Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Prachina Gurjara Kavyasangrah Part 1

Mr. C.d. Dalal · 2011/07

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m प्रस्तावना. आ पुस्तक प्रगट करवानी हेतु ए छे जे साधु साधीमी महाराज ने सम्मान ध्यान माटे कथा रय भति उपयोगी अने जरलेन मो शके छे माटे ते छावी प्रसिद्ध करता योग्य छे एम केटाक साधु माराज तरफयी कहेवामां आव्युं तेथो उपानी मगट कर्यु छे. हवे ते पुस्तकनी हस्त लीखीत प्रत एक, महाराजजी साहेब सुखसागरजीर डीसेथी ते काम मादे प्रश्न मोफली देनी नकल करावी लीधी. पछी वडोदरेयो पन्यासनी दानविजयनो महाराजे एक मा तेवीन आपी तेनी साये में- करणी करी रय सुधार्या. आटलुं छतां घगी भूलो रहेली मालम.पडो ते उपरथी महाराज सिदिविनयजीए सुरत तेमना गुरु- भाइ विनय विजयजी उपर मोकलावी आपी अने असल मूळनी गाधामो सुघरावी. त्यार पछी महागननी सादेव सुखसा- गरजीना उपदेशयी पाणसमे महाराजने वांदवा आवेला भाइ उतार खेपवंदे आ पुस्तक प्रगट करयामा माद तरीके रु. ४६-१-० मोकली आप्या. ते मोटा उपहार साये स्वीकार्या अने काम शरु कयु. पग आटलेथीन ते कामपार पडे एम नहोतं. तेथी वधु पयारा फरी घणे ठेकाणे ते पावतनी समजग पाडी तेमां मदद मागता ठेवदे इभाइयो महारागनी साहेब गुणविजयजीना अदेशयी रु. २५५-०-० मोकलवामां आव्या. तेथी आ काम वधारे समवडयी अने झडायो चना मांडयु. प्रथम सो भा पुस्तकनी अंदर एकला सादा एकवीस रथ छापयानो विचार हतो. पग एटलुंन करवायी थोडा ज्ञान- पागने अर्थनी समजण नहि पढे माटे अर्थ समजावधानी धारे आवश्यकता जगायायी तनवीन करता वकील केशवलाल प्रेमचंद तरफयी तेनी संस्कृत छाया सहित समजुनी लखाण तेमणे पोते करेलु तैयार हतुं ते मळ तेथी वारे आरहाद सापे तेमांची जुटा होना अर्थनी गोठवण मारा मोटा बांधव हीराचंदे फरी आपो. हवे आवी रीते मेटर तैयार करता बारेघडीए मागधीमा अथवा अर्थगा समनगन पडे त्यारे नागोरी तपागछिप भट्टारक रिश्वरजी भ्राहचंद्रजी महाराजे पोतानो अमूल्य वखत रोकी तेमा भूलो सुधारी आपी माटे तेउ साहेबनो उपकार मार्नु छु. तेमज पनारसना पंडित भगपनादास हरखचंदे स्थनु लखाण सुधारवामा पोतानो किंमति वखत रोक्यो ते मादे तेमनो उपहार मानुएं. आ पुस्तक बहार पाडयामा जे जे उदार जैनीभाइओए मदद आपी छे. तेमनां मुबारक नाम मोटा उपकार साथ पुस्तफनी अंते जाहेर फरवामां आव्या छे. आ पुस्तक छपायो बहार पाडता फ सुधारयामां बनती काळजी राखता जा कंपोझीटरोनी सुधारवामा कर रही जपाथी अपया तो पारा द्रष्टिदोपथी या मति मंदतायी फानो, मात्रा, पीडी, अक्षर उलटपालट निगेरेनी भूलो रहोगातोपतो तेने मादे इंमिगमिफाद देवे तथा वाचक Anni aailamental digमों . " तणुएण पाशीमimenu अनीकरतिमा,ameram श्बाकावार,संविधानमुलावद . Kamममसातवमेवोधये मोकिंचल,बपलपाईयो करणेस-मादायमाइARMERोय॥ mcineसाल अहारसमसनिप्पत्ती॥३॥ ... प... स्मता Amनिमय निया सन्ना परिपालिका | महिंदा फालिदी करmtarnaam लोरवलिकरार" हाईसजाय समाईशियाkuuN दानाato समस माया मुला/निमुखाव/ A/ कन पाoiAiii वाकांपावलमारक i. Rakhi पारं५ लमममरवा निंबासनिजतने Ipmamtarai मला जीव MARA --

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गानो anal मना MA २०.. गरा 1211 दामिनावापारय ।।२।। मनोमनाला पामिनीयमनिय पुटवलोभाकारी नोकर" सुमिनालाति पामिरगेदारमिदम नोकतो याममायालुतोग२॥ छापिकानदका भावारविहिन परिपुच्छाद निne तुवरांपयानानिय . .. माला 430 भागीय सामिय ५.. ५. 1.. १७. TER- नाय अासपा सभिग्य सलाका चारवल १० पनि लासिमिय Pasana रकती यानिक शुक्ल रकली दि रतो/कनी १. . तो भापुरकापडिपुत्रकार वारा नमोहम . मात नमोस्तान VASHERE छ ROHIRHAनहालका AIATRaat ARRER मकरानीयस्त aaiमातरमीमाम MER नमोसस

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सिरानी // ANI / रिदार AAAAAABAR हामारयः॥३॥ कयचममरणामाली, निममियअसलोयनालया। भाषाईयपुसिए थरिडसमकंवमावेश भहिनसिसाह, धम्मायरिष्यसंपदे। नुहामिसमासेल, पसाराहणं परमं ॥२ WARM नामा ईयारपुवाइमावmईn Bhagin करता शारsam@पुल, महमाघारसमनि ॥३॥ SAEMहर केयनियिमपनिomin सुनिलसा समरकं, देवाह यसरकाkिan पन Raat/निवासी विभपातयमियम मानित यो मोर करनाnamaARREARवरया चालय नोईय Nine DIRE लममरत राममि .. नमस्त सपनाanावधालाम नवित दानिश . चा ARMA maramain ममावि PARIANETARसा RAAसमान RRANA

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श्रीश्रमायमेरयामा नहाने मयमाडू, मासा आदार सत्रि संवृत्र मोदी संवरणो, पुन विजिये संतिमंपन्ने करपाई विनिजोगा, माणमाईणिव दानिशा आगाराई सन्ना, चठ सोया इंदिया पंच॥२॥ नहलासमा रहपनि राम साड़ मासा पपसा माशा A. ५... य सन्नामे विभप पनि सुमपाल ५०. साहसाचारकरीस पाटी समाजाला परता रा संपरा तेदाचरिंदी .. सारण LaranA वेदी २० संजमम्मिदिर सच्च संनुन सोपा पगुनो उढापानमाउजित्र तेजियपाजिया पराजीव अनार ७ २ ४ खतिसरा महनजुत्ता अवमुक्ती सलिमरना नवसमाना ३

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राईभोप /कोलियममानियन मापानमन • "सामाचारी (मद्राय।।५।। मनारा अमापो, जिस्यण लिए यूई कराए पायरयता, लाफार भएताए ॥ १॥ सामायाइ रहोपंच, नमुकार सारदि नियुत्तो। नाए नुरंगम स्नो, नेश्फुडो परम निचाणं ॥३॥ नानुमत पाए अनुमा भ.. नितमि नियमिक अजातशुरु परा ब ५. .. सपकारिपुर बापगनाइ रस करना तल . SLEE निप्ता INTERभरान ताभ .. १." ना नपायन मागह १० बहानकात्तिानसादर मान्य मतकात भस्मार ४

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प्राचीनगरकाव्यमवहः अहनिसि रायकुंयारिसहस सेयई पय भत्तिहिं । जाणइ नाणनिहाण माण पुण नाणइ चित्तिहिं। दिणदिकिय देकिय आवतु द्रमक साधु सा ऊठि करी । अभिगमण नमण चंदण विणय सुणइ ययण आणंदभरी ॥ ५ चाणारसिनयरीनरिंद नामिहिं संवाहण । पुर अंतेउर पवर अवर हय गय वह साहण | कन्नासहस सुरूव अछह पुण पुत्त न इक्य । राय पत्त पंचत्त लच्छि लियब रिउ दुकय । नेमित्तिवयणि राणीउयरि कुंयर जाणि पहिहिं चविउ । तिणि अंगवीरि अरि त्रासुची रज्जबंध सहु राहविः ॥ ३ ॥ कियसिंगारउदार अंग आरीसह पिकइ । पाणी पडी मुंद्रडी सयल तणु तिणिपरि दिखा। अंतेउरआवासि पासि भववासि विरत्तउ । भरहेसर वरझाण नाण केवल संपत्तउ । एउ चयहि विसयारसिहिं रमा रंगि जणु इम गणइ । तसु अप्पकन अप्पिहिं सरिलं किं परजणजाणायणइ ॥७॥ सेपिय करइ पसंस दुमुहदुन्ययणि निवारइ । रायरिसि कासग्गि रहिउ रणि अरिअण मारह । सिरककत्रि सिरि हत्य पल्लि संजम संभालइ । मनिहिं बद्ध बहु पाप आप आपिहि परकाला। गति कहइ वीर सत्तम मरय मगहराय अचरिज भयउ । तिणि समइ देव जय जय भणइं प्रसनचंद केवलि जयउ ॥ ८॥ भरइसरिसु बल झुज्झि युज्झ संजम अणुसरयु । कुण पंदद लहभाय टाय तिणि कासग्ग करयु । इह पानं नाण माण धरि यच्छर रहियु। सहइ मुस्क यह दुरत तह वि नहु केवल लहियु । नियवाहिनियंभिसुंदरिषयणि मयमयगल जव परिहाइ । रिसहेसरनंदणवायलि सयल कन्न तरफ़ाणि सरइ ।॥ ९॥ कहिय इंदि अतिम्प सुणिय सुर भयेसिहि । पुदवि पत्त मवणइ रूप पेरुई सुविसेसिदि।

१३ उपएसमालकहाणयउपय कियसिणगार सणंकुमार नरनाह निरंतर । हकारइ अत्याणि जाणि आवि देसंतरु। ग्वणि देहि हाणि इम वयण सुणि रज इंडि संजम गहिर। सयसत्त परिस चारित्तधर सहइ रोग लद्धिहिं सहिउ ॥ १० ॥ करइ रन कंपिल्लनयरि उख्खंडनरेसर । जाइसमरणि जाणि पुन्वभवबंधच मुणियर । योहद वह उवएस सहसि पुण तोइ न युज्झाइ । भोग भवतरि बद्ध तिण विसयारस मुज्झइ। सो भदत्त भणि किउ अंध अधिक पातग करी। संपत्ता सत्तउ सत्तमनरगिसु जि साधु पत्त सिद्धहं पुरी॥११॥ सेणियकुलि कोणियनरिंदसुय नियह उदाइय। पाडलिपुरि गुमभत्त रत्त पोसहसामाइय। म्पत्तियपुत्त जाणि तिणि देसह फदिउ । उनेणि पन्नोपराय ओलगइ अणिदिउ । इणि वयरि अपर अलहंत छल परिस बार व्रत धारयुं। तिणि दुहितह वि अवसर लहपि निय उदाह निसि मारपु ॥१२॥ चंपापुरि सुनार नारिसयपंचह सामी। सासिमत्त अदरत्ति गेह नवि एंडइ कामी। तिणि मारी इक नारि अवरनारिहिं सो मारी। पदम भन्न नररूपि विप्पफुलि सो पुण नारी। सयपंच भन्न जे पोर तस घरणि इकु सा नारि हप। पहुधीरपासि पुच्छ सु नर जा सा सा सा धिप्पधूप ।। १३॥ कोसंबी ससि सूर पीर वंदर सचिमाणय । मिग्गय महासत्ति जंत चंदण नयि जाणइ । निसिपकली जाइ पाइ लग्गेपि नमारह । पडिपजद निपदोस रोस मिल्द मिल्हापद । सहभावि शुद्ध फेवल भयु भुजग विनाणिहि जाणियउ। जिम पवत्तणी स भवपार गप विनय अंगितिम आणियउ॥११॥ जंफुमर विलासभवणि परियोहा भन्नाह । प्रभर पंचसयजुत्त पत्त सहिं परभणमद।

१४ प्राचीनगूर्जरकाव्यसनुहः कणयनयाjकोडि छोडि व्रत वंछद सुहमणि । तं पिरकवि तसु वयणि सयल पडियुज्झइ तरूणि। सगीसअघिकसयपंचसि रायग्गिहि संजम लय । सो समि पंचमगणहरह सीस चरिमकेवलि भयउ ॥ १५ ॥ सुसुमरागिहि रत्त पत्त रायग्गिहिनयरिहिं। दास चिलाइपुत्त जुत्त धणरि बहुचोरिहिं । कुंयरि करीय करि न दुड अडविहिं अणुसरिउ । बाहर पत्ता पुष्टि सिठि पुत्तिहिं परिवरित। सो रिक्ति दिक्षि निहु अक्षरिहिं ग्बग्गसीस छंडइ करम । कीडियहं कहि अदद दिवसि सहरसारि दीसह परम ॥१६॥ जागवत्त जिर्णिसीस दंदण गुणजुम्गह । अंतराय जाणिइ लेइ नियलडि अभिग्गह । वारवई उम्मास भमइ गुणि रमह समिबउ । मुराइफ पढ़ महा लहर आहार नमुन्डा । मांगनमादमरसहिप कर्म कटि केवल कलिउ । गंत्त सिरिमंसि सुह तपतम इम पुफिय फलिज ॥१७॥ सुनिति पिपयर भयरल्यमणि न कुणा । मंदगगरिमाम जेम भागार न लुणा । पानापामगदग्ग मण नी माझाणिहि । cifafaif रामवि मिवह ताहि । मां गिनागिरि गगा बाइय भय भमिमिद पणा | मी मशिव नामको रिमनिमग्मिला हा १८ ॥ TEमुग्या गप नितु नमनिमम्गल। नमिन मिxि मवि माई गमागल। राम पलह जिमिम हाया। टन न पनि नचिनार कर शिम सात मला बहुमण वाहित निहिं । मटानाप नगर सिपालि ॥ १॥ पन मारमा मालिन बननमानीपाल ममगा।

उवएसमाटकहाणयछप्पय सुणवि तासु गुणवत्त रत्त धणसिडिकुमारी। कणयकोडिसंजुत्त पत्त सासहं वरनारी। गुरुरयणवयणपडियोह सुणि सुद्धसीलसंजमि रहि । जिम तेणि मुम तिम मुफीद रमणि रयणकोडिहिं सही ॥ २० ॥ नंदिसेण दोहग्गनडिउ निडणवंभणमुय । भवविरत्त चारित्त गहवि नच तयइ अचम्भुय । वेयावयपसंस इंदकियकसिहिं पहुत्तर । पंधिय अंति नियाण सग्गि सत्तमि सो पत्तउ। दसचउरसारनरखयरध्यसहसबहुत्तरिरमणियर । सोहन्गसार वसुदेव हय हरिकुल वंसपयासकर ॥ २१॥ पत्त दिवसि चारित्त कन्हलाहुबंधव रयणिहि । गयसुकुमाल मसाणि रहिउ कासगि जिणपणिहिं । चंभणि वंधवि पालि सीसि वइसानर दिडउ । सिरह सरिस दुफम्म दहवि मुणि तस्कणि सिद्ध । तस दृदृदुरियभारभूरिय उयर फुट नरय गमह । जिम सहि तेणि तिम संसह लहु लच्छि सुपरममह ॥ २२ ॥ थूलभद्द गुम्ययणि कोसवेसाहरि पत्तर। चित्तसालि चउमासि रहिउ रसविगइनिरत्त । पुत्ववेर संभारि समर समरंगणि जित्तर । जिणसासणि जयवंत सुहड सुपरिहिं विदित्तउ। म्खरखन्गधारसिरि संचरिउ सरिउ सीह जिम इक्षमन । जे सीलभाव दुडर धरहं ते सुसाहु ते धन्न धन ॥ २३ ॥ तयसी इका उपकासगेहि गिर गुम अपमानिय । थूलभद्दमुणिसरिसु करिसु तय इम मनि मन्तिय । अत्यलाभ सुणि ययण रयणकंचल भणि चहा । सहवि अपत्य मुवत्य आणि वेसाकरि मिल्हा । पेवि ग्वालि पटिबाहिर मुगुम्पासि पत्ता भणइ । निंदीइ लोकि सो गुम्बयण अप्पमाण इह जो कुणइ ॥ २४ ।। गुणिमणसरिस गन्य म करि मूरन मच्छरि पमि। नहु निम्बडइसमय जइ विगह गयमरकसि।

प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः सुहडभणी संभृतविजय दुकर ति पसंसिय । तसु सीसिहिं पुण थूलभद्दमुणियरगुण खिसिय । तिणि कम्मि कोसवेसिहिं नडिऊ चडिउ हत्य दुतणतणई अपकित्ति अलिय अन्न वि अजस महिमंडलमाहि रुणझणइ ॥२५॥ म करउ मच्छर माण जाण सरिसउ जगि कोह। पूरउ पुण्य प्रभावि पावि पुण हीणा होइ। वाहुसुवाहु मुसाहु सुणचि गुण किउ मनि मच्छर । तिणि हीणत्तण पत्त पीढमहपीदिहिं दुहकर। परजम्मि भिसुंदरि सुधूय महि महिला महियलि मुणउ । सिरिरिसहभरहवाहुवलिहिं बिहुं प्रभाव पुन्नहतणः ॥ २६ ।। अणगल नीर विपार सुहम जीवाइअरकण। इण कारणि बहुकट अप्पफल कहइ वियरकण। विहिं सहिसहस्स परिस तप तपइ अज्ञानिहिं । पारण पुण इकबीसवारजलयोइयधानिहिं । मां तामलि रिसि परिस नपी मास दुन्नि अणसणि सरिउ । मगन साणि तिणि मुरूमग्ग नहु अणुसरिउ ॥ २७ ॥ सन्दरपणायिनाणि जाणि जग उत्तमचंगिम । नरवरपिरहणि जाइ मार पुत्तद पभणद इम । भाभिमपण गुत्तपत्त मेणिय तुह मंदिर । डिपाग माइ ठाइटावा जिणि लिणि परि । नपान र मामि तुम्ह मालिभाय यगण सुणि। भायाचिरल रित्त लिहि मुमस कणयमणि ॥२८॥ भपयंगामुकमाल नगरि उणि पसिना नदिमागुटमविगार मुगावि ममणि परिपुर। अधमुहनिमगिदहाल गा वि ममाणिहि । सामाग रति मांगालि मर मग लाग विमाणिहि। मुगिटामिण मुर हुमा रमणि निमत लिए। नमुदमिलिनि यानपिळद महाकाल fre||२॥ रायलिदिरा ननववर विवहारित। सुनावत मुख बोधिदिक धरि लंबारित।

उपएसमालम्हाणयउपय विहरंतर तिहिं पत्त दुहसोनारह मंदिरि । फोनि कणय जव स्वड बद्ध बद्धा तिणि तस सिरि। दघाइ दिडि दुइ नीकलीय दलिय धरणि निचलु भयउ। नस पंखिप्राण रक्षा करी धरी ध्यान सिद्धिहि गयउ ॥ ३०॥ धणगिरिधरणिसुनंदज्यरि जायउ जाईसर । उम्मासिउ पिउपासि वयर संपत्तउ वयधर । तस समीवि मुणिकत्रि गुरिहिं पायण अणुजाणीय । धन्न सीहगिरिसीस जेहिं मनिय इय वाणीय। जे माणगण मनि परिहरी सुगुम्बयण हम सद्दहद । ते सुद्ध साधु सुकुलीण सविगुणनिहाण गुरुयडि लहई ॥३१॥ संगमसरि गिलाण वासि संजमविहि रकइ । धम्मच्छलि नस मीस दत्त गुम्दोस निरिकह। ग्वित्तविहार सचिन पिंड अंगुलि दिप्पंतिय । नित्यचास नितु सरसु असणु दीवय मणि चिंतिय। मनंतर मुनि अप्पडं सगुण निगुण भणवि गुरु परिभवइ । घोरंधपार घण सह करि सम्मदिछि सुर मिरकवह ॥ ३२ ॥ बडमाण विहरंत नयरि सावत्यिहिं आवई। गोसालउ चउसाल आप नित्ययर भणावइ । मंग्वलिपुत्तसरुब कहद पर पुच्छिउ सीसिहि । जिणवरसंमुह मुछा तेउलेसा तिणि रीसिहिं । तं पिरिक सुगुरुपरिभव असत् सुनकत्त मुनि विचि धयः । तिणि तेजि दट्ट आराधना करवि सग्गि अच्युति गयउ ।। ३३ ॥ नाहियवादि नरिंद नयरि सेतंबी पएसी। पाससीस विहरंत पत तहिं गणहर फेमी। नरपगमणि इकरित्त सुगुरुवयणिहिं पडियोहित। सावयधम्म सुरम्म करवि तिणि अप्पर मोहिम्। सहकालि काल फरि मुजि सरिउ गरिआभसुविमाणि सुर। इम दुरियदुरक दृरिहिं हणी सगल मुररु साधड सुगुरु ॥ ३४॥ तुरमिणिपुरीनरिंद दत्त भणकुलि बलुबल। माउलकालिगमारिपासि पुच्छद जन्न फल ।

प्राचीनगरकाव्यसददः वंभणभन्न सगम्भ हणिय बालक फरकतउ । पिकवि भववेरग्गि लेद संजम दिप्पंनउ । संभरणअवधि छंडिय असण तिणि जगामि जम्मास रहि । अफोस बंधवह दुसहसह सिद्धि पत्त दुफम दहि ।। ४९ ॥ वीरसेणसेवक सहसमल्ल त्ति पसिद्धउ । कालसेनरिउराय जेण विहुवांहिहिं बहः । तिणि गुणि संखनरिंदि किड सामंत विदित्तः । वेरग्गिहिं व्रत लेवि तीण अरिदेसि पहुत्तर । पचारिय पूरव बाहुवल कालसेनि कुहाविउ । सब्यसिद्धि सुरवर सरिउ कोह कह वि तस नाविउ ॥ ४६॥ सावत्यीनिवकणयकेतुसुय खंदग नामिहि । दिक लेवि जिणकप्प करइ विहरइ पुरगामिहिं । व्रत लिडइ तस ताय नेहि सिरि छत्त घरावइ । तह वि अवहउ वंधुपासि कंतीपुरि आवइ । तस वहिन सुनंदा रायघरि मन्गि जंतु तिणि दिड मुणि । नरवरि,अलीकशंका धरिय हरिय प्राण तस तिणि रयणि ॥ ४८ दीरघसिउं रइरत्तचित्त चुलुणी मयणातुरि । वंभदत्तनियपुत्तदहण दकइ लकाहरि । यरधन मंनि सुरंगसंगि रस्किउ परपंचिहिं । फिरिय फिरिय महिमज्झि रज पुण लहइ सुसंचिहिं । इद्द कस्स कोइ नहु वल्लहउ भवसरूप नडपिरकणउं । मुहियां जि मूढ मोहिय भणइ हणइ कन्न पर तहतणउ ॥ ४८ तेपलिपुरि निय कणयकेतु पउमावइ राणी । मंत्री तेयलिपुत्त भन्न तस पुहिल नाणी। जाय मत्त सवि पुत्त राय निय लोभि मरावद। राणी मंत्रि कहेवि एक मुय छन्न रहावद । नरनाद पत्त पंचत्त सुजि कुंयर राप महतइ किया । मदतर पुण पुटिलसुरययणि पडियुद्धउ केवलि थियउ ॥ ४ ॥ रनलोभ मनि घरवि भरह पत्तउ समरंगणि । वाष्ट्रयलिहिं तहि दिटिमुहिदिहि जित्राः खणि ।

उपममराणवछय रोमि चडि रणि गम भरह भादमिरि मिल्हः । धिग पिसयारमिन्दुर मुर मामयमुह ठिहा। इम चित्ति निति मंजम मबल बाहुबलि कामगि रहिउ । भरईसर पत्त अयज्मपुरि भायनेह किनिम कहिउ ॥१०॥ भन्ना यिमयविकारिभारि पदमाणि गहर। परिणत फलस भत्तभीगरि विम यार। रायणमि सुधम्म रम्म पोमहया पारिय। करह पारण जाय माय मराणि विमिचारिय। सुरुवाणि टाणि निअ आणि मण मागला पनगा। दुजमनारि मा नारि पुण भमा भरि भर भीरभर पारवयणि जाणधिनायणि जिला मनि। कोणिय रस टवेगु गु मंगम जान। हाविहारहं हार गुगपगपात दिसा। र फली कणिक रामाणिप गप पड़ा। नियताए पापंजरी पाण पाण गया। मग पाग दिणि दिशि दिया Trir nner.६॥ पणिपास पाणिया पायद यह युधि विधाME पदगुप्तमाहिनाभि पध्ययनिय भाणा। तसमरिमी अनियतिक्रिया नंदरिदह रमनयरि पारदरिया। विमफरमाणि परिणापित सो नि Rughter निगम परिधि विहरि पण् मिह nfiet Rus परशुराम जमदगिलपनमम । फराविरिय नरनाह हणा मासासुपरम । अपण पदम जकवि संपा। सिस अमेस फारशुलिनिय ress निवपरणिना पनि सुनम सूप मिल सभणना निपनेह रस Ext भजमहागिरिति रिभरपायावरण गि जिपि कति ARTAN | प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः कुलघरनियसुहसयणसंग निस्सा सवि छंडिय। अपडिवरविहारसार संजमगुणमंडिय। सायरधरि अनसुहत्यि गुरि गुणपसंस हरपिहिं करिय। अहआदर दिक्ति सुकारणिहिं पाडलपुर तिणि परिहरिय ॥५ सेणियधारणिपुत्त मेह भन्न विमुफिय । वीरपासि यय लिड युद्धि निसि संजम युक्रिय । पुन्यजन्म परिकहिय पुण वि घिर किडउ यीरिहिं । यदुजानगसंवा सहई अइदुसह सरीरिहिं । सो रायसभरर्यसमणि मणिन अप्प तृणसम गई। नारह विनगौमाणि सुट रहिउ सिरि घरभंगण ॥ ५३॥ मेडगभूगमुनिागुनमहासभंगुभम । निजारपेडानपुन विज्ञावलदुराम । भारगममरिधि अंग इग्यारर जाणइ । नाशिमियरगरगि भंगि अतिवृषण आणइ । TifT THIमामिहि फरवि फर हेला हणिउ । गोमनाई नरए गए शिमगदीस परिस भणिः ॥ ७ ॥ rainine नमिष फयादनाणी। रमासानालाई अन्त निगुणा जिणवाणी। माममा मगर विभिवंदणि यंदर । +finiti. निम्मल निदर। तर मुभमुशाम्म इला हरदा wife मगणमानुमंगति कार ॥ ८ ॥ करमामि गमाल विदिता। नानि मगाममिहिमि | समर मिग भासिनिा। नाम पर इसमय गिनि। कोसम्मालिया गिलगि गिर । REFERai पारि ॥ यति गyिi मामला उपएसमालकहाणयछप्पय २३ निसि चंपइ अंगार मूगविण मन्नइ प्राणि । तव अंगारयमद सरि अभविय इम जाणिउ । ते सीस सवे निवपुत्त हय सरि कर यकरभरिउ । तिहिं देखि सपंचरि आयते पुम्बजम्म तकणि सरिउ ॥३०॥ पुष्फचइसुय पुष्फल भइणी नह भन्ना। सुमिणि नरयदुह देखी पुष्फचुला वयसबा। अग्निपमुपगुरुफन्नि ग्बीणघावल जाणी। आणंनी सा भत्तपाण हुप केयसनाणी । पुच्छेद सरि मह नाण कहिं सुपण गंगभीतरि कहा। तय हदेचि उचसग सहि सुगुरु तत्य केवल लहइ ॥३१॥ सिद्धि पत्त मरुदेवितपिहिविगु इणि आलंवणि । के विकरति पमाय ति पणि अच्छरपसम गिणि| जिणि कारणि पुन्यमि जम्मि थायरतम्भीतरि । बोरिसंगि बहु अंगि सहिय दुह कम्म विनिवरि । सुहभावि पावि परिमुकमण सरलसार संतोसमय । जिणणि नाभिकुलगरधरणि रिसह झाणि निव्याणि गप ॥ १२॥ लद्धि पत्त पत्ते य युद्ध सुहसिद्धि समाणद। अच्छरपसमतुल्ल युल्ल किवि ते मनि आणइ । निहिसंपत्ति स चित्ति धरपि पियसाय ति छंडह। सामग्गी परिहरिय करिय पातग निय दंडइ। फरकामुहनमिन गइ निहुचरित्त नितिय सुपरि । धरि धम्म रम्म उनमसहिय मुझ माय अपमाय करि ॥ ६३ ॥ ससगभसगनिवपुत्रावहिणि सुकुमालिय कुमरी। चंपापुरि पारित लेह रूपिहिं किर अमरी। फिरइ तरूण नस पासि रागि रत्ता गयगमणी। रसद पंधर बेउ लेइ तिणि अणसण समणी । यहुदिवसि तापि तपि मरणामुइय जाणि पनि परटयो। ओसहपिसेसि सुजि सज करि सत्यवाहि गहिणि यी ॥१४॥ मु बहुमोसपरिवारसार सिनपिदित्त। महुरापुरि सिरिमंगुरि रमणिदिई जित्त।

२४ प्राचीनगूजरकाव्यसङ्ग्रहः नयरखालि उप्पन्न जरक बहु दुक निहालइ । सुविहियजणपडियोहकत्रि नियजीह दिखालह। जिप्पह मुणिंद रसणिदियह अणजित्तइ परिमु हुउ । जगह जि जोग जुगतिहिं सदा म म म माहनिद्रां मुउ ।। ६५ ॥ गिरिसुय ग्रहिउ पुलिंदि पुष्फसुय तवसी सेवइ । सुयडा अडवीमज्झि अछह पकोदर वैयद । इफ भणइ लिउ मारि अवर पुण विणय पयासह । अंतरसंगविसेसि दोस गुण नरनइपासइ । इम जाणि निगुणसंगति तिजउ सगुणसंग अणुदिण करउ । झगमगइ जेम जगमज्झि जस भवसमुद्द तस्कणि तरउ ॥ ६ ॥ सिरियायचापुत्तरि सुकसरि अणुफमि । सेलगसूरि पमायपंकि पडियउ अदुद्दमि । गया सीस सवि छंडि एक पंथग मुणि रहिउ । खामंतई पगि लागि पञ्बवासरि तिणि कहियउ। मियमहुरवयणि सुनिपुणपणइ ठविउ सुद्धसंजमि स गुरु । सो सूरि पुण वि चारित्त वरि सित्तुंजय सिद्धउ सघर ॥ ६ ॥ सेणियनंदण नंदिसण वारस संवच्छर । वीरमीस वय ;हि बेस धरि वसइ समच्छर। दस प्रतियोध्यापिणु न लेइ आहार निरंतर । इफा न युन्झइ भणइ वेस दसमा तुम्हि सुंदर । इण येमवयणि पुण वेसधर चरण परवि सुर संपजइ । इप जस्स सत्ति देमुणतणी अहह सो वि संजम तिजद ॥ ६८ ॥ परमसहस तय कट करिय कंडरिय न सुद्धउ । अंनि दृट्टपरिणाम कामवश नरपनियद्धा । अचिरकालि परिपालि मुख संजम संपत्ता। पुंडरीक मलसिरि सुयुडिनिम्ताउ । वह दुम्म महयि नवि लद मुह भण दुक्ति यहुमुम्प लाहिउ । बिटु बंधय एवड अंतर भावभदि भगवति काहिर ॥ ३९॥ नयरि मुमपुरि राग भाग दुइ ममि मरणाट । ममा मन्ना धम्म रम्म मना दिसणासुह ।

उपएसमारहाणयछप्पय तपजपविण सो पत्त नरगि ग्रीजद दुहतत्सर । करवि पर दुहचर सन्गि सत्तमइ स पत्तउ । ससि रड सूरसुरजग्गलिहिं तणु तच्छिय दुह दिकपः। सो भणइ जीय विणु तणु दहिहिं नरयदुत किम रतिवउ ॥७॥ सुग्गहमागपईव नाण जे दियई निरुप्पम । तिहं गुरु किं पि अदेय नयि जगमज्झि जगुत्तम । दिडउ जेम पुलिंदि सिवगजकह नियलोयण । तिण सरिस सुर यत्त करइ भत्तह दिय चोयण । केवलई दाणि तूसइ न गुरु अंतरंगभत्तिहिं यरह । तिणि कारणि बिहुपरि करि विणय जिम बाहिरि तिम अंतरह ॥७॥ अंघचौर चंडाल चडिउ अभपडफरि कंपद। दय नामिणी सुवित्र मज्म इम सेणिउ जंपह। विणयविवन्जिय विज्ञान करिवह नयि जग्गह। सिंहासणि बइसारि भारि गुरु करि सो मग्गइ । ओ कहइ पिन ओ लहह फल विहुह कब तकणि सरिउ । इण कारणि जिणसासणि विणय सुगुरु सीस अणुपामि करिउ ॥७२॥ दगसूपरउ तिदंडि तामलित्ती पुरि अच्छद । नापितपासि सुविज लेवि देसंतरि गच्छद । महिमा मोहिम पत्त दंड गयणंगणि रहियउ । पुच्छिउ नरवरि जाम ताम सघउ नयि कहियर। गुरुलोपि कॉपि विना गई गयपदंड महाडि पडित । सज्जिपउ लोकि हसिउ समलि इम सु नाणनिन्हपि नडिउ १७२।। पंभण एक अनेकडकवडाइनिरुता । उज्जेणिहिं कट्टियउ देसि पम्मारि म पत्तः । प्रिहुंगामहं विवालि करह तप वेसि निदंडी। भगनलोकघरसार मुमइ निसि सुजि पाखंडी। अहन दिउ हत्यि नरपरतणइ नपण फहिनडिपी पण! बहु झुरद अति सोचाइ सुचिर निंदद निपफुटरफराउ || ४ || दहरंग परदेव कुहिरूपिहिं पर यंदा । छींक करह जव वीर नाम मरि कहि अभिणंदा ।

२६ प्राचीनगूजर काव्यसतह सेणियपति निर जीव अभयप्रति जा चड विहुपरि । कालसरप्रति कहद म मरि म म जीविय अणुसरि । मगहेसर पुच्छद प कयणु कवण एस परमत्य पुण। जिण भणइ विप्पसेडयचरिय चिहु प्रकारि नरभाचरण ॥ ७ ॥ परि अंगमीइ मरण सरण जिणधम्म धरित्रह। जियहिंसा पुण घोर घोरदुहहेउ न किन्न । कालसरियह पुत्त सुलम जिम पाव निवारउ । परपीडा परिहर तरह संसार असारउ । कुलकारण किं पि म लिस्कवर गुणह रूप गुम्यडि घरउ । परलोगमग जाणउं सुपरि कुपरि कुकम्म म आपरउ ।। ७३ ।। हेजिद हित अरिहंत कह वि नयि प्राणि करावइ । तं पुण दिइ उपदेस जेण किडइ सुम्ब आवद । जं सुरवह सुरवग्गि सन्गि परावणवाहण । जं भरहाहिय रज्जसज मुंजइ सुहसाण । जं जं अवर वि सुरअसुरनरमुक सुरू माणइ घणउ। तिहुयणह मज्झि तं सयल फल जिणवरउयएसहतणउं ॥ ७ ॥ खत्तियकुंडि जमालि वीरजामाइ बत्तिउ । सुइंसणभत्तार सार वयभारपवत्तिउ । नयि मन्नइ किन्जंत किड इय आगमवाणी। निन्हवि तेण कुदिष्टि दुटि किय बहु गुणहाणी। नियकित्ति मुसिय सुर किन्विसिय मिलिउ मिच्छमइ माहियउ। सयपंच साहु साहुणि सहस दंकसटि पुण वोहियर ॥ ७८ ।। जिम मासाहस पंस्त्रि मुस्विहिं मा साहस जंपई । यग्यवयणि पइसेवि मंस लिंनउ नवि कंपइ । निम अवरह उवापस दिति किवि फुडवयणस्करि । पणि अप्पणि न करति रम्म जिणधम्म तणीपरि । वरग्गवाणि नड उच्चरह जलहि जालि पाणी गलइ । इम कम्मभारि भारिय भणी जाइ भूर भवजलतलह ॥७९॥ घन्मवीय जिणराइ आणि दीवंतर दिउ । अविरति सयल विम्बद्ध दमविरते अघ वद्धउ । .

समरागम पासत्ये पुण खुधि वित्ति स्वाइप सहु हारिउ। संजमि ए सुभखित्ति सब्द वापीय पक्षारिउ । निह भेदि जीव ते फरसणी राजदंडि अप्परं दहइ । मुपिहियमुणि रायपसायवसि मुख सुगालि लच्छी लहइ ।। ८० ॥ इणिपरि सिरिउपगसमालकहाणय । सवसंजमसंतोसविणयपिज्जाइ पहाणय । साययसंभरणत्व अत्यपय उप्पयदिहिं । रयणसीहसूरीससीस पभण आणदिहिं । अरिहंताण अणुदिण उद्य धम्ममूल मत्थह हई। भो भविय भत्तिसत्तिहिं सहल सयल लच्छिलीला सह ॥ ८१॥ ॥ इति श्रीउपदेशमालासर्वस्थानछपया ।। समराराम पहिला पणमिउ देव आदीसम सेत्तुजसिहरे । अनु अरिहंत सच्चे वि आराहउँ बहुभत्तिभरे ॥१॥ तउ सरसति सुमरचि सारपससहरनिम्मलीय । जसु पयकमलपसाप मूम्पु माणइ मन रलिय ॥ २॥ संघपतिदेसलपूनु भणिसु परिउ समरातणउ ए। धम्मिय रोल निवारि निसुणउ अयणि सुहावण ॥३॥ भरह. सगर दुइ भूप चायति त हम अतुलवल। पंडव पुहविमचंड तीरधु उधरह अतिसयल ॥ ४॥ जापढताउ संजोगु हम मु दूसम तप उदए। समइ भलेरइ सोइ मंत्रि बाहउदेउ उपजए ॥५॥ हिव पुण नवी य ज पात जिणि दीदार दोलिए। ग्वत्तिय खन्गु न लिंति साहसिपद साहसु गलए ।।६।। निणि दिणि दिनु दिरसाउ समरसीदिलिपरमणि तमु गुण फरई उद्योउ जिम अंधारह फटिफमाण ॥७॥ सारणि अमियतणीय जिणि पहायी मरमंडलिहिं । किउ कृतनुगअवतार कलिनुगि जीतउ पाटुवले ।। ८॥

२८ प्राचीनगूनरकाव्यसङ्कहः ओसवालकुलि चंदु उदयउ एउ समानु नहीं। कलिजुगि कालइ पाखि चांद्रिणउं सचराचरिहिं ॥९॥ पाल्हणपुरु सुमसीधु पुनवंतलोयह निलउ। सोहर पाल्हविहार पासभुवणु तहि पुरतिलउ ॥१०॥ भासदार चहुदा रूभडाए मढमंदिरह निवेसुत । वाविवआरामयण घरपुरसरसपएस त। उवएसगच्छह मंडणउ ए गुरु रयणप्पहरित। धन्नु प्रकासई तहि नयरे पाउ पणासइ दृरित ॥१॥ तमु पटलच्छीसिरिमउदो गणहरू जसदेवतरित। हंसवेसि जसु जसु रमए मुरसरीयजलपूरि त ॥ २॥ तमु पपकमलमराटुलउ ए कामरि मुनिराउत । मानानुपि जिणि भंजिगर मयणमल भड़ियाउ त ॥३॥ मिरमरि तमु सीसबरी किम यस दफजीहत । समुपगोमा सलदिनए हिपलोपवणीहत ॥४॥ सामानामणि मादाय देवगुतगरि बईठु त । पानि निम महमकरी मगमन जिण दीठुन ।।५।। निर पारालंकरण गच्छभारधारेउ न । II मन मिगिरिगुरु पहन ।। २ ॥ तमुवानीसमोनु गितयनि पिचर। माता लीला गाल फरेउ।।७॥ एमनिमलि मरिमत नारन । भारतिय किमाए नही पन तनह पार ॥८॥ र मानदि मलपतु मुगिदिगंभीरता नांदगुदा ममा भाग नियम || र प्रति ना तु गांगदमारता मुग मुगल भनी गभारास निगनाशु.॥ मात्रामा मिन्दारनिगि जम्मा ममारिका सननिरिमनानामिनाही ग धरना॥ नगरीय निमुगि मंदी मालिममारा दान मालिटूमामामिलानि नोविमान १९ सरगगन दतीयभापा-रतनकुपि फुलि निम्मली य भोलीपुनु जाया। सहजउ साहणु समरसीह बहुषुप्निहि आया ॥१॥ लहमलगद सुविचारचतुर मुविवेक मुजाण । रत्नपरीक्षा रंजपद राय अनु राण ॥२॥ तर देसल नियफुलपईच ए पुन मधन । रूपयंत अनु सीलयंत परिणायिय कान गांसलमुति आगामु कियउ अहिलपुरनगरं । पुग्न लहर जिम रगणमाहि नर ममुह महरे ॥४॥ घरासी जिणि पडाटा परवहि विहार । मह मंदिर उत्तंग पंग अनु पोष्टि पगार ॥५॥ सहिं अउह भूपनिहिं भुषण ममाणिहि पराया। विनफा विज्ञानि फरिउ धार नियहरयां ॥३॥ अमियसरोवर सहमलिंगा भरणिहि । वितिभुवारि अवररेमि मागद आय अज्ज विदीमह जत्य धम्मु गालिबालि भनि। आपारिहिं इस नपरतणहमपराप जित ॥८॥ पातसाहि सुरनाणभीयु नहि रामु काई । अलपपानु दिनह लोग पणु मानु शु॥१॥ साहु रापदेसलह तुना मेयर पाए । कला करी जविरानु यह दे पागर ॥१५॥ मीरि मलिपिमानियासमा समरशु पभ। परउपपारियमादि लीह उसु पहिली गा॥११॥ जेटसहोदर महापालि निज प्रगति । दक्षणमालि देवगिरिहि फित धम्माणि ॥१२॥ पीरजिणालय सिणु रति सिरियाणदी। धम्मधुरंधर रोपियउ घर परमह दो।।। माहणु रहियर भनपरि सारगंभीर । पुरपुरिमारितिम ए परनारे ! १४ ॥ हनीपभाषा-रिगुण समाप्रभारिमारपाप गंजपा ।। भषिपदर करणारावि नीरमनु मोहि पनि।

३० प्राचीनगूर्जर काव्यसहदः समरऊ ए साहसधीक वाहविलग्गउ बहअ जण । बोलई ए असमवीरू दूसमु जीपइ राउतवट ए ॥ १ ॥ अभिग्रह ए लियइ अविलंयु जीवियजुब्वणवाहबलि । उधरऊ ए आदिजिणवियु नेमु न मेल्हउ आपणउ ए। भेटिऊ ए तउ पानपानु सिम धूणइ गुणि रंजियउ ए ॥२॥ वीनती ए लागु लउ बानु पूछए पहुता केण कने । सामिय ए निसुणि अडदासि आसालंबणु अम्हतणउए। भइली ए दुनिय निरास ह ज भागी य हींदृभतणी ए। सामिय ए सोमनयणेहिं देपिउ समरा देइ मानु ।। ३ ।। आपिऊ ए सव्यवयणेहिं फुरमाणु तीरथमाडिबा ए। अहिदर ए मलिकाएसि दीन्ह ले श्रीमुखि आपण ए। पतमत ए पानपएसि किउ रलियाइतु घरि संपत्तो। पणमई ए जिणहरि राउ समणसंघो तहि वीनविउ ए॥४॥ संघिहि ए कियउ पसाउ बुद्धि विमासिय वह्वयपरं । सासण एवर सिणगारु वस्तपालो तेजपालो मंत्र । दरिसण ए छह दातार जिणधर्मनयण वे निम्मला ए। आइसी ए रायसुरताण तिणि आणीय फलही य पवर ॥५॥ दूसम ए तणी य पुणु आण अवसरो कोई नहीं तसुतणउ ए। इह जुग ए नही य वीसासु मनुमाने इय किम छरए। तर तुह ए पुनप्रकासु करि जयरि जिणवरघरमु ॥६॥ चतुर्थभापा-संघपतिदेसल हरपियउ अति धरमि सचेतो। पणमइ सिधसुरिपयकमलो समरागरसहितो। वीनती अम्हतणी प्रभो अवधारउ एक । तुम्ह पसाइ सफल किया अम्हि मनोरहनेक ॥१॥ सेत्तुजतीरथ जयरिवा पन्नउ भावो । एक तपोधनु आपणउ तुम्हि दियउ सहाउ । मदन पंडितु आइसु लहपि आरासणि पहुचद । सुगुरवया मनमाहि धरिउ गाउ अति रूपइ ॥ २॥ राणेरा तहि राजु फरद महिपालदेउ राणउ । जीवदया जगि जाणिजए जो धीरु सपराणउ ।

समरारामु पातउ नामिहि मंत्रिपरी तमुतणइ सुरज्जे। चंद्रकन्हह चकोम जिसउ सारद बहुकम्जे ॥३॥ राणउ रहियउ आपुणपई पाणिहि उपकंठे। टंकिय पाहह स्त्रहार भांजइ घणगंठं । फलही आणिय समरवीरि ए अतिवहुजयणा । समुद्र पिरोलिउ यामुगिहिं जिम लाथा रयणा ॥४॥ कृारसि यु अउ निमांगमहनहरं । फलही देपिउ धामियह रंगु माइ न महरे। अभयदानि आगल करणारमचित्तो। गोत्ति मेल्हावद पदरालअह आपइ बहुपित्तों ॥५॥ भांडू आव्या भाउघणउ भवियायण पूजा । जिम जिम फलही पूजिजए निम तिम कलि (जह । खेला नाच नपलपर घाघरिघु समकार । अचरिउ देपिड धामियह कह चित्तु न चमरद ॥३॥ पालीताणइ नयरि संधु फलही य पधायद । बालचंद्र मुनि धेगि पयम कमठाउ कराया। किं करिहि पदीय दंड पारसायरमारिहि ॥ ७॥ सामिपमूरति प्रकट पिप कृप करिउ मंगारे । मागी दीन्ह पचायणी य मनि हरपुन माए । दसलऊयह परिधि सह रलियात धाए॥८॥ पथमी भाषा-संधु यहुभत्तिहिं पाटि ययसारित। लगनु गणिउ गणपरिहि पिपारित। पांसहसाल म्यमामण देयए । सरिसेयंवरमुनि मपि संमहे ॥१॥ घरि यसवि करी के वि माविया। के पि धम्मिय हरसि पम्मिप पाइया । पहदिमि पाठपिप फुकुमपधिपा। सं मिला यहुमतीय मज्जाइपा ॥२॥ सुहगुरसिमसुरिपासि अहिसिरित। संघपति कल्पतरू अमिप जिम सिभित। -- प्राचीनगर्जरकाव्यसह- अष्टमी भाषा-चलउ चलउ सहियडे सेजि चडिय ए। आदिजिणपत्रीठ अम्हि जोइसउंए। माहसुदि चउदसि दूरदेसंतर संघ मिलिया तहिं अति अबाह माणिके मोतिए चउकु सुर पूरह रतनमइ वेहि सोवन जवारा। अशोकवृक्ष अनु आम्र पल्लवदलिहि रितुपते रचियले तोरणमाला ॥ देवकन्या मिलिय धवलमंगल दियह किंनर गायहि जगतगुरो । लगनमहरतु सुरगुरो साधए पत्रीठ करइ सिधसरिगुरो ॥ ३॥ भुवनपतिव्यंतरजोतिसुर जयउ जयउ करइ समरि रोपिउ द्रिदु धरमय दुंदुहि वाजिय देवलोकि तिहुअणु सीचिउ अमियरसे ॥ ४॥ देउ महाधज देसलो संघपते ईकोतरु कुल ऊधरए । सिहरि चदिउ रंगि रूपि सोवनि धनि वीरि रतनि वृष्टि विरचियले । रूपमय चमर दुर छत्त मेघाडंवर चामरजुयल अनु दिनदुनि । भादिजिणु जिउ सहलकतिहिं कुसुम जिम कनकमयाभरण ॥३॥ भारतिर परियले भावलभत्तारिहिं पुव्वपुरिस सगि रंजिपले । दानगरि थिर समर सिरिहि यरोसोयनसिणगार दियह पाचकजन ॥ भसि पाणी प यरमुनि प्रतिलाभिय अचारिउ वाहह दहियदीग। पापित सुभम यितु सिरसेनि इंद्रच्छयु करि ऊतरण ॥ ८॥ भोगीपनंदणु भला महोत्सपि आविउ समा आवासि गनि । तेगहराए नारया पर नंदर जाय रविससि गयणि ॥९॥ समी भारा-सपालु करी चारि भले माल्हंत जिय दरिसण पाप ! सुणि सुंदर पूनिय दरिसण पाप । मोरम मंगु मंगरिमा यां रपणि विहार ॥ १॥ आदिमानु भमरेलीगह माल्हं० भाविउ देसलजाउ । भामा भन जधि मिलए माह मंडलिफ सारठराउ ॥ २॥ टामि टानि उच्य हुभा माल्ह० गरि जूना संपतु । मारा भाया माल्ई. मामुदउ मंगभगुरनु ॥ महिए मना सिमिदिरा माहां माहवार भना गोगिए । विगलित तंतदपुरे मा. गरिर मंघमाणे । सुणिः॥४॥ बमबीनप्रवारिक माह तलाटी पगरमादि। मंदारियादिगा मा पालिहमराहमाहि । गणित समगरामु दामोदन हरि पंचमउ माल्हं० कालमेघो क्षेत्रपाल । सुणि। सुवनरेहा नदी तहिं पहए माल्हं० तरुवरतण झमालु ॥५॥ पाज चडता धामियह मा० ममि मि सुकृत विलसति । सुणि । ऊची य चडिया गिरिफडणि मा० नीची य गति पोडंति ॥ ६ ॥ पामिउ जादवरायभुषणु मा० विनि प्रदक्षिण देह । सिवदेविसुतु भेटिउ करिउ मा० ऊतरिया मदमाहि । सुणि। कलस भरेविणु गयंदगए मा० नेमिहिं न्हवणु करेइ । पूज महाधज देउ करिउ मा० छन चमर मेल्देह ॥७॥ अंगाई अवलोयणसिहरे मा० सांविपज्जूनि चडंति । सुणि । सहसाराम मनोहरू ए मा० विहसिप सवि वणराइ । सुणिः । कोइलसाद सुहावणउ ए मा० निसुणियइ भमरसंकार । सुणि ॥८॥ नेमिकुमरतपोवनु ए मा० दुह जिय ठाउं न लहति । सुणि । इसह तीरधि तिहुयणदुलभे मा० निसिदिनु दान दियंति ॥९॥ समुदविजयरायकुलतिलय मा० वीनतडी अवधारि । सुणिः । आरतीमिसि भवियण भणई मा० चतुगतिफेरडउयारि । सुणि॥१०॥ जइ जगु एफु मुटु जोड्यए मा० त्रिपति न पामियइ तोइ । सुणि । सामलधीर तसार कर मा० वलि बलि दरिसणु देजि। सुणि०॥१२॥ रलीपरेवयगिरि ऊतरिउ ए मा० समरडो पुरुषमधानु । घोडउ सीकिरि सांकलिय मा० राउल दियह पहुमानु । मुणि० ॥१२॥ दशमी भापा-रितु अवतरियड तहि जि वसंतो सुरहिकुसुमपरिमल पूरंतो समरह वाजिय विजयदया। सागुसेलुसलइसच्छाया केसूयकुडयकयंबनिकाया संघसेन गिरिमाहह वहए। वालीप पूछइं तरुवरनाम वाटह आपई नव नव गाम नपनीझरणरमाउलई ॥१॥ देवपटणि देवालउ आवइ संघद सरवो सरु पूरावह अपूरयपरि जहिं एक हुई। तहिं आवइ सोमेसरछत्तो गउरवकारणि गरुड पटूतो आपणि राणउ मूधराजो ॥२॥ फूल कापड बहु दीजई लूणसमउं कपूरु गणीजइ जवाधिहिं सिम लिंपियए। पान ३६ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवादः ताल तिविल तरविरियां वाजहं ठामि ठामि धाकणा कर पगि पगि पाउल पेषण ए॥ माणुस माणुसि हियउं दलिंजइ घोडे वाहिणिगाहु कर हयगय सूझइ नविजन दरिसणस देवालउ चल्लह जिणसासणु जगि रंगिहिं मन जगतिहिं आव्या सिवभुवणि ॥ देवसोमेसरदरिसणु करेवी कवडियारिजलनिहिं जोएबी मियमेलइ संघु ऊतरित पटुचंदप्पहपय पणमेवी कुसुमकरंडे पूज रएवी जिणभुवणे उच्छवु कियउ॥२ कारवि सिवदेउलि महायज दीधी सेले पंचे वनसमिद्धी अपूरघु उस जिनवरधरमि प्रभावन कीधी जयतपताका रवितलि बडी दीड- पयाण दीवभगी कोहिनारिनिवासणदेवी अविक अंबारामि नमेवी दीपि वेलाउलि आवियर ए॥ एगदशी भाषा-संगु रयणापरतोरि गहगहए गुहिरगंभीरगुणि । भाविउ दीपनरिंदु सामुहउ ए संघपतिसयतु सुणि ॥ १॥ परपिउ हरपालु पीति पहतर ए संगु मोलविकरे । पभग दीपद नारि मंघद ए जोभण ऊनावली भाइला यादिन याहि येगुलइ ए पलावि प्रिय बेहुली " ॥२॥ धिमा मुगुमारिपु जोदर नगणुलां सफल करउ । नियममा नधि करमु मनारिम ए कारि ऊभारणाए। बंडारदीय नादि बलियऊ की पंधियारी ॥ ३ ॥ देवानामादियटर मंधपनि मंघसहित। दारि लागई भागामि प्रवहणुप नाद विमान जिम । उदबदबाजोद नवरंग ए रास लाारस ॥४॥ निसानु होमु दीमई एमबरला पयलहर । नि भन्दा माविहाक सभा भला निमुषण । तराइ दिदिक मन भादिनि । ।

ममरारामु दीठउ वेणिवच्छराजमंदिरुप मेदनीगरि धरिउ । अपूरघु पपिउ संघु उत्तारिक ए पहली तढि समुदलाए॥५॥ बादशी भाषा-अजाहरपरतीरधिहि पणमिर पासजिणिदी। एज प्रभावन तहिं करहिं अनिउ प अघिउप अनि सफल मुण्दो॥१॥ गामागरपुरयोलिंतो पलिउ सेतुजि संपत्ती । आदिपुरीपानह चदिऊ प यदिऊ ग पंदिकए यदिशा मदविपनी ॥२॥ अगरि कारिहिं चंदणिदि मृगदि मंणु कोय । कसमीराकुंकुमरमिहिं अंगिहिं अंगिदि ग अंगों अंगिरनीय । जाइयउलविहलेवनिय पूजितु नाभिमल्हागं। जनमुफलु पामिऊ ए भरिया ए भरिया ए भरिया सुलभंग सोहग अपरि मंजरिय धीजी य मेनुजि उभारि। -ठियप समरकर ममरऊए समर आविउ गुजरात। पिपलालीप लोलियणे पुरे रागलोक रंजई । दे पपाणे संचरण राणपुर राणपुरे गणपुरे पाई ॥ ४॥ पढयाणि न पिलंघु किउ जिमिउ करीरे गामि । होईउ पाढलए नमिपऊ पनमिप ग नमिप नेमिनारतगमि। मंरोसर मफलीयफरणु पूजिउ पामजिणिदी। हु सहिं हरपियउ प देपिऊ पदेषिक पपिट फणिमणि दो ॥५॥ उंगरि रिउ न पाहि पनि गलिजन गिर गया। नर आणि ए मधपती मंधपती ए गंधपतिपरिहि भयो । सम्रण समण मिलीयनाहिं अंगिहि अंगुपित। उलटु पण एमांड मारू एनरकटि.॥ मंत्रिपुग्रह मारह मिलिग अनु पयहारिपसार । उपधाषिपर हिहिं पाहिहिं एसिहि पारिप अपमात । हरिपपारतरपरि प तहिं समरउधर भयम् । पगमण ! अभिनयु ग अभिनयुप अभिनउ पुनियासISH पथरि महारए पापित रिसहजिगिदी। मि पहल पर नंदकपनं नंदा जा रविदा।। मध्यरिहि गणहरहनेभगनियामा। बपरिहि रपिप: ए रधिपए रशिप समारासो!

१८
प्राचीनगरकाव्यसङ्घदः
एह रासु जो पद गुणइ नाचिउ जिणहरि देइ ।
अवणि सुणइ सो वयठऊ ए तीरथ ए तीरथ ए तीरथजात्रफलु लेई ॥ १॥
इति श्रीसंघपतिसमरसिंहरासः॥
सिरिथूलिभदफागु।
पणमिय पासजिणंदपय अनु सरसह समरेवी ।
धूलिभद्दमुणिवद भणिसु फागुवंधि गुण केवी ॥१॥
अह सोहगसुंदरख्यवंतु गुणमणिभंडारो ।
कंचण जिम झलकंतकंति संजमसिरिहारो।
धूलिभद्दमुणिराउ जाम महियलि वोहंतउ ।
नयररायपाडलियमाहि पहुतउ विहरंतर ॥२॥
परिसालइ चउमासमाहि साह गहगहिया ।
लियइ अभिग्गह गुरह पासि नियगुणमहमहिया।
अनविजयसंभूयसूरि गुरु वय मोकलावइ ।
तसु आएसि मुणीस कोसवेसाघरि आवइ ।। ३ ।।
मंदिरतोरणि आवियउ मुणिवरु पिरकेवी ।
चमकिय चित्तिहि दासडिय वेगि जाइ वधावी ।
येसा अतिहि उतावलि य हारिहि लहकंती
आविय मुणिवररायपासि करयल जोडती ॥४॥
भास-धर्मलानु मुणियइ भणिसु चित्रसाली मंगेवी ।
रदियउ सीहकिसोर जिम धोरिम हियइ धरैवी ॥५॥
झिरिमिरि झिरिमिरि झिरिमिरि ए मेहा परिसंति ।
मलद्दल खलद्दल स्खलदल ए वाहला यहंति ।
झवझव झवझव झवझव ए वीजुलिप झक्कद ।
धरहर धरहर घरहर ए विरहिणिमणु कंपद ॥ ६ ॥
मष्टरगंभीरसरण मेद जिम जिम गाजते ।
पंचवाण निप कुसुमवाण निम तिम साजते ।
जिम जिम केतकि महमदंत परिमल विहसावद ।
तिम तिम कामि य घरण लगिनियरमणि मनाया ॥७॥

सीयलकोमलसुरहि वाय जिम जिम यायंते। माणमफर माणणि यतिम तिम नाचते। जिम जिम जलभरभरिय मेह गयणंगणि मिलिया। तिम तिम कामीतणा नयण नारिहि झलहलिया ॥ ८॥ भास-मेहारयभरमलटि य जिम जिम नाचा मार। तिम तिम माणिणि पलभलह साहीना जिम चार ॥९॥ अब सिंगारु फरद वेस मोटइ मनऊलटि। रइयरंगि बहुरंगि घंगि चंदणरसऊगटि । पंपयकेतकिजाइकुसुम सिरि घुप भरेह । अतिआछउ सुकमाल पीक पहिरणि पहिरंड ॥१०॥ लहलह लहलह लहलह ए उरि मोतियहारी। रणरण रणरण रणरण पगि नेउरसारी। झगमग मगमग झगमग ए कानिहि परपुंडल। झलहल शलहल शलदल ए आभरणहं मंडल ॥ ११ ॥ मयणबग्ग जिम लहलहंत जसु येणीदंती। सरला तरलउ सामलउ रोमापलिंदंडो। तुंग पयोहर उसह सिंगारथयफा। फुसुमबाणि निय अमियकुंभ फिर धापणि मुका॥ १९ ॥ -काजलि अंजिवि नपणजप गिरि संघा फार। घोरीपावटिकायुलिय पुण उरमंडलि सारं ॥ १५ ॥ कमजुपल जसु लहलहंत फिर मपहिलाला। पंपल पल तरंगपंग जसु नपणकपोला। सोहर जासु फालपालि जणु गालिमगरा। कोमल विमलु सुकंतु जासु पाना संबतूरा ॥१४॥ टवणिमरसभरणपडिप जसु नाहिप रहा। उपणराप फिर विजपखंभ जरा अरू मोहा। सुनहपालव कामदेषभंयुस जिम राजा। मिक्षिमि रिमिझिमि ए पापफमलि पापरिप सबाना ॥१९॥ जापनपिलसंतदेह नपनेहगहिाली । मलतारिहि मपमपंत रातिपहिही।

प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः अहरविंव परवालखंड वरचंपावन्नी । नयणसलूणी य हावभावबहुगुणसंपुन्नी ॥ १६ ॥ भास-दय सिणगार करवि वर जव आवी मुणिपासि । जोएवा करतिगि मिलिय सुरकिंनर आकासि ॥ १७॥ अह नयणकडकहं आहणए वांकर जोवंती । हाव भाव सिणगार भंगि नवनवि य करंति। तह वि न भीजद मुणिपवरो तउ वेस बोलावइ । तवणुतुल्लु तुह देह नाह मह तणु संतावह ॥ १८ ॥ वारहवरिसहंतणउ नेहु किणि कारणि छंडिउ । एवड निठुरपणउ कंइ मुसिउ तुम्हि मंडिउ । धूलिभद्द पभणेइ बेस अह खेदु न कीजइ । लोहिहि घडियउ हियउ मज्झ तुह वयणि न भीजह ॥ १९ मह विलवंतिय उपरि नाह अणुराग धरीजइ । एरिसु पावसु कालु सयलु मूसिउ माणीजइ । मुणिवइ जंपइ वेस सिद्धिरमणी परिणेवा । मणु लीणउ संजमसिरीहिसुं भोग रमेवा ॥ २० ॥ भास-भणड कोस साचउ कियउ नवलइ राचइ लोउ । म मिल्हिवि संजमसिरिहि जउ रातउ मुणिराउ ॥ २१ ॥ उयसमरसभरपूरियउ रिसिराउ भणेइ । चिंतामणि परिहरवि कवणु पत्थर गिहेइ । तिम संजमसिरि परिवएवि बहुधम्मसमुबल। आलिंगद तुह कोस कयणु पसरंतमहायल ॥ २२ ॥ पहिला हिवटा कोस कहइ जुव्यणफलु लीजह । तपणंतरि संजमसिरीहि सुह सुहिण रमीजइ । मुणि बोला जि मा लियउ तं लिया ज होइ । करणु सु अच्छा भुवणतले जो मह मणु मोहइ ॥ २३ ॥ भास-दणारि कोसा भवगणिय धूलिभहमुणिराइ । तमु धीरिम अवधारिकरि चमकिय चित्ति सुहाइ ॥ २४ ॥ आवलयंतु सु मदिरा निणि नाणि निधारि।

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४२ प्राधीनगूर्जरकाव्यसमा इह सह को एक मानि रंको अनु राओ ॥ ४ ॥ सामिय बंदिउ घडमाण सेणीयं पूछीई। जह पसनचंद हिय करेइ काल कीछे ऊपजइ । मन जाणेविण पसनचंद सामी बोलीजइ । नरगावासह सातमए नीछई ऊपजइ ॥५॥ वीजी पूछहं मणुय होइ जीजी अणउत्तर । दुंदुहि वाजी देवकीय चालीय तिहिं सुरवर । सेणिउ पूछ। सामिसाल कांहां जाईजइ । केवलमहिमा पसनचंद देवे कीजीजइ ॥६॥ सेणिउ मनि चिंताचडिओ सामी वलि पूछा। जं प्रभु तम्हे वोलीय तं अम्हे न बूझिउं । सेणिय तम्हि बूझियउं तमं तिसरं त होए। मणपरिणामह विसमगति जीवहं पुण होइ ।। ७ ॥ केवलनाणउ भरहखेति केतूं वरतेसिइ । सामी दापीउ विज्जुमालियउ छेदु होसिइ । चउसहि देवे परियरिउ चउदेवे सहीउ । अतिसई दीसइ देहकंति सेणीचिति चडीउ ॥ ८॥ देवहं नवि हुइ पटु नाणु यउ किम होएसिइ । आजूना दीह सातमए इणि नयरि चवेसिइ । किंकारण पुण एहतिं किंरूयह अतिसर। करणइ धम्महतणइ भावियउ देवभइसउ ॥९॥ ठपणि-महाविदहतणइ विजय वीतसोय नपरी । पदमरथ नामेण राउ वनमाला धरणी। तास ऊयरि ऊपन्न पुत्रु सुरलोपहहंतु । पद नामिई मियकमार वटुगुणिहिं संजुत्तउ ॥ १० ॥ पुलभवंतरतणइ नेहि सागरमणि पछुतु । आवार बंदण मियकुमार बहुभत्तिनुरंतर । इ जागांन मुणिहिं नाह कीछे मई दीटर। पह जन्मह मइयमपि मुझ भाइ यतउ ॥११॥ उहापोह करहि जाम पापिला भर देपा ।

अंधुसाभिचारिय ४३ जा मई मूफी सुरह रिद्धि या कोणई लेखई। तु चिताविउ सिवकुमार अधिरउ संसारो। भवनिप्नासण लेइसिउं अम्हि संजमभारो॥ १२॥ माइन मेल्हई एकपूत सो मुनिहिं पाई। दृढधम्मेण सावरण जायवि घालावी। पारि पारि दृदधम्म भणइ अम्ह भणीउ कीजद । दुल्हम बेडी मायजम्म जननिहिं रापीजद ॥ १३ ॥ कहइ धम्म सो मुणिहि जाम नसु यषण मनेई । विहुं उपपासहं पारणइए आंबिल पारंई। फासुयवेसण भत्तपाण धम्मो आणइ । माहि धीर अंतेरहं सो सील ज पालइ ॥१४॥ नयकरयालीतीपधार करमं सपि मुडद। निहणइ मोहकंदप्पराउ भवपरीयण मौदह । वारहं परसहंतणइ अंति आउधरीजद । पंचमदेवलोकि सियफुमार सो देय ऊपजह ॥ १५ ॥ फरणह नारिहितण उगरि पह जीप पवेसिह । कवणह वापरतणा फुलि पर मंडण होमिद । उसभदत्तसेठिहिं घरणि धारणिउरि नंदण। होसिइ नामिदं जंयुसामि तिहुपणि आणंदण ॥१९॥ ऊठीउ देव अणादिव हरपि नाई। पनु पनु अम्हत्तण पुल पर पुत्त होमिह । पवित्र पिमाणह भताय धारणिरि आषित । सुमिणप्रभाषिई उसभदत्त अंगेहिन माई ॥१७॥ जापत पुयु पहाण जाम दसदिसि उदयंता । पर नामिहिं जंबुतामि गुणगाण संतु। अठपरीसर हउ जाम गुम्पासि पहातु । मालपारि सो लिया नीम भववासपिरसर ॥१८॥ जोरणसद पहुतु जाम कमा मग्गायद । पीना या पाठपए सस पिपारा पप। मन देजितम्हि अम्ह देश भम्हि इमडे करेश।

४४ मामांना समय सांसहं परणी प्रहह नाम नीलामा ॥१॥ माप हंधीय तणां याणि परिणामी । आठा कन्या पक्ष्यार परिणीय र भागा।। आठद परणी मृगनगणी माराइ इटा। पंचसएचोरेमि प्रभवउ गरि पहा ।। २० ।। नीट अणावीग मागणीप आभरणलीता। ते सवि अभीगा टगमग जाना। अभयउ भणद हो जंयुमामि एक माठि ज कीनद । विहुं पिन्नाव एक विन भणीय ज दीनाइ ॥२१॥ हिव हं कहि नवि ज लेवि पुण किम कंग्मां। आठद परिणी ससिवयणी नीघई व्रत लेमा । रूपवंत अणुरत्त रमणि पर एम नासिड़ । अणहंतासुहतणी य आम मुझ जीय करसिद्ध ॥ २२ ॥ पव? अंतर नरहं होइ प्रभवउ चितेई । संवेगरसि जउ गप मन प्रभवर पूछेई। सिद्धिरमणिऊमाहीया ह तम्हि संजम लेमिउ । करणई विलवई माइयप्प किम किम मल्हेसि ॥ २३ ॥ इंदियाल नवि जाणीद ए को किम होइसिड़। अदार नानां एकभवि जंबूस्वामि कहई। पितर तम्हारा जंयुसामि किम तृपति लहेशई । पिंड पडइ लोयहंतणइ ए ऊभा जोसिइं ॥ २४ ॥ वाप मरवि भइंसु हुऊ पुत्रजन्मि हीजद । इणपरि मावा पितरतृप्ति तिणि धीवरि कीजइ । अणहंतासुहतणी य आस हूं तसं छांडेसिर । तिण करसणि जिम कलत्र भणइ अवतरना करेशिउ ॥ २९ ॥ तम्ह मपिहिं हर्ष लोभ कर देपि मणहर ख्यडउं । हत्यिकडेवर काग जिम भवसायर निवड । वीजी कलन कहेवि नाह जड़ अम्ह छंडेसि । तिणि वानरि जिम पच्छुताव बहु चीति घरेसिउं ॥ २६ ॥ बिंदुसमाणउं विसयसुरफ आदर किम कीजह ।

सामिचरिंग इंगालवाहग जेम तुम्हि तृस किम न छीपद । श्रीजी फलप भपाइवि नाह जउ अम्ह छांडेसिउ । तिणि जंयुकि जिम साणहार बहुखेद फरशउ ॥ २७ ॥ ऊतर पडि तर यह य संखेवि कहीजई। विलम्बी हुई ते सच्चि बाल जंबूसामि न बुझई। आसातम्बर मुफ जाम अम्हि इश करेशउं। नेमिहिमि राइमइ जिम परागण करेश ॥ २८ ॥ आठइ कलत्रह झवीय पंचसयसिउं प्रभवउ । माइ वाप वेउ भगई नाम अम्ह साधुसरीसर । टवणि-ग्रह विहसइ सुविहाण प्रभवु चिनवद जंघुसामि । सजनलोक मोकलावि तम्हिसि संजम लेसि ॥२९॥ ग्वण एक पडपागवि राय मोकलापण चालीय। तु सुहडसमूह करवि भुई कंपइं भडभडवई ॥ ३० ॥ जस भय भ्रसका राउ जस भय नींद्र न वपरीयहं । पसउ प्रभवउ जाइ नरनारी जोयण मिलीय। पहतु रायदुवारि पडिहारिहं बोलावीउ । वेगिई राउ भेटावि अम्हि अछउं उत्सुकमणा ए॥ ३१ ॥ पुत्ततणड विझ राय तुम्ह दरिसणि ऊमाहीउ ओ। कारण जाणीउ राय धेगिहिं सो मेल्हावीउ ओ। ट्रेठिन बंडइ राउ प्रभवर देपी आवतः । साचउप भडिवाउ पुरुषह आकृति जाणीह ए॥ ३२ ॥ रूपगुणे संपन्न रायरमणिमन घोरतु ओ। सोहइ निमचंद जइद्रय कोणी प्रणमीउ। नुतउ असीय शरीर जइ कोइ जणणोजाइ । नपणे हटुं नीर संवेगजलहरि परिसिर । सामी खमि अपराध अम्हे लोक संतापीया ए॥ ३३ ॥ पडियन बोलइ राउ कोणी मनि आदिपर। धन्न पनुती माइ इसिउ पुत्र जिणि जाई ओ। तो मोकलायी राउ चारपाली सासंचरण। सजनद फहीई पर अम्हे संजम लेदशाउं ।। ३४ ॥

प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः किण कारणि बहरागतं कारण अम्ह वोलीइए। मेल्ही अठ्ठइ बाल कणयकोडि नवाणवह ए। अनइ रिद्धि बहूत तिहिं पुण पार न जाणीयए । जंवूसामिचरित्त महिमंडलि हां अच्छरीय ॥ ३५ ॥ इणि कारणि वयराग तृण जिम दीठउ मेल्हतउ ओ। अम्ह सोइ जि सामि तम्हे भलई अछजिउ ओ। मोहनरिंदशउं झूझ संजमकित्तिई झूझसि ओ ॥ ३३ ॥ ठवणि-प्रभवउ पंचसएण अइयहयरमाइवप्पो । सविक ए रूठ जाइ नीयघरहूंतु नीसरह ए। चालीउ ए सिवपुरिसाथ सारथवय तिहिं जंबुसामि । तिहुयणी ए जयजयकार सोहम देपीउ जंबुसामि । कंचण ए रयणिहिं दाण जिम घण वरसइ भादवए । सयतऊ ए ईह गोलोक भवियजणसंवेगकरो ।। ३७ ।। ठवणि-कसकेरी पिइ माइ पुत्र कलन धन्न धण । देसी कुडिसारिच्छ जिण जिम जंबू परिहरए । अनइ लोक बहुत व्रत लेवा तिहिं चालीउ वंदिय जिणभवणाई सोहम्मसामिपासि गयउ ॥ ३८ ॥ भवसायर ऊतारि जम्मण मरणह वीह तउ ओ। पंचमहव्ययभार मेरुसमाणउ अंगमइ ए। अनु तेतउ परियार सोहमसामिहिं दिकीउ ओ। हां केवलनाण संजमराज ह पालतांग ॥ ३९ ॥ वीरजिणिदह तीथि केवलि हउ पाछिलउ । प्रभवउ यइसारीउ पाटि सिद्धिं पहुतु जंयुस्वामि । जंवूमामिचरित पदई गुण जे संभलई । सिडिसुरु अणंत ते नर लीलाहिं पामिसिई ॥ ४० ॥ महिंदमरिगुस्सीस धम्म भणइ हो धामीऊ ह । चिंता रातिदिवसि जे सिद्धिहि ऊमाहीया है । वारहयरमसपाहिं कवितु नीपनूं छासठए। सोलद विग्नावि दृरिय पणासउ सयलमंघ ॥ ४ ॥ इति श्रीमंबूस्वामिरासः॥

सापिराभु
४७
सप्तक्षेत्रिरामु
सवि अरिहंत नमेयी सिद्ध सूरि उपझाय ।
पनरकर्मभूमिसाहू तीह पणमिय पाय ॥ १ ॥
जिणसासगहमाहि जो सारो चउदह पूरवतगउ समुधारो।
समरिउ पंचपरमिष्टि नवकारी सप्तक्षेत्रि हिव कहउ विचारो॥२॥
धुन धुनु ते जि संसारे जीहं जिणवरु स्वामी ।
गुरू सुसाहु जिणभणि धम्मु सुग्गड़गामी ॥ ३॥
वारि अंगि दुलहु मणुजम्मु अनी अ विशेपिहि जिणयरधम्मु ।
सम्मत रयणु चिति नियसइ जीह सोहग ऊपरि मंजरि तीह ॥४॥
पुणु जिणसासणु दुलह जीव संभलि कथनु निरुपम ।
नाणुपहाणु एक जि जिनवरधम्मु ॥५॥
भरहखित्ति खट्पंडह घित्ति केवलनाणि जिणवर जपंति।
चेताव्यपरहां मिनि खंड होइ तहि धरमनामु निवरतन तोइ ॥६॥
उल्या निहु ग्वंदि बित्ति केवलि इम आपइ ।
तोहमांहि दुनि पंटने पडिया पापद ॥ ७ ॥
मज्झिम पंड इकु वहनी मडिउ तेउ निहुभागि पाछह पडिउं।
घउघउ भाग घरमनइ लागे तेउ जाईजह सयमइ भागे ॥ ८ ॥
ते अ नवाणयह भाग साह मिय्यातिहि जदिउं ।
धाकत कुमतिकृयोधिकगुरुग्गहि पहिउं ॥९॥
थोडा जीव घेई दीसते जे लिणभणिों मनिहि करंति ।
हिव तिहुयणिहि सारु समिकत्तु पामिउ जीवि जिनपिउ नयतत्तु ॥१०॥
बार घरत तई पामिउ जे जिणवरि युत्ता।
सुगइनिबंधण सत्ता जीव मुगति दीयंता ॥ ११ ॥
प्राणानिपातवतु पहिला होई वीजउ सत्यवचनु जीव जोई।
नीजह ब्रति परधनपरिहारी चउधइ शीलतगड सचारी ॥ १२॥
परिग्रहतण प्रमाणु क्तु पानमद कीजइ ।
इणपरि भवह समुद्दो जीव निश्चय तरीजद ॥ १३ ॥
छाई बनु दिसितणउ प्रमाणु भौगुलभोगव्रत सातमह जाणु ।
अनरभवतु दंड आठम होइ.नवमरं व्रत सामायकु तोह ॥ १४ ॥

। प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः देसावगासी दसमुं ब्रतु नधी मूल । पोपधनतु इग्यारमउ संजमसमतूल ॥ १५ ॥ वतु वारमउं अतिधिसंविभागुउ तोइ मुकतिनयर न न मागो। जे ईणड मारगि चालइ संसार धनु सक्रियारय ते नरनार ॥ १३ ॥ समक्तिमूल बतु वारइ गहियघरमि पालेवउ । सप्तक्षेत्रि जिनभणिया तिह वित्तु पायेवउ ॥ १७॥ मतक्षेधि जिन कहिया महामुनि वितु यावेजिउ वियहपरे । जिनवचनु भाराधीउ भयक्रम साधिउ लहद पारु संसारुसरे ॥ १८ ॥ सप्तक्षेनि जिनसासणिहि सबली कहीजई । अधिक रिधि धनु दन्यु धीजउ तहि जि वायीजह । नहि नि यात्रणा धानकि लाभद देवलोको । कमनी पाहरू मुक्तिकलो पामउ निसंदेहो ॥ १०॥ पहिला क्षेत्र सुनिणद भुवण करावर पंग । जाउ महिमा करइ सहु श्रीगविहसंचू । मुलगभारग्रामंपुगीसहिउ । भाग र रंगमंजो पुस्तक कहिउ ॥ २० ॥ तार पलामणुकीवर भावरत। Form frAIना नालिमाहि दीगह नीकर । ritiirg मांग गांड भनिनाकर । ५ins नाना माग पाम नदि नाम नति॥ fngili कतिदी। निगी माहितया वती। भलमा पुगेपनि EXTETमानाNTIENT | २२ ॥ नहरमा प्रतिक्षिण। FREET माना मगर नावारगरता मं..॥ 71 kit stofnum Emaite irrey -

समाधिरायु
कपणु रूप पीतरागतणु जोइ कपणु विशेषु ।
अठ प्रनिहारि ज जिणहतणइ पृक्ष होइ अशोक् ॥ २४ ॥
भामंडलुसुरकसुमपृष्टिसीहासणुगत्तू ।
मरिचमरदेवंडुणिहिण जोइ फवणु प्रभुत्त।
पशिति पमी वीतराग मेल्ही अपर न होई ।
सरादिक जिनसेव करई नचि सगलई जोई ॥ २५ ॥
तर जिनजीर्णज्डारु भपि जीव विशेपिहि करीयइ ।
भागउ लागउ जिगह भुवणि तेउ तोइ समुरिपह ।
तीपिउ धउलीउ भीगु देह चीत्रामु लिपीजइ।
इणपरि भुपणु समारोप जन्मह फल लीजह ॥ २६ ॥
अनीउ जु काहं किंपि ठामु जिणभुवण सीदाइ ।
तं निधि करावीयए बहुफल बोलाइ ।
आपणि सामिउ वीतरागु ईणपरि भणेइ।
जीर्णोद्धारहतणा पुण्य तेह अंत न होइ ॥ २७ ॥
वीजं से सुजिनह विवु ते इहां विचारो।
मणिमय रयण सुवर्णमए विंव रूपम कारो ।
हिव जिनभुवणह गृहचैत्यदेवरा छ कहीसह ।
कीजा कणयभिंगार फलस जे नीर भरीसह ॥२८॥
तर सीलमा करावीयइ जिनभवन ठवीजा।
पारह पीतलमड़ भलां मिहति पूजीजद ।
घरि देवालाई कराविप नीकाइ मणोहर ।
जीके तिटुयणसरण सामि पूजीजह जिणवर ॥ २९ ॥
सुगंधि नीरि मनाधु करइ जिण जोणि आणदिहि ।
ते संसारह कसमलह नदि छीपद बिंदिय ।
अंगलूहणे सूक्ष्म करउ मुफरां बहुमूलां।
नियनियसक्ति करावियइ कीजे देवंगतूलां ॥ ३० ॥
कीजद औरसु रूपडा सिरखंड घसेवा।
कारवटे पाटीइ काम जिनस्वीमुम्नि देवा।
मूंकह जिणभुपणिहि धोति अतिनीको धूपी।
पालाकुची पूंजणी पीगाणी पूंपी ॥३१॥

प्राचीनगूर्जरकाव्यसद्धहः
अतिसुगंधिहि सिरखंडिहि कपूरिहि आंगी।
कीजइ सामी वीतराग प्रभु नवनयभंगी ।
कस्तूरिहिं कुंकुमिहि तिल निलाडिहिं सामी।
ते
पुण वितपति
करइ भली अतिनीकइ धामी ॥ ३२॥
तउ आभरण चडावियइ सोत्रणमय घडिया।
हीरे माणिकि मोतीए बहुरयणे जडिया ।
अतिख्यड आभरणउ भलउं कीजइ संपूरउ ।
नीकडं सिहर पूठिउं हूतलि अनइ मसूरउ ॥ ३३ ॥
कानिहि कुंडल सिरि मुकुटु किरि ऊगिउ भाणूं।
जाणे तिहूयणि सयल लोक अभिनवउं विहाणूं ।
उरह माल कंठि सांकल मुक्तावलिहार ।
नयणि निहालिन वीतरागु ख्यडउ सुरसार ॥ ३४ ॥
बाहुजुयलि बेउ बहिरखा अतिनीका सोहई।
दोलू श्रीवत्सु साख्यार भवियण मणि मोहइ ।
सोनाकेरी पालठी कीजइ जिनपत्ते ।
सोहह योजउर स्यड सामीजिणहत्थे ॥ ३५ ॥
इणि विवेकिहि यहु य विशेपिहि जिणवरपूज सलरुणी य..
फरर मनरंगिहि नवनवभंगिहि श्रीसंघनयणसुहामणी य ॥३३॥
पती अ जोह आभरणतणी पूजा नीपन्नी ।
हिय भारंभिसु जिणह अंगि सुरहां कुसमन्नी ।
कीजा कुसमे चंगेरीया पूज कारणि रूपडी।
वायरी दीड देवकाजि अन्नइ छाजी छपडी ॥ ३७ ।।
रायचं कंती जाइ सेवनी परिमल ।
बलि सिरीवाला घेभलु अनु करणी पाइल |
नीलामी विधि पूनमाहि सोहइ भतिचंगी ।
विनानि दासद म्यद तिणि नवनयभंगी ॥ ३८ ॥
नांकर गया पूनमादि यरणकि सोहनी ।
परिमन्नु पमरद मुमजाति पाद बिहमनी ।
श्रृंद अना मुधुकंतु याल नई परिजाते।
एम कुमुनि करउ न तुम्हि निष्पणपते ॥ ३९॥

tilfaring सुरहर मरूपा बारगी अनद फरहार । सागह मोदर पीतराग मामी सुरसार । नीलधी नागलि पानमादि जा सोहह । इणपरि पूजा सामिमाल नरनारी धन ॥ ४० ॥ पहिरामणीघद पूज नोदनीकी सोहंती। तर नक्षत्रतमणी माल दीयाशुपंगी। मेटीपद माहि भुयण जिणविंचहकेरी । आणी कुसुमे पूनिया ने मपि संखेगी ॥ ४ ॥ ममामरणु जी पूजीया जो तिलिपयारूं । चिटु पग्नि दीमा पीतरागु जहि तिपणसारू । सउ पूजा नापी पूठि भूपउटजउ लीजद । पीजणिय ऊरोपितु गुरु नदि घंटी पाजद ॥ ४२ ॥ भूप अगुरु सानिपारेमि डावही जि कीजद । दंटालणे अतिरूयटे जिणभुषणु पुंजीजइ। आरोरिहिं मंजूस भनी अग्नय पकीपट । दादर आम्मे करउ भली य मंगलीक आठ य॥ ४३ ॥ परमाणु परकलमु अनइ भद्दासणु छन् । दप्पणु नंदापरतु नहि साथिउ श्रीवत्सू । अट मंगलीक तीण पाटि भरिगइ जिनआगई। इणपरि धन पी एन लेखइ लागइ ॥ ४४ ॥ दीया कीजद जिनमुवणि छननाउदीजह । चमर दलंते पीतराग तेहि धनु वेयीजद । ते उलांच कारापियइ जिणभुवणमझारे । याचाटा मरवर अ लंच फीसद जिनवारे ॥ ४५ ॥ तोरण यंदुरवाली वारि सापि जिणभुवणि । पूजा जोइ सहु कोइ आवइ तीणि विणि । पूजा जोइया जिणह भुयणि तोइ सुहगुम आवह । तर संघिहि आग्रह करीउ तीछे रहाविय ॥ ४६ ॥ पडपउ बेला एक प्रभु अहां उच्छयु होसिइ । संघवयणु मानयि मुगुम निसि सिखं पइसई ।

५२ प्राचीनगूर्जरकाम्पसहदः तिणि वेलां वइसणां पाटि जोइ पाटल्ला । चउकीवटि वासंति सुगुरु तउ भावइ भल्ला ॥४७॥ वइसइ सहइ श्रमणसंघ सावय गुणवंता। जोयइ उच्छयु जिनह भुवणि मनि हरप धरता। तीछे तालारस पडइ बहु भाट पढ़ता। अनइ लकुटारस जोइई खेला नाचंता ॥ ४८ ॥ सविहू सरीपा सिणगार सवि तेवड तेवडा। नाचइ धामीय रंभरे तउ भावइ रूडा। सुललित वाणी मधुरि सादि जिणगुण गायंता । तालमानु छंदगीत मेलु वाजिंत्र वाजंता ।। ४९ ॥ तिविला झालरि भेरु करडि कंसालांवाजई। पंचशब्द मंगलीकहेतु जिणभुवणई छाजइ । पंचशब्द वाजंति भाटु अंवर बहिरंती। इणपरि उच्छयु जिणभुवणि श्रीसंघु करंतउ ॥ ५० ॥ तउ आरत्ती परगुण की आरती पदऊपरि । ऊठिउ संघपति विधिहि सहिउ तउ साहीउ विहुकरि । नीर लण ऊतारियए कुसुम ऊतारी। संघपति ऊठी सेसि भरई सइहत्यिहि माडी । संघपति आरती ल्लिया हुइ जउ वार घडेरी । आरती जोगी भाभली अआणउ गरी ॥५१॥ पाण्इ जिणगुण गाद पदइ सह पालउ लोक । श्रीसं ती अ दान दियई जीह जेसा जोगू। उतारीइ आरतीभ तोइ संघपति सइ हरग्विउ । रोमांचीसारीक तहि जिणदंसणु देखीउ ॥५२॥ मंगलीक नारीपण घंट याजइ सरूई । श्रीसंघु करह प्रभावना जिणसामणि गाई। तर विधि वांदियउ वीतराग श्रीसंघु उतारीउ । परि सुकृतभंडार तोद भगजीविहि भरिपउ ॥ ५३॥ जे जिन भुवणतणां गृत्य इह डर कहिगा। ने गहनेम्य कराविपद मविदोपिदि सादिया।

सप्तक्षेत्रिरासु
५३
अनि अज काई कोर ठामु म हई चीसरियर्ड।
तेउ तुम्हि भविय करावि जि अ सहइ सांभरियां ॥५४॥
उध्धुं जिनभुरपणि हरपि नियमणि करइ संधु जयतु ।
नितु हिव त्रीजउ क्षेत्र कहिसु पवित्तू सुणउ जीप जे जिणभणितृ॥५५॥
श्रीजर क्षेत्र सु संभलउ ए परलोयणे जे भणिउं चीयराइ ।
गुणगंभीर सो जिणह वयणु मृगलोयणे तसु नवि ऊपम काइ ।।१६।।
पचन इकेका मूल नही यरलोयणे जे बोला भगवंतु ।
निहु भुषणे घडामणिय मृगलोयणे सह जाणइ अरिहंतु ॥२७॥
पद कवण व्याप जिनवचनतणउ पर० युज्झइ लोक अलोक।
सड जि सित जसलहीअप मृग० देअइ सिद्धिसंजोगु॥२८॥
गणधर करद पुष्यघर घर० सुयकेवलिहि करंतु।
दसपूरवधर जं करइ मृग० भणियउ यह सिकिंतु ॥ ५९॥
बिटु भुषणहतणउ जाणियह पर० आगममाहि विचार ।
चउदपुरव इन्यार अंग मृग० करद गोतमु सुतिहास ॥१०॥
सूत्रहार तहि निउछणा ए पर जिणि जाणि उसन।
विपदी आपी य पोरनाधिइ मृग आप गोतम यूतु ॥६॥
फेवलमाण पुच्छिति गयउँ पर० गया सपि परवधर ।
जे हुंता गुरु प्रज्ञघणउं मृग० गया सुते मुनियरा ॥ १२ ॥
अल्पमज्ञह नपि धाहरण पर० जिणपणुं निरूपम्।
तीण फारणि श्रीसंघ मिलीय मृग० पोधे ठवीउ आगमु ॥ ६ ॥
भक्षाभक्ष सो युजिहपए पर अल्लो गम्मागंमु ।
कृत्याकृत्य परीछियर मृग० जाणीया धर्माधर्म ॥१४॥
धन जीपी लाहउ लिए पर० युझिपद पर विचार ।
श्रीसिहंतु लियाविषण मृग० जोर ग्रिभुपणह साफ ।। ६५ ।।
प्रोजउ क्षेत्र इस पापीया पर चित्ति संवेगु घरेउ ।
घेवीउ वित्त लिग्वाचिया मृगः श्रीसिद्धान्त जप ॥ १६ ॥
याहुदंड पोधा फराए पर० पोधीप नीकी य तोह।
ज्ञानलगइ सवि लाभ हुइ मृग पह विचार तूं जोह ॥ ६ ॥
पाठा दारी पीटणां पर पर सिखांतह भत्ति।
पानीदौरा स्तरीय मृगटोपणे पोपीय पोधीप सति ॥ ६८ ॥

५४ प्राचीनगरकाव्यसमा जीजउ क्षेत्रु इम वायउ निमाम लियउ लामु टुंतातपाउ । जिम अट्टकम्म गंजीउ भवढह भंजीर सिन्डिनयरि सेमिइ मुगः ॥२- हिव श्रीश्रमणसंधभत्ति करउ जीव तुम्हि यथासक्ति। पहिला कीजइ तोइ पावयणा अनी य विशेपिहि आयरियठपणा इणपरि श्रमणुक्षेनु वावीजइ निश्चय भवसायम तरीजह । जे जिनवरि मुनि कहिया आगमि क्रियासार अनइ खरतर संजमि॥३॥ पंचमहव्ययभाम धरंता दस अनु च्यारि उपगरण बहता। नव कल्पिइ विहार करता ते मुनि भणियइ चारित्तवंता ॥७२॥ जे मुनि पंच समिति छह समिता त्रिहि गुप्तिहि जे अछइ गुपिता। सीलंग सहसअढार वहता ते मुनि भणियह उपसमवंता ।। ७३ ॥ जे मुनि निम्मल निरहंकार सदाचार दीसइ सुवियार । जे धुरि जूता गणगच्छभारा ते मुनि भणिया गुणह भंडारा ।। ७४ ॥ ईणपरि भल्ला क्षेत्र विशेपि दियउ दान तुम्हि भवि हरति । जिम तु छूटउ भवना भार पामउ सिवसुखु निम्पमसाम ॥ ७ ॥ जे जिनआण सदा छह रत्त वावीस परीसह सहइ अपमत्त । जिनआदेसु धरह सिरिऊपरि ते जि महामुनि नमीयइ सुरवरि ॥७३॥ वईतालीसदोपसुविसुद्धउ लियइ आहार जे जिणवरि दिउ । इंदियविषयव्यापिनवि गूचइ तवि नीमि संजमि खण विनमूचइ ॥७॥ किसुं घणउं हां कहउ विचारो मुनिरयणगुण न लहडं पारो। अनुव्रतु चालइ जे जिनआण ते मुनि भणीयइ मेरुसमाण ॥ ७८ ॥ प्रसंसीइ मुनि जिहि गुणि सहिया ते गुण जिणवरि श्रमणी कहिया। एक विशेष पुण श्रमणी दीसइ वहइ उपगरण तोइ पंचवीसह ।। ७९ ॥ चालइ खड्गधार तोइ ऊपरि सीलवंत ति नमीइं सुरवरि । महासती जे छह अपमत्त धारा भणइ हूं तेहि पवित्त ।। ८० ॥ जीह जिनआण हियइ परिणमी ते श्रमणी तोइ मेरह समी। जे सिद्धी जिणआण करती धनु धनु श्रमणी ते महासती ॥ ८ ॥ जिणसासणु जेहि य इम उन्नालिउ कसिमल पायपंकु पखालिउ । पर साह अनइ श्रमणी वित्त याचिन धामी हुईउ सवित्त ॥ ८२॥ जा हिवडांतूं संपति अच्छद इसीय वराप न पामिसि पछइ । जउ भलसेमिहि वित्त नयाविसिपाछपरभवि किसउ लुणाविसि।।३।।

Srilan परापरलोमिनुपाघिमि मार गिनियमानुसाइ फनवार । गाभारनियराम पामिना गुण अणनगुणं पाविसि 11८४|| प्रभारी शिनयरि कहिया पार पम्मी भाषणसहिगा । मा मांग भनुमोदनापाणी जिम मममी गगनिम्याणी ।। ८५॥ परि पाजद मुनि दाजा भक्त पानु मर्शत । विवादानुं जउ दीन माम जिणु भणइ तर पुन्य नहीं पाम ।। ८६ ॥ भरमादि मह यातनं दोनई नियरिहंलउँ । भनिउमाई मुनि उपगरदनं गत पहर करद ॥८॥ मुनि जाना न दीजई नियधमनाई। गुरु भाषंना फागद अभिगमण दाजद भक्ति भाभपंदनः ।।८८॥ पिना पंगापपु भनीउ विज्ञापित कीजद भीउ महामुनि देगी। पर्युपास्लिमहीकाजद पीय जिम जिम जिनपरि आगमि भणीया८९॥ एद र परिश्रमी जाणेयी कर भक्ति तुम्हि हरिब घरवी । जे यस महामुनि दीनहतं संभ्रमणी कीजर ॥ ९ ॥ आगराइ मूर्षिहि सुणीजह धनु धनु सारधवाह फहीजड़। पर विहिरावित जिणि मुणिदउ तिणि फलि हयउ पढम जिणंदू ॥१२॥ हधिणारि नपरि ग्रंपमिहि पारापित रिपुभु इक्षुरसिहिं । मिणि फलि तिण भपिपलुशानु दिइन भविषमुनि इणपरि दान।।१२।। पीर जिणेसर मष्टा मास अंदण पारावा फोमास । ताणि दानि शिय संपति पाभी दियउ दान तुम्हि अनुवत धामो ॥१३॥ जोइन संगमि की मुनि पारावीउ खंड खीम पीउ। तिणि फलितु सर्वार्थसिद्धि पामी पाण्इ होसिह सिवसुहगामी ॥९४ ।। एउ भएर रोतू पारउ वितू अतिफलीभइ संवेगचित्तू। सिपमुह संपत्ती देइन भत्ति सामिसालु आगमि भणित्ति ॥ १५ ॥ हिय नाइ नायकतण क्षेतु भी कहीसह । जउ जिणसासणतणी भूमि अतिभल फलीसिह । फिसर सुश्रापक जाणिवउ जिणसासणभिंतरि। श्रीपतरागतणी प आण मानह सिरपरि ॥ ९६ ।। समकिनमूल बार परत पाल नरनारि । निषसह हियहा पीतरागु एक जि सुरसार ।

। प्राचीनगरमाध्यमरः कामदेव जिम चलइ नहीं वीतरागह धर्म वीरनाहु जिणवरु दियह तसुनी अपम्म ॥१७॥ सदाचाम सुविचार कुसलु अनइ निरहंकाम । शीलवंत निकलंक अनइ दीनगणआधार । जिनह पनि तिम सातधातु जीह श्रावक भेदी । जाणे तीह गर्भवासवेलि मूलटुंति छेदी ॥ १८ ॥ जाणइ चितु सहू काय साचउ विवहार । विधा सुद्धि मनमाहि यसई इकु निश्वउ सारू । उत्सर्ग अनइ अपवाद एह जाणइ सविसे । भणियइ आवकतणी भावीय मूलिइ सा जीह पहु विवेक ॥९॥ जे पुण श्रावकतणा भविय कहीयइ जिणसासणि । ते गुणु जिण भणइ श्रावियह जाणेवा नियमा॥ १०० ॥ विधा सुद्धि वीतराग यसइ मनभीतरि जीह । सुलहउ सिवपुरतणउ वासु तो श्रावक तीह । पढइ गुणइ जिणवयणु सुणइ संवेगि संपूरिय । सील सनाहि पहिरिइ क्रमऊपरि सूरी ॥ १०१ ॥ इहं तु श्रावकतणउ क्षेत्रु वायु सवि दीस । जे तुम्हि भवियउ अच्छद काइ धर्मतणी जगीस । जिम भरयेसरि वावी रिसहेसरनंदणि । गृहवासपरि ज्ञानु जासु पसरीउ तिहुयणि ॥ १०२ ।। तिम तुम्हि वावेउ भलीपरि भविउ इउ वित्तु । लहिसउ फल निरवाणनयरि तिम तिहां बवतु । पहिलं कीजइ महाविनउं गुणश्रावक जाणी। पाय पपालीय सहहायि लेउ कुंकुम वाणी ॥ १०३ ॥ पाछद भोजनुं भलीयभक्ति सविवेकिहि सहियउ । दीजइ श्रावकाविकां एउ आगमि कहिउ । ऊपरि गटि फल पान कापड अनुमानिय । दीजह निजभक्ति भलां गरूयइ बहुमानि ॥ १०४ ।। भरयेसर जिम प्रायकह दीजह आवासे । सीणा जे जिनवयणि अछह घणगुणह निवास ।

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प्राचीन इंह सात क्षेत्र इम बोलीगा भागमभणुमारे । गुण तुम्हे याचीयं भटीयपरि वित्त आपरं ॥ १३ ॥ न्यायनीति वितु लिई ती पानकि पारे। जिणसासणि येचीनु 'कलि कमल सु पारे । संघसमुदाद सह कोई तीरथ चंदा । देवजार गुमजाव करीइ तर भलज भणा ।। ११४॥ इम पितु सु वेवउ धम्म मु संग अणं जीव मयंचमुर । चली न लहिसउ प्रस्तावु पसउ करउ सालु भव मागस3॥ ११९ सातक्षेप इम बोलिया पुण एक कहामिद । कर जोडी श्रीसंघपासि अविणउ मार्गासह । कोईउ ऊगं आग बोलिडं उत्स्ट। ते वोल्या मिच्छा दुकडं श्रीसंघविदीतुं ॥ ११ ॥ मूं मूरप तोइ ए कृण मात्र पुण सुगुरुपसाऊ । अनइ ज त्रिभुवनसामि वसइ हियडइ जगनाही। तीणि प्रमाणिइ सातक्षेत्र इम कीघऊ रासो। श्रीसंघ दुरियह अपहरउ सामी जिणपासो ॥ ११७ ॥ संवत तेरसत्तावीसए माहमसवाडइ । गुरुवारि आची घ दसमि पहिलइ पग्ववाडइ। तहि पूरु हा रासु सिव सुख निहाणूं। जिण चउवीसइ भवीयणह करिसिह कल्याणूं ॥ ११८॥ जां सिसि रवि गयणंगणिहि गइ महिमंडलि । ता परतउ एउ रासु भविय जिणसासणि । निम्मल ज ग्रह नक्षत्र तारिका व्यापई । गयवंतु श्रीसंघ अनद जिणसासणु ॥ ११९ ।। इति सप्तक्षेत्ररासः समासः। .

कट्टलीरासः जिम दुरीउविहंडणु गलनिवारणु निहपणमंडणू पणमपि सामील पासजिणु। परिहिं पंसा बोजीमाहर निसु रासो धमीय रोलु नियारीउ । म महीपति जाउं अठारमा देसु पपाणई गोउलि धनि रमाउलउ॥ नम परमार राजु करई नहिरो सपिवार आगिरिवरु तहि पपरो। ही आदिजिणंदी अगलेसर सिरिमासिरि चंदो तमु तलि नयरीय वन्नीयए। re फम्मणमूली कहली किरि लंफविसाली सरमववावि मणोहरी य॥ नम्हि नयरी य नम्हि नयरी य यसई यह लोय । चिंतामणि जिम दुधीयहं दीइं दानु सविवेय हरिसि य । सपई मीति वयदरई कूटकपटु नचि ते य जाणई । गली जलु बाढी पीइ धम्मकम्मि अणुरत्त । पकाजीह किम पानीइ काली सु पपित्त ।। सड जिसु कविलासो गुरुमंडपु पुतलीयविणासो पासभूयणु रलीयामण। मणि आणंदु आणइ जसड्ढनंदणु तं परिमाणइ सतरि भेदि संजमु परिपाल। रिपहरि गुण गाता गगनर उपचास करइ वीजा दिण आंबिल पारे। देसण आवह रयणिहिं ब्रासंति गुरु वंदीद कविलकोटि श्रीय- सरि विहरंतई। रेयां तुरंतइंसह भर आयीय पंचसपाई समिति नंदई यह य पहा आहडनंदणु बहु गुणवंतः दीग्ब सीइ संसारविरत्तर। सापणछंदपरमाणपरिरूणु आगमधम्मवियारवियरुणु । उनीसी गुरगुणि जुत्ता जाणीउ नियपदि ठविउ निस्ता।

उदयमारिमंघिहिसहीउ नियसदए नियसइ पनिवसइ परहरि पीठि। H पणा अहसर परे। प्राचीनगूर्जरकाव्यसवादः माणिकपलुसूरि नाम् श्रीयसरिमतीचीउ कालीपुरि पाती भूषा सावयलोय करई तसु भत्ती नवनवधम्ममहसवजुत्ती। श्रीयसूरि आरासणिअठाही अणसणविहि पहतउ सुरनादी। निवीय आंबिलि सोसीय नियकाया माणिकपहरि ५१३५ विणठदेह जस धवलह राणी पायपखालणि हुई य पहाणी । माणिकसरि जे कीघ जिणघम्मपभावण इकमुहि ते किम वन्नड कालु आसन्नु जाणेवि माणिकसूरि नयरिकछुलि जाएवि गुणमणिगिरि । सेठि वासलसुर वादिगयकेसरी विरससंसारसरिनाहतारणतरी। संधु मेलवि सिरिपासजिणमंदिरे वेगि नियपाटि गुम ठविड उदयसिंहमूरि कोउ नामि नाचती ए नारिगण गच्छभा सयल समपीजर। सूम जिम भयियकमलाई विहसंतओनयरि चढावली नाव संपत्तओ. वन्न चत्तारि घरवाणि जोरंजए राउलो धंघलोदेउ मणि चमका । कोह कम्माली पायादो गयणि खापरियाई भणइ हउँ वादीभी। पंडिते वंभणे तापसे हारियं राउलोधंधलोदेविहिं चिंतियं । यादिहि जीतउं नयरो नवि कोउ हरावह उदयसूरि जइहोए अम्हमाणु रहाइ । यस्त-जित्त नयरि य जित्त नयरि य सयलमुणिसीह । नीरंतई नीम पडो गरूयदंडवक करंतई । धनु राउलु विनयह सामिसाल पइ मझि संतई। संभण तपसीय पंडीया जंतन बंधई बाल । मु गुरु कम्मालिउ निवणीउ अम्ह अप्पर वरमाल । धंधलजिणदरि सयि मिलिय राणालोय असेस । मसिपमाणी हरायोउ मंनिहिं मंत्रिमंनिहिं पादुकमठी ॥ सेर्यवर तरं हिय रदिजे जे गुरु सिद्धिहि चंडो। विसहरु आयतु परिपलि ने लंपीडालंपीडालंपाउं दंड पपंडो॥ तर गरि मुदंतां मिल्किरि दाई गर पणेण । घाई लीपर गुपई गिली मिलीगलीउ पालभुरंगो।। पारिद्धिवि समुदाय दरहरंतु धीर यायो। जोनहार मरि पलभलीय होया महापापडइ पीर दागे !

सालिभरकम ६१ तर गुरि मूकीउ रयहरणु कीधर सीहु करालो। वाघह जंता दुरि धीउ हरिसीउ ए हरिसीउ ए हरिसीउ नपरु सबालो। इत्यंतरि मुणि गयणठिय तसु सिरि पाडीय ठीव । हुउ कमालीउ कालमुहो लोकिहिं प लोकिहिं प लोकिहिं पाईय च ।। छंडीउमाणु कयालघरो घाईउ चंदर पाय । खमिखमि सामि पसाउ करी जीतउं पजीतउंग जीतउतई मुणिराय।। वस्त-ताच संधीउ तार संधीउ ठीव मंतण। गणहरि करि कम्मालीयह भिग्वभरीउ अप्पीउ मुद्दत्तिण। रामिहिं जिम पायसह इछ निजुत्त सु हरीउ सत्तीण। धारावरसि कयंतसमिभिंडीउ डिंभीउ ताम । प्रतपउ कोडि परीस जिनउदयमूरिरवि जाम ॥ चहापलिहिं विहरीउ प्रभु पहुतउ मेवाडि । पासु नमसीउ नागदहे समोसरीउ आहाहि ॥ जाल फुदालिय नीसरणी दीया पारउ पेटि । वादीय टोडम पद धरए पहुत्तउ पमणउ पेटि । केवलिभुकति न जिणु भणए मारिहि सिद्धि सजाणि । उदयसूरि पमणउ पलीउ जयत ल रापअधाणि ॥ केवलिभुकति म भ्रंति करे नारि जति भुय सिद्धि । तिसमयसिडा पन्नि जीय लीई आहाम चिमुर। पीच पीर दीटंतु दीउ जितु नंदिमुणिपि । गयकुंभधलि आमहीय पदमसिम मयि ॥ चियरणु पिंडपिसुद्धि फीउ धमविहिग्रं प्रसिद्ध। धीयचंदणदीवीय रचीय गणहम भूणि प्रसिडु॥ अम्हहं साजणसेटे एम्मासहं कालो। पसतिणि अपरि ऊपन पदि टापिजि पालो ।। तेरपुरोत्तापरिसे अप साई। चहापलि दिपिहो जगि लीह लिहायी। फरली जाएपि परमफल सुगाभारधरी । पंचम परिस पहंति सजणनंद दीबीउ । देयाएस रवि गाठीप सत्तमे परिस सहो ।

६२
प्राचीनगूर्जरकाव्यसवह
चउदीसि मेलीउ संघु आरीठवण विविहपरे ।
गोतमसामिहिं मंत्रु आपानीजइ दिणी दीइए।
जोगवहाणु बहेचि अंग इग्यारह सो पढए ।
त संजमि रणि जीतु सयरह चुकर पंचसरो॥
गूजरघर मेवाडि मालव ऊजेणी वह य ।
सावय कीप उचयार संघपभावण तहि घणी य॥
सावीसह आपाहि लखमण मयधरसाहुसूओ।
छयणीनयरमझारि आरिठयण भीमि किओ ।।
कमलमूरि नियपाटि सई हथि प्रज्ञासुरि ठवीओ।
पमीउ पमावीउ जीयु अणसणि अप्पा सूधु कीओ।
पणि पहुत्तउ सुरलोइ गणहरू गंगाजलविमलो।
तासु सीसु चिरकाल प्रतपउ प्रज्ञातिलकसूरं ॥
जिणसासणिनहचंदु सुहगुरु भयीयहं कलपतरो।
ता जगे जयवंत उम्हाउ जांजगि गइ सहसकरो।
तेरनिसद रास्तु कारिंदापहि निम्मिउ ।
जिणहरि दितसुणंतं मणपंछिय सवि पूरयउ॥
फालीराम: समा
सालिमकक
भलि भंग कम्मारिवल वीरना पणमेचि ।
पामु मगर कमरिण मालिभगुण केर ॥ १ ॥
रल्प यच्च न्यायनपण मालिभा सुकमाल।
भरा पसगर देव तु कर विज इशिगवार ॥२॥
सरमामयनारनिदिममयमरणि टिउमामि ।
भानु माइ मांदिया धारनाह सियगामि ॥ ३ ॥
कामा पुल कदि का सक्रिय धारि।
व भावमाणिहर कंगणगोममरीरि ॥४॥
भारमनुर आमा माइ अति समा
मंजमाना किमान REAL पार॥५॥

सारिभरसक
६३
गयममत्त वीरियपवर जे जगि पुरिसपहाण ।
सालिभद्द भद्दा भणइ संजमु सोहइ ताण ॥६॥
गारवयाविउ विनवउं काइउ मग्ग माइ।
जह मोकलउ तउ व्रतु लियउं तुम्हह पाय पसाई ॥७॥
घणकुंकुमचंदणरसिण तुह तणु वासिउ यच्छ।
घयह परीसह किम सहिसि मुणि गंगाजलसच्छ ॥८॥
घाणइ पीलिय पंचसई खंदगसरिहि सीस!
साहु माइ दुस्सहु सहई परिस धम्म जिगीस ॥९॥
मवि वउ लिबइ तरुणपणि सालिभद्द सुकुमाल ।
महु कुलमंडण कुलतिलप कुलपईच कुलवाल ॥ १०॥
नाउंगविहिं फुलतणइं पापिनइ भवछेउ ।
माइ मरीचि भव भमिउ पडमाणजिणुदेड ॥ ११ ॥
चरणु लेसिजद पुत्त तुहु नंदण नीयपपीण ।
रोअंती भद्दा भणई मई किम मेल्हिसि दीण ॥ १२ ॥
चारुचपिचलदेव तह वासुदेव वलयंत ।
माइ तडि द्विय परियणह कट्टिा लेइ करंतु ॥ १३ ॥
छण मइलंछणसमवयण तुह भन्ना बत्तीस ।
ते विलयंती पेमभरि किम करिसि फुलईस ॥ १४ ॥
छारु म उ सयलु अंतेउन घरसाम ।
माइ जीयु जउ संचरह छंडेरिणु दंढार ।। १५ ।।
जणणि भणइ जां यालपणु तां पुत्तह पडिवंधु ।
तामह बुल्लाविभउ बहु उन्नाडइ कंधु ॥ १६ ॥
जाणि देह असारवलु भरहिं मूकर मोह।
ताव माइ तसु विहिडिपउं केवलनाण निराहु ॥ १७ ॥
झलकतर कंरणपडिउ सत्तामिपासाउ।
चिहवह कोडाकोहि पण कहि कोई अगर टाउ १८॥
झाणानलि जिणि कम्मयणु यालिउ गहि नाणु ।
पोरनाह महु हिय सरणि रिखि रमणि अपमाणु ॥ १९ ॥
नरया सेणिउ तुम्ह पाहु सुरगोभ सुताउ ।
नित्तु नपलं आभरणु कहि को पित्ति पिसाउ ॥२०॥

प्राचीनगुर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
नाइकु सेणिउ तुम्ह महु जइ किरि कहिदउ माइ ।
ता धणु कंचणु गेहवल खण विन चित्ति सुहाइः॥ २१ ॥
टलटलेसि धम्मत्य पुण धम्मगहिल्ला बाल ।
धम्म करेवा महु समउ तुहु धणुरकण बाल ॥२२॥
टालिसि चरण म माइ मई देइ महावयसिक ।
वडमाणजिणवरकिरिहिं पुन्निहिं लन्भइ दिस्त ॥ २३॥
ठणकइ पुत्त सु चित्ति महु पुत्तविहूणिय नारि ।
विहवह मुच्चइ दुहु सहइ दीणी परघरवारि ॥ २४ ॥
ठामि ठामि जिउ हिंडिइउ भव चउरासीलक।
माइ जि सहिया नरयदुहु ताह कु जाणइ संख ॥ २५॥
डरपिसि सुणियइ सीहसरि निसुणिसि सिवफिकार ।
भुस्किइंउ तिसिइउ वच्छ तुह किम हिंडिसि नरसार ॥ २६ ॥
डालिहि चडियउ डालिसउ माइ म हल्लावेउ ।
पच्छह कहि हउँ चरणु कहि वडमाणुजिणदेउ ॥ २७ ॥
दलई चमर वर पुत्त तुहु सीसि धरिजइ छत्तु ।
मणिसीहासणि बइठण किणि कारणि यइचित्तु ॥ २८ ॥
दाउ पिलग्गउ माइ महु सिवपुरि रबहरेसि ।
योलायउ ठिउ वीरजिणु रहिसु न भवह किलेसि ॥ २९॥
नप अंतेउम नव घर नवजायणु नवरंगु ।
मालिभा नयकणयतणु दल करि चरणपसंगु ॥ ३० ॥
नाणु रमायणु करिसु हां फम्मिघणदाहेण ।
निणि आरिमु माइ तणु जरा न दुपार जेण ॥ ३१ ॥
नम्भरतलि आवासु मुणि भिराट भापणु पाणु ।
गमंडलि आमगु मपणु यच्छ चरणु दहठाणु ॥ ३२ ॥
नाला भंजिषि पदमरद माइ गेहि जमराउ ।
शुधवान्दु न युटु जणु पद भनिनिउ घाउ ॥ ३३ ॥
था इंगर पाहण मरण कमर कंट तुसार ।
पायनिय गरि महित हिलिसि केम कमार ॥ ३४ ॥
भाइररहिन मा मगु माद कहि सा मम्म् ।
बारना शिशु क्यहरत लेगु गाणु धणु धम् ॥ १५ ॥

सालिभरकम
दहविह धम्मु फरेसि किम किम सोसिसि निप अंगु।
पच्छ तहं ता दोहिल होसिइ तुह सोलंगु ॥ ३६॥
दाणसीलतवभावणह अणु न सोसिउ जेहिं ।
माह मणूभवु दुलहा आलिहि हारिउ तेहिं ।। ३७॥
धम्म किदउ जिम रिसहजिणि तिम किन्नइ सुअ इत्यु।
पहिल साखिहिं पसरिउ अंति पयासिउ तित्यु ॥३८॥
धाडउ जमरायतणउ पडइ अचिंतिउ माइ।
कहिउ लिबइ जीयु तिणि धुंब न पाहर काई ॥ ३९ ॥
नयकप्तरिहि पूरिया नंदण कोमल केस।
केतगिवालई वासिया किम उहरिसि असेस ॥ ४०॥
नारायणबंध निसुणि तहिं दिणि दिकिउ बालु।
सीसु अम्गि दुस्सह सहइ माइ सु गयसुकुमाल ॥ ४ ॥
पE सुअ तई पहरियां रसिय दिव्य अहाम।
सुअ उच्यासिहि सोसिया केम करेसि विहार ।। ४२॥
पालिसु पंच महब्बई वारस अंग पढेमुं।
वीरनाहिसं माइ हउं नवकप्पिहि विहरेसु ॥ ४३ ॥
फणिरायह सिरि पुत्त मणि मुल्हेण य बहुमुल्लु ।
सा गिण्हता पाणहर संजमभरु तस तुल्ल ।। ४४॥
फाटिनइ करवत्तु सिरि पाइनइ कधीक ।
माह दुरकु नारय सुणिउ महु उद्धसइ सरीरु ॥ ४५ ॥
वत्तीसहं पलंकि त सपणु फरह नितु जाइ ।
दूंगरि कासुगि करिसि किम वलि किन तह काय ॥ ४६॥
वार मास कासग्गि रहिउ वाहवलि मुणिराउ ।
नाणह कारणि तिणि सहिउ सीअ लूझ जलु पाउ ॥४७॥
भमिसि विहारिहिं भारिअओ नंदण तुं सुकुमाल ।
घोर जिणंदह चरणु पुणु मुणि वापन्न फालु ॥४८॥
भारु माइ भुस्किय यह रासयसहपमुररु ।
आरंकुसकसि ताडियई ताई फु जाणइ दुरु ।। ४९ ॥
मपलंगण जिम तारपई सयलई फिल भत्ताम।
तं वत्सीसहं बहुअरहं पसु देव आधार ॥५०॥

এখানসামা
माइ महामुणि वीमनिणु कुलगुरु मह संताणि।
तसु मई अर्ण अणि जिम मुटु होइ नियाणि ॥२१॥
यह त संजमु लेसि सुभ मेलिहरि सपन्दु मिणेहु ।
ता गोभदु अभागिदार हा विगु छाउ गेह ॥ १२ ॥
याइवनाइगु नेमिजिणु गुणसोहरगनियासु।
भाइ सिद्धिपणि गयउ मेल्हविणु गिहबासु ॥ २३ ॥
रहि रहि नंदण वयणु सुणि मा मा मई संनायि।
तुह विणु नितु कुण पूरिसह मुकाहरणह वापि ॥ १४ ॥
राहडि पूरिय माह तई महुकरी सविचार ।
दिस्त दियावह जिणभणिय जा तियलीभह सार ।। ५९ ॥
लहकइंस संजमु लिया, नंदसेणु मुणिराउ ।
सो संजमुप्पव्यहपडिउ सुअ भोगह कम्मपसाय ॥ १६ ॥
लाहई विणिजु करेसु हउँ छैहउ माइ चएस।
इंणि असारि देहडि य संजमु सारु गहेमु ।। २७ ।।
वच्छ ति नारी दुस्तनिहि जाहं न कंतु न पुत्तु ।
महुत्तई नंदण जाइयई हिंव आविडं निरुत्तु ॥२८॥
वार स माइ सटरकणीय तं मुहत्तु सुपवित्तु ।
घाति बंधव जणइजण चरणु लेइनइ पुत्त ।। ५९ ।।
सहसाकारिहिं गहियवर सुमइ कंडरिएण ।
नंदण तेण ये भरगुह् पामिय भट्टवरण ॥ ६ ॥
सार साउं मिलिए मुह माइ कहिउ तर सम्म ।
वीरनाहु किउ ववदमोलेसु चरणु घणु रम्मु ॥ ३१ ॥
पलर गणोरह पूजिसइं सत्रण होसिइ सोसु ।
नंदण वाइसि समणु एउमहु कम्महं दोसु।। ६२ ॥
पाससासवेयणपमुहवाहि माइतिणु मूल् ।
जोवु तेहिं घंघोलियह उड्डुइ जिम लहु तूलु ॥ ६३ ॥
समल देह कप्पद समल रत्तिदिवस गुरुभाण ।
होइसिहं तुं भद्दा भणइ परआइत्त पराण ॥ १४ ॥

हामा
मालिभह जगह जणणि ए माह कहिउ जिणेण ।
मंजमपिणु भवभयहरण माणुन किनइ फेण ॥१९॥
हपतरोभंता पारण ताम हसंता होउ ।
सालिभर संजमु लिगा मह युज्दिाभइ पमोहु ॥ १६ ॥
हारमउकुंटलमलिज पदिक पुरिसपिमाणि ।
पीरपासि पहतर कुमक जण दिनंतई दाणि ॥ १७ ॥
क्षमाममणि भहातणई दिरिफउ जिणिहि फुमार।
मालिभा यतु सयु फरर आगमु पदह अपाम ॥ ६८ ॥
क्षामेषिणु जिण मुनिसहिउ अणसुणु गहिउ उपनु ।
सब्यहरु मिरिहि गपउ सालिभ६ तहिं धा ॥ ६९॥
महापिदेहि सु मुणि गहपि फेवलनाणु लहेपि ।
सासयसुरफ वि पाविसहि भयियह धम्मु कहेपि ॥ ७० ॥
इह कहियउ कामह कुलउ इकहत्तरि फटुयाह ।
भवियउ संजमु मणि धरउ पहहु गुणहु निमुणेहु ॥ ७२ ॥
सालिभरका समाम.
द्वहामातृका
भले भलेविणु जगतगुरु पणमउं जगह पहाणु
जामु पसाई मूढ जिय पावइ निम्मलु नाणु ॥१॥
उकारिहि उपरउ परमिहिहि नवकार ।
सिवमंगलु कहाणकरो जासु वि नामुचारु ॥२॥
नवनिहि धम्मिहि संपइए सफरफहरिरिद्धि ।
धम्मु इक करि धीर जिव सइ कर आवइ सिद्धि ॥ ३॥
मणगयवरु झाणुंकुसिण ताणिउ आणउ ठाउं ।
जह भंजेसह सीलयां करिसइ सिवफलहाणि ॥४॥
सिज्झइ तमु सवि कनड जसु हियडइ अरिहंतु ।
चिंतामणिसारिच्छ जिय एहु महाफल मंतु ॥५॥
धंधा पडिपउ जीव तुहूं खणि खणि तुइ आउ ।
दुग्गइ कोइन रकिसइ सयणु न बंधयु ताउ ॥६॥

७२ प्राचीनगरमाध्यम मिलिपउ घम्मियसापडउ उनिलमगि वहा ॥७॥ इह यदवाणइ चउहटइ दीसह सीहविमाणु । रंनडुलइ बोलायी अंमुलभग्गेवाणि ॥ ८॥ इय वढयाणइ जि हद हिगड रह न करंद । दिवि दिवि चंदह नेमिजिणु चहियउ गिरिसिहरहि ॥९॥ पाइ चहुद ककरीउ उन्हालइ लू बाई । जे कायर ते पलिया जे साहसिय ते जाई ॥१०॥ साहिलडा सरवरतलिहिं उग्गिउ दवणछोड । उजिलि जंते धंमिए गुंपिउ नेमिहिं मउडू ॥ ११ ॥ सहजिगपुरि वोलेविणु गंगिलपुरहिं पहुत्तु । माडी कहिजि संदेसडउ अंनु जिणेजे पुत्तु ।। १२ ॥ जइ लखमीधरु वोलियं पेखिवि बहु य पलास । तउ हियडर्ड निंवरु थि मुक कुटुंवह आस ॥ १३ ॥ विसमिय दोत्तडि नइ घणिय डंगर नत्यि च्छेऊ । हियडर्ड नेमि समप्पियउं जं भावइ तिव नेऊ ॥ १४॥ करवंदियालं वोलियर्ड अणंतपुरू जहिं ठाई। दिनउ तहि आवासडउ हिय विअद्धिं थाई ।। १५ ॥ नालिपरीटुंगरितडिहिं बहुचोराउलिठाई। धम्मियडा वोलिउ गिया अमुलतणइ सहाई ॥१६॥ भालडागदुसंनउ अविपड वसेइ । धम्मिय कियउ वीसावड सुरधारडीघरहिं ॥ १७ ॥ ओ दीसइ उडुंधलउ सो डुंगरु गिरनार । जहिं अच्छइ आवासियउ सामिउ नेमिकुमार ॥ १८ ॥ मंगूखंभि न मणु रहिउ अनु यहडेउ दिछ । खडहड़ अंगु पखालियं गोवाडलिहि पहुटु ॥ १९ ॥ भाद्रनई जह वोलिउ नाचइ धंमिउ लोउ। उजिलि दीवउ योहियड़ सुरठडिय हउ जोउ ॥ २० ॥ खंडइ देउलि जउ गिया सांकलि वोलिपि । धंमिय कियउ आयासडउ पंचूसरितलि नेई ॥ २१ ॥ ऊजिलमगि पहंता रजु लागइ जसु अगि ।

७३ । चर्च रिका धलि किन्न तसु धमियह इंदु पसंसह सग्गि ॥ २२ ॥ जे मलि मइला पहियडा ते मइला म भणेजे। पापमली जे भइलिया ते भइला ह सुणेजे ।। २३ ।। एउ पाउह लोड कोटर्ड तलि गिरिनाल । ओ दीसइ यवणधली धवलियतुंगपपार ॥ २४ ॥ घर पुर देउल धवलिया धज धवली दीसंति । धंमी सा पवणधली ऊजिलितलि निवसंती ॥२५॥ पउणथली मेलेविणु जउ लागउ गहमग्गि। तउ धंमिड आणंदियउ हरिसुन माइउ अंगि ॥२२॥ रिसहजिणेसरु चंदियउ गदि आवासु करेगी। नाचइ धमिउ हरसियउ हियडइ नेमि धरेवी ॥ २७ ॥ गहु बोली जउ चालीयर तर मणि पूरिय आस । पलि किन्नड ह जंघडिय जोपण बूढ पंचास ॥२८॥ टोलह उपरि मागडउ सो लंघणउ न जाइ । पाउ खिसियउ विसमउ पडइ हियं पिअडई धाई ॥ २९ ॥ अंगणवाणी नइ यहा दिहु दमोदर देउ । अंजणसिलाहिं जि अंजिया धन ति नगणा येउ ॥ ३० ॥ तरवस्तणइ पलांबडे रुसउ मागु जंघेवि । कालमेघु जोहारिपड यन्त्रापदि जाएपी ॥३१॥ अंबाजंबूराइणिहिं बहु यणराइ विचित्त। अपिलिए करवंदिएहिं चंसजालि सुपपित्त ।। ३२ ॥ नीररपाणिउ बलरलइ पानर करहिं पुकार । फोइलसह सुहावणउ नहिं टुंगरि गिरिनारि ॥ ३३ ॥ जउ मई दिही पागडी उंच दिहु पहाऊ। तर धंमिड आणंदिप लर सिवपुरि टाउ ॥ ३४॥ हियडा जंघउ जे पहई ता ऊर्जिति पढेजे। पाणिर पीउ गइंदपद दुप जलंजलि देने ॥३५॥ गिरियाई शंशोडियर पाय पाहर न लहंति । फडि प्रोडई कडि धकी हिपर सांसह जति ॥ ३६॥ जापन पंधलि पष्टिया लस्युपत्तीपाण।

७२ प्राचीनगर्नधान्यसहहः मिलियर धम्मियसापडउ उनिलमगि यह ॥७॥ इह वढवाणइ चउहदइ दीसह सीहविमाणु । रंनडुलइ वोलावी अंमुलअग्गेवाणि ॥ ८॥ इय वढवाणइ जि हद हियड रह न करें । दिवि दियि यंदइ नेमिजिणु चडियउ गिरिसिहरहिं ॥९॥ पाइ चहुइ कमरीउ उन्हालइ लू बाई । जे कायर ते पलिया जे साहसिय ते जाइं ॥ १० ॥ साहिलडा सरवरतलिहिं उग्गिउ दयणछोड । उजिलि जंते धंमिए गुंघिउ नेमिहिं मउडू ॥ ११ ॥ सहजिगपुरि चोलेविणु गंगिलपुरहिं पहुच । माढी कहिजि संदेसडर अंनु जिणेजे पुत्तु ॥ १२ ॥ जइ लखमीधरु वोलियं पेखिवि बहु य पलास । तउ हियडर्ड निंवरु घिउं मुफ कुटुंबह आस ॥ १३ ॥ विसमिय दोत्तडि नइ धणिय डंगर नत्यि च्छेऊ । हियडउं नेमि समप्पियउं जं भावद तिव नेऊ ॥ १४ ॥ करवंदियालं वोलियउं अणंतपुरू जहिं ठाई। दिन्नउ तहि आवासडउ हिय विअदि धाई ।। १५ ॥ नालियरीढुंगरितडिहिं वहुचोराउलिठाई। धम्मियडा वोलिउ गिया अमुलतणइ सहाई ॥ १६ ॥ भालडागदुसुंनउ अवियडउं वसेइ । धम्मिय कियउ वीसावड सुरधारडीघरेहिं ॥ १७ ॥ ओ दीसइ उडुंधलउ सो डुंगरु गिरनार । जहिं अच्छइ आवासियउ सामिउ नेमिकुमारु ॥ १८ ॥ मंगूखंभि.न मणु रहिउ अनु वहडेउ दिदु । खडहड़ अंगु पखालियं गोवाइलिहि पहुटु ॥ १९ ॥ भावनई जह बोलिउ नाचइ धंमिउ लोड। उजिलि दीवउ वोहिया सुरठडिय हउ जोउ ॥ २० ॥ खंडइ देउलि जउ गिया सांकलि वोलिपि । धमिय किया आवासघउ चंचूसरितलि नेई ॥ २१ ॥ ऊजिलमगि यहंता रजु लागइ जमु अंगि।

७३ चर्चारिका थलि किन्नर तसु धमियह इंदु पसंसह सरिंग ।।.२२ ॥ जे मलि मइला पहियदा ते महला म भणेजे। पायमली जे महलिया ते महला ह सुणेजे ॥ २३ ॥ एउ पाउह लोड कोट तलि गिरिनारु । ओ दीसह चरणथली धवलियतुंगपयार ॥ २४ ॥ घर पुर देउल धयलिया धन धवली दीसंति। धंमी सा ववणथली अजिलितलि निवसंती ॥२५॥ पउणधली मेलेबिणु जउ लागउ गहमग्गि । सर धमिउ आणंदियउ हरिसुन माइउ अंगि ॥ २२ ॥ रिसहजिणेसरु बंदियउ गढि आवासु करेवी। नारइ धमिउ हरसिपउ हिपडइ नेमि धरेची ।। २७ ।। गदु वाली जउ चालीयउ तर मणि पूरिय आस । यलि किन्नड हाई जंघडिय जोयण वूद पंचास ॥ २८ ॥ टोलह उपरि मागडउ सो लंघणउ न जाइ। पाउ सिसियउ विसमउ पडइ हियं विअडई थाई ॥ २९ ॥ अंगणवाणी नह पहइ दिदु दमोदर देउ । अंजणसिलहिं जि अंजिया धन ति नयणा वेउ ॥ ३० ॥ तरवस्तणइ पलांबहे स्वउ मागु जंवेपि । कालमेघु जोहारियड पनापदि जाएगी ॥३१॥ अंबाजंबूराइणिहिं बहु धणराइ विचित्त । अंपिलिए करवंदिपहिं पंसजालि सुपवित्त ॥ ३२ ॥ नीहरपाणि खलहलह धानर करहिं चुकार । कोइलसह मुहावणउ तहिं डुंगरि गिरिनारि ।। ३३ ॥ जउ मई दिवी पाजडी उंच दिहु घडाऊ । तउ धमिउ आणंदियउ लड सियपुरि टाउ ॥ ३४ ॥ हिपडा संपरजे यहई ता उचिंति चडेजे। पाणिउ पीउ गइंदयह दुख जलंजलि देजे ॥३५॥ गिरिवाई झंझोडियउ पाय थाहर न लहंति ।. कटि प्रोडई कडि थफी हिपड सोसह जंति ॥ ३६ ।। जावन धंधलि घटिया लखुपत्तीपाण ।

७४
प्राचीनगरकाव्यसदहः
तांय कि लम्भहिं चिंतिया हिरहा जगराण ॥ ३७॥
डूंगरडा अधी फरि लम्गड सीयलि याउ ।
हृय पुणं नवदेहडी अंमुलि किया पसाऊ ॥ ३८ ॥
चर्चरिका समाप्ता
मातृकाचउपइ
त्रिभुवनसरणु सुमरि जगनाहु जिम फिइ भवदयं दुहृदाहु।
जिणि अरि आठ करम निर्दलीय नमो जिन जिम भधि नाव वलिय॥१॥
आंचली-सपि अरिहंत नमिवि सिद्ध मूरि उज्झावय साहू गुणभूरि ।
माईयवावनअक्षरसार चउपईवंधि पदि सुविचारु ॥ १॥
भले भणेविणु भणीअइ भलउं तिहयणमाहि सारु एतलउँ ।
जिनु जिनवचनु जगह आधार इतीउ मूकिउ अवरु अस्सारु ॥२॥
मीडर्ड पडिउ भवनागमा जउ समिकत्ति लोणु आतमा।
जिनह चयणि करिजे निहु
ठाउ हृदय रहवि तिहुयणनाहु ॥ ३ ॥
लोह म लंघिसि जिणवरिभणी जो रिधि वंच्छह सिवसुहतणी।
चहुंगति फोटइ फेरउ वडउ पाच्छद जाइउ सिवगढि चडउ ॥४॥
लीहं वीजी वे उपरि करे देवु गुरु हीयडइ संभरे।
क्षण एकू मन करिसि प्रमादु जिम तुम्हि पामउ मुक्तिसवादुः ॥५॥
अकारि सुमरि अरिहंतु जो अठकमहं कालु कियंतु ।
अनु सिवसुकतणउ दाताम मनह म मेल्हिसि तिद्वयणसारु ॥ ६॥
नव निहाण ते पामइं तिम जीह जिणवयणु हियइ परिणमइ ।
सिवसंपत्ति तीहहकडी जीह जिणआण हियइंस जडी ॥७॥
मनु चंचल जे अविचल करई जिणह आण सिरपरि धरहं।
हणई कसाय इंदीय संवरदं ते सिवनयरि सुस्विं संचरई ॥८॥
सिद्धउं काजु सह तीहतणउं जेहि जीवि कोध जिणवरभणिउं ।
छेदिइ आटकरमनी वेलि गया मुक्ति दुई पेलावेलि ॥९॥
बंध पडिपा दीद मन ममउ अप्पारामि जिणवरिसरमउ ।
भपह तापु नवि लागई अंगि उदु बहुफल पामउ सिवसंगि ॥ १० ॥

मातृभाउपह
अनुब जिनह आण मनि घर उपसमु विवेक संवर करें ।
अरिवर्ण अंतरंगु निग्रहे इणि परि जीय मुकतु संबई ॥ ११ ॥
आलिहि अलीज म झपिसि किमद जे जिनुषपणु हियां तु गमह ।
करमुबंधु पडतर पीतये भापासमि वि सहनि अनुभवे ।। १२ ॥
इणि संसारि दुपभंडारि लइन जीप फाय धन ऊगारि।
घीतरागि आगमि फद्दीउ करे तइ जि पणु भावनसद्दीउ ॥ १३॥
ईमह म कारसि फूड सोसु सोचा जिनह पपणि करि ताम्।
जोइउ आगमतण विनाम पाउ भरिन परतभंडार ॥१४॥
उप्पलदलउप्परि जिम नीरु ने सउं पंचायु जीव सरीम।
धणु फणु रणु सहणु तिम सह दीसइ धम्मु गा घर रह ॥ १०॥
उपरि देखि देय न हाधु तेरहि तिष्ट्रपणि पोइ न मना।
नासीउ पइसिजान जिनसरणिजिम न पामीमह जमणमणि ॥१५॥
रिनिहितणउ लाभु इम लेजि सातिहि पनि पीनु पायेजि ।
उपर सिंचे भायनानीरि पगमा नाही जिम ताहरा सारि॥१७॥
रीण दीण ते पहुगति भमा ले जिन पीतराग मपि नमह ।
नोही कार धरमपासना ते नही गाई मुशिमामना ॥१८॥
लिपायीद सुतु सीरंतु तेह लाभ नपि लाभा अंतु।
ज्ञानतणउ गुण पपटु कांह पीसरागत ज्ञानलगुहा॥१९॥
सीलअमत संसार सरेसि जइजीप मिनधमु परशुलसि ।
सुगरनी जाम विलगीउ परी जान सीप भपमादर तरी ॥२०॥
एकह परि पामिसि भवपास जर समिरल पर अंगीकार
धीरनासु कहर आगमि तोह विण समिकल सिस्पि हा ॥३॥
प भयपनु जोद शिणपरतणुं सहि ऊपमा भिसी भय।
जिणाई पक्ष्ण न अपम पार निभुपरतणी मुहि पाहि ॥२६॥
ओपहं पडी पाणु जे परिसिता संसार अनंत विमि।
जोड पण सिरंत पिपार करिसि धम्मुख पामिसि पाक ॥ २ ॥
ओपधु फरे जीर जिनि भणिडे आपण पु भइयरमहापा।
पाहिगि ओपदिकाई तयार परमोपविण पुनसार ॥४॥
अंतुन साभह संसार पहनापही पिसार ।
एक गधमु करे सपाइ लेउमेदर सिवनमाहि ॥ १९ ॥

प्राचीनगूर्जरकाम्यसवादः अनुदिनु भत्ति कर जिनराय पूजि त्रिकाल तासु पहुपाय। मानपतु दोहिलई पामेसि पाच्छइ जिनपति काहा नमेसि ॥ २६ ॥ कपटिहि मायां वंचई लोकु ते नवि लहई सिद्धिसंजोगु भमडइं जीय चहुँगतिहि मज्झारि इणपरि भव पूरई संसारि ॥२ खन्नइ जगु एउ कालकु अंति एह एतला नही काइ भ्रंति । जिणह वइणु विडिजा इकमणउ भउ फीटिसइ क्रितांतहतणउ ॥२६॥ गम्भवासि जो दिल जाण तउ त माने जिनवरआण। फेडइ दुपु सह जिनराउ तर सिवनहरि अ पावइ टाउ ॥ २९ ॥ घरि घर हिंडिसि जीव अणाहु जइ न नमिसि जिनु तिहमणनाहु ! जिनुधमविणु सुपु नहीं संसारि अवर टमालि दीस मन हारि ॥३॥ उश्चई सरिसु धम्मु जइ करिसि तउ भंडोरु परत नउ भरिसि। जे यणु लागिसि लोकप्रवाहि रडभड हुइसइ चुटुंगतिमाहि ॥ ३१ ॥ चक्रवति पदपंडह धणी हंती रिडि तीहंनइ घणी । जो रिडिहिं परिताणु होउ त यंभु संभुमु निरगि नवि जंत ॥ ३२॥ एपिद जीय करंजे रप जइ तुम्हि जिणसासणि छउ दप । भातमय जीव सचि गणे धम्मह त साम इउ मुषे ॥ ३३ ॥ गगुरु जगरपणु जगनाटु जगबंधयु जगसथवाहु । जगतारणु जिउ जगभाधार जिणविणु अपरि नही भवपाल ॥ ३४॥ जय पातु निम तम्भरि पनु जइ मनमाझि यसइइफ जिगु । जापुनरोपुलि कांद करमि जिनि एफलई मुकति पामेमि ॥ ३५ ॥ अमिदिन गंपमिठि सुमरेजि इणपरि असु, करमु पनि । सुमो करम पायजे घण जिम सुपु लह सिवनगरीतणउं ॥ ३ ॥ टना मेगना परयतरानु जो रवि पच्छिम ऊगई आनु । जो मापन मिल्दर मनाइ तोइ जिनभामि अलीउ न भाइ ॥ १७ ॥ टगामि गगरि कोधि जिनकमही लेजे सोधि । तयानी भागती रिषि मंगई मुभितनी पणी ॥ ३८ ॥ रमोद पाटनभंगमि लांच तंद नवि लागई भोपाजोग। बंतराग मंग्रवादी यविण दिसु पसाई अटारमहमणा ॥१॥ दिपामा जे दार नीयन करिमिम गाउ। नम्मरण शेतीमाल करे यमु परहरीर दमाला ॥

मातृकाप उपह णवणवपरि भग्गऊ भवचारु सांमीभ करिउ अम्हारी य सार । असरणसरणु तुहुं जि जगनाह भवि पडत अम्ह देने वाहु ।। ४१ ।। तनु धनु जीवीउ जौवनु जोइ रिडि समिद्धि सहअणु सह कोई। दिवस पांच मेलावउ होइ पाछह वलीउ न दीसह कोई ॥४२॥ थरथर कंपई काइरचित्त देपीउ मुनियर माहासत्त । धीरा सत्तवंत जे जाण पालई दीपसहीउ जिणआण || ४३ ॥ दमि इंदिअ दुग्गइआर लूसीउ लिअई सुमितु सविवार । जे न जिणिसि जिणवयणविचारि देसिईदगु बहसंसारि ॥४४॥ घरमध्यांनि करि निमल चितु जिम हुइ जीच जनमु सुपवितु। धमिहि सिवह सौपसंपत्ति धमिहि वलीउ न भवि उतपत्ति ।। ४ ।। नर नीतु नमो नीमि जिणनाहु आठकरम जिणि दिन्ही दाउ । मोहराउ रिणि भंजीउ करी लीलहं लई सामि सियपुरी ॥ ४६॥ पदइ गुणइ घरकाणई सुतु पुणु युझई नही तोइ ततु । राणु बेपु मनभीतरि धरई ईमइ वेग्यविडंवउ फरई ॥४७॥ फरइ करमु परभपहत्तणउं जब रिद्धिरहि जीउ हीद घण। दुपु सुपु सह पद लागम आवह सिजि सरिसु आतमा ।। ४८ ॥ वलि कीउ जीवीउ तीहं संसारि जे दिन गमइ पापव्यापारि। सफलु जनमु तीहं नरनारि जे जिनधमि द्रिद चित्तमझारि ॥ ४९ ।। भविं भत्रु बोलई जीप अनंत जाणई नही वइणु अरिहंत । न मुणई अंतर पावह पुग्नु तीहं सोगल कांई सिरिज्या पान ॥५०॥ माणु जि मारई ते जगि सर जे मारीपई मइणि ते भूर । धीरा सुभट सतु ऊटपइ मारीउ मयणु ना नीठयई ॥१॥ य करई तप्पु नीमु संचमु तीहं दुर्गतिना नही कोर गंमु । जीहं सरोईड हुई जिनधंमु विलसह मुकतिसोपु निरपंमु ॥ ५२ ।। रहिसिइं पूत कलत घरवाफ रहिसिइ सइणु सह परिवार । रहिसिइ धणुकणुरइणुभंडारु जीउ एकल जाह निधारु ॥ ५ ॥ लइ जिनदीप मूकि संसाम आठकरम दहीउ फरियार । निरुपम सुपु सिपनदरीतण सहिसि जीप आगमि जिनमणि ॥१४॥ वचनच्यापु जोह जिणवरतणउ अरथ गंभीर अच्छा तहिं एउ। जोसाइरि जलविंदरं पार तउ सभइ सितविचार ।। १५ ।।

. २६ भागनागिyि ar मंगताणाम प्राचीनगरकाम्यसाह शरपरि महा मन पेलि जिनमु लाघउ पाइम टेली। निडभगचितामगि जिनधन्मु करीन जीव भाजइ भपभ्रंमु ॥1॥ पनि पगि माउ गढंतर देपि भयि पदंतु अघुम ओपि । मरन धन्न जं केचतिकहीउ जा सिरपुरि लेप विसही ॥३॥ महानि जीउ भवगतति करर कर्म युतुरादाणी घणु पर। कन्नता नही य ऊमा भयगोतिहिं दुख सहिसि भार बारितु विमा करिस मन कोइ जर जीप आपद संपर हो। भाकलीसर पुरभवतिनं भोगये कोर भणकि ॥१९॥ मंच पर मना गिरिकंदरा भमइ पर। गिरिमात मी रसभम न कर पम्मु निणि रिधि संपा गुम पर मार जालिम करिसिजीप परमनी फाणि। FEAT A समागम्मु अधिनसुरु एक निणथम्पु ॥३१॥ Lawrani मा भरियन भई सिपलस। 4rfantrTIAL मंगल कर माहुणा पाय ॥ १२॥ *HTTEE HAI जगमादिगण निम्। IF ARAR RAHESH मंगानु करा मोतिnिiruit ke ki wif नभत्र सारा सुति। माTIHARI मध्यकलमाईचउपद +rtaintings । Karnalitimननी माया * MEHTA frest ... * rint prile an ent

MENTRE
मिरिसुफ जगि मर को सहाद स्रसमिस्नु जइ हिगडर रहा।
र समिकतु प्रेणिकराय होइ प्रथम तिथंकर होसह सोइ ॥५॥
धन जि गुरपारपर फरंति गुरु शिशु समिस्तु किमान हुंति ।
मुटनु एक ममिकतु फरसंह पुदगल अरथमाहि सिमि पिनेह ॥६॥
अच्छह माहपर इणि ममा ममिस्तु रयणु न लाभह फिमद ।
गुरु मुगुम अंतन करइ इणि कारणि पगति जिउ फिरद॥७॥
भागमययण पंचमद अर फेयलनाणु प्रभव हुद परह।
इस कालि समिकरदचित्त ते नर जाणे जगह पवित्त ॥८॥
इणि भपि परभवि सुरकु लद्देउ सतगुस्तण ययणु पालेहु ।
पीतराग जउ दिनि पाय जर पाणु होइ निम्मल काय ॥९॥
इंदियालु जगि दीसह लोह वाला न हुएट कोर।
परममंचन्नु जद सरिसउ ले पार गया तर सुरकु माणेइ ।॥ १० ॥
ऊगमनहजे नर दीसंनि उंजणधि पाडिया ते जति ।
सुकिय मुकिय वे सरिसा पलई सजनमीत बोलावी यलहं ॥ ११ ॥
ओसरि पाधिया लाभु न हुंति सजल्लु होइ वीजह चूकंति ।
सूधरं दान मुनिहि जो देश संगमतणउ लाभु सो लेह ॥ १२ ॥
रिरिहितणउ लाभु जगि लेतु दस सेये तुम्हि धनु यावेछ ।
दीन्हादानह नासुम जोइ सुपानि दीन्हइ बहुफल होइ ।। १३ ॥
रीतिहि दानह नयी निधार उचित दानु दीजइ सविवार ।
कृसनभयसिउ उ प पारंति पात्रविसेपिहि पीरु स दिति ॥ १४ ॥
लिहिए जगि लोडइ सर फोइ फुपानु पिसहरसाहसु होइ ।
पीठ आणि जउ मुखि घातिपइ पानविसेपिहितसु विसु धियह॥१५॥
लोहन लंघर्ड सतगुरतणी क्रिया करउं जा आगमि भणी।
विधिमारगु मान सविचार जाणउं जद एटउं संसार ॥ १६ ॥
पह फरवलं नर संसारि निग्नि पार जउ पडिउ विहारि।
वीतराग जउ भणि करंसु दस आसातन नितु सरोसु ॥ १७ ॥
ऐ धार मेल्हि जिणु पूजेसु रयणिहिं रमणिगमणु वारेसु ।
न्हवणु तं दिजहि निसिभरि रहई सं पिहिमंदिर सतगुरु कहह ॥१८॥
ओ दीसह मंदिर जगि सारु धम्मरयणकेरउ भंडार।
घउरासी आसातन नितु रापेसु मंदिरि दिवसह पलि दोएसु॥ १९ ॥

८०
.
प्राचीनगरमध्यसवह
ओया दीसहं बहुत गमार धमहतणी न पूछर मार।
जिण गुरि दीठह दूरिहि जति दुलठु माणुमुजंमु आलि गमनि ॥३॥
अंतम विधि अविधिहि जाणंति मंदिर पहठ निसिहि न करनि ।
तालारासु रयणि न हु देइ लउडारसु मूलह वारंह ॥ २१ ॥
अइसउ मंदिर जगि प्रवहणु होइ धमिउ लोड चडइ मुह को ।
पंचप्रमिडिंनी जापर करउ संसारसमुद्र जिम लीलई तरउ ।। २२ ॥
कहियइ यूलिभदु मुणिराउ मयण चरह भंजइ भडियाउ ।
छ विगह सौजनु चित्रसाली रहइ जगहमाहि धूलिभदुलीह लह ॥३॥
सहभड रापि न इणि संसारि जुगप्रधान जोइ घंमु विचारि।
सुद्धउ घरमु करिसि जह किमइ जमणमरणह छुटिसि तिमइ ॥२॥
गलइ आउ जिम अंजलिनीक सीलु जु पालइ सो नर घील।
कपिलनारि पेलइ विनाणि सील सुदरसणतणउं यत्राणि ॥ २९॥
घडतउ फोडतउ वार न लाइ कर्मतणी विसमी गति काई ।
जं जं करमु करइ तं होइ लपमणि दससिक जीतउ जोइ ॥ २६ ॥
निच्छद साहसिउ पत्रकुमार इंदु पसंसइ जो दयसाम् ।
सुर वे आविया जउ सत पडइ कुमल पारंवास घडि चडइ ॥२३॥
चल्लइ सवलवाहणु नरनाहु वीरवंदन हुउ अनिघणुं भाउ ।
दसाणभहु अतिगरयु करह इंदिहि जीतउ रिधि दाखेइ ॥ २८ ॥
छंडा राजु रिद्धि पणमाहि इंदि जीतउ तं न सुहाइ ।
वीरपासि संजमुभम लेइ इंदिहिं हारिउ चलण नमेइ ॥ २९ ॥
जनमु ययरसामिउ तिमसमइ , मास रोयतउ रहइ न किमइ ।
धणगिरि विहरतु पहुतउ घरेइ साति पूतु हिव झाली घरं ॥ ३० ॥
झटकह तउ झोली घातियउ भारि गुरुह लेउ समपिउ ।
गुरु पभणइ पर तिणि आपहु कुमरह आवी सार करहु ।। ३१ ॥
निच्छद जुगप्रधान जिउ होइ इह गुणवन्नणु सकइ न कोइ ।
पालणइ सूतउ अवणि सुणेइ इगारअंग तउ आणावेद ॥ ३२॥
टलइ न पायज कुमरह किमइ मायही झगडउ मांडियउ तिमइ ।
राज विदीतु नु हा लेसु मंदिर नेतउ परिणावेसु ॥ ३३ ॥
टमर मिलिया उगहर करई अमर अणावी तउ विचि धरई ।
यणफल रमणा सा दोपइ धणगिरि रजोहरणु दापेइ ॥ ३४ ॥

मायामाचा
संगमगता मनु रहा न किमा मागदी भवि भघि लामह तिमह ।
सुगन्मेलापर सुलहर हंति पंचमहायत सीगिरि दिति ॥ ३५ ॥
दादर काय वालकुमारि मोहगिरिता हालिया विहारि।
मार भगाई अन्न ययण कुवेद वपरद मुनि तुम्ह कानु करेइ ॥ ३६ ।।
न गण भयरसीम जयमाह मोहगिरितणा सीस सुह लोह ।
अभिनयदीपितु पपण कुदेश सीहगिरितण पपणु मानेइ ।। ३७ ॥
सा संगम विउ परिमसहस्सु जीवदया पालिय गुणह निवासु।
अंतकालि अरमाणि परति कसरी सातमिपहं जति ॥ ३८ ॥
पुंररीक परिससहसु फीउ रज्जु विउ घडिपहं तर सारित कज्नु।
पापज ले गुरु समुहउ पाइ पंचपिमाणे पुंडरीकु जाइ ॥ ३९॥
दम दिसि पसरिउ जगि जसपाउ नयअंगपित्तिकरण गुमाउ।
धमणि थप्पिर पासनिणंदु पणमटु सुहगुरु अभयमुणिंड ॥ ४०॥
धनु सु जिपवरहर यरकाणि नागरयणकेरी छह खाणि ।
यहतालीसमुह पिंड विहरेइ नियिधुमंदिर जगि प्रगट करेह ॥ ४१ ॥
नर निसुपतु सतगुर परमाणु अंतस बूझर थिउ सुजाए।
फुगरपाणितउ विसु उत्तर मुगुरवाणि जउ अमिउ झरेइ ॥ ४२ ।।
परिणइ अदनारि करि लेह मरण यहठउ कया कहेइ ।
प्रभ काम मंदिरि पइसेइ असुपणनिंद सयलजण देइ ॥ ४३ ॥
फहउ जंयुफुमा दम भणइ वियाहुमहोच्छयु प्रभवु न गणइ ।
जंयुधमा जउ इस भांति सपि पंभिया टगमग जोयति ॥४४॥
पंधव अम्हस साटि करंज पिहुं पिघावदह इक थंभणी देज।
कुम भणइ विधा किस करसु रिद्धि परिहरी प्रहहं व्रतु लेसु।। ४ ।।
भण प्रभवु नयजोवण नारि परणिय पुनवसिण संसारि ।
कामभोग भोगपि इणि समह जोषण गइ व्रतु लेजे तिमइ ।। ४६ ॥
मपणु पर सो मई चसि किउ मोहराउ पाडिउ नाधिप।
मधुविदसाहस इहु संसाम निसुणि प्रभव तुहु जोइ विचार ॥४७॥
जगु पिंडाणु सपलु घरतेइ तह पिणु पितरह पिंड कु देह ।
महेसरदलाया जउ कहइ प्रभउ सांभलिउ मनमाहि रहा ॥४८॥
रतिपत्ति जाणउतई पसि फियर नापासण संबंधु किम पिया।
अवारह नानाफथा फहंति प्रभJ सांभली तर झंति ॥ ४९ ॥

संदेह मकरहु जिमसमिकत रहइ भविभवि बोधिवीजु जिउलहा॥३१ सुइ मनि जेनर निमुणंति अणंतसुस्तु सिडिहि पावंति ॥ १४॥ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहा लहणउ लाभइ इह जगमाहि जंबुसामिघरि रिद्वि न माइ । हूंती रिद्धि कुमरु परिहरइ प्रभवु पराई लेया फिरइ ॥५॥ वयणु कहउ पुणु नीजइ वाइ जंवुकुमर तुहु परिणि काई । चालकुमारउ त व्रतु लियत नियनियमंदिरि अट्ठय रहत ॥५१॥ सांभलि प्रभव ज काइउ हुंत जइ घरि रह त संसारि पडत । कथा कहिउ प्रतिवोधेसु नारि वलिउ न आवई इणि संसारि ॥५२॥ पडभड केही रिद्धिहितणी नवाणवइ कोडि सोना छई घणी । जीमणइ हाथिहि तउ हउँ देसु मणवंछिय मागण पूरेसु ॥५३॥ सा सिवकाजउ प्रगुणी करइ दान दियंतउ तउं नीसरह । माय वापु अट्ठनारि चडंति पंचसयसहितु प्रभवु वइसति ॥ ५४॥ हल्लिय सिविका गाजे रली वजिय ढक बुक काहली । सिविका उत्तरिउ चलण नमंति सुहमसामि सई हथि व्रतु दिति॥१५॥ लंघिउ सायरु जउ व्रतु लिउ पंचमगतिप्रस्थान कियउ । जंबुसामिउच्छयु देखेइ बहुतु लोकु जाइउ व्रतु लेइ ॥ ५६ ॥ खयउं पापु जउ पावज लई घरसंसारचिंत तउ गई । मनि जीतइ इंद्रिय वसि थाई करम जिणिय नर सिद्धिहि जाई ॥५॥ मंगल पहिलउ सोहमसामि वीजउ मंगल जंबूसामि । अगणिउ मंगल प्रभव भणंति चउत्थउ मंगल नारिहि हुंति ॥ ५८॥ गणियह जुगवरु सोहमसामि वीजडउ जुगवरु जंबूसामि । योजउ जुगयरु प्रभवु भणंति सिझंभवु चउथउ जाणंति ॥ ५९॥ लंघणि सीह गोयमु पुच्छंति जुगप्रधान जगि केता हुंति । विसहस घ आगला कहेइ छेहिलउ दुपसह तउ जाणेइ ॥ ३० ॥ मंन जुगवा जिणेसरसरि पाबु पणासह दरिसण दुरि । हासामिसि पउपईचंधु कियउ माईतणउ छेहु मह नियउ । ऊपर आगला किंपि भणेउ जगणइ संघ सपल खमेउ ।। ६२॥ श्रीनंदर समुदापरि रहा नंदर विहिमंदिर कवि कहइ । नंदा जिणेसरगरि मुणिंदु जा रवि ऊगद ऊगर पंतु ॥ १३ ॥ माईनणा अमसम धुरि किपर घसठियउपइया बंधु धियउ ! सम्यमाईचाइ सम्पूर्णा.

श्रीनेमिनायागु श्रीनेमिनाथफागु सिद्धि जेहिं सह वर परिय ते नित्थयर नमेवी। फागुवंधि पहुनेमिजिणुगुण गाएस केची ॥१॥ अह नवजुचण नेमिकुमम जायकुलधवलो काजलसामल ललवलउ मुललियमुहकमलो। समुदविजयसियदेवितु सोहगसिंगारो जरासिंधुभडभंगभीमु बलि रूपि अप्पारो ॥२॥ गहिरसहि हरिसंखु जेण पूरिय उदंडो हरि हरि जिम हिंडोलियउ भुपदंडपयंडो। तेयपरिकमि आगलउ पुणि नारिविरत्तर सामि सुलकणसामला सिवसिरिअणुरत्तर ॥३॥ हरिहलहरस नेमिपल्लु खेलइ मास वसंतो। हाचि भावि भिजद नही य भामिणिमाहि भमंतो ॥ ४ ॥ अह सेलाइ बडोखलिय नीरि पुशु मयणि नमावह हरितेउरमाहि रमह पुणि नाहुन राचड् । नयणसलूपउ लडसइंतु जर तीरिहिं आविउ माइ वापि पंधविहिं मांड पीयाह मनाविउ ॥५॥ घरि घरि उत्सव धारयए राउल गहगहए तोरण चंदुरपाल फलस धपपड लहलहए । कन्हडि मागिय उग्गसेणधूप राजल लाया नैमिमाहीप बाल अहभवनेहनियडा ॥ ६ ॥ राइमएसम तिहु भुपणि अपर न अत्यनारे। मोहणयिहि नयाडीय उप्पनीय संसारे ॥७॥ अह सामलकोमल केशपास किरि मोरकला। अखचंदसमु भालु मयणु पोसह भडकाउ । वंडियालीय भुंहडियई भरि भुवणु भमाइ लाडी लोपणलहकुडलर सुर सरगह पाइ ॥८॥ किरि सिसिविंध कपाल फासहिंडोल फुरता नासा पंसा गराए दादिमफल देता।

८४ प्राचीनगूर्जरकान्यसङ्ग्रहः अहर पवाल तिरेह कंलुराजलसर रूडा जाणु वीणु रणरण जाणु कोइलटहकडलउ ॥९॥ सरलतरल भुयवल्लरिय सिहण पीणघणतुंग। उदरदेसि लंकाउली य सोहइ तिवटतुरंग ॥१०॥ अह कोमल विमल नियंचविंच किरि गंगापुलिणा करिकर ऊरि हरिण जंघ पल्लव करचरणा। मलपति चालति वेलहीय हंसला हरावह संझारागु अकालि वालु नहकिरणि करावइ ॥ ११ ॥ सहजिहिं लडहीय रायमए सुलखण सुकमाला घण घणेर गहगहए नवजुवण वाला। भंभरभोली नेमिजिणवीवाह सुणेई नेहगहिल्ली गोरडी हियडइ विहसेई ॥ १२ ॥ सायणनुफिलमट्टि दिणि बावीसमउ जिणंदो चल्द राजलपरिणयण कामिणिनयणाणंदो ॥ १३ ॥ अह सेयतुंगतरलतुरद रदरहि चडइ कुमारो कन्निहि कुंडल सीसि मउड गलि नवसरहारो। चंदणि ऊगटि चंदघवलकापडि सिणगारो केवडियालउ खुपु भरवि वंकुडउ अतिफारो ॥ १४ ॥ घरहि छत्तु विच चमर चालहिं मृगनयी लूणु उत्तारिहिं वरवहिणी हरिसुवलययणी । चटुपरि वइसइ दसारकोडि जादवभूपाला हयगयरहपापक्षचफसीकिरिहिं झमाला ॥ १५ ॥ मंगल गापहि गोरडीय भहह जयजयकारो उन्गसणधरनारि यरो पटुतउ नेमिकुमारो ॥ १६ ॥ भद महिय पयंपप हल सहिए तुह वल्लहर आवइ मालिपटालिहिं चहिउ लोउ मण नयणु सुहापइ । गडम्पि वटी रायमए नेमिना निरम्पइ पमइपमागिदि चंचलिहिं लोभणिहिं कहखई ॥१७॥ किन किस राजलदेविनगर सिणगारु भणेवर । चंगारी माधोई अंगि पंदनुलेयउ ।

गर्नुए भरापिड जाममि कमनूरी मारी माभना मिररह मोतीसरि गारि ॥१८॥ नपगि समितिलप किय गणमिला तमु भाले। मांतील फनिधिय विद्यारिटय करजाले ॥१९॥ अइ निरताप कालरेह नपणि मुहमालि संबोलो नगांदरकंठसा कठि भनु हार विरालो। मरगदसादर फंपुगा फुटफुहं माला फरि पंकण मणियलगपूर पलकारह पाला ॥ २०॥ माणपणाण प गाणु प कटि पपरियाली रिमिनिमि रिमिक्षिमि रिमिलिमिए पपनेजरजुपली। नहि भादरा पलपल सेभंसुपकिमिसि अंख्यिाली रायमर प्रिउ जांभा मनरसि ।।२१।। पाटर भरि जीरन्हंटलवलंत पुरलंत । अहठोटिलं उरसिप देपद राजलकतो ।। २२ ।। अह पर रामलकंतु पाई पसुवंधण दीसह सारदियोला सामिसाल तुद गोरयु छुस्याह । जीप मल्हापड नेमिफुमक सरणागह पालद शिगु संसार असार इस्पर्ड इम भणि रहु पालइ ।। २३ ।। समुदपिजय सियदेपि रामु फेसयु मनावह नइपयाह जिम गयउ नेमि भयभमणु न भावह । धरणि घसफाइ पदर देवि राजल विहलंघल रोह रिजह येसु स्यु बहु मम्मद निष्फल ॥ २४ ॥ उग्गसपाधूरा इम भणइ दुपहिं दाझइ देहो फां विरतउ कैत तुदं नयणिहि लाइवि नेहो ।। २ ।। भासा पूरह पिटुभुयणम्म करि हयासी दय करि दय फरि देव तुम्ह ह अप दासी। सामिन पाटइ पडिवानरं तउ कासु फहीजइ मयाल उपट संचरए किणिं फानि गहीजइ ॥२६॥ नेमि न मनइ नेहु देह संवच्छरदाणूं ऊजागरि संजम लिपर हुप केवलनाणूं।

प्राचीनगूर्जरकान्यसहदः -4000- राजलदेविस सिद्धि गयउ सो देउ धुणीजइ मलहारिहिं रायसिहरसूरि किउ फागु रमीजद ॥ २७ ॥ इति श्रीनेमिनाथफागु. प्राचीनगद्यसङ्ग्रहः आराधना (संवत् १३३० मा लखेला ताडपत्रमाथी) ज्ञानाचारि पुस्तकपुस्तिकासंपुटसंपुटिकाटीपणांकवलीऊतरीठवणीपा दोरीप्रभृतिज्ञानोपकरणअवज्ञा, अकालिपठन अतिचार विपरीतकथनु उत्त अमरूपणु अश्रद्दधानप्रभृतिकु आलोयहु । दर्शनाचारि देवद्रव्यु भ उपेक्षितु प्रज्ञाहीनत्यु जिनभुवनआशातना अधोयति देवपूजा गुरुद्रन ग्रहणु गुरुनिंदा द्रव्यलिंगिएस संसर्ग विवआशातना स्थापनाचार्यआर तना शंका आकांक्षा विचिकित्सा मिथ्यादृष्टिप्रसंसा मिथ्यादृष्टिपरिचउ पांच अतिचार आलोय । चारि आचारि प्राणातिपात मृपावाद अदत्ताद मैगुनपरिग्रह ए पांच अणुव्रत दिगुविरति भोगपरिभोगविरति अनदं विरति ए तिन्नि गुणवत । सामायिक देसावकासिकु पौपधु अतिधिसंविभा प च्यारि सिक्ष्यावत; ईहतणइ विषइ जु कोइ अतिचारु आसेवियर स् आलोयहं । तपाचारि अनशन ऊनोदरिता पृत्तिसंक्षेषु रसत्यागु कापले संलीनता पविघयायतपतणइ विपद प्रायश्चित्तु विनउ वैयाकृत्यु स्वाध्या कापोत्सर्ग पविधाभ्यंतरतपतणइ विपद जु अतीचारु सु हुं आलोपाहूं पापांचारि संतह वलि संतह यीनिं जु धम्मानुष्ठानि उगम नहीं किपर हुँ आटोपटुं । सम्यक्त्वप्रतिपत्ति करतु, अरिहंतु देवता सुसाधु गुरु जिन गौन धर्म सम्यक्त्वदंदा ऊचरह, सागारमत्यासानु ऊपर पहु सर पइसरहु । परमेश्वरभरहंतसरणि सफलफर्मनिर्मुक्तसिद्धसरणि संसारपरी वारसमुनरणयानपानमहासस्वसाधुसरणि मालपापपटलकपलनकलाफलिनु वतिमीनुयम्मुमरणि सिर संघगण केवलि भूत भागार्य उपाप्पाप मयंसाधु तिमी पावक प्राविका इ६ ज काइ आशातना की हुंती ता मिच्या मि दुई । पुरविपद जीय भाउमाइ जीय तेउमाइ जीय पार जीव वसाधा जीव मंदिय दिप पारिदिप जलपर स्थलपर रोपर ।

मनोनयन विगु गाह मिष्यामि पुस । पनर कर्मभूमि नि मनुण ग्रीस अमर्मभूमि जिमनु नाहि मिया मि तुमई। एपमभंतरयिपतणा मनुष्य सीहं मि- मि दुई । मानराणा नारकि दाविध भयनपति अष्टपिप गंतर पंपपिपी विध पमानिका सिंबहुना । रट अरष्ट शात अशात सुग भात स्पनन पान मित शा प्रत्यक्षि परांक्षि जे फेर जीप पतु. रानी सामानि अपना पतुर्गनिकि मंसारि भ्रमंता मई सुमिया पंचिया सहिया मरापिणा हमि मिदिय स्टिाभिगा दामिण पाण्यिा प्रक्रिया भषि भपांतरि भयमति भषसहनि भयटक्षि भवकोटि मनि पनि काई माह मदद मिष्यामि दुबई । भटार पापस्थान पोसिरापर इसपमाणा- विपान गर्न गृपापार गर्न भदशादान सर्च मन सर्च परिग्रह सर्च शोभू ग मान मा मापा सर्गभू प्रेमु पु फल अभ्याख्यान रति भरनि चन्यु मियादर्शनशल्यु परपरिवार अटार पापस्थान प्रिविधिहि मानि पनि माइपरणि फरारपि भनुमति परिहरउ । भतीतु निंदउ वर्तमान मंपरह अनागा पापराउ | पंचपरमेधिनमस्कार जिनशासनिसाम पतुर्दश- पूर्वरमुखा मंपादिनसकलकल्याणसंभार पिहितदुरितापहार द्रोपद्रव- पर्यतपममहार सीतादलिमसमा सु तुम्हि अनुसरह, जिणि कारणि चतु. शापूर्वधर चतुर्दशपूर्वसंयंधित पान परित्यजिउ । पंचपरमेष्ठिनमस्कार स्मरहि, मा तुम्हि पिशेपि स्मरयर, अनइ परमेश्वरि तीर्थकरदेवि इसउ भो भणियउ अच्छा, अनई संसारतणउ प्रतिभउ म फरिसर, अनह प्रस्नमसार इहलाकि परलोकि संपादिपद ॥ आराधना समातेति ॥ पसारे परिभ्रष्टं माशीनं प परन् । सन्तन्यं तपः सः कस्स न स्सरते मनः ।। संस्त् ११३० वर्षे बाधिनमुदि५ गुरावह आशापल्पाम् । अतिचार (सन् १३४० ना अरसाम राया जपाता तापमापी) कालवेला पठा, विनयहीण यहुमानहीणु उपधानहीण गुरुनिण्हव अने. कण्हा पगं, अनेरं कहई व्यंजनकूड अर्धफूह तदुभयफूड फूडउ अस्कर नह मात्रि आगलउ ओउ देवंदणवांदणइ पडिफमणइ सझाउ करतां ८८ प्राचीन गूगमारः पढतां गुणतां हुरहुगइ, माटु काई दुा, या भगवड कडा का ज्ञानोपकरण पाटी पायी फमली सांगुई मांगुढी आमानन पगु सागर लागउं पदतां प्रदेश मच्छर अंतराइड हाई कोचर हुई, नया बानन्युमा उपेक्षितु प्रज्ञापराधि विणाय विणासितां मोम्यं हुंनी मक्ति मारममा कीधिषद, अनेरह ज्ञानाचारिउ फोद अतीचाम सर सुश्मवादरु मनि व काइ पक्षदिवसमांहि तेह सवाहि मिच्ग मि दुकाई ।। सातमइ भोगोपनोगनति सचिरावन्यायिगर मासहाइ पाणही । फोफलि वइसणि आसणि समणि दाणुभइ अंगोहलि फलि फूलि भोज आच्छादनि जु कोइ अतिचाम हुयर पक्षदिवसमाहि यारि भेदिता छहि भेदि वाद्य अणसण इत्यादि उपवास आदि नीविय एकासणु पुरिमदृ न्यासणं यथाशक्ति ता, तथा ऊनोदरितपु नि संखेनु । रसत्यागु कायकिलेसु, संलेखना कीधी नहि, तथा प्रत्याख्यान एक सणां विपुरिम साढपोरिसि पोरिसिभंगु अतीचाम नीविय आंविध उपवासि कीधइ विरासई सचित्त पाणीउ पाउं हुयइ पक्षदिवसमाहि प्रतिपिद्ध जीवहिंसादिकतणइ करणि कृत्य देवपूजा धर्मानुष्ठानतण अकरणि जि जिनवचनतणइ अश्रद्दधानि विपरीतपनपणा एवं बहुप्रका जु कोइ अतीचारु हुयउ पक्षदिवसमांहि ॥ सर्वतीर्थनमस्कारस्तवन (संवत् १३५८ मा ठसायेला कागळना पुस्तकमांथी) पहिलउं त्रिकाल अतीत अनागत वर्तमान वहत्तरि तीर्थंकर सर्वपाप- क्षयंकर हउं नमस्कर। तदनंतरु पांचे भरते पांचे ऐरयते पांच महाविदेहे सत्तरिसउ उत्कृष्ट कालि विहरमाण हउँ नमस्कर। तर पहिलइ सौघम्मि देवलोकि बीस लाख, बीजइ ईसानि देवलोकि अट्ठावीस लाख, बीजइ सनतकुमारि देवलोकि वारलाख, चउत्यह माहेंद्र देवलोकि आठ लाख, पांचमइ ब्रह्मदेवलोकि च्यारि लाख, छह लांतकि नवकारल्याख्यानम् पलोकि पंचास सहस, सातमइ शुमदेवलांकि च्यालीस सहस, आठमइ हस्रारि देवलोकि छ सहस, नवमद आणति देवलोकि विसइ, दसमइ प्राण- देवलोकि विसर, इग्यारमह आरणि देवलोकि यारमइ अच्युतदेवलोकि वह दद् उदु सर, अनइ देठिले बिह अयेयके इग्यारोत्तम सर, माहिले अह अवेयके सत्तोत्तर सर, ऊपइले निह वेयकि एक सर, पंच पंचोत्तरवि- गराने, एवंकारद स्वर्गलोकि चउरासी लाख सत्ताणवइ सहस ग्रेवींस आगला जनभुवन यांदउँ । अनंतक भुवनपतिमझे असुरकुमारमज्झे चउसहि लाख, नागकुमारमझे घरासी लाख, सुवनकुमारमज्झे यहत्तरि लाख, यायकु- मारमझें उन्नवइ लाख, दीवकुमार दिसाकुमार अहिडकुमार विजुकुमार पुणियकुमार अग्गिकुमार छहं मध्यभागे छहत्तरि छहत्तरि लाख, एवंकारह पाताललोकि सातकोडि यहत्तरिलाग्य जिनमंदिर स्तवउं । अथ मनुष्यलोकि नंदीसर परि दीपि यावन्न, च्यारि कुंडलवल्गि, च्यारि रुचकि यल्गि, च्यारि मानुपौत्तरि पर्वति, च्यारि दक्षार पर्वति, पंच्यासी पांचे मेरे, वीस गजदंत पर्वति, दस फुरपर्वति, ग्रीस सेलसिहरे, असीय क्षारसेलसिहरे, सरि- सउ वैतादयपर्वति, एवं च्यारि सइ त्रिसहि जिणालइपडिम, पयं आठ कोडि छप्पम्न लास सत्ताणया सहस च्यारि सइ छियासिया तियन्लुफे गास्वतानि महामंदिर त्रिकाल तीह नमस्काम करउं॥ सतीर्थनमस्कारस्तम्नम् । नवकारव्याख्यानम् नमो अरिहंताणं ॥१॥ माहरउ नमस्कार अरिहंत हर। किसा ति अरिहंत; रागदेपरूपिआ अरि चयरी जेहि हणिया, अधया पतुपष्टि इंद्र- संबंधिनी पूजा महिमा अरिहइ; जि उत्पन्नदिव्यविमलकेवलज्ञान, पउग्रीस अतिशयि समन्वित, अष्टमहापातिहार्यशोभायमान महाविदेहि रोयि विहरमान तीह अरिहंत भगवंत माहरउ नमस्काम हर ॥१॥ नमो सिद्धाणं ॥२॥ महारउ नमस्काम सिद्ध हउ । किसा जि सिद्ध दृष्याष्टकर्मक्षउ फरिउ, जि मोक्षि ग्या। आठ कर्म किसा भणियह शानायर- जीउ दरिसणावरणीउ २ वेदनीउ ३ मोहनीउ ४ आयु ५ नामु ६ गोतु ७ अंतराउ ८ह आठकम्र्मक्षउ फरिउ जि सिडि ग्या। किमी ज मिडि; लोकतणइ अग्रविभागिपंचत्तालीस लक्षयोजनप्रमाणि जिस उत्ताणु मनु प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः तिसइ आकारि ज सिद्धिसिला, अमलनिर्मल जलसंकास जु अजरान स्थानु, तेह ऊपरि योजनसंवंधियइ चउवीसमह य विभागि जि सिद्ध अ- सुखलीण ति सिद्ध भणियइ । तीह सिद्ध माहरउ नमस्कारु हउ ॥२॥ नमो आयरियाणं ॥३॥ माहरउ नमस्कारु आचार्य हुउ । किसा आचार्य; पंचविधु आचारु जि परिपालइ ति आचार्य भणियइ । किसउ विधु आचारु । ज्ञानाचारु, दर्शनाचारु, चारित्राचारु, तपाचारू, वी चारु, यउ पंचविधु आचारु जि परिपालइ ति आचार्य भणिइ । त आचार्य माहरउ नमस्कारु हउ ॥३॥ नमो उवज्झायाणं ॥ ४॥ माहरउ नमस्कार उपाध्याय हुउ । कि- जि उपाध्याय, दादशांगी जि पढइ पढावइ । किसी ज द्वादशांगी; आच रांगु र सुयगड २ ठाणांगु ३ समयाउ ४ विवाहपन्नत्ति ५ ज्ञाताधर्मका उवासगदसा ७ अंतगडदसा ८ अणुत्तरोवयाइयदसा ९ पण्हवागरण विपास्तु ११ दृष्टियादु १२ ए बार आंग जि पदद पहावइ ति उपाध्य भणियह । तीह उपाध्याय माहरउ नमस्कारु हुउ ॥ ४ ॥ नमो लोग सव्यसाणं॥६॥ईणि लोकि जि केई अछइ साधु । पर लो पमिमा भणिपइ । अठाई बीपसमुद्र पनर कर्मभूमि ।जि किसी; पांच भर पांग परयन पांच महाविदह सेत्र, इह पनर कर्मभूमिमाहि जि के भक माथु । रिमा जि साधु; रत्ननउ जि सायद । किसउ रत्नपउ; ज्ञानु दश पारिष्ट्र या रत्लयर जि साधर ति साधु भणियह । तीह साधु पंचमा प्रनारिपाल। पंचमहावन किमा भाणपइ । प्राणातिपातु ? मृपाया अदनादानु ३ मैथुनु ४ परिग्रह ५ रानीभोजन । जि वियर नि सा भगिया । नाह माशु मर्यही माहरर नमस्काम हुउ ॥५॥ गमो पंच नमांकारी ॥३॥पर पंग परमधिनमस्कार I पंचपरमे धिमा । जि पूक्तिगिया अरिहंत ? मिड २ आचार्य ३ उपाध्याय मार इह पंचपरमेष्टिनमस्कार भावि क्रियमाणु हुंत किम कर।" मवानामा ॥ मानणाममारियाद ।णि आ मदुर्गनिति ममारि भरभ्रमण करताना नि भमुभलेशा पापा मलि पंचारमंटिनमन्यार महामंत्रि मुमरीता तर भा हुपर॥१॥ पलाय य ममि म झोर मंगलं ॥८॥णि मंगारि दरिदन- दिक मंगली नगियानाड मंगलीक महामांदिया मंगा ।

अधिभार निकागि सुनायादि पहिला सुमरवां, जिप ति कार्य पहत्तण भाषद निभा पा र नमरकाम अतीतभनागतपर्तमानपउयीसी- भादिजिनोगामार सुतुम्हे पिपहा हिवदानणह प्रस्तापि अर्धयुक्तु ध्येयु my पर पहुंचा किमा। जिणमामणम्म मारी पउदमपुज्याण जो समुहारो। जन्ममणे नवकारी मंगारो तस्स किं पुणह। अनद पन नमस्कार स्मरता इहलोकतणा भप नासह । मरा-भपिगिरिरममा भर्य पणासह नितिओ संतो। रस भरियामाई मापा जह पुत्तभंदाइ ।। पाहिजरजलणतधारहरिफरिसंगामविसहरभाहिं। नामंनि राणेणं सिणनयकारप्पभावेणं। हियागुहाए नपकारकेसरी जाण संठिओ निषं। फम्मलुगंटिदापटपटपं ताण परिनटुं ।। नमस्कारस्य स्वरूपं भण्यते । ईणि नवसरि नव पद पांच अधिकार सत्त- उहि अक्षर, तीहमाहिए भारी इकसठि लघु। इस नमस्कारतणउँमाहातम्यु। एमो मंगलनिलो भपविलओ सयलसंतिसुहजणओ। नववारपरममंती मंतियमित्ती सुहं देउ।। अप्पुल्यो फप्पतरू एसो चिंतामणी य अप्पुन्यो। जोसाइ मपलयालं सो पायद सियसुहं पिउलं ।। नवकाव्याल्यानं समाप्तम् ।। अतिचार. मंचन १३६९ मा लखेला वाहपत्रमांधी. तर तुम्हि ज्ञानाचार दरिसणाचार चारित्राचार तपाचार वीर्याचार चिरिधभागारविषया अतीचार आलोउ । ज्ञानाचारि कालयेला पदिउ णि विनयहीनु यहुमानहीनु उपधानहीन गुरुनिन्दपु अनेरीकन्हइ पदिउं ननेरउ फदिड व्यंजनकूट अक्षरफूट कानद मात्र मागलउ ओर देववं. (पद पडियमणइ सन्माओ करतां पढतां गुणतां हुओ सुइ, अर्धकूट तदु- स्पस्ट, ज्ञानोपकरणि पाटी पोधी ठवणी कमली सांपडा सांपडी पति आसा- निा पगु लागउ धुकु सागउ पडतां गुणतां प्रदेपु मच्छरु अंतराइ हर कोपर्ड गरगहल: मन्टपररपरटी मांग कटारी अरदः पायदा पतलार ९२ जाधि मियान्यु यतावित कृती संस्थापिट, मार्ग प्रापिर, मन्माण भवति । हिमाति मल्दि सरीफ युदंयु तु पापि प्रतिउ, नि अंगइरमानुटाननाद विषद नुसतमु कीपर मुभम्हारर माओ! प्राचीनगूर्जरकाव्यसवाहः हुइ भवसगलाहइमांहि तेह मिच्छा मि दुमदं । मृपावादि सहसानयार आलु अभ्याख्यान दीयउं, रहसमंत्रभेदु कीधइ, मृपोपदेसु दीघउ, कुडउ रेनु लिखिउ, कुडी साखिधापणि मोसउ, कुणहइसउ राडि भेडि कलहु विद्वाविधि, जु कोइ अतिचारु मृपायादि प्रति भवसगलाइमाहि हुइ त्रिविधि विचित्र मिच्छा मि दुफडं। अदत्तादानि विराइउं छानउं फोटु लीयउं दीघउं वावर घरि वाहिरि खेत्रि खलइ पाडइ पाडोसि अणमोकलाविउ चोरीच्छाई पर प्रति प्रयोग कीघउ, नवउं पुराणउ रसु विरसु सजी निजी मेलिजे, की तूल कूडइ थापि कूडउ कहिउ हुइ, अतीचारु अदत्तादानि व्रति भवसगटार- माहि हुउ तेह सवहइ मिच्छामि दुकहमैथुनबति लुझुडपणि आपणा विराम सील संडया सिउणइ सिउणांतरि, दृष्टिविपर्यासु, आठमि घउसितणा से मभंगु, अनंगक्रीडा परविवाहकरण तिमिलापु धरिउ हुइ, अनेराज में अतिचा मैथुनप्रति भवसगलाइमांहि हुअउ तेह सवहह प्रिविधि विग्रिी मिच्छामि दुपदं । हब हियामाहिं सम्यक्त्व धरउ । अरिहंत देवता, सुसा गुरु, जिणप्रणीतु धर्मु, सम्यक्त्यदंडक ऊचरउ । हिव अठार पापस्थानक यो मिराया। सा प्रमाणातिपात, सर्व मृपावाद, स। अदत्तादान, सर्दू मैथुन, मां परिग्रह, समाधु, समानु, सई माया, सर्व लोभ, रागु, येषु, कलह, अभ्या मानु, पैशुन्य, रति,भरति, परपरिवान्, मायामृपावाद, मिथ्यात्वदरिसमा सन्युपारपापस्थान मोक्षमार्गसंसर्गवियनसमान त्रिविधि निविधियोसिस पा, अनीतु निंदर, अनागतु पयरकर, वर्तमान संवरु । सागाम्पत्याम्गानुर। ममि म्यमावि मई ग्पमिउ छव्विह जीवनिकाय । सिद दिप्ता लोयणा नइ मह यह न पावु ! हिय दानगरिहा करीनु अणादि संसारमाह होइतइ हुतर नि देवि पहा महिमा भावना की, नीता नाना फीधी, पुन सिमामा, मायमिकवा, तानाम देवयंदन यांदणार मा पनि भारतापूर्वअनुमोदर पृथ्वीचन्द्रचरित्र ( वाग्विलास) . या विश्वकल्पवहीवल्लीलया कल्पितप्रदा। प्रदत्तां वाग्विलासं मे सा नित्यं जैनभारती ॥१॥ धर्मचिन्तामणिः श्रेष्ठो धर्मः कल्पद्रुमः परः । धर्मः कामदुधा धेनुर्द्धमः सर्वफलमदः ॥२॥ पुण्यलगइ पृथ्वीपीठि प्रसिद्धि, पुण्यलगइ मनवांछितसिद्धि; पुण्यलगद लघुद्धि, पुण्यलगइ धरि ऋद्धिवृद्धि; पुण्यलगह शरीर नीरोग, पुण्यलगह अभं- भोग; पुण्यलगह कुटुंबपरिवारतणा संयोग, पुण्यलगा पलाणीयई तुरंग, पुण्ण. ६ नवनया रंग; पुण्यलगइ घरि गजघटा, चालतां दीजई चंदनछटा; पुण्य- गइ निरुपम रूप, अलक्ष्य स्वरूप; पुण्यलगइ यसिया प्रधान आवास, तुरंगम- णी लास, पूजई मन चीतवी आस; पुण्यलगह आनंददापिनी मूर्ति, अनुत कृत्तिः पुण्यलगइ भला आहार, अद्भुत भंगार; पुण्यलगह सर्वत्र बहुमान, घणं किस्युं कहीपद पामीयह केवलज्ञान। पह पुण्यऊपरि राजाधिराज पृथ्वीचंद्रता कथासंबंध भणीपर । सा ईगई राजुप्रमाणि रत्नप्रभाथ्यीपीठि असंख्याता दीप समुद्र पसई । साह माहि पहिलउ जंबूद्वीप लक्षयोजनप्रमाण जाणियः । तेह पापलि लपणामुन दिलक्षयोजनप्रमाण जाणिवातेहपरबंधातीखंडीप च्यारिलक्षयोजनप्रमाण जाणियउ । तेह पापलि कालोदधि समुद्र आठलक्षयोजनप्रमाण जाणिपउ तेद परई पुफरवरदीप सोललक्षयोजनप्रमाण जाणियउ । तेह पापलि पुष्करप. । रसमुद्र वत्रीसलक्षयोजनप्रमाण जाणियउ। आगलि पारणिोप ६४ सक्षपी. जनप्रमाण जाणियउ।तेह पापलि पारणीसमुद्र एककोडि २८सक्षपोजनमाण जाणिवउ । ईणिपरि ठाण विमणा दीप समुद्र जाणिपउ । कयण कपणाक्षार- योप क्षीरसमुद्र घृतदीप पृतसमुद्र इधुदीप भुसमुद्र नंदीसररसीप नंदीम- रसमुद्र अरुणदीप अरुणसमुद्र अरुणवरदीप अरुणवरसमुद्र अरणपरायभाग. दीप अगणरायभाससमुद्र इत्यादिक योपसमुद्र असंख्यात । तहमाहि पहिल जे जंगीप, तेहनी नाभि मेपर्यंत जिसिर प्रदीप, तेहतुं दक्षिण उत्तर सातक्षेत्र पजद महानदी पपंधर पर्वत पर।

९४ सयलदेश जाणिवा । ते कुण कुण कादमीरदेश १ कीर २ कावेर ३ कांबोज ? प्राचीनगूर्जरकाव्यावहः किसा ते क्षेत्र । भरतक्षेत्र ? हेमवतक्षेत्र र हरिवपक्षेत्र ३ महाविदहक्षेत्र । रम्यकक्षेत्र ५ ऐरण्यवतक्षेत्र व परवतक्षेत्र ७। किसी महानदी। गंगा ? नियु: रोहिताशा नदी ३ रोहिता ४ हरिकांता नदीहरिसलिला नदी ६ सीनादा सीतानदी ८ नारीकांता ९ नरकांता १० रूप्यकूला नदी ?? सुवर्णकुटा नदी ।' रक्तवती १३ रक्तानदी १४ । किस्या किस्या वघर । हिमवंतपर्यंत ? महा हिमवंत २ निपघ ३ नीलवंत ४ समीपर्वत ५ शिमरीपर्वत । हिब जे कहि भरतक्षेत्र तेहमाहि २५ योजनप्रमाण वैताठ्यपर्वत ३२ सहस्र देश। साहापंचवीसदेश आर्य,थाकताअनार्य जाणिया। कमल ५ उत्कल ६ करहाट ७ कुरु ८ काण ९क्रय १० कौशक ११ कोसल । केशी १३ कास्त १४ कारूप १५ कछ १६ कर्णाट १७ कोकट १८ केकि ? कौलगिरि २० कामरूप २१ कुंकण २२ कुंतल २३ कालिंग २४ करकूट . करकंठ २६ केरल २७ पस २८ पर्पर २९ पेट ३० गोड ३१ अंग ३२ गोप्य गांगक ३४ चौड ३६ चिल्लिर ३६ चैत्य ३७ जालंधर ३८ टंकण ३९ कोहि याण ४० डाहल ४१ तुंग ४२ ताजिक ४३ तोसल ४४ दशाण ४५ दंडक ४ देवसभ ४७ नेपाल ४८ नर्तकर पंचाल १० पल्लव २२ पुण्ड्र ५२ पांडु १ प्रत्यग्रथ ५४ अर्बुद ५५ वभ्रु ५६ वभौर १७ भट्टीय ५८ माहिष्मक ५९ महो दय ६० मुरुंड ६१ मुरल ३२ मेद ६३ मा ६४ मुद्दर ६६ मंकन ६६ मल्लवत है। महाराष्ट्र ६८ यवन ६९ रोम ७० राटक ७१ लाट ७२ ब्रह्मोत्तर ७३ ब्रह्मावत ७४ ब्राह्मणवाहक ७५ विदेह ७६ वंग७७ वैराट ७८ वनवास ७९वनायुज वाल्हीक ८१ वल्लव ८२ अयंति ८३ वहि ८४ शक ८५ सिंहल ८६ सुन्ह सूपर ८८ सौवीर ८९ सुराष्ट्र ९० सुहड ९१ अस्मक ९२ हूण १३ हाँक ९४ हर्मोज ९५ हंस ९६ हुहुक ९७ हेरक १८ एवं देश अढाणू अनइ आदन हावत मुगदिमुं धनगिरि सोकोत्तर चोलनाट पांडा तालीउ बिहति भोट महाभोट चाण महाचीण बंगाल पुरसाण माधवच्छ गाजणाप्रमुप अनेक देश यत्त । तोहमाहि पपाणीयइ मरहट्ठदेस। जीणइ देसि ग्राम, अत्यंत अभिराम् 'मलां नगर, जिहां न मागीयई कर । दुर्ग, जिस्या हुइ स्वर्ग; धान्य, न मीप जइ सामान्य; आगर, सोनारूपातणा सागर । जैह देसमाहि नदी यहई, लोक सुपई निर्वहई । इसिउ देश, पुण्यतण निवेश, गरूअउ प्रदेश । तीणि देखि पहुटाणपुर पाटण वर्तई; जिहां अन्याय न वर्तई। जीणई नगरि कउसीसे करी सदायर पापलि पोढर मार; उदार, प्रतोली मार; पातालभणी धाई, महा- ९५ पृथ्वीचन्द्रगरिन पाई, समुद्र जेहतु भाईजे लिइ कैलासपर्वतसिउं वाद, इस्या सर्वज्ञदेव- प्रासादा फरइं उल्लास, लक्षेश्वरीकोटीध्यजतणा आवास; आनंदहं मन, के राजभवन; अपरि अपंड, सुवर्णमय दंड, ध्वजपटल लहलहहं प्रचंड । पाटणमाहि अनेक आदर्य वापरई, चउरासी चउहा कलकलाट करई। स्यां ते पउदा सोनीही १ नाणायटहटी २ जवहरीहटी ३ सौगंधीयाहटी फोफलिया ५ सुप्रिया ६ पडसनिया ७ घीया ८ तेलहरा ९ दंतारा १० हीयार ११ मणीयारहटी १२ दोसी १३ नेस्ती १४ गांधी १५ कपासी १६ डीया १७ फडीहटी १८ एरंडिया १९ रसणीया २० प्रवालीया २१ प्रांवहटा २ सांपडा २३ पीतलगरा २४ सोनार २५ सीसाहडा २६ मोतीमायां २७ बालपी २८ मीणारा २९ फुआरा ३० चूनारा ३१ तूनारा ३२ फूटारा ३३ इलीपारा ३४ परोयटा ३५ घांची ३६ मोची ३७ सुई ३८ लोहटिया ३९ होदारा ४० चीमाहरा ४१ सतृारा ४२ कागलीया ४३ मद्यपहटी ४४ वेश्या ४९ पणगोला ४६ गांचा ४७ भाडभुंजा ४८ वीवाहडा ४९ प्रांवडीया ५० भईसायत ५१ मलिन नापित ५२ चोपा नापित ५३ पाटीवणा ५४ त्रांगडीया ५५ वाहीना ५६ काठवीठीया ५७ चोपावीठीया ५८ सूपडीया ५९ साधरीया ६० तेरमा ६१ वेगडीया ६२ वसाह ६३ सांधूभा २४ पेरूआ ६५ आटीआ६६ दालीपा ६७ दउदीआ ६८ मुंजकूटा ६९ सरगरा ७० भरधारा ७१ पीतलहडा ७२ कंसारा ७३ पत्रसागीआ ७४ पासरीआ ७५ मंजीठीया ७६ साकरीया ७७ सागर ७८ लोहार ७९ सूत्रहार ८० यणकर ८१ तंबोली ८२ कंदोई ८३ युद्धि- हटी ८४ फुनिकापणहटी एवं चउरासी घउटा जाणिवा । जीणई नगरि अनेक पामीयई रत्न, जीहतणां कीजई यत्न । किस्यां ते ल। अश्वरल गजरत्न पुरुपरत्न स्त्रीरल अनइ पद्मराग पुष्पराग माणिक घिलिया गुरुडोद्वारमणि मरकत कर्केतन बन चैडूर्य चन्द्रकांत सूर्यकांत जालकांत शिवकांत चंद्रप्रभ साकरमभ प्रभानाध अशोक चीतशोक अपराजित गंगोदक मसारगल हंसगर्भ पुलिक सौगंधिक सुभग सौभाग्यकर विपहर धृतिकर पुष्टिकर शत्रुहर अंजन ज्योतीरस शुभरुचि शुलमणि अंशुकालि देवा- नंद रिष्टरत्न कीटपंखि कसाउला धूमराइ गोमूत्र गोमेद लसणीया नीला तृण- पर स्वइगइ यत्रधार पट्कोण कणी चापडी पिरोजा प्रवाला मौक्तिमममुख रत्नेकरी दोसई भरियां हाट, अनेकसुवर्णमय घाट; पिहुली बाट, पालइ घोडा- तणां घाट, लोकनई नहीं किसिउ अचाट । जिहां पुण्य विशाल, तीसी पोसाल, .

किनार, परिदरा;श पहराता महारास मायामा ९६ निरूपित, पादरहि नहीं कूडउ; राउलउ अर्थ सारई, लोक उगारण, पपरविग्रह यार पालर दीन दृस्थित निराधार, करद साधुजन उपगारभाषि भन्यदा दानावि राता रानितगई प्रस्तावि स्वप्न एक दीर, नाना लाभगंत मोट। किमते स्वप्न । इमिडं जागइ नरेश्वर रापणार मानव अमर धिमिर राप्नता पर विधार, लामाला रिहा गलिकण नगर आंसर शुभा नियलितगादांमार, Pांगाय र: नशम्य मांगटिपनि, गता भानंदिर मनिभहनुमा प्राचीनगृजरकान्यसङ्घः जिहां छात्र पढई चउसाल, तिसी नेसाल; जिहां अध्यात्मतणी वात दृद्ध, अनेक मद; जिहां लोक जिमई अपार, तिसा सकार; जिहां तिसी पर्व; जिहां रमलि कीजई स्वभावि, तिसी वावि; जिहां आनंद तिसा कृभा; पद्मवनखंडमंडित प्रवर, महाकाय सरोवर; जिहां रंगि को रयवाडी, तिसी वाडी; जिहां सीतल फुरकइ पवन, तिसां पापलियां वन एवं अन्यायरहरं दाटण, पृथ्वीपीठि प्रसिद्ध पुहिठाणपुर पाटण । तीणि पाटणि राजाधिराज पृथ्वीचंद्र इसिई नामिइं राज्य प्रतिशत भुजबलिकरी यइरी वर्ग दालई । जीणि राजा गौडदेशनउ राउ गांजिर, में टनउ भांजिउ; पंचालनउ राउ पालउ पुलई, कानडादेसनउ कोठारिका ढोरसमुद्रता दोषणां दोयइ, वावरउ वारि बइठउ टगमग जोय; चौडनउ दी चांपिउ, कास्मीरनउ कांपिउ; सोरठीयउ सेवइ, तुडि न करई देवा, अंगरे सनउ अंगि ओलगद, जालंधरना जीवितव्यकारणि रिगद; घj कित्युंगो गा, रिपुकुटम्टकेतु शरणागतयनपंजर पंचम लोकपाल । जीणं रिपु सोनि पांयां दुर्ग सर्व आपणा कीधा, ययरीनई देसवटा दीया । इसिउं निकंटकर प्रान्य प्रतिपाता। तेह नरेश्वरनई बुद्धिनिधान, परमहंसनामि प्रधान; लेउसी मानिन अपार, गहिर गंभीर, अतिहिं धीर; मुहि मीठ भाप, गति चिटु युरितण निधान, सवितुं अमात्यमाहि मूलिगु प्रधान गाना तिवारीर, इमिडं ते मंत्रीधर; नरेन्चररहई, शियमप सुरमय * स्मा दियम भतिक्रमई। ति, देवर मन भ्रांति; पलकते नारि हालात बलि हाधि परमात भासमभान विशाल, इमा बालदेवाशपाल जनता सानो वरमाला टिलि नागी, तनलाई गगनां निता भागी; जागिर .

पृथ्वीचन्द्रचरित्र सिउ विनोद नीपजाव्या पण्इ लानमननादिक प्रभातकरणीय की, याचकर- हह दान दीघ । ति वारे गणनायक दण्डनायक पायक पृत्तिनायक यहीवाहक तलवर माडम्बिक कौटुंविक इन्द्रजाली फूलमाली घातुर्यादी मन्तवादी तन्त्र- चादी यन्त्रवादी कपटाइत चपटाइत अगरक्षक अगमर्दक मीटावाला सुहावी- ला कधायोला साचाबोला जूठायोला अनइ अनेक राजराजेन्चर मण्डलेवर सा- मन्त तंत्रपाल तलयर्ग परासीया महामात्य मन्त्रीश्वर श्रीगरणा ययगरणा धर्माधिगरणा सेनाधिपति आगरीया व्यवहारीया राजयारिक भण्डारी कोठारी कापडभण्डारी पूगभण्डारी रसोईया पाणहरी प्रेष्ठि माधवाह पीटमद गरवधू वीणकार वंशकार उतिकार आउजी पग्याउजी पटाउजी भाटयणम्पर टाक्षणिक तार्किक छान्दसिक मुग्वमागलिक पैच ज्योति पाहरी पायर इन्तधर धनुर उधर वालकहार सेजपाल धईगात पण्डित कवि लेगा मेघ महापोध माल मसाहणी पाण्डप पख्तारममुग्णसालाहोकि फरी मीर राजा राजसभां बईठा। राजसभा किसी छ । जीणि राजसभा समजलि एटा दाधीका, पेपिधमुक्ताफलि चतुष्क परिया राई, करितणा शग्न आलिया, कृष्णा रजवाधितणा परिमल महमहई छई, मोतीतणी मिरि पहलालागर गरिया पर, कटीममाणपायपीटगंपुरत गुरुपममाण सुपर्णमए मिहागन दिडं गई। तीणि सिंहासणि राजा बहटा । पिसर राजा दीगर or, स्तिकि येतातपत्र ए पास दलई पामर पवित्र, पाज विधिर वादिर स्तकि मुगट, कानि कुण्डल, हृदयि हाराहार, महाउदार, पनवनगा क्यतार, रूपतणु भण्डार । पण फिसिपहीपद । जिगर MRITTE र, जिस सोलकलासम्पूर्ण पन्द्र, इसउदीमा पाप नन्दा सिद अपसरि प्रतीहार आपिउ प्रणाम नापजाघिउ । राजांगीर रोधी, ऊणि पीनती फीधी जी अयोध्यानगरीतर इन तम्हारा सारांवर विउ मनितणई उत्साहि, जाहर आहेस तु मल्हा माहिर राहा. णि आदेस, दूति कीघउ सभामाहि प्रयेस । रामरहा पंधर शहार, भवं रि योग्य आसण उदार । राजा दसरहा बहुमान दाय, रान मध परं । आनन्द अपनउ अस्पन्न, हिप दूत पानवर कार्य विसपना जहां लोरर नही शिमिश, जिहा नही बहरीनपा प्राण्यापार देवशा अनेक प्रामनगर, सानारूपाला भागर मनोहर पप रोमलान ।

नेस्ती साह वसाह पटउलीया पडसूत्रिया पजूरीआ वीजरीआ कणसारा भग- रोवर नइ नीक निरुपम उद्यान आंव नींब जांबू वीर बीजपूरप्रमुख वृक्षावली करी प्रधान च्यारि पोलि, प्रधान कोसीसातणी ओलि, प्रभातसमइ सूर्यतये किरणेकरी प्रासादतणे शिपिरि घजकलश झलकइ, घजऊड ललका । घणउं किसूं कहीइ, जिसी होइ अमरावती भोगावती अथवा अलका लंका इसी नगरी अयोध्या पाणीइ । तीणि नगरी ईक्ष्वाकुवंशावतंस विहितवयरीकुलविध्वंस निजकुलकमलराजहंस अतुलवल पराक्रम त्रिवि. वाहिनीसमुद्री घणउ किशिउ कहीइ महासासनु अरडकमल्ल जगझंपणउ प्रता पधानि स्त्री कमललोचना इसिहं नामि पहराज्ञी वर्त्तइ । जेह राणी, सहिजि प्राचीनगरमागमः। तिहां छई नगरी अयोध्या । किसी ते नगरी । धनकनकसमृद, एक पीठि प्रसिद्ध अत्यंत रमणीय, सकललोफरगृहणीयः पृथ्वीरूपिणीकामिनीरह- ई तिलकायमान, सर्वसौंदर्यनिशान; लक्ष्मीलीलानिवाम, सरस्वतीतगउ भर वास; अतुलदेवकुलि मंडित, परचकि अखंडित, सदा सुठारि पारित, रन पराजमार्गि शोभित, उत्तंगप्राकारवेष्टित; सदा आधयंतणउ निलय, वसुमार नितायलय, निरुपमनागरिकतण ठाम, मनोभिराम; जनितदुर्जनक्षोभ, सत्र नोत्पादितशोभ; पुरुपरत्नोत्पत्तिरोहिणाचल, कुलवधूकल्पलतारत्नावलाजांड नगरी देवगृह मेरुशिपरोपमान, धवलगृह स्वर्गविमानसमान; अनेक गवाह येदिका चउकी चित्रसालीजाली निकलसां तोरण अवलगृह भूमिगृह भांडागार कोष्ठागार सत्रागार गढ मढ मंदिर पडयां पटसाल अवहटा फडहटा दंडकलन आमलसार आंचली पंदरपाल पंचवर्ण पताका दीपई । सासर मंत्रोसर मांजणहरा सप्तदारांतर प्रतोली रायंगण घोडाहाडि अपाडउ गुणणी रंगमंडन सभामंडपसमूहि करी मनोहर एवंविध आवास । जेह नगरिमाहि दोस्ती सारा मपारा नवकर भोजकर भला लामा अनेक लोक वसइ । पांचसई व्यवः साईया व्यवसायविषइ उल्लसइ । जेह नगर पापलीया अनेकि कूया वाविस क्रमसमान राजा श्रीसोमदेव राज्य प्रतिपालइजा संसालइ, अन्याय टालइ जे राजा सत्ययाचा राजा श्रीहरिचंद प्रतिज्ञा राजाश्रीयुधिष्ठिर निर्भय भीम आपन्न जीमूतवाहन विद्या बृहस्पति लावण्य लवणार्णव रूपि कंदर्प मात्तंड औदापि वलि राजा अद्भुतदानि चिंतामणि सेवकजनकल्पवृक्ष चतुरंग: पलकेचर परराष्ट्रीरायहृदयशल्य इसिज प्रतापी राजा राज्य प्रतिपालइ । तेह राजातणउ अंतःपुरिमाहि प्रधान गुणनिधान भारतणी भक्तिविषय महासा: प्रताप १०१ पृथ्वीचन्द्ररित्र सोमशर्म श्रीधर देवधर गंगाधर गदाधर लक्ष्मीधर श्रीवच्छ पद्मनाभ पुरुषो- तमप्रमुख प्रारमण मिलिया, शांति करिवानई कारणि कलिकलिया; गले ग्रागा, ध्वनि उपरिवा लागा। जे ब्रामण १८ पुराण १८ स्मृति जाणः । ते किस्या पुराण । भागवतपुराण १ भविष्योत्तरपुराण २ मत्स्यपुराण ३ माकंडेयपुराण ४ विष्णुपुराण ५ वाराहपुराण ६ शियपुराण ७ वामनपुराण ८ ग्रामपुराण : ब्रह्मांडपुराण १० ब्रामवैवर्तपुराण ११ आग्नेयपुराण १२ पद्मपुराण १३ लिंग- राण १४ नारदपुराण १५ स्कंदपुराण १६ कूर्मपुराण १७ गडपुराण १८ । ते किसी स्मृति। मानवीस्मृति १ आत्रेयीस्मृति २ वैष्णवीस्मृति ३ हरीतकोस्मृति ४ याज्ञवल्कीस्मृति ५ शयरीस्मृति ६ अंगिरास्मृति ७ मापस्तंवीस्मृति ८ सांपर्तकीस्मृति ९ कात्यायनीस्मृति १० बृहस्पतीस्मृति ११ पारासरीस्मृति १२ शंग्वीस्मृति १३ लिखितास्मृति १४ दाक्षीस्मृति १५ तिमीस्मृति १६ शातातपीस्मृति १७ पाशिष्ठीस्मृति १८ । तिसिहरसामंजरी कुंभरि राजारहइं पीनती करावी, तिहां कुतिग जोया गयी । जेहतगइ परिचारि, सपी अनेकमकारिकस्तूरिका करिका लीलावती भापती चंद्रावती चंद्रउली पंपू हंसी सारसी यगुलीप्रमुख अनेक मपी पसंद। हं सहित तिहां आयी । पितारहई प्रणाम नीपजापी उत्संगि यहठी, दिव्य प देपो रायतणइ मनि चिंता पाठी । एहयोग्य फयण पर, किं नर, किंथिया र, इसी चीतवतई नरेश्वर, सरोवरभणी दृष्टि दीधी । तु निर्मल जन्टि, पाठा मलि; हंस फरई रमलि, च्यारह दिसि पासीई परिमलि; फारंट कुज कन्द सफलगल,ताप टल मोरयास,सर्प नासा; आडि पंपमा सरर, प्रामा गन करई, माहि शतपन सहस्रपत्र फमलयन, दीमतां प्रीति पमारमना देहरी डालस झालहला, लहरि ऊपलम् । इम जोता राजहंस एक सरोवराहता जी स्टर राजातण हाधि, निहालिउ नरनाधिातु रूडउ रूपवंत, सतीपामगा, हामणरावेत, लापण्योपेत जिसि लक्ष्मीदेवनातणउ पमर, जीण माही- अमर, कुंदकुसुमस्तयकसमान प्रधान पक्षिरुलावतंस । इमिउ हंस कुति- करी कुमारी लीपउ, राजा दीपउ तिला जोभा कुमरी, संतला मि जमणी पाप पिस्तारी; एमरि पापमाहि पाती, भलीपरि साती । आदिउहंग, साल पडिउ ध्यसुगसमसतर अठिउ राइ, बाहर भाउ पाउ, पनिरनी. णि घाउ । राउतपायक पलभलिगा, पार गरि मिनिगा। पागणा, माप १०० प्राचीनगरकान्यसह। ५९ लोकव्यवहार ६० वशीकरण ३१ वारितरण ३२ प्रभप्रहेलिकाज्ञान है धर्मध्यान ६४ ए कहीयई सर्वकलाविज्ञान, जाणइ सकल शाम्न वपागड चउसहि विज्ञान । इति श्रीमश्वलाच्छे श्रीमाणिक्यमुन्दरमूरिविरचिते श्रीप्वीचन्द्रचरित्र वाग्विलासे प्रथमोल्लासः। दितीयोल्लासः हिव ते कुमरि, चडी यौवनिभरि; परिवरी परिकरि, क्रीडा करह नवनवी परि । इसिई अवसरि आविउ आपाट, इतरगुणि संबाढ; कादइयर लोह, घामतणउ निरोह; छासि पाटी, पाणी वीयाइ मारी; विस्तरिड वर्षाकाल, जे पंथीतणउ काल, नाठउ दुकाल । जीणिइ वर्षाकालि मधुरध्वनि मेह गाजह, दुर्भिक्षतणा भय भाजइ, जाणे सुभिक्षभूपति आवतां जयहक्का वाज चिहुं दिसि वीज झलहलइ, पंथी घरभणी पुलह, विपरीत आकाश, चंद्रसूर्य पारियास; राति अंधारी, लवई तिमिरी; उत्तरनउ ऊनयण, छायः गयण; दिसि घोर, नाचई मोर; सघर, वरसइ धाराघर; पाणीतणा प्रवाह पलहलई, वाडिऊपरि वेला वलई, चीपलि चालतां शकट स्खलई, लोकतणां - मन धर्मऊपरि यलई; नदी महापूरि आवइं, पृथ्वीपीठ प्लावई; नवां किसलय गहगहई, वल्लीवितान लहलहई; कुटुंबीलोक माचइ, महात्मा बइठां पुस्तक वाचई पर्वततउ नीझरण विछ्टइं, भरियां सरोवर फूटइ । इसिइ वर्षाकाठि राजा सोमदेवतणउं करावि सरोवर भराणु, समुद्रसमाणउं; वधावी धायड़, राजाकन्दइ आय3; राजा मनि गहगहतर, सरोवर जोइवा पुहुत दीठउं भरिउं सरोवर, अपनउ आनंदभर; जोसी तेडी महोत्सवतणुं मुहृत्त लीघउं, अभीष्ट जनरहई तेड कीघ; इसि करतां आविउ आसो मास,दिसि समकास; कमलवन उल्लास, हंसतणु विलास; कादव सूकई, नइ निरर्गलपण मूकई विकसई कुसमकली, परमेश्वर सर्वज्ञ पूजतां पूजइ मनतणी रली; तिसिइ आसोसुदि पंचमीतणइ दिवसि मोटइ आडवरि नरेश्वर सरोवरती पालि पुहुता, धजपट दीसइ लहलहता। ब्राह्मण मिलिया । कवण कयण । दुवे त्रिवादी व्यास सराईत चंद्राईत देवशम्म मोपशम यज्ञशम्म, १०१ पृथ्वीचन्द्रचरित्र सामशर्म श्रीधर देवधर गंगाधर गदाधर लक्ष्मीधर श्रीवच्छ पद्मनाभ पुरुपो. त्तमनमुख प्रात्मण मिलिया, शांति करिवानइं कारणि कलिकलिया; गले वागा, ध्यान उचरिया लागा। जे ब्रामण १८ पुराण १८ स्मृति जाणइ । ते किस्या पुराण । भागवतपुराण १ भविष्योत्तरपुराण २ मत्स्यपुराण ३ मार्कंडेयपुराण ४ विष्णुपुराण ५ वाराहपुराण ६ शिवपुराण ७ वामनपुराण ८ ब्रह्मपुराण ९ अम्मांडपुराण १० प्रात्मवैवर्तपुराण ११ आनेयपुराण १२ पद्मपुराण १३ लिंग- पुराण १४ नारदपुराण १५ स्कंदपुराण १६ कूर्मपुराण १७ गरुडपुराण १८ । ते किसी स्मृति। मानवीस्मृति ? आत्रेयीस्मृति २ वैष्णवीस्मृति ३ धरीतकोस्मृति ४ याज्ञवल्कीस्मृति ५ शनैश्चरीस्मृति ६ अंगिरास्मृति ७ भापस्तंवीस्मृति ८ सांवतकीस्मृति ९ कात्यायनीस्मृति १० वृहस्पतीस्मृति ११ पारासरीस्मृति १२ शंग्वीस्मृति १३ लिखितास्मृति १४ दाक्षीस्मृति १५ तमीस्मृति १६ शातातपीस्मृति १७ वाशिष्ठीस्मृति १८ । तिसिह रत्नमंजरी कुंभरि राजारहई वोनती करावी, तिहां कुतिग जोइया गयी । जेहतणइ परिवारि, सपी अनेकमकारि; कस्तूरिका कर्परिका लीलावती मायती चंद्रावती चंद्रउली चंपू हंसी सारसी वगुलीप्रमुख अनेक सपी वर्तइ । हिं सहित तिहां आयी। पितारहरं प्रणाम नीपजाची उत्संगि वहठी, दिव्य र देपी रायतणव मनि चिंता पहठी। एहयोग्य कयण यर, कि नर, किं विद्या. इसीउं चीतवतई नरेन्चर, सरोवरभणी दृष्टि दीधी । तु निर्मल जलि, वहठा लि; हंस करई रमलि, च्यारद दिसि वासीहं परिमलि; कारंड कुरंज कल- (कलगराई,ताप टल मार पासई,सर्प नासह आडि पंपीआ तरई, मायण न करई, माहि शतपन सहस्रपत्र कमलवन, दीसतां प्रीति पमाडहंमन देहुरी कलस झललई,लहरि ऊछलई । इमजोतां राजहंस एक सरोवरहंतउ उडी उ राजातणई हाथि, निहालिउ नरनाधि।तु रूडउ रूपवंत, स्लीयामणर, हामणरश्वत, लावण्यापेत जिसिरं लक्ष्मीदेवतातणउ चमर, जीणहं मोही- अमर, कुंदकुसुमस्तवकसमान प्रधान पक्षिकुलावतंस । इसिर हंस फुति- ती कुमारी लीघउ, राजा दीघउ । जेतलइ जोगह कुमरी, तेतला हमि णी पाप विस्तारी; कुमार पांपमाहिघाती, भलोपरि साती। ऊपडिउ हंसु, तत्काल पडिउ ध्वंसु । धसमसतउ ऊठिउ रार, कहइ धार धाउ, पलिउ नी. माणि घाउ । राउतपायक पलभलिया, बीर मवि मिलिया। पाई राणा, ब्राह्मण प्राचीनगराणमार। ५. लोकल्यवहार ३० वशीकरण ३१ मारिनरण ३२ प्रभाडेनिमामान 15 धर्मध्यान ३४ प कहोगई मालाविज्ञान, जागर साल शान्त्र या पाउसहि विज्ञान इति श्रीमथला श्रीमाणिगुपगमगीयो भारतीय वामिलामे प्रलोपामः द्वितीयोल्लासः हिय ते कुमरि, पी यौनिभरि; परिवरी परिकरि, फ्रीडा कर नवनयी परि । इसिहं भवसरि आविउ आपात, इतरगुणि संबात, काहय लोह, घामतणउ निरोहा छासि पाटी, पाणी योयाइ माटी; विस्तरिय वर्षाकाल, जे पंधीतणउ काल, नाठर दुकाल । जाणिइ याकालि मपुरध्वनि मेह गाजइ, दुर्भिक्षतणा भय भाजद, जाणे सुभिक्षभूपति आयतां जया वाजइ चिहुं दिसि वीज झलहलह, पंधी घरभणी पुलका विपरीत आया, चंद्रसूर्य पारियास; राति अंधारी, लवई तिमिरी; उत्तरनउ ऊनयण, छायः गयण; दिसि घोर, नाचई मार; सघर, यरसइ धाराघर; पाणीतणा प्रवाह पलहलई, वाडिऊपरि वेला बलई, चीपलि चालतां शट स्थलई, लोकतणां मन धर्मपरि वलई; नदी महापूरि आयई, पृथ्वीपीठ लावई; नयां किसलय गहगहई, वल्लीपितान लहलहइं; कुटुंबीलोक माचइ, महात्मा बइठां पुता वाचइं, पर्वतता नीझरण विछटई, भरियां सरोवर फूटइ । इसिइ वर्षाकाठि राजा सोमदेवतणउं कराविउं सरोवर भराणु, समुद्रसमाण; वघावणी धायउ, राजाकन्दइ आयउ; राजा मनि गहगहतउ, सरोवर जोइवा पुहुत दीठउं भरिउं सरोवर, ऊपनउ आनंदभर; जोसी तेडी महोत्सवतणुं मुहूर्त लीघउं,अभीष्ट जनरहई तेड कीघउं; इसि करतां आविउ आसो मास,दिति सप्रकास; कमलवन उल्लास, हंसतणु विलास; कादव सृकई, नइ निरर्गलपणई मूकई; विकसई कुसमकली, परमेश्वर सर्वज्ञ पूजतां पूजइ मनतणी रली; तिसिइ आसोसुदि पंचमीतणइ दिवसि मोदइ आडवरि नरेश्वर सरोवरतणी पालि पुहुता, धजपट दीसइ लहलहता। तिसिइ समई अनेक ब्राह्मण मिलिया । कयण कवण । दुवे त्रिवाड़ी व्यास पाठक देवाईत मोपाईत सराईत चंद्राईत देवशर्म मोपशम्म यज्ञशर्म ३ पृथ्वीचन्द्रचरित्र सोमशर्म श्रीधर देवधर गंगाधर गदाधर लक्ष्मीधर श्रीपच्छ पमनाम पुरुषो- त्तमप्रमुग्न ब्रामण मिलिया, शांति करियानई कारणि कलिकटिया; गले मागा, ध्वनि उचरिवा लागा। जे ब्रामण १८ पुराण १८ स्मृति जाण । ते कित्या पुराण । भागवतपुराण १ भविष्योत्तरपुराण २ मत्स्यपुराण : मागपुराग ४ विष्णुपुराण ५ याराहपुराण ६ शियपुराण ७ यामनपुराण ८ ब्रह्मपुराण' समांदपुराण १० ग्रामवैवर्तपुराण ११ आग्नेयपुराण १२ पमपुराण १३ निंग. पुराण १४ नारदपुराण १५ स्कंदपुराण १६ फूर्मपुराण १७ गदगण १८ । ते किसी स्मृति । मानवीस्मृति ? आग्रेयीस्मृति २ यंगस्मृति हारीतकीस्मृति ४ याज्ञवल्कीस्मृति ५ शनभरीस्मृति ६ अंगिरास्मति , आपस्तंवीस्मृति ८ सांपरकीस्मृति ९ कात्यायनीरगति १० पृटरपनाग्मृति ११ पारासरीस्मृति १२ शंम्वीस्मृति १३ लिग्नितास्मृति ४ दाक्षास्मृति गांतमीस्मृति २६ शातातपीस्मृति १७ पाशिष्ठीस्मृप्ति १८ । तिसिहरनमंजरी फुगरिराजारह पानती करावी, निहागि जाया आयी । जेहतणः परियारि, सपी अनेकारिकस्तूरिया करिया माती पभापती चंद्रायती पंद्रउली पंपू हंगी मारमी यगुलीमा अनेक गपी पर। तीदं सहित तिहां आयी। पितारहरं प्रणाम नापजायी उमंगिया, nि रूप देषी रायतण मनि चिंता पाटी। पहयोग्य प.पण यर, किना, flrm. घर, इसी पीतयतई नरेश्वर, सरोपरभणी टिदायी । नुमित मन्ति, पारा शमलि; हंस फरई रमलि, च्यारह दिसि पामाई परिमालकारंद गुजबल. एम कलगल,ताप टल मार पासई, सर्प नासा, भारिपाभार, प्राण ग्लान फर; माहि शतपन महयपत्र फमलयन, दीरता प्रातिपमाriमनी दंडवलर सलहलहं, लहरि पल हमजानां राजहंस एक मरीधर या राजातणई हाधि, निहालिउ नरनाधिका रूपन, पाम:, महामणर; वेत, सापण्यापत लिसि लक्ष्मीयताण पमर, tari. पभमर, कुंदफसमस्मयकममान प्रधान पक्षितासमिति. गजरा पुरुमारी , राजा दीपउ । जेवला जागा कुमरी, नेकदा नि जिमणी पाप पिस्तारी; कुमार पांपमाहिपाती, भारि मानी। तिनु, मताल पशि पंगु । यसममता अति गर, हा पार पाड, टिश गायि घाउ । रातपायम परमरिया, पार गरिमिरियागमन

गचीनगरकासह
घरमगी जागा, वो नाठा, सो निवादी ग्राठा। बुध पी राउ पापा
पतिल, हंस भाई पइउ कमलमाहि तेतलई । जे पारू ते ५५
वर माहि तारू समय सरोगर गाहिउ, पणि हंस न साहिउ। निश्वास में
राउ पार पनिर, परिपा परिगर मिलिउ । राणी ते यात जानन
कमी मजगी, मनेन कोभी गंटीगंटी पाणी; राजा आगमी भान
कन्गनाइन परनामास अतिकमाया।
निमिा आरित वसंत, हर शीतनणा मंस, दक्षिणदिमिनार
विम नगराएं
मने भला मासा पण यासाहन सुह
पति पर माथा कुरु॥
inमार, गगाल याकुल, अमर माह
" HEIRTI FUTR frig पाल, निमत or futurt
.*. याम का मुगा मामा, नाग पुभाग गया
" tark infrin Eगमणि लोलणे हा int, Russ
६.१... Futur, MERITr: rintin. पनमा

१०३ - पृथ्वीचन्द्रपारित पास माप मांगी मदन काहल भेरीधुंकार तरपरा ईणिपरि मृदंगपटुपडहप्रमुप बादिन धाग्यां, इन दरि ताज्यां । इकपीस मूर्यना इगुणपंचास तान, इस्यां सं गीत गान; पाक गोन्य प्रधान पत्रदान । फिस्यां ते यत्र । सथिला संग्रा- मां दादिमा मेययना पांदुरा जादरा काला पोगलां पालेवीयां ताकसीनीयां कारीयां फस्तरीया दोषां पउकडीयां सलपलीयां ललवलीयां हंसपडि गजबडि उसालानर्मपीठ अटाण कताण झूना झामरतली भइरव सुद्धभहरव नलीरप्रमुन बन्न जाणियां । इणिपरि महोत्सवभरि, साथि कुमरि, नरेश्वर पहुता नगरि । मनतणद उल्लासि, आन्या आचासि । राघरहइ कुमरीतणउं स्वरूप विमासतां ऊपनी आकाशवाणी, ए पार्ता कहिस्यई केवलनाणी। राजा मां आश्चर्य धरत तद प्रधान तेदायिउ, तिहां आविउ । ते मणाम फरी यइ- उउ तर राजां बोलाविउ हेमंत्रीधर विचारि, पाणिग्रहणयोग्य हुई रत्नमंजरी कुमारि । तु मंडापीयइ स्वयंवर, मेलीयई सवे नरेश्वर, कन्या आपणी इच्छा पद पर । इसिउ आलोच फीघउ, तु राजा सविहुं दूतरहइं आदेश दीधउ; जु को पृथ्योपाटि राय नह राणड, तम्हे जाणउ, ते समग्र ईणि स्थानकि आणउ । तिवारपूटिई स्वयंवरमंदप सूत्रधारपाहिं कराविया मंडाविउ, हुं तुम्हकन्हइ भाविउ । दिव तुम्हे तिहां पाउ धारउ, ए वीनती अवधारउ, राजासोमदेवतणइ मनि आनंद घधारउ। इसी पात्ती सांभली दृतहुई बहुमान देतु कटक लेइ राजा पृथ्वीचंद्र स्वयंपरभणी पालिउ, फटकमारि पातालि शेप नाग हालिउ । हाधीपा घोडा, नहीं घोडा। किस्सा ते हाधीया छ। सिंहलदीपतणा, जाजनगरतणा, भद्रजातीक, मललितसुंदादंद, प्रचंड, पर्वतसमान, जलघरवान, चपलकान, मदजल झरता, भालि करता, अतुटबल, उच्छंग्वल, गलगर्जित करता गजेंद्र सांवरियां, तर रोजी तरयरिया किस्माते । हयाणा भयाणा कुंकणा कास्मीरा हयठाणां पह- गणा सरसईया सीधउरा केकाइला जाइला उत्तरपंधा पाणीपंथा ताजा तेजी रमा काचला कांबोजा भाडेजा आर पाल्हीकज गांधार चांपेय तैतिल गर्त आर्जनेय कांदरेय दरद सौवीर क्षेत्रशुद्ध प्रमाणशुद्ध चपल सरल तरल चासणा परीछणा जोय सहई, यपूकारिया रहई, वांकी नेटी, सभर पूठि; गेटे काने, सूघद यानि, सहरनी ललवलाई, नीटनी कलाई, पूंजतणी आप- ताई; पलाणतणी सामंत्राई; यांकी तुंध्यालि, वठ्ठली पेटयालि, मुहि रूपा, कालीगड मांगा वितणा गूध पिपराइमी महारो भयो। १०४ मान्दर पर अमुन पंदन चंपक बकुल विचिकिल सहकार कांचनार जांच संबीर यानीर कगवीर कीर केलि कदंब निंब नारिंग नालीयरिद्वार दारिम सदार अंकल कंफिल्लि नाग पुन्नागवल्ली यूधिका मालती माधयी जा मम्मपदमना पारधि केतकी मुचकुंद कुंद मंदार तगर सेवत्री राजगि मिरी मांवलि मिरयू सीममि साग दीडूसार आक आकमंदार कपिरयपी यदि काण परण पर पदिर पलाश यह येडस पीपल पीपरि वर पारा शामा पार पेजह पारणी कदर करंज बाउल यीमुरी आमली भारत बोरि गोरि गारडोपामुन वृक्षावली दीसहं, याहंतां गतां रि- यहिन रामईभिनई किलाई मियातमा पस्कार, घूमतणा पत्थर; म- नगा गुग्गा, नन्दामा यार नइ पारमादियानरपरंपरा उपला, महात्मा गमलगल, मिहनाभाभीत मगगल पलमलई । जिस्मा दरिदार न्ट, निशानीलाममा पुराना गुरग; बेताल किलरिता दारी प्राचीनगूर्जरकान्यसङ्ग्रहः आसणि सूधा, हसमंत यहेपारवि अंबर वधिर करता । सूरवीर साहसि काला किरडिया किहाडा नीलडा सेराहा कविला धूसरा मांकडा दोरी योरीया द्वादशावर्त्तव्यंजनगुणि शोभित शालिहोत्रशास्त्रप्रणीतलक्षणलक्षित ससई धसई, साटि पइसई, जुडई, दउडई। जिस्या सूर्यतणा रथ छूटा हुई तिर अनेक तुरंगम सांचरिया । तउ पायक पहटिया । किस्था ते पायक । पूर्व विक्रांत दुर्दीत पग पेडे लीधे श्रमई, वयरीरहई आक्रमई, पवनवेगिपुलिई, योपट जुडई, सेल्ल कुंत तोमर ताकई, वयरीरहई हाकई; वेला लामी, न मेल स्वामी; नयनयां आयुध लिई, एक वार आकाश पडतां घाढ दिइ । कि न दीसह धाका, जोह लगइ हुइ जयपताका; जे धाइं पुलई अच्छलई । इर- पायकनी मिली कोडि, जीह माहि नहीं पोडि । हिव रथ विस्तरिया।रिर- ते रथ । चपलतुरंगमजूता, सुखि सुभट चालई माहि वहठा सूता; धनी दंडायुमै भरिया, वायुवेगि सांचरिया; धडहडाटि धरामंडल धंधोलई, रजमा रविपिंच रोलई; ऊपरि धज लहलहई, जाणे देवसंबंधीयां विमान गहा घांट यान, पयरी भाज; मूत्तिवता जिस्या मनोरथ, इस्या अनेक सांवरिष्ठ रमाणिरि चतुरंग दल चालतां हूतां नरेश्वररहई वाटई अनेक ग्राम न भाग, लोक नयनयां भेटणां नीपजायद । मार्गि जातां आयी एक अटपी। दिय ते किसीपरि वर्णवियो । जेह अटवीमाहि तमाल ताल ईना- पृथ्वीचन्द्रचरित्र तेदमाहि नरेश्वरतणां कटक न लहई माग, न लहइ नदीतणा ताग; न सकाइ गाली घोडा हाथी, न को जाणइ साधी। विपम पर्वतमाला, डावी जिमणी दवतणी ज्वाला, जई न सकइं चडिया नह पाला, तेतलई दीसिवा लागा भील अत्यंत काला। तिवारई राजापृथ्वीचंद्र चीतविउं आयी विषम वेला, जई भाई भील भेला; तु किम झूझीयई, जइ परदल नबूझीयई । जेतला राजा इसिउं घांत- वितेतलई ते कटक अटवीऊपरि हुई पारि पहुतुं, मनि गहगहतुं।आगलि नगर एक देपर, ते हर्प कुणतणइ लेपइ । सवे कटकीया लोक आश्चर्य घरई, परस्परई सी यात करई । कुणहिं नाणिउं, एकटफ इहां कुणि आणि; देर स्टर, पुणि देव दाणय कोई लूटड; जीणई पवई सानिण फी, हेनामात्र दक इहां लीप । अधया राजा पृथ्वीचंद्र धन्य, जनुं गई पुण्य । जेर परणि इस्युं कहदाजे गया विदेसि, पडिया लेशि; ताणीया पाणीनद परि, भाफम्या मूरि, चाप्या सधरि, दसिया पिपरि; धरियां राइ, भेल्या पणे पार सुरडिया मोगे, दूहविया रोगे; ऊपाडिया बंदि, पटिश विदि; माहं मपिएं. नई धर्मनउ आधार, ए सारउ विचार । लोकरहई इसी पात करना राजा तिहां आंचाक्षहेलि आय्या, तारा नीपजाम्या । तेतला भानु, पुलतुः पाउ जोतउ, फायरपणह रोतर पुरुप एक नरेश्वरतणइशारणि पाटउ । मला तरूआरि ताकता, हणिहणि भणी हाकता; केई पुरप आप्पा । नेहा गया बोलाया।आपुए घोर, महाकठोर, जे पहनई रापद ते दोर। नियाई राजान सेपके कहिउँ अरे एकहीई राजा पृथ्वीपंड, एहस्युं पहुपी न मना. रई ते पुरुष कहिया लागा। नरेश्वर पहिला यात अवधारउ, नउ घार गार। अम्हे तलार, फर नगरसणी सार । पुणि ए चौर, दुदान्त भपार; पकि. धसि हेरह, योलापिउ योल फेरह पर मालि अरालि, पहा परगति पालि; फमा म्यादा, पुणि सूतु कोइ न जगार, अघोर निराश पार फोटना आभरण लिया फटारी पापबंधन पाइ, पर्पनमाप करण , परित पार पपाई, राउला भंडार फार दीसा दिसि गान, विधि साक्षात् एतान्त, पिणासीन न मानई पारी, यांधा वाटी आर दोरी; मोह मांसल मोडह, घडी न रहरं पोर हाकिउ ऊजार, रंघिउ मी पा, कार कोपर फरपालि, जार लोकलक्षाषिपाति; गहमंदिर फारस, धारिभर वस्तु ए पार गठनह परनालि पइसतर साधर, पारी सांधा, दरिदार पारि सांचरिया; चतुरंग दल नीकलिउँ, वाहिरि एकठ मिलिगं; दीसई छत्रध्वज कही।तुपियारइ देसि पइस, अन्याय करी इहां वयस;तउतुं अजाण, अजीमारि स्वामीसमरकेतुतणी आण, नहींतु प्रकटि प्राण; चोरदंड तुझनई होसिह, लोग दल सामहाविउ, ए आपणइ पर्व आविडं । चाल्यां वेउ दल, ऊपडई धूलिर. डल; काई आपपर विभागबूझवह नहीं, पितापुत्र सूझइ नहीं। नजाणीइं आपलं दल, न जाणीइ पिरायुदल, नजाणीपदभूतल, न जाणीइ नभोमंडल नजाणार पूचनजाणीद पश्चिम एकाकार हुई । विडं दल मिलते मादल वाजी, जयार याजी, रणचण काहली याजी; रणतूर याजियां। त्र्यंबकतणे ब्रहनहाटि जाने निन्दइ त्रिभुवन टलटलिया सागा, भेरीतणे भूयादि भुहि भिलिहि फारी, काहरतणे कोलादले कापर यमकम्या,नीसाणतणे निनादि उच्चःअवा ऊसनिक, रायण मंदिर, दिग्गज डहवहिपा, दारुबूक याजी, धुंवारय फाटी, बिहुं दति गाह भालि भयस्ताविमलपकालनी शंका हुई।वाभ्यामोध, शुझाईयांग पार जालवईग्रीस दायुष चालयई। किस्मांत। पचक्र २ धनुष३ अंडर प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्घदः नाठउ, तुम्हनई शरणइ पइटउ । पुणि ए पापी, जीणि प्रजा संतापी; ए नु थापउ, अम्हरहई आपउ । नहींतु घायप्रहार देसिड, प्राणिहिं लेसिउँ। रउ ठाकुर सपराणउ, तेह आगलि कोई राय नह राणउ । सांभला एका ए आगलि दीसइ पद्मपुरनगर महाविख्यात । तिहां छइ राजा समरकेतु, ओ सचेतु, वयरी प्रति साक्षात् केतु । जेतलइ तेउ ए वात जाणिसिह, तर ताहा अहंकारतणउ अंत आणिसिइ । एह कारणि चार आपी निर्दोष था पछइ तुम्हे भावइ तिहां जाउ । इसी वाती सांभली आपणां सुभटसाम्हउं राजा पृथ्वीचंद्र हस्या, तर ते सुभट उल्हस्या । ऊठिया ते वीर, ताकवा टा तोमर तीर । नाठा तलार, नासता पूटिइं वाजइ प्रहार; नीठ ते जई नगर, हि पइटा, तु नाभिई सास वइठा । जइ वीनविउ समरकेतु राउ, देपाइई भी पणउ घाउ । समरकेतु राजा कीघउ कोप, हउ दलवई निरोप; तत्काल सा- हिउँ दल, मिलई सुभट सवल; वाजई प्रयाणभेरी, वीहई वयरी; पाटहन्ति । डिउ, तेहऊपरि राजा चडिउ । रथ हथियारे भरिया, तुरंगम पापरिया, पार ऊलई रजातउ तेह दूत मोकलिउ तिहां रही, तीणे पृथ्वीचंद्रप्रतिई इसी वा कातिग जोइसिह । ईणइं यात दूत अपमानी बाहिरि काढी राजा पृथ्वीचंछि पृथ्वीचन्द्रपति १०७ १ पढ्न ५ छरिफा ६ तोमर ७ सुत ८ निशूल ९ भाला १० भिंडमाल ११ मु. दि १२ मक्षिक २६ मुद्गर १४ अरल १५ हल १६ परशु १७ पहि १८ शधि- : १९ फणय २० कंपन २१ कर्तरी २२ तरचारि २३ फुहाल २४ दुस्फोट २९ दिा २६ प्रलय २७ फाल २८ नाराच २९ पाश ३० फल ३१ यंत्र ३२ इस ३ दंड ३४ लगद ३५ कटारी ३६ यहि । इस्यां हपीआर झलहलहं, कायर नई। रथ जूदंता दुरापाती लघुमंधानी शब्दवेधी धनुर्धर धाया, घाण मेल्हते In छापा । एकि घोडे घडई, पकि ऊतायला पडझं कायर रडई, सुभट मर, योध जुरई। घोडा मुह मूकी धाई,यूटे पगि ऊजाई हस्तीतगा सुंडादंड दर, एकिना शिर फूटई । इसिइ युद्धि प्रवर्त्ततइ हुंतइ राजा पृथ्वीचंद्रतj ल पपरीए एकवार भागं, नासिवा लागं । समरकेत हउ सानंद, पृथ्वीचंद्र निरानंद पीतयदए किसी यात, माहरा दलरहई काई हउ उपघात । जा चीतयतदहंतद पीर एक आकाशमार्गि आविउ, तीणई फउतिग नींपजा. उ। तीणं दीठइ ययरीना हायतु हथियार पडियां, पृथ्वीचंद्रना कटकरहई दियां । राजासमरफेतु वांधी पृथ्वीचंद्रतणे पगतली आणिउ, पुण ते धीर चारपूटिई कुणही न जाणिउ । तत्काल जयजयारय ऊछलिउ, राजापृथ्वी. इतणउ पीरवर्ग मिलि। इति श्रीमंघलाई श्रीमाणिम्यगुंदरसूरिविरचिने श्रीपृथ्वीचंद्रचरित्रे द्वितीयोसासः । तृतीयोल्लासः जद मान मोडिउ, तर समरकेतु बंधहंतर छोडिउ; पिहरावी बोलावीउ । हुँ मनि गर्य आणे, माहरी यात न जाणे। किवारई सूर्य पूर्व छांडी पथिम उदप मांडह, समुद्र मर्यादा छांड; मेरु ढलइ, आकाशतउ नक्षत्रराशि गलई पापीया- धरि धर्म पलइ, पाणीमाहि अग्नि प्रज्वलदं; धूमंडल पलभलाई, कुलाचलचम चला; अमृतहतउ विप धाइ, पृथ्वी रसातलि जाइ) पणि दान दीजह, पुणि मुसकन्हइ माणि शरणागत चोरइ किम लीजइ । तिवारई जे आविउ छइ शरणि, ते लागु राजातणे घरणिं; स्वामी तुं धन्य जीणि तइ हुं जगारिर, नहींतु तलार हंतु मारिउ; पडतर संसारि; होगत मनुप्पजन्मतणी हारि । राजा काहि तु किसिउ, जेहनुं मन इमिरं । विद्यारि ते फहिया लागु । अंग-

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*mittitiirlसनीपातिआगलनामा
पीनगरमध्यसहर
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देशि श्रीदुरिनगर, तिहां श्रेठि लक्ष्मीघर, श्रीलक्ष्मीई सार ।
हूं अंगति, पगि विपन देवगति; दसकोधि द्रव्य इंती, पणि
पहुनीतिा परोक्ष हुआ पूठियं जं वाहणमाहि धाति, समुद्र
नमा प्रमिलाद गोरे मुसि; पतवनउपलयदइरहिउँ, कोई मारेर
पर गरा, ममत्र मंडाण दलित समन जग निस्तरि, एकता सम्म
सामवर पजाम गंडिलं, प्रयहण पूरिया माहिती भर
र ति, विनि सर साठि कियाणां गदापा, ससविध पान ।
मकरंता लिगा, पोतां सपाणी भरिया, रेयसमुत्र यापरी पूरा
परमार नाना नागा, गगरि फोलागि माया लागी, गलेना ।
Friभाभा , नागरउ पाशिम, सितालिम पा
PATRITI, Tरीम ललिपप, नीनामा नालियIHD
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-- १०९ पृथ्वीचन्द्रचरिय इकालनु मेह, थोडा मेहनउ बेह, वहिल आवइ छेह । लक्ष्मीतण त न्याय वोपनउ, हिव वैराग्य ऊपनर, तापसदीक्षा लेसु हिय, जिम हुइ सदासिव । हिव समरकेतु राजा ते वार्ता सांभली मनि वैराग्य पामि,राजापृथ्वीचं. प्रतिई शिरु नाभिउ अनइ इसी बात कही, ताहरु पुण्य अद्भुत सही। तूरहिह ओह अदृष्ट देवता सानिध्य करह, सर्व विन हरह। ताहरूं अद्भुत भाग्य, मुझ• नद उपनु वैरान्य। विमासी जोयुं तर असार, संसार। जिशि पीपलनुं पान, जिशिउं गजेद्रनु कान; जिशिउ संध्यानु राग, जिशिउ भमरीनु पाग, शिशिर 'मांकडनु पैराग; जिसिउ वीजनु झबकु, जिसिउ पोइणिनइ पाति पाणी. नउ टयकर; जिशिउ समुद्रनु कल्लोल, जिशिउ धजनु अंचल, तिमिउ मं- सार चंचल । तुं एक कहिउं करि, माहरु राज्य अंगीकरी । हरं तापसी दीक्षा लैउसु, तप करिसु, संसार तरिसु । पृथ्वीचंद्रि तीहं बिहुमति कहिलं तुम्हें कम्बउ धर्म, पणि नधी जाणता मर्म। सांभलउ घन ते पर्णवीद जे वृक्षवंत, नदी ते जे नीरवंत, कटक ते जे धीरवंत, सरोयर ते जे कमलयंत, मेरते ने समावंत, महात्मा ते जे क्षमायंत, प्रासाद ते जे धजायंत, पाट ते जे गूपर्यत, दाद ते जे पस्तुयंत, घाट ते जे सुवर्णयंत, भाट ते जे पचनपन, मठ ने नियंत, गद ते जे अभंगपंत, देव ते जे अरागयंत, गुरु ते जे मियान, पपन जे सत्यवंत, शिप्य ते जे पिनययंत, मनुष्य ने जे धर्मयंत, तुरंगम ने से नजयंत, हस्ती ते जे भद्रजातिवंत, प्रधान ते जे युद्धियंत, घर से जे पाय. त, राय ते जे न्यायवंत, व्यवहारीया ते जे मपात, धर्मा ते जे दगान । नहो महाभागउ, हीयाने लोचने जागर। जेतलूं अंतर राणी मना दागि, तलं अंतर दही नइ हासि, जेतलूं अंतर मधुर पनि नइ भागि; गर्ल नंतर समुद्र नइ कूया, जेतलं अंतर सोनईया ना रूया, जेतलं अंतर पार र फ्या; जेतलूं अंतर नरेश्वर नइ आहीर, जेतलं अंतर रूपा ना कधीर; तलूं अंतर सुवर्ण नइ माटी; जेतलूं अंतर पारू भीति नइ पार्टी, नई तर पटउला ना पाटी; जंतलूं अंतर पडसत्र नइ मतली, जेनलं अंतर जा. ना माणस नइ पतली; जेत; अंतर खड्ग नइ हुरी, जेतलं भंतर संत नह हो; जेतलं अंतर पूर्ण नइ तारा, जेतलं अंतर सासर नह पारा, जेतलं तर सीह नह सीमाल, जेतलं अंतर मभात नइ वीभाल; जेतलं अंतर रंगा E राग, जेतलं अंतर सायलि नइ साग; जेनअंतर भरमदा नद नाग, दिव, टालिउ मिथ्यात्वतणी टेव; आदर दयाधर्म नइ श्रीअरिहंत दंग पयात्ता सांमली तीद बिटुंरहि मिथ्यात्वतणी भ्रांति दली, जैनदीक्षा भार आपिडा दिप राजा रवीचंद्र तह नगरहंता सात पायाणे अयोध्या नगरी 11 कुसंगति विणसइ संतान, स्वरपापड विणसइ गान, लूहं विणसइ महपान, दूधि विणसइ नेत्र, तीहे विणसइ नीपनु क्षेत्र; चीभडी विणसइ कणस्नु पार, विणसइ यन्त्र, जिम कुव्यसनि विणसह सत्कर्म, तिम जीवहिंसा विणसर विपश्मयोगि विणसइ रसवतीतगउ पाक; परसालइ विणसइ शस्त्र, पयरी धर्म । राजा पृथ्वीचंद्र समरकेतु श्रीपतिप्रतिइ कहिइ छइ । सांभलु परमार्थ, एक तिदा आविर,नह सविडतेहरदई प्रणाम नीपजाविउ । पगि लागी, दीक्षा मागी; तीगि दीधी, यांछितवासा सीधी । तिवारपूठिई तेहे झापीचर राजा मोकलावी विहारकम पीयु, नरेश्वरि आयउ पीयाण दीपउापहिलं परतुपर पुरि, लोकपमाडिया भलोपरि।तिदां परमहंस प्रधान स्थापित, कर्णयानु' ११० प्राचीनगूर्जरकाव्यसदहः जेतलूं अंतर हंस नह काग; जेतलइ लूण नइ कपूर, जेतलइ पजूया १३ : जेतलइ डाकिली नइ तूर, जेतलइ खाल नइ गंगापूर; जेतलइ साधु नह: जेतलइ हार नइ दोर; जेतलइ गजेंद्र नइ ससा, जेतलइ गुरुड नइ मसा; लइ कोडि नइ सवा विशा, जेतलइ काविला घाट नइ गोहीस; जाल वृक्ष नइ रोहीस, जेतलइ व्यवसाय नइ कुठाकुर सेव; तेतलं अंतर अनइ श्रीसर्वज्ञदेव। एह कारणि इसउ मनि निश्चियु आणिवउ । जिम श्री सूर्यपापह । नही, पुण्यपापइ सौख्य नहीं, पुत्रपापइ कुल नही, गुरूपदेशपापइ विद्या नहीं। हृदयशुद्धिपापइ धर्म नही, भोजनपापिइ त्रिपति नहीं, साहसपायह . नही, कुलस्त्रीपापइ घर नही, वृष्टिपापा मुभिक्ष नही, तिम श्रीवीतरागपारर मुगति नही । अनइ जिहां हिंसा, तिहां नहीं धर्मतणी प्रशंसा । जेह कारगि इसिउं कहिई । जिम विलंब विणसइ काज, कुठकुरि विणसइ राज, मामा- रिमचारि विणसइ छाज, अणवोलिई विणसइ व्याज; पडपि विणसह दान, व्याधिई विणसइ वान, कुमरणि विणसह अवसान; कुपंडित विणसह पान क्षपणि विणसह गात्र; पीपलि विणसइ प्रासाद, सिंदूरि विणसइ साद; आर फरउ सदरनी सेव; जिम टलइ पापकर्मतणा लेव । . लेवा हुई मनि ली । तेतलइ माग्पयोगि देवसंयोगिई चारण भ्रमणमाहत्मा सधोपचरित्र पाहुना, स्वयंचरि आघ्या दीठा राग सये गहगहता । राजा सोमदेवि साम्हई भाषी महोत्सयि फरी मादि लिया, भला उतारा दिया । तेतलई सपहारे थपंपरमंप नापायु, पोयणिने पाने गायु । कर फस्तूरी महमहई, ऊपरि प्याज सहना पंदूभातणी पिचिप्राइ, पूतलीतणी काविलाई; थंभकुंभीतणा मनोहर पाट, पर भार; रत्नमई तोरण नह मोतीसरि, अलंकरिउ कुसुमतणे यारि; पादिन पाजई, मांगलिस्यगीत छाजई आरीसा झलकई, चालतां श्रीना नेउर पलाई । इसिह मंदपि राययोग्य मांड्यां नामांकित सिंहासण, मागणहारनई पगि पगि दीजह यासण । तु राजासोमदेवदूत सांचरिया, तारे केरिपा; राप सयितुं योग्य आकारण नीपजाव्या; मोटे आडंबरि समग्र नरेश्वर मंडपमाहि भाया । जिस्या देवलोकसंबंधीया हुई देव, तिस्या दीसई सपि रेश्वर सिंहासणि बहटा इंच । तिसिह अवसरि राजा पृथ्वीचंद्र, जिसिउ साक्षात् हुरद्र । इसिउ आपी स्वयंचरि सभामाहि बइठर, सचिहुं रायतणे नि इनिउ शंकाभाय पइटउ । ऊ एउ सही फन्या परिसिइ, अम्हार आवि- उं किमिइ करिसिइ । राजातणइ मस्तकि छत्र, अनइ चमर दलई वित्र । राजा पृथ्वीचंद्र देषी सकललोक इसिउ विमासहं । जिम अक्षरमाहि गेकार, मंग्रमाहि होकार, गंधर्वमाहि तुंवर; वृक्षमाहि सुरतरु, सुगंधवस्तुमाहि पर, पन्द्रमाहि पाटणन पीर, पीरमाहि शनकवीर, गढमांहि कालिंजरु, राणिमाहि पहरागर; वीपमादि जंबूदीप, प्रदीपमाहि रत्नप्रदीप; पर्वतमाहि मेरु- घर, जीवनहेतुमाहि जलधर; जिम हस्तीमाहि ऐरावण, मंडलेश्वरमाहि रायण; रंगममाहि उचाया तुरंग, हरिणमाहि कस्तूरीउ फुरंग; धवलमाहि पृषभ, सस्पदिशिमादि उत्तरककमा अचलमाहि भूमंडल, क्षमावंतमाहि भूमंडल, नम नागमाहि शेपनाग, रागमाहि श्रीराग; जिम ध्यानमाहि गुल ध्यान, नमाहि अभयदान; मंग्रीश्वरमाहि अभपकुमार प्रधान, पानमाहि नागर- हिउ पान; ज्ञानमाहि केवलज्ञान, विमानमाहि सवार्थसिद्धि विमान; गह- माद्दि गगन, पविनमाहि पवन, दर्शनमाहि जैनदर्शन; जिम देवमाहि इंद्र, ग्रहगणिमाहि चंद्र तिसिउ सबिष्टुं रायमाहि दीसइ पृथ्वीचंद्र नरेंद्र । तिवारपूटिई राजा सोमदेवि प्रतीहारपाहि कन्यारहई तेडउ दिपराविउ, तउ सघव स्त्रीए धवलमंगलपूर्व कन्याहुइं मांगलिक लान कराविरं । अंगरू- क्षण अनंतर कन्या सदश श्वेत कपड पहिरियां, आभरणे अंग उपांग अलं- दानव, पृथ्वीपीठि संख्या नही मानव; मिलिया सिद्ध अनइ किनर, संख्या कुमरि, अद्भुत गुण ताहरा संसारि, जेहे आकर्पिया हुंता आसमुद्रांतवी परमंडपमाहि आवी, तु यशोधरा इसिहं नामिइं प्रतीहारीई धोलावी । अहं तणा राय मिलिया, इसि जाणि जेहरदं तुं चरसि तेहना मनोवांछित पासा हिब जोइ तुझ आगलि दसलक्षमगरदेसतणउ नरेश्वर, सहिजिई अल- तणई कृषाणि राज्यलक्ष्मी वसइ, मुखि सरस्वती उसइ, तूटर दारिश हरा, र विलोकि जेहतगह गजलि घालतइ हुँत बटुंइ सपक्षपर्वततणी ११२ प्राचीनगरकाव्यसहहः करियां । किस्यां किस्यां ते आभरण । हार अहहार त्रिसर नाम सूत्र कांची कलाप रसना किरीट मुकुट पट शेपर चूडामणि मुद्रिका दशमुद्रिका केयूर कटक कंकण अवेयक अंगुलीयक अंगुस्थल हेमजाल जाल रत्नजाल गोपुच्छक उरत्रिक चित्रक तिलक कुंडल अनमेचकर हस्तसंकली नूपुरप्रमुख आभरण जाणिवां । इहमाहि स्त्री योग्याभरणि हुई अलंकृतगात्र, हुई रूपतणउ पात्र, मस्तकि धरियां सीकिरितणां कन्यातणइ सिरि सिंदुरि भरिउ माग, मुखि तांबूलराग; आपिनविन तीणि चडी ते चाली देवांगनासमान । आगलि हुइ वादिनध्वनि गान । इणिइं परिहं सकललोकहुई आश्चर्य करती, हाथि वरमाला घरती त्सवसहित कुमरि, पहुती मंडपतणइ दारि । ते देपी नरेश्वर सवे भाका मनाविया हारि, चीतवइ ए रंभा कि तिलोत्तमातणइ अवतारि । पाणिग्रहणतणी वांछा धरई, विविध चेष्टा करई । एकि राय आपणा ई हार हलायई, एकि वाहतणा वहिरपा चलावई; एकि रत्नमय दडा. एकि छुरी ऊछालई; एकि मित्रसि वात्तालाप मांडई, एकि... ऊपजावई, क्षणु एक पांडइं, पकि संभालई कानि कुंडल, ईणिपरि नेष्टा करई राजमंडल । तिसि समय जिजोइया आव्या आकाश देव अनर दलिपा, मनोरथ फलिया। वेश्वर; राजगृहनगरतणउ राजा मकरध्वज इसिइ नामि दीसइ । जेह राना दीटर आनंद कर; रणांगणि गयवरतणी गुदि गांजइ, शामट भांना रस मपाल, गहतगह कंटि पाति यरमाल । अश्या एजोइ पाणारसीतणउ भांजइयरीनगर भडियाउ; ए सागष्टि अवलोकी, जेहतणा प्रताप प्रणि - पृथ्वीचन्द्रचरित्र का नीपजई । जेहतणइ तरलतुरंगमि प्रसरह हुंतइ बहरीरहतहप्रलयकालोड- समुद्रकलोलतणी शंका नीपजइ । इसिउ प्रचंडवल, अखंडभुजवल; अकल, -तकल; कर्मचंद्रनामा नरेश्वर वरि, माहरु कहिलं करि । अथवा विदर्भदेस कुं. निपुरनगरीतणउ नरपति निहालि, जे विपमकालि; यहइ कर्णदानेश्वरतणउ अवतार, धनुर्धरपणई हरइ अर्जुनतणउ कीर्तिप्रारभार; जेहतणइ अतुल भंडार, मवलकोठार, शूझारतणउ नही पार; करइ शत्रुसंहार, करद भE कइयार; म- -लाइवार, महाउदार, कंठि घरमाल घाती ए मकरध्वज राजा अंगीकरि भत्तार। अश्या गोडदेस हंसपुरपाटणनु स्वामी सिंहरध राजा जोइ, जीणि दीठद आणंद होइ । जेह राजासंबंधीयह कुंदमचकुंदकुमुदकेतकीकरघयलि कीर्तिम. रलि प्रसरतइ हुंतई नवी सृष्टि स्थापी, तं अंजनाचलपर्यतरह फैलासपर्यंततणी पद्वी आपी; यमुनातणइ स्थानकि कीधर गंगाप्रवाहु, मित्र कीघा चंद्र नह राहुः सरोपा कीधा हार नइ नाग, अंतर टालिउं वग नइ काग; ईश्वरहुई नीलकंठपण टालि, विष्णुहुई कृष्णपणउं पखालिउ; बलदेव यांधयपण उजुभालि। राणिपरि जोणि ब्रह्मातणी सृष्टि फेरी, तेहनी किसी यात घपाणीयह अनेरी । इसिर अलवेश्वर, सिंहस्थ नरेश्वर, करि तुं आपणउ जीवितेश्वर । ईणिपरि तीणई प्रतीहारीयई राजा हरिकेतु सिंहकेतु मकरफेतु धूमकेतु पद्मरथ पीर्यबाहु सुवर्णबाहु शंखध्वज पद्मदेव पानंद क्षेमंकर पृथ्वीवर सुबाहु रत्नांगद हेमां- गद् हेमरथ मणिरथ मणिशेपर रत्नशेखर चंद्रसोम सोमप्रभ सूरमभप्रमुख नरेश्वर वर्णन्या वपाण्या, पणि रत्नमंजरी कुंभरि मनइमाहि ना आण्या। हिव आगलि दीठउ राजा पृथ्वीचंद्र, निहालिउ तेहतणउ मुपपंद्र, उलटिउ आनंदसागर, मनि पीतयइ एउ सही गुणतणउ आगर । तियार तीदारीयई कहिलं हे कुमरि सांभति, पुरा पूर्वई सगर घमायति र वि. ल्यात वसुधातलि । जेह सगरचक्रवर्तितणइ पउरासी साप हस्ती, जीहतणि गति महाप्रशस्ती; परासी लाप तुरंग, ऊटलता जिस्या हुई फुरंग, परासी हाप रथ सहिजिई सुरंग; परासी लाप नींसाण पाजई, पयरीना भडपार भाजद; अत्यंत अभिराम, छन्न कोडि ग्राम; गाम घोडउं फाढतां पन्नू कोरि साहण मिलई, उन्नू कोडि पायक फलफलक पद सहय संगध, पदसहर अमात्य अत्यंत साधु, नेहनइ पऊदरल, देयता करद पलनयनिधान, राष्टुत्तरि सहस्र नगर प्रधान, अन्यापरहई दाटण, अडतालीस सहस पाटण; जेहे वसई तड़ना पटक कुणइ वर्णवाई जूजुया । देवानीकतणउ पुत्र हउ राजा पूवीर अनुगनि यसनिनगीरि लभप्रशंस; पृथ्वीभारवहणि शेषनाग, सहकारी नातागोमंडल, शांत्रिीयदनारविंदप्रयातन, सस्लमहीपाललीला- मिलान, पादिनाजिनशामन, तुन यरिया पाग्य छ। रलमंजी गारिरियां इस्यां यथन मांगली अंगि रोमांच परसी, नगरना पर काली नर वहनी, राजाकी पुदती। लाज टेली, पंरक्ष टि घा, मापनपद या गा गीत गाई, यादिनीणा वादित १२४ प्राचीनगूनरकाव्यसलाद अनेक कुटंब, इस्या चउवीस सहस्र मटय; जोहना वर्णनतणी कीजइ जेड, सोलसहस्र पेड; जेह चक्रवर्तितणइ सवाकोडि व्यापारी, रिद्धि अत्यंत चरणि रुणझुणइ नेउर, इस्या चउसहि सहस्र अंतेउर; विहितोल्लास, ४ उ लाप पिंडविलास; बत्तीससहस्र राय, प्रभाति प्रणमई पाय; प्रत्यक्ष ससहस्र यक्ष; वीससहस्र सोनारूपातणा आगर, नवकोडि ध्वजाघर, लाप दीवटीया उदार, निनिसई साठि सूआर। एवंविध प्रचंडभुजदंड, भरतत्रिपदपंड; निरुपमस्फूर्ति, अद्भुतमूर्ति, इसिउ एउ सगरनपत्ति।। भगीरथ राजा हउ सगरतणउ पुत्र, जीणइं गंगा समुद्रि घाति • ण चरित्र । तीण राज्य पालिउ अनेक कोडियरस, तेहनइ पुत्र हा . तेदमाहिइ एकरहई कुंतल इसि नाम, तेह कुंतलरहई दीघउं मरहठदेसि.. तेह कुंतलतणइ सि जयवंत जयध्वज देवचंद्र देवानीकममुख राय ? र । जोणि पुहिटाणपुर पाटण धापिलं, स्वर्गतण दर्शन प्रत्यक्ष आपिर दस मभुरयाणि, तेहतणा राजा पृथ्वीचंद्र जाणि। पर नरेश्वर, ऐश्वर्पगुणिस - मुरेश्वर, मैगुणि मे मदीया, दानिगुणि नवीन जलघर, गांभीर्या रिगार; निर्मपण गंगाजल, सौम्यपणशशिमहल; रूपिगुणि भन्नि एमा, परफलप्रपरिदरणगुणि गांगेयतण अवतार; विवेकगुणि राईस रितु अनुराग, रहा छ ताहरउ लाग । घण किमि कहींई। पह राना में गश्वननंगल, हा महामहात्मय विपुल । sts श्रीमान श्रीयो भनिर्मितीसामः प्रवीचन्द्रचरित्र चतुर्थ उल्लासः हिप निसिह अयसरि तद राजालोकमाहि जे धूमकेतु राजा कहिउ तेह- र धूमनुदेयतणउ मंत्र स्फुरद, मीणइंजं चीतपइ तं करइ । धूमकेतुदेव आसीमहनाहिला जाणिवउ । कयण कवण । अंगारक १ विकालिक २ हिनांक ३ शनार ४ आधुनिक ५ माधुनिक ६ कण ७ कणकणक ८ कणक ९ बनानक १० फणसंतानफ ११ सोम १२ सहित १३ अश्वासन १४ स्त १५ पोपग १६ कपुरक १७ अजकरक १८ दुंदुभक १९ शंख २० शंखनाभ २१ विवर्णाभ २२ पंस २३ फंसनाम २४ कंसवर्णाभ २५ नील २६ नीलाय. नास २७ गप्प २८ रुप्यायभास २९ भस्मक ३० भस्मराशि ३१ तिल ३२ लपुष्पपर्ण ३३ दक ३४ दफपर्ण ३५ काय ३६ वंध्य ३७ इंद्राग्नि ३८ धूम- तु ३९ हरि ४० पिंगल ४१ बुध ४२ शुरु ४३ बृहस्पति ४४ राहु ४५ अगलि ४६ माणय ४७ कामस्पर्श ४८ धुर ४९ प्रमुख ५० विकट ५१ विसं. धिकल्प ५२ प्रकल्प १३ जटाल ५४ अरुण ५५ अग्नि ५६ काल ५७ महा- बल ५८ स्वस्तिक ५९ सौवस्तिक ६० बर्द्धमान ६१ प्रलंब ६२ नित्यालोक ३३ नित्योद्योत ६४ स्वयंप्रभु ६५ अपभास ६६ श्रेयस्कर ६७ क्षेमंकर ६८ भारंभकर ६९ प्रभंकर ७० अरजा ७१ विरजा ७२ अशोक ७३ वीतशोक ५४ विनस ७५ विपन्न ७६ विशाल ७७ शाल ७८ सुव्रत ७९ अनिवृत्ति ८० एकनटी ८ दिनी ८२ कर ८३ करिक ८४ राजा ८५ अर्गल ८६ पुष्प ८७ भावयेनु ८८ । इह अय्यासीग्रहमाहि धूमकेतु जाणिवउ । जियारह पृथ्वीचंद्रराजातणइ कंठि वरमाला पडी, तेतलह धूमकेतुराजा. दुई रीस चढी रोसे हउ विकराल, धूमकेतुदेवतातणउ मंत्र स्मरीनइ ऊचालि करयाल । ते खड्ग फीटी हर येतात, जे उंचउ नवताल; कंठाविलंबितरंड- माल, करतलि कपाल; युभुक्षाभिभूत, जिसिउ यमदूत; कान टापरा, पग छापरा; अपि अंडी, पेटि फूडी; ऑपि राती, हाधि काती; विकराल येश, मोकला केश; दहडाटि हसइ, घरामंडलि धस, मस्तकि अंगीठउ बलइ, भैरवा जिम कलकलाइ । इसि रुद्र रूप, केतलं पाणीयह तेहनं स्वरूप । इसिउ वेताल देपी सह भयभ्रांत हव । तेतलई धूमकेतुराजा ऊठी कन्या उपाडी रघि धातिया लागउ । तेतलई राय राणा घसमसिवा लागा। तेतलई तेह जि चेतालहूंतर अं.

नडर भ, पूजा कुंना जदरापराणा भामणपीट, यइंटे रही नीट गरि दरहित फयि, शमरहित पवि; विवेकरहित मणु, वेदरहित वात्मण, स्वर्ग रहित ऐरावण, लंकारहित रावण; शस्त्ररहित पायक, न्यायरहित नापक . दरहित पशु, तपोरहित भिक्षु; वेगरहित तुरंगम, प्रेमरहित संगम, नासिक बाहित मुखमंगल, कर्गपालिरहित कर्णकुण्डल; यनरहित शृङ्गार, सुवर्णरहित सहित कोदंड; परणरहित वाल, राज्यरहित भूपाल; स्तंभरहित प्रासार. भलंगर सांयूलरहित भोग, प्रसिद्धिरहित प्रयोग; कंकणरहित बाहुदंड, पणि कानरहित मान; मुष्टिरदित कृपाण; ठउलीरहित वाण; अणीरहित छुरी, लोर.. दिन नगरी । जिम पाणीरहित सरोवर, तिम रत्नमंजरीपापड ते न शोना डांना व्यतिकर । ते समा, हुई निप्पमा । रीमा हुंते जेहरहा दीनां नोताना याद, ताद भार बोलतां न जाइ कोइ पाट; जीह रक्षा मंत' ने इन गाइ गीत; जेई उपजई चित्र, तेन पाजई यादिन, जीणं पूर्ण लते इन यांना गुन्तक; जोहन यपाणीगई औगिस्य, नितिन, नारन्या इमिह मि स्वयंवरमादि पवर्तनइ टुंता पी गिरा, १५६ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः धकार प्रसरि । जीणई अंधकारि प्रसरतई हुँतई अवर कवण लेखन, आपणी छांह न देपइ । गजेंद्र गलगलारवि जाणीयई, रथचक्र जाणीयह; चिंधपताका किंकिणीकाणि करी जाणीयई, तूर्य शब्दि करी यई, नींसाण द्रवहाटि जाणीयई । इसिउ अंधकार विपहर दिवसतणा, प्रहर रात्रितणा; छपहर गर्भवास सरीपुं प्रवर्तिउं । हिव हूउं प्रभात, फीटी राक्षसनी वात, दलिउ अंधकारव्रत; ६२५ ऋपटल, गगन उज्ज्वल; निःशब्द घूककुल, निर्मल दिग्मंडल; हूउं रविमंडल; विहसई कमल, विस्तरई परिमल; वायु वाई शीतल, महीतल; जिस्या रातापारेवातणा चरण, तिस्यां विस्तरई सूर्यतणा कि , इसिइ प्रभाति हुँतइ दीसइं घोडा हाथीया, दीसई पूरिया साथीया .. रायराणापरिवार, पुणि न दीसई रत्नमंजरी कुमारि सार । तिवारई राजा हूउ सचिंत, परिवार हूउ शोकवंत; पृथ्वीचंद्र राय हूउ विछाय। संबंधीया राईराणा तिसिइ अवसरि उल्हाणा । ते मंडप श्रीक दीसिया लागउ । जिम लवणहीन रसवती, व्याकरणहीन सा गंधरहित चंदन, पृतरहित भोजन; खांडरहित पकवान, मानरहित दान ।

पृथ्वीचन्द्ररित्र जतां पडई, कायर रडई।इम धूजि विटी, पछइ सभाविचालि पृथ्वी फूटी। विवर नोपन । तेह ज माहि तेज प्रगट हउँ । जोताहता तेह विवरमादि दिव्यरू- पधारिणी सिंहासणि बइठी स्त्री एकि दीसिवा लागी । तेह बीनणइ उत्संगि शोभमान तेजभारि, दीठी रत्नमंजरी कुमारि । सह आवर्षपूरित हुई। तीर्ण श्रीई चिहुं हाधि कुंअरि ऊपाडी वाहिरि मेल्ही, आपणपइं माहि गई, पृथ्वी वली तिसीइ जि हुई । असमाधि फेडी, राजा कुंभरि आधी तेढी । तिवार लोकतणा मेला, पात पूछियातणी नही बेला। हिव हपिंड लोक कलकलिया, विशेषतु उच्छच कलिया । राजा कुमारि अनइ पृयागंद्र सहित आवासि पहता । राय तारे हया। भोजन मंदपऊपरि भज लहन रिपा, विवाहमहोत्सव गहगहिया ।हुई धयलगान, नीपनां पायानः केटी पान, स्वजनहुई बहुमान; यापरइं पान, जिमाठीपई जान । कामकाजना पणी पलयटि बांधी हीडइ आफुला, मेलई चाउरी पाकुला । मैना आदणी, हिव भोजनतणी मांडणी । वहठी पांति, जिमणहार परीमणहार वितुरहई पांति । पहिल परीस्या फलायली मंशयाय पान, पद परीगा उण्डा अन्न।तां विशालस्यालि, परीसी शालिदालि; एननणी नालि, पापा. ग्नी पालि परि कूर करवा दही यापरई,णिपरि लोग भोजन करई । भा. चमनभनंतर दीयां कारमिन पीडा, लक्ष्मीपंतनणे मरे पन्तु मंग्लाइ मारा। हिव येलाऊपरि राजापृथ्वीचंद्रष्टुई करापि मंगलस्नान, विवाहयोग्य परिनिगा पत्र प्रधान । साँग शृंगार धरित, जाणे इंद्र अवतरिउ । गगउ ग भाति, उत्तिम नी पधाविउ । गजेंद्रहत ज्जरी दायद पगि मिरापमपुट भांपना माहि पातु । आगारपिचार आ, पउरीसमादि च्यारि मांगलिग पला, मेलावणई दान प्रयत्या राजासोमदेवियरहुई गजरथ तुरंगमदान दीप, राजा. यीचंद्रि महोत्सयसहित रत्नमंजरीतण पाणिग्रहण माघ । पारिदो- पपंत उत्सवसंयुक्त ताराभणी पालिउ, सकलदीक जोदय मिदिउ । तर पपार एवीचंद्र भूप, एकि यपाणद रत्नमंजरीनणरूपः परि वापर भाग, पकि पपाणइ मौभाग्य पकि पपाणइ शरीरतण शृंगार, पकि परा परियार; पकि पपाणइ हतणां फुल, पगि पपाणइ दिनयं शाल मिर्मत पकि पपाणइ लापण्य, पकि पाप पुण्य । इसीपरि पाणी सानद भा. पिड, विश्वई आनंद जापित राजामामारि सागर भार जीणि परमेश्वरि त्रिभुवन आनंद वधारिया । हिव अवसरि आवि, श्रीयम- पणइ आयासि, मनतणइ उल्हासि, पल्यकि पउढी हुंती विपहुर रात्रिसमई निद्राभरि वर्तमान हूंतोई चऊद महास्वम दीठां। किस्यां ते महास्वा । गज! वृपभ २ सिह ३ लक्ष्मी ४ पुष्पमाला ५ चंद्र ६ सूर्य ७ ध्वज ८ पूर्णकलस किसिउ गजेंद्र । चतुदत, विनयवंत, सप्तांगप्रतिष्ठित, गजद्रगुणि अधिष्ठिता विशालकुंभस्थल, विलोलकणांचल; उद्दडशुंडादंड, तेजि करी प्रचंड, मदजल-- जननयनसंताप; प्रधान, गेरायणगजसमान; महाकाय, पर्वतमाय; भद्रजातीय, अदितीय; जेहतणी गति प्रशस्ती, एवंविध दीठउ हस्ती ?। तर दीवउ पभ । किसिड ते पम। निजलयाराघरधवल, विकसितकाशकुसुमसन- जयल, विशालकुद,चंदकिरणतणीपरि विशद, सूक्ष्मसुकुमालरोमराजिविराज- उदंन, पंक्तिशोभितः प्रमुग्यप्रदेश, चामचरणसंनिवेश; असमयदन, दुधी- ११८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवाहः कीयो । कुण हुई घोड, कुग हुई हाधित; कुण हुई आभरण, कुण हुई पटकून ईणिपरि भक्ति कीधी । राय सवे आपणे आपण नगरि पहुता । राजाको चंद्रहुई सोमदेवनरेश्वरतणह आवासि नितु नवनवे गौरवि शिवमय सुबम- दिवस अतिक्रमहं। अन्यदा प्रस्तावि राजापृथ्वीचंद्र अनइ राजासोमदेव राजसना एका बइठा । किसी ते राजसभा। जीणि सभा पात्र नाचई, विद्वांस बइठा पुस्ता यांचई; माल मल्लविद्या मांडिया माचई, रागज्ञ रायहुई रंग रहाविधा राध सुहायोला शुभ बोली स्वामीकन्हे पसाउ याचई, कडा झागडू चिरकाल दि. वाद करी स्वयमेव पाचइ । इसी सभा, विडं नरेश्वरि करि यली वाचन प्रभा । तिसिइ अयसरि हर्षप्रसार पशुता यनपाल, तीणि वीनविउ श्रीसोम- देव भूपाल । स्वामिन् आपणइ उद्यानयनि श्रीधर्मनाथ तीर्थंकरदय पाउ धारिया- नाथतणउं कहिवउं, चरित्र, महापवित्र इणि भरतक्षेत्रिप्रवरगुणि करी मनोहर, रत्नपुर नामिई नगर । तिहां ऐश्वर्यनिर्जितसुरन्धर भानुनामा नरंधर । तेह- तणइ पहराणी, सुव्रता इसिइं नामिइंजाणी ।अन्यदा प्रस्तावि तीणि राज्ञी सरोवर १० समुद्र ११ विमान १२ रनराशि १३ निधूम वैश्वानर १४ ईह अन; दशमहास्वमतण सांभल जूजू वर्णन व्यतिकराराणी प्रथम दीठउ गजेंद्र यासित कपोलमूल, भ्रमरकुल अनुकूल परित्यक्तसकलदोप, उत्पादितसकत मान, स्निन्धकांतिदेदीप्यमान; अभंगल्यामलग, सुंदरममस्तअंगोपांग; विए.

११९ पृथ्वीचन्नुचारित्र स्वरलोचन लिसिउ पाटत हुइ प्रासाद, अधया कैलासपर्वतस्युं लिद याद । सिउ भत्यंत शुभ, दीठउ पभ २ । तर राणीयइ दीठउ सीहु । किसिउ - सीह । रूप्पपिंडपांडुर, अनुतमभाडंबर, रजोत्पलसुकुमालताल, तालूह दागी आरफ जिह्वा जिसि हुइ अशोकप्रवाल विस्तीर्णकेशरसटाशोभित. कंध, यनसारशरीरबंध; भवरपीपरप्रकोष्ठ, कमलदल रकोष्ट, तीक्ष्णदादापिडं- चेतपद्न, पराममतणउं सदन; पुच्छच्छटां पृथ्वी आस्फालतउ, पोतलोचनि भूमिकांनि निहालतउ, मूपागतसुवर्णसमान फिरतां पिंजरनेत्र, शौर्यवृत्ति- पाउं क्षेत्र, अकल अगंजित, सबल अपराजित; अबोह, एविध दीठउ सीह ३ । न दीटी देवी लक्ष्मी । ते फिसी । हिमवंतपर्वततणइ शिपरि, महाप्रवरि; पद्म- हमाहि योजनप्रमाणविमलकमलि संनिविष्ट, चंद्रसमानवदन, कमलसमान- लोचन, निर्जितसूर्यमंडल, देदीप्यमानकुंडल; उदारमलंवितहार, अद्भुतभंगार; दिग्गजेंद्रे अमृतफलसि फरी अभिपिच्यमान, पगतलि चांपी रही नवनिधान एवंविध सफलकल्याणपान, मनोज्ञगात्र, देवी लक्ष्मी दीठी ४ तदनंतर अशोक चंपक नाग पुग्नाग नियंग पाटल सेवत्री जाइ जूही वेउल पउल श्रीदमणा मरूमा मंदार मुचकंद केतकीप्रमुखयनस्पतीतणे कुसुमि निप्पन्न भ्रमरभरभुज्य- मानपरिमल एवं विध दीटउ मालायुन्म । तउ दीठउ चंद्रमा। ते किसीउ चंद्र- मारावितण समपि उदयि फरी, सकल ताप हरी; रोहिणीरमण यामिनीजी- वितेश्वर अमृतमयमूत्ति उज्यलधवल, प्रीणितचकोरकुल, एयविध चंद्रमंडल ६। तर दौठा श्रीसूर्य । किसिउ ते सूर्य । प्रभाततणइ समइ जेह श्रीसूर्यतणइ उदइ प्रासादतणां दार उघडई, देवहुई पूजा चडइ; पंथ सवे यहई, मुनीश्वर धर्मस्या कहई, लोक याटविशेष लहई, मेघ मल्हार गाइइ । मांहि अनेक शतपत्र सहस्रपत्र लक्षपत्र कोटिपत्र सूर्यवंशी कोमल पिहसई, चक्रवाफ उल्हसह एवंविध प्रखरकिरणनिकर, दीठउ सहस्रकर ७ । तर दीठउ ध्वज । किसिर ते ध्वज । कृताहाद, कोई एक गरूउ प्रासाद, प्रसरि, तेहतणइ शिपरि, असंह, सुवर्णमयदंड; तेजि करी अंकुश, कनकमय कलश; भली, रत्नमय पाटली; तिहां जिसी स्वर्गतउ ऊदाली, इसी फाली; निरुपम स्वरूप, तिहां सी- इतण रूप । इसिउ घंटागणि गहगहतर पाइ लहलहतु निर्मल नीरज, राणीई दीटर ध्वज साता दीठउपूर्णकलस। किसिउ ते पूर्णफलस। सुवर्णघटित रत्न- मय पीया स्थापित, कंठि पुष्पमाला व्यापित; माहि अमृतपरित घरगली.

१२० लहरि वाजई, पाणी गाजई; दक्षिणावर्त्तशंखतणां यूथ फिरई, माहि अनेक प्रवहण सांचरई। एकि पूरीई, एकि नांगरीयई, वाहण वाहणरहई एकि मिलि. तां आफलई । मोतीवाला आगरथकां लीजइ, किहां एकड़ मेघिई पाणी पी. जई। इसिउआश्चर्यतणउ निलय, पृथ्वीपीठहुइ वलय; गहिर गंभीर, अनंतनीर; समुद्र, राणीयई दीठउ समृद्र १२ । तर दीठ विमान । किसिउं विमान । सुवर्णमयनित्ति, रत्नमयविच्छित्ति, प्रशस्यकलशि करी शोभमान, गगनल- क्ष्मीहुई कुंडलसमान; जेहमाहि अनेक देव देवी रमलि करई, एकि श्रुति घर- इं पकि गीत गायइं, पकि यादिव वाई; हीयई हर्ष न नाई । अनेककुसुम तणा प्रकर, चंदूआतणा निकर; मोतीतणी सरि लहकई, कपूरकस्तूरीता परिमल बहक; ध्वजा लहलहइं, मन गहगहई। एवंविध विबुधवधृजनकीहा- शि। किसिउ ते रत्नराशि । अनेक वन पैडूर्य चंद्रकांत जलकांत पुष्पराग प. स्थान, तेजापटालि निर्जितनानुप्रधान, दीठउँ विमान १२ । तर दीठउ रत्नरा.. भराग मरफ्त करतन चंद्रप्रभ साकरप्रम मभानाथ अशोक बीतशोफ अफ प्राचीनगनर माध्यमहरः विराजमान, आम्रफलमयान; मांगलिक लक्ष्मीपदाननणद विपद अनसम, . पूर्णकलस १। तर दीठ सरोवर, वृक्षतणउ परिकर; पालिउन वितर, १०, नउ समहर, पाणीनउ आकर । चउकी चउपडी झालहलई, परइ बाइ. ऊच्छलई, ऊपर जाण भरीयई, पड कूद तरीयइ। अमृतोपम नीर, दीठई शरीर; सारस कुरल कपिंजल कलहंस कलगलई, तापनणा व्याप टला : हंस रमई, भ्रमर भमई; चकोर चक्रवाक फूजई, जलकेलिनां कांड पूजाई; वासई, सर्प नासई; आडि पंवीया तरई, बामण लान करई; आस्तिक ला. नित्य सारई, कश्मल निवारह; संध्याविधि साघई, अघमर्षणमंत्र आराव:- धोतीयां धोयई, कमंडल ढोयई । सिसिरगुणतणउ सहयास, जलदेवतातण- निवास । देहरी दंडकलस आमलसारा झलकइ, जलहारिणीकुलवधूतणां न पलकई; तडि कीतिस्तंभ दीसह, हीय विदसइ । बग थलइ जाइइ, मेघ मल्हा गाइइ । माहि अनेक शतपत्र सहस्रपत्र लक्षपन कोटिपत्र सूर्यवंशी सोमवंशी कमलवन विकाश पामई, देवता जिहां क्रीडा कामई । एवंविष उदार, वृत्तागर अत्यंतसार; महामनोहर; दीठ पावनखंडमंडित सरोवर १० । तउ दीटर समुद्र । किसिउ ते समुद्र ! अनंतजल, अनंतकल्लोलकोटीसंकुल । माहि मत्त महामत्स्य नक चक्र पाठीन पीठ तिमिगिलितणां कुल पडइ, एकि ऊपडइ ।

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अमृत संचारी, पत्रयुगल कुंडल श्रीदाम मेल्ही इंद्र स्वस्थानकि पहुतु। MAA १२ पुप्पमकर १२ अष्टमंगलकरण १३ धूपोल्क्षेप १४ गीत १५ नृत्य ! वणकवणपरिहं । उद्धमंताणं शंखाणं संगीयाणं खरमुहीयाणं परिपरिमाण तीणि अवसरि गगन गाजियां, इगुणपंचासभेदि वाजिन वाजियां । - ताणं भेरीणं झल्लरीणं दुंदुभीणं आलिप्पंताणं मुखाणं मुत्तिगाणं नदीमुत्तिगाल अहम्मंताणं पणवाणं पडहाणं अप्फालिजंताणं भंभाणं हारंभाणं ताटि- ताणं दुंदुकीणं चिंपाणं वाइलंताणं करडाणं डिडिमकाणं उत्तालिवंताणं- घटिजंताणं कच्छभीणं चित्तवीणाणं आमोडिबंताणं झुकाणं नउलाणं छि- लाणं तोलाणं कंसतालाणं घहिनताणं रिकिसिकाणं सुंसरिकाणं दुंदुकीर्ण - मिवंताणं यंसाणं वेणूणं एवमाईणं पगूणवन्नाए पवाइजंताणं । ईणि युक्ति इंद्र होई देव मातातणई समीपि मुंकि । पत्रीस वत्रीस स्थाल सिंहासनादिक भावभक्तिई, आत्मशक्ति, परमेश्वरहुई स्नानमहोत्सव करी पुनरपि पंचर वत्रीसकोडि सुवर्णरत्नतणी सृष्टि करी, स्वामीतणइ दक्षिणहस्तांगुष्ठि करो १२२ प्राधीनगूभंगकाम्यमः श्री ४७ ही ४८ सुतारा ४३ चित्रकनका २० चित्रा २२ सीतामणी १२ ५३ रूपांसिका ५४ सुरूपा ५५ रूपवती ५६ एवं अधोलोकनियासिनी ८ लोकनिवासिनी ८ रुचकपर्यंतचतुर्दिशिनियासिनी प्रत्येक ८, ८, : सिनी ४ मध्यरुचकनिवासिनी ४ इणिपरि छप्पनदिमुमारिका आयी। सूतिकर्मतणी समग्ररीति नींपजावी। तदनंतर सीमावर आसनमकंप नीपनउ । पहिल इंद्रहुई कोप ऊपनउ । वन ऊलालिउँ, निहालिउँ । जाणिउं परमेश्वरतणउ अवतार, ऊलटिउ भक्तिभार ।इंद्र भी गहगहिड, आसण छांडी उत्तरासंग करी गड धद मस्तकि हाथ जोडी शत्र स्तव कहिउ । इंद्रि आसणि वइसी हरिणगमेसी देव वोलाविर, तत्ला आविउ । इंद्रतणइ आदेसि सुघोपा घंटा आकालीनइ देवलोकि जणावि इंद्र लक्षयोजनप्रमाणि पालक विमाने ही पंचसाप परमेश्वर लेउ मेरूप ति आविउ । चउसठि इंद्र मिलिया, देवसमूह हर्षि कलकलिया। आठ सह- चउसहि आगला कलसिकरी निर्मलाल भरी स्नान कोय। तदनंतर अंग रक्षण करी विलेपन २ वस्त्रयुगल ३ वासपूजा ४ पुष्पारोहण ५ माल्यारोहण ६ वर्गारोहण ७ चूर्णारोहण ८ ध्वजारोहण ९ आभरणारोहण १० पुष्पा वादिन्न २७ सत्तरभेदपूजातणउं करणीय सीधुं।

लोक ऊलटिधरिया। पृथ्वीरहई अलंकरण, दीठ स्वामीतणउं समांसरण। भी परि जानुप्रमाण पंचवर्ण कुसुम परसई, चिटुं दिसि दिव्य परिमल रलमय तोरण प्रत्यक्ष जिसी मांगलिक्यनी पालि, इसी घंदरयालि। अनेक विचित्र, विशाल छत्र; उदारस्यरूप, पनसमय पूतलीतगां रूप; जेहे लिपिन मिह शादुल गज, इस्यां निर्मल नीरज, पंचवर्ण ध्वज इस्ता समोसरणविचा. सिर प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष, इसिउ घारगुण प्रत्यक्षा तेहतणीला रत्नमप १२३ पृथ्वीचन्द्रचरित्र हिव प्रभाति दासीमहिलोए राउ वघाविउ,स्वामी तम्हारे पुत्र आविउ । चधामणी दीधी, नगरमाहि सर्व महोत्सवतणी पद्धति कीधी।अलंकरिउ र, शृंगारियां प्रतोलीदार । मंच अतिमंचतणी रचना हुई, स्वर्गपुरीतणी मा लई । ध्वजपताका लहकई, पुष्पपरिमल बहकई । नाचई पात्र, राजाभ- आवई अक्षतपात्र । सोमाई भणतां आवई छात्र, लोक अलंकरई आभर- गात्र, उत्सव करिवा एहह ज वात । तीणि वेलां न ऊऊई कोरण, वांधी- तोरण; बांधीयई बंदरवाल, उत्सय विशाल; गुलघीउ लाहीयई, मन ऊमा. दीपद । ईणि युक्ति जन्ममहोत्सव हुआ । नामगरणतणइ अवसरि माताहुई होहलाइ धर्म युद्धि हुई। एहभणी धर्म इसि नाम दीध, परमेश्वरि रमलि करतां वालपणुं लीप, यौवनवयि राजकन्यातणउ पाणिग्रहण कीप । अदई साप यरस कुमारपणउं पाली पंचासवरस राज्यलक्ष्मी पामी, पछद विरक्ति- पुक्त हउ स्वामी । नवविघलोकांतिकदेवतणी वीनतीलगइ सांवत्मरिकदान दीघरं, पछह महोत्सव सहित चारित्र लोध। वि वरस छनस्थ काल अति यी, केवललक्ष्मी पामी; विहारक्रम करई, भव्यलोक तारई । हिव राजा पृथ्वीचंद्र अनइ सोमदेव उद्यानपालकरहई सादावारलाग्य वर्णदान देई समस्तपरिपारसाथिई लेई परमेश्वर नमस्करिया माचरिया, म. केसिउँ ते । समग्र देव आवई, समोसरण नापजापई । तां पहिलं घायुकुमारदे- कतानिर्मित संवर्तक यायु विस्तरई, ते तृण काष्ठ फचयर हरई, आकासि मेश- पटल पसरई, गंधोदकि वृष्टि करई, फुलपगर भरई । गरूअउं रलमय पीठ लसई। रत्नमय सुवर्णमय रूप्यमय निन्नि प्रकार रूपि करी उदार, अनेक पर; मणिरत्नसुवर्णमय फउसीसां सदाकार, च्यारि प्रतोलीमार । तिहां बेह पासे उपेस्तर सुवर्णमय स्तंभ, परि मणिमय कुंभ; इंद्रधनुपमानमरण, लि, मणिवद्वपीठि विशाल सकलमांगलिण्यमुख्य, गरूड अशांत; जि.

प्राचीनगरकाम्पस
सिंहासन, जगनाथहुई बदसण । तेजिई जोई सकीयह नीठ, इसि रल
पदवीट जित्यां विकसित सहस्रपन, तियां पनर नातिज्य; अमर,
द्वादई समर; अमरीकृतभादित्रमंडल, तीर्थकरलक्ष्मीकुंदल, पून्हा
मानंदट। जनन्द दर्शनि मिथ्यात्वपटल दलई, इसिउ आगति पर
न्न दिन्य भि वाज, तीणि निघाप गगनांगणि गान, पनीर
नमा मार मालदा महन्तममायोजन विधात लहलहरं, धूपतणा परि
नन्द, गादिवतगी कोडि दुई। मनुष्यतणी कोटि आयर,मनि रहा
भामा माननि परमेश्वर जगदीचर नयसुवर्णकमति पाए
काग तर भार प्रभारं दसइ दिसि गापता, भरिलो
मुंबनानिमिना गरि परसद, पूर्वाभिगुण सिंदारानि म
. भरमसाजोई। गपूरी, गारपरिसदारी; मियास्यमानमा
ममममारिणी, भगनानुसारिणी, मारवाणी; सामना
ग.
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मांगा, मामरणिमादि पहला । प्राधमा
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१५ :

चिघटला गोला गहिवरिया लोहाणा भाटीया नागउरा आणंदउरा सतला कड- कालापुरीराययालपेसीया पेरूयागोमित्री नारायणा टीटू गजउडा गोपरूआ अजयमेरा फंदोलीया फापत्य सगउद्या सीहउरा जेसवाल नादेवा जाइलवाल- भावेल । पणि सपिलु झातिकुलवंशमाहि वपाणीइ सुश्रावककुल । जीणि भयागून रापीइ, अणंतकाई न चापीई; चोरी न कीजइ, सुपानि दान दीजइ- मुताबि पित्त यावी लाभ लीजा आलोअण लेई पाप घोईइ, परिग्रहप्रमाणि पुष्पयन हाईइ उभयकाल सामायक त्रिकाल देवपूजा समाचरीइ, पुण्यभंडार "मरीक्षा पास अभक्ष यनीस अणंत काय टालीयह, आठमि चऊदसि पूनिम अमावास चउमासी पजूसण पर्व पालीयई, पुण्यमाग उजूआलीयइ। इसुधा. यस्तण फुल, तर पामीपइ जइ पातइ पुण्य हुइ विपुल । उत्तिमकुलि लाघह हुनह गृहस्थरद्दई जय हुई। कुकलनतणउ संयोग, तुहुइ पुण्यतणउ वियोग। किसी ते कुकलनाजे चालती कउयछि, साची अलछि; आत्मकुड़वभं. जति, परचित्तरंजकि; कपटविपइ पटिष्ट, अतिहिं अनिष्ट; बोलति छउड़ उतार रोरा छोह मारहा जीमइंजव छोलइ, अलविइंअसंबद्ध बोलई,बगाई करती १२५ पृथ्वीचन्द्ररित्र ने प्रशसि जेहे जिणतण अपतार, पंशतणउ कवण विचार। पंग मर्यबंश दिल चाहमाण सोलंकीवंश यालावंश पावेला वाघरो- गुदा गुन्वरवंश मामटा भाटीया सीदा चांदा दाहिणमा कच्छवाह णपंश एरीयद शकट मिलार धान्यपालवंश अनंगपाल राजपाल पाल कटाप परमार मारीयंश यादय मधय निकुंभ गुहिलउत्त डोडीवंश डापागवंश भाणा पदरपंश मीलणपंश वोदाणवंश दहीयावंश प्रमुख यश प्रमुन्पयंश जाणिया । अनइ बामणादिक फुलविशेष ज्ञातिविशेष गिरा जिन फलिकाल प्रयतमानि परासी ज्ञाति वोलीपई। किसी ते मामि । श्रीश्रीमाली उमपाल पावरवाल डीटू पुरवाल डीसावाल मेडत- पाट भान सराणा एग्रवाल दादिल सोनी पडपड पंडेरवाल पोरूआड गूजर मोह नागर जालहरा पहाता पोल जांबू पायडा वाव दसउरा करहीया नागदहा मेपाटा भटेरा कयरा नरसिंहरा हारल पंचमवंश सिरपंडला कमोद रोनकी अगरयाल जिणाणी यांभ पांघ पाल्हाउत उचित वगहू अहिछ- बार श्रीगजर पाल्मीकि टाकी तेलटा तिसरा अठवग्री लाडीसाखा वधन- रानुवाल पीयू पभावती नीमा जेहराणा माथुर धाकड पल्लीवाल हरसउरा सुमायानणइ कुलि जीयपधु टालीयर, जीवदया पालीयह; मिथ्यात्व परिहरी, २. सम्यक्त्व अंगीकरीपदा पाणी भलीपरि गालीयइ, इंधण सोधी ज्यालीयइ;

. १२६ , प्राधीनगूर्जरकायसह गोदड गिलइ, घरि विनोड करी वाहिरि मिलइ, योलाची विसई हाय उछला फूफ्नी सापिणी, चालती चीत्रिणी; पुण्यद्वारतणी आगल, नगरतणी भागल घणूं किसिउं कहीयइ । जिसी मिरीतणी ऊगटि, जिसि चालतउं पलेवग: जिसी दायज्वरतणी वहिनि, इसी संतापकारितु संपजइ नारी, जर जीव पाए कमि भारी । अनइ तु हुइ सुकलत्र, जइ पोतइ हुइ पुण्यपवित्र । किसी ने सुशील सुलील सदाचार सत्यवंती विनयवंती विकवंती पुत्रवती बोलयन सुजाणि मधुरवाणि देवगुतणइ विपइ भक्त, पुण्यतणइ विपद आसक्त; सहति सलावण्य, इसी सुकलत्रतु संपजइ जह पोतइ पुण्य । अनइ जं शरीरि संपज लोलायंतपणूं, तं पुण्यतणउं प्रमाणाज मधुरगति चालइ, पापबुद्धि पालइ सहति विचक्षण, शरीरि वत्रीसलक्षण; अलिकुलकजलश्यामल केशपाश, अष्टमीचंद्र- समान भालस्थल, कामदेवकोदंडाकार भ्रूभंग, पूर्णचंद्रसमान पदनमंडल, आइ- शतलसमान कपोलयुगल; मौक्तिकश्रेणिसमान दशनमाल, वक्षस्थल विशाल प्रचंड भुजदंड, इसौ रूपलक्ष्मी अखंड, तु संपजइ जइ पोतइ प्रचुरपुण्यपिंड। अनइ जे द्रव्य पार्जिवातणइ कारणि एकि लोक देवदेवता आराघई, मंत्र- विद्या सघरपणई साधई, राजसभा बुद्धिवंत भणी वइसई, रणक्षेत्रि पहिली पइसइ) व्यापारकला केलवइं, धूर्तपणई भलारहई भोलवई; जलमार्ग स्थलमार्ग आदरि आक्रमई, भूमंडलि भूजावलि भमई, जोगीपूठिई लोभि लुबधा लागई, पकि मोटा ठाकुर मागई; पकि पाला पुलता पंधि चालई, एकि हा देव भणी बहरागरि घाउ घालई, पकि हल पैडई, उलग करई लागा ठाकुरकंडई रसकारणि रसकूपिका पडई, एकि कलकलतई समुद्रि चडई; एकि प्रिनिता साठि क्रियाण बहुरई, पिरायां कवित्व वहरई, कष्ट सहई विपुल, पुणि लक्ष्मी तु पामई जइ पोतई हुइ पुण्य परिघल, घरि सुवर्ण मणिरत प्रवाल, प्रधान मुक्ताफल, गजरथतुरंगमादिक जाणिया लक्ष्मीतणा विलास सकल । दिया जं संपजइ सत्सुत्र, पह पुण्यनण चरित्र । एकई तगइ एकिक पुत्र हुई जे बालपणि पालीई लालाई पणि जेतलई यौवनभरि जाई, तेतला मायावसान्दा पाई; कृत्य अकृत्य गिणई, यहांतणां वचन निहणई; माया नसाम्हां नोटर वोल भणई, अहंकारि हणणई, लक्ष्मीमदि कुपात्रि यरस, कुत्थानकि विलसई, पिराई भूमि ग्रसई; चाहए यचनि उन्लसई, रूही यात कहनां साम्दा घमई; स्वाननी परि भसई, अपरहुई हसई, पापकरी H. मार, धर्मवाना हिपइ न यसई स्या" अभक्त अाण, ए पापन" सुमित्र सन्बन सुजाण,तं पुण्यतणउ प्रमाण इस्पां धर्मफल देपी,प्रमाद जयपी आलस परिहरी, आदर करी; पुण्यतणइ विपद भावनासहित लाम लेराउ। शामइ पूरि; जिम सम्पत्य शोभा प्रभापना, तिम धर्म शोभा भावना। पद कारणि भावनासहित पुण्यति साभ लेवउ । जिसिई पुण्पनापि मर. पीनती कीधी पली। हे जगापा संदह भांजियानई ऊभर हाथ, मुरारी अपरि संदेह न भाजई, संदेहभंजन विद तरह पिरपि सिरं काहीई। समुद्रि उलंघीपदभारंडिन मसह, गजेंद्र धिमारोपर मांदिन तीज तडपरं न दूंकसंग्रामभूमि भिरपहरातिन दयामय, मंडा- शोभई हारि; जिम गृह शोभई उत्तिम नारि; जिम मलक शामा फेलामा मरोवरि शोभइ कमलि,पुष्प शोभइ परिमलि; मुप शोभइ निर्मलिनंगयुगलि, रतणा भार झालियइ अभीष्टि न भलपामण परनतांड मार पृथ्वीचन्द्रपरित्र । अनइ पुत्र विवेकीया विचारवंत, सहजिई संत सौभाग्यवंत, गरू- ति भक्तियंत गुणवंत; देवगुरुधर्मतगइ विपद तत्पर, सुपुत्र पानीयइ जह इ पुण्यतणउ भर। हिव तु पानीयइ सुमित्र उत्तम, जइ पोतइ पुण्य हुइ निरुपम । एक च सहजई दुर्जनप्रकृति, पापतणइ विपद मोटीआकृति; मुहि मीटउ, चित्ति पाठउ पिरायां उलछिद्र जोइ, विणास विण विगोई; उपगारिकेतलईन लीजई, मशंसा मनमाहि पोजह; आपणपउं घणुं देपर, अवर नहीं किमिदं लेबर जन संकटि पाडइ, परदोप ऊयाइ राउलइ पानइ, देवगुरु अपमान; मूनि- अधर्म, वोलइ पिराया मर्म । जिसि विषवृक्षनउं वन, इसिर जाणियां दर्जन । एकि जीव, सहजिई उत्तमस्वभाव, पुण्यऊपरि भाव; उपगार करई, परमर्म हीपडई धरई; परदोपन प्रकासई, असत्य न बोलई हासः उन्मागिं न चालई, पापवात्तो टालई, गुरूपदेश झालई, धर्मतउन हालनवे क्षेत्रे यई धन, जिसि वाय, चंदन; इस्यां जीना सीतल मन, इस्रा कहीगइ सन्चन । सपना जेद्द कारणि इसि कही । जिम प्रासाद शोभइ ध्वजापारि, जिम उदय भारि जिम कर्ण शोभइ स्वर्णालंकारि, जिम शरीरि शोभा शालगारित राधि शोभइ चंद्रमंडलि; पियाह शोभा फरि, उत्स्प शोभा तार, नदी . टपकल्याण संपजई। रसिउ उपदेश सांभली, मनतणी गली, परमेश्वरमति रिह नरवरि समा विपरितणापि जारपिपई गुगदन पूरु, क्षमिहरलगां पर १२८ मिसनद, नागई ययाई किसि कीजई जीणि पाइ उपना सिमा, तानि मिति किमि कोई जोगिई धाई प्रमाद, नाणि परि मां मन्नार, मन्यनुषि भरतरी; तुम्हें जगाडिया, पुण्यमार्गि लगारिता मंतार, नागदं गमतिई किमि कीनई जाणि कराइ पाप । यमर विटुंगड़ी। भासा माहवार, काई पुष्य नयनारि दिदान, पां मग्दिनना कान; कर मुगुरुमगि, नागरिवकयुक्ति करायं मामा प्राचीनगूर्जरकान्यसङ्ग्रहः नदीतणइ पूरिन वाहलई, रायतणइ मनि रंगि रहावीयई मधुस्वरिन पाहतई समुद्रि सेतुबंध बांधोइ पर्वते न काकरई; दृढगढतणी पोलि भांजियइ गजेंछि न वाकरई, याचकजननां दरिद्र टालीयई दातारि लक्ष्मीवंति न आजन्मदुरित, सकलसंदेह भांजीई केवलीए न छद्मस्थि। तेह कारणि तउं दे स्वामिन् अन्हारा संदेह टालि, एक संदेह ऊपनउ सरोवरतणि पालि; एक ऊपनउ अटवीताकि एक संग्रामि; एक स्वयंवरि, प तवे संदेह अपहरि । इसी बीननी सांभनी जगनाथ कहइ छह अहो नरेन्चर सांभलउ । हिय कहीइ छह पूर्वभव, सिमित हुई अनुभव । ईणइ क्षेत्रि भृगुकच्छनामिइं नगर, जिहां नर्मदा नदी भवर प्रौढ अवलगृह, लोक पुण्यविपद सस्पृह; जीणि नगरि महाधर मंडलीक सेट हत्य यरवीर राउत डबइत भाषाइत जहणाइत फलहकार छुरीकार नीघर कुनयर सींगहीया सावलीया जेठी यंत्रवाहा भंडारी कोठारीमभूति राज टोक यसई, सर्वज्ञभवन देपी मन उल्लसइ । जिहां पद्मश्रीनानि सरोक्र. महाननोहर, जिहां राज्य पालई द्रोणनामा नरेश्वर । तेहतगइ सागर अना पूरण सिह नामि पवित्रचरित्र, विपुत्र । ते बेउ नर्मदानदीमाहि वेडी की मन्य विगामि याश्यत्तिया । तिसिह अयसरि मत्स्य एक साम्हउ जोई तीस लिई बोलिया रे दुराचारउ म करउ पाप, नरकि इत्यां मुसिड संताप, महो एटर करनाइ विनाप जइ न मानउ तउ पूछउ आपण वाप। प वानसांनी गग कुमर नपानांत हुभा । निसिइ नदीनद कठि एक दीटर मुनीश्वर। चंडीत उतरा नमस्कारित । या तुन्द म्हारा पात्र, हं पालउं चारित्र; नन् सरर ताई मान किसि कोई जागई यूटई कान, ती भावावि सिमिः कीलाई जोगदं चूक ज्ञान, ताणई ठाकुरि किसित करना गई पानी पगि पगि अपमान; ताण धमि किमि कोतइ जाणाई याय थाई रमादि काल माप, नाणई श्रोई किमि काम जानु कि ने १२९ जीप दरिय पदापई मारि मादः पानद मम्मपत्य, जाणइ नपतत्त्व; करई सामायक मार, रमाद पंचपरमेष्ठि नमस्कार, ये कुमार इसीपरि भरई पुण्यभंडार । भन्दा ममापि द्वाणि राजांनाह विरई राज्य दोध, आपणपई राशी. मदिन भारियनीय निभल पारिप पाली भावविशेपि पातालि यलीन्द्र भवतरित, राणीइंचाणि घनद तह जि भणसरिउ । दिप पूरणतणइ पद्मश्री हमिद नामि हुई फलप, महासरिता ते सागर पूरण पमनी पुण्य करी पहला देपलापि, सीन्य भोगपी अवतरिया मनुष्यलोकि । सगरतणउ जीव तु नोनदेय नरेन्द्र, पूरणनउ जीय उ यीचंद्र । पद्मश्री ईहां रत्नमंजरी अग्नरी पूर्वतग धर्म फलिउ, मर्पसंग मिलिउ । चिहुं नरंपरि इंणिपरि उपदेश सांभलिउ, श्रीधर्मनाथतीर्धकरि वली दिदिय सामला जे पूण्यिा संदेह, तेहनु फीजइ हा जिसिंइ समइ रन- मंजरी नरोपरतणी पालिई पितातणा उत्संगि बइठी, कुणरहई देवातणी चिंता पइटी; तिमिद अयसरि, यलींद्रदानवेधार; शानिप्रमाणि, पूर्व जाणी, पुनरवीचंद्रनिमित पिया समंजरी हंसरूपिई अपहरी आपणइ कन्हइ आगी । एमास पानालि स्थापी, पाय अवसरि पारी आपी। राजा पृथ्वीचंद्र- रस्सम दीघउ, अटवी अनद संग्रामांगणि महासानिध्य कीधउं । अनइ स्वयं- परिजनला भूमोतु राजां तालांघकार विस्तारीनइ रत्नमंजरी रथि घाती, लेनलाई यलीदनणी इंद्राणी ते मन्दिर निपाती।छ प्रहर पातालि रापी, प्रभाति अट करी दापी; उहे दिपाटिउ पूर्वभवस्नेह, एतलई टलियां सवे संदेह । अहो पृथ्वीचंद्र नाहीं विशेपयंत इ भाग्य, अद्भुत सौभाग्य । जेह कारणि गृहस्थनेपि हाधियई पटतां ईद जि भवि ऊपजिसिइ केवलज्ञान, गह भणी भाग्य प्रधान । सोमदेवराई पीजइ भषि मुक्ति, इसी छुइ युक्ति । ए वार्ता मनि धरी, प्राययोग्य धर्म आदरी, परमेश्वर नमस्करी; वे नरेश्वर सपरिवारि स्वस्थानकि आल्या, परमेधरि विहारमाम नीपजाव्या। हिव राजा पृथ्वीचंद्र सुसरउराउ मोकलापी रतमंजरीसहित आपणइ पुहियाणपुरि पादणि आव्या, प्रधानि प्रदेश महोत्सव कराव्या । सकल लोक हाद पाटण काज काम परिहरी आभरण शूटते, येणीदंड छटते; पटउले घाटते, घाट विणसते; समसाटि जोइवा धाइउ राजा महोत्सयसहित भाषणइ आयासि आइउ । रनमंजरी पहराणी स्थापी, फीत्तिई जगनयी व्यापी। राज्यसभा भोगवतो अवसरि रतमंजरी महीधर इसिई नामिई , पृथ्वीचंद्रनरेश्वरतणउं चरित्र सांमली, मनतणी रली, वली; चली, विवेकवंति संवन् १४७८वर धावणमुदि५वो पृथ्वीचन्द्रचरित्रं पवित्रं पुरुपपलने निर्मित समर्थिन् । इति श्रीरामा श्रीमाणिमयमुन्दरमूरितं श्रीकृष्वीचन्द्रचरित्र वापिलासे दशम उदासः । प्राचीनुगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः पुत्र जन्मिउ । ते सर्वांगसुंदर, रूपिई पुरंदर विवेकवंधुर राज्यधुरंधर सत्पुमय- सिंधुर नामि महीधर प्रबर्द्धमान हूउ । राजापृथ्वीचंद्ररहई राज्य करतां नव- लाप नवाणवइ सहस्र नवसई नरोत्तर वरस अतिक्रम्यां । तिसिइ अवसरि कानडदेसनउ राउ सिंहकेतु इसिई नामिई अकस्मात् पुहठाणपुरि पाणि- परि चडी आविउ, लोकरहई आतंक ऊपजाविउ । तत्काल चरपुरपि पृथ्वी- चंद्ररहई जणाविउ । ते सांभली राजापृथ्वीचंद्र कोपि करी करवाल जलालत सामहिउ, सुभटवर्ग गहगहिज; भंभा याजी, गगनांगण रहिउ गाजी। राजा आप जेतलई हाथि चडिउ, तेतलई मनि विमासण पडिउ । रे आत्मन हुं बाह्ययइरी पूठिई धाउं, अंतरंगवइरी पूटि न घाउं । कुण ग बुद्धि, किसी शुद्धि, जीतउ जोईयइ क्रोध,जेहतउचालइ विरोध; जीतु जोईयइ मान, जेह- हुई पर्वतनउं उपमान; जीती जोईयइ माया, जेहतु पामीयइ स्त्रीतणी काया जीतु जोईयह लोभ, जेहतु संसारि समयक्षोभ, जीतु जोईयइ काम, जेहतु फेडई पुण्यतणउं ठाम । ईणिपरि नरेश्वरहुई चीतवतां ऊपन शुक्लध्यान, तत्काल ऊपनउं केवलज्ञान ! आव्या देव, करई सेव; वहरी समिउ, आवी नमिउ; वाजई वादिन, महोत्सव विचित्र । ये वेप दीघउ, राजऋपि लीघर इंसजमलि, वइठउ सुवर्णकमलि दिइ उपदेश, हउ पुण्यतणउ निवेश । एक आदरिउं सम्यक्त्व, पके आवकत्व; एके संयम, एक नियम । ईणिपरि लोग- हुई लाभ देई पृथ्वीमंडलि विहारक्रम करी पृथ्वीचंद्रि राजा सिद्धिसाम्राज्य लीघउ, तेहतणइ पुत्रि महीधरि पहुटाणपुरि अखंडप्रतापि राज्य कौघई। कल्याण ऋडिगृद्धिपरंपरा संपजई। श्रीमदलगच्छे श्रीगुल्माणिक्यसृरिणा। पृथ्वीचन्द्रनरेन्द्रस्य चरित्रं चारु निर्मितम् ॥ यावन्मसर्मही यावन् यावचन्द्रदिवाकरौ । वाच्यमानो ननस्तावदान्योऽयं भुवि नन्दतात् ।

खरतरपट्टायलीपट्पदानि णि दिर आनंद गडद भारहरु पाउगुणु । णि दिर पद पाउन निम्मनु एइ पुणु । पिदि सुर हाद का पुल्युपिउ नासह । मिण विहारिधि परि दालिहु पगासद । निदिनु पम्ममद भयुदर फार महत् । पर नाफगमंत्रिपामजि रमेरि किन पिग्महत् ॥ १ ॥ भपण मारि परि भणुन वाण पुणि पंचम पपरहि । धिम पिम्नपपापि महरिहन मन पिणरहि । मउ पिन्गु मा पाग नपण नापरिमहि घणहरू । नपफगरिजमान जाव न पिक्षित जिणयक । जापथिमि पासजिणिदयसि नाणवंत गिम्मलरयण । मसु पदमबाण न रूप नहिन भुगप्पिम्नु रुइ हइमयण ॥२॥ नमणिपामजिणिंदु गदिउ अलि जु दिवउ । भजपीरि गंभरिनरिंतु मा नियमनि तुहर । कंपणनउ मह पटसु मिहरि साणउ रमविपउ । जणु मुनरणि तउ सरद नियु आयासिसउन्नउ । जा युन्मुभिमिण स्कारपिण कर उन्झिवि फरहरइ घर । जिनदत्तमरि पर धपलि जसि ना पसिद्धि सुरभवणि कय ॥ ३ ॥ देवरिपष्ट नेमिचंदु यलुगुणिहि पसिद्धर । उसोयणु सह पद्धमाणु म्बरलरपर लदउ । मुगुम जिणेमरगरि निपमि जिणचंदु सुसंजमि । अभयदेय मन्वंगु नाणि जिणपाहह आगमि । जिणदत्तगरि टिउ पहि तहि जिण उजोइउ जिणचलणु । सारइहि परिस्मिवि परिवरिउ मुल्लि महग्घउ जिम रयणु ॥४॥ घाहर धययड धरिप मार सिंगार सुसजिप । साहग्गिण गुडगुडिय पंच घर पडिम निमन्निय। तिपड अता अग्गलिय पिम्मपडिकारनिमत्तिय। रहरणरहमुरलिय गम्यमाणिण मइ अनिय । करि पापड मुणिमहिवइहि रहिअ रूम संपुन्नभय । जिणदत्तमरिसीदह भयण मयंणकरडिघड विहाडि गय ॥५॥ तवनलफीसणह पम्मधीरिमसुपिसालह । भ

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APPENDIX 1
श्रीवस्तुपालतीर्थयात्रावर्णनम्
अयं क्षुब्धक्षीरार्णवनवसुधासन्निभचिता-
नुपाकण्याकर्णानुपदमुपदेशानिति गुरोः ।
समस्तध्वस्तैना जनितजिनयात्रापरिकरो
ऽकरोत्सुस्थं प्रास्थानिकविधिमधीशो मतिमताम् ॥ १॥
श्लाघ्योऽतिसवसहितः स हितः प्रजानां श्रीमानय प्रधमतीर्घकृदेकचिसः ।
सम्भाषणाद्भुतसुधाभवचाश्वचार वाचालयारिदपयो रथचक्रनादः॥२॥
सान्नैपर्युपरिवाहपदाग्रजामडूलीपटैटिति कुहिमतामतिः।
मार्ग निरुद्धखरदीधितिधामसडे सहस्तदा भवनगर्भ इयायभामे ॥३॥
नाभेपमभुभक्तिभासुरमनाः कीर्तिभाशुनिमा-
काशः काशहदाभिधेऽध विधे ती निवासानसी ।
चने चाममना जिनार्चनविधि तद्वग्मचर्यग्रता.
रम्भस्तम्भितविष्टपग्रयजयश्रीधामकाममयः ।। ४ ॥
पुष्टिभक्तिभरतुष्टया रयादम्बया हततमःकदम्बा ।
एत्य स्पषमय प्रतिश्रुतं सनिधि समधिगम्य सोऽपलत् ॥ ५ ॥
ग्रामे ग्रामे पुरि पुरि पुवरोतिभिर्ममुख्ः
फ्लसमावेशिकपिधितता प्याम्नि पश्यन्पताः ।
मूत्ताः कीरिमममनुत प्रौदनुत्तमपश्च-
प्यापहीलानुतभुजलतावर्णनीयाः स्वकीयाः ॥ ६ ॥
अध्यावास्य नमस्यकीर्तिविभवः श्रीसहमंहस्तमः-
स्तोमादित्यमुपत्यकापरिसरे श्रीमाटदेगनुजः।
श्रीनाभेपजिनेशदर्शनसमुत्कण्टोलसन्मानस-
म्नस्सन्मोहमधारोह पिमलक्षोणीधरं भारधीः ॥७॥
सप स्नानमहोत्सवच्यसनिनं माण्डचण्डपुनि-
कान्तं सहजनं निरीक्ष्य निमितं सान्द्रीभयन्मानसः ।
सो मापदमन्दमेदुरप्तररानिधिः शुची.
मन्प्रीन्द्रः स्पपमिन्द्रमण्डपमपं मारम्भपामासिवान् ॥ ८॥

प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः मन्त्री मौलौ किल जिनपतेश्चित्रचारित्रपात्रं लानं कृत्वा कलशलुठितैः स्मेरकाश्मीरनीरैः । चक्रे चञ्चन्मृगमदमयालेपनस्वर्णभूपा- वयः पूजाकुसुमवसनस्तं स कल्पद्रुकल्पम् ॥९॥ मन्त्रीदोन जिनेश्वरस्य पुरतः कर्पूरपूरागुल प्लोपडितधूपधूमपटलैः सा कापि तेने मुदा । यावद्धमहाध्वजप्रणयिनी स्वर्लोककल्लोलिनी मिश्रेयं रविकन्यकेति वियति प्रत्यक्षमुत्प्रेक्ष्यते ॥ १० ॥ इत्यं तत्र विधाय निर्मलमनाः सन्मानदानक्रियां सानन्दममदाकुलां कुलनभोमाणिक्यमष्टाहिकाम् । विमोन्मादिकपर्दियक्षविहितप्रत्यक्षसान्निध्यतः प्रसारितसम्मदादुदतरन्मन्त्रीभ्वरो भूधरात् ॥ ११ ॥ भजाहराख्ये नगरे च पार्धपादानजापालनृपालपूज्यान । अभ्यर्चपोप पुरे च कोडीनारे स्फुरत्कीर्तिकदम्बमम्याम् ॥१२॥ देवपत्तनपुरे पुरन्दरस्तूयमानममृतांशुलान्छनम् । भयमुचितचातुरीचितः कामनिमंधननिर्मलगुतिम् ॥ १३ ॥ मीनतांतचिश्चिराय नयनर्यामभुयां वामन- स्थत्यामेप मनोविनोदजननं क्लसप्रवेशं पुरि । भीमानिमलधर्मनिर्मितिममुल्लासेन विस्मापपन् देवं रेवतकाधिरोहमकरोत्सडेन सडेन्वरम् ॥ १४ ॥ (विशेषाम् ) गजेन्द्रपदण्डस्य तत्र पीयूपहारिभिः । चयर मननं मन्त्री चारिभिः पापहारिभिः ॥ १५ ॥ जिनमनमनमत्रनं कलशन्यस्ततदम्युकुमम् । भय महमवेश्य सङ्कटं विदधे वासयमण्डपोयमम ॥१६॥ मरम्भमदृष्टिनमजनाबदष्टामष्टाहिकामयमिहापि कृती वितेने । मतभावनरभामुरचित्तवृत्तिदमृत्तकात्तिचयम्बितदिफदम्यः ॥१३॥ दुमन रतो विजयमेनमुनादापाणिवासीयासितकृयामनभासमानः। मन्यक्त्रोक्तं रितनान नन्दिमानन्दमदुरमयं रमयन्मनामि ॥१८॥ दानरानना यन्दिनजमजदनियारमाहारदानं मानी सन्माना सानापदपि मुखोदाटकमादिकानि ।

३
परपालवीधयानावर्णनम्
मन्त्री सत्कृत्य देवार्चनरचनपरानर्चयित्वापमुचै-
रम्बामगुम्नशाम्बानिति कृतसुकृतः पर्वतादुत्ततार ॥ १९ ॥
असाधि साधर्मिकमानदानेरनेन नानाविधधर्मकर्म ।
अवाधि सा धिपारणेन माया निर्माय निर्मायमनासुपूजाम् ॥२०॥
पुरः पुरः पूरयता पपांसि धनेन सानिध्यकृता कृतीन्दुः।
स्वकीत्तिवनव्यनदीर्ददर्श ग्रीप्मेऽतिभीप्मेऽपि पदे पदेऽसौ ॥२१॥
इति प्रतिज्ञामिय नव्यकीतिप्रियः प्रयाणैरतिवाद्य वीधीम् ।
आनन्दनिस्पन्दविधिविधिज्ञः पुरं प्रपेदे धवलपकं सः ॥ २२ ॥
समं तेजपालान्वितपुरजनेचारधवल-
प्रमुः मत्युद्यातस्तदनु सदनं प्राप्य सुकृती।
युतः सहनासी जिनपतिमधोत्तार्य रयत-
स्ततः सहस्याचांमशनवसनाद्यैर्व्यरचयत् ॥ २३ ॥
प्रसादाभः प्राप्य वैभवमद्भुतम् ।
मन्त्री सफलीच स्वमनोरथपादपम् ॥ २४ ॥
भक्त्याखण्डलमण्डपं नवनवीकेलिपर्यड्किा-
वयं कारयति स्म विस्मयमपं मन्त्री स शत्रुञ्जये।
पण स्तम्भनरेवतमभुजिनी शाम्बाम्बिकालोकन-
प्रद्युम्नप्रभृतीनि किश्च शिखराण्यारोपयामासिवान् ॥ २५ ॥
गुरपूर्वजसम्बन्धिमित्रमूर्तिकदम्बकम् ।
तुरगसमतं मूर्तिदयं स्वस्थानुजस्य च ।। २६ ।।
शातकुम्भमयान् कुम्भान्पश्च तन न्यवेशयत् ।
पञ्चधा भोगसौख्यश्रीनिधानकलशानिय ।। २७ ।।
सौवर्ण दण्डयुग्मं च प्रासादयितये न्यधात् ।
श्रीकीतिकन्दयोग्यनूतनाङरसोदरम् ॥ २८ ॥
कुन्देन्दुसुन्दरग्रावपायनं तोरणवयम् ।
इहैव श्रीसरस्वत्योः प्रवेशापय निर्ममे ॥ २९॥
अर्कपालितकं ग्राममिह पूजाकृते कृती।
श्रीवीरधवलक्ष्मापाहापयामास शासने ॥ ३० ॥
श्रीपालिताख्ये नगरे गरीयस्तरङ्गलीलादलितार्फतापम् ।
तडागमागाक्षयहेतुरेतधकार मन्त्री ललिताभिधानम् ॥ ३१ ॥

प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
होत्कर्ष न केषां मधुरयति सुधासाधुमाधुर्यगर्ज-
त्तोयः सोऽयं तडागः पथि मथितमिलत्पान्धसन्तापपापः ।
साक्षादम्भोजदम्भोदितमुदितसुखं लोलरोलम्बशब्द-
रब्देव्यो दुग्धमुग्धां त्रिजगति जगदुर्यत्र मन्त्रीशकीत्तिम् ॥ ३२ ।।
पृष्ठपन्नं च सौवर्ण श्रीयुगादिजिनेशितः ।
स्वकीयतेजःसर्वस्वकोशन्यासमिवार्पयत् ॥ ३३ ॥
प्रासादे निदधे काम्यकाश्चनं कलशत्रयम् ।
ज्ञानदर्शनचारित्रमहारत्ननिधानवत् ॥ ३४ ॥
कितन्मन्दिरद्वारि तोरणं तत्र पोरणम् ।
शिलाभिर्विधे ज्योल्लागर्वसर्वस्वदस्युभिः ॥ ३५ ॥
लोकैः पाचालिकानृत्तसंरम्भस्तम्भितेक्षणैः ।
इहाभिनीयते दिव्यनाट्यप्रेक्षाक्षणः क्षणम् ॥ ३६ ॥
मासादः स्फुटमच्युतैकमहिमा श्रीनाभिसूनुप्रभो-
स्तस्याग्रस्थितिरेककुण्डलकुलां धत्तेतरां तोरणः ।
श्रीमन्त्रीवर वस्तुपाल कलयन्नीलाम्बरालम्बिता.
मत्युचैर्जगतोऽपि कौतुकमसौ नन्दी तवास्तु श्रिये ॥ ३७॥
अन यानिकलोकानां विशतां बजतामपि ।
सर्वधा सम्मुम्बैयास्ति लक्ष्मीरूपरिवर्तिनी ॥ ३८ ॥
पटाने निराकृतं सुकृतिभिः साम्मुख्यमुख्ययो-
दैतं तन्मम वस्तुपालसचिवेनोन्मूलितं दुर्यशः ।
आशास्तेद्भुततोरणोभयमुखी लक्ष्मीस्तदस्मै मुदा
श्रीनाभेयविभुमसादवशतः साम्मुख्यमेवाऽधुना ॥ ३९ ॥
तस्यानुजय जगति प्रथितः पृथिव्यामव्याजपाम्पगुणगुणीकृती।
श्रीनेतपाल इनि पालयति क्षितीनुमुद्रां समुद्ररसनावधिगीततिः ॥ १२ ॥
समुद्रत्वं शायेमहि महिमधाम्नोऽस्य बहुधा
यतो भीमग्रीप्मोपमविषमकालेप्यजनि यः ।
क्षन क्षीगायामितरजनदानोदकतती
दयारेटाहेलादिगुणितगुणत्यागलहरिः ॥ ४ ॥
यमापयस्य पन्धास्तपस्विनां ग्रामशासनोडारात् ।
पनापनीय नयकरमनवकारः कारया ॥४२॥

. वस्तुपाटतीर्थयात्रावर्णनम् पुण्योल्लासविलासलालसधिया येनान शगुञ्जये श्रीनन्दीश्वरतीर्थमर्पितजगत्पावित्र्यमासूनितम् । पतषानुपमासरः परिसरोदेशे शिलासशय- च्यानहोडतवन्धमुद्धरपय:कलोललुप्तममम् ॥ ४३ ।। स्फुटस्फटिकदर्पणप्रतिमतामिदं गाहते मुधाकृतसुधाकरच्छविपवित्रनीरं सरः। विकस्वरसरोरुहप्रकरलक्ष्यतो लक्ष्यते या सरिदगनापदनविम्बताडम्बरः ॥ ४४ ॥ शालये यः सरसी निवेश्य नीरेयताद्री प जडाधराणाम् । ग्रामस्प दानेन करं निवार्य सहस्य सन्तापमपाचकार ॥ ४५ ॥ क्षोणीपीठमियद्रजःकणमियत्पानीयविन्दुः पतिः सिन्धूनामिपदमुलं वियदियत्ताला च कालस्थितिः । इत्थं तथ्यमयति यत्रिभुपने श्रीपस्तुपालस्य तां धर्मस्थानपरम्परां गणयितुं शङ्के न सोऽपि क्षमः ॥ ४६ ॥ पतत्सुवर्णरचितं विश्वालङ्करणमनणुगुणरत्नम् । सहाधीश्वरचरितं हतदुरितं कुरत हदि संतः ॥ ४ ॥ श्रीनागेन्द्रमुनीन्द्रगच्चतरणिः श्रीमान्महेन्द्रप्रभु- जज्ञक्षान्तिसुधानिधानफलशः पुण्याभिचन्द्रोदयः । सम्मोहोपनिपातकातरतरे विश्वेऽत्र तोशितः सिदान्तोऽप्यपिभेषतर्कविपमं मं दुर्गमाशिधिये ॥ १८ ॥ तसिहासनपूर्वपर्यतशिरमान्तोदयः कोऽप्पभू. प्रास्वानस्तसमस्तदुस्तमतमा प्रीशान्तिपरिमभुः । मत्युजीपितदर्शनातिलसगयाघपमारं तेजम्यसदिगम्बरं विजयते तपस्प लोकोत्तरम् ॥४९॥ आनन्दसारिरिति तस्य भूप शिप्यः पूर्यापरः शमधनोऽमरपन्द्रयरि। धर्मविपस्प दशनापिर पापवृक्षः क्षोदक्षमा जगति या पिशदी विभानः ॥५॥ अस्तापाययपयोनिधिमन्दाधि- मुद्रापुपो फिमनपा स्तुमहे महिम्नः ।

६ प्राचीनगूर्जरकान्यसलहः वाल्पेऽपि निर्दलितवादिगजो जगाद यो व्याघसिंहशिशुकाविति सिद्धराजः ॥ ११ ॥ सिद्धान्तोपनिषन्निपण्णहृदयो धीजन्ममृस्तत्पदे पूज्यः श्रीहरिभद्रसूरिरभवच्चारित्रिणामग्रणीः । मान्त्वा शुन्यमनाश्रयैरिव चिरायस्मिन्नवस्थानतः सन्तुष्ट कलिकालगौतम इति ख्यातिर्वितेने गुणैः ॥५२॥ श्रीविजयसेनसूरिस्तत्पढे जयति जलधरध्यानः । यस्य गिरो धारा इव भवद्वभवदवथुविभवभिदः ।। ५३ ॥ पश्चासराह्नवनराजविहारतीर्थे प्रालेयभूमिधरभूतिधुरन्धरऽस्मिन् । साक्षाद्धाळूतभवा तटिनीच यस्य व्याख्येयमच्युतगुरुक्रमजा विभाति ॥५४॥ भवोटवनावनीचिकटकर्मवंशावलि- च्छिदोच्छलितमौक्तिकमतिमकीर्तिकर्णाम्वरम् । असिश्रियमशिधियदिततभीव्रतं यद्रतं क्षिती विजयतामयं विजयसेनमृरिगुः ॥ ५५ ॥ शियं तस्य प्रशस्यमशमगुणनिधि रभ्यदारण्यदावः ज्याटाजिहालदीप्तिविकजनविपदविवादः कपर्दी । देवी चाम्या निशीधे समसमयमुपागत्य हपाश्रुवी- मेयनेपामुभिक्षाविति निजगदतुर्गद्गदोद्दामनाम् ॥ ५६ ।। नामबन्नति नाम सन्ति कति नो नो या भविष्यन्ति के किं न कापि कदापि सङ्घपुरुपः श्रीवस्तुपालोपमः । यत्वं प्रदरग्नहर्निशमही सांभिसारोबुरी पेनायं विजितः कलिविंदधता तीर्धेशपाम्रोत्सवम् ॥१०॥ तस्मादस्य यशस्विनः सुचरितं श्रीवस्तुपालस्य य. दाचास्माममायया फिल ययाध्यक्षीकृतं सर्वथा । त्वं श्रीमदपरम प्रथय तत् पायपमर्यपः "यते ॥२८॥ इत्युक्त्या गतपास्तारण पधा दृष्ट प्रभातक्षणे विज्ञाय स्वगुरोः पुरः सविनयं नीमचन्मीलिना। सांगत्तर भारती सममय"

यस्तुपालतीर्थयात्रावर्णनम्
प्राप्यादेशममुं प्रभोपिरचयामासे समासेदुपा
मागल्भीमुदयमभेण चरितं निस्पन्दरूप गिराम् ॥ ५९॥
किस श्रीमलधारिगच्छजलधिप्रोल्लासशीतशुते.
लस्पीनरचन्द्रररिसुगुरोमाहात्म्यमाशास्महे ।
पत्पाणिस्मितपत्रवासविकसत्किझल्कसंवासिताः
सन्तः सन्ततमाश्रिताः किल मया भृद्धेय भान्ति क्षितौ ॥३०॥
श्रीधर्माभ्युदपादयेऽन चरिते श्रीसहभर्तुर्मया
दधे काम्पदलानि सहरयितुं फर्मान्तिकत्वं परम् ।
किन्तु श्रीनरचन्द्रमरिभिरिदं संशोध्य पफे जग-
स्पावित्र्यक्षमपादपटूजरजःपुसः प्रतिष्ठास्पदम् ॥ ६१ ॥
नित्यं व्योमनि नीलनीरजमची यावत्त्विपामीधरो
दिक्पालावलिवन्धुर फुचलये यावच हेमाचलः ।
हस्प विदुपामिदं सुचरितं तायन्नवाविर्भव-
सौरभ्यमसरं चिरं कलयतात् फिअल्कलक्ष्मीपदम् ॥ १२ ॥
वि श्रीविजयसनमूरिशिष्यत्रीमदुदयप्रभसूरिविरचिते श्रीधर्माभ्युदयनाम्नि श्रीसद्धपतिच-
रिद सम्यक महाकाव्ये श्रीरस्तुपालतीर्थयात्रोत्सवर्णनो नाम पञ्चदशः सर्गः।
मुक्तमांगें यदेतदिरचितमुचितं सक्षभर्तुश्चरित्रं
सत्रं पावित्र्यपानं पधिकजनमनासेदविच्छेदहेतुः।
अस्मिन्सौरभ्यगर्भामसमरसवती सत्कयां पान्धसार्धाः
माप्य श्रीवस्तुपाल प्रवरनयरसास्वादमास्वादयन्ति ॥१॥
श्रीशारदैकसदनं हृदयालय के नो सन्ति हन्त सकलासु कलासु निष्णाः ।
तापरस्य ददृशे सुकवित्वतत्यवोधाय बुद्धिविभवस्तु न यस्तुपालात् ॥२॥
नैव व्यापारिणः के विधति फरणग्राममात्मैकवश्यं
लेभे सद्योगसिद्ध फलममलमलं केवलं वस्तुपालः।
आकल्पस्थायि धर्माभ्युदयनवमहाकाव्यनान्ना पदीयं
विश्वस्यानन्दलक्ष्मीमिति दिशति यशोधर्मरूपं शरीरम् ॥ ३ ॥

ter? मनसिमरामात गुहानप गययामतिगणं बनिया- Muी मागिदिमानवं नमिग, सादिमाय नम parry कममनिगं गंदग, गांदाहिमाम Aline SR. दाग पणगाम्मम्परिगं भंगा MPL, मवरवायाप महा कमभालीfr समयमा बारमालामावियां Nimis पनि रियामा मंगरगनां मनु APPENDIX II. खयकप्पसंसेवो सिरिनमिजिणं सिरसा नमि स्वयगिरीसाप्पमि। निरिवहरसीसभणिभं जहा य पालित्तएणं ॥१॥ बत्तसिनाइसनीय सिलासणे दिसू पडियनी नमी, सहसंगणे मेर गम, रामरामे देसगा, भवलोभणं उसिहर निन्याणं । रेवगमेलाएका का समातिगं काम सुचारपणपडिमालंकि गाभनिगं जीसस र म कारद । दो वि यत्रेण गिरि कारंग सुपरनाम काम मभंगगमा पडिमा पमाणपनोवयेगा, सिहरे भंगारंगमा मा मनर बन्दागपमंडी संबो एपाई कारे । सिजविणापगो परिहार निमिगुभात निर्माणस्थानं ज्ञात्या निर्माणादनन्तरं कण्देश : Priti मग दामांगराणुरूया कालमेह ? मेहना २ मि Seema KITE : मिहनार गाडिक व रेययातितोग कारणे SARAL | तत्व ग महनादो ममरिठी नामिशितो पिर ..HTMicialतवंग img fornirmani मिरविदारणपडिमा । तत् माया .VE FREE MATHEM, कम्मरमाना , : राम नागिरिमूलनाही मितिभिदा नि सा मूलवामा पान ना ARARE Timi Tant to ९ यसंगको अंगणमेण पूपर्णण लिहिणणं गिडिययं । सहा ग जुगाडे उपचास- वगं पान परलमग्गेण परिभणणं सिजपिणापगो उबलम्भद । तत्य ग परिगिरी दिनभंग टापग ना सहा पररको यह सहा रायमईगुलाए मारए गोदाहिनाए रमाविमा कमिणपिरायचाठी राइमईए पडिमा पणमया भंगागा रूपमधामो भगंगामहीमोचिट्ठति । तह छत्तसिलाचं. मियाकोरिमियानिगं पण्ण तमिलं मग्नं मम्झेणं कणययाली सहस्संव- माझे रपपगुचण्णमपपर्यास लसारामे यायतरीपचीसजिणाण गुहा प- गता बासमेहस्स पुरा गुपण्णयानुभाए नईए सहकमसपतिगेण उत्तरदि- गए गमिता गिरिगुएं पपिमिऊण उदए पहपणं फाऊण, विए उपवासपओएहिं इषारमुन्धारद । मन पदमबारे सुपण्णपाणी, दुश्मदुपारे रयणवाणी, संपहे अयाए चिपिभा। तत्प पण फहभंडारी । अण्णो दामोदरसमीवे । अंजणमिलाए आहोभागे रपयसुवण्णधूली पुरिसपीसेहिं पण्णत्ता । मसत्यमणे मंगलपदेपदालीय संतु रससिडी। मिरिपरोया मंघसमुखरणकमि ॥ सस्मकदाई मम्झे गिपिदत्ता कोलिविंदुसंयोगे । पंदमिलापुण्णयजीपणाओ अंजणसिडी। विनापासाओवपकप्पसंरोयो सम्मत्तो।।

APPENDIX III.
श्रीउज्जयन्तस्तवः
नामभिः श्रीरैवतकोनयन्ताद्यैः प्रथामितम् ।
श्रीनेमिपावितं स्तौमि गिरिनारं गिरीश्वरम् ॥ १॥
स्थाने देशः सुराष्ट्राख्यां विभर्ति भुवनेष्वसौ ।
यशूमिकामिनीभाले गिरिरेप विशेषकः ॥२॥
शृङ्गारयन्ति खङ्गारदुर्ग श्रीमपभादयः ।
श्रीपार्श्वस्तेजलपुरं भूपितैतदुपत्यकम् ॥ ३ ॥
योजनदयतुझेऽस्य शृङ्गे जिनगृहावलिः।
पुण्यराशिरिचाभाति शरचन्द्रांशुनिर्मला ।। ४ ।।
सौवर्णदण्डकलशामलसारकशोभितम् ।
चारु चैत्यं चकास्त्यस्योपरि श्रीनेमिनःप्रभोः॥५॥
श्रीशिवामृनुदेवस्य पादुकाऽन्न निरीक्षिता।
स्पृष्टार्चिता च शिष्टानां पापव्यूह व्यपोहति ॥ ६ ॥
प्राज्यं राज्यं परित्यज्य जरत्तृणमिव प्रभुः ।
वन्धन्विधूय च स्निग्धान प्रपेदेऽत्र महाव्रतम् ॥७॥
अप्रैव केवलं देवः स एव प्रतिलब्धवान् ।
जगजनहितैपी स पर्यणेपीच नितिम् ॥ ८॥
अत एवान कल्याणत्रयमन्दिरमादधे ।
श्रीवस्तुपालो मन्त्रीशश्चमत्कारितभन्यहृत् ॥ ९॥
जिनेन्द्रविम्यपूर्णन्द्रमण्डपस्या जना इह ।
श्रीनेमेर्मननं कर्तुमिन्द्रा इव चकासति ॥ १० ॥
गजेन्द्रपदनामास्य कुण्ड मण्डपते शिरः ।
सुधाविधैर्जलैः पूर्ण लानाईलपनक्षमैः ॥ ११ ॥
शगुरुपायतारंऽन यस्तुपालेन कारिते।
ऋपभः पुण्डरीकोऽष्टापदो नन्दीश्वरस्तथा ।। १२ ॥
सिंहयाना ईमवणां सिद्धयुद्धसुतान्विता ।
कन्नामलुम्बिभृत्याणिरग्राम्या सहवितहत् ॥ १३ ॥

1 उजयन्तस्वकः श्रीनेमिपत्पद्मपूतमवलोकननामकम् । विलोकयन्तः शिखरं यान्ति भव्याः कृतार्थताम् ॥ १४ ॥ शाम्वो जाम्बवतीजातस्तुझे शृङ्गेऽस्य कृष्णजः । प्रद्युम्नश्च महागुम्नस्तेपाते दुस्तपं तपः ॥ १५ ॥ नानाविधीपधिगणा जाज्वलन्त्यत्र रात्रिपु। किञ्च घण्टाक्षरछत्रशिलाः शालन्त उचकैः ॥ १६ ॥ सहस्राम्रवणं लक्षारामोऽन्येपि वनवजाः। मयूरकोकिलाभृगीसद्गीतिसुभगा इह ॥ १७ ॥ न स पृक्षो न सा वल्ली न तत्पुष्पं न तत्फलम् । नेक्ष्यतेऽनाभियुक्तर्यदित्यैतिषविदो विदुः ॥ १८ ॥ राजीमती गुहाग) कैन नामान यन्यते । रचनेमिर्यपोन्मार्गात्सन्मार्गमयतारितः ॥ १९ ॥ पूजालपनदानानि तपश्चाव कृतानि ये। सम्पद्यन्ते मोक्षसौख्यहेतवो भव्यजन्मिनाम् ॥ २० ॥ दिग्भ्रमावपि योऽत्रादौ फाप्यमार्गेऽपि सश्चरन् । सोऽपि पश्यति चैत्यस्था जिना : लपितार्चिताः ।। २१ ।। काश्मीरागतरतेन कूप्माण्ड्यादेशतोऽन च । लेप्यविम्यास्पदे न्यस्ता श्रीनेमेमूर्तिराश्मनी ॥ २२ ॥ नदीनिर्झरकुण्डानां ग्वनीनां वीरधामपि । विदाङ्करोत्यत्र सङ्ख्याः सद्धयावानपि कर खलु ॥२३॥ आसेचनकरूपाय महातीर्थाय तायिने । चैत्यालद्धृतशीपाय नमः ओरैयताद्रये ॥ २४ ॥ स्तुतो मयेति सूरीन्द्रवर्णिताजिनमभः गिरिनारस्तारहेमसिद्धिभूमिसुदेऽस्तु यः ॥ २९॥ इति श्रीजयन्तस्तवः॥

APPENDIX VI. श्रीउजयन्तमहातीर्थकल्पः अयि सुरद्वाविसए उचितो नाम पन्यो रम्मो। तस्सिहरे आरहि भत्तीए नमह नेमिजिणं ॥१॥ अंबाइभं च देवि व्हयणचणगंधधूवदीयेहिं । पहयकयप्पणामा ता जोमह जेण अत्यत्यी ॥२॥ गिरिसिहरं कुहरकंदरनिज्झरणकयाइविभडकूवेहिं । जोगह मत्तवायं जह भणियं पुञ्चमूरीहिं ॥ ३ ॥ कंदप्पदपकप्परणकुगइविदवणनेमिनाहस्स । निळ्याणसिला नामेण अत्थि भुवणंमि विकाया ॥४॥ तस्स य उत्तरपासे दसधणुहेहिं अहोमुहं विवरं । दारंमि सस्स लिंग अययाणे घणुह चत्तारि ॥५॥ सस्म पसुमुत्तगंधो अस्थि रसोपलसएण सपतंयं । विहि कुणइ तारं ससिकुंदसमुन्द्रलं सहसा ॥३॥ पुल्यदिसाए घणुतरंसु तस्सेव अत्वि जागवई। पाहागमया दादिणादिसागए वारसहिं ॥७॥ दिस्मा असत्य पयही हिंगुलवण्णा अ दिव्यपपररसो। विशेष सत्यलोहे फरिसेणं अग्गिसंगणं ॥ ८॥ गीत भत्यि नई विट्टला नामेण पवई पडिमा। दाइ भंगुलीए फरिसरसी पवईदारं ॥९॥ मशवार अजितगिरिवर तस्स उत्तरे पास। मोरागनिभाए पायगणिया पुदयी ॥१०॥ भगवंग वदा पिडीशमिा करंद परतारं । र दरिदवाहिं उत्तारइ दृसतारं ॥ ११ ॥ मिहरे विमालमिंग दीमंत पायहिमा अत्य तस्राम मिहरं कन्याहामहोतारं ॥ १२॥ जिनवगने तत्व य मुहारवानरा भत्यि। मो नागठितो इयार वियरपरदारं ॥ १३ ॥ हत्यमा विदा दिन मायावणिभा मा।

श्रीनियन्तमहानीयकल्पः नीलरसेण संयंता सहस्सवेही रसो नूर्ण ॥१४॥ तंगदिमण निभत्तो हणुवंतं पिघद पामपाएण । सो दफा घरदारं जेण न जाणइ जणो को पि ॥ १५ ॥ उज्जितसिहर उपरि कोइडिहरं खु नाम घिरकार्य । अवरेण तस्स य सिला सदुभयपासेसु ओसं तु ॥ १६ ॥ तं अगसितिल्लमीसं पंभव पडियायवंगिअं वंग। दोगधचाहिहरणं परितुद्वा अंविआ जस्स ॥ १७ ॥ गई नाम नई मणसिलवण्णाइ तत्य पाहाणा । तो पिदि धमिभ संते समसुद्धे होइ परतारं ॥ १८॥ उज्जते नाणसिला तस्स अहो कणयवपिणआ पुढवी। योकडयमुत्तपिंडी म्यहरंगार भवे हेमं ॥ १९॥ नाणसिलाकयपुढची पिंडोबद्धा य पंचगव्येण । ढपाए यसह रसो सहस्सवेही हयइ हेमं ॥२०॥ गिरिवरमासनठिअं आणीयं तिलपिसारणं नाम। सिलवडगाढपीडे वे लरका तत्य दम्माणं ॥ २१ ॥ सेणा नामेण नई सुपण्णतित्थंमि लडुअपहाणा। पढिवाएणय सुत्र करिति हेमं न संदेहो ॥ २२ ॥ विल्लरतयंमि नयरे मउहदरं अत्थि सेलगं दिव्यं । तस्स य मज्झमि ठिओ गणवइरसकुंडओ उपरि ॥ २३ ॥ उपवासी कयपूओ गणपइओ वल्लिकण पपररसो। पामापेवी अत्यि अधंभइ बंगं न संदेहो ॥ २४ ॥ सहसासवं ति तित्थं करंजरुरकेण मणहरं सम्मं । तत्य य तुरयापारा पाहाणा तेसि दो भाया ॥ २५ ॥ इको पारपभाओ पिट्ठो मुत्तेण अंघम्साए । धमिओ फरह तारं उत्तारइ दुरूकतारं ॥ २६ ॥ अवलोमणसिहरसिला अवरणं तत्य वररसो सवइ । सुभपकसरिसवपणो करेइ सुयं वरं हेमं ॥२७॥ गिरिपज्जुन्नवयारे अंविअआसमपयं च नामेण । तत्य वि पीआ पुहवी हिमवाए होइ परहेमं ॥ २८ ॥ नाणसिला उर्जिते तस्स य मूलंमि महिआ पीआ।

१४ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्कहः साहामिअलेवेणं छायामुफ कुणइ हेमं ॥ २९ ॥ उज्जितपटमसिहरे आमहिलं दाहिणेण अवयरि । तिणि धणूसयमित्ते पूईकरं जं विलं नाम ॥ ३०॥ उग्याडि विलं दिकिऊण निउणेण-तत्य गंतव्वं । दंदंतराणि वारस दिव्वरसो जंयुफलसरिसो ॥ ३१ ॥ जउ घोलिअंमि भंडे सहस्सभापण विंधए तारं । हेमं करद अवस्सं हटं तं सुंदरं सहसा ॥ ३२ ॥ कोई दिभवणपुल्येण उत्तरे जाव तायसा भूमी । दीसह अतत्य पडिमा सेलमया वासुदेवस्स ॥ ३३ ॥ तस्सुत्तरेण दीसद हत्येसु अ दससु पबई पडिमा । अपराहमुहरभंगुहिआइ सा दावए विवरं ॥ ३४ ॥ नवाणुहाई पविट्ठी दिरकद कूडाई दाहिणुत्तरओ। हरिभाललरावणी सहस्सवेही रसो नूणं ॥ ३५ ॥ मिते नाणसिला विरकाया तत्य अत्यि पाहाणं । माणं उत्तरपासे दाहिणय भदोमुहो विवरो ॥ ३६ ॥ नस्म य दाहिणभाप दसरणुभूमीइ हिंगुलुपवण्णो । मपि रमो समयेही विधइ सुयं न संदेहो ॥ ३७॥ महरिमदाडे पाहाणा ताण संगमो अस्थि । गयपरलिंडाकिराणा मझ फरिमेण ते वही ॥ ३८॥ निभवणदाहिणणं नई घणुइहिं भूमिजलुभयरी। निरिमणुभरत्तविद्या परिवाए तंबए हम ॥ ३० ॥ गवई नाम नई मणमिलवण्णा य तत्व पाहाणा। मुसम्म पंग मनि घमिआ तयं सिग्धं ॥ ४ ॥ इस उतरणं भविभणं जो करंद निणभता। शरिणामां मी पावर इच्छिभं सुरु ।। ४ ॥ आरनमहानायर APPENDIX Y खतकल्पः पचिमदिसाए सुरद्वापिसए रेवयपन्चपरापसिहरे सिरिनेमिनाहस्स भवणं उगसिहरं अचाह । तत्य किर पुन्धि भयवओ नेमिनाहस्स लिप्पमई पदिमा आसि । अग्नपा उत्तरदिसाविभूसणकम्हीरदेसाओ अजियरयणना. माणो दुनि संध्या संघाहियई होऊण गिरिनारमागया। तेहिं रहसवसाओ घणासिणरससंपूरिअफलसेहिं ण्हवणं कयं । गलिआ लेयमई सिरिनेमिनाह- पदिमा । तओ अईच अप्पाणं सोतेहिं तेहिं आहारो पररकाओ । इया- पोसउववासाणंतरं सपमागया भगवई अंबिआ देवी । उट्ठाविओ संघवई। नेण देविं दहण जयजपसदो कओ। तो भणिों देवीए इमं विघं गिहिसु परं पच्न पिच्छिभव्यं । तमो अजिभसंघाहियइणा गगतंतुकड़िों रयणमयं सिरिनेमिविवं कंचणयलाणए नीभापदमभवणस्स देहलीए आरोवित्ता अइ- हरिसभरनिन्भरणं संघयइणा पच्छाभागो दिवो । ठिअं तत्थेव विवं निचलं । देवीए कुसुमयुट्ठी कया जयजयसदो अकओ। एमं च विवं यासाहपुग्निमाए अहिणवकारिअभवणे पच्छिमदिसामुहे ठविसं संघवइणा । न्हवणाइमहसवं कार्ड अजिओ सबंधयो निभदेसं पत्तो । कलिकाले कलुसचित्तं जणं जाणि. ऊण झलहलंतमणिमयविचस्स कंती अंपिादेवीए छाइमा । पुब्धि गुजरध- राए जयसिंहदेवेणं खंगाररायं हणित्ता सव्रणो दंडाहिवो ठाविभो । तेण य अहिणवं नेमिजिणंदभवणं एगारससयपंचासीए विफमरायवच्छरे कारा- विभं । मालवदेसमुहमंडणेणं साहुभावडेणं सोवणं आमलसारं कारि। घालुमचकिसिरिकुमारपाटनरिंदसंठविअसारद्वदंडाहियेण सिरिसिरिमाल- अनुभवेण यारससयवीसे विफमसंवच्छरे पन्ना कारापिआ । तन्भावुणा धवलेण अंतराले पवा भराविआ। पनाए चडतेहिं जणेहिं दाहिणदिसाए लकारामो दीसह । अणहिल्लवाडयपटणे प पोरवाडकुलमंडणा आसराय- अमरदेवितणया गुबरधराहियइसिरिवीरधवलरनधुरंधरा यस्तुपालतेजपाल- नामधिज्ञा दो भायरी मंतिवरा हुत्या । तत्य तेजपालमंतिणा गिरनारतले निअनामंकि तेजलपुरं पवरगढमदपयामंदिरभारामरम्मं निम्माविभं । तत्य पजणयनामंकिभं आसरायविहारु त्ति पासनाहभवणं कारापिकं । जणणीना. मेणं च कुमरस तिसरीवर निम्माविमातेजलपुरस पुवदिसाए उग्गसेणगढं १६ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्कहः नाम दुग्गं जुगाइनाहप्पमुहजिणमंदिररेहिलं विनइ । तस्स य तिणि नाम- घिन्नाई पसियाई । तं जहा उग्गसेणगढ़ ति वा खंगारगढ़ ति वा गुण्णदुग्गं ति वा । गढस्स वाहिं दाहिणदिसाए चरिआवेईलड्डुअओवरिआपसुवाड्या- इठाणाई चिट्ठति । उत्तरदिसाए विसालथंभसालासोहिओ दसदसारमंडवो। गिरिदुवार य पंचमो हरी दामोअरो सुवण्णरेहानईपारे वइ । कालमेहसमी चिराणुवत्ता संघस्स योलाविआ। तेजपालमंतिणा मिल्हाविआ । कमेण उन्नयंतसेले वत्युपालमंतिणा सित्तुनावयारभवणं अट्ठावयसंमेअमंडवो कव- डिजस्कमरदैविपासाया य काराविआ। तेजपालमंतिणा कल्लाणत्तयों, इंदमंडवो अ देपालमंतिणा उद्धाराविओ। एरावणगयपयमुद्दाअलंकिभं गईद- पयकुंडं अच्छइ । तत्य अंगं पस्कालित्ता दुकाण जलंजलिं दिति जत्तागयः लोआ । प्रत्तसिलाकहणीए सहस्संववणारामो, जत्य भगवओ जायवकुलपई. यस्स सिवासमुद्दविजयनंदणस्स दिकानाणनिब्वाणकल्लाणयाई संजाआई । गि- रिसिहरे चडित्ता अंविआदेवीए भवणं दीसइ । तत्तो अवलोअणं सिहरं । तत्- द्विपहिं फिर दसदिसाओ नेमिसामी अवलोइबति । तमो पढमसिहरे संबक मारो योमसिहरं पज्जुण्णो । इत्य पन्यए ठाणे ठाणे चेइएसु रयणसुवण्णमय जिणचिंचाई नियन्दविभचिभाई दीसंति । सुवण्णमेयणी अ अणेगधारसमे- इणी दिपंती दीसइ । रत्तिं च दीयउच्च पन्नलंतीओ ओसहीओ अपलोइयति। नाण्यविहतमयरपल्लिदलपुष्कफलाई पए पए उवलम्भंति । अणवरपपझरतनि- झरणार्ण बललाराया य मत्तकोयलभमरझंकारा य सुचंति ति। उन्नयंतमहातित्यकप्पसेसलयो इमो। जिणप्पदमुर्णिदेहि लिहिओत्य जहासुअं॥ श्रीवितकल्पः समासः APPENDIX VI अम्बिकादेवीकल्पः सिरिज्जयंतसिहरसेहरं पणमिऊण नैमिजिणं । कोहंडिदेविकप्पं लिहामि युट्टोयासाओ !! अत्यि सुरट्टाविसये धणफणयसंपयणसमिद्धं को नारं नाम नगरं । तत्य सोमो नाम रिद्विसमिद्धो छफम्मपरायणो यागमपारगमा भणी हत्या । तस्स घरिणी अंविणी नाम महन्धसीलालंकारभमियमरांग आमि । तेसि पिसयसुहमणुहवंताणं उत्पन्ना दुवे पुत्ता पढमी मिद्री बाभी युद्ध ति। अन्नपा समागए पिअरपरके भहसामेणं निमंतिआ बंभणा महदिणे । अन्य वि ते येयमुपारन्ति, कत्ल वि आठवन्ति पिण्डपयाणं, का विहोम फरिनि वासदेवं च । सम्पाडिआ सालिदालियंजणपणनभेजनारयण्डपमुहा मध्य । भविणीप असासुआ पहाणं का पहामि अवमा बाद मायाम पारणा भिरकट्टा संपत्ती । तं पलाइना हरिमभनिभरपुलाअंगी महिमा अविणी । पडिलाभिना तीग मुणियरी भनियहमाणपुण्यं महाधिहि भा. पाणेहि । जाय गहिअभिको माट पलिओ नाप मामुआ रिपाऊण गया ठाणमागया। न पिच्छद पदमसिहं । नओमाए 'इविभा" हा परमा! तीए जहटिए युत्ते अंगादिआ सा अज्जूए । जहा पारे लिए प्रार्थ, मन वि देवया न पूईआ अब विन भंगारिमा धिप्पा अनविन भरिमार पिंदाई भग्गसिहा ता किमन्ध गाहणो दिन मना मनोर पहभरो सोमभास । तेण मम्ण अप्पनदिन निनिकाnि fot मा परिभवमिआ सिहं फरंगुटीए धरिता पुरं प in one पलिभा नयराओ बाहिं । पंधे निसाभिमति दाह सल मानना । जाम मा असुजलामलोभणा मंयुत्ता नाव पुरोटिभ मुफमराव निमा भम गोलमाहणेणं तरुणं जलपरि जाये । पाइला दीतिमीभई न । नना दिएहि भोभणं मन्गिमा यालाहि । पुरओ मुशागहमारतानमा ५.१. भी। दिनाई मलाई । अपिणीए नेमि जापा ने सुन्या । जार का प्रभार पीसमा तारजा निसानीए पालाई पानं नारिमाल मर पतलीभीतीए पाहि मामी भाति ताओसीटमारपापिसमा मागणदेवगए गांवोलपानी कमाओ । भििसर भीए पविभा ने मुनिभाई संपाईभाई । अनि प मिन्नु भोक नगरमिलानमनहा मंत्रमाणिमागिमा यनिहाईवीमंतामणपसमाविमा गुरमण गाम- प्राचीनगरकान्यसाहः दंसिभा । एभमयम्भु सासुए दण नियेईभं सोमविपस्स सिरं च जा वच्छ मुटरुणा पदव्ययाय एसा यह ता पचाणोहिं एअंकुलहरं ति जगणी- रिमो पच्चयावानलबन्दंतमाणसो गो यहुयं चाले सोमभहो। तीए पिभो आगच्यन्तं दिभवरं निभवरं दगुण दिसाभो पलोईभाभो । दिवभो भग्गो मगलानो निणवर मणे अणुसरिजण सुपत्तदाणं अणुमोभंतीए अन्य कमि पाविमो । मुहम्झवसाणेण पाणे पाऊण अप्पमा कोहंडरिमाणे मोहम्नाप्पादितु चाहिं जोभणेहिं अंधीभदेवी नाम महद्धिा देवी। विमाणना- मंग कोडी वि भन्नद । सोमण वि तीसे महासईप कूचे पत्रणं दो भना नवगविभो । सोअमरिऊण तत्व जाभी देवो । आभिभोगिभगम्ममा माम्नं शिलिसा तीण गेव याहणं जाभो । अग्ने भणंति अंरिणी वागारामो भगाणे संपायित्ता सपिभी सोमभही यि तहेग मभो । गर्म पर । माग भगई पउन्मुभा दाहिणहत्येसु बलुपि पाम । ग मोगुण पुरां स ग धारद उत्तरारुणयसवणं च पण मा गरे। मिग्निमिनादरग मामणग तिमिवसाद स्वागिरिमिरे मानहाररगणकगाराइमव्यंगीणाभरणरमणिनाइमाम fim गोद निगरेर शिवगंगागं मंतमंडलाईणि भारोहिता Triगालामगिरी, नयति भूपिशागणा- Pune, Friनि पुरादमिरमिरिमा सि। भाता भागालालहरिहासभारं। निमामि विवाद माह मंसी ॥१॥ अनुमावि मलिागमनिलोधारा । भनिनामामामिणमारपणाम ॥२॥ निदानं पाममिहार ताभवसरमा घरमाण ननु सि आराहणामंती ॥३॥ पनि सम्मानी नागमाणि। गाय विभयभित्तयिता। तमुमपान निमाविमा अना॥

APPENDIX VII.
श्रीगिरिनारकल्पः।
वरधर्मकीर्तिविद्यानन्दमपो यत्र विनतदेवेन्द्रः।
स्वस्तिश्रीनेमिरसौ गिरिनारगिरीश्वरो जयति ॥ १॥
नेमिजिनो यदुराजीमतीय राजीमतीत्यजनतो यम् ।
शिश्राय शिवायासौ गिरि० ॥२॥
स्वामी छनशिलान्ते प्रवज्य यदुचशिरसि चक्राणः ।
नामावलोकनमसौ गिरि० ॥३॥
यत्र सहस्रामवणे केवलमाप्पादिशदिभुर्धर्मम् ।
लक्षारामे सोऽयं गिरि०॥४॥
निर्वृतिनितम्बिनीवरनितम्बसुग्यमाप यनितम्बस्थाः ।
श्रीयदुकुलतिलकोऽयं गिरि० ॥५॥
खुद्धा कल्याणत्रयमिह कृपणो रूप्यरूक्ममणिबिम्बम् ।
चैत्पत्रयमकृताऽयं गिरि० ॥६॥
पविना हरिर्यदन्तर्विधाय विवरं व्यधाद्रजतचैत्यम् ।
काभनयलानकमयं गिरि०॥७॥
तन्मध्ये रत्नमयी प्रमाणवर्णान्वितां चकार हरिः।
श्रीनेमेर्मूर्तिमसौ गिरि० ॥८॥
स्वकृततबिम्बयुतं हरिप्रिबिम्बं सुराः समवसरणे ।
न्यदधन्त पदन्तरसौ गिरि०॥९॥
शिस्तरोपरि यनाम्यावलोकनशिरसि रगमण्डपके।
शम्बो बलानकेऽसौ गिरि ॥१०॥
या मशुम्नपुरः सिद्धिविनायकासुर प्रतीहारः।
चिन्तितसिद्धिकरोऽसौ गिरि०॥ ११ ॥
तत्प्रतिरूपं चैत्यं पूर्वाभिमुमं तु नितिस्थाने ।
पत्र हरियोऽसी गिरि० ॥१२॥
तीतिस्मरणाद् पन यादवाः सप्त कालमेघायाः ।
क्षेत्रपतामापुरसौ गिरि० ॥ १३ ॥

२०
प्राचीनगूर्जरकाव्यसवः
विभुमर्चति मेघरवो वलानकं गिरिविदारणश्चक्रे ।
यत्र चतुर्दारमसौ गिरि० ॥१४॥
यत्र सहस्राम्रवणांतरस्ति रम्या सुवर्णचैत्यानाम् ।
चतुरधिकविंशतिरयं गिरि० ॥ १५॥
दासप्ततिर्जिनानां लक्षारामेऽस्ति यत्र तु गुहायाम् ।
सचतुर्विंशतिकासौ गिरि०॥ १६ ॥
चर्पसहस्रादितयं प्रायत्तत यत्र किल शिवासनोः ।
लेप्यमयी प्रतिमासौ गिरि० ॥ १७ ॥
लेपगमेऽम्यादेशात्प्रमुचैत्यं यत्र पश्चिमाभिमुखम् ।
रत्नोऽस्थापयतासौ गिरि० ॥१८॥
काञ्चनवलानकान्तः समवसृतेस्तन्तुनेह विम्वमिदम् ।
रत्नेनानीतमसौ गिरि०॥ १९ ॥
बौद्धनिपिडा सडो नेमिनतौ यत्र मन्त्रगगनगतिम् ।
जयचन्द्रमादिशदसी गिरि० ॥२०॥
तारां विजित्य वौद्धान्निहत्य देवानचन्दयत्संघम् ।
जयचन्द्रो यत्रायं गिरि० ॥ २१ ॥
नूपपुरतः क्षपणेभ्यः कुमायुदितगाथयाम्बपायंत यः।
श्रीसहाय सदायं गिरि० ॥ २२ ॥
नित्यानुष्टानान्तस्ततोऽनुसमयं समस्तसड्वेन ।
यः पठ्यतेऽनिशमसी गिरि० ॥ २३ ॥
दीक्षाज्ञानध्यानव्याख्यानशिवावलोकनस्थाने ।
प्रभुचैत्यपावितोऽसौ गिरि० ॥ २४ ॥
रानीमनीचन्द्रदीगजेन्द्रपदण्डनागझयादी ।
याप्रमुत्तियुनोऽयं गिरि० ॥ २५ ॥
छवाक्षरघण्टाअनबिन्दुशियशिलादि यत्रहार्यस्ति ।
कल्याणकारणमयं गिरि० ॥२६॥
पाकुचमात्यमवनदण्देशाधा अपि व्यधुर्य ।
नेनिभवनानिममी गिरि० ॥२७ ।।
कल्याणप्रयचत्यं तेनपालो न्याविशन्मन्त्री ।
यन्मबलागतममा गिरि ॥२८॥

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२०
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्घः
विभुमर्चति मेघरवो बलानकं गिरिविदारणश्चके ।
यत्र चतुद्धारमसौ गिरि० ॥१४॥
यत्र सहस्राम्रवणांतरस्ति रम्या सुवर्णचैत्यानाम् ।
चतुरधिकविंशतिरयं गिरि० ॥ १५ ॥
दासप्ततिर्जिनानां लक्षारामेऽस्ति यत्र तु गुहायाम् ।
सचतुर्विंशतिकासी गिरि० ॥१६॥
वर्पसहस्रदितयं प्रावर्तत यत्र किल शिवासनोः ।
लेप्यमयी प्रतिमासी गिरि०॥ १७ ॥
लेपगमेऽम्बादेशात्मभुचैत्यं यत्र पश्चिमाभिमुखम् ।
रत्लोग्स्थापयतासी गिरि० ॥ १८ ॥
काञ्चनवलानकान्तः समयमृतेस्तन्तुनेह विम्बमिदम् ।
रत्नेनानीतमसौ गिरि० ॥ १९ ॥
पौडनिपिडा सड्डो नेमिनती यत्र मन्त्रगगनगतिम् ।
जयचन्द्रमादिशदसौ गिरि० ॥ २० ॥
तारां विजित्य वौनिहत्य देवानयन्दयत्संघम् ।
जयचन्द्रो यत्रायं गिरि० ॥ २१ ॥
नृपपुरन: क्षपणेभ्यः कुमायुदितगाथयाम्बपात यः।
श्रीसहाय सदायं गिरि० ॥ २२ ॥
नित्यानुष्ठानान्तस्ततोऽनुसमयं समस्तसङ्केन ।
यः पठ्यतेऽनिशमसी गिरि० ॥ २३ ॥
दीक्षाज्ञानध्यानन्यायानशियावलोकनस्थाने ।
प्रमुनत्यपावितोऽसी गिरि० ॥२४॥
राजीमनीचन्द्ररीगजेन्द्रपदण्डनागझपांदी।
याप्रमुमूर्तियुतोऽयं गिरि० ॥ २५ ।।
उवाक्षरयन्टाअनविन्दृगिरशिलादि यत्रहार्यस्ति ।
कल्याणकारणमयं गिरि ॥२६॥
यायमात्रामवनदण्देशागा अपि गधुर्य।
ननिभयनानिममी गिरि० ॥२७॥
कल्यागययचयं तनापाला नगीविशन्मन्त्री।
पन्नपदागतममी गिरि ॥२८॥

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APPENDIX VIII Inscription of the reign of Alapklan in the temple of Stbaraba hana Parsvanátha at Cambay. ॐ अहं संवत् १३३६ वर्ष प्रतापाक्रान्तभूतलनीअलावदीनसुरवाण- प्रतिशरीरश्रीअल्पखानविजयराज्ये श्रीस्तंभतीर्थे श्रीसुधर्मास्वामिसंताननभी- नभोमणिसुविहितचूडामणिप्रभुश्रीजिनेश्वरमरिपघालंकारप्रभुश्रीजिनप्रबोधमू- रिशिष्यचूडामणियुगप्रधानमभुश्रीजिनचंद्रसूरिसुगुरूपदेशेन ऊकेशबंशीयसा- हजिनदेवसाहसहदेवकुलमंडनस्य श्रीजेसलमेरो श्रीपार्श्वनाथविधिचैत्यकारित. श्रीसम्मेतशिखरमासादस्य साहकेसवस्य पुत्ररत्नेन श्रीस्तंभती निर्मापितस- कलस्वपक्षपरपक्षचमत्कारिनानाविधमार्गणलोकदारिद्रयमुद्रापहारिगुणरत्नाकर स्य गुरुगुरुतरपुरप्रवेशकमहोत्सवेन संपादितश्रीशनुजयोन्नयंतमहातीर्थयात्रा- समुपार्जितपुण्यप्राग्भारेण श्रीपत्तनसंस्थापितकोद्दडिकालंकारश्रीशांतिनाथवि- धिचैत्यालयश्रीश्रावकपौपधशालाकारापणोपचितप्रसृमरयशसंभारेण भ्रातः साहराजुदेवसाहवोलियसाहजेहडसाहलपपतिसाहगुणधरपुत्ररत्नसाहजयसिं- हसाहजगधरसाहसलपणसाहरत्नसिंहप्रमुखपरिवारसारण श्रीजिनशासनम भावकेण सकलसाधर्मिकवत्सलेन साहसलमुश्रावकेण कोइंडिकास्थापनपूर्व श्रीश्रावकपोपधशालासहितः सकलविधिलक्ष्मीविलासालयः श्रीअजितस्वामि- देवविधिचैत्यालयः कारित आचन्द्राक यावनंदतात् ॥ शुभमस्तु । श्रीयात श्रमणसंघस्य । श्री।

भासावरानुजेन साठूणसीहायजेन संघपतिसाधुश्रीदेसलेन पुत्रसा०सहज- निजकुलदेवी (सपि) फामूतिः करिता । यायद्योमनि चंद्राओं यावन्मेरुर्म- हीललेतावत् श्री (सर ) का मूर्तिः" Inscription APPENDIX IX muti of the image of Aditrara. ou the Satrunjaya llill portaining Samari's installa- संवत् १३७१ वर्ष माहसुदि सोमे श्रीमदूकेशयंशे येसटगोत्रीपसा० पुत्रमा०माजरतनपसा गोसलभार्यागुणमतीकुक्षिसंभवेन संघपति- लिसा साहणपालसा सामंतसा समरसा सांगणममुखफुटुम्बसमुदायोपेतेन .... संवत् १३७१ वर्षे माहसुदि १४ सोमे "ज्ञातीयराणकधीमहीपाल- वित्तिः संघपतिश्रीदेसलेन कारिता श्रीयुगादिदेवचैत्यालये । संवत् १३७१ वर्षे माहसुदि १४ सोमे श्रीमदृकेशवंशे येसटगोत्रे सा० सलपणपुत्रसा आजहतनयसागोसलभार्यासागुणमतिकुक्षिसम्भूतेन संघ- पतिसा आशाधरानुजेन सालणसीहायजेन संघपतिसाधुश्रीदेसलेन सा०- सहजपालसा साहणपालसा सामंतसा समरसीहसा सांगणसा सोमप्रभृ. तिकुटुंबसहायोपतेन पृद्धभ्रातृसंघपतिआसाधरमूर्तिः प्रेष्ठिमाढलपुत्रीसं- घरलश्रीमतिसमन्विता कारिता । आशाधरः कल्पतस्यहोपमाशात्रिक लंकृतबाहयुगो युगादिदेवं प्रयतः प्रणौति ॥ चिरं नंदतात् ।। संवत् १४१४ वर्ष वैशांपसु १० गुरौ संघपतिदेसलसुतसा समरस- मरश्रीयुग्मं सा सालिगसा सजनसिंहाभ्यां कारितं । प्रतिष्ठितं श्रीकशासरि- शिष्यैः श्रीदेवगुप्तसरिभिः । शुभं भवतु ॥ पूरित............. ।। शुभं भवतु॥

APPENDIX X
पेथडरासः
विणयवयणि वीनवउं देवि सामिणि वागेसरि
हंसगमणि आकाशभमणि तिद्वयणि परमेसरि ।
वीरजिणिदह नमीय चलण चविहुश्रीसंघिहिं
कवडजक जकाधिराज समरीय मनरंगिहिं ॥१॥
कोडीयनयरनिवासिणी य वंदउं अंबिकदेवि ।
शासनदेवति मनि धरीय गुरुचलण नमेवि ॥२॥
रास रमेवउ जिणभुवणि तालमेल ठवि पाउ ।
संघतलायन रोपीउ ए सभगिरि विभगिरि वेवि ॥३॥
निसुणउ धामी एकमनि महीयलिमज्झि पहाण ।
जास बोध निरवमतिलउ पेय अगंजीयमाण ॥४॥
पिण एक तस गुण संभलउ संघपति साहसधीर ।
अगलीभ कलि जिम छेतरीअ गरूउ गुहिर गंभीर ॥५॥
पोरूआइफलिमंडणउ पर्द्धमाणकुलिलीह।
चांडसीहकुलि अवतरीया पेथपमुह सुतसीह ॥६॥
जिम कंचण कसवीयए पामिउ यलुगुणरेह ।
बंधपि पेयपरीपीपइ बहुभ कालि घरि एह ॥७॥
यसीय पंपड पाट बंधय बोलांबइ
नरमीहरतनह कार मनि मंत्र चलायइ ।
मगूगजन्म अनिलह अनइ श्रावयजम्म
जांच लदइ वहपुण्य जगि जिणवरधम्म ॥८॥
धगमरगणभंडार ते मयि अछह य असार।
मंगइ मानवंय ते मयि जाणे गमार ॥९॥
शाहिनार जागरय करेइ लाज राउल एल ह धरई ।
मयतवन हवं मात कराना जीवियोवनलाहउ लीना ॥१॥
अभिरलाकि रिम विरह करीन जिगह धम तम आम दीना।
मेति रिमझमामि वदाना विविसकारियं प्रभु होतइ ॥१॥

२५ पेघडाम: - चंधवि कीयउ वयण प्रमाण एकनिति मपि ममाण जाण । बंधावि कीया विचार मविहं काजि लिउ नग्मा भार॥ १० ॥ व्य निसुण लोयमज्झि मंधन ममाहर भवाण नाणूंअ दीजह भनिजत्ति भवीया नर मार गाणा: । सिम्लीयई रंगि गम हवं नवम्म नवरंग नवापार सुणि सामहणी मंधतणी जो कार निता वर्गट र इन देवालउं मामुहि नाहं माहि मग्मा जिला प्रमाण । इसदेसाउर वरनयर निहि लेचि क.काग्री पाठयाण पादणि पदसीय सामति तरि कर्णनम्मर भट गानमार । तीरथजान जापय देव नहि देगा? सामान का ..॥ तहि वेगि लेउ पण आवारा सारा समय नायमणि नयर पसादरउ कीपर नवग्यणि नार ना? मगलिगाए। घरि घरि वासाय लोप मनावा या रणग्या मरियममा गामागा पारण ..॥ इसमसमद अहि जिम मिमय REP frur मन प शासनमन। एकभायि नर जिणह पाम alternimom रमा॥ फेषि फुलिंग नर जो निमा मना I feafsanपना। कामिणि भामिणि पल दिगंमा गापना गुण निया। अति:माह जान समाहर करीगल बनि गुणAI | भरा कदा मइया मारी रान दो पाION | में पणापणेरा समधिरा लिन दाम Ame गुण ॥ देवाला पास न विगलीय दिनाय माता in fs.anारमा। महिनामा सेरा बापन बेला बराला मालाला ॥ तिमि पूरा दिना भमनपरि नांगा नियम रममहा देवाला फागुणपंचाम बासापाला ताबा पाणि पनि बारवाई AIRNAR र मागामार। मलम गापामणहबग पाया पर्णा साया । यस्यमसले पनि भागय मंधवान रोकार २६. प्राचीनगूर्जरकाव्यसहहः संघपूज.तिहां कीधउं. अपारी. भोयण सयल लोय सविं पूरीय महोच्छय कारवीय ।। २३ ॥ लवण ॥ फागुणदसमि दिणंद चलीय संघ दहदिसितणउ । हसमस धसमस जोइ मिलीय लोक पण अतिवणउ ए॥ २४ ॥ यहतमल्ल अगेवाण तुरीय ठाठ जोई पापरीय । पुलेहिं पलाण जोइ इकि देवालह फिरीय ॥२९॥ पहिलउं दीधी लागि जोइन देवालां संचरई ए। अखंड पीयाणे जाइ पहिल पोल्याणइ रहीय ॥ २६ ॥ चलीय संघसंजुत्त पहुतउ वेगि डाभलनयरे । तीहं दीन्हा वास भास रास रुलीयामणां ए। देवालइ जहाहु चैत्रप्रवाडि सोहामणी ए ॥ २७ ॥ वडराउत वपाणि करणराउ मनि सलहीद ए। देद दयापरजाम वील्हणवंस वपाणीइ ए ॥२८॥ पहुतउ देवालइ तोइ हरसीय संघ प्रसंसीइ ए। पेथडसमउ न कोइ मारगि मन तुम्हि वीहिसिउ ए ॥ २९ ।। दीन्ह पीयाणउं तोइ मयगलपरि तुम्हि संचरीय । वेगि पहता तोइ नयरमाहि ते तरवरीय ॥ ३० ॥ आंगणि दीन्हा वास देवालां पापलि फिरीय । भविया पणमउ पास जिणह भूयण रुलीयामणउं । कीधीय चैत्रमवाडि देवदेवांगणि पेपणउं ए॥ ३१ ॥ संघह की वत्सल धम्मी नागलपुरतणे ए। चलीय पोपाणइ जाम मारगि माग न जाणीइ ए ॥ ३२ ॥ सह यालइ गीयं ताम संघपति पेय वपाणीहए। नयणि निहालइ लोक पुण्यवंत धनयंत तहिं ॥ ३३ ॥ पूजीया जिणभूयणाई भविया मणारह चित्ति घरे । की पीयाणउं भावि अम्पलीयडीतीयहारि तहिं ॥ ३४ ।। पेधावाइइ जाइ भेटीय मंडणदेव तहिं । लाप मानप्रमाण मीकिरि भायई गुणपवरी ॥ ३॥ भयु मनि करिव तुम्हि मारगि जाउ तम्हि । गिया ते जंबू जाम संवह पार न पामीगए।

Enterture in rur) in mirrrr-timम गुणपत्र mmm ram rafण ॥ in amma rela ! rrory. my name. nuin - Arming Huaafreum om my warn पास ritamin arm Trini पुणगri gar. mmmm पन .71 14.07 भाग। दानापान " Int पद.rfurrm ..." ।। गतिमि in Tam पतिमीfrirs artant ' rf नगणिनिले ॥४॥ मिws दियाirnar NITI II लिपप गयो रिपर सपति मर रदः वहभाः ॥ ४३ ।। पटा भाट मंगपनि निगुणि विन पंटम अपनगर गुरदये गुरद गुग्दो मुग मन । मापाउ हंगर पण निदा फलगर ने चंग पाउल नाप रंगभा गाती गाना गागनी मनह मरंग॥४४॥ फापर पण दिन्ह माहि यहगुण पूरी आम। मंधपति पर पधामण गलीऊ ए चलीक " चलीउ पालीयताणद यासा॥४५॥ गंगाजल जिम निर्मल टलनामर सुपयित । सोधपेन मोरधमिलउ तिममयर निममपरं तिसमयरे संपत्त ॥ ४६॥ मोयि मामिणि पर नमीय मंतिनाह मुरराज । पालिसमरिप्रतिष्ठिउ ए मोलम ए सोलमू ए सोलमा जिणराउ ॥४७॥ हंगरसिरि जे पाहरीय करटिजवावपटिहारो। संघ जि सांनिध मो फरइ पहिलू ए पहिलं प पहिलूं पास जुहारे ।। ४८॥ अणुपम मर देपेवि तहिं पहुंता पालियारि । कामरगारोहण दिड तहिं अहिणव ए अहिणय ए अहिणय ईणं संसारे ।। ४९ ।।

२८ प्राचीनगरानसः अष्टापद अवलोइई परंद्रमंडप अतिनंग। नंदीसर अहिणव तहिं देपीऊ पदेपोज प देगीउ मनिहिं मुरंग ॥ ५० ॥ मंडपि पद्धतउ पवित्र तहिं लोटींगणां करें। पणमीय सामीय रिसहजिण तिन्नि प्रदक्षिण तिन्निमदक्षिण तिनि प्रदक्षिण देउ ॥५२॥ दीठला पदमहकमल निम्मल युगादि जिण पपठला सामी पदमजिण विम- लगिरे। भवीयच्छुणंत सामी लागल्हा तम्ह यई नामि नमो नमो नमो सेजसिहरो२२ वायवद्धामणउं अतिहिं सोहामणु रिसहभूमणि मलीभामगंग भवीयजन कलस कंचणमय मंडियले प दुक्ख जलंजलि देयंति कुसुमजले ॥ धुणंति दीणरीण जीण ऊतारंति जललवण नम्हण करंति सामी सुगंधजले ।। कपूरिपूरि पूरीय तिणि कीय लि मृगनाभिमंढण त्रिजगगुरू गुणनिलउ देवाधिदेव जोउ वेलवउ सेवत्रीपाडल पहल कुसुम परमल : पूजहे। वायवहामणं ।। भवीयमणि वहआणदि आरती उतारइ जिणिंद पढई भह .. तिलक भलउ लि कीय ले कंठि वरमाला ठविय ले चाउलि सिरि धन धामी भवीयजण रंजिय मनि दियंति ते दोण दुधीय जण : नचंति नवनवी रमणि चीणवंसमृदंगमणि तिवल्लि भवण। आय कि रिसहेसर तम्ह परमेसर सामीसाल चिरकालि तम्हची पाय ए कमलभमर भविक जन जयउ जगनाथ अखंडकोडाकोडि सिद्धि ले तीथयर गोत्र बंधीय ले. 4 आयस मग्गीय जय चलीय पूरीय संघ मस्लीप मनि डर ढलीउ। आयस मग्गिय पेय ज चलीउ दलीय टोडर संघपति सपलसंघो पहत पालीताणए घरि घरि साहमीवच्छल २९ पेपरास: वत्त तिहि सपलसिद्धिक्षेने जन्मफल लेउ जो बहुधणवंत रूपावदी चलीय पीयाणए। पातिपति लोक वखाणए सेलडीया संघ पहत तहि चलयउ अखंड पीआणए। अमरेलीयपीयाणए पहतर वेगि तहिं पण विमीयाणए विसमगिरि लं- घीयउ पूरि मनि आसह ॥ रपुरि अंगणि दीन्हा पास उग्रसेनमंदिरु दीठ पगार अपनरकवि भणई गदवि खइंगार। अउ दीसए पोलिपगार नरपम नरसीभ नरआधार । इलकि मंदिउ वास तहिं पिसमए सुरठ वदेस भोल लोक तहि निवसपए। हरि गुरूउ गिरनार स पसिद्ध ता सहि दमोदरो देय प्रसिद्धउ यहि सोचन- रेख नदी जलपूरीय। कालमेघो क्षेत्रपाल गिरिपाहरी मंत्रियाहड देवि पाज करायीय धवलीप वर परव तीण फरापीय। विसमडूंगर गुरूउ गिरनारो पडीय नेमिकुमरि लीयउ संजमभारी दिनि चउपनि परनाण ऊपजइए जगतिगुरु जिणिह पर तमु सिहरे सिज्मए ।। सीधु सामी सामलउ तसु सिहरि संघ पतउ ऊलट आंगिहिं अतिघणउ देपीउ राजलवंत! तहि नाचिनए ए सहिलदी ए लला गीप गिरिनारे राजलियर मलिआमणउ सामलडउ संसारो। तहिं नाचिनए॥ अंग पखालि सुगयंदमद ए जल पहरीय घोति प्रपीत । इंद्रमहोत्सव आयरंभी तहिं ययठ लि बहुधणपंत । तहिं नापिनए सहि ॥ इंद्रमालउच्छाह करी जो चेयीय विभव नीयाणि । सफलमणोरद पूरीय संघपति पडीपलि इन्द्रपिमानि । तहिं नापिनए । चमरशारि सरतारसवंगी गाती यहु आसोस। सामलसापि फिरि संघपति नंदर बहत परीस ॥ तहिं नाचिनए.॥ गपंदमह ए नीरि फलस जलभरीय लि फारिहिं भंगी महापूज अहिसीम । नय फलीय लि आरती उतारउ मंगलिक संघपति ईमतहिं ना॥ अंविकि आस मणोरह पूरी अपलोईय जगनाथ सांवपजन जुदारीप बलीयर पेध जन्म सुकीपायसहिं नासहटली ए स्टी- पा गई गिरिनारि॥

२८ प्राचीनगूर्जरकान्यसहः अष्टापद अवलोईई ए इंद्रमंडप अतिचंग। नंदीसर अहिणव तहिं देपीऊ ए देपीऊ ए देपीउ मनिहिं सुरंग ॥ ५० ॥ मंडपि पहुतउ पवित्र तहिं लोटींगणां करेउ। पणमीय सामीय रिसहजिण तिन्नि प्रदक्षिण तिन्निप्रदक्षिण तिन्नि प्रदक्षिण देउ ॥५१॥ दीठल्ला पदमहकमल निम्मल युगादि जिण पयठला सामी पढमजिण विम- लगिरे। भवीयच्छुणंत सामी लागल्ला तम्ह यई नामि नमोय नमो नमो सेत्रुजसिहरो१२ वायवद्धामणउं अतिहिं सोहामणुं रिसहभूअणि मुलीआमणं ए भवीयजन फलस कंचणमय मंडियले ए दुक्ख जलंजलि देयंति कुसुमंजले ॥ धुणंति दीणरीण जीण ऊतारंतिजललवण नम्हण करंति सामी सुगंधजले ।। कपूरिपूरि पूरीय तिणि कीय लि मृगनाभिमंडण निजगगुरु गुणनिलउ देवाधिदेव जोउ वेलवउ सेवत्रीपाडल बहल कुसुम परमल विपुल पूजहे। वायवडामणं॥ भवीयमणि यहाणंदि आरती उतारइ जिणिंद पढई भ६ मंगलिक रिसह- सामि। तिलफ भला लि कीय ले कंठि वरमाला ठचिय ले चाउलि सिरि यदावीय लि। धन धामी यडामण। भवीयजण रंजिय मनि दियंति ते दीण दुधीय जण मम्गण दाणु नयंति नवनवी रमणि वीणवंसमृदंगमणि तिवल्लि तालनिनाद सुणि पूरीप भवण । पाइपदामपुं०॥ आप कि रिसहेसर तन्द परमेसर सामीसाल चिरकालि मुफिवर । तन्दची पाय ए कमलममर भविक जन जपउ जगनाय तुं जगतगुरो ।। याय- यद्यामर॥ अमंडकोडाकोहि सिद्धि ले तीपयर गोत्र बंधीय ले पूजीयु हरिसह मनि मन मिली। भायस मागीय जब चलीय पूरीय संघ मस्लीय मनि निचंतीय पेपउठि टी. दर नलीउ । यागदामणं॥ आपम मग्गिय पंप पटीर दलीप टोडर संघपति माग्लाय सपटसंयो पहत पालीतामा परि घरि माहीयन्टल कारण।

२९ पेपहरास. पीय वित्त निहि सपलसिदिक्ष जन्मफल लेउ जो बहुधणयंतई रूपावटी चलीप पीयाणए। यहर संघातिपति लोक यग्वाणा सेलडीया संघ पदत तहि पलपउ अखंड पीआणए। जाइ भमरेलीयपीयाणए पहतउ वेगि तहिं पण विकोपाणए विसमगिरि लं- पीपउ पूरि मनि आसह ॥ तेजलपुरि अंगणि दोन्हा पास उग्रसेनमंदिर दीठ पगार अपनरकपि भणई गढवि खइंगार। गरूअउ दोसए पोलिपगार नरपम नरसीभ नरआधार ।। मंहलकि मंहिउ पास तहिं पिसमए सुरट पडदेस भोल लोक तहि निवसयए। गिरि गुरूप गिरनार स पसिद ता सहि दमोदरो देय प्रसिद्ध वहि सोवन- रेख नदी जलपूरीय। फालमेघा क्षेत्रपाल गिरिपादरी मंत्रियाहड देवि पाज करायीय घपलीप वर परव तीण करावीय। विसमहूंगर गुरूउ गिरनारो घडीय नेमिकुमरि लोपउ संजमभारो दिनि उपनि यरनाण ऊपजइए जगतिगुरु जिणिह वर तमु सिहरे सिज्झए । सीधु सामी सामल तसु सिहरि संघ पद्धतउ ऊलट आंगिहिं अतिघणउ देपीउ राजलकंत! तदिनाचिनए एसहिलडी ए लला गीय गिरिनारे राजलिवर रुलिआमणउ सामलडउ संसारो। तहिं नाचिनए०॥ अंग पसालि सुगयंदमइ ए जल पहरीय घोति प्रवीत । इंद्रमहोत्सव आयरंभी तहिं ययठ लि बहुधणयंत । तहिं नाचिनए सहि०॥ इंद्रमालउच्चाह करी जो वेवीय विभव नीयाणि । सफटमणोरह पूरीय संघपति चडीयलि इन्द्रपिमानि । तहिं नाचिनए० ॥ पमरधारि सरतारसवंगी गावंती बहु आसीस। सामलसापि किरि संघपति नंदउ यहत परीस ॥ तहिं नाचिनए.॥ गयंदमह ए नीरि कलस जलभरीय लि कारिहिं भंगी महापूज अहिसीम । नय कलीप लि आरती उतारउ मंगलिक संघपति ईम॥ तहिं ना० ॥ अंविकि आस मणोरद पूरी अवलोईय जगन्नाथ सांवपजन जुहारीय वलीपर पेष जन्म सुकीयाध ॥ तहिं नासलली ए स्ली- या गई गिरिनारि॥

३०
जानीनगर बागमः
सोमनाथचंदपह वंदीप देवीउ यलीउ जाम
दिउ पीयाणं हि मन रहिसउ मंडलिक भाई ईम ।। तहिं ना ॥
दिउ पीयाणं वेगि तहिं हरीयाला सूहा रे मुरवाई संपरा मनीला म
इति श्रीपाटगमौकिया पेपरगम: समासः ॥

+ २८ प्राचीनगूर्जरकान्यसङ्ग्रहः अष्टापद अवलोईई ए इंद्रमंडप अतिचंग। नंदीसर अहिणव तहिं देपीऊ ए देपीऊ ए देषीउ मनिहिं सुरंग ॥५०॥ मंडपि पहुतउ पवित्र तहिं लोटींगणां करेउ। पणमीय सामीय रिसहजिण तिनि प्रदक्षिण तिन्निप्रदक्षिण तिन्नि प्रदक्षिण देउ ॥५२॥ दीउल्ला पदमहकमल निम्मल युगादि जिण पयठला सामी पढमजिण विम- लगिरे। भवीयच्छुणंत सामी लागल्ला तम्ह वहं नामि नमोय नमो नमो सेत्रुजसिहरो१२ वायवडामणउं अतिहिं सोहामणुं रिसहभूभणि मलीआमणं प भवीयजन कलस कंचणमय मंडियले ए दुक्ख जलंजलि देयंति कुसुमजले ॥ धुणंति दीणरीण जीण ऊतारंतिजललवणनम्हण करंति सामी सुगंधजले ॥ कारिपूरि पूरीय तिणि कीय लि मृगनाभिमंडण निजगगुरु गुणनिलउ देवाधिदेव जोउ घेलयउ सेवन्त्रीपाडल बहल कुसुम परमल विपुल पूजहे। वापरजामणं ।। भायमणि बहभाणंदि आरती उतारद जिणिंद पर भह मंगलिक रिसद- सामि। तिलसमला लि कीप ले कंठि वरमाला ठविय ले चाउलि सिरि बरावीय लि। धन धामी पन्छामण ।। भीपजण रंजिय मनि दिगंति ने दीण वृधीय जण मग्गण दाणु नयंति नवनवी रमणि योगममृदंगमणि तिपल्लि तालनिनाद सुणि पूरीय भवण । वाइवयामगुं॥ आर किरिगहेमर तम्ह परमेसर सामीमाल गिरकालि मुफिवर । तन्ही पाय एकमलनमर भविक जन जया जगनाय नुं जगतगुरो ॥ पाय. याम॥ भमाद्याहि मिटि ले तीवयर गोत्र बंधीय ले पूजीयु हरिमह मनि मन मिली। आपस मागाय व पदीय पूरीय मंघ मनीप मनि नियंतीय संटिटी दर वलीउ ।यायाम।। मगिर धज मन्दीर दलीय रोहर मंशपनि माग्लाया ..या पहन पालीतामा परि घरि माहमीरच्छल कारए। * २९ पेपर यपित निहि सपलसिदिक्षेत्रे जन्मफल लेउ जो बहुधणवंतई रूपायटी चालीय पीयाणए। संघातिपति लोक पाणा सेलडीया संघ पहत तहि पलपर अखंड पोआणए। र अमरेलीपपीयाणए पाहता येगि तहिं पण विफ्रीपाणए विसमगिरि लं. घीपउ परि मनि आसह ।। संजतपुरि भंगणि दीन्हा पास उग्रसेनमंदिर दीठ पगार अयनरकवि भणई गदवि खइंगार। गरूअउ दीमए पोलिपगार नरपम नरसी नराधार । मंटलकिमंदिध पामतहि विममा सुरठ परदेस भील लोक तहि निवसयए। गिरि गुरूउ गिरनार स पसिउ मा सहि दमोदरो देय प्रसिद्धउ यहि सोवन- रेख नदी जलपूरीय। कालमेघो क्षेत्रपाल गिरिपाहरी मंप्रियाहड देवि पाज करायीय धवलीय पर परय तीण करावीय। पिसम इंगर गुरूउ गिरनारी पडीय नेमिकुमरि लीयर संजमभारो दिनि उपनि परनाण ऊपजइए जगतिगुरु जिणिह वर तसु सिहरे सिज्झए । साधु सामी सामल तमु सिहरि संघ पहृतउ ऊलट आंगिहिं अतिघणउ देपीउ राजलकंत! तहि नाचिनए ए सद्दिलही ए लला गीय गिरिनारे जिलियर गलिभामणउ सामलडउ संसारो। तहिं नाचिनए०॥ भंग पखालि सुगपंदमदए जल पहरीय घोति प्रयीत । इंद्रमहोत्सव आयरंभी तहिं वयठ लि बहुधणवंत । तहिं नाचिनए सहि ॥ इंद्रमालउच्छाह करी जो योग विभव नीयाणि । सफलमणारह परीय संघपति पडीयलि इन्द्रपिमानि ।। तहिं नाचिनए० ॥ चमरधारि सरतारसवंगी गावंती बहु आसीस। सामलसापि किरि संघपति नंदउ यहत परीस ॥ तहिं नाचिनए० ॥ गयंदमदप नीरि फलस जलभरीय लि फरिहिं भंगी महापूज अहिसीम । नय कलीय लि आरती उतारउ मंगलिक संघपति ईमतहिं ना०॥ अंविकि आस मणोरह पूरी अवलोईय जगन्नाथ सांबपजन जुहारीप वलीपर पेध जन्म सुकीयाथ ॥ तहिं नासहलली ए सली. या गई गिरिनारि॥

२८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसहः अष्टापद अवलोईई ए इंद्रमंडप अतिचंग । नंदीसर अहिणव तहिं देपीऊ ए देपीऊ ए देपीउ मनिहिं सुरंग ॥ ५० ॥ मंडपि पहुतउ पवित्र तहिं लोटींगणां करेउ। पणमीय सामीय रिसहजिण तिन्नि प्रदक्षिण तिन्निप्रदक्षिण तिन्नि प्रदक्षिण देउ ॥५१॥ दीठल्हा पदमहकमल निम्मल युगादि जिण पयठला सामी पढमजिण विम- लगिरे। भवीयच्छुणंत सामीलागल्ला तम्ह पई नामि नमोय नमो नमो सेजसिहरो१२ वायवद्धामणउं अतिहिं सोहामणुं रिसहभूअणि रुलीआमणं ए भवीयजन कलस कंचणमय मंडियले ए दुक्ख जलंजलि देयंति कुसुमजले ॥ धुणंति दीणरीण जीण ऊतारंति जललवण नम्हण करंति सामी सुगंधजले ॥ कपूरिपूरि पूरीय तिणि कीय लि मृगनाभिमंडण त्रिजगगुरु गुणनिलउ देवाधिदेव जोउ वेलवउ सेवत्रीपाडल वहल कुसुम परमल विपुल पूजहे। वायवद्धामणं॥ भवीयमणि वहआणंदि आरती ऊतारइ जिणिंद पढई भह मंगलिक रिसह- सामि । तिलक भलउ लि कीय ले कंठि वरमाला ठविय ले चाउलि सिरि वद्धावीय लि। धन धामी यद्धामण।। भवीयजण रंजिय मनि दियंति ते दीण दुधीय जण मग्गण दाणु नचंति नवनयी रमणि वीणवंसमृदंगमणि तिवल्लि तालनिनाद सुणि पूरीय भवण । वाइबदामगुं० ॥ आय कि रिसदेसर तम्ह परमेसर सामीसाल चिरकालि मुफिवर । तम्हची पाय ए कमलममर भयिक जन जयउ जगनाथ तुं जगतगुरो ॥ वाय- यद्धाम०॥ अखंडकोडाकोहि सिद्धि ले तीयपर गोत्र बंधीय ले पूजीयु हरिसह मनि मन मिली। आयस मागीय जव चलीय पूरीय संघ मालीप मनि निचंतीय पेधडकठि टो. डर बलीउ । पायपदामणं० ।। मग्गिय पेश ज चलीउ दलीय टोडर संघपति मोफलाए पहत पालीताणा घरि घरि साहमीपच्छल कारण।

२९ पेपहरासः र वित्त तिहि सपलसिद्धिक्षेत्रे जन्मफल लेउ जो बहुधणवंत रूपावटी चलीय पीयाणए। उ संघातिपति लोक पखाणए सेलडीया संघ पहत तहि चलपउ अखंड पोआणए। इ अमरेलीयपीयाणए पहतर वेगि तहिं पण विक्रीयाणए विसमगिरि लं. घीपर पूरि मनि आसद ॥ बजलपुरि अंगणि दीन्हा पास उग्रसेनमंदिरु दीठ पगार अपनरकवि भणई गदावि खइंगार। गरूअउ दीसए पोलिपगार नरपम नरसी नरआधार ॥ मंडलकि मंडिउ पास तहिं विसमए सुरठ वदेस भोल लोक तहि निवसयण। गिरि गुरूउ गिरनार स पसिद्धउ ता लहि दमोदरो देय प्रसिद्धउ परि सोपन- रेख नदी जलपूरीय। कालमेघो क्षेत्रपाल गिरिपाहरी मंत्रिवाहड देवि पाज करायीय धयलीप पर परपतीण करावीया विसम डूंगर गुरूउ गिरनारो पडीय नेमिकुमरि लीपउ संजमभारो दिनि चउपनि परनाण ऊपजइए जगतिगुरु जिणिह पर तमु सिहरे सिज्मए । सीधु सामी सामलउ तमु सिहरि संघ पट्टतउ ऊलट आंगिहिं अतिषण देपोर राजलकत । तहि नाचिनए ए सहिलडी ए लला गीय गिरिनार राजलिवर रुलिआमणउ सामलहउ संसारो। तहिं नाचिनए॥ अंग पखालि सुगयंदमह ए जल पहरीप धोति प्रवीत। इंद्रमहोत्सव आयरंभी तहिं वयठ लि बहुधणयंत । तहिं नापिनए सहि ।। इंद्रमालउच्छाद करी जो वेवीय विभव नीयाणि । सफलमणोरद पूरीय संघपति पडीयलि इन्द्रपिमानि ॥ तहिं नाचिनए । चमरधारि सरतारसवंगी गावंती बहु आसीस। सामलसापि फिरि संघपति नंदउ यहत परीस ॥ तहिं नापिनए । गयंदमह ए नीरि फलस जलभरीय लि फारिहिं भंगी महापूज अदिसीम। नय कलीय लि आरती उतारउ मंगलिक संघपति ईम॥सहिं ना ॥ अंविकि आस मणोरह पूरी अपलोईय जगनाथ सांवपजन जुहारीय पलीपर पेय जन्म सुफीपाय । तहिं नासहटटी ए स्टी. पा गई गिरिनारि॥

Prachina Gurjara Kavyasangrah Part 1

Author
Mr. C.d. Dalal
Title
Prachina Gurjara Kavyasangrah Part 1
File name
Prachina Gurjara Kavyasangrah Part 1
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/07
Publisher
Baroda Maharaja Gaekwad
Language
Sanskrit
Pages
167
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
314334
Barcode
99999990310881.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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