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Sharma Aati Hai Magar
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शर्म आती है मगर
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शर्म आती है मगर
[हास्य-व्यग्य की पलविया, प्रहसनो, लेया का अनुपम सग्रह]
इकराम राजस्थानी
संघी प्रकाशन
जयपुर । उदयपुर
प्रकाशक विजेद्र कुमार सघी
सपी प्रकाशन
53, बापू बाजार,
उदयपुर 313001
मूल्य पच्चीस रुपये
सपी प्रकाशन उदयपुर द्वारा प्रकाशित | प्रथम सस्मरण
सर्वाधिक र लेखपाधीन / मुद्रा साति मुद्रणालय, दिल्ली 110032
1988
आत्महत्या करने वालो के लिए बहुत दिनो से सोच रहा था, आत्महत्या करने को नही, इस पर कुछ लिखने को । रोज-रोज अखबारो मे पढकर रेडियो से सुनकर तग आया हू । हा इस मामले मे टेलीविजन अछूता है शायद वह दिन भी आए जब टेलीविजन पर किसी को आत्म- हत्या करते दिखाया जाए या फिर उसके अचूक नुस्खो पर कोई विशेष कायक्रम आरभ किया जाए। वैसे आजकल यह बडा प्रचलित होता जा रहा है। फैशन मे शामिल होता जा रहा है । वो प्रेमी-प्रेमिका कहलाने का हकदार ही नहीं जो आत्महत्या जैसा रोमानी काम न कर सके या फिर ऐसा करने का करिश्मा न दिखा सके। वो दिन अब लद गए जब लडक्यिा और लडके अपने हॉबीज मे तैरना या हवाई जहाज चलाना बताते थे। अब तो पानी मे डूबना या रेल से कट जाना हॉवी में शामिल है। आत्महत्या के अन्दाज को, अदा को कुछ लोग "रस्माकशी" वस इन्ही आधारो पर खुदकशी जसी शानदार परम्परा टिकी हुई है। बहुत से लोग तो आजकल शौकिया कर रहे है "कि चलो यार, कुछ नही कर पा रहे तो कम-से-कम मात्महत्या तो कर ही डालो, और भी नहीं तो कल के अखबार मे नाम तो आ जायेगा।" कुछ महानुभावो के यहा पीढी दर पीढी यह चला आ रहा है। यानी । - शम आती है मगर 5
वशानुगढ रोग, मतलब कभी वो आत्महत्या करते हैं और उनकी
वजह से दूसरे लोग आत्महत्या कर लेते हैं।
वैसे हम भी यही महसूस कर रहे हैं कि इस जमाने मे इससे
सस्ता और सुन्दर और कोई शौक हो नहीं सकता। आदमी का
जब जी चाहा अपने गये और आराम से आत्महत्या कर ली।
खुद तो चले गये और फिर भुगतें पीछे वाले उनकी बता से
एक समय तो ऐसा भी आएगा कि लोग अपनी बेटी का
रिश्ता तय करते समय दूल्हा के पिता से इस तरह के सवाल
किया करेंगे। "माफ कीजिये, क्या आपके परिवार मे कभी किसी
ने भी आत्महत्या नहीं की है?"
"देखिये साहब, हम तो अपनी लडकी उसको देंगे जिस लडके
के परिवार मे आत्महत्या को परम्परा रही हो। कमाल है ।
वडा गया बीता घर है आपका, क्या आपके यहा खुदकशी की
परम्परा नहीं है "
ऐसे परिवार को बहुत हीन दृष्टि से देखा जाएगा, जहा पर
कभी किसी ने आत्महत्या न की हो। ये सारे परिवार पिछडे हुए
माने जायेंगे।
आजकल तो लोग सुबह जब घर से निकलते हैं उस समय
सोचकर निकलते हैं कि आज चाहे कुछ भी हो आत्महत्या करके
ही रहूगा । और अगर वाई चास शाम को सही सलामत लौट आए
हैं तो यू मुह लटका हुआ मानो कोई हिमालय पर चढने का
मौका छूट गया। आते ही पत्नी से कहेंगे, "क्या बताऊ यार, कई
बार ट्राई की, मगर लगता है अपने भाग्य में आत्महत्या करने का
सुख नहीं है।"
कई बार तो पत्नी भी बहती है, "सुनो जी, मेरी तीन-तीन
सहेलियो के पति खुदकशी कर चुके हैं और एक तुम हो । मुझे
तो उनके सामने जाते बडी शर्म आती है । क्या कहेगी वे मुपे।
।
6 मम आती है मगर
अच्छे कायर पति के पल्ले पडी।" विचारे पति मन मसोस कर रह जाते हैं । उन्हे अपनी पत्नी के अन्दर इस हीन भाव के उजा- गर होने की बडी फिक्र है। इस परम्परा को तरह तरह से डवलप कर रहे हैं । इस शोक को बढावा देने के लिए कई समाजसेवी संस्थाये अपना अमूल्य सहयोग दे रही हैं। बुद्धिजीवी इसके सहज तरीको पर प्रकाश डाल देते हैं। हमारे मित्र ने तो आत्महत्या-प्रेमियो के लिए जो निकट भविष्य मे ही नया कीर्तिमान स्थापित करना चाहते हैं, आत्महत्या कोचिंग कालेज खोल लिया है। जो लोग इस असीम सुख से वचित रह गए हैं, ट्रेन के लेट होने की वजह से कट नही पाए, पत्नी के सामने स्वयं को पत्नीव्रत पति या प्रेमिका के सामने अमर प्रेमी सावित नहीं कर पाये, उन्हे ऐसे कमाल के अचूक नस्खे बताये जायेंगे, एक से एक मनपसन्द फार्मूला जिन्हे पढते ही आप घर नहीं सीधे आत्महत्या करने को जाएगे। एक बार अवश्य आजमाइए। मैं तो अव लेख समाप्त कर आज्ञा चाहता हू । आत्महत्या से बचे लोगो से फिर मुलाकात होगी। शम आती है मगर 7
सफरनामा दिल्ली का
अगर हम दिल्ली को हिंदुस्तान का दिल मानें तो फिर
क्लक्त्ता को कलेजा, बम्बई को बडी आत, फरीदाबाद को
फेंफडे, और फिर जयपुर , जालघर, भोपाल, अहमदाबाद वगैरह
को पसलिया, हाथ परो की अगुलिया आदि तो मानना ही
पडेगा। नही मानने का तो सवाल ही नहीं उठता और अगर
कोई उठायेगा तो वह खुद अपनी भुगतेगा, हम इसके लिए कतई
जिम्मेदार नही हागे क्योकि हम तो एकता पर विश्वास रखते हैं।
देखने मे और कभी-कभी इसमे झाकने से पता चलता है, कि यह
दिल काफी वडा है। इसमे कई मजहब, कोमे, समाकर यू एक हो
गयी है जसे कई विरोधी पार्टियो ने मिल कर एक दिल बना
लिया । अगर किसी की वदुआ रग लाया होगी या साहित्यिक
भाषा मे कहे कि किसी को पागल कुत्ते ने काटा होगा तो वह
एक बार जरूर दिल्ली की तरफ मुह करेगा।
आप यहा आकर किसी से भी मिलिए सव अनजान हैं। कोई
किसी को नही पहचानता । यहा तक कि कई बार तो पति पत्नी
भी एक-दूसरे को 'हैलो' कार यू गुजर जाते हैं जसे वे एक
दूसरे से क्मिी जनम मे कभी मिले ही नही। सब भागे जा रहे हैं,
एक-दूसरे के पीछे। इमे भेडगाल तो नहीं कहेगे क्योकि ये लोग
8 शम आती है मगर
कुओ की तरफ नही अपने घरो की तरफ ही जा रहे होगे। और
इतना तो निश्चित है कि इनके घर कही न कही पर तो होगे ही
और जिनके घर-बार नही हैं वो तो और भी ज्यादा भाग रहे है।
यहा आने के बाद जौक और गालिब जैसे शायरो की याद
जेहन मे ज्यादा मडरातो है । तडपन और भडकन होनी चाहिये
वो यहा पग-पग पर है।
आप अगर किसी शरीफ लगने वाले आदमो से कही का पता
पूछेगे तो या तो उसे खुद ही मालूम नहीं होगा या फिर न जाने
कौन-से जनम का बदला निकालने के लिए आपको अगुली के
इशारे से उस तरफ भेज देगा जिधर शायद वो खुद जिन्दगी-भर
नहीं गया होगा और आपको वो रास्ता तो कम से कम
हरगिज नहीं मिलेगा जिसकी आपको तलाश है, और जिसके
बारे मे आपने उस तथाकथित शरीफ आदमी से रास्ता पूछने की
गलती की है । उस पर पछतायेगे । अव यहा आपके सामा य ज्ञान
का इम्तहान है कि आप किस तरह भूल-भुलैया से निकलते है
और सही बस पकडकर अपने नियत स्थान पर पहुच कर स्वय
को अभिम यु सारित कर दें। शायद दिल्ली के राहगीरो के लिए
ये शेर लिखा गया हो-
दियाई राहवरो ने सदा गलत राहे,
भटका-भटक के ही मजिल तलाश की हमने।
अरे साहब, वो जमाना और था जब जोक दिल्ली की इन
गलियो को छोड़कर जाने के लिए किसी कीमत भी तैयार न होते
थे। और अगर उहे जबरदस्ती ले जाना भी चाहते थे तो बच्चो
की तरह मचल पडते थे, लेकिन अब तो वो गलिया भी नहीं रही
जहा जीने और मरने के सवाल दिन में कई बार यू ही पडे हो
जाया करते थे।
ये तो बहुत अच्छा है कि आज गालिय या जौर पिरली में
।
शम माती है मगर
9
।
नहीं हैं, अगर होते तो उहे किसी भी तरह वस नहीं मिल सकती
थी। क्या वो भाग कर चढ सकते थे, मैं कहता हू हरगिज नही
विल्कुल नहीं । अरे साहब, वस पकडना तो दूर, उनको तो इतने
नम्बर ही याद नहीं रह सकते थे । और फिर एक आफत थोडे ही
है, कमवस्त एक जगह जा बस आकर रुकी है, वापसी मे दूसरी
साइड से मिलती है। अब आप सोचिये जितना वक्त वो लोग बसो
के नम्बर याद करने मे लगाते उतनी देर मे मुकम्मल गजल नही
कह लेंगे।
अगर आपकी किस्मत अच्छी है और आपको मनचाही बस
मिल गई है तो बस यही से अनचाहे झटको का दौर हो
जाता है । ड्राइवर बीच-बीच मे अपनी मौजूदगी का अहसास
दिलाने के लिए ऐसे दो चार झटके ब्रेक के साथ लगायेगा कि
पीछे की सारी सवारिया एक साथ आगे आ जायेंगी जिसे
डाइरेक्ट प्रमोशन भी कह सकते हैं वस को छलाग लगाकर जागे
आ जाना। इन झटका में सबसे ज्यादा फायदा तो कालेज के
लडको का होता है, क्योकि ऐसी स्थिति मे कई वार वो अपनी
मवूवा की बाहो मे पहुच जाते है और कई बार माश्क का सर
उनकी गोद में होता है। मेरा रयाल है कि अगर ड्राइवर झटके
न मारे तो शायद लडके इसके विरोध मे हन्ताल कर दें।
लेकिन साहब दिल्ली फिर भी दिल्ली है। इसकी क्या वात
है । अगर आज जोर वाई दी वे यहा आ जाए तो यकीनन यहा
का माहौल देखकर घरग जाए, और अपना ये शेर बदल कर यू
पढते चले जायें-
जल्दी चलिए जोर, ये दिल्ली की गनिया छोडवर
10 गम आती है मगर
बरसात एक दफ्तर की
वरसात आ गई है आनी ही थी, न आती तो जाती कहा इसे
दूसरी ठौर भी तो नहीं है, ले-देकर बस ये ही एक फालतू जगह
थी। हर साल ही ये वैरन आ जाती है कभी फुरसत के मूड में
होती है तो साल में दो बार भी चली आती है। वैसे न तो हमे
इसकी जरूरत है और न ही इतजार। मगर जब आ ही गई है
तो मेहमाननवाजी तो करनी ही है । परपरा है।
वादल छा रहे हैं गरज रहे है और वरस भी रहे हैं । मुहावरो
की बात पर मत जाइए वो तो किसी सिरफिरे ने यू ही कह दिए ।
गुस्से मे कहा होगा कि गरजने वाले बरसते नहीं। एक बात
बताऊ आपको इस विषय पर अच्छा खासा शोध निवन्ध तैयार
हो सकता है मैं किसी दूसरे देश को सैर के लिए जा सकता था।
लेकिन यज्ञ मे राक्षसी विघ्न की तरह किसी बडे आदमी का साला
आयेगा तो आप कल हिंदुस्तानी सापीय रोमास को वहा के
वायलीन पर वजाकर कुछ नए आयाम दे रहा है। और मैं यही
के एक दफ्तर में झोक रहा हू। दिल के अरमान व्यवस्था की
नाली मे बह गए हैं।
इस टाइटल पर एक अच्छी-खासी फिल्म भी बन सकती थी।
बरसात के सीन तो वैसे भी हर फिल्म मै जबर्दस्ती ठूसे जाते हैं
शम आती है मगर
ताकि दशक नायिका के मासल शरीर का भरपूर दर्शन करक अपने मन को प्रसन्न कर सकें। इसी को कहते है स्वस्थ मनोरजन इस फिल्म में भी आफिस टाइम के वाद वॉस के साथ स्टेनो का बरमात मे भीगते हुए एक गाना रखा गया था। मोटे थुल थुल माहर के साथ त वगी कामिनी का कमर को झटके दे देकर गीत गाना और फिर किसी अच्छे होटल मे रात गुजार देना । एक अच्छी फिल्म की भूमिका हो सकती है। प्रोड्यूसर भी राजी हो गया था । शूटिंग करने के दिन नजदीक आ गये थे कि अचानक सारा पैसा लेकर हीरोइन अपने प्रेमी के साथ चम्पत हो गई। और ऐसी गई कि आज तक अपने बच्चो तक के साथ कही दिखाई नहीं दी और इस तरह हिदी फिल्मो के इतिहास में एक बहुत शानदार धमाका होते-होते रह गया। दर्शक बेचारे स्वस्थ मनोरजन से वचित रह गए। मुझे अपनी इस योजना को बीच में ही रोक देना पडा अपनी अपनी मजबूरिया है। अब ये क्या कम मजबूरी है कि इतने धासू टॉपिक पर भी मैं सिर्फ ये लेख लिख पा रहा है। आप मन-ही-मन मुझे गालिया अवश्य दे रहे होगे कि इतनेहमानी मौसम को मैं व्यग्य को दिशा में मोडकर अन्याय कर रहा है। मगर यकीन मानिए, जब कभी रूमानियत व्यग्य शैनी मे बदलती है तो अलग हो जायका देती है। ठीक वैसे ही जैसे पिसी ने सरे राह चलते-चलते प्रेम पथी का सत्कार चरण पादुकाओ से कर दिया हो । आजवल अभिनदन की परम्परा देश में कुछ अधिर ही चल रही है। लोग अपने-अपने परिचितो का अभिन दन करने पर तुले हुए हैं। कई बार तो ऐसा भी हो जाता है आिदमी का अभिनन्दन हो भी जाता है और उसे पता तर नहीं चलता जमे बेहोशी की हालत मे ऑपरेशन करते हैं। डाक्टर लगता है ये दुर्दिन मुझे भी देखने पडेगे। मेरे नयारथिन साहि- 12 गम वाली है मगर - - त्यिक मित्र मेरा भी अभिन दन करके ही छोडेगे चाहे किसी भी विधा मे हो। मैं भी इस रिमझिम माहौन मे कहा ये नीरस बातें ले बैठा था। बात तो वरमात की चल रही थी। आपने महसूस किया हो या नहीं मगर मुझे तो लगता है, वरसात भी अव की बार कितनी आफिशियत होकर आई है। वित्कुल दफ्तरी लग ही नहीं रहा कि बरसात जसा कुछ हुआ है। मन मे तो आ रहा है कि इस फाइल को भी पुट अप करू वॉस के सामने, लेकिन फिर जाने क्या सोचकर बस ये छोटा सा बरसाती नोट ही लिखना काफी समझा। हमारे दफ्तर मे तो हर समय सूरदास को गोपियो की तरह बारिश रत ही रहती है। फाइलो के ढेर पर जब धूल झाडते हैं तो लगता है नभ मे रग-विरगे बादल तैर रहे है। बात-बात पर बॉस का किसी को डाटना-फटकारना गरज और धमाको का एहसास दिला देता है । विजलियो की तो बस बात ही मत पूछिए, गिरती रही है और गिराती रही है। अभी चार दिन पहले ही एक कर्मचारी पर सस्पेन्ड की बिजली गिर पड़ी। बेचारा घर पर बैठा बीबी-बच्चो के साथ आसुओ की बरसात कर रहा है और बादलो से सुजान बॉस के घर अपने आसुओ को ले जाकर बरसाने की विनती कर रहा है। पूर्ण रूप से घनानन्द हो गया है । वेचारा कर्मचारी अभी एक महीने पहले हो एक टेम्परेरी कुआरे पर एक शादीशुदा परमानेट विजती गिर पड़ी वो वाग मे बठा आज कल चल चमेली वाला गीत गा . । जिस समय स्टेनो अपनी खिजावी जुल्फो को लहराते हुए आफिस में प्रवेश करती है तो सावन की घटा-सी छा जाती है। वाँस के दिल पर ता हजारो बिजलिया एक साथ गिर पडती हैं । कुछ मनचले आवारा बादलो की तरह सास भरने तगते है । जय शर्म आती है मगर 13
साहब किसी पर कडकते हैं। तो मूसलाधार बारिश होने लगती
है। कर्मचारी टेबिल पर और अधिक झुक जाते हैं । कुछ भाग
जाते है। कुछ भीग जाते है । पसीने से ही सही फाइलें तैरने लगती
हैं जैसे बच्चे नाव चला रहे हैं। साहव नार्मल हो जाते हैं, बादल
छट जाते हैं, घटाए चली जाती हैं। कमरे मे से खिलखिलाहट की
आवाज आने लगती है, मौसम और भी सुहाना हो जाता है
आफिस की नैया के खेवनहार बॉस भी कुछ हमदद हो जाते हैं
खासतौर से अपने चमचो के लिए लोग पाच वजने का इन्तजार
करते हैं । घर जाने के लिए लोगो को घर से कितना लगाव होता
है। बरसात मे तो और भी ज्यादा अन्दर की बरसात कुछ कम
हुई तो लगा बाहर शुरू हो गई है।
घर पत्नी कडक रही होगी। कुछ भी हो घर पर तो जाना ही
है। अपने ही घर जरा बरसात थम जाए, गदे नाले को पार
करके घर पहुचना होगा साइकिल सिर पर रखकर। बॉस का
तो क्या है कोई फर्क नहीं पडता, उहे कौन सा अपने घर जाना
है। अभी चले जाएगे कार मे बैठ कर स्टेनो को बीच मे कही
छोडते हुए।
14 शम माती है मगर
वडी गलती की शादी करके
।
गलती करना मनुष्य के स्वभाव का एक अग माना गया है।
जिस दिन आदमी गलती करना छोड देगा शायद आदमी ही
नहीं रहेगा। इन्सान है ही गलतियो का पुलला । दिन मे चिराग
लेकर ढूढने पर भी ऐमा आदमी शायद ही मिले जिसने कोई
गलती न की हो। गलतिया तो तभी से की जा रही हैं जब से
दुनिया बनी है। हम तो कहते हैं ससार का निर्माण ही गलती के
कारण हुआ। न तो बाबा आदम गेहू खाते और न ही उन्हे जमीन
पर फेका जाता । कहने का मतलब है कि गलतियो का नतीजा
तो ससार है। अब आप ही सोचिए, जब ऐसे-ऐसे लोग ही
गलती कर सकते है तो हम साधारण व्यक्तियो की तो विसात ही
क्या है । यहा तक की स्वय भगवान ही गलतियो के शिकार हो
गए वरना अधाकती सूरदास ये थोडे ही लिख देता 'विधातही
चूकपरी' और वाकई विधाता ने इतनी गलतिया की हैं कि उन्हे
गिनाना भी मुश्किल है। मिसाल के तौर पर कोयल का इतना
मधुर स्वर है लेक्नि वेचारी का रंग काला देकर उसकी सारी
महिमा मिट्टी में मिला दी । सुदर नयन हिरन को दे डाले जो
मजनू की तरह दर-दर की खाक छानता फिरता है। ज्यादा दूर
जाने की आवश्यकता नही है । हम अपने शरीर पर ही एक नजर
शम आती है मगर
15
डाले तो गलतियो का अम्बार नजर आएगा। अव देखिए न
हमारी दोनो आयें आगे लगाकर कितना बडा क्वाडा किया है।
अगर इनमे से एक आस पीछे लगा देता तो उसका क्या निगड
जाता और कितनी भयकर दुघटनाओ को सभावनाए समाप्त
हो जाती। कम-से-कम फिर पीछे से टक्कर तगने का डर ता नहीं
रहता। फिर देखते कौन भोक्ते हैं किसी की पीठ मे छुरा । मगर
अपनी सुनता कौन है । खैर, जब भगवान ही गलतिया करने से
वाज नही आए तो हम तो हैं ही क्या जिसने भी गलती से इस
संसार में जन्म लिया है, बस हजारो गलतिया करने का मौका
उसे मिल गया है।
आदमी कई तरह की गलतिया करता है। कुछ छोटी कुछ
बडी। कुछ नौकरी करना गलती समझते है और कुछ नौकरी न
करन।
कुछ लोग डिग्रिया हासिल करना महान गलती मानते हैं
और कुछ लोग डिग्रिया न लेने की गलती पर रोते हुए भी देखें
जा सकते है। एक सज्जन मुझसे कह रहे थे-"अगर मैं मट्रिक
होता तो न जाने क्या से क्या हो जाता " अब सोचिए-ये वात
तो वो मुझसे कह रहे थे--जिसने एम० ए० किया है और अब
तक सर्विस के लिए परेशान है।
यहा तक कि कुछ लोग तो मोटर-साइकिल, स्कूटर वगरह
सरीदने की गलती पर आसू बहाते हैं । चलिए छोडिए ये सब
वार्ते-गलतिया गिनवाई नही जाती हैं। गलतियो के गीत तो
आदि काल से गाए जा रहे हैं ।
हम भी मनुष्य हैं और इसी ससार में विचरण कर रहे हैं।
अव मला ये कैसे सभव है कि हम कोई गलती न करें। हमने
भी गलती को और बहुत बडी की। कुछ गलतिया तो ऐमी भी हैं
जो ठीक भी की जा सकती हैं । मगर हमने जो गलती वी
16 शम पाती है मगर
उसका तो ठीक होने का प्रश्न ही नहीं उठता। हा, अलवत्ता हम
जरूर ठीक होते जा रहे है। आप सोचेगे ये कौन-सी गलती है
जो इसी महगाई की तरह बढतो जा रही है। नात ठोक भी है
इसी गलती के कारण ससार में सबसे अधिक साहित्य का द्वार
खुला हुआ है । ससार का हर महान व्यक्ति इस गलती पर रोया
है। ये बात अलग है कि अपनी झेप मिटाने के लिए उसने अपनी
महानता का कारण इसे मान लिया है। अब तो आप मे
से बहुतो के जरम भी ढेर हो गए होगे और पता चल गया होगा
किये गलती है शादी करना।
इसे हम गलती माने या माता-पिता का हमारे प्रति वदले
की भावना व्यक्त होना-कुछ समझ मे नही आता--मा की
ममता के चक्कर मे ये फासी का फदा हमने अपने गले मे डाल
लिया है। हमारी इस खुदकशी पर हमारे मा बाप और मेरे
दोस्तो तक ने खुशिया मनाई।
हमारी यह आत्मा अदर से रोने लगी। हम सरे बाजार लूट
लिए गए । ढोल बजाकर हमारे परो मे गुलामी की बेडिया डाल
दी गई। घर मे बकौल माताजी के चाद-सी बहू आ गई। लेकिन
कुछ ही दिनो बाद चाद की ठण्डी चादनी और मोहक उजाला
दूर हो गया और वाकी रह गया काले चेहरे के दाग । कुछ ही
दिनो मे बहू घर की परेशानी का सामान बन गई-माताजी
पछताने लगी और पिताजी मेरी तरफ वस देखते रहने लगे।
दुल्हन की हाजिर-जवाबी से सारा घर तग आ गया-लगता
है हम बीरबल की बेटी घर मे ले आए हैं। नतीजा यह निकला
कि हम बहू को लेकर अलग रहने को मजबूर किए जाने लगे मा-
बाप की तरफ से और उधर पत्नी का यह आलम कि वो इस घर
मै एक पल भी रहने को तयार नही। अब क्या करूगा मै,
जाऊगा या उधर जाऊगा। माताजी को कुछ समझाता हू तो
शम माती है मगर
17
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पत्नी के गुलाम और अगर पत्नी को कुछ कहता हू पति धर्म से
विमुख माना जाता है। आखिरकार झख मारकर मैंने पत्नी के
साथ माता-पिता से अलग रहने का फैसला कर लिया और साहब
ऐसा करना था कि समझिए आफतो का पहाड टूट पडा। अब
तो घर का हर सामान लाने की जिम्मेदारी मुझ पर-नमक भी
तब आए जब मैं लाऊ । कई बार तो सामान समाजवाद की तरह
ऐसे गायव होते हैं कि मिलने की उम्मीद ही नही । घटो रो
धोकर वापस घर आ जाता है। और क्या-क्या सदमे गिनाए
साहब, जो हम पर बीत रही है वो तो हम ही जानते हैं। लोग तो
इस आफत मे मुझे फसाकर बस तमाशा देख रहे हैं।
अब सोचिए गलती किमकी सजा मिले किसे-~मगर हाय री
किस्मत, अब इस जाल से निकला भी तो नहीं जा सकता।
हालावि शादी आवश्यक गलती है मगर है बहुत भयानक । खुश
नसीब तो वो हैं जो आजन्म कुवारे हो, मगर कुवारे सोचते हैं
काश हम भी शादीशुदा होते।
मेरा तो ये तजुर्वा है कि बस परेशानिया ही परेशानिया हैं।
अगर पहले पता होता तो ऐसी गलती कभी भूलकर भी नहीं
करता। मगर अब निराश होने से क्या फायदा। अब जब गलती
हो गई है तो उस पर पछताना वेवार । बस यही सोचकर हम
इस गलती के साथ अपना जीवन काट रहे हैं क्योकि अगर
इसे ठोप करते हैं तो दुनिया वाले इसे और भी बड़ी गलती
मानते हैं । मेरा मतलब आप समझ गए होगे । इसलिए वे सब
दोस्त जो ये गलती कर चुके हैं इसे निभाए और जिहोने में
गलती नहीं की वो अब ये गलती करने को तैयार हो जाए।
18 गम आती है मगर
- किराए का ही तो मकान है। "तुम्हारा कोई अपना मकान भी कभी होगा?" सुनते-सुनते मेरे कान फटने से बाल-बाल बचे हुए हैं। लगता है किसी दिन फट जाएगे, मगर मेरा मकान नहीं बनेगा। जिस मकान में इस समय मैं रहता हू मेरा नहीं है किसी और का है। मेरा तो मकान क्या कही पान की दुकान तक नहीं। कोई कमरा तक नही। हा, पत्नी की कमर अवश्य है जो अब कमरा ही लगती है । बडा सुकून है । अपना मकान न होने मे दुख क्यो है ? सब औरो के मकानो मे ही तो अपना बोरिया विस्तर डाले पडे हैं। जिनके पास अपने मकान हैं वे दूसरे घरो मे ही रह रहे है। ये कुछ अलग ही मजा है । आजकल देश में सारी जाति-व्यवस्था खत्म हो गई है। बस दो ही कोमे रह गई हैं--मकान मालिक और किराएदार। मैं नम्बर दो मे आता है। हातिमताई की तरह मैं हमेशा मकान की तलाश मे घूमता हू और जब कभी कोई बसेरा मिल जाता है तो लगता है कि हुस्न- बानो के सवालो का जवाब मिल गया है। शाहजहा ने ताज- महल बनवाकर भी शायद इतना अभिमान न किया हो जितना गरूर आज का मकान मालिक दो छोटे कमरे, एक अटैच बाथ- शम आती है मगर 19
रूम और घुटनभरी रसोई बनाकर करता है । एक दिन मैंने
अपने मरान मालिक मे वरमात मे छत टपाने की शिकायत की,
"ययो साब, ये छत से पानी क्व तक टपकता रहगा
उन्होने बडी मासूमियत मे कहा, "मैं क्या जानू में कोई मौसम
विशेषन तो हू नहीं।" कई बार ऐसे अवसर आए हैं जब मुव
मकान मालिक से किराए के बारे में रिमाइन्डर मिले । एक बार
मैंने रात बारह बजे मकान मालिक की घटी बजाई। आजे मलते
मलते उसने दरवाजा खोला।
"अरे, तुम ? क्या बात हो गई ? सब ठीक तो है ? आधी
रात गए कैसे तकलीफकी?" उमने पूछा। मैंने कहा, "नहीं, नहा,
ऐसी बात नही है। सव कुशल है । मैं तो ये कहने आया था
कि कल पहली तारीख है।"
"वो तो मुझे भी पता है मगर यह बात कहने आने की अभी
क्या जरूरत थी ? किराया कत शाम दे देना।" "यही तो कहने
आया हू। कल मैं किराया नही दे पाऊगा। मैंने सोचा कि इस
बात के लिए मैं अकेला ही क्यो परेशान रहू।" और मैं अपने
कमरे में आकर सो गया। पिछले दिनो जब मेरे शहर में भूचाल
आया तो पत्नी ने घरा कर मुझे जगाया। "अरे उठो, भूचाल
आया है मकान गिर जाएगा।
मैने करवट बदल ली, "अरे छोडो, क्यो फिक्र करती हो ।
गिरता है मकान तो गिर जाने दो, किराए का ही तो है।"
20 शम आती है मगर
चन्द तस्वीरे रेस्टोरेट की ऐ मुसव्विर तेरे हाथो की बलाए ले लू खूब तस्वीरें बनाई मेरे वहलाने को। किसी शायर के इस शेर को सुनने या पढने के बाद हमारे दिमाग मे एक तस्वीर उभरती है, वहुत ही हसीन, खूबसूरत, दिलकश, और नाजुक-नाजनीन की तस्वीर । कुछ लोग दिल के आइने मे न जाने कब से तस्वीरे यार लिए घूम रहे हैं और उस यार की हिम्मत को भो दाद देनी पडेगी जो बरसो से इस दिल की हवालात में कैद बैठा है और वोर नहीं हो रहा है । वहुत-से लोग अकसर अपने मेहबूब या मेहबूबा से तस्वीर देने की मिनते करते देखे गए हैं, लेकिन यहा एक बात बिल्कुल साफ हो जानी चाहिए, ये सब तस्वीरे फेम मे जडी होती हैं और दीवार पर टगी रहती हैं। लेकिन आप से चलती-फिरती तस्वीरो का जिक्र कर रहा हू । हो सकता है भापका मबका भी ऐसी तस्वीरो से पाला पडा हो जो जवदस्ती आपके दिलो-दिमाग पर छाती चली गई हो। वसे तो हर जगह से चलती-फिरती नजर आएगी मगर आज मैं आपको एक खास जगह की तस्वीरों से मिलवाऊगा। आप भी उन तस्वीरो से दो चार हो चुके होगे, ऐसा मेरा यी है। रेस्टोरेट के बारे मे तो आप जानते ही होगे, इसे भगर शहर का, शम आती है ।
अजायबघर कहा जाए तो मेरे खयाल से ज्यादा ठीक रहेगा। तरह-तरह के लोग अलग-अलग वेशभूपाए, विभीसरगन पान सब एक ही जगह देखने को मिल जाते है । सडक छाप शायर से लेकर चोटी के नेता तक यहा पाए जाते हैं । ऐसी-ऐसी अजीव तस्वीरें देखने को मिल जाती है कि बस दिल थाम लेना पड़ता है। मरी आख चारो तरफ आइने की तरह घूमकर चारो तरफ का जायजा लेती है और एक टेबिल के पास रक जाती है। एक खूबसूरत जोडा, शायद अभी अभी शादी हुई है, फुसफुसा रहा है क्या बातें कर रहे है कुछ समझ मे नही आ रहा है। वसे भी आदमी जव फुसफुसाता है तो किसी के कुछ समझ में नहीं आता है । अचानक ही वो न जाने क्यो सिसकने लगती है, शायद क्सिी गभीर बात पर आसू आ गए है । अब शब्द भी साफ सुनाई पड़ने लगे है। मेरा पति-पत्नी वाला अदाज शब्दो ने गलत साबित कर दिया। पता चला कि प्रेमी को आर्थिक स्थिति कुछ डावाडोल होने के कारण प्रेयसी को वो आराम नहीं मिल पा रहा जिसकी उसने कल्पना की थी। हाय वेचारा प्रेमी | मेरी आखें अधिक देर तक इस जोडे पर नही ठहर सकी, साथ वहा से आगे बढ गई। मैं कुछ देखने की कोशिश कर हो रहा था कि एक कोने से एक आवाज निक्ली, "अरे भई यहा आ जाओ, हम तो यहा बैठे हैं।" स्वर कुछ जाना- पहचाना-सा लगा, ओह कविवर वौडम थे। न जाने कब से अपनी वोर रचनाए सुनाने के लिए यहा बेताब बैठे हैं। न चाहते हुए भी मुझे उनकी तरफ बढ जाना पड़ा। पास जाते ही बौडम बोले, वठो यार, ये क्या खोए-खोए दिख रहे हो । बोलो क्या लोगे, ठडा या गरम । मैंने उनको आयो मे झाककर ये मालूम करने की योशिश को, क्या ये बिल अदा कर देंगे? लेकिन आखो वो मायूसी ये वह रही थी कि आज भी पर्मेट मुझे ही करनी पडेगो इसलिए जरा इकोनोमी के लिहाज से कहा, नहीं वौडम माहव चाय ही चलेगी। । 22 शम माती है मगर । इसके बाद बौडम जी ने अपनी रचनाओ के सैलाब मे ऐसा बहाया कि मुझे तो ये भी पता नहीं चला कब चाय आई, कब पी गई और कब बौडम जी उठकर चले गए। मैं तो जमीन पर तब वापस आया जब वैरे ने कहा, साब बिल । मैंने बेयरे पर नजर डाली। इस रेस्टोरेन्ट की ये भी तो एक तस्वीर है जो सोए हुए आदमी को जगाकर उसे चेतन होने का अहसास कराता है। कितना अच्छा होता मैं सोया होता, क्योकि यहा का दर्शन कबीर से मेल नही खाता । यहा तो जो सोवत है सो पावत है और जो जागत है सो खोवत है। पसे देकर बैरे को विदा किया और फिर इधर-उधर झाका । देखता क्या हू एक भीमकाय शरीर की काली-कलूटी महिला रोलर की तरह धरती समतत करती हुई अपने निहायत दुबले- पतले पति के साथ मेरी ही नरफ वढी चली आ रही है । मैंने मन ही-मन भगवान का स्मरण किया और सभलकर बैठ गया। मेरे ही सामने को दो कुसियाखाली थी। महिला आते ही गरजो-आपको अगर ऐतराज न हो तो हम यहा वैठ जाए ? मैंने सोचा अगर ऐतराज हो भी तो मैं क्या बिगाड सकता है। फिर जरा मयत होकर बोला- क्यो नही, क्यो नही, अवश्य बैठिए। भला मुझे क्या तकलीफ हा सकती है। महिला बेचारी कराही, चरमराई और फिर अपनी मजबूर हालत पर खुद ही सामोश हो गई। वाले रग पर चटय पीली साडी-सरसो के खेत मे भैम की उपमा गोसाकार कर रही थी। फिर मैंने देखा पति लगभग गिड- गिडाना हुआ बोला-क्या पियोगी सुशीला? तो सुशीला आखें तरेर कर बोली, कुछ भी मगवालो जो, मेरा मूड मत सराव करो। में सुशीला जी की तरफ देखता रह गया । इस रूप पर ये नाम मुझे नाम की दुगति लग रही थी। अचानक सुशीला जो मेरी तरफ मुपातिय होकर बोली. आपरे बारे में कुछ जान सक्ती हू' इस । शम आती है मगर 23 और - अचानक हमले से मैं घररा गया फिर भी अपने आपको मभाला और काफी सहज होगर मैंने पहा, हा-हा-क्यो नही, में एक लेखन ह, मेरा नाम ये है । आजाल में रेस्टोरेट के लोगा पर छलिय रहा हू। ये सुनते ही उनकी बाछे खिल गई। वड ही बुरे ढग से लजा कर कहने लगी, ये तो बहुत अच्छी बात है- क्या आप मुझ पर भी लियेंगे और यह कह कर वो कुछ शरमाई तो लगा तूफान मा आ गया। मैंने कहा, अवश्य, आप पर तो खासतौर से लिखगा। चेहरे पर भयानक मुम्यान फैलाते हुए बोली, जरा सुन्दर-सा वणन करिएगा मेरा । मैंने कहा, मडम आपका तो वो वयान करूगा कि लोग विहारी की नायिका को भूल जाएगे। और साथ ही उसके हुस्न को देखकर ये इच्छा भी जाग गई कि मैं अधा न हुआ। अब समझ में आया कि सूरदास को गोपिया इतनी सुदर क्यो थी। अब जो कुछ भी उन पर लिखना या सो निस दिया, लेकिन भगवान करें सुशीला जी इस लेख को नही पढ़ें। वरना वो मेरा सारा खाया पीया बाहर निकलवा लेंगी, उनके पास तो मेरा घर का पता भी है। सुशीला जी से मिलने के बाद अब देखने को क्या बागी रह गया था। मैं वहा से उठने का इरादा कर ही रहा था कि हकीम साहब ना धमके। एक रंगीन तस्वीर, लखनवी चैनदार कुता, खसखसी दाढी, मी सर पर वेंत की वनी टोपी, परो मे कामदार जूतिया और ऊचा-सा तहमद बस ये ही हकीम साहव लगते हैं। चिडीमार, ये वो हकीम है जो हर मर्ज का इलाज शेर सुनाकर करते है। आजकल ये इस रेस्टोरेट के मैनेजर का इलाज कर रहे हैं जिसका जिगर बढ रहा है। मेरे नसीब मे हकीम साहब के शेर भी लिये थे सो सुने । शेर सुनता रहा और सर धुनता रहा। कई बार उनको रोककर पूछने को कोशिश भी की-आपके पास सब रोगियो का इलाज है, मगर आपकी शायरी के मारे का क्या इलाज है ? हकीम साहन तो ऐसी बातें सुनते ही नहीं। बडी मुश्किल से नजर वचापर मैं रेस्टोरेट से बाहर आया हूं। शम आती है मगर । 24 । तलाक का मुकदमा दृश्य अदालत की गरमागरमी 'शोरा शराबा' आने-जाने वालो के स्वर और फिर बीच मे से जज की आवाज का उभरना। जज आर्डर-आईरहा तो आज का मुकदमा पेश किया जाए । सबसे पहला केस लक्ष्मी विरुद्ध गोपाल । इ है हाजिर किया जाए। दोनो हम तो हाजिर हैं हजूर-कब से कटघरे मे खडे हैं। जज इहे कसम दिलवाइए। गोपाल किस बात की क्सम साब ये कसमे यहा भी चलती हैं 7 जज खामोश रहिए-ये अदालत है -आपका घर नहीं- जहा आप चाहे जो बोलें। गोपाल हजूर, वह भी कहा बोल पाता है। मौका ही नहीं देती श्रीमती जी मुझे बोलने का। वैसे माफ करें हजूर- जज साहब घर पर तो आप भी नहीं बोल पाते होगे। जज ओह शटअप, ये क्या वकवास है । बहुत बेवकूफ है क्या आपा लक्ष्मी जज साहब ये मेरे पति हैं । भव आप ही सोचिए ऐसे पाम आती है मगर 25
आदमी के साथ जीवन कट सकता है। बस इसीलिए
हम तलाक लेने आए हैं।
जज ये तलाक आप दोनो अपनी मर्जी से ले रहे है।
गोपाल मेरा कहना है जज साहब कि कोई भी पति पत्नी
पडोसियो की मर्जी से तो तलाक लेता नहीं है।
जज फिर वो ही वकवास-आपसे किस गधे ने पूछा है ।
तक्ष्मी इतनी देर से आप ही तो पूछ रहे हैं हुजूर ।
जज (झल्लावर) ओफ्फो । कसे अजीव लोगो से पाला
पड़ा है। मैं आपमे चन्द सवाल करता हू उनका जवाब
दीजिए।
दोनो पूछिए।
जज आप तलाक क्यो लेना चाहती है।
लक्ष्मी आप तो ऐसे अक्डकर पूछ रहे हैं जैसे मैं तलाक अपने
पति से नही आपसे ले रही है।
गोपाल अरे, काश-ऐसा होता।
जज आप लोग बहुत बदतमीज हैं। अच्छा चलिए लक्ष्मी
जी बताइए आप अपने पति से तलाक क्या लेना
चाहती हैं।
लक्ष्मी पहला कारण तो ये है कि ये मेरी विल्कुल तारीफ नहीं
करते और करते भी हैं तो फूल उदग से।
जज से-जरा वताइए।
लक्ष्मी एक वार को वात है । हम कही किसी और की शादी
मे जा रहे थे।
[फ्लैश वैष सगीत]
गोपाल अरे अब आआगी भी या यू ही सारा समय
लक्ष्मी आ ता रगह, क्यो आसमान सिर पर उठा रखा है।
वर्वाद
करोगी।
26 म आनामगर
?
सुनो इधर देखो मे कैसी लग रही हू इस पोली साडी मे
बताओ ना।
गोपाल जैसे सरसो के खेत मे केसर खड़ी है।
लक्ष्मी (क्रोध से) क्या कहा
गोपाल नहीं-नही, जैसे भंस पर सरसो का गट्ठर रखा है।
[अदालत मे हमी के स्वर । फ्लेश बैक खत्म]
लक्ष्मी अब आप ही वताइए ये कोई बात है।
जज मार्डर-आर्डर, और कोई बात।
लक्ष्मी एक नही कई हैं माई-बाप।
जज बताइए तो।
लक्ष्मी मेरी माता जी कभी मेरे यहा आ जाती हैं।
गोपाल (बीच मे) कभी-कभी नहीं जज साहब वो तो जब से
शादी हुई है तभी से कुण्डली मार मेरे घर में ही बैठी
हैं बल्कि मुझे तो याद है कि शायद शादी के बाद ये मेरे
घर बाद मे आई और मेरी सास पहले ही मेरे घर आ
गई।
जज फिर आप वोच मे बोले-~-चुप रहिए। हा नो लक्ष्मी
जी, फिर क्या हुआ?
लक्ष्मी एक दिन में और मेरी माता जी घर के आगन मे बैठे
धूप खा रहे थे।
गोपाल और तो कुछ छोडा ही नही इहोने घर में।
जज आप चुप रहिए।
लक्ष्मी इतने मे एक सज्जन आए ।
[फ्लेश बैक]
सज्जन क्या मैं अन्दर आ सकता है श्रीमान ?
गोपाल आप तो पहले ही अन्दर धमक चुके है।
सज्जन मोक्षमा कीजिए, मैं विधवा आश्रम से आया है।
शम सातो है मगर
27
2
गोपाल (आश्चर्य से) है, आप वहा क्या कर रहे हैं आपको तो
विधुर आश्रम मे होना चाहिए था।
सज्जन आप समझे नही थीमान, मैं विधवा आश्रम का
सचालक हू, उसके लिए कुछ लेने आया है।
गोपाल अच्छा अच्छा तो आप विधवा आश्रम के लिए कुछ
लेने आए हैं।
सज्जन ठीक समझे श्रीमान आप
गोपाल तो ऐसा कीजिए, ये हमारी विधवा सास यहा बठी हैं
इन्हे ले जाइए।
[फ्लेश बैंक हसी के स्वर]
लक्ष्मी अब सोचिए जज साहब, मैं रह सकती हू इनके साथ
गोपाल अरे जज साहब क्या सोचेंगे, सोचना तो मुझे है।
लक्ष्मी इन्हे मेरा कोई भी रिश्तेदार फूटी आख नही भाता।
एक बार मेरा भैया
[फ्लेश वैक]
लक्ष्मी सुनो जी, सुन रहे हो?
गोपाल हा सुन रहा हू और सिर धुन रहा है।
लक्ष्मी मुना जिद कर रहा है ।
गोपाल क्सि बात की?
लक्ष्मी कहता है कि चिडिया घर मे जाकर क्या देखूगा।
गोपाल तो उससे कह दो चिडिया घर मे जाने की क्या जरूरत
है, उसके मामा यही आए हुए हैं।
लक्ष्मी तो क्या मेरा भाई वया है?
[हसी के स्वर
जज आर्डर-आर्डर, शात रहिए। हा गोपाल, अब आपसी
वारी है।
गोपाल रहे वरमा ये याद बारी आई है। जज साहब'
28 गम मातीमगर
आपको इसकी एक ही बात सुनाता हू ।
[फ्लेश बैक-पार्टी का स्वर]
गोपाल आप सच बहुत अच्छी हो।
उमिल सच, अच्छी लगी आपको?
गोपाल कभी आइए आप हमारे घर पर ।
उमिल अवश्य माऊगी, इन्तजार मे रहिए।
[तडाक से चाटा पडता है।]
गोपाल अरे क्या वकवास है, आपने ये चाटा क्यो मारा है
मुझे।
उमिल आप निहायत घटिया और बदतमीज आदमी हैं।
गोपाल क्यो, क्या किया है मैंने?
उर्मिल आपने बैठे-बैठे ही मुझे चिकोटी काट ली।
गोपाल हैं, अरे नही-नही मैंने नही काटी, सच लक्ष्मी मैंने नहीं
काटी, उठो लक्ष्मी चलो यहा से चल देते हैं ।
[पाज]
गोपाल सच लक्ष्मी मैंने उसके चिकोटी नही काटी, मैं तुम्हारी
कसम खाता हूँ।
लक्ष्मी मुझे मालूम है तुमने चिकोटी नही काटी है।
गोपाल सच तुम्हे कैसे पता है कि चिकोटी मैंने नहीं काटी?
लक्ष्मी इसलिए कि चिकोटी मैंने काटी थी वरना तुम वहा
से दो घन्टे तक उठने का नाम भी नहीं लेते।
[हसी के स्वर]
गोपाल अव तो मालूम हुआ जज साहव कि ये कैसी है।
जज और तो सारी बाते ठीक हैं, मगर आपके ये तीन
बच्चे प्रॉब्लम है तलाक मे। आपकी शादी को चार
साल हुए हैं और आपके तीन बच्चे यानी हर साल
एक।
शम आती है मगर
29
लक्ष्मी तो इसमे क्या तकलीफ है जज साहव
जज तीन बच्चो को हम आपको कैसे आधा-आधा वाट दें।
डेढ-डेढ वच्चा देने से रहे।
लक्ष्मी अरे हा, इस बात पर तो सोचा ही नहीं था। तुमने भी
नहीं बताया।
गोपाल में तो भूल ही गया कि हमारे बच्चे भी है, अब क्या
करें?
लक्ष्मी अरे तो इसमे दुखी होने की कौन-सी बात है | अगले
साल सही जज साहब, हम अगले साल तलाक लेंगे
जब चार बच्चे हो जाएगे।
30 शम आती है मगर
जब मै सरकार बनाऊगा
'सरकार से तौवा मेरी सरकार से तीवा' जब भी कभी ये
गीत सुनता हू तो सीधी नजर पत्नी पर जाती है। इनके होते कही
और जाने के चास भी नहीं । जमाने-भर मे जम्हूरियत आ गई है
मगर अपने घर मे तो पिछले कई सालो से ये तानाशाह 'सरकार'
ही चली आ रही है। बरसो से ये दिये और तूफान की कहानी
घिसट रही है। निश्चित है दिया यानी कि पिया ही कमजोर
साबित होगा । खैर मैं देश की सरकार से घर की सरकार की
तरफ खिसक गया। मजबूरी है न अपने देश को। यहा सब लोग
विषय से हटकर ही बात कर रहे हैं। गायक फुटबॉल की बात
करते है, नेता फिल्मो मे विलेन बनने की अटकल लगा रहे हैं
तो अभिनेता और कलाकार सीधे राजनीति के मच पर धमक
रहे हैं या कहे कि चमक रहे हैं। मैं तो इतने दिन मे खामोश
बैठा था वरना आप क्या समझते हैं मैं सरकार मे नही आ
सकता जब यू हो कई लूले-लगडे, ऐरे-गैरे, नत्यू पेरे इस
फील्ड में जाकर अपनी बेसिर-पैर की हाफ सकते हैं तो मुझमे
क्या कमी है ? दोस्तो ने कई वार राय दी कि सरकार में आ
जाओ, तुम भी अपनी सरकार बना लो, मगर मैं ठुकराता रहा।
मुझे जच ही नहीं रही थी, सोचता था यहा क्या बुरे हैं ? मगर
7
शर्म आती है मगर
31
अब तो पानी सर से गुजर चुका है। कई राज्यो मे नेतृत्व परि- वतन के समय मुझे ऑफर आये। सबकी नजरें मुझ पर लग जाती मगर मैं सबसे नजरे चुरा लेता। सरकार बनाने के चक्कर से बाल-बाल बच जाता। लेकिन अब लगता है दोस्त नहीं मानेंगे। यार लोग मुझसे सरकार बनवा कर ही दम लगे। इन सबको तो मैं टरका भी देता मगर इस बार तो घर की सरकार ने भी मुझे अल्टीमेटम दे दिया है कि जब तक मैं अपनी सरकार नहीं बनाकर दिखाऊगा वो मुझे अपनी सरहद मे घुसने तक नहीं देंगी। अब आप ही बताइए, टाल सकता हू उनको वात को? मानना ही पडेगा। पत्नी से प्रेरणा लेकर तो लोग महान् वन गये हैं। अभी कुछ दिनो पहले तो एक व्यक्ति बोवी की फरमाइश पर डाकू भी बन गया था, गोया डाकू बनना नही विविध भारती का कार्यक्रम हो गया। तो जब लोग इतने घटिया काम भी घर की सरकार के आदेश पर कर सकते हैं तो मैं तो देश के इतिहास मे एक जबर्दस्त मोड लाऊगा। इसलिए अब की बार मैंने भीष्म प्रतिज्ञा कर ही ली है कि अब मैं सरकार बनाऊगा । मेरे मित्रो ने मुथमे मेरा घोषणा. पर मागा है। मैं इन दिनो सारे काम छोडकर वस इसी पर गहन विचार कर रहा है। जिन विन्दुओ पर मैं निर्णय पर पहुच गया हू, सोचता हू-सक्षेप मे वो आपको भी बता ही दृ क्योकि आखिरकार ये सब जनता के सामने तो आना ही है न । हमारे इस मुत्व की बागडोर किसके हाथो मे दी जाए सो वो तो मैं हू ही । मुझे पतगवाजी मे कई तमगे मिले हैं मनामडल की आवश्यक्ता क्या है। यहा 'यमाडलों की जरूरत है। मेरे सभी कवि और कवयित्रिया बस गवनर बनाकर जगह- । 32 शर्म आती है मगर
जगह भेज दिए जायेंगे ताकि हर तरफ साहित्य का बोलवाला
रहे।
'चुनाव' का नाम बदल कर 'तनाव' रखा जायेगा। इस
नाम मे देश की वास्तविकता झलकतो है। खाद्यमत्री के स्थान
पर अव वाद्यमत्री हुआ करेंगे और रक्षामत्री को रिक्शा मत्री
कहा जाने लगेगा।
सरकारी अधिकारी उन्हें ही बनाया जायेगा जो गवन मे
एक्सपर्ट हो, घूस और रिश्वत मे महारथी हो । जो जितना
अधिक घोटाला करेगा उसे उतना ही योग्य अफसर समझा
जायेगा। मेरी सरकार का राष्ट्रीय चिह्न होगा-'चम्मच' । सव
वादो को समाप्त कर बस चमचावाद चलाया जायेगा।
साहित्य का सबसे बडा पुरस्कार अव 'अज्ञान ढीठ पुरस्कार'
होगा। हमे यकीन है इसे पाने के हकदार देश मै बहुत होगे।
राजधानी तो जो है सो ही रहेगी। मुहम्मद तुगलक ही इसे
बदल सकता है।
पुरस्कारो की बात चली तो कुछ और भी याद आया जो
मैंने सोचा है। ये जितने भी 'चक्र' पुरस्कार हैं इन्हे 'कुचक्र'
पुरस्कारो मे बदल दिया जायेगा। जैसे-वीर कुचक्र या
परमवीर कुचक्र आदि । कीर्ति पुरस्कारो के स्थान पर 'अपयश'
पुरस्कार आ जायेगे। इन पुरस्कार पाने वालो की कमी हमारे
यहा नही है। राष्ट्र का सबसे बडा पुरस्कार होगा-'देश
क्लक। ये पहले भी कई लोगो को दिया जा चुका है और अव
भी इसके लिए अनेक लोग उम्मीदवार हैं। स्कूल-कालेज अब
बन्द कर दिए जायेंगे। बहुत हो गये पढ़े लिखे । अव इनमे मिलें
लगा दी जायेंगी । छान-छात्राओ को सिनेमा हॉल के सामने वस
प्रदर्शन के लिए रखा जायेगा।
विदेश नीति का लेना देना ही क्या है। जब हमसे अपनी
शम आती है मगर
।
33
ही नहीं सभल रही है, तो इसरो के पटे मे पैर क्यो उलझाए ।
वोट शब्द मे बडा खोट आ गया है। अब बस नोट चला
करेगे । सरकार का फिर घाटे में आने का सवाल ही क्या है।
मेरे रयाल स इतना गूढ चिंतन इस समय किसी का नही
हो सकता जितना मैं कर रहा हूँ। और भी ऐसी ऐसी बातें
आपको बताऊगा कि आप भी याद रखें । मैं तो भले की ही बात
करता है। इस देश की भलाई की।
अरे-अरे ये क्या---
-ये मैं क्या कर रहा हूँ। मैं तो नीचे
फश पर आ गया, खाट पर से आगा में आ गया। ओहो तो
गिर गया तोऽ ऽ तोऽऽ ये सपना था जो मैं देख रहा था । अरे
तकदीर कुछ देर तो सपना बना रहता। मगर ये भी गवारा
नही । ओहो-लगता है घर की सरकार भी आ रही है। उठ
जाता हू । चला भैया हम पाट से नीचे गिरे-तो हमारी
सरकार भी गिर गई
34 शम आती है मगर
वात-बनाये न बनें -सारा-का- मिर्जा हाय-हाय खा क्या होरिया है यहा-कमबख्त दम घुटा जा रिया है (खासी) आफ हो- सारा आखो मे भी धुआ जारिया है (चिल्ला कर) अरे बेगम जान कहा हो खा, अरे वोल तो दो अरे वेगम जान । । वेगम अये क्यू गला फाड रिये हो, सारा घर सर पर उठा लिया। क्या है जल्दी कहो (डाट कर)। मिर्जा अरे खा बेगम धीरे बोलो खा। बेगम अच्छा कहो क्यो घबरा रिये थे। मिर्जा अरे खा मैं कह रिया था कि यह घर है या धुआ- खाना । देखो चारो तरफ धुआ-ही धुभा होरिया वेगम अये हये तो भई लकडिया ही गीलर है तो मैं क्या करू, फूक्ते-फूकते मेरा तो दम घुट गया और तुम हो कि जरा सा आयो मे घुस क्या गिया डकराने मिर्जा अरे खा मैं फिर कह रिया हू धीरे बोलो खा धीरे, मैं दिल का बहुत कमजोर हू खा शम आती है मगर लगे। 35 बेगम हाय हाय मुआ तुम्हारा दिल न हुआ कमवरत छुट्टन खा के होटल का खस्ता कवाब हागिया ओ हाथ मे लेते ही टूट जाए। मिर्जा अरे ऐसा न कहो, खा वेगम जान, ऐसा न कहो, बेगम जान । 'ये दिल कवाव नहीं है, इसको अमरूद समझो अरे-इसे कच्चा हो चवा जा तले क्यू है ।' बेगम भला मैं क्यू चवाने लगी मुए तुम्हारे दिल को? मुझे क्या तुमने अल्लारखी की बेकरी समझा है मिया क्या 7 दिलवर अरे-अरे चवाने की वात मत करो या वेगम जान, मुझे नही तो कम-से-कम इस दिल को ही सभाल कर रखो, देखो याद करो खा वह दिन बेगम जान जब हमारा और तुम्हारा निकाह हुआ था और तुमने और मैंने अपने अपने दिल एक दूसरे को देने के लिए एक बार नही तोन तीन बार कुबूल किया था। वेगम हा हा मुई उसी गलती की सजा तो अभी तक भुगत रही है। दिलबर अरे सजा तुम नही भुगत तो मैं रिया हू (धीरे से)। गम क्या कह रिया हो? दिलवर अबुछ नही या कुछ भी तो नहीं कह रिया। मुझे तो खा वस एक याद आरिया है । भोपाल का हे दिल बडी कमजोर चीज है लेकिन ये क्या टिके है बीवी तेरी जया ये सामने वैगम क्या वह रिये हो (रोकर) हा अब तो तुम्ह मेरी जवान भी बुरी लगने लगी, लि को मुई यह शायरी, मुपे भी बुरी कर देगी। आग लगे कम- 36 सम आती है मगर
,
बन्न तुम्हारी शायरी को, अल्लाह करे इस मुई की
आस फूट जाये, हाय-हाय सरकार को नशावदी के
साथ-साथ शायरी बदी भी कर देनी चाहिये, ये
भी तो क्मवरत दूसरो का घर बर्बाद करती है।
दिलबर अरे खा बेगम जान, तुम नहीं जानती खा तुम नही
जानती, शायरी की ऐसी आखे नहीं होती जैसी
तुम्हारी हैं इसकी आखें तो खा जिसम के अदर
होती हैं और उही आखो से यह सहरे सही देखती
है । अगर इसे तुम्हारी आखें मिल जाये तो खा
फिर इसे कुछ भी नजर नही आयेगा।
बेगम हा-हा समझ रही हू-सब समझ रही हू (रोती हुई)
मुझे अधा कहरियो हो-हा कह डालो और कह
डालो, मैं आज ही अपने अब्बा के यहा चली
जाऊगी, फिर खूब ठडक पहुचाना अपने दिल को
(जाते हुए) आग लगे कमबख्त इस शायरी को।
दिलवर अरे कहा चल दी वेगम जान, सुनो तो खा। लो
चली गई (सात-आठ वच्चो को आवाज)।
बच्चे (एक साथ वोलते हुए) अब्वा-अब्बाजान अब्बा-
जाना
दिलबर अरे चुप करो, काहे को सर खाये जा रिये हो ।
कमबस्त घर नही होगिया कोई मदरसा होगिया।
वेगम (दूर से आते हुए) हा-हा अब बच्चे बचे हैं। उनसे
भी कह डालो। देखो मैं कहरी हू कि वच्चो से कुछ
न कहना धरना
दिलबर वरना क्या?
वेगम हा-हा क्या पूछ रिये हो पूछो पूछो चुप क्यो हो
गिये?
शम आती है मगर
37
दिलबर नही खा नही मैं पूछ नही रिया सोच रिया हू खा कि- कभी-कभी मेरे दिल मे सियाल आता है बच्चो का जाल बिछाया गिया है मेरे लिए मैं इससे पहले कुआरा हो ठीक था बेगम घर मे इस फौज को बिठाया गिया है मेरे लिए बेगम अये हये तुम तो ऐसे कह रिये हो जैसे मैं आठ बच्चो को अपने मायके से साथ लाई थी। तुम्हारा ही तो कमवरत किया-धिया है यह सब वरना मेरा क्या- दिलवर हा-हा तुम्हारा क्या, सारा कुसूर मेरा ही तो है । बेगम अये हये तुम्हारा नहीं तो फिर किसका होगा। पहले कहती थी देखो उतने ही पर फैलाओ जितने चादर मे समा सकें, लेकिन मेरी एक नहीं सुनी। अब लगे सर पकडने और डकराने-अये मिया खुद ही सोचो कि जुम्मन मिया के तागे मे सवा- रिया आती है, अव तुम उस तागे मे 10-12 सवा- रियो को बिठाल लो तो कमबरत घोडे का क्या होगा-थोड़ी दूर चलकर फेफडे डाल देगा मिया। दिलवर हा बेगम जान ठीक कह रियो खा, अपनी हालत भी अब थोडे दिनो मे ऐसी ही होने वाली है । बेगम (शरमा कर) अये चलो हटो मुई ऐसी वातो को मुह पर न लाओ, अये हा मैं तो तुमसे कहना कम- वस्त भूल ही गई कि आज अपनी नसीमन और सलीमन के लिए मुई क्ल्लो ने दो लडके देखे हैं--- आज वो दोना घर आयेंगे तो तुम घर हो रहना- 38 शम आती है मगर अय हये मैं क्या उन धीगडो से बात करूगी जरा तुम ही बात कर लेना और देख लो कि लडके ठीक-ठाक रहेगे। दिलबर देखो वेगम जान, लडको को देख तो लूगा पर ठीक- ठाक रहने की गारटी मैं नही ले सकृगा खा । हा पहले ये बता रिया हू, कही फिर बाद मे तुम मेरे पीछे पड जाओ बेगम अय हय, जरा थोडी तो शरम करो, क्या अब भी मैं तुम्हारे पीछे ही पडी रहूगी। दिलवर तो अब खा किसके पीछे पड़ने का इरादा होरिया बेगम अये चलो हटो मुई दिल्लगीन करो (जाते हुए) अच्छा तो मैं बावर्चीखाने मे हूँ। कोई आये तो पुकार लेना और जाना नही कही समझरिये हो- दिलवर समझरिया हू खा सव समझरिया हू। वेटा दिलवर भोपाली, अब पता चलरिया है खा कि शादी के बाद ज्यादा बच्चो के बाप बनने के बाद कैसा मजा मिलरिया है-हाय हाय आफते आयेगी सर पर मुझे मालूम न था इस तरह फूटेगा यह सर मुझे मालूम न था मैं तो समझा था मेरे प्यार का तू ताजमहल है बेगम अरे तू ही आफते जा बनेगी मुझे मालूम न था [खटखटाने की आवाज और पुकारने का स्वर] रुस्तम (जोर-जोर से) मैंने कहा जनाव मिर्जा दिलबर भोपाली साहब , दिलबर लो शायर पहले दामाद साहव आ धमके हैं-अरे हा भई आरिया हू खा। (दरवाजा खोलने की शम आती है मगर 39 आवाज) रुस्तम अस्सलामोअलेकुम । दिलवर वालेकुम सलाम खा भाई मिया-फरमाइये किससे मिलना है। रुस्तम जनाव दिलवर भोपाली का दौलतखाना यही है न । दिलवर जी हा जी हा, मिर्जा दिलवर भोपाली का गरीव- खाना यही है और नाचीज को ही जनाव, मिर्जा दिलबर भोपाली कहते है। अरे वहा क्यो खडे हो खा मिया अदर तशरीफ लाइये, हा यहा तशरीफ रखिए जी हा। रुस्तम जी शुक्रिया। दिलवर मिया क्या मैं यह जानने की गुस्ताखी कर सकता हू कि आपका इस्मे शरीफ क्या है ? रुस्तम जी मुझे रुस्तम उफ मल्लू उस्ताद कहते है । दिलबर माशाअल्लाह तो रुस्तम उफ मल्लू उस्ताद, आप क्या करते हैं मिया? रुस्तम जी, पहलवानी। दिलबर पहलवानी । खर वह तो ठीक है खा, लेकिन मैं पूछरिया हूं कि आप काम क्या करते है । रस्तम जी कुछ नही। दिरावर कुछ नहीं, तो खा खाते क्या हो खा भाई मिया? रुस्तम जी सुबह सिर्फ पाव भर वदाम के हल्वे का नाश्ता, दोपहर में सिर्फ दस-पद्रह रोटी और कोरमा और शाम को सिर्फ- दिलबर वम खा भाई मिया वस समझ गिया या अव समझ गिया, मैं तो आपके सिर्फ से ही समझ गिया 40 शम आती है मगर खा कि आप क्या हैं। रुस्तम अरे आपने मुझे अभी समझा नही क्या? पिछले दिनो जनाब जब वगम गज मे दगल हुआ था तो मैंने कसम जुम्मन उस्ताद की, अकेले चार पहलवानो को हराया था और एक के तो वह पिछाडी दाव मारा था कि उसकी पिछाडी ही जाती रही थी। दिलबर तो मिया फिर वह पिछाडी कहा चली गई, उस पहलवान के पास लौटी या नहीं कमबख्त । रुस्तम (झेंप कर) अरे आप तो मजाक कर रिए है मेरा मतलव था कि दिलबर बस समझगिए खा समझ गिया-अच्छा यह बताओ कि आपके अब्बा मिया क्या करते है। रुस्तम जी वह हुडिया को जोडते हैं। दिलबर क्या मतलव खा अरे जरा साफ-साफ बताओ खा- रुस्तम जी अगर जिस्म की कोई हडडी अपनी जगह से खिसक जाए तो उसको ठीक विठा देते हैं। दिलबर और अगर खा जिस्म की काई हड्डी टूट जासे तो दूसरी फिट कर देते हो। रुस्तम (झेंप कर) जी आप तो मजाक कर रिए है। दिनवर अच्छा मिया आपके अब्बा मिया के कितने बच्चे है यानि आपके भाई बहन रुस्तम जी सिर्फ 6 बहनें और भाई 71 दिलबर (धीरे से) यानि सिफ 13 बच्चे-माशा अल्लाह मिया अल्ला और तरक्की दे। (हसते हुए) अच्छा तो मिया रुस्तम कि-जर हा जी हा भला उस्ताद आपका शादी के बारे मे क्या इरादा है। रुस्तम (शरमा कर) जी कर लूगा। ? शम आती है मगर 4 दिलवर (अपने आप से) लो तो उधर ही बैठे है साहब जादे । अच्छा यह वताइए क्या आप शायरो भी करते है। रुस्तम जी मैं आपदा मतलब नहीं समझ रिया-बडे मिया। दिलबर (गुस्से मे) क्या कहा मिया वडे मिया, अरे क्या मैं तुझे बूढा नजर आरिया हू। बता-बता चुप क्यो हो गिया। रुस्तम (गुस्से मे) आप बूढे है तो मैंने बडे मिया कहा इसमे आप इतने नाराज क्यो होरिए है। समझ क्या रिए हैं आप। दिलबर (डर कर) समझ रिया हू खा समझ रिया हू (अपने मे) अरे मैं तो भूल ही गिया कि आप पहलवान हैं। रुस्तम जी अब मैं जाऊ । सलामापैकुम । दिलबर जी हा तशरीफ ले जाओ खा -वालेकुम सलाम- ओह बचे खार वचे । अगर थोडा यगडा और बढ़ जाता तो कमवरत मुझे भी उसके बाप के पास हड्डी जुडवाने जाना पड़ता। वेगम (आते हुए) अये हये क्या हुआ वह लड़या आया था क्सा था मिया, कुछ ठोम था अपनी नसरमन के लिए कसा रहेगा। (गुस्से मे) अये हये मेरा मुह क्यो ता जारिए हो कुछ बोलागे भी या। दिलवर (चौंक बर) ऐं वह पहलवान हा-हा ठीक रहेगा बिल्कुल ठीक रहेगा और तुम्हारी लडकी के लिए तोपिस्तुल ही ठीक रहेगा वह पहलवान । देगम (पश हार)) हाय-हाय क्या वह पहलवानी पिता है तो तो टीर है चलो मुई शायरी तो नहीं 42 शम आती है मगर
करता कमवरूत।
अन्छनमिया (दरवाजा खटखटाने की आवाज) जनाब मिर्जा
साहब तारीफ रखते हैं क्या।
वेगम लो मुया शायद वह दूसरा होने वाला दामाद आ
गिया । (जाते हुए) मैं चलती ह तुम उसे सभालो
और देखो ठीक से बात करना उससे वरना ।
अच्छनमिया (जोर से) अरे मैं कह रिया है कि जनाब मिर्जा
तशरीफ रखते है क्या?
दिलवर (जोर से) अरे रख रिये हैं खा रख रिये हैं।
(दरवाजा खुलने की आवाज) लो खा हाजिर हो
गिया फरमाईये आपको क्या हो गिया ।
अच्छमिया हाय हाय हाय हाय, मिसरा हो गिया खा मिसरा
हो गिया हा तो आप पूछ रिये हैं। मुझे क्या हो
गिया। अरे जनाब ये पूछिए क्या कुछ न हो गिया।
दिल ही जान रिया है खूविया उसकी
मुद्दत्तो से वह इस दिल मे रह रिया है।
दिलबर वाह वाह मिया मब्वान अल्लाह अदर आइये ।
जी हा यहा तशरीफ खिये तो जनाब का नाम
पूछने की गुस्ताखी को सताया
अच्छनमिया पहले आप कह रिम य क्या होगियों और अब
आप मेहाला पूरिय है। खर कोई बात नहीं ।
आप भी क्या याद रखगे। लोनि सुनिने वता
रिया हू । सो पावसार को जामियाँ जरमी
कहते हैं । और (शरमा कर) अन्धा मिया प्यार से
अच्छू कहते है।
दिलबर चलिये ठीक ही कहते हैं। खात्रिच्छू तो नही
कहते। खैर।
।
पानी
अच्छनमिया अरे जनाव विच्छू तो मेरे शेर होते हैं शेर । अर्ज कर रिया न कभी अश्क वहारिये हैं, न शिकायत कर रिये हैं, यह तो अपनी ही खता है कि मोहब्बत कर रिये हैं। दिलवर वाह वाह क्या खूब आप तो काफी धार पर मालूम पड रिये है खा- अच्छनमिया क्या कह रिये हो मिया? दिलबर मेरा मतलब है मिया कि आप आजकल अच्छी शायरी कर रिये हैं माशा अल्लाह । अच्छनमिया अरे जनाव बडे-बडे शायर मेरी शायरी का लोहा मान चुके हैं (धीरे से) किसी से कहियेगा नहीं। आजकल कोई शायर नही टिकरिया अपने सामने। दिलबर ऐ लो मैं कह रिया हू या लपेट लो खा लपेट' लो आपने कभी दिलवर भोपाली को नहीं सुना है खा वरना ऐसा न कहते। अच्छनमिया (बनतू हुए) हा सुना है। बस खला मे छोटा मोटा तीर छोड लेते हैं। दिलबर (गुस्से मे) क्या कहा जरा फिर तो कहिए खा। अच्छन मिया भई ठीक ही कह रिया हू खा-खैर एक शेर अर्ज कर रिया हू-सुनिए- दिलवर (चिल्ला कर गुस्से मे) मैं नही सुनरिया आप समझ क्या रिये हैं अपने आपको-आपने अभी मुझे सुना ही नहीं मतना है मैं कह रिया हू कि । अच्छनमिया लेकिन आप नाराज क्यो होरिए हैं। दिलबर हू नाराज क्यो होरिये हैं अरे खा मुझे ही मिर्जा दिलवर भोपाली कहते हैं सुना आपने मैं पूछ रिया कि आपने कितने दिन से शायरी शुरू की है- शम आती है मगर
मिया वेटे, मेरी उमर वीत गई है-शायरी करते
करते।
अच्छनमिया लेकिन मेरी सुनिए तो बडे मिया ।
दिलबर क्या कहा बडे मिया-मैं कह रिया हू तशरीफ ले
जाइए उठिए दफा होजाइए, अरे मै कहरिया हू
खा जारियो हो या-
अच्छनमिया (डर कर) जारिया हू। (जाते हुए) हाय हाय जिंदगी
क्या कहरिए हो खा तुम भी। जख्म पै जख्म दिये
जारियो हो।
बेगम (आते हुए) गुस्से मे) अये अये क्या हो गिया क्यो
डकराये जारियो हो।
दिलवर (गुस्सा) हू बेहूदा कही का अपने आगे किसी को
शायरी ही नही समझ रिया अच्छा हुआ चला
गया।
बेगम आ हय तो वह भी शायर था कमबख्त । अच्छा
हुआ चला गया।
शम आती है मगर
45
, होली का हुडदग फिल्मवालो के सग [बाजार का दृश्य, गहमागहमी, आने-जाने वालो की भीड । स्वर उभरता है।] स्वर फिल्मी दुनिया में मचा होली का हुडदग पचरगी पिचकारिया तरह-तरह के रग असरानो ने राटकली साठ कटोरे भग लगा चीखने भीड मे सुदर के सग। असरानी माताओ और पिताओ भाईयो और अभियो बहनो और वहनो जीजाओ और सालियो घर वालो और वालियो सुदर 'वीच मे ही' ये कुछ अधिक बोल रहा है, रग मे भग घोल रहा है। मैं बताता है ये क्या कहना चाहता है। असरानी तुम चुप रहो सुदर भाई मैं इनसे क्या रहूगा अगर कह सक्ता तो अपनी पत्नी को ही कुछ न कहता। बेकार ही तूने ये बात बोलो। सुदर माफ वरना दोस्तो तक्रार कुछ लम्बी हो गई दर- असल हम दोना ने मिलकर एक दुकान खोली है। असरानी इसमे आप फिल्म हीरो और हीरोइनो छाप रग गुलात और पिचकारिया पायेंगे। 46 गर्म आती है मगर सुदर हमारी दुकान से माल खरीदकर होली खेले तो आप भी फिल्मी हीरो हीरोइन बन जायेंगे। असरानी और फिर जल्दी ही जनता के प्यारे हो जाते हैं सुदर अब बद करो यार ये राम कहानी जल्दी से सामान वेचो तुम्हे नही कम-से-कम मुझे तो अपने घर जाना 7 असरानी चल यार तू कहता है तो ऐसा ही सही हा तो मेहर- बानो केंद्र दानो मैं आपको सामान दिखाऊ। यहा लेडीज फर्स्ट नही है आदमियो की वारी पहले। सुदर अरे यार ये क्या बदतमीजी है। असरानी क्यो क्या बात है सुदर भाई मेरे हर काम मे लेडीज फर्स्ट है यहा पीछे क्यू असरानी अरे यार कभी तो वेचारे मर्दो को आगे आने दो। सुदर में नहीं मान सकता मैं बेचता हू सामान पहले देखिए साहिवाओ ये पिचकारिया आप देख रहे हैं तरह-तरह की अलग-अलग रगो की विभिन्न साइजो और डिजाइनो की इन सबके नाम फिल्मी हीरोइनो पर रखे गए हैं। ये देखिए पद्मिनी कोल्हापुरे छाप पिचकारी इसके रगो के क्या कहने जिस पर भी पड़ जाए रग जमाती है कुआरो के व्याह कराती है फ्रिम चार्ल्स पर इसी पिचकारी की बौछार हुई थी, ब्याह हो गया। कसे भी हो इस पिचकारी का रग डालिए एमिट मे रोग रफूचक्कर, चाहे वो प्रेम रोग ही क्यो न हो ? असरानी और इस पिचकारी का इस्तेमाल जरा देय गाल पर करिए ये रेखा छापा है। इसमें सभी रग को है। इसका रग जितेद्र शत्रुघ्न सिन्हा, यिशोद मेहरा, शर्म भाती है मगर सजय दत्त सभी पर पड़ा मगर टिका एक पर भी नहीं यूथ बौछार करिए और फिर वसी यो वैसी। सुदर आपके प्रिय हीरो अमिताभ को ये ही पिचकारी बहुत पसद है। इसे वे सिलसिला में जया पर भी आजमा चुके । ले जाइए फोरन ले जाइए। अमरानी अरे रे ये पिचकारी आप मत छोडिए ये रति अग्नि- होत्री छाप पिचकारी है। इसका रग अदालतो मे चलता है । कोर्ट के सब बाबू इसी रग से होली खेलते हैं इसका रग जिस पर भी गिर जाता है वो इसाफ जरूर पाता है। मिथुन ने इसी पिचकारी से एक फिल्म मे होली खेली थी। सुदर और माथियो क्रिकेट के खिलाडियो मे एक पिचकारी वहुत प्रसिद्ध है ये रीनाराय छाप पिचकारी है इसका रग अभी अभी पाकिस्तान के खिलाडी मोहसीन खान पर चढ चुका है वैसे इस पिचकारी को हमारे यहा के भी कई हीरो बहुत पसन्द करते थे। अमरानी मेरा ख्याल है हमारे पुरुप ग्राहको के चेहरे काफी लटक गए है अब इसकी बात करें जो लोग बूढे हो गए बैठे-बैठे बस मुह पर गुलाल मलने के काम के रह गए हैं। उनके लिए हमारे पास राजकपूर, अशोक कुमार ओ पी नयर छाप गुलाल है वस एक चुटकी भरिए चेहरे पर तगाइए और होली मनाइए। सुदर तुम तो बूढे से हो बात शुरू करते हो। नौजवान साथियो आपको उदास होने की जरूरत नही है आपके लिए भी हमारे पास रगो और तरह तरह की पिच- कारियो का ढेर है। 48 शम आती है मगर
जो लोग अभी जवान हुए हैं उनके लिए सनी देव
कुमार, गौरव कुणाल, सजय दत्त और मोनीश बहल
छाप रगो के गुब्बारे हैं ये जहा फटगे वहा हगामा
करेगे ही मजबूत रग छोडेंगे।
असरानी जितेन्द्र छाप रग आम आदमी के लिए बहुत ठीक है
इस रग का इस्तेमाल करिए और इस बढ़ते बुढापे में
भी कुवारियो के साथ इश्क का नाटक करिए ये रग
बहुत चढता है। हेमामालिनी पर भी चढ गया था
मगर धर्मेन्द्र छाप रग के सामने टिक न सका।
सुदर नौजवानो का रग अमिताभ छाप मार धाड करने
वालो के लिए बिल्कुल फिट ।
देश की भगनें और हीजडे होली पर ये ही रग काम
मे लेते हैं । अब तो ये रग गृहस्थियो के लिए भी ठीक
है । असरानी ये ही रग काम मे लेता है।
असरानी (नोध मे) क्या कहा तुमने मैं ये रग क्यो काम मे लूगा
क्या मेरा अपना रग नही है । समझ क्या रखा है ।
सुदर अरे यार बिगडता क्यो है मैं तो।
असरानी 'बीच में नही तूने ये कैसे कहा मे तेरे दात निकाल
दूगा।
[सगीत का शोर]
मजु 'जागते हुए' अरे ये क्या बात है किसके दातो को
शहीद किया जा रहा है। सुबह सुबह लगता है सपना
देख रहे हो।
असरानी क्या सपना था । क्या मैं बाजार मे नही हू ।
मजु जी नहीं आप बिस्तर मे हैं।
असरानी ओ हो लगता है रात कुछ ज्यादा भाग पी ली दोनो
हसते हैं।
शर्म आती है मगर
49
"एक मै और एक तू"
[कर्कश स्वर मे गाना उभरता है -का करू सजनी आये ना
वालम गीत का स्वर बढता ही जाता है-राजेश आता है
दरवाजा खटखटाता है-]
राजेश सुपमा-सुषमा,-दरवाजा खोलो, अरे भाई क्या हो गया
तुम्हे ? (दरवाजा पीटता है) अरे कम-से कम अदर नही
तो वाहर से तो मेरी आवाज सुन लिया करो भाज
मोर्चा किधर लगा दिया है। सुपमा अरे सुपमा
(खीसता है) अरे क्या बहरी हो गई हो। मगर ऐसा
भाग्य कहा है मेरा अरे योलो दरवाजा-
सुपमा (पास माता स्वर) अरे आ तो रही हू आसमान सर पर
क्यू उठा रखा है। क्या दरवाजा तोडने का ही इरादा
है।
राजेश (ोध मे) दरवाजा तो नही, हा अपना खुद का सर
तोडने का जरूर इरादा है--मैं पूछता हू कि तुम क्या
कर रही थी, क्या घोडे गधे बेचकर सो रही थी। तुम्हें
इतना भी ध्यान नहीं रहता कि वाहर कोई गला फाड
रहा है।
सुपमा हाय मुझे तो सुनाई ही नहीं दिया।
50 शम आती है मगर
राजेश क्यो क्यो नही सुनाई दिया ऐसा कौन-सा जरूरी काम
कर रही थी।
सुपमा (शरमाते हुए) गुम्सा मत करो जी, मैं तो गाना गा रही
थी।
राजेश (और भी क्रोध मे नकल करते हुए) अहा ह ह ह गाना
गा रही थी तो यू कहो ना कि खुद भी अन्दर अपना गला
फाड रही थी।
सुपमा देखो जो, मेरे गाने के बारे मे ऐसी बात मत करना-मै
तासगीत साधना का अभ्यास कर रही थी--
राजेश अरे रहने भी दो, सुषमा, कसम से अभ्यास तुम करती
हा और प्यास-मुझे लगती है।
सुपमा तुम्ह क्या पता-मैं तो अभी आलाप कर रही थी।
राजेश आहा हहह-आलाप कर रही थी और मत किया करो।
सुपमा क्यो।
राजेश अरे तुम्हारा ये आलाप सुनकर तो मुझे सुपमा विलाप
आता है।
सुपमा तुम तो यू ही करते हो। मैं क्या इतना बुरा गाती हू-
(इतराते हुए) लोग तो मुझे सुरो की रानी कहते हैं।
राजेश सुरो की रानी ? लोग तो मुख हैं-मुझे तो तुम असुरो
की महारानी नजर आती हो।
सुषमा (उदामी से) तो-तो क्या मैं इतना बुरा गाती हू ?
राजेश नहीं-नहीं-तुम तो बहुत ही अच्छा गाती हो क्या कहने
है तुम्हारे मधुर गले के मेरी बात छोडो-जरा वेचारे
मोहल्ले वालो से तो पूछकर देखो ?
सुपमा (क्रोध मे) मोहल्ले वाले जाए भाड मैं तुम जाओ चल्हे
मे।
राजेश मैं तो बरसो से उसी मे झुलस रहा हू
शम आती है मगर
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7
कम है।
सुपमा रहने को कैसे देते है, क्या फोक्ट मे रहने देते हैं किराया
नहीं लेते क्या
राजेश अरे किराए से क्या होता है ये ही क्या कम बात है कि
तुम्हारे जैसी कर्कश गले वाली औरत जो मेरी पत्नी है
उसका गाना सुनकर भी मकान खाली करने को नहीं
कहते।
सुषमा (रुआसे स्वर मे) हा-हा-ऐसी ही बात है। मेरे परम
तो उसी दिन फूट गए थे। जव ब्याह कर इस घर में आई
थी।
राजेश अरे तो मेरी कौन-सी दो करोड की लाटरी खुल गई?
मैं तो खुद उसी दिन से अपने पापो की सजा काट रहा
सुपमा अरे जाओ भी भूल गए थे दिन?
राजेश कोन से दिन?
सुपमा वो ही दिन जब तुम्हारे पिताजी शादी के लिए मेरे
पिताजी के पास चौखट पर अपनी नाक रगडने आए थे।
राजेश अरे रहने दो सुपमा हम इतने गए पीते नहीं हैं ऐसी बात
नहीं है।
सुपमा तो कैसी बात है?
राजेश तुम्हे मालूम नही है
सुपमा क्या मालूम नही है।
राजेश शादी की हकीकत।
सुपमा क्या हकीकत है बताओ.
राजेश अरे तुम्हारे पिताजी पुद अपनी चौखट लाए थे। मेरे
पिताजी की नाक रगडवाने के लिए।
सुपमा राजेश, तुम्हे तो शुक्र गुजार होना चाहिए ।
शम आती है मगर
53
सुपमा वकवास छोडो-तुम तो ये बताओ कि जब मैं गाना
शुरु करता हूँ तो तुम घर के बाहर क्यो चले जाते हो।
राजेश तो क्या अन्दर रहकर घुट कर मर जाऊ ।
सुपमा क्यो, क्या ऐसा दम घुटता है मेरे गले से दो घडी वठ
नहीं सकते।
राजेश नही बैठ सकता सुपमा बाहर जाना ही पड़ता है।
सुपमा क्यो-आखिर क्यो चले जाते हो बाहर ।
राजेश सच बता दू सुपमा।
सुपमा कभी आज तक तो वताया नहीं।
राजेश मगर आज सच कह दूगा।
सुपमा अरे तो कहोगे भी या यू ही बात को खाल की तरह
खीचोगे।
राजेश सुपमा, भगवान की कसम आज मैं सच कह ही दूगा।
सुपमा ओफो अव वको भी।
राजेश सुपमा दर असत बात ये है कि जब तुम गाना शुरू
करती हो तो मैं घर के बाहर जा के इसलिए खडा हो
जाता है।
सुपमा किसलिए?
राजेश इसलिए बाहर जाकर खडा हो जाता है ताकि पडौसी
ये न समझें कि मैं तुम्हे पीट रहा हू-
सुपमा तो-तो-क्या मैं इतना बुरा गाती है।
राजेश अरे नही सुपमा, तुम तो वेहद अच्छा गाती हो, मधुर
स्वर लहर बहाती हो ? अरे मैं कहता है ये तो शरीफ हैं
बेचारे हमारे पडौसी।
सुपमा (क्रोव मे) क्यो, इसमे शराफत को कौन-सी बात है ?
वयो पडौसी हमे खाने को देते हैं ?
राजेश खाने को तो नही देते मगर रहने को देते हैं ये ही क्या
52 शर्म याती है मगर
?
कम है।
सुपमा रहने को कैसे देते हैं, क्या फोकट मे रहने देते हैं किराया
नही लेते क्या
राजेश अरे किराए से क्या होता है ये ही क्या कम बात है कि
तुम्हारे जैसी कर्कश गले वाली औरत जो मेरी पत्नी है
उसका गाना सुनकर भी मकान खाली करने को नही
कहते।
सुपमा (रुआसे स्वर मे) हा-हा-ऐसी ही बात है। मेरे करम
तो उसी दिन फूट गए थे। जब ब्याह कर इस घर मे आई
थी।
राजेश अरे तो मेरी कौन-सी दो करोड की लाटरी खुल गई
मैं तो खुद उसी दिन से अपने पापो की सजा काट रहा
?
सुपमा अरे जाओ भी भूल गए थे दिन ?
राजेश कौन से दिन?
सुपमा वो ही दिन जब तुम्हारे पिताजी शादी के लिए मेरे
पिताजी के पास चौखट पर अपनी नाक रगडने आए थे।
राजेश अरे रहने दो सुपमा हम इतने गए बीते नहीं है-ऐसी बात
नहीं है।
सुपमा तो कसी वात है ?
राजेश तुम्हे मालूम नही है
सुपमा क्या मालूम नही है।
राजेश शादी की हकीकत ।
सुपमा क्या हकीकत है बताओ।
राजेश अरे तुम्हारे पिताजी खुद अपनी चौखट लाए थे। मेरे
पिताजी की नाक रगडवाने के लिए।
सुपमा राजेश, तुम्हे तो शुक्र गुजार होना चाहिए ।
शम आती है मगर
53
राजेश जिस बात के लिए?
सुपमा कि इतपी, सुन्दर, सुशीत, आदर्श ग्रहिणी मिली है ।
राजेश वाईदीवे में विशेषण किसके लिए इस्तेमाल किए तुमने।
सुपमा ये बातें, अपने बारे मे जरा मोचो अगर मैं किमो और
की पत्नी होती तो।
राजेश अरे काश ऐसा होता सुपमा-काश--
लेकिन तुम्हे तो मैं ही भुगत रहा हूँ मैं इतना स्वार्थी
नहीं कि किसी और का बुरा चाहू।
सुपमा तुम अपने आपको आखिर समझते क्या हो? कभी खुद
पर भी नजर डाली है। तुम कौन से दूध के धुले हुए हो ।
राजेश अरे तो तुम कौन-सी दानेदार चोनी-सी धुलो हुई हो।
एक भी खरावी हो मुझमे तो बताओ। तुम तो हमेशा
बुद्ध ओ और बेवकूफो की-सी बात करती हो।
सुपमा तो और कैसी बातें करू । तुम्हे समझाने के लिए तो ऐसो
ही वाते रूगी।
राजेश चलो मान लिया कि तुम मुये वेवकूफ समझती हो, हर
पत्नी समझती है अपने पति को। लेकिन अभी इस बात
का फैसला कर लेते है मान लो भगवान तुम्हे जबलमदी
और खूबसूरती में से एक चीज देना चाहे तो तुम क्या
लेना पसद करोगी--
सुपमा (सोचते हुए)--मैं तो अबलमदी पसद क्रूगी।
राजेश बम हो गया फैसला।
सुपमा कसे।
राजेश अरे भाई जिसके पास जो चीज नही होती वो ही तो
लेना चाहेगा।
सुपमा (रोगर चीप कर) अच्छा ये बात है ? तुम तो सदा
ऐसी ही वक्वास करते हो। तुमने मेरी बात आज तर
54
माम आती है मगर
कभी मानी है। क्या तुम्हारे और मेरे विचार कभी
आपस मे मिते है क्या?
राजेश हा हा अवश्य मिले है।
सुपमा क्व मिले हैं?
राजेश तुम्हारी याद पर तो पत्थर पड गए हैं तुम्हे तो कुछ भी
याद नहीं रहता। तुम मुझे भी कुछ दिनों के लिए भूल
जाओ ना।
सुपमा वात को बदलो मत तुम तो ये वताओ तुम्हारे और मेरे
विचार आपस मे कर मिले।
राजेश बताता हू, तुम अपने भेजे पर जमी मिट्टी की परतो को
कुरेदो-तुम्हे याद है हमारे घर में एक बार आग लगी
थी।
सुपमा हा लगी थी। उससे क्या लेना-देना अव ।
राजेश तुम्हें याद आ गया ना कि हमारे घर मे आग लगी थी।
सुपमा अरे तो फिर क्या हुआ था?
राजेश तो उस वक्त क्या हम ए ही दरवाजे से भाग कर
वाहर नहीं गए थे।
सुपमा तो क्या इसे तुम विचारो का मिलना कहते हो।
राजेश नहीं-नही ये तो दिलो का मधुर मिलन है । (घबरा कर)
अरे-ये धुआ कैसा उठ रहा है-क्या हो गया ये ।
सुपमा हाय राम मैं तो स्टोव पर दाल चढा कर सगीत साधना
करने बैठ गई थी।
राजेश लगता है--आग लग गई है-धुआ तेज होता जा रहा
सुषमा हाये अब क्या करें-जल्दी फायर बिग्रेड को बुलाओ।
हाये सब खाक हो जाएगा।
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शम आती है मगर
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राजेश अरे रोओ मत सुपमा रानी हो तो गाने से भी बुरी
लगती हो। आज तो हमारे लिए सौभाग्यशाली दिन है।
सुपमा कैसे।
राजेश आज हमारे विचार फिर मिल गए-आओ हम एक ही
दरवाजे से फिर भाग चलते है--
56 शम माती है मगर
फिल्म चमचारराम का रेडियो प्रोग्राम
उदघोपणा (बहुत ही रोमानी अदाज मे) ये पाताल वाणी का
गडवड केद्र है। अब आप सुनेंगे फिल्म चमचाराम
का म्पोन्सर्ड प्रोग्राम (सगोत का उभरना और
फिर बहुत ही भारी आवाज एक शेर का
गूजना-
उस बॉस की कुर्सी को कोई नही सकता
जिस बॉस को कुर्सी का निगहबान है चमचा
शेर धीरे-धीरे फेड आउट होना है । अमीन सयानी
माइक पर आ जाते हैं।)
अमीन बहनो और भाइयो। फिल्मी दुनिया के इतिहास मे
एक और तहलका एक और म्युजीकल धमाका।
चमचा रामचमचाराम
[तवस्सुम का स्वर उभरता है।
तबस्सुम चमचाराम कहानी है हमारे आज के समाज को
मुसीवतजदा बेरोजगारो की-डूलायमान कुर्मी में
अफसरो की और कुछ बेबस बेसहारा चमचा और
चमचियो को।
(तबस्सुम की आवाज कम होनी है, और
शम माती है मगर
वोरकुमार की आवाज मे टाइटल सोग शुरू होता गीत मै हू चमचा राम मैं हू चमचाराम जिसको मैं न कर सकू कौन-सा है काम । मैं हू चमचाराम मेरे दम से अफसरो की कुर्सिया जमे। कौन है जो जानता नही यहा हमे । अच्छे-अच्छे करते हैं मुझे सलाम । हू चमचाराम [गाने को सुपर इम्पोज करती हुई तबस्सुम की आवाज उभरती है] तबस्सुम चमचाराम का अफसाना भीड भरी सडको से शुरू होकर राजमहलो के अदर तक जाता है । कुटिया से लेकर चकाचौध कर देने वाले बगलो तक इसकी पूव हलचल है। अमीन चमचाराम की कहानी लिखी है ऊटपटाग छोलापुरी ने, सवाद धोखेश्वर के हैं और सगीत की दुनिया मे नया हगामा पेश करने वाले हैं सगीत- कार गोरेलात धोरेलाल | [गाना शुरू होता है। हीरोइन आजारे आजारे मेरे चमचेराजा अव तो काम बना जा रे । ओ ओ होरो आजारे आजारे मेरी चमची रानी बॉस को मुर्ख चना जा रे ओ ओ चमची । चमचे । 58 माम अती है मगर
अमीन चमचाराम के दिलकश गीतो को सुनकर आप
झूम उठेंगे। इसकी तोडदार मोडदार कहानी पर
आप बरसो सोचते रहेगे। इसके लच्छेदार गुच्छे-
दार सवाद आप महीनो गुदगुदाते रहेगे। इसके
उभरते हुए गीतकार गुलकन्द खन्ती और प्रोड्यूसर
हैं पौपट चन्द चौपट चन्द ।
तबस्सुम इस मतरगी फिल्म के चमकते सितारे हैं मियां
फलाप अच्छन, छछुन्दर पौसा मागीनी ठगेश्वरी
डुवाना लाजमी और एक खास भूमिका मे आ रहे
हैं विलेन थप्पडतान ।
अमीन चमचाराम गरीबो की गुदडी है।
तवस्सुम अधो की आखें और लगडा की लकडी है।
अमीन वेरोजगारी का रोजगार है।
[गीत उभरता है]
गीत ओ चमचाराम मेरा काम तुम करा देना।
मिले कही भी कोई काम तो दिला देशा
में एम० ए० पास हू तुम ये भी मानते ही हो
मुझे स्वीकार है तुम प्योन ही बना देना।
अमीन और फिर कहानी में अचानक जवगत गोट मा
जाता है। मुकाबले के हालात पैदा हो जाने ।
चमचो की भयानक टकार शुरू हो जाती है। गा
भयानक मजर देवार भाप ददल जायंग। 14
नए स्टाइल की मिटन्त नए ढगमा बनाया ग
होता है।
तबस्सुम फिर क्या होता है, पौरमा गमगा ।
अजाम जानने के लिए देगि प्राणा
मा पानी
।
पोपट चन्द, चौपट चन्द का न भूलने वाला कार- नामा चमचाराम। अमीन फिल्म चमचाराम अपनी तरह की बस एक ही फिल्म है जो आपके तन-मन को गुदगुदा देगी, दिमाग की नसें हिला देगी, जिसे माप बार बार देखना चाहेगे, जिसके गीत आप हजार वार गुन- गुनाएगे। सुरीली आवाज देने वाले कलाकार हैं भनोद निराशा, धोखेश आडेकर और उभरते हुए हीरो गायक मिया अच्छन फलाप अच्छन । [गीत उभरता है।] कुछ काम बनाना है तो वम चमचो से मिल लो अफसर को पटाना है तो बस चमचो से मिल लो कुछ काम कराया न करो मुफ्त की खाओ कुर्सी का जमाना है तो बस चमचो से मिल लो अमीन चमचाराम का सुरीला सगीत सुनकर आप नाचेंगे, मैं एक बेहतरीन शाहकार है। तबम्सुम चमचा राम बहुत बडा फनकार है इस जमाने का। अमीन चमचाराम फिल्म इस जमाने की सही तस्वीर पेश करती है। जल्दी ही हर गाव, शहर और कम्बे मे धूम मचाने आ रहा है चमचाराम तबस्सुम चूकिये मत आज ही अपनी एडवास बुकिंग करा लीजिए। अपने दोस्तो और परिवार के सदस्यो के साथ देखिए । आपसे मुलाकात के लिए आ रहा है चमचाराम। अमीन चमचा राम वो ही जो अफसर मन भाये के बाद एक और हगामी पेशक्श चमचाराम चमचारामा 60 पाम आती है मगर
(टाइटल सोग उभरता है।]]
मैं हू चमचाराम मैं हूँ चमचाराम
[गाना फेड आउट हो जाता है।
उदघोषणा अभी आप सुन रहे थे चमचाराम का रेडियो
प्रोग्राम
शम माती है मगर
61
मिया-वीवी और वो
नि पुराना घिसापिटा और दकियानूसी मुहावरा इस्ते-
भासनिताता है बेगारे काजी के लिए। वैसे वो खुद इस
महार से भी पुराने घिसेपिटे और दकियानूसी लगते है । आपने
भी सुगा होगा-
- फरेगा काजी?
के इस आधुनिक
लमा में मिल पोगो ने कोर्ट में शादी की है उनका तो इस नाम
की भीग सेवारता ही नहीं पड़ता। अब हमे ये तो मालूम नही
निकोलोग भी युश है या नहीं। कहा तो ये जाता है, 'मिया
भीवी राणी सो गया करेगा काजी', लेकिन मैं ये मानने को
मियुरारोगार रही हूं। मुझे इस मुहावरे मे ही बुनियादी
पातिगो दियाई देती है। देया जाए तो इसका वो पहला हिस्सा
तो विश्वास के सायक ही नहीं है। आप ही बताइए वो मिया
पीनी गगाणो राजी हो । जब तक तूम-लडावा और धम-धडाका
महो जिन्दगी कितनी बेमजा होती है। पता ही ,
कर दे। वन संरक्षण की तरह उनकी गई लौ का भी सरण किया
जाए। मरने में पाप भी उनकी बात मातमा नगा
के प्रमुख चौराहो पर रखना देगो महिए ताकि शादी के पति
और लोगो को विचारो मे भी परिवर्तन भी गर्न । सना होगता
बढे। ये जो शादी के नाम पर नहीं हो जाता है ये काम
दफा है । माफ पारना जरा मैं नि में जगह गया था, फिर
से पटरी पर भाताह । बाल मियाँ बीवी के आमपास धूम रही
थी। काजी तक परतो ग सो मापी गमय तगंगा । joinा हुन
मियां चीयी ये राजी होने पर थी, और गाजतना है हाँगी रहेगी।
भला शेती के साथ भी करे.धी जिन्दगी शासग मना
सकती है ? मगर लिए हमग मुहावी की गावी पकड़ कर
कुछ और तम्या के लिए भागे बदन हैं । अन्न माप ही सानिए,
अगर मिया-बीयी राजी भी हैं तो गर्भ धार-भान में गूगमनंद
भी तरह याजी क्यो टपः । य उनी भाग में भी गुस्ताखी है ।
लेकिाम तो जरा मोर गहराई गगापार में देखना नाह रहा
हूनि अगर राजी मियां-बीयी का बी मानी जी जाएगो उर्गमी
क्या हाहाहा। मेरे रयाल में उगे देखणे ही बोगी की साबित
जानी चाहिए, इस बात पर उगमे ही हैं पियामीनी नगी
का गौरव दिया है। ये बान बलग है कि आप लिपि मात्रा में
भी इसमे महत्वपूर्ण रोल अदा नियाममान के सामने तो
ये काम काजी ही बजाम दिया है और रिया की बाई
न खिर को आप काजी जी पर गुजरीयाली तीन IER
अनुभव लगा सकते हैं। अगर कोई गी हाए तो काली जी
का घर म चुमना तो दूर उनी मरत दूर देखना मदाग
,
-
1
मिया-वीवी और वो कितना पुराना घिसापिटा और दकियानूसी मुहावरा इस्ते- माल किया जाता है वेचारे काजी के लिए। वैसे वो खुद इस मुहावरे से भी पुराने घिसेपिटे और दकियानूसी लगते है । आपने भी सुना होगा-क्या करेगा काजी ? आज के इस आधुनिक जमाने में जिन लोगो ने कोर्ट मे शादी की है उनका तो इस नाम की चीज से वास्ता ही नही पडता। अब हमे येतो मालूम नही कि वो लोग भी खुश हैं या नहीं। कहा तो ये जाता है, 'मिया बीवी राजी तो क्या करेगा काजी', लेकिन मैं ये मानने को बिल्कुल तैयार नही है। मुझे इस मुहावरे में ही बुनियादी गलतिया दिखाई देती हैं। देखा जाए तो इसका वो पहला हिस्सा तो विश्वास के लायक ही नहीं है। आप ही बताइए वो मिया वीवी क्या जो राजी हो। जब तक तुम-लडाका और धूम-धडाका न हो जिन्दगी क्तिनो वेमजा होती है। पता ही नहीं लगता कि ये पति-पत्नी हैं। आपके बहुत दबाव डालने पर चलो एक प्रतिशत मान भी लें कि यही पर वाइफ और हसबैड राजी हैं तो ऐसे जोडे को तो में देखना चाहूंगा चाह कुछ भी खर्च हो जाए। वो तो एक दर्शनीय और ऐतिहासिक जोडा होगा। सरकार को चाहिए कि ऐसे जोडे को तो राष्ट्रीय सम्पत्ति घोपित 62 शम थाती है मगर कर दे। वन सरक्षण की तरह उनकी नस्लो का भी सरक्षण किया जाए। उनके मरने के बाद भी उनकी आदमकद प्रतिमाए नगरों के प्रमुख चौराहो पर रखवा देनी चा हए ताकि शादी के प्रति और लोगो के विचारो मे भी परिवर्तन आ सके । उनका हौसला वढे । ये जो शादी के नाम पर तूफान खडा हो जाता है ये रफा- दफा है । माफ करना जरा मैं विषय से अलग हट गया था, फिर से पटरी पर आता हू । वात मिया-बीवी के आमपास घूम रही थी। काजी तक पहुचने मे तो काफी समय लगेगा। मुझे तो हैरत मिया-बीवी के राजी होने पर थी, और आज तक है हमेशा रहेगी। भला शेरनी के साथ कभी बकरे की जिन्दगी आराम से क्ट सकती है ? मगर चलिए हम इस मुहावरे की वैसाखी पकड कर कुछ और तथ्यो के लिए आगे बढते हैं। अब जरा आप ही सोचिए, अगर मिया-बीवी राजी भी हैं तो इसमे दाल-भात मे मूसरचद की तरह काजी क्यो टपके । ये उनकी शान मे भी गुस्ताखी है। लेकिन मैं तो जरा और गहराई से सोचकर ये देखना चाह रहा है कि अगर राजो मिया-पीवी के बीच काजी जी जाए तो उनकी क्या हालत हो। मेरे ख्याल से उसे देखते ही दोनो की वा, खिल जानी चाहिए, इस बात पर कि उसने ही उहे मिया-बीवी बनने का गौरव दिया है। ये बात अलग है कि आपके लिखे प्रेम-पनो ने भी इसमे महत्त्वपूर्ण रोल अदा किया है। वैसे समाज के सामने तो ये काम वाजी ने ही अजाम दिया है और अगर दोनो की बाछे न खिलें तो आप काजी जी पर गुजरने वाली मुसीबत का स्वय अनुभव लगा सकते हैं। अगर वो वाकई राजी हुए तो काजी जी का घर मे घुसना तो दूर उनकी सूरत दूर तक से देखना गवारा अब इमी मुहावरे मे से एक और सवाई नम: हो जसे कभी-कभी महबूबा stati न करें। Ini अपने दिमाग पर जोर डालकर देखिए, अगर मिया-बीवी राजी है तो उस वक्त वास्तव में काजी क्या करेगा? मगर मैं ये पूछता, मिया बीवी राजी हैं तो भी काजी क्या कर लेगा ? कुछ कर सकेगा? मेरा भी रयाल है काजी को ऐसी जगह जाना ही नहीं चाहिए जहा मिया-बीवी राजी है क्योकि बहा जाने पर तो खतरा ही खतरा है और फिर समझदार को ऐसा इशारा काफी होता है । अगर काजी समझदार है तो ऐसे जोडे से तो भूलकर भी मुलाकात नही करेगा। मेरी नेक सलाह तो ये है कि अगर काजी साहब अपनी खुद की बीवी से भी राजी न हो तो भी किसी ऐसी जगह न जाए जहा मिया-बीवियो के बीच काजी जी दातो मे जीभ की तरह फम जाए और कही जान पर न वा जाए। अगर मिया-जीवी के झगडे के बीच काजी जी आ जाए तो वो लोग अपना झगडा वन्द करके पहले काजी जी पर ही टूट पडें, धयोकि आखिर इस सारे झगडे की जड तो वो ही है। दिल की वर्वादी का मजर नजर के सामने हो तो भला किस आदमी को गुस्सा नहीं आएगा और खास तौर से उसे तो बहुत ही आएगा जो बीवी के झगडो से तग आ गया हो । इसीलिए काजी जी वहा पर कुछ भी नहीं करते जहा मिया-वीवी राजी नहीं। कई बार काजी जी को दुवलेपन की बीमारी अवश्य हो जाती है। लेकिन ये तो उनका पर्सनल मामला है। लोग समझते हैं कि शहर के दुख से होता है जव कि उहै शहर का रत्ती-भर भी गम नही होता है। जव कि उहें वसे खोजबीन के बाद इस मुहावरे म सच्चाई का मुछ अश जरूर नजर आता है। लगता है किसी नौजवान दिल जले पति ने अपनी पत्नी मे तग आवर काजी साहा को परेशान किया होगा। अपनी दादो नुचवाना काफी तकलीफदेह काम है। आपको विश्वास न होता हो तो तुचवावर देखिए। लेकिन दाढी होगी ही नहीं तो क्या 64 शम आती है मगर
नुचवाएगे सिवाय खम्भे नोचने के। फिर कुछ नही किया जा
सकता। इतना तो हम कह सकते है कि इन मुहावगे से काजी
किस्म के जीव का सम्पूर्ण इतिहास उजागर हो जाता है। कभी-
कभी सोचता हू अगर काजी नहीं होता तो क्या दुनिया मे सव
कुवारे ही रह जाते? नही साहर नही। ये हादमा तो फिर भी
होता जिसे लोग शादी के नाम से पुकारते है। काजी तो मुफ्त मे
बदनाम है। मगर करे भी क्या अव का काजी ।
।
शम आती है मगर
65
होली पर टी०वी० . [स्कीन पर एक छवि बहुत ही मजबूर मुस्कान के साथ उभरती है। हमारे सभी दर्शको, प्रदर्शको, प्रशसको, विध्वसको को दूरदर्शन का दूर से-रग भरा, भग भरा, उमग भरा, प्यार भरा, खुमार भरा, मनुहार भरा नमस्कार। माज से हम अपने कार्य- क्रमो मे कुछ नए सडियल, क्षमा कीजिए नए सीरियल आरभ कर रहे हैं। उम्मीद है आप उहे भी इसी मधुर भावना के साथ सहेगे, जिस तरह आज तक के कार्यक्रमो को सहा है, और अपनी मीठी जुवान से कुछ नहीं कहा है। कहने से होगा भी क्या? हम आपकी मनोकामना कभी जानेंगे नही, और आप जो कहेगे उसे मानेंगे नही । प्रिय दशको, हमे मालूम है, आप हमारे किसी कार्यक्रम को मिस नहीं करते, हालाकि हमारा प्रेमी अपनी प्रेमिका को, मित्र अपने दोस्तो को, सहेलिया अपनी सखियो को, बीविया अपने पतियो को अवश्य मिस कर रही हैं। जब हम वोलते हैं, तो कोई किसी की नही सुनता । हमारे कारण बच्चे अपनी परीक्षाओ और अध्यापको का ही नही, अपने मा-बाप तक को भूल गये हैं। 66 सम आती है मगर तो, साथियो, इसी आशा और विश्वास के साथ कुछ नए प्रोग्राम हम होली के इस हुडदगे हगामी त्योहार से शुरू करते हैं जो आप देखेंगे यानी आपको देखना ही पड़ेगा। आइये, सबसे पहले आपको रविवारीय कार्यक्रमो की झलक दिखायें। ये ही वो दिन है जिसमे आप पूरी तरह अपने घर मे होते हैं और उसे पूरी तरह वर्वाद करने का वीडा हमने अधिकार समझकर उठाया है। हमे विश्वास है, आप पूरी तरह सुबह से शाम तक हमारे कार्यक्रमो में इस तरह उलझे रहेगे कि बीमार दोस्त को अस्पताल में देखने तक नहीं जा सकेंगे, और वो आपके दर्शन के बिना दूरदर्शन की मेहरवानी से दम तोड देगा। एक बहुत ही रोचक, रोमाचा कार्यक्रम हम आपको दिखायेंगे, 'सजनी' यानी पत्नी पति से तनी हुई और उससे चिर- पीडित पति की ये घर-घर की यहानी आपको हसाते-हसाते ही लोट-पोट नही कर देगी, बत्कि रुलाते-रुलाते भी आपका दम घोट देगी। इसका टाइटल सौंग होगा-मैं तो तुम सग ब्याह रचाकर हार गया सजनी। मुझको है बच्चो का सदमा, मार गया सजनी। मोहल्ले-भर के लुच्चे-लफगे बदमाशो के सेवाभावी जीवन पर आधारित होगा कार्यक्रम 'टुक्कड' 1 सेटी के टुकडो पर कुत्तो की तरह लडते और टुकडा मिल जाने पर दुम हिलाने वालो की कहानी का साकार चित्रण होगा टुक्कड समाज का सच्चा दर्पण होगा-'टुक्कड' । महिलाए हमारे समाज की शोभा हैं, घर-आगन की लक्ष्मी हैं, राष्ट्र की प्रगति के लिए पुरुष से कधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। ये चाहे तो समाज को एक पल में बदल सकती हैं लेकिन इनका अधिकतर समय दूसरो की निदा करने मे और वरावर गली-पडोसन से झगडने में चला जाता है। इनकी प्रतिभा का सही शम आती है मगर 67 उपयोग हो इसके लिए कर्मशील वहनें अपना कायनम देखेगी नारी दगल। हमारे देश मे हर तीसरा आदमी पान खाना है, हर दूमरा आदमी पिच-पिच पिचकारी थूक्ता है, हर चौथा आदमी चूना लगाता है, गरज ये कि पान की अलग तहजीव सस्कृति, इतिहास और आचार-विचार हैं। कत्था, चूना, जर्दा, मसाला सबकी अलग-अलग डिवियाओ से मिलकर बनता है एक पानदान । यानी अपना हिन्दुस्तान राष्ट्रीय एकता को माला में गुथा कायक्रम प्रस्तुत करेंगे हम 'पानदान'। दर्शको, हमारे यहा क्तिने ही ऐसे लोग है जो न तो तोलते हैं न सतोलते है, बस अचानक ही अपनी जुबान खोलते है और वोलते है, सिर्फ वोलते हैं। जब वो बोलते हैं तो किसी की नही सुनते हैं और सामने वाले वेजारी से अपना सर धुनते है । दूर दर्शन तोगो का भी प्रतिनिधित्व करता है जो बात मे से वात निकालकर उसे शतान की आत बना देते हैं और विना ही बात बिना के बोले चले जाते है। मनोरजन और हसी-मजाक से भर- पूर एक ऐसा ही कार्यक्रम हम आपको दिखाएगे जिसके 13 भाग पूरे हो जाने तक भी आप ये नहीं समझ पायेंगे कि ये क्या बात है, ये सब किस बात पर कहा जा रहा है । ये होगा हमारा नया सीरियल 'वात वे बात'। कई बार आपने देखा होगा, कुछ लोग आते हैं तो ये भूल जाते हैं कि उन्हे वापस जाना भी है यानी जहा पर आए वही जीवन की अतिम सास लेने का इरादा करके जम गए। हमारे कई सीरियल भो ऐसे ही जम जाते हैं । हम समझते हैं कि कार्यक्रम जम रहे हैं यानी श्रोताओ का मन बहला रहे हैं, लेकिन होता है ठीक विपरीत श्रोता दर्शक दरअसल मन नहीं बता रहे होते हैं बल्कि दिमाग मे आये गुस्से को किसी बहाने टला रहे होते हैं। हमने ऐसे लोगो 68 शम आती है मगर के जीवन और आदतो पर आधारित एक नया धारावाहिक आरभ किया है जसे कहावत है ना-यम आता है तो वापस नहीं जाता है वैसे हो ये लोग भी नही जाते हैं। हमारा ये नया सीरियल होगा 'यम लोक'। बच्चे हमारे राष्ट्र के महाते मुस्कुराते फूल हैं, इनकी आयो मे देश का भविष्य झिलमिलाता है। हमने इनको बचपन में ही भरपूर जवान बनाने के लिए अनेको कार्यक्रम विज्ञापनो के साथ प्रसारित किये हैं । जो वयमक फिरमे या विज्ञापन बच्चे मिनेमा हॉल में जाकर नहीं देख सकते थे उनका पूरा आनन्द घर पर रजाई में बैठकर अपने माता-पिता के साथ ले सकते हैं। ऐसी सुखद और आन दमयी स्थितिया पैदा करने का श्रेय दूरदर्शन को ही है। ज्ञान की असीम वृद्धि का कार्यक्रम हम बच्चो के लिए प्रसारित करते हैं 'ज्ञान-अज्ञान'। प्रिय दशको, समय की कमी के कारण हम आपको पूरे कार्य- क्रमो की झलक तो नहीं दिखला पा रहे हैं, लेकिन आपको इतना अवश्य बता दें कि जो कार्यक्रम हम आज से शुरू करने जा रहे हैं उनमे आपके ज्ञान मे तो वृद्धि होगी ही साथ ही-साथ आप इनकी सहायता से इक्कीसवी शताब्दी में भी आसानी से प्रवेश पा जायेगे। अच्छा साथियो, चलते हैं, फिर आते रहेगे आपको बोर करने के लिए, शोर करने के लिए, कुछ-न-कुछ और करने के लिए। होली के इस रगीले-सजील पव पर हमारी ओर से सभी को रगो भरा राम-राम और सलाम। [सगीत विज्ञापन आरभ] शम भाती है मगर 69
तलाश एक जीवनसाथी की
?
मीना तेरी सूरत से नहीं मिलती किसी और की सूरत
(गुनगुनाती है)।
उमिला हाय मीना | आज ये किसकी तसवीर पे ताना-
कशी हो रही है ?
मीना अरे ! आओ उर्मिल, आज किधर रास्ता भूल गई
उर्मिला रास्ता नही भूली, जान-बूझकर आई हू, मुझे तेरे
घर ही आना था माज।
मीना ये तो अच्छा किया । अरे, बैठ तो सही।
उर्मिला बैठ तो जाएगे यार, पहले ये तो बता, अभी किसका
फोटो हाथ मे लेकर गा रही थी? क्या कोई चढ
गया है नजर मे ? मुवारक हो ।
मीना नहीं, ये बात नही है उमिला । मुझे अभी तक तो
कोई लडका पसद ही नही आया और तुझे मालूम
है मैं शादी क्रूगी तो अपनी खुद की पसद से।
उर्मिला वरना क्या करेगी?
मीना जिंदगी भर ही कुवारी रह जाऊगी। वभी शादी
वरूगी ही नहीं, समझो?
उर्मिला बडा ही मुश्किल काम है मीना यह । तुम जानती
70
सम माती है मगर
हो लडकी की जिंदगी कितनी मुश्किलो वाली
होती है ? और वह भी एक कुवारी लडकी की।
मीना वो सब ठीक है उर्मिला, मगर मैं क्या करू, मुझे
कोई जचता ही नहीं।
उर्मिला अच्छा, वो जो फोटो अभी तुम देख रही थी, उसमे
क्या खरावी है?
मीना अरे, वो भी कोई लडका है लगता है भगवान
ने शनिवार के दिन बनाया है। और, तुम्हे मालूम
है, सप्ताह के आखिरी दिन कोई भी मन लगाकर
काम नहीं करता। या फिर शायद उसे ठेके पर
बनवाया गया है । एकदम वौडम ।
उर्मिला वो तो खैर ठीक है, मगर वो फोटो मुझे भी तो
दिखा, मुझे भी तो पता चले कुछ।
मोना अच्छा बावा, ले। तू भी देख । देख जरा आख देख,
खास चमगादड की सी लगती है। और सर, जैसे
तरबूज । गला तो छिपकली की दुम लगता है। मैं
कहती हू उमिला, भगवान की सबसे विचित्र रचना
है ये लडका। नही मुझे तो कोई
उर्मिला अच्छा, तभी तुम गा रही थी, तेरी सूरत से नहीं
मिलती किसी की सूरत
मीना बिल्कुल यही बात है। मैंने तो ऐसी शक्ल अपने
जीवन मे दूसरी नहीं देखी। बाइ गॉड, अगर
मोहल्ले के बच्चे देख लें तो डरकर भाग जाए।
मिला लेकिन मीना, जरा सोच तो सही, लोग उगलिया
उठाते हैं। बातें बनाते हैं।
मीना तो क्या करू? किसी वदर को गले से बाघ लू?
किसी गधे को दुम पकड लू? क्सिी क्रेक को पल्ले
शम थाती है मगर
71
? से वाघ लू, किसो घोचू के साथ फेरे पड लू? मिला नही, नही, ऐसा करने के लिए तुम्हे कौत यह रहा है ? कौन कहता है कि तुम क्सिी जानवर को पल्ले से वाघो? अभी तो ससार में आदमो के बच्चे ही बहुत मिल जाएगे। दुनिया मे इसान बनाने की फक्टरिया बद थाडे ही हो गई। कई मिल जाएगे। नौकर भोलू मेम साव | मेम साथ तैयार हैं मेम साव मीना क्या है ? क्या वक्-चक लगा रखी है ? क्या तैयार भोलू वो सारा इतजाम हो गया है । कमरा भी ठीक कर दिया है, मेम साव। मीना अच्छा किया। अब सर मत खा। भोलू मेम साव, अब मैं तनिक वीडी ले आऊ | ससुरी वीडी को लत ही कुछ ऐसी है। मीना हा, हा, जाओ, मगर जरा जल्दी वापस आना। भोलू बस अभी आया मेम साव । वस समझिए चट गया और पट आया। उर्मिला क्यू मीना, ये क्या चक्कर है ? कमरा ठीक हो गया? सव इतजाम हो गया? ये क्या है ? ये सब क्या चक्कर है मीना अरे हा, मैं ये तो तुम्हे बताना ही भूल गई। आज कुछ इटरव्यूज लेने हैं । तुम अच्छे समय पर आईं। उमिला इटरव्यूज' किसके इंटरव्यूज कैसे इटरव्यूज मीना वात ये है, मैंने अखवार मे अपने लिए शादी का विज्ञापन दिया था। आज वो ही उम्मीदवार इटर- व्यू के लिए आने वाले हैं। उर्मिला अच्छा, तो ये चक्कर है कि मेम साव तैयारियो मे ? ? 72 शर्म आती है मगर
लगी है।
मोना हा, मिला । वडा अच्छा रहेगा हम दोनो मिलकर
इटरव्यू लगे। और ऐसे सवाल करेंगे कि बच्चो को
छठी का दूध याद आ जाए। अच्छा तो पहले
तुझे चाय पिला दें फिर इटरव्यू लेंगे।
[दृश्य परिवर्तन पहला उम्मीदवार आता है]
मीना आपका नाम ? (पहले उम्मीदवार से)
लडका जी। (हकलाना)
मीना मैंने आपका नाम पूछा है। मोनो एक्टिग नहीं कराई
।
लडका जो वो वाक्लाल, (हकलाते हुए) बाई दी थे।
मीना कहा तक पढे हैं आप?
लडका जो मैंने वी० ए० पास किया है। बाई मो थे।
मीना जरा अपना प्रमाण पत्र दियाइए। गानि सर्टि-
फिकेट्स ।
लडका जी? हा र क क क्या? प्रमाण-परा जी?
वो तो मैं घर पर ही भ
भ भृल आगा। जी
वाई दी वे।
मीना तो फिर आप यहा ययो आए है ? क्या परो आए
लडका जी, वैसे इरादा तो तोरण मारोमा था। जी
आगे आपकी मरजी है। वाई दी थे।
मीना आप जाइए मि० बाई दी वे । भाप रिजेक्ट हैं
मि०
लडका बाचा के लाल। जी में जा तो रहा ह, वसे एक बार
अच्छी तरह सोच लीजिए, शायद मैं आपको पसद
आजाऊ।
मीना जी नही, आप मुझे क्तई पसद नही आएगे मिस्टर
वाकेलाल। जसे आए है वैसे ही सीधे रास्ते से चले
जाए। या फिर धक्के खाकर जाएगे वाई दी वे ।
[दूसरे उम्मीदवार का आना, जो एक कवि
।
कवि नमस्कार । क्या मैं यहा बठ सकता हू देवी जी?
मीना हा, हा, वैठिए, आपका शुभ नाम ?
कवि आहा, आहा, वाह, वाह, क्या पूछा है आपने अजी
अनेको नाम हैं मेरे । जो चाहे कह लीजिए। जो
आपको अच्छा लगे कह सकती हैं।
मीना आप तो कोई कवि मालूम होते है । क्या आप
वााई कविता करते हैं ?
कवि अरे वाह, क्या कयामत की नजर पाई है। काश कि
जैसी नजर है वैसा दिल भी हो। खत का मजमून
भाप लिया लिफाफा देखकर।
मीना आपने अभी तक अपना नाम नहीं बताया ? कुछ तो
रखा होगा माता-पिता ने।
कवि मुझे कवि कोमल कहते है । कवि सुकुमार कोमल ।
मीना अच्छा जी । कोमल जी, मान लीजिए, आपकी पत्नी
वीमार हो जाए, तो आप उन्ह अपने हाथ से खाना
बनाकर खिला सकते है?
कवि जी नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, कदापि नहीं।
मीना क्यो ? ऐसा क्यो नही हो सकता
कवि क्योकि मेरे घर मे कुछ पकाने को होगा तव ना।
मीना तो आप क्या खाते-पीते हैं ? क्या यू ही भूखो मरते
?
कवि हाय ! हम तो गम पाते हैं, आसू पोते हैं । ये ही
74 शम माती है मगर
जीवन है।
मीना कविजी | आप जाइए, मुझे आपके साथ शादी
करके अपनी जिंदगी तवाहनही करनी। जहाखाने-
पीने को ही न हो वहा मैं क्या करूगी?
कवि अरे कुछ तो तरस खाइए, एक कवि कितनी से
आपके लिए कष्ट उठाकर आया है। सुकुमारिया
तो मा मे अत्यत कोमल होती हैं।
मीना अव आप जाइए, अपनी रसोई मे जाकर आसुओ
को पीजिए, गमो को खाइए।
मीना भोलू, अगले उम्मीदवार को भेजो।
भोलू चलिए भाई साहब, आप चलिए । आगे चलिए
सरदार जी, कव से बीडी फूक-फूक कर घर को
रेल का प्लेटफार्म बना रखा है।
[तोसरे उम्मीदवार का आना, जो एक अधेड
उम्न का व्यक्ति है]
अधेड नमस्कार करता हू। नमस्ते । ओये वल्ले-बल्ले
सोणिये।
मीना नमस्कार । कहिए अब तक आप कहा थे ?
अधेड जी मैं बार लाइन विच खडा था। मैं भागडा
कररया था जी।
मीना क्या आप खाना बना सकते है ? मेरा मतलब है
आप अपने हाथो से खाना बनाकर अपनी पत्नी को
खिला सकते हैं, सरदार जी?
अधेड तुसी कि वोले जी ? जी आप देखिए, मैका, मैं इत्थे
शादी दा उम्मीदवार बण के आया हू, पाक शास्त
दी परीक्षा देने नहीं।
मोना नही, नहो, मेरा मतलब है कि यदि आपकी पत्नी
शम आती है मगर
4
? , बीमार हो जाए तो क्या करेंगे बाप अधड इलाज करवाऊगा, ताकि वो ठोष हो जाए। मीना तो क्या हाथ मे याना बनाकर नही पिनाएगे? अधेड आय तुमी कि कह रही हैं ? मेर खयाल से आपको वर नहीं रसोइया चाहिए। मैं तो बाज आया ऐसी शादी में । तुसी कोई बावर्ची दृढिए बावर्ची । हैं शादी का इश्तेहार दिया है शादी करगी। ओ तुसी तो कुवारीई रहणा है जी । मैं तो चला जी। मीना पता नहीं कहा से चले आते हैं । भोलू, ओ भोलू । भोलू जी मेम साव | आया जरा वीडो फक दू वाहर (आता है) मीना अगले उम्मीदवार को भेजो। नौकर चलिए, आप चलिए जी, बहुत देर से बूढ़े साड की तरह रम्सी तुडा रहे हो। [अगले उम्मीदवार का आना जो एक बूढा है] बूढा (सामते हुए चले आना) आदाव करता हू मोहतरमा मीना क्या? आप भी शादी के उम्मीदवार है? वूढा जी हा, उम्मीदवार भी हैं तलवदार भी हैं। मीना आपकी उम्र क्या है? बूढा यही कोई साठ के आस-पास । कोई खास ज्यादा 7 नही। मीना साठ साल की उम्न मे भी शादी करने चले है आप? वढा जो हा। क्यो नही, क्यो नहीं । साठ साल की उम्र काई ज्यादा तो नही । आपने वो मिसाल तो मुनी 76 शम आती है मगर ही होगी-साठा सो पाठा । (खासता है) मीना (हसते हुए) लेकिन आपका तो ये बुढापा है बडे मिया। बूढा अरे । तो क्या हुआ मोहतरमा | आजकल के नौजवानो से तो अच्छा ही है, जिनका पता ही नही चलता कि कब जवान हुए और कच डायरेक्ट बूढे हो गए। 1 मीना मिया आपके सारे वाल तो चादनी की तरह सफेद हो गए हैं? बूढा वालो पर न जाइए मोहतरमा। दिल मे झाकिए हा दिल मे । सर पे बुढापा है लेकिन दिल तो अभी जवान है। मीना मैं कहती हू इस उम्र मे ये बाते करते आपको शर्म नही माती बूढा इसमे शम को कौन सी बात हैं मोहतरमा । आपका इश्तेहार अखबार मे पढा, सोचा चलो मिस्मत आजमाए, शायद तकदीर की लाटरी खुल जाए। यकीन कोजिए सीधा लखनऊ से चला आ रहा हूँ। मोना तो फौरन लखनऊ का टिकिट कटाइए और वापस चले जाइए । आपकी जेब में पसे है? चूका हैं । हाय-हाय यह क्या कह रही हो आप ? पैसे की क्या कमी है मोहतरमा? क्या गजय पर रही हैं । इनमीनान करिए, मेरे साथ आपपीजिदगी आराम मे बमर होगी। मीना विमनिंदगी की वात कर रहे हैं आप? आपका तो पल भी भरोसा नहीं है, मुह मे दात नहीं पेट मे आन नहीं। . मम आती है मगर 17 बूढा नहीं, नही मोहतरमा, देख लीजिए-दो दात तो मौजूद हैं। मीना वो तो टूट जाएगे। दो-तीन दिन मे। बूढा भरे मेम साब, किसी ने कहा है, आदमी वो ही जिसके दात दो ही। यहिए कंसी यही? मीना बहुत वेवार । एक्दम वोर । बक्वास । वृढा हे हे हे है (हसते हुए) शुक्रिया। मीना अब आप अपनी तशरीफ का टोकरा यहा से उठाइए। आप जाएगे या वाकी दात भी यही तुडवाएगे? बूढा हाय, हाय, अव में लखनऊ कैसे जाऊगा मोह- तरमा? मीना क्सिी वस या गाडी से टकरा जाइए, अपने आप लखनऊ पहुच जाएगे। (प्रस्थान) कहा-कहा से चले आते है उम्मीदवार बनकर । मेरा तो सर चकरा रहा है उमिल। वस अव नही लेंगे इटरव्यू । बहुत हो चुका । मैं तो घबरा गई ह । नेक्स्ट । [दक्षिण भारतीय आता है] मुत्तूस्वामी (आते हुए) अय्ययो जी। नमस्ते। मीना नमस्ते। वैठिए। मुत्तूस्वामी दयवाद जी। मोना आपका नाम क्या है जी? मुत्तूस्वामी हमारा नाम मुत्तूस्वामी है जी। हम इधर वभाई मे अपना विजनेस करता जी। जमारा फूट अक्सर बबई मे चलता है जी। मीना आप खाना बना सकते हैं मि० मुत्तुस्वामी मुत्तूस्वामी काना तो अम क्या अमारा वाप भी नई बना सक्ता 78 शर्म आती है मगर
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मीना अन्ठा भोलू, उसे भी अदर भेज दो। भोलू आइए, आप भी भाई साहय आदए। उमिना देख जरा ठीक से बात करना, वैचारे का दिल मत तोट देना। भोलू अरे चलिए न भाई साहब, खडा क्य है ? [उम्मीदवार का प्रवेश जो एक मभ्य व सुदर है] म० कुमार नमस्ते। मीना नमस्ते, वैठिए। मि० कुमार जी, शुक्रिया। मीना आपका नाम? मि० कुमार जी मुझे कुमार कहते हैं । रमेश कुमार । मीना शिक्षा कहा तक पाई है आपने ? मि० कुमार मैंने एम० ० ए० दिया है, और आजकल लैक्चरार हू गवर्नमेट कालेज मे। मीना अच्छा मि० कुमार, आप अपने हाथ से खाना वना सकते हैं ? मि० कुमार इसकी कोई जरूरत नहीं। मेरे घर पर नौकरानी है खाना बनाने के लिए। मीना और क्या आप अपनी पत्नी का साथ घुमाने ले जाना पसद करेंगे? मि० कुमार जरूर पसद करूगा, आखिर मेरा स्कूटर है किस- लिए ? मुझे खुशी होगी उसे घुमाकर । मीना बहुत खुशी हुई आपसे मिलकर, आप पसद हैं। आप शादो के लिए चुन लिए गए हो। आपका अदाज हमे अच्छा लगा। मि० कुमार शुक्रिया। यक यू - 80 शर्म आती है मगर
उर्मिला मुबारक हो मि० कुमार | आप शादी के लिए
सलंक्ट हो गए हैं।
मि० कुमार थैक्यू वैरी मच । बहुत शुक्रिया आपका । अब जब
मैं आप लोगो को पसद आ ही गया हू तो जरा वो
लडकी भी मुझे दिया दीजिए जिमसे मुझे शादी
करनी है, जो मेरी जीवनसाथी बनेगी।
मीना जी जी जी क्या कहा आपने ? लडकी?
मि० कुमार जी हा, जी हा । दरअसन मेरा फैसला है कि मैं
बिना लडकी देखे शादी नहीं करूगा । ये मैंने बहुत
पहले ही सोच लिया था कि देखकर ही शादी
करूगा।
मीना तो क्या? मैं आपको लडकी दिखाई नहीं देती?
आपके सामने ही तो खडी है।
मि० कुमार जी ? आप मजाक कर रही है ? ये क्या कह रही है
आप? मैं तो आपका बच्चा हू। आप लडकी को
बुलाइए ना, प्लीज ये वक्त मजाक का नहीं है।
फौरन बुलाइए ना।
मीना (गुस्से से) क्या कहा आपने ? आप मेरे बच्चे हैं ?
शादी के लिए विज्ञापन मैंने ही तो दिया था। मैं ही
शादी करना चाहती हू । लडकी मै ही हू।
'मि० कुमार लेकिन मैडम, मुझे तो अभी अपनी पहली ही शादी
करनी है।
मीना तो तुम क्या समझते हो, मैं कोई चौथी शादी करने
जा रही है?
मि० कुमार देखिए, दरअसल मैं अपने दिमाग मे ऐसी भयानक
तस्वीर अपनी होने वाली पत्नी की बनाकर नही
आया था। मैं तो कुछ और ही सपने लेकर आया
शम आती है मगर
81
था। माफ कीजिए, दरअसल मैंने तो आपको लडकी
की अम्मा समझा था। क्षमा कीजिए। तकलीफ
उठानी पड़ी आपको। अब मैं आज्ञा चाहूगा।
मीना मि• कुमार, आप वडे अजीब आदमी हैं, बदतमीज
है, आप आदमी नही हैं।
मि०
10 कुमार जी बस रहने दीजिए, मैं आपके साथ शादी करके
अपनी जिंदगी बरवाद नही करूगा। आप तो
कुवारी ही रहेगी तो ज्यादा सुदर लगेंगी, समझ
गई । मैं चला, नमस्कार । दुबारा कभी इश्तेहार
दें तो सोच-समझकर दें। नमस्कार ।
मीना हाय उर्मिल, क्या मुझे जीवन मे ऐसे ही रहना
पडेगा । हाय कब खत्म होगी तलाश जीवनसाथी
की।
82 शम आती है मगर
पति-विरोध कवयित्री सम्मेलन [स्थान-रमेश का मकान।] रमेश रत्ना रत्ना (और जोर से) अरे सुनती हो, कहा हो तुम? मेरे आफिस का टाइम हो रहा है और तुम हो कि रत्ना (पास आकर स्वर) आ तो रही है। क्यो आस- मान सर पर उठा रहे हो चीख-चीख कर रमेश अच्छा तो सुबह से ही आपने ये कविता लिखना शुरू कर दिया है, सुबह कविता, शाम को कविता, उठने कविता, वठते कविता, मैं कहता हू रत्ना ये कविताए तुम फालतू समय मे लिखा 2 करो। रत्ना कुछ और भी कहंगे या केवल कविताओ को ही कोसते रहेगे। रमेश घडी की तरफ देखो साढ नौ बज रहे हैं, खाना तैयार है? रत्ना बस अभी तैयार हो जाता है। सब्जी वन रही है तब तक मै कविता रमेश बीच में ही क्या? खाना अभी तक तैयार नही शम आती है मगर .3 -- -- ---
हुआ और तुम कविता लिखने में व्यस्त हो ।
मैं कहता हू रत्ना ये बातें मुझे कतई पसन्द नही
रला आप तो वेकार ही विगड रहे है ।
रमेश मै ठीक कहता हू रत्ना, तुम हमेशा गलत समय
पर कविताए लेकर बैठ जाती हो । अभी तो इसे
वन्द करो वाद मे लिख लेना।
रत्ला जी नही, मैं कविताए लिखना नही छोड सकती।
वडी मुश्किल से तो नाज म्ड बना है।
रमेश (कुछ काध से) ये क्या मजाक है रत्ना, जब तुम्हे
खाना बनाना होता है उस समय तुम कविता
लिखने के लिए मूड वनाती हो। जव चाय के
लिए कहता हू तुम चतुष्पदिया लिखने बैठ जाती
हो।
रत्ना (कुछ रुआसी होकर) हा-हा, ये ही कहोगे।
नौकरानी की तरह घर का काम करने के बाद
भी मेरी तकदीर मे ये ताने सुनना ही लिखा है ।
रमेश कौन-सा काम करती हो तुम जरा हम भी तो
सुनें जब भी किसी काम के लिए कहता हू तुम
कुण्डलिया लिखने के लिए कुण्डली मार कर बैठ
जाती हो । अभी कल ही छोले बनाने के लिए
कहा था, वितु तुम छद बनाती रही। दही
जमाने के लिए कहा था, लेकिन तुमने अपने
नीरस दोहे सुनाकर इस माग को भी ठुकरा
दिया।
रत्ना (सिसक्यिो के स्वर मे) कभी तारीफ भी की है
आपने मेरे विमो काम पी। जब भी वविता
84 शम आती है मगर
लिखने वठती हू आप इसी तरह ताने कसते रहे हो। रमेश मैंने पिताजी से पहले ही कह दिया था कि मैं क्वयित्री से शादी नहीं करूगा । मगर क्या करू तकदीर ही ऐसी थी। दरअसल तग हो गया हू मैं तुम्हारे सडियल इस साहित्यिक शौक से । ऊब गया हू तुम्हारे कबीर का रहस्यवाद सुनते- सुनते। रत्ना (रोते हुए) तो अब क्या हो गया है, साफ-साफ क्यो नही कहते कि आप मुझसे ऊब गए हैं । क्यो बहाने गढ रहे हो? ऐसी ही बात है तो मैं आज ही अपने मायके चली जाऊगी। रमेश आज क्यो अभी चली जाओ, मुझ पर इन मगर- मच्छ के आसुओ का असर नहीं होने वाला। रत्ना ठीक है, मैं आज ही रात को गाडी से चली जाऊगी। रमेश अपना वैडिंग बाधकर तैयार रखना। (घडी की ओर देखकर)पौने दस वज गए, मेरे आफिस का टाइम हो गया है मैं जा रहा हू। (रमेश का प्रस्थान-रत्ना के रोने का स्वर-रत्ना का दरवाजा बन्द करना) रत्ना (स्वय हो) जमाना बदल गया लेकिन इन पतियो का दिमाग अभी तक नहा उदला । बीसवी सदी मे भी वितने दकियानूसी विचार इन पर हावी है। नारी को दासी समझते हैं, पैर की जूती मानते है। ठोक है, मैं भी आज मायके चली जाती हू, दिमाग अपोआप ठीक हो जायेगा। जव हाथ शम आती है मगर 85
7
से रोटिया सेकनी पड़ेंगी। (द्वार पर खटखटाहट।
रत्ना दरवाजा खोलतो है। दो महिलाओ का
प्रवेश । दोनो महिलाए साथ साथ नमस्ते) क्या
क्वयित्री रत्ना कोकिल आप ही है
रत्ना जी हा, कहिए कैसे आना हुआ।
महिला जी बात ये है हमारे महिला संघ की ओर से
आज एक पति-विरोध कवयित्री सम्मेलन का
आयोजन किया गया है।
रत्ना वडा अच्छा विषय रखा है आपने ।
दूसरी महिला जी हा, इसके लिए हमने सभी कवयिनियो को
वुलाया है । आपके पास भी इसीलिए हम आई
हैं कि आप भी हमारे सम्मेलन मे पधारें।
रत्ना लेकिन आज तो मैं शायद (कुछ सोचते हुए)
अच्छा ये वताइये, कितने बजे है ये आपका
सम्मेलन?
पहली महिला (आमत्रण पत्र देते हुए) ये आमत्रण पत्र लीजिये,
इसमे स्थान और समय आदि सभी लिखे हुए
रत्ना (प्रसनता से) अरे ये तो वडा ही अच्छा समय
रखा है आपने, आज तीन बजे।
महिलाए जी हा, अवश्य आइये और हा इसी विषय पर
कुछ लिखकर लाइए।
रत्ना ठीक है, मैं अवश्य आ जाऊगी।
महिलाए अच्छा तो हमे आज्ञा दोजिए। नमस्कार।
रत्ना नमस्कार । (द्वार वन्द करने का स्वर)
[दृश्य परिवतन । स्थान-सम्मेलन । नारो स्वर
उभरते हैं-आपस मे स्त्रियो के वात करने के
86 शम आती है मगर
स्वर मुनाई पड़ते हैं। माइक पर सयोजिका
का स्वर)]
भयोजिका बहनो, आज बडी ही प्रसन्नता के साथ मैं आपको
कहती है कि हमारे महिला मघ ने एक पति-
विरोध कवयित्री सम्मेलन आयोजित किया है।
हर विवाहित महिला जानती है कि ये तथा-
कथित पति परमेश्वर किस प्रकार हम पर
शासन करते हैं। लेकिन बहनो, अव हमे चुप
नही बैठे रहना है। इनके लिए कोई न कोई
इलाज तो दूढना ही है। खैर, मै भाषण को
यही समाप्त कर आपको अपने शहर की प्रति-
ष्ठित कवयित्री बहनो की कविताए सुनवाती
हू । इन सभी कवितामओ मे आपको ये ही विचार
सुनने को मिलेंगे। सबसे पहले पति-विरोध कवि
सम्मेलन की शुरुआत कर रही हैं हमारे शहर की
जानी-पहचानी कवयित्री श्रीमती रेखा कोयल ।
(तानियो के स्वर) आइये बहन कोयल ।
कोयल (माइक पर) बहनो, आज के कवयित्री सम्मेलन
के विपय मे तो आप परिचित ही है। दरअसल
मैं इन सब झगडो और कष्टो की जड शादी को
मानती है। क्योकि जब हम शादी ही नहीं
करेंगी तो पति होगा ही नहीं। इन्ही विचारो
को मैंने लिखा है।
शादी करना बेकार सखी । (खूब वाह-वाह
के स्वर) क्या क्या बतलाऊ तकलीफे । तुम खुद
हो करो विचार सखो। आगे लिखती हूं--पति
तो परमेश्वर होता है, पत्नी चरणो की दासी है,
शम आती है मगर
87
- - , ऐसे अपमानित जीवन से तो, जीना है धिक्कार सपी शादी करना सार सखो, हम कुछ भी बोल नहीं सकती, इनकी चलती मनमानी, दासी से बदतर हालत है कर्मों को घर की रानी है, ये पति देव ही करते हैं, जीवन का बटाढार सपी। शादी करना वेकार सखी । अतिम है-- कव तलक चलेगी दुनिया मे, इन पतियो की ये मनमानी, लेंगी अधिकार बरावर के, हमने भी मन में हैं ठानी, नारी और पुरुष वरावर हैं, य भी चीख रही सरकार सखो। (तालियो की गडगडाहट । वाह-वाह, खूब आदि के स्वर) सयोजिका अभी आपने एक वहन के विचार सुने । अव एक कविता श्रीमती सुषमा शवनम से सुनिए । ये हमारी त्रान्तिकारिणी सदस्या है। जोशीली कविताए लिखती हैं । सुपमा वहन । (तालियो की गडगडाहट) सुपमा मैं आपके समक्ष एक कुण्डली प्रस्तुत कर रही है। इसमें मैंने सभी बहता से कुछ कर गुजरने का जाह्वान किया है। लिखा है- दुनिया भर की पत्नियो सब हो जाओ एक । (वाह-वाह।) पती नाम के जन्तु के घुटने डालो टेक । घुटने डालो टेक छुड़ादो इनके छक्के--। (वाह वाह) घुसे घरो मे मत घुसने दो मारा धक्के । पत्नी को दे ब्लफ वसो दिल में मिस मुनिया। इसीलिए पत्नियो बदल पर रख दा दुनिया । 88 शम आतो है मगर
-
महिलाए वाह शवनम वहन ।
सयोजिका शात बहनो । हा तो अब आपके मामने उर्दू की
शायरा श्रीमती जमीला शमा अपना काम पेण
कर रही हैं। आइए जमीला पहन
शमा मेरी प्यारी बहनो, आपकी पिदमत में आज के
इसी सब्जेक्ट पर एक रुपाई पेण पर रही है।
सुनिए--
दिखते हैं जो घर में, उन्हें जोहर नहीं यहो,
बने आफत जो माथे सी उसे प्रोहर नहीं मरते।
जमाने भरपावि दो गराये ध्यान से गुनो,
दुखाय दिन जो बीवी का उम शोहर नहीं बहते।
[वाह-वाह बहुत अच्छ यून नियती हो]
सयोजिका बह्नो, अब इसी विषय पर लोग प्रिय कपित्री
श्रीमती रत्ना पोषियी पपिता मुनिए ।
आप क्वयित्री होने का गाथ साथ एक अच्छी
गायिका भी हैं। आइए योयिन जी।
रत्ला रहनो, मैं आपसी गेगा मे एम परिता पेण पर
रही हू। (गाकर)
ये पति क्यो हमे सताते हैं,
प्यार शूठा सदा जताते हैं,
हमको दासी समझते हैं लेकिन,
खुद को परमात्मा बताते है,
डाट दफ्तर मे वॉस पी याते हैं,
रोब हम पर मगर जमाते हैं,
आज आफिस में काम ज्यादा था,
ये बहाने सदा बनाते हैं ।
रोज ही लेट घर पे आते हैं
मग माती
और खाते ही लेट जाते हैं।
आखरी है-हाय जिम रोज जाती हू मैं मैके।
बस उसी दिन ये मुस्कराते हैं।
सयोजिका बस वहनो श्रीमती रत्ना कोकिल आज के पति
विरोध ववयित्री सम्मेलन की अन्तिम कवयित्री
थी। अब मैं इस सम्मेलन को समाप्ति की
घोषणा करती हू । अब हम परमपिता परमेश्वर
से सभी नारियो के कल्याण और मगलमय
भविष्य की प्रार्थना करेंगी। उसका तरीका ये
होगा हमारी सघ को दो महिलाए पहले प्राथना
वोलेंगी और उसके बाद सभी उन पक्तियो को
दोहरायेंगी। (महिलाए प्रार्थना करती हैं) परम
पिता श्वर जगत मे नारी का उद्धार करो।
[सव एक साथबोलती हैं । रत्ना सबसे तेज
बोलती है ।]
रमेश रत्ना-रत्ना । ये क्या हो रहा है अरे तुम तो सोई
हुई भी कविता की रचना कर रही हो । हाथ
पकड कर उठाता है। उठो आज उठने का
इरादा नहीं है क्या?
रत्ना है, क्या हुआ, क्या हो गया
रमेश जगने का समय हो गया है, देखो
सूरज
निकल
आया है । अव उठिए जल्दी ही एक कप चाय
पिलाइए।
7
90 शम आती है मगर
वात एक दफ्तर की
-
[ममय प्रात ग्यारह बजे-अधिकारी मिस्टर पणिक्कर अपनी
सीट पर बैठे हैं सामने फाइलो का ढेर लगा है । वो एक फाइल
देख रहे हैं । वाहर गेट पर चपरामी चगू बीडी फूक रहा है और
चुरे गले में गा रहा है (अग्रेजी मे कहते है कि ) पणिक्कर
घण्टी बजाता है। चगू कोई ध्यान नहीं देना है। फिर आवाज
लगाता है, "चगू ओ चगू (चोखता है) चगू?")
पणिपकर चगू कम इन ।
चगू (गाना वद करके आते हुए) क्या कहा साब आपने?
कमोन? हम आपको क्मोन दिखते हैं ? आपने हमको
गाली दी?
पणिक्कर ओह नो । आई मोन ।
चगू अरे रहने दो साव, ये आपका कमोन और आईमोन
इधर नहीं चलने वाला । अफसर हैं तो कोई गाली
निकालने के लिए थोडे ही हैं।
पणिक्कर मिस्टर चगू । हमने गालो नही दिया तुमको।
तुम गलत अडर स्टण्ड कर रहा है।
चग ये आपका अडर स्टेण्ड और वस स्टेण्ड अपने खोपड़े में
नहीं आता सार हमसे मोघे ढग से बात किया करो।
शम आती है मगर
91
पणिक्कर अरे भाई, मैंने तुमको गाली नही दिया, मैंने तो कहा --अदर आओ। चगू तो ऐसा बोलिए ना साब-हिन्दी मे । पणिक्कर हिदी मे नही बोल सकता-हिन्दी प्रोबलम है। चगू हिन्दी मे बात नही कर सकते तो हिन्दुस्तान मे पैदा क्यो हो गए ? (फुसफुसाते हुए) पणिक्कर क्या? What ? क्या कहा तुमने ? चगू कुछ नही साब । कुछ नहीं बोला-आप कहिए कसे बुलाया था मुझे? पणिक्कर में आधा घण्टा से बेल बजा रहा हू, तुम सुनता नहीं चगू सुनते ही तो आ गए साव । वैसे आप तो मालिक हैं इस दफ्तर के आप चाहे तो दिन भर घण्टी बजा सकते हैं, आपको कौन रोक सकता है। पणिक्कर (नोध मे) ओह यू शट अप । चगू कौन सी अप साव । ये कोई रेलगाडी है क्या पणिक्कर अरे मैंने बोला-शट । चुप रहो । मुह बद रखो। चगू जवाब देने के लिए तो मुह खोलना ही पडेगा न ? साब। पणिक्कर अब तुम अपना मुह वद करके उधर जाओ बाहर- दरवाजा खोलकर और जाकर मिस्टर दीनदयाल को भेज दो इधर । नाऊ गो। गेट आऊट। (चग जाता । पणिक्कर (स्वत ) ओ माई गॉड | व्हाट ए टिप्पिक्ल मैन ! हमको समझ नहीं आता, ये लोग हिदी मे क्यू समझता है-अग्रेजी मे क्यू नही बोलता। अग्रेजी लेंग्वेज कितनी अच्छी है-बम वड्स मे बहुत बात। 92 शम आती है मगर ? you ? ? और एक हिन्दी मे दस सेंटेंस बोलो तो मीनिंग एक सेंटेंस का निकलता है । मगर इधर का लोग कुछ अनएजुकेटेड है। हिन्दी के पीछे पडा है ये समझते 941 All nonsense always create problems दीनदयाल (घसते हुए) क्या मैं अदर प्रविष्ट हो सकता हू श्रीमान् पणिक्कर ये आप अदर आने की परमीशन माग रहे है या मेरे हैड पर हैमर चला रहे हैं । कितनी बार आपसे कहा है अग्रेजी मे बात किया कीजिए-- '-But dont obey me आइए, मैं ये आपकी फाइल ही देख रहा था। दीनदयाल कुछ दिखाई दिया इसमे श्रीमान् सर पणिक्कर क्या मतलब? What do you mean दीनदयाल मेरा मतलब कोई गलती? पणिक्कर यू मीन मिस्टेक्स ? एक हो तो बताऊ, आपने तो बहुत मिस्टेक्स की हैं। दीनदयाल कैसे सर पणिक्कर मैंने नोट लिखा था कि आप आफिस के काम के लिए स्कू ड्राइवर मगा सकते है। आपने जवार मे फाइल मे लिखा है स्क्रू मगा लिए हैं -ड्राइवर के लिए एडवरटाइजमेट कर दिया है। दीनदयाल इसमे क्या गलत हो गया सर पणिक्कर दीनदयालजी, आप अग्रेजी समझते नहीं हैं-उसे गलत यूज करते हैं। अब आपने यहा कितनी मिस्टेक्स कर दी है-कुछ पता है ? वाइफ को लाइफ लिखा है। Demond को रिमाड लिख दिया है। दीनदयाल सर, अग्रेजी, मैं इसलिए लियता हू कि हिदी पढने मे शम भाती है मगर 93 7 7 आपको डिफीकुल्टी होती है। पणिक्कर (माथा पकडता है) दीनदयाल जी, डिफीकुल्टी नहीं, डिफीकल्टी। दीनदयाल क्यो सर, ऐसा क्यो ? जव put पुट होता है तो येCulty कुल्टी क्यो नही? सौरी सर । मैं आपसे डिसकुस करने लगा। । पणिक्कर आपको अग्रेजी कम आती है शायद मि० दीनदयाल- आपकी तवियत तो ठीक है न? दीनदयाल जी साब समथिंग इज वैटर दन नथिंग । पणिक्कर तुम लोगो को कभी अग्रेजी बोलना नही आएगा। और जब तक अग्रेजी ठीक नहीं होगा कुछ नहीं होगा, नथिंग विल हैपन । दीनदयाल ये बात नही है सर । इतनी अग्रेजी तो हम लोगो को आती है। हम अपना काम आराम से चला सकते हैं। पणिक्कर क्या अग्रेजी आता है आपको। हमने लिखा था हमारी कपनी मे ऐसा होता है और होता ही जाता है । आपने इसकी अग्रेजी बनाई है-व्हाट एवर इज उन इन अवर कपनी-देट इज डन डना डन-डना डन । English ? मि. दीनदयाल, आपकी इस Poverty से मेरा तो मूड ओफ हो जाता है। कव सीखेंगे आप लोग अग्रेजी। अब आप जाइए। (दीनदयाल जाता है) अरे हा- मि० दीनदयाल, सुना क्ल आपकी वाइफ की तबियत ठीक नहीं थी Somebody was telling क्या हुआ दीनदयाल पता नही सर, शाम को जब मैं आफिस के काम के बाद घर पर पहुचा तब तक तो विल्कुल ठीर थी, अचानक नोन सस हो गई। 94 शम आती है मगर -
पणिक्कर दीनदयाल you are very poor in English आपको
बहुत प्रेक्टिस करना चाहिए।
दीनदयाल ये बात नहीं है सर, हमारे मोहल्ले मे तो अंग्रेजी का
तार सब मुझसे ही पढवाते हैं ।
पणिक्कर (आश्चय से) अच्छा । वेरी गुड।
[इतनी ही देर मे मैथ्यू और पीटर लडते हुए
अदर आते हैं]
मथ्यू सर, मिस्टर पीटर ने हमको एब्यूज किया । उसने
हमे डकी कहा।
पीटर नो सर, इसने स्टार्ट किया क्वारलिंग। इसने मुझे
इडियट कहा।
पणिक्कर ओ० के० Now, no self introduction, I know each
of you who is witness
मैथ्यू सर, चगू was there You can call him
[घटी वजाता है चगू आता है]
पणिक्कर चगू, तुमने इन दोनो को लडाई करते देखा?
चगू देखना ही पडा साब, उम वखत हम वही पर थे।
पणिक्कर क्या किया इन दोनो ने ?
चगू दोनो एक दूसरे को कुछ कह रहे थे।
पणिक्कर क्या कह रहे थे?
चगू ये हम क्या जाने साब, ये क्या कह रहे थे।
पणिक्कर क्य ? तुम तो वहा पर थे।
चगू मौजूद था साब, मगर इनको वात मेरे पल्ले नही
पटी । ये लोग अग्रेजी मे लड रहे थे, और मैं अग्रेजी
जानता नही हू ।
[सब हसते हैं]
पणिक्कर चगू, ये बात तुमने ठीक कही। अग्रेजी तुम्हे नही
शम आती है मगर
95
माती।
-
चगू अरे हा साव, एक बात तो कह्ना भूल गया। (रोता
है)
पणिक्कर अरे क्या वात है ? रोता क्यो है ?
चगू सर, आपके पास जो वगाली बाबू रहते हैं उन्होंने
कहा है कि आपकी मेम माब का तार आया है।
पणिक्कर क्या
What happened ? वो तो बच्चो को लेकर
अपनी मा के पास गई है।
चगू वही से तार आया है साव! वो अभी कहकर गए।
जल्दी मे थे, आप झगडा निपटा रहे थे। उन्होने कहा
कि आपकी मेम साहव आज मर गई हैं।
पणिक्कर (चीखकर) ओ नो ! Dont Late। ये क्या हुआ। (सव
सात्वना देते हैं) मैं क्या करू।हाये मेरी wife ! How
sweet she was में तो वरवाद हो गया। (बुरी तरह
रोता है। फोन की घटी वजती है) हैलो-येस चटर्जी
हा मैं पणिकार क्या क्या मेरी वाइफ-अजमेर
गई है । (हसता है) चगू, मेरी वाइफ अजमेर गई है-
आज मरी नहीं है।
चगू सर, जैसा मैं समझा कह दिया, मुझे माफ कर दें,
साब।
पणिक्कर नही नही, माफी की क्या बात है। दरअसल ये सारा
घपला अग्रेजी की वजह से हुआ। अब मेरे समझ मे
आ गया-सारे देश के लिए हिन्दी क्यो जरूरी है।
हम सब भाई मिलकर एक ही भाषा वोलें तो सब
समझ जायेंगे और दिक्कत भी नही होगी। तो मुनो-
आज से इस दफ्तर का सारा काम हिदी मे होगा।
मैं भी हिन्दी मे काम करूगा । (सब हसते हैं)
96 शम आती है मगर
भूगोल मरे मोहल्ले का जिस मोहल्ले मे मैं रहता हू, वहा लोग कम रहते हैं, हल्ला ज्यादा रहता है। पति कम रहते हैं, पत्निया ज्यादा या यू कहिए कि पति तो बिल्कुल नहीं के बराबर रहते हैं । उन्हे बीविया रहने दे तब न । आपने सुना होगा एक बार क्सिी साहब को एक बहुत अच्छी पढ़ी लिखी घरेलू तमीजदार खूबसूरत वीवी की जरूरत थी। उन्होने अखबार मे इश्तहार दिया। दूसरे दिन उनके पास जो चिट्ठियो के ढेर लग गए । सभी मे लिया था, मेहराती करके मेरी बीवी ले जाइए । बहुत दिनो तक तो मुझे भी इस बात पर यकीन नही आया था लेक्नि अब मैं सौ फीसदी ऐतबार के साथ ये कह सकता हू। कि ये ही वो मोहल्ला है जिसके सभी शोहरो ो वो चिठ्ठिया लिखी होगी। इसमे पहले कि मैं अपने पडोस की जुगरफियाई हालत बयान करू कुछ जरूरी बातें उनके बारे मे बताना निहायत जरूरी महसूस करता हूँ। समझने के ऐतबार से कुछ पोइन्ट्स ये हैं । मौसम-यहा का मौसम वैसे तो काफी खुशनुमा और कहकहो से भरा होता है लेकिन शाम के वक्त जव शोहर घर पर आते हैं मौसम एक दम बदल जाता है, कुछ खुश्की आ जाती है, काफी गरज और धमाके होने लगते है और बजाय प्यार की शम आती है मगर वारिश के तानो, फटकारो गिनो और शिक्वा की पौछार होने लगती है । यहा पर प्यार का मौसम कभी नही होता है, जिस वक्त ये बीविया गरजती हैं और वरसती हैं उस वक्त वेचारे शोहरो की हालत काविले नुमाइश होती है कभी-कभी तो गर्मियो मे भी आसू का सैलाब आ जाता है । जिस बाढ मे बहुत से खुश नसीब शोहर बहकर कभी के शफा पा चुके लेकिन कुछ बदनसीव शोहर अभी तक भो इसी वाढ मे उलझे है जिनके गले तक पानी आकर वापस लौट जाता है वो किसी ऐसी वाढ के इन्तजार म हैं जिसमे वो बहकर जाए लेकिन लगता है इन पैदाइशी दुखी दासो के लिए तो वाढ कभी नही आयेगी। मेरे पडोस की बीवियो मे बस दो ही मौसम पाए जाते हैं। या तो लडने का या फिर बैठकर गपशप करने का । उसमे खासतौर से एक दूसरे को बुराई करने का पतियो के लिए वो मौसम अच्छा माना जाता है जब वीविया घर पर न हो। पैदावार-आप चौकिये नहीं, ये तो सभी जानते है कि जहा पर बीविया होगी वहा पर बच्चे तो होगे हो । वैसे कुछ तरक्की पसन्द लोग चिना बीवियो के बच्चे पदा करना ज्यादा अच्छा मानते हैं रयाल अपना अपना । बच्चो के अलावा जितनी अच्छी नस्ल और किस्म का झगडा मेरे मोहल्ले की बीविया पैदा करती है, उतना अच्छा शायद ही किसी दुनिया के कोने मे पैदा होता हो। एक से बढकर एक और खूबसूरत यही पर पैदा होती है। कुछ बीविया तो आम ही मिर्फ ईजाद करने का करती हैं और फिर कुछ उन तालियो का एडवरटाइजमेट प्रेक्टिकल मे करती हैं। मेरे रयाल से अगर मेरे पडोस की बीवियो के जरिए जो झगडा फसाद पैदा किया जाता है उसे अगर दुनिया के प्रोडक्शन को देखकर दातो तले अगुली दवा लेंगे इससे फौरन पालिसी मे काफी फायदा होने की गुजाइश है। अगर ये झगडे शम आती है मगर 98
।
।
हुई वस पीछे-पीछे चलने की रस्म अदा करती है। वैसे अब ये
वात भी काफी दकियानूस मानी जाने लगी है कि बीविया पीछे
चलें। अपनी-अपनी खिदमत के हिसाब से इस मोहल्ले मे हर
शाहर का चन्द खिताब भी अता किए जाते है। मिसात के तौर
दुनिया के और हिस्मो मे भी भेज दिए जाए तो फिर किमी को
हम पर हमला करने की फुरसत ही नही मिलेगी। और कितने ही
फायदे गिनाऊ मैं आपको।
हालात-इसे हिदी भाषा मे स्थिति कहा जाता है। वैसे
सभी बीवियो की स्थिति काफी मजबूत होती है सिर्फ शोहर की
डावाडोल रहती है। यहा बोवियो की स्थिति में कोई पास
अन्तर नही आया सिर्फ कुछ खास परिस्थितियो को छोड कर।
हा, एक बात जरूर है वीवी घर पर न होने से या मायके चले
जाने की स्थिति मे शोहर के चेहरे पर एक विजय की मुसकान
देखी जा सकती है। यहा हर वीवी अपने से ज्यादा दूसरे की स्थिति
के लिए जागरूक है । जो साडी पडोसन ने पहनी है, वो ही अगर
दूसरी बीवी के पास नहीं आती है तो शोहर की स्थिति मे काफी
भयानक बदलाव आने के अवसर आ जाते हैं । और फिर वैसे भी
तूफान से तो हर आदमी डरता ही है। डरना चाहिए।
खानपान-खाने के नाम पर तो मोहल्ले की वीविया फकत
एक दूसरे का मगज खाने में ज्यादा यकीन रखती है शोहरो के
दिमाग और मगज चाट चुकने के बाद ये वलायें पडोसनो पर
नाजिल हाती है और फिर एक दूसरे का दिमाग वस पचाती
पशु-पालन-इस जगह सबसे अच्छे, सस्ते और टिकाऊ
पशुओं के नाम पर जाते हैं बच्चे । जब देखिए दो बच्चे कन्धो पर
एक गोद मे और एक यो अगुली से लगाए लदे-फदे चले जा रहे है
वीविया तो निहायत खाली हाथ हिलाती है। कमर को मटकाती
रहती है।
शम आती है मगर
पर निखटू अडियल टू जूगादी बन्दर वगैरा वगैरा अब इन नामो को सुनकर आपको कोई शक नहीं रहा होगा। इस मोहल्ले की चन्द पढ़ी-लिखी और एप्रोच वाली बीविया इसी मोहल्ले के एक जाने-माने शोहर को पतोकितावत कर रही हैं खुदा उह इस नेक इरादे मे कामयावी अता फरमाए । काम-धा-मेरे पडोस की वीविया कोई खास काम बचा नहीं करती। शोहर ही करते है ये घर पर रहती है ये ही क्या कम वडा काम है। कोई वहादुर आकर पूछे इनसे कि ये कितनी तक लीफें उठा रही हैं इस घर की चारदिवारी मे शोर शराबा करने गधे हाक्ने, लडने, एक दूसरे से लडवाने, शोहर से झगडने फट कारने, रोने पीटने जैसे बड़े कामो से फुरसत मिले तो ये कुछ और करे कुछ पढ़ी लिखी बीविया भी मेरे पडोस मे हैं लेकिन वो घर पर नही पाई जाती हैं। अब आप ये मोच रहे होगे कि मैंने ये इतना बड़ा काम आखिर कर कैसे दिया इसके कई वजूहात हैं । मैं जिस मकान मे रहता हूँ, उसमे चारो तरफ से वस ये वीविया ही दिखाई देती हैं, पाई जाती है और कुछ तो कोशिश करने पर भी नजर नही आती है । अब आपये पूछियेगा यो मेरी बीवी कैसी है वस ये समझ लीजिये रि उसकी गैर मौजूदगी मे ही ये सब कुछ लिय पाया हूँ। 100 शम पाती है मगर
।
महाकवि अफन्डी का कविता केन्द्र
खुल गई। खुल गई। चौंकिए नही। क्सिी स्टट की लाटरी
नही खुली है । किसी मनचली खटारा गाडी की चूलें नही खुली
हैं। ये तो इस देश के शायरो, लेखको और कवियो की किस्मत
खुल गई। देश भर में तहलका मचा देने के बाद, वडे-बडे
पुरस्कार कई बार ठुकरा देने के बाद हजारो मुशायरो और कवि-
सम्मेलनो मे हूट हो जाने के बाद । महाकवि ने कुछ दिनो के लिए
अपना कविता के द्र चादनी चौक मे खोल लिया हैं । होली के
शुभ अवसर पर हर तरह की रचनाए नई या पुरानी, कविता
या कहानी, दोहे या चौपाई, शेर या रुवाई आप निहायत
सस्ते दामो मे इस दुकान से खरीद सकते हैं और फिर अपने
नाम से पढकर, सुनाकर छपा कर वाहवाही लूट सकते हैं,
दाद पा सकते हैं। इस देश के कवियो ,शायरो और लेखको के
लिए ऐसा सुनहरा मौका बार-बार नही आएगा। इस दुकान
से खरीदे हुए माल की पूरी गारन्टी है। एक बार आप इस
कविता केन्द्र पर आइए तो सही। डरिए मत, झिझकिए मत, हम
आपका परिवार नियोजन केन्द्र पर नही बुला रहे। महिला
कवयित्रियों के लिए भी हमारे यहा पर उन्ही के हिसाब से लिखी
कविताओ का बेहद अच्छा स्टॉक है । उहे अब किसी कवि से
शम आती है मगर
101
मुस्करा कर रचना मागने कि कोई जरूरत नहीं वो दिन अब लद
गए । एक बार आप साडी सेन्टर पर जाने के बजाय इस कविता
केद्र पर आकर तो देखें बेहद आकर्षक विषयो पर तरह-तरह की
रचनाए हमारे यहा थोक भाव मे उपलब्ध हैं। हमारे एजेंटा
को घटी दरो पर माल सप्लाई किया जाएगा। ऐसा कौन-सा
विषय है जो महाकवि अफन्डी से छूट गया हो। आप पायेंगे कि
इनकी क्या निराली शान है। एक दो चार नहीं पूरे शेरोकी खाने
हैं। ये साथ मे इनकी बीवी हैं, जिनकी बगल मे पानदान है।
प्यारे कवि वधुओ, लेखको, इस मौके को चूक मत जाना। एक
वार बस एक बार हमारी दुकाा पर आना और सस्ते भाव से
कवितायें ले जाना ऊचे कवि-सम्मेलनो और मुशायरो मे सुनाना
और फ्री मे अपना रग जमाना । हम आपको मिसाल के तौर पर
चानगी बता देते है। मसलन हास्य रस के कवि इन रचनाओ से
कमाकर खा सकते हैं-
शेर अर्ज है-
आफतें आएगी सर पर मुझे मालूम न था
इस तरह फूटेगा ये सर मुझे मालूम न था
में तो समझा था मेरे प्यार का है ताजमहल
तेरे बाप का है घर मुझे मालूम न था।
फिर श्रोताओ पर ये गीत फेंकिये-
इस तरह चली गईं तुम मुझको छोडकर
जैसे चली गई भैस रस्सा तोडकर।
सर फिरे और मनचले लोगो के लिए ये रुवाई कैसी रहेगी।-
बुढापा दे रहा है दस्तक सी
जवानी का हिसाब कर ही लू
लडकिया कह रही हैं अक्लजी
सोचता हू खिजाव कर ही लू।
102 शम आनी है मगर
और भी इस तरह की मन्डों रचनाए हमारे यहा है महिला
क्वयित्रियों के लिए खास डिजाइनों में रचनायें हमारे यहा हैं।-
दुनिया भर की पन्नियो नर हो जाजो एक
पति नाम के उन्नु के घुटने डालो टेक
घुटने डालो टेक छुड़ा दो इनरे ठक्के
घुसे घरों में मन घुमने दो मारो उसे
इसके बाद कोई कवियित्री हट नहीं हो जाती । फोग्न आइए
ज्यादा माल लेने पर कुछ छूट हो सकती है। दो बडे लेख खरीदने
पर दो दोहे को दिए जाएंगे। चा जिलों के साथ चार शेरो का
सेट फी । आर आप दस बाइया जीदने का हौसला दिखायें
तो चार हिन्दी चौपाइया यू ही घर बैठे लेकर जायो। मोच
लीजिए घर बैठे गगा बा गई। बगर अब भी न नहाए तो जीवन
भर पछतायेंगे। वच्चे, बूढ़े, कुवारे,व्याहे, विधुर, विधवाए सबके
लिए यहा मसाला मौजूद है। फिर न कहिएगा कि हमे मालूम
न था और हमें किसी ने बताया नहीं। हम तो इस वक्त टोल
पीटकर आपको अफडी के कविता केन्द्र मे बुला रहे हैं । याद
रखिए चोरी की रचनाओ पर मुकदमा भी हो सकता है । हम तो
आपको सरेआम बेच रहे हैं। साथ मे प्रमाण पत्र भी हमारा इन
रचनाओ पर । अब हमारा कोई हक नही है। अब ये आप पर
है कि आप क्या करते हैं। हा इतना जरूर याद रखियेगा कि
जल्दी करनी है आप आज ही बार रचनाए खरीद लीजिए।
भीड से बचने के लिए कतार बना लीजिए, क्योकि हमारे पास
कविताए तो हैं कम और देश में कवि-लेखक हैं ज्यादा।
शर्ममाती है मगर
शर्म आती है, मगर
मैं पहला आदमी नही जो शर्माने के बारे मे कुछ लिख रहा
हू। जब बात शरमाने तक आ ही गई है तो मैं क्यो शरमाऊ-जब
और लोग विल्कुल नही शरमाते। शरमाने की धज्जिया आज
उधेल कर रख ही दू, ऐसा मेरा इरादा है। वस शरमाना कोई
लाभदायक क्रिया नहीं है । अगर आप खाना खाते वक्त
शरमाएगे तो भूखा रहना पडेगा, अगर बस के इन्तजार मे आप
खडे खडे शरमाते रहे तो आपका कोई बस नहीं मिलेगी-
वस तो बस, आप को तो बस का टिकट तक नहीं मिल सकेगा।
हा एक वात है अगर कोई युवती खडी-खडी शरमा जाए तो
टिक्ट की तो बात ही क्या, बस तक जाएगी,लोग अपने मेहनत
से खरीदे हुए टिकट उनको देकर अपना जीवन सार्थक मानेंगे ।
ये तो आपको भी मालूम है कि शरमीला आदमी पिस काम
का। जरा कल्पना करके देखिए, आखो मे सुरमा लगाये, हाथो
मे गजरा पहने, ताली बजाते हुए, मटकता हुआ कोई आपके पास
से ये कहता हुआ गुजर जाये "अए-हए वडे अच्छे लग रहे हो।"
इसलिए ये तो बगैर किसी हिचकिचाहट के कहा जा सकता है
वि शरमाना केवल नारी के चरित्र का महत्त्वपूण गुण है, इसका
आभूपण है । अब ये सब कुछ उसको मूझवृष और कुशलता पर
104 शर्म आती है मगर
निभर करता है कि वो अपनी इस कला का उपयोग किस प्रकार
उचित समय पर करती है । महाकवि कालिदास से लेकर आज
के कवि बालीदास तक और अन्धकवि सूरदास से लेकर सूझते
हुए कवि सूरदास तक नारी के इस शरमाने के गुण पर अपनी
जान छिडकते रहे हैं। अगर कोई जरा सी शरमा जाती है तो
वेचारे कवि या शायर की तो जान पर आ जाती है। जब
कोई मुझे देखकर शरमाती है तो उस समय अपने आपको ससार
का सबसे बेहतरीन आदमी मानने लगता है।
एक बात आपको और वताये, ये कोई मजाक नही है कि
आप ठीक वक्त पर शरमा कर वक्त की नजाकत का फायदा
उठा जायें, कई बार ये तीर गलत समय पर भी तरकश से निकल
जाता है और उस समय की हालत तो वो ही जानता है जो घटना-
स्थल पर उपस्थित हो, क्योकि वो सव तो यथार्थ होता है जिसे
भोगना पड़ता है।
जी हा, जरा-सा मौका चुके नहीं कि ये वला, जान के लिए
वला बन जाती है । इसका भी एक समय होता है, एक अवसर
होता है । मिसाल के तौर पर एक शादीशुदा औरत अगर किसी
पराए मर्द को देखकर शर्मा जाती है तो जाहिर है कि परिणाम
सुखद होने के अवसर कतइ नही हैं। जबकि एक स्टेनो अगर अपने
बॉस से डिक्टेशन लेते हुई शरमाती रहे तो उसके प्रमोशन के
चान्सेज हैं, फ्यूचर नाईट है। इसलिए शरमा कर शरमाने की
कोशिश कीजिए । इतना भी मत शरमाइए कि सामने वाला भी
शरमाने लग जाए और दोनो ही शरमा गए तो फिर शर्म का
महत्व जाता रहेगा क्योकि ऐसी हालत मे शम कोमन हो जाएगी
और खेल-प्रेमी जानते है कि रोल मे कोमन पाइन्ट की कोई
गिनती नहीं होती। शर्म पर वैसे कई देशों ने भी भाषण दिए हैं,
उपदेश बखाने है जो उनके लिए नहीं शर्म के लिए एक शर्म की
शम आती है मगर
।
105
बात है। आदिकाल से ही शायर, लेखक, कवि शरमाने की बात पर पोथे भरते चले आए हैं। अगर कोई गलती से भी जरा मी शरमा जाती थी तो साहित्यकार को बदहजमी हो जाया करती थी और जब तक वो उस पर कुछ न लिख देता, उमे चैन नही मिलता और इसके लिखने के वादही समाज के उस वर्ग को भी चैन मिलता जो दुर्भाग्य से उसका पाठक या श्रोता होता है। आजकल ये सब कुछ आउट आफ डेट हो गया है क्योकि जिनके शरमाने पर साहित्यकार मर जाया करता था, उन्होने शरमाना ही छोड दिया है अव तो वो भी इसका अर्थ यू लेती है शरमा-~ना अर्थात् शरमा मत, शर्म किस बात की और फिर शर्म किमसे और क्या। इनका मानना है कि आज तक जितने भी अपराध हुए है उनके पोछे शरमाने की क्रिया का जवर्दस्त हाथ रहा है। इसके पीछे तो तरन पलट गए हैं, सल्तनतें बदल गई है। नूरजहा जहागीर को देखकर जरा सी शरमाई थी और मुगलकाल के इतिहास का ढाचा ही वदल गया। मगर आजक्ल शर्म कही नजर नही आती पहले तो वो कौडियो के भाव दिखाई देती थी। इसका अर्थ ये नही समझना चाहिए कि अव शर्म का महत्त्व खत्म हो गया या उसके ग्राहक नही रहे । शरमाने पर जान निसार करने वाले लोगो की कमी नहीं है। अब भी किसी के शरमाने पर मर मिटने को बहुत से लोग तैयार है। इस पक्ष को सवल बनाने के लिए एक सत्य क्या आपको बताता हू। हुआ ये कि लडका अपनी होने वाली वधू को देखने के लिए गया। लेकिन लडके ने बजाय उस लडकी के उसकी सहेली कोसलेक्ट कर लिया क्योकि वो उससे अधिक शरमा रही थी। अब ये बात अलग है कि आप अपने जीवन मे कितना शरमाते हैं । अगर नारी मे शरमाने की अदा नहीं है तो वो एक चीराना ही महसूस होगी। वैसे भी अगर और शरमाना छोड दें 106 शम माती है मगर ।
तो शायरी और कवियो का क्या होगा । इससे तो साहित्य का बहुत बड़ा नुकसान होगा इसलिए साहित्य के लिए ही सही औरत को कुछ तो शरमाते रहना हो चाहिए। सफल गृहस्थ जीवन के लिए भी ये आवश्यक है कि पत्नी यदा कदा शरमाती रहे इससे कुछ देर के लिए ही सही पति अपने आपको प्रेमी तो महसूस करें। आदमी महबूबा को इसलिए पसद करता है कि वो शरमाती है, पत्नी नही शरमाती है-~-ये बात अलग है कि महबूवा भी वीत्री बनने के बाद शरमाना छोड दे। जाने क्या बात है, पुरुष नारी के शरमाने के पीछे दीवाना रहता है और चतुर नारिया इस कला का सदुपयोग कर जीवन मे आनन्द की अनुभूति करती हैं । शरमाने पर और अधिक क्या कहू, आप भी शायद सोच रहे होगे मैं भी कितना वे शर्म है। मगर ऐसी बात नहीं है, शर्म तो मुझे भी आती है मगर सिफ बुरे कामो से। । शर्म आती है मगर 107
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