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Mantra Mimamsa

Raamaa Mishra Shaastrii · 2004/12/26

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॥ श्रीः॥
मन्त्रमौमांसा।
ब्रह्मामृतवर्षिणौसभासंपादकेन पण्डित
श्रीराममिश्रशास्त्रिणा प्रणीता।
MANTRA-MIMANSÅ.
BY
PANDIT RAMA MISRA SASTRI,
resident of Literary Society of the Benares Pandits.
PRINTED AT THE EXPENSE & SPECIAL ORDER OF
PANDIT MATHURA PRASADA MISRA LATE
HEAD MASTER COLLEGIATE SCHOOL BENARES
काशी
भारतजीवन प्रेस में मुद्रित हुश्री
सन् १८८६ ईखी।
प्रथम बार ५०० ।

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PURPORT OF THE HINDI PREFAČE IN ENGLISH. 1.--Tue necessity of receiving a Muntra is evident from the Vedas and the Dharma Sastras, which are based on the principles of the Vedas. This signifies that it is obligatory on the Brahmans, the Kshatriyas, and the Vaisyas, who are called Dvijas or twice-born, to receive the Gayatri-Mantra; and it is absolutely necessary for others not entitled to the Gayatri-Mantraz to receive the Mantras given in the Puranas and Tantra Sastra. The established truth of the Sastras is that there is no emancipation of the soul without the requisite Mantra. But in process of time, as the Vaidic age declined, people by mistake began to consider that it was needful for even the twice-born to receive, like the Gayatri-Mantra, the Mantrds of the Puranas and the Tantra Sastra. It so happened that nearly all the Maithil & Bengal Pandits began to hold the acceptance of the Mantras of the Tantra Sastra above all. The teachers of these were paid more respect than those of the Guyatri, and the Gayatri- Mantra itself amounted in their opinion to nothing more than a mere matter of course. To such an extent did this evil increase that the teaching of the Mantras was adopted as a profession.

( 2 ) With a view to try and remove this great evil I have written this small book, Mantra-Mimansa by name, in which I have shown by proofs the correctness of the correctness of my statement, and the attention of the public is directed to the Sanskrit extracts, in order to have a greater knowledge of the subject. 2.-Out of the four graded orders*, periods of the religious life of a Brahman, only the Brahmans of the second order and the Brahmacharis or Brahmans who practise chastity throughout life, have a rightful claim to teach Mantras; and not, by any means whatever, Dandis or Brahmans of the fourth order, and others scripturally unauthorized. In respect of a Dandi, the Sastras are of opinion that if one erroneously receives a Mantra from him, it is indispensably necessary for his salvation to ondergo a penance, before receiving again a Mantra from a householder. Notwithstanding the dictates of the Sastras, people make Dandis their spiritual guides. The cause of this is obvious. It is mainly owing to the inattention of the no. First, that of the Brahmachari or Student; second, that of the Grihastha or householder; third, that of the Vanaprastha or anchorite; fourth, that of the Bhikshuk or beggar, (3) bility of this country to the Sastras, and to their dulness of intellect. Not only this but more. The majority of the population of this country are under an impression that Santas, Mahantas, Dandis, and Gosains bave the supernatural power of child-giving to one who longs for a child. All this is the result of the teaching of Mantras by a Dandi. Bnt be it as it may, I have endeavoured to the best of my limited ability to show that it is wholly unscriptural to receive Mantras from a Dandi or an unauthorized Brahman. 3.The different classes of Mantras have also been shortly described. RAMA MISRA SASTRI Brahmamritavarshini Sabha BENARES. st: 1 श्रीनारायणदत्ताख्यः सारस्वतशिरोमणिः । सुप्रसिद्धः सुवैद्योऽस्य कार्यस्य घटकोऽभवत् ॥

भूमिका। सुननशिरोमणि काशी महापुख्य क्षेत्र के निवासी कान्यकुबकुलालङ्करण श्री पं० मथुरा. प्रसाद मिश्र जी ने कुछ दिन व्यतीत हुये कि तीन प्रश्न मेरे पास प्रसिद्ध सुवैद्य पं. नारायण- दत्त जी के द्वारा भेज दिये और कहा भेजा कि इन प्रश्नों का उत्तर वेद और सन्वादिमहामान्य प्रमाणों के द्वारा असंकीर्यदृदय से होना चाहिये। किसी सांप्रदायिक आधुनिक बैंच के कारण पक्षपात न होय जैसा कि समयानुसार संभव है, और प्रश्न ये थे-कि, क्या ब्राह्मणों को अ- थवा अन्य भी त्रैवर्णिकों को गायत्री से भिन्न मंत्र लेना अत्यावश्यक है जैसे कि गायत्री ग्र- हण करना अत्यावश्यक है ? ॥ १ ॥ क्या संन्या- सी भी गृहस्थ को मंत्रोपदेश कर सकता है ? ॥

( २ ) ? २॥ आज कल जो लोग मंत्र लेते हैं वे क्या वैदिक हैं ? अथवा पौराणिक तांत्रिक हैं ? मैंने जब यह प्रश्नपत्र पाया तब मैं अनेक वैदिक लौकिक "ब्रह्मामृतवर्षिणो" सभा के कार्य में व्यग्र था इस हेतु कुछ लिख पढ़ न सका परन्तु जब हमारे मित्र एङ्गलो संस्कृत के प्रधाना- ध्यापक पण्डित माधवप्रसाद जी महाशय ने मुझ से कहा कि "यह समस्त कार्य PUBLIC साधारण का है कुछ किसी व्यक्ति विशेष का नहीं है दूस को तो विशेष रूप से सभा ही का कार्य जानना चाहिये" तब तो मैंने इसे सर्व- कार्य छोड़ के आरम्भ किया और एक संक्षेप से छोटी सी "पंचमीमांसा" नामक पोथी सं- स्कृत में लिखी और आस्तिकों के विश्वसनीय प्रमाण हारा इस पुस्तक में यह सिद्धान्त किया है कि ब्राह्मयों को अथवा अन्य वर्णिकों को भी गायत्री से अतिरिक्त ऐसा कोई मंत्र नहीं है जी लेना आवश्यक होय, हिजत्व की सिद्धि

( ३ )
केवल गायत्री मंत्रही से होती है और किसी मंत्र
से नहीं होती। हां किसी को क्षुद्र कामना
होय, मद्य का आचमन करना होय, कलिया
का फलाहार करना होय और किसी शत्रु का
मारण, मोहन, उच्चाटन, बशीकरण करना होय
तो चाहे वह दिन में चार गुरू से चौदह मंत्र
ले और बहुत ही शोघ फल कामना होय तो
श्मशान में शव के शरीर पर बैठ कर मंत्र जपै
और अघोरी का शिष्य होय और कुत्तों के साथ
भोजन भी करैउनसे भी तृप्त न होकर और २ गुरू
और २ मंत्र ढूंढे औ पूर्वगुरू औ पूर्व मंत्र को
चाहे तो त्याग भी करै। जो तंत्रशास्त्र धर्मशास्त्र
पढ़े हैं वे इस बात को अच्छोरोति जानते हैं कि
संत्रों में गुरू औ मंत्र दोनों के फेर देने का भी
प्रकार लिखा है। ठीक ही है यह तो अमेरि-
का की मनमानी शादी है "चार दिन इस के
संग मनमाना तो भली बात नहीं तो "एक
कन्या सहस बर” दूसरे ही के संग सही" कुछ

( ४ ) मनु जी को उक्त विवाहविधि तो है ही नहीं कि मन, बचन, कर्म से जन्मान्तर में भी दूसरा भाव जहां दोष का जनक होय । कान अपने हैं फुक- बाते चलो, किसी न किसी मंत्र से विना परिश्रम धन दौलत और गोद खिलाने को वाल लाल अवश्य ही मिलेगा, बस एक दूसो बात से आप को विदित हो गया होगा कि जब चाहे तब जिस मंत्र को लेवें और जब चाहें तब छोड़ दें तो वह मंत्र क्या गायत्री के संग लगेगा ? क्या गायत्री मंत्र को भी यह दशा कहीं लिखी है ? गायत्री मंत्र वह है कि जिस से वर्णिकों का धर्मार्थ, काम औ मोक्ष सिद्ध होते हैं और जिस्का उपदेश करने वाला गुरू कभी भी नहीं पलटा जाता औ न तो मंत्र हौ पलटा जाय । यहां पर कितने लोग कह वैठेंगे कि सा- हब, रामानुज संप्रदाय, वल्लभ संप्रदाय, निम्बा- को माध्व संप्रदाय बाले औशङ्कराचार्य के म- तानुयायी समस्त ही लोग गायत्री से भिन्न भौ ? ?

( ५ )
मंत्र देते हैं तो आप के कहने पर कैसा बि-
प्रवास किया जाय । यदि आप यह प्रश्न करते
हों तो कृपा कर संस्कृत जो लिखा गया है उसे
किसी उत्तम शास्त्रज्ञ के संग बैठ कर निरीक्षण
करिये आपको ऐसी शतावधिशंकाओं का उत्तर
इस छोटी सो पुस्तक में मिलेगा आदि अन्त से
पढ़िये तो, शीघ्रता मत करिये, यदि संस्कृत से
भाषा की जाय तो वह संस्कृत से चतुर्गुण
हो जायगी इस हेतु यह समस्त विचार संस्कृत
के द्वारा ही अच्छा होगा।
अब रहा संन्यासी का गुरू करना सो दूस
विषय में हमें यह कहना अत्यावश्यक हुआ है
कि गायत्री मंत्र का न तो कोई संन्यासी
से उपदेश ही लेता है औ न कहीं शास्त्र
ही में संन्यासी से गायत्री लेना लिखा है। अब
रहा क्षुद्र कामना की इच्छा से मल लेना तो
वह कैसे संन्यासी से मन्त्र लिया जा सका है जो
ऐहिक फल साधक है, जिस मंत्र का पुरुष पूर्व

साधन किये रहता है वह मंत्र उस से लेना हो-
ता है तो सांसारिक व्यवहार के मंत्र से और सं-
न्यासाश्रम से तो सहन हस्त का अंतर है संन्यासी
हो कर पुरुष ऐसे मन्त्र को क्योंकर साधन कर
सता है, अब रहा मोक्षमन्त्र तो ऐसे मंत्र का सं-
न्यासी उपदेश दे सकता है परन्तु शास्त्र में गु-
हस्थ को संन्यासी से मंत्र लेने का निषेध लिखा
है * तो कैसे ले सकते हैं कितने लोग यह भी
कहते हैं कि शास्त्र में जो यति से दीक्षा लेने का
निषेध लिखा है वह जैन, बौद्ध इत्यादि प्रविधि-
न्यास वाले से मंत्र ग्रहण का निषेध है परन्तु यह
भी सर्वथा मिथ्या औ दंभ अज्ञान की बात है यह
हम ने अच्छे प्रकार संस्कृत में सिद्ध किया है उसे
।
* जैसा योगिनी तन्त्र में यतेर्दीक्षा ग्रहीत्वा तु कदा-
चिदपि मोहितः । प्रायश्चित्ते धेनुरेका त्रिरातब्रतमेव वा ।
प्रायश्चित्तं ततः कृत्वा पुनर्दीदां समाचरेत् ॥ ऐसे २ संन्यासी
से दीक्षा लेने के प्रतिषेध शतशः चन्द्रयामल, रुद्रयामल
इत्यादि तन्त्रो में मिलते हैं।

( ७ )
देख लो और अपना मन भरलो, अब रहा यह कि
कोई २ लोग रहस्थ हो कर भी संन्यासी को गुरू
करते हैं, तो इस से क्या हुआ हमें शास्र की
बात लिखनी है कि संसार के प्राचार का मूल
खोजना है, जब हमें स्पष्ट बचन मिल गया कि सं-
न्यासी गृहस्थ को मंत्रोपदेश नहीं कर सकता तो
अब यह भी बात अवशेष नहीं है कि संन्यासी
को मंत्रोपदेश का अधिकार जिस से सिद्ध होय
ऐसा भी बचन कहौं मिल जायगा यह कह के
अपनी बात को पूरी कर सकोगे। और आचार की
बात तो मत पूछो अन्य वर्ण की कौन बात है कि-
तने ब्राह्मण को भी आप देख सकेंगे जिन के यहां
गाजीमियां की पूजा बहु काल से होती आती है
औ ताजिया माना जाता है औ मियां साहब
का फूंका “सच पूछो तो धुंका" जल लड़के
लोगों को दिया जाता है औ उनका गर्भा-
धान संस्कार के पूर्व ही रहोमबक्स, करीमवक्स
नाम रक्खा जाता है श्री जगन्नाथ के रथ को

( ८ ) यात्रा न होय तो कोई चिन्ता नहीं परन्तु ता- जिया के साम्हने लड़के की साष्टांग अवश्य ही कराते हैं, जब यही लोकाचार है तब हमें यह मत पूछो कि लोकाचार का मूल क्या है । औ तीसरे प्रश्न का उत्तर संस्कृत में देख लेना वह कुछ बहुत कठिन नहीं है। अब मुझे जगदीश्वर सर्वनियामक सर्व के साक्षी औ प्रेरयिता से यह प्रार्थना है कि वह ऐसी सुमति देवे कि आप लोग त्रैवर्णिक अपने मूल शास्त्र बेद पर निर्भर करें औ उस्के सार- स्वरूप मंत्र पर दृढ़ विश्वास धरैं और छोटी २ बातों को भी आप के पूर्वपिट लोगों का प- रम धन जो वेद है "जो कि नित्य क्षीण होता जाता है" उसी के द्वारा निश्चय करें और पा- खंड मार्गों से दूर रहें। आप ही के हितार्थ मैंने "ब्रात्यसंस्कारमी- मांसा" बनाया है जो कि अति शीघ्र छप जायगा और आशा की जाती है कि इस पुस्तक के ( ६ ) प्रचार से इस घोर कलि मैं भी एक बार फिर त्रैवर्णिक व्यवस्था हो जायगी, ठीक हो है "यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत !" यह स्वयं श्रीकृष्ण भगवान् ने अर्जुन को कहाही है। औ भनेक काल से प्रवृत्त विवाह विषयक महान्धः कार के निवृत्त्यर्थ उहाह समय मीमांसा भी प्र- स्तुत हो चुकी है, शीघ्रही छप कर आप को मि- लैगी, आप उसे काम में लाये और लोकड्य में सुखी होइये परन्तु “श्रेयांसि बहुविवानि" कहीं आधुनिक हठी, नाम के पंडित के हाथ न पड़ियेगा नहीं तो आप डूबते हुये कहीं आप को भी अज्ञान सागर में स्नान न करवाय दें। बाप मन्वादि परममान्य धर्मशास्त्र के हारा अपना निर्णय कौजिये ॥ अापका शुभचिन्तककाशीस्थ ब्रह्मामृतवर्षिगौसभासंपादक राममिश्र शास्त्री।

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n श्रीः॥ श्रियैनमः। श्रीपतयेनमः मन्त्रमीमांसा। ॥ श्रीशाडि हितयीप्रपित्सुजनतासिध्यत्समीहाविधी यस्याः स्वारसिकानवद्यकरुणा जागर्त्यमुत्रानिशम् । वा- राजत्यतिदुर्गतोऽपि च यया दृष्टो दयातः सकृद् । यत्संब- न्धनिबन्धनं भगवतः श्रीमत्त्वमेनां श्रये ॥ मङ्गलं ननु तनोतु, संश्रितान् प्रति जनाञ्जनार्दनः । यत्प दस्मरणवीतकल्मषा नो गतागतस्य शो जनाः ॥ कच्चिद् गायत्रीव्यतिरिक्तमन्त्रग्रहणं नित्यं * त्रैवर्णि- कानाम् ? इति प्रश्ने कथंचिदपि न नित्यमिति शास्त्रत- त्वविदा परामर्शः । यथा हि अनादिनिधनाऽविच्छिन्नवै- दिकसंप्रदायसिद्धोपदेशस्य गायत्रीमन्वस्थानुपदेशे त्रैवर्णि- काः प्रत्यवयन्ति पतन्ति, न च ब्राह्मण्यादिभाजी भवन्ति * अत्रायमभिसंधिः, नित्यं नैमित्तिक काम्यमिति त्रि- विधं कर्म, तत्र नित्यं त्रैवर्णिकानां त्रिसन्धयादि, तच्च हि- विधं संस्कारकं विविदिषाजनकं च, तत्र संस्कारकमिदमिति २ न तथा मन्त्रान्तराग्रहणे तेषां हिजवानिव्यत्तिः प्रत्यवा- योत्पत्तिात्यता वा, गायत्र्यास्तु पुनरनुपदेशे “अत उड़ पतन्त्येते यथा कालमसंस्कृताः। सावित्रीपतिता व्रात्या भ- वन्त्यार्यविगहिताः” इति स्पष्टमेव ब्रात्यतामाह मनुईिती- याध्याये, एवमपरेऽपि स्मृतिकाराः स्मार्तसूत्रकृतश्च सर्वे गा- धिया क्रियमाणं संस्कारकं तदेव चेद् “यकरोषि यदशासि इति गीतोतरीत्या भगवत्यर्पणमुद्रया क्रियेत तर्हि वि- विदिषाजनकं, नित्यत्वं च प्रत्यवायपरिजिहीर्षयाऽनुष्ठीय- मानत्वम्, अस्ति च मा प्रत्यवगाम् इति धिया त्रिसन्ध्या- दिनित्यानुष्ठानमिति लक्षणसमन्वयः । नन्वेवमकरणे प्र- त्यवायजनकत्व नित्यत्वमिति पर्यवस्यति तच्चासंभवि प्रभा- वाद भावोत्पत्त्यनङ्गीकारेण नित्याननुष्ठानस्य प्रत्यवायजन- कखासंभवादिति चेन्न अभावस्य भावाजनकत्वमित्यनेन किं भावस्थाभावनिमित्तकत्वं निषिषधयिषितमुताभावसमवा- विकारणकत्वासमवायिकारणकत्वे प्रतिषिषेधयिषिते ? ना- यः, बीजध्वंसस्याङ्गुरनिमित्तकारणतायाः सर्वानुमततया प्र- तिबन्धकसंसर्गाभावस्य च कार्यमा प्रति कारणतायाः सि- द्धान्तसिद्धतया तथा वक्तुमशक्यत्वात् अभावस्य भावसम- वायिकारणत्वासमवायिकारणत्वे तु न केनाप्यङ्गीक्रियेते इत्वकिञ्चिदिदं, ततश्च यथा गङ्गानाने न पुण्ये जननीये मीमांसा। यत्रीग्रहणहीनानां चैवर्णिकानामैकवर्येण पातित्यमाच- क्षते । गायत्रीव्यतिरिक्तमत्वहीनानां तु न पातित्वावगति- वचनतोऽन्यथा त्वेकस्य पुंसः शैववैष्णवशाक्तगाणपत्यपाशु- पताद्यनन्तपरस्परविरुद्धाचारपुरुषपरिग्राह्यमन्त्रग्रहणानुप- पत्त्या सर्वेषामेव गायच्यतिरिक्ततत्तहेवसंबन्धितत्तदेकमात्र- मन्त्रपरिग्रहजुषां शिष्टानां पातित्यप्रसङ्गात्, न चेष्टापत्ति- स्तथासति सर्वशिष्टव्यवहारविलीपापत्तेः । न च आत्मा समवायिकारणमसमवायिकारणं च नानजनका. ष्टवदाममनःसंयोगोनिमित्तकारणं च यथायथं कालादि, यथा वा ब्रह्मवधजन्ये दुरदृष्टे समवायिकारणमात्मा अस- मवायिकारणं वधजनकादृष्टवदात्ममनःसंयोगस्तथा नि- त्याननुष्ठानजन्यपापसमवायिकारणमात्मा असमवायिका. रणं पापजनकपूर्वोपार्जितदुरदृष्टवदात्ममनःसंयोगो नि- मित्तकारणं च नित्याननुष्ठानमेवेति न कश्चिदिहावद्यसं. बन्धस्तस्मात् “अभावाद् भावोत्पत्ते रदर्शनादकरणे प्रत्य- वायो न युक्तिसहः” इति प्राचां वाचिकमपार्थकं बिभी- षिकामात्र, न चैवं नैमित्तिकैन संकरी जातेध्यादेरकरणे तत्रापि प्रत्यवायश्रुतरिति वाच्यम् । अकरणे प्रत्यवायजन- कताया उभयसाधारण्येऽपि नैमित्तिके जातेध्यादौ पुत्रज- मात्मकनिमित्तसंबन्धस्थाधिकारितावच्छेदककुक्षिनिक्षिप्त तया नित्ये च शुचितत्कालजीवितामात्रस्याधिकारिताप्र-

४
"अदीक्षितानां मानां दोषं शृण्वन्तु साधकाः । अन्न
विष्ठासमं ज्ञेयं जलं मूत्रसमं तथा ॥ अदीक्षितकतं श्राद्धं
श्राद्धं चादीक्षितस्य च ।
ग्टहीत्वा पितरस्तस्य नरके चाशु दारुणे ।
पतन्त्येव न सन्दे हो यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।
तथाप्यदीक्षितस्याची देवा ग्रह्णन्ति नैव हि।
तस्माददीक्षितं दृष्ट्वा सचैलं स्नानमाचरेत् ॥
दीक्षाग्रहणकाले तु पापराशिः प्रलीयते ।
निर्वाणपदसंयुक्तो बहिर्गच्छति तत्परः ।
सर्वाश्रमेषु दीक्षाया नित्यत्वं परिचक्षते ।
अनीश्वरस्य मर्त्यस्य नास्ति त्राता सुरेश्वरि ! ॥
तथा दीक्षाविहीनस्य नेह त्राता परत्र च ।
न तपोभिर्जपैीमैरुपचारैश्च साधनैः ।
दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात्कुर्यात्यापस्य संक्षयम् ।
तस्माद्दीक्षेति सा प्रोक्ता मुनिभिस्तन्ववेदिभिः ॥
दीक्षामूलं जगत्सर्वं दीक्षामूलं परन्तपः ।
दीक्षामाश्रित्य निवसेद्यत्र कुत्राश्रमे जनः ॥
योजकतया शुचितत्कालजीविनोऽकरणे प्रत्यवायजनक नि-
त्यमिति लक्षणपर्यवसानन नित्यनैमित्तिकयोरसाङ्गार्यस्य
सुनिर्वहत्वादधिकं तुमत्प्रणीतायामुद्दाहसमयमीमांसाया-
मवगन्तव्यम् ।

मीमांसा। ५ अदीक्षितश्च मरणे रौरवं नरकं व्रजेत् । तस्माद्दीक्षां प्रयत्नेन ग्रह्णीयादागमान्मुदा ॥ इति यामलवाक्यैर्दीक्षाया नित्यत्वप्रतिपादनेन, अग्र- हण जलानयोर्विष्ठासूत्रसमत्वाख्यानेन अदीक्षितमरणस्य रौरवगमनहेतुत्ववचनेन च दीक्षाग्रहणं नित्यमेवेति वाच्यम् दीक्षाया वैदिक पौराणिकतान्त्रिकभेदभिन्नतसा मोक्षसा- धकत्वत्रिवर्गसाधकंत्वपुरुषार्थ चतुष्टयसाधकत्वप्रतिभेद भि- न्नतया च आयमाभिव्यञ्जकत्ववर्णाभिव्यञ्जकत्वाद्य ने कभेद- भिन्नतया च कां दीक्षामवलम्बा भवतोऽयं यामलवचनोप- रोधविन्यास प्रयासः ? इति वक्तव्यं, यदि हि वैदिकों दीक्षा- मभिप्रेत्य तर्हि ओमिति ब्रूमः, गायत्रीस्वरूपायास्तस्या ब्राह्मणादिवर्णाभिव्यञ्जकतायाः प्रैषादिस्वरूपायाश्च तस्याः संन्यासाद्याश्रमनिर्वाहकताया वैदिकानां सर्वेषामेवाभि- मततया कस्यापि तत्र विप्रतिपत्तिविरहेण विचाराप्रवृत्तेः, यदि च गायत्रीमपहाय वैदिकमन्वान्तरपरिग्रहस्यावश्यं. भावो बुबोधयिषितस्तदापि गायत्राधिकारिपुरुषत्वावच्छेदेन सामानाधिकरण्येन वेति पर्यनुयोगे प्रथमे वक्ष्यमाणरीत्या तस्य नावश्यकतेति ब्रूमः, हितीये तु अधिकारिविशेषाणां तस्यावश्यकत्वेन वैदिकमन्त्रान्तरपरिग्रहोऽप्युचित एवेत्यग्रे विवेचयिष्यामः । पौराणिकदीक्षामभिप्रेत्य तान्त्रिकों वा दीक्षामभिप्रेत्य यद्युच्यते तदा वैदिकदीक्षाऽनधिकारिणां पा मन्त्र andu शूद्राणां सर्वकालेषु, त्रैवर्णिकानामपि कामोपहतवृत्तीनां वैदिकदीचाच्युतानामनधीतवेदानां शूदकर्मणां वैदिक कर्मखनधिकारिणां च कलौ म्लेच्छप्रायता मा प्रसादी- दिति भवेदेव पौराणिकतान्त्रिकमन्त्रग्रहणस्यावश्यंभावः । यथोतं मरुतन्ले । "कते श्रुत्युक्तमार्गः स्यात्त तायां स्मृति भाषणम् । हापरे वै पुराणोक्तः कलावागमसंभवः ॥" इति, न चैतावतापि सर्वत्रैवर्णिकानां कलौ तान्त्रिक- मन्वग्रहणमावश्यकमिति भ्रमितव्यम् यतो नैतेन वचसा कलौ त्रैवर्णिकानां वचनमुद्रया गायत्रीम पहाय मन्त्रान्तर- ग्रहणस्यावश्यकता बोध्यते किन्तु वेदमार्गभ्रष्टानां “कामै- स्तैस्तैईतज्ञानाः" इति गीतोक्तरीत्या मारणमोहनाद्यनुष्ठानरतानामुदर- म्भरीणां स्वतः सिद्ध वैदिकमन्त्रत्यागे तमनूद्य पौराणिका- दिमन्त्रग्रहणप्रचारः कली स्वरूपसन्नन्द्यते, विधीयतां का गायत्रीग्रहणाधिकारवैधुर्य मन्त्रान्तरग्रहणावश्यकतैव, न तावतापि गायत्री ग्राहीलाऽपि त्रैवर्णिकर्मन्त्रान्तरं ग्रहणी- यमेवेति विधिसितमिति वक्तुं युक्तम् । अत एव मेरुतन्वे । पार्वती प्रति शिवः “अशुद्धाः शूद्रकर्माणो ब्राह्मणाः कलिसंभवाः । तेषामागममार्गेण सिद्धिनं श्रौतवर्मना ।

मीमांसा। स्मृता ॥ राजसो आगमोक्त विधानेन कलौ देवान् यजत्सुधीः । न हि देवाः प्रसीदन्ति कलौ चान्यविधानतः ॥ उपासना त्रिधा प्रोता श्रेष्ठा तत्र तुसात्त्विकी। यस्यां च मानसी पूजा जपमुख्यतमा दक्षिणो मार्गः प्रतिमायां च पूजनम् । बाह्योपचारैः पुष्पायैस्तदाद्यानां विशिष्यते ॥ तामसोपासनं प्रोक्तं पीठादौ वलिदानतः । वाममार्गेण तच्चाद्यं वर्ण हिवा प्रशस्यते ॥ एषा व्यवस्था संप्रोक्ता वामदक्षिणयोः परा" इति स्फुटमेव तन्वं सिद्यर्थिन उद्दिश्य आगममार्गोक्त- पूजामन्त्राद्युपग्रहो बोध्यते न तु सर्वव्राह्मणानामपरेषां वा हिजानां मन्त्रान्तरपरिग्रहो विधित्स्यते इति तान्त्रिक पौरा- णिकचनजातैरेकजातीनां गायत्रानधिकारिणां, लौकिक- कामोपहतवृत्तीनामेव वा मन्त्रान्तरग्रहणमावश्यकमिति बोध्यते न तु सर्वेषामपि त्रैवर्णिकानामिति मादृशामवल- बनीयोऽयमजिह्मो वैदिकः पन्थाः । अत एव तु निर्वाण- तन्वे कोलधर्म संस्तुत्य देवी प्रति शिवः “अयं तु परमो- मार्गो गुप्तोऽस्ति पशुसंकटे। व्यक्तीभविष्यत्यचिरात्सप्रवृत्त कलौ युगे। कलिकाले प्रवृत्ते तु सत्य सत्य मयोच्यते । न स्थास्यन्ति विना कौलान् पशवो मानवा भुवि । यदा तु वैदिकी दीक्षा दीक्षा पौराणिकी तथा । न स्थास्यति व- रारोहे तदैव प्रबलः कलिः । यदा तु पुण्यपापानां परीक्षा वेदसंभवा । न स्थास्यति शिवे शान्त तदैव प्रवलः कलिः। ।

मन्त्र- - इत्यतिस्फुटतया कलिबलाट् वैदिकधर्मध्वंसानन्तरमेव हि- जेषु पौराणिकदीक्षाप्रचारस्तत्प्रणाश च तान्त्रिकदीक्षाप्र- चार इत्युक्त मिति न कथंचिदपि गायत्रीग्रहणाधिकारिणां पौराणिकतान्त्रिकमन्त्रजातन गायत्रीमन्त्रस्य विकल्पसमु. चयपरिकल्पनाप्रसङ्ग इति विवेचका एव परीक्षन्ताम् । न च कलौ क्षत्रियवैश्यादिवानामभावेन शूद्रप्राय- वर्णानां सर्वेषामप्यावश्यको मन्त्रान्तरपरिग्रह इति वदुक्ता- रीत्यैव मन्त्रान्तरपरिग्रहावश्य कतासिद्धिरिति फल्गु शङ्क- नीयम् , कलिधर्मनिरूपणेदम्पर्येण प्रवृत्तायां पराशरस्मृतौ 'क्षत्रियो हादशाहेन वैश्यः पञ्चदशाहकैः । शूद्रः शुध्यति मासेन पराशरवची यथा” इति वर्णभेदभिन्नाशौचपक्षस्य स्पष्टमभिहितत्वेन तत एव कलौ चातुर्वर्ण्यव्यवस्थितः शक्य- समर्थनत्वात् एतत्तत्त्वमधिकृत्य पराकान्तमस्माभि त्यसं- स्कारमीमांसासु नागेशमतनिराकृताविति तत एवास्य वि- शेषोऽवगन्तव्य इति शम् ॥ केचित्तु त्रैवर्णिकपुरुषत्वावच्छेदेन रामकृष्णादिमन्त्रग्र- हणावश्यकतां व्यवतिष्ठापयिषन्तः “अयाज्ययाजनैश्चैव ना- स्तिक्ये न च कर्मणाम् । कुलान्याशु विनश्यन्ति यानि ही- नानि मन्त्रतः । मन्त्रतस्तु समृद्धानि कुलान्यल्पधनान्यपि कुलसंख्या च गच्छन्ति कर्षन्ति च महद्यशः । ३ अ० श्लो. । ६५ । ६६ इति मनुना, “यावतो असते पिण्डान् हव्यक- मीमांसा। 2 व्येष्वमन्त्रवित् । तावतो असते प्रेत्य दीप्तान् शूलानयोमु- खान्" इत्यङ्गिरसापि अमन्त्र विदो हव्यकव्यानधिकार प्रा- मुभिकं दुष्फलं चोतं, तस्मान्मन्वग्रहणमावश्यकमित्युपसं. जगुः । तदेतत्ते वादिनि संनेहुर्वा, आहत्योचुर्वा, परं भ्रम- याबभूवुर्वा, स्वयमेव बभ्रमुर्वा शिष्यानेव कुशकाशावल- म्वनेनीयसंजग्टहुर्वा, कथंचिदपि कृष्ण मन्वग्राहणेन लो- कानेवानुजग्टडुर्वेति विशिष्य नावधारयितुं पारयामः कि- वेतच्छास्त्रविरुद्ध युक्तिपथातीतं चेति पुनरुद्भावयामो व- क्ष्यमाणदूषणगणग्रासात् तथाहि श्रौतस्मातवचसामुपक्रमो- पसंहारादिरूपतात्पर्य ग्राहकलिङ्गषट्कोपेतार्थे तात्पर्य पर्य- वसायित्वमुचितं वक्तुं, ततश्चेह “कुविवाहैः क्रियालोपैदा- नध्ययनेन च । कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च" इत्यव्यवहितपूर्वमेव वेदानध्यायस्य कुलापकर्षहेतुताया उप- क्रान्ततया अग्रे पठ्यमानश्लोकेऽपि तदर्थसमानार्थताऽवधा- रणमेव युक्तं कल्पयिमुमिति प्रसते मन्वपदेन मन्त्रभागी खिलोवेद एव वा मनोरनुमत इति न मन्वपदेन रामक- णादिमन्त्रमात्रोपग्रहसंभावनापि अत एव प्रकृतश्लोक व्याचक्षाणेन कुल्लकभट्टेनापि “कर्मणा" मिल्यस्य श्रौतस्मात- कर्मणाम् इति,-य नि हीनानि मन्त्रतः -इत्यस्य च-वे- दाध्ययनशून्यानि कुलानि क्षिप्रमपकर्ष गच्छन्ति" इत्यय- मर्थोऽभिहितो न तु भवदभिमतः प्रतितान्त्रिकोऽर्थ इति न १० किंचिदेतत् । न च पूर्वलोके वेदानध्ययनेन कुलापकर्ष- स्थाख्यातलेन द्वितीयेऽवश्यं विलक्षणार्थोयुक्त इति युक्त मन्वपदेन रामकृष्णादिमन्त्रसंग्रहणमिति शङ क्यम् । वे- दानध्ययनपदेन पूर्वबाधीतवेदानामनावृत्तिर्विस्म तिर्वा कु- लापकर्षहेतुत्वेनाभिमता “तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तद- ल्पते” त्यल्पतायां नञः स्मरणात् , कुल्लू कभट्टोऽपि वेदापा- ठेनेति ब्रुवाणो मेनेऽमुमेवार्थमिति तज्ज्ञा एव विदाकुर्वन्तु उत्तरत्र तु वेदाध्ययनसामान्याभावोऽभिमतः पातित्यहेतु- वेन, अत एव तु प्रकर्षबोधनाय "कुलान्याश विनश्यन्ति" इत्याशुभावः कुलाकर्षहेतुत्वेनीक्तः पूर्व “कुलान्यकुलता" मित्वे न कुलन्यूनतैव, मन्त्रसामान्याभावबुबोधयिषया च यानि हीनानि मन्त्रतः इति हीनपदमुपात सामा- न्याभावबोधसमर्थनायेति मनुमार्मिकाः । अत एव कु- लूकभट्टोऽपि “वेदाध्ययनशून्यानि” इति शून्यपदमुपाद- दान एव व्याचख्याविति न किंचिदपि पाणिपिहि- तम् । न चेह वेदाध्ययनसामान्याभावस्योत्तरत्र विव- क्षितले “अयाज्ययाजनैश्चे”ति न युक्त वेदाध्ययनवि. रहे याजनायाः प्रसक्तिविरहेण खत एव तहिरहसिद्धे- रिति वाच्यम् न हि याजना केवलं मान्त्रिक्ये व यदनधी- त्य वेदान् न सा संपादयितुं शक्य ति वक्तव्यं किन्तु स्म- तिपुराणादिमन्त्रसाध्यापीति दुतां व्रात्यानां साऽपि न मीमांसा। ११ संपादयितुं युक्त ति तात्पर्यात् । अथवा पृथगवाधीतवेदा- नामपि अयाज्ययाजनादिकं प्रत्येकं कुलापकर्षहेतुत्वेन विवक्षितमिति न कश्चिदिह शङ्कातकोऽपि यच्च “यावती- असते पिण्डानित्याङ्गिरसवचोऽवष्टभदानं तदपि वचोऽर्था- नवबोधनिबन्धनमेव सर्वत्र मन्वादिशास्त्रेषु हव्यकव्यादिसं- प्रदानतावच्छेदकतया वेदाध्यायित्वस्यैवासकन्निीतत्वात् तथा हि हतीयेऽध्याये मनुः । श्रोत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दाटभिः। अहत्तमा- य विप्राय तस्मै दत्त महाफलम् । १२८ । एकैकमपि वि- द्वांसं दैवे पित्ये च भोजयेत् । पुष्कलं फलमाप्नोति नाम- न्वज्ञान् बहनपि । १२९ । दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेद- पारगम् । तीर्थं तहव्यकव्यानां प्रदाने सोऽतिथिः स्म । १३० । सहस्र हि सहस्राणामनृचां यत्र भुजते । एक- स्तान् मन्त्रवित् प्रीतः सर्वानहति धर्मतः । १३१ । ज्ञानो- त्कृष्टाय देयानि कव्यानि च वहींषि च । न हि हस्ताव- मुग्दिग्धौ रुधिरेणैव शुध्यतः । १३२ । यावतो असते ग्रासान् हव्यकव्येषु मन्त्रवित् । तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तशूल्यर्थ्ययो- गुडान्” । १३३। इति स्फुटतममिहोपक्रमोसंहारासक्कद- भ्यासादितात्पर्यग्राहकैर्यावद्भिरेव लिङ्गुरक्षरार्थस्वारस्येन, "अथोत्रियः पिता यस्य पुत्रः स्यादेदपारगः । अश्रोत्रियों वा पुत्रः स्यात्पिता स्थाई दपारगः । १३६ । न्यायांसमन- स्मतः १२ योविद्याद यस्य स्थाच्छ्रोत्रियः पिता। मन्त्रसंपूजनार्थं तु सत्कारमितरोऽहति” १३७ । इति कण्ठरवेण च मन्वपद- स्य वेदसामान्यपरत्वमेव मनुरन्वमूमुदन तु त्वदुक्तरीत्या प्रतितान्त्रिककतिपयसांकेतिकशिष्यसंवर्धनसंबोधनौययिक मन्त्रपरतामित्यवहिता एव विजानन्तु । अत एव तु व्यासी- ऽपि स्वस्म तो “ग्रसते यावतः पिण्डान् यस्य वै हविषोऽनृचः असते तावतः शूलान् गत्वा वैवखतालयम्” इति व्यतिरेक- मुखेन अधीतवेदत्वमेव हव्यकव्यसंप्रदानतावच्छेदकमित्य- बोधयत् तस्मादाङ्गिरसम्म तिस्थमन्त्रपदेन स्वसांप्रदायि- कमन्वग्रहणावश्यकताप्रसाधनं स्खशिष्येषु स्वीयमन्त्रग्रह- णावश्यकताप्रसाधनवैयग्यमेव व्यनतीति नाव्यक्तम् । यद- प्यत्रैव त एव स्वसांप्रदायिकार्यप्रसाधनसंरम्भेण "न चात्र मन्त्रशब्देन मीमांसकादिप्रसियनुरोधेन वैदिकमन्त्रमात्र ग्राह्यत इति शङ्कयम् । तथा सति ब्राह्मणभागस्थानादर- णीयत्वप्रसङ्गात् अथ मन्त्रशब्देन सोपि लक्ष्यत इति चेत्तो- कशेषेण वैष्णवदीक्षामन्त्रा, अपि वेदादिसिद्धाः कुतो न ग्रयन्ते” इति निरूपका अपि निरूपयाञ्चक्रुस्तदप्यनति- सारं, यत्र शिष्टानां मन्वा इति व्यवहारस्ते मन्त्रा इत्ये व- मादिलक्षणेन मीमांसकलिलक्षयिषितानां “मन्ले श्वेतवहो- धशसपुरोडाशोण्विन्” इति पाणिनीयादितन्त्र मन्त्रप- देन व्यवहृताना सहिताऽपरपर्यायवेदैकभागानां मन्वपद- मीमांसा। १३ व्यवहार्यत्वप्रसिद्धिसत्त्वे पि प्रकते मन्त्र पदस्थ कत्मवेदार्यक- तायाः पूर्वोक्तमनूपष्टम्भदानेन समर्थिततया मन्त्रविच्छ- ब्देन वेदविद एव ग्रहीतव्यत्वे प्रतितान्त्रिकमन्वार्थकतायाः ब्राह्मणभागाग्रहणशङ्कायाथानवतारात्, न चावत्यमन्त्रप- दस्य कृत्स्वेदार्थकत्वे रामतापनीगोपालतापन्याद्युपनि. षसिद्धोपदेशानां रामकणादिमन्त्राणां ग्राह्यता सिद्दवति सिद्ध नो मनीरथेनेति वाच्यम्, न हि ब्रूमहे रामकृष्णादि- मन्त्रा न वैदिका इति, नापि संनह्यामहे न ग्राह्या इति, प्रत्यु त परदैवतप्रसादासादनसदुपायत्वेन मीक्षावावहि- तोपायांस्तान् मूर्योपास्महे परन्तु न तेषां गायत्रया इव हिजत्वसंपादकतेति ब्रूमः । गायत्रमा हि "सावित्रीमात्र- सारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः । नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि स. वांशी सर्वविक्रयी' म० अ० २ लो . ११८ इति मनुना गायत्र्युपदेशार्हाणां त्रैवर्णिकानामावश्यकत्व बोध्यते न तथा मन्त्रान्तराणामिति बमहे यथा हि गोयत्रानुपदेश त्रैवर्णिकाः प्रत्यवयन्ति पतन्ति च, न तथा मन्त्रान्तरानु- पदेश । किं च योऽयं मन्त्रान्तराणामावश्यकीयदेशी भवतोऽनु- मतः स किं मन्ववे न ? उत वैदिकमन्चले न ? आहोस्ति- मोक्षौपयिकमन्त्रवेन ? अथ वा देवतासार्वभौमाराधन- हेतुत्वेन ? तत्र प्रथमे मन्त्र पदेन मीमांसकप्रसिद्धिसिहम- न्त्रपरिग्रह न भवतोऽर्थसिद्धिस्त्वदीयमन्त्राणां तत्रानुपल- म्भात्, यदि च मन्त्रपदेन लौकिकतान्त्रिकोभयप्रसिद्धिसि- इमन्त्रपरिजिक्षा तदा गारुड्शावरादिमन्त्राणामपि परि- प्राबलमवश्यमापोतेति विनायकं प्रकुर्वाणस्य वानररच- नैवापादिता स्यात्, स्याच मंत्रान्तरापरिग्रहनियमभङ्ग- भीरवैषणवसंपदायाबमानना। द्वितीयपक्षे वैदिकेषु सर्वे- वेव मन्त्रष लवतोऽयमवश्यग्रहणीयताऽग्रहः ? उत केषु- चिदेव ? तत्र प्रथमे वैदिकाः सर्वे मन्त्राः परैर्न गृह्यन्त इति विधिलङ्घन, मन्त्राणां परस्परविरुद्धसाध्यसाधनानां ग्रा- माया एकेकदा असम्भवोऽपि, द्वितीये तु विनिगमका. भावः, कस्य हेतोः केषुचिदेवावश्यकता न सर्वेषु, यद्यश. क्यानुष्ठानतयैव न सर्वेष्वाग्रही वैदिकमन्त्रेषु किन्तु केषु- चिदेवेति, तर्हि वैदिकमन्त्रान्तरग्रहणेनापि भवप्रतिता- विकार्थसिद्धिरिति मन्त्रान्तरं न ग्रहणीयमिति सिद्धा- न्तयुतिः, भवन्मन्दाणां वैदिकमन्त्रान्तरसाधारण्यप्रसङ्गश्च भवन्मन्त्राऽसाधारण्यभङ्गप्रसन्चक्रः प्रसज्येतेति वृद्धिमिच्छ- तोमूलहानिः । तीये तु मोक्षौपयिकमन्नत्व किम् ? मोक्षसाधनमन्वलमुत मोक्षमुख्योपायमंत्रत्वम् ? तत्र न प्रथमः “यत्करोषि यदनासि यज्जुहोषि ददासि यदि”ति भगवदुक्तरीत्या सर्वेषामेव नित्यनैमित्तिककर्मणां भगवद- पितानां मोक्षहेतुतायाः स्वयमेव मोक्षौपयिकमन्वत्व मीमांसा। साधकतावच्छेदकस्य भगवदर्पणस्य यावन्मन्वसाधारण्येन तस्य त्वदीयमन्त्राऽसाधारण्यसाधकताया दुःसंभवत्वात् । नापि मोक्षमुख्योपायत्व, ज्ञानस्यैव साक्षान्मोक्षहेतुतायाः सर्ववैदिकतन्त्रसिद्धत्वेन मन्त्रविशेषपरिग्रहजन्यातिशयवि- शेषस्य मोक्षजनकज्ञानविशेष एवोपक्षीणवे न तस्य मोक्ष- ऽन्यथासिद्धतया मोक्षमुख्योपायताया मन्त्रे असंभवात् ॥ किञ्च मन्त्र विशेषजन्यातिशयस्य ज्ञानेन व्रीहियववद् विकल्पो, यागस्येव प्रयाजानुयाजाभ्यामङ्गाङ्गिभावी, ऽथवा जानकर्मसमुच्चयवादिनामिव समुच्चय इति वक्तव्यं । न तत्र प्रथमस्तस्याष्टदोष दूषितत्त्वेन असति बलवत्तरप्रमाणे त- स्याङ्गीकामशक्यत्वात् । हितीये तु मन्त्रज्ञानयोरङ्गाङ्गिभा- वस्थाप्रसिद्धिस्तदङ्गीकारे:पि वा परोद्देशप्रवृत्ततिविषय- त्वस्वरूपाङ्गभावोऽवश्यं मन्त्रस्यैव वक्तव्योमक्षस्य ज्ञानेक- साध्यतासिद्धान्तसंरक्षणायेति, पूर्वोक्तकल्प इवात्रापि पक्ष तस्यान्तःकरणशुद्धयादिहेतुत्वेनैवोपयोगी वाच्य इति न ता- वता मंत्रसा मोक्षमुख्यीपायत्वसंरक्षणमिति न किञ्चिदेत- त् । तीये तु मोक्षमुख्योपायतायाः समुच्चयवादिना ज्ञा- नमन्त्रीभयपर्याप्ताया वक्तव्यत्वे न तदा भवेदवश्यंभावो भव- * प्रपञ्चिताश्चाष्टौ दोषाः शुद्धिसर्वखे प्रलापप्रमार्जन- प्रकरण दुर्मतदलननिर्दयैरस्माभिः s १६ मन्त्रग्रहणस्य यदि गायत्रया मोक्षमुख्यीपायताव्याहतिः स्यात् , न च भवन्मन्त्रा गायत्रों विकल्पयितुं कल्पन्ते इति शक्यते भवता व्याहर्तुमपि, व्याहृताह्मण्यसाधकतायाः सर्वतन्त्र सिद्धान्तसिद्धत्वात् ततश्च गृहीतगायत्रीकाणामलं मन्त्रान्तरग्रहणनेति भवन्मन्त्रस्य मोक्षमुख्योपायतयाऽपि नावश्यकत्वसिद्धिरिति न पाणिपिहितम् । अथावशिष्टो- देवतासार्वभौमाराधनहेतुत्वेनेति चरमः कल्पस्तत्र यदि मन्मन्त्र एव देवतासार्वभौमाराधनहेतुर्न व्यावृतिमन्त्र इति वदेस्तर्हि तस्या देवतायाः सार्वभौमत्वमेव प्रच्युतं, या देवता न गायत्रार्थः, व्याहृतेः परमदेवतार्थकत्वं ह्यविवादपदमि- ति, यैव परमा देवता भवतोऽभिमता विष्णुः शिवः शक्ति- गणेशो गौरी गुहः सूर्यो वा तस्य गायत्रार्थता वक्तव्यैवेति नान्यावशेक्ष्यते काचिदेवता परमा यामाराधयितुं मन्त्रा- न्तरग्रहणमावश्यकमिति वक्तुं पारयः । तस्माददैतविशि- ष्टाद्वैतनिर्विशेषादेतशुद्धाद्वैतभेदवादभेदाभेट्वादादियावा. तितान्त्रिकवैदिकमार्गेषु गायत्रयाः परमपुरुषाराधनहेतु- ताया आवश्यकत्वान्नेहाणुरपि मार्गो यैन गायत्रातिरिक्त मन्त्रान्तरग्रहणावश्यकतासिद्धिः ॥ यदपि स्वीयदीक्षाग्रहणावश्यकतासाधनलिनमानसा- नाम् “अदीक्षितस्य वामोरु कतं सर्वमनर्थकम् । पशुयोनि- मवाप्नोति दीक्षाहीनो नरो मृतः ॥ विना श्रीवैष्णवों दीक्षां मीमांसा। १० प्रसादं सगुरोविना। विना श्रीवैष्णवं धर्म कथं भागवतोभ- वेदि” त्यादिपामोत्तरखण्डवाक्यान्युदाहृत्य स्वीयमन्त्रग्रह- मावश्यकताप्रसाधनं तदपि गगने पादप्रसारणम् । दीक्षा- शब्दो हि न भवदभिमतार्थकः किन्तु “एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षा विप्रो वने वसन् । विविधाचौपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुती:” श्लो० २८ इति षष्ठे ६ मन तरीत्या वैदिकनियम- परस्ततश्च वैदिकनियमहीनस्य पुरुषस्यानुष्ठितं सर्वमफल- मिति तदर्थ इति न तेन तेऽभिमतार्थसिद्धिरिति बालसंमो- हनमात्रमिदम् । अस्तु च तन्त्रोक्तरीत्या दीक्षाशब्दस्य मन्त्रा- र्थकत्वमस्तु वा वैष्णवदीक्षाया आवश्यकत्व तावतापि किं गायत्रीमन्त्रो न दीक्षाशब्दार्थो येन मन्वान्तरं ततः सिध्ये- त् । सिध्यतु वा मन्त्रान्तरग्रहणस्यावश्यकता न तावता सा ब्राह्मणत्वावच्छेदेन चैवर्णिकवाद्यवच्छेदन वा किन्तु यथा- धिकारमिति न्यरूपयमेव पूर्वमधिकं चाग्रे व्यक्तीभविष्यति वस्तुतस्तु निरुक्तपाद्मवचनयोरदीक्षितस्य पशुदिहाद्यवाप्तिन यत्किञ्चिद्दीक्षाशून्यत्वेऽभिमता “अन्यथा तु हरेर्नाम न ग्रहीयान स्मृशेत्तुलसीदलमि”ति “मत्स्यो येन न खादितो- न चणको मांसं च नो भक्षितम् । कनया येन न पूजिता रतिसुखे पीतं न मद्य तृषा पुत्री येन सहोदरा न गमिता शय्यां रतौ” । इत्यादिप्रसिद्धप्रवादानां सर्वयोषिदुपग्रा- हकाणां वामाचाराणां न हरिमन्त्रग्रहणसम्भवो नाऽपि ह- मन्त्र- - रिमन्त्रीपासकानां तुलसीनलिनाक्षधारिणामानासमू - पुण्ड्राणाम् । “हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरनाथा" "मावत्यर- दारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् । आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः” इति शश्वदुपासीनानां हरिनाममन्वजुषामथ सर्वथापञ्चमकारपराङ्मुखानां न वाममन्त्रग्रहसम्भावनेति न सर्वस्य सर्वदीक्षाग्रहसम्भव इत्यवश्यं पाझस्थादीक्षितश- ब्दस्य दीक्षासामानाविरहवदर्थकतैव वक्तव्येति नास्माकं तत्र विप्रति पत्तिः, प्रत्युत तत्तन्मन्त्राधिकारिणां तत्तन्मन्त्रा- ग्रहणे सर्वथैव व्रात्यतेत्युक्तप्रायमेव, अत एव खत्र “विना श्रीवैष्णवी दीक्षां कथं भागवतो भवे" दित्येवोक्तं न तु तत्राब्राह्मण्यं व्रात्वता वा ऽभिहिता, एष परं विशेषो यद्- यूयं परमं पवित्रं वेदसा रहस्वस्वरूपं परदैवतप्रतिपादन- कसारं ब्राह्मण सर्वख गायत्रीमन्त्र भागवततासाधन न मनुध्वे किन्तु सामानातोब्राह्मण्यसंपादकतां हिजत्वसाधक- तां वा तस्यावगत्य मन्त्रान्तरग्रहण लालायिता भवथ, वयं तु तमेव गायत्रीमन्वं तदुपदेशाधिकारिणां सर्वस्वस्वरूपम- वधार्य तत्रैव तैहलौकिकपारलौकिकभराः सुखमास्महे, ये तु न तदुपदेशाधिकारिणस्ते पुनरुपदेष्टव्याः स्वखोप- देश्यपौराणिकतान्त्रिकतत्तन्मन्वजातमिति तु व्यवातिष्ठि. पमेव पूर्व मिति तत एवावधेयम् । “अवैष्णवस्तु यो विप्र- मीमांसा। १८ चाण्डालादधमः स्म तः । न तेन सह भोक्तव्यमापद्यपि कदाचन" इत्येवमादिपौराणिकवचनस्य प्रामाण्य अवैष्णव- पदेन परदैवतविमुखो पामाद्यधिवासिदेवतार्चनरतो, नास्तिक एव वाऽभिमतः, अत एव "विप्राट् विषड्गुणयु- तादरविन्दनाभपादारविन्दविमुखात् खपचं वरिष्ठम् । म- नो तदर्पितमनीवचने हितार्थप्राणं पुनाति सकुलं न तु भूरिमानः” इति श्रीमद्भागवतेऽपि भगवत्यादपराङ्मुखस्यै- वाधमत्वमावेदितमत एव भगवानपि गीतासु, “न मां टु- कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः” इति प्राह । श्रुतिरपि च “योऽनाथा सन्तमात्मानमनाथा प्रतिपद्यते किन्तेन न अतं पापं चोरणात्मापहारिणा" इत्यात्मतत्त्वविपर्ययवत एव सर्वपापानुष्ठायित्वलक्षणचाण्डालत्वादिकमावेदयती- ति नेह चाण्डालपदेन गायत्रातिरिमागमदीक्षाशूनयो- रामकृष्णादिमन्त्रदीक्षाशून्योवा गृहीतगायत्रीकोऽपि प- डक्तिपावनो ब्राह्मण इति भ्रमितव्यमिति शास्त्रमर्मवि- दामुद्घोषः । इति गायत्रातिरिक्तवैष्णवदीक्षाशूनास्य गायत्रीग्रह- णाराधितदेवतासार्वभौमस्यापि चाण्डालादिसाम्यसंकीर्त- नं गायत्रीमन्ने सामानामन्चतावमवतां धनातमानां नि. पीडितसर्वशास्त्रार्थानामेव शोभतां न तु प्रामाणिकाना- मिति सारम् २० यदण्याहुरपरे-इतिहासपुराणतन्वमन्त्रादिशास्त्रेषु दे. वहिजर्षिब्रह्मर्षिराजर्षियक्षरक्षःपिशाचपर्यन्तानां मान्तिक- सिद्धः प्रसिद्धतया गायत्रीव्यतिरिक्तमन्त्रग्रहणनिराकरण- संनाहो न युज्यते शास्त्रप्रामाण्यमङ्गीकुर्वतामिति तत्पुनः शास्त्रावबोधवैधुर्यनिबन्धनमस्मदुक्तार्थाग्रहणनिबन्धन' च न हि ब्रूमहे गायत्रीव्यतिरिक्ता मन्वा न सन्ति, नापि-न ग्राह्या इति, नापि देवहि जर्षिभिर्नाग्राहिषतेति किन्तु त- दग्रहणे न प्रत्यवायो नापि ब्राह्मण्यादिवैकल्य मोक्षाद्यन- वाप्ति वा इति शास्त्रतात्पर्यमिति । या च मन्त्रान्तरग्रहणे प्रवृत्तिः प्रामाणिकानां सा पुनर. ऑर्थितया कामार्थितया, अनग्रार्थितया वैति कथं सा गाय- त्रीव्यतिरिक्तमन्त्रस्यावश्यग्रहणीयतामापादयेन हि कमनी- यांकान्तां कामुकः कथमपि मोक्षपथमुपायते, नापि मो- क्षमिच्छन् कमनीयकान्तासादनपथम् । अत एव 'यो य- कामः स तत्र प्रवर्तत" इति लौकिकाभाणकमपि। तस्मात्त. त्तदर्थिनां देवद्दिजर्षीणां तत्तन्मन्त्रग्रहणप्रवृत्ति तदर्थानां तत्तन्मन्त्रग्रहणप्रवृत्त्यौपयिकीत्यकिंचिदेतत् । न चैषोऽपि नि- यमो ग्टहीतगायत्रीकेण कामवञ्चितचेतसा चैत्रेण भवमन्त्रं शावरमन्त्रमाराध्य वा समृद्धि नीताः सिद्धय इति परेणापि तास्तथैव संपादनीया इति, केषांचिन्महात्मनां गायत्रीम- न्लमात्राराधनेन पुरुषार्थचतुष्टयावाप्ते रितिहासपुराणादिषु मीमांसा। २१ प्रसिद्धे, न हि सेतिहासानाष्टादश पुराणानि निर्मायाप्य- बुतताप न चाप शान्ति पुराणाचार्यः कृष्णद्वैपायनः स्वयमे- वेति, नेतिहासपुराणानां मोक्षोपयिकत्वं शान्त्यवाप्तिहेतुत्वं वेत्युप्रेक्षन्तेऽपि प्रामाणिकाः, पुराणस्थैकैकोपाख्यान श्रवण- मात्र ण बहूनां मोक्षोपयिकशान्त्यादिलाभस्य पुराणेष्वेव प्रसिद्ध :, अधुनाऽपि तच्छ्रवणेन परमपुरुषार्थावाप्तः शील- शान्त्यादिलाभस्य च विदुषामानुभविकलेन तस्य तहेतुता- या दुरपन्हवत्वाच्च कृष्णद्दे पायनस्य त्वाधिकारिकपुरुषले न खाधिकारपरिमाप्तकर्मसाधनाय पुराणरत्नस्य श्रीमद्भाग- वतस्य प्रणयन, तदप्रणयने शान्त्यलाभसंदर्शनं चीपपद्यते, युज्यते च शुकवैराग्येण शोकाकुलमानसत्व, मपत्योत्पादन' च परक्षेत्रे । इत्याधिकारिकपुंसां केषांचिगृहीतगायत्रीका- शां तत्तदर्थमर्थयमानानां मन्त्रान्तरग्रहणं न त्रैवर्णिकानां मन्त्रान्तरग्रहणनित्यतासाधनायालम् । अत एव तु चतुरी- ऽपि वेदानधीत्य शाण्डिल्यो नाप निष्ठां शान्तिं वेति गु- रुमुपससाद उवाच च “अधीत्य चतुरोऽपि वेदान भगवी नाप निष्ठां शान्तिं वा सोऽहं मन्त्र विदेवास्मि नार्थविद शाधि मामि”ति, स च गुरुभगवान सनत्कुमारस्तमुपदि- देश इत्यै तिहासिका वर्णयाञ्चक्रुः, न चैतावता वेदचतुष्टयस्य निहाशान्तिहेतुता नास्तीति सिध्यति किन्तु "न हि नि- दानवायेन पञ्चरात्रतन्त्रस्य वेदार्थसारगर्भितत्वं फलति २२ मन्त्र- ततश्च यथा वेदचतुष्टयमधीत्यापि सारासारविवेचनाय प- वरात्रतन्त्रसप्रदायप्रचाराय वेदार्थस्यानायासेन निस्संशय- ज्ञानसंपादनाय च भगवान् शाण्डिल्योऽध्य गीष्ट पञ्चरात्र- तन्वं प्रचारयामास च वेदानधिकारिणोऽपि कर्मोपास्ति- जानकाण्डेषु निर्विचिकित्सौं व्य त्यादयन्निति न तस्य पा. थंगयें वेदविरुद्धत्व वा किन्तु “स्त्रीशूद्रद्दिजवन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा न कर्मश्रेयसि मूढ़ानां श्रेय एवं भवेदिह" इति श्रीभागवतीक्तरीत्या स्त्रीशूद्रादिसाधारण्येन भक्तिप्र- पत्त्यादिमार्गसंदर्शनेन तत्तन्मन्वतन्वादिशास्त्रेषु वेदानधि- कारिणीऽनुगृह्यन्ते न तु तेषामावश्यकत्वमपि त्रैवर्णिक- त्वावच्छेदन बीयत इत्यलमतेनावैदिकेनासदर्थपरित्राण- कपाणपरिग्रहविग्रहेणेति शम् ॥ प्रदपि काशीखण्डे एकोनविंशतितमे ऽध्याये विमाट- विमाननाकषावितचित्तेन "अकामः सर्वकामी वा मोक्ष. काम उदारधीस्तीवेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्" ॥ इति श्रीमद्भागवतीक्तरीत्या सर्वकामेन “चतुर्विधा भजन्त मां जनाः सुवतिनोऽर्जुन ! । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी • सर्वभागवतपुस्तकेषु “त्रयी न श्रुतिगीचरा” इति पाठसत्त्वेऽपि न श्रुतिगोचर इत्येव युक्तः याट इति पाठा- पपाठचाः।

मीमांसा। २३ च भरतर्षभ" ! ॥ इति चतुर्विधभक्तेषु आर्थािथिलक्षणा- क्रान्त न ध्रुवेण हादशाक्षरमन्त्रः सप्तर्षिप्रसादादवाप्त इति मन्त्रान्तरग्रहणावश्यकताप्रसाधन । तदपि मन्दधियामेव मोहमावहेत्, यतो दुरभिमानदूषितचेतसा ध्रुवेण भागव- तोत्तमेनापि बालभावसुलभचापलेनावलेपादैहिककामान कामुकेन मन्त्री ग्टहीत इति न तस्याऽकामपुरुषसाधारस्थ - नावश्यकताप्रसाधनपर्याप्तिः, अत एव तत्र काशीखण्डे ऋषीन संबोध्य ध्रुवः “पित्रोत्सृष्टं न काहामि काहामि स्वभुजार्जितम् । मनोरथपथातीतं भवेद् यत्यितुरप्यहो । पिटसंपत्तिभोतारः प्रायशो न यशोधनाः । नरोत्तमास्तु ते जेया ये पित्राधिक्यदर्शिनः ॥ उपार्जितं हि पित्रा ये नाशयन्ति यशः श्रुतम् । धन निधनमेवास्तु तेषां दुर्वृत्त- चेतसाम् ॥ इत्यभिमानपुरस्सरमवोचत् इत्यग्रहीतमायत्री- कस्य पञ्चवार्षिकस्य गायत्रीग्रहणानधिकारिणः क्षत्रियबा- लकस्यौत्तानपादेर्भुवस्य मन्त्रान्तरग्रहणं नावधीरणाय गा- यत्रत्राः, नापि ध्रौव्याय मन्त्रान्तरग्रहणस्येति शास्त्रतत्त्व- विदा विदुषां परामर्शः ॥ यदपि धर्मशास्त्रग्रन्थेषु प्रात्यहिककर्मनिरूपावसरे दैवपञ्चकपूजनस्यावश्यकतयोदितत्वेन पूजनैतिकर्तव्यता. प्रकारानाराजल्या परिप्राप्तीपदेशस्य तत्तद वतामूलमत्त- समाम्बावश्यकतया तसा च “प्राचार्यवान पुरुषो वेद" इति २४ मन्त्र -- । श्रुतिसिद्धी गुर्ववधिकाधिगमोपि पुनरुपदेशसाध्यातिशय. संपादनाय नित्य इति गायत्रातिरिक्तमन्त्रान्तरग्रहणं नि- त्य त्रैवर्णिकानां गृहस्थानाम् । किञ्च माण्डूक्योपनिषदः सर्वसमा अपि प्रणवपरतया, ईश्वरप्रणिधानाहा । १ । क्ल- शकर्मविपाकाशयरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः । २। स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् । ३ । तसा वा- चकः प्रणवः । ४ : तमनस्तदर्थभावनम् । ५ । इति पात- अलसूत्रपञ्चकसमापि का अतिरिक्त प्रणवोपासनविधानप- रतया मन्त्रान्तरग्रहणमावश्यक, देखो योगसूत्रे दितीय- पादे “तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः” इति सूत्रं व्याचक्षाणः कृष्ण पायनोऽपि “स्वाध्यायः प्रणवादि- पवित्राणां जपो मोक्षशास्त्राध्ययनम्” इति वदन ददौ मन्तान्तरग्रहणावकाशमिति स्फुटम्, चतुर्थपादेऽपि च “ज- मौषधित्रतपःसमाधिजाःसिद्धय” “इति सूत्र भाष्यका. र: “मन्त्र राकाशगमनाणिमादिलामः" । इति व्याचख्यौ अत्र मन्त्री रिति ५ हुवचनमहिना मन्तान्तरपरिग्रहपक्षो- ऽनुग्रह्यते, इतिहासपुराणेषु तु क्रियासमभिहारेण म न्तान्तरपरिग्रह प्रतिपादन', यथा भारते वनपर्वणि व्यासोऽनमुपदिदेश ऐन्द्र मन्त, तत इन्द्रः शैवं म- न्त मिति सुपुष्टं गृहीतगायत्रीकाणामपि मन्त, न्तरग्रह- रए जानश्यकमिति तदप्येतहतानुगतिको लोको न लोक मीमांसा। इति न्यायार्थमेवानुसरति न तु शास्त्रार्थ, तथाहि "मन्वै- वैष्णवरौस्तु सावित्रैः शाक्तिकैस्तथा । विष्णुं प्रजापतिं वाऽपि शिवं वा भास्करं तथा ॥ तल्लिङ्गैरर्चयेन्मन्तैःसर्व- देवान समाहितः" इबारमेयपुराणोतरीत्या, "ब्रह्माणं श. इन्रं सूर्य तथैव मधुसूदनम् । अनाांश्चाभिमतान देवान भक्त्या चाक्रोध नो ऽत्वरः ॥ स्वैमन्त रयेन्नित्य पत्रैः पुष्य - स्तथाऽम्बुभिः” इति कूर्मपुराणोक्तरीत्या वा पञ्चदेवतार्चन- विधौ वैदिकैः शैववैष्णवादिसूतैस्तत्तद्दे व पूजन सोदितत्वेन तेषां च सूतानां "खाध्यायोऽध्येतव्यः” इत्यध्ययनविधिसि- द्वाध्ययनसावश्यकतया अध्ययनसिद्धोपदेशतया न गाय- या इव तेषां पृथगुपदेशार्हतासिद्धिः । अथवा तत्तल्लिङ्ग- मन्त्र पदेन यथा कथञ्चिदपि तत्तत्वानुस्मारकपदघटित- मन्त्र परिग्रही यथा “शन्नीदेवीरभिष्टय” इत्यादीनां शनि- पूजोपयोगिलम् । अथवा “प्रणवादिनमोऽन्तं च चतुर्थन्तं च सत्तम ! देवतायाः स्वकं नाम मूलमन्त्र उदाहृतः । इति गारुडोक्तरीत्या नमोऽन्तमन्त्र एव मूलमन्त्र इति न तस्य पार्थक्ये नोपदेशसिद्धिरिति त्रैवर्णिकग्टहस्थकर्तकतत्त- न्मूलमन्त्रपूर्वकपञ्चदेवपूजनविध्यन्यथाऽनुपपत्तिपरिग्राहि. तो मन्त्रान्तरपरिग्रही नित्य स्वैवर्णिकानामिति दुराशा- मात्र, यदि तु “पुस्तकप्रत्ययाधीतं नाधीतं गुरुसन्निधौ । भ्राजते न सभा मध्ये जारगर्भ इव स्त्रियाः" इति पराश- मन्त्र- रमाधवतनारदवचनेन पुस्तकप्रत्ययाधीतस्यातिशयाना- धायकत्ववचनेन मन्त्रस्य गुर्ववधिकाधिगमो नित्य इति नमोऽन्तगारुड़मन्त्रस्य वैदिकस्य तत्तत्सूक्तादेर्देवानुस्मार- कपदघटितवैदिकमन्त्रस्य वा ग्रहणं गुरोरावश्यकमिति सिद्धं मन्त्रान्तरग्रहणनित्यतयेत्युच्यते तदा त्रैवर्णिकानां ग. र्भाधानादिसंस्कारस्याप्यावश्यकलेन गर्भाधानौपयिकस्य जायागुह्यमुपग्टह्य पव्यमानस्य "गर्भ धेहि सिनीवालि ! गर्भ धेहि सरखति" ! इति मन्त्रस्याप्यनधीतस्य लिखित- वाचितस्य अनध्यापितश्रुतग्टहीतस्य वा अतिशयानुत्पाद- कतया तस्याप्युपदेश आवश्यक इति को वा विशेषस्त्वदीये मूलमन्त्रे, यदि तु गर्भाधानमन्त्रस्यापि भवत्येवोपदेश इति ब्रूषे तर्हि तादृशोपदेश विषयतां को वा प्रत्याचष्टे मन्त्रा- न्तरस्य, यथा हि स्वाध्यायसंस्कृतवेदानामेव कौंपयिक- त्वमयथाभूतानां त्वनुपयोग एव एवं सर्वेषामपि मन्त्राणां ग्टहीतानामेवातिशयाधायकत्वमयथाभूतानां तु वैयर्थमि- व्यङ्गीकुर्म एव, न च तावता गर्भाधानमन्त्रापेक्षया कश्चिद- तिशयो मूलमन्ले सुनिरूपो भवता, येन तमतिशयं पुर- स्कृत्य मूलमन्त्रोपदेशो नित्यस्तैवर्णिकानामिति वक्तुं पार- येः । यश्चाधुनिकानां महासमारीही मन्त्रान्वरग्रहणे स तु युक्त एव यदि गायत्रीग्रहणानधिकारो ऽथवा लौकिक- विषयाप्तिपर्याकुलता, अत एव लौकिकाः “कलो चण्डी.

मीमांसा। विनायकों” इति स्मरन्तो विस्मरन्तश्च “देवान् देवयजो- यान्ति यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्, तेऽपि मामव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्” इति भागवत गीतां विशन्त्येव तेषु तेषु संकीर्णेषु मांसाशनसुराऽसवव्यसनसमादेशनपरा- यणेषु वामादिकुवत्मसु इति न ततः परीक्षकाचावन्ते वै- दिकाध्वगा इति पूर्वमसक्कन्निरूपितप्रायमेवेत्य किञ्चिदेतत् । यदपि माण्डूक्योपनिषदः प्रणवीपासनविधायकतया यो- गसूत्राणां तदर्थोपष्टम्भकतया च तत्रत्यव्यासभाष्यस्य प्रण- वादिपवित्रमन्त्रानुष्ठानबोधकतया मोक्षशास्त्राध्ययनवोध- कतया च मन्त्रान्तरग्रहणनित्यतापक्षसमर्थनं, तदपि मरु- मरीचिका तोयसमासादनप्रयत्नायितम् । न हि ततस्तद- र्थसिद्धिस्तानि हि मोक्षशास्त्राणि मुमुक्षूनुपलक्ष्य प्रवृत्तानि तदधिकारपरिप्राप्तीपायपराण्येवेति न तदुपदिष्टोपायस्य त्रैवर्णिकत्वावच्छेदेन नित्यतासिद्धिः, अन्यथा तु “प्रजनार्थ महाभागाः पूजाहाँ गृहदीप्तयः स्त्रियः श्रियश्च गैहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन" इति नवमे ऽध्याये । श्लो० २६ स्त्रीप्रेम- बन्धनविधानस्य ब्रह्मचारिणां यतीनां चावश्यकत्वोत्कीर्तने साधु धर्मपादपपादे खाज्ञानाङ्गारनिक्षेपः । धर्मो हि वर्णाश्रमाधिकारिप्रविभागभित्री यमुद्दिश्य यथाऽभिहित. स्ते नैव उपासितो निश्च यसायापरस्य तु निरयायेति त्रिवर्गसेवनसमासतचित्तानां चतुर्थाविरोध्याचारस्यानुष्ठा.

२८ मन्त्र- तुमावश्यकत्वेऽपि न यतिधर्मोपासनावश्यकतेति न कि- ञ्चिदेतत् । “यदपि मन्त्रैराकाशगमनाणिमादिलाभः” इति व्यासभाष्यस्थ न “मन्वैः” इति बहुवचनेन त्रैवर्णिकानां मन्त्रान्तरग्रहणावश्यकताप्रसाधनं तत्तु कर्णस्पर्श कटिचा- लनायितं, यतो गायत्रातिरितो मन्त्रः कश्चन भवेहा नित्य- स्त्रैवर्णिकानामिति प्रश्ने गरिमाऽणिमादिलाभप्रयोजकी- भूतमन्त्रस्य तदेककामनावत्पुरुषपरिग्राह्यसा उपादेयत्व- ख्यापनेन गायत्रातिरितामन्वसा नित्यत्वाम्नानमत्यन्तमसं. बद्धं तस्माद् यो हि अणिमानं प्रेप्सति यश्च खे यथेच्छ वि: हर्तुमिच्छति तेन यो मन्त्र उपादेयः स त्रैवर्णिकखावच्छे- देन नित्य इतिवदब्रुपहसनीयो भवान् गरिष्ठगोष्ठीविति पूतिकूष्माण्डायितस्त मन्त्रान्तरग्रहणावश्यकतासाधनसं: नाह इति कृतं वाचां विसर्गेण । यदपीतिहासपुराणेषु वहु- शो दीक्षाग्रहणमुपवर्यते यथा महाभारते वनपर्वणि व्या. सोऽर्जुनमैन्द्रसुपदिदेश मन्वमिन्द्रश्च शैवं मन्वमिति गाय- त्रीव्यतिरिक्तमन्वदीक्षानित्यत्वसाधनं तत्तुं विनायकं प्रकु- णस्य वानररचनायितमेव, केवलं तथा हि वनपर्वणि अध्याये ३६ तम “तत एकान्तमुखीय पाराशर्योयुधिष्ठिरम् । अब्रवीदुपपदार्थमिदं वाक्य विशारदः ॥२८॥ श्रेयांस्ते परमः कालः प्राप्तोभरतसत्तम । येनाभिभविता शत्रून् रणे पार्थो धनञ्जयः ॥ २८ । ग्टहाणमां मया प्रोतां सिद्धि मीमांसा। २८ । मूर्तिमतीमिव । विद्या प्रतिस्म,तिं नाम प्रपन्नाय ब्रवीमि ते ॥३०॥ यामवाप्य महाबाहुरर्जुनः साधयिष्यति । अस्त्रहेतो- महेन्द्रं च रुद्र' चैवाभिगच्छतु ॥ ३१ ॥ वरुणं च कुवेरं च धर्मराजं च पाण्डव !। शक्तीद्वेष सुरान् ट्रष्टुं तपसा विक्रमेण च ॥ ३२ । ऋषिरव महातेजा नारायणसहाय- वान् । पुराणः शाश्वती देवस्त्वजेयो जिष्णुरच्युतः ॥ ३३ ॥ अस्त्राणीन्द्राच रुद्राच लोकपालेभ्य एव च समादाय महा- बाहुर्महत्कर्म करिष्यति ॥ ३४ ॥ एवं व्यासेन युधिष्ठिरोऽ- भिहितः, ततश्च व्यासान्महर्षेः शत्रुपराजयोपविकं मन्त्र- मुपग्य युधिष्ठिरोह तवनाकाम्यकं ययौ तत्र चार्जुनं स्ने- हेनोपदिदेश युधिष्ठिरोव्यासप्रसादासादितं मन्त्र', स च मन्त्रो न नित्य स्वर्णिकानां नापि क्षत्रियाणां किन्तु काम्य एवेति न तदृष्टान्तेन गायत्रयतिरितदीक्षानित्यत्वसिद्धिः । अर्जुनोपदिष्टस्य मन्त्रस्य शिवेनोपदिष्टस्य च काम्बवे वनपर्व- भारतप्रकरणं सर्वमेवानुग्राहकम् । अत एव युधिष्ठिरान्मन्त्र- मुपग्टह्य इन्द्रं द्रष्टु' प्रतिष्ठमाने फालाने कणा “यत्ते कुन्ती महावाहो । जातस्यैच्छद्दनञ्जय ! । तत्तेऽस्तु सर्व कौन्तेय ! यथा च वय मिच्छसि” इति स्फुटमेवारिविजयं प्रयोजनं शशंस सर्वेणाम्यनेन ऐन्द्रशैवादिदीक्षाग्रहण परिकरणति स्फुटमेव भारततत्त्वविदाम् । अत एव तु "ईसितोह्येष वै कामो वरं चैनं प्रयच्छ मे । त्वत्तोऽद्य भगवन्नस्त्रं कसमि- ।

मीमांसा। ३१ दोऽयमिति भमितव्यम् । अत्र सा दीक्षा दुःखदायिनीत्य- नेन यतिदीक्षाया दुःखहेतुत्व भिधानेन विपरीतफलाना- नात् । न हि नभोऽग्निचयनस्याप्यसम्भवदुत्पत्तिकस्य वि. परीतफलश्रुतिः, किंचास्मच्छास्त्रेषु यत्र कुत्रापि ज्यौतिष- फलअन्येषु क्षपणकश्रावकाद्युत्कीर्तनं तत्र विशिष्थैव न तु सामान्यतोयतिपदेनेति तथाऽभिधानं शास्त्रशैलीशीलन- शालिनामयुक्तमेव। एतेन महाभारते उद्योगपर्वणि तरा- ट्रेण विदुरेण च सनकादीनां गुरूकरणनिरूपणात्, पञ्चरा- वतन्वे सनकादिभिर्नारदायापि भगवन्मन्वतत्कवचादिदा- नश्रवणात्, नारदस्य व्यासाय भगवन्मन्त्रदानसा पुराखेषु ब्रह्मवैवर्तादिषु, नारदपञ्चरात्र च श्रवणात्, श्रीमद्भागवते. ऽपि ध्रुवे नारदसा उपदेशलक्षणगुरुतरगुरुव्यापारश्रवणात् हादशाक्षरमन्त्रदानसा प्रसिद्धेश्च पनीरहितानामपि दी- क्षादानाधिकार इति निरस्तम् , न हि सनकनारदादयः पत्नीरहिता इत्युपदेशाधिकारिणः किन्तु ब्रह्मचारिण इति, तेषां च पत्नीराहिल्यमावश्यकमेवेति न तदृष्टान्तेन पतीर- हितानां गृहस्थानामप्युपदेशाधिकारितासिद्धिः । अत्रे दमालोचनीयम् । किमिह पत्नीराहित्य म- न्त्रदाटतावच्छेदककुक्षिनिक्षिप्तम् ? उत सहकारि ? आहोखिदुदासीनं ? तत्र पत्नीराहिल्यसा न मन्वदाटता- वच्छेदककुक्षिनिक्षेपसम्भवः, शास्त्रविरोधात्, युक्तिपथाती- - तत्वाञ्च न हि पनीरहितानां सनकनारदादीनामुपदेष्टता श्रूयत इति पत्नीराहित्य तावता मन्त्रदानौपयिकमिति वक्तुं युक्तमन्यथा प्रभयत्वावच्छिन्नानां सनकादीनामुपदे- तृत्वमिति प्रमेयत्वावच्छिन्नसा शूट्रसमाप्य पदेशकर्तृता सि. ध्येत् तदवश्यं पत्नीराहित्यादिकमकिञ्चित्करमुदासीन मिति पूर्वोतविशुद्धमातापिटजत्वात्मगुणोपेतलादिसमानाधिकर- णब्रह्मचर्यवत्त्वमेवोपदेशदानार्हतावच्छेदकमिति सनका- दिदृष्टान्त न पत्नीराहित्यसा न मन्त्रदानाईतावच्छेककु. क्षिनिक्षेपसम्भवः । न च पत्नीराहित्यसेव पत्नीसाहित्यम- पि पुनरुदासीनमेव मन्वदानाईतायामिति साम्प्रतम् । सहस्थसमोपदेशकर्तृले मन्त्रदाटतावच्छेदककुक्षौ "अना- श्रमाणां या दीक्षा सा दीक्षादुःखदायिनी” त्यनेनाना- मिदीक्षाया दुःखहेतुत्वावगमेन आयमित्वसंरक्षणाय वि. द्यमानदारत्वनिक्षेपसावश्यकत्वात् । यद्यप्यग्निहोत्रसेव न पत्नीव्यासक्त कर्तृताकं मन्चदानं पत्न्यास्तत्राग्निहोत्रे आ. ज्यावेक्षणे इव मन्त्रदान कथमप्यनुपकारितया तत्सत्त्वाना- वश्यकत्वात् तथापि अनुपकुर्वाणाया अपि पत्न्याः पत्यौ निरुतवचीबलेन मन्त्रदानौपयिकातिशयाधानहेतुत्वमाव. श्य कमिति ग्रहस्थकर्तृकमन्त्रोपदेशे पत्नीसाहित्यमुदासीन- मित्य निपुणभणितिः । नापि पत्नीराहित्य मन्त्रीपदेशे स- हकारि, अरुन्धतीसहायसा वसिष्ठसा महर्षे रघुकुलधौरेये मीमांसा। अगन्मर्यादाव्यवस्थापके श्रीरामचन्द्र मन्त्रोपदेष्टुत्वदर्शनात्, तदीयोपदेशसा साफल्यं च लोकद्दयझुप्रसिद्धमित्य विवादच- दम् । सहकारित्वं हि तदवच्छिन्नासमवधानप्रयुक्त फलो- यधायकत्वाभाववस्वावच्छिन्नकत्व प्रथा बाधनिश्चयसा प्र- तिबन्धकले खर्मिकाप्रामाण्यम्रहविरहः सइकारी, अप्रा- माण्यग्रहविरहासमवधाने तसा बाधकताविरहात्, ततश्च प्रदीराहित्य मन्त्रदानाहतायां सहकारीत्वत्यन्तमनिपुण- मिति पुष्कलम् ॥ यद्युदासीनं मन्ददामाहतायां पत्नीराहित्य' तर्हि न तत्र तस्य प्रयोजकत्वसंगतिरिति ब्रह्मचर्यवतां पत्नीपरिग्रह- शून्यानामधिकारसिद्धि गुहस्थानां तु विद्यमानपत्नीकाना- मेव न तूढानामपि विधुराणां, यथाह प्रजापतिर्निजस्मृतौ "अप्रजो मृतपत्नीकः सर्वकर्मसु गहितः । छन्दी विनापि न स्थेयं दिनमेकं विनाश्रमम्" अत्राप्रजस्कस्य मृतपत्नी- क्रस्य च पृथगनधिकार इति नार्थः । किन्तु मृतपत्नीको- यद्यप्रजस्कस्तदा तस्य नाधिकारी यदि तु विद्यमानप्रजस्तदा तु मृतपत्नीकोऽपि पनाव्यासक्तकर्तृताके श्राद्धभोजनादाव- धिकुरुते इति तदर्थः, अत एव “यो ऽभार्यः सन् बलं चेतः संयन्ता विधुरो भवेत् । क्रियापरः श्रुतैर्वेचा थाढे ब्रै भो. जयेत्पितः" " "श्रुतिचं कुलजं शान्तं प्रजावन्त जितेन्द्रियम् । ऋतभार्यमपि श्राई भोजयेदविशङ्कितः" इत्यादिना प्रजा- मन्त्र- - पतिस्मृतौ जितेन्द्रियस्य प्रजावतः कुलजस्य शान्तस्य विधु- रस्याधि श्राद्धभोजनाधिकारित्वमभिहितम् । अत्र विधुर- स्यापि शीलशालिनः शाहभोजनाधिकारित्वन्यायेन मन्त्र- दानाधिकारित्वमपि सिध्यतीति केचित् । तदपर अना- अमिदीक्षायाः पूर्वोक्तवचनेन निषिद्धतया न क्षमन्ते । पर च स्नानसंध्याखाध्यायतर्षणदानाधिकारिणां विथुराणां दानत्वाविशेषण दीक्षादानाधिकारित्वमप्यनुमन्यन्ते । मच्छिष्यास्तु “यस्य पुत्राः सदाचाराः श्रुतिज्ञा धर्मसं- मुखाः । पिटभक्तिरता दान्ता न वैधव्यं मृतस्वियि" इति स्मार्तवचोबलेन निरुतगुणशालिनी वैधुर्य निबन्धनानधि- बारित्वाभावावगमेन वर्तमान शिष्टाचारण च अस्त्येव मन्त्र- दानाधिकारितेत्याचक्षते, तदेतदण्यापातरमणीयमेव "अना- थमारणां या दीक्षे” त्यनेन विशिष्यानधिकारिबाभिधाने "न वैधव्यं मृतस्त्रियी' त्यनेन । “अनाथमी न तिष्ठेत्तु दिनमेकमपि हिजः" । "अप्रजो मृतपत्नीकः सर्वकर्म गर्हितः” इत्यादिवचनचोदितानाथमावस्थानप्रयोज्यप्रत्य- वायितावास्तदनुमितसामान्यवैधकर्मानधिकारितायाशा. भावमात्रमुच्यते न तु सघनीकसाध्यकार्यसाधकताम्युच्यते- ऽन्यथा तु तादृशस्य विधुरश्याग्निहोत्रे ऽप्यधिकारिता स्याब चायं शिष्टानुमतः शास्त्राभ्यनुन्नातो वा पन्थाः । अपरथा तु विद्यमानपनीकस्यापि प्रवासितजनकात्मजादारस्योदा- मीमांसा। m रस्थायवलम्बितानुदाररीतेः श्रीरामचन्द्रस्य कुशमयसीता- प्रतिकृतिकरणमप्यनुचितं स्याद् विद्यमानयोः कुशलवयोः, तदवश्यमेतैर्वचनैस्तादृशविशिष्टगुणवत्युत्रवतां सामान्यवि- धिपरिचोदितकर्मखनधिकारमात्रमपनुद्यते न त्वाश्रमिता- पि बोध्यते । यदि तु दीक्षादाने पत्नीमत्त्वं नाधिकारिताव- च्छेदकं किन्त्वनामित्वाभावः, स च प्रवते पुत्रविशेषवतो निरुतवचनैर्वोिढुं शक्य इति मन्त्रदानातावच्छेककुक्षौ- पत्नीमत्त्वनिवेशो नावश्यक इति ब्रूध्वे तदापि ब्रह्मचर्यवदि- तरस्य मन्त्रदाटत्वे पत्नीमत्त्वनिरुतशीलशाल्यपत्यवत्त्वान्यतर- वत्त्वमधिकारित्वप्रयोजकमिति न तावता निरुक्तान्यतरधर्म- शून्यानामनाथमिग्राहस्थानामधिकारिता मन्त्रदाने इति विसृष्टमर्यादानां नाधिकारी मन्त्रदान इति पुष्कलम् । य- दपि सतीनिधनानन्तरं हैमवतीविवाहात्यूर्व विधुरेणापि शिवेन नारदाय ब्रह्मविद्योपदिष्टेति पौराणिकी प्रसिद्धि- मनुरुन्धाना मृतपत्नीकानामपि वैधुर्यदशायां शिष्येभ्यो गायच्यादिमन्त्रदानमनुमन्यन्ते निरुक्तार्थोपष्टम्भदानाय च प्रवर्तमानाः कुशकाशावलम्बनन्यायेन "एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षा विप्रोवने वसन् । विविधाचौपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुती:'।म० । अ०। ६ श्लो० २१ । ऋषिभि झणैश्चैव गृह- स्थैरेव सेविताः । विद्यातपोविवृद्धार्थ शरीरस्य च शुद्धये ॥३१॥ ''आसां महर्षि चर्याणां त्यत्वा ऽन्यतमया तनुम् । वीतशो- my GWY मन्त्र- कभयो विप्रो ब्रह्मकोके महीयते ॥ श्लो० ३३ । पञ्चमे ऽपि मानवे “अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् ॥ दिवं गतानि विप्राणामकत्वा कुलसंततिम् । १५८ । इत्यादिव- चननिचयमुदाहरन्ति तदेतदत्यन्तनिःसारं शाल्मलिफल- कल्पमेव, तथाहि न हि भगवतः शिवस्य हैमवतीपरिणया- प्राग् वैधुर्यवतो नारदे ब्रह्मविद्योपदेशी गायत्रादिमन्त्रा- णामपत्नीकादिग्रहस्थोपदेशयोग्यताप्रसाधनायालं येन त- दृष्टान्तमवष्टभ्य तथा वक्तुं पार्येतापि तथा सति हि महा- भारते ब्रह्मविद्यामधिजिगासमानानामृषीणां धर्मव्याधे मांस विक्रीणाने उपसत्तिरभिहिता तस्यापि गायत्रादि- मन्लोपदेशप्रसाधिका स्यादिति साधु ते दृष्टान्तदृष्टिधर्म- मर्मनिर्णयौपयिकीत्येवाचक्ष्महे । यञ्च पत्नीसंबन्धगन्धशून्यमपि वानप्रस्थ प्रस्तुत्य दीक्षा- ग्रहणं तादृशसा परममोक्षं च वक्ति" इत्यादिना पत्नीसंबन्ध- विधुरसा वानप्रस्थसा "एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षा वित्रो वने वसन्” इत्यादिना दीक्षाग्रहणकथनेन पहीसंबन्धरहिता- नां दीक्षाग्रहणवर्णनं तदप्य पहासास्पदं "संत्यज्य ग्राम्य- माहारं सर्वं चैव परिच्छदम् । पुत्रषु भायी निक्षिप्य वनं गच्छत्सहैव वा" म० अ० ६ । श्लो० ३ । इति मन्वनुम- तरीत्या वानप्रस्थाश्रमें भार्यासहवाससाम्यनुमततया वा- नप्रस्थाश्रमे भार्यासंबन्धविरहनैयत्यविरहेण,“पत्नीसंबन्धशू- मीमांसा। ३७ न्यमपीत्युक्तोरसंभवात्" किञ्च पती पुत्रेषु निक्षिप्य वनं प्र- तिष्ठमानोऽपि न पतींविधुर इति शक्यो व्यवहर्तुं येन तं दृष्टान्तीकृत्य दीक्षादाने पत्नीसंबन्धसौदासीन्यमुपपायेत, “अग्निहोत्रं समादाय रह्यं चाग्निपरिच्छदम् । ग्रामादर- ण्यं निःसत्य निवसेवियतेन्द्रियः” ॥ श्लो० ४ इति पाठमनु- वचनेन सू कस वाद्युपकरणोपेतस्य आवसथ्याग्निसहितस्य वानप्रस्थाश्रमाश्रयण विधानेन पत्नीसंबन्धवैधुर्यव्यवहारक- थाया अग्यनवतारात् । अत एवेहैव "वैतानिकं च जुहुया- दग्निहोत्रं यथाविधि । दर्शमस्कन्दयत् पर्व पौर्णमासं च योगतः” श्लो०८ । इति वानप्रस्थमुपक्रम्याभिहितश्लोकं व्याचक्षाणेन कुल्लकभट्टेन “पुत्रेषु भार्यानिक्षेपपक्षे च रज- स्खलायामिव भार्यायामेतेषामनुष्ठानमुचितं विशेषाश्रवणा- त्” इत्यभिहितम् । भार्यामपहाय वनं प्रस्थितस्य यदि पत्नीसंबन्धशून्यताऽनुमताऽभविष्यत्तदा तु रजखलायामिव भार्यायामिति टीकाकतां दृष्टान्तदानं न समगंस्थत, त- दत्र मनुतयाख्यात्रोरुभयोरपि वानप्रस्थावस्थायां प- नीसहवासासहवासयोरपि पुंसः पत्नीसंबन्धनिबन्धनक- मकर्तृताऽभिमतेति वानप्रस्थस्य पत्नीसंबन्धशून्यत्वाभिधा- नमृजुट्टशामेव शोभताम् । किंच पत्नीसंबन्धो न पत्नयाः संयोगादिलक्षणः संबन्धी गृहस्थावस्थास्वपि तस्यानवरत- स्थासंभवात् किन्तु पत्नीमत्त्वप्रयुक्तादृष्टविशेषशालित्वमेव - पत्नीसंबन्धपदेनावश्यं विवक्षणीयमिति तदस्ति जीवज्जानि- मस्करिव्यावृत्तं वानप्रस्थस्यापि ग्रहस्थेन समानमित्यनिपु- णमेतत् । अत्र यौवनस्थां पत्नी परित्यज्य ग्रहीतन्यासस्य पत्नीसंबन्धशून्यस्यापि पत्नीप्रयुक्तदुरदृष्टशालितया तदपनुत्त्यै विशेषपदं, ततश्च पत्नीसंबन्धनिबन्धनाग्निकार्यादिप्रयोज- कातिशयशालिखे पर्यवसानमिति न कश्चिदिह दोषलेशो- विशेषस्त्वत्र मदीयत्रैवर्णिकसर्वखे ब्राह्मणपेटिकाखवगन्त- व्यः । यदन्यत्र दीक्षापदेन मन्त्रानानं, तदपि मन्वर्थानव- बोधनिबन्धनमेव यतोऽत्र दीक्षाशब्दार्थो न मन्त्रः किन्तु स्मृ- त्युक्तो वानप्रस्थाचारस्तथैव प्रकरणानुग्रहात् तथाहि “ता. पसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्षमाचरेत् । एहमेधिषु चान्येषु हिजेषु वनवासिषु" । म० । अ० ६ । श्लो०।२७। “ग्रामा- दाहृत्य वाऽश्नीयादष्टौ ग्रासान् वने वसन् । प्रतिगृह्य पुटेनैव पाणिना शकलेन वा" । २८ । इत्यभिधाय "एताश्चान्याच सेवेत दीक्षा' इत्यभिहितं ततश्चेह एता इति पदं न मन्त्रपरं भवितुमर्हति तेषामिहानुपक्रान्तत्वाल्किन्तूपक्रमो- पसंहारानुगुण्यात् पूर्वोता वानप्रस्थाचारा एव परामृष्यन्ते अत एव कुल्लूवाभट्टोऽपि “वामप्रस्थ एता दीक्षाः एतानिय- मान् अन्यांश्च वानप्रस्थशास्त्रोतान् अभ्यस्येत्” इति व्या- चख्यौ, तदत्र दीक्षापदं न मन्वार्थकमिति सुपुष्कलम् । यदन्यत्र वानप्रस्थमुपक्रम्य दीक्षाग्रहणं तादृशस्य परमं मीमांसा। ३४ मोक्षं च वती" ति तदपि स्वाभिधेयानवबोधनिबन्धनमेव तथाहि किमिह दीक्षाग्रहणपदेन वानप्रस्थस्य स्वयं दीक्षा- ग्रहणं वा ? वानप्रस्थकर्तृकं परस्य दीक्षाग्रहणमेव अन्त. र्भावितणिजयंतयाऽभिमन्यते तत्र न प्रथमः कल्पोऽवक- ल्पते टहीतगायत्रीकस्यापि दुरदृष्टवतः पूर्वोक्तशाण्डिल्य- महर्षिन्यायेन तत्रालञ्चसंतोषस्य मन्त्रान्तरं जिघृक्षतो भ- वेदेवाधिकारिता शिष्यतावच्छेदकस्य शान्तिदात्यादेर्वान- प्रस्थेऽपि सौलभ्यादिति कस्ते तस्याधिकारितासंरक्षणार्थ मनुवचनोपन्यासप्रयासः । यदितु द्वितीयः कल्पस्तदा तु पू- र्वोक्तताराकल्पवचनानुसारण वानप्रस्थस्य गुरूकरणनिषे- धानोचितं ते तत्यक्षायणमियं व ब्रूमहे । यदपि वैष्णवम- वग्रहणे नायमादिनियमस्तद्हणाधिकारिताप्रयोजकस्य मुमुक्षुत्वस्य सर्वाश्रमाविशेषादिति भवेदप्यन्धमन्त्रग्रहणे परं न वैष्णवमन्त्रग्रहणे कश्चित्सपत्नीकत्वापत्नीकत्वयोनियतो- हेतुभाव इत्यभिधानं, तदपि न विचारसहं तथाहि कि- माधुनिकानां वैष्णवमन्त्रग्राहिणां शास्त्रेष्वनवरतं घुष्टो- वर्णाश्रमनियमो ऽभिमतो न वा, यद्यभिमतस्तहि वर्णप्रयु- तानुष्ठानवतामाश्रमप्रयुक्त विधिनिषाज्ञापरिपालनमाव- श्यकमिति ग्राहस्थस्य ब्राह्मणस्य सपत्नीकस्यैव मन्त्रीपदेशा- दिकर्तृत्वमपत्नीकस्य सर्वकर्मानहस्य तवानधिकारात्, ब्रह्म- चारिणस्तु पुनरपत्नीकस्यैवाधिकारित्वं मन्त्रीपदेशादी, वान- मन्त्र- प्रस्थसंन्यासिनोस्तु पूर्वोत्तरीत्या ब्रह्मविद्योपदेष्टुत्वेऽपि न म- न्त्रोपदेष्टुत्वं तयोः पूर्वोपन्यस्तवचनानुसारेण मन्त्रीपदेशान- धिकारित्वात् । ततश्च मन्त्रीपदेशानुगुणार्थित्वसामर्थ्ययोर- त्यजादिसाधारण्येऽपि यथा वर्णबहिष्कृतानामनुपदेश्यत्वं तवाप्यभिमतं, तथा मुमुक्षायाः सपत्नीकापत्नीकगुरुशिष्यसा- धारण्येऽपि म्लेच्छपतितादिसाधारयेऽपि च न तावन्मात्रस्य प्रयोजकत्वं वर्णाश्रमनियमलङ्घनजङ्घालानां सुवचमिति वैष्णवमन्त्रग्रहणे पत्नीसभावासभावावुदासीनाविति पु- नरनभिज्ञभाषितमेव एतेन “सर्वेषु वर्णषु तथाश्रमेषु ना- रीषु नानासुयजन्मखेषु । दाता फलानामभिवांच्छितानां द्रागेव गोपालकमन्त्र एषः” ॥ इति नारदपञ्चरात्रवचनमु- पन्यस्य सपत्नीकापत्नीकपुरुषसाधारण्येन भगवन्मन्त्राधिका- रितामभिधाय भगवन्मन्त्रग्रहणे न कश्चिनियम इति प्रल- पितमप्यपास्त, निरुक्तपञ्चरात्रवचनेन गोपालदीक्षायाः सर्ववर्णाश्रमसाधारण्याभिधानेऽपि अनाश्रमाणां तदनधि- कारित्वात्, प्रत्युत निरुतवचनमेवानाश्रमाणामनधिकारि- त्वबोधकमाश्रमवर्णसामानाधिकरण्य नाधिकारितोत्कीर्त- नादिति न पाणिपिहितम् । यदपि “पितुर्दीक्षा यतेर्दीक्षा दीक्षा च वनवासिनः । अनाश्नमाणां या दीक्षा सा दीक्षा दुःखदायिनी" त्ये तहचनस्य कौलिकदीक्षापरत्वमाख्याये- । तरमन्त्राणां यत्यादिसाधारण्ये नोपदेशाधिकारमिच्छन्ति' मीमांसा। १ । तदेतदप्यमन्दमान्धनिबन्धनमेव सामान्यतो यतिदीक्षानि- बेधे तस्य कौलिकमन्त्रमात्रपरत्वाख्याने प्रमाणविरहात् । अत एव शैवागमे "भिक्षुभ्यश्च वनस्थेभ्यो वर्णिभ्यश्च महे- खरि!। रहस्थो भोगमीक्षार्थी मन्त्रदीक्षां न चाचरेत् ॥ त्यताग्नयः क्रियाहीना यतयो निष्परिग्रहाः। वनस्थास्ता- दृशा यै च वर्णन्यूनाथया यतः ॥ अतस्तेषां नाधिकारीदी- क्षादाने महेखरि” ! इति स्फुटमेव भोगमोक्षोभयसाधन- मन्वसाधारण्य न यतिदीक्षां प्रतिषिषेध तन्वाचार्यः शिवः । अत एव तु यतितो धमप्रमादादिना दीक्षाग्रहणे धेनुधना- दिलोभन पूजाख्यातिप्रेसया वा मन्वग्रहणे प्रायश्चित्तमुक्त योगिनीतन्ले । “यतेोऽचां ग्टहीत्वा तु कदाचिदपि मोहि- तः । प्रायश्चित्ते धेनुरेका त्रिरात्रव्रतमेव बा॥ प्रायश्चित्तं ततः छत्वा पुनर्दीक्षां समाचरेत्" । चन्द्रयामलेऽपि "पिटदीक्षा यतेयॊज्ञा दीक्षा तु वनवासिनाम् । विरक्तामिणां दीक्षा मुत्रायुधननाशिनी।" इति, ततश्च यतिवानप्रस्थयोः सर्वथा मन्त्रदानानधिकारिता तदीयमन्त्रग्रहणे ग्रहीतुः प्रायश्चि: ताधिकारिता चेति शास्त्र सिद्धान्तः । यश्च शास्त्रेषु यतेज्य- योपदेशः स वाश्रमज्येष्ठे तस्मिन्यत एव यश्च गुहबीपदेशः- स तु ज्येष्ठान, यतिगुरुत्वेन वा, न तु ग्रहस्थस्य मन्त्रदान- मीमांसा। ४ ३ "पितैवोपनयेत्युत्रं तदभावे पितुः पिता। तदभावे पितु - ता तदभावे तु सोदरः” । ततश्च पिटतो मन्त्रग्रहणनिषेध. वाक्य गायत्रातिरिता काम्यमन्त्रपरमिति न किंचिदवद्यम् एवं चाद्यले प्रचलितः शिष्टग्रहेषु पिटतो गायत्रीग्रहणसं- प्रदायोऽप्यनुग्रह्यते । अयमेवार्थो ध्वनितो मनुनाऽपि हि- तीयाध्याये "निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथावि- धि । संभावयति चान्न न स विप्रो गुरुरुच्यते” इति ॥ ततश्च निषेककर्तुः पितुरेवोपनयनादिसंस्कारकारकत्वमित्युपन- यनस्य गायच्युपदेशफलस्य प्रधानानुष्ठापयिता चेत्यिता तर्हि तस्य संस्कारकारकत्वविध्यनाथाऽनुपपत्त्या गायन्यु- पदेष्टुत्वं सिध्यति । अत एवेहैव कुल्लू कभट्टोऽपि “तेन पितु- रवं गुरुत्त्वोपदेशः” इत्यवोचदिति सर्वं चतुरस्रमिति न वचनविद्रोहसमुत्थानसंभावनाऽपीति शम् । इदानीमुपदिश्यमाना मन्त्राः कीदृशाः के च ? इति जिज्ञासायां बहुविधा बहवश्चेत्य त्तरं, तथा हि वैदिकाः, स्मार्ताः, पौराणिकास्तान्त्रिकाः, शावरा, याचाः, राक्षसाः, पैशाचाः स्वाप्पा,गारुडा, वैताला इत्यनेकविधाः, तत्रापि च इति वृद्धमनुना क्रमोऽप्युपदर्शितः । अयं च क्रमो विप्रवि- षये, अनापदि क्षत्रियादेस्त्वध्यापनानधिकारित्वात्पुरोहित एवोपनेतेति विवेकः ।

४४ मन्त्रमीमांसा। वेदस्यैवैकस्य ऋग्यजुः सामाथर्वादिभेदभिन्नतया तेषामपि च संहिताब्राह्मणोपनिषदारण्यकाद्यनेकभेदप्रविभिन्नतया तत्तदवान्तरभेदैर्बहुविधा वैदिका एव मन्त्राः । एवमेव स्मार्ताः पौराणि काश्चापि मन्वा बहुविधाः । तान्त्रिकैस्तु म- न्वैर्जगदेतदशेषमेव व्यामोहितमिति न कस्यापि निरूपकस्य परोक्षमिति न बहु वक्तव्यं, शावर मन्त्रा अपि तत्कालफ- लँदा इति विश्रुता बहुधा प्रचरन्ति, ते गृह्यन्ते नटैभिल्लैर्ध- मच्युतैईि जैरपि । याक्षाश्च यक्षजातीयैरुपदिष्टाः । रा- क्षसाच रक्षोजातीयैरेवं पैशाचाः पिशाचजातीयैः । स्वा. प्रास्तु स्वप्ने कयाचिद्दे वतया अपरेण वा केनचिदुपदिष्टाः सुप्तीस्थितस्य स्मृतिमुपयाताः संस्कृताश्च सन्तस्ते पुनः फल- दा भवन्ति तेषामसंस्करणे तु न किंचिदपि फल मिति तन्त्रशास्त्र प्रसिद्धिः : गारुडास्तु विषघ्नाः, सर्पादिविषवज्ज- न्तुभयदाश्चेति लौकिकी तान्त्रिकी च प्रसिद्धिः । वैतालास्तु वैतालजातीयदेवाराधनहेतुभूतामन्ताः । एवमपरा अपि मन्त्रभिदाः स्वयमूहनीया यथा सौरा गाणपताः सारस्वता वैष्णवा इति । इति श्रीकाशीस्थब्रह्मामृतवर्षिणीसभासंपादकेन पर- मपूरुषकपासरित्यूरपरीवाहपूर्णपात्रेण पण्डितवरश्रीराम- मित्रशास्त्रिणा प्रणीता परमपुरुषार्पिता मन्त्रमीमांसा संवत् १८४३ ॥ आषाढवष्णसप्तमीबृहस्पति ।

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Mantra Mimamsa

Author
Raamaa Mishra Shaastrii
Title
Mantramimaan'saa-
File name
Mantra Mimamsa
Text
OCR done
Citation
1886
Published
2004/12/26
Publisher
Bharatha Jeevan Press,kashi
Language
Sanskrit
Pages
61
Library
Asr,melkote
Classification
Hinduism Narrowly
Keywords
Greatness of Gayatri mantra
DLI number
383178
Barcode
1990020047470.00
Scanning centre
ASR, Melkote
Digital publisher
Digital Library Of India
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Not Available
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3YVTAiESUtd
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