Sanmati Library, Jaipur

Jain Sidhant

Upadhyay, Aatmaram Ji · 2009/11

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ORDPRESORREERRORSansar
जैन सिद्धान्त ॥
(अनेकान्त सिद्धान्त दर्पण)
लेखक
श्री जैन मुनि उपाध्याय आत्मारामजी.
รอคอตอลคสme awa@ลด
प्रकाशक
श्री जैन सभा-पञ्जाव
की तरफसे
बाबु परमानंद प्लीडर, बी. ए.
कसूर (जिला-लाहौर)
प्रथमावृत्ति.
प्रत ५००..
वीर निर्वाण संवत् २४४१. ६० ० १९१५.
अहमदाबादमें पांचएकी नजदीक आया हुमा श्री सत्यनिजय
प्रिन्टींग प्रेसमें गाइ सांकलचंद हरिलालने छापा.
मृल्य रु. ०-६-०.
P

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Preface.
I am Jain by birth and love Jain religion as Uni.
versal Religion, I w&& ignorant of its fundamental
principles as the people of other religione generally are.
Fortunately, I had a chance to see the author of this
book and heard his updesh and had a talk with him
which gave me much information about my religion.
The author is a learned Jain Sadhu belonging to the
Swetamber Sthanakwasi Sadhub of the Punjab. He is
well versed in the Jain literature belonging to all
branobes of.Jaio. Though he is still about 30 years of
age, yet his love for learning and teaching the others
forced me to request him to write this book for the
good of the public which he very kindly did here at my
office as he is staying here with his Guru, great grand
Guru & Chelas for their Chaturmas. I get this book printed
for the public good as a token of gratitude for the oblige.
bion the said Sadhu put me under by giving me the
necessary information about any religion. The cost price
only will be charged which will be given to the Punjab
Jain Sabha.
Kabur.
18-10-14 Devali day
Sambat 1971
Vir Sambat 2441.
Parmanand B. A.
Pleader,
Chief Court-PUNJAB,

विषयानुक्रम.
प्रथम सर्ग.
१
आत्मा और उनके लक्षण.
द्वितीय सर्ग.
प्रमाण विवर्ण...
नय विवर्ण
तृतीय सर्ग.
चारित्र वर्णन. (पंच महाव्रत,
दशविध यतिधर्म और
भावनाओंका वर्णन)
चतुर्थ सर्ग.
रहस्थ धर्म विषय. (धावक गुण वर्णन और व्यसन निषेध) ११

॥ श्री वीतरागाय ॥ नमो समणस्स भगवतो महावीरस्सणं ।। ॥ श्री जैन सिद्धान्त ॥ (श्री अनेकान्त सिद्धान्त दर्पण) ॥ प्रथम सर्गः॥ प्रिय सुज्ञ पुरुपो ! मनुष्यभवको प्राप्त करके तत्त्व विद्याका विचार करना योग्य है, क्योंकि सिद्धान्तसे निर्णय किये विना कोई भी आत्मा पूर्ण दर्शनारूढ़ व चारित्रारूढ़ नही हो सक्ता है । सिद्धान्त शब्दका अर्थ ही वही है, जो सर्व प्रमाणोंद्वारा सिद्ध हो चुका हो, अपितु फिर वह सिद्धान्त ग्रहण करने योग्य होता है। तथा सिद्धान्त शब्द पूर्ण सम्यक् दर्शनका ही वाचक है, इसी वास्ते उमास्वातिजी तत्वार्थसूत्रकी आदिमें मुक्ति मार्गका वर्णन करते हुए यह सूत्र देते हैं:- (२) सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥ सो इस सूत्रमें यह सिद्ध किया है कि सम्यग् दर्शनसे सम्यग् ज्ञान होता है, फिर सम्यग् ज्ञानसे सम्यग् चारित्र प्रगट हो जाता है, किन्तु तीनोंके एकत्व होनेपर जीव मोक्षको प्राप्त होते हैं, तथा यह तीनों ही मोक्षके मार्ग हैं। इससे सिद्ध हुआ कि विना दर्शनके जीव मोक्षमें नहीं जा सक्ते हैं, क्योंकि दर्श- नके विना अन्य गुण भी सम्यक् प्रकारसे प्रादुर्भूत नहीं होते हैं । यथा- मूल सूत्रम् ॥ नादसणिस्स नाणं नाणेण विना न हुति चरणगुणा अगुणिल्सनस्थि मोक्खो नत्थि अ. मोक्खस्स निवाणं ॥ उत्तराध्ययन सू० अ० २७ गाथा ३०॥ संस्कृत टीका-अदर्शनिनः सम्यक्तराहितस्य ज्ञानं नास्ति इत्यनेन सम्यक्तं विना सम्यक् ज्ञानं न स्यादित्यर्थः । ज्ञानविना चारित्रगुणाश्चारित्रं पञ्चमहाव्रतरूपं तस्य गुणाः पिण्डविशुद्धद्या- दयः करण चरण सप्ततिरूपाः न भवति । अगुणिनः चारित्र गुणैः रहितस्य मोक्षः कर्मक्षयो नास्ति अमोक्षस्य कर्मक्षयरहितस्य निर्वाण मुक्तिसुखमाप्तिर्नास्ति । भावार्थ:-उक्त सूत्रमें शृंखलाबद्ध लेख हैं जैसे कि सम्यक् दर्शनके विना सम्यग् ज्ञान नहीं, सम्यक् ज्ञानके विना सम्यक् चारित्र नहीं, सम्यक् चारित्रके बिना सबाल गुण नहीं, गुणों के विना मोक्ष नहीं, मोक्षके बिना पूर्ण सुख नहीं अर्थात् आत्मिक आनंद नहीं। सो मिय बंधुओ | सम्यक् दर्शन सम्यक् सिद्धान्तका ही नाम है, क्योंकि सिद्धान्तके जाने बिना कोई भी आत्मा आत्मिक गुणोंमें प्रवेश नहीं कर सकता, अपितु सम्यक् दर्शन अर्हन् देवने जो प्रतिपादन किया है वही जीवोंको कल्याणरूप है । सो अईत् देवके कथन किये हुए पदार्थको माननेसे सम्पक दर्शन होता है, सम्यक् दर्शनको आहत मत कहो वा जैन दर्शन कहो किन्तु दोनों शब्दोंका एक ही अर्थ है ।। प्रश्न:-जिन शब्द किस प्रकार बनता है, फिर जैन शब्द किस अर्थमें व्यवहत होता है ? उत्तर:-जि जये धातु को नक् प्रत्ययान्त होकर जिन शब्द चन जाता है । यथा 'जि' जये धातु जय अर्थमें व्यवहत है तब ( ४ ) जि-ऐसे धातु रखा है। फिर उणादि सूत्रसे जिन शब्द इस प्र- कारसे बना, जैसे कि- इषिञ्जिदीकुष्यविभ्योनक् । उणादि प्रकरण पाद ३ सू०२॥ अथ उज्ज्वलदत्त टीका-इण्गतौ । पिबंधने । जि जये। दीङ् क्षये | उप दाहे । अवर क्षणे । एभ्यो नक् स्यात् ।। इनो- राज्ञिमभौसूर्ये ॥ इनः सूर्येनृपेपत्यौ । नान्ते ॥२॥ इति विश्वः ।। सह इनेन वर्तत इति सेना || सेनयाभियात्यभिपेणयति ॥ सिनः काणः ॥ जिनो बुद्धः। जिनः स्यादतिद्धेऽपि बुद्धेचार्हति जित्वरे विश्वेनान्त ॥१॥ दीनोदुर्गतः ॥ उष्णमीपत्तप्तम् ॥ ज्वरत्वरेत्यूठ । उनमसम्पूर्णम् ॥ सर्वस्वे तु ऊनयतेरूनामिति साधितम् ।। इतिहत्ति ॥ इस सूत्रसे 'जि' धातुको नक् प्रत्यय हो गया तब जिन शब्द सिद्ध हुआ, अपितु हैमचन्द्राचार्य नाममाला वृत्तिमें लिखते हैं कि- जयत्यनिजवतिरागद्वेषादिशत्रून् इति जिनः ।। इसमें यह वर्णन है कि जो विशेष करके रागद्वेषादि अं- तरंग शत्रुओंको जीतता है वही जिन है, अर्थात् जिसने राग - देषादि शत्रुओंको जीत लिया है वही जिन है । फिर, देवता ॥ शा० अ० २ पा०४ | सू० २०६॥ प्रथमान्तात् साऽस्यदेवतेत्यस्मिन्नर्थे अ- णादयो नयति ॥ इत्यण ॥ आईतः॥ एवं जैनः सौगतः शैवः वैष्णवः इत्यादि । भापार्थ:-इस तद्धितके सूत्रका यह आशय है कि प्रथमा- तसे देवार्थम अणादि प्रत्यय होजाते हैं यथा अईन् देवता अस्य आईतः । जिनो देवताऽस्य जैनः (आरचोऽक्ष्वादेः । शा० अ० २।३ । ८४) इस सूत्रसे आदि अच्को आ-ऐ-औ-आर येह हो जाते हैं। तब यह अर्थ हुआ कि जिन है जिनका देव वही है जैन अथवा ( जिनं वेत्तीति जैनः ) अर्थात् जो जिनके स्वरूपको जानता है वही जैन है ॥ तथा जिनानां राजः जिनराजः यह पष्ठीतत्पुरूप समास है । इससे यह सिद्ध हुआ कि जो सामान्य जिन हैं उनका जो राजा है वही जिनराज है अर्थात् तीर्थकर देव । इसी प्रकार जिनेन्द्र शब्द भी सिद्ध होता है । सो जो श्री जिनेन्द्र देवने द्रव्योंका स्वरूप कथन किया है उसको जो सम्यक् प्रकारसे जानता है वा मानता है वही जैन है ।। प्रश्न-जिनेन्द्र देवने द्रव्य कितने प्रकारके वर्णन किये हैं ? उत्तर-पद् प्रकारके द्रव्य वर्णन किये हैं। प्रश्न-वे कौन कौनसे हैं ? उत्तर-जीव पुद्गल धर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि । सद् द्रव्य लक्षणम् । उत्पाद् व्यय प्रौव्य युक्तं सत् इति द्रव्याः। किन्तु सद जो है यह द्रव्यका लक्षण है क्योंकि, सीदति रवीयान् गुणपर्या- यान् व्यामातीति सत् ।। अपने गुणपर्यायको जो व्याप्त होवे सो सत् है अथवा उत्पादव्ययधौव्ययुक्तं सत् । यह जो पूर्व वचन है अर्थात् उत्पत्ति विनाश और स्थिरता, इन तीनों करी संयुक्त होवे सो सत् है अथवा अर्थक्रियाजारि सद् जो अर्ध क्रिया करनेवाला है सो सत् है ॥ यथा- गुणाण मासो दवं एगदवस्सिया गुणा लक्ख- णं पजवाणंतु उभयो अस्सियाभवे ॥उ० ० २८ गाथा ६॥ वृत्ति ॥ गुणानां रूपरसस्पर्शादीनां आश्रयः स्थान द्रव्यं यत्र गुणा उत्पधन्तेऽवतिष्ठते विलीयन्ते तत् द्रव्यं इत्यनेन (७) में रूपादि वस्तु द्रव्यात् सर्वधा अतिरिक्त अपि नास्ति द्रव्ये एव रूपादि गुणा लभ्यन्ते इत्यर्थः । गुणा हि एक द्रव्याश्रिताः एक- ' स्मिन् द्रव्ये आधारभूते आधेयत्वेनाश्रिता एक द्रव्याश्रितास्ते गुणा उच्यन्ते इत्यनेन ये केचित् द्रव्यं एव इच्छंति तद्व्यक्ति रिक्तान रूपादीन् इच्छति तेपां मतं निराकृतं तस्माद् रूपादीनां गुणानां मध्येभ्यो भेदोप्यस्ति तु पुनः पर्यायाणां नव पुरातनादि रूपाणां भावानां एतल्लक्षणं ज्ञेयं एतत् लक्षणं किं पर्याया हि उभ- याश्रिता भवेयुः उभयोव्यगुणयोराश्रिताः उभयाश्रिताः द्रव्येषु नवीन पर्यायाः नाम्ना आकृत्या च भवंति गुणेष्वपि नव पुराणादि पर्यायाः प्रत्यक्ष दृश्यन्ते एव ।। भापार्थ:-उक्त सूत्रमें यह वर्णन है कि द्रव्यके आश्रित गुण होते हैं, जैसे अग्निका प्रकाश वा उष्ण गुण है । अग्नि द्र- व्य है तथा मूर्य द्रव्य प्रकाश गुण, जीव द्रव्य ज्ञान गुण, किन्तु नित्य गुणका आत्मासे अनादि अनंत सम्बन्ध है । यथा श्री आचारांगे- "जे आया से विन्नाया जे विन्नाया से आया जेणविजाणइ से आया इति वचनात् । अर्थात् जो आत्मा है वही ज्ञान है, जो - है (८) ज्ञान है वही आत्मा तथा जिस करके जाना जाये वही ज्ञान है। क्योंकि यह अनादि अनंत सम्बन्ध है जो परगुण सम्बन्ध है, कोई + अनादि सान्त है, कोई सादि सान्त है, अपितु पर- गुणका सम्बन्ध सादि अनंत नही होता है, सो जब द्रव्य गुण एकत्व हुए फिर उस द्रव्यका लक्षण पर्याय भी हो जाता है, दीपकके प्रकाशवत, अपितु स्वगुणों सर्व द्रव्य अनादि अनन है, परगुणोंमें पर्यायार्थिक नयापेक्षा सादि सान्त है, यथा 3- त्पाद् व्यय धौव्य युक्तं सत, अर्थात् जो उक्त लक्षण करके युक्त है वही सद् द्रव्य है ।। पुनः द्रव्य विषय- धम्मो अहम्मो आगासं कालो पुग्गल जंतवो एसलोगोत्ति पणतो जिणेहिंवर दंसि- हिं ॥ उ० अ० २७ गाथा ७ ॥ वृत्ति-धर्म इति धर्मास्तिकाय १ अधर्म इति अधर्मास्ति- काय २ आकाशमिति आकाशा शास्तिकायः ३ कालः समयादि. रूपः ४ पुग्गलत्ति पुद्गलास्तिकायः ५ जन्तव इति जीवाः + अभव्य आत्माओंका कौके साथ अनादि अनंत सम्ब- न्ध भी है। १ .

(९) ६ । एनानि पद द्रव्याणि शेयानीति अन्वयः एपा इति सा. मान्य प्रकारेण इत्येवं रूपाः उक्त पद यात्मको लोको जिनः मानः कथितः कीदृशीमनग्दनिभिः सम्यक् ययास्थित वस्तुपीः ७ । जनयो जीवा अप्यनन्ता एव ८ ॥ भावार्थ:-धर्मास्निकाय, अधर्मास्तियाय, आकाशास्तिका- य, और जीवानिकाय, फान्ट (सगय,) पुद्गलास्तिकाय-यह पद व्यायम मप यह लोक है अपितु इन द्रव्यांग कालकी अस्ति नहीं क्योंकि रामया मिथर गुण स्वभाव नहीं है और आकाश अस्तिकार लोगालोग प्रमाण है इस लिये यही पर व्यापक रूप लोक है ॥ ७॥ पुनः द्रव्य विषय- धम्मो अहम्मो यागासं दवं इकिक माहियं थानाणिय दवाणि कालोपुग्गल जं- तवो || ० गा० ॥ नि-धम्मादि भेदानाद धर्मा १ अधर्म २ आकाश ३ हव्यं इनि प्रत्येक योज्यं धर्मद्रव्य अधर्मद्रय आकाशद्रव्य इत्यर्थः एतत् द्रव्यं त्रयं एक इनि एकत्वं युक्त एव तीर्थकरैः पाख्यात अग्रे तनानि त्रीणि द्रव्याणि अनंतानि स्वकीय स्व- १ (१०) कीयानन्त भेदयुक्तानि भवति तानि त्रीणि द्रव्याणि कानि काल: समयादिरनंतः अतीतानागताधपेक्षया पुद्गा अपि अनंताः ॥ भावार्थ:-धर्म अधर्म आकाश यह तीन ही द्रव्य असंख्यात् प्रदेशरूप एकेक है अपितु आकाश द्रव्य लोकालोक अपेक्षा अनंत द्रव्य है, यह द्रव्य पूर्ण लोगमें व्याप्त है, अखंड रूप है, निज गुणापेक्षा और कालद्रव्य पुद्गलद्रव्य जीवद्रव्य यह तीन ही अनंत हैं, क्योंकि कालद्रव्य इस लिये अनंत है कि पुद्गलकी अनंत पर्याय कालापेक्षा करके ही सद्रूप है तथा अनंते कालचक्र भूत भविष्यत काल अपेक्षा भी कालद्रव्य अनंत है और समय अस्थिर रूपमें है | फिर असंख्यात शुद्ध प्रदेशरूप जीव द्रव्य है अर्थात् असंख्यात शुद्ध ज्ञानमय जो आत्यप्रदेश हैं वे ही श्रीवरूप हैं इसी प्रकार अनंत आत्मा है और उनके भी प्रदेश पूर्ववत् ही हैं, अपितु निज गुणापेक्षा शुद्धरूप हैं । कर्य मलापेक्षा व्यवहार नयके मतमें शुद्धआत्मा अशुद्धआत्मा इस प्रकारसे आत्म द्रन्यके दो भेद हैं अपि तु संग्रह नयके मतमें जीव द्रव्य एक ही है, जैसे श्री स्थानांग सूत्रके प्रथम स्थानमें यह सूत्र है कि (एगे आया) अर्थात् संग्रह नयके मतमें आत्म द्रव्य एक ही है क्योंकि अनंत आत्माका गुण एक है जैसे सहस्र .. (११) दीपकोंका प्रकाश रूप गुण एक है अपितु व्यवहार नयके म. : तमें सहस्र दीपक रूप द्रव्य है क्योंकि जिस दीपकको जो कोई उठाता है तब वह दीपक प्रकाश रूप स्वगुण साथ ही ले ; जाता है । इस हेतुसे यही सिद्ध हुआ कि आत्म द्रव्य एक भी है और अनंत भी है। अथ पट् द्रव्य लक्षण विषय- गइ लस्खणोउ धम्मो अहम्मोठाण लक्ख- पो नायणं सव्व दव्वाणं नहं श्रोग्गह लक्खणं ॥ उत्त० अ० २८ गाथा ए॥ वृत्ति-धम्मो धर्मास्तिकायो गति लक्षणो ज्ञेयः लक्ष्यते ज्ञायते अनेनेति लक्षणं एकस्माद्देशात् जीवपुद्गलयोर्देशान्तरं प्रतिगमनं गतिर्गतिरेव लक्षणं यस्य स गतिलक्षणः अधर्मों अधर्मास्तिकायः स्थितिलक्षणो ज्ञेयः स्थितिः स्थानं गति निवृत्तिः सैव लक्षणं अस्यैति स्थानलक्षणोऽधम्मास्तिकायो ज्ञेयः स्थिति परिणतानां जीव पुद्गलानां स्थिति लक्षण कार्य ज्ञायते स अधर्मास्तिकायः यत्पुनः सर्वद्रव्याणां जीवादीनां भाजन आधाररूप नभः आकाशं उच्यते तत् च नभः अवगाहलक्षणं अ- वगाढं प्रवृत्तानां जीवानां पुद्गलानां आलम्बो भवति इति अव- (१२) गाहः अवकाशः स एव लक्षणं यस्य तत् अवगाइलक्षणं नम उच्यते ॥९॥ भावार्थ:-धर्मास्तिकायका गमणरूप लक्षण है और जीव द्रव्य अजीव द्रव्यकी गति, यह द्रव्य साहायक भूत है; जैसे राजमार्ग चलने वालोंके लिये साहायक है क्योंकि, यदि पं. थीराज मार्गमें स्थित हो जावे तो मार्ग स्वयं उसको चलाने समर्थ नही होता है, किन्तु उदासीनता पूर्वक पंधीके चलते समय मार्ग साहायक है तथा जैसे मत्सको जल साहायक है। वा अंधेको यष्टि (लाठी ) आधारभूत है इसी प्रकार जीव द्रव्य अजीव द्रव्यको गति करते समय धर्म द्रव्य साहायक है । और अधर्म द्रव्य जीव द्रव्य अजीव द्रव्यकी स्थिति करने में साहायक भूत होता है, जैसे उष्ण कालमें पंधीको वृक्षकी छाया आधारभूत है, तथा जैसे मही आधारभूत है इसी प्रकार जीव द्रव्य अजीव द्रव्यकी स्थिति करनेमें अधर्म है ॥ ओर सर्व द्रव्योंका भाजनरूप एक आकाश द्रव्य है क्योंकि सर्व द्रव्योंका आधार भूत एक अंतरीक्ष ही है जैसे एक कोष्टको एक दीपक के प्रकाशमें सहस्र दीपकोंका प्रकाश भी वीचमें ही लीन हो जाता हैं। इसी प्रकार आकाश द्रव्यमें जीव द्रव्य अजीव द्रव्य स्थिति करते हैं । तथा जैसे एक कलश है जोकि पूर्ण दुग्धसे पूरित है,

(१३)
यदि फिर भी उस कलशमें मत्संड्यादि द्रव्य प्रविष्ट करें तो
प्रवेश हो जाते हैं उसी प्रकार आकाश द्रव्यमें जीव द्रव्य अजीब
ठहरे हुए हैं। अपितु जैसे भूमिकामें नागदंत (कोला)
को स्थान प्राप्त हो जाता है तद्वत् ही आकाश प्रदेशों में अनंत
प्रदेशी स्कंध स्थिति करते हैं क्योंके आकाश द्रव्यका लक्षण ही
अवकाश रूप है।
अथ काल व जीवका लक्षण कहते हैं।
वत्तणा लक्खणो कालो जीवो जवयोग
लक्खणो नाणेणं दसणेणंच सुदेणय दुहेणय ॥
उत्त० अ० ज गाथा १०॥
वृत्ति-व-ते अनवच्छिन्नत्वेन निरन्तरं भवति इति वर्ग-
ना सा वर्चना एव कक्षणं लिङ्गं यस्येति वर्तनालक्षणः काल
उच्यते तथा उपयोगो मतिज्ञानादिकः स एव लक्षणं यस्य स
उपयोगलक्षणो जीव उच्यते यतो हि ज्ञानादिभिरेव जीवो
लक्ष्यते उक्त लक्षणत्वात् पुनर्विशेष लक्षणमाह ज्ञानेन विशेषाव.
घोधेन च पुनदर्शनेन सामान्यावबोधरूपेण च पुनः मुखेन च पु-
नर्दुखेन च ज्ञायते स जीव उच्यते ॥ १० ॥

(१४) भावार्थ:--समयका वर्तना लक्षण है इसी करके समय समय पर्याय उत्पन्न होता है, जैसेकि उपचारक नयके मतमें जीवकी व्यवस्थाका कारणभूत काल द्रव्य ही है । यथा-बाल १ युवा २ वृद्ध ३ अथवा उत्पन्न १ नाश २ ध्रुव ३ यह तीनों ही व्यवस्थाका कर्ता काल द्रव्य है और जो कुछ समय २ उत्प- त्ति वा नाश पदार्थोंका है वे सर्व काल द्रव्यके ही स्वभावसे है अपितु द्रव्योंका उत्पन्न वा नाश यह उपचारक नयका वचन है किन्तु द्रव्यार्थिक नयापेक्षा सर्व द्रव्य नित्यरूप है । और पर्यायोंका कर्ता काल द्रव्य है । जैसे सुवर्ण द्रव्यके नाना प्र. । कारके आभूषणादि बनते हैं। फिर उनहीं आभूपणादिको ढाल कर अन्य मुद्रादि बनाये जाते हैं। इसी प्रकार जो जो द्र- व्यका पर्याय परिवर्तन होता है उसका कर्ता काल द्रव्य ही है। इसी वास्ते सूत्र में लिखा है 'वत्तणा लक्खणो कालो' अर्थात् काल- का लक्षण वर्तना ही है सो कालके परिवर्तन से ही जीव द्रव्य अजीव द्रव्यका पर्याय उत्पन्न हो जाता है और जीव द्रव्यका उपयोगरूप लक्षण है सो उपयोग ज्ञान दर्शनमें ही होता है अ- र्थात् जीव द्रव्यका लक्षण ज्ञान दर्शनमें उपयोगरूप है सो यह तो सामान्य प्रकारसे सर्व जीव द्रव्यमें यह लक्षण सतत विद्य- मान है। अपितु विशेष लक्षण यह है कि मुख वा दुःखका अनुभव (१५) करना क्योंकि सुख दुःखका अनुभव जीव द्रव्यको ही है न तु अन्य द्रव्यको ॥ पुनः सूत्र इस कथनको इस प्रकारसे लिखते हैं। नाणं च दलणं चेव चरितं च तवो तहा वीरियं जवओगोय एयं जीवस्स लक्खणं ॥ जा सू० अ० २७ गा० ११ ॥ वृत्ति--ज्ञानं ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं च पुनदृश्यते अनेनेति दर्शनं च पुनश्चरित्रं क्रियाचेष्टादिकं तथा तपो द्वादशविधं तथा वीर्य वीर्यान्तराय क्षयोपशमात् उत्पन्नं सामर्थ्य पुनरुपयोगो ज्ञा- नादिषु एकाग्रत्वं एतत् सर्व जीवस्य लक्षणं ॥ ११ ॥ भावार्थ:-ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, वीर्य, तथा उपयोग यही जीवके लक्षण हैं, क्याकि ज्ञान दर्शनमय आत्मा अनंत शक्ति संपन्न है । पुनः चरित्र और तप यह भी आत्माके साध्य धर्म है क्योंकि आत्मा ही तपादि करके युक्त हो सकता है, न तु अनात्मा । प्रश्न--जब आत्मा द्रव्य अनंत वीर्य करके युक्त है तब सिद्धात्मा भी अनंत वीर्य करके युक्त हुए तो फिर उनका चीर्य सफलताको कैसे प्राप्त होता है ?

(१६)
उत्तर-अंतराय कर्मके क्षय हो जानेके कारणसे सिद्धात्मा
भी अनंत शक्ति युक्त हैं अपितु अकृतवीर्य्य हैं क्योंकि सि-
द्धात्माके सर्व कार्य सिद्ध है।
पुनः संसारी जीवोंका दो प्रकारका वीर्य है। जैसेकि-
बाल (अज्ञान)वीर्य १और पंडित वीर्य वाल वीर्य उसका
नाम है जो अज्ञानतापूर्वक उद्यम किया जाय । और पण्डित
वीर्य उसको कहते हैं जो ज्ञानपूर्वक परिश्रम हो । सो जिस
समय आत्मा अकर्मक होता है तव अकृतवीर्य हो जाता है
सो सिद्ध प्रभु अकृतवीर्य्य हैं ।।
पूर्वपक्ष:-जिस समय आत्मा सिद्ध गतिको प्राप्त होता है
तव ही अकृतवीर्य हो जाता है सो इस कथनसे सिद्ध पद
सादि ही सिद्ध हुआ।जब ऐसे है तव जैन मतकी मोक्ष अनादि
न रही, अपितु सादि पद युक्त सिद्ध हुई ।
उत्तरपक्ष:-हे भव्य ! यह आपका कथन युक्ति वा सि.
द्धान्त बाधित है क्योंकि जैन मतका नाम अनेकान्त मत है सो
जब जैन मत संसारको अनादि मानता है तो भला मोक्षपद
सादि युक्त. कैसे मानेगा ? अर्थात् कदापि नहीं, क्योंकि संसार
अनादि अनंत है उसी ही प्रकार मोक्षपद भी अनादि अनंत है,
अपितु सिद्धापेक्षा सूत्रकार ऐसे कहते हैं। यथा-
!

(१७) एगनेणयसाइया अपज्जवसियाविय। पुहतेण अणाईया अपज्जवसियाविय ॥ उत्त० अ०३६ गाथा ६ ॥ वृत्ति-ते सिद्धा एकत्वेन एकस्य कस्यचित् नाम प्राणापे- क्षया सादिकाः अमुको मुनिस्तदा सिद्धः इत्यादि सहिताः सिद्धाः भवति च पुनस्ते सिद्धाः अपर्यवसिताः अन्तरहिताः मोक्षगम- नादनन्तरं अत्रागमनाभावात् अन्तरहिताः ते सिद्धाः पृथक्त्वेन बहुः केन सामस्त्यापेक्षया अनादयो अनन्ताश्च ॥ भावार्थ:-एक सिद्ध अपेक्षा सादि अनंत है और बहुतोंकी अपेक्षा अनादि अनंत है, अर्थात् जिस समय कोई जीव मोक्ष- गत हुआ उस समयकी अपेक्षा सादि है अधुनराशचिकी अपेक्षा अनंत है, फिर बहुत सिद्धोंकी अपेक्षा अनादि अनंत है, क्योंकि फाळचक्र अनादि अनंत होनेसे तथा जैसे चेतनशक्ति अनादि है वैसे ही जड़ शक्ति भी अनादि है आपितु जड़ शक्तिकी अपेक्षा चेतन शक्ति रूप शब्द व्यवहृत है, ऐसे ही जड़ शक्ति चेतन शक्तिकी अपेक्षा सिद्ध है। इसी प्रकार संसार अपेक्षा सिद्ध पद है और सिद्धपद अपेक्षा संसारपद है, किन्तु यह दोनों अनादि अनंत है।

(१८) तथा पुद्गलका स्वरूप इस प्रकारसे है। सद्धधयार उजोओ पहा गया तवेइया। वएण रस गंध फासा पुग्ग लाएंतु लक्खणं ।। उत्त० अ० गाथा १२ ।। वृत्ति-शब्दो ध्वनि रूप पौगलिकस्तधान्धकार तदपि पुद्गल रूपं तथा उद्योतोरत्नादीनां प्रकाशस्तथा प्रभा चन्द्रादीनां प्रकाशः तथा छाया वृक्षादीनां छाया शैत्यगुणा तथा आतपो रवरुष्णमकाश: इति पुद्गलस्वरूपं वा शब्दः समुच्चये वर्णगंधरस स्पर्शाः पुद्गमाना लक्षण ज्ञेयं वार शुक्लपीतहरितरक्तकृष्णादयो गंधो दुर्गन्धमुग- धात्मको गुणः रसो पद तीक्ष्ण कटक कपायाम्ल मपुर लवणाद्या स्पर्शः शीतोष्ण खर मृदू, स्निग्ध रुक्ष मधुगुर्वादयः एते सर्वेपि पुद्गलास्तिकाय स्कन्ध लक्षण,वाच्या क्षेयाः इत्यर्थः एभिलक्षणरेष पुद्गला लक्ष्यन्ते इति भावः ॥ १२॥ भावार्थ:-शब्दका होना, अन्धकारका होना, उद्योत, प्रमा, छाया (साया) वा तप्त, अथवा कृष्ण, नील, पीत, रक्त, वेत, यह वर्ण और छ ही रस जैसेकि, कटुक, कपाय, तिक्त,खहा, मधुर और लवण, तथा दो गंध जैसेकि सुगंध, दुर्गध, और अष्ट ही स्पर्श (१९) जैसेकि कर्कश, मृदु, गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रुक्ष, यह आठ ही स्पर्श इत्यादि सर्व पुद्गल द्रव्यके लक्षण हैं,क्योंकि पुद्गल द्रव्य एक है उसके वर्ण गंध रस स्पर्श यह सर्व लक्षण हैं, इन्हींके द्वारा पुद्गल द्रव्यकी आस्तिरूप है। अथ पुद्गल द्रव्यके पर्यायका वर्णन करते हैं:- एगत्तं च पुदत्तं च संखा संठाण मेवय । संजोगाय विन्नागाय पजवाणंतु लक्खणं ॥ उत्त० अ० ज गाथा १३॥ वृत्ति-एतत् पर्यायाणां लक्षणं एतत् किं एकत्वं भिन्नेष्वपि यरमाण्वादिषु यत् एकोयं इति बुद्धया घटीयं इति प्रतीति हेतु: च पुनः पृथक्त्व अयं अस्मात् पृथक् घटः पटात् भिन्नः पटो घटा- द्भिन्नः इति प्रतीति हेतुः संख्या एको द्वौ बहव इत्यादि प्रतीति हेतुः च पुनः संस्थान एव वस्तूनां संस्थानं आकारश्चतुरस्र वत्तु- लतिस्रादि प्रतीति हेतुः च पुनः संयोगा अयं अङ्गुल्याः संयोग इत्यादि व्युपदेशहेतवो विभागा अयं अतो विभक्त इति बुद्धि हेतवः एतत्पर्यायाणां लक्षणं ज्ञेयं संयोगा विभागा बहुवचनात् नव पुराणत्वाद्यवस्था ज्ञेयाः लक्षणं त्वसाधारण रूप गुणानां लक्षणं रूपादि प्रतीतत्वानोक्तं ।

(२०) भावार्थ:-पुद्गल द्रव्यका यह स्वभाव है कि एकत्व हो जाना तथा पृथक् २ अर्थात् भिन्न होना तथा संख्यावद्ध वा संस्थान रुपमें रहना। संस्थानके ५ भेद है जैसेकि परिमंडल अर्थात गो- लाकार १. वृत्ताकार २. साकार ३. चतुरंसाकार ४. दीर्घा- कार ५. और परस्पर पुद्गलोंका संयोग हो जाना, फिर वियोग होना, यह पुद्गल द्रव्यके स्वाभाविक लक्षण हैं । फिर संयोग वि. योगके होने पर जो आकृति होती है उसको पर्याय कहते हैं । अपितु पृथक् वा एकत्व होनेके मुख्यतया दो कारण हैं, स्वाभा- विक वा कृत्रिम । सो यह दो कारण ही मुख्यतया जगत्में विद्यमान हैं, जैसेकि जो कृत्रिम पुद्गल सम्बन्ध है उसके लिये सदैव काल जीव स्वः परिश्रमसे प्रायः यही कार्य करता दी. खता है । तथा काल स्वभाव नियति ३ कर्म, पुरुषार्थ अर्थात् समयके अनुसार स्वभाव होनहार कर्म पुरुषार्थका होना और उसीके द्वारा अशुभ पुद्गलोंका वियोग शुभ पुद्गलोंका संयोग होता रहे और मोक्षका साधक जीव तो सदैव काल यही परि- श्रम करता है कि मैं पुद्गलके बंधनसे ही मुक्त हो जाऊँ। जो स्वाभाविक पुद्गलका संयोग वियोग होता है, वह तो स्वः स्थि- सिके अनुसार ही होता है । तथा जो वस्त्र, भाजन, तथा धानादि जो जो पदार्थ ग्रहण करनेमें आते हैं तथा जो जो प. ३ (२१) दार्थ छोड़ने में आते हैं वह सव परिणामिक द्रव्य हैं, इस लिये उन्हें पर्याय कहते हैं ।। तथा बहुतसे अनभिज्ञ कोगोंने पुद्गलद्रव्यके स्वरूपको न जानते होंने ईश्वरकृत जगत् कल्पन कर लिया है अपितु उन लोगोंकी कल्पना युक्तिवाधित ही है। जैसे कि जब परमात्मामें सृष्टिकर्तृत्व गुण है, तव परलय कर्तृत्व गुण असंभव हो जायगा, क्योंकि एक पदार्थमें पक्ष प्रतिपक्ष रूप युग पत् समूह ठहरना न्याय विरुद्ध है। जैसे कि अग्निमें उष्ण वा भकाश गुण सदैव काळसे हैं वैसे ही शीत वा अन्धकार यह अनिमें सर्वथा असंभव हैं, इसी प्रकार इश्वरमें भी नित्य गुण एक ही होना चाहिये परस्पर विरुद्ध होने के कारणसे ।। यदि यह कहोगे कि जैसे पुद्गलकी समय २ पर्याय परि- चर्चनाके कारणसे पुद्गल द्रव्य दो गुण भी रखनें समर्थ है, इसी प्रकार इश्वरमें भी दो गुण ठहर सक्ते हैं, सो यह भी कथन स- मीचीन नहीं है क्योंकि पुद्गल द्रव्यका जब पर्याय परिवर्तन होता तब उसमें सादि सान्तपद कहा जाता है। फिर प्रथम पर्यायकी जो संज्ञा (नाम) है उसका नाश जो नूतन संज्ञा है उसकी उत्प- ति हो जाती है तो क्या ईश्वरकी भी यही दशा है ? तथा जब परलय हुइ फिर आकाशका भी अभाव हो गया तब परमात्मा सर्व व्यापक रहा किम्वा न रहा । यदि रहा तव परळय न हुई, .

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(२२) क्योंकि व्यापक शब्द ही सिद्ध करता है कि प्रथम कोई वस्तु व्याप्य है जिसमें वह व्यापक हो रहा है। यदि परमात्माकी भी परलय मानी जाये तब ईश्वरपद ही खंडित हो गया तो भला सृष्टिकर्तृत्व गुण कैसे सिद्ध होगा? सो इस विषयको मैं यहाँपर इसलिये विस्तारपूर्वक लिखना नही चाहता हूं कि मैं सिद्धान्तको ही लिख रहा हूं न तु खंडन मंडन ॥ अव नव तत्वका विवर्ण किञ्चित् मात्र लिखता हूं:- जीवाजीवाय बंधोय पुरणं पावा सवोतहा। संवरो निङरा मोक्खो संतेएतहिया नव ॥ उत्तर अशज गाथा १४।। वृत्ति-जीवाश्चेतनालक्षणाः अजीवा धर्माधर्माकाश- कालपुद्गलरूपाः वन्धो जीव कर्मणोः संश्लेषः पुण्यं शुभप्रकृति रूपं पापं अशुभं मिथ्यात्वादि आस्रवः कर्मबंधहेतुः हिंसा मृषाऽदत्तमथुनपरिग्रहरूपः तथा संवराः समिति गुप्त्यादि- भिरास्रबद्वारनिरोधः निर्जरा तपसा पूर्वाजितानां कर्मणां परि- शाटनं मोक्षः सकलकर्मक्षयात् आत्मस्वरूपेण आत्मनोऽत्र- ( २३ ) स्थानं एते नव संख्याकास्तथ्याः अवितथाः भावाः संति इति सम्बन्धः नव संख्यात्वं हि एतेषां भावानां मध्यमापेक्षं जघन्यतो हि जीवाजीवयोरेव बन्धादीनां अन्तर्भावात् योरेव संख्यास्ति उत्कृष्टतस्तु तेषां उत्तरोत्तर भेदविवक्षया अनन्तत्वं स्यात् ॥ भावार्थ:-तत्व नव ही हैं जैसे कि जीवतत्त्व १ अजीवतश्व २ पुण्यतत्त्व ३ पापतत्त्व ४ आस्रवतत्त्व ५ संवरतत्व ६ निर्ज- रातत्व ७ बंधतत्त्व ८ मोक्षतत्त्व ९ । सो जीवतत्व ही इन तत्वोंका ज्ञाता है न तु अन्य ॥जीवतत्त्वमें चेतनशक्ति इस प्रकार आभिन्न भावसे विराजमान हैं कि जैसे सूर्य प्रकाश मत्संडीमें मधुरभाव ॥ अजीवतत्त्वमें जडशक्ति भी प्राग्वत् ही विद्यमान है किन्तु वह शून्यरूप शक्ति हैं। जैसे बहुतसे यादित्र गाना भी गाते हैं। किन्तु स्वयम् उस गीतके ज्ञानशून्य ही हैं । पुण्यतत्व जीवको पथ्य आहारके समान सुखरूप है जैसे कि रोगीको पथ्याहारसे नीरोगता होती है, और रोग नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार आत्मामें जब शुभ पुण्यरूप परमाणु उदय होते हैं उस समय पापरूप अशुभ परमाणु आत्मामें उ- दयमें न्यून होते हैं किन्तु सर्वथा पापरूप परमाणु आत्मासे (२४) संसारावस्था में भिन्न नही होते क्योंकि ऐसा कोई भी माणी नही है कि जिसके एक ही प्रकृति सर्वथा रही हो । पापतत्त्व रोगीको अपथ्य आहारकी नाइ है जैसे रोगीको अपथ्य भोजन बढ़ जाता है, उसी प्रकार उसकी नीरोगता भी घटती जाती है । इसी प्रकार आत्मा जब अशुभ परमाणुओंसे व्याप्त होता है तब इसके पुण्यरूप परमाणु:भी मंद दशाको प्राप्त हो जाते हैं । आस्रवतत्त्वके दो भेद हैं। द्रव्यास्त्रव १ भावास्रव २ । द्रव्य आस्रव उसका नाम है जैसे कुंभकार चक्र करके घट उत्पन्न करता है, इसी प्रकार आत्मा मिथ्यात्वादि करके कर्मरूप आ- स्रव ग्रहण करता है । भावास्रव उसका नाम है जैसे तड़ागके पाणी आनेके मार्ग हैं इसी प्रकार जीवके आस्रव है, तथा जैसे मंदिरका द्वार नावाका छिद्र है इसी प्रकार जीवको आ- स्रव है ॥ किन्तु हिंसा, असत्य, अदत्त, अब्रह्मचर्य, परिग्रह, यह पांच ही कर्मों के प्रवेश करनेके मार्ग हैं सो इन्हींके द्वारा कर्म आते हैं, इस लिये इन्हीं मार्गोंका ही नाम भाव आस्रव है अपितु आस्रव जीव नहीं है जीवमें कर्म आनेके मार्ग हैं। सम्बरतत्त्व उसका नाम है जो जो कर्म आनेके मार्ग हैं उन्हीके वशमें करे जैसे तड़ागके पाणी आनेके मार्ग हैं उनको ( २५ ) चंद किया जावे तव नूतन जळफा आना बंद होजाता है। इसी प्रकार जो जो आस्रवके मार्ग है जब वह बंध हो गये तब नूतन कर्म आने भी बंद हुए क्योंकि शुद्धात्मा आस्रवरहित स- म्वररूप है ॥ निर्जरातत्त्व उसको कहते हैं जब संवर करके कर्मोंके आ- नेके मार्ग बंद किए जावें फिर पूर्व कर्म जो हैं उनको तपादि द्वारा शुष्क करना काँसे आत्माको रहित करना उसकाही नाम निर्जरा है ।। जैसे तदागके जलादिको दूर करना तथा मंदिरके द्वारादिके मार्गसे रजादिका निकालना अथवा नावाके जलको नावासे वाहिर करना । इसी प्रकार आत्मासे काँका भिन्न करना उसका नाम निर्जरा है ।। तप द्वादश प्रकारका निम्न सूत्रानुसार है। अनशनावमौर्य व्रतिपरिसङ्ख्यानरसप- रित्याग विविक्तशय्यासन कायक्लेशा बाह्यं तपः॥ तत्त्वार्थ सूत्र अ सू० १ए ॥- अर्थः-अनशन १ उनोदरी २ भिक्षाचरी ३ रसपरित्याग ४ विविक्त शय्यासन ५ कायक्लेश ६ यह पद प्रकारसे बाथ तप है। तथा- (२६) प्रायश्चित्त विनय वैयावृत्य स्वाध्याय व्युत् सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥ तक सू० अ०G सु० २०॥ अर्थ:-प्रायश्चित ७ विनय ८ वैयाकृत्य ९ स्वाध्याय १० व्युत्सर्ग ११ ध्यान १२ यह पद प्रकारके अभ्यन्तर तप हैं। इनका उब्वाइ सूत्र, विवाहमज्ञप्ति सूत्र, प्रश्न व्याकरण सूत्र तथा नव तत्वादि ग्रंथोंसे पूर्ण स्वरूप जानना योग्य है । बंधतत्वका यह स्वरूप है कि आत्माके साथ कर्मोंका द्रव्याथिक नयापेक्षा अनादि सान्त सम्बन्ध है और अनादि अनंत भी है, क्योंकि जीवतत्त्व अर्हनके ज्ञानमें दो प्रकारके हैं, जैसेकि-भव्य१ अभव्य सो यह.भव्य अभव्य स्वाभाविक ही जीव द्रव्यके दो भेद है किन्तु परिणामिक भाव नहीं हैं, अपितु जीव द्रव्यमें काँका सम्बन्ध पर्यायार्थिक नयापेक्षा सादि सान्त है, किन्तु इनकी एकत्वता ऐसे हो रही है जैसेकि-तिलों में तैल, दुग्धमें घृत २ सुवर्णमें रज ३ इसी प्रकार जीव द्रव्यमें क- मौका सम्बन्ध है, जिसके प्रकृतिवंधर स्थितिबंधर अनुभागबंध मदेशबंध ४ इत्यादि अनेक भेद हैं, अपितु यह काँका बंध आत्माके भावों पर ही निर्भर है ।। मोक्षतत्त्व उसको कहते हैं, जैसे तिलोंसे तैल पृथक् हो (२७) जाता है १ दुग्धसे घृत भिन्न होता है २ सुवर्णसे रज पृथक् हो जाती है ३ इसी प्रकार जीव काँसे अलग हो जाता है अपितु फिर कर्मोंसे स्पर्शमान नहीं होता जैसे तिलोंसे तैल पृथक् हो कर फिर वह तैल तिलरूप नही बनता एसे ही घृत सुवर्ण इत्यादि । इसी प्रकार जीव द्रव्य जव कोंसे मुक्त हो गया फिर उसका कर्मोंसे स्पर्श नहीं होता, किन्तु फिर वह सादि अनंत पदवाला हो जाता है । सो यह नव तत्त्व पदार्थ हैं। तथा च जीवाजीवास्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् ॥ तत्त्वार्य के इस सूत्रसे सप्त तत्व सिद्ध हैं, जैसेकि जीवतत्त्व १ अजी- वतत्त्व २ आस्रवतत्व ३ वन्धतत्व ४ सम्वरतत्व ५निर्जरातत्त्व मोक्षतत्व ७॥ किन्तु पुण्यतत्व, पापतत्व, यह दोनों ही तत्व आस्रवतत्व के ही अन्तरभूत है, क्योंकि वास्तवमें पुण्य पाप यह दोनो ही आस्रवसे आते हैं अपितु पुण्य शुभ प्रकृतिरूप आस्रव हैं, पाप अशुभ प्रकृतिरूप आस्रव । काँका बंध जीवाजीवके एकत्य होने पर ही निर्भर है क्योंकि जीवाजीवके एकत्व होने पर ही योगोत्पत्ति है, सो योगोंसे ही काँका बंद है और पुण्य पाप- से ही आस्रव है अर्थात् पुण्य पापका जो आवागमण है, वही (२८) आस्रव है। संवर निर्जरासे ही मोक्ष है, क्योंकि जब नूतन कर्मोंका संवर हो गया तव तपादि द्वारा प्राचीन काँकी निर्जरा हुई। जब आत्मा कर्मलेपसे सर्वथा रहित हो गया, सो तिस सम. यकी पर्यायको मोक्ष कहते हैं ।। सो इस प्रकारसे श्रीजिनेन्द्र देवने तत्वों का स्वरूप मति- पादन किया है तथा मुख्यतामें अईद् देवने दो ही द्रव्य कथन किये हैं जैसेकि, जीवद्रव्य १ अजीव २; किन्तु अजीव द्रव्यमें पंचद्रव्य गर्भित हैं जैसेकि-धर्मद्रव्य.१ अधर्मद्रव्य २ आकाश द्रव्य ३ कालद्रव्य ४ पुद्गलद्रव्य ५। सो यह पांच ही द्रव्य जड़ रूप हैं किन्तु जीवद्रव्य ही चेतनालक्षणयुक्त है। और इनके ही अनेक लक्षण हैं जैसेकि-अस्तित्वं, वस्तुत्वं, द्रव्यत्वं, प्रमेयत्वं, अगुरुलघुत्वं, प्रदेशत्वम् , चेतनत्वं, अचेतनत्वं, मूर्तत्वं, अमूर्तत्व।। यह दश समान गुण सर्व द्रव्योंके वीचमें हैं, किन्तु एकैक द्रव्य अष्टावष्टौ गुणा भवंति जीव द्रव्ये अचेतनत्वं मृतत्वं च नास्ति पुद्गल द्रव्ये चेतनत्वम् मूर्तत्वं च नास्तिधर्माधर्माकाशकालद्रव्येषु चेतनत्वं मूर्तत्वं च नास्ति ॥ एवं द्विद्विगुणवर्जिते अष्टावष्टौगुणा: प्रत्येक द्रव्ये भवंति ॥ दश सामान्य गुणोंका यह अर्थ है:-तीन कालमें जो स्वः चतुष्टय करि विद्यमान द्रव्य है जैसेकि स्वाद्रव्य १ स्वाक्षेत्र १ (२९) स्वाकाल ३ स्वाभाव ४ । उसका आस्ति स्वभाव है, जैसेकि घेत- नका तीन कालमें ज्ञानस्वरूप रहना, और पुद्गल द्रव्यमें अना- दि कालसे जड़ता इत्यादि । सो इसी प्रकार वस्तु द्रन्यके प्रमेय, अगुरुलघु, प्रदेश, चेतन, अचेतन, मूर्त, अमूर्त इत्यादि यह दश सामान्य गुण एक एक द्रव्यमें आठ २ सामान्य गुण हैं जैसेकि जीव द्रव्यमें अचे. तनता और मूर्तिभाव नहीं है, और पुद्गल द्रव्यमें चेतनता अमूर्तिभाव नहीं है ॥ धर्म, अधर्म, आकाश, काल द्रव्यमें चेतनता मुर्तिभाव नहीं है । इसी प्रकार दो दो गुण वर्जके शेष अष्ट अष्ट गुण सर्व द्रव्योम हैं,और विशेष पोडश गुण हैं जैसेकि ज्ञान, दर्शन, मुख, वीर्याणि, स्पर्श, रस, गंध, वर्णाः, गतिहेतुत्वं, स्थितिहेतुत्वं, अवगाहनहेतुत्वम्, वर्तनाहेतुत्वं,चेतनहेतुत्वं,अचेतन हेतुत्वं, मूतत्व, अमूर्तत्वं द्रव्याणां विशेषगुणाः पोडश विशेषगुणेषु जीव पुद्गलयोः पहिति। जीवस्य ज्ञान दर्शन मुख वीर्याणिचेतनत्व ममूर्तमिति पद ।। पुद्गलस्य स्पर्श रस गंध वर्णाः मूर्त्तत्वमचेतन मिति षट् । इतरेपा धर्माधर्माकाशकालाना प्रत्येक त्रयो गुणाः धर्म द्रव्ये गतिहेतुममूर्तत्वमचेतनत्वमेते त्रयो गुणाः । अधर्म द्रव्ये स्थि- तिहेतुत्वममूर्तत्वमचेतनत्वमिति । आकाश द्रव्ये अवगाहन , (३०) हेतुत्वममूर्तत्वमचेतनत्वमिति । काल द्रव्ये वर्तना हेतुत्वममू- तित्वमचेतनत्वमिति विशेषगुणा अन्तस्थाश्चत्वारो गुणाः स्व- जात्यपेक्षया सामान्यविजात्यपेक्षया तएव विशेष गुणाः ॥ इति गुणाधिकारः॥ भावार्थ:-इन षोडश गुणो से जीव द्रव्यमें पड् विशेष गुण हैं, जैसेकि जीव द्रव्यमें ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य, चेतनता, अमूर्तिभाव यह षद् गुण हैं; और पुद्गल द्रव्यमें भी षड् गुण है, जैसेकि स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, मूर्तिभाव, अचेतन भाव || अ- पितु अन्य द्रव्यों में उक्त विशेष गुणों से तीन तीन गुण विद्य- मान हैं जैसेकि धर्म द्रव्यमें गतिहेतुत्व (चळण लक्षण), अ- मूर्तत्व ( मूर्ति रहित ), अचेनत्व (जड़ता ), यह तीन गुण हैं। और अधर्म द्रव्यमें स्थितिहेतुत्व (स्थिर लक्षण), अमूर्ति- त्व, (मूर्ति रहित ), अचेतनत्व (जड़) यह तीन गुण हैं ।। और आकाश द्रव्यमें अवगाइनहेतुत्व (अवकाश लक्षण), अ- सूर्तत्व (मूर्ति रहित), अचेतनत्व (शून्य )॥ काल द्रव्यमें वर्च- नाहेतुत्व अमूर्त्तत्व अचेनत्व यह विशेष गुणों से तीन १ गुण प्रति द्रव्य में हैं, क्योंकि द्रव्यत्व, क्षेत्रत्व, कालत्व, भावत्व, यह चारोंकी स्वजात्यपक्षया विशेष गुण हैं और परगुणापेक्षा सा- मान्य गुण हैं।

(३१) फिर स्वभाव इस प्रकारसे जानने चाहिये:- यथा-स्वभावाः कथ्यन्ते । आस्तिस्वभावः नास्तिस्वभावः नित्य स्वभावः अनित्य स्वभाव; एक स्वभावः अनेक स्वभाषः भेद स्वभावःअभेदस्वभावः भव्य स्वभावाअभव्य स्वभावःपरम स्वभावः द्रव्याणामेकादश सामान्यस्वभावाः चेतन स्वभावः अचेतन स्व- भावः मूर्त स्वभावः अमूर्त स्वभावः एकादेशस्वभावः अनेक प्रदेशस्वभावः विभावस्वभावः शुद्ध स्वभावः अशुद्ध स्वभावः उपचरित स्वभावः एते द्रव्याणां दशविशेपस्वभावाः । जीव पुद्गलयोरेकविंशतिः चेतन स्वभावः मूर्त स्वभावः विभाव स्व- भावः एकप्रदेशस्वभावः शुद्ध स्वभाव एतैः पंचभिः स्वभावैर्वि- नाधर्मादित्रयाणां पोदशस्वभावाः संति ।। तत्र बहु प्रदेशं विना कालस्य पञ्चदश स्वभावाः एकविंशति भावाः स्युजीवपुद्गलयो- मताः । धर्मादीनां पोडश स्युः काळे पञ्चदश स्मृताः ॥ १ ॥ अर्थ:-जो तीन कालमें विद्यमान पदार्थ हैं और अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव करके अस्तिरूप हैं तिनका नाम अस्ति स्वभाव है । और जो परगुण करके नास्तिरूप है सो नास्ति स्वभाव है । जैसेकि घट अपने गुण करके अस्ति स्वभाववाला है और पट अपेक्षा घट नास्तिरूप है ऐसे ही पट; क्योंकि घट (३२) अपने गुणमें अस्तिरूप है, पंट अपने गुणमें विधमान है, परंतु परगुणापेक्षा दोनों नास्तिरूप हैं सो नास्ति स्वभाव है। जो द्रव्य गुण करके नित्यरूप है सो नित्य स्वभाव है जैसे चेतन स्वभाष ॥३॥ जो नाना प्रकारकी पर्यायों करके नाना प्रकारके रूप धारण करे सो अनित्य स्वभाव है जैसे पुद्गलका स्वभाव सं- योग वियोग है ॥ ४ ॥ जो एक स्वभावमें रहे सो एक स्वभाव जैसे सिद्ध प्रभु एक अपने निज गुण शुद्ध स्वभावमें हैं, क्योंकि काँकी अपेक्षा जीवमें मलीनता है, अपितु निजगुणापेक्षा जीव एक शुद्ध स्वभाववाला है ॥ ५ ॥ जो अनेक पर्यायों करि अनेक रूप धारण करता है सो अनेक स्वभाविक है जैसे मु. वर्णके आभूषणादि ।।६।। जहां परगुण गुणीका भेद हो उसका नाम भेद स्वभाव है, अर्थात् जो द्रव्य विरुद्ध गुण धारण करे तिसका नाम भेद स्वभाव है ॥७॥ और गुणगुणीका भेद न होना सत्य गुण वा नित्य गुणयुक्त रहना तिसका नाम अभेद स्वभाव है ॥८॥ जिसकी भविष्यत कालमें स्वरूपाकार होनेकी शक्ति है, वा सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यग् चारित्रद्वारा अपने निज स्वभाव प्रगट करनेकी शक्ति रखता है तिसका नाम भव्य स्व- भाव है ॥ ९॥ जो तीन कालमें भी अपने निज स्वरूपको प्रगट करनेमें असमर्थ है, अनादि कालसे मिथ्यात्वमें ही मगन gro (३३) उसका नाम अभव्य स्वभाव है १० ॥ जो गुणोंमें ही विराजमान है अर्थात् जो निज भावोंद्वारा निज सत्तामें स्थिति करता है उसका नाम परम स्वभाव है ॥ ११॥ यह तो ११ प्रकारके सामान्य स्वभाव है। विशेष भावों- का अर्थ लिखता हूं । जो चेतना लक्षण करके युक्त है सुखदुःख- का अनुभव करता है, ज्ञाता है, सो चेतन स्वभाव है ॥ १ ॥ जिसमें उक्त शक्तिये नहीं हैं शून्य रूप है उसका नाम अचेतन स्वभाव है ॥२॥ और जिसमें रूप रस गंध स्पर्श है उसका ही नाम मूर्तिमान है, क्योंकि मूर्तिमान् पदार्थ रूपादिकरके युक्त हो- ता है ।। ३ ॥ जिसमें रूपरसगंधस्पर्श न होवे उसका नाम अमू- तिमान है जैसे जीव ॥ ४ ॥ जैसे परमाणु पुद्गल आकाशादिकके एक प्रदेशमें ठहरता है सो एक प्रदेश स्वभाव है अर्थात स्कंध देश प्रदेश परमाणु पुद्गल इस प्रकारसे पुद्गलास्तिकायके चार भेद किए हैं ॥५॥ जो धर्मास्ति आदिकाय हैं वह अनेक प्रदेशी कही जाती है तिनका नाम अनेक प्रदेशी स्वभाव है ॥६॥ जो रूपसे रूपान्तर हो जावे जैसे पुद्गल द्रव्यके भेद हैं उसका नाम विभाव स्वभाव है ॥ ७॥ और जो अपने अनादि कालसे शुद्ध स्वभावमें पदार्थ (.३४ ) ठहरे हुए हैं जैसे षट् द्रव्य क्योंकि कोई भी द्रव्य अपने स्वभा- बको नहीं छोड़ता है और नाहीं किसीको अपना गुण देता है। अपने गुणों अपेक्षा वह शुद्ध स्वभाववाले हैं तथा जैसे सिद्धा॥८॥ जो शुद्ध स्वभावमें न रहे पर गुण अपेक्षा सो अशुद्ध स्वभाव है जैसे कर्मयुक्त जीच ॥ ९ ॥ उपचरित स्वभावके दो भेद हैं। जैसे जीवको मूर्तिमान् कहना सो काँकी अपेक्षा करके उपच- रित स्वभावके मतसे जीवको मूर्तिमान कह सक्ते हैं अपितु जीच अमूर्तिमान् पदार्थ है क्योंकि शरीरका धारण करना कोंसे सो शरीरधारी मूर्तिमान अवश्य होता है तथा जीवको जड़- बुद्धि युक्त कहना सो भी कमौकी अपेक्षा है, इसका नाम उपचरित स्वभाव है ॥ द्वितीय । सिद्धोंको सर्वदर्शी मानना वा सर्वज्ञ अनंत शक्ति युक्त कहना सो निज गुणापेक्षा काँसे रहित होनेके कारणसे है यह भी उपचरित स्वभाव ही है ॥ १०॥ इस प्रकार अनेकान्त मतमें परस्परापेक्षा २१ स्वभाव हुए | उक्त स्वभावों से जीच पुद्गलके द्रव्याथिक नयापेक्षा और पर्याया- र्थिक नयापेक्षा २१ स्वभाव हैं जैसोक-चेतन स्वभाव १ मूर्त स्वभाव २ विभाव स्वभाव ३ एक प्रदेश स्वभाव ४ अशुद्ध स्वभाव ५ इन पांचोंके विना धर्मादि तीन द्रव्योंके षोडश स्व-

( ३५ )
भाव हैं। और वहु प्रदेश विना कालके १५ स्वभाव हैं, सो यह
सर्व स्वभाव वा द्रव्योंका वर्णन प्रमाण द्वारा सापित है ।।
प्रश्न-जैन मतमें प्रमाण कितने माने हैं ?
उत्तर-चार॥
पूर्वपक्ष-सूत्रोक्त प्रमाण सह चार प्रमाणोंका स्वरूप
दिखलाईए॥
उत्तरपक्ष:-हे भव्य इसका स्वरूप द्वितीय सर्गमें सूत्रपाठयुक्त
लिखता हूं सो पदिए ।
प्रथम सर्ग समाप्त
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॥ द्वितीय सर्गः ॥ ॥ अथ प्रमाण विवर्ण ॥ मूलसूत्रम् ॥ सेकिंतं जीव गुणप्पमाणे २ तिविहे पएणते तं. नाणगुणप्पमाणे दंसणगुणप्प- माणे चरितगुणप्पमाणे सोकतं नाणगुणप्पमाणेश चजविहे पं.तं. पञ्चक्खे अणुमाणे उवमे आगम।। भावार्थ:-श्री गौतमप्रभुजी श्री भगवान्से प्रश्न करते हैं कि हे भगवन् वह जीव गुण प्रमाण कौनसा है ? क्योंकि प्रमाण उसे कहते हैं जिसके द्वारा वस्तुके स्वरूपको जाना जाये । तव श्री भगवान् उत्तर देते हैं कि हे गौतम ! जीव गुणप्रमाण तीन प्रकारसे कथन किया गया है जैसे कि-ज्ञान गुण प्रमाण १ दर्शन गुण प्रमाण २ चारित्र गुण प्रमाण ॥ फिर श्री गौतम- जीने प्रश्न किया कि हे भगवन् ज्ञान गुण प्रमाण कितने प्रकारसे वर्णन किया गया है ? भगवान्ने फिर उत्तर दिया कि-हे गौ- तम ज्ञान गुण प्रमाण चार प्रकारसे वर्णन किया गया है जैसे (.३७) कि-प्रत्यक्ष प्रमाण १ अनुमान प्रमाण २ उपमान प्रमाण ३ आ. गम प्रमाण (शास्त्र प्रमाण )४॥ मूल॥ सेकिंतं पञ्चक्खे ५ दुविहे पं. तं. इंदिय पच्चक्खे नोदिय पञ्चक्खे सेकिंतं इंदिय पच्चक्खेर पंचविहे पं.तं.सोइंदिये पञ्चक्खे चक्खुशंदिय प- चक्खे घाणिदिय पञ्चक्खे जिनिंदिय पञ्चक्खे फासिं दिय पञ्चक्खे सेतं इंदिय पञ्चक्खे ॥ भाषार्थः हे भगवन् प्रत्यक्ष प्रमाण कितने प्रकारसे वर्णन किया है ? तव श्री भगवान्ने उत्तर दिया कि-हे गौतम ! पंच प्रकारसे कहा गया है जैसे कि श्रोतेंद्रिय प्रत्यक्ष १ चक्षुरिंद्रिय प्रत्यक्ष २ घ्राणेंद्रिय प्रत्यक्ष ३ जिह्वाइंद्रिय प्रत्यक्ष ४ स्पशांद्रय प्रत्यक्ष ५॥ यह इंद्रिय प्रत्यक्ष ज्ञान है, किन्तु निश्चय नयके मतमें यह परोक्ष ज्ञान हैं अपितु व्यवहारनयके मतसे यह इंद्रिय जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष माने हैं जैसे कि-नयचक्रमें लिखा है कि- सम्यग् ज्ञान प्रमाणम् । तद्विधा प्रत्यक्ष- तर भेदात् । अवधि मनःपर्यायवेकदेश प्रत्यको केवलं सकल प्रत्यक्षं । मतिश्रुति परोदे इति - वचनात् ॥ १ ५ .

(३८) इसमें यह कथन है कि-सम्यग्ज्ञान प्रमाणभूत है किन्तु सम्यग्ज्ञान द्वि प्रकारसे है, प्रत्यक्ष और इतर । अपितु अवधि मनःपर्यवज्ञान यह देश प्रत्यक्ष है और केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष है, किन्तु मतिश्रुत परोक्ष ज्ञान हैं। इसी प्रकार श्री नंदीनी सूत्रमें भी कथन है कि मतिश्रुति परोक्ष ज्ञान है और अवधिज्ञान मनःपर्यवज्ञान केवलज्ञान यह प्रत्यक्षज्ञानहैं किन्तु व्यवहारनयके मतमे इन्द्रियजन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है।। प्रश्ना-नोइंद्रिय प्रत्यक्ष ज्ञान कौनसा है ? उत्तर:-नोइंद्रिय प्रत्यक्ष ज्ञानका स्वरूप लिखता है, पढ़िये। मूल ॥ सेकिंतं नोदिय पच्चरखे २ तिविहे पं. तं.दिनाण पञ्चक्खे मणपजावनाण पञ्चक्खे केवलनाण पञ्चश्खे सेतं नोदिय पञ्चक्खे ॥ भाषार्थ:-हे भगवन् ! नोइंद्रिय प्रत्यक्ष ज्ञान कौनसा है ? भगवान् कहते हैं कि-हे गौतम ! नोइंद्रिय प्रत्यक्ष ज्ञान तीन प्रकारसे वर्णन किया गया है जैसे कि अवधिज्ञान, मनःपर्यव ज्ञान, केवलज्ञान । यह तीन ही ज्ञान नोइंद्रिय प्रत्यक्ष ज्ञान हैं, क्योंकि यह तीन ही ज्ञान इंद्रियजन्य पदार्थों के आश्रित नहीं हैं, अपितु अवधिज्ञान मनापर्यवज्ञान यह दोनों देशप्रत्यक्ष हैं और ( ३९) केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष है | अवधि ज्ञानके पदभेद हैं जैसेकि अनुग्रामिक १ (साथही रहनेवाला), अनानुग्रामिक २ (साथ न रहनेवाला), बर्द्धमान (दृद्धि होनेवाला),हायमान ४ (हीन होने- वाला), प्रतिपातिक (गिरनेवाला),अमतिपातिकक्ष (न गिरनेवा- ला); और मनःपर्यवज्ञानके दो भेद है जैसे कि-जुमति १ और विपुलमति २। केवलज्ञानका एक ही भेद है क्योंकि यह सकल प्रत्यक्ष है । इसी वास्ते इस ज्ञानघालेको सर्वज्ञ चा सर्वदर्शी कहते हैं । इनका पूर्ण विवर्ण श्री नंदीजी सूत्रसें देखो | यह प्रत्यक्ष प्रमाणके भेद हुए अब अनुमान प्रमाणका स्वरूप लिखता हूं। मूल ॥ सेकिंतं अणुमाणे २ तिबिहे पं. तं. पुत्ववं सेसवं दिहि साहम्मवं सेकिंतं पुत्ववं मायापुत्तं जहाणडं जुवाणं पुणरागयंकाई प- चभि जाणिज्जा पुलिंगेण केणइतरक्खइयणवा वएणणवा मसणवा लंबणेणवा तिलएणवा सेतं पुछवं ॥ भापा:-शिष्यने गुरुसे प्रश्न कियाकि हे भगवन् अनु- (४०) मान प्रमाण कितने प्रकारसे प्रतिपादन किया गया हैं ? तब गुरु पृछकको उत्तर देते हैं कि हे धर्मप्रिय ! अनुमान प्रमाण तीन प्रकारसे वर्णन किया गया है जैसेकि पूर्ववत् १ शेषवत् २ दृष्टिसाधीवत् ३ ॥ शिष्यने पुनः प्रश्न किया कि हे भग- चन् पूर्ववत्का क्या लक्षण है ? तव गुरु इस प्रकारसे उत्तर देते हैं कि हे शिष्य जैसे किसी माताका पुत्र बालावस्थासे ही प्रदेशको चला गया किन्तु जुवान होकर वह वालक फिर उसी नगरमें आ गया तव उसकी माता पूर्व लक्षणों करके जोकि उसको निश्चित हो रहे हैं उन्हों लक्षणों करके जैसेकि जन्म समय पुत्रके शरीरमें क्षति किसी प्रकारसे हो गई हो उस क- रके अथवा वर्ण करके मषादि करके वा स्वस्तिकादि लक्षणों करके तथा शरीरमें पूर्व दृष्ट तिलादि करके अपने पुत्र होने का निश्चय करती है । जवकि उसका पूर्व लक्षणों करके निश्चय हो गया तब वे अपने पुत्रसे प्रेम करती है सो यह पूर्ववत् अनुमान प्रमाण है । पुनः शेषवत् इस प्रकारसे है जौसकि- मूल ॥ लेकिंतं सेसवं २ पंचविहे पं.तं. क- ज्जेणं कारणेणं गुणेणं अवयवेणं आसयणं से- किंत कज्जेणं २संक्खसदेणं नेरितालियणं वसन्न (४१) ढकिएणं मोरंकंकाइएणं हयहसिएणं हत्थिगुल- गुलाइएणं रहंघणघणाश्एणं सेतं कजेणं ॥ भापार्थ:-श्री गौतम प्रभुजी श्री भगवान से पूछते हैं कि, हे भगवन् ! वे कौनसा है शेषवत् अनुमान प्रमाण ! तब भगवान् प्रतिपादन करते हैं कि हे गौतम ! शेषवत् अनुमान प्र- माण पंच प्रकारसे कहा गया है जैसेकि कार्य करके १ कारण करके २ गुण करके ३ अवयव करके ४ आश्रय करके ५ ।। फिर गौतमजीने प्रश्न कियाकि हे भगवन् ! वे कौनसा है शेपवद अनुमान प्रमाण जो कार्य करके जाना जाता है ? तब भगवान्ने उत्तर दिया कि हे गौतम ! जैसे शंख (संख) शब्द करके जाना जाता है अर्थात् शंखके शब्द को सुनकर संखका ज्ञान हो जाता है कि यह शब्द शंखका हो रहा है, इसी प्रकार भेरी ताडने करके, पभ शब्द करके, मयूर (मोर ) कंकारव करके, अश्व शब्द करके अर्थात् हिपन करके, इस्ति गुलगुलाट करके, रथ घण घण करके, यह कार्याधीन अनुमान प्रमाण है, क्योंकि उक्त वस्तुयें कार्य होने पर सिद्ध होती हैं अ- र्थात् कार्य होने पर उनका अनुमान प्रमाण द्वारा यथार्थ ज्ञान हो जाता है।

( ४२ ) अध कारण अनुमान प्रमाणका वर्णन करते हैं। मूल ॥ सोकतं कारणेणं तंतवो पमस्स कारणं नपमे तंतुकारणं एवं वीरणा कडस्स कारणं नक- मो वारणा कारणं मयपिंडो घडस्स कारणं नघको मयपिंडस्स कारणं सेतं कारणेणं ॥ भाषार्थः-पूर्वपक्षः-कारणका क्या लक्षण है ? उत्तर पक्ष:- जैसे तंतु पटके कारण हैं किन्तु पट तंतुओंका कारण नहीहै तथा जैसे तृण पल्यंकादिका कारण है अपितु पल्यंक तृणादिका कारण नही है तथा मृत्तपिंड घटका कारण है न तु घट मृत्तपिंडका कारण, इसका नाम कारण अनुमान प्रमाण है, क्योंकि इस भेदके द्वारा कार्य कारणका पूर्ण ज्ञान हो जाता है और कारण के सदृश्य ही कार्य रहता है। जैसे मृत्तिकासे घट अपितु वह घट सदूरूप मृत्तिकाही है न तु पटमय; इसी प्रकार अन्य भी कारण कार्य जान लेने ॥ अथ गुण अनुमान प्रमाणका वर्णन किया जाता है- मूल ॥ सकिंतं गुणेणं २ । सुवनं निकसेणं पुप्फंगंधेणं लवणं रसेणं मरंआसाणं वत्थंफा-

(४३)
सेणं सेतं गुणेणं ॥
भापार्थः-प्रश्ना-गुण अनुमान प्रमाणका क्या लक्षण है ?
उत्तर:-जैसे सुवर्ण पापाणोपरि संघर्पण करनेसे शुद्ध
प्रतीत होता है अर्थात् सुवर्णकी परीक्षा कसोटीपर होती है,
पुष्प गंध करके देखे जाते हैं, लवण रस करके वा मदिरा आ-
स्वादन करके, बन स्पर्श करके निर्णय किए जाते हैं, विसका
नाम गुण अनुमान प्रमाण है, क्योंकि गुणके निर्णय होनेसे प-
दार्थोके शुद्ध वा अशुद्धका शीघ्र ही ज्ञान हो जाता है ।
अथ अवयव अनुमान प्रमाणके स्वरूपको लिखता हूं-
मूल ॥ सेकिंतंअवयवेणं २ महिसं सिंगणं
कुक्कुडसिहायणं हथिविसाणेणं वाराहदाढाणं
मोरपिजेणं आसंक्खुरेणं वग्नहेणं चमरिवाल-
ग्गणं वानरंनंगूलेणं दुप्पयमणुस्समादि चप्प-
यंगवमादि बहुप्पयंगोमियामादि सीहंकेसरेणं
वसहकुकुहेणं महिलंवलयबाहाहि परियारबंधे-
एं नडजाणेजा महिलियं निवसणेणं सित्येणं
दोणपागंकविंचएकाएगाहाए सेतं अवयवेणं॥१॥

(४४) भाषार्थः-(प्रश्नः ) अवयव अनुमान प्रमाणके उदाहरण कौन २ से है अर्थात् जिन उदाहरणों के द्वारा अवयव अनुमान प्रमाणका बोध हो, क्योंकि अवयव अनुमान प्रमाण उसे कहते हैं जिस पदार्थके एक अवयव मात्रके देखने से पूर्ण उस पदा- थके स्वरूपका ज्ञान हो जाये ।। (उत्तरः) जैसे महिप शृंग क- रके, कुर्कुट शिखा करके, हस्ति दांतों करके, शूकर दादा करके, अश्व खुरकरके, मयूर पूछ करके, वाघ नख करके, चमरी गायवा- लों करके, वानर लांगुल (पूछ ) करके, मनुष्य द्विपद क- रके, गवादि पशु चार पद करके, कानखरजुरादि वहुपदकरके, सिंह केसरकरके, वृपम स्कंध करके, स्त्री सुजाओंके आभूपण करके शुभट राजचिन्हादि करके तथा स्त्री वेप करके, एक सित्य मात्रके देखनसे हांडीके तंडुलादिकी परीक्षा हो जाती है, कविकी परीक्षा एक गाथाके उच्चारणसे हो जाती है, इसका नाम, अवयव अनुमान प्रमाण है, क्योंकि एक अंश करके वोध हुआ सर्व अंशोका बोध हो जाता है जेसेकि, आगममें कहा है कि (जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ) जो एकको जानता है वह सर्वको जानता है जो सर्वको जानता है वह एकको भी जानता है ।। अथ आश्रय अनुमान प्रमाण स्वरूप इस मकारसे कथन किया जाता है जैसेकि- (४५) मूल ॥सेकिंतं आसयणं २ अग्गि धूमणं सलिलं वलागेणं बुष्ठि अन्न विकारेणं कुल पुत्तसील समायारेणं । सेतं आसयणं सेतं सेसवं॥ भाषार्थ:-श्री गौतमजीने पुनः प्रश्न कियाकि हे भगवन् ! आश्रय अनुमान प्रमाण किस प्रकारसे वर्णन किया गया है ? भगवान् उत्तर देते है कि हे गौतम ! आश्रय अनुमान प्रमाण इस मकारसे कथन किया गया है कि जैसे अग्नि धूम करके जाना जाता है, जल वगलों करके निश्चय किया जाता है, दृष्टि वादोंके विकारसे निर्णय की जाती है, कुल पुत्र शील समाचर- णसे जाना जाता है, इसका नाम आश्रय अनुमान प्रमाण है और इसकेही द्वारा साध्य, सिद्ध, पक्ष, इत्यादि सिद्ध होते हैं। सो यह शेषवत् अनुमान प्रमाण पूर्ण हुआ ॥ अब दृष्टि साधयंता का वर्णन किया जाता है- मूल । सेकिंतं दिठिसादम्म २ विहे पं. तं. सामानविटंच विसेसदिडंच सेकिंतं सामा- नदिलु २ जहा एगो पुरिसो तहा बहवे पुरिसा (४६) जहा वहवे पुरिसा तहा एगे पुरिसे जहा एगो करिसावणो तहा वहवे करिसावणो जहा व. हवे करिसावणो तहा एगे करिसावणो सेतं सामान्नदिई॥ भावार्थ:-(प्रश्नः) दृष्ट साधर्म्यता किस प्रकारसे वर्णित है ?(उत्तर) दृष्ट साधर्म्यता द्वि प्रकारसे वर्णन की गइ है जैसेकि- सामान्यष्ट १ विशेषदृष्ट २॥ (पूर्वपक्ष) सामान्य दृष्टके क्या २ लक्षण हैं ?( उत्तरपक्षा) जैसे किसीने एक पुरुषको देखा तो उसने अनुमान कियाकि अन्य पुरुष भी इसी प्रकारके होते हैं तथा जैसे किसीने पूर्वीय पुरुषके कृष्ण वर्गको देखकर अनुमान किया अन्य भी पूर्वीय मायः इसी वर्णके होंगे। इसी प्रकार युरो. पमें गौर वर्णताका अनुमान करना । ऐसे ही सुवर्ण मुद्रादिका विचार करना क्योंकि जैसे एक मुद्रा होती है प्रायः अन्यभी उसी प्रकारकी होंगी, इस अनुमानका नाम सामान्य दृष्ट है ।। प्रायः शब्द इस लिये ग्रहण है कि आकृतिमें कुछ भिन्नता हो परंतु वास्तवमें भिन्नता न होवे, उसका नाम सामान्य दृष्ट है ।। अव विशेष दृष्टका लक्षण वर्णन करते हैं ॥.

(४७) मूल ॥ सेकिंतं विससदिढ २से जहा नामए के पुरिस्से वहुणं मज्केपुत्वं दिलु पुरिसं पञ्चन्नि जाणेझा अयं पुरिसे एवं करिसावणे ॥ भाषाय:-श्री गौतम प्रभुजी भगवान् से पृच्छा करते है कि-हे भगवन् ! विशेष दृष्ट अनुमान प्रमाण किस प्रकारस है ? भगवान् उत्तर देते हैं कि हे गौतम ! विशेष दृष्ट अनुमान प्रमाण इस प्रकारसे है जैसेफि-किसी पुरुपने किसी अमुक व्यक्ति को किसी अमुक सभा में बैठे हुएको देखा तो मनमें वि. चार किया कि यह पुरुप मेरे पूर्वदृष्ट है अर्थात् मैंने इसे कहीं पर देखा हुआ है, इस प्रकारसे विचार करते हुएने किसी लक्षणद्वारा निर्णय ही करलिया कि यह वही पुरुष है जिसको मैं- ने अमुक स्थानोपरि देखा था। इसी प्रकार मुद्राकी भी परीक्षा करली अर्थात् बहुत मुद्राऑमसे एक मुद्रा जो उसके पूर्व दृ- ट थी उसको जान लिया उसका ही नाम विशेष दृष्ट अनुमान प्रमाण है ॥ अपितु- मूल ॥ तंसमास तिविहं गहणं नव- इतं. तीयकालग्गहणं पमुप्पणकालग्गहणं अ- णागयकालग्गहणं ॥

(४८) भाषार्थ:-विशेष दृष्ट अनुमान प्रमाणहारा तीन काल ग्रहण होते हैं अर्थात् उक्त प्रमाणद्वारा तीन ही कालकी वातोंका नि. र्णय किया जाता है जैसेकि भूत कालकी वार्ता १ वर्तमान कालकी २ और भविष्यत कालमें होनेवाला भाव, यह तीन कालके भाव भी अनुमान प्रमाणद्वारा सिद्ध हो जाते हैं। मूल ॥ संकिंतं तीयकालग्गहणं उचिणाई वणाई निष्फनसबसस्संवा मेईणि पुन्नाणि कुंम सर नदि दहसरण तलागाणि पासित्ता तेणं साहिडाइ जहा सुवुट्टी आसीसेतं तीयका- लग्गहणं॥ भाषार्थ-(पूर्वपक्ष) अनुमान प्रमाणके द्वारा भूतकालके पदार्थोंका बोध कैसे होता है । ( उत्तरपक्ष ) जैसे उत्पन्न हुए हैं पनों में तृणादि, और पूर्ण प्रकारसे निष्पन्न हैं धान्न, फिर पृथि- वीमें भली प्रकारसे सुंदरताको प्राप्त हो रहे हैं और जलसे पूर्ण भरे हुए हैं कुंड, सरोवर, नदी, द्रह, पानीके निझरण, सो इस प्रकारसे भरे हुए तड़ागादिको देखकर अनुमान प्रमाणसे कहा जाता है कि इस स्थानोपरि पूर्व सुदृष्टि ईथी क्योंकि ( १९) सुदृष्टिक होनेपर ही यह लक्षण हो सक्ते है सो इसका नाम सूत अनुमान प्रमाण है क्योंकि इसके द्वारा भूत पदार्योंका चोध भली प्रकारसे हो जाता है। मूल ॥सेकित्तं पमुप्पण कालग्गहणं २ साहु गोयरग्गगयं विडमिय पजर भत्तपाणं पासित्ता तेणं साहिजइ जहा सुन्निक्खं वदृश् सेतं पमुप्पन्न कालग्गदणं ॥ भाषार्थ:-(प्रश्न ) किस प्रकारसे वर्तमान कालके पदा- याँका अनुमान प्रमाणके द्वारा बोध होता है ? ( उत्तर ) जैसे कोई साधु गौचरी (भिक्षा) के वास्ते घरों में गया तब साधुने घरों में प्रचुर अन्नपानीको देखा अपितु इतना ही किन्तु अनादि पहुतसा परिष्ठापना करते हुओंको अवलोकन किया सब साधु अनुपान प्रमाणके आश्रय होकर कहने लगाकि जहां पर मुभिक्ष (मुकाळ ) वर्तता है, सो यह वर्तमानके पदार्थोंका बोध करा- नेवाला ई-अनुमान प्रमाण है ।। मूल ॥ सेकिंतं अणागय कालग्गहणं २ अ- मनस्स निम्मलतं कसिणाय गिरिस विज्जुमेहा (५०) थपियवाउमाणं संज्झानिघाघरताय वारुणं वामाहिंदंवा अन्नयरं पसत्थ मुप्पायं पासित्ता तेणं साहिडाइ जहा सुवुष्टि नविस्तर सेतं अणागय कालग्गहणं ॥ भापार्थः-(पूर्वपक्ष) अनुमान प्रमाणके द्वारा अनागत भविष्यत ) काळके पदार्थों का वोध किस प्रकारसे हो सकता ? ( उत्तरपक्ष ) जैसे आकाश अत्यन्त निर्मल है, संपूर्ण पर्वत कृष्ण वर्णताको प्राप्त हो रहा है अर्थात् पर्वत रजादिकरके युक्त नहीं है, और विद्युत (विजुली) के साथ ही मेघ है अर्थात् यदि वृष्टि होती है तब साथ ही विजुली होती है, वर्षांके अनु- कुल ही वायु है, और सन्ध्या स्निग्ध है, वारुणी मंडलके नक्ष- त्रोंमें बहुत ही सुंदर उत्पात उत्पन्न हुए हैं, क्या चन्द्रादिका योग माहिन्द्र मंडलके नक्षत्रोंके साथ हो रहा है, इसी प्रकार अन्य भी सुंदर उत्पातोंको देखकर और अनुमान प्रमाणके आ- अय होकर कह सक्ते हैं कि सुदृष्टि होनेके चिन्ह दीखते हैं अ- र्थात् मुवृष्टी होगी ॥ यह भविष्यत कालके पदार्थों के ज्ञान होने- वाला अनुमाण प्रमाण है क्योंकि इनके द्वारा अनागत कालके सदार्थों का बोध हो जाता है ।

(५१ ) मूल । एएसिंविवजासेणंति विहंगदणं न- वइतं. तीयकालग्गहणं पमुप्पण कालग्गहणं अ. पागय कालग्गहणं सेकिंतं तीयकालग्गहणं णित- एणवणाई अनिप्फणसस्संवा मेईणी सुक्काणिय कुंड सर णदि दह तलागाणि पासित्ता तेणं सा- हिडाइ जहा कुवुष्टिासी सेतं तोयकालग्गहणं॥ भावार्थ:-जो पूर्व तीन कालके पदार्थीका अनुमान प्रमा- के द्वारा ज्ञान होना लिखा गया है उससे विपरीत भी तीन कालके पदायाँका बोध निम्न कथनानुसार हो जाता है । जैसेकि तृणले रहित वर्ण है, पृथ्वीम धान्नादि भी उत्पन्न नहीं हुए है, और कुंड, सर, नदी, द्रह, तडागादि भी सर्व जलाशय शुष्क हुए दीखते हैं अर्थात् जलाशय शुके हुए हैं, तव अनुमान प्रमाणके द्वारा निश्चय किया जाता है कि जहांपर कुष्टी है सृष्टी नही है, क्योंकि यदि मुष्टी होती तो यह जलाशय क्यों शुष्क होते सो इसका नाम भूतकाल अनुमान प्रमाण है ।। मूल ॥ सेकित्तं पमुप्पन्न कालग्गहणं ५ सा-

हु
(५२ )
गोयरग्गगयं निक्खं अलभ्भमाएं पासिता
तेषं साहिजारजहादुनिखं वदृश्सेतं पमुप्पन्न
कालग्गहणं ॥
भाषार्थ:-(पूर्वपक्ष) वर्तमानके पदार्थों का बोध करानेवाला
अनुमान प्रमाणका क्या लक्षण है?(उत्तरपक्षः)जैसे साधु गोचरीको
प्राम वा नगरादिमें गया तब भिक्षाके न माप्त होनेपर वा घरोंमें
प्रचुर अन्नादि न होनेपर अनुमान प्रमाणके द्वारा कहा जाता है
कि जहाँपर दुर्भिक्ष वर्तता है, इसलिये इसका नाम वर्तमान अनु-
मान प्रमाण ग्रहण है ।।
मूल ॥ सेकित्तंश्रणागय कालग्गहणं धुमाउ
तिदिसाउ संविय मेईणीअप्पमिवछावायानेर
या खलु कुवुष्टि मेवं निवेयंति अग्गेयं वा वायवं
वा अन्नयरं वा अप्पसत्थं जप्यायं पासित्ता तेणं
साहिङ कुवुष्टि.नविस्सइ सेतं अणागय का-
लग्गहणं सेत्तं विसेसदिलु सेनं दिठि साहम्म
सेत्तं श्रनुमाणे ॥

(५३) भाषार्थ:-(पूर्वपक्षः) अनागत कालके पदार्थोका वोधजन्य अनुमान प्रमाण किस प्रकारसे वर्णन किया गया है ? (उत्तरपक्ष) जैसेकि धूपसे दिशाओं आच्छादित हो रही हैं और रजादि करके मेदनी युक्त है अर्थात् पृथ्वीमें रज बहुत ही हो रही हैं, पुद्गक परस्पर अपतिबद्ध भावको माप्त हैं अर्यात् वर्षाके अनुकूल नही है, वायु नैरतादि कू में विद्यमान है और अग्निमंडळके नक्षत्र पा व्यायत्रमंडळके नक्षत्रोंका योग हो रहा है, इसी प्रकार अन्य कोई अप्रशस्त उत्पातको देखकर अनुमान होता कि कुष्ठि होनेके चिन्ह दीखते हैं अर्थात् कुष्टि होवेगी। यही अनागतकाळ ग्रहण अनुमान प्रमाण है; इसीके द्वारा भविष्यत काळके पदार्थोंका x अग्निमंडलके नक्षत्रों के निम्नलिखित नाम है | कृतिका १ विशाखा २ पूर्वमाद्रवपद ३ मघा ४ पुप्य ५ पूर्वाफाल्गुणी ६ मरणी ७॥ अथ व्यायव मंडलंके नक्षत्र लिखते हैं । जैसेकि-चित्रा १ हस्त २ स्वाति ३ मृगशिर ? पुनर्वसु ५ उतराफाल्गुणी ६ मश्वनी ७॥ अपितु वारुणी मंडलके नक्षत्र यह हैं-अश्लेपा १ मूल २ पूर्वापाड़ा ३ रेवती ४ शतमिशा ५ आर्द्रा ६ उत्तरामाद्रवपद ॥अथ माहेन्द्र मंडलके निम्न हैं-ज्येष्टा १ रोहणी २ अनुराधा ५ प्रवण ४ धनेष्टा ५ उतरापाड़ा ६ अभिजित ७॥

(५४) वोध हो सक्ता है । सो यह विशेष दृष्ट है और यही दृष्टि सा- धम्यत्वं अनुमान प्रमाण है सो यह अनुमान प्रमाणका स्वरूप संपूर्ण हुआ। मूल ॥ लेकित्तं उवमे २ऽविहे पं. तं. सा- हम्मोवणीयए वेहम्मोवणीयए सोकतं साहम्मो वणीयए तिविहे पं. तं. किंचिसाहम्मोवणीए पायसाहम्मोवणीए सबसाहम्मोवणीए । भाषार्थः-श्री गौतमप्रभुनी भगवान्से प्रश्न करते हैं कि हे भगवन् उपमान प्रमाण किस प्रकारसे वर्णन किया गया है ? भगवान् कहते हैं कि हे गौतम ! उपमान प्रमाण द्वि प्रकारसे वर्णन किया गया है जैसेकि साधोपनीत १ वैधोपनीत २॥ गौतम. जीने पुनः पूर्वपक्ष कियाकि हे भगवन् साधोपनीत कितने प्र- कारसे कथन किया गया है ? भगवान्ने फिर उत्तर दियाकि हे गौतम! साधोपनीत अनुमान प्रमाण तीन प्रकारसे कथन किया गया है जैसेकि किञ्चित् साधोपनीत अनुमान प्रमाण १ प्राय: साधोपनीत अनुमान प्रमाण २ सर्व साधम्योपनीत अनुमान प्रमाण ३ ॥ इसी प्रकार गौतमजीने पूर्वपक्ष फिर किया ।

(५५) मूल ॥ सेकित्तं किंचि साहम्मोवणोए २ जहा मंदिरो तहा सरिसवो जहा सरिसवो तहा मंदिरो एवं समुदो २ गोप्पयं आश्चोखज्जोत्तो चंदोकुमुद्दो सेत्त किंचि सादम्मे ॥ भाषार्थ:- पूर्वपक्षः ) किंचित् साधोपनीत किस प्रकार प्रतिपादन किया है ? (उत्तरपक्षः) जैसे मेरुपर्वत वृत्त (गोल) है इसी प्रकार सरसवका बीज भी गोल है, सो यह किश्चित् मात्र साधर्म्यता है क्योंकि वृत्ताकारमें दोनोंकी साम्यता है परंतु अन्य प्रकारसे नही है। ऐसे ही अन्य भी उदाहरण जान लेने- जैसेकि समुद्र गोपाद, आदित्य (सूर्य) और खद्योत, चंद्र और कृमुद, सो यह किंचित् साधर्म्यता है । मूल ॥ सेकित्तं पाय साहम्मोवणीय २ जहा गो तहा गवउ जहा गवउ तहा गो से पाय- पाय साहम्मे ॥ भापार्थ:-(प्रश्नः ) वह कौनसा है प्रायः साधोपनीत उपमान प्रमाण ? ( उत्तरः) जैसे गो है वैसी ही आकृतियुक्त (५६) नीलगाय है, केवल:सास्त्रादि वर्जित है किन्तु शेष अवयव मायः साधर्म्यतामें तुल्य हैं; इसी वास्ते इसका नाम मायः साधम्र्यो- पनीत अनुमान प्रमाण है ॥ अथ सर्व साधोपनीतका वर्णन किया जाता है। मूल ॥सेकित्तं सब साहम्मोवमनस्थि तहा वितस्स तेणेव उवमं कीर तंजहा अरिहंतेर्दि अरिहंत सरिसं कयं एवं चक्रवटिणा चक्कवट्टी सरिसं कयं बलदेवेणं बलदेव सरिसं कयं वासु. देवेणं वासुदेव सरिसं कयं साहुणा साहु स- रिसं कयं सेत्तं सब साहम्मे सेत्तं सब साहम्मो- वर्षीय ॥ भाषार्थ:-(मनः) वह-कौनसा है सर्व साधोपनीत उप- मान प्रमाण ? ( उत्तरः) सर्व साधोपनीत उपमान प्रमाणकी कोई भी उपमा नहीं होती है परंतु तद्यपि उदाहरण मात्र उपमा करके दिखलाते हैं। जैसेकि अरिहंत (अईन)ने अरिहंसके सामान ही. कृत किया है इसी प्रकार चक्रवतीने चक्रवतीके तुल्य ही (५७) कार्य कीया है, बलदेवने चलदेवके सामान, वासुदेवने वासुदेवके सामान कृत किये हैं तथा साधु साधुके सामान.व्रतादिको पालन करता है, यह सर्व साधोपनीत उपमान प्रमाण है ।। मूल ॥ सेकिंत्तं वेहम्मोवणीय २ तिविहे पं. तं. किंचिवेहम्मे पायवेहम्मे सबवेहम्मे से- कित्तं किंचिवेहम्मे जहा सामलेरो न तहा वा- हुलेरो जहा वाहुलेरो न तहा सामलेरो से किंचिवेहम्मे ॥ भाषार्थ:-(प्रश्नः ) वह कौनसा है वैधयोपनीत उपमान प्रमाण ? (उत्तरः) वैधोपनीत उपमान प्रमाण तीन प्रका- रसे वर्णन किया गया है जैसेकि-किंचित् वैधम्र्योपनीत उपमान प्रमाण १ प्रायः वैधयत्व र सर्व वैधय॑त्व १ ॥(पूर्वपक्षा) कि- चित् वैधयं उपमान प्रमाणका क्या उदाहरण है? (उतरपक्षः) जैसे श्याम गोका अपत्य है वैसी ही श्वेत गोका अपत्य नही है अ- यदि जैसे श्याम वर्णको गोका वत्स है वैसे ही श्वेत गोका वत्स नहीं है, क्योंकि वर्णमें भिन्नता है इसका ही नाम किंचित् वैधर्म्यत्व अपमान है। सर्व अवयवादिमें एकत्वता सिद्ध होनेपर केवळ वर्ण- की विभिन्नतामें किंचित् वैधय॑त्व उपमान प्रमाण सिद्ध हो गया । .

(५८)
मूल ॥ सेकित्तं पायवेहम्मे जहा वायसो
न तहा
पायसो
जहा
पायसो न तहा बायसो
सेत्तं पाय वेहम्मे ॥
भाषार्थः-(पूर्वपक्षः ) प्रायः वैधर्म्यताका भी उदाहरण
दिखलाइये । (उत्तरपक्षः) जैसे काग है तैसे ही हंस नहीं है और
जैसे हंस है वैसे काग नही है, क्योंकि काक-हंसकी पक्षी होने.
पर ही साम्यता है किन्तु गुण कर्म स्वभाव एक नहीं है, इसीलिये
प्रायः वैधय॑त्व उपमान प्रमाण सिद्ध हुआ है ।।
मूल ॥ सेकित्तं सबवेहम्मे २ नत्थि तस्स
उवमं तहावितस्स तेणेव उवमं कीरइतं. नोचणं
नीचसरिसं कयं दासेणं दास सरिसं कयं का.
गेणं कागसरिसं कर्य साणेणं साण सरिसं कयं
पाणेणं पाणं सरिसं कयं सेत्तं सब वेहम्मे सेत्तं
विहम्मोवणीय सेत्तं उवमे ॥
१ वृत्तमें वैधर्नाकी उपमा-क्षीर और काकसे लिखी है कि
वर्ण मादिकी वैधर्म्यता है।

(५९) भाषार्थः-( पूर्वपक्षः ) सर्व वैधयंताके उदाहरण किस प्र- कारसे होते हैं ? ( उत्तरपक्षः ) सर्व वैधयंताके उदाहरण नहीं होते हैं किन्तु फिर भी सुगमताके कारणसे दिखलाये जाते हैं, जैसे कि-नीचने नीचके सामान ही कार्य किया है, दासने दासके ही तुल्य काम कीया है, काकने काकवतही कृत किया है वा चांडालने चांडाल तुल्य ही क्रिया की है सो यह सर्व वैधयंताके ही उदारण हैं । इसलिये जहांपर ही सर्व वैधोपनीत उपमान प्रमाण पूर्ण होता है इसका ही नाम उपमान प्रमाण है। इसके ही आधारसे सर्व पदार्थोंका यथायोग्य उपमान किया जाता है। अब आगम प्रमाणका वर्णन करते हैं। मूल ॥ सेकित्तं आगमे २ दुविहे पं. तं. लो- श्य लोयुत्तरिय सेकित्तं लोइय २ जन्नंइमं अन्ना- णीहिं मिच्छादिहीहिं सबंद बुद्धिमइ विगप्पि- यं तं नारदं रामायणं जाव चत्तारि वेया संगो- वंगा सेत्तं लोश्य आगमे॥ भावार्थ:-श्री गौतम प्रभुजी भगवान से प्रश्न करते हैं कि हे प्रभो ! आगम प्रमाण किस प्रकारसे वर्णन किया गया है ?

(६०) तव श्री भगवान् उत्तर देते हैं कि.हे गौतम ! आगम प्रमाण द्विविधसे प्रतिपादन किया है जैसेकि कौकीक आगम १ कोको- तर आगम २॥ श्री गौतमजी पुनः पूछते है कि हे भगवन् लो- कीफ आगम कौनसे हैं ? भगवनि उत्तर देते हैं कि हे गौतम! सकि मिथ्यादृष्टि लोगोंने अज्ञानताके प्रयोगसे स्वछंदतासे कल्पना करलिये हैं भारत रामायण यावत् चतुर वेद सांगोपांग पूर्वक, यह सर्व लौकीक आगम है, क्योंकि इन आगोंमें पदा- याँका सत्य २ स्वरूप प्रतिपादन नहीं किया है अपितु परस्पर विरोधजन्य कथन है, इस लिये ही इनका नाम लौकीक मागम है। मूल ॥सेकित्तं लोगुत्तरिय आगमे २ जश्म अरिहंतेहिं नगवंतेहिं जावपणीय दुवालसंगं तंजहा आयारो जावंदिठिवाओ से लोगुत्त- रिय आगमे॥ भाषार्थ:-(प्रश्नः) कोकोत्तर आगम कौनसे हैं ? (उत्तर) ज़ो यह प्रत्यक्ष अरिहंत भगवंत कर करके प्रतिपादन किये गये हैं, द्वादशांग आगमरूप सूत्र समूह जैसेकि आचारांगसे (६१) हुक्षा दृष्टिवादमयन्त आगम है, यह सर्व लोकोत्तर आगम हैं क्यों कि पदार्थोंका सत्य २ स्वरूप द्वादशांगरूप आगममें प्रतिपादन किया हुआ है, क्योंकि स्याद्वाद मतमें पदार्थोंका सप्त नयोंके द्वारा पथावत् माना गया है जोकि एकान्त नय न माननेवाले उक्त सिद्धान्तसे स्खलित हो जाते हैं । मूल ॥ थहवा श्रागमे तिविहे पं. तः सु. तांगमेय अत्थागमेय तऽभयागमे ॥ भाषार्थ:-अथवा आगम तीन प्रकारसे कथन किया गया है। जैसेकि-सूत्रागम १ अर्थागम २ तदुभयागम ३ अर्थात् सूत्ररूप आगम १ अर्यरूप आगम २ सूत्र और अर्थरूप आगम ३ ॥ मूल ॥ अदवा भागमे तिविहे पं. तं. अ- 'द्वादशाङ्ग आगमोंके निम्नलिखित नाम हैं। आचारांग सूत्र १ सूयगडांग सूत्र २ ठाणांगसूत्र । स्थानांग सूत्र ४ विवाह प्रज्ञप्ति सूत्र ५ ज्ञाता धर्म कथांग सूत्र ६ उपासक दशांग सूत्र ७ मंतछत सूत्र ८ अनुत्रोववाइ सूत्र ९ प्रभव्याकरण सूत्र १० विपाकसूत्र ११ दृष्टिवाद सूत्र १२ ॥

(६२) नागमे अत्तरागमे परंपरागमे तित्थगराणं अ- स्थस्स अत्तागमे गणदाणं सुत्तस्स अत्तागमे अत्थस्स थर्णचरागमे गणहर सीस्ताणं सुत्त- स्स अणंत्तरागमे अत्थस्ल परंपरागमे तेण. परं सुत्तस्सावि अत्यस्साव नोअत्तागमे नोअणंत- रागमे परंपरागमे सेत्तं लोगुत्तरिय सेत्तं आगमे सेत्तं नाण गुणप्पमाणे॥ भाषार्थ:-अथवा आगम तीन प्रकारसे और भी कथन किया गया है जैसे कि आत्मागम १ अनंतरागम २ परंपरागम ३ । किन्तु तीर्थंकर देवको अर्थ करके आत्मागम है और गण- धरों को सूत्र करके आत्मागम है अपितु अर्थ करके अनंतराग- 'म है २॥ परंतु गणधरके शिष्योंको सूत्र अनंतरागम है अर्थपरं- परागम है उसके पश्चात् सूत्रागम भी अर्थागम भी नहीं है आ- मागम नही है अनंतरागम केवल परंपरागम ही है । यही लोगो- तर आगमके भेद हैं । इसका ही नाम ज्ञान गुण प्रमाण है ।। अथ दर्शन गुण प्रमाणका स्वरूप लिखता हूँ ॥ .

(६३) मूल ॥ सेकित्तं दंसण गुणप्पमाणे २ चन- विहे पं. तं. चक्खु देसण गुणप्पमाणे अचक्षु दसण गुणप्पमाणे जहि दसण गुणप्पमाणे केवल दसण गुणप्पमाणे॥ भाषार्थ:-(प्रश्नः) दर्शन गुण प्रमाण किस प्रकारसे है ! (उत्तर) दर्शन गुण प्रमाण चतुर्विधसे प्रतिपादन किया गया है जैसेकि चक्षुः दर्शन गुण प्रमाण १ अचक्षुः दर्शन गुण प्रमाण २ अवधि दर्शन गुण प्रमाण ३ केवळ दर्शन गुण प्रमाण ४ ॥ भव चार ही दर्शनोंके लक्षण वा साधनताको लिखते हैं। मूल ॥ चक्खुदसणं चक्खुदसणिस्स घमपम- माईसु अचक्खुदसणं अचक्खुदंसणिस्स आय- नावेलहिदसणं हिदंसणिस्स सबरूविदवेसुन पुण सव्वपज्जवेसु केवल दसणं केवल दंसणिस्स सब दवेहिं सब पजावेहिंसेतं दसणगुणप्पमाणे॥ भाषार्थः-दर्शनावी कर्मके क्षयोपशम होनेसे जीवको चक्षु दर्शन घटपटादि पदार्थों में होता है, अर्थात् जव आत्मा- (६४) का दर्शनावणी कर्म क्षयोपशम हो जाता है तब आत्मामें घट पट पदार्थोंको देखनेकी शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसीका ही चक्षु दर्शन है क्योंकि चक्षुर्दशी जीव घटादि पदार्थोंको चक्षु- ओं द्वारा भळी प्रकारसे देख सकता है दूरवर्ती होने पर भी। अचक्षु दर्शन जीवके आत्मा भावमें रहेता है क्योंकि चक्षुओं- से भिन्न श्रोतेंद्रियादि चतुरिंद्रियों द्वारा जो पदार्थोंका वोध होता है अथवा मनके द्वारा जो स्वमादि दर्शनोंका निर्णय कि- या जाता है उसका नाम अचक्षुदर्शन है और अवधि दर्शन युक्त जीवकी प्रवृत्ति सर्व रूपि द्रव्यों में होती है किन्तु सर्व पर्यायों में नही हैं क्योंकि अवधि दर्शन रूपि द्रव्योंको ही देख- नेकी शक्ति रखता है न तु सर्व पर्यायोंकी, सो इसका नाम अवधि दर्शन है। अपितुं केवल दर्शन सर्व द्रव्यों और सर्व पर्यायों में स्थित है क्योंकि सर्वज्ञ होने पर सर्व द्रव्योंको और सर्व पर्यायोंको केवल दर्शन युक्त जीव सम्यक् प्रकारसे देखता है सो इसका ही नाम दर्शन गुण प्रमाण अथ चारित्र गुण प्रमाण वर्णनः ॥ मूल ॥ सेंकित्तं चरित्त गुणप्पमाणे २ पंचविहे पं. तं. सामाइय चरित्त गुणप्पमाणे बेउवठाव- है (६५) णिय चरित्त गुणप्पमाणे परिहार विसुद्धिय च- रित्त गुणप्पमाणे सुहुमसंपराय चरित्त गुणप्पमाणे अहक्खाय चरित्त गुणप्पमाणे ॥ भापार्थ:-(शंका) चारित्र गुण प्रमाण कितने प्रकारसे प्रति- पादन किया गया है ? (समाधान ) पंचप्रकारसे प्रतिपादन किया गया है-जैसेकि सामायिक चारित्र गुण प्रमाण | क्योंकि चारित्र उसे कहते हैं जो आचरण किया जाये सो सामायिक आत्मिक गुण है जैसेकि सम, आय, इक, संधि करनेसे होता है सामा- यिक, जिसका अर्थ है कि सर्व जीवोंसे समभाव करनेसे जो आत्माको लाभ होता है उसका ही नाम सामायिक है । इसके द्वि भेद हैं स्तोक काल मुहूर्तादि प्रमाण आयु पर्यन्त साधुत्ति रूप, सावध योगोंका त्यागरूप सामायिक चारित्र प्रमाण है। इसी प्रकार छेदोपस्थापनीय चारित्र गुण प्रमाण है जो कि पूर्व पर्यायको छेदन करके संयममें स्थापन करना। परिहार विशुद्धि चारित्र गुण प्रमाण उसका नाम है जो संयममें बाधा करने- वाळे परिणाम हैं, उनका परित्याग करके सुंदर भावोंका धारण करना तथा नव मुनि गछसे वाहिर होकर १८ मास पर्यन्त तप करते हैं परिहार विशुद्धिके अर्थे उसका नाम परिहार (६६) विशुद्धि है । सूक्ष्म संपराय चारित्र गुण प्रमाणका यह लक्षण है कि यह चारित्र दशम गुणस्थानवी जीवको होता है क्यों. कि सूक्ष्म नाम तुच्छ मात्र संपराय नाम संसारका अर्थात् जिसका स्तोक मात्र रह गया है लोभ, उसका ही नाम सूक्ष्म संपराय चारित्र गुण प्रमाण है। यथाख्यात चारित्र उसका नाम है जो सर्व लोकमें प्रसिद्ध है कि यथावादी हैं वैसे ही करता है अर्थात जिसका कथन जैसे होता है वैसे ही क्रिया करता है जोकि ११ गुणस्थानसे १४ गुणस्थानवी जीवोंको होता है, अपितु जो क्षपक श्रेणी वत्ती जीव है वे दशम स्था- नसे द्वादशमें गुणस्थानमें होता हुआ १३ वें गुणस्थानमें केवल ज्ञान करके युक्त हो जाता है फिर चतुर्दशवें गुणस्थानमें प्रवेश करके मोक्ष पदको ही प्राप्त हो जाता है ।। मूल ॥ सामाश्य चरित्त गुणप्पमाणे दु- विहे पं. तं. इतरियए आवकहियए बेउवगवणे सुविहे पं. तं. साश्यारेय निरश्यारेय परिहारे १ पंच चारित्रोंके मेद विवाहप्रज्ञप्ति इत्यादि सूत्रोंसे जानने ।

(६७) दुविहे पं. तं. निविस्समाणेय णिविठकाइय सुहुमसंपरायए दुविहे पं. तं. पमिवाश्य अप्प- भिवाश्य अहक्खाय चरित्त गुणप्पमाणे विहे पं.तं. बनमत्थेय केवलीय सेत्तं चरित्त गुणप्पमा- णे सेत्तं जीव गुणप्पमाणे सेत्तं गुणप्पमाणे ।। भाषार्थः-(प्रश्नः) सामायिक चारित्र गुणप्रमाण कितने भकारसे वर्णन किया गया है ? ( उत्तरः) द्वि प्रकारसे, जैसे कि इत्वर् काल १ यावज्जीवपर्यन्त २ । (प्रश्नः) छेदोपस्था- पनी चारित्रके कितने भेद है ? ( उत्तरः) दि भेद है, जैसेकि सातिचार १ निरतिचार २ । (प्रश्नः ) परिहार विशुद्धि चा- रित्र भी कितने वर्णन किया गया है ? (उत्तरः) इसके भी द्वि भेद है जैसेकि प्रवेशरूप १ निवृत्तिरूप २॥ (प्रश्नः) सूक्ष्म संपराय चारित्रके कितने भेद हैं ? ( उत्तरः)दो भेद हैं, जैसेकि प्रतिपाति १ अप्रतिपातिर। (प्रश्नः) यथाख्यात चारित्र भी कितने प्रकार वर्णन किया गया है?

(६८) (उत्तरः) दो प्रकारसे कथन किया गया है, जैसेकि छमस्थ यथाख्यात चारित्र १ केवली यथाख्यात चारित्र २॥ सो यह चारित्र गुणप्रमाण पूर्ण होता हुआ जीव गुणप्रमाण भी पूर्ण हो गया, इसका ही नाम गुणप्रमाण है ।। सो प्रमाणपूवर्क जो पदार्ण सिद्ध हो गये हैं वे नययुक्त भी होते हैं क्योंकि अईन् देवका सिद्धान्त अनेक नयात्मिक हैं । ॥ अथ नय विवर्णः॥ अन्यदेव हि सामान्यमभिन्नज्ञानकारणम् । विशेषोऽप्यन्य एवेति मन्यते नैगमो नयः ॥ १॥ सद्पताऽनतिक्रान्तं स्वस्वभावमिदं जगत् । सत्तारूपतया सर्व संगृह्णन् संग्रहो मतः ॥२॥ व्यवहारस्तु तामेव पतिवस्तु व्यवस्थिताम् । तथैव दृश्यमानत्वाद् व्यापारयति देहिनः ।। ३ ।। तत्रर्जुसूत्रनीतिः स्याद् शुद्धपर्यायसंश्रिता । नश्वरस्यैव भावस्य भावात् स्थितिवियोगतः ॥ ४॥ विरोधिलिङ्गसंख्यादि भेदा भिन्नस्वभावताम् । तस्यैव मन्यमानोऽयं शब्दः प्रत्यवतिष्ठते ॥ ५॥ तथाविधस्य तस्याऽपि वस्तुनः क्षणवर्तिनः ।

(६९) ब्रूते समभिरूढस्तु संज्ञाभेदेन भिन्नताम् ॥ ६ ॥ एकस्यापि ध्वनेर्वाच्यं सदा तन्नोपपद्यते । क्रियाभेदेन भिन्नत्वाद् एवंभूतोऽभिमन्यते ॥ ७ ॥ तथा हि- नैगमनयदर्शनानुसारिणौ नैयायिक-वैशेषिकौ । संग्रहाभि- प्रायमवृत्ताः सर्वेऽप्यद्वैतवादाः । सांख्यदर्शनं च । व्यवहारनयानु- पाति मायश्चार्वाकदर्शनम्। ऋजुसूत्राऽऽकूतप्रवृत्तबुद्धयस्तथागताः। शब्दादिनयावम्बिनौ चैयाकरणादयः।। प्रश्न:-अईन् देवने नय कितने प्रकारसे वर्णन किये है, क्यों- कि नय उसका नाम है जो वस्तुके स्वरूपको भली प्रकारसे प्राप्त करे ? अर्थात् पदार्थों के स्वरूपको पूर्ण प्रकारसे प्रगट करे।। उत्तरः-अहन देवने सप्त मकारसे नय वर्णन किये हैं। प्रश्न:-वे कौन २ से हैं ? उत्तर:-सुनिये ॥ नैगम १ संग्रह २ व्यवहार ३ ऋजुसूत्र ४ शब्द ५ सम- भिरूढ ६ एवंभूत ७॥ इनके स्वरूपको भी देखिये। नैगमस्त्रेधा भूतभाविवर्तमानकाल भेदात् । अवीवे वर्तमाना- रोपणं यत्र सभूत नैगमो यथा-अद्य दीपोत्सवदिने श्री वर्द्धमा- (७०) नस्वामी मोक्षं गतः । भाविनिभूतवत्कथनं यत्र स भावि नैगमो यथा अईन् सिद्ध एव कर्तुमारब्धमीपन्निप्पन्नमनिप्पन्नं वा वस्तुनिष्पन्नवत् कथ्यते यत्र स वर्तमाननगमो यथा ओदना पच्यते ॥ इति नैगमस्त्रेधा ।। भाषार्थ:-नैगम नय तीन प्रकारसे वर्णन किया गया है, जैसोकि भूतनैगम १ भाविनैगम २ वर्तमाननगम ३। अतीत काल- की वार्ताको वर्तमान कालमें स्थापन करके कथन करना जैसेकि आज दीपमालाकी रात्रीको श्री भगवान् वर्द्धमानस्वामी मोक्ष- गत हुए हैं इसका नाम भूत नैगमनय है। अपितु भावि नैगम इस प्रकारसे है जैसेकि अर्हन सिद्ध ही है क्योंकि वे निश्चय ही सिद्ध होंगे सो यह भावि नैगम है। और वर्तमान नैगम यह है कि जो वस्तु निष्पन्न हुई है या नही हुई उसको वर्तमान नैगमऽपेक्षा इस प्रकारसे कहना जैसेकि तंडुल पक्कते हैं अर्थात् (ओदनः पच्यते ) चावल पक्क रहे हैं, सो इसीका नाम वर्तमान नैगम नय हैं। ॥ अथ संग्रह नय वर्णन ॥ संग्रहोपि द्विविधः सामान्यसंग्रहो यथा सर्वाणि द्रव्याणि परस्परमविराधीन । विशेषसंग्रहो यथा-सर्वे जीवाः परस्पर- मविरोधिनः इति सहाहोऽपि द्विधा ।।

(७१) भाषार्थ:--संग्रह नय भी द्वि प्रकारसे वर्णन किया गया है जैसे कि-सामान्य संग्रह विशेष संग्रहः अपितु सामान्य संग्रह इस प्रकारसे है, जैसेकि सर्व द्रव्य परस्पर अविरोधी भावमें हैं अर्थात् सर्व द्रव्योंका परस्पर विरोध भाव नहीं हैं, अपितु वि- शेष संग्रहमें, यह विशेष है कि जैसेकि जीव द्रव्य परस्पर अवि- रोधी भावमें है क्योंकि जीव द्रव्यमें उपयोग लक्षण वा चेतन शक्ति एक सामान्य ही है सो सामान्य द्रव्योंमेंसे एक विशेष द्रव्यका वर्णन करना उसीका ही नाम संग्रह नय है । ॥ अथ व्यवहार नय वर्णन ॥ व्यवहारोऽपि द्विधा सामान्यसङ्ग्रहभेदको व्यवहारो यथा द्रव्याण जीवाजीवाः । विशेषसंग्रहभेदको व्यवहारो यथा जीवाः संसारिणो मुक्ताश्च इति व्यवहारोऽपि द्विधा । भाषार्थ:--व्यवहार नय भी द्वि प्रकारसे ही कथन किया गया है जैसेकि सामान्य संग्रहरूप व्यवहार नय जैसेकि द्रव्य भी द्वि प्रकारका है यथा जीव द्रव्य अजीव द्रव्य || अ- पितु विशेष संग्रहरूप व्यवहार इस प्रकारसे है जैसोक जी- व संसारी १ और मोक्ष २ क्योंकि संसारी आत्मा काँसे युक्त हैं और मोक्ष आत्मा काँसे रहित हैं, इस लिये ही उनके (७२) नाम अजर, अमर, सिद्ध, बुद्ध, पारगत, परंपरागत, मुक्त इत्या- दि हैं। जीव द्रव्य विभेद यह व्यवहार नयके मतसे ही है इसी प्रकार अन्य द्रव्योंके भी भेद जान लेने ॥ ॥ अथ ऋजुसत्र नय ॥ ऋजुसूत्रोऽपि द्विधा सूक्ष्मणु सूत्रो यथा-एक समया- वस्थायी पर्यायः । स्थूलर्जु सूत्रो यथा मनुप्यादि पर्यायास्तदायुः प्रमाण कालं तिष्ठति इति ऋजुसूत्रोऽपि द्विधा ॥ भाषार्थः---ऋजु सूत्र नय भी द्वि भेदसे कहा गया है यया जो समय २ पदार्थोंका नूतन पर्याय होता है और पूर्व पर्याय व्यवच्छेद हो जाता है उसीका ही नाम सूक्ष्म ऋजुसूत्र नय हैं अपितु जो एक पर्याय रहता है उस पर्या- यकी संज्ञाको लेकर शब्द ग्रहण करे जाते हैं उसका नाम स्थूल ऋजुसूत्र नय है जैसेकि-नर भव १ देव भव २ नारकी भव ३ तिर्यग् भव ४। यह भव यथा आयुप्रमाण रहते हैं इसी वास्ते मनुष्य १ देव २ तियम् ३ नारकी ४ यह शब्द व्यवहत कर- नेमें आते हैं। ॥ अथ शब्द समभिरूढ एवंभूत नय विवर्णः ॥ बाब्दसमभिरूढवभूता नया प्रत्येकमकैका नयाः शब्दनयो यथा आयु पर्यन्त (७३) दारा भार्या कलत्रं जलं आपः । समभिरूढ नयो यथा गौः पशु: एवंभूतनयो यथा इंदतीति इन्द्रः ॥ इति नयभेदाः ॥ भापार्थ---शब्द, समभिरूढ, एवंभूत, यह तीन ही नय शु- द्ध पदार्थों का ही स्वीकार करते हैं यथा शब्द नयके मतमें एकार्थी हो वा अनेकार्थी हो, शब्द शुद्ध होने चाहिये, जैसेकि-दारा, भार्या, कलत्र, अथवा जल, आप, यह सर्व शब्द एकार्थी पंचम नयके मतसे सिद्ध होते हैं अर्थात् शुद्ध शब्दोंका उच्चारण करना इस नयका मुख्य कर्तव्य है। और समभिरूढ नय विशेष शुद्ध वस्तुपर ही स्थित जैसोक गौ अथवा पशु । जो पदार्थ जिस गुणवाला है उसको वैसे ही मानना यह समभिरूढ नयका मत है तथा जिस पदार्थमें जिस वस्तुकी सत्ता है उसके गुण कार्य ठीक २ मानने वे ही समभिरूढ है । और एवंभूत नयके मतमें जो पदार्थ शुद्ध गुण कर्म स्वभावको प्राप्त हो गये हैं उसको उसी प्रकारसे मानना उसीका ही नाम एवंभूत नय है जैसेकि-इन्दतीति इन्द्रः अर्थात् ऐश्वर्य करके जो युक्त है वही इन्द्र है, यही एवंभूत नय है । ॥ अथ सप्त नयोंका मुख्योद्देश ॥ नैकंगतीति निगमःनिगमो विकल्पस्तत्र भवो ghar ( ७४ ) नैगमः अन्नेदरूपतया वस्तुजातं संगृह्णातीति संग्रहः । संग्रहेण गृहीतार्थस्य नेदरूपतया वस्तु व्यवहियत इति व्यवहाराऋजुप्रांजलं सू- त्यतीति ऋजुसूत्रः शब्दात् व्याकरणात् प्रकृति प्रत्ययकारेण सिकः शब्दः शब्दनयः। परस्परे- पादि रूढाः समन्निरूढाः। शब्दन्नेदेऽप्यर्थन्नेदो नास्ति यथा शक इन्डः पुरन्दर इत्यादयः सम- निरूढाः । एवं क्रियाप्रधानत्वेन भूतः ॥ इति नयाः॥ भाषार्थ:-नैगम नयका एक प्रकार गमण नहीं है अपितु तीन प्रकारका विकल्प पूर्वे कहा गया है वे ही नैगम नय है जो पदार्थोंको अभेदरूपसे ग्रहण किया जाता है वही संग्रह नय है २। जो अभेद रूपमें पदार्थों हैं उनको फिर भेदरूपसे वर्णन करना जैसेकि-गृहस्थ धर्म १ मुनिधर्म २ उसीका ही नाम व्यवहार नय है । जो समय २ पर्याय परिवर्तन होता है उस पर्यायको ही मुख्यं रखे पदार्थोंका वर्णन करना उसका ही नाम भूयत इत्येवं- ऋजु सूत्र है क्योंकि यह नय सांपति कालको ही मानता है ।। शब्द नयसे शब्दोंकी व्याकरण द्वारा शुद्धि की जाती है जैसेकि प्रकृति, प्रत्यय, यथा धर्म शब्द प्रकृतिरूप है इसको स्वौजश् अमौट् शस् इत्यादि प्रत्ययों द्वारा सिद्ध करना तथा भू सत्तायां वर्त्तते इस धातुके रूप दश लकारोंसे वर्णन करने यह सर्व श- ब्द नयसे बनते हैं ५। जो पदार्थ स्वगुणों में आरूढ है वही सम- भिरूढ नय हैं तथा शब्दभेद हो अपितु अर्थभेद न हों जैसेकि शक्र इन्द्रः पुरंदर मघवन् इत्यादि । यह सर्व शब्द समभिरूढ नयके मतसे बनते हैं ६ । क्रिया प्रधान करके जो द्रव्य अभेद रूप हैं उनका उसी प्रकारसे वर्णन करना वही एवंभूत नय ७॥सो सम्यग्दृष्टि जीवोंको सप्त नय ही ग्राह्य है किन्तु मुख्य-- तया करके दोइ नय हैं। यथा- पुनरप्यध्यात्मभाषया नया उच्यन्ते । ता- वन्मूलनयो द्वौ छौ निश्चयो व्यवहारश्च । तत्र निश्चयनयो अन्नेदविषयो व्यवहारलेदविषयः॥ भापार्थ:-अपितु अध्यात्म भाषा करके नय दो ही हैं जैसे कि निश्चय नय १ व्यवहार नय २। सो निश्चय अभेद विषय है, ( ७६ ) व्यवहार भेद विषय है, किन्तु फिर भी निश्चय नय दि प्रकारसे है जैसेकि शुद्ध निश्चय नय १ अशुद्ध निश्चय नय २। सो शुद्ध निश्चय नय निरुपाधि गुण करके अभेद विषय विषयक है जै- सेकि केवल ज्ञान करके युक्त जीवको जीव मानना यह शुद्ध निश्चय एवंभूत नय है १ | सोपाधिक विषय अशुद्ध निश्चय जैसे मतिज्ञानादि करके युक्त है जीव २॥ इसी प्रकार व्यवहार नय भी द्वि प्रकारसे प्रतिपादित है जैसकि-एक वस्तु विषय सद्भूत व्यवहार, भिन्न वस्तु विषय असद्भुत व्यवहार किन्तु स. द्भूत व्यवहार भी द्वि विधसे ही कहा गया है जैसेकि-उपच- रित १ । अनुपचरित २। फिर सोपाधि गुण गुणिका भेद विषय उपचरित सद्भूत व्यवहार इस प्रकारसे है जैसेकि जीवका मति- ज्ञानादि गुण है ॥ अपितु निरुपाधि गुणगुणिका भेद विषय अनुपचरित सद्भूत व्यवहारका यह लक्षण है कि-जीव के- चल ज्ञानयुक्त है क्योंकि निज गुण जीवकी पूर्ण निर्मलता ही है तथा असद्भूत व्यवहार भी द्वि प्रकारसे ही वर्णन किया गया है जैसेकि उपचरित, अनुपचरित । फिर संश्लेपरहित व- स्तु विषय उपचरित असद्भूत व्यवहार जैसेकि देवदत्तका धन है, और संश्लेपरहित वस्तु संवन्ध विपय अनुपचरित ( ७७ ) असद्भूत व्यवहार जैसे कि जीवका शरीर है यह अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नय है सो यह नय सर्व पदार्थों में संघटित है इनके ही द्वारा वस्तुओंका यथार्थ वोध हो सकता है क्योंकि यह नय प्रमाण पदार्थोंके सद्भावको प्रगट कर देता है। ॥ अथ सप्त नय दृष्टान्त वर्णनः॥ अब सात ही नयोंको दृष्टान्तों द्वारा सिद्ध करते हैं, जैसेकि किसीने प्रश्न किया कि सात नयके मतसे जीव किस प्रकारसे सिद्ध होता है तो उसका उत्तर यह है कि सप्त नय जीव द्रव्यको निम्न प्रकारसे मानते हैं, जैसेकि-नगम नयके मतमें गुणपर्याय युक्त जीव माना है और शरीरमें जो धर्मादि द्रव्य हैं वे भी जीव संज्ञक ही है ५ ॥ संग्रह नयके मतमें असंख्यात प्रदेशरूप जीव द्रव्य माना गया है जिसमें आकाश द्रव्यको वर्जके शेष द्रव्य जीव रूपमें ही माने गये हैं २ ॥ व्यवहार नयके मतसे जिसमें अभिलापा तृष्णा वासना है उसका ही नाम जीव है, इस नयने लेशा योग इन्द्रियें धर्म इत्यादि जो जीवसे भिन्न इनको भी जीव माना है क्योंकि जीवके सहचारि होनेसे ३॥ और ऋजु सूत्र नयके मतमें उपयोगयुक्त जीव माना गया है, इसने लेशा योगादिको दूर कर दिया है (७८) किन्तु उपयोग शुद्ध (ज्ञानरूप) अशुद्ध ( अज्ञान ) दोनोंको ही जीव मान लिया है क्योंकि मिथ्यात्व मोहनी कर्म पूर्वक जीव सिद्ध कर दिया है ४ ॥ और शब्द नयके मतमें जो तीन कालमें शुद्ध उपयोग पूर्वक है वही जीव है अपितु सम्यक्त्व मोहनी कर्मकी वर्गना इस नयने ग्रहण कर ली शुद्ध उपयोग अर्थे ५ ॥ समभिरूढ नयके मतमें जिसकी शुद्धरूप सत्ता है और स्वगुणमें ही मग्न है क्षायक सम्यक्त्व पूर्वक जिसने आत्माको जान लिया है उसका नाम जीव है, इस नयके मतमें कर्म संयुक्त ही जीव है ६॥ एवंभूत नयके मतमें शुद्ध आत्मा केवल ज्ञान केवल दर्शन संयुक्त सर्वथा कर्मरहित अजर अमर सिद्ध बुद्ध पारगत इत्या- दि नाम युक्त सिद्ध आत्माको ही जीव माना है ७॥ इस प्रकार सप्त नय जीवको मानते हैं ॥ द्वितीय दृष्टान्तसे सप्त नयोंका माना हुआ धर्म शब्द सिद्ध करते हैं ।। नैगम नय एक अंश मात्र वस्तुके स्वरूपको देखकर सर्व वस्तुको ही स्वीकार करता है जैसेकि नैगम नय सर्व मतोंके धर्मोको ठीक मानता है क्योंकि नैगम नय- का मत है कि सर्व धर्म मुक्तिके साधन वास्ते ही है अपितु संग्रह नय जो पूर्वज पुरुषोंकी रूढि चली आती हैं उसको ही धर्म कहता है क्योंकि उसका मन्तव्य है कि पूर्व पुरुष हमारे ( ७९ ) अज्ञात नही थे इस लिये उन ही की परम्पराय उपर चलना हमारा धर्म है। इस नयके मतमें कुलाचारको ही धर्म माना गया है २ ।। व्यवहार नयके मतमें धर्मसे ही सुख उपलब्ध होते हैं और धर्म ही सुख करनेहारा है इस प्रकारसे धर्म माना है क्यों- कि व्यवहारनय वाहिर सुख पुन्यरूप करणीको धर्म मानता है ३ ।। और ऋजुसूत्र नय वैराग्यरूप भावोंको ही धर्म कहता है सो यह भाव मिथ्यात्वीको भी हो सक्ते हैं अभव्यवत् ४ ॥ अपितु शब्द नय शुद्ध धर्म सम्यक्त्व पूर्वक ही मानता है क्योंकि सम्यक्त्व ही धर्मका मूल है सो यह चतुर्थ गुणस्थानवी जीवोंको धर्मी कहता है ५ ॥ समभिरूढ नयके मतमें जो आत्मा सभ्यम् ज्ञान दर्शन चारित्र युक्त उपादेय वस्तुओं ग्रहण और हेय (त्यागने योग्य पदार्थों का) परिहार, ज्ञेय (जानने योग्य ) पदार्थोंको भनी भकारसे जानता है, परगुणसे सदैच काल ही भिन्न रहनेवाला ऐसा आत्मा जो मुक्तिका साधक है उसको ही धर्मी कहता है ६॥ और एवंभूत नयके मतमें जो शुद्ध आत्मा काँसे रहित शुक्ल ध्यानपूर्वक जहाँ पर घातिये काँसे रहित आत्मा ऐसे जानना जोकि अघातिये कर्म नष्ट हो रहे हैं उसका ही नाम धर्म है ७॥

(८०) ॥अथ सप्त नयों द्वारा सिद्ध शब्दका वर्णन ॥ नैगम नयके मतमें जो आत्मा भव्य है वे सर्व ही सिद्ध है क्योंकि उनमें सिद्ध होनेकी सत्ता है १ ॥ संग्रह नयके मतमें सिद्ध संसारी जीवों में कुछ भी भेद नहीं हैं, केवल सिद्ध आत्मा काँसे रहित हैं, संसारी आत्मा कर्मोंसे युक्त हैं २ ॥ व्यवहार नयके म- तमें जो विद्या सिद्ध हैं वा लब्धियुक्त हैं और लब्धि द्वारा अनेक कार्य सिद्ध करते हैं वे ही सिद्ध हैं ३ ।। ऋजुसूत्र नय जि- सको सम्यक्त्व प्राप्त हैं और अपनी आत्माके स्वरूपको सम्य- क् प्रकारसे देखता है उसका ही नाम सिद्ध है ४॥ शब्द नयके मतमें जो शुक्ल ध्यानमें आरूढ़ है ओर कष्टको सम्यक् प्रकारसे सहन करना गजमुखमालवत् उसका ही नाम सिद्ध है ५ ॥ समाभिरूढ़ नयके मतमें जो केवल ज्ञान केवल दर्शन संपन्न १३ ३ वा १४ वें गुणस्थानवी जीव है उनका ही नाम सिद्ध है ६॥ एवंभूत नयके मतमें जिसने सर्व कर्मोंको दूर कर दिया है केवल ज्ञान केवल दर्शन संयुक्त लोकाग्रमें विराजमान है ऐसे सिद्ध आत्माको ही सिद्ध माना गया है क्योंकि सकल कार्य उसी आत्माके सिद्ध हैं ७॥

(८१ ) अथ वस्तीके दृष्टान्त द्वारा सप्त नयोंका वर्णन ।। फिर यह सप्त नय सर्व पदार्थों पर संघटित हैं जैसेकि कि- सी पुरुषने अमुक व्यक्तिको प्रश्न किया कि आप कहां पर वस- ते हैं ? तो उसने प्रत्युत्तरमें निवेदन किया कि मैं लोगों वसता हूं। यह अशुद्ध नैगम नयका वचन है। इसी प्रकार प्रश्नोत्तर नीचे पढियें ॥ पुरुषः-मिय महोदयवर ! लोक तो तीन है जैसेकि स्वर्ग मृत्य पाताल; आप कहां पर रहते हैं ? क्यों तीनों लोकोंमें ही वसते है? व्यक्तिः-नहीजी, मैं तो मनुष्य लोगमें वसता हूं ( यह शुद्ध नैगम नय है)। पुरुपः-मनुष्य लोगमें असंख्यात द्वीप समुद्र है, आप कौनसे द्वीपमें वसते हैं। व्याक्त:-बूद्वीप नामक द्वीपमें वसता हूं ( यह विशुद्धतर नैगम नय है)। पुरुपः-महाशयजी ! जंबूद्वीपमें तो महाविदेह आदि अनेक क्षेत्र हैं, आप कौनसे क्षेत्रमें निवास करते हैं? व्यक्तिः-मैं भरतक्षेत्रमें वसता हूं ( यह अति शुद्ध नैगम नय है)।

(८२) पुरुषः-प्रियवर ! भरतक्षेत्रमें पट् खंड हैं, आप कौनसे खंडमें निवास करते हैं ? व्यक्ति:-मैं मध्य खंडमें वसता हूं ( यह विशुद्ध नैगम नय है)। - पुरुषः-मध्य खंडमें अनेक देश हैं, आप कौनसे देशमें उहरते हैं? व्यक्तिः-मैं मागध देशमें वसता हूं (यह अतिविशुद्ध नैगम नय है)। पुरुष:-मागध देशमें अनेक ग्राम नगर हैं, आप कौनसे आम वा नगरमें वसते हैं ? व्यक्तिः-मैं पाटलिपुत्रमें बसता हूं ( यह अतिविशुद्ध- तर नैगम नय है)। पुरुषः-महाशयजी ! पाटलिपुत्रमें अनेक रथ्या हैं (मुहल्ले ) तो आप कौनसी प्रतोलीम वसते हैं ? व्यक्ति:-मैं अमुक प्रतोलीमें बसता हूं (यह बहुकतर विशुद्ध नैगम नय है)। पुरुषः-एक मतोलीम अनेक घर होते हैं, तो आप कौनसे घरमें वसते हैं ( एक मुहल्ले में)? व्यक्ति:-मैं मध्य घर (गर्भ घर) में वसता हूं ? ( यह (८३) विशुद्ध नय है । यह सर्व उत्तरोत्तर शुद्धरूप नैगम नयके ही वचन हैं। पुरुप:-मध्य घरमें तो महान् स्थान है, आप कौनसे स्था- नमें वसते हैं ? व्यक्तिः-मैं स्वः शय्यामें वसता हूं ( यह संग्रह नय है) विछावने प्रमाण ॥ पुरुषा-शय्यामें भी महान् स्थान है, आप कहांपर रहते हैं? व्यक्तिः-असंख्यात प्रदेश अवगाह रूपमें वसता हूं (यह व्यवहार नय है)। पुरुष:-असंख्यात प्रदेश अवगाह रूपमें धर्म अधर्म आकाश पुद्गल इनके भी महान् प्रदेश हैं, आप क्या सर्वमें ही चसते हैं व्यक्ति नहीजी, मैं तो चेतनगुण (स्वभाव ) में वस- ता हूं ॥ यह ऋजुसूत्र नयका वचन है । पुरुषा-चेतन गुणकी पर्याय अनंती है जैसोक ज्ञान चेतना अज्ञान चेतना, आप कौनसे पर्याय वसते हैं ? व्यक्ति:-मैं तो ज्ञान चेतनामें वसता हूं ( यह शब्द नय है)।

(८४) पुरुषः-ज्ञान चेतनाकी भी अनंत पर्याय हैं, आप कहां पर वसते हैं? व्यक्ति:-निज गुण परिणत निज स्वरूप शुक्ल ध्यान- पूर्वक ऐसी निर्मल ज्ञान स्वरूप पर्यायमें वसता हूं ( यह समभिरूढ नय है)। पुरुषः-निज गुण परिणत निज स्वरूप शुक्ल ध्यानपूर्वक पर्यायमें वर्धमान भावापेक्षा अनेक स्थान हैं, तो आप कहां पर वसते हैं? व्यक्तिः-अनंत ज्ञान अनंत दर्शन शुद्ध स्वरूप निजरूपमें पसता हूं। यह एवंभूत नयका वचन है ।। इस प्रकार यह सात ही नय वस्ती पर श्री अनुयोग द्वार- नी सूत्रमें वर्णन किए गये हैं और श्री आवश्यक सूत्रमें सा- मायिक शब्दोपरि सप्त नय निम्न प्रकारसे लिखे हैं, जैसेकि- नैगम नयके मतमें सामायिक करनेके जब परिणाम हुए तबी ही सामायिक हो गई। अपितु संग्रह नयके मतमें सामायि- कका उपकरण लेकर स्थान प्रतिलेखन जव किया गया तव ही सामायिक हुई ॥ और व्यवहार नयके मतमें सावध योगका जब परित्याग किया तब ही सामायिक हुई ।

(८५)
और ऋजु नयके मतमें जव मन वचन कायाके योग शुभ
वर्तने लगे तब ही सामायिक हुई ऐसे माना जाता है ॥ शब्द
नयके मतमें जव जीवको वा अजीवको सम्यक् प्रकारसे जान
लिया फिर अजीवसे ममत्व भावको दूर कर दीया तव सा-
मायिक होती है ।। एवंभूत नयके मतमें शुद्ध आत्माका नाम ही
सामायिक है ।। यदुक्तं-
आया सामाइय आया सामाश्यस्स अहे।
इति वचनात् अर्थात्, आत्मा सामायिक है और आत्मा ही
सामायिकका अर्थ है, सो एवंभूत नयके मतसे शुद्ध आत्मा शुद्ध
उपयोगयुक्त सामायिकवाला होता है ॥ सो इसी प्रकार जो
पदार्थ हैं वे सप्त नयोंद्वारा भिन्न २ प्रकारसे सिद्ध होते हैं और
उनको उसी प्रकार माना जाये तव आत्मा सम्यक्त्वयुक्त हो
सक्ता है, क्योंकि एकान्त नयके माननेसे मिथ्या ज्ञानकी प्राप्ति
हो जाती है अपितु अनेकान्त मतका और एकान्त मतका ही-
और भी का ही विशेष है, जैसेकि-एकान्त नयवाले जब कि-
सी पदार्थों का वर्णन करते हैं तब-'ही' का ही प्रयोग करते
हैं जैसेकि, यह पदार्थ ऐसे ही है । किन्तु अनेकान्त मत जब
किसी पदार्थका वर्णन करता है तब 'भी' का ही प्रयोग ग्रहण

(८६) करता है जैसेकि-यह पदार्थ ऐसे 'भी' है । सो यह कथन अ- विसंवादित है अर्थात् इसमें किसीको भी विवाद नहीं है जै- सेकि-जीव सान्त भी है-अनंत भी है ॥ यदुक्तमागमे- जेवियर्णते खंदया जाव सरंते जीवे अ- एते अजीवे तस्सवियणं अयमठे एवं खनु जाव दवओणं एगे जीवे सते १ खेतडणं जीवे असंक्खेज पयसिए असंक्खेज पयसो गाढे अस्थि पुषसे अणंते २ कालणं जीवेण कयाश्नासि निच्चे णस्थि पुणसे अंत्ते ३ नाव- जणं जीवे अर्णताणाण पजावा अणंत्ता दसण पजावा अणंत चरित्त पडावा अणंता गुरुय लहुय पजावा अणंत्ता अगुरुय लहुय पजवा एस्थि पुणसे अंते ४ सेत्तं दव जीवे सयंते खेत्त जीवे सते काल जीवे अणंते ना- वर्ड जोवे अणंते ॥ भगवती सूत्र शतक २ उद्देश १॥

(८७) भाषार्थः-श्री भगवान् वर्द्धमान स्वामी स्कंधक संन्यासीको जीवका निम्न प्रकारसे स्वरूप वर्णन करते हैं कि हे स्कंधक ! द्रव्यसे एक जीव सान्त है १ । क्षेत्रसे असंख्यात प्रदेशरूप जीव असंख्यात प्रदशों पर ही अवगहण हुआ आकाशापेक्षा सान्त है २ । कालसे अनादि अनंत है क्योंकि उत्पचिसे रहित है इस लिये कालापेक्षा जीव नित्य है ३। भावसे जीव नित्य अनंत ज्ञान पर्याय, अनंत दर्शन पर्याय, अनंत चारित्र पर्याय, अनंत गुरु लघु पर्याय, अनंत अगुरु लघु पर्याय युक्त अनंत है ४ । सो हे स्कंधक! द्रव्यसे जीव सान्त, क्षेत्रसे भी सान्त, अ- पितु काल भावसे जीव अनंत है, तथा द्रव्यार्थिक नयापेक्षा जीव अनादि अनंत है, पर्यायार्थिक नयापेक्षा सादि सान्त है, जैसेकि-जीव द्रव्य अनादि अनंत है पर्यायार्थिक नयापेक्षा सा- दि सान्त है क्योंकि कभी नरक योनिमें जीव चला जाता है, कभी तिर्यग् योनिमें, कभी मनुष्य योनिमें, कभी देव योनिमें । जब पूर्व पर्याय व्यवच्छेद होता है तब नूतन पर्याय उत्पन्न हो जाता है। इसी अपेक्षासे जीव सादि सान्त है तथा जीव चतुर्भगके भी युक्त है, यथा जीव द्रव्य स्वगुणापेक्षा वा द्रव्या- (८८) र्थिक नयापेक्षा अनादि अनंत है । आर भव्यजीव कर्मापेक्षा अनादि सान्त है क्योंकि काँकी आदि नहीं किस समय जीव कर्मोंसे बद्ध हुआ, इस लिये कर्म भव्य अपेक्षा अनादि सान्त है २। और जो आत्मा मुक्त हुआ वे सादि अनंत है, क्योंकि वे संसारचक्रसे ही मुक्त हो गया है और अपुनरावृत्ति करके युक्त है जैसे दग्धवीज अंकूर देनेमें समर्थ नहीं होता है, उसी प्रकार वे मुक्तआत्माओंके भी कमरूपि चीज दग्ध हो गये हैं। और प्रवाह अपेक्षा कर्म अनादि, पयार्यापेक्षा कर्म सादि सान्त है, जैसेकि पूर्व किये हुए भोगे गये आपतु नूतन और किये गये सो करनेके समयसे भोगनेके समय पर्यन्त सादि सान्त भंग बन जाता है, परंतु मवाहसे कर्म अ. नादि ही चले आते हैं, जैसेकि घट उत्पत्तिमें सादि सान्त है, मृ- त्तिकाके रूपमें अनादि है क्योंकि पृथ्वी अनादि है। इसी प्रकार सर्व पदार्थोके स्वरूपको भी जानना चाहिये, वे पदार्थ द्रव्यसे अ- नादि अनंत है पर्यायार्थिक नयापेक्षा सादि सान्त भी है सादि अनंत भी है अथवा सर्व पदार्थोंके जाननेके वास्ते सप्त भंग १ मुक्त आत्मा एक जीव अपेक्षा सादि अनंत है और बहुत जीवोंकी अपेक्षा अनादि अनंत है, क्योंकि मुक्ति भी अनादि है।।

(८९ भी लिखे हैं जिनको लोग जैनोंका सप्तभंगी न्याय कहते हैं, जैसेकि- १ स्यादस्त्येव घट:-कथंचित् घट है स्वगुणोंकी अपेक्षा घट अस्तिरूप है। २ स्यान्नास्त्येव घट:-कथंचित् घट नहीं है । ३ स्यादस्ति नास्ति च घट:-कथंचित् घट है और कथंचित् घट नहीं है। • ४ स्यादवक्तव्य एव घट:-कथंचित् घट अवक्तव्य है । ५ स्यादस्ति चावक्तव्यश्च घटः कथंचित् घट है और अ- वक्तव्य है। ६ स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च घट:-कथंचित् नहीं है तथा अवक्तव्य घट है। ७ स्यादस्ति नास्ति चावक्तव्यश्च घट:-कथचित् है नही है इस रूपसे अवक्तव्य घट है। मित्रवरो! यह सप्त भंग है । यह घटपटादि पदार्थों में पक्ष प्रतिपक्ष रूपसे सप्त ही सिद्ध होते हैं जैसाकि घट द्रव्य स्वगुण युक्त अस्तिरूपमें है । प्रत्येक द्रव्यमें स्वगुण चार चार होते हैं द्रव्यत्व क्षेत्रत्व कालत्व भावत्व । घटका द्रव्य मृत्तिका है, क्षेत्र जैसे पाटलिपुत्रका बना हुआ, कालसे वसंत ऋतुका, भावसे नील घट है, सो यह स्वगुणमें अस्तिरूपमें है। वे ही घट परद्रव्य (प. यादि ) अपेक्षा नास्तिरूप है क्योंकि पटका द्रव्य तंतु हैं, क्षेत्र- | से वे कुशपुरका बना हुआ है, कालसे हेमेंत ऋतुमें बना हुआ, भावसे श्वेत वर्ण है, सो पटके गुण घटमें न होनेसे घट पटापेक्षा नास्तिरूप है । तृतीय भंग वे ही घट एक समयमें दोनों गुणों करके युक्त है, स्वगुणमें अस्तिभावमें है, और परगुणकी अपेक्षा नास्ति रूपमें है, जैसे कोई पुरुष जिस समय उदात्त स्वरसे उच्चारण करता है उस समय मौन भावमें नहीं है, अपितु जिस समय मौन भावमें है उसी समय उदात्त स्वरयुक्त नहीं है, सो प्रत्येक २ पदार्थमें अस्ति नास्तिरूप तुतीय भंग है । जवके एक समयमै दोनों गुण घटमें हैं तब घट अवक्तव्य रूप हो गया क्योंकि वचन योगके उच्चारण करनेमें असंख्यात समय व्यतीत होते हैं और वह गुण एक समयमें प्रतिपादन किये गये हैं इस लिये घट अवक्तव्य है, अर्थात् वचन मात्रसे कहा नहीं जाता । यदि एक गुण कथन करके फिर द्वितीय गुण कथन करेंगे तो जिस समय हम अस्ति भावका वर्णन करेंगे वही समय उसी घटमें नास्ति भावका है, तो हमने विद्यमान भावको अविद्यमान सिद्ध किया जैसे जिस समय कोई पुरुष खड़ा है ऐसे हमने उच्चारण (९१) किया तो वही समय उस पुरुषकी वैठनेकी क्रियाके निषेधका भी. है इस लिये यह अवक्तव्य धर्म है। इसी प्रकार अस्ति. अ- वक्तव्य रूप पंचम भंग भी घटमें सिद्ध है क्योंकि वे घट पर गुणकी अपेक्षा नास्तिरूप भी है इस लिये एक समयमें अस्ति अवक्तव्य धर्मवाला है। इसी प्रकार स्यात् नास्ति अवक्तव्यरूप षष्टम भंग भी एक समयकी अपेक्षा सिद्ध है । और स्यादस्ति नास्ति चावक्तव्य रूप सप्तम भंग भी एक समयमें सिद्धरूप है किन्तु वचनगोचर नहीं है क्योंकि एक समयमें अस्ति नास्ति रूप. दोनों भाव विद्यमान हैं परंतु वचनसे अगोचर है अर्थात् कथन मात्र नहीं है ।। इसी प्रकार सर्व द्रव्य अनेकान्त मतमें माने गये हैं और नित्यअनित्य भी भंग इसी प्रकार वन जाते है । यथा-१ स्यात् नित्य २ स्यात् आनित्य ३ स्यात् नित्यम- नित्यम् ४. स्यात् अवक्तव्य ५ स्यात् नित्य अवक्तव्यम् ६ स्यात्, अनित्य अवक्तव्यम् ७ स्यात् नित्यमनित्य युगपत् अवक्तव्यम् इत्यादि ।। इन पदार्थों का पूर्ण स्वरूप जैन सूत्र वा जैन न्यायग्रं- थोंसे देख लेवें । और संसारको भी जैन सूत्रोंमें सान्त और अनंतः निम्न प्रकारसे किखा है । यदुक्तमागमे- एवं खलु मए खंधया चविहे लोए पं.

(९२) तंजहा दवयो खेत्तो कालो नावयो दवओणं एगे लोय सत्ते खेत्तओणं लोए अ- संज्जा ओजोयण कोमाकोमीओआयामविक्खं नेणं असंखेज्जा ओजोयण कोमाकोमीओ परि- खेवेणं पं. अस्थि पुणसे अंत्ते कालोणं लोयण कयायिनसि न कदायि न भवति न कदा- यि न भविस्सति नुविसुय नवतिय नविस्सति धुवेणिनियसासए अक्खए · अवए अवठिए णिच्चे णस्थि पुणले अंते नावओणं लोय अणं- त्ता वएण पज्जवा गंध पजवा रस फास अणंता पज्जवा संगण पज्जवा अयंता गुरु लहुय पज- वा अणंता अगुरु लहुय पज्जवा णत्थि पुणसे अंचे सेतं खंधगा दवतो लोगे सअंते १ खेत्ततो लोय सते २ कालो लोय अयंते ३ नाव- ओ लोय अणंते ४ ॥ भगवती सूत श०५ उद्देश १॥

(९३) भाषार्थः-श्री भगवान् वर्द्धमान स्वामी स्कंधक संन्यासी- को लोगका स्वरूप निन्न भकारसे प्रतिपादन करते हैं कि है स्कंधक ! द्रव्यसे लोक एक है इस लिये सान्त है । क्षेत्रसे लोक असंख्यात योजनोंका दीर्घ वा विस्तीर्ण है और असं. ख्यात योजनोंकी परिधिवाला है इस लीये क्षेत्रसे भी लोक सान्त है २ । कालसे लोग अनादि है अर्थात् किसी समयमें भी लोगका अभाव नहि था, अब नहीं है, नाही होगा अर्थात् उत्पत्ति रहिन है, नित्य है, शाश्वत है, अक्षय है, अव्यय है, अवस्थित है, किन्तु पंच भरत पंच ऐरवय क्षेत्रोंमें उत्सप्पिणि काल अवसाप्पिणि काल दो प्रकारका समय परिवर्तन होता रहता है और एक एक कालमें पद षट् समय होते हैं जिसमें पद वृद्धिरूप पट हानीरूप होते हैं अपितु पदा- योका अभाव किसी भी समयमें नही होता, किन्तु किसी वस्तु- की वृद्धि किसीकी न्यूनता यह अवश्य ही दुआ करती है। इनका स्वरूप श्री जंबूद्वीप प्रज्ञप्तिसे जानना । अपितु कालसे लोग अ- नादि अनंत है क्योंकि जो लोग जीव प्रकृति ईश्वर यह तीनोंको अनादि मानते हैं और आकाशादिकी उत्पत्ति वा प्रलय सिद्ध करते हैं तो भला आधारके विना पदार्थ कैसे ठहर सकते हैं। इस लिये कोगके अनादि माननेमें कोई भी बाधा नही पड़ती (९४) और भावसे लोकमें अनंत वर्गों की पर्याय अनंत ही गंध, रस, स्पर्शकी पर्यायें और अनंत ही संस्थानकी पर्याय, अनंत ही गुरु लघु पर्याय, अनंत ही अगुरु लधु पर्याय हैं इस वास्ते भावसे भी लोक अनंत हैं । सो द्रव्यसे लोक सान्त १ क्षेत्रसे भी सान्त २ कालसे लोक अनंत ३ भावसे भी लोक अनंत है ४॥ सो उक्त लोकमें अनंत आत्मायें स्थिति करते हैं और स्वः स्वः कर्मानुसार जन्म मरण सुख वा दुःख पा रहे हैं। अपितु लोक शब्द तीन प्रकारसे व्यवहृत होता है जैसेकि-उर्व लोक १ तिर्यग् लोग २ अधोलोक ३ ॥ सो उर्ध्व लोकमें २६ स्वर्ग हैं, उपरि इषत् ममा पृथ्वी है और लोकाग्रमें सिद्ध भगवान् विर- जमान है। और तिर्यग् लोकमें असंख्यात द्वीप समुद्र है और पाताल लोकमें सप्त नरक स्थान है वा भवनपत्यादि देव भी है किन्तु मोक्षके साधनके लिये केवल मनुष्य जाति ही है क्योंकि जांति शब्द पंच प्रकारसे ग्रहण किया गया है जैसेकि इकेंद्रिय ज्ञाति जिसके एक ही इंन्द्रिय हो जैसेकि पृथ्वीकाय १ आप- काय २ तेयुःकाय ३ वायुकाय ४ वनस्पतिकाय ५। इनके केवल एक स्पर्श ही इन्द्रिय होती है। और द्विइन्द्रिय जीव जै- सेकि शीप शंखादि इनके केवल शरीर और जिता यह दोई ( ९५) इन्द्रियें होती हैं । और तेईन्द्रिय जाति कुंथु वा पिप्पलकादि इनके शरीर, मुख, घ्राण यह तीन इन्द्रिय होती हैं । और चतु- रिन्द्रिय जातिके चार इन्द्रिय होती है जैसेकि-शरीर, मुख, घ्राण, चक्षु, मक्षिकादियें चतुरिंद्रिय जीव होते हैं। और पंचि- न्द्रिय जातिके पांच ही इन्द्रियें होती है जैसेकि शरीर; मुख, घाण, जीहा, चक्षु, श्रोत्र यह पांच ही इन्द्रिय नारकी, देव, मनुष्य, तियोंके होते हैं. जैसे जलचर, स्थलचर, खेचर अर्थात् जो संज्ञि होते हैं वे सर्व जीव पंचिंद्रियें होते हैं। अपितु मुक्तिके लिये केवल मनुष्य जाति ही कार्यसाधक है और कर्मानुसार ही मनुष्योंका वर्णभेद माना जाता है, यदुक्तमागमे- कम्मुणा बनणो होइ कम्मुणा होश खतियो । वइस्सो कम्मुणा हो सुदो हवश् कम्मुणा ॥ उत्तराध्यायन सूत्र अ० २५ ॥ गाथा ३३ ॥ भाषार्थ:-ब्रह्मचर्यादि व्रतोंके धारण करनेसे ब्राह्मण होता है, और प्रजाकी न्यायसे रक्षा करनेसे क्षत्रिय वर्णयुक्त हो जाता है, व्यापारादि क्रियाओं द्वारा वैश्य होता है, सेवादि क्रियाओंके करनेसे शूद्र हो जाता है, अपितु कर्मसे ब्राह्मण १ १. संज्ञि जीव मनवालोंका नाम हैं तथा जो गर्भसे उत्पन्न हों।

३ (९६) कर्मसे क्षत्रिय २ कर्मसे वैश्य ३ कर्मसे शूद्र ४ जीव हो जाता है। किन्तु मनुष्य जाति एक ही है, क्रियाभेद होनेसे वर्णभेद हो जाते हैं ॥ सर्व योनियों में मनुष्य भव परम श्रेष्ठ है जिसमें सत्यासत्यका भली भांतिसे ज्ञान हो सक्ता है और सम्यग् ज्ञान, सम्यग् दर्शन, सम्यग् चारित्रके द्वारा मुक्तिका कार्य सिद्ध कर स- ता है। किन्तु सम्यग् ज्ञानके पंच भेद वर्णन किये गये हैं जैसेकि- मतिज्ञान १ श्रुत ज्ञान २ अवधि ज्ञान ३ मनापर्यव ज्ञान ४ केवल ज्ञान ५, अपितु मति ज्ञानके चतुर भेद हैं जैसेकि- अवग्रह १ ईहा ३ अवाय ३ धारणा ४॥ (१) इन्द्रिय और अर्थकी योग्य क्षेत्रमें माप्ति होने पर उत्पन्न होनेवाले महा सत्ता विषयक दर्शनके अनन्तर अवान्तर सत्ता जातिसे युक्त वस्तुको ग्रहण करनेवाला ज्ञान विशेष अग्रवह कहलाता है ।। (२) अवग्रहके द्वारा जाने हुए पदार्थमें होनेवाले संशयको दूर करनेवाले ज्ञानको ईहा कहते हैं, जैसेकि अवग्रहसे निश्चित पुरुष रूप अर्थमें इस प्रकार संशय होने पर कि "यह पुरुष दाक्षिणात्य है अथवा औदीच्य (उत्तरमें रहनेवाला)" इस संशयके दूर करनेके लिये उत्पन्न होनेवाले ' यह दाक्षिणा- त्य होना चाहिये । इस प्रकारके ज्ञानको ईहा कहते हैं ॥ (३) भाषा आदिकका विशेष ज्ञान होने पर उसके यथार्थ स्वरूपको ( ९७ ) पूर्व ज्ञान ( ईहा ) की अपेक्षा विशेष रूपसे दृढ़ करनेवाले ज्ञा- नको अवाय कहते हैं जैसेकि " यह दाक्षिणात्य ही है " इस प्रकारका ज्ञान होना । (४) उसी पदार्थका इस योग्यतासे (दृढ़ रूपसे) ज्ञान होना कि जिससे कालान्तरमें भी उस विषयका विस्मरण न हो उसको धारणा कहते हैं। अर्थात् जिसके निमित्तसे उत्तर कालमें भी "वह ऐसा स्मरण हो सके उसको धारणा कहते हैं । और मतिज्ञानसे ही चार प्रकारकी बुद्धि उत्पन्न होती है, जैसेकि उत्पत्तिया १ विणइया २ क- म्मिया ३ परिणामिया ४॥ उत्पत्तिया बुद्धि उसका नाम है जो पार्ता कभी सुनी न हो और नाही कभी उसका अनुभव भी किया हो, परंतु प्रश्नोचर करते समय वह वार्ता शीघ्र ही उत्पन्न हो जाये और अन्य पुरुषोंको उस वार्ता शंकाका स्थान भी माप्त न होवे ऐसी बुद्धिका नाम उत्पत्तिका है । और जो विनय करनेसे बुद्धि उत्पन्न हो उसका नाम विनायिका है २ । अपितु जो कर्म करनेसे प्रतिमा उत्पन्न होवे और वह पुरुप कार्यमें कौशल्यताको शीघ्र ही माप्त हो जावे उसका नाम कम्मिका बुद्धि है ३ । जो अवस्थाके परिवर्तनसे बुद्धिका भी परिवर्जन हो जाता है जैसे वालावस्था युवावस्था वृद्धावस्थाओंका अनुक्रमतासे परिवर्तन होता है उसी प्रकार बुद्धिका भी परिवर्तन हो (१८) जाता है क्योंकि इन्द्रिय निर्बल होनेपर इन्द्रियजन्य ज्ञान भी प्रायः परिवर्तन हो जाता है, अपितु ऐसे न ज्ञात कर लिजीये इन्द्रिये शून्य होनेपर ज्ञान भी शून्य हो जायगा । आत्मा ज्ञान एक ही है किन्तु कर्मोंसे शरीरकी दशा परिवर्तन होती है, साथ ही ज्ञानावणी आदि कर्म भी परिवर्तन होते रहते हैं परंतु यह वार्ता मतिज्ञानादि अपेक्षा ही है न तु केवलज्ञान अपेक्षा । सो इसको परिणामिका बुद्धि कहते हैं ४ । सो यह सर्व बुद्धिये मतिज्ञानके निर्मल होनेपर ही प्रगट होती हैं, किन्तु सम्यग् दृष्टि जीवोंकी सम्यग् बुद्धि होती है मिथ्याटष्टि जीवोंकी बुद्धि भी मिथ्यारूप ही होती है अर्थात् सम्यग् दीको मतिज्ञान होता है मिथ्या- दशीको मलिअज्ञान होता है, इसका नाम मतिज्ञान है । और श्रुतज्ञानके चतुर्दश भेद हैं जैसेकि-अक्षरश्रुत १,अन- क्षरश्रुत २, संजिश्रुत ३, असंज्ञिश्रुत ४, सम्यग्श्रुत ५, मिथ्यात्व श्रुत ६, सादिश्रुत ७, अनादिश्रुत ८, सान्तश्रुत (सपर्यवसानश्रुत) २, अनंतश्रुन १०, गमिकश्रुत ११, अगमिकश्चत १२, अंगम- विष्टश्रुत १३, अनंगप्रविष्टश्रुत १४ ॥ भाषार्थ:-अक्षरश्रुत उसका नाम है जो अक्षरोंके द्वारा सुनकर ज्ञान प्राप्त हो, उसका नाम अक्षरश्रुत है ।। (२) अनक्षर (९९) श्रुत उसका नाम है जो शब्द सुनकर पदार्यका ज्ञान तो पूर्ण हो जाये अपितु वह शब्द उस भांति लिखने में न आवे जैसे छीक, मोरका शब्द इत्यादि । (३) संज्ञिश्रुत उसे कहते हैं जिसको कालिक उपदेश (सुनके विचारनेकी शक्ति) हितोप- देश (सुनकर धारणेकी शक्ति ) दृष्टिवादोपदेश (क्षयोपशम भावसे वस्तुके जाननेकी शक्तिका होना तथा क्षयोपशम भावसे संज्ञि भावका प्राप्त होना) यह तीन ही प्रकार शक्ति प्राप्त हो उसका नाम संजिश्रुत है । (४)असंज्ञिश्रुत उसका नाम है जिन आत्माओंमें कालिक उपदेश और हितोपदेश नहीं है केवल दृष्टि- वादोपदेश ही है अर्थात् क्षयोपशमके प्रभावसे असंज्ञि भावको ही प्राप्त हो रहे हैं । (५) सम्यग्श्रुत-जो द्वादशाङ्ग सूत्र सर्वज्ञ प्रणीत हैं अथवा आप्त प्रणीत जो वाणी है वे सर्व सम्पग्श्रुत है।। (६) मिथ्यात्वश्रुत-जो सम्यग् ज्ञान सम्यग् दर्शन सम्पग् चारित्रसे वर्जित ग्रंथ हैं जिनमें पदार्थोंका यथावत् वर्णन नहीं किया गया है और अनाप्त प्रणीत होनेसे वे ग्रंथ मिथ्यात्वश्रुत है ॥ (७) सादिश्रुत उसको कहते हैं जिस समय कोई पुरुष श्रुत अध्ययन करने लगे उस कालकी अपेक्षा वे सादिश्रुत है । क्षेत्रकी अपेक्षासे पंच भरत पंच ऐरवत क्षेत्रोंमे द्वादशांग सादि हैं, तीर्थंक- रोका विरह आदिका होना कालसे उत्सपिणि अवसप्पिणिका (१००) वर्तना इस अपेक्षासे भी सादिश्रुत है भावसे अर्हन्के मुखसे पदायाँका श्रवण करना चे भी एक अपेक्षा सादिश्रुत है ।। (८) अनादिश्रुत उसका नाम है जो द्रव्यसें बहुतसे पुरुप परंपरागत श्रत पढ़ते आये हैं । क्षेत्रसे द्वादशाक्षरूप श्रुत महाविदेहोंमें अनादि हैं क्योंकि महाविदेहोंमें तीर्थंकरोंका अभाव नहीं होता और द्वादशाङ्गरूप श्रुत व्यवच्छेद नही होते । कालसे जहांपर उत्सामिाण आदि काळचक्रोंका वर्तना नहीं है वहां भी अना- दिश्रुत है जैसे महाविदेहोमें ही। भावसे क्षयोपशम भावकी अपेक्षा अनादिश्रुत है अर्थात् क्षयोपशम भाव सदैवकाल जीवके साथ ही रहता है (चेतनगुण) ॥ (९) सान्तश्रुत पूर्ववत् ही जान लेना; जैसे एक पुरुषने श्रुताध्ययन आरंभ किया, जब वे श्रुत अध्ययन कर चुका तब वे सान्तश्रुत हो गया ? क्षेत्रसे पंचभरतादि सान्तश्रुत है २ कालसे उत्सप्पिणी आदि कालसे भी सान्तश्रुत है ३ भावसे जो अर्हन् भगवानके मुख से श्रुत प्रतिपादन किया हुआ है वे व्यवच्छेदादि अपेक्षा सान्तश्रुत है ४ ॥ (१०) अनंत श्रुत-द्रव्यसे बहुतसे आत्मा श्रुत पढ़ेथे वा पढ़ेगे। अनादि अनंत संसार होनेसे श्रुत भी अपर्यवसान है १ क्षेत्रसे ५ महाविदेहोंकी अपेक्षासे भी श्रुत अपर्यवसान ही है २ काळसे उत्सार्पिणि आदिके न होनेसे अनंत है ३ भावसे क्षयोपशम भावकी १ Pror (१०१) अपेक्षा श्रुत अनंत ही है क्योंकि क्षयोपशम भाव आत्मगुण है इस लिये श्रुत भी अपर्यवसान है ४ ॥ (११) गमिकश्रुत दृष्टिवाद है ।। (१२) अगमिकश्रुत आचारांगादि श्रुत हैं । (१३ ) अंगप्रविष्टश्रुत द्वादशाङ्ग सूत्र हैं ।। (१४) अनंगपविष्ट श्रुत अंगोंसे व्यतिरिक्त आवश्यकादि सूत्र है। इनका पूर्ण वृत्तान्त नंदी आदि सिद्धान्तों से जानना ॥ अवधि ज्ञानका यह लक्षण है कि जो प्रमाणवर्ती पदार्थों- को देखता है वा जो रूपि द्रव्य है उनके देखनेकी शक्ति रखता है जिसके सूत्रमें पट् भेद वर्णन किये गये हैं जैसेकि आनु- गामिक ( सदैव काल ही जीवके साथ रहनेवाले ) अनानु- गामिक (जिस स्थानपे अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ है यदि वहां ही बैठा रहें तो जो इच्छा हो वही ज्ञानमें देख सक्ता है, जब वे ऊठ गया फिर कुछ नही देखता) वृद्धिमान (जो दिनप्रतिदिन वृद्धि होता है ) हायमान (जो हीन होनेवाला है ) प्रतिपाति (जो होकर चला जाता है) अप्रतिपाति ( जो होकर नहीं जाता है) यह भेद अवधिज्ञानके हैं। और मनःपर्यवज्ञान उ. सका नाम है जो मनकी पर्यायका भी ज्ञाता हो। इसके दो भेद है जैसेकि-ऋजुमति अर्थात् सार्द्ध द्वीपमें जो संज्ञि पंचिंद्रिय जीव (१०२) हैं सार्द्ध द्वि अंगुल न्यून प्रमाण क्षेत्रवती उन जीवोंके मनके पर्या- योंका ज्ञाता होना उसका ही नाम ऋजुमति है । और विपुलमति उसे कहते हैं जो समय क्षेत्र प्रमाण ही उन जीवोंके पर्यायोंका ज्ञाता होना उसका ही नाम विपुलमति है। और केवलज्ञानका एक ही भेद है क्योंकि वे सर्वज्ञ सर्वदी है, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे सब कुछ जानता है और सब कुछ ही देखता है, उसका ही नाम केवलज्ञान है । किन्तु यह सम्यग्दीको ही होते हैं अ- पितु मिथ्यादीको तीन अज्ञान होते हैं जैसेकि-मतिअज्ञान १ श्रुतअज्ञान २ विभंगज्ञान ३१ ज्ञानसे जो विपरीत होवे उसका ही नाम अज्ञान है ॥ और सम्यग्दर्शन भी द्वि प्रकारसे प्रति- पादन किया गया है जैसेकि-वीतराग सम्यग्दर्शन १ और छंद्मस्थ सम्यग्दर्शनं २ अपितु दर्शनके अंतरगत ही दश मका- रकी रुचियें हैं जिनका वर्णन निम्न प्रकारसे है। जीवाजीवके पूर्ण स्वरूपको जानकर आस्रवके मार्गोंका वेत्ता होना, जो कुछ अर्हन् भगवान्ने स्वज्ञानमें द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे पदार्थों के स्वरूपको देखा है वे कदापि अन्यथा नहीं है ऐसी जिसकी श्रद्धा है उसका ही नाम निसर्गरुचि है १॥ जि- सने उक्त स्वरूप गुर्वादिके उपदेशद्वारा ग्रहण किया हो उसका (१०३.) ही नाम उपदेशरुचि है २॥ फिर जिसका राग द्वेष मोह अज्ञान अवगतं हो गया हो उस आत्माको आज्ञाचि हो जाती है ३ ॥ जिसको अंगसूत्रों वा अनंगसूत्रोंके पठन करनेसे स- म्यक्त्व रत्न उपलब्ध होवे उसको सूत्ररुचि होती है अर्थाद सूत्रों के पठन करनेसे जो सम्यक्त्व रत्न प्राप्त हो जावे उसका ही नाम सूत्ररुचि है ४ || एक पदसे जिसको अनेक पदोंका वोध हो जावे और सम्यक्त्व करके संयुक्त होवे पुनः जलमें तैलबिंदुः वत् जिसकी बुद्धिका विस्तार है उसका ही नाम बीजरुचि ५॥ जिसने श्रुतज्ञानको अंग सूत्रोंसे वा प्रकीणोंसे अथवा दृष्टि- वादके अध्ययन करनेसे भली भांति जान लिया है अर्थात् श्रुतज्ञानके पूर्ण आशयको माप्त हो गया है जिसका नाम अभि- गम्यरुचि है ६ ॥ फिर सर्व द्रव्योंके जो भाव हैं वह सर्व प्रमाणों द्वारा उपलब्ध हो गये हैं और सर्व नयों के मार्ग भी जिसने जान लिये हैं उसका ही नाम विस्तारखचे है ७ ॥ और ज्ञान दर्शन चारित्र तप विनय संत्य सामित गुप्तिमें जिसकी आत्मा स्थित है सदाचारमें मग्न है उसका ही नाम क्रियारुचि है ८ ॥ जिसने परमतकी श्रद्धा नही ग्रहण की अपितु जिन शास्त्रोंमें भी विशारद नही हैं किन्तु भद्रपरिणामयुक्त ऐसे जीवको संक्षेपरुचि होती है ९ ॥ पद् द्रव्यों का स्वरूप जिसने भलिभां- (१०४ ), तिसे जान लिया है और श्रुतधर्म चारित्रधर्ममें जिसकी पूर्ण निष्टा है जो कुछ अर्हन् देवने पदार्थों का वर्णन किया है वे सर्व यथार्थ हैं ऐसी जिसकी श्रद्धा है उसका ही नाम धर्मरुचि है १० ॥ और परमार्थको सेवन करना, फिर जो परमार्थी जन है उन्हीकी सेवा सुश्रुपा करके ज्ञान प्राप्त करना और कुदर्शनोंकी संगत वा जिन्होंने सम्यक्त्वको परित्यक्त कर दिया है उनका संसर्ग न करना यह सम्यक्त्वका श्रद्धान है अर्थात् सम्यक्त्व. का यही लक्षण है। सो सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शनके होनेपर स- म्यग्चारित्र अवश्य ही धारण करना चाहिये ।। . हितीय सर्ग समाप्त।

(१०५) ॥ तृतीय सर्गः॥ ॥ अथ चारित्र वर्णन ॥ आत्माको पवित्र करनेवाला, कर्ममलके दूर करनेके लिये क्षारवत, मुक्तिरूपि मंदिरके आरूढ़ होनेके लिये निःश्रोणि स- मान, आभूषणोंके तुल्य आत्माको अलंकृत करनेवाला, पापक- काँके निरोध करनेके वास्ते अर्गल, निर्मल जल सदृश्य जीव- को शीतल करनेवाला, नेत्रोंके समान मुक्तिमार्गके पथमें आधार- भूत, समस्त प्राणी मात्रका हितैपी श्री अर्हन् देवका प्रतिपादन किया हुआ तृतीय रत्न सम्यग् चारित्र है। मित्रवरो! यह रत्न जीवको अक्षय सुखकी प्राप्तिकर देता है। इसके आधारसे पाणी अपना कल्याण कर लेते हैं सो भगवान्ने उक्त चारित्र मुनियों वा गृहस्थों दोनोंके लिये अत्युपयोगी प्रतिपादन किया है। मुनि धर्ममें चारित्रको सर्ववृत्ति माना गया है गृहस्थ धर्ममें देश- तिक नामसे प्रतिपादन किया है। सो मुनियों के मुख्य पांच महा- व्रत है जिनका स्वरूप किंचित् मात्र निम्न प्रकारसे लिखा जाता (१०६) (१) सबाज पाणावाया वेरमणं ॥ सर्वथा मकारसे प्राणातिपातसे नित्ति करना अर्थात् स- वैथा प्रकारसे जीवहिंसा निर्वर्तना जैसेकि मनसे १ वचनसे २ कायासे ३, करणेसे १ करानेसै २ अनुमोदनसे ३ क्योंकि यह अहिंसा व्रत प्राणी मात्रका हितैषी है और दया सर्व जीवोंको शान्ति देनेवाली है। फिर दया तप और संयमका मूल है, सत्य और ऋजु भावको उत्पन्न करनेवाली है, दुर्गतिके दुःखोंसे जीवकी रक्षा करनेवाली है अपितु इतना ही नही कितु कर्मरूपि रज जो है, उससे भी आत्माको विमुक्ति कर देती है, शत स. हस्रों दुःखोंसे आत्माको यह दया विमोचन करती है, महर्षि- यों करके सेवित है, स्वर्ग और मोक्षके पथकी दया दर्शक है, ऋधि, सिद्धि, शान्ति, मुक्ति इनके दया देनेवाली है।। पुनः प्रा- णियोंको दया आधारभूत है जैसे क्षुधातुरको भोजनका आ- धार है, पिपासेको जलका, समुद्रम पोतका, रोगीको ओषधिका, भयभीतको शुरमेका आधार होता है । इसी प्रकार सर्व माणि- योंको दयाका आधार है, फिर सर्व प्राणि अभयदानकी प्रार्थना करते रहते हैं, जो सुख है वे सर्व दयासे ही उपलब्ध होते हैं।

(१०७) यथा- . मातेव सर्वभूतानां अहिंसा हितकारिणी । अहिंसैव हि संसारमरांवमृतसारणिः ॥ १ ॥ अहिंसा दुःखदावानि मावषेण्य घनावली । भवभ्रमिरुंगार्चानामहिंसा परमौषधी ॥२॥ दीर्घमायुः परंरूपमारोग्यं श्लाघनीयतां । अहिंसा याः फलं सर्व किमन्यत्कामदैवसा ॥ ३ ॥ भाषार्थ:-सज्जनों ! अहिंसा माताके समान सर्व जीवोंसे हित करनेवाली है और अमृत के समान आत्माको तृप्ति देनेवा- की है और जो संसारमें दुःखरूपि दावाग्नि पचंड हो रही है उसके उपशम करने वास्ते मेघमालांके समान है। फिर जो भव- भ्रमणरूपि महान् रोग है उसके लिये यह अहिंसा परमौषधी तथा मित्रो ! जो दीर्घ आयु, नीरोग शरीर, यशका प्राप्त होना सौम्यभावका रहना अर्थात् जितने संसारी सुख हैं वे सर्व अहिंसाके ही द्वारा प्राप्त होते हैं। इस वास्ते सर्वज्ञ सर्वदर्शी अर्हन् भगवान्ने मुनियोंके लिये प्रथम व्रत अहिंसा ही वर्णन किया है, सो सर्व वृत्तिवाला जीव सर्वथा प्रकारसे हिंसाका परित्याग करे इसका नाम अहिंसा महावत है ।

(१०८)
(१) सबाउ मुसावायाउ वेरमणं ॥
सर्वथा प्रकारसे मृपावादसे निति करना जैसेकि आप
असत्य भाषण न करे औरोंसे न करावे असत्य भाषण करता-
ओंका अनुमोदन भी न करे, मन करके, वचन करके, काया
करके, क्योंकि असत्य भाषण करनेसे विश्वासताका नाश हो
जाता है और असत्य वचन जीवोंकी लघुता करनेवाला होता
है, अधोगतिमें पहोंचा देता है, वैर विरोधके करनेवाला है तथा
कौनसे कष्ट हैं जिसका असत्यवादीको सामना नहीं करना
पड़ता। इस लिये सत्य ही सेवन योग्य है । सत्यके ही महात्म्यसे
सर्व विद्या सिद्ध हो जाती हैं । तप नियम संयम व्रतोंका सत्य
मूल हैं परमश्रेष्ठ पुरुषोंका धर्म है, सुगतिके पथका दर्शक है, लो.
गमें उत्तम व्रत है। सत्यवादीको कोई भी पराभव नही कर सक्ता,
यथार्थ अर्थोंका ही सत्यवादी प्रतिपादक होता है और सत्य
आत्मामें प्रकाश करता है, परिणामोंके विषवादको हरण करने-
वाला है और अनेक विकट कष्टोंसे जीवकों विमुक्त करके
मुखके मार्गमें स्थापन करता है तथा देव सहश शक्तिये
दिखानेमें भी सत्यवादी समर्थ हो जाता है । और
लोगों सारभूत है । सर्व विद्या सत्यमें निवास करती

( १०९) हैं और सत्यके द्वारा ही पदार्थोंका निर्णय ठीक हो जाता है। अ. पितु सत्य द्रव्य गुण पर्यायों करके युक्त होना चाहिये । पूर्वपद द्रव्यों का स्वरूप वा सत्य असत्य नित्यानित्य स्यादस्ति नास्ति आदि पदार्थों का स्वरूप लिखा गया है उनके अनुसार भाषण करे तो भाव सत्य होता है, अन्यत्र द्रव्य सत्य है, सो महात्मा भाव सत्य वा द्रव्य सत्य अर्थात् सर्वथा प्रकारे ही सत्य भाषण करे यही महात्माओंका द्वितीय महावत है ।। (३) सबाउ अदिन्नादाणा वेरमणं ॥ तृतीय महाव्रत चौर्य कर्मका तीन करणों तीन योगोंसे परित्याग करना है जैसेकि आप चोरी करे नही (विना दीए लेना ), औरोंसे करावे नही, चौर्यकर्म करताओंका अनुमोदन भी न करे, मन करके वचन करके काया करके, क्योंकि इस महाव्रतके धारण करनेवालोंको सदैव काल शान्ति, तृष्णाका निरोध, संतोप, आत्मज्ञान निरास्रव पदार्थो गतिकी इन पदार्थोंका भलिभान्तिसे वोध हो जाता है। और जो चौर्य कर्म करनेवालोंकी दशा होती है जैसेकि अंगोका छेदन वध दोभाग्य दीनदशा निर्लज्जता असंतोप परवस्तुओंको देखकर मनमें कलुपित भावोंका होना दोनों लोगोंमें दुःखोंका भोगना अविश्वासपात्र बनना मुखका स्पर्श, (११०) सज्जनों करके धिकारपात्र होना अनंत काँकी प्रकृतिको एकत्र करना संसारचक्रमें परिभ्रमण करना कारागृहोंमें विहार अनेक दुर्वचनोंका सहन करना शस्त्रोंके सन्मुख होना इत्यादि कष्टोंसे जीव विमुक्त होते हैं जो तृतीय महाव्रतको धारण करते हैं, क्योंकि योगशास्त्रमें लिखा है कि- वरं वन्हिशिखा पीता सास्य चुम्बितं वरम् । वरं हालाहलं लीढं परस्य हरणं न तु ॥ १ ॥ अर्थात् अग्निकी शिखाका पान करना, सर्पके पुनः विषका भक्षण सुंदर है किन्तु परद्रव्यको हरण करना सुंदर नही है क्योंकि इन क्रियाओंसे एकवार ही मृत्यु. होती है आपितु चौर्यकर्म अनंतकाल पर्यन्त जीवको दुःखी करता है, इस लिये सर्व दुःखोंसे छुटनेके लिये मुनि तृतीय महाव्रत धारण करे ।। (3) सवाउ मेहुणाज वेरमणं ॥ सर्वथा मैथुनका परित्याग करे तीन करणों तीन ही योगों- से, क्योंकि यह मैथुन कर्म तप संयम ब्रह्मचर्य इनको विघ्न करने- वाला है, चारित्ररूपी ग्रहको भेदन करनेवाला है, प्रमादोंका मूल है, बालपुरुषोंको आनंदित करनेवाला है, सज्जनों करके परित्यागनीय है और शीघ्र ही जराके देनेवाला है, क्योंकि का- (१११ ) मीको वृद्ध अवस्था भी शीघ्र ही घेर लेती है। मृत्युका मूल है कामी जन शीघ्र ही मृत्यु के मुखमें प्राप्त हो जाते हैं तथा कामि- योंकी संतति भी (संतान) शीघ्र ही नाश हो जाती है, क्योंकि जिनके मातापिता ब्रह्मचर्य से पतित हुए गर्भाधान संस्कारमें प्रवृत्त होते है वे अपने पुत्रोंके प्रायः जन्म संसारके साथ ही मृत्यु संस्कार भी कर देते हैं तथा यदि मृत्यु संस्कार न हुआ तो वे पुत्र शक्तिहीन दौर्भाग्य मुख कान्ति- हीन आलस्य करके युक्त दुष्ट काँमें विशेष करके प्र- तमान होते हैं। यह सर्व मैथुनकर्मके ही महात्म्य है तथा इस कर्मके द्वारा विशेष रोगोंकी माप्ति होती है जैसेकि राजय- क्ष्मादि रोग हैं वे अतीव विषयसे ही मादुर्भुत होते हैं और कास श्वास ज्वर नेत्रपीडा कर्णपीडा हृदयशूल निर्वलता अजीर्णता इत्यादि रोगों द्वारा इस परम पवित्र शरीर विषयी लोग नाश कर बैठते हैं। कइयोंको तो इसकी कृपासे अंग छेद- नादि कर्म भी करने पड़ते हैं । पुनः यह कर्म लोग निंदनीय वध बंधका मूल है परम अधर्म है चित्तको भ्रममें करनेवाला है दर्शन चारित्ररूपि घरको ताला लगानेवाला है वैरके करने- वाला है अपमानके देनेवाला है दुर्नामके स्थापन करनेवाला है। अपितु इस कामरूपि जलसे आजपर्यन्त इन्द्र, देव, चक्रवर्ती वासु- (११२ ) देव राजे महाराजे शेठ सेनापति जिनको पूर्ण सामान मिळे हुए थे वे भी तृप्तिको प्राप्त न हुए और उन्होंने इसके वशमें होकर अनेक कष्टोको भोगन सहन किया । कतिपय जनाने तो इसके वश होकर माण भी दे दिये । हा कैसा यह कर्म दुःखदायक है और शोकका स्थान है क्योंकि विषयीके चित्तमें सदा ही शोकका निवास रहता है, इसलिये इन कप्से विमुक्त होनेका मार्ग एक ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्य से ही उत्तम तप नियम ज्ञान दर्शन चारित्र समस्त विनयादि पदार्थों प्राप्त होते हैं। और यमनियमकी वृद्धि करनेवाला है, साधुजनों करके आसेवित है, मुक्तिमार्गके पथको विशुद्ध करनेहारा है और मोक्षके अक्षय सुखोंका दाता है, शरीरकी कांति सौम्यता प्रगट करनेवाला है, यतियों करके सुरक्षित है, महापुरिसों करके आचरित है, भव्य जनोंके अनुमत है, शान्तिके देनेवाला है, पंचमहावताका मूल है, समित गुप्तियोंका रक्षक है, संयमरूपि घरके कपाट तुल्य है, मुक्तिके सोपान है, दुर्गतिक मार्गको निरोध करनेवाला है, लोगमें उत्तम व्रत है, जैसे तड़ागकी रक्षा करनेवाली वा तड़ागको सुशोभित करनेवाली सोपान होती है, इसी प्रकार संयमकी रक्षा करनेवाला ब्रह्मचर्य है तथा जैसे शकटके चक्रकी तूंवी होती है, महानगरकी रक्षाके किये

(११)
कपाट होते हैं तथावत् ब्रह्मचर्य आत्मज्ञानकी रक्षा करने-
वाला है। अपितु जिस प्रकार शिरके छेदन हो जानेपर
कटि भूजादि अवयव कार्यसाधक नहीं हो सक्ते इसी
प्रकार ब्रह्मचर्यके भन्न होनेपर और व्रत भी भग्न हो जाते हैं।
फिर ब्रह्मचर्य सर्व गुणोंको उत्पादन करता है । अन्य व्रतोंको
इसी प्रकारसे सुशोभित करता है जैसे तारोंको चन्द्र आभूषणोंको
मुकुट वस्त्रोंको कपासका वस्त्र पुष्पोंको अरविंद पुष्प वृक्षोको च.
दन सभाओंको स्वधर्मीसभा दानोंको अभयदान ज्ञानोंको केव-
ल ज्ञान मुनियोंको तीर्थकर वनोंको नंदनवन । जैसे यह वस्तुयें
अन्य वस्तुयोंको सुशोभित करती हैं इसी प्रकार अन्य नियमोंको
ब्रह्मचर्य भी सुशोभित करता है क्योंकि एक ब्रह्मचर्यके पूर्ण
आसेवन करनेसे अन्य नियम भी सुखपूर्वक सेवन किए जा सक्ते
हैं । फिर जिसने इसको धारण किया वे ही ब्राह्मण है मुनि है
ऋपि है साधु है भिक्षु है और इसके द्वाग सर्व प्रकारकी मु-
खोंकी माप्ति है।
यथा-
प्राणभूतं चरित्रस्य परब्रह्मक कारणम् ।।
समाचरन् ब्रह्मचर्य पूजितैरपि पूज्यते ॥१॥

(११४) वृत्ति-प्राणभूतं जीवितभूतं चरित्रस्य देशचारित्रस्य सर्व- चारित्रस्य च परब्रह्मणो मोक्षस्य एकमद्वितीयं कारणं समाचरन् पालयन् ब्रह्मचर्य जितेन्द्रियस्योपस्थनिरोधलक्षणं पूजितैरपि सुरासुरमनुजेन्द्रः न केवळमन्यैःपूज्यते मनोवाक्कायोपचारपूनाभिः॥ भाषार्थ:-यह ब्रह्मचर्य व्रत चारित्रका जीवितभूत है, मोक्ष- का कारण है, जितेन्द्रियता इसका लक्षण है, देवों करके पूज्यनीय है। चिरायुपः सुसंस्थाना दृढं संहनना नरा ।। तेजस्विनो महावीर्या भवेयुर्ब्रह्मचर्यतः ॥ २ ॥ वृत्ति-चिरायुपो दीर्घायुपोऽनुत्तरमुरादिपूत्पादात् शोभनं संस्थानं समचतुरस्रलक्षणं येषां ते सुसंस्थानाः अनुत्तरसुरादि- घूत्पादादेव दृढं बलवत् संहनमस्थिसंचयरूपं वज्रऋपभनाराचा- ख्यं येषां ते दृढसंहननाः एतच्च मनुजभवेपूत्पद्यमानानां देवेषु संहननाभावात् तेजः शरीरकान्तिः प्रभावो वा विद्यते येषां ते तेजस्विनः महावीर्या बलवत्तमाः तीर्थकरचक्रवादित्वेनोत्पादात भवेयुर्जायेरन ब्रह्मचर्यतो ब्रह्मचर्यानुभावात् ।। भाषार्थ:-दीर्घआयु सुसंस्थान दृढ संहनन (पूर्ण शक्ति) शरीरकी कान्ति महा पराक्रम यह सर्व ब्रह्मचर्यके धारण ही .

. (११५) होते हैं, तथा जो इस पवित्र ब्रह्मचर्य रत्नको प्रीतिपूर्वक आ. सेवन नहीं करते हैं तथा इससे पराङ्मुख रहते हैं, उनकी नि.. प्रकारसे गति होती है। यथा- कम्पः स्वेदः श्रमो मूर्छा, भ्रमिग्लानिर्वलक्षयः ॥ राजयक्ष्मादि रोगाश्च, भवेयुमैथुनोत्थिताः॥१॥ अर्थः-कम्प स्वेर्दै (पसीना ) थकावट मूर्छा भ्र। ग्लानि वलका क्षय राजयक्ष्मादि रोग यह सर्व मैथुनी पुरुषोंको ही उत्पन्न होते हैं, इस लिये सत्य विद्याके ग्रहण करनेके लिये आत्मतत्त्वको प्रगट करनेके वास्ते और समाधिकी इच्छा रख- तो हुआ इस ब्रह्मचर्य महाव्रतको धारण करे यही मुनियों का चतुर्थे महावत है, और सर्व प्रकारके सुख देनेवाला है ।। सबाउ परिग्गहाउ वेरमणं ।। सर्वथा प्रकारसे परिग्रहसे नित्ति करना तीन करणों तीन योगोंसे वही पंचम महावत है, क्योंकि इस परिग्रहके ही प्रतापसे आत्मा सदैवकाळ दुःखित शोकाकुल रहता है, और संसारचक्रमें नाना प्रकारकी पीड़ाओंको प्राप्त होता है । पुनः (११६) इसके वशवतियोंको किसी प्रकारकी भी शान्ति नही रहती अपितु क्लेशभाव, वैरभाव, ईष्या, मत्सरता इत्यादि अवगुण धनसे ही उत्पन्न होते हैं और चित्तको दाह उत्पन्न करता है। प्रत्युतः कोई २ तो इसके वियोगसे मृत्युके मुखमें जा बैठते हैं और असह्य दुःखोंको सहन करते हैं और जितने सम्बन्धि हैं वे भी इसके वियोगसे पराङ्मुख हो जाते हैं, और इसके ही महात्म्यसे मित्रोंसे शत्रुरूप बन जाते हैं, तथा जितने पापकर्म हैं वे भी इस धनके एकत्र करनेके लिये किये जा रहे हैं। ध. नसे पतित हुए पाणि दुष्टकर्मों में जा लगते हैं। फिर यह परि- ग्रह रागद्वेषके करनेवाला है, क्रोध मान माया लोभकी तो यह वृद्धि करता ही रहता है, धर्मसे भी जीवोंको पाराङ्मुख रखता है। और धनके लालचियोंके मनमें दयाका भी प्रायः अभाव रहता है, क्योंकि न्याय वा अन्याय धनके संचय करनेवाले नही देखते हैं, वह तो केवल धनका ही संचय करना जानते हैं, और इसके लिये अनेक कष्टको सहन करते हैं । किन्तु इस धनकी यह गति है कि यह किसीके भी पास स्थिर नही रहता । चोर इसको लूट ले जाते हैं, राजे लोग छीन लेते हैं, अग्नि और जलके द्वारा भी इसका नाश हो जाता है, सम्ब- धि वांट लेते हैं तथा व्यापारादि क्रियायोंमें भी विना इच्छा (११७) इसकी हानी हो जाती है अर्थात् लाभकी इच्छा करता हुआ व्यय हो जाता है, और इसके वास्ते दीन वचन बोलते हैं, नीचौकी सेवा की जाती है अर्थात्- ऐसा कौनसा दुःख है जो परिग्रहकी आशावानको नही प्राप्त होता ?.चित्तके संक्लेष मनकी पीड़ाओंको भी येही उत्पन्न करता है, इसलिये सूत्रोंमें लिखा है कि (मुच्छा.परिग्गहो वुतो) मूर्छाका नाम ही परिग्रह है। सो मुनि किसी भी पदार्थ पर ममत्व भाव न करे और शुद्ध भावोंके साथ पंचम महाव्रतको धारण करे, और अपरिग्रह होकर पापोंसे मुक्त होवे, माण मोती आदि पदार्थोंको वा तृणादिको समं ज्ञात करे और मान अपमा- नको भी सम्यक प्रकारसे सहन करे, सर्व जीवोंमें समभाव रक्खें, अपितु सर्व जीवोंका हितैपी होता हुआ संसारसे विमुक्त होवे । और अष्ट प्रकारके काँके क्षय करनेमें कुशल जिसके मन बचन काया गुप्त है, सुख दुःखमें हर्ष विषवाद रहित है, शान्ति करके युक्त है, वा दान्त है, जिसको शंखकी नाइ राग द्वेष रूपि रंग अपना फल प्रगट नही कर सक्ता, जिसके चन्द्रवत् सौम्य भाव है और दर्पणवत् हृदय पवित्र है, और शून्य स्थानों में जिसका निवास है, इत्यादि गुणयुक्त ही मुनि इस व्रतको धा- रण कर सक्ते हैं। , - (११८) और षष्टम रात्रीभोजन त्यागरूप व्रत है, पथा- सबाउ राउन्नोयणाज वेरमणं ।। सर्वथा रात्रीभोजनका त्यागरूप पष्टम व्रत है जैसेकि अन्न १ पाणी २ खाधम' ३ स्वाधम ४ यह चार ही प्रका- रका आहार तीनों करणों और तीनों योगोंसे परिहार करे, क्योंकि रात्रीभोजनमें अनेक दोष दृष्टिगोचर होते हैं। जीवोंकी रक्षा वा किसी कारणसे जूं आदि यदि आहारमें भक्षण हो जाये तो जलोदरादि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। फिर जिस दिनसे रात्रीभोजन त्यागरूप व्रत ग्रहण किया जाता है, उसी दिनसे शेष आयुमेंसे अर्द्ध आयु तपमें ही लग जाती है तथा रात्रीभोज- नके त्यागियोंको रोगादि दुःख भी विशेष पराभव नही करसक्ते क्योंकि रात्री दिनका किया हुआ भोजन सुखपूर्वक परिणत हो जाता है और रात्रीको विशेष आलस्य भी उत्पन्न नहीं होता। जीवोंकी रक्षा, आत्माको शान्ति, ज्ञान ध्यानकी वृद्धि इत्यादि अ- नेक लाभ रात्रीभोजनके त्यागियोंको प्राप्त होते हैं, इस लिये यह व्रत भी अवश्य ही आदरणीय है । इसका होनाम षष्टम व्रत है, सो १ खानेवाले पदार्थ जैसे मिष्टान्नादि । २ आस्वादनेवाले पदार्थ जैसे चूर्णादि ।

(११९) मुनि *पांच महाव्रत षष्टम रात्रीभोजनरूप व्रतको धारण करे। अपितु भावनाओं द्वारा भी महाव्रतोंको शुद्ध करता रहे क्यों- कि प्रत्येक २ महाव्रतकी पांच २ भावनायें हैं। भावना उसे कहते हैं जिनके द्वारा पांच महावत सुखपूर्वक निर्वाह होते हैं, कोई भी विघ्न उपस्थित नहीं होता, सदैच काळ ही चित्तके भाव व्रतोंके पालनमें लगे रहते हैं। सो भावनाओंका स्वरूप निम्न प्रकारसे है। प्रथम महाव्रतकी पंच नावनायें ॥ मथम भावना-महावतके धारक मुनि जीवरक्षाके वास्ते विना यत्न ऊठ बैठ गमणागमण कदापि न करें और नाहि किसी आत्माकी निंदा करें क्योंकि निंदादि करनेसे उन आत्मा- ओंको पीड़ा होती है, पीड़ा होनेसे महाव्रतका शुद्ध रहना कठिन हो जाता है ॥ द्वितीय भावना-मनको वशमें रखना और हिंसादि युक्त मन कदापि भी धारण न करना अर्थात् मनके द्वारा किसीकी * पांच महावतोंका षष्टम रात्रीमोजन त्यागरूप व्रतका स्व. रूप श्री दशवैकालिक सूत्र, श्री आचारांग सूत्र, श्री प्रश्नव्याकरण सूत्र इत्यादि सूत्रोंसे जान लेना ॥

( १२० ) भी हानि न चितवन करना क्योंकि मनका शुभ धारण करना हो महाव्रतोंकी रक्षा है ।। तृतीय भावना-वचनको भी वशमें करना । जो कटुक, दुःख- प्रद वचन है उसका न उच्चारण करना, सदा हितोपदेशी रहना ।। चतुर्थ भावना-निदोंप ४२ दोपरहित अन्न पाणी सेवन करना, अपितु निदोपोपरि भी मूच्छित न होना, गुरुकी आज्ञा- नुसार भोजनादि क्रियायोंमें प्रवृत्ति रखना ।। पंचम भावना-पीठफळंक, संस्तारक, शय्या, वस्त्र, पात्र, कंबल, रजोहरण, चोळ, पट्टक (कटिबंधन), मुहपत्ति, आसनादि जो उपकरण संयमके निर्वाह अर्थे धारण किया हुआ है उस उपकरणको नित्यम् प्रति प्रतिलेखन करता रहे और प्रमादसे रहित हो कर प्रमार्जन करे, उक्त उपकरणोंको यत्नसे ही रक्खे, यत्नसे ही धारण करे, यत्नपूर्वक सर्व कार्य करे, सो यही पंचमी भावना है । प्रथम महाव्रतको पंचभावनायों करके.पवित्र करता रो क्योंकि इनके अहणसे जीव अनावी हो जाता है, और यह भावना सर्व जीवोंको शिक्षामद हैं ।। द्वितीय महावतकी पंच नावनायें। प्रथम भावना--सत्य व्रतकी रक्षा वास्ते शीघ्र, या कढक, (१२) सावध, कुतुहलयुक्त वचन कदापि भी भाषण न करे क्योंकि इन वचनोंके भाषण करनेसे सत्य व्रतका रहना कठिन हो जाता है और यह नाही वचनवतियोंको भाषण करनेयोग्य है द्वितीय भावना-क्रोधयुक्त वचन भी न भाषण करे क्योंकि क्रोधसे वैर, वैरसे पैशुनता, पैशुनतासे क्लेष, क्लेषसे सत्य शील विनय सवका ही नाश हो जाता है, क्योंकि क्रोधरूपि अग्नि किस पदार्थको भस्म नही करता अर्थात् क्रोधरूपि अग्नि सर्व सत्यादिका नाश कर देता है। तृतीय भावना-सत्यवादी लोभका भी परिहार करें क्योंकि कोभके वशीभूत होता हुआ जीवं असत्यवादी बन जाता है, तो फिर व्रतोंकी रक्षा केसे हो ? इस लिये लोभको भी ? त्यागे । चतुर्थ भावना-भयका भी परित्याग करे क्योंकि भय- युक्त जीव संयमको भी त्याग देता है, सत्य और शीलसे भी मुक्त हो जाता है, अपितु भययुक्त आत्माके भावं कभी भी स्थिर नही रहते ॥ पंचम भावना-सत्यवादी हास्यका भी परित्याग करे । हास्यसे ही विरोध, क्लेष, संग्राम, नाना प्रकारके कष्ट उत्पन्न

(१२२)
होते हैं और प्रथम हास्य मनोहर पीछे दुःखमद होता है और
हासीयुक्त जीव सत्यकी रक्षा करनेमें भी समर्थ नही होता है।
इस लिये सत्य व्रतके धारण करनेवाले हास्यको कदापि भी
आसेवन न करें। सो उपर लिखी पंच ही भावनाओं करके युक्त
द्वितीय व्रतको धारण करना चाहिये ।।
तृतीय महाव्रतकी पंच नावनायें ॥
प्रथम भावना-निर्दोष वस्ती शुद्ध योगोंका स्थान
जहांपर किसी प्रकारकी विकृति उत्पन्न नही होती, और वह
स्थान स्वाध्यायादि स्थानों करके भी युक्त है, स्त्री पशु क्लीबसे
भी वर्जित है अर्थात् जिनाज्ञानुकूल है ऐसे स्थानकी विधि-
पूर्वक आज्ञा लेचे अर्थात् विनाज्ञा कहींपर न ठहरे, तब ही तृतीय
व्रतकी रक्षा हो सक्ती है, क्योंकि व्रतकी रक्षा वास्ते ही यह
भावनायें हैं ॥
द्वितीय भावना-यदि किसी स्थानोपरि प्रथम ही तृणादि
पड़े हो वह भी विनाज्ञान आसेवन न करे ।।
तृतीय भावना-पीठफकक-शय्या-संस्तारक इत्यादि-
कोंके वास्ते स्वयं आरंभ न करे अन्योंसे भी न करावे तथा अनु-
मोदन भी न करे और विषम स्थानको सम न करावे नाही कि-
सी आत्माको पीड़ित करे ।।

( १२३) चतुर्थ भावना-जो आहार पाणी सर्व साधुओंका भाग युक्त है वे गुरुकी विनाआज्ञा न आसेवन करे क्योंकि गुरु सर्वके स्वामी है वही आज्ञा दे सक्ते हैं अन्यत्र नही । पंचम भावना-गुरु तपस्वी स्थविर इत्यादि सर्वकी विनय करे और विनयसे ही सूत्रार्थ सीखे क्योंकि विनय ही परम तप है विनय ही परम धर्म है और विनयसे ही ज्ञान सीखा हुआ फलीभूत होता है और तृतीय व्रतकी रक्षा भी सुगमतासे हो जाती है, इसलिये तृतीय महाव्रत भावनायें युक्त ग्रहण करे ।। चतुर्थ महाव्रतकी पंच नावनायें ॥ प्रथम भावनां-ब्रह्मचर्यकी रक्षा वास्ते अलंकार वर्जित उ- पाश्रय सेवन करे क्योंकि जिस वस्तीमें अलंकारादि होते उस वस्तीमें मनका विभ्रम हो जाना स्वाभाविक धर्म है, सो वस्ती वही आसेवन करे जिसमें मनको विभ्रम न उत्पन्न हो। द्वितीय भावना-स्त्रियोंकी सभामें विचित्र प्रकारकी कथा न करे तथा स्त्री कथा कामजन्य, मोहको उत्पन्न करनेवाली यथा स्त्रीके अवयवोंका वर्णन जिसके श्रवण करनेसे वक्ता श्रोतें सर्व ही मोहसे आकुल हो जाये इस प्रकारको कथा ब्रह्म- चारी कदापि न करे॥

(१४) तृतीय भावना-नारीके रूपको भी अवलोकन न करे तथा अंगनाके हास्य लावण्यरूप यौवन कटाक्ष नेत्रोंसे देखना इत्या दि चेष्टाओंसे देखनेसे मनं विकृतियुक्त हो जाता है, इसलिये मुनि योषिताके रूपको अवलोकन न करे | चतुर्थ भावना-पूर्वकृत क्रीडाओंकी भी स्मृति न करें क्यों- कि पूर्वकृत काम क्रीडाओंके स्मृति करनसे मन आकुल व्या. कुलता पर हो जाता है, क्योंकि पुनः २ स्मृतिका यही फल होता कि उसकी वृत्ति उसके वंशमें नहीं रहती ॥ पंचम भावना-ब्रह्मचारी सिंग्धं आहार तथा कामजन्य पदार्थोंको कदापि भी आसेवन न करे, जैसे बलयुक्त औष- घिय मद्यको उत्पन्न करनेवाली औषधियें, क्योंकि इनके आं. सेवनसे विना तंप ब्रह्मचर्य से पंतित होनेका भय है, मनका वि- भ्रम हो जाना स्वाभाविक है । इसलिये ब्रह्मचर्यकी रक्षा वास्ते स्निग्ध भोजनका परित्याग करे और पांच ही भावनायें युक्त इस पवित्र महाव्रतको आयुपर्यन्त धारण करे । पंचम महावतकी पंच नावनायें । प्रथम भावना-श्रोत्रंद्रिपको वशमें करे अर्थात् मनोहर श- ब्दोंको सुनकर राग, दुष्ट शब्दोंको श्रवण करके द्वेषयह काम (१२५) कदापि भी न करे क्योंकि शब्दोंका इंद्रियमें प्रविष्ट होनेका धर्म है । यदि रागद्वेष किया गया तो अवश्य ही काँका बंधन हो जायगा, इसलिये शब्दों को सुनकर शान्ति भाव रक्खे ॥. द्वितीय भावना-मनोहर वा भयाणक रूपोंको भी देखकर रागद्वैप न करे अर्थात् चक्षुरिन्द्रिय वशमें करे तृतीय भावना-सुगंध-दुर्गंधके भी स्पर्शमान होने पर रागद्वेष न करे अपितु घ्राणेन्द्रिय वशमें करे । चतुर्थ भावना-मधुर भोजन वा तिक्त रसादियुक्त भोजन- के मिलनेपर सेंद्रियको वशमें करे अर्थात् सुंदर रसके मिल. नेसे राग कटक आदि मिलने पर द्वेष मुनि न करे । पंचम भावना-सुस्पर्श वा दुःस्पर्शके होनेसे भी रागद्वेष न करे अर्थात् स्पर्शेन्द्रिय वशमें करे ॥ सो यह *पंचवीस भावनाओं करके पंच महाव्रतोंको धा- रण करता हुआ दश प्रकारके मुनिधर्मको ग्रहण करे ।। यथा- दसविहे समण धम्मे पं. तं. खंती * पंचवीस भावनाओंका पूर्ण स्वरूप श्री आचाराङ्ग सूत्र श्री समवायाङ्ग सूत्र वा श्री प्रश्न व्याकरण सूत्रसे देख लेना ॥ - कष्टोंसे पृथक् ही (१२६ ) मुत्ती अावे मद्दवे लाघवे सच्चे संजमे तवे चियाए बंनचेरवासे ॥ ठाणांग सूत्र स्थान १० ॥ अर्थ:-सव अौँको सिद्ध करनेवाली आत्माको सदैव काल ही उज्ज्वलता देनेवाली अंतरंग क्रोधादि शत्रुओंका पराजय करनेवाली ऐसी परम पवित्र क्षमा मुनि धारण करे ॥ फिर सं- सारवंधनसे विमोचनता देनेवाली रखनेवाली निराश्रय वृत्तिको पुष्ट करनेवाली निर्ममत्वता महात्मा ग्रहण करे २॥ और सदा ही कुटिल भावको त्याग कर ऋजुभावी होवे, क्योंकि माया ( छल ) सर्व पदार्थों का नाश करती है ३ ॥ फिर सर्व जीवोंके साथ सको- मल भाव रक्खे अर्थात् अहंकार न करे परं मानसे विनयादि सुंदर नियमों का नाश हो जाता है ४ । साथ ही लघुभूत होकर विचरे अर्थात् किसी पदार्यके ममत्वके बंधनमें न फंसे । जैसे वायु लघु शेकर सर्वत्र विचरता है ऐसे मुनि परोपकार करता हुआ विचरे ५ ॥ पुनः सत्यव्रतको दृढतासे धारण करे अ. र्थात पूर्ण सत्यवादी होवे ६ ॥ संयम वृत्तिको निपतासे पालण करे । यदि किसी प्रकारसे परीषह पीड़ित करे तो भी संयमवृत्तिको कलंकित न करे ७ ॥ और तपके द्वारा आत्माको निर्मल करे ८॥ ज्ञानयुक्त होकर साधुओंको अन्नपाणीआदि ला-

( १२७)
कर दान देवे अर्थात् साधुओंकी वैयाकृत्य करे ९॥ और मन
वचन कायासे शुद्ध ब्रह्मचर्य व्रतको पालन करे जैसेकि पूर्व
लिखा जा चुका है १० ॥ ब्रह्मचर्यकी रक्षा तपसे होती है
सो तप *द्वादश प्रकारसे वर्णन किया गया है । यथा-
(१) व्रतोपवासादि करने या आयुपर्यन्त अनशन करना,
(२) स्वल्प आहार आसेवन करना, (३) भिक्षाचरीको जाना,
(४) रसीका परित्याग करना, (५) केशलुंचनादि क्रियायें,
(६) इन्द्रियें दमन करना, (७) दोष लगनेपर गुर्वादिके
पास विधिपूर्वक आलोचना करके प्रायश्चित्त धारण करना,
(८) और जिनाज्ञानुकूल विनय करना, (९) वैयावृत्य
(सेवा) करना, (१०) फिर स्वाध्याय ( पठनादि ) तप
करना, (११) आपितु आर्तध्यान रौद्रध्यानका परित्याग
करके धर्मध्यान शुक्लध्यानका आसेवन करना, (१२) अपने
शरीरका परित्याग करके ध्यानमें ही मन हो जाना || अपितु
द्वादश प्रकारके तपको पालण करता हुआ द्वाविंशति परीषहों-
को शान्तिपूर्वक सहन करे ॥ जैसेकि-
* द्वादश प्रकारके तपका पूर्ण विवर्ण श्री उववाइ आदि सूत्रों-
से देखो।

(१२८) वावीसं परीसहा पं. तं. दिगमा परीसह १ पिवासा परीसहे २ सीय परीसहे३ जसिण परी. सहे ४ दसमसग परीसरे ५ अचेल परीसरे ६ अरश परीसहे ७ इत्थी परीसहे ८ चरिया परीसहे ए निसीहिया परीसहे १० सिजा परी- सहे ११ आकोस परीसहे १२ वह परीसहे १३ जायणा परीसह १४ अलान्न परीसहे १५ रोग परीसहे १६ तणफास परीसहे १७ जन परीसहे १७ सकार पुरकार परीसहे १ए पन्ना परीसहे २० अन्नाण परीसहे २१ देसण परीसहे २२॥ सम- वायाज सूत्रस्थान २५॥ भाषार्थ:-महात्माको महा क्षुधातुर होनेपर भी सचित आहारादि वा अकल्पनीय पदार्थ लेने योग्य नहीं है अर्थात् क्षु- १ द्वाविंशति पपिहोंका पूर्ण स्वरूप श्री उतराध्ययन सूत्र- जीके द्वितीयाध्यायसे देखना चाहिये ।

(१३९ ) 'धा परीपहको सम्यक् प्रकारसे सहन करे किन्तु जो कृषिसे विरुद्ध है ऐसे आहारको कदापि भी न आसेवन करें १ ।। इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतुके आने पर निर्दोष जलके न मिलने पर यदि महापिपास (पा) भी लगी हो तो उसको शान्तिपूर्वक ही स- इन करे, अपितु सचित जल वा वृत्ति विरुद्ध पाणी न ग्रहण करे, क्योंकि परीषहके सहन करनेसे अनंत काँकी वर्गना क्षय हो जाती है २॥ और शीत परीषदको भी सहन करे क्योंकि सा- धुके पास प्रमाणयुक्त ही वस्त्र होता है सो यदि शीतसे फिर भी पीड़ित हो जाय तो अमिका स्पर्श कदापि भी न आसेवन करे ३ | फिर ग्रीष्मके ताप होनेसे यदि शरीर परम आकुल.. व्याकुल भी हो गया हो तद्यपि स्नानादि क्रियायें अथवा सुख- दायक ऋतु शरीरकी क्षेमकुशलताकी न आकांक्षा करे ४॥ साथ ही ग्रीष्मताके. महत्वसे मत्सरादिके दंश भी शान्तिपूर्वक सहन करे, उन क्षुद्र आत्माओंपर क्रोध न करे ५॥ वस्त्रोंके जीर्ण होनेपर तथा वन न होनेपर चिंता न करे तथा यह मेरे वस्त्र जीर्ण वा मलीन हो गये हैं अब मुजे नूतन कहाँसे मिलेंगे वा अब जीर्ण वस्त्र परिष्टापना करके नूतन लूंगा इस प्रकार से हर्ष विपवाद न करे ६॥ यदि संयममें किसी प्रकारकी चिंता उत्पन्न हुई हो तो उसको दूर करे ७ ॥ और मनसे स्त्रियोंका (१०) राग भी चितवन न करे अर्थात स्त्रियोंको पंफ (कीचड़ ) भूत जानके परित्याग करे ८ ॥ प्रामों नगरोंमें विहार करते समय जो कष्ट उत्पन्न होता है उसको सम्यक् मकारसे सहन करे, ऐसे न कहे विहारसे बैठना ही अच्छा है ९॥ ऐसे हो बैठनेका भी परीषह सहन करे, क्योंकि जिस स्थान मुनि बैठा हो विना कारण वहांसे न ऊठे १० ॥ और सम विषम शय्या मिलनेसे भी शान्तिपूर्वक परिणाम रक्खे ११ ॥ यदि कोई आक्रोश देता हो वा दुर्वचनोंसे अलंकृत करता हो तो उसपर क्रोध न करे क्योंकि मानसे विचारे इसके पास यही परितोषिक है १२॥ यदि कोई वध ( मारने ) ही करने लग जावे तो विचारे .यह मेरे आत्माका तो नाश कर ही नहीं सक्ता अपितु शरीर मेरा है ही नहीं, इस प्रकारसे वध परीषहको सहन करे १३ ।। फिर याचनाका भी परीपह सहन करे अर्थात् याचना करता हुआ लज्जा न करे १४ ॥ यदि याचना करनेपर भी पदार्थ उपलब्ध नहीं हुआ है तो विषवाद न करे १५॥ रोगों के आनेपर शान्तिभाव रक्खे तथा सावध औपाधि भी न करे १६ ॥ और संस्तारकादिमें तृणोंका भी स्पर्श सहन करे किन्तु तृणोंका परित्याग करके वस्त्रोंकी याचना न करे १७॥ स्वेदके ... आ जाने पर मलका परीषह सहन करे १८॥ इसी प्रकार सत्कार - (१३१) अपमानको भी शान्तिसे ही आसेवन करे १९ ॥ बुद्धि महान् होनेपर अहंकार न करे, यदि स्वल्प बुद्धिं होवे तो शोक न करे २० ॥ फिर ऐसे भी न विचारे की मेरेको ज्ञान तो हुआ ही नही इस लिये जो कहते हैं मुनियोंको लब्धियें उत्पन्न हो जाती है वे सर्व कथन मिथ्या है, क्योंकि जेकर ज्ञान वा लब्धियें होती तो मुजे भी अवश्य ही होती २१ ॥ और षट् द्रव्य वा तीर्थंकरोंके होनेमें भी संदेह न करे अर्थात् सम्यक्त्वसे स्खलित न हो जावे २२ ।। इस प्रकारसे द्वाविंशति पपिहोंको सम्यक् प्रकारसे सहन करता हुआ धर्मध्यान वा शुक्लध्यान में प्रवेश करता हुआ मुनि अष्ट कर्मोंकी वर्गनासे ही मुक्त हो जाता है। अष्ट काँसे ही संसारी जीव संसारके बंधनोंमें पड़े हुए हैं इनके ही त्यागनेसे जीवकी मुक्ति हो जाती है ।। यथा-ज्ञानावर्णी १ दर्शनावर्णी २ वेदनी ३ मोहनी ४ आयु ५ नाम ६ गोत्र ७ अंतराय कर्म ८॥ इन कर्मोंकी अनेक प्रकृतियें हैं जिनके द्वारा जीव सुखों वा दुखोंका अनुभव करते हैं, जैसेकि-ज्ञानावणी कर्म ज्ञानको आवर्ण करता है अर्थात् ज्ञानको न आने देता सदैव काल प्राणियोंको अज्ञान दशामें ही रखता है, पांच प्रकारके ही ज्ञानोंको आवर्ण करता है और यह कर्म जीवोंको धर्म अधर्म की परीक्षासे भी पृथक् ही रखता है अर्थात् इस कर्मके बलसे

( १.३२)
माणी तत्वविद्याको नहीं प्राप्त हो सक्त हैं। किन्तु यह कर्म जीव
षट् प्रकारसे बांधते हैं जैसेकि-
णाणावरणिज्ज कम्मा सरीरपनग बंधेणं
भने कम्मरस उदयणं गोयमा पाणपमिणीययाए
१ पाणणिएहवणयाए शणाणंतराएणं ३ णाण
प्पदोसणं ४ णाणच्चासादयाए ५ णाणविसं.
वादणा जोगेणं ६॥ भगवती सू० शतक
उद्देश ए॥
भाषार्थ:-श्री गौतम प्रभुजी श्री भगवान्से प्रश्न पूछते
है कि हे भगवन् ! जीव ज्ञानावणी कर्म किस प्रकारसे बांधते
हैं ॥ भगवान् उत्तर देते हैं कि हे गौतम ! षट् मकारसे जीव
ज्ञानावणी कर्म बांधते हैं जैसेकि-ज्ञानकी शत्रुता करनेसे अर्थात्
सदैव काल ज्ञानके विरोधि ही बने, रहना और अज्ञानको
श्रेष्ठ जानना, अन्य लोगोंको भी अज्ञान दशामें ही रखनेका
परिश्रम करना १॥ तथा ज्ञानके निण्हव बनना अर्थात्
जो वार्ता यथार्थ हो उसको मिथ्या सिद्ध करना
तथा ज्ञानको गुप्त करना, जैसेकि किसीके पास ज्ञान है. उसने

( १.३३ ) विचार किया कि यदि मैंने किसी औरको सिखला दिया तो मेरी प्रतिष्ठा भंग हो जायगी २ ॥ और ज्ञानके पठन करने- में अंतराय देना अर्थात् ऐसे २ उपाय विचारने जिस करके लोग विद्वान् न वन जाये और पूर्ण सामग्री होनेपर भी ज्ञान- वृद्धिका कोई भी उपाय न विचारना ३ ॥ और ज्ञानमें द्वेष करना ४ ॥ ज्ञानकी आशातना करना ५ ॥ ज्ञानमें विष- वाद करना तथा सत्य स्वरूपको परित्याग करके वितंडावाद- म रहना ६ ।। इन कर्मोंसे जीव ज्ञानावणी कर्मको वांधते हैं जिसके प्रभावसे जाननेकी शक्तिसे भिन्न ही रह जाते हैं, और इन कमाँ ( कारणोंसे ) के परित्याग करनेसे जीव ज्ञाना- वर्णको दूर कर देते हैं, जिस करके उनको पूर्ण ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। और दर्शनावी कर्म भी जीव उक्त ही कारणोंसे वांपते है जैसेकि-दर्शनप्रत्यूनीकता करनेसे १ दर्शननिण्हवता २ दर्शन अंतराय ३ दर्शन प्रवेपता ४ दर्शन आशातना ५ दर्शन विपवाद योग ६ ।। इन कारणों से जीव दर्शनावणी कर्म- को बांधकर चक्षुदर्शनादिका निरोध करते है २ ॥ और वेद- नीय कर्म वि प्रकारसे बांधा जाता है जैसे कि सुख वेदनी १, दुःखवेदनी २। अर्थात् जिसने किसीको भी पीड़ा नहीं दी, सर्व रसा करता रहा, किसीको दु:खित नहीं किया, वह जीव सुखरूप वेदनी कर्म बांधता है और उसका मुखरूप ही फल भोगता है।

(१३४ ) और जिसने हिंसा की, जविको दुःखित किया कभी भी परोपकार नही किया वह जीव दुःखरूप वेदनीय कर्म बांधते हैं और दुखरूप ही उसके फळ भोगते हैं । और क्रोध मान माया लोभ तथा सम्यक्त्व मोहनी मिश्रमोहनी मिथ्यात्वमोहनी इनके द्वारा जीव मोहनी कर्मको बांधते हैं जिस करके जीव मोहमें ही लगे रहते हैं। प्रायः कोई २ धर्मकी वातको भी सुनना नहीं चाहते हैं, संसारके ही कामों में लगे रहते हैं तथा क्रोधादिमें ही लगे रहते हैं, और आयुकर्म- की प्रकृतियें चार गतियोंकी चार २ कारणोसे ही जीव वांधते हैं, जैसेकि नरक गतिकी आयु जीव चार कारणों से बांधते हैं- यथा महा आरंभ करने ( हिंसादि कर्म करनेसे ) से १ और महा परिग्रह (धनकी लालसा ) के कारणसे २ पंचिंद्रिय जीवोंके वध करनेसे अर्थात् शिकारादि कर्म ३ और मांस- भक्षणसे ४॥ और चार ही कारणों से जीव तिर्यग् योनिके कर्मों- को बांधते हैं जैसेकि माया करने (छल)से १ मायामें माया करना २ असत्य भाषण करना ३ कूट तोला मापा करना. अर्थात् कूड़ तोलना कूड़ ही मापना ४ ॥ और चार ही कार- णोंसे जीव मनुष्य योनिके कर्म वांधते हैं, जैसेकि प्रकृतिसे ही भद्र होना १ प्रकृतिसे ही विनयवान होना २ दयायुक्त होना ३ मत्सरता वा ईयां न करना ४ इन्ही कारणोंसे जीव मनुष्य (१३५ ) योनिके कर्मबांधते हैं। और चार ही कारणोंसे जीव देव आ- युको बांधते हैं जैसेकि-सराग संयम पाळण करना अर्थात् साधु चि राग सहित पाळण करना १ श्रावकसति पालनेसे १ और अज्ञान कष्ट सहन करनेसे ३ अकाम निर्जरासे अर्थात् जिस वस्तुकी इच्छा है वह मिळती नही है और वासना नष्ट भी नहीं हुई उस कारणसे भी आत्मा देव आयुको बांध लेते हैं, अपितु मृत्यु समय जेकर शुभ परिणाम हो जाये तो ४ ॥ नाम कर्म भी जीव चार ही कारणोंसे बांधते हैं, जैसेकि-कायाको ऋजु- तामें रखना ? भावोंको भी ऋजु करना २ भापा भी ऋजु ही उच्चारण करनी ३ और मनमें कोई भी विषयाद न करना ४, इन कारणोंसे नीव शुभ नाम कर्मको बांधते हैं | और यह चार ही वक्र करनेसे जीव अशुभ नाम कर्मको बांधते हैं और अष्ट कारणोंसे जीव उच्च गोत्र कर्मको बांधते हैं, जैसेकि-जातिका मद न करनेसे १ कुळका मद न करनेसे २ बळका मद न क- रनेसे ३ रूपका मद न करनेसे ४ तपका मद न करनेसे ५ काभका मद न करनेसे ६ श्रुतका मद न करनेसे ७ ऐश्वर्यका मद न करनेसे ८ और आठ ही प्रकारके मद करनेसे जीव नीच गोत्रके कर्मीको बांधते हैं। और पांच ही प्रकारसे जीव अंतरांय कर्मोको बांधते हैं, जैसेकि-दानकी अंतरायसे १ लाभान्तरायसे

२ भोग अंतरायसे ३ उपभोग अंतरायसे ४ बल वीर्य अंतरायसे
५ | यह पांच ही अंतराय करनेसे जीव अंतराय काँको बांधते
हैं जैसेकि कोई पुरुष दान करने लगा तब अन्य पुरुष कोई
दानका निषेध करने लग गया और वह दान करनेसे पराङ्-
मुख हो गया तो दानके निषेध करताने अंतराय कर्मको
बांध लिया। इसी प्रकार अन्य अंतराय भी जान लेने ।
सो यह अष्ट कर्मोके बंधन भव्य जीवापेक्षा अनादि सान्त हैं,
यदुक्तयागमे-
तहा जीवाणं कम्मो वचय पुडा गोयमा
अत्थेगश्याणं जीवाणं कम्मो वचय सादिए
सपझावसिए अत्थे गश्याणं जीवाणं कम्मो
वचय अणादिए सपअवसिए अत्थे गश्याणं
अणादिए अप्पावसिए नोचेवणं जीवाणं कम्मो
वचय सादिए अप्पजवसिए से गोयमारिया
वदिया बंधयरस कम्मो वचय सादिय सपजा-
वसिए अवसिद्धियस्स कम्यो वचय श्रणादि-
ए सपङावसिए अन्नवासिबियस्स कम्मो वचय

D
( १३७ )
अणादिय अप्पावसिय से वत्थेणं नंते किं
सादिए सपशवलिय चउभंगो गो वत्थे सा-
दिय सपङवसिय अवसेस्य तिण्डिविपमिसे-
दियवा जहाणं ते वत्थे सादिय सपजावासिय
नो अणादिय अप्प नो अणादिय सपनो
अणादिय अप्पज तहा जीवा किं सादिया
सपज्जवसिया चोग्नंगो पुच्छा गोयमा अत्थे सा-
दियायचत्तारि विनापियवा से गो नेर
यतिरिक्खजोणिय मणुस्स देवा गइराग पहुंच
सादिया सपज्जवसीता सिद्धिगई पमुच्च सादिए
अपज्जवसिया नवसिदीलाई पमुच्च अणादिया
सपङवलिया अनवसिखिया संसारं पमुच्चय--
पादिया अप्पावसिया॥जगवती सूत्र शतक
६ उदेश ३॥
भापार्य:-श्री गौतम प्रभुनी श्री भगवान्से प्रश्न पूछते हैं
कि हे भगवन् ! जीवोंके साय काँका उपचय (सम्बन्ध ) क्या

( १३४) सादि सान्त है अथवा अनादि सान्त है तथा सादि अनंत है वा अनादि अनंत है ? श्री भगवान् उत्तर देते हैं कि हे गौव- म ! कतिपय जीवों के साथ कर्मोंका उपचय सादि सांत भी है और कतिपय जीवोंके साथ अनादि सान्त भी है और कतिपय जीवोंके साथ काँका उपचय अनादि अनंत भी है किन्तु जीवोंके साथ कौंका उपचय सादि अनंत नहीं होता है तब गौतमजी पूर्वपस करते हैं कि हे भगवन् ! यह वार्ता किस प्रकारसे सिद्ध है ? श्री भगवान् उदाहरण देकर उक्त कथनको स्पष्टतया सिद्ध करते हैं कि हे गौतम ! इर्यावही क्रियाका बंध सादि सान्त है उपशम मोहमें वा क्षीण मोहनी कर्ममें हो इ- सका बंध है। और भव्य जीव अपेक्षा *काँका उपचय अनादि सान्त है अपितु अभव्य जीव अपेक्षा कर्मोंका उपचय अनादि अनंत * श्री पणवन्नाजी सुत्रमें अष्ट कर्मोकी प्रकृतिये १४८ लिखी हैं जैसेकि-ज्ञानावर्णीकी ५ दर्शनावणांकी ९ वेदनीकी २ मोहनीकी २८ आयुकर्मकी ४ नामकर्मकी ९३ गोत्रकी २ अंतराय कर्मकी ५॥ और इनका बंध उदय उदीरणा सत्ता इत्यादिका स्वरूप उक्त सूत्रमें वा श्री भगवती इत्यादि सूत्रोंसे ही देख लेना।

(१३९.) है, इस कारणसे हे गौतम ! कतिपय जीवोंके साथ काँका स- म्वन्ध सादि सान्तादि कहा जाता है। श्री गौतमजी पुनः पू- छते हैं कि हे भगवन् ! जो वस्त्र है क्या वे सादि सान्त है वा अनादि सान्त है तथा सादि अनंत है वा अनादि अनंत है? भी भगवान् उत्तर देते हैं कि हे गौतम ! वस्त्र सादि सान्त ही किन्तु अन्य भंग वस्त्रमें नहीं है। श्री गौतमजी-यदि वस्त्र सादि सान्त पदवाला है और भंगोंसे वर्जित है तो हे भगवन् ! जीव क्या सादि सान्त हैं वा अनादि सान्त हैं तथा सादि अनंत हैं वा अनादि अनंत हैं ? श्री भगवान् कतिपय जीव सादि सान्त पदवाले हैं, और कतिपय अनादि सान्त पदवाले हैं, अपितु कतिपय सादि अनंत पदवाते भी हैं और कतिपय अनादि अनंत पदवाले भी हैं। श्री गौतमजी-यह कथन किस प्रकारसे सिद्ध है अर्थात् इसमें उदाहरण क्या क्या हैं ? श्री भगवान्हे गौतम ! नारकी तिर्यक् मनुष्य देव इन योनियों में जो जीव परिभ्रमण करते हैं उस अपेक्षा (गता- गतिकी) जीव सादि सान्त पदवाले हैं क्योंकि जैसे मनुष्य योनिमें कोई जीव आया तो उसकी सादि है, अपितु जिस

(१४०)
समय मृत्युको प्राप्त होगा उस समय मनुष्य योनिका उस जीव
अपेक्षा अंत होगा। इसी प्रकार सर्वत्र जान लेना । और सि-
द्ध गतिकी अपेक्षा जीव सादि अनंत हैं, किन्तु भव्य सिद
लब्धि अपेक्षा जीव अनादि सान्त है, अभव्य जीव
अपेक्षा अनादि अनंत हैं ॥ सो भव्य जीवोंके कर्मों-
का सम्बन्ध द्रव्यार्थिक नयापेक्षा अनादि अनंत है और
पर्यायाथिक नयापेक्षा सादि सान्त हैं ।। सो अष्ट काँके बंधनोंको
छेदन करके जैसे अकार्बु (तूंवा) मृत्तिकाके वा रज्जुओंके बंधनों-
को छेदन करके जलके उपरि भागमें आ जाता है इसी प्रकार
आत्मा कर्मोंसे रहित हो कर मोक्षमें विराजमान हो जाता है ।।
सो मुनिधर्मको सम्यग् प्रकारसे पालण करके सादि अनंत
पदयुक्त होना चाहिये, इसका ही नाम सर्व चारित्र है।।
इति तृतीय सर्ग समाप्त ॥

॥ चतुर्थ सर्गः॥ ॥ अथ गृहस्थ धर्म विषय ॥ और गृहस्थ लोगोंका. देशवृत्ति धर्म है क्योंकि गृहस्थ कोग सर्वथा प्रकारसे तो वृत्ति हो ही नहीं सक्ते इस लिये श्री भगवान्ने गृहस्थ लोगोंके लिये देशत्तिरूप धर्म प्रतिपादन किया है । सो गृहस्थ धर्मका मूल सम्यक्त्व: है जिसका अर्थ है कि शुद्ध देव शुद्ध गुरु शुद्ध धर्मकी परीक्षा करना, फिर परी- क्षाओं द्वारा उनको धारण करना, फिर. तीन रत्नोंको भी धारण करना, न्यायसे कभी भी पराङ्मुख न होना क्योंकि गृहस्य लोगोंका मुख्य कृत्य न्याय ही है, और अपने माता पिता भगिनी भार्या माद इत्यादि सम्बन्धियोंके कृत्योंको भी जानना, और कभी भी अन्यायसे वर्ताव न करना । देखिये श्री शान्तिनाथजी तीर्थकर देव न्यायसे पट खंडका राज्य पालन करके फिर तीर्थंकर पदको प्राप्त करके मोक्ष हो गये हैं। इसी प्रकार भरत चक्रवर्ती भी षट् खंडका राज्य भोग कर फिर मोक्षगत हुए । इससे सिद्ध है कि गृहस्थ लोगोंका मुख्य कृत्य न्याय ही और न्यायसे ही यश संपत्. लक्ष्मी इनकी प्राप्ति होती है। और (१४२) जो पुरुष अन्याय करनेवाले होते हैं वे दोनों लोगोंमें कष्ट सहन करते हैं जैसेकि इस लोगों चौर्यादि कर्म करनेवाले वध बंधनोंसे पीड़ित होते हैं और परलोकमें नरकादि गतिओंके कष्ट भोगते हैं। और हेमचन्द्राचार्य अपने वनाये योगशास्त्रक प्रथम प्रकाश गृहस्थ धर्म सम्बन्धि निम्न प्रकारसे श्लोक लि- खते हैं:- न्यायसम्पनविभवः शिष्टाचारमशंसकः। कुलशीलसमैः सार्द्ध कृतो दाहोऽन्यगोत्रजैः ॥ १॥ . पापभीरू प्रसिद्धं च देशाचार समाचरन् । अवर्णवादी न क्वापि राजादिषु विशेपतः ॥ २॥ अनतिव्यक्तगुप्ते च स्थाने मुमातिवेश्मिके। अनेकनिर्गमद्वाराविवर्जितनिकेतनः ॥ ३ ॥ कृतसङ्गः सदाचारैर्मातापित्रोश्च पूजकः । त्यजन्नुपप्लुतं स्थानमपत्तश्च गहिते ॥ ४ ॥ व्ययमायोचितं कुर्वन् वेषं विचानुसारतः । अष्टभिधीगुणैर्युक्तः शृण्वानो धर्ममन्वहम् ॥ ५॥ . अजीणे भोजनत्यागी काले भोक्ता च सात्म्यतः। अन्योन्यामतिवधेन त्रिवर्गमपि साधयन् ।। ६॥

(१४१) यथावदतिथौ साधौ दीने च पतिपचिकृत् । सदानभिनिविष्टश्च पक्षपाती गुणेषु च ॥ ७ ॥ अदेशाकालयोश्चर्या त्यजन् जानन् बलावलम् । वृत्तस्थ ज्ञानवृद्धानां पूज्यका पोष्यपोषकः ॥ ८॥ दीर्घदशी विशेषज्ञः कृतज्ञो लोकवल्लभः । सलज्जः सदयः सौम्यः परोपकृतिकर्मठः ॥ ९ ॥ अंतरंगादिषड्वर्गपरिहारपरायणः । वर्श:कृतन्द्रियग्रामो गृहिधर्माय कल्पते ।। १० ।। भावार्थ:--न्यायसे धन उपार्जन वा शिष्टाचारकी प्रशंसा करनेवाला, वा जिनका कुल शील अपने सादृश्य है ऐसे अन्य गौत्रवाळेके साथ, विवाह करनेवाला, वा पापसे डरनेवाला है, और प्रसिद्ध देशाचारको पालन करता हुआ किसी आ- स्माका भी कहींपर अवर्णवाद नहीं बोलता,अपितु राजादिकोंका विशेष करके अवर्णवाद वर्जता है और अति प्रगट वा अति गुप्त स्थानोंमें भी निवास नहीं करता किन्तु अच्छे पडोसीवाले घरमें रहनेवाला, और जिस स्थानके अनेक आने जानेके मार्ग होवे उस स्थानको वर्जता है। फिर सदाचारियोंसे संग करनेवाला, उपद्रव संयुक्त स्थानको वर्जनेवाला और जो कर्म (१४४) जगत्में निंदनीक हैं उनमें प्रवृत्ति नही करनेवाळा, और अपने लाभके अनुसार व्यय करनेवाला तथा धनके अनुसार वेष रखनेवाला जो निरन्तर ही धर्मोपदेश श्रवण करनेवाला है, फिर अजीर्णमें भोजनका त्यागी समयानुकूल आहार करनेवाका है, अपितु किसीकी हानि न करना ऐसी रीतिसे धर्म अर्थ काम मोक्षको सेवन करता है और यथायोग्य अतिथियों और दीनोंकी प्रतिपत्ति करनेवाला है, फिर सदैव काल आग्रहरहित, गुणोंका पक्षपाती, जो देशके विरुद्ध काम नहीं करता, सब का- मोंमें अपने वलावलके जानकरके काम करनेवाला तथा 'जो महात्मा पंच महाव्रतोंको पालते हैं, और जो ज्ञानकी वद्धि- में सदैवकाल कटिबद्ध है, ऐसे महात्माओंकी भक्ति वा पोपणे योग्यका पोषण करनेवाला, दीर्घदशी, विशेषज्ञ, कृतज्ञ, लोकवक्लभ, लज्जालु, दयालु, सौम्य, परोपकार करने में समर्थ, काम क्रोध लोभ मद हर्ष मान इन षट् अंतरंग वैरियोंके त्याग करनेमें तत्पर, और पांच इन्द्रियोंके वश करनेवाला, इस प्रकारकी वृत्तिवाला पुरुष गृहस्थ धर्मके धारणके योग्य होता है । और फिर सम्य- क्त्वयुक्त गृहस्थ प्रथम ही सप्त व्यसनोंका परित्याग करे क्योंकि यह सात ही व्यसन दोनों लोगोंमें जीवोंको दुःखोंसे पीड़ित कर नेवाले हैं और इनके वशमें पड़ा हुआ प्राणी अपने अमूल्य - (१४५) मनुष्य जन्मकों हार देता है इस लिये सातोंका ही अवश्य त्याग करना चाहिये, जैसेकि-प्रथम व्यसन द्युतकर्म है अर्थात् जूयका खेलना सब आपत्तियोंकी खानि है और जुया- रीको संव ही अकार्य करने पड़ते हैं। यश संपत् सुनाम धैर्य सत्यं संयम सुकर्म इत्यादि सर्वका ही यह शुतकर्म नाश कर देता है इस लिये यह व्यसन त्यागनीय है। द्वितीयं व्यसन----मांसभक्षण कदापि न करे क्योंकि यह कर्म अति निक्ति धर्मका ही नाश करनेवाला है और आर्यता. का नष्ट करनेवाला है। अनेक रोग इसके द्वारा उत्पन्न होते हैं। फिर यह ऋण है क्योंकि जिस प्राणीका जिस आत्माने मांस. भक्षण किया है उस पाणीके मांसको भी वंह अवश्य ही खायेंगे तथा विचारशील पुरुषोंका कथन है कि-जो पशु (सिंहादि) मांसाहारी जब वे कुछ परोपकार नही कर सक्ते तो भला जो मनुष्य मांसाहारी हैं उनसे परोपकारकी क्या आशा हो सक्ती है। इस लिये द्वितीय व्यसन मांसभक्षणका त्याग करना चाहिये । तृतीय व्यसन मुरापान है जो बुद्धिका विध्वंसक सत्य गुणाका नाशक है और धर्म कर्मसे पराङ्मुख करनेवाला है जिसकी उत्पत्ति भी परम घृणादायक है । और जो मद्यपान (१४६) करनेवालोंकी दुर्गति होती है वह भी लोगोके दृष्टिगोचर ही है। इस लिये यह परम निंदनीय कम अवश्य ही त्यागने योग्य है। चतुर्थ व्यसन-वेश्यासंग है । इसके द्वारा भी जो जो प्राणी कष्टोंका अनुभव करते हैं वे भी अकथनीय ही हैं क्योंकि यह स्वयं तो मलीन होती ही है अपितु संग करनेवाले मळीन- तासे अतिरिक्त शरीरके नाश करनेवाले अनेक रोगोंका भी पारितोषिक ले आते हैं। फिर वे उन पारितोपिक रूप रोगोंका आयुभर अनुभव करते रहते हैं। वेश्यागामीके सत्य शील तप दया धर्म विद्या आदि सर्व सुगुण नाशताको प्राप्त हो जाते हैं। फिर जो उनकी गति होती है वे महा भयाणक लोगोंके सन्मुख ही है, इस लिये गृहस्थ लोग वेश्या संगमा अवश्य ही परिहार करे॥ पंचम व्यसन आहेटक कर्म है। जो निर्दय आत्मा वनवासी निरापराधि तृणों आदिसे निर्वाह करनेवाले हैं उन प्राणियोंका वध करते हैं, वे महा निर्दय और महा अन्याय करनेवाले हैं, क्योंकि अनाथ प्राणियोंका वध करना यह कोई शूरवीरताका लक्षण नहीं है। बहुतसे अज्ञात जनोंने इस कर्मको अवश्यकीय ही मान लिया है, वे पुरुष सदैवकाल अपनी आ- (१४७) त्मोपरि पापोंका भार एकत्र कर रहे हैं, इस लिये माणिवध (शिकार) का त्याग अवश्यमेव ही करना चाहिये ।। पष्टम व्यसन-परस्त्री संग है, जिसके ग्रहणसे अनेक राजा- ओंके भयाणक संग्राम हुए और उनको परम कष्ट भोगने पड़े। अपितु कतिपयोंके तो प्राण भी चले गये और परस्त्री संगसे अने- क दुःख जैसेकि-अपयश, मृत्युका भय, रोगोंकी वृद्धि, शरी- रका नाश, राज्यदंड इत्यादि अनेक. कष्ट भोगने पड़ते हैं, इस लिये गृहस्थ लोग पष्टम व्यसनका भी परित्याग करें । सप्तम व्यसन-चौर्य कर्म है, सो यह भी महा हानिकारक, वध बंधादिका दाता, निंदनीय दुःखोंकी खानि, धर्मके वृक्षको काटनेके लिये परशु, सुकृतिका नाश करता, जिसके आसेवनसे देशमें अशान्ति इत्यादि अवगुणों का समूह है सो धर्मकी इच्छा करता हुआ गृहस्थ इस चौर्य कर्मका भी परिहार करे । फिर द्रव्य क्षेत्र काल भावके अनुसार धर्मका उदय करता हुआ गुरु मुखसे द्वादश व्रत धारण करे जो निम्न लिखितानुसार है ।। थुलाउ पाणाश्वायाउ वेरमणं ।। स्थूल जीवहिंसासे निवृत्तिरूप प्रथम अनुव्रत है क्योंकि सर्वथा जीवहिंसाकी तो गृहस्थी निवृत्ति नही कर सक्ते, इस (१४४ ) लिये उसके स्थूलं जीवहिंसाको परित्याग होता है, जैसौकि- जान करके वा देख करके निरंपराधि जीवोंकी ने मारें। उसमें भी सगासम्बंधिं आदिका आगार होता है और इस नियमसे न्यायमार्गकी प्रवृत्ति अतीव होती है। फिर इस नियमको राजोंसे केकर सामान्य जीवों पर्यन्तं सवी आत्मायें सुखपूर्वक धारण कर सक्ते हैं और इस नियमसे यह भी सिद्ध होता होता है कि जैन धर्म प्रजाका हितैषी राजे कौगोंका मुख्य धर्म है। निरं- पराधियोंको मत दुःख दो और न्यायमार्गसे वाहिर भी मत हो- वो और सिद्धार्थ आदि अनेक महाराजोंने इस नियमको पालन किया है। फिर भी जो जीव सअपराधि है उनको भी दंड अन्यायसे न दिया जाये, दंडके समय भी दयाको पृथक् न किया जाये, जिस प्रकार उक्त नियममें कोई दोष न लगे, उसे प्रकारसे ही ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि सूत्रोंमें यह वात देखी जाती है । जिस राजाने किसी अमुक व्यक्तिको दंड दिया तो साथ ही स्वनगरमें उद्घोषणासे यह भी प्रगट कर दिया कि- हे लोगो ! इस व्यक्तिको अमुक दंड दिया जाता है इसमें राजेका कोइ भी अपराध नहीं है, ने अंजाकों, अपितुं जिस प्रकार इसने यह काम किया है उसी प्रकार इसको यह दंड दिया गया है। सो इस कथनसे भी न्यायधर्मकी ही पुष्टि होती है।

(१४१) सो प्रथम व्रतकी शुद्धयर्थे पांच अतिवारों को भी वर्जित करे जोकि प्रथम व्रतमें दोषरूप है अर्थात् प्रथम व्रतको कलं. कित करनेवाले हैं, जैसेकि- बंधे १ वहे ५ विच्छेदे ३ अश्भारे ४ नत्तपाणिवु ए ५॥ अर्थ:-क्रोधके वश होता हुआ कठिन बांधतों से जीवों को चांधना १ और निर्दयके साथ उनको मारना २ तथा उनके अंगोपाङ्गको छेदन करना ३ अप्रमाण भारका लादना अर्थात् पशुकी शक्तिको न देखना अन्न पाणीका व्यवच्छेद करना अर्थात् अन्न पाणी न देना ५ ॥ यह पांच ही दोष प्रथम व्रतको कलंकित करनेवाले हैं, इस लिये प्रथम व्रतको पालनेहारे जीव उक्त लिखे हुए पांच अतिचारोंको अवश्य ही त्यागें, तब ही ब्रतकी शुद्धि हो सक्ती है। द्वितीय अनुव्रत विषय । थुलाल मुसावायाज वेरमणं॥ स्थूल मृषावाद निटतिरूप द्वितीय अनुव्रत है जैसेकि स्थूलमृवा- चाद कन्नाके लिये, गवादि पशुओं के लिये, अम्पादिके लिये अथ- .

( १५०) वा स्थापनमृषा (धरोड मारना) कूट शाक्षी तथा व्यापारमें स्थूल असत्य और अन्य २ कारणोंमें जिसके भाषण करनेसे प्रतीतका नाश होचे, राज्यसे दंडकी प्राप्ति होवे, और आत्मा पापसे कलंकित हो जाय इत्यादि कारणोंसे असत्यभापी न होवे, अपितु यह ना समज लिजीये स्थूल ही मृषावादका परित्याग है किन्तु सू- क्ष्मकी आज्ञा है । मित्रवरो! सूक्ष्मकी आज्ञा नही है किन्तु दोष न लग जानेपर स्थूल शब्द ग्रहण किया गया है अर्थात् व्रतमें दोष न लगे | अपितु असत्य सर्वधा ही त्यागनीय है और जीवको सदैवकाल दु:खित रखनेवाला है, संसारचक्रमें परि- वर्तन करानेवाला सुकौंका नाशक है, किन्तु सत्य व्रत ही आत्माकी रक्षा करनेवाला है। सो इस व्रतकी रक्षार्थे भी पांच ही अतिचारों वजें, जैसेकि- सहस्सा नक्खाणे रहस्सा भक्खाणे सदार- मंतनेय मोसोवएसो कूड लेह करणे ॥ अर्थ:-अकस्मात् विना उपयोग भाषण करना । तथा गुप्त वाताओंको प्रगट करना अर्थात् जिनके प्रगट करनेसे किसी आत्माको दुःख पहुंचता हो अथवा कामकथादि २१ और अपने घरकी वात वा सस्त्रीकी बातें प्रगट करना ३ ॥

(१५१)
और अन्य पुरुषोंको असत्य उपदेश करना ४ । तथा असत्य
ही लेख लिखने ५ | इन पांच ही अतिचारोंको त्याग करके
द्वितीय व्रत शुद्ध ग्रहण करे ॥
तृतीय अनुव्रत विषय ॥
थुलाल श्रदिन्नादाणायो वेरमणं॥
तृतीय अनुव्रत स्थूल चोरीका परित्यागरूप है जैसेकि
ताला पडि कूची, गांठ छेदन करना, किसीकी भित्ति तोड़ना,
मार्गों में लूटना, डोके मारने क्योंकि यह ऐसा निंदनीय कर्म है
कि दोनों लोगोंमें भयाणक दशा करनेवाला है और इसके
द्वारा वधकी प्राप्ति होना तो स्वाभाविक वात है । फिर इस कर्म
कर्ताओंके दया तो रही नही सक्ति, सब मित्र उसीके ही शत्रु
रूप बन जाते हैं और इस कर्मके द्वारा प्राणि अनेक कष्टको
भोगते हैं, इस लिये तृतीय व्रतके धारण करनेवाला गृहस्थ पांच
अतिचारोंका भी परिहार करे जैसेकि-
तेणाहमे १ तक्कर पउगे २ विरुद्ध रजा-
श्कम्मे ३ कूड़ तोले कूड़ माणि ४ तप्पमिरूवग
ववहारे ५॥
-

भाषार्थ:-इस व्रतकी रक्षा अर्षे निम्न लिखित अतिचार अवश्य ही वर्जे, जैसेकि-चोरीकी वस्तु (माल) लेनी क्योंकि इस कर्मके द्वारा जो लोग फल भोगते हैं वह लोगोंके दृष्टिगो- चर ही हैं और चोरोंकी रक्षा वासहायता करना २। राज्य विरुद्ध कार्य करने क्योंकि यह कार्य परम भयाणक दशा दि- खलानेवाला है और तृतीय व्रतको कलंकित करनेवाला है । फिर कूट तोळ कूट ही माप करना ( घट देना, वृद्धि करके लेना) ४ । और शुद्ध वस्तुओंमें अशुद्ध वस्तु एकत्र करके विक्रय करना क्योंकि यह कर्म यश और सत्यका दोनोंका ही घातक है। इस लिये पांचो अतिचारोंको परित्याग करके तृतीय व्रत शुद्ध धारण करे।। चतुर्थ स्वदार संतोष व्रत ॥ मित्रवसे ! कामको वशी करना और इन्द्रियों को अपने वशमें करना यही परम धर्म है जैसे इंधनसे अग्नि तृप्तिको प्राप्त नही होती केवळ पाणी द्वारा ही उपशमताको प्राप्त हो जाती हैं, इसी प्रकार यह काम अग्नि संतोष द्वारा ही उपशम हो सक्ती है, अन्य प्रकारसे नही, क्योंक्ति यह ब्रह्मचर्य व्रत आत्मशक्ति, मुक्तिके अक्षय सुख, शरीरकी निरोगता, उत्साह, हर्ष, चित्तकी (१५३ ) प्रसन्नता देनेवाला है और उभय लोगमें यशपद है। इसके धारणा करनेवाले आत्मा स्व स्वरूप, वा पर स्वरूपके पूर्ण वेत्ता होते हैं । अपितु गृहस्थ लोगोंको पूर्ण ब्रह्मचारी होना परम कठिन है, इसी वास्ते अर्हन् देवने व्यभिचारक बंध करनेके वास्ते गृहस्थ लोगोंका स्वदार संतोष व्रत प्रतिपादन किया है अर्थात् अपनी स्त्री वर्जके शेष स्त्रिय भगिनी वा मातृवत् जानना ऐसे वतला- या है। और स्त्रियों के लिये भी स्वपति संतोष व्रत है; अपितु इतना ही नहीं, अपनी स्त्री पर भी मूर्छित न होना, परस्त्रियोंका कभी भी चितवन न करना और अपनी स्त्री पर ही संतोष का रना । सो इस व्रतके भी पांच अतिचार हैं, जैसेकि- श्तरिय परिग्गहिय गमणे अप्परिग्गहिय गमणे अणंग कीडा पर विवाह करणे कामभोग तिवान्निलाले ॥ भाषार्थ:-स्वस्त्री* यदि लघु व्यवस्थाकी हो क्योंकि किसी * प्रथम अतिचारका अर्थ ऐसे भी लिखा हुआ है कि पर- स्त्रीको स्तोककाल पर्यन्त अपनी स्त्री बनाके रखना । द्वितीय अ- तिचारका अर्थ विधवा ला वेश्याको आसेवन करना । चतुर्थका अर्थ परके विवाह आदि करने। परंतु श्री पूज्य आचार्य सोहनलालजी महाराजने उपर लिखे हुए ही अर्थ बतलाये हैं।

(१५४ ) कारण वशान लघु व्यवस्थामें ही विवाह हो गया तो लघु व्य वस्थायुक्त स्त्रीके साथ संभोग न करे, यदि करे तो प्रथम अतिचार है १ । अथवा. यदि उपविवाह हुआ उसके साथ संग करना जिसको मांगना कहते हैं २ । कुंचेष्टा करना अर्थात् कामके वशीभूत होकर कुचेष्टा द्वारा वीर्यपात करना ३ । तथा परका मांगना किया हुआ उसको आप ग्रहण करना (उ- पविवाहको)४। और कामभोगकी तिव्र अभिलाषा रखनी ५। इन पांच ही अतिचारोंको त्यागके चतुर्थ स्वदार संतोषी व. तको शुद्धताके साथ धारण करे क्योंकि यह व्रत परम आल्हाद भावको उत्पन्न करनेहारा है ।। फिर पंचम अनुव्रतको धारण करे जैसेकि- इच्छा परिमाण व्रत विषय ॥ हा परिमाणे॥ मित्रवरो ! तृष्णा अनंती है, इसका कोइ. भी थाह नही मिलता। इच्छाके वशीभूत होते हुए प्राणी अनेक संकटोंका.सा- मना करते हैं, रात्री दिन इसकी ही चिंतामें लगे रहते हैं, इसके लिये कार्य अकार्य करते कज्जा नही पाते और अयोग्य कामों- के लिये भी उद्यत हो जाते हैं, परंतु. इच्छा फिर भी पूर्ण . , ( १५५) नही होती। अनेक राजे महाराजे चक्रवर्ती आदि भी इस तृष्णा रूपी नदीसे पार न हुए और किसीके साथ भी यह लक्ष्मी न गइ । यदि यों कहा जाय तो अत्युक्ति न होगा कि तृष्णाके वशसे ही प्राणी सर्व प्रकारसे और सर्व ओरसे दुःखोंका अ- नुभव करते हैं। इस लिये तृष्णा रूपी नदीसे पार होनेके लिये संतोप रूपी सेतु (शेतुपुल ) बांधना चाहिये अर्थात् इच्छा- का परिमाण होना चाहिये । जव परिमाण किया गया तब ही पंचम अनुव्रत सिद्ध हो गया। इसी वास्ते श्री सर्वज्ञ प्रभुने दुःखों- से छुटनेके वास्ते आत्माको सदैवकाळ आनंद रहेनेके वास्ते. पंचम अनुव्रत इच्छा परिमाण प्रतिपादन किया है, जिसका अर्थ है कि इच्छाका परिमाण करे, आगे वृद्धि न करे ॥ और इस व्रतके भी पांच ही अतिचार हैं, जैसेकि- खेत्त वत्थु प्पमाणातिकम्मे हिरएण सुवएण प्पमाणातिकम्मे दुप्पय चउप्पय पमाणाति- कम्मे धरण धारण प्पमाणातिकम्मे कुविय धात प्पमाणातिकम्मे ॥ भावार्थ:-क्षेत्र, वस्तु (घर हाट) के परिमाणको अति- ऋम करना, हिरण्य सुवर्णके परिमाणको अतिक्रम करना, द्विपाद (मनुष्यादि) चतुष्पाद (पशवादिके के परिपाणको अतिक्रम करना, और धन धान्यके परिमाणको अतिक्रस करना, फिर घरके उपकर्णके परिमाणको अतिक्रम करना वही पंचम अनुव्रतके अतिचार हैं अर्थात् जितना जिस वस्तुका परिमाण किया हो उनको उल्लंघन करना वही अतिचार हैं, इस लिये अतिचारोंको बजेके पंचम अनुव्रत शुद्ध पालन करे ।। और षष्टम, सप्तम, अष्टम, इन तीनों व्रतोंको गुणव्रत कहते हैं क्योंकि यह तीन गुणवत पांच ही अनुव्रतोंको गुणकारी हैं, और पांच ही अनुव्रत इनके द्वारा सुरक्षित होते हैं । अथ प्रथम गुण व्रत विषय ।। दिग्त्रत ॥ सुयोग्य पाठक गण! प्रथम गुणवतका नाम दिग्बत है जिसका अर्थ यह है कि दिशाओंका परिमाण करना, जैसेकि पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर, उर्व, अधो, इन दिशाओंमें स्खक्का- या करके गमण करनेका परिमाण करना । और पांच आस्रव सेवनका परित्याग करना क्योंकि जितनी मर्यादा करेगा उत- ना ही आस्रव निरोध होगा। सो इस व्रत के भी पांच ही अति- चार हैं जैसेक्ति-

(१६७)
उह दिसि प्पमाणातिकमे. श्रहों दिसि
प्पमाणाइक्कमै तिरिय दिसि प्पमाणाइक्कमें
खेत बुद्धि सअंतरद्धा।
भाषार्थ:-उर्ध्व दिशिको प्रमाण अतिक्रम करना १ अधी
दिशिका प्रमाण अतिक्रम करना २ तिर्यग् दिशिका प्रमाण अति-
क्रम करना ३ क्षेत्रकी वृद्धि करना जैसेकि कल्पना करो कि
किसी गृहस्धने चारों ओर शतं ( सौ ३) योजन प्रमाण क्षेत्र
रक्खा हुआ है । फिर ऐसे न करे कि पूर्वकी ओर १५०
योजन प्रमाण कर लूं और दक्षिणकी ओर १० योजन ही रहने
दूं क्योंकि दक्षिणमें मुजे काम नही पड़ता पूर्वमें अधिक काम
रहता है; यह भी अतिचार है ४ । और पंचम अतिचार यह है
कि जैसेकि प्रमाणयुक्त भूमिमें संदेह उत्पन्न हो गया कि
स्यात् में इतना क्षेत्र प्रमाण युक्त आ गया हूँ सो संशयों ही
आगे गमेणं करना यही पांचमा अतिचार है अपितु पाँचो ही
अतिचारोंको वर्जके प्रथम गुणत्रत शुद्ध ग्रहण करनी चाहिये ।।
लोग परिलोग परिमाणे ।
जो वस्तुं एक बार भीगनमें आवे तथा जो वस्तु वारम्बार

(१५८)
भोगनेमें आवे उसका परिमाण करना सो ही द्विनीय गुणवत
है, सो इस व्रतके अंतरगत ही पविशति वस्तुओंका परिमाण
अवश्य करना चाहिये, जैसेकि-
१ उल्लणियाविहं-स्नानके पश्चात् शरीरके पूंछनेवाले वस्त्रका
परिमाण करना तथा जितने वस्त्र रखने हों।
२ दंतणविहं-दांत पक्षालण अर्थेदांतुनका परिमाण करना।
३ फलविहं-केशादि धोवनके वास्ते फलोंका परिमाण करना।
४ अभंगणविहं-तैलादिका प्रमाण अर्थात् शरीरके मर्दन
वास्ते ।
५ उवट्टणविह-शरीरकी पुष्टि वास्ते उबट्टनका परिमाण ।
६ मज्जनविहं-स्नानका परिमाण गणन संख्या वा पा-
'णीका परिमाण ।
७ वत्थविहं-वस्त्रोंका प्रमाण अर्थात् वस्खोंकी जाति संख्या
बा गणन संख्या।
८ विलेवणविह-चंदनादि विलेपनका परिमाण ।
९ पुष्फविहं-शरीरके परिभोगनार्थे पुष्पोंका परिमाण ।
.

(१५९) १. आभरणविई-आभूषणोंका परिमाण । ११ धूवविई-धूपविधिका परिमाण अर्थात् धूपयोग्य वस्तुओंके नाम स्मृति रखके अन्य वस्तुओंका परित्याग करना। १२ पिज्जविह-पीनेवाली वस्तुओंका परिमाण करना । १३ भक्खणविह-भक्षण (खाने) करनेवाली वस्तुओं- का परिमाण। १४ उदनविई-शाल्यादि धानादिका परिमाण । १५ सूफविहं-शूपा (दाल) दिका परिमाण । १६ विगयविहं-दुग्ध, घृत, नवनीत, तैळ, गुढ़, मधु, दधि, इनका परिमाण करना। १७ सागविह-शाक विधिका परिमाण अर्थात् जो वन- स्पतिये शाकादि परिपक्क करके ग्रहण की जाती हैं। १८ महुरविह-फलोंका परिमाण । १९ जीमणाविहं-व्यञ्जनादिका परिमाण जैसेकि मसालादि। २० पाणीविहं-पाणीका परिमाण कूपादिका तथा अन्य जल। २१ मुखावासविहं-ताम्बूलादिका परिमाण । २२ वाहणविह-वाहण विधिका परिमाण अर्थात् स्वारि का परिमाण।

(१६. २३ पाहणिविई-पादरक्षकका परिमाण अर्थात् जूती आदिका परिमाण करना। २४ संयणबिह-शय्याका परिमाण अर्यात वस्त्रोंकी गणन संख्या अथवा शय्यादि स्पर्श करना चा पल्यकादिका परिमाण । २५ संचित्तविह-सचित्त वस्तुओंका परिमाण अर्थात् पृथ्वी, पाणी, अग्नि, वायु, वनस्पति इत्यादि सचित्तं वस्तुओंका परिमाण । २६ दरवविह-द्रव्योंका परिमाण अर्थात् भिन्न २ वस्तुओंका नीम लेकर परिमाणं करना । जैसे किसीने ५ द्रव्य रक्खें तो जळ १ पूपा (रोटी )२ दाल ३ शाकं ४ दुग्ध ५ । इसी प्रकार अन्य द्रव्योंका परिमाण भी जान लेना चाहिये । तात्पर्य यह है कि विनां परिमाण कोई भी वस्तु ग्रहण करनी न चा- हिये । सो इसके भी पांच ही अतिचार, जैसेकि- सचित्ताहार सचित्त पडिबंद्धाहारे अप्पो- लिंउसही नक्खणया सुप्पोलउसही नक्ख- णया तुच्छोसही नक्खण्या ।। भाषार्थः साँचत्त वस्तुका परित्यागे होने पर यह अति- चार भी वर्ने, जैसेकि सचित्त वस्तुका आहार १ सचित्तं पति- ।

(१६१.) बद्धका आहार २ अपक आहार ३ दुःपक्क आहार ४ तुच्छोप- धिका आहार ५॥ इन पांच ही अतिचारोंको वर्जक फिर १५ कर्मादानको भी परित्याग करे क्योंकि पंचदश कर्म ऐसे हैं जिनके करनेसे महा काँका बंध होता है । सो गृहस्थों को जानने योग्य हैं अपितु ग्रहण करने योग्य नहीं हैं, जैसे कि- १ अङ्गारकम्मे-कौलादिका व्यापार । २ वणकम्मे-बन कटवाना क्योंकि यह कर्म महा निर्दय- ताका है। ३ साडीकम्मे-शकट (गाड़े) करवाके वेचने । ४ भाडीकम्मे-पशुओंको भाडेपर देना क्योंकि इस कर्म करनेवालोंको पशुओंपर दया नही रहती। . फोडीकम्मे-पृथ्वी आदिका स्फोटक कर्म जैसे कि शिलादि तोड़ना वा पर्वत आदिको । ६ दत्तवणिज्जे-हस्ती आदिके दांतोंका वणिज करना। ७ लख्खवाणिज्जे-लाखका वणिज तथा मजीठाका व्या- पार करना ॥ परसवाणिज्जे-रसोंका वनज करना जैसेकि घृत, तेल, गुड़, मदिरादि ॥ ९ केसवाणिज्जे-केशोंका वनज करना तथा केश शब्दके अंतरगत ही मनुष्य विक्रियता सिद्ध होती है ॥

( १६२)
१०विसवाणिज्जे-विपकी विक्रियता करनी क्योंकि यह
कृत्य महा कोंके बंधका स्थान है और आशीर्वादका तो यह
प्रायः नाश ही करनेवाला है।
११ जत्तपीलणियाकम्मे-यंत्र पीड़न कर्म जैसे कि कोल्हु
ईख पीड़नादि कर्म हैं।
१२ निळच्छणियाकम्मे-पशुओंको नपुंसक करना चा
अवयवोंका छेदन भेदन करना ।।
१३ दवग्गिदावणियाकम्मे-चनकों अग्नि लगाना तथा
द्वेषके कारण अन्य स्थानोंको भी अनिद्वारा दाह करना इत्यादि
कृत्य सर्व उक्त कर्ममें ही गर्भित हैं।
१४ सर दह तलाव सोसणियाकम्म-जलाशयोंके जलको
शोषित करना, इस कर्मसे जो जीव जलके आश्रयभूत हैं वा जो
जीव जलसे निर्वाह करते हैं उन सबोंको दुःख पहोंचता है
और निर्दयता बढ़ती है ।।
१०. असइजणपोसणियाकम्मे-हिंसक जीवोंकी पाळना
करना हिंसाके लिये जैसेकि-मार्जारका पोपण करना भूपकों
( उंदर ) के लिये, श्वानों की प्रतिपालना करना जीववध के लिए
और हिंसक जीवोंसे व्यापार करना वह भी इसी कर्ममें गर्मित
है, सो यह कर्म गृहस्थोंको अवश्य ही त्याज्य हैं । जो आर्यकर्म

(१६३) हैं उनमें जीवहिंसाका निरोध होनेसे ही जीवोंको निज ध्यानकी ओर शीघ्र ही आकर्षणता हो जाती है वचोंकि-आर्य कर्मके द्वारा आर्य मार्गकी भी शीघ्र प्राप्ति होती है। फिर इस द्वितीय गुणवतको धारण करके तृतीय गुणव्रतको ग्रहण करे। अथ तृतीय गुणव्रत विषय । सुज्ञ जनों ! तृतीय गुणत्रत अनर्थ दंड है । जो वस्तु स्वग्रहण करनेमें न आवे और किसीके उपकारार्य भी न हों, निष्कारण जीवोंका मर्दन भी हो जाए ऐसे निंदित काँका अवश्यमेव ही परित्याग करना चाहिए । वे अनर्थ दंडके मुख्य कारण शास्त्रोंमें चार वर्णन किये हैं जैसेकि-( अवज्झाण चरियं पमायचरियं हिंसपयाणं पावकम्मोवएसं) आर्त ध्यान करना क्योंकि इसके द्वारा महा कर्मोंका बंध, चित्तकी अशान्ति, धर्मसे पराङ्मुखता इत्यादि कृत्य होते हैं इस लिए अपने संचित कर्मोंके द्वारा सुख दुःख जीवोंको प्राप्त होते हैं, इस प्रकारकी भावनाएं द्वारा आ- स्माको शान्ति करनी चाहिए । फिर कभी भी प्रमादाचरण न करना चाहिए जैसे घृत तैल जलादिको विना आच्छादन किये रखना, यदि उक्त वस्तुओंमें जीवोंका प्रवेश हो जाए तो फिर उनकी रक्षा होनी कठिन ही नहीं किन्तु असंभव ही है। फिर (१६४ ) हिंसाकारी पदार्थोंका दान करना जैसे-शस्त्रदान, अग्निदान, और ऊखल मूसलदान इत्यादि दानोंसे हिंसाकी प्रत्ति होती है, सुकर्मकी अरुचि हो जाती है । और चतुर्थ कर्म अन्य आ- त्माओंको पाप कर्ममें नियुक्त करना, सो यह कर्म कदापि आ- सेवन न करने चाहिए। फिर इस तृतीय गुणव्रतकी रक्षाके लिए पांच अतिचारोंको भी छोड़ना चाहिए जो निम्न प्रकारसे हैं । कंदप्पे १ कुकुश्ए २ मोहरिए ३ संजुत्ताहि गरणे ४ उवलोग परिजोग अरित्ते ५॥ भावार्थ-कामजन्य वार्ताओंका करना १ और कुचेष्टा करना तथा साँग होरी आदिमें उपहास्यजन्य कार्य करने २ असंबद्ध वचन भाषण करने तथा धर्मयुक्त वचन बोलने ३ प्रमाणसे अधिक उपकरण वा शस्त्रादिका संचय करना ४ जो वस्तु एक वार आसेवन करनेमें आवे अथवा जो वस्तु पुनः २ ग्रहण करनेमें आवे उनका प्रमाणसे अधिक संचय करना अथवा प्रमाणयुक्त वस्तुमें अत्यन्त मूछित हो जाना। यह पांच ही अतिचार छोड़ने चाहिए, क्योंकि इन दोषों के द्वारा व्रत कलंकित हो जाते हैं और निर्जराका मार्ग ही बंध हो जाता है, सो विना निर्जराके मोक्ष नहीं अपितु मुक्तिके लिए श्री

(१६५)
अर्हन् देवने चार शिक्षाक्त प्रतिपादन किए हैं जिनमें प्रथम
शिक्षाबत सामायिक है ॥
अथ सामायिक प्रथम शिक्षाबत विषय ॥
जो जीवोंको अतीव पुण्योदयसे मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ
है उसको सफल करनेके लिये दोनों समय सामायिक
करना चाहिए ॥ रसम-आय-इक-इन की संधि करनेसे
१ नवविहे पुण्णे पं. तं. अन्नपुण्णे १ पाणपुण्णे २ वत्थपुण्णे
लेणपुण्णे ४ सयणपुण्णे ६ मणपुण्णे ६ वयपुण्णे ७ कायपुण्णे
८ नमोकारपुण्णे ९ ॥ ठाणांग सू० स्था० ९॥
मापार्थ--नव प्रकारसे जीव पुन्य प्रकृतिको बांधते हैं जैसे
कि अन्नके दानसे १ पानीके दानसे इसी प्रकारसे २ वस्त्रदान
३ शय्यादान ४ संस्तारकदानसे ५ । फिर शुभ मनके धारण
करनेसे ६ और शुम वचनके बोलनेले ७ शुभ कायाके धारण
करनेसे ८ और सुयोग्य पुरुपोंको नमस्कार करनेसे ९ । सो इन
कारणोंसे जीव पुन्यरूप शुभ प्रकृतिका बंध कर लेता है।
२ सम शब्दके सकारका अकार, ठण् प्रत्ययान्त होनेसे दीर्घ
हो जाता है क्योंकि-जिस प्रत्ययके ब्–ण-इत्संज्ञक होते हैं उनके
आदि अच्को आ-आर् और ऐच हो जाते हैं। इसी प्रकारसे
सामायिक शब्दकी भी सिद्धि है।

(१६६) सामायिक शब्द सिद्ध होता है जिसका अर्थ यह है कि आत्माको शान्ति मार्गमें आरूढ़ करना वा जिसके करनेसे शान्तिकी प्राप्ति होचे उसीका नाम सामायिक है । सो इस प्रकारसे भाव सामायिकको दोनों काल करे । फिर प्रातःकाळ, और सन्ध्याकालमें सामायिककी पूर्ण विधिको भलि भांतिसे करता हुआ सामायिक सूत्रको पठन करके इस प्रकारसे विचार करे कि यह मेरा आत्मा ज्ञानस्वरूप है, केवल कर्मोंके अंतरसे ही इसकी नाना प्रकारकी पर्याय हो रही है और अनादि काल के कर्मोंके संगसे इस प्राणीने अनंत जन्म मरण किये हैं। फिर पुनः २ दुःखरूपि दावानलमें इस प्राणीने परम कष्टाको सहन किया है, और तृष्णाके वशमें होता हुआ अतृप्त ही मृत्युको माप्त हो जाता है । सो ऐसे परम दुःखरूप संसार चक्रसे विमुक्त हों- नेका मार्ग केवळं सम्यग् ज्ञान सम्यग् दर्शन सम्यग् चारित्र ही है। सो जब प्राणी आस्रवके मागाको बंध करता है और आत्माको अपने वशमें कर लेता है, तव ही कोंके बंधनोंसे विमुक्त हो जाता है । सो इस प्रकारके सद् विचारोंके द्वारा सामायिक कालको परिपूर्ण करे। अपितु सामायिक रूप व्रत दो घटिका प्रमाण दोनों समय अवश्य ही करना चाहिये और इस व्रतके भी पांचों अतिचारोंको वर्जना चाहिये, जैसे कि- ( १६७ ) ते मण दुप्पणिहाणे वय दुप्पणिहाणे काय दुप्पणिहाणे सामायियस्स अकरणयाय सामा- यियस्स अणवठियस्त अकरण्याए ॥५॥ भापार्य:-सामायिक व्रतके भी पांच ही अतिचार हैं। जैसे कि-मनसे दुष्ट ध्यान धारण करना १ वचन दुष्ट उच्चा- रण करना २ और कायाको भी वशमें न करना ३ शक्ति हो. हुए सामायिक न करना ४ और सामायिकके कालको विनाही पूर्ण किये पार लेना ५ ॥ यह पांच ही सामायिक व्रतके अतिचार हैं, सो इनका परित्याग करके शुद्ध सामायिक रूप नियम दोनों समय अर्थात् सन्ध्या समय और प्रातःकाल नियम- पूर्वक आसेवन करे और अतिचारोंको कभी भी आसेवन करे नहीं, क्योंकि अतिचाररूप दोष व्रतको कलंकित कर देते हैं। सो यही सामायिक रूप प्रथम शिक्षाव्रत है ।। फिर द्वितीय शिक्षाबत ग्रहण करे, जैसे कि- देशावकाशिक ॥ जो पष्टम व्रतमें पूवादि दिशाओंका प्रमाण किया था उस प्रमाणसे नित्यम् प्रति स्वल्प करते रहना उसीका ही नाम देशा-

( १६८ ) .
चकाशिक व्रत है और इसी व्रतमें चतुर्दश नियमोंका धारण किया
जाता है । अपितु जिस प्रकारसे नियम करे उसी प्रकारसे
पालन करे किन्तु परिमाणकी भूमिकासे वाहिर पांचास्रव सेवन
का प्रत्याख्यान करे। अपितु इस व्रतके धारण करनेसे बहुत ही
पापोंका प्रवाह बंध हो जाता है और इस व्रतका भी पांचो अति-
चारोंसे रहित होकर पालण करे, जैसे कि-
आणवणप्पजग्गे पेसवणप्पजग्गे सहाणु-
वाय रूवाणुवाय वहियापोग्गल पक्खेवे ॥
भाषार्थ:-प्रमाणकी भूमिकासे बाहिरकी वस्तु आज्ञा
करके मंगवाई हो १ तथा परिमाणसे वाहिर भेजी हो २ और
शब्द करके अपनेको प्रगट कर दिया हो ३ वा रूप करके अपने
आपको प्रसिद्ध कर दिया हा ४ अथवा किसी वस्तु पर पुद्गल
क्षेप करके उस वस्तुका अन्य जीवोंको बोध करा दिया हो५॥
सो इन पांच ही अतिचारोंको परित्याग करके दशवा देशावका-
शिक व्रत शुद्ध धारण करे । और फिर पर्व दिनों में तथा मासमें
षट
पौषध करे क्योंकि पौपध व्रत अवश्य ही धारण करना चा-
हिये जिसके धारण करनेसे कौकी निर्जरा वा तप कर्म दोनों
ही सिद्ध हो जाते हैं।

( १६९) तृतीय पौषध शिक्षाबत विषय ॥ उपाश्रयमें वा पौषधशाला तथा स्वच्छ स्थानमें अष्ट याम- पर्यन्त एक स्थानमें रहकर उपवास व्रत धारण करना उसका ही नाम पौषध व्रत है | आपितु पौषधोपवासमें अन्न, पाणी, खा- धम, स्वाधम, इन चारों ही आहारका प्रत्याख्यान होता है, आर ब्रह्मचर्य धारण करा जाता है। आपितु मणि स्वादिका भी प्रत्या- ख्यान करना पड़ता है, शरीरके शृंगारका भी त्याग होता है,अपितु शस्त्रादि भी पास रक्खे नही जा सक्ते और सावध योगोंका भी नियम होता है । इस प्रकारसे पौषधोपवास व्रत ग्रहण करा जाता है। प्रतिमासमें षट् पौषधोपवास करे तथा शक्ति प्रमाण अवश्य ही धारण करने चाहिये । और पांचो अतिचारोंको भी त्यागना चाहिये-जैसेकि शय्या संस्तारक न प्रतिलेखन किया हो, यदि किया है तो दुष्ट प्रकारसे प्रतिलेखन किया है १ । इसी प्रकार शश्या संस्तारक प्रमार्जित नहीं किया हो, यादे किया है तो दुष्ट प्रकारसे किया गया है:२। ऐसे ही पूरीषस्थान वा मलवनस्थान पतिलेसन न किया हो, यदि किया है तो दुष्ट प्रकारसे किया है ३ । और यदि प्रमार्जित न किया हो तथा किया हो तो दुष्ट प्रकारसे प्रमार्जित किया हो ४ ।

( १७० ) फिर पौषधोपचास सम्यक् प्रकारसे पालन किया न हो ५ ॥ इस प्रकारसे इन पांचों ही अविचारोंको वर्जके तृतीय शिक्षाबत. गृहस्थी लोग सम्यक् प्रकारसे धारण करें। फिर चतुर्थ शिक्षात्र- भी सम्यक् भकारसे आराधन करे ।। चतुर्थ शिक्षावत अतिथि संविन्नाग॥ महोदयवर ! चतुर्थ शिक्षाव्रत अतिथि संविभाग है जिसका अर्थ ही यही है अतिथियोंको संविभाग करके देना अर्थात् जो कुछ अपने ग्रहण करनेके वास्ते रक्खा है उसमेंसे आतिथियोंका सत्कार करना ।। अपितु जो अतिथि ( साधु) को दिया जाये वे आहारादि पदार्थ शुद्ध निर्दोष कल्पनीय हों किन्तु दोपयुक्त अशुद्ध अकल्पनीय आहारादि पदार्थ न देने अच्छे हैं क्योंकि नियमका भंग करना वा कराना यह महा पाप है। अपितु वृत्ति- के अनुसार आहारादिके देनेसे कर्मोंकी निर्जरा होती है, वृत्तिके विरुद्ध देनेसे पापका बंध होता है। इस लिये दोषोंसे रहित प्राशूक एषनीय आहारादिके द्वारा अतिथि संविभाग नामक व्रतको सम्यक् प्रकारसे आराधन करे और पांचों ही अतिचारोंका भी परिहार करे, जैसेकि- (१७१) सचिन निक्खेवणया १ सचित्त पेहणिया २ कासाश्कम्मे ३परोवएसे धमच्छरियाए ५ ॥ भाषार्थ:-न देनेकी बुद्धिसे निर्दोष वस्तुको सचित वस्तुपर रख दी हो १ वा निर्दोपको सचित्त वस्तु करिके ढांप दि- या हो २ और कालके अतिक्रम हो जानेसे विज्ञप्ति करि हो तथा वस्तुका समय ही व्यतीत हो गया होवे ही वस्तु मुनियों को दे दी हो ३ और परको उपदेश दिया हो कि तुम ही आहारादि देदो क्योंकि आप निर्दोष होने पर भी लाभ न ले सका ४ अथवा मत्सरतासे देना ५ ॥ इन पांचों ही अतिचारोंको त्याग करके चतुर्थ शिक्षाबत पालण करना चाहिये । सो यह पांच अनुव्रत, तीन अनुगुणवत, चार शिक्षाव्रत एवं द्वादश व्रत गृहस्थी धारण करे, इसका नाम देशचारित्रं है, क्यों- किं सम्यग् ज्ञान, सम्यग् दर्शन, सम्यग् चारित्र, तीन ही मुक्तिके. मार्ग हैं। इन तीनोंको ही धारण करके जीव संसारसे पार १ द्वादश व्रत इस स्थलपे केवल दिग्दर्शन मात्र ही लिखे हैं किन्तु विस्तारपूर्वक श्री उपासक दशाङ्ग सूत्र वा श्री आव- श्यकादि सूत्रोंसे देखने चाहिये ।।

( १७२ ) हो जाते हैं। आपतु यथाशक्ति इनको धारण करके फिर रात्री- भोजनका भी परिहार करना चाहिये। इनमें अनेक दोषोंका समूह है। फिर श्रावक २१ गुण करके संयुक्त हो जावे, वे गुण उक्त नियमोंको विशेष लाभदायक हैं और सर्व प्रकारसे उपादेय है, सत् पथके दर्शक हैं, अनेक कुगतियोंके निरोध कर- नेवाले हैं, इनके आसेवनसे आत्मा शान्तिके मंदिरमें प्रवेश कर जाता है । अथ एकविंशति श्रावक गुण विषय ।। धम्मरयणस्स जुग्गो अक्खुद्दोरूववं पगश्सोमो॥ लोथपियो अक्कूरो असहो सुदक्खिणो॥१॥ खजानो दयालू मन्नबो सोमदिछी गुणरागी॥ सकह सपक्खजुत्तो सुदीददंसी विसेसएणू ॥२॥ वहाणुग्गो विणियो कयएण्यो परदियत्थकारोय।। तहचेव लद्धलक्खो गवीस गुणो हवः सहो॥३॥ भाषार्थ:-जो जीव धर्मके योग्य है वह २१ गुण अवश्य ही धारण करे क्योंकि गुणोंके धारणके ही प्रभावसे गृहस्थ सु- ( १७३) योग्यताको प्राप्त हो जाता है, और यशको धारण करता है, तथा गुणोंके महत्त्वतासे जैसे चंद्र सूर्य राहुसे विमुक्त होकर सुंदरताको प्राप्त हो जाते हैं इसी प्रकार गुणों के धारक जीव पापोंसे छूट कर परमानंदको प्राप्त होते हैं । पुनः गुण ही सर्वको प्रिय होते हैं, गुणोंका ही आचरण करना लोग सीखते हैं, और गुणोंका विवर्ण निम्न प्रकारसे है, जैसेकि- १ अक्खुद्दो-सदैव काल अक्षुद्र वृत्तियुक्त होना चाहिये क्योंकि शुद्र वृत्ति सर्व गुणोंका नाश कर देती है और क्षुद्र वृत्ति वाले के चितको शान्ति नही आती, न चे ऋजुताको ही प्राप्त हो सक्ता है, न किसीके श्रेष्ठ गुणोंको भी अवलोकन करके उनके चित्तको शान्ति रह सक्ति है, तथा सदा ही क्षुद्र तिवाला अ. कार्य करनेमें उद्यत रहता है, अपितु निर्लज्जताको ग्रहण कर ले- ता है, इस लिये अक्षुद्र पत्तियुक्त सदैवकाल होना चाहिये ।। २ रूववं-मित्रवरो ! रूपवान् होना किसी औषधीके द्वारा नही बन सक्ता तथा किसी मंत्रविद्यासे नही हो सक्ता, केवल सदाचार ही युक्त जीव रूपवान् कहा जाता है । इस लिये सदा- चार ब्रह्मचर्यादिको अवश्य ही धारण करना चाहिये जिसके द्वारा सर्व प्रकारकी शक्तियें उत्पन्न हो और सदैव काल चित्त प्रसन्नता रहे, कौगोंमें विश्वासनीय बन जाये, मन प्रफुल्लित रहे।

(१७४ ) ३ पगइ सोमो-सौम्य प्रकृति युक्त होना चाहिये अर्थात् शान्ति स्वभाव शूद्र जनोंके किये हुए उपद्रवोंको माध्यस्थ- ताके साथ सहन करने चाहिये, और मस्तकोपरि किसी कालमें भी अशान्ति लक्षण न होने चाहिये । ४ लोअपिओ-लोकप्रिय होना चाहिये अर्थात् परोपका- रादि द्वारा लोगोंमें प्रिय हो जाता है । परोपकारी जीव ऊच्च कोटि गणन किया जाता है। परोपकारियों के सव ही जीव हि- तैषी होते हैं और उसकी रक्षाम उद्यत रहते हैं। परोपकारी जीव सर्व प्रकारसे धम्मोन्नति करने में भी समर्थ हो जाते हैं और अपने नामको अमर कर देते हैं । इस लिये लोगों प्रिय कार्य करनेवाला लोगप्रिय बन जाता है । ५ अकूरो-क्रूरतासे रहित होवे-अर्थात् निर्दयतासे रहित होवे। निर्दयता सत्य धर्मको इस मकारसे उखाड़ डालती है जैसे तीक्ष्ण परशुद्वारा लोग वृक्षोंको उत्पाटन करते हैं। निर्दयी पु. रुष कभी भी ऊच्च कक्षाओंके योग्य नहीं हो सकता । क्रूर चिच- बाला पुरुष सदैव काल क्षुद्र वृत्तियोंमे ही लगा रहता है ।। ६ असडो-अश्रद्धावाला न होवे-अर्थात् सम्यक् दर्शन युक्त ही जीव सम्यक् ज्ञानको धारण कर सकता है। अपितु इत- ( १७५) ना ही नहीं किन्तु श्रद्धायुक्त जीव मनोवांछित पदार्थोंको भी माप्त कर लेता है और देव गुरु धर्मका आराधिक वन जाता है। ७ सुदक्खिणो-मुदक्ष होवे अर्थात् बुद्धिशील ही जीव सत्य असत्यके निर्णयमें समर्थ होता है और पदार्थोंका पूर्ण माता हो जाता है, अपितु बुद्धिसंपन्न ही जीव मिथ्यात्लके बंधनसे भी मुक्त हो जाता है । बुद्धिद्वारा अनेक वस्तुओंके स्व. रूपको ज्ञात करके अनेक जीवोंको धर्म पथमें स्थापन करनेमें समर्थ हो जाता है, अपितु अपनी प्रतिभा द्वारा यशको भी प्राप्त होता है। < लज्जाल्लूओ-लज्जायुक्त होना-वृद्धोंकी वा माता पिता गुरु आदिकी लज्जा करना, उनके सन्मुख उपहास्य युक्त वचन न बोलने चाहिये तथा उनके सन्मुख सदैव काल वि- नयमें ही रहना चाहिये तथा पाप कर्म करते समय लज्जायुक्त होना चाहिये अर्थात् अपने कुल धर्मको विचारके पाप कर्म न करने चाहिये। ९ दयालूलू-दयायुक्त होना-अर्यात् करुणायुक्त होना, जो जीव दुःखोंसे पीड़ित हैं और सदैवकाळ क्लेपमें ही आयु व्यतीत करते हैं वा अनाथ है वा रोगी हैं उनोपरि दया भाव प्रगट

( १७६ )
करना और उनकी रक्षा करते हुए साथ ही उनोंको धर्मका
उपदेश करते रहना, निर्दयता कभी भी चित्त न धारण करना,
( अपितु ) आहंसा धर्मका ही नाद करते रहना ।।
१० मभच्छो मध्यस्थ होना-अर्थात् स्तोक वाताओं
परि ही क्रोधयुक्त न हो जाना चाहिये, अपितु किसीका
पक्षपात भी न करना चाहिये, जो काम हो उसमें मध्यस्थता
अवलंबन करके रहना चाहिये क्योंकि चंचलता कायाक सुधा.
रनेमें समर्थ नहीं हो सक्ति अपितु मध्यस्थता ही काम सिद्ध
करती है।
११ सोमदिट्टी-सौम्य-दृष्टि युक्त होना-अर्थात् किसी
उपर भी दृष्टि विषम न करना तथा किसीके मुंदर पदार्थको
देख कर उसकी मत्सरता न करना क्योंकि प्रत्येक २ प्राणी
अपने किये हुए कर्मों के फलोंको भोगते हैं। जो चित्तका विषम
करना है वे ही कर्मोंका बंधन है ।।
१२ गुणरागी-जिस जीवमें जो गुण हों उसीका ही राग
करना अपितु अगुणी जीवमें मध्यस्थ. भाव अवलंबन करे,
अन्य जीवोंको गुणमें आरूढ़ करे, गुणोंका ही प्रचारक होवे ।।
१३ सकह-फिर सत्य कथक होवे क्योंकि सत्य वक्ताको

( १७७ ) कहीं भी भय नहीं होता, सत्यवादी सर्व पदार्थों का ज्ञाता होता है, सत्यवादी ही जीव धर्मके अंगोको पालन कर सकता है, सत्य- वादीकी ही सव ही लोग प्रतिष्ठा करते हैं और सत्य व्रत सर्व जीवोंकी रक्षा करता है, इस लिये सत्यवादी बनना चाहिये । १४ सपक्खजुत्तो-और सच्चेका ही पक्ष करना क्योंकि न्याय धर्म इसीका ही नाम है कि जो सत्ययुक्त हैं, उनके ही पक्षमें रहना, सत्य और न्यायके साथ वस्तुओंका निर्णय करना, कभी भी असत्यमें वा अन्याय मार्गमें गमण न करना, न्याय बुद्धि सदैव काल रखनी ।। १५ सुदीहदंसी-दीर्घदी होना अर्थात जो कार्य करने उनके फलाफलको प्रथम ही विचार लेना चाहिये क्योंकि बहुतसे कार्य प्रारंभमें प्रिय लगते हैं पश्चात् उनका फल निकृष्ट होता है, जैसे विवाहादिमें वेश्यावृत प्रारंभमें प्रिय पीछे धन यश वीर्य सवीका नाश करनेवाला होता है क्योंकि जिन बाल- कोंको उस नृतमें वेश्याकी लग लग जाती है वे प्रायः फिर किसीके भी वशमें नही रहते । इसी प्रकार अन्य कार्योंको भी संयोजन कर लेना चाहिये ॥ १६ विसेसण्णू-विशेषज्ञ होना अर्थात् ज्ञानको विशेष कार- के जानना | फिर पदार्थोंके फलाफलको विचारना उसमें फिर (१७८ ) जो त्यागने योग्य कर्म हैं उनका परित्याग करना, जो जानने योग्य हैं उनको सम्यक् प्रकारसे जानना, अपितु जो आदरणे योग्य हैं उनको आसेवन करना तथा सामान्य पुरुषों में विशे- षज्ञ होना, फिर ज्ञानको प्रकाशमें लाना जिस करके लोग अ- ज्ञान दशामें ही पड़े न रहें। १७ वट्टाणुगो-वृद्धानुगत होना अर्थात् जो वृद्ध संदर कार्य करते आये हैं उनके ही अनुयायी रहना, जैसेकि-सप्त व्यसनोंका परित्याग वृद्धोने किया था वही परम्पराय कुलमें चली आती होवे तो उसको उल्लंघन न करना तथा वृद्ध उभय काळ प्रतिक्रमणादि क्रियायें करते हैं उनको उसी प्रकार आ. चरण कर लेना, जैसे वृद्धोंने अनेक प्रकारसे जीवोंकी रक्षा की सो उसी प्रकार आप भी जीवदयाका प्रचार करना अर्थात् धा- र्मिक मर्यादा जो वृद्धोंने वांधी हुई है उसको अतिक्रम न करना । १८ विणियो-विनयवान् होना क्योंकि विनयसे ही सर्व कार्य सिद्ध होते हैं, विनय ही धर्मका मुख्याङ्ग है, विनयसे ही सर्व सुख उपलब्ध हो जाते हैं, विनय करनेवाले आत्मा सबको प्रिय लगते हैं, विनयवान्को धर्म भी प्राप्त हो जाता है, इस लिये यथायोग्य सर्वकी विनय करना चाहिये ।

( १७९ ) १९ कयण्णूओ-कृतज्ञ होना अर्थात् किये हुए परोपकार- का मानना क्योंकि कृतज्ञताके कारणसे सबी गुण जीवको प्राप्त हो जाते हैं जैसेकि-श्री स्थानांग सूत्रके चतुर्थ स्थानके चतुर्थ उद्देशमें लिखा है कि चतुर् कारणोंसे जीव स्वगुणोंका नाश कर बैठते हैं और चतुर् ही कारणोंसे स्वगुण दीप्त हो जाते हैं, यथा क्रोध करनेसे १ ईयां करनेसे २ मिथ्यात्वमें प्रवेश कर- नेसे ३ और कृतघ्नता करनेसे ४ ।। अपितु चार ही कारणों से गुण दीप्त होते हैं, जैसेकिं पुनः २ ज्ञानके अभ्यास करनेसे १ और गुर्वादिके छदे वरतनेसे २ तथा गुर्वादिका आनंदपूर्वक कार्य करनेसे ३ और कृतज्ञ होनेसे ४ अर्थात् कृतज्ञता करनेसे सर्व प्रकारके सुख उपलब्ध होते हैं, इस लिये कृतज्ञ अवश्य ही होना चाहिये । २० परडियत्यकारीय-और सदैव काल ही परहितकारी झोना चाहिये अर्थात् परोपकारी होना चाहिये, क्योंकि परोप- कारी जीव सब ही का हितैषी होते हैं, परोपकारी ही.जीव ध- मकी वृद्धि कर सक्ते हैं, परोपकारीसे सर्व जीव हित करते हैं तथा परहितकारी जीव ऊच्च श्रेणिको प्राप्त हो जाता है, इस लिये परो. 'पकारता अवश्य ही आदरणीय हैं ।

( १८०) २१ लद्धलक्खो-लब्धलक्षी होवे अर्थात् उचित समयानु- सार दान देनेवाला जैसे कि अभयदान, सुपात्र दान, शास्त्रः दान, ओषधि दान, इत्यादि दानोंके अनेक भेद हैं किन्तु देशका- लानुसार दानके द्वारा धर्मकी वृद्धि करनेवाला होवे, जैसे कि जीव (अभयदान) दान सर्व दानों में श्रेष्ठ है, यथागमे (दाणाण सेढ अभयं पयाणं) अर्थात् दानोंमें अभयदान परम श्रेष्ठ है । सो सूत्रानुसार दान करनेवाला होवे और दानके द्वारा जिन धर्म की उन्नति हो सक्ति है, दानसे ही जीव यश कर्मको प्राप्त हो जा- ते हैं । सो इस लिये श्रुत दान अवश्य ही करना चाहिये । फिर द्वादश भावनायें द्वारा अपनी आत्माको पवित्र करता रहे, जैसेकि- पढम मणिच्च मसरणं संसारे एगयाय अन्नत्तं ।। असुश्तं आसव संवरोय तह निजारा नवमी १॥ लोगसहावोबोहीउद्धहा धम्मस्स सावहगायरिदा एया उन्नावणाउन्नावेयवा पयत्तेणं ॥२॥ भाषार्थ:-संसारमें जो जो पदार्थ देखनेमें आते हैं वे सर्व अनित्यता प्रतिपादन कर रहे हैं । जो पदार्थोंका स्वरूप (१८९) पातकालमें होता है वह मध्यान्ह काळमें नही रहता, अपितु जो मध्यान्ह कालमें देखा जाता है वह सन्ध्या कालमें दृष्टिगोचर नही होता। इस लिये निज आत्मा विना पुद्गल सम्वन्धि जो जो पदार्थ 'हैं वे सर्व क्षणभंगुर हैं, नाशवान हैं, जितने पुद्गलके सम्बन्ध मिले हुए हैं वे सब विनाशी हैं । इस प्रकारसे पदार्थोकी अनित्यता विचारना उसीका नाम अनित्य भावना है। अशरण नावना ॥ संसारमें जीवोंको दुखोंसे पीड़ित होते हुएको केवल एक धर्मका ही शरण होता है, अन्य माता पिता भार्यादि कोई भी रक्षा करनेमें समर्थ नही होते तथा जव मृत्यु आती है उस कालमें कोई भी साथी नहीं बनता किन्तु एक धर्म ही है जो आत्माकी रक्षा करता है। अन्य जीव तो मृत्युके आने पर सर्व 'पृथक् २ हो जाते हैं किन्तु जव इन्द्र महाराज मृत्यु धर्मको प्राप्त होते हैं उस कालमें उनका कोई भी रक्षा नही कर सक्ता तो भला अन्य जीवोंकी वात ही कौन पूछता है? तथा जितने पास- वर्ती धन धान्यादि हैं वे भी अंतकालमें सहायक नहीं बनते केवल आत्मस्वरूप ही अपना है और सर्व अशरण हैं, इस लिये यह उत्तम सामग्री जो जीवोंको प्राप्त हुई है उसको व्यर्थ न खोना चाहिये ।।

( १८२) संसार नावना॥ संसार भावना उसका नाम है जो इस प्रकारसे विचार करता है कि यही आत्मा अनंतवार एक योनिमें जन्म मरण कर चुका है अपितु इतना ही नहीं किन्तु प्रत्येक २ जीवके साथ सर्व प्रकारसे सम्बन्ध भी हो चुके हैं, किन्तु शोक है फिर यह जीच धर्मके मार्गमें प्रवेश नहीं करता। अहो ! संसारकी कैसी विचित्रता है कि पुत्र मृत्यु होकर पिता बन जाता है और पिता मरकर पुत्र होता है। इस प्रकारसे भी परिवर्तन होनेपर इस जी- वने सम्यग् ज्ञानादिको न सेवन किया जिसके द्वारा इसकी मुक्ति हो जाती। एकत्व नावना॥ फिर इस प्रकारसे अनुप्रेक्षण. करे कि एकले ही जीव मृत्यु होते हैं और प्रत्येक २ ही जन्म धारण करते हैं किन्तु कोई भी किसीके साथ आता नहीं और न कोई किसीके साथ ही जाता है। केवल धर्म ही अपना है जो सदैवकाल जीवके साथ ही रहता है अथवा मेरा निज आत्मा ही है इसके भिन्न न कोई मेरा है और न मैं किसीका हूं। यदि मैं किसी प्रकारके दुःखोंसे पीड़ित होता हूं तो मेरे सम्बन्धी उससे मुजे मुक्त नहीं (१८३ ) कर सक्ते और नाही मैं उनको किसी प्रकारसे दुःखोंसे विमुक्त करनेमें समर्थ हूं। प्रत्येक २ प्राणी अपने २ किये हुए कोंके फलको अनुभव करते हैं इसका ही नाम एकत्व भावना है । अन्यत्व भावना॥ हे आत्मन् ! तू और शरीर अन्य २ है, यह शरीर पुग- कका संचय है अपितु चेतन स्वरूप है। तू अमूर्तिमान सर्व ज्ञानमय द्रव्य है । यह शरीर मूर्तिमान शून्यरूप द्रव्य है और तू अक्षय अव्ययरूप है, किन्तु यह शरीर विनाशरूप धर्मवाला है फिर तू क्यों इसमें मूच्छित हो रहा है ? क्योंकि तू और शरीर भिन्न २ द्रव्य हैं । फिर तू इन कोंके वशीभूत होता हुआ क्यों दुःखोंको सहन कर रहा है ? इस शरीरसे भिन्न होनेका उपाय कर और अपनेसे सर्व पुद्गल द्रव्यको भिन्न मान फिर उससे विमुक्त हों क्योंकि तू अन्य हैं तेरेसे भिन्न पदार्थ अन्य हैं । अशुचि नावना॥ फिर ऐसे विचारे कि यह जीव तो सदा ही पवित्र है किन्तु यह शरीर मळीनताका घर है । नव द्वार इसके सदा ही मलीन रहते हैं अपितु इतना ही नही किन्तु जो पवित्र पदार्थ इस गंध- मय शरीरका स्पर्श भी कर लेते हैं वह भी अपनी पवित्रता खो ( १८४) वैठते हैं, क्योंकि इसके अभ्यन्तर मलमूत्र, रुधिर राघ, सर्व गंधमय पदार्थ हैं फिर मृत्युके पीछे इसका कोई भी अवयव काममें नहीं आता, परंतु देखनेको भी चित्त नहीं करता। फिर यह शरीर किसी प्रकारसे भी पवित्रताको धारण नहीं कर सक्ता, केवल एक धर्म ही सारभूत है अन्य इस शरीरमें कोई भी पदार्थ सारभूत नही है क्योंकि इसका अशुचि धर्म ही है। इस लिये हे जीव ! इस शरीरमें मूञ्छित मत हो, इससे पृथक् हो जिस करके तुमको मोक्षकी प्राप्ति होवे ॥ आस्त्रव भावना ॥ राग द्वेष मिथ्यात्व अव्रत कषाययोग मोह इनके ही द्वारे शुभाशुभ कर्म आते हैं उसका ही नाम आस्रव है और आ- ध्यान, रौद्रध्यान इनके द्वारा जीव अशुभ कर्मोंका संचय करते हैं तथा हिंसा, असत्य, अदत्त, अब्रह्मचर्य, परिग्रह, यह पांच ही कर्म आनेके मार्ग हैं इनसे पाणी गुरुताको प्राप्त हो रहे हैं और नाना प्रकारकी गतियोंमें सतत पर्यटन कर रहे हैं। आप ही कर्म करते हैं आप ही उनके फलोंको भोग लेते हैं। शुभ भावोंसे शुभ कर्म एकत्र करते हैं अशुभ भावोंसे अशुभ, किन्तु अशुभ काँका फल जीवोंको दुःखरूप भोगना पड़ता है, शुभ काँका सुखरूप फल होता है । इस प्रकारसे विचार करना उसका ही नाम आस्रव भावना है।

(१८५) संवर नावना ॥ जो जो कर्म आनेके मार्ग हैं उनको निरोध करना वे संवर भावना है तथा क्रोधको क्षमासे वशमें करना, मानको मार्दव वा मृदुतासे, मायाको ऋजु भावांसे, लोभको संतोषसे, इसी प्रकार जिन मार्गोंसे कर्म आते हैं उन मार्गोंका ही निरोध करना सो ही सम्बर भावना है जैसे कि अहिंसा, सत्य, दत्त, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, सम्यक्त्व, व्रत, अयोग, समिति, गुप्ति, चारित्र, मन वचन कायाको वशमें करना वे ही संवर भावना है। निर्जरा भावना ॥ निर्जरा उसका नाम है जिसके करनेसे कर्मों के वीजका ही नाश हो जाये तव ही आत्मा मोक्षरूप होता है । वह निर्जरा द्वादश प्रकारके तपसे होती है उसीका ही नाम सकाम निर्जरा है, नही तो अकाम निर्जरा जीव समय र करते हैं किंतु अकाम निर्जरासे संसारकी क्षीणता नही होती। सकाम निर्जरा जीचको मुक्ति देती है अर्थात् ज्ञानके साथ सम्यग् चारित्रका आचरण करना उसके द्वारा जीव कोंके वीजको नाश कर देते हैं और वही क्रिया जीवके कार्यसाधक होती है । सो यदि जी- बने पूर्व सकाम निर्जरा की होती तो अब नाना प्रकारके कष्ट .

( १८६ ) को सहन न करता किन्तु अब वही उपाय किया जाये जि- सके द्वारा सकाम निर्जरा होकर मुक्तिकी प्राप्ति होवे । लोकस्वभाव भावना ॥ कोकके स्वरूपको अनुप्रेक्षण करना जैसेकि यह लोग अ- नादि अनंत है और इसमें पुद्गल द्रव्यकी पर्याय सादि सातन्ता सिद्ध करती है और इसमें तीन लोग कहे जाते हैं जैसेकि म- नुष्यलोक स्वर्गलोक पाताललोक नृत्य करते पुरुषके संस्थानमें हैं, इसमें असंख्यात द्वीप समुद्र है, अधोलोकमें सप्त नरक स्थान हैं तथा भवनपति व्यन्तर देवोंके भी स्थान हैं, उपरि ६ स्वर्ग हैं ईषत् प्रभा पृथिवी है सो ऐसे लोगों शुचीके अग्रभाग मात्र भी स्थान नहीं रहा कि जिसमें जीवने अनंत चार जन्म मरण न किये हो, अर्थात् जन्म मरण करके इस संसारको जीवने पूर्ण कर दिया है किंतु शोक है फिर भी इस जीवकी संसारसे तृप्ति न हुई, अपितु विषयके मार्गमें लगा हुआ है । इस लिये लोकके स्वरूपको ज्ञात करके संसारसे निवृत्त होना चाहिये वे ही लोकस्वभाव भावना है ॥ धर्म भावना ॥ इस संसारचक्रमें जीवने अनंत जन्म मरण नाना प्रकारकी योनियों में किये हैं किन्तु यदि मनुष्य भव प्राप्त हो (१८७) गया तो देश आर्यका मिलना अतीव कठिन है क्योंकि बहुतसे देश ऐसे भी पड़े हैं जिन्होंने कभी श्रुत चारित्र रूप धर्मका नाम ही नहीं सुना। यदि आर्य देश भी मिल गया तो आर्य कुलका मिलना महान् कठिन है क्योंकि आर्य देशमें भी बहुतसे ऐसे कुल हैं जिनमें पशुवध होता है और मांसादि भक्षण कर-- ते हैं। यदि आर्य कुल भी मिल गया तो दीर्घायुका मिलना परम दुष्कर है क्योंकि स्वल्प आयुमें धार्मिक कार्य क्या हो सक्ते. हैं ? भला यदि दीर्घायुकी प्राप्ति हो गई तो पंचिंद्रिय पूर्ण मिलनी अंतीच ही कठिन हैं क्योंकि चक्षुरादिके रहित होनेपर दयाका पूर्ण फल जीव प्राप्त नहीं कर सक्ते । भला यदि इन्द्रिय पूर्ण हों तो शरीरका नीरोग होना बड़ा ही कठिन है क्योंकि व्याधियुक्त जीव धर्मकी वात ही नहीं सुन सक्ता । सो यदि शरीर भी नी- रोग मिल गया तो सुपुरुषोंका संग होना महान् ही दुष्कर है क्योंकि कुसंग होना स्वाभाविक वात है । भला यदि मुजनोंका संग भी मिल गया तो सूत्रका श्रवण करना महान कठिन है। भला सूत्रको श्रवण भी कर लिया तो उसके उपरि श्रद्धानका होना अतीव दुष्कर है। भला यदि श्रद्धान भी ठीक प्राप्त हो गया तो धर्मका पालन करना परम कठिन है क्योंकि धर्मकी क्रिया: आशावान् पुरुषोंसे नही पल सक्ती किन्तु धर्म अनायौँका नाथ ( १८८) है, अबांधवोंका बांधव है, दुखियोंकी रक्षा करनेवाला है, अमि- त्रोंवालोंका मित्र है, सर्वकी रक्षा करनेवाला है, धर्मके प्रभा- चसे सर्व काम ठीक हो रहे हैं तथा धर्म ही यक्ष, राक्षस, सर्प, हाथी, सिंह, व्याघ्र, इनसे रक्षा करता है अर्थात् अनेक कष्टोंसे चचानेवाला एक धर्म ही है। इस लिये पूर्ण सामग्रीके मिलने 'पर धर्ममें आलस्य कदापि न करना चाहिये । हे जीव ! तेरेको उक्त सामग्री पूर्णतासे प्राप्त है इस लिये तू अव धर्म करनेमें प्रमाद न कर । यह समय यदि व्यतीत हो गया तो फिर मिलना असंभव है। इस प्रकारके भावोंको धर्म भावना कहते हैं। . बोधबीज नावना ॥ संसार रूपी अर्णवमें जीवोंको सर्व प्रकारकी ऋद्धियें प्राप्त हो जाती है किन्तु वोधबीजका मिलना बहुत ही कठिन है अर्थात् सम्यक्त्वका मिलना परम दुष्कर है । इस लिये पूर्वोक्त सामानिये मिलनेपर सम्यक्त्वको अवश्य ही धारण करना चाहिये, अर्थात् आत्मस्वरूपको अवश्य ही जानना चाहिये । सम्यग् ज्ञान, सम्यग् दर्शन, सम्यग् चारित्रके द्वारा शुद्ध देव गुरु ध. मेकी निष्ठा करके आत्मस्वरूपको पूर्ण प्रकारसे ज्ञात करके सम्यग् चारित्रको धारण करना चाहिये क्योंकि संसारमें माता मिता भगिनी भ्राता भाया पुत्र धन धान्य सर्व प्रकारके (१८९ ) संयोग मिल जाते हैं परंतु बोधवीज ही माप्त होना कठिन है। इस लिये बोधवीनको अवश्य ही प्राप्त करना चाहिये । इस प्र- फारसे जो आत्मामें भाव धारण करता है उसीका नाम घोष- वीन भावना है । सो यह द्वादश भावनायें आत्माको पवित्र करनेवाली हैं, कर्ममळके धोनेके लिये महान् पवित्र वारिरूप हैं, संसार रूपी समुद्र पोतके तुल्य हैं, द्वादश व्रतोंको निष्कलंक करनेवाली है और अतिचारोंको दूर करनेवाली हैं, सत्यरू- पके बतलानेवाली है, मुक्तिमार्गके लिये निश्रेणि रूप हैं । इस लिये प्राणीमात्रको इनके आश्रयभूत अवश्य ही होना चाहिये। फिर निम्नलिखित चार प्रकारकी भावनायें द्वारा लोगोंसे वर्ता- व करना चाहिये। मैत्री प्रमोद कारुण्य माध्यस्थ्यानि च सत्त्वगुणाधिक क्लिश्यमानाऽविनयेषु । तत्त्वा- थसूत्र श्र0 सू० ११॥ इसका यह अर्थ है कि मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्यस्थ, यह चार ही भावनायें अनुक्रमतासे इस प्रकारसे करनी चाहिये जैसे कि सर्व जीवोंके साथ मैत्रीभाव, एकेन्द्रियसे पंचिंद्रिय. पर्यन्त किसी भी जीवके साथ द्वेष भाव नहीं करना और यह (१९०) भाव रखनेसे कोई जीव पाप कर्म न करे, नाही दुःखों को प्राप्त होवे, यथाशक्ति जीवोंपर परोपकार करते रहना, अन्तःकरणसे वैरभावको त्याग देना उसका ही नाम मैत्री भावना है। और जो अपनेसे गुणों में वृद्ध हैं धर्मात्मा हैं परोपकारी हैं सत्यवक्ता हैं ब्रह्मचारी हैं दयारूप शान्तिसागर हैं इस प्रकारके जनोंको देखकर प्रमोद करना अर्थात् इा न करना अपितु हर्ष प्रगट करना और उनके गुणोंका अनुकरण करना प्रसन्न होना उनकी यथायोग्य भक्ति आदि करना उसीका नाम प्रमोद भावना है । और जो लोग रोगोंसे पीड़ित हैं दुःखित हैं दीन हैं वा पराधीन हैं तथा सदैव काल दुःखोंको जो अनुभव कर रहे हैं 'उन जीवों पर करुणा भाव रखना और उनको दुःखोंसे विमुक्त करनेका प्रयत्न करते रहना यथाशक्ति दुःखोंसे उनपीड़ित जीवोंकी रक्षा करना उसीका ही नाम कारुण्य भावना है अर्थातू सर्व जीवोपरि दयाभाव रखना किन्तु दुःखियोंको देखकर हर्ष न प्रगट करना सोई कारुण्य भावना है। और जो जीव अवि- नयी हैं सदैवकाल देव गुरु धसे प्रतिकूल कार्य करनेवाले हैं 'उन जीवोंमें माध्यस्थ भाव रखना अर्थात् उनको यथायोग्य शिक्षा तो करनी किन्तु द्वेष न करना वही.माध्यस्थ्य भावना है। सों यह चार ही भावनायें आत्मकल्याण करनेवाली हैं और .

( १९१) जीवोंको सुमार्गमें लगानेवाळी हैं और सत्यपथकी दर्शक हैं। इनका अभ्यास प्राणी मात्रको करना चाहिये क्योंकि यह संसार आनित्य है, परलोकमें अवश्य ही गमन करना है, माता पिता भार्यादि सब ही रुदन करते हुए रह जाते हैं आरै फिर उसका अग्नि संस्कार कर देते हैं, और फिर जो कुछ उसका द्रव्य होता है वे सब लोग उसका विभाग कर लेते हैं किन्तु उसने जो कर्म किये थे वे उन्ही कर्मोको लेकर परलोकको पहोंच जाता है और उन्ही फाँके अनुसार दुःख सुख रूप फलको भोगता है, इस लिये जब मनुष्य भव प्राप्त हो गया है फिर जाति आर्य, कुळ आर्य, क्षेत्र आर्य, कर्म आर्य,भाषा आर्य,शिल्पार्य जब इतने गुण आयताके भी प्राप्त हो गये फिर ज्ञानार्य, दर्शनार्य चारि- त्रार्य, अवश्य ही बनना चाहिये । तत्त्वमार्ग के पूर्ण वेत्ता होकर 'परोपकारियोंके अग्रणी बनना चाहिये और सत्य मार्गके द्वारा सत्य पदार्थोंका पूर्ण प्रकाश करना चाहिये। फिर सम्यग् ज्ञान, सम्यग् दर्शन, सम्यग् चारित्रसे स्वआ- स्माको विभूषित करके मोक्षरूपी लक्ष्मीकी प्राप्ति होवे । फिर सिद्धपद जो सादि अनंत युक्त पदवाला है उसको प्राप्त होकर अजर अमर सिद्ध बुद्ध ऐसे करना चाहिये । अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतमुख, अनंतववलवीर्य युक्त होकर ( १९२) जवि मोक्षमें विराजमान हो जाता है, संसारी बंधनोसे सर्वथा ही छूटकर जन्ममरणसे रहित हो जाता है और सदा ही सुख- रूपमें निवास करता है अर्थात् उस आत्माको सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यग्चारित्रके प्रभावसे अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है । आशा है भव्य जन उक्त तीनों रनोंको ग्रहण करके इस प्रवाहरूप अनादि अनंत संसारचक्रसे विमुक्त होकर मोक्ष- रूपी लक्ष्मीके साधक बनेंगे और अन्य जीवोंपर परोपकार क- रके सत्य पथमें स्थापन करेंगे जिस करके उनकी आत्माको सर्वथा शान्तिकी प्राप्ति होवेगी और जो त्रिपदी महामंत्र है जै- सेकि उत्पत्ति नाश, ध्रुव, सो उत्पत्ति नाशसे रहित होकर ध्रुव व्यवस्था जो निज स्वरूप है उसको ही प्राप्त होवेंगे क्योंकि उ. त्पत्ति नाश यह विभाविक पर्याय हैं किन्तु त्रिकालमें सरूपमें रहना अर्थात् निज गुणमें रहना यह स्वाभाविक अर्थात् निज- गुण है। सो कर्ममलसे रहित होकर शुद्धरूप निज गुणमें सर्व- ज्ञतामें वा सर्वदर्शितामें जीव उक्त तीनों रत्नों करके विराजमान हो जाते हैं। मैं आकांक्षा करता हूं कि भव्य जीव श्री अहन्देवके प्रतिपादन किये हुए तत्वोंद्वारा अपना कल्याण अवश्य ही करेंगे।। इति श्री अनेकान्त सिद्धान्त दपर्णस्य चतुर्थ सगे समाप्त ॥

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यह पुस्तक मिलनेके पत्ते ॥
यह पुस्तक निन्न लिखित पत्तेसे विक्रित मिलती है।
श्री जैन सभा-पञ्जाब
अमृतसर
बाबु परमानंद -प्लीडर; बी. ए.
• कसूर (जिला-लाहौर)

Jain Sidhant

Author
Upadhyay, Aatmaram Ji
Title
Jain Sidhant
File name
Jain Sidhant
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2009/11
Publisher
Punjab, Jain Sabha
Language
Sanskrit
Pages
199
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain Sidhant
DLI number
344334
Barcode
99999990234204.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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