Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Upanishadon Ke Chodah Ratna
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उपनिषदोक
बौदह
हनुमानप्रसाद पोद्दार
मुकल्या रासस
घनश्यामदास भावरान
गीताप्रेस, गोरगपुर
स. १९९२ रो १९९७ तरू ११,२५०
स० १००० चतुर्थ सरकरण ३०००
सं० २००१ पाम सस्करण ५०००
मूल्य 1) आना
पता-गीताप्रेस, गोरखपुर
। श्रीहरि प्रार्थना उपनिषद् हमारी यह अमूल्य निधि है, जिसमें सरक्षित विविध ज्ञान-विज्ञानमयी अचिन्त्य रतराशिकी निर्मल सच्चिदानन्दमयी ज्योति- का एक कण प्राप्त करनेके लिये समस्त ससारके तत्त्वज्ञ श्रद्धापूर्वक सिर झुकाये और हाय पसारे खड़े हैं । उपनिपदोंमें उस कल्याणमय ज्ञानका अखण्ड और अनन्त प्रकाश है जो घोर क्लेशमयी और भधकारमयी भाटवीमें भ्रमते हुए जीरको सहसा उससे निकालकर नित्य निर्बाध ज्योतिर्मयों और पूर्णान दमयी ब्रह्मसत्तामें पहुँचा देता है। आन दकी बात है कि आज उही उपनिषदोंसे चुनी हुई कुछ कथाएँ पाठर्कोको भेंट की जा रही हैं । लगभग दस वर्ष पूर्व बम्बई में 'उपनिषदोनी बातो' नामक एक गुजराती पुस्तक देखी थी, तभी हिन्दीमें भी वैसी ही कथाएँ लिखनेका मन हुआ था और उसी समय कुछ कथाएँ लिखी गयी थी । उनमेंसे कुछ तो बिल्कुल गुजरातीकी शैलीपर ही थी और कुछ अन्य प्रकारसे । वे ही कथाएँ अब पाठकोंको पुस्तकरूपमें मिल रही हैं । इसके लिये गुजराती पुस्तकके लेखक और प्रकाशक महोदयका मैं हृदयसे कृतज्ञ हूँ। इस छोटी सी पुस्तकसे हिन्दीके पाठकोंने यदि लाभ उठाया तो सम्भव है आगे चलकर उपनिषदोंकी ऐसी ही चुनी हुई अयाय कथाओंके प्रकाशनकी भी चेष्टा की जाय । भूल चूकके लिये विद्वान् पाठकक्षमा करें और कृपापूर्वक सूचना दे दें, जिससे यदि नया सस्करण हो तो उस समय उचित सुधार कर दिया जाय | आशा है पाठक इस प्रार्थनापर ध्यान देंगे। विनीत हनुमानप्रसाद पोद्दार ५ " ८ १६ " भौहार विपय-सूची विषय १-वादी विजयी है (27 उपरिपके आधारपर) २-भोसा अतिथि (कठ १-यमराजका अतिथि २-अधिकारिपरी ३-श्रेय और रेय Y-साधन और सम्म ३-भारदर्म (सान्दोग्य ४-गाड़ीवालेका शान ५-गोसेवासे ग्रहाशान ६-अमिद्वारा उपदेश ( ७-निरभिमानी शिष्य ८-तत्त्वमसि ९-एक सौ एक यपकानाचय( १०-तीन यार द (बृहदारण्या ११-परम धन १२-घोड़े रिसे उपदेश ( १३-सर्वश्रेष्ठ प्रक्षनिष्ठ १४-सद्गुरुकी शिक्षा " " " " ) ४९ " " " " 3 ( . ८२ पर्तमान जिससे देवत
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(कठ ) " " ) " मोहरि विषय-सूची विपय पृष्ठ-सत्या १-नहा ही विजयी है (केन उपनिषद्के आधारपर) २-अनोखा अतिथि ८ १-यमराजका अतिथि २-अधिकारिपरीक्षा १६ ३-श्रेय और प्रेय ४-साधन और सरूप ३-आपद्धर्म (छान्दोग्य ४-गाड़ीवालेका शान ५-गोसेवासे ग्रहाशान ६-अमिद्वारा उपदेश ७-निरभिमानी शिष्य ८-तत्त्वमसि ९-एक सौ एफ वषका नक्षचय( १०-तीन पारद (बृहदारण्यक " ११-परम धन १२-घोड़ेके सिरसे उपदेश । ") १३-सवश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ ८२ १४-सद्गुरुकी शिक्षा (तैत्तिरीय ") " " " ( ( ( " " " " " " " " " " " पॉचवें सस्करणका निवेदन वर्तमान महायुद्ध के कारण इस बार आटपेपरकी भारी कमी हो गयी, जिससे केवल एक ही रंगीन चिन दिया जा सका है -प्रकाशक
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书生
是人心
--lee
श्रीहरि उपनिषदोंके चौदह रत्न ब्रह्म ही विजयी है एक समय स्वर्गके देवताओंने परमात्माके प्रतापसे असुरोंपर विजय प्राप्त की। इस विजयसे लोगोंमें देवताओंकी पूजा होने लगी। देवोंकी कीर्ति और महिमा सब तरफ छा गयी । निजयो मत्त देवता भगान्- को भुलकर कहने लगे कि हमारी हीजय हुई है। हमने अपने पराक्रम और बुद्धिबलसे दैत्योंका दलन किया है, इसीलिये लोग हमारी पूजा करते हैं और हमारे विजयगीत गाते हैं। मद अधा बना देता है, देवता भी विजयमदमें अधे होकर इस बातको भूल गये कि कोई सर्वशक्तिमान् ईश्वर है और उसीके बल और प्रभावसे सब कुछ होता है। उसकी सत्ता विना पेड़का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। भगवान् बडे दयालु हैं। उन्होंने देखा कि देवतागण मिथ्या अभिमानमें मत्त होकर मुझे भूलने लगे हैं, यदि इनके यह अभिमान दृढ़ हो गया तो असुरोंकी भाँति इनका भी सर्वनाश हो जायगा । विजय प्राप्त करनेपर जहाँ सत् पुरषोंमें नम्रता आती है वहाँ इनमें अभिमान बढ़ रहा है। यों विचारकर देवताओं के अभिमानका नाश कर उनका उपकार करनेके लिये परमात्मा ब्रह्मने अपनी लीलासे एक ऐसा अद्भुत कौतूहलप्रद रूप प्रकट किया जिसे देखकर देवताओंकी बुद्धि चक्कर खा गयी । देवता घबराये और उहोंने इस यक्ष सदृश रूपधारी अद्भुत ६ - उपनिषदोंके चौदह रत्न पुरुषका पता लगानेके लिये अपने अगुआ अग्निदेवसे कहा कि 'हे जातवेदस् * ! हम सबमें आप सर्वापेक्षा अधिक तेजस्वी हैं, आप इनका पता लगाइये कि ये यक्षरूप वास्तनमें कौन हैं । अग्निने कहा 'ठीक है, मैं पता लगाकर आता हूँ।' यों कहकर अग्नि वहाँ गये, परन्तु उसके समीप पहुँचते ही तेजसे ऐसे चकरा गये कि बोलनेतकका साहस नहीं हुआ। अन्तमें उस यक्षरूपी ब्रह्मने अग्निसे पूछा कि 'तू कौन है । अग्मिने कहा-'मेरा नाम प्रसिद्ध है, मुझे अग्नि कहते हैं और जातवेदस् भी कहते हैं । ब्रह्मने फिर पूछ-'यह सब तो ठीक है, परतु हे अग्नि | तुझमें किस प्रकारकी सामर्थ्य हे, तू क्या कर सकता है।" अग्निने कहा-'हे यक्ष ! इस पृथ्यी और अन्तरिक्षमें जो कुछ भी स्थावर-जङ्गम पदार्थ हैं उन सबको मैं जलाकर भस्म कर सकता हूँ।" ब्रह्मने सोचा कि इसका अहङ्कार बातोंसे नहीं दूर होगा, इसको कुछ चमत्कार दिखलाना चाहिये। यों सोचकर ब्रह्मने उसमें से अपनी शक्कि खींच ली और 'तस्मे तृण निदधो'-उसके सामने एक सूखे घासका तिनका डालकर कहा कि 'और सबको जलानेकी बात तो पीछे देखी जायगी, पहले 'एतहह'--इस तृणको तू जला।' अग्निदेवता अपने प्रे वेगसे तृणके निकट गये और उसे जलानेके लिये सर्व प्रकारसे यत्न करने लगे, परन्तु तृणको नहीं जला सके। लजासे उनका मस्तक नीचा हो गया और अन्तमें यक्षसे बिना कुछ कहे ही अग्नि- देवता अपना-सा मुँह लिये देवताओं के पास लौट आये और कहा कि मैं तो इस बातका पता नहीं लगा सका कि यह यक्ष कौन है । * जातवेदस्का भय धनक्य दावा या उत्पन्न हुए समन्न पदार्थोक्य शाता होता है।
ब्रह्म ही विजयी है - इसके बाद देवताओंने वायुसे कहा कि 'हेवायो ! तुम जाकर पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है। वायुदेव बहुत अच्छा' कहकर यक्षके पास गये, परन्तु उनकी भी अमिकी सी दशा हो गयी, वे बोल नहीं सके- यक्षने पूछा, 'तू कौन है " वायुने कहा- मैं वायु हूँ, मेरा नाम ओर गुण प्रसिद्ध हे--में गमनक्रिया करनेवाला और पृथ्वीकी गन्धको वहन करनेवाला हूँ। अन्तरिक्षमें गमन करनेवाला होनेके कारण मुझे मातरिश्वा भी कहते हैं।' यक्षने कहा---'तुझमें क्या सामर्थ्य है " वायुने कहा---'इस पृथ्वी और अन्तरिक्षमें जो कुछ भी पदार्थ हैं उन सबको मैं ग्रहण कर सकता हूँ (उड़ा सकता हूँ)।' ब्रह्मने वायुके सम्मुख भी यही सूखा तिनका रख दिया और कहा 'एतदादत्स्व' -इस तिनकेको उड़ा दे। वायुने अपना सारा बल लगा दिया, परन्तु तिनका हिला भी नहीं। यह देखकर वायुदेव बडे लजित हुए और तुरत ही देवताओंके पास आकर उन्होंने कहा-'हे देवगण ! पता नहीं, यह यक्ष कौन है, मैं तो कुछ भी नहीं जान सका ।' जब मुनीमोंसे काम नहीं होता तब मालिककी बारी आती है। इसी न्यायसे देवताओंने इन्द्रसे कहा कि 'हे देवराज ! अब आप जाइये।' इन्द्र यक्षके समीप गये। देवराजको अभिमानमें भरा हुआ देखकर यक्ष- रूपी ब्रह्म वहाँसे अन्तर्धान हो गये, इन्द्रका अभिमान चूर्ण करनेके लिये उनसे बाततक नहीं की । इन्द्र लज्जित तो हो गये, परन्तु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और ध्यान करने लगे। इतनेमें उहोंने देखा कि अन्तरिक्षमें अत्यन्त शोमायुक्त और सब प्रकारके उत्तमोत्तम अलङ्कारोंसे ८ - उपनिषदोंके चौदह रत्न विभूषित हिमवान्की काया भगक्ती पार्वतीउमाखड़ी हैं। पार्वतीके दर्शन कर इन्द्रको हर्ष हुआ और उन्होंने सोचा कि पार्वती नित्य ज्ञानबोध- स्वरूप भगवान् शिवके पास रहती है, अतएव इहें यक्षका पता अवश्य ही मालूम होगा । इन्द्रने विनयभाषसे उनसे पूछा- 'माता! अभीजो यक्ष हमें दर्शन देकर अन्तर्धान हो गये वे कौन थे. उमाने कहा- 'यह यक्ष प्रसिद्ध ब्रह्म था। हे इन्द्र ! इस ब्रह्मने ही असुरोंको पराजित किया है, तुमलोग तो केवल निमित्तमात्रहो, ब्रह्मके विजयसे ही तुमलोगोंकी महिमा बढ़ी है और इसीसे तुम्हारी पूजा भी होती है। तुम जो अपनी निजय और अपनी महिमा मानते होसो सन तुम्हारा मिथ्या अभिमान है, इसे त्याग करो और यह समझो कि जो कुछ होता है सो केवल उस ब्रह्मकी सत्तासे ही होता है।' उमाके वचनोंसे इन्द्रकी आँखें खुल गयीं, अभिमान जाता रहा। ब्रह्मकी महान् शकिका परिचय पाकर इन्द्र लौटे और उन्होंने अग्नि और वायुको भी ब्रह्मका उपदेश दिया अग्नि और वायुने भी ब्रह्मको जान लिया। इसीसे ये तीनों देवता सबसे श्रेष्ठ हुए ! इनमें भी इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माने गये। कारण, उहोंने ब्रह्मको सबसे पहले जाना था। इससे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मको सबसे पहले जाननेवाला ही सर्वश्रेष्ठ है। (केन उपनिषद्के आधारपर) (२) अनोखा अतिथि सत्ययुगका पवित्र काल है । देशभरमें यज्ञोंका प्रचार होरहा है। यज्ञघूममे और उसकी पवित्र सौरमसे आकाश मरा हुआ है। वेदके . - ।
१९ अनोखा अतिथि वरद मन्त्रोंसे दिशाएँ पूँजती हैं । यज्ञका हरि ग्रहण करनेके लिये खर्गसे देवगण पृथ्वीपर उतरते हैं । पवित्र और आनन्दमयी वाद्ययनिसे समस्त जीव प्रफुल्लित हो रहे हैं । यज्ञकर्ता यत्रकी पूर्णाहुति होनेपर परमश्रद्धासे ऋत्विगणको दक्षिणा बौटते हैं। आकाक्षारहित होकर सात्विक यज्ञ- कर्ता वेदविधिका पूर्णतया पालन करते हुए समस्त कार्यसम्पादन करते है। ऐसे पवित्र युगौं मषि वाजश्रयाके सुपुत्र उद्दालक मुनिने विश्वजित् नामक एकयज्ञ किया। इस यज्ञमें सर्वखदान करना पड़ता है। तदनुसार वाजश्रवस ( वाजश्रयाके पुत्र) उद्दालकने भी 'सर्ववेदसं ददौ'- अपना मारा धन ऋषियोंको दे दिया। कपि उहालकके नचिकेता नामक एक पुत्र था । जिस समय ऋषि ऋत्विज और सदस्योंको दक्षिणा बौट रहे थे और उसमें अच्छी-बुरी सभी तरहकी गौएँ दी जा रही थी उस समय बालक नचिकेताके निर्मल अन्त करणमें श्रद्धाने प्रवेश किया । नचिकेताने अपने मन में सोचा- पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रिया। अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ।। ( कठ०१।१।३) 'जो गोएँ (अतिम बार ) जल पी चुकी हैं, घास खा चुकी हैं और दूध दुहा चुकी हैं, जो शकिहीन अर्थात् गर्भ धारण करनेमें असमर्थ है, ऐसी गायोंको जो दान करता है वह उन लोकोंको प्राप्त होता है जो आन दसे शून्य हैं। यज्ञके बाद गौदान अवश्य होना चाहिये, परन्तु नहीं देने योग्य गौके दानसे दाताका उलटा अमङ्गल होता है । इस प्रकारकी उपनिषदोके चौदह रत मापनासे सरल हृदय नचिकेताके मन में बड़ी वेदनादुई और अपना बलि. दान देकर पिताका मनिष्ट निवारण करने के लिये उसने कहा--- तत फस्मै मा दाम्यसीति । 'हे पिताजी ! मैं भी आपका धन हूँ, मुझे आप किसको देते हैं । पिताने कोई उत्तर नहीं दिया । नचिकेताने फिर कहा- 'पिताजी! मुझे किसको देते हैं " पिताने इस बार भी उपेक्षा की। धर्मभीर नचिकेतासे नहीं रहा गया । उसने तीसरी बार फिर यही प्रश्न किया। मपि चिद गये और खीझकर कह उठे-'तुम्हें देता हूँ मृत्युको ।' 'मृत्यवे त्या दामीति' पिताके क्रोवमरे पचन सुनकर नचिकेता सोचने लगा कि 'शिष्य और पुत्रोंकी तीन श्रेणियों हुआ करती हैं--उत्तम, मध्यम और अपम।जो गुरुका अभिप्राय समझकर उसकी आज्ञाकी कोई प्रतीक्षा किये बिना ही सेवा करने लगते हैं वे उत्तम हैं। जो आज्ञा पारेपर कार्य करते हैं वे मायम हैं और जो गुरुका अभिप्राय समझ लेने और आज्ञा सुन लेनेपर भी गुरुके इच्छानुसार कार्य नहीं करते वे अधम कहलाते हैं । मैं प्रयम श्रेणीमें चाहे न होऊँ पर दूसरीमें तो अवश्य हूँ, मैं अधम तो कदापि नहीं हूँ, मुग सरीखे गुणसम्पन्न पुत्रको पिताजीने न मालूम क्यों यमको दे दिया ? मृत्यु-देवताका मुझसे क्या प्रयोजन सिद्ध होगा। सम्भवत पिताजीने क्रोधके आवेशमें ही ऐसा कह दिया है, परतु जो कुछ भी हो, पिताजीका वचन असत्य नहीं होना चाहिये। यों विचारकर उसने यमराजके यहाँ जानेका ही निश्चय कर लिया। धम पितृभक्ति और धन्य त्याग !!
अनोसा अतिथि पुत्रकी व्यवस्था देख ऋषि एक ओर बैठेपछतारहे थे कि मैंने कोध- में पुत्रसे क्या कह दिया, इतनेहीमें नचिकेताने जाकर पितासे कहा--- अनुपश्य यथा पूर्व प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्य पच्यते सस्यमिवाजायते पुन ॥ (26०१।१।६) 'हे पिताजी ! अपने पूर्वजोंका व्यवहार देखिये, इस समयके साधु पुरुषोंका व्यवहार देखिये । उनके चरित्रोंमें न कभी पहले असत्य था और न अब है । असाधु लोग ही असत्यका आचरण किया करते हैं। परन्तु उस असत्यसे कोई अजर-अमर नहीं होसकता ।मनुष्य अनाजकी तरह जराजीर्ण होकर मर जाता है और अनाजकी तरह ही कर्मवश पुन जन्मता है। अतएव इस अनित्य ससारमें मिथ्या आचरणसे क्या प्रयोजन है । आप अपने सत्यका पालनकर मुझे यमराजके पास जानेकी आज्ञा दीजिये।" पिताको बड़ा दुख हुआ, परन्तु पुत्रकी सत्यपरायणता देखकर ऋषिने आज्ञा दे दी । नचिकेताने पिताके वचनोंको निभाने के लिये यमसदनकी ओर प्रयाण किया । यमराजका अतिथि निमीकचित्त नचिकेताने पिताके आज्ञानुसार यमराजके घरपर आकर पता लगाया तो मालम हुआ कि यमराज कहीं बाहर गये हुए हैं। मचिकेताको तीनरात्रितक अन्न-जल ग्रहण किये बिना यमराजकी प्रतीक्षा करनी पड़ी। तीसरे दिन यमराजके लौटनेपर घरके लोगों ने उनसे कहा- वैश्वानर प्रविशत्यतिथिळह्मणो गृहान् । तस्यैतार शान्ति कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ (कठ० १११।७) । सर्यान् । १० उपनिषदा चारह रक्षा 'साक्षात् अपि ही मानण-अतिपिके रूपमें घरों प्रवेश करते हैं । साधु गृहम्प उस अनियिल्प अमिफे दाहकी शान्तिके ये उसे जल (पादा) दिया करते हैं । अतपय हे वैवस्वत । आप उस ग्रामण घाटकोपर धोनेके पिये ना ले जाइये। अनियि तीन दिनोंसे आपकी साट देखता हुक्षा मनशन ठिये बैठा है, भतएष आप स्वय उसकी से करेंगे तभी यह शात होगा।' पाशामतीक्षे सहत सूरता च इष्टापूर्ते पुत्रपध पतद्गुट्के पुरपम्पाल्पमेधसो यस्यानिन् पसति ब्राह्मणो गृदे । (कार. १.८) 'निस अल्पनुद्धि पुरुपके घरपर अतिथि ग्राहग बिना भोजन किये रहता है उस मन्दबुद्धिकी सारी आशाऔर प्रतीक्षाएँ --शात और अज्ञात वस्तुओं के प्राम होने की इच्छाएँ, उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाला पल, उसकी सम्पत्ति, पुत्र, पशु, सापभाषण, यज्ञ और सारे पूर्त (युएँ, तालान, धर्मशाला आदि बनानेका पुण्य) नष्ट हो जाते हैं । इस बात- को सुनकर यमराज जलसे भरा हुआ स्वर्णकलश लेकर दौड़ और अतिथि नचिकेताको पादार्घ्य देकर आदरपूर्वक कहने लगे- तिनो रात्रीर्यवारसीहे मे अननन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमभ्य । नमस्तेऽस्तु ब्रामन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति श्रीन् परान् वृणीष्य ॥ (२००१।१।९) - । अनोसा अतिथि 'हे ब्राह्मण ! तुम नमस्कार करने योग्य अतिथि होकर मेरे घर- पर तीन दिनसे बिना कुछ खाये पडे हो, तुमको नमस्कार है और इससे मेरे दोषकी निवृत्ति होकर मेरा कल्याण हो। मुझसे बड़ा अपराध हुआ है । अतएव तुम प्रत्येक रात्रिके लिये एक-एक वरके हिसाबसे कुल तीन वर मुझसे माँग लो। यमराजके द्वारपर तीन दिनतक अतिथि भूखा पड़ा रहे, कितना बड़ा अपराध! प्राचीन भारतमें अतिथिसेवा गृहस्थका सबसे आवश्यक फर्म माना जाता था। धर्मशास्त्रोंमें लिखा है कि अतिथिको साक्षात् नारायण मानकर उसकी सेवा करनी चाहिये। जो गृहस्थ अतिथिसेवासे शून्य है, उसके समस्त शुभ कर्मोंको कह भूखा अतिथि ले जाता है। भारतके वैदिक युगमें घरपर आये हुए अतिथि-नारायणकी बड़ी सेवा होती थी। यमराजका यह उदाहरण बड़े ही महत्त्वका है । जिस दिनसे भारतने इस परसेवाव्रतके बन्धनको ढीला कर दिया, जबसे भारतके गृहस्थ केवल अपने स्त्री पुनोंके भोगविलासकी सामग्रियों का प्रबंध करने में ही कर्तव्य- की इतिश्री मानने लगे, जबसे अतिथि नारायणों के लिये गृहस्थका द्वार बंद होने लगा, तभीसे भारतको दुर्गति आरम्भ हो गयी ! अस्तु, यमराज- की बातको सुनकर सदास तुष्ट' नचिकेताने यह सोचकर कि पिताको मुख पहुँचाना ही पुत्रका सबसे प्रथम कर्तव्य है, यमराजसे यही पहला घर माँगा- शान्तसङ्करप सुमना यथा स्या द्वीतमन्युर्गीतमो माभि मृत्यो। त्वत्प्रसृष्ट भाभिवदेत् प्रतीत प्रयाणा प्रथम वर वृणे ॥ (कठ०१।१।१०) उपनिषदा पौरख रखा हे मुरयो । तीन यरोनेसे 'प्रयम यर महीमोगता है कि मेरेरिता मेरे प्रति जा तसङ्कल्प, प्रसन्नचित और कोपरक्षित हो जाय और जब मैं मापके यहोसे छोटकर घर जाऊँ तो में मुझे पहचानार मुझसे प्रेमसे मानचीत करें। यमराजने तयारतु' यहकर कहा कि मेरे द्वारा तुम्हारे पापस लौट जापर तुम्हारे पिता पहलेकी भाँति तुम्हें पहचानो,मायुकि मुनमेटे पए तुमको देखकर ये सुखमे सोयेंगे और उनका मोष शान्त हो जाय। पितृभक्त यालककी पहली कामना पूर्ण हई। नचिकेताने इस प्रकार पिताका मुग्यसम्पादनकर फिर समस्त जीवोंके गाट के लिये सके माधन अमितत्यको जाननेके लिये यमराजसे कहा-~-हे मृत्यो! स्वर्गमें कुछ भी भय नही है, यहो न माप (मृत्यु) है, न किसीको बुदापेका भय है, भूख प्याससे पार होकर और शोकमे तरकर वहाँ पुरुष बड़ा आनद भोगता है। अतएव हे मृत्यो ! आप उस वर्ग साधाभूत अमिको पपायरूपसेजानते हैं । मुझ श्रद्धावान्को आप यह पतलाइये । कारण, उसको जानकर लोग स्वर्गम रहकर अमृतव ( देवस्व ) को प्राप्त होते है। यह मैं दूसरा पर माँगता है। यमराजने घड़ी तपस्या करके अग्निविधाको जाना था। वास्तविक अधिकारी विना इस विचाको देनेसे दाता और ग्रहीता दोनोंमसेक्सिीका कल्याण नहीं होता। परन्तु भाज नचिकेताको उत्तम जिनासु जानकर अग्नितत्तका महत्व बतलाते हुए यमराज बोले-- प्र ते प्रवीमि तदु में नियोध स्वायमसि नचिकेत प्रजानन् । . - अनोखा अतिथि अनन्तलोकाप्तिमयो प्रतिष्ठा विद्धि त्वमेत निहित गुहायाम् ॥ (कठ.१११।१४) 'हे नचिकेता! मैं उसस्वर्गके साधनभूत अग्निको भलीभाँति जानता हूँ और तुमको बतलाता हूँ,तुम इसको अच्छी तरह सुनो। यह अग्निअनन्त (वर्ग) लोककी प्राप्तिका साधन है, विराटरूपसेजगत्की प्रतिष्ठाका मूल कारण है। इसे तुम विद्वानोंकी बुद्धिरूप गुहामें स्थित जानो।' इसके अनन्तर यमराजने नचिकेताको समस्त लोकोंके आदिकारण उस अग्निकी और उसके लिये जैसी ओर जितनी ईंटें चाहिये, वे जिस प्रकार रक्खी जानी चाहिये,सोसब बतलाया अर्थात् यज्ञस्थानके निर्माणके लिये आवश्यक सामग्रियों और अग्निचयन करने की विपिको बतलाया। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने यमराजकी कही हुई सारी बातोंको दुहराकर अपनी प्रतिभाको सिद्ध कर दिया। यमराजको बालकको अप्रतिम योग्यता देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई और उहोंने पहले तीन वरोंके अतिरिक्त एक चौथा यह यर और दिया कि- तवैव नाम्ना भवितायमशि चेमामनेफरूपा गृहाण ॥ (कठ०१।१।१६) मैंने जिस अग्निकी बात तुमसे कही नह तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। और तुम इस विचित्र रत्नोंवाली शब्दवती मालाको भीग्रहण करो।' नचिकेताका तेजोदीप्त मुखमण्डल प्रसन्नतासे भर गया। यमराज फिर बोले 'जिसने यथार्थरूपसे माता पिता और आचार्यके उपदेशानुसार तीन बार नाचिकेत अनिकी उपासना कर यज्ञ, वेदाध्ययन और दान किया है वह 1 उपनिषदोरे चौपदरता जग और मृत्युको तर जाता है और जब यह माग्यवान् पुरुष उस अग्नि- को मारे उपना, ITमापन पूजनीय देय जाता है तब यह शान्तिको प्राप्त दोता जो नागिन माग माप, संध्या और आनि देनेकी प्रणालीको जानकर उमकी उपासना करता है पर देहपानमे पदले दी मृत्यु के पाशको तोदकर और शोकरहित होकर स्वर्गमें भानन्दको प्राम होता है।' नाचिरेत अग्निको स्वर्गवासाधन यतलाकर और उसकी पुर और प्रशंसा परके गमराजने नचिकेतासे कहा-'तृतीय घर नचिकेतो पृणीप्य'--'हे नचिये ! अब तीसरा घर मोंगो।" अधिकारिपरीक्षा पितायी प्रसन्नताफा पर इस लोकके लिये और स्वर्गक साधन अग्निका ज्ञान परलोकके लिये यरकर नचिकेता सोचना है कि क्या खर्गसुवमें ही जीपका परम कल्याण है। वर्गसे मी तो पुण्यारमाओंका पुण्य क्षय होनेपर वापस लौटना सुना जाता है, अतएव भव तीसरे बरसे उस मृत्युतर या आत्मतत्वको जानना चाहिये जिसके जाननेपर और कुछ जानना बाकी नहीं रह जाता।यो सोचकर 'आरमा परलोकमें जाता है या नहीं, मरने के बाद आत्माकी क्या गति होती है - -इस आत्मज्ञान- के जटिल प्रश्नको समझने के हेतुसे नचिकेताने यमराजसे कहा-'मृत मनुष्य के विषयमें एक सशय है। कोई कहते हैं ..~-शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धिके अतिरिक्त देहातरसम्बधी कोई अ य आत्मा है। कोई कहते है-ऐसा कोई खतत्र मात्मा नहीं है । प्रत्यक्ष या अनुमानसे इस विषयका कोई निर्णय नहीं हो सकता । आपमृत्युके अविपति देवता है, अनोखा अतिथि 1 अतएव मैं यह भात्मतच आपमे जानना चाहता हूँ । यही तीसरा वर मैं माँगता हूँ। नचिकेताका महत्वपूर्ण प्रश्न सुनकर यमराजने सोचा--- 'ऋषिकुमार बालक होनेपर भी है बड़ा ही बुद्धिमान् , कैसे गोपनीयतत्व- को जानना चाहता है। परन्तु आत्मतत्व उपयुक पात्रको ही बतलाना उचित है, अनधिकारीके समीप आत्मतत्त्व प्रकट करनेसे हितके स्थानमें प्राय अनिष्ट ही हुआ करता है। इसलिये पहले पात्र-परीक्षाको आवश्यकता है ।' यो विचारकर यमराजने इस तत्सकी कठिनताका बखान करके नचिकेताको टालना चाहा । यमराजने कहा-'देवताओंको भी पहले इस विषयमें सन्देह हुआ था। इस आत्मतत्त्वका समझना कोई आसान बात नहीं, यह बड़ा ही सूक्ष्म विषय है, अतएव हे नचिकेता! तुम दूसरा वर माँगो, इस बरके लिये मुझे मत रोको।' नचिकेता विषयकी कठिनताका नाम सुनकर घबराया नहीं, परन्तु और भी अधिक दृढ़तासे कहने लगा-'हे मृत्यो । पूर्वकालमें देवताओं- को भी जब इस विषयमें सन्देह हुआ था औरजन आप भी कहते हैं कि यह विषय आसान नहीं है, तब मुझे इस विषयका समझानेवाला आपके समान दूसरा वक्ता ढूँढ़नेपर भी कोई नहीं मिल सकता । आप किसी दूसरे वरके लिये कहते हैं, परन्तु मैं समझता हूँ कि इसकी तुलनाका और कोई वर नहीं है, क्योंकि यही कल्याणकी प्राप्तिका हेतु है। अतएव मुझे यही समझाइये। किसी विपयको जब नहीं बतलाना होता है तो सबसे पहले उसकी कठिनताका भय दिखलाया जाता है। यमराजने भी परीक्षाके लिये यही किया, परन्तु नचिकेता इस परीक्षा उत्तीर्ण हो गया। अबकी बार यमराजने और भी कठिन परीक्षा लेनी चाही । साधककी परीक्षाके चौर- उपनिपदोंके चौदह रत जम और मृत्यु तर जाता है और जब वह भाग्यवान् पुरुष उस अग्नि- को मासे उत्पन्न हुआ, ज्ञानसम्पन्न पूजनीय देव जानता है तब वह शान्तिको प्राप्त होता है। जो नाचिकेत अग्निफे स्वरूप, सध्या और माहुति देनेकी प्रणालीको जानकर उसकी उपासना करता है वह देहपातसे पहले ही मृत्यु के पाशको तोड़कर और शोकरहित होकर स्वर्गमें आनन्दको प्राप्त होता है।' नाचिकेत अनिमोस्वर्गका साधन बतलाकर और उसकी कुछ और प्रशंसा करके रामराजने नचिकेतासे कहा-'तृतीय घर नचिकेतो घृणीप्य'--'हे नचिकेता ! अब तीसरा वर माँगो ।' अधिकारिपरीक्षा पिताको प्रसन्नताका वर इस लोकके लिये और स्वर्गक साधन अग्निका ज्ञान परलोकके लिये यरकर नचिकेता सोचता है कि क्या वर्गसुखमें हो जीनका परम कल्याण है। वर्गसे भी तो पुण्यात्माओंका पुण्य क्षय होनेपर वापस लौटना सुना जाता है, अतएव अब तीसरेपरसे उस मृत्युतत्व याआत्मतत्त्वको जानना चाहिये जिसके जाननेपर और कुछ जानना बाकी नहीं रह जाता।यों सोचकर 'आत्मा परलोकमें जाता है या नहीं, मरनेके बाद आत्माकी क्या गनि होती है - -इस आत्मज्ञान- के जटिल प्रश्नको समझने के हेतुसे नचिकेताने यमराजसे कहा-~-मृत मनुष्यके विषय में एक सशय है। कोई कहते हैं--शरीर, इन्द्रियाँ, मन ओर बुद्धिके अतिरिक्त देहा तरसम्बधी कोई भय आमा है। कोई कहते है-ऐसा कोई स्वतन्त्र आत्मा नहीं है । प्रत्यक्ष या अनुमानसे इस विषयका कोई निर्णय नहीं हो सकता। आप मृत्युके अस्पिति देवता हैं, अनोखा अतिथि अतएव मैं यह आत्मतत्व आपसे जानना चाहता हूँ। यही तीसरा वर मैं माँगता हूँ। नचिकेताका महत्त्वपूर्ण प्रश्न सुनकर यमराजने सोचा- 'ऋषिकुमार बालकहोनेपर भी है बड़ा ही बुद्धिमान् , कैसे गोपनीयतत्त्व- को जानना चाहता है। परन्तु आत्मतत्त्व उपयुक्त पात्रको ही बतलाना उचित है, अनधिकारीके समीप आत्मतत्व प्रकट करनेसे हितके स्थानमें प्राय अनिष्ट ही हुआ करता है । इसलिये पहले पात्र-परीक्षाकी आवश्यकता है। यों विचारकर यमराजने इस तत्तकी कठिनताका बखान करके नचिकेताको टालना चाहा । यमराजने कहा- देवताओंको भी पहले इस विषयमें सदेह हुआ था। इस आत्मतत्वका समझना कोई आसान बात नहीं, यह बड़ा ही सूक्ष्म विषय है, अतएव हे नचिकेता ! तुम दूसरा वर माँगो, इस वरके लिये मुझे मत रोको ।' नचिकेता विषयकी कठिनताका नाम सुनकर घबराया नहीं, परन्तु और भी अधिक दृढ़तासे कहने लगा- -'हे मृत्यो! पूर्वकालमें देवताओं- को भी जब इस विषयमें सन्देह हुआ था औरजब आप भी कहते हैं कि यह विषय आसान नहीं है, तब मुझे इस विषयका समझानेगाला आपके समान दूसरा धक्का ढूँढनेपर भी कोई नहीं मिल सकता। आप किसी दूसरे वरके लिये कहते हैं, परन्तु मैं समझता हूँ कि इसकी तुलनाका और कोई वर नहीं है, क्योंकि यही कल्याणकी प्राप्तिका हेतु है। अतएव मुझे यही समझाइये ।। किसी विषयको जब नहीं बतलाना होता है तो सबसे पहले उसकी कठिनताका भय दिखलाया जाता है । यमराजने भी परीक्षाके लिये यही किया, परन्तु नचिकेता इस परीक्षा उत्तीर्ण हो गया । अबकी बार यमराजने और भी कठिन परीक्षा लेनी चाही। साधककी परीक्षाके
उपनिषदा चौदप रखा
लिये दो ही प्राशन होते हैं-Vफ मय' और दूसरा 'लोम' ।
नचिकेता भपसे नहीं हिगा, इसटिये अन यमराजने दूसरे शब लोम
का प्रयोग उसपर किया । यमराजने कहा-
'मालक ! तुम क्या फरोगे ऐसे परको लेकर ' तुम महण करो
इन भुसकी विशाल साममियोंको'-
शतायुप' पुत्रपौत्रान
पृणीय
पहन पशून् हस्तिहिरण्यमवान् ।
भूमेर्महदायतन वृणीप्य
म्यय ध जीय शरदो यारदिच्छसि ।।
(२४.१।१।२१)
'सौ-सौ वर्ष जीनेवाले पुन पौन मोंगो, गौ आदि बहुत-से पशु,
हायी, सुवर्ण, घोड़े और विशाल भूमण्डलका राज्य माँगो और इन
सबको भोगनेके लिये जितने वर्ष जीनेकी इच्छा हो उतने ही वर्ष
जीते रहो।' इतना ही नहीं,--
पतत्तुत्य यदि मन्यसे
घर
धृणीप्य वित्त चिरजीविका च ।
महाभूमी नचिकेतस्त्वमेधि
कामानां त्वा काममाज करोमि।
(क्र.१।१।२४)
इसीके समान और कोई घर चाहो तो उसे, और प्रचुर धनके
साथ दीर्घजीपन माँग लो, अधिक क्या इस विशाल भूमिके तुम सम्राट
बन जाओ। मैं तुम्हें अपनी सारी कामनाओंका इच्छानुसार भोगने-
वाला बनाये देता हूँ। इसके सिवा-
-
अनोखा अतिथि । ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाश्छन्दत प्रार्थयख। इमा रामा सरथा सतूर्या न हीडशा लम्भनीया मनुष्य । आमिर्मत्प्रत्ताभि परिचारयस्व नचिकेतो मरण मानुपाक्षी ॥ (कठ० १११।२५) 'जो-जो भोग मृत्युलोकमें दुर्लभ हैं, उन सबको तुम अपने इच्छा- नुसार मोगलो। येरथोंसमेत और बाघोंसमेत जो सुन्दर रमणियाँ हैं, ऐसी रमणियों मनुष्योंको नहीं मिल सकती। मेरे द्वारा दी हुई इन सारी रमणियों- से तुम अपनी सेवा करामो, परन्तु, है नचिकेता ! मुझे मरणसम्बधी (मृत्युके बाद आत्मा रहता है या नहीं ) यह प्रश्न मत पूछो।' ससारमें ऐसा कौन है जो बिना चाहे इतनी भोगसामग्रियों और उनके मोगनेके लिये दीर्घजीवनव्यापी सामर्थ्य प्राप्त होनेपर भी उन्हें नहीं चाहेगा, सुनते ही लार टपकने लगती है, परन्तु विचार और वैराग्य- की उच्च भूमिकापर पहुँचा हुआ नचिकेता अटल और अचल है, यम- राजके प्रलोभनोंका उसके मनपर कोई असर नहीं हुआ। सत्य है- रमाविगस राम अनुरागी । तजत बमन इव नर बहभागी ॥ 'जो बड़भागी रामके प्रेमीजन हैं वे रमाके विलास (भोगों) को यमनके समान त्याग देते हैं। जिसने एक बार विश्वविमोहन मनोहर झाँकीकी अनोखी छटा देख लो, यह फिर विषयोंकी ओर भूलकर भी नहीं झोंकना। नचिकेताने कहा-~-'हे मृत्यो! आपने जिन भोग्य बुस्तुओंका S तक रहेंगी या नहीं, इसमें भी सन्देह है। ये मनुष्य- - २० । उपनिपाके चौदह रत की सारी इन्द्रियों के तेगको दरण कर लेती हैं। आपने मो दीर्घजीवन देना चाहा, याद मी मनात पायी तुटना में बहुत थोड़ा दी है। जब मझाका जीपन भी अन्य माना है तपोरोंकी तो बात ही क्या है । अतण्य में यह सर नही पाहता। आपके रप, घोडे, हाथी सोर नाच-गान आपके ही पास रहें। धनसे मनुष्य कभी गृप्त नहीं होता, जो केरल कामाया ही विस्तार है, यहोवृति केसी भोगविटासकी तृष्णा अभार और अपूर्णता- में मति और आकांक्षाके सिवा और क्या रह सकता है । अतएव 'यरस्तु मे घरणीय स एव'-मुझे तो यही मारमतवाप पर चाहिये । मला, अजर और अमर देवताओं के समीप आकर नीचेके भृत्युलोकका जरा-मरणशील कौर ऐसा मनु-य होगा जो अम्भिर और परिणाममें दुख देनेगले विषयोंको चाहेगा' शरीरके सौन्दर्य और विषय- भोगके प्रमादोंको अनित्य और क्षणभगुर समझकर भी कौन ऐसा समझदार होगा जो संसारके दीर्घजीउनमे मानद मानेगा ! पतएय हे मृत्यो ! जिसके विषयमें लोग संशय करते हैं, जो महान् परलोकके विषयमें निर्णयात्मक आत्मतसविज्ञान है, मुझे यही दीजिये । योऽय यरो गृहमनुमयिष्टो तस्मानचिकेता सृणीते। (घट०१।१।२१) यह आरमतत्यसमधी घर गूढ़ होनेपरभी नचिकेता इसके सिना दूसरा ( अज्ञानी पुरुषोंद्वारा इच्छित ) अनित्य यर नहीं चाहता।' इम अग्निपरीक्षामें भी नचिकेता उत्तीर्ण हो गया। यमराजने भर नचिकेताको आरमज्ञानका पूर्ण अधिकारी समझा । वास्तवमें जो इस - अनोखा अतिथि मायामय जगत्के सारे सुखोंके मनोहर चित्र, धनके प्रलोमन, रमणियों के रमणीय प्रणय-वधन और कमनीय कीर्तिकी कामनामादि सभी पदायोंको आमज्ञानकी तुलनामें काकविष्ठापत् या जहरके लड्डुओंके समान अत्यत हेय और त्याज्य समझता है, जो इस लोक और परलोकके बड़े- से-बड़े भोगोंको तुच्छ समझकर सबको लात मार सकता है वही आत्म- ज्ञानका यथार्थ अधिकारी है। परन्तु जो कौडी-कौड़ीके लिये जम- जन्मान्तरतक वैरभावको आश्रय देनेके लिये तैयार रहते हैं और काम पड़नेपर आत्मज्ञानके सिवा दूसरी बात नहीं करते, वैसे लोग किस अधिकारके प्राणी हैं, इस बातको विज्ञ पाठक स्वय सोच लें। विषयवैराग्य, साधुसङ्गति और भजन साधनके प्रभावसे पहले आत्म- ज्ञानका अधिकार प्राप्तकर तदनतर उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न फरना चाहिये नहीं तो उभयभ्रष्ट होनेकी ही अधिक सम्भावना है। श्रेय और प्रेय यमराजने नचिकेताको परम वैराग्यवान्, निर्मीक और उत्तम अधिकारी समझकर परम प्रसन्न होकर कहा कि 'हे नचिकेता एक वस्तु श्रेय (कल्याण) है और दूसरी वस्तु प्रेय है ( श्रेय मनुष्यके वास्तविककल्याण मोक्षका नाम है और प्रेय स्त्री-पुन, धन-मानादि प्रिय लगनेवाले पदार्योंका नाम है)। इन दोनोंका भिन्न-भिन्न प्रयोजन है और ये अपने-अपने प्रयोजनमें मनुष्यकोषाधते हैं। इन दोनों से जो श्रेयको ग्रहण करता है उसका कल्याण (मोक्ष) होता है और जो प्रेयको चुनता है वह आपातरमणीय घन मानादिमें फंसकर पुरुषार्थ से भ्रष्ट होजाता है। श्रेय और प्रेय दोनों से मनुष्य चाहे जिसको ग्रहण कर सकता है। युद्धिमान् पुरुष श्रेय और प्रेय दोनोंके गुण-दोषोंको मलीभाँति - उपनिरोके चौदह रहा की सारी इन्द्रियोंके तेजको हरण कर लेती हैं। आपने जो दीर्घजीवन देना चाहा है, वह भी मनत्त कारकी तस्नामें यत्त पोसा ही है। जब प्रझाका जीवन भी अन्य कारका तय मोरोंकी तो बात ही क्या अतएवं में यह सर नहीं चाहता। आपके रथ, घोदे, दापी और नाच-गा आपके ही पास रहें ।' धनसे मनुष्य कभी तृप्त नहीं होता, जहों केरल कामनाका ही विस्तार है, यो तृप्ति कैसी मोगरिसकी तृष्णा अमान और अपूर्णता- में अतृमि और भाकाक्षाके सिया और क्या रह सकता है। अतरव 'परस्तु में परणीय स एय'-मुझे तो यही आत्मतत्वदप पर चाहिये । मला, मजर और अमर देवताओंके समीप भाकर नीचेके मृत्युलोकका जरा-मरणशील कौन ऐसा मनुष्य होगा जो अस्थिर और परिणाममें दु ख देनेवाले विषयोंको चाहेगा। शरीरके सौदर्य और विषय- भोगके प्रमादोंको अनित्य और क्षणभार समझकर भी कौन ऐसा समझदार होगा जो संसारके दीर्घजीयनसे आनन्द मानेगा ! अतएय हे मृत्यो ! जिसके विषयमें लोग सशय करते हैं, जो महान् परलोकके विषयमें निर्णयात्मक आत्मतस्य विज्ञान है, मुझे यही दीजिये। योऽय घरो गृढमनुप्रविष्टो मान्य तस्मानचिकेता घृणीते॥ (वठ०१।१।२९) यह आत्मतत्वसम्बन्धी वर गूद होनेपर भीनचिकेता इसके सिगा दूसरा ( अज्ञानी पुरुषोंद्वारा इच्छित ) अनित्य वर नहीं चाहता ।' इस अग्निपरीक्षामें भी नचिकेता उत्तीर्ण हो गया। यमराजने अत्र नचिकेताको आत्मज्ञानका पूर्ण अधिकारी समझा । वास्तवमें जो इस अनोखा अतिथि मायामय जगत्के सारे सुखोंके मनोहर चित्र, धनके प्रलोभन, रमणियोंके रमणीय प्रणय-बन्धन और कमनीय कीर्तिकी कामना आदि सभी पदार्पोको आत्मज्ञानकी तुलनामें काकविष्ठापत् या जहरके लड्डुओंके समान अत्यन्त हेय और त्याग्य समझता है, जो इस लोक और परलोकके बड़े- से-बड़े भोगोंको तुच्छ समझकर सबको लात मार सकता है वही आत्म- ज्ञानका यथार्थ अधिकारी है। परन्तु जो कौडी कौड़ीके लिये जम- जमान्तरतक वैरभावको आश्रय देनेके लिये तैयार रहते हैं और काम पड़नेपर आत्मज्ञानके सिवा दूसरी बात नहीं करते, वैसे लोग किस अधिकारके प्राणी है, इस बातको विज्ञ पाठक स्वय सोच लें । विषयवैराग्य, साधुसङ्गति और भजन साधनके प्रभावसे पहले आत्म- ज्ञानका अधिकार प्राप्तकर तदनन्तर उसकी प्राप्तिके लिये प्रयन करना चाहिये नहीं तो उभयभ्रष्ट होनेकी ही अधिक सम्भावना है। श्रेय और प्रेय यमराजने नचिकेताको परम वैराग्यरान, निर्भीक और उत्तम अधिकारी समझकर परम प्रसन्न होकर कहा कि 'हे नचिकेता! एक वस्तु श्रेय (कल्याण) है और दूसरी वस्तु प्रेय है (श्रेय मनुष्यके यास्तविक कल्याण मोक्षका नाम है और प्रेय स्त्री-पुत्र, धन-मानादि प्रिय लगनेवाले पदार्थोंका नाम है)। इन दोनोंका भिन्न-भिन्न प्रयोजन है और ये अपने अपने प्रयोजनमें मनुष्यको बौधते हैं। इन दोनों से जोश्यको ग्रहण करता है उसका कल्याण (मोक्ष) होता है और जो प्रेयको चुनता है वह आपातरमणीय धन मानादिमें फंसकर पुरुषार्थसे भ्रष्ट हो जाता है। श्रेय और प्रेय दोनों से मनुष्य चाहे जिसको ग्रहण कर सकता है। बुद्धिमान् पुरुष श्रेय और प्रेय दोनोंके गुण-दोषोंको भलीभाँति नेता सूर २२ उपनिषदोंके चौदह रत सगाकर उनका भेद करता है और नीर-क्षीरविवेकी हसकी तरह प्रेयको त्यागकर श्रेयको ग्रहण करता है । पल्तु मूर्ख टोग प्रेयो मन्दो योग क्षेमाद् घृणीते'-योगक्षेमके लिये यानी प्राप्त नी, पुत्र, धनादिकी रक्षा और प्राप्त भोग्य पदार्थोकी प्राप्तिके लिये प्रेयको ही ग्रहण करते हैं। हेनचिकेता --- सत्व प्रियान् प्रियरूपारपच फामा मभिघ्यायन्नचिकेतोऽत्यनाक्षी विचमयीमयाप्तो यस्या मजन्ति यहयो मनुप्या ॥ (4ठ०१।२३) 'तुमने मेरे द्वारा बार-बार प्रटोमन दिखाये जानेपर भी जो प्रिय सी-पुत्रादि और प्रियरूप अप्सरादि समस्त भोग्य विषयोंको अनित्य समझकर त्याग दिया, इस द्रव्यमयी निकृष्ट गतिको तुम नहीं प्राप्त हुए, जिसमें कि साधारणत बहुत-से मनुष्य इवे रहते हैं। इस भाषणसे यमराजने नचिकेताके पिवेक और वैराग्यकी विशेष प्रशंसा कर वित्तमयी ससारगतिकी निन्दा की और साथ ही विवेक- वैराग्यसम्पन्न मनुष्य ही ब्रह्मज्ञानका अधिकारी है, यह भी सूचित किया। इसके अनन्तर श्रेय और प्रेयके परस्पर विपरीत फल उत्पन करनेके कारणकी मीमासा करते हुए यमराज कहने लगे-- दूरमेते विपरीते विपूची अविधा या च विधेति ज्ञाता। विधाभीप्सिन नचिकेतस मन्ये न त्या कामा यहयोऽलोलुपन्त ॥ (कठ० ।।४) -
अनोखा अतिथि
4
विद्या और अविद्या ये दोनों प्रसिद्ध हैं, ये दोनों एक-दूसरेसे
अत्यन्त विपरीत मौर भिन्न-भिन्न तरफ ले जानेवाली हैं। हे नचिकेता!
मैं तुम्हें विधाका अभिलाषी मानता हूँ, क्योंकि तुम्हें बहुत-से भोग भी
नहीं लभा सके।
अविद्यायामन्तरे वर्तमाना
धीरा पण्डितमन्यमाना।
दन्दम्यमाणा
परियन्ति
अधेनेव नीयमाना
यथान्धा॥
(कठ०१।२।५)
'अविद्यामें पड़े हुए भी जो लोग अपनेको बड़े बुद्धिमान और
पण्डित मानते हैं वे भोगकी इच्छा करनेवाले मूढजन अधेसे चलाये हुए
अधोंकी तरह चारों ओर ठोकरें खाते भटकते फिरते हैं।'
वास्तवमें आजकल जगत्में ऐसे अनेक मनुष्य हैं जो बिना समझे-
बूझे ही अपनेको तत्त्वज्ञानी माने हुए हैं । यदि उनके अन्त करणका
दृश्य देखा जाय तो उसमें नानाप्रकारको कामनाओंका ताण्डवनृत्य होता
हुआ दिखायी पड़ता है। परन्तु बातों और तकों में कहींपर ब्रह्मज्ञानमें जरा-
सी भी त्रुटि नहीं दीखती । यमराजके कथनानुसार इस प्रकारके मिथ्या-
ज्ञानियोंके लिये मोक्षका द्वार बद रहता है और उन्हें पुन -पुन आवा-
गमनके चममें ही ठोकरें खानी पड़ती हैं। 'पुनरपिजनन पुनरपि मरणं
पुनरपि जननीजठरे शयनम्' ऐसा क्यों होता है यमराज कहते हैं-
-
साम्पराय
प्रतिभाति बाल
वित्तमोहेन मूढम् ।
प्रमाधन्त
२४ उपनिषदोंके चौदह रत धनके मोहसे मोहित, प्रमादमें रत रहनेवाले मूर्खको परलोक या कल्याणका मार्ग दीखता ही नहीं। वह तो केवल-~- अय लोफो नास्ति पर इति मानी पुनर्वशमापयते (कठ०१।२।० 'यही मानता है कि स्त्री-पुत्रादि भोगोंसे भरा हुआ एकमात्र यही लोक है, इसके सिवा परलोक कोई नहीं है। इसी मान्यताके कारण उसे बारबार मेरे (मृत्युके ) अधीन होना पड़ता है।' यमराज फिर बोले कि हे नचिकेता! आत्मज्ञान कोई साधारण सी बात नहीं है। अनेक लोग तो ऐसे हैं जिनको आत्माके सम्बन्धको बातें सुननेको ही नहीं मिलतीं । बहुत-से लोग सुनकर भी इसे जान नहीं सकते, आत्माका पक्का भी आश्चर्यरूप कही ही कोई मिलता है और इस आत्माको प्राप्त करनेवाला भी कहीं कोई एक निपुण पुरुष ही होता है, इसी प्रकार किसी निपुण आचार्यसे शिक्षाप्राप्त कोई बिरला ही आश्चर्यरूप पुरुष आत्माको जाननेवाला होता है। 'किसी साधारण मनुष्यके विवेचनसे आत्माका यथार्थ ज्ञान नहीं होता, आत्मज्ञान तभी होता है जब उसका उपदेश किसी अनन्य ( अमेददी) समर्थ पुरुषके द्वारा किया जाता है, क्योंकि यह (आत्मा) सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म होनेके कारण सर्वथा अतर्य है । यह ज्ञान तसे प्राप्त नहीं होता, यह तो किसी अलौकिक ब्रह्मज्ञानीके द्वारा बतलाया *गीता अध्याय २९ में इसी आशयका सोक है अनोखा अतिथि २५ जानेपर ही प्राप्त होता है। हेनचिकेता! तुमने ऐसा पुरुषपाया है,वास्तव- में तुम सत्य-धारणासे सम्पन हो। तुम-जैसा जिज्ञासु मुझे मिलतारहे।' यो कहकर यमराजने सोचा कि यदि नचिकेताके मनमें कर्मकाण्ड- के फलोंकी अनित्यताके सम्बन्धमें कुछ भी सन्देह रह गया तो उसका परिणाम शुभ नहीं होगा । अतएव यमराजने कहा- 'हे नचिकेता! मैं जानता हूँ कि धनराशि अनित्य है और अनित्य वस्तुओंसे नित्य वस्तुकी प्राप्ति नहीं होती। यों जानते हुए भी मैंने अनित्य पदार्थोसे वर्गसुखके साधनभूत नाचिकेत अग्निका चयन किया है । इसीसे मैंने यह आपेक्षिक अर्थात् अन्यान्य पदोंकी अपेक्षा नित्य (अधिक कालस्थायी ) यमराजका पद पाया है।' परन्तु हे वत्स! तुम तो सब प्रकारसे श्रेष्ठ हो, तुमने उस परम पदार्थके सम्मुख जगतकी चरम सीमाके भोग, प्रतिमा, यज्ञफलरूपी हिरण्यगर्भका पद, अभयकी मर्यादा (चिरकालस्थायी जीवन), स्तुत्य और महान् ऐश्वर्यको हेय समझकर धैर्यके द्वारा त्याग दिया है । ययामें तुम बड़े गुणसम्पन्न हो। यद्यपि यह आत्मा-यह नित्य प्रकाशरूप आत्मा जीवरूपसे हृदयमें विराजमान है तथापि सहजमें इसके दर्शन नहीं होते, क्योंकि यह अत्यन्त ही सूक्ष्म है, यह अत्यन्त गूढ़ है, समस्त जीवोंके अन्तरमें प्रविष्ट है, बुद्धिरूपी गुफामें छिपा हुआ है, राग-द्वेषादि अनर्थमय देहमें स्थित है और सबसे पुराना है । जब कोई धीर पुरुष इस देवताको आत्मयोगके द्वारा अर्थात् चित्तको विषयोंसे निवृत्तकर उसे आत्मामें समाहित करता है तब इसे जानकर वह हर्ष और शोकसेतर जाता है।
२६
उपरिषदोंके चौदह रत्न
कारण, आत्मामें हर्ष और शोकको कहीं भी स्थान नहीं, ये तो वास्तवमें
केवल बुदिके विकारमात्र हैं। जिसने ब्रह्मनिष्ठ आचार्यके द्वारा आत्मतत्व
को सुनकर उसे सम्यक्रूपसे धारण कर लिया है और धर्मयुक्त इस सूक्ष्म
आत्माको जड शरीरादिसे पृथक् समझकर प्राप्त कर लिया है वही
भानन्दधामको पाकर अतुल आनन्दमें रम जाता है । मैं समझता हूँ कि
नचिकेताके लिये भी वह मोक्षका द्वार खुला हुआ है।
'विवृतर सद्म नचिकेतस मन्ये'
यमराजके वचनोंसे अपनेको आत्मज्ञानका अधिकारी समक्ष
कर नचिकेताने कहा-
अन्यत्र धर्मादन्यप्राधर्मादन्यत्रासात्कृतारुवात् ।
अन्यत्र भूताध भयाञ्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥
(कड०१।२।१४)
'हे भगवन् ! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और भवर्मसे
अतीत तथा इस कार्य और कारणरूप प्रपञ्चसे पृथक् एव भूत तथा
भविष्यत्से भिन्न जिस सर्व प्रकारके व्यावहारिक विषयोंसे अतीत
परब्रमको आप देखते हैं उसे मुझे बतलाइये ।'
साधन और स्वरूप
नचिकेताके प्रश्नको सुनकर यमराजने आत्माका स्वरूप
बतलानेसे पूर्व उसके साक्षात् साधन प्रणवका उपदेश भारम्भ
किया। यमराज बोले..--
सर्व चेदा यत्पदमामनन्ति
तपासि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
२७ । अनोखा अतिथि यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पद सग्रहेण नवीम्योमित्येतत् ||* ( कठ०१।२।१५) 'समस्त वेद जिसका प्रतिपादन करते हैं, समस्त तप जिसे बतलाते हैं अर्थात् जिसके लिये किये जाते हैं, जिसको प्राप्त करनेके लिये साधकगण ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं वह पद मैं सक्षेपमें बतलाता हूँ, वह है ॐ वह परात्पर परमात्मा जो सब नामोंसे परे होनेपर भी सब नामों में भरा हुआ है, जो सर्वथा नामविहीन होते हुए भी अनेक नामोंसे सम्बोधित किया जाता है, उसके समस्त नामोंमें ॐ सर्वश्रेष्ठ है । ॐ शन्द महाका प्रतीक है। यह अक्षर ही ब्रह्म है और इसी अक्षरको ब्रह्म- खरूप समझकर इसकी उपासना करनेसे साधक जो चाहता है सो पाता है। 'यो यदिच्छति तस्य तत् ।' यह ओंकार हीब्रह्मकी प्राप्तिका सबसे उत्तम और श्रेष्ठ अवलम्बन है और इसी अवलम्बनको जान लेनेसे ब्रह्मलोकमें महिमा होती है। इस प्रकार प्रणवोपासनारूपी साधन बतलाकर अब यमराज आरमाका खरूप बतलाते हुए कहते हैं- न जायते म्रियते या विपश्चिन् नायं कुतधिन्न बभूव कश्चित् । * गीताके भध्याय ८ के ११३ झोप मोडे-से अन्तरसे यही बात कही है और आगे चलकर १३ ३ कमें प्रगरा साधन बवाया है।
उपनिषदाशे चौदह रक्षा सजो नित्य शाश्वतोऽय पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (कर१1३११८ यह चैतन्यसाप मारमा न जमना है, न मरता है, न पह किसी दूसरेसे उत्पन्न हुआ है, न कोई दूसरा दो इससे उत्पन्न हुआ है। यह अजमा है, निरप है, शाश्चत है और सनातन है, शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मरता माना और मारना सप शरीर में है, आमा नकभी मरता है, न कोई उसे मारमकता है। शनादिसे देह कट जाने पर भी देह में स्थित यह मात्मा ज्यों-का-त्यों बना रहता है। जिस प्रकार मकान- के नष्ट होने से उसमें स्थित आकाश नए नहीं होता, इसी प्रकार देवादिके नाशसे आरमाका नाश नहीं होता। इसीलिये यमराज कहते हैं- हन्ता चेन्मन्यते धन्तु हतश्चन्मन्यते इतम् । उभी तो न विजानीतो नायन्ति न हन्यते ॥ ( 41) 'अज्ञानी मारनेवालासमशता है कि मैं इसे मारता है और मरनेवाला समझता है मैं मरा हूँ परतु वे दोनों ही नहीं समझते हैं, क्योंकि यह मात्मा नतोकिमीको मारता है और न कोई मरता ही है। यह भात्मा- अणोरणीयान् महतो महीया- नात्मास्य अन्तोर्निहितो गुहायाम् । कठ०१।२।२०) जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर है और जो महान्से भी महत्तर है,जो जीन- की हृदय गुफा में डिपा हुआ है। इसे वही देव पाता है जो कामनाओं- *गीता अध्याय २ शोक १९२० मैं थोड़े-से शम्दान्तरसे ये दोनो मन्त्र ज्यों के त्यों है।
अनोखा अतिथि से रहित है, जो कर्मोकी सिद्धि और असिद्धिमें समचित्त है, जो सुत- वित-दारके उत्पत्ति या विनाशमें हर्ष और शोकको नहीं प्राप्त होता, नो प्रत्येक अवस्था में परमात्माकी एक मनन्त सत्ताको उपलब्ध करता हुआ शान्त और स्थिर रहता है । परन्तु जो इस प्रकारका नहीं है उसे आत्माके दर्शन नहीं होते, क्योंकि यह आत्मा निश्चल होनेपर मी दूरतक पहुँच जाता है, सोया हुआ ही सर्वत्र चला जाता है, विद्या और धनादि मदयुक्त होते हुए भी मदरहित हैं। इसे मेरे अतिरिक अन्य कौन जान सकता है ? अशरीरर शरीरेप्वनरस्थेववस्थितम् । महान्त विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोवति ॥ कठ०१।२ । २२) यह समस्त भनित्य शरीरों में रहते हुए भी शरीररहित हे, समस्त अस्थिर पदार्थोंमें व्याप्त होते हुए भी सदा स्थिर है, इस नित्य और महान् विभु आत्माको जो धीर पुरुष जान लेता है वही शोकसे तर जाता है।' यह एक ही आत्मा सब ओरसे और सबमें व्यापक होनेपर भी-- प्रवचनेन लग्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।* 'न तो यह वेदके प्रवचनसे प्राप्त होता है, न विशाल बुद्धिसे मिलता है और न केवल जन्मभर शास्त्रोंके श्रवण करनेमे ही मिलता है। यह मिलता है उसीको जो इसको पानेके लिये परम ब्याकुल हो जाता है और मिलता है उसको- नायमात्मा *गीताके अध्याय ११ के ५३ ३ शोकमें प्राय ऐसे ही वचन है १ ३० उपनिषदोके चौदह रत यमेवैष पृणुते तेन ल्भ्य- स्तस्यैष आत्माविणुते तनूरखाम् ।। (पठ १११३) -जिसको यह वप्रकाश आत्मा खय खीकार कर लेता है और जिसके निकट अपना यथार्थ खरूप प्रकट कर देता है। सो जानइ जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ आई ।। जबतक परमात्माको पाने के लिये हृदयमें व्याकुलता और अधीरता नहीं उत्पन्न होती,तबतक साधक निष्काम साधनसे सम्पन्न नहीं हो जाता । जनतक परमात्माके नित्य खरपके साथ उसके मनका सर्वपा संयोग नहीं हो जाता तबतक सारी बातें और सारी क्रियाएँ शुष्क और व्यर्थ हैं। ऐसे पुरुषका ज्ञान केरल मौखिक और लोकरक्षकमात्र होत है। उससे कोई लाभ नहीं होता। जो पापोंमें रत है, जो दम, शा तया चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप समाधिसे रहित है, जिसका मन अशान्त है उसको केवल पाण्डित्यकी प्रचुरता ओर तोंकी तीक्ष्णतासे है आत्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता । जो शम-दमादि गुणों से युक्त है, शुद्ध, सयत और समाहितचित्त है, जो इदियलालसाओंसे विरत है औ जिसने श्रवण, मनन तथा निदिध्यासनद्वारा अभेदरूप प्रज्ञान प्राप्त क लिया है वही उस प्रज्ञानके द्वारा इस आत्माको प्राप्त होता है- 'प्रशानेननमाप्नुयात्। जो साधनसम्पन्न नहीं हैं, उनको आत्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इसी बातको बतळानेके लिये यमराजने फिर कहा कि 'हे नचिकेता! देखो, दूसरोंकी तो बात ही क्या है, जो ब्राह्मण और क्षत्रिय समस्त धर्मोंके रक्षक और प्राणस्वरूप है, जो इतने श्रेष्ठ हैं वे भी उस -- अनोपा अतिथि परमात्माके अनबन जाते हैं। सबका सहार करनेवाला मृत्यु भी जिसपरमात्माके भोजनका उपसेचन अर्थात् साग पात बन जाता है ऐसे उस महामहिमान्वित परमात्माको ससारके भोगोंमें मासक्त और साधन- रहित मनुष्य कैसे जान सकता है कि यह इस प्रकार का है।' आत्मा और परमात्माका निर्णय करके यमराजने शिष्यको कर्मसे भमिविद्या और ज्ञानसे ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति बतलानेके लिये कहा, 'जो यजमानकोदु खसागरसे पार करनेके लिये पुलके समान है वही नाचिकेत भग्नि है. और जो ससारसागरसे पार होना चाहनेवालोंके लिये परम आश्रयस्वरूप है यही अक्षर परमझ है। कर्मके द्वारा अपरब्रह्मको और ज्ञानके द्वारा परब्रह्मको जानना चाहिये । जीवकी मुक्तिके लिये जितने पथ है उन सबमें ज्ञान ही प्रधान है। तदनन्तर यमराजने आत्माका रथीरूपसे वर्णन करते हुए कहा- आत्मानर रविन विद्धि शरीरर रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन प्रमहमेव च ॥ इन्द्रियाणि हयानाटुर्विपया स्तेषु गोचगन् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्त भोक्तेत्याहुर्मनीषिण ॥ (कठ०१।३।३४) 'शरीर रथ है, आमा रपका खामी रथी है, बुद्रि सारथि है. और मन लगाम है, ऐसा समझो। श्रोत्रादि इन्द्रियों घोड़े हैं, शब्द- स्पर्शादि विषय ही इनके दौड़नेका मैदान है और शरीर, इन्द्रिय तथा मनसे युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं।' घोड़ोंसे ही रय चलता है, परन्तु उस रथको चाहे जिस तरफ पकड़े हुए बुद्धिमान् सारथिका काम है ।... ले जाना ३२ उपरिषदोंके चौदह रक्षा इनियापी बलवान् और प्रमयनकारी घोहे विषयरपी मैदान में मनमाना दौड़ना चाहते हैं, परतु यदि थुद्धिरूपी सारपि मनरूपी लगामको जोरसे ग्वीचकर उन्हें अपने वश में रखता है तो घोड़ोंकी ताकत नई कि वे मनापी लगामके सहारे पिना ही चाहे जिस तरफ दोहन लगे। यह सनको विदित है- इंद्रियों यास्तयों विषयका ग्रहण तमी कर सकती है जब मन उनके साथ हो। घोदे उसी ओर दौड़ते हैं जिस ओर ठगामया सहारा होता है, परतु इस टगाम ठीक रखना सारपिके बल, बुद्धि और मार्गके ज्ञानपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिम्प सारयि विवेकपूर्ण सामीका माज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान् और इन्द्रियरूपी अश्वोको सञ्चालनक्रियामें निपुण नहीं होता तो इद्रियरूपी दुष्ट घोड़े उसके वशमें न रहकर लगामको अपने वशमें कर लेते हैं और परिणाममें वे रथको रथी और सारथिममेत चाहे जैसे बुरे स्थानमें ले जाकर पटक देते हैं। परतु-- यस्तु विमानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि घश्यानि सदस्य इव सारथः ।। (२८० ११३।६) 'जिसकी बुद्धिमें विवेक होता है, जिसका मन एकाम और समाहित होता है उसकी इद्रियों अच्छे धोड़ोंकी तरह बुद्धिरूप सारपिके वश रहती हैं। जिसका मन निमहरहित है, जो अविवेकी है और जोसदा अपनिन है, ऐसे रपीको कभी अपने लक्ष्य-परमपदप्रक्षकी प्राप्ति नहीं होती। उसे बारबार कष्टमय जन्म मरणरूपससारमें ही भटकना पड़ता है। परतु- ।
अनोखा अतिथि यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्क सदा शुचि । स तु तत्पदभाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते ॥ (कठ. १।३।८) जो विवेकी है, जिसका मन निगृहीत है, जो सदा पवित्र रहता है वह ऐसे परमपदको पाता है जहाँसे लौटकर फिर ज म प्रहण नहीं - करना पड़ता । जिसका बुद्धिरूप सारथि विवेकी है, जिसकी मनरूप लगाम स्थिर है, जिसके इद्रियरूपी घोड़े लगामके साथ ही-साथ विवेक- मयो बुद्धिके वशमें हैं वह इसी रथकी सहायतासे ससारसागरके उस पार अपने लक्ष्यस्थानपर अनायास ही जा पहुँचता है और वही- तद्विष्णो परम पदम् ---'विष्णुका परमपद है। यमराजने फिर कहा कि इन्द्रियों से उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धिसे महत् श्रेष्ठ है, महत्से अव्यक्त श्रेष्ठ है और अव्यक्तसे पुरुष श्रेष्ठ है।' बस, इस पुरुषसे परे और कोई नहीं है-- सा काष्टा सा परा गति । यही चरम सीमा है, यही परमगति है, परन्तु यह केवल- दृश्यते त्वप्रथया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिमि । सूक्ष्मदर्शियोंके द्वारा सूक्ष्म वस्तुके निरूपणमें निपुण एकाग्रतायुक्त चुद्धिसे ही देखा जा मकता है। अतएव 'उत्तिष्टत जाग्रत प्राप्य वरा- नियोधत' उठो! जागो। और महापुरुषोंके पास जाकर इसे जानो बुद्धिमान् लोग इस मार्गको तलवारकीधारपर चलनेके समान बतलाते हैं- दुरत्यया दुर्गे पथस्तत्कवयो घदन्ति | - -- सुरस्य धारा चौ.
है उपनिषदोंके चौदह रत इन्द्रियों बहिर्मुखी है, इसीसे ने केवल पाइरकी वस्तुओंको देउनी हैं, अनरा माको नहीं देखती । कोई पिकसम्पन पुरुष ही अमृतत्वको शुम इच्छासे इनद्रियोंको अतर्मुखी करके अ तरात्माको देख पाता है। अज्ञाना लोग बाह्य विषयों की ओर ही दौड़ते हैं और इमीसे वे सर्वत्र व्याप्त मृत्यु के फदेमें फंस जाते हैं, परन्तु ज्ञानी पुरष उरा अमृतत्वको जानका इन अनित्य पदार्थोसे नित्य वस्तुको प्रार्थना नहीं करते। जो यहाँ (कार्यमें ) है वही वहाँ ( कारणमें ) । परतु जो उपारिक सम्बधसे और मेदज्ञानके कारण अविधाके प्रभारसे उस अभिन्न स्वरूप ब्रह्मको नाना रूपों में देखता है- मृत्यो मृत्युमामोति। वह बार-बार मृत्युको (जन्म मरणको) ही प्राप्त होता है। इस ज्ञानकी प्राप्ति केवल विचारसे ही हो सकती है। यहाँ किञ्चित् भी भेद नहीं है। जिसको यहाँ भेद दीखता है उसीको बार-बार मृत्युकी शरण लेनी पड़ती है। जैसे शुद्ध जन्में शुद्ध जल मिलानेपर दोनों मिलकर एकरस तमय हो जाते हैं इसी प्रकार आत्मदर्शी पुरुषका आत्मा परमात्मासे मिलकर ब्रह्मरूप बन जाता है। यमराजने आगे चलकर फिर कहा, 'हे नचिकेता ! मैं नमन होकर तुम्हें यह अत्यत गोपनीय सनातन ब्रह्मतत्व बतला रहा हूँ। मृत्युके बाद जीवका क्या होता है सो तुम सुनो! जिसके जैसे कर्म और जैसी वासना होती है, जिसका जेसा ज्ञान होता है उसीके अनुसार कोई तो मृत्युके बाद माताके गर्भ में जाता हे ओर कोई मृत्युके पश्चात् वृक्ष, पाषाणादि स्थावर योनिको प्राप्त होता है । जब समस्त अनोपा भतिथि प्राणी निद्राग्रस्त रहते हैं तर जो एक निर्गुण ज्योतिर्मय ब्रह्म सुप्रकाशित. रूपसे जाग्रत् रहकर समस्त विषयों को प्रकाशित करता है, वही शुद्र है, यही ब्रह्म है, उमीका नाम अमृत है, उसके सिवा और कोई छिपा हुआ ब्रह्म नहीं है । पृथ्वी आदि सभी लोक उसीमें अस्थित हैं, उसका अतिक्रमण कोई भी नहीं कर सकता। असिर्ययको भुवन प्रविष्टो रूप रूप प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतातरात्मा रूप रूप प्रतिरूपो पहिश्च ।। वायुययैको भुवन प्रविष्टो रूप रूप प्रतिरूपो बभूव । पकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूप रूप प्रतिरूपो रहिश्च ॥ (कठ०२।२।०१०) अग्नि एक ही है परन्तु जैसे सम्पूर्ण भुवनमें प्रवेश करनेपर वही मिन मिन वस्तुओंमें भिन्न-भिन्न रूपमें दीखता है, इसी प्रकार समस्त प्राणियों में रहनेवाला आत्मा एक ही है, परन्तु सबमें भिन्न भिन्न रूपमें दीग्वता है, आकाशकी तरह निर्विकार होनेके कारण बाहर भी वही रहता है जैसे एक ही वायुलोको प्रवेश कर मिन मिन रूपमें दीखता है टमी प्रकार सब प्राणियोंमें व्यापक एक ही आत्मा भिन्न भिन्न रूपमें दीखता है तथा बाहर भी रहता है। अग्नि और वायुके दृष्टातमें केवल यही अतर है कि अग्नि तो प्रकाशस्त्ररूप होकर लोकमें प्रवेश करता है और वायु प्राणस्वरूप होकर प्रत्येक देहमें प्रवेश करता है। सूर्यो यया सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाभुपैर्वाह्यदोपै । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मान लिप्यते लोकदु खेन वाह्य ॥ मातोहचान लिया कड़० २।२।११) आपद्धर्म एक समय कुरदेशमें ओलों को बड़ी वर्षा होनेसे मौर उगते हुए अनका नाश हो जानेसे भयानक अकाल पड़ गया। अकालसे पीड़ित नर-नारी अनके अमानसे देश छोड़कर भागने लगे। इसीलिये चक्रके पुत्र उपस्तिने भी अपनी अप्राप्तयौवना पत्नी आटिकीको साथ लेकर देश छोड दिया और मदकते भटकते दोनों एक महारतों के ग्राममें पहुँचे । भूखके मारे उस समय उपस्ति मरणासन्न दशाको प्राप्त हो रहा था। उसने एक महारतको उबले हुए उड़दके दाने खाते देखा और उसके पास जाकर कुछ उड़द देनेको कहा । महानतने कहा-- मैं इस वर्ननमें रग्वे हुए जो उड़द खा रहा हूँ इन जूठे उड़दोंके सिका मेरे पास ओर उडद नहीं है, तब मैं तुम्हें कहाँसे हूँ , महावतकी बात सुनकर उपस्तिने कहा--'मुझे इनमें से ही कुछ दे दो।' तब महारतने उनमेंसे योडे-से उड़द उपस्तिको दे दिये ओर जल सामने रखकर कहा किलो, इनको खाकर जल पी लो। इसपर उपस्तिने कहा- भाई ! मैं यह जल पीईंगातो मुझे दुमरेको घुटन खानेका दोष लगेगा।' महावतने अचरजसे पूछा, 'तो क्या तुमने जो उड़द मुझसे लिये हैं, ये जूठे नहीं हैं, फिर यूंठे जलहीमें कौन सा दोष हे" उपस्तिने उत्तर दिया-~~'भाई । यदि मैं यह उड़द नहीं खाता तो मेरे प्राण नहीं रहते ( प्राण-सफटमें आपद्धर्म समझकर ही मैं उडद खा रहा हूँ) अब जल तो मेरे इच्छानुसार मुझे दूसरी जगह आपद्धर्म भी मिल जायगा । यदि उड़दकी तरह मैं तुम्हारा जूठा जल भी पी लूँ तब तो वह स्वेच्छाचार ही होगा | आपद्धर्म नहीं रहेगा । इसलिये मैं तुम्हारा जल नहीं पीऊँगा।' इतना कहकर उपस्तिने कुछ उड़द खा लिये और शेष अपनी स्त्रीको दे दिये। ब्राह्मणीको पहले ही कुछ खानेको मिल गया था, इसलिये पतिके दिये हुए गूंठे उडद उसने खाये नहीं, अपने पास रख लिये । दूसरे दिन प्रात काल उपस्तिने प्रात कृत्य करने के बाद अपनी स्त्रीसे कहा---'क्या करूँ, मुझे जरा सा भी अन्न कहींसे खानेको मिल जाय तो मैं अपना निर्वाह होने लायक कुछ धन प्राप्त कर सकता हूँ, यहाँसे समीप ही एक राजा यज्ञ कर रहा है, यह ऋत्विक्के काममें मेरा भी वरण कर लेगा।' यह सुनकर स्त्रीने कहा 'मेरे पास कलके बचे हुए कुछ उड़द हैं, लीजिये, इहें खाकर यज्ञमें शीघ्र चले जाइये ।' भूखसे अशक्त हुर उपस्तिने उड़द खा लिये और कुछ स्वस्थ होकर वे राजाके यज्ञमें चले गये । यहाँ जाकर वे आस्तावमें ( स्तुतिके स्थानमें ) स्तुति करनेवाले उद्गाताओंके पास जाकर बैठ गये और स्तुति करनेवालोंकी भूल देखकर उनसे बोले-हे प्रस्तोता ! आप जिन देवताकी स्तुति करते हैं वे देव कौन हैं । आप यदि अधिष्ठाताको जाने बिना उनकी स्तुति करेंगे तो याद रखिये, आपका मस्तक नीचे गिर पड़ेगा। इसी प्रकार उद्गातासे कहा कि 'हे उहीयकी स्तुति करनेगले ! यदि आप उदीयमागके देवताको जाने बिना उनका उद्गान करेंगे तो आपका मस्तक नीचे गिर पड़ेगा ।' तदन तर उन्होंने प्रतिहारका गान करने- आपद्धर्म एक समय कुरदेशमें ओलोंको बड़ी वर्षा होनेसे और उगते हुए अनका नाश हो जानेसे भयानक अकाल पड गया । अकालसे पीड़ित नर नारी अन्नके अभारसे देश छोडकर भागने लगे। इसीलिये चक्रके पुत्र उपस्तिने भी अपनी अप्राप्तपौचना पनी आटिकीको साथ लेकर देश छोड़ दिया और भटकते भटकते दोनों एक महारतोंके ग्राममें पहुँचे । भूखके मारे उस समय उपस्ति मरणासन्न दशाको प्राप्त हो था। उसने एक महापतको उबले हुए उड़दके दाने खाते देखा और उसके पास जाकर कुछ उडद देनेको कहा । महानतने कहा--- 'मैं इस वर्तनमें रखे हुए जो उड़द वा रहा हूँ इन जूंठे उड़दोंके सिवा मेरे पास और उडद नहीं है, तब मैं तुम्हें कहांसे हूँ " महावतकी बात सुनकर उपस्तिने कहा-'मुझे इनमेंसे ही कुछ दे दो।' तब महानतने उनमेंसे घोडे-से उडद उपस्तिको दे दिये ओर जल सामने रखकर कहा कि 'लो, इनको खाकर जल पी लो।' इसपर उपस्तिने कहा- 'भा । मैं यह जल पी गातो मुझे दुसरेकी गूंठन खानेका दोष लगेगा।' महावतने अचरजसे पूछा, तो क्या तुमने जो उड़द मुझमे लिये हैं, ये जूठे नहीं हैं, फिर जूंठे जलहीमें कोन सा दोष हे ॥ उपस्तिने उत्तर दिया-भाई । यदि में यह उड़द नहीं खाता तो मेरे प्राण नहीं रहते ( प्राण मकटमें आपद्धर्म समझकर ही मैं उडद खा रहा हूँ) अब जल तो मेरे इच्छानुसार मुझे दूसरी जगह मापद्धर्म ३९ भी मिल जायगा । यदि उड़दकी तरह मैं तुम्हारा नँठा जल भी पी लें तब तो यह स्वेच्छाचार ही होगा। आपद्धर्म नहीं रहेगा । इसलिये मैं तुम्हारा जल नहीं पीऊँगा।' इतना कहकर उपस्तिने कुछ उड़द खा लिये और शेष अपनी स्त्रीको दे दिये। ब्राह्मणीको पहले ही कुछ खानेको मिल गया था, इसलिये पतिके दिये हुए जूठे उडद उसने खाये नहीं, अपने पास रख लिये । दूसरे दिन प्रात काल उपस्तिने प्रात कृय करनेके बाद अपनी -~-'क्या करूँ, मुझे जरा-सा भी अन्न कहींसे खानेको मिल जाय तो मैं अपना निर्वाह होने लायक कुछ धन प्राप्त कर सकता हूँ, यहाँसे समीप ही एक राजा यज्ञ कर रहा है, वह ऋत्विक्के काममें मेरा भी वरण कर लेगा।' स्त्रीसे कहा- । यह सुनकर स्त्रीने कहा--'मेरे पास कलके बचे हुए कुछ उडद हैं, लीजिये, इन्हें खाकर यज्ञमें शीघ्र चले जाइये ।' भूखसे अशक हर उपस्तिने उड़द खा लिये और कुछ स्वस्थ होकर वे राजाके यज्ञमें चले गये। वहाँ जाकर वे आस्तावमें (स्तुतिके स्थानमें ) स्तुति E करनेाले उद्गाताओंके पास जाकर बैठ गये और स्तुति करनेवालोंकी भूल देखकर उनसे वोले-'हे प्रस्तोता ! आप जिन देवताकी स्तुति चरने हैं वे देव कौन हैं । आप यदि अधिष्ठाताको जाने बिना उनकी सुति करेंगे तो याद रखिये, आपका मस्तक नीचे गिर पडेगा। इसी प्रकार उद्गातासे कहा कि हे उद्गीयकी स्तुति करनेवाले ! यदि आए उद्गोयमागके देवताको जाने बिना उनका उद्गान करेंगे तो आपका मस्तक नीचे गिर पड़ेगा। तदनन्तर उहोंने प्रतिहारका गान करने- ४० उपनिषदोंके चौदह रत थालेकी ओर भी मुहकर कहा कि हे प्रतिहारका गान करनेवाले प्रतिहत ! यदि आप देवताको बिना जाने उसको प्रतिहार करेंगे तो आपका मस्तक नीचे गिर जायगा ।' यह सुनकर स्तोता, उदाता और प्रनिहर्ता आदि सब विजपण मस्तकके गिरनेके डरसे अपने-अपन कर्मको छोड़कर चुप होकर बैठ गये। राजाने अपने विजोंको यह दशा देखकर कहा कि हे भगवन् ! आप कौन है, में आपका परिचय जानना चाहता हूँ। उपस्तिने कहा-~-'राजन् ! मैं चक्रका पुत्र उपस्ति हूँ।' राजान कहा-'ओहो ! भगवन् । उपस्ति आप ही हैं। मैंने आपके बहुत से गुण सुने हैं। इसीलिये मैंने ऋत्विजके कामके लिये आपकी बहुत खोज की थी, परतु आपके न मिलनेपर मुझे दूसरे ऋलिज वरण करने पड़े । अब मेरे सौभाग्यसे आप पधारे हैं तो हे भगवन् ! ऋत्विजसम्बधी समस्त कर्म आप ही करने की कृपा कीजिये।" उपस्तिने कहा-बहुत अच्छा। परन्तु इन ऋत्विजोंको हटाना नहीं, मेरे आज्ञानुसार ये स्विजगण अपना अपना कर्म करें। और दक्षिणा भी जो इन्हें दी जाय, उतनी हो मुझे देना ।' (न तो मैं इन लोगोंको निकालना चाहता हूँ और न दक्षिणा अधिक धन लेकर इनका अपमान करना चाहता हूँ। मेरी देख रेखमें ये सब कर्म करते रहेंगे।) तदनन्तर प्रस्तोता, उदाता आदि समस्त ऋविजोंने उपस्तिके पास जाकर विनयपूर्वक उनसे पूछ-पूछकर सब बातें जान ली और उपस्तिने उन लोगोंको सब समझाकर उनके द्वारा राजाका यज्ञ मलीभाँति पूर्ण करवाया। (छान्दोग्य उपनिषदे आधारपर) ब्राह्मण (४) गाड़ीवालेका ज्ञान प्रसिद्ध जनश्रुत राजाके पुत्रका पौत्र जानश्रुतिनामक एक राजा था, वह बहुत ही श्रद्धाके साथ आदरपूर्वक योग्य पात्रोंको बहुत दान दिया करता था। अतिथियों के लिये उसके घरमें प्रतिदिन बहुत-सा भोजन बनवाया जाता था। वह महान् दक्षिणा देनेवाला था। वह चाहता था कि प्रत्येक शहर और गाँवमें रहनेवाले साधु, आदि सब मेरा ही अन्न खायें, इसलिये उसने जहाँ-तहाँ सर्वत्र ऐसे धर्मस्थान, अन्नसत्र या छात्रावास खोल रखे थे जहाँ अतिथियों आदिके ठहरने और भोजन करनेका सुप्रबध था। राजाके अन्नदानसे सतुष्ट हुए ऋषि और देवताओंने राजाको सचेत करके उसे ब्रह्मानन्दका सुख प्राप्त करानेके लिये हसोंका रूप धारण किया और राजाको दिखायी दे सकें ऐसे समय वे उड़ते हुए राजाके महलकी छतके ऊपर जा पहुँचे । वहाँ पिछले हसने अगले हससे कहा-भाई भल्लाक्ष ! इस जनश्रुतके पुत्रके पौत्र जानश्रुतिका तेन दिनके समान सन जगह फैल रहा है। इसका स्पर्श न कर लेना, कहीं स्पर्श कर लेगा तो यह तेज तुझे भस्म कर डालेगा।' यह सुनकर अगले हसने कहा- माई ! तुम बैलगाड़ीवाले रैक्वको नहीं जानते, इसीसे तुम उस रैक्वसे इसका तेज बढ़त ही कम होनेपर भी उसकी सी प्रशंसा कर रहे हो।' पिछले हसने कहा- -'यह गाड़ीपाला रैक्य कौन है और पैसा है, सो तो बता ।' अगले हसने कहा-'भाई ! उस रैक्वकी २ । उपनिषदोंके चौदह रत महिमाका क्या खान किया जाय । जमे जुआ खेलने के पासेके नीचे के तीनों माग उसके अतर्गत होते है, यानी जन जुआराका पासा पड़ता है तर यह तीनोंको जीत लेता है। इसी प्रकार प्रजा जो कुछ भी शुभ कार्य करती है, वह सारे शुम कर्म और उनका फल रक्यके शुभ कर्मके अतर्गत है । अर्थात् प्रजाको समस्त शुभ क्रियाओंका फल उसे मिलता है। वह रेच जिस जाननेयोग्य यस्तुको जानता है, उस वस्तुको जो जान जाता है उसे भी रैक्वके समान ही सब प्राणियोंके शुभ कर्माका फल प्राप्त होता है। मैं उसी विद्वान् रेकरके लिये ही ऐसे कह रहा हूँ ।' महलपर सोये हुए राजा जानश्रुतिने हमोंकी ये बातें सुनी और रातभर यह इही बातोंको स्मरण करता हुआ जागता रहा । प्रात काल व दीजनोंकी स्तुति सुनकर राजाने बिछौनेसे उठकर वदीजनोंसे कहा कि 'हे रस ! तुम गाड़ीवाले रैकाके पास जाकर उससे कहो कि मैं आपसे मिलना चाहता हूँ ।' भाटने कहा-'हे राजन् ! वह गाड़ीवाला रैक्य कौन है । और कैसा है " राजाने जो कुछ हसीने कहा था, सो उसे कह सुनाया । राजाके आज्ञानुसार भाटोंने बहुत से नगरों और गोंगोंमें रैक्रकी खोज को, परतु कहीं पता नहीं लगा। तब लौटकर उ होंने राजासे कहा कि हमें तो रैक्वका कहीं पता नहीं लगा। राजाने विचार किया कि इन भाटोंने रक्को नगरों ओर प्राोंमें ही ग्वोजा है। भला, ब्रह्मज्ञानी महापुरुष रिश्यी पुरुषांके बोचमें कैसे रहेंगे और उनसे कहा कि 'अरे । जाओ, अप्रवेत्ता पुरुषोंक रहनेके स्थानों में (अरण्य, नदीतट आदि एका त स्थानों में ) उह खोजो। - गाडीवालेका मान राजाके आज्ञानुसार भाट फिर गये और ढूंदते ढूँढ़ते किसी एक एका त निर्जन प्रदेशमें गाड़ी के नीचे बैठे हुए शरीर खुजलाते हुए एक पुरुषको उ होंने देखा व दीजन उनके पास जाकर विनयके साथ पूछने लगे-हे प्रभो क्या गादीपालेरैक्य आप ही मुनिने कहा-हाँ,मैं ही हूँ।' रैक्रका पता लगनेसे माटोको बड़ा हर्ष हुआ और वे तुरत जाके पास जाकर कहने लगे कि हमने अमुक स्थानमें रैक्चका रता लगा लिया। तदन तर राजा उ सौ गायें,सोनेका कण्ठहार और खचरियोंसे जुता हुआ एक रथ आदि लेकर रैकरके पास गया और वहाँ जाकर हायजोड़कर रैक्वमे बोला-~-भगवन् ! यह छ सौ गायें, एक सोनेका हार और यह वञ्चरियों से जुता हुआ रथ, ये सर मैं आपके लिये लाया हूँ। कृपाकरके आप इनको स्वीकार कीनिये और हे भगवन् ! आप जिस देवताकी उपासना करते हैं, उस देवताका मुझको उपदेश कीजिये ।' राजाकी बात सुनकर रैश्चने कहा, 'अरे शूद* ! यह गौएँ, हार और रघ तू अपने ही पास रख ।' यह सुनकर राजा घर लौट आया और विचारने लगा कि मुझको मुनिने शद्र क्यों कहा। या तो मैं हसोंकी वाणी सुनार लोकातुर या इसलिये शूद्र कहा होगा अपवा थोड़ा धन देखकर उत्तम विधा लेने का अनुचित प्रयत्न समझकर भी मुनि मुझको शूद्र काह सकते हैं । परन्तु बिना ज्ञानके तो मेरा शोक दूर होगा नहीं, अतएव मुनिको प्रसन्न करनेके लिये मुझे फिर वहाँ जाना चाहिये।
उपनिपदोंके चौदह रत यह विचारकर राजा अबकी बार एक हजार गाएँ, एक सोने कण्ठहार, खचरियों से जुता हुआ एक रप और अपनी पुत्रीको लेकर फिर मुनिके पास गया और हाथ जोड़कर कहने लगा-~- -'हे भगवन् ! यह सब मैं आपके लिये लाया है, इनको अपखोकार कीजिये और धर्मपक्षीके रूप मेरी इस पुत्रीको और जहाँ आप रहते हैं इस गौरको भी ग्रहण कीजिये। तदनन्तर आप जिस देयकी उपासना करते हैं उसका मुझे उपदेश कीजिये राजाके वचन सुनकर, कन्याको करुणाभरी स्थिति देखकर मुनिने उसको आश्वासन दिया और कहा कि 'हे शूद ! तू फिर यही सब वस्तु मेरे लिये लाया है (क्या इहाँसे बहाज्ञान खरीदा जा सकता है ए राजा चुप होकर बैठ गया। कुछ समय बाद मुनिने राजाको धनके अभिमानसे रहित हुआ जानकर महाविद्याका उपदश किया। मुनि रैक्य जो रहतेथे उस पुण्य पदेशका नाम रैक्मपर्ण हो गया। (छान्दोग्य उपनिषद्के माधारपर) १५ गोसेवामे ब्रह्मज्ञान जबाला नानी एक सदाचारिणी ब्राह्मणी थी। उसके सत्यकाम नामक पुत्र था। जब वह विद्याध्ययन करनेयोग्य हुआ, तब एक दिन उसने गुरुकुल जाने की इच्छासे अपनी मातासे पूछा-'हे पूजनीया माता ! मैं ब्रह्मचर्यपालन करता हुआ गुस्की सेवामें रहना चाहता हूँ, गुरु मुझसे नाम और गोत्र पूडेंगे, मैं अपना नाम तो जानता ही हूँ परन्तु गोत्र नहीं जानता, अतएर मेरा गोत्र क्या है सो बतलाओ ।'
- गोसेवासे ब्रह्मज्ञान जबालाने कहा-'बेटा ! तू किस गोत्रका है, इस बातको मैं नहीं जानती। मेरी जवानीमें, जब तू पैदा हुआ था, तब मेरे स्वामीके घरपर बहुत से अतिधि आया करते थे। मेरा सारा समय उनकी सेवामें ही बीत जाता था, इससे मुझको तेरे पितासे गोत्र पूछनेका समय नहीं मिला, अतएर मैं तेरा गोत्र नहीं जानती । मेरा नाम जनाला है और तेरा सत्यकाम, बस मैं इतना ही जानती हूँ। तुझसे आचार्य पूछे तो कह देना कि मैं जनालाका पुत्र सत्यकामहूँ।' माताको आज्ञा लेकर सत्यकाम महर्षि हरिद्रुमके पुत्र गौतम स्मृपिके घर गया ओर प्रार्थना करके बोला कि 'हे भगवन् ! मैं ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ आपके समीप रहकर सेवा करना चाहता हूँ। मुझे स्वीकार कीजिये।' गुरुने बड़े स्नेहसे पूछा-~'हे सौम्य ! तेरा गोत्र क्या हे " सरल सत्यकामने नम्रतासे कहा- भगान् । मेरा गोत्र क्या है, इस चातको मैं नहीं जानता । मैंने यहाँ आते समय मातासे पूछा था तन उहोंने कहा कि मैं युवावस्थामें अनेकों अतिथियोंकी सेनामें लगी रहनेके कारण स्वामीसे गोत्र नहीं पूछ सकी ? युवावस्थामें जब तेरा जम हुआ था उसी समय तेरे पिताकी मृत्यु हो गयी थी, इसलिये शोक और दु खसे पीड़ित होनेके कारण दूसरोंसे भी तेरा गोत्र नहीं पूछ सकी। मैं केवल इतना ही जानती हूँ कि मेरा नाम जवाला है और तेरा सत्यकाम है । अतएव हे भगवन् ! मैं जबालाका पुत्र सत्यकाम हूँ।' सत्यवादी सरलहृदय सत्यकामकी सीधी सच्ची बात सुनकर ऋषि गौतमप्रसन होकर बोले-'वत्सा ब्राह्मणको छोड़कर दूसरा मी प्रकार सरल बात नहीं कह सकता- ४६ उपनिषदोंके चौदह रत वियतुमईति'-ऐसा सत्य और कपटरहित वचन कहनेवाला तू निश्चय ब्राह्मण है । मैं तेरा उपनयनसस्कार कगा,जा, थोड़ी सी समिधा ले आ' विधिवत् उपनयनसंस्कार होने के बाद वेदाध्ययन कराकर ऋषि गौतमने अपनी गोशालामें से चार मौ दुबली पतली गौ चुनकर अधिकारी शिष्य सत्यकामसे कहा-'पुत्र। इन गौओंको चराने वनमें ले जा । देख, जबतक इनकी सत्या पूरी एक हजार न हो जाय तबतक यापस न आना।' सत्यकामने प्रसन्न होकर कहा--भगान् ! इन गौओंकी सरया पूरी एक हजार न हो जायगी, तबतक वापस नहीं आऊँगा।" 'नासहस्रेणावते येति'-यों कहकर सत्यकाम गोओको लेकर जिस बनमें चारे पानीकी बहुनायत थी, उसीमें चला गया और वहीं कुटिया बनाकर वर्षोंतक उन गौओंकी तन मनसे सूब सेवा करता रहा । गुरुभक्तिरा कितना सुन्दर दृष्टात है । ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की इच्छावाले शिष्यको गौ चरानेके रिये गुरु वनमें भेज दें और वह चुपचाप आज्ञा शिरोधार्य कर वर्षातक निर्जन वनमें रहने चला जाय । यह बात ज्ञानपिपासु गुरुभक्त भारतीय ऋषिकुमारोंमें ही पायी जाती है। आजकी सस्कृति तो इससे सर्वथा विपरीत है, अस्तु । सेवा करते करते गौओंको संख्या पूरी एक हजार हो गयी। तब एक दिन एक वृषमने आकर पुकारा-'सत्यकाम! सत्यकामने उत्तर दिया--भगवन् ! क्या आज्ञा है । वृषभने कहा-बस हमारी सरया एक हजार हो गयी है, अब हमें गुरुके घर ले चलो, मैं तुमको ब्रह्मके एकपादका उपदेश करता सत्यकामने कहाकिहिये मान !" ।
- गोसेवासे ब्रह्मज्ञान इसके बाद वृषभने ब्रह्मके एक पादया उपदेश देकर कहा---'इसका नाम प्रकाशमान है । अगला उपदेश तुझे अग्निदेव करेंग ।' दूसरे दिन प्रात काल सत्यकाम गौओंको हाँककर आगे चला, सन्ध्याके समय रास्ते पडार डालकर उसने गौओंको वहाँ रोका और उन्हें जल पिलाकर रात्रिनिवासकी व्यवस्था की । तदन तर वनसे काठ बटोरा और अग्नि जलाकर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । अग्निदेवने तीन बार कहा-'सत्यकाम' सत्यकामने उत्तर दिया-- 'भगवन् । क्या आज्ञा हे " अग्निने कहा-'हे सौम्य ! मैं तुझे ब्रह्मके द्वितीय पादका उपदेश करता हूँ। सत्यकाम बोला-'कीजिये भगवन् ।' तदन तर अग्निने ब्रह्मकेदृमरे पादका उपदेश करके कहा- 'इसका नाम अनन्तमान् है । अगला उपदेश तुझे हस करेगा।' सत्यकाम रातभर उपदेशका मनन करता रहा। प्रात काल गौओंको हाँककर आगे बढ़ा और सन्ध्या होनेपर किसी सुन्दर जलाशयके किनारे ठहर गया । गौओंके लिये रात्रिनिवामकी व्यवस्था की और आप आग जलाकर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया। इतनेमें एक हस ऊपरसे उडता हुआ आया और सत्यकामके पास बैठ- कर बोला---'सत्यकाम ! सत्यकामने कहा-'भगरन् । क्या आज्ञा है " हसने कहा-'हे सत्यकाम ! मैं तुझे ब्रह्मके तीसरे पादका उपदेश करता हूँ।' सत्यकामने कहा-'भगवन् ! कृपा करके कीजिये। पश्चात् हसने ब्रह्मके तीसरे पादका उपदेश करके कहा- 'इसका नाम ज्योतिष्मान् है । अगला उपदेश तुझे जलमुर्ग करेगा।" रातको सत्यकाम ब्रह्मकेचितनमें लगा रहा, प्रात काल गौओंको हौंककर आगे चला और सन्ध्या होनेपर एक वटके वृक्षके नीचे ठहर ४८ उपनिषदोंके चौदह रख गया। गौओंको उचित व्यवस्था करके वह अग्निजाकर पूर्वाभिमुसहोकर बैठ गया। इतने में एकागजमुर्गने आकर पुकारा मायकाममयकामन उत्तर दिया--भगवन् ! क्या भाना है "मुनेि कहा---'यस! मैं तुझे बनके चार्य पादका उपदेश करता हूँ।' सत्यकाम नोटा-'प्रभो । कीजिये। तदन तर जमुने आयतमान-पसे ग्राबाउपदेश किया इस प्रकार सय, गुरुसेरा और गोसेवाके प्रतापसे वृषभम्र यायु, अग्निदेय, हेमगर सूर्यदेव और मुर्गरूप प्राणदेवतासे मनमान प्रामकर सत्यकाम एक हजार गौओंके बड़े समूहको लेकर आचार्य गौतमके घर पहुँचा। उस समय उसके मुख मण्डलपर ब्रह्मनेज उिटक रहा था, भान दकी सहा-सहम फिरणे झटमग रही थी। गुरुने सत्यकामकी चितारहित, नेजपूर्ण दिव्य मुख कातिको देखकर कहा---'यस सत्यकाम! उसने उत्तर दिया- मगन् । गुरु बोले-~हे सौम्य ! तू ब्रह्मज्ञानी के मश दिसाय दे रहा है, वत्स ! तुझको किसने उपदेश किया। सत्यकागने कहा- भगवन् ! मुझको मनुष्येतरोंसे उपदेश प्राप्त हुआ है।' यों कहकर उसने सारा हाल सुना दिया और कहा-~भावन् ! मैंने सुना है कि- भगवगेभ्य आ पायर्यादेष विद्या विदिता साधिष्ठ आप सहश आचार्य के द्वारा प्राप्त की हुई गिचा ही श्रेष्ठ होती है, अतएर मुझे आप ही पूर्णरूपसे उपदेश कीजिये। गुरु प्रसन्न हो गये और उहोंने कहा-'रत्स! तूने जो कुछ प्राप्त किया है, यही मझतत्व है । अन तेरे लिये कुछ भी जानना शेष नहीं रहा।" (शादोग्य उपनिषद्के आधारपर) अनिद्वारा उपदेश कमल्का पुत्र उपकोसल सत्यकाम जाबालके पास जाकर उनका शिष्यल खीकार कर रहने लगा। उसने पूरे बारह पर्पतक गुरुके अमियों- की सेवा की। गुरुने अपने दूसरे शिष्य ब्रह्मचारियोंका समावर्तन (वेदा- ध्ययन पूर्ण करवा) कर उन्हें घर जानेकी आज्ञा दी परन्तु उपकोसल्को आज्ञा नहीं दी। उपकोसलके मनमें कुछ रिपाद हो गया, यह देखकर गुरुपत्नीके मनमें दया उपजी। उसने स्वामीसे कहा, 'इस ब्रह्मचारीने ब्रह्मचर्यके नियमोंका पालन किया है और श्रद्धापूर्वक विद्याध्ययन किया है तथा आपके अग्नियोंकी भलीभौति से की है, अतएव इसका समावर्तन करके इसकी कामना पूर्ण कीजिये। नहीं तो ये अग्नि आपको उलाहना देंगे।' सत्यकामने बात सुनी अनसुनी कर दी और यह बिना ही कुछ कहे यानाके लिये घरसे चले गये । उपकोसलको इससे बहुत दु व हुआ। वह मानसिक व्याधियोंसे दुखी हो गया और अन्न छोड़कर अनशन व्रत करने लगा। स्नेहमयी गुरु- पत्नीन कहा-'हे ब्रह्मचारी!तू भोजन कर किसलिये भोजन नहीं करता है ?' उसने कहा---'मेरे मनमें अनेकों कामनाएँ हैं, में अनेक प्रकारके मानमिक दु खोंसे ग्रस्त हैं अत में कुछ भी नहीं खा सकूँगा।' गुरुपनी चुप हो गयीं। अग्नियोंने विचार किया कि इस तपस्वी ब्रह्मचारीने मन लगाकर हमारी बहुत ही सेवा की है, अतएव इसकी कामनाको हमलोग पूर्ण करें। यह विचारकर अग्नियों ने उसे अलग अलग ब्रह्मविधाका यथोचित उ. चौ०४- - उपनिपदोंके चौदह रत उपदेश किया। उपदेशके अनतर सबमनियों ने मिलकर उससे कहा- 'हे सौम्य उपकोसल! हमने तुझको अग्नि तया आत्माका यथार्य उपदर्श दिया है, अब तेरे आचार्य आकर तुझे इस विद्याके फलका उपदेश देंगे।" कुछ दिनों बाद गुरु यातासे लौट आये, उहोंने शिष्यको पुकारा-~~-'उपकोसल !' उसने कहा--भगवन् !' उपकोमलका मुव ब्रह्मनेजसे देदीप्यमान हो रहा था, उसकी समस्त इन्द्रियों सात्विक प्रकाशको प्राप्त थी, यह देखकर आचार्य ने हर्षमें भरकर पूछा-~-'बेटा उपकोसल ! तेरा मुख ब्रह्मनानियोंकी तरह चमक रहा है, बता, तुझको किमने महाका उपदेश किया। किमी इष्यसे उपकोसलको उपदेश नहीं मिला था इससे उसने स्पष्ट न कर- कर साङ्केतिक भाषा कहा-'भगवन् ! आपके बिना मुझे कौन उपदेश करता यह अग्नियों पहले मानो और प्रकारके से थे, मब आपको देख कर'मानो डर-से रहे है। मकेतका अर्थ समझकर भाचार्यने कहा--- वत्स ! अग्मियोंने तुझे क्या उपदेश किया। उपकोसाटने अमियोंसे जो कुछ प्राप्त किया या, सब कह सुनाया। सुनकर गुरु बोले- वत्सइन अग्मियोंने तो तुझे लोकसम्बधीही उपदेश किया है। मैं तुपको उस पूर्णब्रह्मका उपदेश करूँगा, जिसका साक्षात् हो जानेपर जैसे कमलके पत्तेपर जलकास्पर्श नहीं होता, वैसे ही उसपर पापका स्पश नहीं हो सकता।" शिष्यने कहा-'भगवन् ! आप उपदेश करें। इसके बादआचार्यने उपकोसलको ब्रह्मका रहस्यमयसम्पूर्ण उपदेश किया और उसका समावर्तन करके उसे घर जानेकी आज्ञा दी। (ोग्य उपनिषद्के अधारपर ) . . निरभिमानी शिष्य उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलपका पुत्र सत्ययज्ञ, भन्छवका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और अश्वतराधिका पुत्र धुडिउये पाँचों महाशाल अर्यात जिनकी शालामें मसंरय रियायों पढ़ते थे ऐसी महान् शालानाराले महान् श्रोत्रिय यानी वेदका पठन-पाठन करनेवाले थे । एक दिन ये एकत्र होकर 'वास्तवमें मामा क्या है और प्रक्ष क्या है। इस वियपर विचार करने लगे, परन्तु जब किसी निर्णयपर नहीं पहुँचे तब किसी दूसरे ग्रह्मवेता विद्वान्के पास जाकर उनसे पउनेका निधयकर आपसमें कहने लगे कि वर्तमान समयमें अरुणके पर उहालक भामरूप वैश्वानरको मलीभौति जानते हैं, यदि सरकी राय हो तो हमको उनके पास चलना चाहिये।' सपकी राय हो गयी और चे उद्दालक- के उदारकने उनको दूरसे देखते ही उनके आनेका प्रयोजन जान लिया और वे विचार करने लगे.--'ये महाशाल और महान् श्रोत्रिय पाते ही मुझसे पूरेंगे और मैं इनके प्रश्नों का पूर्ण समाधान कर नहीं सकूँगा। इससे उत्तम यही है कि मैं इहें किसी दूसरे योग्य पुरुषका नाम बतला दूं।' ऐसा विचारकर उद्दालकने उनसे कहा-'हे भगवन्! मैं जानता हूँ आप मुझसे आत्माके विषयमें कुछ पूछने पधारे हैं, परन्तु इस समय केयके पुत्र प्रसिद्ध राजा अश्वपति इस आत्मरूप वैश्वानरको भलीभांति जानते हैं, यदि आप सबकी अनुमति हो तो हम सब उनके पास चलें। सर्वसम्मतिसे सब राजा अश्वपतिके गये पास गये पास ५२ उपनिषदों चौदह रत अश्वपनिने उन छहों ऋषियों-- अतिथियोंका अपने सेवकों यथायोग्य अलग अलग भलीभाँति पूजन साकार करवाया और दूसरेरि प्रात काल राजा सोकर उठते ही उनके पास गये और बहुत सा ११ सामने रखकर विनयमावसे उसे ग्रहण करने की प्रार्थना करने लगपाल वे नो धनकी जयासे वहाँ नहीं गये थे, इससे उन्होंने धनका स्पर्श में नहीं किया और चुपचाप बैठे रहे। राजाने सोचा, शायद ये मुझे अभी या दुराचारी समझते हैं, इसीलिये मेरा धन (दूषित समझकर नहीं लेने यह विचारकर राजा कहने लगे..- न मे स्तेनो जनपदे न कदयों न मद्यप । नानाहितामिलोरिधान न स्वैरी स्वैरिणी पुत ॥ 'हे मुनियो ! मेरे राज्यमें कोई चोर नहीं है, क्योंकि किसीके पा किसी वस्तुका अभाव नहीं है, कारण) मेरे देशमें ऐसा कोई धनी ना है जो कंजूम हो यानी यथायोग्य दान न करता हो । न मेरे देश को शराब पीता है, न कोई ऐसा द्विज है जो अग्निहोत्र न करता हो, न को ऐसा ही व्यक्ति है जो विद्वान् न हो, और न कोई व्यभिचारी पुरुष । मेरे देशमें है, जब पुरुष ही व्यभिचारी नहीं हैं तो खी तो व्यभिचारिण होगी ही कहाँसे । अतएव मेरा धन शुद्ध है, फिर आप इसे क्यों नह लेते "* मुनियोंने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब राजाने सोचा, शाय धन थोड़ा समझकर मुनि न लेते हों, अतरख वे फिर कहने लगे.-- * राजाओंको इस मार्शपर विचार करना चाहिये और रसोरे अनुमा अपने राज्य एक-एक पैसेको गुद्ध बनाना चाहिये।
निरभिमानी शिष्य 'हे भगान् ! मैं एक यज्ञका आरम्भ कर रहा हूँ, उस यज्ञमें मैं एक- एक ऋत्विक्को जितना धन दूँगा, उतना ही आपमेंसे प्रत्येकको दूंगा। आप मेरे यहाँ ठहरिये और मेरा यज्ञ देखिये।' राजाकी यह बात सुनकर उन्होंने कहा-'हे राजन् ! मनुष्य जिस प्रयोजनसे जिसके पास जाता है, उसका वही प्रयोजन पूरा करना चाहिये । हमलोग आपके पाम आत्मरूप वैश्वानरका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे आये हैं, क्योंकि इस समय आप ही उसको भलीभाँति जानते है इसलिये आप हमें वही समझाइये । हमें धन नहीं चाहिये ।'* राजाने उनसे कहा-'हे मुनियो! कल प्रात काल में इसका उत्तर आपको दूंगा ।' ज्ञानकी प्राप्तिके लिये अभिमानका त्याग करना परम आवश्यक है, केवल मुँहसे माँगनेपर ज्ञान नहीं मिलता। वह अधिकारी- कोही मिलता है । राजाके उत्तरसे मुनि इस बातको समझ गये और दूसरे दिन अभिमान त्यागकर सेवावृत्तिका परिचय देनेवाले समिधको हाथों में लेकर दुपहरसे पहले हीविनयके साथ शिष्यभावसे सब राजाके पास पहुंचे और जाते ही उनके चरणों में प्रणाम करने लगे। राजाने उनको चरणों में प्रणाम नहीं करने दिया, क्योंकि एक तो वे ब्राह्मण थे और दूसरे सद्गुरु मान-बड़ाई, पूजाको इच्छा नहीं रखते। तदनतर राजाने उन्हें गुरुरूपसे नहीं, किंतु दाताके रूपसे वैश्वानररूप ब्रह्मविद्याका उपदेश किया। (छान्दोग्य उपनिषद्के माधारपर ) TV सायको किसी भी प्रलोभनमें न फंसकर अपने *इसी रक्ष्यपर रहना 'तत्त्वमसि अरुणके पुत्र आरुणि उद्दालक श्वेतकेतुनामक एक पुत्र था। वह बारह वर्षकी भास्थातक केवल खेलकूदमें हीरहा। पिता सोचते रह कि यह न्यय ही विद्या प्राप्त करनेकी इच्छा करे तो उत्तम है, परतु उसने वैसी इच्छा नहीं की, तब पितासे नहीं रहा गया । उन्होंने एक दिन उसे अपने पास बुलाकर कहा-~-'हे घरसम्वेतकेतो! पूजा और सुयोग्य गुरुके समीप समचारी होकर रह । हे सौम्य अपने यशमें कोई भी ऐसा उत्पन्न नहीं हुआ जिसने वेदोंका त्याग किया हो और जो ब्राह्मणके गुण और माचारोंसे रहित होकर केवल नामधारी ब्राह्मण बनकर रक्षा हो। ऐसा करना योग्य नहीं है । साराश, तुझे वेदोंका अध्ययन करके प्रमको प्राप्त करना ही चाहिये। पिता आरुणिका मीठा उलाहना सुनकर श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामें गुरुकेघर गया और पूरे चौबीस वर्षको अरस्थातक गुरुगृहमें रह- कर व्याकरणादि छ भङ्गोसहित चारों वेदोंका पूर्ण अययन करनेके पश्चात् गुरुकी आज्ञा लेकर घर लौटा। उसने मन-ही मन विचार किया कि में वेदका पूर्ण ज्ञाता हूँ, मेरे समान पण्डित और कोई नहीं है। मैं सोपरि विद्वान् और बुद्धिमान् हूँ।' इस प्रकारके विचारोंसे उसके मनमें गर्व उत्पन्न हो गया और वह उद्धत तया विनयरहित होकर बिना ही प्रणाम किये पिताके सामने आकर बैठ गया । आरुणि भूपि उसका नमनारहित औद्धत्यपूर्ण आचरण देखकर इस बातको जान गये कि इसको वेदके अध्ययनसे बड़ा गई होगया है,तो भी आरुणि ऋषिने उस अभिनयी पुत्रपर कोध नहीं किया और कहा-'हेश्नेतकेतोतू ऐमा क्या - 'तत्त्वमसि पढ़ आया है कि जिससे अपनेको सबसे बडा पण्डित समझता है और इतना अभिमानमें भर गया है। विद्याका खरूप तो विनयसे ही खिलता है। अभिमानी पुरुषके हृदयसे सारे गुण तो दूर चले जाते हैं और समस्त दोष अपने आप उसमें भाजाते हैं। तूने अपने गुरुसे यह सीखा होतो बता कि ऐसी कौन-सी वस्तु है कि जिस एकके सुननेसे बिना सुनी हुई सब वस्तुएँ सुनी जाती हैं, जिस एकके विचारेसे विना विचार की हुई सब वस्तुओंका विचार हो जाता है, जिस एकके ज्ञानसे नहीं जानी हुई सब वस्तुओंका ज्ञान हो जाता है। मारुणिके ऐसे वचन सुनते ही श्वेतकेतुका गर्व गल गया, उसने सोचा कि मैं तो ऐसी किसी वस्तुको नहीं जानता। मेरा अभिमान मिथ्या है। यह नम्र होकर विनयके साथ पिताके चरणोंपर गिर पड़ा और हाथ जोड़कर कहने लगा-भगवन् ! जिस एक वस्तुके श्रवण, विचार और ज्ञानसे सम्पूर्ण वस्तुओंका श्रवण, विचार और ज्ञान हो जाता है उस वस्तु- को मैं नहीं जानता । आप उस वस्तुका उपदेश कीजिये।' आरुणिने कहा- हे सौम्य ! जैसे कारणरूप मिट्टी के पिण्डका ज्ञान होनेसे मिट्टी के कार्यरूप घट, शराव आदि समस्त वस्तुओंका ज्ञान हो जाता है और यह पता लग जाता है कि घट आदि कार्यरूप वस्तुएँ सत्य नहीं हैं केवल पाणीके शिकार हैं, सत्यतो केवल मिट्टी ही है। हे सौम्य ! जैसे कारणरूप सोनेके पिण्डका ज्ञान होनेसे सोनेके कड़े, कुण्डलादि सब कार्योंका ज्ञान हो जाता है और यह पता लग जाता है कि ये कड़े, कुण्डलादि सत्य नहीं है, केवल थाणीके शिकार हैं, सत्य तो केवल नख काटनेकी नहरनीआदिमें रहे हुए लोहेका ये खा, परशु आदिका ज्ञान हो जाता है और सोना ही शान हो उपनिषदोके चौदह रन यह पता लग जाता है कि वालपमें ये सब सत्य नहीं है, एक लोहार सत्य है, बस, इसी तरह वह ज्ञान होता है।' पिता आरुणिके यह पचन सुनकर श्वेतकेतुने कहा-पिताजी निश्चय ही मेरे विद्वान् गुरु इस वस्तुको नहीं जानते हैं, क्योंकि यदि व जानते होते तो मुझे बतलाये विना कभी नहीं रहते। अतएर हे भगवन्! अब आप ही मुझको उस वस्तु का उपदेश दीजिये जिस एकके जाननसे सब वस्तुएँ जानी जाती हैं। आरुणिने कहा,अशा सावधान होकर सुन- 'हे प्रियदर्शन ! यह नाम, रूप और क्रियास्वरूप दृश्यमान जगव उत्पन होनेसे पहले केवल एक अद्वितीय, सत् ही था। उससत् ना सङ्कल्प किया कि में एक बहुत हो जाऊँ ऐसा सङ्कल्प करके उसन पहले तेज उत्पन्न किया, फिर उससे जल उत्पन्न किया और तदन तर उममे अन उत्पन किया । इही तीन तत्वोंसे मब पदार्थ उत्पन दुए । जगत्में जितनी वस्तुएँ है, सब तेज, जल आर अन्न-~-इन तीनोंके मिश्रणसे ही बनी हैं । जहाँ प्रकाश या गरमी है वहाँ तेजतत्त्वकी प्रधानता है, जहाँ दर या प्रवाही भाव है वहाँ जलकी प्रधानता है और जहाँ कठोरता है वहाँ अन्न या पृथ्वीकी प्रसनता है। अग्निमें जो लाल, श्वेत और कृष्ण वर्ण है उसमें टलाई तेजकी, सफेदी जलकी और श्यामता पृथ्वीकी है। यही बात सूर्य, चन्द्रमा आर बिजलीमें है। यदि अपि, सूर्य, च द्रमा और बिजलीमेंसे नेज, जल और पृथ्वीको निकाल लिया जायतो अग्निमें अग्निपा, सूर्यमें सूर्यपन, चन्द्रमामें च द्रपन और विद्युत्में विद्युत्पन कुछ भी नहीं रह जायगाइसी प्रकार सभी वस्तुओं- में समझना चाहिये। खाये हुए अनके भी तीन रूप हो जाते हैं। स्थूलमाग 'तत्वमसि विष्ठा बन जाता है, मध्यम भाग मास बनता हे और सूक्ष्म भाग मनरूप हो जाता है । इसी तरह जलके स्थूल भागसे मूत्र वनता है, मध्यम भाग- से रक्त बनता है और सूक्ष्म माग प्राण बनता है। इसी प्रकार तैल, वृत आदि तैजस पदार्थोके स्थूल भागसे हड्डी बनती है, मध्यम भाग मजारूप हो जाता है और सूक्ष्म भाग वाणीरूप होता है । अतएव मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजमय है अर्थात् मन अन्नसे बनता है, प्राण जलसे बनता है और वाणी तेजसे बनती है।' इसपर श्वेतकेतुने कहा-'हे पिताजी ! मुझको यह विषय और साफ करके समझाइये। उद्दालक आरुणि बोले- हे सौम्य । जैसे दही मथनेसे उसका सूक्ष्म सार तत्त्र नवनीत ऊपर तैर आता है इसी प्रकार जो अन्न खाया जाता है, उसका सूक्ष्म सार अशमन बनता है । जलका सूक्ष्म अश प्राण और तेजका सूक्ष्म अंश वार बनता है। असलमें ये मन, प्राण और वाणी तथा इनके कारण अन्नादि कार्यकारणपरम्परासे मूलमें एक ही सत् वस्तु ठहरते हैं। सरका मूल कारण सत् है, वही परम आश्रय ओर अधिष्ठान है। सत्के कार्य नाना प्रकारको आकृतियाँ सर वाणीके विकार है,नाममात्र हैं। यह सत् अणुकी भौति सूक्ष्म है, समस्त जगतका आत्मारूप है, जैसे सर्पमें रज्जु कल्पित है, इसी प्रकार जगत् इस 'सत्' में कम्पित है। हे श्वेतकेतो! वह 'सत्' वस्तु तू ही है। तत्वमप्ति हे सौम्य ! जैसे शहदकी मक्खी अनेक प्रकारके वृक्षोंके रसको उसको एकरस करके शहदके रूपमें परिणत करती को प्रात रस जैसे यह नहीं जानता कि में वे । उपनिषदोंके चौदह रत आमके पेड़का रस हूँ या मैं कटहरके वृक्षका रस है, इसी प्रकार सुषुप्तिकालमें जीव 'सत्' वस्तु के साथ एकीभावको प्राप्त होकर यह नहीं जानते कि हम सत्में मिल गये हैं। सुपुप्तिसे जागकर पुन अपने अपने पहलेके बाघ, सिंह, वृक, शूकर, कीट, पतग और मच्छरके शरीरको प्राप्त हो जाते हैं । यह जो सूक्ष्म तत्व है यही आत्मा है, यह सत् है और हे श्वेतकेतो। वह तू ही है । 'तत्वमसि' श्वेतकेतुने कहा---(भगरन् । मुझको फिर समझाइये। आरुणि बोले-~-'हे सौम्य ! जैसे समुद्रके जलसे ही बादलोंके द्वारा पुष्ट हुई गङ्गा आदि नदियों अतमें समुद्रमें ही मिलकर अपने नाम रूपको त्याग देती हैं, यह नहीं जानती कि मैं गङ्गा हूँ, मैं नर्मदा हूँ' और सर्वथा समुद्रभावको प्राप्त हो जाती हैं, और फिर मेधके द्वारा वृष्टि- रूपसे समुद्रसे बाहर निकल आती हैं, किन्तु यह नहीं जानती कि हम समुद्र से निकली हैं । इसी प्रकार ये जीव भी 'सत्' से निकल- कर 'सत्' में ही लीन होते हैं और पुन उसीसे निकलते हैं, पर तु यह नहीं जानते कि हम 'सत्' से आये हैं । और यहाँ वही वाघ, सिंह, वृक, शूकर, कीट, पतग या मच्छर जो-जो पहले होते हैं वे हो जाते हैं । यह जो सूक्ष्म तत्त्व सबका आत्मा है, यह सत् है, यही आत्मा हे और हे श्वेतकेतो। वह सत् तू ही है ।' 'तत्वमसि' श्वेतकेतुने कहा-~~-भगवन् ! मुझे फिरसे समझाइये ।' उद्दालक आरुणिने 'तथास्तु' कहकर समझाना शुरू किया--- हे सौम्य । बड़े भारी वृक्षकी जड़पर कोई चोट करे तो वह एक ही चोटमें मूव नहीं जाता, वह जीता है और उस छेदमेंसे रस 'तत्त्वमसि' झरता है । वृक्षके बीचमें छेद करनेपर भी वह सूखता नहीं, छेदमेंसे रस झरता है, इसी प्रकार अप्रमागपर चोट करनेसे मी वह जीता है और उसमेंसे रस टपकता है। जबतक उसमें जीवात्मा व्याप्त रहता है तबतक वह मूलके द्वारा जल ग्रहण करता हुआ आनन्दसे रहता है। जब इस वृक्षकी शाखाओंमें एक शाखासे जीर निकल जाता है तब वह सूख जाती है, दूसरीसे निकलनेपर दूसरी और तीसरीसे निकलनेपर तीसरी सूख जाती है । और जब सारे वृक्षको जीव त्याग देता है तब वह सब-का सब सूख जाता है। इसी प्रकार यह शरीर भी जब जीवसे रहित होता है तभी मृत्युको प्राप्त होता है। जीव कभी मृत्युको प्राप्त नहीं होता, यह जीवरूप मूक्ष्म तत्व ही मामा है । यह सत् है, यही आत्मा है और हे श्वेतकेतो। 'यह सत्तू ही है। 'तत्वमसि' श्वेतकेतुने कहा-'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' पिता आरुणिने कहा-सा, एक बड़ा फल तोडकर ला । फिर तुझे समझाऊँगा । श्वेतकेतु फल ले आया। पिताने कहा -इसे तोड़कर देख इसमें क्या है " श्वेतकेतुने फल तोड़कर कहा--'भगवन् ! इसमें छोटे-छोटे बीज हैं । ऋषि बोले, 'अच्छा,एक बीजको तोडकर देख उसमें क्या है " श्वेतकेतुने बीजको फोड़कर कहा--'इसमें तो कुछ भी नहीं दीखता ।' तब पिताआरुणि बोले-~-'हे सौम्य ! तू इस घट-बीजके मूक्ष्म भावको नहीं देखता, इस अत्यन्त सूक्ष्म तत्वसे ही महान् वटका वृक्ष निकलता है। बस, जैसे यह अत्यन्त सूक्ष्म वट-बीज बडे भारी वटके वृक्षका प्रकार सूक्ष्म सत् आत्मा इससमस्त स्थूल जगत्- य ! मैं सत्य कहता हूँ, तू मेरे वचनमें श्रद्धा का -- .
६० उपनिषदोंके चौदह रत रख । यह जो सूक्ष्म तत्व आत्मा है वह सत् है और यही आत्मा है। हे श्वेतकेतो । वह 'सत्' तू ही है । 'तत्त्वमप्ति श्वेतकेतुने कहा-~-भगवन् ! मुझको पुन दूसरे दृष्टा तर समझाइये ।' उहालकने एक नमककी डली श्वेतकेतुके हाथों देक कहा-मास । इस डलीको अभी जलसे भरे हुए लोटेमें डाल दे और फिर कल सबेरे उस लोटेको लेकर मेरे पास आना।' श्वेतकेतु ऐसा ही किया । दूसरे दिन प्रात काल जब श्वेतकेतु जलका लोटा लेकर पिताके पास गया, तब उन्होंने कहा-'हे सौम्य ! रातको जो नमककी डली लोटेमें डाली थी, उसको जलमेंसे ढंदकर निकाल तो दे, मैं उसे देखू ।' श्वेतकेतुने देखा, पर नमककी डली उसे नहीं मिली, क्योंकि वह तो जलमें गलकर जलरूप हो गयी थी। तब आरुणिने कहा---'अच्छा इसमें से इस तरफसे थोडा-सा जल चखकर बता तो कैसा है । शेतकेतुने आचमन करके कहा-~-पिताजी ! जल खारा है। आरुणि बोले-~-'अच्छा, अब बीचमेंसे लेकर चखकर बता।" श्वेतकेतुने चवकर कहा---'पिताजी 1 यह भी स्वारा है। आरुणिने कहा-'अच्छा । अब दूसरी ओरसे जरा-सा पीकर बता केमा म्वाद है " श्वेतकेतुने पीकर कहा-'पिताजी ! इधरसे भी स्वाद खारा हो है । अतमें पिताने कहा--'अब सब ओरसे पीकर, फिर जल्को फेंक दे और मेरे पास चला आ ।' शेतकेतुने वैसा ही किया और आकर पितासे कहा---'पिताजी ! मैंने जो नमक जलमें डाला था, यद्यपि मैं अपनी आँखोंसे उसको नहीं देख पाता,परन्तु जीभके द्वारा मुझको उमका पता लग गया है कि उसकी स्थिति उस जलमें सदा और सर्वत्र है। पिताने कहा-'सौम्य ! जैसे तू यहाँ उम प्रसिद्ध सदा 'तत्त्वमसि । - नमकको नेत्रोंसे नहीं देख सका तो भी वह विद्यमान है, इसी प्रकार यह सूक्ष्म तत्व आत्मा है । वह सत् हे और वही आत्मा है और हे श्वेतकेतो! यह आत्मा तू ही है।' 'तत्वमसि' श्वेतकेतुने कहा-'पिताजी ! मुझे फिर उपदेश कीजिये। तर मुनि उद्दालक बोले..-'सुन, जैसे चोर आँखोंपर पट्टी बाँधकर किसी मनुष्यको बहुत दूरके गान्धार देशमे लाकर किसी जगलमें निर्जन प्रदेशमें छोड़ दे और वह पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं- की ओर देख देखकर सहायताके लिये पुकार करके कहे कि 'मुझको आँखोंपर पट्टी बांधकर चोरोंने यहाँ लाकर छोड़ दिया है। और जैसे उसकी करुण पुकारको सुनकर कोई दयालु पुरुष दयाश उसकी आँखोंकी पट्टी खोल दे और उससे कह दे कि गान्धार देश इस दिशामें है, तू इस रास्तेसे चला जा, वहाँ पहुँच जायगा ।' और वह बुद्धिमान् अधिकारी पुरुष जैसे उस दयालु पुरुषके वचनोंपर श्रद्धा रखकर उसके बताये मार्गपर चलने लगता है और एक गाँवसे दूसरे गाँत्र पूछ परछ करता हुआ आखिर अपने गाधार देशको पहुँच जाता है। इसी प्रकार अज्ञानकी पट्टी बाँधे हुए काम, क्रोध, लोभादि चोरोंके द्वारा ससाररूपी भयङ्कर वनमें छोड़ा हुआ जीर ब्रह्म- निष्ठ सद्गुरुके दयापरवश हो बतलाये हुए मार्गसे चलकर अविद्याके फंदेसे छटकर अपने मूल स्वरूप 'सत्' आत्माको प्राप्त हो जाता है। यह जो सूक्ष्म तर हे, सो आत्मा है । वह सत् है, वही आत्मा है, है श्वेतकेतो ! वह सत् आत्मा तू ही है।' तत्त्वमसि' वेतकेतुने कहा-~भगवन् ! कृपापूर्वक मुझको फिर उपदेश कीजिये । तब मुनि उद्दालक बोले-'सुन, जैसे कोई एक रोगी मनुष्य 6 उपनिषदोंके चौधरम मरने गादोता है, तब उनके सम्बधी टोग उसे घरकार ने है कि तुम हमें पदयानते हो या नहीं। जबतक उमरोगी जीभ बागीका मामें, मनका प्राणमें, प्राणका तेजमें और तेना प्रम लपदी हो जाता तबतक पद सको पहचान सकता है। जब अमकी पाणी का मनमें, मनका प्राणमें, प्राणका लेनमें और तेत्र या प्रामें लय हो जाता है तब यह किसीको नही पहचान सकता। यह सूक्ष्म माव है सो मारमा दे, यह सत् है, यही मारमा है, हे शेततो यह आमा र दी है। नवममि' नरेतुने कहा-~भगान् । पार्षक मुझे फिर समझाइये।' तब मुनि फरने लगे-सला सुन, एक आदमी चोरीके सदेहमें पहा जाता है और उससे पा जाता है कि तेन चोरी को या नदी, यह अखीकार करता है। तय राज्यके अधिकारी जलनी हुई कुल्हाड़ी लाकर उसके हायमें देनेकी आशा करते हैं, युल्हाड़ी लायी जाती है और यदि उसने चोरी की है और झूठ बोलकर छटना चाहता है तो आत्माको असायके साथ जोड़नेके कारण पुन्हाहीका स्पर्श होते ही उसका हाय जल जाता है और उसे अपराध के लिये दण्ड दिया जाता है। परतु यदि वह चोर नहीं होता और सत्य ही कहता है तो आमाको सम्यके साथ सयुक रापने के कारण उसका शाप उस कुल्हाड़ीसे नहीं जलता और वह बन्धनसे छूट जाता है ।* *स बणनरा पता गता है कि प्राचीन काल में सत्यपर रितना विश्वास था । सत्यो प्रवापसे उस सत्यमय वातावरणमैं जलली कुल्दानी भी सत्यवत्ता के ज्ञप नगै मल सकती थी और असत्या आमयी सीसे अलवर ददित होता था।
एक सी एक वर्षका ब्रह्मचये इस प्रकार सत्यताके कारण जलती हुई कुल्हाड़ीसे सत्यवक्ता बच जाता है, इससे सिद्ध होता है कि जीव सत् है, वह सत् है, वही आत्मा है । हे श्वेतकेतो। वह आत्मा तू ही है । 'तत्वमसि' इस प्रकार पिता उद्दालक आरुणिके उपदेशसे श्वेतकेतु आत्माके अपरोक्ष ज्ञानको प्राप्त होकर कृतार्थ हो गया । (छान्दोग्य उपनिषद्के मापारपर) एक सौ एक वर्षका ब्रह्मचर्य य आत्मापातपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिध- सोऽपिपास सत्यकाम सत्यसवरप सोऽन्वेष्टन्य स विजिक्षा- सितव्य स सर्वाश्च लोकानाप्नोति सारश्च कामान्यस्तमात्मा- नमनुविध विज्ञानातीति ह प्रजापतिरावाच । (यादो० ८१७१) एक समय प्रजापतिने कहा कि 'आत्मा पापसे रहित, बुढ़ापेसे रहित, मृत्युसे रहित, शोकसे रहित, क्षुधासे रहित, पिपासासे रहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है । उस मात्माकी खोज करनी चाहिये। वही जानने योग्य है । जो उस आत्माको जानकर उसका अनुभव करता है, न सम्पूर्ण लोकोंको ओर सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त करता है।' प्रजापति के इस पचनको सुनसर देवता और असुर दोनोंने आत्मा- को जानने की इच्छा की। देवताओं द्र और असुरों में विरोचन प्रतिनिनि उन गये और उन दोनोंने प्रजापति के पास जानेका विचार किया।
उपनिपदोंके चौदह रत परस्पर उपके कारण आपसमें एक दूसरेसे कुछ भी न कहकर दोनों समिपाणि होकर विनयपूर्वक प्रजापतिके पास गये ।* दोनोंने वहाँ जाकर परस्परकी ईर्माको मुटाकरलगातार बत्तीस वर्ष तक प्रमचर्यका पालन किया। इसके बाद प्रजापतिने उनसे पूछा--- किमिच्छन्तारवास्तम् किस असे तुम दोनों यहाँ आकर रहे हो।" उन्होंने कहा-'भगन् ! आमा पापरहित, जरारहित, मृत्यु रहित, शोकरहित, क्षुमा ओर पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसकल है, यह जानने योग्य है, वही अनुभव करने योग्य है, जो उस जानकर उसका अनुभव करता है वह सम्पूर्ण लोकों और सम्पू। भोगोंको प्राप्त होता है। आपके ये वचन सबने सुने हैं इसीसे उ आत्माको जाननेकी इच्छासे हमलोग यहाँ आये हैं।' तो ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत ए आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रहोति । प्रजापतिने कहा 'आँखोंमें यह पुरुष द्रष्टा अन्तर्मुखी दृष्टि- वालोंको दीखता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय है, यही ब्रह्म है। इद्र और विरोचनने अशुद्ध बुद्धि होनेके कारण इस कथनको अक्षरश ज्यों का-त्यों ग्रहण कर लिया। उन्होंने समझा कि नेनों में जो * यह नियम है किस गुरुमेवामिगच्छेद समिपाणि श्रोनिय ब्रह्मनियम् ॥' (मुण्डक. १।२।१२) शिष्यको हाथमें समिधा लेकर मोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास जाना चाहिये।
- एक सौ एक वर्षका ब्रह्मचर्य मनुष्यका प्रतिबिम्ब दीख पड़ना है वही आत्मा है। इमो निश्चयको दृढ करनेके लिये उन्होंने प्रजापतिसे सिर पूछा-'हे भगवन् ! जलमें जो पुरुषका प्रतिबिम्ब दीखता हे अयमा दर्पण शरीरका जो प्रतिबिम्ब दीखता है, इन दोनों से आपका बतलाया हुआ ब्रह्म कौन मा है. ? क्या ये दोनों एक ही हैं । प्रजापतिने कहा हाँ, हाँ, वह इन दोनोंमें ही दीख सकता है । वही प्रत्येक वस्तुमें है।' इसके बाद प्रजापतिने उनसे कहा-'जाओ! उस जलसे भरे हुए कुण्डमें देखो और यदि वहाँ आत्माको न पहचानसको तो फिर मुझसे पूछना, मैं तुम्हें समझाऊँगा।' दोनों जाकर कुण्डमें अपना प्रतिबिम्ब देखने लगे। प्रजापतिने पूछा 'तुमलोग क्या देखते हो" उन्होंने कहा- सर्वमेवेदमाया भगव आत्मान पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्य प्रतिरूपमिति। 'भगवन्! नखसे लेकर शिखातक हम सारे आत्माको देख रहे हैं ।' नख शिखको बात सुनकर ब्रह्माजीने फिर कहा-'अच्छा, तुम जाओ और शरीरोंको स्नान कराकर अच्छे अच्छे गहने पहनो और सुन्दर- सुदर वस्त्र धारण करो। फिर जाकर जलके कुण्डमें देखो। नख और केशके सदृश यह शरीर भी अनात्म है। इसी बातको समझानेके लिये प्रजापतिने यों कहा, परन्तु उन दोनोंने इस बातको नहीं समझा। वे दोनों अच्छी तरह नहा धोकर सुन्दर-सुन्दर वस्रालङ्कारोंसे सजकर कुण्डपर गये और उसमें प्रतिबिम्ब देखने लगे । प्रजापतिने पूछा- 'क्या देखते हो। उन्होंने कहा -'हे भगरन् ! जैसे हमने सुन्दर- सुदर वस्त्र और आभूषण धारण किये हैं, इसी प्रकार हमारे इस आत्माने भी सुन्दर सुन्दर बसालकारोंको धारण किया है।' ।
उपरिषदोंदे चौदह रक्ष प्रजापति ने सोचा कि त यी अधिक कारण धार्थ स्वरूप इनका समझमें नदी माया, मम्मपन मेरे वचनोसमा परनेगे इनवे प्रनिय ६क सरकारो दरबोनपर इनको मारमा उनको सोगा। यो विचारफर प्रजापनि यहा-मही नाम है यही अविशाशीद, यही अभय है, यही मन है। प्रजापतिके वचन मन इद्र और रोिचन सतुष्ट होकर अपनी अपने घरकी ओर चले जाको यौही जाते देखकर प्रजापनिने मनमें कहा अनुपलभ्यात्मानमननुविद्य मजतो यतर एतदुपनिय भविष्यात देवा पाएगाया ते पराभविष्यति । 'ये यचारे मारमाको जाने बिना ही, साक्षातू अनुभव किये बिन ही जा रहे है। इन देय और असुरों से जो को भी इस (प्रतिबिम्द भाधार शरीरको ही प्रत मानने ) उपनिषद्वाले होंगे, उनका तो परामर ही होगा। विरोचन तो अपनेको ज्ञानी मानकर शात हृदयसे अमरीके पास जा पहुँचा और प्रतिविम्बके निमित्त शरीरको ही आमा समझकर उसने इस शरीरमें आत्मबुद्धिरूप उपनिषद्का उपदेश आरम्भ कर दिया।' उसने कहा---प्रजापतिने शरीरको ही मारमा बतलाया है, इसलिये यह शरीररूपी आत्मा ही पूजा करने योग्य है, यही सेवा करने योग्य है, इस जगत् में केवल इस शरीररूपी सामायी ही पूजा और सेवा करनी चाहिये । इसीको सेवासे मनुष्यको दोनों लोक (दोनों लोकोंमें सुख) प्राप्त हो सकता है इस देहात्मनादवे कारणसे जो दान नहीं करता, सत्कायों में श्रद्धा । ।
एक सौ एक वर्षका ब्रह्मचर्य नहीं रखता तथा यज्ञादि नहीं करता, उसको आज भी असुर कहा जाता है । यह देहात्मवादी उपनिषद् असुरोंका ही चलाया हुआ है। ऐसे लोग शरीरको ही आत्मा समझकर इसे गहने, कपड़े आदिसे मजाया करते हैं और सारा जीवन इस शरीरकी सेवा पूजामें ही खो देते हैं । अतमें यही लोग मृत शरीरको भी गहने कपड़ोंसे सजाकर ऐसा समझते हैं कि हम स्वर्गको जीत लेंगे । 'अमु लोक जेप्यन्त ।' इधर दैवी सम्पदापाले इन्द्रको स्वर्गम पहुँचनेसे पहले ही विचार हुआ कि 'प्रजापतिने तो आत्माको अभय कहा है, परन्तु इस प्रति- बिम्वरूप आत्माको तो अनेक भय रहते है । जब शरीर सजा होता है तो प्रतिबिम्ब भी सना हुआ दीखता है, शरीरपर सुदर वस्त्र होते हैं तो प्रतिबिम्ब भी सुदर वस्त्रोंवाला दीखता है, शरीर नव केशसे रहित साफ- सुथरा होता है तो प्रतिविम्व भी साफ सुथरा दीखता है। इसी प्रकार यदि शरीर अधा होता है तो प्रतिबिम्ब भी अधा होता है, शरीर काला होता है तो प्रतिबिम्ब भी काला दीखता है शरीर लूला सँगड़ा होता है तो प्रतिविम्ब भी लूला लँगड़ा दीखता है, शरीरका नाश होता है तो प्रतिविम्ब भी नष्ट हो जाता है। इसलिये इसमें तो मैं कुछ भी आत्म- स्वरूपता नहीं देखता । इस प्रकार विचारकर इन्द्र समिरपाणिहोकर फिर प्रजापतिके पास आया । प्रजापतिने इन्द्रको देखकर कहा-'इन्द्र ! तुम तो विरोचनके साथ ही शात हृदयसे वापस चले गये थे, अन फिर किस इच्छासे आये हो" इदने कहा-'भगवन् ! जैसा शरीर होता है वैसा ही प्रतिबिम्ब दीखता है, शरीर सुन्दर वनालङ्कृत और परिष्कृत होता है तो प्रतिबिम्ब । । ६८ उपनिषदोंके चौदह रत भी वखालकृत और परिष्कृत दीखता है । शरीर अध, खाम य अङ्गहीन होता है तो प्रतिविम्ब भी वैसा ही दीखता है। शरीरका नार होता है तो इस प्रतिबिम्बम्प आत्माका भी नाश होता है। अतए इसमें मुझे कोई मानद नहीं दीख पड़ता ।। प्रजापतिने इरके वचन सुनकर कहा-'हे इन्द्र! ऐसी ही यात है । वास्तवमें प्रतिबिम्ब आत्मा नहीं है, मैं तुम्हें फिर समझाऊँग, अभी फिर बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यनतसे यहाँ रहो।' इन्द्र बत्तीस वर्पतक फिर ब्रह्मचर्य के साथ गुरुके समीप रहा, तब प्रजापतिने उससे कहा- य एप स्वमे महीयमानश्चरत्येष मारमेति होवाचैतदमन मभयमेतद् ब्रह्मेति। 'जो इस स्वममें जित होता हुआ विचरता है, स्वममें अनेक मोग मोगता है यह आत्मा है, वही अभय है, अमृत है, वही ब्रह्म है ।' इन्द्र शात हृदयसे अपनेको कृतार्थ समझकर चला, परन्तु देवताओंके पास पहुँचनेके पहले ही उसने सोचा कि 'स्वपके द्रष्ट्रा आत्मामें भी दोप है । यद्यपि शरीर अवा होनेसे यह स्वप्नका इष्टा अधा नहीं होता, शरीरकेस्राम (व्यापिपीडित) होनेसे यह साम नहीं होता, शरीरके दोपसे यह दूषित नहीं होता, शरीरके वधसे इसका वध नहीं होता तथापि यह नाश होता हुआ सा, भागता हुआ-सा, शोकप्रस्त होता हुआ सा और रोता हुआ-सा लगता है, इससे मैं इसमें भी कोई आनद नहीं देखता।" इस प्रकार विचारकर इद हाथमें समिरा लेकर फिर प्रजापतिके समीप आया और प्रजापतिके पूटनेपर उसने अपनी शङ्का उनको सुनायी।
है एक सो एक वर्षका ब्रह्मचर्य प्रजापतिने कहा-इन्द्र ! ठीक यही बात है। स्वामका द्रष्टा आत्मा नहीं है। मैं तुम्हें फिर उपदेश करूँगा, तुम फिर बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यवतसे यहाँपर रहो।' इन्द्र तीसरी बार बत्तीस पर्वतक ब्रह्मचर्यके साथ फिर रहा। सके बाद प्रजापतिने कहा--जिसमें यह जीव निद्राको प्राप्त होकर सम्पूर्ण इन्द्रियों के व्यापार शान्त हो जानेके कारण सम्पूर्ण रीतिसे निर्मल और पूर्ण होता है और स्वप्नका अनुभव नहीं करता, यह आत्मा है, अमय है, अमृत है, यही ब्रह्म है।' इद्र आत्माका यथार्थ स्वरूप समझमें आ गया मानकर शान्त हृदयसे स्वर्गकी ओर चला, परन्तु देवताओं के पास पहुँचनेके पहले ही मार्गमें विचार करनेपर उसे सुषुप्ति अवस्थामें पडे हुए जीवको आत्मा समझने में दोप दीख पड़ा। उसने सोचा कि 'सुषुप्ति-अवस्थामें आत्मा जाग्रत् और स्तनकी तरह यह मैं हूँ' ऐसा अपने को नहीं जानता। न इन भूतोंको जानता है और उसमेंसे पिनाशको ही प्राप्त होता है। यानी सुषुप्ति-अवस्थाका सुख भी निरन्तर नहीं भोग सकता, अतएव इसमें भी कोई आनन्द नहीं दीखता ।' इस प्रकार विचारकर इन्द्र समिन्पाणि होकर चौथी बार फिर प्रजापतिके पास आया। उसे देखकर प्रजापतिने कहा-'तुम तो शान्त हृदयसे चले गये थे, लौटकर कैसे आये । इद्रने कहा- 'भगवन् ! इस सुषुप्तिमें स्थित यह आत्मा जाग्रत् और स्वप्नमें जैसे अपनेको जानता है वैसा यहाँ 'यह मैं हूँ' यों नहीं जानता, इन भूतोंको भी नहीं जानता और इस अवस्थामेंसे इसका विनाश-सा भी होता है, अतएव मैं इसमें भी कोई आनन्द नहीं देखता ।। - तीन बार 'द' एक समय देवता, मनुष्प और अवर सरके पितामह प्रजापति ब्रह्माजीके पास शिष्यमापसे विद्या सीखने गये एव नियमपूर्वक प्रयदर्य का पालन करते हुए उनकी सेवा करने लगे। इस प्रकार कुछ काल बीत जानेपर उहोंने उपदेश ग्रहण करना चाहा। सरसे पहले देवताओंन जाकर प्रजापति से प्रार्थना की भगरन् । हमें उपदेश कीजिये। प्रजापति ने उत्तरमें एक ही अक्षर कह किया ' । स्वर्गमें भोगोंकी भरमार है: भोग ही देवलोकमा सुख माना गया है, कभी वृद्ध न होकर देवगण सद इन्द्रिय-भोगोंमें लगे रहते हैं, अपनी इस अवस्थापर रिचारकर देवताओं 'द'का अर्थ 'दमन' इन्द्रिय सयमममझा और अपनेको कृतकृत्य मान कर प्रजापतिको प्रणामकर वे बहोंसेचाटने लगे। प्रजापतिने पूछा क्य मेरे उपदश किये हुर अक्षरका अर्थ तो तुम समझ गये न " देवताओं क्दा 'जी, समझ गये, आपने हम पिलासियोंको इन्द्रिय दमन करने माझा की है। प्रजापति ने कहा-'तुमने ठीक समझा, मेरे द' कहने यही अर्थ या जाओ, परन्तु मेरे उपदेशके अनुसार चलना, त तुम्हारा कल्याण होगा। तदन तर मनुष्योंने प्रजापतिके पास जाकर कहा-'भगरन् ।। उपदेश कीजिये।। प्रजापतिने उनको भी वही दर अक्षर सुना दिया मनुष्योंने विचार किया हम कर्मयोनि होने के कारण सदा लोभवश व करने और अर्थ सग्रह करने में ही लगे रहते हैं । इसलिये प्रजापतिने । N तीन बार 'द' ७३ लोमियों को दान करने का उपदेश किया है। यह निश्चय कर वे अपनेको सालमनोरय मानकर चटने लगे, तब प्रजापतिने उनसे पूछा 'तुमलोग मरे कपनका अर्थ समझकर जा रहे होन" समप्रिय मनुष्योंने कहा 'जी 'हाँ, समय गये, आपने हमें दान करने की आज्ञा दी है ।' यह सुनकर प्रजा- पति प्रसन्न होकर बोले, 'हा, मेरे कहनेका यही अर्थ था, तुमने ठीक समझा है । अब इसके अनुसार चलना, तभी तुम्हारा कल्याण होगा। इसके पश्चात् असुरोंने प्रजापति के पास जाकर प्रार्थना की भगवन्! हमें उपदेश कीजिये। इनको भी प्रजापतिने 'द' अक्षरका ही उपदेश किया । असुरोंने समझा, 'हमलोग स्वभावसे ही हिंसावृत्तिवाले हैं, क्रोध और हिंसा हमारा नित्यका व्यापार है, अतएव प्रजापतिने हमें इसदुष्कर्मसे छुड़ानेके लिये कृपा करके जीवमात्रपर दया करनेकाही उपदेश दिया है।' यह विचारकर वे जर चलनेको तैयार हुए तब प्रजापतिने यह सोचकर कि ये लोग मेरे उपदेशका अर्थ समझे या नहीं, उनसे पूछा 'तुम जा रहे हो, परतु यताओ, मैंने तुम्हें क्या करनेको कहा है ।' तब हिंसाप्रिय अमरों- ने कहा, 'देव ! आपने हम हिंसकोंको 'द' कहकर प्राणिमात्रपर 'दया' करनेकी आज्ञा की है।' यह सुनकर प्रजापतिने कहा 'वत्स ! तुमने ठीक समझा, मेरे कहनेका यही तात्पर्य था ! अब तुम द्वेष छोड़कर प्राणिमात्रपर दया करना, इससे तुम्हारा कल्याण होगा देव दनुज मानव समी रहैं परम कल्यान । पाटे जा 'द' अर्थको दमन दया अरु दान ॥ ( वृहदारण्यक उपनिषद्के आधारपर ) परम धन महर्षि यातायके दो त्रियों थी । एकका नाम था मैत्रेयी और दुसरीका कात्यायनी। दोनों ही सदानारिणी और पतिमना भी परतु इन दोनों में मैत्रेयी तोपामा माके प्रति अनुरागिणी यी और कात्यायनीका मन संसारके भोगों में रहता था । महार्षियाजमायने संयाम ग्रहण करते समय मैत्रेयीको अपने पास बुलाकर कहा कि मैत्रेयी! में अबइम गृहस्थाश्रम को छोड़कर सेन्याम ग्रहण करना चाहता हूँ। तुम दानों मेरे पीछेसे मापसमें झगड़ा न कर सुवाक रह सको इसलिये मैं चाहता हूँ कि तुम दोनोंको घरकी सम्पत्ति साधी-आधी चौंठ दु।' स्वामोकी बात सुनकर मैत्रेयीते अपने मनमें सोचा कि मनुष्य अपने पासकी किसी वस्तुको तभी छोड़ने को तैयार होता है जब उसको पहलीकी अपेक्षा कोई अधिक उत्तम स्तु प्राप्त होती है । महर्षि घर-बार- को छोड़कर जा रहे हैं अतएव इनको भी कोई ऐमी यस्तु मिली होगी, जिसके सामने घर बार सर तुच्छ हो जाते हैं, अवश्य ही इनके जानेमें कोई ऐमा बडा कारण होना चाहिये और यह परम वस्तु ज म मरणके ब धनसे मुक्ति लाभकर अमृत को-परमात्माको पाना ही है। यों विचारकर मैत्रेयीने कहा-'भगरन् ! मुझे यदि धनधा यसे परिपूर्ण समस्त पृथ्वी मिल जाय तो क्या उमसे मैं अमृतासको पा सकती हैं। याज्ञस्यने कहा 'नहीं, नहीं ! धनसहित पृथ्वीको प्राप्तिसे तेरा धनिकोका सा जीवन हो सकता है, परतु उससे अमृतस्य कभी नहीं मिल सकता । मैत्रेयोने कहा- परम धन ७१ - सा होवाच मैत्रेयी येनाह नामृता स्या किमह तेन कुयाँ यदेव भगवान्वेद तदेव मे हीति । (इ० २।४।३) 'जिससे मेरा मरना न छूटे, उस वस्तुको लेकर क्या करूं' हे भगवन् । आप जो जानते हैं ( जिस परम धनके सामने आपको यह घर-नार तुच्छ प्रतीत होता है और बड़ी प्रमनतासे आप सबका त्याग कर रहे हैं ) वही परम धन मुझको वतलाइये।' याज्ञवल्क्यने कहा स होवाच यापवल्क्य प्रिया तारे न सती प्रिय मापस पस्यास्य ध्याग्यास्यामि ते व्याचक्षाणम्य तु मे निदिध्यासस्नेति । (यह० २।४।४) 'मैत्रेयी ! पहले भी तू मुझे बड़ी प्यारी थी, तेरे इन वाक्योंसे वह नम और भी बढ़ गया है । तू मेरे पास आकर बैठ, मैं तुझे अमृतत्वका उपदेश करूंगा। मेरी बातोंको भलीभाँति सुनकर उनका मनन कर।' इतना कहकर महर्षि याज्ञवल्क्यने प्रियतमरूपसे आत्माका वर्णन आरम्भ किया। उन्होंने कहा स होवाच न वा अरे पत्यु कामाय पति प्रियो भव त्यात्मनस्तु कामाय पनि प्रियो भवति । मैत्रेयी ! (स्त्रीको) पति पतिके प्रयोजनके लिये प्रिय नहीं होता, पर तु आत्माके प्रयोजन के लिये पति प्रिय होता है।' रस आत्मा शब्दका अर्थ लोगोंने भिन्न भिन्न प्रकारसे किया है, कुछ कहते हैं कि आत्मासे यहाँपर शरीरका लक्ष्य है । यह शिमोदर- परायण पामर पुरुषोंका मत है। कुछ कहते हैं कि जबतक अदर जीन है तभीतक ससार है, मरनेके बाद कुछ भी नहीं, इसलिये यहाँ इमी उपनिषदोंके चौदह रत जीपका लक्ष्य है यह पुनर्ज म न माननेवाले जडवादियोंका मत है। कुछ लोग 'आत्माके लिये' का अर्थ करते हैं कि जिस वस्तु या जिस सम्मधीसे आश्माकी उन्नति हो, आत्मा अपो स्वरूपको पहचान सके वही प्रिय है। इसीलिये कहा गया है कि 'आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्' यह तीव्र मुमुक्षु पुरुषोंका मत है। कुछ तत्वज्ञोंका मत है कि आत्माके लिये इस अर्थमें कहा गया है कि इसमें आत्मतत्व है, यह आत्माकी एक मूर्ति है। मित्रकी मूर्तिको कोई उस मूर्तिके लिये नहीं चाहता पर तु चाहता है मित्रके लिये। ससारकी समस्त वस्तुएँ इसीलिये प्रिय हैं कि उनमें केवल एक आत्मा ही व्यापक हे यावे आरमाके ही स्वरूप हैं । महर्षि याज्ञवल्क्यने फिर कहा---- न वा भरे जायाये फामाय जाया मिया भवत्यात्मनस्तु पामाय जाया प्रिया भवति, न वा अरे पुनराणा कामाय पुधा प्रिया भय त्यात्मनस्तु कामाय पुत्रा प्रिया भवन्ति, न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्त प्रिय भवत्यात्मनस्तु कामाय रित्त मिय भवति, न वा अरे ब्रह्मण कामाय ब्रह्म प्रिय भवत्यात्मनस्तु * गोमार तुसीदासजीने सम्भवत ऐसे ही विचारको लक्ष्यमें रखकर भक्तकी दृष्टिसे कहा है कि- जाके प्रिय नराम वैदही। सजिये ताहि वोदि वैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥ तज्यो पिता प्रहलान, विभीषन बधु, भरत महतारी। मलि गुरु तज्यो छत ब्रज बनितन्हि, मये मुद मगलकारी॥ नाते नेह राम मनियत मुहद सुमेश्य जहाँ लो। भजन कहा ऑखि जेहि फूट, बहुतक कहाँ कहाँ रौं। तुलसी सो सब भाति परम हित पूज्य प्रानवे प्यारो। जासों होय सनेइ राम पद, एतो मतो हमारो।
परम धन कामाय ब्रह्म प्रिय भवति, न वा अरे क्षनस्य कामाय क्षन प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षन प्रिय भवति, न वा अरे लोकाना कामाय लोका प्रिया भव त्यात्मनस्तु कामाय लोका प्रिया भवन्ति, न वा अरे देवाना कामाय देवा प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवा प्रिया भवति, न वा अरे वेदाना कामाय वेदा प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय चेदा मिया भवन्ति, न वा अरे भूताना कामाय भूतानि प्रियाणि भवत्यात्मनस्तु कामाय भूतानि मियाणि भवन्ति, न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वे प्रिय भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्व प्रिय भवति । आत्मा वा अरे दृष्टय श्रोतव्यो मतव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदः सर्व विदितम् । (बृह० २।४।५) 'अरे, स्त्री स्त्रीके लिये प्रिय नहीं होती परन्तु वह आत्माके लिये प्रिय होती है, पुत्र पुत्रोंके लिये प्रिय नहीं होते परतु वे आमाके लिये प्रिय होते हैं, धन धनके लिये प्यारा नहीं होता परन्तु वह आत्माके लिये प्रिय होता है, नाह्मण ब्राह्मणके लिये प्रिय नहीं होता परन्तु वह आत्माके लिये प्रिय होता है, क्षत्रिय क्षत्रियके लिये प्रिय नहीं होता परन्तु वह आत्माके लिये प्रिय होता है, लोक लोकोंके लिये प्रिय नहीं होते परन्तु आत्माके लिये प्रिय होते हैं, देवता देवताओंके लिये प्रिय नहीं होते परन्तु आत्मा- के लिये प्रिय होते हैं, वेद वेदोंके लिये प्रिय नहीं हैं परन्तु आत्माके लिये प्रिय हैं, भूत भूतोंके लिये प्रिय नहीं हैं परन्तु आत्माके लिये प्रिय होते हैं, अरे मैत्रेयी ! सब कुछ उनके लिये ही प्रिय नहीं होते परन्तु सब आत्माके लिये ही प्रिय होते हैं। यह परम प्रेमकास्थान आत्माही वास्तपमें दर्शन करने योग्य, श्रवण करने योग्य, मनन करने योग्य ओर निरन्तर । . उपनिषदोंक चोदद रस ध्यान करने योग्य है । हे मोयी। इस मामाने दर्शन रक्षण मन्न और साक्षात्कारसे ही सब कुछ जाना जा मकना है।' यही गन ह इसके पश्चात् महपि यात्वनयनीने सत्रया आरमाके माय अमिन्न रूप बतलाते हुए इटियोंका अपन पियों में अधिष्ठान यताया और तदनातर मामयी असण्ड प्रयास सत्ताका वर्णनपर मतमें यदा कि 'जबतक द्वैतभार होता है तभीतक दसरा दूसरेको देना है, दूसरा दूसरेको सूंघता है, दूसग दूसरेयो सुनता है, दूसरा दूसरेसे बोलता है। दूसरा दूसरेके टिये विचार करता है और दूसरा दूसरेको जानता है, परतु जब सात्मभान प्राप्त होता है, जब समस्त वस्तुएँ आत्मा ही है ऐसी प्रतीति होती है तब वह किमसे पिसको देश किससे किसको सँधे। किससे किमके साथ बोले । किसमे किसका स्पन करे तथा किमसे किसको जाने । जिससे यह इन समस्त पस्तुओंको जानता है उसे वह किस तरह जाने। यह आत्मा आद्य है इससे उसकाग्रहण नहीं होता, यह मशीर्य है इससे वह शीर्ण नहीं होता, वह असङ्ग है इसमे कभी आसक नहीं होता, यह ब धनरहित है इससे कभी दुखीनही होता और उसकाकमीनाशनहीं होता । एसे सामरूप, सबके जाननेवाले आत्माको किस तरह जाने। श्रुतिने इसीलिये उसे 'नेति नेति कहा है, वह आत्मा अनिर्वचनीय है। मोयी। बस, तेरे लिये यही उपदेश है, यही तो मोक्ष है। इतना कहकर पासल्क्यजीने सयास ले लिया और वैराग्यके प्रताप तथा ज्ञानकी उक्ट पिपासाके कारण स्वामीके उपदेशसे मैत्रेयी परम कल्याणको प्राप्त हुई। (शारण्यक उपनिष के आधारपर) ( १२ ) घोडेके सिरसे उपदेश अश्विनीकुमार देवलोकके चिकित्सक हैं। इहोंने देव अथर्वण ऋषिके शिष्य दध्यड् अथर्वण ऋषिसे वेदाध्ययन किया था । दध्यड् ऋषि ब्रह्मानी थे पर तु वैराग्यादि साधनोंके अभानमें अश्विनीकुमारोंको अनधिकारी समझकर उन्हें ब्रह्मरियाका उपदेश नहीं किया था । विद्याके अभिमानमें एक समय अश्विनीकुमारोंने इन्द्रका अपमान किया, तब इद्रने इन्हें यज्ञभागसे बहिष्कृत कर दिया । तबसे इनको किसी भी यज्ञमें भाग मिलना बद हो गया । इहोंने नाराज होकर गुरु दध्य ऋषिसे इन्द्रसे लड़कर उसे जीतने अथवा ओषधि आदिके द्वारा इन्द्रका विनाश करनेकी आज्ञा चाही। दप्यङ् ऋपि महान् पुरुष थे, उन्होंने काम क्रोधादिकी निदा करते हुए अश्विनीकुमारोंको अ याय उपायोंसे सफलता प्राप्त करनेकी आज्ञा दी और यह कहा कि तुमलोग यदि हृदयके अभिमान काम क्रोधादि दोषोंसे रहित और वैराग्ययुक्त होकर मुझसे पूछोगे तो मैं तुम्हें अधिकारी पाकर दुर्लभ ब्रह्मविधाका उपदेश करूँगा । पश्चात् गुरुकी आज्ञासे अश्विनीकुमारोंने च्यवन ऋषिके नेत्र अच्छे कर दिये और ध्यानजीने अपने तपोबलसे उन्हें यज्ञमें अधिकार दिलवा दिया। इस प्रकार बिना ही लड़ाईके अश्विनी- कुमारोंका मनोरथ सिद्ध हो गया। एक समय इ ही दघ्यद् ऋषिके आश्रममें इन्द्र आया। अतिथि- वासल ऋषिने इन्द्रसे कहा कि 'आप मेरे अतिथि हैं जो कुछ कहिये सो मैं करूं।' इ ने कहा -'मुझे ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये ।'
८० उपनिषदोंके चौदह रत दध्यङ् सुपि दुरिनामें पड़ गये। वचन देकर नहीं करते हैं तो वाणी असत्य होती है और उपदेशके योग्य अधिकारी इन्द्र है नहीं। आसिर उहोंने पचनको सत्य रखने के लिये उपदेश देनेका निश्चय किया और भलीभांति ब्रह्मविद्याका उपदेश किया। उपदेश करते समय ऋषिने प्रसङ्गश भोगोंकी निदा की तथा भोगदृष्टिसे इन्द्रको और एक कुत्तेको एक सा सिद्ध किया । इद्र ब्रमनियाका अधिकारी तो था ही नहीं, स्वर्गादि भोगोंकी निदा सुनकर उसे कोर मा गया और उसने दध्यक् प्राषिपर कई तरहसे स देह करके निदा, शाप और हत्याके डरसे उन्हें मारनेकी इच्छा तो छोड़ दी परतु उनसे यह कहा कि यदि आप इस प्रमविधाका उपदेश किसी दूसरेको करेंगे तो मैं उसी क्षण मनसे आपका सिर उतार दूंगा । क्षमाशील मपिने शात हृदयसे इन्द्रकी बात सुनकर विना ही किमी क्षोभ या क्रोधसे उससे कहा, 'अच्छी बात है, हम फिसीको उपदेश करें तर सिर उतार लेना।" इस बर्तावका इन्द्रपर प्रभाव पड़ा और वह शान्त होकर स्वर्गको लौट गया । पुछ दिनों बाद अश्विनीकुमारोंने वैराग्यादि साधनोंसे सम्पन्न होकर ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके लिये गुरुके चरणों में उपस्थित होकर अपनी इच्छा जनायी और ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेके लिये प्रार्थना की। इसपर सत्यपरायण दायड्ने सोचा कि इनको उपदेश न देनेसे मेरा वचन असाय होगा और उपदेश करनेपर इन्द्र मेरा सिर उतार लेगा । वचन असत्य होने की अपेक्षा मर जाना उत्तम है । प्रतिज्ञा- भग और असत्यका जो महान् दोष होता है उसके सामने मृत्यु क्या चीज है । शरीरका नाश तो एक दिन होगा ही।' यह विचारकर । घोडेके सिरसे उपदेश उन्होंने उपदेश देना निश्चय कर लिया और अश्विनीकुमारोंको इद्रके साथ जो बातचीत हुई थी वह कहकर सुना दी । अश्विनीकुमारोंने पहले तो कहा कि भगनन् । आप हमलोगोंको अब कैसे उपदेश देंगे। क्या आपको इन्द्रके वज्रसे मरनेका डर नहीं है। परन्तु जब दध्यङ् ऋपिने कर्मवश शरीरधारीके मृत्युकी निश्चयता, परमार्यरूपसे नि मारता और सत्यकी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी तब अश्विनीकुमारोंने कहा, 'भगवन् ! आप किञ्चित् भी भय न करें। हम एक कौशल करते हैं, जिससे न आपकी मृत्यु होगी और न हमें ब्रह्मरियासे वञ्चित होना पड़ेगा। हम पृथक-पृथक् हुए अङ्गोंको जोडकर जीपित करनेकी विद्या जानते हैं। पहले हम इस घोड़ेका सिर उतारते हैं, फिर आपका सिर उतारकर इस घोड़ेकी धडपर रख देते हैं और घोड़ेका सिर मापके धडसे जोड देते हैं। आप घोड़ेके सिरसे हमें ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये फिर जब इन्द्र आकर आपका घोड़ेवाला सिर काट देगा तब हम पुन उसका सिर उतारकर आपके घड़से जोड़ देंगे और इन्द्रके द्वारा काटा हुआ घोडेका सिर घोड़ेकी धड़से जोड देंगे। न घोड़ा ही मरेगा और न आपको ही कुछ होगा।' दध्यड् पिने इस प्रस्तारको खीकार करके उन्हें भलीमोति ब्रह्मविधाका उपदेश किया । जब इद्रको इस बातका पता लगा तो इन्द्रने आकर वनसे दध्यङ् माषिके धड़से जोड़ा हुआ घोडेका सिर काट डाला। पश्चात् अश्विनीकुमारोंने सञ्जीवनी विद्याके प्रभावसे घोड़ेकी धड़से जुड़ा हुआ ऋषिका सिर उतारकर उनकी धड़से नोंड़ दिया और घोड़ेकी धडपर घोडेका सिर रखकर उसे जोड़ दिया। दोनों जारित हो गये। (तैत्तिरीय माह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद्के आधारपर) उ. चौ०६- सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ एक समय प्रसिद्ध विदेह राजा जनकने बहुदक्षिणनामक बड़ा यज्ञ किया । यतमें कुरु और पाञ्चाल आदि देशोंके बहुत-से ब्राह्मण एकत्र हुए । जनक राजाने आक्षणोंको बहुत दक्षिणा दी, अन्त में इन ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता कौन है। यह जाननेकी इन्चासे जनक अपनी गोशालामेंसे एक हजार गौएँ निकालकर प्रत्येक गायके दोनों सींगोंमें दस-दस सोनेकी मुहरें बाँध दी और ब्राह्मणोंसे कहा कि 'हे पूजनीय भाह्मणो ! आपलोगोंमें जो अमिष्ठ हों वे इन गायोंको अपने घर ले जायँ ।' परतु किसी भी ब्राह्मणका उन्हें ले जानेका साहस नहीं हुआ । अन्तमें महर्षि याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य ब्रह्मचारीसे कहा कि 'हे प्रियदर्शन ! हे सामथवा ! (सामवेदके अध्ययन करनेवाले ) इन गायों को अपने घर चल ।' गुरुके इन वचनोंको सुनकर शिष्य उन गौओंको हॉककर गुरुके घरकी ओर ले जाने लगा । यह देखकर सभामें बैठे हुए ब्राह्मणोंको इस बातपर बड़ा क्रोध हुआ कि 'हम- लोगोंके सामने मैं अमिष्ठ है। ऐसा याज्ञवल्क्य कैसे कह सकता है।" महाराज जनकले होता ऋत्विज् अश्वलने आगे बढ़कर याज्ञवल्क्यसे पूछा--- त्य नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसि । 'हे याज्ञवल्क्य ! क्या तुम्ही हम सबमें ब्रह्मिष्ठ हो । यद्यपि ये शन्द अपमानजनक थे परन्तु याज्ञवल्क्यने इस उद्धतपनसे कुछ भी विकारको न प्राप्त होकर नम्रताके साथ उत्तर दिया-- सर्वथैष्ठ ब्रह्मनिष्ठ नमो वय अमिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वय स्म । भाई ! अमिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं। हमें तो गौओं- की चाह है । इसीलिये हमने गौएँ ली है ।। ब्रह्मनिष्ठाभिमानी अश्वल याज्ञवल्क्यको नीचा दिखानेके लिये उनसे एकके बाद एक बड़े-बड़े जटिल प्रश्न पूछने लगा । याज्ञवल्क्य सबका उत्तर तुरंत ही देते गये । इसके बाद ऋतभागपुत्र आतभाग, लापुन मुज्यु, चक्रपुत्र उशस्त, कुषीतकपुत्र कहोल, वचपुत्री गार्गी और अरुणपुत्र उद्दालकने कई गम्भीर प्रश्न किये और याज्ञवल्क्यसे तुरत उनका उत्तर पाया । मर ब्राह्मण थक गये, तब अन्तमें गागाने आगे बढ़कर सब ब्राह्मणोंसे कहा, 'हे पूज्य ब्राह्मणो ! यदि आपकी अनुमति हो तो मैं इस याज्ञवल्क्यसे दो प्रश्न फिर करना चाहती हूँ। यदि उन दो प्रश्नोंका उत्तर यह दे सका तो फिर मैं यह मान लूंगी कि आपमेंसे कोई भी इस ब्रह्मादीको नहीं जीत सकेंगे। ब्राह्मणोंने कहा जागी ! पूछ।' गार्गाने गम्भीर स्वरमे कहा 'हे याज्ञवल्क्य ! जैसे वीरपुत्र विदेहराज या काशिराज उतारी हुई डोरीके धनुषपर फिरसे डोरी चढ़ाकर शनुको अत्यन्त पीड़ा देनेवाले दो बाणोंको हाथमें लेकर शत्रुके सामने खड़ा होता है, इसी प्रकार मैं दो प्रश्नोंको लेकर तुम्हारे सामने खड़ी हूँ, तुम यदि ब्रह्मवेत्ता हो तो इन प्रश्नोंका उत्चर मुझे दो !' याज्ञवल्क्यने कहा 'जागी । पूछ ।' गार्गी बोली-~ सा होगाव यदूर्व याशयस्य दिनो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भुत च भवश्व भविष्यवेत्याचक्षते फस्सिस्तदोत व प्रोत चेति । (वृह० ३१८३३) सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ एक समय प्रसिद्ध निदेह राजा जनकने बहुदक्षिणनामक बड़ा यज्ञ किया। यज्ञमें कुरु और पाश्चाल आदि देशोंके बहुत-से मानण एकत्र हुए । जनक राजाने आह्मणोंको बहुत दक्षिणा दी, अन्तमें इन ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता कौन है। यह जाननेकी इच्छासे जनक अपनी गोशालामें से एक हजार गौएँ निकालकर प्रत्येक गायके दोनों सींगों में दस-दस सोनेकी मुहरें बाँध दी और ब्राह्मणोंसे कहा कि 'हे पूजनीय ब्राह्मणो । आपलोगोंमें जो बहिष्ठ हों वे इन गायोंको अपने घर ले जायें। परन्तु किसी भी ब्राह्मणका उन्हें ले जानेका साहस नहीं हुआ। अतमें महर्षि याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य ब्रह्मचारीसे कहा कि 'हे प्रियदर्शन ! हे सामश्रवा ! (सामवेदके अययन करनेवाले ) इन गायोंको अपने घर ले चल ।' गुरुके इन वचनोंको सुनकर शिष्य उन गाओंको हाँककर गुरुके घरकी ओर ले जाने लगा । यह देखकर सभामें बैठे हुए ब्राह्मणों को इस बातपर बड़ा क्रोध हुआ कि 'हम- लोगोंके सामने मैं बलिष्ठ हूँ ऐसा याज्ञवल्क्य कैसे कह सकता है।" महाराज जनकके होता ऋत्विज् अश्वलने आगे बढ़कर । याज्ञवल्क्यसे पूछा-- त्व नु खलु नो याशवस्य ग्रह्मिष्ठोऽसि । 'हे याज्ञवल्क्य ! क्या तुम्ही हम सबमें अमिष्ठ हो । यद्यपि ये शब्द अपमानजनक थे परतु याज्ञवल्क्यने इस उतपनसे कुछ भी शिकारको न प्राप्त होकर नम्रताके साथ उत्तर दिया--- । . सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुमो गोकामा एक वय स । 'भाई ! अमिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं। हमें तो गौओं- की चाह है। इसीलिये हमने गौएँ ली हैं।' ब्रह्मनिष्ठाभिमानी अश्वल याज्ञवल्क्यको नीचा दिखानेके लिये उनसे एकके बाद एक बड़े-बड़े जटिल प्रश्न पूछने लगा । याज्ञवल्क्य सबका उत्तर तुरंत ही देते गये । इसके बाद ऋतभागपुत्र आर्तमाग, लह्यपुत्र मुन्यु, चक्रपुन उशस्त, सुषीतकपुत्र कहोल, वचनपुत्री गार्गी और अरुणपुत्र उद्दालकने कई गम्भीर प्रश्न किये और याज्ञवल्क्यसे तुरत उनका उत्तर पाया । सब ब्राह्मण यक गये, तब अन्तमें गागाने आगे बढ़कर सब ब्राह्मणोंसे कहा, 'हे पूज्य ब्राह्मणो । यदि आपकी अनुमति हो तो मैं इस याज्ञवल्क्यसे दो प्रश्न फिर करना चाहती हूँ। यदि उन दो प्रश्नोंका उत्तर यह दे सका तो फिर मैं यह मान लूंगी कि आपमेंसे कोई भी इस ब्रह्मवादीको नहीं जीत सकेंगे। प्राह्मणोंने कहा 'गागी। पूछ।' भागाने गम्भीर स्वरसे कहा 'हे याज्ञवल्क्य ! जैसे वीरपुत्र विदेहराज या काशिगज उतारी हुई डोरीके धनुषपर फिरसे डोरी चढ़ाकर शत्रुको अत्यन्त पीडा देनेगले दो बाणोंको हाथमें लेकर शत्रुके सामने खड़ा होता है, इसी प्रकार में दो प्रश्नोंको लेकर तुम्हारे सामने खड़ी हूँ, तुम यदि ब्रह्मवेत्ता हो तो इन प्रश्नोंका उत्तर मुझे दो। याज्ञवल्क्यने कहा 'गागी। पूछ ।' गार्गी बोली- सा होवाच यदूर्घ याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूत च भवञ्च भविष्यञ्चेत्याचक्षते करिसरस्तदोत च प्रोतं चेति । (यह० ३1८३) - - उपीिपदोंके चौदह रत 'हे यापचय ! जो ब्रह्माण्डसे उपर है, जो मझाण्डसे नीचे है और नो इस स्वर्ग और पृपिके वीचमें स्थित है तथा नो भूत, वर्तमान और भविन्यप है, ऐसा शाख जाननेवाले रोग पाहते है, यह 'सूत्रात्मा' (जगद्यप सूत्र ) किममें ओतप्रोत है" गाजश्मयने कहा- स होवाच यदूर्ण गागि दियो यदयापृथिव्या यदन्तरा पापाथियी इमे यदूत घ मपश्च भविष्यवेत्याचक्षत आकाशे तदोत च प्रोत चेति । 'हे गागी ! जो स्वर्गसे उपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो वर्ग और पृथिवीके बीचमें स्थित है तथा जो भूत, वर्तमान और भविष्यरूप है, एमा शास्त्रवेत्तागण कहते हैं यह व्याक्त (मितिको प्राप्त कार्यप स्थूल ) जगरूप सूत्र भतर्यामीम्प आकाशमें ओत- प्रोत है। इस उत्तरको मुनकर गागौने कहा 'हे यायलय । तुमने मेरे इस प्रक्षका ऐसा स्पष्ट उत्तर दिया, इसके लिये तुम्हें नमस्कार है। अब दूसरे प्रयके लिये तैयार हो जाओ।' याज्ञवल्क्यने सरलतासे कहा 'गागी ! पूछ।' गार्गीन एक बार उसी प्रश्नोतरको फिरसे दोहराकर याज्ञवल्क्य से कहा- खनाफाश कस्मिनु ओतश्च प्रोतश्चेति। हे यानाक्य ! तुम कहते हो व्याक्न जगद्रूप सूत्रात्मा तीन कालोंमें सर्वदा अतर्यामीप आकाशमें ओतप्रोत है। तो वह भाकाश विसमें ओतप्रोत है।
सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ याज्ञवल्क्यने कहा- स होवाचेतद्वै तदक्षर गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्य. स्थूलमनण्वहसमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वना- काशमसङ्गमरसमगन्धमवक्षुप्फमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कम- प्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्य न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन । (६० ३ । ८10) 'हे गागों ! अन्तर्यामीरूप अव्याकृतका अधिष्ठान यही वह अक्षर है, इस अविनाशी शुद्ध ब्रह्मका वर्णन ब्रह्मवेत्तागण इस प्रकार करते हैं--यह स्थूलसे भिन्न, सूक्ष्मसे भिन्न, हस्ससे भिन्न, दीर्घसे भिन्न, लोहितसे भिन्न, स्नेह (चिकनाहट) से भिन्न, प्रकाशसे भिन्न, अन्धकारसे भिन्न, वायुसे भिन्न, आकाशसे भिन्न, सङ्गरहित, रमरहित, गन्धरहित, चक्षुरहित, श्रोगरहित, वाणीरहित, मनरहित, तेजरहित, प्राणरहित, मुखरहित, परिमाणरहित, छिद्ररहित और देश, काल, वस्तु आदि परिच्छेदसे रहित सर्वव्यापी अपरिच्छिन्न है, वह कुछ भी खाता नहीं और उसे भी कोई खाता नहीं', इस प्रकार यह सब विशेषणोंसे रहित एक ही अद्वितीय है। इम प्रकार समस्त विशेषणोंका ब्रह्ममें निषेध करके अब उसका नियतापन बतलाते हुए याज्ञरश्य कहते हैं--- एतम्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतो तिष्ठत । एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गागि धावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासा मासा ऋतव सवत्सरा इति विधृतास्ति - .
उपनिषदोंके चौदह रत टन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गागि प्राच्योऽन्या नद्य यन्दन्ते शेतेभ्य पर्वतेभ्य प्रतीच्योऽन्या या या च दिश भनु । एतस्य या अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुप्या प्रश- सन्ति यजमान देवा दवा पितरोऽन्वायत्ता (इ. ३६८९) 'हे गागी ! इस प्रसिद्ध अक्षरकी आज्ञामें सूर्य और चन्द्रमा ये नियमितरूपसे वर्तते हैं। हे गागी ! इस प्रसिद्ध अक्षरकी आज्ञासे ही स्वर्ग और पृथिवी हायमें रक्से हुए पापाणकी तरह मर्यादामें रहते हैं । हे गागी ! इस प्रसिद्ध अक्षरकी आज्ञामें रहकर ही निमेष, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतु और संवत्सर इस कालके अवयवोंकी गणना करनेवाले सेवककी तरह नियमितरूपसे आते-जाते हैं। हे गागा । इस प्रसिद्ध अक्षरके शासनमें रहकर ही पूर्ववाहिनी गङ्गा आदि नदियाँ श्वेत हिमालय आदि पहाड़ोंमेंसे निकलकर समुद्रकी ओर बहती है तथा पश्चिमवाहिनी सिधु आदि और अन्यान्य दिशाओंकी ओर बहती हुई दूसरी नदियों इसी अक्षरके नियन्त्रणमें आजतक वैसे ही बहती हैं । हे गागी! इस प्रसिद्ध अक्षरकी आज्ञासे मनुष्य दाताओंकी प्रशसा करते हैं और इन्द्रादि देवगण, यजमान और पितृगण दकेि अनुगत हे अर्थात् देवता यजमानद्वारा किये हुए यज्ञसे और पितृगण उनके लिये किये जानेवाले होममें घी डालनेकी चमचीसे यानी उस होमसे पुष्ट होते हैं।' इसके बाद याज्ञवल्क्य फिर बोले- यो या एनदक्षर गार्यविदित्यास्मिल्लोके जुहोति यजते तपरतप्यते वहति वर्षसहस्राण्य तथदेवास्य तद्भवति । यो धा . सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ एतदक्षर गार्यविदित्वास्माल्लोकात्पैति स रुपणोऽथ य एतदक्षर गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्मेति स ब्राह्मण । (यूह ० ३ ॥ ८ ॥१०) 'हे गार्गी ! इस अक्षरको बिना जाने यदि कोई पुरुष इस लोक- में हजारों वर्षांतक देवताओंको उद्देश्य करके यज्ञ करता है, व्रतादि तप करता है तो भी उस कर्मका फल तो अन्तपाला ही होता है अर्थात् फल देकर वह कर्म नष्ट हो जाता है, वह अक्षय परम कल्याणको प्राप्त नहीं होता !* हे गागी । जो पुरुष इस अक्षरको नहीं जानकर (भगवत्प्राप्ति होनेसे पूर्व ही) इस लोकसे मृत्युको प्राप्त होता है वह (बेचारा) कृपण (दीन,दयाके योग्य) है और हे गार्गी! जो इस अक्षरको जानकर इस लोक- में मरणको प्राप्त होता है यह ब्राह्मण(ब्रह्मविद्, मुक्त) हो जाता है। अब याज्ञवल्क्य ब्रह्मका उपाधिरहित स्वरूप बतलाते हुए कहते हैं- तद्वा यतदक्षर गार्यदृष्ट द्रष्ट्रथुतर श्रोतमत मन्त्रविशातं विशात नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट नान्यदतोऽस्ति श्रोत नान्यदतोऽस्ति मन्त नान्यदतोऽस्ति विशात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गााकाश ओतश्च प्रोतश्चेति । (वृह० ३।८।२१) 'हे गागौं ! यह प्रसिद्ध अक्षर किसीको नहीं दीखता पर यह सबको देखता है । इसकी आवाज कानोंसे कोई नहीं सुन सकता तेषां तवत्यत्पमेधमाम् । देवा देवयत्रो पान्ति मद्भका यान्ति मामपि ॥ (गीता ७१२३) परमात्माको न जाननेवाले उन अल्पबुद्धि जनाका वह फल नासवान् है और वे (भेदमावसे) देवताओंको पूजनेवाले देवताओंको प्राप्त होते है (परतु) मेरे (भगवान्क) भक्त ( किसी प्रकार से मी मजनेवाले अन्तमें) मुझको (मगवान्को) ही प्राप्त होते हैं। - * अन्नवत्तु उपनिषदोंके चौदह रत परन्तु यह सनकी सुनता है। यह किसीकी धारणाम नहीं आता परतु यही सरका मन्ता है। कोई इसे बुद्धिमे नहीं जान सकता परन्तु यही सबका विज्ञाता ( जाननेवाला) है। इससे भिन्न द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मता नहीं है और इससे भिन्न कोइ विज्ञाता नहीं है। हे गागी ! वह अव्याकृत आकाश इसी प्रसिद्ध अक्षर अविनाशी ब्रह्ममें ही ओतप्रोत है ।* महर्षि याज्ञवल्क्यके इस विलक्षण व्याख्यानको सुनकर गार्गी सतुष्ट हो गयी और प्रमुदित होकर ब्राह्मणोंसे कहने लगी कि, 'हे पूज्य नाह्मणो ! याज्ञवल्क्यको नमस्कार करो। ब्रह्मसम्बधी विवादमें इसको कोई भी नहीं हरा सकता। इसकी पराजय मनकी कल्पनामें भी नहीं आ सकती।' इतना कहकर गार्गी चुप हो गयी। इसके बाद शकलके पुत्र शाकल्य या विदग्धने गज्ञवल्क्यसे कई इधर-उधरके प्रश्न किये। अतमें याज्ञवल्क्यने उससे कहा कि अब मैं तुझसे एक बात पूछता हूँ, तू यदि उसका उत्तर नहीं दे सकेगा तोतेरा मस्तक कट जायगा। शाकल्य उत्तर नहीं दे सका और उसका मस्तक घडसे अलग हो गया । याज्ञवल्क्यके ज्ञान और तेजको देखकर सारी समा चकित हो गयी। तदनन्तर याज्ञवल्क्यने फिर ब्राह्मणोंसे कहा, 'तुमलोगोंमेंसे कोई एक या सब मिलकर मुझसे कुछ पूछना हो तो पू, परतु किमीने कुछ नहीं पूछा। चारों ओर याज्ञवल्क्यकी जयध्वनि होने परतर नान्यविचिदस्ति धनञ्जय। मयि समि- प्रोत सूत्रे मणिगणा इव ॥ (गीता ७१७) "भगवार कहते हैं, हे अजुन ! मेरे मिदा किञ्चित् मा दूसरी वस्तु नहा है, यह स पूण जगर सूनामें सूतक मणियांकी भाति मुझमें ही गुंथा हुआ है।' जो मगवान्को इस प्रकार जानता है वह मुक्त होता है । * मत सद्गुरुकी शिक्षा लगी। रिमानानन्दसे याज्ञवल्क्य ओर गार्गीका चेहरा चमक रहा था। इसी ब्रह्मको यथार्थरूपसे जानने की चेष्टा करना और अन्तमें जान लेना मनुष्य जन्मकी सफलताका एकमात्र प्रमाण है। (हमारण्यकोपनिष के आधारपर ) (१०) सद्गुरुकी शिक्षा वेदका अध्ययन कर चुकनेपर गुर अपने शिष्यको नीचे लिखे वेद-वर्मोका उपदेश करते हैं- सत्य घद । धर्म चर । स्वाध्यायान्मा प्रमद । (चि०१।११।१) सत्य बोलो । धर्मका माचरण करो। स्वा यायकर कभी त्यागन करो। आचार्यको गुरु-दक्षिणा देकर प्रजाके सूरको न काटो अर्थात् ब्रह्म- चर्य-आश्रमका पालन कर चुकने पर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करो। सत्यका कभी किसी अवस्थामें भी त्यागन करो। धर्मका कभी त्याग न करो। कल्याणकारी कर्मों का त्याग न करो। साधनकी जो विभूति प्राप्त है, उसे कभी मत त्यागो । स्वाध्याय और प्रवचन में कभी प्रमाद न करो। मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथि- देवो भव । यात्यनयद्यानि कर्माणि । तानि सेवितम्यानि । नो इतराणि। (तैत्ति. १।११।२) उ० चौ०७ ।
। । उपनिषदोंके चौदह रत परन्तु यह सबकी सुनना है। यह किसीकी धारणामें नहीं आता परतु यही सबका मता है। कोई इसे बुद्धिमे नहीं जान सकता परतु यही सरका विज्ञाता ( जाननेवाला) है। इससे भिन्न द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न श्रोता नहीं है, इससे मिन्न कोई मता नहीं है और इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है। हे गागी! यह अव्याकृत आकाश इसी प्रसिद्ध अक्षर अविनाशी ब्रह्ममें ही ओतप्रोत है।* महर्षि याज्ञवल्क्यके इस विक्षण व्याख्यानको सुनकर गार्गी सतुष्ट हो गयी और प्रमुदित होकर ब्राह्मणोंसे कहने लगी कि, 'हे पूज्य ग्रामणो ! याज्ञवल्क्यको नमस्कार करो । ब्रह्मसम्बधी सिदमें इसको कोई भी नहीं हरा सकता । इसकी पराजय मनकी कल्पनामें भी नहीं आ सकती।' इतना कहकर गार्गी चुप हो गयी। इसके बाद शकलके पुत्र शाकल्य या विदग्धने गज्ञवल्क्यसे कई इधर-उधरके प्रश्न किये। अतमें याज्ञवल्क्यने उससे कहा कि अब मैं तुझसे एक बात पूछता हूँ, तू यदि उसका उत्तर नहीं दे सकेगा तोतेरा मस्तक कट जायगा। शाफल्य उत्तर नहीं दे सका और उसका मस्तक घडसे अलग हो गया । याज्ञवल्क्यके ज्ञान और तेजको देखकर सारी सभा चकित हो गयी। तदनन्तर याज्ञवल्क्यने फिर ब्राह्मणों से कहा, 'तुमलोगोंमसे कोई एक या सब मिलकर मुझसे कुछ पूछना हो तो पूछे, परतु किमीने कुछ नहीं पूछा। चारों ओर याज्ञवल्क्यकी जयपनि होने मान्यत्किञ्चिस्ति मयि सवमिद प्रोत सूत्रे मणिगणा इव । (गीता ७।७) 'भगवान् कहते है, हे अजुन ! मेरे मिवा विञ्चित भी दूसरी वस्तु नहीं है, यह सम्पूर्ण जगत् स्तमें सूतक मणियों की भाँति मुझमें ही गुंथा हुआ है। जो मगवान्को इस प्रकार जानता है वह मुक्त होता है । *मत्त धनभय।
सद्गुरकी शिक्षा लगी। विज्ञानानन्दसे याज्ञवल्क्य और गागाका चेहरा चमक रहा था। इसी ब्रह्मको यथार्थरूपसे जाननेकी चेष्टा करना और अन्तमें जान लेना मनुष्य जन्मकी सफलताका एकमात्र प्रमाण है। ( वृहदारण्यकोपनिषदधे आधारपर) ( १८ ) सद्गुरुकी शिक्षा वेदका अययन कर चुकनेपर गुरु अपने शिष्यको नीचे लिखे वेद-पोका उपदेश करते हैं- सन्य बद । धर्म चर । स्वाध्यायामा प्रमद । (ar.।११।१) मत्य बोलो। धमका आचरणकरो। स्वाध्यायका कमी त्यागन करो। आचार्यको गुरु-दक्षिणा देकर प्रजाके सूनको न काटो अर्थात् ब्रह्म- चर्य-आश्रमका पालन कर चुकनेपर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करो। सत्यका कभी किसी अवस्थामें भी त्याग न करो। धर्मका कभी त्याग न करो। कन्याणकारी कमों का त्यागन करो। साधनकी जो विभूति प्राप्त हे, उसे कमी मत त्यागो । स्वाध्याय और प्रवचनमें कमी प्रमाद न करो। मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथि- देवो भव । फर्माणि । तानि सेविनव्यानि । नो इतराणि। (वैति ।।११ ।
उपरिषदोंके चौपदरा देवकर्म (य) और पितृकर्म (श्राद्ध, तर्पण आदि) का कमी त्याग न करो ! मानाको देवा-पमे पूजो विनाको देवपमे पूगो। भाचार्यको देवरूपसे पुनो। अतिथिको देवापसे पूजो । जो कर्म निदारहित हैं उहीको कगे। अप(निदित कर्म) मत करो। हमारे (गुरुके ) श्रेष्ठ आचरणों का अनुसरण करो, दुमरोंका नहीं । जो ब्राह्मग अपनेसे श्रेष्ठ हों उन्हें तुरत चैठने के लिये आमन दो । जो कुछ दान करो प्रदामे करो, अश्रद्धासे नहीं । ग्रीके लिये दान करो, ( लक्ष्मी चञ्चल है, प्रगुको सेवामें उसे समर्माण नहीं करोगे तो वह तुम्हें त्याग कर चटी जायगी) लोक-लाजके लिये ही दान करो। शास्त्रसे डरकर भी दान करो, दान करना उचित है इस सिकसे दान करो। अपने किसी कर्म अपना लौकिक आचारके सम्बध मनमें कोई शहा उठे, तो अपने समीप रहने वाले ग्राह्मणोंमें जो बेदविहित काँमें विचारशील हो, समदशी हो, कुशल हो, सतन्त्र हों (किमोके दवामें आकर व्यवस्था देनेवाले न हों), झोपरहित अथवा शान्तखमार हों और धर्मके लिये ही कर्तव्यपालन करने- वाले हों, वे जिस प्रकारका आचरण करें, उसी प्रकारका आचरण । यही आदेश है, यही उपदेश है, यही वेदोंका भाव है, यही आज्ञा है, ऊपर बनलायी हुई प्रणालीसे आचरण करने चाहिये । इसी प्रकार आचरण करना चाहिये। (सिरीय उपनिषद्)
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