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Ruus Ki Chithi

Thakur,shri Ravindra Nath · 2011/01

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रूसकी चिट्ठी
[भ्रमण-कहानी]
श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर
यनुवादक
धन्यकुमार जैन
"विशाल-भारत” पुरतकालय
१२०२,,अपर सर्कलर रोड,
कलकत्ता
--

PHON- 4mare More श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर

रूसकी चिट्ठी
१
मास्को
आखिर रूसमें आ ही पहुचा। जो देखता हू, आश्चर्य
होता है। अन्य किसी देशसे इसकी तुलना नहीं हो सकती।
बिलकुल जडसे प्रभेद है। आदिसे अन्त तक सभी आदमियोको
इन लोगोने समान रूपसे जगा दिया है।
हमेशासे देखा गया है कि मनुष्यकी सभ्यतामे मप्रसिद्ध
लोगोका एक ऐसा दल होता है, जिनकी सरया तो अधिक
होती है, फिर भी वे ही बाहन होते हैं, उन्हें मनुष्य बननेका
अवकाश नहीं, देशकी सम्पत्तिके उच्छिष्टसे ये प्रतिपालित होते
हैं। वे सबसे कम साकर, सबसे फम पहनकर, सरसे कम
सीसकर अन्य सवोंकी परिचर्या या गुलामी करते हैं, सबसे
अधिक उन्हींका परिश्रम होता है, सबसे अधिक उन्हींफा

रूसकी चिट्ठी
असम्मान होता है। वात-बातपर वे भूखों मरते है, ऊपरवालोको
लातें खाते है-जीवन-यात्राके लिए जितनी भी सुविधाएं और
मौके है, उन सबसे वे वंचित रहते हैं। वे सभ्यताकी दीवट
हैं, सिरपर दिआ लिये सडे रहते है, ऊपरवालोको सबको
उजीता मिलता है और उन चारोंके ऊपरसे तेल ढलझता
।
रहता है।
मैने इनके बारेमें बहुत दिनोंसे बहुत सोचा है, मालम
हुआ कि इसका कोई उपाय नहीं। जब एक समूह नीचे न
रहेगा, तो दूसरा समूह ऊपर रह ही नहीं सकता, और ऊपर
रहनेकी आवश्यकता है ही। ऊपर न रहा जाय, तो बिलकुल
नजदीकको सोमाके बाहरका कुछ दिसाई नहीं देता,--मनुष्यत्व
सिर्फ जीविका-निर्वाह करने के लिए ही नहीं है। एकान्त जीविकाको
अतिक्रम करके आगे बढे, तभी उसकी सभ्यता है। सभ्यताको
उत्कृष्ट फसल तो अवकाशके खेतमे पैदा होती है। मनुष्यकी
सभ्यतामे एक जगह अवकाशकी रक्षा करनेकी जरूरत तो है
ही। इसीलिए सोचा करता था कि जो मनुष्य सिर्फ अवस्थाके
कारण ही नहीं, बल्कि शरीर और मनकी गतिके कारण नीचे
रहकर काम करनेको मजबूर है और उसी कामके योग्य है,
जहां तफ सम्भव हो, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुस और
सुविधाके लिए उद्योग करना चाहिए।
मुशकिल तो यह है फि दयाके वश कोई स्थायी चीज
नहीं बनाई जा सकती , बाहरसे उपकार करना चाहें नो

३
रूसकी चिट्ठी
पद-पदपर उसमे विकार उत्पन्न होते रहते हैं। समान धन
मऊं, तभी सत्य सहायता हो सकती है। कुछ भी हो, मैं
अच्छी तरह कुछ सोच नहीं सका हू-फिर भी इस बात को
मान लेनेमे कि अधिकाश मनुष्योंको नीचे रसकर, उन्हें अमानुप
बनाये रखकर ही सभ्यता ऊँची रह सकती है, हमारा मन
धिकारोसे भर जाता है।
जरा सोचो तो सही, भूखे भारतके अन्नसे इग्लँड परिपुष्ट
हुआ है। इग्लैंडके अधिकांश लोगोंके मनका भाव यह है कि
झालैंडका चिरकाल पोपण करनेमे ही भारतको सार्थकता है,
भलैंड बडा होकर मानव-समाजमें बड़ा काम कर रहा है, और
इस उद्देशकी सिद्धिके लिए हमेशाके लिए एक जातिको दासतामे
घाँध रखनेमे कोई बुराई नहीं , यह जाति अगर कम साती
है, कम पहनती है, तो उससे क्या धनता-बिगडता है , फिर
भी कृपा करके उनको अवस्थाकी कुछ उन्नति करना चाहिए,
यह घात उनके मनमे बैठ गई है। परन्तु एक सौ वर्ष हो
चुके, न तो शिक्षा ही मिली, न स्वाथ्य ही मिला और न
सम्पद ही देसी।
प्रत्येक समाज अपने अदर इसी एक ही बातका अनुभव
करता है। जिस मनुष्यका मनुष्य सम्मान नहीं कर सकता,
उस मनुष्यका मनुष्य उपकार करनेमे असमर्थ है। और कहीं
नहीं तो, जन अपने स्वार्थपर आकर ठेस लगती है, तभी
मार-फाट शुरू हो जाती है। रूसमे एकदम जडसे लेकर इस

रुसको चिट्ठी समस्याको हल करनेको कोशिश की जा रही है। उसका अन्तिम परिणाम क्या होगा, इस बातपर विचार करनेका समय अभी नहीं आया, मगर फिलहाल जो कुछ मौसोंके सामनेसे गुजर रहा है, उसे देसकर आश्चर्य होता है। हमारी सम्पूर्ण समस्याओंका सबसे बड़ा रास्ता है शिक्षा । अभी तक समाजके अधिकांश लोग शिक्षाको पूर्ण सुविधासे वचित हैं और भारतवर्ष तो प्राय पूर्णत. ही वंचित है। यहाँ-रूसमे-वही शिक्षा ऐसे आश्चर्यजनक उद्यमके साथ ममाजमें सर्वत्र व्याप्त होती जा रही है कि जिसे देखकर दंग रह जाना पड़ता है। शिक्षाको तौल सिर्फ सरन्यासे नहीं हो सकती, वह तो अपनी सम्पूर्णतासे-अपनी प्रपलतासे ही तौली जा सकती है। कोई भी आदमी नि सहाय और बेकार न रहने पावे, इसके लिए कैसा विराट आयोजन और कैसा विशाल उद्यम हो रहा है। केवल सफेद रूसके लिए ही नहीं-मध्य- एशियाकी अर्ध-सभ्य जातियों में भी ये वाढकी तरह शिक्षा विस्तार करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, जिससे साइन्सकी अन्तिम फसल तक उन्हें मिले, इसके लिए इतने प्रयत्न हो रहे हैं, जिनका अन्त नहीं। यहां थियेटरके अभिनयों में बडी जबरदस्त भीड होती है, मगर देसनेवाले कौन है—फिसान और मजूर । कहीं भी इनका अपमान नहीं। इसी अरसेमें इनकी दो-एक सस्थाएं भी देसी, और सर्वत्र हो मैने इनके हृदयका जागरण और आत्म-सम्मानका आनन्द पाया। हमारे देशके सर्वसाधारणकी तो .

रूसकी चिट्ठी पात ही छोड दो-टपटके मजूर-समाजके साथ तुलना करनेसे जमीन-असमानका फर्क नजर आता है। हम श्रीनिकेतनमे जो फाम करना चाहते हैं, ये लोग देश-भरमें अच्छी तरह उस फामको पूरा कर रहे हैं। हमारे कार्यकर्ता अगर यहां आकर कुछ सीस जा सकत, तो बडा-मारी उपकार होता। रोजमर्रा में हिन्दुस्तान के साथ यहाँकी तुलना करता हूँ और सोचता हूँ कि क्या हुआ और क्या हो सकता था। मेरे अमेरिफन साथी डाक्टर हेरी टिम्बर्स यहाँको स्वास्थ्य-व्यवस्थाकी चर्चा करते हैं, उनकी कार्य-पद्धति देसनेसे अनि खुल जाती है, और कहां पड़ा है रोग-सतप्त, भूखा, अभागा, निरुपाय भारतपर्प। कुछ पहले भारतकी अवस्थारे साथ यहाँको साधारण जनताको दशाकी विलकुल समानता थी--इस छोटसे समयमे घड़ी तेजीके साथ उसमे फैसा परिवर्तन हुआ है। और हम अभी तक जडताके कीचडमे ही गले तक डूये पडे हैं। इसमें कोई गलती ही न हो, यह बात म नहीं कहता- गहरी गलनी है। और वह किसी दिन इन्हें बड़े सस्टमें डाल देगी। सक्षेपमे वह गलनी यह है कि शिक्षा-पद्धतिको इन्होंने एक सांचा सा बना डाला है, पर साँचेमे ढला मनुष्यत्व कभी स्थायी नहीं हो सकता-सजीव हृदय-नत्त्वके साथ यदि विद्या-तत्त्वका मेल न हो, तो या तो किसी दिन सोचा ही टूट जायगा, या मनुप्यका हृदय ही मरकर मुर्दा बन जायगा या मशीनका पुर्जा बना रहेगा। यहाँके विद्यार्थियोमे विभाग बनाकर हर विभागको पृथक्-पृथक् फाय सौप जाते है, छानागासकी व्यवस्था वे खुद ही करते हैं- - रूसकी चिट्ठी ६ किसी विभागपर स्वास्थ्य-सबधी भार है, तो किसीपर भोजनादिका । जिम्मेदारी सर उन्हींके हाथोमे है, सिर्फ एक पग्दिर्शक रहता है। शान्ति-निकेतनमे मैंने शुरूसे ही इस नियमको चलानेकी कोशिश की है, पर वहां सिर्फ नियमावली ही बनकर रह गई, कुछ काम नहीं हुआ। उसका मुख्य कारण यह है कि हमने स्वभारत. ही पाठ-विभागका लक्ष्य बनाया परीक्षा पास करना, मौर-सवको उपलक्ष्य मात्र सममा , यानी हो तो अच्छा, न हो तो कोई हर्ज नहीं-हमारा आलसी मन जबरदस्त जिम्मेदारोके बाहर काम चढाना नहीं चाहता। इसके सिवा वचपनसे ही हम कितावें रटनेके आदी हो गये हैं। नियमावली बनानेसे कोई लाभ नहीं, नियामकोके लिए जो आन्तरिक विपय नहीं, वह उपेक्षित विना हुए रह ही नहीं सकता। गांवोकी सेवा और शिक्षा-पद्धतिके विषयमे मैंने जो-जो बातें अब तक सोची है, यहां उसके अलावा और कुछ नहीं है, है केवल शक्ति, है केवल उद्यम और कार्यकर्ताओंकी व्यवस्था-बुद्धि। मुझे तो ऐसा मालूम पडता है कि बहुत-कुछ शारीरिक वलपर ही निर्भर है-मलेरियासे जर्जरित अपरिपुष्ट शरीरको लेकर पूरी तेजीसे काम करना असम्भव है यहाँ इस जाडेके देशमे लोगोंकी हड्डी मजबूत होनेसे ही कार्य इतनी आसानीसे आगे वढ रहा है-सिर गिनकर हमारे देशके कार्यकर्ताओंकी सख्याका निर्णय करना ठीक नहीं--उनमें से प्रत्येको एक-एक आदमी समझना भूल है। सितम्बर, १६३० .

२ मास्को स्थान रूस। दृश्य, मास्कोको उपनगरीका एक प्रामादभवन । जंगलेमें से देख रहा हु-दिगन्त तक फैली हुई अरण्यभूमि, मन्ज रंगकी लहरें उठ रही हैं, कहीं स्याह सब्ज, कहीं फीका बैंगनी-मिलमा सब्ज, यहीं पीलिया सब्ज-हिलोरें-सी नजर आ रही हैं। वनकी सीमापर बहुत दृर गांवकी झोपडियां चमक रही हैं। दिनके करीब दस बजे हैं, आकाशमे वादलपर बादल धीमी चालसे चले जा रहे हैं, बिना वर्षाका समारोह है, हवासे सीधे खडे पीपलर-वृक्षोंकी चोटियां नशेमे झूम-सी रही है। मास्कोमें कई दिन तक जिस होटलमे था, उसका नाम है प्रेन्ड-होटल। घडी-भारी इमारत है, पर हालत अन्यन्त दरिद्र, मानो धनाढ्यका लडका देवालिया हो गया हो। पुराने जमानेका असमान है-कुछ विक चुका है, कुछ फट-उट गया है, जोडने और थेगरा लगाने-लायक सामर्थ्य नहीं , मैले-कुचले कपडे है, धोबीसे सम्बन्ध नहीं। सारे शहर-भरकी यही हालत है- रूसको चिट्ठी अत्यन्त अपरिडिन्नताके भीतरसे भी नवाबी जमानेका चेहरा दिखाई दे रहा है-जैसे फटे कुडतेमे सोनेके घटन लगे हों, जैसे ढाकेकी धोतोमें रफ़ दूरसे चमक रहा हो। आहार-व्यवहारमे ऐसी सर्वव्यापो निर्धनता यूरोपमे और कहीं भी देखनेमे नहीं आती। इसका मुख्य कारण यह है कि और-सब जगह धनी दरिद्रका भेद होनेसे धनका पुजीभूत रूप सबसे ज्यादा बड़ा होकर निगाहके सामने पडता है वहीं दरिद्र रहता है यवनिकाके पीछे नेपथ्यमे, जहाँका सब-कुछ वेसिलसिलेका, विसरा हुआ, गन्दा, अस्वास्थ्यकर है, जहाँ दुर्दशा और बेकारीके घोर अन्धकारके सिवा और कुछ दिसाई ही नहीं देता। परन्तु वाहरसे आये हुए हम जहाँ आकर टिकने हे, वहाँके जंगलेसे जो कुछ देखते है, हमें सब सुभद्र, सुशोभन और परिपुष्ट ही दिसाई देता है। यह समृद्धि यदि समान रूपसे बाँट दी जाती,, तो उसीसे पता लग जाता कि देशमें धन ऐसा कुछ ज्यादा नहीं है, जिससे सबको साने-पहननेको काफी तौरसे जुटता। यहाँ भेद न होनेसे ही धनका चेहरा बिगड गया है, और दीनतामे भी कुरूपता नहीं है, है अकिंचनता। देश-भरमें फैला हुआ ऐसा अधन और-कहीं देसा नहीं, इसीसे सबसे पहले हमारी दृष्टि उसीपर पड़ती है। अन्य देशोमे जिन्हें हम सर्वसाधारण समझते हैं, यहां केवल वे ही रहते हैं। मास्कोकी सडकोंपर सब तरहके आदमी चल-फिर रहे है। किसीमे शान-शौकत नहीं, कोई फीट-फाट नहीं, देखनेसे मालूम - - रूसकी चिट्ठी होता है कि मानो अवकाश भोगी समाज यहाँसे सदाके लिए निदा हो गया है। सभी-कोई अपने हाथ-पैरोंसे काम-धधा करके जिन्दगी बिताते है, वायूगीरीको पालिश कही है ही नहीं। डा० पटोव नामक एक सज्जनके घर जानेका काम पड़ा, वे यहांके एक प्रतिष्टित आदमी है, ऊँचे ओहदेदार । जिस मकानमे उनका दफ्तर है, वह पहले एक रईसका मकान था, पर घरमे असवान बहुन हो कम और सजावटको तो यू तक नहीं-विना काटके फर्शपर एक फोनेमे मामूलोसी एक टेबिल है, सक्षेपमे पितृपियोगमे नाई-धोबी-वर्जित अशीच-दशाका-सा रूसा-रूसा भाव है-जैसे वाहरवालोके सामने सामाजिकताको रक्षा करनेकी उनको कोई गरज ही नहीं। मेरे यहाँ जो साने-पीनेकी व्यवस्था थी, वह प्रेन्ड-होटल नामधारी पान्थावासके लिए बहुत ही असगत थी। परन्तु इसके लिए कोई सकोच नहीं-क्योकि सभीकी एक-सी दशा है। मुझे अपने बचपनकी बात याद आती है। तवकी जीवन- यात्रा और उसका आयोजन अवकी तुलनामे कितना तुच्छ था, परन्तु उसके लिए हममेसे किसीके मनमे जरा भी सकोच नहीं था , कारण, तबके ससार-यात्राके आदर्शमे बहुत ऊच-नोचका भाव नहीं था-सभीके घर एक मामूली-सा चाल-चलन था- फर्क था सिर्फ पाण्डित्यका, यानी गाने-बजाने और लिसने-पढ़ने आदिका। इसके सिवा लौकिक रोतिमे पार्थस्य था, अर्थात् भापा, भाव-भगी और आचार-विचारगत विशेपत्व था। परन्तु तय +

रूसको चिट्ठी
१०
जैसा हमारा आचार-विचार था और उपकरण आदि जिस ढगके
थे, उन्हें देखकर तो आजकलके मध्यम श्रेणीके लोग भी अवज्ञा
कर सकते थे।
अर्थगत वैपम्यकी बडाई हमारे यहाँ पाश्चात्य महादेशसे आई
है। किसी समय हमारे देशमे जय नई फैशनके आफिस-विहारी
और रोजगारियोके घरमें नये रुपयोकी आमदनी हुई, तब उन
लोगोंने विलायती वाचूगीरीका चलन शुरू कर दिया। तभीसे
असबाबकी तोलसे भद्रताकी तौल शुरू हुई है, इसीलिए हमारे
देशमें भी आजकल कुल-शील, रीति-नीति, बुद्धि-विद्या-इन सबके
ऊपर आकर दिखाई देती है धनकी विशिष्टता। यह विशिष्टताका
गौरव ही मनुष्यके लिए सबसे बढकर अगौरव है। यही नीचता
फही हमारी नसमे भी न धुस जाय, इसके लिए हमे अत्यन्त
सावधान हो जाना चाहिए।
यहां आकर जो मुझे सबसे अच्छा लगा है, वह है इस
धत-गग्मिाफी नीचताका सर्वथा तिगेभाव। सिर्फ इसी वजहसे
इस देशमे जनसाधारणका आत्म-सम्मान क्षणमे जाग्रत हो उठा
है। किसान-मजदूर सभी कोई आज आसम्मानका धोम पटककर
सिर उठाकर सड़े हो सके हैं। इसे देखकर में जितना विस्मित
हुआ हू, उतना ही आनन्दित भी। मनुष्य मनुष्यमें पारस्परिक
व्यवहार कैसा आश्चर्यजनक सहज-स्वाभाविक हो गया है। बहुतमी
वातें कहनी है, लिसनेकी कोशिश करूँगा-परन्तु अभी तो मेरे
लिए विश्राम करनेकी जरूरत है, इसलिए जगलेके सामने लम्बी

रूसकी चिट्ठी
मारामकुप्सीपर पैर पसारका बैठगा, पैगेंपर कम्मल डाल दूगा-
फिर अगर अखि मिच हो जावें, तो जबरन उन्हें रोक रखनेकी
कोशिश न करूगा।
१६ सितम्बर, १६३०
m
मास्को
बहुत दिन हुए तुम दोनोको पत्र लिखे। तुम दोनोंको सम्मिलित
चुप्पीसे अनुमान होता है कि वे युगलपत्र मुक्तिको प्राप्त
हो चुके हैं। ऐसी विनष्टि भारतीय डाकसानोमे आजक्ल हुआ
हो करता है, इसीलिए शका होती है। इसी वजहसे आजकल
चिट्ठी लिसनेको जी नहीं चाहता। कमसे कम तुम लोगोकी
तरफसे उत्तर न मिलनेपर मे चुप रह जाता है। नि शब्द रात्रिके
प्रहर लम्वे मालूम होने लगते हैं-उसी तरह नि चिट्ठी'का समय
भी कर पनामे बहुत लम्मा हो जाता है। इसीसे रह-रहकर ऐसा
मालूम होने लगता है, मानो लोकान्तर-प्राप्ति हुई हो, मानो समयको
गनि बदल गई है-घडी बजती है लम्वे तालपर। द्रौपदीके
चीर-हरणकी तरह मेरा दश जानेका समय जितना ही सिंचता
जाता है, उतना ही अनन्त होकर वह बढ़ता ही चला जाता
है। जिस दिन लौटूगा, उस दिन तो निश्चित ही लोटूगा-
-

रूसकी चिट्ठी १२ आजका दिन जैसे बिलकुल निकट है, वह दिन भी उसी तरह निकट आयेगा, यही सोचकर सान्त्वना पानेकी कोशिश कर रहा हूँ। सैर, कोई बात नहीं, फिलहाल रूसमे आया ह-न आता तो इस जन्मकी तीर्थयात्रा निलकुल अधरी ही रह जाती। यहा इन लोगोने जैसा काड किया है, उसपर भले-बुरेका विचार करनेसे पहले ही मुंहसे निकल पडता है-कैसा असम्भव साहस है। 'सनातन' नामका जो पदार्थ है, वह मनुष्यको नस-नसमें मन और प्राणोके साथ हजार-हजार बनकर जकड गया है उसकी कितनी दिशाओंमें कितने महल हैं. कितने दरवाजोपर कितने पहरे लग रहे हैं, कितने युगोसे कितना टैक्स वसूल करके उसका खजाना पहाड वन गया है-इन लोगोने उसे एकदम जडसे उसाड फंका है, इनके मनमे भय, चिन्ता, सशय कुछ भी नहीं। सनातनकी गद्दी झाड फैकी है, नयेके लिए एकदम नया आसन बिछा दिया है। पश्चिम महादेश विज्ञानके बूतेपर दुसाध्यको साध्य कर दिखाता है, देखकर मन तारीफ कर उठता है , मगर यहाँ जो विशाल कार्य चल रहा है, उसे देसकर में सबसे ज्यादा विस्मित हुआ है। अगर सिर्फ एक भीपण परिवर्तन या नष्ट-भ्रष्टका मामला होता, तो उससे कुछ आश्चर्य न होता, क्योकि नेश्तनाबूद करनेकी शक्ति इनमे काफोसे ज्यादा है, मगर यहां देखता हू कि ये लोग बहुदूरव्यापी एक सेत बनाकर एक नई ही दुनिया बनानेमे कमर कसकर जुट पडे हैं। देर सही नहीं जाती, क्योंकि दुनिया-भरमे इन्हे प्रतिकूलता-ही-प्रतिकूलता रूसको चिट्ठी दिखाई दे रही है, सभी इनके विरोधी हैं-जिननी जल्दी हो सके, इन्हे अपने पैरों खड़ा होना ही होगा-हाथो-हाथ प्रमाणित कर देना है कि ये जो कुछ चाहते हैं, वह इनको भूल नहीं है, 'हजार वर्प' के विरुद्ध 'दस-पन्द्रह वर्षको लडकर जीतना ही है-प्रतिज्ञा जो की है। अन्य देशोको तुलनामे इनका आर्थिक बल बहुत ही थोड़ा है, हाँ, प्रतिज्ञाका जोर दुर्द्धर्प है। यह जो क्रान्ति हुई है, उसे रूसमे ही होना था--इसके लिए वह बाट जोह रही थी। तैयारियां बहुत दिनोंसे हो रही थीं। प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध सभी तरहके लोगोंने कितने ही दिनोसे प्राण दिये हैं, असह्य दुस सहे हैं। ससारमे विप्लवके कारण बहुत दूर तक व्यापक रहते है, परन्तु किसी-न-किसी जगह चे धनीभूत हो उठते हैं, समस्त शरीरका रक्त दूपित होनेपर भी कहीं एक कमजोर स्थानपर फोडा होकर लाल हो उठता हो है। जिनके पास धन है, जिनके हाथमे शक्ति है, उनके हाथोसे निर्धन और अशक्तोंने इसी रूसमे ही असह्य अत्याचार सहे हैं। दोनों पक्षोंका वही अत्यधिक असाम्य अन्तमे प्रलयके बीचमेसे गुजरकर इस बसमें ही प्रतिकार करनेपर उतारू है। एक दिन फरासीसी-विद्रोह हुआ था इसी असाम्यकी ताडनासे । उस दिन वहाँकै पीडित समझ गये ये कि इस असाम्यका अपमान और दुस विश्वव्यापी है, इसीलिए उस दिनके विलक्मे साम्य, भ्रातृत्व और स्वातन्यकी वाणी स्वदेशको लकीर पार करके बाहर भी ध्वनित हो उठी थी , पर वह टिकी नहीं। इनके यहाँकी

रूसकी चिट्ठी
क्रान्तिकी वाणी भी विश्ववाणी है। आज ससारमे कम-से-कम
इस देशके लोग तो ऐसे हैं, जो स्वजातिके स्वार्थपर ही समस्त
मानव-समाजका स्वार्थ सोच रहे है। यह वाणी स्थायी रूपसे
टिक सकेगी या नहीं, कोई कह नहीं सकता , परन्तु स्वजातिकी
समस्या समस्त मानव-जातिको समस्याके अन्तर्गत है, यह बात
वर्तमान युगके भीतरकी बात है, इसे मानना ही होगा।
इस युगमे विश्व इतिहासको रगभूमिका पर्दा उठ गया है।
अब तक मानो भीतर-ही-भीतर रिहर्सल हो रहा था-थोडा-थोडा
करके अलग-अलग कमरोंमे । प्रत्येक देशके चारो तरफ
चहारदीवारी थी। बाहरसे आने-जानेका रास्ता विलकुल था ही
नहीं, सो बात नहीं, परन्तु विभागोमे बँटे हुए मानव-संसारका
जो चेहरा देखा है, आज उसे नहीं देसता। उस दिन दिखाई
दे रहा था एक-एक पेड, आज देस रहा हू अरण्य । मानव-समाजमे
यदि भार-सामजस्थका अभाव हो गया हो, तो वह आज दिखाई
दे रहा है ससारके इस पारसे लेकर उस पार तक। इस तरह
विशालरूपमें दिखाई देना कोई फम बात नहीं है।
टोकियोमे जब कोरियाके एक युवकसे पूछा था कि तुम्हे
कष्ट किस बातका है ? तो उसने कहा था-"हमारे कँधोपर
महाजनोका राज्य सवार है, हम उनके मुनाफेके बाहन हैं।"
-"किसी भी कारणसे हो, जब कि तुम लोग कमजोर
हो, तो यह भार तुम अपने बूतेपर कैसे माड फेंक सकते हो ?"
उसने कहा-“निरुपाय पराधीन जातियाँ तो आज दुनिया-भरमें
.
मैंने पूछा--
,

१५
रूसको चिट्ठी
फैली हुई हैं, दुख उन सबको एक साथ मिला देगा-जो धनी
है, जो शक्तिसम्पन्न है, व अपने-अपने लोहेके सन्दूकों और
सिंहासनोंके चारों तरफ अलग सडे रहेंगे, वे कभी मिल नहीं
सफेंगे। कोरियाको यल है अपने दु सका घल।"
दुखी आज समस्त मानव-जातिकी रंगभूमिपर अपनेको विराट
रूपमे देस रहा है, यह बडी-भारी बात है। पहले अपने को
अलग देख रहा था, इसीसे किसी भी प्रकार अपने शक्तिरूपको
नहीं देस सका था-भाग्यके भरोसे सर-कुछ सहता रहा था।
आज अत्यन्त निरुपाय भी कम-से-कम उस स्वर्गगज्यकी
कल्पना कर सकता है, जहाँ दुसीका दुख दूर होता है, अपमानितका
अपमान दूर होता है। यही कारण है कि ससार-भरके दुःखजीवी
आज जाग उठ है-उन्हे अपनी स्थितिका ज्ञान हो गया है।
जो शक्तिमान हैं, वे उद्धत है। आज जिस शक्तिकी प्रेरणाने,
दु सियोमें सचारित होकर, उन्हें चचल बना दिया है, बलशाली
उसे बाहरसे दबा देना चाहते है-उसके दूर्ताको घरमे घुसने
नहीं देते, उनका गला घोंट द रहे है। परन्तु वास्तवमे जिससे
उन्हे सबसे अधिक डरना चाहिए था, वह है दुसीका दुस।
पर उसीकी ये हमेशासे अवज्ञा करते आये हैं, और अब यह
उनको आदत पड़ गई है। अपने लाभके लिए उस दुसको
ये बहाये ही जाते हैं, जरा भी नहीं डरते, अभागे किसानको
दुर्भिक्षक कवलमें
ठूसकर
फी-सदी दो-तीन सौका मुनाफा उठानेमे
* परिशिष्ट देग्यो।

1 . रुसको चिठी इनका हृदय नहीं कापता। क्योकि उस मुनाफेको हो ये शक्ति समझते है। परन्तु मानव-समाजके लिए सभी तरहको अतिमे विपत्ति है, उसे बाहरसे फभी भी दबाया नहीं जा सकता। अति-शक्ति अति-अशक्तिके विरुद्ध हमेशा अपनेको चढाये हुए नहीं चल सकती। क्षमताशाली यदि अपनी शक्तिके। मदमें उन्मत्त न रहता, तो वह सबसे ज्यादा डरता इसी असाम्यकी ज्यादतीसे , क्योंकि असामजस्य-मात्र ही विश्वविधिके विरुद्ध है। मास्कोसे जब निमत्रण मिला, तब तक बोल्शेविकोंके सम्बन्धमे मेरे हृदयमे कोई स्पष्ट धारणा नहीं थी। उनके विपयमें बरावर उलटी ही बातें सुनता आया था। मेरे मनमें उनके विरुद्ध एक सटका-सा था, क्योंकि प्रारम्भमे उनकी जो साधना थी, वह जबरदस्तोकी थी। मगर अब एक बात खास देसनेमे आई, यह कि इनके प्रति यूरोपमे जो विरुद्धता थी, वह अब क्षीण होती जा रही है। मैं रूस जा रहा हू, सुनकर बहुतोंने मुझे उत्साहित किया है। यहां तक कि एक अगरेजके मुंहसे भी इनकी प्रशसा सुनी है। बहुतोंने कहा है कि ये एक अति आश्चर्यजनक परीक्षामें लगे हुए हैं। और बहुतोंने मुझे डराया भी था, पर डरानेका मुख्य विषय था आरामकी कमी। कहते थे, खाना-पीना सब ऐसा मामूली दर्जेका है कि मुझसे वह सहा नहीं जायगा। इसके सिवा ऐमी चात भी बहुतोने कही थी कि मुझे ये लोग जो-कुछ दिखायेंगे, उसका अधिकाश वनावटी होगा। यह तो मानना ही पडेगा कि

--Pun
S00/90000
साहित्य-सभामें रवीन्द्रनाथका स्वागत

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रूसकी चिट्ठी माज मानव-समाजके एक ओर पुजीभूत हैं, दूसरी ओर सर्वत्र अनन्त नि सहायता-ही-नि.सहायता नजर आ रही है। इसके कुछ दिन पहलेसे ही ढाकेके अत्याचारकी बात मेरे मनमे उधेड-बुन मचाये हुए थी। कैसो अमानुपिक निष्ठुरता थी वह, पर इंग्लैन्डके अखबारोंमे उसकी कोई खबर ही नहीं छपीजर कि यहां किसी मोटर-दुर्घटनामे दो-एक आदमी मर जानेपर उसकी सरर देशके इस छोरसे उस छोर तक पल जाती है मगर हमारा धन-प्राण-मान तो बहुत ही सस्ता हो गया है। जो इतने सस्ते हैं, उनके विपयमे कभी न्याय या सुविचार हो ही नहीं सकता। हमारी फरियाद ससारके कानो तक पहुच ही नहीं सकती, सारी राहे वद हे। और मजा यह कि हमारे विरुद्ध ससार- व्यापी प्रचार करनेके उपाय इनके हाथमे पूरे तौरपर हैं। आज दिन कमज़ोर जातियों के लिए यह भी एक बडी-भारी ग्लानिकी बात है, क्योंकि आज जमाना ऐसा है कि जनश्रुति या अफवाहे तक सारी दुनियामें फैल जाती है; वाक्य-चालनाके यत्र तो सब शक्तिमान जातिके हाथमें है, और वे बदनामी और अपयशकी भोटमे अशक्त जातियोंको विलुम रखना चाहते है। ससारके सामने यह यात काफी तौरसे प्रचारित है कि हम हिन्दू- मुसलमान आपसमें मार-काट करते हो रहते है, इसलिए इत्यादि। मगर यूरोपमे भी तो किसी दिन साम्प्रदायिक मार- फाट होनी थी, वह गई किस तरह ? केवल एफ शिक्षाके १६ रूसकी चिट्ठी प्रचारसे ही उसका लोप हुआ है। हमारे देशमे भी उसी उपायसे साम्प्रदायिक झगडोंका लोप हो सकता था, मगर अपेजी शासनको यहाँ सौ वर्षसे भी अधिक हो गये, पर फी-सदी पांच आदमियोके भाग्यमे ही शिक्षा जुटी, और वह भी शिक्षा नहीं- शिक्षाकी विडम्सना-मात्र है। अवज्ञाके कारणोंको दूर करनेकी कोशिश न करके लोगोके सामने यह साबित करना कि हम अवज्ञाके ही योग्य हैं, यह हमारी अशक्तिका सबसे बडा टैक्स है। मनुप्यकी समस्त समस्याओके समाधानोंकी जड है सुशिक्षा। हमारे देशमे उसका रास्ता ही चन्द है, कारण, Law and Order ( कानून और व्यवस्था) ने और किसी उपकारके लिए जगह ही नहीं रसी, सजाना बिलकुल साली है। मैने देशके कामों में शिक्षाके कामको श्रेष्ट मान लिया था,-जनमाधारणको आत्म-शक्तिपर भरोसा रखनेको शिक्षा देनेके लिए अब तक मैने अपनी सारी सामर्थ्य लगा देनेकी कोशिश की है। इसके लिए सरकारकी अनुकूलताको भी मने ठुकराया नहीं, और साथ ही कुछ आशा भी रसी है-मगर तुम तो आनती ही हो, कितना फ्ल मिला है। समझ चुका हू, यह होनेका नहीं। हमारा पाप जबरदस्त है, हम अशक्त हैं। इसीलिए जन सुना कि रूसमे सर्वसाधारणकी शिक्षा शून्य- अकसे एकदम बडे अकॉमे बढ गई, तर मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि ग्न शरीर भले ही और भी रुम हो जाय,

४
मास्कोसे सोपियटको व्यवस्था सम्बन्धमे दो वडी-बडी
चिट्ठियां लिसी थी। वे कर मिलेगी और मिलेंगी भी
या नहीं, मालूम नहीं।
बर्लिनमे आकर एक साथ तुम्हारी दो चिट्ठियां मिली। घोर
वर्षाकी चिट्ठी हैं ये, शान्ति-निकेतनके आकाशमे शालबनके ऊपर
मेघकी छाया ओर जलकी धारामे माग्न हिलोरें ले रहा है यह
चित्र मानसपटपर सिंचते हो मेरा चित्त कैसा उत्सुक हो उठता
है, तुमसे तो कहना ही फिजूल है।
परन्तु अवको जो रूसका चकर लगाया, तो वह चित्र मनसे
धुल-पुछ गया। बार-बार में अपने यहाँके किसानोंके फष्टोकी
वात सोच रहा हू। अपने यौवनके आरम्भकालसे ही वगालके
ग्रामोंके साथ मेरा निकट-परिचय है। तब किसानोंसे रोज मेरी
भेंट-मुलाकात होती थी-उनकी फरियादें मेरे' कानो तक पहुचती
थीं। मैं जानता हूं कि उनके समान नि सहाय जीव बहुत थोडे
ही होंगे, वे समाजके अँधेरे तहसानेमे पडे है, वहाँ ज्ञानका
उजेला बहुत ही कम पहुचता है, और जीवनको हवा तो जाती
ही नहीं, समम लो।

रुसको चिट्ठी उस जमानेमे जो लोग देशकी राजनीतिक क्षेत्रमे असाडा जमाये हुए थे, उनमें से ऐसा कोई भी न था, जो ग्रामवामियों को भी देशका आदमी समझता हो। मुझे याद है, पवना-कानफरेन्सके समय मैने उस समयके एक बहुत बड़े राष्ट-नेतासे कहा था कि हमारे देशको राष्ट्रीय उन्नतिको यदि हम सत्य या वास्तविक बनाना चाहते है, नो सनसे पहले हमें इन नीचेके लोगोंको आदमी बनाना होगा। उन्होंने उस वातको इतना तुच्छ समझकर उडा दिया कि मै रपष्ट मझ गया कि हमारे देश-नेताओंने 'देश' नामके तत्वको विदेशी पाठशालासे समझा है, अपने देशके मनुष्योकी वे हृदयमे अनुभूति नहीं करते। ऐसी मनोवृत्तिसे लाभ सिर्फ इलना ही है कि हमारा देश विदेशियोके हाथमें है'-इम बातपर हम पश्चात्ताप कर सकते है, उत्तेजित हो सकते हैं, कविता लिस सकते हैं, असनार चला सकते हैं, मगर काम तो तभीसे शुरू होता है, जब हम अपने देशवासियोंको अपना आदमी कहने के साथ ही साथ उसका दायित्व भी तभीसे स्वीकार कर लें। तबसे बहुत दिन बीत गये ।। उस पवना-कानफरेन्समे प्राम- संगठनके रिपयमे मैने जो कुछ कहा था, उसकी प्रतिध्वनि बहुत धार सुनो है-सिर्फ शब्द नहीं, माम-हितके लिए अर्थ भी संग्रह हुआ है-परन्तु देशके जिस ऊपरी मजिलमे शब्दोंकी आवृत्ति हुई है, वहीं वह अर्थ भी घूम-फिरकर विलुम हो गया है, समाजके जिस गहरे सदमे गांव डूबे हुए है, वहाँ तक उसका कुछ अश भी नहीं पहुंचा। "

रूसकी चिट्ठी
एक दिन मने पद्माकी रेतोपर वोट लगाकर साहित्य-चर्चा
की थो। मनमे ऐसी धारणा थी कि लेसनीसे भावको खान
खोदूंगा, यही मेरा एकमात्र कार्य है, और किसी कामके में
लायक ही नहीं। मगर जब यह बात कह-सुनकर किसीको
समझा न सका कि हमारे स्वायत्त्वशासन या स्वराज्यका क्षेत्र
है देहातोमे, और उसका आन्दोलन आजसे ही शुरू करना
चाहिए, तब कुछ देरके लिए मुझे कलम कानमे सोसकर
यह बात कहनी ही पडी कि 'अच्छा, में ही इस काममें
जुटूगा
।'
इस सम्ल्पमे मेरो सहायता करनेके लिए सिर्फ एक आदमी
मिला था-वे है कालोमोहन । शरीर उनका रोगसे जीर्ण है, दोनों
वक्त उन्हें बुखार आता है, और उसपर भी पुलिसके रजिस्टरमें
उनका नाम चढ चुका है।
उसके वाद, फिर वह इतिहास दुर्गम ऊपडसाबड मार्गसे योडासा
तोशा लेकर चला है। मेरा अभिप्राय था—किसानोंको आत्म-शक्तिमें
दृढ करना ही होगा। इस विषयमें दो वातं सदा ही मेरे हृदयमे
भान्दोलित होती रही है-जमीनपर अधिकार न्यायत जमींदारका
नहीं, बल्कि किसानका होना चाहिए , दूसरे, समवाय नीतिके
अनुसार खेतीके खेत सब एकसाथ बिना मिलाये किसानोकी कभी
उन्नति हो ही नहीं सकती। मानधाताके जमानेका हल लेकर
मेडदार छोटेसे सेनमें फसल पैदा करना और फूटी गागरमे पानी
लाना-दोनो एक ही बात है।
फिन्तु ये दोनों हो मार्ग दुरुड हैं। पहले तो किसानोको

रूसमा चिट्ठी
जमीनका अधिकार दनसे वह स्वत्व दूसर ही क्षण महाजनके
हाथमे चला जायगा, इससे उनके कष्टोका भार बढनेके सिवा
घटेगा नहीं। खतोको एक साथ मिलाकर खेती करनेके विपयमे
मैंन एक दिन किसानोंको बुलाकर इसकी चर्चा की था।
सिलाइदमे म जिस मकानमे रहता था, उसक बरामदसे
एक बाद एक दिगन्त तक खत-ही-खत दिखाई देते थे। खूप
सवर हा उठकर हल-बल लिये एक-एक किसान आता और
अपना छोटासा खत जोतकर घर लौट जाता। इस तरहकी वॅटो
हुई शक्तिका कितना अपव्यय होता है, सो मने अपनी आँखोंसे
दसा है। किसानोको बुलाकर उन्हे जब सब सतोंको एक साथ
मिलाकर मशीनक हलसे खेती करनेकी सहुलियतें मैंने समझाई,
तो उन लोगोन टसे उसी समय मान लिया। मगर कहा-'हम
लोग कमअकल है, इतना भारी काम कैसे सम्हालेंगे ? अगर मैं
कह सकता कि उसका भार में लेनको तगार हू, तो फिर कोई
झमट ही न रहता , पर मुझमे इतनी सामर्थ्य कहा ? ऐस
फामक चलानेका भार लेना मेर लिए असम्भव ई-वह शिक्षा,
वह शक्ति मुझमे नहीं है।
परन्तु यह वात वराजर मेरे हृदयमे जाप्रत रही है।
बोलपुरमे को-आपरेटिवकी व्यवस्थाका मार विश्वभारतीके हाथमें
आया, तब फिर एक दिन आशा हुई थी कि अबकी बार शायद
मौका मिल जायगा। जिनके हाथमें आफ्मिका भार है, उनको
उमर क्म है, मुमसे उनकी बुद्धि यही यिफायती और रिक्षा

रूसकी चिट्ठी बहुत ज्यादा है। परन्तु हमारे युवक ठहरे स्कूल-सिखुए, और किताव-रटू है उनका हत्य। हमारे देशमे जो शिक्षा प्रचलित है, उससे हममें विचार करनेको शक्ति, साहस और काम करनेकी दक्षता नहीं रहनी , किताबी बोलियोकी पुनरावृत्ति करनेपर ही छात्रों का उद्वार अवलम्बित है। बुद्धिको इस पल्लवप्राहिताके सिवा हमारे अंदर और भी एक निपत्तिका कारण मौजूद है। स्कूलमे जिन्होंने पाठ कठ किये है, और स्कूलके बाहर रहकर जिन्होंने पाठ कठ नहीं किये, इन दोनों श्रेणी-विभाग हो चुका है-शिक्षित और अशिक्षितका। स्कृलमे पढे मनका आत्मीयता-ज्ञान पोथी-पढोके पाठके वाहर नहीं पहुच सकता। जिन्हे हम गवार-किसान कहते हैं, पोथीके पन्नोंका पर्दा भेदकर उन तक हमारी नष्टि नहीं जाती, वे हमारे लिए अस्पष्ट है। इसीलिए वे हमारे सन प्रयत्नोके बाहर रहकर स्वभावत ही अलग छूट जाते है। यही कारण है कि को-आपरेटिव या सहयोग- समिनियोके जरिये अन्य देशोंमे जव समाजके निम्न-श्रेणीमे एक सृष्टिका कार्य चल रहा है, तब हमारे देशमे दवे-हाथो रुपये उधार देनेके सिवा आगे और कुछ काम नहीं बढ़ सका। क्योकि उधार देना, उसका सूद जोडना और रुपये वसूल करना अत्यन्त भोर हृदयके लिए भी सहज काम है, बल्कि यो कहना चाहिए कि भीरु हदयके लिए ही सहज है, उसमे यदि गिनतीको भूल न हो तो कोई आशका ही नहीं।

रूसकी चिट्ठी दोनों अभापते ही दुम्बीका दुप दूर करना हमारे देशमे इतना कठिन काम हो गया है , परन्तु इम अभावके लिए किसीको दोप नहीं दिया जा सकता। . क्योंकि लार्क-फकरी बनाने के लिए ही एक दिन हमारे देशमे चणिक-राज्य द्वारा स्कृल सोले गये थे। टनिल-लोकमे मालिकके साथ सायुज्य (अभेट ) प्राप्त करनेमे हो हमारो सङ्गति है। इसीलिए उम्मेदवारीमे अकृतार्थ होते ही हमारी विद्या-शिक्षा व्यर्थ हो जाती है। इसीलिए हमारे देशमें प्रधानन देशका काम कांग्रेसके पडाल और अखनारोकी लेखमालामे शिक्षित सम्प्रदायके वेदना-उद्धोपणमे ही चकर काट रहा था। हमारे क्लमसे बँधे हाथ देशको बनानेक काममे आगे बढ़ ही न सके। में भी तो भारतकी ही आवहवामे पला हु, इसीलिए जोरके साथ इस बातको कयासमे लानेकी हिम्मत न कर सका कि करोडों जनसाधारणको छातीपर से अशिक्षा और असामर्थ्यका पहाड उतारना सम्भव है। अन तक यही सोचता रहा ह कि थोडा -बहुत कुछ किया जा सकता है या नहीं। सोचा था, समाजका एक चिराधा-प्रस्त जो नीचेका अश है, जहां कभी भी सूर्यका प्रकाश पूर्णरूपसे नहीं पहुंचाया जा सकता, वहाँ कमसे कम तेलकी वत्ती जलानके लिए कमर कसकर जुट जाना चाहिए। परन्तु साधारणत उतना कर्नव्य-बोध भी लोगोंके दिलपर काफी जोरके साथ धका नहीं लगाता , क्योकि जिन्हें हम अंधेरेमे देस हो नहीं सकते, उनके लिए कुछ भी किया जा सकता है यह वात भी साफ तौरसे हमार मनमे नहीं आती।

रूसको चिट्ठी २८ इस तरहके स्वल्प साहसी हृदयको लेकर ही रूसमें आया था , सुना था--यहां किसान और मजदूरोमे शिक्षा-प्रचारका कार्य बहुत ज्यादा बढ़ गया है . और बढ़ता ही जाता है। सोचा था, इसके मानी ये है कि यहाँ प्रामीण पाठशालाओं में 'शिशु-शिक्षा' का पहला भाग या बहुत हो तो दुसरा भाग पढानेका कार्य, सख्यामे, हमारे देशसे अधिक हुआ है। सोचा था, उनकी साख्यिक सूची उलट-फेरकर देख सकूगा कि वहकि कितने किसान दस्तखत कर सकते हैं और कितनोंने १० तक पहाडे याद कर लिये हैं। याद रखना, यहां जिस क्रान्तिने जारका शासन लुप्त किया है, वह हुई है १९१७ मे। अर्थात् उस घटनाको हुए सिर्फ तेरह वर्ष हुए हैं। इसी बीचमे उन्हें क्या घर और क्या बाहर, सर्वत्र प्रचड विरुद्धताके साथ युद्ध करना पड़ा है। ये अकेले हैं, और इनके ऊपर एक बिलकुल टूटे-फूटे राष्ट्रको व्यवस्थाका भार है। मार्ग इनका पूर्व दुशासनके फूडे-करफ्टको गदगीसे भरा पडा है-दुर्गम है। जिस आत्म-क्रान्तिके प्रवल तूफानके समय इन लोगोने नवयुगके घाटके लिए यात्रा की थी, उस क्रान्तिके प्रच्छन्न और प्रकाश्य सहायफ थे इग्लेन्ड और अमेरिका। आर्थिक अवस्था या पूंजी इनके पास बहुत हो थोड़ी है-विदेशके महाजनोंकी गहियोंमें इनकी क्रेडिट नहीं है। देशमे इनके फल-कारखाने फाफी तादादमे न होनेसे अर्थोपार्जनमे ये शक्तिहीन है, इसलिए किसी तरह पेटका अन्न बचकर इनका उद्योगपर्व चल रहा है।

२६ रुमको चिट्ठी इसपर राष्ट्र-व्यवस्थामे सनसे बढ़कर जो अनुत्पादक विभाग--- सेना-विभाग है, उसके पूरी तरहसे सुदा रसनेका अपव्यय भी इनके लिए अनिवार्य है। क्योकि आधुनिक महाजनी युगकी समस्त गप्ट्र-शक्तियां इनकी शत्रु हैं, और उन मनोने अपनी-अपनी अस्त्रशालाए छत तक भर रखी है। याद है, इन्हीं लोगोंने लोग-आफ्-नेशन्समे अस्न निषेधका प्रस्ताव भेजकर कपट शान्ति-इच्छुकोंक मनको चौका दिया था। क्योंकि अपना प्रताप वढाना या उसकी रक्षा करना सोवियटोंका लक्ष्य नहीं है --इनका उद्देश्य है सर्वसाधारणको शिक्षा, स्वास्थ्य, अन्न और जीवनकी अन्य आवश्यकताओंकी पूर्तिके उपाय- उपकरणोको प्रकृष्ट प्रणालीसे व्यापक बना देना , इन्होंके लिए निरुपद्रव शक्तिकी सबसे अधिक आवश्यकता है। परन्तु तुम तो जानते ही हो, लीग-आफ्-नेशन्सके सभी पहलवान गुडईके बहु-विस्तृत उद्योगको किसी तरह भी बद नहीं करना चाहते , महज इसलिए कि शान्तिकी जरूरत है सब मिलकर पुकार मचाते है। यही कारण है कि सभी साम्राज्यवाले देशोंमे अस्त्र-शस्त्रके कटीले जगलकी फसल अन्नकी फसलसे आगे बढती जा रही है। इसी बीचमे कुछ समय तक रूसमे बडा-मारी दुर्भिक्ष भी पडा था -क्तिने आदमी मरे, जिसका ठीक नहीं। उसकी ठेस सहकर भी सिर्फ आठ वर्षसे ये नये युगको गढनेका काम कर रहे है-बाहरके उपकरणों का अभाव होते हुए भी। यह मामूली काम नहीं है-यूरोप और एशिया-भरमै .

रुसको चिट्ठी
चेहरा देखने लिए मुझे दूर नहीं जाना पडा, या स्कूल
इन्स्पेकरको तरह हिज्जे पूछने ममय यह नहीं देखना पडा
ये "गणा" और "वाणी" में मूर्धण्य 'ण' लगाते है या दन्ती।।
दिन शामको मास्को शहरमे एक मकानपर गया। वह किसान
रहनेका घर था, गविले जन किसी कामसे वे शहरमें आते
तो सस्तेमें उसी मकानमे उन्हें रहने दिया जाता है।
लोगोंसे मेरी बातचीत हुई थी।
उस तरह की बातें
हमारे देशके किसानोसे होगी, उम दिन हम साइमन-कमीशन
जवाव दे सकेंगे।
और कुछ नहीं, यह स्पष्ट दिखाई देता है कि सभी क
हो सकता था, मगर हुआ नहीं-न' सही, हमे मिला,
Lar and Order | हमारे यहाँ साम्प्रदायिक लडाइयां होती रहन
हैं, और इसके लिए हमारी खास तोरसे बदनामो को जाती है-
यहाँ भी यहूदी सम्प्रदायके साथ ईमाई सम्प्रदायको लडाई हमा
ही देशके आधुनिक उपसर्गकी तरह अत्यन्त कुत्सित और व
ही जंगली ढगसे होती थी-शिक्षा और शासनके द्वारा एकद
जडसे उसका नाश कर दिया गया है। कितनी ही बार मैं
सोचा है कि साइमन कमीशनको भारतमे जानेसे पहले एक बान
रूस घूम जाना उचित था।
तुम-जैसी भद्र-महिलाको साधारण भद्रता-पूर्ण चिट्ठी -
लिसकर इस तरहकी चिट्ठी क्यो लिख रहा हू, इसका कारण
सोचोगी तो समझ जाओगी कि देशकी माने
.
-
TRA

रवीन्द्रनाथके लिए कवि सवर्द्धना सभा

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३३
रूसको चिट्ठी
आन्दोलन मचा रसा है। जालियानवाला बागके उपद्रवके
बाद और भी एक बार मेरे मनमे ऐसी अशान्ति हुई
थी। ढाकेके उपद्रवके बाद आज फिर उसी तरह दुसित हो
उस घटनापर सरकारी पलस्तर चढा है, मगर इस
तरहके सरकारी पलस्तरको क्या कीमत है, सो राजनीतिज्ञ
समझते हैं। ऐसी घटना अगर सोवियट रूसमें होती, तो
किसी भी पलस्तरसे उसका कलक नहीं ढक सकता था।
सुधीन्द्र हमारे देशके राष्ट्रीय आन्दोलनपर जिसकी कभी भी
किसी तरहकी श्रद्धा नहीं थी-उमने भी अवकी यार मुझे
ऐसी चिट्ठी लिखी है, जिससे पता चलता है कि सरकारी
धर्मनीनिके प्रति धिक्कार आज हमारे देशमें कहाँ तक बढ गया
है। सैर, आज तुम्हारी चिट्ठी अधूरी ही रही-कागज और समय
खतम हो आया, दूसरी चिट्ठीमे इसके अपूर्ण अशको पूरा करूगा।
२८ सितम्बर, १६३०
बलिन,
जर्मनी
मास्कोसे तुम्हे मैं एक बडी चिट्ठीमें रूसके बारेमे अपनी
धरणा लिख चुका है। वह चिट्ठी अगर मिल गई
होगी, तो रूसके बारेमें कुछ बातें तुम्हें मालूम हो गई होंगी।
n. 3

रूसकी चिट्ठी ३४ यहां किसानोंकी सर्वाङ्गीन उन्नति के लिए कितना काम किया । जा रहा है, उसोका वर्णन थोडासा लिखा था। हमारे देशमें जिस श्रेणीके लोग मूक और मूढ़ हैं, जीवनके सम्पूर्ण सुयोगोंसे वंचित होकर जिनका मन भीतर और बाहरकी दीनतासे बैठ गया है, यहाँ उसी श्रेणीके लोगोंसे जब मेरा परिचय हुआ, तब मैं समझ सका कि समाजके अनादरसे मनुष्यकी चित्त-सम्पद कहाँ तफ लुप्त हो सकती है-फैसा असीम उसका अपव्यय है, कैसा निष्ठुर उसका अविचार है । मास्कोमे एफ पि-भवन देखने गया था। यह सस्था उनकी फ्लप-सी है। रूसके समस्त छोटे-बड़े शहरों और ग्रामोंमें इस तरहके भवन बने हुए हैं। इन सब स्थानों में कृपि-विद्या समाज-तत्त्व आदि विषयोंपर उपदेश दिये जाते हैं, जो निरक्षर हैं, उनके लिए पढ़ने-लिपनका इन्तजाम किया जाता है, और सास-सास फ्लासामे किसानोंको वैज्ञानिक ढगसे खेती करनेकी शिक्षा दी जाती है-हर तरहसे यह विपय उन्हें समझाया जाता है। इसी तरह प्रत्येक भवन प्राकृतिक और सामाजिक-सब तरहके शिक्षणीय विषयोको म्यूजियम है। इसके अलावा इनमें किसानोंको और भी सब तरहके उपयोगी परामर्श दिये जानेकी व्यवस्था है। किसान अब किसी कामसे गांवसे शहरमे आते हैं, तो बहुत ही कम खर्चमें कम-से-कम तीन सप्ताह तक इस तरहके मकानोंमे रह सकते हैं। इस बहु-व्यापक संस्थाके द्वारा सोवियट-सरकारने ऐसे किसानो-जो किसी समय बिलकुल निरक्षर थे-चित्तको

रूसकी चिट्ठी
उद्योधित फरके उनमें समाजव्यापी नया जीवन ला देनेकी
प्रशंसनीय नींव डाल दी है।
भवनमें घुसते हो क्या देखता हूँ, कोई भोजनागारमे घंटे
भोजन कर रहे हैं, तो कोई पाठागारमे घेठे असनार पढ़ने में लगे
हुए हैं। ऊपरफे एक कमरेमें जाफर म पैठा-वहां सर भाकर
इको हुए। उनमे अनेक स्थानोंके आदमी थे , कोई बहुत दूरफा
है, तो फोई नजदीफफा। उनका स्वभाव सरल और स्वाभाविक
है, किसी तरहका सकोच नहीं।
पहले स्वागत और परिचयपे लिए भवनके परिदर्शयने कुछ
कहा-मैंने भी कुछ कहा। उसके बाद उन लोगोंने मुझसे
प्रश्न करना शुरू कर दिया।
पहला प्रश्न, उनमे से एकने किया-
"भारतमे हिन्दू-मुसलमानामें
मगडा क्यों होता है ?"
मैंने कहा---"जन मेरी फम उम्र थी, कभी इस तरहकी
बर्बरता नहीं देखी। उस समय गांव और शहर-सर्वत्र दोनों
सम्प्रदायोंमें सौहार्य की कमी नहीं थी। परस्पर एक-दूसरेक
क्रिया-काडोंमे भाग लिया करते थे, जीवन-यात्राके सुख-दुःसामे
दोनों एक थे।
अब जो वीच-बीचमे पुत्सित घटनाएं होती
दिखाई देती है, वे देशके राष्ट्रीय आन्दोलनके चादसे शुरू हुई
हैं। परन्तु, पड़ोसियोंमे परस्पर इस प्रकारके समानुपिक दुर्व्यवहारके
ताजे कारण चाहे जो हो, इसका मूल कारण है सर्वसाधारणमे
अशिक्षा। जितनी शिक्षाक द्वारा इस तरहकी दुर्बुद्धि दूर हो
-

रूसकी चिट्ठी ३ , - सकती है, उतनी शिक्षाका प्रचलन आज तक वहां नहीं हुआ। तुम्हारे यहाँ जो कुछ देखा, उससे मैं विस्मित हो गया है।" प्रश्न- "तुम तो लेसक हो, अपने यहाँके किसानोंके बारेमें कुछ लिसा है भविष्यमे उनकी क्या गति होगी" उत्तर "सिर्फ लिसा ही नहीं, उनके लिए मैंने काम भी छेड दिया है। अकेलेसे जितना सम्भव है, उतनेसे उनकी शिक्षाका काम चलाता हू, गांवोंकी उन्नतिके लिए उनकी सहायता करता हु । परन्तु तुम्हारे यहाँ जो शिक्षाका विराट आयोजन थोडे ही समयमें हुमा है, उसकी तुलनामें मेरा वह उद्योग बहुत ही मामूली है।" प्रश्न 1- हमारे यहां जो किसानो के संगठनका उद्योग हो रहा है, उस सम्बन्धमे तुम्हारा क्या मत है ?" उत्तर--"मत देने योग्य मेरा अनुभव नहीं हुआ है, मैं तुम्ही लोगों से सुनना चाहता हूं। मैं यह जानना चाहता हूँ कि इसमे तुम लोगों की इच्छाके विरुद्ध कोई ज़बरदस्ती की जाती है या नहीं " प्रश्न..." क्या भारतमे साधारणत सब-कोई यहाँके सगठन तथा अन्य सब उद्योगों के विषममे कुछ जानकारी नहीं रखते ?" उत्तर :--"जानने लायक शिक्षा बहुत कम लोगो में है। इसके सिवा तुम्हारे यहाँके समाचार कितने ही कारणो से दव जाया करते हैं। और जो कुछ उनके कानों तक पहुचता है, वह सब विश्वास-योग्य नहीं।" प्रश्न- हमारे यहाँ ये जो किसानो के लिए भवनों की व्यवस्था है, इस सम्वन्धमें क्या पहले आप कुछ नहीं जानते थे ?" -

७
रूसकी चिट्ठी
उत्तर
--"तुम लोगो के हितके लिए क्या-क्या हो रहा है, यह
ने मास्कोमें माफर देसा और जाना। कुछ भी हो, अव मेरे
नो का उत्तर तुम लोग दो।-किसान प्रजाके लिए इस सगठनके
रिमें तुम्हारा क्या मत है, तुम्हारी इच्छा क्या है ?"
एफ युवक किसान, जो यूक्रेन प्रदेशसे आया है, घोला-
दो वर्ष हुए एक ऐकत्रिफ (सगठित ) पि-क्षेत्रको स्थापना हुई
, मैं उसमें काम करता है। इस सेतीमें फलो की फसल के
लए पाग हैं, वहांसे फल और साग-सब्जी सन फारसानो को
जी जाती है। वहां वह टीनके डब्यो मे पैक होती है। इसके
सेवा बडे बडे खेत हैं, वहीं गेहूकी खेती होती है। आठ घंटे
में काम करना पडता है, हर पांचवें दिन हमारी छुट्टी रहती
है। हमारे पडोमी जितने भी किसान अपनी खेती आप करते
, उनकी अपेक्षा हमारे यहाँ कम से-कम दूनी फसल होती है।
"लगभग प्रारम्भमे ही, हमारी सगठित खेतीमे डेढ सौ
किसानों के खेत मिलाये गये थे। १९२६ मे आधे किसानों ने
अपने खेत वापस ले लिये । उसकी वजह यह हुई कि सोवियट कम्यून
दलके प्रधान मंत्री स्टैलिनके उपदेशानुसार हमारे कर्मचारियों ने ठीक
तरहसे काम नहीं किया। उनका मत है कि समष्टिनाद ( कम्यूनिज्म)
की मूल नीति है ममाजका समष्टिरूपसे स्वेच्छामृत सगठन ।
परन्तु घहुत जगह ऐसा हुआ कि कायर्ता इस बातको भूल
गये, जिससे शुरूआतमे बहुतसे किसानो ने सगठित
छोड दिया। उसके बाद क्रमश उनमे से चौथाई

३८ - रुसकी चिट्ठी आकर सम्मिलित हुए। अब हमे पहलेसे भी अधिक बल मिल गया है। अब हम संगठित किसानो के रहने के लिए नये मकान हैं, नई भोजनशालाएँ हैं और नये स्कूल खुल गये है।" इसके बाद साइविरियाकी एक किसान खीने कहा-"संगठित खेतीके काममे मैं लगभग दस वर्षसे हू। एक बात याद रखें, सगठित कृषि-क्षेत्र ( collective farm ) के साथ नारी-उन्नतिके उद्यमका घनिष्ट सम्बन्ध है। आज दस वर्षके अदर यहां किसान स्त्रियो मे काफी परिवर्तन हो गया है। अपनेपर उन्हें बहुत कुछ भरोसा हो गया है। जो स्त्रियां पिछड़ी हुई है और संगठित खेतीमें जो बाधक हैं, उनमे भो हम सगठित स्त्रियां धीरे-धीरे जीवनका संचार कर रही हैं। हमने सगठिन स्त्रियो का दल बना लिया है, भिन्न-भिन्न प्रान्तोंमें वे भ्रमण करती हैं और स्त्रियों में काम करती हैं-मानसिक और आर्थिक उन्नतिके लिए संगठन फैसा लाभदायक है, इस बातफो वे समझाया करती हैं। संगठित दलकी किसान त्रियो की जीवन-यात्राको सहज बनानेके लिए प्रत्येक संगठित खेतमे बच्चो के लालन-पालनके लिए एक-एक शिशु-पालनागार, शिशु-विद्यालय और साधारण पाकशालाएँ स्थापित की गई हैं।" सुसोज प्रान्तमे जाइगान्ट नामका एक प्रसिद्ध सरकारी कृपि-क्षेत्र है। वहाँके एक किसानने, रूसमें संगठित खेती आदिका कैसा विस्तार हो रहा है, इस विषयमें मुझसे कहा- हमारे इस खेतकी जमीनका परिमाण एक लाख हेक्टर ( hectares ) है । पिछली साल वहां तीन हजार किसान काम करते थे। इस रूसको चिट्ठो साल सख्या कुछ घट गई है, मगर फसल पहलेसे कुछ घढेगी ही, घटेगी नहीं। क्यो कि जमीनमें विज्ञानके अनुसार साद देने और मशीनफे हलसे काम लेने की व्यवस्था हो गई है। इस तरहके हल हमारे यहां तीन सौसे ज्यादा होगे। प्रतिदिन माठ घटे काम करनेकी मियाद है। जो उससे ज्यादा काम करते हैं, उन्हें ऊपरी पारिश्रमिक मिलता है। जाडो के दिनो में खेतीका काम घट जाता है, तब किसान शहरो मे जाफर मकान बनाने और सड़क मरम्मत आदिका काम करते हैं। उस मनुपस्थितिके समय भी उन्हें वेतनका तिहाई हिस्सा मिला करता है और उनके परिवारके लोगोंको उन्हीं निर्दिष्ट घरों में रहने दिया जाता है।" मेने फहा-"सगठित खेतीमे अपनी निजी सम्पत्ति मिला देनेके वारमें तुम लोगो की कोई आपत्ति या सम्मति हो, तो मुझे साफ-साफ बतायो। परिदर्शकने प्रस्ताव किया कि हाथ उठवाकर मत लिया जाय। देखा गया कि ऐसे भी बहुतसे आदमी है, जिनकी सम्मति नहीं है। असम्मतिका कारण क्या है, पूछनेपर वे अच्छी तरह सममा नहीं सके। एफने कहा में अच्छी तरह समझ नहीं सका। साफ समझमे आ गया कि असम्मतिका कारण मानव- चरित्रमें ही मौजूद है। अपनी सम्पत्तिपर अपनी ममता यह तर्कका विषय नहीं है, यह हमारा सस्कार है। अपनेको हम प्रकट करना चाहते हैं, सम्पत्ति उस प्रकाशनका एक उपाय है।

-
रूसको चिट्ठी
४०
उससे भी बड़ा उपाय जिनके हाथमे है, वे महान हैं,
वे सम्पत्तिको पर्वाह नहीं करते। सब-कुछ खो देनेका काम पडे
तो उसमें भी उन्हें कोई बाधा नहीं। परन्तु साधारण मनुष्यके
लिए अपनी सम्पत्ति अपने व्यक्ति-रूपकी भाषा है-उसके सो
जानेपर वह गूंगा-सा बन जाता है। सम्पत्ति यदि सिर्फ अपनो
जीविकाके लिए ही होती, आत्म-प्रकाशके लिए न होती, तो युक्तियोंसे
समझाना सहज हो जाता कि उसके त्यागसे ही जीविकाकी उन्नति
हो सकती है। आत्म-प्रकाशके उच्चतम उपाय--जैसे बुद्धि, गुण,
स्वभाव-कोई किसीसे जबरदस्ती छीन नहीं सकता ,
सम्पत्ति
छीनी जा सकती है, धोखेसे, उडाई जा सकती है। इसीलिए
सम्पत्तिके वाट-बंटवारा और भोगके अधिकारके लिए समाजमे
इतनी निष्ठुरता, इतनी धोखेबाजी और इतना अन्तहीन विरोध है।
मेरी तो धारणा है कि इसका एक ही मध्यम दरजेका
समाधान हो सकता है, वह यह कि व्यक्तिगत सम्पत्ति तो रहे,
पर उसके भोगकी एकान्त या अत्यधिक स्वतंत्रताको सीमित कर
दिया जाय। उस सीमाके वाहरका अवशिष्ट अश सर्वसाधारणके
लिए निकल जाना चाहिए ।
फिर सम्पत्तिका ममत्व लालच,
धोखेबाज़ी या निष्ठुरता तक नहीं पहुचेगा ।
सोवियटोंने इस समस्याका समाधान करते हुए उसे अस्वीकार
करना चाहा है। इसके लिए जबरदस्तीकी हद नहीं।
घात तो कही ही नहीं जा सकती कि मनुष्यको स्वतंत्रता नहीं
रहेगी, बल्कि यह कहा जा सकता है कि स्वार्थपरता नहीं
यह

४१
रूसकी चिट्ठी
रहेगी। अर्थात् अपने लिए कुछ तो अपना होना ही चाहिए,
परन्तु चाकी दूसरॉके लिए होना चाहिए। स्व और पर दोनोको
स्वीकार करके ही उसका समाधान हो सकता है। दोनों में से
किसी एकको निकाल देनेसे मानव-चरित्रका सत्यसे युद्ध छिड
जाता है। पाश्चात्य महादेशके मनुष्य जोर' पर अत्यधिक
विश्वास रखते हैं। जिस क्षेत्रमें जोरको दरअसल ज़रूरत है,
वहीं वह नि सन्देह बड़े कामकी चीज हैं, पर अन्यत्र उससे
विपत्तिको ही सम्भावना है । सत्यके बलको शारीरिक बलसे
जितनी हो प्रबलतासे मिलाया जायगा, एक दिन उतनी ही
प्रबलतासे उसका विच्छेद होगा-ही-होगा।
मध्य-एशियाके यास्किर रिपब्लिक (Bashkir Republic) के एक
फिसानने कहा-"इस समय भी मेग अलग खेत है, मगर फिर
भी मैं पासके सगठित कृपि-क्षेत्रमे शीघ्र ही शामिल हो जाऊगा।
क्योंकि मे देस रहा हू कि अलग खेती करनेकी अपेक्षा सगठित
खेतीमे बहुत अच्छी और ज्यादा फसल होती है।
कि अच्छी तरह खेती करनेके लिए मशीनकी जरूरत पड़ती ही
है और छोटी खेती करनेवालोके लिए उसका सरीदना असम्भव
है। इसके सिवा, छोटी-छोटी जमीनोंमे मशीनके हलसे काम
लेना असम्भव है।"
फल एक उच्चपदस्थ सरकारी कर्मचारीसे बातचीत
हुई थी। उन्होंने कहा-'त्रियों और बच्चोंके लिए हर तरहको
सुविधाएँ जैसे सोवियट-सरकार द्वारा दी गई हैं, उतनी और कहीं भी
जब
मेने कहा-

महान हैं,
-
रुसको चिट्ठी
उससे भी बड़ा उपाय जिनके हाथमे है, वे.
वे सम्पत्तिको पर्वाह नहीं करते। सब-कुछ सो देनेका काम पड़े
तो उसमें भी उन्हें कोई घाधा नहीं। परन्तु साधारण मनुष्यके
लिए अपनी सम्पत्ति अपने व्यक्ति-रूपकी भाषा है-उसके सो
जानेपर वह गूंगा-सा बन जाता है। सम्पत्ति यदि सिर्फ अपनी
जीविकाके लिए ही होती, आत्म-प्रकाशके लिए न होती, तो युक्तियोंसे
समझाना सहज हो जाता कि उसके त्यागसे ही जीविकाकी उन्नति
हो सकती है। आत्म-प्रकाशके उच्चतम उपाय-जैसे बुद्धि, गुण,
स्वभाव-कोई किसीसे जबरदस्ती छीन नहीं सकता ,
सम्पत्ति
छीनी जा सकती है, धोखेसे, उडाई जा सकती है। इसीलिए
सम्पत्तिके बांट-घंटवारा और भोगके अधिकारके लिए समाजमें
इतनी निष्ठुरता, इतनी धोखेबाजी और इतना अन्तहीन विरोध है।
मेरी तो धारणा है कि इसका एक ही मध्यम दरजेका
समाधान हो सकता है, वह यह कि व्यक्तिगत सम्पत्ति तो रहे,
पर उसके भोगकी एकान्त या अत्यधिक स्वतत्रताको सीमित कर
दिया जाय। उस सीमाके बाहरका अवशिष्ट अश सर्वसाधारणके
लिए निकल जाना चाहिए। . फिर सम्पत्तिका ममत्व लालच,
धोखेबाज़ी या निष्ठुरता तक नहीं पहुचेगा ।
सोवियटोंने इस समस्याका समाधान करते हुए उसे अस्वीकार
फरना चाहा है। इसके लिए जबरदस्तीकी हद नहीं। यह
घात तो कही ही नहीं जा सकती कि मनुष्यको स्वतन्त्रता नहीं
रहेगी, बल्कि यह कहा जा सकता है कि स्वार्थपरता नहीं

४१
स्मकी चिट्टी
हुई थी। उन्होंने कहा-'त्रियों और बच्चोंके लिए हर तरहको
रहेगी। अर्थात् अपने लिए कुछ तो अपना होना ही चाहिए,
परन्तु थाकी दूसरोंके लिए होना चाहिए । स्व और पर दोनाको
स्वीकार करके ही उसका समाधान हो सकता है। दोनामें में
किसी एकको निकाल देनेसे मानव-चरित्रका मन्यसे युद्ध हिद
जाता है।
पाश्चात्य महादेशके मनुष्य 'जोर' पर अत्यधिक
विश्वास रखते हैं। जिस क्षेत्रमें जोरफो दरअसल ज़रूरत है,
वहाँ वह नि सन्देह बडे फामकी चीज हैं, पर अन्यत्र उनमें
विपत्तिकी ही सम्भावना है ।
सत्यके पलको शारीरिक परसे
जितनी ही प्रनलतासे
मिलाया जायगा, एक दिन उतनी हो
प्रगलनासे उसका विच्छेद होगा-ही-होगा।
मध्य-एशियाकै पास्किर रिपब्लिक (Bashkir Republic) के एक
किसानने कहा-"इस समय भी मेरा अलग खेत है, मगर फिर
भी म पासके सगठित कृपि-क्षेत्रमें शीघ्र ही शामिल हो जाऊंगा।
क्योंकि मैं देख रहा हू कि अलग खेती करनेकी अपेक्षा सगठिन
खेतीमे बहुत अच्छी और ज्यादा फसल होती है। जा
कि अच्छी तरह सेती करनेके लिए मशीनकी जरूरत पड़ती ही
है और छोटी खेती करनेवालोंके लिए उसका सरीदना असम्भव
इसके सिवा, छोटी-छोटी जमीनोंमे मशीनके हलसे काम
लेना असम्भव है।"
"कल एक उच्चपदस्थ सरकारी कर्मचारीसे बातचीत
-
है।
मैंने कहा-
सुविधाएँ जैसे सोवियट-सरकार द्वारा दी गई हैं, उतनी और कहीं भी

रूसको चिट्ठी
उससे भी बड़ा उपाय जिनके हाथमें है, वे महान हैं,
वे सम्पत्तिकी पर्वाह नहीं करते। सन-कुछ खो देनेका काम पडे
तो उसमें भी उन्हें कोई बाधा नहीं। परन्तु साधारण मनुष्यके
लिए अपनी सम्पत्ति अपने व्यक्ति-रूपकी भापा है-उसके सो
जानेपर वह गूंगा-सा बन जाता है।
सम्पत्ति यदि सिर्फ अपनो
जीविकाके लिए ही होती, आत्म-प्रकाशके लिए न होती, तो युक्तियोंसे
समझाना सहज हो जाता कि उसके त्यागसे ही जीविकाकी उन्नति
हो सकती है। आत्म-प्रकाशके उच्चतम उपाय--जैसे बुद्धि, गुण,
स्वभाव-कोई किसीसे जबरदस्ती छीन नहीं सकता ,
सम्पत्ति
छीनी जा सकती है, धोखेसे उड़ाई जा सकती है। इसीलिए
सम्पत्तिके घाट-बटवारा और भोगके अधिकारके लिए समाजमें
इतनी निष्ठुरता, इतनी धोखेबाजी और इतना अन्तहीन विरोध है ।
मेरी तो धारणा है कि इसका एक ही मध्यम दरजेका
समाधान हो सकता है, वह यह कि व्यक्तिगत सम्पत्ति तो रहे,
पर उसके भोगकी एकान्त या अत्यधिक स्वतत्रताको सीमित कर
दिया जाय। उस सीमाके बाहरका अवशिष्ट अश सर्वसाधारणके
लिए निकल जाना चाहिए । फिर सम्पत्तिका ममत्व लालच,
धोखेबाज़ी या निष्ठुरता तक नहीं पहुचेगा।
सोवियटोंने इस समस्याका समाधान करते हुए उसे अस्वीकार
करना चाहा है। इसके लिए जवरदस्तीकी हद नहीं। यह
घात तो कही हो नहीं जा सकती कि मनुष्यको स्वतत्रता नहीं
रहेगी, बल्कि यह कहा जा सकता है कि स्वार्थपरता नहीं
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" रूसको चिट्ठी बडी-बडी वैज्ञानिक परीक्षाशालाएँ आजरवाइजन, उजबेकिस्तान, जार्जिया, यूक्रेन आदि रूसके कोने-कोनेमें स्थापित हो गई हैं। रूसके समस्त देश-प्रदेशोंको, जाति-उपजातियोंको समर्थ मोर शिक्षित बना डालनेके लिए इतना बडा सर्वव्यापी असाधारण अथक उद्योग भारतकी ब्रिटिश प्रजाको सुदूर कल्पनाके परे है। इस वातको मैं यहाँ आनेसे पहले सोच ही न सका था कि इतना आगे बढ़ जाना भी सम्भव है। क्योंकि बचपनसे हम जिस Law and order की आबहवामे पले हैं, वहाँ ऐसे दृष्टान्त देखे ही नहीं जो इसके पास तक फरक सकते हो। अबको वार इग्लैंड रहते हुए मेने एक अप्रेजसे पहले-पहल यह सुना था कि सर्वसाधारणके हितके लिए इन लोगोंने कैसा असाधारण आयोजन किया है। सब साँसे देसा–देसा कि इनके राष्ट्रमे जाति-वर्णका विचार तो ज़रा भी नहीं है। सोचियट-शासनके अन्तर्गत लगभग बर्वर प्रजाओंमें शिक्षा-प्रचारके लिए इन लोगोंने जिस उत्कृष्ट पद्धतिकी व्यवस्था की है, भारतके सर्वसाधारणके लिए वह दुलभ है। फिर भी, अशिक्षाके अनिवार्य फल-स्वरूप हमारी बुद्धि और हमारे चरित्रमे जो दुर्वलता है, हमारे व्यवहारमे जो मूढता है, देश-विदेशोंमे भी उसकी बदनामी हो रही है। अग्रेजोमे एक कहावत है जिस कुत्तेको फांसी देनी हो, उसकी बदनामी करनेसे फाम सहज हो जाता है। जिससे बदनामी कभी मिट ही न सके, ऐसा उपाय करनेसे यावज्जीवन फेद और फांसी दोनोंको मिला लिया जा सकता है। १ अक्टोवर, १६३० .

खसकी चिट्ठी ४४ सिर्फ धनियाका नहीं। हम अपने लोभके कारण मशीनोंको दोप देते हैं, नशेबाजीके लिए दड देते है ताडवृक्षको,-मास्टर जैसे अपनी असमर्थताके कारण विद्यार्थीको बचपर खडा कर देता है। उस दिन मास्कोके कृपि-भवनमे मैं अपनी सांसे स्पष्ट देख आया हूं कि दस वर्षके अंदर रूसके किसान भारतके किसानोंको कितना पीछे छोड गये हैं। उन्होंने सिर्फ कितावें पढना ही नहीं सीखा, उनका मन बदल गया है-वे आदमी बन गये है। सिर्फ शिक्षाकी बात कहनेसे उसमे सब धातें नहीं आ जाती, खेतीकी उन्नतिके लिए देश-भरमें व्याप्त जो बडा-भारी उद्यम है, वह भी असाधारण है। भारतवर्षकी तरह यह देश भी कृषि-प्रधान देश है, इसलिए कृपि-विद्याको जहाँ तक सम्भव हो, आगे बिना बढाये देशवासियोंकी रक्षा नहीं की जा सकती। ये उस वातको भूले नहीं हैं। ये अत्यन्त दुसाध्यको साध्य करनेमे लगे हुए हैं। सिविल-सविसके अफसरोको मोटी-मोटी तनखाहे देकर ये आफिस चलानेका काम नहीं कर रहे है , जो योग्य हैं, जो वैज्ञानिक हैं, वे सबके सव काममें जुट गये हैं। इन्हीं दस वर्षोमे इनके कृषिचर्चा-विभागकी जेसी उन्नति हुई है, उसकी ख्याति ससार-भरके वैज्ञानिकोंमें फैल चुकी है। युद्ध के पहले इस देशमे वीज छाँटनेकी कोई कोशिश ही नहीं की जाती थी। आज लगभग तीन करोड मन ऊँटे हुए वीज इनके हाथमे हैं। इसके सिवा, नये अनाजाका प्रचलन सिर्फ इनके कृपि-कालेजके आँगनमें ही सीमित नहीं, बल्कि बड़ी तेजीके साथ सारे देशमें उनका प्रचार किया जा रहा है। कृषि-सम्बन्धी । - मास्कोके कला-भवनमें रवीन्द्रनाथका स्वागत - - है रूसकी चिट्ठी दुर्चल राम ये, भूखे थे, ति सहाय थे, मूक थे। आज देसने-देखते इनके खेतोंमें हजारों की संख्यामें हलयन्त्र काम कर रहे हैं। पहले ये लोग थे बेचारे-गरीव, आज ये हैं. बलराम । केवल यंत्रोंसे ही काम नहीं चल सकता, यंत्री (सचालक) यदि मनुष्य न हुए। इनके खेतको कृपि मनकी कृपिके साथ ही साथ बढ़ती जा रही है। यहा शिक्षाका काम और उसकी पद्धति सजीव है। मैं वरावर कहता आया हू कि शिक्षाको जीवन-यात्राके साथ-ही साथ चलाना चाहिए। उससे अलग कर लेनेसे वह भडारकी चीज बनी रहती है, खाकर पेट भरनेकी चीज , नहीं बनती।। यहां आकर देखा कि इन लोगोंने शिक्षामें प्राण भर दिये हैं। इसका कारण यह है कि इन्होंने घर-गिरस्तीकी सीमासे स्कूलकी सीमाको अलग नहीं रखा है। ये जो-कुछ सिखाते हैं, वह पास करने या पडित बनानेके लिए नहीं, बल्कि सर्वतोभावसे मनुप्य बनानेके लिए ही सिखाते हैं। हमारे देशमे विद्यालय हैं- परन्तु विद्यासे बुद्धि बडी होती है, सवादसे शक्ति बडी होती है- पुस्तकोंकी पक्तियोंका वोम हमपर ऐसा लद जाता है कि फिर हममें मनको ठीक रास्तेपर चलानेकी शक्ति ही नहीं रह जाती। कितनी ही बार कोशिश की है अपने यहाके छात्रोंसे बातचीत करनेफी, पर देखा कि उनके मनमे किसी तरहका जिज्ञासु-भाव ही नहीं है। जाननेकी इच्छाके साथ जाननेका जो योग है, वह योग उनका टूट गया है। उन्होंने कभी जानना सीखा ही नहीं-शुरूसे ही उन्हें पुराने नियमोंके अनुसार शिक्षा दी जाती है, उसके बाद उस सोखी हुई मास्कोके कला-भवनमें रवीन्द्रनायका स्वागत

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विद्याको दुहराकर चे परीक्षाके मार्क
आते हैं।
मुझे याद है, जर दक्षिण-अफ्रिकासे लं
शान्तिनिकेतन आये थे, तब एक दिन उनमें
"हमारे छात्रोंके साथ पारुल-वन देस
उसने कहा-"मालूम नहीं।" इस बारेमे
पूछना चाहा। मैंने कहा-~~ "पूछना पीछे,
तुम्हारी आनेकी इच्छा है या नहीं ?"
जानता।" कहने का मतलब यह कि वह ।
कुछ इच्छा नहीं रसता-उसे चलाया ज:
अपने आप वह कुछ सोचता ही नहीं।
इस तरहके मामूली विपयोंमें मनकी
साधारत हमारे छात्रोंमे नहीं पाई जाती, Eि
और भी जरा कठिन और विचारणीय विप
उसके लिए इनका मन जरा भी तैयार न
चातकी बाट देसा करते हैं कि हम उनके 3
है, उसीको सुनें। ससारमें ऐसे निश्चेष्ट
मन और क्या हो सकता है।
यहां शिक्षा-पद्धतिक सम्बन्धमे अनेक

५० रुसको चिट्ठी वही सबसे बढकर कामकी चीज है। उस दिन उसे मने अपनी आँसोंसे देखा है । 'पायोनियर्स कम्यून' नामसे इस देशमे जो आश्रम स्थापित हुए है, उन्होंमे से एकको देसने गया था। हमारे शान्तिनिकेतनमे जैसे व्रतीबालक और प्रतीवालिकाएँ हैं, इनकी पायोनियर्स सस्थाएँ लगभग उसी ढगकी हैं। मकानमें प्रवेश करते ही देखा कि मेरे स्वागतके लिए द्वारकी सीढियोंपर दोनो किनारे वालक-बालिकाएँ पक्तिवार खडे हैं। भीतर घुसते ही वे मेरे चारो ओर सटकर बैठ गये, जैसे मै उनका अपना ही कोई हू। एक बात याद रखना, ये सभी विना माता-पिताके अनाथ है। ये जिस श्रेणीसे आये हैं, एक दिन ऐसा था जब कि उस श्रेणीके लोग किमीसे किसी तरहका सम्मानका दावा नहीं कर सकते थे, दरिद्रोंकी तरह बहुत नीच घृत्तिसे अपनी गुजर किया करते थे। इनके मुँहकी ओर निहारकर देखा, तो मालूम हुआ कि ये अनादर और असम्मानके कुहरेसे ढके हुए चेहरे ही नहीं है। न सकोच है, न नडता। इसके सिव मालूम हुआ, मानो सभीके हृदयमे एक प्रकारका प्रण है, सामने एक तरहका कार्यक्षेत्र है, मानो ये हमेशा तैयार से रहते हैं, किसी तरफसे असावधानी या शिथिलता है ही नहीं। स्वागतके उत्सग्मे मने भी कुछ कहा। उसीके प्रसंगमे उनमेसे एक लडकेने कहा- पर-श्रमजीवी (Bourgeonse) अपना व्यक्तिगत मुनाफा थाहते हैं, पर हम चाहते हैं देशके ऐश्वर्यमे सब आदमियोंका समान स्वत्त्व रहे। इस विद्यालयमे हम लोग उसी नीतिपर चलते हैं।"

रूसफी चिट्ठी
एक लडकीने कहा-"हम अपनेको स्वयं चलाती है। हम
सब मिलकर सलाह करके काम करती हैं, जो सबके लिए अच्छा
है, वही हमारे लिए ठीक है।"
एक दूसरे लडकेने कहा- "हम गल्ती कर सकते हैं, यदि
चाहे तो, जो हमसे बडे है, उनकी सलाह लिया करते हैं।
जरूरत पडनेपर छोटे लडके-लडकियां बडे लडके-ल्डकियोंसे सलाह
लेते हैं, और उन्हें सलाहकी जरूरत हो तो वे शिक्षकोके पास
जाते है। हमारे देशके शासनतरका यही विधान है। हम
यहाँ उसी विधानकी चर्चा और अनुशीलन किया करते है।"
इससे समझ सस्ते हो कि इनकी शिक्षा मिर्फ कितायोमे
ही सीमित नहीं है। अपने व्यवहारको, अपने चरित्रको इन्होने
एक बडी लोकयात्राके अनुकूल बना डाला है।
इनका एक प्रण बन गया है, और उस प्रणको रक्षा करनेमे ही
ये अपना गौरव समझते हैं।
अपने यहांके लडके लडकियो और शिक्षकोंसे मैंने बहुत
कहा है कि लोकहित और स्वार सनफे जिस
दायित्व-जोधकी आशा हम सम्पूर्ण देशसे रसते है, शान्तिनिकेतनकी
छोटीसी सीमाके भीतर हम उसीका एक सम्पूर्ण रूप देखना
चाहते हैं। वर्तमान व्यवस्था छात्र और शिक्षकोंकी सम्मिलित
स्वायत्तशासनकी व्यवस्था होनी चाहिए-उस व्यवस्थासे जन
यहाँके समस्त फाय सुसम्पूर्ण होने लोगे, तब उतनी ही
सीमाम हमारे सम्पूर्ण देशकी समस्या हल हो सकती है। व्यक्गित
वह विपय
बार

रुसको चिट्ठो इच्छाको सर्वसाधारणके हितफे अनुकूल बना डालनेको चर्चा राष्ट्रीय व्याख्यान-मंचपर खडे होकर नहीं की जा सकती, उसके लिए खेत बनाये जाने चाहिए-यह खेत ही हमारा आश्रम होगा। एक छोटासा दृष्टान्त तुम्हारे सामने रखता हू। साने-पीनेकी रुचि और अभ्यासके सम्बन्धमे बंगालमे जैसा कदाचार है, पैसा और कहीं भी नहीं। पाकशाला और पायत्रको हमने बहुत ही भारग्रस्त बना डाला है। इस विषयमें सस्कार या सुधार करना बडा कठिन है। अपने समाजके चिरन्तन हितके प्रति लक्ष्य रखकर हमारे छात्र और शिक्षक यदि पथ्यके विपयमें अपनी रुचिको यथोचित रूपसे नियंत्रित करनेका प्रण कर सकते, तो मैं जिसे शिक्षा कहता है, वह शिक्षा सार्थक हो सकती। सात-तिया-इक्कीस कठस्थ करनेको हम शिक्षा ही समझते हैं, और इस बातपर लक्ष्य न रखनेको कि इस विषयमे भूल न करें, हम बडा-भारी अपराध समझते हैं, परन्तु वास्तवमे देखा जाय तो जिस चीजको पेटमें भरते हैं, उस विषयको शिक्षाकी कम कीमत समझना मूर्खताके सिवा और कुछ नहीं। अपने दैनिक भोजनके सम्बन्धमे देशके सामने हमारा एक दायित्व है और वह बहुत बडा दायित्व है-अन्य समस्त उपलब्धियोके साथ-साथ इसकी याद रसना इम्तिहानके मार्कसे कहीं बडा है । मैने उनसे पूछा-"कोई कुछ अपराध करे, तो उसके लिए क्या विधान है ?"

१३
मेने कहा-
रूसकी चिट्ठी
एक लडकीने कहा-“हमारे यहा किसी तरहका शासन नहीं
है, क्योंकि हम अपनी सजा आप ही लिया करते हैं।"
और जरा विस्तारसे कहो। अगर कोई
अपराध करे, तो क्या तुम लोग उसके लिए कोई सास सभा
करते हो? या अपनेमे से किसीको पच चुन लेते हो ? और
सजा देनेके नियम है, तो कैसे हैं ?"
एक लडकीने जवाब दिया-"उसे विचार-सभा नहीं कहा
जा सकता, हम लोग
आपसमे बातचीत करते है। किसीको
अपराधी सिद्ध कर देना ही सजा है, इससे बढकर और सजा
फ्या होगी।"
एक लडकेने कहा-~"वह भी दु सित होता है, हम भी दुसित
होते है, बस झगडा तय हुआ।"
मान लो, कोई लडका अगर सोचे कि उसपर
झूठा दोपारोप हो रहा है, तो तुम लोगों के ऊपर और भी कहीं
वह अपील कर सकता है ?"
लडकेने कहा- तब हम लोग वोट लेते है-अधिक मतसे
अगर निणय हो कि वह अपराधी है, तो उसपर फिर अपील
नहीं चल सकती।"
मने कहा--" अपील न चले, यह दूसरी बात है, पर फिर
भी अगर वह समझे कि अधिक मतोने उसके प्रति अन्याय
किया है, तो उसका कोई प्रतिकार हो सकता है या नहीं ?"
एक लडकीने उठकर कहा-"तब सम्भव है हम लोग अपने
मेने कहा-

--
रूसको चिट्ठी
शिक्षकोके पास जाये और इस विपयमे उनकी सलाह लें-पर
ऐसी घटना कभी हुई नहीं।"
मेने कहा-"जिस तपस्यामे सभी कोई शामिल हैं, वह स्वय
ही अपराधोसे तुम्हारी रक्षा करेगी।"
यह पूछने पर कि तुम्हारा कर्तव्य क्या है, उन्होने कहा-
"अन्य देशके लोग अपने कामके लिए धन चाहते हैं, सम्मान चाहते
हैं , हम वैसा कुछ भी नहीं चाहते, हम सर्वसाधारणका हित चाहते
हैं। हम गाँववालोको शिक्षा देनेके लिए देहातोंमे जाते हैं, और उन्हें
समझाते है कि किस तरह सफाईसे रहा जाता है, सब काम
बुद्धिपूर्वक किस तरह सरलनासे किये जाते है, इत्यादि। अनेक
अवसर ऐसे आते है, जब हमें स्वय वहाँ रहना पड़ता है, इसके
लिए हम नाटक खेलते हैं और देशकी हालत उन्हें समझाते हे।"
उसके बाद उन लोगोंने मुझे दिसाना चाहा कि वे सजीव
समाचार-पत्र किसे कहते है। एक लडकीने कहा-
सम्बन्धमें हमे बहुतसे समाचार जानने पड़ते हैं, हमे जो मालूम
हो जाते हैं, उन्हे दूसरोको जता देना हमाग कर्तव्य है।
क्योकि तथ्यको ठीक तौरसे जानने और उस विषयमे विचार
करनेसे ही हमारा कार्य ठोस हो सकता है।"
एक लडकेने कहा-“पहले हम कितानोंसे और शिक्षकोंसे
सीसते हैं, फिर उसी विषयपर आपसमे आलोचना करते
हैं, उसके बाद हमें सर्वसाधारणको समझाने जानेकी आज्ञा
मिलती है।"
देशके
-

रुसकी चिट्ठी मनोव समाचारपत्रका अभिनय करके मुझे दिखाया गया। विषय था रूसका पचवार्षिक साल्प'। अर्थात् इन लोगोंने दृढ प्रण क्यिा है कि पांच वर्षके अदर ये सारे देशको यन्त्रशक्तिम सुदक्ष फर डालेंगे, निजली और भाप की शक्तिको ये देशके इस छोरसे उस ओर तक सर्वत्र काममे लायेगे। इनका देश' से यह मतलब नहीं कि सिर्फ यूरोप और रूस, बल्कि एशियाके बहुत दूर तक उसका विस्तार है। वहाँ भी ये अपनी शक्तिके पाहनको ले जायेंगे। धनीको अधिकतर धनी बनानेके लिए नहीं, बल्कि जन-समाजको शक्तिसम्पन्न करनेके लिए-उस जन- समाजमे मध्य-एशियाके काले-चमडे के मनुष्य भी शामिल है। वे भी शक्तिके अधिकारी होंगे, इसके लिए कोई डर नहीं, चिन्ता नहीं। इस कामके लिए इन्हें बहुत ज्यादा रुपयोंकी जरूरत है- यूरोपोय बडे-बाजारोंमे इनकी हुडी नहीं चलती- नकद दाम देकर सौदा लेनेके सिवा और कोई चाग ही नहीं। इसीलिए मुँहका फोर देकर ये जरूरी चीजें खरीदते हैं, यहाँका पैदा हुआ अनाज, पशु-मास, अडे, मसन-सब-कुछ निदेशके वाजारोमें विकने जाता है। दश-भरके लोग उपवासके किनारे तक आ पहुचे है, अब भी डेढ वप बाकी है। दूसरे देशोंक महाजन इनसे खुश नहीं है विदेशी इजिनीयरोंने इनके बहुतसे कल-कारसाने नष्ट भी कर दिये हैं। यहाँका काम बहुत-वडा और जटिल है, समय बहुत थोडा है। समय बढानेका साहस नहीं होता, .

- रुसको चिट्ठी क्योंकि ये समस्त धनी-समाजकी प्रतिकूलताके सामने सड़े हैं, जितनी जल्दी हो सके, अपने बूतेपर धन कमाना इनके लिए बहुत ही जरूरी है। तीन वर्ष बीत चुके, अब भी दो वर्ष चाकी हैं। सजीव असवार अभिनयके समान है, नृत्य-गीत और झडा उडाकर ये जता देना चाहते है कि देशकी धन-शक्तिको यत्रवाहिनी फरके धीरे-धीरे इन्होने कितनी सफलता पाई है। देखनेकी जरूरत बहुत ज्यादा है। जो जीवनयात्राके अत्यन्त आवश्यक सामग्रियोंसे वचित रहकर कष्टसे दिन बिता रहे हैं, उन्हे समझानेकी जरूरत है कि शीघ्र ही इस कष्टका अन्त होगा, और उसके बदले जो कुछ मिलेगा, उसका स्मरण करके उन्हें आनन्दके साथ, गौरवके साथ कप्टोको गले लगाना चाहिए। इसमे सन्तोपकी बात यह है कि इस कार्यमे कोई दल- विशेप नहीं, बल्कि सभी लोग एक साथ तपस्यामे लगे हुए हैं। ये सजीव सवादपत्र अन्य देशोके समाचार भी इसी ढगसे देश-भरमे फैलाया करते है। पतिशरमे * देहतत्त्व और मुक्तितत्त्वपर एक नाटक देसा था, उसकी याद, उठ आई-ढग एक ही है, लक्ष्य भिन्न है। सोच रहा हू, देश लौटकर शान्तिनिकेतन और सुखल (श्रीनिकेतन) मे इसी तरहके सजीव सवादपत्र चलानेकी कोशिश करूँगा। 1 * वगालका एक स्थान, जहा कविक्री जमींदारी है।

१७
रूसकी चिट्ठी
इनका दैनिक कार्यक्रम इस प्रकार है-सवेरे सात बजे
उठने हैं, उसके बाद पन्द्रह मिनट व्यायाम करते हैं, फिर
नित्यनिया और कलेवा । आठ बजेसे खास बैठती है। एक
बजे थोडी देरके लिए साने और विश्राम करनेकी छुट्टी
होती है। तीन बजे तक छास होती रहती है। सीसनेके
विषय हैं-इतिहास, भूगोल, गणित, प्राथमिक प्राकृत-विज्ञान,
प्राथमिक रसायन, प्राथमिक जीव-विज्ञान, यन्त्र-विज्ञान, राष्ट्र-निज्ञान,
समाज-विज्ञान, साहित्य,
हाथकी कारीगरी, बढईका काम,
जिन्दसाजीका काम, नये ढगकी खेतीकी मशीन आदिका व्यवहार,
इत्यादि। रविवार नहीं है। हर पांचवें दिन छुट्टी रहती है।
तीन बजे बाद सास दिनकी कार्य-सूचीके अनुसार पायोनियर
लोग ( अप्रगामियाका दल) कारखान, अस्पताल, गांव आदि
देसने जाया करते हैं।
देहातोंमें भ्रमण करानेकी व्यवस्था की जाती है। कभी-
फभी ये स्वय अभिनय करते हैं और कभी-कभी थियेटर देसने
भी जाते है। शामका कायक्रम है- कहानियां पढना, कहानियाँ
सुनाना, तर्क करना, साहित्यिक और वैज्ञानिक सभाएं करना।
छुट्टी दिन पायोनियर लोग अपने कपड़े धोते है, घर साफ करते
है, मकान और मकानके चारों तरफ सफाई करते हैं, क्लासके
पाठके अलावा अतिरिक्त पाठ पढते है, घूमने जाते हैं।
विद्यालयमे भरती होनेकी उमर है सात-आठ साल और विद्यालय
छोडनेकी उमर सोलह । इनका अध्ययन-काल हमारे देशकी

- रूसको चिट्ठो तरह लम्बी-लम्बी छुट्टियोंसे पोला नहीं किया गया, इसलिन थोडे ही दिनोमे ये बहुत ज्यादा पढ़ सकते है। यहाके विद्यालयोंका एक बडा-भारी गुण यह है कि ये जो कुछ पढते हैं, साथ-साथ उसकी तसवीर भी सींचते जाते है। इससे पाठका विषय मनपर चित्रित हो जाता है, चित्राकनमे हाथ सध जाता है और पढ़ने के साथ रूप-चित्रणका आनन्द भी मिल जाता है। यकायक ऐसा मालूम होने लगता है कि इन लोगोंका ध्यान सिर्फ कामकी मोर ही है, और गवारोंकी तरह ये ललितम्लाकी अवज्ञा करते हैं। परन्तु यह बात बिलकुल नहीं है। सम्राटोके जमानेमे बने हुए बडे-बडे नाट्य-मन्दिरोंमे उच्च श्रेणीके नाटक और औपेराओंके अभिनयके दिन देरसे टिकट मिलना मुशकिल हो जाता है। नाट्याभिनय-कलामे इनके समान उस्ताद ससारमें बहुत थोडे ही हैं। प्राचीनकालमें अमीर-उमराव ही इनका आनन्द ले सकते थे-उस जमानेमे जिनके पैरोंमे जूते न थे, कपडे थे फटे-पुराने-मैले, जिन्हें भर-पेट खानेको न मिलता था, अहोरात्र जो मनुष्य और देवता सभोसे डरा करते थे, परित्राणके लिए जो पुरोहित-पडोको घूस दिया करते थे, और मालिक पैरो-तले धूलमे सिर रखकर जो अपनी अवज्ञा आप करते थे, आज उन्हींकी भीडसे थियेटरोंमें जगह नहीं मिलती। में जिस दिन अभिनय देखने गया था, उस दिन खेल था टाल्सटायका 'रिसरक्शन'। मेरी समझसे यह नाटक सर्वसाधारण लिए सहज-उपभोग्य नहीं हो सकता। परन्तु श्रोतागण गम्भीर होकर - रुमकी चिट्ठी बडे ध्यानसे चुपचाप सन सुन रहे थे। ऐग्लो-सैक्सन किसान-मजूर श्रेणीके लोगोंने इस नाटकको रातके एक बजे तक ऐसी दिलचस्पीके साथ शान्तभावसे देखा होगा--यह बात कल्पनामे नहीं आती, हमारे देशको तो घात ही छोड दो। और एक उदाहरण देता हू। मास्को शहरमे मेरी तसवीगेकी प्रदर्शनी हुई थी। यह तो कहना ही न होगा कि मेरी तसवीरें विचित्र और दुनियासे न्यारी ही थीं। सिर्फ निदेशी हों सा नहीं, कहा जा सकता है कि वे किसी भी देशकी नहीं है, मगर लोगोंका भीड-भम्भड काफी था। इन थोडेसे दिनोंमे पाच हजार आदमी तसवीर देखने आये थे। और कोई चाहे कुछ कहे, कमसे कम में तो इनकी रुचिकी प्रशसा बिना किये नहीं रह सकता। रुचिकी बात छोड़ दो, मान लो कि वह एक सोखला कौतूहल ही था, परन्तु यह कौतूहल ही तो जाग्रत चित्तका परिचय है। मुझे याद है, एक दिन अपने कुएके लिए मैंने अमेरिकासे एक वायुचल-चक्रयन्त्र मगाया था, जिससे कुआकी गहरी नीचाईसे पानी उठ आता था , परन्तु जर देखा कि लडकोके मनकी गहराईसे जरा भी कौतूहल नहीं उठ रहा, तो मनमे बडा ही धिकार आने लगा। हमारे यहाँ भी तो बिजली के कारसाने हैं, कितने लडके जाते हैं वहा उत्सुकता मिटाने ? कहनेको तो भद्रश्रेणीके लडके हैं। घुद्धिको जडता जहा है, वहीं कौतूहल दुर्वल है। यहा स्कूल के लडकोकी बनाई हुई तसवीरें हमे बहुनसी मिली रूसको चिट्ठो हैं-देसकर आश्चर्य होता है-बेशक वे चित्र है, किसीकी नमः नहीं, उनकी अपनी उपज हैं। यहाँ निर्माण और सृष्टि दोनों तरफ लक्ष्य देसफर बहुत सन्तुष्ट और निश्चिन्त हुआ हू । जबसे या आया हूँ, अपने देशको शिक्षाके वारेमें मुझे बहुत सोचन पड़ा है। अपनी निसहाय सामान्य शक्तिसे इसमे से कुछ ले और प्रयोग करनेकी कोशिश करूँगा। पर अब समय कहा है- सम्भव है, मेरे लिए पचवार्पिक सकरप भी पूरा न हो। लगभग तीन वर्षसे जैसे अकेला ही प्रतिकूलताके विरुद्ध लघोसे नाव टेलता रह हु-और भी दो-चार वर्ष उसी तरह ठेलना पडे, पर बहुत आगे बढ सकूगा, में जानता हू-फिर भी किसीसे फरियाद न करूंगा आज अब समय नहीं रहा। आज ही रातकी गाडीसे जहाज घाटकी ओर रवाना होना है, कल समुद्रसे पार होऊँगा।' २ अक्टोबर, १६३० नेमेन स्टीमर मतलान्तिक रूससे लोटकर आज फिर जा रहा हू अमेरिकाके घाटपर। किन्तु रूसकी स्मृति आज भी मेरे सम्पूर्ण मनपर अधिकार किये हुए है। उसका प्रधान कारण यह है कि और-और जिन देशोमे घूमा हूँ, वहाँके समाजने समग्ररूपसे मेरे मनको ६१ रूसको चिट्ठी हिलाया नहीं है। उनमे अनेक कार्योका उद्यम है, पर अपनी- अपनी सीमाके भीतर। कहीं पालिटिक्स है तो कहीं अस्पताल, कहीं विश्वविद्यालय है तो कहीं म्यूजियम-विशेषज्ञ अपने-अपने क्षेत्रमे ही मशगूल हैं, मगर यहां सारा देश एक ही अभिप्रायको लेकर समस्त कार्य-विभागोको एक ही स्नायुजालमे बांधकर एक विराट रूप धारण किये हुए है। सब कुछ एक अरखड तपम्यामें आकर मिल गया है। जिन देशोंमें अर्थ और शक्तिका अध्यवसाय व्यक्तिगत स्वार्थोमे बॅटा हुआ है, वहीं इस तरहकी गहरी हार्दिक एकता असम्भव है। जब यहां पच-वर्ष-व्यापी यूरोपीय महायुद्ध चल रहा था, तब भख मारकर देशकी अधिकाश भावनाए और कार्य एक अभिप्रायसे मिलकर एक हृदयके अधिकारमे आये थे, पर वह था अस्थायी-किन्तु सोवियट रूसमे जो कार्य हो रहा है, उसकी प्रकृति ही वही है , ये तो सर्वसाधारणका काम, सर्वसाधारणका हृदय और सवसाधारणका स्वत्व नामकी एक असाधारण सत्ता कायम करनेमे लगे हुए हैं। उपनिपदकी एक वात मने यहाँ आकर निलकुल स्पष्ट समझी '-लोभ न करो। क्यों लोभ न करें? इसलिए कि सब-कुछ एक सत्यके द्वाग ही परिव्याप्त है-और व्यक्तिगत लोम उस एककी उपलब्धिमें बाधा पहुचाता है। 'तेन त्यक्तेन मुजीथा'-उस एकसे जो आता है, उसीका भोग करो आर्थिक दृष्टिकोणसे ये यही बात कहते हैं। है-'म गृध समस्त मानन- रूसकी चिट्ठी भी सोज की जाती है। इन सब केन्द्रोके साथ जो म्यूजियम हैं, उन्होंके जरिये सर्वसाधारणमें शिक्षा-प्रचारका कार्य होता है और यह बडा-भारी काम है। सोवियट राष्ट्रमे सर्वसाधारणको ज्ञानोन्नतिका जो नवयुग आया है, स्थानिक तथ्यानुसधानी व्यापक चर्चा और उससे सम्बन्ध रसनेवाली म्यूजियमें उसकी एक मुख्य प्रणाली हैं। इस तरहका निकटवर्ती स्थानोंका तथ्यानुसधान शान्तिनिकेतनमें कालीमोहनने कुछ-कुछ किया है--पर उस कार्यमे हमारे छात्र और शिक्षकोंके शामिल न होनेसे उससे कोई उपकार नहीं हुआ। अनुसन्धानके फल पाने की अपेक्षा अनुसंधान करनेका मन तैयार करना कुछ कम बात नहीं है। मैंने सुना था कि कालेज-विभागके इकॉनॉमिक फ्लासके विद्यार्थियोके साथ प्रभातने इस प्रकारकी चर्चाकी नोंव डाली है, परन्तु यह काम और भी अधिक साधारण रूपमे होना चाहिए, पाठ-भवनके लडकोको भी इस कार्यमें दीक्षित करना होगा, और साथ ही समस्त प्रादेशिक सामग्रियोकी म्यूजियम स्थापित करनेकी भी आवश्यकता है। यहाँ तसवीरोको म्यूज़ियमका काम कैसे चलाया जाता है, उसका विवरण सुननेसे अवश्य ही तुम्हें सन्सोप होगा। मास्को शहरमें ट्रेटियाकोव गैलरी ( Tretyakor Gallery ) नामक प्रसिद्ध चित्र-भंडार है। वहाँ १६२८ से १९२६ तक एक वर्षके अन्दर लगभग तीन लास भादमी चित्र देखने आये हैं। इतने दर्शक आना चाहते हैं कि उनके लिए स्थान एक LINEnted मास्कोके कृषि भवन में रवीन्द्रनाथ

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रूसको चिट्ठो दना कठिन हो रहा है, इसलिए दर्शकाको पहले ही से छुट्टी दिन अपना नाम रजिस्टग्मे लिया देना पड़ता है। सन १६१७ में, सोनियट-शासन चालू होनेसे पहले जो दर्शक इस तरह की गैलरीमे आते थे, ये थे धनी-मानी-मानी दलके लोग-जिनको ये bourgeonce करने है-अर्थात् पर-श्रमजीवी । और अव आते हैं असत्य स्वश्रमजीवी-जसे राजमिस्त्री, लुहार, चढई, दर्जी, मोदी आदि। इनके सिना मोर आते है सोवियट सनिक, सेनानायक, विद्यार्थी भोर किसान आदि। धीरे-धीरे इनके हत्यमें आर्टका ज्ञान जगाते रहना जरूरी है इन जसे अनाडियोंके लिए प्रथम दृष्टिमे चित्र-कलाका रहस्य ठोक तोरसे समझ लेना फटिन है। ये धूम-घूमफर दीवालोपर टंगी हुई तसवीरें देखते फिरते हैं-बुद्धि काम नहीं देती। इसके लिए लगभग समी म्यूजियमोंमें योग्य परिचायक रखे गये हैं, वे उन्हें समझा दिया करते है। म्यूजियों के शिक्षा-विभागमे अथवा ऐसी ही अन्य राष्ट्रीय कार्यशालाओंमे जो वैज्ञानिक कार्यकर्ता है, उन्होंमे से परिचायक चुने जाते हैं। जो देखने आते है, उनके साथ इनका लेन-देनका कोई भी सम्नन्य नहीं रहता। परिचायकोका यह कर्तव्य होता है कि तसवीरमे जो विषय प्रकट किया है, सिर्फ उसीको देस लेने-मानसे तसवीर देखनेका उद्देश पूग हो गया, दर्शकों द्वारा ऐसी भूल न होने दें। चित्र-वस्तुका गठन (composition ), उसकी वर्ण-कल्पना (colour scheme), उसका अग्न, उसका स्पेस' ( space-- अकित रूसकी चिट्ठी जा - वस्तुओंका पारस्परिक अतर), उसकी उज्ज्वलता (dllumination)- चित्रकलाके ये जो मुख्य शिल्प-कौशल ( techniqua) हैं, जिनसे कि चित्रोंको विशेष शैली प्रकट होती है-ये सब विषय अब भी बहुत कम लोगोको मालूम है। इसलिए परिचायकोंमें इन सब विषयोका अच्छा ज्ञान होना चाहिए, तभी वे दर्शकोंकी उत्सुकता और इच्छाको जगा सकने है। एक बात और, म्यूजियममें सिर्फ एक ही चित्र नहीं होता, इसलिए एक चित्रको समझ लेना दर्शकोंका उद्दश नहीं होना चाहिए, म्यूजियममे जो विशेष श्रेणोके चित्र रहते हैं, उनकी श्रेणीगत रीतिका समझना आवश्यक है। परिचायकोंका कर्तव्य है कि किसी विशेष श्रेणीके कुछ चित्र छांटकर दर्शकोको उनकी प्रकृति समझा दें। आलोच्य चित्रोंकी सरन्या बहुत ज्यादा होनेसे काम नहीं चल सकता, और समय भी बीस मिनटसे ज्यादा लगाना ठीक नहीं। प्रत्येक चित्रको अपनी एक भाषा होती है-अपना एक छन्द होता है, वही समझनेका विपय है , चित्रके रूपके साथ उसके निषय और भावका क्या सम्बन्ध है, इसकी व्याख्या करना आवश्यक है। चित्रोंको पारस्परिक विपरीतताके द्वारा उनकी विशेषता समझा देना अकसर बहुत काम कर जाता है। परन्तु, यदि दर्शकका मन जग भी कहीं थक जाय, तो वहीं इसे छुट्टी दे देनी चाहिए। अशिक्षित दर्शकोंको ये किस तरह तसवीर देखना सिखाते हैं, उन्हींकी रिपोर्टसे उपर्युक्त बातें समह करके तुम्हे लिख रहा है। इनमेंसे भारतीयोको जिस घातपर विचार करना चाहिए, वह यह ।

रूसकी चिट्ठी है-पहले जो चिट्ठी लिग्यी है, उसमें मैंने कहा है कि ये लोग कृपिपल और यन्त्रमलसे समस्त देशको जल्दी-से-जल्दी शक्तिमान बनानेके लिए बडे उगमफे साथ फमर फसकर जुट पडे हैं। यह घड़े ही कामकी बात है। अन्य समस्त धनी देशोंके साथ प्रतियोगता फरते हुए अपने वलपर जीवित रहने के लिए ही इनकी यह कठोर तपस्या है। हमारे देशमें जन इस प्रकारकी देशव्यापी राष्ट्रीय तपस्याका जिक माता हे, तर हम यही कहना शुरू कर देते है कि बस सिर्फ एक लाल मशाल जलाफर देशके अन्य समस्त विभागोंके सब दीपकोंको बुझा देना चाहिए, नहीं तो मनुष्य अन्यमनस्क हो जायेंगे। सासकर ललितकला और-सन तरहके कठोर सकल्पोकी विरोधिनी है। अपनी जातिको पहलवान धनानेके लिए सिर्फ ताल ठुकवाकर उसे पैंतरेबाजी सिखानी चाहिए, सरस्वतीकी वीणासे अगर लाठीका काम लिया जा सके, तभी वह चल सकती है, अन्यथा नव नैव च। इन बातोंसे कितना नकली पौरुप प्रकट होता है, यहां आनेसे स्पष्ट समझा जा सकता है। यहावाले देश- भरमें फल-फारसाने चलानेमे जिन मजदूरोंको पका कर देना चाहते हैं, वे ही मजदूर जिससे अपनी शिक्षित बुद्धिसे तमगीरोंका रस ग्रहण पर सके, इसीके लिए इतना विराट आयोजन हो रहा है। ये लोग जानते हैं कि जो रसम नहीं है, वे वर हैं, और जो वर्वर है, वे बाहरसे रूखे मोर भीतरसे कमजोर होते हैं। रूसकी नवीन नाट्यकलाने असाधारण उन्नति की है। १६१७ की क्रान्तिके रूसको चिट्टो साथ-साथ ये लोग भी घोरतर दुर्दिन और दुर्भिक्षके समय नाचते रहे है, गाते रहे हैं, नाट्याभिनय करते रहे है-इनके ऐतिहासिक विराट नाट्याभिनयके साथ उसका कहीं भी विरोध नहीं हुआ है। मरुभूमिमे शक्ति नहीं होती। शक्तिका यथार्थ रूप वहीं देसनेमे आता है, जहा पत्थरकी छातीमे से जलकी धारा कल्लोलित होकर निमलती है, जहां वसन्तके रूप-हिल्लोलसे हिमालयका गाम्भीर्य मनोहर हो उठता है। विक्रमादित्यने भारतवर्षसे शक शत्रुओको भगा दिया था, किन्तु कालिदासको 'मेघदूत' लिसनेके लिए मना नहीं किया। यह नहीं कहा जा सकता कि जापानी लोग तल्वार नहीं चला सकते, किन्तु साथ ही वे समान निपुणताके साथ तूलिका भी चलाते है। रूसमें आकर अगर देसता कि ये केवल मजदूर बनकर कारखानोके लिए सामान ही पैदा करते हैं और हल जोतते है, तो समझता कि ये भूसो मरेंगे। जो वृक्ष पत्तोंकी मर्मरध्वनि चन्द करके सट-खट आवाजसे अहकार करता हुआ कहता रहे कि मुझे रसकी जरूरत नहीं, वह जरूर बढईके घरका नकली वृक्ष है-वह अत्यन्त कठोर हो सकता है, पर है अत्यन्त निष्फल ही। अतएव मे वीरपुरुपोंसे कहे देता हू सावधान किये देता है कि जब मैं अपने देशको लोटूगा, तब पुलिसकी लाठियोकी मूसलपार वामे भी अपना नाच-गान बन्द - न क्रूगा। रूसके नाट्यमचपर फलाकी तपस्याका जो विकास हुआ है, वह असाधारण है-महान है। उसमे नवीन सृष्टिका साहस रुसकी चिट्ठी उत्तरोत्तर वहना ही दिखाई देता है, उसको गति अभी रुको नहीं है। वहाको सामाजिक क्रान्तिमे यह नई सृष्टि ही असीम साहससे फाम कर रही है। ये लोग समाजमें, राष्ट्रमें, फला-तत्त्वमे-कहीं भी नगीनतासे डरे नहीं है। जिस पुराने धर्मतन्त्रने और जिस पुराने राज्यतन्त्रने शताब्दियोंसे इनको बुद्धिको प्रभावित कर रखा है और प्राणशक्तिको नि शेषप्राय कर दिया है, इन मोवियट-क्रान्तिकारियाने उन दोनों ही को निर्मूल कर दिया है, इतनी बडी बन्धन न-जर्जरित पराधीन जातिको इतने थोडे समयके अदर इतनी बडी मुक्ति दी है कि उसे देसफर हृदय आनन्दसे भर जाता है। क्योकि जो धम मानवजातिको मूढताका वाहन बनाकर मनुष्यके चित्तको स्वाधीनताको नष्ट करता है, उससे बढकर हमारा शत्रु कोई राजा भी नहीं हो सकता-फिर वह राजा थाहग्से प्रजाकी स्वाधीनताको कितना हो क्यो न वेडियोंसे बांधता हो । आज तक यही देसनेमे आया है कि जिस राजाने प्रजाको दास बनाये रसना चाहा है, उस राजाका सबसे बड़ा सहायक बना है वही धर्म, जो मनुष्यको अन्धा बनाये रखता है। वह धर्म विप-कन्याके समान है , आलिंगनसे वह मुग्ध कर लेता है, और मुग्ध करके मार डालता है। शक्तिशूलकी अपेक्षा भक्तिशल और भी गहरे मर्ममें जाकर प्रवेश करता है, क्योंकि उसकी मार आरामकी मार होती है। सौवियटोंने रूस-सम्राट द्वारा स्येि गये अपमान और आत्महत अपमानके हाथसे इस देशको बचाया है-अन्य देशोंके धार्मिक चाह उनकी कितनी ही निन्दा करें, पर मैं निन्दा नहीं कर जापानने इस शिक्षाके द्वारा ही थोडे समय अदर देशको राष्ट्रशक्तिको सर्वसाधारणको इच्छा और उद्यर के साथ मिला दिया है, देशको अर्थोपार्जनको शक्तिको बहुत गुना बढा दिया है। वर्तमान टीने तेजीके साथ इसी शिक्षाका बढाकर धर्मान्धताके भारी थोमसे देशको मुक्त करनेका मार्ग दिलाया है। "भारत सिर्फ सोता ही रहता है। क्योकि उसने अपने घरमे प्रकाश नहीं आने दिया, जिस प्रकाशसे आजका सतार जागता है, शिक्षाका वह प्रकाश भारतके बंद दरवाजे के थाहर ही खडा है। जन रूसके लिए रवाना हुआ था, तब वहुत ज्यादाकी आशा नहीं की थी। फ्योंकि कितना साध्य है और कितना असाध्य, इसका आदर्श मुझे ब्रिटिश-भारतसे ही मिला है। भारतकी उन्नतिकी दुल्हता किननी अधिक है, इस वाको स्वयं ईसाई पादरी टमसनने बहुत हो करुण स्वरमे सारे मारके सामने कहा है। मुझे भी मानना पडा है कि दुरूहते है अवश्य, नहीं तो हमारी ऐसी दशा क्यों होती १ यह बात मुरु मालूम थी कि रूसमें प्रजाकी उन्नति भारतसे ज्यादा ही दुरूदे थी, कम नहीं। पहली बात तो यह है कि हमारे देशमें भद्रेतर श्रेणीके लोगोकी जैसी दशा अव है, यहाकी भद्रेतर श्रेणीकी भो-फ्या बाहरसे और भीतरसे वैसी ही दशा थी। उसी तरह ये लोग भी निरक्षर और निरुपाय,थे, पूजा-अर्चना और पुरोहित-पडोंके दिन-रातके तकाजोंके मारे इनको भी बुद्धि बिलकुल दबी हुई

रूतकी चिट्ठी
थी, उपरवालोंक परोको धूल्से इनका भी आत्म-सम्मान मलिन
था, आधुनिक वैज्ञानिक युगको सुविधाए इन्हे भी कुछ नहीं मिली
थी, इनके भाग्यपर भी पुरसोक जमानेका भून सवार था, उस
भूनने इन्हें हजारो वपके पुराने अचल खूटसे पाँध रया था,
पीच-बीच में यहढी पड़ोप्तियाके लिए जर उनपर खून सवार हो
जाता था, तर इनकी भी पाशविक निठुरताका अन्त नहीं रहता
था। ये ऊपरवालोंक हायसे चाबुक खानेमे जितने मजबूत थे,
अपने समान श्रेगोवालोपर अन्याय-अत्यार करनेमे भी उतने ही
मुस्तैद रहते थे।
यह तो उनकी दशा थी। आजकल जिनके हाथमे उनका
भाग्य है, अगरेजोंकी तरह वे ऐशर्यशाली नहीं है, अभी तो कुल
१६१७ के बादसे अपने देशमे उनका अधिकार आरम्भ हुआ
है-राष्ट्र-व्यवस्था सब तरफसे पछी होने-योग्य ममय और साधन
उन्हे मिली हो नहीं-घर मोर थाहर सर्वत्र विरोध है--
उनमें आपसो गृह-कलहका समर्थन करनेके लिए अगरेजों-
और यहा तक कि अमेरिकनोने भी गुप्त और प्रकट रूपमै
कोशिश की है। जनसाधारणको समर्थ और शिक्षित बना
डालनेके लिए उन लोगोंने जो प्रतिज्ञा की है, उसकी 'डिफिकल्टी'
(कठिनाई) भारत-शासकोंकी डिफिकल्टीसे कई गुनी बडी है।
इसलिए, मेरे लिए ऐसी आशा करना कि रूस
बहुत-कुछ देखने को मिलेगा, अनुचित होता। हमने अभी देना
ही क्या है और जानन ही कितना है, जिससे हमारी आशामा
जाकर

वसका चिट्ठा
जोर ज्यादा हो सकता। अपने दुःखो देशमें पलो हुई बहुत
कमजोर आशा लेकर रूस गया था। वहां जाकर जो कुछ
देसा, उससे आश्चर्यमे डूब गया।
Law and Order ( शान्ति और
व्यवस्था) को कहा तक रक्षा की जाती है, कहा तक नहीं-
इस बातकी जांच करनेका मुझे समय नहीं मिला , सुना जाता
है कि काफी जबरदस्ती होती है, बिना पिचारके शीघ्रतासे दड
भी दिया जाता है। ओर-सब विषयों में स्वाधीनता है, पर
अधिकारियोके विधानके विरुद्ध विलकुल नहीं। यह तो हुई चन्द्रमाके
कलकको दिशा, परन्तु मेरा तो मुख्य लक्ष्य था प्रकाशकी दिशापर ।
उस दिशामे जो दीप्ति देखो, वह आश्चर्यजनक थी-जो एकदम
अचल थे, वे सचल हो उठे है।
सुना जाता है कि यूरोपके किसी-किसी तीर्थ-स्थानसे देवकी
कृपासे चिम्पगु भी अपनी लाठी छोडकर पैदल वापस आये
हैं-यहा भी वही हुआ , देसते-देखते ये पगुकी लाठीको दौडनेवाला
रथ बनाते चले जा रहे हैं जो पयादोसे भी गये-चीते थे, दस ही
वर्षमें वे रथी बन गये है। मानव-समाजमे वे सिर ऊँचा किये
सड़े हैं, उनकी बुद्धि अपने वश है, उनके हाथ-हथियार सब
अपने वशमे हैं।
हमारे सम्राट-वंशके ईसाई पादग्यिोने भारतवपमे बहुत वर्ष
बिता दिये है, डिफिकल्टीज़ कैसी अचल है, इस बातको वे समझ
गये है। एक बार उन्हें मास्को माना चाहिए।
विशेष लाभ नहीं होगा-याक सास तौर, क्लक देखना ही
पर आनेसे

रूमयी चिट्ठी
उनका व्यवसायगत अभ्यास है, प्रकाशपर उनकी दृष्टि नहीं
पडतो,-सासकर उनपर तो और भी नहीं पडनी, जिनसे उन्हें
रिक्ति है। वे भूल जाते है कि उनके शासन-चन्द्रमे भी
पलक ढूंढने के लिए पडे चश्मेकी जरूरत नहीं पड़ती।
लगभग सत्तर वर्षको उमर हुई-अब तक मेरा धर्य नहीं
गया। अपने देशको मूढ़ताके बहुत भारी योमकी मोर देखकर
मैंने अपने ही भाग्यको अधिकतासे दोप दिया है, बहुत ही कम
शकिके वृतपर थोडे-बहुत प्रतिकारकी भी कोशिश की है, परन्तु
जीणं आशामा रथ जितने कोस चला है, उससे कहीं अधिक बार
उसकी रसी टूटी है, पहिये टूट हैं। देशके अभागोंके दुसकी
ओर देखकर सारे अभिमानको तिलाजलि द चुका हू। मरफारसे
सहायता मागी है, उसने चाहवाही भी वो है , जितनी भीस दी,
उससे ईमान गया, पर पेट नहीं भरा। सबसे बढकर दुस
और शर्मको पात यह है कि उनके प्रसादसे पलनेवाले हमारे
स्वदशी जीवोंने ही उसमे सबसे ज्यादा रोडे अटकाये हैं। जो
देश दूसरोंके शासनपर चलता है, उस देशमे सबसे भयानक
व्याधि हैं ये ही लोग,-जहाँपर अपने ही दशके लोगोंके मनमे
ईर्षा,
, क्षुद्रता और स्वदेश-विरद्धतामी कालिमा उत्पन्न हो जाय,
उस देशके लिए उससे मयानक विष और क्या हो सस्ता है ?
बाहरके सन कामोके ऊपर भी एक चीज होती है, वह हे
आत्माकी साधना । राष्ट्रीय और आर्थिक अनेक तरहकी गडवडियोमे
जन मन गॅदला हो जाता है, तब उसे हम स्पष्ट नहीं देस सक्त,

रूसको चिट्टो इसीलिए उसका जोर घट जाता है। मेरे अदर वह यला मौजूद है, इसीलिए असली चोजको में जकडे रहना चाहता हूँ । इसके लिए कोई मेरा मजाक उडाता है तो कोई मुझपर गुस्सा होता है , वे अपने मार्गपर मुझे भी सींच ले जाना चाहते हैं। परन्तु मालूम नहीं, कहासे आया हूँ मैं इस ससार-तीर्थमे, मेरा मार्ग मेरे तीर्थ-देवताको वेदोके पास ही है। मेरे जीवन-देवताने मुझे यही मत्र दिया है कि में मनुष्य-देवताको स्वीकार करके उसे प्रणाम करता हुआ चलूँ। जब मै उस देवताका निर्माल्य ललाटपर लगाकर चलता हू, तर सभी जातिके लोग मुझे बुलाकर आसन देते है-मेरी बात मन लगाकर सुनते है। जब में भारतीयत्वका जामा पहनकर सडा होता है, तो अनेक बाधाए सामने आती है। जन ये लोग मुझे मनुष्य-रूपमे देसते है, तन मुझपर भारतीय रूपमे ही श्रद्धा करते हैं , जब मैं सालिस भारतीय रूपमे दिखाई देना चाहता है, तब ये लोग मेरा मनुष्य-रूपमे आदर कर नहीं पाते। अपना धर्म पालन करते हुए मेरा चलनेका मार्ग गलत समझनेके द्वारा उबडसावर हो जाता है। मेरी पृथ्वीको मियाद सकीर्ण होती आ रही है, इसलिए मुझे सत्य बननेकी कोशिश करनी चाहिए, प्रिय बननेकी नहीं। मेरी यहाँकी सबरें झूठ-सच नाना रूपमे देशमे पहुचा उस विषयमे हमेशा मुझसे उदासीन नहीं रहा जाता, इसके लिए में अपनेको धिकारता हूँ। चार-बार ऐसा मालूम होता रहता है कि वाणवस्थकी अवस्थामे समाजस्थकी तरह व्यवहार करनेसे विपत्तियोका सामना करना पड़ता है। करती है।

७७
रूसकी चिट्ठी
कुछ भी हो, इम देशको 'एनार्मस डिफिकल्टीज' की (अन्तर्तम
या अत्यन्त भीतरी कठिनाइयोंकी) बातें किता?मे पढी थीं,
कानोंसे सुनी थी, पर आज उन डिफिकल्टीजको (कठिनाइयोको)
पार करनेका चेहरा भी आंखोंसे देस लिया। बस ।
४ अक्टूबर, १६३०
है
'नेमेन' जहाज
हमारे
'मारे देशमे पालिटिक्सको जो लोग सालिस पहलवानी समझते हैं,
उन लोगोने सब तरहकी ललितकलाओंको पौरुपका विरोधी
मान रखा है। इस विषयों में पहले हो लिस चुका है।
रूमका जार किसी दिन दशाननके समान सम्राट् था, उसके
साम्राज्यने पृथ्वीका अधिकाश भाग अजगर सर्पकी तरह निगल
लिया था, और पूंउसे ऐंठनसे भी जिसको उसने लपेटा उसके
भी हाड-गोड पीस डाले।
लगभग तेरह वर्ष हुए होगे, उसी जारके प्रतापक साथ
क्रान्तिकारियोंकी लडाई ठन गई थी। सम्राट् जन मय अपने
सानदानके लुम हो चुका, उसके बाद भी उसके अन्य सम्बन्धी
लोग दौड-धूप करने लगे और अन्य साम्राज्य-भोगियोंने अस्त्र
और उत्साह देकर उनकी सहायता की। अन समझ सकते

유 रूसकी चिट्ठी क्रान्तिकारियोने धर्म-मन्दिरोंकी चहारदीवारीको तोडकर उन्हे सर्वसाधारणको सम्पत्ति बना दिया है। पूजागरी सामग्रियों को छोडकर बाकी सन सामान म्यूजियममें इकट्ठे किये जा रहे हैं। इधर जन कि आत्म-विप्लव चल रहा है, चारो ओर टाइफाइडका प्रवल प्रकोप हो रहा है, रेलके मार्ग सब नष्ट कर दिये गये हैं-ऐसे समयमें वैज्ञानिक अन्वेपकगण आसपासके क्षेत्रमे जा-जाकर प्राचीन कालकी शिल्प-सामग्रियों का उद्धार कर रहे हैं। इननी पोथियां, इतने चित्र, इतने खुदाईके कामके अलभ्य नमूने सग्रह किये हैं कि जिसकी हद नहीं। यह तो हुआ धनिकोंो मकान और धर्म-मन्दिगेमें जो कुछ मिला, उसका वर्णन । यहाँके मामूली किसान कारीगरोंकी बनाई हुई शिल्प-सामग्रियों, प्राचीन कालमें जिनकी अवज्ञा की जाती थी, उनका मूल्य भी ये समझने लगे हैं, और उधर इनकी दृष्टि है। सिर्फ चित्र ही नहीं, बल्कि लोक-साहित्य और लोक-संगीत आदिका काम भी बड़ी तेजीसे चल रहा है। यह हुआ इनका सग्रह । इन संग्रहोके द्वारा लोक-शिक्षाको व्यवस्था की गई है। इससे पहले ही में इस विषयमे तुम्हें लिख चुका है। इतनी, वार्ने मैं जो तुमको लिस रहा हू, उमका कारण यह है कि अपने देशवासियोंको मैं जता देना चाहता हूँ कि आजसे केवल दस वर्ष पहले रूसको साधारण जनता हमारे यहाँकी वर्तमान साधारण जनताके समान ही थी, सोवियट-शासनमे उसी श्रेणीके LA ।

सोवियट विद्यार्थियोर्म रवीन्द्रनाथ

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Phes-m
किया जाय,
वसूल करनेका
८१
रूसको चिट्ठी
रोगोंको शिक्षाफे द्वारा आदमी धना देने का आदर्श फितना ऊँचा
है। इसमें विज्ञान, साहित्य, मगीत, चित्रकला सभी कुछ है,
मयांत् हमारे देशमें भद्र-नामधारियोंके लिए शिक्षाका जैसा कुछ
मायोजन है, यहाँकी व्यवस्था उससे कहीं अधिक सम्पूर्ण है।
असनारोंमे देखा कि फिलहाल हमारे देशमें प्राथमिक
शिक्षाका प्रचार करनेके लिए हुफ्म जारी किया गया है कि प्रजासे
कान पकडकर शिक्षा-फर
और
भार दिया गया है जमींदागेपर। अर्थात् जो मे ही अधमरे
पडे हैं, शिक्षाके बहाने उन्हींपर घोझ लाद दिया है।
शिक्षा-र जरूर चाहिए, नहीं तो खचर्चा कहासे चलेगा?
परन्तु देशके हितके लिए जो कर है, उसे सन कोई मिलकर क्यों
नहीं देंगे ? सिविल सर्विस है, मिलिटरी-सर्विस है, गवर्नर, वायसराय
और उनके सदस्यगण है, उनकी भरी जेबोंमें हाथ क्यो नहीं
पडता ? वे क्या इन किसानों को ही रोजीमे से तनखाह और
पेन्सन लेकर अन्तमे देशमे जाफर उसका भोग नहीं करते।
जूट-मिलोंके जो बडे-बड़े विलायती महाजन सन उपजानेवाले
किसानो के सनसे मोटा मुनाफा उठाकर देशको रवाना कर दिया
फरते हे, उनपर क्या इन मृतप्राय किसानोंको शिक्षाका जरा भी
दायित्व नहीं हैजो मिनिस्टरवर्ग शिक्षा-कानून पास करनेमे
भर-पेट उत्साह प्रकट करते हैं, उन्हें क्या अपने उत्साहकी
कानीकोडी कीमत भी अपनी जेबसे नहीं देना चाहिए?
क्या इसोका नाम है शिक्षासे सहानुभूति ? मैं भी तो
n6

रूसको चिट्ठो ८२ एक जमीदार हु, अपनी प्रजाकी प्राथमिक शिक्षा लिए कुछ दिया भी फरता हू-और भी दो-तीन गुना मगर देना पड़े, तो देनेको तैयार ह , परन्तु यह बात उन्हें प्रतिदिन समझा देना जरूरी है कि में उनका अपना आदमी हू, उनको शिक्षासे मेरा ही हित है, और हम ही उन्हें देते हैं, राज्यके शासनमे ऊपरसे लेकर नीचे तक जिनका हाथ है, उनमेसे कोई भी एक पैसा अपने पाससे नहीं देता। सोवियट-रूसके जनसाधारण की उन्नतिका भार बहुत ही ज्यादा है, उसके लिए आहार-विहारमे लोग कम कष्ट नहीं पा रहे हैं, परन्तु उस कष्टका हिस्सा ऊपरसे लेकर नोचे तक सबने समान रूपसे बांट लिया है। ऐसे कष्टको कष्ट नहीं कहगा, वह तो तपस्या है। प्राथमिक शिक्षाके नामसे सरसो-भर शिक्षाका प्रचलन कर भारत-सरकार इतने दिनों बाद दो सौ वर्षका कलक धोना चाहती है, और मजा यह कि उसके दाम वे ही देंगे, जो दान देनेमे सबसे ज्यादा असमर्थ हैं, सरकारके लाडले अनेकानेक बाहनोंपर तो आंच तक न आने पायेगी-चे तो सिर्फ गौरव-भोग करनेके लिए है। मैं अपनी मांसोसे न देखता तो किसी कदर भी विश्वास न करता कि अशिक्षा और अपमानके सदकमेसे निकालकर सिर्फ दस ही वर्पक अन्दर लाखों आदमियोको इन्होने सिर्फ क ख ग घ ही नहीं सिखाया, बल्कि उन्हें मनुष्यन्वसे सम्मानित किया है। केवल अपनी हो जातिके लिए नहीं, दूसरी जातियोंके लिए भी इन्होंने समान उद्योग किया है। फिर भी साम्प्रदायिक धर्मके लोग इन्हें अधार्मिक बताकर इनकी निन्दा किया करते हैं। धर्म क्या सिर्फ पोथियोंके मन्त्रमें है, रूसरी चिट्ठी देवता क्या केवल मन्दिरकी घेदीपर ही रहते हमनुष्यको जो सिर्फ धोसा ही देते रहत हैं, देवता क्या उनमे फहोंपर मौजूद हैं। बहुतसी नाते कहनी है। इस तरह तथ्य साह करके लिसनेका मुझे अभ्यास नहीं, पर न लिसना अन्याय होगा-इसीसे लिसने बैठा हू। रूसकी शिमा-पद्धतिके बारेमे क्रमश लिखने का मैंने निश्चय कर लिया है। कितनी ही बार मेरे मनमे आया है कि और कहीं नहीं, रूसमे आकर तुम लगोको सर देस जाना चाहिए। भारतसे बहुनसे गुपचर यहां आते हैं, क्रान्तिकारियोका भी आना- जाना बना हो रहता है, मगर में समझता हू कि और किसी चीजके लिए नदों, सिर्फ शिक्षा-सम्बन्धी शिक्षा प्राप्त करने के लिए यहाँ आना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक है। सैर, अपनी बातें लिखनेमे मुझे उत्साह नहीं मिलना। आशंका होती है कि कहीं अपनेको आर्टिस्ट समझकर अभिमान न करने लग जाऊँ। परन्तु अब तक जो चाहरसे ख्याति मिली है, वह अन्तर तक नहीं पहुची। बार-बार यही मनमें आता है कि वह ख्यानि देवके गुणसे मिली है, अपने गुणसे नहीं। इस समय बीच समुद्रमे बह रहा हूं। आगे चलकर तकदीरमे क्या बदा है, मालूम नहीं। शरीर थक गया है, मनमें इच्छाओंका उफान नहीं है। रीते भिक्षापात्रके समान भारी चोज दुनियामे और कुछ भी नहीं, जगन्नाथको उसका अन्तिम अध्य देकर न-जाने कर छुट्टी मिलेगी? ५ अक्टोबर, १६३० प D "Bremer - विज्ञानकी शिक्षामें पुस्तक पढनेके साथ आँखो से देखने योग रहना चाहिए, नहीं तो उस शिक्षाका तीन-चौट हिस्सा बेकार चला जाता है। सिर्फ विज्ञान ही क्यों, अधिक शिक्षाओं पर यही घात घटती है। रूसमे विविध विषयो म्यूजियमो -द्वारा उस शिक्षामे सहायता दी जानी है। ये म्यूजिय सिर्फ बडे-बडे शहरो मे ही नहीं, बल्कि हर प्रान्तमें छोटी-छोट देहातों तकके लोगों को प्रत्यक्ष ज्ञान कराते हैं। आँसो से देखकर सीसनेकी दूसरी प्रणाली भ्रमण भी है तुम्हे तो मालूम ही है कि मैं बहुत दिनो से भ्रमण-विद्यालयो सकल्पको मनमे लादे आ रहा है। भारतवर्ष इतना बडा देश है, सभी विषयों में उसका इतना अधिक वैचित्र्य है कि हटरपे गज़टियर पढकर सम्पूर्णत उसकी उपलब्धि नहीं की जा सकती। किसी समय हमारे देशमे पैदल भ्रमण करनेकी प्रथा थी-और हमारे तीर्थ भी भारतमें सर्वत्र व्याप्त है। भारतवर्षको यथासम्भव समप्ररूपसे प्रत्यक्ष जानने और अनुभवमें लानेका यही उपाय या । फेवल शिक्षाको लक्ष्य बनाकर पांच वर्ष तक छात्रो को यदि रूसकी चिट्ठी सारा भारतवर्ष घुमाया आय, तो उनकी शिक्षा पक्की शिक्षा हो सकती है। मन जब सचल रहता है, तब वह शिक्षाके विषयों को सरलतासे ग्रहण कर सकता है और उसका परिपाक भी अच्छा होता है। बंधी हुई खुराकके साथ-साथ जैसे गायो को खेतो मे चरकर साने देना भी जरूरी है, उसी तरह बंधी हुई शिक्षाके साथ-ही-साथ चरकर शिक्षा ग्रहण करना भी हृदय या मनके लिए अत्यन्त आवश्यक है। अचल विद्यालयों में कैद रहकर अचल श्रेणी या कासो को पुस्तको की खुराफसे मनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। पुस्तको की आवश्यकताको एकदम अस्वीकार नहीं किया जा सकता-मनुप्यके लिए ज्ञानके विषय इतने अधिक हैं कि खेतमे चरकर पूरा पेट नहीं भरा जा सकना, भडारसे ही उन्हे अधिकतर लेना पड़ता है। परन्तु पुस्तको क विद्यालयको साथ लेकर यदि प्रकृतिके विद्यालयमे भी छात्रो को घुमाया जाय, तो फिर किसी तरहकी कमी न रहे। इस विषयमे बहुतसी बातें मेरे मनमे थीं और आशा थी कि यदि पूंजी मिले, तो किसी समय शिक्षा-परिखजन चला सकूगा , परन्तु अब मेरे पास समय भी नहीं है और पूँजो भी नहीं मिल सकती। सावियट-रूसमें, जैसा कि देस रहा हू, सर्वसाधारणके लिए देश-भ्रमणकी व्यवस्थाका भी काफी प्रसार हो रहा है। निशाल इनका देश है, विचित्र जातियोके मनुष्य उसके अधिवासी है। जारके शासनकालमे एक तरहसे इनको परस्पर भेंट-मुलाकात, जान-पहचान -- रुसको चिट्ठी . और मिलने-जुलनेकी सुविधाए प्राप्त नहीं थीं। यह तो कहना ही व्यर्थ है कि उस समय देश-भ्रमण एक शोककी चीज़ थी, और वह धनाढ्यो के लिए ही सम्भव था। सोवियटके ज़मानेमें सर्व- साधारणके लिए उसकी व्यवस्था है। परिश्रमसे थके हुए तथा रुम मजूरों की थकावट और रोग दूर करनेके लिए पहलेसे ही सोवियटों ने दर और निकटवर्ती अनेक स्थानों में स्वास्थ्य-निवामो की स्थापनाके लिए उद्योग किया है। पहले जमानेके बडे-बडे महल-मकानो को उन लोगों ने इसी काममे लगा दिया है। उन सब स्थानों में जाकर जैसे विश्राम और आरोग्य लाभ करना एक लक्ष्य है, उसी तरह दूसरा लक्ष्य शिक्षा प्राप्त करना भी है। लोक-हितके प्रति जिनका अनुराग है, इस भ्रमणके समय वे नाना स्थानोंमे जाकर नाना प्रकारके मनुप्योंकी अनुकूलताके विपयमे भी चिन्ता करते हैं, और यही उसके लिए अच्छा अवसर है। जनसाधारणको देश-भ्रमणके लिए उत्साहित करने और उसके लिए उन्हें सुविधाएँ देनेके लिए रास्तेमे बीच- चीचमे सास-सास विपयोंकी शिक्षा देनेके योग्य सस्थाएँ सोली गई है, वहाँ पथिकोंके साने-पीने और रहने-सोनेका इन्तजाम है , इसके सिवा सब तरहके जरूरी विषयोंमें वहाँसे उन्हें अच्छी सलाह भी मिल सकती है। काकेशिया प्रान्त भूतत्त्वकी आलोचनाके लिए एक उपयोगी स्थान है। वहीं इस तरहके पान्थ-शिक्षालयोंमें भूतत्त्वके । सम्बन्धमे विशेष व्याख्यान दिये जाते हैं। जो प्रान्त विशेष रूपसे मनुष्यतत्त्वकी आलोचनाके रूसको चिट्टी लिए उपयुक्त हैं, उन स्थानोंमे मनुप्यतत्त्वो विशेपज्ञ उपदेशक तैयार किये गये है। गरमियोंके दिनोंमें हजारो भ्रमणेच्छु दफ्तरोंमे जाकर अपने नाम दर्ज कराते हैं। इस तरहकी यात्राएं मई महीनेसे शुरू होती हैं--प्रतिदिन दलके दल नाना मार्गोसे यात्रा करनेके लिए निकल पडने है-एक-एक दलमे पचीस-तीस यात्री होते हैं। सन् १६२८ मे इन यात्रि-सधोके सदस्योकी सस्या थी तीन हजारके लगभग–२६ मे उनकी सस्या हुई है वारह हजारसे भी ऊपर । इन विषयमें यूरोपके अन्य स्थानो या अमेरिकासे तुलना फरना ठीक न होगा, हमेशा याद रखना चाहिए कि रूसमें माजसे दस वर्ष पहले मजदूरोकी दशा हमारे ही समान थी,- इस वानका किसीको आभास तक न था कि वे शिक्षा प्राप्त करेंगे, विश्राम करेंगे या स्वास्थ्य-सम्पन्न होंगे,—आज लोगोंको जो मुविधाएं सहज ही में मिल रही हैं, वे हमारे यहाँके मध्यम श्रेणीके गृहस्थोंके लिए तो आशातीत हैं और पनिको के लिए भी सहज नहीं है। इसके सिवा यहां शिक्षा प्राप्त करनेकी चारा सारे देश-भरमे एकसाथ इतनी प्रणालियो से वह रही है कि सिविल-सर्विससे सरभित हमारे देशवासी उसकी कल्पना ही नहीं कर सकते। जैसी शिक्षाको व्यवस्था है, वैसी ही स्वास्थ्यकी। स्वास्थ्य- तत्त्वफे विपयमे सोवियट-रूसमे जैसा वैज्ञानिक अनुशीलन हो रूसको चिट्ठी रहा है, उसे देखकर यूरोप और अमेरिकाके विद्वान भी इनकी मुक्तकठसे प्रशसा करते हैं। सिर्फ मोटी तनसावाले विशेषज्ञोंसे पुस्तकें लिखवाना ही इनके कर्तव्यकी हद हो, सो थात नहीं, ये तो इस कोशिशमे है कि साधारण जनतामे भी स्वास्थ्य- विज्ञानफे प्रयोगोको व्याप्त कर दें, यहाँ तक कि देशकी चौरंगीसे जो बहुत दूर रहते है, वे भी अस्वास्थ्यफर अपस्थामे विना सेवा और इलाज न मरने पावें-वहां तक ये अपनी पूरी दृष्टि दौडाते है। - हमारे देशमें घर-घर यक्ष्मा या क्षयरोग फैला हुआ है-- रूस आनेके वाद इस प्रश्नको मनसे दूर कर हो न सका कि हमारे यहां गरीब मुमपुओके लिए कितने आरोग्याश्रम हैं ? इस समय यह प्रश्न मेरे हृदयमे इसलिए और भी उठ सडा हुआ है कि ईसाई धर्मयाजक लोग भारत-शासनकी बडी-भारी डिफिकल्टीजके बारेमे अमेरिकावालोके सामने रोया-झोंका करते हैं। डिफिकल्टीज हे क्यों नहीं, जरूर है। एक ओर उन डिफिकल्टीज़ो की जडमे है भारतीयोंको अशिक्षा और दूसरी ओर है भारत-शासनकी बहुव्ययिता-अनापशनाप सर्च। उसके लिए किसे दोप दिया जाय १ रूसमे अन्न-वस्त्रका अभाव आज भी दूर नहीं हुआ है , रूस भी बहु-विस्तृत देश है, वहां भी बहुत विचित्र जातियोका वास है, वहां भी अज्ञान और स्वास्थ्यतत्वके विषयमें पर्वन-प्रमाण अनाचार मौजूद था, परन्तु फिर भी, न तो वहां शिक्षा-प्रचारमें किसी तरहकी आधा है ,

८६
रूसको चिट्ठी
और न स्वास्थ्य-प्रचारमे कोई अड़चन, इसीलिए विना प्रश्न
किये रहा नहीं जाता कि डिफिकल्टोज दर-असल हैं किस
जगह?
जो मेहनत-मजदूरी करके पेट भरते हैं, उन्हें सोवियट
स्वास्थ्य य-निवासोंमे गिना सर्चकै रहने दिया जाता है, और उन
स्वास्थ्य-निवासोंके साथ-ही-साथ आरोग्य-आश्रम ( Sanatorrum)
भी होते है। वहां सिर्फ चिकित्सा हो नहीं, वरिक पथ्य और
शुश्रूपाकी भी उचित व्यवस्था रहती है। ये सभी व्यवस्थाएं
सवसाधारणके लिए हैं, और सर्वसाधारणमे ऐसो सभी जातियां
शामिल हैं, जिन्हें यूरोपीय नहीं कहा जा सकता, और यूरोपके
आदर्शक अनुसार जिन्हें असभ्य कहा जाता है।
इस तरहकी पिछडी हुई जातियोको-जो यूरोपीय रूसके
फिनारे या बाहर वस रही है—शिक्षाके लिए सन् १६२८ फे
बजटमें कितने रुपये स्वीकृत किये गये है, उसे देसनेसे ही
पता चल जायगा कि शिक्षा-प्रचारके लिए इनका कसा उदार
प्रयत्न है। यूमननियन रिपब्लिकके लिए ४० करोड ३० लाख,
अति-कशोय रिपब्लिकके लिए १३ करोड ४० लारस, उजनेकिस्तानके
लिए ६ करोड ७० लास और तुर्कमेनिस्तानके लिए ० करोड
६ लास रबल मजूर किये गये है।
अनक देशोंमे अरवी लिपिका प्रचलन होनेके कारण शिक्षा
प्रचारमें अडचन होती थी, वहां रोमन लिपि चलाकर वह
अडचन दूर कर दी गई है।
-

रूसकी चिट्ठी
होती है। इसकी व्यवस्थामें कईएक कार्य-विभाग हैं, जैसे-
स्वास्थ्य-विभाग, गार्हस्थ्य-विभाग ( Household commission ),
फ्लास कमेटो आदि । स्वास्थ-विभाग देखता है कि सब कमरों
( compartments ), क्लासों और आंगन वगैरहमे सफाई रहती
है या नहीं। कोई लडका अगर वीमार पड जाय-फिर चाहे
वह मामूलीसे मामूली बीमारी क्यो न हो तो उसके लिए
डाकर बुलाने और इलाज करनेका भार इसी विभागपर है।
गार्हस्थ विभागके अन्तर्गत बहुतसे उपविभाग हैं। इस विभागका
कर्तव्य है कि वह इस बातकी देसभाल रखे कि लडके साफ-सुथरे
रहते हैं या नहीं। क्लासमे पढते समय लडकोंके आचरणपर दृष्टि
रखना फ्लास-कमेटीका काम- है। प्रत्येक विभागसे प्रतिनिधि
चुनकर अध्यन-सभा बनाई जाती है। इस अध्यक्ष-सभाके
प्रतिनिधियोको स्कूल-कौन्सिलमें वोट देनेका अधिकार प्राप्त है।
लडकोंका आपसमे या और किसीके साथ झगडा-टटा हो जाय,
तो अध्यक्ष-सभा उसकी जांच करती है, और यह सभा जो
'फैसला देती है, उसे सब छात्र मानने के लिए बाध्य है।
इस विद्या-भवनके साथ एफ फ्लव है। वहाँ अकसर
बहुतसे लडके मिलकर अपनो भापामे नाटक खेलते और
गाते-बजाते है।
क्लबका अपना एक सिनेमा भी है, जिसमें
लडकोंको मध्य-एशियाके जीवन-यात्राको चित्रावली दिसाई
जाती है। इसके सिवा. दीवारोंपर टांगनेके अखबार भी निकाले
-
जाते हैं।

FT चित्र-प्रदर्शनीमें रवीन्द्रनाथका प्रागमन

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, ६७ रूसकी चिट्ठी तुर्कमेनिस्तानको खेतीकी उन्नतिके लिए वहां काफी सख्यामें कृषि-विद्याके विशेषज्ञ भेजे जाते हैं। दो सौ से अधिक आदर्श कृषि-क्षेत्र सोले गये हैं। इसके सिवा पानी और जमीनके व्यवहारके सम्बन्धमे ऐसी व्यवस्था की गई है कि बीस हजार गरीव-सेनारीव किसान परिवारोंको खेतीके लिए खेत, पानी और कृपिके वाहन (बैल घोडे आदि) आसानीसे मिल गये हैं। इस कम प्रजावाले देशमे १३० अस्पताल सोले गये हैं, और डाकरो की सख्या है छै सौ। बुलेटिनके लेखक सलन भाषामे लिखते है "Horrever, there is no Occision to rejoice in the fact, since there are 2,640 inhabitants to each hospital bod, and as regards doctors, Tarcmenistan must be relegated to the last place in the Union, We can boast of some attainmeats in the field of modernization and the struggle against crass ignorance, though again we most warn the reader that Tarcmenistan, being on a very low level of civilization, has preserved a good many customs of the distant past However, the recent laws, passed in order to combat the selling of women into marriage and child marriages, bad produced the desired effect" तुर्कमेनिस्तान-जैसे मरु-प्रदेशमे ६ सालके अदर १३० अस्पताल सोले गये, इसके लिए ये शर्मिन्दा हो रहे हैं-ऐसी शर्म देसनेका अभ्यास हमे नहीं है, इसलिए हमे आश्चर्य हुआ। हमें अपने सामने बहुतसी डिफिकल्टीज़ दिखाई दी, और यह 7

रूसकी चिट्ठी
६८
लक्षण भी दिखाई दिया कि वे जल्दी टससे मस , होनेवाली
नहीं है, किन्तु समाल तो यह है कि उसके लिए हममें विशेष
लज्जा क्यों नहीं दिसाई देती ?
सच बात तो यह है कि मेरे हृदयसे भी इसके पहले
देशके लिए काफी आशा करनेका साहस जाता रहा था।
ईसाई पादरियों की तरह मैं भी डिफिकल्टीजों का हिसाब देसकर
दंग रह गया था-मन-ही-मन कहता था कि इतने विचित्र
जातियों के मनुष्य है, इतनी विचित्र जातियो की मूर्खताएँ हैं,
इतने परस्पर-विरुद्ध धर्म हैं, ऐसी दशामें न-जाने कितने दिन
लगेंगे अपने दु खोका चोम हटानेमें-अपने कलुप-कालिमाको
धोनेमें।
साइमन-कमीशनकी फसल जिस आब-हावमे फली है, अपने
देशके सम्बन्धमे मेरी प्रत्याशाकी भीरुता भी उसी आब-हावकी
उपज है। सोवियट-रूसमे आकर देखा कि यहाँकी उन्नतिकी
घडी हमारी ही घड़ीकी तरह बद थी-कमसे कम सवसाधारणके
घरो में , किन्तु यहाँ आज सैकडों वर्षोंसे बंद-पड़ी घडीमे
आठ-दस वर्ष चाबी भरते ही वह मज़में चलने लगी है।
इतने दिनों बाद समम सका है कि हमारी घडी भी चल
सकती थी, किन्तु चावी नहीं भरी गई। डिफिकल्टीजके मन
परसे अब मेरा विश्वास उठ गया है।
अब बुलेटिनमें से दो-चार अंश उधृत करके चिट्ठी समाप्त
फलंगा
-
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१६ रूसकी चिट्ठी "The imperialist policy of the Czarıst generals, after the conquest of Azerbaijan, consisted in conrerting the districts, inhabited by Mahommedans into colonies, destined to supply raw material to the central Russian markets" याद है, बहुत दिन हुए स्वर्गीय अक्षयकुमार मैत्रेय तब रेशमकी सेतीके बारेमे बडे उत्साही थे, उनकी सलाहसे में भी रेशमकी खेतीके प्रचारके काममें लगा हुआ था। उन्होंने मुझसे कहा था--"रेशमकी खेतीमे मजिस्ट्रेटसे मुझे बहुत-कुछ सहयोग मिला है, परन्तु जितनी धार इन कोओंसे सूत और सूतसे कपडे बुननेका काम किसानोंमे चालू करनेकी इच्छा प्रकट की, उतनी ही बार मजिस्ट्रेटने उसमे बाधा पहुचाई ।" "The agents of the Czar's Government were ruthlessly carrying out principle of 'Divide and Rale' and did all io their power to so hatred and discord between the varions races National animosities were fostered by the Government and Mahommedans and Armenians were spateipatically incited agajust each other The everrecurring conflicts between these two pations at times assumed the form of massaores अस्पतार्लोकी अल्प संख्याक विषयमे चुलेटिन-रेसकने अपनी लक्षाको स्वीकार अवश्य किया है, किन्तु एक विषयमे अपना प्रकट क्रिये मिना उनसे रहा नहीं गया "It is an undoubted fact, which eren the rorst enemies of the Soviets cannot deny for the last eight Fears the peace betweon the races of Azerbaijan lins norer been disturbed" " गौरव चलन नहीं रूसकी चिट्ठी भारतवर्षके राज्यमे लज्जा प्रकट करनेका गोग्व प्रकट करनेका भी रास्ता नहीं देखनेमें आता। इस लज्जा-स्वीकारके प्रसंगमे एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है। वह यह कि बुलेटिनमें लिखा है-सारे तुर्कमेनिस्तानमें शिक्षा लिए आदमी-पीछे पाँच रुबल सर्च किये जाते है। रुबलका मूल्स हमारे देशके रुपयेके हिसाबसे ढाई रुपया है। पांच रुवलक मतलब है साढे-धारह रुपया। इसके लिए कर वसूलीका को जरिया होगा अवश्य, पर वह ऐसा नहीं है कि जो प्रजामे अपने अदर आत्म-विरोध पैदा कर दे। ८ अक्टोबर, १६३० - % १२ - 'मेन जहाज तुर्कमेनिये कमेनियोंके विपयमे पहले ही लिख चुका हू कि वे मरुभूमि- निवासी सख्यामे दस लाख है। यह चिट्ठी उसीका परिशिष्ट है। सोवियट-सरकारने वहाँ कौन-कौनसे विद्यामदिर स्थापित फरनेका सकल्प किया है, उसकी एक सूची दे रहा हू Beginning with October 1st, 1930, the new budget year, a number of now scientific institutions and lastitutes will be opened in Turcomedia, pamely - रूसकी चिट्ठी 7 1 Turcomon Geological Committee , 2 Turcomen Iostitute of Applied Botany, 3 Institute for stady and research of stock breeding 4 Institute of Hydrology and Geophysics, 5 Institate for Economic Research, 6 Chemico-Bacteriological Institute, and lastitute of Social Hygiene The activity of all the scientific institutions of Tarcomedia will be regulated by a special scientific management attached to the Coancıl of People's Commissars of Tarcomonta lo connection with the removal of the Turconen Gorbroopt from Ashkhabad to Chardjar the construction of buildings for the following museums bas been started --Historical Agricultural, Industrial and Trade Moseann Art Museum Museums of the Revolation in addition, the constraction of an Observatory, State Library, House of published books and House of Science and Coltare is plavned The Department of Langaage and Literature of the Institute of the Torcomon Culture has completed the Tevision and trapslation into Russian of Tarcomenſan poetry incladiog folk lore material and old poetry texts, Eive itinerant caltural bases have been orgapized 10. Turcomenia Dorlog the year 1930 tro coarsos for training practical parses and midwives wero completed Altogether 46 persons were graduated All graduates are sent to the village 5972197, 9810 - वियट- विविध प्रकारके उपाय काममे लाये गये है, उसका कुछ-कु माभास पहलेको चिट्ठियोंसे मिल गया होगा। आज तुम्हें उन्हींमें- एक उद्योगका संक्षिप्त विवरण लिख रहा हूँ। कुछ दिन हुए मास्को शहरमे सर्वसाधारणके लिए एक आराम घाग कायम किया गया है। बुलेटिनमे उसका नाम दिया है- Masoow Park of Education and Recreation उसमे एक प्रधान मंडप है, जो प्रदर्शनीके लिए है। यदि कोई चाहे, त वहाँसे मालूम कर सकता है कि समस्त प्रान्तोंमे कारखानों हजारो मजदूरोंके लिए कितने अस्पताल खोले गये, मास्को प्रान्त स्कूलोंफी संख्या कितनी वृद्धि हुई, म्यूनिसिपल विभाग दिस रहा है कि मजदूरोके रहनेके लिए कितने नये मकान तयार हुए किनने नये बगीचे बने, शहरमे कितने विपयोंकी कितनी उन्नति हुई, इत्यादि । प्रदर्शनीमें अनेक प्रकारफे माडेल (नमूने ) दिसाये गये हैं, जैसे-पुराने ज़मानेकै गईनाव, आधुनिक प्राम, फल-फूल और सब्जियां पैदा करनेके आदर्श सैत, सोवियट कमान सोवियट कारखानोंमे जो यंत्र ( मशीनरी) बनाये जाते हैं, उनके नमूने, १०३ रूसकी चिट्ठी माजकलकी को-आपरेटिव व्यवस्थासे फैसे रोटी बनती है और पिछली क्रान्तिके समय कैसे बनती थी, इत्यादि। इसके अलावा और भी तरह-तरहके तमाशे हैं, और विभिन्न प्रकारके खेलके स्थान है, रोज़ एक-न-एक मेला-सा लगा रहता है। पार्कमे छोटे लडकोंके लिए एक अलग स्थान है, वहां बड़ी उम्रनाले नहीं जा सकते । प्रवेश-द्वारपर लिखा हुआ है लड़कोंको तग न फरो। यहाँ लडकोंके खेलनेके हरएक तरह के सिलौने, खेल, बचकानी थियेटर आदि है, जिनके लड़के ही सचालक है और लडके ही है अभिनेता। इस लड़कोंके विभागसे कुछ दूरीपर है Creche, हिन्दीमे जिसे 'शिशु-रक्षणी' कहा जा सकता है। पिता-माता जन पार्कमें टहलने लगते है, तो छोटे चर्चाको वे यहां घायोके पास छोड जा सकते हैं। लवके लिए एक दुमज़िला मडप ( Parillion) है। ऊपर लाइनरी है। कहीं शतरज खेलनेका सरजाम है, तो कहीं दीवालपर मानचिन और अखबार पढनेका इन्तजाम है। इसके सिवा सर्वसाधारणके लिए भोजनकी बहुत अच्छी को-आपरेटिव दुकानें हैं, वहां शरान वेचना मना है। मास्को-पशुशाला-विभागकी तरफसे यहां एक दुकान सुली है, जिसमें तरह-तरहका पक्षि-मास और पौधे विका करते हैं। प्रान्तीय शहरोंमे भी इस प्रकारके पार्क बनाये जानेका प्रस्ताव हो रहा है। जो पात विचार करने की है, वह यह है कि ये सर्वमाधारणको भद्र-साधारणफे उच्छिष्टसे आदमी नहीं बनाना चाहत। उनके लिए रूसकी चिट्ठी १०४ शिक्षा, आराम, जीवन-यात्राके सुयोग आदि पूरी तौरसे दिये जाते है। उसका मुख्य कारण यह है कि जनसाधारणके सिवा यहाँ योर कुछ है ही नहीं। समाज-प्रत्यके केवल परिशिष्ट अध्यायमें ही इनका स्थान हो सो बात नहीं, सब अध्यायोंमे ये ही हैं। और एक घटान्त देता हू । मास्को शहरसे कुछ दूरीपर पुराने जमानेका एक प्रासाद है। रूसके अभिजातवंशके काउन्ट मप्राक्सिन लोग उसमे रहते थे। पहाडके चारों तरफका दृश्य बहुत ही सुन्दर है-खेत, नदी और पहाडी जंगल है, दो सरोवर और बहुतसे मरने हैं। विशाल स्तम्भ, ऊँचे वरामदे, पुराने जमानेके असवाब, चित्र और पत्थरकी मूर्तियोंसे सुसज्जित दरखार, संगीतशाला, खेलनेके घर और लाइझेरी, नाट्यशाला, बहुतसे सुन्दर बैठकसाने-इन सबने प्रासादको अर्द्धचन्द्राकार घेर रखा है। अब उस विशाल प्रासादमे 'आलगाभो' नामसे एक को-आपरेटिव स्वास्थ्यागार खोला गया है-ऐसे आदमियोके लिए जो किसी दिन उस प्रासादमें गुलाम बनकर रहते थे। सोवियट-राष्ट्रसघमे एक को-आपरेटिव सोसाइटी है, जिसका मुख्य काम है मजदूरों के लिए मकान बनवाना , उस सोसाइटीका नाम है विश्रान्ति-निकेतन' The Home of Rest आलगाभो' स्वास्थ्यागार इसी सोसाइटीकी देखरेखमें चलता है। इस तरहके और भी चार सैनिटोरियम इसके हाथमें हैं। काम- काजको मौसिम खतम हो जानेपर कम-से-कम तीस हजार परिश्रमसे थके हुए मजदुर-किसान इन पांचों आरोग्यशालाओंमे आकर विश्राम

कर सकते है। प्रत्येक आदमी पंद्रह दिन तक यहां रह सकता है।
खाने-पीनेका इन्तजाम अच्छा और पर्याप्त है, आरामका बन्दोबस्त
फाफी है और डाकरको व्यवस्था भी ठीक है। को-आपरेटिव
पद्धतिसे चलनेवाले इन विश्रान्ति-निकेतनोंकी स्थापनाका उद्योग
क्रमश सर्वसाधारणको सहानुभूति और सम्मति प्राप्त कर रहा है।
यह ठीक है कि मजदूरोंके लिए इस ढगके विश्रामकी
आवश्यकताको और कोई देश महसूस नहीं कर सका है, और इस
विपयमे इतनी चिन्ता भी और-किसीने नहीं की है, हमारे देशके
सम्पन्न व्यक्तियोंके लिए भी ऐसी सुविधाएं मिलना दुर्लभ है।
मजदूरोके लिए इनकी कैसी सुन्दर व्यवस्था है, यह तो मालूम
हो ही गया।
अव वक़के सम्बन्धमे फैसी व्यवस्था है, इसपर कुछ
लिखता हू। वधा, चाहे वह जारज हो या विवाहित दम्पतिकी
सन्तान, दोनोमे कुछ फर्क नहीं समझा जाता। फानून यह है कि
बचा जब तफ अठारह सालका होकर बालिग न हो जाय, तव तक
उसके पालन-पोपणका भार पिता-मातापर होगा। घरपर वचोंके
पालन-पोषण और शिक्षाके लिए मा-बाप क्या कर रहे हैं, क्या
नहीं-इस विषयमें राज्य उदासीन नहीं रहता। सोलह सालकी
उमरके पहले किसी भी बालकको मेहनत-मजूरीके कामपर नहीं
लगाया जा सकता। अठारह साल की उमर तक उनके काम करनेका
समय छै घंटे है, इससे ज्यादा नहीं। बच्चोंक प्रति माता
अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं या नहीं, इसकी जांच
भार अभिभावक-विभागपर है। इस विभागके कर्मचारी यी-

शिक्षा, आराम, जीवन-यात्राके सुयोग आदि पूरी तौरसे दिये जाते हैं। उसका मुख्य कारण यह है कि जनसाधारणके सिवा यहाँ और कुछ है ही नहीं। समाज-प्रन्थके फेवल परिशिष्ट अध्यायमें ही इनका स्थान हो सो बात नहीं, सन अध्यायोंमें ये ही हैं। और एक घटान्त देता हू। मास्को शहरसे कुछ दूरीपर पुराने जमानेका एक प्रासाद है। रूसके अभिजातवशके फाउन्ट अप्राक्सिन लोग उसमें रहते थे। पहाडके चारों तरफका दृश्य बहुत ही सुन्दर है-खेत, नदी और पहाडी जंगल है, दो सरोवर और बहुतसे मरने हैं। विशाल स्तम्भ, ऊँचे वरामदे, पुराने जमानेके असवाब, चित्र और पत्थरकी मूर्तियोंसे सुसज्जित दरवार, संगीतशाला, खेलनेके घर और लाइसरो, नाट्यशाला, बहुतसे सुन्दर बैठकरसाने- इन सबने प्रासादको अर्द्धचन्द्राकार घेर रखा है। अव उस विशाल प्रासादमें 'आलगाभो' नामसे एक को-आपरेटिव स्वास्थ्यागार खोला गया है-ऐसे आदमियोके लिए जो किसी दिन उस प्रासादमें गुलाम बनकर रहते थे। सोवियट-राष्ट्रसंघमे एक को-आपरेटिव सोसाइटी है, जिसका मुख्य काम है मजदूरोंके लिए मकान बनवाना , उस सोसाइटीका नाम है 'विश्रान्ति-निकेतन' The Home of Rost. 'आलगाभो' स्वास्थ्यागार इसी सोसाइटीकी देखरेखमें चलता है। इस तरह के और भी चार सैनिटोरियम इसके हाथमें है। काम- काजको मौसिम खतम हो जानेपर कम-से-कम तीस हजार परिश्रमसे थके हुए मजदुर किसान इन पांचों आरोग्यशालाओंमे आफर विश्राम ,

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कर सकते हैं। प्रत्येक भादमी पद्रह दिन तक यहां रह सकता है।
खाने-पीनेका इन्तजाम अच्छा और पर्याप्त है, आरामका बन्दोबस्त
काफी है और डाफरकी व्यवस्था भी ठीक है। को-आपरेटिव
पद्धतिसे चलनेवाले इन विश्रान्ति-निकेतनोंकी स्थापनाका उद्योग
क्रमश सर्वसाधारणको सहानुभूति और सम्मति प्राप्त कर रहा है ।
यह ठीक है कि मजदूरोंके लिए इस ढगके विश्रामको
आवश्यकताको और कोई देश महसूस नहीं कर सका है, और इस
विषयमे इतनी चिन्ता भी और-किसीने नहीं की है, हमारे देशके
सम्पन्न व्यक्तियों के लिए भी ऐसी सुविधाएं मिलना दुर्लभ है।
मजदूरोके लिए इनकी कैसी सुन्दर व्यवस्था है, यह तो मालूम
हो ही गया।
अव बच्चोंके सम्बन्धमे फंसी व्यवस्था है, इसपर कुछ
लिरसता है। बच्चा, चाहे वह जारज हो या विवाहित दम्पतिकी
सन्तान, दोनोमे कुछ फर्क नहीं समझा जाता। फानून यह है कि
यचा जब तक अठारह सालका होकर बालिग न हो जाय, तब तक
उसके पालन-पोपणका भार पिता-मातापर होगा। घरपर वचाके
पालन-पोषण और शिआके लिए मा-बाप क्या कर रहे है, क्या
नहीं इस विषयमें राज्य उदासीन नहीं रहता। सोलह सालकी
उमरके पहले किसी भी घालकको मेहनत-मजूरीके कामपर नहीं
लगाया जा सकता।
अठारह सालमी उमर तक उनके काम करनेका
समय छ घंटे है, इससे ज्यादा नहीं। पचोंके प्रति माता-पिता
अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं या नहीं, इसकी जांच करनेका
भार अभिमावक-विभागपर है। इस विभागके कर्मचारी वीच-बोचमें
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रूसका विद्या १०६ देख-भालके लिए निकलते हैं देखते हैं कि बच्चाका स्वास्थ्य कैसा है, क्या पढते-लिखते हैं। अगर मालूम हुआ कि लडकोंका पालन- पोपण ठीक नहीं हो रहा है, नो पिता-माताके हाथसे बच्चोंको अलग कर लिया जाता है। मगर फिर भी चचोंके भरण-पोपणकी जिम्मेदारी मा-वापपर ही रहती है। इस तरहके लड़के-लडकियोंको पाल-पोसकर योग्य बनानेका भार पड़ता है सरकारी अभिभावकोंपर । बात असलमें यह है,-सन्तानें केवल मा-बापकी ही नहीं हैं, मुख्यतः मारे समाजकी हैं। उनकी भलाई-बुराई सारे समाजकी भलाई-बुराई है, इसलिए उनको योग्य बनानेकी जिम्मेदारी समाजकी है, क्योंकि उसका नतीजा समाजको ही भोगना पडेगा। विचार कर देखा जाय, तो परिवारकी जिम्मेदारीसे समाजकी जिम्मेदारी ज्यादा है, कम नहीं। सर्वसाधारणके विषयमें भी इनके ऐसे ही विचार हैं। इनके विचारसे सर्वसाधारणका अस्तित्व मुख्यत विशिष्ट-साधारणके लाभ या सुविधाके लिए नहीं है। सर्वसाधारण समस्त समाजका अग है, न कि समाजके किसी विशेप अंगका प्रत्यंग। अतएव उनके लिए सारा स्टेट जिम्मेदार है। व्यक्तिगत रूपसे अपने भोग या प्रतापके लिए कोई समस्त समाजको उल्लंघन कर जाय, यह नहीं हो सकता। कुछ भी हो, मैं नहीं समझता कि मनुष्यको व्यक्तिगत और समष्टिगत सीमाका इन लोगोंने ठीक तौरसे पता लगा लिया है। इस विषयमे ये फैसिस्टोंके समान हैं। यही कारण है कि समष्टिके लिए व्यष्टि (व्यक्तित्व ) को पीडा देनेमे ये लोग किसी तरहकी घाधा नहीं मानना चाहते। वे इस बातको भूल जाते है कि व्यष्टिको दुर्वल करके , रूसकी चिट्ठी समप्टिको सवल नहीं बनाया जा सकता , व्यष्टि यदि वन्धनवद्ध हो जाय, तो समष्टि स्वाधीन नहीं हो सकती। यहाँ ज़बरदस्त आदमीका एकनायकत्व चल रहा है। इस तरह एकके हाथमें देशकी बागडोर रहना कदाचित् कुछ दिनके लिए अच्छा फल दे भी सकता है, किन्तु वह स्थायी कभी नहीं हो सकता। परम्परा-रूपसे घरावर सुयोग्य नायकका मिलना कभी भी सम्भव नहीं हो सकता। इसके सिवा, अबाध शक्तिका लोभ मनुष्यकी बुद्धिमे विकार उत्पन्न कर देता है। हाँ, एक इनमें अच्छी बात है, यद्यपि सोवियट मूळ नीतिक विषयमे इन लोगोंने मनुष्यकी व्यक्तिगत स्वाधीनताको अत्यन्त निर्दयताके साथ कुचलनेमे कोई सकोच नहीं रिया, फिर भी साधारण रीतिसे शिक्षा और चर्चाके द्वारा व्यक्तिकी आत्म- शक्तिको ये बढाते ही जा रहे हैं फैसिस्टोंकी तरह लगातार उसे पीसते ही नहीं रहे। शिक्षाको अपने विशेष मतको अनुगामी बनाकर कुछ शक्तिके बलपर और कुछ मोहमत्रके जोरसे एकमुसी कर डाला है, फिर भी सर्वसाधारणको बुद्धिका काम बंद नहीं किया है। यद्यपि सोवियट-नीतिके प्रचारके सम्बन्धमें इन लोगोंने युक्ति-बलके ऊपर भी वाहुवलको सडा कर रखा है, फिर भी युक्तिको निलकुल छोडा नहीं है, और धर्म-मूढता और समाज-प्रथाको अन्धतासे सर्वसाधारणके हृदय-मनको मुक्त रसनेके लिए प्रनल उद्यम किया है। मनको एक तरफसे स्वाधीन बनाकर दूसरी ओरसे अत्याचारोंसे उसे वश करना सहज काम नहीं है। भयका प्रभाव कुछ दिन काम कर सकता है, अन्तमें उस भीरुताको धिकारकर शिक्षित मन किसी . - रूसकी चिट्ठी ११२ सम्राटोकी भी यही प्रवृत्ति थी। फिनिश लोग समुद्रोंके किनारे-किनारे वाणिज्य करते रहे, पर राज्यको छीना-झपटीसे वे दूर ही रहे। एक दिन यूरोपसे वणिकोंके जहाज जब पूर्व महादेशके घाटोंपर आ-आकर जमा होने लगे, तबसे संसारके मानव-समाजके इतिहासमे एक नया अध्याय क्रमश प्रकट होने लगा , क्षात्र- युग चला गया, वैश्ययुगने पदार्पण किया। इस युगमे वणिकोंका दल विदेशोंमे पहुचकर वहाँके बाजारोंके पिछवाडेमें अपना गज्य स्थापन करने लगा। मुख्यतः वे मुनाफेके अंकोको घढाना चाहते थे-~वीर धनकर सम्मान प्राप्त करना उनका लक्ष्य न था। इस कामके लिए उन्होंने अनेक तरहके कुटिल हथकडोंसे काम लिया और उसके लिए वे जरा भी लज्जित नहीं थे, कारण वे चाहते थे सिद्धि-कीर्तिसे उन्हें कोई मतलब नहीं था। उस समय भारतवर्ष अपने विपुल ऐश्वर्यके लिए ससारमे प्रसिद्ध था-उस जमानेके विदेशी ऐतिहासिकगण धार-बार इस बातकी घोपणा कर गये हैं। यहां तक कि स्वय । क्लाइवने कहा है- भारतवर्षकी धनशालिताके विषयमें जन विचार करता हू, तो मैं अपने अपहरण-नैपुण्यके संयमसे आप ही विस्मित हो जाता है।" इतना-विपुल-धन ऐश्वर्य, यह कभी भी सहजमें नहीं हो सकता–भारतवर्पने इसे स्वय ही उत्पन्न किया था। तब विदेशसे आकर जो यहाँके राज्यासनपर बैठे थे, उन्होने इस धन-ऐश्वर्यका भोग किया, पर उसे नष्ट नहीं किया। अर्थात् वे भोगी थे, किन्तु बणिक न थे।

रवीन्द्रनाथ चित्र प्रदर्शनीमें रवीन्द्रनाथ

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ढकनेसे ढका नहीं जा सकता। इस देशी वर्तमान सस
११३
उपसहार
उसके बाद वाणिज्यके मार्गको सुगम करनेके लिए विदेशी
चणिोंने अपने कारोबारकी गद्दीपर राज्यका तख्त बिठाया।
समय उनके अनुकूल था।
नर मुगल राज्यमे घुन लगना शुरू
हो गया था, मरहठे और सिस मुगल-साम्राज्यकी मज़बूत जजीरकी
कडियो को काटनेमे लगे हुए थे, इतनेमें अगरेजो का हाथ लगा
और उनका हाथ लगते ही वह छिन्न-भिन्न होकर ध्वसके रास्तेपर
चला गया
और भी प्राचीनकालमे जब राज-गौरवक लोलुप इस देशमें
राज्य करते थे, तर यहाँ अत्याचार, अन्याय और अव्यवस्था
थी ही नहीं, यह बात नहीं कही जा सकती , मगर फिर भी
वे थे इम देशके हो अग। उनके पैने नाखूनोसे देशके शरीरपर
जो दाग या धाव-से पड गये थे, वे सिर्फ चमडेपर ही थ,
रक्तपात भी काफी हुआ था, मगर उससे अस्थि-बन्धन ढीले
नहीं हुए। धन-उत्पादनके विचित्र कार्य उस समय ज्योंके त्यों
चल रहे थे, यहां तक कि नवाब वादशाहोकी तरफसे भी उनमे
सहारा मिला था। अगर ऐसा न होता, तो यहाँ विदेशी धणियों की
भीड इतनो न जमने पाती,-मरुभूमिमे टिड्डियोंका क्या काम ?
उसके बाद भारतमे वाणिज्य और साम्राज्यके अशुभ
सगमकालमें बणिक राजा देशके धन-कल्पतरकी जएको किस
तरह सोदने लगे, इसका इतिहास सैकडो धार कहा हुआ और
अत्यन्त कर्णकटु है। परन्तु पुराना होनेसे उसे स्कृितिक
n. 8

रूसकी चिट्ठी ११४ दरिद्रताफी भूमिका तो वहींसे है। भारतवर्ष किसी दिन धन- महिमामे सर्वश्रेष्ठ था, परन्तु उसकी वह महिमा न-जाने किस वाहनपर बैठकर द्वीपान्तरको चली गई, अगर हम इस घातको भूल जाय, तो ससारके आधुनिक इतिहासकी एक तत्त्वपूर्ण बात ही छूट जायगी। आधुनिक राजनीतिकी प्रेरणाशक्ति वल-वीर्यका अभिमान नहीं है, वह है धनका लोभ , और इस तत्त्वको हमे याद रखना चाहिए। राज-गौरवके साथ प्रजाका एक मानविक सम्बन्ध रहता है, किन्तु धन-लोभके साथ वह रह ही नहीं सकता। धन निर्मम है, निर्दय है, नैयक्तिक है। जो मुरगी सोनेके अंडे देती है, लोभ सिर्फ उसके अडोको ही टोकरीमे उठा ले जाता हो, सो यात नहीं , वह मुरगी तकको जिबह कर डालता है। चणिक-राजके लोभने भारतकी धन-उत्पादनकारी विचित्र शक्तिको ही पगु कर दिया है। वची है सिर्फ कृपि, नहीं तो कच्चे मालका पाना उनके लिए बंद हो जाता और विदेशी मालके बाज़ारमें हमारी मूल्य देनेकी शक्ति बिलकुल ही नष्ट हो जाती। भारतकी रोजमर्राकी जीविका इस अत्यन्त क्षीण घृन्तपर अवलम्बित है। यह बात मान लेते हैं कि उस जमानेमें जिस निपुणता और जिन तरीको से हाथका काम चलता था और कारीगर लोग जिससे अपनी गुजर करते थे, यत्र (मशीनरी ) की प्रतियोगितामें वे सर अपने आप ही निष्क्रिय हो गये है। इसलिए प्रजाकी - उपसंहार रक्षाके लिए यह बहुत ही आवश्यक था कि हर तरहसे उन्हें चत्र-कुशल बना दिया जाय। जान बचानेके लिए मभी देशोमें आज यह उद्योग प्रमल है। जापानने थोड समयकं अदर धनके यत्र-साहनको अपने कावूमें कर लिया है। मगर वह ऐसा न फरता, तो 'यत्री यूरोप' के पडयनसे वह धन और प्राण दोनोंसे ही हाथ धो बैठता। हमारे भाग्यमे वह भी नहीं बदा था, क्योंकि लोभ ईर्ष्यालु होता है। उस जबर्दस्त लोभके मारे हमारे धन-प्राण सूखे जा रहे है, उसके बदले राजा हमे सान्त्वना देनेके लिए कहते है-"अब जो धन-प्राण थोडा-बहुत घाकी बचा है, उसकी रक्षाके लिए कानून और चौकीदारोंकी व्यवस्थाका भार हमपर रहा।" इधर हम अपने अन्न-वन और विद्या- बुद्धिको गिरवी रसकर मौतके किनारे खड़े हुए चौकीदारोंकी वर्दोका खर्च जुटा रहे हैं। यह जो घातक उपेक्षा या सदासीनता है, इसकी जडमे है लोभ । सर तरहकी ज्ञानशक्ति और फर्मशक्तिका जहाँ झरना था पीठस्थान है, वहांसे बहुत नीचे सड हुए अव तक हम मुँह वाये ऊपर ही की ओर देयते आ रहे हैं, और उस बलोकसे बराबर यही आश्वासवाणी सुनते आ रहे हैं-- "तुम्हारी शक्ति यदि क्षय हो रही है, तो तुम्हे डर क्सि बातका ? हमारे पास शक्ति है, हम तुम्हारी रक्षा करेंगे।" जिसके साथ लोभका सम्बन्ध है, उससे मनुप्य मतलय साधता है, फ्भी भी उसका सम्मान नहीं करता। और जिसका सम्मान नहीं करता, उमफी मांगतो वह उहाँ तक बनता है " रूसको चिट्ठी ११६ छोटा बनाये रखता है। अन्तमे वह असम्मानित मनुष्य इतना ज्यादा सस्ता हो जाता है कि उसके बडेसे घडे अभावमे भी थोडासा सर्च करना भी उनको सटकने लगता है, जो बराबर उससे अपना मतलन गांठने रहे है। हमारे प्राण और मनुष्यत्वकी रक्षाके लिए कितना कम दिया जाता है, इस बातको सभी जानते है। सानेके लिए अन्न नहीं, जाननेके लिए विद्या नहीं, इलाजके लिए वैद्य नहीं, पानीके लिए पानी निकालना पड़ता है कीच छानकर, मगर फिर भी हमारे चारों तरफ चौकीदारोंका जमघट है, और है मोटी तनखा पानेवाले अफसरोंकी भीड, जिनका वेतन गल्फ-स्टीमकी तरह सब चला जाता है ब्रिटिश द्वीपके शीत-निवारण के लिए, और अन्तमे उनकी पेन्शन चुकानी पडती है हमे अपनी अन्त्येष्टि-क्रियाके सर्चमे से। इसका एकमात्र कारण-लोभ अन्धा है, लोभ निष्ठुर है-~भारत भाग्तेश्वरोंके लोभकी सामग्री है। फिर भी, कठिन वेदनाको अवस्थामे भी, इम वातको मैं कभी भी अस्वीकार न करूंगा कि अपेजोंके स्वभावमे उदारता है, विदेशी शासन-कार्यमे अन्य यूरोपियनोंका व्यवहार अगरेजोंसे भी कृपण और निष्ठुर है। अगरेज जाति और उसकी शासन-नीतिक सम्बन्धमें वर्चन और आचरणसे हम जैसी विरुद्धता प्रकट करते है, और किसी जातिके शासनकर्ताओंके सम्बन्धमे वैसा करना सम्भव न होता , और यदि होता भी तो उसकी दण्डनीति और भी बढकर असह्य होती , सास यूरोपमे, यहाँ उपसहार तक कि अमेरिकामे भी, इसके प्रमाणों का अभाव नहीं है। प्रकाश्य रूपसे विद्रोहकी घोपणा करते समय भी, राजपुरुपोंके द्वारा पीडित किये जानेपर हम जब विस्मयके साथ शिकायत करते हैं, वन प्रमाणित हो जाता है कि अगरेज जातिके प्रति हमारी गूढ़ श्रद्धा मार सात-साते भी मग्ना नहीं चाहती। अपने देशी राजा या जमींदारोंसे हमें और भी कम आशा है इग्लेण्डमे रहते ममय एक वातपर मेने लक्ष्य किया है कि भारतमें दिये गये कठोर दडोके विपयमें ग्लानिजनक कोई समाचार वहाँके असनारोमे नहीं पहुचने पाते । इसका एकमात्र कारण यह नहीं है कि वे डरते है कि कहीं यूरोप या अमेरिकामे उनकी निन्दा न होने लगे। वास्तनमे फूडे अगरेज शासनकर्ता अपनी ही जातिकी शुभवुद्धिसे डरते हैं , अगरेजोके लिए छाती ठोकार यह कहना कि-'अच्छा किया है, ठीक किया है, जरूरत थी जबरदस्ती करनेकी' सहज नहीं है , कारण, अगरेजोमे उदार-हृदय मौजूद है। भारतके सवधमे सची बातें बहुत कम अगरेज जानते हैं। वे अपनेको धिकारें तो किस बातपर, उसके कारण तो उन तक पहुचते ही नहीं। यह सच है कि जिसने भारतका नमक बहुत दिनों तक साया है, उसका अगरेजी यकृत और हृदय कलुपित हो गया है, फिर भी दुर्भाग्यसे वे ही हमारे 'ऑथरिटी' हैं। भारतमें वर्तमान आन्दोलनके समय जो दमनचक्र चलाया गया है, उसके विषयमे हमारे भाग्य-विधाताओं का कहना है कि वह बहुत ही मामूली था। इस बातको माननेके लिए हम बिलकुल तैयार . .. रूसकी चिट्ठी नहीं हैं, किन्तु अतीत और वर्तमान शासन-नीतिमे तुलना करनेसे उनकी बातको अत्युक्ति नहीं कहा जा सकता। हमने मार खाई है, अन्यायपूर्ण मार भी काफी साई है , और सबसे बढकर कलंककी बात है गुप्त मार, उसकी भी कमी कभी नहीं रही। यह भी कहना पडेगा कि अधिकाश मौकोंपर माहात्म्य उन्हींका है, जिन्होंने मार साई है । जिन्होंने मारा है, उन्होने अपना सम्मान ही सोया है। परन्तु साधारण राज्य-शासननीतिके आदर्शके अनुसार हमारी मारकी मात्रा अवश्य ही बहुत कम कही जा सकती है । रमासकर जब कि हमसे उनका रक्तका कोई मम्बन्ध नहीं था, और दूसरे, समस्त भारतवर्षको 'जालियानवाला बाग' बना डालना बाहुबलको दृष्टिसे उनके लिए कोई असम्भन बात नहीं थी। अमेरिकाकी समग्र नीग्रो-जाति युक्तराज्यसे अपना सम्बन्ध त्यागने के लिए स्पर्धापूर्वक आन्दोलन करनेमे जुट जाती, तो कैसे वीभत्स रूपसे खूनकी नदियाँ बहती, इस वर्तमान शान्तिको अवस्थामे भी उसका अनुमान करनेमे ज्यादा कल्पना- शक्तिकी जरूरत नहीं पडेगी। इसके सिवा इटली आदिमे जो हुआ है, उस विषयमे आलोचना करना ही व्यर्थ है। परन्तु इससे सान्त्वना नहीं मिलनी,। जो मार लाठोके सिरेपर है, वह मार दो दिन बाद थक जाती है, यहाँ तक कि उसका स्वय लजित होना कोई असम्भव बात नहीं। परन्तु जो मार भीतर-ही-भीतर अपना काम करती रहती है, वह तो ज्योंकी त्यों बनी ही रहती है, उसका लोप तो होता ही नहीं। समस्त जातिको उसने भीतर-ही-भीतर कंगाल कर क्रमश

११६
उपसहार
दिया है। शताब्दियां बीत गई उसकी गति रुकी नहीं। क्रोधकी
मार रुकती है, पर लोभकी मारका अन्त नहीं।
'टाइम्स' के साहित्यिक मोडपत्रमें देसा था, Machee नामके
एक लेखकने लिसा है-भारतमें दरिद्रताका Root Cause यानी
मूल कारण है वहाँके लोगोंका निना विचारे विवाह करना
और उससे अधिक प्रजाका उत्पन्न होना।" इसका भीतरी
भाव यह है कि देशके बाहरसे जो शोपण-कार्य चल रहा है,
वह इतना दुसह न होता, यदि थोडे अनाजसे थोडेसे आदमी
हैंडिया पोछ-पछिकर अपनी गुजर कर लेते। सुनते हैं-
रेण्डमें सन् १८७१ से लेकर १६२१ तक फी-सदी ६६
आदमियोंकी वृद्धि हुई है। भारतमे पचास वर्षकी प्रजावृद्धिका
मोसन ३३ फी-सदी है। फिर एक ही मुहूर्तकी यात्रामे पृथक फल
फ्यो हुआ ? इससे मालूम होता है कि root cause प्रजावृद्धि
नहीं, बल्कि मूल करण जीविकाका अभाव है। और उसका
root (मूल) कहाँ है?
जो देशपर शासन करते हैं, और जो प्रजा उनके द्वारा
शासिन होती है, दोनोंका भाग्य यदि एक-सा हो, तो कमसे
कम साने-पहग्नेके विषयमें शिकायत नहीं हो सकती। अर्थात्
सुभिक्ष और दुर्भिक्षमे दोनों ही लगभग समान ही भाग लेते
हैं। परन्तु जहां कृष्णपक्ष और शुक्लपक्षके वीचमें महालोभ
और महासमुद्रका व्यवधान है, वहीं अमावस्याको ओर विद्या,
स्वास्थ्य, सम्मान और सम्पदको कंजूसी दूर नहीं हो सकती,

है । इसका यदि . रुसको चिट्ठी १२० और उसपर भी मजा यह कि निशीथ रात्रिके चौकीदारोंफे हाथमें सर्चलाइटका आयोजन बढ़ता ही जाता है। इस घातपर विचार करनेके लिए स्टैटिस्टिक्सकी बहुत ज्यादा नुक्ताचीनीकी जरूरत नहीं पडती कि आज एक-सौ-साठ वर्षसे भारतके भाग्यमें सर विपयोंमें दरिद्रता और ब्रिटेनके भाग्यमे सब विपयोमे ऐश्वर्य-ही-ऐश्वर्य भोग करना बदा एक पूरा चित्र अंकित करना चाहू, तो घगालमे जो किसान सन उत्पन्न करते है और सुदूर डडी (स्काटलैंड) मे जो उसका मुनाफा उठाते हैं-दोनो की जीवन-यात्राका दृश्य पास-पास रखकर देखना पडेगा। दोनो मे सम्बन्ध है लोभफा, और विच्छेद है भोगका। यह भेद डेढ सौ वर्षोंसे बढता हो रहा है, नहीं। जबसे यान्त्रिक उपायोंसे अर्थोपार्जनको बहु-गुना बढानेका रास्ता खुल गया, तबसे मध्ययुगका वीरधर्म (शिवलगे) बणिक- धर्ममे परिणत हो गया। इस भीषण वैश्ययुगको प्रथम सूचना मिली समुद्रयानके द्वारा विश्वपृथिवीके आविष्कारके साथ-साथ । वैश्ययुगकी आदिम भूमिका है दस्युवृत्तिमें। दास-हरण और धन-हरणकी वीभत्सतासे धरित्री उस दिन से उठी थी। यह निष्ठुर व्यवसाय विशेषत परदेशमें अधिक चलता था। थोडे ही दिन हुए, स्पेनवालोंने मेक्सिकोमे जाकर सिर्फ सोनेको खाने ही नहीं हडपीं, बल्कि वहाँकी सारी सभ्यताको खुनसे मिटा डाला। उस रक्त-मेघकी आंधी पश्चिमसे भिन्न-भिन्न मोको में घटा

गुप्त रास्तों से
१२१
उपसहार
भारतमे आने लगी। उसका इतिहास कहना अनावश्यक है।
धन सम्पदका स्रोत पूर्व दिशासे पश्चिमकी ओर मुडा ।
उसके बादसे पृथिवीपर कुनेरका सिंहासन स्थायी बन गया।
विज्ञानने घोषणा कर दी कि यत्रका नियम हो विश्वका नियम
है, पाह्य सिद्धि-लामके अतिरिक्त कोई नित्य सत्य नहीं है।
प्रतियोगिताको उपता सर्वव्यापी होने लगी, दस्युत्तिको भद्रवेशमे
सम्मान मिलने लगा। लोभके प्रकट और
फारसानोंमे, सानोंमे और बडी-बडी सेतियोंमें छद्मनामधारी दासवृत्ति,
मिथ्याचार और निर्दयता कैसी हिंसक बन गई है, इस विषयमें
यूरोपीय साहित्यमे रोमाचकारी वर्णन काफी देखनेमे आते है।
पाश्चात्य देशोमे जो लोग रुपया कमाते है और जो लोग
उन्हे उस काममे मदद देते है, अर्थात् धनी और मजदूरोंमें
बहुत दिनोसे विरोध चल रहा है। मनुष्यका सबसे बडा धर्म
लोम ही उस धर्मका सबसे बडा घातक है।
इस युगमें एकमात्र लोभ ही मनुष्यके समाजको झकझोरकर
उसके सम्बन्ध-वन्धनोको शिथिल और विच्छिन्न करता जा
रहा है।
एक देशमे एक ही जातिके भीतर यह निर्मम धनार्जनका
लोभ जो मेद खडा कर देता है, उसमे दुस चाह जितना
भी हो, परन्तु फिर भी वहां सुयोग (चान्स ) का दखाजा सनके लिए
समानरूपसे सुला रहता है , शक्तिमे पार्थक्य हो सकता है, पर
अधिकारमें रोक नहीं है। धनकी चकीमे आज जो वहां पीसा
है समाज।
,

रूसको चिट्ठी
१२२
।
जा रहा है, फल हो वह पोसनेवाला बन सकता है। सिर्फ
इतना ही नहीं, बल्कि वहां जो धनियों के पास धन इकट्ठा
होता है, अनेक प्रकागेसे देशके सभी लोगोंमे उसका कुछ न
कुछ अश अपने आप ही न जाता है। व्यक्तिगत सम्पत्तिपर
जातीय सम्पत्तिका भार कुछ-न-कुछ रहता ही है। सर्वसाधारणके
लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन तथा और भी अनेक तरहके
हितकर कार्य-इन सब कामोंके लिए काफी रुपयोंकी जरूरत
होती है, और देशकी इन समस्त विचित्र मांगोंको चाहे
इच्छासे हो या अनिच्छासे- लक्ष्यत हो चाहे अलभ्यत.-धनी
लोग पूग करते ही रहते है।
परन्तु भारतके जिस धनसे विदेशी वणिक या राज-कर्मचारी
धनी होते हैं, उसका कमसे कम उच्छिष्ट-जो नहींके बराबर
होता है-भारतके हिस्सेमे पड़ता है। सन पैदा करनेवाले
किसानोकी शिक्षा और स्वाथ्यका अभाव प्यासे चातककी तरह
मुंह याये पड़ा रहता है, विदेशको जानेवाले मुनाफेमे से उसे
कुछ भी नहीं मिलता। जो कुछ गया, वह बिलकुल गया-
उसमें से कुछ लौट नहीं सकता। सनकी खेती और उसमें से
मुनाफा उठानेके लिए ही गाँवके तालाब दूपित किये जाते हैं,
फिन्तु फिर भी
जलकप्टको दूर करनेमे विदेशी
महाजनोंकी ,भरी जेवमें से एक पाई भी नहीं निकलती।
यदि पानीको व्यवस्था की भी गई, तो उसका सारा खर्चा टैक्सके
रूपमें उन्हीं बणिकों द्वारा चूमे जानेवाले गरीब भूसे किसानोंको
-
असहा

१२३ उपसहार ही देना पड़ता है। सर्वसाधारणको शिक्षा देनेके लिए राजकोपमे रुपये नहीं हैं। क्यों नहीं है ? इसका मुख्य कारण है, काफी रुपया भारतको सम्पूर्णत त्यागकर बाहर चला जाता है, यह है लोभका रुपया, जिससे अपना रुपया भी पूरी तरहसे दूसरेका हो जाता है। अर्थात् पानी सूखता है इस पारके तालारका और बादल होकर उसकी वर्षा होती है उस पारके देशोंमे । उस देशके अस्पतालो और विद्यालयोके लिए यह अभागा अशिक्षित अस्वस्थ मुमूर्षु भारतवर्ष हमेशा अप्रत्यक्ष रूपसे रसद जुटाता आ रहा है। देशवासियों को शारीरिक और मानसिक अवस्थामा चरम दुस-दृश्य बहुत दिनोंसे अपनी आँसोंसे देखमा आ रहा हू । दरीद्रनासे मनुष्य सिर्फ मरता ही नहीं, बल्कि अपनेको अवज्ञाके योग्य बना लेता है, इसीलिए जान साइमनने कहा है "In our view the most formidable of the evils from which India is sufferiog hare their roots in social and economic customs of long-standıog which can only be remedied by the action of the Indian poople thomselves" यह अवज्ञाकी बात है। भारतको आवश्यकताओंपर वे जिस आदर्शसे विचार कर रहे है, वह उनका अपना आदर्श नहीं है। अधिकसे अधिक धन-सम्पत्ति उपार्जन करनेके लिए जैसी शिक्षा, जसी सुविधाएँ, जैसो स्वाधीनता उन्हें प्राप्त है- जिन सुविधाओंसे उनकी जीवन-यात्राका आदश ज्ञान-कर्म-भोग .

रुसकी चिट्ठी १२४ आदि अनेक दिशाओंसे काफी पुष्ट हो चुका है-जीर्णवस्त्र शीर्ण- शरीर रोगप्लान्त शिक्षा-वंचित भारतके लिए वैसी शिक्षा, वैसी स्वाधीनता और वंसी सुविधाओं के आदर्शको वे कल्पना भी नहीं लाते, बल्कि वे तो यह चाहते हैं कि हम किसी तरह अपनी सख्या-वृद्धिको रोककर दिन काटें और सर्च घटाये और अपनी आजीविकाका गला घोंटकर उनकी जीविकाका जो बढा हुआ आदर्श है, उसका भारी योम हमेशा ढोते रहें, जिससे वह ज्योंका त्यों बना रहे। इससे ज्यादा कुछ विचारनेकी जरूरत नहीं, अतएव रेमेडी (इलाज) की पूरी जिम्मेदारी हमारे ही हाथमे है, जिन लोगोंने रेमेडीको दु साध्य कर डाला है, उनके लिए विशेप कुछ करना नहीं है। मनुष्य और विधाताके विरुद्ध इन सब अभियोगोंको स्थगित ग्सफर ही मैं अन्तरग दृष्टिसे अपने निर्जीव गांवोंमे प्राण सचार करनेके लिए अपनी अत्यन्त क्षुद्र शक्तिका कुछ दिनोंसे प्रयोग कर रहा है। इस कार्यमे सरकारको अनुकूलनाकी मेने उपेक्षा नहीं की, बल्कि उसकी मैंने इच्छा ही की है। परन्तु कुछ फल नहीं मिला, कारण वहां दर्द नहीं है-सहानुभूति नहीं है। और दर्द होना सम्भव भी नहीं, कारण, हमारी अक्षमताने-हमारी हर तरहकी दुर्दशाने हमारी मांगको बहुत कमजोर बना दिया है। देशके किसी यथार्य करने योग्य कार्यमे सरकारके साथ हमारे कार्यकर्तामोका उचित सहयोग-सम्बन्ध होना मुझे तो असम्भव-सा मालूम होता है। इसलिए, यही स्थिर रहा कि चौकीदारोंकी वर्दीका खर्च पुरा करके हमारे

१२५
उपसंहार
पास जितनी भी कोडी बचें, उनसे जो काम हो सकता है
उतना ही काम करें।
मैं ऐसे समयमे रूस गया था, जन कि भारतके राजकीय
लोभ और उससे उत्पन्न असह्य उदासीनताके रूपने मेरे हृदयमें
निराशाका अन्धकार फैला रसा था। यूरोपके अन्याय देशोंमे
ऐश्वर्यका काफी आडम्बर देसा है, वह इतना अधिक उचा
है कि देशको ईर्ष्या भी उसको ऊचाई तक नहीं पहुच सकती।
रूसमें भोगका वैसा समारोह निलकुल नहीं, शायद इसीलिए
उसका भीतरी रूप देसना सहज था।
भारतवर्ष जिससे बिलकुल ही वचित है, यहाँ उसीके आयोजनको
सर्वव्यापी बनाने का प्रबल प्रयास हो रहा है, और उसे मेने अपनी
आँखोंसे देसा है। कहना न होगा कि मैंने अपनी उस बहुत
दिनोकी भूसी दृष्टि से मर देखा है। पश्चिम महादेशके अन्य
किसी भी स्वाधिकार-सौभाग्यशाली देशवासीकी दृष्टिमे यह दृश्य
कैसा लगेगा, इस वातका ठीक-ठोक विचार करना मेरे लिए
सम्भव नहीं। अतीत कालमे भारतका कितना धन ब्रिटिश द्वीपको
रवाना हो गया है और वर्तमानमे नाना प्रणालियोंसे प्रतिवर्ष
फिनना जा रहा है, इस विषयमें सख्या-मम्बन्धी तर्क मैं नहीं
करना चाहता। परन्तु म तो स्पष्ट देस रहा हूँ और बहुतसे
अगरेज भी इस चातको स्वीकार करते हैं-कि हमारे दशका
शरीर रक्तहीन हो गया है और उसका हृदय बिलकुल दव
गया है, जीवनमे न तो आनद है, न मुस, हम भीतर बाहर

रूसकी चिट्ठी १२८ पीडित थे, और अनेक विषयोंमे जिनका दुःखभार हमसे भी ज्यादा था, उनमे ही आज शिक्षाका प्रचार इन थोडे ही वर्षांमें इतना अधिक हो गया है कि डेढ सौ वर्पमें भी हमारे देशके उच्च श्रेणीके लोगो मे उतना नहीं हुआ। हम अपने दरिद्राणा मनोरथ -स्वदेशकी शिक्षा-के सम्बन्धमे जिस दुराशाका चित्र मरीचिकाके पटपर भी नहीं सींच सकते, यहीं उसका प्रत्यक्ष रूप दिगन्तसे लेकर दिगन्त तक विस्तृत देसा। मै अपनेसे बार-बार यह प्रश्न करता हूं कि इतना बड़ा आश्चर्यजनक कार्य हुआ तो हुआ कैसे ? हृदयमे इसका उत्तर मुझे यों मिला है कि वहां लोभको बाधा कहीं भी नहीं है, इसीलिए हुआ। इस बातको विचारनेमें कहीं भी सटका नहीं होता कि शिक्षाके द्वारा सभी मनुष्य यथोचित शक्तिवान् हो जायेंगे। दूर एशियाके तुर्कमेनिस्तान-वासी प्रजाओंको भी पूरी तौरसे शिक्षा देनेमे इनको जरा भी खटका नहीं, बल्कि प्रबल आग्रह है। वे सिर्फ रिपोर्टमे इस बातका उल्लेख करके उदासीन होकर नहीं बैठे कि तुर्कमेनिस्तानवासियोके दुःख-कष्टोंके कारण उन्हींकी सामाजिक रूढियोमे मौजूद हैं। कोचिन-चायनामें शिक्षा-विस्तारके सन्बन्धमे सुना है कि किसी मासीसी पाडित्यव्यवसायीने कहा है कि भारतमें अगरेजोने देशी लोगोंको ( भारतीयोंको) शिक्षा देकर जो भूल को है, प्रान्स वैसी भूल वहाँ न कर बैठे। यह बात माननी ही पडेगी कि अगरेजोंके चरित्रमे ऐसा एक महत्व है, जिसके लिए विदेशी

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v 0 rs के प्रेसिडेन्ट प्रो० पेट्रभ और रवीन्द्रनाथ

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उस १२६ उपसहार शासन-नीतिमे वे कुछ-कुछ गलतियां कर ही बैठते है, शासनकी गफ बुनावटमे कहीं-कहीं सूत टूट ही जाता है, नहीं तो प्रतिवादके लिये हमारी जवान खुल्नेमे शायद और भी एकआध शताब्दीसरी देर हो जाती। इस वातसे इनकार नहीं किया जा सकता कि शिक्षाके अमावसे हो अशक्ति या असामथ्य अटल धनी रहती है, अतएव अशिक्षा पुलिसके डडो से कम वलबान नहीं है। मालूम होता है, लार्ड फर्जनने इस बातको कुछ-कुछ महसूस किया था। शिक्षा देनेके मम्बन्धमे उक्त फ्रासोसी पाडित्यव्यवसायी अपने देशको आवश्यकताओ या स्वार्थका जिस आदर्शसे विचार करते हैं, शासित देशकी आवश्यकताओ पर आदर्शसे विचार नहीं करते। इसका एकमात्र कारण है लोभ । जो लोभके वाहन हैं, उनके मनुष्यत्वको वास्तविकता लोभीके लिए अस्पष्ट है, उनकी मांगको हम स्वभावत ही कुछ नहीं समझते। जिनके साथ भारतके शासनका सम्बन्ध है, उनके सामने भारत आज डेढ सौ वर्षसे छोटा है-नाचीज है। इसीलिए उसकी मर्मगत आवश्यकताओंपर ऊपरवालोका उपेक्षाभाव दूर नहीं हुआ। हम क्या सात है, किस पानीसे हमारी प्यास मिट सकती है, कैसी गहरी अशिक्षासे हमारा चित्त अन्धकारपूर्ण है-इन बातोंपर आज तक अच्छी तरह उनकी दृष्टि नहीं गई। क्योंकि उनके लिए यही मुख्य धान है कि हम ही उनकी आवश्यकीय वस्तु हैं, और हमारे लिए भी जीवन- सम्बन्धी आवश्यकताएँ हो सकती है, यह बात उनके लिए n9

रूसकी चिट्ठी
फालतू है। इसके सिवा हम इतने नाचीज, इतने तुम
हुए हैं कि हमारी आवश्यकताओंका सम्मान करना उनके
असम्भव है।
भारतकी जैसी कठिन समस्या है, जिससे कि हम
तक तन-मन-धनसे मर रहे हैं, ऐसो पाश्चात्य देशोंमे कही
नहीं है। वह समस्या यह है कि भारतका समस्त
दो भागोंमे बांट दिया गया है और सत्यानासी विभागके
है लोभ । इसीलिए, रूसमे आकर जब इस लोमको ति
होते देखा, तो उससे मुझे जितना गहरा आनन्द हुआ,
शायद दूसरेको न होता। फिर भी
मूल
वातको
अलग नहीं कर सकता, वह यह कि आज जो केवल भ
ही नहीं, बल्कि सारे ससारमे ही किसी-न-किसी बडो विप
जाल बिछा दिखाई देता है, उसकी प्रेरणा है लोभ ।
किसीको कोई भय है तो उस लोभका ही है, सशय है
उस लोभका है, जितनी भी अस्त्र-शस्त्रोकी तैयारियाँ हे, जि
भी मिथ्याचरण और निष्ठुर राजनीति है, सब लोभके लि-
ओर एक तर्फका विषय है डिक्टेटरशिप, यानी गज
कार्यों में नायकतत्रका झगडा। किसी भी विषयमें नायक-प
मैं स्वय पसद नहीं करता। हानि या दडके भयको ३
रखकर अथवा भापा तथा हावभाव या व्यवहारमे जिद एफड
अपने मतके प्रचारके गस्तको बिलकुल साफ करनेकी चेष्ट
फभी भी अपने कार्यक्षेत्रमे नहीं कर सका। इसमें सन्देह नहीं
।
ܢ ܫ

उपसहार
मनायफनामें विपत्तियों बहुत हैं, उसकी नियाकी एकतानता
और नित्यना अनिश्चित है पलानेवाले और चल्नेवालो के
धीच इच्छाका असम्पूर्ण योग (मल) होनेसे विद्रोहके कारण
हमेशा यने ही रहेंगे, इमयः सिरा पल् पर्वक चलाये जानेका
अभ्यास चित्त और चरित्र घलयो घटाता है, इसको सफलता
एक ओर जहां बाहरसे दो-चार फसलोसे अजलि भर दती
दै, यहाँ दुमगे ओर उसकी भीनगे जडको सुसा देतो है।
भाग्य यदि उनको सम्मिलिन इच्छाके द्वारा ही
न यने और न पनपे, तो वह उनके लिए निरा पिंजडा बन
जाता है, दाना-पानी वहां अच्छा भी मिल सकता है,
उसे नीट (घोसला) नहीं कहा जा सकता,-वहाँ रहते-रहते
उसके पसो में स्कवा मार जाता है। यह नायकता चाहे
शाखामे हो, चाहे गुरुआमे, और चाहे राष्ट्र नेतामोमे,
मनुष्यत्वको हानि पहुचानेवाला ऐमा उपद्रव और कुछ हो हो
जनतामा
पर
नहीं सस्ता।
हमारे समाजमे इस नपुसकत्वकी सृष्टि युगोंसे होती आई
है और इसका फल गेजमरी देसता आया है। महात्माजीने
जन कहा था कि विदेशी कपड़ा अपवित्र है, तब मैंने इसका
प्रतिवाद किया था
कहा था कि विदेशी कपडा मार्थिक दृष्ट्रिसे
हानिकर हो सकता है, पर अपवित्र नहीं हो सकता। परन्तु
हमें जो शास्त्र आधारपर चलनेवाले अन्ध-चित्तको समझाना है,
नहीं तो काम नहीं हो सकता,-मनुष्यत्वका ऐसा चिरस्थायी
स

रूसकी चिट्ठी
१३२
अपमान और क्या हो सकता है ? नायक-चालित देश इसी
प्रकार मोहान्छन्न हुआ करता है, एक जादूगर जहां बिदा
हुआ, वहाँ दूसरा जादूगर आकर नया मत्र बनाकर लोगों को
मोह लेना है।
डिक्टेटरशिप एक आफ्त है, इस वातको मैं मानता हू,
और उस आफतसे आज रूसमें अनेक अत्याचार हो रहे हैं,
इस बातपर भो में विश्वास करता है। इसकी नडर्थक दिशा
जबरदस्तीकी दिशा है, वह पाप है। परन्तु मदर्थक दिशा, जो
कि शिक्षाको दिशा है, जबरदस्तीसे मिलकुल उलटी है।
देशको सौभाग्यशाली बनानेमें साधारण जनताका हृदय
सम्मिलित होना चाहिए, तभी उमको क्रिया सजीव और स्थायो
होती है। अपने एकनायकत्वके लोभमे जो लुब्ध है, अपने
हृदयको छोड़कर अन्य समस्त हृदयोंको अशिक्षाके द्वारा जड
बनाये रखना हो उनकी अभिप्राय-सिद्धिका एक मात्र उपाय है।
जाग्के राजत्वकालमें शिक्षाके अभावसे जनता मोहाच्छन्न थी,
उसपर सर्वव्यापी धर्ममूढताने अजगर सर्पकी तरह उसके चित्तको
सैकडों लपेटोसे जकड रसा था।
उस मूढताको सम्राट् बड़ी
आसानीसे अपने काममे लगा सकते थे। उस जमानेमे यहूदियों के
साथ ईसाइयोका और मुसलमानोके साथ आरमीनियोका सब तरहका
वीभत्स उपद्रव धर्मके नामपर अनायास ही हो सकता था। तब
ज्ञान ओर धक मोहमे आत्मशक्ति-हीन शिथिल और कई
भागोंमे विभक देश घाहरके शत्रुऑके सामने महज ही प्रभावित

उपसहार
हो गया था। एकनायकत्वके चिराधिपत्यके लिए ऐसी अनुकूल
अवस्था और कोई भी नहीं हो सकती।
पहले जैसी रूसको अवस्था थी, वैसी अवस्था हमारे दशमे
बहुत दिनोंसे मौजूद है। आज हमारा देश महात्माजीके
चालफत्व या नायकचके चशमे हो गया है, कल वे नहीं रहेगे,
तर इस नायकत्वके इच्छुक लोग उसी तरह अकस्मात् दिखाई
देते रहेंगे, जिस तरह हमारे देशमै धर्म-मोहितोके सामने नये-
नये अवतार और गुरु जहां-तहाँ उठ रडे होत है। चीन
देशमे आज नागफत्वको लेकर कुछ क्षमता-लोभी जबरदस्तोंमे
निरन्तर प्रल सघर्ष चल ही रहा है।
कारण सर्वसाधारणमें
वह शिक्षा ही नहीं है, जिससे वे अपनी सम्मिलिन इच्छाके
द्वारा देशका भाग्य स्वय गढ सकें, इसीलिए आज उनका सारा
देश नष्टभ्रष्ट हुमा जा रहा है। हमारे देशमें उस नायक-पदको
लेकर तनातनी या छीना-झपटी न होगी, ऐसा मैं तो नहीं
समझता-तत्र घासकी तरह दलित-विदलिन होकर गरीब ही वेचारे
मरेंगे , उसका बुरा परिणाम जो कुछ होगा, उसका फल भुगतना
पडेगा साधारण जनताको ही।
रूसमें भी आजकल नायकका प्रपल शासन देसनेमे आ
रहा है। परन्तु इस शासनने अपनेको चिरस्थायी बनानेका
एक दिन वह मार्ग पकडा था जारके शासनने-
मशिक्षा और धममोहसे जनसाधारणके मनको प्रभावित करके
भोर चाबुकोंसे उनके पौरुषको शिथिल करके। फिलहाल रूसका
मार्ग नहीं पकड़ा।

रूसकी चिट्ठी
१३८
शासनदंड निश्चल है, ऐसा मैं नहीं समझना , किन्तु शिक्षा-
प्रचारका उद्यम असाधारण है। इसका कारण यह है कि उसमें
व्यक्तिगत या दलगत किसी तरहका धनका लोभ या क्षमता
पानेकी लालसा नहीं है। एक खास अर्थनैतिक मतके अनुसार
सर्वसाधारणको दीक्षित करके-जाति, वर्ण और श्रेणीका किसी
प्रकारका भेदभाव न रसते हुए-सवको मनुष्य बना डालनेको
दुर्निवार इच्छा इनमे अवश्य है। यदि वह न होती, तो
फ्रासीसी विद्वानको वान माननी पडती कि शिक्षा देना एक
वडी-भारी गलती है।
उनको यह अर्थनैतिक मत पूरी तौरसे स्वीकार है या नहीं,
इसपर विचार करनेका समय अभी नहीं आया-क्योकि यह
मत अव तक मुख्यत केवल पोथियोंमे ही बद पडा था, ऐसे
बड़े क्षेत्रमे इतने बड़े साहसके साथ उसे मुक्ति कभी नहीं
मिली। जिस प्रबल लोभके कारण इस मतको शुबसे ही
घातक बाधाओंका सामना करना पड़ा है, उस लोभको ही इन
लोगोंने कठोरताके साथ हटा दिया है। परीक्षाओके भीतरमे
परिवर्तन होते-होते इस मतका कितना अश कहा जाकर स्थायी
होगा, इसका निश्चित उत्तर अभी कोई नहीं दे सकता।
परन्तु यह बात निश्चित रूपसे कही जा सकती है कि रूसकी
सर्वसाधारण प्रजाको इतने दिनो बाद जो शिक्षा अधिकतासे
और अनिवार्यरूपसे मिल रही है, उससे उनके मनुष्यत्वका
उत्कर्प और सम्मान स्थायी हो गया है।

-- । . ५ उपसहार वर्तमान रूसमे निष्ठुर शासनकी जनश्रुति हमेशा ही सुननेमें ती है, हो सकता है कि यह पात असम्भव न हो। ठुर शासनकी धारा वहां हमेशासे बहती आई है, सहसा का सर्वथा नाश न होना स्वाभाविक है। फिर भी वहाँ बोसे, सिनेमाओंसे, इतिहासकी व्याख्याओसे पुराने जमानेके र शासन और अत्याचारोंको सोवियट-सरकार बराबर सबके नने रस रही है। यह सरकार यदि स्वय भी इस तरहके कुर मार्गपर चल्ती है, तो लोगोंमे निष्ठुर व्यवहारके प्रति गे अधिक घृणा पैदा कर देना, और कुछ नहीं तो, अद्भुत जरूर है। सिगज उद्दौलाफी काली कोठरीकी तृशसताको सिनेमा मादि द्वाग सर्वत्र जिन किया जाता, तो उसके :-हो-साथ जालियानवाला-बागके हत्याकाडको कमसे कम ना कहनेमे कोई दोष न होता। क्योकि ऐसी दशामें विमुस - अनधारीको ही लगेगा। सोनियट रूसमें कार्ल मार्क्सको अर्थनीतिके कारण प्रजाकी कारबुद्धिको एक सचिमें ढालनेका जबरदस्त प्रयत्न हो रहा और उस जिदके कारण इस विषयमें स्वतत्र आलोचनाका ॥ जोरके साथ रोक दिया गया है। इस अपवादको मैं समझता हू। कुछ दिन पहले यूरोपके महायुद्धके समय तरह मुँह बद करना और गवर्मेन्टकी नीतिके विरुद्ध नेवालोके मत-स्वातत्र्यको जेलसाने या फांसीके तलेपर चढाकर E अन्त कर देनेकी चेष्टा की गई थी। - " ॥ . , --

रूसकी चिट्ठी
१३४
शासनदंड निश्चल है, ऐसा मैं नहीं समझता , किन्तु शिक्षा-
प्रचारका उद्यम असाधारण है। इसका कारण यह है कि उसमें
व्यक्तिगत या दलगत किसी तरहका धनका लोभ या क्षमता
पानेकी लालसा नहीं है। एक सास अर्थनैतिक मतके अनुसार
सर्वसाधारणको दीक्षित करके-जाति, वर्ण और श्रेणीका किसी
प्रकारका भेदभाव न रसते हुए--सबको मनुष्य बना डालनेको
दुनिबार इच्छा इनमे अवश्य है। यदि वह न होती, तो
भासीमी विद्वानकी बात माननी पड़ती कि शिक्षा देना एक
चडी-भारी गलती है।
उनको यह अर्थनैतिक मत पूरी तौरसे स्वीकार है या नहीं,
इसपर विचार करनेका समय अभी नहीं आया-क्योंकि यह
मत अब तक मुख्यत केवल पोथियोंमें ही वद पडा था, ऐसे
बड़े क्षेत्रमे इतने बड़े साहसके साथ उसे मुक्ति कभी नहीं
मिली। जिस प्रबल लोभके रण इस मतको शुरूसे ही
घातक बाधाओंका सामना करना पड़ा है, उस लोभको ही इन
लोगोने कठोरताके साथ हटा दिया है। परीक्षाओके भीतरसे
परिवर्तन होते-होते इम मतका कितना अश कहां जाकर स्थायी
होगा, इसका निश्चित उत्तर अभी कोई नहीं दे सकता।
परन्तु यह बात निश्चित रूपसे कही जा सकती है कि रूसकी
सर्वसाधारण प्रजाको इतने दिनों बाद जो शिक्षा अधिकनासे
और अनिवार्यरूपसे मिल रही है, उससे उनके मनुष्यत्वका
उत्कर्ष और सम्मान स्थायी हो गया है।
.

५
उपसंहार
वर्तमान रूसमे निष्ठुर शासनकी जनश्रुति हमेशा ही सुनने में
जी है, हो सकता है कि यह बात असम्भव न हो।
ठुर शासनकी धारा वहां हमेशासे बहती आई है, सहसा
का मर्वथा नाश न होना स्वाभाविक है। फिर भी वहां
मोंसे, सिनेमाओंसे, इतिहासकी व्याख्यामोसे पुराने जमानेके
र शासन और अत्याचारोंको सोवियट-सरकार वराबर मनके
हने रख रही है। यह सरकार यदि स्वय भी इस तरहके
र मार्गपर चल्ती है, तो लोगोंमे निष्ठुर व्यनहारके प्रति
= अधिक घृणा पदा कर देना, और कुछ नहीं तो, अद्भुत
जरूर है। सिराजउद्दौलाकी काली कोठरीकी नृशसताको
सिनेमा आदि द्वारा सर्वत्र लजित किया जाता, तो उसके
-हो-साथ जालियानवाला-वागके हत्याकाडको कमसे कम
। कहने में कोई दोप न होता। क्योंकि ऐसी दशामे विमुख
अत्रधारीको ही लगेगा।
सोवियट रुसमें कार्ल माकी अर्थनीतिके कारण प्रजाकी
रबुद्धिको एक साँचेमे ढाल्नेका जबरदस्त प्रयत्न हो रहा
और उस जिदके कारण इस विषयमे स्वतत्र आलोचनाका
| जोरके साथ रोक दिया गया है। इस अपवादको मैं
समझता हू। कुछ दिन पहले यूरोपके महायुद्धके समय
तरह मुँह बद करना और गवर्मेन्टको नीतिके विरुद्ध
वालोके मत-स्वातत्र्यको जेलसाने या फांसीके तख्तेपर चढाकर
अन्त कर देनेकी चेष्टा की गई थी।

रूसको चिट्टो
१३६
जहाँ शीघ्र ही फ्ल-प्राप्तिका लोभ अत्यंत प्रबल है, वहीं
राष्ट्रनायक मनुष्यके मत-स्वातत्र्यके अधिकारको स्वीकार नहीं
फरना चाहते। वे कहते है कि ये सब बातें पीछे होंगी,
फिलहाल काम सिद्ध करना चाहिए। रूसकी अवस्था युद्धकालकी
व्यवस्था है , भीतर और बाहर सर्वत्र शत्रु मौजूद हैं। वहाँकी
समस्त परीक्षाओं को नष्ट कर देनेके लिए आज चारो
ओर छल-बलसे काम लिया जा रहा है। इसीसे वे अपने
निर्माण-कार्यकी नीवको जहाँ तक हो, जल्दी पकी फर लेना
चाहते हैं, और इसीलिए चे बल-प्रयोग करनेमे हिचकिचाते
नहीं हैं। परन्तु मतलब चाहे कितना ही जरूरी क्यों न हो,
'बल' हमेशा इकतरफा चीज़ है। उससे बिगडता ही है, बनता
नहीं। सृष्टि या गठनकार्यमे दो पक्ष होते हैं , उपादानको अपने
पक्षमे लाना ही होगा-मार-पीटकर नहीं, बल्कि उसके नियमको
स्वीकार करके।
रूस जिस काममे लगा हुआ है, वह काम युगान्तरका मार्ग
तैयार करना है, उसके लिए पुराने विधि-विश्वासोंकी जडोको
पहलेकी जमीनसे उसाड फेंकना और चिर-अभ्यस्त आरामोंका
तिरस्कार करना पड़ता है। ऐसा तोड-फंकनेका उत्साह जिस
भेवरकी सृष्टि करता है, उसके चकामे आ जानेपर मनुष्यको
अपनो मत्तताका
अन्त नहीं मिलता-फिर तो उसकी स्पर्धा
और हिम्मत बढ़ जाती है , मानव-प्रकृतिको साधना करके उसे
वश करनेको आवश्यकताको वह भूल जाता है, समझता है

उपसहार १३७ कि उसके मायसे जबरदस्ती छीनकर ले जानेसे-मोताहरण जैसी घटना कर डालनेसे-उसको प्राप्त किया जा सकता है। उसके बाद लगामें भले ही आग लग जाय, उसको चिन्ता नहीं। पर्याप्त समय लेकर स्वभावके साथ समझौता करनेके लिए जिनके पास धैर्य नहीं है, वे उपद्रवमे विश्वास रखत हैं, और अन्नमें वे ठोंक-पीटकर रात-ही-रातमे जिस चीजको गढ डालते है, उसके भगेसे काम नहीं चलना और न वह अधिक दिनों तक स्थायी ही रहती है। जहां आदमो तैयार नहीं हैं, जहां लोकमत तैयार नहीं हुआ है, वहाँके उग्र दण्डनायकोपर मेरा विश्वास नहीं है। पहला कारण यह है कि अपने मतके विपयमें शुरूमे ही पूरा विश्वास कर लेना सुबुद्धि नहीं है, उसे कार्यरूपमे परिणत करते-करते ही उसका परिचय मिलता है। उधर जो नेता धर्मतत्रके समय शास्त्र-वाफ्योको नहीं मानत, इधर उन्हें ही देखता हु कि अथतनके समय वे शास्त्र मानकर अटल बने बैठे हैं। उम शास्त्रके साथ -जैसे बनता है वैसे, टोंटी दानकर, चोटी पकडकर--मनुष्यको मिलाना चाहते हैं, फिर वे इस बातको भी भूल जाते हैं कि 'मार- पीटकर महरापर बैठाओ भी, तो हुर्र नहीं होती'--वह कभी सत्य नहीं हो सकता। वास्तवमे देसा जाय तो जहाँ जितनी ज्यादा जनरदस्ती होती है, वहीं उतना ही कम सत्य होता है यूरोपमे जब ईसाई शास्त्र-वाक्योंपर लोगोका जबरदस्त विश्वास था, तर मनुष्यके हाड-गोड तोडकर, उसे जलाकर,

रूसको चिट्ठी
१३८
तांचकर, मम्मोकर धर्मको सत्यता प्रमाणित करनेकी कोशिश
चलनी रहती थी। आज बोलशेविक-मतवादके विषयमें उसके
विरोधी और समर्थक दोनो ही पक्ष उसी तरहकी जबरदस्त
सीनाजोगेकी युक्तियोंका प्रयोग करते दिखाई देते हैं। दोनों
ही पक्ष एक दूसरेकी यह शिकायत करते हुए पाये जाते हैं
कि मनुष्यके विचार-स्वातत्र्यके अधिकारको दवाया जा रहा है।
चीचमें पडी पश्चिम-महादेशको मानव-प्रकृति बेचारी आज दोनों
ओरसे पिसो जा रही है।
मोवियट रूसकी लोक-शिक्षके सम्बन्धमे मेरा जो वक्तव्य
है, वह मैं कह चुका। इसके सिवा इस वातको भी आलोचना कर
चुका हू कि वहाँकी राजनीति मुनाफा-लोलुपोके लोभसे कलुपित
नहीं है, और इसलिए उन्होने रूसराष्ट्र के अन्तर्गत अनेक प्रकारकी
प्रजाको-जाति और वर्णका किसी प्रकार भेदभाव न रखकर
सबको समान अधिकार और उत्कृष्ट शिक्षाको सुविधाएँ देकर
सम्मानित किया है। में ब्रिटिश भारतको प्रजा हू, मोर
इमीलिए रूसके इस कार्यसे मुझे इतना गहरा, आनन्द हुआ
अब मैं समझना है कि एक अन्तिम प्रश्नका उत्तर मुझे
देना पडेगा। बोलशेविक अर्थनीतिक सम्बन्धमे मेरा क्या मत
है, यह प्रश्न बहुतसे लोग मुझसे किया करते हैं। मुझे डर
इस वातका है कि भारतवर्ष हमेशासे शास्त्र-शासित और पडा-
चालित देश रहा है, विदेशसे आये हुए वचनोंको एकदमसे
वेदवाक्य मान लेनेको ओर हो हमारे मुग्ध हृदयका झुकाव है।
-
है

समय देना १३६ उपसहार गुरुमनके मोहसे अपनेको सम्हालकर हमे कहना चाहिए कि प्रयोगके द्वारा ही मतका विचार हो ममता है, अभी तक परीक्षा सतम नहीं हुई है। कोई भी मनुष्य-सम्बन्धी मतवाद फ्यों न हो, उसका मुख्य अग है मानन-प्रकृति । इस मानव- प्रकृतिके साथ मतवादका कहाँ तक सामजस्य हो सकता है, इस निपयमें पका मिद्धान्त होनेमें समय लगता है। तत्त्वको सम्पूर्णत ग्रहण करनेके पहले कुछ ठहरना या पडता है। मगर फिर भी उस विपयमे आलोचना की जा सकती है, और वह सिर्फ लॉजिक या गणितपर ही नहीं- बल्कि मानव-प्रकृतिको सामने रसकर । मनुष्यमे दो दिशाएं है-प्रथमत वह स्वतन है, दूसरे वह सनके माथ सम्बन्ध-युक्त है। इनमे से एकको छोड देनेपर जो धाको बचे, वह अवास्तविक है। जब किसी एक धुनमे पड़कर मनुष्य एक ही ओर एकान्तरूपसे लापता हो जाता है, और अपना वजन नष्ट करके तरह-तरहकी विपत्तियां लाता रहता है, तब सलाहकार आकर सकटको हलका करना चाहते हैं, कहते हैं कि दूसरी दिशाको एकदम छाँटकर निकाल दो। व्यक्ति- स्वातत्र्य जब उत्कट स्वार्थका रूप धारण करके समाजमें तरह-तरहके उपद्रव मचाता है, ता उपदेशक लोग कहते है- 'स्वार्थ' से 'स्व' को एक ही बारमें गडासेसे उडा दो, तब सब ठोक हो जायगा। इसमे उपद्रव घट सकता है, मगर उमका नाश नहीं हो सकना । लगाम टूट जानेपर घोडा गाडाको रूसको चिट्ठी १३८ नोंचकर, झकझोरकर धर्मको सत्यता प्रमाणित करनेकी कोशिश चलनी रहती थी। आज भोलशेविक-मतवादके विपयमें उसके विरोधी और समर्थक दोनों ही पक्ष उसी तरहकी जबरदस्त सीनाजोरीकी युक्तियोंका प्रयोग करते दिखाई देते हैं। दोनों ही पक्ष एक दूसरेकी यह शिकायत करते हुए पाये जाते है कि मनुष्यके विचार-स्वातत्र्यके अधिकारको दवाया जा रहा है। बीचमे पडी पश्चिम-महादेशकी मानव-प्रकृति वेचारी आज दोनों ओरसे पिसी जा रही है। सोरियट रूसकी लोक-शिक्षाके सम्बन्धमे मेरा जो वक्तव्य है, वह मैं कह चुका। इसके सिवा इस वातको भी आलोचना कर चुका हू कि वहाँकी राजनीति मुनाफा-लोलुपोके लोभसे कलुपित नहीं है, और इसलिए उन्होंने रूसराष्ट्र के अन्तर्गन अनेक प्रकारकी प्रजाको जाति और वर्णका किसी प्रकार भेदभाव न रखकर सबको समान अधिकार और उत्कृष्ट शिक्षाको सुविधाएँ देकर सम्मानित किया है। में त्रिटिश भारतकी प्रजा हू, और इसीलिए रूसके इस कार्यसे मुझे इतना गहरा आनन्द हुआ है। अब में समझता हूं कि एक अन्तिम प्रश्नका उत्तर मुझे देना पड़ेगा। बोलशेविक अर्थनीतिक सम्बन्धमे मेरा क्या मत है, यह प्रश्न बहुतसे लोग मुझसे किया करते हैं। मुझे डर इस बातका है कि भारतवर्ष हमेशासे शास्त्र-शासित और पडा- चालिन देश रहा है, विदेशसे आये हुए वचनोंको एकदमसे वेदवाक्य मान लेनेको ओर ही हमारे मुग्ध हृदयका झुकाव है।

- सम्पूर्णत ग्रहण - १३६ उपसहार गुरुमत्रके मोहसे अपनेको सम्हालकर हमे कहना चाहिए कि प्रयोगके द्वारा ही मतका विचार हो सकता है, अभी तक परीक्षा सतम नहीं हुई है। कोई भी मनुष्य-सम्बन्धी मतवाद फ्यों न हो, उसका मुख्य अग है मानव-प्रकृति । इस मानव- प्रकृतिके साथ मतवादका कहाँ तक सामजस्य हो सकता है, इस विषयमे पका सिद्धान्त होनेमें समय लगता है। तत्त्वको करनेके पहले कुछ ठहरना या समय देना पड़ता है। मगर फिर भी उस विषयमे आलोचना की जा सकती है, और वह सिफ लॉजिक या गणितपर ही नहीं- बल्कि मानव-प्रकृतिको सामने रसकर । मनुष्यमे दो दिशाएं है---प्रथमत वह स्वतत्र है, दूसरे वह सनके साथ सम्बन्ध-युक्त है। इनमें से एकको छोड देनेपर जो धाकी बचे, वह अवास्तविक है। जब किसी एक धुनमे पडकर मनुष्य एक ही ओर एकान्तरूपसे लापता हो जाता है, और अपना वजन नष्ट करके तरह-तरहकी विपत्तियां लाता रहता है, तर मलाहकार आकर सकटको हलका करना चाहते हैं, कहते हैं कि दूसरी दिशाको एकदम छाँटकर निकाल दो। व्यक्ति- स्वानन्य जर उत्कट स्वार्थका रूप सरह-तरहके उपद्रव मचाता है, ता उपदेशक लोग कहते है- 'स्वार्थ' से 'स्व' को एक ही बारमें गडासेते उडा दो, तर मय ठीक हो जायगा। इसमे उपर घट सकता है, मगर उमा नाश नहीं हो सकता। धारण करके समाजमे लगाम टूट जानेपर घोडा

रूसको चिट्टी
१४०
खंदकमे डाल देता है, इसलिए घोडेको गोलीसे उड़ा दिया
जाय तो फिर गाडी ठीकसे चलेगी, ऐसा खयाल न करके
लगाम ठीक करनेकी चिन्ता करना ही बुद्धिमत्ता है।
शरीरसे पृथक्-पृथक् अस्तित्व होनेसे ही मनुष्य छीना-
झपटी किया करता है, परन्तु समस्त मनुष्योंको एक रस्सीमें
बांधकर सारी पृथिवीमें उसे एक ही विपुल कलेवरमे लानेका
प्रस्ताव करना--यह बात तो किसी बलसे गर्वित अर्थतात्त्विक
जारके मुससे ही शोभा देती है। विधाताकी विधिको बिलकुल
जडसे उसाड फेंकनेको चेष्टामे जितना साहस है, उससे कहीं
ज्यादा उसमें मूढताकी जरूरत पड़ती है।
एक दिन ऐसा था, जब भारतवर्पका समाज मुख्यत
ग्रामीण समाज था। इस तरहके घनिष्ठ ग्राम्य समाजमें व्यक्तिगत
सम्पत्तिके साथ सामाजिक सम्पत्तिका सामंजस्य होता था।
लोकमतका ऐसा प्रभाव था कि धनी अपने धनको सम्पूणत
अपने भोगम लगानेमे अपना अगौरव ममझते थे। समाज
उसकी सहायता-सहानुभूति ग्रहण करता था, तभी वह कृतार्थ
होता था-अर्थात् अगरेजीमे जिसे चरिटी कहते हैं, उसमे वह
बान नहीं थी। धनीके लिए वहीं स्थान होता था, जहाँ निर्धन
होते थे। उस समाजमे अपने स्थान और सम्मान की रक्षा
करनेके लिए धनीको अनेक परोक्ष प्रकारोंसे बड़े-बड़े अकोंमे
टैक्स देना पड़ता था। गांवमे विशुद्ध जल, वैद्य, पडित, देवालय,
नाटक, गान, कथा, कुआ, वावडी, मार्ग आदि जो कुछ होता

१४१
उपसहार
था, वह गांवके व्यक्तिगत अर्थकै ममाजमुसी प्रवाहसे ही होता
था, राज-करसे नहीं। इसमे व्यक्तिगत स्वेच्छा और समाजको
इच्छा दोनों ही मिल जाती थों। इस तरहके आदान-प्रदान
गष्ट्रीय यत्रसे नहीं होते थे, किन्तु मनुष्यकी इच्छासे हुआ
फरते थे, इसलिए इनमे धर्म-साधनकी क्रिया चलनी थी , अर्थात्
इसमे केवल कानूनके चलनेसे बाहरी फल नहीं लगते थे, बल्कि
अन्तरगमे व्यक्तिगत उत्कप होता रहता था। यह व्यक्तिगत
उत्कर्ष ही मानव-ममाजमा स्थायी कल्याणमय सजीव आश्रय है।
वणिक-मम्प्रदाय-धनको काममे लगाकर लाभ करना ही
जिमका मुख्य व्यवसाय है-समाजमे पतित समझा जाता था,
क्योंकि तन धनका अधिक सम्मान नहीं था, और इसीलिए
धन और अधनका इनना वडा भेद भी तब नहीं था।
अपने बडे सचयके कारण समाजमे सम्मान नहीं पाता था,
बल्कि अपने महान् दायित्वको पूरा करके ही वह सम्मानिन
होता था, नहीं तो वह लजित ही बना रहता था। अर्थात्
सम्मान धर्मका था, धनका नहीं। इस सम्मानको समर्पण करते
हुए किसीके आत्म-सम्मानको हानि नहीं होती थी।
दिन चले गये हैं, इसीलिए सामाजिक दायित्वहीन धनके प्रति
अमहिष्णुताके लक्षण अनक आकागेमे दिखाई देने लगे है।
कारण,
अब मनुष्यको अर्घ्य नहीं चढाता, बल्कि उसे
अपमानित ही करता है।
यूरोपीय
सभ्यता पहरेसे ही नगरोंमें पर जमानेका गस्ता
धन
अन वे
धन

रूसको चिट्ठी १४२ ढूढ़ रही है। नगरोंमे मनुष्योको मौके बहुत मिलते हैं, पर सम्बन्ध बहुत सकुचित हो जाता है। नगर बहुत बड़े होते हैं, मनुष्य वहाँ विक्षिप्त हो जाता है, व्यक्ति-स्वातंत्र्य वहां अति मात्रामे होता है, प्रतियोगिताका आन्दोलन भी वहां प्रबल होता है। ऐश्वर्य वहाँ धनी और निर्धनके भेदको बढा देता है और चैरिटीके द्वाग जो-कुछ सम्बन्ध मिलाया जाता है, उसमे न तो सान्त्वना ही है और न सम्मान ही। वहां जो धनके अधिकारी और धनके वाहन है, दोनो में आर्थिक सम्बन्ध होता है, सामाजिक सम्बन्ध विकृत हो जाता है या टूट जाता है। ऐसो अवस्थामे यत्रयुग आया, लाभके अझ वढने लगे और हदसे ज्यादा बढ़ने लगे। यह मुनाफेको महामारी जब दुनिया- भरमे फैलने लगी, तब जो दूरके रहनेवाले अनात्मीय थे, जो निर्धन थे, उनके लिए रास्ता ही बंद हो गया। चीनको अफीम खानी पड़ी , भारतके पास अपना कहनेको जो-कुछ था, उसे उजाड कर देना पड़ा , अफ्रिकाको हमेशा कष्टोंका सामना करना पड़ा और उसके कष्ट दिनोदिन बढने ही लगे। यह तो हुई बाहग्की बात, अब पश्चिम महादेशको लो, वहाँ भी धनी और निर्धनका भेद आज अत्यन्त कठोर हो गया है, जीवनयात्राका आदर्श बहुमूल्य और उपकरण-बहुल होनेसे- जीवनकी आवश्यकताएं अत्यन्त बढ जानेसे दोनों पक्षोका भेद अत्यत तीव्र होकर आँखोंके सामने पडता है। पुराने जमानेमे कम-से-कम हमारे दशमे, ऐश्वर्यका आडम्बर था, मुख्यत सामाजिक उपसहार दान और कर्ममे, और अब है व्यक्तिगत भोगमे। यह हमे विस्मित करता है, आनन्दित नहीं करता , इससे ईर्ष्या पदा होती है, प्रशसा नहीं होती। सबसे बड़ी बात यह है कि उस समय समाजमे वनका व्यवहार केवल दाताकी स्वेच्छापर निर्भर नहीं था, उसपर सामाजिक इच्छाका प्रनल प्रभाव था, इसलिए दाताने नम्र होकर दान करना पड़ता था, 'श्रद्धया देय'—यह बात कार्यरूपमे परिणत होती थी। मतलब यह कि आजकल व्यक्तिगत धन-संचय धनीको प्रबल शक्तिका जो अधिकार देता है, उससे सर्वसाधारणको सम्मान और आनन्द नहीं मिल सकता। उसमें एक ओर असीम लोम है और दूसरी ओर गहरी ईर्ष्या, बोचमें है दुस्तर पार्थक्य । समाजमे सहयोगिताकी अपेक्षा प्रतियोगिता हदसे ज्यादा बढ़ गई है। यह प्रतियोगिता अपने दशमे है एक श्रेणीके साथ अन्य श्रेणी की , और बाहर है एक देशक साथ दूसरे देशकी। इसीसे चारो ओर सशयहिंस्र अन चमक रहे हैं, उनकी तादाद घटानेमे कोई भी किसी तरह समर्थ नहीं हो रहा। और जो परदेशी इस दूरस्थित भोग-राक्षसकी क्षुधा मिटानेके काममे लगे हुए है, उनकी रक्तहीन कृशता युगोंसे बढ़ती ही जाती है। जो अपने पलके दपमें यह बात कहते हैं कि इस बहु-विस्तृत कृशतामें ससारफी अशान्ति आकर घर नहीं बना मकती, कहना चाहिए कि वे अपनी मूखताके अन्धकारमे भटक रहे हैं। जो हमेशा दुस-हो-टुस पा रहे है, वे अभागे ही दुख-विधातार भेजे हुए दुतोंके प्रधान रूसको चिट्ठो सहायक हैं, उनके उपचास-लयनोंमे प्रलयकी आग सचित हो रही है। वर्तमान सभ्यताकी इस अमानविक अवस्थामे वोलशेविक- नीतिका अभ्युदय हुआ है। वायुमडलके एक अंशमे तनुत्व उपस्थित होनेपर आँधी जैसे बिजली-रूपी दांत पीसकर घातकः मूर्ति धारण करके झपटकर आती है, यह भी.वैसा ही काड है। मानव-समाजमे सामजस्य जाता रहा है, इसीलिए इस अप्राकृतिक विप्लवका प्रादुर्भाव हुआ है। समष्टिके प्रति व्यष्टिको उपेक्षा क्रमशः बढती ही जा रही थी, इसीसे समष्टिकी दुहाई देकर आज व्यष्टिको बलि चढानेका आत्माघाती प्रस्ताव उठ सड़ा हुआ है। समुद्र-तटपर अग्निगिरिका उपद्रव शुरू हुआ है, इसलिए समुद्रको ही एकमात्र वन्धु घोपित किया जा रहा है। तटहीन समुद्रका जब सम्पूर्ण परिचय मिलेगा, तर किनारे पहुचनेके लिए फिर निहोरे करने पडेंगे। उस व्यष्टि-वर्जित समष्टिको अवास्तवताको मनुष्य , कभी भी सहन नहीं कर सकता। समाजसे लोभके दुर्गोको जोतकर अपने कब्जेमे लाना होगा, परन्तु व्यक्तिको वैतरणी पार करके समाजकी रक्षा कौन कर सकता है ? सम्भव है, वर्तमान रुग्न युगमें बोलशेविक नीति ही सुचिकित्सा हो, परन्तु चिकित्सा तो हमेशा नहीं चलाई जा सकती, वास्तरमे डाक्टरका शासन जिम दिन दूर होगा, वही दिन रोगोके लिए शुभ दिन है हमारे देशमें, हमारे गांव-गौनमे और परिचालनके काममे समवाय नीतकी जय हो–यही मेरी कामना है। - धन-उत्पादन पायोनियर विद्यार्थियों में रवीन्द्रनाथ

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१४५
उपसहार
फारण, इम नौनिमे जो सहयोगिता है, उसमे सहयोगियोंकी
इच्छाफा और उनके विचारोंका तिरस्कार नहीं किया जाता, अतएव
गानव-प्रकृतिका सम्मान रिया जाता है। उस प्रकृतिको विरुद्ध
पनाकर पलसे फाम लिया जाय, तो वहां चल युछ काम नहीं देगा।
इसके साथ ही एफ यात सास तोरपर कहनी है, वह
यह कि जब मैं चाहता है कि हमारे देशमे गांर जीवित हो
उठ, तय इम घातको हरगिज़ नहीं चाहता कि हममें फिरसे
माम्यता या गँवारूपन आ जाय। ग्राम्यता एक ऐसा सस्कार
है, जिसको विद्या, बुद्धि, विश्वास और फायका प्राम-सीमाके
वाहरसे कुछ सम्बन्ध नहीं, अर्थात् वह प्राम-सीमामे ही आवद्ध
रहता है। वर्तमान युगकी जो प्रकृति है, यह सिर्फ उससे
पृथर हो नहीं, परिक विरुद्ध है। वर्तमान युगकी विद्या और
युद्धिको भूमिका विश्वव्यापी है-यद्यपि उसके हृदयकी मनुवेदना
सम्पूर्णत उननो व्यापक नहीं हुई है। गांवोंमे ऐसा जीवन
लाना होगा, जिसके उपादान तुच्छ और सकीर्ण न हों और
जिसके द्वारा मानव-प्रकृतिमे कभी भी किसी भी दरह ओठापन
न आने पाये, और न उसपर अन्धकार ही छा सके।
इग्लेण्डमें एक दिन फिसी ग्राममे एक किसानके घर गया
था। देखा कि लन्दन जानेके लिए उस घरको त्रियोंका चित्त
चचल हो रहा है। शहरक सब तरहक ऐश्वर्याको तुलनामें
गांवोंकी पूंजी इतनी दीन-हीन है कि गांवके चित्त स्वभावत
ही सवदा शहरकी ओर खिंचते रहते है। देशके भीतर रहते
n.10

रूसको चिट्ठी । हुए भी गांव मानो निर्वासित-से हो रहे हैं। रूसमे दूसरी ही चात देखी-गांवोके साथ शहरोकी जो प्रतिकूलता है, उसे हमेशाके लिए मिटा देने की कोशिश हो रही है। यह उद्योग यदि अच्छी तरह सफल हुआ, तो शहरकी अस्वाभाविक अतिवृद्धि दूर हो जायगी। देशकी प्राण-शक्ति और विचार-शक्ति देशमे सर्वत्र व्याप्त होकर अपना काम कर सकेंगी। हमारे देशके गांव भी शहरकी जूठन और बचे-खुचेसे पेट भरनेवाले न होकर मनुष्यत्वके पूर्ण सम्मान और सम्पदके भोक्ता हो-यही मेरी कामना है। एकमात्र समवाय-पद्धतिसे ही गाँव अपनी सोझोन शक्तिको डूबतेसे बचा सकेंगे-ऐसा मेरा विश्वास है। वडे खेदका विषय है कि आज तक हमारे देशमें समवाय-पद्धति सिर्फ रुपये उधार देनेमे ही थककर एक जगह बैठ गई,-यह तो महाजनी ग्राम्यताको ही कुछ माड-पोंछकर साफ-सुथरा रूप दिया गया है,-सम्मिलित उद्योगसे जीविका उपार्जन और भोगके काममे वह नहीं लग सकी। इसका मुख्य कारण यह है कि जिस शासनतंत्रके आधारपर नौकरशाही समवाय-नीति हमारे देशमे आविर्भूत हुई है, वह यत्र 'अन्धा-बहरा-उदासीन है। इसके सिवा, लज्जासे सिर झुकाकर शायद यह बात भी स्वीकार करनी पडेगी कि चरिनमें जिस गुणके होनेपर संगठित होना सहज होता, हममें वह गुण नहीं है। जो “फमजोर हैं, परस्परमें उनका विश्वास भी कमज़ोर होता है। अपनेपर अश्रद्धा ही दूस पर अश्रद्धाकी -मीच है।

उपसहार जो बहुत समयमे पराधीन हैं, उनका आत्म-सम्मान जाता रहा हे, इमोसे यह दुर्गति है। प्रभु-श्रेणोके शासनको वे सिर झुकाये स्वीकार कर सकते हैं, किन्तु स्व-श्रेणीका सचालन उनसे सहा नहीं जाता, स्व-श्रेणीको धोखा देना और उसके साथ निष्ठुर व्यवहार करना उनके लिए स्वाभाविक ही है। रूसी कहानियों की पुस्तकें पढनेसे मालूम हो सकता है कि वहाँके बहुत फालसे सताये हुए किसानोंकी भी यही दशा है। किनना ही दुसाध्य क्यो न हो, और कोई रास्ता ही नहीं है, परस्परको शक्ति और हृदयको सम्मिलित करनेका लक्ष्य बनाकर प्रकृतिका सशोधन करना ही पड़ेगा। यह काम समवाय- पद्धतिसे कर्ज देकर पूरा नहीं हो सकता, एकत्र सगठिन कार्य कराकर प्रामवासियोके चित्तको एकताकी ओर उन्मुस करके तन कहीं हम गांवोकी रक्षा कर सकते हैं।

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१५१
परि
मूल्यको में हृदयसे स्वीकार करता है। स्वीकार न करने
मैं अपराध समझता हू। उमते मनुष्यको बहुत ऐश्वर्य दिर
है, ऐश्वर्यका मार्ग विस्तृत किया है। सब कुछ हुआ, परन्ड
दुख और पापोंके द्वारा कलिकाल ऐसे किसी छिद्रसे प्रवेश करत
है कि पहले तो हमे उसका कुछ भान ही नहीं होता-फि
धीरे-धीरे उसका पल हमारे सामने आता है।
में वहाके अनेक विचारशील मनोपियोंके साथ मिला हू,
और उसने यातचीत भी की है। वे उद्विग्नताके साथ सोच
रहे है. इतनी विद्या, इतना ज्ञान, इतनी शक्ति, इतनी सम्पद है,
किन्तु सुस क्यो नहीं है-शान्ति क्यो नहीं है? प्रतिक्षणमें
मत्र शंकित रहते हैं कि न-जाने कब कैसा भीपण उपद्रव
प्रलयकाड उठ खड़ा हो। उन्होंने क्या निश्चय किया है, मैं
नहीं कह सकता। अभी तक शायद कोई कारण निश्चित नहीं
कर सके हैं, या उनमें से अनेक प्रकारके लोगोंने अपने-अपने
स्वभावके अनुसार अनेक कारण निश्चित किये होंगे। मने भी
इस सम्बन्धमें कुछ विचार किया है। में जैसा समझता हू, वह
पूर्णत सत्य है या नहीं, मैं नहीं कह सकता , किन्तु मेरा अपना
विश्वास है कि इसका कारण कहाँ है, मन-ही-मन मैं उसका
ठीक-ठीक अनुभव कर रहा हूँ।
पश्चिम देशने जिस सम्पदको सृष्टि की है, वह अतिपिपुल,
प्रचड, शक्ति-सम्पन्न यत्रके द्वारा की है। धनका वाहन बना है
यंत्र, और उस यंत्रका वाहन हुआ है मनुष्य--लासों-हजारों

१--ग्रामवासियों के प्रति
बन्धुओ, एक वर्ष प्रवासमे रहनेके बाद, पश्चिम महादेशके
नाना स्थानोमे भ्रमण करके आज फिर अपने देशमे आया
हू। तुम लोगोंसे एक बात कहना जरूरी है, तुममे से कितने
लोग ऐसे होगे, जो शायद इस बातका अनुभव ही न कर
सकेंगे कि मेरी बात कहाँ तक सत्य है। पश्चिमके देश-विदेशका
भीतरी दुस आज प्रकट हो गया है इस बातकी मैंने कभी
करपना भी नहीं की थी। वे मुखी नहीं है। वहीं बड़ी
तादादमें असनाव है, तरह-तरहके आयोजन और उपकरण हैं
और होते जा रहे है-इसमे सन्देह नहीं। किन्तु इस छोरसे
लेकर उस छोर तक वहां गहरी अशान्ति है, गहरा दुख उन्हे
सन तरफसे घेरे हुए है।
यह न समझना कि अपने देशपर मुझे अभिमान है,
इसलिए ऐमा कह रहा हू। वास्तवमें यूगेपपर मेरी गहरी श्रद्धा
है। पश्चिम महादेशमे मनुप्यने जैसी साधना की है, उन साधना
* श्रीनिकेतनमें वार्षिकोत्सवपर ग्रामवासियोंके प्रति दिया हुआ भाषण ।

परिशिष्ट
मूल्यको मे हृदयसे स्वीकार करता हू। स्वीकार न करनेको
मैं
अपराध समझता हू। उसने मनुष्यको बहुत ऐश्वर्य दिया
है, ऐश्वर्यका मार्ग विस्तृत किया है। सर कुछ हुआ , परन्तु
दुस और पापोके द्वारा कलिकाल ऐसे किसी छिद्रसे प्रवेश करता
है कि पहले तो हमे उसका कुछ भान ही नहीं होता-फिर
धीरे-धीर उसका फल हमारे सामने आता है।
में वहाके अनेक विचारशील मनीपियोंके साथ मिला हू,
और उसने पातचीत भी की है। वे उद्विग्नताके साथ सोच
रहे है- इतनी विद्या, इतना ज्ञान, इतनी शक्ति, इतनी सम्पद है,
किन्तु सुस क्यो नहीं है-शान्ति क्यो नहीं है ? प्रतिक्षणमें
सब शकित रहते हैं कि न-जाने कब कैसा भीषण उपद्रव
प्रलयकाड उठ सडा हो। उन्होने क्या निश्चय किया है, मैं
नहीं कह सम्ना। अभी तक शायद कोई कारण निश्चित नहीं
कर सके हैं, या उनमे से अनेक प्रकारके लोगोने अपने-अपने
स्वभावके अनुसार अनेक कारण निश्चित किये होंगे। मैंने भी
इस सम्बन्धमे कुछ विचार किया है। में जैसा समझता है, वह
पूर्णत सत्य है या नहीं, मैं नहीं कह सकता , किन्तु मेरा अपना
विश्वास है कि इसका कारण कहाँ है, मन-ही-मन मैं उसका
ठीक-ठीक अनुभव कर रहा हूँ।
पश्चिम देशने जिस सम्पदकी सृष्टि की है, वह मतिविपुल,
प्रचड, शक्ति-सम्पन्न यत्रके द्वारा की है। धनका वाहन बना है
यन, और उस यन्त्रका पाहन हुआ है मनुष्य-लाखों-हजारों
,
म

रूसको चिट्ठो
मनुष्य। उसके बाद यान्त्रिक सम्पदको वेदी-प्रतिष्ठाके रूपमें
उन्होंने शहर बनाये, उन शहरोंका पेट उत्तरोत्तर वढता ही गया,
और उसकी परिधि अब बहुत बडो हो गई है। न्यूयार्क,
लन्दन आदि शहरोंने अनेक गांव-उपगांवों की प्राणशक्ति निकालकर
तब कहीं बृहत् दानवीय रूप धारण किया है। परन्तु एक
बात याद रखनो होगी-यह कि शहरमे मनुष्य कमी भी घनिष्ठ
रूपसे सम्बन्ध-युक्त नहीं हो सकता। दूर जानेकी जरूरत नहीं,
कलकत्ता शहरको ले लो, जहां हम रहते है। मैं जानता हू,
यहाँ पड़ोसियोंका पडोसियोंके साथ सुस-दु समे आपद-विपदमे
कोई सम्बन्ध नहीं। हम उनका नाम तक नहीं जानते ।
मनुष्यका एक स्वाभाविक धर्म है, वह है उसका समाजधर्म ।
समाजमे वह अपने लिए यथार्थ आश्रय पाता है परस्परके
सम्बन्ध-सहयोगसे । परस्पर सहायता करनेसे मनुष्यको जो
शक्ति मिलनी है, उसका ज़िकर मैं नहीं कर रहा हू
मेरा
कहना है, मनुष्यका सम्बन्ध जब चारो तरफके पडोसियों में,
अपने घरमे और घरके बाहर व्याप्त हो जाता है, तन
सम्बन्धकी विशालता उसे स्वत हो आनन्द देती है। हमारी
गहरी तृप्ति तो वहीं है, जहां केवल व्यावहारिक सम्बन्ध
नहीं, सुयोग-सुविधाओं का सम्बन्ध नहीं, व्यवसायका सम्बन्ध
नहीं, फिन्तु सन ताहके स्वार्थके बाहर आत्मीयताका सम्बन्ध
है। वहीं मनुष्य और सन चीजोंसे वचित रह सकता है,
किन्तु मानव-आत्माको तृप्ति वहां पूरी मात्रामे मौजूद है।
उस
-

१५३
परिशिष्ट
विदेशोमे मुझसे बहुतोंने पूछा है-जिसको कि ये happiness
कहते हैं और हम सुख कहते हैं, उसका आधार कहा है ?
मनुष्य सुसी वहीं होता है, जहा मनुष्यके साथ मनुष्यका
सम्बन्ध सत्य हो जाता है, यह सर्वमान्य बात है। परन्तु
फिर भी आज इसे समझा देनेकी जरूरत है। क्योकि इम
सम्पन्धको छोडकर जहाँ व्यवसाय-घटित सम्बन्ध है, वहीं मनुष्य
इतना अधिक फल प्राप्त करता है बाहरी फल -उसमे
इतना
मुनाफा होता है, इतने तरहके मोके ('चान्स') मिलने है कि फिर
मनुष्यमे यह फहनेको हिम्मत नहीं रह जाती कि यही सत्यताका
चरम विकास नहीं है। इतना से मिलता है। इतनी उसकी
शक्ति हो जाती है। यत्रके द्वारा जो शक्ति प्रबल हो उठनी
है, उससे वह सारे ससारको इस तरह प्रभावान्वित कर लेता
है कि फिर वह समझने लगता है कि विदेशके इतने लोगोको उसने
अपना दास बना लिया है, इतना उसमे अहंकार हो जाता है,
और उसके साथ ही ऐसी बहुतसी सुविधाएं उसे मिलती हैं,
जो वास्तवमे मनुष्यको जीवन-यात्रा मार्गमे अत्यन्त अनुकूल
पडती हैं। वे ऐश्वयके द्वारा पैदा हुई है। उन्हें मनुष्य सहज
ही चरम लाभ समझने लगता है। ऐसा समझे वगैर रह नहीं
सकता। इसके हाथ उसने मनुष्यको सबसे बड़ी चीज येच दी
है-वह है मानव-सम्बन्ध ।
मनुष्य मित्र चाहता है, जो सुस-दु समे उसे अपनावें,
जिनके पास बैठकर घातचीत करनेसे उसे खुशी हो, जिनक

r रूसको चिट्ठी मा-बापोंके साथ उसका सम्बन्ध था और जिन्हे वह माता-पिताके समान समझता था, और जिनके बाल-बच्चोको वह अपने ही वोंके समान जानता हो। इस प्रकारको पारिवारिक मित्र-मडलीमे मनुष्य अपने मानवत्त्वका अनुभव करता है। यह बात सच है कि एक विशालकाय दानवीय ऐश्वर्यमे मनुष्य अपनी शक्तिका अनुभव करता है। वह भी बहुमूल्य है, मैं उसकी अवज्ञा न करूंगा। किन्तु उस शक्तिके विस्तारके साथ-साथ यदि मानवी सम्बन्धक विकासके लिए अनुकूल क्षेत्र क्रमश सकीर्ण होता गया, तो वह शक्ति फिर शक्ति नहीं रहती-शक्तिशूल हो जाती है, वह मनुष्यको मारती है, मारनेके अस्त्र बनाती है, मनुष्यका सर्वनाश करनेके लिए पड्यत्र करती है, असत्यका प्रसार करती है, अनेक निष्ठुरताओंका पालन करती है, और समाजमे नाना प्रकारकै विपक्षोंका बीजारोपण करती है। ऐसा हुए बिना रह नहीं सकता, होगा ही। दर्द या सहानुभूति जब जाती रहती है, मनुष्य जब अधिकाश मनुष्योंको आवश्यकीय सामग्रीकी दृष्टिसे देसनेका आदी बन जाता है, जब देखता है कि लाखों मनुष्य मिलके पहिये घुमाकर उसकी निजी मिल्का' कपडा सस्ता करेंगे, उसके अनापशनाप सर्चके लिए रुपये इकट्ठा कर देंगे, उसके अलेके भोग- उपभोगके लिए उपकरण सुगम कर देंगे-एक मनुष्य जन अनेक मनुष्योंको इस तरह देसने का आदी बन जाता है, तब वह यथार्थ मनुष्यको नहीं देखता-मनुप्यकी मेशीनको देखता है।

। परिशिष्ट यहाँ चावलकी मिलें है। उस मिल-दानवके चक्के है सथालोंके चाल-बच्चे। धनी क्या उन्हें आदमो समझते है। उनके सुस- दु सोंका क्या हिसान है। रोजकी मजूरी देकर उनसे कसकर खून सुम्पानेवाला काम वसूल कर लिया जाता है। इससे रुपया भी मिलता है, सुख भी मिलता है और बहुत मिलना है, मगर मनुष्यकी सबसे श्रेष्ठ वस्तु मानवत्व विक जाता है। दया-माया, परस्परकी स्वाभाविक अनुकूलना, दर्द-सहानुभूति- कुछ भी नहीं रहता। कौन देखना है-उनके घरमे क्या होता है क्या नहीं। किसी समय हमारे यहाँके गांवोंमे ऊँच-नीचका भेद था ही नहीं, सो बात नहीं,-प्रभु ये, दास थे, पडित थे, मूर्स थे, बनी थे, निर्धन थे, परन्तु सबके सुस-दु सोंपर सनकी दृष्टि थी। उन्होने आपसमें मिलकर एक एकत्रीभूत जीवन-याना तैयार कर ली थी। पूजा-पार्वणमें, आनन्द- उत्सवमें-घात-बातमे प्रतिदिन वे नाना प्रकारसे मिला-जुला करते थे। ठाकुरद्वारेमे इक्ट होकर बाया-परवानाओंके साथ बैठकर बातचीत किया करते थ। जो अन्त्यज थे, वे भी एक किनारे बैठकर मानन्दका भाग लिया करते थे। ऊच-नीच और ज्ञानी-अज्ञानियोके वीचमे जो रास्ता या-जो सेतु था, वह सुला था। में देहातोंकी बात कह रहा हूँ, पर याद रसना-देहात ही तर सन-कुछ थे, शहर ता नगण्य ये, यह नहीं कहना चाहता, पहनेश मतला यह है कि शहर गोण थे, मुख्य नहीं।

" रूसको चिट्ठी गांव-गांवमें कितने ही पंडित, कितने ही धनी-मानी पैदा होते थे और वे अपने जन्मस्थानको अपनाकर वहीं रहते थे। जीवन-भर नवाबोंके यहां या दरवारमे काम करते थे, और जो-कुछ सम्पत्ति उन्हे मिलनी थी, उसे अपने गांवको ले आते थे। उस धनसे विद्यापीठ चलती थो, पाठशालाएं खुलनी थीं, रास्ते वनते थे, कुएं खुदते थे, अतिथिशाला और धर्मायतन स्थापित होते थे, जिससे गांवोंके तन-मन-प्राण एक होकर मिल जाते थे। प्रामोंमे हमारे देशके प्राणोंकी प्रतिष्ठा थी, उसका कारण यह है कि गांवोमे मनुप्यके साथ मनुष्यका जो सामाजिक सम्बन्ध होता है, वह सत्य हो सकता है। शहरोंमे वैसा होना असम्भव है। इसलिए सामाजिक मनुष्य प्रामों में ही आश्रय पाता है। और जो कुछ है, सो सामाजिक मनुप्यके लिए ही तो है। धर्मकर्म सामाजिक मनुष्य के लिए ही हैं। लखपनी- फोडपती रुपयेकी थैलियां लिये गदियों पर बैठे आराम कर सकते हैं, बड़ी-बडी हिसावकी बहियो के सिवा उनको अपनी चीज ओर कुछ है ही नहीं, उनके साथ किसीका सम्बन्ध ही नहीं है। अपने, रुपयो की गढी बनाकर धनी उसोमे बैठा रहता है, सर्वसाधारणके साथ उसका सम्बन्ध कहां है । वर्तमान समयसे तुलना की जाय, तो पता चलेगा कि पहले हमारे देशमे बहुतसी कमियां थीं। अन हम नलका पानी पोते है, जिसमे रोगके वीज कम हैं, चिकित्साके लिए अच्छे डाकर मिलते है, अस्पताल हे और ज्ञान-विज्ञानकी सहायतासे बहुतसो सुविधाएं भी , १५७ परिशिष्ट मिल्नी है। मैं इनका असम्मान नहीं करता, किन्तु हमारी जो सरसे बड़ी सम्पत्ति थी, वह थी आत्मीयता। उससे बडी सम्पद और कुछ हो ही नहीं सकती। उस आत्मीयतामा जहाँ अभाव है, यहा मुस-शान्ति रह ही नहीं सकती। पश्चिम महादेशमें आदमी-आदमोमे परम्पर जो आत्मीयता है, वह अत्यन्न बहती हुई है। उसकी जड गहराई तक नहीं है। सर कहते है-में भोग फवंगा, मैं बडा वनगा, मेरा नाम होगा, मुझे मुनाफा होगा। क्यो कि जो ऐसा कर रहा है, उसका किताना यडा सम्मान है। उसको धनशक्तिको तौलते हुए वहाँके लोगोंका हृदय रोमाचित हो उठता है। व्यक्तिगत शक्तिको ऐसी उपासना हमारे देशमे नहीं पाई जाती। वास्तवमें है कुछ नहीं, एक आदमी सिर्फ घुसेवाजी कर सकता है-वहा घूसेनाजीफा एक बडा टस्ताद रास्तेसे निक्ला, चारों तरफ भीड लग गई। सपर मिली कि सिनेमाकी नटी लन्दनके रास्तेसे गाडीपर जा रही है, गाडीके भीतरसे एक नज़र उसे देसने के लिए जनतासे रास्ता भर गया। हमारे देशमे जो महदाशय कहलाते है, उनके आनेपर सर उनके पैर हते हैं। महात्मा गान्धी आते हैं, तो सारा देश उनके लिए पागल हो जाता है। उनके पास न तो धन है और न बाहुपल, किन्तु है हृदय और आध्यात्मिक शक्ति । मुझे जहां तक मालूम है, वे घूसा चलाना नहीं जानते , परन्तु मनुप्यके साथ मनुष्यके सम्बन्धको उन्होंने बहुत वडा "माना है, अपनेको उन्होंने पृथक नहीं रखा। वे हम सभीके हैं, और हम 11- रूसको चिट्ठी १५८ सर उनके है। बस, हो गया, इससे ज्यादा हम कुछ नहीं चाहते। उनसे भी बहका अनेक विद्वान है, ज्ञानो है, धनी है, परन्तु हमारा देश देखना चाहता है-आत्मदानका ऐश्वर्य । यह क्या कम बात है। इससे समझ सकते हैं कि हमारे देशके लोग क्या चाहते हैं। वे पाण्डित्य नहीं चाहते, ऐश्वर्य नहीं चाहते, और कुछ नहीं चाहते, वे चाहते है मनुष्यको आत्माकी सम्पद । परन्तु दिन-पर-दिन परिवर्तन होता आया है। मैने ग्रामो मे बहुत दिन निताये हैं,-किसी तरहके कटुशब्द नहीं कहना चाहता। ग्रामकी मैंने जो मूर्ति देसी है, वह बहुत ही भही है। वहा आपसमें ईर्ष्या, द्वेप, छल-कपट, धोखेनाजी आदि घडी विचित्र तरहसे हुआ करती है। झूठे मुकदमोंके घातक जालमे फंसाकर एक दूसरेका घात करते रहते है। वहाँ दुर्नीतिने कितनी जड पकड ली है, यह मेने खुद अपनी आँसोसे देखा है। शहरमें कुछ सुविधाएँ होती हैं, जो गांगोमे नहीं हैं। गांवोंकी जो अपनी चीज थी, वह भी आज जाती रही। ग्रामवासियो, मै आज तुम्हारे पास हृदयमे बडो उत्सुकता लिये हुए आया हू। पहले तुम लोग सामाजिक बन्धनसे एक थे, आज तुम छिन्न-भिन्न होकर- एक दूसरेको केवल चोट पहुचा रहे हो। अब फिर एक बार सम्मिलित होकर तुम्हे अपनी शक्तिको जगा देना होगा। घाहरफी अनुकूलताकी बाट न देखो। तुम्हारे अदर वह शक्ति मौजूद है-यह जानकर ही भूली हुई शक्तिकी तुम्हें याद दिलानेके लिए ही हम सन यहां आये हैं क्योंकि तुम्हारी उस

१५३
परिशिष्ट
शक्पिर सारे देशका अधिकार है। नीव ज्यों-ज्यों धसमतो
जा रही है, त्यों-त्यो ऊपरको मजिलं फटती जा रही हैं-
ऊपरसे पलस्तर चढाकर अधिक दिन तक उसकी रक्षा नहीं की
जा सकती।
आओ तुम लोग, प्रार्थी रूपमें नहीं सफल कार्यकर्ता वनकर
आयो। हमारे सहयोगी बनो, तभी हमारा उद्योग सार्थक होगा।
प्रामो के सामाजिक प्राणो को स्वस्थ होकर बलवान बनने दो। गानसे,
गीतसे, काव्यसे, यातचीतसे, अनुष्ठानसे, मानन्दसे, शिक्षासे, दीक्षासे
चित्तको जगाओ। तुम्हारी दीनता, तुम्हारी दुर्वलता, तुम्हारा
अपमान आज भारतवर्षको छातीपर वडा-भारी बोझ बनकर ला
हुआ है। और-सय देश बहुत आगे बढ गये हैं, हम अज्ञान और
अशिक्षासे स्थावर होकर जहां-के-तहाँ पडे हुए हैं। यह सब कुछ
चुटकोमे दूर हो जायगा यदि हम अपनी-अपनी शक्तिरूपी
पूँजीको इकट्ठी करके एक घार
उठ खडे हो। हमारे इस
श्रीनिकेतनमे सर्वसाधारणको उस शक्ति-सगठनकी साधना हो रही है।

२-~ग्राम-सेवा- वेदोमे अनन्त स्वरूपको कहा है-"आवि-प्रकाश-स्वरूप । उनका प्रकाश अपनेमें ही सम्पूर्ण है। उनसे मनुष्य की प्रार्थना यह है-"आविरावीने एधि।" हे आवि, मेरे अदर तुम्हारा आविर्भाव हो। अर्थात् मै अपनी आत्मामे अनन्तस्वरूपका प्रकाश चाहता हू। ज्ञानमे, प्रेममे, कर्ममें मेरी अभिव्यक्ति अनन्तका परिचय दे-इसोमें मेरी सार्थकता है। मनुष्य अपनी चित्तवृत्तिसे, अपनी इच्छाशक्तिसे, अपने कर्मोद्यमसे अपूर्णताका आवरण धीरे-धीरे दूर करके अनन्तके साथ अपना साधर्म्य प्रमाणित करता रहे, यही मनुष्यका धर्म-साधन है। अन्य जीव-जन्तु जिस अवस्थामे ससारमे आये है, उसी अवस्थामे उनका परिणाम है, अर्थात् प्रकृतिने ही उनको प्रकट किया है और उस प्रकृतिकी प्रेरणाको मानकर हो वे जीवनयात्राका निर्वाह करते हैं, इससे अधिक और कुछ नहीं। परन्तु अपने भीतरसे अपने अन्तरतर सत्यको अपने ही अद्यमसे निरन्तर उद्घाटित * श्रीनिकेतनके उत्सवमें दिया हुमा भाषण !

Cariur पायोनियस कम्यूनमें दो पायोनियर-विद्यार्थी मौर रवीन्द्रनाथ

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२६१
परिशिष्ट
करना होगा, मनुष्य के लिए यही चरम अध्यवसाय है। उस
आत्मोपलब्ध सत्यमे ही उसका प्रकाश है, प्रकृति द्वारा नियन्त्रित
प्राणयात्रामे नहीं। इसीलिए उमको फठिन प्राथना यह है कि
सभी ओर वह अनन्तका प्रकाश कर सके। इसोसे वह कहता
है.-भूमैव सुस-महत्वमें हो मुख है , नाल्पे सुखमस्ति-थोडेमे
मुस नहीं है।
मनुप्यके लिए यह समसे बडा दुर्गतिका कारण हुआ कि
अपने जीवनमे वह अपने भीतर स्थित भूमाको प्रस्ट न कर
सका-जिससे बाधाएँ कठोर बनकर सामने आती ही नहीं। यह
उसके लिए मृत्युसे भी बढ़कर मृत्यु है। आहार और विहारमे,
भोग और विलासमें वह परिपुष्ट हो सकता है, परन्तु ज्ञानकी
दीप्तिमे, त्यागकी शक्तिमें, प्रेमके विस्ताग्मे, फर्माद्यमके साहसमे
वह यदि अपने प्रबुद्ध मुक्त-स्वरूपको कुछ अशोंमे भी प्रकट
न कर सके, तो उसे 'महतो पिनष्टि' कहा जायगा-वह विनष्टि
प्राणीको मृत्युमे नहीं, किन्तु आत्माके अप्रकाशमे है।
जिसे हम सभ्यता कहते हैं, उसका प्रतिशब्द है भूमाका
प्रकाश। मनुष्यके भीतर जो निहितार्थ है-जो उसका गम्भीर
सत्य है--सभ्यतामे उसीझा आविष्कार हो रहा है। सभ्यतामें
मनुप्यकी शिक्षा-पद्धति इतनी व्यापक और इतनी कठिन इसीलिए
है। उसकी सीमा परावर भागे ही बढती जाती है, सभ्य
मनुप्यकी चेष्टाए प्रकृतिको निर्दिष्ट किसी सीमाको चरम नहीं
भानना चाहती।
R 11

रूसकी चिट्ठी હૃર मनुष्यमे नित्य बढती हुई सम्पूर्णताको जो आकाक्षा है, उसकी दो दिशाए हैं-एक व्यक्तिगत सम्पूर्णता और दूसरो सामाजिक । किन्तु ये परस्पर संयुक्त है-दोनों के वीचमे कोई भेद नहीं है। व्यक्तिगत उत्कर्षमे ऐकान्तिकता नहीं हो सकती। मानवलोकमें जिन्हो ने श्रेष्ठ पदवी पाई है, उनकी शक्ति सनकी शक्तिके भीतरसे ही व्यक्त होती है, वह भिन्न नहीं है। मनुष्य जहाँ व्यक्तिसे विच्छिन्न है, परस्परकी सहयोगिता जहाँ गादी नहीं है, वहीं बर्बरता मौजूद है। वर्वर या जगली अकेला ही शिकार करता है, सह-सड रूपसे जीविकाके योग्य अनुभव प्राप्त करता है, और उस जीविकाका भोग अत्यन्त छोटी सीमामे सीमित है। अनेक मनुष्यों की चित्तवृत्तिके उत्कर्पके सहयोगसे अपने चित्तको उन्नति, बहुत आदमियोंकी शक्तिको मिलाकर अपनी शक्तिका प्राबल्य और अनेकोंकी सम्पद इकट्ठी . करके अपनी सम्पदकी प्रतिष्ठा करना ही सभ्य मानवका लक्ष्य है। उपनिपत् कहता है ..हम जब अपनेमे अन्यको और अन्यमें अपनेको पाते हैं, तभी सत्यके पास पहुचते है--नि ततो विजुगुप्सते'-- तब फिर हम छिपकर नहीं रह सकते, तभी हमारा प्रकाश होता है। सभ्यतासे मनुष्य प्रकाशवान और बर्बरतासे अप्रकाश-युक्त होता है। परस्पर एक दूसरेमे आत्मोपलब्धि जितनो सत्य होती जाती है, उतना ही सभ्यताका यथार्थ रूप विकसित होता जाता है। धर्मके नामपर, कर्मके नामपर, सम्पत्तिके नामपर, स्वदेशके नामपर-जहाँ कहीं भी मनुष्य मानवलोकमें भेद उत्पन्न करता है, वहीं दुगतिका - १६३ परिशिष्ट कारण गोचर या अगोचरमे बलवान होता रहता है। वहाँ मानव अपने धर्मपर आघात करता है, और वहीं आत्मघातका प्रशस्त मार्ग सुल जाता है। इतिहासमे युग-युगमें इसके प्रमाण मिलते हैं। सभ्यताकै विनाशका कारण ढूढनेसे एक हो कारण मिलेगा, वह है मानव-सम्बन्धको विकृति या व्याघात । क्षमताशाली और अभमके वीचका व्यवधान वढते-नढते यहाँ तक बढ़ गया कि सामाजिक सामजस्य ही नष्ट हो गया। प्रभु ओर दासमे, भोगी और अभुक्तमे भेद होते-होते समाजके टुकडे-टुकडे हो गये और उन भेदोने समाज-शरीरमे प्राण-प्रवाहके सचारको रोक दिया, जिससे एक अगकी अतिपुष्टि हुई और अन्य अगो मे अतिशीर्णता होनेसे रोगोंने अपना घर बना लिया। ससारके सभी सभ्य देशोमे इन छिद्रोसे यमराजके चर विहार कर रहे है। अन्य देशोकी अपेक्षा हमारे देशका प्रनेशद्वार उनके लिए और भी रोक है। यह दुर्घटना हाल ही में हुई है। एक दिन हमारे देशके गांव सजीव थे। सारा देश उसी समाजके द्वारा सम्बन्ध-बद्ध था, हमारी सारी शिक्षा-दीक्षा मौर धर्म-कमका प्रवाह गांव-गाँवमे प्रवाहित था। देशका विशाल हृदय गाँव-गाँवमे प्रसारित होकर सर्वत्र व्याप्त था, वहीं उसे प्राण मिले थे। यह बात सच है कि आधुनिक अनेक ज्ञान-विज्ञानोकी सुविधाओसे हम वचित थे। उस जमानेमें हमारे उद्योगकी परिधि संकीर्ण थी, वैचित्र्य कम था, जीवन-यात्राकी आवश्यकताओंका अभाव भी काफी था। किन्तु फिर भी सामाजिक प्राण-क्रियाका योग अरिच्छिन्न १ रूसको चिट्ठी था। अब वह बात नहीं रही। नदीका स्रोत जब चलता रह है, तब उस स्रोतके द्वारा ही इस पारसे उसपार या इस देशसे देशको जाना-आना और लेन-देनका सम्बन्ध कायम रह सत्ता परन्तु पानी जब सूख जाता है, तब उस नदीकी साई विघ्न रूपमे दिखाई देती है , तब किसी समय जो मार्ग था, वही अम बन जाता है। वर्तमानमें यही बात हुई है। जिन्हें हम भद्र-साधारण कहते हैं, वे जो विद्या अर्जन करते उनकी जो आकाक्षा और साधना है, उन्हें जो सुविधाए मिलती वह तो सूखी नदीके सूखे गडहोका एक किनारा है, दूसरे किनारे साथ उसके ज्ञान, विश्वास, आचार, अभ्यास और दैनिक जीवनयात्रा इतना फासला है कि जो लांघा नहीं जा सकता। ग्रामवासियो पास न तो विद्या है, न स्वास्थ्य है, न सम्पद है, न अन्न-वस्त्र उधर जो कालेजमे पढते है, वकालत करते है, डाक्टरी करते बैंकोमें रुपये जमा करते है, वे ऐसे टापूमे है, जिसके चारों से अथाह पानी है--ग्रामवासियोंसे उनका सर्वथा विच्छेद है। जिम स्नायुजालके द्वारा अग-प्रत्यंगो की वेदना शरीरके मर्मस्थ तक पहुचतो है, सम्पूर्ण शरीरका आत्मबोध अग-प्रत्यगोके योध सम्मिलनसे पूर्ण होता है, उसमे यदि विच्छेद हो, तो वह उसकी मर दशाको ही सूचित करता है। हमारे समाजको वही मरण-दशा है देशको मुक्ति देनेके लिए आज जो लोग उत्कट अध्यवसायमे प्रह है-ऐसे लोगोको भी वहाँ तक दृष्टि नहीं जाती, जहाँ समाजमे गहर भेद है और लकोक लक्षण साफ दिखाई दे रहे है। रह-रहक परिशिष्ट उनके मुंहसे यही निकलता है कि कुछ करना चाहिए, किन्तु स्वरके साथ उनके हाथ नहीं उठते। देशके लिए हमारा जो उद्योग है, उसमे देशकी जनताको हम छोड ही देते हैं। इसके हम इतने आदी वन गये है कि इसकी विराट् विडम्बनाको भी हम नहीं समझ पाते। इसका एक दृष्टान्त देता है। हमारे देशमे आधुनिक शिक्षा-विधिके नामसे जिस वस्तुका दय हुआ है, उसीके नामपर स्कूल और कालेज कुकुरमुत्तेकी तरह जहां-तहां सर उठाये दीख पडते है। ये इस ढगसे बनाये गये है कि इनका प्रकाश कालेजी मडलके बाहर बहुत कम पहुचता है-सूर्यका प्रकाश चन्द्रमा प्रकाशमे परिणत होकर जितना विकसित होता है, उससे भी कम। उसके चारो तरफ विदेशी भापाकी मोटी-मजबूत चहारदीवारी है। मातृभापाके द्वारा शिक्षा-प्रचारके विषयमें जन विचार करता हू, तो उस विचारमे साहस बहुत कम पाता हूं। अन्त पुरिका वधूकी तरह वह भयभीत-सी मालूम होती है। मांगन तक ही उसकी गति है, उसके बाहर जाते हो उसका ठोडी तक घूघट उतर आता है। मातृभापाका इलाका प्राथमिक शिक्षाक भीतर ही है, वह केवल चालकोंको शिक्षाके योग्य है-अर्थात् मातृभापाके सिवा अन्य कोई भापा सोसनेकी सुविधा ही नहीं, उस विराट जनसपको विद्याके अधिकारफे विषयमे वचोंके साथ स्थान दिया गया है। वे किसी तरह भी पूर्ण मनुष्य नहीं पन सस्ते, फिर भी हम आँस मोचकर स्वराज्य के सम्बन्धमें यह कल्पना करते है कि उन्हें पूर्ण मनुप्यका अधिकार मिलेगा।

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रूसकी चिट्टो
१६६
ज्ञान-लाभके बेटवारेको लेकर देशके अधिकाश जनसमूहके
लिए इतनी घडी अनशनकी व्यवस्था और किसी भी नव-आग्रत
देशमे नहीं है, न जापानमे, न फारसमे, न टर्कीमे और न
ईजिप्टमे। मातृभापा मानो एक अपराध है-ईसाई धर्मशास्त्रमे
जो आदिम पाप कहलाता है। देशवासियोके लिए मातृभापागत
शिक्षाके भीतरसे ज्ञानकी सर्वाङ्ग पूर्णताको हमने कल्पनाके बाहर
छोड रखा है। अगरेजी होटलवालेकी दूकानको छोडकर और
कहीं भी देशवासियोंके लिए पुष्टिकर भोजन मिल ही नहीं
सकता-यह कहना, और अगरेजी भापाके सिवा मातृभापामें
ज्ञानकी भलीभांति प्राप्ति नहीं हो सकती-यह कहना, दोनो'
एक ही बात है।
इस सम्बन्धमे एक बात याद रखनी चाहिए, वह यह कि
आधुनिक समस्त विद्याओ का जापानी भापामे समावेश करके
तब कहीं जापानी विश्वविद्यालय देशको शिक्षा-व्यवस्थाको सत्य
और सम्पूर्ण बना सके है। इसका कारण यह है कि शिक्षाके
मानी जागनियों ने 'सम्पूर्ण देशकी शिक्षा समझा है, 'भद्र'नामधारी
एक सकीर्ण श्रेणीकी शिक्षाको ही उन्हो ने शिक्षा नहीं माना। मुंइसे
हम चाहे जो-कुछ कहे, देशके मानी हम 'भद्रसमाजका देश'
समझते है। सर्वसाधारणको हम 'लो-क्लास' या 'छोटे-आदमी'
कहते हैं, यह शब्द जमानेसे हमारी नस-नसमे समा गया है।
छोटे मादमियो के लिए सम तरहके पैमाने भी छोटे बने हैं। उन
लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया है। बड़े पैमानेकी मांग पेश

परिशिष्ट
करने लायक उनमे साहस ही नहीं रह गया। ये भद्र समाजके
छायाचर है, उनका प्रकाश धुंधला है, किन्तु दशमे उन्हींकी सख्या
ज्यादा है, और इसलिए देशका धारह-आना भाग धुंधला है।
भद्र-समाज उन्हें स्पष्ट देस ही नहीं सकता, विश्व-समाजकी तो
वात ही छोड़ दो।
राष्ट्रीय आन्दोलनको उन्मत्त दशामे हम मुहसे चाहे जो
कुछ भी
क्यों न कहे, देशाभिमानको गला फाइ-फाड कर
कितना ही क्यो न व्यक्त करें हमारा देश प्रकाशहीन हो
रहा है, और इसीलिए फर्मपथपर देश-सेवामे हमारी इतनी
उदासीनता है। जिनको हमने छोटा बना रखा है, मानव
म्भावको कृपणताके कारण हम उनपर अन्याय ही कर रहे
है। उनकी दुहाई देकर हमेशा क्षण-क्षणमे हम रुपये इकट्ठ
करते हैं, मगर उनके हिस्सेमे कोरी वार्ते ही आती हैं, रुपया
अन्तमे
घूम-फिरकर हमारे ही दलके लोगो मे समा जाता है।
कहनेका मतलब यह है कि देशके जिस अति क्षुद्र अशमें विद्या-बुद्धि
और धन-मान केन्द्रीभूत है, उन फी-सदी पांच आदमियो के साथ
पचानवे आदमियो का व्यवधान महासमुद्रसे भी बढकर है। हम
सब एक ही देशमे रहते है, फिर भी हमारा देश एक नहीं है।
बचपन में अपने यहां मैंने एक तरहका चिगग जलते देखा
था, जिसे बगालमें 'सेज' कहते हैं उसके पात्रमे नीचे पानी और
ऊपर तेल भरा रहता था।
उसका उजेला कम होता था और
धुओं ज्यादा। हमार पुराने जमानेकी लगभग यही दशा थी।

रूसकी चिट्ठी
भद्र-साधारण और
अभद्र-साधारणका सम्बन्ध ऐसा ही था।
दोनों का सम्मान समान नहीं, फिर भी दोनों ने एक साथ रहकर
एक ही चिरागको जला रसा था। क्योंकि उनका एक ही अखंड
आधार था। परन्तु आज तेल एक तरफ चला गया है और
पानी दूसरी तरफ। तेलकी ओर दिआ जलनेके अन्य उपादान
कम हैं, और पानीकी तरफ बिलकुल है ही नहीं।
जब उमर वढी, तो घरमे आ गया विदेशसे मिट्टोके तेलका लम्प ,
उसमे पूरा तेल भरा है और सारे तेलमे उद्दीपन-शक्ति मौजूद है।
उसका उजेला भी तेज है। इसके साथ यूरोपीय सभ्य समाजको
तुलना की जा सकती है। वहाँ एक हो जातिकी विद्या और शक्ति
देशके समस्त लोगोंमे व्याप्त है। वहा ऊपरके सड और नीचेके
सड है, ऊपरके संडमे वत्ती तेज जला करती है और नीचे के संडमें
जलती ही नहीं। परन्तु वह मेद लगभग आकस्मिक है--सारे
तेलमे दीप्ति-शक्ति मौजूद है। उस हिसायमें ज्योतिका जाति-भेद
नहीं है-नीचेका तेल यदि ऊपर उठे, तो उसके उजेलेमे कुछ तारतम्य
नहीं होगा। वहां नीचेवालोके लिए उपर चढना असाध्य नहीं
है-उसकी कोशिश हमेशा ही होती रहती है।
और एक तरहकी वत्ती है-वह कहलाती है विजली-बत्ती ।
उसमें तारकी फुडलीसे प्रकाश नि
प्रकाशवान हैं। उसमे, दीप्त और
सा
क
प्रकाशलगमग
।

१६४ परिशिप किन्तु कहीं-कहीं शुरू हो गया है, इसके यत्रको पका बनानेमे शायद अब भी बहुत-कुछ बनाना-विगाडना होगा, यत्रक महाजनोंमे कोई-कोई देवालिया भी हो जा सकते हैं,--परन्तु पश्चिम महादेशमे इधर लोगोंका काफो झुकाव हो रहा है, इस बातको अन डिपाया नहीं जा सकता। यह हे प्रकाशमा उद्यम, मनुप्यका अन्तरग धर्म, इस धर्म-साधनसे सभी मनुष्याको अव्याहत अधिकार मिलेगा, ऐसा एक प्रयास अव क्रमश फैलता हो जाता है। मगर आज, केवल हमार ही इस अभागे देशमे देखा जाता है कि एक दिन मिट्टोके दिसमें जो वत्ती जल रहो थी, उसके लिए भी तेल नहीं जुटता-बाधाएं आ रही हैं। आज हमार देशके डिप्रो-धारी लोग जन देहातोके विपयमे कुछ विचार करते भी है, तो उनके लिए बहुत ही हलके वजनकी कोई चीज देनेको काफी देना समझते हैं। जब तक हमारा ऐसा मनोभाव रहेगा, तब तक गांवके रोग हमारे लिए विदेशी ही बने रहेगे। यहां तक कि उनसे भी ज्यादा पराये हो जायगे। इसका कारण यह है कि हमे स्कूल-कालेजोंसे जितनी विद्या मिलनी है, वह विद्या यूरोपीय है। उस विद्याकी सहायतासे यूरोपीयोको समझना और यूरोपीयोंके सामने अपनेको समझाना हमारे लिए सहज हो गया है। इलैंड, फ्रान्स और जर्मनीको मनोवृत्ति हमारे लिए सहज और प्रफट-सी है, उनके काव्य नाटक उपन्यास जो-कुछ हम पढते हैं, वे हमार लिए पहेली से नहीं मालूम होते , यहाँ तक कि जो कामना और तपस्या उनकी है, लगभग वही कामना और वही तपस्या हमारी भी होती जा रही है। परन्तु - ।

रुसको चिट्ठी १७० जो लोग सीतला माई, झोला माई, मनमादेवी, पष्ठोदेवी, कालीजी, भवानीजी, राहु-शनि, भूत-प्रेत, पोथी-पत्तरा और पंडा-पुरोहितोंकी छायामे पले हैं, उनसे हम बहुत ज्यादा अपर चढ़ गये हो, सो बान नहीं, किन्तु उनसे दूर जरूर हट गये है-इतनी दूर कि एक दूसरेको आवाज तक नहीं सुन पाते। उनका ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करने योग्य कौतूहल भी हममे नहीं है। हमारे कालेजोंमे जो इकॉनॉमिक्स या एथनॉलॉजी पढते है, अपने पासके गांवके लोगोंका आचार-विचार जाननेके लिए वे यूरोपीय पंडितोंका मुह ताफा करते हैं। अपने पड़ोसियोंको वे 'छोटे-आदमी' समझते है, हमारे हृदयमे मनुष्यके प्रति जो कुछ दर्द या सहानुभूति है, उसके द्वारा हमे वे दिसाई ही नहीं देते। पश्चिम महादेशके अनेक प्रकारके "मूवमेन्टो" का इतिहास इन्होंने पढा है, किन्तु हमारे देशके जनसाधारणमें जो अनेक प्रकारके "मूनमेन्ट ( आन्दोलन ) चल रहे हैं, हमारे शिक्षित-साधारणको उसकी कुछ राबर ही नहीं-जाननेके लिए किसी तरहकी उत्सुक्ता ही नहीं है , क्योकि उसके जाननेसे परीक्षामे मार्क नहीं मिलते। देशके साधारण-समाजमे कितने ही सम्प्रदाय है, वह हमारे लिए उपेक्षाकी चीज नहीं है, भद्र-समाजमे नये-नये धर्म-प्रयासोंकी अपेआं उनमे अनेक विषयोंमे गम्भीरता है- उन सम्प्रदायोंका जो साहित्य है, वह भी श्रद्धाके साथ रक्षा करने - योग्य है--मगर हम जो उन्हें 'छोटे आदमी' समझते हे। सभी देशोंमे नृत्य क्ला-विद्याके अन्तर्गत माना जाता है, और " परिशिष्ट वह भार प्रकट करने का उपाय होनेसे अच्छी दृष्टिसे देखा जाता है। हमारे देशमे भद्र-समाजसे उसमा लोप हो गया है, इसलिए हमने समझ रखा है कि यह हमारी अपनी चीज नहीं है। किन्तु फिर भी मर्वसाधारणको नृत्याला अनेक रूपमें अब भी मौजूद है-मगर ये 'छोटे आदमी' ठहरे। अतएव उनमें जो कुछ है, वह हमारी चीज नहीं। यहां तक कि सुन्दर और मुनिपुण होनेपर भी वह हमारे लिए लन्नाका विपय ही बना रहेगा। धीरे-धीरे सम्भन है यह सर-पुल लुम हो जाय-मगर फिर भी हम उसे देशको स्मृतिमे नहीं गिनते-क्योकि वास्तवमे वे हमारे देशमे नहीं है। कविने कहा है-“देसहिमे परदेस भयो अन " उन्होने इसो सयालसे कहा है कि हम विदेशी शासनमे है। उससे भी सत्य और उससे भी गम्भीर-भावसे कहा जा सकता है कि अपने देशमे ही परदेशी ई-अर्थात् हमारी जातिके अधिकाशोका देश हमारा देश नहीं है। वह देश हमारे लिए अदृश्य है-अस्पृश्य है। जन देशको हम गला फाड-फाडकर माता कहकर पुकारते हैं, तब मुहसे चाहे जो कुछ कहे, मन-ही-मन समझते हे कि हमारी बह 'मा' कुछ लाडले लडकोकी हो मा है। क्या इसी तरह हम जिन्दा रह सकते है? सिफ वोटका अधिकार मिल जानेसे ही क्या हमें चरम मुक्ति मिल जायगी ? इसी दु ससे, इमी वेदनासे देशवासियोंकी गहरी उदासीननाके चीचमें, सबको अनुकुलनासे वचिन होते हुए भी, यहाँ, इन थोडेसे मामोंमे हमने प्राण-सचारण के लिए यज्ञ करना शुरू कर दिया है।

रूसको चिट्ठी १७० जो लोग सीतला माई, ओला माई, मनमादेवी, पष्टोदेवी, कालीजी, भवानीजी, राहु-शनि, भूत-प्रेत, पोथी-पत्तरा और पडा-पुरोहितोंकी छायामे पले हैं, उनसे हम बहुत ज्यादा ऊपर चढ गये हों, सो वात नहीं, किन्तु उनसे दूर जरूर हट गये है--इतनी दूर कि एक दूसरेको आवाज तक नहीं सुन पाते। उनका ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करने योग्य कौतूहल भी हममे नहीं है। हमारे कालेजोमे जो इकॉनॉमिक्स या एथनॉलॉजी पढ़ते हैं, अपने पासके गांवके लोगोका आचार-विचार जाननेके लिए वे यूरोपीय पंडितोका मुह ताका करते हैं। अपने पड़ोसियोंको वे 'छोटे-आदमी' समझते है, हमारे हृदयमें मनुष्यके प्रति जो कुछ दर्द या सहानुभूति है, उसके द्वारा हमें वे दिखाई ही नहीं देते। पश्चिम महादेशके अनेक प्रकारके "मूवमेन्दो" का इतिहास इन्होंने पढा है, किन्तु हमारे देशके जनसाधारणमे जो अनेक प्रकारके “मूत्रमेन्ट" (आन्दोलन ) चल रहे हैं, हमारे शिक्षित-साधारणको उसकी कुछ सबर ही नहीं जाननेके लिए किसी तरहकी उत्सुक्ता ही नहीं है, क्योकि उसके जाननेसे परीक्षामे मार्क नहीं मिलने। देशके साधारण-समाजमे कितने ही सम्प्रदाय हैं, वह हमारे लिए उपेक्षाकी चीज नहीं है , भद्र-समाजमे नये-नये धर्म-प्रयासोकी अपेक्षा उनमे अनेक विषयोंमे गम्भीरता है-उन सम्प्रदायोका जो साहित्य है, वह भी श्रद्धाके साथ रक्षा करने योग्य है-मगर हम जो उन्हें छोटे आदमी' समझते हैं। सभी देशोंमें नृत्य कला-विद्याके अन्तर्गत माना जाता है, और " उन्होने १७१ परिशिष्ट वह भाव प्रकट करनेका उपाय होनेसे अच्छी दृष्टिसे देखा जाता है। हमारे देशमे भद्र-समाजसे उसका लोप हो गया है, इसलिए हमने समझ रखा है कि वह हमारी अपनी चीज नहीं है। किन्तु फिर भी मर्वसाधारणको नृत्याला अनेक रूपमें अब भी मौजूद है- मगर वे 'डोटे आदमी' ठहरे। अतएर उनमें जो कुछ है, वह हमारी चीज नहीं। यहाँ तक कि सुन्दर और सुनिपुण होनेपर भी वह हमारे लिए लजाका निपय ही बना रहेगा। धीरे-धीरे सम्भव है यह सर-कुछ लुम हो जाय-मगर भी हम उसे देशको स्मृतिमे नहीं गिनते-क्योंकि वास्तवमे वे हमारे देशमे नहीं है। कविने कहा है-"देसहिमे परदेम भयो अब इसी सयालसे कहा है कि हम विदेशी शासनमे है। उससे भी सत्य और उससे भी गम्भीर-भावसे कहा जा सकता है कि अपने देशमे ही परदेशी है-अर्थात् हमारी जातिके अधिकाशोंका देश हमारा देश नहीं है। वह देश हमारे लिए अदृश्य है--अस्पृश्य है। जन देशको हम गला फाड-फाडकर माता कहकर पुकारते हैं, तर मुहसे चाहे जो कुछ कहे, मन-ही-मन समझते हैं कि हमारी बह 'मा' कुछ लाडले लडकोकी हो मा है। क्या इसी तरह हम जिन्दा रह सकते है। सिर्फ वोटका अधिकार मिल जानेसे ही क्या हमे चरम मुक्ति मिल जायगी? इसी दु खसे, इसी वेदनासे देशवासियोंकी गहरी उदासीनताके चीचमें, सनको अनुकूलनासे वचिन होते हुए भी, यहाँ, इन थोडेसे ग्रामोंमे हमने प्राण-सचारणके लिए यज्ञ करना शुरू कर दिया है।

" , - रूसको चिट्ठी १७० जो लोग सीतला माई, ओला माई, मनमादेवी, पप्ठोदेवी, कालीजी, भवानीजी, राहु-शनि, भूत-प्रेत, पोथी-पत्तरा और पडा-पुरोहितोंकी छायामे पले हैं, उनसे हम बहुत ज्यादा ऊपर चढ गये हों, सो बात नहीं, किन्तु उनसे दूर जरूर हट गये है-इननी दूर कि एक दूसरेको आवाज तक नहीं सुन पाते। उनका ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करने योग्य कौतूहल भी हममें नहीं है। हमारे कालेजोंमे जो इकॉनॉमिक्स या एथनॉलॉजी पढ़ते है, अपने पासके गांवके लोगोका आचार-विचार जाननेके लिए वे यूरोपीय पंडितोंका मुह ताका करते है। अपने पडोसियोको वे 'छोटे-आदमी' समझते है, हमारे हृदयमे मनुष्यके प्रति जो कुछ दर्द या सहानुभूति है, उसके द्वारा हमे वे दिसाई ही नहीं देते। पश्चिम महादेशके अनेक प्रकारके “मूवमेन्टों" का इतिहास इन्होंने पढा है, किन्तु हमारे देशके जनसाधारणमे जो अनेक प्रकारके “मुनमेन्ट" (आन्दोलन ) चल रहे हैं, हमारे शिक्षित-साधारणको उसकी कुछ सवर ही नहीं जाननेके लिए किसी तरहकी उत्सुस्ता ही नहीं है, क्योंकि उसके जाननेसे परीक्षामें मार्क नहीं मिलते। देशके साधारण-समाजमे कितने ही सम्प्रदाय हैं, वह हमारे लिए उपेक्षाकी चीज नहीं है , भद्र-समाजमे नये-नये धर्म-प्रयासोंकी अपेक्षा उनमें अनेक विपयोंमे गम्भीरता है- उन सम्प्रदायोंका जो साहित्य है, वह भी श्रद्धाके साथ रक्षा करने योग्य है-मगर हम जो उन्हें छोटे आदमी' समझते है। मभी देशोंमें नृत्य पला-विद्याकै अन्तर्गत माना जाता है, और - १७१ परिशिष्ट वह भार प्रकट करनेका उपाय होनेमे अच्छी राष्टिसे देखा जाता है। हमारे देशमे भद्र-समाजसे उसा लोप हो गया है, इसलिए हमने समझ रखा है कि वह हमारी अपनी चीज नहीं है। किन्तु फिर भी सर्वसाधारणको नृत्यकला भनेक रूपमें अब भी मौजूद है-~मगर वे 'छोटे आदमी' ठहरे। अतएर उनमें जो कुछ है, यह हमारी चीज नहीं। यहां तक कि सुन्दर और मुनिपुण होने पर भी यह हमारे लिए उन्नाका विषय ही बना रहेगा। धीरे-धीरे सम्भव है यह सर-कुछ लुम हो जाय-मगर फिर भी हम उसे देशको स्मृतिमे नहीं गिनते-पयोंकि वास्तनमे वे हमारे देशमें नहीं है। फरिने कहा है-"देसहिमे परदेस भयो अब " उन्होंने इसौ सयालसे कहा है कि हम विदेशी शासनमे हैं। उससे भी सत्य और उससे भी गम्भीर-भावसे कहा जा सकता है कि अपने देशमे ही परदेशी है-अर्थात् हमारी जातिके अधिकाशोंका देश हमारा देश नहीं है। वह देश हमारे लिए अदृश्य है--अस्पृश्य है । जर देशको हम गला फाड-फाडकर माता कहकर पुकारते है, तर मुँहसे चाहे जो कुछ कहें, मन ही-मन समझते हैं कि हमारी वह 'मा' कुछ लाडले लडकोंकी हो मा है। क्या इसी तरह हम जिन्दा रह सकते हैं सिर्फ वोटका अधिकार मिल जानेसे ही क्या हमे चरम मुक्ति मिल जायगी ? इसी दुससे, इसी वेदनासे देशवासियोंकी गहरी उदासीनताके वीचमे, सनको अनुकूलतासे वचिन होते हुए भी, यहाँ, इन थोडेसे ग्रामोंमे हमने प्राण-सचारणके लिए यज्ञ करना शुरू कर दिया है। - रूसको चिट्ठी १७४ शासनका सम्बन्ध जोडता, यानी वह वश्यराज न वनकर क्षत्रियराज वनता, तो तुम्हें किसी तरहका पश्चात्ताप न रहता ?" -“आर्थिक सम्बन्धके जरिये विशाल जापानकी सहस्रमुसी भूख हम लोगोंको चूसे जा रही है, इससे तो राज-शासनका बोझ हलका था, वह सम्बन्ध व्यक्तिगत है, सीमाबद्ध है। राजाकी इच्छा यदि केवल शासनकी ही इच्छा हो, शोपणकी इच्छा न हो, तो उसे मानते हुए भी मामूली तौरसे सारा देश अपनी स्वाधीनता और आत्म-सम्मानकी रक्षा कर सकता है। परन्तु धनिकोंके शासनसे हमारा समग्र देश दूसरे ,एक समग्र देशकी चीजोंका बाजार बन जाता है। हम लोभी वस्तु बन गये है, उसमे न तो आत्मीयता है और न गौरव ही" ---"ये जो वाते तुम सोच रहे हो और कह रहे हो, यह जो समष्टिगत भावसे जातीय आत्म-सम्मानके लिए तुम्हारा आग्रह है, क्या उसका कारण यह नहीं है कि जापानके प्रतिष्ठित विद्यालयमे तुम आधुनिक युगकी राष्ट्रीय शिक्षासे दीक्षित हुए हो ?" युवक दुविधामे पडकर चुप रहा। मैंने कहा--" मुंह उठाकर देसो, सामने वह चीन देश दिसाई दे रहा है। वहाँ जातीय आत्म-सम्मानका ज्ञान शिक्षाके अभावसे देशके जनसाधारणमे सोया पड़ा है। इसीसे वहां व्यक्तिगत क्षमता-प्राप्तिको दुगशासे कुछ लोभी मनुष्योंमे मार-काट चल रही है। सिर्फ इसी वजहसे देशमें लूट-मार और अत्याचार हो रहे हैं-अभागा देश आज डकतो और सैनिकों के हाथमें पडकर नेश्तनाबूढ हो रहा है, देशमे आज सनकी नदियां यह परिशिष्ट रही हैं, प्रभा आज असहाय होकर रात-दिन आतकित धनी रहती है। शिक्षाके ज़ोरसे जहाँ साधारण जनतामे स्वाधिकारका ज्ञान स्पष्ट नहीं हुमा, वहाँ स्वदेशी या विदेशी दुराकांक्षियो के द्वारा उनपर किये गये अत्याचारो को कौन रोक सकता है ? उस दशामे वे क्षमतालोलुपो के स्वार्थ-साधनके उपकरणमात्र बने रहते हैं। तुमने अपने देशको धनियोंके स्वार्थको वस्तु बताकर पश्चात्ताप किया था, किन्तु जो मूढ है, जो कापुरुप है, जो भाग्यपर भरोसा रखकर उसीके मुहकी ओर ताकने रहते हैं, जो आत्म-कर्तृत्वपर निवास नहीं रसते, उनकी वह उपकरण-दशा फभी दूर हो ही नहीं सस्ती। कोरियाको अवस्था मुझे नहीं मालूम, परन्तु यदि वहां नवयुगकी शिक्षाके प्रभावसे साधारण जनतामे स्वाधिकार-वानका अकुर भी उगा हो, तो वह शिक्षा क्या उन्हें जापानसे ही नहीं मिली ?" -"किससे मिली, किससे नहीं-इससे क्या माता-जाता है ? शत्रु हो, चाहे मित्र-कोई भी चाहे किसी उपायसे हमे पयो न जगावे, जागरणका जो धर्म है, वह तो अपना काम करेगा ही।" -"इस थातको म मानता हू, मेरा यह तर्क ही नहीं है। विचारनेका विषय तो यह है कि तुम्हारे देशमें शिक्षा-प्रचार इतना हुआ है या नहीं, जिससे देशके अधिकाश लोग स्वाधिकारकी उपलब्धि और यथार्थ रूपमे उसका दावा कर सके? अगर इतना न हुआ हो, तो वहीं विदेशियोंके दूर हो जानपर भी सर्वसाधारणके द्वारा आत्म-शासन नहीं हो सकता, हो सकता है कुछ साम आदमियो के उपद्रवसे आत्म-विप्लव ।, इन थोडेसे आदमियो के .

१७६
G
-
-
रूसको चिट्ठी
व्यक्तिगत स्वार्थ-धोधको संयत करने का एकमात्र उपाय है बहुत
आदमियों का समष्टिगत स्वार्थ-योधका उद्धोधन ।"
जितनी और जिस ढंगकी शिक्षासे विशाल रूपसे समप्र
देश चेत सकता है, उसे हम सम्पूर्ण रूपसे दूसरों से पानेको आशा
कैसे कर सकते हैं
-"तुम्हारे जैसे शिक्षित पुरुपो को ही यदि देशमें वैसी शिक्षाका
अभाव मालूम होता है, तो उस शिक्षा-प्रचारके साधनको ही सबसे
पहला और सबसे मुख्य कर्तव्य समझकर उसे स्वयं अपने हाथमें
क्यों नहीं ले लेते ? देशको मरनेसे बचानेके लिए केवल भावुकतासे
ही काम नहीं चल सकता, उसके लिए ज्ञानकी बहुत बड़ी आवश्यकता
है। मेरे मनमें और भी एक विचारणीय विपय है। भौगोलिक,
ऐतिहासिक या जातीय प्रकृतिगत कारणो से कोरिया बहुत दिनो से
कमज़ोर है। आज जब कि युद्ध कग्ना वैज्ञानिक साधन-साध्य
और
बहुव्यय-साध्य हो गया है, तो क्या तुम जापानसे अपनी शक्तिसे
अलग होकर अपनो ही शक्तिसे अपनी रक्षा कर सकते हो ?
ठोक-ठीक बताओ?"
"नहीं कर सकते, यह तो मानना ही पडेगा।"
-"यदि नहीं कर सकते, तो इस बातको भी मानना होगा कि
कमज़ोर सिर्फ अपने लिए ही अपने माप विपत्ति नहीं लाता,
चल्कि औरो के लिए भी बुला लाता है। दुर्बलनाके फुऍपर प्रनल
दुराझाझा आप हो दूरसे आकृष्ट होकर मडराती रहती है। सवार
सिंहकी पीठपर नहीं चढ़ सकता, घोडेको ही लगामसे बांध सकता है।

पायोनियर्स कम्यूनमें खीन्द्रनाथ

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परिशिष्ट
मान लो, रूस यदि कोरिया मडा गाड दे, तो वह सिर्फ कोरियाके
लिए ही नहीं, जापान के लिए भी विपत्ति है। ऐसी दशामें दूसरे
प्रबलको रोकनेके लिए कोरियामै जापानको अपनी ही शक्ति
बढानी पडेगी। और उस दशामें यह सम्भव नहीं कि किसी दिन
जापान बिना पराजयके ही कोरियाके कमज़ोर हाथों में कोरियाका
भाग्य सौप देगा। इसमें जापानको सिर्फ मुनाफेका ही लोभ
नहीं है, बल्कि जानका भी खयाल है।"
----"आपका प्रश्न यही है न, कि तब कोरिया क्या करेगा ?
मैं जानता हू, कि आधुनिक युद्धके योग्य सेना हम नहीं तैयार
कर सकते। उसके बाद युद्धके लिए जहाज, हवाई जहाज और
पनडुब्बे तैयार करना, उनका परिचालन करना हमारी कल्पनाके
भी बाहरकी बात है, और विदेशी शासनके अधीन रहकर असम्भव
है, किन्तु फिर भी हम यह तो हरगिज़ नहीं कह सकते कि
हाथ-पैर चलाना बद करके डूब जाना ही अच्छा है।"
~~" यह कहना अच्छा भी नहीं है। हाथ-पैर चलाना बंद
नहीं कर सकते, परन्तु किस तरफ जानेसे किनारा मिलेगा,
इस बातको अगर न सोचें और बुद्धिसंगत कोई जवाब न दें,
तो मुँहसे चाहे जितना ही क्यो न चिल्लावें, भापान्तरमें उसे
'हाथ-पैर चलाना चंद' ही कहा जायगा।"
" मैं क्या सोचता है, सो कहता हूँ। ऐसा एक समय
आनेवाला है, जब ससारमें जापानी, चीनी, रूसी, कोरीय मादि
अनेक जातियो में आर्थिक स्वार्थगत राष्ट्रीय प्रतियोगिता ही मवसे
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212
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रूसकी चिट्ठी मुख्य ऐतिहासिक घटना नहीं समझी जायगी। क्यो नहीं समझी जायगी, इसका कारण बताता है। जिस देशके मनुष्योंको हम स्वाधीन कहा करते हैं, उनके भी ऐश्वर्य और प्रतापके क्षेत्रमें दो विभाग हैं। एक विभागके कुछ थोडेसे - आदमी ऐश्वर्यका भोग करते हैं, और दूसरे विभागके असंख्य अमागे उस ऐश्वर्यका भार ढोते हैं। एक विभागके दो-चार आदमी प्रताप-यज्ञकी अग्निशिखा अपनी इच्छासे नहीपित करते हैं, और दूसरे विभागके आनेकानेक लोग इच्छा न होते हुए भी अपने हाड़-मांससे उस प्रताप-यज्ञमे इन्धन जुटाते हैं। सारे ससारमें युग-युगमे मनुष्यों के भीतर ऐसे मूलगत विभाग रहे हैं-एक ऊपर, दूसरा नीचे। इतने दिनों तक नीचे विभागके लोग अपनी निचाईको घराबर मानते आये हैं , इस बातको वे सोच ही नहीं सके कि यह अवश्य स्वीकार्य नहीं है, इससे इनकार भी किया जा सकता है।" मैंने कहा- सोचना शुरू करा दिया है, क्यो कि ससारमे जो युगान्तकारी द्वन्द्व शुरू हुआ है, वहा भिन्न-भिन्न महाजातियों में ही नहीं, बल्कि मनुष्यके दो ही विभागो मे है-शासनकर्ता और शासितमे। शोपणकर्ता स्वार्थी और शुष्क होता है। इस विषयमें कोरिया और जापान, 'प्राच्य और पाश्चात्य-सब एक ही पक्तिमें हैं। हमारे कष्ट और हमारी दीनता ही हमारी 'महाशक्ति हैं। उसीने संसार-भरमें हमारा सम्मिलन कराया है, और उसीके बलपर भविष्यपर हमारा अधिकार होगा। किन्तु जो धनिक है, - -- 1 है परिशिष्ट वे किसी भी तरह एक नहीं हो सकते-स्वार्थको दुलंघ्य प्राचीरसे वे अलग-अलग घिरे हुए हैं। हमारे लिए बड़े आश्वासनकी बात यह है कि जो सत्य रूपमे मिल सकते हैं, उन्हींकी जय होती है। यूरोपमे जो महायुद्ध हुआ था, वह धनिकोंका युद्ध था। उस युद्धका बीज आज असख्य होकर ससार-भरमे फैल गया है। वह चीज मानव-प्रकृतिके अंदर ही है, स्वार्थ ही विद्वप-बुद्धिकी जन्मभूमि है। अब तक दुसी ही दीनता और अज्ञानतासे परस्पर एक दूसरेसे अलग थे , और धनमे जो शक्तिशूल था, वह उनके मर्मस्थलमें चुभा हुआ था। आज दुःस और दीनता ही हमें मिलायेगी, और धन ही धनियो को विच्छिन्न करायेगा। संसारमें आज राष्ट्रतत्रकी जो अशान्त लहरें उठ रही हैं, बलवान जातियों मे जो दुराकांक्षाएँ पढ रही हैं, इससे क्या हमे यही नहीं दीख रहा ?" इसके बाद फिर हमे बातचीत करनेका अवकाश नहीं मिला। मैं मन-ही-मन सोचने लगा-यह बात सच है कि असयत शक्तिका लोभ अपने ही अदर विप उत्पन्न करके अपने आपको मारता है, परन्तु समर्थ और असमर्थका भेद आज जो एक विशेष रूप धारण करके प्रकट हो रहा है, उसे रक्तपात करके नष्ट कर डालनेसे क्या मानव-प्रकृतिसे भेदकी जड नष्ट हो जायगी? ऐसा सुना गया है कि पृथिवीकी समस्त उच्चभूमि तूफानकी झाडूसे साफ होकर घिसते-घिसते एक दिन समुद्रमें मिल जायगी, किन्तु क्या उसी दिन पृथिवीके मरनेका समय नहीं आयेगा ? समत्व और पचत्व फ्या एक ही वस्तु नहीं है ? मैदको नष्ट करके मानव-समाजके सत्यको रूसकी चिट्ठी १८० नष्ट किया जाता है। भेदके अदर कल्याणकर सम्बन्ध स्थापित करना ही उसकी नित्य साधना है, और भेदके भीतर अन्यायके साथ ही उसका नित्य संग्राम है। इस साधनासे, इस संग्रामसे ही मनुष्य बडा होता है। यूरोप आज जन कि साधनाको छोडकर समामको हो एकान्त वस्तु बनाना चाहता है, तो उसकी चेष्टा होगी समर्थको विनाश करके असमर्थको साम्य देना। यदि यह अभिलापा सफल हुई, तो जिस हिंसाकी सहायतासे वह सफल होगी, उस रक्त-बीजको ही जयडका बजा कर उस सफलताके कंधेपर चढा देगी। फिर केवल रक्तपातका चक्रावर्तन ही रह जायगा । शान्तिकी दुहाई देकर ये लोग युद्ध किया करते हैं और उस युद्धके धकेसे ही उस शान्तिको मारते हैं-आजकी शक्तिके विरुद्ध युद्ध करके फलकी जिस शक्तिको जगाते हैं, फिर दूसरे ही दिनसे उसी शक्तिके विरुद्ध युद्धको तैयारी शुरू कर देते हैं। आखिर चरमशान्ति क्या विश्वव्यापी श्मशानक्षेत्रमें है। कोरियाके युवकके साथ मेरी जो बातचीत हुई थी, उसका भाव मात्र यहां लिखा गया है। यह हूबहू उसकी प्रतिलिपि नहीं है । .

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Ruus Ki Chithi

Author
Thakur,shri Ravindra Nath
Title
Ruus Ki Chithi
File name
Ruus Ki Chithi
Text
OCR done
Citation
1925
Published
2011/01
Publisher
Vishal Bharat Pushtakalya Calcutta
Language
Sanskrit
Pages
192
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546692
Barcode
4990010025142.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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