), आचार्य तथा बी० एड० है। सितार के प्रसिद्ध वादक और आकाशवाणी कलाकार श्री राधेश्याम शर्मा प्रज्ञाचक्षु इस संस्था के संगीत अध्यापक है । श्री रतनलाल कोठारी रोकेनिंग टीचर और सम्पूर्ण उद्योगशाला के व्यवस्थापक श्री भरोसीलाल जैन दोनो नेत्रहीन है। जयपुर के सरकारी विभागों मे कुसियों की बुनाई के आर्डर प्राप्त करना, कुसियों की बुनाई करवाना सारी व्यवस्था नेत्रहीनता के बावजूद बखूबी करते है। इस संस्था के उपाध्यक्ष श्री नरपतमल जैन स्थानीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में संगीत अध्यापक है । आदर्श यह कि स्वयं नेत्रहीन है तो आपने अपना विवाह भी देहरादून अंध विद्यालय की छात्रा नेत्रहीन कुमारी सुदेश जैन से ही किया। श्रीमती सुदेश अब वही राजकीय बालिका विद्यालय में अध्यापिका है । टाइप फुर्ती मे कर लेती हैं । गैस के चूल्हे पर सुस्वादु भोजन बनाती है, और मजाल कि किसी चपाती पर दाग पड जाये या वह कच्ची रह जाये। इस संस्था से कई नेत्रहीन स्नातक सम्बद्ध है जो वहां के पुस्तकालय में श्रेल- लिपि के उच्च कोटि के साहित्य मे लाभ उठाते है। खलील अहमद 'खलील' बी० एस-सी० करते-करते अपनी आँखें खो बैठे। वहां ग्रेल में 'अ-आ' सीखकर अब अपनी अधूरी शिक्षा को गति दे रहे हैं । सगीत के साधक श्री सचेतन नेत्र- हीनता को 'उह' कहकर दर्शन-शास्त्र में इसी वर्ष यहाँ मे एम० ए० कर रहे हैं। और जो वायलिन के तार छेड वैठे तो बस लोग झूम-झूम उठते हैं । उपेक्षाओं से क्षुब्ध और नेत्रहीनता से संतप्त समाजशास्त्र में एम० ए०, संगीत के आचार्य, स्वयं के साधनों से "अनुराग संगीत शिक्षण केन्द्र" के संचालक श्री अजित जैन मचमुच बाधाओं से अजित सिद्ध हुए। सुन्दर, गौरवणं, आकर्षक मुखाकृति वाले श्री अजित जब गजलें गाते हैं तो श्रोता मत्रमुग्ध हो जाते है । किसी भी गीत को राग का रूप देकर उनकी स्वर- लिपि उमी क्षण तैयार कर देते है। श्री अजित राजस्थान नेपहीन कल्याण संघ की भभा के सम्मान्य सदस्य है । यह सस्था, जहां कही भी नेत्रहीन बालक मिलते हैं ।

62 . कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ . उन्हे अपने खर्च पर यहां लाती है उन्हें नि शुल्क भोजन, आवास, वस्त्र, चिकित्मा आदि सुविधाएँ देकर शिक्षित बनाती है, उद्योग सिखाती है। इस संस्था ने मम्पूर्ण राजस्थान में राजस्थान राज्य परिवहन की बस सर्विस (जहां तक वह जा सकती है) में नि शुल्क यात्रा मुविधा नेत्रहीनो को दिलवायी है । समस्त नेत्रहीनों के सामू- हिक स्वर से राजकीय सेवा में दो प्रतिशत स्थान नेत्रहीनो के लिए सुरक्षित कर दिये गये है। देश में राजस्थान ही पहला प्रांत है जिसने नेत्रहीनों को यह मुविधा दी है। कई नेत्रहीन अव विना सहायक की सहायता के रेलों में सफर कर लेते हैं। अव नेत्रहीनता की विशाल बाधा का क्षेत्र सिमट कर छोटे-से-छोटा होता जा रहा है । यह सब वही स्वर हैं जो कर्ण के मुख से कभी निःसृत हुए थे। आज नौ लाख मुखो से यही ध्वनि आ रही है-"ममायत्तेतु पौरूपम्।" प्रसिद्ध लेखिका सुश्री सावित्री परमार ने जब इस संस्था का अवलोकन किया था तो उन्होंने लिखा-~ "नेत्रहीन बालक-बालिकाओं का यह विद्यालय वास्तव में नियमानुसार चल रहा है। गांवो से आये छात्र-छात्राओं की निवास व्यवस्था यही पर है। बाहरी चक्षु यदि खो गये तो आतरिक चक्षु कितने सजग हो गये है इस ब्रेल लिपि के द्वारा। ये नेत्रहीन गौरव से जीवन यापन करते हैं। किसी का बोझ बनकर नहीं, परित्यक्त बनकर नहीं वरन् हौसले और चुनौती के साथ।...आज प्रत्येक क्षेत्र इन नेत्रहीनो के लिए मुगम हो गया है। प्रत्येक सोये, निराश और हीन हृदय 'मे कर्मठता और स्वाभिमान की भावना भरी है। [अवलोकन और इटरव्यू, सावित्री परमार-1 फरवरी, 76) हे वैदिक ऋषि, अपनी ऋचा में निर्भय होकर परिवर्तन कर दो, अब प्रार्थना में पहले पश्येम शरदः शतम् के स्थान पर साहस के साथ कह दो, जीवेम शरद शतम्।

विचारकण कालजयी श्रीकृष्ण विश्नोई असीम अगोचर अभाषित काल; क्रिया से जुडकर भाषित, परिभापित होता है। काल क्या है ? घटित होना, केवल कुछ होना ही काल का बोध है । हर मनुष्य किंवा प्राणी जीवित रहना चाहता है, केवल जीवित ही नहीं; अमर होना चाहता है, कालजयी बनना चाहता है। परन्तु क्या आज तक कोई कालजयी बन पाया है? काल को जीतने का क्या अर्थ है ? यह समझने की बात है। मान लो कोई मनुष्य 25 वर्ष की आयु में वेहोश हो गया; या पागल हो गया। उसकी वह बेहोशी या पागलपन बीस वर्ष के बाद अचानक एकदम से ठीक हो गयी। अब प्रश्न उठता है कि क्या यह इन वर्षों में जीया? उसकी आयु अब 45 वर्ष मानेंगे या 25 वर्ष? जरा चिन्तन करें; क्या हम बेहोशी या पागलपन में ही तो नहीं जी रहे हैं ? हर चेतनधर्मा मनुष्य अपने से प्रश्न करे कि उसके घटित जीवन में क्या है जिसे वह अपना जीवन, अपना जीना कह सकता है। यदि हम गम्भीरता से सोचें तो पाएंगे कि केवल चन्द घटनाएं, चन्द क्षणों में घटी घटनाएं हैं जिन्हें हम वास्तव में अपना जीवन कह सकते है। हां, खाते-पीते, सोते वर्षों बीत गये और उनमे अपना जीवन केवल चन्द घटनाएं ! अब जरा सोंचे, उन घटनाओ में ऐसा क्या था जिनके कारण हम उन्हें अपना जीवन जीना कह रहे है ? यदि मन को थामकर देखें तो हम पाएंगे कि उन घट- नाओं के घटित होते समय हम केवल हम थे। हम स्वयं घटना बन गये थे या घटना हम से यी। अर्थात् हमने अपने आप को काल के साथ जोड़ दिया था। हम स्वय काल बन गये थे। समय हम से पृथक रहा नहीं था। हम, यह घटना और काल; नीनों एक बन गये थे; बिल्कुल समयाय; सृष्टि पूर्व तीन गुणों की तरह ! इम प्रसग मे चिन्तनीय बिन्दु यह है कि यदि हमें जीवन को जीना है तो हम 64 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ अपने आपको काल के साथ जोड़ दें। प्रातकाल के आलोक में अपने को विस्तारें। पक्षियों के गान में गायें; उनके स्वर ही अपने स्वर बन जायें । सूर्य ऊपर उठा है, हम ही आर उठ गये है। उसके प्रकाश में अपना ही प्रकाश है। उसकी तपन में हमारी तपन है। देखो वह पक्षी अपनी चोंच में दाना भरकर लाया है, उसके बच्चे कैसे चीची करते हुए उसे घेर रहे हैं। वह उनके मुंह में दाना देता है। वे चुप हो गये हैं । उसको नजरों में देखो कितना सन्तोष झलक रहा है। हम भी उसमें मिल जायें यह घटना हमारा जीवन बन जायेगी। देखो ! सूरज ढल गया । हम भी आराम की गोद में चले जायें; सान्ध्य-गगन की लालिमा अपना ही अनुराग वनकर क्षितिजों को चूम लें। यह रात घिर आयी है। आसमां असख्य तारों से चमकने लगा है। हमारे पाम एक अमीम मन है। हम उमे हर तारे के साथ चमकने दें। तब हम स्वयं चांदनी बनकर अपनी ही शीतल गोद में स्वप्नों के साथ पलेंगे। इस प्रकार यदि हमने अपने आप को काल के साथ जोड दिया--तो हम स्वय समय की धारा बन जायेंगे; उस रूप में काल हमसे पृथक नही रहेगा। हमारा वह होना (Being) ही काल का सच्चा वोध होगा। इसी अर्थ में हम कालजयी बन सकते हैं। प्रकारान्तर से इसी चिन्तन को हम घटनाक्रम के दर्शक बनकर भी काल का अनुभव कर सकते हैं। यह भी कालजयी बनने का एक विकल्प है। पहले जो क्रम था वह था अपने को काल के साथ जोड दें; यह क्रम है काल को छोड़ दें। हम स्वयं काल के दर्शक बन जायें। पूर्ण समर्पण या पूर्ण पृथकता एक ही लक्ष्य तक पहुंचाते हैं। दोनों ही स्थितियां काल-बोध की स्थितियां हैं। जैसे अपने को काल के साथ जोड़कर हम एक ही दिन मे हजारों वर्ष जी सकते हैं, उसी प्रकार हम अपने आप को काल के किनारे खड़ा करके भी समय का सकुचन एवं विस्तार महसूम कर सकते हैं। साक्षी ! केवल साक्षी !! हर घटना का साक्षी होना भी दूसरे शब्दों में उस घटना के साथ जुड़ना ही है। यह पृथकता का एहसाम भी मिलन से ज्यादा आनन्द- दायी रहता है । मिलन में सुख-दुख दोनों अनुभूत होगे, परन्तु इस बिछुइन में केवल आनन्द-ही-आनन्द है । यहाँ घटनाएँ हम में हैं । हम पटना से नहीं हैं। घटनाएं हमारे सामने घटित हो रही है। हम घटना नहीं है। व्यापार मे घाटा हुआ, चूंकि हम दर्शक हैं, अत. उस नुकसान को सहने में कोई दुःख न होगा। उस स्थिति में हमारे सिर का दर्द हमारा ददं नही होगा, केवल सिर का दर्द होगा; हम किनारे खड़े होकर देख रहे होंगे कि सिर को दर्द हो रहा है तथा हम उस दर्द का उसी प्रकार उपचार करेंगे जैसे एक डॉक्टर एक बीमार का इलाज करता है।

कालजयी : 65 डॉक्टर अत्यन्त परिश्रम से रोगी को चीर-फाड़ करता है, उसे पसीना आ गया है परन्तु वह रोगी के सम्बन्धी या स्वयं रोगी की तरह दुखी नहीं है । वस यही हालत हमारी होगी। हम अपने जीवन के दर्शक बन जायेंगे । भोक्ता नहीं। अपने जीवन के हर क्षण का साक्षी होना भी एक चेतनामय जीवन जीना है। दूसरे शब्दों में यह काल पर विजय है। हम विजयी बनें । काल को आत्मसात करें या काल के दर्शक बन जायें। मूल बात चेतना की है। उसे चमकायें; जबकि हम सामान्यतः उस पर निरन्तर अज्ञानता को, बेहोशी की ठंडी राख डालते जा रहे हैं, और फिर कहते है; दुषी है; रोगी है; मौत पास आ रही है। एक बार यदि विवेक के चक्रवात से अज्ञानता की राख उड़ जाये, तो चेतना आलोक मे परिणित होकर, हमारे समस्त जीवन को; एक-एक क्षण को आलोकित कर देगी। उस क्षण मौत का भय, मौत का भ्रम मिट जायेगा । हम सही अर्थ मे कालजयी बन जायेंगे। की चिनगारी एक

लघु-एकांकी
सवाल उठता है
आनन्द कुरैशी
[पर्दा उठता है। मंच पर उदघोषक के अतिरिक्त कोई नहीं है। न कोई साजन
सामग्री। एकदम शून्य-सा।]
उद्घोषक . आज मुझ पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गयी है। न जाने
वयो बार-बार मुझे ही इस काम के लिए चुना जाता है।
नाटक शुरू करू इससे पहले चन्द सवाल आप लोगों से पूछना
चाहता हूँ। पास तौर से उन लोगो से जो बातें तो खूब करते
हैं, लेकिन जब भी मौका आता है भाग जाते हैं। क्या आप भी
मेरी बात सुनकर भागने लगेंगे? तव फिर मेरे सवाल का
जवाव कौन देगा? इम समाज को आखिर कौन बदलेगा?
हजारो साल से इस देश में यही सवाल दोहराया जाता रहा
है-रामराज्य से लेकर गांधी राज्य तक ।
आप में से कौन है वे लोग जो बार-बार इस देश में जाति
और धर्म की बात उठाते है ? मैं पूछता हूँ क्या आप भी देश की
तकदीर बनाने के लिए इसानियत को अलग-अलग अखाडों मैं
बांट देना चाहते हैं ? क्या देश से भी बड़ी जाति है ? क्या देश
से भी बढकर आपका धर्म है ?
[दर्शको को भीड से एक व्यक्ति उठता है।]
एक दर्शक : पामोश ! हमारा देश धर्म-निरपेक्ष है। कानून की निगाह में
सब बराबर है क्या तुम नही समझते इस बात को?
[दूसरा एक और दर्शक भी खड़ा हो जाता है ]
दूसरा दर्शक : आज न कोई छोटा है न बडा । हर जगह सबको समान अधि.
कार प्राप्त है।

सवाल उठता है . 67 उद्घोपक : (हंसता है) मेरे भाई ! मैं अछूतो की, हरिजनों की, दलितो की बात करता हूँ। क्या तुम्हारे मन्दिर मे इनके लिए कोई जगह है ? क्या तुम्हारे विवाह संस्कार मे इनके सौभाग्य का सिंदूर भी है ? क्या तुम्हारे सामाजिक सस्कारों की जाजम पर इनके बैठने के लिए थोडी-सी भी जगह है ? कुछ लोग : (खड़े होकर दर्शकों को भीड़ से) भागो ! बकवास बन्द करो। हम लोग नाटक देखने आये है तुम्हारा भाषण मुनने नहीं। उद्घोपक : शान्ति रखो मेरे भाई ! शान्ति | मैं नाटक ही तो दिखा रहा हूँ। पर्दे के पीछे दूसरी ओर अछूत और दलित कहे जाने वाले कुछ लोग बैठे हैं । मैं उनको साथ लेकर आया हूँ। उनमे मेह- तर, चमार, बलई-सभी है। सभी रोज आपकी सेवा करते हैं । आज चलिए आप लोग इनकी सेवा करें। चलिए, इसी काम से अपना यह नाटक शुरू करें। तीसरा दर्शक : (भीड़ से खड़ा होकर) आज कोई हरिजन कल्याण सप्ताह का कार्यक्रम है क्या, जो हम लोग... [सब लोग हंसते है। एक दर्शक : पंतीस साल हो गये जनाव, क्या अब भी सेवा की जरूरत है। दूसरा दर्शक : आरक्षण ! रिजर्वेशन ! विशेष छूट । मौका ! इतना सब कुछ पा लिया अब क्या वचा? तीसरा दर्शक . हमने कोई ठेका ले रखा है क्या? उद्घोपक : नहीं, बिलकुल नहीं । तुम क्यो ठेका लोगे मेरे भाई । तुम तो वात करोगे !कभी वेद में, कभी पुराण मे-तुम्हारी ही बात तो वार-यार पढ़ी है सवने ! किसी को ब्राह्मण, किसी को क्षत्रिय, किसी को वैश्य, किसी को शूद्र तुमने ही तो बनाया है ! तीसरा दर्शक : अपने कर्मों का फल है । जन्म देना कोई हमारे हाथ की यात है क्या? उद्घोषक : नहीं, विलकुल नहीं । तुमने भी बड़े कुल में कोई अपनी मरजी से जन्म थोड़े ही लिया है। यह तो मां-बाप की करतूत है कि तुम धरती पर बातें करने आ गये ! तीसरा दर्शक : बदतमीजी करते हो? उद्घोषक : नही नहीं, मेरे भाई ! अच्छा, तुम्हारा नाम क्या है ? तीसरा दर्शक : मन्नालाल गुप्ता। उद्घोषक : और तुम्हारा? दूसरा दर्शक : फकीर चन्द शाह ।

68 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ उद्घोषक और मेरे भाई, तुम्हारा? पहला दर्शक : नेमीचन्द शर्मा। उद्घोपक : तुम सब क्या हो? तीनो । (एक साथ) हिन्दू । उद्घोपक . मेरे साथ जो लोग आये है वे भी अपने-आप को हिन्दू ही कहते तीनो . (एक साथ) ठीक है वो सव भी हिन्दू है। उद्घोपका : तुम हिन्दू ! वो हिन्दू । हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई ! क्यो है न ? तीनो : (एक साथ) हाँ हाँ, हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई ! उद्घोपक : मुसलमान, सिक्ख, ईसाई? तीनो (एक साथ) वो भी भाई-भाई। उद्घोषक : चलो फिर आज से तुम सड़कों की सफाई करो, मैला उठाओ, जूते बनाओ। तुम इनको रोज पूजा के लिए अपने मन्दिर में आने दो। तुम अपने बेटे का विवाह इनमें से किसी की लड़की से करो। तुम इनके घर जाकर आज शाम खाना खाओ। तीनों : (चिल्लाते हैं) बैठो ! बकवास करते हो ! नाटक शुरू करो! उद्घोषक • नाटक भी करूंगा। पहले मेरे सवाल का जवाब तो दो। तीनों : (एक साथ) बकवास करता है। उद्घोषक : मेरा काम ही है बोलना । लेकिन तुम्हारी तरह जुलूसों में नहीं बोलता। मभाओं में नहीं बोलता। किताबों में आदर्श वाक्य नही लिखवाता ! मैं न नेता हूँ, न सेवक हूँ, न पंडित, न मौलवी - पहला दर्शक : पागल है चलो। (चलने लगता है) दूसरा दर्शक : हमे उल्लू बनाता है, चलो। (चलने लगता है) तीसरा दर्शक : चलो, चलो। (चलने लगता है) [दूसरे लोग भी खड़े होते हैं। उद्घोषक : भाग रहे हो। लेकिन मेरे सवाल का क्या होगा? क्या हरिजन कल्याण सप्ताह तुम लोग फिर कभी नहीं मनाओगे ? क्या चुनाव के दिनो मे धर्म-निरपेक्षता का मुखौटा तुम नही पहनोगे ? क्या समाओं मे, जुलूसों में भाई-भाई का नारा तुम नही लगाभोगे? सब : चलो चलो। उद्घोषक : सब में भी नाटक नहीं शुरू करूंगा। पिके.पीक लोग दौडकर आते हैं।

सवाल उठता है . 69
लोग : हमारा क्या होगा?
उद्घोषक : तुम बढो! आगे बढ़ो ! इतना आगे कि ये सब लोग बौने नजर
आयें। तुम क्या समझते हो अछूतोद्धार कोई समारोह मनाने
से होगा? अपने आपको ऊंचा उठाने से होगा। कबीर बनो या
फिर कबीर की बात को समझो! गाधी के मन में क्या था
उसे समझो ! तुम लोग आगे बढ़ो मेरे अछूत कहे जाने वाले
भाइयो ! मैं यही पड़ा हूँ। मेरा काम ही है नाटक करना । ये
लोग चले जायेंगे तो दूसरे आयेंगे। मैं उनसे भी यही सवाल
पूलूंगा। जब तक तुममे से एक भी अछूत, दलित समझा जायेगा
तब तक बार-बार यह सवाल पूछता रहूँगा।
[धीरे-धीरे मुख्य पर्दा गिरता है]

बाल एकांकी रखामोश आनन्द कुरैशी [पर्दा खुलता है। अदालत का भीतरी दृश्य । जिला वन न्यायाधीश मृगराज कुर्सी पर बैठे हैं। कठघरे में वानर प्रसाद खड़ा है। एक ओर रीडर रोछपाल, वकील सूअर प्रकाश सब अपनी-अपनी जगह बैठे हैं। दर्शक भी हैं। गैडादास . (पया स्थान खड़े होकर) मिस्टर वानर प्रसाद, तुम पर चार्ज है कि तुमने परीक्षा-कक्ष मे अध्यापक खरगोश चन्द्र को इस कारण धमकाया कि उन्होंने तुम्हे नकल करने से रोका था। उनका कहना है कि तुमने उन्हे एक चाकू भी दिखाया था। वानर प्रसाद : आप नहीं जानते सर, श्री खरगोश चन्द्र जी वैसे भी हमेशा घबराये-से रहते हैं। जहां तक चाकू दिखाने का सवाल है, शायद उन्होंने घबराहट मे गलत अनुमान कर लिया-मैंने तो खाली गत्ते का टुकड़ा दिखाया था। {सव हंसते है। मृगराज : (मेज पर हथौड़ा मारते हुए) खामोश, यह अदालत है। हां, तो इसका मतलब यह हुआ खरगोश चन्द्र झूठ कहते है। वानर प्रसाद : अब मैं अपने मुंह से कैसे कह सकता हूँ, सर। वैसे एक बात बतला दूं, मुझे क्रोध जरूर आया था उन्हें देखकर। बात यह है सर, खरगोश चन्द्र जी कहने को विज्ञान पढाते है। लेकिन ईश्वर सौगन्ध मैंने उनको तीन महीने बाद उस दिन देखा था। साल-भर में मुश्किल में पांच बार पीरियड लिया होगा । सर, प्रैक्टिकल तो एक भी नहीं कराया। अब आप सोच सकते हैं, हम तोग परीक्षा क्या खाक देते ! आप न मानें तो विज्ञान कक्ष के चपरासी बदाभाई भेड़ में पूछ सकते हैं । ।

खामोश : 71 रोछपाल : (आवाज लगाता है)-चपरासी बदाभाई को हाजिर किया जाये। चपरासी). (दर्शकों के नजदीक आकर जोर से)-चपरासी बदाभाई जिराफ खां हाजिर हो! चपरासी बदाभाई हाजिर हो! चपरासी बदाभाई हाजिर हो ! {बदाभाई दर्शको के बीच रास्ता बनाता गवाह के कट- घरे मे आकर खड़ा हो जाता है सूअर प्रकाश : अध्यापक सरगोश चन्द्र को जानते हैं आप? वदाभाई : लो मास्टरजी को भला मै क्यो नही जानूंगा? सारा दिन तो उनके घर पर रहता हूं। सूअर प्रकाण : क्यों ? क्यो? उनके घर क्यो? बदाभाई : बहुत काम रहता है जी। खाना बनाता हूँ, कपड़े धोता हूँ, सामान ला देता हूँ। मास्टर जी को फुरसत थोडे ही मिलती है। घर का काम तो मुझे ही करना पड़ता है जी। सूअर प्रकाश : क्यो ? क्यो? तुम्हें क्यो? वदाभाई · लो, आपको पता ही नही। दिन भर वेचारे ट्यूशन करते है घर-घर जाकर। [सव हसते है। मृगराज : (हयोड़ा ठोककर) खामोश ! यह अदालत है ! हो, तो मिस्टर वानर प्रसाद का कहना है कि खरगोश चन्द्र ने अब तक एक भी प्रैक्टिकल का पीरियड नहीं लिया है। क्या यह सच है ? बदाभाई : लो, आपको पता ही नहीं। चाबी तो मेरे पास रहती है जी। मुझे तो याद ही नहीं कि मैंने कभी कमरे का ताला खोला हो। कीमती सामान है साहब, खो जाये, टूट जाये तो बेचारे मास्टर जी मर नहीं जायेंगे? [सव हँसते हैं। मृगराज : (हथोड़ा ठोककर) पामोश ! खामोश !! चरागाह समझ रखा है, कह दिया यह अदालत है। हां, तो मतलब यह हुआ वेतन तुम सरकारी खजाने का उठाते हो और काम मास्टर जी का करते हो? बदाभाई : मास्टर जी भी तो प्रिसिपल साहब का काम करते हैं जी। [सब हंसते हैं। मृगराज : (गोड़ा ठोककर) चोण ! खामोश नहीं रह सकते क्या ! हाँ, तो क्या मतलब है तुम्हारा?

72
कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएं
बदाभाई : प्रिंसिपल साहब के लड़को को उनके घर जाकर पढाते हैं । लो,
आपको पता ही नहीं जी!
[सव दबी आवाज में हंसते है । मृगराज हथौड़ा फेंकते.
फेंकते रह जाते है।
मृगराज हूँ, तो स्थिति बहुत गम्भीर है। शिक्षा विभाग को लिखना
होगा। लिखो रीडर साहब खास पोइंट है यह । समझे?
बदाभाई मैं भी यही कहता हूँ जी, खास पोइंट है।
मृगराज तुम चुप रहो। हां, तो इसका मतलब यह हुआ कि खरगोश
चन्द्र की रिपोर्ट झूठी है।
आप उनसे कव मिले थे सर? यहां तो अभी उनके बयान भी
होने वाकी हैं?
मृगराज मेरे घर रोज आते है भाई। मेरे बच्चों को विज्ञान पढाते हैं।
[अदालत में जोरदार ठहाका लगता है। इसी के साथ
पर्दा धीरे-धीरे गिरता है।
वानर प्रसाद

व्यंग्य एकांकी
प्रजा का भाग्य
कुन्दन सिंह सजल
पात्र
.
ठाकुर भीमसिंह : रायपुर के ठाकुर
छोटूराम ठाकुर भीम सिंह का टहलुआ
प्रधानमत्री : पाटन राजा का दीवान
महेश, दिनेश, सुरेश, परेश, जनेशसभी नागरिक,
एक सिपाही
प्रथम दृश्य
[सुनसान पथ पर ठाकुर भीमसिंह और उनका टहलुआ छोटूराम चले जा रहे हैं।
वे रिपासत को राजधानी पाटन की ओर परस्पर यात करते हुए जा रहे हैं।
समय प्रातःकाल के लगभग सात बजे]
छोटूराम : ठाकुर साहब, आज राव राजा पाटन को तेरहती है और आज
ही नये राजा का चयन किया जायेगा।
भीमसिंह : हाँ, भाई छोटूराम, इस रियासत में राजा के चयन का तरीका
भी कितना अजीव है। पूरी रियासत को प्रजा आज राजधानी
पाटन में एकत्रित होगी और एक वाज छोड़ा जायेगा । वाज
एकत्रित प्रजा में मे जिसके भी सिर पर बैठ जायेगा, वही
रियासत का शासक नियुका होगा।
छोटूराम : हमारे गांव रायपुर में भी कल डोंडी पीटकर यह घोषणा प्रना-
रित करवायी गयी थी और हरेक प्रजाजन को उपस्थित होने

74 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ का आमंत्रण दिया गया था। भीमसिंह - हमारे ही गांव में क्यों, पाटन रियासत के हर गाँव मे इसी प्रकार डोडी पिटवाकर प्रचारित करवाया गया है कि राव राजा को तेरहवी के दिन वाज छोड़कर नये राजा का चयन किया जायेगा। छोटूराम अव देखो, प्रजा के भाग्य गे वाज किसके सिर पर बैठता है ? भीमसिंह अच्छा छोटूराम, तुम यह बताओ यदि भाग्यवश बाज तुम्हारे मिर पर बैठ जाये और तुम्ही पाटन के राजा घोपित कर दिये जाओ तब तुम क्या-क्या कार्य प्रजा के हित में करोगे? छोटूराम ठाकुर साहब, मैं ठहरा आपका टहलुआ, आपका सेवक । पहले तो सभव ही नहीं कि मेरे सिर पर वाज बैठे और यदि बैठ भी जाये तो मैं अपनी योजना बाद में वताऊँगा। पहले आप फर- माइये कि यदि वाज आपके सिर पर बैठ जाये तो राजा बनकर आप क्या-क्या करेंगे? भीममिह . भाई छोटूराम, यदि प्रजा का सौभाग्य हो और बाज इत्तफार से मेरे सिर पर बैठ जाये तो में राज्य के सभी देवालयों में यज्ञ, हवन तथा धार्मिक कृत्यो को अनिवार्य कर दूंगा। प्रजा की बेरोजगारी मिटा दूंगा, महंगाई पर अंकुश लगा दूंगा। चोरी, डकतो. टगी, तस्करी मभी कुछ अपने राज्य से समाप्त करवा दूंगा। राज्य के विमान अपनी फसलें दुगुनी पंदा करेंगे । उनके लिए अच्छे पाद-योग की व्यवस्था करवाऊंगा । सभी प्रकार के नशों पर पाबंदी लगा दंगा। गांव-गांव में अस्पताल गुलयाऊँगा। अशिक्षा ५ कुशिक्षा की समाप्ति के लिए गांव-गांव में विद्या. लपी पी व्ययस्था करूंगा। अब तुम यताओ, तुम क्या-गया करोगे, राजा बनकर। छोटूराम : टाकुर माहय, मेरे गिर पर सो याज बैठने का मतलय होगा प्रजा का दुर्भाग्य, क्योकि म तो राजा बनार गुरा और गुन्दरियों में डूबा रहूँगा। रामनर्मचारियों को प्रष्टाचार को पूरीट दूंगा। कोई कुछ भी मरे में आने ऐशो-आराम मदान वर्ग:मही मगा। भीमगिल : प्रजा-हित बोटिगे ये गर या नियतीनही, मागे गुरागमालोमात गुनायी देनाtit मगरयानी कीरा पाई। नर पर गे :रिमोम हममे भीगा S प्रजा का भाग्य .75 देखो, सूयं भी काफी चढ़ आया है और हम राजधानी में प्रवेश कर रहे है। दूसरा दृश्य [सायंकाल के चार बजे हैं। एक बहुत बड़े मैदान में पाटन रियासत की जनता अपने मावो राजा के चयन हेतु एकत्रित है। मैदान में अस्पष्ट जनरव व्याप्त है। राज्य के मंत्रीगण एक ऊँचे मंच पर विराजमान हैं। एक उच्च आसन पर बाज पक्षी बैठा हुआ है। राज्य के प्रधानमंत्री उठकर घोषणा करते हैं। शोर शांत हो जाता है।] प्रधानमंत्री : प्रिय प्रजाजनो, आज हमारे स्वर्गीय राव राजा को तेरहवी है। वारह दिन के राजकीय शोक के पश्चात् आज हम नये राजा के चयन हेतु यहाँ एकत्रित हुए हैं। जैसा कि आपको ज्ञात है (वाज की ओर इशार करके) यह पक्षी छोड़े जाने पर जिस भी प्रजाजन के सिर पर बैठ जायेगा, वही राज्य का भावी शासक होगा। राज्य के सभी कार्य उसके हस्ताक्षरो से ही सचालित होंगे। (अस्पष्ट जनरव) हाँ, तो (घड़ी देखकर) अव समय हो रहा है और एक मिनट पश्चात् ही यह पक्षी उडेगा। आप लोग शांत बैठकर ईश्वर से प्रार्थना कीजिये कि यह किसी सज्जन ध्यक्ति के सिर पर बैठे। [इशारा पाकर एक मत्री वाज पक्षी को उड़ाता है। लोग शांत हो जाते है । वाज पूरे मैदान की भीड़ पर चक्कर लगाकर एक कोने में मंडराने लगता है। उस कोने में ठाकुर भीमसिंह अपने टहलुए छोटूराम के साथ बैठे है और देखते-ही-देखते बाज छोटूराम के सिर पर बैठ जाता है। पूरे मैदान की उत्सुक निगाहे छोटूराम की ओर उठ जाती हैं। एक बार फिर अस्पष्ट जनरव वातावरण पर तैर जाता है। राज्य मत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य जाकर छोटूराम को सादर मंच पर लाते है। प्रधानमंत्री छोटराम से परिचय प्राप्त करने के वाद मच पर खड़े होकर घोषणा करते है] प्रधानमंत्री : है प्रजाजनो, बाज ने हमारे भाग्य का फैमला कर दिया है। आज से हमारे राजा (छोटूराम की ओर इशारा करके) छोटूराम 76 . कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएँ । जी हो गये है। छोटूरामजी राजधानी के पास के गांव रायपुर के रहने वाले है। ये एकदम जवान और युवक है। हम सभी इनके दीर्घ जीवन की ईश्वर से कामना करते है और अंतर से चाहते है कि ये दीर्घायु होकर हमें अपना मार्ग-दर्शन और सफल राज्य संचालन देते रहे । चोलो राजा छोटूरामजी को... प्रजाजन : ...जय। तीसरा दृश्य [राजधानी पाटन का एक बाजार । बाजार को एक दूकान पर कुछ युवा नागरिक बैठे हैं और राजा के कुकृत्यों पर परस्पर चर्चा कर रहे हैं। समय मध्याह्न काल] महेश । हमारे राजा छोटूराम को न सुरा से अवकाश है न सुन्दरियो से फुसंत । राज्य में कितना भीषण अकाल पड़ा है किन्तु राजा के ऐशो-आराम में तनिक भी कमी नही आयी है और उन्हे प्रजा की सुधि लेने का तो जैसे खयाल ही नहीं है । दिनेश : महगाई सुरसा की भांति वेलगाम बढ़ती ही जा रही है। व्यापारियो ने चीजो के मनमाने भाव कर दिये है। राजा की न व्यापारियो पर रोक है न तस्करियो पर पकड़ । सुरेश : दैनिक समाचार पत्र प्रतिदिन जगह-जगह होने वाले बलात्कारो की खबरें साया कर रहे है किन्तु राजा के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। उन्हें तो अपनी मस्ती से मतलव है। परेश : राज्य में डकैती तो अब आम चलन हो गया है। राज्य की पुलिस निष्क्रिय है । डकत आये दिन प्रजाजनों को लूट रहे हैं। प्रजा प्राहि-त्राहि कर रही है किन्तु उसके क्रन्दन को सुनने वाला कोई नहीं है। जनेश : मत्रिमंडल के सभी सदस्य राजा की झूठी हाँ में हाँ मिलाकर अपनी कुर्मियां बरकरार रखने की जोड-तोड़ में है । उन्हें प्रजा के दुग से कोई सरोकार नहीं है और यदि है भी तो उसे राजा तक पहुँचा कर राजा के आराम में दखलंदाजी नही करना चाहते। महेश : राज्य कर्मचारी प्रजा की लूट में मक्रिय हैं । प्रजा का कोई भी काम किमी भी स्तर पर बिना रिश्वत दिये नहीं होता। भ्रष्टाचार उनकी रगों में ममा गया है।

प्रजा का भाग्य: 77 दिनेश : राजा के नजदीकी लोग अपने विपक्षियों पर झूठे इल्जाम लगा- कर मुकदमे दायर कर रहे है तथा उन्हें हर प्रकार से परेशान कर रहे है। सुरेश : (सामने से सिपाही को आता देखकर)धोरे बोलो, सामने देखो, वह सिपाही नशे में धुत्त डगमगाते कदमों से इधर ही आ रहा है। सिपाही : (पास आकर) क्यो वे...नालायको... राजा की...बुराई कर रहे हो?...हमारे राजा...वो छोटूरामजी...बहुत अच्छे... राजा है । (महेश से) क्यों वे. क्या चुगलो...कर रहा था... राजाजी की...है। महेश : नही दीवानजी, हम तो राजा का गुणगान कर रहे हैं। हमारे राजा सचमुच देव पुरुप है और प्रात. स्मरणीय है। सिपाही : ठीक है...ठीक है...तुम बहुत अच्छे...नागरिक हो ।(जाता है) दिनेश . कितनी शराब पी रखी है। चारो ओर का वातावरण दुर्गन्ध- मय हो गया । हे ईश्वर, इस राज्य मे रहना तो सचमुच नरक की यातना सहना है। परेश : यह राजा किसी का कहा-सुना भी तो नही मानता । अभी कुछ दिन पहले प्रजा की ओर से एक शिष्टमडल राजा से मिला था और राज्य की सारी दुर्व्यवस्था से उन्हे अवगत भी कराया गया था किन्तु आश्वासन के पश्चात् भी स्थिति में कोई अंतर नही आया, वही ढाक के तीन पात। जनेश : मिमो, मुझे ज्ञात हुआ है कि हमारे ये राजा साहब, इनके गांव रायपुर के ठाकुर भीमसिंह के घरेलू सेवक थे। अपन चलकर ठाकुर साहब से निवेदन करें और वे आकर इनको यदि सम- झाएँ तो शायद राजा के आचरण मे कुछ सुधार की आशा की जा सकती है। सुरेश : यह करके भी देख लो। यदि इतना-सा करने मात्र से स्थिति में कुछ फर्क पड़ जाये और प्रजा के भाग्य बदल जाएँ तो सोने में सुगन्ध। दिनेश : तब हम लोग कल रायपुर चलेंगे और ठाकुर भीमसिंहजी के सामने सारी स्थिति बयान कर देंगे। वैसे तो वे स्वयं राजा के कारनामो से परिचित होंगे किन्तु हम उनसे अनुरोध करेंगे कि वे आकर राजाजी को समझाएँ । जनेश : ठीक है, तो कल प्रातःकाल ही हम रायपुर के लिए प्रस्थान करेंगे।

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प्रजा का भाग्य : 19 महेश : हमारी प्रार्थना है कि आप एक वार जाकर उन्हें अवश्य सम- झाएँ तमा सारी स्थिति से अवगत कराएं। परेश : द तो इस बात का है कि उनके मंत्रिमडल के सहयोगी उन्हें राज्य को वस्तुस्थिति से अवगत नहीं कराते तथा प्रजा के अमन-चैन की झूठी बाते कहकर उन्हें अंधेरे में रखते हैं। भीमसिंह : ठीक है, आपलोगों का अनुरोध है तो मैं राजा से मिलकर बात करूंगा लेकिन मेरी समझ में उनका आचरण बदलना असंभव सभी एक साथ : आप कोशिश करके तो देखिये। अच्छा, चलते हैं। राम-राम (जाते हैं)। पांचा दृश्य राजा छोटूराम को खास सलाहगाह में ठाकुर भीमसिंह और राजा छोटूराम बैठे है। राजा एक ऊँचे आसन पर विराज रहे हैं। सामने टेबल पर अंग्रेजी शराम की बोतल य प्याला रखा है। दो सुन्दरियां दाएं-बाएँ खड़ी पंखा झल रही हैं । एक सुन्दरी प्याला भरफर राजा की ओर बढ़ाती है । समय संध्या काल का है।) .. छोटूराम : ठाकुर साहब, हमारी मनुहार तो स्वीकार कोजिये। एक पंग तो ले लीजिये । (सुन्दरो के हाथ से पंग लेकर ठाकुर की ओर बढ़ाता है) भीमसिंह : आप जानते हैं राजा साहब... छोटूराम : (बीच में हो) मुझे मालूम है, आप पीते नहीं हैं लेकिन आपके मुंह से मुझे राजा साहब कहना, शोभा नहीं देता। आप तो मुझे छोटू राम कहकर ही संबोधित कीजिये। भीमसिंह : अच्छा तुमको इतना होश तो है, शुक्र है भगवान का। छोटूराम : फिर क्या आप मुझे बेहोश समझते हैं ? भीमसिंह : नहीं, मैं तो तुम्हें बेहोश नही समझता किन्तु प्रजा का जो बेहाल इस समय हो रहा है, वह तो इस बात का एक प्रतिशत भी प्रमाण नहीं कि तुम होश में हो और पूरे होश में हो। वात छोड़िये ठाकुर साहब, आप अपनी कहिये, आपको है ? आपने यहां पधारने का कैसे कष्ट किया? ' हो तो निस्सकोच कहिये । (सुन्दरी एक है जिसे राजा गटक जाते हैं) 4 .

78 कौमी एकता यी तलाश और अन्य रचनाएँ चौथा दृश्य [प्रातःकाल के 9 बज रहे हैं । ठाकुर भीमसिंहजो को बैंठक में पाटन से आये नाग. रिक उनसे बात कर रहे हैं। ठाकुर साहब पलंग पर मंठे हैं, हाय में माला है। ये माला फिरा रहे हैं । नागरिक कुसियों पर बैठे हैं। । महेश बहुत हो गया ठाकुर साहब, अब हमसे अधिक नहीं सहे जा सकते राजाजी के जुल्म । हम राज्य के जागरूक युया नागरिक है, प्रजा का क्लेश अव हमसे नही देखा जाता। दिनेश आप देख रहे हैं, कितना भीषण अकाल राज्य में पड़ा है। आदमी और पशु अनाज और चारे के अभाव में विना मौत काल के ग्रास बन रहे है और हमारे राजा को सुरा और सुन्दरियों से अवकाश नहीं है। सुरेश · प्रजा पर क्या-क्या कहर बरपाये जा रहे है । महंगाई द्रोपदी का चीर हो गयी है। चोरी, डकैती, तस्करी, रिश्वत आम रिवाजो जैसे हो गये है। प्रजा पाहि-त्राहि कर रही है। लोग गरीब से अधिक गरीव हो रहे है और धनवानों की वन आयी है। गरीब लोग गरीबी के मारे अपना ईमान बेचने तथा धर्म बदलने पर मजबूर हो रहे है। महेश . राज्य के चंद व्यापारिक घराने करोड़पति से अरबपति हो गये है। राज्य की सारी अर्थव्यवस्था चरमरा गयी है। परेश : सरकारी कर्मचारियो की लूट पर कोई अकुश नहीं है । विना रिश्वत के कोई भी जायज या नाजायज कार्य होना असभव है । जनेश किसी भी प्रजाजन की इज्जत आज सुरक्षित नहीं है । पुलिस जो प्रजा की रक्षा के लिए है, भक्षक बन गयो है । गरीबो के झुग्गी-झोपड़ों को उजाड़कर उनकी जगह पूंजीपतियो या राज- नेताओं के महल खड़े किये जा रहे हैं। महेश : हमने सुना है कि राजा छोटूरामजी किसी समय आपके सेवक हुआ करते थे। हम चाहते है कि आप चलकर उन्हें समझाएँ ताकि वे अपने आचरण में परिवर्तन कर प्रजा के दुःख, तक- लीफों की ओर ध्यान दें। भीमसिंह : सुना तो आपने सही है लेकिन राजमद किसे नहीं होता? मैं उसके पास जाऊँ और वह मेरी बात नहीं मानें तो फिर क्या उपाय है आपके पास? ।

प्रजा का भाग्य :19 महेश : हमारी प्रार्थना है कि आप एक वार जाकर उन्हें अवश्य सम- झाएँ तथा सारी स्थिति से अवगत कराएँ। परेश खेद तो इस बात का है कि उनके मनिमडल के सहयोगी उन्हें राज्य की वस्तुस्थिति से अवगत नहीं कराते तथा प्रजा के अमन-चैन की झूठी बातें कहकर उन्हें अंधेरे में रखते हैं। भीमसिंह : ठीक है, आपलोगो का अनुरोध है तो मैं राजा से मिलकर बात करूंगा लेकिन मेरी समझ मे उनका आचरण बदलना असभव है। सभी एक साथ . आप कोशिश करके तो देखिये। अच्छा, चलते है । राम-राम (जाते हैं)। पांचवां दृश्य [राजा छोटूराम को खास सलाहगाह में ठाकुर भीमसिंह और राजा छोटूराम बैठे हैं। राजा एक ऊंचे आसन पर विराज रहे हैं। सामने टेबल पर अंग्रेजी शराब की बोतल व प्याला रखा है। दो सुन्दरियां दाएं-बाएं खड़ी पंखा झल रही हैं । एक सुन्दरी प्याला भरकर राजा को ओर बढ़ाती है। समय संध्या काल का है।) छोटूराम . ठाकुर साहब, हमारी मनुहार तो स्वीकार कीजिये । एक पैग तो ले लीजिये। (सुन्दरी के हाथ से पैग लेकर ठाकुर की ओर बढ़ाता है) भीमसिंह : आप जानते है राजा साहब... छोटूराम : (बीच में हो) मुझे मालूम है, आप पोते नहीं है लेकिन आपके मुंह से मुझे राजा साहब कहना, शोभा नहीं देता। आप तो मुझे छोटूराम कहकर ही संबोधित कीजिये । भीमसिंह : अच्छा तुमको इतना होश तो है, शुक्र है भगवान का। छोटूराम : फिर क्या आप मुझे बेहोश समझते हैं ? भीमसिंह : नहीं, मैं तो तुम्हे वेहोश नही समझता किन्तु प्रजा का जो बेहाल इस समय हो रहा है, वह तो इस बात का एक प्रतिशत भी प्रमाण नहीं कि तुम होश मे हो और पूरे होश में हो। छोटूराम : प्रजा को वात छोड़िये ठाकुर साहब, आप अपनी कहिये, आपको क्या तकलीफ है ? आपने यहां पधारने का कसे कप्ट किया? मेरे योग्य कोई सेवा हो तो निस्सकोच कहिये। (मुन्दरी एक पंग भरकर फिर पेश करती है जिसे राजा गटक जाते हैं) 80 : फौमी एकता को सलाम और अन्य रचनाएँ भीमगिह मेरा अपना कोई प्रयोजन तुमगे दरसाल करने या नहीं है। मैं तो तुम्हे प्रजा पो स्थिति अवगत कराने आया हूँ । अय भी समय है मंगल जाने का और अपना स्थान प्रजा के माग में बनाने का। . छोटूराम मुझे न प्रजा के मानम को परवाह है और न उगी आलोचना थी। मैं जो पुष्ट कर रहा हूँ, अपने यिवेक रो कर रहा हूँ और जो मैं अपने विवेक गे कर रहा हूँ, यह मेरे विवेक मे ठीक ही है। भीमगिह : तुम मदा राजा नहीं रहोगे छोटूराम । मुछ तो ऐगा फर गाओ कि भविष्य में भी तुमको प्रजा पादरी । अब तुम्हारा ही नहीं प्रजा का भाग्य भी तुम्हारे इशारे से गंवर एवं विगढ़ गकता है। छोटूराम (रसता है, मुन्दरी एक पंग और महाती है, उसे सालो करके) ठाकुर साहब, मैंने आपको उसी दिन अर्ज नहीं किया था कि राजा बनकर मैं मायया बागा। आप सोचिये, प्रजा का भाग्य हो अगर अच्छा होता तो वाज बजाय मेरे आपके सिर पर नहीं बैठना? यह तो प्रजा का दुर्भाग्य है जिस कारण बाल मेरे सिर पर बैठा और में तो जितने दिन का भी राजा हूं, ऐशो-आराम से जिंदगी बसर करगा। अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए इतना धन, इतनी जायदाद इकट्ठी कर गाऊँगा कि वे मौज से अपनी जिन्दगी बसर कर लें। मुझे प्रजा के हाल-बेहाल से कुछ भी लेना-देना नहीं है। मैंने अपना जीवन जिस रफ्तार पर ढाल लिया है, उसे मैं बदल नही सकता हूँ। (सुन्दरो पाला आगे बढ़ाती है, राजा उसे थामकर पी जाते हैं) वाज मेरे सिर पर बैठा और में राजा बना। अव प्रजा के हाथ में नहीं है कि वह मुझे अपदस्थ कर सके। जो कुछ भी अब मैं करूंगा, अपनी मर्जी से करूंगा। जो मेरी हाँ में ही मिलायेंगे, मोग करेंगे, अपने पदों पर बने रहेंगे। जो मुझे नसीहत देंगे या खिलाफन करेंगे, वे अपदस्थ कर दिये जायेंगे। भीमसिंह : जैसी तुम्हारी मर्जी, छोटू राम । भविष्य में इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा, सोच लो। छोटूराम : मैं तो आज पर जिन्दा हूँ, कल किसने देखा है। कल जो देखेगा वह भोगेगा। मुझे तो आज को भोगने दो ठाकुर साहब, और आप भी मेरे दरबार में रहो, ऐश करो। भीमसिंह : नहीं, नही, मुझे मेरे हाल में रहने दो। तुम्हें धन्यवाद । अच्छा अब मैं चलता हूँ (जाता है)। पटाक्षेप ..

रम्यरचना कलम, कागज और किताब भगवतीप्रसाद गौतम " "कलम बडी है कलम बड़ी। जव चाहे तव कर सकती है इसकी-उसकी खाट खड़ी..." छोटी बिटिया बडे ही जोश-खरोश के साथ इन पक्तियों को उच्चारित करने लगी ही थी कि हम चीख उठे--"ऐ ! क्या बकवास कर रही हो यह ?" “यह तो आपकी ही कविता पढ रही हूँ, पापाजी।" उसने अपने मन में भरा किलो भर उल्लास उगल दिया। "हमारी कविता? कब लिख मारी हमने ऐसी कविता?" "हाँ हाँ, आपकी ही है। नहीं मानें तो देख लीजिए फाइल में।" "फाइल में कैसे मिल गयी ऐसी..." "कल मम्मीजी ने आपके कमरे के साजो-सामान को धूप दिखायी तो हमने उसी फाइल मै इमे देखा और पढ़ा भी।...कलम किसी को खाट कैसे पड़ी कर सकती है, पापाजी?" उसने एक भारी प्रश्न उछाला। "चुप रहो। अभी तुम नही समझ सकती यह सय। लाओ, हम देखें, यह फाइल कहाँ है।" कहते हुए हमने फाइल कब्जे में कर ली। सच, उसमें कविता घायल अवस्था में सुरक्षित थी और हमें यह सोचने को मजबूर हो जाना पड़ा था कि हम इस स्तर तक भी उतर सकते हैं । आपिर, हम जो इस सदी के गंभीर रचनाकार हैं ! खर साहय, कलम को ही यात चल पड़ी है तो उसे रोका भी कसे जा सकता है ! हाथ कंगन को आरसी क्या ! कलम घमीटने मे किस बात की कंजूसी जब हम छोटे ये तो पिताजी फरमाते थे-~-"जाओ, दवात-कलम ले आओ।" हम वफादार सिपाही की तरह उनका हुक्म यजाते थे और वे पोल के चवूनरे पर बैठ कर ग्रामीण छुटभैयों के आने-पाई का हिसाव लगाते, लाल मुर्ग 82 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ आवरण वाली बहियों में लिखते और फिर आतुर नजरों से झांकते कर्जदार से कहते-“कान्हा, सुन ले । तूने आज की मिती पर दो सौ रुपये उधार लिये थे, जिनका साल भर का ब्याज जुडा अड़तालीस रुपया। यानी कि नौ पचोल और तीन रुपया । कुल धन हुआ दो सौ अड़तालीस...समझ गया?" "ठीक हजूर ।" कान्हा मरियल आवाज में एक टुकड़ा जवाब सरकाता, साफे की आंट से तुर्ड-मुड़े नोट निकालकर बड़े प्यार से हाथ फेरता हुआ उन्हें देखता जैसे कह रहा हो-"खून-पसीना एक करके तुम्हे जोड़ा था और आज तुम भी जा रहे हो। अच्छा जाओ, मजे में रहना..." और पिताजी को सौंप देता था । तब हमारे मन में रह-रहकर सवाल उठता था-"कलम में इतनी ताकत? दो सौ का दो सौ अडतालीस रुपया?" मगर पिताजी की बहियां जहाँ की तहां रह गयी और हम चल पडे शहर की ओर । कच्चे झोंपड़ो को छोड़कर जा पहुंचे चूने-सीमेंट की लवी गलियो में। चाचाजी ने स्कूल में दाखिला करवाया तो रो-धोकर नियमित रूप से सही रास्ते पर चलना पड़ा। मगर मास्टर रामनारायण शर्मा ने स्लेट-पट्टी की पढाई- लिखाई के बाद अपनी आदत बधारना प्रारंभ कर दिया-"ऐसे नहीं, ऐसे पकड़ो कलम । बहुत पीट ली अटियां, खूब खेल लिये कबड्डी। अब आये हो वेटा चक्कर मे!" वस समझिये कि उनकी दहाड़ पर नेकर भी भीग जाती हो तो झूठ की रत्ती भर गुजाइश नहीं । हाँ, तो सस्कार ही कुछ ऐसे पड़े कि उन दिनो जो कलम पकडी, वह आज तक भी नही छूट सकी। स्कूल-कॉलेज में पढ़ते हुए ही पता लगा कि कलम नाम की चीज बडी ताकत- वर होती है। कलम क्या नहीं है ! कलम अफसर है, कलम दफ्तर है, कलम साहूकार है, कलम पत्रकार है, कलम लेखक है, कलम अध्यापक है...वह नेता भी है, अभिनेता भी है, वह जादूगर भी है, वाजीगर भी है । कलम कलम है जनाब ! कलम चलती है तो कोई-न-कोई चीज अवश्य अवतरित होती है-क्या गद्य- पद्य, क्या किस्से-कहानी, क्या संस्मरण-रेखा चित्र, क्या सवाद-परिसवाद, क्या क्षणिकाएँ-हसिकाएँ...न जाने कैसे-कैसे रग को विधाएं प्रकट होने लगती हैं। वह क्या नहीं कर सकती! वह आगे बढ़ सकती है, पीछे हट सकती है, फकीरचंद को अमीरचद बना सकती है, रणजीत सिंह को रणछोड लाल का जामा पहना सकती है, पान की गुंटी पर खड़े एक अदद फटीचर को टीचर से भिड़ा सकती है, चोटी पर बैठी किसी भी हस्नी को मस्ती मे धूल चटा सकती है। इसे उठा सकती है, उसे गिरा सकती है, पत्थर मे जान डाल सकती है, जिदा शेर को मुर्दे मे ढाल सकती है। कलम ही तो है जिसने बड़े-बड़े गदर करवा दिये। कलम ही तो है जिसने कलम, कागज और किताब .83 अंग्रेज के बच्चों को हिन्दुस्तान का पानी पिला दिया, अच्छे-अच्छो को छठी का दूध याद दिला दिया। न कलम होती, न देश में जान होती। न कलम होती, न जनता देश पर कुर्बान होती। कलम उठी, लड़ाई छिड गयी। कलम उठी, आजादी मिल गयी। हां, तो आजाद देश के कर्णधारो, कलम की धार तलवार की धार से ज्यादा असरदार होती है। इसकी मार मुग्दर की मार से ज्यादा खतरनाक होती है। इसके जागने पर बेखवर दुनिया खबरदार होती है। इसलिए कलम का चलना ही अपने आप में बहुत बड़ी क्राति है। हम क्रांति लाना चाहते है मगर यह बड़ी टेढी खीर है। कलम-क्राति के लिए कागज-माति चाहिए। कागज कलम की एक अहम् आवश्यकता है। कागज विना कलम का क्या अस्तित्व ! कागज और कलम का वंमा ही नाता है जैसा चोली और दामन का। हम जानते है कि कागज की समस्या शक्कर और प्याज की समस्या से भी ज्यादा गंभीर है। ऐसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए भी तो ढेर सारा कागज चाहिए।... .और तो और रद्दी कागज के भाव सुने आपने ? एकदम आस- मान के गाल नोचने वाले भाव ! इसीलिए कागजी घोड़ो की रफ्तार में फर्क आ गया है। कुछ साहित्यकार तो विराम-चिह्नो को भी छुट्टी करने पर तुले हैं ताकि कागज की पीठ पर अधिक-से-अधिक आरतियां अकित कर सकें। वेचार अखवार वाले कहते है-कागज ! दफ्तरो के वायू पुकारते हैं- कागज ! स्कूलों के अध्यापक अलापते है-कागज लेखक चिल्लाते है-कागज ! सम्पादक बिलविलाते हैं-कागज ! कागज की मांग कहाँ नही है ! यह चीज ही ऐमी है साहब, जिसे घरवाली भी सुबह-शाम अपार श्रद्धा से याद करती है- आखिर, उसे अंगोटी जो जलानी है। ....कल-परसों ही एक मित्र मिले थे। कहने लगे-"गुरु, एक-आध किताब प्रेस में डाल दो वरना कोई नहीं पूछेगा तुम्हे।" वात हमें भी जंची। भाई, किताव तो होनी ही चाहिए। इसमें अपनी एक इमेज बनेगी। पत्र-पत्रिकाओं वाले भी कहाँ तक छापेंगे हमारी रचनाएँ। ये तो वैसे भी सच्चे भक्ति-भाव से अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं। वे या तो मूर्धन्य रचनाकारों के प्राण लेने को तुले हैं या फिर नये हस्ताक्षरों को प्रकाश में लाने का मायावी नाटक रच रहे हैं। फिर तो बचे हमारे जमे बेहाल बुद्धिजीवी जो न इघर के रहते है, न उघर के । इसीलिए सोचा-अपनी भी किताव मार्केट में मानी ही चाहिए। कवर पेज पर हमारा अपना नाम देव-देवकर उम्र को गंवाई में कम-से-कम दम-बोम बरस की वृद्धि तो हो ही सकती है। हो, तो एक किताब मार्केट में लाने का लक्ष्य बनाफर हमने प्रवाशक का दर. - 84 . कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएँ . वाजा खटखटा दिया, मगर यह निकला हमारा गुरु। बोला-"किताय ! कागज कहाँ से आयेगा, डियर? नही नहीं, फिलहाल आप सब कीजिये...फिर कभी...." हम तो भूल ही गये थे यार कि कागज का अकाल चल रहा है। बच्चों को पाठ्य-पुस्तकें ही नसीब नहीं हुई है। उनकी अभ्यास-पुस्तिकाएँ भी कितनी परे- शानी के बाद जुटा पाये थे और हम चते किताव के सपने देखने । वाह ! तो भाईसाहब, कागज नहीं है तो किताब नहीं छपेगी और कागज नहीं है तो कलम-त्राति भी फीकी-फीकी ही रहेगी क्योकि कलम, कागज और किताव का सवध वैसा ही है जैसा रोटी, कपड़ा और मकान का। आम आदमी रोटी, कपडा और मकान के लिए ताशे बजा रहा है और हम है कि कलम, कागज और किताव की समस्या से जूझ रहे है। मगर आप जानते है हर समस्या के हल के लिए मही वक्त तलाश जरूरी है इसलिए हमें फिलहाल धैर्य धारण किये बैठे रहना ही रास आ रहा है। 0 रम्य रचना (रेखा चित्र) लाला मनसुरवदास जी का संगीत-प्रेम अर्जुन 'अरविंद' लाला मनसुग्रदाम जी मे मिले एक अर्सा हो चला था। वे और हम वचपन में एक साथ पढे और बढे थे। यूं भी वे दूर के रिश्ते मे हमारे भाई ही लगते थे। लाला मनसुखदास जी कुल मिलाकर आदमी बडे मिलनसार है । उनका सबसे बड़ा गुण या शौक मेहमान नवाजी है। उनके घराने में उससे भी बड़ा दिलचस्प शौक है, गाने का। उनके घराने मे गाना आमतौर पर खाने के पश्चात् शुरू होता है। मनसुखदासजी के घराने को गाने की प्रेरणा अक्सर वह अभागा मेहमान देता है जो किस्मत का मारा भूल से उनकी ओर आ निकलता है। घर मे जब भी कोई मेहमान आता है, लाला मनसुखदाम जी बडी आत्मीयता से उसकी आवभगत करते हैं। यह उनकी हॉवी समझिये या पुश्तैनी परम्परा कि पूरा परिवार ही मेहमान नवाजी में व्यस्त हो जाता है। मनसुखदास जी से हमारा सम्पर्क टूटे अनेक वर्ष हो गये थे। लेकिन पत्र. व्यवहार की रस्म उनसे बदस्तूर चल रही थी। उनके लगभग हर पत्र मे ही आग्रह होता था कि मैं उनको मेहमान नवाजी स्वीकार करूं। अत उनके बार-बार के आग्रह से प्रभावित होकर एक दिन हम उनके यहां जा पहुंचे। उस दिन शाम को उनके यहां बड़ा रुचिकर पाना बना। खाने के पश्चात् मनसुखदास जो ने पेट पर दो-तीन बार हाथ फेरा और कुछ लम्बी डकारें लेकर पूछने लगे-~~"कुछ देर ताश-वाश खेलोगे?" "नहीं।" "अरे दो-चार बाजी ही सही।" भोजन से तृप्ति हो जाने के बाद हमे जम्हाई पर जम्हाई आती जा रही थी। उस ममय मूड मिर्फ सोने का हो रहा था। इसलिए उन्हें साफ उत्तर दिया--"जव मै नौकरी के चक्कर में फैमे है, ताश-वाश का सब चक्कर छूट गया। कभी हम- तुम साय सेला करते थे। वे दिन अब कहाँ ?"

86 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रननाएँ वे तुरन्त अपने पुत्र से बोले-"अरे रज्जू ! जा, फिर भीतर से ग्रामोफोन उठाला ।" लड़का ग्रामोफोन लेने चला गया तो मतसुखदास जी अपने ग्रामोफोन की विशेषताओं का वर्णन करने लगे-"आजकल असली जापानी चीज मिलती वहां है? वह तो बीस वर्ष पहले अचानक मेरे हाथ लग गया था। मैंने आज भी इसे संभालकर रख छोडा है।" मैं सोचने लगा था, जापान की प्रगति का महत्व इस बात से नहीं है कि वहाँ के लोगो ने पश्चिम की सभ्यता, संस्कृति और विज्ञान को अपनाया है और न ही इस बात में है कि उन्होंने निरन्तर उत्पादन और आविष्कारों में वृद्धि की है। उसका महत्व तो केवल इस बात में छिपा है कि जापान के लोग भारत के मध्यम वर्ग को जापानी ग्रामोफोन, जापानी घड़ियां, जापानी साड़ियां, जापानी रेडियो आदि हजारों प्रकार की घटिया, वेकार लेकिन सस्ती बस्तुएँ भेजकर उन्हें झूठा अह पाते रखने में सफल होते है। उस ग्रामोफोन को ही लीजिये, देखने में अत्यन्त आकर्षक, वजन में काफी हल्का, एकदम रेडियो जैसा लगता था और कीमत केवल पचपन रुपये। लेकिन हर महीने या पन्द्रह दिन बाद उसका फनर टूट जाना तो मामूली बात है। यह बात तो प्रसंग से हटकर है। हाँ, असल बात तो है गाने की। मनसुखदास जी ने एक रेकार्ड उठाया, जिस पर धूल की पतं जमी हुई थी। उसे साफ करते हुए वोले-"आपने यह गाना तो सुना है न-अब के बलमवा, परदेश मत जाइयो... "जी हाँ, मैंने तो यह फिल्म भी देखी है।" मनसुखदास जी को हमारा उत्तर सुनकर आश्चर्य हुआ। वे निराश हो उठे और दूसरा रेकार्ड उठाते हुए बोले-'हवा में उड़ता जाये, मेरा लाल दुपट्टा मल- मल का...' तो आपने अवश्य नही सुना होगा? न चाहते हुए भी निराश होकर हमें उनके आगे आत्म-समर्पण करना ही पड़ा-"हाँ, यह तो नहीं सुना।" "सो अब सुन डालो।" कहकर उन्होने रेकार्ड बनाना आरम्भ कर दिया। लेकिन शायद उनके ग्रामोफोन को हमारी दशा पर रहम आ रहा था। इसलिए उस पर आधा गाना भी न बन पाया था कि उसका फनर टूट गया था अन्य किसी पराधी के कारण धड़-घड् की आवाजें आने लगी। मनसुखदास जी का मुंह कडवाहट से भर उठा। उन्होंने आवाज दी-"अरे रज्जू ! यह ग्रामोफोन बन्द कर दे। फिर मुस्करावर बमे वडी- पुत्री को मवोधित कर घोले-~"वेटी संगीता,' गाना तो सुनाओ!" मनमुखदास जी को आवाज सुनकर बेचारी जरा त लाला मनसुखदासजी का संगीत-प्रेम : 87 है। वह लाज के मारे कानो तक लाल हो उठती है और सिर झुका लेती है। इस तरह हमें पूरा विश्वास हो गया कि संगीता गाना तो क्या, बोलना भी नहीं जानती होगी। किन्तु उरो विवश किया जा रहा है। जब संगीता कुछ देर तक टस से मस नहीं हुई तो मनसुखदास जी ने दूसरी चार प्यार से लेकिन तनिक ऊँची आवाज में कहा-"संगीता बेटी, हारमोनियम भी ने आना, मेरे कमरे में रखा है।" हमारी पलके पहले ही नींद के कारण झुकी जा रही थी। लेकिन विवश होकर धीरे-से संगीता से कहना ही पड़ा-"हाँ, सगीता वहिन, तुम कुछ सुना दो। मैंने बडी तारीफ सुनी है, तुम्हारे गाने की। हमारे गुड्डू की मां कह रही थी कि तुम बड़ा अच्छा गाती हो।" जो कुछ हमने संगीता से कहा था, वह कोरा और सफेद झूठ था। क्योकि न तो वैचारी संगीता अच्छी तरह गा सकती थी और न गुड्डू की मां गाना सुन सकती थी। क्योकि वह तो जन्म से ही बहरी है। और फिर बहिन सगीता- उसका क्या किया जाये कि भारत को स्त्रियां केवल दो ही प्रकार की होती है . एक माएँ और दूसरी बहिनें। यदि वह सुन्दर हो, युवा हो तो बहिन और कुरूपा हो तथा अधेड़ या बूढी हो तो मां होती है। भारत में स्थियो के बस दो ही प्रकार हैं। तीसरा कोई नहीं। क्योकि इनके बीच की विवाहित स्त्री तो स्त्री न होकर पैर की जूती बन जाती है। संगीता गाने लगती है । मनसुखदास जी हुक्का गुड़गुडाने लगते हैं। उनकी पत्नी पीढ़े पर बैठी अपनी पुत्री की ओर घूर रही है कि वह मेहमान की ओर देख तो नही रही है ! सगीता मध्यम बारीक कठ से स्वर को तनिक ऊंचा उठाकर गाने लगती है-"बलमा सिपइया, हाय रे तेरी बंदूक से डर लागे..." और हम गाना सुनते-सुनते करपना-लोक मे विचरने लगे। हम देख रहे थे कि किसी नाजुक वदन रूपसी ने प्यार की हिमाकत भी की तो एक कर सिपाही के साथ । कवि ने किस प्रकार विचित्र पात्रो का सूत्र पिरोया है ! सिपाही और रूपसी युवती। इन कवियों का मस्तिष्क भी विचित्र किस्म का होता है जो हर समय विचित्र कल्पनाओं की सेती करता रहता है । हम यही तक सोच पाये थे कि संगीता ने दूसरा गाना शुरू कर दिया- "या हबीबी, या हवीवी .. मैंने रक्खा है मुहब्बत अपने अफमाने का नाम, तुम भी कुछ अच्छा-सा रख दो, अपने दीवाने का नाम... हम सोच वैठे, आखिर इस 'या हवीवी' का अर्थ क्या है ? लेकिन हमारी समझ में कुछ न आया। तब साहस बटोर कर पूछ ही लिया--"यहिन संगीता, इस गाने की पहली पंक्ति या हबीवी' का क्या अर्थ है ?" " 86 : कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएँ वे तुरन्त अपने पुत्र से बोले---"अरे रज्जू ! जा, फिर भीतर से नामोफोन उठा ला।" लडका ग्रामोफोन लेने चला गया तो मनमुखदास जी अपने ग्रामोफोन की विशेषताओं का वर्णन करने लगे-"आजकल असली जापानी चीज मिलती कहां है ? वह तो बीस वर्ष पहले अचानक मेरे हाथ लग गया था। मैंने आज भी इसे संभालकर रख छोड़ा है।" मैं सोचने लगा था, जापान की प्रगति का महत्व इस बात से नहीं है कि वहाँ के लोगो ने पश्चिम की सभ्यता, संस्कृति और विज्ञान को अपनाया है और न ही इस बात में है कि उन्होंने निरन्तर उत्पादन और आविष्कारो में वृद्धि की है। उसका महत्व तो केवल इस बात में छिपा है कि जापान के लोग भारत के मध्यम वर्ग को जापानी ग्रामोफोन, जापानी घडियां, जापानी माडियां, जापानी रेडियो आदि हजारों प्रकार को घटिया, बेकार लेकिन सस्ती वस्तुएँ भेजकर उन्हें झूठा अहं पाले रखने में सफल होते है। उस ग्रामोफोन को ही लीजिये, देखने में अत्यन्त आकर्षक, वजन में काफी हल्का, एकदम रेडियो जैसा लगता था और कीमत केवल पचपन रुपये। लेकिन हर महीने या पन्द्रह दिन बाद उसका फनर टूट जाना तो मामूली बात है। यह बात तो प्रसंग से हटकर है। हां, असल बात तो है गाने की। मनसुखदास जी ने एक रेकार्ड उठाया, जिस पर धूल की पतं जमी हुई थी। उसे साफ करते हुए वे बोले----"आपने यह गाना तो सुना है न-अब के बलमवा, परदेश मत जाइयो..." "जी हाँ, मैंने तो यह फिल्म भी देखी है।" मनसुषदारा जी को हमारा उत्तर सुनकर आश्चर्य हुआ। वे निराश हो उठे और दूसरा रेकार्ड उठाते हुए बोले-~~-'हवा में उड़ता जाये, मेरा लाल दुपट्टा मल- मल का...' तो आपने अवश्य नहीं सुना होगा? न चाहते हुए भी निराश होकर हमें उनके आगे आत्म-समर्पण करना ही पडा--- --"हां, यह तो नहीं सुना।" "तो अब सुन डालो।" कहकर उन्होंने रेकार्ड बजाना आरम्भ कर दिया। लेकिन शायद उनके ग्रामोफोन को हमारी दशा पर रहम आ रहा था। इसलिए उस पर आधा गाना भी न वज पाया था कि उसका फनर टूट गया था अन्य किसी खराबी के कारण घड़-घड़ की आवाजें आने लगी। मनसुखदास जी का मुंह कड़वाहट से भर उठा । उन्होंने आवाज दी~"अरे रज्जू ! यह ग्रामोफोन बन्द कर दे।" फिर मुस्कराकर अपनी सबसे बडी तथा युवा पुत्री को सबोधित कर बोले--"वेटी सगीता, अब तुम आओ! जरा इन्हें अपना गाना तो मुनाओ!" मनसुखदारा जी की आवाज सुनकर बेचारी संगीता की बुरी हालत हो जाती लाला मनसुखदासजी का संगीत-प्रेम : 87 है। वह लाज के मारे कानों तक लाल हो उठती है और सिर झुका लेती है। इस तरह हमे पूरा विश्वास हो गया कि संगीता गाना तो क्या, बोलना भी नही जानती होगी। किन्तु उसे विवश किया जा रहा है। जव सगीता कुछ देर तक टस-से-मस नहीं हुई तो मनसुखदास जी ने दूसरी वार प्यार से लेकिन तनिक ऊंची आवाज में कहा-"सगीता बेटी, हारमोनियम भी ले आना, मेरे कमरे में रखा है।" हमारी पलकें पहले ही नीद के कारण झुकी जा रही थी। लेकिन विवश होकर धीरे-से संगीता से कहना ही पड़ा-"हो, सगीता बहिन, तुम कुछ सुना दो। मैंने बड़ी तारीफ सुनी है, तुम्हारे गाने को। हमारे गुड्डू की मां कह रही थी कि तुम बड़ा अच्छा गाती हो।" जो कुछ हमने सगीता से कहा था, वह कोरा और सफेद झूठ था। क्योंकि न तो बेचारी संगीता अच्छी तरह गा सकती थी और न गुड्डू की मां गाना सुन सकती थी। क्योंकि वह तो जन्म से ही वहरी है। और फिर वहिन सगीता--- उसका क्या किया जाये कि भारत को स्त्रियां केवल दो ही प्रकार की होती है : एक माएं और दूसरी बहिनें। यदि वह सुन्दर हो, युवा हो तो बहिन और कुरूपा हो तथा अधेड़ या यूढी हो तो मां होती है। भारत में स्त्रियों के बस दो ही प्रकार हैं। तीसरा कोई नहीं। क्योकि इनके बीच की विवाहित स्त्री तो स्त्री न होकर पर की जूती बन जाती है। संगीता गाने लगती है। मनसुखदास जी हुक्का गुड़गुडाने लगते हैं। उनकी पत्नी पीढ़े पर बैठी अपनी पुत्री की ओर घूर रही हैं कि वह मेहमान की ओर देष तो नहीं रही है ! संगीता मध्यम बारीक कठ से स्वर को तनिक ऊंचा उठाकर गाने लगती है-"बलमा सिपइया, हाय रे तेरी बंदूक से डर लागे..." और हम गाना सुनते-सुनते कल्पना-लोक मे विचरने लगे। हम देख रहे थे कि किसी नाजुक यदन रूपसी ने प्यार की हिमाकत भी की तो एक क्रूर सिपाही के साथ। कवि ने किस प्रकार विचित्र पात्रों का सूत्र पिरोया है ! सिपाही और रूपसी युवती। इन कवियो का मस्तिष्क भी विचित्र किस्म का होता है जो हर समय विचित्र कल्पनाओ की खेती करता रहता है। हम यही तक सोच पाये थे कि. संगीता ने दूसरा गाना शुरू कर दिया- "या हबीबी, या हबीबी... मैंने रक्खा है मुहब्बत अपने अफसाने का नाम, तुम भी कुछ अच्छा-सा रख दो, अपने दीवाने का नाम... हम सोच बैठे, आखिर इस 'या हबीबी' का अर्थ क्या है ? लेकिन हमारी समझ मे कुछ न आया। तब साहस बटोर कर पूछ ही लिया---"बहिन सगीता, इस गाने की पहली पंक्ति 'या हबीबी' का क्या अर्थ है ?"

88 : कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएँ बहिन संगीता लजाकर बोली-"मैंने फिल्म में ऐसा ही मुना था।" फिर बहिन सगीता ने तोमरे गाने का स्थर छेड दिया और उसके बाद चौथे का। हमने घड़ी देखो, ग्यारह से अधिक बज चुके थे। नीद के लिए आंग्रे इस तरह तरस रही थी जमे कई दिनों से प्यासा पानी के लिए तरसता है। ठीक उसी समय मनसुखदारा जी ने कहा--"सगोता, तू जाकर आराम कर, अब जरा रागिनी को भेज दे, दो-चार गाने वह सुनायेगी।" फिर हमारी ओर मुडकर बोले-"रागिनी आजकल शास्त्रीय-संगीत सीख रही है। उस्ताद गुलाम अली से, लखनऊ के माने हुए उस्ताद हैं, गुलाम अली।" फिर छोटी वहिन रागिनी ने शास्त्रीय संगीत की जो कंठ-फाड राग छेड़ी तो वरवस हमे वाह-वाह कर देना पड़ा। उस रात को नीद तो हराम हो चुकी थी क्योंकि जब हम बिस्तर पर पहुंचे तो रात आधौ से अधिक बीत चली थी। फिर मच्छरो का संगीत आरम्भ हो चुका था। जैसे-तैसे सुवह हुई । हम अपना मूट-केग संभालने लगे तो लाला मनसुखदास जी हैरानी से बोले- "यह क्या वर्खरदार !" "आप तो जानते ही है कि यह नौकरी बड़ी बुरी चीज होती है। हर जगह वदिश-ही-बंदिश । बड़ी मुश्किल से एक ही दिन की छुट्टी लेकर चला था। अव फिर कभी आऊंगा तव..." हालांकि हम सोचकर यही चले थे कि लाला मनसुख। दासजी को दो-चार दिन मेहमान नवाजी का अवसर देगे। लेकिन उनके परिवार के संगीत-प्रेम ने हमें मजबूर कर दिया था। स्टेशन की ओर बढते हुए मन मे वार- वार यही विचार आ रहा था कि जागरण की एक रात और लाला मनसुखदास जी के परिवार मे व्यतीत कर लेते तो शायद किसी रोग की शरण में अवश्य जाना पडता ! अव भी लाला मनसुखदास जी का मेहमान नवाजी का शोक याद आ जाता है और उमसे भी अधिक उनके परिवार का सगीत-प्रेम।

रंगमंचीय एकांकी
रवरच
मोगजी पाटीदार
पात्र
राजो का पुत्र
राजो : मृतक शिवराम की पत्नी (वा)
धन्नाराम
केवलराम : धन्नाराम का चाचा
जग्गाराम : प्रभावी ग्रामीण
समरत : जग्गाराम की पत्नी
भगतजी . सामाजिक कार्यकर्ता
गोपा : चार वर्ष का वालक
पहला दृश्य
[समय-सन्ध्या । सूरज डूबने चला है। नदी पार दूर-दूर फैले पेड़ो के झुरमुटों से
कोसों दूर पहाड़ी क्षितिज में इसके ओझल होने का मोहक दृश्य । सूरज की हल्की-
सो रश्मियों पहाड़ी पर बसे जीर्ण मकान को दीवारों को चूमती हुई विदा ले रही
हैं । घास-फूस व केवेलू को छत वाला यह छोटा-सा मकान दो भागों में बँटा है।
प्रवेश पूर्व की ओर है। मकान के बायीं ओर का भाग पशुओं के लिए एवं दायों
ओर का भाग निवास है । बीच में चौडा गलियारा है। इसके पीछे की दीवार
जीर्ण हो चुकी है। स्टेज के इस गलियारे के सम्मुख का भाग काफी नीचा है।
ज्यों-ज्यों आगे की ओर बढ़ते हैं, ऊँचाई बढ़ती जाती है। दीवारों को खूटियों पर
रस्सियां देंगी हैं। कई वस्तुएँ इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं। खजूर की पत्तियों की
बनी चटाई फर्श पर बिछी हुई है।
दिवंगत शिवराम की पत्नी राजो गलियारे के अन्तिम भाग और निवास

90 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ द्वार के बीच वंठो हुई है। हल्का-सा अंधेरा छा रहा है। शोक के कारण वह घर के भीतर ही रहती है । चूंघट काढे गलियारे में कभी वक्त-बे-वक्त आ जाती है। जब कभी पुरुष को आवाज या पदचाप सुनायी देती है तो भीतर की ओर हो जाती है। आंवलिक प्रथा के अनुसार शोक में काली साड़ी पहने है, जो काफी मलीन हो चुकी है। विलाप एवं रुदन ने मानो भाक्ल को बदल डाला है। चेहरा पीला पड़ चुका है। बदन सूखकर कांटा हुआ जा रहा है । बड़ी-बड़ी आँखें भीतर धंस गयी हैं। वर्तमान एवं भविष्य की चिन्ताओं ने मानो उसे झकझोर दिया है। धन्नाराम उसका बड़ा पुत्र है। जो पास के शहर में फेरी लगाता है। पिता मृत्यु का समाचार सुनकर घर आया है। थेगड़ों वाला पुराना पायजामा एवं कमीज पर्ने है। पहनावे से लग रहा है कि वह बहुत ही मामूली-सी राशि कमाकर अपने परिवार के पोषण में सहयोग दे रहा है। छोटा भाई गोपा अभी मात्र चार वर्ष का है वह सभी चिन्ताओं से दूर अबोध बना फिरता है। उसके तन पर मात्र एक फटी कमीज है। स्टेज पर हल्का अधकार छाया है। - धन्ना राजो . (दुर्बल एवं दबे स्वर में) धन्ना..'ओ'धन्ना ! चिमनी जला दे, बेटा ! (गोपाल रो रहा है । वह उसे चुप करने की कोशिश करती है।) (बाहर से ही आवाज आतो है) आया 'माँ...! [धन्ना का प्रवेश अरे, गोपाल...! माँ को तग न कर। आ जा। मेरे पास आ"चल, तुझे छाछ पिलाऊँ। [कहते हुए आगे बढ़ता है। गोपा : (कुछ आगे बढ़ने के बाद ठिठक जाता है) मुझे ' लोटी... देगा.''तो .। (भोलेपन से कहता है एवं आँखें मलते हुए कुछ आगे बढ़ता है।) धन्ना : हाँ."हाँ, दूंगा । अच्छा "जरा रुक जा। रोशनी कर लूं फिर देता हूँ तुझे रोटी। (भीतर जाकर एक हाथ मे चिमनी एवं दूसरे हाथ में जलता हुआ कंडा लिये आता है। फूंक मारकर कंडे से चिमनी जलाता है। उसे दीवार के सहारे लटके तख्ते पर रख देता है । चहूँ और रोशनी हो जाती है।) धन्ना : (गोपाल को अपने पास बुला लेता है । वह पैरों के सहारे खड़ा हो जाता है। धन्ना कभी मां की ओर देखता है तो कभी गोपा की और मां भीतर चलो (वेदना एवं आग्रह भरे स्वर से) परच:91 तुम्हे यहाँ वैठी कोई देखेगा तो क्या कहेगा? लोग तो बात-बात पर अंगुलियां उठाने लग जाते हैं। (यह स्तब्ध खड़ा मां को एक टक देखता रहता है।) राजो : (गंभीर चिन्ता की मुद्रा में दुर्बल व भावुक स्वर) बेटा ! मुझे कोई क्या कहेगा?''क्यो कहेगा ? (कुछ रुक-रुककर) रोशनी मेरे जीवन में है ही यहाँ ? अंधेरे को काली चादर ने मुझे अपने में समेट लिया है । तन्हाइयां जीवन के भविष्य को भी दबोच चुकी है । (स्वर भारी हो जाता है) मुझे कौन देखेगा? क्यों देरोगा? खुशियां सदन में और आशाएं निराशाओ मे बदल चुकी हैं, बेटा ! (यह रो देती है, आँसू ल.फ पड़ते हैं।) धन्ना : (भारी आवाज से गंभीर मुद्रा बनाकर) भावनाओ मे न वही माँ ! हमे सहारा दो। उठो, पिता का साया उठने के बाद अब तुम्हारे सिवा हमारा कौन है ? तुम रो-रोकर सूखकर कांटा हुई जा रही हो। मेरा मनोबल ऊंचा उठाओ। मुझे अधिक दुःखी न करो, माँ ! अन्यथा हम कही के न रहेगे। तुम इस तरह कब तक यादो के गुबार ला-लाकर रोती रहोगी? राजो : (उसी स्वर में) रोने के सिवा अब मेरे पास रह ही क्या गया है ? जीवन का सत्य तो काल का ग्रास बन गया। अव छल, कपट, न्याय और फरेव के समक्ष काल के अंधेरे भविष्य को कैसे व्यतीत करूं। मुझे कौन सहारा देगा। (सिसकियां भरती धन्ना : (गोपा को वहीं खड़ा छोड़ बढ़ता है। मां के पास दायां घुटना टेक कर बैठ जाता है। एक हाथ राजो की ओर बहाता है तो दूसरे से अपनी आंखें पोंछता है।) मां ! हिम्मत बांधो। रोज सीय देने वाली मां को इस तरह कमजोर देख मेरा हृदय व्यथित हो उठा है। मेरी तरह तुम भी पत्थर बनो। पिता की मौत का रंज किस औलाद को नहीं होता, लेकिन जीवन में हिम्मत हारने से काम नहीं चलता है। (वह उठ खड़ा होता है ।) यह सब-कुछ देखकर तुम्हें कुछ नहीं होता? हृदय परिवर्तन करो। गंगा कभी उल्टी नहीं बही । सूरज कभी पश्चिम में नहीं निकला माँ ! तुम मुझे महारा दो। कठिनाइयों से जूझने की हिम्मत बंधाओ। राजो : (गोपा उसको ओर जाता है। वह उसे गोद में बिठाती है।) तुम्हीं मेरी आशा और विश्वास हो धन्ना । मैं जानती हूँ कि 92 : कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएं । धन्ना . तुम्हारी अपार व्यथा ने तुम्हे दोच लिया है, फिर भी मेरे दुख को भुलाने के लिए क्या कुछ कर रहे हो। लेकिन हिम्मत बांधे भी नहीं बांधी जाती। भीतर से मुबारे से उठते हैं । अतीत तो भुलाना आसान नहीं होता। टूटे हुए तानपूरे से स्वर भरना मभव तो नहीं है। (गम्भीर किन्तु समझाने की दृष्टि से) सन्तान समझदार हो तो सव दुख भुलाये जा मकते हैं। एक नही हजार तानपूरे के तारो को बदलकर स्वर लहरियां पैदा की जा सकती है मां। (व्यथित हृदय से) दुख के पहाड सब पर टूटते है। कई विधवा माताओं को अपने बेटों के सहारे की आवश्यकता पड़ती है। वे भी तो वेटों के सहारे गुजर-बसर करती होंगी। राजो . मैं उन्ही अभागिनो मे से हूँ। लेकिन वे सब कुछ सह चुकी है। धन्ना : फिर, तुम क्यों कमजोर हुई जा रही हो, मो? राजो : क्रूर-काल के शिकाजे मे जो फैसी हूँ। माया-मोह के घेरे में बन्द ही तो हूँ। धन्ना : इससे आर उठो। जीवन धूप-छांव है। इसमें कभी 'अमृत तो कभी जहर भी पीना पडता है। राजो . वेटा ! मेरा हृदय हल्का करने के लिए यह क्या-क्या कहते जा रहे हो। मैं तुम्हारी विवशता को समझ रही हूँ। मैं सच कह रहा हूँ। तुम हार चुकी हो । एक मां कभी सन्तान के सामने इस तरह हौसला-पस्त नही होती है। (आगे बढ़ते हुए आग्रह से) उठो, तुम मुझे सहारा दो, ताकि मैं भविष्य की आशा बनकर इस गहरे विषाद को खुशियों का वातावरण दे सकू। राजो : मुझे दुखी देखकर तुम दुखी न हो। मैं एक औरत हूँ। पर- मात्मा ने औरत को बनाया ही दुखों को झेलने के लिए है। आखिर नारी मन से न चाहते हुए भी सहन करती ही तो है। गोपा (उठकर आगे बढ़ता है) भईया...मुझे...भूख... लोटी...ओल चाच...खाऊँगा। धन्ना : (मां के पास जाकर सहारा देते हुए) उठो मौ! हमारे सामने और भी चिन्ताएं हैं। चुनौतियों का सामना करना बाकी है। राजो : (उठती हुई) लगता है मुझे चक्कर से आ रहे है...। (दो कदम आगे बढ़ने के बाद रुक जाती है) यही बैठने दे मुझे-~-देर में चलूंगी.... गोपा को याना दे दो। (वह लड़खड़ाती हुई एवं ..लगी है... .

खरच : 93 धन्ना . भारी आवाज में बोलती हुई बैठ जाती है।) गोपा : चलो...न...मां...मैले...सात...तुम...नही खोओगी लोटी और चाच...1 राजो : (सिर पर हाथ फेरती हुई) तुम खा लो, जाओ। मैं फिर खा लूंगी (प्यार से) जाओ वेटा ! (गोपा की अंगुली पकड़े भीतर की ओर जाता है।) ठहर जा देता हूँ। (वह लटके हुए छोंके की ओर बढ़ता है, छोंके मे देखते ही स्तम्भित रह जाता है। रोटी गायव है। छाछ को हँडिया को नीचे उतारता है।) भैया ! छाछ पियेगा न .(दुःखी मन से) गोपा : नहीं अकेली...चाच नही...पिऊँगा। लोटी...भी खाऊँगा। धन्ना : ले छाछ पी ले...! रोटी बिल्ली खा गई है। मां फिर बना देगी, तब हम दोनो फिर खाएंगे। गोपा : ॐ...हूँ...नही ..ॐ...ॐ...ॐ ..(वह जमीन पर गिरकर मचल जाता है। (वह व्यथित हृदप से उसे पुचकारता हुआ उठाता है। कटोरी मुंह से लगा देता है। बालक भूख से व्याकुल होने के कारण छाछ पी जाता है । वह उसे राजो के पास बैठा देता है।) मां, आज तो दिन कट गया, लेकिन कल के लिए आटा नहीं है। अभी तो समरत काकी रोटी बना देगी, लेकिन व्यवस्था तो करनी ही है। राजो : (दुःखी भाव से विवशता बताते हुए वेटा, एक दुःख होता तो सहन भी हो जाता। इन हमार दुखो को झेलकर कैसे जिन्दा रहे । चारों ओर से घेरे जा चुके हैं। धन्ना : कोई उपाय तो सोचना ही पड़ेगा। आखिर कब तक चलेगा धन्ना . । ऐसे। राजो : तू अपने साथ कितने रुपये लाया है। शहर में किसी और से उधार ले आना था। धन्ना : (एक बार ऊपर की ओर देखता है, फिर राजो की ओर देख कर एक सम्यो सांस लेता है) वह शहर है, वहां कौन किसको उधार दे मां। वहाँ तो सब भूसे ही लगते हैं । रुपये को हवस वहीं तो बहुत ज्यादा है । सब मांगने वाले मिले, देने वाला कोई नहीं। फिर, मेरे कपड़ो और शक्ल को देखकर ही लोग तो असलियत को समझ जाते है।

94 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ धन्ना . राजो . लेकिन, तेरे पास कुछ रुपये तो होंगे ही? धन्ना (एक दोघं निश्वास छोड़ते हुए) सिर्फ पचास रुपये है। महीना भर गलियों में चिल्लाता रहा-ऊदरा की दवा लो, मच्छर की दवा लो, खटमल की दवा लो। मो, चिल्ला-चिल्ला कर हड्डियां निकल आयी है । जब जाकर सौ रुपये जोड़े। जिनमे से पचास पर्च हो गये वाकी साथ लाया हूँ। राजो . सुन, इस तरह की घर की वातें समरत काकी को न कहना । लोगों के सामने कहती फिरेगी, तो हमारी मजाक उड जायेगी। कहेगी-हमारे तो घर में खाने तक को दाना नहीं हैं। छोकरा भी कपूत निकला जो कुछ नहीं कमाता है। न जाने क्या-क्या बातें हो जायें। (विवशता भरी दीर्घ श्वास लेते हुए) ठीक है, ठीक है मां । ये दिन सदा नही रहने है । अपने पुरुषार्थ से मै अपना भाग्य बदलूंगा। इससे भी ज्यादा कप्टों को सहने की क्षमता लाऊँगा। तकदीर भी यदि साथ न दे तो उसकी भी छुट्टी। मैं अपने हाथों को जगन्नाथ बनाऊंगा। राजो : (समझाने का प्रयत्न करती है ।) विधि के विधान से कार कोई नहीं उठा, बेटा ! ईश्वर पर भरोसा रखकर कर्म करो। अपने दिवंगत पिता से सीखो। खेतों में वे कितनी मेहनत करते थे। कभी कुछ मिलता तो कभी कुछ भी नहीं मिलता था। फिर भी अपने दम पर विश्वास रखते थे। (बाहर की ओर देखते हुए) लो, वह समरत काकी आयी। आओ काकी ! तुम्हारा ही इतजार था। समरत हाँ...हाँ, (हाथ नवाती हुई) आयो नही...मरी। कह मरी! हाय राम! मुझे तो मौत भी नही आती (चेहरे पर उदासीनता के साथ ही क्रोध झलक रहा है) राजो : तुम यह क्या कह रही हो? (एकटक देखते हुए) क्या कुछ बोलना हो गया है उनसे! समरत : बोलना होता कब नही ! जब देखो तब झगड़े-टंटे । मैं तंग आ चुकी हूँ। ऐसे वेगरत आदमी से । भगवान मौत दे दे तो अच्छा है, ऐसे जीने से तो...! राजो : (सहानुभूति दिखाते) ऐसी अशुभ बात मुंह से न निकालो जिनपर विपत्तियों के पहाड़ टूट पड़े हैं, उनसे पूछो मौत कितनी भयानक होती है। कहो, कहना क्या चाहती हो? धन्ना .

खरच : 95 समरत . कुछ नही बस...कुछ नही (गुस्से से लाल हो जाती है।) भगवान इस जनम मे अच्छे करम कराना ताकि ऐसा आदमी फिर तो न मिले। धन्ना : तुम अपनी परेशानी बताती क्यो नही ! अपने स्वामी के लिए ऐसा कुछ कहना ठीक तो नही काकी! समरत : मैं तुम्हारी परेशानी तो कम नहीं कर सकी, फिर मेरी उलझने तुम पर लाद दूं। नही...नही (कुछ एककर) राजो, तुम पर विपत्ति जरूर आयी है लेकिन चम्पा, सोभा और रामी को याद करो। उन्हें देखकर तसल्ली करो। कितनी छोटी उमर मे वैधव्य का भार आ पड़ा है उन पर। उनकी तरह तुम भी दिल पर पत्थर रखकर इन बच्चों का सहारा वनो। धन्ना : (बात काटते हुए) काकी ! तुम वात बदल क्यों रही हो ! सच- सच क्यों नहीं बताती । जग्गाराम ने कुछ कहा है क्या? समरत (एक लंबी सांस लेते हुए) कुछ नहीं कहा ! धन्ना : फिर इतनी विवश क्यो लगती हो? समरत वस, वैसे ही समझो। औरत को तो आदमी के पैर तले देवकर ही तो रहना पड़ता है। लोग शादी क्या रचाते हैं, औरत को तो मानो खरीद ही लेते है । धन्ना (आशंकित होता हुआ) हमारे लिए तो कोई चर्चा नही चली? राजो : (बीच में ही) क्यो नही चलेगी चरचा, उन पर ही तो खर्च का भार है। अच्छा बुरा उन्हें ही तो सोचना है। हमारी नाक रखने की चिन्ता उन्हें भी तो होगी। धन्ना : माँ ! मुझे भी तो चिन्ता है। पिता के पिण्डदान की व्यवस्था तो आखिर करनी ही है । काकी ! गोपा सो जायेगा । हम भी भूखे है । तुम खाना बनाओ। मैं जाता हूँ। उनसे मिलता हूँ। [सब भीतर चल देते है] (पर्दा गिरता है] . । दूसरा दृश्य [समय--रात्रि । शिवराम के छोटे भाई केवलराम का वैसा ही जीर्ण मकान। आंगन में पुराने खंभों पर बना ओसारा। खाट बिछी हुई है। लकड़ी के पुराने खंभे पर लटका लालटेन हल्का-सा प्रकाश फैला रहा है। एक संमे के सहारे बैल बंधे हैं । केवलराम दुबला-पतला इफहरा बदन एवं श्यामवर्ण है । यह पुरानी 96 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ धोती व कुर्ता पहने एवं सिर पर साफेनुमा सफेद कपड़ा बांधे है। एक ओर साट पर जग्गाराम बैठा है। भारी-भरकम प्रारीर एवं रंग हल्का गोरा है। बड़ी-बड़ी मूंछे रोबोते चेहरे को परिचायक हैं। पत्नी की ओर से--शिवराम के घर से मामूली-सा रिश्ता होने के कारण औपचारिकता तक ही अपने को सीमित ररो - . केवतराम . (अधुपूरित आँखों से) उन पर क्या बीती? कैसे बीती ? यह तो मैं ही जानता हूँ, जग्गू भाई ! कहने को होता हूँ तो दिल भर आता है। जग्गाराम (अफसोस भरे स्वर से) दवाखाना तो कोई खास दूर है नहीं, तुम उसे वहां क्यो नहीं ले गये ? केवल राम : दवाखाने के लिए सोचा ही था कि मलेरिया वाले डाक्टर साहव आ गये। उन्होने बताया कि भाई के पेट मे गांठ है। इसका तो ऑपरेशन करना पड़ेगा। एक हजार से कम का खर्चा नहीं बैठेगा। जगाराम : अरे भले आदमी ! वह डाक्टर थोड़े ही है। वह तो मलेरिया की गोलियां बांटने वाला है। ऑपरेशन करना पड़े, न करना पड़े. उसे क्या मालूम था ? फिर रुपयों की व्यवस्था करके चले तो जाना था। केवलराम : (सहमकर) रुपयों की व्यवस्था तो कर ही रहा था, लेकिन...। जग्गाराम : (बात काटकर) लेकिन क्या ? यो कह कि व्यवस्था हो न सकी। अरे, मुझे ही बुलवा लेता। मैं तो पड़ोस के गांव ही तो गया था। शहर तो सध्या समय गया था। [धन्नाराम का प्रवेश] धन्ना : (व्यंग्य एवं दु.ख के मिश्रित स्वर में) आप मेरे बापू की मदद नहीं कर सके । मुझे तो आप पर भरोसा था कि कभी मुसीबत आयी तो आप जरूर साथ देंगे। [आंखें सजल हो जाती है] जग्गाराम : तेकिन, कोई कहे जब न...। शिवराम की बीमारी का पहले तो मुझे पता भी नहीं था । तेरी काकी तक ने भी तो पहले कभी नहीं कहा । शहर गया था वहाँ से आज ही लौटा हूँ। धन्ना : (ध्यंग्य से) अब तो पता चला न शायद जमीन के झगड़े के बदले का यही मौका समझा होगा। ऐसा अबसर और कव मिलता? ।

97 जम्गाराम : (अपने को निर्दोष बताते हुए) नहीं नहीं, धन्ना ! यह तुम गलत समक्ष गये। भला ऐसे समय कोई बदले की भावना रखता है। फिर हमारी कोई ऐसी दुश्मनी भी तो नहीं थी। जमीन-जायदाद के मामले तो चलते रहते है। केवल राम : (चोच ही में) ऐसा नही मोचते धन्ना । जग्गा भाई मौजूद होते तो तेरे बापू का कुछ नही विगडता। विपत्ति के समय कोई बैर निकालने को नहीं गोचता है। धन्ना : आप भी तो प्रयल करते? क्या आपको किसी ने रुपये नहीं दिये? केवलराम : दरद अचानक उठा था। (विवशता बताते हुए) इतनी जल्दी रुपये किससे लेता विना गहनों के व्यापारी तो कोई देता नहीं है, फिर मैं किसके पास जाता? धन्ना : उप, कुसमय में मेरे मब के सब दुश्मन बन गये ! (अफसोस के साथ) मुझ पर किसी को भरोसा नहीं रहा जग्गाराम : (केवलराम से) इसकी मां के गहने ले लेते। वह ऐसे वक्त मनाही तो नहीं करती। केवल राम : (गम्भीरता से) यह कहानी कुछ और ही है। न सुनो मुझसे इस बारे मे जग्गा भाई ! (आँखें मलता है) जग्गाराम : (जिज्ञासापूर्वक) क्यों ? क्या हुआ? गिरवी हैं क्या किसी के 1 पास? धन्ना : नही, गिरवी नहीं हैं । वेचे जा चुके है । जग्गाराम : (आश्चर्य से) तुम यह क्या कह रहे हो? धन्ना : हाँ, मैं सच कह रहा हूँ। जग्गाराम : (हमदर्दी दिखाते हुए) क्यो? ऐसा क्या काम आ गया कि गहने भी बेच दिये? धन्ना : (गम्भीर बनकर) लोग मोचते है कि गहने वक्त पर मनुष्य का साथ देते हैं। इसलिए बनवाते हैं । छनक-मनक तो दूसरा पहलू है । लेकिन मेरे बापू कुछ और ही मिजाज के आदमी थे। उन्होंने सोचा कि गहने क्या काम आयेंगे। इन्हें बेच दूं। बच्चों का पेट पालूं । जागाराम : तो क्या खाने-पीने में ही सब उड़ा दिया ।... धन्ना : (शिकायत के लहजे में) तुमने कभी इतना भी ध्यान नहीं दिया। इतना तो सोचा होता कि वे कब, क्या और किस तरह काम करते है।

98 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएं धन्ना - जग्गाराम. जग्गाराम : मैं तो बिलकुल ही अनभिन हूँ। मैं नहीं जानता कि वे कब क्या करते थे। इतना जरूर है कि उन्होंने परिश्रम से कुआं बनवाया और रहट परीदा । फिजूलपर्ची का तो मुझे ध्यान ही नहीं। (लम्बी सांस लेते हुए) वे फिजूलखर्ची कतई न थे। उनके पयाल की नई आशा उनके मौत का कारण बन गयी।वर! कोई बात नहीं, उन्होंने तो अच्छा ही मोचा था। जग्गाराम : तुम कहना क्या चाहने हो ? स्पष्ट कहोन"" केवलराम - (धन्ना को विवशता को समझते हुए) मेरे भाई ने बहुत ही बुद्धिमानी का कदम उठाया था। लोगों को एक सबक सिखाया है । जग्गाराम ! उनके खेत पर कुओं और रहंट जो तुम देख रहे हो, वह उन्ही गहनों से बनाया है। लेकिन, इम बजर भूमि का लहलहाना वे देख भी नहीं पाये। इसमे बुराई क्या थी? यह तो बहुत अच्छा किया। घर में गहने-भर रखने से क्या लाभ ? मुझे तो इस कदम के लिए मन- ही-मन बहुत खुशी है। यह दूसरी बात है कि एक संयोग ऐसा हो गया । इनको भी तो क्या मालूम था । सबके साथ तो ऐसा होता नहीं है। केवल राम . लेकिन यह सब कुछ उनके तो किसी काम न आया (आँखें पौंछता हुआ) भगवान ! ऐसे फूटे भाग किसी को न देना। धन्ना : काका !इन आंसुओ को बहने दो, और बहने दो, पोछो नहीं...। ये गले का हार बनना चाहते हैं । वहने दो इन्हे 'काका ! यहने दो। ये ही एक दिन रोशनी दिखायेंगे। जग्गाराम : तसल्ली करो केवल ! रोने-धोने से अब क्या होता है, हो गया है उसे सहन करते हुए आगे को सोचो ! केवलराम : (उसी मुद्रा में) क्या सोचूं । किस तरह सोचूं । कुछ भी तो समझ में नहीं आता। जग्गाराम . खरच की भी तो व्यवस्था करनी है। उसके लिए क्या सोचा है। केवलराम . (दुःखो भाप से) यह भी तो एक पहाड़-सा लग रहा है। धन्ना : (तसल्ली देते हुए)काका ! अब चिन्ता आपको ही नहीं, इनको भी करनी है। हमारे पास तो है ही क्या ? केवलराम : हमारे लिए ये क्या करें? यह तो हमारे घर का मामला है। धन्ना : (व्यंग्य से) जीते जी साथ न दे सके तो मरने के बाद भी नहीं देंगे। शायद झगड़ा अव तो वाकी नही रहा होगा। जग्गाराम : (डांटते हुए) तू इस तरह न बोल, धन्ना ! मेरा तेरे बापू खरच 99 माथ काई बर नहीं रहा। मेरा मजाक बनाने की कोशिश न कर । क्या शिवराम मुझे प्यारा नहीं था ? मेरी उसके प्रति क्या भावना थी, यह मैं ही जानता हूँ। तू नादान क्या समझेगा। नाहक भावुक बन रहा है। मुझे क्या करना है, वह मैं समझ फेवलराम : (समझाने के ढंग से) तू ना समझी में न बोल, धन्ना ! किसके साय कसे बोलते है, यह ध्यान रखा कर जरा.... धन्ना : (गुस्से से होंद काटता हुआ) म सब जानता हूँ। केवल राम : सब क्या जानता है ? (डांटते हुए) पिता के सोग का तो ध्यान रस, कोई कहे तो क्या कहे ? धन्ना : (एक लम्बी सांस लेते हुए) बस, यही कि मैं नादान हूँ। केवल राम : छोड भी ऐसी बातो को...। जग्गाराम : (बात का ज्यादा युरा न मानते हुए) अब आगे क्या करना है ? सोच लो, कोई दो हजार का खर्च है। केवलराम : पर्च तो बहुत ज्यादा है। खेत तो मात्र दो ही है। यदि किसी को दे भी दें तो घर का गुजारा कैसे चले। (एक लम्बे श्वास के साथ परेशान-सा) हां...पर बेच के तो तीरथ जा नहीं सकते है। बिन गजे को गधी अहमदाबाद का भाड़ा करे भी कैसे। कैवलराम । हाँ, ठीक है, लेकिन सर्च के लिए कुछ करना तो है ही है। जग्गाराम : घर में भी तो अनाज ज्यादा नहीं होगा फिर घी की तो बात ही धन्ना और है। धन्ना : अभी तो गुजारे का ही है । ज्यादा कुछ नहीं । सबके पेट भी तो पालने पड़े । मेरे पास तो मात्र पचास रुपये है जो चाय-नमाखू के लिए भी नाकाफी हैं। केवलराम : (स्मरण करता हुआ) अरे हाँ, मैं तो भूल हो गया । आप बोडी-तमाखू तो पीते नही, चाय तो बनवा दूं। (वह भीतर जाने को होता है) जग्गाराम : नहीं, यह जरूरी नहीं। धन्ना : गुड़ की नही, शक्कर की बनवाता हू । थोड़ी तो ले लेना। जग्गाराम : दूध भी तो नहीं होगा। केवलराम : बागड़ ही बनवा लेते है। मैं आपको और क्या सेवा करूं? (अफसोस के लहजे में) 100 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ जग्गाराम . लेकिन, थोडी ही बनवाना। (कुछ रुक कर) केवल ! एक काम करो। . केवल राम : क्या? हो, रुकना जरा'" "(यह भीतर की ओर जाकर वापिस आ जाता है।) जग्गाराम : सेठ धनपाल के पास जाकर मेरा नाम लेकर कहना, वह रुपये कितने मूद पर देता है। कहना--जामीन जग्गू देगा। उमका रुपया समय पर अदा कर देंगे। केवलराम वह माने जव न जम्माराम क्यों नहीं मानेगा? वह मान जायेगा। आखिर उसे हमसे ही तो कमाना है। धन्ना काका ! मैं उसका सूद नही भर सकता हूँ। मेरे बापू की तरह मैं भी कर्ज में जी कर, कर्ज मे ही नहीं मरना चाहता। जगाराम तो और क्या उपाय है ? व्यवस्था कहाँ से हो? धन्ना : आप मेरा कहना माने..। [केवल भीतर की ओर जाकर चाय लेकर आता है। जग्गाराम कटोरी से चाय पीता है। वे दोनों नही पीते है जग्गाराम (चाय को चुस्की लेते हुए) वोलो, क्या कहना चाहते हो ! कोई नई बात सोची है क्या? धन्ना . हाँ, मैं अपने खेत हिस्से पर किसी को दे दूंगा। आप बैल और गाडी का सौदा कर दीजिए। केवल राम : यह कैसे हो सकता है । यह तो असंभव है। धन्ना . यह असंभव नहीं है काका। सभव इसलिए है कि इतनी छोटी जोत पर जीकर मैं कर्ज नहीं भर सकता और न ही परिवार का पोपण ही कर सकता हूँ। फिर महाजन का भारी सूद तो मैं भर ही नहीं सकता हूँ। जग्गाराम : ऐमा ही चाहते हो, तो मैं जाता हूँ। देखता हूँ जो ठीक हो वही करूंगा । (चाम को कटोरी भूमि पर रख देता है) [वह जाता है] धला : काका! उनके पास भी तो बहुत-सा अनाज भरा पड़ा है। हमारी थोडी मदद करने से कौन-सा कम हो जायेगा। हम रात तो मांगते नहीं है। फिर काकी भी तो हमारे रिश्ते में केवलराम : (अफसोस से) हमारी गरीबी पर कौन तरस पायेगा ? फिर, खरच: 101 धन्ना धन्ना . हमे दया की भीख भी तो नहीं चाहिए। यह भीख नही सहयोग है। देहात के लोग तो मयोग से ही तो जीते हैं। केवलराम (चेहरे पर गम्भीरता लिए हुए) हमारे पास कुछ नही, इमका मानी यह तो नहीं कि हम अपना स्वाभिमान खो दें। इसमे स्वाभिमान की क्या बात है ? हम तो उधार ले रहे है। केवलराम • क्या तुम उधार लेकर सदा के लिए उसमे दवा रहना पसन्द करोगे? धन्ना : इसमे दबने की क्या बात है ? केवलराम : जरूर है, मौके-बे-मौके वह सुना सकता है कि तेरे बाप का खरच तो मेरे उधार से हुआ था। इतनी जल्दी भूल गया क्या? वताओ, उस समय तुम्हारा क्या जवाव होगा? धन्ना : यह भी ठीक है यह हमारे स्वाभिमान का मामला है, समय पर उनको कहने का मौका देना ठीक नहीं । इससे तो अच्छा है कि हमारे पास जो है, उसे वेच कर काम चलावें। केवलराम : इसका मानी यह भी नहीं कि किसी से कभी सहयोग ही न लें? धन्ना : क्या मतलव ? केवल राम : मतलब यह कि जग्गाराम जैसे व्यक्ति जो लोगो को अपने तले रखना चाहते है, कभी भी ताना मार सकते हैं। ऐसे लोगों का सहयोग हमे नहीं चाहिए। [समरत का प्रवेश समरत : धन्ना रे...!(हाय के इशारों से आग्रह करती है) मेरे साथ चल । धन्ना : क्यो? कोई खास काम है क्या? समरत : खरच के लिए तेरे काका मे कुछ वात करवा दूं। घर में हैं फिर और कहाँ मांगने जावें। धन्ना : वो तो हो चुकी बात। समरत : क्या बात हुई ? कुछ देने के लिए कहा है उन्होंने ? धन्ना : नहीं, यही कि वैल और गाड़ी वेचकर बापू के परच की व्यवस्था करें। समरत : ऐसा नहीं होगा । सूद पर कुछ रुपये ले लो। कुछ मैं सहायता करूंगी। धन्ना : ऐमा जग्गा काका ने तो नहीं कहा, फिर आप कहाँ से देंगी? समरत : (ताने के ढंग से) किसी को कहा हो जब कहे ना । अपने पराये का पयाल ही तो कहाँ रहता है, उन्हें ? हमारे बीच झगडा भी 102 : कौमी एकता की नलाश और अन्य रचनाएँ तो रोज ऐगी यानों का होता है। धन्ना : आपको मेरे प्रति सहानुभूति है. यही यहुत कुछ है कारी । तुम व्यर्थ भी उलझन मे न पडओ। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे घर में फलाह पैदा करू । मुही युछ भी न पाहिए। [जग्गागम का प्रदेश, ममरत उसे देनते ही धीरे-में मत देनी है। जग्गाराम : पेवल ! तुम जाओ, मैया भाईरी बल और गाड़ी की बात तय करो। फेवलराम (जिज्ञासा से) मेठ जी ने क्या कहा? जग्गाराम निराशा के स्वर में) उगका रुपया हमारे काम का नहीं ! फेवलराम : (यही जिज्ञासा) मयों, मग मूद मांगते हैं ? जग्गाराम । (परेशान-सा होता हुआ) पन्द्रह रुपये मैकड़ा पट्टा काट करके देना, और तिम पर भी व्याज पांच रुपये सैकडा माहवार । धन्ना : मैं यही तो कह रहा था। ग जोक गे सौदा नहीं हो सकता है। सारे गाय को लूट कर या गया। कोई कुछ कहना भी तो नहीं है केवलराम कोई भी क्या कहे ? गवको अपनी गरज प्यारी होती है। हमारी मजबूरी से ही तो लूटता है। देखते नहीं, कितना पेट बढ़ाया है। गरीबों का पा-खा कर इस कमीने ने । इस कसाई को किसी पर भी रहम नही आता धन्ना : काका! इस तरह का हराम का रुपया आगे जाकर पागल औलाद पैदा करता है। एक, दो, तीन मे नही, तो सातवीं पीढ़ी तक जाकर भी तो अमर होता ही है, और बाद में सब साफ हो जाता है । एक नहीं, सैकड़ों उदाहरण हैं ऐमै । कैवलराम : (उपेक्षा भाव से) ऐसी बातो में हमे क्या लेना! हमे तो अपने काम से काम । मैं जाता हूँ। केवलराम का प्रस्थान] लघु यवनिका धन्ना : (आगे बढ़ते हुए) काका! मुझे एक ख्याल आया है। कुरान मानो तो कहूँ। जग्गाराम : कहो, इसमे बुरा मानने की क्या बात है भला! अपने विचारो की सबसे स्वतन्त्रता है । (उत्सुकता मे ध्यान देकर सुनता है।) धन्ना : आज मुझ पर मुमीयत है, इसलिए मैं समझ पाया कि परच खरच: 103 कितना मंहगा होता है। किस तरह घर वरवाद होते हैं । मेरी तरह और लोग भी तो दुखी होते होगे। जग्गाराम : मोतो है ही सोचते भी हो तो क्या हो? यह तो पिण्डदान है। आदमी जीवन भर कमाता ही तो है। अपने साथ क्या ले जाता है। मरने के बाद का यह दान ही तो आगे काम आता है। यह तो हमारी परम्परा है। शास्त्रो में भी तो उसका उल्लेय मिलता है। धन्ना : शास्त्रों में भले ही लिखा हो। धर्म इमका हिमायती क्यों न हो, लेकिन मैं इसका विरोध करते हुए इतना तो जरूर सोचता हूँ कि आज के समय और परिस्थितियों को देखते हुए परिवर्तन जरूरी है। सबको खिलाना, यह तो हमारी रूढ़ि है । दान कसे हुआ ! आप मेरे पहां खाते हैं, मैं आपके यहाँ खाता हूँ। यह तो...पत्तल के बदले पत्तल है, दान कहां हुआ। जग्गाराम : (बात को समझते हुए) तो तुम्हारे कहने का मानी परच हो ही नही। धन्ना : काका! आज वह समय तो नही, जब यह काम हर कोई आमानी से कर सकता है । विपमताओ एवं महगाई के जमाने में आदमी यह भार कैसे सह सकता है। आप देख रहे है। (अपनी कमीज बताता हुआ) मेरी कमीज पर कितने थेगड़े लगे हुए है। यानी कि मुझे कपड़ा पहनने को नहीं मिल रहा है मेरे जैसे और कितने भाई होगे ऐसे। जग्गाराम : परम्पराओं को निभाना ही तो होता है ? दुख किसके जीवन मे नही आते हैं। मगर महज ऐसी बातों मे रस्मों-रिवाज को टाला तो नहीं जा सकता है । धन्ना : शायद, आप यह सोचे कि मुझे खरच करना पड़ रहा है । इस- लिए मैं वचने की सोचता हूँ। लेकिन यह एक गम्भीर प्रश्न है। गरीबो को घरवादी मे बचाने का एक मात्र उपाय है । समय रहते एक उपयोगी कदम है। जग्गाराम : यह तुम्हारे और मेरे हाथ की बात नहीं है। यदि तुम ऐमा नहीं करते तो लोग जमीन पर चलने नहीं देंगे। कदम-कदम पर उलाहने मुनने मिलेंगे। हर कोई यही कहेगा, तू किस मुंह से बात कर रहा है । तेरा बाप तो राय मे डटा पड़ा है । पेट तो कुत्ता भी भरता है, तूने जीकर क्या किया? याप का खरच भी नहीं हुआ।

104 : कोमो एकता को तलाश और अन्य रचनाएँ धन्ना : यह मेरा एक विचार है । आप बडे लोग ही इम पर सोचना । इस बारे मे मैं अकेला क्या कुछ कहूँ। समाज सुधारक तो हूँ नहीं । मैं चलता हूं। आप कल दिन में घर जरूर आना।' (सहानुभूतिपूर्वक) हां, मैं कल आऊँगा। बैठकर बात तय कर जग्गाराम । लेंगे। [पर्दा गिरता है तीसरा दृश्य [समय-दोपहर । वही धन्नाराम का मकान । प्रथम दृश्य वाली स्थिति। राजो घर के भीतर बैठी सोग मना रही है । स्टेज वाले गलियारे में खजूर को पत्तियों को बनी हुई चटाई बिछी हुई है। जग्गाराम उस पर बैठा है । एक ओर दीवार के सहारे मायूस चेहरा लिये केवलराम बंठा है। धन्नाराम फटे-पुराने कपड़ों मे उदास-सा हाय में लोटा लिये पानी पिला रहा है । गोपा कभी बाहर आता है। तो कभी भीतर जाता है।] केवलराम : मन तो नहीं माना, फिर भी क्या करूं सौदा करना ही पडा। जग्गाराम . (जिज्ञासा दिखाते हुए) कितने में तय हुआ? केवलराम . (भारी मन से) बैल गाडी पुरानी है, इसलिए पांच सौ से ऊपर देना नहीं चाहता है, वैलों का सौदा एक हजार में तय हुआ है। (दीर्घ इवांस लेते हुए) दिल पर पत्थर रखे हुए हूँ। विवशता मुझे कही भी तो छोड नहीं रही। जग्गाराम : विवश होने से क्या होगा? आखिर खरच तो करना ही है। धन्ना अपनी मां से तो पूछ लो। [नेपथ्य से आवाज आती है। मुझे मजूर है। धन्ना : उन्हे मजूर है काका! वेवम इन्सान क्या नहीं करता? आप सामान मंगवाने की व्यवस्था करवा दो। जग्गाराम : (केवलराम की इच्छा जानने की दृष्टि से) कैवल ! तुम्हारे पाम कुछ सुविधा तो होगी ही। केवलराम मैं कोशिश में तो हूँ, लेकिन नंगा निचोडे क्या और पहने क्या ? मेरे घर की हालत तो तुम जानते ही हो ! में जाकर मामान का प्रबन्ध करता हूँ। [वह जाता है, एक ओर से समरत का प्रवेश।] समरत : (भ्यंग्य से) बैल और गाड़ी तो बिकवा दी। (हाय नचाती हुई) खरच . 105 । कहती हूँ, आपका धन कोन खायेगा। इतना सारा किसके लिए इकट्ठा कर रहे हो ! धरम-करम को तो कुछ पहचानो। जम्गाराम : सीधे ढंग से कोई वात क्यों नहीं करती हो? कहना क्या है। रात-दिन तेवर चढ़ाये रहती हो । दिमाग तो तुम्हारा मातवे आसमान पर चढा रहता है । मैं तो तग आ गया हूँ तुमसे ! समरत : (उसो स्वर में) तंग आ गये हो...। और वह भी मुझसे...। अवके जाऊँगी मैके तो सात जनम आने का नाम न लूंगी...। फिर नानी याद आयेगी तुम्हे तो...। समझते क्या हो अपने को...। मैं तो जाने घर का कूडा-करकट हूँ...कूड़ा-कर- कट... सोगिनी के घर बैठे और कुछ नहीं कहती, बस इतना ही कहना है-तुम क्या दे रहे हो इन्हे ? जग्गाराम : इसमे कौन बड़ी बात है ? अपने से जो वन सका जरूर देंगे। खरन भी तो ज्यादा है, देना तो पड़ेगा ही कुछ-न-कुछ। धन्ना : (बात काटते हुए) काकी, मुझे कुछ नही चाहिए। तुम इन पर न बिगड़ो। [गोपा फटे हाल हाथ में लोटा लिये जाता है। जग्गा- राम की ओर लोटा बढाता है । वह पीठ सहलाता हुआ उसे अपने पास बैठा देता है।] समरत : भला, इसमे बिगडने की क्या बात है ! जब ये नही समझे तो मुझे कुछ कहना ही पडेगा । सम्बन्ध तो इस पर से मेरा है, और जब मेरा है तो इनका भी हुआ। कुछ देते है तो कौन-मा बहमान करते है तुम पर। धन्ना : हाँ, यावा, एहसान नहीं करते हैं, परन्तु अब तुम जाओ भीतर । मां से दो बात करो। समरत : हां, मैं तो तुम सयको अखरती हूँ। जाऊँ क्यों नही.. [ममरत का प्रस्थान] जग्गाराम : धन्ना, तुम्हारा घर शुरू में ही गरीब रहा है। लेकिन मान- मर्यादाओं को निभाने मे कभी पीछे नहीं रहा। मैं चाहना हूँ कि अब की बार भी मय काम ठोक दगगे हो, ताकि लौकिकता में आने वाला कोई छींटा कमी न करे । धन्ना : मैं अपना पर फूंक तमाशा देख रहा हूँ। इममे ज्यादा क्या कर मकता हूँ। [एकाएक स्टेज के बाजू गे भगतजी का प्रवेश भगतजी : हाँ बेटा! लोगों को न जाने क्यों अपने ही घर फंक तमाशा 106 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ जगाराम . देखने में आनन्द आता है। (एकाएक चौंक-सा जाता है) खड़ा होकर दोनों हाथ जोड़ देता है । जय गोपालजी की! [भगतजी एक सामाजिक कार्यकर्ता एवं सम्मानित व्यक्ति हैं। ऊंचा कद एवं आकर्षक व्यक्तित्व लिये दम- कोला चेहरा । चेहरे पर बिल्कुल ही झुरियां नहीं हैं। उम्र कोई पचास से ऊपर 1 घोती कुर्ता पहने हैं एवं मिर पर लम्बे वाल है। भगतजी - (प्रत्युत्तर में) जय गोपालजी की !(वह अपने हाथ की थैली को भूमि पर रख देते हैं।) जग्गाराम वैठो, (वह बैठ जाते हैं) आपने तो इधर आना ही कम कर दिया। भगतजी (अपने दोनों हाथों से बालों को ठीक करते हुए) समाज के काम ही बहुत ज्यादा बढ गये है। क्या बताऊँ, फुरसत्त विलकुल नहीं मिलती है । घर फूंकने की अभी वात सुनी तो इधर चला आया। पता नहीं लोगो को औरों के घर फूंकने मे क्या मजा आता है। दस्तूर तो निभाने ही पड़ते हैं। [गोपा जग्गाराम के पास ही भूमि पर ऊँध गया है। भगतजी उसे देखते है शरीर पर हाथ फिराते हैं ।] भगतजी : सुना है, इस बालक के घर के बैल और गाड़ी वेचकर पिता का परच किया जाने वाला है। जग्गाराम (चकित होकर) यह आपको किसने कहा? भगतजी : (कुछ सोचते हुए) मैं अन्तर्यामी तो नही हूँ, लेकिन समाज का कार्यकर्ता होने के नाते कुछ जनप्रिय तो है ही। मुझसे भला कोई क्यो छिपायेगा। जग्गाराम : (झिझक से) लेकिन...लेकिन यह तो...। भगतजी : (बात काट कर)हाँ, हो...। यह तो तुम तक ही सीमित है यही न ! जग्गाराम ! गरीय की आह, दीवारों को भी भेद देती है, हर पत्थर दिल को पिघाल देती है। (निष्टर बनकर) झकझोर कर पूछती है, क्या तुम्हारा यही न्याय है । क्या इसी बेरहमी का दूसरा नाम धर्म है ? तुम मुझे न भी कहो। इममे क्या होना ? इन्ही वे-महारा और विवश आत्माओं की आवाज ने मेरे मातर को चुनौती दी है। मुझे आह्वान किया है। जग्गाराम - खरच : 107 धन्ना : (पड़ा होकर दोनों हाथ जोड़ कर सम्मानपूर्वक) आपने ठीक ही सुना और समझा है, परन्तु यह मेरे घर का मामला है। मुझे इसके लिए किसी ने विवश नही किया। जग्गाराम : हाँ, इसको कोई क्यों कहने लगा। यह तो अपने पिता के पुण्य के लिए जबरन ही ऐसा करने पर उतारू है। भगतजी : जबरन...? नही.. नहीं। जिसके पास खाने तक का पूरा अनाज नही, पहनने ओढने की व्यवस्था नहीं, यह इतना खर्च कैसे करे । सरकारी कानून क्या है । आप जानते है ? धन्ना : आप मेरे बारे मे इतना अधिक न सोचें। मुझे अपने पिता के पिण्डदान में खर्च करना ही है। भगतजी : (निष्ठुर बनकर) पिण्डदान के लिए मृत्यु-भोज जरूरी तो नहीं। जग्गाराम : (विनीत स्वर में) हमारी ऐमी कुछ मर्यादाएँ तो बनी हुई हैं। हम उन्हें कैमे टालें धर्मशास्त्रो मे भी तो इमे स्थान दिया गया है। भगतजी: धर्मशास्त्र उस काल और परिस्थिति को देखकर लिखे गये होंगे। अब हमारे लिए परच की लीक पीटना उचित तो नहीं फिर यदि पिण्डदान करना ही है तो परच तो जरूरी नहीं । अपनी हैसियत से कुछ भी दान में दे दीजिए। धन्ना : (विवशता बताते हुए) यदि हम धर्म को खिलाफत करके यह न भी करें, लेकिन लोगों के ताने तो हमे जीने न देंगे। पग-पग पर लोग हमारे खानदान की निन्दा करेंगे। कहेंगे कि चाप का भोज भी नहीं दिया है । उमे राख में उटा छोड़कर तू भूमि पर चल कैसे रहा है । और भी न जाने क्या-क्या मुनना पड़े। भगनजी : बेटा ! न तो यह धर्म के विलाफ है और न ही लोक-लाज की मजबूरी। जग्गाराम : लोग निन्दा तो करेंगे ही । उन्हें कौन रोक गकता है। भगतजी : (खड़े होकर इधर-उधर घूमने लगते हैं) उफ ! निन्दा !! कमी निन्दा.... यह तो हमारी कमजोरी है। मानवता का कलंक है। इमी ने तो हमको अंधकार से प्रकाश की ओर नहीं जाने दिया है । यही तो है हमारी दुश्मन । राग, द्वेप नोरा की परिणति का विकृत मा यही तो है, निर्मोही। पेतना को शत्रु यह निन्दा किसी को भी तो चन गे नहीं जाने देनी । (इदता से) जग्गाराम ! आदमी वही है जो निन्दा-म्नुनि मे कार उठना 108 . कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ धन्ना . है। निन्दा का दायरा अंधेरा ही है जो कभी उजाले की ओर नही बढने देता है। इससे ऊपर उठकर देखो, मानव का भविष्य उज्ज्वल दिखायी देता है। इस गदगी के बाहर की ओर झाँको। एक पवित्र मानव-मन को देखो जो प्रगति के पथ पर बढ़ रहा है। धन्ना : मै आपसे बहुत प्रभावित हूँ, परन्तु असहाय हूँ । और लोग तो कुछ भी नही कहते-करते, फिर यह भार मैं अपने पर कैसे लूं। भगतजी : सब यही सोचते हैं । अपने को बचाये रखना चाहते है। यही तो हमारी कमजोरी है। तुम अपने को असहाय क्यों मानते हो। जग्गाराम . धन्ना ठीक ही कहता है । उसके अकेले के बूते की तो वात नहीं यह। भगतजी . हम किसलिए हैं। क्या धरती का भार बनकर पेट ही भरते रहेगे? गरीव की आह नही सुनी तो वह जीवन नर्क के समान है। भगतजी ! गरीव की सुनता ही कौन है ? भगतजी लोग नहीं तो ईश्वर तो सुनता ही है । उसके यहां तो सभी के लिए न्याय ही होगा। लेकिन वह तो उसके दरबार की बात है, दुनिया वाले तो खुद ही अपना फैसला करते है। भगतजी नही, तुम स्वय ही अंधेरे में रहना चाहते हो । चेतन मन से कभी नये मार्ग को ओर बढने की सोचते तक तो नहीं फिर नियति को दोप देना और गरीबी को कोसना कहाँ तक ठीक है । [गोपा की नीद खुल जाती है। वह भगतजी को देखकर भीतर भागता है] जग्गाराम : आप सौ फीसदी सही कह रहे है । चन्द समृद्ध लोगो के साथ जीने वाला यह विशाल गरीब समाज है, जो कि झूठी मान्य- ताओ मे पीमा जा रहा है। आप मंगटन बनाइये। मै इसके लिए तैयार हैं। समाज का यह दोप मैं अपने पर लेता हूँ। जग्गाराम हां, मुझे भी आपकी बात अच्छी लगी । आज के इस महगाई के में वेचारे ये गरीव कैसे इन भारी खर्चों को सहन मृत्युभोज आज के युग की बुराई है । हमारी चेतना को चुनौती . धन्ना करें।

खरच : 109 । [केवलराम के साथ कुछ और व्यक्ति है जो सिर पर सामान उठाये मंच की ओर बढते है।] भगतजी : (पास आते हो) तो आ गये तुम ? क्या लाये हो अपने साथ इतना सारा? केवलराम : (नम्रतापूर्वक) यरच का सामान है। भाई की आत्मा के पीछे पुण्य के लिए। भगतजी : (निष्ठुरता से) और पाप नही क्या ? केवलराम : मैं समझा नही .. भगतजी : आप पुण्य को समझ रहे हैं, फिर पाप को क्यो नहीं? केवल राम : उन्होंने तो कोई पाप नहीं किया। और न ही मैंने भी . । भगतजी : तो अब कर रहे हो पाप? केवल राम : पाप कसा भगतजी ! आप क्या पहेली बुझा रहे है मैं समझा नहीं। भगतजी : यह भी एक पाप है । हाँ, किसी गरीव की आत्मा दुखाना वैसा ही पाप है, जैसे कि अन्य बुरे काम होते हैं। केवल राम परन्तु यह तो दान है, परम्परा है। मेरे भाई के पीछे इतना भी नहीं किया तो लोग क्या कहेगे? भगतजी ; (तोसे स्वर से एक ही सांस में) परम्परा निभाने के पीछे तुमने अपने भाई की वीवी और बच्चों तक का ख्याल नहीं किया? बैल और गाड़ी बेचकर तुझे परम्परा निभाते हुए शर्म नहीं आयी? केवलराम : (विनम्र स्वर में) लोक-लाज में जीना ही तो पड़ता है। मैं अकेला क्या कर सकता हूँ? घर की हालत जानता हूँ फिर मजबूरी से करना ही तो है। भगतजी : अब तुम अकेले नहीं । जग्गाराम और धन्ना तुम्हारे साथ है । जग्गाराम : हां, केवल भाई! इम कमर तोड मॅहगाई के जमाने मे धन्नाराम जैसे सैकड़ो गरीवो को मृत्यु के खरच से राहत देने के लिए, हमें एक जुट होना पडेगा । मैं तुम्हारे साथ हूँ। भगतजी: (सन्तोप की सांस लेते हुए) मैं आज धन्म हुआ। तुम्हारे जैसे युवकों का साथ चाहिए । धन्ना अपनी मां को कह दो खरच नहीं होगा । दान-पुण्य अपनी हैसियत से जो चाहो कर लो। धन्ना : जी भगतजी ! उनको भी मना लेता हूँ। [नेपथ्य से आवाज आती है-मुझे मन्जूर है] भगतजी : आप सभी सुनिये, रूढ़िवादिता के शिकंजे में फम कर हमने 110 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ . अपने गरीव भाईयो को ऊपर ही नही उठने दिया, बल्कि राष्ट्र के लिए भी भारी अहित किया है । फिजूलखर्ची में दवा किसान ऋण मे ही पैदा होता है और ऋण में ही मरता है। बच्चों का पेट काटकर किये जाने वाले ये खर्च हमे तो तिल-तिल कर जीने पर मजबूर करते ही हैं। साथ ही देश के विकाम की गति को रोक देते है । आप नवयुवक है। जागरूक बनकर रूढिवादिता के शिकजे में फंसे गरीबों को बाहर निकालो। इन्हे ऊपर उठाओ। केवल ! तुम्हें एक काम और करना है। केवल राम एक नही, दस काम बताइये। मैं चुटकी में करने को तैयार हूँ। भगतजी आज वारह गांवो के पचो को सूचना दे दो। मठ पर एक बैठक का आयोजन किया जा रहा है वहां सभी को आना जरूरी है। केवलराम जी, भगतजी ! अभी जाता हूँ। (वह राहत की सांस के साय जवाब देता है।) भगतजी और सुनो...। यह सामान जहाँ से लाये हो वहाँ वापस पहुँचा दो। धन्ना के बल और गाडी छुडवा लो। जग्गाराम वैठक मे क्या-क्या बातें करनी है ? भगतजी . (व्यंग्य) लड्डू-पूरी की बात नही करना है । खरच पर पाबन्दी के लिए ठोस कदम उठाना है। जग्गाराम सभी पचो को मनाना तो कुछ मुश्किल ही है। भगतजी मुझे विश्वास तो है । ऐसे कार्य के लिए विरोध नहीं होगा। अधिकतर लोग गरीबी मे जी रहे है। जम्गाराम । यदि विरोध हुआ तो? भगतजी तो भी हम सफल हो जायेगे। जग्गाराम · (जिज्ञासा से) वह कैमे? भगतजी : जब धन्नाराम के घर का करुण दृश्य उनके सामने रखूगा तो उनके दिल दहल जायेंगे। उन्हें बता दूंगा कि गरीबो का पेट काटकर, उन्हें बरवाद कर और बैल व गाड़ी वेचकर खरच करना पुण्य नहीं है । पाप है। घोर पाप है। जग्गाराम फिर भी न माने तो क्या हो? (आशंकित होकर) न माने तो भले न माने, मैं आज से सत्याग्रह पर उतर जाऊँगा। गाधीजी के मत्याग्रह ने अग्रेजो की ताकत को हिला दिया। फिर, क्या हम अपनी छोटी-सी रूदि को नहीं मिटा सकेंगे। मेरा अपना निश्चय है कि या तो इसे बंद करवाऊँगा या यावजी की उम पावन धूणी पर अपने प्राण त्याग दूंगा। भगतजी

खरच: 111
--
:
आजादी के लिए भी तो वीरों ने फांसी के फन्दे गले में डाले
थे।
केवलराम : (जाने को उतारू होता है) मैं अभी जाता हूं। सवको कह देता
हूँ कि यह समाज का कलंक आज से मिटाके ही रहेगे। यह
अभियान में अपने घर से आरभ करूंगा।
भगतजी : क्यों धन्नाराम ! तुम्हें दुख नो नहीं हो रहा ?
[केवतराम और उसके साथी सामान उठाकर चल
देते हैं । गोपा हाथ में रोटी का टुकड़ा लिये आता है।
खुशी-खुशी टुकड़े तोड-तोड़ कर पाता है।]
धन्नाराम (एक साथ) नही, हमे कोई दुख नहीं है । यह पुण्य है । गरीबों
जग्गाराम ' की आत्मा की आवाज है।
[पर्दा गिरता है]

संस्मरण (विद्यालय-जीवन का एक शब्द-चित्र) बेंत की कुसियाँ अर्जुन कावडिया प्रार्थना-कार्यक्रम का महत्त्व है, और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है प्रवचन-कार्यक्रम के परम विचारणीय विन्दु-बढ़िया शिक्षा, नैतिक शिक्षा, अधिकाधिक वृक्षा- रोपण आदि । शिक्षक और छात्र ही तो देश के कर्णधार है। "प्रत्येक छात्र को इस सत्र में कम-से-कम तीन-तीन खड्डे खोदकर तीन-तीन वृक्ष लगाने है और उद्योग कार्यानुभव के कालाश का आपको पूरा उपयोग करना है । उद्योग/कार्यानुभव पढाने वाले सभी शिक्षक इसके प्रभारी होंगे।" प्रधानाध्यापक अपनी बात पूरी करते है और इसी बीच पहले कालांश के 10-15 मिनिट न जाने कहाँ छू-मन्तर हो जाते है-पहला कालाश जो गणित, विज्ञान, अंग्रेजी अथवा हिन्दी का होता है । खैर ! कोर्स पूरा कराने की जिम्मेदारी तो शिक्षक स्वयं समझता ही है । पढाते वक्त थोड़ा रॉकेट की चाल से चल देगा। युग भी तीव्र गति से चलने का जो है। उद्योग का कालाश है। छात्र शिक्षक के साथ विद्यालय के पोछे की पहाड़ी पर है। 35 छात्र-छात्राएँ है और उनके बीच विद्यालय के स्टोर से निकाली गयी एक गेंती और दो सब्बल । प्रत्येक छात्र को तीन खड्डे खोदकर तीन पेड लगाने हैं । गेंतो और सब्बल की छीना-झपटी शुरू हो जाती है छात्रों में। शिक्षक समझा रहा है पर हर कोई छात्र अपना काम पहले पूरा कर लेना चाहता है। इतने मे टहलते-टहलते प्रधानाध्यापक निरीक्षण को आ पहुँचते है। "देखो मास्साब ! ये बालक छीना-झपटी कर रहे है इन्हें रोकिये। समझाइये !" शिक्षक कहता है--"मर! कुछ गेतियों को और आवश्यकता है, यदि खरीद लें तो लक्ष्य निर्धारित समय में पूर्ण हो सकेगा और ये छीना-झपटी भी..." "देखिये मारसाब, आपकी वात वाजिव है, परन्तु इस वर्ष हमने दस तगारिया परीद ली है अत: अव तो आप जैसे-तैसे काम चलाइये । हमे तो विभाग की मंशा पूरी करनी है बेंत की कुर्सियां : 113 छात्र पड़े-खड़े एक-दूसरे का मुंह देख रहे है। प्रधानाध्यापक चले जाते हैं। शिक्षक अपने चेहरे पर आये परिवर्तनों को बदल कर छात्रों से कहता है.---"देखो, आपकी जो सामयिक जांच होगी उसमें आपको तभी पूर्ण अंक मिलेंगे जब आप तीन खड्डे खोदकर तीन-तीन वृक्ष लगा देंगे। सुन लिया आपने !" "सर । यो मने गेंती नी देइरियो है। किस्तर खोदूं।" एक छात्र आवाज करता है। "देखो बच्चो, तुम्हे किसी भी प्रकार इस कार्य को पूरा करना है। अपने घर से साधन लाकर, छुट्टी के बाद एककर, या सुवह जल्दी आकर।" दूर गांव के यालक कुछ सोच मे डूब जाते है, थोड़ी देर मौन छा जाता है। पर अव उनके हाथों में तीसे-तीखे लम्बे पत्थर हैं और उन्ही से वे खड्डे खोदना प्रारम्भ कर देते हैं और इस बीसवी सदी मे मुझे प्रस्तर युग के आदि मानव को एक झलक दिखाई दे जाती है। वृक्ष लग चुके हैं। बालक उन्हे संभाल आते है। कभी-कभार दूर के कुएँ से पानी खीचकर भी पिला देते हैं। मैं आश्चर्यचकित हूँ यह देखकर कि वालकों ने अपने लक्ष्य से भी अधिक वृक्ष लगा दिये हैं । कोटे ढंककर उनकी सुरक्षा भी कर दी है । मैं संतोष की सांस लेता हूं। वर्षा का मौसम बीत गया है । पहाडी पर, पूरी पहाडी पर पास लहलहा. रही है । उसके बीच बालको द्वारा लगाये विभिन्न वृक्ष अपना अलग ही महत्व जता रहे हैं। इधर प्रधानाध्यापक-कक्ष के बाहर बरामदे के नीचे वाली जमीन पर स्वतः ही उग आयो एक हजार ककड़ी दृष्टिगोचर हो रही है । पकी हुई पीली-हरी हजार ककड़ी की शक्ल उभरकर सामने आ जाती है। प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि यह भी अच्छी फले-फूले। गणित का कालांश है । शिक्षक-छात्र पढ़ने-पढ़ाने में व्यस्त हैं, इस बीच पियॉन टपक पडता है, हाथ में एक कागज लेकर ! शिक्षक के चेहरे पर थोडी झल्लाहट के भाव आ जाते हैं, शिक्षण के क्रम के टूट जाने के कारण। वृक्षों की मासिक प्रगति का विवरण चाहा गया है । शिक्षक उसे अंकित कर पुन. पढ़ाने में जुट जाता कार्यानुभव का कालांश है । शिक्षक बालको के साथ पहाड़ी पर वृक्षारोपण की प्रगति देख आते हैं। वालको के चेहरे पर आयो प्रसन्नता को अपने चेहरे पर शिक्षक भी झलका देता है। हवा के झोंके से घास के तन मे लचक आ जाती है। अन्तिम कालांश चल रहा है । गांव के कुछ व्यक्ति कार्यालय में एकत्रित है। उनके और प्रधानाध्यापक के बीच चर्चा चल रही है। दो-एक शिक्षक भी हैं।

114 : कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएँ छुट्टी की घटी बजी। उपस्थिति पजिका में शिक्षक प्रस्थान के हस्ताक्षर कर रहे हैं। "कल धास नीलाम होगी"-एक शिक्षक ने कहा। 'विद्यालय के विकास हेतु कुछ राशि जुट जायेगी"-दूसरे ने कहा। अगला दिन- घास नीलाम हो गयी है। जिसके नाम धास नीलाम हुई, शर्त के अनुसार उसके पशुओं ने पहाडी पर चरना शुरू कर दिया है। घास को काटा भी जा रहा है। विद्यालय को इससे 300/-२० का लाभ हो गया है। दिन गुजर गये हैं । शिक्षक उद्योग के कालाश मे पहाड़ी पर जाते है । घास की सफाई-कटाई के साथ-साथ वृक्ष भी साफ हो गये हैं या कुचल दिये गये है। नन्हें-नन्हे बाल-वृक्ष । शिक्षक उदास हैं और एक अजीव-सा चेहरा लिये पुनः कक्षा में आते है। हजार ककडी की टहनियाँ टूट कर नीचे विखरी हैं । तना टूट कर नीचे झुक गया है मानो उसने भी अपनी गर्दन नीची कर ली है। अगला दिन- बालक दरियों के लिए झगड रहे है । खोचतान हो रही है। इधर प्रधाना- ध्यापक-कक्ष से पुराना फर्नीचर बाहर निकाला जा रहा है। एक लोहे की टेवल और कुछ बेंत की कुर्सियां जमा दी गयी है। प्रधानाध्यापक खुश हैं, मगर अव वृक्षारोपण की मासिक प्रगति का विवरण लेने पियॉन शिक्षक के पास नहीं आता। D संस्मरण (विद्यालय-जीवन का एक शब्द-चित्र) मासाब, थे ही तो किया छाक! बद्रीलाल शर्मा । घटना सन् 1973 की है, जब मैं पचायत समिति अरांई की केन्द्रीय प्राथमिक शाला अरांई में कार्यरत था। केन्द्रीय विद्यालय होने से कभी-कभी हमारे विद्यालय के अध्यापकों को केन्द्र अधीनस्थ शालाओं में प्रति-नियुक्ति पर जाना पड़ता था। अत. मुझे भी एक बार प्रतिनियुक्ति पर प्राथमिक विद्यालय कटयूरा मे जाना पड़ा। नया गांव था, नवीन पाठशाला थी, और फिर नये बालक थे। ज्योंही मै विद्यालय प्रांगण के निकट पहुंचा, कई वालकों ने आगे आकर मुझे अभिवादन किया। बहुत से छात्रो ने अभिवादन नहीं भी किया, क्योंकि वे भ्रम मे थे कि "क्या मैं ही प्रतिनियुक्ति पर आने वाला अध्यापक हूँ।" प्रार्थना कार्यक्रम समाप्त हुआ। प्रार्थना के पश्चात् मैंने बालकों को 'आज्ञा. पालन' पर प्रवचन दिया। प्रवचन मे मैंने बालकों पर यह छाप छोडी कि “शिष्य को गुरु की हर आज्ञा का पालन करना चाहिए।" मेरे प्रवचन को किसने सुना या किसने नही, किसने समझा या किसने नही। उस समय में, यह ज्ञात नहीं कर सका। मैंने कक्षा 3 से 5 के बालकों को एक कमरे मे विठाया तथा कक्षा 1 एव 2 के बालकों को बाहर बरामदे मे । और यही व्यवस्था मेरे लिए छात्र संख्या को देखते हुए उपयुक्त भी थी। मध्यावकाश पूर्व तक सब ठीक-ठाक चलता रहा । मैं एक दिन का जो मेरा कर्तव्य था, उसको पूर्ण जिम्मेदारी के रूप से निभा रहा था। मध्यावकाश हुआ और समाप्त भी हो गया। मध्यावकाश पश्चात् बरामदे में धूप आ जाने के कारण मैंने अविभक्त इकाई प्रथम एवं द्वितीय वर्ष के बालकों को वरामदे के पास ही प्रांगण में एक बबूल के वृक्ष के नीचे विठा दिया। करीब पौने चार बजे मैंने कक्षा 1 एव 2 को गिनती एवं पहाड़े बोलने के लिए कहा और एक बडे बालक को कक्षा नायक के रूप में खड़ा करके मैं कमरे मे चला आया। कुछ ही समय पश्चात् उस कक्षा नायक ने 116. कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ एक बालक को मेरे पास लाकर कहा--"मासाब, ओ राजू गिणती को-न बोल । राजू ने अपने को निदोप ठहराते हुए कहा-"नहीं मासाव, म तो बोल रियो छो, पण ओ मन यान ही ले आयो।" उम समय में सामाजिक ज्ञान का एक पाठ कक्षा 5 को पढा रहा था । अत. मेरे पढाने के कार्य में बाधा आती देश, मैंने बिना मोचे- समझे ही उस बालक को मुर्गा बनने का आदेश दे डाला। उस छोटे अबोध बालक के साथ मैंने कितना अन्याय किया था, इसका भान मुझे उस समय नहीं हुआ। और मैं पुन पढाने में लग गया, अत उस बालक को मुर्गा बनाकर मेरे लिए भूलना स्वाभाविक था। कुछ समय बीत जाने पर मैंने कक्षा 1 एवं 2 के वालको को घर जाने की छुट्टी भी दे दी। सब बालक अपनी-अपनी धुन मे घर की ओर चल पड़े। कक्षा- नायक ने भी उस आज्ञाकारी यालक की ओर नहीं देखा। बबूल के नीचे मात्र वह बालक मुर्गा बना हुआ था जिसका मुझे अभी ज्ञान नही था! घंटी बजी, सब छात्र उछलते-कूदते हुए चल पड़े अपने घरो की ओर। मैं कमरे से बाहर निकला और मेरी सीधी नजर पडी उस वालक राजू की और जो अभी भी 'गुरुजी के आदेश' की पालना कर रहा था। मैं तीव्र गति से बबूल की तरफ चला, मैंने देखा--राजू के पैर कांप रहे थे, आँखों से अश्रुधारा बह रही थी; किन्तु फिर भी वह अचल अपने छोटे-छोटे हाथों से कानों को पकड़े मुर्गा बना हुआ था । अगले ही क्षण मैंने मेरे दोनो हाथों से पकड उसको खड़ा किया मैं राजू के सामने खड़ा था और राजू मेरे सामने। राजू गर्व से सीना ताने खडा था, जबकि मैं अपराधी के समान। मुझे ऐसा लगा मानो राजू की आज्ञा- कारिता एव कर्तव्यपरायणता के आंसू बार-बार मुझे पश्चाताप करने के लिए कह रहे हैं । अत मैंने भविष्य में ऐसी भूल नहीं करने की शपथ ली। मेरे शब्द थे----"वेटे, मैं तुमको मुर्गा बनाकर भूल गया था, तुमको अपने साथियों के साथ घर चले जाना चाहिए था।" "मासाब, थे ही तो किया छाक, क, गुलूजी की बात मानणी चाव।" उसके शब्द थे। ।

संस्मरण (एक यात्रा रिपोर्ताज) सूर्यास्त कमर मेवाड़ी पहली बार बीस साल पहले आया था। तब कई लोग माय थे । मन रम गया था। लगा यहीं रह जाऊँ अकेला। एक कुटिया छवा कर। इतना खूबसूरत प्राकृतिक स्थान, मैंने नहीं देखा आज तक । जगह-जगह भटका हूँ ..आज भी भटक रहा हूं...खूब यायावरी की है। पर मुझे तो ताजमहल या परशुराम महादेव के अलावा कोई ऐसा तीसरा स्थान नहीं मिला। जहां मेरे मन को शान्ति मिली हो। एक...किसी शहंशाह के प्रेम का प्रतीक...पूणिमा को धवल चांदनी में स्फटिक की भांति चमकता-दमकता शाहजहाँ के दिल की दर्द भरी दास्तान... संसार का सातवां आश्चर्य ताजमहल । और दूसरा...अरावली की गोद मे अवस्थित...प्रकृति का सुरम्य स्थल... परशुराम महादेव। जहाँ हजारों...लाखो स्त्री-पुरुष अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए श्रद्धा से अपना सिर झुका देते है । नीचे सादड़ी कस्वा है। वहीं से एक जीप किराये पर की थी। जीपे...कारें... स्टेशन-वैगन. सभी मिल जाते हैं वहां...ये सब कुण्ड पर जाकर रुक जाते हैं। फिर चढ़ाई शुरू होती है पहाड पर। पिछली बार जब आना हुआ था, तय कुम्भलगढ़ के रास्ते से आया था। का लोग साय थे। वैसे मुझे साथ का कोई मौक नहीं। अकेला ही घूमता-फिरता हूँ बड़ा आनन्द आता है अकेले में किस-किस को साथ लिये फिरूं। फिर जरूरीत. नहीं कोई जिन्दगी-भर आपके साथ चिपका ही रहे । पर इस बार अनु मेरे माय थी। अनु...अनु...यानी...प्यार का एक समन्दर...एक श्रद्धा...एक देवी प्रति रूप...जिसकी मेरे जैसा नास्तिक आदमी भी पूजा करता है...हर रोज...हर क्षण।

118. कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएं चढाई बड़ी विकट है। कांटेदार झाड़ियां...झरवेरी के पौधे...एक तरफ पहाड़ आसमान से आंख मिलाता हुआ दिखाई देता है तो दूसरी ओर गहरी खाई मुंह चिढ़ाती हुई लगती है। चढ़ाई देखकर वह ठिठक गयी। मैंने हाथ उसकी पीठ पर रख दिया और उठा लिया अपनी बाहों में...यतख जितना वजन...वह नहीं-नही करती रही . पर मैं उठाये रहा। चढाई समाप्त होने पर उतार दिया नीचे । अब रास्ता साफ था और सीधा । वह थोडा रुक गयी चलत-चलते। मुस्ताने के लिए। उसकी आंखों में एक विशेष प्रकार की चमक थी, जो तृप्ति के बाद आती है किसी स्त्री को आंखो में। कुछ समय बाद हम फिर चलने लगे। उसके चेहरे पर रौनक थी। थकान नाम का कोई चिह्न नहीं था और यह खुश-खुश थी। मैंने सोचा.. ...काश,...मैं जिन्दगी भर उसे...इसी तरह खुश रख सकू। हम ऊपर पहुँच गये। पहाड के शिखर पर। वह मुझे खीचकर एक तरफ ले गयी। कुछ बताने। पर नही शायद कुछ और बात है। वह पर्स से निकालकर अपना रूमाल बांध देती हैं एक जगह । मैं पूछता हूँ यह क्या कर रही हो? वह प्यार से झिड़क देती है-~-तुम चुप रहो...तुम कुछ नही समझते...मूर्ख कही के । फिर खिलखिलाकर हंसने लगती है। झिड़कना और हँसना उसकी आदत है । मैं बुत बना देखता रहता है। वह कहती है...सुनो, अब जैसा मैं कहूँ...करते जाना...समझ गये...मन से करोगे न सव? मैं हाँ कर देता हूँ। मन से। सीढ़ियां चढ कर हम ऊपर पहुँच जाते हैं। मन्दिर के द्वार पर । वही चिर-परिचित मनमोहक स्थान...वही शिवलिंग...वही पत्थर के बने प्राकृतिक गौ-थन में लिंग पर टपकती पानी की बूंदें...एक के बाद...एक...लगातार...टप-टप...वही चारो ओर फैली धूपबत्ती और फूलों की गमक । अपने आप श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है आदमी। वह पुष्प चढ़ाती है...फिर नारियल तोड़ा जाता है...महन्त से कहा जाता है आरती के लिए...काफी भीड इकट्ठा हो गयी है...ठस्सम-उस खडे हैं लोग । आरती के बोल में उसका स्वर अलग ही प्रकार से मेरे कानों में मीठा-मीठा रम घोल रहा है। बड़ा पवित्र वातावरण बन गया है। वह दो-तीन जगह सिक्के डालती है। फिर श्रद्धा से अपना सिर टिका देती सूर्यास्त : 119 है। ईश्वर के प्रति उसकी अमीम श्रद्धा ने अभिभूत कर दिया है मुझे। मैं यह सब यड़ा-गड़ा देखता रहता हूँ। आज वह मुझे पहली बार एक गृहिणी के रूप में दिखायी देती है। ..सब अब हमे नीचे उतरना था। नीचे जीप वाला हमारा इन्तजार कर रहा होगा। कुछ नीचे उतरने के बाद एक मुड़ाव पर, एक आदमी बैठा तस्वीरें और बुकलेट बेच रहा था। हम वहाँ बैठ गये। वह बता रहा था... यहाँ बहुत माप हैं...पर किसी को काटते नही... महादेवजी की कृपा है...चूहे भी बहुत है यहाँ । स्वाभाविक है जहाँ चूहे रहेंगे... वहाँ माप होंगे ही।... .जहाँ शिकार...वही शिकारी। चूहे की बात से उसके शरीर मे कुछ झुरझुरी-सी हुई और उसने अपनी दृष्टि आस-पास फेंकी। मुझे मालूम था सौप से ज्यादा वह चूही मे डरती है। पर न वहाँ घूहे दिखाई दे रहे थे . न सांप...कुछ भी नहीं। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और खीचती हुई नीचे उतरने लगी। आसमान पर वादल छा गये थे। पर सूरज छिपा नहीं था। वह कभी छिप भी जाता तो भी वादलों की खिड़की से वापस झांकने लगता। कुछ लोगों को अदेशा था कि बरसात हो सकती है। वे तेज-तेज कदमो से चल रहे थे। हमने भी अपनी चाल बढ़ा दी। लेकिन सूरज हमारे सिर पर सवार था । और साथ-साथ चल रहा था। हमें नीचे पहुँचने में करीव घण्टा-भर का समय लग गया। जब हम कुण्ड पर पहुंचे, चारों ओर अधेरा छा गया था और सूर्य शरमा कर बादलों के पीछे जा छिपा था। ऐसा लग रहा था मानो रात हो गयी हो । उसने पूछा- -यह क्या हो गया? ----सब-कुछ पत्मा --क्या? -~-सूर्यास्त । ---ऐमे कैसे बोलते हैं आप। और यह कहते-कहते उसका खिला हुआ चेहरा अचानक मुरझा गया। मैंने उस वक्त बड़े ध्यान से देखा उसके सुखं चेहरे पर कालिमा उभर आयी थी और वह काफी थकी-थकी लग रही थी। मैंने जीप मे बैठते हुए आश्वस्त करने के लिए उससे कहा :

120 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ -सुनो ! देखा जाये तो सूर्यास्त हो चुका । पर अभी दिन के दो ही बजे हैं । काफी वक्त शेष है। अगर धरती को जरूरत होगी तो वह सूरज को पुकारेगी और सूरज किसी भी अवस्था मे होगा, वह बादलों का सीना चीरता हुआ धरती पर फैल जायेगा। उसने मेरी बात मुनी और आंखों-ही-आँखों में मुस्करा दी। अव हमारी जीप उन्ही ऊबड़-खाबड़ रास्तो से वापस लौट रही थी। अपने गन्तव्य की ओर। .

रिपोर्ताज (ग्राम्यांचल का एक शब्द-चित्र) अलग-थलग पड़े लोग निशात गंगानगर जिले का दक्षिणी-पूर्वी भाग, पल्लू अचल । गगानगर से जयपुर के लिए जब बस से चलते हैं तो हनुमानगढ से आगे स्पष्ट होने लगता है कि आगे कोई पिछड़ा इलाका आने वाला है । लेकिन तभी आती है संसार की सबसे बड़ी नहर राजस्थान केनाल और एक बार फिर चारों ओर हरियाली नजर आती है। पर यह हरियाली ज्यादा दूर तक नहीं है । वस ज्योही रावतसर कस्वे से आगे निकलती है तो नजर आने लगता है रेत के धोरों का अनन्त विस्तार । रावतसर से लगभग मील भर की दूरी पर पानी का एक पतला-सा नाला कुछ हरियाली पैदा करने को असफल-सी कोशिश करता नजर आता है। लेकिन अधिकतर लोगों के खेत विरानी हैं। वर्षा होती है तो कभी-कभार इन खेतों में हरियाली नजर आती है। नहीं तो सब ओर रेत-ही-रेत होती है। इन खेतों में डचाब और झाड़-झंखाड़ की इतनी अधिकता होती है कि समा लगा हो तो भी फसल दिखाई नहीं पड़ती। मन बीघे से ज्यादा शायद ही पैदा हो पाता हो इन खेतों में । हां, वैसे यह डचाब और झाड-झंखाड पशुओं के चरने के खूब काम आता है। इसलिए पशुधन इधर कुछ ठीक ही है । अब लोग हाड़ी (रबी) की फसल भी बोने लगे हैं और उसके लिए जमीन को संवारने लगे हैं । भूमि को जोत-जोतकर डचाव और झाड़-झंखाड़ को नष्ट करने लगे हैं। गांवो के बस के अड्डों पर वसों पर चढने-उतरने वाले लोगो को देखकर इस अंचल की बदहाली स्पष्ट आंकी जा सकती है। गंगानगर और जयपुर की तरफ के लोग इन्हे विदेशी नजर आते होंगे। इसी नवम्बर माह में मेरा इधर आना' हुआ था। बस में एक जयपुर जाने वाले परिवार के बच्चे और सदस्य गर्म कपड़ों के बोझ से लद-पद थे । और इधर के एक परिवार के बच्चों के गले में पूरी कमीजें भी नहीं थी। इधर कई गांवों से भाटा (चूना) भी निकलता है। लेकिन उसका लोगों के 122 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ जीवन स्तर पर कोई प्रभाव नहीं है। पानी में सरकारी आदमी होते हैं।टक आते है और भरकर चले जाले हैं। प्रभाव पड़े भी कैसे? पल्लू से दो मील दूर मेरा पुस्तनो गाँव है दनियामर । कभी-कभार चाचाजी से मिलने जाना होता है। पल्लू अड्डे से उतरकर चल पड़ा हूँ। पहले पगडण्डो की एक लकीर होती थी। अब ऊंटगाड़ियां चलने लगी हैं तो दो लकीरें पड गयी हैं। अव इधर-उधर भटक जाने का खतरा नहीं रहा । वस, इतनी-सी प्रगति हुई है। एक-एक धोरे को पार करता हुआ चल रहा है। पांव रेत में फंसे जा रहे है। पहली बार चलना मुश्किल लग रहा है। माम कुछ मुश्किल-मे आ रहा है। लेकिन चलने के मिवाय कोई चारा नहीं। इसलिए चल रहा हूं। थोड़े दिन पहले इधर अच्छी वर्षा हुई थी। देख रहा हूँ सब लोगो ने रवी की बुआई कर दी है। कुछ अभी भी कर रहे हैं। डचाव में भरी भूमि में भी हल चला दिया गया है। पिछले तीन सालों में इधर नाम मात्र का ही अन्न पैदा हुआ है। सबसे बड़ी ट्रेजडी तो इन लोगों के साथ यह होती है कि बुआई के वक्त बीज तो इनका खर्च करवा दिया जाता है। लोग दुगनं भाव उधार लेकर वीजते है। लेकिन काटने के वक्त बीज भी नही मुडता। पिछली सावणी की फमल की बुआई लोगों ने वडे तग होकर, तीन-चार मौ रुपए क्विटल के भाव वीज और सौ-डेढ मौ रुपए क्विटल के भाव ऊँटों के लिए नीरा खरीद कर दी थी। लेकिन वह सब चौपट हो गयी। बुआई के वक्त वर्षा हो गयी तो क्या? बाद में सब सूख गयी । मँहगाई की मार तो यहां वे-हिसाब है। हनुमानगड, रावतसर या सरदार- शहर यहाँ से कोई ज्यादा दूर नहीं। लेकिन वहाँ से यहां चीजों के दाम लगभग डेढ गुने होते है । और अगर उधार पर लेने हो तो फिर तो देने वाले की इच्छा पर निर्भर करता है। वह जी मे आया भाव लगाता है। बेचारे कई गरीव किसान इन वनियो के शिकंजे मे फंस जाते है। इनसे उधार उतर नहीं पाता और उमर भर बेगार देने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं। कर्ज ज्यों-का-त्यों बना रहता है । पाँच- दस साल बाद जब भी समां लगता है फसल ये बनिये हथिया लेते हैं । गरीब की जुर्रत ही क्या है कि इन्हें पैसा न दे । मेरे कुनबे के लोग भी इस प्रकार के शोपण का शिकार होते है यहाँ। हाडी की बुआई हो गयी है। इसलिए गांव के लोगों को आशा बंध गयी हैं । वैसे भीतर से लोग बेहद टूटे हुए है। एक आदमी मुझे बताता है-~-अब तक का टाइम हमने यहाँ बडी मुश्किलों से काटा है। लोगों ने आधे मोल गायें-भेमें बेच दी। इस मेह के बरसने से पहले हम सोच रहे थे-~-कहाँ जायेंगे? कैसे जायेगे ? हमारा क्या बनेगा? हम भर पेट रोटी नही खाते थे। वर्षों का जोड़-जाड़कर रखा उलगा-थुलगा हमने सव लगा दिया है। अब अगर यह हाडी की फसल भी हाथ न लगी तो बस मारे जायेंगे। । ।

अलग-थलग पड़े लोग : 123 । शाम के वक्त गुवाई में बैठे चार-पाच बूढे-बुजुर्गों से राम-रमी करता हूँ। दो-चार मिनट बैठता हूँ। वे मेरी नौकरी पूछ बैठते हैं। छ-सात सौ का नाम सुनकर चौंक जाते हैं। कहते हैं-बहुत नौकरी है तुम्हारी। सरकार को तुम्हे इतने पैसे नहीं देने चाहिए। उनकी गरीबी को देखते हुए मुझे उनकी बात जायज लगती है। लेकिन जिस इलाके में मैं रहता हूं, वहां के लोगों को आय के मुकाबले में तो सरकारी कर्म- चारियो की तनखाह कोई ज्यादा नही लगती। मुझे स्थान-स्थान के लोगो की आधिक गैर-बराबरी खलने लगती है। सोचता हूँ--राजस्थान केनाल यहाँ मे वीम मील से ज्यादा दूर नहीं। यह ठोक है कि यहाँ ऊंचे-ऊँचे धोरे है । लेकिन इन धोरो के बीच मोल-मोल भर लम्बी समतल जगह भी तो है । इन डहरो मे आसानी से नहरो का पानी लगाकर सेती की जा सकती है। दनियासर और पल्लू के ऐन पास से बिजली के बडे-बडे खम्भो को एक लाइन निकली है। सरकार यहाँ कोई उद्योग-धंधा ही स्थापित कर दे तो भी इन लोगों को बदहाली कुछ मिट सकती है। दनियासर मे पचायत समिति का प्राईमरी स्कूल है। लेकिन बच्चे पढ़ते ही नहीं । शायद गांव भर से पन्द्रह-बीस बच्चे जाते हैं । अध्यापक भी कभी स्कूल में रहता है, कभी नहीं । वच्चे तो सुबह-सुबह ही पशुओ के पीछे निकल पड़ते हैं । मैं अभी निपटने के लिए ही बाहर निकला हूँ। और छोटे-छोटे बच्चे पशुओं को लिये सेतो की ओर जा रहे हैं। दिन अभी पूरा निकला नहीं है। पाले से सिकुड़ते हुए, एक बिना बटनों की कमीज में भी चले जा रहे हैं। मेरे शरीर पर तीन-चार कपड़े पड हुए है । मैं सोचता हूँ-सचमुच हो ये लोग गरीब हमारी वजह से ही है। अतर्राष्ट्रीय गैर-बरावरी मिटाने की बातें की जाती है लेकिन एक ही देश के स्थान-स्थान की गैर-बराबरी मिटाने की बातें क्यो नही चलाई जाती? दूसरे दिन पल्लू अड्डे पर आता हूँ। रास्ते में एक आदमी बताता है कि यहाँ के आदमी में और उधर के आदमी मे बहुत फर्क है। उधर का आदमी खर्च करते हुएं तनिक भी नही झिझकता। अच्छा खाता-पीता है और पहनता है। इधर जिसके पास कुछ होता है, वह भी पूरा खाता-पीता नही और अच्छा पहनता नहीं । वह भी जितना पाम है उसमें दो पैसे और मिलाने की कोशिश करता है। इसका कारण है कि यहां के आदमी को यह विश्वास नही रहता कि जो बोया है वह हो ही जायेगा । उधर के आदमी को यह विश्वास होता है । वह जितना कूतता है, उससे मन दो मन ही कम बेसी होता है । यहाँ का तो बचपन ही चिन्ता-फिकर में डूबा है। उसे भी यह फिकर रहती है कि कल पशु चराने किधर ले जाऊंगा? पल्लू में सेकेण्डी स्कूल बने दो वर्ष हो गये हैं। एक परिचित अध्यापक से 124: कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ मिलने जाता हूं। पूछने पर पता चलता है कि यहां दसवी में आठ विद्यार्थी हैं और नौवी मे नौ । पल्लू सात-आठ गांवो का सेन्टर है । दस-दस मील के एरिय में, यह एक हाई स्कूल है । लेकिन पढने वाले ? अगर लोग पढ़ायें और पढ़ाने के काबिल होतो पचास-माठ बच्चे दसवी क्लास के सिर्फ पल्लू गांव के ही होने चाहिए। इतना बडा गांव तो पल्लू है हो। लेकिन अड्डे पर बैठा मैं साफ देख रहा हूँ। पास ही के एक खेत में एक याप अपने बेटे को हल जोतना सिखा रहा है । लड़का कोई सात-आठ वर्ष का है । वह हल की हथेली तक बड़ी मुश्किलों से पहुंच रहा है। फिर भी उसने हल संभाल रखा है । वाप पीछे-पीछे चल रहा है । बाप सोच रहा है-अब हम अधिक भूमि जोत सकेंगे । अधिक भूमि जुतेगी तो अधिक आमदन होगी। लेकिन...

पात्रा संस्मरण पशुपतिनाथ के देश में रूपनारायण काबरा । ग्रीष्मावकाश की लम्बी छुट्टियां पर्यटन का अच्छा अवसर प्रदान कर देती है। यद्यपि मौसम ने तो खूब हराया वाहर घूमने को, पर नेपाल दर्शन की अदम्य इच्छा नहीं झुकी, नही पिघली इतनी गर्मी से भी। जीवन में इतनी बड़ी यात्रा करने का मेरा प्रथम अवसर था। साथ में परिवार था, पत्नी और दो बच्चे अतः कुछ घबराहट भी थी ही, यद्यपि हमने पूरी यात्रा के लिए ट्रेन मे आरक्षण की व्यवस्था कर ली थी। मेरा भय निर्मूल नही या। भारत की राजधानी दिल्ली में हमारी तीन वर्थ आरक्षित होते हुए भी असम- मेल के शयनयान में कुली को पूरी सहायता के बावजूद भी किस कठिनाई से हम घुस पाये थे इसे याद कर अव भी सिहर उठता हूँ । वच्चे चीत्कार कर उठे थे, मै पिस गया था और पत्नी पमीन-पसीने होकर हांफने लगी थी। हमने अपने आपको भीड़ के हवाले कर दिया और चीखते-निल्लाते, पिसते-पिसाते जाने कैसे उस छोटे कम्पार्टमेंट में अपनी सीट पर पहुंच गये। गनीमत थी कि इन अवैध घुस- पठियों ने सीटों पर कब्जा नहीं किया था। उनका साम्राज्य केवल गेट और गैलरी तक ही था। यात्रा के दौरान कानपुर के पांच-छह कॉलेज स्टूडेन्ट भी हमारे डिब्बे में (हमारी इजाजत से !) आ घुसे थे। हम आशकित थे विद्यार्थियों से, पर वे सब बडे भले सिद्ध हुए। जब उनको यह ज्ञात हुआ कि मैं अध्यापक हूँ तो उनका मेरे प्रति सम्मान और भी बढ गया और मुझे अपने अध्यापक होने पर प्रसन्नता और गर्व हुआ। उन्होंने पानी लाने में, चाय की, फल की व्यवस्था करने मे पूरी मदद की। केवल लघुशंकाएँ करने स्वयं जाना पड़ता था जो कि हिन्दुस्तान की बढती जन- संख्या की प्रतीक भीड़ को लांघकर एक दुर्ग फतह करने से कम नहीं थी। विद्यार्थियों ने हमारा आतिथ्य भी किया और.विदा होते वक्त झुक कर नमस्कार । फुलेरा मे रक्मोल (बिहार) तक की लगभग चालीस घटे को यात्रा में और 126 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ कही कोई कप्ट नहीं हुआ। यात्रा सुखद रही। रक्मोल से हम वीरगंज (नेपाल) पहुंचे, जहां से काठमाडू के लिए बस पकड़ी और चल दिए। पहाडो मे वसे नेपाल की ओर । विदेश यात्रा में जाना अच्छा लग रहा था । वीरगज मे ही भारतीय मुद्रा को नेपाली मुद्रा में बदलवाने के लिए एक दुकानदार के पाम गये । उसने बड़ी सहृदयतापूर्वक बदल दिये । पर कुछ नोट जीर्ण-शीर्ण दे दिये । हमने बदलने को वापिस दिये तो उसने उनके टुकड़े-टुकड़े करके कहा--"भाई साहब, नेपाल में राजा का सम्मान है। नोट कैसा भी हो कोई लेने से मना नहीं करता है, चाहे फटा हुआ हो, टुकड़े-टुकड़े हो, कैसा भी क्यों न हो, हर दुकानदार, रिक्शावाला, चाय वाला सब ले लेते हैं।" और बात सही थी। हमारी वस चल पडी, पहाडी घाटियो में चढती, उतरती, घूमती, चक्कर खाती। पग-पग पर पसरा प्रकृति का सौन्दर्य कितना रमणीय था। रास्ते में पहाड़ों से रिस-रिस कर वहते छोटे-बडे झरने, पहाड़ी नदियां, मजबूत पुल, विचित्र पहाड़ी मकान, सभी कुछ अच्छा लग रहा था । कही बेहद शुष्कता, तो कही नमी । कभी वस हजार फीट नीचे चली जाती तो कभी हजार फीट ऊपर । कभी दिन का प्रकाश धुंधला जाता तो कभी ठड बढ़ जाती तो कभी ठंड कम हो जाती । और जब बस को खिड़की से हजारों फीट गहराई में देख लेते तो जीवन की क्षण-भंगुरता का बोध हो जाता । जिन्दगी और मौत इतनी समीप और साथ-साथ चलती हुई मुझे वहीं महसूम हुई । पहाड़ियों पर छाये हुए बादल के ढेर, कुहरा, सभी कुछ अजीब लगता था, अच्छा लगता था। पहाड़ों में की गयी सीढ़ीनुमा खेती भी वही देखने को मिली। कितने मेहनती हैं वे लोग पर उनके चेहरे व कपड़ो से सामान्यत. गरीव ही नजर आये । इस दुनिया में मेहनत मजदूरी का अमीरी से बहुत दूर का रिश्ता है । मेहनत तो अमीरी से अपने रिश्ते का जिक्र करती रहती है पर अमीरी अपने इन मेहनतकश रिश्तेदारों को कम ही पहचान पाती है। आत्मीयता दिखाने का तो प्रश्न ही नही उठता है। लगभग नौ घटे की यामा करके हम काठमांडू पहुँचे उम समय रात के तग- भग नौ बज गये थे। कुलियो और रिक्शे वालों ने लूटना चाहा और लूटा भी। हम मारवाड़ी सेवा समिति के होटल पहुंचे और वहाँ रहे पूरे चार दिन । उस होटल में जिसे मैं धर्मशाला ही कहूँगा मभी सीढ़ियां, रेलिंग, कही छत तो कही दीवार तक भी लकड़ी की थी। बाद में मालूम हुआ कि काठमांडू मै काठ यानी लकड़ी का प्रयोग अत्यधिक है और इसीलिए इमे काठमाडू कहते हैं। धर्म- माला सस्ती अवश्य थी पर थी गन्दी और अंधेरी । लेकिन इसके मस्तेपन ने हमारी अन्य शिकायतो को समाप्त कर दिया और हमने अपने को इसमें जगह मिल जाने से भाग्यशानी ही समझा था।

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128 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ - वत्सक इत्यादि इस क्षेत्र के प्रमुख स्थान है जिनका अपना पौराणिक इतिहास है। शिवरात्रि पर पशुपतिनाथ का जबरदस्त मेला लगता है। नेपाल में दर्शनीय स्थलों की कमी नही। बूढा नीलकट, स्वयभू, शाही- म्यूजियम, हनुमान ढोका, चिड़ियाघर, राजकीय उद्यान, गोदावरी पार्क, पाटन का कृष्ण मदिर, बाला जू, गोकर्ण सुन्दरी जल, शखमूल, दक्षिण काली, मुक्तिनाथ इत्यादि काफी प्रसिद्ध है । बूढ़ा नीलकठ में भगवान विष्णु की शेपशायी मूर्ति है, विशाल पत्थर की। बताया जाता है कि किसी प्राचीन अभिशाप के कारण राज- परिवार का सदस्य वहां नहीं जा सकता । स्वयभू मे बुद्ध की चार प्रतिमाएं है और बुद्धनाथ का विशालकाय स्तूप ससार के विशालतम स्तूपों में एक है। चार जोडी भगवान बुद्ध की आँखें मानव मात्र के क्रिया-कलाप को देखती हुई वनायी गयी है। पास ही मदिर मे जलते सैकडों दीप और लामाओं द्वारा विशेष पूजन-अर्चन, भजन-कीर्तन दर्शनीय है । पोखरो की प्राकृतिक सुपमा वर्णनीय है। काठमाडू में विदेशी माल से भरी हुई दुकानें, बड़े-बडे शोरूम और वहाँ खरीददारी करती हुई भीड 80% भारतीय थी। स्पष्ट था कि विदेशी माल का कितना आकर्षण भरा है हमारे अन्दर। नेपाल से लौटने पर सबका पहला प्रश्न- "आपने नेपाल मे क्या-क्या देखा?" न होकर यही था कि “नेपाल मे क्या-क्या विदेशी माल लाये ?" कैमरा एवं ट्राजिस्टर की तो मेरी भी बहुत इच्छा थी पर कस्टम से बच निकलने की न कला थी, न निर्भीकता। अतः मन मारकर रहना पडा । केवल बच्चों के लिए फोल्डिंग छतरी, कुछ पेंसिल-रबर तथा एकाध फ्रॉक वगैरह ही ला पाये । जसियां खरीदते वक्त हमारे एक परिचित ने बताया कि सही बात तो यह है कि भारत में बनी लुधियाना-जालन्धर की जसियां, सूरत की साड़ियाँ, भारतीय मिलो के सुटिंग वगैरह "मेड इन कोरिया, मेड इन चाइना, जापान" इत्यादि के लेवल देखकर लोग उन्हें खरीदते है । विदेशी गुणवत्ता की चकाचौध पर ड्योढ़े दाम देते है। भारत मे यह सब मिलता है। पर लोगो को 'क्रेज' है विदेशी माल का। मैंने तो नेपाल से विशेष चीज पश्मीना शॉल लिया यह समझकर कि नेपाल की वस्तुओ के लिए भारतीय चुगो चौकी पर परेशान नहीं होना पड़ेगा। हिन्दुस्तान मे 'कोकाकोला' बन्द है । मेरी बच्ची ने वहाँ कोकाकोला पिया। मुझे तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि इसमे स्वाद क्या है कि लोग इतना पीते है । वैमे पीने को तो मैंने भी चालीस-पचास बोतलें पी ही होगी अब तक (नेपाल में एक भी नही) जब भारत में विकता था तब । काठमांडू का 'काका पाक' हमे अच्छा लगा, गर्म भी और ठंडा भी। मेरी वच्ची मचल उठी थी जापानी यच्चों में बाल बनवाने के लिए क्योकि गोदावरी उद्यान में कई नेपाली बच्चे-बच्चियों के बाल देषकर वह निश्चय कर चुकी थी।

पशुपतिनाथ के देश में : 129 और हेयर ड्रेसर मे रातो-रात बाल बनवाये क्योंकि दूसरे दिन सुबह ही तो रवाना होना था। नेपाल के शिक्षा मंत्रालय में भी गया और वहां की शिक्षा-व्यवस्था की जान- कारी की.। मैंने अंग्रेजी मे वार्तालाप किया तो उन्होंने कहा कि "आप हिन्दी बोलिये, हम हिन्दी अच्छी प्रकार समझा लेते है।" मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई उनके हिन्दी प्रेम को देखकर । नेपाली स्कूलों मे साज-सामान, पर्याप्त भवन इत्यादि की कमी है । अनुशामन भी कोई खास नही । शिक्षा ने प्रभावित नहीं किया। चार दिन काठमांडू में बिताने के पश्चात् हम पुन. रवाना हुए वीरगंज के लिए और वीरगज से पहुंचे रक्सोल । रक्सोल मे हम रिक्शे वालो से मात खा गये । और पहली बार यह मानना पड़ा कि हर आदमी अपने काम में होशियार होता है भले ही वह शिक्षित हो या अशिक्षित । उन अनपढ रिक्शे वालो ने मुझे कस्टम की सख्ती से ऐसा डराया कि मैं उनके चक्कर में आ गया और भारतीय सीमा में सामान पहुंचाने के खामखाह अस्सी रुपये देकर पिंड छुडाया । और इस प्रकार नेपाल के ठडे वातावरण से हम पुन आ पहुंचे भारत मे चलने वाली गर्म हवाओ के बीच। कैसे भूल सकते है पर्वतों के मनोरम दृश्य, मदिरों को सास्कृतिक पृष्ठभूमि और प्रकृति का रमणीय सामीप्य । एक सुहृद, सौम्य एव नेक राष्ट्र का वह प्रवास मैं कभी नहीं भूल सकूँगा।

रखाइये मगर होशियारी से अब्दुल मलिक खान बावा आदम के जमाने में इसान कंद-मूल खाकर गुजारा करता या। आग का ईजाद होने के बाद ही उमने खाना पकाना सीखा होगा। तब से अब तक खाना बनाने और पकाने के वेहिसाब तरीके निकल चुके हैं। इस तरह बहुत पहले अनेकानेक शास्त्रो की शाखाओ से लदे मानव ज्ञानरूपी वृक्ष में एक शाखा और फूट निकली जिसे पाकशास्त्र कहा जाता है। 'पाकशास्त्र' याने खाना पकाने की कला सिखाने वाला शास्त्र । कहने वाले खाना पकाने को कला कहते है यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन उनको क्या कहें जो इसको वला समझते है । और बला समझकर ही इसका अंतिम संस्कार करते हैं। अंतिम संस्कार से मेरा मतलब है फाइनल टच । भोजन को अंतिम रूप देना ताकि वह खाने लायक हो जाये। इस क्रिया में लापरवाही से कई वार खाने वाले का अतिम संस्कार तक हो जाता है। फिर भी पकाने वाले को अपनी गलती का एहसास तक नहीं होता। आदमी हमेशा खाने को खाता है लेकिन ऐसे में 'खाना' आदमी को खा जाता है । छुटपन मे हमारे उस्ताद हमे एक लतीफा चटखारे ले-लेकर सुनाया कर थे-“एक बार एक लड़के ने खाना पाते हुए अपने वाप से पूछा-चीटा स्वाद में कैसा लगता है ?" बाप अपने बेटे के इस बेतुके सवाल पर झुंझला उठा--"खाना खाते वक्त तुम ऐसी वेकार वात क्यों पूछ रहे हो?" लडके ने सफाई दी-"मैं यह बात इसलिए पूछ रहा हूँ कि अभी जो कोर आपने खाया उसमे एक चीटा भी था।" हमारे एक दोस्त अपने किसी रिश्तेदार के यहां मेहमान बनकर गये हुए थे। उस वक्त वे रिश्तेदार घर पर मौजूद नहीं थे। घर पर बच्चे और उनकी मां थी। रिश्तेदार की वेगम साहिवा हमारे दोस्त से पर्दा करती थी। खाने का वक्त हो खाइये मगर होशियारी से : 131 गया तो बच्चे थाली में खाना ले आये। दोस्त महाशय खाना खाने बैठे तो पहली ही रोटी में उनको मरी हुई मक्खी चिपकी नजर आयी। उनको वडा जुनून आया अपने रिश्तेदार की बीवी पर । फिर भी उन्होंने उस वक्त कुछ कहना ठीक नहीं समझा। उन्होंने रोटी का मक्खी वाला टुकड़ा तोड़ कर थाली में एक तरफ रख दिया। यह सोचकर कि खाना खाने के बाद जब थाली रिश्तेदार की बीवी के पास पहुंचेगी तो रोटी के टुकडे में मक्खी चिपकी हुई देखकर उनको अपनी लापरवाही का एहमास होगा। टुकड़े को थाली में रखकर वे खाने मे मशगूल हो गये। उसी वक्त मेजवान रिश्तेदार भी आ पहुंचे और उनकी तीमारदारी मे लग गये। होते-होते दोनो मे बातचीत का दौर चला। हमारे अजीज़ दोस्त खाना नोश फरमाते जा रहे थे और वातचीत भी करते जा रहे थे। कुछ देर बाद ये खाना खाकर उठने ही वाले थे कि अचानक उन्हें उस टुकडे का ख्याल आया जो उन्होंने थाली में एक तरफ रखा था। लेकिन थाली तो चटियल खोपड़ी-सी साफ चमक रही थी। बार-बार नजर घुमाने पर भी वह आपत्तिजनक टुकड़ा उनको दिखाई नहीं दिया। हमारे दोस्त सोच रहे थे कि क्या मरी हुई मक्खी टुकडे को उड़ा ले गयी या बात-बात में हम उस टुकड़े को भी... खैर ! औरों की क्या हम अपनी ही कहें कि अगर हम खाने में से निकलने वाली इस तरह की किस्म-किस्म की चीजो को शुरू से ही इकट्ठी करने लगते तो अब तक हमारे पास एक अच्छा-खासा अजायबघर वन जाता। तिनके, घास, बाल, धागे, चाक के टुकड़े, माचिस की जली हुई तीली, चीटे, चीटियां और घुन वगैरह निकलना तो आम बात है। कई बार बटन, ककड़, सेपटीपिन, हेयर पिन, कचे और न जाने क्या-क्या हमारे दांतों और आंतों की मजबूती का इम्तिहान लेने चले आते है। इसी सन्न इम्तिहान के मोर्चे पर जंग करते हुए अब तक हमारे दो दांत शहीदी का दर्जा पा गये। आगे अल्लाह मालिक है। चावल या दाल में कंकड़ आने पर हमारी वेगम साहिया इसको दूकानदार की कारस्तानी बताकर बरी जिम्मे हो जाती हैं। उनका कहना है कि चावल और दाल मे दुकानदार इस तरह के कंकड़ मिलाते हैं कि शक्ल में हू-ब-हू वे उनके सगे भाई नजर आते हैं। माइक्रोस्कोप में भी देखा जाये तो वह भी धोखा खा जाये। आपने कहावत सुनी होगी, 'अनाज के साथ धुन भी पिस जाता है इसलिए हम घुन की वात नही करेंगे । चीटियां भी कई जगह बड़े शौक मे खायी जाती हैं। मक्खी-चूस का खिताब तो आपने कई बार सुना होगा । वमे भी मक्खी चूम कर फॅबने और मक्यी निगलने में कोई फर्क नजर नहीं आता। इस वजह से इन छोटे- मोटे प्राणियों का जिक्र करना कोई ग्राम माने नहीं रखता। शादी के बाद पहली बार हमारी मब्जी में लवा काला वाल निकला तो हमने - 132 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ बडे शाही अदाज में बेगम साहिवा को वह नजराना दिपलाया। हम तो अंदर से उबले जा रहे थे लेकिन उनके चेहरे पर शिकन तक नजर नहीं आयी। व खिल. खिलाती हुई वोली--"शुल्फो और गेसुओं के जिक्र से तो अच्छे-अच्छे शायरों की शायरी महक रही है । आपने भी अपनी न जाने कितनी नग्मों में काली लटों की तारीफों के पुल बांधे हैं । उनमे से एक गेसू अगर आपकी प्याती में पहुंच गया तो इसमें कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा।" सच मानिये इसके बाद हमने उनकी काली धुंघराली जुल्फों की तारीफ करना ही छोड़ दिया। एक दोपहर को हम वाजार से भाकर खाने पर टूट पड़े। दो ही लुकमे लिये होगे कि हमारे मुंह से एकदम चीख निकल गयी। ऐसा लगा जैसे किसी ने हमारे तंदुरुस्त जबडे में इंजेक्शन की सुई घुसा दी हो। हाथ से टटोलकर देखा तो एक तीखा आलपिन हमारे मसूड़े के दरवाजे में घुसने की जोरदार कोशिश कर रहा था। हमने शिकायत की नजर से वेगम की तरफ देखा तो फलासफर की तरह उन्होंने हमें बड़े पते की बात बतायी । कहने लगी--"जिन्दगी मे तो लोहे के चने तक चबाने पडते हैं और आप एक मामूली से आलपिन को देखकर ही घबरा गये।" हम उनकी फलासफी का लोहा मानकर चुप हो गये। हमारी मर्दानगी हम पर तानाकशी करने लगी। हमने सोचा, अच्छा होता अगर हम आलपिन को कच्चा चवा गये होते। हमारे एक पड़ोसी के पेट में बड़े जोर का दर्द रहता था। हर तरह से इलाज करवाया लेकिन कोई फर्क नहीं पडा। आखिर उन्हें अपने पेट का एक्स-रे कर- वाना पडा। डॉक्टर की रिपोर्ट के मुताविक उनकी बड़ी आंत में एक लोहे की चीज अटकी हुई थी। फौरन ऑपरेशन किया गया तो अंदर से निकला एक हेयर- पिन जो कभी उनकी श्रीमतीजी के बालों की शोभा बढाता था। और इसमे कोई शक नहीं कि वह खाने के जरिये ही उनके पेट में पहुंचा होगा। में तो हम ऐसी बातों पर बावेला मचा दिया करते थे। हम गुस्से से लाल-पीले हो जाते लेकिन वेगम हमेशा नामल रहकर ऐसा जताती जैसे कुछ हुआ । ही न हो! उस रोज लजीज खीर की तारीफ करते-करते हम खोर गटक रहे थे कि अचानक कोई सख्त-सी चीज हमारे गले में अटक गयी। हमारी समझ में नहीं आया कि कवाब में हड्डी कहाँ से आ फेमी। खासकर हमने हथेली फैलायी तो एक अच्छा-खासा सुनहरे रंग का बटन टपक पड़ा। हमारे कुछ कहने से पहले ही बेगम साहिवा की बांछे खिल उठी-"अरे वाह ! हम अपने कोट में लगाने के लिए कब से इस कलर के बटन को ढूंढ रहे थे। आपने हमारी सारी मुश्किल आसान कर दी।" कहते हुए उन्होंने हथेली पर से बटन घाइये मगर होशिमारी से : 133 झपट लिया। हमारा एक हाथ बदस्तूर गले को सहला रहा था, उस पर उनका ध्यान नहीं गया। बचपन से हमें मेथी, पालक की सब्जी खाने का बड़ा शौक है। एक दिन सब्जी में हरी घास के टुकडे निकलने पर हमने उनसे अपील की तो उन्होंने फौरन दलील दी कि---"हर वनस्पति में किमी-न-किसी तरह का विटामिन होता है। आपने देखा, सोड कितने ताकतवर होते है। वे सिर्फ घास खाते हैं। हरी घास सेहत के लिए कोई युरी चीज नहीं होती।" हमने खीझकर कहा-~"घास तो गधे भी साते है। क्या आपने हमे गधा समझ रखा है ?" हमारी बात शायद उनको लग गयी थी। वे आंसी होकर बोली-"हम आपको गधा समझेंगे तो फिर लोग हमको क्या कहेंगे, आपने इतना भी नही सोचा?" हमने आगे वहस करना मुनासिब नहीं समझा। बेगम साहिबा का कहना है कि हमारे सामने तो आज तक कोई ऐमी वैमी चीज नही आयी। एक हम हैं कि घर-बाहर, होटल, रेस्तरां हर जगह कुछ-न- कुछ ढूंढ ही लेते हैं। यह तो हुई उन चीजों की बातें जो खाते-नवाते वक्त नजर में पड़ जाती हैं। लेकिन न जाने कितनी ऐसी गुमनाम हस्तियां है जो चुपचाप पेट के ज्वालामुपी मे चली जाती है और कानोकान पबर तक नहीं होती। इसकी एक वजह यह भी है कि खुदा ने पेट को जबान नही दो वरना वह सारी तफसील बयान कर देता। गले की चौकी पार करने के बाद कोई भी चीज कहीं-से-कही जा मकती है। हमने येगम को कई बार आगाह किया कि खाने-पीने के सामान को ढक कर रखा करो और खाना बनाने में ज्यादा होशियारी से काम लिया करो। इस पर हमेशा उनका एक ही जवाब होता है---"हमारी शादी को दस साल से ऊपर हो चुके । इस दौरान हम दो से चार हो गये । आपकी सेहत विल्कुल ठीक है, फिर तो आपको हम पर एतबार होना चाहिए।" हमे उनकी बात में वजन नजर आता है। शादी के बाद हम कभी बीमार नहीं हुए। दाँतो के हादमे को अगर छोड़ दिया जाये तो हमारे हमउम्न साथियों की बनिस्पत हमारी सेहत अच्छी है। इन सब बातों को देखते हुए हम इस मसले पर नये सिरे से सोचते हैं। हो सकता है हमारी सेहत का राज खाने में निकलने वाली इन अजीबो- गरीब चीजों में ही छिपा हो। फिर भी हर खाने वाले से हमारी गुजारिश है कि खाते वक्त हाथ और मुंह के साथ-साथ आँखों से भी काम लेना नहीं भूलें।

रम्य रचना कोरा लिफाफा रामदत्त शर्मा । में गुदगुदी मेज पर पड़े एक लिफाफे को उलट-पलट कर देखा, हाथ में लिया तो पता लगा कि यह तो कोरा लिफाफा है। पता नही यह किसके हाथ मे जायेगा। इसमे रखा जाने वाला कागज कोई पय होगा या आदेश या इसमें वजन रखा जायेगा, कुछ भी नही कहा जा सकता। यदि इसमे कोई प्रेम-पत्र रखा गया तो किसी बेताबी से प्रतीक्षा करने वाले की आंखो को चकाचौंध करने में भी यह पीछे नहीं रहेगा। वह इसे बार-बार देखेगा, पढेगा और मीने से लगायेगा। उसके हृदय होगी एव हाथो मे कम्पन । कांपते हुए हाथो मे इसे खोला जायेगा । खुलते ही इसका महत्व एक तरह से समाप्त हो जायेगा। जिस पत्र को सुरक्षित रखने हेतु इसने अपने घर को छोडा वह इसे छोड़ कर किसी की निगाहों का केन्द्र बनेगा और यह लिफाफा किसी कूड़ेदान में फेंक दिया जायेगा। यदि इस लिफाफे में किसी की नियुक्ति का आदेश रखा गया तो यह किसी की रोटी-रोजी का माध्यम बनेगा। वह इसे प्राप्त कर अपने भाग्य को सराहेगा परंतु आदेश को पढ़ने की शीघ्रता में इसे बेदर्दी से फाड़ कर फेंक देगा। पता नही कहां और किस अवस्था में यह पड़ा रहेगा। इसकी सुध-बुध लेने तक की चिन्ता किसी को नहीं रहेगी। इसी प्रकार इस लिफाफे में यदि कोई स्थानान्तर का आदेश हुआ तो इसका स्वागत भी हो सकता है और निरादर भी। स्थानान्तर चाहने वाले को यदि इस लिफाफे में रखा आदेश उसके इच्छित स्थान का हुआ तो यह बड़ी उत्सुकता से इसे खोलेगा और इसका स्वागत करेगा। यदि स्थानान्तर आदेश अनिच्छित स्थान का हुआ तो वह इसे क्रूर दृष्टि से देखेगा। खोलकर आदेश को पढ़ते ही उसका माथा ठनकेगा और वह चुपचाप उस आदेश को लिफाफे में रखकर सिर पर हाथ लगाकर बैठ जायेगा। ऐसी स्थिति में यह लिफाफा फाड़- कर फिर जाने की दुरावस्था से बच जायेगा। कैसी विडम्बना प्राप्त करने वाले ने तो लिफाफा वेदों में फाड़ दिया और अनचाहा आदेश प्राप्त मनचाहा आदेण कोरा लिफाफा : 135 करने वाले ने इसे वरुश दिया। सरकारी कर्मचारी बहुधा कहते हैं कि हमारा तो लिफाफे में घर है। लिफाफा उनके घर को बसाने या उजाडने का माध्यम बन जाता है, परन्तु वारीकी से सोचें तो उनके मन में लिफाफे के लिए वास्तव मे न आदर है और न उससे किसी प्रकार का क्षोभ । उसे वे कोई महत्व नही देते । महत्व तो उममे रखे कागज का है। यदि यह कागज महत्त्वपूर्ण है तो लिफाफे का महत्व हो जाता है परन्तु तभी तक जव तक लिफाफा खोलकर भीतर के कागज को निकाल नही लिया जाता है। इसके बाद तो लिफाफा कहाँ जाता है इसकी परवाह बहुत कम लोग ही करते हैं। फिर भी न जाने क्यो कहा यही जाता है कि लिफाफे में घर है। पता नही यह लिफाफे का मजाक उडाना है या उसके नाम को बदनाम करना है। यदि इस लिफाफे का उपयोग कुछ वजन रखकर किसी को चुपचाप भेट करने में किया गया तो इसके भाग्य ही खुल जायेंगे क्योकि कोरे लिफाफे में वजन रखने का रिवाज आजकल बढ़ता जा रहा है। ऐसे कार्य जो नियम और सिद्धान्त के आडे आने से नहीं किए जा सकते लिफाफे में वजन रखकर पहुंचाने से आनन- फानन में हो जाते है । यदि अफसर का रुख टेढा देखो तो लिफाफे में वजन रखकर भेंट कर दो। समझ लो कि रुख अनुकूल हो जायेगा । कई अफगर ऐसे होते है जो लिफाफे में वजन देखते ही भभकते है, भोकते है और डाट-फटकार भी कर देते हैं । उन्हे बस चुपचाप घर जाकर अधिक वजनदार लिफाफा दे दो। यदि फिर भी राजी न हो तो उनकी श्रीमती जी से सांठ-गांठ कर वह लिफाफा पहुंचा दो। सफलता मिलने के बहुत आसार हो जायेंगे। कोरे लिफाफे में वजन रखना तो महत्वपूर्ण है ही, परन्तु उससे भी वजनदार लिफाफे को सही स्थान पर पहुंचाने वाले व्यक्ति की व्यवहार कुशलता एव पटुता है। उसकी सूझ-बूझ और योग्यता का पूरा इम्तिहान है । जो जितनी कुशलता से वजनदार लिफाफे को उपयुक्त स्थान पर पहुंचा सकेगा उतनी ही गारन्टी से मनचाहा काम पूरा करा सकेगा। काम छोटा हो या वडा, वजनदार लिफाफे से आज के समय मे सब-कुछ सम्भव है। लिफाफे में वजन बढाते जाइये और बडे-से-बडा काम पूरा कराते जाइये। अफसर की ही बात नहीं। बडे-से-बड़े नेता और यहां तक कि सरकार के मंत्री जी भी वजनदार कोरे लिफाफे के आकर्षण से अपने आपको अछूता नही रख पाते है। कोटा हो या परमिट हो, चाहे लाइसेंस हो या टेन्डर सभी को मंजूर कराना वजनदार कोरे लिफाफे की पूरी तरह सामर्थ्य मे है। आवश्यकता इम बात की है कि आप ऐसा लिफाफा पहुँचाने मे कितने ट्रेन्ड है। यदि आपने किसी अच्छे गुरु से ट्रेनिंग प्राप्त की है तो अवश्य ही आप जान जाएंगे कि किस प्रकार के कार्य के लिए कितना वजन कोरे लिफाफे मे रखें और उसे किस माध्यम से कहां पहुँचायें। इसके लिए अवसर का भी बड़ा महत्व है। कैसा भी बढ़िया कोरा, एक- 136 . कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएं दम अछूता और आकर्षक लिफाफा ले लीजिये, उसमें वजन भी अच्छा-खासा रख लीजिए परन्तु यदि आपने उसे उचित अवसर पर नहीं दिया तो बना-बनाया काम बिगड़ भी सकता है। अत अवसर का जरूर ध्यान रखें। अवसर ही नहीं वजनदार कोरा लिफाफा पहुंचाने के लिए उचित स्थान का भी महत्त्व कम नहीं है। आपने ऐसा लिफाफा यदि किसी ऑफिस में जाकर दिया तो आपको धक्के मारकर बाहर भी निकाला जा सकता है। दो-चार आदमियो के सामने कमरे में दिया तो अवश्य ही आप अपने फूहड़पन का प्रदर्शन करेंगे। इसके लिए उचित स्थान का चयन करना कोई मामूली बात नही है। विशिष्ट प्रकार की तीन बुद्धि वाले अनुभवी एवं सूझ-बूझ से युक्त व्यक्ति ही सही स्थान का चयन कर सकते हैं। इसे देते समय ध्यान इतना अवश्य रखिये कि जहाँ तक हो एकान्त हो क्योकि ऐसे लिफाफे नम्बर दो मे ही दिये जा सकते हैं । कोरा लिफाफा पहुंचाने मे माध्यम का भी कोई कम महत्व नही है। यदि आप इतने कुशल और अनुभवी नही है कि लिफाफे को सही स्थान पर सीधा ही पहुंचा सकें तो उचित माध्यम जरूर खोज निकालिये । इसे ढूंढने के लिए बहुत सूझ-बूझ की जरूरत है, यदि गलत माध्यम चुन लिया तो सम्भव है कि लिफाफे का वजन रास्ते ही मे कम हो जाये। यह भी सम्भव है कि आपका लिफाफा वीच मे ही रह जाये और आप धोखे के शिकार हो जायें। इसमें काफी सतर्कता की जरूरत है । आप यह तो कहगे कि कोरे लिफाफे में वजन रखने और पहुँचाने की बात अधिक विस्तार में कही गयी है परन्तु मैं क्या करूं यह तो आज के ममय की बलि- हारी है जिसने कोरे लिफाफे को लिखे हुए से अधिक महत्व दिया है। इसीलिए तो लिखा लिफाफा फाड़कर फेंक दिया जाता है परन्तु कोरा लिफाफा जव वह वजन- दार हो जाता है तो उसे फाडकर फेंकना तो दूर रहा बहुत मेंभाल कर अन्दर की जेब में रखा जाता है। इसीलिए तो कहते है कि आज इस युग में लिखे और पढे से ज्यादा कीमत कोरे को है। इसे कही आप मुहावरा न समझ लें, क्योकि कभी- कभी लोग तपाक से कह देते है कि क्या हो गया जो कोरे लिफाफे बनते जा रहे हो । कभी कोई ऐसा भी कहते हैं कि कोरे लिफाफे ही मत रह जाना, वजनदार बनना, नही तो फूंक मारकर उडा दिये जाओगे, अतः समय को पहचानना चाहिए। इसी से तो हाथ मे कोरे लिफाफे को देखकर सोच रहा हूँ कि पता नहीं इस लिफाफे के भाग्य में क्या बदा है। ऐसा न हो कि किसी हवा के झोके मे यह लिफाफा उड जाये और उड़ते-उडते इतनी दूर पहुंच जाये कि किसी की निगाह मे ही न आये । किसी कोने में पडा नही रह जाये या किमी फाइल के नीचे न दव जाये, क्योंकि महत्व तो निगाह के सामने रहने का है। यदि निगाह मे ओझल हो गया तो इसका भाग्य फूटा ही समझो। ऐसी स्थिति में वजन रखने की जरूरत पड़ने पर कोई दूसरा ही कोरा लिफाफा खोजना पड़ेगा।

रम्य रचना रूठे-रूठे पिया, मनाऊँ कैसे ! सत्या भार्गव । । ऑफिस से आते ही ये वोले-"मैडम फटाफट तैयार हो जाओ, शर्मा के घर चलना है।" तो मैं बोली-"शर्मा के घर, वहां आज क्या है ?" "आज उसके विवाह का दिन है, पार्टी दे रहा है। सभी दोस्तों को सपरिवार बुलाया है।" "एक वात वताओ, वो 'शादी-दिवस' मनाते ही कब है ?" "ओ हो ! ये सब तुम उसी से पूछना। जव देखो तब बहस करने लगती हो। तुम्हारी यह आदत मुझे जरा भी पसन्द नहीं।" मैं इनसे कुछ कहे-सुने बिना तैयार होने चल दी। जब वहां पहुंची तो देखा--- मीना मित्तल, रीना चटर्जी, मोना मुकर्जी, शीला गोयल, शशि पारीख सभी मेरा इन्तजार कर रही थी। सबसे अभिवादन किया, फिर चारों ओर देखा पर घर. वाली अर्थात् विमल शर्मा कहीं दिखाई नही दी जबकि शर्मा साहब सबके स्वागत मे तन्मय थे। करीब आधा घटा इन्तजार करने के बाद विमल जी पधारी। मांखें मूजी हुई थी। साफ पता लग रहा था कि रोई हुई हैं। सबकी नजर उन पर थी। बधाई देने हेतु कौन आगे बढ़े-सब सोच ही रहे थे। तभी लपक कर शर्मा साहब आगे आये और बोले, "आइए देवीजी।" कहने का लहजा ऐसा था कि सब हंस पडे तभी गोयल साहब वोल पड़े, "यार लगता है जमकर झगड़ा हुआ है।" शर्मा साहब बोले-"झगड़ा किसका नहीं होता। यार, तुम एक बात बताओ। हम प्यार तो इनसे करें फिर झगडा किससे करने जायें। ये कई दिनों से रूठी हुई थी तभी तो आज पार्टी करनी पड़ी।" "क्या मतलब? क्या आज तुम्हारी शादी का दिन नहीं है ?"-मैं बोली। "नही, शादी तो हमारी जून में हुई थी अभी तो जनवरी ही चल रहा है। पर भाभी जी इनको मनाने का यही ढंग मबसे अच्छा है।" हम सब खूब हमे फिर तो रूठने-मनाने के अनेक रूप मामने आये। मोना मुकर्जी बोली-मुकर्जी साहब को जव मोघ आता है तो जो चीज मामने दीपे वही तोड डालते हैं। बड़ी मुश्किल से नार्मल होते हैं। हाँ, जब नार्मल होते हैं तो उम दिन विशेष तौर पर खिचड़ी बनती है। एक कटोरी भर घी डालकर मिट्टी

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रम्य रचना एक भुलक्कड़ प्रधानाध्यापक रामनिवास सोनी शिक्षा जगत के विशाल कारखाने में ऐसी कई विभूतियां आज भी मौजूद है जिनकी विमल यशोगाथा का वर्णन विचारी निरीह जड लेखनी द्वारा कदापि मम्भव नहीं। राजकीय सेवा काल में दीपावधि तक रहने तथा स्थान-स्थान पर सविम करने से ऐसी कई अज्ञात हस्तियों के दर्शन होते हैं जो हमारे मानस पटल पर स्थायी प्रभाव डाल मके। शिक्षकों में ही क्यो, प्रधानाध्यापकों में भी कई भुलक्कड़, जल्दबाज, सनकी तथा विक्षिप्त-से मिल जाते है जो समाज को अहेतु मनोरंजन दे जाते है। अजीब-अजीब टाइप के व्यक्ति इस विभाग की शोभा बढ़ाते है। कुछेक के अपने- अपने तकिया-कलाम है तो कुछ निरे जोकर टाइप । कुछ "भिंडी सा'ब", "टमाटर मा'व" तो कुछ "कोफ्ता" के नाम से चिढते है। कुछ के तकिया-कलाम हैं- "आक् छी.," "बात यह है कि " अथवा "जो है सो"... इत्यादि। भिडी सा'ब भिडी की सब्जी नहीं पाते और नाम लेते ही उनका पारा आसमान में चढ जाता है। इसी प्रकार टमाटर सा'य को टमाटर से सख्त नफरत है। बाजार मे आक् छी' की आवाज सुनते ही एक साहब अपना सतुलन खो बैठते हैं । इस प्रकार की छेड़खानी से लोगो का तो मनोविनोद होता ही है उनकी भी प्रसिदि किसी-न-किसी रूप में हो जाती है। हमारी लघु जानकारी में एक-दो शिक्षक ऐसे भी हैं जो पढ़ाते समय "बात यह है कि..." का पुट बार-बार लगाते हैं । यह आदत धीरे-धीरे नए गुल खिलाती है। छात्र भी उनकी नकल करने से नहीं चूकते। छात्रों ने सम्भवत. एक अध्यापक जी का नाम 'कोपता' इसलिए रख दिया कि उन्हें मुफ्त कोफ्ता खाना अधिक प्रिय है। एक बार एक शाला में गणित के नये अध्यापक आये। छात्रों को बुरी तरह पीटते । छात्र मभी भयभीत मगर करें क्या? आखिर उसी कक्षा के एक नटखट छात्र ने समाधान निकाला। जब भी कोई कक्षा मे आकर पूछा कि यह किसका घटा है तो छाय उत्तर देते--"एक सही एक बटा दो (11) का।" शनैः शनैः वात 138 : कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएँ खाते है । तब नाराजगी दूर होती है । रीना चटर्जी बोली-~~इनके गुस्से का हाल कुछ निराला है। लड-झगड कर स्कूटर उठाया और आधी-आधी रात तक दोस्तों के संग घूमते-फिरते रहेंगे। कभी-कभी तो किसी दोस्त के घर बैठे पो ताश खेलते रहते है और जब मैं मनाऊँ तभी नाराजगी दूर होगी वरना गुब्बारे की तरह फूले रहेंगे। पारीख साहब बोने---भई हमारी श्रीमतीजी की नाराजगी बड़ी महंगी पडती है । कई दिनो नकान काम न धाम बस गुलदस्ते की तरह सज-धज कर बैठ जायेंगी । मैं कमरे में तो ये वाहर और मैं बाहर तो ये अन्दर। राजी तभी होगी जब चार-पांच सौ का खर्च कर दूं। में बोली, “सो कमे?" "अरे भाभी जी मनाने के लिए साडी लानी पडती है, पिक्चर दिखानी पड़ती है तब कही देवी जी सही रास्ते आती हैं।" मित्तल माह्व सबकी बातें बड़े आराम से सुन रहे थे तभी मीना मित्तल से हमने पूछा- भाभीजी आप भी तो कुछ कहिए।" "अरे ये बडे धुन्ने हैं, चट भी मेरी पट भी मेरी वाली कहावत चरितार्थ करते हैं । जरा-जरा सी बात पर चुप्पी साध कर ममाधी लगा कर बैठ जाते हैं । लाख पूछे पर क्या मजाल जो नाराजगी का कारण बता दें । शुरू-शुरू में तो मेरा बहुत ही दम घुटता था फिर सोचा इनकी तो आदत हो ऐसी है। चार-पांच दिन बाद अपने आप नार्मल हो जाते हैं।" अब तक विमल शर्मा भी स्वस्थ हो चुकी थी सबकी बातों में रम ले रही थी, बोली -~~"मेरा जब-जब इनसे झगडा हुआ तय-तब पड़ोसियों तक को पता चल जाता है।" "सो कैसे ?" मध तो यह है कि मैं बिन्दो लगाना एकदम छोड देती हूँ। सोचती हूँ जिसके लिए विन्दी लगाती हूँ वही नाराज हैं तो बिन्दी किस के लिए । जब सब टोकते हैं कि अरे सूने माथे क्यों है विन्दी क्यों नही लगाई तो इन्हें बहुत बुरा लगता है । झटपट मना लेते हैं और इसी खुशी में पार्टी करके दिल खुश कर देते हैं।" समय काफी हो गया था। पार्टी का आनन्द लेते हुए सब उठ गए । घर आयी तो सोचने लगो-जहां वर्तन होगे खड़केंगे ही। पति-पत्नी एक दूसरे के सच्चे मित्र, सच्चे साथी, सच्चे प्रेमी और सच कहूं सच्चे दुश्मन भी होते है। इनका तो कहना है पति-पत्नी में झगडा अत्यावश्यक है। झगड़ा प्रेम बढाता है, कम नही करता । देखिये झगडे के तमा रूठे को मनाने के हमने कितने नुस्खे बता दिये । आप सोचते होगे कि इनमें से हमारा झगड़ा कौन-सा है ? अगर नहीं तो कौन-सा झगड़ा उत्तम लगा? क्या अपनाकर देखू ? नहीं-नही ऐसा मत करना । जीवन-नया प्रेम रूपी नदिया मे अबाध गति में बढ़ती रहे। खट्टे-मीठे अनुभव संजो कर रखिये। प्यार तो सागर है जिसम मोती भी हैं, कंकड भी । मोती बटोरते रहिए ककडों पर ध्यान मत दीजिए।

रम्य रचना एक भुलक्कड़ प्रधानाध्यापक रामनिवास सोनी शिक्षा जगत के विशाल कारखाने में ऐसी कई विभूतियां आज भी मौजूद है जिनकी विमल यशोगाथा का वर्णन विचारी निरीह जड लेखनी द्वारा कदापि सम्भव नहीं। राजकीय सेवा काल मे दीर्घावधि तक रहने तथा स्थान-स्थान पर सर्विस करने से ऐमी कई अज्ञात हस्तियो के दर्शन होते हैं जो हमारे मानस-पटल पर स्थायी प्रभाव डाल सकें। शिक्षको मे ही क्यों, प्रधानाध्यापको में भी कई भुलक्कड़, जल्दवाज, सनकी तथा विक्षिप्त-से मिल जाते है जो समाज को अहेतु मनोरंजन दे जाते है। अजीव-अजीब टाइप के व्यक्ति इम विभाग की शोभा बढ़ाते है। कुछेक के अपने- अपने तकिया-कलाम है तो कुछ निरे जोकर टाइप । कुछ "भिंडी सा'ब", "टमाटर सा'ब" तो कुछ "कोफ्ता" के नाम से चिढ़ते हैं। कुछ के तकिया-कलाम है-"आक् छी.," "बात यह है कि " अथवा "जो है सो". .इत्यादि । भिडी साव भिडी की सब्जी नहीं पाते और नाम लेते ही उनका पारा आसमान में चढ जाता है। इसी प्रकार टमाटर सा'ब को टमाटर से सख्त नफरत है। बाजार में आक् छी. की आवाज सुनते ही एक साहब अपना सतुलन खो बैठते हैं । इस प्रकार की छेड़ग्रानी से लोगों का तो मनोविनोद होता ही है उनकी भी प्रसिद्धि किसी-न-किसी रूप में हो जाती है। हमारी लघु जानकारी में एक-दो शिक्षक ऐमे भी है जो पढ़ाते समय "वात यह है कि..." का पुट बार-बार लगाते हैं । यह आदत धीरे-धीरे नए गुल खिलाती है। छाम भी उनकी नकल करने से नहीं चूकते। छात्रो ने सम्भवत. एक अध्यापक जी का नाम 'कोपता' इसलिए रख दिया कि उन्हें मुफ्त कोफ्ता खाना अधिक प्रिय है। एक बार एक शाला में गणित के नये अध्यापक आये। छात्रों को बुरी तरह पीटते। छात्र मभी भयभीत मगर करें क्या? आखिर उसी कक्षा के एक नटखट छान ने समाधान निकाला। जब भी कोई कक्षा में आकर पूछना कि यह किसका घटा है तो छात्र उत्तर देते-"एक सही एक वटा दो (11) का।" गनः गर्न यात 140 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ ने ऐसी करवट बदली कि उन्होंने छायो को पीटना बिल्कुल बन्द कर दिया। इस बात पर जहां थोड़ी अनादरपूर्ण हंसी आती है वहीं छात्रों को सूक्ष्म बुद्धि और मेधा का भी पता चलता है। सच तो यही है कि अध्यापक का सही मापदण्ड यदि कोई कर सकता है तो वह छात्र हो। जब से मिस्टर 'क' इस शाला के प्रधानाध्यापक बनकर पधारे हैं तभी से शाला के वातावरण में हास्य-विनोद का एक नया मोड़ आ गया है। आये दिन नित नयो बातें, नित नये कानून और नित नये प्रयोग । सर्वत्र भुलक्कड एवं जल्द- वाज प्रधानाध्यापक जी को पर्वा । उनकी अकारण तुनकमिजाजी से छात्र, अध्यापक, चपरासी सभी हैरान, परेशान । छोटी-छोटी बात पर झिड़काना, आंखें बदलना, पतरे दिखाना, माफी मांगना या वेसिर-पैर की ऐसी बात कहना कि मवको बरबस हँसी आ जाये। एडमीशन, टी० सी०, छुट्टो की अर्जी अथवा फीस वसूली~सभी कार्यों में अविवेकपूर्ण हठधर्मिता। मिलने वाली का तांता, अभि- भावको मे माथापच्ची, डायो से भिडत-भाषण पर भाषण मगर निर्णय कुछ नहीं । हर दिन मनहूस-सा वोलता। पाने -शनैः इसके मनोवैज्ञानिक कारणों का पता स्वत चल गया। अपनी साइकिल पर सवार होकर जब भी भुलक्कड़ प्रधानाध्यापकजी शाला मे आते, चपरासी झट इंडा पकड़ा देता जिसे अपनी काँख मे दवाकर राउंड करते तो लगता जैसे "कत्थक नृत्य" कर रहे हों क्योकि इनके पैर पूरे जमीन पर नही टिकते और बैलेंस बिगड़ने का खतरा हर वक्त बना रहता। घर से आते वक्त कभी कुछ भूल जाते तो कभी कुछ। एक वार की बात । मिस्टर 'क' राउंड पर। चपरामी साथ में, डडा हाथ में। शायद टेस्ट चल रहे थे। एक कक्षा के बाहर आकर रुके और किवाडों पर लगे दनादन डडा बजाने---"ए लड़के, सीधे बैठो। बोई की तरफ देखो। ध्यान किधर है ?" कमरे का दरवाजा विल्कुल बन्द । बाहर ताला पडा। पास खड़े चपरासी ने कहा-"हुजूर, लड़के टेस्ट देकर चले गये।' तो बोले-~-'वेवकूफ, हमे पहले क्यों नहीं बताया।" और द्रुत गति से आगे निकल गये। एक और हँसा देने वाली घटना। दफ्तर मे बैठे थे कुछ साथियो से आवश्यक परामर्श कर रहे थे। चपरासी पास में था। अचानक बोले-"चपरासी, चपरामी को बुलाओ। मेरा मुंह क्या ताकते हो।" उसने उत्तर दिया--"हुजूर, किसे बुलाऊँ ?" तो भुलक्कड प्रधानाध्यापक जी दार्शनिक की तरह अपने को समेट कर बोले---"नालायक, पहले क्यों नहीं बताया" और उलझ गये परामर्श की अतल गहराइयों में । पास बैठे सभी शिक्षक मुंह फेर कर हँसने लगे। एक और जल्दबाजी को हैरत अगेज घटना सुनिये । स्थानीय अन्य शाला का एक छात्र मिस्टर 'क' से मिलने आया। उसके हाथ में एक पत्र था। छात्र दफ्तर एक भुलक्कड़ प्रधानाध्यापक 141 , के बाहर खडा हो गया। इतने में डडा फटकारते, डास करते-से प्रधानाध्यापकजी शाला का पूरा राउंड लगाकर दफ्तर की तरफ मुडे। आते ही उम छात्र पर बरस पडे--- "नालायक, अब आया है इतनी देर से ? कहाँ है तुम्हारा वस्ता? निकालो हाथ !" और अकारण वालक की नरम हथेलियो पर नडातड डडे वरमा दिये । बालक चीखा। पास खडे एक अध्यापक महोदय ने कहा कि यह दूसरे स्कूल का छात्र है और आपसे मिलने आया है तो आप फौरन कुछ नम्र होकर बालक से वोले- "बदमाश, पहले क्यों नहीं बोला? कहिए, ऐसे बदमिजाज और जल्दबाज अफसर भी शिक्षा विभाग के विशाल कबूतरखाने में गुटरगूं करते है या नही?" मिस्टर 'क' छोटे से गोल-मटोल अफसर, ओछी गर्दैन, खिजावयुक्त बाल, खिलता चेहरा तथा पैरों मे स्पजनुमा फुर्ती। वातें ज्यादा, काम कम। शिक्षकों, चपरासियो, अभिभावको आदि से इनका वाक्-युद्ध होना सामान्य बात है । कभी- कभी तो दफ्तर पूरा हल्दी घाटी या थर्मापोली बन जाता है। वोलने खडे होते है तो ऐसे जैसे मेल ट्रेन छोटे-छोटे स्टेशनो पर नही रुकती। पिछला भूलते जाते हैं आगे उगलते जाते हैं । पुराने स्टेज पेसेन्ट की तरह तब तक नही रुकते जब तक श्रोताओं की तालियां इन्हें विवश न कर दें। अधिकतर तो पर्यायवाची शब्दो या वाक्याशो मे उलझ कर रह जाते है। भुलक्कड प्रधानाध्यापक जी के चेहरे पर जैसे एक विस्मृति की रेखा हमेशा छाई रहती है। उन्हे न किसी से नफरत है न किसी से मुहब्बत । हृदय के सरल होते हुए भी गलत दार्शनिक चिन्तन ने उन्हें व्यावहारिक जगत से दूर, बहुत दूर पटक दिया। एक बार पट्मासिक परीक्षा के दिनों में काफी व्यस्त थे और आवश्यक चर्चा साथियो से चल रही थी। अचानक आप पूछ बैठे-"मास्टर सा'व, अठारह तारीख को कितनी तारीख है ?" पास बैठे सभी सज्जन मुसकराने लगे। इसी बात को पुनः रिपीट करते खोए-खोए से खुद भी मुसकराने लगे और पूछने लगे-~". "क्यो क्या बात है ? मैंने ठीक ही तो पूछा कि अठारह तारीख को कौन-सा वार है ?" तब कही जाकर हंसी समाप्त हुई। गरज यह कि जब भी आप उदास हों अथवा आपका 'मूड' खराब हो तो शिक्षा जगत की ऐसी दुर्लभ विभूतियों का स्मरण मात्र कर लें तो आपको पुन: ताजगो के विटामिन की गोलियां मिल जायेंगी। .

रम्य रचना मजाक, पानी के बिल का शिवकुमार शर्मा "आपको इस मास के बिल में इस महीने और पिछले महीने दोनों महीनों की पानी की खपत का पैसा चुकाना होगा। पिछले मास यहाँ दरवाजे पर ताला लटका था। जलदाय विभाग का कानून है। किसी महीने जव 'मीटर रीडर' मीटर की रीडिंग लेने उपभोक्ता के घर जाये और वह नहीं मिले तो उस मास के विल से औसत खपत के अनुसार राशि प्राप्त की जाये। फिर उसके बाद के महीने के बिल में दोनों मास की यपत का पूरा पैसा वसूल किया जाये।" मीटर रीडर रोब के माथ कहने लगा। मैं स्वयं भी उस समय मौजूद था। मैंने कहा-"कानून कुछ भी हो, परतु मेरे मकान के दरवाजे पर ताला कभी लगता ही नहीं है।" मीटर रीडर बोला--"आप कुछ भी कहे । मैं आया था उस दिन यहाँ ताला सगा था। आपके याहर का दुकानदार गपाही है ।" मैं बाहर निकला। बाहर का दुकानदार मौजूद था । "ययो जी, क्या आपको याद है कि पिछले माम जब ये आये थे तो मेरे घर के दरवाजे पर ताला पड़ा था?" दुकानदार ने मीटर रीडर की ओर देगा। तभी मीटर रीडर वोला-"योलो। मैंने तुमसे पूछा था न किये लोग कहाँ गये और तुमने कहा था कि मैं नहीं जानता।"दुकानदार कहने लगा-"मैं तुमको नहीं पहनानता। मुझे तुम्हारी यान भी याद नहीं है।" तभी निकट की दूगरी दुकान मे उसके पिता आये और पहने नगे-~-"बिजली और पानी पालो ने तो अधेर मचा रहा है। अधाधुंध जो चाहे विम में लिए देने हैं। मीटर पहना हम मोग जानने नहीं है । जब पाहें मिगी उपमाता के घर पर 'ताना मगा' निय और औगन याका बिन बना दें और दूसरे महीने दो माग की गागे गार यो समधिन में भरकर उपभोक्ता को पार कर दें। अब नो मुहल्ले. यार जम TIभीमामा की यूनियन बनानी हो गयी है।" मैंने पहा- " टीकमले।। गर्म अधेरगी को दूर करने के लिए नार पटना गाहामा।" मगे-"- नाममा आदन पर अमानत में दावा मजाक, पानी के बिल का : 143 करके वमूली पर निषेधाज्ञा लानी चाहिए। इनको अगर आप पैसा चुका देंगे तो कोई भी वाद में सुनने वाला नहीं है।" मैंने भी कहा-"आप ठीक कहते है । मैं अवश्य कुछ करूँगा।" मीटर रीडर इस सारी बातचीत को सुनता रहा और फिर चुपचाप चला गया। मेरे मन पर, कुछ-न-कुछ करने की बात घर कर गयो। परन्तु उन दिनों में प्रात: 9.30 बजे से संध्या 6.00 बजे तक एक महत्वपूर्ण कार्य में लगा हुआ था। काम तीन दिन का था। काम के महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ उमसे अच्छी-खासी आय भी हो रही थी। उस काम को पूरा किया। चौथे दिन रविवार था। रविवार के दिन सध्या को चेतक से उक्त महत्वपूर्ण कार्य को करने के उद्देश्य से मुझे नौ दिन के लिए बाहर जाना पड़ा। कुछ-न-कुछ करने की बात मन मे जमी हुई थी। जव याहर से लौटा तो घर पर पूछा कि जलदाय विभाग से बिल आया या नही? मालूम हुआ कि अभी तक वह बिल नही आया है । ऐसी ही मनोदशा में जव मैं दूसरे काम से घर के बाहर निकला तो जलदाय विभाग के ही एक वरिष्ठ अभियन्ता मिल गये। मैं इनको एक प्रभावी और सूक्ष- बूझ वाले प्रशासनिक अधिकारी के रूप में जानता था। इन्होंने पहले मेरी एक ऐसे ही प्रकरण में मदद भी की थी। अभिवादन की औपचारिक प्रक्रिया पूरी करते ही मैंने उन्हें अपनी वर्तमान समस्या को राम कहानी सुनायो। उन्होंने कहा -~"मैं अब एक दूसरे कार्यालय में काम करता हूँ। आप कृपया अमुक से मिलिये। वो अच्छे है। वैसे इस काम से सबधित अधिकारी तो दूसरे है परतु थे आपके लिए अधिक मददगार नहीं होंगे।" दूसरे दिन सवेरे जल्दी-जल्दी तैयार हुआ। सोचा, ठीक इस वजे ही ऑफिस में पहुँचूं । परंतु भोजन करने का सदेश मिला। सवेरे-सवेरे खाना खाने के प्रस्ताव पर मना नहीं करना चाहिए। इसलिए मैंने भी कह दिया--"फौरन लाओ, मुझे पानी के बिल का फैसला करने ऑफिम जाना है।" खाना आया। जल्दी-जल्दी खाया। अपनी बूढी सुवेगा (ऑटो) गाड़ी घर से बाहर निकाली। उसे स्टार्ट करने के लिए पंडिल घुमाने लगा। श्वास चढ़ गया। स्टार्ट नहीं हुई। थोड़ा दम लिया। श्वारा की गति सामान्य हुई। इतने में एक भक्त आया। बोला- "बाबूजी, मैं धक्का दूं?" "हां भाई । आपका ही इंतजार था !" मैंने मुस्कराते हुए मजाक किया। मैं गाड़ी पर सवार हुआ । उसके धक्के से गाड़ी चल पड़ी। कार्यालय बगीचे के अंदर है। बगीचे की सड़कों की मरम्मत हो रही थी। सीधे रास्ते की बजाय बगीचे के पीछे वाली फाटक मे भीतर घुमना पड़ा। वहीं फाटक आने-जाने वालों के लिए उस रोज खुला हुआ था। बूढ़ी सुवेगा का एक्मी- लेटर कितना ही खोचो, उसकी चाल तो उसकी ही रहती है। ऑफिस में काम से पहुंचने में देरी हो सकती है। किसी को स्टेशन पर 'सी-ऑफ' करने जाता है तो ।

144. कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ । । गाडी चली जाने पर पहुँचाती है । परतु इसको सबसे बडी अच्छाई यह है कि यह इसके सवार को 'एक्सीडेंट प्रूफ' रखती है। इस प्रकार निर्भय रह कर मैं पूरे इत्मिनान मे अभियन्ता, जलदाय विभाग से मिलने को पूर्वाह्न 11.40 बजे कार्यालय मे पहुँचा। उनके चेम्बर का दरवाजा बंद था। चपरासी से पूछा। मालूम हुआ कि वे फील्ड ऑफिसर है । सवेरे 9.00 बजे आये थे। अभी-अभी मौका देखने निकले है। मैं सोचने लगा-मजे फील्ड ऑफिमर्स के है । फोल्ड पर रवाना होने का नाम लेकर कही भी, भले घर हो, चले जायें तो भी ड्यूटी पर माने जाने में कोई कोर-कसर नहीं रहती। मैंने चपरासी से पूछा--कब तक आवेंगे? उत्तर मिला-साढे तीन बजे आने का समय है। मैंने फिर पूछा-जरूरी मिलना है। साढ़े तीन बजे मिलेंगे तो सही? उसने कहा जरूरी-वरूरी कुछ नहीं। अगर मिलना ही है तो फिर चार-साढे चार बजे आइये । लावार हो घर लौट आया । काम करने लगा। तबीयत नही लगी। ज्यों- ज्यो समय गुजारा 4 बजे वापस रवाना हुआ। वही सुवेगा, वही चक्करदार रास्ता । साढ़े चार बजते-बजते ऑफिस जा पहुंचा । अभियन्ता महोदय के चेम्बर का दरवाजा अभी बद था। उसी चपरासी से मैंने पूछा-"क्या यह दरवाजा अभी तक नहीं खुला?" उसने उत्तर दिया-"साहब, अभी-अभी ही पधारे हैं।" मैंने फिर पूछा-"कव तक लौटने की उम्मीद करें? उमने कहा-"अब तो आप कल ही पधारिये । आज तो वे सकिट हाउस' गये हैं । अब आने की उम्मीद नहीं हैं।" मैं वापस घर लौट आया। दूसरे दिन सवेरे अपनी रविश के अनुसार तैयार होकर कार्यालय पहुंचा । इस बार चेम्बर का दरवाजा खुला था। परतु अंदर पहुंचने पर नजर आया कि कुर्सी वाली है । वहाँ पास की कुर्मी पर एक गज्जन बैठे थे। मैंने अपने तीसरी बार आने का कारण और अपनी ममस्या का कच्चा चिट्ठा उनको सुनाया। वे कहने लगे-"काम तो आपका वो साहय करेंगे जो उग सामने के कमरे मे बैठते हैं ।" यह यात समाप्त भी नहीं हुई कि वे साहय उमी फमरे में चले आये। मैं यहा हो गया। उनको सामने देखकर मुझमे भी न रहा गया। मैंने भी कह ही तो दिया, मुझे आपमे ही मिलना था। उधर भीड़ थी अतः यहाँ बैठा भीड ,टने का इलजार कर रहा हूं। 'सय फिर आइये' कहकर ये वापस अपने पंम्बर में सौट गरें । मैं भी साथ-गाप यहीं पहुंच गया। मुझे अमग-अलग माध्यमों में मालूम हो चुका था कि ये अधिकारी दी है, अतः मैंने अपने आरोपी गिरि के लिए आव देया न ताय, बहम गुरू कर दी। मर्वप्रथम मैंने अपना परिचय दिया। अपने हॉस्टर होने और विभागीय पर पी गर्योजना पर रह गुमने सिरिया। फिर यह भी महा, 'नौकरी मेमो गव थे परन्तु अब आजाद है।'किरहना गुरु रिपा, 'मआरसा मीटर रीर -- मजाक, पानी के बिल का : 145 अमुक दिन आया था। उसने हम पर कसे-कसे रोय कसा और फिर क्या-क्या बातें कही। यह भी कहा कि उसकी सच्चाई को प्रभावित करने को गवाह चाहिए थे। परन्तु उसकी बात का मेरे पड़ोसियों ने इकार कर दिया।' अपनी बात को चालू रयते हुए मैंने आगे कहा, 'आपका मीटर-रीडर एक दिन मे सौ मीटरों का अकन करता है । काम करते-करते उमे यह पता लग जाता है कि किस-किस उपभोक्ता के कौटुम्बिक सदस्यो को सख्या कितनी-कितनी है। कौन-कौन नौकरी पर निकलते है। कब-कब सभी वाहर जाते है। ऐसे अनुभव का लाभ लेकर वह रोजाना दो- चार उपभोक्ताओं के मकान पर ताला लगा' लिखकर अपना रेकार्ड पूरा करके सामान्य मासिक दर से पानी का विल बना सकता है। इस प्रकार की बेईमानी से एक तो उसे आराम मिलता है। विभाग को कोई नुकसान नहीं होता उल्टे लाभ ही होता है। सामान्य मागिक दर पर उस मास रकम की वसूली हुई फिर अगले मास पिछते मास और उस मास के जल के उपयोग के पैसे की आमदनी हो ही गई। परन्तु, इस प्रकार करते रहने से उपभोक्ता तो लुटने लगता है। आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग के कुटुम्ब यो दो-चार बार परेशान होकर 'मीटर-रीडर' की गरज करने लगेंगे। उसे चाय-पानी का पैसा देकर जब वे घर पर न हो तो 'ताला बन्द' का नोटिंग करने की बजाय उससे दुवारा या तिवारा आने का समझौता करेंगे। इस प्रकार उपभोक्ता और 'मीटर-रीडर' दोनो के पोबारह होगे पर सरकार तो डूवेगी। यह आपा-धापी तो है 'मीटर-रीडर' की परन्तु यदनामी तो विभाग और सरकार की होगी। वैमे भी जनता यह मानने लगी है कि राष्ट्रीयकरण योटा है । निजी कारोबार की शिकायत तो सरकार सुनती है। कैसी ही बहरी सरकार हो फिर भी कभी तो कान पर जूं रेंगती ही है। परन्तु जव सरकार ही कारोबार करने चले तो सामान्य जनता कहाँ जाकर पुकारे।" मैं कहता चला गण। फिर मैंने अपने ही विभाग का उदाहरण दिया, "मैं जब अधिकारी था तो हमारे प्राथमिक विद्यालयों के निरीक्षक क्षेत्रीय अधिकारी थे। स्कूलो को देखने जाने का कार्यक्रम बनाकर घर सोये रहते। तथ्यो को पुराने रेकार्ड या अधीनस्थ कर्मचारियों से मंगाकर प्रतिवेदन तयार कर देते। यात्रा-व्यय और भत्ता भी उठा लेते। ऐसे लोगो की हम जांच करते थे। सत्यता प्रमाणित होने पर सजा देते थे।" अब मैने दाद मांगी,"अत कृपया जांच कीजिए। मौके पर पधारिये। मेरे मकान को और उसकी स्थिति को देखिये । कुटुम्ब के सदस्यो की सख्या की जानकारी लीजिये। पड़ोसियो के बयान लीजिए। मेरी सत्यता से आश्वस्त होइये । 'मीटर-रीडर' की आपा-धापी को समाप्त कीजिये । यह आपका दायित्व है, महाशय।" मेरी बहस को वै तन्मयता से सुनते रहे। फिर कहा, "आप ठीक कहते हैं। अभी मीटर-रीडम यहां नहीं हैं । वे अपराह्न साढ़े तीन बजे आते हैं। संदर्भित 146 कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ मोटर-रीडर को बुलाकर मैं पहले उमरो बान करेगा। उसी से कुछ-कुछ पता चल जावेगा। फिर जैसी जरूरत होगो वंसी कार्यवाही करेंगे।" उनके इस कथन पर, धन्यवाद देकर जब में लौटने लगा तो उन्होने कहा, "अच्छा हो, आप चार-सादे चार बजे आयें।" मैंने यह बात स्वीकारी और लौट आया । अपराह्न सवा चार बजे वापस कार्यालय में जा पहुंचा। दोनों अभियताओं के चैम्बर वन्द थे। पूर्ववत् सकल्प-विकल्प की स्थिति में मैं चाहर खड़ा-पड़ा इंतजार करने लगा। साढ़े तीन से पांच का समय उपभोक्ताओं के लिए शिकायतें दायर करने की दृष्टि से निर्धारित है । यह बात काले नोटिस बोर्ड पर सफेद रंग से बड़े-बडे अक्षरो मे स्थाई रूप से लिखी हुई थी। परन्तु शिकायत सुनने वाले दोनों अधिकारी मौजूद नहीं थे। बडे-बड़े थक जाने पर अपनी सुयेगा की सीट पर वैठ गया और इतजार करने लगा। तभी एक चेला आया। मैंने मास्टरी की है। मेरे पढाये हुए विद्याथियो को मैं चेला कहता हूँ। चेले ने पूछा, "गुरुजी आप यहाँ कमे?" मैने उसे यहां पहुंचने का कच्चा विट्ठा सुनाया । अब पांच बजने में पांच मिनट बाकी थे। तभी उम कार्यालय के अकाउटेंट बाहर आये । चेले ने कहा---- "इनसे बात कीजिए।" मैं अकाउटेंट के पास गया । अपना परिचय दिया तो वे मुझे उनके कक्ष में ले गये। फिर कहने लगे, “अव बताइये, क्या समस्या है।" इनके सामने सवेरे वाली वही वहस जो मैंने अभियता के सामने की थी, थोडी हेर-फेर के साथ वापस दुहरा दी। मेरा प्रार्थना-पत्र और नवम्बर, 81 का विल भी उनके सामने रख दिया। उन्होंने मेरा विल भेजकर संबंधित मोटर-रीडर को अपना रजिस्टर लेकर बुलाया। मैरी शिकायत पर पूछा, 'सच बोलिये क्या हुआ था ?' वह कहने लगा, 'इनसे मेरी पिछले वक्त जब मै घर गया था तब भी वात हुई थी। अब उसने अपना रजिस्टर दोनों हाथों से पकड़ा और कहा, 'मेरे हाथ में रिजक है । मैं झूठ नहीं बोलता । मै दिमाक 10-10-81 को इनके घर गया था। ताला लगा था। मैंने पड़ोसियों से भी पूछा । यह दुमरी वात है कि वे मेरी गवाही दें, न दें।' अकाउटेंट ने उमको रवाना किया। फिर मुझसे कहा, 'आप यह प्रार्थना-पत्र ले जाइये । इसे फिर चैक कीजिये । यह आदमी औरो से अच्छा है। जिम्मेदार है। इसने रिजक की कसम खाई है। आप एक बार अपनी जांच पुख्ता कर लीजिए।''ठीक है । कहकर मैं घर लौट आया। घर आते ही मैने अपनी दैनिक डायरी देखी। उस दिन के पांच दिन पूर्व से ही में इक्कीम दिन की यात्रा पर बाहर था। घर के चार सदस्य मेरे साथ गये थे। मैंने मुन्नी से पूछा, 'क्यो री, इस दिनाक को तेरे भाई साहब और बहू बगरा घर पर थे या नहीं ?' उसने उत्तर दिया, 'भाभीजी कहती थी कि आप लोगों के जाने के तीन-चार दिन बाद हम भी परशुराम महादेव गये थे। तभी मेरा पुत्र - मजाक, पानी के विल का 147 ऑफिस से लौट आया। यही बात मैंने उससे पूछी। उत्तर मिला, 'अगर यह बात दिनाक दस अक्टूबर को थी, तो वास्तव मे हम ताला लगाकर बाहर गये थे।' मैं सोचने लगा, 'मैं स्वयं भी सच्चाई को लिए जीवन भर काम करता रहा हूँ। मीटर रीडर सच्चा है। अब मैं कैसा मुंह तेकर वापस जलदाय विभाग जाऊँ।' मैं नहीं गया। वही मीटर रीडर तीन-चार दिन बाद दूसरा बित देने घर आया। मैंने उससे कहा, 'भैया ! दिनाक दस अक्टूबर को वास्तव में यहां ताला लगा था। वह प्रसन्न होकर बोला-'ये तो आप ही है जो इतनी यात बढ जाने पर भी सच्चाई को मजूर कर रहे है ।' मैं चुप हो गया। और यो पानी के बिल का मजाक बन गया। परन्तु शायद अधिक सच तो यह है कि मजाक मेरा वन गया। फिर भी दरवाजे पर ताला लटका होने की इतनी बड़ी सजा देने सबधी जलदाय विभाग के काले कानून को मिटाने की कमम अब भी वाकी है।

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वात एक शाम को : 149 खाता लोम का कीडा उन्हें अपनी वान का उत्तर पाने की गरज से मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने के लिए मजबूर कर देता है। "भाई, पारिश्रमिक की वात छोडो, सपादक तो वैसे ही भूखे होते है, ये किसी को क्या देंगे । इनका युद का ही पेट भर जाये वही बहुत है।" निर्विकार भाव से सपाटबयानी करता हुआ मैं उठ खड़ा होता है। हम दोनो 'रतन पान भंडार' के सामने जाकर खड़े हो जाते है । वह यत्रवत् पान के टुकडे हम दोनो के हाथों में थमा देता है। पान का एक-एक टुकडा गालो मे दबाकर हम कुछ देर वहीं खड़े रहते है। पान चवाते-चबाते पहली पीक वही पिच्च करके सडक की छाती पर वे उडेल देते है। सामने ही बड़ का छोटा-सा पेड जिसके चारो ओर पक्का गट्टा। हम दोनो उसी गट्टे पर जम जाते हैं । अब लोगो की आमदरपत कुछ कम हो चली है। शर्मा जी आदतन फिर सिगरेट सुलगा लेते है और छोड़ने लगते है हवा में आर की ओर धुएं के गोलाकार छल्ले । धुएं के गोलाकार छल्ले धूम्रपान मे अजित उनकी अब तक की कलाकारी को भली-भांति प्रमाणित कर रहे होते है । तभी एक व्यक्ति मथर गति से हमारी ओर आगे बढकर ठीक सामने खड़ा हो जाता है और अपने हाथ मे शेष बचा वीड़ी का टुकडा नीचे फेंककर जूते से मसल देता है। "आप तो गुरुजी है, आपको तो बीडी-सिगरेट पीनी नहीं चाहिए।" आगतुक शर्मा जी की ओर इगित कर अनायास ही वदूक की गोली-सी दाग देता है । शर्मा जी इस अप्रत्याशित प्रहार से तिलमिला जाते है और बात टालने की गरज से उत्तर में सिर्फ "क्यो नही ?" कहकर अपने को सहेजने में जुट जाते हैं। "क्यो क्या, जब मास्टर ही वीड़ी-सिगरेट पियेगे तो फिर चेले क्यो नही !" आगतुक अपने नथुनो को कुरेदता हुआ अंतस में छिपी घृणा को शब्दो के जरिये शर्मा जी पर थोपने को आमादा-सा हो जाता है। इस वार शर्मा जी का पारा चढ जाता है और उनका धैर्य उनका साथ छोड़ने की जबरदस्त धमकी दे देता है । मैं स्थिति को भाप बीच मे ही बोल पड़ता हूँ- "भाई साहब, बात क्या हुई ? आपका पढ़ने वाला कोई बच्चा बीड़ी पीने लगा है क्या? मास्टरो के ऊपर ही इतना आदर्श बघारने की नौबत कैसे आ गई ?" सुनकर आगंतुक थोडा सहमता है-"हाँ साव, क्या बताएँ, एक बच्चा है दसवी में पढ़ता है । उसे आज उसकी मां ने छत पर वीड़ी पीते हुए देख लिया। तभी से...।" "अच्छा तो यह बात है; लेकिन वह बीड़ी लाया कहाँ से !" मैंने कुछ और कुरेदने की गरज से उनसे पूछ ही लिया। "अजी ताया कहाँ से, वही कमरे में टंगे मेरे कुर्ते की जेब से ले ली उसने।" गले मे थूक गटकता हुआ मकुचाई ढीली आवाज से वह व्यक्ति बोला। - रम्य रचना बात एक शाम की सत्यपाल सिंह बात मीरा नगरी की है। मैं शाम के वक्त और दिनों की तरह खाना खाकर घर से निकल पड़ता हूँ। अस्पताल के कम्पाउंड से गुजर रहा होता हूँ तभी पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज "मैं भी आ रहा हूँ" कानो से टकराती है। बिना पीछे मुडकर देखे ठिठक जाता हूँ। "आओ शर्मा जी" कहकर औपचारिकता पूरी करके धीरे-धीरे आगे की ओर कदम बढ़ाने लगता है। कुछ ही क्षणो में हम दोनो वाजार, की गहमागहमी के बीच पहुंच जाते है। मदिर की छत से उभरता संगीत हरि-राम रस मीठा' इस समय कानों को बडा भला लगता है । मैं उसी के लोभ में मंदिर के बाहर की दुकानो के सामने वाली पटिया पर बैठ जाता हूँ। "सिंह साहव, यार आप भी कैसे आदमी हो, सिगरेट तक नहीं पीते" रोज- मर्रा को तरह मुझ पर दोष थोपते हुए शर्मा जी अपनी जेब से एक सिगरेट निकाल लेते है और पास में ही खड़े एक अपरिचित बीडीवाज से माचिस मांग- कर उसे सुलगा लेते है। बस फिर क्या है, रईसी अदाज में आकाश की ओर किश्तों मे धुआं छोड़ना शुरू कर देते है। धुएँ का अनचाहा जायका नाक-मुंह सिकोडते मुझे भी बरबस लेना ही पड़ता है। "यार आप कहानी तो भाई साहब बड़े गजब की लिखते हो" सिगरेट का गुल खिराते हुए शर्मा जी अनायास कह उठते है । "कहाँ मिल गई आपको मेरी कहानी पढने के लिए" कहकर मैं उनकी बात को जैसे थोड़ा और आगे बढ़ा देता हूँ। "यार इतवारी-पत्रिका मे, क्या कहानी लिखी है आपने भी ! और हाँ उसका पारिथमिक भी खूब मिला होगा इस बार तो । हो जाय पान इसी बात पर।" कहते कहते शर्मा जी सिगरेट का बचा-खुचा टुकडा फेंक देते है और मन में मरोड़ बात एक शाम की : 149 खाता लोम का कीडा उन्हें अपनी वान का उत्तर पाने की गरज से मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने के लिए मजबूर कर देता है। "भाई, पारिश्रमिक की वात छोडो, सपादक तो वैसे ही भूखे होते है, ये किसी को क्या देगे। इनका खुद का ही पेट भर जाये वही बहुत है।" निविकार भाव से सपाटवयानी करता हुआ मै उठ खडा होता हूँ। हम दोनों 'रतन पान भडार' के सामने जाकर खडे हो जाते है । वह यत्रवत् पान के टुकडे हम दोनो के हाथों में थमा देता है। पान का एक-एक टुकडा गालो मे दवाकर हम कुछ देर वही खडे रहते हैं । पान चबाते-चबाते पहली पीक वही पिच्च करके सडक की छाती पर वे उडेल देते है। सामने ही बड का छोटा-सा पेड़ जिसके चारो ओर पक्का गट्टा। हम दोनो उसी गट्टे पर जम जाते है । अब लोगों की आमदरफ्त कुछ कम हो चली है। शर्मा जी यादतन फिर सिगरेट सुलगा लेते है और छोडने लगते है हवा में कार की ओर धुएं के गोलाकार छल्ले । धुएँ के गोलाकार छत्ले धूम्रपान मे अजित उनकी अब तक की कलाकारी को भली-भांति प्रमाणित कर रहे होते है। तभी एक व्यक्ति मथर गति से हमारी ओर आगे बढकर ठीक सामने खड़ा हो जाता है और अपने हाथ में शेष बचा बीडी का टुकडा नीचे फेंककर जूते से मसल देता है। "आप तो गुरुजी है, आपको तो बीडी-सिगरेट पीनी नही चाहिए।" आगतुक शर्मा जी की ओर इगित कर अनायास ही वंदूक की गोली-सी दाग देता है। शर्मा जी इम अप्रत्याशित प्रहार से तिलमिला जाते है और वात टालने की गरज से उत्तर में सिर्फ "क्यो नही ?" कहकर अपने को सहेजने में जुट जाते है । "क्यों क्या, जब मास्टर ही बीडी-सिगरेट पियेंगे तो फिर चेले क्यो नही !" आगतुक अपने नथुनो को कुरेदता हुआ अतस मे छिपी धूणा को शब्दो के जरिये शर्मा जी पर थोपने को आमादा-सा हो जाता है। इस वार शर्मा जी का पारा चढ जाता है और उनका धर्य उनका साथ छोड़ने की जबरदस्त धमकी दे देता है । मैं स्थिति को भाप वीच मे ही बोल पड़ता हूँ- "भाई साहब, बात क्या हुई ? आपका पढने वाला कोई बच्चा बीडी पीने लगा है क्या? मास्टरो के कार ही इतना आदर्श वधारने की नौबत कैसे आ गई ?" सुनकर आगंतुक थोडा सहमता है-"हां साव, क्या बताएँ, एक बच्चा है दसवी में पढ़ता है । उसे आज उसकी मां ने छत पर बीडी पीते हुए देख लिया। तभी से...।" "अच्छा तो यह बात है। लेकिन वह वीड़ी लाया कहाँ से !" मैने कुछ और कुरेदने की गरज से उनसे पूछ ही लिया। "अजी लाया कहाँ से, वही कमरे मे टेंगे मेरे कुर्ते की जेब मे ले ली उसने।" गले में थूक गटकता हुआ राकुचाई ढीली आवाज से वह व्यक्ति बोला।

150 : कौमी एकता को तलाश और अन्य रचनाएँ "भाई साहब, शर्म तो आनी चाहिए आपको, गुद बीडी पीते हो और दोप मढते हो दूसरो के मत्थे । आप यह भूल जाते हो कि बच्चे की आदतों का निर्माण तो घर से ही होता है। हम लोगों के पास तो यह रहता ही कितने ममय के लिए है। अधिक समय तक तो आपकी ही मारी करतूत घर में देवता है, वही सारी बात उसके मस्तिष्क में घर कर लेती है।" मेरा इतना ही कहना होता है कि शर्मा जी फिर तो सवार हो जाते हैं उसके ऊपर और वेलगाम जवान से पधारने लगते है अपना लोकोक्ति-ज्ञान- "नो सौ चूहे खाय विल्ली हज को चली, क्यो! दूसरों पर छोटाकशी करने मे ज्यादा मज़ा आता है क्या? पहले अपने दोप देखो फिर दूसरों के । सिर्फ दूसरो के दोप देखने से कुछ भी सुधार होने का नहीं है, समझे । चले आते है...." उपस्थित सभी व्यक्ति, आगंतुक व्यक्ति को और व्यंग्य और घृणा भरी नजरों से देखने लगते है । वह एक पिटे मोहरे की तरह तिलमिला कर रह जाता है और गर्दन झुकाये बढ जाता है भागे दूर तक परारी सुनसान सड़क की ओर । बचे-खुचे लोग भी धीरे-धीरे विखर जाते हैं। अब सिर्फ मैं और शर्मा जी रह जाते है वहाँ। तभी शर्मा जी धीमी किन्तु गभीर आवाज में कह उटते है-"सिंह माहब, कहा तो इस वेचारे ने भी ठीक ही था । भाई, हम लोगों को भी सिगरेट वगैरा पीना शोभा तो नही देता क्योकि आखिर हमारा पेशा...आज से मैं भी...." मैं और शर्मा जी दोनों वहाँ से उठ खड़े होते है और रोज के घिसे-पिटे रास्ते से ही घर की ओर चल पडते है । शर्माजी के चेहरे पर ऐसे भाव हैं जैसे दिग्विजय कर लौट रहे हों। दूसरे दिन सुबह जब शर्मा जी से स्टाफ-रूम मे भेट होती है तो पाता हूँ कि उनके चेहरे पर एक विशिष्ट गरिमा उनको सहज मोहक-मुस्कान की सगति से द्विगुणित हो रही है। सोचने लगता हूँ--"काश ! सभी इसी तरह...।"

राजस्थानी एकांकी
डायज्यो
जगदीश नागर
पात्र
रणजीत--एक पयस्या वाळो आदमी।
कुलदीप-रणजीत रोवेटो।
राधेश्याम--एक गरीब आदमी।
गीता-राधेश्याम री बहू ।
पेलो दृश्य
राधेश्याम : (आपरी बहू गीता सू) सुनीता व्याय जेडी व्हेगी...अब आपणो
फरज है...कोई छोको लडको देख'र वेगाई अणरा हाथ पीळा
करया।
गीता : आपरो केवणी वाजब है. ......पण मू आ चाहूँक म्हारी बेटी
कोई छोका घराणां री बहू वणे।
राधेश्याम : म्हारी भी अन्दरूणी भावना आई है...पण अण भायना ने पूरी
कारणों नी करणों भगवान रे हाप है ।
गीता : भगवान बड़ो दयालु है...गरीब आदम्या रो दुध आठी तरे
सू जाणे है !
राधेश्याम : आज मंगळवार रो दिन है...कोई मुभ काम करणे सारू ओ
दिन ठीक मान्यो जारे। अगं वास्ते सगाई-गवध जेडा मुभ काम
मा मू याज ही घर छोड़वो ठीक ममस्।
गीता : हो...पण एक बात रो ध्यान रापन्यो। मूं आपन फेर के
म्हारी बेटी रो तो संबंध ऐड़ा घर मा भो नी रहेगों ना

152 . मौमी एकता को तताश और अन्य रचनाएँ जिणमे पेट भरण गाम दो यगत रो धान भी नी होय...अर ऐडा घर माय भी नी व्हेणों चाय जणम रोज-गुलधरां उड़। गगाई-व्याय कोई टावर्ग रो पेल. थोडी है...पया वाळा री तो आ हारन है क लड़की वाला कानी सू बणान् पतरोई माल मळ जाय तो भी वणा री भूय नी युम् । वां रतो आम् दिन धन री चापर लाग। राधेश्याम : यौको केवो बराबर है। इम्या मौका मात् तो मोच-सम' चालणो चाय । घणां पय-या याळा { फंगवो भी ठोक नी... आकी उमर को कमायोडो एक दिन माय ठिकाण लाग जाद ।...फेर दुध एक दिन को हुन् तो मनं कर सका...आकी उमर की वन्दण कुण रोन् कर। गीता : आपा तो गरीब आदमी हो...अणं सार आपणी सोड माय जतरा पग पसार सको वतरोई ठीक रेसी। आपा दूसरा को होडाहोड गोडा नी फोडां...हाँ एक बात और याद आई। नवगढ़ माय आपणी विरादरी रा रणजीत सिंह जी रेव्... वणारा लड़का री सूप बडाई सुणी...अणी घरस वो चपदवी रो पढाई पूरी करी है...वणनें भी देखयो ठीक रेसी। राधेश्याम : हो...नवळंगड मारग मायं आसो...एक दो घड़ी हार लड़का ने देयतो आऊंगो। [राधेश्याम मोटर रोटेम हुयो जाणं र घर सू जाव अर गीता भी घर का काम-काज माय लाग जान् । [पर्दो बन्द हुन् दूसरो दृश्य [ठौड़-रणजीत रा घर री बैठक रो माळीयो। टेम--साम रा पांच बजिया है।] राधेश्याम : (किंवाड़ बजावतो थको)...खट्...खट्...खट्...खट् । रणजीत : (किंवाड़ खोलतो थको)...कुण है ? राधेश्याम : रणजीत जी वर्मा रो मुकाम ओई है? रणजीत . हाँ सा। [रणजीत राधेश्याम न् आपरी बैठक मोय ले जाव) रणजीत (बिछावणों बिछा'र) विराजो सा। (राधेश्याम बिछावणां डायज्यो 153 मात् बैठ जाव्... ...रणजीत भी वणारे पागतो वैठतो थको) आपरो-सुभ नाम? राधेश्याम : म्हारो नाम राधेश्याम वर्मा है। मैं भावनगर रो वासी हूँ। रणजीत : (दोन्युं हाथ जोड़तो यको) आपरी में कांई सेवा कर सकूँ। राधेश्याम : आप अठ् आणे री म्हारी कोई खास वजे है । रणजीत (अचम्भो करतो थको) खास वजे...! राधेश्याम · हाँ सा। रणजीत : पाम बजे भी के, मुणावो...मुणवास्यूई पतो लागसी। राधेश्याम : (चस्मों हावळ करतो थको) आपरा लडका री घणी बडाई सुणी...अणी कारण आपरा लडका न् देखबा मार भावनगर सू अठाताई आ पूग्यो। रणजीत : आपरो केवणो तो ठीक है, पण म्हारी आ मनस्या है क धन्धा. पाणी लागवा पेली वणरो...(केवतो-केयतो रुक जाद) राधेश्याम : (उदास होवतो यको) फेर म हाथ हितावतो थको पाछो जाऊँ। (रणजीत काई जवाब नी देव ) काई मो केवो (रणजीत फर भी कांई नी फेव्) क्यूं, फिस्या सोच-विचारा माय पड़ग्या? रणजीत : (सोच मार पड़तो थको) वांई बताऊँ ? राधेश्याम : आग् पाए तो आपन आपरा लड़का रो व्याव करणो पदमी... फेर दो दिन पेली करवा मांय कांई नुकसाण है। रणजीत : म्हारो भी ओई विचार है...पण दिमाग काम नी देव । राधेश्याम : (रणजीत रो अन्दरुणी भावना जाणया सारु बणतो-यको) लगतुमार वढतो थको ओ मेगीवाड़ो काई केसी काइपयस्या वाळा अर काई गरीव...यापडा सब दुय्यारा है। रणजीत : जनता सुखी जादा है...अर् दुखी कम । छोटा सू छोटा गावड़ा मायजार देखत्यो...व्याव कतरा ठाठ-बाठ मू व्हेरीया है। हमारूं रप्या रो डायज्यो देरीया है...दो रोज पेली कुलदीप आपरा एक माथोडा रा व्याय माय गयो थो... पाठो आवनाई कयो...जीसा, गांव तो छोटो मा हो. ...पण बटारा आदमी एक. सू एक लखपती देखणं म् आया। अभी कारण तो म्हारा सायीटान्गाठ हजार रो डायग्यो मळीयो। राधेश्याम : आजरा अणं जमाना माय गाठ...गाठ...पपाम...पचाम हजार रो डायज्यो करोडपती दे सके...परदेगा मार जिगार बोम-योग दुकानां चाल्...गूर आंधी कमाई हो...

154 . कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ रोज एक रुप्या री चीज रा 5 रुप्या वगूल कर गरीवा रो गळो घोट...या फेर...(फेयतो फेयतो रुक जाय) रणजीत बोलो नी...चुप क्यूं होग्या? ঘাম या कोई मोटो अफसर हुव्...अर् पक्की रिस्थत पोर हुन् । रणजीत आज री अण दुनियां माय मन्तो कोई अल्ला री गाय मी दीय...सब रिस्वतां लेय...वेती गमा माय मय हाथ धोत् । जो घर आई गगारो आय आदर नी कर...म्हारा विचाग माय यो दुनियाँ रो सय वडो करमफूटो है। आराम को जीवो सब चाव...फेर अणं थोड़ी-मी सनया इंकाई हुन् । राधेश्याम डायग्यो देवो.. व्याव-स्यादी माय बर्बादी करवो...मौत का नाम लम्बो-चोडो वरोड़ो करवो.. गव सामाजिक कुरीत्या है । अणां र् मात् पाबन्दी लागणी चाय...आ पावन्दी आप नी लगास्या.. तो देवता तो आर् लगावामू रीया । रणजीत पूरी उमर पा हाथ-पग तोडर् मेनत करां...फेर वी मेनत री मौज भी तो लूटणी चायज् । राधेश्याम : अर् एड़ी मौज लूटवा मारू गरीब लोगां रा माचा मन री काई ठा कतरी युराया सुणनी पड 1 मूं तो एडी मौज र पगस म् कोनी। रतजोत : (थोड़ो सोधणतो यको) आपरो केवणो वाजव है...पण घणी कजूसी भी काई काम री। राधेश्याम घणो कजूम अण दुनियां मायं आपन वोई मिळळा जो घणो मेनती है। जो रागा रो एक-एक पयस्यो भेळो करवा सारूं आपरा सरीर न् सरीर नी गण्। जो वळ वळाती सूरज री गरमी माय अर् कांपती सरदी माय आपरा सरीर नू घणी तकलीपा देव . व कंजूस नी पयस्यां रा सांचा साथी है ..सांचा भगत है। रणजीत फेर तो अण सौदा रो पटणों मुसकळ है । राधेश्याम : मन् घणो दुख है क् आप सगाई-व्याव जेडा कामां न् सौदो समझ्या बैठा हो...पेली सू ई मनें आ खबर होती क आ तो वाणियारी दूकान है, तो मूं अणं घर कानी देखवो भी पाप समझतो। रणजीत : आपरा विचारा मांय् आ वाणिया री दूकान व्हे सक... .मन् तो ओ म्हारो घर दिख्। राधेश्याम माफ करज्यो...वाणिया री दूकान वणी जागां न् नी केवां... .

डायज्यो : 155 जिण जागा मात्...तेल, लूण.. अर् मिर्ची मळ ... म्हारी राय म्तो ये सब दूकानां याणिया री दूकानां है... जठ् आप जेडा आदमी मार् जेड़ा गरीब आदमी सू ऐड़ी वाता कर् । व्याव- स्यादी तो एक ऐड़ो पावन वधण है...जिण सू दो धड़कता मन न्यारा-न्यारा होता थका भी एक व्हे जाम् । (उठतो थको) अब घणो टेम होग्यो...मू तो चाळस्यू अर् आप धीरज सू म्हारी वात पर विचार करोता तो जरूर समझ म्वेठसी (जेब सूं एक कारट निकादर देवतो थको) अर् ओ लो म्हारा घर को पतो। आप चावो तो एक हप्ता पच् इण पता माल आपरा विचारों री मन् जाणकारी दे सको...पण ध्यान राखबा की बात है... घणी देर नी व्हेणी चात् । रणजीत . (थोड़ो सो वणतो यको) फेर भी...व्याव-स्यादी जेडा कामा माय घणी जब्दी नी करणी चाय । [राधेश्याम चल्यो जान् । वणा र जाणे रे बाद रणजीत भी बैठक मांय सू उठ' र आपरा मुकाम रा दूजा कमरा माय् चल्यो जान् । [पर्दो बन्द हुन्]] तीसरो दृश्य [जागां- राधेश्याम रा घर रो कमरो। राधेश्याम माचा मात् बैठो है...अर अणा री बहू गीता फरस मात् बैठी है। दोन्यू मांय सुनीता रा संबंध री याता व्हेरी है। राधेश्याम : नवळगढ़ सू आया आज मन् पांच दिन व्हेग्या । हाळताई वणा रो कोई कागद नी आवियो । सात दिन री के' र आयो हो। दो दिन और बाट देखा। गीता : नवळगढ वाळा वड़ा आदमी है। वणां रा कागज रो कांई ठिकाणो...आ भी जाव् अर् ना भी आव् । आज काल करता-करता यूई छोरी की उमर ढळ जाई। राधेश्याम : जितरी चिन्ता थे करो हो .अण सू भी ज्यादा मन् है। गीता : लडका रा रस रोपतो लागीतो? राधेश्याम : लड़का रो रुप आपणी कानी व्हे तो भी वण विचारा री काई दाळ गळ ? आपिर तो वणरा मां-बाप जो करसी वो होगी।

156 : कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ : गीता : पण लड़का सू पूथ्यो भी तो जरूरी है। राधेश्याम : जरूरी तो है...पण पयस्या बाळा रा घरां म्पयस्या क आग लड़का-लड़की री राय फीकी है । [घर को बारलो किवाड़ खटखटाबा को आवाज आरी राधेश्याम : (आवाज सुणर) कुण है सा...?--(कुलदीप फेर किंवाड़ खटखटातो थको)...कुण है सा ? (राधेश्याम किवाड़ खोल र देखतो थको-कुलदीप न देख'र)...आओ सा...मायपधारो- (आपरा घर री बैठक मांय ले जातो थको) आपरा कागद री घणी वाट देखी...चालो ओ भी ठीक-हुयो क्...आप खुद पधारग्या। (कुलदीप चुपचाप बैठो है) आप र घरे है तो सब ठीक-ठाक। कुलदीप सब ठीक है सा राधेश्याम : म्हाळोगा ताई रणजीत जी कांई संदेसो-भिजवायो है ? कुलदीप (जेव सूं कागज निकाळर देतो यको) ओ कागद-आपरी सेवा माय भेज्यो है। [राधेश्याम कागद खोलर पढ़तो थको नवळगढ़ जेठबदी तीज संवत् 2030 सिध श्री जोग लिखी श्रीनगर मू सुभसुथानेक सर्वोपमान लायक राधेश्याम जी न् रणजीत वर्मा रा राम राम बंचावसी। अल् म्हें भगवान की किरपा सू राजो-खुसी हां आपरी राजी पुसी ताई ईश्वर सू नेक चावा हां। अपरच समाचार एक जाणसी क म्हारो लड़को कुलदीप कागद ले आपरी सेवा मांय हाजिर व्हेरीयो है । कागद लिखवा म्'देरी हुई-जिणं सारू माफी दिरावसी । आपरो संबध मने मंजूर है। इणं संबंध सारूं मन् सोनो...चादी अर् डायग्यो काई भी नी चायज् । आपरी खुसी माय म्हारी खुशी है । म्हारी तो अन्दरुणी भावना आई है क् लड़की पढ़ी-लिखो...सुमील अर् घर का काम काज माय ठीक व्हेणी चाव् । डायज्या री आ रीत एक सामाजिक बुराई है। दण मारू आप रे साथ मैं भी आ मोगन याई हूँ - अण बुराई न् ममाज रे-~मायऊं जड़ मूल मूगतम करणी है। हायज्या रो~मामाजिक बंधणं बिगुल बेकार है...अणं डायज्यो : 157 बुराई न् हटाया सारू ..लाखा... ..करोड़ा को घाटो भी उठाणों पड़ यो तो उठावंगा। वण दिन आपन्म जो वाता कई...वण सारूमाफी अरज करू हूँ। वणं दिन म् अपणे आपम् राजा मानतो हो...अर आज गळी रो मामूली आदमी। कुण जाण की बगत ठोकर लाग् अ आपणों जीव निकळ जाव । अर् आ लाखां को धन-सम्पत्ति अठई रे जाव । री ब्याव की वात .. म्हारो विचार, ओ है क् कुलदीप धन्धा-पाणी लाग्या पच् घर- बार का पचड़ा मांय्पड़ तो ठीक रेसी। और कांई लिवू । कागद वेगो दिरावेजो। आपरो रणजीत वर्मा । राधेश्याम : (कागज पढ़ र् जेब मांय मेलतो थको) आ खुसी की यात है क् रणजीत जी न्यो रिस्तो मजूर है। (थोड़ाठेर र विचार करतो थको) बेटा जमानो केडो खराव आयो है...। एक जमाना वो हो जद् वाप सू पेली वेटो नी मरतो। झूठ बोलणी सबसू बडो पाप मान्यो जातो। चोरी को नाम निसाण भी नी हो। सय सादो जीवन जीता। कोई मिलावट रो नाम भी नी जाणता। रिस्वत वणं जमाना माय न तो कोई लेता...अर् न कणी आदमी री रिस्वत देवा री हिम्मत पडती ।दूसरी कानी आज चोरी, अन्यायो, झूठ, रिस्वत, मारकाट...रो जोर है। कुलदीप : बात तो ठीक है सा। राधेश्याम : इण रावसू मूगी है...आजकाल रो पढाई। ऊंची पढ़ाई विचारा गरीय पयस्या की कमी के कारण नी कर सक...अर् आ पढ़ाई भी जिन्दगी माय कोई काम नी आव्...क्यूं फ् आ कोरी किताबी है। स्कूल...कालिज छोड़वा क बाद बाबूगिरी को लेणं के अलावा आजकाल का छोरा न् कांई धन्धों को दिए। अफगर तो हजारा मुइक्का-दुक्का व...बाकी सब बाबू यणता थका नजर आए । अण सारू भी यणांन दो जोरदार हथकन्डा अपपावणों पड़...रिस्वत मर जाण पिचाप । दो दृषकन्डाई अणं जमाना मायं नौकरी राधाम माधन है। कुलदीप : आपरी बात वाजवी है सा। राधेश्याम : पेळी रासाधु भी बड़ाईक लायक हा। वन माधुआं माय अनरो तपोवनहोर मोडा आदमी न् जीवनी करणों या 158 • कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ रा वायां-हाथ रोल हो। ये चरमचारी भी पक्का हा। जो यात येता...वोई करता। कणीर साथ धोको करणों तो वणां ने आवतो हो नी थो।वणां न् देयताई एड़ो मालूम व्हेतो क् जाण् अ तो धरमराज रा अवतार ही दोस्।...अर् आज- काल का असाधु...सांच सूं कतराई कोरा अळ्गा रैव् । जद् आई बात हो तो क्यूं साधु वण्यां। जटा बढ़ा'र...भसम रमा, र क्यूं जनता न् धोको दियो। कुलदीप हो...सा। राधेश्याम (उठ'र) मुंअवार आयो...आप योड़ा-बैठज्यो। (जावतो थको) कुलदीप : म् आपन अरज करूंसा... ...मन् अणी गाडी सूं पाछो पूगणों है...म्हारी गाडी रो टेम व्हेग्यो। राधेश्याम . आपन आज ही पुंचवो जरूरी है तो...रोकवा सूं भी कांई फायदो। (दोन्यूं उठ'र जाव) [पदों वन्द हुन्] रम्य रचना (व्यंग्य) कौमी एकता की तलाश भगवतीलाल व्यास - हमारे मुल्क हिन्दुस्तान में जाति, मजहब, वेशभूपा, भापा, भोजन सब तरह की अनेकताएँ मिल जाती हैं। इतनी अनेकताओ में एकता हूंढना मुश्किल काम है । और फिर एकताओं में भी जो श्रेष्ठ किस्म को एकता होती है उसे कौमी एकता कहते है, यह ज्ञान हमे पिछले दो-एक सालो मे ही हुआ है। अपने इस नवीनतम ज्ञान के आधार पर हमने निश्चय किया कि हम कौमी एकता को ढूंढकर ही दम लेंगे। एक जगह हमने देखा कई लोग जमा हो रहे थे। कुछ लोगों के हाथ में झंडे थे, कुछ के हाथ मे डंडे । डंडों के एक सिरे पर गत्ते लगे हुए थे। हमने सोचा कौमी एकता जरूर इस भीड़ मे मिल जायेगी । आखिर एक लाल परदे पर हमारी नजर पड़ी। वहां एक चीज बैठी थी। हमने उस चीज से पूछा-'क्यो बाई, क्या आप ही कौमी एकता है ?' वह चीज हथौडामार स्वर में बोली-'नहीं, हम मजदूर एकता है। हम चुपचाप आगे बढ गये। आगे एक बड़ा मदरसा था। शायद कॉलेज रहा हो। आज यहां चुनाव था। सड़क की ओर रख किये जो दीवार इस भवन की थी वहाँ माइक्रोस्कोप की सहायता से ही वह जगह ढूंढ़ी जा सकती थी जहाँ इश्तहार न चिपकाये गये हो या कुछ लिखा न हो। बाहर कुछ नेता टाइप छान या छात्र टाइप नेता हाथों में लाल, पीले, हरे कागज लिये मुफ्त वौट रहे थे। हर कोई हाथ बढाकर कागज ले सकता था। मुफ्त मिलने वाली चीज से कैसा परहेज ! हमने भी हाथ बढ़ाया। एक गुलाबी रंग का परचा हमारी पकड़ में आ गया। परचे में सबसे ऊपर बड़े अक्षरों में लिया था 'छात्र एकता जिंदाबाद'। हमारी वां खिल गई। हमें लगा कि इस छात्र एकता से जरूर पता लग जायेगा कि कौमी एकता कहां रहती है ? हमने एक संजीदा से दिखने वाले छात्र नेता के पाम जाफर पूछा---'क्यों भाई, तुम हमे कौमी एकता का पता दे सकते हो? हमें उममे आज ही मिलना है।' वह संजीदा दिखने वाला छात्र एकदम जाति को मुद्रा में आ गया और अपना 160 . कौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ एका हाथ हवा में लहराते हुए बोला-'आप किम कोमा-विराम की बात कर रहे हैं ? यह छात्र एकना है साहब । छात्र एकता---एक बहता हुआ दरिया। कभी न रुकने वाला नूफान । समझे आप? जो हममे टकरायेगा....' यागे की बात न मुनना ही बेहतर समझकर हम बिमक लिये । कौमी एकता की कसम, छाम एकता के कहकहे तोरो की माफिर हमारी पीठ पर काफी दूर तक चुभते रहे। इनसे बचने के लिए हम मुख्य सड़क छोडकर एका तग गली में घुस गये। यह गली एक बड़े मैदान तक जाती थी। हम चलते गये। मैदान में सभा हो रही थी। यह सभा आम सभा थी। आम सभा को पहचानने में हम गलती नहीं कर मक्ते । आम सभा की पहली पहचान यह है कि उसमे कुछ पास आदमी भाषण देते है। इस आम मभा में भी जो भाषण दे रहे थे वे पास थे इसलिए हमने आमानी से पहचान लिया कि यह आम सभा ही थी। हमने सोचा हम कौमी एकता जैसी महत्वपूर्ण चीज को ढूंढ़ने निकले है और बड़ी जल्दबाजी से काम ले रहे है। ऐसे तो मात जन्म में भी कौमी एकता मिलने वाली नहीं है। अत: हम इत्मिनान से एक युजुर्ग सज्जन को बगल में बैठ गये । भापणकर्ता महाशय का भाषण खत्म हुआ और लोगों ने तालियां बजाई। दोनो हाथो का एक साथ ममान उपयोग करने के मौके जिंदगी में बहुत कम आते है और जव जव आते है, अच्छे लगते हैं। महज इसीलिए हम भी ताली बजाने वालो मे शरीक हो गये। ताली-कर्म से निवृत्त होकर हमने उन बुजुर्गवार से पूछा-~~-'आदरणीय, क्या मैं आपमे कौमी एकता के बारे में कुछ पूछ सकता हूँ?' हमारे स्वर में इतनी नरमी थी कि और कोई होता तो जेब से निकाल कर कौमी एकता को हमारी हथेली पर ही रख देता मगर उन वुजुर्ग सज्जन की भौहे हमारा सवाल सुनते ही तन गई। रोप के साथ बोले-'अजीव सिरफिरे हो तुम । कौमी एकता का पता हमसे पूछते हो? कौम के लीडरो के पास जाओ। हम तो कौम के खिदमतगार हैं यानी करमचारी । समझे ? यह करमचारी एकता की मीटिंग है। करमचारियों की अपनी ही मुश्किलात इतनी है कि ..सर ! जाने दो। लगता है तुम करमचारी नही हो।' हमे लगा कि अब अगर एक मिनट भी यहां रुके तो ये महाशय हमें धक्के देकर निकलवा देंगे। कौमी एकता की तलाश मे हमे एक के बाद एक विभिन्न अनुभव हो रहे थे और लगातार असफलता मिल रही थी। मगर यह भी सच था कि कौमी एकता का पता लगाना जरूरी था। कौमी महत्त्व की चीज़ को आखिर यूं ही छोडा भी तो नहीं जा सकता। सुबह जब घर से चले थे तो वाकायदा घोषणा की थी कि आज हम कौमी एकता लेकर ही लौटेंगे। अब अगर खाली हाथ वापस लौट गये तो बीवी-बच्चे हंसेंगे। हमने एक बार थके मन से फिर सकल्प किया जो भी हो, कौमी एकता का पता जहर लगाना पड़ेगा। नये सिरे से कार्ययोजना पर विचार . कौमी एकता को तलाश : 161 करने के लिए हम एक पार्क में जा पहुंचे । थोड़ा सुस्ताये, ताजगी हासिल की और फिर अभियान पर चल पड़े। सांझ हो चली थी। चलते-चलते हम बड़े भवन के सामने से गुजरे। यहाँ कई कारें, स्कूटर, साइकिलें, ऑटोरिक्शा खडे थे । बड़ा शामियाना तना था, टेवलें लगी थी। बेयरे खाने-पीने का सामान ला रहे थे 1 बला की फुर्ती थी माहौल मे। हमने सोचा किसी बड़े आदमी को शादी का प्रीतिभोज होगा। हम आगे बढने ही वाले थे कि हमारी निगाह मुख्य द्वार पर लगे 'वेनर' पर पड़ गई। लिखा था---'कौमी- एकता सप्ताह महभोज ।' हम इस बेनर को पढकर कितने आनदिन हुए होगे इसका अनुमान आप लगा सकते हैं । सहभोज का निमंत्रण पत्र तो हमारे पास नही था पर हम धड़धड़ाते हुए खाने की टेबल के पास पहुंच गए। न किसी ने रोका न टोका । हमने मन-ही-मन उन चितकों को प्रणाम किया जिन्होंने अपनी चिंतन को अक्षय पूंजी को मथकर कौमी एकता जैसा रत्न निकाला। हमने इससे भी अधिक श्रदा के साथ उन आयोजकों को शीश नवाया जिनकी अचूक सूझ-बूझ के तहत यह सहभोज आयोजित था। निश्चित समय पर मुख्य अतिथि की कार शामियाने के पास आकर रुकी। लोगों ने उन्हे फूलमालाओं से लाद दिया। फिर सब लोग टेबलों के पास जमा हो गये। मुख्य अतिथि जी ने एक दही-बड़ा अपनी प्लेट में रखा और देर तक उसे कुतरते रहे। अधिकांश लोगों ने यही किया। जिसने पहली बार अपनी प्लेट में जो भी चीज़ रख ली उसी को देर तक खाता रहा या खाने का अभिनय करता रहा। फिर लोग जाने लगे। धीरे-धीरे काफी कम लोग रह गये । हमने देखा खाद्य पदार्थों की प्लेटें लगभग ज्यो-की-स्यों रखी है । नाम मात्र को ही उनमें से ग्रहण किया गया है। हमने सोचा कौमी एकता शायद भूखे रहने से ही आती हो इसलिए हमने भी चुपचाप अपनी प्लेट एक तरफ रख दी और बाहर निकल आये। वाहर दो सम्भ्रात अतिथि वार्तालाप करते जा रहे थे। 'कैसा रहा कौमी एकता का डिनर?' 'डिनर क्या खाक रहा यार । हाजिरी देनी थी जिससे अगले चुनाव की सभा में फध के साथ कह तो सकें कि हमे हरिजनों के साथ खाना खाने में कोई शिक्षक नहीं। और इस तरह....' आगे की बात बिना सुने भी समझी जा सकती थी। हमे समझ में आ गया था कि आखिर कौमी एकता है क्या चीज । हम नहीं कहते कि हमारी तलाश पूरी हो चुकी मगर फिलहाल कोम के हालात देखकर हमने कौमी एकता की तलाश कुछ दिनों के लिए मुल्तवी कर दी है। ।

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सम्पर्क सूत्र सवाई सिंह शेखावत, व्याख्याता, रा० उ० मा० वि०, उदयपुर वाटी (झुझुनू) रूपनारायण काबरा, व्याख्याता, रा० उ० मा० वि०, गोबनेर (जयपुर) विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी, व्याख्याता, रा० वांगड उ० मा० वि०, पाली (राज.) श्यामलाल कौशिक, शिक्षा मंत्रालय, पो० बॉ०-64, वाऊची (नाईजीरिया) रामनिवास सोनी, काली जी का चौक, लाडनूं (नागोर) मोहन सिंह, प्रधानाध्यापक, रा० मा० वि०, तलवाडा झील (श्री गगानगर) चुन्नीलाल भट्ट, अध्यापका, रा० मा० वि०, जेठाना (डूंगरपुर) चन्द्रदान चारण, प्रधानाचार्य, भारतीय विद्या मदिर रात्रि उ०मा० वि०, योकानेर (राज.) बसंतीलाल सुराना, महिला आश्रम, भीलवाडा (राज.) प्रेम 'खकरधज', स० अ०, रा० मा० वि०, सिणधरी (बाड़मेर) सोमनाथ शर्मा, स० अ०, रा० पटेल उ० मा० वि०, व्यावर (अजमेर) गौरीशंकर आर्य, सेवा निवृत अध्यापक, कवि कुटोर, चौमहला (झालावाड़) श्रीकृष्ण विश्नोई, व्याख्याता, श्री जैन उ० मा०वि०, बीकानेर आनन्द कुरैशी, सेन्ट पैट्रिक स्कूल, डूंगरपुर (राज.) कुंदन सिंह सजल, उदय निवास, रायपुर (पाटन) (जि० सीकर) जगदीश नागर, अध्यापक, रा० मा० वि०, दुजाना (पाली) मोगजी पाटीदार, स० अ०, रा० मा० वि०, पालोदा (वांसवाडा) अर्जुन कावड़िया, द्वारा-श्री धर्मेशजी मादरेचा, पोस्ट ऑफिम के पाम, राजसमन्द (उदयपुर) बद्रीलाल शर्मा, म० अ०, उ० प्रा०वि०, भामोलाय, वाया अरांई (अजमेर) फमर मेवाड़ी, चांदपोल, कांकरोली (उदयपुर) निशांत, द्वारा-श्री डी० राज पेन्टर, पीलीबंगा, (श्री गंगानगर) अब्दुल मलिक खान, प्रेस रोड, मिंधी कॉलोनी, भवानी मण्डी (झालावाड) रामदत्त शर्मा, मो-91, रणजीतनगर, भरतपुर (राज.) सत्या भार्गव, व्याख्याता, श्री राम उ० मा० वि०, काटा (राज.)

164
शियकुमार शर्मा, 52, गायत्री मार्ग, उदयपुर (राज.)
सत्यपाल सिंह, व्याख्याता, रा० सेठ कि० ला० कां० उ० मा०वि०, नागोर
भगवती प्रसाद गौतम, व्यख्याता, रा० उ० मा०वि०, भवानी मंडी (राज.)
अर्जुन 'अरविंद', कालीपल्टन रोड, टोंक (राज.)
भगवतीलाल व्यास, प्राध्यापक, लोकमान्य तिलक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय,
डवोक (उदयपुर)

शिक्षक दिवस प्रकाशन
सम्पूर्ण सूची
1967
1. प्रस्तुति (कविता), 2. प्रस्थिति (कहानी), ३. परिक्षेप (विविधा)
4. सालिक ए गोहर (उर्दू), 5. दार को दावत (उर्दू)
1968 :
6. कैसे भूलू (संस्मरण), 7. सग्निवेश (विविधा), 8. दामाने बागयां
(उर्दू)
1969:
9. प्रस्तुति-2 (कविता), 10. बिम्ब-विम्ब चाँदनी (गीत), 11. प्रस्थिति-2
(कहानी), 12. अमर चूनड़ी (राजस्थानी कहानी), 13. यदि गांधी
शिक्षक होते (निबन्ध), 14. गांधी-दर्शन और शिक्षा (शिक्षा दर्शन),
15. सन्निवेश-2 (विविधा)
1970:
16. सूखा गाँव (गीत), 17. खिड़की (कहानी), 18. कैसे भूलूं-दो
(सस्मरण), 19. सनिवेश-3 (विविधा)
1971:
20. प्रस्तुति-3 (कविता), 21. प्रस्थिति-3 (कहानी), 22. सन्निवेश-4
(विविधा)
1972
23. प्रस्तुति-4 (कविता), 24. प्रस्थिति-4 (कहानी), 25. सन्नियेश-5
(विविधा), 26. माळा (राजस्थानी विविधा)

166 1973 27 धूप के पसेरू (कविता), 28. खिलखिलाता गुलमोहर (कहानी 29. रेजगारी का रोजगार (एकाकी), 30. अस्तित्व की खोज (विविधा 31, जूना बेली : नुवां वेली (राजस्थानी विविधा) 1974 32. रोशनी बाँट दो (कविता) सं० रामदेव आचार्य, 33. अपने आस पास (कहानी) स० मणि मधुकर, 34. रग-रग बहुरङ्ग (एकाकी; स० डॉ० राजानन्द, 35. आंघो अर आस्था व भगवान महावीर, (दों गजस्थानी उपन्यास) स० यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र', 36. बारखड़ी (राज- स्थानी विविधा) स० वेद व्यास 1975 . 37. अपने से बाहर अपने में (कविता) स० मंगल सक्सेना, 38. एक और अन्तरिक्ष (कहानी) सं० डॉ० नवलकिशोर, 39. संभाळ (राज० विविधा) सं० विजयदान देथा, 40. स्वर्ग भ्रष्ट (उपन्यास), रो० भगवती प्रसाद व्यास, स० डॉ० रामदरश मिश्र, 41. विविधा स० डॉ० राजेन्द्र शर्मा 1976 42. इस बार (कविता) स० नन्द चतुर्वेदी, 43. संकल्प स्वरों के (कविता) मं० हरीश भादानी, 44. बरगद को छाया (कहानी) सं० डॉ० विश्वम्भर. नाथ उपाध्याय, 45. चेहरों के बीच (कहानी व नाटक) स० योगेन्द्र किसलय, 46. माध्यम (विविधा) स० विश्वनाथ सचदेव 1977: 47. सृजन के आयाम (निबन्ध) स० डॉ० देवीप्रसाद गुप्त, 48. क्यों (कहानी व लघु उपन्यास) स० श्रवणकुमार, 49. चेते रा चितराम (राजस्थानी विविधा) म० डॉ० नारायणसिंह भाटी, 50. समय के संदर्भ (कविता) स० गुगमन्दिर तायल, 51. रगयितान (नाटक) सं० सुधा राजहस 1978 : 52. अंधेरे के नाम सघि-पन नहीं (कहानी संकलन) स० हिमाशु जोशी 53. लखाण (राजस्थानी विविधा) सं० रावत सारस्वत, 54. रचेगा संगीत 167 (कविता सकलन) स० नन्दकिशोर आचार्य, 55. दो गांव (उपन्यास) ले० मुकारय खान आजाद, स. डॉ० आदर्श सक्सेना, 56. अभिव्यक्ति की तलाश (निवन्ध) स० डॉ० रामगोपाल गोयल । 1979 . 57. एक कदम आगे (कहानी संकलन) सं० ममता कालिया, 58. लगभग जीवन (कविता संकलन) स० लीलाधर जगूड़ी, 59. जीवन यात्रा का कोलाज/नं० ? (हिन्दी विविधा) स० डॉ. जगदीश जोशी, 60. कोरणी कलम री (राजस्थानी विविधा) स० अन्नाराम सुदामा, 61. यह किताब बच्चों की (बाल साहित्य) सं० डॉ० हरिकृष्ण देवसरे। 1980: 62. पानी को लकीर (कविता संकलन) सं० अमृता प्रीतम, 63. प्रयास (कहानी सकलन) स० शिवानी, 64. मंजूषा (हिन्दी विविधा) स० राकेश जैन, 65. अंतस रा आखर (राजस्थानी विविधा) स० नृसिंह राजपुरोहित, 66. खिलते रहे गुलाब (बाल साहित्य) स० जयप्रकाश भारती . 1981 67. अंधेरों का हिसाब (कविता संकलन) सं० सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, 68. अपने से परे (कहानी सकलन) सं० मन्नू भण्डारी, 69. एक दुनिया बच्चो की (बाल साहित्य) स० पुप्पा भारती, 70. सिरजण (राजस्थानी विविधा) सं० तेजसिंघ जोधा, 71. चन्देमातर्म (हिन्दी विविधा) सं० डॉ. विवेकी राम। 1982 . 72. अपना अपना आकाश (कविता संकलन) सं० जगदीश चतुर्वेदी, 73. धर्मक्षेत्रे : कुरुक्षेत्र (कहानी सकलन) सं०मणाल पाण्डे, 74. फूलों के ये रंग (बाल साहित्य) सं० लक्ष्मी चन्द्र गुप्त, 75. कंपळ (राजस्थानी विविधा) १० कल्याण सिंध शेपावत, 76. फौमी एकता की तलाश और अन्य रचनाएँ (हिन्दी विविधा) सं० शिवरतन पानयो।

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Komi Ekta Ki Talash Aur Anya Rachnain

Author
Shiv Ratan Thanvi
Title
Komi Ekta Ki Talash Aur Anya Rachnain
File name
Komi Ekta Ki Talash Aur Anya Rachnain
Text
OCR done
Citation
1970
Published
2011/03
Publisher
Chinmay Prakashan Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
194
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551368
Barcode
4990010032116.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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