Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Soindarnandan Mhakavyam
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विषय-सूची
पृष्ठ
१-१६
विषय
१. भूमिका
२ पाठ्यांश
३ टिप्पणी
३६-४०
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भूमिका गौन्दर नटवाव्य के लेखक यीस उपशा, प्राचार्य प्रार मन्यागी महाकवि अश्वघोर है । इस फाय की दो ही प्राचीन हस्तलिखित प्रतियाँ यता उपलब्ध हुई है। दोनों ही बुटिपूर्ण तथा होनारया में साहीत है । इनो ग्राधार पर शुभ और कहीं कहीं पूरा पाट निश्निा परना समय मा है। सर्व प्रथम म्याय मा महोपाध्यार ५० हर प्रमाट शास्त्री ने इन प्रतियों के आधार पर इस दाव्य को मरादित करके ११.३० में प्रकाशित करवाया ग। इसके पश्चात् यूगेर के नाम मुघोग्य विद्वानों ने भी मक्लना पूर्वक 'नक स्यों के पाठों का सम्मान किया । मन् १६२८ ई. में मूलप्रतियों के प्राचार पर तथा मुद्रित सागरण पौर विजनी में नुमारे पाठ मुमारी का योग मरते हुए स्वीर डा० सोरटन ने हर काम का एक सुन्दर सपना निवाला । प्रस्तुत नुर्य मर्ग में हसीनुमा रिया गया गान्टर नन्द पाच्य सस्कृत में लिता गया । इसमे बुद्धम्या का पर्णन है। द की जीरनी और निदान से सम्बंधित प्रश्वप ने टो बगर लिग है, एक तो मन्तुत कापात पीर दगरा वृद्ध-नरित । पति के टोनों ही पाय एक दूसरे पूरक हैं। कपिल नाम निमार, रिम जर मी वा नति में नहीं है, परन्दर नन्द' ६ प्रगम सर्ग में fruary में नगि । उनी भनि पावर शासनसनी ? रनिकी TA । ही मानिनी को दन्ति प्रयन सार रागी में कि, मोन्टर मार नीमगारग में nि नया निमें नन्द की मार, jि २६ मा रवित। मोटर दो. रामगारात काम,दिग्नि र पर कि 2 दिन 115 टर नट २) १६/१७ की दूसरी पक्ति में ससार के मिथ्या कारणों की गणना मात्र की गई है, किन्तु बुद्ध चरित के अष्टादशम सर्ग में इनकी विस्तृत व्याख्या है। यद्यपि "सौदर नद" का सम्बध बुद्ध कथा से है तथापि इसका वास्तविक विष्टय बुद्ध के मौसेरे और सौतेले भाई "सुन्टर' उपनामधारी अत्यन्त मुन्टर 'नन्ट' का धर्म परिवर्तन है प्रस्तुत काव्य कपिल वस्तु की स्थापना के वर्णन से प्रारंभ होता है। जिसमें अश्वघोष को अपने वीरकथाओं और पुराण कथानों के विशाल शान को प्रदर्शित करने का पर्याप्त अवसर उपलब्ध हुआ है । द्वितीय सर्ग में राजा शुद्धोदन का वर्णन है सवार्थ सिद्धि और उसके सौतेले भाई नन्द की कथा सूक्ष्मरूप से वर्णित है। तृतीय सर्ग में बुद्ध का विशद वर्णन है । चतुर्थ सर्ग में नन्द की स्त्री रूपवती सुन्दरी के दिव्य सौन्दर्य का तथा उसके और नन्द के निशाच न्द्र योग का वर्णन किया गया है । इसी में तथागत के नन्द गृह से खाली हाथ लौट जाने पर तथा नन्द के द्वारा श्राधेमन से उनका अनुगमन करने का वर्णन है। सुन्दरी से नन्द की विदा का वर्णन नन्द की विकावेला की द्विविधा तथा उस युगल के प्रेमबन्धन का सफल चित्रण है । पचम सर्ग में बुद्ध शीघ्रत पूर्वक नन्द को यौद्ध भिक्षु के रूप में उसकी अनिच्छा होते हुए भी दीक्षित कर देते हैं। षष्ठ सर्ग में नट-जाया सुन्दरी का विलाप वर्णित है । सप्तम सर्ग में प्रियानुरक्त नन्द अनेक अनुरूप गाथात्रों द्वारा प्राचीन नरपतियों द्वारा संन्यास त्याग कर गृहस्थ जीवन के आनन्दोपभोग का वर्णन करते हुए नन्द सुन्दरी के प्रति अपने लगाव का पोपण करता है । अष्टम सर्ग मे स्त्रियों के दोष उनके चाटु वचन और क्लुपित हृदय का वर्णन करके न ट के हृदय परिवर्तन का प्रयत्न किया जाता है। नवम सर्ग में प्राचीन वीरो के उदाहरण द्वारा नद को अहङ्कार के टोपों को बताया गया है कि तु इस सघ का उस पर कई असर नहीं होता । दशम सर्ग में बुद्ध साहसपूर्ण विनियोजन के द्वारा नन्द को स्वर्ग में ले जाते हैं और मार्ग में उसे हिमालय प्रात में एक भद्दी एम्नेत्रा नारी को दियाएर उममे पूछते है फि का मु दरी इस वानरी से अधिक सुटर है । नद उन्मादपूर्वक अपनी पत्नी के प्रिय-दशिव की स्थापना करता है । किन्तु स्वर्ग में "अप्सरायों को देखकर यह मोहित हो जाता है और अप्सरानों को मुदरी मे उतनी ही सुटर पतलाता है जितना कि बागरी मे मुदरी और इस प्रकार अपनी माया के शिगिन दोनने पर एक अप्सरा में परिगाय करना चाहता है। अप्सरा ऐसे ही नदी प्राप्त हो सस्तो उसके लिए शुभको मे ग्वर्ग को प्रात परमा प्रावश्यक है अतः नवम सर्ग में बद इस लक्ष्य के लिए उद्योग करता है तथागत का गिय प्रान ट ठगे अनेक उदाहरण देकर उमको सचेत करता है कि रान पुन म्यागा :- पुग योगा होने पर रहीं में पुनः पृषी पर लौटना पाता है । द्वादश मर्म में पागदशम मर्ग तक नाद के हदय परिवर्तन पोर उसने उदार सो पया है । अनुगेर गरने पर नन्दा मन वर्ग के गुम्न में हट जाता है और वह घर से उपटेम सागा एग्दा है । वह वन मिनु नहीं Eजाना पार पद्धनिज मे फेवन गयनो निर्वाण-प्रालि ही नहीं राग जाना परन गई साधारण योनि प्राप्ति साधन उपदेश पाने सामगन हम कह गए ने है मोगर माई होने दुप मी सिदार्थ श्रीर नद प्रारम में ही मिल मानिने छ । मिसाई पचपन में ही समार में निगार मग ने पनि निमा भाव को पोषित पिधे । मेरा मेगा पर होंने अपने योग में पदस्त एर परम गान प्राप्त किया। मग पोर न पारम में ही जगमीन नथा गमामा थे। कामवासना में ५६ मे नया र ३ग्ने लिए टन जिय गगन दिसे मान, पग उमीदा मन में नद - मा नो मनका मानर, भारमिनार मराफर 33. . प.यकीन पारनिदान ।
( ४ ) में निर्देश मात्र है । विषय के इतने सूक्ष्म होने पर मी अश्वघोष ने इस विषय को लेकर एक महाकाव्य की रचना की, यह उसकी कवित्व शक्ति और काव्य-रचना-कौशल का परिचायक है । काव्य के प्रारम्भिक माग में उचित काव्य उपकरणों की सहायता से इस गाथा को बढाया गया है और उत्तर माग में कवि ने अपनी धामिक धारणा एव विचार को काव्य मय अभिव्यक्ति की है । प्रथम छ सों में कपिलवस्तु को स्थापना, इसके राजा, बुद्ध और नन्द का जन्म, नन्द का उसकी पत्नी सुन्दरी के प्रतिप्रेम नन्द का बाध्य होकर भिक्षुत्व ग्रहण, नन्द का अन्तर्द्वन्द्व और सुन्दरी का विलाप यह सब काव्य शैली मे अत्यन्त कौशल से वर्णित है और वर्णन सौन्दर्य से समलकृत है। सौन्टरनन्ट के उत्तर भाग में वर्णन और कयानक नन्द के स्वर्गारोहण और अप्सरासक्ति के अतिरिक्त अधिक मात्रा में कहीं भी नही हैं। इस काव्य कृति के अन्तिम विभाग (सर्ग १३-१८) में सुलिलत वाणी में बुद्ध के धर्म का सुन्दर व्याख्यान किया गया है जिसका साराश अघो- लिखित है। आर्य सत्य चार है- १ दु ख २ इसका कारण, ३ इसका विनाश और ४ दुख-विनाश का मार्ग । दुख जन्म और सासारिक प्रवृत्ति के साय साथ है । यह दो प्रकार का है (१)शारीरिक (२) मानसिक । रोग, वाधक्य, क्षुत्पिपासा, शीतोष्मा श्राटि शारीरिक व्याधियाँ हैं और शोक, अरति, क्रोध, भयादि मानसिक दुःख । इन दोनों प्रकार के दुखों का कारण जन्म और तृष्णा ग्राटि समूह जन्म का कारण । तृष्णादि वर्ग को समल नष्ट करके ही दुस से मुक्ति हो सकती है। दुख विनाश होने पर ही निर्वाण प्राप्ति हो सकती है। इसकी प्राप्ति के पश्चात् मनुष्य जन्म, जरा श्राधिव्याधि, अप्रिय-सयोग,प्रिय-वियोग, मृत्यु श्रादि से सटा के लिए मुक्त हो जाता है। यह कल्याणकारी पट है जो नैष्ठिक और अक्षय । यही अमृतपट है जो श्रष्टाहक मार्ग का अनुसरण करने से प्राप्त होता है। दम मार्ग के आठ ग्रह है।
१ गम्गक वागी-गृतं गगटन न रधि-
इतमापि नजरूप नाप्रिय ।
पलक्ष्णमपि नन अगादित
रितमप्युरान न न पैशनार यत् ।।
• सम्यक कर्म- न जिदिग समाप में नुमपि
परवोपजीविन ।
वित विश्ल गुग सदर
मटा दिन मुनेकपामया ॥
শায়ী হনৗsবি
पम्पम्भिवामदोपि मन् ।
नान्न धनमपनदार तगा-
जगादिवान्यविमवादि किया।
विमतानिनोऽपि नरगोऽपि
शिरय पहियोऽपिमन ।
न च पादानी मगमगार
हिता नतोऽयमग्न ।।
३. मार कापिका-र माननों द्वारा जीवन गापन ।
मरपि-दातिर मगों का गस्नानक न ।
मम पित। -पवार ।
६. मग प्रयान--पमानिनामा निगम नौ मदिचा सपोर।
मगर पनि-गारिक मानमिर दायाँपनि गरा।
समामाथि-मान, मानसिप
मार नागौर करणाने । गीतको भिदिनों
(म, ग, म, 1 ) 17 नाम नी पाने सम्पर
नानीलाई मनन का निमः
दिन माना।
A" Rit
।
( ६ ) उक्त अष्टाङ्ग मार्ग पर चलने के लिए ऋजुता, धैर्य, सारख्य, ही, प्रमादहीनता, एकान्त, अल्पेच्छता, सन्तोष, अनासक्ति, सांसारिक प्रवृत्ति में अरुचि और क्षमा की आवश्यकता होती है.- अस्योपचारे धृतिरार्जव चहीरप्रमादः प्रविविक्तताच । अल्पेच्छता तुष्टिरसगता च लोकप्रवृत्तावरति क्षमाच ॥ (१६।३८) सक्षेपत. कहा जा सकता है कि दुःखमुक्ति की प्राप्ति के लिए सदाचार एव आत्यन्तिक मन शुद्धि की परमावश्यकता है। योगाम्यास मी इसी का नाम है। मानसिक एकाप्रता आदि के लिए जो शील, इन्द्रियसंयम परिमित भोजन, अल्पनिद्रा, एकान्तसेवन श्रादि उपायों का निर्देश किया गया है वह मुमुनु योगाभ्यासी व्यक्तियों के लिए तो श्रावश्यक हैं ही अपितु अाधुनिक जीवन क्षेत्र में कर्मनिरत जनसाधारण के लिए मो उनका उपयोग है। षोडशम सर्ग के अन्तिम छ. श्लोकों में उद्योग के सम्बन्ध में प्रेरणापूर्ण सुन्दर व्याख्यान है जिससे कोई भी सांसारिक व्यक्ति लामावित हो सकता है। द्रव्य यथा स्यात्कटक रसेन तच्चोपयुक्त मधुर विपाके। तथैव वीर्य कटुक श्रमेण तस्यार्थ सिद्धय मधुरो विपाक: वीर्य पर कार्यकतो हि मुल वीर्याहते काचन नास्ति सिद्धिः । उदेति वीर्यादिह सर्वसपन्निवार्यता चेत्सकसश्च पाप्मा । अलब्धस्यालामो नियतमुपलन्धस्य विगम- स्तथैवात्मावा कृपणमधिकेन्य परिभवः । तमो निस्तेजत्व ध्रुतिनियमतुष्टि व्युपरमो नृणां निर्वीयाणा भवति विनिपातश्च मदति ।। नय श्रुत्वा शक्को यदयममिवृद्धिं न लभते । पर वर्म हावा यदुपरि निवास न लमते । गृह त्यक्त्वा मुलो यदयमपशान्ति न लमते : निमित्त कौमोघ मवति पुरुप स्यारनरिपु. ।।
( 3 )
नवोन्माही यदि रानति नां वारि लपका
मा च्यामनन् बलनमामि या जनयति ।
वाला योगे तु अवमुपलमन्ने समफल ।
इन निन्य यानगो शिरिमपि - मिन्दन्ति गरिन ।,
एका गा परिपाय १ मतैरनानि सस्यमिय:
गनेन गिगाामानाजत नथिया मानि
गमवाय बामियभित नरे-दक्षिय
तदनीय मातये विनिग्त चीहि गम ॥
"जिस प्रकार त्य विसर पा रस बना होता है और उसका उपयोग
मने पर मोठा फल मिलता है मप्रकार यावट के कारन उद्योग स्ट
(परमर गीर अनिए ) होना है, पिन लवर की मिमि होनाने पर मोटा
ख मिलता है।
गरी मफलता ग ल फार है चार उद्योग, उद्योग में गि
'नाई मी सिद्धि नहीं होती है, ज्योगही गर ममृदियों उदय होता
है, सौर जहाँ सपोग नहीं है हाँ पाप की प है।
गनुयोगी मनु-यों को निश्चय ही पाप दस्त्यो पी प्राप्ति नही
और हन पान दस्तुत्रों का मो नाग हो जाता है, उनका आम
सम्मान पला जाता है, न न हो जाने है, रवाने में प्रमानित
होते है, मानगिक पसार र नरा नदीप हो जाना , दिया,
ममम तौर संतोर ना हो जाता है. (गर ) नवा पतन
शोमा
सहि माय उपाय पुर पनी म ,
राम धर्म गुनहर पर शनिवार ( १८ ) जो नहीं पाप का
trgi लिए परम शाकाजीको नाक
HTTER ना ही वापरयन (n) |
विना मगरने या प्रातरादा.
Pा एमाग if ज्न्द एटा
योगाभ्यासी पुरुष अवश्य अपने परिश्रम का फल प्राप्त करते है और निरन्तर द्रुतगति से बहने वाली नदियाँ पर्वत को भी फोडती हैं । भूमि को जोतकर और अत्यन्त परिश्रम-पूर्वक ( खेत की) रखवाली कर मनुष्य उत्तम शस्य प्राप्त करता है, प्रयत्न पूर्वक समुद्र के जल में प्रविष्ट होकर वह उत्तम रत्न-राशि से क्रीड़ा करता है, तीरों से शत्रुओं के उद्योग को निष्फल कर वह राज-लक्ष्मी का उपभोग करता है, अत. शान्ति प्राप्त करने के लिए उद्योग करो क्योंकि उद्योग में ही सब समृद्धियों का निवास है।" इस प्रकार नन्द ने युद्ध के उपदेश सुनकर बाचरण किया और क्लेशों पर विजय प्राप्त की। ध्यान करके अर्हत्व ( जीवन्मुक्ति ) प्राप्त किया । उनको श्रौत्सुक्य मय, श्राशा शोक, मद, स्नेह और राग से मुक्ति मिली, द्वद्वातीतत्व की स्थिति प्राप्त की उन्होंने अत्यन्त आनन्द और परम शान्ति का अनुभव किया । कृतकृत्य होकर जब उन्होंने गुरु बुद्ध से प्रत्युपकार का उपाय पूछा तो गुरु ने बताया इहोत्तमेभ्योऽपि मत. स तूत्तमो य उत्तम धर्ममवाप्यनैष्टिक । प्रचिन्तयित्वात्मगत परिश्रम शम परेम्योप्युपदेष्टुमिच्छति ॥ विहाय तस्मादिह कार्यमात्मनः कुरुस्थिरात्मन्परकार्यमप्यथो । प्रमत्सु सत्वेषु तमोवृतात्मसुश्रुतप्रदीपो निशि धार्यतामयम् ॥ वही मनुष्य उत्तम है, जो अपने परिश्रम की चिन्ता न करता हुआ दूसरों को मी शम धर्म ( शान्ति ) का उपदेश देता है। अतएव हे स्थिरा- स्मन् , अपना कार्य छोटकर दूसरों का भी कार्य करो । श्रमानतिमिराच्छन्न प्राणियों के समूह में इस ज्ञान प्रदीप को धारण करो" चतुर्थ सर्ग का स्थानक - "सौन्दरनन्द' महाकाव्य के इस सर्ग का नाम "मार्यायाचितक" ( पत्नी की अनुमति ) है । इसमें नन्द और उसकी पनी सुन्दरी के पारस्परिक राग का वर्णन करते हुए तथा बुद्ध के प्रभाव के कारण नन्द और सुन्दरी के अन्तद्वन्द्व का चित्रण करके महाकवि ने नन्द के मोनमार्ग में प्रवृत्त होने के प्रथम सोपान को अपनी भार समृद्धि तथा का य -
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( १ ) - । किया है । यह काव्य विदर्म शैली में लिखा गया है । 'बाण' के अनुसार इस शैली का उद्देश्य काव्य विषय का पूर्ण अभिव्यञ्जन है, परवर्ती कवियों की मांति अलकार ही नहीं है। अश्वघोष का उद्देश्य सर्व साधारण में त्याग और वैराग्य का सदेश पहुँचाना था तथा बुद्ध धर्म का प्रचार करना था। सर्व साधारण पाण्डित्य की सराहना करने में असमर्थ होता है । अत अश्वघोष ने कथा, वर्णन, उपदेश के लिए ऋजु काव्यशैली का सहारा लिया है । यह शैली स्पष्टतया, स्फुटता, और शालीनता से सम्पन्न है । परवर्ती और किसी अ श तक पूर्ववर्ती कार्यों की तुलना में भी अश्वघोष को शैली श्राकर्षक एव सरल है। इसमें कृत्रिमता की अपेक्षा स्वामाविकता की मात्रा अधिक है जो सीधी हृदय को प्रभावित करती है। कालिदास की अपेक्षा मी अश्वघोष की शैली सरल है। छोटे छोटे समास हैं जिससे विग्रह करने का अधिक कष्ट नहीं होता । चार शब्दों से अधिक के समास अत्यल्प सख्या में हैं । कहीं कहीं तो समास है ही नहीं। कवि ने उपमानों के सहारे ही जटिलतम बौद्ध सिद्धान्तों को अद्भुत सरलता एव स्पष्टता से समझाया गया है । यथा.- दीपो यथा निर्वृतिमम्युपेता नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्ष । दिश न कांचिद्विदिश न कांचिरस्नेह तयात्केवलमेति शान्तिम || एव कृती निवृतिमभ्युपेतो नैवावनि गच्छति नान्तरिक्ष । दिश न कांचिद्विदिश न काचि त्वलेशनया केवलेमति शान्तिम् ।। (सौ १६/२८-२६) उन्होंने सस्कृत और पाली साहित्य, लोकजीवन और उपमायों का चुनाव किया है । सामान्यत उनकी उपमायें सुन्दर और उपयुक्त है। उपमा के अतिरिक्त अश्वघोष ने 'दीपक' अलङ्कार का भी अनेक स्थानों पर प्रयोग क्यिा हे | यथा श्रवेदी बुद्धिशास्त्राम्यामिह चामुत्र चैतम । परक्षीदर्य वीर्यास्यामिन्द्रियाण्यपि च प्रजा ॥ ( मौ ०/१५) - - (१३) और मी अनेक अलङ्कारों का उपयोग मिलता है। किन्तु कालिदास ने जिस अर्थान्तरन्यास का स्यान स्थान पर प्रयोग किया है वह प्रश्ववोप की रचनात्रों में दू दने से ही मिल सकता है । "सौन्दरनन्द" में अनेक प्रकार के 'यमक' के उदाहरण उपलब्ध होते है। चतुर्थ सर्ग में हो अनेक उदाहरण उपलब्ध होते हैं । यथा छातोदरी पीनपयोधरोरु स सुन्दरी रुक्मदरीमिवाद ।। फाण पश्यन्न ततप नन्दः पिबनिवेकेण जलकरेण ॥ तत क्रमैर्वितमै. प्रचक्रमे कयनुयातो न गुरुर्भवेदिति । स्त्रजेय तां चैव विशेपकनिया कथं प्रियामा विशेष कामिति ।। ६/४६ तथा १०/५६-५७ के प्रत्येक पाद में यमक है। कहीं कहीं तो सम्पूर्ण श्लोक को हो प्रावृत्ति हुई है। जैसे पूर्व उद्घ त सौन्दरनन्द के १६ सर्ग के २५-२६ वें श्लोकों में । 'सौन्दरनन्द' में अनेक प्रकार के छन्द व्यवहत किये गये हैं। कुल १०६३ पद्यों में से ३८४ श्लोक और ४५६ उपजाति छन्द है । वशस्य, शिखरिणी यादि अन्य छन्दो का भी प्रयोग किया है। विद्वानों का मत है कि सप्तम सर्ग का अन्तिम पथ ( जो नीचे उद्धत है ) 'मन्दाक्रान्ता' का पूर्वरूप है। इसी का उपयोग करके कालिदास और हरिपेण या महाकवि फालदिास या दोनों ने ही अलग अलग 'मन्दाक्रांता' का आविष्कार किया होगा। तस्मादिक्षार्थ मम गुरुरितो यावदेव प्रयात- स्याश्वा कापाय गृहमहमित स्तावदेव प्रयास्ये। पूक्ष्य लिङ्ग हि स्खलित मनसो विम्रत क्लिष्टबुद्ध- नामुत्रार्थः स्यादुपहतमतेर्नाप्पय जीवलोकः । चतुर्थ सर्ग में उपजाति छन्द है । महाकाव्य के नियम के अनुसार अत में छन्द परिवर्तन किया गया है। सामान्यत यश्वघोष ने व्याकरण के नियमों का पालन किया है। सौन्दरनन्द के बारहवें सर्ग के नवम दशम पद्य में उपमा द्वारा व्याकरण के नियमों का उसख किया गया है- - ( १४ ) वभूव स हि सवेग यसस्तस्य वृद्धये । धातुरेधिरिवाख्याते पठितोऽक्षर चिन्तकै नतु कामान्मनस्तस्य केन चिज्जगहे धृति त्रिघुकालेषु सर्वेषु निपातोऽस्तिरिव स्मृतः उक्त दशम श्लोक में लिखित नियम पाणिनि के व्याकरण में नहीं है । ऐमा प्रतीत होता है कि प्रश्वघोष ने भी मौन्दरनन्द में यत्र-तत्र काव्य के माध्यम द्वारा व्याक या की शिक्षा दी है। द्वितीय सर्ग में "लु' का अत्यधिक प्रयोग किया गया है। छठे सर्ग के अकेले चौतीसवें श्लोक में 'लिट्' के बारह रूप दिये गये हैं । श्लोक नीचे उधृत है- रुरोद मम्लौ विकराव जग्लौ बभ्राम तस्थौ विललाप दध्यो । चकार रोप विचकार माल्य चकर्त वक्त्र विचकर्प वस्त्रम् ।। दशम सर्ग के प्रथम श्लाक में अनेक मन्नन्त प्रयोग हुए हैं । समापिका क्रिया के भी प्रचुर प्रयोग मिलते हैं। भूतकाल के लिए 'लट ' 'लुट' और 'लिट् के प्रयोग में कोई अन्तर नहीं किया गया है। सारी पुस्तक में 'लिट्' का चारमो साठ वार 'लुङ' का ११८ वार एव 'ड' का ३८ बार प्रयोग हुआ है । कारक विमक्ति समास, क्रिया श्रादि के प्रयोग में अनेक स्थलों पर व्याकरण सम्मत प्रयोग से भिन्नता पाई जाती है । हो सकता है इसका कारण पाठदोष हो हो, किन्तु इसका समर्थन रामायण और महाभारत में भी मिलता में है । सज्ञात्रों के मी कुछ विचित्र मेद मिलते 'वर्षः प्रकोष्ठ' 'नपु सक लिङ्ग' तथा 'मित्र' पुलिङ्ग में प्रयुक्त हुए हैं । 'मंत्र' या 'मैत्री' के स्थान में 'मैत्रा' शब्द का प्रयोग किया गया है। मोन्दरनन्द की तिथि के विषय में अनेक मत हैं, जिनमें दो मुख्य हैं । एक मत के अनुसार रचना-कौशल की दृष्टि से सौन्दरनन्द बुद्धचरित का परवर्ती प्रतीत होता है। क्योंकि काव्य कला की दृष्टि से सौन्दरनन्द बुद्धचरित मे सुदर है। यह कवि की प्रौढ रचना है । अत मम्मवत यह बुद्धचरित मे पीछे लिखा गया है । दूसरा मत कीथ का है जिमके अनुसार सोन्दरनद को युद्ध नरित का पूर्ववर्ती गाना गया है । मौन्दरनन्द के अ त में कवि ने ( १५ ) जाता स्पष्ट घोषणा की है कि चूंकि जन साधारण ससार सुख में अधिक प्रानंद लेते हैं और मोक्ष की परवाह नहीं करते इसलिए उसने धार्मिक तथ्यों को काव्य का वाना पहना कर उपस्थित किया है । कि यहाँ पर उसने इस प्रकार के किसी पूर्ववर्ती काव्य का उल्लेख नहीं किया है । घत. यह उसकी पहली ही रचना प्रतीत होती है। इन दोनो मनों में प्रथम मत हो तर्क सम्मत प्रतीत होता है। अश्वघोप की तिथि के विषय में हम इदमित्य कुछ नहीं कह सकते ) धाम एव अन्त माक्ष्य के श्राधार पर इतना अवश्य विदित होता है कि ये कवि, उपदेशक, घाचार्य, और सन्यासी थे, और साकेत के निवासी थे। सौन्दरनन्द के अन्त में निम्नलिखित वास्य इस कथन के प्रमाण स्वरूप उद्धृत किया है, "प्रार्य सुवर्णातीपुत्रस्य सातकस्यमिदाराचार्यस्य मदन्ताश्वघोपस्य महाकर्महावादिन ऋतिरियम्" । किंवदन्ती है कि इनका जन्म ब्राह्मण कुल में ही हुआ था और प्रारम्भ में उनको ब्राहाण धर्म की ही शिक्षा-दीक्षा भी मिली थी । सौटरनन्द के अठारवं सर्ग के ५८ वें श्लो के द्वितीया/श- "अहो बताश्चर्यमिदं विमुक्तये करोति रागी यदय कयामिति' को देख कर हम कह सकते हैं कि अपन पार भिक जीवन में अश्वघोप विषय- भोगासक्त रहे होंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने बाद में बौद्धधर्म की दीक्षा ली और सन्यासी होगये । यही कारण है कि धर्मदीक्षा का विषय उन्हें अत्यन्त प्रिय था उनकी अन्य कृति "शारिपुत्र प्रकरण' का विषय मी धर्मदोता ही है। वे मध्य देश में भ्रमण करते हुए धर्मोपदेश करते थे और इसी निमित्त इन्होंने काव्यरचना की। कि श्रारम्भ में उन्हें ब्राह्मणधर्म को शिक्षा-रक्षा मिली थी अत: उनको रचनाओं पर रामायण महामारत का पर्याप्त प्रमाव लक्षित होता है । धार्मिक अन्धों के अतिरिक्त उन्हें अन्य शास्त्रों का भी पर्याप्त ज्ञान था। उनकी रचनायें कामशास्त्र, राजशास्त्र, दण्डनीति सांख्ययोग यादि से प्रभावित है। वे काव्य व्याकरण और छन्द शास्त्र में पर्याप्त मात्रा में निष्णात थे। मौद्ध धर्म की दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात् उन्होंने बौद्ध ग्रन्थों का गम्मीर अध्ययन किया और बुद्ध के मौलिक उपदेशों को श्रात्मसात् -- . ।
( १६ ) किया। वे स्थविरवादी और हीनयानी थे। हीनयान के अन्तर्गत सर्वास्ति- वादी या सौत्रान्तिक थे। उनका आदर्श अर्हत् ( जीवन्मुक्त ) था । कोथ का कथन है कि उन्होंने पहले बौद्धमत के सर्वास्तिवाद सम्प्रदाय को ग्रहण किया किन्तु पीछे महायान मत के अग्रणी बन गये । अश्वघोष कालिदास और मास के पूर्ववर्ती थे । ये सर्व प्रथम महाकाव्य रचयिता थे। इन्होंने बुद्धचरित के श्रतिम सर्ग में अशोक के धर्मानुराग का उल्लेख किया है। इससे स्पष्ट है कि वे अशोक (२६५-२११ ई० -५०) के बाद हुए होंगे । उनके इसी ग्रन्थ का चीनी अनुवाद पाचवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हुआ था प्रत. वे इस से पूर्व हुए होंगे। परम्परानुसर उन्हें कनिष्क का उपजीव्य माना जाता है। कुछ भी हो वे श्राज से प्राय. दो हजार वर्ष पहले हुए थे | डा० लाहा के अनुसार मी 'अश्वघोष को प्रथम शताब्दी पूर्व रखना उचित है। रचनाशैली के प्राधार पर भी यही मत सही प्रतीत होता है । काव्य विकास की दृष्टि से अश्वघोष वाल्मीकि के बाद और कालिदास के पहले आते हैं । काव्य में वाल्मीकि के ऋणी हैं तो कालिदास उनका ऋणी है । अश्वघोष ने अपनी कृतियों में वाल्मीकि को प्रादिकवि और श्रीमान कहकर सबोधित किया है और इस प्रकार उनके प्रति श्रादर का भाव व्यक्त किया है। 'बुद्धचरित' में रामायण की कथा से उदाहरण लिए गये हैं । भाव, माषा, उपमानों और अन्य अलङ्कारों में अश्वघोष की रचनाओं पर "रामायण" का प्रमात्र स्पष्ट लक्षित होता है "सौन्दानन्द" की क्था मी रामायण की कथा की भाँति ही प्रथित की गई है। किन्तु अश्वघोप में नवीनता के दर्शन मी होते हैं । इस नवीनता का विकास इनके परवर्ती काव्यों में हुआ है । "रामायण" के श्लोक अर्थ और व्याकरण की दृष्टि से एक दूसरे से सयुक्त हैं, परन्तु अश्वघोष के श्लोक प्राय इस दृष्टि से पृथक इकाई के रूप में हैं । इनमें छन्दों की विविधता दूसरी नवीनता है । इसका कारण सम्भवत इनके पूर्वववी वे काव्य है जो उनके समय में रहे नॉग और पबि लुप्त होगये ।
( १७ ) . । अश्वघोष और कालिदास को कृतियों में कितनी ही समान और समनार्थक शब्दावलियों और पक्तियाँ मिलती हैं । इनमें से सम्मत्रत कुछ कालिदास की सूझ हैं, कुछ को जानकर या अनजान में लिया गया है और कुछ कालक्रम से लुप्त मध्यवर्ती कायों से ली गई होंगी। श्रत हम कह सकते बहुत सी समानतायों के सम्बन्ध में कालिदास अपने इस पूर्ववर्ती कवि के ऋणी है अश्वघोष और कालिदास की समानताओं की तालिका नीच उदत की जाती है।- अश्वघोष कालिदाम at सुन्दरी चेन लमते नम्ट परस्परेण स्पृहणीयशोम सा वा निषेवेत नत नतभ्र न चेदिद द्वन्द्वमयोजयिप्पत् । द्वद ध्रुव तद्विकल न शोमे- अस्मिन्वये रूप । विधान यन तान्योन्यहीनाविव रात्रिचन्द्रौ।। पत्यु प्रजानां वितयोऽमविष्यत् ॥ सौ०-४/७ कुमा ७/६६ त गौरवं बुद्धगत चर्ष मार्गाचल व्यक्तिकरा- मार्यानुराग पुनराचकर्ष । फुलितेव सिन्धु । सोऽनिश्चयानापि ययौनतस्यौ तर स्तर गेप्विव राजहस ॥ न ययौ न तस्थौ ॥ कुमा. ५/८५ हतत्विषोन्या शिथिला समाहव निशीथदीपा सहसा इतत्विषो स्त्रियो विपादेन विचेतना इव || मभूवुरालेख्य समपिता इव ॥ बु च. ८/२५ रघु ३/१५ प्रादित्यपूर्व विपुल कुलते । एकातपत्र जगत प्रभुत्वं । नव वयो दीप्तमिदं वपुश्च ॥ नव वय कान्तमिद वपुश्च ।। बु. च १०/२३ रखु. २/४७ मोक्ष अम नाईति मार कतुम् । अल महीपाल तव श्रमेण । बु च. १३/५७ रघु २/३४ प्रमदामनागतिर्न विद्यते। मनोरथानामगतिर्न विद्यते । कुमा. ५/६४ शैलाधिराजतनया सौ. ४/४२ सौ ८/४४ .
( १८ ) सौ १६/१७ कालिदासेतर कवियों ने मी अश्वघोष पद्य अपनी रचनात्री में उद्धत किए हैं । वाण ने उनसे उपमार्य ग्रहण की हैं और मातृचेट और पार्यशर मी इस कवि से प्रभावित हुए विना नहीं रह सके । नीचे की तालिका से उपनिषद और "सौन्दरनन्द" की समानता लक्षित हो सकेगी उपनिषद् सौन्दरनन्द कालस्वमावो नियतिर्यदृच्छा प्रवृत्ति दुखस्य च तस्य लोके भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्यम । तृणादयो दोषगणा निमित्तम् । सयोग एषां न त्वात्मप्रभा वात् नैवेश्वरो न प्रकृतिन कालो श्रात्माप्यनीश सुखदु खहेतो ॥ नापि स्वमात्रो न विधिर्यदृच्छा। -श्वेताश्वतर उप १/२ म यदा शकुनि सूत्रेण प्रबद्धो सूत्रेण बद्धोहि यथा विहङ्गो दिश टिश पतित्वान्यत्रायतनम- व्यावर्तते दूरगतोऽपि भूय । लब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत । अज्ञानसूत्रेण तथावबद्धो छा ३०/ गतोऽपिर पुनरेति लोक ॥ सौ ११/-8 "भगवद्गीता" " से भी अश्वघोष प्रमावित । भगवद्गीता में १८ अध्याय है तो सौन्दरनन्द में १८ सर्ग है । गीता में जिस प्रकार कर्तव्यपथ से विचलित अर्जुन को श्रीकृष्ण अपने उपदेश द्वारा सीधे मार्ग पर लाये हैं तो "सौन्दरनन्द" में बुद्ध ने कुमार्ग में प्रवृत्त नद को सत्पथ का पथिक बनाया है। दोनों में ही गुरु शिष्य सवाद हैोर शिप्य गुरु का मक्त और शरणागत है । सौन्दग्नन्द के "कर्मयोग" 'अम्यासयोग," “इन्द्रीयाणीन्द्रियार्थेभ्य" पद अश्वघाप पर गीता का प्रमाव स्पष्ट प्रदर्शित करते है । सौन्टरनद के १४ वे सर्ग के अधिकांश भाग में गीता के अघो- लिखित दो श्लोकों की विस्तृत व्याख्या की गई है नात्यग्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नत । न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव गर्जुन ॥
( १६ ) युक्ताहार विहाराय युक्तचेप्टत्य कर्मसु । युक्तस्वप्नाव बोद्धस्य योगी भवति दुखहा ।। उक्त समान सादृश्य, समानता तथा समानार्थकता का कारण अश्वघोष की भारम्मिक शिक्षा दीक्षा है। किन्तु इसमे यह नहीं समझ लेना चाहिये कि उन्होंने अपने काव्यों में किसी बौद्ध तर धर्म का व्याख्यान किया है। अपनी शिक्षा दीक्षा का तथा पाण्डित्य और सस्कार का प्रमाव तो रहता ही है और वैसे मी बौद्धधर्म मिन्न जातीय नहीं है । जैसा कि ऊपर प्रकट किया जा चुका है सौन्दरनन्द काव्य सर्वसाधारण के लिए लिखा गया है और इसमें सर्वसाधारण की मान्यतानों, मनोविकारों, मचि आदि का पर्याप्त ध्यान रखा गया है । इसमें कवि पाठक को प्रय से श्रेय की ओर प्रय मार्ग द्वारा लेजाना चाहता है। विधाता ने इन्द्रियों की वहिमुख प्रवृत्ति रची है इमो को लक्ष्य करके अश्वघाप ने सौन्दरनन्द में लालित्य का वर्णन है । प्रत इस काव्य को और विशेषत चतुर्थ सर्ग को पढते समय काव्य के अंतिम श्लोक ( जो नीचे दिया गया है ) का अवश्य ध्यान रखना चाहिये। प्रायेणा लोक्य लोक विषयरतिपर मोवात्प्रतिहत काव्यव्याजेन तत्व कथितमिह मया मोक्षः परमिति । तबुद्ध्वा शामिक यत्तदवहितमितो ग्राम न ललित पांसुम्यो धातुजेम्यो नियतमुपकर चामीकरमिति || सौ. १८/६४ ससार को प्राय विपयानन्द में लिप्त एवं मोक्ष से पराडमुख देखकर मोक्ष को ही सर्वोपरि समझ कर मैंने इसमें तत्व का उपदेश किया है। ऐसा ममझ कर सावधानतया इसमें से शान्तिदायक वस्तु को ही ग्रहण करना चाहिये न कि अानन्ददायक ( ललित ) वस्तु को क्योंकि लोग धातु के कणों में से उपयोगी सुवर्ण (कों) को ही ग्रहण करते हैं --
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अश्वघोषप्रणीत-सौन्दरनन्दस्य चतुर्थः सर्गः (१) मुनौ त्रु वाणेऽपि तु तत्र धर्म धर्म प्रति ज्ञातिपु चाहतेपु । प्रासादसंस्थो मदनककार्यः प्रियामहायो विजहार नन्दः ।। अन्वय -तन मुनो धर्म ग्रु वाणेऽपि धर्म च प्रति ज्ञातिपु पाहतेषु प्रासादसस्थः मदनककार्यः नन्दः प्रियासहायो विजहार | व्याख्या-तत्र कपिलवस्तुनाम्नि नगरे, मुनौ शाक्यमुनी बुद्ध धर्म त्रुवाणे अपि कृतप्रचारे अपि, बौद्धधर्म च प्रति ज्ञातिषु वान्धवेषु, अाहतेषु दर्शितसमादरेषु अपि, प्रासादसस्थः राजभवनस्थः, मदनैक- कार्यः कामक्रियासक्तः, नन्द. बुद्धानुज , प्रियासहायः भार्यासहित , विजहार रेम विहारं कृतवाग्नित्यर्थ. । बुद्धे कृतधर्मप्रचारे सबन्धिभिः धर्म प्रति दर्शितादरेष्वपि नन्द एव एकाकी स्वकीयभार्यया राजभवने कामक्रीहा- सक्त सन् विहारं कृतवान् । While the sage was busy preaching religion and his kipsmen bad exhibited their reverence to the faith, Nanda absorbed in passions of love, continued staying in the palace and indulged in pleasures in company of his beloved, वहा (कपिलवस्तु में) जब बुद्ध धर्म का उपदेश कर रहे थे और उनके वन्धु-बान्धव धर्म के प्रति श्रद्धा दिखा रहे थे, उस समय भी नन्द मापनी प्रियतमा के साथ महलों में रहकर विहार कर रहा था।
( २ ) (२) स चक्रवाक्येव हि चक्रवाकः तया समेत प्रियया प्रियाईः। नाचिन्तयत् वैश्रमण न शक तत्स्थानहेलो. कुत एव धर्मम् ॥ अन्वयः- चक्रवाक्या तया प्रियया समेत स प्रियाईः चक्रवाक इव वैश्रमण शक्र न अचिन्तयत्, तरस्थानहेतो धर्म कुनः एव । व्याख्या-चक्रवाक्या तुल्यया तया स्वकीयप्रियया प्रियतमया, समेतः युक्तः चक्रवाक. रथागखगसमः, स प्रियाई प्रियासपूजितः नन्दः, चैश्रमण कुवेर, शक्र इन्द्र चापि न अचिन्तयत् न चिन्तितवान् । तत् स्थानहेतो तदवस्थितिकारणभूतस्य धर्म कुतः, धर्मस्य चिन्ता कुतस्तस्य। स्वकीयभार्यया समेतः नन्दः कुबेरेन्द्रादिक कमपि देव न चिन्तितवान् , तेषा देवाना प्रतिष्ठाहेतुकं धर्मे कुत. चिन्तयितु तस्याव- काशः । धर्मस्य वार्ता तु दूर एव अपासिता इत्यर्थः। Like a shel drake ia company of Shel duck, he worthy of love with his beloved never thought of Kubera or Indra. How could he bear contemplate of the religion which bestowed that honour on them ? चक्वी के समान अपनी प्रियतमा के साथ उस चक्रवाक रूपी नन्द ने नो सर्वथा उस के योग्य था, न तो कुबेर की परवाह की और न कभी इन्द्र की । उनकी प्रतिष्ठा के कारण धर्म की तो बात ही छोहिये । (३) लक्ष्म्या च रूपेण च सुन्दरीति स्तम्भेन गर्वण च मानिनीति । दीप्त्या च मानेन च भामिनीति यातो बभापे विविधन नाम्ना ॥
अन्वयः-लक्ष्म्या च रूपेण सुन्दरी, स्तम्भेन गर्वेण च मानिनी, दीप्त्या मानेन च भामिनी, अतः निविधेन मास्ना या बभापे । व्याख्या-लदम्या शरीरशोभया रूपेण लावण्येन च सुन्दरी, स्तभेन कृत्रिमरोपेण गर्नेण अभिमानेन मानिनी, दीप्त्या श्रोजस्वितया मानेन मनस्वितया च मामिनी या सुन्दरी नन्दपत्नी त्रिविधेन त्रिप्रकारेण नाम्ना अभिधानेन, बभापे श्राहृता ज्ञाता वा प्रासीत् । विविधगुण- सपना सा सुन्दरी त्रिभिरभिधान. ख्यातासीत् । She was addressed by her threa epithets Sundari because of charm and beauty, Manini because of arrogance and pride and Bhamai because of daughtiness and feign anger अपने सौन्दर्य और रूप के कारण सुन्दरी, हठ और अभिमान के कारण मानिनी एव पोज और मान के कारण भामिनी--इस प्रकार जो तीन नामों से पुकारी जाती थी । (४) सा हासहसा नयन द्विरेफा पीनस्तनात्युन्नत पद्मकोशा । भूयो बभासे स्वकुलोदितेन स्त्री पद्मिनी नददिवाकरेण ।। अन्वय.- हासहसा नयनविरेफा पीनस्तना मस्युसतपाकोशा सा एत्री पशिनी स्वकुलोदितेन नन्ददिवाकरेण भूयो बभासे । व्याख्या-हस इव धवलो हास; स्मय यस्याः सा हासहसा, नयने लोचने (दिरेफः भ्रमरः नत्तु ल्ये) यस्या' सा नयन द्विरेफा, पीनौ मांसली पुष्टौ वा स्तनौ कुचौ अत्युन्नतपद्मकोशसमौ कमलकोरकतुल्यो यस्या. सा स्त्री पद्मिनी स्त्रीषु कमलिनीव सुन्दरी, स्वकुलोदितेन सूर्य- ( ४ ) वशोद्भवेन नन्दरूपेण दिवाकरेण मास्करेण भूया अत्यन्त मासे अशोभत । यथा कमलिनी भास्करकिरणसपर्कमवाप्य विकसति तयैव सा मनोहरगात्रा सुन्दरी नन्दस्य ससर्गमवाप्याधिक शोभितवती । With her stap-like smile bee like eyes and with high protruding breasts developed like lotus buds, she a lily amongst women appeared all the more charming while in company of Sun like Nanda, born in the solar lide हस के समान श्वेत मुसकानवाली, भ्रमर के समान काले लोचन- वाली, कमल कोश के समान उभरे हुए पुष्ट स्तनों वाली, वह स्त्रियों में कमलिनी समान सुन्दरी, सूर्यवश में उत्पन्न हुए उस नन्दरूपी सूर्य से बहुत शोभित हुई। चेष्टितेन । . (५) रूपेण चात्यतमनोहरेण रूपानुरूपेण च मनुष्यलोके हि तदा बभूव सा सुन्दरी स्त्रीषु नरेष नन्दः॥ अन्वय-अत्यन्तमनोहरेण रूपेण, रूपानुरूपेण चेष्टितेन च तदा स्त्रीपु सा सुन्दरी नरेपु नन्द मनुप्यतोके बभूव । अत्यन्तमनोहरेण सर्वथाहृदयहारिणा स्वकीयेन रूपेण सौन्दर्यण, रूपानुरूपेण तद्रूपानुसारेण चेष्टितेन व्यवहारेण, तदा तस्मिन् काले स्त्रीषु सुन्दरी नरेषु च नन्दः मनुष्यलोके पृथिव्या अप्रतिमौ बभूव । स्वकीयेनात्यतमनोहारिणा सौन्दर्येण तदनुकूल- लीलाविलासेन च द्वावपि सुन्दरीनन्दी लोके अप्रतिमौ श्रद्वितीयो श्रास्तामि-यर्थः। व्याख्या ( ५ ) With their excessively charming beauty and their movements suiting the grace, Sundarı among women and Nanda among males, both were peerless in the world of mortals. अपने अत्यन्त अाकर्षक रूप के कारण और तदनुकूल चेष्टाओं के कारण, स्त्रियों में सुन्दरी तथा पुरुषों में नन्द उस समय समस्त मनुष्यलोक में (अनुपम) थे। (६) देवता सा नन्दनचारिणीव कुलस्य नन्दी जननश्चनन्द । अतीत्य माननुपेत्य देवान् सृष्टावभूतामिव भूतधात्रा ॥ अन्वय -नन्दनचारिणीव सा देवता, कुलस्य नन्दी जनन मन्दश्च मानतीत्य देवाननुपेत्य भूतधात्रा सृष्टौ अभूताम् इव । व्याख्या-नन्दनमिन्द्रोपवन तस्मिन् संचारिणी देवता सुरसुन्दरीव, फुलस्य स्वशस्य नन्दीजननः मोदप्रदायकः नन्दश्च, द्वावपि मान् मानुषानतीत्य अतिशयानों देवान अनुपेत्य अधस्तात् भूतधात्रा ब्रह्मणा सष्टी उत्पादितो अमूताम् श्रास्ताम् । द्वावपि सुन्दरीनन्दी देवमानुपयो मध्यस्थाविव प्रजापतिना सृष्टी समुत्पादिताविवा- शोभताम् । She like a Goddess walking in celestial gardens and he delight of his family, were created by the creator as surpassing the mortals but remaining slightly lower to gods.
( नन्दन क्न में भ्रमण करने वाली सुरांगना के समान वह सुन्दरी और अपने वश को श्रानन्द देने वाला नन्द दोनों को ब्रह्मा ने मनुष्यों से ऊपर और देवों से कुछ नीचे उत्पन्न किया था । (७) ता सुन्दरी चेन्न लभेत नन्दः सा वा निपेवेत न त नतन । द्वन्द्व ध्रुव तद्विकल न शोभेत् अन्योन्यहीनाविव गत्रिचन्द्रौ ।। अन्वयः-चेत् नन्द तां सुन्दरी न लभेत सा वा नत: त वा न निषेवेत, प्रन्योऽन्यहीनौ रात्रिचन्द्रौ इव विकल तद् द्वन्द्व ध्रुवं न शोभेत् । व्याख्या-चेत् यदि नन्दः ता सुन्दरी न लभेत न प्राप्नुयात् सा वा नत प्राकु चितभ्रू त नन्द न निषेवेत न भजेत् समागच्छेत् का, तदा ध्रुव निश्चयेन तद्विकल वियुक्त द्वन्द्व तथा न शोभेत यया अन्योन्य- हीनौ परस्पर वियुयुक्तौ रात्रिचन्द्रौ निशाशशाको न शोभते न विलसत । तयोः ममागमः सर्वथैव स्पृहणीय श्रासीदन्यया वियुयुक्ती तो कदापि शोमा न धारयेताम् । If Nanda bad been not united with that Sundati or she with arched eyebrows would have failed to obtain him, indeed that separated coaple would not look happy as the Digh! and moon when separated यदि नन्द उठ मुन्दरी को प्राप्त नहीं करता श्रथवा वह तिरछी मोही वाली उससे न मिल पाती तो निश्चय ही वह नोड़ा कभी शोभित न होता जैसे एक दूसरे के वियोग में गत्रि और चन्द्रमा शोभित नहीं होते।
(5) कन्दर्परत्योरिव लक्ष्यभूत प्रमोदनान्द्योरिव नीडभूतम् । प्रहपं तुष्ट्योरिव पात्रभूत द्वन्द्व महारंस्त मदान्धभूतम् ।। श्रन्धयः-~कन्दर्परत्योः इव लक्ष्यभूतः प्रमोदनान्यो: इस नीडभूतं, प्रहपतुष्टयो: इव पानभूतं मदान्धभूतं द्वन्द्व सह परंस्त | व्याख्या-कन्दर्पः श्रनग., अनंगरत्यो. लक्ष्यभूत श्रादर्शमिव, प्रमोदो विनोद. नान्दी श्रानन्द विनोदानन्दयोः कुलायमिव, प्रहर्षः प्रसन्नता सतुष्टिः सतोष तयोः पात्रभूत माजनमिव मदान्धभूत प्रणय- विह्वलं तत् द्वन्द्व सदेव सयुव्यैव रस्त रेमे । प्रणयमावबद्धौ कामासक्तौ तौ परस्परं सार्धमेव केलिकलासु श्रानन्द मनुभूतवन्तौ । Being target as it were of cupid and his spouse Rati, being a nest of delight and joy, being a vessel of pleasure and gratification the two dalled sports blindly काम और रति के लक्ष्य बनकर, विनोद और श्रानन्द के नीड वन कर, प्रसन्नता और सन्तोष के पात्र बन कर उस कामविह्नल युगल ने परस्पर रमण किया। (8) परस्परोद्वक्षीण तत्पराक्ष परस्परव्याहत-सक्त-चित्तम् । परस्परा-श्लेप-हृताङ्गरागम् परस्परंत न्मिथुनं जहार।। अन्वयः-परस्परोद्वीक्षणतस्परा परस्परव्याहृतसक्तचितं परस्पराश्लेष- हृतांगराग तन्मिथुन परस्परं जहार । व्याख्या-परस्परोद्वीक्षणे मिथः सदर्शने तत्परे उत्सुके अक्षीणि लोचनानि यस्य मिथुनस्य तन्मिथः सदर्शनोत्सुक नेत्र मिथुनम्, परस्पर In amorous ( 5 ) 1n con भावानुरक्ती व्याहते भाषणे सक्त व्यस्ते चित्त' यस्य मिथुनस्य परस्परसभाषणव्यापृत- हृदयमित्यर्थः, परस्पर श्राश्लेषालिंगनादिमि हत मृष्टमंगरागं यस्य मिथुनस्य द्वन्द्वस्य, एवभूत तत् मिथुन परस्पर जहार चित्त- माचकर्ष । With eyes longing to gaze at each other, with their, hearts absorbed each others conversation, with their body paint rubbed by their mutual embraces, the two tinued to attract each other उनकी श्रीखें एक दूसरे को देखने में उत्सुक थीं , उनके हृदय एक दूसरे की बातों में खोये हुए थे, एक दूसरे के श्रालिंगन से उनके श्र गराग पुछ गये थे और इस प्रकार उस युगल जोड़ी ने परस्पर एक दूसरे को अपनी ओर आकृष्ट किया हुश्रा था । (१०) गिरिनिर्भरस्थौ। तो किनरी कि पुरुषाविवोभौ । चिक्रीडतुश्चाभिविरेजतुश्च रूपश्रियाऽन्योन्यमिवाक्षिपन्तौ ।। अन्वय ---भावानुरक्लो गिरिनिर्भरस्थौ किनरी कि पुरुषो इव तो उभी रूपश्रिया अन्योन्य प्राक्षिपन्तौ इव चिक्रीस्तु अभिविरे- जतुस । व्याख्या-भाव प्रणयस्तस्मिन्ननुरक्तो प्रणयासक्ती गिरिनिरस्यो पर्वत निझरवासिनौ किंनरी किं पुरुषो यक्षदपतीव रूपश्रिया सोंदर्यकान्त्या श्रन्योऽय परस्पर श्राक्षिपती अतिशयानाविव चिक्रीस्तु मीहा- परौ अभिविरेजतुः अशोभेनाम । किन्नरटपतीव तो सुन्दरीनन्दो स्वकीये रूपे प्रतिस्पर्धिनी कीडामलग्नमानसौ रेजतु. । Sentimentally attached to each other those two lihe a yaksha couple residing near a hilly water fall, as if challenging each other in the radliance of beauty, sported and shone forth
(६ )
परस्पर प्रणयभाव में वे वे दोनों पर्वत के झरने पर वास करने वाले
किन्नरयुगल के समान सौन्दर्य की कान्ति से एक दूसरे को चुनौती
देते हुए परस्पर फ्रीड़ा में श्रासक्त हो शोभित हुए।
(११)
अन्योऽन्यसंरागविवर्धनेन
तद्वन्द्वमन्योऽन्यमरीरमच्च ।
क्लमान्तरेऽन्योऽन्यविनोदनेन
सलीलमन्योऽन्यममीमदच्च ।।
अन्वय-अन्योन्यसरागविवर्धनेन तत् द्वन्द्व अन्योऽन्यमरीरमत्,
फ्नमान्तरे व अन्योऽन्यविनोदनेन सलीलमन्योन्यममीमदत् ।
व्याख्या- सरागः प्रणयः परस्परप्रणयसंवर्धनेन, तत् द्वन्द्व मिथः
प्ररीरमत् मोदयामाम । क्लम श्रमस्तदनन्तरे अन्योऽन्यविनोदनेन मनो-
रजनेन सलील सीड श्रन्योन्य श्रमीमदत् मियः मादयामास । पूर्व
प्रणयव्यापारेषु प्रसक्तचेतसौ तौ श्रानन्दोपभोग चक्रुः । पश्चात् श्रान्ती
सर्कड मनोरजनादिमि. परस्पर मादयाचफ रित्यर्थः ।
Having inflamed mutual
the two yielded
ecstasy to each other lo the interval of exbaustion they
sportively intoxicated each other by means of recreations
परस्पर अनुराग बहा कर, उस युगल ने एक दूसरे को श्रानन्दित
किया और थकावट के बाद परस्पर मनोरजन कर एक दुसरे को
लीला सहित उन्मत्त बनाया ।
{१२)
विभूपयामास ततः प्रियां म
सिपेविपुस्ता न मृजाहवार्थम् ।
स्वेनैव रूपेण विभूषिता हि
विभूषणानामपि भूषणं सा !!
passions
( १० ) अन्वय --तत प्रियां सिषेविषु न मृजाहवार्थ स ता विभूष- यामास, हि सा स्वेनैव रूपेण विभूषिता विभूषणानां अपि भूषण (शासीत्। व्याख्या-ततः परस्परानन्दप्रदानानन्तर प्रिया सिपेविषु सेवितुकामः, न मृजाहवार्थ प्रसाधनसस्कारार्थ, सः ता विभूषयामास अलकृतवान् । हि यत स्वेनैव स्वकीयेन रूपेण सौन्दर्येण पर्याप्त विभूषिता. ऽलकृता सा विभूपणानामाभरणानामपि भूषण महनमासीत् । नन्दः प्रिया सेवितुकाम एव तामलकृतवान् यतः सा स्वयमेव स्वकीयेन रूपेण विभूषिता पर्याप्तमलकृतासीत् नदस्य प्रसाधनेन तस्याः सौन्दर्य- परिवृद्धिः न सभावनीयासीत् । तस्यानुग्रहलाभाय एक नन्दस्तस्या महनमकरोत् । Then he decorated his beloved to prove serviceable to her and not to ornament her only, because she the ornaments of ornaments was well embellished by her beauty तब प्रिया की सेवा करने की इच्छा से, केवल शृ गार भावना से नहीं, उसने उसे सजाया, क्योंकि भूषणों को भी सुन्दरता प्रदान करने वाली वह अपने ही रूप से भूपित थी। . (१३) दत्वाथ सा दर्पणमस्य हस्ते ममाग्रतो धारय तावदेनम् । विशेपक यावदह करोमी- त्युवाच कान्त स च त वभार । धन्वय -सा अस्य हस्ते दर्पणं दरवा त कान्तं उवाच 'यावदह विशेपक करोमि, एन मम अग्रतो धारय' इति । स च तं यभार । व्याख्या-सा अस्य नन्दस्य हस्ते करे दर्पण मुकुर दत्वा त स्वकीयं पान्त प्रियमुवाच यावदह विशेषकं मुग्यमण्डन करोमि विदधामि तावत् त्व ( ११ ) एन' मुकुर अप्रत सम्मुखे स्थित्वा धारय । स च नन्दस्तमादर्श तयैव वमार धारयामास । नन्दहस्ते दर्पण दत्वा सुन्दरी विशेषकं चकार स्वकीय मुखप्रसाधन सपादयामास । Having handed a looking glass in the lover's hands, she asked him, "Hold it out till I paint my face " And he held it out. तब अपने प्रियतम के हाय में दर्पण पकड़ाकर सुन्दरी ने कहा, 'जब तक मैं यह विशेषक समाप्त नहीं कर लेती, इसे पकड़े रहो' । और तब न द उस दर्पण को अपने हाथ में वैसे ही पड़े रहा । (१४) भतु स्तत श्म निरीक्षमाणा विशेपक मापि चकार ताहा। निश्वासवातेन च दर्पणस्य चिकित्सयित्वा निजघान नन्दः ।। अन्वय.-ततः भतु:श्मश्रु निरीक्षमाणा सापि ताहक विशेषक पकार । नन्दश्च निश्वासवातेन चिकित्सयित्वा दर्पणस्य निजवान । व्याख्या-ततः भर्तु नन्दस्य श्मश्रु. निरीक्षमाणा पश्यन्ती सा सुन्दरी तादृक् तयैव धात्मनो वदने विशेषक मडनं चकार । सापि स्वकीयमुखे वर्णिकया श्मश्रु चित्रितवतीत्यर्थ । तस्या शाठ्य निरीक्ष्य नन्द निश्वासवातन श्वासवायुना तत् चिकित्सयित्वा प्रतिकार विधाय दर्पणस्य छायां निजघान समापितवान् । मनोविनोदनाय सुन्दर्या स्वकीये मुखे नन्दवत् श्मश्रु · चित्रितासीत् । नन्दस्तस्या दुर्ललितशाध्य विलोक्य दर्पणछाया श्वासेन श्राविलयामास । Loohing at the moustaches of her husband she too painted her face the same way Nanda (noticiog her mischief) counteracted by blinding the surface of the mirror with his breath,
( १२ )
:
अपने प्रिय की मूछो को देखकर सुन्दरी ने भी उसी प्रकार विशेषक
चित्रित किया । तब नन्द ने प्रतिकार कर मुख के श्वास से दर्पण को
मैला कर दिया।
(१५)
सा तेन चेष्टाललितेन भतु
शाठ्ये न चान्तर्मनसा जहास ।
भवेच्च रुष्टा किल नाम तस्मै
ललाटजिम्हा भृकुटि चकार ॥
अन्वयः-सा तेन भतुश्चेष्टाललितेन शाठ्येन च मनसान्त हास |
किल नाम तस्मै रुष्ट। च भवेत् ललाटजिम्हां सुकुटि चकार ।
व्याख्या-सा सुन्दरी भर्तु: नन्दस्य चेष्टाल लितेन सुभगविनोदेन
शाट्य न परिहासेन च अन्तर्मनसा मनसि भृश जहास हृदये प्रसन्नाभूदि-
त्यर्थः । किल नाम रुष्टा च कृत्रिमरोषपरा च स्वकीयां भृकुटिं भूचाप
ललाटजिम्हा ललाटे वा चकार । नन्दस्य परिहासेन सुन्दरी मनसि
नितान्त तुष्टापि कृत्रिमरोपच्याजेन भूलतामा चयामास ।
She felt delighted in heart by her husband's playful
trick and mischief But feigned anger and knitted her eye
brows at the fore head
प्रियतम की इस शरारत भरी लीला पर वह मन ही मन हसी, पर
नाममात्र को रोष प्रकट करने के लिये उसने अपनी भौहों को टेढा
कर लिया।
(१६)
चिक्षप कर्णोत्पलमस्य चासे
करेण सव्येन मदालसेन ।
पत्रागुलिं चार्धनिमीलिताक्षे
वक्त्रेऽम्य तामेव विनिदुधाव ।।
( १३ )
अन्वयः-सव्येन मदालसेन करेण अस्य म से कणोत्पल च
चिक्षप । अस्य च अर्धनिमीलिता वक्ने तामेव पत्रांगुलि विनि.
धाव ।
व्याख्या-सत्येन वामेन मदालसेन मदशिथिलेन करेण अस्य नन्दस्य
$से स्कन्धप्रदेशे कर्णोत्पल अवतसमूतं कमलं चिक्षेप क्षिप्तवती ।
पुनश्चास्य अर्धनिमीलिताक्षे ईषदुन्मीलितनेत्रे वक्त्रे मुखे तामेव पत्रागुलि
रागक्लिन्नामगुलिं विनिदुधाव न्यस्तवती । प्रथम नन्द त्पिलेन ताडया-
मास तदनन्तर च संमोदनिमीलितनेत्र वदने पत्रागुलिना चित्रितवती ।
By her left languid hand she threw the ear- lotus
on bis shoulder Further, on his face with eyes half shut, she
applied the same paint-stick.
तदनन्तर अपने अलमाये वाये हाथ से अपने कान का कमल उसने
नन्द के कधे पर फेंका । उसके अधुमु दे नयन वाले मुख पर फिर उसने
वही अगराग लेप दिया ।
ततश्चलन्नूपुरयोक्तृताभ्या
नखप्रभोद्भासितरागुलिभ्याम् ।
पद्भ्यां प्रियाया नलिनोपमाभ्यां
मूर्ना भयान्नाम ननाम नन्द ।।
चलन नूपुरयोक्तृताभ्यां नखप्रभोद्भासि-
तरांगुलिम्यां नलिनोपमाभ्यां प्रियाया. पद्भ्यां नन्दः भयान्नाम
अन्वय
-
तत
मनाम ।
व्याख्या-ततः चलन् चचलनू पुरयुक्ताभ्या नखप्रभा नखकान्ति-
स्तयोद्भासि प्रकाशितागुलिया नलिनोपमाम्या कमल तुल्यान्या प्रियाया.
( १४ ) - ___ पम्या चरणाभ्यां नन्द. भयान्नाम कृत्रिमभयप्रदर्शनपूर्वक ननाम नमश्चकार । ता मानिनी प्रसादयितु नन्दस्तस्याः चरणयोरात्मनः शिरसा प्रण तिमकरोत् । As if in fear he bowed down in the feet of his beloved, which had tremulous anklets, the toes of which gleamed by the brilliant rays of the nails and which resembled two loiuses तब चचल नू पुरों से युक्त जिनकी अंगुलिया नख कान्ति से चमक रही थीं, उन कमल से कोमल चरणों में नन्द ने इस प्रकार शिर नवाया नानों वह भयभीत हो। (१८) स मुक्तपुष्पोन्मिषितेन मूर्ना ततः प्रियायाः प्रियकृत् बभासे । सुवर्ण वेद्यामनिलावभग्नः पुष्पातिभारादिव नागवृक्ष । श्रन्वय -ततः मुनपुप्पोन्मिपितेन मूर्ना प्रियाया. स प्रियकृत सुवर्णधेया पुष्पातिभारात् अनिलावमग्न नागवृक्ष इव सभासे । व्याख्या-तत मुक्तै. स्रस्तै. पुप्पै कुसुमैरुन्मिषितेन ईपलक्ष्येन मूर्ना शिरसा, स. प्रियायाः सुन्दर्या प्रियकृत् वल्लभः, सुवर्णवेद्या वेदिकाया पुष्पातिमारात् कुसुमसभारात् अनिलः पवनस्तद् वेगेनावमग्न. पतित नागवृक्ष. पु नाग इव मासे अशोभत । प्रियाचरणयोः न्यस्त- मृर्घा नन्द. सौवर्णवेदिकाया पतित पु नाग इवाधिक रराज । With flowers dropped down from his head that wooer of his beloved shone forth like an Arjun tree, fallen on a gold platform uprooted by the wind and laden with abund. ance of flowers तब फूल गिर जाने से उसका मस्तक चमक उठा, और वह इस प्रकार शोभित हुश्रा जैसे सोने की वेदी पर वायुवेग और फलों के भार से गिरा हुअा नागवृक्ष हो ।
( १५ ) . (१६) सा त स्तनोद्वर्तितहारयष्टिः उत्थापयामास निपीड्य दोाम् । कथ कृतोऽसीति जहास चोच्चै. मुखेन माचीकृतकुहलेन ॥ अन्वयः-स्तनोद्वर्तितहारयष्टि सा त दोा निपीड्य उस्या- पयामास | साचीकृतकुंटलेन मुखेन च कथ कृतः असि' इति (उक्त्वा) उच्चैः जहास । व्याख्या-स्तनयोः उद्वतिता लम्बिता हारयष्टि. हारावलियस्या सा सुन्दरी तं नन्द दोर्या बाहुभ्या निपीड्य परिष्वज्य उत्थापयामास । साचीकृताल बितकु हलेन मुखेन च, कथ कृतः असि किं स्वया कृतमासीत् इत्युक्त्वा उच्चैः स्पष्ट जहास अहसत् । स्वचरणनिपतित प्रिय वीक्ष्य त बाहुभ्या उत्याप्य पृष्टवती पूर्व त्वया किमर्थं मुकुर मलिनीकृतम् १ With shings of necklace swung over ber breasts, she raised him up having clasped in the arms. With ear rings dangling around her face she, asked him, what have you done, and laughed aloud जिसके हार की लड़िया उछलकर स्तनों पर झूल रही थीं ऐसी सुन्दरी ने प्रिय को बाहों में भरकर ऊपर उठाया और फिर कान के कु हलों को भुलाते हुए मुख से पूछा 'क्यों क्या हुआ' १ और फिर स्वय जोर से हस पड़ी। (२०) पत्युस्ततो दर्पणसक्तपाणेः मुहुर्मुहुर्वक्त्रमवेक्षमाणा । तमालपत्रातले कपोले समापयामास विशेषक तत् ।। अम्बया-सत. दर्पणसक्रपाणेः पत्युः मुख मुहुमुहुः भवेक्षमाणा (सा) तमालपत्रातले कपोले तत् विशेषकं समापयामास | ( १६ ) व्याख्या-त' दर्पणसक्तमाणे मुकुरव्यापृत हस्तस्य पत्यु नन्दस्य मुख मुहुमुहुः वार वार अवेक्षमाणा निरीक्ष्यमाणा सा सुन्दरी तमाल. पत्रवत् प्रातले स्निग्धे कपोले विशेषक अ गराग विलेपन समापयामाप्त । प्रेम्णा सुस्निग्ध पश्यन्ती नन्दमुखं सा कपोले तदालेख्य समापयामास । With his hands busy in holding the mirror, she completed the painting of her face with surface as smooth as a Tamal leaf and continued to gaze at Nanda repeatedly तव नन्द ने दर्पण हाथ में पकड़ लिया, उसके मुख से बार बार देखती हुई सुन्दरी ने अपने तमालपत्र से कोमल गाला पर विशेषक लगा लिया। (२१) तस्या मुख तत्सतमालपत्र ताम्राधरोष्ठ चिकुरायताक्षम् । रक्ताधिकार पतितद्वरेफ सशैवल पद्ममिवाबभासे ॥ अन्वय -सतमालपन तानाधरौष्ठ चिकुरायताच तस्या मुख रक्ताधिकाग्र पतितद्विरेफ सगैवल पद्ममिव श्रावभासे । व्याख्या-तमालदलसहित ताम्र रक्त अधरोष्ठ यस्य अरुणाधर चिकुरे चचले श्रायते विशाले लोचने यस्य चचलदीर्घलोचनं तस्या वदन रक्ताधिकाग्र लोहिताभ पतितद्विरेफ भ्रमरससेवितं सशैवल शैवलयुत कमलमिव श्राचभासे शोभितवान् । विशेषकानन्तर तस्या. सुन्दर मुख कमलमिवाघिक्मशोभत । Moistened by a Tamal leaf, with red nether-lip and tremulous long eyes her face looked like an excessively red lotus which is surrounded by bees and water-weeds तमालपत्र से युक्त उसका वह मुख जिसके श्रघर लाल थे और चंचल विशाल लोचन थे, उम रक्त कमल के समान शोभित हो रहा या जिस पर भारे महरा रहे हो और जो शैयाल से घिरा हो । -
( १७ )
(२२)
नन्दस्ततो दर्पणमादरेण
विभ्रत्तदामडन साक्षिभूतम् ।
विशेषकावेक्षण
के कराक्षः
लडत् प्रियाया वदन ददर्श ।।
अन्वय.-ततः मंटनसासिभूतं दर्पणं भादरेण विभ्रत विशेषका-
बेक्षणकेकरातः नन्दः प्रिपापा: नडत् वदनं ददर्श ।
व्याख्या-ततः मंडनसाक्षिभूतं प्रसाधनसूचक दर्पणमादर्श श्रादरेण
सुनिपुण विभूत् धारयन्, विशेषक कपोलालेख्यं तस्य अपेक्षण
प्रक्षण केकराक्षः तिर्यग् लोचनः नन्द प्रियायाः सुन्दर्याः लहत् शोमनं
घदन मुख ददर्श अपश्यत् । हस्ते मुकुरमादाय नन्दः प्रियाया वदने
चित्रित विशेषक मुख च सुस्निग्धमपश्यन् ।
Then holding carefully that mirror witness of the
decorations carried out, with eyes falling slant at the pain
tings Nanda grzed at her pretty face.
उस श गार के साक्षी दर्पण को सावधानी से पकड़ते हुए, तिरछी
नजर से उसके विशेषक को देखते हुए नन्द ने प्रियतमा के सुन्दर मुख
को देखा।
(२३)
लत्कु डलादष्टविशेषकान्त
कारंडवक्लिष्टमिवारविन्दम् ।
नन्दः प्रियाया मुखमीक्षमाणे?
भूपः प्रियानन्दकरो पभूध ॥
अन्वप:-वत् फुएटलादष्टविशेषकान्तं कारंवक्लिष्टं भरविम
एव प्रियापा मुख ईक्षमाणः मन्दः भूपः प्रियानन्दकरः बभूव ।
ईक्षमाणः पश्यन् नन्दः भूरः अधिक प्रिया सुदरी
( १८ )
व्याख्या-तदनन्तर कुडलाभ्या श्रादष्ट भक्षित पिहित वा विशे
फस्य महनस्यान्तं अन्तभाग कु डलपिहितविशेषकान्तभाग, कारण्डवा
सारसाभ्या क्निष्टमाकृष्ट अरविन्द
अरविन्द कमल इव, प्रियायाः मुख वद
तस्या श्रानन्दक
प्रीतिकर बभूव । उभयकपोलयोरालम्बिताभ्या कु हलाभ्या विशेषकस्य
न्तभाग पिहितं प्रच्छन्तमासीत् , अतस्तत् कारडवाकृष्टकमलमि
व्यराजि । तन्मुखमीक्षमाणः प्रिय प्रियायै सुखदो बभूवेत्यर्थः ।
With both ends of visheshaka concealed under ti
ear rings, her face resembled a lotus being dragged by to
swaps on both sides Nanda gazed at the face and adde
delight to his beloved
कु हला के स्पर्श से विशेषक के दोनों छोर जहां मिट से गये थे
ऐसा मुख उस कमल के समान शौमित दीख पड़ा जिसे दोनों ओर
हंस खींच रहे हो । उस प्रिया के मुख को देखते हुए नन्द ने सुन्दरी क
और भी प्रमन्न किया।
(२४)
विमानकल्पे स धिमानगर्भ
ततस्तथा चेव ननन्द नन्द ।
तथागतश्चागतभैक्षकाल
भेक्षाय तस्य प्रविवेश वेश्म ।।
धन्वय -विमानकल्पे विमानगर्भ स नन्द तथा ननन्द । ततश्ः
घागतभेक्षकाल तथागत: तस्य घेश्म प्रविवेश |
व्याण्या-विमानक्ल्पे देवप्रासादतुल्ये विमानगर्भ प्रासादक्क्षेष
स नन्दस्तथा उक्त प्रकारं ननन्द श्रमोदत । ततस्तदन तर धागत
पायात भेक्षकालः मिक्षासमय. यस्य स तपागतः बुद्धः भैक्षाय भिताये
( १६ )
प्रेष्यजनप्रमादात्
सस्य नंदस्य वेश्म गृहे प्रविवेश प्रवेश कृतवान् । एवं पूर्वोक्तप्रकारे
नदस्तु स्वकीये प्रासादे नितरा मोटपर. प्रासीत । तदैव भिक्षासा
भगवान् बुद्धः स्वीयभ्रातु हे समाजगाम ।
Thus Nanda revelled in his mapsions resemblı
celestial palaces. Then at the fixed bour of begging Budd
entered his house for begging alms,
इस प्रकार देव-प्रासाद तुल्य उस महल में नन्द विहार करता थ
तभी (एक दिन) भिक्षा के निश्चित समय पर बुद्ध ने उस गृह में भिा
के लिये प्रवेश किया।
(२५)
अवाड मुखो निष्प्रणयश्च तस्था
भ्रातुगृहेऽन्यस्य गृहे यथैव ।
तस्मादथो
भिक्षामलव्ध्वव पुनर्जगाम ।।
मन्वय:-यथा अन्यस्य गृहे (तथा) भ्रातु गृहे अवाइम
निष्प्रायश्च वस्यो । प्रष प्रेष्यजनप्रमादात् भिक्षां भलब्ध्वा
तस्मात् पुन. जगाम।
व्याख्या-या अन्यस्य कस्यचिदपि गृहे कोऽपि तिष्ठेत् ।
भ्रातु. नन्दस्य गृहे भगवान् श्रवाहमुख, नतवदन. निष्प्रणय. उदास
पत् श्रागन्तुक इव तस्थौ स्थितवान् । अनन्तर च प्रध्यननानां दास
ममादात् अनवधानात् भिक्षा लब्ध्वा अप्राप्य एव तस्मात् गृहात् पुर
गाम निश्चक्राम { मुहूर्त बुद्ध, स्वीयभ्रातुगृहे एव तस्थौ यथा स्या
परिचितस्य गृहे कोऽपि स्थितो भवति । यदा केनापि तस्य स्वागत
कृत, स प्रतिनिवृत्त ।
With face leaning down abd like one detached he st
10 his brother's abode as if is some ope's house. Then, boce
of carelessness of alttendants, he left the house with
obtaining alm.,'
( २० )
नीचा मुख किये उदासीन से तब वे अपने भाई के घर में इस
प्रकार खड़े रहे जैसे किसी अपरिचित घर में हों। तब दासजनों की
असावधानी के कारण विना भिक्षा प्राप्त किये ही थे वापिस चले गये।
(२६)
काचित् पिपेपागविलेपन हि
वासोऽगता काचिदवासयच्च ।
श्रायोजयत् स्नानविधि तथान्या
जग्रन्थुरन्याः सुरभीः सजश्च ॥
अन्वयः-- काचित् हि अगविलेपन पिपेष, काचित् च श्रगना वासः
प्रवासयत्, तथा मन्या स्नानविधि आयोजयत् , अन्याः च सुरभी: स्रजः
जग्रन्थु ।
व्याख्या--काचित् स्त्री श्रगविलेपन अगराग पिपेष चूर्णितवती,
काचित् च वास. वस्त्राणि अवासयत् , तथा अन्या योषित् स्नान विधि
प्रक्रिया प्रायोजयत् योजयामास, श्रन्याश्च स्त्रियः सुरभी. सुगन्धा स्रजः
पुष्पमालाः जग्रन्युः ग्रथितवत्यः । तस्मिन् समये प्रासादे सर्वा एव विविध.
कार्येषु त्यस्ता श्रासन् ।
Some one pounded the body paint another perfumed
the garments, similarly another was arranging for bath and
the rest were busy wreathing fragrant garlands.
कोई अगराग (उबटन) पीस रही थी, कोई वस्त्रों में धूप दे रही
यी, कोई स्नान के लिये तैयारी कर रही थी और वाकी फूलों की सुगंधित
मालाए गूय रही थीं।
(२७)
तस्मिन् गृह भतुरतश्चरन्त्यः
क्रीडानुरूप ललित नियोगम।
काश्चिन्न बुद्ध दशुः युवत्यः
बुद्धस्य वैपा नियत मनीषा ॥
( २१ ) अन्षयः-प्रतः तस्मिन् गृहे भतु क्रीडानुरूप नलित नियोगं धरन्स्यः काश्चित् युवत्यः वुद्ध न दृशुः । वा बुद्धस्य एषा मनीषा नियतं (आसीत्।। व्याख्या-श्रत एतस्मात् कारणात् तस्मिन् गृहे हर्ये भतु: नन्दस्य क्रीडानुरूप खेलानुकूल ललित स्निग्ध नियोग श्रादेशं चरन्त्यः अनुपाल- यन्तः काश्चित् का अपि युवत्य. समागत बुद्ध न ददृशु नापश्यन् । वा अथवा एषा बुद्धस्य एव नियत निश्चितं मनीषा अभिलाषासीत् । नन्दस्य क्रीडाकर्मसु व्यापृता श्र गना समागत बुद्ध न विविदुः । कदाचिदे षा बुद्धस्य वाञ्छासीत् यत् कोऽपि तस्यागमन न जानीयात् येन नन्दस्य प्रबोधस्य अवसरः उत्पद्येत । Therefore, occupied in the easy directives pertaining to sports and gambls of the master, the women took no notice of Buddha's arrival or it was so desired by Buddha इस प्रकार नन्द महाराज की क्रीडा के अनुरूप विविध सुन्द श्रादेशों का पालन करतो हुई वे स्त्रिया बुद्ध के श्रागमन को न जान सकी। सभव है बुद्ध भगवान् की यही इच्छा रही हो । (२८) काचित्स्थिता तत्र तु हर्म्यपृष्ठे गवाक्षमार्ग प्रणिधाय चनः । विनिष्पतन्तं सुगतं ददर्श पयोदगर्भादिव दीप्तमर्कम् ॥ अन्वय'-काचित् तु तय हय॑पृष्ठे स्थिता गवाक्षमार्गे घर प्रणिधाय पयोदगर्भात् दीप्त अर्क इव विनिप्पतन्त सुगत ददर्श । व्याख्या-काचिदगना तत्र हर्यपृष्टे प्रासादतले स्थिता गवार मार्गे वातायने चद, नेत्र प्रणिधाय प्रेयित्वा पयोदगर्भात् मेघोदर ( २२ ) विनिष्पतन्त निस्सरन्त दीप्त भास्वरं अर्क सूर्य इव गृहात् बहिर्गच्छन्तं सुगतं बुद्ध ददर्श अपश्यत् । सयोगवशात् हर्म्यपृष्ठस्था काचित् योषित् गृहात बहिरागच्छन्त बुद्ध एवमपश्यत् यथा नीलनीरदगर्मात् भगवान् भास्कर निस्सरति । Some one standing on the roof the palacen happened to look through the ventilator and noticd Budha coming out of the house as the blazing sun emerges out of the interior of the clouds किसी स्त्री ने महल की छत पर खड़े होकर झरोखे की राह से भगवान् बुद्ध को घर से बाहर इस प्रकार निकलते देखा जैसे मेघों के भीतर से चमकीला सूर्य बाहर निकलता है । (२६) मा गौरव तत्र विचार्य भतु: स्वया च भक्त्याहतयाहतश्च । नन्दत्य तस्थौ पुरत. विवनु. तदाज्ञया चेति तदाचचक्षे ॥ अन्वप -तन सा (भतु. गौरव विचार्य) स्वया भक्त्या अहंतश्च अर्हतया नन्दस्य पुरत विवक्षु : तस्थौ तदाशया च तदा इति प्रापचा। व्याख्या-तस्मिन समये सा स्त्री स्वया भक्त्या श्रद्धया अर्हतः बुद्धस्य श्रह तया पूजनीयभावनया मर्तु: नन्दस्य गौरव प्रतिष्ठा च विचार्य बन्दस्य पुरत संमुखे विवन वक्त मिच्छु' तस्यौ स्थितवती । सद् श्राशया नन्दादेशेन च तत एव श्राचचक्षे अकथयन । स्वीयभक्त्या नन्दस्य प्रतिष्ठा च मात्वा सा भर्तु ममीपे गत्वा निवेदन चकार । Ccosidering the great reverence for the master and having worshipped Buddha out of her own devotion, she desirous of informing Nanda approached and spoke thus at his permission .
( २३ ) याति । अह जाने अपनी भक्ति तथा पूज्य भावना से प्रेरित होकर एवं बुद्ध भगवान् के चादर का ध्यान घर सूचना देने की इच्छा से वह नन्द के समीप पहुंची और उसकी प्राज्ञा प्राप्त कर ऐसे बोली। (३०) अनुग्रहायास्य जनस्य शके गुरुहं नो भगवान्प्रविष्ट । भिक्षामलब्ध्वा गिरमामन वा शून्यादरण्यादिव याति भूयः ।। अन्वय शंके अस्य जनस्य मम अनुगृहाय न. गृह गुरु भगवान् प्रविष्ट , भिक्षां गिरं घासन वा अलवा एवं शून्यात् अरण्याव इव भूय व्याख्या-शके यत् अस्य जनस्य मम अनुग्रहाय कृपायै न अस्माक गृह गुरुः भगवान बुद्ध प्रविष्ट प्राप्तीत् । किन्तु भिक्षा मैक्ष गिर सूनृता वाणी श्रासन विष्टर अप्राप्य एव अस्मात् गृहात् भूय पुन: शून्यात् निर्जनात् श्रणयात् काननात् इव याति वहिर्गच्छति । जाने यद- स्मार्कअनुकपार्थ भगवान् बुद्ध समायातः परं मिक्षामप्राप्यैव वहिर्गच्छति । I presume that in order to oblige the person the great saint had entered our house out of compassion But having failed to obtain alme, sweet speech or 2 seat, he is going back, मेरा विचार है कि हम पर अनुग्रह कर इस घर में बुद्ध भगवान् पाये थे। पर भिक्षा, सत्कार की वाणी अथवा श्रामन विना प्राप्त किये ही वे वापिस जारहे है। (३१) श्रुत्वा महर्पः स गृहप्रवेश, सत्कारहीनं च पुनः प्रयाण, । चचाल चित्राभरणाम्बरनक, कल्पद्र मो धून इवानिलेन !
( २४ ) अन्वय -चित्राभरणाम्बरसक् सः (नन्द) महर्षेः गृह प्रवेश पुनश्च (तस्य) सरकारहीन प्रयाणं श्रुत्वा अनिलेन धूत कल्पनु म इव चचाल | व्याख्याः- चित्राभरणाम्बरस्रक् चित्र. मनोहरैः श्राभरणैः श्राम पणैः अम्बरैः वस्त्र. सम्मिश्च मालाभिश्च युक्तो विभूषितो वा स. (न दः महा तथागतस्य गृहप्रवेश स्वगृहागमन पुनश्च तत्पश्चात् तस्य सत्का. हीनं श्रातिथ्यहीन प्रयाण गमन श्रुत्वा (परिजनमुखात्) निशम्य अनिलेन वायुना धूतः कम्पितः कल्पद्रुम पारिजात: इव चचाल कम्पितवान् । Hearing that the great saint had entered his houee and departed again without receving a welcome, he with beautı ful ornaments, clothes and garlands, started as if tree of Paradise shaken by the wind, यह सुनकर कि महर्षि ने घर में प्रवेश किया था और सत्कार के विना ही वे लौट गये, मनोहर श्राभूषणों, वस्त्री, एव मालाश्री से युक्त नन्द वायु से कम्पित कल्पवृक्ष के समान काँपने लगा। (३२) कृत्वाञ्जलिं मूर्धनि पद्मकल्प ततः स कान्ता गमन ययाचे । कर्तुं गमिष्यामि गुरी प्रणाम मामभ्यनुज्ञातुमिहामीति ॥ धन्मय --तत' स पद्मकल्प अन्जलिं मूर्धनि कृत्वा कान्तां गमन ययाचे--"गुरौ प्रणाम फत् गमिष्यामि इह माम् ' अभ्यनुज्ञातुम अहंसि" इति । व्याख्या-तत तदनन्तर स नन्द पद्मफल्प कमलसदृश अञ्जलि हत्तपुटं कृत्वा कान्ता प्रिया गमन ययाचे प्रार्थितवान्, यत् गुगे महषों प्रणाम प्रणति कतु विघातु गमिष्यामि श्रतएव इह अस्मिन् विपये माम अभ्यनुनातुम अनुमति दातु श्रमि इति ।
( २५ ) Then joining his hands like a lotus bud and raising them to his head he asked his beloved for leave to go, saying I shall go to bow to the Guru, so it behoves of you to give me leave for this." तब उसने मस्तक पर कमल सदृश अजलि बाँध कर प्रिया से जाने की श्राशा मागी-'मैं गुरू को प्रणाम करने जाऊँगा, इस लिए तुम्हें मुझे श्राशा देनी चाहिये।" (३३) सा वेपमाना परिषस्वजे ल शाल लता वालसमीरितेव । ददर्श चाश्रुप्लुतलोलनेत्रा दीर्घ च निश्वस्य वचोभ्युवाच ॥ अन्वयः--चेपमाना सा त परिषस्वजे वातसमीरिता लता इव शालं, अश्रुप्लुतनेना (सा त) ददर्श च, दीर्घ घ निश्वस्य वचः प्रभ्युवाच । व्याख्या-( इदं शृत्वा) वेपमाना कम्पनयुक्ता सा नन्दकान्ता त नन्द परिषस्वजे समालिङ्गितवती वातसमीरिता वायुना कम्भिता लता इव वल्ली इव शालं एतन्नामक वृक्षम् । अर्थात् यथा वायुवेपिता लता समीपस्थ शालवृक्ष समालिङ्गति तथैव वेपमाना सा नन्दकान्ता त परिषस्वजे । पुन' किं कृतवती सा ? पुन सा अश्रु प्लुतनेत्रा वाप्पसिक्त न- यना त ददर्श दृष्टवती तदनन्तर दीघ निश्वस्य दीर्घनिश्वासपूर्वक वच वक्ष्यमाणवचन श्रभ्युवाच कथितवती । ( Hearing this ) she clasped him trembling, as a creeper stirred by, a wind clasps a sal tree and, gazing at him with rolling eyes swimming with tears, said to him with a long sigh (यह सुन कर) काँपती हुई उसन उसका (न द का) श्रालिङ्गन किया जैसे वायु से कम्पित लता शालवृक्ष का अलिङ्गन कर रही हो । श्रश्रुसित्त चञ्चल नेत्रों से उसे देख कर निश्वासपूर्वक वह बोली ।
( २६ ) । (३४) नाह यियासोगुरुदर्शनार्थम् अर्हामि कतुं तव धर्मपीडा । गच्छार्यपुत्रहि च शीघ्रमेव विशेपको यावदयं न शुष्कः ॥ अन्वय,---अहं गुरुदर्शनार्थ यियासोः तव धर्मपीड़ां तु न हामि (हे) आयपुर । गच्छ शीघ्रम् एव च एहि यावत् अथ विशेषकः शुष्क न (भवति)। व्याख्या- अहं गुरुदर्शनार्थ महर्षिदर्शनाय यियामो गन्तुम् इच्छो. धर्मपीहां धर्मबाघा फतु विधातु न अर्हामि न शक्नोमि त हे श्रार्य- पुत्र । स्वामिन् । गच्छ प्रस्थान कुरु पुनश्च शीघ्रमेव सत्वरमेव एहि श्रागच्छ यावत् अयं विशेषक मएहनप्रताधन शुष्क न भवति तावत् । It does not become of me to binder you in the perfora mance of your duty to go and see the Guru Go, my lord, but return quichly before this paint is dry गुरु के दर्शनार्थ जाने के इच्छुक अापके कर्तव्य में बाधा उपस्थित करना मेरे लिए उचित नहीं है । ( अत ) हे श्रार्यपुत्र । जाश्रो, किन्तु शीघ्र ही लौट कर आयो जिससे कि यह विशेषक सुखने न पाये। (३५) स चेद्वेस्त्व खलु दीर्घसूत्रो दण्ड महान्त त्वयि पातयेय । मुहुर्मुहुस्त्वा शयितं कुचाभ्यां विवोधयेय च न चालपेयम् ।। अन्वय चेत् स एवं दीर्घसून खलु भवे ( तर्हि ) स्वयि महान्तं दण्डपातयेयंम् । शयित त्या मुह मुहुः कुचाभ्यां वियोधयेयं न च भनपेयम् । - ( २७ ) व्यख्या चेत् कदाचित् स इत्थभूत. त्व दीर्घसूत्र विलम्बायात खलु निश्चयेन भवे तर्हि त्वयि महान्त श्रनल्प दण्ड पाठयेयम् दण्ड- विधानम् करिष्ये । केन प्रकारेण तद् व्रते । शयितं निद्रालीढ त्वा मुहु- मुहु वारं वारं कुचाम्याम् उरोजाभ्या पीडनेन इति शेषः विबोधयेय अर्थात् तव निद्राभन करिप्ये न पुन अलपेय त्वया सह वार्तालापं करिष्यामि । Should you housever, delay longer, I shall inflict a heavy punishment on you as you lie asleep, I shall repeatedly waken you by beating you with my breasts and shall not speak to you यदि तुम देर करोगे तो तुम्हें महान दण्ड दूंगी, कुचों ( के प्रहार ) से तुम्हें बार बार जगाऊँगी और फिर बोलूँगी नहीं। (३६) श्रथाप्यनाश्यानविशेषकाया मय्येष्यसि त्व त्वरितं तलस्त्वा । निपीडयिप्यामि भुजद्वयेन निभू पणेनाविलेपनेन ॥ प्रन्वय - अथ भपि स्वम् अनाश्यानविशेषकाया मयि त्वरितं एप्यसि तत. स्वां निभूषणेन थाविलेपनेन भुजद्वयेन निपीड- यिप्यामि । व्याख्या-- श्रथ अत्रान्तर गमनपश्चात् इति अर्थ. अपि चेत् त्वम् अनाश्यान विशेषकाया प्राविशेषवायां मयि मदन्ति के त्वरित शीघ्र एष्यसि श्रागमिष्यसि तत तहि त्वा निमूषणेन अलङ्कार- व्यवहितेन श्राई विलेपनेन अशुष्कविशेषकेण मुजद्वयेन वाहुयुगलेन निपीडयिष्यामि गाढ समालिनयिष्यामि । But if you return to me quickly before the paint is dry, I sball hug you with my upadorned arms with the ointment still on them ( २८ ) यदि तुम मेरे विशेषक के सूखने से पूर्व ही लौट श्रानोगे, तो मैं श्राभूषणरहित तथा लेपयुक्त भुजाओं से तुम्हारा प्रगाढ़ श्रालिङ्गन करूगी। (३७) इत्येवमुक्तश्च निपीडितश्च तयासवर्णस्वनया जगाद। एव करिष्यामि विमुच चण्डि यावद् गुरुर्दूरगतो न मे स ॥ असवर्णस्वनया तया इति एवम् उक्त निपीड़ितः नगाद-चण्डि, एव करिप्यामि, विमुन्ध, यावद् स: मे गुरुः दूरगत : धन्वय न । व्याख्या- प्रसवर्णस्वनया विकम्पितस्वरया तया नन्दभामिन्या इति एव पूर्वोक्तप्रकारेण उक्त निपीडित. च समालिङ्गितश्च (स नन्दः इति शेष) जगाद कथितवान् हे चण्डि । कोपनशीले एवमेव करिष्यामि श्रर्थात् शीघ्रमेव श्रागमिष्यामि यावत् तव विशेषकः न शुष्क तद् विमुञ्च मा बाहुपाशात् मुक्त कुरु यावत मे मम गुरु तथागत दूरगत. न स्यात् । Having been spoken to and embraced by her wbose voice was unsteady, he rplied, "So will I do. Let me go, oh cruel one, before my guru is gcne too far कापती वाणी में उसक द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर और श्रालि- गन किये जाने पर (नन्द नै) कहा- 'ऐमा ही करूगा हे चण्डि, छोड़ो, मेरे वह गुरु दूर न चले जायें । (३८) ततस्तनोद्वतितचन्दनाम्या मुक्तो भजाम्या न तु मानसेन । विहाय वेप मदनानुरूप मत्कारयोग्य स वपुर्वभार || ( २६ ) अन्वय -तत स्तनोद्वर्तितचन्दनाम्या भुजाभ्यां न तु मानसेन कः स. मदनानुरूप वेषं विहाय सत्कारयोग्यं वपुः यभार । व्याख्या-ततः तत्पश्चात् स्तनोद्वर्तित चन्दनाभ्या कुचघृष्टचन्दन- पनाम्या भुनाम्या बाहुभ्या मुक्त. न तु मानसेन मुक्तः अपितु मनसि सम्यक् क्त सः न दः मदनानुरूप कामानुरूपं वेषं विहाय परित्यज्य सत्कारयोग्य गतिथ्ययोग्य वपु. वेष बभार धृतवान् । Then freed from her arms covered with sandalwood aste rubbed out by her breasts, but not from her heart, he, aving taken off the clothes fit for love making which he jay wearing assumed the appearance fit for offering ospitality तब स्तनों (की रगड़) से जिनका चन्दन छूट गया था ऐसी भुजाओं 3, न कि मन से, मुक्त होकर उसने कामक्रोहा के उपयुक्त वेष को छोड़ कर श्रातिथ्य के अनुरूप वेप धारण किया । (३६) सा तं प्रयान्त रमण प्रदथ्यो, प्रध्यानशून्यस्थितनिश्चलाक्षी । स्थितोच्चकर्णा व्यपविद्धशष्पा भ्रान्त मृग भ्रान्तमुखी मृगीव ।। अन्वय.-प्रध्यानशून्यस्थितनिश्चलाती सा तं प्रयान्तं रमणं प्रदभ्यो स्थतोरचकर्णा व्यपविद्धशप्पा भ्रान्तमुखी मृगी इव भ्रान्त मृगम् । व्याख्या-प्रध्यानशून्यस्थितनिश्चलाक्षी गहनचिन्तनेन शून्यस्थिते निश्चले च अक्षिणी नेत्रे यस्या सा नन्दभामिनी त प्रयान्त गच्छन्त रमणं रति प्रदध्यौ मनोयोगपूर्वक प्रक्षितवती, का इव स्थितोच्चकर्णी व्यपविद्ध- शप्पा स्खलिततृणा मृगी इव भ्रान्तं दूरे गच्छन्त मृगं हरिणम् । यथा स्खलितमुखतृणा स्थितोच्चकर्णा भ्रान्तमुखी मृगी ध्यानपूर्व के भ्रान्त मृगं पश्यति तथैव सा नन्दजाया अपि स्वपतिं प्रदथ्यो।
( ३० ) were With eyes which stony and desolate fro brooding she watched her lover going away, just as a bin with ears pricked and wild looks and the grass dropping from her mouth watches the stag wandering away, चिन्ता के कारण सूनी और निश्चल श्राखों से वह (सुन्दरी) उस जाते हुए प्रियतम को मनोयोगपूर्वक ऐसे दे रही जैसे दूर जाते हुए हरिण को कान खड़े करके, चकित मुखवाली हरिणी (मुख के) तृण को गिराते हुए देखती रहती है । (४०) दिदृक्षयाक्षिप्तमना मुनेस्तु नन्दः प्रयाण प्रति तत्वरे च । विवृत्तहप्टिश्च शनैर्ययौ तां करीव पश्यन् स लडत्करेणुम् ।। अन्वय -मुने दिदृक्षया आक्षिप्तमना नन्दः प्रयाण प्रति तस्वरे च विवृत्तदृष्टिश्च स तो स्वभार्या पश्यन् शनै ययौ नहरकरेगु करि इव । . व्याख्या-मुने दिहक्षया द्रष्टुमिच्छा दिक्षा तया श्राक्षिप्तमना श्रीकृष्टचित्तः नन्दः प्रयाण गमन प्रति तत्वरे विवृत्तदृष्टिश्च भार्याभि- मुग्वश्च स ता सुन्दरी पश्यन् शनैः ययौ गतवान् यया करि. गजालहरेणु विलासशीलकरिणी पश्यन् गच्छति । But Nanda both hurried to start with mind drawn by desire to see the sage and (at the same time) went slowly with back turned gaze, looking at het AS a bullelephant looks at a sportive cow elephant, मुनिदर्शन की इच्छा से उत्कण्ठित चित्त नद ने जाने में शीघ्रता की, साथ ही पीछे (मुन्दरी) की अोर दृष्टि घुमाए हुए उसको देखता हुआ ( ३१ ) धीरे धीरे इस प्रकार गया जिस तरह विलासिनी हथिनी को देखता हुश्रा हाथी धीरे धीरे जाता है। (४१) छालोदरी पीनपयोधरोरु स सुन्दरी रुक्मदरी मिवाद्र.। काक्षण पश्यन्न तलप नन्द : पिबन्निवैकेन जल करेण ॥ थन्वय --स मन्द अद्र रुक्मदरीम् इव छातोदरीं पीनपयोधरोह सुन्दरी काण पश्यन् एकेन करेण जल पियन्निव न ततर्प । व्याख्या- स नन्द. अद्रः पर्वतस्य रुक्मदरीम् इव स्वर्णगुहाम् इव छातोदरीं क्षीणमध्या पीनपयोधरोरु पृथुलकुचजधाम् सुन्दरी का- क्षण तिरश्चीनदृष्ट्या पश्यन् अद्र. रुक्मदरी पक्षतु सङ्कुचिताभ्यन्तर- भागा सघनघनाच्छादितपार्श्व पश्यन् एकेन करेण जल पिवन इव न ततप तृप्ति तोपं लब्धवान् Looking with a sido long glance at Sundari who with her slender waist and swelling (thick) breasts and thighs resembled & golden cave of a mountain with a narrow interior and spurs on each side covered with thick clouds, Nand could l'o more be satisfied with looking as if he were drinking water out of one band सकड़े अन्तर्भाग वाली और सघन मेघा से प्राप्छादित युगल पार्श्व वाली पर्वत की स्वर्णकन्दरा के समान पतली कमर वाली, पुष्टकुचयुगला पृथुल ज धा वाली सुन्दरी को कनखियों से देखता हुश्रा नन्द इस प्रकार तृप्त नहीं हुआ जैसे एक हाथ से पानी पीने वाला तृप्त नहीं होता। (अञ्जलि से पानी पीने से ही तृप्ति मिलती है ।)
( ३२ )
(४२)
ल गौरव बुद्धगत
बुद्धगत चकर्प
तुरंस्तरङ्ग
भार्यानुरागः पुनराचकर्ष ।
सोऽनिश्चयन्नापि न ययौ न तस्थौ
'विव राजहंस. ॥
अम्बय --बुद्धगतं गौरव तं चकर्ष पुनः भार्यानुराग पाचकर्ष
अपि सः भनिश्चयन् तरङ्गषु तुरन राजहंसः इव न ययौ न सस्थौ ।
व्याख्या-बुद्ध ातं गौरव बुद्धगता भक्तिः त नन्दं चकर्ष कर्षितवती
पुनः भार्यानुराग काम्ताप्रेम तम् पाचकर्ष अपि स. अनिश्चयात् गमना
गमनानिश्चवयात् न ययौ गतवान् न तस्यौ स्पितवान् यथा तरङ्गषु लहरीषु
तुरन् प्रयासेन गच्छन् राजहसः इव न ययौ गतवान् न तस्थौ स्थितवान् ।
Reverenco for Buddha drew him forward, love for
his wife drew him back again, thus from irresolution he
neitber went away nor stood still, like a royal swan
pressing fro wards on the waves
बुद्ध को मक्ति ने उसे (आगे की ओर) खींचा, फिर भार्या के प्रेम
न उसे वापिस खींचा। अनिश्चय के कारण न तो श्रागे ही गया और
न खड़ा ही रहा, जैसे तरंगों पर (प्रयासपूर्वक) चलने वाला राजहंस न
श्रागे ही बढ़ता है और न निश्चल ही रहता है।
(४३)
तस्या
प्रदर्शन तूपगतश्च
हात्ततश्चावततार पूर्ण ।
श्रु त्वा ततो नूपुरनिम्वन स
पुनर्ललम्बे हदये गृहीतः ।।
पन्वय-तत । तस्याः भदर्शनं उपगतस्तु स: स्यात् तूर्णम् अवसतार । तत नूपुरनिस्वनं श्रुस्वा पुनः हृदये गृहीत बलम्बे । व्याख्या-तत द्विविधान्तर तस्याः सुन्दर्या प्रदर्शन चक्षुपयातिक्रमण उपगत प्राप्त तु स नद हात् निजप्रासादात् तूर्ण शीघ्र अवतवार । तत. सुन्दर्या नूपुरनिस्वन नूपुरध्वनि श्रुत्वा निशम्य पुन ललम्बे विलम्बितवान् । But when he had gone out of her sight, he descended quickly from the palace roof then hearing the tinkling of her anklets he delayed again, gripped in his heart तब उसकी दृष्टि से प्रोझल होने पर वह महल से शीघ्र ही उतर गया, फिर नूपुरों का शब्द सुनकर वह बद्धहृदय होकर ठहर गया । ( ४४ ) म कामरागेण निगृह्यमाणो धर्मानुगगेण च कृष्यमाण. | जगाम दु खेन विवर्त्यमान 'लवः प्रति स्रोत इवापगाया । अन्वय-म. कामरागेण निगृह्ममणः धर्मानुरागेण च कृष्यमाणः भापगाया प्रतिस्रोतेप्लव इव दुःखेन विवर्त्तमा नः जगाम । व्याख्या--सः नन्द. कामरागेण कामासक्त्या निगृह्यमाणः बद्ध भवन् धर्मानुरागेण च धर्मप्रेम्णा कृप्यमाण प्राकृष्ट सन् श्रापगाया नधा प्रतिस्रोते विपरीतस्रोते प्लव इव नौका इव विवर्त्यमान वारवार अर्धामिमुखः भवन् दु खेन कप्टेन जगाम ययौ। Held bach by the passion of bis love and drawn for. ward by his love for duty, he went on reluctantly, ball turned round like a boat on a river going against the stream ( ३४ ) तत. कामासक्ति से श्राबद्ध और धर्मानुराग से श्राकृष्ट होकर वह दु खपूर्वक अर्थात् अनिच्छापूर्वक इस प्रकार मुड़ता हुआ गया जिस प्रकार नाव नदी की प्रतिकूल धारा में जाती है। ( ४५ ) क्रमैर्दीर्घतमै प्रचक्रमे कथ नु यातो न गुरुर्भवेदिति । स्वजेयता चैव विशेषकप्रिया कथ प्रियामा विशेषकामिति ।। अन्वय-तत. दातमै क्रमै. प्रचक्रमे कथ नु गुरुः यातो न भयेदिति कथ च विशेषकप्रियां आविशेषकां तां प्रियां स्वजेय एष । व्याख्या-हृदयस्य द्विविधता प्राप्त स नन्द, अन्ततोगत्वा दीर्घतमै प्रलम्बै क्रमै पादविन्यासै प्रचक्रमे चलितवान् कथा नु (सम्भावनायां) गुरु गौतम यात दूरप्रयात न मवेत् इति पुन च विशेषकप्रिया मण्डन प्रसाधना नुकला श्राविशेषको अशुष्कमण्डनप्रसाधना प्रियां of सुन्दरी (शीघ्रमेव पुनरागत्य) कथ स्वजेय प्रालिंगेय एव इति । यावत् मार्यानुरोधेन नन्द विलम्बितवान् तावत् गौतमः सुदूरगत मवेत् इति श्राशक्य त काले एव प्राप्तु मन्त्रर चलितवान् पुनश्च शीघ्रमेव गुरु दर्शन कृत्वा यावत् प्रियाया विशेषक शु-क न भवति तावदेव पुनरागत्य प्रियां आलिंङ्गय प्रसादयितु अल मवेय इति विचार्य दीर्घतमै क्रमै प्रस्थितवान् । Then he stepped out with long strides, thinkio perhaps the Guru has already gone and perhaps I ca inanage to embrace the beloved, who is fond of the paid while the paint is still wet गुरु दूर न चले जायें और (शीघ्र ही वापस घाकर) उस विशेषक प्रिय पाद विशेषक वाली प्रिया का थालिङ्गन कर सफू , यह विचार कर वह तब लम्बे-लम्बे डग मरता हुआ चला।
( ३५ ।
( ४६ )
श्रथ स पथि ददर्श मुक्तमानं
पितृनगरेऽपि तथागताभिमानम् ।
दशबलमभितो विलम्बमान
ध्वजमनुयान इवैन्द्रमय॑मानम् ।।
पम्वग-पथ भनुयान पथि स: ऐन्द्रधनम् इव वितरबमानम्
ममितः अच्यमान पितृनगरेऽपि तथागताभिमान मुक्तमान दशवल ददर्श ।
व्याख्या-अथ प्रस्थानानन्तरम् म नन्द अनुयान. अनुगमनशील. पथि
मागें ऐद्रध्वजमिव इन्द्रस्यकेतुमिव विलम्बमान । वुद्धपक्षे यथास्थान विरममाणम् ।
अर्घ्यमान पूज्यमान पितृनगरेऽपि तथागतामिमान मुक्तमान मानविरहित दशबल
बुद्ध ददर्श दृष्टवान् ।
Then following he saw on the road the Dasa bala
(Buddha) who was revered as the Tathagat, and was free
from arrogance even in his father's city, stopping and being
saluted on all sides, like the flag of Indra when it flies in a
procession aud is worshipped
तब पीछे जाते हुए उसने मार्ग में दशवल धारी (बुद्ध) को देखा, जो
तथागत के रूप में सम्मानित था और पिता के नगर में मी अभिमान से
रहित था और जो ठहर-ठहर कर चारों ओर से पूजा जा रहा था जैसे कि जुलूस
में फहराता हुआ इन्द्रध्वज ।
( ३८ ) उद्वीक्षण-ताक झाक । तत्पर+अक्ष-उत्सुक । व्याहृत-बातचीत (वि+ श्रा +/ह ) । श्राश्लेष-श्रालिंगन । मिथुन= जोडा। • भाव-स्नेह भावना । निर्भर झरना, जल-प्रपात । किनरी यक्षिणी । किंपुरुष-यक्ष । प्राक्षिपन्तौ चुनौती देते हुये ( श्रा./क्षिप् ) १. सराग-अनुराग । क्लम परिश्रम | सलील हावभाव सहित । अरीर मत्-श्रानन्द प्रदान किया (/रम लुइ प्रेरणार्थक किया । २. मृज सस्कार | आहव-सम्पादन, युद्ध । सिषेविषु' सेवा की इच्छा वाला, (सेव् , सन्नन्त प्रयोग । ३ विशेषक-मुख पर लेपन द्वारा श्रालेख्य | कान्तम्-प्रियतम । धारय- पारण करो (Vधा-लोट् ) । यभार धारण किया /भृ-लिट् ) 3. श्मश्रु =म् छ । निश्वास वात=श्वास की वायु । निरीक्षमाणा=(निर् + Vईक्ष+शानच् )-देखती हुई। चिकित्स-यित्वा प्रतिकार करके । निनघान=नष्ट किया (नि+/हन्-लिट ) 1. ललित सुन्दर । शाठ्य-शरारत । जिम्ह-टेढी । भृकुटी भौहें । रुष्टा- कुद्ध हुई (रुप्+क्त+आ) । चकार=किया (/कृ-लिट् ) ६ उत्पल-कमल । सकन्धा । सव्य वायाँ । मदालस-मस्ती से ढीला पत्रागुलिम्रग लगाने को अगुली या ब्रुश | वक्त्र=मुख । विनिर्दुभाव खींची (वि+निर+/धूम्-लिट् ) ७ योक्ति=युक्त । प्रमा-कान्ति । उद्भासितर=बहुत चमकने वाली । मूर्धन्-शिर, माया । ननाम-प्रणाम किया (/नभ-लिट ) । ८ मुक्त विखरे । उन्मिपित-खुले हुये (उत्-/मिप-क) । अनिल वायु । अवमग्न टूटा हुश्रा (श्रव/मजा+क्त) | नागवृक्ष-केसर का वृक्ष ।
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( ४० ) , - सम्मुख | विचार्य-विचार कर( विचार-ल्यप् )। विवतुः-वोलने की इच्छा करने वाला (विद सन्नन्त प्रयोग)। ३० शङ्क-शक-नट् , उत्तम पुरुष ए० व० (श्रा० अलवान। लम्+क्त्वा । ३१ गृह प्रवेश-गृह-प्रवेश, तत्पु० । सरकारेण हीनं सत्कार हीनम् । प्रयाण- गमन | चचाल-/चल्+लिट् , अन्य पु० ए० व० । ३२ ययाचे=/याच्+लिट् , अन्य पु० ए० व० ( श्रा० ) कर्तु =कृ+तुमन् । ३३ वेपमाना=/वेप्+शानच्+स्त्री० । परिसस्वजे परि+/स्व ज्+लिट अन्य पु० ए० व० । वातेन समीरिता-वातसमोरिता । समीरिता-सम्+ /ईर्+क्त+स्त्री० । निश्वस्य-नि./श्वस्+ल्यप् । ३४ यियासु =सन्नत या+उ | २५ दीर्घसूत्र:=ढीला, देर करने वाला। ३६ अनाश्यान-नञ् श्यै+क्त । ३७ जगाद-गद्+लिट् प० पु० ए० व० । ३८ विहाय = वि./हा+ल्यप् ३६ प्रयान्तम्=प्र/या+शतृ । प्रदध्यौ प्र/ध्यै+ल्टि श्रा० पु० ए० व० । (५० प० ) ४० दिदृक्षा-दृश+सन् + य स्त्री० { दृष्टि =दृश्+क्तिन् । करेणु हथिनी । ४१ रुक्मदरी स्वर्ण कन्दरा । ततर्प=/तृप्+लिट् अन्य पु० ए० व० (प०)। ४२ पाचकर्षा+/कृप + लिट् एक व० श्रन्य पुरुप । तुरन्तुर्+शत् । ४३ उपगत =उप/गम्+क्त तूर्णम् शीघ्र । श्रवत तार-अव+तृ+लिट् अन्य पु० ए० व० । (५०प०) ललम्बे=/लम्ब्+लिट् श्र० पु• ए० व० (प्रा.) ४४ प्रापगा-नदी। प्रतिस्रोत-प्रतिकूल धारा । प्लव नौका । ४५ क्रम=क्दम, पद, डग, प्रचक्रमे-प्र+कम+लिट् अ० ७० ६० व० (ग्रा.), यात =या+क्त । ४: विलम्बमान-वि./लम्ब+शानच् । पितृ नगरेपितु नगरे तत्पु० ।