Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Paniniyaprabodh (purvardh)

Shastri,gopal · 2012/08

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श्रीमद्भयः
सादरमुपहृतः।
श्रीगोपालशास्त्रिणा।

हार्दम् "अंगानि वेदाश्चत्वारो, मीमांसा न्यायविस्तरः । धर्मशास्त्रं पुराणानि, विद्याश्चताश्चुतर्दश || उपवेदैश्चतुर्भिस्तु ता एवाष्टादश स्मृताः ॥ ४ चार वेद, ६अङ्ग, (शिक्षा, कल्पसूत्र, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिप और छन्द ) मीमांसा, (पूर्व, मध्य और उत्तर ) न्यायविस्तर, (वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, पाशुपत, वैष्णव, सौगत, (बौद्ध) जैन, (आईत) लोकायत (चार्वाक) सभी गर्किक दर्शन ) १८ धर्मशास्त्र, १८ पुराण, (१८ उपपुराण भी) ये ही १४ विद्याए हैं। ४ उपवेद, ( आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र) मिलाकर ये ही १८ अठारह हो जाती हैं । इन्हीं चौदह विद्याओंके अध्ययन कर लेनेसे मनुष्य पूर्णप्रज्ञ हो जाता | अतः इनको संक्षिप्त रूपमे पाठकोंके सामने रखना ही मनीषियोंका कर्तव्य है। मैं यहां केवल व्याकरणके विषयमें कुछ सार बातें कहूंगा:- "समुद्रवद् व्याकरणं महेश्वरे तदर्धकुम्भोद्धरणं बृहस्पतौ । तद्भागमागाच्च शतं पुरन्दरे कुशाग्रविन्दुत्पतितं हि पाणिनौ।। माहेश व्याकरण समुद्रके समान विस्तृत है । वृहस्पतिका समुद्र से कुम्भद्वारा निकाले जलके समान थोड़ा है । पुरन्दर (इन्द्र) का . उसके भी शतांश भागके बराबर है । पर पाणिनिका व्याकरण समु- इसे निकाले कुशके अग्रभागसे टपकते हुए जलबिन्दु के बराबर है। इससे यह सिद्ध है कि पाणिनि महर्षिने समुद्रके समान विस्तृत व्याकरणको कुशाग्रबिन्दु बलके समान पवित्र और संक्षिप्त बनादिया है । पाणिनि व्याकरणकी पूर्णतामें तो किसीको सन्देह ही नहीं है। इस व्याकरणमें लौकिक वैदिक दोनों शब्दोंकी सिद्धि की गयी है, अतः इस पद्यका तात्पर्य पाणि- नीय व्याकरण के संक्षिप्त स्वरूपकी प्रशंसा करने में ही है इसीलिये पतञ्जलिने भी:--" रक्षोहागमलध्वसन्देहाः प्रयोजनानि ।" इस वाक्यसे व्याकरणके प्रयोजनमें लाघव (लघुत्न) भी एक प्रशस्त गुण माना है। वस्तुतः पाणिनिने अपने व्याकरणके लाघव करनेमे अद्भुत प्रतिभा दिखायी है । यहां करोड़ों करोड़ों शब्दोंके साधुत्वके लिये एक एक सूत्र लिखे गये हैं। देखिये- तिष्ठद्गुप्रभृतीनि च २।१।१७, उणादयो बहुलम् ३११११, पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम् ६।१।१५७, इत्यादि एक २ सूत्रोंसे अनन्त प्रयोगोंकी सिद्धि होती है । सूत्र भी इतने संक्षिप्त हैं कि "एकमात्रालाधचे सति पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः।" यह प्रसिद्धि, ही चल पड़ी है । समुद्र के समान विस्तृत च्याकारणको अतिसंक्षिप्त कर ३९६६ सूत्रोंमें ला देना, यह पाणिनि महर्षिकी ही तपस्या तथा प्रतिभाका प्रभाव है। ऐसे (१) 'अति संक्षिप्त पाणिनीय व्याकरणको भी टीका, प्रटीका, वृद्धप्र- टीका, व्याख्या, उपव्याख्या, उपोपव्याख्या करके आज इतना विस्तृत रूप दिया गया है कि-"द्वादशभिर्व्याकरणं श्रूयते" ; यह किंवदन्ती चल पड़ी है । जिस महर्षिने समुद्रके समान विस्तृत व्याकरणको कुशाग्रबिन्दुके रूपमें ला दिया था। आज उसीका व्याकरण-"पुनस्तत्रैवावलम्बितो वेतालः ।" इस नीतिके समान पुनः समुद्रवत् विस्तृत हो गया है। यह कितने आश्चर्यका विपय है । अतः आज सभी आधुनिक मनीपियोंका यह परम कर्तव्य है कि वे पाणिनि महपिके मुख्य उद्देश्य लघुत्व एवं सरलताकी ओर पुनः प्रवृत्त होवें। सरलता पाणिनि महर्पिके सूत्रक्रममे कूट कूट कर भरी पडी है । एक सूत्रके पद आगेके सूत्रोंमें अनुस्यत रहते हैं, जिससे सहज ही सूत्रार्थ समझमें आता जाता है । पाणिनि व्याकरण 'पढनेवालोंकी मेधाशक्ति भी प्रखर हो जाती है। उनको आगेके सूत्रोंमें पीछेके सूत्रोंका स्मरण रखना पड़ता है। आज बहुतोंमें यह भ्रम फैला हुआ है कि संस्कृत तो कठिन भाषा है, पर यदि सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो सभी भाषाओंकी अपेक्षा संस्कृत बड़ी सरल है । हमलोगोंकी मातृभाषाके सैकड़े ७५ पचहत्तर शब्द संस्कृतके ही अप- भ्रंश हैं। बहुतसे शब्दं तत्सम हैं, जो आज भी सभी भाषाओं में संस्कृतके समान ही प्रयुक्त हो रहे हैं। इससे संस्कृत ।

हृदयपर अनायास ही प्रयोगोंके साधनेका संस्कार दृढ़ ।
सूत्रार्थ समझ लेता है। बाद तीन महीनेमें प्रयोगोंको साध कर
... अब.. मैं देशके सच्चे सेवक, शिक्षासुधारके पक्षपाती..
संस्कृतभाषाके अभ्युदयके अभिलापी तथा संस्कृतच्छात्रोंका उद्धार
उपहृत कर अपना कर्तव्य समाप्त करता हूँ। ॐ शान्तिः.३..
के
होता
जाता है। प्रयोग उनको स्मृतिसे बिलुप्त नहीं होते। साथ ही
संस्कृत बोलनेका अभ्यास भी दृढ़ होता जाता है। इस प्रकार
अभ्याससे थोड़े ही समयमें छात्र मेधावी बन जाता है।
सन्धियोंकी सरलता तथा उनका अनुगम और निष्कर्ष,
प्रयोगों एवं प्रकरणों के सञ्चयनकी विशेषता, प्रकरणोंके प्रारम्भमें
उनके विषयों का सामान्य ज्ञान करा देना, तथा विषयों के प्रति-
पादनशैलीकी स्पष्टता इत्यादिका ज्ञान तो पुस्तक पढ़ने वालोंकों
होगा ही। उसपर मुझे कुछ नहीं कहना है ।
: छात्र प्रतिदिन, २०. बीस सूत्रोंके अभ्यास क्रमसे दो
महीनेमें ११८७ सूत्रोंकोः कण्ठस्थ करलेता है और एक महीने में
वह संस्कृतभाषाका ज्ञाता होजाता है,।
चाहनेवाले सभी राष्ट्रप्रेमी विद्वानोंके समक्ष इस पुस्तकको
कन्यासंस्कृतशिक्षामन्दिरम्
५६.३१ शिवपुरवा,
सिगरा, काशी।
'श्रीगोपालशास्त्री मधरिः (शाण्डिल्यः);
सौ० २४७१२००७ -

श्रीसनातनधर्मस्य रक्षको राष्ट्रनायकः ।
विश्वविद्यालयस्येह प्रतिष्ठापयिता मुनिः ।
प्रयागीयो भरद्वाजगोत्रजः कुलदीपकः ।
राजते मालवीयोऽयं श्रीमान् मदनमोहनः ।

है है। यह भाषा तो मनुष्यको देवता बनादेती है । इसी कारण इसे भाषाद्वारा हम सभी प्रान्तोंको अनायास ही एक सूत्रमें बांधे रहेगे। यह.एक राजनीतिक लाभ भी संस्कृतद्वारा स्वयं सिद्ध है। संस्कृत भाषामें यह विशेषता है कि वह अत्यन्त मधुर और सङ्गीतमय है । छन्दः शब्द ही सङ्गीतका पय्यीय शब्द हमारी संस्कृतभाषा छन्दोंमें ही निबद्ध पायी जाती है । संस्कृत के अध्येता पाश्चात्य पण्डितोंने भी इस भाषा पर मुग्ध होकर जो उद्गार निकाले हैं वे आजके पाश्चात्याभि- मुख नवयुवकोंको अपने हृदयमें अङ्कित कर लेने चाहिये-- "अमृतं मधुरं सम्यक् संस्कृतं हि ततोऽधिकम् । . देवभोग्यमिदं यस्मादेवभाषेति कथ्यते । न जाने विद्यते किं तन्माधुर्यमिह संस्कृते सर्वदैव समुन्मत्ता येन वैदेशिका वयम् ।" अमृत तो मधुर है ही, पर संस्कृत तो उससे भी अधिक मधुर देवभाषा कहते है । न जाने संस्कृतमें कैसी जादू भरी मधुरता है कि हम विदेशी लोग भी सर्वदा ही संस्कृतक पढते समय उन्मत्त हो कर झूमने लगते हैं। देखा आपने, यह है संस्कृत की विशेषता । अतः स्वतन्त्र भारतमें आज संस्कृतका पठन-पाठन पूर्ववत् पुनः प्रवृत्त हो इस उद्देश्यसे मै अपने चिरकालके अनुभव द्वारा निम्नलिखित ग्रन्थको लिखने में प्रवृत्त हुआ और आज परमेश्वरकी अतुल अनुकम्पासे आपके समक्ष इसे उपस्थित करनेमें समर्थ हो सका हूं। पाणिनि महर्पिके पहले तथा पीछे भी बहुतसे व्याकरणके ग्रन्थ बने हैं और कालके अविरत प्रवाहमें विलीन हो गये हैं। पर इस युगमें जन-कल्याणेकी कामनासे जो ग्रन्थ लिखे जायगें, उनका प्रचार बहुत तेजीसे और स्थायी रूपमें हो सकता है । 'पाणिनीयप्रबोध' ग्रन्थ भारतीय संस्कृतिके संरक्षक, राष्ट्रिय- सूत्रात्माके समुद्बोधक, नवीन शिक्षाके सम्बर्द्धक, हिन्दुविश्ववि: द्यालयके प्रतिष्ठापक महामुनि स्वर्गीय मदनमोहन मालवीय जी महाराजकी प्रेरणासे लिखा गया है। इसके अध्ययनसे बालिकाओं एवं बालकोंको संस्कृतभापाका ज्ञान बहुत शीघ्र और थोड़े परिश्रमसे हो जाता है। यहां केवल इतना ही कहना है कि, पाणिनिके ३९९६ सूत्रोंमें केवल ११८७ सूत्रोंका ही क्रम-बद्ध अतिसंक्षिप्त संग्रह यह 'पाणिनीयं प्रबोध' है। लघुकौमुदीसे इसकी विशेषता. यह है कि, यहां सूत्रोंकी घृत्ति रटनी नहीं पड़ती । पूर्व सूत्रोंसे आये हुए पदोंके आधार पर छात्रस्वयं सूत्रार्थ कर लेता है । (यह प्रकार समी सूत्रोंके सामने कोष्ठमें पूर्व सूत्रोंसे अनुवृत्त पदोंको लिखकर सूत्रोंके साथ उनपर अन्वयात्र देकर स्पष्ट कर दिया गया है। ) वाद सरल संस्कृत मापामें प्रयोगोंको साधकर समझा दिया गया है। जिससे छात्र A सन

पाणिनीयप्रबोधे
संज्ञाप्रकरणम्
वाग्देवी प्रणिपत्यादौ पाणिन्यादीन मुनींस्तथा।
पाणिनीयप्रबोधोऽयं बालयोधाय तन्यते ॥
येनातरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् ।
कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्त तस्मै पाणिनये नमः॥
येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः।
तमश्चाज्ञान
भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ।।
वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् ।
पाणिनि सूत्रकारञ्च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ।।
१ अइउण २ ऋलक् ३ एओख ४ ऐऔच ५ इयवरट ६ लए
७ नमहणनम् ८ झमन, ९ घढधप् १० जबगडदश ११ सफछठय.
चटतव १२ कपय १३ शपसर १४ हल।

पाणिनीयप्रबोधे ( কাৰ इति माहेश्वराणि चतुर्दश सूत्राणि प्रणादिसंज्ञार्थानि । एषु.सादया अण्णा- द्यर्थाः । हकारादिषु प्रकार उच्चारणार्थः । * हलन्त्यम् १।३।३। ( उपदेशे इत् )। आदिरन्त्येन सेहता १।११७१ मध्यस्य स्वस्य च बोधक: 1) अतश्च प्रक् इत्यनेन प्रत्याहारेण अ-इ.उ.ऋ.ल. इति वर्णपञ्चकस्य ज्ञानं भवति । एवम् अचहल अल इत्यादयः प्रत्याहारा शेयाः । उकालोऽज्यस्वदीर्घसुतः । १।२।२७ ( उच-ऊश्च ऊ३श्व वः, ai इव कालो यस्य स ऊकालः ) इत्येवम् अकारादयः स्वरात्रिधा भवन्ति । तत्र लकारो द्विधा तस्य दीर्घाभावात् । एचोऽपि तया, तेषां ह्रस्वाभावात् । योऽच् प्रत्येकमुदातादिभेदेन त्रिधा । उच्चैरुदात्तः ।।२।२९ नीचैरनुदात्तः । श२।३०। समाहारः स्वरितः ११।२।३१ । इत्येवमकारादयो नवधा भवन्ति । * नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढकानव पश्च वारम् । उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्श शिवसूत्रजालम् ।। :: स्वरहीनं व्यञ्जनं हल इति प्राचीनानां प्रवादः । अथवा हल च ल च तयोः समाहारः हल् इति विप्रहे द्वन्द्वसमासे 'यणः प्रतिषेवो वाच्यः' इति वार्तिकस्या- नित्यत्वात् द्वितीयल कारस्य संयोगान्तलोपे 'हल्' इति रूपसिद्धिः । तेन अन्त्य ल इत् भवतीत्येकोऽर्थः, अन्त्यं हल हत् भवतीति द्वितीयोऽर्थः। ततश्च प्रथमार्थेन अन्तिमस्य 'इल' सूत्रस्थलकारस्येत्संज्ञायाम् 'श्रादिरन्त्येन सहेता' इति सूत्रबलात् इल प्रत्याहारः सिध्यति । द्वितीयायन सूत्रान्तिमानां इलमत्याहारस्थवर्णानां सत्संशायाम 'लादिन्त्येन महेता' इति सूत्रबलात् अण् अक् अच् इत्यादि. प्रत्याहारमिद्धिः । इत्येवमन्त्यपदमात्रात्येव निर्वाहात सूत्रावृत्तिर्न कार्या भवत्य- योन्याश्रयादिदोषवारणायेति विद्वद्भिर्वि भावनोयम् । ॐकारमहतिवा आणि गून गमान किती नाना मलबजने बम मग पूर्वको प्रा6 किन्तु " ओलादेश संज्ञाप्रकरणम् । ३ , 4 " . तत्र लकारः षोड़ो । एचोऽपि तथैव । सोऽच नवविघोऽपि प्रत्येकम् अनुनासिकनिर- नुनासिकभेदेन द्विधा । मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः । १।१।८ । (वर्ण :) कु-प-न-म-म-इत्याधुदाहरणम् । तदित्यम्-प्रकारादयः प्रत्येकमष्टादशभेदा भवन्ति । तृकारो द्वादशधा । एचोऽपि तथैव । तुल्यास्पप्रयत्नं सवर्णम् ।१।१।८। (वर्णजातम् ) [ प्रयत्नश्च प्राभ्यन्तरो गृह्यते 1 ] (ऋल्वर्णयोमिथः साक- ण्यं वाच्यम्) अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः । इचुपशानां तालु । ऋटुरषाणां मूर्धा । उपूपध्मानीयानामोष्ठौ । लुलसानां दन्ताः । ञमङपनानां नासिका च । एदेतोः कण्ठताल । ओदौतोः कण्ठोष्ठम् । वकारस्य दन्तोष्ठम् । जिह्वामूलीयस्य जिह्वा- मूलम् । नासिकाऽनुस्वारस्य । प्रयत्नो द्विधा प्राभ्यन्तरी बाह्यश्च । प्राभ्यन्तरः पञ्च घा स्पृष्टः, ईषत्पृष्टः, विवृतः, ईषद्विवृतः संवृत इति । कादिमान्तानां (स्पर्शानाम्) स्पृष्टः । अन्तःस्थानां (यणाम्) ईवस्पृष्टः। विकृतोऽचा (स्वराणाम् य ईषद्विवृतमु मणां (शलाम् ।हत्वस्याकारस्य संवृतः। प्रक्रियादशायां तु विकृत एव । इति आभ्यन्तरः प्रयत्नः । बाह्यप्रयत्न एकादशवा-विवारः संधारः श्वासो नादो घोषः अघोषः अल्पप्राणः महापाणः उदातः अनुदात्तः, स्वस्तिश्चेति । बाह्यपयनश्चिान्तरतम्यपरीक्षायाम् उपयुका भवन्ति । खरो विधारा: श्वासा अवशेषाः | हशः संवारा नादा घोषाः । प्रथमतृतीयपञ्चमवर्णा यणश्व अत्यप्राणः । द्वितीयचतुर्थवर्णी शलश्च महाप्राणाः । कादयो मावठानाः सः । यण अन्तरपः शल उष्मा | कखयोः पूर्व विधनानः अर्घविसर्गसहयो निढामूलीयः । पायो पूर्व विद्यमानोऽर्धविवर्गपहरा उपमानोपः । प्रचः परौ अनुवारविमा । स्वरोपरि एकनिन्दुरतुस्वारः । स्वरदक्षिणा बिन्दुयं विमर्गः । * अगुदित्स. *पत्र परणकारेण 'अण्' प्रत्याहारो ज्ञेयः । १ गोटा - नार घोडेति पाणिनीयप्रबोधे ४ वर्णरय चाप्रत्ययः । २०६७ (ग्राहकः) (कु-चु-टु-त-पु इति एते उदितः) तदेवम्-'अ'इत्यष्टादशानां ग्राहकः । तथेकारोकारी। ऋकारस्त्रिंशतः। एवं लकारोऽपि । एचो द्वादशानां । अनुनासिकाननुनासिकभेदेन यवला द्विधा' अतस्ते प्रत्येक द्वयोद्धयोहकाः। तपरस्तत्कालस्य शि७०। (ग्राहकः) सुपतिङन्तम् पदम् ।१।४।१४। रामः । भवति । विभक्तिश्च ।१।४।१०४ (सुप्तिह) प्रथमैकवचनात् सोः सुपः पकारावधि सुप प्रत्याहारो भवति । तद्यथा- २ . २ एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् विभक्तिः Gi जस प्रथमा श्रम् औट शस् द्वितीया भ्याम् भिस् तृतीया -- भ्याम् भ्यस् चतुर्थी ङसि भ्याम् भ्यस् पंचमी ओस् ग्राम् षष्ठी श्रोभू तप्तमी सम्बोधनं प्रथमावन्नेयम् प्रथमपुरषैकवचनस्य तिपरितकारात् इत्तमपुरुष बहुवचनस्य महिको कारावधि तिङ प्रत्याहारो भवति । तद्यथा संज्ञाप्रकरणम् । परस्मैपदिनःप्रत्ययाः एकवचनम् दिवचनम् बहुवचनम् पुरुषाः में तिप् तस् प्रथमपुरुष: सिप् य मध्यमपुरुषः मि वस् मस् उत्तमपुरुष: आत्मनेपदिनः प्रत्ययाः एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् पुरुषाः त श्राताम् म प्रथमपुरुषः थास् शायाम् विम् ! मध्यमपुरुषः वहि महिङ् उत्तमपुरुषः प ३ ३ * येन विधिस्तदन्तस्य १।१।७२ (स:) विशेषणं तदन्तस्य संज्ञेत्यर्थः . इह 'येन' इत्यत्र करणे तृतीया, करणं च अपवानं भवति । प्रधानता च विशेष्यविशेषणभावमादाय विशेषणे एव भवति । अतश्च विघीयमाने कार्य विशेषणे अन्तशन्दो नियोऽयः यथा ईदूदेद्विवचनम् प्रगृह्यम् इति सूत्रे ईदन्तम् अंदन्तम् एदन्तं द्विवचनं प्रगृह्यम् भवतीत्यर्यो लम्यते । ॥ इतिसंज्ञाप्रकरणम् ॥

पाणिनीयप्रबोधे - संहितोपक्रमः सन्धानम् सन्धिः । सम्पूर्वकात् 'घा' धातोः 'कि' प्रत्यये कृते सन्धिशब्दो निरापद्यते । तस्यायों भवति सम्मेलनम् संहिता इत्यादिः । अत्रतु पूर्वापरीमावेन स्थितयोर्वर्णयोरत्यन्तसन्निधाने सति उभयोरन्यतरस्य वा योहि कार्यविशेषः सम्पद्यते स एव सन्धिशब्दार्थः । तस्या सामान्यतस्त्रयो मेदा:-अच्सन्धिः । हलसन्धिः । विसर्गसन्धिश्चेति । यत्रोभयत्राचः सत्वे कार्यविशेषो जायते सोऽस- धिः । यत्र पूर्व प्राधान्येन हलः परत्र हलि अचि वा सति कार्यविशेषो भवति स इल्सन्धिः । यत्र पूर्वत्र सकारे रेफे विसर्गे वा परत्राचि इलि वा विद्यमाने कार्य- विशेषः परिणमति स विसर्गसन्धिः । तस्य नियमाः :- संहितैकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः । नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते । एकपदादिषु अवश्य सन्धिः कर्तव्यो भवति । केवलं वाक्ये स वक्तुरधीनो विद्यते । वास्यस्य लेखको वक्ता वा सन्धिं करोतु न करोतु वा स तत्र स्वतन्त्रोऽस्ति । उदाहरणानि-यया:--ने+अनम्नयनम् । उत् + भवति उद्भवति । मनसू- रथा मनोरथः । वाक्ये तु--गना अस्ति पत्र ! गङ्गास्त्यत्र । वट वृक्षाः। षवृक्षाः । रामः वाच्यः । रामो वाच्यः । इत्युभयथापि प्रयोगा ‘भवन्ति । परन्तु वाक्येऽपि सर्वथा सन्धिः कर्तव्य इति शिष्टसम्प्रदायो विद्यते । इत्यलम् । अथ अच-सन्धिः ( स्वर-सन्धिः) वेद + अध्ययनम् इति स्थिते अकः सवर्णे दीर्घः ६।१।१०१ (अचि एक:

अच्सन्धिप्रकरणम्। (भचि ४ २ १ पूर्वपरयोः) इति दी(कादेशे-वेदाध्ययनम् । एवं स्वराज्यान्दोलनम् । महान्यायः । कारागारम् । नृपतीन्छा । पतीहा । गौरीव । गौरीशः । साधूत्सवः। बाहूर्वम् । चमू. ल्लासः । चमूमिः । पितृणम् इत्यादि । राम+ इच्छा इति स्थिते 'अदेङ गुणः श२ इति अदेडोः गुणसंज्ञायाम् आद्गुणः ६१८७ एकः पूर्वपरयोः) इति गुणकादेशे कर्तव्य स्थानसाम्यादेकारैकादेशे । रामेच्छा । एवम्-देवेहा । रमेह । रमेशः । देशोद्धारः । महोत्सवः । धनोनः । गङ्गोवंगा। देव+ ऋणमिति स्थिते श्राद् गुणः इति गुणे कर्तव्ये स्थानसाम्यादकारैकादेशे उरण रपरः १११५१ इति रपरे । देवर्णम् । एवम्-महर्षिः। तवल्कारः। खट्वकारः इत्यादि । एक+ एकम् इत्यत्र वृद्धिरादैच् १११११ इति आदैचोः वृद्धिसंज्ञायाम् वृद्धिरेचि ६।१।८८ (आत् एकः पूर्वपरयोः इति वृद्धकादेशे कर्तव्ये स्थानसाम्यादैकारादेशे । एकैकम् । एवम् महै. श्वर्यम् । सूपौदनम् । गङ्गौधः । ममौत्सुक्यम् । महौद्धत्यम् इत्यादि । दघि + अत्र इति स्थिते इको यणचि ६।११७७ इति यणि कर्तव्ये स्थानसाम्यात् इकारस्य यकारे दध्यत्र । एवम् वार्यानय । सुष्यगना । सेनान्यागमनम् । वायुत्सवः। अश्विन्युत्सवः । वायू मिः । नमिः । _णम्। रोहिण्यक्षम् पूजयेला फोशातक्योदनम् । लक्ष्म्यैश्वर्यम् । वाषिधम् । नन्वय । मध्विदम् पश्वैश्वर्यम् । अहोदनम्, बाहौषधम् । पित्रिच्छा । मात्रुत्सवः । स्वसेकता । होश्वर्यम् । धात्रोषधिः । पित्रौषधम्। लाकृतिः इत्यादि । ने+ अति इति स्थिते एचोऽयवायायः ६११७८ (अचि)। इति एकारस्य अयादेशे। नयति । एवं भवति । नायकः । पावकः, हरय + दह इत्यत्र लोपः शाकल्यस्य ८।३।१९ (अवर्णपूर्वयोः पदान्तयो : ओश पाणिनीयप्रबोधे (मते) इति यलोपे हर हह इति सिद्ध प्राप्तो गुणः पूर्वत्रासिद्धप टा२।१ (अधि कारोऽयम्) इति यलोपासिद्धया निवर्तते । पक्षे हरयिह । एवम् विष्ण इह । विष्ण : विह त भागताः । तथागताः । भान पायाहि । भानवायाहि । तस्मा अर्थः । तस्मा. यर्थः । रामा इह । रामाविह। हरे+अव इति स्थितौ प्राप्तम् अयादेशम् अपोद्य एङः पदान्तादत्ति । ६।१।१०।(पूर्वरूपम्) इतिपूर्वरूपे हरेऽव। एवम् चटोऽपसर्प । हरी + एतौ इत्यत्र प्रातयणं सन्निरुप ईदूदेद्विवचनं प्रगृह्यम् ॥१।१।११ इत्यनेन हरी इत्यस्य प्रगृह्यसंज्ञायाम् प्लुनप्रगृह्या अचि नित्यम् ६।१।१२५ (प्रकृतिभावः) इति प्रकृतिभावे । हरी एतौ । एवम् भानू उदितौ । माले एते । इत्यच् सन्धिः । -- तन्निष्कर्षों यथा:-- १-अकि समानस्वरयोों जायते । २-अवर्णादिकि परे यथास्थान गुणकादेशो भवति । ३-अवर्यादेचि परे वृद्धये कादेशः कल्पते । ४ -इकोऽ- सत्रणेऽचि परे यथास्थानं यण् निष्पद्यते । ५-एचः क्रमाद्-ग्रय-अव्=प्राय: श्राव् इति सम्पद्यतेऽचि परे । ६-पदान्तादेङः परस्य हृस्वाकारस्य पूर्वरूपमे व भवति । ७-द्विवचनानामौदूदेदन्तानां प्रकृतिभावेन दीर्घषणयाद्यादेश- पूर्वरूपाणि नैव भवन्ति । इत्यलम् । -- अथ हल्-सन्धिः रामस्+शेते इत्यत्र स्तोः श्चुना श्चुः ७।४।४० इति श्चुत्वेन सस्य शवे य ३ हल-सन्धिप्रकरणम् । ३ प ३ रामश्शेते । एवम् सच्चित् जगच्छत्रम् | मरुज्जयः । यात्रा ।' रामस् + पष्ठ इति स्थिती प्टुना टुः ७।४।४१ (स्तोः) इति ष्टुत्वेन सत्य घत्वे रामषष्ठः । एवम् तट्टीका । उड्डीयते । रणड्ढक्का । लिखण्णकारम् । वाक् + ईश इति स्थिते झलां जशोऽन्वे । ८।२।३९ । इति जशत्वेन कस्य गत्वे वागीशः । एवम् अजन्तः । लिड्भ्याम् । तद्वद्। ककुचियम्। धाग् + कृता इस्यत्र खरि च ८४१५५ (झलां चरः) इति गस्य कत्वे वाक्कृता । एवम् तत्तनोति । तत्सत् । प्राट्सरति । ककुष्प्रकाशते । वाक् + मात्रम् इत्यत्र यरोऽनुनासिकेऽनु नासिको वा ८४४५ इति ककारस्य अनुनासिके डकारे वाङ्मात्रम् । एवम् तन्नित्यं । आगूनद्याः । आमनदी । तत् + लय इत्यत्र तोलि ८४६० (परसवर्णः ) इति तस्य परसवर्णतया लवे । तल्लयः । एवम् विद्वाल्लि. खति । अत्रानुनासिकस्य नस्यानुनासिक एव लकारः । वाफ + हरिः इत्यत्र झयोहोऽन्यतरस्याम् ८४६२ ( पूर्वसवर्णः ) इति पूर्वसवर्णतया संपार नादघोषमहाप्राणप्रयतस्य हकारस्य घकारे । कस्य च जश्वेन गकारे वाग्परिः । एवं अन्झीनम् । तद्धविः । विड्ढसति ।.ककुम्भता । वाक् + शूराः इत्यत्र शश्लोऽटि ८४६३ (झयः) इति शकारस्य छकारे । वाफ्छूरः । एवम् -तच्छिवः । (स्तोः श्चुना श्चुः। इति दस्य चुवेन जकारे खरिचेति चत्वेन चकार इति प्रक्रिया शेया) पछेरते । ककुपछयनम्। छत्वममीति वाच्यम्। तच्छ्लोकेन शिव+छाया इत्यत्र छे च ६११७३ (तुक् हस्वस्य) इति कि कर्तव्ये आद्यन्तो टकिती श१।४६ इति कित्वात् अकारस्यान्ते तुकि ते फकारस्य -इलन्त्यम् इत्यनेन उकारस्य उपदेशेऽजनुनासिक इत् ११३६२ इत्यनेन इत्संज्ञायाम् तस्य लोपः ११३९ (इतः ) इत्पनेन उभयोोपे शियत् छाया 8 ३ 8 "पाणिनीयप्रबोधे B ५ ५ ३ ३ १ इति जाते तकारस्य जश्त्वेन दकारे तस्य श्रुत्वेन जकारे खरि चेति जकारस्य चकारे शिवच्छाया। एवम् संस्कृतच्छात्रः । इत्यादि । प्रत्यङ+ आत्मा इत्यवस्थायाम डमो हस्वादचि डमुनित्यम् ।८।३।३२॥ (अचः) इति उकारस्य ङमुडागमे कर्तव्ये । 'आद्यन्तौ टकितौ' इति टित्वाद् डकारात्पूर्वम् डुटि, अनुबन्ध- लोपे प्रत्यङङात्मा । एवम् सुगण्णिह । तस्मिन्नद्रौ इत्यादि । राजन् + तथा इति- स्थितौ नश्छव्यप्रशान् । ८३७ । (रुः अम्परे) इति नस्य रुकारे कृते अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा ७३।२॥ (रोः) इति नकारोत्तरवर्तिनोs. कारस्यानुनासिके राजरु+तथा इति जाते अनुबन्धलोपे खरवसानयोर्विसर्ज. नीयः १७।३।१५ (२) इति रेफस्य विसर्गे । राजः तथेति जाते विसर्जनीयस्य सः ।।३।३५। (खरि) इति विसर्गस्य सकारे । राजैस्तथा । एवम् पतस्थुत्कारः । इसश्चलति। विद्वाश्छात्रः। राजष्टीकसे । सँष्ठक्कुरः। हरिम् + हसति इत्यवस्थायाम् मोऽनुस्वारः ८।३।३३ (हलि) इति मस्यानुस्वारे । हरिं हसति । एवम् ग्राम सरति । सुखदं शयनम् । यशान् + सि इत्यत्र नश्वापदान्तस्य झलि ८।३।२४ ( मोऽनुस्वारः) इत्यनेन नस्यानुस्वारे यशासि । एवम् श्राक्रम् + स्यते इत्यत्र मस्यानुस्वारे प्राक्रस्यते । अं+ कितः इत्यत्र अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः ४५८॥ इति परसवणे डकारे अङ्कितः। एवम् वाञ्छितः ।कुण्ठितः। छन्दितः । चुम्बितः । त्वं + करोषि इत्यत्र वा पदान्तस्य ८.४५६ (अनु. स्वारस्य परसवर्णः ययि ) इति वैकल्पिके परसवणे डकारे। त्वङ्करोषि । त्वं करोषि । एवम् सँय्यन्ता, संयन्ता । सव्वत्सरः, संवत्सर: । यल्लोकम् । य लोकम् । इति हल-सन्धिः ३१ ३ ५ विसर्गसन्धि प्रकरणम् । . । तन्निष्कर्पो यथा:- १-~-दन्त्याक्षराणि तालव्येनाक्षरेण सह तालव्यानि मूर्धन्येन सह मूर्धन्यानि स्वतुल्यानि भवन्ति । २-अशि वर्गप्रथमाक्षरस्य स्ववर्गीय तृतीयमक्षरम् भवति । ३-खरि परे वर्गतृतीयाक्षरस्य स्ववर्गीयं प्रथमाक्षरं भवति । ४-अनुनासिके परे वर्गप्रथमाक्षरस्य स्ववर्गीयं पञ्चमाचर तृतीयाक्षरं वाभवति। ५-तदनानां लकारे परे स्वतुल्यो लकारो शेयः । ६-वर्गप्रथमाक्षरात् परो हकारस्तद्वर्गीयचतुर्थाक्षरत्वं भजते । प्रथमावरच तृतीयाक्षरं भूत्वा तिष्ठति । ७-वर्गप्रयमात् तृतीयादाक्षरात् परः अम्परकः शकारः छकारो भवति तृतीयाक्षरञ्च प्रथमाक्षरं भूत्वा तिष्ठति । ८-पदान्ता हरवपूर्वा डएनाः स्वरे परे द्विगुणितास्तिष्ठन्ति । ९-पदान्तो नकारस्तु अपरकेषु त-थ-च छ-टठेषु षट्सु अक्षरेषु (छवि ) तत्स्थानीय स- श-ष-परम्होऽनुरवारो भूत्वा तिष्ठति । १०-वर्गाक्षरेषु (स्पशेषु ) परेषु अपदा- तनंकारमकारी अनुस्वारीभूय तदर्गीयपञ्चमाक्षरतां बजतः । ११-पदान्तमकारस्तु वर्गाक्षरेषु परेषु य-व-लेषु च अनुस्वारो भूत्वा विकल्पेन परसवर्षता गच्छति । १२-शषसहरेफेषु परेषु अपदान्ती नकारमकारी पदान्तश्च मकारोऽनुस्वारतामेव गच्छति । १३-हस्वादचः परः छकारः चकारपूर्वकस्तिष्ठति । इति । अथ विसर्ग-सन्धिः राम + करोति इत्यत्र समजुपो के 1८।२१६६ (पदान्ते ) इति सत्यः रुत्वे अनुबन्धलोपे रामर करोति इति जाते। खरवसानयोविसर्जनीय इति विसर्गे रामः करोति इति स्थिते कुप्पो-कपो च ८।३।३७ विसर्जनीयस्य दति वैकल्पिके लिह्वामूलीये राम करोति। पक्षे रामः करोति । एवं हरि पाणिनीयप्रबोधे खनति । हरिः खनति । मेघः पतति इत्यत्र वैकल्पिके उपध्मानीये। मेघ पतति । वृक्षः फलति, वृक्ष फलति । विष्णुः प्राता इत्यत्र विसर्जनीयस्य इति सकारे विष्णुस्त्राता । रामः + सरति इत्यत्र वा शरि ८।३।३६ (विसर्जनीयः) . इति वैकल्पिके विसर्गे रामः सरति) पक्षे सकारे रामस्सरति । एवं रामः शेते इत्यत्र पक्षे सत्वे श्चुत्वे रामशेते। रामः टीकते इत्यत्र पक्षे सत्वे ष्टुत्वे रामष्टीकने इत्यादि । राम + अर्घ्य इत्यत्र अतो रोरप्लुतादप्लुते ६।११११३ (उ: अति ) इति रोः उकारे गुणे पूर्वरूपे रामोऽWः । एवम् गुणोऽनर्यः । शिवोऽपीत्यादि । राम + हसति इत्यत्र हशि च ६।२११४ (अप्लुदादतः रोः उः) इति उत्वे गुणे रामो हसति । एवम् शिवो याति । घटो भूतले । पटो मठे । मनोरथः । मनोरमा । पयोधिः । देवाह+ इह इति स्थिती भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि ८।३।१७ (रोः) इति रोर्यत्वे 'लोपः शाकल्यस्य' इति पाक्षिके यलोपे । देवा इह । देवायिह । एवम् देवाय + नम्या इत्यत्र हलि स. र्वेषाम् ८।३।२२ (भोभगो अघो अपूर्वस्य यः लोपः ।) इति यलोपे देवा जम्याः । एवम् नरा यान्ति । बाला हसन्ति । पापा रुवन्ति । पुनर् + रमते इत्यत्र रोरि ८३।१४ (लोपः) इति रेफस्य लोपे ठूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः ६।३।१११ इति पूर्वस्याकारस्य दीर्धे । पुना रमते । एवम् हरी रम्यः । भान् रक्षति। हेपिता रक्षा हे नारद । ससु+ करोति इत्यत्र। एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनम् -समासे हलि ६१११३२ इति सुजोपे स करोति । एवम् स पठति । चलति । स वदति । स गच्छति । एष सरति । एष वन्धः। एष शिवः । इत्यादि । इति विसर्ग-सन्धिः ४ - द २ ४ ३ स ०*० शब्दविचारप्रकरणम् । तन्निष्कर्पो यथा-- १-खरि विसर्ग एव तिष्ठति । तत्रैव तस्य कखयोः पफयो: पूर्व जिह्वा. मूलीयोपध्मानीयरूपरे वैकल्पिकाविसर्गा भवतः । २-दन्त्य-तालव्य-मूर्द्धन्येषु नवसु स्वरप्रत्याहाराक्षरेषु त एव वैकल्पिका: विविधाः सशषा, भवन्ति । (अशि उ: यलोप: रेफश्चेति त्रिधा सन्धिर्भवति ) ३-तत्र हत्वाकारात्परस्य रोः अति हशिच उः भवति । ततो गुणे कृते अतश्च पूर्वरूपे सति प्रयोगसिद्धिः। हवाकारात् परस्य रोः हत्वाकारभिन्ने अचि तथा आकारात् परस्य तु अशि यकारो बायते । तस्य च लोपे सन्धिकार्याभावः । ७-~- -इचः परस्य रोः तथा रेफान्तशब्दस्थरेपास्य, ऋदन्तशब्दानो सम्बुद्धिरेफस्य च अशि परे रेफ एव तिष्ठति । अत्यैव त्रिविषस्य रेफस्य रेफे परे लोपो जायते पूर्वस्य च दीर्घः । ८-स, एष इत्युभयोः पदयोः ह्रस्वाकार भन्ने अलि निविसंगमेव रूपं तिष्ठति । सर्वत्र सुलोप एव भवतीत्यर्थः । केवलमति उत्वादि कार्य जायते । इत्यलम् । इति-सन्धिप्रकरणम् शब्दविचार:- संस्कृतव्याकरणे चत्वारो विषया विशेषतः परिशीलनीया विद्यन्ते । तेषां शानेन द्रुतमेव संस्कृतभाषायां प्रवेशो जायते । तेच विषयाः-१-सन्धयः । २ शब्दरूपाणि । ३ धातुरूपाणि । ४ समासाश्च । इति नामतो ज्ञेयाः। १-सन्धिशब्दार्थो हि पूर्वमभिहितः । तस्वरूपमपि गतप्रकरणे प्रतिपादितमेव । २-शन्टाध संस्कृतभाषायां व्युत्पन्ना अव्युत्पन्नाश्चेति द्विविघा भवन्ति । ये हि सन्दाधातुजाः सन्ति ते व्युत्पन्नाः पश्यन्ते। ये च स्वयं सिद्धास्तेऽव्युत्पन्नाकश्यन्ते।'

१४ पाणिनीयप्रबोधे अत्र श्राचार्याणां मतभेदोऽप्यस्ति ।। शाकटायनप्रभृतयो व्याकरणाचार्या यास्कादयश्च निरुक्ताचार्याः शब्दा धातुजा व्युत्पन्ना एव भवन्तीति सङ्गिरन्ते । कियन्तो वैयाकरणा गार्यप्रभृतयो निरुताचार्याश्च यौगिकान् एव शब्दान् धातुजान् व्युत्पन्नानाहुः । अन्थान् रूढानव्युत्पन्नानेवामिदधति । सर्वेष्वपि शब्देषु कारकहारकप्रभृतयः प्रत्यक्षक्रियाः अश्वगोप्रभृतयः प्रकल्प्यक्रियाः। 'डित्थडवित्थादयोऽविद्यमानक्रियाश्चेति त्रिधा शब्दा भवन्ति । ३-ये हि धातुभ्यः प्रत्यययोगेन शब्दा निर्मायन्ते ते घातुनाः शब्दाः 'कथ्यन्ते--मूलधातवश्च अष्टाशीत्युत्तराण्यष्टादशशतानि विद्यन्ते (१८८८) सन्नन्तादिप्रत्ययान्तधातुभेदतो नामधातुभेदतश्च तेऽनन्ता भवन्तीति धातुप्रकरणेऽभिधास्यते। तत्रापि विशिष्टधातवस्तु परिमिता एवं सन्ति, यान ज्ञात्वा तिप्रत्यययोगेन धातुरूपागि निर्माय सामान्यतः क्रियाव्यवहारः कर्तुं शक्यते । तेभ्य एवं परिमितधातुभ्यः कृत्प्रत्यय- योगेन शब्दान् निर्माय संस्कृतपद प्रयोगमं प्रातिपदिककार्य कनु पार्यते । अद्यत्ने नास्ति वाचो विग्लापनस्य प्रयोजनम् अप्रसिद्धधातुपोषणादिना । (तिद्धन्ते धावरूपाणि द्रष्टव्यानि) । ४-समामाश्च समाप्रकरणे द्रष्टव्याः । इह शब्दनिरूरणं प्रस्तूयते । तथाहि- २-शब्दसंख्यापि अनन्ता विद्यते । परन्तु क्रियतामेव विशिष्ट शब्दानाम् ना- मानि ज्ञात्वा ते पुरतः सुवादिविभक्तियोगेन शहराणि निर्माय (न तु केवलं शब्दरूपाणि कण्ठस्थीकृत्य ) सर्वेषामेव संस्कृतमामान्यशब्दाना रूपशानं कर्नु मापते। ते च निंगामा: मने ये कामना: प्रायः म रामेव रायानाम् शब्दविचारप्रकरणम् । सागि ज्ञातुं शक्यन्ते । यतो हि प्रायः सर्वेऽपि शब्दाः तत्समानरूपभाजो भवन्ति । अल्पीयांस एवं शब्दा अपवादरूपेण काचिद्विभक्तिषु तद्भिन्नरूपतामाश्रयन्ति । इति न विस्मरणीयम् । संस्कृतभाषायां शब्दानां त्रीणि लिङ्गानि भवन्ति-१ पुल्लिङ्गम् २, खी- लिङ्गम् ३, नपुंसकलिङ्गश्चेति । इत्थं त्रिषु लिङ्गघु विभक्तानाम् शब्दानाम् २१ एकविंशतिसुचादिविभक्तियोगेन पृथक् पृथग विभिन्नानि बहूनि रूपाणि जायन्ते । इति भिन्नरूपाख्य एकः शब्दमेद उच्यते । द्वितीयोऽध्य पाख्योऽपि शब्दस्यवास्ति भेदः । यत्र रूपभेदो न जायते। न व्येति-विकारं न प्राप्नोति इत्यव्यय इति तद्व्युत्पत्तियोगात् । उक्तं च केनचित्- सदृशं त्रि लिङ्गपु सर्वासु च विभक्तियु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ।। इति इत्य हि संस्कृतशब्दाः (१) भिन्नरूपाख्याः (रूपभेदवन्तः) (२) तद्धिन्ताः (अध्ययनामकाः) इति रूपभेदविचारणया द्विविधा भव. न्ति । इमे उमयेऽपि शन्दा अर्यभेदविवक्षया चतुर्दा उच्यन्ते । (१) जातिवाचकाः (२) गुणवाचकाः (३) क्रियावाचकाः (४) द्रव्य- वाचकाश्चेति । गौः शुक्ल: पाकः देवदत्तः इत्युदाहरणम् । महाभाष्यकार: पतञ्जलिस्तु वृषरूपकत्वेन शब्दस्वरूपमुक्तवान्ः--तथाहि । "चत्वारिशृङ्गाः त्रयोऽस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य । विधा बद्धो वृपभो रोरवीति महो देवो म| माविवेश"- यस्य नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्चेति चत्वारि ताः (शृङ्गानि) भूनभविष्य- दर्तमानकाला इति त्रयोऽस्य शन्दस्य पादा उच्यते । सुतिट चेति द्वे शो हतः - पाणिनीयप्रबोधे सप्त विभक्तयो हि हस्तासः ( हस्ताः) सन्ति । उरसि कण्ठे शिरसि च त्रिषु स्थानेषु बद्धः रोरवीति शब्दं करोति । फलतः एभिरेव त्रिभिः स्थानः शब्दो- गमो भवति । एवं हि शब्दो वृषभस्वरूपो महो देवो जगद्व्यवहारकारको देवः प्रकाशात्मा मयों मनुष्येषु प्राविवेश प्रविष्टोऽस्ति । इति । मनुरपि शब्दमूलक- मेव भगव्यवहारम् श्रान्नाति । इति प्रसंगसङ्गत्या शेयम् , तथाहि- वाच्या नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः तां तु यस्तेनयेद्वाचं स सर्वरतेयकन्नरः॥ (मनुः) श्रस्तु, संस्कृतभाषायाम भिन्नरूपाल्पे ( रूपमेदवन्नामके ) शब्दभेदे यान्टि त्रीणि लिङ्गानि भवन्ति । यानि च तेषु त्रिष्वपि एकवचन द्विवचनबहुवचन- भेदतो वचनानि त्रीणि सन्ति तानि सर्वाग्यपि विभक्तियोगेनैव व्यक्तीभवन्ति । (विभजन्ति शब्दान् नानारूपेषु इति विभक्तय उच्यन्ते ।) ताश्च २१ एफविंशतिः विभक्तयः-प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, पष्ठी सप्तमीति सप्तधा सन्ति । तासु परिवपि प्रत्येकं वचन-त्रय योगो, भवतीति त्रिगुणताः सप्त एकविंशतिर्जायन्ते । , पुरुप भेदः कियावत् शब्देवाप प्रथमः, मध्यमः, उत्तम इति प्रयः पुरुषमैदाः शान्ति अस्मन्छन्द उत्तमपुरुषः । युमच्छन्दो मध्यमपुरुषः। एतद्वयातिरिक्ताः मऽपि शा: (प्रधानत्वात् ) प्रथमपुरुषा गपाते। प्रघानपुरुषः प्रथमपुरुष दति व्युत्पोः । अन्यपुरुषः, अपर पुमषः तृतीयपुरुष इत्यादि प्रथमपुरुषस्येव नामान्तगण।

पुल्लिङ्गप्रकरणम् । लिङ्गज्ञानम् संस्कृतभाषायां लिङ्गशानाय प्रायः शब्दार्थज्ञानं कारणम् । परन्तु बहुत्रार्थ- विरुद्धमपि लिङ्गं प्रयुज्यते । यथा स्त्रीवाचकेऽपि 'कलन'-शन्दे क्लीव-लिङ्गम् । तद्वाचक एव दारशब्दे पुल्लिङ्गं बहुवचनञ्च । जलवाच केऽपि 'अपशब्द स्त्रीलिङ्गं बहुषचनञ्च । इत्यत एव पाणिनिना लिङ्गज्ञानार्थ लिङ्गानुशासनं नाम पृथक् प्रकरणमेवैकं निर्मितं विद्यते । पदप्रयोगः प्रकृतिभिः (शब्दैर्धातुभिर्वा सह ) विभक्तियोगे सति पदानि जायन्ते। तदेव · पदतां प्राप्ताः शन्दा धातवो वा वाक्ये प्रयोगार्दा भवन्ति । विभक्तियोगरहिताः केवलशब्दा घातको वा संस्कृत भाषायां नैव प्रयुज्यन्ते सुप्रतिकादिविभक्तयः शब्दामे धात्वने वा समागत्य लुप्ता भवेयुनाम परन्तु तासा तयोरन एकदाऽऽगमनमावश्यकम् । यथाहि-श्रव्ययशब्दा निर्विभक्तिका दृश्यन्ते, परन्तु तत्र विभक्तयः समागत्य "अव्ययादा मुपः" इति सूघेण विलुप्ता भवन्ति । इति तेऽव्ययशब्दाः पदानि वध्यन्ते । अत एव ते प्रयोगार्थी भवन्ति । उकश्च भाष्ये-"अपदं न प्रयुजीत । न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तच्या नापि केवलः प्रत्ययः । इति । संस्कृतभाषायां नानि पदानि सुबन्ततिडन्तमेदेन द्विविधानि भवन्ति । येषामन्ते तुविभक्तिर्भवति तानि सुवन्तानि, येषामग्ने तिविमतिर्भवति तानि तिङन्तानि । इति विवेकः । एषामेव सुबन्ततिङन्तपटानां माधुत्वं व्याकरणस्य मुख्यं प्रयोजनम् । प्रातिपदिकशब्दानामने सुधिमकीनां, বানুনাম पाणिनीयप्रवोधे अत तिविभक्तीनां योगो जायते । व्युत्पन्नाव्युत्पन्नभेदेन शब्दा द्विविधा इत्युक्तमेव । धातुभ्यः कृदादिप्रत्यययोगतो निर्मिता व्युत्पन्नाः, तद्भिन्ना अव्युत्पन्नाः, एतदप्यु. तमेव । ये हि व्युत्पन्नशब्दा धातुजा भवन्ति, तेभ्यः तथान्येभ्योऽव्युत्पन्नशब्दे- भ्यश्च पुनरपि तद्धितादिप्रत्यययोगेन शब्दा निर्मीयन्ते; ते च सर्वेऽपि व्युत्पन्नशब्दा एव भवन्ति । इत्यादिप्रकारेण व्युत्पन्नशब्दनिर्माणमपि द्वितीयं व्याकरण- प्रयोजन गण्यते । एवं तस्मै वैयाकरणाय हित सद्धितमिति तद्धितशब्दसिद्धिरपि सार्थिका भवति । पतञ्जलिस्तु "रक्षोहागमलप्यसन्देहाः प्रयोजनानि" इति वेदासत्वेन व्याकरण प्रयोजनमाह । अनयोरव्युत्पन्नव्युत्पन्न- योरुभयोरपि शब्दयोः "अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्" "कृत्तद्धित- समासाश्च' इति क्रमेण प्रातिपदिकसंज्ञायां सत्या स्वाद्युत्पचिर्पयते । ततश्च सूत्रबलात् विकरणादियोगतः पदसिद्धिर्भवति । तथाहि 'राम' शब्दो यदा दाशरपिरामचन्द्रेऽथें रूढस्तदा तस्याऽव्युत्पन्नतया "अर्थवदिति सूत्रेण प्रातिपदिक- संशा जायते । यदा च रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति विग्रहेण (वृत्यवोधक खाद्य निगाहः । कुत्तचितसमासैकशेषसनाद्यन्तधातुरूपाः पञ्च वृत्तयः) अधिकरणे घनि उपचादी 'राम' इति कृदन्तशब्दो निष्पद्यते तदा तस्य ध्यपन्नतया "कृत्तन्दित." इत्यनेन प्रातिपदिकमंशा भवति । इत्येवमुभयया- ऽपि प्रातिपदिकात् 'रामशब्दात्' स्याद्युत्पत्ती 'रामः रामी रामाः' इत्यादीनि नाक्यप्रयोगमाणि पदानि नियन्ते । इत्थं हि ड्यन्तामन्तादि. योनिदेयोऽपि वायो विभत्रय उत्पद्यन्ते । पुंलिङ्गशब्दाः प्रपा पुंसिरादा विनिर्दिश्यन्ते । ते च प्राधान्येन दशैव मन्ति | पुंलिने पुल्लिङ्गप्रकरणम् । .१६ तेषामेव साधुत्वज्ञानेन प्रायः समेषामेव पुंलिङ्गशब्दानां साधुत्वं, रूपाणि चार- गम्यन्ते ते च यया--- १राम रहरि ३करिन् ४भानु ५मरुत् ६ कर्तृ ७ वन्द्रमा विस् भगवत् १०मात्मन् इति दश शब्दाः प्रातिपदिकानि । एभ्यःमातिपदिकम्यः प्रत्येक पूर्वोकाः सप्त विभक्तयः क्रमश अायान्ति । एका सम्बोधनविभक्ति रेति नाना अष्टमी विमतिरप्यस्ति । परन्तु तस्या प्रथमायामेवान्तावन न पृषगणना मियते । सप्तैव विमकय इति प्राचीनमवादोऽप्यायाति । अथ पुल्लिङ्गप्रकरणम् पदं बीजं तुमो वाक्यं प्रमाणं फलमाप्यते । यस्याः प्रसादात्तो नित्या वाग्देवी प्रणमाम्यहम् ।। ५ - रामो हरिः करी भानुर्मरुत्कर्ता च चन्द्रमाः विद्वाँश्च भगवानारमा दर्शते पुंसि नायकाः । अकारान्तः पुंलिलो रामराब्दः, तस्य, प्रत्युत्पन्न पक्षे अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ।।४५ (शब्दस्वरूपम् ) इत्यनेन, व्युत्पन्नाचे तु वृत्तद्धित समासाश्च ।।४६ । (प्रातिपदिकम् ) इत्पनेन प्रातिपदिकमुशायाम् । योजसमोदछष्टाभ्याम्भिस्ङ भ्याम्भ्यरतिभ्याम्भ्यस्छ-सोसाम्कयोस्सुपा४ १२। (ज्याप्पातिपदिकात् प्रत्ययः परश्च ) इत्यनेन एकपरिभाषा सौ विभक्तौ राम + सु इति पिते "उपदेशेऽजनुनासिक इन्" इत्युकार- स्पेरोशाया 'तस्य लोपः' इति लोपे च राम+स् इति जावे"सन जुगेका' पाणिनीयप्रबोधे प इति रुत्वे 'खरवसानयो' रिति विसर्गे 'राम:' इति सिद्धम् । द्वित्वविवक्षायाम् रामभ गमश्च रामी, इति विग्रहे रामशब्दयात् औ विभक्ती समागतायाम् स पाणाम एक शेष एकविभक्तौ २२।६४ इति एकरामशब्दशेषे अन्यस्य च रामशब्दस्य लोपे राम+ौ इति स्थिते प्रथमयोः पूर्वसवर्णः६।१।१०२ (दीर्घः) इति प्राप्तस्य दीर्घस्य नादिचि ६।१।१०४ । (दीर्घः पूर्वसवर्णः) इति निषेधे 'वृद्धिरेचि' इति वृद्धौ रामौ । बहुत्वविवक्षायाम् रामश्च रामश्च रामश्च रामा, इति विग्रहे रामशब्दत्रयात् जस विभक्तौ समागतायाम, एकशेष. कार्ये राम + जस इति स्थिती चुटू ११३।७४ (प्रत्ययस्य आदी इतौ ) इति जस्य इत्संज्ञायां लोपे च राम+ अस् इत्यवस्थायाम् पूर्वसवर्णदीर्घ रामास् इत्यत्रान्त्यसकारस्य इत्संज्ञायाम् प्राप्तायां नाविभक्तौ तुस्माः १।३।४ (इतः) इत्यनेन निषेधे करवे विसर्गे च 'रामाः' इति सिद्धम् । राम+ अम् इति स्थिती अमि पूर्वः ६।१।१०७ (अकः रूपम्) इति पूर्वरूपे रामम् । रामौ । राम + शस् इति यता लशक्वतद्धिते ११३७ (इत्) इति शस्य इत्तंज्ञायाम् लोपे च रामन- अस् इति जाते पूर्ववर्णदीधैं रामास् इति जाते तस्माच्छसो नः पुसि ६।१।१०३ ( पूर्वसवर्णदीर्घात् ) इति सत्य नत्वे रामान् । इत्यत्र यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽजन्म ११४५१३ इति 'राम' इत्यस्य श्रङ्गसंज्ञायाम् दाङसिङ मागिनास्याः ७१।१२ (अतः अङ्गात् ) इति टाविभत्तोः इनादेशे मन-दन इत्यमा गुणे रामेन इति जाते अटकुप्वाइनुमव्यवायेऽपि ८४२ (रपाभ्यां नौ पः समानपदे) इति नस्य णत्वे रामेण | राम---भ्याम् इत्यत्र सुपि च ७३।१०२ ( अन्नस्य अतो दी| यनि) इति दीधे रामाभ्याम् । राम+टा ५ ३ ४ पुल्लिङ्गप्रकरणम् । २१ १ ३ ३ २ ३ ४ राम+भि इति स्थितौ अतो भिस् ऐस् ७११९ इति भि ऐलादेशे कर्तव्ये अनेकाल शित्सर्वस्य २११५५ इनि सर्वस्यैव भि ऐमादेशे वृद्धी रुत्वे विसर्गे च रामैः । राम+डे इत्यवस्थायाम ङर्यः ७।१।१३ (अतोऽङ्गात्) इति डेविभक्तर्यादेशे स्थानिवदादेशोऽनलविधौ १।१।५६ इति स्थानि- वद्भावे सुपिचेति दीर्घ रामाय, रामाभ्याम् , राम+भ्यस् इत्यत्र बहु- वचने झल्येत्।७।३।१०३ (अतः अङ्गस्य सुपि) इति एत्वे रुवे विसर्गे च रामेभ्यः। राम+डसि इति स्थिती 'टार सिडसाम्' ईते डसेराति दी रामात् इत्यत्र जश्त्वेन दकारे वावसाने सा४।५६ (झलां चरः)इति चत्वेन वैकल्लिकेतकारे रामात्- रामाद्, रामाभ्याम्, रामेभ्यः । राम+इस् इति स्थिती याडसिद साम्० इति डसः स्या- दशे रामस्य । राम + श्रोस् इत्यत्रओसि च ७ ३.१०४ (अतः अङ्गस्य एत् सुपि) इति प्रकारस्य एकारे रामे+ श्रोस् इति जाते अयदिशे रत्वे विसर्गे च रामयोः । राम् + आम् इत्यत्र ह्रस्वनद्यापो नुट् ७१।५४ (आमः ) इति नुहागमे कर्तव्ये 'आद्यन्तौ टकितौ' इति टिवादाम यादौ नुटि उकारटकारयोरित्संजायां लोपे राम+नाम् इति जाते नामि ६४।३ (अचः अस्य दीर्घः) इति दीघे णत्वे रामाणाम् । राम+ कि इत्यत्र डकारस्येत्संज्ञायां लोपे च गुणैकादेशे रामे रामयोः । राम+सु. इति स्थिने एत्वे कृते आदेशप्रत्यययोः ८१३१५९ (इएकोः अपदान्तयोः सः मूर्धन्यः ।) इति सकारस्य मूर्धन्यषकारे 'रामेषु' इति सिद्धम् । सम्बोधने हे राम+सुइति स्थिते एकवचनं मम्बुद्धिः२।३।४६ (प्रथमायाः) इति सोः सम्बुद्धिसंज्ञायाम् एक ह्रस्वात् सम्बुद्धः ६।११६९ (भङ्गात् हलः लोपः) इत्यनेन सुलोपे हे राम हे रामौ हे रामा: पूर्ववत्। एवम्-घट, पर, कर, हस्त, चय, जय, लय, पाक, राग, पाद, मास, ३ २ 8 प पास २२ पाणिनीयप्रबोधे , . . . , ज्ञन्दा म A वास, काल, रोग, भोग, लोक, दीर्घ, सूर्य, चन्द्र, नग, नाग, दन्त, धन, मेध, केश, वृक्ष, कुम्भ, कीट, गुण, शूर, पुत्र, छात्र, मन्त्र, यन्त्र, प्रश्न, यश, यत्न, देव, मेष, वुदकुर, सिह, व्याघ्र, गज, मूषक, छाग, नर, वानर, वक, हं, शकुन्तादयः । सर्वेऽपि घनबनधाचप्रभृतिप्रत्ययान्ताः ज्ञेयाः । श्राकारान्तशब्दे तु सर्वत्र सन्धिकार्य रूपसिद्धिः । तथाहि-हाहाः । हाहौ। हाहाः । हाहाम् । हाहौ । हाहान् | हाहा, हाहै, हाहाः, हाहौः । हाहाम् । हाहे ! इत्यादि । अत्राप्यश्राकारान्तधातु-शब्दानां भ-संज्ञायाम् रूपविशेषः। यथा गोपाशब्दात् शसि विभक्ती समागतायाम् अनुबन्धलोपै गोपा-+ अस् इत्यत्र याच भम् ११४।१८ ( स्वादिष्वसर्वनामस्थाने) इति भ-संज्ञायाम आतो धातोः ६।४। १४० (म-संक्षस्य लोपः) इति भ सकस्य श्राफारस्य लोपे गोपः, गोपा,गोपे गोपः गोपोः गोपाम् गोपि। इत्यादि । एवं त्रीलिङ्गेऽपि । शशमा कोलालपादयोऽ. प्येवमेव सीलिङ्गपुलिायोभियोरपि सरूपा शेयाः । धातुशब्दाश्च- किवन्ताश्च विडन्ताश्च विजन्ता येऽपि धातवः । ते धातुत्वं न जइति शन्दवं प्राप्नुवन्ति च । इति इकारान्तः पुंल्लिो हरि शब्दः ( बन्दर, विष्णु ) रिशब्द कृदनात्यात् प्रातिपदिकमंज्ञायाम् सौ विसर्गे च हरिः । हरि + श्री रत्यत्र पूर्वतवादी हो । हरि---अम इत्यत्र पूर्वगवर्णदीर्य बाधित्वा-जसिं च ७५३११०९ (१५ गुण :) इत्यनेन गुणे अयादेशे हरयः । हरिम् । एवं हरीन् । रि-- इत्यवस्थायाम् शेपोध्यसखि ४९७ (हस्व इमार जगार देगः ) निमि-संशायाम, आटानाधरियाम् ७।३।१२० (घेः) इति ४ ३ पुंलिङ्गप्रकरणम् । ब " नादेशे णत्वे हरिणा । हरिभ्याम् । इरिभिः । इरि+हे इत्यत्र-पहिति ७३।१११ (गुणः) इति गुणे अयादेशे हरये। हरिभ्याम् । हरिम्यः। हरे+अस् इत्यव. स्थायाम् डसिखसोश्च ६।१।११० (एडः पूर्वरूपमेकादेशः) इति पूर्णरूपे हरेः। हरिभ्यां । हरिभ्यः । हरेः । हो: । हरीणाम् हरि+डिः इति स्थिती अञ्च घे: ७१३।११९ (ईः इदुस्याम् औत्) इत्यनेन डेरीति कृते इकारस्याकारादेशे च वृद्धौ हरौ, होः, हरिपु । हे हरि + सु इत्यवस्थायाम् हस्वस्य गुण ७३।१०८ (सम्बुद्धौ) इति गुणे एडहवादिति सुलोपे हे हरे। हे हरी। हे हरयः ।एवं मुनि, कपि, कवि निघि विधि, यति, ग्याधि, जलधि, रवि, पहि, रश्मि, पति, भूपति, वृहस्पति, शनि, दाशरथि द्रौणि, दालि, पाणिनिपभृतयः संज्ञाविशेषणशब्दा -हस्वकारान्ताः पुल्लिङ्गा ज्ञयाः । केवलपतिशन्दे तु यादौ विशेषः । पति + आ इत्यत्र पतिः समास एवं ११४] (घि) इत्यनेन पि. त्वाभावेन नत्वाभावे यणि पत्या, पत्यम् इत्यत्र ख्यत्यात्परस्य६।१।११२(डसिडसोश्चात उत् इति विभक्तेरकारस्योकारे रुत्त्रे विसर्गे च पत्युः । पति + इ इति स्थिते औत् ७॥ ३।१।१८ (इदुभ्यां कः) इति विभक्तेरौकारे यणि पत्यौ इत्यादि । शेष इरिवत् सखिशब्दस्य तु असम्बुद्धिसर्वनामस्याने विशेषः सखि + सु इति स्थिते अनहसौ ७१६३ (सख्युः असम्बुद्धौ) इति अनडि कर्तव्ये डिच १११।३५ (अन्त्यस्य आदेश:) इति डित्वादन्त्यस्य इकारस्य अनडादेशे सखन् + सु इति स्थिते सुडनपुसकस्य १।११४३ (सर्वनामस्थानम्) इति सुटः सर्वनामस्थानसंज्ञा. याम् सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ ६।४।७ (नोपघाया दीर्घः) इति नोपधादी सखान +सु इति स्थिते हलङ याभ्यो दीर्घात् सुतिस्यपृक्त हल ६।१।६८ (लुप्यते) २ . B प पाणिनीयप्रबोधे इति . सुलोपे। नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य ८।२।७। इति नलोपे सखा । सखि + औं' इत्यत्र सख्युरसम्बुद्धौ७।१।६२।(सर्वनामस्थानं णित् इति णिद्वद् भावे अचौब्णिति ७।२।११५ । (वृद्धिः अङ्गस्य) इति इकारस्य वृद्धौ आयादेशे सखायौ सखायः । सखायम् सखायौ इत्यादि शेषं पतिवत् । ह्रस्वोकारान्ताः लिङ्गा:-भानु, विष्णु, गुरु, साधु, राहु, बाहु, ऋतु, पृथु, केतु, सेतु, हेतु, शिशु, विधु, शत्रु, प्रभु, जन्तु, अध्वर्यु, पशु, शम्भु प्रभृतयः शब्दा हरिव ज्ञेयाः । परन्तु एपु गुण श्रोकार स्तस्य प्रवादेश इति विशेषः । यथा भानु: भानू मानवः । भानुम् भानू भानून् । भानुना भानुभ्याम् भानुभिः । भानवे भानुभ्याम् भानुभ्यः । भानोः भानुभ्याम् भानुभ्यः । भानो: भान्वो: भानूनाम् । भानी भान्वोः. भानुषु । हे भानो हे भान हे भानवः । दी|कारोकारान्तशब्देषु तु विभक्तियोगे सन्धि- का रूपसिद्धिः । यथा पपीः पयो पप्यः । यणं बाधित्वा पूर्वरूपे पपीम् पप्यो पपीन् । पप्या पपीभ्याम् पपीभिः । पप्ये पपीभ्याम् परीभ्यः । पप्य: पपीभ्याम् पपीभ्यः पप्यः पप्योः पप्याम् । पपी पप्योः पपीषु । हे पपी: हे पप्यौ हे पप्यः। एवं ययो वातप्रमीप्रभृतयो धातुभिन्ना ईप्रत्ययान्ता ईकारान्ता हूहूप्रभृतय ककारान्ताश्च शब्दाशयाः। कारान्तः पुंलिङ्गः कर्तृ शब्दः (करने वाला) द है न मराब्दात् सो विभक्ती-ऋदुशनस्पुरदंसोऽनेहसां च ॥११९४ (अस- ग्बुद्धीअनसी) इति हिवादन्त्यस्य प्रकारस्य अनडादेशे कर्तन् सु इति जाते प्रतिपदविधित्वात् 'सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धी' इति बाधित्वा अपतन्तच्वस पुल्लिङ्गप्रकरणम् । २५ .. नतृनेतृत्वक्षतृहोतृपोतृप्रशास्तृणाम् ६।४।११ । ( उपधादीयः सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ) इति उपेघादी फर्तान सु इत्यत्र सुलोपे नलोपे 'कर्ता' इति सिद्ध्यति फर्तृ + श्रौ इति स्थिते-प्रतो डिसर्वनामस्थानयोः ६।३।११० । ( गुणः अङ्गस्य ) इति 'कारस्याकारे गुणे 'उरणपरः' इति रपरे कर्तर् + श्री इत्यत्र 'अप्तृन्०' इत्युपधादी' कर्तारौ। कर्तारः । कर्तारम् । कर्तारौ । कर्तृन् । यणि फना । कर्तृभ्याम् । कर्तृभिः । फर्के । कर्तृभ्याम् । कर्तृभ्यः। कत + अस् इति स्थिते । ऋत उत् ६।१।११ । ( उसिङसोः प्रति एकादेशः) इति काराकारयो रुदेकाशे कर्तव्ये 'उरणपरः' इति रपरतया उरि कृते कर्तुम् इति जाते रासस्य ८।२।२४ । (लोपः) इति सलोपे रेफस्य विमर्गे कर्तुः । कोः । कर्तृ + नाम् इत्यत्र नामीति दीर्णे (अवर्णावस्य णत्वं वाच्यम्) इति वार्तिकेण नत्य णत्वे कृते फत णाम् । कृतो हि इति गुणे कर्तरि । कत्रोंः । कर्तृपु।। हे कर्तः । हे कतारी । हे कर्तारः। एवं धर्तृ, भर्तृ, इर्तृ, गन्तु,दात, पात, पात, यात, नेतृ, तृ, गोल, चोर- यितु कथयितृप्रभृतय ऋकारान्ताः तृन्, तृच् प्रत्ययान्ता विशेषणशब्दा ज्ञयाः। शनि नत्वाभाववान् स्त्रीलिङ्गत्वसशद्वश्चैको शेयः । उणादिसिद्धेषु संज्ञाशब्देषु तृन तृच् प्रत्ययान्तेषु तु उद्गातृराद्वविशिष्टाः सूत्रपठिता नपत्रादयः सप्तैत्र शेयाः । सूत्रपठिते. भ्योऽन्येषां भ्रातृ- मामातृ, पितृ, देव, नू, सड़येष्ठप्रभृति पुलिहराब्दानाम्, ननान्ह, दुहित, यातृ, मातृ, प्रभृतिस्त्रीलिङ्गशब्दानां चोणादिनिष्पन्नानां तृन् . नत्रादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम्, तथाहि उग्पादिनिष्पनाना तृन्तृच । प्रत्ययान्तानां संज्ञाशब्दानां चेद्दी| भवति तर्हि नत्रादीनामेव तेनेह न भ्राता भ्रातरावित्यादि।

२६ पाणिनीयप्रबोधे ४ ५ तृच-प्रत्ययान्तानां संज्ञाशब्दानां रूपाणि तु दीर्घाभावाणि ज्ञयानि । यया प्राता भातरी भ्रातरः भ्रातरं भ्रातरौ भ्रातृन् इत्यादि । स्त्रीलिङ्गे तु शसि नत्वाभावो विशेषः । ननान्दा ननान्दरौ ननान्दरः ननान्दरं ननान्दरौ ननान्डः इत्यादि। नशब्दस्य तु आमि नुटि + नाम इत्यत्र नृचक्षा६ (नामिन दीर्थो वा) इति वैकल्पिके दीघनिषेधे णत्वे नृणाम्, नृणाम् । तकारान्तः पुंल्लिङ्गः मरुत् (वायु) शब्दः मरुत् + सु इत्यत्र विभक्तेलेपि जश्त्वे तस्य वैकल्पिके चर्वे मरुत् मरुद् अन्यत्र विभक्तियोगे, हलादौ जश्त्वे मस्ती मरुतः । मस्तम् मरुती मरतः । मक्ता मरभ्याम् मरुद्भिः । मरते मरुद्भ्याम मरुद्: ममता मन्भ्याम् मरुद्भ्यः । मरुतः मस्तोः मक्ताम् मरुति मरुतोः मस्तु । हे ममत् हे मसद् हे मरतो हे मरतः । भूमिभृत्, क्षितिभृत्, शस्त्रभृत् धनुर्भृत् शाम्मकृत् राज्यकृत् बहुश्रुत् राज्यहत् दण्डधृत इत्याधुभयलिशाः सरित् , समित् क्षुत् विद्युत् तडित् इत्यादयः केवल स्त्रीलिज्ञाः तकारान्ताः शद्वा शेयाः । तत्र 'भगवत्' शल्लिङ्गे विशेषः । भगवत् + सु इत्या अत्वसन्तस्य चाधातोः ६४।१४। ( ( उपधादीपः असग्नुसौ मी) इति उपधादा भगवात् --सु इति स्थिते उगिदचा सर्वनाम- स्थानेऽधाती: ७१५० | (नुम) इति नुमागमे कर्तव्ये मिदचोऽन्त्यात्परः २२॥४७॥ इति दीयांकारात् परे नुमि अनुबन्धलोपे भगवान्त् + सु इति स्थिते सुलोपे संयोगान्तलापे तस्यागिद्धत्वान्नपामा भगवान् भगवन्ती भगवन्तः । भगवन्तम् भगवती घायसर्थ मन्छन्दयत् रूपं शेयम् । सम्मुखी दे भगवन् दे भगवन्ती भ्यः। इत्येवं भूभृत् : - ५ पुल्लिङ्गप्रकरणम् । २७ 8 . ३ हे भगवन्तः । एवं इवतु प्रत्ययान्त-भवत्-मतुपमययान्त-धीमत्-गोमत् धनवत्-रश्मिवत्-बनवत्-बलवत् प्रभृतयोऽत्वन्तशन्दा शेयाः । शत्रन्ते भवत् पठत् इत्यादिशब्दे तु अत्यन्ताभावात् दीर्घाभावे नुमि सुलोपे संयोगान्तलोपे भवन् भवन्ती भवन्तः । इत्यादि रुपं शेयम् । तत्रापि अभ्यस्तसंशकानां शब्दाना नुमागमाभावे केवलं मच्छशब्दवदेव रूपम् । तपाहि ददत् + सु इत्यत्र उगिद. चामिति नुमि प्राप्ते तस्य उभे अभ्यस्तम् ।६।१।५॥ इति ददत् शब्दस्य अभ्यस्त- संज्ञकत्वात् । नाभ्यस्ताच्छतुः ७।११७८ (नुम् ) इति निषेधे सुलोपे ददत् ददतौ ददतः । इत्यादि। नकारान्त इन्नन्तपुल्लिङ्गः करिन् (गज) शब्दः फरिन् + सु इत्यत्र 'सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धी' इति प्रासं नोपधादी बाधित्वा इनहेन्पूपार्यम्णां शौ ।६।४।१२। ( उपधा-दीपः ) इति नियम- सूत्रानिषेधे प्राप्ते ततश्च सौ च ६।४।१३। ( इन्नादीनामुपधादीपः) इति उपघा- दीघे सुलोपे नलोपे करी करिना इत्यत्र 'अट्कुप्वाङ नुमव्यवायेऽपि' इति नस्य णत्वे करिणी करिणः । करिणम् करिणो करिगः । करिणा नलोपे फरिभ्याम् करिभि,। करिणे, करिणः करिणोः फरिणाम् । करिणि करिषु इत्यादि । सम्बुद्धौ प्राप्तस्य • नलोपस्य-न डिसम्बुद्धयोः ।८।२८। (नलोपः) इति निषेधे हे करिन् हे करियौ हे करिणः। एवं हस्तिन्-शशिन्-स्वामिन् - ग्रादिन् मन्त्रिन् गृहिन्- दण्डिन्नखिन् धन्विन्-यशस्विन् - मेघाविन् - स्रग्विन्-मायाविन्-तरस्थिन्-प्रभृतय इनन्ताः-शब्दा ज्ञेयाः । इन्नन्तेऽपि पथिन् शब्दे विशेष:-पथिन् + सु इत्यत्र पथि- मध्यभुक्षामात् ।७।१।८५। (सौ)इति नकारस्य प्राकारे पथिश्रा+तु इति जाते इतोऽत्सर्वनामस्थाने ७।१।८६ (पयिमय्यभुक्षाम) इति इकारस्याकारे पथना + ३ पाणिनीयप्रबोधे आत्मानः। सु इति जाते-थोन्थः ७११८७॥ (सर्वनामस्थाने ) इति यस्य न्यादेशे पन्थ+ आसु इति स्थिते सवर्णदो रुत्वे विसर्गे पन्थाः पथिन् + औ इत्यत्र इकारस्या- कारे यकारस्य न्यादेशे पन्धन् + औ इति जाते नान्तोपधादीधै पन्यानी पन्थान: पन्थानं पन्थानी पयिन् + अस् इत्यत्र भस्य टेर्लोपः७।१।८८ (पथिमथ्यभुक्षाम) इति इनः टेलोपे पथ: पथा। नलोपे पथिभ्याम् पथिभिः हे पन्याः इत्यादि 'एवम् मथिन् मुक्षिन् शद्वौ ज्ञेयो। नकारान्तः पुंलिङ्ग आत्मन् (आत्मा) शब्दः । आत्मन् + सु इत्यत्र 'सर्वनामस्थाने' इति दी सुलोपे नलोपे आत्मा आत्मानी मात्मानम् श्रात्मानौ श्रात्मन्+अस इत्यत्र अल्लोपो. ऽनः 1६।४।१३४ ( भरय ) इति अल्लोपे प्राप्ते तस्य-न संयोगाद्वमन्तात् ६।४।१३७ (अल्लोपोऽनः ) इति निषेधे प्रात्मनः श्रात्मना । नलोपे श्रात्मभ्याम् इत्यादि अत्र 'पूर्वत्रासिद्धम् इति नलोपत्य असिद्धत्वात् प्रात्वमेव- मत्त्वज्ञ न भवति । सम्बुद्धी हे प्रात्मन् हे श्रात्मानौ हे प्रारमानः । एवम् यज्वन्- श्रध्वन् नान् कृतवर्मन् नुजन्मन् सुवर्मन् सुधर्मन् मुकर्मन् शर्मन् वर्मन् इत्यादयो नकारान्ताः शब्दा ज्ञयाः । तत्राऽपि राजन् सुनामन् सुदा- मन् मन् अर्यमन् निमीमन् लघिमन् महिमन् अणिमन् गरि- मन् क्षेपिमन् क्षादिमन् पटिमन् हसिमन् द्रधिमन् द्रदिमन् भूमन् प्रेमन, अश्वत्थामन् प्रभृतयः पुलिमाः, सीमन् दामन् प्रभृतयः स्त्रीलिमा वमन्त- गयोगशन्या नकारात्ताः शब्दाः शसादी अल्लोपभानो भवन्तीति न विस्मरणीयम् । तपाहि राम रामानी राजानः । रानानम् रामानी । राजन् + अस् इति स्थिकी लोयोना' इति अल्लोपे श्येन नकारत्य भकारे ग+ अस् इत्यत्र पुंलिङ्गप्रकरणम् । २९ राशा रामभ्याम् ४ ३ व मकारप्रकारयोर्योगे शकारोल्लेखे तस्य विभक्तियोगे राशः इत्यादि । डौ तु विभाषा. डिश्योः ६।४।१३६ (अल्लोपोऽनः ) इति वैकल्पिके अल्लोपे राशि राजनि हे गजन इत्यादि । एवं श्वन् युवन् मघवन् शब्दा अपि ज्ञेयास्तेषां शमादौ सम्प्रसारणम् । तथाहि श्वन् + अस् इति स्थितौ श्वयुवमघोनामतद्धिते ६।४.१३३ ( मस्य सम्प्रसारणम् )इति सम्प्रसारणे वर्तव्ये इंग्यणः सम्प्रसारणम् ।।११४५। इति नियमात् वस्य उकारे सम्प्रहारणे शु अन्+अस इति जाते सम्प्रसारणाच ६।१।१०८ (अचि पूर्वः एकः पूर्वपरयोः) इति अकारस्य पूर्वरूपैकादेश उकारमाने जाते शुनः शुना श्वन्याम् इत्यादि । युवन् शब्दे शसि वस्योकारे सम्प्रसारणे-यु उ अन् + अस् इत्यत्र न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् ६।१३७ इति यस्य सम्प्रसारणनिषेधे 'सम्प्रसारणाच' इति । पूर्वरूपेण अकारस्य उकारमात्रे नाते यु उन्+अस इत्यत्र सवर्णदीर्धे विभक्तिकार्य यूनः यूना युवभ्यामित्यादि । मघवन्शद्वे शसि तु सम्प्रसारणे पूर्वरूपे गुणे मघोनः मघोना मघवभ्यामित्यादि वृत्रहन् शब्दे तु वृत्रहन् +अस इत्यत्र अल्लोपे वृत्रह + अस इत्यत्र होहन्ते- णिन्नेपु ५।३।५४ (कु) इति कुत्वेन घकारे वृत्रप्नः वृत्रघ्ना वृत्रहभ्यामित्यादि । पूषन् अर्थमन्-शब्दानां तु सुटि करिवत् शसादौ अल्लोपे रानवतत्रापि णत्यकार्य विशेषः पूषा पूषणौ पूषणः । पूपणं पूषणौ पूष्णः । पूष्णा पूषभ्यामित्यादि । नान्ता: षड्विधाः शब्दाः सन्ति । एके सुटि उपघादीर्घशालिनः शसादौ श्रलो. पिनी यथा-राजादयः । द्वितीयाः सुटि उपधादीर्घशालिनोऽपि शमादौ नालोपिनो यया-ग्रात्मादयः । तृतीयाः केवलं सौ दीर्घशलिनः शसादौ अविकृतिनो यथा- कारिणमृतयः । चतुर्थाः सौ दीर्घ शालिनोऽपि शसादौ विकृतिनो यथा-वृत्रहादयः। पञ्चमाः सुटि दीर्घ शालिनः शसादौ विकृतिनश्च यथा-श्वादयः । षष्ठाः सर्वत्रैव विकृतिनो यथा पथिप्रभृतयः ।

पाणिनीयप्रबोधे १ ३ सकारान्तः पुल्लिङ्गः चन्द्रमस् शब्दः । चन्द्रमस् सौ इत्यत्र 'अत्वसन्तस्य चाधातोः' इति दीघ सुलोपे झत्त्वे वि- सर्गे चन्द्रमाः । चन्द्रममौ । उत्वे गुणे चन्द्रमोभ्याम् चन्द्रमस्+सु इत्यत्र रुत्वे वि- सगें 'विसर्जनीयस्य सः' इति सत्वे चन्द्रमासु । सम्बुद्धौ दीर्घाभावात् हे चन्द्रमः इत्यादि । एवं वेघस्-सुचेतस्-सुतेजस्-सुरेतस्-सुमनस् सुपयसू-सुयशस्- सुसरस-महौनस्-दिवौकस्-सुवक्षस्-दुर्वासस-इत्यादयः पुल्लिङ्गाः स्त्रीलिङ्गाः सकारान्ताः शब्दा शेया । सकारान्तपुंल्लिङ्ग विद्वस्शब्दे तु विशेषः । विद्वस्+-सु- इति स्पिती 'उगिदचामिति' नुमि विद्वन्स्+ सु इत्यत्र सान्तमहतः संयोगस्य ६।४।१० (सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धी नोपधाया दीर्घः) इति नोपाघादीघे संयोगान्त- लोपे सुलोपे सयोगान्तलोपत्याप्तिद्धत्वात नलोपाभावे विद्वान् । विद्वन्स+श्री इत्या नवापदान्तस्य झलीति अनुस्वारे विद्वांसी इत्यादि,विद्स् अस् इति स्थिती वसोः सम्प्रसारणम् ६।४।१३१ (भत्य) इति वस्योकारे सम्प्रसारणे सम्प्रसारणा. नेति पूर्वरूपे सस्य मून्यादेशे विदुषः। विद्वस् + भ्याम् इति स्थिती 'वसुसंसुध्वस्वननुहां दः ८७२ पति सस्य दफारे विद्वद्भ्याम् । विद्वत्सु । देविद्वान् इत्यादि एवम् सेदिवस. तस्थितम् जन्मिएर चाहियस् प्रभृतयः यस्वन्ताः शब्दाशयाः । शसादायपि 'अकृत- दा: पायिनीयाः' इति इटागमाभावे सेवस' इति स्थिती वस्य सम्प्रसारणाविकृत्ये सेतुप लादि । परन्तु श्रेयस नामीपस्द्रीयस् गरीयस्-प्रथीयस्-व्यायर भूयस अशीयस्- १५: ययाना: 'शब्दाः नुटि विद्वच्छन्दतान् तद्भिनयिमती चन्द्रम मायाः । समाधि श्रेपान् श्रेयांसावित्यादि, श्रेयाठा धयोभ्यामित्यादि । प्राशि-ए-गिर-धुर-पुरपति पान्तरेकातस्पीक्षिाशद्वानामपि य १ स्त्रीलिङ्गप्रकरणम् । ૨ १ म रूपापि प्रायः चन्द्रमसशब्दवदेव ज्ञ यानि । तथाहि-त्राशिष् + सु इत्यत्र पत्वस्यासि- द्धत्वात् समजुनोः इति सत्वे वोरुपधाया दीर्घ इकः ८।२।७६ (झलिपदान्तेच) इतीको दीर्घ सुलोपे विसर्गे श्राशी । आशिषी । रत्वे दीघ आशीभ्याम्।अाशिष् + सु इत्यत्र कत्वे दोघे विसर्ग (वा शरि ) ३३६ (विसर्गः) इति वैकल्पिक विसर्ग प्राशी:सु इति भाते नुम्बिसर्जनीयशर्यवायेऽपि ८.३१५८ (इण्फो सः मूर्धन्यः ) इति मूर्धन्ये आशीषु पक्षे विर्जनी- यस्येति छत्वे । ष्टुनाष्टुरिति ष्टुत्वेन पकारे प्राशीष्णु हे प्राशीः इत्यादि । एवम् सजः सजुषो । साम् सजाषु सजुधु । हे सजूः । इत्यादि । गी: गिरौ गीाम् । गिर+सु इत्यत्र दीर्घ रोः सुपि । ८।३।१६ (एवं विसर्गः) इति विसर्गनिषेधे 'नुविसर्जनीय०' इति मूर्धन्ये गी' । हे गीः । इत्यादि । एवम् धूः धुरी धाम् धूपु । इत्यादि । पूः पुरौ पूाम् पुषु । इत्यादि । इति पुंल्लिङ्गप्रकरणम् अथ स्त्रीलिङ्गप्रकरणम् । रमा, रुचिर्नदी धेनुर्वास्त्रीश्री! बंधूस्तथा । क्षुत्मादृट् च शरचव द्वादश स्त्रीपु नायकाः ।। तत्रावन्तः स्त्रीलिङ्गो रमाशब्दः 'रमते' इति रमा इति विग्रहे रम् धातोः पचायचि रम इत्यस्मात् प्रातिपदिकात् अजाद्यवटाप् ४।१।४। (स्त्रियाम् ) इति टापि अनुबन्धात्सायां लोपे दीर्ष च रमा इत्यावन्तात् 'ड्याप्मातिदिकात्' इति सौ इल्ड्याभ्यः' इति सुजोपे रमा। रमा च रमा च रमे इति विग्रहे रमाशब्दयात् श्री विभक्तौ . समागतायो वरूणामे कशेष एक विमतौर ३ ३२ पाणिनीयप्रबोधे ३ ३ १ ३ १ न इत्येकरमाशद्वशेषे अन्यलोपे रमा श्री इति स्थिते औङ आपः७११११८ । ( अङ्गात् शी ) इति श्री श्यादेशे अनुबन्धस्येत्संशायां लोपे गुणे च रमे । रमा च रमा च रमा च रमा इति विग्रहे रमाशब्दप्रयात् असि विभक्तो समागतायाम् एकशेषकायें रमा + जस इति स्थित्तौ अनुबन्धलोपे दीर्थे रत्वे विसरों च रमा रमाम् रमे रमाः । रमा+श्रा इत्यत्र-~-आङि चापः ७३।१०५ (ोसि एत) इत्याप एत्वे रमे आ इत्ति जाते अयादेशे रमया ।रमाभ्याम् रमाभिः । रमाए इत्यत्र याडाप: ७३।११३ । (डितः ) इति टित्वाद् विभक्त- रादौ याडागमे रमाया-+ए इति जाते वृद्धौ रमायै । याडागमे दीर्घ च रमायाः । एत्वे अयादेशे च रमयोः प्रावन्तानुटि अनुबन्धलोपे रमाणाम् । रमा + डि इत्यत्र-~-डे राम् नधान्नीभ्यः ७।३।११६ इति रामि रमा+श्राम् इति जाते याहागो दो रमायाम । रमयोः रमासु । सम्बोधने हेरमा + सु इति स्थिती सम्बुद्धी च ७३।१०६ । (श्राप एत् ) इति श्राप एत्ये 'एक हस्यात्सम्बुद पति सुलो दे रगे । हे रमे, हे रमाः । एवम् श्राला, एपका, वसा, अश्वा, चटका, पिका, मन्दा, मेघा, गला, यमुना, विद्या, लता, दोरा, निशा, दिशा, यात्रा, तारा, नारा, बाला, माला, दाला, शाला प्रभृतय श्रायन्ता शया: । अम्मा, नका, प्रता समानान्तु मन्बुद्धी विशेषः । तथाहि-अन्ना + सु इति स्थिती अम्बार्थनधोहस्वः । २११८७ । (सन्मुस) इति हरये गुलो ६ अग्य हे अया हे श्राहा । इत्यादि । यशि रमालिकारान्तो यदिशब्दापायेण एरियरूपम् चिः,मची रुचयः । निम, चीनमालामा रनौ। गच्या चिम्याम् नचिभिः । कचिए रिति १०४.६ । (यूपयायो नदी इयर या स्थानावली या) इति फलिप- 8 १ ३ - -- ६ स्त्रीलिङ्गप्रकरणम् । ३ 8 8 ६ क्यां नदीसंज्ञायाम् आणनद्याः ७३।११२ । (डिताम्) इति विभक्त राडागमे रुचि श्रा+ए इति जाते-आदश्च ६३९० (अचि वृद्धिः पूर्वपरयोः) इति वृद्धी यणि रच्यै नदीवाभावपक्षे 'शेषोप्यराखि' इति चित्वात् 'धेडिति' इति गुणे प्रयादेशे . स्चये । स्याः सचेः रुच्योः स्चीनाम् । रुचि + डि इत्यत्र नदीसंज्ञायाम् कैरामिति प्राप्तमाम बाधित्वा परत्वात् श्रौत् इति श्रौत्वे प्राते तद् बाधित्वा इदुद्- भ्याम् ७।३।११७ । (राम् नद्याः) इति ङरामि आटि वृद्धौ यणि च्याम् पक्षे रुचौ । स्च्योः रुचिषु । हेरचे! इत्यादि । एवम्-मति,नति, रति गति, हति, पंक्ति, भक्ति, श्रासक्ति, व्यक्ति, शक्ति, शान्ति, श्रान्ति, क्षान्ति, क्रान्ति, भ्रान्ति, रात्रि,जाति, नीति, गति, कीर्ति, उक्ति, बुद्धि, श्रुति, द्रुति, मूर्ति, धूलि, लूनि, धृति, सति, स्मृति, भृति, मृति, वृत्ति, सम्पृक्ति, हृति, हेति, प्रभृतयः सर्वेऽपि तिन्नन्ताः स्त्रीलिङ्गशब्दमा शेयाः । ङीवन्तो नदीशब्दः । सुलोपे नदी, यणि नद्यो नद्यः। परत्वादमि पूर्वरूपे नदीम्, शसि पूर्ववर्णदीर्घ स्त्रीत्वान्नत्वामावे नदी । नद्या नदी भ्याम् नदीभिः । नदी+ ए इत्यत्र यूज्या स्यौनदी श४।३ । इति नदीसंज्ञायाम् प्राडागमे आटश्चेति वृद्धौ यणि नये नद्याः नद्योः नदीत्वान्नुटि नदीनाम् । हो नदीत्वादामि प्राडागमे वृद्धौ यणि नद्याम् । अम्बार्थनद्योहस्व इति हस्ते हस्वत्वात् सन्बुद्धिलोपे है नदि । एवम्-देवी, गौरी, मौरी, नारी, देसी, मानुषी, गोपी, कुन्ती, द्रौपदी, सावित्री, गार्गी, प्रायो, मैत्रेयी, मन्दोदरी, फाली, धात्री, दात्री, पात्री, गन्त्री, फत्री, भवित्री, नेली, दण्डिनी, शास्निग्गी, मन्त्रिणी, ऐन्द्री, पार्मिकी, इत्वरी, गत्वरी, सौपणेयी, मगवती, मवती, पचन्ती, पठन्ती, दोगन्ती, अवती, सती, माती, विभूती, जहती, चिन्वनी, तुदती, तदन्ती, विटनी . ३ . . - पाणिनीयप्रबोधे , विन्दन्ती, रुन्धती, तन्वती, क्रीणती, चोरयन्ती, विदुषी, निषेदुषी, तस्थुषी श्रीमती, श्रेयसी, भवानी, रुद्राणी, मातुलानी, श्राचार्याणी, क्षत्रियाणी, चन्द्रमुखी सुस्तनी, सुकेशी, सखी, पुत्री-प्रभृतयः स्त्रीलिङ्गाः शब्दा शेयाः ॥ लक्ष्मी:- तरीः स्तरी: तन्त्री: अवीः, आसु ङीचन्ताभावाल सुलोपः सर्वमन्यन्नदीवदेव । ईका- रान्तेऽपि स्त्रीशब्दे विशेषः । ड्यन्तात् स्त्रीशब्दात् सौ सुलोपे स्त्री, स्त्री+इत्यत्र खियाः ।६४।७९। ( इयङ् श्रचि) इति ङित्वाद् अन्तस्य ईकारमात्रस्ये यहादेशे स्त्रियो, स्त्रियः । स्त्री+ अम् इत्यत्र वाम्शसोः ६८०। (स्त्रियाः इयछ) इति वैकल्पिके इयङि स्त्रियम् पक्षे पूर्वरूपे स्त्रीम् , शसि स्त्रियः स्त्रोः, स्त्रिया, स्त्रीभ्याम् स्त्रीभिः । स्त्रिय, त्रियाः, परत्वान्नुटि स्त्रीणाम् । रामि स्त्रियाम् स्त्रीषु । नदीत्वाद्धस्त्रे हे नि शेपं नदीवत् । ड्यन्तभिन्न-धीशन्दे तु सोऽपि विशेषः । प्रातिपदिकरवाती सत्वे विसर्गे च श्रीः श्री+श्री इत्यत्र अचि नुधातुभ्र वां य्वोरिया बङो ६।४।७७ । इति इयडादेशे थियो प्रियः । भियम् , श्रियः, प्रिया श्रीभ्यां श्रीभिः, थि+ ए इत्यत्र 'छिति हरवश्व' इति वैकलियां नीसंज्ञायाम् श्रादि वृद्धी इटिः श्रिय पक्षे श्रिये, श्रियाः, श्रियः । वियोः श्री + श्राम् इत्पत्र बामि १४:४५। (यूस्याख्यो नदो इयङ बङ.. स्थानावनी) इति नदीत्वास टि रगत् श्रीणाम् पदे श्रिपाम् , डी नदीत्याद् शाम नुट' बाधित्वा श्राद्यागमे इयहादेशे थियाम् पछे भियि थियोः श्रीपु । . २ गथनी सन्धी-तरी लक्ष्मी-घी हो-धीणामुणादिषु । BREAR J हनुमोशे न पदाचन ॥ अत्र लक्ष्म्यन्ताश्चत्वारो नागद, पादप श्रीराया।

स्त्रीलिङ्गप्रकरणम् । सचिवज्ज्ञ या, .. सम्बुद्धी हे श्री+ सु इति स्थिते नेयङ वङ स्थानावत्री १२४।४। (यूस्त्राख्यो नदी) इति नदीत्वनिषेधेन हस्वाभावे हे श्री. हलादौ नदीवत् । एवम्-धी:, हो, भीः, इत्यादय ईकारान्ताः, भूः भ्रः सूः दूः जूः लूः, इत्यादय ऊकारान्ताश्च स्त्रीलिङ्ग- शब्दा शेयाः । (स्त्र : स्त्रियां निझरे खुवे । नूः पिशाची । दूः हिरण्यरक्षसोः । लूः छेदनम् । भूः पृथ्वी । भ्रूः चक्षुषोर्मध्यदेशः।) उकारान्तस्त्रीलिङ्गो धेनुशन्दो केवलमत्रोकारत्वाद्वकारश्रुतिः, धेनुः, धेन् धेनवः । धेनु स्त्रीत्वान्नात्वाभावे घेनूः । धेन्वा, धेनुभ्याम् घेनुभिः'। ये वै, धेनवे, घेवाः, धेनोः, धेन्वोः, धेनूनाम् । धेन्वाम्, धेनौ, धेनुयु । हे धेनो इत्यादि । एवम् रज्जु कु मृदु गुरु तनु रेणु हनु बहु सरयु प्रियद्गु करेणु कृकवाकु श्रध्वर्यु प्रभृतयः स्त्रीलिङ्गा सयाः। ऊकारान्तस्त्रोलिलो वधूशब्दोऽपि नदीवज्ञयः । केवल सौ रुत्वविसौं । अन्यत्रोकारत्वाद्वकारश्रुतिः । वधूः वध्वौ वध्वः । वधूम वश्वौ वधूः स्त्रीवानत्वाभावः । वया वधूम्यां वधूभिः । ववै बध्वाः वथ्योः वधूनाम् | वधां वधूषु । सम्बुद्धौ हस्ते हे वधु । एवं चमू श्व फर्कन्धू अलावू लक्षणोरू वामोरू करमोरू न्द्र पशू प्रभृतयः दीपोंकारान्ताः संलिकाः शब्दा गेयाः । ऋकारान्नेषु मातृ यातृ ननान्ह दुहित प्रभृतयः स्त्रीलिङ्गाः पुंल्लिङ्ग-कारान्त-पितृशन्दवज्ज्ञयाः । स्वमुशब्दः कर्तृवज्ञ यः। केवलं शसि स्त्रीत्वान्नत्वाभावः । समा स्वसारी स्मारः स्ससारम् स्वसः स्वता स्वतः स्वमग्याम् स्वसरि हेस्ससः इत्यादि । श्रोकारान्तो गोशब्दः उभयलितः गो+सु इति स्थिती गोतो णित् ७१।९। ( सर्वनामम्मानम् इति सोणिले 'पाचो विशति इति वृक्षौ रत्ने निसगं च गोः गानौ गावः । गो+ श्रम इसम- भौताशसोः ६११९२ । (प्राव एकः पूर्वपरयोः) इत्यनेन शन्दास करत. है - ३६. पाणिनीयप्रबोधे विभक्त रकारस्य च उमयोमिलित्वा आकारकादेशे गाम् गाः पूर्वसवर्णदीर्घा- भावान शसो नकारः । सन्धिकार्य गवा गोभ्याम् । इसिडसोः गोः । गवाम् गोषु इत्यादि । एवम्-धो सुद्यो प्रभृतय श्रोकारान्ता उभयलिङ्गाः शब्दा ज्ञेयाः । नौशवोऽपि केवलसन्धिकार्थे नौः नावौ नावः नावम् नावा नौभ्यामित्यादि रूपं भगते । एवम्--ग्लो प्रभृतयोऽपि पुल्लिङ्गा अन्ये चोभयलिङ्गा औका- रान्ताः शदा शेयाः। हलन्तेषु चकारान्तः स्त्रीलिङ्गो वाच् शद्वः । वाच् + सु इत्यत्र-चोः कुः ८।२।३० (झलि पदान्ते च) इति कुत्वेन ककारे कलां जशोऽन्ते' इति प्रश्त्वेन गकारे वावताने इति वैकल्पिके चत्वे वाक् वाम् । शजादी स्वरस योगे हलादी कुत्वजश्त्वे वाची वाग्भ्याम् । सुपि कुत्वे मूर्धन्या- देशे वाभु इत्यादि रूपाणि । एवम्-त्वच शुच् रुजू रुच् प्राच् सज् प्रभृतयः स्त्री- लियाः पयोमुच् बलमुच् प्रभृतय उभयलिजाः चंकारान्ता वणिज भिषज् हुत्भुजू भूभुज प्रहस्विज सुयुज प्रमृतयो जकागन्तायोभयलिगाः शदा शेयाः। केवलम् अजादी चारजकारश्रुतिरिति विशेषः । ऋतु पूर्वकाद् यज धातोः प्रविग्दधृग- यग्दिरिणगचुयुजि मुख्यां च ३।२। ५९ (फिन् ) इति छिन् प्रत्यये फका- रेलारनकाराणामनुवाघाना 'लश पतरिते' 'उपदेशेऽजनुनासिक इति। हलन्त्यम्' इति प्रयोग ययाकम लोपे अपृक्तरय नकारस्य वेरपृक्तस्य ६।१।६७ (लोपः) इति लोपे प्रत्ययस्य निस्यात् वचिस्वपियजादीनां फिति ६।१।१५ (सन्सारणम्) रए रियज रहस्य कृतिय ३३११९३ (प्रत्ययः) इति frन: माया तामासा' इति प्रलपादकत्वात् गोलिज् + नु इत्यत्र 'पल्ट मा त सोपे किन्प्रययार दु: सारा (पदान्ते) इति कुस्थेन गकारे P: तिलिये पर दस दिन भाविक) इत्यादि । मामले नीलिङ्गप्रकरणम् । 8 ६ ५ प्राञ्च् अवाञ्च् प्रत्यञ्च् उदञ्च् सम्यञ्च् सध्यञ्च तिर्यञ्च इत्यादीनां पुल्जि- ङगशद्वानां रूपविशेषः । तथाहि प्रान्च Xसु इति स्थिती निदितां हल उप- धाया किति ६४।२४। (अङ्गस्य नलोपः) इत्यनेन सूत्रेण- नकारजावनुस्वारपञ्चमी झलि धातुपु । सकारजः शकारश्चर्षादृवर्गस्तवर्गज' ।। इति नियमात अकारस्य नकारतया तल्लोपे 'उगिदचा सर्वनामस्थाने ' इति नुमि अनुबन्धलोपे प्रान्च् + सु इति स्थिती सुलोपे संयोगान्तलोपे च पान् इत्यस्य 'किन प्रत्ययस्य कुः, इति कुत्वेन डकारे प्राङ् इति साधुः । पाञ्च्+ श्री इयत्र नलोपे उगिदचामिति नुमि च कृते अनुस्वारे परसवणे सति प्राची प्राञ्चः। शसि नलोपे प्राच अस इयत्र अचः ६।४।१३८ ( भस्य अलोपः) इति अलोपे प्रच इत्यत्र चौ ६३।१३७ (पूर्वस्य दीर्घः) इति पूर्वस्वरदी प्राचः पाचा, किन् प्रत्ययस्येति कुत्वेन ककारे वरत्वेन गकारे प्रारभ्याम् । प्राक्षु इत्यादि । एवमेव श्रवाङ अवाञ्चौ वाचः अवाग्भ्याम् तथा प्रत्या प्रत्यञ्ची। शसि नलोपे तत:प्र- लोपे (निमितापाये नैमित्तिकस्पाप्यपायः) इति परिभाषया यणोऽभावे प्रतिच् + अस इत्यत्र 'चौ' इति दीर्घ प्रतीचा प्रतीचा प्रत्यग्भ्यामित्यादि । एवम् समः समिः ६।३।९३ सहम्य सध्रिः ६३६५ तिरसस्तियेलोपे ६३६४ इत्यादिसूत्रः सम्याद्यादेशेन सम्मन्नानाम् सम्यञ्च् मपञ्च तिर्यञ्च् प्रतिराद्वानाम् रूपाणि ज्ञयानि सम्पङ , सम्पञ्चौ, समोचः, समाचा, सम्यग्म्यामित्यादि । सभ्य सध्यञ्चौ सत्रोचः सत्रोचा सध्याम्गानित्यादि । तिया, नियंञ्चौ, तिरश्चः, तिरश्या, तिर्थयामित्यादि । एवम्-उद, उदची, शसि उदच्न अस् इति स्थितौ 'प्रचः लो इति प्राप्तम् अलोपं बाधित्वा उद इत् ६४।१३९ (अचा , पाणिनीयप्रबोधे २ १ इति इत्वे 'चौ' इति दी उदीचः,उदीचा : हलादौ. उदग्भ्यामित्यादि । एषां स्त्रीलिङ्गरूपाणि तु. प्राची, अवाची, प्रतीची समीची सध्रीची तिरश्ची उदीची इत्यादीनि नदीवशे यानि । वाच शब्दवदेव शकारन्तहकारान्ता ताश दिश् दृश स्पृश् उािह, इत्यादि स्त्रीलिङ्गाः-गोदुहू इत्याधुभयलिङ्गाः शब्दा अपि शेयाः । केवलमजादौ तेषाम् शकारहकारश्रुतिः । तथाहि तत्पूर्वकात् दृश धातोः त्यदादिषु शोऽनालोचने कच ३।२।६० (क्विन् ) इति किन् प्रत्यये किनः रापिहारिलोपे सर्वनाग्नश्च 'अलोन्त्यस्य इति सूत्रबलात् अन्त्यसकारस्य आसर्वनाम्नः६ ३।९१ ( दृगशवतुषु) इत्यात्वे सवर्णदीप सादृश् शब्दस्य प्रातिपदिकत्वात् सो ताहश + सु इत्यत्र सुलोपे 'किन प्रत्ययस्य कु.' इति पुत्वेन घकारे नश्श्वेन गकारे पावसाने इति वैकल्पकेन चत्वेन ककारे ताहक ताइग् नाशी त्यादि । एवं दिक् दिग् दृक् दृग् इत्यादि । घृतस्पृश् शब्दस्य स्पृशोऽनुद के बिन् ।२.५८] पति किन्नन्तत्वेन प्रातिपदिकत्वात्सो घृतस्पृः पग इत्यादि । एवम् उदिक मिग पिणौ इत्यादि । गोंदुइ + सु इति स्थिती सुलोपे दादेर्धा. तोघः ८।२।३२ । (हः झलिपदान्त) शति दस्य घकारे गोदुध इति भाते एकाची यौ भपक्षपन्ताय रथ्यो: ।।३७ ( पदान्ते ) इति दकारय घसारे गोधुम इत्यत्र कारण पत्थेत गरारे तस्य पाक्षिकवरन गकारे गोधुर गोधुर गोतुती गोरः । गोदुग्याम् गोवा इत्यादि । दकारान्तात्रीलिए ग: शरद् शब्दः मुल्लोपे पारिने चले शरत् शरद् शरदी इत्यादि एवम्-दृपद्, शारद, विषद्, सम्पद, पशिद, मविद् इत्यादयः फेवलीलिए गाः मुहद, मर्मभिद्, सभासद, सरशिद गद् , तमीनुद्, मानविद्, धर्मक्दि, अन्नद्, हृदयानुन, परपद, प्राय उमलिए गा दकारान्ताः शन्दा शेयाः । एम-अप बुध T A स्रोलिङ्गप्रकरणम् । ३९ युध, वीरध, समिध इत्यादयः स्त्रीलिड गाः समिध, शुध, बुध, प्रभृतयः पुंल्लि. ङ गाध धकारान्ता शेयाः केवलमजादौ धकारश्रुतिः । क्षुत् सुद् क्षुधौ क्षुभ्याम् क्षुत्सु इत्यादि ।बुध शद्वेवियान् विशेषः बुध+तु इति स्थिती मुलोपे नशत्वचा 'एकाचोवशोभएझपन्तस्य रध्वोः' इति बस्य भकारे मुद् भुत् बुधौ.बुवः भुभ्याम् भुत्सु इत्यादि। पकांगन्तः स्त्रीलिङः पावृष शद्वः सौ हल्ङ याभ्य इति सुलोपे जश्त्वेन डकारे पाक्षिकचान टकारे प्रावृट प्रायड् प्रादृषौ प्राड्म्याम् प्रावृट्स इत्यादि । एवम- तृपस्विम् रिप-रुध् निश इत्यादयः केवलस्त्रीलिङ गाः स्वमुप, द्विप विश्- विराजू सम्राज-विभ्राज् सज्-मृज, देवेज , लिद प्रभृतयः उभयलिट गाः पवारान्त जकारान्त हकारान्त-शद्वा शेयाः। केवलमजादौ षकार-शकार जकार हकारभुतिः विश् + सु इति स्थितौ । श्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छा पः ८१५।३६ ( झलि पदान्ते.) इति शरय पत्ने जस्त्वे चत्वें विट विड्, विशौ, विशः, विड्याम् विट्स । एवम्-विराट-विराड्, विराजौ, विगड्भ्याम् , विगटसु इत्यादि । लिङ् + सु इत्यत्र सुलोपे हो दः पा२।३१ (मलि पदान्ते) इति हस्य ढकारे जश्त्वे चत्वे च लिट, लिड् लिहौ, लिहः, लिहा, लिड्म्याम् लिट्स इत्यादि । दृह, मुह, स्नु , स्निह् इति चतुर्णा उभयलिङ्गानां हान्तानान्त-घत्वढत्वाभ्याम् पदान्ते रूपविशेषः । तथाहि मित्रशब्दात् सौ सुलोपे वाहमुहणुष्णिहाम् ८२।३३ (होपः झलि पदान्ते ) इति हस्य घकारे 'एकाचो वशोभष' इति दकारस्य धकारे जश्त्वे चर्वे च मित्र- क्, मित्रभुग पक्षे 'होटः' इति ढवे जश्त्वे चर्वे च मित्र ट्र मित्रध्रुड् , मित्रगृहौ, मिनद्रुहः, मित्रध्रुग्भ्याम् मित्रधुड्भ्याम् , मित्रध्रुक्षु- मित्रभुटसु इत्यादि । एवमितरेऽपि यो शेयाः । इकारान्तेऽपि पुंसि अनडु ३ ४ ४० पाणिनीयप्रबोधे । शन्दे विशेषः । अनडुह् + सु इति स्थितौ चतुरनडुहोरामुदात्तः ७१६८ ( सर्वनामस्थाने ) इति आमागमे कर्तव्ये 'मिदचोऽन्त्यात्परः' इति उकारस्यान्ते श्रामि अनुबन्धलोपे अनडु+ आह + सु इति जाते यणि अनड्वाई + सु इति जाते । सावनडुः ७११९८२ (नुम्) इति मित्वादाकारस्यान्ते नुमि अनुव- न्धलोपे सुलोपै संयोगान्तलोपे तस्यासिद्धत्वात् नलोपाभावे अनड्वान्-अनड्वाही, अनडुहः, वसुलंसुध्वस्वनहुदा दः इति दत्वे अनडुभ्याम्-अनडुत्सु सम्बुद्धौ सौ हेअनडुइ + सु. इतिस्थितौ (अम्सम्बुद्धौ ७१।९९ (चतुरनडुहोः ) इति श्रमागमे नुमि सुलोपे संयोगान्तलोपे हे अनड्वन इत्यादि । स्त्रीलिङ्गे उपानशब्दे तु झलि पदान्ते विशेषः। उपानह + सु इति स्थिती नहोधः ८१२। ३४ (सति पदान्वे) इति हस्य धात्रे जश्त्वे चत्वे च कृते उपानत् उपानद् आनही उपानद्भ्याम् उरानस्तु । इति स्त्रीलिङ्गकरणम् । श्रथ नपुंसकलिङ्गप्रकरणम् ज्ञानं दधि पयो वर्म धनुर्वारि जगराया। मधु नाम मनोहारि दशैतानि नपुंसके ।। अकारान्तो नपुंसकलिलो शानशब्दः कृदन्तरवात् प्रातिपदिक. सायां सो शाम+मु इति स्थिते अतोऽम् ७:११२४ (मीयात खमोः) इति सोरमादेशे "अमिपूर्व" इति पूर्वरूपे शानम्,शान + प्रोत्व. - ४ नपुंसकलिङ्गप्रकरणम् । ३ २ १ 8 वस्थायाम्-नपुंसकाच्च ।७।१।१६। (भोङः शी) इति श्रोहः श्यादेशे शस्ये संज्ञायां लोपे च गुणे शाने । ज्ञान+जम् इति स्थिती-जश्शतोः शिः १७।१।२०॥ (नपुंसकात्) इति जसः शौ तस्य 'शिसर्वनामस्थानम्' १।११४२ इति उर्वनामस्यान. संज्ञायां-नपुंसकस्य झउचः ।७।१।७२ (नुम्सर्वनामस्थाने ) इति नुमि ज्ञानन् + इ इति स्थिते "सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धी" इति दी ज्ञानानि । पुनस्तद्वत् । शेष रामवत् । एवं मूल, फल, जल, स्थल, धन, वन, दान, लवण, शास्त्र, मित्र, पत्र, पात्र, गात्र, यन्त्र, इसित, पठित, गमन, भवन, घटत्व, पटत्वादयः शब्दा शेयाः। इकारान्तनपुंसकलिङ्गोवारि शब्दः।वारि + सु इति स्थिते स्वमोर्नपुंसकात् ।७।१।१३। ( लुक् ) इति सोलुकि वारि। वारि + श्री इत्यत्र 'पौडः शी' इति श्यादेशे अनुबन्धलोपे वारि+ई इति जाते इकोऽचि विभक्तौ ।७।११७३। (नुम् ) इति नुमि णचे वारिणी वारीणि वारिया वारिभ्यां वारिभिः वारिणे वारिम्यां वारिभ्यः । वारिणः वारिभ्यां वारिभ्यः । 'वारिणः वारिणोः (नुटि) वारीणाम् । वारिणि वारिणोः वारिषु । सम्बुद्धौ- है वारि + सु इत्यत्र सोलुकि 'न लुमताङ्गत्य' इति निषेधस्यानित्यत्वात् 'हस्वस्य गुणः' इति-पाक्षिके गुणे-हे पारे ! हे वारि ! हे वारिणी-हे वारीणि ! एवं इकारान्तनपुंसकलिजाः सर्वेऽपि शब्दा शेयाः । दधिशद्वे केवल टाद्यजादौ विशेषः । तथाहि-दधि + था इत्पत्र अस्थिदधिसक्थ्यक्षणा- मनन्दात्त: ।६।१।७५। (टादावचि) इति डिवादिकारस्यानहि दधन् + आ इत्यत्र भल्लोपोऽनः।४ १३४। (भस्य ) इति अकारलोपे ध्ना, दधिभ्याम्- दधिभिः । दने दधिभ्याम् दधिभ्यः । दनः दधिभ्याम् दधिभ्यः । दन: दनोः नाम् । दधन् + इ इस्सल 'विभाषा हिश्यो' रिति वैकल्पिके अल्लोपे दग्नि पाणिनीयप्रबोधे २ दधनि दनोः दधिषु । हे दधि। हे दधे! हे दधिनी ! हे दधीनि! एवं अस्यि, सक्थि, अक्षि प्रभृतयः । उकारान्तो नपुंसकलिलो मधु शब्दः । श्रस्य वारिशब्दवत् सर्व रूपं शेयम् । मधु मधुनी मधूनि । पुनस्तद्वत् । मधुना । मधुने। मधुनः । मधुनोः मधूनाम् मधुनि। हे मघो! हे मधु ! हे नधुनी! है मधूनि । एवं सुलु, सुनुप्रभृतयो नपुंसकलिङ्गशद्वा शेयाः । तकागन्तनपुंसकलिङ्गो जगत् शब्दः । जगत् + सु इति स्थिते सोर्छ कि जगत् जगती नुमि जगन्ति पुनस्तद्वत् । तृतीयादिविभक्तियोगे भूमृद्वद्रूपं शयम् 1 नकारान्तो नपुंसकलिङ्गो नामन् शब्दः । नामन् + सु इति स्थिते, सोलुं कि नलोपे नाम । वैकसिके अल्लोपै नानी, नामनी । उपधादी नापानि। पुनस्तद्वत् । टादावचि अल्लोपे नाना नामन्भ्यामित्यत्र स्वादिपवसर्वनामस्थाने १४।१७} (पूर्व पदम् ) इति पदसंज्ञायाम् नलोपः प्रातिपदिकान्तस्येति नलोपे नामभ्यामित्यादि । डो नानि, पक्षे नामनि । नकारान्तनपुंसकलिङ्गो वर्मन् शब्दः । धर्म, वर्मन् +ौ इति स्थिते 'औङः शीति श्यादेशेन संयोगादम- न्तादिति अल्लोपनिषेधे वर्मणी वर्माणि । पुनस्तद्वत् । टादाबात्मवत्। नकारान्त नपुंसकल्झिने मनोहारिन् शब्दः । मनोहारि, णचे मनोहारिणी, मनोहारीणि। पुनस्तहत् । शेयं करिवत् । सकारान्तनपुंसकलिङ्गः पयस् शब्दः । पयस्+तु इति स्थिते सोलु कि विसर्गे पयः, पयसी नुमि सान्तमहतस्संयोगस्येति दी नस्यानुस्वारे पयांसि । पुनस्तद्वत् । शेष चन्द्रमोवत् । पकारान्तो नपुंम शिको धनुम् शब्दः । पत्वत्पासिद्धत्वात् रुत्वे धनुः, धनुषी, धपि । पुनस्तद्वत् । मनुपा-धनुश्यामित्यादि ॥ इतिनपुंसकलिङ्गप्रकरणम् । 8 सर्वनामशब्दाः.! , अथ सर्वनामशब्दाः सर्वेषां नाम सर्वनाम, इति तत्पुरुषसमासकाणेन सर्वनामशब्दरयार्थो भवति यो हि शब्दः सर्वेषामेव संज्ञाशब्दानां नाम (संज्ञा) स्यात् । यथा- कृष्णः शेते, बुद्धः जागति । गान्धी श्रायाति । सर्वोऽपि देशमतोऽस्ति । अन्न चरम- वाक्ये कृष्णः, सुख, गान्धी इत्यस्य स्थाने सर्व इत्यस्य प्रयोगः । प्रतः सर्व इति पदं सर्वनामपदम् अस्ति। एवं पयप्राणो विजयते, यतोऽसौ उत्णही वर्तते । श्रम द्वितीयवाक्ये "असो" इति पदं "जयप्राण' शब्दस्य स्थाने प्रयुक्तो विद्यते । अतः 'सौ' इतिपदं सर्वनामपदं शयम् । इत्यभिमा व्युत्पत्तिमादाय सन्नाम- शब्दा: संस्कृते यथार्थनामान: सन्ति । तेषु च क्यिन्तो मुख्या: कियन्तः पारिभाषिका अपि सन्ति । तथाहि-सर्गविश्वप्रभृतयः मुख्यसनामघाचका अन्ये नेमप्रभृतयः पारिभाषिकाः सन्तिान प्रायस्त्रिविधा: सर्वनामशब्दाः सन्ति । केचन अन्यस्य नाम: स्याने प्रयुज्यन्ते । केचिद्विशेषणवाचिन: सन्ति । कियन्तः सख्यावाचकाः सन्ति । यया-सर्ग विश्वप्रभृतयोऽन्यस्य स्थाने प्रयुज्यन्ते । पूर्वपरादयः विशेषणवाचकाः । एक, द्विप्रभृतयः सख्यावाचकाः। तेहि सामान्यत: पञ्चत्रिशत् सन्ति । सर्व विश्व, उभ, उभय, डतर, इतम, अन्य, अन्यनर, इतर, त्वत्, स्व, नेम, सम, सिम, पूर्ण, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर, स्व, अन्तर, त्वद् , तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस एक, दि, युष्मद् , अस्मद्, मवतु, किम् । इति ॥ 'भवत् शब्दाथ तु युष्मच्छन्दार्थवदस्ति । परन्तु अस्य प्रयोगेण सह प्रथमपुरुषस्य क्रिया भवति । यथा-भवान् गन्छति । भवन्ती गच्छतः । इत्यादि एवं भवत् शब्देन सह 'तत्र' पत्र' इतिपदयोोंगे पूज्योऽर्थो जायते । यथा- "तन भवान् भाष्यकार श्राह"! पूज्यो भाष्यकारो पदतीत्यर्थः । इदमे तदिति । - .

४४ पाणिनीयप्रबोधे - शद्वौ समानार्थो । तथा तद्, अदम् एतावपि समानार्थी । परन्तु तत्र कियान् सूक्ष्मो मेदो विद्यते । तथाहि- इदमः समक्षरूपं समीपतरवर्ति चैतदो रूपम् । अदसस्तु विप्रकृष्टं तदिति परोक्षे विजानीयात् ।। इति 'यत्तदोनित्यसम्बन्धः' यत्र यच्छदस्य प्रयोगो भवति, तत्र तच्छब्दस्य, तत्पर्याय- चाचिनोऽदशब्दस्य वा प्रयोगोऽवश्यं भवति । यथा-'यो विंशतिवर्ष वदाचारी तिष्ठति स एव दाम्पत्यसुखमपत्यसुखं च विन्दति ।". किम् शब्दः प्रश्नवाची 'विद्यते । तस्य शुद्धरूपेण अपि, चित्, चन इति शब्दानां योगे अनिश्चितार्थो द्योतते । यथा--कोऽपि, कश्चित्, कश्चन । कावपि, कौचित् , कौचन । केऽपि, केचित् , केचनेत्यादि । आत्मीयार्थवाचकं संस्कृत शब्दद्वय मस्ति । निजशब्दः स्वशब्दश्चेति । तत्र 'निज' इति सामान्यशब्दः । 'स्व' इति सर्वनामशब्दः । इमो 'च द्वौ विशेष्यनिम्नौ स्तः। विशेष्यरादानुपारं त्रिषु लिङ्गेषु प्रयुज्यते । यया- "सा निन्दन्ती, स्वानि (निजानि) भाग्यानि, बाला वाहूत्क्षेपं रोदितुश्च प्रवृत्ता।" आत्मार्यवाचकमपि शद्वद्वयमस्ति आत्मराद्वः स्वशदश्चेति । तत्र आत्मशब्दो हि पुलिस एकवचन एवं प्रयुज्यते । तत्रैव प्रयुक्तः सर्वत्र लिङ्गेपु, वचनेषु प्रयुक्तानां संज्ञाशब्दानां, निजार्य-बोधको भवति । स्वशद्वस्तु त्रिजिङ्गो विद्यते स्त्रोद्देश्या. -नुमारेणेव प्रयुज्यते यथा-स प्रात्नानं निन्दति । ते प्रात्मानं निन्दन्ति । सा वात्मानं प्रशशंस | ता आत्मानं प्रशशंसुः । स व निन्दति, ते स्वान् निन्दन्ति । सा स्वां प्रशंसति । ता: स्वाः प्रशशंसुः इत्यादि । 'स्वयम्' इति प्रथमान्तोऽव्यय- शब्दः । स स्वयं जगाम, सा स्वयं नंगामेत्यादि ।

सर्वनामशब्दा..। सर्वः सर्वा च सर्वश्च स सा तत्त्वमहन्तथा। अयचेयमिदम्चासावसावद इद्दोदिताः॥ , सर्वानामगणस्यतया सर्वनामत्वात् त्रिलिजपु विशेषरूपवत्सु च शन्देषु अकारान्तः पुंलिनः सर्वशन्दः-सच सामान्यतो रामशब्दवदेव शेयः । विशेष- स्थले सर्वादिकार्य प्रदर्शयिष्यते । सर्वः सर्वो, सर्व+जस् इति स्थिते 'सर्वादीनि सर्वनामानि' इति सर्वनामसंज्ञायां, 'नसः शी' इति जसः श्यादेशे अनुबन्धलोपे. गुणे सर्वे । सर्वम् सौ सान् । सर्वेण सर्वाभ्याम् सौंः। सर्व + इत्यत्र- सर्वनाम्नः स्मै ११४। (ॐ) इति में विभक्तेः स्मै इत्यादेशे 'सर्वस्मै' । सर्वा- भ्याम्-सर्वेभ्यः । सर्व + छसि इत्यत्र-मसिहयोः स्मास्मिनौ । ( सर्वनामः) इति 'स' मात्' इत्यादेशे कृते वैकलिके चत्वें जश्त्वे च सर्वस्मात् सर्व- . स्माद् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः । सर्वस्य सर्वयोः सर्व+पाम् इति स्थिती- आमि सर्वनाम्नः सुट । ७१।५२। ' इति टित्वादाम श्रादौ सुटि अनुबन्धस्य इत्संज्ञालोपे, एत्वे, षत्वे च 'सर्वेषाम्' । सर्व+ङि इति स्थिती के स्मिन् इत्या- देशे कृते सर्वस्मिन् सर्वयोः सर्वेषु । हे सर्व ! हे सर्वा ! हे सर्वे! एवमेव सर्वेऽपि विश्वादयः सर्वादिगणस्थाः शब्दा शेयाः । एषां यो हि विशेषसाधनप्रकारः, स च यथासौविध्यं प्रदयिष्यते । स्त्रीलिड्गेतु सामान्यतो रमाशब्दवद्रूपम् , केवलं सर्वा- दिकार्ये विशेषः । तद्यथा- 'अजाद्यतष्टाप्' इति टापि, दोघे, 'डथाविति' स्वाद्य- त्पत्तौ तमोपादिकायें सर्वा सर्वे सर्वाः । सर्वाम् सर्ने सर्वाः । सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वामिः, मा + हे इत्यत्र अनुबन्धस्येत्संज्ञालोपे-सर्वनाम्नः स्यादहस्वश्च ।।३।११४ (आबन्तात् हित आपः) इति रित्वाद्विभक गदौ स्याटागमे, आपश्च हरवे पाणिनीयप्रयो) सर्वस्या+ए इति जाते वृद्धौ सर्वस्यै । सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः । सर्वा + ङसि इत्यत्र स्याटि श्रापश्च ह्रस्वे दीघे सर्वस्याः सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः । पठयेकवचने सिवत् । सर्वस्याः । शोसि सर्वयोः, सर्वा+प्राम् इत्यत्र सुटि सर्चासाम् सर्वाङि इति स्थितौ रामि स्याटि, श्रापश्च हस्ते दीघे सर्वस्याम् । सर्वयोः सर्वासु । हे सर्वे ! हे सर्वे ! हे सर्वाः ! नपुंसकलिङ्गे तु प्रथमाद्वितीययोः ज्ञानवत् । शेषं 'पुंलिङ्गसर्वशब्दवद्रूपम् । तद्-(वह) शब्दस्य पुंलिङ्गे तद् + सु इति स्थिते त्यदा. दित्वात् टेः प्रकारे कृते-तदोः सरसावनन्त्ययोः।७।२।१०६॥ (त्यदादीनाम्) इति तकारस्य सकारे रुत्वे विसगे च स: तीते । शेषं सर्वशब्दवत् । एवं त्यद्, यद्, शब्दयोः स्यः त्यो त्ये । यः यौ ये इत्यादि । एतच्छन्दे षत्व कार्य विशेषः । एषः एतौ एते इत्यादि । स्त्रीलिङ्गे अन्वे, टापि, दोघे, स्वाद्युत्पत्तौ सत्वे, सुलोपे सा ते ताः । शेषं सर्वावद्रूपम् । एवं स्या त्ये सः ! या ये याः। एका एते एताः । इत्यादि । नपुंसकलिङ्ग सो कि तद् । तद् + प्रौ इति स्थिती प्रत्ये, पौडःश्यादेशे, गुणे ते तानि । पुनस्तद्वत् । टादौ पुंवत् । एवं, त्यद्, यद् एतद्, शब्दमा शयाः । युष्मद् (तुम ) अस्मद् (मैं) शब्बी पियु लिऔषु समानौ । युष्मद् +-सु, अस्मद् + सु इति स्थिते-के प्रथमयोःम् ।७।१।२८। ( युष्मद- स्मयाम् ) इति सोः अमि--स्वाही सौ ७।२।९४ । (युष्मदस्मदोर्मप- यन्तस्य) इति मर्यन्तस्य वाहादेशे। व अद्+अम् , अह अद्+ श्रम् इति जाते-'श्री गुणे' इति पररूपे त्वद्+श्रम, अहद + अम् इति स्थिते शेपे लोपः सर्वनामशब्दाः। है ७।५।९० इति टिलोपे स्वरसंयोगे त्वम् अहम् । औ विभक्तौ-युवावो द्विवचने 1७।२।१२। युष्मदस्मदोर्मपर्यन्तस्य (इति यथावसरं सर्वत्र सनिवेशः) इति युवा- वादेशे पररूपे-प्रथमायाश्च द्विवचने भापायाम् ।७२।८८1 (आत्वम्) अन्त्यस्यात्वे दी युवाम् प्रावाम् । अस्विभक्त रमादेशे- यूयवयो जसि । २।३। इति यूपवयादेशे अन्त्यजोपे यूयम् वयम् । अमि, त्वमावेकवचने ७।२।९ । इति मपर्यन्तस्य समादेशे--द्वितीयायांच। ७।२।८७ (आत्) इति अस्यात्वे दी स्वाम् माम् । शमि तु-शसोनः १७।१।२६ । (युष्मदस्मद्भया परस्य) आदे: पास्य इति विभक्त रादेन कारे संयोगान्तलोपे श्रात्ये दीर्घ च युष्मान् अस्मान् । युष्मद् + टा अस्मद् +टा इति स्थिते, मपर्यन्तस्य स्वमादेशे पररूपे योऽचि | ७।२।८६ । इति दस्य यत्वे खया, मया । युवादेशे--युष्मदरमदोरनादेशे ।७।२ ८६॥ (आत् हलादौ विभक्ती इत्यात्वे युवाभ्याम् भावाभ्याम् । क: अमि--तुभ्यमझौ इयि ७,२।५५ । इति मपर्यन्तस्य तुभ्यमह्यादेशे शेषलोपे तुभ्यम् मह्यम् । युवाभ्याम् श्रावाभ्याम् । म्यसि- भ्यसो भ्यम् ७१।३० । इति विभक्तिकार्ये शेषलोपे युष्मभ्यम् अस्मभ्यम् । डसि, मपर्यन्तस्य त्वमादेशे पररूपे एकवचनस्य च ७१।३२ । (अत्) इति विभक्तरदादेशे शेषलोपे च स्वरसंयोगे त्वत् मत् युवाभ्याम् आवाभ्याम् पञ्चम्या अत् । ७।१।३१ । (भ्यसः ) इति विभक्त रदादेशे टिलोपे युष्मत् अस्मत् । तबममौ सि । ७२०६६। इति तवममादेशे-युष्मदसद्भया २ २ F २ १ ४८ पाणिनीयप्रबोधे सोऽश् । ७।१।१२७ । इति विभक्तिकाये: तव-मम । साम आकम् । ७।१।३३ । इति भावि सुटसहितस्यैवाम. याकमादेशे लोपकायें च युष्माकम् अस्माकम् । डौ तु स्वन्मदादेशे यत्वे च त्वयि मयि, युवयोः, श्रावयोः युष्मासु अस्मासु । त्वामौ द्वितीयाया: ८।१।२३ ( पदात् अपादादौ युष्मदस्मदो: एके. वचनस्य पदस्य) तेमयावेकवचनस्य ८।१।२२ पदात् अपोदादौ षष्ठी चतुर्थी स्थयो; युष्मदस्मदोः पदस्य ) युष्मदस्मदोः षष्ठोचतुर्थीद्वितीयास्थयोनी ८।१।२० ( पदात् अपादादौ पदस्य ) बहुवचनस्य वस्नसौ ८.११२१ (पदात् अपादादौ युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोः पदस्य ) इत्येतेषां सूत्राणां बलेन पदात् परतोः श्लोकेषु च पादादौ न स्थितयोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीया स्थयोः युष्मदस्मदोः पदस्य द्वितीय कवच त्वा मा षष्ठीचतुश्यकवचने ते मे तामा द्विवचने वांनी बहुवचने वस् नौ इत्यादेशा भवन्ति । तयादि- २ ५ 8 ३ अवेत्त्वा मा गिरा देवी दद्यात्ते मे चलं शिवम् । ज्ञानं ते मे सदा रक्षेत् पायाद्वां नौ सरस्वती ।। विद्यां व नी शुभां यच्छेत् तां नी वर्धचेत्सदा । साऽव्याद्वो नः सुखं वोनो दत्ताद्वोनो यशोऽवतात् ।। गिन देवो तो मां रक्षेदित्यर्थः । तुभ्यं मयं शिवं पलं दद्यात् ।तब मम शानं सदा रक्षेत् । सरस्वती युवाम् अायां पायात् । युवाम्यां श्रावाभ्यां शुभां विद्यां यच्छेत् । जुगयोः प्रारयोः कां रिया सदा येत । सा सरग्बती युप्मान् अमान अव्यात् । उष्मम्यम् अाममय मुसंटनात् । गुम्माकम् अम्गाक नराः कीनिम्रताद रसात् ।

सर्वनामप्रकरणम् । ) 3 न च वा हाऽहैवयुक्त ८ ॥ १ । २४ (युष्मदस्मदोः वानावादयः) इति सूत्र बलाद् देवी त्वा मांच रक्षतु । कथं त्वा मां वा न रक्षेदित्यादौ त्वा मादेशो न भवति । प्रतिलिङ्गं भिन्नरूपस्य 'इदम्' शब्दस्य पुंल्लिङ्गे इदम् तु इति स्थिते । इदमो मः । ७ । २ । १०८ (सी) इति त्यदाद्यत्वं बाधित्वा मत्वविधाने इदोऽयं पुसि ७।२।१११ ( इदम: सौ ) इतीद: अयादेशे अयम् सु इति माते इलङ्याभ्य इति सुलोपे अयमिति सिद्ध्यति। इदम् + औ इत्यत्र त्यदाद्यत्वे वृद्धौ इदौ इति जाते देश्च ७ । २ । १०६ (इदमो मः विभक्तौ ) इति दस्य मत्वे इमौ । इदम् जस् इति स्थिते त्यदाद्यत्वे जसःशी ७ । १ । १७ (अतः सर्वनाम्नः) इति श्यादेशे विभक्तिकार्य गुणे दस्य मत्वे इमे । इमम्, इमो, इमान् इंदम् टा इति स्थितौ त्यदाद्यत्वे इनादेशे गुणे इदेन इति स्थिती अनाप्यकः ७।२।११२ (इदमः इदः विभक्तौ)इति इद: अनादेशे अनेन । इद + भ्यामित्यत्र हाल लोप: ७ । २ । ११३ । (अकः इदमः इंदः विभक्तो) इति इदो लोपे अभ्यामिनिजाते भाद्यन्तवदेस्मिन् १ । १ । २१ । इति श्राधन्तवद्भावे सुपि चेति दीघे आभ्याम् । इंद+भित इत्यत्र हलि लोपे नेदमदसोरकोः ॥११६ (मिस ऐस ) इति मिस ऐवानषेधै वहुबचने शल्यदित्येत्वे एभिः । अस्मै, अस्मात् , इद + ओस इति स्थिती अनाप्यक इति इदोऽनादेशे ओसि चेत्येत्वे प्रयादेश अनयोः एषाम । अनि, अनयोः, एषु । किञ्चित्कार्य विधातुमुपात्तस्य कार्यान्तर विधातुं पुनरुपादानमन्वादेशः' । यथाऽन्न व्याकरणमघीतमेनं . एभ्यः आम्याम्, पश्यः आभ्याम्, श्रस्य ५० पाणिनीयप्रबोधे " . छन्दोऽध्यापयेत्यर्थे द्वितीयाटौवेनः २ । ४ । ३४ । ( इदम एतदोऽन्वादेशे) इति द्वितीया टाओस् विभक्तिः एनादेशे एनम्, एनौ, एनान, एनेन, एनयोः इति पञ्च रूपाणि भवन्ति । स्त्रीलिङ्गे-~-इदम् + सु इति स्थिते यः सौ ७ । २ । ११० ( इदमो दः) इति दकारस्य यकारे कृते, हल्डया. दिना सुज़ोपे इयम् । इदम् + औ इत्यत्र त्यदायत्वे टाधि दीर्धे दस्य मत्वे ईमा औ इति जाते और आप' इति श्रीङः शीभावे अनुबन्धलोपे गुणे इमे, इमाः । इमाम् , इमे, इमाः ! अनया, आभ्याम् , आमिः । अस्ये, श्राभ्याम् , आभ्यः । अस्याः, आभ्याम् , आभ्यः । अस्याः, अनयोः, आमान । अस्याम् , भनयोः, आतु । नपुंसके तु सोलु कि इदम् , इदम् + औ इत्यत्र त्यदाद्यत्वे नपुसकायेत्यौडः शीभावे अनुपन्धलांपे गुणे दश्चेति दस्य मत्वे इमे, मानि पुनस्तद्वत् । शेयं नपुंसक सर्व शब्दवत् । प्रतिलिङ्ग पिनरूपस्य सर्वनाग्नः 'अदम्' शब्दस्य पुलिङ्ग अदस्+ सु इति स्थिते अंदस औ सुलोपश्च ४।२। १०७ (मो3 ) इति सकारस्यौकारे सुलोपे वृद्धौ भदौ इति माते तदोः सः सावनन्त्ययोरिति सकारे असी इति क्षति स्थिते स्यदायत्वे पररूपत्वे सी अदी इति जाते असोऽर्शदुदोमः ८ । २ । इति मत्मोत्ने इति स्थिते त्यायवादिफाय अदे जाते पतवचने ८।२।८१ ( भदशोऽसेदान्दोगः ति मात्र अमो रपदा एवादि-गादि-गयारा मवेये च प्रमुम्, अम्, अनन् । त्यदायावे पद+टाइन रिपो मरवाने थानानिमामिति नामारे अगुना wient . २ ४ दकारस्य सदस्+श्री घदस + बम् संख्याप्रकरणम् । 4 " अमीभिः । अमुष्मै, अमूम्याम् अमीभ्यः । अमुष्मात् अमूभ्याम् अपीभ्यः अमुव्य अमुयोः अमीषाम् । अमुस्मिन् अमयोः अमीषु । स्त्रीलिङ्ग तु सौ पुवकार्ये असी, भौदित्यदायले टापि शीमावे अत्यमले अमू, भो त्य- दाद्यत्वे दापि सर्वादिगणकृत्ये मत्वोत्वे अनूः। अमूम् अमूः अमूः। अमुया अमूभ्याम् अभूमिः।अमुष्य प्रमुभ्याम् अनूभ्याअनुष्याःअनूभ्याम् अमूभ्यः।अनुष्याः अमुयोः • अमूषाम् । अमुध्याम् अमुयोः अमूपु । नपुंसके तु स्वमोलु कि अदः मौद्धि न्यदाद्यत्वे विभक्तिकायें मत्वोत्वे अमू जश्यमोः अनूनि शेषं पुवत् । इति सर्वनामप्रकरणम् अथ संख्याप्रकरणम् संख्यान संखश गणनेति यावत् । सा हि संख्या निया भिद्यते १ क्रमसख्या: २ पूरणीसंख्या,३ किनाम्यावृतिगणना चे'ने । तवाया संख्या-संख्येय भेदेन द्विधा एकत आरम्याष्टादशान्ता तु संख्येयबोधिवास्ति । अतः सा विशेष्यनिमा- त्रिलिङ्गा भाति । तथाहि-रका शाटो, एक: पटः, एकं कुण्डम् । अष्ठादश स्त्रियः, अष्टादश नराः, अष्टादश पुस्तकानि । उक्तञ्च-'अष्टादशान्ता एकाद्याः शंख्याः संख्येयगोचराः' । तत्रापि पश्चन प्रारम्याष्टादयावधिसंख्यानां त्रिष्यपि लिनेषु समानान्येव रूगणि। उक्तञ्च -'घटसंशकान्त्रिषु समाः, युध्दस्म. शिङब्ययम्' । इति । यथा पञ्च नार्यः, पञ्च वाल काः, पञ्च फलानि । घट् कुमार्यः, षट् कुमाराः, षट् मूनानि । कति कन्याः, कति घटाः, कति पत्राणि। विशंत्यादयः सख्यास्त एकवचनान्ता एव । तत्रानवनवतिम् स्त्रीलिङ्गाः शतादयस्लु नपुंसकलिङ्गाः। सर्वा अपि संख्या संख्येयवाचिकाः । उकब-विशत्यायः , पणिनीयप्रबोधे सदेकत्वे सर्वाः संख्येयसंख्ययोः । संख्यार्थे द्विबहुखे स्तरतासु चानवतेः स्त्रियः । शतादिः क्लीवरिङ्गव कोटि: रत्र्यवादिषट् पुमान् " तत्र संख्यार्थे द्विबहुवचने मपि भवतः । यथा-विशतिः पटानाम्, विशिती ब्राहाणानाम् , तिम्रो विंशतयो गवाम् । शतम् अश्वानाम् , द्वशते छागानाम् , त्रीणि शतानि सैन्यानान् । विशतिः छात्राः, विशति: कन्याः, विशतिः कुलानि । शतं वृषाः, शतं महिष्यः श्वतं रतानि एकाम्यास्ता: पगन्तिा गणने कीर्तिता बुधैः । एक दश शतञ्चैव सहस्रमयुतं तथा । लक्षञ्च नियुतञ्चव कोटिरर्बुद मेव च । पर्व: खी निखर्वश्च शङ्खः पनध सागरः । अन्त्यं मध्यं परार्द्धश्च दशवृद्धया यथाक्रमम् । मवानां वामतो गातारति नियमः । पूरणी संख्या । सर्वापि विशेष्यनिन व विद्यते । पुंलिने रामवत् स्त्रीलिङ्गे श्राकारान्ता रमावत् ईकारान्ता नदीवत् नपुंसके शानवत् तथादि-प्रथमः पुरुषः । प्रथमा कन्या, प्रथमं पात्रम् एवम् द्वितीयः द्वितीया द्वितीयम् । तृतीयः तृतीया तृतीयम् । चतुर्थः चतुर्थी चतर्थम् । पञ्चमः पञ्चमी पमम् । ६g: षष्ठी पष्टम् । एकादशः एकादशं| एकादश्यम् । विशः विशतितमः, विशी विशतितमा, विंशम विशतितमम् । विश: त्रिशत्तमः, निशी निशत्तमा, निशम् निशत्तमम् ! पतिमः बटिसमा घटितमम् । शततमः शाततमा, शततमम् । ३ कियाक्तिगणना तु अव्यमरोव । यथा--साद भुक । द्विवक्ति । त्रिः शृणोति । पशवो गण- गी। इमादि संख्याविचारः ।

संख्याप्रकरणम् । * R ) . , कति द्वौ , त्रयः तिनः, त्रीणि चत्वार इत्यपि । चतत्रश्चापि चत्वारि पञ्च पट गणिता: फमाद । नित्यं वहुवचनान्तलिलियामपि समानरूमा कतिराब्दः । सर्वत्रैव लिसपु कति- +जम्,शस् इति स्थिते । -डति च ।। १ । २५ ॥ (संपा षट् ) इति षट संज्ञायाम् पडभ्यो लुक । ७ । १ । २२ ॥ (दशेसोः ) इति विमत्योर्छ कि कति२ शेष हरिवत् । नित्यं द्विवचनान्तलिलिङ्गो द्विशब्दः । तत्र पुंसि द्वि+ो इत्यत्र यदादीनाम इत्यत्वे द्व+ौ इति नाते वृद्धयेकादेशे द्वौ पुनस्तदद दो अत्वे कृते दो दाभ्याम् ३ । एत्वयत्वयोः द्वयोः २ । स्त्रीलिङ्ग त्यदाद्यत्वे टापि दीचे श्रौद्धः श्यादेशे गुणे द्वे २ इत्यादि रमावद्रूपम् (१) नित्यं बहुवचनान्तनियन्द निलिङ्गश्च । तत्र पुसि हरिवद् गुणादिकायें त्रयः, त्रीन्, त्रिभिः,त्रिभ्या, २त्रि+ पाम् इत्यत्र-त्रयः ।। ७ । १५३ ।। (प्रामि ) इति त्रयादेशे नुटि दी ‘णावे अयाणाम् , त्रिषु । है त्रयः । स्त्रीलिङ्ग तु त्रि+म त्रि+शसु इसिस्थिते त्रिचतुः स्त्रियां विसृचतम् ।।७।२। ९९ ॥(विमको ) इति तिलादेशे तो डीति प्रासं गुणं बाधित्वा गुणदीवोवारवादःत्वेन। अचिर ऋता ॥ ७ ॥ २ ॥ १०॥ (तिस्चतम विभक्तो ) । इति ऋकारस्य रकारे कुवे स्वरसंयोगे विसर्ग व तिला तिसः । तिसमिः । तिसभ्यः ।तिसु+भाप इति स्थिते नुटि प्रातस्स दीर्घस्य न तिवस।। ६ । ४ ( प्रामि दीर्घः) इति निषेधै (ऋर्णानस्य णत्वं वाच्यम् ) इति णले तिक्षणाम् । तिस हे तितः। नसके जसि शसि पारिवत् काय त्रीषि। (२) नपुंसके शानबद् द्विवचनमेव रूपम् । . २ ४ ४ पाणिनीयप्रबोधे .. त्रीणि | शेषं पुवत् । चतुर शब्दो नित्यं वहुवचनान्तस्त्रिलिर: !! चतुर + जस- इत्यत्र चतुरनडुहोरामुदात्तः इत्यामि कृते यणि । चत्वारः । अन्यत्र चतुरः । चतुभिः । चतुभ्यः । चतुर् + आमित्यत्र षट्चतुर्थ्यश्च ।। ७ १ १ १ ५५ ॥ ( आमि नुट् ) नुट् ) इति नुटि-अनुबन्धलोपे चतुर्नाम् इति जाते रषाभ्यां नो णः समानदे ॥८।४ ।१॥ इति णत्वे कृते अचो रहाभ्यां हूँ ॥ । ४ । ४६ ॥( यरो वा) इति द्वित्वे चतुमि । शे: सुपि ( रोरेव विसर्गः) इति नियमाद् विसर्गाभावे चतुषु । हे चत्वार इति । स्त्रीलिङ्गे तु पूर्वसूत्रः त्रीलिङ्गत्रिशंव्दवदेव साधनप्रकारः । चततः २। चतसृभिः । चतसृभ्यः २। तसृणाम् । चतसृपु। हे चतस्त्रः नपुसके तु चतुर + जस् चतुर ---शस इति स्थिते जश्शसोः शिः इति तयोः शौ वृते तस्य सर्वनामस्थानत्वात् आमागमे च चत्वारि । चत्वारि । शेपं चद्रूपम् !! बिहियां समानरपो नित्यं हुवचनान्तो नकारान्तः पञ्चन् शब्दः ष्णान्ताः पट् ।। १ । १ । २४ ॥ ( संख्या ) इति पद संज्ञायाम् पदभ्यो लुक् इति जयशसो लुकि नलोपे पञ्च । पञ्च । पश्यन् + मिस इत्यत्र स्वादिष्वसर्वनामस्थाने । १।४ । १७ । ( क.पपत्ययावधि ) पदम ) ति पद सरज्ञायां ' मलोपः प्रातिपदिपान्तस्य' तिनलोपे पतभिः । नाम भ्यः २ । एश्वन+आम् इत्यत्र फ्ट चतुर्या इति नुटि पञ्चम् + इति चाते नौपधायाः ६१ ४ १ ७ ॥ ( नाम) प्रति उपभा में कलये ? पानाम । । २ पुसायोपि faferi ..

अव्ययप्रकरणम् । समानरूपो नित्यं बहुवचनान्त: पम् शब्दः ॥ तस्मात् पश्थसोलुंकि जशवे वैकल्पिके चत्वं च । षट् पड़ २ । जस्त्वे पद्मिः । षड्भ्या पड्भ्यः । नुटि सन्धिाकार्ये पण्णाम् । षट+ सु इति जाते टुना रिति प्रातस्य षत्वस्य-सात्पदोद्योः ।। ३ । १११। (नै मुर्धन्यः) इति निषेधे पटसु । घट इति । स्त्री नपुसकयोरप्येवं रूपाणि । एवं सतादयोऽष्टादशान्ताः विष्वपि लिनेषु सर्वेऽपि समानरूपाः पञ्चवत् शेयाः । उनविंशत्यादयो नवनवत्यन्ता: सर्वेऽपि शब्दाः स्त्रीलिङ्गा एकवचनान्ताः । विंशतिः । त्रिंशत् । चत्वारिंशत् । पञ्चाशत् । षष्टिः । सप्ततिः। प्रशीतिः नवतिः । तत्र तकारान्ताः शरदत्, इकारान्ता मतिवत् । संख्येयायें एकवचनान्त: शत-सहस्रादिशब्दो नपु'कलिङ्गो ज्ञानशब्दवज्ञयः । इति संख्याप्रकरणम् । अथ अव्ययप्रकरणम् संस्कृतभाषायां वाक्य-प्रयोगविषयेऽव्ययं बहुपकरोति । न व्येति विकार प्राप्नोति । इत्यव्ययस्य व्युत्पत्तित्भ्योऽर्थः । तच्चाव्ययं स्वाभाविक पारिमाविक मेदेन द्विधा भिद्यते । तथा च स्वगदयो निपाता स्वाभाविकाध्ययत्वं मजन्ते 'तद्धितश्चासर्यविभक्तिः' इत्यादि पारिभाषिक सूत्रोक्त व्ययन्तु तै; सूत्ररेयो च्यते । स्वरादयो हि सत्यास्वत्यवाचका उभयेऽपि, निपाता: चादयामादयस्तु अस त्ववाचका एवाव्ययतो यान्ति । ! कारान्तरेण सर्वमप्यत्ययं पञ्चविधं विद्यते । १ द्रव्यवाचकम् , २ क्रियाविशेषणम् ३ संयोजनम् , ४ मनोविका सूचकम् ५ उपसर्गधेति । तत्र द्रव्यवाचकम्-यया स्वर=स्वर्ग। भूर-धमयाम् ।। स्वरादावेव कालदेशवाचाम् কিয়াহিদ कथ्यते या-उर्वद नीति . इत्या. भुव:- अन्तरिक्षे पाणिनीयप्रबोधे अजस्र पठति । इत्यादि । द्रव्यवाचकोऽनव्ययऽशब्दोऽपि द्वितीय कवचन विभक्ति- योगेन क्रियाविशेषणी कृत्य वाक्ये प्रयुज्यते । यथा-सुखं भुव मधुरं हि । परुषं मा वद । स्तोकं पर । मृदु व्यवहर । इत्यादि, ३ संयोजकम् च, वा, तु, अपि इत्याद्यव्ययम् पदस्यान्तरव प्रयुज्यते यथा-मः कृष्णश्च गमिष्यतः । रामः कृष्णो वा गमिष्यति । स तु गतः । त्वमपि गन्तासि । इत्यादि । अथवेत्यव्ययं पदयोमध्ये प्रयुज्यते यया-रामोऽयवा कृष्णो वस्तु । 'इति' शब्दो अन्यान्ते, वाक्यान्ते, पदान्ते एव प्रयज्यते यथा-इति श्रीमहाभारते । 'अहं गमिष्यामि' इत्यभ्यधात्सः । राम इति पदं सिद्धम् । इत्यादि । मनोविकारसूचकम् पदस्यादावेव प्रयुज्यते यथा---इन्त ! क गतः । श्रा! तस्येदृशीदशा । हा ! कष्टं । वत हुम् चित्रम् , हे मात दैवतानि धिक् । भोः पितः ! कासि है सुभ्र ! वहेवं विललार स:" ( इति भष्टिः) ५ उपसर्गस्तु प्रादिः क्रियायोगे भवति । ततः पूर्वमेव प्रयुध्यते च यथा गैति, समेति, उदेति । इत्यादि रवर्शदात्-अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् इति प्रातिपदिकत्वात् स्वादिविभक्ती समागतायाम् - स्वरादिनिपातमव्ययम् ।। १।११३७ ॥ इत्यव्यय - संज्ञामाम् भव्ययादाप्सुपः ॥ २ । ४ । ८२॥ (तुझ्) इति मुपो लकि विस स्वः । एवं स्वरादीनां निपातानाच सर्वेषाम--- प्यन्ययानां सर्वत्र विभक्ती समानमेव रूपम् । तथा हि प्राचीनोक्तिः साशं त्रियुलिछो सान च विमति । गचने च संपन्न व्यक्ति तदव्ययम् ।। १ ।। . 9 अव्ययप्रकरणम्। कियन्ति तानि निर्दिश्यन्ते-स्वर् प्रातर् अन्तर् उच्चेस् नीचैम् शनैस् ऋते युगपत् आरात् पृथक् श्वस् ह्यस् दिवा नर्फ सायं चिरं मनाक् ईषत् तूष्णीम् पहिस अधस समया निकषा स्वयम् ननु वा सामि वत्-(विधुवत् हरिषत् इत्यादि) सना तिरस्अन्तरा अन्तरेण सहसा विना नानास्वस्ति स्वाहा स्मधा अलम् 'वषट् वौषट् अस्ति उपांशु वृथा मृषा मिथ्या मुधा पुरा मियस् प्रायस् मुहुस् आमीणम् साकम् सार्धम् नमधिक हिरुक् अथ आम् माङ् कामम् साम्प्रतम साक्षात् सत्यम् मंक्षु संवत् अवश्यम् सपदिप्राविस् अनिशम् नित्यम् सदा अजस्लम् ओम् भूर् भुवर झटिति झगिति शीघ्रम् अञ्जमा सु कु स्थाने वरं सुदि वदि -आहोश्वित् दिष्टया इब अद्यत्वे इति-(स्वरादिराकृतिगणः) अथनिपात नाहच वा -हू अहम् नूनम् शश्वत् भूयस् चेत् कचित् किश्चित् यावत् तावत् एव एव रे -आहो उताहो अहो नो अयो तु नु इति वत सत्यम् नहि जातु कथम् अव - अनु हा कम् खम् पशु सह अङ्ग अये बरे औषट् वौषट् खल किल सुटु स्म श्राः है भो है यथा यत् इति ('चादिरप्याकृतिगणः )२ उपमर्गविभक्तिस्तरपति- रूपकाच अवदत्तम् अहंयु अस्तिशीरा अ आ इ ई उ ऊ ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः। एवमन्येऽपि । श्रन्ययाः पारिभाषिका यया-तद्धितश्चासर्व विभक्तिः १ ।१।३८ ।, (अव्ययम् ) तदा सर्वदा ( तसिलादयः माक् पाशरः शरप्रमृतयः १ चादयोऽसत्वे । १।४ । ५७ (निपाताः) २ प्रतिरूपकशन्दस्य प्रत्येक योगः तथाच उपसर्गप्रतिरूपकं अवदत्तमित्यादि । विपक्तिश्च सुतिहमयरूपा तन सुबन्तप्रतिरूपकं अहम, वाम् . अहयुरित्यादि । तिन्तिमतिरूपकम् -अस्तिशी- नेत्यादि । स्वरप्रतिरूपकम्-अ, प्रा इत्यादि । .

५८. पाणिनीयप्रबोधे ។ २ । भाक् समासान्तेभ्यः । अम् श्राम्। कृत्वोऽर्थाः। तसिवती नानाजी कृन्मेन्जन्तः ।। ३९॥ (अव्ययम् ) स्मारम्, स्मारम् ! जीवसे । क्त्वातोसुन्न सुनः । ११११४०१ (अध्ययम्) कृत्वा, उदेतोः, विसृपः । अव्ययीभावश्च १ १।४।। (अव्ययम् ) अधिहरि । कृते बहुव्रीहौ सर्वे स्वव्यया अप्यनव्ययाः ! आगतेऽध्यापके वालाः कृत तूष्णीम आभवन् । इति। अष्टि भागुरिल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः प्रापं चैव हलन्तानां' यथा वाचा निशा दिशा ॥ २ ॥ प्रादयः १ । ४१५८ (निषाताः) इति सूत्रेषः प्रादयोऽपि निपाता भवन्ति । ते च-प्रपरम्पसमन्ववनिर्दुरमित्यधिसूदतिनिप्रति प्रर्यपयः । उप अाडिति विंशतिरेष सखे ! उपसर्गगणः कथितः कविना इमे प्रादयः क्रियायोगे उपसर्गतां गतिसज्ञा च लभन्ते । उपसर्गाः क्रियायोगे । १ । ४१५९।। - प्रादयः ) गतिश्च । १ । ४ । ६० ते प्राग्धातोः । १ । । ६०॥ उपसर्गेण: धास्वर्गों वलादन्यत्र नीयते । विहाराहारसंहार प्रहार परिहारवत् ।। १ ॥ विहरवि' संहरति प्रहरति परिहरति इत्यादि । धात्वर्थ वाघते कश्चित् कश्चित्तमनुवर्तते । तमेव विशिनष्टयन्य उपसर्गविधा मतः ॥ ॥ पराजयते पराजितो भवतीति जयते विरुद्धोऽर्थः । अभिभवति परास्तं करोतीति भवतेविरुद्धोऽयः । पराभवति परास्तो भवति इति परास्तभवने ऽर्थे भवनरूपार्थोऽनुवर्तते । प्रभवति समर्थी भवतीति भवनाथ' निशिनष्टि ।। इत्यव्ययप्रकरणम् । अथ स्त्रीप्रत्ययाः प्रातिपदिकानन्तरं हुयाभ्याम् स्वायुत्पत्ति विहितेति तन्निरूपर्ण प्रसङ्ग प्राप्त झियते स्तन पेशवती स्त्रीस्यालोमशः पुरुषारमृतः। उभयोरन्तरं यच्च तदभावे नपुंस- ।

कीप्रत्ययप्रकरणम्। ५६ . - कम् तथासत्त्वरजस्तममा प्राकृतगुणानां वृद्धिः पुंस्त्वम् अपचयः स्त्रीत्वम् । स्थिति म' नपुंसकम् इत्यादयो लौकिकलिङ्गनियमा नेह व्याकरणे समुपयुज्यन्ते । दार- शब्दस्य पुंस्त्वात् कजन शद्वस्य नपुंसकत्वोक्तश्च तेना सैन्यम् , आलयः आगाम् कुटी, कुटीरम्, तरः तटी, तटम् इत्यादिषु लिङ्गभेदशानाच्चेति ज्ञेयम् । अत एव पाणिनिना लिङ्गानुशासन पृथक् , प्रकरणमेकं विरचितम् । पतञ्जलिना च , अवश्ययावत् कश्चित् स्वकृतान्त आस्थेयः" इत्यादिना तत्समर्थनं कृतम् । अत- श्चेदं त्रिविधमपि लिङ्ग जातिव्यक्तिवत्, प्रातिपदिकार्य एच | टाप , डीप, प्रभृति स्त्रीप्रत्ययान्तु केबलं द्योतकाः । तेच प्रत्ययाः टाप, चाप, डोप, श्री हीन ,ऊ, ति इति सतविधा एव सन्ति ते चेह संक्षेपतो निर्दिश्यन्ते । नियाम् ४ ॥ १।३ ( अधिकारः समर्थानाम् इति यावत) अजशब्दात स्त्रोत्वविवक्षायाम् भजाद्यतष्टाप ४ । १ । ४ (स्त्रियाम्) इति टापि अनुबन्धलांपे दी डया प्रातिपदिकादिति, स्वाद्युत्पत्तौ अजा । एवम् एटका कोकिला इत्यादि । अदन्तेषु खट्वेत्यादि । अजादिशब्दानामदन्तत्वेऽपि 'वयसि प्रथमे 'जातेरस्त्रीविष- यादयोपघात्' इत्यादिना वध्यमाणस्य डीपो डीपश्च वाधनार्थमजादिगणेषु पाठः गन्तृप्रभृति ऋकारान्तात् दण्डिन् प्रभृति नकारान्ताच ऋन्नेभ्यो सीप ४।५। ५ (स्त्रियाम् )इति डीपि अनुबन्धलोपे सन्धिकार्ये डयन्तत्वात्सौ तल्लोपे सति गन्त्री की दात्री धात्री इत्यादि दण्डिनी स्वामिनी मन्त्रिगो गुणिनी मालिनी राशीत्यादि सिद्धयति । ऋदन्तेषु स्वतादिभ्यः नान्तेषु षट संकेभ्यश्च डीपः प्राप्ती सत्याम् न पवनादिभ्यः ४ । १ । १० (लियाम् वी टायौ ) इति निषेधे यथावत्स्थितिः । रवसा पञ्च सप्त इत्यादि "रूसा निखश्वतखश्च नमान्दा दुहिता , पाणिनीयप्रबोधे १ तथा । याता मातेति सतते स्वखादय उदाहताः । एवं नान्तेषु सीमन् प्रभृति शब्दात् मनः ४ । १ । ११ (न कोप ) इति कीनिषेधे सीमा इत्यादि पुल्लिङ सुनामनशव्दवद्रूपम् । पाचकादिभ्यः स्त्रीत्वविवज्ञायां यपि । प्रत्ययस्थात्कारपूर्वस्यात इदायसुपः ७ । ३ । ४४ इति इत्वे पाचिका कारिका,सर्विकेत्यादिः । नदादिशब्देभ्यः- टिदादिभ्यस्तु स्त्रीत्वविवक्षायाम् टिड्ढाण ब् द्वयसन्नमात्रच तयप ठक ठन्कन करपः ४ । १ । १५ (स्त्रियां डोप ) इते डोपि नदी वैनतेयी सौपर्णे यी ऐन्द्री, औत्ती, उपद्वयसी, उरुदनी,उक्ष्मात्रीपञ्चतयी लावणि की याशी इत्तरी जित्थरी नश्वरो सूत्वरी गत्वरी त्रयाणा लोकानां समाहारः त्रिलोकी इति द्विगुसमासे द्विगोः ४। १।२१ (त्रियां ङीप ) इति डीपि ( यस्येतिच ) इति अकारलोपे त्रिलोको त्रिलिङ्गी इत्यादि कुमार शद्वात् स्त्रीत्वविवक्षायां टापि प्राप्त बधि प्रथमे । ४।१।२. (डी)इति डीपि कुमारी ति म्यन्तात्सोतल्लोपे कुमारी शत्रन्तराद्रेभ्यस्तु भवत् प्रभृतिभ्यः उगितश्च। ४ । १ । ६ । ( ही स्त्रियाम् ) इति ङीपि अनुबन्धलोपे शपश्यनोनित्यमा७।१।८१ (शीनद्यार्नुम् शतुः) इति नुमि भवन्तो पचन्ती पश्य ती दीयन्तीत्यादि । नाभ्यस्ताच्चतुरिति नुम् निषेचे ददती जातीविभ्रतीत्यादि तुदत्मभृतिभ्यस्तु 'आच्छोनद्योः ७ । ११० ( नुम् शतः वा) इति वैकल्पि के नुमि तुदन्ती तुदती भान्तो भातीत्यादि । तथान्येऽपि सन्धती तन्वती सुन्वती त्यादि शत्रता विदुरी श्रीमती भेषमीत्यादि शिन्नोगिदन्ताः शब्दाः स्त्रीलिङ्गे डीन न्ता शेयाः । वशिष्टय पक्षोत्याही पत्युनों यज्ञसंयोगे ४११ ०३३ (स्त्रियां डीप ) इति दीपि न कारयोगे पनी धर्मपत्रीत्यादि । शूद्रस्य परनीत्यादि प्रयोगस्तूप वारान्द्र २५ 3 स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम्। २ १ 3 विष्यति : विद्भयो गौरादिभ्यश्च स्त्रीत्वविवक्षायाम् अन्यतो को ४।१।४० पिगौरादिभ्यश्च ४ । १ । ४१ (त्रियां डीए ) इति कीषि अनुबन्धलापे नर्तकी गौरीत्यादि । मृदुशद्वात् वोतोगुणवचनात् ।। १ । ४४ ( स्त्रियां ङीष् ) इति पाक्षिके डीषि मृद्वी मृदुः ।बहुशद्वात् वह्वादिभ्यश्च ४ । १।४५ (स्त्रियां ङीष् वा) इति वैकलिकेडीपि बही बहुःइत्यादि। गोपस्य स्त्रीत्यर्थे गोपशद्वात् पुयोगादाख्या वाम ४ । १ । ४८ ( ङी स्त्रियाम् ) इति डीषि गोपीत्यादि । इन्द्रस्य स्त्री इत्यय इन्द्रवरुणभवशवरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुक्४।१।४६ (त्रियों डीए) इति डीपि आनुगागमे च इन्द्राणी एवम् वरुणानी भवानी रुद्राणी मृडानी (हिमारण्ययमहत्वे) महद्विमं हिमानी महारण्यम् अरण्या नी ( यवाद दोघे ) दुटो यवो यवानी ( यवनाल्लिप्याम् ) यवनानां लिपिर्यवनानी ( मातलोपाध्याययोरानुग्वा मातुलायानी मातुली उपाध्यानी उपाध्यायी यातु स्वयमेवाध्यापिका तत्र वा डीववाच्यः) उपाध्यायी उपाध्याया आचार्यादयत्व च आचार्यम्य स्त्री श्रासऱ्यांनी या तु स्वयमेव वेदमन्त्रव्याख्यात्री सा आचार्या चन्द्रवत् मुखं यस्या इति बहुश्रीहि समासे चन्द्रमुखशब्दात् स्वाहाचोपसर्जनाद सयोगोपधात् ।। १ । ५४ (स्त्रिया डीप या) इति वैकल्पिके डीपि चन्द्रमुखी चन्द्रमुखा सुकेशी सुकेशा इत्यादि । नक्रोडादिबसचश्च ।४।१ । ५६ (डीप स्त्रियाम् ) ल्याणकोडा । कुछ टस्वजातिविशिष्टा स्त्री कुकटी इति विग्रहै जातेलीविषयाव्योपधात् ४।' ६३ ( डी ) इति कीपि अल्लोपे वरयोगे ड्यन्तात् सुपि पदसाधुत्वम् । आकृतिग्रहणाञ्जाति: ' शूकरी गर्दभी लिङ्गानाञ्च 3 पाणिनीयप्रबोधे २ नसर्वभासकृदाख्यातान ह्या वृषली। गोत्रौंच चरणैःसहा औपगवी रूठी बहची दक्षस्यापत्य स्त्री दाक्षी इति विग्रहे- यक्षशब्दा त्' अत इञ् इति इञ् िअल्लोपे इकारान्तात् दाक्षि शब्दात् इतो मनुष्यजाते: ४ । १ । ६५ ( डोष स्त्रियाम् ) इति डोषि दाक्षी, एवं दाशरथी वैनापकोत्यादि। कुरुत्वजातिविशिष्टा स्त्री कुरूः इति विग्रहे ऊङतः ४ । १ । ६६ । (स्त्रियाम् ) इत्यूङि दी लिङ्गविशि ष्टपरिभाषया सौ रुत्वे विसर्गे कुरूः वधूराद्धपशूपम् । वामे ऊरू यस्याः सा चामारू इति विग्रहे बहुव्रीहौ वामोफराब्दात् उहत्तरपदादौपम्ये ४।१।६६ (अड् स्त्रियाम् ) इत्यूङि दोघे सुपि वामोरू: । कम्भोरू: रम्भोरूः इत्यादि युवन् शद्वात् स्त्रिस्वविवक्षायाम् युनस्ति: ४ । १ । ७७ । ( स्त्रियाम् ) इति तिप्रत्यये नलोपे युवति शद्वातू लिङ्गविशिष्टपरिभाषया सुपि युवतिः इत्यादि रुचिचद्रूपम् । इति स्त्रीलिङ्ग प्रकरणम् । श्रथ कारकप्रकरणम् तत्र भूमिका क्रियया साक्षात् सम्बन्धमागेव कार कमुच्यते तस्य षडेव भेदा भवन्ति । यतो हि ष राणामेव पदार्थानां क्रियया सह साक्षात् सम्बन्धों भवितुमर्हति । तपाहि (१) क्रियायाः स्वतन्त्र आश्रय: कतो यथा-गिरिधरोऽस्ति । (२) क्रियायाः फलाश्रयः कर्म यथा-आम गच्छति । (३) क्रियायाः सिद्धावत्युपकारक करणम् यथा-पूच्या सीव्यति । (४) किया यस्यकृते भवतितत्मम्प्रदानम् यथा-फल पनि कारकप्रकरणमा . म् । षष्ट्यन्त पदार्थों सह साक्षात् सम्बन्धो नैव भवति । क्रियाकर्मणः यस्य सम्बन्धः कर्तुमिष्टः तदपि सम्प्रदानं कथ्यते । यथा विप्राय गां ददाति । (५) क्रिया यतः पृथक भवति तदपादानम् यथा अश्वात् पतति । (६) क्रियायाः क्रियाजन्यफलस्य च परम्परया श्राश्रयः अधिक रणम् कथ्यते । यथा- -कटे शेते शिशुः, स्थाल्यां पचति तण्डुल हि कारक भवितुन्नाई ति यतस्तस्य क्रियया किन्तु केनापि तत्सम्बन्धिना वस्तुना ( कारकेण ) तस्य सम्बन्धो जायते । यथा-मम पुत्रः पठति । अत्र मदर्यस्य पुत्रेण सह सम्बन्धो नतु पठनेन यत्र षष्ट्यन्तार्थस्य क्रियया सह सम्बन्धो भवति तत्रस कारकं भवत्येव यथा-तण्डुलानां पाचकः। एकस्मिन् वाक्ये सर्वकार- कोदाहरणम् यथा राजानो द्रव्यगशिं स्वहस्तेनैर मावोयमहोदयेभ्य आत्मनः कोशात् उद्धृत्यात्र भारते ददति -अत्र 'ददति' इति किया- दानक्रियायां दान कर्तृत्वाश्रयाः राजानः सन्ति, अतस्ते 'कर्तृ कारकम्' इति नाम्नोच्यन्ते । द्रव्यराशिः दीयमानोऽस्ति, (त्यज्यमानोऽस्ति) अतः स 'कर्मकारकम् मालवीयमहोदया दानक्रियाकर्मणासम्बद्धाः क्रियन्ते अतस्ते दानपात्रतया 'सप्रदानकारकम् । दाने हस्तः साहाय्यमाचरनीति स: 'करण- • क.रम्' कोशात् उद्धृत्योद्धृत्य द्रव्यराशिः प्रदीयते, इति “पृथक्करणकियायाः • (उद्धरणक्रियायाः) अगदानतया कोशः 'अपादानकारकम् अत्र- भारते दानक्रिया भवतीति दानक्रियाधारतया भारतम् 'अधिकरणकारकम् । इत्थं हमे षडपि पदार्याः क्रियया सइ निनसम्बन्धं साक्षात् संस्थापयन्ति अतस्ते कारकादवाच्या भवन्ति, तत्रैव 'भात्मनः' इति पदार्थः दानक्रियया, पदम् तत्र । ..

६४ पाणिनीयप्रबोधे सम्बन्धं विहाय केवलं हस्तपदान सम्बन्ध संस्थापयति अतो हि स षष्ठ्यन्तपदार्थः कारकं नोच्यते । यतो हि सर्वत्रैव वाक्ये क्रिया हि कतरिमपे- शिष्यते । कर्मणि स्वपलं जनयिष्यति । केनापि कारणेन-निष्पन्ना भविष्यति । कस्यापि कृते स्थास्यति । कुतोऽपि विभागः क्रिययैव भविष्यति । कस्मिंश्चि- दाधारे एव किया निष्पन्ना. भविष्यति । यत्र षष्ठ्यन्तार्थस्य "क्रियया सह सम्बन्धो नैव भविष्यति । तत्र स कथमपि कारकसंज्ञां नैव लपस्यते यत्र सम्बन्ध-विवक्षया षष्ठ्यन्तार्थस्य क्रियया सह सम्बन्धो जायते तत्र त कर्तरि कमणि वा षष्ठी विभक्तिर्भवत्येव, परन्तु तत्र सा कारकषष्टीति न कथ्यतेऽपितु- सम्बन्धषष्ठीत्युच्यते, यथा-सतां गतम् । सर्पिषो जानीते । महाभारतस्य लेखनम् इत्यादिकम् । प्रथम-कारकञ्च केवल-शब्दार्थमात्रबोधनेऽपि प्रयुज्यते । तत्रापि यत्र न क्वापि क्रिया स्यात्तत्रास्तिः प्रयुज्यते । इति नियमादस्तिप्रयोगोऽध्याहियते । अतश्च तत्रापि क्रियासम्बन्धस्तिष्ठत्येव । इत्थं हिं प्रातिपदिकस्यायन सहः लिङ्गमात्रभ्याधिक्यबोधने एवं परिमाणमात्रस्य एकत्व द्वित्वबहुत्बमात्रस्य चाधिक्यबोधनेऽपि प्रथमकारक शेयम् यथा वैदः, स्मृतिः, पुराणम् । तटः तटी, तटम, । द्रोणो ब्रीहिः । एकः, द्वौ, त्रयः, | सर्वनये कोऽपि शब्दः निविभक्तिक: प्रयोक्त नशक्यते, । इत्यतश्च शब्दमात्रबोधनेऽपि प्रथम. कारक भवतीति न कदापि विस्मर्तव्यम् । उत्तञ्च पतलना अपदं । प्रयुखोत । सुपा तिला वा कापि प्रकृतिने हातम्या ! न फेवला प्रकृतिःप्रयोक्तच्या नापि वेवलः प्रत्ययः । इति निष्कर्षा शेयः। यतो हि संस्कृते वेवल प्रकृतिप्रयोगेण न केऽप्ययों भास्ते स हि प्रयगो नरर्थकोड द्धश्च भवति, 'गमः इति विमतिक कारकप्रकरणम् । ५ - प्रयोगेण तु रामार्थस्य बोधो मवतिः परन्तु 'राम' इति निर्विभक्तिक-शन्द कथनेन- कस्याप्यर्थत्य संस्कृत-भाषायां शानं न जायते । सम्बोधनपदमपि सविभक्तिकमेव भवति, किन्तु तत्र विभक्त लोपेन तदर्शनं न जायते । एवमव्ययपदमपि सविभक्तिकमेव तिष्ठति, विभक्तस्तत्राव्ययत्वात् 'अव्ययादाप सुपः।' इति लग- भवति, अतश्चान्ययमपि सुबन्तत्वात्' पदमुच्यते । इत्यच यत्र न कस्यापि कार- करय सम्भावना तत्रापि प्रथम- कारकम् अस्तिभवत्योरध्याहारेया प्रयोक्तव्य मिति सुस्थिरम् । कारकञ्च षड्वियम् यथा- कर्ता कर्मः च करण सम्प्रदान तथैव च । अपादानाधिकरणमित्याहुःकारकाणि षट् । साक्षात् क्रियान्वयित्वं कारपत्वमिति परिष्कारात् षष्ठचन्तस्य साक्षात् क्रियान्वयाभावात् न कारकत्वम् । . प्रातिपादिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमाने प्रथमा, २।३।४६ प्रातिपदिक र्थ माने प्रथमा यथा-रामा, श्रीः, शान,उच्चैः। लिगामात्राधिक्ये तटः, तटी, तटम् । परिमाणमाने द्रोणो नीहिः । बचनमात्रे एकः। द्वौ । त्रयः । सम्बोधने च, २३४७४ (प्रथमा स्यात्,) हे प्रथमराष्ट्रपते राजेन्द्रप्रसाद ! स्वतन्त्रः कर्ता, १।४४५ ( कियायाम् ।) कर्तृवाच्ये प्रयोगे उक्त कर्तरि प्रयाग,यथा--गान्धि- महात्मा जयति । कर्तुरीपसिततमं कर्म १।४ । ४६ मालवीयमहामुनिहिंन्दु. विश्वविद्यालय स्थापितवान् । शिवप्रसादो विद्यापीठं प्रतिष्ठापितवान् । कर्मणि द्वितीया ॥३॥ · अनभिहिते २३ शिशुर्वन्दिकृष्णो दुग्धं पिबति । महात्मा पाणिनीयप्रबोधे धातूनां प्रधानकर्मणा गान्धी भारतमाता मन्दिरम् (भारतमातृ-मन्दिरम् ) उद्घाटितवान् । अकथितश्च शा५१ (कर्म) एतदेवाप्रधानं कर्मोच्यते । दुहिर्मुषिः पृच्छति-याचिशास्तयो, धिन वी दण्डति-मन्थती पचिः । वर्जियिमिक्षिचिनौ च व वृो, कृषिर्वहि नयतीति धातवः । द्विकर्मकास्सन्ति तदर्यकास्तथा, विकल्पतरस्युस्सकला विभक्तयः । अमुख्यगौणाकथितादिनामतः, सदैव कर्मान्यदमीषु युज्यते ॥ ( केशरी ) उपर्युक्ताना दुहादीनाम नविंशत्याः तत्समानार्थफानाश्चान्येषां सार्धमन्यत् कर्म प्रयुज्यते, तदेवाकथितं गौणम मुख्यं वा कर्मोन्यते । यथा- गोपो गां दोग्धि पयः । वामनो बलिम् याचते वसुधाम् । न्यायाधीयोऽपराधिनं दण्डायति शतम् । भक्तो देवं वृणुवे वरम् । सूदस्तण्डुलान् पचति ओदनम् । कृष्णो ब्रजमवरुणद्धि गाम् । पान्यो माणवकं पृच्छति पन्थानम् । स देवदत्तं मुष्णाति शतम् । मालवीयो विश्वविद्यालयं कर्षति वहति हरति नयति वा तदध्यापकान् । हरिः सुधां मध्नाति क्षीरनिधिम् । मालाकारो वृक्षान् अवचिनोति पुष्पाणि । कालीप्रसादः शिष्यं भूते शास्ति वदति वा धर्मम् । सुभाषः स्वतन्त्रता जयति ब्रह्मदेशम् । एवम्- ' वलिं भिक्षते वसुवाम् । आचार्यः शिष्यान् ब्रूतेऽभिधत्ते वक्ति वा धर्मम्, इत्यादि । उपान्वध्याडवसः ११४४८ (आधारः कर्म) उपवसति अनुवसति अधिवसति आवमति वा कारागारं सावरकरो वीरः। ठभसर्वतमीः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु, द्वितीयाऽडितान्तेषु ततोऽन्य प्रापि दृश्यतो कारकप्रकरणम् । ६७ । उभयतः सर्वतः, उपर्युपरि, अधोऽधः, अध्यधि वा भूमि मद्यत्वे युद्धम् । ( अभितः परितः समया निकपा हा प्रतियोगेऽपि । यथा-अमितः परितः समया निकषा भारत युद्धम् । हा आत्मविम्मरणमार्याणाम् । श प्रति शाठ्यं कुरु । अन्तरान्तरेण युक्त , २॥३।४ (द्वितीया) लोकमान्य तिलकमन्तरा स्वराज्यमन्त्रदः कोऽन्यः । न चमत्कारमन्तरेण नमस्कारः । कालाऽम्बनोरत्यन्तसंयोगे १३२५ (द्वितीया) मासमधीते । कोशं धान्य क्षेत्राणि सन्ति (अकर्मकघातभियोगे देशाकालो मावो गन्तव्योऽवा च कर्मसंज्ञक इति वाच्यम् ।) कुरून् स्वपिति । मासमास्त । गोदोहमास्ते । कोशमास्ते । साधकतमं करणम् ११४।४२ ( क्रियायाम ) कर्तृकरणयोस्तृतीया ३११८ (अनभिहिते,) भारतीयैर सहयोगेन स्वराज्यमुपलब्धम् । हेतौ ॥२३ ( अनभिहिते तृतीया,) तकैयन्त्रेणाधिकरवातन्त्र्यमिह मारते स्यादेव । कर्मणा यमभिमंति स सम्प्रदानम्, २४१२ (कारकम्,) चतुर्थी सम्प्रदाने, २।३।१३ (अनमिहिते,) रुच्यर्थानां प्रीयमाणः, · १।४।३३ ( सम्प्रदानम्, ) रोचते सत्याप्रहिणे कारागारम् । धारे रुत्तमः, १।४।५ । (सम्प्रदानम् ) महाननाय रुग्यकशत घारयति कृषकः । स्पृहेरीप्सितः, १।४।३६। (सम्प्रदानम् ) । गतास्ते दिवसा राजन् ! मुक्तानां जन्म शुक्तिषु । उदुम्बरफलायापि स्पृहयामोऽधुना वयम् । क्रुधदुहेाऽसूयार्थानां यं प्रति कोपः, १।४।३७ । (सम्प्रदानम् ) विप्राय गां ददाति, , ६८ पाणिनीयप्रबोधे भारतद्रव्यलुण्ठकेभ्यो वैदेशिकेभ्यो नेतारः क्रुध्यन्ति, द्रुह्यन्ति, ईयन्ति, अस्यन्ति च, । नमस्वस्तिस्वाहविधाऽलंवषड्योगाच्च, २ । ३॥ १६॥ ( चतुर्थी ) भारतमात्रे नमः । प्रजाभ्यः स्वस्ति । अमये स्वाहा । पितृभ्यः स्वधा अलमास्थास्वास्थ्ये विद्याय। मन्यकर्मण्यनादरे विभाषाऽप्राणिपु, ५ ॥३॥ १७। (चतुर्थी पक्षे द्वितीया च।) सत्याग्रही कारागारं तृणाय मन्यते, तृणं वा । ध्रुवमपायेऽपादानम्, १।४ । २४ । अपादाने पञ्चमी, २ । ३ । २८ । (अनभिक्तेि ।) कारागारादायाति । प्रासादादवतरति । भावतोऽश्वात् पतति । भीत्रार्थानां भयहेतुः, १।४।२५ । (अपादानम् । ) मिथ्याचाराद् बिभेति । दम्भाद् उद्विजते । देशद्रोहिन्यो भारतं त्रायस्व । गोररण्डशासनाद् भारतं रक्ष। वारणार्थानामीप्सितः । १।४1७1 (अपादानम् । कृषकेभ्यः शोषकवर्गान् वारयति राष्ट्रियमहासभाशासनम् ! जनिक :प्रकृतिः,१ । ४ । ३० ( अपादानम् ) ब्रहाणः प्रजाः प्रजायन्ते । पृथग विनानानाभिस्तृतीयाs न्यतरस्याम् ।३।३।३। (पञ्चमी ) मालवीयमहामुनेः पृथक् का विश्व. विद्यालयशोभा पक्षे मुनिना मुनि वा पृथक इत्यादि एवं विना कमलापति क: संसारसमुद्घर्ता । ( त्यलोपे कर्मण्यधिकरणेच ) मभामगडपप्रकोष्ठात् प्रेक्षन्ते दर्शकाः । राजर्बिटण्डनो वेत्रासनात् नियन्त्रयति सभामण्डपसदस्यान् । सभामण्डपप्रकोष्टं प्रविश्य त्रासने उपविश्येत्यर्थः अन्यारादितरर्तेदिकृशब्दाचूत्तरपदाजाहियुक्त, - २।३ । (पञ्चमी ) अन्यो मिनो ऽपरो वा पाणिनेन वैयाकरण श्रेष्ठः आरद् गृहादुपवनम् ५ पृशग विनातरेणते हिरङ नाना ब वर्जने- .. . -इत्यमरः।

कारकप्रकरणम् । ६६ ऋते नेहरू को गोरण्डनीतिमर्मविद् । पूर्वः सीतारामाच्छीनारायणः । प्राग वाराणसीतो विहारप्रदेश: प्रत्यगप्रयागत् । मध्यदेशः षष्ठी शेपे।३।५० दक्षिणा गृहाद्भवत्यवस्करालयः । दक्षिणा हि भारताल्लकाद्वीपन् । राशः पुरुषः । भगवदासस्य मानवधर्मसारः । कर्मादिष्वपि सम्बन्धविवक्षायां षष्ठी यथा-तां गतम् । नामिस्तृप्पति काष्ठानां नाप गानां महोदधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न बुधा शानकर्मणोः ॥ कर्तृ-कर्मणोः कृति, ३1३।६५) (षष्ठी) व्यासस्य कृतिः महाभारतम् । रामायणस्य कर्ता बाल्मीकिः । [निमित पर्यायपयोगे सर्वासा प्रापदर्शनम्] ( वार्तिकम् ) किं निमित्तम्, केन कस्मै, कस्मात्, कश्य, कस्मिन् वा निमिचे श्रागमनम् । एवम् को हेतुः किं कारणं किं प्रयोजन केनेत्यादिकं शेषम् । न लोकान्यय निष्ठाखउर्थहनाम्, ।। ३।६९ । (योगे षष्ठी ) कुर्वन् कुर्वाणो वा देशोद्धार कांग्रेससदस्यः कारागृहं गच्छति । कारागृहावरुद्ध' भगतसिंह द्रष्टु तन्माता शनी प्रार्थनापत्रं प्रहिणोति। सससैन्य घातको हिटलरः जयप्राणमाहाय्येन गोरण्डान् जित्वा भारत स्वतन्त्रं कर्तुं सुभावोद्योगः । जनप्राणो जितवान् ब्रह्मदेशम् । भारतवासनेन जितं हिन्दुमुस्लिमहृदयम् । ईषत्करः कलहो ग्डेच्छैः । संयुक्तमान्ते प्रधानमन्त्रयिता गोविन्दवल्लभान्तः। आधारोऽधिकर णम्, १।४।४५॥ सप्तम्यधिकरणे च २।३ । ३६(चाद्दूरान्तिकार्थेभ्यः कटे ह्यास्ते कुमारोऽसौ वटे गावः सुशेरते । तिलेषु विद्यते तैलं हृदि ब्रह्मामृतं परम् । दूरेऽन्तिके वास्ति श्रीमावारिप्रणेनिया विहार-मामागद पाणिनीयप्रबोधे - यस्य च भावेन भावलक्षणम्, २१३१३७ (तत्र ससमी ! ) गोषु दुह्यमानासु) गतः । देवे वर्षत्यपि पर्यटन्ति रक्षिणः । षष्ठी चानादरे, २११३८ रुदति पदतो वा प्रामाजीत्. । सदन्तं पुत्रादिकमनादृत्य संन्यस्तवानित्यर्थः। यतश्च निर्धारणम, २१४१॥ (तत्र षष्ठी सप्तमीच 1) नृणां नृषु वा कर्तव्यपरायणो नरः श्रेष्ठः । गवां गोषु वा कृष्णा बहुक्षीग । गच्छता गच्छत्सु वा धावन् शीघ्रः मन्त्रिणा मन्त्रिधु वा श्रीसम्पूर्णानन्दः पटीयान् यो हि शिक्षाविभागमर्थबिभाश्च साधु सञ्चालयति। - कारकप्रकरणं समाप्तम् . समासः समसनं संक्षेपकरणं समास इत्युच्यते . सम्पूर्वकात् अत् धातो वे पनि सभास इति शब्दो निष्पद्यते । समास: संक्षेपः, व्यासः वस्तारः । इति पर्यायशब्दौ परस्परं मिन्नौ स्तः । समासे हि द्वयोर्वहूनां वा पदानां विमक्तयो. लुसा भवन्ति, ततश्च सन्धिना सम्मिलिताः शब्दाः पूर्वपदापेक्षयाऽल्पाकाग भवन्ति इत्यन्वयं संज्ञा विद्यते । उदाहरणं यथा-देशस्य भक्त:- देशभक्त इति लौकिक विग्रहे, देश म्स भक्त सु इत्यगकिक-विग्रहे 'षष्ठी' इति सूत्रेण तत्पुरुषसमासे पाठयाः प्रथमायाश्च विभकेलु कि केवलं 'देशभक्त' इत्येकः शब्दरमजायते । तस्य च समासस्वात्प्रातिपदिकसंज्ञायाम् स्वाद्युत्पत्तौ देशभक्तः देशमत्तौ, देशभक्ता समासप्रकरणम्। - .. इत्यादीनि रामवद् रूपाणि जायन्ते । समासशक्तथा च देश-सम्बन्धी भक्त इत्यर्थो जायते । एवमेव बहूनां पदानां मिश्रणेन माद्दी पदम् निर्मातुं शक्यते यथा निर्भीकश्वासौ देशभक्तः इत्यत्र कर्मधारय समासं कृत्वा उभयोः शब्दयो. विभक्त्योलु कि शब्दमात्रसम्मेलने निर्भीक देशभक्त' इत्येकशब्दस्य समासत्वात् प्रातिपदिक-संज्ञायाम् स्वाद्युत्पत्ती निर्भीकदेशभक्तः, निर्भीकदेशभक्ती, इत्यादीनि रामवत् शब्दरूपाणि शेयानि, पुनश्च निकदेशभक्ते श्रद्धा निर्भीकदेशभक्त. श्रद्धा, इत्येवं महान् दी कारः शब्दस्समासोपरि समासं कुर्वता निर्मातुं शक्यते । इत्यस्मादेव हेतोः समासबहुलतया संस्कृते काठिन्यमायाति । कादम्बरीमन्ये सम्यक समाविन्यासो विद्यते । समासादिषु अर्यविवोधनार्थ: पदविवरणात्मना पदानां पृथक् पृथक् उपन्या विधीयते स एव विग्रहः कथ्यते । यया देशभक्त देशस्य भक्तः, इति विग्रहः पूर्वमुक्तः । तपाचोक्तम् । (वृत्याव- मोधकं वास्य' विग्रहः) समासमेदेन समासविग्रहस्यापि मेदो विद्यते तत्र ससासस्य साधारणतया षड् भेदाः सन्ति | तथादि- [१] अन्यपीमावः, [:] वत्पुरुषः (३) द्विगुः (४) कर्मधारया [५] द्वन्द्वः (६) बहुव्रीहिश्चेति तत्र चतुरामेव प्राधान्यम् । प्रायश्चत्वार एव समासाः तत्पुरुष-फर्मधारय दन्द्व-बहुव्रीहयो बाहुल्येन संस्कृतवाक्येषु प्रयुका उपलभ्यन्ते इति त एवात्र विशेषेण स्फुटीकृता भविष्यन्ति । समासविषयकमेकं प्राचीन पयं विद्यते। द्वन्द्वो द्विगुरपि चाहे मद्गेहे नित्यमन्ययीभावः । वत्पुरुप कर्मधारय येनार स्याम्बहुव्रीहिः ।। शन्दे एव, पणिनीयप्रबोधे अत्र षण्णामपि समासानां नामानि सन्ति । चतुर्णा समासानाम् विग्रह प्रदर्शनार्यमप्येकं पद्यं विद्यते । चकारबहुलो द्वंद्वः स चासौ कर्मधारयः । यस्य येणं बहुव्रीहिः शेषस्तत्पुरुषो मतः ॥ यत्र 'च' शब्दस्य बाहुल्येन प्रयोगो भवति स द्वन्द्व समास विग्रहो शेयः । यत्र 'सचासौ' इत्येवं कथनं स्यात् स कर्मधारय समास-विग्रहो बोध्यः । यत्र यस्य, यस्मिन् इत्यादि पदानां प्रयोग: स्यात् स बहुप्रीहि-विग्रहो मन्तव्यः । यत्र पूर्व- पदं द्वितीयादिविभत्त्क्यन्तमुत्तरपदश्च प्रथमान्तमिति स शेषः तत्पुरुषः-तथाहि रामश्च कृष्णश्च == रामकृष्णो द्वन्द्वः। चतुरश्चासौ छात्रः-चतरच्छात्रः कर्मधारयः प्रियो देशो यस्य = स: प्रियदेशः नेता बहूबीहिः । वेदस्य अध्ययनम् = वेदाध्ययनम् तत्पुरुषः । एतेषां समासानां द्रागववोधाय सरलोपायोऽयमस्ति । तथाहि यंत्र पूर्वपद प्रधानं सोऽव्ययीभावः यथा उपकुम्भं । यत्रोत्तरपदम् प्रधानम् स तत्पुरुषः यथा राज- पुत्रः । स एव विशेषण विशेष्यात्मकः मन् विशेष्यप्रधानः कर्मधारयः यथा चतु. रच्छात्र: । यत्रोभयं पर प्रधानम् स द्वन्द्वः यथा शिवकेशवो। यत्र समस्त पदादन्यत् पदं प्रधानम् स बहुव्रीहिः यथा प्रियपुत्रः । इत्येव संक्षेपतः समासविधि निरूपित: । सम्प्रति विशेषेण निरुप्यन्ते ते समासाः पृथक् । अग्यो भावः। अनव्ययम् अव्ययं सम्पद्यते इत्यव्ययीभावः । यद्धि पदं समासात् पूर्वन्तु अध्यपन्नास्ति को समासे तु अध्ययं नायते तद्वि अव्ययी भाव-समास-पदं कथ्यते । इत्पन्वर्ययं संज्ञा । अत्र समास-विग्रहे एकं पदं प्रायम अन्वयम्भवति । द्वितीयं पदं न तद्व्यतिरिक्तमेव भवति । परन्तु समासे फते अव्ययीभावप्रकरणम् । समस्तं सर्वमेव पदमव्ययम् भवति तदीयं स्वरूपंच नपुंसकलिनस्य प्रथमैकवचनान्त पदवदेव सम्पद्यते। तादृशं रूपं सर्वास्वपि विमतिषु भवति । यया गृहस्य समीपम् उररहम्, अत्र समीपार्थन उपेत्पव्ययेन गृहत्येति पदस्य समासे, विभक लुकि 'उपगृहेति' समस्तपदस्य अल्पयत्वम् अन्य. यार्थप्राधान्यादेकवचनं च जायते । ततश्च स्वादिविभक्तीनाममादेशे पुन: क्लीव. लिङ्गस्य शानशब्दस्य प्रथमैकवचनान्तं ज्ञानम् इति यथारूपं भवति । तथैवास्य 'उपगृहम् ' इत्येव रुपम् सर्वास्वेव विभतिषु जायते । केवलं अदन्तशन्दानाम् पञ्चम्याम् नित्यम् तृतीया-सप्तम्योर्विकल्पेनततद्विभक्तिकार्याणि नायन्ते । यथा उपगृहम् उपगृहेण, उपहम् उपगृहातू, उपदम् उपगृहे इति । ईशान्येव सर्वे. षामपि अदन्ताव्ययीभाव धन्दानां रूपाणि भवन्ति । इकारान्तादिशब्दानान्तु न कापि- . विकारो बायते । प्रधानतया विभक्तिप्रभृत्यर्थेष्वव्यययीभावः समारो नायते । यथा च'अघिहरि' इत्यत्र हरौ इति अधिहरि इति लौकिके अस्व-पद-विग्रहे हरि हि अघि सु इत्यज्ञौकिके स्वादविग्रहे अव्यय विभकिमीपसमृद्धचर्या भावात्ययासम्प्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथानुपूर्वयोगपद्यमादृश्यसम्प्रतिसा. कल्यान्तवचनेषु (२।१६।) (सहमपातुप्यमस्यते) इत्यनेन सप्तमीविभक्य वर्तमान- स्य'अधि' इत्यन्यपस्य हरिशन्देन महसमासे ततश्च प्रथमानिर्दिष्टं समाय- उपसर्जनम्।।२।१३ इत्यनेन समासूत्रेग 'अव्ययम्' इत्यादी प्रपमानिर्दिष्टस्य 'अघि- 'इत्यस्य उपसर्जन समायाम् उपसर्जनम् पूर्वम् २१.१३०६ति तस्य पूर्वनिपाते "सुपो धातुपातिरदिकयोः" इति प्रपोलुकि 'अभिहरि' इत्यस्य समासत्वात् मातिपदिकसंशपाम् स्वाद्युत्पचौ अध्ययीभावश्च, इवि अवयवात् सपो लुमि ७४ पाणिनीयप्रबोधे .. ૨ 'अधिहरि इत्येवम् सार्वविभक्तिक रूपम् । समीपाय-गुरोः समीपे = उपगुरु इति अस्वपदलौकिकविहे गुरु+ ङस उप+सु. इत्यलौकिकस्वपद विग्रहे "अव्ययं विमति" इत्यादिना समासे उपसर्जनसंज्ञायाम् .. पूर्वनिपाते सुपो लुकि उपगुरु इत्यादि । एवं सर्वेऽपि इकारान्तोकारान्ता अव्ययीभाव समासगा: शब्दा शेया: । कृष्णस्य समीपम् = उपकृष्णम् इति लौकिके अस्वपदविग्रहै कृष्ण + ङस उप+ सु इत्यलौकिके स्वपदविग्रहे समीपायें उपत्यव्ययस्य कृष्णेन सह समासे ततः समासकृत्ये च कृते उपकृष्ण इत्यस्य प्रातिपदिकत्वात्सौ विभक्तौ समागतायाम् उपकृष्ण+सु इत्यवस्थायाम् अव्ययत्वात् सुपो लुकि प्राप्ते नाध्ययीभावादतोऽस्त्वपञ्चभ्याः ।४ । ८३ (सुपोलुक) इति सोः श्रमादेशे अमि पूर्व इति पूर्वरूपे 'उपकृष्णम् तृतीयासतम्योस्तु तृतीयासप्तम्योहुलम् २ । ४ । ८४ ( अव्ययीभावातू अतोऽम्) इति बाहुल के अमि उपकृष्णम् । पक्षे उभयत्र उपकृष्णेन, उपकृष्णे इति । पञ्चम्यास्तु नित्यं विभक्तिकार्य उपकृष्णात् (द्) इति . ज्ञानशब्दबद्रूपम् द्विवचन बहुबचने तु न स्तः समीपार्थप्राधान्येन एकत्वार्थस्यौत्सर्गिकत्वात् । मक्षिकाणाम्- अभावो निर्मक्षिकम् इति लौकिके अस्वपद-विग्रहे मक्षिका+श्राम निर+सु इत्यलौकिके. स्वपदविग्रहे समासादिकायें. निर्मक्षिका इत्यत्र । 'मसिका' इत्येतन्मात्रस्य एकविभक्ति चापूर्वनिपाते ११२ । ४४ ( उपसर्जनम् ) इत्यु पसर्जनसंज्ञायाम गोत्रिपोरुपसर्जनस्य १।२। ४८ (हस्त्रः ) इति मक्षिकाकारस्य इस्वे निमक्षिकशन्दस्य प्रातिपदिक त्वात्सौ अमादेशे निर्मक्षिकम् अव्ययीभावप्रकरणम् । इत्यादि उपकृष्णवद्रूपाणि । विष्णोः पश्चात् अनुविष्णु इति लौकिकात्वपद विद्महे विष्णु + ङस् अनु+सू इत्यलौकिकस्वपदविग्रहे पश्चादथें अनु- इत्यव्यपत्य विष्णुशब्देन समासे समासादिकायें अनुविष्णु इति सार्वविभक्तिकं रूपम् । ( योग्यतावीप्सापदार्गनतिवृत्तिसादृश्यानि यथार्थाः) तत्र योग्यतायें रूपस्य योग्यम् अनुरूपम् । पदार्यानतिवृत्तिरूपेऽशक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति । वीप्साथै गृहं गृहं प्रति प्रतियहम् । शरटः समीपम् उपशरदम् इति लौकिकेऽस्वपदविग्रहे शरद् +डस् उप+ =इत्यलौकिके स्वपदविमहे समानादिकाय उपशरद् इति जाते अव्ययीभावेशरप्रभृतिभ्यः ५।४।१० (टच्) इति टचि अनुबन्धलोपे दकारस्य स्वरसंयोगे उपशरद इत्यस्य समासत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञायां स्वाद्युत्पत्तौ 'उपशरदम्' इत्यादि । राज्ञः समीपम् उपराजम् इतिलौकिकास्वपदविग्रहे राजन+हुत उप+सु इत्यलौकिके विग्रहे समादि- कार्ये उपराजन् इत्यतः अनश्च ५।।। १०८ (अव्ययीभाव इच् ) इति टवि- नस्तद्धिते ६ । ४ । १४४ (मस्य टेलोपः) इति टिलोपे उपराज इत्यस्य प्रातिपदिकत्वात् सौ तस्यामादेशे उपराजम् इत्यादि । समिधः समीपम् इति लौकि- केऽस्वपदविग्रहे समिध+इस+उप४ सु इत्यलौकिके स्वपदविमदे समामादि- काय उपसमिष इत्यतः झयः ५।४। १११ (अव्ययीभावाटच) इति टचि अनुबन्धलोपे स्वरसंयोगे उपसमिध इत्याय प्रातिपदिकत्वात् स्वाद तस्यामि उपसमिमित्यादि।

पाणिनीयप्रबोधे .. तन्पुरुष-समास: तत्पुरुषशब्दो हि ईडग विद्यते यस्य समासविग्रहेणैव तत्पुरुषसमासीय विग्रहस्य मनाक् प्रतीतिर्जायते । तथाहि तस्य पुरुषः तत्पुरुष इत्येवं यत्र षष्ठी तत्पुरुष-समासो भवति अथवा स चासौ पुरुषस्तत्पुरुष इत्येवं कर्मधारयसमासो भवति । अनेन समासद्यसाधकविग्रह करणेनेदमेव सूच्यते यदेवमेवास्मिन् तत्पुरुषसमासे विग्रहः करणीयो भवति । यथा अस्मिन् तत्पुरुशन्दे एको विग्रह ईदृशः क्रियते यत्र पूर्वपदे प्रथमवित रतिरिक्ता काचनान्या षष्ठी विभक्तिर्वि. यते । एवमेव सर्वस्मिन्नपि तत्पुरुषसमासे एको विग्रह एवं करणीयो यत्र पूर्वपदे प्रथमातिरिक्ता द्वितीयादिविभक्ति: स्यात् । सहि व्यधिकरण तत्पुरूष. शब्देनोच्यते । वमेव केचित् द्वितीयातत्पुरुषः तृतीयातत्पुरुष इत्यादि संशयापि कथयन्ति । द्वितीयश्च तत्पुरुष-समास-विग्रह ईदृश: क्रियते यत्रोभयस्मिन्नपि पदे समानैव प्रथमा विभक्तिदृश्यते ।. तथोश्च विशेषणविशेष्यभावोऽपि तिष्ठति इति । इत्थं हि यत्र समास-विप्रहे समान-विभक्तिको मिशेषण-विशेष्यभाववोधको विग्रहो भवति तत्र समानाधिकरण तत्पुरुष-समासो शेयः स हि 'कर्मधारयः इति संशामपि लभते । तत्रैव यदि पूर्वपदे संख्यावाचिनः शब्दा भवन्ति तदा तस्य 'द्विगु' रिति नाम भवति । यया सप्त च ते ऋषयः-सप्तर्षयः अत्र हि समासः संख्यापूर्वतया कर्मधारय इति संज्ञामलब्ध्वा द्विगुरित्ति संा लभते । इत्यं हि स एव समानाधिकरणतत्पुरुषो 'नम्' शब्दप्रयोगे ना तत्पुरुष नाम्ना शायते । यथा-न ब्राह्मण:-अबाह्मण इत्येवमादि तत्रसमासविग्रहो जायते । एवम् 'तत्पुरुषप्रकरणम् । २ सर्वेषामपि उदाहरणान्यग्रे स्फुटीभविष्यन्ति । तत्पुरुषः १२२ (अधिकारोऽयं 'शेषों वहुवीहिः' इत्यतः प्राक् = कृष्ण श्रितः = कृणश्रित इतिलौकिके विग्रहे कृष्ण अम् श्रित तु इत्यलौकिके विग्रहै द्वितीयाश्रितातोतरतितगतात्यस्तप्राप्तापन्न । २।१।२४ इतिसमासे सुपो लुकि द्वितीयान्तस्य कृष्णशब्दस्योपसर्जनसंज्ञायाम् पूर्वनिपाते कृष्णश्रित इत्यस्य समासत्वात् प्रातिपदिक-संज्ञायाम् स्वाद्युत्सत्तौ कृष्णश्रितः इत्यादि रामवत् ।। हरिणा बात: हरित्रातः इति लौकिकविग्रहे हरि टा त्रात सु इत्यलौकिक विग्रहे कर्तृ करणे कृता बहुलम् २१११३२ तृतीया समस्यते ) इति समासे सुपो लुकि समासत्पात्प्रातिपदिफसंशायाम् स्वायुत्पत्ती हरित्रात इत्यादि । एवम् यूपाय दारु इति-विग्रहे चतुर्थातदर्थार्थवलिहितसुख रक्षितैः ॥११३६ ( सुर सुपा समस्यते ) इति प्रकृतिविकृतिभावार्यकेन तदर्थेन दारुणा समासे तत्काये च कृते प्रातिपदिकत्वात्सुपि नपुसकत्वात् तल्लु कि यूप- दारु । (अर्थेन नित्य समासों विशेष्यलिङ्गता चेति वक्तव्यम् ) द्विनाय अयं दिनार्यः सूपः । द्विजार्या यवागूः । द्विजार्य पयः । भूतवलिः । जनहितम् । आत्मसुखम् । वालरक्षितम् । इत्यादि । युद्धात् भयम् इति विग्रह पञ्चमी भयेन १२।११३७ ( सुप सुपा समस्यते ) इति समासे तत्कायें प्रातिपदिककाय च युद्धभयमित्यादि । पष्ठी २।२।८ (सुप सुपा समस्यते ) राजपुरुषः विद्यालयः वेदाध्ययनमित्यादि । सप्तमी शौण्डः २।११४० (सुप् सुपा समस्यते ) अचशौण्डः तर्कचतुरः, न्यायनिपुणः, व्याकरणावाग्मी । अत्र सर्वत्रैव सुत्रे पु द्वितीयादिपदानां योगविभागात् यथायोग्यं सर्वैरेव सुवातै द्वितीयादि सुबन्तानाम् समासो शेयः यथा खट्वामारुढः खटवारुट इत्यादि । २ , ७८ पाणिनीयप्रबोधे कर्मधारयः कर्मधारय-समासो हि तत्पुरुषस्यैवैको भेदोऽस्ति । यत्र विशेष्यविशेषण भावः प्रधानतया भवति तत्र व कर्मधारय समासो जायते । अत्यैव समानाधिकरण तत्पुरुष इत्यपि नामान्तरं विद्यते । अस्य समासस्य विग्रहवाक्ये उभय पदयोर्मध्ये विशेष्यानुसारेण तच्छदस्यादश्शब्दस्य वा रूपस्योल्लेखो जायते यथा वीरश्चासौ राम: वीररामः । रक्ता चासौ लता रक्तलता । नीलञ्च तदुत्पलम् नीलो. स्पलंम् इत्यादि। द्विवचनबहुवचनयोरपि सलिङ्गेषु लिङ्गानुसारेण विग्रहवाक्यं प्रयोज्यम् । तथाहि वालश्चासौ कृष्णः चालकृष्णः इति लौकिकविग्रहे वाल सु कृष्ण सु इत्यलौकिके विग्रहे विशेषण विशेष्येण वहुलम् ।।१५७ (सुप्पा समस्यते ) इति समासे तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः ।।२।४२ इति कर्मधारय-संज्ञायाम् सुपो लुकि समासतया प्रातिपदिकत्वात्सुपि बालकृष्णः इत्यादि । रक्ता चासौ लता रक्तलता इति लौफिकविग्रहे रक्ता सु-लता सु इत्यलो. किकविग्रहे समासे सुपो लुकि रक्तालता इति बाते तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारय इति कर्मधारयज्ञायाम् पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु ६।३।४१ (अनूङ त्रियां भांषितपुस्कात् ) इतिरक्तायाः पुंवद्भावे रक्तळतेत्यादि । एवम् -नीलञ्च तदुत्पलम् --नीलोत्पलम् इत्यादि ज्ञयम् । सर्वेषामप्येषां द्विवचनादौ तु वालौ च तौ कृष्णौ बालकृष्णी, वालाध ते कृष्णाः बालकृष्णाः । रक्त च ते लदे रक्तलते, रक्ताश्च ताः लताः रक्तलताः । नीले च ते उत्पले नीलोत्पले, नीलानि च तानि उत्पलानि नीलोत्पलानीत्यादीनि विग्रह. ।

कर्मधारयप्रकरणम् । ७९ .. २ पाक्यानि श यानि । घन इव श्याम:=घनश्यामः, इति लौकि विग्रहे । धन सु-श्याम सु इत्यलौकिकविग्रहे उपमानानि सामान्यवचनैः २।१।५५ (सह समस्यन्ते ) इति समासे सुपो लुकि समाससूत्रे प्रथमानिर्दिष्टस्य धन इत्युपमानस्य उपसर्जनतया पूर्वनिपाते घनश्याम इत्यस्य समासत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञायाम् स्वाद्युत्पची घनश्याम इत्यादि । नर: सिंह इव इति लौकिके नर सु सिंह सु इत्सलौकिके विग्रहे उसमितं व्याघ्रादिभिः सामान्या. प्रयोगे २।१।५६ ( सह समस्यते ) इति समासे सुपो लुकि उपमेयस्य प्रथमा निर्दिष्टस्योपसर्जनसंवायाम् पूर्वनिपाते नरसिंह इत्यस्य समासत्वात् प्रातिपदिकतया सुपि नरसिंहः । एवम् पुरुषव्याघ्रः । नरपुङ्गवः,पुरुषर्षभः, इत्यादि । अयमुपमित समामो द्विघा दृश्यते, उपमामूलको रूपकमूलकश्चेति तत्र रूपकमूलको यथा-मुखमेव चन्द्रः मुखचन्द्रः प्रकाशते । धनमेव वलम् धनवलं मदयति । राहुरेव ग्रहा-राहुग्रहश्चन्द्रमाच्छादयति इत्यादि उपमामूलकस्तु नरसिंहादावुक्त एव । मुखं चन्द्र इव इत्यादावपि स शेयः । सप्त च ते ऋषयः सप्तर्षयः इति लौकिकविरहे सम जस प्रषि बस् इत्यलौकिक विगहे दिक् संख्ये संज्ञायाम् ( समस्येते मुवन्ते सुपा सह) इति समासे सुपो लुकि सन्धी सप्तर्षि इत्यस्य प्रातिपदिकत्वाजसि सप्तर्षयः, इति । पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवम् इति लौकिके विग्रहे पञ्च श्राम गो पाम् इत्यलौकिके विग्रहे तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च २ ॥१५१ (सुबन्ते सुर्वन्तेन सह दिक संख्य समस्येते ) इति समासे सुपो लुकि पञ्चगो इत्यस्मात् गोरतद्धितलाक ६० पाणिनीयप्रबोधे २ २ २ 3 . ५।४। ९२ (टच तत्पुरुषात् ) इति टचि अनुबन्धलोपे अवादेशे पञ्चगव इत्यत्र समासस्य संख्यापूर्वी द्विगुः २ ॥१५॥इति द्विगु संज्ञायाम् स न पुंसकम् २।४ । १७ इति नपुंसक संज्ञायाम् द्विगुरेकवचनम् २ । ४।१ इति एकवद्भावे प्रातिपदिकात्सो तस्यामि पूर्वरूपे पञ्चगवम् इति सिध्यति । (अकारान्तोत्तरपदो द्विगुः स्त्रियामिष्टः ) त्रिलोकी त्रिलिङ्गी त्रिफलेत्यादि (पात्राद्यन्तस्य न) पञ्चपात्रम् , त्रिभुवनमित्यादि, । कुत्सितः पुरुषः कुपुरुषः इति लौकिके-कु सु-पुरुष सु इत्यलौकिके विप्रहै कुगतिप्रादयः २ । २ । १८ (समस्यन्तै सुपा) इति समासे विभक्त लुकि कुपुरुष इत्यस्य प्रातिपदिकत्वात्सौ कुपुरूषः । निश्चयेन चित्वा इति निश्चित्य इति विग्रहे कुगति प्रादयः समासे समासेऽनपूर्वा क्वो ल्यप् ७ । १ । ३७ हति क्त्वा प्रत्ययस्य ल्यवादेशे अनुवन्धलोपे निश्चित्य इत्यस्य प्रातिपादिकत्वात् सौ तस्य अन्ययत्वाल्लुकि निश्चित्य इति साधु । एवं सञ्चित्य । सग्य । संस्कृत्यादि मालामतिकान्ता अतिमाल इति लौकिके विग्रहे माला अम् अति सु इत्यलौकिके विग्रहे (अत्यादयः कान्ताद्यये, द्वितीयया) इति वार्तिकबलात् 'कुगतिपादयः' इति समासे विभक्त लुकि 'अति' इत्यस्योपसर्जनतया पूर्वनिपाते अतिमाला इति जाते तत्र 'माला' इत्यस्य, 'एक विभक्ति चापूर्व निपाते' इति उपसर्जन संज्ञायाम् 'गोलियो रुपसर्जनस्य' इति हरवे अतिमाल इत्यस्मात् प्रातिपदि कत्तया सुपि रुत्वादिकार्थे अतिमालः इत्यादि रामवद्रूपम् । शोमनश्चासौ राजा सुराजा इति लौकिके ! सु राजन् सु इत्यलौकिके विग्रहे प्रादिसमासे तत्पुरुपप्रकरणम् । ८१ 3 १ सुपो लुकि सुराजन् इत्यतः राजाहसखिभ्यष्टच् ५ । ४ । ९१ (समासान्तः ) इति प्राप्तस्य टचः न पूजनात् ५।४।६९ ( समासान्तः ) इति निषेधे सुरा. जन् शब्दश्य प्रातिपदिकतया सौ उपधादीधैं सुलोपे नलोपे च सुराना इत्यादि एवम् अतिराजा ( स्वतिभ्यामेव, इत्यतश्च ) महान् चासो राजा महाराजः इति लौकिके महत् सु राजन् सु इत्यलौकिके विग्रहे विशेषणसमासे सुपो लुकि महत् राजन् इति स्थिते आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः ६।३।४६ इति तकारस्याकारे द घे महाराजन्, इत्यतः टचि टिलोपादिकार्ये स्वाद्य पत्तौ रामवद् रूपसिद्धिः। एवम् महती चासौ नवमी महानवमी महाराजी इत्यादि । अन्यत्र महतो वंशः महदंशः, महता कृतम् महत्कृतम् इत्यादि विवुधानां सखा विबुधसखः कृष्णसखः, इत्यत्र 'राजाहसखिभ्यष्टच्' इति टचि राम- वद्रपाणि । न ब्राह्मणः ब्राह्मणः इति विग्रहे न २ १२॥ ६ (सुपा सह समस्यते ) इति समासे विभक्त लुकि न लोपो नमः । । । ३ । ७३ इति नसोपे अबाह्मण इत्यस्य समामतया प्रातिपदिकत्वात्सुपि रुत्वादिकाये अबामणः इत्यादि । न अश्वः अनश्वः इति विग्रहे नञ्तमासे सुपो लुकि न लीपे ष अश्व इति जाते तस्म न्नडचि ६३७४ इति नुटि अनुबन्धलोपे स्वासंयोगे अनश्व इत्यस्मात् प्रातिपदिकत्वात् सुपि अनश्वः इत्यादि एवम् अनीशः, अनर्थ्य, अनर्हः, इत्यादि । इति तत्पुरुषः । ६ २१ पाणिनीयप्रबोधे अथ बहुव्रीहिः- अयं . समासोऽप्यन्यसमासवत्स्वशन्दविग्रहेणैवस्वार्थवोधकतया अन्वर्ग- संशकोऽस्ति । तपादि बहुः ब्रीहिर्यस्य स बहुव्रीहिः इति शब्देऽन्यपदार्थप्रधान तश अस्मिन् समासे समासस्योभयपदव्यतिरिक्तमन्यदेव पदं प्राधान्यम् ममते । समासश्या समानाधिकरणतत्पुरुष-( कर्मधारय-) पत् विशेषणविशेष्य- पदरेष भवति । परम्तूमयोमध्ये इयान् भेदो विद्यते यदन बहुनीहिसमासे जाते उभयमपि पदं मिलित्वा एकशब्दीभूय अन्यस्य विशेषयं भवति । यथा रामः ईश्वरः यस्य सः रामेश्वरः(शिवः) अत्र राम इति विशेषणम् पर इति विशेष्यम् समासे माते एकमन्दीभूध पुनः शिवस्प विशेषणं भवति । कर्मपारपे तु नै भ. बति तस तु समासे नाते समस्तं पदं विशेष्यरूपमेन तिष्ठति । यथा-रामधासो ईश्वरः रामेश्वर इति । मह हि रामस्य ईश्वर इति विप्ररे तत्तुरूपोऽपि भवति । उक्त "रामस्तत्पुरुषं माह बहुव्रीहिं शिवोऽनधीत् । रामेश्वर परे कमिकर्मधारक- मुसमान्" इति । इत्थंदि सर्वत्रैव समस्तपदेषु विप्रहभेदेन समासभेदो शेयः । यभा होक: नामः यस्य स लोकमाषः (बहुव्रीहिः) लोकस्य नाव: लोकनाव: (तत्पुरुषः) इस्पादिशु विग्रहवाक्यैन बहुव्रीहि-तत्पुरुषयोभदो शेयः । ममापि विष प्राचीनं पधमे विद्यते । तथाहि "महवरखा राजेन्द्र! लोकनाथामावपि। बहुनीदिर रामन् षष्ठीतत्पुरुषो भवान्" इति । बहुनी हेरपि भेदद्यं विद्यसे एक समानाभिकर याबहुमीहिः। द्वितीयो ब्यधिकरणबहुगी हिश्चेति । पचा नीकम् अम्मरं यस्य स नीलाम्बरः। श्रमोमयमपि पदं प्रथमान्तमेवास्तीति समानाधिकरबों पहुव्रीहिप्रकरणम् । - 3 ४ यहुरीहि निगद्यते । चन्द्रः शेखरे यस्य स चन्द्रशेखरः इत्पनैकं प्रथमान्तं द्वितीयञ्च सप्तम्यन्तमिति व्यधिकरणो बहुव्रीहिनिगद्यते। एवं मृगस्य नयने इव नयने यस्याःसा मृगनयनी वाला इत्यादिषु बहुव्रीहिर्बोध्य: । शेपो बहुव्रीहिः २ २३ (अधिकारः) प्राप्तम् उदकं यं स प्रासोदको माम:, इति लौकिके विग्रहे प्राप्त सु उदक सु इत्यलौकिके विग्रहे अनेकमन्यपदार्थे ।२।६४ ( सुप् सुपा सह समस्य- मानो वहुव्रीहिः) इति समासे जाते सुपो लुकि सप्तमी-विशेषणे वहुव्रीहो२।२।३५ ( पूर्यम् ) इति विशेषणस्य पूर्वनिपाते सन्धिकाय्य समासत्वात् प्रातिपदिक संज्ञायाम् स्याद्युत्पत्ती प्राप्तोदकः, स्त्रीलिङ्गे प्राप्तोदका इत्यादि रूपम् विशेष्यानुसार शेवम् । एमम् ऊदो रभो येन स ऊढरथोऽनड्वान् इत्यादि । उपहृतः पुरस्कारः यस्मै स उपहतपुरस्कारः (परीक्षोतीर्णः छात्र: ) उद्धृत श्रोदनो यस्याः सोद्धृतोदना उषा । पीतम् अम्बरम् यस्य स पीताम्बरो हरिः इत्यादि शेयम् । वीरः पुरुषो मस्मिन् स बीरपुरुषक: ग्रामः इति लौकिकविग्रह-वीर सु पुरुष सु इत्यलौकिये विप्रहे छमासे सुपो लुकि वीरपुरुष इत्यस्मात् शेषाद्विभाषा ५।४।१५४ ( बानी- हो का ) इति कप्प्रत्यये पकारस्येत्संशालोपे समासत्वात् प्रातिपदिकमंज्ञायाम् माथुत्पत्तौ मीरपुरुषक: । कण्ठे कालो यस्य सः कण्ठेकालः ( शिवः) इति- लोषिके मिप्रहे समासे सुपो लुफि प्राप्त हळदन्तात्सप्तग्योः संज्ञायाम् ।। हत्तरपदे ) इति सप्तम्या प्रलुकि कण्ठेकालशन्दात् प्रातिपदिकतमा स्वाधुत्पत्तौ कण्ठेकाम इत्यादि । चित्रा गायों यस्य स चित्रगुः इति लौकिके विप्रहे । चित्रा मस् इत्यलौकिके विग्रहे समासे सुपो लकि 3 3 नस् पाणिनीयप्रबोधे इति सहस्य स्त्रियापुंवद्भाषितपुंस्कादन समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु ६।३।३४ इति पूर्वपदस्य पुबद्भावे गोशब्दस्य गोस्त्रियोरिति ह्रस्वे चित्रगुशब्दात् स्वाद्युत्पत्ती चित्रगुरित्यादि भानुवद्रपम् । पूर्व कृतं येन सः कृतपूर्वः इति चौकिकविग्रहे पूर्व सु कृत सु इत्यलौकिकविग्रहे समासे सुपो लुकि निष्ठा २०३६। ( बहुब्रोहौ पूर्वम् ) इति कृतशब्दस्य पूर्वनिपाते कृतपूर्वशब्दात् सौ रूप. सिद्धिः । सीतया सह ससीत इति विग्रहै तेन सहेति तुल्ययोगे २।२।२८ ( बहुबीहिः) इति समासे सुपो लुकि सत्यस्योपसर्जनतया पूर्वनिपाते सहसीता इत्यत्र चोपसर्जनस्य ६३।०२। (सहस्य सः) सादेशे सीताफारस्य गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य' इति हस्वेससीत इत्यस्मात् स्वाद्युत्पत्ती ससीतः इत्यादि । केशेषु केशेषु गृहीत्वा स्थितयोः इदं युदं प्रवृशम् इति लौकिके विग्रहे केश सु केश सु इत्यलौकिकविग्रहे तत्र तेनेदमिति सरूपे २।२ । २७ (बहुव्रीहिः) इति समासे सुपो लुकि केश-केश इत्यत्र अन्येषामपि दृश्यते ६।३ । १३७ (दीर्घः उत्तरपदे) इति पूर्वकेशा- काय दीवे केशाकेश इत्यस्मात् इच् कर्मव्यतिहारे ५। ४ । १२७ इति इचि यस्येति चेति अकारलोपे केशाकेशि इत्यत्र इच् प्रत्ययस्य तिष्ठद्गुप्रभृतीनि- च २।१।१७ (एतानि निपात्यन्ते) इति तिष्ठद्गुप्रभृतिषु पाठात् अव्ययीभावत्वनिपातनेन अव्ययत्वे च कृते प्रातिपदिकतया स्वाद्युत्पत्तौ तस्य अध्य- यत्वाद् लुकि केशाकेशि । एवम् दण्डैश्च दण्डैश्च प्रहत्य स्थितयोः इदं युद्धं प्रवृत्तमिति विग्रहे दण्टादण्डि । मुसलामुसलि । इत्यादि द्वौ वा त्रयो द्वन्द्वप्रकरणम् । - वा द्विधाः इति लौकिकविग्रहै वि श्री त्रि जस इत्यलौकिक वाहे संख्ययाऽव्ययासन्नादूराधिक-संख्याः संख्येये २ । २ । २५ ( समस्यन्ने ) इति समासे सुपो लुकि द्वित्रि इत्यत्र बहुव्रीहौ संख्येये डजबहुगणात ५। ४ । ७३ । इति डचि डित्वाहिलोपे द्वित्र इत्यस्मात् स्वायु त्पत्तौ द्वित्रा इत्यादि । एवं पञ्चषाः, उपपञ्चा:, अधिकषोडशाः, इत्यादि । अथ द्वन्द्वः- द्वे द्वे इति द्वन्द्वम् इति विग्रहेण सिद्धोऽयं द्वन्द्वशः: सार्थक एव। यतो ह्यत्र उमयोरपि दुन्दुस्यपदयोंः प्राधान्यं तिष्ठति । अस्य त्रयो भेदा भवन्ति- १ इतरेतरयोगः, २ समाहारः, ३ एकशेषश्च ति, तत्र एकशेषस्येतरेतर योग एवान्तर्भावात्णधान्येन द्वौ .एवं भेदी शास्त्रे गृह्यते । अस्य समास स्याप्यन्वर्थतया अत्र येष| पदानां समासो भवति तानि सर्वाण्यपि प्रथमान्तान्येव भवन्ति । विग्रहवाश्ये तु मध्ये मध्ये च शब्दस्य प्रयोगो वाहुल्येन जायते । समस्ते पदे चकार तिर्न बायते, विग्रहगतान्यन्यानि पदानि निर्विभक्तिकानि भूत्वा एकशब्दीभूय तिष्ठन्ति। तत्रेतरेतरयोगे उत्तरपदानुरूपं लिङ्ग शेयम् । शब्दद्वये द्विववचनम्, शन्दवाहुल्ये बहुवचन मिति । समाहारे तु एकवचनम् नपुंसकञ्च जायते । एकशेपे तु मासे जाते एक एव शब्दोऽवशिष्यतेऽन्यस्य तु लोप एव भवति । समास प्रकारो यथा-रामश्च कृष्णश्च रामकृष्णौ इति लौकिकविग्रहे राम सु कृष्ण सु इत्यलौकिकविग्रहे चार्थे द्वन्दः २।२।२९ इति इतरेतरयोग समासे सुपो लुकि रामकृष्ण इति रिपती परवल्लिज इन्द्वतःपुरुषयोः रा.

5 पाणिनीयप्रबोधे ।२६-इति परवल्लिो पुल्लिङ्ग प्रातिपदिकत्वाद् द्विषविषक्षायाम् मौविभक्तो वृद्धौ रामकृष्णौ। जाया च, पतिश्चेति विमहे समासे सुपो लुकि (नानाशन्दस्य जम्भावो दम्भावश्च वा वक्तव्यः) इतिषार्तिकात् बापाशब्द. व वैकल्पिके जम्भावे दम्भावे च कृते प्रातिपदिकत्वात् द्विवचने औ विभक्ती विभक्तिकार्ये जम्पती, दम्पती पक्षे जायापती इत्यादि । हरिब हराचेति विप्रहे समासे सुपो लुकि द्वन्द्वे घि ६।२।३२ (पूर्वम् ) -इति हरिचन्दश्य पूर्वनिपाते हरिहर इत्यस्मात् प्रातिपदिकत्वात्मुषि हरिहरावित्वादि । पपलदिराः । कुक्कुटश्च मयूरी व कुक्कुटमयूर्यो इमे, मयूरीकुक गरिमौ बा। बारारम्भ निन्द्राच भयश्च मैथुनञ्च तेषां समाहर आहारनिद्रामय मानम् इति विग्रहेण समाहारद्वन्द सुपो लुकि 'स नपुसंकम्' इति नपुंके समाहारत्वात्स्वाभाविके एकत्वे स्वाद्युत्पत्ती एकवचनरूपाणि । पाणी च तयोः समाहार: पाणिपादम् इति विप्रो समाहारबन्दु सुपो लुकि इन्द्रश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् २।४।२ (एकत् ) इति एफबद्भावे वायुरुपची पाणिपादम् इत्यादि । एवम् रथिकाश्यारोहम् । मार्दशिकपापविकम् गाता च पिता च पितरौ इति विप्रथे इतरेतरइन्द्रे सुपो कुकि पिता माना। ७० (भन्यतरस्पाम् एकशेषः ) इति पितुः एकशेषे स्मायुत्पत्तौ पितरौ। पसे मातृपितृ इति स्थितौ धान तो इन्द्व ६।३।२५ ( उत्तरपरे ) इति मात:कारस्य मानकि मातापिराभवात् द्विवचने औ विभक्ती मातापित. वियादि । शश्च कृम्भ ईशक्षण इति विग्रहे समामे सुपोलुकि जाधदन्तम् र पायो द्वन्द्वप्रकरणम् । ७ 9 - २२२॥३३ (पूर्वम्) इति ईशशब्दस्य पूर्वनिपाते विवचने औ घिमक्तो ईशकाणी शिवान देशवाच शिवकेशवो हति विपहे सुपो लुकि अल्पाचतरम् २०३४ (पर्वम् ) इति शिवस्य पूर्व निपाते द्विवचने औ विभक्तो शिषकेशयाविरमादि छो च श च द्वादशति विग्रहे बन्दसमासे सुपो लुफि द्वघष्टनः संस्पायामबहुप्रीयमीत्योः ३१३ ४७ ( मात्) इति विशन्दस्पेकारस्या- कारे वापरान् शम्दानुहुवचने जसादिविभक्तो दादशेत्यादि । एवम् माटो घ दश घारादश दो च विंशति द्वाविशतिः । भाराविशतिः इत्यादि । त्रयश्च दश च प्रयोदशेति विप्रो समामादिकार्य मयः ।। इति त्रयम् इत्यादेरो सन्धिकाय् त्रयोदशन् शब्दात् विभक्तिकायें त्रयोदशे. स्पादि । एवम् प्रयोविंशतिः अपनिराद् इत्यादि । वाक् प वा च तयोः समाहारः वाकवचम् इति विप्रहे समाहारहन्द सुपो लुकि द्वन्द्वाछचुदष- सन्तात् समामारे ५।४। १.६ (य्च् ) इति समानान्ते रधि मनुमन्य- लोप स्वरसंयोगे प वाक्त्वत्पदन्तास्वारी वाफवचमित्यादि। एवम् छनोपाहानही । तयोः समाहारः नोपानाम् । समीषदम् वासिषम् । समाहारे किम् माइगरदौ । विष्णोः पूः विष्णुपुरम् इत्यत्र समाधाविका अकपुररुभू.पपामान ५।४। ७४ इति 'य' प्रत्यये फोथात् क्लीनत्ये प्रातिपदिकतया सुपि विष्णुपुरम् इत्यादि । एवम् विमला भाप: परिमा मरलि तद् धिमक्षापं घर: । राणधुरा रामपषः रम्पपपो देश इत्यादि । तद्भिताः तरमै हितम तमितम् इति विग्रम पतित्पुरुषसमासेन निष्पगोऽयं अन्दः।

पाणिनीयप्रबोधे नस्मै वैयाकरणाथ अथवा नाम्ने प्रयोगकरणाय पा ये प्रत्यया बहुहित मादधति ते हि तद्धितप्रत्ययाः कथ्यन्ते । यथा-पत्र अयं व्याकरणमधीते इति वक्तव्यं विद्यते तत्र व वैयाकरणोऽयम् । इत्युक्त शब्दप्रयोगकर्तुः वैदुष्यं गाम्भीर्य प्रयोगेऽपि लालित्यं प्रतीयते । अतश्च यस्य प्रयोगेण वैयाकरणानां हितं भवति तच तद्धितामति अन्दयं संज्ञा। इदञ्च मया पूर्वमेवोक्तम् यत् पाणिनिः प्रत्ययादौ अनुबन्धसन्निवेशेन वहुकृत्यम् साधयति । इह तद्धितप्रत्ययेष्वपि णित् कित् मित् टिदादिना आदिवृद्धिप्रभृतिकार्याणि सोधयत्यैवेति तत्र तत्र स्थलेषु द्रष्टव्यम् । समर्थानां प्रथमाद्वा ४।१।२ (समर्थानां मध्ये प्रथमो- चारितादित्यर्थः) प्राग्दीव्यतोऽण १११८३ (अधिकारः) अश्वपतेरपत्यमाश्वपत मिति विग्रहे अश्वपति शब्दात् प्रथमोच्चारितात् अश्वपत्यादिश्च ४।१८४ ( अण्) इणि णकारस्येत्संशा-लोपे तद्धितेष्वचामादेः ७१२।११७ ( वृद्धिः डिपति) इति आदिवृद्धौ यस्येति चेति इकारतोपे आश्वपत-शब्दात् 'कृत्तद्धित-समासाश्च' इति प्रातिपदिकतया स्वाा त्पत्तौ क्लीवे आश्वपतम् दितेरपत्यं पुमान् दैत्यः इति दितिशब्दात्मयमोच्चारितात् रित्यंदित्यादित्य रत्युत्तरपदाण्ण्या ४११८५ ( प्राग्दीव्यतीयेषु ) इति ण्य प्रत्यपै अनुबन्धलोपे आदि वृद्धौ इकारलोपे तकारस्य यकारेण संयोगे दैत्य शब्दात् स्वायु सत्तौ दैत्यः इत्यादि । रधोरपत्यं पुमान् राघवः इति विग्रहे रघुशब्दात तापत्यम् ४):1९२ ( अण) इत्यणि आदिवृद्धी राघु + म इति जाते ओर्गुण: ६।११६४६ (भस्य तद्धिते) इति गुणे अवादेशे विप्रहे । २ 3 LF-

तद्धितप्रकरणम् ।
८९
3
स्वादौ राघवः । दक्षस्यापत्यम् पुमान् दाक्षिः इति विग्रहे दक्षचन्दात्
अत इभ ४। श८५ ( तस्यापत्यम् ) इति इप्रत्यये प्रादिवृद्धौ अकारलोपे
स्वरसंयोगे सुपि दाक्षिः । एवम् दाशरथिः, द्रौणिः, बिनताया।
प्रपत्यम् মান
वैनतेया इति
विग्रहे
पिनताशदात्
स्त्रीभ्यो ढक ४ । १ । १२. (तस्यापत्यम् ) इति
दकि कस्पेसंश
लोप किति च ७।३।११८ ( तद्धिते आदेः वृद्धिः) इति आदि-द्वी
टफारस्य च आयनेयोनीयियः फनखछपा प्रत्ययादीनाम् ।।१।।
इति एयादेशे अाफारलोपे प्रत्यययोगे सुपि वैनतेयः एवं भागिनेपः,
सौपर्णेयः, गायः, इत्यादि, शिवत्यापत्यम् शैव इति विग्रहे शिवशब्दात
शिवादिभ्योऽण ४।।। १२२ ( तस्यापत्यम् ) इत्पणि अनुबन्धमाग्ये
सुपि शैवः। द्विमातुरपत्यम् इति विप्रहे द्विमातृ-शब्दात् मातुकत्संख्या
सम्भद्रपूर्वायोः ।। १ । ११५ (अपत्येऽण् ) इत्यणि ऋफारस्य ।
उकारे रपरे च कृते प्रादिपृसौ वैमातुरः, एवम् प्रेमातुरः । पाण्मातुरः
साम्मातुरः । भाद्रमातुरः । कन्याया अपत्यम् कानीनः इति विग्रहे कन्या
शम्दात्-न्यायाः कनान च ४।१।११६ (अपत्येऽण ) इत्यणि कनीनादेशे
अनुवन्धकार्य प्रातिपदिकत्वाच मुपि कानीनो
रामोऽपत्यम् रामन्यः
इति विद्महे राजन्-शरदात् राजश्वशुराद्यत्
१ । १३७ ( अपत्ये ) मानावेत वारयम् इति नियमात् यति-ये नामा.
व्यासः
कर्णम ।

पाणिनीयप्रबोधे 3 २ 3 ૨ १ २ बकर्मणोः ६ । ४ । १६८ ( अन् प्रकृत्या ) इति प्रतिभावेन टिलोप. निषेधे राजन्यः । जात्यभावे तु अपत्येऽणि मन (प्रकृत्या अणि) इति प्रकृतिभावेन टिलोप निषेधे राजनः । ३२शुरस्या- पत्यम् श्वशुर्यः । पितृष्वस शब्दात्-पितृष्वसुश्छण् ४।११३२ ( अपत्ये ) इति छणि णित्वाद् वृद्धौ .छस्य ईयि यणि प्रातिपदिकत्वातू सुपि पैतृष्वस्त्रीयः । ढकि लोपः ४ । १ । १३३ (पितृष्वसुः ) इति ज्ञापकादेव ढकि अन्त्यलोपे च पैतृष्वसेयशब्दात् प्रातिपदिकत्वासौ पैतृष्यसेयः । मातृध्वसुश्च । ।। १ । १३४ (छण् इकि लोपश्च ) मातृष्वस्नीयः । मातृष्नसेयः । कुलाखः ४।१।१३७ कुलीनः । स्वसुश्छ: ४ । १ । १४३ स्वतीयः । भ्रातुय॑च्च ४।१ । १४४ । ( चाच्छः ) भ्रातृव्यः भ्रात्रीयः, पौषी पौर्णमासी अस्मिन्निति पौषः इति विग्रहे पौषी शब्दात् सास्मिन् पौर्णमासीति संज्ञायाम् ४ । २ । २१ ( अण्) इत्यणि ईकार लोपे प्रातिपदिकत्वात्सौ पौषो मासः । एवम् माधः फाल्गुनः, चैत्रः, वैशाखः, ज्येष्ठः, आषाढा, श्रावणः, आश्विनः इत्यादि। कषायेण रकं वन काषायमिति विग्रहे कषाय शब्दात् तेन रक्त रागात् ४।२।१ (अण्) इत्यणि आदिवृद्धौ सुपि काषायम् । पुष्ये श युक्तमहः प्रौषमिति पुष्यशब्दात् नक्षत्रेण युक्तः कालः ४ १ २ १ ३ (अण्ण) इत्यरिण । (तियपुष्ययोर्नक्षत्राणि यलोप इति वाच्यम् ) इति यलोपे वृद्धी सुपि पीपम् । तैपम् । टिदेति डीपि श्रावणी, पौष्ठपदी। इन्द्रो देवता " प्रकरणम् । ६१ ४ २ 3 अस्येति ऐन्द्रं हविः इति विग्रहे इन्द्रशब्दात् सास्य देवता ४।२१ २४ (अण) इत्यणि अनुबन्धकाये सुपि ऐन्द्रम् , वारुणम् । पितुर्माता पितृव्यः । मातीता मातुलः { मातुः पिता मातामहः । पितः पिता पितामहः इत्य तत्तच्छन्दात् पितुर्यन् मातुर्दुलच् मातापित्रोमिहच् इत्वेवं तत्तत्प्रत्यये इमे शब्दाः पितृव्यमातुलमातामहापतामहाः । ४।२।२६ इति सूत्रात् निपात्यन्ते । काकानां समूहः काकम् इति विद्महे काक-शब्दात् तस्य समूहः ४।२- ३७ (अण) इत्यणि अलोपे सुपि काकम् । एवं वाकम् । मात्स्यम् । कापोतम् इत्यादि । प्रामजनबन्धुभ्यस्तल ४।२। ४३ ग्रामता, मनता, बन्धुता। व्याकरणमधीते वेद वा वैयाकरणः इति विग्रहे व्याकरण-शन्दात् तधाते तद्वदे४ । २ । ५७ ( इत्यये अण) इति अणि आदि वृद्धी प्राप्तायाम् नय्वाभ्यां पदान्ताभ्याम् पूर्वी तु ताभ्यामैच् ४ । ३ । ३ (वृद्धिः ) इति ऐकारागमे स्वाद्युत्पत्तौ वैयाकरणः । क्रतूस्थादिसूत्रान्ताफ ४।२।६० इति उकथादित्वात् ठकि नैयायिका। पौराणिक: ज्यौतिषिफा । ऐतिहासिकः । क्रममधीते वेद वेति विग्रहे क्रमादिभ्योवुन् ४।२।१ इति वुनि अकादेशे अकारलोपे स्वरसंयोगे स्वाद्युत्पत्तौ क्रमकः । एवम् शिक्षका, मीमांसकः । चक्ष पा गृह्यते इति चाच पं ( रूपम् ) इति विद्महे वक्ष प धम्मात् शेप ४।२। ९२ (श्रण) । ( अपत्यादिचतुरस्य॑न्तादम्यः शेषस्तम अण्णादय: प्रत्ययाः स्युः) इत्यणि अादिवृक्षौ सुपि चापम् (प) . १ १२ पाणिनीयप्रबोधे प्रत्यया: तत्र जातः ता. भवः वा २ -- भाषणः (शब्दः ) श्रौपनिषदः (पुरुषः ) दृषदि पिष्टा दार्षदाः ( सक्तना) चतुर्मियते चातुर्र ( शकटम् ) चतुर्दश्याम् इयते चातुर्दशं ( रक्षः) 'तस्य विकारः' इत्यतः प्राक् शेषाधिकारः । इह प्रकृतिविशेषाद् घादयः ट्युलन्ताः अर्थविशेषेषु उच्यन्ते । तत आयातः। सोऽस्य निवासः। तेन प्रोक्तम् । इत्यादयोऽर्थ. विशेषा कयाः । तत्र राष्ट्र बातो भवी राष्ट्रिय इति विग्रहे राष्ट्रशन्दात् राष्ट्रावारपाराद्घखौ .४ इति चे प्रत्यये घस्स इयि' अनोपे स्वरसंयोगे सुपि राष्ट्रियः इत्यादि ( अवार- पाराद् विगृहीतादपि विपरीताच्चेति वक्तव्यम् ) अवारीणः, पारीणः अवारपारीयः पारावारीण इति। प्रोमायखनौ ४।२।९४ ग्राम्यः, प्रामीण: । दक्षिणस्यां दिशि जातः दाक्षिणात्यः इति विग्रहे दक्षिणा-शब्दात् दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक ४।२।९८ इति त्यकि आदिवृद्धौ सुपि दाक्षिणात्यः । एवं पाश्चात्यः, पौरस्त्यः, दिवि भवनम् इति विग्रहे दिवशब्दात्-युप्रागपागुदक्प्रतींचो यत् ।।११ इति यति दिव्यप्रातिपदिकात्स्वाद्युत्पत्तौ दिव्यम् , एवम् प्राच्यम् , अपाच्यम्, उरीच्यम् , प्रतीच्यम् , अमा सह भवति इति अमात्य इति विग्रहे अमेत्यव्ययात्- भव्ययात्त्य ४।३।१०४ इति त्यपि अनुबन्धलोपे सुषि अमात्यः एवम् इहत्या, कत्या, कात्यः, इंतल्या, ततस्त्यः, तत्रत्य इत्यादि । 'त्यवनेर्भुव इति वक्तव्यम्' नित्यः । शालायाम् भवः शालीयः इति विग्रहे शालाशब्दस्य वृद्धियस्याचामादि. रतयुद्धम् ॥ इति वृद्ध-संशायाम् वृद्धाच्छ। ४।२।११४ ( जाताद्यर्थे ) . १ तद्धितप्रकरणम् । , इति छे छरय ईयि सुपि शालीयः । एवं मालीयः । तस्मिन् भवः तस्यायं वा इति विप्रहे तत्शब्दस्य त्यदायोनिच ॥१४॥ ( वृद्धम् ) इति वृद्ध-संशायाम छप्रत्यये छत्य ईयि तदीयः । एवम् यदीयः,भाषर्दया, अदसीयः,इदमीया, एतदीयः, ( वा नामधेयस्य वृद्धसंशा वक्तव्या ) रघुवरीयः, वङ्गीय: युवयोर्युष्माकम् वा अयम् इति अर्ये युष्मद् शब्दात् युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च ४।३।१ (चाच्छः) इति खभि खस्य ईनादेशे युष्मद् + ईन इत्यन्न सस्मिन्नणि च युष्माकास्माको ४।३२ इति युष्माकादेशे यादिवृद्धौ अकार लोपे प्रत्यययोगे मूर्धन्यात्परस्य नस्य णत्वे सुपि यौष्माकीणा, एवम् श्रास्माफीन: अणि यौम्माकः, आस्माकः, छे युष्मदीयः अस्मदीयः । तवायम् , ममायम 3 ४ " . ६ . , २ इत्पर्य एकार्थकात् युस्मदस्मन्नन्दात् खभि अणि च तवकममकावेकवचने ६३॥ ( तस्मिनणि युष्मदस्मदोः) इति तवक-ममकादेशे आदि वृद्घौ सुपि तामकीनः । मामफीन: तावकः, मामकः, छे तु तस्य इयि प्रत्ययोत्तरपदयोश्च ४।२।९८ ( युष्मदस्मदोर्मपर्यन्तयोः त्वमावेकवचने ) इति म पर्यन्तयोः त्वमादेश सुपि त्वदीयः, मदीयः । मध्ये जात इत्यये मध्यशन्दात् मध्यान्म:।।३।८ इति म प्रत्पपे भातिपदिक्त्वात् अपि मध्यमः । काले भवः जातो वेत्य फालशदात काळाम ४।३।११ (कालवाचिनः ) इति ठमि तस्य च ठस्येव : ७।३।५० इति इगादेशे अफारलो स्वरयोगे मुखि कालिक: एवम् मासिकः वार्षिक: सांवत्सरिक: पीनःनिकः सायम्यातिकः । १ २ - पाणिनीयप्रबोधे सायं जात इत्यर्थे सायं चिरं प्राह प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्य टुलौ तुट् च ४।३।२३ ( कालात् ) इति ट्य प्रत्यये अनुवन्धनोपे युषोरनाको ७।१।१ इति योरनादेशे डागमे च कृते प्रातिपदिकत्वात् सुपि सायन्तनम्। एवं चिरन्तनम् प्रातनम् सनातनम् श्वरतनम् स्तनम् पुरातनम् । टित्वात् स्त्रीलिङ्ग डीपि अद्यतनी व्यवस्थेत्यादि । अध्यात्मम् भव: आध्यात्मिक इत्यथे अध्यात्म शब्दात तत्र भवः ४ । ५ । ५३ ( ठञ् ) ( अध्यात्मशब्दाहनिष्यते) इति उजि ठस्यैकादेशे नित्वादादिवृद्धौ अकारलोपे श्राध्यात्मिक-शब्दस्य प्राति पदिकतया सुपि प्राध्यात्मिकम् । अधिदेवं भवम् आधिदैविकम् इति विग्रहे उजिं तस्येकादेशे पादि वृद्धी प्राप्तायाम् अनुशतिकादीनाञ्च ७।३।२ (उभयपदवृद्धिः ) इत्युभयपदवृद्धौ आधिदैविक-शब्दस्य प्रातिपदि. कत्वात्सुपि श्राधिदैविक्रमित्यादि । एवम् आधिभौतिकम् , पारलौकिकम् । उपाध्या यस्यायम् उपाध्याये भव उपाध्यायादागतो वा इत्यर्थे तत मागत ४१३ । ७३ ( इत्यर्थे ) विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यो वुञ् ४।३ । ७७ इति बुनि श्रादि वृद्धौ अनुवन्धलोपे वोरकादेशे औपाध्यायकः । पैतामहका | पितुरागतः पित्र्यम्, पैतृकम् इति विग्रहे पितृशब्दात् पितु यच्च ४ । ३ । ६ ( चाम् । इति यति रीड प्रतः ७।४। २७ ( अकृरसार्वधातुकयो: यि चौ) इति ऋकारस्य रीडादेशे यस्येति चेति ईलोपे सुपि पिच्यम् । पछे ऋतान ६ । ७२ इति ठनि निस्वाद वृधौ २ 3 १ ठस्य च तद्धितप्रकरणम् । ९ ५ 3 २ १ २ 3 इसुसुक्तान्तात् कः ७।३।५ ( ठस्ये ) इति कादेशे पैतृकम् । एवम् मातृकम् , होतृकम् इत्यादि । मथुरा निवासोऽस्य इति माथुरः इति विग्रहे मथुराराध्यात् सोऽस्य निवासः ४।३।८६ इति अणि आदिवृद्घौ अलापे प्रातिपदिककार्य - माथुर: । पाणिनिना प्रोक्तम् इत्यर्थे पाणिनि-शब्दात् - तेन प्रोक्तम ४।३०१०१ (छः ) इति छ प्रत्यये छस्य ईयादेशे इकारलोपे सुपि पाणिनीयम् । भस्मन- इदम् विकारो या भास्मनम् इति विग्रहे भस्मन् शब्दात् तस्येदम ।।३।१२० ( भण्) तस्य विकारः ११३६१३४ (अण्) इत्यणि 'अन्' इति प्रकृतिभावे सुपि भास्मनम् एवम् मार्तिकम् । पैप्पलम् (चूर्णम् ) मौर्वः, जानुषः, त्रापुषः पालाशः, खादिरः इत्यादि । अश्मनोविकार इत्यर्थे अश्मन शब्दात्-- मयड्बैतयोर्भापायामभक्षाच्छादनयोः ।।१४३ इति मयटि अनुबन्धलोपे मुपि भस्ममयम् पो आश्मानम् । भक्ष्ये मौद्गः (सूपः ) आच्छादने कापसम् प्राच्छादनम् । गोश्चपुरीपे १२१४४ ( मयट ) गोमयम् । प्रक्षेदीव्यति पाक्षिकम् इति विग्रहे प्राग्नहतेष्ठक् ४।४।१ तेन दीव्यति खनति जयति जितम् ४।४।१ ( उक् ) इति ठकि तस्येकि प्रकृतिकाये प्राधिकराम्दात् सुपि प्राक्षिकम् । दध्ना संस्कृतम् दाविकम् इति विग्रहे दघिसन्दात् संस्कृतम् ४।४।३ ( ठम् तेन ) इति ठॉफ तस्येथि आदिबुद्धी सुपि दाधिकम् । नापा तरति नाविकः इति विप्रो नौशन्दाद् तनि ४।४।५ (ठक् ) इति ठकि तस्यैकादेशे आवादेशे नाविक-सन्दात् सुपि नाविकः धार्म चरति धार्मिकः इति विप्रहे धर्मग्रन्दात् चरति 1815 (टक) नि पाणिनीयप्रबोधे २ ठकि प्रत्यय-कायें सुपि धार्मिकः । समाज रक्षति सामाजिक इति विग्रहे समाज शब्दात् रक्षनि ४।४।३३ ( ठक् ) इति ठकि ठस्येकि अलोपे सुपि सामाणिकः । अपूपाः पण्यमस्यैनि श्रापूपिकः इति विग्रहे तदस्य पण्यम ४।४।५१ (क) इति ठकि आदिधौ इगादेशे सुपि रूपसिद्धिः । मृदङ्ग शिल्पं यस्य 8 मार्दङ्गिकः इति विग्रहै मृदङ्गशब्दात् शिल्पम ४।४।५५ (ठक तदस्य ) इति ठकि इगादेशे आदिवृद्घौ सुपि मार्दङ्गिक इत्यादि । धनुःपहरणमस्येति विग्रहे धनुषशब्दात् प्रहरणम् ४।४।६७ (तदस्य ठक् । इति ठकि ठस्य 'इसु. मुक्ता तात्कः' इतिककागदशे आदिवृद्धौ सुपि धानुष्कः अस्ति प्रेत भात्मा इति मतिययासौ आस्तिकः इति विद्महे अस्तिशब्दात् अस्तिनास्तिदिष्टंमति:४।४।६० ( तदस्य ठक् ) इति ठकि श्रादिधौ इक लोपे सुपि आस्तिकः । एवम् नास्ति प्रेत आत्मा इति मतिर्यस्यासौ नास्तिकः । दिष्टम् इति मतिर्यस्यासौ दैष्टिका । 'अपूप शीटमस्येति आपूपिकः इति विग्रहे अपूप-शब्दात् शीळम vi६. ( तदस्य ठक ) इनि ठकि ठस्येगादेशे श्रादिवृद्धौ सुपि आपूपिका । शरणे माधुः शरण्यः इति विद्महे शरण-शब्दात् प्राग्धिताधत् १७५ इति यतोऽ- धिकारे तत्र साधुः ।।१।९८ ( यत् ) इति यति 'यस्येति' चेति अलोपे सुपि शरण्यः । एवम् सभ्यः, अग्र्यः, कर्मण्यः। वत्मेभ्यो हितम् वत्सयम् इति विग्रहे * मृदङ्गशब्दो लाक्षणिक: । मृदङ्ग = मृदङ्ग वादनम् । * येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्ताति के एतद्विद्या मनुशिष्टस्स्त्रयाई वारा- गामेष वस्तृतीयः । (कट ०) + अपूपान्दो लाक्षणिकः । अरूपम् अपूरमक्ष गम् तद्धितप्रकरणम् । ६७ 1 २ 3 वत्स शब्दात् प्राकक्रीताच्छः ५।०१ इति छाधिकारे तस्मै हितम् ५५११५ (छः ) इति छ प्रत्यये सुपो लुकि छस्य ईयादेशे अलोपे सुपि वत्सीयं दुग्धम् । दन्तेभ्यो हितम् इत्यय दन्तशब्दात् शरीरावयवायत् ५६ तरमै हितम् ) इति यति अलोपे प्रातिपदिकात् सुपि दन्त्यम् । एवं कएल्यम् ओलम् , नासिकाय हितम्स्यिर्थे यति सुपो लुकि (नस नासिकायाः) इति वार्तिकबलान्नसादेशे नस्यम् । आत्मने हितमित्ययें श्रात्मन् शब्दात् श्राल्गन् विश्वजन-भोगोत्तरपदात्यः ५१०९ तस्मै हितम् ) इति खप्रत्यये खस्य ईनि आत्माध्वानौ ख ६१६९ ( प्रकृत्या ) इति प्रकृतिमावे सपि आत्मनीनम् , विश्वजनीनम् मातृभोगीनम् । पञ्च पादाः परिमाणमस्य- त्यय पञ्चन शब्दात् पंक्तिविंशतित्रिंशञ्चत्वारिंशत्पष्टिसप्तत्यशीतिनतिशतम् १५६ ( इमे निपात्यन्ते तदस्य परिमाणमित्यर्थे स्त्रीलिङ्ग एकत्वे च संख्या संख्येय वाचकाः ) इति निपातनात् ति प्रत्यये प्रकृतेष्टिलोपे चकारस्य कुरवे अनुस्वारपरसवर्णयोः सुपि पक्तिः ( पञ्चाक्षरा पञ्चपादा पंकिः इति उन्दसि ।) एवं दो दशती परिमाणमस्य संघस्येति विंशतिः इति विग्रहे द्विदशत् शब्दात् शतिच् प्रत्यये प्रकृतेविन्भावे अनुस्वारे सुपि विंशतिः इत्यादि । दण्डम् अर्हति दण्ड्यः इति विद्महे दण्ड-गन्दात् तदर्हति ५।१.६३ इत्यर्थस्याधिकारे दण्डादिभ्यो यत् श६६ इति यति प्रकृतिकाय च रहय इत्यादि । बामणेन ल्यम् मासणवत् (पटवि) इस्पर्षे ब्राहाण- शब्दात् तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः ॥१।१९५ इति वति प्रातिपदिकादागतस्य पाणिनीयप्रबोधे . ४ ५ -- । २ 3 सुपोऽव्ययत्वात् लुंकि रूपसिद्धिः गृहवद् व्यवहरति सभायाम् । पुत्रवत् पश्यति छात्रम् इत्यादि । गोर्भावः गोत्वमिति विग्रहे गो शब्दात् तस्य भावस्त्वतलौ ५॥१११६ इति से गोस्वेति प्रातिपदिकत्य • नपुंसकत्वं सुपि गोत्वमित्यादि तलि स्त्रीत्वे गोता इत्यादि । एवम् घटत्वं घटता लघुत्वं लघुता पटुत्वं पटुता इत्यादि । पृथोर्भावः प्रथिमा इति विग्रहे पृथु शब्दात् पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा ५।११२२ ( वावचनम् अणाद्यर्थम्) इति इमनिधि र ऋतो हलादेलंघोः ६॥ १६१ ( इष्ठेमेयस्सु । ( पृथु मृदु भृश कुश दृढ़ परिवृढ़ाना- मेव रत्वम् ) इति ऋकारस्य रकारादेशे प्रथु + इमन् इति स्थिते दें: ६४१५५ ( लोप: इण्ठे मेयस्सु ) इति टि लोपे प्रथिमन् शब्दात् प्रातिपदि- कतया स्वाद्युत्पत्तौ प्रथिमा, मदिमा, भ्रशिमा, ऋशिमा, ढिमा, परिवढिमेति । अणि पार्थवम् । मार्दवम् इत्यादि । तलि पृथुता मृदुता त्वे च पृथुत्वम् मृदुत्वमित्यादि । शुक्लस्य भावः शौक्ल्यम् इति विग्रहे शुक्ल शब्दात् वर्ण- हढादिभ्यः प्यञ्च ५।१।१२३ (चादिमनिच् ) इति व्यशि अनुबन्धलोपे मित्वादादिवृद्धौ यस्येति चेति अलोपे शौक्ल्य शब्दात् सुपि शौक्लयम् पक्षे शुक्लिमा शुक्लना शुक्लत्वम् । एवम् दान्यम् द्रढिमा दृढ़ता दृढ़त्वम् । जडस्य भावः कर्म वा जाड्यम् इति विग्रहे गुगवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च श६१२४ ( व्यञ् चाद्भावे ) इति ध्यान अनुबन्ध लोपे आदिवृद्धी प्रातिपदिकत्वात् सुपि जाड्यम् । एवं मौढ्यम् ब्राहाण्यम् । षो डीपर्यः । उचि- तस्य भावः औचितीति उचित शब्दात् यत्रि श्रादिवृद्धौ अलोपे च कृते -- 'तद्धितप्रकरणम् ९९ औचित्य इति जाते ‘षिद् गौरादिम्यो डीज्' इति डोषि हलस्तद्वितस्य ६।४।१५० ( यलोप ईति) इति यलोपे औचिती । एवम् यापाकामी 'बहतो नुम् च' इति नुमि आहेन्ती । सख्युविः कर्म वा सख्यम् इति विग्रहे सखि शब्दात् सख्युर्यः ५।१।१२६ इति यप्रत्यये इकारलोपे सुपि सख्यम् । सेनापतेर्भावः, कर्म वा सैनापत्यम् इति विग्रहे पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक् ५।१।१२८ इवि यकि आदिवृद्धौ सुपि सैनापत्यम् एवं पौरोहित्यम् । तारकाः सञ्जाता अस्येति तारक्तिम् (नमः) इति विग्रहे तारका शब्दात् तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतच ५।२।३६ इति इसचि प्राकारलोपे सुपि तारकितम् । एवम् पण्डा सदसद्विवेकिनी बुद्धिः सञ्जाता अस्येति पण्डितः । हस्तः प्रमाणमस्येति हस्तमात्रम् इति विप्रहे हस्त शब्दात् प्रमाणे द्वय- सज्दघ्नन्मात्रचः ५।२।३३ इति मात्रचि अनुबन्धलोपे सुपि हस्तमात्रम् । एवम् जानुदनम् । यत् परिमाणमस्य यावान् इति विग्रहे यत् शब्दात् यत्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुप शराः इति वपि अनुबन्धलोपे यद्+वत् इत्यत्र आ सर्वनाम्नः ६।३।९१ ( दृग्दृश्यतुपु ) इति आकारान्तादेशे यावत् शब्दात सौ नुमादिकाय यावान् । एतावान् स्त्रीलि यावती एतावती इत्यादि । इदै परिमाणम् अस्येति विप्रहे इदम् शब्दात् किमिदंभ्यां वो घः ५।।४० इति वपि अनुबन्धलोपे वकारस्य च प्रकारे तत्य इयादेशे इदम् + इयत् इति नावे -इदं किमोरीकी १३।१० ( इन्हवतुषु) इति शित्वात् सर्वस्यैव इदम: ईशादेशे अनुबन्धनोपे यस्येति चेति ईकारलोपे केवल प्रत्ययमात्रात् इयत् चन्दा पाणिनीयप्रबोधे व्यपदेशिवद्भावमादाय प्रातिपदिकतया सुपि इयान् स्त्रीलिंगे इयती । का संख्या एषां ते कति इति विग्रहे किम् शब्दात् किमः संख्यापरिमाणे डति च५।२।४१ इति इति टिलोपे कतिशब्दात् नास तल्लुकि कति इत्यादि । किं परि- माणमस्येति विग्रहे वतुपि वस्य धकारे तस्येयादेशे किमः 'कि' इत्यादेशे पियत् शब्दात् सुपि कियान् इत्यादि । पञ्च अवयवा अस्येति विग्रहे पञ्चन् . शब्दात् संख्याया अवयवे तयप् ५।।४२ इति ताप न लोपे सुपि पञ्चतयम् । चतुष्टयम् द्वौ अवयवी अस्थेत्यर्थे द्विशब्दात्-तयपि तत्य द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा शरा४३ इति अयजादेशे अनुबन्धलोपे इकारलोपे स्वर-संयोगे सुपि द्वयम् पक्षे द्वितयम् । त्रयम् त्रितयम् । एकादशानां पूरण: एका- दश इतिविग्रहे एकादशन् शब्दात् तस्य पूरणे डट् ( ५।२।४८) इति डटि डित्वाहिलोपे सुपि एकादशः स्त्रीलिगे एकादशी । पञ्चानाम् पूरणं पञ्चमः इत्यर्थे पञ्चन् शब्दात् डटि नान्तादसंख्यादेमैट् ५।४६ (डटः) इतिडटो मडादेशे नलोपे प्रातिपदिकात् पञ्चमशब्दात् सुपि पञ्चमः । एवं सप्तमः । अष्टमः इत्यादि । चतुर्ण पूरण इत्यर्थे चतुर् शब्दात् डटि अनुबन्धलोपे चतुर्थ इत्यत्र षट्कतिकतिपयचतुरां थुक श२५१ (डटिं) इति चतुरः थुगागमे नुबन्धलोपे सुपि चतुर्थः । एवं कतिया ! प्टुत्वे षष्ठः । विशते: पूरण इत्यर्थे विंशति शब्दात् विशत्यादिभ्यः तमडन्यतरस्याम् ५।२।५६ इति तमटि प्रातिपदिकात् सुपि दिदातितमः । पक्षे डटि सूपो लुकि तिविंशतेर्डिति ६४।१४२ ( लोप: भस्य ) . ૨ तद्धितप्रकरणम् १.१ ។ 3 ४ २ इति भस्य तिशब्दस्य लोपे यस्येति चेति अलोपे सुपि विशः । एवम् शिवमः डटिं टिलोपे त्रिंशः चत्वारिंशः इत्यादि । द्वयोः पूरणमित्यर्थे द्वि शब्दात द्वेस्तीपः ५।२।५४ इति तोयत्यये सुपि दितीयम् स्त्रोजिंगे द्वितीया एवम् ः सम्प्रसारणं च ५।२१५५ ( तीयः ) इति त्रियब्दस्य तीयप्रत्यये -सम्प्रसारणे च तृतीयः । गावोऽस्यास्मिन् वा सन्तीति विग्रहे गो शब्दात् तदस्या- स्त्यस्मिन्निति मतुएं ५।२६४ इति मतपि अनुबन्धलोपे स्वाद गोमान् स्त्रीलिंगे गोमती । धीमान् धोमतोत्यादि । भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने । सम्बन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुवादयः॥ भूमा बहुत्वम् यथा गोपान् यापान , इत्यादि । निन्दायाम् हनुमान इत्यादि । प्रशंसायाम् रूपवान् । प्रशस्ता विद्या अस्तिं अत्यासो विद्यावान् इति विप्रहे विद्या शब्दात् मतुप अनुबन्धलोपे वादिभ्यः ८।। इति मस्य वकारे सुपि विद्यावान् , किंवान, लक्ष्मी- वान् , यशस्वान् , तडिदस्यास्ति इति तडिवान् इति विमहे मनुपि अनु. वन्यज्ञोपे झपः ८२११. (मतोवः) इति मस्प ककारे तसो मत्वयं १ । ४ । १९ (भम् ) इति म संघायाम् अश्वामावे तहित्वान् 'विद्युत्वान् इत्यादि दण्डोऽस्यास्तीति विनहे दण्डशब्दात् अन इनिठनी ५।२।११५ इति इनि प्रत्यये 'अलोपे दण्डिन् शन्दात् प्रातिपदिकात् सुपि - दण्डी। ठनि तस्येकि तु दण्डिकः । एवं घनी धनिकः इत्यादि । प्रपत्ता या मादुपधायाश्च मतोर्वोऽय- पाणिनीयप्रबोधे - ૨ .3 १ अस्येति विग्रहे वाच शब्दात् वाचो ग्मिनिः ५।२।१२४ इति रिमनि प्रत्यये अनुबन्धलोपे कुत्वे जश्वे सुपि वाग्मी, स्त्रीलिङ्ग वाग्मिनी । अासि अस्य विद्यन्ते इति अर्शसः इति विग्रहे अर्श भादिभ्योऽच् ५।२।१७ तदस्यास्त्य- स्मिन्निति ) इति अचि सुपि रूपसिद्धिः आकतिगणोऽयम्। कस्मादिति कुत इति विग्रहे किम् शब्दात् पञ्चम्यन्तात् किसर्व-- नामबहुभ्योऽद्वयादिभ्यः ।३।२ (प्राग्दिशः प्रत्ययाः) इत्यधिकारात् पञ्चम्या-- स्तसिल ५२३१७ इति तसिल प्रत्यये सुपोधातुप्रातिपदिकयोरिति सुपो लुकि प्राग्दिशो विभक्तिः ॥३१ इति तसिलों विभक्तिरज्ञायाम् कु तिहो : ७।३।१० (किमः) इति कादेशे कुतः शब्दातू तद्धितत्वात् प्रातिपदिक- संज्ञायाम् सुपि 'तद्वितश्वास विभक्तिः' इति अन्ययात् सुपो लुकि - कुतः। अस्मादिति इत इति विग्रहे पञ्चम्यन्तात् इदमशब्दात् तसिलि सुपो लुकिइदम इश २३ प्राग्दिशीयेषु ) इति इशादेशे अनुबन्धलोपे सुपि तस्या व्ययत्वाल्लुकि इतः एवम् एतदोऽन् ५।३।५ अतः । एवम् तस्मादिति ततः इति विग्रहे तसिलि सुपो लुकि त्यदाद्यत्वे पररूपत्वे सुपि तस्य लुकि ततः। एवं, यतः, अमुतः, सर्वतः, विश्वतः, इत्यादि । पय॑भिभ्यांच ५१३६ परितः ( सर्वतः ) अभितः ( उभयतः) तस्मिन्निति विग्रहे सप्तम्यन्तात् तद् शब्दात् सप्तम्यास्त्रलू ५। ३।१० इति त्रलि सुपोलुकि तस्य विभकिसंज्ञायाम् 'त्यदादीनामः' इति अवे पररूपे सुषि लुकि तत्र यत्र कुन बहुत्र इत्यादि । अस्मिन्निति इह इति विग्रहे इदमो है:-- 3 तद्धितप्रकरणम् २ 3 २ 3 १ ३ ५।३।११ (सप्तम्याः) इति ह प्रत्यये इदम 'इश' इति इशादेशे अनुबन्धलोपे सुपि तस्य लुकि इह । कस्मिन्निति क कुत्र वेति विप्रहे सप्तम्यन्तात् किमशब्दात् किमोऽत् ४।३ । १२ (सप्तम्याः) इति अति सुपो लुकि काति ७ १२ । १०५ ( किमः) इति कादेशे यस्येतिचेति अलोपे मुपि तस्य लुकि क पक्षे बलि कु तिहोः इति क्कादेशे कुत्र । इतराभ्योऽपि दृश्यन्ते ५।३ । १४ (तसिलादयः) दृशि ग्रहणाद्भवदादियोगे एव । स भवानिति वक्तव्ये ततो भवान् तत्र भवान् इति । तं भवन्तमिति वक्तव्ये ततो भवन्तं तत्र भवन्तम् इत्यादि । सर्वस्मिन् काले सर्वदा सदा वा इति विग्रहे सप्तम्यन्तात् सर्व शब्दात् सवैकान्य किंयत्तदः काले 'दा ५।३ । १५ (सप्तम्याः) इति दाप्रत्यये सुपो लुकि सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि । ३।६ (प्राग्दिीयेपु ) हति सादेशे अवयवत्वात्सुषो लुकि संदा पक्षे सर्वदा एवम् एकदा अन्यदा यदा तदा' किमः कः इति कादेशे कदा । काले किम् सर्वत्र देशे । अन् काले एतर्हि सप्तम्यन्तात् इदम् शन्दात् इदमोहिल ५१३ । १६ (सप्तम्याः काळे) इति हिलि सुपो लुकि एतेतौ रथोः ५।३।४ (इदमः प्राग्दिशीयेपु ) इति एतादेशे सु.पि तस्य लुकि एतहिं । काले किम् इह देशे । अस्मिन् काले अधुना अत्र सतम्यन्तात् इदम शब्दात् अधुना ५ । ३ । १७ ( इदमः सप्तम्याः, काले ) इति श्रधुना प्रत्यये इदम इश् इति पाणिनीयप्रबोधे २ . सद्यः । शित्वात् सर्वस्य इदम इशादेशे इ+ अधुना इत्यत्र यस्येतिचेति इलोपे केग्लात् अधुनेति प्रत्ययमात्रात् व्यपदेशिवद्भावमादाय प्रातिपदिकत्वात् सुपि तस्य लुकि* अधुना। कस्मिन् काले कदा इति विग्रहे किं शब्दात् सप्तम्य- न्तात् अनद्यतने हिलन्यतरस्याम् ५। ३ । २१ (सप्तम्याः किं सर्वनाम बहुभ्यः काले) इति हिलि तस्य विभक्तित्वात् 'किमः कः' इति कादेशे कहिँ, यहि, तर्हि । एतस्मिन्निति एतर्हि त्यदायत्वे रूपम् । समाने अनि इत्यादिषु अर्येषु सद्यःपरुत्परायैषमःपरेद्य यद्यर्वेद्य रन्येद्य : रन्यतरेा रितरेछु रपरेा रघरेा रुभयेा रुत्तरेयुः ५ । ३ । २२ (निपात्यन्ते अव्ययानि) तेन प्रकारेण तथा इति विग्रहे तृतीयान्तात् तत् शब्शत् प्रकारवचने थाल् ५ । ३ । २३ ( किमादिभ्यः ) इति यालि सुपो लुकि त्यदायत्वे पररूपत्वे सु पि तस्य लुकि तथा । सर्वथा उभयथा । अनेन प्रकारेण इत्यम् इति विग्रहे इदमः तृतीयान्तात् इदमस्थमः ५ । ३ । २४ ( प्रकारवचने ) इति थमु प्रत्यये अनुवन्धलोपे 'एतेती रथोः इति इदमः हतादेशे सुपि तस्य लुकि इत्थम् । एवम् तृतीयान्तात् किम्शब्दात् किमश्च ।। ३ । २५ (प्रकारबचने यमुः ) इति (*) उदितवति परस्मिन् प्रत्यये शास्त्र-योनी गतवति विलयब प्राकृतेऽपि प्रपञ्च । सपदि पदमुदीतं केवलः प्रत्ययो यत् तदियदिति मिमीते कोऽधुना पण्डितोऽपि ।। एवम् यथा तद्धितप्रकरणम् १०५ 3 यमु प्रत्यये कृते 'किमः कः' इति कादेशे सुपि तस्य 'लुकि कथम् इत्यादि । एकः प्रकारो यस्याः सा क्रिया एकघा इति विग्रहे एकशब्दात् प्रथमान्तात् प्रकारेऽथ संख्याया विधार्थे धा-५ । ३ । ४२' इति पा प्रत्यये सुपो लुकि प्रातिपदिकस्वात् सुपि तस्य लुकि एकघा । एवम् द्विधा, त्रिधा चतुर्धा पञ्चधा इत्यादि.। अयमेषामतिशयेन श्राव्य इति प्राब्यतमः इति विग्रहे प्रथमान्तात् श्राव्यशब्दात् अतिशायने तमविष्टनौ ५। ३१५५ इति तमपि सुपो लुकि अनुबन्धलोपे सुपि आन्यतमः । एवम् लघुतमः टिलोपे लधिष्ठः अतिशयेन पचतीति पचतितमाम् इति विग्रहे पचति इति तिङन्तात् तिडश्च ५। ३ । ५६ (अतिशायने तमप् ) इति तमपि अनुबन्धलोपे तरप्तमपौ घः १।। १ २२ इति तमपो घ संज्ञायाम् किमेतिडव्ययधादाम्बद्रव्यप्रक ५। १११ इति आमि दीर्धे पचतितमाम् । एवम् पठतितमाम् इत्यादि तिम्तमाने शेपम् । अयमनयोर- तिशयेनात्य इति आन्यतर इति विग्रहे प्रयमान्तात् आद्य शब्दात् द्विवचन- विभज्योपपदे तरवीयसुनौ ५ । ३ । ५७ इति तरपि सुपो लुकि अनुबन्धलोपे सुपि आन्यतरः । एवम् लघुतरः । ईयसुनि टिलोपे लपीयान् पटुतरः पटीयान् अयमनयोरेपां वा प्रशस्य इति 'प्रशस्यतरः प्रयत्यतमः ईयसुनि इष्टनि तु स्पो लुकि प्रशस्यस्य श्रः ५ । ३ । ६० ( अजाद्योः) इति श्रादेशे अकारलोपं वाधित्वा प्रकृत्य काच ६।४। ६३ ( इष्ठे मेपरसु) इति प्रकृतिमावे गुणे प्रातिरादिकत्वात् मुपि अयान् अष्टः। ज्यप पाणिनीयप्रबोधे ५। ३ ६१ (प्रशस्यस्य अजाद्योः) इत्यनेन ज्यांदेशे ज्य+ ईयस् इत्यत्र ज्यादादीयसः ६।४ । १६० (इष्ठेमेयस्सुः) इति आदेः परस्येति नियमादी- कारस्याकारे दी सुपि ज्यायान् । वृद्धशब्दस्यापि ईयमुनि इष्ठनि च वृद्धस्य च शश६२ ( ज्यः अजाद्योः ) इति ज्यादेशे ज्यायान् , ज्येष्ठ इति पूर्ववद्रूपं भवतः । अयमनयोरेषां वा अतिशयेन युवा इति कनीयान्, कनिष्ठः. यवीयान् यविष्ठो वा इति विग्रहे.प्रथमान्तात् युवनशब्दांत् ईयसुनि इष्ठनि च सुपो लुकि युवाल्पयोः कनन्यतरस्याम्।।३।६४ इतिकनादेशे सुपि कनीयान् कनिष्ठ इति । पक्षे स्थूल दूरयुक हस्वक्षिप्रमुद्राणां यणादिपरं पूर्वस्य च गुणः ६।४।१४६(लुप्यते इष्टेमयस्सु ।) इति युवन् शब्दस्य वनो लोपे उकारस्य च गुणेऽवि यवीयस् यविष्ठ इति. शब्दात् मुपि यवीयान् यविष्ठः । एवं स्थवीयान् स्थविष्ठः दवीयान् दविष्ठः । हसीयान् हसिष्ठः। क्षेपीयान् क्षेपिष्ठः । क्षोदीयान् क्षोदिष्ठः। हुस्वक्षिप्रक्षुद्रादीनां पृथ्वादित्वादिनिचि हृसिमा । क्षेपिमा । क्षोदिमेत्यादीन्यपि रूपाणि। अयम. नयोरेषां वातिशयोन प्रिय हति प्रेयान् प्रेष्ठ इति विग्रहे प्रियशब्दात् प्रथमान्तात् इयसुनि इष्ठनि च सुपो लुकि अनुबन्धलोपे च प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुतगुरु- वृद्धतृप्रदीर्घवृन्दारकाणां प्रस्थस्फवरवंहिगर्वर्षिचन्द्राधिवृन्दाः ॥ ६।४।१५७ ( इष्ठेमयस्सु ) इति प्रियस्य प्रादेशे गुणे सुपि प्रेयान् । प्रेष्ठः । एवम् स्थेयान् । सष्ठः । वरीयान् । वरिष्ठः । वहीयान् बंहिष्ठः । गरीयान् । गरिष्ठः । वर्षीयान् । वर्षिष्ठः पीयान् त्रपिष्ठः । द्राधीयान् द्राधिष्ठः। इत्यादि । प्रियोरबहुलगुरु दीर्घाणां पृथ्वादित्वात् इमनिचि प्रेमा, परिमा, हिमा, गरिमा 'द्राधिमा , तद्धितप्रकरणम् १०७ इत्यादि। अयमनयोषा या अतिशयेन अन्तिक इति नेदीयान् नेदिष्ठः इति विग्रहे अन्तिक शब्दात् ईयसुनि इष्टनि च सुपो लुकि अन्तिम बाढयो. नेदसाधौ ५।३।६३ (अजाद्योः ) इति अन्तिक शब्दस्य नेदादेशे सुपि नेदीयान् नेदिष्ठः । एवं बाढशब्दस्य साधीयान् साधिष्ठः । अयमनयोरेषां वा अतिशयेन स्रग्वी इति सजीयान् खजिष्ठः इति विग्रहे सग्विन् शब्दात् प्रथमान्तात् ईयसुनि इष्टनि च कृते सुलोपे अनुबन्धलोपे विन्मतोल क् ५५३१६५ (अजाद्यो:) इति विनो लुकि सुपि सजीयान् , लजिष्टः। एवमनयोरेयां वा अतिशयेन त्वग्वान् इति त्वचीयान् त्वचिठः इत्यादि विन्मतुपोः लुकि शेयम् । प्रशस्त: पटुः पटुरूपः इति विग्रहे प्रथमान्तात् पटुशब्दात प्रशंसायां रूपप्. २३६६ (सुतिभ्याम्) इतिरूपए प्रत्यये सुपो लुकि अनुबन्धलोपे सुपि परूपः। एवं तिङन्तादपि प्रशस्तं पचतीति पचतिरूपम् । ईपदूनो विद्वान् विद्वत्कल्पः इति विग्रहे प्रथमान्तात् विद्वच्छवात् ईपदसमाप्ती कल्पन्देश्य देशीयरः ॥३३७। इति कल्यप् प्रत्यये सुपो लुकि अनुबन्धलोप (वलंसु. स्विनडहां दः) इति सस्य दत्वे चत्वं च कृते मुपि विद्वत्कल्पः । एवं द्विद्देश्यः विद्वद्देशीयः । एवं तिङन्तादपि ईगदूनं पचति इति पचति. पल्पम् पचतिदेश्यम् पचतिदेशीयम् अपरिसमाता असम्पूर्ण पाफक्रियेति यावत् । प्रागिवात्क: ५।१७ (इवे प्रतिकृती' इत्पतः प्रायफाधिकारः) करया यमयः प्रश्वफः इति विग्रहे प्रथमान्तात् अश्वशात् ममाते शश७३ (मः) इति फ प्रत्यये सुपो लुकि प्रातिप्रतिकारश्यकरदार सो प्रया:

१०८ पाणिनीयप्रबोधे एवं कुत्सितोऽश्वोऽश्वकः इत्यत्रापि प्रथमान्तात्तस्माद् कुत्सिते २३।७४ (कः) इति के प्रत्यये सुपो लुकि सौ अश्वकः इत्यादि । उच्चै रेव उच्चकैः इति विग्रहे अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टेः ५।३१७९ इति ऐकारात्पूर्वम् अकचि श्रनुबन्धलोपे प्रातिपदिकत्वात् सुपि तस्याव्यक्त्वाल्लुकि उच्चकैः । एवं नीचकैः । सर्वकः इत्यादि "प्रोकार सकार भकारादौ सुपि सर्वनाम्नष्टेः प्रागकच अन्यन्न तु सुबन्तस्य टेः प्रागकच्” इति नियमात् युष्मदस्मद् शब्दात् श्रोसि टेः प्रागकचि युष्मकद् ओम अस्मकद् प्रोस् इति जाते मपर्यन्तयोः तयोः युवादेशे युवकद् श्रोस' श्रावकद् ओस इत्यत्र योऽचि इति दस्य यकारे रुत्वविसर्गयोः युवकयोः श्रावकयोः । एवम् युष्मकासु अस्मकासु युष्मकाभिः अम्मकाभिः युवकाभ्याम् आवकाभ्याम् इत्यादि । अन्यत्र त्वया मया इत्यत्र अकचि त्वयका मयका इति । अश्व इव प्रतिकृतिः अश्वकः इति विग्रहे- इवे प्रतिकृतौ ५१३९६ (कन् ) इति अश्वशब्दात् कन, प्रत्यये सुपो लुकि अनुबन्धलोपे सुपि अश्वकः । मृदादिनिर्मिता प्रतिमा प्रतिकृतिः । ( प्रतिकृतेः स्त्रीत्वेऽपि 'स्वार्थिकाः प्रकृतितो लिङ्गवचनान्यनुवर्तन्ते' इति पुलिनत्वम् । ) पञ्चवारान् भुंक्त करोति वा इत्यर्थे पञ्चन् शब्दात् द्वितीयान्तात् संख्यायाः क्रियाभ्यावृत्तिगणने कृत्वसुच् १९१७ इति कृपहुंच प्रत्यये सुगे लकि अनुबन्धनोपे नलोपे पश्चकत्वस् शब्दात् सुपि तस्य अव्ययाल्लुकि हवे उपमानाणे वर्तमानात् प्रातिपदिकात् प्रथमान्तात् प्रतिकृती प्रति- कृतिभूते उपमेयेणे कन् प्रत्ययो भवति ।

तद्धितप्रकरणम् १०९ .. पश्चकृत्वः । एवम् षट्कृत्वः सप्तकृत्वः इत्यादि । द्विवारं भुक्तै करोति वा इत्यादौ तु द्विशब्दात् द्वित्रिचतुर्व्यः सुच् ५।४।१८ ( कियाभ्यावृत्ति गणने) इति सुचि अनुबन्धलोपे सुपि तल्लुकि द्विः त्रि: चतुः (अत्र रात्सस्यति सलोपः ) एकवारं भुक्त पचति वा इत्यर्थे एकशब्दात् एकस्य सकृच्च ।४।१९ (सुच् ) इति सुचि सकृदादेशे च अनुबन्धलोपे शंयोगान्ततोपे प्रातिपदिकत्वात् सुपि अव्ययात् लुकि सकृद् भुक्त पचति वा । प्राचुर्येण प्रस्तुतम् अन्नम् अन्न- मयम् इति विग्रह प्रथमान्ताद् अन्नशब्दात् तत्प्रकृतवचने मयटपा४।२१ (भावे अधिकरणे च ) इति मटि सुपो लुकि श्रनुबन्धलोपे सुपि श्रन्नमयम् वर्तते प्रचुरमन्नमरतीत्यर्थः । यवागूमयी । अपूपमयो वर्तते । अधिकरणेऽर्थे प्रचुग अपूपा अस्मिन्निति अपूपमयो यज्ञः। यत्र प्राचुर्यविशेषणकापूपाधिकरणेऽयें- मयटि कृते सुपो लुकि अनुबन्धले पे सुपि विशेष्यनिघ्नतया अपूपमयो यज्ञः अपपमय पर्व इत्यादि । प्रश एच प्राज्ञ इति विग्रहे प्रथमान्तात् प्रज्ञशब्दात् स्वार्थे प्रज्ञादिभ्यश्च ५।४।३८ (श्रण स्वायें ) इत्यणि सुपो लुकि आदिवृद्धी वहुलतया उपस्थितः प्रकृतशब्दार्थः, तस्य वचने वोधने तदधिकरणे मयत् प्रत्ययो भवतीत्यर्थः । अत्र 'वचन' शब्दो भावेऽर्थेऽधिकरणेऽर्थ च ल्युटि कृते सिध्यति तेनोभयोऽर्थः सूच्यते ।

पाणिनीयप्रबोधे . अकारलोपे " स्वरसंयोगे प्रातिपदिकत्वात्सुपि प्राश: स्त्रीलिंगे टिड्ढेति डीपि प्राशी । एवम् दैवतः चान्धवः । बहूनि ददाति बहुश: इति विग्रहे द्वितीयान्तात् वहु शब्दात् घट्वल्पार्थाच्छस् कारकादन्यतरस्याम् श१२ इति शसि प्राति- पदिकात् सुपि तस्य अव्ययाल्लुकि बहुशः । एवमलयशः । द्वौ द्वौ ददाति द्विश इति विग्रहे वीप्साङ्के द्विशब्दात् द्वितीयान्तात् संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम् श४४३ ( शस् ) इति शसि प्रातिपदिकात् सुपि तस्याव्ययाल्लकि द्विशः। एवं निशः चतुरशः पञ्चशः षट्छः इत्यादि । ग्रामादागच्छति ग्रामतः इति विग्रहे पञ्चम्यन्ताद् ग्रामशब्दात् अपादाने चाहीयरुहोः २४४५ पञ्चम्याः तसिः) इति तसि प्रत्यये अनुबन्धलोपे अव्ययात्सुपो लुकि प्रापतः। एवं नगरतः वृक्षतः इत्यादि । आदौ आदित: इति विग्रहे आदि शब्दात् सप्तम्यन्तात् आधादिभ्यस्तसेरुपसंख्यानम् ( सार्वविभक्तिकोऽयं तसिः ) इति तसि प्रत्यये सुओ लुकि अनुबन्धलोपे सुपि तल्लुकि च आदितः । एवं मध्यतः स्वरतः वर्णत: (आकृतिगणोऽयम् ) अकृष्णः कृष्णः सम्पद्यते कृष्णीभवति इति विग्रहे प्रथमान्ताद् कृष्ण शब्दात् कृम्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्विः ५।४।५० (अभूततद्भावे इति वक्तव्यम्) इति चि प्रत्यये सुपो लुकि कृष्ण + चि इत्यत्र अस्य च्वौ ७४।३२ (ईत् ) इति कृष्णाकारस्येकारे वेः सर्वथा लोपे कृष्णी- भवति । एवम् शुक्लोभवति श्वेतीकरोति पण्डितीभवतीत्यादि। पटत् पटत् द्विरुक्तप्रक्रिया १११ करोति पटपटाकरोति इति विग्रहे 'डाचि विवक्षिते दे बहुलम्' इति द्विरुच्चा- रिताद् पटत् पटत् शब्दात् भव्यक्तानुकरणाद् द्वयजवरा दनिती डाच् पाटा५७ इति डाचि अनुबन्धलोपे टिलोपे पटत पटाकरोतोत्सवस्थायाम् 'नित्यमानेडिते डाचीति वक्तव्यम् ' ( पूर्वपरयोः वर्णयोः पररूपम् ) इति डापरके अानेडिते परे पूर्व-पटत्-तकारस्य परपटापकारस्प चेत्युभयोः पका- ररूपे जाते पटपटाकरोति खटखटाकरोति । द्विरुक्तप्रक्रिया पौनः पुन्येऽर्थे सर्वस्य द्व (अधिकारात् ) पचति इत्यस्य नित्यवीप्सयोः८।१।४ (सर्वस्य द्व) इति पचतीत्यस्य द्वित्वे पचति पचति । एवम् . वृक्षं वृक्षं सिञ्चति । ग्रामो ग्रामो रमणीयः । भुस्त्वा भुक्त्वा गतः । इत्यादि वाक्यादेरामन्त्रितस्यासूयासम्मतिकोपकुत्सनभर्सनेपु ८।१५८० (') असूया. याम्-सुन्दर सुन्दर वृथा ते सौन्दर्यम् । सम्मती-देश देश वन्द्योऽसि । कोपे-मूर्ख मुर्ख तूहीं भव कुत्सने-पण्डित पण्डित वृथा ते पाण्डित्यम मार्सने-जा जल्प पश्यामि ते जल्लनम् । “सम्भ्रमेण प्रवृत्ती यथेष्टमनेकप्रयोगो न्योय. सिद्धः' सर्पः सर्पः, बुध्यस्व बुध्यत्य इत्यादि । वे इति इन्द्वम् इति विमहे द्विशब्दात् द्वन्द्व रहस्यमर्यादावचनव्युत्क्रमणयज्ञपात्रप्रयोगाभि- व्यक्तियु ११५ इति दिशब्दस्य द्विर्वचनपूर्वपदस्य जम्मावे उचरपदस्य अले. नपुंसकत्वे च निपातिते द्वन्द्वम् इति सिध्यति । द्वन्दं मन्प्रयते। 'द्वन्द्वम्' इति योग-

पाणिनीयप्रबोधे द्विरुक्तप्रक्रिया
विभागात् अन्यत्रापि । द्वन्द्वानि सहते । शीतोष्ण मेकं द्वन्द्वम् । सुखदुःखञ्चा-
परम् । चार्थे द्वन्द्वः। इत्यादि ज्ञेयम् ।
शिवं ध्यायमानाः पठन्तु प्रवीणाः, कुमार्यः कुमाराः प्रयोगेष्वदीनाः ।
भवेत्सर्वविद्यासु तेषां प्रवेशो न चेतो भवेद् व्याकृते तिलेशः ।।
पुराणमित्येव न साधु सर्वं नं चापि किञ्चिन्नवमित्यवद्यम् ।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥
स्मारं स्मारं कालिदासोक्तिमेतां
ध्यायं ध्यायं संस्कृताभ्युन्नतिं बाम् ।
श्रावं श्रावं मामकीनाम्प्रतिज्ञा
शालां शाला पाठयन्तु 'प्रबोधम् ।।
इति श्रीक्षेमधरिणा शाण्डिल्येन श्रीगोपालशास्त्रिणा दर्शनकेशरिणा
निर्मिते पाणिनीयप्रबोधे पूर्वार्द्ध समाप्तम् ।
( शुभं भूयात् )

श्रीकृष्णः शरणम्मम। पारिभाषिकसंज्ञार्थाः अन्वर्थसंज्ञा विहिता महर्षिभिः पुरातनैाकृति-शास्त्र-पारगैः । कालप्रभावण विलोपमागता तदर्थ-संज्ञानमुदाहरे कियत् ।। व्याकरणमहाभाष्ये पतजलिनाऽभिहितम् "महतीयं संज्ञा क्रियते । संज्ञाच नाम, यतो न लघीयः । कुन एतत्, लवर्थ हि संहाकरणम् । तत्र महत्याः संज्ञायाः करणम्, एतत्ययोजनम्, अन्वर्थाः संज्ञा यथा विज्ञायेत" इति भाप्येण विज्ञायते यत् द्विविधा संज्ञा शब्दशास्त्रे समुपदिष्टा। एकाक्षरा रूढिरूपा बहारा चान्वर्थेति । तत्र टि, घि, घु, घ, म, इत्यादय एकाक्षरास्तु स्व-स्वार्थयोधायाष्टाध्याय्यां तत्तत्सूत्रः पारिभापिक- रूपेण स्त्रयमुपदिष्टाः । तेः सूत्रैरेव तासामर्थाः स्फुटीमवन्ति इति तत्र नास्ति ने प्रयासप्रयोजनम् । तथाहि-'अचोऽन्त्यादि टि।" दोपो ध्यसखि ।' 'दाधा वदाम् ।' 'तरतमपौ पः ।' 'यचि भम् ।' इत्यादि ।

(२) अन्वर्थाः संज्ञा हि भूयस्यः सन्ति। पाणिनीयाष्टाध्याय्यां प्रायः तासां संख्या पञ्च-सप्ततिर्विद्यते । ता हि कमर्थ विभ्रति इति साम्प्रतिका वैयाकरणा अपि पछाचाविरमृतिं गताः सन्ति । यतो हि व्याकर- संज्ञानामर्थस्याध्ययनाध्यापन-पद्धतिरुच्छिन्नप्राया दृश्यते । इत्यत एक तामुन्जीवायतुमिहान्वर्थरज्ञानामर्थकरणप्रकारदिङ् मया निर्दिश्यते । वैयाकरणा विद्वांसोडो रख-स्व-शिष्यान् स्वबुद्ध या स्वयं समूह्याऽन्वर्थ- संज्ञानामर्थन् बोधयन्तु । इत्येव मेऽभ्यर्थना । ११) 'प्रत्याहारः'-संक्षिष्यन्ते प्रत्याहियन्ते-वर्णा यत्र स प्रत्याहारः । इत्यत्र प्रति+आ-पूर्वकात् हृ धातोरधिकरणेऽर्थे घधि प्रत्यय धातोर्वृद्वी निष्पन्नस्य प्रत्याहारशब्दस्यार्थज्ञानं सुशक्यम् भवति । (२) णान्ताः षट्' इति सूत्रेण षष, पञ्चन्, सप्तन् , अष्टन् , नवन , दशन् , इति परणामेव प्रातिपदिकानां (शब्दानाम् ) इयं संज्ञा विद्यतेऽतोऽस्याः 'षट्' इति संज्ञाऽन्वर्था । यथा लोके अम्बुधयः समुद्राः चत्वार इति 'अम्बुघि समुद्रादि-शब्देन चतुर्णा बोधो जायते । (३) 'सार्वधातुकमपित्'- इत्यत्र सार्वधातुक प्रत्ययाः तिङः शितः च सर्वेभ्य एव धातुभ्यः सर्वेषु च लकारेपूतिष्ठन्ते । यद्यपि शित्प्रत्यया आ धातु यु बाधिता भवन्ति तथापि योगत उपस्थितिरतु तेषां सर्वत्रैव विद्यन इति सार्वधातुकेति संज्ञाऽन्वर्था ।

(३) (४) 'आर्धधातुकं शेषः' --आद्धधातुकप्रत्यया इट् , स्य, तास प्रभृतयोऽद्धभ्य एव धातुभ्योद्वेष्वेव लकारेषु भवन्तीति तेपाम धा- तुकसंज्ञाऽन्वर्था । (५) 'सर्वादीनि सर्वनामानि-ये हि शब्दाः सर्वेपां प्रातिपदिकानां नामानि (प्रतिपादकाः पोषका इति यावत् ) सन्ति । सर्वेषामेव नाम्नां यः काय साध्यते त एव शब्दाः सर्वनामानि ! यथा हरिः अत्रासीत् , स क गतः । सीता वीरबालाऽस्ति, सा नारीणामुत्तमा । इत्यादिषु तच्छ- ब्दः 'हरि' 'सीता' इत्येतयोरुभयोरपि नाम्नोः कार्य स्वयं साधयतीति सर्वनामसंज्ञाया अन्वर्थता । . (६) 'शि सर्वनामस्थानम'-सर्वेपां नाम्नां (पानिपदिकानां) स्वरूपस्थितानां स्थानम् । यत्रहि नामानि स्वरूपं वयित्वैव तिष्ठन्ति । भ-पद-संज्ञा कृत विकृति नैव गच्छन्ति, तत् सर्वनामस्थानम् । (७) 'अदेगुग'-यत्र वणा: स्वरूपं विहाय कञ्चन गुगं स्वस्मिन् स्थापयन्ति (विप्रति) यथा इकार एकारो भूत्वा, उकारश्च ओकारो भूत्वा स्वस्मिन् विशिष्टं गुणं विभून इति एकारस्य प्रोकारस्य च गुण- संज्ञान्वर्था। (८) 'वृद्धिरादेच्-यत्र पर्णा वृद्धि गच्छन्ति । गुगादपि निज रूपमधिकं बर्द्धयन्ति । यथा इकार ऐकारो मवति । उकारश्य भोकारो ( ४ ) जायते । इति वृद्धिरन्वर्था संज्ञा । अत एव पाणिनिता सर्वप्रथम 'वृद्धिरादैच' इत्येव सूत्रम् अष्टाध्याय्यां मङ्गल-कामनया पठितम् । यच्च पतञ्जलिनापि "मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरुषाण्यायुष्मत्पुरुषाणि च भवन्ति ।" इत्यादिना समर्थितम् । (१) 'निपात एकाजनाङ-ये स्वयमकस्मादेव निपतन्ति । (नितरां पतन्ति) प्रकृतिप्रत्यययोगतो न निष्पाद्यन्ते । ते निपाता इत्यन्वर्थता तेषाम् । (१०) 'उपसर्गाः क्रियायोगे'-धातुमुपेत्य सृजन्ति विविधान् अर्थान् इत्युपसर्गाः । यथा-उपसर्गेण धात्वथों बलादन्यत्र नीयते । विहाराहा- रसंहारप्रहारपरिहारवत् । इति । (११) 'गतिश्च'~गमयति अर्थान्तरं पदानि । आहोस्वित् गम्य- तेऽर्थो यया सा गतिरित्यन्वर्थताऽस्याः संज्ञायाः। . (१२) 'इग्यणः सम्प्रसारणम्'–सम्यक् प्रसारणम् विस्तारकरणम् अद्ध मांत्रिकस्य यकारस्य एकमात्रिक इंकार क्रियत इति सम्प्रसारण शब्दः स्फुटमन्वर्थः । ( १३ ) 'यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम-प्रकृतिप्रत्ययोरङ्गाङ्गि- भावसम्बन्धोऽस्ति । अतश्च प्रधाने प्रत्ययेऽङ्गित्वम् प्रकृती चाङ्गत्वम् । इत्य- तश्च प्रकृवेरगसंक्षान्वर्था ।

(१४) 'कृदतिङ्- करोतीति कृत् इति विगृह्य किए प्रत्ययेन निष्पादितः कृच्छन्दः क र्थवोधकः । अतश्च ये प्रत्ययाः कर्थवोधका- स्त एव कृत्प्रत्यया इत्यन्वर्थेयं संज्ञा । (१५) 'कृत्याः'-क्रियते इति 'कृत्यम्' इति व्युत्पत्या 'विभापा कृवृषोः' इति सूत्रोण क्यपि सिद्धरय 'कृत्य' शब्दस्य कर्मार्थवाचकता भतश्च कर्मणः ( अकर्मकधातोश्च भावस्य ) प्रतीकृतया तयोरेवार्ययोः 'कृत्या-प्रत्ययो जायते इत्यन्वर्थताऽस्य । (१६) 'अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'-पदम् पदम् इति प्रति- पदम् तत्र भवः प्रातिपदिकम् । इति सर्वत्रौव पदेषु प्रातिपदिक्त्वम् तिष्टत्येवेत्यन्वर्थताऽस्य । अथवा प्रतिपदि भवः प्रातिपदिकश्चन्द्ररतेन तुल्यं शब्दरवरूपं प्रातिपदिकम् । यथा प्रतिपदि चन्द्र उदित्यं तिथिभियुको वर्द्धते तथैव प्रातिपदिक्मपि सुवादिविक्ति भयुक्तसद् वर्डचे इत्य- न्वर्थताऽरय । चन्द्रस्य प्रातिपदिक्तं प्राक्तनैरप्यगीकृतम् तथाहि- "कीग्धीरः पदं ब्रूते को रोगी कश्च नास्तिकः । नमस्यन्ति च चन्द्रक तच्छावं पाणिनेद" इत्यस्योत्तरे इदमेव सूत्रं निगद्यते । इति प्राति. पदिकश्चन्द्रोऽभिधीयते । [१७] 'तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः'-कर्म (विशेषण) धारयतीति पर्मधारयः। भन्न फर्म-पूर्वक-धारि' इति ण्यन्तधातोः पचादित्वाद् अचि प्रत्यये गुणे अयादेशे 'कर्मधारय' इति शब्दः सिध्यति' तस्यार्थो भवति विशेषणधारको विशेष्यः । फलतो यत्र विशेष्यः प्रधानी भूय गौणतया विशेषणं धारयति । स्वयं बहुब्रीहिवद् अन्यस्य विशे- षणतयाऽप्रधानीभूय गौणतां न गच्छति स शब्दः कर्मधारय इत्यन्वर्थः । [१८] 'चार्थे द्वन्दु,'-'द्वन्द्व रहस्यमर्यादावचनव्युत्क्रमयज्ञपात्र- प्रयोगाभिव्यक्तिषु' एतेष्वर्थेषु 'द्वन्द्व'-शब्दः प्रयुज्यते । तत्राभिव्यक्तिरूपोऽर्थ इह गृह्यते । सचात्यन्तसहचरितत्वेन लोके विज्ञानमभिव्यक्तिरित्यर्थोऽत्र समासेऽन्वितस्तिष्ठति । यतोहि द्वन्द्व सबोण्येव पूर्वोत्तरपदानि प्रा. -नान्येव तिष्ठन्ति । [१९] 'तत्पुरुषः'-तस्य पुरुपः तत्पुरुषः । स चासौ पुरुषः= तत्पु- रुपः इत्युभयस्यापि विग्रहस्य निदर्शकः 'तत्पुरुष' शब्दः प्रतीकरूपेण गृहोनः । तत्र प्रथम-विग्रहः केवल तत्पुरुपयोधकः । द्वितीयस्तु कर्मधार- याख्यतत्पुरुषबोधक इति विवेकेन तस्य सार्थकता ज्ञेया। [२०] 'शेपो बहुव्रीहिः'-बतो ब्रोयो यस्व स बहुव्रीहिः । इति अन्यपदार्थप्रधानो 'बहुव्रीहि'-शब्दः विग्रहेण साक्षादेव स्वार्थप्रतीक इति सार्थिकेयं संज्ञा। [२१ ] 'संख्यापूर्वो द्विगु:'-द्वाभ्यां गोभ्यां क्रीतो द्विगुः । इति विग्रहे तेन क्रीतम्' इति तद्धिनार्थे ठकि तस्य च लुकि हस्त्रादि- ( . ) कार्ये द्विगुशब्दो निष्पद्यते । इत्येवं द्विगुशब्दोऽयं तद्धितार्थप्रतीकतया संख्यापूर्वकत्वाच् द्विगुसमासस्य सम्यक् प्रातिनिध्यमावहति । [२२] 'अव्ययीभावश्च'-न अव्ययः अनव्ययः अनव्ययः अव्ययो भवतीति अव्ययीभावः । बन समासे 'उपकृष्णम्' इत्यादिपु अनव्यय. शब्दा अव्ययतां गच्छन्तीति अन्वर्थः 'अव्ययीभाव'-शब्दः । [ २३ ] 'तद्धिताः तस्मै हितम्' इत्यादिना सूत्रेण तत्सम्बन्धिहिवेऽथे तद्धितप्रत्यया विधीयन्ते । अतश्च प्राधान्यात् तस्यैव सूत्रस्य प्रतीकतया 'तद्धित' इति संज्ञा। अथवा तस्मै वैयाकरणाय हिताः हितकराः [प्रत्ययाः ] 'तद्धिताः' इत्यर्थेनाप्यन्वर्थता ज्ञेया तद्धितप्रयोगेण प्रौढ़वैयाकरणता द्योत्यते। महावैयाकरणा एव तद्धितान्तप्रयोगान् प्रयुअते । तथाहि किवदन्ती "तद्धितमूढोऽवैयाकरणः कः कृदन्तं विना कविः" [२४] 'प्रत्ययः'-प्रतीयते प्रधानतया ज्ञायते इति प्रत्ययः । आहोरिवत् प्रत्येति प्रकृतिम् प्रति एति गच्छति इति प्रत्ययः । इत्येवमुभयथाऽपि विगृह्य प्रत्यय-शब्दनिर्माणेऽन्वर्थतवास्याः संज्ञायाः। [२५] 'पूर्वोऽभ्यास'-एकस्य वारं वारम् उचारणमेव तु अभ्यासः । एवं सति मूलशब्द एव द्विरुचरितः 'अभ्यास'-संज्ञको जायते । अत्श्च पूर्व-शब्दस्य 'अभ्याज' इति संज्ञा सार्थिफैव ।

(८) [२६ ] 'उभे अभ्यस्तम् '-अभ्यासेन पुनः पुनरुचारणेन जातम् अभ्यस्तम्' इत्युभयमेव 'अभ्यस्त'-संज्ञया बोध्यतेऽनः सार्थकतास्याः संज्ञायाः । [२७] अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा'- उपसमीपे धीयते स्थाप्यते इति उपधा अन्तिमाक्षरस्य समीयस्थो वर्णः 'उपधा' इति सार्थकतास्याः संज्ञायाः एवमेव सर्वेऽपि महाज्ञास्थाः शब्दाः सार्थका ज्ञेयाः दिङ्मात्र- मिह दर्शितम् वैयाकरणानामेतद्विषयिणी प्रवृत्तिं जौगरितुम् इत्यलम् । शिवं भूयात् ।

Paniniyaprabodh (purvardh)

Author
Shastri,gopal
Title
Paniniyaprabodh (purvardh)
File name
Paniniyaprabodh (purvardh)
Text
OCR done
Citation
1952
Published
2012/08
Publisher
Kashi.,amarvani Yantralaya
Language
Sanskrit
Pages
128
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313403
Barcode
99999990322094.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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