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Yog Yogin Rajasthan
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युग-युगीन राजस्थान,
सपादक
सुखवीरसिह गहलोत
हिन्दी साहित्य मन्दिर
जगदीशसिंह गहलोत मार्ग, जोधपुर
प्रकाशक हिन्दी साहित्य मन्दिर जगदीशसिंह गहलोत माग, जोधपुर श्री जगदीशसिंह गहलोत शोव सस्थान, जोधपुर प्रकाशन वर्ष-1991 मूल्य -6000 रुपये मुद्रक- सन-साईन प्रिण्टर्स, सिवाची गेट के अदर, जोधपुर
अनुक्रमणिका
1-48
पूर्णिमा नबीनलाल
निदेशक श्री जगदीशसिंह गहलोत
शोध सस्थान, जोधपुर
राजस्थान-इतिहास
लेखन का इतिहास
49-84
सुखवीरसिंह गहलोत
(पूर्व) पार ए एस
सचिव, जगदीशसिंह गहलोत
शोध संस्थान, जोधपुर
प्रागैतिहासिक एव
पायेतिहासिक राजस्थान
-
85-136
ऐतिहासिक राजस्थान
जहरखा मेवर
सह प्राचाय, इतिहास विभाग
जोधपुर विश्वविद्यालय
137-148
आधुनिक राजस्थान का
निर्माण
डॉ रामसिंह सोलंकी
वरिष्ठ व्याख्याता, राजनीति
विज्ञान, राजकीय बागड
महाविद्यालय पाली
অনান্তনা यद्यपि राजस्थान में इतिहास लेखन की परम्परा अत्यन्त ही समृद्ध है किंतु प्रारम्भ में इतिहासकारो का रष्टिकोण पान से सक्या मिन्न था। स्वतनता प्राप्ति के पश्चात् तक राजस्थान के इतिहास को मध्यकालीन शौर बलिदान तक सीमित रखा गया। प्रत जहाँ प्रय क्षेत्रो में इतिहास के पुन लेखन को प्रावश्यक्ता का अनुभव किया जा रहा है यहां राजस्थान के समग्र इतिहास के लेखन को आवश्यक्ता का अनुभव किया जाता रहा है। प्रस्तुत पुस्तक मे राजस्थान के लगभग एक लाख वर्ष के इतिहास को समाहित करने का प्रयल किया गया। पूर्णिमा नवीनलाल ने न केवल आज तक के इतिहास लेखन का ही विवेचनात्मक विवरण प्रस्तुत किया है बल्कि पधनाम जसे इतिहासकारों का मूल्यांकन किया है जिनके सबंध मे प्रमी तक कुछ भी नहीं लिखा गया। प्रद्योपात प्रकाशित समस्त प्रर्थों की सूची के समावेश से नि स देह प्रस्तुत विवरण अत्यधिक मूल्यवान हो गया। श्रम तक प्रागतिहासिक और प्रायतिहासिक इतिहास को लिखने के प्रयास नगण्य ही हुए हैं। राजस्थान के समी प्रचनों को प्रागैतिहासिक एव भाद्य तिहासिक सभ्यतामों का वर्णन प्रस्तुत कर इस क्षेत्र में राजस्थान के इतिहास से सम्बधित एक कमी को पूरा करने का प्रयास राजस्थान के समूचे इतिहास को सक्षेप मे प्रस्तुत करने का कठिन कार्य प्रसिद्ध साहित्य वि एव इतिहासकार जहूरखा मेहर द्वारा किया गया है । मडोर के प्रतिहार, पपिनी कथा की ऐतिहासिकता, राव जोधा, 1857 का स्वत गता सग्राम तथा राजस्थान में स्वनशता भादोलन का इतिहास साधारण पाठकों व गहन अध्येतामों के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होंगे। ० रामसिंह सोलको ने गहरी राजनीतिक सम से राजनतिक गतिविधियो व राजस्थान है एकीकरण का पणन प्रस्तुत किया है । एकीकरण के विभिन्न घरण राजनीतिक महापोह का प्रमाणिक विवरण, राजस्थान के विभिन्न रजवाहों को स्वीकृत किए गए प्रिवीपस प्रादि के पणन से प्रस्तुत विवरण भी अत्यन्त ही महत्वपूण बन गया है। माशा है समान रूप से यह पुस्तक समी अभ्यता के लिए एक समान रुचिकर सिद्ध जगदीशसिंह गहलोत माग, जोधर (राज) 14 जनवरी, 1991 सुखवीरसिह गहलोत राजस्थान - इतिहास लेखन का इतिहास ? 7 तुम कौन थे, कसे रहे, अरु क्या तुम्हारा ज्ञान था इतिहास बतलाता मही, कैसा तुम्हारा मान था इतिहास शब्द इति +8+ पास से बना है, जिसका अर्थ है, ऐसा ही हुआ। इतिहास मे घटनाग्रो का क्रमिक वर्णन तथा निश्चयात्मकता होती है । इसमे अतीतकालीन तत्वो की खोज तथा उसके आधार पर लिखे गये विवरणो का लेखा होता है । इतिहास बोध और इतिहास की जानकारी उस देश की संस्कृति का अभिन्न अग होना है लेकिन हमारे देश मे इतिहास रचना की ओर बहुत कम ध्यान दिया गया है। हमारे देश मे प्राचीन काल से ही यही धारणा रही है कि "मनुष्य का जीवन क्षण भगुर है और हमे अागामी जन्म और परलोक को सुधारने की ओर ध्यान देना चाहिये । हमे इस जीवन और बीते दिनो मे रुचि लेने मे कोई लाभ नहीं है।" यो भारतीय प्राचीन साहित्य मे इतिहास प्राय्यान, पुराण आदि शब्द मिलते है तथा रामायण, महाभारत आदि मे इतिहास के तत्व मिलते है लेकिन उन्हे इतिहास अथ नही माना जा सकता है । अाज जिन अर्थो मे इतिहास को लिया जाता है उन अर्थों मे भारत मे इतिहास बहुत वाद मे लिखा जाने लगा। मध्यकाल मे जो भी इतिहास लिखे गये वे इतिहास कम और प्रशस्तियाँ ज्यादा थी। उनमे र जा, दरबार, युद्धो,पडयो ग्रादि का ज्यादा वणन मिलता है। सामान्य प्रादमियो के जीवन, उस समय की सामाजिक व आर्थिक दशा का नाममान का जिक्र हुआ है। अठारहवी शताब्दी के अतिम वर्षों मे जब यहा अग्रेजो का प्रभुत्व जमने लगा तथा अविर सरया मे अग्रेज विद्वान यहा पाने लगे तब उन्होन यहा के इतिहास को नये दृष्टिकोण से लिखना प्रारम्भ किया । इसमें कोई सन्देह नही कि इसमे उनका उद्देश्य स्वय को उच्च प्रादर्शवान बतलाना, पूर्ववर्ती शासको को हीन बतलाना, हिदू-मुसलमानो के बीच भेदभाव लाना, आदि था। फिर भी उन विदेशी इतिहास- कारो ने भारतीय इतिहास तथा पुरातत्व की खोज मे एक नये युग का सूत्रपात किया । सन् 1784 मे कलकत्ता मे एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बगाल की स्थापना, एशिया के इतिहास, पुरातत्व, प्राचीन कला व साहित्य की खोज हेतु की गई । तब से ही राजस्थान के इतिहास, पुरातत्व आदि पर भी विस्तृत खोज आरम्भ हो गई। ' कर्नल जेम्स टॉड ने मेवाड मे 1818 मे पोलिटिकल एजेण्ट के रूप में नियुक्ति पाकर यहा के इतिहास के विषय मे खोज आरम्भ कर दी थी। बाद मे हाडौती, मारवाड, सिरोही व जैसलमेर का भी पोलिटिकल एजेण्ट के रूप मे काम 1822 [ 2 ] तक वह देखते रहे । इस बीच उहोने राजस्थान के इतिहास के विषय में काफी मामग्री इकट्ठी कर ली और इसके फलस्वरूप 1829 मे उन्होने राजस्थान के इतिहास के रूप मे 'अनाल्स एण्ड ऐण्टीक्वीटीज प्रॉफ राजस्थान' का पहला भाग 1829 मे र दूसरा भाग 1832 मे प्रकाशित किया। उन्होने उदयपुर से बम्बई जाते समय रास्ते के स्थानो का वर्णन डायरी के रुप मे 'ट्रावल्स इन वैस्टर्न इण्डिया' लिखा जिसका प्रकाशन उनके स्वगवास के वाद 1839 मे हुआ। इसमे उनके द्वारा देखे स्थानो व स्मारको का सजीव चित्रण है। 'पनाल्म एण्ड एण्टीक्वीटीज ऑफ राजस्थान, म उनके द्वारा सग्रहित अभिलेखो, मिक्को, बहियो, ख्यातो आदि के आधार पर लिखा मेवाड, मारवाड, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही, जयपुर व कोटा का इतिहास है । इस इतिहास के प्रकाशन पर राजपूतो के शोय, वलिदान और त्याग की ख्याति प्रय प्रान्तो व विदेशो मे फैल गई। इस ग्रथ के प्रकाशन से राजस्थान के इतिहास मे और अधिकशोध होने लगी। इस ग्रथ के आधार पर कई देशी व विदेशी इतिहास- कारो ने अपने इतिहास ग्रथ लिखे और लिखते जा रहे है। उत्खनन कार्य इतिहास के विनिर्माण के लिये आवश्यक है कि पृथ्वी की विभिन्न परनो या तहो मे प्राप्त ध्वसावशेषो, ककालो, जीवाश्मो, उपकरणो, स्मारको, पुरालेखो, सिक्को आदि का वैज्ञानिक रीति से अध्ययन और अनुसधान करना । बीसवी शताब्दी के तीसरे दशक मे (1921-22) सिन्धु सभ्यता के मोहनजोदडो, हडप्पा आदि प्राचीन स्थलो को खोजा जा चुका था और तब भारत के इतिहास की ई पूर्व 2000 तक की जानकारी हो गई थी। अब यह अनुमान किया जाने लगा कि सिधु नदी के पूर्ववर्ती क्षेत्र- राजस्थान मे भी ऐसी ही सभ्यता पनपी होगी और ऐसी सभ्यता के स्थलो की खोज होनी चाहिये । सन् 1937 मे के एन दीक्षित (भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक) ने जगदीशसिंह गहलोत की पुस्तक राजपूताने का इतिहास की प्रस्तावना मे लिखा था- "भारत के इतिहास मे राजपूताने का एक महत्पूर्ण स्थान रहा है । मेग यह विश्वास है कि भारत के इस परम चिताकर्षक भू-भाग मे प्राग्इतिहास काल की प्रचुर सामग्री विद्यमान है, जिसकी ओर इतिहास रसिको का अभी तक ध्यान नहीं गया है । मुझे अपना यह विचार पूणरूप से युक्तिसगत प्रतीत होता है कि राजपूताने के अनेक भागो मे विशेपत जोधपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर की मरुभूमि मे, हडप्पा एव मोहनजोदडो के समकालीन प्रागैतिहासिक प्राचीन मानव सभ्यता तथा प्राचीन नगरो के अवशेष खोजने से अवश्य मिल सकते हैं ।" दीक्षित ने इसी कारण जयपुर के शक्तिधर शर्मा तथा जोधपुर के जगदीशसिंह गहलोत को, जब अहीछत्रा (जिला बरेली, उत्तर प्रदेश) मे खुदाई बडे पैमाने पर करवाई, तब उनको भी प्रशिक्षण दिया ताकि वे भी अपने राज्यो मे जाकर खुदवाई करवा कर वहा के प्राचीन वैभव को, प्रकाश मे ला सके । जगदीशसिंह गहलोत की सेवामो का लाभ जोधपुर रियासत उठा नहीं सकी लेकिन राजस्थान के निर्माण- के वाद 1950 मे --- उनकी सेवाप्रो का उपयोग, जोधपुर-बीकानेर सग्रहालय व पुरातत्व विभाग के अधीक्षक के पद पर नियुक्त कर लिया गया। डा वीलर ने 1944-48 तक महानिदेशक पद पर काम किया। तब उन्होने खुदाई के काम के नये तरीके अपनाये 1 उन्होने तब कई विश्वविद्यालयों के छात्रो को उत्खनन कार्य मे प्रशिक्षण दिया । तब ही जोधपुर के महावीरसिंह गहलोत ने भी तक्षशीला (अब पाकिस्तात में) प्रशिक्षण प्राप्त किया । महावीरसिंह गहलोत प्रशिक्षित होते हुए भी, तत्कालीन सामन्ती शासन के कारण, पुरातत्व विभाग मे कोई पद नही पा सके लेकिन उनके पुरातत्व ज्ञान का लाभ सभी जिज्ञासूनो को आज तक बराबर मितता रहा है । रत्नचन्द्र अग्रवाल ने भी तब ही तक्षशीला मे प्रशिक्षण प्राप्त किया था। बाद मे वह राजस्थान के, पुरातत्व विभाग मे नियुक्त होकर निदेशक पद से काम कर सेवा निवत हुए। उन्होने राजस्थान के कई क्षेत्रो- पाहाड जोवपुरा, गणेश्वर, नोह प्रादि मे उत्खनन काय करवाया जिससे राजस्थान के प्रागतिहामिक काल पर काफी प्रकाश पडा । राजस्थान के इतिहास तथा सस्कृति पर उनके विद्वतापूर्ण लेख भारत की सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं मे बराबर प्रकाशित होते रहे है। उनकी पुस्तक 'पार्कोलॉजीकल रिमेंस इन वेस्टर्न इण्डिया' में इनका अच्छा संग्रह है। सन् 1947 में भारत का विभाजन हो जाने पर लगभग सभी आद्य ऐतिहासिक स्थल पाकिस्तान मे चले गये और पाकिस्तान अपनी सभ्यता 5000 वष पुरानी बतलाने लगा। भारत मे ज्यादातर पुरातात्विक स्थल मध्य काल के ही रहें गये । अत भारत मे आद्य-ऐतिहासिन स्थलो की खोज तेजी से की जाने लगी। यो प्रागैतिहास मे अध्ययन, भारत मे उनीसवी सदी के अतिम वर्षों में प्रारम्भ हो गया था। सन् 1867 मे बून्दी, टोक वजयपुर रियासतो मे कई फरशे व विदारणिया जियोलोजिकल सर्वे विभाग के हाकेट को मिली थी 1 वाद मे कारलेइल को पापीण सगोरा तथा स्फटिक के फलक दौमा (जयपुर राज्य) व देवली (टोक राज्य) मे मिले । दयाराम साहनी को वैराट की खुदाई मे 1937-38 मे दो चर्ट सत्क तथा चट के कई प्रोड मिल जो सिन्धु घाटी के ताम्रपाषाणकालीन स्थलों के समान थे। 1915-16 मे लुगी पीयो तैस्सीतोरी (1888-1919) ने बीकानेर राज्य के गगानगर क्षेत्र में कई प्राकइतिहाम काल के स्थानो की खोज की थी । तेस्सीतोरी की खोजो का अनुसरण कर 1940 मे सर ऑरेल स्टेइन ने गगानगर-भावलपुर क्षेत्र मे प्रागैतिहासिक अवशेषो को खोज सरस्वती नदी के काठे में की थी और अपनी विस्तृत रपट 'एन मार्कोलोजिकल दूर अलाग द घघर हाकडा रिवर' तैयार की। इसके बाद हाना रोड भौर अमलान द घोष ने कई स्थलो पर उत्खनन कार्य दिये। इन यत्रतत्र मिली सामग्री ने हसमुख धी सालिया, मुबाराव, सुन्दरराजन, को एन मिश्रा, वापनकर, सत्यप्रकाश श्रीवास्तव, रत्नचन्द्र आदि को उत्खनन से ऐसे हो गई प्रागैतिहासिक स्थलो भो खोजने को प्रेरित पिया। इससे कई - [ 4 ] प्रागैतिहासिक, प्रादय ऐतिहासिक, ताम्रपाषाण व ऐतिहासिक काल के स्थन नोह, गिलुण्ड, भीनमाल, आहाड, नोहर, वागोर, तिलवाडा, गणेश्वर, जोधपुरा आदि प्रकाश में आये । बाद मे काँटली और साहिबी नदी की उपत्यकामो का सर्वेक्षण कर वहा 30 पुरातात्विक स्थलो की जानकारी प्राप्त कर पापाण युग से लेकर ऐतिहासिक युग तक की सास्कृतिक गतिविधियो के सम्बध मे जानकारी मिली। इससे प्रागैतिहासिक व आद्यऐतिहामिक राजस्थान का इतिहास लिखा जा सका तथा यह स्पष्ट हो गया कि राजस्थान की प्रागैतिहासिक काल मे काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही । दक्षिणपूर्वी राजस्थान मे मानव बस्तिया एक लाख वप पूर्व वस गई थी। राजस्थान के उत्तर पश्चिम मे कालीबगा (गगा नगर जिला) मे 2500 ई पूर्व मे जो बस्तिया थी वे सम्भवत वदिक आर्यों या ईरान मे आये पार्यों की थी। विभिन्न स्थलो का विवरण हतारीड की रंगमहल-स्वीडिश आकियोलोजिकल एक्मपिडीशन टू इडिया, एच डी साकलिया की एक्सकेवेन्शन एट पाहाड, व 'पार्कोलोजी श्राफ राजस्थान' मे पढे जा सकते है । दक्षिण पूर्व मे पाहाड व गिलुण्ड मे भी बनास नदी के किनारे पर 2000 ई पूर्व मे बस्तिया वस गई थी । वे भी सम्भवत पार्यां की थी । ये लोग तत्कालीन भीलो से ज्यादा विकसित थे । इस सम्बन्ध मे वी एन मिश्रा का 'बुलेटिन ऑफ द डक्कन कॉलेज रिसर्च इसटीट्यूट' मे 'पेलियोलिथिक कलचर ऑफ वैस्टन राजपूताना,' प्रदरिस बनर्जी का 'पार्कोलोजिकल हिस्ट्री ऑफ साउथ इस्टर्न राजस्थान' तथा ह धी साकलिया की 'दी आर्कोलोजी ऑफ राजस्थान' पुस्तके महत्वपूर्ण है। अभिलेख धातु पत्थर, हाथी दाँत, बतन, मोहर आदि पर उद्भूत या उभार कर बनाए गए लेय अभिलेख कहलाते हैं। केवल पत्थर पर बनाए गए लेख शिलालेख कहलाते हैं । तावे की चद्दर का बना हुआ खण्ड या टुक्डा जिस पर राजकीय अभिलेख उत्कीण हो वह ताम्रपन लेख कहलाता है । किसी स्तम्भ पर उत्कीर्ण अभिलेख स्तम्भ लेख कहलाता है। कई राजाओ की प्रशस्तिया अक्ति मिलती है। प्रशस्तियो में राजामो की उपलब्धियों का प्रशसायुक्त वणन होता है। कई कीति स्तम्भ, विजय स्तम्भ, गोवधन स्तम्भ, सती स्तम्भ, मान प्रशस्ति, दान प्रशस्ति, मूर्ति लेख, मक्वरो और मस्जिदो पर उत्कीण आलेख भी मिलते है । इन अभिलेखो से तत्कालीन ऐतिहासिक अध्ययन में महत्वपूण सहायता मिलती है। राजस्थान में ऐसे अभिलेख हजारो मे है । कुछ महत्वपूर्ण अभिलेख निम्नलिखित है- 1 बिजोलिया अभिलेख (वि स 1226) 93 श्लोको का है। इसमे चौहान शासको का वशानुक्म तथा तत्कालीन सामाजिक व धार्मिक जीवन का उल्लेख है । 2. सूणवसदी प्रशस्ति (वि स 1287) मे आबू के परमार शासको और उनसे मत्री वस्तुपाल और उसके अनुज तेजपाल के विषय मे जानकारी दी गई है। ऐसी ही जानकारी नेमीनाथ मदिर प्रशस्ति मे मिलती है। 3 सुधा पवंत (जालोर जिला) प्रशस्ति वि स 1319 की है । इसमें [5] जालोर के शासक चाचिगदेव सोनगरा चौहान की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है। 4 रमिया की छत्री प्रशस्ति (वि स 1331) म मेवाड के बप्पा रावल से नरवर्मा तक के गुहिल वशीय शासको का वणन है तथा उस समय की राजनैतिक, सामाजिक, व धार्मिक स्थिति के अध्ययन हेतु उपयोगी है । 5 अचलेश्वर मन्दिर (मावू) प्रशस्ति (वि स 1377) मे चन्द्रावती, अर्बुद व शाकम्भरी के शासको पर प्रकाश डाला गया है। 6 जैमलमेर के पाश्वनाथ मन्दिर प्रशस्ति (वि स 1473) मे जैसलमेर के शासक लक्ष्मणराज के काल की जानकारी है । समधिश्वर मन्दिर (चित्तौड दुग) प्रशस्ति (वि स 1485) मे गुहिल वशीय शासको की उपलब्धियो का गिवरण मिलता है । इममे राजनीतिक व सामाजिक पहलुओं पर प्रकाश पडता है । रणकपुर चौमुखा मन्दिर प्रशस्ति (वि स 1496) मे मेवाड के शासको का महाराणा कुम्भा तक का वणन है । तत्कालीन धार्मिक व सामाजिक स्थिति की भी अच्छी जानकारी मिलती है। कोति स्तम्भ चित्तोड प्रशस्तियाँ विभिन शिलामो पर उत्कीण की गई थी। इनमे मेवाड के शासको की वशावली महारणा कुम्भा तक देकर उनकी उपलब्धियो क, वणन किया गया है। तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक व सास्कृतिक पहलुप्रो पर भी प्रकाश डाला गया है। बीकानेर दुर्ग प्रशस्ति (वि स 1050) मे वीकानेर के सस्थापक नरेश रावं बीका से महाराजा रायर्यासह तक की उपलब्धियो का वर्णन किया गया है । बीकानेर राज्य के इतिहास के अध्ययन हेतु यह प्रशस्ति बड़ी महत्वपूर्ण है। राजप्रशस्ति (वि स 1718) राज समुद्र तालाब पर 25 वडी बडी काले पत्थर की शिलानो पर उत्कीण है। यह भारत का सबसे बडा शिलालेख है । इसमे कुल 1106 श्लोक है । इममे महाराणा राजसिंह द्वारा किये गये राजनीतिक आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक कार्यो का उल्लेख है । मेवाड के इतिहास के अध्ययन हेतु यह प्रशस्ति वडी उपयोगी है । यह प्रशस्ति पुस्तक रूप में साहित्य सस्थान उदयपुर द्वारा प्रकाशित की गई है । यो इसकी प्रतिलिपि वीरविनोद के अलावा एपीग्राफिया इण्डिका मे प्रकाशित की गई है। सन् 1834 मे डॉ राकीन तथा सार्जेण्ट दीन ने सीकर मे हपनाथ मदिर शिलालेख (वि स 1030) खोज निकाला। यह चौहानो के इतिहास को जानने के लिये अत्यत महत्वपूर्ण है । कनिघम, कारलयल, केप्टन बट, कर्नल टॉड आदि ने कई और शिलालेख खोज निकाले। इनके मूल पाठ व इनके अध्ययन हेतु 1872 मे वर्गस द्वारा इण्डियन ऐण्टीक्वेरी का प्रकाशन प्रारम्भ क्यिा गया । सन् 1877 मे हुल्सच द्वारा कॉर्पस इस्लीपनम इडीकेरम सम्पादित होकर प्रकाशित हुआ जिसमें अशोक के अभिलेखो मे बैराट का अभिलेख भी था । 'कॉपस के तीसरे भाग -मै बयाना का वि स 428 का विजयगढ यूप स्तम्भ शिलालेख तथा गगधार का वि स 480 का लेख भी प्रकाशित किया गया। इण्डियन ऐण्टीक्वेरी मे राजस्थान .
[ 6 ] ये कई महत्मपूर्ण शिलालेख, वि स 746 का शीतलेश्वर मन्दिर शिलालेख, 795 का रणसुवा मन्दिर शिलालेख, वि स 481 का नगरी शिलालेख आदि प्रकाशित हुए । मन् 1888 में 'इपिग्राफिया इण्डीका' का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया । इसमे अभिलेखो पर शोधपूण लेख प्रकाशित होने लगे। राजस्थान के कई अभिलेखो को भी इसमे महत्व दिया गया। राजस्थान के प्राचीन इ'तहास पर इस पारण नया प्रकारा पडा । बाद के वर्षों में कई स्थानो पर पुरातत्व सर्वेक्षण से विभिन्न राजवशी के शिलालेख मिले। ऐसे अभिलेखो की सूचि देवदत्त रामकृष्ण भण्डारवर द्वारा प्रकाशित 'द लिस्ट ऑफ इसितपशस काम नोदन इण्डिया' में मिलती है । उपरोक्त अभिलेखो के अलावा भी कई अभिलेख हैं जो एपिग्राफिया, इण्डिका, इन्डियन एण्टीक्वेयरी, वरदा, गोध पत्रिका, जनरल ऑफ रायल एशियाटिक सोसा इटी, जनरल प्रॉफ जगदीशसिंह गहलोत रिनच इस्टीट्यूट, प्रादि मे प्रकाशित हो चुके हैं । यो कई अभिलेख डॉ भगवानलाल इन्द्रजी के 'गुजरात या प्राचीन इतिहास भावनगर के रावन तस्तमिह के 'भावनगर प्राचीन गोध मग्रह, विजयधम सूरी का 'प्राचीन लेख संग्रह' जॉन फेयफुन पनीटके 'गुप्ता इमक्रिपगन्म, सेमिल वेडल के 'जर्नी मॉफ लिटरेरी एण्ड प्राक्यिोनोजिकन रिमच इन नेपाल एण्ड नादन इण्डिया' मुनि जिन विजय के प्राचीन जैन नेय,' पूणचन्द नाहर के 'जैन लेख संग्रह' (तीन जिन्द), मुखवीरमिह गहलोत, सोहन कृष्ण पुरोहित व नील कमल शर्मा के राजस्थान ये प्रमुष अभिनेय', ', मे दिये गये हैं। राजस्थान के प्राचीन अभिलेखा या सास्कृतित पध्यया श्यामप्रमाद व्यामने अपनी इमो नाम पी पुस्तप मे किया है । फारमी भाषा जगदातर अभिनेय एपिग्राफिया इण्डो मोम्नेमिया, रिमचर, एपिग्राफ्यिा इण्डिका परमिर एण्ड पशियन, एयुत रिपोर्ट मान इण्डियन एपिग्राफी में प्रकाशित हुए हैं। पुरावस्तु पम मे सम 100 वर्ष पूर्व पे प्राचीन पलात्मर व मलान भवन, गुफायें, पराएँ, पुरावस्तु पहताती है । प्राचीन स्मास, या उनो अवशेष, मूतिया, भगायोप, पुगने गण्डहर, ऐतिहामिप मह य ये प्रयशेप प्रादि इतिहाम जानो तु या गायक गिर हो । राजस्थान ये क्लारमय पुरावमाप्रो । इतिहास परीमो गय प्रारपिन गिया है। यहा रे पुध स्मारा। ये विषय में सवते पहने जानकारी हमे जेम्ग पगु मन द्वारा मन् 1827 4 1847 ये वीच दौरा परी यापिनी रिपोर्टों मे गारो है।गा 1861 में भारतीय पुरातत्य गर्वेशण दिमाग मी म्पा नियम यो प्रध्यक्षता में सो गई। तय धिम राजम्यान पादोगपर कई महापा स्यामा माग दिया। तय हो 1864 म पराट जगे ruril को भी पोनापिम के निर्दा म पाग्मेशन 1871-73 म raगर 1882 84 में गरम्परा पर्दविहागिर नया पनागर स्मारस पापा मारामापी ग्मारसा, प्रमिांगा, मूला, गिरा पारिप विषय मानिसमा परिपा पोर मायागापमापरिपपगी अपा। तिता गरा। - । 71 भारत सरकार ने 1881 में मेजर कॉन को प्राचीन स्मारको का सरक्षक नियुक्त किया। उसने प्राचीन' स्मारको के सरक्षण के लिये काफी महत्वपूर्ण कार्य किया। उसने 22 भागो में 'प्लिमिनेरी रिपोटस प्रॉन मोनुमेण्टस' प्रकाशित की।। सन् 1881 मे उसी के अन्तगत राजपूताना पर भी रिपोट प्रकाशित की जिसमे पाबू, अजमेर, जयपुर, अलवर आदि के स्मारको का उल्लेख है। कई महत्त्वपूण इतिह सिक भवनो को सरक्षित घोपित किया गया तथा उनकी मरम्मत कराई गई। सन् 1904 मे पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी के रूप मे देवदत्त रामकृष्ण भण्डारकर की नियुक्ति की गई। उन्होने राजस्थान के पुरातात्विक अवशेषो व स्मारको का विस्तार से सर्वेक्षण किया। उनके द्वारा तैयार की गई रपटें 'प्रोग्रेस रिपोट अॉफ द मार्कोलोजिकल सर्वे, वेस्टन सकल, पूना' मे,राजस्थान के इतिहास, सस्कृति, कला व स्मारको के अध्ययन के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है । उन्होने ही 1915-16 मे नगरी (प्राचीन मध्यमिका)की खुदाई कराई थी जहा से ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी से सातवी शताब्दी तक के कई सिक्के, मूतिया, अभिलेखे प्रादि मिले। जॉन मार्शल स्वय, ने 1933-34 मे मण्डोर की खुदाई करवाई तब गुप्त तथा प्रतिहार काल के , कई, अवशेष मिले ।' यहा अरब आक्रमणकारियो के 30 सिक्के भी मिले । माशल ने कई स्मारको के सरक्षणो, हेतु भी सुभाव दिये । ऐसे स्मारक आमेर के महल, करणसुआ का शिव मन्दिर, रामगढ का माताजी का मदिर, शाहबाद की मस्जिद आदि है । दयाराम साहनी ने महा निदेशक पुरातत्व विभाग पद से 1935 मे सेवानिवृत होने के बाद, जयपुर राज्य के वैराट व साभर मे चुदाई का काय कराया। तव वहा कई प्राचीन मूर्तिया व अवशेष मिले। जैसा कि पहले लिखा जा चुका है, राजस्थान मे प्राचीन स्मारक दुर्ग, राजमहल, हवेलिया, मदिर, छतरिया आदि काफी सय्या मे है। यहाँ के कलात्मक मन्दिर तथा उनमे स्थित मूर्तियो के विषय मे फगु शन, निगम, कारलयल ,गरिक, वगैस, भण्डारकर आदि ने काफी लिया। जेम्स फर्गुसन को पुस्तक 'द हिस्ट्री ऑफ इण्डियन एण्ड ईस्टर्न आकिटेक्चर' (1870) कनिधम तथा उसके दो सहायको - कारलेयल तथा गैरिक ने राजस्थान के स्मारकों के विषय में अपनी रिपोर्ट, (1872-1874) मे काफी प्रकाश डाला लेकिन उन्होंने ज्यादा महत्व उन स्मारको, की लम्बाई चौडाई आदि देने मे ही दिया । उनको कला के विषय मे ज्यादा नहीं. लिखा। इस कमी को देवदत्त' रामकृष्ण भण्डारकर ने पूरा किया। उन्होने स्मारको की कला के माथ मूर्तिकला पर भी काफी प्रकाश डाला। उनमे लगे, शिलालेखो का भी उल्लेख करके उन स्मारको से साधत कथा कहानियो का भी वर्णन किया। इस से उनके निर्माताग्रो के इतिहास का भी पता चलता है उनकी महत्वपूर्ण रपटें-'पोग्नेस रिपोट ऑफ पार्कोलोजिकल सर्वे, वेस्टर्न। सकत' कई मन्दिरो को प्रकाश मे लाई है।। इन मन्दिरो मे स्थित मूर्तिया, शिला पट्टो, कलात्मक स्तम्भो व वल्लरियो का भी प्रचुर मात्रा मे वर्णन किया गया है।" वाद के वर्षों में इनकी कला के विषय मेयू.पी शाह, एम. ए ढाकी, कृष्णदत्त, [ 8 ] रत्न चद्र अग्रवाल, के वो सु दरराजन आदि ने काफी बारिकी से अध्ययन कर लेख लिखे। इनके लेखन से ममार को पता चल गया कि राजस्थान मे स्थापत्य कना का अपूर्व भण्डार है। राजस्थान के स्मारको का विवरण जगदीशसिंह गहलोत कृत 'राजपूताना का इतिहास' मे भी मिलता है । उनको 'स्वतत्रता-पूव राजस्थान में भी स्थापत्य कला केन्द्रो का विवरण देखा जा सकता है। मूर्तिया पुरावस्तुप्रो मे मूर्तियो का वडा महत्व है। 'ये मूर्तिया विभिन्न रग के पत्थरो के अलावा तावा, पीतल या अय धातु आदि से बनी मिलती हैं ! कालीवगा, पाहाड आदि प्रागैतिहासिक युग की मूर्तिया पकी हुई मिट्टी की बनाई गई थी। नोह, लालसोट, आभानेरी, कामवन, कोटा आदि से गुप्त काल की मूर्तिया उपलब्ध हुई है। चन्द्रावती (झालरापाटन), नागफणी (गरपुर जिला) म भी गुन काल की कई मूर्तिया मिली है। गुप्तोतर काल के महामारु शली के कई मन्दिर मेवाड के अलावा, जालोर मण्डोर, अमझरा(डुगरपुर जिला प्रोसिया आदि में बना इन मदिरो की मूर्तिया शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट है। उदयपुर मे जगत मन्दिर मे उमामहेश्वर, वीणाधर शिव, कल्याणपुर की गणेशमूति, पल्लू की सरस्वती प्रतिमा शिल्प के अच्छे उदाहरण है। डीडवाना से प्राप्त काले पत्थर स बनी विष्णु की मूर्ति आभानेरी की विष्णु मूर्तिया, लोदरवा के जैन मन्दिर की गणेश मूर्ति, प्रासिया की सचियामाता की प्रतिमा धार्मिक सहिष्णुता को प्रदर्शित करती है। चित्तौड के कीर्ति स्तम्भ की मूर्तिया तो स्पष्ट बनलाती है वि पन्द्रहवी शताब्दी मे मूर्तिकला का विकास अपने शिखर पर था। उदयपुर के जगदीश मन्दिर की मूर्तिया भी बडी क्लात्मक है। धातु की प्रतिमाये प्राबू, वम तगढ, पिण्डवाडा आदि मे देखी जा सकती है। स्मारको व प्राचीन स्थलो की राष्ट्रीय महत्ता का विचार कर इन का प्रारक्षित स्मारक, 'एण्टिक्वीटीज एण्ड हिस्टोरिक्ल मोनुमेण्टस एण्ड आर्कोलोजिकल साईटस एण्ड रिमेम (डिकलेरेशन ऑफ नेशनल इम्पोर्टेन्स) एक्ट 1951' के अतगत घोपित किया गया। भारत मे ऐसे स्मारक ज्यादातर राजस्थान के ही थे। इन स्मारको पर' 'एशियेण्ट मोनुमेण्टस एण्ड पार्कोलोजिकल साइटम एण्ड रिमेन्स एक्ट 1959' लागू किया। राजस्थान मे ऐसे स्मारक थे- चित्तौडगढ, कुम्भलगढ़, जैसलमेर व रणथम्भौर के दुर्ग, भावानेरी, हर्षनाथ, बिजोलिया, नागदा नगरी प्रादि के मदिर, जो अब के द्रीय सरकार के प्रत्यक्ष नियन्त्रण में आ गये। प्रातीय महत्व के स्मारवो की सुरक्षा के लिये राजस्थान मरकार ने 'राजस्थान मोनुमेण्डम एण्ड पार्योलोजिकल साइटस एण्ड एण्टीक्वीटीज एक्ट 1961,' सन् 1964 से लागू पिया। यो पुछ रियासतो मे भी स्वत प्रतापूर्व काल में ऐतिहामिक स्मारको एव पुरातच स्पती के विषय मे यानून बन चुके थे। जोधपुर में 'मारवाड एशियण्ट मोगुमेण्टग प्रिनवेंन माडिने ग' 1928 मे बन गया था तया उमके प्रतर्गत 20 स्मारप ऐतिहामिर व पतारमर महत्व पे घोपित हो चुके थे। जयपुर राज्य में [ 9 ] जयपुर ऐंशियेण्ट मानुमेण्टस प्रिजवेशन एक्ट' 1941 मे बन गया था जिसके अन्तगत स्मारको को सरकार ने सरक्षण तो दिया ही लेकिन वहा मे किसी कलात्मक वस्तु या पुरातत्व महत्व को वस्तु हटाना भी अपराध माना गया था। इस कारण यहा के स्मारक व उनमे लगी मूतिया व शिलापट्ट इतिहास लिखने मे काफी सहायक सिद्ध हुए। चित्रकला-यहा के लोगो की प्राचीन काल से ही चित्रकला के प्रति रुचि रही है। मुक्न्दरा की पहाडियो तथा अरावली पर्वत श्रृखला मे वी एस वाकणकर, व जगत नारायण श्रीवास्तव ने कई प्राचीन शैल चित्रो का पता लगाया है तथा अपने लेखो मे व्यौरा दिया है। इन चित्रो मे मानव एव जानवरो की प्राकृतिया काफी है। ये चित्र शिकार, पूजा पाठ, टोटका प्रादि से सम्बन्धित है। ज्यादातर चित्र लान, पीले और हरे रंग से चित्रित किये गये है। कालीवगा, माहाड प्रादि की बुराई से प्राप्त मिट्टी के बर्तनो पर भी काली व सफेद रेखाओ, पूल पत्ती, एव भोज पत्रो पर चित्रकारी बारहवी शताब्दी के सचित्र ग्रथो पर मिलती है। ऐसे सचित्र ग्रथ जैसलमेर के जन भण्डार से प्राप्त हुवे है । वहा कई चित्र पट्टिकाए है। इन पर जैन साधुनो, पशु पक्षी, पेड पोवे अादि चित्रित है। अजमेर, पाली, पाबू, पाहाड, आदि ऐसे चित्रकारो के मुख्य केन्द्र थे। ग्यारहवी पद्रहवीं शताब्दी तक के सचित्र ग्रथो मे निशीथरिण, विपष्टिशालाकापुरुप चरित्र, नेमिनाथ चरित्र, क्था महित्यगर कालक कथा, सुपासना चरियम्, रमिकाप्टक, गीत गोविन्द सादि हैं। - विभिन्न राजदरवारो मे प्राश्रित चित्रकारी ने अपने अपने ढग से चित्र बनाने प्रारम्भ किये । प्रत विभिन्न चित्र शलियो मेवाड शैली, जयपुर शैली, मारवाड शली, बून्दी शली, किशनगढ शैली, कोटा शैली, नाथद्वारा शली आदि का विकास हुआ। मारवाड शली का उत्तराध्ययन सूत्र, पचतत्र, शुकनासिक चरित्र, जयपुर शली के बारामासा, रागमाला, भागवत आदि के चित्र इनके उदाहरण है। नाथद्वारा की क्लम में बने पुष्टि माग से प्रभावित श्रीनाथजी के चित्र तथा प्रकृति के चित्र बडे सुदर हैं । इन चित्रो मे राम, कृष्ण आदि की लीलायो के अलावा समकालीन समाज के जीवन व दशन पर काफी प्रकाश पडता है। राजस्थान के चित्रो का व्यवस्थित अध्ययन डा आनन्द कुमार स्वामी ने प्रारम्भ पिया था। उनके द्वारा सन् 1912 में राजपूत चित्रो पर लिखे लेख ने पश्चिम देशो मे हलचम मचा दी और तव उनकी पुस्तक 'राजपूत पेटिग्स' (दो भाग) 1916 मे तथा 'केटलॉग ऑफ इण्डियन क्लेक्शन इन द म्युजियस ऑफ फाईन पाटस् बोस्टन (6 भाग)" 1926 मे प्रकाशित हुई। तव उनकी राजपूत चित्रो पर विद्वतापूर्ण शोध को ससार भर मे सराहा गया। उहोने अपनी शोध में यह स्पष्ट कर दिया कि राजपूत शैली मुगल शंसो से पूणतया भिन्न है तथा वह भ्थानीय परम्परा के अनुरूप है। ओ सी गागुली ने उस गोध को आगे बढाया और उहोने इस विषय मे 'मास्टर पीसेज ऑफ राजपूत पेटिंग' और 'रागस एण्ड - इस प्रकार से [ 10 ] रागनीज' पुस्तके लिखी। हरमन गोट्स ने अपनी लिखित पुस्तक, 'पार्ट एण्ड आर्किटेक्चर ऑफ बीकानेर' मे यह प्रतिपादित किया कि राजस्थानी चित्र शैली की और भी उपशैलिया-मारवाडी शैली, नागौर शैली, बीकानेर शैली आदि है। इस विषय मे उन्होने कई लेख विभिन्न अतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्र-पत्रिकामो मे लिखे। उनके लेख गुजराती शैली के चित्रो की राजस्थानी चित्र शैली की देन पर ज्यादा थे। डॉ मोतीच द्र ने पश्चिमी भारत के जैन त चिनो के विषय मे काफी लिखा। जैसलमेर के जैन ग्रन्थ भण्डारो मे चित्रित ग्रथो के विषय मे एस एम नवाब ने 'द अोलरेस्ट राजस्थानी पेण्टिग्स फ्रॉम जैन भण्डार्स' लिखकर राज- स्थान में विभिन्न सग्रहो के विषय मे लोगो की रुचि उत्पन कर दी। राजस्थानी चिन शैलियो के विषय मे राय कृष्णदास की 'भारतीय चिन कला' तथा राम गोपाल विजयवर्गीय की 'राजस्थान चित्रकला' महत्वपूण पुस्तके हैं। बाद के वर्षों मे प्रमोद चन्द्र, यू पी शाह, वासुदेव शरण अग्रवाल, काल पण् लवाल, सत्यप्रकाश श्रीवास्तव श्रादि ने राजस्थानी चित्र शैलियो पर कई लेख लिखे। इसके कारण देश विदेश मे कई विद्वान राजस्थानी चिन शैलियो की ओर आकर्षित हुए। कई पुस्तके किशनगढ़ पेन्टिग्म, मेवाड पेटिग्स, बून्दी पेन्टिग्स आदि पर भी लिखी गई । इन चित्रो के सम्बव मे लिखी पुस्तको से राजस्थान के सास्कृतिक इतिहास को लिखने में काफी सहायता मिली है । भित्तिचित्र अठारहवी शताब्दी के उत्तराद्ध मे काफी भित्तिचित्र वने। या इसके पहले भी मन्दिरो और राजप्रसादो मे भित्तिचित्र बनते रहते थे । ऐसे चिन चित्तौडगढ के प्राचीन महलो, उदयपुर के महलो, पामेर के महलो, कोटा के झालमसिंह की हवेली, नाडोल के जैन मन्दिर, सूरजमल (भरतपुर) की छतरी आदि मे वने है। ये चित्र पालागीला पद्धति से बनाये गये थे। जैसलमेर, बीकानेर शेखावाटी आदि की हवेलियाँ मे भी कई भित्तिचित्र है। भित्तिचिनो पर अचना कुलश्रेष्ठ को 'राजस्थान के भित्तिचिच' उरलेखनीय पुस्तक है। सिके ढला हुआ और निर्दिष्ट मूत्य का धातु का टुक्डा, जिसका प्रयोग वस्तु विनिमय के लिए किया जाता है सिक्का कहलाता है। सिक्के के मूल्य वर्ग का निर्धारण और उसको जारी करने का अधिकार प्राधिकृत सघो या शासन में निहित होता है। सिक्के राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक एव भौतिक जीवन पर काफी प्रकाश डालते है। इनके प्राप्ति स्थलो से काफी सीमा तक राज्यो के विस्तार का पता चलता है। राजस्थान के प्राचीनत्तम सिक्यो मे धातु के टुकडो पर विशिष्ट चिह्न टकिन होते थे और इस कारण पाहत सिक्के कहलाते है । सिक्को के ढेर राजस्थान मे काफी मात्रा में विभिन स्थाना पर मिले है। सन् 1871 में कार्लायल को नगर (उरिणयारा)मे लगभग 6000मालव सिक्के मिले थे जिससे वहा मालवो के आधिपत्य तथा उनकी समृद्धि का पता लगा है । सन् 1933 मे [ 1 ] - जयपुर जिले के मिकराय गाय के निकट सम्राट चन्द्रगुप्त के 39 सोने के सिक्के मिले थे । सन् 1938-39 मे जव के एन परी ने रैढ (टोक जिला) की खुदाई कराई थी तर भी वहा 3175 गधिया सिक्वे मिले थे। ये सिक्के मोय काल के थे। इनका विवरण रिपोर्ट ऑन द एक्मकैवेशन एट रैद' में मिलता है । सन् 1948 मे वयाना मे 1921 गुयानीन स्वर्ण मिक्के मिले थे। ये सिको चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम प्रादि के हैं। इन मिको के विषय मे ए एस अल्तेकर ने 'केटलॉग ऑफ द गुप्ता गोल्ड कॉइन्म इन द रयाना होड' मे पूर्ण विवरण दिया गया है। अजमेर संग्रहालय के अधीक्षक यू सो मट्टाचार्य ने अजमेर मेरवाडा क्षेत्र मे पीपलाज गाव में मिले 3000 गधिया मिक्कों के विषय मे काफी लिखा है । तत्कालीन राजपूताना वी 'रियामतो के सिक्को के विषय में ड ड वेव ने, 1893 मे 'द परेमीग ऑफ दी हिंदू स्टेटम ऑफ राजपूताना' पुस्तक लिखी जो आज भी अद्वितीय मानी जाती है। कनिधम ने 1894 मे 'काइन्म प्रॉफ मेडीवियल इण्डिया' प्रकाशित की जिममे भी राजपूताना के सिक्को का विवरण दिया है । मिक्को के विषय मे तीन और पुस्तके-ई थोमस को 'द कॉनिक्ल्स ऑफ द पठान किंग्स ऑफ देहती' (1871), ई जे रेपसन की इण्डीयन कॉइम' (1897) तथा वो ए स्मिथ को वेटलॉग प्रॉफ कॉइस इन दि इण्डीयन म्यूजियम कलकता' (1906) भी है । मारवाड ये सिस्मो पर एव महत्वपूर्ण पुस्तक विश्वेश्वरनाथ रेऊ को 'कॉइन्स ऑफ मारवाड' (1946) है जिसमे मारवाड़ क्षेत्र मे मिले प्राचीन काल से वतमान काल तक के मिक्को का प्रमाणिक विवरण है। इनमें आठवी- नवी सदी के अरव सिक्को जो मण्डोर व चोहटन मे मिले थे, का विवरण है। जगदीशसिंह गहलोत ने अपने ग्रन्थ राजपूताना का इतिहास मे मभी रियामतो के सिक्को का सक्षिप्त विवरण दिया है । सिक्को पर' एक और पुस्तक ब्रजमोहनसिंह परमार द्वारा लिपित "युग-युगो मे राजस्थान-सिक्को के माध्यम से" काफी महत्वपूर्ण है। सग्रहालय - सग्रहालय वह भवन है जहा कलात्मक वस्तुयो, विशिष्ट युगीन महत्वपूर्ण उपलब्धियों से सम्बद्ध उपकरणो या स्थायी महत्त्व की क्लाकृतियों का।सुरक्षित रूप से एकत्रित किया और व्यवस्थित रूप से प्रदश्नाथ रखा जाना है । सामान्य भाषा मे इसे अजायबघर भी कहा जाता है क्योकि जनसाधारण की दृष्टि मे, वहाँ अनेकांना विचिन विलक्षण अद्भुत् कि तु कलात्मक 'वस्तुए देखने को मिलती है। मग्रहालयो को वस्तुप्रो के महत्व को पाक्ने के लिए कभी कभी 'अनुकृतियो, चाटों, छात्राचित्रो आदि का भी प्रयोग किया जाता है। इनसे इतिहास लेखन मे काफी सहायता मिलती है । यह हमार मौभाग्य है कि राजस्थान मे जितने संग्रहालय है उत्तने क्सिी अन्य प्रात में नही है । इन संग्रहालयो के अध्यक्ष के रूप मे डा गौरीशकर हीराचन्द ओझा, प विश्वेश्वर नाथ रेउ, श्री रत्नच द्र अग्रवाल, श्री जगदीशसिंह गहलोत आदि जैसे इतिहासकारो ने काम किया है। कला व पुरातत्व इतिहास के पूरक होते है । अत कलात्मक व पुरातात्विक [ 12 ] वस्तुप्रो के सग्रहालयो से इतिहास लेखन मे बडी सहायता मिली है। राजस्थान के युगयुगीन जीवन एव सस्कृति के सम्बन्ध मे इन संग्रहालयो मे काफी सामग्री सग्रहित है। इन सग्रहालयो की विवरणात्मक पुस्तिकाएं भी इतिहास शोधको के उपयोग हेतु प्रकाशित की गई है। इन मे उन संग्रहालयो की मूर्तियो, अभिलेखा, चित्रो, कलात्मक वस्तुओ व हस्त कला के नमूनो पर काफी प्रकाश डाला गया है। उन्नीसवी शताब्दी के अन्तिम वर्षों मे जयपुर, व उदयपुर रियासतो मे सग्रहालय स्थापित हुए। अत 1886 मे अलवर्ट हॉल म्युजियम जयपुर मे तथा 1840 मे विक्टोरिया हॉल म्युजियम उदयपुर मे खोला गया। इनमे इन रियासतो के विभिन्न क्षेत्रो से मिली प्राचीन वस्तुऐ , शिलालेख, सिक्के, मूर्तिया, पोशाके, आदि, जो इतिहास व संस्कृति से सम्बन्थित थी, रखी गई। प्रातीय संग्रहालय के रूप में 1908 मे राजपूताना सग्रहालय अजमेर मे खोला गया । इसमे राजपूताना के विभिन्न क्षेत्रो की इतिहास व सस्कृति से सम्बवित वस्तुऐ रखी गई है। इस सग्रहालय के अध्यक्ष गौरीशकर हीराचन्द अोझा नियुक्त क्येि गये जो लगभग 30 वष तक उस पद पर काम करते रहे । जोधपुर मे 1909 मे कनात्मक तथा प्रौद्योगिक वस्तुप्रो की प्रदशनी लगाई गई और उनको बाद में सुरक्षित रखने को "मारवाड प्रौद्योगिक सग्रहालय" स्थापित किया गया जिसे 1914 मे इतिहास सम्बधी वस्तुओ का सग्रहालय बना दिया गया, और 1917 मे सरदार सग्रहालय नाम दे दिया गया । सन् 1914 मे इसके अध्यक्ष विश्वेश्वर नाथ रेऊ बनाये गये जो इस पद पर लगभग 30 वर्ष तक काम करते रहे । सन् 1936 मे यह उम्मेद उद्यान के भवन में स्थानान्तरित किया गया जहा वह अब भी स्थित है। इस मग्रहालय मे रत्नच द अग्रवाल, जगदीशसिंह गहलोत आदि इतिहासज्ञ व पुरातत्वान्वेपी ने अधिक्षक के रूप मे काम करते इस सग्रहालय को काफी स्मृद्ध तथा आकर्षक बनाया। लू पि तस्सीतोरी ने 1915-16 मे बीकानेर राज्य मे कई कलात्मक तथा पुरातात्विक महत्व की वस्तुऐ इकट्ठी की जो प्रारम्भ मे बीकानेर के लालगढ राजमहल मे सुरक्षित रखी गई थी। महाराजा गगासिंह ने इनको जनता के ज्ञान- वधन हेतु 1937 मे गगा गोल्डन जुबली सयहालय बनवाकर स्थानान्तरित कर दिया। बाद में एक नया भवन 1954 मे बनवाकर अन्तिम रुप मे वहा सग्रहित किया गया। इसमे कई प्रकार की मूर्तिया, कलात्मक वस्तुऐ, चित्र आदि है। सन् 1915 में ही झालावाड के महाराजराणा भवानीसिंह ने झालावाड मे एक सग्रहालय स्थापित किया जिसमे कई शिला लेख, मूर्तिया, शिलापट्ट आदि सग्रहित किये गये। सन् 1940 में अलवर राज्य की पुस्तकशाला, सिलहखाना व तोपेखाना फी वस्तुए अलवर मे एक संग्रहालय बनाकर प्रदर्शित की गई। इसी वप इसी प्रकार भरतपुर मे भी सावजनिक पुस्तकालय मे राज्य मे मिले पुरावशेषो को साहित किया गया । सन् 1944 मे लोहागढ़ दुर्ग में अलग से राजकीय सग्रहालय स्थापित किया गया। कोटा व सीकर मे संग्रहालय 1945 में स्थापित किए गये । - A इस प्रकार राजस्थान के निर्माण तक कुल 12 संग्रहालय अजमेर, जयपुर, आमेर अलवर, भरतपुर, कोटा, बू दी, झालावाड, उदयपुर, जोधपुर, बीकानेर के.सीकर मे थे। राजस्थान बनने के बाद डू गपुर पाहाड, आबू, मण्डोर, चितौडगढ व पाली मे नये सग्रहालय स्थापित किये गये । निजि सस्थानो मे सागरिया (जिला, गगा- नगर) मे मर छो राम सग्रहालय तथा पिलानी जिला झू झूनू) मे विडला संग्रहालय स्थापित किये गये। कहलाता पुरालखागार-विशिष्ट प्रशासकीय निकाय के लिखित प्रलेख तथा उसकी प्रकाशित सामग्री जिसे अधिकृत रूप से, कार्यालय विशेष या पुरालेखागार मे अभिरक्षा और भावी सदर्भ के लिए सुरक्षित रखा जाता है, पुरालेखागार । पुरालेखागार मे रखे सामा यत 40 वर्ष पुराने अभिलेखो को शोध आदि प्रयोजनो के लिए पाठक विना किसी प्रतिबघ के देख व प्रयोग कर सकते हैं । विभिन रियासतो मे न केवल प्रशासकीय प्रलेखो को व्यवस्थित रूप मे रखा जाता था बल्कि पाण्डुलिपियो, ग्रयो आदि का भी संग्रह किया जाता था। इनके अलावा ऐसे सग्रह न केवल विद्वानो बल्कि मन्दिरो, मठो, उपासारो, हवेलियो राजमहलो आदि मे भी मिलते है। ऐसा अनुमान है कि सबसे बडी ग्रथ सम्पदा राजस्थान मे ही है । जैसलमेर का जिनभद्रसूरि ज्ञान भण्डार, बीकानेर का अनूप सस्कृत पुस्तकालय, जयपुर का पोथीखाना, जोधपुर का महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश उदयपुर का सरस्वती भण्डार विख्यात ग्रन्थालय है। डी आर भण्डारकर के ही बडे भाई एस आर भण्डारकर ने 1905 06 मे राजस्थान के कई राज्यो मे सग्रहित प्राचीन प्रथो की खोज की। जैसलमेर के ज्ञान भण्डार तथा बीकानेर, नागौर, जयपुर, उदयपुर, किशनगढ, अलवर आदि मे कई महत्वपूर्ण पोथिया ढूढ निकाली। इनका प्रकाशन उन्होने अपनी 1907 की रिपोट मे किया। उन्होने ही जैसलमेर के भाटी शासको के कई शिलालेखो का उल्लेख अपनी रिपोट मे किया था। बाद मे इतालवी विद्वान लुगी पिजो तेस्सितोरी ने कई प्राचीन राजस्थानी ग्रथो-राठौड पृथ्वीराज री वेलि क्रिमण रुकमणी री, छद राउ जइतसीरो वीठू सूजारोकयो, वनिका राठौड रतनसिंह जी री महेश दासोत री खिडिया जगा री कही, आदि को ढू ढा व उनका सम्पादन इस विषय मे उनकी पुस्तक 'ए डीस्कपटिव कैटलॉग ऑफ वाडिक रण्ड हिस्टोरोक्ल मेनुस्क्रिप्टस' बडो महत्वपूर्ण है। तेस्सितोरी ने ही सर्वप्रथम यहा की भाषा का नाम पुरानी गुजराती के स्थान पर पुरानी पश्चिमी राजस्थानी नाम दिया तथा इसकी पुष्टि मे कई लेख लिखे। उन्होन लगभग 4 वर्ष तक (1915- 1919) जोधपुर व बीकानेर मे खोज कार्य का अपनी खोज 'जनल ऑफ द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बगाल (1915-18) मे 228 पृष्ठो मे (छपी) प्रकाशित को। जगदीशसिंह गहलोत के शब्दो मे 'तैस्सतोरी के राजस्थान के प्रति प्रेम तथा राजस्थानी के प्रति की गई सेवाऐ स्वर्णाक्षरो मे लिखी जानी चाहिए' । किया।
- ? [ 14 ] दुख की बात यह है कि वह 32 वर्ष की प्रायु में ही (1919 मे) महाप्रमाण कर गये। राजस्थान के अन्य बडे ग्रथागार है प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर, निमकी शाखाये जयपुर, अलवर, भरतपुर, बीकानेर, उदयपुर, चित्तौडगढ व कोटा में है। टोक मे अरबी व फारमी ग्रन्थो का प्रथालय है। इन प्रयागारो मे न केवस पुस्तक बल्कि कई प्राचीन पाण्डलिपिया, ऐतिहासिक दस्तावेज प्रादि है। राजस्थान के बाहर ऐतिहामिक प्रलेखो का सबसे बड़ा संग्रह दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभि लेखागार है। मध्यप्रदेश के सीवता मऊ म नटनागर शोध सध्यान में भी राजस्थान के इतिहास सम्बन्धि सामग्री डा रघुवीर सिंह के मद्प्रयत्नी से एकत्रित है। प्राचीन ऐतिहासिक साहित्य- राजस्थान इतिहास लेखन के लिये मम्कृत, प्राकृत, अपभ्र श, राजस्थानी, फारसी, हिन्दी प्रादि की कृतिश बडी उपयोगी है। इन कृतिया के रचयिता या तो राज्याधय प्राप्त थे या स्वान सुखाय लिखने वाले थे। इन कृतियो मे तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियो, सामाजिक गतिविधियो, धार्मिक मा यतायो, युद्ध प्रणाली प्रादि पर काफी प्रकाश पडता है । यो कुच गयो मे रचयितानो द्वारा अपने प्राश्रयदाता का अतिश्योक्तिपूण वर्णन तथा कुछ सुनी सुनाई वातो का उल्लेख कर देने मे उन पर पूर्ण विश्वास नहीं किया जा सकता फिर भी उनका ऐतिहासिक महत्व कम नहीं हो जाता है। आवश्यक्ता यह है कि इन ग्रन्थो का वैज्ञानिक ढग से सम्पादन हो। तब ही इनका महत्व बढगा और इनका इतिहास लेखन हेतु पूर्णरूपेण उपयोग हो सकेगा। सस्कृत काव्य थ इतिहास से सम्बन्धित संस्कृत मूलत काव्य रूम मे मिलती है। विभिन्न कवियो ने इतिहास विषयक काव्य प्रथा की रचना की। ऐसे काव्य ग्रथ है- पद्मनाथ परिमल का नवमाहमान चरित्र, कल्हा आदि का राजतर गिणी, जयानक का पृथ्वीराज विजय, नयन च की हम्मीर महाकाव्य, उदयराज का राजविनोद महाकाव्यम्, विहारी का संग्रामसिंह महोदयम, रघुनाथ का जगतमिह काव्य, मोहन भट्ट का जगतसिंहाष्टक, जीवाधर की अमरमार, गगाराम मट्ट का हरिभूपण महाकान्यम् मदाशिव का राजरत्नाकर लाल भट्ट का राजसिंह प्रभोवणनम्, मुकुन्द शात्रिय का राजसिंहाष्टक, रणछाइ भट्ट का अमरकाव्यम्, वैकुण्ठ व्यास का अमरमिहाभिपैर काव्य, मगल का अमरनाम रत्न काव्य, जगजीवन भट्ट वा अजितोदय महाकाव्यम्, कृष्ण भट्ट का देश्वर विलाम महाकाव्यम् मीताराम भट्ट या जयवरा महाकाव्यम्, कृष्णाराम भट्ट मा पच्छवी महाकाव्यम्, यमुनादत्त शास्त्री का वीरतरग आदि। इन पाव्य ग्रन्था मे तत्कालीन राजनीतिक, मामाजिक व मास्कृतिक पहलुपी काफी लिखा गग है तथा प्रव इतिहास लेपन हेतु उपयोगी है। जैन साहित्य-यह माहित्य मूलत जैन तीथकरी की महत्ता, जन धम पे प्रादाविनना आदि से ही सम्बन्धित है लेकिन इनसे कई ऐतिहासिक की कृतिया - [ 15 ] तथ्य भी मिलते है। जैन मुनि अपने ग्रथो मे तिथिया व सवत् अवश्य देते थे अत उनके साहित्य से कई ऐतिहासिक घटनाग्रो पी गुत्थिया खुल जाती है। ऐसी इतिहास सहायक पुस्तके है - धनपाल रचित सत्यपुरम्, जिनपाल कृत परतरगच्छ जिनेश्वर रचित कथाकोश, विजय सूरि का मान्तु ग मानवती रास, हेमरतन का गोरा बादल चरिय, लब्योदय का पड्मनी चरिन चौपाई, जयचन्द्र जयविमल की सईकी ग्रादि। इन पर समीक्षात्मक रूप में एक अत्यन्त महत्वपूण पुस्तक कस्तुरच द कामलीवाल की 'राजस्थान के जैन सत व्यक्तित्व एव कृतित्व' है। राजस्थानी साहित्य इतिहास विषयक राजस्थानी वृतिया गद्य व पद्य दोनो में मिलती है। मध्यकाल में यहा जो अनेकानेक युद्ध हुए उनका काफी वर्णन राजस्थानी कृतियों में प्राप्त होता है। ज्यादातर रचनाकारो को राज्याश्रय प्राप्त था अत उन्होने अपने आश्रयदाता का अतिश्योक्तिपूर्ण यशोगान किया है लेकिन उनमे प्रोखोदेखा ऐतिहामिक घटनाग्रो का विवरण भी मिलता है। उनसे तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियो, सामाजिक गतिविधियो, धार्मिक मान्यतामो, युद्ध के तौर तरीको आदि पर भी प्रकाश पड़ता है। ऐसी ऐतिहासिक गद्य कृतिया मे ख्यात, वात, विगत, यशावनी, हाल, हकीकत, याददास्त, बही प्रादि को ले सकते है । राजस्थानी पद्यतियो मे रासो, विलास, प्रकास, रपन, वचनिका, वैलि, ममाल, झूलगा, निलोका, दवावंत, नीसाणी, मरस्या, दूहा, छंद आदि को ले सकते हैं। राजस्थानी साहित्य की इन ऐतिहासिक रचनाओं का सम्पादन होना चाहिये ताकि शोधार्थी उपयोगी सदभ दुढ निभाल सके। तव ये और ज्यादा महत्वपूण और उपयोगी हो सकेगी। नकास-किसी वश अथवा व्यक्ति विशेष की उपलब्धियो या घटना विशेष पर प्रकाश डालने वाली कृतियो का नाम प्रकास रखा गया है। ये ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। ऐसे प्रवास हैं-किशोरदास का राजप्रभास प्राशिया मानसिंह का महायश प्रकास, कविया करणीदान का सू ज प्रकास, रामदान तालस का भीमप्रकास, मोडा आशिया या पाबूप्रकास, किशन सिढायच का उदयप्रकास, वरनावर का केहर प्रवास, कमजी दूधवाडिया का दीपक कुल प्रकास,पादि। ख्यालें - राजस्थान के इतिहास की सामग्री न केवलर पद्य बल्कि गद्य मे भी मिलती है। गद्य मे यह सामग्री सत्रहवी शताब्दी मे कलमबद्ध की गई। यह साहित्य ख्यात, विगत, वात, हाल, हकीकत, वशावली, आदि के रूप मे लिखा गया। सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री प्याते है। प्याति प्राप्त, प्रसिद्ध, एव लोकविश्रुत पुरुपो की जीवन घटनामो का सग्रह ख्यात कहलाता है। प्यात लेखको । मे मुहणोत नैणसी, बाकीदास प्राशिया, दयालदास सिंढायच और अजीतसिंह मेहता विशेष उल्लेखनीय है। इनमे मुहणोत नैणसी प्रमुख है राजस्थान के मध्यकालीन इतिहासकारो मे मूहता नैणसी प्रमुख है जिसे -- - - -- -- - -- 1 [ 16 ] का नाम द्वारा लिखित राजस्थान को अबुल फजल कहा जाता है। उसने अपनी 'ख्यात' मे मारवाड का राजनैतिक इतिहास काफी विस्तार से दिया है। उनकी दूसरी पुस्तक 'मारवाड रा परगना री विगत' है जिसमे मारवाड का राजनैतिक के साथ मामाजिक व आर्थिक इतिहास भी काफी मिलता है। बीकानेर के दयालदाम मिढायच (1798-1891) राजस्थानी ख्यातकारो मे महत्त्वपूर्ण है। उसका सम्पूर्ण जीवन इतिहास लेखन और साहित्य सृजन मे ही बीता। उसके बीकानेर रे राठौडा री ख्यात सुप्रसिद्ध है। उनके अन्य ग्रथ-देशदपण, बीकानेर रे पट्टार गावो री विगत, अार्याग्यान कल्पद्रम व जस रत्नाकर है। उन्नीसवी शती का वह अन्तिम परम्परिक ख्यातकार था। यो कुछ लिखी गई जिससे राजस्थान का इतिहास लिखने मे काफी सहायता मिलती है। यथा मुदियाड री ख्यात, कविराजा री ख्यात, जोधपुर राज री ख्यात प्रादि । सुप्रसिद्ध बाकीदास की ख्यात मे लगभग 3000 फुटकर छोटी-छोटी बातो का संग्रह है। ये याददास्त के लिये लिखी गई थी अत उसमे कोई कम नहीं है लेकिन यह सग्रह इतिहास से शोधकर्तामो के लिए वडी उपयोगी। और भी स्याने द्वारा जैसलमेर को अजीतसिंह मेहता ने राज्य का दीवान रहते अपने पूर्वजो सचित की गई इतिहास सामग्री के अनुमार ई सन् 1864 के लगभग 'जैसलमेर की य्यात' लिखी जिसमे जैसलमेर के भाटी शामको का प्राचीन काल से ई सन 1864 तक का वृतात है। इसमें प्रत्येक शासक के समय की कुछ मुख्य घटनामो के संवत व तिथिया अकित है । तत्कालोन लोकमान्यताप्रो, धारणाओं व सामाजिक आदर्शों का अच्छा चित्रण दिया है। इसी के आधार पर ई सन् 1891 मे लिखमीच ने 'जसलमेर रो तवारीख' लिखी थी। इस प्रकार प्यातकारो का राजस्थान इतिहास लेखन मे महत्वपूर्ण योगदान रहा। (प्यातो के विशेष अध्ययन हेतु परिशिष्ट देखें।) रासो-मध्यकालीन राजपूत शासको ने विद्वानो और कवियो को अपने दरबार मे उचित सम्मान दिया । वे राजाओ की प्रशसा मे काव्यो की रचना करते हुए उनके राजघराने का भी विवरण लिखने लगे। इससे इन काव्यो मे इतिहास की सामग्री मिलती है। ऐसे काव्यो को रासो कहा जाता है। रामो ग्रथ मे चदरदाई का पृथ्वीराज रासो, नरपति नाल्ह का बीसलदेव रासो, कविया गोपालदास का "मवस यश प्रकास या लावा रासा, दयालदास ब्रह्मदत्त का राणा रासो, नवाव अलफ खा उफ कवि जान का क्यामखाँ रासो, दौलत विजय का खुमाणरासो, गिरधर आसिया का सगत रासो, राव महेशदास का बिन्है रासो, कुम्भकण का रतन रासो डूगरसी का शत्रुकाल रामो, जोधराज का हम्मीररासो, जाचिक जीवण का प्रतापरासो, सीताराम रत्नु का जवानरासो आदि है । (राजस्थानी ग्रन्यो मे विशेष ग्रन्थ 'कान्हडदे प्रब' व 'वश भास्कर' के लिये परिशिष्ट देखें।)
अब्दुल कादिर [ 17 1 फारसी सवारीखें फारसी तवारीखो व दस्तावेजो का भी बडा महत्व है। ऐसी तवारिखो मे सदरउद्दीन हसन निजामी की ताज-उल-मासिर, अमीर खुसरो को मिफता-हुल-फुतुह व खजाइनुल व फुतुह, शम्स सिराज अफीफ की तवारीप - ए - फीरोजशाही, शरफुद्दीन अली माजदी का जफर नामा, अव्यास खा सेरवानी मा तवारिख-ए-शेरशाही, जहीरूद्दीन बाबर का बावरनामा, गुलबदन लिखिन हुमायू नामा, अबुलफजल का प्रयवरनामा,मुहम्मद कासिम हिन्दूशाह फरिस्ता का तवारीख-ए-फरिस्ता, निजामुद्दीन का तबकात-इ-अकारी, वदायूनी का मुतषय-उ-तवारिख जहागीर का प्रात्मचरित्र तुजुक्-ए-जहागीरी, कानपनी का पादशाहनामा, अब्दुल हमीद लाहोरी का पादशाहनामा, मुहम्मद वारिम या पादशाहनामा, इनायतखां का' शाहजहानामा खफीखा का मुन्तखव- उल-नवाब, मुहम्मद कामीम कृत प्रालमगीरनामा, ईश्वरदास नागर का फुतुहात इ-बालमगिरी इरादनखा का तवारीख-ए-इरादतखाना, खुशालच द का तवारीख ए-मुहम्मदशाही, शिवदास लखनवी का मुनव्वर कलाम, अली मुहम्मद खा का मोरात-ए-अहमदी, मुहम्मद अलीखा अन्मारी का तवारीख-ई-मुज्जफरी, हरचरनदास का चहर गुलजार • ए - शुजाई, भुमावरलाल का अमीरनामा, ज्वालाप्रसाद का वाय-ए-राजपूनाना, यलोराम कायस्थ का तवारीख-ए-राजस्थान, मुहम्मद उबेदुल्लाह फरहनी का तवारीख तुहुफ ए-राजस्थान, के अनुवाद हिन्दी या अग्रजी में उपलब्ध है। राजस्थान इतिहास लेखन हेतु ये बडी उपयोगी सिद्ध हुई हैं। बादशाहो द्वारा जारी किये गये फरमानो, दरवार के अख्बारो आदि से भी राजस्य न के इतिहास को जानने में सहायता मिलती है । नये इतिहास प्रन्थ-उनीसवी शताब्दी के प्रारम्भ मे विदेशी विद्वानो ने राजस्थान का इतिहास लिखने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया था। राजस्थान के इतिहास के विषय मे प्रति प्रसिद्ध ग्रथ क्नल टॉड द्वारा लिखित 'अनाल्स एण्ड एण्टीक्वोटोज श्रॉफ राजस्यान' (82)-1832) के अलावा 'ट्रावल्स इन वेस्टर्न इण्डिया' (1839) उन्नीसवी मदी के प्रारम्भ मे ही प्रकाशित हुए थे। सुनीतिकुमार चटर्जी ने टॉड के इतिहास को बगाल की स्वतन्त्रता प्रेमी जनता के लिए नया महाभारत काव्य बतलाया है जिसको पढकर स्वतन्त्रता-प्रेमियो ने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। टॉड के इतिहास मे वणित महाराणा प्रताप, राजसिंह, वीर दुर्गादास राठौड प्रादि वीर बगालियो के स्वतन्त्रता नायक बन गये। बाद के वर्षों में मेजर स्ट्रेटन ने 'साट हिस्ट्री ऑफ कोटा स्टेट, जे पी स्ट्रेटन ने 'चितौड एण्ड द मेवाड फेमीली', क्नल जेम्स व क ने 'हिस्ट्री ऑफ जयपुर' सोबस ने 'नोटस ऑन जयपुर, जनरल साबास ने 'ए । मिसिंग चेप्टर ऑफ द इण्डियन म्युटिनी' प्रादि इतिहास ग्रथो की । रचना, की जिनके कारण विभिन्न रियासतो के राजापो को अपने अपने। राज्यो का इतिहास लिखवाने की रुचि जागृत हुई। कई रियासतो ने उनीसवी शताब्दी क अतम वा मे इतिहास व पुरातत्व के अध्ययन हेतु इतिहास विमा स्थापित किये। उदयपुर मे महाराणा सज्जनसिंह ने मेवाड का इतिहास लिखाने हेतु 1877 मे कवि- - [ 18 ] राजा श्यामलदास को अपने इतिहास विभाग में नियुक्त किया, जि होने काफी परिश्रम कर 1892 मे वीरविनोद चार जिल्दो मे2(68'छो बढे पृष्ठो मे ) प्रकाशित किया। इसमे न केवल मेवाड राज्य का बल्कि राजस्थान की अन्य रियासतो का भी सक्षेप मे इनिहास था। श्यामलदास के सहायका मे गौरीशकर हीराचद माझा भी थे। इतने विमाल ग्रथ के तैयार हो जाने पर भी मेवाड के महाराणा न कुछ कारणवश इस ग्रन्थ के वितरण पर रोक लगा दी और इस कारण यह अथ जनता के बीच स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद ही आ सका। जोधपुर राज्य में भी 1888 में 'मारवाड का इतिहास' लिखाये जाने के लिये अलग से महकमा तवारीख खोला गया जिसमें मुन्शी देवीप्रसाद जसे इतिहास प्रेमी विद्वान नियुक्त किये। उनका स्वगवास 1923 मे हो गया। उन्होने जयचन्द से राब तोडा तक तथा राव मालदेव व महाराजा जमव तमिह (प्रथम) के जीवन चरित्र प्रकाशित करवाये। (उन्होने आमेर के राजा पृथवीराज मे भगवन्नदाम तक का इतिहास और ग्रामेर के महाराजा मानसिंह (प्रथम) का जीवन चरित्र, मेवाड के महाराणा मागा मे महाराणा प्रताप तक तथा बीकानेर के राववीया से लेकर राव कल्याणमल तक के शामका के जीवन चरित्र छावाये थे)। नवारीख महकमा मारवाड द्वारा काफी परिश्रम करने के बाद 6 राजामो की जीवनियां ही 196 तक लिखी जा सकी। अत महकमा तवारीख बद कर दिया गया। एक नया इतिहाम विभाग खोला गया और विश्वेश्वरनाथ रेऊ को अध्यक्ष नियुक्त किया गया जिन्होने 1934 मे राष्ट टो का इतिहास' प्रकाशित किया तथा बाद में विस्तृत रुप से 'मारवाड का इतिहास दो भागो मे (1933 व 1940 मे) प्रकाशित हुआ। बूदी राज्य मे सरकार की ओर से सूर्यमल मिश्रण ई मन् 1840 मे इतिहास लिखने को नियुक्त किया गया जिन्होंने कविता में 'वश भास्कर' नामक ग्रथ 4 भागो मे रचा। इममे एक लाख डिंगल पद्यो मे बून्दी राज्य का इतिहास, बूदी राज्य की स्थापना से लेकर रावनारायणदास हाडा को मृत्यु तक है । वूदी नरेश ने भी इस इतिहास प्रय के प्रचार व प्रसार की स्वीकृति नहीं दो क्योकि इसमे कई तथ्य राजा को उचित नही लगे। बाद मे सूयमल के दत्तक पुत्र मुरारीदान ने पश्चातवर्ती राजाओं का इतिहास लिखकर 'वश भास्कर' के नाम से ई सन् 1899 मे प्रकाशित किया। मुरारोदा ने जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह द्वितीय (1873-95) के जीवन पर 'यशवत यशोभूपण' लिखा । बीकानेर राज्य मे मुशी सोहनलाल से 'तवारीख इ. राज श्री बीकानेर' लिखवाया गया। जैसलमेर राज्य में लक्ष्मीचन्द से तवारीख ई जमलमेर' 1891 मे तथा योटा राज्य मे भूशी मूलचद से 'तवारीख ई राज्य मोटा' 1918 मे तया सिरोही राज्य मे लल्लू भाई भोमभाई देसाई से 'चौहान कुल पलदुम' 1927 मे लिपवाया गया। कल्पद्रुम के दूसरे भाग मे सिरोही के राजवश मटा चौहानों पा इतिहास है। तब ही अग्रेजी मे मीताराम का सिरोही राग्य पा इतिहास 1920 में प्रकाशित हुआ। गौरीशकर हीराचद प्रोमा से भी सिरोही राज्य या इनिहाम 1911 में राज्य ने लिखवाया लेक्नि उसकी ज्यादातर प्रतियो गिरोही दरवार ने वितरित नहीं होने दो। वे प्रतिया अभी भी सिराही दरवार -- [ 19 ] ने रोक रखी है। जयपुर नरेश ने भी 'ए हिस्ट्री ऑफ जयपुर' जदुनाथ सरकार से लिखवाया। यह इतिहास 1939 मे तैयार हो गया था लेकिन महाराजा ने कुछ अशो को अपने राजवश के मान सम्मान के हित मे मही समझा अत उसका प्रकाशन नहीं होने दिया तथा काफी रकम जदुनाथ सरकार को देकर उसकी पाण्डुलिपी अपने पास रख ली। जोबनेर के नरेन्द्रसिंह ने भी अग्रेजी मे 'जयपुर राज्य का इतिहास' लिखा था जो भी महाराजा जयपुर ने अपने पास रख लिया जो बाद मे 1962 मे मथुरालाल शर्मा ने सरकार द्वारा लिखित 'हिस्ट्री ऑफ जयपुर स्टेट' को देख कर व इमसे सहायता लेकर अपने नाम से प्रकाशित किया। सरकार की हिस्ट्री प्रॉफ जयपुर स्टेट' 1974 मे प्रकाशित हुई जिसका सम्पादन डा रसुवीरसिंह ने किया। कोटा राज्य ने भी मथुरालाल शर्मा से कोटा राज्य का इतिहास लिखवाया जो दो भागो मे में प्रकाशित हुआ। स्वतन्त्र प्रयास-रियासतो की ओर से राजकीय प्राश्रय मे जब इतिहास लिखवाये जा रहे गे तब ही कई इतिहास लेखक अपने प्रयासों से इतिहास लिखने में लगे थे। इस कारण गौरी शकर हीराचन्द प्रोझा ने 1928-1931 में उदयपुर राज्य का इतिहास प्रकाशित किया। बाद के वर्षों मे उहोंने डूगरपुर (1936), वासवाडा, (197) प्रतापगढ (1949), बीकानेर (1939-40) व जोधपुर राज्य (1938-1941) का इतिहास प्रकाशित किया । जोधपुर राज्य का इतिहास अधूरा ही प्रकाशित कर पाये। महाराजा तस्तैसिंह के व उनके बाद के राजामों का वृतांत अभी छपना है। जोधपुर राज्य का सम्पूर्ण इतिहास जगदीशसिंह गहलोत ने 1925 मे प्रकाशित किया। इस प्रकार जोधपुर रियासत अपने प्रयासो में जहा विफल रही, जगदीशसिंह ने सफलता प्राप्त कर ली। बाद के वो मे उन्होने राजस्थान की सम्पूण रियासतो (19) ध अजमेर मेरवाड का इतिहास लिखे। अर्थाभाव के कारण अब तक 10 रियामतो के ही इतिहास - उदयपुर, ईगरपुर, बांसवाडा, प्रतापगढ, शाहपुरा, करौली, जैसलमेर, बून्दी, कोटा, सिरोही, अलवर व जयपुर के ही इतिहास लगभग 1300 पृष्ठो मे प्रकाशित हुए है। अपने अतिम दिनो (सितम्बर 1958) मे उहोन यह महसूस किया कि उन्होने जो कुछ परिश्रम पिछले 40 वर्षों में किया वह काफी टप्रद व आर्थिक दृष्टि से हानि- कारप रहा। ऐसा काम किसी साधन सम्पन्न व्यक्ति द्वारा या क्सिी सस्था द्वारा ही प्रारम्भ किया जाना चाहिये था। इसी कारण उनके ज्यादार ग्रथ अप्रकाशित ही रह गये । उनके प्रकाशन का प्रयास अंब हो रहा है । . स्वतन्त्रता-पूर्व काल मे राजस्थान तथा विभिन रियासतो का इतिहास लिखने वालो मे मुशी देवीप्रमाद, रामनाथ रत्नु जगदीशसिंह गहलोत, रामकरण आसोपा, हरविलास शारदा, हनुमान शर्मा, भावरमल शर्मा आदि प्रमुख य । मुभी देवीप्रमाद ने प्रतिहार बाउक का वि स 1894 का तथा घटियाला का वि म 918 का शिलालेय खोज निकाला था जो उन्होने 'मारवाड के प्राचीन अभिलेख मे प्रकाशित किया था। उन्होने मीराबाई, राव मालदेव, राववीका; राव जैतसिंह, - [ 20 ] आमेर के पृथ्वीराज, मेवाड के महाराणा रत्नसिंह व महाराणा उदयसिंह के जीवन चरित्र लिखे थे। उदू मे 'तवारिस ई-मारवाड' भी निखी थी नैयिन वह अभी तक प्रकाशित नही हो सको है। रामनाय रत्नु ने 'इतिहाम राजस्थान' लिखा लेकिा उसका प्रचार व प्रसार कम हो पाया । सन् 1925 में जगदीगमिह गहलान का 'मारवाड राज्य का इतिहास' प्रकाशित हुप्रा जिममे विभन राठौड राज्या (मालवा की रियासतो का भी) का भी इतिहाम था। रामारण प्रामोपा का 'मारवाड का मून इतिहास' सन् 1931 में प्रकाशित हुअा। उन्होने मारवाड का सक्षिम इतिहाम' प्रकाशित करने हेतु दधिमति पत्रिका में ई सन् 1927 से धारावाहिक छापना प्रारम्भ किया था लेकिन वह ई सन् 1689 तक का ही इतिहास लिख सके । आगे का छप नही सका और न वह पुस्तक रूप में प्रकाशित हो सका। मन वह इतिहासकारो तथा गोधको के लिये अप्राप्य है। पासोपा ने कुछ जागीरो-नीमाज, आमोप, ठिकानो के इतिहास भी लिखे । राजस्थानी ऐतिहासिक काव्यो मेराज रत्ना कर, वीरभाण के राजरुपक, करणीदान के सूरजप्रसाश नया मुहगीत नैणसी की ख्याता का भी सम्पादन हुआ। हरविलाम शारदा ने चौहानो यो राजधानी अजमेर पर बडी विद्वतापूर्ण व प्रमाणिक इतिहास 'अजमेर हिस्टारियल एण्ड डिस्त्रिप्टीय' (1911 ) लिखा। बाद में महाराणा कुम्भा (195), महाराणा सागा (1918) 'हम्मीर ऑफ रणथम्भौर' (1921) एम्परर वीमलदेव (1935) लिखा । झाबरमल शर्मा ने सीकर का इतिहास (1927), सेतडी नरेश और विवेकानन्द (1927) राजा अजीतसिंह का जीवन चरित (1940) लिखा। हरदत्त व्यास ने जसलमेर का इतिहास (1920) तथा हनुमान शर्मा ने जयपुर का इतिहास (1924) लिखा । राजस्थान का एकीकृत इतिहास लिखने वालो मे पृथ्वीसिंह मेहता का 'हमारा राजस्थान' (1950) तथा रघुवीरसिंह का पूर्व प्राधुनिक राजस्थान (1951) मुख्य है। दोनो इतिहासकारा को कृतिया आज भी अनेक इतिहास प्रकाशित हो जाने पर भी प्रमाणिक मानी जाती है। भारत में प्रथम स्वतन्तत्रता संग्राम में राजस्थान की देन के सम्ब व मे नाग्राम खडगावत की पुस्तक 'रोल ऑफ राजस्थान इन 1857 एक अत्यत महत्वपूर्ण पुस्तक है। उन्होने राजस्थान के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर भी पाण्डुलिपि तैयार की लेकिन वह अभी तक राजस्थान सचिवालय मे ही प्रकाशन का इ तजार कर रही है। सन् 1857 के विद्रोह के विषय मे एक और पुस्तक प्रकाश व्यास ने 'राजस्थान का स्वतन्त्रता सग्राम' लिखी। सम्पूण इतिहास लिखने वालो मे सुखबीरसिह गहलोत का राजस्थान का सक्षिप्त इतिहास (1969) गोपीनाथ शर्मा का राजस्थान का इतिहास (1971) बी एम दीवाकर का राजस्थान का इतिहास आदि है। आधुतिक राजस्थान का इतिहास 1988 मे एम एस जैन के द्वारा लिखा गया है जो एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तक है। मेवाड के इतिहास पर रामवल्लभ सोमानी ने हिस्ट्री ऑफ मेवाड़ (1967) तथा लेटर मेवाड (1986) प्रकाशित की है। इनकी एक और पुस्तक 'महाराणा कुम्भा' 1974 मे प्रकाशित हुई। राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान का इतिहास लिखवाये जाने को 1959 मे एक समिति बनाई गई थी। सम्पूण राजस्थान का अब तक [ 21 ] . । . येवल एक भाग 1066 में 'राजस्थान ध्र द एजेज' प्रकाशित हो सका है। शेष दो भाग अभी तक प्रकाशित नहीं हो सके हैं। स्वतत्रता प्राप्ति के बाद के 43 वर्षों मे राजस्थान के इतिहास के विभिन्न क्षेत्रो व कानो के विषय म काफो अध्ययन व शोध हो रहा है। कई शोध ग्रन्थ प्रकागित हो चके है। कई विविद्यालयो मे शोध क य हो रहा है। कई विश्वविद्यालयो के शोधको व शोध मस्थागो मे विद्वानो के राजस्थान के इतिहास के विभिन्न पहलुमो पर भाषण होते रहते है तथा उनका प्रकाशन भी होता है। न केवल राजनतिक इतिहास वल्कि मूल स्रातो व तत्कालिन दस्तावेजो' के आधार पर सामाजिक, आर्थिक व मांस्कृतिक इतिहास पर भी काफी लिखा जा रहा है। (इनका विवरण परिशिष्ट 3 मे देखे) । राजस्थान पुरालेखागार मे संग्रहित सामनी राजस्थान के इतिहास लेखन कार्य हेतु भारत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। डॉ हुकमसिंह भाटी, के शब्दो मे 'यहा शिलालेख ताम्रमत्र, प्याते, वाते, पट्टे परवाने, काव्य ग्रथ आदि इतनी विपुल मात्रा मे उपलब्ध है कि इन सबका सम्पादन व प्रकाशन भी सहज सम्भव नहीं है फिर भी आधारभूत महत्वपूर्ण ग्रथो का सम्पादन और प्रकाशन का कार्य यथा शीघ्र हो जाये तो इस समस्या का 'सामाधान हो सकता है।' भारतीय इतिहास में राजस्थान के वैशिष्टय पूर्ण इतिहास के अन्तगत यहा के राजवंशो की गौरवपूण गाथाओ से पृष्ठ के पृष्ठ भरे हुए है ।" आशा यह की जाती है कि शीघ्र ही सस्पूर्ण राजस्थान का प्रामाणिक इतिहास विस्तृत रुप से प्रकाशित हो सकेगा। हे अतीत, तुमि हृदये आभार । कथा को, कथा को ।। १ . रविन्द्रनाथ टैगोर 1 परिशिष्ट om दो महत्वपूर्ण ग्रन्थ १. कान्हडदे प्रवन्ध-प्राचार्य जिनविजय मुनि के अनुसार 'महाकवि पद्यनाभ रचित महाकाव्य 'कान्हडदे प्रबन्ध' राजस्थान के चौहान कुल शिरोमरिण वीर का हडदे के स्वधर्म और स्वदेश की रक्षा के निमित्त अनुपम बलिदान की कोति कथा है। यह काव्य विशुद्ध धर्म-प्रेम, उन्नत राष्ट्र प्रेम, उत्तम सदाचार प्रेम और सात्विक सत्य प्रेम का एक प्रशस्त पुण्यस्रोत है। यह काव्य प्रवन्ध प्राय शुद्ध ऐतिहासिक काव्य है। इसमे वर्णित घटनाये वहुत अग मे इतिहास मथित है। प्राचीन राजस्थानी किंवा प्राचीन गुजराती भाषा की यह एक सर्व श्रेष्ठ कृति हैं।' 'पद्मनाभ जालोर निवासी था तथा चौहान नरेश अखयराज का राजकवि था। प्रखयराज कान्हड़दे की पाचवी पिढी में था। प्रखयराज की प्रेरणा से कवि ने वि स 1512 (ई सन् 1455) मे इन काव्य की रचना की। वह बहुश्रव कवि तथा इतिहास का अच्छा जानकार था। उसे समाज का तथा राजदरबार के रीतिरिवाजो का भी अच्छा ज्ञान था। यह काव्य देवनागरी लिपि मे प्राचीन राजस्थानी भाषा मे लिखा गया था। इसमे कान्हडदे की कथा इस प्रकार दी है-- नवकोटि मारवाड में कनकाचल पवत की तलहटी मे बसे जालोर के सोनगरा चौहान साम तसिंह (ई सन् 1282 ~1307) के पुत्र कान्हडदे (ई सन् 1290-- 1314) व मालदेव थे। ज्येष्ठ पुत्र का हडदे अपने पिता को प्रशासन मे ई सन 1296 में सहयोग देने लगा। यह समय बडा उथल पुथल का था। दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी (ई मन् 12961-1316) इस समय भारत के विभिन्न क्षेत्रो को जीतने मे लगा था। उस समय गुजरात का शासक सारगदे (नास्तव मै कण बना) था। उसका प्रधान मत्री माधव ब्रह्मरण किमी कारणवश राजा से नाराज होकर अलाउद्दीन के पास चला गया और उसने सुल्तान को गुजगत पर आक्रमण करने हेतु उपसाया। प्रत अलाउद्दीन ने गुजरान को जीतकर सोमनाथ के मन्दिर को नष्ट करने का निश्य किया। सुल्तान ने गुजरात जाने के लिये जालोर नरेश से, उसने राज्य मे होकर अनुमति मागी लेकिन कान्हडदे ने यह मदेश भेजकर मना र दिया मितुम्हारी सेना हमारे गायो को नष्ट करतो, लोगो को बदी बनाती, स्त्रियो की इज्जत लेती, बह्मणो को परेशान करती और गायो की हत्या करती जावेगी और यह हमारे धर्म के विरुद्ध होने से हम मापको अनुमति नहीं दे सकते है। अलाउद्दीन धम कारण नाराज हो गया लेकिन तय चुप रहा और अपनी सेना (सन 1299 में) मेवाड होकर भेज दी। गुजरात में सोमनाथ पाटण का मदिर, 23 प्रव तोड दिया गया। गुजरात से लोटते समय मुस्लिम सना न जालार का रास्ता लिया। जालोर के चौहान यह जानकर क्रोधित हो उठे कि वह सेना सोमनाथ से महादेव की मूर्ति के साथ सैकडो हिदू स्त्री-पुरुषो को बन्दी बनाकर ले जा रहे थे । जालोर से 18 मील दूर सिराणा गाव मे खिलजी सेना ने पडाव किया ही था कि कान्हडदे के सामन्त जेता देवडा ने शत्रु सेना पर भी प्राक्रमण कर उनके कुछ सरदारों को मौत के घाट उतार दिया लेकिन उनका सेनापति उलुघखा बच निमला। चौहानो ने बन्दियो को छुडवा दिया और महादेव की मूर्ति के पाच टुकडो को अपने कब्जे में लेकर उनको सोरठ (प्रभास) बागड, पाबू, जावालिपुर (जालोर व अपने महल के बाग मे स्थापित कर दिया। इस काय से काम्हडदे की कौति सर्वत्र फैल गई। अलाउद्दीन अगले सात वर्षों तक विभिन्न स्थानो की विजय मे लगा रहा । इस समय मे उसने रणथम्भौर (1299-1300) चित्तौड (1303) आदि को जीत लिया। सन् 1305 मे पूरी तैयारी कर उसकी सेना जालोर पहुच गई। अलाउद्दीन के सेनापति नाहर मलिक ने कान्हडदे को बडी चालाकी से अपना मित्र वना लिया तथा उसे सुल्तान के दरबार मे उपस्थित होने के लिए राजी कर लिया। कान्हडदे मित्रभाव से दिल्ली चला गया लेकिन उसने यह देखा कि वहा एक राजपूत नरेश का स्वाभिमान से रहना कठिन है। कवि के अनुसार दिल्ली दरबार मे अलाउद्दीन की शाहजादी पोरोजा, कान्हडदे के राजकुमार वीरमद को देखकर मोहित हो गई और अपने पिता को स्पष्ट कह दिया कि वह पूर्व जन्म से ही वीरमदे की पत्नि है। सुल्तान ने हारकर वीरमदे से विवाह करने हेतु कहा लेकिन वह टाल गया। उधर कान्हडदे सुल्तान को वह गोंक्ति सहन नहीं कर सका जव उसने यह शेखी उधारी कि भारत का कोई नरेश उसका सामना नहीं कर सकता है। कान्हडदे सुल्लान को यह कहकर जालोर चला गया कि वह सुल्तान का सामना करेगा और यदि वह विफल रहा तो मृत्यु का आलिंगन कर लेगा। इस प्रकार उलाउद्दीन व कान्हड़दे के बीच सघष आरम्भ हो गया। खिल्जी सेना जालोर के लिये रवाना हो गई। रास्ते मे कान्हडदे के भतीजे शीतलदे, जो सिवाणा का शासक था, को सिवाणा से घेर लिया। सात वर्ष के संघर्ष के बाद अलाउद्दीन की सेना ने सिवाणा दुर्ग पर कब्जा कर लिया। कब्जा करने में मुख्य हाथ एक देशद्रोही भायला परमार का था। दुर्ग की सियो ने जौहर किया। शीतलदे 1303 को 9 सितम्बर को मारा गया। सुल्तान ने सिवाणा का नाम बैराबाद रख दिया। खिल्जी सेना ने बाद में बाडमेर, सत्यपुर (साचोर), व भीनमाल आदि पर पधिकार कर लिया ताकि कान्हड्दै को बाहर से कोई सहायता नहीं मिल सके तथा कान्हडदे भयभित हो जावे । कान्हड़दे की सेना भी शात नहीं रही और उमने गुरिल्ला युद्ध द्वारा शत्रु को परेशान करना प्रारम्भ कर दिया। एक बार उन्होंने खिल्जो सेना के धारणसा पडाव पर यकायक हमला कर भीनमाल मे गिरफ्तार किये ।
- [ 24 गये ब्राह्मणो को छुडवा लिया। बाद मे जव जालोर के ये सैनिक स्नान कर रहे थे तब खिल्जी सेना उनपर हट पड़ी और लगभग 4000 सैनिको को मार डाला। उधर दिल्ली मे शाहजादी पीरोजा ने बादशाह से निवेदन किया कि वह जालोर पर कब्जा न करे व सेना वापस बुला लेवे। उसने अपने पिता को बतलाया कि जालोर का दुग बडा सुदृढ है-और उममे अन्न व पानी का काफी सग्रह है। कान्हडदे,व उसके भाई मालदेव के बीच राम-लक्ष्मण जैसा प्रेम है। सुल्तान न पीरोजा की बात नहीं मानी और उसने एक लाख सैनिक जालोर भेज दिये। सेना के साथ शाहजादी की धाय ददा सनावर को भेजा ताकि वह वीरमदे को जीवित पकडवा देवे अन्यथा उसका कटा सिर ले पावे। यह सेना मेडता होकर सुदरी पहुची। रास्ते मे मालदेव व वीरमदे की सेना ने रोका। लेकिन शत्रु सेना आगे बढती ही गई और जालोर दुर्ग को घेर लिया। चौहानो की सेना गुरिल्ला युद्ध से मुस्लिम सेना को परेशान करती रही। खिल्जी सेनापति कमालुद्दीन फिर भी डटा रहा और उसने दुग के सैनिको को पहुचने वाली रसद को रुकवा दिया । दुग के जल स्रोत भी समाप्त हो गये। फिर भी कान्हडदे डटा रही। अभाग्यवश कान्हडदे का एक सामन्त वीका दहिया शत्रु सेनापति द्वारा दिये लालच में आ गया और उसने उसे दुर्ग का एक छिपा मार्ग, जो असुरक्षित था, वतला दिया। उस रास्ते से शत्रुसेना दुग मे प्रवेश कर गई। वीका की पत्नी हीरादेवी को अपने पति की इस करतूत का पता लगा तो उसने उसकी हत्या कर दी और का हडदे को यह सूचना दे दी लेकिन तब तक काफी देर हो गई थी। कान्हडदे निराश हो गया था क्योकि उसके कई वीर साम त-जेता देवडा, काधल, जैता उलीचा, लूणकर मोल्हन अजुन बाडवाल आदि मारे जा चुके थे। खिल्जी सेना दुग मे प्रवेश कर कान्हस्वामी के मन्दिर तक पहु च गई थी। यह देखकर कान्हडदे ने दुर्ग की 1584 स्त्रियो को जौहर करने दिया और अपनी अतिम लडाई की तैयारी कर ली। वीरमदे का राजतिलक किया गया। का हडदे केमरिया धारण करें शत्रु सेना पर दृट पड़ा और वि स 1366 की वैसाख सुदी पचमी बुधवार (ई सन् 1311 की 24 अप्रेल) को वीर गति को प्राप्त हुआ। वास्तव मे पचमी गे बुधवार न होकर शनिवार था। अत यह तिथि सही नहीं है। वास्तविक तिथि वि स 1371 की ज्येष्ठ (मई 1914) है। इस प्रकार जालोर के मोनगरो का राज्य समाप्त हो गया । वीरमदे 8 दिन ही राज कर सका। वह शत्रु सेना द्वारा पकड लिया गया लेकिन उसने अमने पेट में कटार भोक कर आत्म हत्या कर ली। इस युद्ध मे सभी राजपूत सैनिक मारे गये। शत्रुसेना का भी दमवा भाग ही बचा । यात्रु सैनिक मारे गये । ददा सनावर वीरमदे का सिर रत्नजटित पीजरे मे सुर्गा धत द्रव्यों में रखकर दिल्ली ले गई। वह सिर सोने के थाल मे रखकर शाहजादी के सामने रखा गया लेकिन वह सिर शाहजादो को देखते हो पीछे की ओर फिर गया। शाहजादी ने अपने माता पिता से अनुमति लेकर वीरमरे के साथ चिता मे बठी प्रौर इस प्रकार उमया दाह सस्कार कर दिया गया। वादशाह ने 8- माह तर शोर मनाया ।' चार लाख [ 25 ] T . ܐ ܕ कवि पद्मनाथ ने यह काव्य कान्हडदे की मृत्यु के लगभग 140 वर्ष बाद रचा प्रत इसमे कुछ ऐतिहासिक तथ्य सही नही है। गुजरात आक्रमण के समय गुजरात का राजा कण वघेला था तथा अलाउद्दीन ने माधव के उकसाने पर गुजरात पर आक्रमण नही किया था। सोमनाथ मन्दिर की मूर्ति तोडकर सीधी दिल्ली भेजी गई थी अत उसके टुकडे विभिन्न स्थानो पर स्थापित किया जाना सही नही है। शाहजादी पीरोजा का वीरमदे पर मोहित होना तथा बादशाह से अनुमति लेकर वीरमदे के सिर के साथ सतो होना भी मानने योग्य नहीं है। जालोर दुर्ग पर कब्जा मई 1314 मे हुआ था, न कि अप्रेल 1311 मे । सिवाणा दुग पर भी कब्जा सितम्बर 1308 मे हुया था । सिवाणा का घेरा सात वष चलना व जालोर दुग का घेरा 8 वष चलना सही नहीं है। ये सब कवि कल्पनायें हैं। कान्हडदे प्रबन्ध एक ऐतिहासिक काव्य है। उसका भौगोलिक वर्णन काफी सही है।' उसमे तत्कालीन समाज का सजीव व विस्तृत वर्णन मिलता है। मेरुतु ग'की "विचार श्रेणी' जिन प्रभ सूरि का 'विविध तीथ कल्प' व 'मुहणोत नैणसी को ख्यात' कान्हडदे प्रबन्ध को मुख्य मुख्य ऐतिहासिक बातो का समर्थन करते है । डा दशरथ शर्मा ने भी अपनी रचनाओ मे मुख्यत 'राजस्थान श्रू द एजेज' मे इस ग्रथ के अाधार पर तत्कालीन समाज का वर्णन क्यिा है। प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी का यह उच्च श्रेणी का काव्य है । '२ वश भास्क्रर-महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण (1815-1868) रचित वशभास्कर राजस्थान का एक अत्यन्त महत्वपूण ग्रंथ है जिसने राजस्थानी जनता को काफी प्रभावित किया है। डा आलमशाह खान के शब्दो मे 'युवा मरुवीरो ने उसमे अपमे रक्त का रग देखा तो रमणियो ने जौहर की ज्वाला के दर्शन किये तो वृद्धजनो ने मू छो पर हाथ धरे और बालवृन्द केशरिया रग का जादू समझने लगा। राजानो ने उसके परायण से राजत्व समझा, पण्डित-शास्त्रियो ने नीति और शास्त्र गुना, क्लावन्तो ने क्लाए जानी, कवि प्राचार्य साहित्य की परख में समर्थ बने और राजस्थान के इतिहास-प्रणेताओ ने तो इसे आधार बनाकर चलने मे ही सिद्धि देखी। इस प्रकार वश भास्कर काव्य और इतिहास के रुप मे ही नही अपितु भारतीय ज्ञान परम्परामो के समृद्ध कोप और राजस्थानी सभ्यता सस्थति के स्मारक-अथ के रूप मे प्रख्यात है।" यह ग्रन्थ बून्दी नरेश महारावराजा रामसिंह के आदेश से तयार किया गया। इसको रचना ई सन् 1840 से 1856 के बीच 16 वर्षो मे हुई। इसमे चौहान वश की हाडा शाखा के लगभग 200-राजामो, जो बून्दी राज्य से सम्बन्धित थे, या इतिहास है। य, इसमे,राजस्थान और भारतवर्ष का-इतिहाम प्रमगवा लिखा गया है। इसमे सृष्टि की रचना से लेकर ई सन् 1833 तक का इतिहास है। तत्कालीन दी नरेश रामसिंह ने जब इस ग्रन्थ मे लिखे अश सुने तो सूयमल्ल से रहा कि "पापने मेरे वापदादा, परदादा प्रादि के जो दोष लिखे हैं उनको पटकर तो . .
- [ 26 ] मैंने जैसे तैसे मन किया परन्तु अपने दोपो के लिए नही कर सकता।" सूर्यमल्ल ने उत्तर दिया कि 'जव मवके दोष लिखे गये है तो आपके भी लिखे जावेगे।' इस पर महारावगजा ने कहा कि ऐसे लिखने से तो नही लिखना अच्छा है।' यह सुन कर स्पष्टवादी व सत्यवादी मिश्रण ने उसी दिन से वश भास्कर की रचना बद कर दी यो सूयमल्ल इस ग्रंथ को दो अयनो, 12 अशो (विभागो) और 1000 मयूखो म रचना चाहता था लेकिन वह 212 मयूखो मे 6 राशियो की रचना कर, उत्तरायण मे सातवी राशि लिखकर आठवी राशि पूरी नहीं कर पाया। आठवी राशि के अन्तगत रामसिंह का चरित्र वरिणत कर रहा था तव ही इसकी रचना बद करनी पसी । सूर्यमल्ल के मरणोपरात उसके पुत्र मुरारिदान से साढे आठ मयूख लिखवाकर महारावराजा ने इस राशि की पूर्ति करवाई तथा उसे महारावर जान एक गाव भी देकर पुरप्त किया। वसभास्कर हिन्दी का अत्यात बंडा ग्रथ है। अधूरा होते हुए भी यह लगभग 2500 मुद्रित पृष्ठो का है। सक्षिप्त टीका सहित इसके पृष्ठो को सख्या 4368 तक पहुची है। कवि ने यह ग्रथ 4 लेखको को विठलाकर डिक्टेशन पद्धति से लिखवाया था। इन लेखको को प्रात काल से लेकर सायकाल तक सूर्यमल्ल के साथ रहना पढता था और जब भी कवि की इच्छा होती वह लिखवाने लग जाता था। सूप मल्ल मद्य ज्यादा पीते थे। मद्यो माद के फलस्वरूप कवि कही कही ऐतिहासिक सवतो की बडी भूले कर जाते थे। वाभास्कर मे बूदी ये हाडा वश के नरेशो का चरित्र चित्रण वशानुनम मे किया गया है। हा पालमशाह यान के अनुसार 'इसमे किसी एक युग के राजा मा परित्राण्यान करते हुए उसके अन्तगत ही प्रसगवश अन्य गोणपात्रो का समावेश हो गया है। जहा मावश्यक समझा है, वहा मया य गौण पात्रो का वणन विस्तार से पर दिया गया है। तथा माल्यो भीम, कछवाह जयसिंह, राठोडं जसवत सिंह, गिसोहाधिन राणा मादि।" यह ग्रय पिगुद याव्यति अथवा ऐतिहासिय पाव्य न होकर एप पाव्यमय इतिहराम है घोर गूयमान इतिहास मा पयि । उमया उद्देश्य येवल काव्यरचना ही नही रहा यन्यि विविध राजवगो पा इतिहाम लिपना भी रहा। उसने इसे इतिहाग मान ये विश्यकोप पे रूप में प्रस्तुत पिया है। इसके लियने मे उसने पुराण रामायण, महाभारत, भोजप्रय घ, तयारीप परिस्ता, मन परनामा, रामपाती मेलामो पुरतमा पादिमा उपयोग किया है। यूदी ये कार्यालयो पौर माया मारों को पुग्नों में यहुन पानयोन कर लिया है। जहां मे जो सामग्री मिमी उगने गको बिना एपिहागिर परय विप एए से ज्यादातर ग्यो माया errm पर मिपा। रा गो ही पोमा ने उगरे सिपे सिधा है, 'कधि में उग माननिहाग मियो में दिप पोज मी हो, ऐमा पापा नही जाता । कषि पता को पोरहो रहा है। प्रापीन राग मी शुद्धि की पोर ift" । पाममा पास दिएर मनियाल नही तर इतिहागामी [ 27 ] शुद्धि' का प्रश्न है, उसने जो ऐतिहासिक सामग्री दी है उससे अधिक की आशा उससे हम कर भी नहीं सकते क्योकि उस युग मे इतिहास के साधन आज की तरह प्रचुर नही थे और न ही उस दिशा में कोई विशेप खोज ही हो पाई थी तथापि उसने उपलब्ध सामग्री के आधार पर ही अपने - मत निर्धारिण करने का प्रयास किया था।" डा कानूनगो का कथन है कि 'वश भास्कर का सबसे अधिक महत्व ऐतिहासिक सामग्री का विशाल सकलन है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह ग्रन्थ 'पृथ्वीराज रासो' से भी अधिक महत्वपूण है व साहित्यिक दृष्टि से उन्नीसरी शताब्दी के महाभारत को गणना मे रखा जा सकता है।' वास्तव में बशभास्कर एक काव्ययम इतिहास है जो पुराणो की परम्परा मे लिखा गया और जिसमे राजवशो का ही विगद वर्णन किया जाता था। कवि के समय तक इतिहास लेखन की वैज्ञानिक पद्धति, जिसमे कि ऐतिहासिक तथ्यो का विश्लेपण करके सत्य घटनाग्रो की खोज की जाती है, का प्रारम्भ नहीं हुआ था। सब कुछ विचार करते यही लिखना उचित है कि इससे ऐतिहासिक तथ्यो का अपूर्व सकलन है। इन नर्थ मे तत्कालीन धार्मिक विश्वासो, सामाजिक रीतिरिवाजो, उत्सवो व त्यौहारो का का भी काफी विवरण मिलता है। कोई भी इतिहास शोधक इस ग्रन्थ की उपेक्षा नहीं कर सकता है। डॉ पालमशाह खान के शब्दो मे वश भास्कर को 'ऐतिहासिक वृतात सम्पन्न एक सहिता ग्रन्थ कहे तो कोई अत्युक्ति न होगी । । T --- T परिशिष्ट-२ ख्यातें ख्याना में प्रसिद्ध ख्यात शब्द संस्कृत के शब्द प्रख्यात का अपभ्रश है। व्यक्तियो के जीवन तथा उनके कायकलापो तथा उनके काल की घटनाग्रो का विवरण रहता है। विभिन राजवशा, रियासतो व ठिकानो के बारे में इनसे जानकारी मिलती है। राजस्थान की प्रसिद्ध ख्याते हैं-मुहणीत नेणसी री ख्यात बाकीदास री ख्यात, दयालदास री ख्यात, जोधपुर राज्य री ख्यात, जैसलमेर री ख्यात, मुदियाड री ख्यात, राठोडा री ख्यात, आदि। राजस्थान के कुछ प्रसिद्ध ख्यानकार है-~-मुहणीत नैरासी, बाकीदास और दयालदास । १. अनुहणौत नैणसी (ई सन् 1619~~1670)-वह जोधपुर के दीवान जयमल का ज्येष्ठ पुत्र था तथा 27 वर्ष की आयु में राज्य मेवा में नियुक्त हो गया। शीघ्र ही वह देश दीवान बनकर जोधपुर के महाराजा जसवतसिंह का अतिविश्वसनीय अधिकारी बन गया। अपने जीवन के अतिम वर्षों में वह महा राजा का कोपभाजन वन गया और उसे तगाकर आत्महत्या करनी पड़ी। उमने 1643 से ही इतिहास लेखन विषयक सामग्री इकट्ठी करना प्रारम्भ कर दिया था तथा स्वात सुखाय लेखन काय किया। वह भारत भर के तत्कालीव राजपूत राजवशो का क्रमबद्ध इतिहास लिखना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने विभिन्न राजपूत राजवशी से सम्बन्धित ऐतिहासिक आधार सामग्री का सकलन किया। वह मारवाड के सभी परगनो का क्रमबद्ध विस्तृत व्यौरा भी लिखना चाहता था। इसक लिये उसने परगनो के पचवर्षीय (1658 1662) सर्वेक्षण करवाये । जाधपुर परगने का सर्वेक्षण करते उसने मारवाड के शासको का इतिहास भी तैयार करवाया। उसने प्राचीन स्तम्भ लेख, देवली लेख, ताम्रपन, पुरानी दशावलियो, पट्ट आदि तथा प्राचीन ग्रन्थ पचाग आदि भी इक्ट्ठ करवाये । इतिहास लिखने के लिये काफी प्रमाणिक आधार सामग्री इक्ट्ठी कर ली। विश्वसनीय सूत्रो से भी इतिहस की जानकारी प्राप्त की और उन्ही के आधार पर उसने अपने इतिहास ग्रथ लिसे। उमके द्वारा रचित इतिहास प्रथ है-(1) मुहणोत नएमी गे ख्यात, और (2) मारवाड रा परगना री विगत । मुहणीत नेगमी री ख्यात-इसका रचना काल सन् 1643 से 1666 तक का है। इसमे मामग्री का काफी सक्लन किया गया था लेकिन 1666 मे कद हो जान के कारण वह उसे टपस्थित नहीं कर सका। क्सिो एक शासक का विवरण भी एक स्थान पर समति नही कर सका और न उसे ठीक ढंग से क्रमबद्ध ही कर इस प्रकार उसन --- सका। इस प्रकार यह व्याप्त अव्यवस्थित और अपूर्ण है। ख्यात की मूल प्रति भी अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। उसके अनुसार इसमे राजस्थान तथा सामान्य रूप से गुजरात, मालवा आदि के इतिहास सम्बन्धी सामग्री का संग्रह है। राठोड, गुहिलोत, चौहान, भाटी आदि राजवशो व उनकी खापो का विस्तृत वणन है । चौहानो और भाटियो का तो काफी विस्तार से विवरण दिया गया है। चौदहवी शताब्दी के बाद के राजपूतो के राजनैतिक इतिहास के लिये यह ख्यात फारसी ग्रथो से भी अधिक महत्व की है। विभिन्न रियासतो की भूगोल की भी जानकारी दी गई है। इस प्रकार यह ख्यात सम्बधित रियासत के इतिहास के लिये महत्व- पूर्ण पूरक आधार नथ है। - इस ख्यात की सत्यता तथा यथार्थता की सभी लेखको ने प्रशसा की है। एक इतिहासकार के रूप मे भारतीय साहित्य को नैणसी की देन सवथा अनुपम है। मारवाड रा परगना री विगत मे नैणसी ने जोधपुर, मेडता, जैतारण, फलोधी, सीवागा, सोजत तथा पोकरण के ऐतिहासिक विवरण लिखे। पोकरण के 86 गावो मे से 61 गावो का ही विवरण लिख सका और तब (1666) ही वह पदच्युत होकर कैद हो गया। अत 25 गावो के विवरण अपूर्ण रह गये। विगत मे परगनो के गावो की सूची, जातियो की सूची और प्रत्येक गाव का वि स 1715 से 1719 तक का पच वर्षीय सर्वेक्षण विवरण दिया गया है । विभिन परगनो के ऐति- हासिक विवरणो मे परगना जोधपुर का विवरण बहुत ही विस्तृत रूप से दिया है । जोधपुर के परगने के विवरण मे राठोड राजघराने का प्रमाणिक इतिहास विस्तार से दिया है। परगनो के कस्बो की आवादी, वहाँ के जन जीवन, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व आर्थिक व्यवस्था आदि पर भी पर्याप्त प्रकाश डाला गया है । तत्कालीन राजस्व व्यवस्था और साधनो पर भी काफी लिखा गया है। प्रसगवश राजपूतो की शाखामो-चौहान, साखला, कच्छवाहा, देवडा आदि का भी यथा- वणन दिया गया है। इस प्रकार 'मारवाड,रे परगना री विगत' 'मध्यकालीन मारवाड के राजनैतिक इतिहास के अलावा धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक इतिहास के लिये बडा महत्वपूर्ण प्राथमिक प्राधार अथ है मुशी देवीप्रसाद ने नणसी को राजस्थान का अबुलफजल बतलाया है। कालीकारजन कानूनगो ने उसे अबुल फजल से भी अधिक योग्य बतलाया है। नैणसो अवुलफजल की भाति राज्य आश्रित इतिहासकार नहीं था। उसका इतिहास सयोजन अबुलफजल की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक और प्रभावशाली- था। उसका लेखन अबुलफजल से ज्यादा स्पष्ट, निष्पक्ष तथा सत्यता के निकट था। उसने सतुलित इतिहास तटस्थ होकर लिखा लेकिन अबुल फजल ऐसा नही कर सका।, नएसी का योगदान अपूर्व है तथा इसी कारण बीसवी शताब्दी के इतिहासकारो ने अपने इतिहास लेखन मे नैणसी के ग्रन्थो से बराबर सदभ लिये है। इस प्रकार राजस्थान इतिहास लेखन मे नैणसी के प्रेथ" अमूल्य आधार ग्रन्थ है । बाकीदाताआशिया (ई सन् 1781--1383)-वह जोधपुर के 1 - H - - [ 30 ] महाराजा मानसिंह के दरबार मे महाराजा के बहुत निकट के निजि व्यक्तियों में से था। उसने काव्य सजन के अलावा इतिहास लेखन भी किया। उसकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना उसकी ख्यात है जो वास्तव में ऐतिहामिक टिप्पणी सग्रह कही जानी चाहिये। इसमे लगभग 300 फुटकर पाते हैं जो एक पक्ति से लेकर 6 पक्ति तक हैं। ये सब नोट्स के रूप मे याददास्त के लिए लियो गई। उसका कोई श्रम नहीं है। कई दुवारा भी लिखी गई है। स्पष्ट है कि जब भी किसी ने कोई बात बतलाई या उहे याद आई उसे लिख दिया। इस सग्रह की कई वाते बडी उपयोगी व महत्वपूर्ण हैं। कई ऐसी बाते है जो अन्यत्र नहीं मिलती है। कई राजामा के जन्म और मृत्यु की तिथिया भी दी गई है। कई ऐतिहासिक पुरुषो के ननिहाल सतति, रानिया आदि की भी जानकारी दी गई है। कई बाते यहा के लोगो के सास्कृतिक जीवन को भी उजागर करती है। कई वातं भोगोलिक विषयों पर भी है। इन बातो से राजस्थान के इतिहास के अलावा मरहठो, सिक्खो, मुसलमाना, अग्रेजा आदि के विषय में कई ऐतिहासिक सूचनाये प्राप्त होती है। मारवाड के अलावा मेवाड, डूगरपुर, कच्छ गुजरात मालवा आदि राज्यो के इतिहास विषयक बाते मिलती है। राजदरबारी होते हुए भी बाकीदास एक निभिक तथा स्पष्टवादी लेखक था। उसके अग्रेजो के विरुद्ध होने तथा उमकी देशभक्ति होने का भी उसकी कृतियो से पता चलता है। उसकी ख्यात राजस्थान के इतिहास को अमूल्य देन है । दयालदास सिळायच (ई सन् 1798-1891) - वह बीकानेर के महाराजा रत्नसिंह का राजदरबारी था। बीकानेर नरेश को इस बात का बडा दुख था कि कनल टॉड ने बीकानेर राजवश को राजस्थान के राज्यो मे द्वितीय श्रेणी का.माना था। वह चाहते थे कि टॉड के इस कथन को झुठलाया जावे । इस कारण महाराजा नै दयालदास को बीकानेर राज्य का इतिहास लिखने का आदेश दिया। दयालदाल ने तीन ऐतिहासिक ग्रंथ लिखे-बीकानेर रे राठोडा री ख्यात, देश दर्पण और पायख्यान क्त्पद्रुम । इनके अतिरिक्त पवार वश दपरण, बीकानेर रे पट्टा रे गावो री विगत, जम रत्नाकर, सुजस वावनी प्रादि.भी लिखी। दयालदाम की रचनाओ मे मवाधिक महत्वपूण 'बीकानेर रै राठोडा,री ख्यात है जो 'दयानदाम गे ख्यात' के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध है। इसी के आधार पर सर्वप्रथम कर्नल पी ड् पोकलेट नै 'गजेटियर ऑफ द बीकानेर स्टेट' सन् 1874 मे लिखा था तथा बाद में प गौरीशकर प्रोझा ने भी अपने अथ बीकानेर राज्य का इतिहास' इसका भरपूर उपयोग किया। दयालदास ने अपनी यात मै यह बतलाने का बराबर प्रयत्न किया कि मुगल राजनीति में बीकानेर शासको की भूमिका को अधिक से अधिक प्रभावशाली बतलाया जावे नाकि उम राजवश के बड़ा महत्वपूर्ण समझा जावे। उसकी ख्यात में बीकानेर की राजकुमारियो । मुगल बादशाह व शाहजादो से विवाह होने का [ 31 ] कोई उल्लेख नहीं है। उसने यह भी बतलाने का प्रयत्न किया कि यद्यपि बीकानेर के शासक मुगल मनसबदार रहे लेकिन उन्होने पेशकशी की रकम नहीं दी। इस प्रकार वह अग्रेजो को यह दिखलाना चाहता था कि बीकानेर राज्य ने कभी किसी को खिराज नहीं दिया। उसने घटनामो का तिथिक्रम भी सही नहीं दिया है। इसका कारण उसके द्वारा महत्वपूर्ण अभिलेखो की उपेक्षा का हो सकता है। कही कही सुनी सुनाई बाते ही लिख दी जो सही नहीं थी। उसने मुगले के बादशाहों द्वारा बीकानेर के शासको को भेजे गये फारसी भाषा मे लिखे फरमानो का राजस्थानी अनुवाद भी दिया है। दयालदास एक राज्याश्रित इतिहासकार था और उसने बीकानेर नरेशो की उच्चता बतलाने में ही अपनी लेखनी का प्रयोग किया फिर भी उसके अर्थ राजस्थान के इतिहास लेखन के लिये स्रोत रोमग्री की दृष्टि से बडे उपयोगी है। डा घनश्यामलाल देवडा के अनुसार, "यह तो स्वीकार करना ही होगा कि कम से कम दयालदास ने बीकानेर राज्य का एक क्रमबद्ध वृहत इतिहास तैयार कर दिया जिसका अभाव कई शताब्दियो तक खलता।' १ परिशिष्ट - राजस्थान के एकीकरण पश्चात प्रकाशित महत्वपूर्ण इतिहास ग्रन्थ दशरथ शर्मा-1 राजस्थान शुद एजेज (प्रथम भाग) 2 चौहान सम्राट पृथ्वीराज तृतीय एव उनका युग के सी जैन एसियेण्ट सिटिज इन राजस्थान अदरिस बनर्जी यार्कोलोजिकल हिस्ट्री आफ साऊथ ईस्टनं राजस्थान डी सी शुक्ला-अर्ली हिस्टरी ऑफ राजस्थान दशरथ गर्मा-1 अली चौहान डायनेस्टीज 2 पचार वा दपराग अनिता सुदन-ए स्टडी प्रॉफ चाहमान इस्त्रिपशन्स जी सी राय चौधरी-हिस्ट्री ऑफ मेवाड अप टू 1303 एच डी साकलिया-प्रार्कोलॉजी इन राजस्थान मार्क ऑरेल स्टेइन-एन आर्कोलोजिकल टूट एलाग द घग्घर- -हाकडा रिवर एम एम पाहलूवानिया-मुस्लिम एक्सपान्मन इन राजस्थान रामवल्लभ सोमानी -1 पृथ्वीराज एण्ड हिज टाइम्स 2 महाराणा कुम्भा 3 जैन इस्त्रिपशन्स ऑफ राजस्थान 4 हिस्ट्री प्रॉफ मेवाड 5 लेटर मेवाड जी डी शर्मा-राजपूत पोलिटी के एम गुप्ता-1 मेवाड एण्ड द मगठा रिनेशन्स 2 सलेकशस फ्रॉम वनेडा पाहिज श्याम प्रसाद व्यास-राजस्थान के अभिलेखो का सास्कृतिक अध्ययन डी सी गागूली-हिस्ट्री आफ द परमारस आर बी सिंह-हिस्ट्री ऑफ द चाहमान्स वी एन मिश्रा-पेलियोलिथिक क्लचर्स ऑफ वेस्टन राजस्थान एस के गुप्ता-लेण्ड रेवेन्यू सिस्टम ऑफ ईस्टन राजस्थान यू एन ई-मेवाड अण्डर महाराणा कुम्भा चद्र भूपण त्रिपाठी - लाइफ एण्ड टाइम ऑफ मिर्जा राजा जयसिंह घनश्याम देवडा-1 राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था 2 व्यूरोग्रेमी इन राजस्थान 3 राजस्थान का सास्कृतिक इतिहास [ 33 ] जी पार परिहार-मराठा मारवाड सम्बन्ध पार एन प्रसाद-राजा मानसिंह मऑफ पामेर वी एस भटनागर-सवाई जयसिंह रतनलाल मिश्र-1 राजस्थान के दुर्ग 2 शेखावटी का इतिहास मागीलाल मयक 1 जोधपुर राज्य का इतिहास 2 जैसलमेर का इतिहास रामप्रसाद व्यास-1 महाराणा राजसिंह 2 रोल ऑफ नॉविलिटी इन मारवाड 3 राजस्थान का वृहत इतिहास (अाधुनिक) गोपाल व्यास - मेवाड का सामाजिक एव आर्थिक जीवन गोपीनाथ शर्मा-1 मेवाड मुगल सम्मघ 2 राजपूत स्टडीज 3 राजस्थान का इतिहास श्री राम शर्मा - महाराणा राजसिंह एण्ड हिज टाईम्स जदुनाथ सरकार-ए हिस्ट्री ऑफ जयपुर मीरा मित्र-महाराजा अजीतसिंह एव उनका युग बी एस भागव-1 मारवाड से मुगलो का सम्बन्ध वेनी गुप्ता-1 मराठा पेनीट्रशन इण्टू राजस्थान 2 रिलेश स विद द स्टेटस ऑफ कोटा एण्ड बून्दी एच सी टिक्कीवाल-जयपुर एण्ड द लेटर मुगल्स पार के सक्सेमा मराठा रिलेशस विद द मेजर स्टेटस ऑफ राजस्थान पेमाराम-1 मध्यकालीन राजस्थान मे धार्मिक आदोलन 2 अग्रेरियन मुवमेण्ट इन राजस्थान पी सी चान्दावत-महाराजा सूरजमल और उनका युग के पार कानूनगो-1 हिस्ट्री ऑफ जाटस 2 स्टडीज इन राजपूत हिस्ट्री मनोहरसिंह राणावत -भरतपुर महाराजा जवाहरसिंह जाट जे के प्रोझा - मेवाड का इतिहास प्रकाश व्यास 1 मेवाड राज्य का इतिहास 2 राजस्थान मे स्वाधीनता संग्राम' सुखवीरसिंह गहलोत-1 राजस्थान के का तिथिक्रम 2 राजस्थान मे जागीरदारी उन्मूलन 3 कास्टस एण्ट ट्राइब्स इन राजस्थान रुरल लाइफ इन राजस्थान 5 राजस्थान के प्रमुख अभिलेख 4 { 34 ] जी सी शमी--एडमिनिस्ट्रेटिव मिम्टम प्रॉफ द राजपूतम शिवदत्त दान बारहट-महाराजा विजयसिंह एव उनमा युग राजकुमारी पौल-राजस्थान के राजघरानो को हिन्दी सेवा निमल चन्द्र राय -महाराजा जसवसिंह का जीवन व ममय हुक्मसिंह भाटी-- राजस्थान के मेड़तिया राठोड. 2 राजस्थान के ख्यातकार व उनके प्रथी का तिधिगम एस सी मिश्रा-सिन्धिया होल्कर गयेवलेरी इन राजस्थान एण्ड्री व टोप्यफील्ड-पेन्टिग्त फाम राजस्थान प्र पाल~~द क्लासिकल ट्रेडिशन इन राजपूत पेन्टिगम रामनाथ- पाकिटेकचर ऑफ चित्तौडगढ रावट एकेल्टन--राजस्थानी टेम्पल हैगिग्स एम सी बीच-राजपूत पेन्टीगस एट बूदी एण्ड कोटा उपेन्द्रनाथ शर्मा-जाटो का नवीन इतिहास जी एन शर्मा-1 सोशल लाइफ इन मेडिविवल राजस्थान 2 राजस्थान का मास्कृतिक इतिहास राम पाण्डे-~~! भरतपुर अप 1826 2 रेल्वेज इन राजपूताना 3 अग्रेरियन मुवमेण्ट इन राजस्थान 4 पिपलम मुवमेण्ट इन राजस्थान महावीरसिंह गहलोत - 1 जगदेव परमार री वात 2 वीरमदे सोगनरा री बात करणीमिह-बीकानेर के राजघराने का केन्द्रीय मत्ता से सवध गोविन्द अग्रवाल चूरु मण्डल का शोधपूण इतिहास 2 स्वामी गोपालदास कालूराम शर्मा-उनीसवी सदी के राजस्थान का सामाजिक एवं आर्थिक जीवन राजेन्द्र जोशी-उन्नीसवी शताब्दी का अजमेर वसन्त जोशी-उन्नीसवी सदी का राजस्थान निर्मला गुप्ता-राजस्थान का अधुनिकीकरण नीलम गहलोत-प्राधुनिक राजस्थान का प्रार्थिक इतिहास एसी बनर्जी-1 राजपूत स्टेटस एण्ड ईस्ट इण्डिया कम्पनी 2 राजपूत स्टडीज एम एल शर्मा-हिस्ट्री ऑफ जयपुर स्टेट पद्मजा शर्मा-जोधपुर के महाराजा मानसिंह और उनका काल राधेमोहन माथुर राजपूत स्टेटस एण्ड ईस्ट इण्डिया कम्पनी वी के वशिष्ठ-राजपूताना एजन्सी-1832-1858 हर्मन गोण्ट्स-भाट एण्ड प्राक्टिक्चर ऑफ बीकानेर १ [ 35 ] प्रमोदचन्द्र--बून्दी पेण्टीग्ज एरिक डिक्सन-किशनगढ पेण्टीग्ज धूलसिंह-ए स्टडी ऑफ लण्ड रिफार्मस इन राजस्थान एम एस जैन-आधुनिक राजस्थान का इतिहास कृष्ण चैतन्य--राजस्थानी ट्रेडिशन्स हीरालाल माहेश्वरी-हिस्ट्री ऑफ राजस्थानी लिटरेचर डी डी गोड-कस्टीटयुशनल डेवलपमेण्ट ऑफ ईस्टर्न राजपूताना स्टेटस वी एल पानगडिया-1 राजस्थान का इतिहास 2 राजस्थान मे स्वतत्रता संग्राम जगदीशसिंह गहलोत-1 राजस्थान के राजवशो का इतिहास 2 राजस्थान का सामाजिक जीवन 3 स्वतत्रता-पूर्व राजस्थान 4 दुर्गादास राठोड 5 मेवाड का केन्द्रीय शक्तियो से सम्बन्ध आर पी शास्त्री-झाला झालिमसिंह जबरसिंह-द ईस्ट इण्डिया कम्पनी एण्ड मारवाड श्रो पी कच्छवाहा-हिस्ट्री ऑफ फेमीनस इन राजस्थान पार ए अग्रवाल-1 हिस्ट्री, प्राट एण्ड अर्टिटेकचर प्रॉफ जैमलमेर 2 मारवाड मुरल्स पृथ्वीसिंह मेहता-हमारा राजस्थान असीम कुमार रॉय - हिस्ट्री ऑफ जयपुर सिटी जहूरखा मेहर-1 राजस्थान मे आजादी रो आन्दोलन 2 टाल्वा निवन्ध धर मजला धर कोसा 4 राजस्थानी सस्कृति रा चितराम 5 राजस्थान मे स्वतत्रता संघर्ष पूरणमा नवीनलाल-1 राजस्थान अनुशीलन 2 राजस्थान मे स्वतत्रता आन्दोलन 3 युगयुगीन राजस्थान वावुलाल गुप्ता-ट्रेड एण्ड कॉमस इन राजस्थान सतोप यादव-उन्नीसवी और बीसवी शताब्दी मे स्त्रियो की स्थिति जी सी वर्मा-हिस्ट्री ऑफ एजुकेशन इन राजस्थान शकरसहाय सक्सेना तथा पद्मजा शर्मा-बिजोलिया किसान पादोलन का इतिहास रामनारायण चौधरी-बीसवी सदी का राजस्थान एस एम माथुर-स्ट्रगल फॉर रेस्पोन्सीबल गवर्नमेन्ट इन मारवाड पो पार शाह - राज मारवाड डयुरिंग ब्रिटिश पेरामाउण्टेसी [ 36 ] निर्मला उपाध्याय द एडमिनिसस्ट्रेशन ऑफ जोधपुर स्टेट हीरालाल शास्त्री-प्रत्यक्ष जीवन शास्त्र शकरमहाय सक्सेना-जो देश के लिए जिए गगाप्रसाद कामथ धोलपुर का राजनतिक इतिहास सुमनेश जोशी-राजस्थान मे स्वतत्रता संग्राम के सेनानी के वी एल गुप्ता-द इवोलयुशन प्रॉफ द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ द फामर भरतपुर स्टेट लक्ष्मणसिंह राठौड-1 पोलिटिकल एण्ड कस्टीटयुशन डवलपमेण्ट इन राजस्थान 2 पॉइम्स ऑन द थार 3 वीर दुर्गादाम राठोड 4 जोहर ऑफ पानी 5 द ग्लोरी प्रॉफ रणथम्भौर वाई एस मेहता--एडमिनिसट्रेटिव रिफामस इन द स्टेटस ऑफ राजपूताना देवीलाल पालीवाल-मेवाड एण्ड द ब्रिटिश एच ई वानवर्ट--लाइफ प्रॉफ सर प्रतापसिंह रतनशाह-सास्कृतिक राजस्थान जगमोहनसिंह परिहार--सास्कृतिक राजस्थान कमला मालू--हिस्ट्री ऑफ फेमीनस इन राजपूताना एच एस सेक्सेना-चेजिंग अग्रेरियन सोशल स्ट्रकचर इन रुरल राजस्थान मालती सक्सेना-इम्पेकृ ऑफ द ब्रिटिश सोवरनटी मान इकोनोमिक कडिसन्स प्रॉफ राजस्थान नाथूराम खडगावत-राजस्थानस रोल इन द स्ट्रगल ऑफ 1857 पी सी जन - ट्राइवल अग्ररियन मुवमेण्ट देवीदत्त शर्मा- मेवाड का धार्मिक, साहित्यिक एव सास्कृतिक इतिहास एल पी माथुर-रेजीस्टेस मुवमेण्ट ऑफ ट्राइबल्स नीलम कौशिक-राजस्थात के चुण्डावतो का इतिहास बद्रीप्रसाद साकरिया-मुहणोत नणसी री ख्यात (चार भाग) जयसिह नीरज व बी एल शर्मा-राजस्थान की मास्कृतिक परम्परा आर सी अग्रवाल-पार्कोलोजिकल रिमेन्स इन वेस्टन इण्डिया एच सी बत्रा-रिलेसन्स ऑफ जयपुर स्टेट विद ईस्ट इण्डिया कम्पनी राजीव नयन प्रसाद-राजा मानसिंह आफ पामेर पी एस चौधरी-राजस्थान विटवीन द टू वल्ड वारस श्यामसिंह रत्नावत हरफूलसिंह आर्य -शेखावटी के ठिकानो का इतिहास एव योगदान राघवे द्रसिंह मनोहर - राजस्थान के खगारोत पछवाहो का इतिहास देवीदत्त शर्मा - मेवाड का धार्मिक, साहित्यिक एव सास्कृतिक इतिहास वित्रमसिंह राठौड-महाराजा सर प्रतापसिंह -राजपूत नोबिलिटी
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राजस्थान इतिहास लेखन के स्रोत ग्रन्थ
डा रघुवीरसिंह --राजस्थान के प्रमुख इतिहासकार और उनका कृतित्व
डा हुक्मसिंह भाटी-राजस्थान के इतिहासकार
डा कृष्णस्वरुप गुप्ता व डा गोपालवल्लभ व्यास-राजस्थान के इतिहास के स्रोत
डा गोपीनाथ शर्मा-1 राजस्थान के इतिहास के स्रोत
2 विबलियोग्राफी ऑफ मेडीवियल राजस्थान
3 कविराजा श्यामलदास और उनका वीर विनोद
डा मनोहरसिंह राणावत - इतिहासकार मुहणौत नैणसी तथा उसके इतिहास प्रथ
डा घनश्याम देवडा-स्यातकार दयालदास सिंढायच
डा लु जी तस्सिीतोरी-ए डिस्क्रीपटिव केटलॉग ऑफ वाडिक एण्ड हिस्टोरिकल
क्रोनिकल्स
डा राम पाडे-सोर्सेज ऑफ कलचरल हिस्ट्री ऑफ राजस्थान
शौकतअली खा-हिस्ट्री एण्ड हिस्टोरियनस ऑफ राजस्थान
नारायणसिंह भाटी-राजस्थान के ऐतिहासिक ग्रथो का सर्वेक्षण (तीन भाग)
पी सरण-डेसक्रिप्टव केटलाग ऑफ नानपसियन सोर्सेज ऑफ मेडिवियल
इण्डियन हिस्ट्री (करिंग राजस्थान एण्ड एडजेसेण्ट रिजन्स)
जहूरखा मेहर इतिहासकार जगदीशसिंह गहलोत व्यक्तित्व एव कृतित्व
हेबर रेजीनाल्ड-नेरेटिव अॉफ ए जर्नी टु द अपर प्रोविन्सज ऑफ इण्डियन फ्रॉम
केलकटा बाम्बे
जेम्स टॉड ट्रावल्स इन वेस्टन इण्यिा
परिशिष्ट-8 राजस्थान के प्रमुख इतिहासकार . कर्नल जेम्स टॉड-(ई सन् 1782-1835) -इग्लण्ड निवासी जेम्स टॉड भारत मे सन् 1860 मे पैदल सेना के लेफ्टिनेट नियुक्त होकर पाये। 1817 मे वह मेवाड, कोटा, बून्दी, मारवाड, जैसलमेर, सिरोही व जयपुर रियासतो मे गवनर जनरल का राजनैतिक प्रतिनिधि वनकर उदयपुर में नियुक्त हुए। लगभग 5 वर्षों तक यहा रहकर, वह अपने अधिकारियो द्वारा उनपर रियासतो का अत्याधिक पक्ष लेने का सदेह करने पर, त्याग पत्र देकर वापस अपने देश चले गये । उहोंने यहा की सभी रियासतो की यात्रा की तथा यहा के निवासियो के सम्पक से उन पर यहा की सस्कृति का काफी प्रभाव पडा तथा वह यहा के निवासियो के अनय हितपी बन गये। उन्होने समय समय पर अग्रेजो की स्वार्थी और आतकात्मक शासन नीति का विरोध भी किया था । अपनी पुस्तक 'ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इण्डिया' मे स्पष्ट लिखा था-'ब्रिटेन के सरक्षण मे जो जातिया आ गई है उनको सजा देते समय दया का व्यवहार बहुत कम किया जाता है और न्याय का दण्ड अवश्य ही किसी न किसी का मार गिराता है जिससे हमारा शामन तलवार का शासन कहा जाता है। यही नही हमारी सरकार द्वारा राज्य तथा धर्म सम्बधी जो भी कानून बनाये जाते हैं वे इनकी (प्रजा की) दशा सुधारने के दृष्टि से नही बल्कि हमारे कोप को भरने के लिये बनाये जाते हैं। अपनी भारतीय प्रजा की गाढी कमाई से लाखो स्वण मुद्राए प्राप्त करके उसका नाममात्र भाग भी उनकी भलाई के लिए खच नहीं किया जाता है।' कम्पनी की सेवा से निवृत होकर टॉड इग्लैण्ड लौट गये। वहा उहोने भारत रहते जो इतिहास विषयक सामग्रो इकठ्ठी की थी उमके आधार पर अनारस एण्ड एण्टीक्वीटीज ऑफ राजस्थान तथा 'ट्रवल्स इन वेस्टन इण्डिया' नामक ग्रथ तिखकर प्रकाशित कराये। अपने द्वारा भारत से लाई गई मूर्तियो शिला लेखो, हस्तोलखित ग्रयो, प्राचीन मिक्को, दस्तावेजो आदि के 40 सन्दुको मे भरे सग्रह को ल दन की रायल एशियाटिक सोमायटी को भेट कर दिये । कनल टॉड का ऐतिहासिक दृष्टिकोण बडा व्यापक था। वह राजपूता इतिहास, गौर्य और वलिदान के कायक्लापो से काफी प्रभावित थे। यो उ होने राजपूतो के अत्यधिक प्रफोम प्रेम की निदा भी की है। यह कहा नहीं जा सकता कि क्यो उमने राजपूतो के शौय और पराक्रम की ज्यादा ही प्रशमा की जब कि वह यह भी जानते थे कि राजाप्रो के आश्रित कवियो ने अपने प्राश्रयदातागो की थोथी प्रशमा ज्यादा ही की है। राजाप्रो मे प्रचलित बहुविवाह, नशाखोरी, पारस्परिक मनोमालिय आदि दुव्यसनो के कारण उनकी सामाजिक, व आर्थिक - [ 39 ] स्थिति को बिगडते देखकर भी वह उनके विरूद्ध कुछ नही लिख सके। राजपूतो को मुसलमानो के विरुद्ध बराबर युद्ध करते रहना बतलाकर और उन्हे धम युद्ध की सज्ञा देखकर उन्होने हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक विद्वेष का प्रचार किया। इसी कारण हमारा इतिहास राजपूत युग, मुस्लिम युग, मराठा युग आदि के नाम से विभाजित हो गया। टॉड के अनुसार मध्यकातीन भारत मे सभी मुस्लिम शासक थे और सभी गैर मुस्लिम शासित थे जव कि तब भी अधिकाश मुसलमान गरीब तथा तिरस्कृत थे। टॉड ने भारत मे हिन्दू और मुस्लिम सस्कृतियो को भिन भिन्न माना। सम्भव है यह सब कुछ इस कारण किया गया हो कि हिन्दुनो और मुसलमानो के बीच भेदभाव लाया जावे ताकि ये लोग एक होकर नहीं रह सके जैसा कि पश्चातवर्ती अग्रेजी साम्राज्यवादी नीति रही और जिसका परिणाम आज तक हम भोगते जा रहे हैं । कर्नल टॉड के 'अनाल्स एण्ड एटीक्वीटीज ऑफ राजस्थान' अथ के प्रकाशन को युरोप के प्राच्यविद्या विद्वानो ने बहुत सराहा । डा रसुवीरसिंह के शब्दो में 'अग्रेजी भाषा मे अपने विषय का सवप्रथम अथ होने तथा साथ ही अपनी प्रोजपूर्ण भाषा तथा रोचक शली के कारण यह ग्रय अत्यन्त लोकप्रिय हुग्रा। इस ग्रथ मे उल्लेखित तथा प्रतिपादित तथ्यो के विषय में विभिन्न विद्वानो, आलोचको आदि ने कई प्रकार की टिप्पणिया लिखी और लिखते जा रहे है तथा अपने प्रथो मे उस मामग्री का उपयोग करते आ रहे है।' यही अग्रेजी भाषा मे एक राजस्थान का इतिहास है जिसके कई सस्करण अब तक प्रकाशित होते है। यही इस ग्रथ की विशिष्टता व लोक प्रियता सिद्ध करने को पर्याप्त है। यह ग्रथ न केवल राजनतिक बल्कि मामाजिक आर्थिक व मास्कृतिक पटलुओ को भी उजागर करता है। राजपूत समाज मे स्रियो की स्थिति, वाल विवाह, विध पात्रो, जौहर, सतियो आदि के विषय मे भी काफी लिखा है । राजस्थान मे प्रचलित धम, देवो देवनाओ, धार्मिक त्यौहारो, उत्सवो अन्ध विश्वामो, धार्मिक मा यताओ, ब्राह्मणो व जैनियो का समाज और प्रशासन पर प्रभाव के विषय मे बहुत ही महत्वपूर्ण वर्णन मिलता है। उनका ग्रथ भरत के धम, प्रजाति शास्त्र, एव समाज शास्त्र के विकास के अध्ययन के लिए एक महत्वपूण ग्रन्थ है। उनके ग्रथ को पढकर विभिन्न भारतीय भापानो के साहित्यकारो और इतिहासकारो ने अनेक देशभक्तिपूर्ण नाटक, उपन्यास, कहानिये काव्य व ग्रथ लिखे। इस ग्रथ में वर्णित वीरो व वीरागनाओं की कोति दूरस्थ प्रदेशो मे फैल गई और उन्हे स्वतत्रता को साधना के लिए प्रेरित करने लगी। बगला साहित्य की सभी साहित्यिक विधामो मे टॉड के राजस्थान की वीर गाथानो पर अनेको रचनाऐ इस प्रकार भारतीय स्वतत्रता सघप के लिए यह अथ एक अमूल्य राजस्थान की रियासतो के एकीकरण के विषय मे यही कहा जाता रहा है कि 'टॉड द्वारा प्रशसित स्वाधीनता सेनानी महाराणा प्रताप का एक स्वप्न मिलती है। देन रहा है।
[ 40 ] । राजस्थान का एक सुसगठित प्रात बनने पर ही साकार होगा।' इस प्रकार कर्नल जेम्स टॉड राजस्थान का इतिहास लिखने वालो तथा राजस्थान के इतिहास की प्राधार शिला रखने वाले सर्वाधिक महत्वपूर्ण इतिहासज्ञ थे। उन्होने ससार के विद्वतजनो को बनलाया कि राजस्थान में इतिहास लेखन को ऐसी प्रमाणिक और अत्यधिक मात्रा मे सामग्री है जितनी उन उन्नतशील होने का दम मरने वाले देशो मे भी नहीं है। उ होने स्पष्ट लिखा था कि कुछ लोग पाख भीचकर यह मान वठे है कि 'हिन्दुप्रा के पास ऐतिहासिक ग्रथो जैसी कोई वस्तु नहीं है लेकिन वे भुलावे मे है।' ट्रेवल्स इन वेस्टन इडिया (पश्चिमी भारत की यात्रा) कर्नल टॉड की दूसरी महत्वपूर्ण कृति है जिसमे उन्होने उदयपुर से माण्डवी तक की पश्चिमी भारत को यात्रा का विवरण दिया है। इस याना से सम्बधित स्थानो, तीर्थों, मन्दिरो, गढा, शासको आदि के विषय में जानकारी दी गई है। प्राबू पहाड को ससार मे ख्याति फैलने वाली यही प्रथम पुस्तक है। चन्द्रावती के भग्नावशेषो का सवित्र विवरण इसी में है। कई शिलालेखो व अन्य महत्वपूण सामग्री को भी जानकारी दी गई है। इस प्रकार कर्नल टॉड के इतिहास प्रथ राजस्थान के इतिहास पर प्रथम महत्वपूण ग्रथ है जिनके आधार पर, राजस्थान इतिहास लेखन प्रारम्भ हुआ और उनके आधार पर आज तक बरावर लेखन काय हो रहा है। यह उनकी महत्वपूण व अमूल्य देन है। २ श्यामलदास दधवाडिया (ई सन् 1836-1893)- ग्राट डफ, कनिधम, माक्स विलरस मॉल काम, जेम्स टाड आदि अग्रेज इतिहासकारो द्वारा विभिन्न इतिहास न थ लिखे जाते देखकर राजस्थान के नरेशो ने भी अपन अपन राज्य के इयिहास लिखाने का विचार किया। इस कारण मेवाड के महाराणा न 1871 मे मेवाड का एक वृद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थ लिवाने का काय श्यामलदास को सौपा। इसके लिये एक लाख रुपये का प्रावधान रखा तथा श्यामलदास की सहायता के लिए अनेक सुयोग्य विद्वाना की नियुक्त किया जिनमे से एक गौरीशवर होराचन्द अोझा भी थे। काफी परिश्रम व लगन के साथ विविध प्रकार के मोता से ऐतिहासिक सामग्री का सक्लन किया गया और 1884 तक (महाराणा मजासिंह के स्वगवास तक) का मेवाड का इतिहास 'वीर विनोद' के शीपर से लिया गया । इस इतिहास का मुद्रण मन् 1886 मे प्रारम्भ हो गया था किन प्रय का उपमहार लिखा ही नहीं जा सका क्योकि बाद के महाराणा फलह मिह मिमी वारण वश श्यामलदास से नष्ट हो गये और मुद्रित प्रथ को . राजमहल मे बदरवा पर सील करवा दिया। इस कारण वीरविनोद की प्रतिया ई सन् 1945 तर एकाध इतिहासकार को ही प्राप्त हो सकी। गौरीशार हीराचन्द प्रामा, महाराज कुमार था रसुधीरसिंह, श्री जगदीशसिंह गहलोत प्रादि इतिहासकार हो [ 41 ] सन् 1945 से पूर्व इसका अध्ययन कर सके। अब तो इसके कई सस्करण प्रकाशित हो गये है। मूल ग्रन्थ 5 बडी जित्दो के 2685 पृष्ठो मे था। वीर विनोद मुख्यत मेवाड का इतिहास है लेकिन इसमे जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ, रीवा, बदी आदि राजपूताने की लगभग सभी रियासतो का भी सक्षिप्त वर्णन है । इसमे अनेक पट्टो, शिलालेग्वो, ताम्रपनो, खरीतो प्रादि की नक्ले दी गई है। पूर्ण ग्रन्थ नागरी लिपि मे है लेकिन हिन्दी के साथ फारसी भाषा का ज्यादा ही प्रयोग हुआ है। श्यामलदास ने वीर विनोद तैयार करने मे फारसी इतिहासकारो रयातो के लेखको और कर्नल टॉड की घटनाओ का वणन लिखने की पद्धति का अनुसार किया था। मुहणोत नैणसी की भाति विभिन्न राज्यो का सक्षिप्त इतिहास भी मेवाड के इतिहास के साथ दिया। बाकीदास की भाति किसी भी समय के इतिहास से सम्बन्धित व्यक्तियो और रीतिरिवाजो का भी वर्णन किया। अग्रेजी गजेटियरो के समान मेवाड की सामाजिक दशा को भी बतलाया है। ग्रथ को तैयार करते समय मेवाड राजघराने के पुरालेखागार का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने टॉड के इतिहास की अनेको भ्रान्तियो व भूलो को सुधारा। अपने सरक्षको के शासन काल का इतिहास लिखने मे यथासभव पक्षपात नहीं किया । यो उन्होने चारणो की ज्यादा ही प्रशंसा और ब्राह्मणो की निन्दा की है। स्वय जागीरदार होने के कारण जागीरदारो के पक्ष में भी काफी लिखा । शायद इन्ही कारणो से महाराणा ने इस ग्रन्थ का प्रसार रोक दिया। उन्होने अपने ग्रन्थ मे रयातो व ख्यातकारो का कम उल्लेख किया लेकिन अग्रेज लेखको-कनिघम, ऐडीसन हण्टर, मिल आदि के मतो की विवेचना करते हुए उनका उल्लेख अवश्य किया। सब पहलुप्रो पर गौर कर हम कह सकते है कि श्यामलदास ने सभी साधनो से इतिहास सामग्री प्राप्त करने का यथासभव प्रयत्न किया । उन्होने समीक्षात्मक विवेचन क्म क्यिा तथा ग्रथ को ज्यादा ही विवरणात्मक बनाया लेकिन फिर भी उनका प्रयास अत्यन्त सराहनीय था। उनके ग्रथ को आज 'भी देश विदेश मे बडी श्रद्धा की दृष्टि से पढा जाता हैं। उन्होने वीर विनोद जैमा बृहदकाय इतिहास लिखकर राजस्थान के इतिहासकारो का पथ प्रशस्त क्यिा ।। डा गोपीनाथ शर्मा के शब्दो मे, 'यदि न्याय की दृष्टि से देखा जाय तो टॉड का पी कृत स्वरूप और अोझा की विश्लेपणात्मट शक्ति का प्रारूप वीर विनोद मे है।' ३. गौरीशकर हीराचन्दा -1947) सिरोही के एक गाव रोहीडा में ज में गौरीश 1885 मे ।
[ 42 ] मेट्रिकुलेशन परीक्षा पास करने के बाद 1888 मे उदयपुर पहुच कर वहा के इतिहास कार्यालय में कार्यालय मत्री (प्रधान लिपिक) के रूप में काम प्रारम्भ किया। तब वहा गामलदास का वीर विनोद छप रहा था। वहा ऐतिहासिक सामग्री देखने का बहुत अच्छा अवमर उन्हे मिला तथा बाद मे वीर विनोद की छपी प्रति भी मिल गई। वोर विनोद को छ में प्रतिया महाराणा के आदेश से गोदाम मे सील कर दी गई अत अन्य समकालीन लेसक उमसे वचित रह गये। बाद म प्रोझाजी विक्टोरिया हाल के पुस्तकालय व सग्रहालय खुलने पर उसके अध्यभ नियुक्त कर दिये गये। वहा रहते हुए उन्होने प्राचीन लिपिमाला नामक ग्रथ लिखकर पुरातत्व जगत मे विशिष्ट ख्याति प्राप्त की। सन् 1907 मे 'सोलकिया का प्राचीन इतिहास' तथा सन् 1908 मे वह राजपूताना सग्रहालय में अध्यक्ष नियुक्त होकर अजमेर चले गये। वहा उन्होने सबसे पहले सिरोही प्रदेश से सहायता प्राप्त कर अपनी जन्म भूमि "सिरोही का इतिहास' 1911 मे लिखा जिसकी छपाई का कुल व्यय सिरोही नरेश ने उठाया। सिरोही नरेश ने इतना करके भी कुछ कारणो से उस ग्रथ का प्रसार रोक दिया। वह राजपूतानो सग्रहालय के संग्रहालयाध्यक्ष पद रहते अब राजपूताने की रियासतो के इतिहास लिखने मे लग गये। वीर विनोद जैसे वृहद इतिहास की प्रति उनके पास थी। अत अन्होने राजपूताने की रियासतो के इतिहास इस प्रकार लिखे-राजपूताने का प्राचीन इतिहास (1925), उदयपुर राज्य का इतिहास प्रथम भाग (1928) द्वितीय भाग (1932), डूगरपुर राज्य का इतिहास (1936), बासवाडा राज्य का इतिहास (1936) बीकानेर राज्य का इतिहास (दो भाग 1937 व 1940) जोधपुर राज्य का इतिहास (दो भाग 1938 व 1941, (प्रतापगढ राज्य का इतिहास (1940) ! जोधपुर राज्य का इतिहास तोन भागो मे छपना था लेकिन तीसरा भाग छप नही सका। जयपुर राज्य का इतिहास वह विचार करते भी लिख न सके । यो उहोने कनल जेम्स टॉड का जीवन चरित्र (1902), मध्यकालीन भारतीय सस्कृति (1928) पर भी पुस्तके लिखी। उन्होने कई निबध भी लिखे जो उनके स्वगवास के बाद सन् 1954 मे तीन भागो मे प्रकाशित हुए। ये निबन्ध इतिहास, पुरातत्व, मुर्तिकला आदि पर है। उहोने इतिहास लेखन मे सभी प्रकार की उपलब्ध आधार सामाग्री का उपयोग किया। इतिहास विषयक प्रकाशित पुस्तको का उन्होने गहन अध्ययन किया था। डा हुक्मसिंह भाटी के अनुसार 'उहोने प्रत्येक घटना के वणन में प्राप्त सभी आधार स्रोतो का उपयोग करते हुए अपनी सूझ बूझ से उसकी सत्यता को प्रमाणित करने का यथासम्भव प्रयास ही नही किया बल्कि सदभ सामग्री का सुस्पष्ट उल्लेख पाद टिप्परिणयो से दिया है। यो राजपूताने के इतिहास मे आधार | 43 ] स्रोतो का इस प्रकार पाद टिप्पण मे उल्लेख करने की परम्परा अोझा ने ही डाली थी।" अोझा का यह सौभाग्य था कि उन्होने श्यामलदास के अधीन काम किया था तथा उन्हे वीर विनोद की एक प्रति प्राप्त हो गई थी। इसका भरपुर उपयोग उन्होने अपने इतिहास ग्रयो मे किया। विभिन रियासतो-डूगरपुर, वासवाडा, प्रतापगढ सिरोही, बीकानेर आदि ने अपनी अपनी इतिहास सामग्री उन्हे उपलब्ध करादी। उन्होने अपने इतिहास ग्रथो मे सिरोही, उदयपुर व बीकानेर राज्यो के प्रति ज्यादा मोह दर्शाया है। उदयपुर महाराणा की सेवा मे तो वे रह ही चके थे। बीकानेर के महाराजा गगासिंह अपनी रियासत को प्रथम श्रेणी की रियासत घोषित करवाना चाहते थे अत उन्होने अोझा को आर्थिक सहायता देन मे भी कोई कसर नहीं छोडो। इसी कारण उन्होने बीकानेर की कई घटनामो का सही सही निरूपण नहीं किया और बीकानेर राजवश के चारित्रिक दोपो को छिपाने का प्रयास किया। प अम्बालाल कल्ला ने डा प्रोझा की लीपा पोती इस प्रकार दर्शाई है, "जोधपुर का इतिहास लिखते हुए माननीय प्रोझाजी मुगल बादशाहो को दी हुई जोधपुर की राजकुमारियो का सविस्तार वर्णन करते हुए एक सेच्चे इतिहा- सकार का वज्र कठोर नियम निबाहते है पर जिस समय वे बीकानेर के इतिहास पर आते हैं उनकी विख्यात लेखनी की धारा ही बदल जाती है। उनका सच्चे इतिहास- कार का दुदमनीय साहस और स्पष्टवादिता हवा हो जाती हैं और फलस्वरुप उनका बीकानेर का इतिहास अपना वास्तविक रुप छोडकर गहरे लिपे पुते ढग से हमारे सामने आता है।" अोझा ने महाराजा गगासिंह पर ही 232 पृष्ठ लिख दिये जो स्पब महाराजा गगामिह के प्रति पक्षपात बतलाता है । इसके विपरीत प्रथम श्रेणी की रियासत जोवपुर का इतिहास लिखते समय उस रियासत को बीकानेर से कुछ निम्न दिखलाने का ही प्रयत्न किया । जोधपुर राज्य के इतिहास की कुछ प्रातियो का निराकरण करने का प्रयत्न ही नही किया। जोधपुर के नरेशो को बुराईयो को कुछ ज्यादा ही उछाला है। इतना होते भी अोझा के ग्रन्थ दूसरे इतिहास ग्र थो की तुलना में बहुत ही प्रमाणिक और उपयोगी है। डा के पार काननगो के अनुमार, "अोझा वास्तव मे राजपूत इतिहास के अनुमधान के क्षेत्र में कविराजा श्यामलदास के सुयोग्य उत्तराधिकारी थे। लगभग एक दशव पश्चात, अपने वहुमुत्य साहित्यिक योगदान के अलावा राजपूत इतिहास के अनुमधान के क्षेत्र मे अपने सभी पूर्ववर्ती इतिहासकारो से गुणात्मक एव मख्यात्मक रूप मे आगे बढते हुए पूर्ण आयु एव प्रसिद्धि प्राप्त कर परलोकवासी ।" वह प्रथम इतिहासकार थे जिहोंने स्थानीय स्रोतो को परखा और इतिहास प्रयो मे वज्ञानिक ढग से उनका उपयोग किया। उनकी कृतियो का अध्ययन किरे बिना कोई भावी लेखक इतिहास न थ लिख नहीं सकता है। यही उनकी इतिहास लेखन को देन है ।
रापासुमुद { 44 ] 8 जगदीशसिंह गहलोत (ई सन् 1896-1958)-- मण्डोर (जोधपुर के एक मिसान परिवार में जन्मे जगदीगमिह गहलोत को किसी महा विद्यालय में शिक्षा नही मिती लेकिन गहन इतिहास अध्ययन पर तथा इतिहास सम्बन्धी सामग्री का सकलन कर उ होने जो इतिहास ग्रथ लि उनसे वह इतिहास क्षेत्र मे काफी प्रसिद्धी पा गये । डा गोगेशकर हीराचन्द प्रोभा ने सन् 1925 में उनके निये लिखाया, "गहतोत जी परिश्रमी तया अध्ययन गौन व्यक्ति है तथा उनमे ऐतिहासिक सामग्री को मनोयोग पूर्वक परखने तया सम्पर रप से सम्मिलित एय प्रमबद्ध परने को पूरा योग्यता है।" उनके इतिहास ग्रथो को पढकर सन् 1947 मे डा मुर्जी ने उन्हे लिखा था मैं आपके शोध कार्यों और उन पर प्राधारित ऐतिहासिक प्रयों को बड़ा महत्वपूर्ण समझता हूँ । मेरो मायता है कि प्राप राजपूतान की रियामतों की पुरालेखा सामग्री का भली प्रकार उपयोग कर रहे हैं।" अपने प्रारम्भिक जीवन मे वन निरीक्षक, रेल्वे गाड, कृषि फार्म आदि पर काम करते उहाने कई पुस्तकें लियी। इनमे मे प्रमुख पुस्तकें राजस्थान की कृषि कहावतें, मारवाड का सक्षिप्त वृतात, मारवाड राज्य का इतिहास आदि है । डा रघुवीर सिंह ने उनके द्वारा रचित 'मारवाड राज्य का इतिहास' के लिये लिखा "मारवाड के इतिहासिक वृतांत के अतिरिक्त वहा का भौगोलिक यणन और कई अन्य एसे विषयो का उसमे उल्लेख किया गया है जो वहा के अग्रेजी गजेटियरो मे भी नहीं मिलता है। शासको के साथ ही प्रजावग की वास्तविक स्थिति भी उससे ज्ञात हो सकती है। राजघराने के साथ हो राजस्थान तया अय प्रदेशो के सब राठोड राज्यों के मी सक्षिप्त इतिहास दे दिये गये है। इस प्राय के प्रकाशन के बाद जगदीशसिंह एक सशोधक इतिहासकार के रूप मे माय होने लगा था।" डा जदुनाथ सरकार ने इस प्रथ को हिदी साहित्य को एक अत्यन्त उपयोगी देन" बतलाया था। उनके अनुसार यह सही ढग से व मेहनत से लिखा ग्रन्थ है जिसमे काफी महत्वपूण ऐतिहासिक, सामा- जिक व आर्थिक जानकारी दी गई है ।' उनकी अपूव योग्यता को देखकर जोधपुर सरकार ने उहे फरवरी 1927 में जोधपुर राज्य के इतिहास व पुरातत्व कार्यालय में योलेटर (प्रतिलिपियो का मिलान करन) पद पर नियुक्त किया। सन् 1928 में उनके मारवाड राज्य के इतिहास का दूमरी सस्करण प्रकाशित हुआ और कुछ ही समय मे वह भी अप्राप्य हो गया। इतना विद्वतापूर्ण ग्रन्य लिखने पर भी जब इतिहास कार्यालय में पदो की कटौती की गई तब उहे वहा से पदमुक्त कर जोधपुर राज्य के सचिवालय मे टाईपिस्ट पद पर भेज दिया गया। इस नये पद पर वह 1930 से 1950 तक रहे और इन दो दशको मे उन्होने राजपूताने की सभी 19 रियासतो के अलावा अजमेर मेरवाडा, दाता व पालनपुर के इतिहास लिखे। सन् 1937 में उनका राजपूताने को इतिहास का प्रथम भाग प्रकाशित हुआ। उन्होने 500 वर्षों (वि स 1501 से 2000) का इतिहास सहायक पचाग तैयार कियाथा मारवाड के 1 [ 45 ] - - जिसमे इस्वी सन्, बगाली सन् हिजरी सन् व विक्रम सवत की समानान्तर सारणिया दी है। उनके अन्य उल्लेखनीय ग्रन्थ है, -राजस्थान का सामाजिक जीवन, मीरा- वाई की जीवनी और काव्य, राठौड दुर्गादास, मारवाड के रीतिरिवाज, भारतीय नरेश आदि। राजस्थानी भाषा के वह वडे समथक थे। उहोने ही सवप्रथम १९२५ मे यह माग की थी कि राजस्थान की भाषा राजस्थानी होनी चाहिये और इसके प्रचार व प्रसार हेतु राजस्थानी साहित्व मम्मेलन (प्रसादनी) स्थापित होनी चाहिये। उन्होने कई राजस्थानी ग्रन्थो का सम्पादन किया यथा, ऊमर काव्य, राजस्थानी वातालार्थ, मारवाड के गाम गीत, राजिया के सोरठे, वीर मायण मारवाडी कहावते, राजस्थानी ऐतिहासिक कहावते, आदि । जोधपुर राज्य के मचिवालय मे एक टाइपिस्ट के पद पर काम करते समय मन् 1937 मे जब राजपूताने का इतिहास का प्रथम भाग प्रकाशित हुआ तब डा पी के गोड ने न्यू इडियन एटीक्वेरी मे लिखा था, "इस अय को और इसके पूर्व की रचनायो को देखकर यह कहने मे कोई सकोच नहीं है कि ऐसा गहन अध्ययन पूण प्राय जिसमे राजपूतो की अनेक सामाजिक और आर्थिक समस्यानो पर नतन प्रकाश डाला गया है, लेखक को स्वत ही गौरव प्रान कर देता है । " मार्डन रिव्यु, कलकत्ता मे उस पथ की समालोचना के कुछ अश इस प्रकार है, 'हम यह प्राशा करते हैं कि गहलोतजी अपने इतिहास लेखन कार्य को एक देशी राज्य के प्रापत्तिजनक क्षेत्र मे बैठे, राजपूताने के उन इतिहासकारों मुहलोत नेरासी और कविराजा बाकीदास को माति दुर्भाग्यशाली भने दिना जारी रखेंगे।" जोधपुर राज्य सरकार ने उनकी सेवाप्रो का सही उपयोग नहीं किया लेकिन प मदनमोहन मालवीय ने उचित ही लिखा था कि "जोधपुर राज्य के लिए यह एक पूर्ण सतोष एव ममिमान गव को धात होनी चाहिए कि उस राज्य का एक सपूत इतना प्रसिद्धि प्राप्त इतिहासवेत्ता है।" इसमे कोई सन्देह नहीं है कि उहोने श्यामलदास, गौरीशकर हीराचन्द ओझा आदि की भाति राजाओ की पृष्ठभूमि मे इतिहास लिखा लेकिन तत्कालीन परि स्थितियो मे वही इतिहासकारों का दृष्टिकोण रहा। एक रियासत मे साधारण पद पर रहते निसन्देह राजाओ के विरोध मे विशेष कुछ नही लिख सके। तब के स्वतत्रता सेनानी भी तो उत्तरदाई सरकार की स्थापना राजाओ की छत्रछाया मे ही स्थापित करने की मांग करते थे। तब भी (1925 मे) उनका यह लिखना समय के अनुसार ही था कि "राजनैतिक कारणो से जो मातृभूमि के भक्त छोटी छोटी बातो पर दोषी बनाकर जेल में ठेल दिया जाते है और वे शातचित्त से इन जेलघरो को तपोभूमि ही मानते है। सच्चे सेवक अपने धर्म, जाति और देश के लिए कठिन से कठिन यातनाए सहने के लिए तैयार रहते है ।" "राजनैतिक जागृति को देखकर सरकारी अधिकारियो को अपनी नीति की समालोचना होने का भय तगा और फलस्वरूप मारवाड प्रेस एक्ट 1923 जारी हुआ। इस प्रेस एक्ट मे इतने बडे नियम रखे गये कि जिसका ब्रिटीश भारत के प्रेस एक्ट से मुकाबला नहीं हो सकता है। समझ मे घोटा गया 7 चूकते हैं। राज [ 46 ] नहीं पाता कि इस दका को रखकर मारवाड के प्रेस व सामाचार पत्रो का क्या गला मावजनिक प्रयो के अभाव मे मारवाड बहुत कुछ पिछड गया है क्योकि किमी देश व जाति की उन्नति प्रेस व सामाचार पत्रो पर हा निर्भर रहती है।" 'गजस्थान के सामाजिक जीवन में राजायो के लिये लिखा था, "अग्रेजा के मवीन होने के बाद से इन नरेशो को शिक्षा व प्रशिक्षिण इस प्रकार से दिया जाने लगा है कि वे सभी कार्यों को लिये अग्रजी सरकार के ही प्राश्रित रहते हैं। प्रार का कम ध्यान दिया जाता है। ऐमी शिक्षा के प्रभाव से ही भावो शासका और जनता के बीच एक दीवार खड़ी हो गयी है।' जागीरदारो के लिये लिखा था, 'वे निरकुश होकर अपनी प्रजा पर अत्याचार करने मे कभी कर्मचारियों के विषय मे बतलाया कि 'अधिकाश राज्यो मे घूसखोरी अमेरशाहो, पक्षपान आदि का दवदवा है।' किसानो से उन्हे पूरी सहानुभूति थी, क्योकि "व किसान पीढियो से सख्न वेगार, पचासो अजीबो गरीब लागो (कर), भारी लगान और मनमाने राजनैतिक जुल्मो को चक्की में पिसते जा रहे हैं। अछूत जातियो पर होने वाले अत्याचारो को देख कर लिखा था, 'इन हरिजनो को दशा रियासतों में धडी शोचनीय है। जो मामाजिक अत्याचार इन पर होते है उनका वणन यह नही किया जाये तो उचित ही होगा। इतना लिखना जरूरी है कि इतनी बड़ी सध्या के लोगो को और किसी भी राज्य का ध्यान नहीं गया है।' स्पष्ट है कि लेखक ने राज्य सेवा से रहने भी मामान्य जनता को वास्तविक स्थिति बतलाने म कोई सकोच नहीं किया है। उन्होने इतिहास बात सुखाय लिखा, पिसी राजा के आदेश या ईशारे से नहीं लिखा, उनका उद्देश्य एक ऐमा ग्रन्य जनता की सेवा में रखने का रहा है कि इसमें कोई ऐसी बात छूटने न पाये जा इतिहाम, भुगाल अथवा सामाजिक विषय से सम्बन्ध रखती हो। बनाने हेतु इसको भाषा सरल व सुबोध रखी है और इतिहास की घटनाएं ऐसी गली से दी गई है जो सब के लिए शिक्षाप्रद व रोचक हो। यदि इससे योग्यतर इतिहासवेतानो मे जागृति हुई तो हम अपना परिश्रम सफा गमझगे। निसदेह हम इसे मागणपूण इतिहास विसी रूप में नहीं कह सकते है और न यह पूज्य सोझाजी महाराज के स्मारय प्रथ का मुकाबला कर सकता है पर तु यद्यपि पदमी ससार को प्रकाश देता है और उगका उजाला दीपक से अधिन होता है तथापि उससे घर के दीपकमा महत्व कम नही होना क्योकि घर यो सर चीजें देखने के लिए दीपक ही वाम पाता है। इसी प्रकार हमारा यह इतिहास भी राजम्यान वे इतिहास प्रमियो यो दीपक का काम देगा।' ( राजपूताना क इतिहास भाग प्रथम, भूमिका 30-31 ) इस उद्देश्य की पूर्ति म उन्होने इतिहास प्रथ लिसे। नागरी मापारिणी पत्रिका काशी ने इनो अथ राजपूताना वी इतिहास को रामालाधना परने लिया था, 'अभी तक हमारेदेश के विभिन्न विद्वान इतिहास लेसको से समूचे अथ को सव माधारण व लिये उपयोगी [ 47 ] राजपूताने का कोई प्रमाणिक इतिहास प्रकाशित नहीं किया था। श्री गहलोत ने इम कमी को पूरा करने का उद्योग करके राजपूताना के निवासियो तथा इतिहास प्रेमी जनता का बडा उपकार किया है। वम्बई के बाम्बे क्रान्तिकल पन ने तब विचार प्रकट किये कि "उन्होने हिन्दी मे राजपूताना का इतिहास लिखा है जिसने उनकी रूपाति मे चार चाद और लगा दिये हैं और जिसकी देश व विदेश के प्रख्यात विद्वानो ने मुवतिकठ से प्रशसा की है। श्री जगदीश सिंह गहलोत को किसी राज्य से किसी प्रकार का सरक्षण नहीं मिला। एक माधारण किसान परिवार का होने से उनकी आर्थिक स्थिति भी अच्छी नही थी फिर भी अपने अध्ययन हेतु अपार इतिहास सामग्री एकत्रित की। दजनो ख्यातो, प्रशस्तियो, वनिकायो, बहियो व अप्राप्य ग्रथो की प्रतिलिपिया उहोने म्वय तैयार की या करवाई। वीर विनोद' तारीख तुडफए राजपूताना वका- यिग्र राजपूतानाह, आदि की प्रतिलिपिया आज भी उनके संग्रह मे उपलब्ध है। उन्हाने सकडो चित्रो का सग्रह किया था तथा अपने स्वगवास तक 1146 कॉपर ब्लाक तैयार करवाये थे। गनिज पुस्तकालय मे 2738 इतिहास अथ छोड गये । वह पत्र लिखने के बडे प्रेमी थे। तत्कालीन सभी इतिहासकारो व लेखको डॉ गोरी शकर हीराचन्द ओझा, डा पी के गोडे, डा राधाकुमुद मुकर्जी, श्री हरविलास शारदा, डा सूयकात, श्री सूयकरण पारीख, श्री नरोत्तम स्वामी, श्री हरिनारायण पुरोहित, डा वासुदेव अग्रवाल आदि उनके अभिन्न मित्रो मे थे और उनसे बरावर पन व्यवहार करते रहते थे । यह आश्चय है कि सचिवालय मे टाइपिस्ट (अग्रेजी) का काम करते रहने के बाद के समय इतना काम कैसे करते थे। शायद इसी कारण वह इतना लिखने के बाद भी अर्थाभाव के कारण उनका प्रकाशन लही करा सके। भारत सरकार के महानिदेशक ने उसकी इतिहास के प्रति रूचि देखकर उन्हे 1941 मे अहीछाना (उत्तर प्रदेश) में उत्खनन का प्रशिक्षण दिया था तथा 27 मार्च 1941 को जोधपुर सरकार को लिखा था, 'श्री गहलोत ने उत्खनन के आधुनिक तरीके सीखने में सभी अवसरो का उपयोग किया है और इस प्रकार प्राचीन भारतीय इतिहास व पुरातत्व के ज्ञान की वृद्धि की है। मुझे विश्वास है कि जोधपुर रियासत उनकी सेवाओं का उपयोग करेगी।" जोधपुर रियासत ने फिर भी उहे टाईपिस्ट ही बने रहने दिया। मन् 1951 मे जब राजस्थान के संग्रहालय एथ पुरातत्व विभाग के कमचारियो का चयन हुआ तव उनका 1927 से की गई सेवाओ को आका गया और उहे वरिष्ठतम संग्रहालयाध्यक्ष (क्युरेटर) का पद दिया गया और बाद मे वह जोधपुर-बीकानेर डिवीजन के अधीक्षक पद से सेवा- निवृत हुए। श्री गहलोत का सचिवालय के टाईपिस्ट पद से पुरा विभाग में जाना विभाग वालो को बहुत अखरा । वहा वह परदेशी समझे गये और उस समय (1951) से जो सघप उन्हे विभागाध्यक्ष से करना पड़ा, वह। अब 48 - लिखना व्यर्थ है। उनके स्वर्गवास (1958) के दो वर्ष बाद, उनके उतराधिकारियों को उनकी नेचएटी, प्रावधायी निधि आदि को रकम मिली। यदि वह रकम उर्ने अपने जीवल काल में मिल जाती तो सभव था कि राजपूनाने के इतिहास के शाप 1500 पृष्ठ भी छप कर प्रकाशित हो जाते। अस्तु सन् 1951 से 1958 तक वह अपना कोई ग्रन्थ प्रकाशित नहीं करा सके। श्री जगदीशसिंह गहलोत का यह दुर्भाग्य था। उनकी जीवनकाल की अतिम कृति (1948) राजस्थान का दिग्दशन' थी जिसमें राजस्थान की समस्त रियासतो का सक्षेप मे सचिन विवरण था। उसमे राजस्थान के स्वतनता आन्दोलनो का विवरण भी था। उन्होने 1949 से 1958 के बीच के वर्षों में अपने ग्रन्थो को सशोधित व परिवद्धित अवश्य कर दिया। उनके स्वर्गवास के बाद उनमे से कुछ अथ प्रकाशित भी हो गये है और कुछ प्रकाशनाधीन हैं । प्रकार नाधीन में मुख्य राजपूताने का इतिहाम (चौथा व पाचवा भाग) तथा 'इतिहास सहायक तिथि पत्रक (वि स 1501 से 1701 तथा 1901-2000 वि सवत) है । पजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा सूर्यकात ने उनके लिये उचित ही लिखा था 'जन्म से राजस्थानी होने से उनके लिये राजस्थान के इतिहास में अध्ययन व शार करने से बढकर और कोई विषय हो ही नही सक्ता था।" ।
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[ 50 ] से कम एक लाख वर्ष ई पूर्व तक का अनुमान दिया जा सकता है। इस युग को प्रागैतिहासिक कहा जाता है। प्रागितिहाम (प्राकइतिहाम) शब्द का प्रयोग, मानव के उस प्रादि काल के इतिहास के ओथं में किया जाता है, जव मानव ने अपनी पाशविक वृतियो का परित्याग किया और सभ्यता के क्षेत्र मे पदापण किया । प्रागितिहास जानने के लिये पुरातत्व पर निर्भर रहना पडता है। इसके लिए तत्कालीन प्रयुक्त पापाण-उपकरणो, मृद्भाडो, जीवाश्मो, नर ककाला प्रादि का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। इसके वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भूविज्ञान, जीवाश्म विज्ञान, नृविज्ञान तथा रसायन विज्ञान विषयक प्रविधियो प्रादि पर निभर रहना पडता है। उपरोक्त विधि से अध्ययन करने से पता चला है कि राजस्थान का इतिहास लाखो वर्ष पूर्व से सम्बन्धित है । यहा का दक्षिण-पूर्वी भाग, न केवल भारत बल्कि ससार का प्राचीनतम क्षेत्र है जैसा कि यहा की चट्टानो से ज्ञात होता है । यहा का पश्चिमी व उत्तर-पूर्वी भाग इतना प्राचीन नहीं है। पश्चिमी राजस्थान तो उत्तर-पूर्वी भाग से भी वाद का है। वह अशत समुद्र के गर्भ मे था जैसा की इस क्षेत्र के जीवाश्मो से प्रमाणित होता है। इस बाल में मध्यप्रदेश से पजाव को जाने के लिये समुद्री रास्ता नमदा घाटो वच्छ होकर था। राजस्थान की अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन व ऊँची पवतमाला थी। यह निश्चित नही है कि पश्चिमी राजस्थान क्षेत्र से समुद्र कब हटा लेकिन इमको हटने मे हजारो वर्ष लगे होगे। समुद्र के हटने पर वहा पर कई बडी बडी झोले रह गई जो काफी समय बाद सूखी। इसी कारण से यहा नमक व खड्डी के काफी भडार हैं । राजस्थान मे हजारो वर्षों तक पहाडो से बहकर आने वाली नदिया अपने साथ रेत और मिट्टी लाकर यहा मदान बनाती रही और उही के फलस्वरूप यहा उपजाऊ मैदान बन गये। लगभग एक लाख वर्ष पूर्व हमारा कोई पूर्वज यहा के जगली जानवरो की भाति यहा के किसी जगल मे पाया। वह जगली जानवरो की भौति ही नगा रहता था और जगली कन्दमूल खाकर अपना पेट भरता था । जगली जानवरो के बीच उसका रहना उसके लिए सुखद नही था । हिंसक जानवरो से वह लुक छिपकर पेडो पर या क दराप्रो रहता था। अपनी रक्षा के उपाय वह दिनरात सोचता रहता था। इसी के फलस्वरूप वह कठोर पत्थर से भद्दे और भोडे हथियार और औजार बना पाया । इनसे वह न केवल हिंसक पशुप्रो से अपना वचाव कर सका वल्कि शिकार भी करने लगा। शिकार से मारे गये पशुओ से अपना पेट भरने लगा। राजस्थान की प्रागतिहासिक सस्कृति को जानने लिये यहा के विभिन्न स्थलो की वैज्ञानिक आधार पर पिछले 40 वर्षों मे उत्खनन किया गया। इन स्थलों से [ 51 ] । प्राप्त उपकरणो के आधार पर पुरातत्ववेतानो ने मानव द्वारा बनाये जाने वाले पापारण उपकरणो के उस काल को पुरापापण काल नाम दिया है। यह वह पाषाणकालीन प्रारम्भिक अवस्था है जिसमे मानव ने पापाण उपकरण बनाने प्रारभ कर दिये थे। इसका वर्गीकरण निम्न प्रकार से है. प्रारम्भिक जापाण काल इसका समय लगभग एक लाख वर्ष पूर्व से पिछले 50 हजार वर्ष तक का माना जाता है। इस काल मे मानव हैण्ड एक्स (हस्त कुठार), क्लीवर (विदारणी) तथा चोपर (गडासा) आदि का प्रयोग करता था। हस्त कुठार 10 से 20 से मी लम्बा नोकेदार, एक और गोल और चौडा तथा दूसरी और नुकीली तथा तेज किनारे वाला होता था और कद मूल खोदने, पशु को काटने और खाल उतारने के काम लिया जाता था। क्लीवर (विदारणी) एक आयताकार 10 से मी से 20 से मी तक लम्बा और 5 से घी से 10 से मी तक चौडा औजार होता था जिसका एक किनारा कुल्हाडी की भाति सीधा और तेज धारदार तथा दूसरा गोल, सीधा और त्रिकोण होती थी। चॉपर (गडासा) गोल होता था जिसके एक और अर्द्ध चन्द्राकार धार होती थी। इसका दूसरा किनारा गोल और मोटा तथा हाथ मे पकडने के लिए हत्या होता था। इस सस्कृति के प्रमाण अजमेर अतवर, चितौड, जयपुर, जालोर, नागोर, झालावाड, टोक, पाली, भीलवाडा आदि जिलो की नदियो के किनारी पर मिले उपकरणो से प्राप्त हुए हैं । चम्बल और बनास नदियो व उसकी सहायक नदियो -वेडच, गम्भिरी, बागा आदि के किनारो पर भी प्रागैतिहासिक उपकरण बहुत संख्या में मिले है। पैराट मे कुछ प्राकृतिक गुफापो तथा शैलाश्रयो मे प्रारम्भिक पापाण काल से लेकर मध्य पाषाण काल (दस हजार वप पूर्व) तक की सामग्री मिली है। भरतपुर जिला के दर नामक स्थान से मानवाकृति, व्याघ्र, बारहसिंघा, सूकर आदि से चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं । अधिकाश शैलाश्रयो का मुह दक्षिण- पूर्व की ओर होता था'। इनको दीवारो व छतो पर, अवकाश के समय मानव अपने मनोरजन हेतु तथा यादगार हेतु अनेक चित्र अकित करता रहता था। के विपय प्रमुखतया शिकारवृत्ति से सम्बन्धित हैं। शैलचित्र मुख्यत दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में चम्बल, पावती, परवन आदि नदियो के किनारो के शेलो मे मिले है। ऐसे स्थान हैं- कोटा जिले में कपीलवारा, मोरसन, दर्रा, क यादेह, कालाजी की कुई, चटनेश्वर, कोटा नगर मे जवाहर बधा, भलवाड़ा जिले मे माण्डल वन्धा, चित्तौडगढ जिला मे चामली नाला, चित्तौडगढ दुर्ग के पास को पहाडी, अजमेर में आना सागर के पाम की पहाडी सवाई माधोपुर मे अमरेश्वर व शोलेश्वर, झाला- वाड जिले मे वागोट के पास अमझारी माला व भावू पवत । इन शैलचिनो मे लाल, पोले, हरे प्रादि रगो का प्रयोग हुअा है। इस समय तक - इन चित्रो मानव यायावर था।
[1 52 ] भरता था। जगली कद मूल, फल, हरिण, शूकर, भेड बकरी आदि खाकर ही अपना पेट इस काल के उपकरण वेडच क्षेत्र की नदियो के अलावा, गम्भिरी, वागाँ, व कादमाली से मिले हैं। बेडच नदी क्षेत्र के स्थल डोरोली, करणपुर, धीमडा, सरजना, बल्लभनगर गाडरीयावास, तुकरावा, धनेट व नगरी से 161, गम्भिरी नदी क्षेत्र से 242 उपकरण बागा नदी क्षेत्र के गाव हाजी खेडी, भूटीया, ब्यावर व चम्पाखेडी से 118 कादमाली नदी क्षेत्र के निम्बाहेडा के पुल के पास 38 उपकरण मिले है। सभी उपकरण पत्थर के है और इनमे कोड कुठार, गडासे विदारणिया हस्त कुल्हाडे, शल्क आदि मुख्य है । मध्यकालीन पाषाण काल-यह युग प्रारम्भिक (पुरा) पापाण काल और नवपाषाण काल के बीच की कडी माना जाता है। इस युग का प्रारम्भ 50000 वर्ष पूर्व के आसपास का माना जाता है । इस काल के उपकरण वागा नदी व कादमाली घाटी क्षेत्र मे मिले है। वागा क्षेत्र के स्थल हाजी खेडी, भूटिया, ब्यावर, व चम्पावेडी है जहा से क्राड शल्क, खुरचनिया व हस्त कुहाडे मिले है । बेड च क्षेत्र में इस काल के नाममात्र के उपकरण मिले है। गम्भिरी नदी क्षेत्र में ऐसे कोई उपकरण नहीं मिले हैं। डा वी एन मिथा द्वारा किये गये सर्वेक्षणो से यह सिद्ध हो गया है कि कम से कम 30 से 40 हजार वर्ष पूव लूणी नदी क्षेत्र मे मानव रहता था तथा इस नदी मे काफी पानी बहता था। क्योकि तब यहा की आबहवा काफी नम थी। तव वर्षा भी ज्यादा तथा नियमित रूप से होती थी। शेखावाटी व गगानगर का क्षेत्र भी तब तक काफी हराभरा था। प्रारम्भिक पाषाणकाल व मध्यपाषाण काल के उपकरणो मुख्यत हस्त कुल्हाडी, क्रोडा के अनुपात मे व शल्को की बनावट मे काफी विभिन्नता है। नवपाषाण युग-नवपाषाण युग का प्रारम्भ लगभग 10,000 ई, पूर्व माना जाता है। इस काल मे कृषि, पशुपालन, धुमक्कड वृत्ति के स्थान पर स्थायी निवास के साथ साथ वतन बनाने के लिए चाक का प्रयोग होने लगा। अब वह पशुप्रो के वालो और पौधो के रेशे के वस्त्र पहनने लगा था। घास, पूस, मिट्टी तथा वृक्षो को शाखाग्रो की सहायता से रहने को झोपडिया बनाना सीख लिया था। इस काल के अपषित पाषाण उपकरण तथा कुछ अस्थि उपकरण भी मिले हैं। इस पाल की वेडच नदी घाटी के 26 स्थलो मे 2912 हस्तकृतिया मिली हैं। इन उपकरणो मे काम पाने वालो मुख्य सामग्री घट की 4447 प्रतिशत व विल्लोर की 36 53 प्रतिशत है। घटं कई रंगो का है जिनमे मुख्य हल्का पीला, गहरा भूरा व पापलेट भूरा है। विल्लोर पाक्लेट भूरे रग का है। हस्तकृतियो मे मुख्यत फ्लप व घल्य हैं। राजस्थान के मरूस्थल में पापाण काल के उपकरण मिले हैं। जायत (जिला नागौर) एक बहुत ही समृद्ध स्थल था जहा से कई उपकरण मिले हैं । यहा [ 53 ] की भूमि के परीक्षण से ज्ञात हुआ है कि यहा नदी बहती थी जिसकी धारा काफी तेज थी। यहा का जलवायु तब नम था जैसाकि चिकनी खडीया की वनावट से ज्ञात होता है। जायल से 60 कि मी पूध मे स्थित डीडवाना मे भी इस क ल के उपकरण मिले हैं। प्रतिनूतनकाल के उत्तर्गद्ध मे झोल का पानी बहुत ही खारा था लेकिन नूतन काल (ई पूर्व 10000 से ई पूर्व 3000) मे भील मे मीठा पानी भरा हुआ था। यहा के प्रारम्भि काल के उपकरण चिकनी मिट्टी मे गडे मिले है। ये बहुत ही अच्छी दशा मे मिले है। ये अधिकाश बिल्लोर या स्फटिक के बने है यह पत्थर डीडवाना क्षेत्र की पहाडियो से मिलता है। डीडवाना के उपकरण अधिकाशत बहुफलकीय है। कुछ हस्त कुडार, गडासे और खुरचनिया मिली है। ये उपकरण प्रारम्भिक पाषाण काल के हैं जबकि जायल के उपकरण वाद के प्रतीत होते है। पश्चिमी राजस्थान का विस्तृत रजयुक्त प्रदेश कई मीलो तक फैला है तथापि लूनी सरिता शुष्क उत्तर प्रदेश अपने गर्भ मे बालू के तले खाद, जमी हुई मिट्टी और वजरीकत -ककर, चूर्ण धारण किये हुए है-यह मृच्छलिका पर आश्रित है। यह पत्थर कई परतो मे होने के कारण सहज मे हट जाता है। प्रागतिहासिक युग मे लूनी नदी इस भू भाग की जल प्रदान करती रही होगी जिस कारण वहा हरे जगल होगे । खाद्य सामग्री-मात्र सग्रह की अवस्था मे आदिमानव ने इन वनवीथियो मे भ्रमण करते हुए चकमक प्रस्तर के अश्मीपकरणो द्वारा जीवन निर्वाह किया होगा। . पुरातन मानव के प्रयुक्त अश्मीपकरण राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग मे भी मिलते हैं। इनका आकार छोटा है । ऐसे औजार प्राय धारदार एव नुकीले होते है। इस अपरपाषाण युग मे मानव प्रारम्भिक पापाण युग से भिन प्रकार के उपकरण प्रयोग मे लाया। इससे अनुमान होता है कि इस युग मे दक्षिण-पूर्व एव पश्चिमी राजस्थान के मानव की अावश्यक्ता प्रारभिक पापारण से भिन्न प्रकार की थी। ये पाषाणस्त्र बहुधा उन पशुप्रो को काटने, उनका चमडा छीलने एव उनमे छेद करने के काम आते थे जिनको मानव शिकार करके लाता था। ये पापाणास्त्र जीवन-सुरक्षा हेतु शस्त्र का काम भी देते थे। मालो और वाणागो के दोनो और की तेजधार को देखकर यह मत पुष्ट होता है। इस प्रकार के अश्मोपकरण सहस्त्रो को सख्या में पूर्वी, दक्षिण-पूर्वी तथा पश्चिमी राजस्थान मे उपलब्ध हुये है। प्राद्यैतिहासिक काल बागोर-यह भीलवाडा जिला मे एक कस्वा है जो भीलवाडा नगर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर कोठारी नदी के किनारे पर बसा हुआ हैं । यहा 1967 से 1970 के वीच उत्खनन कार्य हुआ था और तवं यहा काफी मात्रा में आयेतिहासिक महत्व को सामग्री मिली थी।
[ 54 ] सवप्रथम यहा पर 167 मीटर गहरी 3x2 मीटर भूमि पर खुदाई करके भावी काय की स्मरेवा निर्धारित की गई थी। तदनन्तर 20x8 मीटर क्षेत्रम काय बड़े पैमाने पर प्रारम्भ किया गया था। मागे के वर्षों में 20x6 मीटर व 20 x 10 मीटर क्षेत्रो में युदाई कार्य सम्पन्न किया गया था व खुदाई के आधार पर यहा आदि मानव को सभ्यता के तीन विभिन्न युग प्रस्तुत हुये। सबसे नीचे की परतो से लघु पापणास्त्र तथा मृत पशुओं के प्रयोष ही प्रकारा मे पारे । इमसे यह सिद्ध हुआ कि प्रादिमानव इम युग में भोजन संग्रह को अवस्था में था और भोजन उत्पादन करना नहीं जानता था। वह प्राखेट एवं कन्दमूल एकत्र पर अपना जीवन निर्वाह करता था। इतना होते हुए उस समय या मानव पत्थर के योग से पटी भूमि पर रहा करता था। मृत शरीर का ढाचा जो वहा से प्राप्त हुआ वह पश्चिम-पूर्व दिशा मे लेटा मिला। इससे अनुमान लगाया जाता है कि आदि मानव उस समय मरणोपराल जलाया नहीं जाता था परन् अपने घर में ही दफनाया जाता था और दफनाते समय उसे वे उत्तर-दक्षिण न लिटार पश्चिम पूर्व लिटाते थे। रेडियो कावन विधि से इस स्तर को ईसा पूर्व 4450, 385.4 3285 तक का बताया गया है। इस स्तर में मिट्टी का ढेर 50 से लेकर 30 से मी का है। दूसरे स्तर में 30 से 50 से भी मिट्टी का ढेर खोद गया। इस स्तर से लघु पापाणास्त्र तथा पशु अवशेष कम होने प्रारम्भ हुए और तामास्त्र तया मृद्भाण्ड प्रकाश मे पाने प्रारम्भ हुये। यहा के मृदभाण्ड हाथ के बने है तथा उन पर कुरेदी हुई रेखाये हैं। मानव के मृत शरीर पूर्व-पश्चिम दिशा में लेटे मिले है। मृत शरीर के साथ पर्याप्त संख्या मे मृदभाण्डो के अवशेष, धातु अस्त्र, प्राभूषण तथा भोजन सामग्री भी प्राप्त हुई। इस युग मे मानव समाज की सुविधाओं का उपभोग करता होगा, ऐसा प्राभास अवशेषो से प्राप्त होता है । यद्यपि इस युग के लोग भी प्रस्तर के उपकरण बनाते थे और पशुओ का शिकार एवं कन्दमूल फल एकत्र किमा करते थे पर वे मिट्टी के बतन भी बनाने लग गये थे। वे ताम्रोपकरण के प्रयोग के साथ साथ सम्भवत कृषि व पशुपालन के आधार पर भोजनोत्पादन भी करते लग गये थे। प्राप्त अवशेषा के प्राधार पर वे अपने पूर्वजो के समान अपने शवो का घरो में ही पूर्व-पश्चिम दिशा मे गाडते थे। तथा उनके साथ काफी बर्तन खाद्य पदाथ व उपकरण रखते थे। दो रेडियो कावन तिथियां इस स्तर के अवशेषा के परीक्षण के आधार पर मिली है और वे ईसा पूर्व 2765 और 500 के बीच की है । तीसरा युग स्तर विभाजन के अाधार पर बागोर के टोले के मध्य मे 35 से 75 मिट्टी के टीलो की खुदाई से ज्ञान हुया। इसका समय सम्भवत ईसा पूर्व 500 से लेकर ईसा सन् को चौथी शदी तक का है। इस स्तर से जो भी लाहाल प्राप्त हुए तथा मृदभाण्ड मिले वे हाथ के बने न [ 55 ] . होकर कुम्हार के चाक द्वारा बने है। चाक पर बो बर्तन अच्छी तरह पके होने के साथ साथ हल्के तथा सुदृढ़ हैं। उन पर प्राय चिकनी मिट्टी का लेप नहीं है। रग द्वारा उन पर कोई चित्रकारी नहीं है पर कही कही रेखाये खोचकर अथवा मिट्टी द्वारा अलकरण किया गया है। इस काल के पात्रो मे हमे खम्भाकार हाडिया, चौडे भु ह एव चपटी पैन्दी वाले प्याले, सकरे मुह वाले गोल धडे तथा भिन्न प्रकार के शरावक प्राप्त हुये है। यहा से 7 लोहे के उपकरण मिले है जिनमे दो बाणान विशेष महत्व के है। मनुष्य द्वारा लोहे का ज्ञान प्राप्त कर लेने के कारण समाज मै पत्थर के उपकरण का उपयोग बहुत कम हो गया था। इसी प्रकार अर्थ व्यवस्था में मनुष्य द्वारा भोजन उत्पादन स्वय कर लेने की क्षमता ने मानर को मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग सिखा दिया। पत्थर के जो भी उपकरण मानव ने इस युग मे बनाये वे लघु थे तथा कई प्रकार के के कारण बागोर स्थान के लघु पापारगोपकरण उद्योग का एक अत्यन्त विकसित केन्द्र होने का साक्षी है। ऐसे उपकरण यहां से लाखो की संख्या में प्राप्त किये गये है। ये उपकरण मुख्यतया चर्ट एव स्फटिक के बने है। तथा बडी कुशलता से बनाये गये थे । बहुत बडी सख्या मे लयुपापारणास्त्रो की यहा से प्राप्ति इस बात का द्योतक है कि मानव यहा अन्य क्षेत्रो की तरह आवेट के लिये माया था व अपनी आवश्यक्ता के उपकरण बनाता तथा अनावश्यक सामग्री वहा पर छोड कर चला गया। ऐसा उसने मेवाड के कई स्थानो पर किया। आभूषणो मे शीशे, हड्डी व पत्थर की मणिया मिली। आवास गृहो मे पत्थगे के साथ ईटो का प्रयोग होता था ऐसे अवशेष प्राप्त हुये है। मृत शरीर इस युग मे पूर्व-पश्चिम में स्थान पाकर + उत्तर-दक्षिण दिशा मे स्थान पाने लगा। कावन तिथिया जो भी इस स्तर की ज्ञात हुई हैं वे एक बडे युग की सस्कृति को साक्षी है। वह युग जैसा कि लिखा गया है ईसा कि प्रारम्भिक शतियो तक यहा पर निवास करने वाले मानव के काय कलापो की और इगित करता है। बागोर से प्राप्त पाषाण उपकरणो को लघुपाषाणोपकरण कहते है क्योकि प्राचीन पाषाणकालीन उपकरणो की तुलना मे ये उपकरण अत्यत छोटे आकार के है। इनको लम्बाई सामान्यत एक सेन्टीमीटर से लेकर चार सेन्टीमीटर तक है। इन उपकरणो मे कई एक ज्यामितीय आकृति के है जो मुख्यतया आखेट के काम आते थे। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि यहा का जीवन मुख्यतया पाखेट पर निभर था। ये उपकरण प्रचुरमात्रा मे घरो मे ही मिले है अत यह निश्चित है कि प्रत्येक परिवार अपनी आवश्यक्ता के उपकरण स्वय बनाता था । वागोर उत्तर पाषाणकालीन सस्कृति का एक मात्र निवास स्थल नहीं है । बागोर से कुछ किलोमीटर पूर्व की ओर कोठारी नदी के ही किनारे सूरना का खेडा नामक गाव के पास ऐसा दूसरा स्थल तथा लगभग 60 ऐसे और स्थान मिले - 1 -- - . - [ 56 ] . है जो उत्तर पापाण कालीन सस्कृति के प्रौद्योगिक स्थान थे। ये स्थान उदयपुर, चित्तौडगढ, भीलवाडा, अजमेर, टोक, झालावाड, कोटा आदि जिलो मे फैले हुए हैं। इस सस्कृति के निर्माता आज के भीलो के पूर्वज होगे यह अनुमान किया जा सकता है। गणेश्वर-यह स्थान नीम के थाना (जयपुर जिला) से 15 किमी दूर तथा जयपुर से लगभग 150 कि मी दूर है । यहा की सस्कृत पाठशाला के उत्तर मे टीलो से ताम्रयुगीन लगभग 2000 उपकरण-कुल्हाडे आदि मिले है। ऐसे कुल्हाडे अव तक भारत मे कही भी प्राप्त नही हुये है । यहा कई गैरिक मृद्भाण्ड भी मिले हैं। ताम्र उपकरणो मे तीर, बाणान, चूडिया, छल्ले, वल्लम, दड, फलक, काटे, छैनिया, मणके आदि मिले है। भारत में पहली बार इतनी बडी संख्या मे प्रागैतिहासिक काल के उपकरण, गैरिक मृद्भाण्डो के साथ, यही मिले है। ऐसे वारणान, काटे, पत्तियां आदि प्राय सिन्धु क्षेत्र के स्थलो से प्राप्त हुई हैं। यहा से प्राप्त अधिकाश वाणाग्र विभिन्न स्वरूप के है। ये पाच से साढे है छ से मी तक के है। यह लकडी के डरे मे लगाए जाते थे तथा शिकार करने के काम पाते थे। कुछ वारणाग्र घुमावदार है जो पक्षियो के झड का शिकार करने मे प्रयोग किये जाते होगे । किसी वारणान मे छेद नही है जैसा कि बागौर के वागाग्रो मे मिलता है। यहा सूक्ष्म पापाण उपकरण भी मिले है। जिससे ज्ञात होता है कि यहा के लोग तब तक पशुप्रो के शिकार से ही पेट भरते थे। सभवत पडोस की खेतडी आदि की ताम्र खानो से ताम्र का उपयोग करने लग गये थे। यहा से कई भालो के पतले पलक मिले हैं । लगभग 50 मछली पकडने से काटे भी मिले हैं । गणेशवर से 60 फरसे भी मिले है जो लगभग एक किलो वजन के है, इन पर एक से छ तक बिन्दुओ मे पहचान के निशान बने हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि गगेश्वर से निकलने वाली काटली नदी नोहर, सोथी व भादरा के पास दृप्दवती नदी से मिलती थी । गणेश्वर से 60 कि मी दूर खेतडी की खानो से ही ताम्र निकलता था और लगभग 2700 ई पूर्व मे यहा के लोग ताम्र उपकरण बनाने मे सिद्धहस्त हो गये थे। इन ताम्र उपकरणो मे 47 % शुद्ध ताबा है। ये उपकरण हडप्पा की ओर से आये लोगो के नहीं थे। वास्तविकता यह है कि यहा के लोगो द्वारा उधर को सभवत इन उपकरणो का अन्यन निर्यात किया जाता था। ये उप- करण प किस्तान, पजाब व हरियाणा क्षेत्रो मे भेजे गये थे जहा से वे अब उत्खनन से प्राप्त हुये है। राजस्थान के अय भागो मे भी यही से ताम्र उपकरण भेजे गये थे। खुराडा (तहसील परवतसर, जिला नागोर) मे सन् 1934 मे उत्खनन से प्राप्त 103 उपकरण [ 57 ] जो लगभग 2000 ई पूर्व के है, भी यही से गये प्रतीत होते है। इन उपकरणो मे से 10 अभी भी जोधपुर संग्रहालय मे देखे जा सकते है। यहाँ से मिले नालीदार प्याला ईरान से मिले प्याले के समान ही है। अत यहा से ताम्र वस्तुये विदेशो को भी भेजा जाना सिद्ध होता है। गणेश्वर व जोधपुरा (जिला जयपुर) से मिले गैरिक भाण्ड एक समान है । यो इन्हे लाल लेपवाले रेखाक्ति बतन, जा कालीवगा, सौथी, सीसवाल प्रादि के वतनो के समान है, ई पूर्व 2 00 से 1180 तक के माने जाते है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि ये प्रारम्भ मे ई पूर्व 2500 से 2200 के बीच वहा बाने लग गये थे सौर यहा के लोग तव उत्तर पूर्व की ओर गये तव वहा भी लेते गये। गरिक भाण्ड वाले लोग सिन्धु घाटी के पूर्व हडप्पा या हडप्पा युग के लोग नहीं थे बल्कि गणेश्वर खेतडी क्षेत्र के थे। वे ताम्र उपकरण सावी, काटली आदि नदियो के रास्ते से देश के पूर्वी व पश्चिमी भागो मे भेजते थे। इस प्रकार गणेश्वर के उत्खनन व खोज से पूर्व हडप्पा ताम्र कला की ई पूर्व 2800 मे विकसित होने का पता चलता है। इसे गणेश्वर-जोधपुरा सस्कृति कह सकते है। सभव है कि ऐसे और कई स्थल खेतडी क्षेत्र मे उत्खनन पर मिल जावे। जोवनुरा (जिला जयनुर)-पार्यों को सस्कृति का विस्तार राजस्थान मे और कहा हुअा यह देखने के लिये जयपुर से 98 किलोमीटर तथा बैराट से 15 किलोमीटर की दूरी पर जोधपुरा नामक स्थान पर राजस्थान पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई की गई। यहा पर गरिक रग के पात्र, टीले के सबसे नीचे स्तर से, जिनमे वैठकदार तश्तरिया मुरय है, अधिक्तम गडे मिले उनके साथ ही आकारहीन ताम्रखण्ड भी यहां से प्राप्त हुये है । साथ ही साथ यहा के तीसरे स्तर से चित्रित स्लेटी रग के पान भी मिले। इन पानो मे कटोरो तथा पानी पीने के पात्रो के अवशेषो के साथ-साथ तश्तरियो के भी अवशेप है। सलेटी रंग के पात्रो पर काली रेखाओ से चित्रण कही कही वहुन ही सु दर है और वे कलापूण भी है। इन पात्रो के साथ यहाँ से लोहे की बनी वस्तुओ की भी प्राप्ति हुई है। इस स्तर की उपलब्धिया, जो विशेषतया उत्लेखनीय है, वे बिना रगे काले और लाल पात्र, गेरू के रंग के पात्रो और चिनित सलेटी रग के पात्रो के युगो के बीच के युग के प्रतिनिधित्व करने वाले है। यहा के काले व लाल रंग के पानो मे विशेष तया उल्लेखनीय है तश्तरी व प्याले। यहा के पात्र नोह मे प्राप्त पात्रो के समान हैं। उनका स्वरुप पाहाड से प्राप्त काले व लाल पत्रो मे सवथा भिर है। इस स्तर से प्राप्त काले व लाल पात्र तथा काली चमक के पात्र पूरी तरह से पके है । । चित्रित मोटी पात्र अदर तथा बाहर को नाना प्रकार की क्ला के अधार पर इन पायो में [ 58 ] हस्तिनापुर तथा नोह से प्राप्त पात्रो से सहज मे ही होड करते है। मुर यतया तश्तरिया, प्याले व कटोरे हैं। जोधपुरा की विशेषता एक और भी है। काले व लाल पात्र इस स्तर से भी चित्रित स्लेटी पात्रो के साथ प्राप्त होते है। अन्य वस्तुग्रो में जो इस स्तर से प्राप्त हुये है- लोहे के अस्न, मृण्मय घटाकार मणके, हड्डी की तीले, हड्डी के बडे छेदवाले पदाथ तथा पत्थर के मणके। यहा के दो अय स्तरो से ऐतिहासिक कालीन सस्कृति की झाकी मिलती है। चौथे स्तर से सम्बधित युग के निवासी उत्तरी चमकदार पालिशवाले पात्रो के साथ साथ बिना चिकनाहट के लाल पात्रो का प्रयोग करते थे। उनके प्रयोग के पात्रो मे प्याले, कटोरे तथा धडे मुख्यतया उल्लेखनीय थे। महत्वपूर्ण पुरावशेपो मे जो इस स्तर से प्राप्त हुये हैं उनमें उल्लेखनीय लोहे के वने तीरो के अग्रभाग तथा लोहे की कीलें शख निर्मित चुडियो के टुकडे हाथ के बने कुबडे बैल की प्राकृतिये तथा पाषाण निर्मित मणके है। यहा के पाचवे अर्थात अतिम स्तर से शुग व कुपारणकालीन पात्रो की प्राप्ति हुई है । इससे सिद्ध है कि इस स्थान पर शुग व कुपारण काल मे आबादी थी। इस युग मे लाल रग के पान आज्वल की तरह चाक के द्वारा बनाये जाते थे। पात्र मध्यम आकार के होते थे पर वे पतले होते थे। पात्रो पर चिकनाहट की जाती थी। वे खुरदरे न होकर फिमलाहट को स्थान देते थे। साधारण प्राकार के पात्र जिनमे ढक्कनदार व विना ढर्कन के प्याले व कटोरे तथा टोटीदार छोटे छोटे पान सम्मिलित थे, यहा से प्राप्त हुये है। ऐसे पात्रो के टुकडे भी प्राप्त हुये हैं जिनपर निरत्न एव स्वास्तिक चि ह भी बने है। इस युग के महत्वपूर्ण पुरावशेषा मे लौहास्त्र, मृण्मय घटाकर मणके, पापाण के मणके और एक ताम्रमुद्रा उल्लेनीय है। यहां से लोह भट्टिया मिली है जो लोह उपकरण बनाने के काम आती थी। इन भट्ठियो मे उपलो का प्रयोग होता था। जोधपुरा मे मानव आवास के चिह्न फर्श और ईटो की दीवार के रूप मे मिले है। मकान की छतो पर खपरेलो का प्रयोग होता था। छप्पर छाने का भी रिवाज था। , यहाँ से मिली वस्तुप्रो से यहा का कालक्रम ई पूव 2500 से ई सन् 200 तक का ज्ञात होता है। कालीबगा-जहा तक पता चला है सिन्च, पजाव व राजस्थान की प्रारम्भिक सभ्यताये नगरीय सभ्यताये थी। सि व मे मोहनजोदडो, चहुदडो, अमरी, कोट डिजी, पजाब (पाकिस्तान) में हडप्पा, पजाब (भारत) मे रूपड, गुजरात मे रोजडी व देसलपुर की भाति राजस्थान पे गगानगर जिला के कार्लीबगा में भी उत्खनन में नगर का ही पता चला है। इसका उत्खनन व्रजवासी लाल व वी के थापड द्वारा सन् 1961 मे आठ वर्षो तक क्यिा गया।
[ 59 ] उत्तरी राजस्थान के इम श्रेत्र मे वैदिक सरस्वती एव दृपद्वती नदि कभी बहा करती थी। सरस्वती वैदिक काल मे बडी पवित्र नदी मानी जाती थी। यह नदी हिमालय की सिवालिक पहाडियो ने निकलती थी। अब यह नदी घग्घर कहलाती है । वर्षात के बाद यह हनुमानगढ, पीलीवगा, सूरतगढ़ व अनूपगढ,के धोरो के मैदानो मे सूखी रहती है। सर्वेक्षण के अाधार पर इस क्षन में कई हडप्पाकालीन स्थलो की खोज भी की गई थी। प्राचीन मरस्वती (जिसकी वतमान मे 'घग्घर' कहा जाता है) के दक्षिणी तट पर स्थित कालीवगा नामक स्थान पर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा विधिवत खुदाई की गई। कालीबगा हनुमानगढ नगर के पास है। उत्खनीत स्थल वर्तमान गाव से पौन किलोमीटर दूर है। घग्घर नदी प्राचीन काल मे यहा पर लगभग 5 मीटर गहरो बहती थी। अभी तो यह रेत से भरी दिखाई देती है। यहा पर किये गये उत्खनन द्वारा सिद्ध हुआ कि अनुमानत आज से 4000 वर्ष पूर्व एक अत्यत सभ्य मानव जाति यहा विकसित हुई । पालीवगा के उत्खनन से प्राप्त वस्तुप्रो मे नगर निर्माण योजना हेतु सुनिश्चित मेप का अनुसरण किया जाना प्रकाश में आया है। उस समय सडको व गलियो वा निर्माण उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर हुअा करता था। उस समय प्राय कच्चे इटो के मकान बनाये जाते थे। प्रत्येक घर के खुले चौक के अतिरिक्त चार या पाच वडे-बडे कमरे होते थे । काम मे आये हुए गन्दे पानी को बाहर निकालने के प्रबन्ध हेतु प.को ईटो को नालिया एव शोपण पान का प्रयोग होता था। इस युग की सभ्यता के प्राप्त अवशेषो मे सादे तथा रगीन मृतिका पान खण्ड शस्त्रो के मान-चिनित चपटे फल, ताम्बे के हथियार, ग्राभूषण, कडी मिट्टी की प्राकृतिया, पुरूपाकृति को स्थान देने वाले खिलौने तथा पत्थर के बाट के अतिरिक्त खडिया-मिट्टी की बनी ऐसी चिन्हित मुद्राये भी सम्मिलित है जिन पर आदश हडप्पा लिपि मे उपाख्यान (लेख) भी अक्ति है। दुर्भाग्यवश जो लिखा मिलता है है वह अभी तक पढा नहीं जा सका है । कही-कहीं पशु प्राकृति, विविध नाट् दृश्य, चिन्हित मोन पात्र व सक्डे पेंदे के जल पीने के प्याले, चिकनालाल पृष्ठ भूमि पर क ले रंग से त्रित्रित प्राकृतियुक्त मृद भणडावशेष चपटे गोस छेद वाले गुटके व कडी मिट्टी के बने खिलौने की गाडियो के नमूने, चपटी तथा गोल दोहरी उमरी हुई वडी. मिट्टी के चिमटिये तथा वमकीले पत्थर के लम्बे फत, जो वास्तव में हडप्पा की सभ्यता के प्रतीक है, इस प्राचीन स्थान से प्राप्त हुये है। कालीगा के दो टीलो में जहा पर खुनाई हुई - एक जो पूर्व मे है बहुत बडा और ऊचा था। दूमरा उमकी अपेक्षा पर्याप्त छोटा था। यद्यपि दोनो मे हडप्पा- कालोन सडके, भवन तथा नालियो के माथ साथ एक सुन्दर नगर-योजना के चिह .
[ 60 ] प्राप्त हुए है, पर पश्चिमी टोले की खुदाई के आधार पर एक बहुत बड़ा कच्ची मिट्टी का चबूतरा प्रकाश में आया है। इस चबूतरे से हडप्पा एव मोहन जोदडो से प्राप्त नगर की दीवार के अवशेष प्राप्त हुवे है । मोहनजोदडो और हडप्पा से हमे भवनो की निश्चित निर्माण विधि का पता नही चलता है पर कालीबगा से प्राप्त भवनो के अवशेषो से उस समय की स्थापत्य कला पर प्रकाश पडता है। कच्ची ईटो से बने भवन पर मिट्टी का लेप ऊपर से किया जाता था । इनकी भूमि पके मृण्मय उपलो से पाटो जाकर मिट्टी से लीपी जाती थी और मृण्मय उपलो मे लकडी व कोयलो का मेल होता था। ऐसे ढग से बनी भवनो की भूमि काफी दृढ होती थी। मृण्मय उपलो का प्रयोग सवत्र भवनो की भूमि सुदृढ बनाने में किया जाता था। कालीबंगा से भवनो की छतो के बनाने की विधि का भी अनुमान लगाया जा सकता है। यह हमे न मोहनजोदडो से पता चलता है न हडप्पा एव लोथल से ही किन्तु कालीवगा से हमे पता चलता है कि भवनो की छते लकडी की बल्लियो से पाटी जाती थी। इन बल्लियो को कच्ची मिट्टी से अच्छी प्रकार से दबा देते थे। छोटी वस्तुग्रो मे जो अवशेषो के रूप में कालीवगा से प्राप्त हुये है, एक मृणमय मानव सिर है जिसका मस्तक पीछे की और जाता हुआ है तथा जिसकी आखे अण्डाकार है तथा जिसकी नाक सीवी नोकदार है। उसके नीचे के होठ मोटे तथा उसकी छुड्डो सुदृढ़ है। ऐसी प्राकृति मोहनजोदडो से भी प्राप्त हुई है। पात्रो के कुछ टुकडो पर दाहिनी से वाई पोर लिखी जाने वाली, मिधु नदी की घाटी में निवास करने वालो के द्वारा प्रयोग करने वाली लिपी में लेख है। मिट्टी के पात्रो में गले के चारो ओर एक चौडा काला घेरा है और उसमे लगातार घेरो तथा सजावट के अन्य प्रकारो का समावेश है। पात्रो मे छोटे-बड़े कई प्रकार के गोलाकार पात्र मिले है । इनका किनारा उधर की ओर मुडा है। यहा पर जिस प्रकार के पार पाये गये है वे सिंध (पाकिस्तान) के कोटडीजी स्थान से भी प्राप्त हुए है। कोटडीजी की सभ्यता को विदवाना ने पूर्व हडप्पाकालीन माना है। कालोबगा मे की गई 1962-63 की खुदाई ने इस क्षेत्र मे हडप्पाकालीन सस्कृति से पूर्व की संस्कृति की विमानता को पुष्ट किया है। पाच भवन स्तर यहा से प्राप्त हुये है। छ प्रकार के मृदपात्र यहा से प्राप्त हुये है। जो निवामगृह प्रकाश मे पाये उनकी ईटो का आकार 30x20x10 से मीटर था। ये ईटें बडी कुशलता से जमाई गई थी ताकि मकान सुदृढ रहै। कच्ची मिट्टी की ईटो के साथ-माथ पक्की मिट्टी को ईटो का भी प्रयोग मिला है । खाना पकाने के लिए चल्हे विम प्रकार के प्रयोग होते थे यहा से ज्ञात हुआ है । चूल्हे और अगोठी को दीवारे कच्ची मिट्टी से पोती जाती थी और जिस और खुली होती थी उन पर दीवारें झुकी रहती थी। ईधन रखने के लिये घरहो और अगीठियो का मुस सुदर ढग से खुला रहता था। ये चूल्हे वतमान कालीन तदुरो के समान थे। तदुरोकी प्रथा पूर्वी राजस्थान - [ 61 ] मे नहीं थी। यह पश्चिमी एशिया मे सामान्य थी। इससे यहा के लोगो का ईरान व पश्चिमी एशिया से निकट सम्बध होने का पता चलता है। रेडियो कावन तिथि जा कालीवगा के ऊपरी स्तर से वैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर प्राप्त हुई है वह 4070 F115 बी पी +3980+115 वी पी है। अन्य परीक्षणो से भी यह ज्ञात होता है कि कालीवगा मे हडप्पा सस्कृति लगभग 200 वप रही और यह 2000 ई पू के प्रारम्भ मे समाप्त हो गई। पूर्व हडप्पाकालीन सस्कृति की प्राचीनता वैज्ञानिक ढग से अद्यावधि नही जानी जा सकी है। अवशेपो के आधार पर सभवत यह हडप्पाकालीन युग से 100 वर्ष पूर्व पनपी तथा अस्तित्व मे रही। स्टिवाइट पत्थर की ऐसी रेखाकि मुहरे भी यहा से प्राप्त हुई है जिन पर एक ओर पशु की प्राकृति बनी हुई है तथा दूसरी ओर बहुछिद्र धारी पिण्ड है। कुछ मृदपानो के टुकडो पर स्फुट लेख हैं। प्राप्त मुहरो मे से कुछ कच्ची मिट्टी की तथा कुछ पक्की मिट्टी की है। यहा से ऐसे मणके भी प्राप्त हुए हैं जो फायम कार्नीलियन तथा स्टियाइट के बने है। मृण्मय कलाकृतियो मे पशुप्रो तथा पक्षियो का भी अकन है । यहा से बहुत बडी संख्या मे चुडिया भी मिली है। ये चुडिया मिट्टी की तथा सीप की हैं। ताम्बे के प्रौजारो के साथ ही यहा से तोलने के बाट विभिन पकार के पत्थरो के मिले हैं। मिट्टी तथा चर्ट पत्थर के बने खेलने के गु भी यहा से प्राप्त हुए हैं। पुरातत्व विभाग ने कालीबगा मे पुरातात्विक अवशेषो के प्रदर्शन हेतु एक संग्रहालय अब स्थापित कर दिया है । इस प्रकार कालीवगा की सभ्यता सिधु सभ्यता के समान ही है लेकिन इसमे कुछ नई विशेषतायें मिलती है। प्रथम विशेषता यहा दो प्रकार के प्रावासगृह मिलना है-पश्चिम की ओर गढ का मिलना है जो पूर्ववर्ती हडप्पा पूर्व काल की बस्ती पर बना है। यह सयोग की बात है कि हडप्पा, मोहनजोदडो व कालीबगा मे गढ पूर्ववर्ती बस्तियो पर ही बने है। दूसरे प्रावामग्रह पूर्व की ओर है और निचती सतह पर है। गढ व निचली सतह के प्रावाम गृहो को घेरने वाली चार दिवारी कच्ची ईटो मे बनी है। इस चार दिवारी की पूर्व से पश्चिम की और जाने वाली 23 मीटर दीवार को खोला गया है। शहर की 5 उत्तर-दक्षिण व 3 पूर्व पश्चिम सडको तथा पूर्व-पश्चिम की कुछ गलियो को जाचा गया है। इससे स्पष्ट हो गया है कि यह नगर सुनियोजित ढग से बनाया गया था। मकान मालिको द्वारा सडको व गलियो में वतमान काल की भाति कोई अतिक्रमण नही दिखाई देता है । सडको व गलियो के मोडो पर गाडियो से मकानो को हानि पहुचाने से रोकने के लिये लकडी के पट्टे लगाये जाते थे। मकानो के वाहर चौरस चबुतरे बने थे ताकि मकान के बाहर बैठकर लोग गप्प सप्प कर सके या मजदूर विश्राम ले सके या उससे घोडे, ऊँट आदि पर चढ सके । मकानो का गन्दा पानी बाहर निकालने के लिए पकी ईटो को नालिया बनी [ 62 ] हुई थी - । इन नालियो का पानी गली में पुदे होदो में जाता था। प्रत्येष मकाा दो या तीन पोर पुना था जमा अव चण्डीगढ मे है। ज्यादातर मान नीन और खुले थे। मकाा चतुशाता पद्धति पर बने थे प्रत हग और प्रभास काफी प्राता था। मकानो के चौर में एक पोर तुरा भी होता था। शेष तीन ओर 6 या 7 कमरे बने होते थे। कई मकानो मे छनो पर जाने के लिये मिढिया भी बनी है। मकान की छते समतल थी। कालीवगा का गढ़ चौकोर है। यह दो वरावर भागा मे पटा है। इसके चारो पोर चार दिवारी की है। दीवार को चौडाई 3 में 7 मीटर है। इसकी सुन्ढता के लिये बुर्ज वो है। इनको बनाने के लिए 40x20x10 सेण्टीमीटर और 30x15x75 सेण्टीमीटर की ई टो का प्रयोग किया गया है। दक्षिणी किनारे पर 5,6 चबुतरे बने है जो ई टो से बने है । प्रत्येर चबुतरे पर चढने लिए सिदिये है। एक चबुतरे पर 1x1 25 मीटर का गोलाकार हवन कुण्ड है जिसमे कुछ हड्डिया मिली है। मम्भवत यहा पूजा स्थल हो। पाम मे ही एक कुप्रा व यज्ञवेदी है जिससे इसकी पुष्टी होती है। ऐसी ही यनवेदिया लोथल, अमरी, हडप्पा, मोहनजोदडो आदि में भी मिली है। कालीबंगा के लोग मासहारी व निगमिषाहारी थे। वे गेहूँ व बाजरा का प्रयोग करते हागे भले ही इनके अवशेष नहीं मिले है। पशुप्रा मे गाय, भैस, शूकर, बारासिंघा, हाथी, गधा, ऊंट आदि की हड्डिया मिली हैं। वे मृतको को गाडते थे। गढ के पश्चिम की ओर 300 मीटर चौकोर काह मिली है। मृतक का सिर उत्तर की ओर रसकर गाडा जाता था। मृतक के सिर के चारो ओर घडे, तस्तरिया, प्याले आदि रख दिये जाते थे। कुछ मृतको के पास गहने भी रख दिये जाते थे। एक बच्चे के मस्तिष्क की खोपडी पर छ गोत्र छेद भी मिले है। इससे यह ज्ञात होता है कि उसका क्पाल शल्य नम किया गया था। ऐसे क्पाल शल्य कम करने की प्रथा सभी देशो मे 3000 पूर्व प्रचलित थी। उत्तरी गुजरात मे लगनाज मे भी ऐसी सोपडी मिली है। स्पष्ट है कि गुजरात, सिध, पजाब आदि मे भी लगभग 5000 वप पूर्व कपाल शल्य क्म की प्रथा चालू थी। मोहनजोदडो की भाति यहा, लिंग, योनी, मातृशक्ति आदि की मूर्तिया नहीं मिली है अत यहा वह धार्मिक भावना नहीं थी। यहा के लोग कौन थे ? यह भी स्पष्ट नहीं है। क्या व वेदकालीन प्राय ये स्पष्ट उत्तर नही दिया जा सकता है जब तक कि मिन्धु लिपि को पढा नहीं जाता है यो सम्भवत वे ईरान से प्राये आर्य थे। उहोने ही यहा सरस्वती नदी के किनारे बस कर वेदों की रचना की होगी। यही इस क्षेत्र की महत्ता है। ।
- प्राहाड पाहाड उदयपुर नगर मे बनास नदी की एक शाखा आहाड नदी के किनारे वसा है। यहा के एक ऊंचे टीले, जिम स्थानीय लोग एलकोट कहते थे, का उत्खनन मार मी अग्रवाल ने कराया था। बाद मे वहा वी एन मिश्रा व एच डी साकलिया ने प्रागैतिहामिक युग मे दक्षिण पूर्वी राजस्थान मे बनास और चम्बल नदियो को घाटियो मे मास्कृतिक दशा को और अच्छी तरह जानने के लिये पाहाड (1954-1962) तथा गिनू ड (1929-60) मे बुगाई कराई। इसमे हमे पाहाड के अवशेष मृदभाण्डो के प्राधार पर 'पाहाड सस्कृति' मे परिचित हुये। ये मृद्भाण्ड रगे हुये काले और लाल है तथा अब 'ग्राहाड-सस्कृति' की छाप लगाये हुये है । 'पाहाड सस्कृति' का मुख्य केन्द्र दक्षिण-पूर्वी राजस्थान था। इन पानो का ऊपरी भाग काला तथा पेदा लाल है। यही नहीं काले भाग पर सफेद रग से कलात्मक चित्र भीतर व बाहर पाये गये है। प्रारम्भिक युगो मे पाहाड निवासियो ने कई प्रकार के मृ पानो का निर्माण किया। वे गुण और परिणाम दोनो मे वहुत है । वे समाज की पूरी आवश्यकतानो की पूर्ति करते थे। इस पात्र-निर्माण के क्षेत्र मे रगीन काले और लाल रंग के पानो ने अच्छा योग दिया। आहाड से कुछ ऐसे चमकदार लाल रंग की चिकने पात्र पिले है जिनके गदन तथा कन्ये अलकृत है। उन पर कटावदार काम होने के साथ साथ हे ददार एव अलकृत है। इनमे से कुछ बडे होने के नाते अन्न सग्रह का काय देते थे। इनके साथ ही जैसा कि आगे बतलाया गया है दो-तीन प्रकार के पान काले, चकतेदार सलेटी रग के भूरे, तथा साधारण लाल पात्र भी मिले है। ये सब निसी न किसी प्रकार से अलकृत थे। कुछ पान केवल गले या कथे तक सजे थे तथा कुछ पेट तक, कुछ को बालू की सहायता से खुरदरा बना दिया गया था। वे सम्भवत खाना पकाने के काम के लिये होने के कारण भूमि मे गाड दिये जाते थे । ये सब नीचे पतले तथा उपर मोटे बने थे। इनका ऊपर का भाग ही अधिक मिला है। दो या तीन दूसरे प्रकार के मृत्पात्रो की भी प्राप्ति पाहाड से हुई है। एक वे है जो खूप पके है और जो उगली से ठनकाने से शब्द करते है। उनकी मजबूती ऐसी ही है जैसा कि पत्थर के पात्रो की। भूरे, सन्तरे व चाकलेट रग मे हल्की फिसलने वाली आभायुक्त ये पात्र देखने मे बडे चमकदार है । उन पर खुव पालिश लगी प्रतीत होती है। अब तक केवल छोटी थालिया या तश्तरियो के टुकडे ही प्राप्त हुये है। ऊपर का घूमा भाग तथा गले के ऊपर का भाग जो यहा अवशेषो के स मे प्रात हुअा है वह कभी कभी वैठको के साथ भी मिला है। इन सबकी बैठक बडी कलापूर्ण है। पतले भूरे र ग के वतन तथा काले लोहित वण की श्वेत रग के प्राभायुक्त पात्र भी आहाड से पर्याप्त संख्या मे प्राप्त हुए है। सम्भवत ये पात्र ईरान से भारत मे पाये थे क्योकि इनकी प्राप्ति वहा उसी भूमि पर [ 64 ] , । युग की सामग्री के साथ हुई है। यही नहीं अन्य इसी प्रकार की सामग्री इम सम्भावना की पुष्टी करती है। इस शैली के चिनित काले तथा लाल अथवा रगभेद से काले, भूरे अथवा लाल काले पान कदाचित पाहाडकालीन युग में मेज पर रखने वाले (डीलक्स पोद्री) कहे जा सकते है। ऐसे मृदपात्रो मे छोटे प्याले, कम गहरी थालिया तथा छोटे ऊँचे- सकडे गदन के छोटे गोल पात्र मम्मिलित है। ये पात्र सभवत खाने पीने के काम मे आते थे क्योकि उनके निर्माण मे अतिम रुप देते समय सावधानी बरती गई। उन पर बाहर और भीतर पालिश करके चिकनाया गया और वि दुओ या टेढी रेखाओ द्वारा चित्रित किया गया है। प्रतिदिन प्रयोग में आने वाले पान भी पाहाड तथा गिलु ड से प्राप्त हुए है। इन पात्रो मे बड मचयपात्र एव रसोईघर के छोटे पात्र भी सम्मिलित है। रोटी सेकने के तवे भी उत्खनन से प्राप्त हुए है। इन पातो मे बडे सचयपात्र एव रसोईघर के छोट पात्र भी सम्मिनित है। रोटी मेकने के तवे भी उत्खनन से प्राप्त हुए है। पीसने के लिये काम में प्राने वाले चौरस सिलबट्ट बनास नदी के तट पर पाहाड और गिलु ड से प्रागतिहासिक युग के लोगो के दैनिक प्रयोग की वस्तुओ का पूण चित्र प्रस्तुत करते है। यद्यपि पाहाड के उत्खनन से कोई खात्यान नहीं प्राए हुए है तथापि इस प्रदेश के मुख्य वतमान आहार से अनुमान लगाया जाता है कि चावल, जवार, गेहूँ, मक्का, बाजरा, जौ, चना आदि प्रादेशिक खात्या न उस समय भी बोये और खाये जाते होगे। वे लोग मासाहारी भी ये। गाय, मूवर, बकरा भेड, मछली, क्छवा, आदि खाते थे। भोजन पकाने के पात्र, मेकने के तवे, कढाई, वडे तथा छोटे चपटे नतोदर सतह की पाषाण सिल, गोलबट्टे (लोढ) और मूसल आदि की प्राप्ति यह सिद्ध करते है कि इस क्षेत्र मे आद्यै तिहासिक काल मे मानव ने आखेटक एव खाद्य संग्रह की स्थिति को समाप्त कर अपना पाहार स्वय उत्पादिन करना प्रारंभ कर दिया था। पाहाड से उत्खनन द्वारा पात्र, कढाई तथा खाद्य सामग्री भरने के दैनिक उपयोग के घडे आदि के साथ ही विना हत्य के जल पीने के पात्र, छोट कटोरे तथा बठकदार थालिया भी प्राप्त हुई है। सिंधुघाटी की सभ्यता के सूचक किसी भी स्थल से नहीं प्राप्त होने वाले ऐसे बिना दस्ते के छोटे जलपात्री की प्राप्ति राजस्थान का, ईसा के लगभग 103 वष पूव ईरान से सवव बतलाती है। डॉ साकलिया के मतानुसार ऐसे पात्र ईरान के टेपेमियाल्क, हेपेहिसार तथा शाहटेपे से प्राप्त होने के कारण सभवत राजस्थान व ईरान का सास्कृतिक सवध इस प्राचीन युग मे रहा हो। इसी प्रकार की समानता उस नालीदार टोटी के कटोरे में भी प्राप्त होती है जो नागौर जिले के परबतसर तहसील को खुरडी ग्राम से प्राप्त किया जाकर जोधपुर सग्रहालय मे सुरक्षित है इसी प्रकार का कटोरा ईरान के टेरेगिया से भी प्राप्त हुआ है। इस प्रकार लगभग 20 से 10 शताब्दी ई पू राजस्थान का ईरान से सास्कृतिक सम्बध रहा होगा, ऐसा अनुमान किया जाता है। - [ 65 ] तत्कालीन मानव समाज द्वारा प्रयुक्त अस्त्र शस्त्रो की कल्पना भी हमे पाहाड से प्राप्त हुई हैं। इन अस्रो मे ताम्र-निर्मित शस्त्रास्त्र भी थे। सभवत घरेलु तथा कृषि कार्यो के लिये ताम्र के चाकू के फन तथा हसिये प्रयोग होते थे। पाहाड मे उत्खनन के परिणामस्वरुप खाई 'ए मे कई सामान्य चपटे उन्नतोदर धार के ताम्र कुठार तथा एक अलकृत भाण्ड के भीतर फश के नीचे से प्रकाश मे पाये है। उन दिनो । पाहाड निवासी सभ्य नथा धनी न होकर बहुत साधारण आय के ये। यह उस काल के स्त्रियो द्वारा प्रयुक्त प्राभूपणो से ज्ञात होताहै। ऐसे कुछ प्र भूपण खुदाई से प्राप्त हुए है। प्राप्त प्राभूपणो मे अवशेष अलंकृत नक्काशीदार व पकी हुई मिट्टी के है । कुछ मे सूक्ष्म रेखाकित और इन्द्रगोप मणिया प्रयुक्त होती थी। पक्की मिट्टी के वर्तुजाधार कर्ण' ल भी उस समय स्त्रियो द्वारा प्रयुक्त होते थे। तत्कालीन समाज मे बच्चे ऐसे खिलौने से खेलते थे जो मिट्टी के बने थे तथा पशुमो की प्राकृति के थे। ऐसे खिलौनो से उस युग के पशुमो के बारे मे भी जान- कारी प्राप्त होती है। प्राप्त खिलौनो मे मेढे, हाथी, श्वानदि पशु हमे उस युग के पशुधन की ओर सकेत देते है। - पाहाड को खुदोई से दक्षिण-पूर्वी राजस्थान मे ईसा-पूव के इस युग मे मानव आवासगृह की शैली का पता चलता है। उत्खनन से प्रकाश में आये भवनो के खण्डहर तत्कालीन भवन निर्माण का स्पष्ट बोध कराते है। उन दिनी नीव मे पत्थर की दीवार उठाकर मकान बनाते थे। यह खडे पत्थर के टुकडो से बनी दीनार, नीव एव अशत ऐसे भवन जिनका ऊपरी भाग पकी हुआ तथा कच्ची मिट्टी की ई टो से बने है, खडे करने के काम आती थी। दीवारो के मुख्य भाग श्रेष्ठतर ‘खडे हुए चौरम पत्थर से निर्मित होती, थी जो अजीब ढंग से प्राडे-टेढे जमाये जाते थे। पत्थरो का दूसरा किनारा बेडौल है। प्राप्त भवनो मे मवसे छोटे आकार के घर 10x10' या कुछ अधिक या बडें से बडे '45 x 15' नाप के पाये गये। मकानो के पुराने हो जाने पर उसी स्थान को समतल कर नये मरान बना लेते थे। . । उन दिनो मिट्टी के झोपडो को भी बनाने में लोग नीव और दीवारो को रमणीय करने हेतु चमकीले विल्लोरी पत्थर के दाने तथा चट के टुकडे मिट्टी में मिला दिया करते थे। यह ध्यान देने की बात है कि चमकीले बिल्लोरी पत्थर के दानो का प्रयोग भवन निर्माण हेतु इतिहाम प्रारम्भ होने से पूर्व के युग से चला ग्रा रहा है और माज भी राजस्थान मे प्रयोग मे पा रहा है। नदी को इकट्ठा की गई सुदर काली मिट्टी भी घरो का फश बनाने के काम आती थी। वितु मिट्टी के पात्र बनाने में लोग नदी की इट्टी की गई सुदर वालू तया भोडल (प्रभरक) का/ [ 66 J प्रयोग करते थे। इस स्थान पर ऐसी मिट्टी बहुतायत से उपलब्ध होती है। घरो मे वस्तु संग्रह करने के पात्रा के साथ साथ वटी-बडी भट्टियो या बडे ल्हे भी मिले है। साई 'डी' से प्रकाश में आई एक भट्टी या प्रसारा मे पाया एप बडा चूल्हा तथा साथ ही उस पर रयकर पाने के बडे पात्र के अवशेष दशय पो सहज में ही उस स्थल का कभी एक बड़े परिवार में निवास का आभास देते है। मम्भवत ऐसे बडे एव सयुक्त परिवार का पाना उस युगमे एक स्थान पर ही बनता था। जनजीवन की झाकी से सबधित अय बुद्ध फुटकर प्रमाण भी युदाई से प्राप्त हुये है। यहा का मुख्य उद्योग ताम्बा गलाना और उसके उपकरण बनाना था। इसका प्रमाण यहा से लघु पापारण उपकरणो या न मिलना बलि 5 ताम्र कुल्हाडो व ताम्रास्त्रो का मिलना है । साथ ही एक घर मे ताम्मा गलाने की भट्टी भी मिली है। पाहाड के आसपास के क्षेत्रो मे भी ताम्र की खदाने है हो। यहा ताम्बे का पूरक उद्योग होने से यह वस्ती ताम्बावती के नाम से प्रसिद्ध थी। बाद मे यहा धूल का वडा टीला हा जान के कारण धूलकोट कहलाने लगा। पाहाड से प्राप्त पकी हुई मिट्टी । बन धरो के पक्तिबद्ध निर्मित शोपरणगत दशको की उन दिनो की शव सिजन सस्कार पदधति का परिज्ञान कराते है। पाहाड के एक टीने के उपरी भाग में ही उत्खनन से प्राप्त एक शोषणगत तथा पास मे स्थान पाने वाले मिट्टी के घर यह सिद्ध करते है कि प्रागैतिहासिक युग मे किस प्रकार शव विसजन दिया करते थे। प्राप्त सामग्री से ज्ञात होता है कि शव को आभूपण सहित गाडते थे तथा शव का मस्तक उत्तर और पैर दक्षिण की और रखते थे। रेडियो कावन तिथि के आधार पर आहाड की सस्कृति ई पूर्व 1800 से 1200 की है। इस कालक्रम की पुष्टि इससे भी होती है कि पाहाड से प्राप्त छेददार मृण्मय मरिणया प्राकार और प्रकार मे ठीक वैसी ही है जैसी कि मध्य एशिया से प्राप्त हुई है और उनका भी काल लगभग यही भाका गया है। गिलु ड --मेवाड क्षेत्र की दूसरी खुदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा गिलू ड स्थान पर की गई थी। गिलु ड उदयपुर से उत्तर-पूर्व मे 45 मील दूरी पर स्थित है। यहा पर दो बडे टोले बनास नदी के दाहिने तट से डेढ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। उनमे से एक 14 मीटर ऊँचा तथा दूसरा 8 मीटर ऊँचा है । दोनो टीलो की खुदाई से जो अवशेष मिले वे ताम्रयुग के परिचायक है। 'पूर्वी टोले की खुदाई से प्राप्त अवशेषो से पता चला कि वहा पर आबादी ताम्रयुग से लेकर ऐतिहासिक युग तक रही पर पश्चिमी टोला ताम्र-मृदपात्रयुग के पश्चात् प्राबाद न रह सका।
[ 67 ] यहा की खुदाई से चार युगस्तर-विभाजन किया जा सकता है। इनमे से एक भवन अवशेष 100x80 फुट का प्रकाश में आया। इसमे चार समानान्तर-उत्तर- दक्षिण जाने वाली दीवारे मिली। ये दीवारें दक्षिणी किनारे पर पूर्व पश्चिम दीवार से जुडी हुई मिली। जो दीवारे प्रकाश मे आई वे प्राकार मे 13x5 1/3 फुट की पाई गई और कच्ची मिट्टी की ईटो की बनी पायी गई । समानान्तर दीवारो के बीच का स्थान बालू से भरा गया था किन्तु अदर एव बाहर की दीवारो पर थोडे चूने मे गारा मिलाकर लेप लगा दिया था। यहा से एक कच्ची मिट्टी का भवन, जिसमे एक चूल्हा था, मिला । इसमे एक स्थान पर जली ई टे भी मिली। पक्को ईटो से बनी एक दीवार के अवशेष से जो 36x1'10" के प्राचार की है और जिम पर मिट्टी, बालू तथा मूने का लेप है हमे उस स्थान पर कभी एक बड़ी आबादी के निवाम का अनुमान होता है। यहा से प्राप्त ईटे आकार मे 14"x6" x4" को होने से हमे उस स्थान पर ताम्र पाषाण युग मे विशेष महत्व की जानकारी होती है। यहा से प्राप्त भवन जो कच्ची मिट्टी की ई टो के बने मिले है, बॉस की सपच्चियो लाल मिट्टी से पाटे जाते थे। इन भवनो मे जो चूल्हे मिले है वे पोते हुए हैं। उनके साथ लगातार चूल्हे हैं । कुछ चूल्हो की लम्वाई 9 फुट चौडाई 6 फुट और गहराई 2 फुट है। इनकी एक कतार मे लाने के लिये 1/2 इच का मफेद मिट्टी का प्लास्तर क्यिा गया है। सफेद मिट्टी मे बाल के साथ साथ वनस्पति से प्राप्त राख मिला दी जाती थी। गिलू ड की सभ्यता आहाड से मिलती हुई होते हुए भी ताम्र पाषाण युग की उस सस्कृति की परिचायक है जिसकी विशेषता उन बडे भग्नावशेषो में निहित है जो कच्ची मिट्टी, बिना पकी तथा पकी ई टो से निर्मित किये गये थे। गिलू ड से प्राप्त मृदभाण्ड पाहाड की तरह पाच प्रकार के हैं । चित्रित काले और लाल बतनो के टुक्डो के अतिरिक्त यहा से प्राप्त मिट्टी के बतन के टुकडे (1) सादे (2) काले (3) पालिशदार भूरे (सलेटी) (4) लाल और (5) कुछ काले, चिकने लाल और लाल भूमि पर सफेद र ग की स्थान देते हुए रगीन कारीगरी को स्थान देने वाले (बहुरगी) पात्र हैं। अर्द्धश्वेत पर काले तथा लाल पर काले रंग को स्थान देने वाले पात्र ऊपरी स्तर से तथा शेप नीचे के स्तरो से गिलू ड से प्राप्त हुए है। यद्यपि यहा से प्याले एव तश्तरिया कलात्मक नमूनो को अदर बाहर दोनो ओर स्थान देते हुए प्राप्त हुई हैं पर लाल रग मे और लाल पर काले रग मे बैठकदार तश्तरी, ऊँचे गलेदार पानी का पात्र आदि यहा की विशेषताये है। यहा से प्राप्त मृण्मय कलाकृतियो मे सीगदार वल, खेल के गुट्ट, जिनके शिर ।
[ 68 ] पशुप्रो के से है, प्राप्त हुए हैं। ताम्र के अस्त्र अधिक प्राप्त होने से यहा से बहुत कम पापारणास्न प्राप्त हुये है। रेडियो कार्वन तिथि जो मैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर यहा के सदभ में प्राप्त हुई है वह 1700 ई पूर्व और 1300 ई पूर्व के बीच की है। इस तिथि को पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि नवदाटोली के समान यहा के ऊपरी स्तर से भी प्रद्धश्वेत चिकने बतन जिन पर नतंको तथा चित्तीदार पशु रेसानित हैं, प्राप्त हुये है। नोह-मोह भरतपुर-आगरा राजपथ पर स्थित एक गाव है। यह भरतपुर के पश्चिम में लगभग चार मील की दूरी पर स्थित है। यहां पर एक टोले पर खुदाई से पाच सास्कृतिक युगो के अवशेष मिले हैं। प्राय किस प्रकार राजस्थान में पूर्वी द्वार से प्रविष्ट हुए और उनकी सस्कृति किस प्रकार इस प्रदेश में फैली, इमका आभाम यहा से प्राप्त अवशेषो से ज्ञात होता है। यहा पर निचले स्तर से कमश गेरू के रग के मृत्पात्र (गरिक मृदमाड) सादे काले और लाल मिट्टी के पात्रो के अवशेष प्राप्त हुये हैं। पर यह ध्यान देने की बात है कि यहा के काले व लाल मृत्पात्र पाहाड से प्राप्त मृदपात्रो से सर्वथा भिन्न है । इनके साथ ही मलेटी रग पात्रो के अवशेप और गरू के रग के पात्रो के अवशेष भी प्राप्त हुये। इसके बाद के स्तर से जिम युग की संस्कृति का प्राभास मिला वह चित्रित सलेटी रग के पानी की तथा काली चमकदार पात्रो (उत्तरी काले प्रोपदार मृदभाड) की संस्कृति थी। ऐसे मृदुपात्रो के अवशेप हस्तिनापुर से भी प्राप्त हुये हैं । सभवत इनका प्रयोग मभ्रात वग द्वारा किया जाता था। इस स्तर से विशेष महत्व के अवशेपो में चित्रित सलेटी रग के पात्रो मे एक ऐसे पात्र का अवशेष मिला जिसके ऊपर चिडिया की प्राकृति है। इसके अतिक्ति हस्तिनापुर तथा वैशाली से प्राप्त मृण्मय तथा अन्य प्रकार की मणिया और मृण्मय गोलाकार ढक्कन के प्रकार की वस्तुये जिन पर कुरेदी हुई अस्पष्ट प्राकृतिया है, भी यहा मे मिली है। काले और लाल पात्रो के अवशेष इस स्तर से भी पूर्व स्तर की तरह मिले । इसके बाद के स्तर से काले और लाल पात्रो के अवशेष मिलना वद हो गये और चित्रित स्लेटी रग के पानी के अवशेषो के साथ साथ उत्तरी काले प्रोपदार मृदभाड प्राय मिलने प्रारम्भ हो गये। इस युग मे लोहे का प्रयोग होने से लोहे के बाणो के नोक के भाग प्राप्त हुये है। इस स्तर के कुछ भवनो के भग्नावशेष भी प्रकाश में आये है। इसके बाद के स्तर से कच्ची मिट्टी को ईटो से बना एक महत्वपूर्ण परकोटा भी खुदाई से प्रकट हुअा। इसे ईसा की प्रथम शताब्दी पूर्व का माना जा सकता है । - .
[ 69 ] इस स्तर से ही एक स्थान पर बडी बडी पक्की ईटो से निर्मित एक दीवार प्रकट हुई है । यहा से केवल लाल रंग के साधारण वर्तनो के टुकडे मिले है और पिछले स्तरो से प्राप्त पानी के अवशेष एक भी नहीं मिले । इम स्तर की उल्लेखनीय उपलब्धियो मे मथुरा के मित्र शासको के ढाले हुये ताबे के सिक्के, मानव एव पशु प्राकृतियो की मृण्मय कलाकृतिया मिली है। मृण्मय कलाकृतियो से वसु धरा तथा कामी-युगल का अकन उल्लेखनीय है। इम स्तर मे चिकने चुनार पत्थर के कुछ टुकडे प्राप्त हुये हैं जिन पर मौयकालीन पालिश है। इस स्तर से कुषाण कालीन पात्रो के साथ माथ एक ऐसा पात्र भी मिला है जिस पर ब्राह्म लिपि मे चारो ओर लेख अङ्कित है। अतिम स्तर से, जो 7 वी शताब्दी के युग का परिचायक है, पाषाण फलको के साथ साथ आदमवद बुद्ध या यक्ष की सुन्दर हथेली चित्तेदार लाल पत्थर मे बनी प्राई हुई है। रेडियो कावन तिथ जो वैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर यहा के सबसे नीचे के स्तर की दी गई है वह 1100 ई पूर्व से 900 ई पूर्व की है। इस प्रकार गणेश्वर, जोधपुरा, कालीबगा गिलुण्ड, पाहाड व नोह मे ताम्रपाषाण व ताम्रयुगीन सस्कृति (ई पूर्व 2800 से ई पूव 12 0) प्रकाश मे पाई है। उपरोक्त उल्लेखित स्थलो मे तावे का प्रयोग सर्वप्रथम हुआ । इस युग मे प्रचुर मात्रा मे मिले अवशेष पुरातत्व के क्षेत्र मे अत्यन्त महत्वपूर्ण है । अन्य ताम्रयुगीन स्थलो मे चौथवाडी, नन्दलालपुरा व किरडोत (जिला जयपुर) मलाह (जिला भरतपुर) कुराडा (जिला नागौर), पिण्ड पाडलिया (जिला चितोड) झाड ल (जिला उदयपुर), सावणिया व पूगल (जिला बीकानेर) एलाना (जिला जालौर) बूढा पुष्कर (जिला अजमेर) कौल महालो (जिला सवाई माधोपुर) से भी कई ताम्र उपकरणो के भडार प्राप्त हुए है। किरडोत से ताम्रयुगीन 38 चूडिया प्राप्त हुई है। मलाह से काफी सख्या मे ताम्र हारपुन, तलवारे आदि मिली है। हारपुन से बड़ी मछली, गेडे आदि का शिकार किया जाता था। कुराडा से अन्य ताम्र सामग्री के साथ प्रणालयुक्त अध्यपात्र मिला है जो पश्चिमी राजस्थान तथा पश्चिमी एशिया विशेषत ईरान से परस्परिक सम्बधो को बतलाया है। ताम्रयुगीन सभ्यता के बाद मे लोह युगीन सस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ। इस युग मे मानव लोहे का प्रयोग करने लग गया था। यह मानव विकास के तीन युगो पाषाण युग, ताम्र युग एव लोह युग कि अतिम कडी है । इस सस्कृति को प्रादि आर्यों को सस्कृति माना जाता है। भारत में ऋग्वदिक काल मे अयस (लोहे) का उल्लेख मिला है। इसका प्रयोग ई पूर्व 2000 के वाद होने लग गया था। लोह के कारण यहा के इतिहास मे युगान्तरकारी परिवतन माया। अव मजबूत व तेज धार वाले अस्त्र शस्त्र बनने लग गये। लोहे के उपकरणो से खेती करने में सुविधा [ 70 ] हो गई। पर्याप्त धन धाय होने के कारण अनेक सास्कृतिक एव दाशनिक क्षेत्र में काफी परिवतन पाया । इस मम्कृति के प्रमुख स्थल नोह(भरतपुर जिला)जोधपुरा व वराट (जिला जयपुर) तथा सुनारी (जिला झू भन्), तारयानवालो का रेरा व चर 84 (जिला गगानगर) में स्थित है। मोह और जोधपुरा में ताम्र की वस्तुए नही मिती है लेकिन वहा ताम्रयुगीन कपिपय! मृदपार अवश्य मिले है। इन लोह युगीन सास्कृतिक स्थलो मे मीय पालीन सभ्यता के भी कई अवशेष मिले है। जिनमे प्रमुख रूप मे उत्तरी भारत के कृष्ण परिमार्जित मृदपात्र है। यो बैराठ मोयकाल मे बौद्ध धम का एक प्रसिद्ध केन्द्र था वहा से ही अशोक के दो अभिलेख मिले है। वैराठ अभिलेय से ही ज्ञात होता है कि अशोर ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। यहा से अशोक कालीन माह मीलिपि के अक्षर युक्त ईट भी प्राप्त - सुनारी-गणेश्वर से 25 कि मी दूर काटली नदी के दाहिने किनारे पर स्थित गाव सुनारी तहसील सेतडी, (जिला झू झन्) की खुदाई से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य अयस से लोहा बनाने की भट्टिया है तथा लोहे से उपकरण बनाने की भट्टिया है। ये भारत की प्राचीनतम भट्टिया मानी जाती है। यहा की पहलो भट्टी खुली धमन भट्टी है। जिससे उपलो के द्वारा अयस से लोहा बनाया जाता था। दूसरे प्रकार की भट्टी से लोहे के उपकरण पनाये जाते थे। इनमे धोकनी लगाने का प्रावधान भी था ताकि भट्टी का तापक्रम नियत्रित किया जा सकें। यहा से लोहे के तीर तथा भाले के अग्रभाग काफी संख्या में प्राप्त हुए है। यहा से लोहे का एक कटोरा भी प्राप्त हुया है। उम काल का ऐसा प्याला अब तक भारत भर मे नही मिला है। कृष्ण परिमार्जित मृदपान भी मिले है। उपरी स्तर पर काफी संख्या मे लोहे के हथियारो के साथ काली पोलिम वाले मृदपात्र भी मिले है । मृदपान मौयकाल के है। इसके अलावा यहा से मिट्टी तथा पत्थर के मणके, शख की चूडिया तथा मृणमूर्तिया भी मिली है। यहा के लोग चावल का प्रयोग करते थे। घाडो से ग्थ खिंचते थे। यहा के लोग साधारण मकान मे रहते थे ऐसा अनुमान किया जाता है कि यहा की बस्ती वैदिक आर्यों ने बसाई थी तथा मौयकाल के बाद शु ग तथा कुपाणकाल (ई पूर्व दूसरी शताब्दी) से लेकर ईमा नी तीमरी शताब्दी तक फलती फूलती रही। कुपागकाल मे काले रंग के मृदपात्र चाक द्वारा बनाये हुए मिले है। कई प्याले, सिकोरे तथा सकल्प से सम्ववित जलपात्र मिने है। मातृका की मृण- मूर्तिया भी काफी सय्या मे मिली । एक बडी मूण (पौने प'च फुट ऊँची) भी यहा पर मिली है जिसमे वान का सग्रहण किया जाता था। इमम यह ज्ञात होता है कि ये लोग कृषि काय मे रूचि लेने लग गये थे तथा यह क्षेत्र पर्याप्त समृद्ध [ 71 ] था। ये मृदपान बौद्ध धर्म की उपासना पद्धति मे काम आते थे। सुनारी के निकट मे भी ऐसे मृदपात्र मिले है। यहा के मौर्य कालीन स्तरो से भी लोहे के हथियार काफी मात्रा में मिले है। लोहे के तीरो के मिलने से यह अनुमान किया जाता है कि यहा कृषि के साथ साथ आखेट द्वारा भी भोजन प्राप्त किया जाता था । तिलवाडा--यह स्थल बाडमेर जिला के वालोतरा नगर से 16 किलो- मीटर पश्चिम मे लूणी नदी के बाये किनारे, रेतीले क्षेत्र मे बसा है। यहा 1966- 67 मे गाव के दक्षिण-पश्चिम मे 2 किलोमीटर की दूरी पर एक धोरे की खुदाई की गई जहा 90 सेंटीमीवर नीचे पाच आवास स्थलो के अवशेष मिले | एक गोलाकार झूपे के अवशेष बतलाते है कि वह 3 मीटर व्यास का था और उमकी दीवारे मिट्टी से बनी थी तथा उसकी छत तिनको से छाई थी। इसके आगन मे समतल चौरस पत्थरो का प्रयोग मिलता है। एक शिलवट्टा, मृदभाण्ड व अन्य कई बतन-हाण्डी आदि मिले हैं। चूल्हो मे राख, जली हड्डियो के अलावा बतनो व सूक्ष्म उपकरणो के टुकडे मिले हैं । मृदभाड चाक से बने है जो काफी पकाये गये थे तथा सलेटी व लाल रंग के है। सलेटी रग की हाण्डिया कई नाप की है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि वे खाना पकाने के काम ली जाती थी क्योकि उनके तले जले हुए है तथा इन पर अलकरण नहीं है । लाल पात्रो मे थाली व लोटे है। यहा के लयु उपकरण स्थानीय सामग्री स्फटीक, बिल्लोर, चटं आदि के बने हैं। सूक्ष्म उपकरणो मे पत्तिये, तियक, तिरछे कुठित फलक, अपरिष्कृत फलक, त्रिकोण, वेधनी तथा कुछ चौकोर उपकरण मिले है। ये सूक्ष्य उपकरण काफी मेहनत से तैयार किये गये थे। तिलवाडा की ऊपरी सतह मे लोह के टुकडे, काच की चूटियो के टुक्ड भी मिले है लेकिन कुछ नीचे से हड्डी के मणके, एक टुकडा सीप की चूडी का तथा कुछ लोहे के टुकडें भी प्राप्त हुए है। यहा अग्निकुण्ड भी मिले है जिनमे मानव अस्थि भस्म प्राप्त हुई है। एक अस्थि अवशेष के साथ मृदपात्र भी प्राप्त हुए है। मृत पशुप्रो के अस्थि अवशेषो से ज्ञात होता है कि इस युग मे गाय, बकरी, गीदड या कुत्ता, सूअर, चित्तीदार हरिण, नेवला आदि उस क्षेत्र मे विचरण करते थे । बागोर की अपेक्षा तिलवाडा मे मानव बहुत बाद पहुचा और यही कारण है कि यहा की संस्कृति सम्बधी अवशेष बहुत पुराने नही है। इस स्थान से थोडी दूर बोदरा नामक स्थान पर भी उत्खनन काय हुआ। यहा का टीला बहुत बडा तथा विस्तृत है । यहा पर खुदाई 16x5 मीटर भूमि पर की गई। बागोर की तरह यहा भी प्रादि मानव रहा करता था। ऐसा आभास यहाँ के रेतीले प्रदेश के विश्लेषण से चलता है। यहा रेतीते प्रदेश मे नीचे ककर और चूने का पाया जाना .
[.72 ] सिद्ध करता है कि यह स्थल कभी आपाद रहा था पर उम समय में मानव प्रत उत्पादन की अवस्था से न रहा होगा। उस युग मे लूनी नदी उस क्षेत्र मे बहती होगी और आदि मानव उसके तट पर रहकर जीवन यापन किया करता होगा । लघु पाषाण शस्त्रो की ऊपरी रेतीले क्षेत्र में प्राप्ति ग्रादि-मानव के कार्य-कलापो का परिचय देती है। ऊपर की सतह से मृद्भाण्ड ज्यादा मिले है। लघुपाषाण कम है लेकिन नीचे की ओर सूक्ष्म उपकरण ज्यादा मिले है। अत यहा से संस्कृतियो को दो काला का अनुमान किया जाता है। प्रारम्भ मे वर्तन कम थे और वाद मे बतनो के ज्यादा प्रयोग होने लग गया था। स्पष्ट है कि यहा को सस्कृति पाषाण युग की नहीं थी यद्यपि यहा सूक्ष्म शल्क उपकरण मिले है जो बागोर मे मिले उपकरणो जैसे ही है। यदि हम लोहे की व काच की चूडियो की ओर ध्यान न देखें कि वे ज्यादा वाद के समय के लोगो की है जो कभी अस्थाई रूप से वहा पाये हो लेकिन चाक से बने वर्तन-हाडी, लोटा थाली प्रादि, शिलबट्टा व झूपे वहा के निवासियो को जमक्कड या केवल शिकारी होना नही बतलाते है । डा बी एन मिश्रा इनका समय ई पूर्व 500 से ई सन् 200 बतलाते है । - - बैराठ (जिला जयपुर) --जयपुर नगर से उत्तर मे 52 मील दूर स्थित बैराठ मे दो बार खुदाई हुई। प्रथम बार स्वदाई बीजक की पहाड़ी पर की गई। यहा पर किमी समय एक शिलालेख था जो ग्राजकम क्लकत्ता में एगिया- टिक सोसायटिक वगाल के संग्रहालय मे है। इस टीले पर ही की गई खुदाई ने अशोक तथा उमके पूर्व को सस्कृति पर अच्छा प्रकाश डाला है। यहा से खुदाई के आधार पर एक गोल बौद्ध मदिर का ढाचा प्रकाश में आया। हीनयान धर्म मे बुद्ध सवधी अवशेष किस प्रकार मन्दिर के बीच मे रखे जाते थे तथा उनकी परितमा के लिये प्रावधान किया जाता था, यह इस मदिर की निर्माण विधि से पता चलता है। मूल मदिर के चारो ओर गोल घेर मे विस प्रभार'लकडी के स्तम्भ लगे होगे तथा इनके योग से उपर मण्डप बना होगा, सहज मे हो अनुमान लगाया जा सकता है। लकडी के स्तम्भ अठपहलु थे और स्तम्भो के बीच मे प्लास्टर के पला स्थान पाते थे। खुदाई से प्राप्त चौडी पकी हुई ईटो से जो मौय-युगीन सस्कृति की परिचायक हैं, हम उम युग को मम्मृति का अनुमान लगा सस्ते है । मदिर के चारो और बौद्ध भिक्ष-भिक्षुरिगयो के निवाम गृह बौद्ध मठा के रूप में थे। उनके अवशेष अव तक देखने को मिलते है। सबसे अधिन सुरक्षित- मठ का वह भाग था जो पूर्व को और स्थित था। यहा पर छ से सात कोठरियो के भग्नव गेप देखने को पर भी मिलते है। इनमे प्रयुक्त मिट्टी की ईट प्रावार मे 20 इच x 1 75 इच है। इनकी मांधारण मिट्टी के चूने मे जाडा गया था। अवशेषा मै जलो लाडी के [ 73 ] अवशेष तथा मृद खपडेल मिले। इन खपडलो से ही प्राय मठो की छत पाटी जाती थी। जो मृदपात्र इस स्थान की कोठरियो से प्रकाश मे आये उनमे नाना प्रकार के अलकारिक पात्र थे। पात्रो में प्रयुक्त अलकरण मे पहिये पर वित्न, स्वस्तिक आदि थे। इनके अतिरिक्त वहा से लोहे की कीलें, अण्डाकार धेरदार पतली तहो वाले पत्थर के छोटे-छोटे फलक भी मिले है। उस समय ये सभवत तावीज के रूप मे प्रयोग किये जाते थे। - मृदपात्रो के टुकडे जो यहा से प्राप्त हुये है वे है उत्तरी काली पालिशदार पात्रो के टुकडे । इनके माथ साधारण मोट बर्तनो के टुकडे भी प्राप्त हुये है। 36 पाहत मुद्रायें तथा भारतीय-यूनानी सिक्के भी एक कपडे मे लिपटे यहा से प्राप्त हुये । कपडे का वज्ञानिक ढा का परीक्षण इस बात का साक्षी है कि उस समय का कपडा कैमा बनता था। मौययुगीन मृण्मय कलाकृतिया यहा से प्राप्त हुई है। मृण्मय कला- कृतियो मे सपफल धूपदान, धूप की बत्तियो को ग्रहण करने के लिये छेदधारी मृद वस्तुये, नतकी एव यक्षी की वह मृण्मय कलाकृति जिसमे युवती का बॉया हाथ वाई जघा के पीछे की ओर है तथा दाहिना जघा पर है, मिटटी का वह बेसवेल जिम पर कटहरे का अकन है चिकने चमकदार सुन्दर भिक्षा पात्रो के कई अवशेष, मिट्टी को छाटो थालिया, पूजा का चौडा पान जिसको कोर पर एक छोटा दीपक का कटोरा लगा है आदि है। धातु के मिट्टी की वस्तुओ के अतिरिक्त यहा से बहुत बड़ी संख्या मे विभिन्न माप की कोले, दोवार पुष्ट करने की लोहे का छोटी छड, वडे आकार की लोहे की ऐसी पट्टिया जिनमे कोले उनके चोडे किनारो पर जडी हुई थी, लोहे की रेतो, फोतो की गठरी, केवल एक बारपान, तावे की मुई भी प्राप्त हुये है। कार लिखित वस्तुओं के प्राप्ति स्थान स थोडी दूर पर ही एक चिक्ना चुनार पत्थर का बट्टा भी मन्दिर की दक्षिण दिशा मे प्राप्त हुआ था। मन्दिर की उत्तरी दिशा की खाई से मिट्टी के घडे के ऊपरो किनारे का वह भाग प्राप्त हुआ जिमसे घड़े पर साधारण छेद युक्त नक्काशी के साथ ब्राह्मी अक्षरो मे एक लख अक्ति है। अभाग्यवश इस लख का शुद्ध रूप पढा नहीं जा सका है। इमी कारण उसका अर्थ भा ठीक से नही जाना जा सका है। यहा से प्राप्त सभी मृदंपात्र साधारण चाक पर निर्मित है। इन पर न कोई लेप है और न कोई चिकनाहट या चमक है। इन सात्रों पर साधारण रेखायें तिरछी, वाकी, लम्बी-चौडी, ऊपर से नीचे तथा एक ओर से दूसरी और पात्रों के मध्य मे तथा पात्रो के ऊपरी क्धो पर चित्रित होती है। इनके साथ। साथ -A [ 74 ] पवित्र बौद्ध विह-धमचक्र, निरल, स्वस्तिक, कमलो का गुच्छा, हाथ की उगलियो से बनाया गया कुम्हार द्वारा श्रृखला- बध साचा अथवा असाधारण छेदयुक्त रेखाये भी पालो पर चित्रित है। ऐसे पान साधारणतया सलेटी मिट्टी के बने है। सुन्दर हल्की मिट्टी के बने बहुत ही चमकदार पात्रो मे कुछ थोडे वे भिक्षापान है जिन पर किसी समय अलकरण या और जिनकी ताम्बे की कीलो व तारो से उनके टूट जाने की प्रवस्था मे जोडकर सुरक्षित किया गया था। यहा को अन्य उल्लेखनीय उपलब्धियो मे यहा से प्राप्त 7 प्रकार की मिट्टी की इंटे है। इनमे सबसे बडी 2'7 इच x 14इच - 3इच की तथा सबसे छोटी 135 इच xइचx2 इच की है। पच्चर के प्राकार की ईटो का प्रयोग वैराठ के खुदाई की विशेषता है। इनका प्रयोग वैराठ के गोलाकार मदिर मे हुआ था। सिधु नदी को सभ्यता के अवशेषो की प्राप्ति से पूर्व ऐसी ईंटे कही और प्रयुक्त नहीं हुई थी। ऐसा अव तक के किये गये उत्खनन कार्य से सिद्ध होता है। यह ध्यान देने की बात है कि बैराठ मे कोई भी महात्मा बुद्ध की मूर्तिया या मृण्मय कृतिया नहीं मिली हैं। यह स्पष्ट बतलाता है कि बैराठ की चौद्ध सस्कृति महायान धर्म सबधी न होकर हीनयान थी। ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियो की वस्तुओ मे दीपक, गोरिय्या, छोटी बोतल मिट्टी की तथा पानी पीने व रखने के छोटे पात्र आदि मुख्य थे। मृदपात्रो पर कुरेदे कलात्मक खाके भी है। यहा से मृण्मय मणके भी प्राप्त हुये हैं । बैराठ की दूसरी बार की खुदाई चार स्तर जन बता सकी है। इस खुदाई से चार स्तर प्रकाश में आये और उनसे बैराठ की चार विभिन युगीन सस्कृतियो पर प्रकाश पडा । सबसे पहले यहा पर चित्रित सलेटी पात्र के प्रयोग करने वाले रहा करते थे। उसके बाद उतरी काले पालिश वाले पात्रो के प्रयोग करने वाले यहा बसे । उनसे सम्बधित छोटे छोटे अवशेप भी मिले। उसके पश्चात ईसा की प्रारभिक युगीन सस्कृति का पता उस युग के पात्रो की प्राप्ति से हुा । चौथे स्तर से मध्ययुगीन चमकीली वानिश को स्थान देने वाले पात्रो के टुकडे मिले। यह ध्यान देने की बात है कि सबसे नीचे के स्तर से ही लोहे का प्रयोग वैराठ निवासी करने लग गये थे। यह हम यहा के प्राप्त अवशेषों से ज्ञात होता है। बैराठ की खुदाईयो के आधार पर प्राय सस्कृति का केद्र होने के अतिरिक्त मध्य युगीन सस्कृति का केन्द्र भी रहा । यहा के प्राप्त अवशेषो से भी, जो यहा के प्रसिद्ध भवनो के रूप में अब तक विद्यमान है, पुष्ट होता है। नगरी-दक्षिण पूर्व राजस्थान का नगरी स्थान चितौड के उतर मे13 किलो [ 75 ] मीटर की दूरी पर स्थित है। यहा पर दो बार खुदाई हुई । सर्वप्रथम यहा पर सन 1904 मे खुदाई डॉ भण्डारकर ने की थी। उन्होने खुदाई दो स्थानो पर कराई थी। नगरी के परकोटे के अदर स्तूप के टीले पर एक खुदाई की गई थी तथा दूमरी हाथी बाडा स्थान पर जो नगरी गाव से 1 किलोमीटर पूर्व है, की गई थी। नगरी प्राचीन माध्यमिका नगरी थी। इसका उल्लेख पातन्जलि के "महाभाष्य" मे है। खुदाई के आधार पर यहा पर किसी समय शिवि-जनपद था। ऐसा प्रमाण यहा से प्राप्त शिवि जनपद के सिक्को की प्राप्ति से हुआ है। यहा से प्राप्त आहत मुद्राये शिवि सिक्के, लेखाकित पाषाण खण्ड, मृण्मय-कलाकृतिया तथा मूर्तिबण्ड इस स्थान को ऐतिहासिकता ई पू की तृतीय शताब्दी से लेकर सातवी शताब्दी ई तर प्रमाणित करते है। . । यहा से गुप्तकाल के प्रारम्भ के कई मृणमूर्तिखण्ड भी प्राप्त हुये है। टीले के मध्य मे प्रारभिक गु- युग का एक मदिर, जिममे शिव की मूर्ति भी थी, पाया गया था। यहां से ही गुप्तयुग के प्रारभ की मृण्मय कलाकृतिया प्राप्त हुयी है। ये कलाकृतिया अलकरिक होने के साथ साथ गुप्तकला की परिचायिक है। यही नही, यहा स लाल पालिशदार पात्रा भी, जो पश्चिमी भारत मे अधिकतर मिलते है, प्राप्त हुये थे। यहा से क्षत्रप सिक्को की भी प्राप्ति हुई थी। नगरी में वैज्ञानिक ढग से दूसरी बार सन् 1962 मे खुदाई केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा की गई। 5 मीटर गहरी खाई से तीन सास्कृतिक स्तरो का ज्ञान हुआ। प्रथम दो स्तरो से साधारण सादे लाल व सलेटी रग के पान गिले पर यहा से चार चक्राकार कुऐ (रिंग वैल्स) तथा साधारण पत्थरो से बने कुछ प्रकारो के अवशेष मिले जो प्राय नगर की रक्षाथ किसी समय निर्मित किये गये थे। तृतीय सास्कृतिक स्तर से वड कूपो के अवशेष लाल पालिशदार पात्रो के टुकडे तथा सफद प्लास्तर की तरह की खडिया मिट्टी के पात्र मिले थे। इस खुदाई से प्राप्त अन्य सामग्री मे पाहत मुद्राये, शिवि जनपद के मिक्के जिन पर 'मध्यमिका' लिखा हे तथा प्रारभिक क्षत्रप सिक्के, हड्डियो के नोक, मानव एव पशु प्राकृतियो की मृण्मय कलाकृतिया, जो शुग तथा गुप्तकालीन कला की परिचायिका है तथा मणके, अन्य मृण्मय वस्तुएँ जिनमे बच्चो के खिलौने तथा कचे आदि है, ताम्बे की सुरमा लगाने की शलाकाये तथा अगुठिया मुख्यतया उल्लेखनीय है। प्राप्त सामग्री से द्मरी बार की खुदाई से भी कोई वस्तु ई पूर्व की चौथी शताब्दी से पूर्व की नही मिली यद्यपि लघु पापाणास्त्रा का प्राप्ति धरातल पर यत्र तत्र हुई है। दुग का आकार जो यहा पर प्राप्त है वह सभवत गुप्त युग मे बनाया गया था। यह ध्यान रखने की बात है कि यद्यपि इस स्थान से खुदाई द्वारा तीसरी [ 76 ] -- शताब्दी ईसा पूर्व के अन्य पात्रो के टुकडो को मामग्री मिली पर उत्तरी काली पालि- दार पात्रो के टुक्डे नहीं मिले। रैढ-जयपुर के दक्षिण मे90किलोमीटर की दूरी पर रैढ गाव है । यह भूतपूर्व जयपुर राज्य की बोली तहसील के भरतना ठिकाने मे किसी समय स्थित था। अब यह निवाई तहसील मे है। यहा पर की गई खुदाई से ई पूर्व की तीसरी शताब्दी से लेकर ईसा की द्वितीय शताब्दी तक के अधिक अवशेष प्राप्त हुये, यद्यपि कुछ थोडे अवशेषो से यहा पर पूर्व गुप्तकालीन सस्कृति का प्रचलन भी अनुमानित होता है । शोषण कूप जिनमे पकी मिट्टी के बडे घेरे है एक पक्ति मे यहा से बहुत बड़ी संख्या मे प्राप्त हुए है। इस स्थान से 115 शोषण या घरदार तूप मिले थे। इनमे 5 से से लेकर 25 घेरे एक से दूसरे पर रखा है। हर घरा दो फुट दो इच चौडा बीच मे तथा लगभग 7 इच ऊचा है। इनकी मोटाई प्राची इच है। इनके प्रदर टूटे प्याले, मणके, मृण्मय कलाकृतिया अादि पाये गये थे। कुछ घरो के अन्दर अनाज के दाने भी पाये गये थे। कुछ शोषण गर्त के रूप में निवास गृहो मे पाये गये थे उनकी गहराई 17 इच से लेकर 19 फुट 4 1/5 इच पाई गई। यहा से तीन सहस्त्र से अधिक पाहत मुद्रायें, मालव एव मित्र सिक्के प्रादि भी खुदाई के आधार पर प्राप्त हुये है। 14 मित्र सिक्को के साथ यहा से 6 सेनापति सिक्के, सात वपु सिक्के, एव टूटा अपोलोडोट्स का सिक्का, 189 गज्ञात ताम्र सिक्के, थोडे इण्डोससे- नियन सिक्के भी मिले थे। यहा से प्राप्त मृण्मय कलाकृतिया जो नाना पो की मातृकाओ को पशु प्राकृतियो के साथ है यहा की अमूत्य सामग्री में है। यहा से प्राप्त मणके तथा माहरे भी उल्लेखनीय है। यहा से प्राप्त एक सीसे की मुहर 'मालव जनपद - स" ब्राह्मी लिपि मे अकित है, इस क्षेत्र में किसी समय मालव जनपद होने का स्पष्ट प्रमारण उपस्थित करता है। यहा से बहुत बड़ी संख्या मे लोहे के औजार प्राप्त हुए हैं। अत प्राचीन काल मे सम्भवत यहा पर कोई लोहे की वस्तु बनाने का . कारखाना था। स्पष्ट छापेदार कलाचिन्हो की स्थान देने वाले पात्रो के टुकडे घुमावदार हत्या, अन्दर से खोखने ढक्कन, उठाने के लिये घुण्डी के पात्रो के ढक्कन, छोटी बोतलनुमा सुराहिया, जिनमे पैदे से ऊपर कारीगरी की गई है -सा की प्रथम शताब्दी की सस्कृति के परिचायक है। रेढ की खुदाई की विशेष उपलब्धि यहा से प्राप्त लगभग समानान्तर भित्तिया है। ऐसी भित्तीया प्रागतिहासिक युगीन मोहनजोदडो से ही प्राप्त हुये थे। रेढ से बहुत सय्या मे विभिन्न धातुपो से निर्मित वस्तुएं प्राप्त हुई है। ये ताम्बे, सीसे, चाँदी तथा सोने की है। यहा से प्राप्त पालिशदार रगीन मणिया जिन पर कलात्मक काम है तथा यहा से मिलो हाथी दात, कासे आदि की वस्तुएं ये सिद्ध करती है कि रेढ ईसा पूर्व की [ 77 ] तीसरी शताब्दी से लेकर ईमा की तीमरी शताब्दी तक एक बहुत ही सम्पन्न स्थान था। सभवत उत्तरी-पश्चिमी भारत में रहने वाली मल्लोइ जाति के लोग सिकन्दर के प्राक्रमण के पश्चात् यहा जर बसे तब यहा सुख शाति का वातावरण पाकर अपनी सुख-सुविधा की समस्त सामग्री जुटाकर अपनी संस्कृति को, जो मालव सस्कृतिवाद को जन्म देने वाली हुई और जो यहा भी समृद्ध हुइ, पुष्ट करने मे सहायक हुए। नलियासर-जयपुर से 83 किलोमीटर पश्चिम मे साभर झील से लगभग 3 मील दूर पर नलियामर गाव है। यहा पर एक बहुत बडा टीला है। जिस पर की गई खुदाई से ईसा पूर्व की तीसरी शताब्दी से लेकर वी शताब्दी इ के अवशेष प्राप्त हुये हैं। शाकम्भरी के चौहानो के विषय मे साहित्य एव शिलालेखो से ज्ञात होता है, पर इस खुदाइ द्वारा चौहान युग से पूर्व पर अच्छा प्रकाश पडा है । खुदाई से प्राप्त सामग्री मे पाहत मुद्राये,उत्तर इण्डोससेनियन सिक्के, हुविष्क के सिक्के, इण्डोग्रीक सिक्के योयो के सिक्के (जिनमे छोटे सिक्के पर एक पक्ति पर बहुधा व तथा दूसरे पर गण अकित है। गुप्तयुगीन चादी के सिक्को के अतिरिक्त कई सोने तथा ताम्बे की वस्तुऐ है। इन वस्तुप्रो मे सोने का एक गले के हार का लटकन है जिस पर पखदार शिर की खुदी प्राकृति है। सोने की अन्य वस्तुप्रो मे सोने के पतरे से निर्मित मणका है जो सम्भवत मन्त्र के रूप मे कभी प्रयोग किया जाता था इसी प्रकार का बना एक हृदय के आकार की वह वस्तु है जिसके दोनो ओर सीग के रूप की एक आकृति है जो कि तुरही हो सकती है। यहा सोने से निभित खुदा हुआ सिंह शिर या कीर्तिमुख भी प्राप्त हुना है। ताम्बे की वस्तुओ मे यहा से घण्टिका, चम्मच, छोटे पात्र आदि प्राप्त हुये थे। फुटकर मिट्टी की बनी सामग्री मे तोलने के बाट है। ये बहुधा चौकोर है। अन्य सामग्री मे बडे गेद, छोटे गेद, मिट्टी की छोटी तलवार, भुनझने आदि है। शरीर का मैल दूर करने के झापे, गोल गोल मिट्टी के छोटे छोटे तवे के समान वस्तुए अलकरण युक्त ईटे, नालियों के गोल पाइप, पुजा हेतु छोटे कुण्ड या पात्र, मिट्टी के आभूषण । जिनमे पचमणिया विशेषतया उल्लेखनीय है) मणके मिट्टी, शीशे धातु एव मणियो से निर्मित भी यहा से प्राप्त हुये हैं शीशे की चूडियो के साथ पत्थर के बने सिल- बट्ट, हड्डी का बना पासा, कासे के बने बच्चा के कडे तथा उनकी अगूठिया व कासे की बनी घण्टे का हत्या विशेषतया उल्लेखनीय है। ऐतिहासिक सामग्री मे यहा से प्राप्त 105 ताम्बे को मुद्रायें महत्वपूर्ण है। ये सिक्के कुपारणकालीन राजस्थान की स्थिति पर प्रकाश डालते है। सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री मे वह लेखयुक्त छोटा फलक है जो इस प्रकार पढा गया है- तत (तत) शसक काल (ति) त सूर्य - अकित है। [ 78 ] (मव) ता राव प्रिय ति नीता ग यद्यपि इम अधूरे लेख को पढकर प्रथ निकालना असम्भव है लेकिन यह लेख ईमा की दूसरी शती से लेकर ईसा की चौथी शती का हो सकता है। यह लेख सस्कृत भाषा मे है पर इसकी लिपि ब्राह्मी है। यहा से एक कासे की मुहर भी मिली है। इस पर अर-ल (१) दस सम्भवत यह किसी का नाम है। यह ब्राह्मी लिपि मे है और अक्षरो को बनावट के आधार पर इमा की तीसरो शताब्दी की मानी जा सकती है। प्राप्त सामग्री के अध्ययन से पता चलता है कि साभर की संस्कृति इमा पूर्व की तीसरी शताब्दी में जन्मी व विकसित हुइ पर इमा की छठी शति से पूर्व ही लुप्त हो गइ । नित्य प्रति प्रयोग की ताम्बे के पानो के अतिरिक्त यहा से असरय मृण्यय वस्तुऐ तथा कलापूर्णलाल तथा श्वेत मिट्टी पर उभरे हुये काम को स्थान देते हुये मृदभाण्डो के टुकडे भी मिले है। ऐसे बतनो के टुकडे कुपाण तथा गुप्तयुगीन है। यहा से कलापूण बतनो के टुकडो तथा मृण्मय कलाकृतियो की बहुत बड़ी सध्या मे प्राप्त होना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि कुषाण एव गुप्तकाल मे माभर मे अच्छे कलाकार रहते थे और यह कलात्मक मृ पानो एव मृण्मय क्लाकृतियो के निमाण मे सिद्ध हस्त थे। मृण्मय कलाकृतिया गोल होने के साथ-साथ उभरी कला को अपने मे स्थान देती है। इनमें एक कृति शिव के मुकुट मे डमरू तथा गले मे सप माला धारण किये प्रस्तुत करती है। यह द्विबाहुधारो प्राकृति है । एक कृति एक विचित्र देवी की है जो कि एक अद्भुत शिरोवेष्टन को स्थान देती है तथा जिसके बाये हाथ मे एक पात्र है। हाथ से बनी अन्य कृतियो मे एक पुरुषाकृति पासीन मुद्राये है तथा दूसरी ऐसे तोदधारी मानव की है जो कि शिखा के माथ-साथ यज्ञोपवीत धारण किये है। एक कृति मे महिपामुर का अवन है समे माला धारण किये या तो महिषासुर है या भसे पर आम्द यम है। उल्लेखनीय सामग्री मे यक्षणियो की प्राकृतिया, उमा महेश्वर, पात्रधारी कुवेर प्रादि है। इसी प्रकार को मानव तथा पशु प्राकृतिया बहुत बडी सय्या मे यहा मे प्राप्त हुई थी।' इनके अतिरिक्त यहा से बहुत से चौपड के पासे प्राप्त हुए हैं। वे मिट्टी तथा हड्डी के बने हैं। लोहे की बनी वस्तुप्रो मे यहा मे लकड़ी के दो टुपडो को जोड़ने के नाहे के टुक्डे, हमिया, लटकने वाले दीप, लोहार के प्रयोग के कई प्रौजार आदि भी प्राप्त [ 79 ] हुए है। नित्य प्रति प्रयोग के मृद पात्रो मे सुराही का वह भाग है जिस पर शिव की जटा से गगा निकलती प्रदर्शित की गई है। कई पात्रो की टोटिया भकती हुई महिलायो को घडे धारण किये प्रदर्शित करती है। अन्य मे मकरगिर, सिंह शिर वाराहशिर मादि है। यही नही नलियासर (साभर) मे कुपाण एव गुप्तकालीन भवनो के अवशेष भी प्राप्त हुये है। इन भवनो के प्रस्प को देखने से स्पष्ट ज्ञात होता है कि ई पू की द्वितीय शताब्दो से लेकर नौवी शताब्दी तक किस प्रकार के घरो मे लोग निवास किया करते थे। जयपुर राज्य के पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई से पूर्व भी सांभर मे लगभग सौ वष पूर्व खुदाई की गई थी और तब छोटी छोटी वस्तुप्रो के माथ एक छोटी मुहर प्राप्त हुई थी जिस पर अकित अक्षरो के अध्ययन से यह अनुमान लगाया गया था कि मुहर ई पूर्व की तीसरी शताब्दी की थी। इस अनुमान की पुष्टि प्रागे की गई क्योकि इस स्थान से इसकी अन्य सामग्री भी प्राप्त हुई। इस प्रकार से साभर मे ईमा पूर्व की तीसरी शताब्दी से लेकर चौहान युग तक यहा सस्कृति पनपी एव विकास को प्राप्ति हुई। यह यहा पर हुई खुदाईयो से स्पष्ट हो गया। नगर -(जिला टोक) (ई पूर्व 00 से ई सन् 200) इसी सरकृति को पोषक दूसरा नगर जो किसी समय मालव नगर कहलाता था और जो "नगर" नाम से भूतपूर्व जयपुर राज्य के उरिणयारे ठिकाने मे स्थित था, खुदाई का आधार बना। यहा पर सौ वर्ष से अधिक पूर्व कालाईल महोदय को 6000 मालव सिक्के इस प्रकार पड़े मिले थे जैसे घोघे समुद्र के तट पर पडे पाये जाते है । यहा से प्राप्त अवशेष ई पू की प्रथम शताब्दी से लेकर मा की तीसरी शताब्दी तक के है । एक हजार से अधिक पात्रो के टुकडे तथा लगभग 500 अय छोटे छोटे अवशेष यहा से खुदाई द्वारा पाप्त हुए थे। लगभग 1000 मालव सिक्के तथा बहुत सी पाहत मुद्रायें टीले के ऊपर से उत्खननकर्ता द्वारा बटोरे गये थे। यहाँ के मृदा भाडो के अवशेष अधिकतर लाल थे। कुछ थोडे खण्ड स्लेटी रग के भी पाये गये थे। यहा पर जो अन्न भरने के मटको के टुकडे प्राप्त हुये उसमे हमे यह ज्ञात होता है कि उस समय ऐसे पात्रो पर उगली से डिजाइन बनाये जाते थे। कुछ मटको के अवशेप इस कथन की पुष्टि करते है कि उन पर फिसलाहट के साथ साथ अलत कलात्मक नमूने है। ऐसे अलकरण हाथ की उगलियो से बनाये गये थे। पकाने के पात्रो मे अधिकतर लाल रंग के पात्र ही है। इन पानी मे एक मृदभाण्ड गोल पैदे का चौडे मुख का मिला था जिसके बैठकीदार घेरा था। उत्खनित खईयो से जो मृदपात्रो के टुकडे मिले वे असय्य होने के साथ नाना प्रकार के भी है। बड़े बड़े अन्य सग्रह-मटको के टुकडो से लेकर छोटो छोटी हाडियो खाना [ 80 ] के टुकडे भी यहा से मिले । ये सुन्दर होने के साथ साथ बहुत ही उपयोगी भी थे। पूरे पात्र तो बहुत कम मिने पर पानी के टुकडो की सख्या तो इतमी थी कि एक ठेला भराया जा सकता था। जिस मिट्टी का प्रयोग पायो में किया गया वह सब लाल, गुलावी व भूरी होने के साथ साथ पानी का मोखने वाली थी। सलेटी र ग के पात्र सम्भवत वे पात्र ये जो कम पके छोड दिये गये। बहुत से पात्रो पर पकाने से पूर्व चिकनाहट कर दी गई थी। चिकनाहट करने से पूर्व उन पर गुलाबी, हल्का लाल रंग गहरा लाल रग गेरू के माध्यम से लगा दिया गया था। काली चिकनाहट काजत के प्रयोग से सम्भवत पाई गई थी। पानो के ढक्कन को उठाने की युडी भी लगी है । छिडकाव के लिये छेददार पात्र तथा टोटीदार पात्र भी यहा से पर्याप्त संख्या मे मिले है। पात्रो मे धूपदान, हत्येदार सूराही,लोटे, टोटीदार तथा साधार बैठकीदार प्याले उल्लेखनीय है । ये सब पान सामग्री गुप्तकालीन है । उत्तर कुपारण व गुप्तकालीन पानो मे एक हत्थेदार तम्तरी तथा एक प्राकषक पून पत्तियो से अलकृत पात्र है। इस समय के अन्न सग्रह पात्र मोटी बनावट के न होकर पतले है। यहा से पर्याप्त मात्रा मे सफेद खडिया के बमे उभरे अलकृत पात्र प्राप्त हुये है । इस प्रकार की सफेद खडिया चमकदार चीनी के समान है। यहा के अलकरण की बिशेपता निम्न प्रकार है (अ) कुछ पर मानव एव पशु प्राकृतिया है । (ब) कुछ पर रेखा और रगयुक्त चित्र है। (स) कुछ पर छापो द्वारा पालेखन है। (द) कुछ पर अन्दर कुरेदे हुये या खुदाई द्वारा किये पालेख है। (इ) कुछ पर पालेख उभरे हुये हैं। (अ) श्रेणी में प्राप्त मृदपायो के अघशेष श्वेत खडिया और लाल रंग के पात्रो के हत्थो का है । इन पर कही बन्दर को प्राकृति है और कही स्त्री तथा पुरूप की प्राकृतिया भी बनी मिलती है। कुछ पात्रो मे मकर का शिर धारण किये हुये टोटिया भी मिली है। सफेद खडिया के बने पात्रो मे दो कटोरी के टुक्ड सुदर हमो की क्सिी लता से घिग हुमा प्रदर्शित करते हैं। पुछ पर अगूर वी पत्ति का प्रालेखन है। इन अवशेषो के माथ ही भवनो के भग्नावशेष पूरी ईटे तथा ईटी के टुकड़ो के रूप में भी यहा से प्राप्त हुये है। पूरी ईटो प्राकार में 3इच मे 135 इच x9इच - [ 8 ] x225 से 2 52 इच की है। इस स्थान से कुछ स्लेटी पत्थर मे बनी प्राकृतिया भी प्राप्त हुई है। इनमे एक ऐसी प्रतिमा का अवशेष मिला है जिसमे कमल पर किसी देवता का पैर रखा है। यहा से प्राप्त महिषासुरमदिनी का अकन भी सुदर है। एक छोटे फलक मे मछली तथा दूसरे आलेखन खुदे हुए है। गोलाई मे खुदा एक मुख शिवलिंग यहा से प्राप्त हुग्रा है। यहा से एक गणेश का अकन भी खुदा हुआ स्लेट पत्थर पर मिला है। यह अकन बहुत ही सुन्दर है। इसमे गणेश के दो हाथ है, तथा तौंद निकली है तथा इनके दाहिने हाथ मे पाशा है तथा बायें मे मोदक है। एक अन्य अकन मे एक देवी बैठी हुई है। देवी सम्भवत दुर्गा है किन्तु उसका दाहिना हाथ ऊपर की ओर उठा है। एक खडी प्रतिमा लक्ष्मी की हाथ में कमल लिये हुये भी यहा से मिली है। स्लेट पत्थर मे एक सुन्दर अकन तीन फणधारी नाग का है। मकराकृति को धारण करते हुये दूसरे स्लेट-पत्थर के कोने पर टे फलक मे भी कला का अच्छा प्रदशन है। ये सब कलाकृतिया गुप्तोत्तर काल की है। उत्खनन से कुछ लेख भी प्राप्त हुये थे । ये पात्रो पर बहुधा अकित लेख प्राप्त हुये थे । ये लेख या तो किसी का नाम है या यो ही प्रदशन हेतु दिये गये है। ये प्रारम्भिक गुप्त लिपि मे लिखे है - इनमे से एक है। क्षरोस, योग, "स", "अ" यदि पान खण्डित न होते तो उनके पूरे होने से अर्थ निकाला जा सकता था । एक मृदपात्र पर "पशु" भी लिखा मिलता है। केवल दो मिट्टी की थालियो पर दो ऐसे लेख मिलते है जो सम्भवत कुम्हारो के नाम थे। एक पर "डोमर" तथा दूसरे पर "मागे" लिखा मिलता है। इन सबकी लिपि गुप्त तथा गुप्तोतर कालीन ब्राह्मी हैं। नगर से प्राप्त अन्य सामग्री हैं - उपरिलिखित सामग्री के अतिरिक्त सीप की चूडिया, मणके, पत्थर की मूर्तिया, धातु (विभिन्न प्रकार), शीशे, हड्डी आदि की बनी वस्तुप्रो के अवशेष । "नगर से प्राप्त अवशेषो मे मुख्यतया सफेद प्लास्तर की तरह की मिट्टी की बनी मृण्मय कलाकृतिया तथा इसी मिट्टी के बने मृदपात्र है। इस श्वेत मिट्टी से कल त्मक ढग के पान तथा कलाकृतियो मे उस समय मे पर्याप्त संख्या में बने मृदपात्रो मे साधारण तथा उभरे डिजाइनदार पात्र भी है। कुछ ऐसे कलापूर्ण है कि उनकी कला को देखते ही बनता है। ऐसे मृदपात्रो मे क्लापूर्ण चम्मच है जिन पर कई प्राकृतिया बनी है। कलापूर्ण कृतियो मे पुरुष व पशु आकृति वाले पान, रेखा व रग से चित्रो वाले पात्र तथा वेलदार डिजाईनो के पात्र, कुरेदी हुई डिजाईनो को पात्र तथा उभरे हुए डिजाइन वाले पान हैं। श्वेत प्लास्तर के समान मिट्टी से बनी मुण्मय कलाकृतियो मे कामदेव व रति - 2 [ 82 ] का अकन है । यह छोटा मानव मिर जो कि शोर-सतप्न मुद्रा मे दर्शाया गया है। तथा यक्षी की प्रतिमा खडी त्रिभग मुद्रा मे (बायें हाथ को पदयावलम्बित मुद्रा में किये हुए तथा दाहिने हाथ से एक वृक्ष की डाल पकडे हुये, (गालभजिका), महिषासुर मदिनी आदि विशेपतया उल्लेखनीय है । प्राप्त सामग्री से यह निश्चयत सिद्ध हो जाता है कि यह क्षेत्र भी रेढ क्षेत्र के समान मालवो का एक प्रमुख क्षेत्र कभी रहा होगा। मालवो के पश्चात भी यह क्षेत्र आबाद रहा और गुप्तकाल के पश्चात् तक सम्भवत यहा पर सास्कृतिक चहल-पहल रही। रगमहल (जिता गगानगर)- उत्तरी राजस्थान के बीकानेर क्षेत्र मे सूरतगढ़ के निक्ट (5 कि मी ) जिला श्री गगानगर मे घग्घर के पेटे मे कई टीले है। मुय्य टीला 250 मीटर का है जो लगभग 10 मीटर ऊचा है। रगमहल मे जो खुदाई की गई उसने भी ईमा के प्रारम्भिक युगो की संस्कृति पर अच्छा प्रकाश डाला है । इस क्षेत्र से तथा इसके आसपास तेस्सीतोरी की प्रारभिक गुप्तयुग की बड़ी मृणय कलाकृतिया सन् 1918 मे प्राप्त हुई थी। रगमहल के उत्तर पूर्व मे 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित स्थान पर स्लेटी रग के मृदपानो की प्राप्ति ने यह प्राशा दिलाई थी कि रगमहल से प्राय सभ्यता के सूचक अवशेषो की सभवत प्राप्ति हो पर "रॉयल स्वैडिश एक्सपीडीशन" द्वारा डॉ हनारिड के निदेशन में की गई खुदाई द्वारा यहा से ऐसे लाल पान मिले जिन पर काले रंग के डिजाइन बने हुये है । यद्यपि कुछ पालो के टुक्डो पर वही डिजाइन पाये गये जिनको देखकर पात्रो पर हडप्पाकालीन डिजाइन के होने का भ्रम होता था पर छानबीन के पश्चात् उस क्षेत्र मे एक नई सस्कृति होने की पुष्टि हुई। यह सस्कृति अपने लाल पानो पर काले रग से डिजाइनो के कारण तथा हडप्पा मे प्राप्त चिनो की समता वाले अलकरणो के कारण तथा अन्य सामग्री के आधार पर रगमहल सस्कृति कहलाई। यहा की सस्कृति कुषाण कालीन एव पूर्व गुप्तकालीन के समकक्ष कही जाय तो अत्युक्ति न होगी। यहा के पान क्षेत्रीय कारीगरी का अक्न होने के कारण राजस्थाT के वाहर की सस्कृति से अछूते रहे, यह ध्यान देने को वात है । रगमहल से खुदाई के आधार पर प्राप्त सामग्री मे घटाकार मृदपात्र अपनी विशेषता रखते है। इन पर चित्रित चिन्ह है। ये कलात्मक अलकरण लाल भूमि पर काले रंग से बने हुये है। कुछ पानो पर ये मिट्टी मे कुरेदे हुये भी हैं। ये उसी प्रकार के है जैसे हस्तिनापुर से प्राप्त हुये है और जिनको ईसवी सन् के प्रारम्भिक युगो का माना गया है। कुछ पात्र लाल रग से रगे पानो पर काले रंग का पुट रखते है। ये भी ईसा की प्रारम्भिक शताब्दी के है। यहा की अन्य उपलब्धियो मे टोटीदार घडे है। ये छोटे व बडे दोनो प्रकार - [ 83 ] । के है,। कुछ वैसे ही है जैसे भीटा से प्राप्त हुये है। कुछ का आकार वैसा ही है जैसा भमन थेरी से प्राप्त घडो का है। लाल पालिशदार वे पात्र भी जो छिडकाव मे प्रयोग किये जाते होगे, इस स्थान से पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हुये थे । इन पात्रो मे कुछ सरोटी रग के भी है और तक्षशिला के सिरकप स्थान से प्राप्त पात्रो से सहज मे ही साम्य प्रस्तुत करते है। कुछ मृदपानो पर कपडो की छाप है। ऐसा प्रतीत होता है कि कुम्हार ने पान बनाते समय कपडे को गीली मिट्टी पर रख दिया और कपडे को चुनने की छाप पान पर पड गई हो। दिन-प्रतिदिन के उपयोग के पात्रो मे खाना पकाने के बतन तथा कढाई आदि भी यहा से प्राप्त हुये है। अय पात्रो मे छोटे-बडे प्याले, पटोरे तथा बतनो के ढक्कन हैं। इनके साथ ही दीपक, दीपदान, दीप-वैठकें तथा धूपदान भी यहा से प्राप्त हुये है। रगमहल से 12 कि मी पूर्व मे वडा पाल के टीले से भी मूर्तियाँ मिली है। सूरतगढ के पश्चिम मे सरदारगढ मे भी चित्रित वतन मृदपान मिले है। सरदारगढ के दक्षिण पूर्व मे भैरापुर मे भी बर्तन मिले है। यहा से प्राप्त पात्र छेददार साचे से बने तथा रोगनदार है । सम्भवत लाल रग का प्रयोग अलकरण एव चरक देने के लिये पानो पर हुआ करता था। कलाकृतियो मे मानव प्राकृतिया भी प्राप्त हुयी है । मृण्मय कलाकृतियो मे कतिपय पशु-आकृतिया है। इनके साथ ही कई वच्चो के खेलने की पहियेदार छोटी मिट्टी की गाडिया भी यहा से मिली है । भीनमाल (जिला जालोर) राजस्थान पुरातत्व विभाग द्वारा जालोर जिले में स्थित भीनमाल स्थान पर सन 1954 मे खुदाई की गई थी पर टीले को ग्रामीणो द्वारा ईटो की प्राप्ति की धुन मै सोद दिये जाने के कारण भीनमाल के विषय मे कुछ ऐतिहासिक तथ्य प्रकाश मे नही आ सके । साहित्य के आधार पर हम सब जानते हैं कि भीनमाल को श्रेय महाकवि माघ को जन्म देने का है पर हमको गुप्तोत्तर काल से पूर्व का भीनमाल का इतिहाम नही ज्ञात है। खुदाई द्वारा प्राप्त मृदभाण्ड खण्डो से तथा क्षत्रप सिक्को की वहा से प्राप्ति से यह अनुमान लगाया जा जकता है कि ईमा को द्वितीय या प्रथम शताब्दी से यहा पर सांस्कृतिक जीवन पनपा। यह हमे यहा से बहुत बडी संख्या में प्राप्त लाल रगी भूमि पर काले रग के चित्रण से स्पष्ट होता है। ऐसे पान रगमहल से भी प्राप्त हुये है। माघ के समय तक और उसके पश्चात भी यह स्थान सास्कृतिक क्षेत्र बना रहा। इसका अनुमान यहा पर और यहा के आसपास स्थित भवनो के अध्ययन से भी होता है। यहा के मृदपाशो पर विदेशी प्रभाव देखा गया है। इनमे यूनानी दुहत्थी सुराही की प्राप्ति विशेष उल्लेखनीय है । यो भीनमाल को प्राचीन काल मे श्रीमाल भी कहते थे।
[ 84 ] इस प्रकार राजस्थान के विभिन्न भागो में किये गये उत्खननो से प्रागैतिहासिक राजस्थान की काफी जानकारी मिली है। इससे स्पष्ट हो गमा है कि राजस्थान के निवासी ससार के अन्य सभ्य देशो के निवासियो की भाति ही भाजन संग्रह की अवस्था से लेकर भोजन उत्पादन की विभिन्न अवस्थामो तक निरन्तर प्रगति करते रहे। उपयोगी, अलकारिक तथा ललित कलामो के विकास में भी वे किसी से पीछे न रहे। यहा मानव सवप्रथम दक्षिण-पूर्वी राजस्थान मे आया और वह यहा ऐतिहासिक काल तक बराबर रहा। पश्चिमी राजस्थान व उत्तरी राजस्थान में दूमरी व तोमरी खेप में आये। उनरी राजस्थान में प्रथम तीन खेपो का पता नही चला है लेकिन उनकी नगर सस्कृति का अवश्य पता चला है। इसके समापन होने के बाद वे लोग आये जो काश्त करते थे तथा पशुपालन मे भी रूचि लेते थे। इस निबन्ध मे सक्षेप में राजस्थान के प्रागैतिहास पर प्रकाश डाला गया है। अभी तक राजस्थान के प्रागैतिहासिक पुरातत्व का व्यवस्थित रुप से अध्ययन नहीं हुआ है ताकि उस युग का सुसंगत वणण किया जा सके। अभी भी प्रागैतिहास को और ज्यादा जानने के लिये विस्तृत उत्खनन की आवश्यक्ता है। अभी तक जो भी पुरातात्विक स्थलो का अध्ययन हुआ है तथा यहा के उत्खनन कार्यों की रिपोर्ट व उनके सम्बन्ध मे निवन्ध प्रकाशित हुए हैं, उनसे सुसगत जानकारी नहीं मिली है। आवश्यकता है कि पश्चिमी, उत्तरी व दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के पुरातत्व पर विस्तार से अध्ययन हो तथा सर्वेक्षण रिपोट प्रकाशित हो।
ऐतिहासिक राजस्थान राजस्थान अथवा रायथान का शब्दिक अर्थ राजधानी है। इस अथ से यह शब्द बहुत पहले से प्रचलन मे था। जोधपुर महाराजा भीमसिंह ने 1791 ई मे मराठो के विरुद्ध सम्मिलित कायवाही के उद्देश्य से जयपुर नरेश को लिखे पत्र मे 'राजस्थाना' (राजधानियो) मे एकता की इन्छा प्रकट की अत इतना तो निश्चित है कि कनल जेम्स टॉड से बहुत पूर्व राजस्थान शब्द प्रचलित था। टॉड ने अपने नथ 'एनाल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज आफ राजस्थान' मे सर्वप्रथम इस शब्द को प्रदेशवाची अथ दिया। वास्तव मे राजस्थान का अथ स्थानो का राजा 'अथवा 'श्रेष्ठ स्थान' है। इस प्रकार प्रारम्भ मे राजस्थान शब्द का अथ राजा का स्थान था किन्तु आज उसका अथ स्थानो का राजा या श्रेष्ठ स्थाा है। कर्नल जेम्म टॉड ने ही राजस्थान के धर घर मे लियोनीडाज और करण करण पर थर्मोपाली जैसे युद्ध होने की बात कही थी जो कीर्तिस्तम्भ व हवामहल की भांति राजस्थान की पहचान बन गई । शिलालेखो व प्राचीन ग्रथो में राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रो के अनेक नाम मिलते है । यहा समय समय पर शासन करने वाली जातियो तथा भौगोलिक विशेषतामो के कारण यह नामकरण हुए थे मरून धन्व नाम रामायण व भागवत मे जोधपुर सम्भाग के विभिन्न क्षेत्रो के लिये प्रयुक्त किये गये । 'जागल' बीकानेर प्रदेश का महाभारत कालीन नाम है। कालान्तर मे 'जगलधर वादशाह' बीकानेर के नरेशो की उपाधि थी। मत्स्य महाजनपद की राजधानी विराट- नगर थी और इसका क्षेत्र वतमान जयपुर अलवर व भरतपुर के कुछ भागो तक विस्तृत था। ब्रज से सटे राजस्थान के वर्तमान क्षेत्र मे ही प्राचीन शूरसेन स्थित था। बीकानेर-नागोर सीमा त क्षेत्र साल्व राज्य था। शिवि जनपद का स्थान चित्तोड के निकट था जबकि भादानक क्षेत्र भरतपुर-धयाना सीमा था। आधुनिक मेवाड को मेदपाट, प्राग्यवाट आदि नामो से जाना जाता था। सीकर से साभर तक का क्षेत्र अनतगोचर, साभर सवा लाख गावो के कारण सपादलक्ष कहलाता। जालोर का प्राचीन नाम जबालिपुर, मेडता का मेदान्तक, पाली का पल्लिकानगरी, मडीर का माण्डव्यपुर, चित्तोड का चित्रकूट, जैसलमेर को माड नागोर का अहिछत्रपुर, आबू का अबु द । राजस्थान की धरती पर मनुष्य का निवास प्राज से एक लाख वर्ष पूर्व से माना जाता है। बनास गभीरी, वेडच इत्यादि नदियो के किनारे मिले भौडे घडे हुए पत्थर के औजारो के बल पर विद्धान यह स्वीकार करते हैं कि प्रारम्भिक
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[ 87 ] था। भरतपुर साभर तथा अजमेर से काफी बड़ी मात्रा मे गुप्त राजानो के सिक्के प्राप्त हुए हैं। गुप्त कालीम स्थापत्य सम्बन्धी विशेषतानो से युक्त मन्दिर गोडवाड, मुकुदडा, भीनमाल, मडोर, कामा, प्रोसिया, और वेदला आदि राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रो मे निर्मित किये गये अत राजस्थान का गुप्तो के प्राचीन होना निश्चित है। सामान्यत यह स्वीकार किया जाता है कि चद्रगुप्त प्रथम के शासन काल से लेकर कुमारगुप्र के बाद तक राजस्थान मे गरूड युक्त गुप्त राज्य मुद्रा से शासन काय सम्पन होता रहा। गुप्त शामन की अवधि डेढ सौ वष के लगभग थी । मालव, योधय और शको के छोटे छोटे राज्यो को, समुद्रगुप्त और चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य की विजयवाहिनियो ने कुचल दिया । परवर्ती निवल गुष्ट शासवो के समय राजस्थान पर हूण आक्रमण हुए। शक्तिकुमार के अटपुर अभिलेख से ज्ञात होता है कि गुहिल वशी अल्लट के शासक का विवाह हरियादेवी नामक हूण राजकुमारी से हुआ था। पदमनाभ द्वारा रचित काहडदे प्रबंध के अनुसार जालोर के शामक कान्हडदे के अधीन हूण, यादव, परमार गुहिल आदि थे। दसवी शताब्दी के जैन विद्वान सोमदेव सूरी ने नीतिवाक्यामृत नामक ग्रन्थ मे एक परम्परा का उल्लेख किया है जिसके अनुसार एक हूण शासक (सम्भावत मिहिर- कुल) ने चित्रकूट पर विजय प्राप्त की थी। प्राचीन माध्यमिका अथवा वर्तमान चित्तोड का क्षेत्र चित्रकूट नाम से जाना जाता था इसका साक्ष्य गुलि रायमल्ल का उदयपुर अभिलेख प्रस्तुत करता है जिसमे कहा गया है कि अरिसिंह ने चित्रबूट (चित्तोड) की रक्षाथ प्राणोत्सग कर दिया। कोटा क्षेत्र का भीमचौरी अभिलेख भी राजस्थान पर हूण प्रारमण का प्रमाण देता है । इस अभिरेख के अनुसार ध्र वस्वामी नामक व्यक्ति हूणो के विरूद्ध युद्ध करते हुए मारा गया । राजस्थान के अनेक क्षेत्रो से हूणो की मुद्राए भी मिली है। हार्नले नामक विद्वान ने मारवाड के किसी क्षेत्र से मिली हुई 175 मुद्राओ का परीक्षण कर उ हे हूण शासक तोरमण की मुद्राऐ बताया। रनियावास, खोह, अबनेरी, खेजरोली, लोसल (सीकर जिला), साभर, देसूरी, नागोर, जालोर, चोहटन मरदारगढ, पीपलाज, सायरा-रणकपुर माग, जूनाखेडा (झालावाड जिला) तथा मेवाड से भी हूणो के चादी और तावे के सिक्के मिले है। अत इतिहासकारो द्वारा यह स्वीकार किया जाता है कि गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात राजस्थान के कुछ भागो पर हूणो की सत्ता स्थापित रही । माण्डव्यपुर (मडोर) के प्रतिहारो का प्रारम्भ छठी शताब्दी का मध्य भाग माना जाता है। पौराणिक मा यताप्रो के अनुसार माडू ऋषि ने मडोर की स्थापना की थी। वतमान जोधपुर से आठ किलोमीटर उत्तर मे स्थित मडोर के प्रतिहार वश की जानकारी के अधिक साधन उपलब्ध नहीं है। मडोर के प्रतिहार वशी शासक बाउक का जोधपुर अभिलेख तथा उसके भाई क्क्कुक के जोधपुर मे 32 किलोमीटर उत्तर पश्चिम मे स्थित घटियाला (प्राचीन नाम रोहिंसवप) से प्राप्त [ 86 ] पापाए युग के मानव ने गजस्थान को धरती पर अपने प्रिया-कलाप पारम्भ कर दिये थे। सिन्धु घाटी सभ्यता के समय राजस्थान मे ममद्ध सभ्यता के अवशेष कालीबंगा से मिले हैं। महाकाव्य काल की अनेक घटनाये जागल विराट- नगर (वैराठ), मरूयन्त्र महकान्तार उलूक, अ• द, अहिछयपुर तथा अनेक अन्य राजस्थानी प्रदेशो से सम्बन्धित रही। पाहड, बागोर (भीलवाडा) रगमहल (गगानगर), रेड (जयपुर), साभर, नोह (भरतपुर) इत्यादि स्थानो मे प्राप्त पुरातात्विक सामगो के बल पर पुरातत्त्ववेत्ता यह स्वीकार करते हैं कि ईसा से बहुत पहले ही राजस्थान मे सुविकसि र सभ्यता विद्यमान थी। ईसा से लगभग छ सौ वप पूर्व मत्स्य और शूग्मेन जैसे महाजनपदो का उत्थान व पतन भी राजस्थान की भूमि पर ही हुआ। कठिन भौगोलिक परिस्थि- तियो के कारण पावागमन दुष्कर था और प्रारम्भ से ही बडी बडी फौजे 'इस क्षत्र की भोर मुह करने से कतराती थी। रेगिस्तान और पहाडो के कारण प्रारम्भ से ही इस धरती ने शरणागत की रक्षा की। यूनानी विजेता सिकदर से पराजित मालव, योधय तथा शिवि जातियो ने राजस्थान मे ही आश्रय लिया था। शिवि चित्तोड के समीप गिरी, मालव जयपुर के पास वागरछल और योधय बीकानेर के निकट जोहियावाटी मे आ कर उस गये। जयपुर के नजदीक 'वीजक पहाडी' पर ईटो से चुना हुमा गोल मन्दिर, अशोक मा भान अभिलेख, चित्तोड दुर्ग का निर्माता चन्द्रराव मोरी, बप्पा रावल का मौय शासक मान पोरी से चितोड छीनने,सम्भवी परम्परा, मेजर एस्किनी द्वारा राजस्थान की जातियो की सूची मे मौय जाति को सम्मिलित करना आदि कुछ ऐसे तय है जो यह साक्ष्य प्रस्तुत करते है कि चन्द्रगुप्त व अशोक के समय राजस्थान भी मौर्य साम्र ज्य का ही अग था । माय वश के शासन का अत कर पुष्यमिन ने मगध में एक नये वश की स्थापना को जो इतिहास मै सु ग वस के नाम से प्रसिद्ध है। सुग शासन काल में माध्यमिका और साकेत पर यूनानी आरमरण का उल्लेख प्रमिद्ध विद्वान पानजनी ने दिया है। माध्यमिका वत- मान चित्तोड के निकट स्थित नगर था। अधिकाश विद्वान पुष्यमिन सुग के समय हुए इस माम मरण का नेता टेमेट्रियस अथवा मनेन्डर को मानते हैं । नलियासागर, बैराठ तथा नगरी म यूनानियों के सिक्के मिले है जो यह साक्ष्य प्रस्तुत करते ह कि राजस्थान पर यूनानिया के मात्रमण हुए। कुपारणा और शव क्षत्रपो का प्रभाव भी राजस्थान के कुछ क्षेत्रो पर रहा। इसकी पुष्टि करते हैं वासवाडा चित्तोड, साभर तथा पुष्कर से प्राप्त शका के सिक्के और गगानगर से मिली हुई युपारणा की मुद्राए । सौराष्ट्र के शक शामक द्रदामा में 150 ई के जूनागढ़ अभिनेख स भी राजस्थान के कुछ भागो पर शम शासन की पुष्टि होती है। रूद्रदामा का जूनागढ़ ममिलेय ऐसा प्राचीनतम अभिलेख है जिसमै मरदेश का वणन मिलता है। ईसा की चौथी शताब्दी में प्रारम्भ में राजस्थान गुप्त माम्राज्य में सम्मिलित [ 87 ] था । भरतपुर साभर तथा अजमेर से काफी बड़ी मात्रा मे गुप्त राजानो के सिक्के प्राप्त हुए है। गुप्त कालीन स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताग्रो से युक्त मन्दिर गोडवाड, मुकुन्दडा, भीनमाल, मडोर, कामा, प्रोसिया, और वेदला आदि राजस्थान के विभिन क्षेत्रो मे निर्मित किये गये प्रत राजस्थान का गुप्तो के प्राचीन होना निश्चित है। सामान्यत यह स्वीकार किया जाता है कि चन्द्रगुप्त प्रथम के शासन काल से लेकर कुमारगुम के वाद तक राजस्थान मे गरूड युक्त गुप्त राज्य मुद्रा से शासन कार्य सम्पन होता रहा। गुप्त शामन की अवधि डेढ सौ वर्ष के लगभग थी । मालव, योधैय और शको के छोटे छोटे राज्यो को समुद्रगुप्त और चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य की विजयवाहिनियो ने कुचल दिया । परवर्ती निवल गुह शासको के समय राजस्थान पर हूण अाक्रमण हुए। शक्तिकुमार के अटपुर अभिलेख से ज्ञात होता है कि गुहिल वशी अल्लट के शामक का विवाह हरियादेवी नामक हुरण राजकुमारी से हुआ था। पद्मनाभ द्वारा रचित कान्हडदे प्रबंध के अनुसार जालोर के शामक कान्हडदे के अधीन हूण, यादव, परमार गुहिल आदि थे। दसवी शताब्दी के जैन विद्वान सोमदेव सूरी ने नीतिवाक्यामृत नामक ग्रय मे एक परम्परा का उल्लेख किया है जिसके अनुसार एक हूण शासक (सम्भावत मिहिर- कुल) ने चित्रकूट पर विजय प्राप्त की थी। प्राचीन माध्यमिका अथवा वर्तमान चित्तोड का क्षेत्र चित्रकूट नाम से जाना जाता था इसका साक्ष्य गुहिल रायमल का उदयपुर अभिलेख प्रस्तुत करता है जिसमे कहा गया है कि अरिमिह ने चित्रकूट (चित्तोड) की रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग कर दिया। कोटा क्षेत्र का भीमचौरी अभिलेख भी राजस्थान पर हूण प्रारमण का प्रमाण देता है। इस अभिरेख के अनुसार ध्रुवस्वामी नामक व्यक्ति हूणो के विरूद्ध युद्ध करते हुए मारा गया । राजस्थान के अनेक क्षेत्रो से हूणो की मुद्राएं भी मिली है। हानले नामक विद्वान ने मारवाड के किसी क्षेत्र से मिली हुई 175 मुद्रानो का परीक्षण कर उहे हूण शासक तोरमण की मुद्राऐ वताया। रनियावास, खोह, अबनेरी, खेजरोली, लोसल (सीकर जिला), साभर, देसूरी, नागोर, जालोर, चोहटन मरदारगढ, पीपलाज, सायरा-रणकपुर माग, जूनाखेडा (झालावाड जिला) तथा मेवाड से भी हूणो के चादी और तावे के सिक्के मिले है। अत इतिहासकारो द्वारा यह स्वीकार किया जाता है कि गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात राजस्थान के कुछ भागो पर हूणो की सत्ता स्थापित रही। माण्डव्यपुर (मडोर) के प्रतिहारो का आरम्भ छठी शताब्दी का मध्य भाग माना जाता है। पौराणिक मा यताप्रो के अनुसार माडू ऋपि ने मडोर की स्थापना की थी। वर्तमान जोधपुर से आठ किलोमीटर उत्तर में स्थित मडोर के प्रतिहार वश की जानकारी के अधिक साधन उपलब्ध नहीं है। मडोर के प्रतिहार वशी शासक बाउक का जोधपुर अभिलेख तथा उसके भाई कक्कुक के जोधपुर में 32 किलोमीटर उत्तर पश्चिम मे स्थित घटियाला (प्राचीन नाम रोहिंसवूप) से प्राप्त ? यह [ 88 ] पाच अभिलेखो मे अकित तथ्यो के आधार पर डा दशरथ शर्मा, प्रार सी मजुमदार, दिनेशचन्द्र शुक्ल, वैजनाथ पुरी आदि ने इस वश का इतिहास निर्मित करने के प्रयत्न किये है। बाउक का अभिलेख वि स 894 (837 ई ) का है तथा घटियाला मे प्राप्त कक्कुक के कुल पाच अभिलेखो मे मे तीन की तिथि वि स 918 (861 ई ) है। बाउक व कक्कुक के अभिलेखो के आधार पर उनका आदि पूवज हरिशच द्र था जिमका समय इतिहासकारो ने छठी ईस्वी शताब्दी का मध्य भाग माना है। इतिहास मे मडोर के प्रतिहार वंश के अतिरिक्त दो अन्य वश भी प्रतिहार कहे जाते थे। इन तीनो राजवशो मे परस्पर क्या सम्बध था प्रश्न प्राज तक बिवाद का विषय बना हुआ है। मडोर के अलावा जो दो अन्य वश ज्ञात हैं उनमे से एक कन्नोज पर शाम न करने वाला प्रतिहार वश है जिसमे नागभट्ट, व सराज, मिहिरभोज व महे द्रपाल जसे पराक्रमी नरेश हुए। वश से सम्बन्धित अधिकाश साधनो मे इस वश को गुजर-प्रतिहार वश कहा गया है। एक अन्य वश दक्षिणी गुजरात स्थित लाट देश पर शासन करता था, नन्दिपुरी इसकी राजधानी थी । लाट के शासक दद्द ने हप वद्ध न से पराजित वल्लभी के ध्र व भट्ट को शरण दी थी। लाट के शासक गुजर कहलाते थे। मामान्यत यह स्वीकार किया जाता है कि मडोर, कन्नोज व लाट मे शासन करने वाले राजवशो मे परस्पर रक्त सम्बन्ध था । इस मान्यता के समथन मे निम्न तक दिये जाते है- (1) कन्नोज व मडोर के राजवशो को वशावलिया देखने से ज्ञात होता है कि दोनो के कई शासको के एक जैसे नाम थे यथा नागभट्ट व कक्कुक । (2) माण्डव्यपुर व लाट दोनो राजवशो मे दद्द नामक शासक हुए । (3) पार मी मजूमदार की मान्यता है मिडोर तथा कनोज दोनो ही राजवशो के लेखो मे उहोने लक्ष्मण को अपना प्रादि पूवज बताया है। तीनो राजवशो मे सम्बन्ध स्थापित करने के लिये दिये गए तों का विश्लेपण करने पर यह धारग्गा सत्य नही लगती क्योकि-(अ) माण्डव्यपुर के शासको ने . अपने लेखा मे स्वय को सदैव प्रतिहार कहा है। कभी भी उन्होने अपने नाम के माय गुर्जर नही जोडा। इसके ठीक विपरित लाट शासक सदैव ही गुजर कहे जाते थे, उन्होने भिी भी म्वय को प्रतिहार नहीं कहा। इन दोनो वशो से पूणतया अलग कन्नोज के शासक गुजर प्रतिहार कहनाते थे। (ब) यद्यपि माण्डव्यपुर तथा पन्नोज के शामको के लेपो में श्रीराम के छोट भाई लक्ष्मण के उल्लेख मिलते है पितु जैसा यि डा दशरथ शर्मा ने स्पष्ट किया है वग्नोज के प्रतिहारो ने लक्ष्मण को अपना प्रादिपूवज बताया और उन्होन मय यो सूयवशी, रघुवगी, रघुकुल चूडामणि प्रादि कहा। इसके विपरीत मडार के प्रतिहारो ने लक्ष्मण मा उल्लेख येवल म. लिय किया कि उमने प्रतिहार का कार्य सम्पन्न पर इस पाय को गौग्य तथा प्रतिष्ठा जाता था। [ 89 ] प्रदान की। साथ ही मडोर के प्रतिहारा ने मदैव ही हरिशचद्र नामक ब्रह्मण को अपना प्रादिपूर्वज बताया। उपरोक्त विश्लेपण से स्पष्ट है कि कन्नोज के प्रतिहार रसुवशी क्षत्रिय थे। सम्भवत प्रारम्भ मे गुर्जर क्षेत्र से सम्बन्धित होने के कारण स्वय को गुजर-प्रतिहार कहते थे । माण्डव्यपुर के प्रतिहार वंश का गुजर जाति अथवा क्षेत्र से कुछ भी सम्बध नहीं था और वे क्षत्रिय नहीं बल्कि ब्राह्मण थे। लाट के शामको ने स्वय को कभी प्रतिहार नही कहा इसलिये वे गुर्जर जाति के ही थे। वास्तव मे तीनो राजवशो का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं था। मण्डोर का प्रतिहार वश मूल रूप से ब्राह्मण वश था क्योकि जोधपुर अभिलेख और घटियाला अभिलेखो मे इस वश का आदि पूर्वज ब्राह्मण हरिशचन्द्र नामक व्यक्ति बताया गया है। अतेय ब्राह्मण मे यज्ञ के समय विशेष काय करने वाले ब्राह्मणो को प्रतिहार कहा गया है। गजपूत काल मे द्वाररक्षक् को प्रतिहार कहा मडोर के प्रतिहार निश्चित रूप से प्रारम्भ मे द्वारपाल का काय करते होगे क्योकि उन्होने अपने लेखो मे तक्ष्मण की केवल इस कारण प्रशसा की है कि उसने द्वारपाल के काय को गौरव प्रदान किया। जोधपुर तथा घटियाला लेखो के अनुसार वाउक तथा कक्कु हरिशचद्र के बारहवे वशज थे । इस कारण विद्वान हरिशचद्र का समय 550 ई के लगभग मानते है । अभिलेखो के अनुसार हरिशचद्र के दो रानिया थी-एक ब्राह्मणी तथा दूसरी क्षमारणी । भद्रा नामक क्षत्राणी के पुन क्षत्रिय प्रतिहार कहलाये। हरिशचद्र के सम्बध मे अधिय जानकारी उपलब्ध न होने से यह कहना कठिन है कि ह स्वय शासक था अथवा नही। उसे रोहिल्लधी की उपाधि अवश्य ही दी गई है। इस उपाधि वा अथ अभी तक ज्ञात नहीं है। मजूमदार तथा रे इस उपाधि के आधार पर प्रतिहारो को विदेशी बताते है। डा दशरथ शर्मा के अनुमार रोहिल्लधी का अथ है योग की क्यिा मे निपुण । हरिशचद्र के क्षगाणी भद्रा से उत्पन चार पुत्र थे-भोगभट्ट, कक्क, रज्जिल व दद्द। अभिलेखो के अनुसार हरिशचद्र के चारो पुनो ने अपनी शक्ति से माण्डव्यपुर पर अधिकार स्थापित कर लिया मजूमदार को मा यता है कि हरिशचद्र के चारो पुत्रो ने चार पृथक गज्य स्थापित किये तथा दद्द ने ही नदिपुर मे इस वश का शासन स्थापित किया । मजूमदार महोदय की धारणा स्वीकार करने योग्य नहीं है। यदि हरिशचद्र के पुत्र ने सुदूर गुजरात तक साम्राज्य स्थापित किया होता तो इसका उल्लेख अभिलेखो म अवश्य ही किया गया होता जसे कि सगव मडोर विजय का वणन किया गया है। हरिशचद्र का उत्तराधिकारी उमका तीसरा पुत्र रज्जित बना इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनो बडे पुनो को मृत्यु उसके जीवन कान मे ही हो गई। रज्जिल का उत्तराधिकारी उसका पुन नरभट्ट वना जिसे पेल्ला पेल्ली की उपाधि प्राप्त थी। उसके सम्म व म विशेष कुछ भी जानकारी उपलब्ध [ 90 ] नही है। नरभट्ट का उत्तराधिकारी नागभट्ट था जिसने मेदातक अथवा वतमान मेडता को अपनी राजधानी बनाया। वह हप वन का समकालीन था। प्रतिहार इतिहास का एक भी ऐसा साधन नहीं है जिसमे प्राभाम होता हो कि उमने हर्ष की आधीनता मान ली थी। नागभट्ट के बड़े पुत्र तात ने अपने बाट भाई भोज के पक्ष मे सिंहासन त्याग दिया और मडोर स्थित प्राथम मे स्वय ईश्वर अराधना मे तल्लीन हो गया। मजूमदार की यह मान्यता निराधार है कि चीनी यात्री ह्मनसाग की यात्रा के समय तात शासन कर रहा था। चीनी यात्री द्वारा उल्लिखित पी लो मा- लो की पहचान लगभग सभी विद्वान भीनमाल से करते है जहा उस समय चापवश का शासन था। भोज के उत्तराधिकारी क्रमश यशोवद्धन तथा चण्डुक बने वितु घटियाला और जोधपुर अमिलेखो से इन तीनो शासको के सम्बन्ध मे कुछ जानकारी नहीं मिलती। चण्डुक के पश्चात सिलुक शासक बना जो इम वश का अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण शासक सिद्ध हुआ। सिलुक का समय आठवी शताब्दी इस्वी का प्रारम्भ माना जाता है। जोधपुर अभिलेख के अनुसार उसने प्रावानी तथा वल्ल की सीमा निर्धारित की। उसने भट्टी देवराज को परास्त किया। डॉ दशरथ शर्मा की मान्यता है कि सिलुक के पूर्वज जैसलमेर के भाटियो के अधीनस्थ थे। सिलुक ने देवराज को पराजित कर स्वतत्र राज्य की स्थापना करदी। अभिलेखो मे उसे 'वल्ल मण्डल पालक' की उपाधि प्रदान की गई है। यद्यपि इस उपाधि का स्पष्ट अथ ज्ञात नहीं हैं किन्तु यह माना जाता है कि प्रतिहारो के पडास मे स्थित वल्ल राज्य की सेनानो द्वारा प्रतिहारो पर बार बार आक्रमण किये जाते थे। सिलुक ने वल्ल राज्य पर विजय प्राप्त की। मजूमदार की मान्यता है कि मालवा, लाट तथा मडोर के प्रतिहारो के सघ का नेतृत्व करने के कारण सिलुक ने 'वल्ल मण्डल पालक' की उपाधि धारण की थी। यह मत इस धारणा पर आधारित है कि तीनो राजवशो मे रक्त सम्बन्ध था। जोधपुर अभिलेख से ज्ञात होता है कि सिलुक धार्मिक प्रवत्ति का व्यक्ति था। प्रेता नामक स्थान पर उसने एक जलाशय तथा सिद्धेश्वर महादेव के मदिर का निर्माण करवाया। सिलुक के शासन के अतिम वर्षों मे सिंध के अरबो के आक्रमण हुए। अरव सेनापति जुनैद ने भीनमाल, जुर्ज व ममद पर आक्रमण किये। इनमे से मर्मद सिलुक के साम्राज्य के अन्तर्गत था। इस समय अरब आक्रमणो का सामना कनोज शाखा के नागभट्ट प्रथम द्वारा किया गया था। सिलुक के उत्तराधिकारी झोट, भिल्लादित्य, क्क्क, वाहुक तथा कक्कुक के इतिहास की विशेष जानकारी नहीं है। इतना निश्चित है कि वाद के राजाओं को कनाज के प्रतिहारो की प्राधीनता स्वीकार करनी पड़ी। इस प्रकार मडोर के इस प्रतिहार वश का स्वतत्र राज्य समाप्त हो गया। भारतीय इतिहास के प्राचीन काल का 700 ई से 1200 ई तक का युग - [ 91 ] 'परवर्ती प्राचीन काल' 'प्रारम्भिक मध्य युग' सामन्तीय युग' आदि नामो से भी सम्बोधित किया जाता है कि तु अधिकाशत इस युग को 'राजपूत काल' के नाम से जाना जाता है । इस युग मे गुजरात मे सोलको (चौलुक्य),मालवा मे पवार(परमार), बुन्देलखण्ड में चदैल, कनोज मे गहडवाल, दिल्ली मे तवर (तोमर), बगाल मे पाल तथा कर्नाट में राष्ट्रकूट वश का शासन स्थापित था। राजस्थान मे गुहिल, राठोड, कच्छवाह, भाटी, मालनी, गौड, प्रतिहार (परिहार), चौहान, पवार इत्यादि वशो के राज्य स्थापित हुए। राजस्थान में राजपूत राज्यो की स्थापना के माथ ही विदेशी आक्रमणो की झड़ी लग गई तथा पूरे उत्साह से इन आक्रमणा का मामना करने की परम्परा भी प्रारम्भ हो गई। इस दृष्टि से सव प्रथम जालोर और भीनमाल के प्रतिहारो ने उल्लेखनीय कार्य किया। 740 ई के लगभग भीनमाल पर सिन्ध के अरबो का प्रारमण हुअा। प्रतिहार नागभट्ट प्रथम ने अपने राज्य की तो सफलतापूर्वक रक्षा की ही साथ ही भडोच पर प्रारमण करने वाले अरबो को पराजित कर वहा अपने वश की सत्ता स्थापित की। इस प्रतापी वश में वत्मराज, नागभट्ट द्वितीय जैसे पराक्रमी नरेश हुए। नागभट्ट द्वितीय ने कनोज जीता और उसे अपनी राजधानी बनाया। इस वश के शासको ने पूर्वी वगाल (वतमान वगला देश) तक अपनी धाक जमाई। पाल-प्रतिहार-राष्ट्रपट वशो के बीच पीढियो तक चलने वाले त्रिकोणात्मक संघप मे सफलता प्राप्त कर इस वश के राजानो ने लगभग समस्त उत्तरी भारत पर अपने वश का साम्राज्य स्थापित किया। मिहिरभोज ने अनेक अरब अाक्रमणो को विफल किया। बिलादुरी और सुलेमान सौदागर जैसे अरव इतिहासकारो ने लिखा कि भारत मे प्रतिहार भोज अरबो का मबसे प्रवल शत्रु था। प्रतिहारो का प्रतापशीय धीमा पडा तब तक चौहानो का उदय होने लगा। माभर ग्रादिस्थान होने तथा साकम्भरी देवी का उपासक होने के कारण यह चौहान वश सभरीम व साकम्भर नामो से भी प्रसिद्ध हुमा। चौहान अधिपत्य के समय साभर राज्य के आधीन सवा लाख गाव होने के कारण इस वश को सपादलक्षी भ कहा गया। इस चौहान वश मे अजयराज अर्णोराज, विग्रहराज चतुथ वीसल- देव तया पृथ्वीराज तृतीय जैसे प्रतापी नरेश हुए। अजयराज ने अजमेर नगर की स्थापना की। अर्णोराज ने अनासागर तालाब बनवाया और एक प्राक्रमणकारी मुस्लिम सेना को बुरी तरह पराजित किया तथा जयसिंह सिद्धराज व कुमारपाल जैसे चौलुक्य शासको से युद्ध किये। विग्रहराज वीसलदेव ने अनेक नवीन विजयो द्वारा चौहान साम्राज्य की सीमानो मे वृद्धि की। बीसलदेव के दिल्ली शिवालिक अभिलेख तथा बिजोलिया अभिलेख यह साक्ष्य प्रस्तुत करते है कि उसने तोमरो को युद्ध क्षेत्र मे पराजित कर दिल्ली पर चौहानो का अधिकार जमाया और अपने वश को अखिल भारतीय स्तर पर मान-प्रनिष्ठा दिलाई। वीसलदेव के दोनो अभिलेख पृथ्वीराज रामो द्वारा उत्पन स परम्परा को असत्य सिद्ध करते हैं कि दिल्ली के [ 92 ] तोमर शामक अन गपाल ने अपने दो हत्र पृथ्वीराज को दिल्ली का राज्य मांपा था। अनेक मबल प्रमाणो से अव यह सिद्ध हो गया है कि न तो गमगपाल की पुत्री कमलादेवी पृथ्वीराज की माता थी और पृथ्वीराज को अपने नाना से दिल्ली का राज्य ही प्राप्त हुआ। पृथ्वीराज चौहान की माता का नाम क्यू रदेशी था और वह त्रिचूरी के अचल राय की कन्या थी व पृथ्वीराज के ताऊ बीसलदेव न तोमरो को पराजित कर दिल्ली पर प्राधिपत्य स्थापित किया था। पृथ्वीराज तृतीय चौहान 'राय पिथौरा' नाम से भी प्रमिद्ध था। उसने भदानको को पराजित कर उनके राज्य को चौहान साम्राज्य मे मिलाया तथा सोलकियो चदेला व गहडवालो पर अपनी धाक जमाई। भारत विजय की महत्वकाक्षा से प्राश्रमण करने वाले मोहम्मद गौरी को 1191 ई मे तगइन के प्रथम युद्ध मे बुरी तरह पराजित किया। इस युद्ध की एक महत्वपूर्ण बात तो यह थी कि इसमे भारत के अनेक राजाओ से सम्मिलित होकर पृथ्वीराज के नेतृत्व में युद्ध किया था और इस एकता के परिणाम स्वरूप आक्रमणकारी को पराजित किया गया। दूसरी उल्लेखनीय वात पृथ्वीराज की यह भूल कि उसने भागते हुए शत्रु का पीछा कर उसे पूरी तरह नष्ट नही किया जिससे अगले वर्ष 1192 ई मे पूण तयारी के साथ उसने पुन आक्रमण किया और तराइन के दूसरे युद्ध मे पृथ्वीराज को पराजित कर दिल्ली पर अपना राज्य स्थापित कर लिया। चौहानो के तीन अन्य प्रमुख राज्य जालोर, नाडोल और रणथम्भोर मे स्थापित हुए। जालोर की शाखा स्वणगिरी पवतमाला मे शासन करने के कारण सोनगरा कहलाई। कीर्तिपाल ने मेवाड के सामतसिंह को अपदस्थ किया, उसी ने सिवाना के परमारो को पराजित किया । कीर्तिपाल के बाद समरसिंह ने जालोर दुर्ग की प्राकार बनवाकर तथा अनेक भवनो का निर्माण कर यश अजित किया । उसके पुत्र उदयसिंह के प्राधीन नाडोल व साचोर तक फैला हुआ बहुत विशाल साम्राज्य था। मेवाड के गुहिलो, गुजरात के सोलक्यिो तथा मारवाड के परमारा पर उसने अपने वश की धाक जमाई। उदयसिंह के पुन चाचिगदेव ने भी साम्राज्य की सीमाओ मे वृद्धि की। उसकी बहिन का विवाह मेवाड के राणा तेजसिंह से हुआ था। उसका पुत्र साम तसिंह व पौत्र काहडदेव प्रमश उसके उत्तराधिकारी हुए। कान्हडदेव के समय जालोर पर अलाउद्दीन खिल्जी का प्रारमण हुमा । साभर के सिंहराव या वाक्पतिराज के पुत्र लाखण को नाडोल शाखा का प्रवत्तक माना जाता है। इस शाखा मे शोभित, बलिराज, विग्रहराज, महेन्द्र, अपहिल्ल, वालाप्रसाद, जेंदुराज, पृथ्वीपाल, जाजलदेव, आशाराज, रत्नपाल, राज्य पाल, कटुदेव, सहजपाल, पाल्हण, केल्हण, जेतसिंह तथा सामतसिंह नामक शासक हुए। अहिल्ल नाडोलिया चौहान शाया का महत्त्वपूण शासक था। उसने गुजरात के भीमदेव द्वितीय को पराजित किया और साभर को भी जीता। उसका पुत्र वेल्हण भी इस वश का महत्वपूण शासक था ।
[ 937 रणथम्भोर शाखा मे गोविन्दराज, वारहण प्रल्हादन, वीरनारायण, वाग्भट्ट जसिंह तथा हमीर नामक शासक हुए। हमार ईश्वर का सर्वाधिक महत्त्वपूण नरेश था। उसने जलालुद्दीन तथा अलाउद्दीन खिल्गो से युद्ध किये। 1192 ई, के द्वितीय तगइन युद्ध मे विजय से मोहम्मद गौरी का दिल्ली पर अधिकार स्थापित हो गया। फिर दिल्ली के सुल्तानो द्वारा राजस्थान पर बार वार आक्रमण क्येि गये। दिल्ली के निकट स्थित होने के कारण सामरिक दृष्टि से राजस्थान सुल्तानो के लिये अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण क्षेत्र था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अजमेर पर आक्रमण किया। अल्तमम ने 1230-34 ई मे भारी फौज बल से रणथम्भोर पर आक्रमण किया। बलबन ने मेवात पर आक्रमण किया। 1291 ई मे जलालुद्दीन खिल्जी ने रणथम्भोर पर अमफल आक्रमण किया। दिल्ली सल्तनत के सर्वाधिक शक्तिशाली सुल्तान अलाउद्दीन खिल्जी ने 1301 से 1311 ई के बीच अपनी समस्त शक्ति राजस्थान पर आक्रमण मे झाक दो। शरणागत की रक्षा की परम्परा का पालन करते हुए रणथम्भोर के चौहान शासक हमीर ने अलाउद्दीन के दो बागी सरदारो को शरण दे दी। यद्यपि रणथम्भोर का सैनिक दृष्टि से महत्व था कि तु जहा उसके पूर्ववर्ती सुल्तान असफल हुए उस अभेध समझे जाने वाले रणथम्भोर को जीतने की अलाउद्दीन की महत्वाकाक्षा इस अाक्रमण का वास्तविक कारण थी। कि तु हमीर द्वारा बागियो को शरण देना तात्कालिक कारण बना। जवरदस्त युद्ध हुना। समस्त एशिया जीतने की लालसा रखने वाले अल उद्दीन को काफी लम्बे समय तक असफल होना पड़ा। अन्त मे "घर का भेदी लका ढाव' वाली कहावत चरिताथ हुई। धन के लालच मे पड कर किमी पडयत्रकारी ने दुग के द्वार खोल दिये। साके तथा जोहर हुए। 1302 ई मे अलाउद्दीन ने चित्तोड मे समरसिंह के उत्तराधिकारी रतनसिंह पर प्रारमण किया। इस आक्रमण का कारण रतनसिंह की स्पवती रानी को माना जाता रहा किन्तु आज पद्मिनी क्था की ऐतिहासिकता पर पुन विचार की आवश्यकता है। मध्यकालीन राजस्थान के इतिहास की अनेक नायिकामो के पारम्परिक विवरण विश्लेषण करने पर अस्पष्ट दिखलाई पडने लगते है। जयचंद गहडवाल की माता सुदरीदेवी और पृथ्वीराज तृतीय चौहान को माता कमलादेवी को आज इतिहास मे कही स्थान नहीं है और लगभग सभी विद्वान इन दोनो को 'पृथ्वीराज रासो' के लेखक की कल्पना मानते है। रणथम्भौर के चौहान हमीर की क या देवलदेवी को भी श्री के एम मुशी, डॉ के आर कानूनगो तथा बाबू जगनलाल गुप्ता ने अनेक ठोस प्रमाणो के बल पर 'हमीर रासो तथा हमीर महाकाव्य' के लेखक की कल्पना की उपज प्रयारिणत कर दिया है। सयोगिता एव पद्मिनी की भी लगभग यही दशा है।
[ 94 ] डा कानूनगो ने मन 1959 मे कनकना विश्वविद्यालय मे पार पी नोपाणी भापणमाला के अनर्गत भाषण देते हुए पधिनी के अस्तित्व मे सन्देह प्रकट किया और अनेक प्रमाण देकर उसे वन मलिक मोहम्मद जयसी की कल्पना की उपज ठहराया। वैमे कानूनगो पद्मिनी के अस्तित्व मे मन्देह करने वाले पहले व्यक्ति नहीं है। पद्मिनी की ऐतिहामिकता का न मानने का सूत्रपात वू दी के प्रसिद्ध कवि सूयमान मिश्रा ने अपने 'वश भास्कर' मे किया था। इसके पश्चात् पद्मिनी कथा इतिहासकार के प्राकपण का केद्र बन गई। डॉ दशरथ शर्मा ने लिखा है Perhaps no other heroine of Rajesthan has attracted greater attent 1on of pocis and writes Rajasthanis and aon Rajasthanıs as well, than the far famed queen Padmini of Chittor पद्मिनी क्था की ऐतिहासिकता के विषय मे एक विवाद सा उठ खडा हुआ। तर्क-वितर्क के परिणाम स्वरूप दो स्पष्ट मान्यताए सामने प्राई । खलजी वश के इतिहास के लेखक डॉ रिमोरी शरणलाल ने पद्मिनी कथा मे मह उत्तन करने वाली धारणा को अनेक प्रमाणो और तर्को द्वारा बल प्रदान किया। श्यामलदास, जी एच प्रोमा ईश्वरीप्रमाद, दशरथ शर्मा एव जी एन शर्मा ने पद्मिनी कथा को सत्य माना है। पद्मिनी कथा की ऐतिहासिकता मे सन्देह का मूल कारण यह है कि अलाउद्दीन के चित्तोड अाक्रमण (1303 ई ) के 237 वप पश्चा ता के एक भी ग्रन्थ, लेख या किसी अन्य साधन में पमिनी कथा का वरलेघ तक नहीं किया गया है। यद्यपि इस लम्बी अवधि मे मध्यकालीन इतिहास के अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ रचे गये जिनमे अलाउद्दीन के चिनौड अभियान का उल्लेख तो है पर पद्मिनी-कथा तो दूर स्वय पधिनी के नाम का उल्लेख तय किसी भी बोत मे उपलब्ध नही है । प्रस्तुत विवरण मे केवल यह बताने का प्रयास किया गया है कि सवप्रथम जायसी ने पद्मिनी क्था को रचा। पद्मावत की ऐतिहासिकता सादग्ध है व वाद के सभी साधनो ने मूल यथा जायमी से ही प्राप्त को है अत इसे प्रमाणिक इतिहास का अग नहीं माना जाना चाहिये। पद्मावत की रचना जायसी ने शेरशाह के शासन-पाल मे 1540 ई मे अवध में की थी। पद्मावत की क्या सक्षेप मे इस प्रकार है कि मिहल ये गधर्वसेन नाम शामक की पुत्री पधिनी या एक हीरामान नामन तोता जो बोलता भी था विता- विकाता चित्तौड के शासक ग्लसेन के पास पहुंजा व उसे पद्मिनी के गुणो व सोदय की सूचना दी। जोगी भेस में रत्नसेन सिंहन पहुंचा, लगभग 12 वप भटपा व तत्पश्चात् पग्रिना से विवाह कर वापस लौटा। राघवचेतन नामक एव ग्राह्मण ने रत्नमेन द्वारा अपमानित होकर निष्कासित किये जान पर अलाउद्दीन का पपिनी के [ 9 ] गुणो व सौन्दर्य से अवगत करा कर उसे प्राप्त करने को प्रेरित किया। अलाउद्दीन प्रारमण कर अाठ वर्ष तक चित्तौड को घेरे रक्खा। हताश होकर अलाउद्दीन का दपण मे पद्मिनी का बिम्ब देखना धोखे से रत्नसेन कावन्दी बनाकर दिल्ली ले जाना, 1600 पालकियो मे बैठ राजपूतो द्वारा दिल्ली से रत्नमेन को छुडा लाना, गोरा-बादल की वीरता व चित्तौड पहुच रत्नसेन का कुम्भलगढ के शासक देवपाल पर आक्रमण कर मारा जाना आदि तथ्य पद्मावत की मूल कथा के प्राधार है। निम्नलिखित ऐतिहासिक विश्लेषण करने पर पद्मावत मे अधिक सच्चाई दिखलाई नही पडनी। इतिहास मे केवल सत्य घटनामो का लेखा जोखा ही होता है जबकि पद्मावत मे बोलने वाला तोता हीरामन भी मूल कथा की एक त्वपूर्ण कडी है। कुम्भलगढ अभिलेख से ज्ञात होता है कि अपने पिता समरसिंह के पश्चात् रत्नसिंह ने 1359 वि स (1302 ई ) मे शासन प्रारम्भ किया। सभी फारसी तवारीखें 25 अगस्त 1303 अगाउद्दीन की चितौड विजय की निश्चित तिथि बताती है। इसी प्रकार रत्न सिंह को शासन की एक या डेढ वर्ष की अवधि ही मिली थी। यदि हीरामन ने रत्नसिंह को शासक बनते ही सूचित कर दिया और वह उसी क्षण पद्मिनी को प्राप्त करने के लिये रवाना हो गया होगा तब भी सीमित आवागमन के साधनो के कारण एक-दो वर्ष उसे चितौड से सिंहल पहुचने व वापस पाने में भी लगे होंगे। 12 वप वह जोगी बना धूमता रहा। वापस आते ही यदि उसने राघव- चेतन को अपमानित कर दिया व उसकी प्रेरणा पर अलाउद्दीन ने उसी क्षण चितौड पर धावा बोल दिया तब भी पाठ वप तक उसे चितोड दुग को घेरे रखना पड़ा। इस प्रकार कम से कम समय जोडने पर भी अलाउद्दीन की चित्तौड़ विजय का समय 1325 ई के आस पास ठहरता है जबकि स्वय अलाउद्दीन की मृत्यु भी 1317 ई मे निश्चित रूप से हो चुकी थी। साथ ही केवल एक- ढ वप ही शासन करने वाले रत्नसिंह का 12 वर्ष सिंहल मे भटकते रहने व अाठ वर्ष अलाउद्दीन की सेना से घिरे रहने का वर्णन उपलब्ध करने वाला जायसी का पद्मावत निश्चित रूप से ऐतिहासिक नदी माना जा सकता। सिंहल के इतिहास से पता चलता है कि 14 वी शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों मे चितौड के रत्नसिंह का समकालीन सिंहल का शासक भुवनेकपाहु या कीर्तिनिश्शक देव पराक्रमबाहू था। साथ ही सिंहल के समूचे इतिहास का अध्ययन करने पर भी वहा गवर्वसेन नामक किसी शासक का नाम नहीं मिलता प्रत पद्मावत की पद्मिनी का पिता गन्धवसेन तो निश्चित रूप से एक काल्पनिक पान है। जायसी के अनुसार अलाउद्दीन ने चितोड पर एक असफल एक सफल, कुल दो आक्रमण किये थे किन्तु सभी मध्यकालीन फारसी तवारीखो मे अलाउद्दीन के केवल एक ही आक्रमण का उल्लेख किया गया है।
[ 96 ] कुम्भलगट का जायमी ने अलाउद्दीन द्वारा चितोड पे धेरै यो अवधि पाठ वप बनाई है जबपि सभी फारसी तवारीप इन घरे या ममय 8 माह से पाठ माह के पीच बनाती है। जायमी के पात्रो मे निश्चित म्प गे हीरामन, पान, देवपाल व गधवमेन आदि नरिय काल्पनिर हैं। जहा इतने कान पाम है वहा पधिनी भी यदि वल्पना ही हो ता अधिक पाश्चय नहीं । प्रन जायमीन अलाउद्दीन के रत्नसिंह पर प्रायमगण को प्राधार नारर एर विशुद्ध साहित्या कृति तैयार की है। पद्मावत की ऐतिहामिरना 7 सम्बन्ध में यह कहावत ठीक वैठनी है 'मुद्दई मुस्त और गवाह चुस्त"। बेचारे जायसी ने स्त्रय पद्मावत की कथा को केवन अपनी वरपना ती उपज मानते हुए मावजनिर रूप से घापरणा करदी फिर भी अाधुरि विद्वान् उसे विशुद्ध इतिहास मानन पर तुले हुए है। जायसी ने इसे अपनी कल्पना की उपज बताते हुए लिखा- तन चितउर मन राजा किहा। हिय सिंहल, बुधि पधिनि चीहा। नागमती यह दुनिया धन्वा । बाचा सोई न एहि चित बवा ।। राघवदूत मोई सैतान् । माया अलाउदी सुलतानू । प्रेम क्या एहि भाति विचारहु । बूझ लेहु जो बूझ पारहु ।। जायमी ने अपने रत्नसेन को चितौड के क्सिी चित्रसेन नामक शासक का उत्तराधिकारी पुन बताया है। अलाउद्दीन के आक्रमण के समय चितौड या शासक रत्नसिंह था व कुम्भलगढ लेख से निश्चित ज्ञात है कि वह समरसिंह का पुत्र था। चिनसेन नामक शासक चितौड मे हुअा ही नहीं अत वह और सम्भवत रत्नसेन भी जायसी के अन्य काल्पनिक पानी की तरह ही होगे। कम से कम जायसी को रत्नसिंह का न तो सही नाम ही ज्ञात था न उसके पिता की जानकारी ही थी। अलाउद्दीन ममस्त सत्तनत काल के सभी सुल्तालो मे सर्वाधिक विशाल सेना का स्वामी था। 1600 पालकियो मे बैठे अधिक से अधिक 6000 व्यक्तियो द्वारा अलाउद्दीन की शक्ति के केन्द्र दिल्ली, से अलाउद्दीन को महासेगा का सफलतापूर्वक विरोध कर, रत्नसिंह को न केवल छुडाना बल्कि लडते भिडते चितौड पहुचा देना कल्पना के अतिरिक्त और क्या हो सकता है। अलाउद्दीन की गुमचर व्यवस्था की सभी विद्वान भूरि-भूरि प्रशसा करते नही थकते। चितोड मे रवाना 1600 पाल क्यिो मे बैठे व्यक्तियो को दिल्ली पहुचाने मे काफी समय लगा होगा। इम बीच मार्ग मे उन्होने कई रातें विधाभ की बिताई। सैकडो बार शौच-स्नान से भी निवृत हुए होगे फिर भी मध्यकाल के श्रेष्ठत्तम अलाउई न के गुप्तचरो को इसका तनिक भी पता न चल सका। प्रसिद्ध है कि [ 97 ] साम्राज्य के कोने कोने से पत हिलने तक की सूचनाए सुल्तान के पास पहुँचती थी। केवल इन सोलह सौ डोलियो की किमी गुप्तचर ने बिलकुल परवाह नहीं की सायद इसलिये कि सुल्तान इनके आगमन की बडी कौतुहल से प्रतीक्षा कर रहा था। फिर सोलह सौ पालकिया यदि पक्तिवद्ध खडी हो कर दी जाये तो पहली और अन्तिम के बीच एक-दो मोन की दूरी अवश्य रहेगी। इस परिस्थिति मे वह बदी गृह कितना विशाल होगा? पद्मावत मे रत्नसेन का कुम्भलगढ के शासक देवपाल से युद्ध करना व घायल होकर मारे जाने का उल्लेख है। स्मरण रहे कुम्भलगढ की स्थापना महाराणा कुम्भा ने रत्नसिंह के मारे जाने के भी 156 वर्ष पश्चात 1459 ई मे की थी। प्रत रत्नसेन का कुम्भलगढ के शासक देवपाल के हाथो घायल होकर मारा जाना कितना हास्यास्पद है। सामान्यतया इतिहासकार अलाउद्दीन के चित्तोड अभियान का कोई स्पष्ट कारण न बता केवल पमिनी की प्राप्ति की इच्छा को ही इस पाक्रमण का आधार बना लेते हैं। आक्रमण के किसी अन्य स्पष्ट कारण के प्राव मे भी पद्मिनी के अस्तित्व को स्वीकारना उचित नही माना जा सकता था। वैसे अलाउद्दीन के चित्तौड अभियान के काल्पनिक कारण हूँढने की आवश्यकता नहीं क्योकि इस आक्रमण के निम्न लिखित कारण तो ज्ञात है ही- अलाउद्दीन समस्त एशिया को जीतने का इच्छुक था। काजी की मत्रणा ने उसकी एशिया विजय योजना को भारत विजय योजना का रूप दे दिया था। प्रत भारत के किसी भी क्षेत्र पर अलाउद्दीन के आक्रमण का कारण उसकी भारत विजय की महत्वकाक्षा ही था। समकालीन आर्थिक गतिविधियो के अध्ययन से पता चलता है कि चितोड उस ममय व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। सिध, मालवा, गुजरात, मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश सभी क्षेत्री के व्यापारी अत्यन्त ही प्राचीन काल से माध्यमिका (चित्तौड) के माग से व्यापार करते थे। अलाउद्दीन के राजस्व सुधार व बाजार नियत्रण हेतु यत्न मिद्ध करते है कि उसमे आर्थिक सूझ थी। यदि चित्तौड के आर्थिक महत्व के कारण अलाउद्दीन ने आक्रमण किया हो तो प्राश्चय नही। राजनैतिक दृष्टि से भी चित्तौड-नियत्रण महत्वपूण था। उस समय अभेद्य दुग सुरक्षा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन थे। जिसके पास जितने अधिक सुदृढ दुर्ग होते उसकी स्थिति भी उसी अनुपात मे सुरक्षित समझी जाती। अलाउद्दीन के पूर्व दिल्ली सल्तनत के किसी भी शासक ने चित्तोड को न है 3
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। [ 99 ] (1540 ई) व छित्ताई-चरित के बताये गये रचना काल (1526 ई ) मे बहुत थोडा अन्तर है। 'चित्ताई-चरित' की तिथि 1526 ई मान लेने से भी पधिनी का अस्तित्व निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं होगा क्योकि यह मूल प्रश्न फिर भी अपनी जगह बना रहेगा कि अलाउद्दीन के चित्तौड आक्रमण के 237 वष पश्चात तक के किसी साधन मे पद्मिनी कथा का उल्लेख क्यो नही है। हा प्रश्न मे 237 वप के स्थान पर 223 वर्ष हो जायेगे पर इससे प्रश्न की महत्ता मे विशेष अन्तर न होगा। अत छित्ताई चरित की तथाकथित तिथि तो सदिग्ध है ही पर उसे स्वीकार कर लिये जाने पर भी पद्मिनी का अस्तित्व निश्चित रूप से मिद्ध नहीं होगा। आरम्भ मे प्रो हबीब तथा अन्य कई विद्वान तो अलाउद्दीन के दरवारी अमीर खुसरो की 'खाजेनुल फतुह' मे भी पद्मिनी सम्बन्धी विवरण का उल्लेख बताने लगे थे। इस पुस्तक मे एक स्थान पर खुसरो ने स्वय को हुद हुद कहा है। लेखक गण हुद हुद की खोज मे जुट गये और अन्तत मालुम कर ही लिया। शेवा की रानी वितकिश की सूचना जिसने सुलेमान तक पहुचाई वह हुद हुद नामक पक्षी था। इतनी जानकारी हो जाने पर शुलेमान को अलाउद्दीन व विलकिश को पद्मनी बताकर पद्मिनी कथा को सत्य स्वीकार कर लिया गया। किन्तु स्वय खुसरो के वणन मे पद्मिनो तो दूर की बात विलकिश तक का उल्लेख भी नहीं है। डॉ कानूनगो ने एक फारसी के विद्वान वाहिदमिर्जा के हवाले से गतत सत्य प्रकट किया कि अमीर खुसरो के वर्णन का चाहे कितना ही तोडा-मरोडा जाए उसमे पद्मिनी का उल्लेख कही नहीं मिलेगा। जायसी के पचास वर्ष पश्चात अबुल फजल की आईन-ए-अकबरी, फरिस्ता की तवारीख और कुछ समय पश्चात हाजीउदवीर की जफरूलवाली, फासीसी मनूचो की स्टोरिया डो मोगोर तथा जेम्स टॉड को 'एनल्स एण्ड एन्टीक्वीटीज अाफ राजस्थान' नामक पुस्तको मे पद्मिनी का कुछ वणन मिलता है। अबुल फजल ने पद्मिनी को एक विशेष गुणो वालो त्री बताया है। फरिस्ता ने 700 पालकियो सहित दिल्ली पहुच कर रतनसिंह को बदीगृह से छुडाने का श्रेय रतनसिंह की पुत्री को दिया है। हाजीउदबीर ने जफरूरलवाली मे लिखा है कि रतनसिंह को बादी बना कर अलाउद्दीन उसे दिल्ली नही ले गया बल्कि चित्तोड के पास ही कही कैद रखा। यहा से 500 पालकियो मे पद्मिनी के साथ पहुचने वाले योद्धाओ ने उसे आजाद करवाया । धुम्मकड मनूची जो गप्पे हाकने वाले के रूप मे प्रसिद्ध है, पद्मिनी को जयमल की रानी बताता है। टॉड ने पद्मिनी को हमीर सख की पुत्री और राणा लखमसी के काका की पत्नी लिखा है। कितने असमजस और उहा- पोह मे फसे हुए थे बेचारे इतिहास लेखक। राजस्थान के चारणो तथा भाटो में पद्मिनी के वणन सुन सुन कर बोखलाहट मे जसा जचा वैसा ही लिख मारा। उपरोक्त सभी विवरणो मे एकता का सूत्र केवल यह है कि सभी के मूल मे जायसी का वर्णन क्सिी न किसी रूप में विद्यमान है।
[ 98 ] जीता था। अनाउद्दीन इम सैनिक गौरव को प्रयम वार अजित करना चाहता था। सूयमल मिश्रण ने 'वशभास्कर' मे अलाउद्दीन के चितौड अभियान के सबसे महत्वपूर्ण कारण का वणन किया है। जोवराज कृत हमीर रामो के आधार पर यह कहा गया है कि रणथम्भौर के हमीर के दो पुत्र अलाउद्दीन के विरुद्ध युद्ध करते हुए मारे गये। तीसरे को जिमका नाम रत्नसिंह था उसने चित्तौड के शासक के पास शरण हेतु भेज दिया। बरनी के विवरण से ज्ञात होता है कि हगीर का पुन जीवित था क्योकि जिस मगोल नेता को शरण दने के कारण हमीर के वश का नाश हुमा था बन्दी रूप मे अलाउद्दीन के समक्ष लाने पर उमने हमीर के पुत्र को शामक बनाने की इच्छा व्यक्त की थी। इस प्रकार निश्चित है कि चितोड अाक्रमण का कारण ठीक वही था जो रणथम्भौर अाक्रमण का था। जसे रणथम्भौर आक्रमण का लक्ष्य देवलदेवी को मानने की आवश्यकता नही वसे ही जित्तौड आक्रमण का लक्ष्य पद्मिनी नही थी। अत यह कहना कि अलाउद्दीन के चित्तौड प्रामकरण का कोई स्पष्ट कारण दिखलाई नही पडता और पद्मिनी ही आक्रमण का कारण रही होगी ऐतिहासिक नही माना जा सकता। उल्लेखनीय है कि कानूनगो द्वारा पद्मिनी के अस्तित्व मे सदेह खडा करने से अब तक यद्यपि कान् नगो के तर्को का खण्डन करने का प्रयत्न अवश्य किया गया है परतु पद्मिनी थी, इस वारणा के समथन मे अभी तक किसो विद्वान् द्वारा ठोम प्रमाण नहीं दिये गये है। हा कात्नगो की अलोचना करते हुए डॉ दशरथ शर्मा ने नोपारणो स्मृति भाषण माला मे व्याख्यान देते हुए यह बताने का प्रयास अवश्य किया कि जायसी से पूर्व भी साहित्य मे पद्मिनी का उल्लेख मिलता है। उन्होने 1526 ई मे तोमर वशी शासक सल्हदी के ममय रचे 'छित्ताई चरित' की उस हस्तलिखित प्रति मे पद्मिनि का उल्लेख बताया है जो श्री अमरचन्द जी नाहटा के पास सुरक्षित है। इस सदभ मे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किये जा सकते हैं जसे, सल्हदी कौन से क्षेत्र का स्वतन शासक था? दिल्ली व उसके समीपस्थ क्षेत्र से तो इससे शताब्दियो पूव तोमर सत्ता समाप्त हो चुकी थी। 'छित्ताई-चरित' की तिथि किस आधार पर 520 ई मानी गई है। क्या इस बात के प्रमाण है कि इस तोमरवशी शासक का समय 1526 ई ही था और 'छित्ताई-चरित' निश्चित रूप से उसी के समय लिखा गया था? क्या इसकी कुछ अय प्रतिया भी उपरब्ध हुई है ? यदि हा, तो क्या उनमे भी अलाउद्दीन के पाश्रमण तथा पद्मिनी का उल्लेख है ? 1526 ई में भारतीय शासक वावर के विरुद्ध जूझ रहे थे। ऐसे समय साहित्यिक रचनाएं हुई हो यह सम्भव दिखलाई नही पडता। अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता इमलिये है कि जायसी की पद्मावत के रचना काल [ 99 ] (1540 ई ) व छित्ताई-चरित के वताये गये रचना काल (1526 ई ) में वहुत थोडा अन्तर है। 'छित्ताई-चरित' की तिथि 1526 ई मान लेने से भी पद्मिनी का अस्तित्व निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं होगा क्योकि यह मूल प्रश्न फिर भी अपनी जगह बना रहेगा कि अलाउद्दीन के चित्तौड प्रारमण के 237 वर्ष पश्चात तक के किसी साधन मे पद्मिनी कथा का उल्लेख क्यो नही है। हा प्रश्न मे 237 वप के स्थान पर 223 वर्ष हो जायेगे पर इससे प्रश्न की महत्ता में विशेष अन्तर न होगा। अत छित्ताई चरित की तथाकथित तिथि तो सदिग्ध है ही पर उसे स्वीकार कर लिये जाने पर भी पद्मिनी का अस्तित्व निश्चित रूप से सिद्ध नही होगा। प्रारम्भ मे प्रो हबीब तथा अन्य कई विद्वान तो अलाउद्दीन के दरवारी अमीर खुसरो की 'खाजेनुल फतुह' मे भी पद्मिनी सम्बन्धी विवरण का उल्लेख बताने लगे थे। इस पुस्तक में एक स्थान पर खुसरो ने स्वय को हुद हुद कहा है। लेखक गण हुद हुद की खोज में जुट गये और अतत मालुम कर ही लिया। शेवा की रानी बिलक्शि की सूचना जिमने सुलेमान तक पहुचाई वह हुद हुद नामक पक्षी था । इतनी जानकारी हो जाने पर शुलेमान को अलाउद्दीन व बिलकिश को पद्मनी बताकर पद्मिनी क्था को सत्य स्वीकार कर लिया गया। कि तु स्वय खुसरो के वणन मे पद्मिनो तो दूर की बात बिलकिश तक का उल्लेख भी नहीं है। डॉ कानूनगो ने एक फारसी के विद्वान वाहिदमिर्जा के हवाले से अन्तत सत्य प्रकट किया कि अमीर खुमरो के वणन को चाहे कितना ही तोडा-मरोडा जाए उसमे पद्मिनी का उल्लेख कही नही मिलेगा। जायसी के पचास वप पश्चात अबुल फजल की आईन-ए-अकबरी, फरिस्ता की तवारीख और कुछ समय पश्चात हाजीउदवीर को जफरूलवाली, फासीसी माची की स्टोरिया डो मोगोर तथा जेम्म टॉड को 'एनल्स एण्ड एन्टीक्वीटीज आफ राजस्थान' नामक पुस्तको मे पद्मिनी का कुछ वणन मिलता है। अबुल फजल ने पद्मिनी को एक विशेष गुणो वालो स्री बताया है। फरिस्ता ने 700 पालक्यिो सहित दिल्ली पहुच कर रतनसिंह को बन्दीगह से छुडाने का श्रेय रतनसिंह की पुत्री को दिया है। हाजीउदबीर ने जफरूरलवाली मे लिखा है कि रतनसिंह को बन्दी बना कर अलाउद्दीन उसे दिल्ली नही ले गया वरिक चित्तोड के पास ही कही कैद रखा। यहा से 500 पालकियो मे पद्मिनी के साथ पहुचने वाले योद्धानो ने उसे अाजाद करवाया। धुम्मकड मन्ची जो गप्पै हाकने वाले के रूप मे प्रसिद्ध है, पद्मिनी को जयमल की रानी बताता है। टॉड ने पद्मिनी को हमीर सख की पुत्री और राणा लखमसी के काका की पत्नी लिखा है। क्तिने असमजस और उहा- पोह मे फसे हुए थे वेचारे इतिहास लेखक। राजस्थान के चारणो तथा भाटो से पधिनी के वणन सुन सुन कर बोखलाहट मे जैसा जचा वैसा उपरोक्त सभी विवरणो मे एकता का सूत्र केवल यह है कि सभी के मूल मे जायसी का वणन किसी न किमी रूप में विद्यमान है। लिख मारा।
[ 10 ] आधुनिक काल के विद्वानो मे ईश्वरी प्रसाद ने पद्मिनी कथा को ऐतिहासिक स्वीकार कर यह प्रश्न खडा किया कि यदि पद्मिनी कथा असत्य होती तो यह इतन वर्षों तक राजपूत परम्परानो मे सुरक्षित कैसे रह सकती थी ? एर अन्य विद्वान न यह तर्क दिया कि पद्मिनी का अस्तित्व नही था तब उसके महल कहा से आए इन्हे वापस प्रश्न किया जा सकता है कि राजा भोज और गगू तेली सम्बधी तथ्य अब तक प्रचलन मे कमे है ? पृथ्वीराज रासो की अनेक गप्पे शने शन इतिहास कारो ने कैमे स्वीकार की। पीढी दर पीढी मानव कठो मे अठकेलिया करती हुई शुद्ध माहित्यिक वात इतिहास का रूप धारण कर लेती थी। डा कानूनगो ने ऐसे प्रश्नो का अत्यन्त ही विस्तत तकसगत उणन प्रस्तुत किया है। एक बार पद्मिनी कथा स्वीकार करली गई तब चित्तोड मे महलो की कमी कहा थी। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अलाउद्दीन के चित्तोड अभियान का कारण पद्मिनी नही थी। पद्मिनी का जन्म पद्मावत से हुआ। पद्मावत विशुद्ध साहित्यिक कृति है। साहित्य की बात धीरे धारे इतिहास बन गई । रणथम्भोर तथा चित्तोड के पश्चात अलाउद्दीन ने जैसलमेर, सिवाणा और जालोर पर आक्रमण किये। 1308 ई मे अलाउद्दीन के हमले के समय शीतलदेव सिवाणा का शासक था। अलाउद्दीन के एक सेनापति कमालुद्दीन 'भेडिया' ने सिवाणा दुग का घेरा डाला। सीढिया इत्यादि लगा कर दुग पर चढने के प्रयत्न किये जाते तब ऊपर से गोफणो से पत्थर फेके जाते, तीरो को बौछार की जाती तथा उकलता हुमा गम तेल फेंवा जाता। कमालुद्दीन के सभी प्रयास विफल हो गये। कई महीनो तक गढ को घेरने से भी सफमता नही मिली तब अलाउद्दीन स्वय भारी फौज बल से मिवारणा पहुचा। मारवाड के परगनो की विगत मे नरामी ने इस हमले के सम्बव मे एक बहुत ही पाश्चयजनक बात लिखी । किलोमीटर से गढ की छोटी मी पहाडी क देखकर अनाउद्दीन ने यह वचन लिया कि गढ को जीते बिना वह अन्न जल भी ग्रहण नहीं करेगा। सुल्तान के वचन के पाननाथ सनिको ने पूरे उत्साह से प्रयत्न किया। कि तु उहे सफलता नहीं अन-जल के विना सुल्तान की दशा विाडने लगी। सेनापतियो ने सुल्तान को वचन से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से आटे का गढ बना कर उसे जीतने को योजना बनाई। गढ के सोनगरो को इस योजना की जानकारी मिलने पर वे क्रोधित हुए और शीतलदेव का भाई सोम चुने हुए वीरो के साथ गढ से बाहर निकला व वनावही दुर्ग की रक्षाथ अपने प्राणो की आहूति दे दी। पाट के गढ़ की बात की सच्चाई मे तो सदेह है किन्तु अमीर खुसरो ने अपनी पुस्तक 'खजाइन फुतूह' मे शीतलदेव के शौय की बहुत प्रशसा की है। विशेषकर शीतलदेव का अप्रतिम बल और हाथी जैसा शरीर देख कर स्वय मुस्तान प्राश्चय चक्ति हो गया। अनेक महीनो तर शत्रु सेना से घिरा रहने पर किले के कोठार खाली हो चार मिली।
[ 101 ] गये तब दरवाजे खुले और साका करने की धारे हुए योद्धा शाही सेना पर टूट पड़े । भीषण मार काट के बाद ही अलाउद्दीन की सेना सिवाणा जीत सकी। जालोर मे सिवाणा से भी अधिक भीषण युद्ध हुआ। कई महीनो तक शाही सेना ने दुर्ग को घरे रखा। पद्मनाभ ने 'कान्हडदे प्रब ध' मे लिखा है कि सेजवाल विक्रम नामक व्यक्ति ने धन के लालच मे पड़ कर नमक हरामी की। उसने दुग के गुप्त द्वार का मार्ग शत्रु को बता दिया। परम्परामो मे यह घटना भी सुरक्षित है कि घर पहुच कर किम ने अपनी पत्नी को बताया कि उनको गरीबी के दिन अब समाप्त होने वाले है। पूरी बात सुनकर विक्रम की पत्नी अत्यन्त कोधित हुई और उसने हाथ मे भोजन परोसने हेतु पकडे हुए थाल के जोरदार प्रहार से विक्रम का सिर धड से अलग कर दिया। वह भाग कर का हडदे को अपने पति की कुटिलता को सूचना देने पहुची कि तु तव तक सुल्तान की सेना गढ मे प्रवेश कर चुकी थी। हृदय विदारक युद्ध के पश्चात ही अलाउद्दीन जालोर जीत सका। चित्तौड विजय के पश्चात अलाउद्दीन ने अपने पुन खिचखा को वहा नियुक्त किया। कुछ समय पश्चात मालदेव सोनगरे को वहा का सूबेदार बना दिया । 1326 ई मे मीसोदा के सामत हमीर ने बरबडीजी नामक चारणी के आशीर्वाद से मालदेव के पुत्र बनवीर मोनगरे को पराजित कर चितोड पर अधिकार कर लिया। हमीर से पूर्व चित्तौड के शासक 'रावल' कहे जाते थे किन्तु हमीर के समय से राणा और महाराणा कहे जाने लगे। पहले के शासक गुहिलोत थे किन्तु हमोर के मम्य से वे मीसोदिया कहलाने लगे। हमीर के पश्चात खेता, लाखा, मोकल तथा कुम्भा चित्तोड के सिंहासन पर बैठे। कुम्भा के समय चित्तौड राज्य का पर्वा गीण विकास हुा। कुम्भा ने वू दी, गागरोण, मडोर, सिराही माडल- गढ, बिजोलिया, जहाजपुर, खाटू, गगराणा, चाटसू, इत्यादि पर मेवाडी आधिपत्य जमाया। उमने मालवा के सुल्तान को पराजित किया। गुजरात तथा मालवा के सुल्तानो की सम्मिलित सेनामो से मफलतापूर्वक युद्ध कर चित्तौड के गौरव की रक्षा की। महाराणा कुम्भा का विशेष महत्व इसलिये माना जाता है कि एक योग्य सेनानायक और सफल विजेता होने के साथ ही वह कला साहित्य का सरक्षक, धार्मिक सहिष्णु और स्वय उच्च कोटि का विद्वान था। उसके दरबार मे राजस्थान के साथ ही मालवा तथा गुजरात के कलाकारो, साहित्यकारो और विद्वानो का जमघट लगा हुआ था। 'नाव भीतडा सू रव' सम्ब धी कहावत कुम्मा के सदर्भ मे सत्य दिखलाई पडती है। मेवाड मे स्थित कुल 84 किलो मे से कुम्भलगढ सहित 3' का निर्माण कुम्भा द्वारा ही करवाया गया था। कीर्तिस्तम्भ, रणकपुर जन मन्दिर दिलवाडा मनि चित्तोड का कुम्भस्वामी मदिर, एकलिंगजी का मीरा मन्दिर इत्यादि युगो युगो तक कुम्भा की कीर्ति को साक्ष्य प्रस्तुत करते ही रहगे। कुम्भा स्वय उच्चकोटि का कवि, सगीतकार, नाटककार और विद्वान था।
[ 10 ] आधुनिक काल के विद्वानो मे ईश्वरी प्रसाद ने पधिनी क्या को ऐतिहासिक स्वीकार कर यह प्रश्न खडा किया कि यदि पधिनी कथा असत्य होती तो यह इनन वर्षों तक राजपूत परम्परामो मे सुरक्षित कैसे रह सकती थी ? एक अन्य विद्वान न यह तर्क दिया कि पद्मिनी का अस्तित्व नहीं था तब उमके महल कहा से आए? इन्हे वापस प्रश्न किया जा सकता है कि राजा भोज और गगू तैलो सम्बन्धी तथ्य अब तक प्रचलन मे कमे है ? पृथ्वीराज रासो की अनेक गप्पे शनै शनै इतिहास कारो ने कमे स्वीकार की। पीढी दर पीढी मानव कठो मे अठकेलिया करती हुई शुद्ध साहित्यिक बात इतिहास का रूप धारण कर लेती थी। डा कानूनगो न ऐसे प्रश्नो का अत्यन्त ही विस्तृत नकसगत वणन प्रस्तुत किया है। एक बार पयिनी कथा स्वीकार करली गई तब चित्तोड मे महलो की कमी कहा थी। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अलाउद्दीन के चित्तोड अभियान का कारण पधिनी नहीं थी। पधिनी का जन्म पद्मावत से हुआ। पद्मावत विशुद्ध साहित्यिक कृति है । साहित्य की बात धीरे धारे इतिहास बन गई। रणथम्भोर तथा चित्तोड के पश्चात अलाउद्दीन ने जैसलमेर, सिवाणा और जालोर पर प्राकमरण किये। 1308 ई में अलाउद्दीन के हमले के समय शीतलदव सिवाणा ना शासक था ! अलाउद्दीन के एक सेनापति कमालुद्दीन 'भेडिया' ने सिवाणा दुग का घेरा डाला। सीढिया इत्यादि लगा कर दुग पर चढने के प्रयत्न किये जाते तब ऊपर में गोफरणो से पत्थर फेके जाते, तीरो की बौछार की जाती तथा उक्लता हुअा गम तेल फेया जाता। कमालुद्दीन के सभी प्रयाम विफल हो गये। कई महीना तक गढ को घेरने से भी ममता नही मिली तब अलाउद्दीन स्वय भारी फौज वल से मिवारणा पहुचा । मारवाड के परगनो की विगत में नएमी ने इस हमले के सम्बन्ध में एक बहुत ही आश्चर्यजनक बात लिखा। चार किलोमीटर से गढ को चोटी मी पहाडी के दबकर अलाउद्दीन ने यह वचन लिया किगढ को जीते गिना वह अन-जन भी ग्रहण नहीं करेगा। सुल्तान के वचन के पालनार्थ मैनिको ने पूरे उत्साह से प्रयत्न किया। कितु उहे सफलता नहीं अन-जल के विना सुल्तान को दशा बिगडने लगी। सेनापतियो ने सुल्तान को वचन से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से प्राटे का गढ़ बना कर उसे जीतने की योजना बनाई। गढ़ के सोनगरो को इस योजना की जानकारी मिलने पर व पोधित हुए और शीतलदेव 7 भाई सोम चुने हुए चोरी के साथ गढ से बाहर निकला व बनावही दुर्ग की रक्षाथ अपने प्राणों की आहूति दे दी। बात की सच्चाई में तो सदेह है किन्तु अमीर खुसरो ने अपनी पुस्तक 'नाइन फुतूह मे शीतलदेव के शौर्य को बहुत प्रशसा की है। विशेषकर शीतलदेव का अप्रतिम बल और हामी जसा शरीर देश भर स्वय सुल्तान प्राश्चर्य चक्ति हो गया। प्रनर महीनो तर शत्रु सेना से घिरा रहने पर क्लेि के कोठार पाली हा मिली। प्राट के गढ़ की [ 101 ] गये तब दरवाजे खुले और साका करने की धारे हुए योद्धा शाही सेना पर टूट पड़े । भीषण मार काट के बाद ही अलाउद्दीन की सेना सिवाणा जीत सकी। जालोर मे मिवाणा से भी अधिक भीषण युद्ध हुआ। कई महीनो तक शाही सेना ने दुग को घरे रसा। पद्मनाभ ने 'काहडदे प्रवध' में लिखा है कि सेजवाल विक्रम नामक व्यक्ति ने धन के लालच मे पड कर नमक हरामी की। द्वार का मार्ग शत्रु को बता दिया। परम्परामो मे यह घटना भी सुरक्षित है कि घर पहुच कर क्रिम ने अपनी पत्नी को बताया कि उनकी गरीबी के दिन अब समाप्त होने वाले हैं । पूरी बात सुनकर विक्रम को पत्नी अत्यन्त क्रोधित हुई और उसने हाथ मे भोजन परोसने हेतु पकडे हुए थाल के जोरदार प्रहार से विक्रम का सिर धड से अलग कर दिया। वह भाग कर का हडदे को अपने पति की कुटिलता की सूचना देने पहुची कितु तब तक सुल्तान की सेना गढ मे प्रवेश कर चुकी थी। हृदय विदारक के पश्चात ही अलाउद्दीन जालोर जीत सका। उमने दुर्ग के गुप्त चित्तौड विजय के पश्चात अलाउद्दीन ने अपने पुन खिज्रखा को वहा नियुक्त किया। कुछ समय पश्चात मालदेव सोनगरे को वहा का सूबेदार बना दिया। 1326 ई मे मीसोदा के सामत हमीर ने वरबडीजी नामक चारणी के आशीर्वाद से मालदेव के पुत्र बनवीर मोनगरे को पराजित कर चित्तोड पर अधिकार कर लिया। हमीर से पूर्व चित्तौड के शासक 'रावल' कहे जाते थे किन्तु हमीर के समय से राणा और महाराणा कहे जाने लगे। पहले के शासक गुहिलोत थे किन्तु हमीर के समय से वे मीमोदिया कहलाने लगे। हमीर के पश्चात खेता, लाखा, मोकल तथा कुम्भा चित्तौट के सिंहासन पर बैठे। कुम्भा के समय चित्तौड राज्य का पर्वा गीण विकास हुप्रा। कुम्भा ने बू दी, गागरोण, मडोर, सिराही, माडल- गढ, विजोलिया, जहाजपुर, खाटू, गगराणा, चाटसू, इत्यादि पर मेवाडी आधिपत्य जमाया। उमने मालवा के सुल्तान को पराजित किया। गुजरात तथा मालवा के सुलानो की सम्मिलित सेनामो से सफलतापूर्वक युद्ध कर चित्तौड के गौरव की रक्षा की। महाराणा कुम्भा का विशेष महत्त्व इसलिये माना जाता है कि एक योग्य सेनानायक और सफल विजेता होने के साथ ही वह कला साहित्य का सरक्षक, धार्मिक सहिष्णु और स्वय उच्च कोटि का विद्वान था। उसके दरबार मे राजस्थान के साथ ही मालवा तथा गुजरात के कलाकारो, साहित्यकारो और विद्वानो का जमघट लगा हुआ था। 'नाव भीतडा सू रैवै' सम्ब धी कहावत कुम्भा के सदभ मे सत्य दिखलाई पड़ती है। मेवाड मे स्थित कुल 84 किलो मे से कुम्भलगढ सहित 3' का निर्माण कुम्भा द्वारा ही करवाया गया था। कीर्तिस्तम्भ, रणकपुर जन मदिर दिलवाडा मन्दिर, चित्तोड का कुम्भस्वामी मन्दिर, एकलिंगजी का मोरा मदिर इत्यादि युगो युगो तक कुम्भा की कीति को साक्ष्य प्रस्तुत करते ही रहगे। कुम्भा स्वय उच्चकोटि का कवि, सगीतकार, नाटककार और विद्वान था। 1 [ 102 [ जयदेव रचित संगीत के प्रसिद्ध गन्थ 'गीतगोविन्द' की रसिक प्रिया' नामक टीका स्वय कुम्भा द्वारा की गई। उसके सरक्षण में संगीत और स्थापत्य जमे तकनीकी विषयो पर ग्रन्थ लिखे गये। कुम्भा का नाम केवल राजस्थान ही क्या समस्त भारत के प्रतिभासम्पन सम्राटो को अगिम पक्ति में लिया जाता है। कुम्भा के पश्चात ऊदा, रायमल और सागा महाराणा बने । सागा की धाक समूचे उत्तरी भारत मे जमी हुई थी। 17 माच 1527 को प्रात साढे नौ बजे खानवा के मदान मे मुगल माम्रज्य के संस्थापक बाबर और महाराणा सागा की सेनामो के बीच भयकर भिडन्त हुई। अन्तत तोपे तलवारो की तुलना में अधिक घातक सिद्ध हुई अन्यथा मुगल साम्राज्य के स्थान पर मेवाडी राज्य की स्थापना में अधिक सर नही रह गई थी सागा के पश्चात रतनसिंह विक्रमा- दित्य तथा बरणवीर के समय मेवाड पर आफत की काली पोली आधिया मडराने लगी। आन्तरिक पडयन्त्र, कलह और कुचक्रो का दौर चला। अन्तत पना धाय न स्वामी धम का निर्वाह कर अपने पुत्र का बलिदान पर उदयसिंह के प्रारण बचाये। 1541 ई मे मीसोदिया सामन्तो के सहयोग से उदयसिंह ने सिंहासन प्राप्त किया तथा अपनी व्यक्तिगत योग्यता से अव्यवम्या दूर कर प्रशानिक ढाचे को मुमगठित करने में सफलता प्राप्त की। उदयसिंह ने 1559 ई मे दक्षिण-पश्चिमी मेवाड मे पहाडी श्रृखलामो के मध्य उदयपुर शहर की स्थापना की। आन्तरिक स्थिति सुधारने के प्रयत्नो मे लगे हुए अदयसिंह ने अपनी चतुगई से शेरशाह के प्रारमण से तो चित्तौड को बचा लिया कि तु 1567 ई मे अकबर के प्राक्रम के समय वह चित्तोड की रक्षा न कर सका सामन्ती की मश्रणा के अनुसार उमे अनिच्छा से चित्तोड छोड़ कर पहाडो को शरण लेनी पड़ी। गढ की रक्षा में जयमल और पत्ता ने अभूतपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया। स्वय अकवर उनकी वीरना मे इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपने इन शत्रु शूरमाग्री को सम्मान देने हेतु उनकी प्रतिमाएं प्रागरा में प्रतिष्ठिन करवाई। उदयसिंह के उत्तराधिकारी प्रताप का स्वतन्त्रता प्रेम प्राज तक गीतो में गाया जाता है और वाना मे उसकी सराहना होती है। प्रताप ने समस्त राजसी वभव की तुलना मे स्वतत्रता को अधिक महत्वपूर्ण माना । हल्दीघाटी का युद्ध १ जून 1576 को लडा गया। इस युद्ध का एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि महाराणा प्रताप को मैना में हरावल का नेतृत्व हकीमखा पठान ने दिया जबदि मुगी सेना की कमान मामेर के राजा मानमिह ने सभाली थी। युद्ध में दोनो पक्ष के लगभग 650 सैनिक मारे गये। प्रारम्भ में प्रताप की सेना का पलडा भारी रहा पर अन्न मे मानसिंह विजयी हुमा। हल्दी घाटी के युद्ध मे पराजय से प्रताप ये सघप वा मत नहीं हुमा। इसके पश्चात प्रताप ने छापामार नीति अमनाई तथा मुगल चौकियों पर धावे वाले। 19 जनवरी 1597 में चावड में स्वगवाम तर प्रताप [ 103 ] निरन्तर संघर्ष करता रहा तथा अनेक परम्परागत मेवाडी क्षेत्रो पर पुन अधिकार कर लिया था। प्रताप के उत्तराधिकारी अमरसिंह ने मेवाड की स्थिति में सुधार को ठान कर मुगलो से सन्धि करली। काला तर मे महाराणा जगतसिंह व राजसिंह ने मेवाड को पुन महिमामंडित करने के प्रयास किये। बादमे आपसी कलह और मराठो के निरन्तर आक्रमणो व अत्याचारी के कारण मेवाड को भी अग्रेजो से सन्धि करनी पड़ी। डी का स्वतत्रता प्राप्ति से पूर्व भारतीय रियासतो मे क्षेत्रफल की दृष्टि से हैदराबाद और कश्मीर के पश्चात सबसे बडी मारवाड की रियासत का क्षेत्रफल 36016 वर्गमील था। राजस्थान के रजवाडो मे शौर्य, बलिदान, स्वामीभक्ति और वीरता की दृष्टि में मारवाड का इतिहास अत्यन्त ही महत्वपूर्ण माना जाता है। वैसे तो मारवाड की पुरानी राजधानी मण्डोर का इतिहास ठेट माडू ऋिपि से जुडा हुआ है किन्तु मारवाड मे राठौडो का आगमन 13 वी शताब्दी मे माना जाता है। ख्यातों के अनुसार जयचद गहड वाल का वशज राव सीहा सव प्रथम द्वारका जाते हुए मार्ग में पुष्कर मे था, तब उसे पल्लीवाल ब्राह्मणो ने प्रामत्रित कर पाली बुलाया। आज कल इस धारणा को अधिक मान्यता प्राप्त नहीं है। सीहा को गहड वाल स्वीकार करने मे कुछ वाधाए दिखलाई पड़ने लगी है। चाहे हथू राष्ट्रकूट था, कर्नाट के राष्ट्र ट्रो का वशज था अथवा जयचद गहड़वाल का वशज, यह सभी इतिहासकार स्वीकार करते है कि वह मारवाड मे राठौडो का प्रथम पूवज था। पल्लोवालो के निमरण पर उनकी रक्षाथ सीहा सवप्रथम पाली पहुचा, बाद में उसने खेड पर अग्ना ग्राधिपत्य जमाया। सीहा को ग्यारहवी पीढी मे राव चूण्डा ने मडोर मे राठौड राज्य की स्थापना की। मडोर अधिकार के पश्चात चूण्डा ने नागौर, फलोदी तथा सोजत जीता। चूण्डा के पुन रणमल ने मोकल तथा कुम्भा के समय चित्तोड मे अनेक उल्लेखनीय काय किये। अन्तत वह सीसोदिया- राठौड सामतो मे प्रतिद्वन्द्विता के कारण एक पडयन का शिकार बन कर मारा गया। उसका पुत्र जोधा मारवाड के प्रारम्भिक नरेशो मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था। उसने न केवल मडोर मे राठौड शासन को पुन स्थापना ही कि बल्कि अनेक नवीन क्षेत्रों को जीतकर उहे अपने सम्बचियो को सौपा व मारवाड मे सामन्त प्रथा का सूत्रपात किया। जोधपुर नगर की स्थापना कर मारवाड की शक्ति और गौरव मे वृद्धि की। नि सदेह वह राठौड सत्ता का वास्तविक सस्थापक और राठौड साम्राज्य को एक निश्चित स्वरूप प्रदान करने वाला व्यक्ति था। डॉ दशरथ शर्मा का कहना है कि "Jodha can be regarded as the real founder of Rathore power in Rajasthan With him th'y became people with a setteled and permanent territtory to which they could call their 'Watan or homeland' [ 104 ] जोधा के पिता राव रणमल्ल चित्तोड मे चूण्डा सीसोदिया व उसके सहयोगिया द्वारा रचित एक पडयत्र में मारे गये । जोधा, कान्वल, वरजाग व अन्य राठौड जा चित्तोड दुग मे नीचे ठहरे हुए थे रणमल्ल की हत्या का समाचार मिलते ही मडोर की तरफ रवाना हो गए। प्यातो मे जोधा के सहयोगियो की संख्या भिन्न भिन बताई गई है कितु अधिकाश साधनो मे कहा गया है कि इस समय जोधा के साथ लगभग 700 व्यक्ति थे। रावत चूण्डा के नेतृत्व मे चित्तौड की सेना ने जोधा का पीछा किया। रेऊजी के अनुमार चितरोडी गाव के पास पीछा करती हुई सेना से जोधा की प्रथम मुठभेड हुई। अोझाजी प्रथम लडाई कपासन नामक स्थान पर मानते है। मूथा नैणसी ने 'वात परगने जोधपुर री' मे लिखा है कि चित्तौड से रवाना होने के पश्चात पहली लडाई पाठ-दस कोस पर हुई। कपासन चित्तोड से आठ कोस पर स्थित है अत अोझाजी का मत ही सत्य दिखलाई पडता है। कपासन मे भीषण युद्ध हुआ जिसमे जोधा के लगभग 200 सहयोगी मारे गये। रावत चूण्डा के साथ बहुत अधिक सैनिक थे अत अवसर मिलते ही राठौड सेना यहा से भाग निकली। सोमेश्वर के घाटे तक पहुचते-पहुचते चितरोडी सतखम्भा कनवज तथा केलवा नामक स्थानो पर मुठभेडे हुई अत मोमेश्वर पहुचने पर जोधा के साथ केवल 250 सैनिक, बचे । सोमेश्वर मे वरजाग ने एक योजना प्रस्तुत की जिसके अनुसार सात योद्धाओ सहित जोधा को मन्डोर की तरफ रवाना कर दिया व शेप लोग पीछा करने वाली सेना को रोकने हेतु डट गये। यद्यपि सोमेश्वर के युद्ध मे लगभग दो सौ व्यक्ति मारे गए (चादराव, पृथ्वीराज, तेजसिंह, व चरडा आदि मारे गये) पर वे जोधा को सकुशल मन्डोर पहुचाने म सफल हो गए। मन्डोर मे भी जोधा सुरक्षित नही था उसके सभी महत्वपूर्ण सहयोगी कामा चुके थे अत मडोर से आवश्यक सामाग्री और अपने सहयोगियो को माथ लेकर जगलू की तरफ निकल गया व वतमान बीकानेर के पास काहूनी नामक एक छोटे से गाव मे पहुच गया। चित्तोड की सेना ने सोमेश्वर के पश्चात बिना अधिक विरोध के मण्डोर पर अधिकार जमा लिया। अज्जा, एका, राघवदेव व हीगनू आदि मोसोदिया माम तो ने मन्डोर मे अपनी स्थिति सुदृढ कर चौकडी मेडता और मौजत आदि स्थानो पर अपनी सैनिक चौकिया स्थापित की और जोधा को खोजने लगे। इस प्रकार जोधा के सामने अत्यन्त ही निराशाजनक परिस्थितिया थी। चित्तोड की सेना तो उसे ढू ढ ही रही थी मारवाड की राजनैतिक परिस्थिति भी उसके अनुकूल नही थी। उस समय वर्तमान मारमाड के विभिन्न क्षेत्रो पर स्वतत्र शासक राज्य कर रहे थे जिनमे से अधिकाश चित्तौड के प्रति स्वामीभक्त थे। जैतारण मे राव प्रास्थान के पुत्र सिंधल के वशज थे जो चित्तोड के राणाग्रा की आधीनना मानते थे। सीवारणा मे जैतमलोत शासन कर रहे थे जो राव सलखा के पुत्र जैतमल के वराज थे, खेड और पोकरण राव मल्लिनाथ के वशजो के प्राधीन [ 105 ] थे। नागोर मै पुन खानजादा वश ने अपनी मत्ता स्थापित करली थी। प्रत जोगा को न केवल मोमोदियो से पन्डोर ही छीनना था बल्कि इन सभी स्वतन शामको को मी नतमस्तक करना था। लगभग पन्द्रह वर्ष तक नोधा इधर उधर भटकता रहा और अपनी शक्ति मे निरन्तर वृद्धी करता रहा। रयातो से ज्ञात होता है कि मण्डोर पर उसका प्रथम आक्रमण असफल रहा। कुछ समय पश्चात एक बुढिया से प्रेरणा प्राप्त कर उमने मन्डोर से दूर दूर के ठिकानो पर आक्रमण करना प्रारम्भ किया। उसके साथ काफी योद्धा एकत्रित हो गए कितु अभी तक अच्छे अश्वो का अभाव था । सेतरावा के रावत लूणा के पास बहुत अश्व थे और उसकी पत्नी जोधा की मौसी थी। ठकराइन की सहायता से जोधा ने एक शक्तिशाली अश्व सेना तैयार की। इसी बीच जोधा बैगटी नामक गाव मे सिद्ध पुरुष हडबू साखला से भी मिला । हड वूजी ने विश्वास दिलाया कि जोधा को इच्छित कार्य मे सफलता मिलेगी। इसमे उसके उत्साह व मनोबल मे वृद्धि हुई। मण्डोर पर अधिकार करने की पूरी योजना तैयार कर जोधा ने अपने एक विश्वासपान सहयोगी काला मगलिया को मडोर दुर्ग मे भेजा। मन्डोर मे काला मगलिया का एक सम्बन्धी निवास करता था अत किसी को सन्देह न हुआ। वह जोधा को मन्डोर की आन्तरिक स्थिति और गतिविधियो की सूचना भेजने लगा। अन्त मे एक निश्चित तिथि की रात्रि में मगलिया ने दुर्ग के द्वार खोल दिये अद्धं रात्रि मे जोधा ने अपनी सेना सहित दुर्ग में प्रवेश कर अज्जा, ऐका, हीगलू, राघवदेव, सहसमल और नवद आदि को मौत के घाट उत्तार कर मन्डोर पर अधिकार कर लिया। मेवाड के इतिहास के साधो मे जोधा के मन्डोर अधिपत्य के सम्बन्ध मे बताया गया है कि महाराणा कुम्भा की दादी हसाबाई ने एक बार उससे कहा "रणमल ने मेवाड की बहुत सेवा को उसने चाच-मेरा को मारा, माण्डू के सुल्तान से मेवाड की रक्षा की व उसके गौरव मे वृद्धि की, इसके बदले उसे मृत्यु पुरस्कार मे मिली और अब उसका पुत्र जोवा भी मारा फिर रहा है।" कुम्भा ने स्पष्ट रूप मे जोधा की सहायता करने में असमर्थता प्रकट की वितु हसावाई ने कहा "वह जोधा को मन्डोर पर अधिकार करने लिए सूचित करदे । महाराणा इस कार्य को बुरा नहीं समझेगे"। इस प्रकार उदयपुर के इतिहास के साधनो के अनुसार जोधा का मन्डोर अधिकार कुम्भा की स्वीकृति से ही सम्भव हो सका। कितु उपलब्ध तथ्यो का आलोचनात्मक विश्लेषण करने पर यह धारणा असत्य लगती है क्योकि (3) सम्भवत हमा बाई और कुम्भा की जोधा को सहायता सवधी वार्ता व [ 106 ] हसाबाई की प्राथना केवल महाराणा कुम्भा के गौरव की रक्षा करने के ध्येय से ही लिखे गये है। मारवाड की ख्यातो मे जोधा द्वारा सैनिक बल से मन्डोर जीतने का अत्यन्त ही विस्तृत विवरण उपलब्ध है। ऐतिहासिक दृष्टि से मारवाड के साधन अधिक विश्वसनीय है। (2) यदि वास्तव मे मडोर पर अधिकार कुम्भा की स्वीकृति से किया जाता तो युद्ध न होता और अज्जा, ऐका, हीगलू और सहसमल जैसे सामघरमी सीसोदिया साम तो को न मराया जाता। अत मडोर शक्ति से छीना गया था। (3) राजपूत इतिहास के प्रसिद्ध विद्धान डा दशरथ शर्मा ने लिखा है 'राजपूत चरित्र की एक मूल विशेषता यह है कि सक्ता और भूमि के लिए प्राणोत्सर्ग कर देते है क्योकि भूमि के लिए प्राणो का बलिदान स्वग प्राप्ति के समाम समझा जाता था। इस चरित्र के महाराणा कुम्भा ने स्वेच्छा से अधिकारत्याग दिया यह कहना उचित नही लगता।" (4) 1453 ई मे जोधा द्वारा म डोर पर अधिकार के समय कुम्भा की स्थिति दयनीय थी और वह कठिनाइयो से घिरा हुआ था। उस पर मालवा और गुजरात की सेनाए मडरा रही थी। ऐसे उचित समय मे जोधा द्वारा मन्डोर पर अधिकार निश्चित रूप से उसकी दूरदर्शिता और सूझ का पारिचायक है। यह भी स्पष्ट है कि जोधा द्वारा ऐसे उपयुक्त समय पर आक्रमण किया गया था जबकि मन्डोर के सीमोदिया मामन्तो को चित्तोड से सैनिक सहायता मिलने की कोई सम्भावना नहीं थी। ऐसे समय जबकि मालवा एव गुजरात के विरुद्ध योग्य व्यक्तियो की आवश्यकता थी कुम्भा अपने अज्जा, ऐका, हीगल, सहसमल और नवद जसे योद्धानो को जोधा के हाथो, अपनी स्वीकृति से कैसे मरवा सकता था। (5) मन्डोर विजय के पश्चात जोया ने मेवाड के सीमात प्रदेशो पर अाक्रमण किए इसी समय गोडवाड के अनेक परम्परागत मेवाडी क्षेत्रो को मारवाड मे मिलाया। यदि कुम्भा की इच्छा से ही जोधा को मन्डोर मिला होता तो वह मेवाडी क्षेत्रो पर माक्रमण कदापि न कर पाता। (6) 1459 ई मे जोधा द्वारा एक सुरक्षित पहाडी पर सुदृढ दुग की स्थापना भी मेवाडी आक्रमण की सम्भावना से ही की गई। यदि कुम्भा की स्वीकृति से मडोर लिया जाता तो सुरक्षित स्थान ढ़ दन की क्या आवश्यकता थी। 12 मई 1459 जोधा द्वारा बनवाये जाने के समय ख्याता के अनुमार दुग का नाम 'गढ चिंतामणी' रखा गया । कुछ समय पश्चात यह क्लिा 'मयुरध्वज नाम से प्रसिद्ध हुआ [ 107 ] गढ ऊचो चित्तौड प्राबू सू वाता करै । मोरध्वज री मोड किरण सू कमती किसनिया ।। इस नामकरण का कारण गढ का मयूर प्राकार था। आजकल यह किला मेहरान- गश नाम से प्रसिद्ध है। मेहर का अथ सूय है अत मेहरानगढ का अथ हुग्रा सूर्यवशियो का किला डिंगल मे 'गढ मेहराण' अभेद्य व सुदृढ़ दुर्ग को कहा जाता है । (7) मारवाडी ख्यातो से ज्ञात होता है कि मन्डोर मे जोधा की सफलता की सूचना मिलने पर महागणा कुम्भा अत्यन्त त्रुध हुआ व स्वय एक सेना लेकर मारवाड की ओर बढा। जोधपुर राज्य की ख्यात से ज्ञात होता है कि जब जोधा को इसकी सूचना मिली तो उसने बीस हजार सैनिको की सेना तैयार की व पाच हजार बलगाडियो मे सैनिक बिठाकर कुम्भा का सामना करने निकला। पाली के निकट पहुच कर कुम्भा को ज्ञात हुआ कि मरने मारने पर उतारु राठौड सेना पा रही है जो वह वापस लौट गया। उत्साहित राठौड सेना चित्तौड तक जा पहुची। गुण जोधायण (पसाइत गाडण लिखित) के अनुसार जोधा ने चित्तौड़ दुर्ग के द्वार जला दिये। (8) मन्डोर पर अधिकार कर जोधा ने अपने बड़े भाई अखैराज को राज्य सौंपना चाहा। अखैराज ने इसे अस्वीकार करते हुए अपने रक्त से जोधा का तिलक कर उसे मन्डोर का राव घोपित किया। बदले मे जोधा ने मेवाड से बगडी की जागीर छीनकर अखराज को सौंपी। तव से मारवाड मे यह परम्परा बन गई कि जोधपुर मे जब भी कोई नया शासक बनता बगडी का स्वामी अपने रक्त से तिलक करता। स्पष्ट है कि मण्डोर मे राठौड सत्ता की स्थापना दया, कृपा या कुम्भा के आशीर्वाद से नही बल्कि युद्ध और रक्त के बल पर हुई थी। मण्डोर विजय के पश्चात जोधा ने चौकडी (पीपाड), कोसाणा, सोजत, जैतारण आदि पर आक्रमण कर इन क्षेत्रो को जीता। सोजत व जैतारण को पहली बार जीधा ने ही मारवाड मे मिलिया । मारवाड को मेवाडी आधिपत्य मे मुक्त कर जोधा ने उन व्यक्तियो को -पुरस्कृत करने का विचार किया जिन्होने दुर्दिनो मे उसकी सहायता की थी। इस इच्छा की पूर्ति के लिए नये प्रदेशो पर विजय आवश्यक थी। छापर-द्रोणमुख या मोहिलवाटी पर निश्चित रूप से जोधा ने विजय प्राप्त की थी। प्रजीतसिंह मोहिल था। यद्यपि उसके साथ जोधा की राजाबाई नामक एक पुत्री का विवाह हुआ था किन्तु जोधा ने उसे पराजित कर अपने पुत्र वीदा को वहा का शासक बना दिया। अजीतसिंह के काका बछराज ने बहलोल लोदी के हिंसार मे छापर का शासक [ 108 ] चेप्टा की। गवनर सारगखा की सहायता से मोहिलवाटी पर पुन अधिकार करने की असफल बछराज व सारंगखाँ की सम्मिलित नेतानो को परास्त कर जोधा न स्थाई रुप से छापर मे राठौड सत्ता की स्थापना कर दी। सारगखा पर जोधा की विजय का उल्लेख नणसी व दयालदाप ने तो किया ही है साथ ही कयामखा रासो व श्रृगारदेवी अभिलेख मे भी इसका उल्लेख मिलता है। यह विजय इसलिये महत्वपूर्ण है कि इससे जोधा के साम्राज्य की सीमा हीसार तक जा पहुची। तत्कालीन भारत की सबसे महत्वपूर्ण सत्ता लोदी वश के एक प्रभवशाली अमीर को पराजित करने से जोवा के मान व प्रतिष्ठा मे अभूतपूर्व वद्धि हुई। जोधा की अन्य विजयो का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है किन्तु नणसी ने चाड ढाढी के आधार पर लिखा है "जोवा ने जालार को जीता, कन्छवाहो व भाटियो को अपनी कन्याए व्याहने के लिए बाध्य किया, बू दी से कर ग्रहण किया, घाणेराव का गौरव नष्ट किया, गून्दोज की स्थापना की, सेतरावा को नतमस्तक किया। उसने राणा की भूमि को रौदा और अपने घोडो को पिछोला मे स्नान कराया।" यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि चाड के इस कथन मे कितना सत्याश है। यदि इसे पूण सत्य मान लिया जाय तब निश्चित रूप से समस्त वतमान राजस्थान पर जोधा का प्रभाव स्थापित था। किन्तु यह कथन बहुत बढा-चढा कर लिखा गया है । महाराणा कुम्भा के पुत्र ऊदा ने पिता की हत्या के पश्चात जोवा को अजमेर व साभर इसलिये दिये कि जोधा उसे चित्तोड का स्वामी मान ले । ऊदा का विश्वास था कि जोधा की मान्यता मिल जाने से अन्य क्षेत्रो से विरोध की सम्भावना नहीं रहेगी। इसी कारण जोधा की स्वीकृति का मूल्य उसने अजमेर व साभर के रूप मे चुकाया। निसन्देह इस समय जोधा की प्रतिष्ठा बहुत अधिक थी व कुम्भा की मृत्यु के पश्चात मभी राजपूत शासको की तुलना मे वह सबसे अधिक शक्तिशालो, बडे माम्राज्य का स्वामी और नीति निपुण शासक था । जोधा के शासन की एक अत्यत ही महत्वपूर्ण घटना उसकी साखली रानी नौरगदे से उत्पन पुत्र बीका द्वारा बीकानेर की स्थापना थी। जोधा के शासन में ही मारवाड में सामात प्रथा की दृढ स्प से स्थापना हुई । उमने अपने मम्मधियो को महायता से ही विशाल साम्राज्य निर्मित किया था। पावागमन के सीमित साधनो के कारण इतने विस्तृत साम्राम्य पर एक केंद्र से दशामन करना सम्भव न था। साथ ही कठिन परिस्तिथियो में सहायता परने वाले सहयोगि गे को भी पुरस्कृत करना प्रापश्यर था। प्रत जोधा ने अपने माम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रा पर शामन करने हेतु अपने भाइया व पुत्रों की नियुक्तिया की।
[ 109 ] भाई चापा क्षेत्र कापरडा+बनाई भाद्राजूरण साण्डराव लूणावास वगडी माइत मण अधराज इत्र सातल बीया चोदा भारमल दूदा चरमसी पोकरण-+'फलोदी वीवानेर छापर द्रोणमुख बोलाडा मेडतर पासोप जोगा धामिक प्राति का व्यक्ति था। अपने पिता रणमल के अवशेषो को गगाजी पहुनाने वाले च दन चारण को उमने एक गाव दान दिया था। उसने स्वय प्रयाग व गया वो तीर्थ यात्राए वी थी व इन स्थानो पर लगने वाले करो को समाप्त करवाने हेतु प्रयत्न दिये थे । इस प्रकार जोधा न पेल राठोड सत्ता का पास्तविक सस्थापक ही था बल्कि उसने मारवाड को सीमायो एप उमफे गौरव में भी अभूतपूर्व वद्धि को। जोधा के पश्चात् सातल, सूजा, गागा तथा मालदेव सिंहासनारूढ हुए । मालदेव के समय (1532-1572 ई ) मारवाड की सीमा और गौरव मे वृद्धि हुई। गहर के चारो ओर ५ फीट चौडे व 32 फीट ऊंचे परकोटे का निर्माण मालदेव द्वारा ही करवाया गया। परकोटे के बीच-बीच में सात जगी दरवाजे बनवाये। इनमें से पाच दरवाजो के नाम मालदेव द्वारा विजित प्रदेशो के नाम के आधार पर रसे गये। किले पर खडे होकर नागौर को दिशा मे नागौरी गेट, मेडता की ओर मेडती गेट, तथा मिवाणा की ओर सिवाची गेट का निर्माण करवाया। शेष दो का नाम चद्रमा व सूर्य के आधार पर चादपोल तथा सूरजपोल रखा। मालदेव की सैनिक शक्ति की इतनी धोस जमी हुई थी कि शेरशाह द्वारा पराजित मुगल बादशाह हुमायू' मालदेव की शरण हेतु मारवाड की ओर ग्रा पहुचा। मालदेव द्वारा हुमायू को आश्रय देने सम्बधी समाचारो से क्रुद्ध शेरशाह को बीकानेर के कल्याणमल और मेडता के वीरम ने और अधिक भडकाया। शेरशाह ने मारवाड पर चढाई कर दी। दोनो फौजे आमने सामने पडी थी तब ऐसा कुचक्र चलाया गया कि विश्वासघात की आशका से मालदेव युद्ध क्षेत्र से निकल गया। स्वामीभक्ति का साक्ष्य प्रस्तुत करने [ 110 [ के उद्देश्य मे जता का कूपा के नेतृत्व मे मारवाड की सेना ने ऐसा युद्ध किया कि विजयी होने के पश्चात् भी शेरशाह को यह कहने के लिये विवश होना पड़ा 'मुट्ठी पर वाजरे के लिये दिल्ली की सल्तनत खो बैठता। दिल्ली के मुल्लानो से भिडन्त के ममान ही पारम्परिक चर्चाओं में मालदेव की 'रूठी रानी' ऊमादे भटियाणी तथा दामी भारमली से सम्बन्धित बाते विशेष उल्लेखनीय है। मालदेव का पुन चन्द्रसेन महागणा प्रताप के समकक्ष स्वतन्त्रता का पुजारी। चन्द्रमेन जीवन भर सिवाणा के पहाडी क्षेत्र मे अकबरी फौजो से भिडता रहा। सीहा मे चन्द्रसेन तक 'राव' कहलाने वाले राठोड शासक उदयसिंह के समय 'राजा कलाने लगे। उदयमिह व गजसिंह ने मुगली मसबदार के रूप में दक्षिण भारत के युद्धो में बहुत यश अजित किया। गजसिंह के दोनो पुत्रो - अमरसिंह व जसवन्तसिंह-ने मारवाड़ के गौरव मे वृद्धि की। अमरसिंह राजस्थान की प्रान-बान के प्रतीक के रुप में प्रसिद्ध हुआ। शाहजहा की बीमारी के समय मुगल उत्तराधिकार युद्ध में जसवत सिंह ने दारा का समथन कर मालवा मे धरमत नामक स्थान पर युद्ध किया। इस युद्ध में पगजित जसवमिह के साथ उसकी हाडी रानी द्वारा किये गये व्यवहार के अनेक किम्मे आज तक मारवाड मे प्रचलित है पर इनका कोई ठोस ऐतिहासिक आधार नहीं है। काबुल मे जसवन्तसिंह ने मुगल मेनापति के रूप मे पठान विद्रो- हियो को दवाया । 28 नवम्बर 1678 को जमन्द मे जसवन्तसिंह के स्वगवास के पश्चात् पोरगजेब के कुचक्र मे बालक राजकुमार अजीतसिंह और मारवाड राज्य की रक्षा स्वामीभक्त दुर्गादास ने अपनी व्यक्तिगत सूझ, वीरता और त्याग की भावना से को। अाज तक मारवाड मे दुर्गादास की स्वामीभक्ति के उदाहरण दिये जाते हैं। परवर्ती मुगलो की निर्वलता के ममय अजीतसिंह ने दिल्ली भी राजनीति म भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अजीतसिंह के उत्तराधिकारी अभयसिंह ने अहमदाबाद पर आक्रमण कर सरवुल दखा को पराजित किया । अभयसिंह के भाई वसतसिंह ने मराठो से जबरदस्त युद्ध किया। अभयसिंह के पुत्र रामसिंह तथा वखतमिह के बीच हुए उत्तराधिकारी युद्ध के कारण मारवाड मे मराठो का प्रवेश हुआ। विजयसिंह के समय मगठा पातक छाया रहा। मानसिंह के समय (1803-1843) स्वामी भक्तो को पुरस्कार मिले तो विरोधियो को विप पान करना पड़ा। मानसिंह स्वय उच्च कोटि का कवि और विद्वानों का प्राश्रयदाता था ! उदयपुर की राजकुमारी कृष्णा वरी से विवाह के प्रश्न पर जोधपुर जयपुर युद्ध, सामन्तीय पहयत्र, मीरसा पिण्डारी के द्वारा लूट खसोट प्रादि कारणो से बाध्य होकर मानसिंह को अप्रेजा से मधि परनी पड़ी। आमेर के पच्छवाहो के प्रादि स्थान सम्बधी समस्या या अभी तक पूर्ण सामाधान तो नहीं हो सका है विन्तु सामायन यह स्वीकार किया जाता है कि 12वी शताब्दी मे दुनहाय ग्वालियर से दौमा पहुचा और उसने बडगूजरी को हराया। एक बार दौमा मे पर जम जाने पर उसने अपने समुगल पक्ष (पोन) [ 111 ] की सहायता से मीरगो को परास्त कर माची (माज का रामगढ), खोह, झोटवाडा अर गटोर पर विजय प्राप्त करली। उसके वशज काकिलदेव ने भीणो से आमेर छीन कर उसे राजधानी बनाया । ख्यातो मे इस वश के मालसी, जिलदेव, रामदेव, कुतल, जरणमी, उदयकरण, नृसिंह और चन्द्रसेन के नामो के उल्लेख मिलते हैं। च द्रसेन के पुत्र पृथ्वीराज ने महाराणा सागा के साथ खानवा मे बाबर से युद्ध किया था। पृथ्वीराज का विवाह बीकानेर के राव लूणकण की पुत्री वालाबाई से हुआ। पृथ्वीराज की विशेष कृपापात्र बालाबाई के प्रभाव से उसने अपने छोटे पुन पूरणमल को उत्तराधिकारी मनोनित कर दिया। 1533 ई मे पृथ्वीराज के ज्येष्ठ पुन भीमदेव ने पूरणमल को पराजित कर आमेर पर अधिकार कर लिया। गृह-कलह से उत्पन अव्यवस्था कारण प्रामेर मे अफगानो मुगलो द्वारा हस्तक्षेप की सभावना बढ गई। भीमदेव का उत्तराधिकारी रतनसिंह अयोग्य था। अपनी एश्वयशाली प्रवृत्ति के कारण वह शेरशाह के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना न कर सका। फलत उसे अधीनता अगीकार करनी पड़ा। अव्यवस्था का लाभ उठाकर रतनसिंह के काका सागा ने आमेर की काफी भूमि पर अधिकार कर मागानेर की स्थापना की। सागा के बाद उसके भाई भारमल ने सागा के काय दो और आगे बढाया। भारमल के भडकाने पर आसकरण ने अपने भाई रतनसिंह को जहर दे दिया। 1547 ई मे सामतो का समथन प्राप्त कर भारमल ने प्रासकरण को गद्दी से उतारा और खुद आमेर का स्वमी बन गया। पचास वप की अवेड उम्र का भारमल राजनीतिक दाव पेच में माहिर । चारो ओर मडराती मुसीबतो से छुटकारे के प्रयत्नो मे वह ख्वाजा साहब की जियारत हेतु आये हुए अक्बर से मिला। मुगली राज की नीव पक्की करने के लिये अकवर का भी शक्तिशाली व विश्वासपात्र सहयोगियो की आवश्यकता थी। दोनो मे सम्बन्ध स्थापित हुआ जो उस समय दोनो के लिये ममान हितकर था। बाद मे अकवर का विश्वासपात्र बनकर भारमल ने अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन किये। 1574 ई मे मृत्यु के समय भारमल का मनसब बढते वढते पचहजारी तक पहुच गया था। भारमल का उत्तराधिकारी भगवतदास बहुत योग्य सिद्ध हुअा। सात वप तक उसने कुशलता पूर्वक पजाव की सूवेदारी सभाली। 1589 मे भगवतदास का देहावसान होने पर मानसिंह ने आमेर की बागडोर मभाली। मानसिंह ने, प्रारम्भ मे अपने दादा भारमल के समय (1562-1574) अपने पिता भगवतदास के समय (1574-89) और फिर स्वय अामेर के शासक के रूप में लगभग 67 महत्त्वपूर्ण युद्धो में भाग लिया। उसने बगाल, बिहार और उडीसा मे मुगली साख जमाई और कई महत्त्वपूण काय किये । मध्य कालीन एशिया के सर्वाधिक गौरवशाली शासक अकबर के योग्य सेनापति और नौ रत्नो मे प्रमुख मानसिंह ने मुगल साम्राज्य की बहुमूल्य सेवा की। दुरसा, होलराय, अबूल फजल और तानसेन जसे कवियो-कलाकारो की सगत का प्रभाव मानसिंह पर भी पडा। कहा जाता है कि [ 112 ] एक फकीर कवि मग के पास जाकर रोने धोने लगा अन्त मे गग ने एक हजार रुपये की हुडी मानसिंह के नाम की लिख कर फकीर को दे दी। मानसिंह ने सहप हुडी सिकार कर कवि गग के पास उलाहना पहुचाया कि बेचारे फकीर का दरिद्र दूर ही करना था तब इतनी छोटी राशि की हुडी क्योकर भेजी। यह भी कहा जाता है कि मानसिंह के विश्वासपात्र कवि हापोजी के पास निज के एक सौ हाथी थे । मानसिंह के पश्चात भावमिह ामेर का शासक बना। वह जहागीर का विशेष कृपा पात्र था किन्तु नशे की लत के कारण अधिक जीवित न रह सका। उसके पश्चात मिर्जा राजा जयसिंह ने मराठो पर शाही नियत्रण हेतु अनेक प्रयाम किये किन्तु उस पर शिवाजी को आगरा से निकलने मे महायता करने का आरोप लगा। बरहानपुर में मिर्जा राजा की मृत्यु के पश्चात विशनसिंह आमेर का शासक बना। काबुल में उसकी मृत्यु होने हर सवाई जयसिंह उत्तराधिकारी बना। सूझ- बूझ तथा शूरमाई मे अपने पूर्वज जयसिंह से भी सवाया। दक्षिण के युद्धा में योग्यता बताने पर मालवा की सुबेदारी का अधिकार बना। सवाई जयसिंह का प्रताप शौर्य इतना बढा चढा था कि वादशाह मुअज्जम ने आमेर को खालमा घोषित किया। जयसिंह ने सैनिक बल से आमेर पर पुन अधिकार कर लिया। समकालिन राजपूत नरेशो मे जयसिंह की धाक थी। उसी के प्रयत्नो से 1734 ई मे भीलवाडा के पास गुलाबपुरा से टेढ मील पर स्थित हुरडा नामक स्थान पर उदयपुर जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ इत्यादि के शासक मराठो के विरूद्ध संयुक्त प्रयत्न करने के उद्देश्य से एकत्रित हुए थे। कला-साहित्य के सरक्षक जयसिंह ने 18 नवम्बर 1727 को जयपुर शहर की स्थापना की। आमेर का दीवान-ए-खास, व्रिजनाथजी मन्दिर, आनन्दकृष्णजी का मन्दिर, अयोध्या मथुरा और काशी मे धर्मशालाऐ, जयपुर दिल्ली, उज्जेन व बनारस की वेधशालाएं (जतर मतर) आज भी जयसिंह का यशगान करने के लिये विद्यमान हैं। उसके दरबार मे देश-विदेश के साहित्यकारो, शिल्पियो, ज्योतिपियो, भगोल शास्त्रियो प्रादि का जमघट लगा हुआ था। 1743 ई मे सवाई जयसिंह के स्वगवास के साथ ही उसके बडे पुत्र ईश्वरीसिंह और मेवाड को राजकुमारी से उत्पन्न पुत्र माधोसिंह के बीच उत्तराधिकार का बखेडा पड़ा हुआ। इस गृह कलह ने जयपुर के उज्जवल इतिहास पर कालिख मल दी। जबरदस्त वर्वादी हुई। इस अवस्था का लाभ मराठो ने उठाया। प्रजा को भी अनेक अत्याचार सहन करने पडे। ईश्वरीसिंह-माधोसिंह तो एक के बाद एक शासक बन गये पि तु मानसिंह तथा सवाई जयसिंह के प्रयत्नी से विकसित राज्य को विपदानो की पाई में धकेल दिया। प्रतापसिंह ने तुगा ये युद्ध मे मराठो से जोर- दार टक्कर लो। हवा महल के रूप मे जयपुर के स्थापत्य में सुदरतम अलवरण जहा। क्ला-माहित्य की उन्नति के लिये भी प्रतापसिंह ने अनेक प्रयत्न किये। 1803 ई में प्रतापसिंह के स्वर्गवास के पश्चात् उमरे उत्तराधिकारी जगतसिंह को अग्रेजा या प्राश्रय लेने के लिये बाध्य होना पड़ा।
[ 113 ] दक्षिण पूर्वी राजस्थान के हाडोती क्षेत्र मे स्थित कोटा बू दी के राज्यो ने भी राजस्थान के इतिहास को गौरवान्वित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हाडा चौहानो से पूर्व वहा मोगो का आधिपत्य था। वू दा मीणा के कारण बून्दी नाम पडा। भसरोडगढ के समीप बवावदे के नाटौल चौहान देसिह ने सव प्रथम 1242 ई के लगभग इस क्षेत्र मे हाडा चौहानो का प्रभाव जमाया। मीणो से बून्दी, गजमल गौड से खटकड, मनहरदास गोहिल से पाटन जसकरण दहिया से करवर व गैरपोली तथा लाखेरी क्षेत्र जीत कर देवसिंह ने हाडा राज्य की नीव डाली। कनल जेम्स टॉड ने देवसिंह के एक चमत्कारी घोडे तथा उसकी आन-बान का प्राश्चय चकित कर देने वाला वर्णन किया है। टॉड के अनुमार देवसिंह ने दिल्ली के सुल्तानो से भी सघप किया। देव हाडा के समय चम्बल नदी बून्दी की सीमा थी। देव का उत्तराधिकारी ममरसिंह भी अपने पिता के स्तर का योद्धा था। नवीन क्षेत्र विजय करने के लिये उसने चम्बल नदी को पार कर अखेलगढ व मुकन्दरानाल के भीलो को पराजित कर इस क्षेत्र की देखभाल का कार्य अपने पुत्र जैतसिंह को सौपा। कोटिया भील के नाम के कारण इस क्षेत्र का कोटा नामकरण हुआ । इसके पश्चात कोटा की जागीर बू दी शासक के छोटे भाई को दी जाने लगी। सुरजन हाडा, शत्र साल और रतन के समय बून्दी का निरन्तर विकास हुवा। कभी हाडे बनावटी दुर्ग को रक्षार्थ वट मरे तो कभी बून्दी राग युद्ध क्षेत्र से महाराणा कुम्भा की पगडी ले भागे। इसी प्रकार की शौर्य और बलिदान की कथाओ से बून्दी का इतिहास भरा पड़ा। 1624 ई मे राव रतन के छोटे भाई माधोसिंह के समय कोटा एक स्वत न राज्य बन गया। महाराव किशोरसिह ने दक्षिण मे मुगल साम्राज्य के विस्तार के समय महत्वपूर्ण कार्य किये । धरमत के युद्ध मे भी कोटा राव ने उल्ले खनीय सेवाए प्रदान की। कानान्तर मे कोटा-बून्दी मे परस्पर विरोध तथा झगडे मे दोनो राज्यो को हानि हुई। निरन्तर मराठो के आक्रमणो, उनके अत्याचारो और युद्धो के कारण हाटोती के इन राज्यो को भी अग्रेजो का आश्रय लेना पड़ा। जोधपुर शहर और दुर्ग के सस्थापक राव जोधा के पुन बीका ने स्वय की व्यक्ति- गत योग्यता से जागल प्रदेश मे एक नये राज्य की स्थापना की। बीका के नाम पर इस नवीन राज्य का नाम बीकानेर हुआ। यह भी कहा जाता है कि इस क्षेत्र के जाट नेता नरा और बीका के नामो को सयुक्त कर बीकानेर नामकरण किया गया । बीका ने पूगल के भाटियो, जागलू के साखलो, सिंधारणा के जोहियो, हिंमार के पठानो व बलोचो को पराजित कर सिरसा, भटिंडा, भटनेर, नोहर तथा नागौर तक अपने साम्राज्य की सीमायो का विस्तार किया। 1504 ई मे वीका के स्वर्गवास के समय बीकानेर चालीस हजार वर्गमील के क्षेत्र मे विस्तृत था। इसमे लगभग तीन हजार गाव सम्मिलित थे। बीका का उत्तराधिकारी नरा वना किन्तु 13 जनवरी 1505 ई मे अल्प प्रायु मे ही उसकी मृत्यु हो गई और उसका छोटा भाई लूणकरण शासक बना। लूणकरण योग्य शासक मिद्ध हुमा । उसने देवा और चायलवाड [ 114] जोते और जैसलमेर पर माक्रमण कर राव जंतसी को बुरी तरह पराजित किया । 21 मार्च 1526 को भाटी व जाहियो के घात से वह नारनोल के नवाब से युद्ध के समय मारा गया। लूणकरण दानो, प्रजा हित चाहने वाला व गुराजनो का सम्मान करन वाला शासक था। बीठू सूजा ने 'राव जैतमी रो छद' में उसे कल- युग का कण कह कर सम्बोधित किया। वोठू सूजा के वणन से ज्ञात होता हैं कि लूणकरण के उत्तराधिकारी जैतसी ने मुगल शहजादे कामरान को पराजित किया। नये प्रदेश जीनने की लालसा से कामरान ने भटनेर (हनुमानगढ) जीत कर बीकानेर पर प्राक्रमण किया। जैतमी ने श्रेष्ठ रण कौशल का प्रदशन किया। भोजराज रूपावन को बीकानेर की रक्षा का भार सौप कर उसने चुने हुए वीरो के साथ शहजादे की सेना पर धावा बोल दिया। अचानक हुए प्राक्रमण से मुगल सेना हडबडा कर भागने लगी। मुगलो से युद्ध के कारण थको मादी जैतसी की सेना कुछ समय पश्चात मारवाड के राव मालदेव के आक्रमण का प्रहार न झेल सकी। जैतमी युद्ध में मारा गया। उसके पुत्र कल्याणमल ने शेरशाह के पास पहुच कर उसे मालदेव पर चढाई करने के लिये उकसाया। इस प्राक्रमण के समय कल्याणमल ने अपना पैतृक राज्य पुन प्राप्त कर लिया। बाद में कल्याणमल ने अकवर से सम्पर्क स्थापित किया। कल्याणमण का पुन रायमिह बीकानेर का सर्वाधिक योग्य शासक सिद्ध हुअा। मुगली मसवदार के रूप मे उसने नागौर तथा जोधपुर राज्य का काय भार भी सभाला। कावुल, ब्लोचिस्तान और दक्षिण भारत मे रायसिंह ने अदभुत वीरता और साहस का प्रदर्शन किया। राजस्थान मे सिरोही, जालोर, मेवाड और सिवाणा के युद्धो मे भी उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बीकानेर का दुग रामिह ने ही निर्मित करवाया तथा कई कवियो को लाख पसाव व कोउ पसाव (विशेष सम्मान व पुरस्कार) प्रदान किये। इस शूरवीर का स्वगवाम दक्षिण में बुरहानपुर मे 1612 ई में हुआ। रायसिंह के भाई पृथ्वीराज ने 'वेलि किसन रूकमणी री' की रचना की। रायमिह के पुनी-सूरसिंह दलपतसिंह मे मनोमालि य रहता था। जहागीर ने प्रारम्भ मै दलपत के टीका किया लेकिन बादमे नाराज हो गया तव वीकानर के सरदारो ने ही उसे कैद करवा दिया और सूरसिंह बीकानेर का शासक बना। सूरसिंह के उत्तराधिकारी कर्णसिंह (1631-1669) ने अटक नदी के पार जाने से मना करने वाले नरेशो का नेतृत्व किया और 'जय जगलवर वादशाह' कहलाया। उसके बाद अन्पसिंह (1669 (1698) शामर बना। वह विद्या अनुरागी था और विद्वानो को उचित मान मम्मान देकर उमन यश अर्जित किया। अन्पमिह ने दक्षिण मे बोजापुर, गोलकुण्डा और मराठा के विरुद्ध युद्धा म योग्यता मिद्ध कर 'माही मुगतिव' वा सम्मान प्राप्त किया। अपसिंह के पश्चात सरूमिह सुजानसिंह व जोरावरसिंह शामा बने । सुजान सिंह के समय वोकानर पर जोधपुर के अजीतमिह और नागार के वखतसिंह के प्रारमण हुए। जोरावरसिंह के समय मारवाड के अभयसिंह का प्राश्रमण हुमा पर इस समय सवाई जयसिंह ने बीकानेर की सहायता की। बाद में राज्य [ 115 ] प्राप्ति हेतु पडया व बुचा, भाटियो द्वारा लूट, जनानी ढ्योढी का राजनीति म अनुचित हस्तक्षेप और इसी प्रकार के प्रान्तरिक कलह का दौर आरम्भ हो गया। यह उल्लेखनीय है कि राजस्थान के अधिवाश राज्यो ने मराठो की लूट व अत्या- चारो से प्रातकित होकर पेरामाउण्ट पावर का आश्रय लिया था कि तु बीकानेर को आन्तरिक कलह और पडयत्रो से ग्रस्त होने पर अग्रेजो से सन्धिया करनी पड़ी। राजस्थान में जाटो के प्रमुख राज्य भरतपुर की स्थापना ग्रिज के योग्य पुत्र चूडामण द्वारा की गई। सूरजमल के ममय भरतपुर का बहुत विकास हुग्रा । सूरजमल का प्रभाव इतना बढ़ गया कि उमने पजाब के जाटो के सहयोग से दिल्ली पर प्रारमण की योजना बनाई। उसके उत्तराधिकारी ने होल्कर को हराया और घोलपुर पर अधिकार स्थापित किया। 1805 ई मे जाट शूरमाओ ने एक बार तो अग्रेजो के छक्के छुड़ा दिये। राजस्थान के अधिकाश रजवाडो ने अग्रेजो को मित्रता स्वीकार करली तर 1826 मे भरतपुर ने भी अंग्रेजो से हाथ मिला लिया। उपरोक्त राज्यो के साथ ही सिरोही, हूगरपुर, जैसलमेर, अलवर, वामवाडा, शेखावाटी, झालावाड, करोली तथा शाहपुरा ने भी राजस्थान के इतिहास को गौरवशाली बनाने में योग दिया। टॉड ने लिखा है कि राजस्थान के प्रत्येक स्थान पर थर्मोपाली जैसे युद्ध और लियोनीडाज के समान योद्ध हुए। इस प्रकार मध्यकाल में राजस्थान प्रा-बान वाला क्षेत्र रहा। यहाँ के शूरमानो ने शौय और बलिदान के नये नये कीर्तिमान स्थापित किए। आस्मरण- कारी राजस्थान की ओर पाने से क्तराते थे। इसलिये यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि ऐमी वलिदानी प्रकृति वाले राजस्थान ने अंग्रेजो का प्राश्रय क्यो लिया? प्रश्न का उत्तर तत्कालीन परिस्थितियो के विश्लेपण से स्पष्ट होता है। अठारवी शताब्दी के प्रतिम छोर तथा उन्नीसवी के प्रारम्भिक वर्षों में राजस्थान में ऐसी उठक-पटक मची कि यहा के राजा-राणा हड वडा कर अग्रेजो की गोद मे जा बैठे। पोरजेब के पश्चात मुगल शासक निवल होते गये। राजस्थान पर भी मुगलो की सर यदुनाथ सरकार ने लिखा "समस्त राजस्थान एक ऐसा अजायबघर वन गया जिसके पिंजरो के न तो - कही दरवाजे ही थे और न ही पहरेदार ।" मराठो के निरतर आक्रमण और जुल्म बढने लगे। अधिक हुए। कभी एक पक्ष मराठो को अपने समर्थन मे बुला लाया तो कभी दूसरे पक्ष ने पिण्डारियो का आश्रय लिया। मराठो की लगातार लूट से अधिकाश रजवाडो के कोप रिक्त हो गये । राज्य' कोप की रिक्तता ने सनिक दुवलता को जन्म दिया। इस अव्यवस्था का लाभ उठाकर सामत भी स्वेच्छाचारी होने लगे। इस प्रकार की विपदानो से घिरे राजाप्रो ने अग्रेजो के प्राथय को धय भाग्य माना। 1818 ई तक अधिकाश रजवाडो के अग्रेजो से इस निवलना का प्रभाव पड़ा। उस समय यहा उत्तराधिकार के युद्धा बहुत करारनामे हो गये।
[ 116 ] अग्रेजो से सन्धिया होने पर विश्रयलित राजस्थान में एर बार तो व्यवम्या स्थापित हो गई। अगले नालोम वर्षों में लगभग सभी विपत्तिया दूर हो गई। कुछ तो 1761 मे तृतीय पानीपत युद्ध म अहमदशाह अब्दाली ने मराठा शक्ति का कुचल दिया और कुछ रही सही कमर अग्रेजो ने निकाल दी। इस प्राार बुचले जाने पर मराठे राजस्थान पर प्रायमरण करने योग्य नही रह गये । उत्तराधिकार के युद्ध भी समाप्त हो गये। अग्रेज जिसके पक्षधर बनते उमाशामन पर अधिकार मिश्चित । अग्रजा से सन्धियों के पूर्व रजवाडी ये बीच छोटी छोटी बाता के लेकर होने वाले युद्ध भी रुक गये। सधियो के अनुमार अग्रजो के मित्रों के बीच सौहाई बना रहना प्रावश्यक था। सामतो या प्रभाव भी धीमा पड़ गया। इस प्रकार मधिया से पूर्व की लगभग सभी समस्याग्रो का समाधान हो गया। अब प्रश्न यह मामने पाता है कि यदि सन्धियो के इतने सुपरिणाम हुए तब राजस्थान में 1857 में अग्रेजी विरोधी प्राप्ति की अग्नि क्यो प्रज्वलित हुई। कठिन भौगोलिक दशामा के कारण राजस्थान के लोग अन्य क्षेत्रो से अलग- थलग रहे और उनमे स्वतत्र प्रवृत्ति का विकास हुग्रा। बाकीदास, सूपमल मिश्रण, महाराजा मानसिंह, प्राढा जवानजी, बारह दुर्गादत्तजी, पाढा जादूरामजी, आसिया बुधजी, तिलोकदानजी, पाढा चिमनजी, त्रिलोक्दानजी, दधवाडिया गोपालदानजी, लालम नवलजी, शकरदार सामौर आदि साहित्यकारो ने अग्रेजी का विरोध करने मे अपनी कलम की कारीगरी दिपलाई। इन साहित्यकारा ने अपनी रचनाओ से जनता व राजापो के मन मे अप्रेज विरोधी भावनाए उत्पन्न कर क्रान्ति का माग प्रशस्त किया। क्रान्ति जैसा महत्वपूर्ण कार्य माधारण जनता के सहयोग के अभाव मे कभी सफलतापूर्वक सम्पन नहीं किया जा सकता। क्रान्ति से पूर्व यहाँ के लोगो के मन टटोलने से ज्ञात होता है कि आम आदमी ने भी अग्रेजी सत्ता का विरोध करने के लिये कमर कम रखी थी। लोगा की मन की थाह उस समय प्रचलित अनेक अग्रेज विरोधी लोक गीता से मिलती है। लोग अग्रेजो से इतनी घृणा करते थे कि उन्हाने द गजी-जवाहरजी जसे डा"ओ की लोक गीतो मे केवल इसलिये प्रशसा की कि उन दोना ने अग्रजो की छावनी को लूटा था वीकानेर के महाराजा रतमिह की गोतो मे इसलिये प्रशमा की गई कि उसने जवाहमिह को अग्रेजो को सौपने से दृढतापूर्वक मना कर दिया। जोधपुर के तखतमिह को पालोचना का कारण केवल यह था कि उसने डू गजी को अप्रेजो को मौंप दिया। राजस्थान के लोग प्रारम्भ से ही परम्परावादी रहे । धम को खतरे का आभास हो जाने पर वे सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये तत्पर हो जाते । 1857 से पूर्व अमेज, डच और फासीसियो ने राजस्थान सहित समस्त भारत में ईसाहियत का प्रचार करता आरम्भ कर दिया था। अग्रेजी स्कूलो, अस्पतालो और अनाथालया की स्थापना होने लग गई थी। अकाल की चपेट मे घिरे लोगो की सहायताथ अन वस्ल व अावश्यक वस्तुओ का वितरण कर पादरियो ने धम परिवर्तन का जाल फैलाना प्रारम्भ कर दिया था। इस प्रकार ईसाहियत के प्रचार राजस्थान में 1857 की [ 117 ] से आम आदमी झप्ट हो गया। सती प्रथा को समाप्त करने के प्रयत्नो का भी विपरीत प्रभाव पडा। परम्परागत रीति रिवाजो पर प्रहार से रूढीवादी लोग अग्रेज विरोधी बन गये। जनता के विरोध ने स्वतनता सेनानियो को आवश्यक प्ररणा और बल प्रदान किया। 1 1 राजायो के अग्रेजो से मन्धियो के कारण मामनो की स्थिति बिगड़ गई। मामतो के अनेक परम्परागत अधिकार समाप्त हो गये। सभी वर्गों के सामन्त अग्रेजी शामन के विरोधी थे और उसकी ममाप्ति हेतु प्रयत्नशील थे। अउवा, प्रासोप, गूलर, पालगियावास, लाम्बिया बाटा, भीवालिया, राडावास, वाजावास, सेजडला सत्वर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीद के ठाकुरो ने राजस्थान मे 1857 के प्रथम स्वतत्रता संग्राम के समय प्रमुख भूमिका निभाई थी। सामन्तो की भाति कई राजा भी अग्रेजो का विरोध करने लगे थे। अग्रेजो से सधिया की तब उनके मन मे पिण्डारियो, मराठो और साम तो का डर बैठा हुआ था। अग्रेजो ने भी इन राजानो को समझा-बुजा कर मन्धियो के लिये तैयार किया था। धीरे धीरे अग्रेजो ने मित्रता का चोला उतार फेका और स्वामी की तरह व्यवहार करने लगे। दैनिक कार्यों में बढता हुअा हस्तक्षेप राजाप्रो को खटकने लगा। जोधपुर के महाराजा मानसिंह जैसे कई राजा अग्रेजो से घृणा करने लगे। भरतपुर, कोटा, अलवर इत्यादि मे उत्तराधिकार के झगडो मे निशि हस्तक्षेप भी राजाओ को बुरा लगा। अनेक राज्यो के परम्परागत क्षेत्रो को ब्रिटिश राज्य मे मिलाया जाना भी राजायो के विरोध का कारण बना। योग्य शासक यह भी समझ गये कि अंग्रेज उनके राज्य का आथिक शोपण कर रहे थे। अपनी जनता और सामन्तो के अग्रेज विरोधी व्यवहार से भी शासगण प्ररित प्रोत्साहित हुए। तत्कालीन परिस्थितियो का विश्लेषण करने से ज्ञात होता है कि राजानो के मन मे अग्रेजो के प्रति घृणा होते हुए भी उन्होने 1857 की शान्ति मे सक्रिय भाग नहीं लिया। कारण तो यह था कि राजानो पर अग्रेजो की जबरदस्त धाक जमी हुई थी। फिर राजा क्राति की व्यापकता का अनुमान नही लगा सके। उन्हे इस बात का आभास तक नहीं था कि समूचे तेश मे क्रान्ति को आग लग चुकी है। कान्ति के नेताओ ने राजानो का सहयोग प्राप्त करने के लिये कुछ भी प्रयत्न नही किये । कारण कुछ भी रहे हो यह निश्चित है कि यदि सभी अपने फौज वल सहित आजादी की इस लड़ाई में सम्मिलित हो जाते तो अग्रेजो की ऐमी दुगति होती कि उनके सामाचार लन्दन पहुचाने वाला भी जीवित न बच पाता। ब्रिटिश फौज के देशी सिपाहियो के साथ जो सौतेला व्यवहार किया जाता था उससे राजस्थान को छावनियो मे स्थित देशी सैनिको के मन में भी आग लगी हुई थी। साधू-फोर वेप मे दिल्ली के सैनिक राजस्थान पहुचे और गाय-सुअर की.. चर्वो वाले कारत्सो को सूचना यहा के फौजिया को वीच पहुचा दी। राजस्थान इसका प्रथम M [ 118 [ की छावनियो में एक यह बात भी रग लाई कि फौजियों को जो पाटा मप्लाई होता है उसमे मनुष्य की हड्डिया पीस कर मिलाई जाती है। इस प्रकार राजस्थान की जनता, मामत, राजा, साहित्यकार और देशी सैनिक सभी 1857 की क्रान्ति के समान भागीदार थे। आबू मे पाराम करते हुए ए जी जी लारेम के पास 19 मई 1857 का मेरठ की कान्ति के समाचार पहुचे तो एक बार तो वह सकपका गये। अपनी पार से सुरक्षा के उपायो पर विचार कर राजायो को पत्र लिखे कि वे वागियो को अपनी सीमा में प्रवेग न करने दें घबराहट मे ए जी जी माहब अजमेर की स्थिति पर विचार करने लगे। राज्य का सारा कोप और शम्ब अजमेर मे ही थे। राजस्थान में अग्रेज सत्ता का केन्द्र अजमेर ही था अत यदि अजमेर मे ही वखेडा हो गया तो कुछ भी उपाय न हो सकेगा। माहब की बोखलाहट का विशेष कारण यह था कि अजमेर की सुरक्षा के लिये पन्द्रहवी नेटिव इन्फे ट्री की जो टुकडिया नियुक्त थी वे हाल ही में मेरठ से स्थान्तरित होकर अजमेर पहुची थी। इस प्रकार एक तो राजस्थान में पहले ही अग्रेजो के प्रति घृणा की भावना विद्यमान थी और और फिर मेरठ में शान्ति के समाचार मिल गये तब बेचारे माहब का घबराना स्वभाविक ही था। हडबडाहट मे 'साहब ने अजमेर की सुरक्षा के प्रथम उपाय के रूप मे 15 वी नेटिव इफट्री की दोनो टुकडियो को अजमेर से हटा कर नमीराबाद भेज दी जहा इम इफ ट्री के शेष सनिक तैनात थे। इससे भी धगहट दूर नही हुई तो छावनी में ता लगवाकर अन्य परटनो के वफादार रानिको को मोर्चों पर नियुक्त कर दिया। साहब की अजमेर की सुरक्षार्थ की गई व्यवस्था ने ब्रिटिश राज्य को ग्राफत में डाल दिया। 15 वी नेटिव इन्फै ट्री के सनिक कोधित हो गये। बख्तावरसिंह नामक सैनिक ने अग्रेज अफसर प्रिचाई के पास जाकर पूछा कि "क्या यह सत्य है कि यहा यूरोपियनो को एक फौज बुलाई गई है।" 28 मई 1857 को मुशी मीर बाकर अली ने प्रिचाट को बताया कि सभी फोजो इस बात से जुध हैं कि उन्ह जो पाटा दिया जाता है उसमे हड्डिया मिला दी जाती है। प्रिचाड कोई सतोपजना उत्तर न दे सका कि तु उसने ब्रिगेडियर के पास रिपोर्ट भेज कर आवश्यक कायवाही का आश्वासन दिया। दुपहर दो बजे प्रिचाड भोजन करने के पश्चात हाथ साफ कर रहा था कि तोप छूटने की तेज आवाज से उसके कानो के पर्दे भना उठे। घर से बाहर देखने पर उसे जबरदस्त भगदड मची हुई दिखाई दी। पन्द्रहवी नेटिव इफंट्री के सैनिको ने तोपखाने पर अधिकार कर लिया। पहले धुडसेना और बाद मे अय सैनिको को नोपखाने की अोर बढने के आदेश दिये गये वितु किसी ने इन आदेशो को अनुपालना नहीं की। तोपखाने में लगातार गोले दागे जा रहे थे। स्पोडिसवुड नामक एक मेजर तोपखाने की ओर बढा किंतु चार कदम बढाते ही ।
[ 119 ] एक दनदनाती गोली ने उसका भेजा बिखेर दिया। कर्नल न्यूवरी के भी टुकडे कर दिये गये। छावनी के कनल सहित अनेक अग्रेज अफसर घायल हुए। घबराये हुए अग्रज अफसर अत्यन्त ही कठिनाई से स्त्रियो व बच्चो को साथ लेकर छावनी से निकल सके। यह अदेशा था कि छावनी के विद्रोही सनिक अजमेर की ओर बढगे। अत छावनी से भगोडे अग्रेजो ने ब्यावर की राह पकडी। छावनी के विद्रोही इच्छानुसार क्रोध प्रकट करने लगे। चर्च और अग्रेज अफसरो के बगलो को आग लगा दी। माल असबाब कब्जे किया और कपडो व अन्य सामान को मैदान में एकत्रित कर दिया। छावनी को तहस नहस कर यह सैनिक दिल्ली की ओर रवाना हुए। यहा यह तथ्य उल्लेखनीय है कि यह केवल असन्तुष्ट सनिको का बखेडा अथवा कोई आकस्मिक घटना नही थी बल्कि पूर्व नियोजित विचार विमश के अनुसार अग्रेजी साम्राज्य को समूल नष्ट करने के उद्देश्य से की गई क्रान्ति थी। सव प्रथम तो इस सान्ति मे सभी धर्म सम्प्रदाय के लोग मम्मिलित थे। फिर यदि छावनी जूटने के पश्चात यह सैनिक लूट के माल सहित अपने घर की ओर चले जाते तब तो बान अलग होती। कितु सब ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया और माग मे लडते-भिडते दिल्ली पहुच गये। वहा पहुच कर दिल्ली का घेरा डाली हुई एक अग्रेज पलटन पर टूट पडे । इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि यह नाति- कारी भारत भूमि को अग्नेजी दासता से मुक्त करना चाहते थे। यह लोग दिल्ली के अग्रेज विरोधी बादशाह जफर की सहायताथ दिल्ली पहुंचे थे। एक बहुत खटकने वाली बात यह है कि अग्रेज तो अजमेर की सुरक्षा के लिये बहुत ही चितित थे और नसीराबाद के क्रान्तिकारी सैनिको ने अजमेर की ओर देखा तक नहीं। जाते समय यदि अजमेर पर धावा बोल देते तो राजस्थान मे अग्रेजी शासन की कमर ही टूट जाती। उदयपुर में पालिटिकल एजेंट सावर्स ने लिखा कि दिल्ली के विद्रोहियो ने इहे दिल्ली पहुचने का निम नण दिया था। यही कारण है कि नसीराबाद के सनिक शिघ्रातिशिघ्र दिल्ली पहुचने के लिए आतुर थे। इनके दिल्ली पहुचने की आतुरता की जानकारी इस तथ्य से भी होती है कि शीघ्र दिल्ली पहुचने की धुन मे अनेको ने ल्टे माल को माग में ही फेक दिया। भार कम कर जल्दी पहुचने के उद्देश्य से ही तूट का माल फेका गया था। नसीराबाद के पश्चात् नीमच मे कान्ति को ज्वाला ने अंग्रेजी साम्राज्य की नीव हिलाई। नीमच की छावनी नसीरावाद से 120 मील की दूरी पर स्थित थी। वहा मेरठ से समाचार पहुचने से पहले ही भयभीत कनल प्रोबाट को नसीराबाद मे क्राति की सूचना मिलने पर प्रातकित हो गया। देशी सिपाईयो को एकत्र कर अनुनय विनय करने लगा। उसने वाईवल पर हाथ रख कर सोग ध्र खाई कि वह देशी सैनिकी पर पूर्ण विश्वास करता रहेगा फिर कुरान तथा गगाजल की शपथ दिलवाकर देशी सैनिको से आश्वासन लिया कि वे ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार [ 120] बसे रहगे। 2 जून को घुडगधार मोहम्मद प्रत्री बेंग में पर्नर प्रोशम ये मम्मुश जावर पहा ' अप्रेजो ने मोगध पर निभाई। यया प्रयप में प्राप जारदम्नी नहीं धुसे । फिर वेवल हिन्दुस्तानी ही मोगध पर क्यो अटे रह उस गमय तो प्रागट ने जगे नसे लल्लु चप्पु वर मोम्मद अली या गात पर दिया। किंतु प्रगत दिन प्रात ही नसोगवाद की प्रानि पे गमानार नीमच पहा गये। दिन में ग्यारह बजते वजते छाननी में भचाभव मच गई। मंनि नोपपाने पर अधिकार जमाया और छावनी को प्राग लगा दी। प्रोधिा गनियों ने एक अग्रज माजेंट बन्ने को भाग में फेंक दिया। छावनी के लग ग गालीग अग्रज जान बचा कर मेवाड भी भोर भागे। छावनी के पदियो यो मुक्त कर, गजाना लूटा और छावनी यो प्राण लगाने के पश्चात् इन देशी मनिको ने भगोडे अग्रेजी पीछा पिया। दूगला नामक गाव पहुंचन पर इन भागते हुए अपजो को कमान साबम भौर बख्तावर सिंह के नेतृत्व में मेवाडी फौज या सरक्षण मिना तव इनकी जान बची। नीमच के फौजी सूबेदार गुरेमराम को यमाण्डर, सूबेदार सूदेरीसिंह को ब्रिगेडियर और जमादार दोस्त मोहम्मद को मेजर नियुक्त कर वैण्ड-बाजो के साथ रवाना हुए। चित्तोडगढ, हमीरगढ और बनेडा ये सरकारी वगली को लूट पर प्राग लगाते हुए शाहपुरा, निम्बाहेडा होते हुए देवली पहुंचे। देवली में भी छायनी यो जहा के अग्रेज तो पहले ही भाग गये और देशी सनिक नीमच के इन मैनिको के साथ मिल गये। यहा से यह लोग टोय पहुचे जहा जनता ने इनका स्वागत किया। यही कोटा से पाए हुए अनेक संनिक भी इनके माथ हो लिये। टौंग के नवाव के अनेक प्रयत्न करने पर भी वह असफल रहा और उसकी फौज के अनेक सैनिक भी नीमच के इन क्रातिकारियो के साथ मिल गये। टौक से यह सम्मिलित सेना दिल्ली पहुची और वहा अग्रेजो से युद्ध करने वाली एक बड़ी सेना की सहायता में जुट गई। 1836 ई मे अग्रेजो ने जोधपुर लीजियन नामक एक फौज बनाई। मारवाड में 1857 की क्राति का इस फोन में धनिष्ठ सम्बध है। 18 अगस्त को जोधपुर लीजियन की ए टुक्डी रौवा ठाकुर के बखेडे के समाधान हेतु प्रावू की जडो मे बसे हुए गाय प्रनादरा पहुची। 21 अगस्त की रात्रि को लगभग पचास फौजी अनादरा में माउन्ट प्रावू चढे । प्रात लगभग सवा तीन बजे कोहरे से छाई हुई धुव के बीच यूरोपियन सो जरो की वैरेको तथा जोधपुर लीजियन के कप्तान हाल माहब के बगले पर गोलिया बरसने लगी। हाल साहब के व गले मे ए जी जी का पुत्र ए लारेन्स भी घायल हुमा यद्यपि पावू मे छुट-पुट वारदात ही हुई वितु इसकी सूचना जोधपुर लीजियन के प्रमुख केन्द्र ऐरनपुरा पहुचने पर तो गजव हो गया। 22 अगस्त को ऐरनपुरा मे भी क्राति का विगुल बज गया और उसी दिन पाबू में गोलिया परमाने वाले [ 121 ] सैनिक भी ऐग्नपुग या पहुचे। क्रोधित रोनिको ने छावनी और स्टशन को लूट लिया तथा महरवानसिंह को अपना जनरल नियुक्त कर अजमेर की तरफ रवाना हो गये। थोडी दूर जाने पर इन्हें समाचार मिला कि हिलेदार अनाडसिंह के नेतृत्व मे पाई जोधपुर के महाराजा तसतसिंह की एक फौज पाली मे डेरा डाले हुए है। इस सूचना पर ऐरनपुरा के सनिको ने खेरवा का माग पकडा और अउवा के पास एक गाव मे पहुच कर डेरा डाला। अउवा ठाकुर खुशालसिंह चापावत के महाराजा तखनसिह के अनबन । ठाकुर अग्रेजो को झगडे का कारण मानकर उसे घृणा करता था। यह बात गाव की चौपालो मे आज तक प्रसिद्ध है कि खुशानसिंह दस सिर और चौपन हाथो वाली अपनी कुलदेवी मुगाली माता की मूर्ति के सम्मुख पूजा हेतु बैठा था तब उसे ऐरनपुरा के सनिका के आगमन की सूचना मिली । तुरत सामने जाकर ठाकुर इन सैनिको को गढ मे ले आया। ठाकुर के चाकरो ने समझा कि देवीमा का पादेश होने पर ही ठाकुर कातिकारियो का स्वागत कर रहा है। प्रागे से आगे खुमर-पुसर होते. होते यह वात चौपालो तक पहुच गई। आसोप के ठा विशनसिंह और पालरिणया- वाम ठा अजीतसिंह भी अपनी-अपनी सेनाप्रो सहित अउवा आ पतुचे। इनके अतिरिक्त लाम्बिया, बाटा, भीवालिया, राडावास तथा वाजावास के ठाकुर भी खुशालसिंह के समथक थे। सेजडला तथा मेवाड के सलूम्बर, रूपनगर लासाणी तथा आसीद के ठिकानो की फौजे भी अउवा पहुच गई। एक हजार सनिक तथा छ सो घुडमवार ऐरनपुरा से पाए ही थे। सब मिलाकर छ हजार के लगभग सनिक सय्या हो गई। , किलेदार अनाडसिंह के नेतृत्व मे आई हुई जोधपुर महाराजा की सेना के साथ ए जी जी का खास मर्जीदान ले हीथकोट भी था। प्रारम्भ मे छोटी-छोटी मुठ- भेडो के पश्चात विथौरा नामक गाव के निकट बडी लडाई हुई। अउवा ठाकुर तथा ऐरनपुरा के क्रान्तिकारियो ने इतना भयकर युद्ध किया कि जोधपुर की सेना पस्त होने लगी। कुशलराज सिंघवी तथा मेहता विजयसिंह युद्ध क्षेत्र से भाग खडे कठिनाई से हिथकोट अपनी जान बचा सका। अनाडसिंह नथा उसके साथ दरबार की फौज के छीयत्तर सैनिक मारे गये। शेष फौज के पैर उखड गए तथा युद्ध क्षेत्र से भाग गई। दरवार की फौज का सामान खुशालसिंह तथा उसके सहयोगियो ने लूट लिया। अनार्डासह की मृत्यु और अपनी सेना की पराजय के समाचार से महाराजा तखतसिंह बहुत दुखी हुए। सुबह तथा साय दो बार दुग मे प्रतिदिन वजने वाली नौपत को केवल एक बार बजवा कर महाराजा ने अपना दुख प्रकट किया । ए जी जी लारेंस तो प्रातिकारियो की सैनिक मफलता की सूचना से बावला हो उठा। उसने तुरन्त व्यावर से सेना साथ लेकर पाउवा की ओर प्रस्थान ।
[ 122 ] कर दिया। जोधपुर से पानिटिकल एजेन्ट वेप्टिन मैक मैसन भी ए जी जी की सहायतार्थ पहुचा। 18 सितम्बर, 1857 को पुन भयकर युद्ध छिडा । ए जी जी की सेना बुरी तरह पराजित हुई। अंग्रेजी सरकार पर जोरदार बलक यह लगा कि मैक मैसन कातिकारियो के हाथ पड गया। बेचारे मैक मैसन को मारकर उसकी लाश को अउवा गढ के मुख्य द्वार के सामने एक वृक्ष पर लटका दी। हताश ए जी जी को अजमेर लौटना पड़ा। बेचारे मैक मैसन के व्यथ ही जान गवाई। जनता के भय से महाराजा उसकी मृत्यु के शोक मे नौपत वजवाना भी बन्द न करा सके। भउवा के आजादी के आगीवानो का सम्पर्क दिल्ली से था और मारवाड की जनता को सद्भावना उनने साथ थी। गत दो वर्षों से खुशालसिंह का सहयोगी सिमरसिंह मारवाड-मेवाड के जमीदारो मे एकता स्थापित करने के लिए प्रयत्न शील था। एकजुट होकर मारवाड-मेवाड से अग्रजी का सफाया करने की ठान रखी थी। 10 अक्टूबर को जोधपुर लीजियन के फौजी और खुशालसिंह के कई सहयोगी ठाकुरो ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। दिल्ली को और प्रस्थान करने का कारण यह था कि यह लोग बहादुरशाह जफर का फरमान प्राप्त कर उमकी सनिक सहायता से मारवाड तथा मेवाड को अग्रेजी आधिपत्य से मुक्त करवाना चाहते थे। दिल्ली की पोर गच करने वाली इस क्रान्तिकारी सेना में भरने मारने के लिए तत्पर गभग चार हजार सनिक थे। रेवाडी पर विजय के पश्चात दिल्ली में अग्रेजो की विजय से खिन्न चित्त इस सेना को 16 नवम्बर को नोरनोल मे ब्रिगेडियर गेराई ये नेतृत्व वाली एक विशाल अग्रेजी फौज से भिडत हुई। जोधपुर मोजियन को पराजय से मारवाड-मेवाड से अग्रेजी प्रभाव समाप्त करने की लालसा की इति श्री हो गई। सब स्थानो की ओर से पूर्णतया प्रास्वस्थ हो जाने पर जब जनवरी 1958 में चम्बई से नई युमर भी प्रा गई तब अग्रेजो ने पुन अउवा की तरफ मुह बरन मा गाहस दिया। पनल होम्स की कमान में वम्बई सी पलटन और 12वी नेटिय इफेन्ट्री ने प्रउवा की घेराबन्दी की। जोधपुर महाराजा को फौज भी इस ब्रिटिश मेना यो गहायता पर रही थी। 20 जनवरी को घमासान युद्ध हुआ। चार दिन सप दोनों पक्षापी सो माग उगलती रही। उस समय पउवा की रक्षा के लिए दुग में पहुत बम संनिग ही थे। 23 जन को रात्रि को प्रापाश यादता से डर गया। निरन्तर वर्षा होने लगी। यामदार तथा सहयोगियो ३ अधिक प्राग्रह परन पर पानादो का यह दीवाना पानसिंह गोना-बारी के बीच में नियस पर, मैनिय मरापता को भाया से मेयाः पटल गया। मैप मोगा में दुग की राय जबरदस्त पुरनियारितु मानो मी पई गुना विशार सना पोर जगी तोपघाना नियन [ 123 ] मिद्ध हुए। 24 जनवरी को दूर्ग पर ब्रिटिश सेना का अधिकार हो गया। फिर तो अग्नजो ने वहा यातनापो का ताडव ही कर दिया । बाद मे अग्रेजो ने खुशालसिंह पर मुकदमा चलाने का दिखावा भी किया कितु मजा देने का साहम न जुटा सकने पर अन्त मे बरी कर दिया। 25 जुलाई, 1864 को ग्राजादी के लिये अलख जगाने वाले इस शूरमा का उदयपुर मे स्वगवास हुमा । युगो युगो के लिये इस स्वतन्त्रता सेनानी के कृतित्व को छाप राजस्थानी जन मानस मे अकित रहेगी। कोटा में 1857 की क्राति का महत्व अपेक्षाकृत इसलिए अधिक माना जाता है कि लगभग छ महिनो तक कोटा पर कातिकारियो का अधिकार रहा। सारी जनता क्राति समथक बन गई। मारकाट भी अधिक हुई । सितम्बर मे वाहशाह जफर कैद हो गया और लाल किले पर अग्रेजी आधिपत्य स्थापित हो गया तब भी कोटा के प्रातिकारी केवल अपने वल पर अग्रेजो से लोहा लेते रहे । 1838 ई मे कोटा महाराव के खच से निर्मित कोटा कटिजट नामक ब्रिटिश सेना के देशी सिपाही मेरठ, नसीराबाद, नीमच इत्यादि मे काति के ममाचारो से व्याकुल हो गए। ऐसे मे 'पायगा पलटन' के रिसालदार मेहराबखा के हस्ताक्षरो वाली एक अपील फौजियो के पास पहुची । इसमे चरबी वाले कारतूमो तथा प्राट मे मिली हुई हड्डियो के उल्लेख के पश्चात् देश से अग्रेज प्राधिपत्य को समाप्त करने मे सहयोगी बनने का निवेदन किया गया था। 15 अक्टूबर को प्रात फौज ने बगावत कर दी। दो तोपो तथा दो घोमलो (ऊट पर लादी जाने वाली छोटी तोप) सहित लगभग तीन हजार सनिको नै मेहराबवा के नेतृत्व मे एजेन्सी हाऊम को घेर लिया। बगले मे पाग लगाकर कुछ सैनिक लकडे की सीढी लगाकर ऊपर के कमरे मे पहुचे जहा कोटा का पालिटिकल एजेन्ट मेजर बटन और उसके दो युवा पुत्र छुपे हुए थे । कोधित सनिको ने तीनो के टुकड़े-टुकड़े कर दिए । एजेन्सी हाऊम पर इस हमले के समय दो अ ग्रेज डॉक्टर भी मौत के घाट उतार दिए गए । मेजर बर्टन का सिर काट कर समस्त कोटा शहर मे घुमाया गया । छ माह तक मेहराबखा और जयदयाल के नेतृत्व मे फौज ने इच्छानुसार शासन चलाया। अग्रेजो के अनेक पिठ्ठो को तोपो के मुह पर बाधकर उड़ा दिया गया । अग्रेजो के विरुद्ध कार्यवाही के पश्चात् कातिकारी असमजस मे पड़ गये। ग्वालियर मे सम्भलगढ के शासक गोविन्दराव विठ्ठल को सहायता के लिए जो पत्र भेजा उसने वह पत्र अग्रेजो को सौप दिया। कोटा महाराव किले के भीतर दुवके हुए थे। इस कठिन परिस्थिति मे कौन सहायता करे ? मार्च 1858 मे बम्बई से पाई हुई विशाल निटिश सेना के साथ कर्नल रॉबट कोटा पहुचा । महाराव की स्वामी भक्त सेना, करौली के शासक को फौज तथा गोटेपुर शासक की फौज भी इस [ 124 ] ब्रिटिश सेना के साथ मिल गई । जगह-जगह घमामान युद्ध हुए। अनेक लोग मारे गए । कई दिनो तक मामना करने के पश्चात् प्रातिकारी मेना पराजित हुई। नेतानो पर अ ग्रेना ने जबरदस्त अत्याचार किए। मेहरावखा और जयदयाल पर मुकदमो के दिखावे के पश्चान भारन के गवर्नर जनरल की इच्छानुमार उहे उसी एजेन्सी हाऊम में फासी पर लटकाया गया जहा उन्होने मेजर बटन और उसके पुनो को मारा था। एक बार काति पर नियन्त्रण हो जाने पर तो अ ग्रेजो ने अत्याचारी की सारी सीमाए पार करली । नवाब के मामू पालमखा के नेतृत्व मे टोक की फौज ने भी बगावत करदी। नवाब की स्वामी भक्त मेगा से लडता हुग्रा पालमखा तो मारा गया कि तु टोक के लगभग छ सौ क्रातिकारी सैनिक लडते-भिडते वहादुरशाह जफर की सहायताथ दिल्ली पहुंचे । भरतपुर, धौलपुर, अलवर, मेवाड तथा जयपुर सभी स्थानो पर 1857 मे कुछ न कुछ कातिकारी घटनाए अवश्य ही हुई। उस समय अग्रजो के प्रवल विरोधी के रूप में राजस्थान की प्रसिद्धी समस्त भारत में फैल गई । तात्या टोपे जैसा अ ग्रेजो का शत्र राजस्थान को अपने लिए उपयुक्त शरण-स्थल । मानकर अलीपुर मे चार्ल्स नेपियर से पराजित होने के पश्चात् राजस्थान आ पहुचा । इस प्रकार 1857 की क्राति के समय राजस्थान के कोने-कोने में ज्वालाऐ धधकने लगी । जैसे,तैसे अंग्रेजो ने इस आग को बुझा तो दिया किन्तु फिर भी इससे वह धुनी चेतन हो गई जिसकी राख मल कर अजु नलाल सेठी, गोपालसिंह खरवा, विजयसिंह पथिक और जारावरसिंह बारहठ जैसे कातिकारियो ने पुन आजादी का अनख जगाया। असफल होकर भी प्रथम स्वाधीनता संग्राम मागे आने वाले आजादी के मतवालो के लिए एक प्रेरणा पुज बन गया । प्रथम स्वाधीनता संग्राम के पश्चात् राजस्थान मे स्वतत्रता संग्राम के इतिहास को तीन अवस्थो मे विभाजित पिया जा सकता है-राजनतिन चेतना और नाति- कारी हलचल 1885 ई से 1024, जन प्रादोलन तथा राजनतिक सस्थामो की स्था पना 1924मे 1938 और प्रजामटल व स्वायत शासन की माग19 8 से 1949 तक । राजस्थान में राजा, ब्रिटिश शासन तथा जमीदार नीतो को धौस थी और रेल, सडक डार, तार, छापाखाने इत्यादि का प्रभार था। शामन के अधीन क्षेत्रो की तुलना मे राजस्थान मे स्वतत्रता आदोलनो का श्री गणेश अधिक देरी से हुा । स्वदेशी आन्दोलन को प्रारम्भ करने का श्रेय स्वामी दयान द सरस्वती को प्राप्त है। स्वामीजी की मा यता थी कि एक अच्छे से अच्छा विदेगी गासन भी अव्यवस्थित देशी शासन की तुलना में यही अधिक हानिकारक होता है। स्वामीजी के विचारो से प्रेरणा प्राप्त कर श्यामजी कृष्ण वर्मा ने दामोदर राठी स विचार विमर्श कर लावर मे कृपया मिल्स' की स्थापना की। 'कृष्णा मिल्स' । अत मोवे ब्रिटिश - [ 125 ] 1 का खजाना कान्तिकारी कार्यों के लिये सदैव खुला रहता था। "कृष्णा मिल्स' का प्रागण आजादी के बागीवानो की गतिविधियो का प्रमुख केन्द्र बन गया। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस की स्थापना हुई प्रतिवर्ष इसके सम्मेलन होने लगे। गवनमेट कालेज के कुछ छानो ने अजमेर मे काग्रेम समिति का गठग किया काग्रेस के चतुर्थं अधिवेशन में भाग लेने हेतु सवप्रथम अजमेर के गोपीनाथ माथुर और किशनलाल इलाहाबाद पहुचे । शनै शनै अजमेर मेरबाडा तथा अन्य राज्यो मे भी काग्रेस का प्रभाव बढने लगा। इससे जन जागृति और राजनैतिक चेतना जागृत हुई। स्वामीदयानद के ही एक शिष्य गोविन्द गुरू ने डूगरपुर, बासगांडा, दक्षिणी मेवाड, सिरोही भोर ईडर के पहाडी क्षेत्रो मे निवास करने वाले भीलो के मध्य आजादी का अलख जगाया। पूरे पच्चीस वर्ष (1883--1908) तक गोविन्द गुरू ने अपनी 'सप सभा' के माध्यम से भीलो मे जागृति के निरन्तर प्रयास किये । 1 राजस्थान में राष्ट्रीय अखबार पढने वालो की सय्या तेजी से बढ़ने लगी। अजमेर के 'गजस्थान टाइम्स' और उसके हिन्दी सस्करण के साथ ही सिमरथदान चारण के सम्पादन में 1889 मे 'राजस्थान समाचार' तथा 'देश हितैषी' 'परोप- कारक' 'जगहितकारक ' तथा 'राजपूताना गजट' जसे अखवारो के कारण नवीन दृष्टिकोण विकसित होने लगा। 'कमयोगिन' अमृत वाजार पत्रिका' 'काल केसरी' तथा 'जमीदार जैसे राष्ट्रवादी समाचार पनो ने शोपण व अत्याचारो का भडा फोड कर लोगो मे व चेतना का सचार किया। " 1914 05 के रूस जापान युद्ध मे एशिया के जापानी वौने ने यूरोप के रूसी दत्य को बुरी तरह पराजित किया। जापान की इस विजय ने भारतवासियो मे एक नये उत्साह और स्पू ति का संचार कर दिया। 1905 मे वगाल के विभाजन और देश के य य प्रा तो के घटनाक्रम ने भी राजस्थानियो को प्रभावित किया। शान्तिकारी हलचल के समय राजस्थान मे भिन्न भिन स्थानो पर तीन अलग अलग कतिकारी दल सक्रिय थे। प्रथम दल अजु नलात सेठी के नेतृत्व मे जयपुर, दूसरे दल के केसरीसिंह बारहठ कोटा मे और तीसरे दल के गोपालसिंह खरवा व अर्जुन लाल मेठी ने अजमेर को अपनी गतिविधियो का केद्र बनाया। अजु नलाल सेठी राम विहारी बोस के निकट सहयोगी थे। सेठीजी ने जयपुर में पद्ध मान विद्यालय की स्थापना की। इस विद्यालय में देश के कोने कोने से नव- युवक शान्ति का पाठ पढने के लिये पहुचते। बद्धमान विद्यालय के विष्णुदत्त ने अपने चार शिष्यो-मोतीचद, माणकचद, जयचद और जोरावरसिंह-सहित नातिकारी गतिविधियो हेतु धन एकत्रित करने के प्रयोजन से पारा (पटना) जिने [ 126 ] उस समय कई प्राप्ति- मे नीमेज गाव के उपामरे में 20 माच 1913 को डाका डाला। उपासरे का मन मारा गया। इस सम्बन्ध मे मातीवद पकडा गया पर उम फासी हुई। इस घटना से पूर्व 23 दिसबर 1912 को दिल्ली मे वायमराय लार्ड हाडिंग पर बम्ब भी जोरावरसिंह ने ही फका था। उम दिन वायसराय भाग्य अच्छे थे कि वन को चपेट मे पाने के पश्चात भी वह बच गया। उपामरे पर डाके, महन्त की हत्या और वायसराय की हत्या के प्रयल के अपराध में जोरावरसिंह को फासी की सजा दी गई कि तु वह पक्डा नहीं जा सका। सताईम वए तक छुपते फिरने के पश्चात 1939 मे उसका स्वगवास हुमा । जोरावरमिह जमे आजादी के दीवानो युगा युगो तक राजस्थानियो के प्रेरणा पुज बने रहेंगे। कोटा के प्रमुख कातिकारी केमरीसिंह बारहठ ने महाराणा फतहसिंह का वायस गय कजन के सयय 1903 में आयोजित दिल्ली दरवार में सम्मिलित होने से रोकने के लिये 'चेतावनी के चू गटिये' लिख कर भेजे। राजस्थान वगाल और पजाब के क्रान्तिकारियो से केसरीमिह का सम्पक था। कारिया को जेलो मे यातनाए दी जा रही थी व अनेको को फासी पर लटका दिया गया। केसरीसिंह इन क्रान्तिकारियो के परिवारो की सहायता करने के लिये धन एकत्रित करना चाहता था इस उद्देश्य से मोटा के महत की हत्या की गई। केमरीसिंह, लाहेरी, रामकरण व हीरालाल जालोरी को इस सम्बन्ध में बदी वनाया गया। हीरालाल को सात वर्ष तथा शेष तीनो को वीस-बास वर्ष की सजा हुई। कुछ समय पश्चात केसरीसिंह को बिहार को हजारी वाग जेल भेज दिया दिया । केसरीसिंह का पूरा परिवार ही क्रान्तिकारी था। भाई जोरावरसिंह ने पारा डकैती व वायसराय पर वम फेकने का कार्य किया और बेटा प्रतामिह, बम बनाते हुए पक्डा जाकर बरेली जेल भेजा गया। जेल मे इतनी अधिक यातनाए दी गई की प्रतापसिंह की जेल मे ही मृत्यु हो गई। रासबिहारी बोस व सचिद्रनाथ सान्याल से प्रेरणा प्राप्त कर खरवा (अजमेर) राव गापालसिंह व बारहठ केसरीसिंह ने राजस्थान मे 'वीर भारत सभा' नामक एक गुप्त सस्था की स्थापना की। 1909-10 मे रासबिहारी बोस ने भूपसिंह नामक एक युवक को अजमेर की तरफ भेजा। बुलदशहर के मासागढ गाव के गुजर युवक भूपसिंह ने विजयसिंह पथिक के नाम राजस्थान के आन्दोलन का नेतृत्व किया। भूपसिंह को अन्य स्थानो के कान्तिकारियो के लिये शस्त्र एकत्रित करने और राजस्थान की गतिविधियों को तेजी पकड़ने के उद्देश्य से यहा भेजा गया था। वह खरवा राव गोपालसिंह से मिला व दोनो ने सशस्त्र क्रान्ति की योजना बनाई। दिसम्बर 1914 मे भारत भर के क्रान्तिकारी बनारस मे एकत्रित हुए तथा पजाब से क्रान्ति के सूत्रपात का निश्चय किया। राजस्थान मे गोपालसिंह खरवा व दामोदरदास राठी को ब्यावर, भूपसिंह को अजमेर और नसीराबाद पर कब्जा करने [ 127 ] का आदेश दिया था। 21 फरवरी को गोपालसिंह व भूपसिंह दो हजार सशस्त्र सैनिको सहित खरवा रेल्वे स्टेशन के निकट ना पहुचे। स्टेशन के निकट छुप कर पूर्व निश्चित इशारे की प्रतीक्षा करने लगे। सकेत यह निश्चित किया गया था कि दिल्ली-अहमदाबाद रेलगाडी के स्टेशन से रवाना होने के पश्चात एक बम का धमाका होगा। गाडी निकल गई किन्तु बम का धमाका नही हुआ क्योकि पजाव मे 19 फरवरी को ही क्रान्ति की योजना का पता चल गया था। अग्रेज सरकार ने कारित की कलई खुलने पर उसे विफल करने के आवश्यक कदम उठा लिये। पजाब के कई कान्तिकारी पकडे गये और अन्य शस्त्रागारो पर हमले के समय पहले ही घात लगाकर बैठे हुए ब्रिटिश सैनिको की गोली के निशान बने । काति के भडाफोड होने की सूचना गोपालसिंह-भूपसिंह को मिलते ही उन्होने अपने सैनिको को इधर उधर भेज दिया। इस घटना के कुछ दिन पश्चात ही अजमेर पुलिस ने गोपालसिंह-भूपसिंह को बन्दी बनाकर मारवाड-मेवाड की सीमा पर स्थित टाडगढ दुर्ग मे कैद कर दिया। किसी प्रकार भूपसिंह टाडगढ से निकल भागा और मेवाड के पहाडो मे जा पहुचा। वह काफी समय तक पहाडो मे भटक्ता फिरा। इस समय उसने डाढी बढा कर अपना नाम विजयसिंह पथिक रख लिया। गोपालसिंह भी टाडगढ से तो निकल भागा किन्तु कुछ समय पश्चात किशनगढ राज्य मे पुन पकडा जा कर शाहजहापुर जेल मे भेज दिया गया। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ ही महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीय राजनीति ने करवट बदली । जाति का स्थान सत्याग्रह ने ले लिया। इस समय भी एक के बाद एक सत्याग्रह होने लगे। मेवाड के विजोलिया ठिकाने के किसानो ने साधू सीताराम के नेतृत्व में आन्दोलन किया । जमीदार के प्रत्या चारो के कारण आन्दोलन शिथिल होने लगा तब विजयसिंह पथिक विजोलिया जा पहुचा और किसानो को पुन सक्रिय करने के प्रयत्न मे जुट गया। इस समय नव- युवर माणिक्यलाल वर्मा भी ठिकाने की नोकरी को ठोकर मारकर साधु सीताराम दास और विजयसिंह पथिक के माग की और चल पडा। बिजोलिया आन्दोलन के समाचार गणेश शकर विद्यार्थी के 'प्रताप', प्रयाग के 'अभ्युदय', क्लकत्ता के 'भारत- मित्र' और पूना से प्रकाशित होने वाले लोकमान्य तिलक के 'मराठा' जैसे राष्ट्रीय अखबारो में धूम मचाने लगे। महात्मा गाधी, तिलक, मालवीय और जमनालाल जसे महत्वपूर्ण नेताओं का ध्यान बिजोलिया प्रान्दोलन की ओर आकपित होने लगा । इस आदोलन की गूज भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस के वार्षिक सम्मेलन मे भी मुनाई दी। समस्त भारत में किसानो का इस प्रकार का यह प्रथम प्रादोलन था। विजोलिया आन्दोलन ने किसानो मे प्रात्म विश्वास फूक दिया। मेवाड के अप कई ठिकानो मे भी कृषक लाग, वाग और वेठ-वेगार का विरोध करने लगे। बेगू ठिकाने मे जोरदार पान्दोलन हुा । 13 जुलाई 1923 को राज्य को फोज ने राजस्थान -- [ 128 ] वेगू ठिकाने के गोविन्दपुरा नामक गाव मे घेरा डालकर आग लगा दी। भागते हुए किसानो पर वद्को से गालिया दागी गई-। लगभग दा सौ किमान मारे गए और अनेक घायल हुए । बल प्रयाग पार दमनकारी नीति से बगू का रिसान आदोलन कुचल दिया गया कि तु लोगो के मन मे प्रज्वलित - असन्तोप- की अग्नि शात नहीं हुई । विजोलिया और बेगू के किसानो के बलिदान रग लाए और उनसे प्रेरणा प्राप्त कर बूदी के किमानो ने भी लाग, वाग वेठ वेगार देने से स्पष्ट इनकार कर दिया। राज्य ने दमन चक्र चलाया और आन्दोलन के नेता ननुराम शर्मा को वदी वनाकर चार वप के कारावास की सजा दे दी। दमनकारी नीति से अान्दालन को दवाया नहीं जा सका तब 1923 मे गोलिया वरसी जिसमे नानकराम नील की मृत्यु हो गई । 'राजस्थान सेवा मघ' ने हस्तक्षेप किया तव करसो की आधी माग स्वीकार हुई तव आन्दोलन धीमा पडा। 1920-21 मे स्थापित 'राजस्थान सेवा सघ के विजयसिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, मणिक्य लाल वर्मा, हरी भाई किंकर शोभालाल गुप्ता, लादूराम जोशी, प्रेमचद, भील, माडसिंह, नेन् राम शमा इत्यादि के प्रयत्न ने सेवा संघ की अच्छी साख जम गई और रजवाडो के शासक उससे चमकने लगे। 1921 मे अहमदाबाद में काग्रेस का सम्मेलन हुआ। इसमे भाग लेने वाले प्रतिनिधियो ने वापस लौटने पर अपने अपने क्षेत्रो मे सगठना कीस्थापना की। जोधपुर में 1921 मे जयनारायण व्यास, प्रान दराज सुराणा इत्यादि ने- मारवाड हितकारीणी सभा' की स्थापना की। सभा ने जानवरो की निकासी पर रोक लगाने के लिये आन्दोलन प्रारम्भ किया और माग स्वीकार हो जाने पर सुख देव प्रमाद को पदच्चुत करने की माग कर दी। इस पर सरकार ने कठोर नीति अपनाई और मभा के अनेक सदस्या को मारवाड के बाहर निकाल दिया। 1927 मे जयनारायण व्यास ने व्यावर से 'तरुण राजस्थान' अखबार निकाला और उसमे राज्य की आपाधापी और जागीरी जुल्मो की पोल खोली। 'अखिल भारतीय देशी राज्य परिपद' के 17 दिसम्बर 1927 के वम्बई अधिवेशन मे भाग लेकर वापस लौटने पर जयनारायण व्यास ने 'मारवाड प्रजा परिषद' की स्थापना की पितु राज्य ने इसका अधिवेशन नहीं होने दिया। जयनारायण व्यास आनदराज सुराणा, भवरलाल सर्राफ आदि को पक्ड वर मागोर मे मुक्दमे चलाए और सजा सुनाई। कारावाम से टने पर जयनारायण व्यास ने ब्यावर मे चादकरण शारदा की अध्यक्षता मे 'मारवाड प्रजा परिपद' का अधिवेशन किया जिसम कस्तूरबा गाधी मुख्य अतिथि थी। 1931 से 1939 तक मारवाड यूथ लीग, मारवाड प्रजा मडल, नागरिक रक्षा ममिति तथा बाल भारत मभा के द्वारा अचलेश्वर प्रसाद शर्मा, छगनराज चौपानीवाला मानमल जन रणछाडदाम गट्टानी भवरलाल सर्राफा, पुम्पोत्तमप्रमाद नैयर इत्यादि प्राजादी के आगीवाना न मारवाड मे जापादोलन प्रारम्भ किये। 1938 के हरिपुर अधिवेशन म । भारतीय [ 129 ] राष्ट्रीय काग्रेस ने देशी राज्यो को भी अपने काय क्षेत्र में सम्मिलित कर लिया। इससे भयभित होकर देशी राज्यो की सरकारो ने अपने दृष्टिकोण में थोड़ी नरमी अपनानी प्रारम्भ की। 1938 में 'लोक परिपद' की स्थापना हो गई जो महाराजा की छन छाया मे स्वायात शासन की माग करने लगी। जयनारायण व्यास के मारवाड में प्रवेश करने पर प्रतिव ध लगा हुआ था वह हटा लिया। लोक परिपद की शाखाए मारवाड के परगनो मे भी स्थापित हुई और स्वायत शासन की माग निरतर जोर पक्डने लगी। अन्त मे क्रोधित राज्य सरकार ने 8 माच 1940 को पपिपद को अवैध घोषित कर जयनारायण व्यास, अचलेश्वर प्रसाद शर्मा, छगनराज चौपासनीवाला, अभयमल जैन, गणेशलाल आदि को पकड कर दूर दूर स्थित किलो मे कैद कर दिया। इसके विरोध मे 2 अप्रेल को मथुरादास माथुर के नेतृत्व मे विशाल जलूस निकाला गया। इस जलूस पर पुलिस ने डडे बरसाये । मथुरादास माथुर व बाद मे रणछोडदास गट्टानी कैद हुए। लोगो मे उत्साह निरन्तर बढने लगा जिसमे वाध्य होकर 26 जून 1940 को सरकार ने परिषद से समझौता किया और सभी नेता कारावास से छोड दिये गये। रोड चडावल और गू दोज मे परिपद के कार्यकर्तानो पर अत्याचार हुए। अन्त मे 26 माच 1942 को परिपद का डिक्टेटर नियुक्त होने पर जयनारायण व्यास ने आन्दोलन प्रारम्भ किया। व्यास की गिरफ्तारी के पश्चात मथुरादास माथुर, चैनदास, राधाकृष्ण तात आदि डिक्टेटर बने और आन्दोलन निरन्तर तेज होने लगा। अनेक काय- कर्तामा को जेल में डाला गया। जेल मे भूख हडताल हुई। बालमुकुद बिस्सा जेल के अत्याचारो और भूख से बीमार होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ । इस समय देश मे महात्मा गाँधी ने 'भारत छोडो' आन्दोलन चलाया। आदोलन भी गाधीजी के 'भारत छोडो' मा दोलन के साथ मिल कर उसी का अग बन गया। 17 अक्टूबर 1942 को स्टेडियम सिनेमा और 14 अप्रैल 1943 को सिवा ची गेट के बाहर बम विस्कोट हुए। कई गतिविधियो के वाद 27 मई 1944 को समझोता हुआ। सभी राजनैतिक कैदी छोड दिये गये। 13 मार्च 1947 को डीडवाना के पाम डाबडा गाव मे 'लोक परिपद' और 'किसान सभा' का सयुक्त अधिवेशन निश्चित हुआ। वहा अनेक किशान एकत्रित हुए। 'लोक परिपद के नेताओ और किसानो के वहा पचहुने पर जागीरदार के लोगो ने उन पर हमला किया। सरकारी आकडो के अनुसार छ और 'लोक परिपद' के अनुसार बत्तीस लोग मारे गये । 'लोक परिपद' के मथुरादास माथुर, द्वारकाप्रसाह पुरोहित, नृसिंह कच्छवाहा, बशीधर पुरोहित, राधाकृष्ण बोहरा तात, किशनलाल शाह इत्यादि घायल हुए। इस जुल्म की सब तरफ आलोचना हुई। इस बीच देश की राजनीति मे अनेक घटनाएं घटी और 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया ।। केद्र के दवाव पर जयनारायण व्यास के नेतृत्व मे मिली जुली सगकार बनी नों थोडे बहुत परिवर्तन के साथ 'जोधपुर राज्य के राजस्थान मे विलय तक मारवाड का । चलती रही।
[ 130 ] बीकानेर महाराजा गगासिंह के समय दमन और देश निकालो जैसे मध्य- कालीन हथकण्डो का जोर था । सभाग्रा, भापगो और समाचार पनो पर प्रतिपद लगा दिए गए । थोडी सी राजनैतिक हलचल होते ही दमनचक्र प्रारम्भ हो जाता । महात्मा गाधी की जय बोलने और खादी भण्डार खोलने तक पर प्रतिरद लगा दिया गया। शिक्षा और सामाजिक सुधार के उद्देश्य से स्वामी गोपालदास ने चुरू मे 1912 मे 'सहितकरणी सभा' की स्थापना की। 1920 मे बीकानेर म 'सट- विद्याप्रचरिणी सस्था' की स्थापना हुई। राज्य के गुप्तचर इन संस्थानो पर भी नजर रखते थे। सत्यनारायण सराफ, खूब राम सराफ और उनके सहयोगिया के प्रयत्नो से दिल्ली के प्रिंसली इण्डिया' रियासत' और अजमेर के 'त्याग भूमि' जसे सामाचार पनो मे शासन की दमन और अत्याचारी नीति की अालोचना हुई। 1931 मे लन्दन मे गोलमेज सम्मेलन के समय पर्चे वितरित किये गये जिनमे महाराजा की दमनकारी नीति और राज्याधिकारियो के अत्याचारो का विवरण था। इस सम्मेलन मे महाराजा गगासिंह स्वय उपस्थित थे। लदन से जुध होकर बीकानेर लौटने पर महाराजा ने दमनचक्र चलाया। सत्यनारायण, खूवराम, स्वामी गोपालदास, चदनमल, बद्रीप्रसाद इत्यादि को गिरफ्तार किया गया । उन पर मुक्दमो के दिखावे के पश्चात कठोर करावास की सजाऐ सुनाई गई। इस दमनकारी नीति के कारण बीकानेर मे अगले कई वर्षों तक राजनीतिक हलचल मे शिथिलता आ गई। प्रजामंडल का आन्दोलन भी बीकानेर मे, देरी से 1940 मे आरम्भ हुग्रा । अन्त मे प्रजामडल ने 29 जुलाई 1942 को स्वायत शासन हेतु आन्दोलन की तिथि घोपित की। घोपित तिथि से पूर्व हो आ दोलन को समाप्त करने के उद्देश्य से सरकार ने प्रजामडल के अध्यक्ष रघुवर दयाल गोयल को बीकानेर राज्य की सीमा के बाहर निकालने का प्रादा दे दिया। 26 अगस्त 1944 को रघुवर दयाल ने निोवाज्ञा का उत्लघन कर बीकानेर मे प्रवेश कर लिया। रघुवरदयाल और उनके दो सहयोगी गगादास कौशिक और दाऊनाल गिरफ्तार किये गये । लोगा ने सरकार की दमनवारी नीति के विरुद्ध विरोध दिवम' मनाया। 'प्रजा परिषद' के नेतृत्व मे स्वायत शासन की माग का आन्दोलन तेजी पकडने लगा। 'नेताजी दिवस' तथा 'आजादी दिवम' पूरे उत्साह से मनाये गये। सरकार ने पुन दमनकारी नीति का प्राश्रय लिया। 1946 मे प्रेस अधिनियम लागू किया। जमीदारों ने भी अनेक अत्याचार किये। रतनगढ तहमील के गाव कागद तथा दूधवाखारा मे कृपको पर व्यथ ही अत्याचार किये गये । गजगढ, रायमीनगर व दूधवाखारा मे बड पमाने पर किसान आदोलन हुए। रायसीनगर मे किसान नेता वोरबलसिंह पुलिस की गोलियो का निशाना बन कर अमर हुा । बीकानेर मे मघाराम, केदारनाथ, रघुवर. दयाल, हनुमानसिंह और कुम्भाराम प्राय इत्यादि ने किसानो का नेतृत्व किया। 31 अगस्त 1946 को महाराजा सादूलसिंह ने घोषणा की कि जल्दी ही काफी अन्तत [ 131 ] उत्तरदायी शासन की स्थापना कर दी जायेगी। 18 माच 1948 को साझा सरकार वती। जितने सदस्य 'प्रजा परिषद' के लिये गये ठीक उतने ही महाराजा की ओर से मनोनित किये गये। कुछ समय तक महत्वपूर्ण विषयो पर दोनो पक्षो मे खीच तान होती रही। 30 माच 1949 को बीकानेर राज्य का राजस्थान मे विलय हो गया । गोवि द गुरु के पश्चात् मोतीलाल तेजावत ने मेवाड के भीलो मे जागृति के प्रयत्न किये। 1932 से 1938 के मध्य नागरिक अधिकारो की प्राप्ति के लिये उपक्रम किये गये। 1938 मे मणिक्यलाल वर्मा और उनके सहयोगियो ने 'प्रजा मण्डल' की स्थापना कर 'सविनय अवज्ञा आदोलन' प्रारम्भ किया । डडे बरसे और पकड धकड हुई। 26 जनवरी 1940 को उत्साहपूर्वक 'आजादी दिवस' मनाया गया। 'प्रजा मण्डल' के 1941 के अधिवेशन मे प्राचार्य कृपलानी मुख्य अतिथि बने। इस अवसर पर खादी की प्रदशनी का उद्घाटन श्रीमती विजय लक्ष्मी पडित ने किया। यह अधिवेशन बहुत सफल रहा जिसमे कायकर्ताप्रो के उत्साह मे अभूत पूर्व वृद्धि हुई। 1942 मे 'प्रजा मडल' ने महाराणा से अंग्रेजो से सवधी विच्छेद कर जिम्मेदार हकमत स्थापित करने की मांग की। मणिक्यलाल वर्मा, मोहनलाल सुखाडिया और वलवतसिंह मेहता सहित पन्द्रह लोगो को गिरफ्तार किया गया । आन्दोलन का प्रभाव नाथद्वारा, भीलवाडा, चित्तौड, छोटी सादडी और अनेक अन्य मेवाडी क्षेत्रा मे भी पहुच गया। आन्दोलन का स्वरुप निरन्तर व्यापक होने लगा। अन मे 1944 मे राजनैतिक वदियो को छोडा गया। 1944 मे मणिक्यशाल वर्मा की अध्यक्षता मे 'प्रजा मडल की बैठक हुई जिसमे निणय लिया गया कि नगर परिपद और व्यवस्थापिका का गठन शीघ्र किया जाए। 1945 में 'प्रजा मडल' पर लगा हुग्रा प्रतिवन्ध हटा लिया। 1946 मे उदयपुर मे पडिन जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्व मे 'अखिल भारतीय देशी राजा परिपद' का गधिवेशन हुआ। इससे उत्तरदायी शासन की माग को अधिक बल मिला व स्थानीय कायकर्तामो मे नवीन प्ररणा का सचार हुप्रा। माच 1947 मे उदयपुर के प्राइम मिनिस्टर राघवाचाय ने शासन मे थोडे बहुत सुधार करने की घोषणा की किन्तु यह केवल लोगो को सम में डालने का प्रयास ही था। जो कुछ दिखावटी सुधार किये गये उनसे महाराणा के निरकुश शासन के स्वरुप मे कुछ भी परिवतन नही हुआ। 'प्रजा मडल ने इन सुधारों को अस्वीकार कर इनका विरोध किया। 1947 मे दा स्वतत्र हुप्रा । इसके पश्चात राजस्थान के राजवगो का सघ चना जिसमे मम्मिलित होने पर उदयपुर को इस संघ को राजधानी बनाया गया। मरिणक्य लाल वमा के नेतृत्व मे इस सध का मत्री मडल बना । ग्यारह माह पश्चात इस सब का राजस्थान मे विलयीकरण हो गया। जसलमेर रेगिस्तान के मध्य स्थित एक पिछडी हुई रियासत । यहा पर दो [ 132 ] सर्वप्रथम रयुनायसिंह मेहता ने जसलमेर रावल की निरकुशता के विरुद्ध प्रावान उठाई। रावल को यह सहन नहीं हुअा और रघुनायसिंह को गिरफ्तार कर लिया। जीवनलाल कोठारी ने जन जागृति का प्रयास किया तो वह भी पकड लिया गया। सागरमल गोपा और पारायणदास भाटी ने भी निरकुशलता के विरुद्ध अावाज उठाई। सागरमल गोपा को जमलमेर से बाहर निकाल दिया गया। नागपुर प्रवास के समय उसने समाचार पनो म जैसलमेर शासक की निरकुशता नथा अत्या चारो का पर्दाफाश किया। 1939 मे शिवशकर ने जैसलमेर मे 'प्रजा परिषद्' की स्थापना की किन्तु उसे भी जैसलमेर छोडना पड़ा। माच 1951 मे सागरमल गोपा के पिता का स्वगवास हो गया। सागरमल गोपा को जोधपुर स्थित रेजीडेण्ट ने आश्वासन दिया था कि उसके विरुद्ध कोई शिकायत नहीं है तथा वह नि सकोच अपने निवास स्थान जैसलमेर जा सकता है। जैसलमेर जाकर जब लगभग दो माह पश्चात वह वापस लौट रहा था तव रवाना होने से पूर्व अचानक ही गिरफ्तार कर लिया गया। सरकार को भय था कि बाहर जाने पर फिर पहले की तरह ही विरोध प्रचार मे लग जाएगा। जेल मे ही उस पर मुकदमा चलाया गया। रिया सत के विरूद्ध पा दोलन के अपराध का दोषी मानकर 10 जून 1942 को उसे राज द्रोह की धारा के अन्तर्गत 6 वष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुना गई। उसने अपनी डायरी में लिखा कि उसे जेल मे प्रतिदिन पीटा जाता था और उसकी नाक व गुदा मे मिच डाली जाती थी। उसने गुप्त रुप से जयनारायण व्यास तथा जवाहरलाल नेहरु को पत्र लिखे और उन्होने रेजोउन्ट से जाच करने आ अनु रोध किया। रेजीडेन्ट ने जसलमेर जाने का कायम बनाया तब यकायक गोपा पर मिट्टी का तेल डालकर उसे जला दिया गया। लगभग बीस घटे तक तडफने के पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई। 5 अप्रैल 1931 को जयपुर शहर में 'मोतीलाल दिवस' मनाया गया। इससे क्रुध होकर जयपुर सरकार ने गुलाबचद चौधरी, कुदनलाल और किशोरसिंह का बन्दी बनाकर कठोर कारावास की सजाऐ ठोक दी। अगले छ सात वप तक राजनैतिक गनिविधिया शिथिल पड़ गई। 1937 मे उत्तरदायी शासन के उद्देश्य से जयपुर 'प्रजा मडल' की स्थापना गई। 1938 मे जमाालाल बजाज की अध्यक्षता मे इसका अधिवेशन हुआ। उस समय जमनालाल बजाज के जयपुर में प्रवेश पर प्रतिवध लगा हुआ था। इस प्रतिवध की अवहेलना कर वे अधिवेशन मे भाग लेने हेतु पहुचे थे इसलिये पक्ड लिये गये। हीरालाल शास्त्री, चिरजीलाल अग्रवाल, कपूरचद पाटनी तथा हरिशचद्र शर्मा ने भी सजाए भुगती। सत्याग्रह बहुत तेजी पकड रहा था कि तु गाधीजी ने सत्यग्रह समाप्त करने की मश्रण दे दी। समझौता होकर 'प्रजा मडल' को मान्यता मिल गई । नेतागण जेल से रिहा कर दिये गये। 'प्रजा मडल' की जड़ें धीरे धीरे जमने लगी। 1940 मे पुलिस ने 'प्रजा मडल' के कार्यालय पर धावा बोलकर कागजात जब्त कर लिये। जयपुर में 'प्रगति [ 133 ] शीत प्रजा मडल' और 'पाजाद मोर्चा' नाम से नये दल भी वने तथा राज्य की निर- कुशता का विरोध हुअा। 1945 मे जयपुर दरवार ने कुछ मुगारो की घोषणा कर उत्तरदायी शासन की दिशा मे कदम उठाया। प्रारम्भ मे देवीश कर तिवारी और बाद मे हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व मे लोकप्रिय मनी मडल बने । राजस्थान में विलय तक लोकप्रिय मत्री मडल निरन्तर सक्रिय रहे । 1918 मे कोटा मे स्थापित 'प्रजा प्रतिनिधि सभा' ने विदेशी माल का बहिष्कार कर देशी वस्तुप्रो, खादी के वम्रो और टोपी का आह्वान किया। 1926 मे कोटा मे 'हाडोती प्रजा मडल' का निर्माण हुआ। बाद में इसका नाम 'कोटा राज्य प्रजा मडल' रख दिया गया। 1939 मे अभिन्नहरि के नेतृत्व मे उत्तरदायी शामन के लिये आन्दोतन हुना। 1942 मे देश मै 'भारत छोडो' आन्दोलन के समय कोटा में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये हडताले हुई, जलूस निकाले गये। पुलिस ने दमन चक्र चलाया । अभिन्नहरि और उनके साथी गिरफ्तार कर लिये गये। पुलिस ने लोगो पर डडे बरसाये। अन्त मे लोगो का आक्रोश भडका उत्तेजित भीड ने कोटा नगर के दरवाजो व कोतवाली पर अधिकार कर लिया। मरकारी भवन पर तिरगा झडा फहरा दिया। पुलिस को बैरेको मे बन्द कर दिया। जनता ने तीन दिन तक शासन को अपने हाथ मे ले लिया। बाद में महाराव ने आश्वासन दिया कि जनता का दमन नही किया जाएगा तव शासन वापम मोपा। 1945 में भी कोटा के कार्यकर्तायो को शाति भग करने सम्बन्धी काले कान्न का शिकार होना पडा। राजस्थान मे विलय तक कोटा मे राजनैतिक गतिविधिया निरन्तर हाती रही। कोटा मे राजनैतिक जागृति का श्रेय नयनूराम शमा, अमिनहरि, इन्द्रदत्त स्वाधीन, नाथूलाल जैन, राजेन्द्रकुमार, विमलकुमार, क्जोलिया, तनसुखलाल मित्तल ग्रादि को है । ऐश्वयपूवक जीवन वीताना अनवर के महाराजा की पहली पसन्द । स्पष्ट है महाराजा के प्रति खर्चातू स्वभाव का भुगतान तो राज्य की प्रजा को ही करना था। किसानो पर नये से नये कर लगाये जाते। अलवर के बनसूर तथा गाजी का थाना के क्सिानो ने भूमि बन्दोवस्त के नाम पर लगने वाले करो का विरोध किया और रेजीडेट के पास शिकायत भी की। कृषको द्वारा रेजीडेण्ट के पास शिकायत करने से महाराजा जयदेवसिंह बहुत ही क्रोधित हो गया। 14 मई 1925 को भू- राजस्व के नाम पर होने वाली लूट के सवव मे विचार विमश के लिए किसान अलवर को बनसूर तहसील के नीमूचाना नामक गाव मे एकत्रित हुए । यकायक बहा राज्य की सशस्त्र सेना पहुची और निहत्थे किसानो को घेर कर उन पर गोलियो की बौछार कर दी। इस समय 353 घर जला दिये। 95 व्यक्तियो की इस गोलीकाण्ड में मृत्यु हो गई और 250 लोग घायल हुए। महात्मा गाधी ने इस दमनचक और नृशंस हत्याकाण्ड को 'यग इण्डिया' मे 'दोहरी डायरशाही' की सज्ञा दी और इस काण्ड [ 134 ] को जलिया वाला वाग से भी अधिक वीभत्म बताया। लगभग मभी प्रमुख भारतीय समाचार पत्रो ने इस काण्ड की निदा की 1 1932 में मेवातियों ने राज्य की शिक्षा नीति और अनुचित करो का विरोध दिया। अल्प समय मे ही मेवातियो के आन्दोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया। उन पर नियंत्रण स्थापित करना अलवर राज्य की शक्ति के बाहर हो गया। अन्त में राज्य ने अंग्रेजो से सैनिक सहायता का निवेदन किया। ब्रिटिश सेना की महायता से अत्यन्त ही यठिनाई से इस आदोलन को दवाया जा सका। इस घटना के पश्चात अलवर में विधिश मरवार का दबदवा जम गया और महाराजा केवल अग्रेजो की कठपुत नी मात्र रह गया। 1938 मे प्रजामण्डल की स्थापना हुई। लक्ष्मणस्वरूप त्रिपाठी तथा हरनारायण शर्मा को सजाए हुई। अनेक गतिविधियो के पश्चात 1940 मे प्रजामडल' को मा यता मिली। उत्तरदायी शासन की माग निर तर जोर पकडने लगी। 1946 मे शोभाराम, कुजविहारी और हरनारायण इत्यादि गिरफ्तार हुए। अन्तत 16 मार्च 1948 को अलवर 'मत्स्य सघ' मे सम्मिलित हो गया। अलवर का ही शोभाराम इस सघ का प्राइम मिनिस्टर वना । बाद मे समूचे 'मत्स्य सघ' का ही राजस्थान में विलय हो गया । - दिया। सिरोही राज्य के कुछ लोगो ने बम्बई मे प्रजा मडल की स्थापना कर वही से राज्य की निरकुशता का विरोध तथा उत्तरदायी शासन की माग करना प्रारम्भ कर दिया। इन लोगो मे गोकल भाई भट्ट, भीमशकर शर्मा, टकचद, सिंघी, वद्धिशकर निवेदी, भवूतमल आदि प्रमुख थे। 22 जनवरी 1939 को सिरोही नगर मे राज- नैतिक सभा करने के कारण गोक्लभाई भट्ट तया छ अन्य लोगो को बन्दी बना लिया गया। जनता द्वारा निरन्तर पाँच दिन तक गिरफ्तारी के विरद्ध प्रदशन करने पर विवश होरर राज्य सरकार ने पकडे हुए लोगो को विना शर्त रिहा कर उस ममय सिरोही मे प्रजा मडल की स्थापना हुई। नवम्बर 1939 मे ही राज्य विरोधी गतिविधियो के कारण इसे अवैद्य धापित कर दिया तथा इसके प्रमुख नेतातो को गिरफ्तार कर लिया। 1942 मे भारत छाडो आ पोतन के समय सिरोही मे भी आदोलन हुआ। सिरोही के प्रमुख कार्यकर्ता गोक्लभाई भट्ट राज पूताना प्रान्तीय काग्रेस कमेटी के प्रथम सभापति थे। भारत के स्वतन होने पर सिरोही राज्य भारतीय संघ मे सम्मिलित हो गया तथा गोकलभाई भट्ट के नेतृत्व में वहा मत्री मडल का गठन क्यिा गया। कुछ कारणो से सरदार पटल ने मिरोही का प्रशासन 8 नवम्बर 1948 को भारत सरकार से लेकर 5 जनवरी 1950 को वम्बई सरकार को सुपुद कर दिया। इसके विरुद्ध केवल सिराही ही नहीं बल्कि समस्त राजस्थान मे आन्दोलन हुए। अत ! नवम्बर 1956 को सिरोही को पुन राजस्थान में सम्मिलित कर दिया गया। धोलपुर राज्य मे प्रजा मडल की स्थापना 1936 मे हुई। इसके अध्यक्ष [ 135 ] कृष्णदत्त पालीवाल व सचिव मूलचद चुने गये। राज्य इस संस्था को सहन नही कर सका और इसकी सम्पत्ति को जन्त कर लिया। 1938 में प्रजा मडल ने उत्तर- दायी शासन की माग की किन्तु इम और कुछ भी ध्यान नहीं दिया गया। 1947 मे तासीमो नामक गाव मे होने वाले राजनैतिक सम्मेलन के समय पुलिस की गोली से छत्रमिह व पचसिंह नामक दो नेता मारे गये। जनता ने सवैधानिक सुधागे के लिये जारदार आन्दोलन चलाया। विवश होकर सरकार को सुधारों को योजना घोषित करनी पड़ी। मार्च 1948 मे धोलपुर का विलय मत्स्य संघ मे हो गया। -15 मई 1949 को मत्स्य सघ का राजस्थान मे विलय हो गया। भरतपुर में अत्यधिक लगाम और गज्य को दमनकारी नीति के कारण प्रजा दुखी थी। 1928 में राज्य को विगडी ग्राधिक दशा और प्रशासन मे सुधारो के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त दिवान मेके जी की मनमानी और अत्याचारो के कारण पादोलन प्रारम्भ हुए। भरतपुर राज्य मे 1938 में प्रजा मडल की स्थापना की योजगा बनी और लम्वे सघप के बाद 1947 मे उसका पजीयन हुआ तथा 'भरतपुर राज्य प्रजा परिषद' नाम रखा गया। 1942 मे आन्दोलन के समय युगलकिशोर चतुर्वेदी, प्रादित्येन्द्र प्रादि गिरफ्तार किये गये। उसी वप राज्य मे वाढ या जाने के कारण पादोलन स्थगित कर प्रजा मडल ने राज्य में समझौता कर लिया। 1947 मे बेगार के विरोध मे लोगो ने आन्दोलन किया। एकत्रित भीड पर घुड़सवारो को दौडाया गया जिससे काफी लोग घायल हुए । कुछ समय पश्चात महाराजा के दौरे से लौटने पर लोगो ने पुन सत्याग्रह किया। पुलिस ने एक मोटर गाडी (बस) सत्याग्रहियो पर चडा दी जिससे अनेक लोग घायल हुए और रमेश स्वामी की मृत्यु हो गई। इस समय अनेक कायर"यो को गिरफ्तार कर लिया गया। देश के स्वतन्त्र होने के बाद दिसम्बर 1947 में महाराजा ने अ तरिम सरकार चना कर चार लोकप्रिय मत्रियो को उसमे सम्मिलित रिया । दर्ग फल गये इसलिये केन्द्र सरकार ने यहा का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। 18 माच 1948 को अलवर, भरतपुर, वोलपुर और करौली की रियामतो को मिला कर 'मत्स्य सघ' का निर्माण हुआ और 15 मई 1949 मे इस सघ को चारा रिया सतो का राजस्थान में विलय हुआ । करोनी राज्य मे जन जागृति का सूत्रपात मदनसिंह, ओकारसिंह चिरजीलाल शर्मा आदि द्वारा किया गया। 1939 मे प्रजा मण्डल की स्थापना हुई। सपोटरा नामय स्थान पर जागीरी जुल्मो क विरूद्ध पा दोलन हुआ। पड़ोसी राज्यों ने 1946 में उत्तरदायी सरकार की मांग उठाई। जुलाई 1947 मे महाराजा ने सवधानिक सुवारी हेतु समिति बनाई। यह समिति सुधारों पर विचार विमश कर हो रही थी कि 1948 में राज्य को मत्स्य सग में सम्मिलित कर लिया गया। प्रतापगढ़ राज्य मे उदटपुर के सुधारवादी प्रयत्लो के प्रभाव मे भोलो तथा यहा साम्प्रदायिक [ 136 ] पिछड़ी जातिया मे जागृति के प्रयास हुए 11936 मे ठपकर बप्पा ने यहा हरिजा पाठशाला स्थापित की। काना तर मे दो प्रचार ममा प्रादि द्वारा जन जागरण हुमा। अमृतलाल ने यहा 1946 में प्रजा मडल की स्थापना की। किशनगढ़ राज्य अजमेर के निकट स्थित होने के कारण वहा जन जागृति के प्रयास काफी जल्दी होने लगे। कान्तिचन्द्र, पुरूपोत्तम लाल शर्मा, जमालशाह आदि किशनगढ़ में जन जागृति के अग्रदूत बने । टोक मे अधिकतर बार्मिक ग्रान्दोलन हुए चिन्तु वहा के लावा ठिकाने के महेन्द्रकुमार जैन ने राष्ट्रीय कायमो मे अत्यन्त ही उत्साह में भाग लिया। शाहपुरा में 1938 म प्रजा मडल की स्थापना हुई। वेगार का विरोध, नगर परिपद की स्थापना आदि के प्रयत्न किये गए। 1942 के आन्दोलन के समय अनक कायकर्तायो को पकड कर अजमेर जेल भेजा गया। गोक्ल लाल अमावा, लादूराम व्यास, रमेशचंद्र, लक्ष्मीदत्त आदि इस क्षेत्र के प्रमुख जन नायक थे। इस राज्य में प्रगतिशील कदम अपेक्षाकृत जल्दी उठाये गये। 1948 में इस रियामत का राजस्थान मे विलय हुआ। 15 अगस्त 1947 को आजादी के प्रागीवाना के बलिदान रगलाये और देश स्वतन्न हो गया। राजस्थान के रजवाडो मे जबरदस्त हलचल मच गई। जितने मुह उतनी बाते होने लगी। पडित जवाहरलाल नेहरु और सरदार वल्लभ भाई पटन जैसे राष्ट्रीय नेतामा और कई रजवाडी लोक नेताओ के सप्रयत्नो के परिणाम स्वरुप राजस्थान का एकीकरण 1 नवम्बर 1956 को सम्पन हुमा तथा राजस्थान का वर्तमान परिप्कृत स्वरूप निखर कर सामने आया।
आधुनिक राजस्थान का निर्माण परिचयात्मत्र 1 देशी राज्यों के भारतीय संघ में अधिमिलन, एकीकरण एव लोकतनी- करण की प्रक्रिया के विषय में प्राथमिक एव प्रमाणिक जानकारी के स्रोत निम्न- लिखित ग्रथ हैं (अ) भारत सरकार के राज्य मन्त्रालय का प्रकाशन ह्वाइट पेपर ऑन इडियन स्टेट्स (इसका प्रथम सस्करण जुलाई 1948 मे तथा द्वितीय सशोधित सस्करण माच, 1950 मे प्रकाशित हुआ) (व) वी पी मेनन, दि स्टोरी आफ द इडियन स्टेट्स (इसके दो सस्करण मार्च और सितम्बर 1956 तथा तृतीय सस्करण 1961 मे ओरियन्ट लौंगमैन्स, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित किया गया। (स) सुखवीरसिंह गहलोत, राजस्थान रौ एकीकरण, राजस्थानी भाषा मे लिखा गया यह शोध-लेख श्री जगदीशसिंह गहलोत शोध संस्थान पत्रिका जोधपुर के 1985-86 के अक 5-6 मे प्रकाशित हुआ। इस आलेख में मानक ग्रन्थो तथा तत्कालीन समाचार पत्रो को अद्घृत करते हुए राजस्थान को विभिन्न रियासतो के एकीकरण से सम्बद्ध प्रामाणिक जानकारी प्रदान की गई है। 2 अाधुनिक राजस्थान का निर्माण बीसवी शताब्दी के पाचवे दशक की महान् ऐतिहासिक घटना है, जिसके कारण राजपूताने की रियासतो मे प्रचलित निरकुश सामन्तवादी प्रशासनिक व्यवस्था के प्रतिमानो का रूपान्तरण आधुनिक युग को लोकतात्रिक प्रणाली मै सम्भव हो सका। 3 स्वतत्रता से पूर्व भारत दो भागो मे विभक्त था (अ) ब्रिटिश भारत और (व) भारतीय राज्य अथवा नेटिव स्टेट्स । ब्रिटिश भारत का सर्वोच्च शासक गवनर जनरल एव वायसराय था और देशी राज्यो के शासक ब्रिटिश सरकार की परमोच्च शक्ति (Paramount Power) के अधीन थे, कि तु वे अपनी रियासतों के आ तरिक प्रशासन मे सम्प्रभु थे। 4 भारतीय रियासतो का वर्गीकरण भिन-भिन्न दृष्टिकोणो के आधार पर किया जाता रहा है। अत उनकी संख्या मे भी न्यूनाधिक अन्तर पाया जाता है । जसे, भारत सरकार के प्रकाशन 'द इडियन स्टेट्स' के अनुसार 1 जनवरी, 1928 को 1 .
[ 138 ] देशी रियासतो की कुल सय्या 562 थी, इनमे से 119 के शासको को तोपो द्वारा सलामी दी जाती थी तथा 441 राज्य अथवा ठिकाने तोपो द्वारा सलामी से वचित थे। "दि इडियन स्टेटस कमेटी" (बटलर समिति) के प्रतिवेदन 1929 मे भी नरेन्द्र मण्डल (चैम्बर आफ प्रिंसेज) मे प्रनिनिधित्व की योग्यता के आधार पर देशी राज्यो की सय्या 562 निश्चित की गई। ब्रिटिश सरकार ने मेमोरेण्डा पान द इडियन स्टेटम' मे रियासतो की सय्या 601 वताई है परन्तु त्रिटिश सरकार के अन्तिम गवनर जनरल एव वायसराय लाड माउटबेटन ने 25 जुलाई, 1947, को देशी राजाओ के शासको तथा उनके प्रतिनिधियो के सम्मेलन में भाषण देते हुए देशी राज्यो की सरया लगभग 565 वतायी। 1 5 स्वतन्त्रता पूर्व राजस्थान मे तोपो की सलामी की हकदार 19 रियासतें तथा तोपसलामी से वचित ठिकानो की सख्या 3 थी। इनके नाम निम्नलिखित है- अलवर, भरतपुर, वौलपुर, करौली, वासवाडा, बू दी, डूगरपुर, झालावाड, किशन गढ, कोटा, मेवाड, प्रतापगढ, शाहपुर, टोक, जयपुर, जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, सिरोही, (19) और लावा, कुशलगढ तथा नीमराना (31) परमोच्च शक्ति 6 स्वतन्त्रता से पूर्व भारतीय राज्यो पर ब्रिटिश परमोच्च शक्ति का नियत्रण था, जिसका विकास ईस्ट इडिया कम्पनी के प्रशासन (1757-1856) के कालखण्ड मे हुमा। गवर्नर जनरल लाड डलहोजी (1848-56) को इस बात का श्रय है कि उसने अपने व्यपगत सिद्धान्त (डाक्ट्रिन आफ लैप्स) तथा पजाव-विजय (1848-49) के साथ भारत में ब्रिटिश परमोच्च शक्ति की स्थापना अन्तिम रूप से कर दो। 7 1857 में ईस्ट इडिया कम्पनी की राजसत्ता के विरूद्ध भारत मे विप्लव प्रारम्भ हुआ। परिणामस्वरूप ब्रिटीश ससद ने भारत सरकार अधिनियम, 1858 पास करके भारत की शासन सत्ता उसका भू-भाग तथा राजस्व ईस्ट इंडिया कम्पनी से लेकर ब्रिटिश राजमुकुट मे हस्तान्तरित कर दिया। कम्पनी से जाउन के हाथो मे सत्ता के हस्तान्तरण के सम्बध मे महारानी विक्टोरिया ने 1 नवम्बर, 1858 को शाही घोपणा की । इस घोषणा के साथ भारतीय रियासता पर ब्रिटिश झाउन की परमोच्च शक्ति विधित और तथ्यत स्थापित हो गई। 8 ब्रिटिश सरकार ने परमोच्च शक्ति की व्याख्या कभी नहीं की। विलियम ली वारनर (दि नेटिव स्टेट्स आफ इडिया, 1910) के अनुमार- "ब्रिटिश पाउन मे परमोच्च शक्ति है, परन्तु उसके अधिकार क्षेत्र को बुद्धिमत्ता पूवक परिभाषाविहीन छोड दिया गया है।" बटलर समिति के प्रतिवेदन (1929) में लिखा गया "परमोच्च शक्ति को परमोच्च ही रहना चाहिए।" सर [ 139 ] 9 बटलर समिति ने परमोच्च शक्ति को परिभाषित तो नहीं किया, परन्तु उमके कायकलापो को चार प्रमुख शीर्षको मे विभक्त किया (अ) वैदेशिक सम्बध, (व) अन्तर-राज्यीय सम्बध, (स) भारत की प्रतिरक्षा, और (द) राज्यो के पातरिक मामलो मे हस्तक्षेप के अवसर । इस प्रकार देशी राजा स्वतन रूप से अन्तर राष्ट्रीय सम्बध स्थापित नहीं कर सकते थे। भारतीय राज्य अन्य भारतीय राज्या के माथ न तो राजनीतिक सम्बध स्थापित कर सकते थे और न युद्ध अथवा शान्ति सधि कर सकते थे। प्रतिरक्षा के क्षेत्र मे परमोच्च शक्ति दोना --ब्रिटिश भारत और भारतीय राज्यो की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी थी और प्रातरिक सुरक्षा से सम्बंधित सभी विषयो पर उसको हस्तक्षेप करने तथा नीति निर्धारण का अधिकार था। राजनीतिक विभाग की स्थापना- 10 1915 में देशी रियासतो तथा उनके शासको से ब्रिटिश सरकार के सम्बधो के मामलोग देखरेख के लिए वायसराय के अधीन एक 'राजनीतिक विभाग की स्थापना की गई। इस विभाग के प्रभाव के बारे मे वी पी मेनन का कथन है -'राजनीतिक विभाग ने रियासतो मे धीरे-धीरे शासन के अन्दर शासन की स्थिति ग्रहण करली थी।" नरेन्द्र माण्डल की स्थापना- 11 राजानो ने भारतीय राष्ट्रीय ग्रान्दोलन का दमन करने और प्रथम महायुद्ध मे ब्रिटिश सरकार की मदद करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनका भारतीय राजनीति मे निरन्तर, सम्पक सम्वध बनाए रखने के सदभ मे ब्रिटिश सरकार ने 1921 मे शाही उघोषणा द्वारा 'नरेन्द्र मण्डल' की स्थापना की। यह एक परामर्शात्मक तथा सलाहकार निकाय के ममान था। वायसराय इसका अध्यक्ष होता था तथा नरेन्द्र मण्डल के सदस्य अपने मे से एक वर्ष के लिए एक चामलर और एक प्रो वायम चामलर चुनते थे। नरेन्द्र मण्डस शीघ्र ही बहुसय्यक राज्यो का वास्तविक प्रतिनिधि बन गया और नरेशो तथा राजनीतिक विभाग के बीच एक सम्पर्क कडी के रूप मे भूमिका प्रस्तुत करने लगा। काग्रेस और देशी राज्य 12 राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीयता के बढते हुए तूफान को रोकने के लिए देशी राज्यो ने ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा - प्राचीर के रूप मे कार्य किया, काग्रेस के अखिल भारतीय संघ की स्थापना का विरोध किया और ब्रिटिश भारत से पृथक अपनी अलग राजनीतिक सत्ता को बनाए रखने का सदैव प्रयास किया। 13 देशी भारत मे राजनीनिक आन्दोलनो का मार्ग दर्शन करने एव उनमे [ 140 ] समन्वय स्थापित करने हेतु दिसम्बर 1927 मे वम्बई में प्रभा देशी राज्य लोक परिपद की स्थापना की गई। प्रारम्भ मे अभा राष्ट्रीय काग्रेस ने रियासतो के प्रति तटस्थता की नीति अपनायो । अन्तत 1938 मे काग्रेस ने हरिपुर अधिवेशन मे प्रस्ताव पास किया कि काग्रेस देशी राज्या म पूण उत्तरदायी शामन की स्थापना और नागरिक स्वतन्त्रताओ के सरक्षण पो माग या पूर्ण समया करती है। उसने रियासतो में काग्रेस समितियों और प्रजामण्डला की स्थापना का समयन किया। राजस्थान ने नजानइलों की स्थापना 14 राजस्थान में राजनीतिक चेतना का विवाम करने और विभिन्न रिया- सतो मे उत्तरदायी शामन की स्थापना के लिए मधप करने के लिए प्रजामण्डलो को स्थापना की गई। 1934 मे मारवाड प्रजामण्डल की स्थापना की गई। इससे पूर्व जयनारायण व्याम के नेतृत्व में मारवाड राज्य लोक परिषद द्वारा जोधपुर राज्य म उत्तरदायी शासन की स्थापना और नागरिक अधिकागे के सरक्षण के लिए सरक्षण के लिए संघर्ष किया गया था। मारवाड प्रजामण्डल को अवध घोषित किए जाने पर जयनारायण व्यास ने मई 1938 मे मारवाड लोप परिषद् की स्थापना की। बीकानेर राज्य मे सवप्रथम 1936 मै तथा पुन जुलाई 1942 मे प्रजामण्डल की स्थापना की गई। उदयपुर मे 1938 मे तथा जयपुर मे सर्वप्रथम 1931 मे (1937- 38 मे सेठ जमनालाल बजाज की प्रेरणा से पुनगठन) प्रजामण्डल की स्थापना की गई । जैसलमेर (1939), भरतपुर (1938), डूंगरपुर (1944), वासवाडा (1943), मिरोही (iv39), वू दी (1944), धौलपुर (1938, और करौली राज्य (1939) में प्रजामण्डली की स्थापना की गई। 15 राजस्थान में प्रजामण्डल आदोलनो के प्रमुख नेता सवश्री जयनारायण व्यास, मघाराम वैद्य, रसुवरदयाल गायल, कुम्भाराम आय, बलवत्तसिंह मेहता, माणिक्यलाल वर्मा, मेठ जमनालाल बजाज, हीराताल शास्त्री सागरमल गोपा, मीठालाल व्यास, मास्टर भोलानाथ, प नय राम शर्मा' प अभित हरि, ठाकुर देशराज, मास्टर आदित्येन्द्र, राजबहादुर, भोगीलाल पड्या, भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी, गोकुल भाई भट्ट, व्रजसुन्दर शमा, ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु, चिरजीलाल शर्मा, रामनारायण चौधरी, गोकुल लाल असावा आदि थे। 16 अाधुनिक राजस्थान के निर्माण में विभिन रियासतो के प्रजामण्डलो की भूमिका निर्णायक रही उन्होने राजनीतिक चेतना का शखनाद किया, सामाजिक परिवतन एव भूमि सुधारी का माग प्रशस्त किया, उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए सघप दिए और रियासतो के शासको पर भारतीय सघ मे विलय, एकीकरण तथा लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना के लिए दबाव डाला। वस्तुत प्रजामण्डलो के नतानो ने राजस्थान के एकीकरण सम्बधी सरदार पटल के महान प्रयासो में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। - विभाजन का मार्ग भी प्रशस्त कर दिना। [ 141 [ भारत विभाजन और स्वतन्त्रता 17 द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय राष्ट्रीय आदोलन अपने यौवन के चरम उत्कर्ष पर पहुच गया। अन्त ब्रिटेन की श्रमिक सरकार के प्रधानमन्त्री एटली ने भारत की सवैधानिक समस्या के समाधान के लिए मार्च 1946 मे कैबिनेट मिशन भारत भेजा। कैबिनेट मिशन ने 16 मई, 1946 को अपने प्रस्तावो की घोषणा की। 18 कैबिनेट मिशन की योजना के अनुरूप 2 सितम्बर 1945 को अतरिम सरकार का निर्माण हुआ जिसमे गवनर जनरल तथा वायसराम लाड वैवल ने प जवाहरलाल नेहरु को अपनी कार्यकारिणी मे उप प्रधान तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल को गृहमत्री मनोनीत किया। जुलाई 1946 मे सविधान सभा के लिए चुनाव हुए और सविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर, 1946 को हुआ। 19 भारतीय राज्यो के सम्बन्ध मे कैबिनेट मिशन ने कहा कि परमोच्च शक्ति का हस्तातरण नूतन भारत सरकार को नहीं होगा, किन्तु इसक अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। प्रस्तावित भारतीय सघ मे शामिल होने वाली रियासतो को वैदेशिक सम्बध, प्रतिरक्षा और सचार के अलावा अन्य विषयो के प्रशासन में स्वत त्रता होगी। सविधान सभा मे देशी राज्यो के प्रतिनिधियो की संख्या 93 निश्चित की गई। सविधान सभा मे प्रतिनिधियो के चयन एव प्रतिनिधित्व सम्बधी समस्या के सामाधान के लिए नरेन्द्र मण्डल देशी राज्यो की एक समझौता- वार्ता समिति नियुक्त करेगा जो सविधान सभा द्वारा नियुक्त समझौतावार्ता समिति 20 नरेन्द्रमण्डल ने जून 1946 मे तथा सविधान सभा ने दिसम्बर 1946 मे 'समझौता वार्ता समिति (Negotugting Committee) की नियुक्ति की। दोनो समितियो मे अप्रेल 1947 मे सविधान सभा मे देशी राज्यो के प्रतिनिधियो की सख्या (93) के वितरण और चयन के विषय मे समझौता हो गया। 21 प्रान्तो के अनिवार्य समूहन सम्वधी कवीनेट मिशन के प्रस्तावो पर काग्रेस और मुस्लिमलीग मे मतभेद होने के कारण लीग ने 29 जुलाई, 1946 को कविनेट मिशन योजना को अस्वीकृत कर दिया और इस गतिरोध ने भारत से बातचीत करेगी। . 22 अन्तत काग्रेस और लीग ने 3 जून, 1947 को भारत विभाजन की माउटबेटन योजना को स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश ससद ने "भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम, जुलाई 1947" पास किया जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को भारत और पाक्स्तिान नामक दो स्वतन डोमिनियनो को स्थापना का प्रावधान किया गया। स्वतत्रता अधिनियम मे कहा गया कि भारतीय रियासतो के नए डोमि- [ 142 1 नियमो में से किमी एक मे अधिमिलन (विलय) पर प्रतिवध नहीं होगा। अधिनियम के अनुसार ब्रिटिश परमोच्च शक्ति का हस्तान्तरण भारत अथवा पाकिस्तान को नहीं किया, किन्तु इस का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया। মিলিল লাগ্লাই 23 तत्कालीन भारतीय राजनीतिक घटनाक्रम के सन्दर्भ में देशी राज्यो के भारत-सघ मे अधिमिलन और एकीकरण के मार्ग मे अनेक समस्याए-बाधाए थी। उदाहरणाथ (1) 29 जनवरी, 1947 को बम्बई मे देशी राज्यो के शासको का एक सम्मेलन हुआ जिसमे प्रस्ताव पास किया गया कि प्रत्येक राज्य स्वय निश्चित करेगा कि भारतीय संघ मे शामिल हो या न हो। सघ उनकी सीमायो मे और उनके समिधान में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता और न कोई हस्तक्षेप उत्तराधिकारी नियुक्त करने मे ही किया जा सकता है। (u) 13 जून 1947 को लाड माउन्टवेटन ने रियासतो के मसले पर विचार-विमर्श करने के लिए दलीय नेताओं की बैठक बुलाई, उसमे मुस्लिम लीग के नेता श्री जिना का तक था कि परमोच्च शक्ति का हस्तान्तरण नये डोमिनियनो को नहीं किया गया। अत तकनीकी रूप मे देशी राज्य 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्र हो गए। उहे पाकिस्तान या भारत में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। प नेहरू का प्रत्युत्तर था कि कोई भी रियासत पाकिस्तान मे शामित हो सकती है, किन्तु कैविनेट मिदान के ज्ञापन मे अनुसार वह स्वतन्त्र रहने का दावा नहीं कर सकती। (11) काठियावाड, राजस्थान, पजाब, दक्षिण उड़ो सा तथा छत्तीसगढ की रियासतो ने क्षेत्रीय सघो के निर्माण का विचार किया। काग्रेस ने इस योजना का विरोध क्यिा, क्योकि क्षेत्रीय सघो का विचार भारतीय राष्ट्रवाद तथा एक्ता के विरुद्ध था। (v) राजनीतिक विभाग के प्रधान सर कोनरेड कोरफील्ड ने भी भारतीय डोमीनियन सरकार के लिए वाधाए पैदा करने के अनेक प्रयास किए। कहा जाता है कि उसने रियासतों से सबधित अभिलेखो को नष्ट करने की स्वीकृति निटिदा सरकार मे प्राप्त करली थी। (1) हैदरावाद राज्य के निजाम ने 12 जून, 1947 को स्वतत्र रहने की घोषणा की और लीग के प्रमुख पत्र 'डॉन' ने निजाम ने इस निर्णय का हार्दिक स्वागत किया। 11 जून, 1-47 को ट्रावनकोर ने स्वतत्र रहने वो घोपणा की। जूनागढ के नवाब ने 15 अगस्त, 1947 को पापिस्तान में अधिमिलन की घोषणा की । अधिमिलन के लिए भारत सरकार के प्रयास 24 प्रभा कास समिति ने 15 जून, 1947 को प्रस्ताव पास किया वि पिसी भी भारतीय रियासत द्वारा स्वय को स्वतत्र घोपित करने का अधिकार नहीं है। प नेहर ने कहा-"भारत सरकार ने कुछ अननिहित परमोच्च शक्ति है जो समास नहीं हो सकती। भारत-सघ की परमोच्च शक्ति या एक मात्र [ 143 ] १ विकल्प यह है कि रियासतो मे मिल जाना चाहिए और सघीय विधान मण्डल तथा सघीय कायपालिका मे समान रूप में भाग लेना चाहिए।" 25 27 जून 1947 को भारत सरकार के अन्तर्गत 'रियासती विभाग' खोला गया । सरदार पटेल को इसका प्रभारी मन्त्री और वी पी मेनन को सचिव नियुक्त किया गया । यह प्रस्तावित हुअा कि तीन विषयो वैदेशिक सम्बव, प्रतिरक्षा और सचार के सदर्भ में रियासतो को सघ मे अधिमिलन के लिए कहा जाए। 26 5 जुलाई, 1947 को मरदार पटेल ने कहा---'अगर आप भारत की डोमोनियन मे शामिल होमा चाहते है तो आप ऐसा 15 अगस्त से पहले करे । इसमे स देह नहीं कि ऐसा करना प्रत्येक देशी राज्य के हित मे होगा और प्रत्येक होसियार तथा विवेक सम्पन राज्य सरकार भारत डोमिनियन में सम्मिलित होना चाहेगी । इस अधिमिलन का आधार ऐसा होगा कि आपको आन्तरिक मामलो मे काफी स्वतन्त्रता रहेगी। और साथ ही सुरक्षा, सचार और वदेशिक मामलो मे आप चिता मुक्त हो जाएगे।" 27 25 जुलाई 1947 को लार्ड माउन्टवेटन ने प्रथम तथा अतिम बार नरेशो के सम्मेलन मे भाषण देते हुए कहा "सैद्धातिक रूप से देशी राज्य अपना भविष्य निर्धारण के लिए स्वतन्त्र है। उन्हे ब्रिटिश राजा के प्रति उनके सब दायित्गे से मुक्त कर दिया गया है, पर तु कुछ भौगोतिक बाध्यताए है जिनसे मुंह नही मोडा जा सकता है । लगभग 565 रियासतो मे से अधिसरय भारत के डोमिनयन से भौगोलिक दृष्टि से अपरिहाय रूप से जुडी हुई है ।" माउटबेटन ने राजानो से कहा कि अधिमिनन के लिए 15 अगरत अतिम तारीख निर्धारित की गई है, जिससे पले ही उहे अधिमिलन के लिए सहमति देनी चाहिए। वास्तव मे लाड माउटबेटन ने राजाओ पर भारत सघ मे अधिमिलन के लिए सराहनीय राज- नीतिक एव कुटनीतिक दबाव डाला। आधुनिक राजस्थान का निर्माण 28 रियासती विभाग का अधिमिलन लेखपत्र को31जुताई 1947 को अतिम रूप दिया गया। 15 अगस्त 1947 तक जूनागढ, मगरोल, मानवादर, हैदराबाद और जम्मू काश्मीर को छोडकर भारत से भौगोलिक समीपतावाली सभी रियासतो ने अधिमिलन लेखपत्र पर हस्ताक्षर कर दिए । माउटवेटन ने 15 अगस्त को सविधान सभा को सूचित किया- "संयुक्त राजनीतिक सरचना स्थापित हो चुकी है ।" 29 अाधुनिक राजस्थान का निर्माण तीन चरणों में हुआ। प्रथमचरण, भारतीय सध में अधिमिलन, द्वितीय चरण, राजस्थान को 19 रियासतो तथा 3 ठिकाना का राजस्थान मध मे एकीकरण तथा तृतीय चरण का सवध राजस्थान में लोकतात्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना से है।
[ 144 ] 30 रियासतो के सविधान सभा में भाग लेने के प्रश्न पर नरेन्द्र मण्डल के चासलर भोपाल के नवाब ने असहयोगी तथा नकारात्मक भूमिका अभिनीत की। उनकी राष्ट्र विरोधी नीति का विरोध करते हुए माच 1947 मे बीगनेर के महा- राजा शादुलसिंह ने कहा-"हमे सविधान सभा में भाग लेना चाहिए।" उनके वक्तव्य ने न केवल नवाव भोपाल के नेतृत्व को चुनौती दी, बल्कि अप्रेल 1947 के अन्त तक राजस्थान की प्रमुख रियासता ने सविधान सभा में अपने स्थान भी ग्रहण कर लिए। अधिनिलन 33 भारतीय स्वतत्रता अधिनियम जुलाई 1947 के अन्तर्गत अन्य देशी राज्यो की भाति राजस्थान की रियासतो को भी भारत या पाकिस्तान दोनो मे से किसी एक डोमीनियर मे अधिमिलन का निणय करना था। इस सन्दर्भ में उल्लेख नीय है कि जोधपुर नरेश ने नवाब भोपाल के साथ 6 अगस्त 1947 को जिना से भेट की । जिन्ना ने जोधपुर नरेश हनुव सिंह को पाकिस्तान मे सम्मिलित होने के बदले में उन्ह एक स्वतत्र गज्य का स्तर प्रदान करने का वचन दिया। 8 अगस्त को राज्य विभाग के सचिव वी पी मेनन ने हनव तसिंह को भेंट माउन्टवेटन से करवा दी। परिणामस्वरूप हनुवतसिंह का पाकिस्तान मे विलय का विचार बदल गया और 11 अगस्त को उन्होने नवाब भोपाल को सूचित किया कि वह भारत मे अधिमिलन कर रहा है। 15 अगस्त तक राजपूताने की सभी रिया- सतो का अधिमिलन भारतीय संघ मे हो गया। एकीकरण 32 भारतीय सघ मे अधिमिलन के पश्चात दूसरा चरण राजस्थान की रियासतो के एकीकरण का था। मेवाड के महाराणा भूपालसिंह, जयपुर के महा- राजा मानसिंह, कोटा के महाराव भीमसिंह और डूगरपुर के महारावल लक्ष्मण सिंह ने अपने अपने स्तर पर रियासतो के सघ बनाने के प्रयत्न किए, परन्तु वे अपने सामतवादी अहम् और निरकुश व्यक्तिवाद के कारण सघ बनाने में असफल रहे। 33 राजस्थान में राज्यो के एकीकरण की प्रक्रिया को अनेक कारको ने गति एव दिशा प्रदान की । जैसे प्रजामण्डल आन्दोलनो का विभिन्न राज्यो पर एकीकरण हेतु दबाव डालना, अखिल भारतीय राज्य लोक परिषद् (AISPC) का प्रजामण्डल आन्दोलनो का समथन एव विभिन्न प्रजामण्डलो मे समवय-सामजस्य स्थापित करना, राज्यो के निरकुश, अनुत्तरदायी और सामतवादी प्रशासन के प्रति जनता मे अविश्वास की भावना और सरदार पटेल का प्रभावी राजनीतिक नेतृत्व तथा वीपी मेनन का राजनयिक कौशल । 34 सर्वप्रथम जयनारायण व्यास ने अपने पत्र 'तरूण राजस्थान में 20 -- [ 145 ] सितम्बर, 1929 के अ क मे विभिन्न रियासतो के विलय से एक सयुक्त राजस्थान के निर्माण की सकल्पना प्रस्तुत की थी। अभी देशी राज्य लोक परिपद् की राज पूताना प्रातीय सभा ने सितम्बर 1946 मे प्रस्ताव पास किया कि राजस्थान की रियासते पृथक्-पृथक इकाई के रूप मे भारतीय संघ मे शामिल होने के योग्य नहीं है । अत समस्त राजस्थान का विलय एक इकाई के रूप मे भारत सघ मे होना चाहिए । मार्च 1948 मे पुन प्रातीय सभा की कार्यसमिति ने स्पष्ट रूप मे घोषणा की "राजस्थान की राजनीतिक समस्या का सर्वोत्तम विकल्प वृहत राजस्थान का निर्माण है । काग्रेस के नेतृत्व एव मागदशन मे कायरत विभिन्न रियासतो के प्रजा- मण्डल भी बृहत राजस्थान के निर्माण के लिए प्रबल जनमत तैयार कर रहे थे। राजस्थान के इतिहासकार जगदीशसिंह गहलोत ने 16 अप्रैल, 1947 को 'नवभारत' दिल्ली के विशेष सवाददाता को साक्षात्कार में बताया कि सिंध का थरपारकर अमरकोट जिला), हिसार जिले के भिवानी और गुडगाव का कुछ क्षेत्र मालवा प्रान्त का कुछ भाग, ईडर, सिरोही, दाता, पालनपुर और राजस्थान की ममस्त रियासतो को मिलाकर बृहत राजस्थान का निर्माण करना चाहिए क्योकि यह क्षेत्र सस्कृति, भाषा और भू-राजनीति की दृष्टि से बृहत राजस्थान के अभिन्न अग है। उपर्युक्त कारणो के अलावा भारत विभाजन के कारण अलवर और भरतपुर मे साप्रदायिक हिंसा ने राजस्थान मे एकीकरण की प्रक्रिया को गति प्रदान की। राजस्थान के एकीकरण के प्रमुख चरण निम्नलिखित है मत्स्य सघ का निर्माण 35 देश के विभाजन के ससय अलवर और भरतपुर मे भीपण साम्प्रदायिक परिणामस्वरूप इन रियासतो मे आतरिक अशान्ति और प्रशासनिक अराजकता फैल गई। साम्प्रदायिक दगो की स्थिति से निपटने तथा कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारत सरकार ने अलवर और भरतपुर का प्रशासन अपने हाथो मे ले लिया। अलवर और भरतपुर से भौगोलिक समीपता रखने वाली धौलपुर और करौली छोटी-छोटी रियासतें थी। ये चारो रियासते भारत सरकार द्वारा निर्धारित मापदण्ड के अनुसार पृथक अस्तित्व बनाये रखने योग्य नही थी। अत भारत सरकार ने 27 फरवरी, 1948 को चारो रियासतो के सामने एकीकरण द्वारा एक नए राज्य सघ के निर्माण का प्रस्ताव रखा। उनके द्वारा प्रस्ताव स्वीकृत होने पर भारत सरकार ने प्रस्तावित राज्य का नाम मत्स्य सघ रखा। मत्स्य सघ का उद्घाटन केन्द्रिय मत्री एन वी गाडगिल ने 18 दगे भडक उठे।
[ 146 ] मार्च, 1948 को किया मत्स्य सघ के चारा घटक राज्यो का कुल क्षेत्रफल लगभग 12000 कि मी जनसख्या 18 करोड और वार्षिक आय 2 करोड रुपये थी। संघ के राजप्रमुख महाराजा पोलपुर और उपराज्यप्रमुख महाराणा करौली बनाए गये। अलवर प्रजामण्डल के लोकप्रिय नेता शोभाराम कुमावत को मत्स्य सघ का प्रधान मनी मनोनीत क्यिा गया। - सयुक्त राजस्थान का निर्माण 36 महाराव कोटा ने कोटा, बू दी और झालावाड के विलय द्वारा हाडौती संघ और महाराव डूगरपुर ने डूगरपुर, वासनाडा एव प्रतापगड के विलय द्वारा 'बागड सघ' बनाने के असफल प्रयत्न किए। इसी मन्दभ मे भारत सरकार के गज्य विभाग ने 3 माच, 1948 की कोटा, वू दी, झालावाड, टोक, टूगरपुर, वास- वाडा, प्रतापगढ, कुशलगढ, किशनगढ और शाहपुरा की रियासतो को मिलाकर संयुक्त राजस्थान के निर्माण का प्रस्ताव किया और प्रौपचारिक स्वीकृति प्राप्त हो जाने के बाद सयुक्त राजस्थान का उद्घाटन 25 माच, 1948 को किया । महाराव कोटा को राजप्रमुख और प्रो गोकुललाल असावा को इस राज्य का प्रधानमनी मनोनीत किया गया। शुनगठित सयुक्त राजस्थान 37 मार्च 1948 मे महाराणा मेवाड और प्रजामण्डल मे मतभेद होने के वारण मेवाड मे राजनीतिक गतिरोध उत्पन हो गया। मेवाड प्रजामण्डल पत्रिका ने 8 और 15 मार्च को सम्पादकीय लेखो मे लिखा है कि मेवाड एक पृथक इकाई के रुप में विकास नहीं कर सकता। अत जन कल्याण को ध्यान में रखते हुए उमे सयुक्त राजस्थान में मिल जाना चाहिए। समय की माग और मेवाड मे उत्तरदायी शासन की स्थापना हेतु आदोलन के दबाव के कारण उदयपुर ने सयुक्त राजस्थान मे विलीन होने का निणय किया। फलस्वरुप 18 अप्रैल, 1948 को उदयपुर का मयुक्त राजस्थान मे विलय हो गया। पुनर्गठित सयुक्त राजस्थान को राजधानी उदयपुर थी और महाराणा उदयपुर को राजप्रमुख एव माणिक्यलाल वर्मा को प्रधानमत्री मनोनीत किया गया। वृहत् राजस्थान का इतिहास 38 14 जनवरी 1949 को सरदार पटेल ने उदयपुर में घोषणा की कि, जोधपुर जयपुर और बोकानेर ने सयुक्त गजस्थान मे शामिल होना स्वीकार कर लिया है। 30 माच को मरदार पटेल ने वृहत राजस्थान का उद्घाटन किया। जयपुर को बृहत राजस्थान की राजधानी बनाया गया तथा महाराणा उदयपुर को महाराज प्रमुख, जयपुर नरेश मानसिंह को राजप्रमुख एव हीरालाल शास्त्री का प्रधानमन्त्री मनानीत किया गया। - [ 147 ] 39 मत्स्य सघ का विलय 15 मई 1949 को बृहत राजस्थान मे हुआ। 40 जनवरी 1950 मे सरदार पटेल ने सिरोही राज्य का विभाजन करके माउट पाबू और आबू तहसील के दक्षिण भाग का बम्बई राज्य मे विलय कर दिया था और शेप सिरोही रियासत का राजस्थान मे विलय कर दिया। सिरोही की जनता ने इस निणय का विरोध करते हुए आन्दोलन प्रारम्भ किया। एक नवम्बर, 1956 को राज्य पुनगठन आयोग की सिफारिश पर भूतपूर्व सिरोही राज्य का माउन्ट पावू आदि इलाका एव अजमेर-मेरवाडा राजस्थान में शामिल कर दिए गए। इस प्रकार 6 चरणो मे आधुनिक राजस्थान का निर्माण हुआ। लोकतन्त्रीकरण 41 वी पी मेनन ने अपने राजनीतिक कौशल तथा राजनयिक चातुर्य से राजस्थान के द्वितीय सघ अर्थात पुननठित सयुक्त राजस्थान के सविधान (दि कोवे. नेन्ट) की धारा 8 मे यह प्रावधान कराया कि राजप्रमुख को एक नए अधिमिलन पन पर हस्ताक्षर करने थे जिसके अनुसार उसे यह स्वीकार करना होगा कि वह भारतीय सविधान सभा द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय को स्वीकार करने के लिए बाध्य होगा जो 'सयुक्त राज्य राजस्थान पर लागू किया जावे। इस प्रकार अगस्त 1947 तक तीन विषयो (वैदेशिक सम्बध, प्रतिरक्षा एव सचार) को भारतीय सध को सौपने को शत समाप्त हो गई । 42 वृहत्तर राजस्थान के सविधान में एक नया प्रावधान जोडा गया जिसके अनुसार राजप्रमुख को नए अधिमिलन पर हस्ताक्षर करने होगे जिसके अन्तर्गत भारत की मविधान सभा द्वारा सघीय और समवर्ती सूचियो को स्वीकार करना प्रावश्यक था। 43 उपयुक्त दो प्रावधानो के अनुसार राजस्थान का भारतीय संघ में न केवल पूण एकीकरण हो गया बल्कि राजस्थान को राजनीतिक व्यवस्था की प्रकृति का भी तोकतन्त्रीकरण हो गया । 44 26 जनवरी 1950 को गणत त्रात्मक भारत के संविधान के क्रियान्वयन के साथ भूतपूर्व देशी राज्यो की जनता को वयस्क मताधिकार पर आधारित उत्तर- दायी शासन की राजनीतिक व्यवस्था मे सहभागिता प्राप्त हो गई। सभी नागरिको को समान रूप से राजनीतिक, नागरिक एव मौलिक आधार प्राप्त हो गए तथा देशी राज्यो की वशगत सामन्तवादी निरकुश व्यवस्था का सदैव के लिए उन्मूलन हो गया। 45 इस प्रकार राजस्थान के प्रजामण्डल के नेतामो-विशेषकर जय- [ 148 ] नारायण व्यास माणिक्यलाल वर्मा, हीरालाल शास्त्री और इतिहासकार जादीश सिंह गहलोत के आधुनिक राजस्थान के निर्माण का राजनीतिक स्वप्न पूरा हुआ। देशी राज्यों के भारतीय संघ के अधिमिलन, एवीररण और लोक्त त्रीकरण के सन्दर्भ में भारत के प्रथम उप प्रवायमन्त्री एव गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटर का सशक्त राजनीतिक नेतृत्व और प्रवर राष्ट्रभक्ति तथा राज्य विभाग में उनक वीपी मेनन का राजनयिक कौशत मदव स्मरणीय रहेगा। निबीपर्स 46 भारत सरकार द्वारा राजस्थान को विभिन्न रियासतो को स्वीकृत किए गए प्रिवीपस की राशि का विवरण निम्नलिखित है 2 भरतपुर 1 अलवर 3 धौलपुर 5 बासवाडा 7 डूगरपुर 9 किशनगढ़ 11 मेवाड 13 शाहपुरा 15 जयपुर 17 बीकानेर 19 लावा 21 नीमराना 5,20,000 2,64000 4 परोली 1,26,000 6 वू दी 1,98,000 8 झालावाड 1,36,000 10 कोटा- 10,00,000 12 प्रतापगढ़ 90,000 14 टोक 18,00,000 16 जैसलमेर 17,00,000 18 जोधपुर 12,500 20 कुशलगढ़ 15,000 22 सिरोही कुल योग 101,42,875 5,02,000 1,05,000 2,81,000 },36,000 7,00,000 1,02,000 2,78,000 1,80,000 17,50,000 34,776 2,12,600
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