Adarsh Library, Jaipur

Martiyu Heen

Mitra Vimal · 2011/03

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मृत्युहीन शकुन्तला मित्र और पल्लव मिन्द्र को मृत्युहीन विमल मित्र

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अस्पताल के छोटा-सा केविन । केविन के दरवाजे के बाहर लकड़ी पर लिखा हुमा है केस नंबर ४६ । सवेरे दैनिक नियम के अनुसार बड़े डॉक्टर साहब आए, उनके साथ छोटे डॉक्टर साहब और मेट्रन । अस्पताल में हर बैड के सामने आकर मरीज की परीक्षा करते हैं, निकट टंगे चार्ट को पढ़ते हैं और जरूरत पड़ने पर हालचाल पूछते हैं । खास-खास मरीजों की नाही की परीक्षा करते हैं, कही- कही स्टेथिस्कोप से जांच करते हैं। जब दोनों तरफ के मरीजों को एक-एक कर देख लेते हैं, उसके बाद बगल के हॉल के अन्दर प्रवेश करते हैं । सवेरे की मीठी धूप आकर ठिठक गई है। चारों ओर से आती हुई समुद्र की हवा से दरवाजे के परदे हिल-डुल रहे हैं । फर्श पर रेंगती कच्ची धूप का सोना अलमला रहा है। जो मरीज़ उठकर खड़े हो सकते हैं, वे डॉक्टर के आने के पूर्व ही खिड़की से सटकर बाहर आंखें दौड़ाते हैं । नारियल के पेडों की पंक्तियां जहां समाप्त हुई हैं, वही से समुद्र की शुरुआत है । लहरे गारियल के पेड़ों के पांवों पर पछाड खाकर लोटती हैं । उन्ही नारियल के पेड़ो की पात से काले काले मछुआरे पंक्तिवद्ध होकर चले जा रहे हैं । उनके कंधों पर एक-एक बांस है जिनपर मछली पकड़ने के बडे-बड़े जाल झूल रहे हैं। बालू पर कई एक नौकाएं पड़ी हुई हैं। कई नौकाएं दूर सागर में निकल चुकी हैं। कई नौकाएं छोटे-छोटे धम्बे जैसी दिख रही हैं । वे लोग मछली पकड़ने की तलाश में निकले हैं। पकड़ने के बाद बालू के टीले पर सूखने देंगे। मछलिया बहुत दिनों तक सूखती रहेंगी और वे लोग आसपास खड़े होकर पहरा देते रहेंगे, वरना चील और बाजों के मारे एक भी मछली नहीं बचेगी। लडकी और औरतो का काम पहरा देना है । मदों का काम मछलियां पकड़ना । उसके बाद जहाज़-घाट में जिस दिन डाक-जहाज आकर रुकता है, बडे-बड़े रबर के पहियेदार ठेलागाड़िया मालियां लेने याती हैं। सबसे वाद में आता है चीनी सरदार। उसके हाथ में हिसाव का खाता "लु'लु'लु'लु'लु'लु'लु'लु..." दोनों हाथों की उंगलियों को मुंह के अन्दर डालकर वे एक अजीव किस्म को भयंकर आवाज मुंह से बाहर निकालते हैं। वह आवाज एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले में गौर वहां से फिर किसी एफ तीसरे मुहल्ले के मछुआरों के कानों में गंजने लगती है। हाथ के काम को ज्यों का त्यों छोड़वार सभी दौड़े- दौड़े आते हैं। "सरदार भाया है, सरदार..." एक पास किस्म का शोरगुल मच जाता है। आज इस हफ्ते का पावना मिलेगा। हप्ता मिलने पर ये चावल, गिट्टी का तेल और कपड़े खरीदने बाजार जायेंगे । औरतें गंधी और सुगंधित तेल खरीदने जायेंगी। उसके बाद शाम में नाग को मजलिस जमेगी। चीनी सरदार फाला पजामा पहने है । उसको मूछ लंबी बोर सुई की तरह नुकीली हैं । ल्यां तोयां भाग का आदमी नहीं है। तीस सालों से यह यही कारोबार करता भा रहा है और इस कारोबार पर उसका एकाधिकार है । दुख-गुसीबत भाने पर यह कर्ज देता है। फिर किसी दिन जब व्याज की राशि काफी बढ़ जाती है और जब लोग न तो व्याज ही तुका पाते हैं और न मूल ही, तब मछलियां दिया फारते हैं । ल्या तोयां बिलकुल सस्ती दर में मछलियां खरीद लेता है। मछली की कीमत में से कुछ पैसे ब्याज फी मद में काट लेता है और कुछ पैसे पेट-खर्च के लिए उन्हें दे दिया करता है। इतना कम देता है कि उन्हें और ज्यादा कर्ण लेना पड़ता है और लाचार होफर सस्ती कीमत में मछलियां धेचनी पड़ती हैं । जहाज से कपड़े, सिगरेट, तंबान के पत्ते, चीनी वगैरह बहुत-सी चीजें उतरती हैं । उसके साथ-साथ चिट्ठियों फी थैलियां "सफेद और काले चमड़े के लासो.. बिलौने, दया, चाय, साबुन, तमाम पुदरा माल । पोले का पोद, दालचीनी, इलायची, लौंग और सागूदाने की लदाई होती है । फिर सूखी मछलियां अलग-अलग माप की, अलग किस्म की मछलियां। * सप्ताह में एक दिन मछुआरे छुट्टी मनाते हैं । उस दिन मछली पकड़ने का झमेला नहीं रहता है । औरतें साफ-सुथरे कपड़े पहनती हैं। देह पर सीपी के - - ६ , गहने रहते हैं । वे एक मील दूर शहर की चहलकदमी करने जाते हैं। एक- दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर चलते हैं, जैसे लंबी-सी एक साकल हो । चीनी मुहल्ले में जुए का खेल चलता है । लोग नशा करते हैं, चाय पोते हैं । काफी रात ढल जाने पर भी कोई घर वापस आने का नाम नहीं लेता। त्यां तोयां चिल्ला पड़ता है : "मका पाच लुपिया." "विशुख, साढे तीन लुपिया. "भिरमी, दो लुपिया.." "बोधक. बोधक..." बोधक नहीं है। बीमारी के कारण आ नही सका है। उसकी बीवी मुगरी आगे बढ़ आई। मुंगरी घोंघे का हार पहने है, जिसके नीचे सोपी का लॉकेट झूल रहा है । होठों पर लिपस्टिक का रचाव है। चीनी सरदार मुंगरी को देखते ही चिल्ला उठा- "वोधक एक लुपिया..." "एक रुपये मे क्या होगा सरदार ?" मुगरी के स्वर मे प्रतिवाद की ध्वनि थो। चीनी सरदार विना ध्यान दिए चिल्ला उठा... उसके बाद हरेक को रुपमा देकर ल्यां तोया जिल्ददार मोटे खाते को निकालता है। एक-एक कर सभी बायें हाथ के अंगूठे का निशान लगाते हैं और दांया हाथ पैसे के लिए फैलाये रखते हैं। अस्पताल की पूरब की खिड़की से यह सब दृश्य दिख'पडता है। जब यह अस्पताल यहा बनकर तैयार नही हुआ तब इस ओर मछुआरों का इससे बड़ा मुहल्ला था। मुगरी का मायका इसी मुहल्ले में था। ताड के बड़े-बड़े पत्तों की छावनी थी। झुककर अन्दर जाना पड़ता था। यही भरमी के बाप की सर्पदंश से मृत्यु हुई थी। वह काफी बूढ़ा हो चुका था। यही एक बार चौदह साल पहले भूकंप के कारण पानी भर गया था और घर-बार ले गया था। उस वक्त वोधक के जाल में एक हंगर आकर फंस गया था। विशाल हंगर था वह । वैसा हंगर समुद्र के इस किनारे आमतौर से नजर नहीं आता है। इसके अतिरिक्त हंगर खास तौर से इतने किनारे आया भी नहीं करता है। पता नही कैसे तो भूकंप के समय उतना बड़ा हंगर ऊची भूमि में बोधक के . ७ . . जाल में फंस गया था। तमाम मछुआरे मुहल्ले के बूढ़े, बच्चे और औरतों को निमंत्रण मिला। सभी गोलाकार बैठकर गीत गाने लगे और घूम-घूम कर नाचना शुरू कर दिया। अस्पताल का निर्माण लड़ाई छिड़ने के वाद हुआ। साहवों ने शहर से दूर, नारियल और ताड़ के वृक्षों की सघन छाया की बोट में अस्पताल का निर्माण किया है । पर हवाई जहाज़ से यह दिखाई पड़ता है। किसी तरफ से इतने विशाल दोमंजिले भवन का कोई अता-पता नहीं चलता। सफेद “चमड़े के साहवों की अजीव ही बुद्धि हुआ करती है । इस चीनी सरदार ल्यां तोयां से भी वे लोग ज्यादा अक्लमन्द हैं। लड़ाई छिड़ते-न छिड़ते बड़े-बड़े जहाज़ आए। साहबों और मेमों की जमात भाई। सभी लाल-नीली पोशाक पहने थे। नागमणि के वनों में फूल खिलने पर जिस तरह की खूबसूरती छा जाती है, वैसी ही खूबसूरता फैल गई। उस बार चाय, साबुन और सिगरेट के साथ ढेरों माल उतरा । लोहा, इंट, लकड़ी, चूना, सुखी, गोला-बारूद, तोप-कमान और भी हजारों तरह के ऐसे माल जिनका नाम मालूम नहीं। भिरमी, मकफ और विशुख की जमात देखकर हैरान हो गई... एक दिन बिना किसी पूर्व सूचना के उन लोगों के मकानों को मलवे में बदल दिया गया। कितने ही पुरखों की वह खानदानी जमीन थी। थाली-वर्तन तक हटाया नहीं गया। वक्त पर नोटिस तक न दी। इस तरह मलवे में बदल देगा? इस मकान के अन्दर पकाया हुआ, चावल, कपड़े-लत्ते, चीनी मिट्टी की थाली, लोटा सब कुछ था । औरतों की इज्जत, बाल-बच्चों का सम्मान- पुछ भी मानी नहीं रखता? इस तरह ढाह देगा? विशुख क्रोध से पागल हो गया था, क्योंकि उसे क्रोध बहुत जल्दी आ जाया करता था। "हरामजादों को मार डालूंगा ! क्या सोचा है उन लोगों ने ? हम लोग पया आदमी नहीं हैं ?" बोधक ने उसे पकड़ रखा । वह धैर्यवान और शांतिप्रिय व्यक्ति है। उन. लोगों के हाथों में लंबी-लंबी बंदूकें हैं। उनके जूते वजनदार हैं। उनकी पोशाक हरे रंग की है। सभी के चेहरे-मोहरे सेनापति जैसे हैं ! दिमाग बिगड़ गया है, जो उन लोगों से झगड़ा मोल लेने चला है ! एक बार भूकंप में जैसा हुआ था, इस बार भी तमाम घर-दरवाजों को एक घंटे के दरमियान ढाह दिया गया। इन दोनों ने वहां फिर नये सिरे से मकान बनाए । ल्यां तोयां से पयादा ब्याज पर फिर से कर्ज लिया। सफेद चमड़े के साहबों के प्रताप से मुहल्ला खाली हो गया। उसके बाद इस अस्पताल का निर्माण हुआ। निकट से गुजरने पर दवा को कैसी-कैसी तो सोंधी गन्ध आती है ! रात के वक्त जब ये लोग ठर्रा पीने के बाद गोलाकार होकर धूम-घूम कर नाचते हैं, खिड़की के सूराखो से रोशनी बाहर दिखती रहती है। बिजली की रोशनी रहती है । बिलकुल दिन जैसा हो जाता है । ये सफेद चमड़े के साहव रात को एकबारगी दिन बनाकर छोड़ते हैं ! एक विशाल अस्पताल का निर्माण हुआ । कुली जहाज पर चढकर आए। छ: महीने तक लगातार काम चलता रहा। जरूरी काम है, जल्दी-से-जल्दी खत्म करना है। इंटो पर ईंटें गुंथती गई। शहर के पच्छिम चीनी बाजार में कुली जुमा खेलने जाते थे। उस चीनी मुहल्ले में मछुआरो के मुहल्ले के लोगों को बाजार करने के लिए जाना पड़ता था। लेकिन समय का वह अन्तराल बहुत कम रहता था, फिर भी इसी के दरमियान चंडूखाने के अड्डे, चाय के अड्डे और जुए के अड्डे से हो लेते हैं और रेडियो का गीत भी सुन आते है। पहले वहा इस तरह की बात न थी, लेकिन लड़ाई के पहले ही से भीड़ वहने लगी। उस तरफ की सड़क पर वेहद भीड़ लगी रहती है। उत्तर की ओर के बड़े-बड़े खाली मकानो के मालिको के पास मोटर गाडियां हैं। उन मोटरों को वे लोग अक्सर वेपरवाह चला देते हैं । एक वार पहिये के नोचे भा जाए तो वस हुआ। फिर देखने की कोई जरूरत नहीं । हानं बजाते-बजाते हाथी जैसी विशाल गाड़ियां आदमी की देह पर चला देते हैं । उनमें दया-माया नाम की चीज नही है। चीनी बाजार समाप्त कर दक्खिन की ओर चलो। दक्खिन में समुद्र के किनारे से सटे हुए तमाम बाग-बगीचे हैं । घिरे हुए लम्बे-लम्बे बगीचों में सिर्फ केले के दरख्त हैं-एक-दो नही, बल्कि हजारो। लेकिन केले के वगीचो के मालिक वहा नहीं रहते। वे लोग उत्त । "रफके - गया था। ग. हल्ले के बूढ़े, बच्चे और औरतों ग मिला। सभी गोलाकार बैठकर गीत गाने लगे और घूम-घूम ना शुरू कर दिया। पताल का निर्माण लड़ाई:छिड़ने के बाद हुआ। हवों ने शहर से दूर, नारियल और ताड़ के वृक्षों की सघन छाया की में अस्पताल का निर्माण किया है । ऊपर हवाई जहाज़ से यह ई पड़ता है । किसी तरफ से इतने विशाल दोमंजिले भवन का कोई -पता नहीं चलता। सफेद "चमड़े के साहबों की अजीब ही बुद्धि हुआ ती है । इस चीनी सरदार ल्यां तोयां से भी वे लोग ज्यादा अक्लमन्द हैं । हाई छिड़ते-न छिड़ते बड़े-बड़े जहाज़ आए। साहबों और मेमों की जमात ई। सभी लाल-नोली पोशाक पहने थे। नागफणि के वनों में फूल खिलने र जिस तरह की खूबसूरती छा जाती है, वैसी ही खूबसूरती फैल गई। उस वार चाय, सावुन और सिगरेट के साथ ढेरों माल उतरा । लोहा, इंट, लकड़ी, चूना, सुर्सी, गोला-बारूद, तोप-कमान""और भी हजारों तरह के ऐसे माल जिनका नाम मालूम नहीं। भिरमी, मकफ और विशुख की जमात देखकर हैरान हो गई... एक दिन बिना किसी पूर्व सूचना के उन लोगों के मकानों को मलबे में बदल दिया गया। कितने ही पुरखों की वह खानदानी ज़मीन थी। थाली-बर्तन तक हटाया नहीं गया । वक्त पर नोटिस तक न दी। इस तरह मलबे में बदल देगा? इस मकान के अन्दर पकाया हुआ, चावल, कपड़े-लत्ते, चीनी मिट्टी की थाली, लोटा सव कुछ था। औरतों की इज्जत, बाल-बच्चों का. सम्मान- कुछ भी मानी नहीं रखता? इस तरह ढाह देगा? विशुख क्रोध से पागल हो गया था, क्योंकि उसे क्रोध बहुत जल्दी अ जाया करता था। "हरामजादों को मार डालूंगा ! क्या सोचा है उन लोगों ने ? हम ले क्या आदमी नहीं हैं ?" वोधक ने उसे पकड़ रखा। वह धैर्यवान और शांतिप्रिय व्यक्ति है। लोगों के हाथों में लंबी-लंबी बंदूकें हैं। उनके जूते वजनदार हैं। 3 " पोशाक हरे रंग की है। सभी के चेहरे-मोहरे सेनापति जैसे हैं ! दिमाग बिगड़ गया है, जो उन लोगों से झगड़ा मोल लेने चला है ! एक बार भूकंप में जैसा हुआ था, इस बार भी तमाम घर-दरवाजों को एक घंटे के दरमियान ढाह दिया गया। इन दोनो ने वहां फिर नये सिरे से मकान बनाए । ल्यां तोया से ज्यादा व्याज पर फिर से कर्ज लिया। सफेद चमड़े के साहबो के प्रताप से मुहल्ला खाली हो गया। उसके बाद इस अस्पताल का निर्माण हुआ। निकट से गुजरने पर दवा की कैसी-कैसी तो सोंधी गन्ध माती है ! रात के वक्त जब ये लोग ठर्रा पीने के बाद गोलाकार होकर घूम-घूम कर नाचते हैं, खिड़की के सूराखो से रोशनी बाहर दिखती रहती है। बिजली को रोशनी रहती है। बिलकुल दिन जैसा हो जाता है । ये सफेद चमड़े के साहब रात को एकबारगी दिन बनाकर छोड़ते हैं ! एक विशाल अस्पताल का निर्माण हुआ। कुली जहाज़ पर चढ़कर पाए। छ: महीने तक लगातार काम चलता रहा। जरूरी काम है, जल्दी-से-जल्दी खत्म करना है। इंटों पर इंटें गुंयती गई। शहर के पच्छिम चीनी बाजार में कुली जुआ खेलने जाते थे। उस चीनी मुहल्ले मे मछुआरों के मुहल्ले के लोगो को बाजार करने के लिए जाना पड़ता था। लेकिन समय का वह अन्तराल बहुत कम रहता था, फिर भी इसी के दरमियान चंडूखाने के अड्डे, धाय के अड्डे और जुए के अड्डे से हो लेते हैं और रेडियो का गीत भी सुन आते है। पहले वहां इस तरह की बात न थी, लेकिन लड़ाई के पहले ही से भीड़ बढने लगी। उस तरफ की सड़क पर बेहद भीड़ लगी रहती है। उत्तर की ओर के बड़े-बड़े खाली मकानो के मालिकों के पास मोटर गाड़ियां हैं। उन मोटरों को वे लोग अक्सर वेपरवाह चला देते हैं। एक बार पहिये के नीचे आ जाए तो वस हुआ। फिर देखने की कोई जरूरत नहीं । हार्न बजाते-बजाते हाथी जैसी विशाल गाड़ियां आदमी की देह पर चला देते हैं । उनमे दया-माया नाम की चीज नहीं है। चीनी बाजार समाप्त कर दक्खिन की ओर चलो। दक्खिन मे समुद्र के किनारे से सटे हुए तमाम बाग-बगीचे हैं । घिरे हुए लम्बे-लम्बे बगीचों में सिर्फ केले के दरख्त हैं-एक-दो नहीं, बल्कि हजारो। लेकिन केले के बगीचों के मालिक वहां नहीं रहते। वे लोग उत्तर की तरफ के । हल्ले में रहते हैं और उन लोगों का कारोबार दक्षिण में है । दक्षिण की हवा से केले के पत्ते फर-फर उड़ते रहते हैं। सप्ताह में एक बार जहाज़ जेटी से लगता है। रबर की पहियेदार ठेलागाड़ियों से, जिस बी मछलियां लादी जाती हैं, कुली उसी तरह अपने-अपने सिर पर केले द ढोकर चढ़ाते हैं। मछलियां और केले के घौद कहां जाते हैं, कौन खाता ता नहीं। अस्पताल की छत पर चढ़ने से हो सकता है कि यह देखने में कि जहाज़ किस ओर जा रहा है। लेकिन इन नारियल के दरख्तों के वे बालू के ढूह पर खड़े होकर देखने से दूर की चीजें दृष्टिगोचर नहीं होती । अन्त में जहाज़ की चिमनी से धुआं ऊपर की ओर उठता है और के समान में यत्र-तत्र उसका हल्का आभास प्रतीत होता है। शहर के बीच-ठीक बीचोबीच-गिरजाघर है। चौराहे की मोड़ पर टावर । चारों तरफ चहारदीवारी से घिरे बगीचे। छोटा-सा एक फन्वारा। उत्तर दिशा के मुहल्ले के साहबों के बाल-बच्चे दाई-नौकरों के साथ यहां चहलकदमी करने आते हैं। अस्पताल के चारों तरफ परती जमीन है । साहबों ने किसी उद्देश्य से ही प्रेरित होकर खुली ज़मीन में अस्पताल का निर्माण कराया था । व्यापार और जमींदारी करने के लिए जो साहव आते थे, बीमारी की हालत में उनकी सेवा-चिकित्सा हो सके-अस्पताल बनवाने के पीछे उनका यही उद्देश्य था। पोलो खेलने के लिए मैदान, घुड़दौड़ के लिए मैदान-इन सवों का भी होना . जरूरी था। लेकिन लड़ाई के दौरान सब कुछ उनके हाथ से निकल गया। चालानी जहाज़ पर लदकर एक दिन हड़बड़ाते हुए लाल मुंह वाले सभी साहब चले गए। कहां गए, ईश्वर जाने। एक दिन जापानी आए। चीन बाज़ार से तमाम चीनियों को मार-मारकर भगा दिया। कुछेक को पकड़क ले गए। साहवों पर निगाह पड़ते ही तत्काल उनकी हत्या कर डाली। वह कांड ही था। शोरगुल के मारे रात में नींद नहीं आती थी। कितनी भी आवाज़ थी! जापानियों और साहवों में लड़ाई छिड़ी थी। चीनी सरदार तोयां मा नहीं पाता था। यह सब आज से बहुत पहले की बातें हैं। १० इस दरमियान फितने ही कांड हो चुके हैं । वोधक का बड़ा लड़का बम के टुकड़े की चोट से मारा गया। समुद्र में मछली पकड़ने गया था, तभी जापानियों के बम की चोट से कंपनी का चालानी जहाज़ टुकड़ा-टुकड़ा हो गया। दूसरे दिन सुबह ज्वार के साथ सफेद चमड़े की लाशें दूहों पर तैरकर आने लगीं। वोधक के लड़के की लाश भी अस्पताल के सामने आकर लगी। लड़ाई छिड़ने के एक दिन पहले सभी साहब भाग खड़े हुए। जो-जो भागकर चले गए उनमें से सभी क्या जिन्दा बच गए ! अनेकों बम की चोट से मौत के मुंह में समा गए और अनेको अर्द्ध मृत अवस्था में पानी के अन्दर हूयकर खत्म हो गए। अस्पताल से डॉक्टर और नर्स देख रहे थे। तम वहां के डॉक्टर थे बूढ़े जानसन साहब । उसकी शादी लंबी थी । मुह में हमेशा पाइप लगा रहता था । जब चालानी जहाज जेटी मे आकर लगता, जानसन साहब अस्पताल से स्वयं आकर पार्सल और चिट्ठी वगैरह ले जाते ये । वृद्ध जानसन साहब जेटी के रास्ते में मछुआरों के बाल-बच्चों के हाथ में पैसा यमाते हुए चलते थे उसके बाद ओकिकुरा साहब आया। ठिंगने कद का, चिपटी नाक वाला जापानी डॉक्टर । रातो रात नों की जमात मैं रद्दोबदल हो गई। हवाई जहाज से जापानी लड़कियां आई। वे रात-दिन काम में तल्लीन रहती थी, न कही घूमती-फिरती थी और न किसी की ओर आंख उठाकर ताकती थी। वस काम और काम । कहीं से जहाज़ में भरकर मरीज लाए जाते थे, जिनके हाथ-पांव, चेहरे पर बैंडेज बंधे रहते थे। रुलाई से जेटी-घाट थरथराने लगता था । किसी का धड़ गायब है, किसी की आंखें उलट गई है, गले से चीची आवाज निकलती है। सभी को अस्पताल लाया जाता है। कोई रास्ते में ही मर जाता है, कोई दो दिन जिन्दा रहता है और कोई दो घण्टे । विशुख और भिरमी की जमात गरमी के मौसम में बाहर सोई थी। उन्होंने देखा, रात के अंधेरे में ठेलागाडियो से मरे आदमियों को नावो पर लादकर किसी दूर द्वीप की ओर चले गए। हो सकता है कि दूर ले जाकर देंगे। . ड़ देंगे या जलाकर राख बना ह सब लड़ाई के वक्त की बातें हैं। तब ऐसी हालत थी कि कौन बचेगा और कौन मारा जाएगा, कहना मुश्किल था। दिन-रात साइरन T रहता था। गिरजाघर के इर्द-गिर्द ट्रेंच खोदे गए थे। धायं-धायं राज़ होती रहती थी। मछली पकड़ने में भय का अहसास होता था, क्योंकि पनडुब्बियां आकर तोपों का निशाना बना दें, कहना मुश्किल है। कभी- भी हवाई जहाज़ से पनडुब्बियों पर वम गिराया जाता था और देखते न खते नीला पानी बैंगनी रंग में बदल जाता था। वे कितने डरावने दिन थे! कितनी डरावनी रातें! अव सब कुछ बदल गया है । ल्यां तोयां पहले की तरह ही चीनी बाजार के नुक्कड़ पर स्थित चंडूखाने के अड्डे पर आकर बैठता है। मछुआ टोली के वाशिन्दे दुवारा उसी तरफ से होते हुए लिंफू की दुकान में पहुंचते हैं और सौदे खरीदते हैं । केले के बगीचे के मालिक विलसन साहब की गाड़ी कीचड़ उछालती हुई निकल जाती है। चूंकि वह विलसन साहब का ड्राइवर है, इस- लिए घमण्ड से चूर रहता है। होटल के सामने तख्त पर बैठी बूढ़ी विधवा मातुझौटा लपटे पैरों को हिलाती हुई सड़क की ओर ताकती रहती है। सामने के होटल में रेडियो और जगमगाती बत्तियां लगाए गए हैं। तमाम गाहक वहीं इकट्ठे होकर भीड़ लगाया करते हैं। ईर्ष्या से विधवा बूढ़ी मातु का लटका हुआ चेहरा और भी लटक जाता है । दांतों का डॉक्टर लड़ाई के दिनों में कहीं भागकर चला गया था । वह फिर से लौट आया है। उसने दुवारा दुकान के सामने शीशे की आलमारी लगवाई है। आलमारी के बीच वत्तीस दांत बाहर निकाले हुए एक नर-मुंड सजा रहता है। चीनी बाज़ार चीनियों ने दुवारा यहां आकर बाजार को गुलज़ार कर दिया है। जापानि के समय एक भी चीनी यहां नहीं था। डॉक्टर ओकिकुरा के बाद युवा सा कर्नल वाटसन आए हैं। लम्बी आकृति, लम्बोतरा खूबसूरत चेहरा। दिन किताबों में ही डूवे रहते हैं। किताव पढ़ते-पढ़ते संभवतः उनकी खराव हो गई हैं। मोटे कांच का चश्मा लगाते हैं । बूढ़ी मेट्रन सिर रूमाल बांधे उजले-धुले गाउन में कर्नल वाटसन के पीछे-पीछे चक्कर करती है। रूमाल की वजह से उसके पके बाल ढंके रहते हैं । १२ आज संभवत: चालानी जहाज आने का दिन है। त्यां तोयां को आवाज यहां साफ-साफ पहुंच रही है : "भेरमी छह लुपिया... "वोधक एक लुपिया.. "विश्ख तीन..." बरामदे को पारकर डॉक्टर मेट्रन के साथ उत्तर के हॉल में पहुंचे। कहीं कोई गंदगी या मेल नहीं है, फर्श झिमिक चमक रहा है। धूप आकर फर्श पर चिपक गई है। आज सुबह मे ही सफाई चल रही है। हैड ऑफिन से मेक्रेटरी आया है। आज सभी चीजों की जांच-पड़ताल होगी। सात में एक बार उमका आना होता है। आज की जांच पड़ताल पर बहुतों का भविष्य निर्भर करता है। कर्नल वाटसन जीने के पास आकर टिठक गए। मैट्रन संत्रस्त होकर सामने बढ आई। "वह सब क्या है -कपड़ो के फटे टुकड़े ! उन सबो को क्यों नहीं फेंका गया? सारा कूड़ा-कचरा" जीने से उतरने के बजाय कर्नल वायी ओर से चक्कर लगाकर आया। चायों ओर पहले एक केबिन है। केबिन के सामने लाल स्याही में लिखा है: 'साइलेन्स' यानी चुप । और उसके नीचे मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा है : 'केस नम्बर ४६।' मेट्रन अपने आप वोल उठी, "सबेरे देख गई थी, सो रहा था, सर..." कर्नल वाटसन ने जैव से नोटबुक निकाली। बहुत सारे पन्नों को पलटने के बाद एक पन्ने पर उनकी आखें ठिठक गई। पूछा, "यह यहां कितने वरसो मेट्रन ने आगे बढकर कहा, "जापानियों के समय से ही है, सर! अब तक कोई सुधार नही हुआ।" कर्नल से दुबारा सवाल किया, "मेडिकल जरनल में इसी के बारे में छपा पान? तसवीर के साथ पूरा इतिहास इसी का था न?" मैट्रेन बोली, "हां सर, यह वही केस नम्बर ४६ है, जिसके बारे में अमरीका के मेडिकल जरनल में लेख छपा करते हैं..." १३ - ने नोटबुक के पन्नों को फिर से एक बार देखा और कहा, "इसी के लिए बलिन से डॉक्टर सुल्जवर्जर आए थे?" "हां," मेट्रेन ने कहा, रीका से आए थे मेडिकल बोर्ड के प्रेसिडेण्ट डॉ०थियोडोर क्लेयर।" नानक मेट्रन के चेहरे पर डॉक्टर की आंखें ठिठक गई। उन्होंने पूछा, कतने दिनों तक इसे यहां रखा जाए ?" दिन के उत्तर पर भरोसा न करके कर्नल ने आहिस्ता-से केबिन के दरवाजे को ठेला। बाहर रोशनी थी, अन्दर अन्धेरा। शुरू में बहुत-कुछ ता-धुंधला जैसा महसूस हुआ। लेकिन ज्योंही गौर से ताका, कर्नल सन चौंक उठे। कमरे के अन्दर कोई नहीं था। २ यह कहानी कहने के लिए कुछ दिन पीछे की ओर लौटना पड़ेगा, कुछ वर्ष पीछे की ओर। पोस नम्बर ४६ का तब कोई नाम था। यह बहुत दिन पहले की बात है। तब कुल मिलाकर युद्ध की शुरुआत हुई थी। एक दिन सैनिकों के दल में नाम लिखाफर वह यहां इस लड़ाई के मैदान में आया था। उसके बाद कितना कुछ घटित हो चुका है, कुछ भी याद नहीं । डॉक्टर आता है और उसकी परीक्षा करके चला जाता है। पूरे जिस्म की जांच करता है और अजीब-अजीब तरह के सवाल पूछता रहता है। मरीजनुमा लम्बा डॉक्टर पूछता है, "तुम्हारा नाम क्या है ?" वह अवाक्-सा ताकता है। वह अपना नाम याद नहीं कर पाता है। "तुम्हारा मकान कहां है ?" "मालूम नहीं।" "यहां कब आए हो?" "मालूम नहीं।" "तुम्हारे रेजिमेण्ट का क्या नम्बर है ?" "मुझे यह मालूम नहीं। यहां सभी मुझे केस नम्बर ४६ कहकर पू १४ हैं।" वह उत्तर देता है। हजारों प्रश्न पूछे जाते हैं । प्रश्नों का कोई अन्त नही । वह भी क्या सिर्फ एक ही आदमी ? कहा-कहा से नये-नये डॉक्टर आते हैं । मेट्रन उनके साथ रहती है । और उसको केन्द्र मानकर अनुसंधान का सिलसिला चलता है- उसके नाम मोर धाम के संदर्भ में गवेषणा होती है । उसकी कितनी ही तस्वीरें लेता है । वे तस्वीरें विलायत और जर्मनी की तमाम डॉक्टरी की पत्रिकाओं में छपती है । जब जापानी डॉक्टर था, उस वक्त भी यही सिलसिला चलता रहा। जैसे वह सभी के लिए कौतूहल की सामग्री हो । जैसे उसमें जीवन न हो। जैसे हर कोई उसे चूहा या गिनपिग के रूप में ले रहा हो। जो भी मरज़ी होती है, उससे बातें कर जाता है। कभी-कभी दोनो पैरों को ऊपर की ओर' उठाकर और सिर को नीचे की ओर रखकर उसे सुलाया जाता है । फिर दिन में आकर विभिन्न प्रकार की चिकित्सा की जाती है। नतीजा कुछ हुआ या नहीं, देखना चाहिए । हो सकता है कि दो दिनो तक उसे निराहार रखा जाए, फिर अलग-अलग रंगो और जायके की दवाए दी जाएं । मुह तोता हो जाता है, के करने का मन होता है। कभी-कभी कच्चा केला उबालकर खाने के लिए दिया जाता है । न नमक, न तेल-कुछ भी नहीं ! हो सकता है, कोई नतीजा निकले। वह अगर स्वस्थ हो जाए या उसकी स्मरण शक्ति लौट आए तो डॉक्टरो का बड़ा ही नाम फैलेगा, पैसे मिलेंगे, ख्याति प्राप्त होगी। डॉक्टरी की जमात नाम कमाने के उद्देश्य से उसको लेकर खीचतान कर रही है। उसका जिन्दा रहना या मरना एक जैसा है । इससे किसी का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। "मेट्रेन, कल से इसे सिर्फ नीम के पत्ते खिलाकर रखना।' डॉक्टर परामर्श देकर चले गए । भय से उमकी संपूर्ण देह सिहर उठी। दिन पर दिन, साल पर साल उसको लक्ष्य बनाकर यही सिलसिला चलता रहेगा। इसका कोई अन्त नही । कितने सालो से यह सिलसिला चल रहा है, वह इसे याद नहीं कर पा रहा है । फिर भी उसे बडा कप्ट होता है । शारीरिक कष्ट। जब कमरे के अन्दर कोई नही रहता है, वह विस्तर से उठकर खिड़की के पास सडा होता है। वहां कितनी विशाल धरती है ! कितने ही आदमी !

। गिराना मानन्द, गितनी हसी-युशी ! यहाँ जाने गा उसे कोई अधिकार नहीं। उसे पायल गीधी घनफर रहना होगा। पटरों गी गरजी पर निर्गर रहगार उसे जीवन जीना होगटरों गी अभिपि पर उसका जीना या गरजा निर्भर भारता। शारीर मे पाय पर गई । अब गिसी गिरणगी याराना गा अहसारा नहीं होगा। यह गाणी स्मरण हो गया है। अनुगति मिले तो वह बाहर निकाल जाए। रागुन मे गिनारे रेत पर जाकर गालियों मा पपादना देण रामता है। गुरछ कि पहले उसमे सिर में बंधेज बंधी थी। सिरबाही गारी-मारी गालगता था। उसने बाद एक दिन डॉटर गाया और बडेज खोल दी। जय शिपा इस गली गे उसे और कोई दुरारी तगारलीफा नहीं है । ये लोग ऐसी-ऐसी पीनों उरी गाने पे लिए देते हैं जो उसे गचती ही नहीं। पूरा मुंह, पूरी पारगा गारीलेपन से पूर्ण हो जाते हैं । गाण यह भारागान यो गिर गी तरह उद पाता ! गाण गाग रोगग गारों को साथ नाय में बंटगार रामुद्र में गरनिगा पगार पाता ! यह जो जहावा माया हुआ है उसमें भाग गितनी गीय बाजोगटर पैदल जा रहा है। जितनाही गाल-अरावाच उतर रहा ! लोग स्परांधा है। गोई उन्हें रोकगार नहीं रग्रता । एमागान वही बंदी है। गाणी-पानी रात में, गहरी रात में, जब नींद उरागी आंखों में नहीं उतरती, गा, गागरे अन्दर पहलगायगी गारने लगता है। पहलगादगी पारता है और सोपता रहता है । असंलग्न गिताएं--जिनगा न मोई आदि है और न कोई अंरा । उसे गाद भाता, शिवह यहाँ गाहा से आया है ? यह जाए तो मह जाए? यह गहा गयों रह रहा है ? उसे गौन यहां ले आया है ? डॉक्टर , आगर अजीब-अजीव गिरम मे सवाल पररी है, वह गरी सारी बातों का उत्तर ! भौर गय रामा उतारनदेगा, ये छोड़ेंगे नहीं । ये लोग उसे पाय रो गाट काट कर पीर-फामगार ऐनना चाहते हैं। सवाल यह बड़ा नहीं है कि गह जिन्दा रहे। डॉगटर आगार पूछो , "तुम्हें गौन-सी पीपा पाने की इच्छा होती है ?" गह गाफी देर रामः सोगता है। रामगुप उसे पगा पाने की इच्छा होती घारा पेर हागा सोगने-पिचारने के बाद भी उसे गोई पूल-गिनारा नहीं ?

मिलता । अंत में वह कहता है, "मुझे छोड़ दें, डॉक्टर साहब "छोड़ दूं तो तुम कहां जाओगे?" डॉक्टर पूछता। "समुद्र के किनारे जाऊंगा-जहां मछुआरे मछली पकड़ रहे हैं। उसके वाद नाव पर चढकर समुद्र के बीच जाऊंगा।" वह कहता। "अगर तुम डूब जाओ?" हां, बात तो सही है । डूब जाने का मानी है सांस का बंद होना और मौत के मुंह में समा जाना। यानी फिर वह जिन्दा न रह पाएगा। धरती, प्रकाश, वायु, परिन्दे, समुद्र-किसी को वह देख नहीं पाएगा। डॉक्टर फिर से पूछता, "क्या खाओगे? क्या खाकर जिन्दा रहोगे? तुम्हें खाने को कौन देगा?" उन बातों का वह कोई उत्तर नहीं दे पाता है। कोई खाना देता है तभी न भादमी खा पाता है ! सचमुव वह क्या खाएगा? कौन उसे खाना देगा? यहां उसे अवश्य ही तकलीफ होती है, मगर रात में नसं आकर विस्तर बिछा जाती है, मच्छरदानी लगा जाती है । नहाने के लिए तेल दे जाती है। डॉक्टर सोचते हैं कि मरीज़ अब तक स्वस्य नहीं हो पाया है। धीमी आवाज में वे मेट्रन से क्या कहते हैं, वह सुन नही पाता । कठोर दृष्टि से वह डॉक्टर का पीछा करता है। कितने निष्ठुर हैं ये लोग! फिर किसी दिन हाथ में नोटबुक यामे डॉक्टर आता है। वही एक ही प्रश्न की पुनरावृत्ति : "तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हार देस कहां है ? तुम्हारे पिताजी का नाम क्या है ? तुम्हारे रेजिमेण्ट का नम्बर क्या है ?" संख्यातीत प्रश्न । इयत्ताहीन कौतूहल । वह एक बात का भी उत्तर नहीं दे पाता है। समग्र पृथ्वी को टटोले चलता है। कही किसी आशा का इंगित नहीं । इन तमाम प्रश्नों का जब तक वह उत्तर नहीं देगा तब तक उसे छुटकारा नहीं मिलेगा । उत्तर न दे पाएगा तो दिन के बाद दिन, साल के बाद साल इसी तरह का अत्याचार चलता रहेगा। कितनी तरह की दवाएं, कितने तरह के इलाज चलते रहते हैं। कुछ भी कारगर साबित नहीं होता, और इसीलिए उनकी जांचो का क्रम अनवरत चलता रहता है। एक दिन मेट्रन आई और बहुत-सी किताबें दे गई। तमाम किताबें । . - अलग-अलग रंगों की । पहले पहल पढ़ने में थोड़ी ऊब महसूस हुई। कितने दिनों से, कितने बरसों से उसने पुस्तकें नहीं पढ़ी हैं। किताब पढ़ते- पढ़ते वह तल्लीनता में डूब गया है। दुनिया में कितने देश, कितने आदमी, कितना आकाश, कितनी बातें हैं ! कितने समुद्र, कितना नीलापन लिए हैं; कितना सुख है, कितना मधुर और गंभीर ! इस छोटे अस्पताल के बाहर बहुत बड़ी दुनिया फैली है ! इस समुद्र के उस पार कितने जनपद, कितने मनुष्य हैं ! वहां आदमी आदमी को प्यार करता है, आदमी-आदमी को रुलाता है.-हास-रोदन से परिपूर्ण है हमारी यह पृथ्वी ! आकाश के जो तारे टिमटिमाते रहते हैं, वे कितने बड़े-बड़े ग्रह हैं ! आकाश की जैसे कोई सीमा नहीं, लगता है, इस पृथ्वी की भी कोई सीमा नहीं है। इस सीमाहीन पृथवी का वह खुद भी एक व्यक्ति है, उसे भी यहां जीवन जीने का अधिकार है, जीवन भोगने का अधिकार है। आकाश की नीलिमा और धरती की हरीतिमा से उसका भी तो मन थिरकने लगता है। वह यहां क्यों बंदी है ? इस तरह की असंगत चिन्ताएं उसे रात-दिन जकड़े रहती हैं । मेट्रन उसे विभिन्न देशों के समाचार पत्र लाकर देती है। कितनी ही खबरें रहती हैं। कव तो विश्वव्यापी युद्ध हुआ था। चारों तरफ उसी की अनुवृत्ति चल रही है । एटमवम किसे कहते हैं ? लगता है, एक के ही विस्फोट से सव कुछ ध्वस्त हो जाता है। अमरीका और इंगलैंड, अफ्रीका और रूस, चीन और हिन्दुस्तान-यह सब देशों के नाम हैं । एक दिन पुस्तक पढ़ते-पढ़ते सहसा उसे एक प्रकार की अद्भुत अनुभूति हुई-बड़ी ही अद्भुत अनुभूति । तमाम शिराओं में रक्त का संचालन होने लगा, जैसे उसने नये सिरे से जन्म लिया हो, नये सिरे से इष्टि-शक्ति उपलब्ध की हो, नये सिरे से सांसें ली हों। समग्न अनदेखी पृथ्वी का परिदर्शन जैसे नये सिरे से हुआ हो । संपूर्ण शरीर रोमांचित हो उठा। एकाएक उसे अहसास हुआ कि वह अकेला नहीं है। उसके भी आत्मीय हैं, स्वजन हैं । लगा, वह बेवजह यहां कैदी बनकर है । अगर वह शक्ति का उपयोग करे तो मुक्त हो सकता है। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते उसकी आंखें लाल हो गई। दोनों हाथ अवश हो गए। तीक्ष्ण दृष्टि से पांच सौ पन्नों की उस पुस्तक के पन्नों को पढ़ने लगा । वह जिस पुस्तक को पढ़ रहा है उसमें उसी की बातें - हैं। हूबहू जैसे उसका ही जीवन है । कलकत्ते में शंभुनाथ लेन का वह मकान उसी का है । वह उसी का नौकर गोविन्द है । गली है, मगर है मकान विशाल । उतने विशाल मकान में वह और उसके पिता रहते थे। जिस दिन दोपहर के वक्त स्कूल में छुट्टी रहती थी और उसके पिताजी कालेज में पढ़ाने गए हुए होते थे, उसका एकाकीपन । गरमी के दिनों में आइसक्रीम बेचनेवाले की चिल्लाहट : वरफ चाहिए"याइसक्रीम... फिर टनटन आवाज करते हुए वर्तनवाले का जाना। हूबहू ठीक उसी की तरह उसकी बातें इस तरह किसने लिखी? वह एक दिन किसी को विना कहे-सुने लाम पर चला गया था। बाप का एकलौता लड़का था-प्रचुर धन और वैभव का अधिपति । सब कुछ त्यागकर वह लड़ाई मे शामिल हुआ। लेकिन क्यों ?-केवल एकाकीपन को दूर करने के लिए । दुनिया को जानने का उसमे भाग्रह नही था ? या छुटपन में उसने अपनी जिस मां को खो दिया था, हो सकता है कि उसी मा ने बाकाश के हर तारे से इंगित करके 'घर की मोह-ममता से उसे दूर कर दिया हो । कौन कह सकता है ! पाच सौ पन्नों की पुस्तक यो । उस पुस्तक ने उसकी आखो की निद्रा और शरीर का विश्राम हर लिया। एक-एक कर सब कुछ याद आने लगा। .."उसके बाद वह युद्ध-प्रलयंकर युद्ध । वह बेहोश होकर गिर पड़ा। कितनी भयंकर आवाज थी! कितना कठोर आघात ! सिर पर तोप के गोले का टुकड़ा आकर लगा और वह छिटककर जमीन पर गिर पड़ा । उसके बाद होश मे आते-न माते तोप से एक गोला सामने आकर गिरा। मुरभुरी मिट्टी और पास की थिगलियों से वह ढक गया । सभी को पता चला कि वह मारा गया। उसके बाप के पास तार आया : उसके पुत्र ने ससम्मान लड़ाई के मैदान में वीर की तरह प्राणों का त्याग किया... पिता ने पांच सौ पन्नो की पुस्तक उसको ही केन्द्र मानकर लिखी है । दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक नित्यानंद सेन को इस पुस्तक पर विश्वविद्यालय की ओर से डी० लिट्० को उपाधि मिली है। यह पुस्तक वेजोड है ! सारे देश में उनका नाम फैल गया है। परलोक तत्त्व से सम्बद्ध इस पुस्तक ने चारों तरफ - उत्तेजना फैला दी है । दुनिया में इसकी कितने हजार की संख्या में खपत हुई है, यह वात पुस्तक के प्रथम पृष्ठ में अंकित है। कितनी आश्चर्यजनक पुस्तक है ! पढ़ने का नशा सवार हो गया। रातुल ! रातुल केस नम्बर ४६ को एकाएक याद हो आया। उसका नाम रातुल है। रातुल सेन । उसका देस कलकत्ता है, शम्भुनाथ पंडित लेन में। उसे सब कुछ याद आया : उसका देस है, पिता हैं। वह कैदी नहीं है। मेट्रन ने आकर पूछा, "किताव पढ़ना खत्म नहीं हुआ ?" "नहीं; इसे रहने दें।" रातुल ने कहा। वार-बार पढ़ने पर भी पुरानी नहीं हुई । उसने फिर कोई दूसरी पुस्तक नहीं पढ़ी। पढ़ने की इच्छा ही नहीं हुई । अपने पिता डॉक्टर सेन की लिखी 'परलोक तत्त्व' लेकर वह सोता था और फिर जगकर पढ़ना शुरू कर देता था। कहीं जैसे यह रत्न छिपा हुआ पड़ा था और बहुत दिनों के बाद उसे प्राप्त हुआ है । उसके बारे में उसके पिता ने पुस्तक लिखी है। ठीक उसके बारे में नहीं, बल्कि उसकी आत्मा के बारे में। रातुल को मृत आत्मा से उनका वार्तालाप, रातुल की पितृभक्ति, स्वर्ग जाने के वावजूद पिता से मिलने की उसकी तीव्र आकांक्षा-सारी बातें हैं। मगर कितना गहरा अनुराग है ! रातुल को याद आया--जब वह लड़ाई में भरती हुआ तो पिता के हृदय में कितनी प्रबल यातना थी! वही यातना उनकी तमाम चिट्ठियों में गहरे अनुराग के रूप में व्यक्त हुई है । सिंगापुर से मलय देश, मलय देश से फिलि- पाइन्स-वह जहां-जहां गया है, पिता की चिट्ठियों ने उसका पीछा किया है। तव कभी-कभी उसे लगता कि वह लड़ाई में क्यों भर्ती हुआ ! पिता के मन कष्ट पहुंचाकर वह क्यों विश्व-विध्वंसक युद्ध में सम्मिलित हुमा ? राइफल चलाते-चलाते जब धुएं से सारा आसमान भर जाता, वह असीम में खो जाता था। उसे कोई चेतना नहीं रहती थी। उसके दोस्त-मित्र कहा करते थे कि वह बड़ा ही साहसी है, कि उसके समान उन लोगों के रेजिमेंट में कोई दूसरा .. वीर पुरुष नहीं है। लेकिन रातुल खुद जानता था कि वह कितना असहाय है। दर से पिता की यादें उसे पागल बनाकर छोड़ती थीं, पिता की याद आते ही वह धीरज खो बैठता था। तव उसे होश-हवास नहीं रहता था, राइफल - - २० . के धुएं के गुब्बारे से वह आसमान को काले रंग में बदल देता था ताकि कहीं कोई रिक्त स्थान न रह जाए । रह जाएगा तो पिता के चेहरे की याद आने लगेगी पुस्तक की हर पंक्ति में रातुत के लिए कितनी उद्विग्नता है ! रातुल से साक्षात्कार करने की उनमें कितनी प्रवल आसक्ति है ! उसे मृत समझकर अत्यन्त व्यस्तता में तल्लीन हो परलोक के बारे में लगातार साधना कर रहे हैं । यह तो मान रातुल से मिलने की आसक्ति और उससे बातचीत करने की ती इच्छा करने के कारण ही है। अचानक पिता से मिलने की रातुल को इच्छा हुई। सवेरा होते ही मेट्रन आएगी। रोजमरे की तरह वह एकरस प्रश्नों की झडी लगा देगी। रातुल ने आहिस्ता से दरवाजा खोला। शायद हलकी-सी आवाज हुई। सो हो, कोई हानि नही । सभी नींद की वाहो मैं ऊंघ रहे हैं । दवे पावों वह सीढ़ियां उतरा। सीढ़ी की वत्ती तब जलो हुई थी। पता नही क्यों, रातुल को डर नहीं लगा। वह फिर से पिता से मिलने जाएगा। अब डरने से काम चलने का नहीं है। पीछे के फाटक को पारकर सीधे उस ओर निकला जहा जहाज- 'घाट है। आज मछुआरो को छुट्टी का दिन था। बड़े-बडे घड़ियालो की तरह नौकाएं पेट के बल पड़ी थी। नारियल के दरख्तो की पत्तिया सर-सर आवाज कर रही थी। पीछे से पता नहीं, कौन-कौन उसका पीछा कर रहे हैं । कही वे उसको पकड़वा न दें ! रातुल ने मुड़कर अस्पताल की मोर निगाहे फेरी। साधारण-सी कई बत्तिया टिमटिमा रही थीं। चारों तरफ हवा चल रही थी। आहिस्ता-आहिस्ता रातुल जेटी के ऊपर पहुंचा । रात का अंतिम पहर ऊंच रहा था। जेटी का पहरेदार तिपाई पर नीद मे डबा हुआ था। रातुल चुपचाप डेक पर आकर खड़ा हुआ। सिर पर मुक्त आकाश है। अनगिनत तारो का जमघट । एकाएक बगल में किसी के पैरो की आहट हुई झटपट, एक ही लमहे के अन्दर रातुल डेक के नीचे छिप गर फनल वाटसन मेट्रन को चोर मुड़े । बोले, "केस नम्बर ४६ कहा है ? तुम्हारा मरीज ?" .

- भेट्रन का चेहरा बुझ गया । कोई उत्तर खोज न पाने के कारण वह चुप्पी ओढ़े खड़ी रही। कर्नल वाटसन की आवाज़ में तीखापन आ गया, "मरीज़ कहां है ? जवाव दो...॥ मेट्रन मौन थी । वाटसन ने अब बोलना फिजूल समझा। सीधे नीचे उतर आया। "दरबान, दरवान !".."उसने पुकारा । दरवान आया। मलयदेशीय दरवान । उम्र चालीस वर्ष, दाढ़ी-मूंछ उगी नहीं है। "दरवान, चारों तरफ आदमी भेजो," डॉक्टर ने कहा, "अभी तुरन्त, केस नम्बर ४६ भाग खड़ा हुआ है। जहां भी हो, खोजकर लामो..." मोटे कांच के चश्मे के नीचे वाटसन की आंखों में उद्विग्नता मंडराने लगी। केस नम्बर ४६ भाग खड़ा हुआ है । लोग शहर के उत्तरी मुहल्ले में गए । एक व्यक्ति चीनी मुहल्ले के बाजार के ल्यां तोयां के चण्डूखाने के अड्डे पर पहुंचा जहां विधवा मांतु होटल के सामने तल्लीनता के साथ पांव हिलाती रहती है। सामने के होटल में तव रेडियो का वजना शुरू नहीं हुआ था। दांतों के डॉक्टर की शीशे की मालमारी में बत्तीसो दांत निकाले हुए एक विशाल नर-मुंड सजा हुआ था । केले के बगीचे के मालिक विलसन साहब की गाड़ी तब साहब को लिए सरसराती हुई दक्खिन तरफ जा रही थी। एक आदमी पूर्वी समुद्र से सटे मछुआ रों के मुहल्ले में गया। तव मछुआरे नावें लेकर बहुत दूर निकल चुके थे। कल उन्हें हफ्ता मिला था। इसलिए वे काफी रात तक जगे हुए थे। मगर सवेरे से ही सभी काम में मशगूल हो गए थे। विशुख समुद्र के किनारे खड़ा धूप में जाल सूखने के लिए डाल रहा था। कल पेट की बीमारी से पीड़ित रहने के कारण आज वह काम पर नहीं गया मुहल्ले के विशुख ने कहा, "किसे खोज रहे हैं, सिपाही जी ?" "मरीज़ भाग गया है.---अस्पताल का मरीज़ ! इधर देखा है ?" २२ १ भाश्चर्य की बात है ! विष को दिलचस्प लगा । अस्पताल से कहीं मरीज भागता है ? जाकर चोनी मुहल्ले में देखोल्यां तोयां के चंदुखाने में। हो सकता है अब तक पिलम से दम लगाकर लुढक गया हो और सर पर इंट मारकर बेहोश पड़ा हो, या केले, के बगीचे के जंगल के बीच होगा। अगर वहां जाकर छुपा होगा तो अब तक क्या जिन्दा होगा? हो सकता है, जंगली सुअर ही उसे चट कर गए हों।" विधवा बूढ़ो मातु के कानो में भनक पहुंची। उस तरफ भीड़-भाड़ देखकर पूछा, “क्या हुआ है जी ?" उसकी बात का उत्तर किसी ने न दिया। विधवा मांतु की बातो का कोई कभी उत्तर नहीं देता है। हाय में संइसी लिए बाहर निकलकर दावों के डॉक्टर ने पूछा, "क्या हुआ?" विलसन साहब की गाड़ी यमदूत की तरह सरसराती हुई आ रही थी। भीड़-भाड़ देखकर एक क्षण रोक ले, सो नही । बाप रे बाप ! गर्दन पर चला देगा क्या? भागो'मागो "अहंकार से ड्राइवर जमीन पर पांव ही नहीं रखता। लोगों की जमात हटकर खड़ी हो गई और गाड़ी सायं-सायं करती करीव से निकल गई। चलती हुई गाडी से विलसन साहब को बुडबुड़ाहट सुनाई पड़ी, "लही स्वाइन लोगों की जमात हर तरफ से घूम-धामकर अस्पताल लौट आई । एक- एक कोना ढूढ़ मारा, लेकिन कही न मिला। कर्नल बाटसन गुस्से से उबलने लगे। मोटे चश्मे के अन्दर की माखों की आकृति सष्ट न हुई। सामने खड़ी मेट्रन कांपने लगी। "तुम लोगों ने कहां-कहां तलाश की?" कर्नल वाटसन ने गंभीर स्वर में पूछा । हुजूर का हुक्म मिलते ही उन लोगों ने कोई कोना बाकी न रखा। शहर छान डाला है। चीनी मुहल्ला, मछुआ टोली, उत्तरी मुहल्ला, केले के बगीचे सब.. "जहाज पर गए थे-जहाज के अन्दर और बाहर...?"

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लगा, पर के जीने से कोई नीचे उतर रहा है। हलकी-सी बाहट मिल रही है। चार-पांच व्यक्ति टाचं जलाए नीचे उतर रहे हैं, परों की भारी आवाज । लकड़ी की सीढ़ी के ऊपर पैरो की चीखती आवाजें सीने पर जैसे खट-खट् आवाज कर रही हैं। "सांप को पिटारी किस ओर है गोदाम वाबू ?" सांप!इस बार चोंक उठा। सांप को पिटारी ! सांपों का चालान हो रहा है क्या? "सांपों की बारहों पिटारी अब इस बंदरगाह में उतारनी हैं । उधर एक सिंह है, उसे अलीपुर चिडियाखाने में भेजना है..." किसी एक व्यक्ति ने कहा। "अब याद आया । यही वजह है कि हर रोज दहाड़-दहाड़कर कलेजे को कंपा जाता था। अंधेरे में टटोलकर कितनी ही जगहो की चहलकदमी की है। मगर सांप को पिटारी से हाथ छू जाता तो क्या होता! पता नहीं सांप को पिटारियां कैसी हैं ! हवा जिससे आ-जा सके, इसके लिए छोटी-छोटी सूराखें अवश्य होंगी। अगर कोई साप बाहर निकल आता...या सिंह के पिंजड़े को सलाखों के अन्दर असावधानी से हाथ चला जाता तो... "विजली-बत्ती खराब हो जाने से कितनी कठिनाई का सामना करना ! "अजी मो, मशाल ले आओ।" फिर लोगों को जमात क्या इसी तरफ चली आ रही है ? बडी-बड़ी गठरियो को लांपते हुए, पैकिंग वक्सों की बगल से टाचं जलाते हुए उसी की तरफ आ रहे हैं। कितनी अजीब बातें हैं ! उसने इतने दिन सांप और सिंह के बीच ही गुजारे हैं ! वह सर से पैर तक कांप उठा। अचानक ऊपर की सीढी के इर्द-गिर्द का हिस्सा रोशनी से भर उठा । एक बड़ी-मी जलती मशाल लेकर एक आदमी नीचे उतर रहा है। अब छिप- कर रहने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। अब वह आसानी से पकड़ लिया जाएगा। फिर उसे पकडकर लोग अस्पताल के सेल में रख देंगे। उसका नाम फिर से रखा जाएगा केस नम्बर ४६ । फिर वही तोदवाली मेट्न आकर खाने के लिए कूड़ा-कवरा देगी। एक आदमी उसको तसवीर खीचेगा। २५ , उसी तरह के एकरस प्रश्नों का सिलसिला चलेगा। प्रश्नों का फव्वारा... और सचमुच अगर वह अपना नाम बता दे तो उसी कैदखाने में रखा जाएगा। तब न तो उसके पास टिकट रहेगी और न रुपया-पैसा । वह किस चीज़ से टिकट खरीदेगा? अगर वह किसी तरह अपने पिता के पास पहुंच जाए तो फिर उसके लिए डरने की कोई बात नहीं है । तब उसके लिए कोई चिन्ता की बात न रहेगी। वह आराम से वहां पड़ा रहेगा । वह अपने पिता का इकलौता पुत्र है । युद्ध में क्यों सम्मिलित हुआ था ? -सिर्फ खामखयाली के कारण ही न ! गोविन्द अब भी जरूर होगा । गोविन्द ही उसे क्या कम प्यार करता था! "कोन.. कौन है यहां ?" "किससे कह रहे हैं गोदाम बाबू ?" "लगा, वहां किसी चीज़ की आवाज़ हुई."लगा, जैसे कोई हिला- डुला है..." "वह तो मेरे जूतों की आवाज थी, जूते से टकराकर बांस गिर पड़ा।" "होशियार रहना, अगर कहीं कोई टूट जाए तो कोई जिन्दा न बचेगा। दरअस्ल सबके सब अफ्रीका के अजगर हैं..." सिर के ऊपर दो बड़े-बड़े पैकिंग केस हैं और दोनों बगल में दो अदद और । उसके बीच सिकुड़कर वह बैठ गया । अव वह किसी भी ओर से पकड़ा नहीं जा सकता है। लेकिन अगर इन पैकिंग केसों को भी उठा लिया तो फिर ...? तब कहीं कोई उपाय न रह जाएगा। एकाएक उसे महसूस हुआ कि लोगों की जमात मशाल लिए उसके इर्द- गिर्द खड़ी हो गई है। उसे घेरकर वे लोग वातचीत कर रहे हैं। "फिर वे लोग इन्हें उठाकर ले जाएं। "उफ, विजली की लाइन खराव हो जाने से कितनी कठिनाई होती है... "अरे, इन सवों को भी उठाकर ले जाओ.. नीचे लोहे का गैंता लगाकर जोर से उठाना पड़ेगा, वरना बहुत ही वजनदार हैं..." पंकिंग बाक्स के नीचे लेटने के कारण छाती घड़-धड़ करने लगी हैं । क्या कह रहे हैं ये लोग ! सचमुच क्या वे लोग उसकी देह पर गैंता चला देंगे ! अगर सचमुच गते की नोक से दे मारे तो तुरन्त हरहराकर उसका...

"ऐ गोदाम वावु, जल्दी आइए जल्दी..." अचानक ऊपर से पुकार आई। "फिर क्या हुआ ! चल वेटे, कपर चल, कोई काम खत्म नहीं करने देगा। ...गोदाम के कामो से नाकोदम हो गया हूं..." वे सोग जिस तरह भाए थे उसी तरह सदल-बल लोट गए । र, अब अन्दर रह पाऊंगा। भगवान ने रक्षा की। राखे राम तो मारे कोन! मगर अभी भी बहुत कुछ बाकी है। कितने दिन वाकी हैं, कहां जा रहा हूं, मालूम नहीं। सरकता हुआ बाहर आता है ! वाहर यानी पैकिंग वॉक्स के नीचे से बाहर--- दमघोंटू घने अंधेरे में। हो सकता है, वे लोग फिर नीचे उतरें । अबकी किसी निरापद जगह की तलाश कर लेनी है। दूसरे दिन जहाज कही आकर रूका । अव हिलना डुलना नहीं है। लोगों 'की आवाज मन्द हो गई है। बहुत-सा माल ऊपर उठाकर ले गया है । अब कोई अन्दर नहीं आ रहा है । समी पादमी क्या जहाज से नीचे उतर गए ? घर अव चन को मांस ले पाऊंगा। अब आराम से सो पाऊंगा। सिर्फ इसको ही जानकारी नहीं है कि सिंह का पिंजड़ा कहां रखा हुआ है । दहाड वहां से, उस कोने से आ रही है। लगता है, कोई यादमी कई दिनों के अन्तराल पर मांस खिला जाता है। मांपों की पिटारिया ले गया है; खर, जान बची। लेकिन इस बन्दगाह में मगर माल लादा जाए तो? बड़ी ही भूख लग गई है। मूखी मछलियां खाई नही जाती। खाने की कोई चीज़ यहा नहीं है पया ? अकेले चक्कर काटते-काटते हाय मे कोई चीज़ छू गई । गोल फुटबॉल की तरह । इतने-दतने फुटबॉल हैं ! बड़ी-बडी टोकरियों में भए हुए। हाय से अच्छी तरह टटोलने लगा। चिकने जैसे हैं। उनमे से एक को उठाया। वजन- दार है । किसी तरह की कोई गंध नहीं है । कोहदा भी हो सकता है। भूख के मारे इमे भी पाया जा सकता है । काटने का कोई यन्न नहीं हैं । दात । हा, दात तो है। दांत से काटा । लार टपकने लगी। फुटबॉल नहीं, कोहड़ा भी नहीं, बल्कि तरबूज उसी तरह के एकरस प्रश्नों का सिलसिला चलेगा। प्रश्नों का फव्वारा" और सचमुच अगर वह अपना नाम बता दे तो उसी कैदखाने में रखा जाएगा। तव न तो उसके पास टिकट रहेगी और न रुपया-पैसा । वह किस चीज़ से टिकट खरीदेगा? अगर वह किसी तरह अपने पिता के पास पहुंच जाए तो फिर उसके लिए डरने की कोई बात नहीं है । तव उसके लिए कोई चिन्ता की वात न रहेगी। वह आराम से वहां पड़ा रहेगा। वह अपने पिता का इकलौता पुत्र है । युद्ध में क्यों सम्मिलित हुआ था ? -सिर्फ खामखयाली के कारण ही न ! गोविन्द अब भी ज़रूर होगा । गोविन्द ही उसे क्या कम प्यार करता था! "कोन' 'कौन है यहां ?" "किससे कह रहे हैं गोदाम वाबू ?" "लगा, वहां किसी चीज़ की आवाज़ हुई. 'लगा, जैसे कोई हिला- । . डुला है..." . "वह तो मेरे जूतों की आवाज़ थी, जूते से टकराकर वांस गिर पड़ा।" "होशियार रहना, अगर कहीं कोई टूट जाए तो कोई ज़िन्दा न वचेगा दरअस्ल सबके सब अफ्रीका के अजगर हैं..." सिर के ऊपर दो बड़े-बड़े पैकिंग केस हैं और दोनों बगल में दो अदद और । उसके बीच सिकुड़कर वह बैठ गया । अव वह किसी भी ओर से पकड़ा नहीं जा सकता है। लेकिन अगर इन पैकिंग केसों को भी उठा लिया तो फिर ...? तब कहीं कोई उपाय न रह जाएगा। एकाएक उसे महसूस हुआ कि लोगों की जमात मशाल लिए उसके इर्द- गिर्द खड़ी हो गई है। उसे घेरकर वे लोग वातचीत कर रहे हैं। "फिर वे लोग इन्हें उठाकर ले जाएं... "उफ, विजली की लाइन खराब हो जाने से कितनी कठिनाई होती है..." "अरे, इन सवों को भी उठाकर ले जाओ.. नीचे लोहे का गैता लगाकर जोर से उठाना पड़ेगा, वरना बहुत ही वजनदार हैं..." पैकिंग वाक्स के नीचे लेटने के कारण छाती धड़-धड़ करने लगी है । क्या कह रहे हैं ये लोग! सचमुच क्या वे लोग उसकी देह पर गैता चला देंगे! अगर सचमुच गैते की नोक से दे मारे तो तुरन्त हरहराकर उसका . २६ "ऐ गोदाम वायू, जल्दी माइए जल्दी..." अचानक ऊपर से पुकार आई। "फिर क्या हुआ! चल बेटे, ऊपर चल, कोई काम खत्म नहीं करने देगा। ...गोदाम के कामो से नाकोदम हो गया हूं..." ये लोग जिस तरह आए थे उसी तरह सदल-बल लौट गए। खैर, अब अन्दर रह पाऊंगा। भगवान ने रक्षा की। राखे राम तो मारे कौन! मगर अभी भी बहुत कुछ बाकी है। कितने दिन वाकी हैं, कहां जा रहा हूं, मालूम नहीं। सरकता हुआ बाहर आता है ! बाहर यानी पंकिंग बॉक्स के नीचे से बाहर- दमघोंटू घने अंधेरे में। हो सकता है, वे लोग फिर नीचे उतरें । अबकी किसी निरापद जगह की तलाश कर लेनी है । दूसरे दिन जहाज कही आकर रूका । अब हिलना डुलना नहीं है। लोगो 'की आवाज़ मन्द हो गई है। बहुत-सा माल ऊपर उठाकर ले गया है। अब कोई अन्दर नहीं आ रहा है। सभी आदमी क्या जहाज से नीचे उतर गए ? खैर अव चैन की माम ले पाऊंगा। अब आराम से सो पाऊंगा। सिर्फ इसको ही जानकारी नहीं है कि सिंह का पिजड़ा कहां रखा हुआ है । दहाड़ वहा से, उस कोने से आ रही है। लगता है, कोई आदमी कई दिनों के अन्तराल पर मास खिला जाता है । सांपों की पिटारिया ले गया है। घर, जान बची। लेकिन इस बन्दगाह मै अगर माल लादा जाए तो? बड़ी ही भूख लग गई है। सूखी मछलियां खाई नहीं जाती। खाने की कोई चीज यहां नहीं है क्या अकेले चक्कर काटते काटते हाय से कोई चीज़ छू गई । गोल फुटबॉल की तरह । इतने इतने फुटबॉल हैं ! बड़ी-बड़ी टोकरियो में भए हुए । हाप से अच्छी तरह टटोलने लगा। चिकने जैसे हैं। उनमें से एक को उठाया। वजन- दार है । किसी तरह की कोई गंध नहीं है । कोहड़ा भी हो सकता है । भूख के मारे इसे भी खाया जा सकता । काटने का कोई यंत्र नहीं हैं । दात । हा, दात तो है । दात से काटा । लार टपकने लगी। फुटबॉल नही, कोहड़ा भी नही, बल्कि ? तरखूज!

उसी तरह के एकरस प्रश्नों का सिलसिला चलेगा। प्रश्नों का फव्वारा और सचमुच अगर वह अपना नाम बता दे तो उसी कैदखाने में रखा जाएगा। तव न तो उसके पास टिकट रहेगी और न रुपया-पैसा । वह किस चीज़ से टिकट खरीदेगा? अगर वह किसी तरह अपने पिता के पास पहुंच जाए तो फिर उसके लिए डरने की कोई बात नहीं है । तव उसके लिए कोई चिन्ता की वात न रहेगी। वह आराम से वहां पड़ा रहेगा। वह अपने पिता का इकलौता पुन है । युद्ध में क्यों सम्मिलित हुआ था ? -सिर्फ खामखयाली के कारण ही न ! गोविन्द अब भी जरूर होगा। गोविन्द ही उसे क्या कम प्यार करता था! "कौन.. कौन है यहां ?" "किससे कह रहे हैं गोदाम बाबू ?" "लगा, वहां किसी चीज़ की आवाज़ हुई.. लगा, जैसे कोई हिला- डुला है..." "वह तो मेरे जूतों की आवाज़ थी, जूते से टकराकर वांस गिर पड़ा।" "होशियार रहना, अगर कहीं कोई टूट जाए तो कोई ज़िन्दा न बचेगा। दरअस्ल सबके सब अफ्रीका के अजगर हैं..." सिर के ऊपर दो बड़े-बड़े पैकिंग केस हैं और दोनों बगल में दो अदद और । उसके बीच सिकुड़कर वह वैठ गया। अब वह किसी भी ओर से पकड़ा नहीं जा सकता है। लेकिन अगर इन पंकिंग केसों को भी उठा लिया तो फिर ...? तब कहीं कोई उपाय न रह जाएगा। एकाएक उसे महसूस हुआ कि लोगों की जमात मशाल लिए उसके इर्द- गिर्द खड़ी हो गई है। उसे घेरकर वे लोग वातचीत कर रहे हैं। "फिर वे लोग इन्हें उठाकर ले जाएं..." "उफ, विजली की लाइन खराव हो जाने से कितनी कठिनाई होती है। "अरे, इन सवों को भी उठाकर ले जाओ.. नीचे लोहे का गैंता लगाकर जोर से उठाना पड़ेगा, वरना बहुत ही वजनदार हैं..." पैकिंग बाक्स के नीचे लेटने के कारण छाती धड़-धड़ करने लगी है । क्या कह रहे हैं ये लोग ! सचमुच क्या वे लोग उसकी देह पर गैंता चला देंगे! अगर सचमुच गते की नोक से दे मारे तो तुरन्त हरहराकर उसका... २६ "ऐ गोदाम बाबू, जल्दी बाइए जल्दी..." अचानक ऊपर से पुकार आई। "फिर क्या हुआ !चल बेटे, ऊपर चल, कोई काम खत्म नहीं करने देगा। ..गोदाम के कामों से नाकोदम हो गया हूं..." वे लोग जिस तरह बाए थे उसी तरह सदल-बल लोट गए । खैर, अब अन्दर रह पाऊंगा। भगवान ने रक्षा की। राखे राम तो भारे कोन! मगर अभी भी बहुत कुछ बाकी है। कितने दिन बाकी हैं, कहां जा रहा हूं, मालूम नहीं। सरकता हुआ बाहर आता है ! वाहर यानी पंकिंग वॉक्स के नीचे से बाहर-- दमघोटू घने अंधेरे में। हो सकता है, वे लोग फिर नीचे उतरें । अबकी किसी निरापद जगह की तलाश कर लेनी है। दूसरे दिन जहाज कही माकर रूका । अव हिलना डुलना नहीं है। लोगों 'की आवाज मन्द हो गई है। बहुत-सा माल ऊपर उठाकर ले गया है । अब कोई अन्दर नहीं आ रहा है । सभी आदमी क्या जहाज से नीचे उतर गए ? खैर अव चैन को मास ले पाऊंगा। अब आराम से सो पाऊंगा। सिर्फ इसकी ही जानकारी नहीं है कि सिंह का पिजड़ा कहां रखा हुआ है । दहाड़ वहा से, उस कोने से आ रही है। लगना है, कोई आदमी कई दिनों के अन्तराल पर मांस खिला जाता है। मापी की पिटारिया ले गया है। खर, जान बची। लेकिन इस बन्दगाह में अगर माल लादा जाए तो? बड़ी ही भूख लग गई है। सूखी मछलियां खाई नहीं जाती। खाने की कोई चीज़ यहां नहीं है क्या? अकेले चक्कर काटते-काटते हाथ से कोई चीज छू गई । गोल फुटबॉल की तरह । इतने-इतने फुटबॉल है ! बड़ी-बड़ी टोकरियो मे भए हुए । हाय से अच्छी तरह टटोलने लगा। चिकने जैसे हैं। उनमें से एक को उठाया। वजन- दार है । किसी तरह की कोई गंध नहीं है । कोहडा भी हो सकता है । भूख के मारे इसे भी पाया जा सकता है। काटने का कोई यंत्र नहीं हैं । दात । हा, दात तो है । दात से काटा । तार टपकने लगी। फुटबॉल नहीं, कोहड़ा भी नहीं, बल्कि तरबूज !

पके हुए तरबूज ! सारी बातें याद आने लगीं। उसको बचपन के दिनों में गरमी के मौसम में गोविन्द बाजार से बहुतेरे तरबूज ले माता था। कितने दिनों बाद, कितने बरसों बाद पहले का यह खाद्य आज प्राप्त हुआ है ! पूरा का पूरा एक तरबूज खा डाला। पेट भरते ही आंखें नींद से वोझिल हो गई। एक पैकिंग बॉक्स की वगल में अंधेरे में उसने अपने आपको निढाल छोड़ दिया। आरम्भ में एक उकार आई। क्या ही भाराम महसूस हो रहा है ! दुनिया में कहीं कोई इस तरह आराम से नहीं है। आरामकुरसी पर उठंगकर सोने जैसा यह सोना है। उसके बाद फिर हिलना-जुलना शुरू हो गया है । लगता है, जहाज खुल चुका है। हिंग-टांग डिंग-बांग.. घड़ियाल के घंटे जैसा ऊपर कुछ बजने लगा । डेक के ऊपर लोहे की मोटी सांकले घूम रही हैं किरं.. फिर... बगल के इंजन-घर में पट-पट कोयला डाला जा रहा है। कोयला तोड़ने की ठक-ठक आवाज हो रही है.. और पैकिंग बॉक्स की धगल में गोदाम के अंधकप में लेटकर बेटिकट की नियद्देश्य याना हो रही है। उसके बाद कलकत्ते पी वही छत होगी। छत की तरंगें उन तरंगों को फलांगने के बाद शंभुनाथ पंडित लेन गोविन्द नौकर गरमी की छुट्टी में आइसक्रीम वाले की वही चिल्लाहट'''बरफ, आइसक्रीम बरफ ''उसके बाद टन-टन आवाज करते हुए वर्तनवाले का जाना। "ऐ, तुम फोन हो जी ? फोन हो?" भव हड़बड़ाकर उठ बैठता है । भय से सर्वांग सिहर रहा है। ", तुम कौन हो जी ? कोन हो ? उठो, उठो..." जरूर ही कोई लंबा-तगड़ा आदमी है, वरना गले की भावाज इतनी भारी भरकम क्यों होती! चेहरा दिख नहीं पड़ता है, पांवों के बूटों से ही चेहरे का अनुमान किया जा सकता है। रातुल का पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा है। अव की वह पकड़ा गया। अब आत्मरक्षा का कोई रास्ता नहीं है । पंकिंग पोस के नीचे से निकलना ही पड़ेगा। बाहर आकर हाथ जोड़कर माफी मांगनी होगी। तमाम घटनाओं को स्पष्टतया कहना होगा । उसके बाद जो होना है, हो। अचानक कोई उसको बगल से वोल पड़ा, "मैं भोम्बल हूं, सिपाही जी... भोम्वल...॥ "भोम्बल! तू यहां क्या कर रहा है ? कब ड्यूटी है ?" सिपाही ने पूछा। "ड्यूटी तो अभी है, मगर सिर में बेहद दर्द हो रहा है, इसलिए जरा करवट बदल रहा था। कुछ बोलना मत । लो, यह रहे चार पैसे, पान खाना।" भोम्बल उठकर खड़ा हुआ और दात निपोरकर सिर खुजलाने लगा। रातुल बाल-बाल बच गया। लगता है, अब तक उसे किसी ने देखा नहीं है। फिर से जैसे उसकी देह में प्राण लौट आए हैं । किन्तु इस तरह कितने दिनो तक चलेगा! सिपाही बूट से खट-खट् आवाज करता हुआ दूसरी तरफ चला गया। सिपाही को एक भद्दी-सी गाली देकर भोम्बल फिर में अपनी जगह लेटने की तैयारी करने लगा। रातुल ने उस आदमी की ओर गौर से देखा ।साको पोशाक पहने है, माये पर पग्गड़, बगैर दाडो-मूछों का चेहरा । उम्र करीब-करीब रातुन के बराबर है । कुछ देर बाद मोम्बल फिर दिख नहीं पड़ा। पंकिग केस के अन्दर . घुस गया। फिर से सोने की कोशिश करनी चाहिए । इसके अन्दर इस तरह कही सोया जा सकता है ? कभी तकलीफ सहने की आदत न पी। सारी ज़िन्दगी आराम से गुजारी है । इस लड़ाई मे आते तकलीफ की शुरुआत हुई-बूट पहनकर परेड करना और प्रात.काल चार बजे नींद को परे हटाकर जगना । और वह खाना! किस चीज का मास रहता था. मालूम नही । मास अच्छी तरह सोना हुआ भी नही होता था। फिर पाव रोटी दात से काटना । सवेरे कंटीन के सामने पंक्ति में खड़ा होना। हाथ मे एक मग रहता था। उसी मग में योड़ी-सी चाय दी जाती थी और दाहिने हाथ में पाव रोटी की चार टुकड़िया और एक अंडा। रसोईघर के सामने कीचड़ फैला रहता था-इतना कि पांव डूब जाएं। उसी कीचड़ पर पलथी मारकर धान मिले चावल का भात खाना पड़ता था। बायें हाथ में पानी का मग रहता था। अगर किसी दिन जूते में पालिश नहीं की जाती थी तो सजा मिलती थी। सजा यानी मजदूर का काम करना पड़ता था। कुदाल से मिट्टी कोड़ना या फिर गेट पर पहरा देना । चुपचाप एटेन्शन की मुद्रा में पहरा देना, और कोई अफसर अगर पास से गुजरे तो सलामी ठोंकना। सलामी देने में अगर ज़रा भी चूक हो जाए तो फिर से सजा दी जाती थी। यह तो साधारण समय की बात हुई। लेकिन फांट पर ! सिंगापुर के खजूरों के झुंड में लेटकर युद्ध करना पड़ता था। किसी भी क्षण ऊपर से बम गिरने की संभावना रहती थी। जंगल में सांप काट सकता था । खाना ठीक समय पहुंच जाता था तो जान में जान आती थी, अन्यथा इसके अभाव में नाहीं न कर सकता था। मार्च करते हुए जाता था तो अनवरत चलना ही पड़ता था, दर्द से पांव दुखने लगें तो भी रुक नहीं सकता था । दस-बारह मीलों तक लगातार चलना पड़ता था। चलते-चलते यदि कोई वेहोश होकर गिर पड़े तो कोई 'आह' तक निकालने वाला नहीं। हो सकता है कि हजारों फीट नीचे दौड़- कर उतरना पड़े। अगर पांव मुड़क जाए तो मुड़के । इसके कारण तुम्हारे लिए कोई वैठा नहीं रहेगा। उसके बाद जब जापानियों के हाथ में पड़कर बंदी बनाया गया, उसकी 'घटना और भी ज्यादा तकलीफदेह है । दिनभर माटी कोड़ो, पौधे लगाओ। अगर उस पौधे से फसल मिली तो तुम्हें खाना मिलेगा। पीठ की तरफ चावुक तैनात रहता था। दिन-रात उसी चावुक का भय बना रहता था। वे लोग खा-पी लें फिर यदि कुछ बच जाएगा तो तुम्हें खाना मिलेगा । उफ, कितना कष्ट उठाना पड़ा है ! इस तरह वह लड़ाई में क्यों आया था? लड़ाई में आने का उस पर शौक क्यों सवार हुआ था ? उसे किस बात का दुख था ? वह वाप का इकलौता बेटा है। शंभुनाथ मित्र लेन में उन लोगों का उतना बड़ा मकान है। गोविन्द जैसा नौकर है । चाहे दिन भर घर में बैठे-बैठे पुस्तकें ही क्यों न पढ़े-उतनी बड़ी लाइब्रेरी जो है। या छत पर बैडमिण्टन खेले । और अगर कुछ अच्छा न लगे तो मोटर लेकर बाहर 'निकल जामो...~ या तो विक्टोरिया मेमोरियल के मैदान की ओर या प्रिंसेस - ३०

पाट की ओर । इसके अतिरिक्त कलकत्ते शहर में काम का कोई अभाव नहीं।
सिनेमा देखने जाओ, फुटबाल के मैदान की ओर हजारों किस्म की और भी
दिलचस्पिया इधर-उधर, चारो तरफ विपरी पड़ी हैं।
"कौन ? कौन है जी? यहा किसका पांव हिल रहा है ?"
लगा, भोम्बल के गले की आवाज है । मगर उसे क्योकर देख लिया?
"तुम कौन हो ? कौन हो ? जवाब क्यों नहीं दे रहे हो?"
रातुल ने गरदन घुमाकर चारों तरफ आंखें दौड़ाई । कोई कही से उसे
पुकार रहा है । फिर क्या अन्ततः वह पकड़ा हो गया ?
"इधर, इधर पीछे की ओर देखो-रो की तरफ !"
पैरों को ओर दृष्टि फेंकते ही रातुल को एक जोड़ा आंखें दिखाई पड़ी जो
पंकिंग केस को सूराख से उसकी ओर ताक रही थी। वह भोम्बल है।
"बाहर निकलो, बाहर..."
रातुल सोचने-विचारने लगा कि बाहर निकले या नहीं।
"वाहर निकलो वरना पकड़वा दूगा।" भोम्बल ने दूसरी बार कहा ।
रातुल को बहुत तकलीफ उठाकर, सिकुड़-सिमट कर आखिरकार बाहर
निकलना पड़ा।
भोम्बल बाहर निकला! निकलते ही चट से रातुल का हाथ पकड़ लिया ।
"टिकट है, टिकट !" मोम्बल ने आखें तरेरकर पूछा।
रातुल ने कहा, "टिकट नहीं है, मगर तुम मेरा हाथ छोड़ी..."
"ऊपर चलो, एक तो टिकट है नहीं और उसपर हेकड़ी दिखा रहे हो ?"
सचमुच खीचते हुए ऊपर ले जाएगा क्या? पकड़वा देगा ?
"किम जात के हो ? बंगाली हो?"
"अरे अब तक यताया क्यों नहीं ? कितने ही वंगालियो को कालापानी
के पार पहुंचा दिया है। किस जिले मे पर है ?"
"कलकत्ता
इस बीच भोम्बल उसका हाय छोड़ चुका था।
"समझ गया, कि तुम कलकत्ते के युवक हो, गुस्से में मां से झगडकर
भाग आए हो । अब कहने की जरूरत नहीं। लो मूंगफली साओ।" भोम्बल

खांकी कमीज़ की जेब से मुट्ठी भर मूंगफली निकालकर रातुल के हाथ में मा दी और खुद भी खाने लगा। भोम्बल बोला, "चलो, यहां कोई देख लेगा, हम लोग वहां चलकर बनें।" ४ पैकिंग केस को लांघकर भोम्बल रातुल को और भी कोने की तरफ ले गया । एकान्त जगह में जाकर बोला, "यहां बैठो, किसी के बाप की मजाल नहीं कि हमें यहां देख ले..." "अव बताओ, कहां गए थे ? जेब में रुपया-पैसा है !" इतना कहकर भोम्बल ने और कई एक मूगफलियां बढ़ा दी। "पैसा-कोड़ी है या ठनठन गोपाल ?" भोम्बल ने फिर पूछा। रातुल को उस बात का जवाब नहीं देना पड़ा। उसकी आंखों को देखते ही भोम्बल की समझ में बात आ गई। "अब कहने की कोई जरूरत नहीं, समझ गया। मां के गहने चुराकर भाग आए थे, अब पैसे खत्म हो गए हैं, इसीलिए मां के लिए मन उदास है। सब समझ गया । दो साल से जहाज़ में काम कर रहा हूं, कितने ही बंगाली लड़कों को काला पानी के पार पहुंचा चुका हूं।" उसके बाद मालूम नहीं क्या सोचकर कहा, "मगर अब वे दिन नहीं रहे भाई, अब बड़ा ही कठिन नियम लागू हो गया है। रातुल को भी थोड़ी घबराहट महसूस हुई। "फिर भी कोई परवाह नहीं," रातुल पर आंख टिकाते हुए भोम्बल ने कहा, "जब तक मैं हूं, किसी भी वंगाली युवक के लिए कोई चिन्ता को वात .. नहीं है . "खैर, वह वात रहे । दाढ़ी बना लो, मैं अपनी एक खाकी पोशाक तुम दूंगा । उसको ही पहनना । कोई कुछ न कहेगा। इन कई दिनों के दरमिया तुम्हारे पेट में तो चूहे कूद रहे होंगे ! क्या खा रहे हो?" ३२ .

"यो तरबूज ।" रातुल ने उंगली से इशारा किया।
"वाह, बड़े ही वहादुर हो ! घबराना मत, मैं तुम्हें ही यपना गागिर्द
चनाऊंगा। वन सकोगे?" भोम्बल ने पूछा।
राहुल ने पूछा, "किस चीज का शागिर्द ?"
"यह देख..."
.
कहकर भोम्बल ने जैव से एक पैसा निकाला। हथेली पर रखकर पूछा,
"मेरे हाथ में क्या देख रहे हो?"
रातुल बोला, "एक पैमा।"
भोम्बल ने मुट्ठी बन्द को। उसके बाद मुट्ठी पर एक फूंक मारकर
मुट्ठी फिर से खोल दी।
"अव क्या देख रहे हो?"
रातुल ने आश्चर्य में आकर देखा-ढेर सारे पैसे थे । इतने कि हाय
समा नहीं रहे थे । भोम्बल ने फिर से अपनी मुट्ठी बन्द की। रातुल ने
देखा-अवकी हथेली एकदम खाली थी-कानो कौड़ी तक नहीं थी।
रातुल पर आंख टिकाकर भोम्बल बोला, "यह तो मामूली बात है, अभी
तुरन्त तुम्हारी जेब से मुगी का एक अंडा निकाल सकता हूं। देखोगे..."
हिंग-हाग, हिंग-डांग । ऊपर से घण्टे की आवाज आई।
भोम्बल उछल पड़ा।
वोला, "ट: बज गया। चलू अव ड्यूटी में हेर-फेर होगा।"
"किस बात की ड्यूटी ?" रातुल ने पूछा।
"दुत पगले, मैं नौकरी जो करता हूं, ड्यूटी में हेर-फेरन होगा। अब तक
ड्यूटी हुई, अव छुट्टी। जाऊंगा और घट से सोट आऊंगा। ममाला पोमना,
झाड़ देना-सभी काम मुझको करना पड़ता है। काम न करूं तो तनवा रे
भला! पचास रुपये माहवार क्या मुह देखकर देता है ?"
उसके बाद जेब से और मूगफलियां निकालकर रातुल के हाय मे पमा
दो बोर कहा, "अब यह नौकरी अच्छी नहीं लगती है भाई। आदमी का
गला काटकर फिर से जोड़ना सीख जाऊंगा तो इस नौकरी को छोड़ दूगा।'
"गला काटकर जोड़ना!" रातुल ने आश्चर्य में बकर पूटा।
"यह सब बाद में बताऊंगा। हां, रात में क्या खाओगे ?"

। रातुल जैसे अवाक् हो गया हो भोम्बल बोला, "मांस वगैरह खाते हो न ! या पूरे वैष्णव हो ? चॉप ओगे या कटलेट ? मछली नहीं मिलेगी। गरम भात और मांस करी ही मलेगा। तुम कलकत्ते के वाशिन्दे हो, संदेश या रसगुल्ला नहीं मिलेगा, पहले से ही कहे देता हूं। जवाव का इन्तज़ार वगैर किए भोम्बल वहां से भागा। उसके जूतों की खट-खट आवाज़ दूर से कानों में आती रही। रातुल निःसंग बैठा-बैठा सोचने लगा। भोम्बल उसके बाद नहीं आया। आहिस्ता-आहिस्ता अंधेरा उतरने लगा । तलघर की बत्ती अब तक मरम्मत नहीं हुई है। आज भी शायद अंधेरे में ही वक्त गुजारना पड़े। वत्ती की मरम्मत होते ही उसे कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। । बहुत दिनों के बाद आराम से खाना खा रहा है । गरम-गरम भात और मुर्गी का शोरवा । महा-हा, अमृत !. पैकिंग केस का ही विस्तरा क्यों न हो, वाहे सिर के नीचे तकिया न रहे, लेकिन गहरी नींद आई। ऐसा बहुत दिनों से हो नहीं पाया था। सौभाग्यवश भोम्बल था, इसीलिए राहत की सांस लेने का मौका मिला ! ऐसी मुसीबत में कोई कहीं सहायता मिलती है ! सवेरा होते-न होते भोम्बल आकर उपस्थित हो गया। बोला, "मैं ख और तुम वैठे-बैठे खाओ, यह नहीं चलेगा।.. मेरे पास कोई ज़मींदारी = है कि वंगाली पर नजर पड़ते ही नाचना शुरू कर दू। भोम्बलदास के सा यह सब नहीं चलेगा। पैसा फेंको, तमाशा देखो-मैं भैया इसी बात को म - इसके बाद खाकी पोशाक निकालते हुए कहा, "देखू, पहनो तो अब से तुम भोम्बलदास वनोगे। समझे !" रातुल भय से सिकुड़ गया। बोला, "अगर कोई पहचान ले ?" "पहचान लेगा तो पकड़े जाओगे। पुलिस के हाथों सौंप देगा, हक डाल दिए जाओगे।" फिर जोर-जवरदस्ती कोट, पैंट और पगड़ी पहनाते हुए बोल ३४ "जागो..." भी पहचान नहीं पाएगा, तुम भी काले-कलूटे हो और मैं भी। फर्क महज इतना ही है कि तुम्हारे बाल घराले हैं । सो पगड़ी से ढंक दिया है। तुम्हारे और मेरे गले की आवाज एक जैसी है। साज-सज्जा करने के बाद भोम्बलदास ने कहा, "लाओ, चेहरा मेरी तरफ. करो तो।" रातुल ने अपना मुंह घुमाया। भोम्बल बोला, "सब ठीक-ठाक है। दाढ़ी-मूंछ बनाकर तुम एकबारगी भोम्बलदास हो गए हो।" उसके बाद रातुल की पीठ पर धक्का लगाकर कहा, रातुल को एक प्रकार के भय ने जकड़ लिया। डरने की कौन-सी बात है जी," भोम्बल ने कहा, "तुम मेरे शागिर्द बन चुके हो । सोधे सीढ़ियां तय करने के बाद नलघर के पास रसोईघर मिलेगा। वहां देखोगे कि चटगांव का गोरा-चिट्टा ब्राह्मण रसोई बना रहा होगा । जाकर उससे कहना : महराज जी, क्या-क्या मसाला पीसना है ? वह तुम्हें आधा सेर धनिया, एक सेर लाल मिर्च और थाधा सैर हल्दी देगा। पीस सकोगे न ? बहुत महीन पीसना।" "जिन्दगी में कभी मसाला पीसा नही है ।" रातुल ने "फूल जैसे मुलायम हो न! मसाला पीसने से इनका हाथ घिस जायेगा! मसाला अगर पीस नहीं सकते हो तो फिर मा की ही गोद में क्यों न पड़े रहे?" भोम्बल ने मुंह बिदकाकर कहा। फिर भी रातुल को हिलते-डुलते न देखकर भोम्बल बोला, "मसाला जब खत्म हो जायेगा तो सारंग साहब के कमरे में जाकर उनका पर दावना होगा । देखना, जोर से मत दाबना। फिर सारंग साह्य जव ड्यूटी पर चले जाएं, उनके कमरे से लौटकर नल से पानी भरना। बाल्टी से महराज के ड्राम में पानी भर देना। उसके बाद जव महराज कहें कि अब पानी की जरूरत नहीं है, सीधे गोदाम वायू के पास चले जाना । गोदाम वाबू का कमरा तीन- मंजिल पर है। गोदाम बाबू के हुक्म से इधर-उघर जाना पड़ेगा। उसके बाद गोदाम बाबू जब नहाने चले जाएं, तमाम फेयिनो में झाडू लगा देना-बाहर माह देने की जरूरत नहीं, सिर्फ अन्दर ही। बाहर शाह लगाने के लिए । धर्मदास है। जाओ, जल्दी जाओ। हो सकता है कि अब तक गुस्से में आकर ब्राह्मण देवता ने चिल्लाना शुरू कर दिया हो।" रातुल तव भी निःशब्द खड़ा था । अब यह कौन-सी मुसीबत आई। कहीं तीनमंजिला है, कहां केविन ! वह किसी को पहचानता नहीं, किसी का नाम उसे मालूम नहीं, रास्ता जाना-पहचाना नहीं। भोम्बल ने उसे कैसी मुसीवत में डाल दिया। यह तो यही हुआ, कि दो मुट्ठी अनाज खिलाकर शेर के मुंह में डाल देना । यह कैसा प्रेम है ! "तव हां, एक बात ।" भोम्बल ने उसे चेतावनी दी। "वह कल जो सिपाही था, नम्बरी शैतान है । उसे देखते ही दो-चार सलाम करना और यह लो..." दो इकन्नियां थमाकर भोम्बल बोला, "अगर ज्यादा डांट-डपट करे तो उसके हाथ में एक आना पैसा थमा देना । पट्ठा चुप्पी साध लेगा । वडा टेढ़ा आदमी है..." कल के सिपाही को रातुल थोड़े ही पहचानता है। उसका चेहरा रातुल ने देखा नहीं था। इसके अलावा कितने ही सिपाही चारों तरफ चक्कर काट रहे हैं। कब किसको पंसा देकर कहीं वह कोई अन्याय न कर बैठे। भोम्बल पैकिंग केस पर लेट गया है, उसकी पलके मुंदी हैं। पलकों को फिर से खोलकर कहा, "अयं, अब तक तुम गएं नहीं ? मेरी नौकरी लेने का इरादा है ? जाओ, जल्दी जाओ।" रातुल एक-एक कदम सीढ़ी पर यों रखने लगा जैसे वह बलिवेदी पर अपना माथा चढ़ाने जा रहा हो। बहुत दिनों से सूर्य की रोशनी उसने देखी नहीं थी। डेक पर जाकर चारों ओर आंख दौड़ाते ही उसका सिर चकराने लगा। चारों तरफ धम-धम आवाज़ हो रही है । हवा में तपिश है । समुद्र से हवा सनसनाती हुई आ रही है । समुद्र का रंग कितना गहरा हरा है ! देखने से ही भय का बोध होता है। यह कैसा दृश्य है । डरावना, बीभत्स रूप । चारों तरफ कहीं मिट्टी के टीले का नामोनिशान तक नहीं । बीच-बीच में मात. कुछ सफेद और काले परिदे दूर से उड़कर आते हैं, जहाज़ के ऊपर २६ बैठते हैं और फिर उड़कर चले जाते हैं । एकाएक समुद्र में कूदकर मछलिया पकड़ते हैं, फिर उड़कर जहाज़ पर बैठ जाते हैं। किन्तु तब उस ओर देखने का वक्त उसके पास न था। सामने और पीछे से लोगों का आना-जाना लगा हुआ था । कोई उसे छद्मवेश में पकड़ ले तो जल जाने की नौबत आ जायेगी। हवालात में सड़ना पड़ेगा। शायद रसोईघर वह रहा । प्याज और मांस की गंध आ रही है । यर्दी में लस एक गोरा उधर ही जा रहा था । सामने आते ही रातुल उसे सलामी दी। साहब सिर हिलाकर चला गया। महराज लेकिन भादमी के लिहाज से भला निकता । ज्यादा वातूनो नहीं है । बस सिर्फ एक बार ही कहा, "तुम्हे इतनी देर हो गई भोम्बल ?" "नीद जरा देर से टूटी, महराज जो!" इतना कहने के बाद फिर कोई दूसरा सवाल नहीं किया गया। महराज अपने हाथो से रसोई बनाने और रात-दिन बीड़ी पीने में ही मशगूल रहता है। देह से पसीने की धूदें गिर रही हैं। लाल मिर्च, धनिया, हल्दी, प्याज वगैरह निकालकर दिया । प्रोफेसर नित्यानन्द सेन ने जीवन में कभी सोचा भी न होगा कि उनके जैसे बड़े आदमी के इकलौते पुत्र को किसी दिन जहाज के रसोईघर मे बैठकर मसाला पीसना होगा । फिर भी क्योंकि पटना-धक के कारण एक दिन उसने बंदूक के कुदे को पकड़कर गोली छोड़ने का प्रयास रिया था और भाग्यवश जापानियों की कृपा के कारण मिट्टी कोडने से लेकर तमाम किस्म के कामो की शिक्षा प्राप्त की थी, इसीलिए आज यम के भार से उसने अपनी चेतना नहीं खोई। "आज यह कैसा मसाला पीसा, भोम्बल ! यूष महोन नहीं हुआ है." उंगलियो से छू-छकर महराज ने नाराजगी जाहिर फो, "समता है. कर तुमने-फिर नशाखोरो को यो।" क्या उत्तर दे, सोच पाने में अपने आपको असम पाकर उसने एस जार का सहारा लिया। "नहीं महराज जी,” उसने कहा, "कस गोराम रा रा र दराते, दवाते मेरी नाड़ी दुखने लगी है।"

" - महराज गुस्से में आकर बोला, "यह बात है ! एक क्षण चुप रहने के बाद फिर कहा, "चलो, कप्तान साहब के पास चलो । कह सकोगे जो मुझसे कहा ! कहोगे न ! देखना, गोदाम बाबू की नौकरी आज मैं ले वैलूंगा । लो, चलो, कप्तान साहब के पास चलो।" "नहीं महराज जी, मेरी नौकरी चली जायेगी।" रातुल ने अनुनय-भरे स्वर म कहा। "अच्छा तो फिर जाओ, मगर तुम देख लेना, भोम्बल, गोदाम बाबू की नौकरी मैं लेकर ही छोडूंगा। तभी मेरा चटगांव के ब्राह्मण का लड़का होना सार्थक होगा। दाल क्योंकि कड़वी हो गई थी इसलिए पिछले महीने गोदाम वावू की रपट की वजह से मुझे आठ आना जुर्माना भरना पड़ा था । लेकिन मैं भी मजा चखाऊंगा। किसी दिन रंगे हाथ पकड़वा दूंगा। भंडारघर के नौकर से पैर दबवाने का तुम्हें मजा चखाता हू क्रोध के अतिरेक के कारण लंबी छोलनी को देगची के अन्दर डालकर खट-खटाक्, खट्-खटाक् आवाज़ करने । ... लगा। । "और कहता क्या है, मालूम है !" झटपट वीसेक लालमिर्च चने की दाल में डालकर महराज ने कहा, "और कहता क्या है कि मैं ज़मींदार वंश का हूं। कि एक सो आदमी के लिए इस वक्त और एक सौ आदमी के लिए उस वक्त मेरे घर में पत्तल विछता है, कि मेरे गुहाल में अभी भी तीस गायें हैं।" दाल नीचे उतारकर थोड़ी-सी चख ली। उसके बाद एक मुट्ठी नमक डालकर छोलनी चलाने लगा। "तुम्हीं सोचकर देखो, भोम्बल ! अगर तुम इतने बड़े ज़मींदार हो, तुम्हारे घर में इतनी-इतनी गायें हैं, दूध, घी, मक्खन, मांस, मछली इतना प्यादा खाने की तुम्हें आदत है तो मामूली मिर्च का कड़वापन तुम्हारे पेट को वरदाश्त न हुआ? सवेरे से तीस बार तुम्हें पाखाना हुआ "मैं कोई नया रसोइया नहीं हूं," एक क्षण रुककर महराज फिर कहने लगा, "डंकन साहब जव इस जहाज का कप्तान था, तव एक दिन मुझे क्या सूझा, कहूं? मुर्गी की करी अच्छी तरह से पकाई । जाड़े का दिन था, बड़े दिनों की छुट्टी, नये साल का पहला दिन ! झमाझम बारिश हो रही थी।

शाम सात बजे रसोई पकाना पत्म हो गया। आठ बजे साह्य पाना पाने चंठा । पाकर इतनी तारीफ की, इतनी कि फलहारी से पूछना। बंजू को भी मालूम है । ऐमी तारीफ को "मेरी मोर पचास रुपये बढ़ा दिए । आदमी थे तो यस वे लोग ही थे। न तो अब वैसा यक्त रहा और न उस तरह के आदमी।" "तुम्हें भूख लगी है क्या ?" अपने मुंह में मास का एक टुकड़ा डालकर महराज ने पूछा। "लो, ड्राम की ओट में बैठकर या लो। अभी-अभी खानसामा मा चला।" एक छोटी कटोरी में थोड़ा मांस, दो अदद मालू के टुकड़े और जहर की तरह कढ़ आ शोरवा डालकर उसकी ओर बढ़ा दिया। "कहो, कसा लगा? कड़ा है ?" कड़वेपन के कारण रातुल को हिचकियां भाने लगी। फिर भी उसने कहा, "अहा-हा, तुम्हारी रसोई बड़ी मजेदार है, महराज जी!" "थोड़ा और दू?" महराज अच्छा आदमी है । खुशामद करने से गद्गद हो जाता है। घाने-पीने के बाद बाल्टी लेकर ड्राम में पानी भरना पड़ा। काम समाप्त होने पर गोदाम वायू के कमरे मे जाने की बात है । मालूम नहीं, कमरा किधर है। रसोईघर से निकलने के बाद रातुल क्या फरेगा, यही सोचने लगा। इस तरफ से टहलते-टहलते उस तरफ चलू । आसपास के आदमी काम की वजह से इधर-उधर आ-जा रहे हैं । बगल के एक आदमी ने एकाएक रुककर पूछा, "क्यो जी, पहपाना ही नहीं ? नशे में हो क्या ?" "बुरा मत मानो मया, युरा मत मानो..." और रातुल उसकी वगल से होकर निकल गया । पोड़ी देर और हो जाती तो वह पकहा जाता। लेकिन गोदाम पावू का कमरा जय तक नही मिल जाता, चंन नहीं मिलेगा । जाते- जाते एक जगह उसने लकड़ी की दीवार पर लिया देखा : 'स्टोरकीपर।' अन्दर घुसे कि इसके पहले ही किसी ने पुकारा, "यह रहे लाटसाहब भोम्बलदास! इतनी देरी क्यो की ?"

. प्रणाम-पांती कर रातुल आगे बढ़ा और बोला, "महराज के कामों के ते थोड़ी देर हो गई।" गोदाम वावू झुंझला उठे। चश्मे का फ्रेम नाक पर और ज्यादा खिसक या। बोले, "अगर भलाई चाहते हो तो महराज की वात पर ज्यादा मत चा करो। पिछले महीने आठ आना जुर्माना किया था। अवकी तुम्हें भी जुर्माना करूंगा..." "अयं, बैठ क्यों गए? पैर दावना नहीं हैं ? सब भुला बैठे!" गोदाम बाबू फिर से झुंझला उठे। बोले, "आज तुम बहुत अच्छी तरह दाव रहे हो ! नींद आने लगी।" फिर अपने आप बुड़बुड़ाने लगे, "यह कोई तुम्हारे महराज की तरह खड़े-खड़े काम करने जैसा काम नहीं है । मेरी तरह अगर दिन भर चक्कर काटना पड़ता तो पढ़े की समझ में वात आती। देख रहे हो न, एक बार ऊपर जामओ, एक बार नीचे । इत्मीनान से पल भर भी खड़ा होने न देगा। गोदाम का काम बड़ी झंझट का काम है।" कुछेक क्षणों के बाद गोदाम वाबू की नाक घर-घर बजने लगी। लेकिन वैसी स्थिति कुछ ही क्षणों तक रही। उसी तरह लेटे-लेटे वोलने लगे, "ठहरो भोम्बल, दो-चार दिन धीरज घरो। तुम्हारे महराज की नौकरी में ले बैलूंगा । फिर वही बात ! मुझसे चालाकी? कहता क्या है कि मैं रिश्व लेता हूं। महराज ने तुमसे यह कहा है नहीं, बताओ तो सही।" "कहा है हुजूर !" मजा देखने के खयाल से रातुल ने आहिस्ता से कह "देख रहे हो न, चटगांव के ब्राह्मण का वह बच्चा कितना शतान है ही दया में आकर उसकी नौकरी लगा दी थी। दुनिया में आदमी की भ नहीं करनी चाहिए।" "आपने नौकरी लगा दी थी? वह तो कहता है कि डंकन स जमाने से है।" रातुल ने उसे उकसाने के खयाल से कहा। "फिर सुनो, खाना नसीव नहीं हो रहा था, बदन की हाड़-हाड़ निकल आई थी, फटेहाल की तरह बर्मा की सड़कों पर भीख मांग था। एक दिन मैं बंदरगाह के सामने घूम-फिर रहा था। लंगड़ात बूढ़ा मेरे पास आया और भीख मांगने लगा। जानते हो, हम लोग ठ . ४० के जमीदार। बाबू जी के नाम के कारण अभी भी वाघ और बकरी एक पाट मे पानी पीते हैं। गोदाम भावू की नौकरी तो शौक से कर रहा हूं। लेकिन हम सोगों को तवयित का कोई मुकावला नहीं कर सकता। यही वजह है कि गरीव भादमी पर नजर पडते ही मैंने उसके हाप में एक रुपया पमा दिया । देते-न देते यह शैतान मेरे पैरों पर गिरकर लोटने लगा। बोला : कोई नौकरी दिला दीजिए बाबू जी। मैंने कहा : कौन-सा काम कर सकते हो? उसने कहा हर तरह का काम कर सकता हूं हुजूर! सो दया से पिपलकर इसी वन्दे ने उस जमाने में दस रुपये तनपा पर पिउन की नौकरी लगा दी। अव.. अब देह में कितनी चिकनाई आ गई है ! बदन में खुशबूदार साबुन लगाता है, टेढ़ी मांग काढ़ता है । साफ रुमोज पहनता है । देख-सुनकर हंसते. हंसते मरा..." एक क्षण चुप रहने के बाद फिर मोठी धावाज में बोले, "याज बड़ा ही आराम महसूस हो रहा है, भोम्बल । इसी तरह हर रोज दावना पर दाबता पा तो बंगु । लड़ाई के पहले की बात है~सन् ३५ को। पर दाबना दावना न होकर सहलाना हो जैसे । अव जमाना कितना बुरा आ गया ! न तो वह पर का दावना ही रह गया और न वैसे आदमी ही। पर, तुम बैठो, हां, यहां बैठे रहो, और बैठे-बैठे रेडियो सुनो।" बगल के हॉल में रेडियो है। गोदाम बाबू ने जोर से चिल्लाकर कहा, "धर्मदास !" "रेडियो एक वार खोल दे और यंगता गीत वजन दे।" गोदाम बाबू पीठ के बल लेट गए। यगत के कमरे में रेडियो वजने लगा। वंगला गीत हो रहा था । बड़ा ही अच्छा लगा। गीत सभवतः समाप्ति पर पा। एकाएक कानों में आवाज आई- 'यह आकाशवाणी कलकत्ता है। अगले कार्यक्रम प्रसारित करने के पहले एक घोषणा की जा रही है : कल रात भारतीय समय साढे पाठ बजे डॉक्टर नित्यानन्द सेन एम० ए०, पी.एच. डी.... रातुल ध्यान लगाकर मुनने लगा।

'डॉक्टर नित्यानन्द सेन, एम० ए, पी-एच० डी० परलोक विद्या से अपने विशिष्ट अन्वेषण के संदर्भ में भाषण देंगे। उनके एकमान पुन तुल सेन ने विश्व युद्ध में वीर की तरह हंसते-हंसते प्राण न्योछावर किया पने उसी प्राणों से प्रिय पुन से वह संपर्क स्थापित करके बातचीत करते उसी के संदर्भ में चर्चा करेंगे...' ५ . - रातुल का सिर जैसे चकराने लगा। कितने दिन, कितने महीने और कितने बरसों के बाद वह अपने पिता के गले की आवाज़ सुन पाएगा! लेकिन ऐसी गलती कैसे होती है ? यह कैसे संभव होता है ? रातुल तो मरा है नहीं। वह तो जिन्दा है । न केवल जिन्दा है, बल्कि वह अपने बाप के पास लौटकर जा रहा है । पहले से ही खबर भेजने की कोई जरूरत नहीं। एकाएक वह पिता के सामने उपस्थित होकर उन्हें चौंका देगा। कितना मजा आएगा! जिसके संदर्भ में इतना शोर-शरावा मचा हुआ है, वह असल में मरा नहीं है । क्या ही मजा आएगा! हां, क्या ही मज़ा! खुशी से रातुल की इच्छा हुई कि वह तालियां पीटे । इतनी तकलीफ जैसे तकलीफ के तौर पर उसे महसूस ही न हुई। अभी यदि वह बाबूजी को एक पत्र डाल दे तो हजारों रुपये उसके पास चले आएं। गोदाम बाबू उठकर बैठ गए। बोले, "तुम्हारी दरख्वास्त मैंने रेकमेन्ड कर दी है। समझे ! किस चीज़ की दरख्वास्त ? रातुल को घबराहट का अहसास हुआ। "साहब ने पूछा था कि यह नौजवान कैसा काम करता है। मैंने कहा वेरीगुड । साहब ने फटाफट सेंक्शन कर दिया। अब मुझे क्या खिलाते हो 'तुम्हारा दो रुपया माहवार बढ़ गया। खिलाओ..." तव रातुल के दिमाग में कुछ भी नहीं समा पा रहा था। कहां कि माहवार दो रुपया बढ़ा और कौन खिलाए ! एकाएक उसे शंभुनाथ ले वह मकान याद आया। वावूजी के पढ़ने का कमरा, जहां सामने रातुल मुझे कुछ ४२ । फोटो है बाबूजी वहां कॉलेज से लौटने के बाद वैठकर लिखा करते थे। याद थापा, गाम आठ बजे का गाना याना-एक साम, एक ही मेज पर बैठार। जिस दिन रातुल को सौटने में देर हो जाती उस दिन वह रातुल के लिए बहुत देर तक बैठकर प्रतीक्षा किया करते थे। जब रातुल लोटकर पाता, दोनो जने एक साथ भोजन करते थे। बीच-बीच में पुकारते थे, "गोविन्द, मो गोविन्द..." गोविन्द आफर सामने खड़ा होता था। बापूजी कहते, "अभी तुम क्या काम कर रहे हो?" "काम तो है, मगर क्या करना है, कहिए!" "पयादा दूर नहीं, बस ट्राम के रास्ते के मोड़ पर जाकर देख तो आओ कि मुन्ना आ रहा है या नहीं।" फिर जब गोविन्द चला जाता, यह एकबारगी खिड़की के पास चले माते थे और झाक-झाककर देखते रहते थे । जाने किसके पैरों की आहट हो रही है । पैरों को बाहट टोक मुन्ना की-मी है । फिर मुन्ना मया मा गया ! शांत और गंभीर उनके जैसे व्यक्ति ने हृदय के तल प्रदेश के सबसे कोमल स्थान को मुन्ना के लिए सुरक्षित रख छोड़ा था। किन्तु एकांत गोपन में रक्षित उस बहुमूल्य वस्तु को डाक लूटकर रो गए। रातुल ने उस डरावने दिन की कल्पना करने की कोशिश की, जिस दिन सैनिकों से भरा जहाज मोंपू बजाकर खिदिरपुर डॉक से रवाना हुआ था । उस जहाज को इस बात का पता भी नहीं चला कि वह अपने निष्ठर हाप से किसी का सायूत कलेजा छीनकर लिए जा रहा है। लेकिन कल ? छत्तीस घंटे और बाकी है। ये छत्तीस घंटे से व्यतीत होंगे? मेसे वह इस समय-सागर को पार करेगा ? एकाएक गोदाम यायू की पुकार आई, "अरे, क्या बात है ! तुम रो रहे हो, भोम्बल ?" इस तरह पर अपनी मोर पोच सकता है, मन इस तरह चंचल हो सकता है-इसके पूर्व रातुल को कभी इसका बोध न हुआ पा । कहां वह शंभुनाय पंडित लेन! कहां कलकत्त के किसी एक कोने का एक दोमंजिला भवन ! दिशाहारा नाविक को भाज ये ही अलोक-स्तंभ की तरह लोभनीय प्रतीत हुए। सारा दिन परिश्रम में ही व्यतीत हुआ।

महराज का मसाला पीसना पड़ा, कमरों में झाड़ लगाना पड़ा, गोदाम वूि का पैर दावना पड़ा और फिर दो व्यक्तियों के कलह के बीच संपर्क- न बनकर पराई निन्दा सुननी पड़ी। सबसे आखिर में महराज के पास ट भर कड़ा मांस खाने को मिला। परिश्रम और भोजन के बाद दोनों पर जैसे अवश हो गए थे। बीच में भोम्बल के लिए छिपकर खाना ले जाना पड़ा था। उसके बाद जहाज़ के तल- घर में अंधेरे के साये में पैकिंग केस पर खुद को निढाल छोड़कर वह गहरी नींद की वांहों में वेहोश हो गया। कल रात साढ़े आठ बजे! रात साढ़े आठ बजे... सागर की सीमा का अतिक्रमण कर.. देश-काल की दीवारों को लांघ- कर निद्रा की तरंगें लुढ़कती हुई दुर, बहुत दूर निकल गई। इस अशेप यात्रा का एक दिन अन्त होगा। प्रतीक्षा का अन्त होगा। तब रातुल के आकाश में पुनः सूर्योदय होगा। तब रास्ते के सफर का अन्त होगा। सवेरे भोम्बल आया । उसके चेहरे पर गंभीरता की छाप थी । ज्यादा वातचीत नहीं कर रहा था। इतना ही कहा, "अजी बंगाली होकर भी तुमने यह सर्वनाश किया?" "मैंने सर्वनाश किया !" रातुल के आश्चर्य की कोई सीमा न थी। भोम्बल ने कोई जवाब न दिया। गंभीरता ओढ़े चुपचाप बैठा रहा। सामने बढ़कर रातुल ने घबराहट-भरे स्वर में पूछा "मैंने तुम्हारी कोन-सी हानि की ?" भोम्बल के मुंह से बहुत देर तक आवाज नहीं निकली। इतना बातूनी आदमी भी जैसे मौन होकर मुरझा गया है। जैसे सचमुच उसकी बहुत बड़ी हानि हुई है। "मैंने क्या किया, बताओ न भाई!" रातुल के अनुनय में उद्विग्नता भरी थी। "चूंकि मैं तुम्हें खाना देता था, बंगाली होने के नाते तुम्हारा आदर करता था, इसीलिए मेरा ऐसा तुमने सर्वनाश किया! इसमें तुम्हारी ही कौन-सी गलती है, यह तो हम बंगालियों में ही दोप है। अगर तुम सगे भाई भी होते तो मैं तुम्हें कत्ल कर डालता। मगर तुम मेरे होते ही कौन हो जो तुम पर विगह तुम्हें मार-पीढूं? कलकता पहुंचने के बाद तुममें मुममें कोई रिता नहीं रह जायेगा। हम एक-दूमरे के लिए बजनबी हो जाएंगे। फिर मारी झमट खत्म..." हतम-सा पड़ा रातुल भोम्बल की बातें सुनता रहा। "मां-बाप तो दूर की बात, बचपन से अपना कहार मैंने किसी को जाना नहीं। गुटों के दल में पला । लाटू गुंडा कहा करता था कि वह मुझे बाउट- रामघाट पर पड़ा देखकर उठाकर ले आया था। पता नही, मेरे मां-बार जिन्दा हैं या नहीं। और जिन्दा होंगे भी तो मुझे क्या पहचानेंगे? या हो साता है कि इसीलिए उम तरह फेंक दिया या निमसे पहचानने की जरूरत न पड़े। कमी-कभी बहुत.." इतना कहकर भोम्बल जमे किसी चिन्ता मे देव गया। अपनी बात के म को उसने पूरा नहीं किया। रातुल सामने के पैकिंग केस पर यामोग बैठा "मैंने तुम्हारी कौन-सी हानि को, वतामो न !" रातुल ने फिर सवाल दिया। "कहता हूं..." और मोम्नल ने कहना शुरू किया, "मुनो, हमारे गोदाम बाबू यांटली के जमीदार वंश के पुत्र हैं या नहीं, मालूम नहीं। यह भी मालूम नहीं कि मह- राज वर्मा की सड़कों पर भीख मांगते चलता था या नहीं। फिर भी इतना जरूर मालूम है कि मैं जैसे बाढ़ के पानी में बहकर आया था." .."इसीलिए अब किमी को यहते हुए देखता हूं तो प्राण कलपने लगता है । मैं गुंडों के बीच पला- बड़ा। माटू गुंडा ने अपने पुत्र की तरह मेरा लालन-पालन कियापा। सोचा था, बड़ा होकर मैं उमी की तरह नामी गुंडा होऊंगा. लेरिन उसकी उम्मीद अपूरी ही रह गई । हाय को मफाई की कला वेगक अच्छी तरह मोस गया था, आदत बनाए रखता तो साटू को मात कर देता, इसमें संदेह की कोई गुजाइश नहीं, मगर मेरा यून भरसक अलग ही जाति का है। ऐसी बात नहीं होती तो छोटे-छोटे बच्चो के गले से हार छीनने में मेरा कलेजा दहल क्यों उठना ! यही वजह है कि एक दिन मुढो को जमात मे-लाट गुडे की सीमा से बाहर भाग गया।"

रातुल अवाक् होकर सुन रहा था । “उसके वाद ?" उसने पूछा। एक पल चुप रहने के बाद भोम्बल ने फिर कहना शुरू किया, "तुम गों के मां-बाप हैं । इसलिए यह वात तुम लोगों की समझ में नहीं आयेगी । वह कितना वेधक होता है-दुनिया में अकेला होना कितना वेधक होता ! उफ, इतने बड़े आदमी के लिए दुनिया में कहीं कोई पीछे का आकर्षण नहीं है ! दुनिया से हार मानकर जो निकल पड़ता है, सिर्फ वही इस बात को जान सकता है। उसके बाद कितनी ही रातें इसलिए आउटराम घाट में चक्कर काटने और उसके दोनों किनारों पर आंख टिकाए रखने में गुजारी हैं कि मां को पहचान लूं । मोटरगाड़ी के अन्दर, चूंघटों की फांक के अन्दर झांककर अपनी आंखों से मां की खोज की है । फुटपाथ के भिखमंगों के चेहरों से अपने चेहरे का मिलान किया है । अपनी मां की तलाश में कितने ही अड्डों पर रातें गुजारी हैं । आखिरकार एक दिन मां मिल गई..." "मिल गई ?" रातुल ने हैरत में आकर पूछा। "हां, मिल गई, स्ट्रैड रोड के मुहाने पर मेरी मां मिल गई। सड़क पर बैठी-बैठी दहाड़ मारकर रो रही थी। चारों तरफ जमघट लगा था और उसके सामने मोटर से दवा एक लहूलुहान मरा वालक- 'मैं समझ गया, ही मेरी मां है।" रातुल ने पूछा, "कैसे समझे कि वह तुम्हारी मां है ?" भोम्बल ने उस बात का सीधा जवाब न दिया। पल भर के बाद वोल "सिर्फ दस महीने पेट में ही रखने से कोई मां हो जाती है ? तुम वेवफ् ..."खैर, उस मां को सड़क से उठाकर घर ले आया..." वात करते-करते भोम्बल बीच में चुप हो गया और फिर कहना किया, "मगर मैं तुम्हें यह सब कहने गया ही क्यों? तुम मेरे होते ही हो ? तुमसे मेरा झगड़ा हो चुका है । थोड़ी-सी और देर हो जाती ते मेरी नौकरी ले बैठे थे।" रातुल बोला, "मैं कैसे तुम्हारी नौकरी ले रहा था ?" भोम्बल उठकर खड़ा हो गया और बोला, "अभी वह सब बातें कर मेरे पास वक्त नहीं है । अब अपने खाने-पीने का खुद ही इन्तज़ाम राम नाम जपो । अव इस बंदे से किसी का कोई रिश्ता नहीं। जन ।

अपनी मां ही जब छोड़कर चली गई तो फिर तुम जैसे परापे का क्या विश्वास ? न तो तुम्हारा नाम मालूम है और न ही धाम । तुम मेरा सर्वनाश करोगे, इसमे अचरज की कौन-सी बात है ?" इतना कहकर मोम्बल ऊपर की ओर चला गया । सव कुछ सुनने के बाद रातुल के मन में भोम्बल के प्रति स्नेह उमड आया । किसके हृदय में कौन- सी व्यथा छिपी रहती है, इसका पता नहीं चलता । आजन्म पर से परित्यक्त इस युवक में दुनिया बसाने की इच्छा भी क्या नहीं है । हमेशा के लिए वह पया अपने आपको याजोगरी में लाए रपेगा ? रातुल के मन में चिन्ता भी जगी। इस निरापद स्थान को अन्ततः उसे छोड़ना पड़ेगा? फलकत्ते से वह और कितनी दूरी पर है ? दोपहर जब बीत गई, भोम्बल आया। बोला, "फिर वोरिया-विस्तर संभालो।" "कहीं उतरना है?" अबकी जहाज जहां रुकेगा। आधा घंटे के बाद ही अदन आ जाएगा। विस्तर के नाम पर तुम्हारे पास एक पादर तक नहीं है। दिन भर विना पाय- पिये रहो। एक धोती और एक अंगोछा लेकर जहाज से उतर जाओ। उसके बाद परदेस में रास्ते-रास्ते भीष मांगकर मरो। मुझे क्या ? मैं क्यों चिन्ता थारूं ?तुम मरो या जियो, मैं तुम्हें देखने नहीं आ रहा हूं। मैं तो माराम मे हूं। मेरे लिए जय किसी को फिक्र नहीं तो फिर मैं ही पयो किसी के लिए फिक मारूं? तुम तो मेरी नौकरी लेने पर अमादा हो गए थे।" "तुम्हारी नौकरी में कव छुड़ा रहा था?" "तुम्हें मैंने बार-बार कहा था कि मुवह महाराज का मसाला पीसने के बाद सारंग साहब का परदाय देना। कहा नहीं या तुमसे ? उधर यह गुस्से में उपलते रहे कि दिन भर कोई उनका पर दायने नहीं गया।" "मैं तो गोदाम बापू का पर दाव आया हूं।" "श्या यात है ! तुमने मुझे कृतार्य कर दिया । गोदाम का काम करने के लिए धर्मदास उनका नौकर है । तुम उनका पर दाबने क्यों गए ? सारग साहब ने मेरी हाजिरी काट दी। एक दिन की तनया नहीं मिलेगी। तुम दोगे? परियत यही है कि नौकरी नहीं गई।"

कलकत्ता कितनी । । इतना कहकर भोम्बल जा रहा था, किन्तु वह रुक गया और बोला, "अब उतर जाओ, अदन आ रहा है । पराये की भलाई करने का बढ़िया फल मिल गया । बहुत बड़ी सीख मिली है। लेकिन अब नहीं। घर का शनु विभीपणा होता है । अब मन से दूर हो जाओ।" और भोम्बल चला गया। पैकिंग केस पर अकेले बैठकर रातुल सोचने लगा । कलकत्ता है ? बीच सफर में यह कैसी विपत्ति आई! फिर कब किस जहाज़ पर कोई. मित्र मिलेगा, कव भोम्बलदास जैसा कोई युवक उसे भाई की तरह टिकट के बिना इतनी दूर ले जायेगा ? जहाज़ से माल उतारने के लिए गोदाम वावू आए । कुलियों का दल आया और वे बड़े-बड़े पंकिंग केसों को उठाकर ऊपर ले जाने लगे । शाम का वक्त हो रहा था। यहां काफी अंधेरा फैला था। हो सकता है, अभी छह वजा हो। उसके बाद दुनिया की तमाम घड़ियों में साढ़े आठ बजेगा। रेडियो से बाबूजी की आवाज़ बाहर आकर तैरने लगेगी। कितने सालों के बाद बाबूजी उसके नाम का उच्चारण करेंगे। लेकिन रातुल सुन नहीं पायेगा । तव वह किस बंदरगाह में किस हालत में रहेगा, कौन कह सकता है ! चारों तरफ टन-टन आवाज हो रही है । लगता है, जहाज़ बन्दरगाह में लगने जा रहा है। उसके बाद जेटी से लगाया जायेगा। भोम्बल घबराया हुमा आया। उसके हाथ में खलासी की पोशाक थी। बोला, "इसे पहन लो।" भोम्बल ने एक बार रातुल के चेहरे पर दृष्टि स्थिर की। भोम्बल बोला, "मेरी ओर क्या ताक रहे हो ? इस चेहरे पर माया-- ममता नहीं है-हां, कुछ भी नहीं । मेरे प्रति जब किसी में ममता नहीं है तो फिर मैं ही.. आज सारंग साहब ने जब मुझे अपमानित किया तो उस वक्त तुम मेरी रक्षा तो करने नहीं आए भाईजान ! कोई भी बचाने नहीं आया। खैरियत यही हुई कि मैंने सारंग साहब के पैर पकड़ लिए, वरना मेरी नौकरी तो उसी क्षण जा चुकी थी। दुनिया में अव किसी पर यकीन न रहा। और अपनी मां ही जव..." रातुल ने कमीज़ लेकर अपने बदन पर डाली। - ४८ भोम्बल बोला, "जेटी गे पाने के पहले ही नहाल ये बोट गे तुम्हें उतरना है । परने की कोई वाम नहीं, दुगरे-पूरे गमागी भी गरेंगे, उनक माप तुम्हें भी निकाल दंगा।" उनना बहकर भोम्यम पमा गया। बार यह बहाही ध्यान दिया रहा था। नाके बाद नगी संग्री में फर्गत निवासकर भाम्यत ने बार ग पुकारा । अपने पास बुलाकर जहार के रंक पर गया । बोला, "टग मांटी रस्मी की गीढ़ी पकड़कर उतर जाना । टीक उगी सण, अंग और-और. नांग उतर रहे हैं। लामो, टारी !" रामुप ने देखा कि गभी उतर रहे हैं । बा भी समी एकटकर प्रय गया। उगने दुवारा भोम्बम में चहरे पर अपनी रष्टि स्थिर की । भाम्यम रगी की मोर धाक रहा था 1 अपकपाकर उगन थपना मुंह घुमा लिया। इसके बाद पारस्पांप मंडिग की ऊंचाई गे रामी परकर दसरम-टानं गनुल को एकाएक महगुम हया कि वह एक पत्रीय ही व्यक्ति है। भोम्यग नहीने म्नेह के माय ग याश्रय दिया था योर बार टमी ने गर्म पर हाय कर भगा दिया । नीघं गहरा कामा पानी प्रलममा रहा था। छोटी-मी एक मात्र थी। गमी दगी पर रहे थे । नाव नहार ग मटकर पड़ी पी। हवा देल गगतार से बह रही थी। पानी छमछम बावाट करना था जहान में टकरा रहा था । मापानी में नीचे उतरकर गप पाहा। निकट ही गोरगम मे मग महा था। फिनार का दायरे में जगमग रोगनी जल रही थी और हम योर बंधेग मा था। नग हाफ भी गगी ही एक नाव जगी थी। चिल्ला-चिल्लाकर उन योगों में ये मोग प्रिम किनिक भाषा में बातचीत कर रहे थे, मालूम नहीं। याहिम्ना-आहिम्ना नाव बेटी के एक किनारे वाकर यगी। ६ विगाल बंदरगाह । टगक बाद फाटक पार की ही महा। माघी और पौड़ी महका पानी, मारवाड़ी, माहब और कितनी ही मानि आगे बढ़ा। चायघर । खाने-पीने की दुकानें। रिक्शा, मोटर, वस और लॉरी। माल की लदाई हो रही है । फेरीवाले चिल्ला रहे हैं। रातुल को भूख की तीव्रता का बोध हो रहा है। जेब में एक भी पैसा नहीं है। यह कैसी मुसीवत है ! रातुल एक दुकान के सामने रेडियो बज रहा था। अंग्रेजी गीत । अभी के बजा है ? पता नहीं, आसपास कहीं घड़ी है या नहीं। झुककर एक दीवार पर आंखें दौड़ाने लगा। सात बज गया । भव ज्यादा देर नहीं है । साढ़े आठ बजे किसी से कहकर कलकत्ता स्टेशन लगवाना चाहिए। बहुत दिनों के बाद बाबूजी का शांत स्वर वह फिर सुन पायेगा । बाबूजी की प्रशान्त मूर्ति फिर आंखों के सामने तैरने लगेगी। रातुल दुकान के सामने आकर खड़ा हुआ । उस क्षण-विशेष में रातुल . जैसे देश-दुनिया भूलकर बहुत दिनों के बाद फिर से शंभुनाथ लेन के मकान में आकर उपस्थित हो गया। मकान के अन्दर घुसने के पहले वायीं तरफ गोविन्द का कमरा है । गोविन्द रात में वहीं सोता है। उसके कमरे में रस्सी. पर उसके कपड़े-लत्ते झूल रहे हैं। बाहर बरामदे में बत्ती टिमटिमा रही है। शाम होते-न होते गोविन्द ऊंघने लगता है । गहरी नींद में बीच-बीच में वह . चौंक उठता है । बाहर किसी के पैरों को आहट होते ही वह चिल्ला उठता है, "कौन ? कोन जा रहा है ?" वह ठिगने कद का बूढ़ा आदमी है । कब कहां से आकर शंभुनाथ लेन के इस मकान में नौकरी स्वीकार ली थी, किसी को याद नहीं। उसके बाद एक-. एक कर उतना बड़ा मकान खाली हो गया। मां चल बसी, दूर के नाते के जो लोग थे वे भी एक-एक कर विदा हो गए । मकान में रह गए बाबूजी, रातुल और गोविन्द । दोपहर में जव सन्नाटा रेंगता रहता और मुहल्ला खाली हो जाता, सड़क के मोड़ से आइसक्रीम वाले की थकी आवाज़ आती। वह जब दवे पांवों सदर दरवाजे से होकर आइसक्रीम खरीदने जाता, गोविन्द की पकड़ में आ जाता। "कोन जा रहा है?" रातुल चुपचाप निकल रहा था मगर गोविन्द उठ बैठा। ..

रातुल झटपट निकलना चाहता था किंतु गोविन्द उठकर बैठ गया। "कहां जा रहा था, मुला?" "आइसक्रीम खाने।" "जा, अभी जाकर सो रह, नहीं तो बाबूजी से कह दूगा। वेकार को चीजें खाने से वावू नै तुझे मना किया है न !.."आइसक्रीमवाला मरता भी नहीं। इतनी जगह रहने के बावजूद तुम लोग इस मकान के सामने क्यों माते हो?" उसके बाद फेरीवाले से बहुत झगड़ा-टंटा मच जाता । मुहल्ले के लोगों का जमघट लग जाता था। फिर वह रातुल को समझा-बुझाकर कमरे में सुला देता और खुद अपने कमरे में जाकर सो जाता था। वहा उस अदन बन्दरगाह मै अनेकानेक अजीब आदमियों की भीड़ में खड़ा होकर रेडियो का गीत सुनते-सुनते रातुल स्वयं में खो गया। सड़क, मादमी, पहाड़, पानी, मैदान मब कुछ पारकर कव रातुल अपने आवास के उस एकात स्थान में पहुच गया, उसे याद नहीं रहा । एकाएक कंधे पर किसी के हाथों का स्पर्श महसूसकर रातुल पीछे को तरफ मुड़ा । मुहते ही वह आश्चर्य में डूबने-उतराने लगा । "तुम? यहां ?" उसने पूछा। भोम्बल चुप्पो ओड़े रहा। रातुल ने फिर दुवारा प्रश्न किया, "तुम ? फिर लौट क्यो आए?" "इसलिए कि मन उदास हो गया ।" रातुल के कंधे पर हाय रखकर भौम्वल ने कहा, "तुमको भगा देने के बाद मेरा मन हाहाकार कर उठा : कोई कुत्ता या दिल्ली नहीं पा । बादमी को यों भगा दिया? लगा, में मां के द्वारा प्रताड़ित बालक हूं, इसलिए मेरी बात अलग है। तमाम दुनिया मेरे लिए पराई है, मगर तुम तो पैसे नहीं हो..." पलभर चुप रहने के बाद वह कहने लगा, "वहरहाल तुमसे जो कहा है, उसे भूल जाओ। हमारा जहाज रात साढ़े नौ बजे रवाना हो रहा है। तुम उसके पहले ही चले आना। मैं तुम्हारे लिए जहाज के फाटक पर खड़ा को तुम ।" भोम्बल की बातों ने रातुल को आश्चर्य में डाल दिया। यह मेघ और का अगल-बगल रहना जैसी बात है । वह विलकुल आश्रयहीन नहीं है। कलकत्ता जाने का एक मौका मिल गया। "फिर मैं अभी चलूं । तुम्हारे लिए रात का खाना रखे रहूंगा। तब तक म-फिर कर इस मुल्क देख लो।" और भोम्बल मुड़ा और वहां से चल दिया। उस तरफ से कोई गाड़ी आ रही थी। हॉर्न की आवाज सुनकर रातुल फुटपाथ पर आकर खड़ा हो गया। निकट ही एक चायघर था। वहां कुछ कुरसियां रखी थीं। किसी ने बगल की कुरसी से पुकारा, "कौन ? हरिदास !" ने बगल की तरफ मुड़ते ही रातुल ने देखा, सलवार पहने हुए, एक व्यक्ति जिसके सिर पर पगड़ी है, उसकी ओर ताक रहा है। "मेरा नाम हरिदास नहीं है ।" रातुल ने कहा । "नहीं है ? आश्चर्य ! विल्कुल हरिदास की तरह देखने-सुनने में, हुबहू "हरिदास कौन है ?" "हरिदास को नहीं पहचानते ? तुम्हारा घर कहां है कलकत्ता ?..'यहां 'किसलिए आए हो?" रातुल ने बताया कि जहाज आया हुआ है और वह कुछ क्षणों के लिए 'घूमने-फिरने निकला है। "आप किस जात के हैं ?" रातुल पूछा, "आप इतनी अच्छी बंगव वोलते हैं, हालांकि पोशाक देखने से लगता है..." एकाएक मन में कुछ सोचकर चाय के प्याले को हाथ में लिए मानस ने कहा, "चाय पियोगे, भाई.. अजी, और एक प्याली चाय देना चाय आई । भलामानस अपने आप बुड़बुड़ाने लगा, "हरिदा ' भारी परेशानी में डाल दिया "हम दोनों ने मिल-जुल कर चाय की की। सोचा था, हम दोनों मित्र एक साथ रहेंगे। वह दुकान की फरेगा और मैं बाहर की। मगर बिना कहे-सुने... उफ कितनी मु ५२ हाल गया..." और भलेमानस का चेहरा निराशा से बुझ गया। रातुल ने चाय के प्याले से घूट लेकर कहा, "वह कहां गए, कुछ खबर मिली है?" "और कहां जायेगा, दिमाग में कोड़े जन्म लेने से जो होता है वही हुआ। बचपन से ही साधु बनने को झोक सवार थी। दसआदमी के षड्यंत्र से भगवान को भी भूत होना पड़ा था। यही लो न, मैं पंजाबी हो गया हूं और उसने गेरुआ बाना धारण किया "वात एक ही है, वरना इतने-इतने मुल्कों के रहने के बावजूद, अपना घर-द्वार रहने के बावजूद इस पाडवजित देश में आकर कही चाय की दुकान करता "एक तरह से बंगला मुला ही बैठा हूं... पंजाबी औरत से शादी करके यही दुनिया बसा ली है."एक बात में अगर कहा जाए तो सब कुछ पा चुका हूं। और हरिदास ठीक इमी समय वितामो मैं क्या करूं..." पल भर के बाद मला आदमी वोला, "बंगाल से अब कोई संपर्क न रहा, यही वजह है कि आहिस्ता-आहिस्ता बंगला भाषा भी भूलता जा रहा हूं.""बीच-बीच में बंगला भाषा या वंगला गीत सुनने को जब इच्छा जगती है तो रेडियो से वह कलकत्ता स्टेशन लगता हूं... आम के बगीचे और बंसवारी की बगल से होकर बूढा शिव के मंदिर में जाने के रास्ते की याद आने लगती रातुल बोला, "जरा कलकत्ता स्टेशन लगाइएन । बहुत दिनों से मुझे बंगला गीत सुनने का मौका नहीं मिला है।" "ठीक है.. अरे, रेडियो का स्विच घुमाकर कलकत्ता लगा दे तो..." गोदाम बाबू के कमरे में रेडियो से बंगला गीत सुना था और आज फिर मुनने का मौका मिल रहा है। ऐसा मौका इस तरह हासिल होगा, इसकी जानकारी न पी। भले आदमी ने एकाएक कहा, "तुम तब तक गीत सुनो भाई जी, मैं जरा उस तरफ देखभाल करूं..'सामने न रहने पर पढ़े चाप और कटलेट दना- दन मुह में डाल देंगे..." तब कलकत्ता स्टेशन से गीत प्रसारित हो रहा था। सात समुद्र तैरह नदियों के पार से गीतो के परिन्दे झुड बाधकर आकाश में उड़ रहे थे।

म आसमान में तारे डने पसारकर उड़ रहे थे। लगता है, अदन के बंदर- में आकर वे नीड़ का निर्माण करेंगे। रातुल की आंखों के सामने से काला दा एक निमिप में हट गया और कोलाहल से भरी चाय की दुकान के मने के फुटपाथ की कुरसी पर बैठे हुए उसे लगा कि वह उन परिन्दों के तों के पंखों का सहारा लिए कलकत्ता शहर के बीच पहुंच गया है । वहां जो लोग रहते हैं, वे उसके आत्मीय हैं-परम आत्मीय ! और कितने क्षण बाकी ही हैं ! अब कितने क्षणों के बाद उसके संपूर्ण मन को आश्चर्य में डालकर सामने पड़े रेडियो से उसके पिता का कंठ-स्वर तैरता हुआ आयेगा? लंबे अरसे से अनदेखे अपने पुत्र की बातें फिर से उनके भाषण में करुण और सुंदर होकर व्यक्त होंगी। फिर साढ़े आठ बजा। दुनिया के किसी कोने में कहीं भी अगर तलाश की जाए तो अभी, इस वक्त संभवतः अंजुरी भर भी वायु न मिलेगी। लगता है, दुकान की तमाम वत्तियां एक साथ गुल हो गई हैं। दुनिया के दूसरे-दूसरे तमाम आदमी कहीं एक क्षण के अन्तराल में अदृश्य हो गए हैं और दोनों कोनों पर मात्र दो व्यक्ति जीवित वच गए हैं-एक कोने में रातुल और दक्षिण सीमान्त के परले छोर पर रातुल का पिता। आरंभ में बहुत देर तक आविष्ट रहने के पश्चात् आहिस्ता-आहिस्ता रातुल की चेतना वापस आई। चुप्पी साधे व सुनने लगा। "मुझे दिव्य दृष्टि उपलब्ध नहीं है अतः मुझमें ब्रह्मज्ञान की स्पर्धा नहीं है । मान विज्ञान और तर्कशास्त्र के सहारे मेरी समझ में जो वात है, आज मैं वही आपसे कहने जा रहा हूं। मेरे पुत्र रातुल के देहावस मेरे जिस दुर्भाग्य का सूत्रपात हुथा, दुनिया के तमाम आदमियों के भ प्रतिदिन वह दुर्भाग्य घटित हो रहा है-यह बात सोचने पर मन को ब शान्ति मिलती है। लेकिन यदि हम यह भी सोचें कि मृत्यु के परे भी अस्तित्व है, कि मरने के बाद हम एक अमर लोक में जाकर अपने-अपने से साक्षात्कार करेंगे तो हमारी सांत्वना की नीव और भी मजबूत है । हमें इस जीवन के दुख-कष्टों के बीच एक अतुलनीय सांत्वना मिलेगा' 'मेरा पुत्र रातुल आज से सात वर्ष पहले लड़ाई में घा अजनबी, अनदेखे शनुओं की गोली से किस दूर देश में उसकी सांसें खो गई थीं, मुझे इसका पता भी नहीं मिला। एक दिन जो लड़का मुझे बिना कहे युद्ध के मैदान में चला गया था, उसको मृत्यु की सूचना मुझे तार से मिली। छोटा- सा तार आया था। मगर मेरे कलेजे पर जैसे वचपात हुआ। न जाने, कितने दिनों तक मैं शय्याशायी रहा। पली बहुत दिन पहले ही स्वर्गगता हो चुकी है, मगर पुन-शोक ने मुझे विचलित कर दिया। विश्व के अनन्त भंडार में सीमाहीन ज्ञानराशि बिखरी पड़ी है, उसकी तुलना में हम लोगों का मौजूदा विश्व से संबद्ध ज्ञान कितना तुच्छ है, उसकी थोड़ी-बहुत उपलब्धि हमें तभी होती है जब हम उस परम सत्ता और उसके नियमों के संदर्भ में सोचते- विचारते हैं । सृष्टि के रहस्यो को हम किसी दिन उद्घाटित पाएंगे या नही, मालूम नहीं, लेकिन उसे समझने के पहले हमें इस बात को समझ होनी चाहिए कि वह कौन है जिसे हम 'मैं' कहा करते हैं । यह 'मैं' मात्र दैहिक पग-प्रत्यंग या इंद्रियों की समष्टि नहीं है। रातुल मौन मे डुवा अपने पिता के शब्दो को सुनता रहा। झुछ उसको समझ में आया, कुछ नही आया । भाषण के हर स्तर मे रातुल को अपने पिता की मूर्ति साफ-साफ दिख पड़ी। मृत पुन के शौक से आविष्ट एक व्यक्ति अपने पुन का ध्यान रात-दिन कर रहा है-उसी विषय के संदर्भ मे अनुसंधान कर रहा है। उसके पिता का स्वर पुन. तैरने लगा : ..."उसी पुन से मेरी प्राय. हर रोज़ मुलाकात होती है। उसकी अशरीरी आत्मा मेरे निकट आकर प्रबल तृप्ति पाती है । रातुत मेरे सामने अपने मन के भावों को जाहिर करता है, अपनी विदेही-दृष्टि से मेरी ओर ताकता है । मुझे यह स्वीकारने में तनिक भी झिझक नहीं हो रही है कि मैं रातुल को बेहद प्यार करता था, लेकिन आज मैं आपलोगों से जो कुछ कहने जा रहा हूं, उससे आपको समझ में यह बात आ जायेगी कि मैंने अंघ संस्कारवश किसी चीज को नही माना है "मेरे दोस्त-मित्रों मे से अनेकों ने रातुल को देखा है। आज भी अगर उससे पूछता हूं कि उन दिनो की बातें उसे याद हैं या नहीं तो वह साफ-साफ उत्तर देता है । जो इस दुनिया में सशरीर मौजूद नहीं है, जिसके पार्थिव हृदय का अभी तक विलयन नहीं हुआ है, मेरी खोज उसी अपने मृत पुन रातुल के संदर्भ में जारी है."रातुल अव इस धरा-धाम में नहीं है।" किन्तु उसको आत्मा के निकट अपनी पहुंच के कारण मैं उसके शोक को थोड़ा बहुत भूल चुका हूं..." भाषण के अन्त में रेडियो से प्रसारित किया गया : "इतनी देर तक आपने जिनका भाषण सुना वह हैं प्राध्यापक नित्या- नन्द सेन । दर्शनशास्त्र के पद को त्यागकर फिलहाल वह परलोक के संबंध में अनुसंधान कर रहे हैं । इस अनुसंधान के कारण हिन्दुस्तान के अनेक विश्व- विद्यालयों ने उपाधि प्रदान कर उन्हें सम्मानित किया है । श्रोताओं के अनुरोध की रक्षा करने के लिए अगले महीने हम पुनः उनके भाषण का आयोजन करेंगे..." यह किस तरह होता है ? कैसे यह संभव हो पाता है ? बैठे-बैठे रातुल भावना में तल्लीन हो गया। वाचूजी का तमाम चिन्तन, कल्पना, प्रतिष्ठा उसको केन्द्र मानकर यानी रातुल की मृत्यु पर आधारित है । पहले मान लिया गया है कि रातुल की मृत्यु हो गई है, उसकी वाद खोजों का सिल- सिला चल रहा है ! क्या रातुल के बाबूजी ही सही मार्ग पर हैं और रातुल गलत मार्ग पर ?दरअसल रातुल की मौत हो चुकी है । उसने जो कुछ किया है, जो कुछ देखा है, सव-का-सव भौतिक है । ये लोग सभी बेशक आदमी हैं- यह भोम्बल, यह हरिदास का मित्र, जो चाय की दुकान का मालिक है, वे भी आदमी ही हैं। इसके अतिरिक्त वह अस्पताल, डॉक्टर, बूढ़ी नर्स सभी आदमी हैं। रातुल ने अपने पैरों के तलवों की ओर गौर से देखा, अपनी देह की चमड़ी में चिकोटो काटी। उफ, बहुत दर्द महसूस हो रहा है । वह स्थान विशेष सूज गया था। उसका शरीर अशरीरी शरीर नहीं है, उसे भूख का अहसास होता है, उसे भय का बोध होता है, रुलाई आती है। इसके अतिरिक्त अगर वह भूत ही है तो फिर उसे देखकर कोई डरता क्यों नहीं? उसका सब कुछ आदमी जैसा ही है । उसे जीवित रखने के लिए डॉक्टर इतना प्रयास कर रहे हैं, उसे स्वस्थ बनाने के लिए कितनी ही तरह के अखाद्य खिला रहे हैं। नीम के पत्ते का स्वाद उसकी जीभ को कसला ही लगा था। चाय उसे मोठी ही लगती है। वह कहां इस देश से उड़कर उसे देशा में जा पाता है ! भूत की - - तरह आंखों से ओझल हो जाने का कौशल उसे कहां मालूम है ! यही वजह है कि उसे जहाज पर छिपकर रहना पड़ा था। फिर कौन-सी बात सही है और कौन-सी गलत ? उसके पिताजी कैसे इस तरह की गलती कर रहे हैं ? उसके पिता जैसे विद्वान-ज्ञानवान् व्यक्ति के द्वारा यह होना संभव है ? और उसके पिता ही अगर गलती में हो तो दुनिया तो पागल नहीं हो गई है। इतने इतने विश्व- विद्यालयों से उन्हें जो हिग्रियां दी गई, सबकी सब क्या घोषाबाजी हैं ? फिर क्या दुनिया को तमाम चीजें इस प्रकार की धोखेवाजियो और असत्य पर आधारित हैं ? यह हो ही नहीं सकता । रातुल ही गलती मे है। हो सकता है कि उसकी स्मरण-शक्ति को गड़बड़ियो में अब भी सुधार न हुआ हो। हो सकता है कि असल मे उसका नाम रातुल नहीं है, और कुछ दूसरा ही है। दरअसल रातुल की मौत हो चुकी है । जो असल में प्रोफेसर नित्यानन्द सेन का लड़का था, वह जिन्दा नहीं है । अचानक उस पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते उसके दिमाग में आया कि उसी का नाम रातुल है । हो सकता है कि वह गावरडांगा, घुघुडागा या चड़कडागा का रहनेवाला हो । उसका नाम चाहे हरिदास या शिवदास या कि विप्रदास है । वह अपने माप सोचता है कि उसकी बीमारी दूर हो गई है, मगर सच्चाई यह है कि उसकी बीमारी दूर नहीं हुई है। उसी बीमारी के चलते वह चक्कर काट रहा है । यह चक्कर काटना- यह चक्कर काटने की इच्छा-संभवतः एक प्रकार का रोग है। लेकिन सचमुच क्या वह युद्ध में शरीक हुआ या? फिर अगर युद्ध पर न गया होता तो उस मजीव स्पान में वह क्यों कर पहुचा-वहाँ, जहा न कोई बंगाली है और न कुछ दूसरी ही चीजें । सिर्फ एक अस्पताल और एक समुद्र । खिड़की से वह समुद्र कितना विशाल दिखता था। लेकिन वाबूजी को उस किताव मे रातुल की एक तसवीर थी। तमवीर वेशक उसके छुटपन की थी, लेकिन उससे विशेष कोई समानता नही है । समानता न होना स्वाभाविक ही है । लड़ाई के मैदान में भारी चोट लगने के कारण उसके चेहरे में एक आमूल परिवर्तन आ गया है । भेजे में जैसा हरफेर हुआ था उसी तरह चेहरे में भी एक बड़ा परिवर्तन आ गया है। पुराने लोग उसे खासतौर पर पहचान न पायेंगे। अमरीका के 'मेडिकल की केस नम्बर ४६ की तसवीर से प्रोफेसर नित्यानन्द सेन की वीर में बहुत बड़ा अन्तर है । इसलिए उसके मन में यह बात क्यों आई रातुल है ! फिर वह क्या जा रहा है ? किस मरीचिका के पीछे ? कसके पास जा रहा है ? उसका बाप कौन है ? रातुल की आंखों में भारीपन के साथ धुंध सिमट आई । उसका कोई नहीं है । इतने दिनों से वह पिता की स्मृति को सामने रखकर गे बढ़ रहा था। उसके लिए उसके पिता ध्रुवतारा थे। पिता के अतिरिक्त ह किसी दूसरे को पहचानता नहीं था। पर अब वह विलकुल बेसहारा है उसके पिता कहां हैं ? पिता ने उसके न होनेपन को मान लिया है । वह नहीं है। रातुल उनके लिए जीवित नहीं है। रेडियो का वजना कब बन्द हो गया था, पता न चला। अचानक घड़ी ने टन-टनकर रात का दस बजाया। दस ! रातुल चौंक उठा । नौ बजे जहाज खुलने की बात थी। रातुल उठकर खड़ा हुआ। " अयं, तुम उठ रहे हो...?" पंजाबी सज्जन आगे बढ़ आया। शायद दुकान बन्द करने का वक्त हो चुका था। उसके हाथ में चावियों का गुच्छ था। दुकान के गाहक जा चुके थे। लगता है, रातुल एकाग्र मन से रेडिर सुनते-सुनते भावनाओं के अतल में डुबकियां लगा रहा था । भोम्बल ने क था कि वह मांस-भात लिए उसका इन्तजार करता रहेगा। रातुल जाने-जाने को हुआ तो पंजाबी सज्जन ने कहा, "कह रहे हो?" "शायद मेरा जहाज़ चल चुका । देखू।" रातुल ने कहा। "देखने से कोई फायदा नहीं होगा भाई मेरे, जहाज़ जा चुका है। आवाज़ तुमने सुनी नहीं ? अब वह जहाज़ मंझधार में होगा..." "फिर क्या करूं?" रातुल ने जैसे अपने आपसे प्रश्न किया । स गया। "अव क्या होगा ! नौकरी चली जाएगी। कितनी तनखा मिलती थी?" मला आदमी तब तक दुकान का दरवाजा बन्द कर चुका था । दो-चार व्यक्ति, जो दुकान की देखरेख करते हैं, छुट्टी लेकर चले गए। मला आदमी बोला, "सोचने से अव फायदा ही क्या होगा? चलो, मेरे घर पर चलो। कही न कहीं तुम्हें सोना है ही । वहां सोने की जगह है । हरिदास के कमरे में उसके विस्तर वगैरह पड़े हैं। पहले के जमा हो..." "मुझे कलकत्ता जाना जरूरी था।" मला आदमी हंस दिया । बोला, "तुम्हारे लिए कलकत्ता जाना बड़ी बात है । लेकिन मुझसे तुम्हारी यहां मुलाकात होना भी शायद भगवान की इच्छा ही है, वरना..." "वरना क्या?" "वरना."चलो न मेरे साय घर, वहीं बताऊंगा। अब रोने-धोने से कोई फायदा नहीं होगा जहाज मिलने की कोई उम्मीद नहीं है भाई!" घर पहुंचने के बाद वह भला आदमी अपने हाथों में मात की दो यालियां ले आया और बिस्तर पर बैठ गया । बोला, "सभी सो चुके हैं, इसलिए मैं खुद ही भात ले आया। लो, खाओ।" मांस और भात । जोरों को भूख लगी थी । तमाम दिन खाने को कुछ भी नहीं मिला था। मगर नियति उसे फिर कहां ले आई है ! किसी दिन रातुल ने सोचा था कि भोम्बल ही उसका एकमात्र भरोसा है। इस दुनिया मे भोम्बल के लिए एक ही आदर्श है और वह है उसका जादू । एक दिन उसकी मां ने उसे दुनिया में छोडकर अपना चेहरा शर्म से ढंक लिया था। लगता है, उसी दिल से वह तमाम दुनिया को बाजीगरी का खेल समझता है। और यह भला आदमी! मला मादमी कहने लगा, "कल तुम कहा थे और आज किसके विस्तर पर बैठकर भात खा रहे होऐसा ही होता है. देखो न, हरिदास चला गया..." रातुल ने कहा, "कहा चला गया है ? आप ठीक-ठीक जानते हैं कि वह बन गया है ?" । आदमी ने कहा, "उसका रुझान हमेशा इसी तरफ थावह सिर्फ पने साथ ले जाना चाहता था..." तुल बोला, "फिर?" "फिर क्या? दुनियादारी में लगाने की मैंने जी-जान से कोशिश की। ो भी तरह भुलावे में न आया । मुझसे हरिदास कहता : भवतोष, सव त्याग दो "उस आनन्द के सामने यह सब भौतिक आनन्द कुछ भी नहीं "चलो भवतोप, हम दोनों सब कुछ छोड़कर चले जाएं। लेकिन जो होनी हीं है वह कैसे हो? अंत में एक दिन बिना किसी से कुछ कहे-सुने चला गया। मेरे लिए एक पन छोड़ गया था।" रातुल ने पूछा, "चला गया ? "हां, चला गया," भवतोप बाबू ने कहा, "लेकिन मज़ा आया उसके . वाद?" "क्या?" । "मज़ा आया कि.."उसके चले जाने के बाद अचानक उसके नाम से एक पत्र आया । बर्मा से एक वकील ने भेजा था। वह पन्न बहुत चक्कर काटने के बाद पता नहीं कैसे यहां आ पहुंचा। पत्र लिफाफे में था, खोलकर पढ़ा तो उसमें एक अजीव ही वात थी। बड़ी ही अजीव । उसके कोई दादा वर्मा में जागौन की लकड़ी का व्यापार करते थे। पता नहीं, उसने उनको देखा था या नहीं। उसको जवान से उनका कभी नाम सुनने को नहीं मिला। वही दादा सागीन के जंगल में ही मौत के मुंह में समा गए। मर गए तो खैर अच्छ ही हुआ, मगर दुनिया में सिवा हरिदास के उनका कोई अपना नहीं था लगभग दो लाख रुपये इसके नाम से रख गए हैं। यही है हरिदास कहानी । देखो भाई, उसकी तकदीर तो देखो ! जो धन नहीं चाहता, उसी का पीछा करता है । चिट्ठी पढ़कर मेरे हाथ थरथराने लगे। दो रुपया ! मगर वह रुपया मेरा तो है नहीं। मेरा न भी हो, मगर हरिदा तो है, यह सोचकर दुख हुआ कि कोई न कोई पैसे को लूट ही लेगा। सोचते मन बहुत ही उदास हो गया। मैंने वकील के नाम से एक पर दिया कि हरिदास तीरथ करने निकला है। वह लौटकर आयेगा तो ६० आपके पास स्पया लाने भेज दूंगा। उसके बाद से मुझे चैन नहीं मिल रहा है। लिखने के लिए तो चिट्ठी लिख दी, मगर हरिदास मिलेगा कहां? पागल की तरह अजनवियों के चेहरे की ओर देखने लगा। जहाज की जेटी पर जाकर खड़ा रहने लगा। उसके बाद अकस्मात् तुम पर जव नजर पड़ी तो मैं चौंक पड़ा । चेहरा हरिदास के जैसा ही है । गले को आवाज तक..." उसके बाद गट-गट एक कटोरा दूध पीकर भवतोप बाबू बोला, “वो देखो, वह रहे हरिदास के कपड़े-लत्ते । वह अपने साथ एक भी चीज़ न ले गया । इसी कमरे में, इसी बिस्तर पर वह सोता था। वह देखो, वह उसकी एक फोटो टंगी है।" उसके बाद आवेश में आकर उसने एकाएक रातुल का हाथ पकड़ लिया। "तुम्हें जहाज की नौकरी में कितनी तनखा मिलती है भाई ?- पचास, साट या सत्तर या कि ज्यादा से ज्यादा अस्सी-यही न ! लेकिन अगर तुम्हें यह पया मिल जाए तो जिन्दगी भर तुम्हें खटने की कोई जरूरत नहीं। तुम्हारा असली नाम मुझे मालूम नहीं। यह एक तरह से अच्छा ही है । आज से मैं तुम्हे हरिदास कहकर पुकारा करूंगा।" रात गहराने लगी है । यह सब कैसी घटनाएं उसके जीवन में घटित हो रही हैं ? कहां वह अस्पताल के एक कमरे में बंद था, कहां वह पिता के आकर्षण से खिंचकर कलकत्ता जा रहा था और फिर यहां अदन के बंदरगाह के एक कोने में आ गया है । किसके घर में आकर, किसके बिस्तर पर बैठने पर यह पट-परिवर्तन हो रहा है ! भवतोप दाबू ने कहा, "हरिदास मेरा बचपन का दोस्त है .... मैं उसकी रग-रग को पहचानता हूं। रिहर्सल कर मैं तुम्हें सब कुछ सिखा दूंगा। इसके अलावा कपड़े-लत्ते और कागजात वगैरह उसी के हैं। अब तुममें सिर्फ इच्छा जगनी चाहिए। और ....." रातुल ने पूछा, "और क्या ?" "और मैं किसी चीज़ का दावा नही करने जा रहा हूं, भाई । तुम दया कर मुझे जो कुछ दोगे, मैं हाथ फैलाकर ले लूगा।" पल भर मौन रहने के बाद भवतोप बाबू ने फिर कहा, "खैर, यह सब बात अभी रहे । काफी रात हो चुकी है, तुम अच्छी तरह से सोचकर देखो। - 1 - कल सुवह मुझे बताना। ठीक है न !' रातुल कब तक सोया रहा, उसे पता न चला। अचानक एक चौंकाने वाली आवाज़ से उसकी नींद गायव हो गई। निस्तब्ध रात । अजनबी घर। अनजाना देश । एक दिन के परिचित भवतोप बाबू के घर में एक रात के लिए आश्रय लेने से यह कैसी विपत्ति आई! उसकी नियति उसे कहां ले आई है ? वह गृह-परित्यक्त होगा, ऐसी बात तो थी नहीं। उसके लिए सहारे की कमी नहीं है । उसका अपना घर बहुत बड़ा है। स्नेह और प्यार रात-दिन 'उदारतापूर्वक उसका आह्वान कर रहे हैं । उसकी स्थिति भोम्बल की जैसी नहीं है। न वह भोम्बल की तरह निराश्रय ही है। भोम्बल ने जन्म से ही घर और स्नेह की कामना की थी। क्योंकि उसे प्राप्त न हो सका, इसलिए उसने घुमक्कड़ी वृत्ति अपना ली । और रातुल ? सब कुछ रहने के बावजूद वह दुनिया का आस्वाद करने के लिए बाहर निकला है । लेकिन अव नहीं, काफी हो चुका। उसकी तमाम इच्छाएं पूरी हो चुकी हैं । वह फिर से अपने पिता के स्नेह-नीड़ के शांत एकान्त में लौट जाना चाहता है। मन की स्थिति जब कि ऐसी है तो वह इस वक्त कहां आकर अटक गया! पाल-तनी नाव एकाएक झांझर हो गई क्या? भवतोप बाबू की बात पर सहमत हो जाए तो उसे प्रचुर धनराशि प्राप्त हो सकती है । भवतोप बाबू ने सोचा है कि शायद वह रुपया कमाने के लिए ही बाहर निकला है। लेकिन भवतोप बाबू को इसकी जानकारी ही नहीं है कि उसे रुपये का अभाव नहीं है। वह वाप का इकलौता पुत्र है। पिता के स्नेह और धन का वह एकमात्र उत्तराधिकारी है। सिर्फ एक बार सामने जाकर खड़ा होना है। पिता उसे अपने उदार वक्ष से लगा लेंगे और फिर छोड़ेंगे ही नहीं। एक तरफ पिता की दुनिया है और दूसरी तरफ उनका पुत्र रातुल । रातुल के लिए उसके पिता तमाम दुनिया को त्यागने के लिए ६२ उनुक हैं । पुत्र के वभाव में उनके पिता का बोक्न सूना है। योस हुआ लड़का मिल जाएगा तो उनका जीवन एक संपूर्ण इकाई में परिणत हो जाएगा। किंतु पिताजी के पास जाने का कौन-सा उपाय है ? एकमान भोम्बल हो सहारा था। खिलाये-पिताये, बिना टिकट के से जा रहा था। लेकिन कहां का पानी कहां बहकर चला गया! क्या से क्या हो गया ! अन्ततः बिना किसी तरह को आवाज किए जहाज रवाना हो गया। रेडियो से पिता का भाषण सुनने में मग्न रहने के कारण उसे ध्यान ही न रहा। उसके बाद भवतोप बाबू आया। ईश्वर के किस आदेश का वह पालन करे ! किसे वह स्वीकारे! हे ईश्वर, रातुल को तुमने किस मुसीबत में डाल दिया ! जब यह बंधु-बांधर रहित और निराश्रय था, तुम उससे कैसी परीक्षा लेने सगे ? विदेश के इस अजनबी माहोल में, जब उसके हाथ में कानी कौड़ी तक नहीं है, जब उसे किसी आश्रय की आवश्यकता है और तुमने उसे माश्रय दिया भी लेकिन दिया सो किस घृणित मार्ग के विनिमय मे ? वह अपने आपको करो क्षमा करेगा ! इसकी तुलना मे अदन को सड़कों पर भीख मांगना कही अच्छा था। या अगर यही उसकी नियति थी तो फिर द्वीप के मध्य भाग में स्थित अस्पताल ही कहीं अच्छा था। सारा जीवन-जब तक वह जिन्दा रहेगा-हर कोई उसे रखेगा, भगायेगा नहीं । उनको जानकारी यही रहेगी कि यह केस नम्बर ४६ है । वे प्रतिदान में किसी भी तरह के उपकार की अपेक्षा न करेंगे। एकाएक रातुल को लगा कि बगल के कमरे में कोई कटारी से कुछ काट । रहा है । फिर इतनी रात में कोई सेंध लगा रहा है ? या कोई दूसरी ही विपत्ति आ रही है ? बीच-बीच मे धम-धम और एक अजीव ही किस्म को आवाज हो रही रातुल का शरीर सिहरने लगा है । किसके मन मे कौन-सी बात है, मालूम नही । भवतोप बापू के मन में कौन-सा मतलब सक्रिय है, कहना मुश्किल है।

यह भी हो सकता है कि रातुल की यहां हत्या करके प्रचार कर दे कि हरिदास ने आत्महत्या कर ली। उसके बाद जाली चिट्ठी प्रकाशित करना नामुमकिन नहीं है । उस जाली चिट्ठी में हरिदास की ओर से लिखा रहेगा कि वह अपनी तमाम जायदाद अपने मिन्न भवतोप...... सब कुछ होना संभव है। काम निकालने के लिए बदमाशों के द्वारा सव कुछ कराया जा सकता मन में होता है कि वह भाग जाए। इस आधी रात में चुपचाप दरवाजा खोलकर वह बाहर निकल जाएगा। उसके बाद दोनों पैर जिस ओर खींचकर ले जाएंगे, उसी ओर चल देगा-~~-इस वंदरगाह की पहुंच के परे, जहां भवतोप वावू का हाथ पहुंच नहीं पायेगा ! पांवों से, पैदल-रास्ते से होता हुआ, वह कलकत्ते की ओर चल देगा। चाहे जितनी ही दूर तक वह जा सके। जहां रास्ता रोककर समुद्र खड़ा मिलेगा, वह दूसरे रास्ते का सहारा लेगा। और अगर किसी माध्यम से उसे एक बार हवाई जहाज़ की मदद मिल जाए तो फिर वह निश्चिन्त हो जायेगा। चाहे जैसे भी हो, उसे सात समुद्र और तेरहों नदियों को पार करना है। एकाएक बाहरी दरवाजे पर दस्तक पड़ती है। "हरिदास "अजी ओ हरिदास......" बात की बात में रातुल विस्तर से कूदकर दरवाजे के पास जाता है। दरवाजे के सिटकनी खोले या नहीं, उसकी समझ में नहीं आता। "हरिदास. ओ हरिदास, दरवाजा खोलो भाई......" दुवारा पुकार आती है। दरवाजा खोलते ही धीमी रोशनी में रातुल की नज़र भवतोप वावू. को देखती है, उसके एक हाथ में टार्च है और दूसरे में छुरा । टॉर्च की रोशनी में छुरे की जीभ लपलपाने लगती है। गहरे अंधेरे में भवतोप बाबू का चेहरा रातुल को बड़ा ही बीभत्स प्रतीत होता है । लगता है, इस आदमी के द्वारा सव कुछ हो सकता है। यहीं, इस आधी रात में उसकी हत्या करके उसे मिट्टी में गाड़ दे तो भी वह कुछ कह नहीं सकता। ६४ भय नहीं बल्कि निराशा से रातुल एक बार चिल्लाने की कोशिश करता है। इससे भी बड़ी मुसीबत में वह पड़ चुका है । वे सब अनुभूतिया और भी अधिक भयंकर हैं । मृत्यु के मुह के सामने खह होकर उसने युद्ध किया है। जहां आदमी के प्राणों के लिए छोना-झपटी चलती रहती है । जहा जिन्दगी सस्ती है। इस तरह की अनुभूतियों के बीच से वह गुजर चुका है। लेकिन यह उस किस्म का नहीं है। अब वावूजी से उसकी मुलाकात नहीं हो पायेगी। बाबूजी को जिन्दगी के आखिरी दौर में वह उन्हें शाति नहीं दे पायेगा। किसी दिन वावूजी के पास से भागकर उनके मन में जो यातना पहुंचाई थी, अब वह उसको क्षतिपूर्ति नहीं कर पायेगा। निराशा के कारण रातुल के गले की आवाज अटक जाती है। लेकिन इसी बीच भवतोप बाबू आगे बढकर रातुल का गला दबोचने लगता है। ठीक-ठीक दबोचा नहीं है बल्कि दबोचने के लिए हाथ बढाता है। रातुल तत्काल जरा पीछे की ओर हटता है और भवतोप बाबू का हाथ पकड़ लेता है। फिर एक पल बीततेन बीतते बायें हाथ से पांव बीच लेता है और भवतोप बाबू पीठ के बल धड़ाम से गिर पड़ता है । रातुल एक क्षण के अन्तराल में भवतोप बाबू की छाती पर चढ बैठता है। लंबा-तगड़ा शरीर है । भैस के दूध-घी से पला शरीर रातुल के हाथो के दबाव से बेकाबू होकर असहाय के जैसा थर-थर कांपने लगता है। एक बार उठने की कोशिश करते ही रातुल कुहनी से उसके पेट को दया देता है और साथ ही साथ भवतोप बाबू की भयंकर चीख गूजने लगती उस चीख से रातुल की नीद टूट गई। उस अंधेरे कमरे में बिस्तर पर पड़े-पड़े रातुल ने आप खोलकर देया कि कौन कहां है । वह तो उसी विस्तर पर लेटा हुआ है । रातुल उठा और रोशनी जलाई । बगल में पड़ी सुराही से एक गिलास पानी ढालकर पिया। फिर क्या वह अब तक सोया-सोया सपना देख रहा था! आश्चर्य। सचमुच आश्चर्य की ही बात है । उसने ऐसा सपना या दंडक नहीं । हो सकता है, वह तमाम रात हरिदास के बारे में ही सोचता हुआ नींद में खो गया हो और नींद में चिन्ता के नागपाश ने उसे जकड़ लिया हो। लेकिन भवतोप बाबू उसकी हत्या करने की कोशिश क्यों करेगा? अगर वह स्वीकार न करे? अगर वह भवतोष वावू का प्रस्ताव स्वीकार न करे तो उसका कोन क्या बिगाड़ सकता है ? लेकिन ऐसी स्थिति में स्वीकारने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। कमरे की दीवार पर एक फोटो टंगी थी। शायद हरिदास की फोटो है। करीब-करीब रातुल के जैसा ही चेहरा । देह में एक सफेद कुरता है, पांवों में कावुली चप्पल । बाल भी उसी के जैसे कटे हुए हैं । आज से उसे कोई रातुल के रूप में नहीं जानेगा। यह सोचते ही रातुल को तकलीफ का अहसास हुआ। सच है, नाम से क्या आता-जाता है । लेकिन आज से उसे क्या अपने अतीत जीवन को एक- बारगी पोंछ डालना होगा? उसके लिए पिता नामक व्यक्ति नहीं रहेगा? अपने ही घर के अन्दर घुसने का उसे अधिकार तक न रहेगा ? जिन्दगी में उसे कितने ही किस्म के अहसासों के बीच से गुजरना पड़ा है, और कितने ही अभी बाकी हैं । किसी दिन उसे हर कोई रातुल कहकर जानता था । वह नाम बदलकर हो गया केस नम्बर ४६ । और अब हरिदास हो जायेगा। किसी एक हरिदास में स्वयं को खोकर उसे एकाकार हो जाना है । यह हमेशा- हमेशा के लिए छद्मवेश धारण करने जैसा है। थियेटर में एक रात के लिए आलमगोर का पार्ट करना कितना सुखद है ! लेकिन जिन्दगी भर आलमगीर की पोशाक पहने घर-बाहर चक्कर लगाना नियति की कितनी बड़ी विडंबना है ! नाम से लेकर उसके हाथ की लिखावट तक बदल जायेगी । हरिदास का परिचय ही उगका परिचय होगा। हरिदास की शिक्षा ही उसकी शिक्षा होगी, हरिदास के सगे-सम्बन्धी उसके सगे-सम्बन्धी होंगे, हरिदास के मित्र ही उसके मित्र होंगे और हरिदास के शन्नु ही उसके शत्रु होंगे ! कमरे के अन्दर एक सूटकेस पड़ा था । रातुल ने ज्योंही ढक्कन हटाया, खुल गया। अन्दर कपड़े-लत्ते थे और उनके नीचे ढेर-सी चिट्ठियां । एक चिट्ठी को खोलकर रातुल पढ़ने लगा। हाथ की लिखावट टेढ़ी-मेढ़ी थी :

"पल्टू दा, कई महीनो से तुम्हारा समाचार न मिला । तुमने इसकी भी सुघ न ली कि हम जिन्दा हैं या मर गए । पता नहीं, किसने तुम्हारा दिल पत्थर का बनाया था। अवको 'कच्चा-मीठा' पेड़ में बहुत आम लगे हैं। पक- पककर पेड़ के तले गिरते रहते हैं."दोपहर में अकेलो जाने के बाद जब उन मामों को देखती हूं तो मेरे कलेजे में बड़ी चोट पहुंचती है। मां कहती है कि मैं बड़ी ही कमजोर हो गई हूं...तुम्हारे रोपे अमरूद के पेड़ में अदकी फल लग रहे हैं। तुमने कहा था न, कि जब अमरूद फले तो पहला फल बूढ़ा शिव पर चढ़ाना। मैं पहला फल छिपकर देवता के चरणों पर चढ़ा आई हूँ"खाकर देखा, बड़ा ही मीठा अमरूद था.''जानते हो, उस दिन माधी से दरवाजे के सहजन का पेड़ चरमरा कर टूट गया..." एक दूसरी चिट्ठी- ".. पल्टू दा, अपनी किसी भी चिट्ठी का जवाब न पाया। पता नहीं, तुम्हारे हाय में चिट्ठियां पहुंचती हैं या नहीं। या कि पोस्टमास्टर खुद फाड़- कर पढ़ लेता है और पढ़कर हंसा करता है ! हो सकता है कि मुझे पगली समझकर.. अब मुझे चिट्ठी लिखना अच्छा नहीं लगता। एक ही तरफ से कितनी लिखी जाएं. लेकिन मा किसी भी हालत में मानने को तैयार नहीं होती है। वह अंधी है, इसलिए हो सकता है कि मेरी चिन्ता उसके हृदय को मयती रहती है. कहा करती है : जवाब मिले या नहीं, तुम चिट्ठी लिखती रहो मगर पल्टू दा, चाहे कोई दूसरा तुम्हें पहचाने या न पहचाने, मैं तुम्हें अवश्य पहचानती हूं."फुटबॉल के खेल में पैर तुड़ाकर जिस दिन तुम पर लौटे, तकिये पर माया रखकर पड़े रहे. (तुम्हारी जगह कोई दूसरा व्यक्ति रहता तो रो-रोकर घर भर को परेशान कर डालता) में रात भर तुम्हारा पर सेंकती रही । मुझे मालूम है कि तुम उस दिन दर्द के किस दौरे से गुजर रहे थे.. कभी-कभी मैं सोचती, तुम्हारे बाप-मां-वहन कोई नहीं हैं और न भी हैं तो हर्ज ही क्या.""मेरे तो मां-बाप हैं । तुम्हें वांधकर रखूगी ...लेकिन अच्छा पल्टू दा, तुमने तो कहा था कि ठीक से पुकारने पर देववा के कानों में बात पहुंचती है।"वह कौन-सा देवता है पल्टू दा ? वह कौन-सा देवता'"तव हा, हम लोगों का बूढ़ा शिव विलकुल बहरा है । है न ?"...

इसी किस्म की लगभग तीन सौ चिट्ठियां थीं। चिट्ठी के नीचे लिख शैल । यह शैल कौन है ? लगता है, हरिदास का पुकारू नाम पल्टू है । न पर दिन, महीने पर महीने इसी तरह की वेशुमार चिट्ठियां लिखती ई है । रातुल ने तारीख को ध्यान से देखा । सवसे पुरानी चिट्ठी तीन साल पहले की लिखी है। कल वक्त निकालकर वह तमाम चिट्ठियां पढ़ डालेगा। रातुल ने पेटी से कुरता मोर घोती निकाली। कुरता वदन पर डाला । माप विलकुल ठीक है। कोई खोट नहीं है। यदि लाचार होकर उसे हरिदास ही बनना होगा, तो उसे हरिदास के रूप में ही सज्जित होना है । अन्ततः कुछ दिनों के लिए हरिदास के रूप में ही सजना है। फिर हाथ में जब पैसे आ जायेंगे, वह घर लौट जायेगा। या तो जहाज़ का टिकट कटायेगा या 'फिर हवाई जहाज़ का। रात संभवतः ढलने-ढलने पर है। रातुल ने खिड़की से बाहर आकाश की ओर ताका । अजनवी देश की सुबह । लगता है, हर देश में सुवह एक जैसी ही होती है । नीला अंधेरा और धीमी रोशनी। हरिदास की पोशाक पहनकर रातुल सोचने लगा । सिर्फ शंभूनाथ लेन की बातें, और कुछ भी नहीं । उस घर की बातें, गोविन्द की बातें और बाबूजी की बातें अभी उसके लिए जैसे अनधिकार चर्चा के विषय हैं । खुली खिड़की से समुद्र की लवणाक्त तेज़ वायु आकर उसके चेहरे टकरा रही थी। किसी तरफ कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था, ले रातुल को लगा कि उसने जैसे कुछ देखा । सवेरे-सवेरे हरिदास और छोटी लड़की आम चुनने निकले हैं। उस लड़की का नाम है शैल के आंचर में आमों के गुच्छे हैं । हरिदास आम चुन-चुन कर शैल के में रखता जा रहा है। 'कच्चा-मीठा' शाम के पेड़ के तले माते ही 'पुकारती है, "पल्टू दा..." "क्या है शैल ?" पल्टू पूछता है । "बड़ा ही डर लग रहा है, पल्टू दा। यहां इस वांझ पेड़ के हिल-डुल रहा था।" "डरने की क्या बात है ? चली मामो।"

और पल्टू दोनों हायों से शैल को छाती से लगा लेता है, जैसे उमकी छोटी बहन हो । "हरने की कोई बात नहीं है," वह कहता है, "याती पर हाथ रखो, छाती पर हाथ रखकर राम-राम-राम कहो । वीस वार राम का नाम जपो"भय माग जायेगा।" उस सुबह बाम के पेड़ के तले खड़ी होकर शेल ने पल्टू की दात मानकर वीस बार राम नाम का जप किया था, उसका हिसाब जल की चिट्ठी में लिखा है । आज कहां किस गांव के कोने में, किस वविख्यात अंचल में शैल रहती है और कहां उसका पल्टू दा-हिमालय की किस दुर्गम गुफा में किस परमाश्चर्य की खोज में रह रहा है, इसका किसे पता है ! दरवाजे को ठेलकर पीछे से भवतोप दावू आया । तमाम बदन में मिट्टी लगी थी, पहनावे में एक लंगोटी । लगता है, अब तक कुश्ती कर रहा पा। कितना मजबूत वदन है ! इस भवतोप वादू को सपने में रातुल ने कैसे पटाड़ दिया था ! "कुस्ती करके आ रहा हूं," उसने कहा, "यद दुकान जाना है। तुम्हारे लिए चाय और दूध भेज रहा हूं।" एक क्षण वाद, जाने के पहले पोछे की ओर मुड़कर भवतोप वाबू बोला, "मेरी बातों पर सोचा ? मंजूर है न! ?" रातुल भवतोप के चेहरे पर मां टिकाए रहा। उसके बाद कहा, "मुझे मंजूर है।" 8 कहने के लिए अपनी स्वीकृति उसने अवश्य ही दे दी लेकिन कहना जितना सरल है करना भी क्या उतना ही सरल है ! यह भी तो 'एक किस्म को धोखेबाजी है। पिता से अपने छुटपन से ही वह जो उपदेश सुनता आपा है उनमें से मुख्य उपदेश है : 'सदा सत्य आचरण रखो।' उसके पिता ने जीवन में कभी असत्य का सहारा नहीं लिया है। कॉलेज में दावूजी दो दवात रखते थे। एक दवात और कलम कॉलेज की ओर से को यह ए पैसे की होती थीं और दूसरी अपने पैसे से खरीदी हुई। कॉलेज के के लिए वह कॉलेज की कलम-दवात उपयोग में लाते थे और व्यक्तिगत वगैरह अपनी दवात की स्याही से लिखते थे। आरंभ में रातुल अजीव ही तरह का लगता था। एक दिन वह बैठा। चावूजी ने कहा, "मन-प्राणों से सत्य का पालन करना होगा। सत्यं शवम् सुंदरम्-यानी जो सत्य है, वही शिव है, वही सुंदर है । सुन्दरम् का इसके अतिरिक्त कोई दूसरा अर्थ हो ही नहीं सकता।" रातुल ने पूछा, "फिर कोन सत्य है और कोन असत्य-यह किस तरह समझू वावूजी ?" "उसकी एक तरह से परीक्षा की जा सकती है, और वह है-जो काम पराये के सामने करने में लज्जा महसूस हो, वह अन्याय है सत्य कार्य से कभी लज्जा का अनुभव नहीं होता है।" उसी पिता का पुत्र होने के बावजूद रातुल आज घोर असत्य का सहारा लेगा? रुपये-पैसे के लालच में ? हो सकता है कि उसे रुपये-पैसे का लालच न हो, लेकिन इसके अतिरिक्त उसके लिए विकल्प ही क्या है ? इतनी बड़ी दुनिया के एक कोने में प्रतिदान के बिना उसे कौन सहारा देगा? अपने आपको छिपाने के अलावा कौन-सा चारा है ? जहां कहीं वह सहारे की तलाश जायेगा लोग उससे सही परिचय के बारे में पूछताछ करेंगे। महज एक टयूशन की तलाश में निकलने पर भी लोग नाम-धाम की पूछताछ करते हैं। खै ये बातें रहें। जब कि वह जवान दे चुका है तो उसे निभाना ही है। अच्छा ही हुआ। किसी दिन रातुल लड़ाई के मैदान में मारा गया और आज अदन के इस बन्दरगाह में केस नम्बर ४६ को मृत्यु हो इसके बाद वह जब तक जीवन जियेगा, लोग उसे हरिदास के नाम जानेंगे । यह उसका असत्य आचरण नहीं, बल्कि जन्मान्तर है । अदन शैल में आकर जैसे उसका जन्मान्तर हुआ है। दुकान जाने से पहले भवतोप बाबू ने उससे मुलाकात की। वोला, "तुम्हारे खाने का यहीं इन्तजाम कर दिया है । तुम आराम करना भाई। मैं दोपहर में जव खाना खाने आऊंगा तब ७० होगी । घूमते-घामते अगर दुकान तक मा सको तो फिर पाप-कटलेट खिलाऊं।" "चलिए, मैं भी थोड़ी खुली हवा से हो आऊ..." कहां, किस ओर वह घूमने-फिरने जाए? रातुल ने चारों तरफ निगाह दौड़ाई ! रातुल कल रात जहाज से उतरा है। यहां का वह कुछ भी नहीं देख सका है। भवतोप बाबू ने कहा, "कहा घूमने-फिरने जाओगे, भाई ! यह देश मरु- भूमि है, कहीं एक भी हरी घास नही दिखेगी। ऐसा अगर न होता तो यहाँ पानी तक क्यों खरीदकर पोना पड़ता?" थोडी दूर जाने के बाद भवतोप बाबू ने फिर कहा, "शुरू-शुरू में हम दोनों मिन जव यहां जहाज़ से उतरकर आए, तमाम जिस्म में फोड़े उभर आए गरमी के मारे रात में नींद नहीं आती । दिन के वक्त घर से बाहर निकल नही पाता था ! प्यास से छाती फटने लगती थी। एक गिलास पानी पीने को नहीं मिलता था। सोचा, इस मुल्क को छोड़कर भाग जाऊ... अंत में..." उंगली से दूर की ओर इशारा करते हुए भवतोप बाबू ने कहा, "वह जो 'जेबेल-शान' का पहाड़ देख रहे हो, उसीकी तलहटी के अरवो के एक गाव में हम गए । मगर वह पहाड़ क्या पहाड़ है ! एक घास तक जहां जिन्दा नहीं रहती वहां क्या आदमो जिन्दा रह सकता है ? फिर भी हरिदास ने कहा : यही रहूगा। जब बंगाल छोडकर चला आया हूं तो बंगाली कह- कर अपना परिचय नही देंगे । अपनी जन्मभूमि, अपने देश ने जब हमे आश्रय न दिया तव सभी देश हमारे लिए अपने देश हैं। यहा जब इतने- इतने आदमी रह रहे हैं, फिर हम क्यो नही रह पायेंगे? हम भी तो भादमी दोनों जने पैदल ही जा रहे थे। ऊंटों का काफिला सड़क पर चला जा रहा था। अजीव ही जानवर है ! कितना विशाल शरीर है ! लेकिन इसके अलावा किस पर निर्भर किया जा सकता है ? नीले समुद्र के जहाज को तरह धूसरित भूमि का यह धूसरित युद्धपोत है। पीठ के बल काले-काले सोमाली सोये हुए थे।

भवतोष बाबू ठिठककर बोला, "अब मैं चलूं भाई! मुझे बायीं तरफ जाना है। तुम घूम-धाम कर मेरी दुकान में अवश्य चले आना।' रातुल एकाएक ठिठककर बोला "आप दोनों अपना देश छोड़कर इस देश में क्यों आए, मैं यही सोच रहा हूं.." भवतोप वाबू के चेहरे पर एकाएक उदासी मंडराने लगी । सुवह के अदन के गर्द-गुवार से भरे पहाड़ी रास्ते पर भवतोप बाबू एक निमिप को आंखें बंद किए खड़ा रहा। उसके बाद आंखें खोलकर धीमे स्वर में बोला, "अन्ततः तुमने देश की बातें याद करा ही दी, भाई ! यह काम तुमने अच्छा नहीं किया..." सामने 'स्टीमर पाइंट' की तरफ मा-अला रोड है । भवतोप बाबू उसी तरफ जाने लगा। सपनों का नशा जैसे उसकी आंख में तैरने लगा। बोला, "वाबूजी का देहान्त हो गया । कुछ दिनों के बाद जब भात खाने बैठा तो सब्जी नदारद थी। एक दिन देर से घर लौटने पर सुना कि भात खत्म हो गया है.''तब मालूम नहीं था कि परिवार का मैं कोई नहीं हूं।" भवतोष बाबू जैसे अपने आप से ही बातचीत करने लगा, "अचानक एक दिन देखातीन रसोईघर बनाए गए हैं. मेरा परिवार होता तो चार रसोईघर बनाए जाते. 'देखा, घर में तीन दीवारें खड़ी हो गई हैं. 'हम लोग चार भाई थे, मैं ही सबसे छोटा बड़े तीन भाइयों की शादी पहले ही हो चुकी थी और हरिदास ? दुनिया में उसके अपने कहकर जो लोग थे, वे कब के विदा हो चुके थे जिन लोगों के घर में उसका लालन-पालन हुआ, कहा जा सकता है कि वे उसके कोई लगते नहीं थे। एक शैल ही थी, जिसके लिए उसका मन बीच-बीच में उदास हो जाता था "खैर, जब एक दिन मैंने कहा : चलो, भाग चलें, हरिदास ! तो वह तत्काल राजी हो गया। उसमें शुरू से ही भाग जाने की प्रवृत्ति थी..." कहानी कहते-कहते भवतोप बाबू एकाएक मुड़कर खड़ा हो गया। बोला, "खैर, इन बातों को छोड़ो याद न करना ही बेहतर है, भाई !' रातुल ने देखा, भवतोष की आंखों में पानी भर आया है। उसके बाद वह निःशब्द अपनी दुकान की ओर चल दिया। जाने के पहले कह गया, "गरीव होने की यातना रग-रग में समाई हुई है, भाई साहब! यही वजह है कि तुम्हें हरिदास बनने को कहता हूं, वरना और किस..." रातुल पैदल चलता हुआ अकेला ही 'स्टीमर पाइन्ट' को तरफ चला याया। भीतरो बन्दरगाह से एक अरबी बजरा आहिस्ता-आहिस्ता समुद्र की मोर मला जा रहा था। उधर पानी के निकट एक सोमाली मौलवी नमाज पढ़ रहा था! स्याह समुद्र का पानी सूर्य की रोशनी पड़ने से हल्की चमक लिए हुआ था । धुंधलके में डुवे समुद्र में कही दूर शायद एक उड़नेवाली मछली पानी से दस-बारह हाथ ऊपर उछलकर फिर से पानी के अन्दर चली गई... उसके पीछे एक और उसके पीछे थोड़ी दूर पर एक तीसरी "उसके पीछे एक चौथी.. जेटी से सटकर एक नाव जा रही थी। पता नहीं वह किस द्वीप को ओर जा रही है। मल्लाहों का दल क्रमबद्ध डांड़ खेते हुए चिल्ला रहा था, ..'याहुदी अल्लाह ! सुवह को हलकी हवा समुद्र के वक्ष मे ज्वार जगा रही थी। शायद एक जहाज तब दूर दक्षिण की ओर जा रहा था, जो सुबह के अंधेरे में एक काले धब्बे की तरह खो गया। रातुल ने चौड़ी सड़क की ओर मुडकर देखा । इस बीच सड़क पर लोगों का माना-जाना शुरू हो गया है । धूप मे तपिश माने के पहले ही उन लोगों ने काम शुरू कर दिया है। ऊंट को नकेल थामे अरबी लोग अपने-अपने काम पर निकल चुके हैं । उनके ढीले काबों में चांदी को मूठ के कई चाकू लटके हुए हैं । उनके पीछे एक व्यक्ति चल रहा है । देखने से लगता है कि वह उन लोगों की अपेक्षा बहुत बडा आदमी है । वह लम्वा रेशमी जब्बा पहने है । देह पर जरीदार सुनहला वेस्टकोट है। सड़क से सटी हुई वस्तो है । लगता है, मछु- भारों की बस्ती है। एकाएक 'एकाएक रातुल के आश्चर्य की कोई सीमा न रही। विपरीत दिशा से कोई आ रहा था । चेहरा-मोहरा पहचाना-पहचाना जैसा लगता था । रातुल बहुत देर तक तीक्ष्ण दृष्टि से उस ओर ताकता रहा। उसके बाद वह मूर्ति ज्यों ही सामने आई, वह चिल्ला उठा, "भोम्बल ! भोम्बल तुम " मोम्बलदास आगे बढ़कर सामने आया सबेरे-सबेरे वह मूंगफली खा रहा है । जेव से दो मूंगफलियां बाहर निकालकर उसकी और बढ़ा दी और वोला, "वाह, तुम तो अजीब आदमी हो ! लो खाओ.." रातुल ने भोम्वल के कंधे को दबाते हुए कहा, "भोम्बल, तुम गए नहीं ?" कल तमाम रात जैसे भूकंप का दौर चलता रहा था और आज जैसे वह थम चुका है। असीम सागर में भटकता हुआ जहाज़ जैसे तीर से लग गया है । अव रातुल निश्चिन्त है, निर्भय... "तुम गए नहीं, भोम्बल ?" "तुम तो अजीब आदमी हो ! मैं तुम्हारे लिए मांस-भात लेकर बैठा रहा। भूख तुम्हें लगी नहीं ? सोचा, बंगालियों में कोई सामर्थ्य तो होती नहीं, सिर्फ गुस्सा करना जानते हैं। आठ वजा, फिर नो, फिर दस । शुरू में जेटी की सीढ़ी हटा ली गई, जहाज़ की रेलिंग पकड़कर मैं बहुत देर तक सोचता रहा : क्या हुमा? उसके साथ कौन-सी घटना घटी? तलाश में निकलूं, इसका भी उपाय न था । गेट बंद हो चुका था."रात तुम्हारे कारण नींद नहीं आई। अनजान अजनवी जगह है, किसी से तुम्हारी जान-पहचान नहीं, कहां सोओगे, क्या खाओगे---यह सब सोचते-सोचते' 'तुम रात भर कहां रहे जी? क्या खाया-पिया...? तुम नो बजे तक क्यों नहीं लौटे ? महा-हा, तुम्हारा चेहरा बिलकुल उतर गया है ! खिलायेगा ही कौन ? दुनिया में भोम्बल दर्जनों की संख्या में जो नहीं हैं। और उधर तुम्हारी जेब में कानी कौड़ी तक न थी।" रातुल वोला, "रेडियो सुनते-सुनते रात का दस बज गया । याद ही न रहा सोचा, जहाज रवाना हो चुका है । खैर । मगर तुम क्यों नहीं गए भोम्बल ?" "अरे, हमारा जहाज़ यहां विगड़ गया। रात नौ बजे खुलने की वात थी। अचानक बॉयलर या किसी दूसरे पार्ट में क्या हुआ, पता नहीं । जहाज़ हिलने का नाम ही नहीं ले रहा था । सारी रात मरम्मत का काम चलता रहा." अब सुनने में आया कि ठीक हो गया है । रात दस वजे खुलने की बात थी। रात भर तुम्हारे लिए चिन्ता करता रहा और जव भोर हुई तो तुम्हारी तलाश में निकला-यह सोचकर कि देखू, जिन्दा है या मर गया..." रातुल ने खड़े-खड़े सोचा । तो फिर अन्तत: वह कलकत्ता जा सकेगा। "ठहो," उसने कहा, "मैं एक बार भवतोप वाबू से जाकर कह आऊ । मैं - ७४ अभी-अभी आया।" भोम्बल ने पूछा, "भवतोप वावू कोन ?" आकर बताऊंगा।" रातुल 'मा-अला' रोड पकड़कर चल दिया । तब सड़क पर लोगों के आने-जाने के क्रम में वृद्धि हो चुकी थी। ऊंटों के काफिले की भीड़ को पार- कर रातुल दुकान के सामने पहुंचा। भवतोप बावू तव पंखा झलकर चूल्हा जला रहा था। "आ गए ? अच्छा हुआ बेठो भाई , चाय पियो।" "नहीं; मैं बैठने नहीं आया हूं भवतोप वावू ! मैं चला।" रातुल ने हांफते. हांफते कहा। भवतोप बाबू हाय में पंखा लिए ही उठकर चला आया। "यह क्या ?" उसने कहा, "कहां जा रहे हो?" "कल रात हम लोगों का जहाच घराब हो गया था। अभी तक बेटी से लगा हुआ है । दस बजे सुलेगा। अच्छा, मैं चलू भवतोप वाबू ।" "सचमुच जा रहे हो ?""फिर?" भवतोप वावू के स्वर में दयनीयता उमड़ पाई। उसके बाद वह फिर बोला, "मैं तुम्हें आज कैसे रोक रखू भाई? खैर, हममें जो बातचीत हुई है, उसे किसी से मत कहना । और एक बात..." एकांत में ले जाकर भवतोप बाबू फुसफुसा कर बोला, "तुम्हे जवान दे चुका हूं, माई ! जहाज की नौकरी में तुम्हें मिलता ही कितना होगा ? तुम जब कभी आओगे, तुम्हें वर्मा ले चलूंगा । एक बार रुपया मिल जाए तो फिर आराम से जीवन जियेंगे। गरीब होने की यातना रग-रग में समाई हुई है। वरना किसकी खातिर और..." रातुल खामोश रहा। "फिर वही वात पक्की भाई" भवतोष वावू बोला, "जब भी तुम आओगे वैसे ही." मुझे एकमान तुम्हीं पर भरोसा है, भाई.."मुझे निराग मत करना, भाई. इतन-इतना पैसा मैं तुम्हारे इन्तजार में बैठा रहूंगा."रयादा देर मत करना।" भवतोप वायू की आंखें स्लाई के कारण छलछला आई।

१० नित्यानंद सेन वैठे-बैठे लिख रहे थे । नयी पुस्तक के लिए सारी सामग्री प्रस्तुत थी । अब वह पूरी पुस्तक का शुरू से अन्त तक संशोधन-परिमार्जन करेंगे। शंभुनाथ पंडित लेन की खिड़की से नित्यानन्द सेन ने एक बार आकाश की और आंखें फैलाई। पश्चिम दिशा का आकाश लाल होता जा रहा था। रक्त की तरह लाल । सात वर्ष पहले आकाश का और भी हिस्सा दिख पड़ता था। अब गली को उस ओर कई बड़े-बड़े मकान बन चुके हैं। तब वहां मैदान था। उसी मैदान में रातुल तीसरे पहर मुहल्ले के लड़कों के साथ खेला करता था और वह खिड़की से ताका करते थे। अकेला मुन्ना एक सौ में एक था। तमाम खिलाड़ियों को हराने के बाद जयमाला उसे ही प्राप्त होती थी। वह जहां कहीं भी जाते उनका मन मुन्ना के इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहता। पता नहीं, कहां कौन-सा कांड कर बैठे ! किसका सिर फोड़ देगा। किसकी क्या हानि कर बैठेगा । गुनाहगार आखिर उन्हें ही तो होना होगा। इसके अलावा मुन्ना की ही गलती क्यों कही जाए ? अक्सर वह दिनभर कॉलेज में रहा करते थे। मुन्ना की देखभाल का भार गोविन्द पर रहता था। लेकिन मुन्ना गोविन्द की ही परवाह क्यों करने लगा? कॉलेज से लौटने के बाद तमाम वातों को पूछताछ किया करते थे : क्या खाया, क्या नहीं खाया; क्या- क्या पढ़ा; सोया या नहीं, या तमाम दिन मुहल्ले के लड़कों के साथ ही खेलता रहा । “गोविन्द, ए गोविन्द !" मकान के आखिरी छोर पर तब गोविन्द चूल्हा जलाने में व्यस्त था। पूरा मकान धुएं से भर गया था। बाबू की आवाज़ सुनते ही वह दौड़ा-दौड़ा - आया। उनके हाथों में ढेर सारी मोटी-मोटी पुस्तकें थीं। कंधे पर रेशमी चादर। गोविन्द ने उनके हाथों से कितावें ले लीं। प्रोफेसर साहब ने गले की चादर भी गोविन्द को थमा दी। । ७६ । दिख नहीं रहा है ? वेतने गया है क्या?" "नहीं, खेलकर बहुत पहले ही तोट चुका है। पर पढ़ने के कमरे में देखा था।" प्रोमर साहब बागे-आगे चले, पोछे-पोछे गोविन्द । सौड़ी के कार दाहिनी तरफ घूमने से एक हॉलनुना कमरा है। करीब-करीब दो कमरों के बरादर । जब रानुल की मां जोदित दी, वह उनी कमरे में मुन्ना के साथ रहती थीं। दाबूजी वगल के छोटे कमरे में अपनी पढ़ाई-तिबाई और किवाद- कापी में व्यस्त रहते थे। तब वह यदा-कदा कमरे से बाहर निकलते थे। मां की स्मृति अद व्यतीत हो चुकी है, क्योंकि बहुत ही कम उम्र में उनको मृत्यु हो गई यौ। प्रोमर वह दिन बब भी भूले नहीं । हत्की-हल्की सरदी को रात यी। रात तीन बजे डॉक्टर निराश होकर बैठ गया दार्शनिक प्रोफेसर वाहर की खिड़की से देख रहे थे : रात के अंतिम पहर के घुधले नाकाम में एक बड़ा तारा भभककर जल उठा और फिर नीचे गिर पड़ा । हत बोर पेड़-पौधों के झुरमुट में वह तारा एक ही निमिप में अदृश्य हो गया। फिर वह दिखाई नहीं पड़ा। तब मुन्ना उन बड़े कमरे के पश्चिमी भाग में एक खाट पर सोपा सपने में हम रहा था। उस विपति की स्थिति में भी प्रोफेसर साहब एक बार रातुल को देखने गए। दो साल के शिशु के चेहरे पर कहीं कोई विकार न था। मुन्ना इत्मीनान से नींद को वांहो में कंध रहा या योर नीद में ही जैसे परित्यक्त स्वर्गलोक का सपना देखकर हंस रहा था। मुन्ना के जन्म के बाद से ही उसके आरंभिक जीवन से ही-जिस दुर्भाग्य मूचना मिली थी, उसकी परिणति इस तरह की करुण स्थिति में होगी, यह वात पोकमर को सोवनी चाहिए थी। एक बार कहा था, "मुन्ना, तेरे कारण मुझे बड़ी तकलीफ होती है।" अंधेरे कमरे को एक गोलमेज के सामने बैठ कर नित्यानंद सेन ने बहुत वार यह प्रश्न पूछा था, "मुन्ना, तुझे जब नहीं देखता हूं तो मुझे बड़ो तर लीफ होती है।" "मुझे भी तकलीफ होती है, बाबूजी !" मुन्ना का उत्तर स्पष्ट होकर कागज पर लिप जाता था। "फिर तू पाने में इतनी देर क्यों करता है ? आजकल मैं जब इन्तजार रते थक जाता हूं, तब तू आता है । " 'मेरे लिए क्या सचमुच । है ?" धेिरी आधी रात में शंभुनाथ पंडित लेन के एक सिटकनी बंद कमरे में र इसी तरह के प्रश्न और उत्तर का सिलसिला चलता रहता था। "तुझे आने में तकलीफ महसूस होती है, मुन्ना ?" "आज बड़ा ही अच्छा लग रहा है।" "वहां जाने पर तेरा साक्षात्कार किन-किन व्यक्तियों से हुआ है ?" "मां से भेंट हुई है।" "लड़ाई के मैदान में जब तू घायल हो गया, तुझे बड़ा ही यातना-बोध हो रहा था। है न यह बात ? उफ, तूने कितनी तकलीफें उठाई हैं !" "यहां आने पर किसी तरह की तकलीफ नहीं महसूस कर रहा हूं। बड़ी ही शांति है यहां!" मुन्ना शांति में है, यह जानकर नित्यानंद सेन इत्मीनान की सांस लेते। इसी तरह हर रोज़ पिता-पुत्न में संवाद चलता रहता । नयी पुस्तक में उन्होंने इसी के परिप्रेक्ष्य में विस्तार के साथ लिखा है। इस तरह एक दिन सर ओलिवर लॉज का पुन रेमवो दुनिया से विदा हो गया। सर ओलिवर ने उससे संवद्ध एक पुस्तक लिखी है-'द सरवाइवल ऑफ मैन ।' रातुल के बारे में भी नित्यानंद सेन ने बहुत पुस्तकें लिखी हैं । पुन मृत्यु के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी है। कहा जा सकता है कि वास्तव जगत् से एक तरह से उन्होंने नाता ही तोड़ लिया है। फिर भी समाज और संसारको छोड़ नहीं सके हैं। लोग भाषण सुनना चाहते हैं। हजारों आदमी के सामने उन्हें अपने नये तर के मुद्दे पर बोलना पड़ता है। फिर रेडियो पर भी वोलना पड़ता है। अखबा के कर्मचारी उनकी फोटो खींचकर ले जाते हैं । नौकरी छोड़ने के बाद उन्ह सोचा था कि घर के एकांत कोने में बैठकर आत्मचिंतन में समय व्य करेंगे, पर परिणाम इसके विपरीत हुआ है । बहुत दूर-दूर से उनके आमंत्रण आते रहते हैं, चिट्ठियां आती रहती हैं। जिनमें अनजाने-अनप लोगों की अनुनय-विनय रहती है। दुनिया के बहुत-से लोग उन्हें आत्मीयों से बिछुड़कर विधुर जीवन जी रहे हैं । वे लोग उनसे अप के आत्मीयों की बातें सुनना चाहते हैं : कि मृत्यु के बाद वे किस तरह की - ७८ हैं। कि दुनिया की याद उन्हें आती है या नहीं? वे लोग उनसे सांत्वना चाहते हैं। उनकी पुस्तकें खरीदते हैं और पढते हैं । पत्रो के माध्यम से अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। हम लोग कितना जानते हैं, कितना समझते हैं, कितना देख पाते हैं ? हम लोगों के ज्ञान, समझ और दृष्टि के परे जो अपार रहस्य से पूर्ण जगत् अंधेरे में ढंका हुआ है, उसे देखना, जानना और समझना होगा। प्राचीन ऋपि फठोपनिषद् में लिख गए हैं : "यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विज्ञानतां विज्ञातम विज्ञानताम् ।" कितने ही दिन, अनेक बहानों के माध्यम से नित्यानंद सेन ने रातुल को यही उपदेश दिया था । सत्य से साक्षात्कार करना होगा। सत्य आचरण जीना होगा। दुनिया की बाकी चीजें छलना हैं। श्रेय है तो केवल सत्य । सत्-चित्-आनन्द । उसी सच्चिदानंद को प्राप्त करना होगा । संकल्प, साधना और योग से । रातुल की मृत्यु के बाद नित्यानंद सेन को बहुत बड़ा लाम हुआ। उन्हें उस परम सत्ता की जानकारी हासिल हुई । रातुल की मृत्यु के माध्यम से सच्चिदानंद जैसे उनके अन्तर्मन में उद्भासित हो रहा है। कभी-कभी सभा-समिति में भाषण देते-देते उन्हें लगता है, तमाम शोर- गुल पारकर--शहर, भीड़ और पार्थिव घेरे को त्यागकर--वह बहुत ऊपर एक अलग ही दुनिया में पहुंच गए हैं । कब वे लोग तालियां पीटते हैं, फूलों के गजरे गले में डालते हैं, पावो की धूल लेते हैं, ऑटोग्राफ लेते है और गाडी से घर पहुंचा आते हैं, उन्हें पता नहीं चलता। रातुल उन्हें अपने दर्शन-जगत् के एक अलग ही स्तर पर ले गया है। उन लोगों ने अनेक उपाधियां दी हैं । दुनिया की हर दिशा से सम्मान और यश मिल रहे हैं । बिन मागे। कितने ही दूर-दूर के देशो से आने का निमंत्रण मिलता है। इन कई सालो के दरमियान कई देशों में जाकर कितने ही लोगो मे मिल आए हैं। छपकर निकलते ही उनको पुस्तकें रातों-रात बाजार से गायब हो जाती हैं । जापान, सिंगापुर, चीन, कोरिया, मेक्सिको और पेरू पहुंच जाती हैं। कितनी ही मापाओं में उनका अनुवाद हो चुका है। अयं और यश की प्रचुरता से उनका जीवन भरा-पूरा है। प्रोफेसर साहब अंधेरी रात में प्रश्न पूछते :

नव नित्यानन्द सेन ने आंख उठाकर देखा। "तुमने किसे देखा है-रातुल को ? कहां ?" "हुजूर, कालीघाट में !" "एकाएक तुम कालीघाट क्यों गए ? कालीघाट जाने की क्या जरूरत ? तमाम बदमाश और धोखेबाजों का वहां अड्डा रहता है। तुम्हें चकूफ समझकर किसी दिन ठग लेंगे।" "मगर मुन्ना को गोद में खेला-खेलाकर मैंने उसका लालन-पालन किया था। ऐसी हालत में मुझसे पहचानने में कोई गलती हो सकती है भला?" नित्यानन्द सेन दुवारा काम में मशगूल हो गए। "जाओ; बुढ़ापे में तुम्हारा दिमाग गड़बड़ा गया है । तुमसे फालतू बातें करने का मेरे पास वक्त नहीं है। तुमने क्या से क्या देखा है, सुनना चाहिए कुछ और, सुना है कुछ और ही। तुम्हारी आंखें खराब हो गई हैं, गोविन्द ! तुम्हें चश्मा खरीद देना पड़ेगा।' गोविन्द अचानक फर्श पर बैठ गया। नित्यानन्द सेन के पांवों के पास । उसकी आंखों में आंसू की बूंदें थीं। बोला, "बाबू, आप एक बार चलिए। ह हमारे मुन्ना के अलावा कोई नहीं हो सकता।" "जिसको-तिसको मुन्ना कहने की गलती मत करो गोविन्द ! यह बात तुम बहुत बार कह चुके हो।" "अवकी गलती नहीं है, वाबू ! गेरुआ वस्त्र धारण करने से क्या होगा मैंने ठीक-ठीक पहचान लिया। एक बार आप चलें वावू, आपके जाने से मुन्न नाहीं न कह पायेगा । मुझसे उसने भली भांति बातचीत तक न a वावू..." "तुम जैसे पागलों से कौन बातचीत करे !" गेरुआ वस्त्र पहने विलकुल साधु बन गया है । काली के मन्दिर के सामने के चबूतरे पर आंख मूंदे चुपचाप बैठा था। साम जाते हुए ज्योंही मेरी दृष्टि पड़ी मैं ठिठककर खड़ा हो गया। मैंने कौन-मुन्ना? मेरे कहते ही उसने आंखों खोलीं, उसके बाद एक पल मेरी ओर ताककर फिर से आंखें मूंद लीं। लेकिन मैं छोड़ने ही क्यों उसके पैरों के पास बैठ गया। फिर से पुकारा : मुन्ना ! तब उसने "नहीं बाबू ८२ माखें खोली । अब मुझे किसी तरह का संदेह न रहा बाबू ! मैंने उसके दोनो हाथों को कसकर पकड़ लिया। फिर में उसका हाथ क्यों छोड़ने जाऊ! मेरा कारनामा देखकर चारों तरफ लोगो की भीड़ लग गई। मैने कहा : यह हमारा मुन्ना बाबू है । अचानक मुन्ना ने एक झटके में अपना हाथ छुड़ा लिया और इसी तरह मेरी ओर घूरा कि क्या कहूं वावू । तब मैने कहा : मुन्ना, तुम मुझे क्यों रुला रहे हो?.."सुनकर मुन्ना ने अपना मुह घुमा लिया। फिर मेरी ओर एक बार भी न वाका । मेरी आखों से टपटप आंसू गिरने लगे... मैं कलप-कलपकर वहीं रो पड़ा।" "फिर?" "फिर वहां से दौडा-दौड़ा यहां आया। आप एक बार चलिए बाबू ! नित्यानंद सेन बोले, "तुम्हारा दिमाग खराव हो गया है गोविन्द ! मुझ से जो कुछ कहा, किसी से मत कहना वरना लोग तुम्हें पागल समझेंगे।" नित्यानन्द सेन मन ही मन हंस पड़े। अगर मह संभव हो तो फिर उनकी मृत आत्मा से बातचीत, उनका भाषण, उनका यह पुस्तक लिखना, ये तमाम उपाधिया, उनकी विद्या-बुद्धि और उससे भी बढकर सर ओलिवर लॉज, काननडायल-सबके सब मिथ्यावादी हैं। उनकी संपत्ति, उनकी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जायेगी। पागल फिर कहते ही किसे हैं ! गोविन्द अनपढ़ पागल है ! नित्यानन्द सेन फिर से अपने काम मे व्यस्त हो गए। बाहर के दरवाजे की कुटी खड़खड़ा उठी। क्षितीन वाबू आए हैं । "ऊपर ही ले आओ।" नित्यानन्द सेन ने कहा। क्षितीन बाबू तर्कशास्त्र के प्रोफेसर हैं। वह अकस्मात् इस वक्त क्यों आए? "क्या बात है, भाई जो?" "तुम्हारे रातुल पर नजर क्षितीन बाबू भी जैसे आश्चर्यचकित हैं । क्षितीन बाबू के तमाम चेहरे पर अस्वाभाविक उद्वेग है । आतंक । उन्होने जैसे इतने बडे रास्ते को दौड़ते हुए तय किया हो । उनका पूरा शरीर रोमांचित होकर थरथरा रहा है। नित्यानन्द सेन ने पूछा, "किस को देखा--रातुल को ?" ।

"हां; कालीघाट के मन्दिर में, गेरुआ वस्त्र पहने। देखते ही पहचान लिया। मैं हर रोज़ मन्दिर की ओर जाता हूं, यह तुम्हें मालूम ही है । एका- एक रातुल पर नज़र पड़ते ही अपनी आंखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हुआ। यह कैसे हुआ? मैंने अपने आप से सवाल किया।" "क्या कह रहे हो तुम? सच्ची बात है ?" नित्यानन्द सेन का चेहरा एकाएक वुझ गया। ११ जहाज बारह बजे दिन में खिदिरपुर डॉक से आकर लगा। महासागर पारकर बन्दरगाह में पहुंचा। यहां कुछ दिनों के लिए रुका रहेगा। महराज ने आज जल्दी-जल्दी रसोई तैयार कर ली है। इतने-इतने आदमियों के लिए उसे रसोई बनानी पड़ती है। किसी को रोटी चाहिए तो किसी को भात, किसी को दाल, किसी को शोरवा, किसी को रोस्ट। "आज मांस में भरपूर लाल मिर्च डाली है, देखना है कि तुम्हारा गोदाम वावू कितनी फाइन करता है।" महराज ने कहा। मांस चखता हुआ भोम्बल बोला, "मगर बड़ा ही उम्दा पका है 'महाराज! बहुत दिन से ऐसा मांस खाने को न मिला।" "थोड़ा और दूं भोम्बल ?" होठों से वीड़ी दवाये, महराज ने कलछी से थोड़ा-सा और डाल दिया। "अहा, खाने में सचमुच बहुत ज़ायकेदार लग रहा है ! महाराज ने कहा, "पिछले महीने गोदाम बाबू की रपट के कारण मुझे आठ आना जुर्माना भरना पड़ा था। अवकी देखना है कि कितना जुर्माना करता है।" इतना कहकर वह लंबी छोलनी से मांस की देगची में खट-खट खटा, खट-खट खटाक आवाज़ करने लगा। "उस दिन देखा..." महाराज बोला, "उस दिन देखा कि तुम मशीनघर के सामने गोदाम बाबू से हंस-हंसकर बातचीत कर रहे हो लगता है, तुम्हारा दो रुपया माहवार + आठ बजे बढ़ा दिया है इसलिए तुम दुनिया भर को खुशामद करते हो। तुम उसे पहचान नहीं पार, भोम्बल ""मैं उसकी नौकरी लेकर ही रहूंगा । मैं जनेऊ छूकर तुमसे कह रहा हूं। देख लेना..." मांस को देगची नीचे उतारकर महराज ने दाल का वर्तन चूल्हे पर चढा दिया। उसके बाद एक बोड़ी सुलगा कर कहने लगा, "मैं कोई नया रसोइया नहीं हूं। डंकन साहब जब कप्तान थे, मेरे मन में क्या खयाल आया, जानते हो भाई ? फॉबल करी दिलचस्पी मे बनाई । सरदियों का मौसम था, बड़े दिनो का बाजार । झमाझम बारिश हो रही थी। शाम सात बजे रसोई पकाना खत्म किया, 'साहब खाना खाने बैठे। खाकर इतनी तारीफ की, इतनी फला- हारी से पूछना । बैजू को भी मालूम है । इंकन साहब ने भाई इतनी तारीफ की, इतनी कि उसी वक्त मेरा माहवार पचीस रुपया बढा दिया । वे लोग आदमी थे। न अब वह वक्त रहा और न वैसे आदमी।" उबलती दाल के वर्तन मे चट से पचीसेक लालमिर्च डाल कर महराज बोला, "गोदाम बाबू कहा करता है कि वे लोग खाटुली के जमींदारों के वंशज हैं । हु, होते तो इतनी कम मिर्च खाकर तुम्हारा पेट ही क्यो बिगडता ? फिर तुम जमोदार की औलाद कैसे हुए? ठीक कह रहा हूं न, भोम्बल ?" उसके बाद एक पल चुर रहने के बाद महराज फिर से कहने लगा, "कभी-कभी सोचता हूं कि कुछ भी न कहूं। वह जो कहता है, कहा करे । पागल क्या नहीं बकता है.. मगर वह कहता फिरता है कि मैं बर्मा को सड़कों पर भीख मांगता चलता था और साहब से कहकर उसने ही मुझे नौकरी दिला दी है । अरे, हम तीन-तीन पुरतों से रसोइये का काम करते आ रहे हैं । मेरे दादा लाट साहव के हेड बावर्ची थे। तीस सालों तक नौकरी करने के बाद पेंशन मिली... अकस्मात् जैसे बिजली गिर पड़ी। ठीक-ठीक बिजली नहीं गिरी बल्कि गोदाम बाबू ने कमरे के अन्दर प्रवेश किया। और एक क्षण बीतते-न बीतते महराज के चेहरे पर भम और भक्ति की छाया हिलने-डुलने लगी। दोनों जूठे हामों को जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा, "आइए। मुझसे कुछ कहना चाहते हैं, सर !"

गोदाम वाबू ने गंभीर स्वर में कहा, "मुझे बारह वजे के पहले हीखना लना चाहिए । देर नहीं होनी चाहिए। जहाज ज्यों ही खिदिरपुर पहुंचेगा तुझे दम लेने की फुर्सत नहीं मिलेगी।" "आप जैसा कहें हुजूर ।" एक क्षण पहले का महराज अव वह जैसे नहीं था । गोदाम बाबू के कमरे में घुसते ही जैसे बाजीगरी का करिश्मा हो गया। "फिर वह वात याद रखना।" "जी हां हुजूर !" "गोदाम का काम करना झंझटों का पहाड़ ढाना है।" कहते-कहते गोदाम बाबू जिस तरह कमरे में आए थे, उसी तरह लौट गए। गोदाम बाबू के बाहर निकलते ही महराज ने बाहर की ओर झांककर एक वार अच्छी तरह देख लिया। उसके बाद दनादन कई लाल मिर्च दाल में डालते हुए कहा, "देखा न भोम्बल ! तुमने देखा ही। कितनी अकड़ में रहता है, तुमने देख ही लिया। मैं उसकी अकड़ को मटियामेट कर डालूंगा । मैं जैसे गाय-बकरी होऊ । कभी-कभी इतना गुस्सा माता है, इतना कि अगर सतजुग होता तो जनेऊ छूकर ऐसा शाप देता कि जलकर राख हो जाता और मैं उस राख को चूल्हे में फेंक डालता..." - जहाज़ से उतरने के बाद भोम्बल ने चार पैसे की मूंगफली खरीदी। बोला, "लो खाओ।" डॉक के बाहर आकर बोला, "ये कई दिन तुम्हारे बड़ी तकलीफ में गुजरे हैं । अन्यथा मत लेना । पता नहीं, गुस्से में क्या कह बैठा हूं। जानते हो कभी मां का प्यार नहीं मिला। लाटू' गुण्डा के पास रहता तो अब त गुण्डागर्दी ही सीखता । खैर, उन बातों को छोड़ो। अगर किसी दिन मेरी या आए तो सोचना, वह घोर पागल था, उसके दिमाग का कोई ठीक नहीं अगर किसी दिन बड़ा आदमी बन सका तो शायद अखबारों में मेरा न देखोगे। हो सकता है कि मेरा मैजिक देखने के लिए हजारों की भीड़ उ आए। वह दिन अगर आ जाए तो मुझसे मिलना, उसके पहले नहीं।" चलते-चलते दोनों ट्राम लाइन पर चले आए । वेशुमार बस, ट्राम, नि और आदमी की भीड़ का आना-जाना जारी था। रातुल अच्छी तरह देखने लगा ! कितने बरसों के बाद वह फिर से कलकत्ता आया है। पहले दाम, यस और सड़को पर इतने आदमी नहीं हुआ करते थे। वह इसके पहले भी दो-चार बार खिदिरपुर मा चुका है। सब जानी-पहचानी जगहे हैं। उसे लगा कि यद्यपि वह इतने देश, इतने इतने आदमियों को भ्रमण के क्रम में देख चुका है, लेकिन कही उसे इतना अच्छा मालूम नही हुआ था। सब कुछ-- यह सड़क, ये मकान, गद-गुबार-जैसे उसके बहुत-बहुत प्रिय हैं। ये लोग उसके देश के आदमी हैं । निकट के आदमी। मन के आदमी। तीसरा पहर हो चुका है, दफ्तर बन्द हो जाने के कारण वस और ट्रामों मे खडे होने तक को जगह नहीं है । डॉक के कुलियो को छुट्टी मिल चुकी है । कोयले की गर्द से भरे मैली पोशाक में मदं और औरत कुलियों की जमात है जो दोनों किनारे के फुट- पायों से पंक्तिवद्ध होकर अपना झुग्गियो की ओर जा रहे हैं। रातुल को माखो के दायरे मे जो कुछ भा रहा है, उसे अच्छा लग रहा है । अच्छा लग रहा है पावो के नीचे स्वदेश की मिट्टो का स्पर्श ! अच्छी लग रही है गंगा से आती हुई हवा और आदमी की जमात । भोम्बल ने पूछा, "तुम क्या सोच रहे हो?" "कुछ भी नहीं।" रातुल ने कहा । उसके बाद भोम्बल के स्वर में एकाएक मिठास तिर आई, "तुम्हे मुझे छोड़कर जाने मे तकलीफ नही महसूस हो रही है ?" इतना कहकर भोम्बल ने एक कहकहा लगाया। रातुल ने पूछा, "तुम हंसे क्यो?" "छोड़ो; तुम नही समझोगे । अब तुम घर जाओ । वस पकड़ो।" विदा करने की मुद्रा मे भोम्बल ने रातुल के पीठ पर अपना हाथ रखा। "तुम भी मेरे साथ चलो।" रातुल ने कहा। "मैं ? मुझे अपने घर ले चलोगे?" "बाबूजी तुम्हें देखकर बेहद खुश होगे।" "तुम्हारे घर पर और कौन-कौन हैं ? तुम्हारी मा जीवित नहीं हैं ?" "नही; मा को मैंने देखा तक नहीं।" "तुम्हारी भी मां जीवित नहीं है ? तुम लोग बहुत धनी हो ?"

"मालूम नहीं।" " "तुमको देखने से तो यही लगता है कि तुम लोग बहुत बड़े आदमी हो। तुम मेरा दुख समझ नहीं पाओगे। मैं तुम्हारे घर पर नहीं जाऊंगा। अगर मैं खुद किसी दिन बड़ा आदमी हो सका तो फिर तुमसे मिलंगा।" रातुल मुसकराता हुआ बोला, "बड़े आदमी क्या बहुत बुरे होते हैं ?" "बड़े आदमी गरीबों को बड़ी हेय दृष्टि से देखते हैं। जब तुम बड़े होगे तो यह बात तुम्हारी समझ में आएगी । बड़े आदमी सोचते हैं कि जिनके पास पैसा नहीं, विद्या, बुद्धि, मन-कुछ भी उनके पास नहीं रहता है।" "तुम्हें इतनी बातों की जानकारी कैसे हुई भोम्बल ?" "कितने ही आदमियों के पास रहकर कितने ही तरह के काम कर चुका हूं-कितनों के घर में वर्तन मांजने का काम किया है, रसोई बनाई है, झाडू-बुहारू देने का काम किया है । तुम्हारे लिए सारी वातें सुनना जरूरी नहीं है । सुनने पर हो सकता है कि समझ ही नहीं पाओ। अपने दुख को सिर्फ हमी लोग समझते हैं, और अगर ईश्वर है तो वह भी समझता है." "मैं वह सब नहीं समझना चाहता। चलो, मेरे घर चलो।" दोनों ट्राम पर चढ़ गए। कुछ देर के बाद भोम्बल बोला, "तुम पर नजर पड़ते ही घर के सभी लोग आश्चर्य में आ जायेंगे। है न यह वात ?" "इसमें आश्चर्य की कौन बात है ? वावूजी अभी घर पर नहीं होंगे। होगा तो सिर्फ गोविन्द हो । वह हमारा वहुत पुराना नौकर है।" वस के अन्दर खड़े-खड़े जा रहे हैं और छत की सलाख पकड़े हिल- हुल रहे हैं। कंडक्टर चारों तरफ के आदमियों से टिकट मांग रहा है । वह किस ओर से किस ओर जा रहा है, दिख नहीं पड़ता। जब रातुल घर पहुंचेगा, गोविन्द संभवतः उस वक्त चूल्हा जला चुका होगा। कुंडी खट- खटाते ही वह दरवाजा खोलने आएगा। सोचेगा, शायद बाबू आए हैं। लेकिन जब उसकी नजर मुन्ना पर पड़ेगी, वह हैरान हो जायेगा । हो सकता है, उसे विश्वास न हो पाए। जिसके बारे में पता है कि वह मर चुका है, उसके आवि- र्भाव से चौकना स्वाभाविक है। फिर वह चाय बनाकर लाएगा। हो सकता है कि कुछ देर तक रोता रहे, लेकिन वह खुशी की रुलाई होगी। और अगर गोविन्द घर में न हो या वह नौकरी छोड़कर बहुत दिन पहले चला गया हो तो फिर? लड़ाई के दौरान वहुत-कुछ बदलाव के दौर से गुजर चुका है । इसमें याश्चयं की कोई बात नहीं। हो सकता है उसके घर में कोई दूसरा नौकर हो । अजनवी रहने के कारण वह रातुल को पहचान नहीं सकेगा। पूछेगा : बाप कौन हैं ? किससे मिलना चाहते हैं ? हो सकता है शुरू में अन्दर ही न जाने दे। रातुन अपना नाम बताएगा, तो भी विश्वास नहीं करेगा। रातुल ? बाबू का लड़का रातुल तो लड़ाई में बहुत दिन पहले मर चुका है। धोखाधड़ी करने की कोई योर जगह न मिली ? वादू घर पर नहीं हैं। यह सब नहीं चलेगा। बाबू आ जाएं फिर जो करना होगा, करेंगे। किमी भी अजनवी को घर के अन्दर घुसने दू, इसकी मुझे इजाजत नही मिली है । और अगर वैठना ही है तो वाहर के कमरे में बैठो। हां तब तक, जब तक वह आ न जाएं। वह जब तक नहीं पा जाते हैं तब तक घर के अन्दर के आने दूं। "सर्वनाश हो गया।" एकाएक भीम्बल चिहुंक उठा। "क्या हुआ?" रातुल ने पूछा। "मेरा मनीबंग?" भोम्बल अपनी जेवें टटोलने लगा। कही नहीं है । कहां गया? वह अभी. अभी दो महीने की तनख्वाह लेकर रास्तं पर निकला था। लगभग डेढ़ सो रुपये उममें थे। जेब कट गई ? सौमाग्य कहिए कि कुछ रेजगारी अलग ही रखी हुई थी। कंडक्टर आया और टिकट की मांग की। रातुल ने कहा, "मेरे पास कानी कौड़ी तक नहीं है।" भोम्बल बोला, "तुम्हारे घर पर जाना नहीं हो पाएगा।" "क्यों?" "मनीवंग की तलाश में मझा बाजार जाना पड़ेगा।" "मिल जाएगा?" रातुल ने निराग मुद्रा में कहा। "उरूर । और कहा जायेगा ? अड्डे पर पहुंचने से अवश्य ही मिल जाएगा।" "किस अड्डे में ?" रातुल ने पूछा।

"लाटू गुंडा के अड्डे में। मछुए वाज़ार में। चोरी की सारी चीजें पहले वहीं जमा की जाती हैं.."चलो देखें, किस्मत में क्या है। ज्यादा देर होने से हो सकता है कि माल का बंटवारा हो जाए। रातुल ने कहा, "मैं भी चलूं ?" "चलो, ज्यादा देर नहीं होगी। गया और लौटा।" "मगर इतने दिनों के बाद लाटू गुंडा अगर तुम्हें देख ले और पकड़कर रोक ले और फिर आने न देतो?" भोम्बल ने सीना तानकर कहा, "देखा जाए । डेढ़ सौ रुपया गायब होने दें ? खून-पसीना एक कर कमाया है।" १२ अलकतरे की सड़क पर टैक्सी सरसराती हुई जा रही थी। आशुतोष मुखर्जी रोड पकड़कर बसों की भीड़ को पीछे छोड़ती हुई टैक्सी हाजरा रोड के मोड़ पर आई। उसके बाद दाहिनी तरफ सीधे हाजरा रोड को पकड़कर चली। टैक्सी भागी जा रही थी और उसके चारों पहिये थरथराते हुए चक्कर लगा रहे थे। गोविन्द ड्राइवर के पास बैठा था। पिछली सीट पर नित्यानन्द सेन और क्षितीन बावू । संध्या सात बजे एक हॉल की सभा में उन्हें सम्मिलित होना है। एक वार उन्होंने मुड़कर कलाई घड़ी देखी। अभी कई घंटे वाकी हैं। किसी की जवान से एक भी शब्द वाहर नहीं निकल रहा था। एक तरह का आतंक और आनंद से मिला-जुला कोतूहल टैक्सी के अन्दर के वातावरण में मंडरा रहा था। कालीघाट रोड के मोड़ पर आकर टैक्सी वायीं ओर मुड़ी । अब सीधा रास्ता है। इसके बाद ही वायीं ओर काली का मंदिर । अब पांच मिनट के वाद ही मुन्ना बाबू पर नजर पड़ेगी। जब उसने जन्म लिया था और छोटा था, एक तरह से गोविन्द ने ही उसका लालन-पालन किया था। घर की - ६० मालकिन एक वार जो विछावन पर गिरी फिर दुवारा उठ नहीं पाई। वह एक हाथ से रसोई पकाता था, बाजार करता था और दूसरे से मुन्ना का लालन-पालन करता था। हर तरह का काम गोविन्द ही करता था। बचपन में मुन्ना कितना शरारती पा! दोपहर में गोविन्द सदर दरवाजे के पास लेटा था । गरमी की दोपहर यी । वायू कॉलेज जा चुके थे। शंमनाय लेन की छोटी तंग गली में माइसक्रीम वाला माया करता था। मुन्ना आहिस्ता- माहिस्ता दबे पांवो रास्ते पर उतरा। अचानक गोविन्द को नींद टूट गई। "कौन है ? कौन ?" गोविन्द पर नजर पड़ते ही मुन्ना भागकर ऊपर चला गया। राम- राम कूड़ा-कर्कट है वह सब ! खाने से पेट की बीमारी होती है। गोविन्द ने वाबू से कितनी ही बार कहा था कि मुन्ना वाद को पंसा मत दिया करें। "इतने छोटे बच्चे के हाथ में पैसा क्यों देते हैं बाबू । फेरीवाले ही मारे अनयों की जड हैं । मुहल्ले मे इतने-इतने मकान हैं, मगर इसी मकान के सामने आकर पुकार लगाते हैं : मूंगफली। दालपूरी। धुघना । रामदाना। गोल- गप्पा ! हुँ; इन लोगों की मौत क्यों नहीं होती?" छुटपन में मुन्ना पढने से बड़ा जी चुराता था। बाबू का भय दिखाकर मुहल्ले से खोजकर लाना पडता था। उधर मास्टर साहब बैठे-बैठे इन्तजार किया करते थे। मालकिन मरने के समय कुछ वोलकर नहीं जा सकी। अन्तिम समय मे कुछ दिनो तक जवान ही बन्द हो गई थी। फिर भी स्वर्ग जाकर वह देख तो रही हैं। एक तरह से उसके ही हायो में सौंप गई थी। लेकिन कब तक आंखों के सामने रखा जाए? लडका जव बड़ा हो जाता है तो बाप की ही बात कहां सुनता है ? बाबू को जानकारी नहीं दी गई थी उसके बाद कई दिन बड़े कष्ट मे व्यतीत हुए थे। बाबू के गले के नीचे भात उतरता ही नहीं था। मात के थाल के सामने बैठे-बैठे पता नही, माकाश- पाताल क्या-क्या सोचा करते थे। भात ज्यो का त्यो पड़ा रहता था। पड़ोसी के घर से बिल्ली आकर चट से मछली उठाकर ले जाती थी। उसके बाद से गोविन्द खाना परोसकर रसोई घर की सिटकनी बंदकर अपने सामने सिलाता था। - -- "वह तली मछली रही, वह शोरवेदार, वह बड़ी कटोरी में दाल है और वो रही परवल की भुजिया । यह थोड़ा-सा भात दही के साथ खा लें वावू । फेंकने से नहीं चलेगा। " मालकिन जिस दिन से चल बसी हैं आपको अच्छा खाना नहीं मिल पाता है । उस दिन क्षितीन वावू की मां के पास जाकर चटपटी रसोई बनाना सीख आया हूं। "कल कलाई की दाल खरीद लाया हूं। वरी बनाने को सोचा है । माप तली हुई बरी खाना पसन्द करते थे। अकेले दाल चुनना है, फिर पानी में डालना होगा, फिर पीसना । उसके बाद वरी बनानी हैं। यही नहीं, सव काम छोड़-छाड़कर धूप में सुखाना होगा।" वाबू कहते, "इतनी-इतनी रसोई किसके लिए बनाते हो गोविन्द ? देकार इतनी मेहनत करते हो। मुझे सिर्फ थोड़ा भात और आलू का भुरता दे दिया करना ।" सारे कपड़े-लत्ते फट गए थे। वावू नये कपड़े वनवा ही नहीं रहे थे। गोविन्द एक दिन दुकान से दर्जी को बुला लाया। बाबू के सामने खड़ा होकर वह बोला, "ठीक से माप लो भैया। सात दिनों के अन्दर देना है। सिलाई खराव हुई या कपड़ा पसन्द न आया तो मजूरी काट लूंगा। हां, कहे देता हूं।" अन्ततः वावू ने कॉलेज जाना बन्द कर दिया। कहीं भी नहीं निकलते थे। रात-दिन दरवाजा बन्द करके कमरे में पड़ रहते थे । दरवाजे को ठेलकर खाना खिलाना पड़ता था। दोपहर और रात में खाना खिलाने के वक्त सिर्फ माधे-आधे घंटे के लिए मुलाकात होती थी। मेज़ पर बैठकर खाना खाते- खाते किताव पढ़ा करते थे। क्या खा रहे हैं, इस ओर उनका ध्यान ही नहीं रहता था। वैठे-बैठे ढेरों चिट्ठियां लिखते रहते थे। उन चिट्ठियों के ढेर को गोविन्द लेटर वॉक्स में डाल माता था। कॉलेज जाना बन्द हुआ, बंधु- वांधवों का आना-जाना बंद हुआ-वस कमरे में तमाम दिन बैठे-बैठे क्या करते थे, भगवान जाने। चेहरा दुवलाकर रस्सी की तरह हो गया। कई सालों तक यही सिलसिला चलता रहा। इतनी बड़ी लड़ाई समाप्त हुई, कलकत्ते में वमवारी हुई, अकाल पड़ा, कलल वीरान हो गया, वीरान हो गया, लोग-बाग - । मुहल्ले से गायब हो गए, ब्लंकआउट हुआ-किसी तरफ कोई ध्यान नहीं। दोपहर और रात में बाबू को खाना खिलाकर गोविन्द लोट आता। उसके बाद करने के लिए उसके पास कोई काम न रहता था। दरवाजे के पास लेटा- लैटा वह असंलग्न चिन्ताओ में डूब जाता था। समय काटे नहीं कटता। दो प्राणियों के परिवार में काम हो हो कितना सकता था ! इसी तरह बहुत साल बिताने के बाद एक दिन वह पर से बाहर निकले। लेकिन फिर कॉलेज गए ही नहीं। बोते : "अब नौकरी नहीं करूंगा, गोविन्द । किसके लिए करूं ? एक आदमी की रोजी-रोटी किसी तरह निभ ही जाएगी।" घर से निकलना फिर से चालू हो गया। बंधु-वाधव फिर से घर पर आने लगे। यहां-वहां मीटिंग होने लगी। दो-चार दिनों के लिए सभा-समिति में सम्मिलित होने के लिए दूर-दूर जाने लगे। कभी पश्चिम की ओर, कमो प्रयाग । साथ में गोविन्द रहता। बड़-बड़े आदमी मोटर से मिलने के लिए आने लगे। वे फूलों का हार पहना जाते । मुन्ना की आदमकद फोटो बनवा कर टंगवा दी। उसके बाद हर रोज शाम के वक्त कमरे को अंधेरा करके और दरवाजे को बन्दकर कई घंटे तक क्या-क्या करते हैं, गोविन्द कुछ समझ नहीं पाता है। समझने की कोशिश भी नहीं करता है । "उतरी गोविन्द, उतरो, आ गए..." क्षितीन बाबू की पुकार से गोविन्द को चेतना लोट आई। टैक्सी काली मंदिर के सामने आकर खड़ी हो चुकी थी। बाबू ने उतरकर चलना शुरू कर दिया था, क्षितीन बाबू उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। टैक्सी रुकी रहेगी । वे लोग उसी टैक्सी से वापस जायेंगे । पत्थर की टाइल को सडक को पार करने के बाद ही मंदिर का प्रागण है । भिखमंगो की जमात पीछे लग गई। "एक पैसा वाबू एक पैसा..." तीस-चालीस बच्चे-बूढे, औरतें करुण स्वर में भीख माग रहे थे। गोविन्द बोला, "जामो तंग मत करो भैया। हम लोग तीर्य करने नहीं आए हैं। फिर भी तुम लोग पीछे लग गए हो । लगता है, तुम्हारे कानो में चात नहीं पहुंच रही है।"

क्षितीन वा रास्ता दिखाते हुए जा रहे थे । आज मंदिर में कुछ ज्यादा भीड़ थी। तीर्थयात्रियों का जमघट था। मां के मंदिर में लोगों का जमाव था। डाली की दुकानों से होकर जाने का उपाय नहीं है । वे लोग खींचतान शुरू कर देते हैं। हम तीर्थयात्री नहीं हैं, यह पहचान नहीं पाते। ये कैसे पंडे हैं ! हम काम से आए हैं। रास्ता छोड़ो, छोड़ो रास्ता। हम लोग अपनी ही परेशा- नियों से बेहाल हैं। मुन्ना बाबू मिल जाए, मनाकर हम उसे घर ले जाएं, वह दुनियादारी करने लगे, उसमें सुविवेक जग जाए तो फिर हम मनौती तो मनाये हुए हैं ही, पोडशोपचार से पूजा-पाठ करेंगे । सिर्फ डाली ही नहीं चढ़ायेंगे बल्कि मां का दरवाजा खोलने के वक्त सुवह जो प्रसाद दिया जाता है, वही भोग चढ़ायेंगे, उसके बाद अन्नभोग। हम लोगों के वावू जैसा वावू तुम लोगों को नहीं मिलेगा। । मां के मंदिर के दक्षिण के बड़े हॉल में संगमरमर पत्थर पर... क्षितीन बाबू ने दिखाया, "वह रहा ।" नित्यानंद सेन ने देखा। गोविन्द इसके पहले भी देख चुका था। अवकी और ध्यान लगाकर देखने - सुदूर नक्षत्रलोक का कोई, वाणी, मन और दृष्टि से परे का, रहस्य अनन्त काल से मनुष्य के कौतूहल को उत्तेजित करता आ रहा है । कितने ही महापुरुष उस रहस्य की यवनिका को अनावृत करने की व्यर्थ प्रचेप्टा में मृत्यु को वरण कर चुके हैं—मनुष्य का इतिहास इसका साक्षी है। फिर भी वर्तमान से आरम्भ कर दूर, बहुत दूर अनागत के मनुष्य हर युग में उसी रहस्य के उद्घाटित करने के लिए प्राणपण से परिश्रम करेंगे। यही आदमी की करुण नियति है। विश्वनियंता की इस सृष्टि के रहस्य के तिल-भर सत्य का भी आविष्कार करने में कोई समय नहीं होगा, यह जानते हुए भी साधना की गति में ठहराव नहीं आएगा। प्राणोत्सर्ग की गति थमेगी नहीं। यह क्या उनके जीवन का फलाफल है ! रातुल की मृत्यु के कारण जिस सत्य की खोज करने के बाद उन्हें गर्व का अनुभव हुआ था, रातुल पुनर्जन्म लेकर उनका परिहास करने आया है। उनके समस्त गौरव को धूलि में मिलाने आया है।

छि:छि.... अन्दर ही अन्दर गोविन्द की सांस जैसे अटक रही थी। अब वह स्वयं को संयत रख नहीं पाया । घडाम से वह मुन्ना बाबू के परोपर गिर पड़ा । वोला, "मुन्ना बापू. मुझे तुमने पहचाना नहीं ? मैं तुम्हारा गोविन्द हूं.'' रुलाई, आनन्द और उत्तेजना के कारण गोविन्द के मुंह से आधी वात बाहर ही नहीं निकली। क्षितीन बाबू बोले, "देखो नित्यानन्द, केवल माथे का बाल मुंडा हुआ है, वरना हूबहू वैमा ही है । मुझे तो वैसा ही लगता है..." यात्रियों के कई और दल वहां इकट्ठे हो गए। पूछा,"क्या बात है भाई?" उनमें से एक व्यक्ति अधिक आग्रहशील था । वह आगे बढ़ा और बिलकुल गोविन्द के पास चला गया, "क्या हुआ भाई जी, क्या हुआ है ?" गोविन्द दहाड़ मारकर रोने लगा, "भैया, वह हमारे मुला बाबू हैं । घर से भाग माए हैं। साधु बनकर जा रहे हैं। आप लोग दस आदमी मिलकर इन्हें समझाएं । ए मुन्ना वावू, एक बार बाबू की ओर तो देवो। तुम्हारे वारे में सोचते-सोचते उनका शरीर सूखकर आधा हो गया है । सुन रहे हो मुन्ना वावू ! सुन रहे हो..." आहिस्ता-आहिस्ता और ज्यादा लोग जमा हो गए । "क्या हुआ है जनाब?" "किसका लड़का है ?" "पुलिस को सूचना दी गई है कौन किसकी बात का उत्तर दे ! क्षितीन बाबू ने एक बार और नित्या- नंद की ओर गौर से देखा । नित्यानंद सेन शांत-गम्भीर रष्टि से मब कुछ देख रहे थे। फिर भी वह जैसे कुछ भी देख नहीं पा रहे थे। उनकी सारी साधना, मुख्पानि, विद्या-बुद्धि माज एक ओर थी और दूसरी ओर पुनर्जन्म प्राप्त रातुल । अचानक उन्हें अपना ही शरीर अपने आपको बड़ा भारी लगने लगा। तव चारों तरफ कौतूहल में डूबी जनता को भोड़ के प्रश्नों का वाण असह्य जैसा लग रहा था। क्षितीन बाबू बोले, "गोविन्द एक ओर तू पकड और एक ओर में पकडता हूं। वह जबकि वातचीत नहीं कर रहा है, उसे गाडी से घर ले चलना चाहिए। " "अव लतीफ ही कलकत्ते के दफ्तर का मालिक है । मगर जब मैं दल में था, मेरे सामने ही लतीफ की तालीम की शुरुआत हुई। तव वह मेरा शागिर्द था। अव लाटू गुंडा का कृपापान होने की वजह से उसकी तकदीर चमक उठी है। मांग काढ़ता है, हाथ में कलाई घड़ी रहती है, उंगलियों में सोने की चार- चार अंगूठियां हैं । मुझसे बार-बार कहा : दल में लोटकर चले आओ। पाकिस्तान हिन्दुस्तान के बीच तस्करी का कारोबार करोगे तो महीने में हाथ- खर्च के लिए चार सौ रुपये मिलेंगे, उसके अलावा खाने का खर्च । मैंने कहा : जरूरत नहीं है, भाई । अगर मैजिक और थोड़ा सीख लिया-ज्यादा नहीं, कटे सिर को जोड़ने का खेल मालूम हो जाए तो चार सौ रुपयों को पांव की ठोकर लगाऊंगा।" एक पल मौन रहने के बाद वोला, "एक व्यक्ति है -सैगोन का एक बूढ़ा चीनी । पट्ठा नंवरी अफीमखोर है। चार रत्ती अफीम का इन्तजाम कर उससे मिलने के लिए संगोन उसके घर पर गया था। अफीम को डिविया में रख लिया और उसके बाद ढेर सारे रुपयों की मांग की। मगर है हुनरमन्द आदमी।। यही वजह है कि गोदाम बाबू और महराज के लात-जूते खाकर भी वहां पड़ा हुआ हूं। सोचता हूं, साठ-सत्तर रुपये तो मिल रहा है। जमा करते-करते. जब लगभग हज़ार रुपये हो जायेंगे तो उसी दिन..." उसके बाद कुछ क्षणों तक वह खामोशी में डूबा रहा और मन ही मन कुछ सोचता रहा। बोला, "इसके अलावा पाकिस्तान-हिन्दुस्तान कहां तक करता फिरूं ? पकड़ा जाऊंगा तो फिर फांसी के फन्दे पर लटका देगा। उससे. तो बेहतर है कि इस उम्मीद में जी रहा हूं.. हो सकता है एक दिन मां मिल जाए । आवारे की तरह यह चक्कर काटना अब अच्छा नहीं लगता। मन में होता है, अपनी कोई अगर मां होती और अगर वह मारती-पीटती, डांट-डपट- सुनाती तो वही अच्छा होता। बहुत दिनों से मन में होता है कि मां की डांट-. डपट सुनूं..." चलते-चलते वे फिर ट्राम लाइन के किनारे आ गए। एकाएक उसकी निगाह घड़ो की एक दुकान की तरफ गई और वह चिहुंक उठा। "अरे ! आज मेरी सात वजे से ड्यूटी है । आज मैं तुम्हारे घर पर नहीं- जा पाऊंगा, भाई । मैं उस बस से चलता हूं। तुम जाओ।" 8८ इतना कहकर जाते-जाते वह अचानक ठिठक गया । बोला, "अरे ठहरो।" निकट माकर बोला, "तुम्हारी जैव तो ठनठन गोपाल है । तुम तो नम्बरी देवकफ हो जी ! पर कैसे जानोगे? इस नोट को अपने पास रख लो।" मोम्बल ने दस रुपये का एक नोट रातुल की ओर बढ़ा दिया। उसके बाद बोला, "शायद यहां और तीन-चार दिनों तक रहूंगा। अगर वक्त निकालकर एकाध बार आ सको तो मुलाकात हो जाएगी, वरना नहीं । कल सुबह-शाम जब मर्जी हो, एक बार आना' अव और कुछ नही कहना है... बेकार मोह-ममता बढ़ाने से कोई फायदा नहीं है..." और भोम्बल एक चलती बस पर उछलकर पड़ गमा। एक क्षण तक वहा खड़ा-खड़ा रातुल सोचता रहा । जोवन के बीच का हिस्सा अगर दुःस्वप्न में ही बीता है तो बीते । उसके बारे में ज्यादा दुखित होने की जरूरत नहीं है । भोम्बल वैसा ही व्यक्ति है। उसके साय जितने दिन गुजरे--उसकी स्मृति जीवन में यमर बनकर रहे । किसी भी दिन उसने रातुल के नाम तक को जानने की उत्सुकता व्यक्त नहीं की। इस तरह अजनवी व्यक्ति को प्यार करना उसे किसने सिखाया? किस स्कूल में उसे शिक्षा मिली, कोन उसका शिक्षक रहा ? आदमी की दुनिया से रातुल का कहा तक साक्षात्कार हो ही पाया है ! अधिक जानने और देखने का गर्व उसे नहीं है, लेकिन उसे लगा कि तमाम दुनिया में ऐसे व्यक्ति बहुत ही कम हैं। रातुल दाम के अन्दर पहुंचा । अभी साढ़े सात बजे बाबूजी से युनिवसिटी इस्टिच्यूट मे भेंट होगी। सभा में जब वह भाषण दे चुके होंगे, यह उनसे मिलेगा। उसके पहले नहीं। चाहे जो हो, बाबूजी बहुत हो चौको। हां, जरूर ही चौंक उठेंगे। शुरू मे वह कहेंगे : 'तुम कौन हो?' रातुल कहेगा, 'मैं रातुल हू, बाबूजी ! मैं रातुल हूँ। मेरी मृत्यु नही हुई है। आप लोग मेरे बारे में बहुत ही गलतफहमी में रहे। कितनी दिलचस्प बातें है...' 'क्या कह रहे हो तुम ! रातुल !! रातुल !!!' उस चलती ट्राम के सेकिंड क्लास के एक कोने में बैठे रातुल को आयो के सामने से नित्यानन्द सेन सशरीर उपस्थित हो गए। बहुत साल पहले का देखा हुआ चेहरा हूबहू वैसा ही था। वैसे ही स्नेह के प्रगाढ़ आलिंगन को ।

- परितृप्ति से प्रोफेसर की आंखें मुंद गई। विरह-व्याकुल बाप के सीने में रातुल ने अपना मुंह छिपा लिया। और उसको बाद दोनों की मानस दृष्टि से एक ही क्षण में भूत-भविष्य-वर्तमान, त्रिभुवन, सृष्टि के समग्र चराचर ओझल हो गए। रातुल को लगा, इस दुनिया में कोई नहीं है । दुःख, शोक और दुःस्यप्नों से पूर्ण यह घरती अकस्मात् जैसे बहुत ही प्रिय मावास बन गई है। वह फिर से उस विशाल वक्ष के निरापद आश्रय में-स्नेह के हनों पर- निश्चिन्तता के साथ चिन्तारहित होकर जीवन जी लेगा। कोल्हटोला, कोल्हूटोला... ढन-नुन, दन-दन.. - १४ रातुल चलती हुई ट्राम से उतर चुका था। यहां से कॉलेज स्पवायर होकर एक पगडंडी जाती है। इंस्टिच्यूट के पास पहुंचने के बाद रातुल को थोड़ी हैरत महसूस हुई। बाहर बहुत आदमी इकठ्ठ होकर गपशप कर रहे थे। अन्दर से बहुत आदमी बाहर निकल रहे थे। कहीं कोई तारतम्य नहीं था। क्या बात है ! मीटिंग खत्म हो चुकी ? रातुल ने एक मादमी से पूछा, "क्या बात है भाई साहब ?" "मालूम नहीं भैया! अफवाह तो बहुत तरह की सुनने में आ रही है।" वह भला यादमी एक ओर सरक गया। बाहर दीवारों पर तव भी सभा को पाई विज्ञापन चिपके पड़े थे। चिल्लाहट, शोरगुल और हो-हल्ला ने परिवेश को दबोच लिया था। रातुल ने एक दूसरे व्यक्ति से पूछा, "भाई साहब, मीटिंग का क्या हुआ माज नहीं होगी ?" "नहीं भाई, आज नहीं होगी। न केवल आज बल्कि कभी नहीं होगी।" और वह व्यक्ति अपने गंतव्य की ओर चला गया। भीड़ आहिस्ता-आहिस्ता पाम होती जा रही थी। रातुल ने एक तीसरे व्यक्ति के सामने वही प्रश्न उछाला, "मीटिंग नहीं ?

होने जा रही है, माई साहब ?" उस व्यक्ति ने एक बार रातुल के चेहरे पर अपनी निगाह दौड़ाई । इन उम्र में परलोक के सम्बन्ध में कौतूहल होना सचमुच व्यतिक्रम ही है । उस व्यक्ति ने कहा, "कहां से आ रहे हो, भाई ?" "क्यों ?" रातुल ने पूछा। "नहीं; यों ही पूछ रहा हूं। अगर तुम्हारा मकान दूर है तो कभी तुरन्त घर लौट जाओ। मीटिंग-वीटिंग की उम्मीद छोड़ो। जितनी तरह का बोगस कारोवार है, सब बंगाल में ही चलता है। इस तरह का मिलावटवाला देश तीनों लोक में कहीं नहीं मिलेगा।" उस ओर बातचीत करते हुए कई आदमी चले जा रहे थे। "अरे, अव तक सिर्फ दूध और घी में ही मिलावट चल रही थी। अब देख रहा हूं कि विद्या-बुद्धि, लिखना-पढ़ना, डिग्री-डिप्लोमा वगैरह में भी मिलावट का दौर चल रहा है। न, दुनिया में किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता है। जो कुछ हो, किताबो को बेच-वेचकर भले आदमी ने खूब पैसा कमा लिया है । एक-एक किताब के पाच-पाच संस्करण हो चुके हैं। सब धोखा- घड़ी है..." तमाम बातों और चर्चाओं को सुनकर रातुल जैसे हतप्रभ हो गया। फिर वाबूजी मीटिंग में नहीं आए ? हर कोई बाबूजी के बारे मे ही चर्चा कर रहे हैं ! क्या वोगस है ? किसने धोखेबाजी की ? उसके पिता ने ? प्रोफेसर नित्यानन्द सेन ने ? जो जीवन मे कमी झूठ नही बोले-उन नित्यानन्द सेन ने ? जिसने कभी दफ्तर की दवात-कलम से एक चिट्ठी तक न लिखो ! उस सत्यवादी, दार्शनिक, लोमहीन, अनासक्त व्यक्ति के बारे में ही ये लोग बतिया रहे हैं ! रातुल अब अपनी उत्सुकता को दबाकर रख नहीं सका। उसने पूछा, "प्रोफेसर नित्यानन्द क्या आज मीटिंग मे नही आए, साहब ?" लोगों की जमात मे से एक व्यक्ति ने कहा, "नही भया, नहीं आए। अव आकर फोन-सा मुह दिखायेंगे ?" "क्यों ?" रातुल की उत्सुकता मे तीव्रता यो। उसकी सांसें जैसे अटक रही थीं।

"अरे, भाई मेरे, जिस पुत्र को केन्द्र बनाकर परलोक की इतनी चर्चा कर रहे थे, डिग्गियां बटोरी हैं, मोटी-मोटी पुस्तकें लिखी हैं-असल में उस लड़के की मौत हुई ही नहीं है । इतने दिनों के बाद वही लड़का घर लौट आया है। अव शर्म के मारे मुंह कैसे दिखाएं ! खुद भी बेवकूफ बने और तमाम युनिव- सिटियों को बेवकूफ बनाया। छिः छिः ! यकीन न हो तो उनके शंभुनाथ पंडित लेन के मकान में जाकर देख आओ।" अब रातुल ने एक क्षण भी देर न की, वह वस में जाकर बैठ गया। आधा घंटे के बाद रातुल बस से उतरकर शंभुनाथ लेन के मकान के सामने पहुंचा। जाकर उसने देखा कि वहां लोगों की बहुत बड़ी भीड़ लगी है। रात के अंधेरे में बहुत आदमी घर के दरवाजे के सामने खड़े होकर बातचीत कर रहे हैं। शंभुनाथ लेन अव पहले जैसा न रहा । पहले गैस की बत्तियां जला करती थीं। अब जहां-तहां दो-चार दुकानें खुल गई हैं। उन दुकानों से रोशनी माकर रास्ते पर फैली थी। रातुल घर के सामने पहुंचकर खड़ा हो गया। सामने काफी लोगों का जमघट था। उस जमघट ने छोटी-मोटी भीड़ का रूप ले लिया था। सभी लोगों के सामने गोविन्द खड़ा था । गोविन्द हाथ- मुंह नचा-नचाकर कुछ कह रहा था। गोविन्द का चेहरा फैसा हो गया है ! जैसे वह पहचान ही में नहीं आ रहा है। पहले देखने में कैसा मोटा-तगड़ा था! उसकी तोंद बहुत बड़ी थी। तोंद को ऊपर की ओर किए वह लेटा करता था । जव गोविन्द की तबियत खुश रहती, दोपहर के वक्त वरामदे पर लेटा-लेटा वह बायें हाथ को सीने पर और दाहिने हाथ को तोंद पर रखकर उंगलियों से एकाग्र होकर तवला वजाता था। मुंह से तबले का वोल निकलता था : तागे नाधिन नागेधिन, ने केटे ताक, ने केटे ताक ताक ताक, तागे नाधिन नागेधिन. दोमंज़िले के उपरले कमरे से, कबूतर की गूटरगू-गूटरगू जैसे, गोविन्द की तोंद के तवले के बोल सुनाई पड़ते थे। वह तोंद अव विलकुल चिपक गई है। देह का कसाव ढीला पड़ने लगा है। रंग और भी काला हो गया है। -- गोविन्द चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था: "हुजूर, आप लोग मुझ पर नाहक ही दोप मढ़ रहे हैं। मैं कौन होता हूं? मैं इस घर का नौकर हूं। हुक्म का बन्दा । मालिक का अन्न खाता हूं, मालिक का हुक्म मानना पडेगा । जब आप लोगो का अन्न खाऊंगा तो आप लोगो का भी..." पता नही भीड़ में से कोन बोल उठा, "तुम एक बार जाकर देखो न ! कहो कि राखाल वाबू आए हैं । क्या कहते हैं, लौटकर मुझे बताओ।" गोविन्द भी हार माननेवाला जीव न था । वोला, "हुजूर मैं गया था। मेरो वात किसी ने सुनी नहीं। अन्दर से सिटकनी बंदकर क्षितीन बाबू और मेरे मालिक मुन्ना से बातचीत कर रहे हैं । अभी मेरी वात पर कौन ध्यान देगा, सरकार ! मैं ठहरा मामूली नौकर !" फिर भी उस भलेमानस ने विरोध किया, "तुम लोगो का मुन्ना लोट आया है ? उसको मृत्यु नहीं हुई थी ?" गोविन्द ने अपनी जीभ दात से काट ली, "शिव-शिव ! मरेगा क्यो हुजूर ! कामाख्या जाने से जिस तरह टोना-टोटका किया जाता है, ठीक उसी तरह के टोने-टोटके से अब तक रोक रखा था।" किसी एक व्यक्ति ने "फिर इसके बारे में इतनी किताबें लिखना, उतना मापण देना..." एक दूसरे व्यक्ति ने कहा, "अहा-हा, उसे यह सब कहने से फायदा हो कहा, क्या है ?" "आप ही बताएं!" गोविन्द को जैसे अब कोई सहारा मिल गया था । "आप ही बताएं ! मैं मामूली एक नौकर हूं या नहीं? मालिक ने कड़ी हिदायत दी है कि किसी को अन्दर मत आने दो । अभी मैं आप लोगो को अन्दर जाने दूं तो मेरी नौकरी ही चली जाएगी। फिर मुझे कौन-सा सहारा मिलेगा? इस बुढापे में मुझे कौन नौकरी देगा? या कि मेरे पास ज़मीदारी है जो उसको ही भंजा-भंजा कर खाऊ !" रातुल तब खड़ा-खड़ा गोविन्द को बातें सुन रहा था और उमकी भगि- माओ को निहार रहा था। गोबिन्द के पहले के चेहरे में बदलाव आ - वातूनी वह पहले जैसा था आज भी वैसा ही है। चाहे जो हो, बड़ा ही मज़ा आ रहा है। रातुल सजकर कौन माया है ?जाली प्रतापचांद है क्या?भवाल संन्यासी की तरह मंझले राजकुमार का अविर्भाव हुआ है ? सचमुच बड़ा ही मजा मा रहा है । यह तो जैसे रातुल के जीवन के संदर्भ में जासूसी उपन्यास की शुरुआत हुई है। रातुल को बड़ी हंसी आई। ? । किसने सोचा होगा कि घटनाचक्र में इस तरह का बदलाव आएगा रातुल ने भीड़ को ठेलकर आगे बढ़ने की कोशिश की। "गोविन्द ऐ गोविन्द..." उसने पुकारा। पुकार संभवतः गोविन्द के कानों में पहुंची। वह बोला, "अभी गोविन्द किसी की भी बात नहीं सुनेगा, भाई। मैं किसी से भी बातचीत नहीं कर सकता हूं। मैं ठहरा हुक्म का बन्दा । जैसा हुक्म मिलेगा वैसा ही करूंगा। मैं किसी की बात सुनूं ही क्यों ?" रातुल ने एक बार कहना चाहा : 'गोविन्द, इधर सुनो । मैं रातुल हूं-मैं ही असली रातुल हूं।' मगर वह वोल नहीं सका। पता नहीं, उसने अपने मन में क्या सोचा। इसका अंतिम परिणाम देखना चाहिए । आखिर वातों का सिलसिला कहां तक पहुंचता है ! जिसकी तमाम ज़िन्दगी अभी वाकी पड़ी है उसे इतनी जल्दबाजी करने की ज़रूरत ही क्या है ? किसी झूठ को हमेशा के लिए सत्य कहकर नहीं चलाया जा सकता है-यह बात उसने अपने पिता से ही सीखी है । जो धोखा है वह कभी न कभी पकड़ में आ ही जाएगा । किसी दिन सारी बातें मालूम हो जाएंगी। तव मज़ा आएगा। रातुल उस अंधेरी गली में भीड़ के बीच एक तरफ खड़ा होकर दिलचस्पियां लेने लगा। जीने पर चढ़ते ही बायीं तरफ एक कमरा है। वह कमरा आमतौर से १०४ किसी काम में नहीं लाया जाता है। उस कमरे में वेकार की तमाम चीजें भरी हैं। उसके ठीक बाद के कमरे मे सिटकनी बन्दकर नित्यानन्द सेन बैठे हैं । वह युवक एक कुरसी पर बैठा है । भितीनमोहन बाबू सामने बैठे उससे बातचीत कर रहे हैं। क्षितीन बाबू बोले, "सच बोलने में तुम्हारी कौन-सी हानि होती है, मुन्ना?" "मैं सच-सच ही कह रहा हूं।" युवक ने सिर झुकाकर यह बात कही। "लेकिन यह मकान, यह कमरा तुम्हारा है न? यह वात तुम स्वीकार कर रहे हो न ? अपने बाप की ओर आंख उठाकर देखो। तुम्हारे बारे में मोचते-मोचते उनका चेहरा कैसा हो गया है ! तुम्हारे दिल में थोड़ी भी माया-ममता नहीं है? इतने दिनों तक लिखने-पढ़ने के बाद आदमी बनकर तुमने यही तालीम पाई ?" युवक के मुंह से एक भी शब्द न निकला। "और एक बात !" क्षितीन याबू कुरसी खीचकर और निकट सरक आए । "और एक यात! सडको की धूल छानते-छानते तुम्हारे चेहरे की जो हालत हो गई है, देख हो रहा हूं। मेरी पीठ पर बैठकर तुम कितने ही दिन खेल चुके हो। तुम वही रातुल हो। यह तुम कैसा सर्वनाश कर रहे हो । न केवल अपना बल्कि बाप का भी सर्वनाश कर रहे हो । लेकिन अगर तुम 'बाबूजी' कहकर उन्हें एक बार पुकारो तो सारा झमेला खत्म हो जाए। देय ही रहे हो कि वह अपना मुह ढंककर तब से दूसरी तरफ आखें टिकाए बैठे हैं। लेकिन अभी अगर तुम उन्हें पुकारो तो सब भूलकर वह तुम्हे छाती से लगा लेंगे।" थोडी देर बाद क्षितीन बावू ऊचकर बोले, "वर, तुम आज रात सोच- कर देखो । तमाम रात सोचकर देखो। खामो-पियो। बिस्तर पर सोओ। बहुत दिनो से तुम आराम से सो भी नहीं मके हो। उसके बाद, उसके बाद अगर तुम्हें लगे कि यह सब तुम्हारी भलाई के लिए हो कहा जा रहा है, मेरी बात का उत्तर देना । कहा नित्यानन्द, ठीक कह रहा हूँ न, माई?" क्षितीन बाबू कुरसी से उठकर नित्यानन्द के पास गए। वह दो । - से अपना मुंह छिपाए बैठ थे। निकट जाकर क्षितीन बावू ने कहा, "अभी उसे परेशान करने की कोई जरूरत नहीं। उसे थोड़ा आराम करने दो। लगातार सवाल करने से वह नर्वस हो जाएगा। इसके अलावा अपने घर में दो दिन रहने के बाद उसे पुरानी बातें याद आएंगी। मां की याद आएगी। देखने-सुनने के बाद नशा दूर हो सकता है। साधु-संन्यासी होना वास्तव में एक तरह का रोग ही है। गिरीन्द्रशेखर से पूछो। उसे मालूम है । अरे, इस जीवन में कितना कुछ देख- सुन चुका हूं, भाई !" 1 उसके बाद कुछ सोचकर बोले, "तुम सुधीर को पहचानते हो न जी?- सुधीर चटर्जी-जो हम लोगों का क्लास-फ्रैंड था ? दस-दस बच्चों का वाप है, रुपये-पैसे की कोई कमी नहीं। वहीं हम लोगों का सुधीर, जी ! पहचान नहीं पा रहे ?" नित्यानन्द ने एक भी बात का उत्तर न दिया। क्षितीन बाबू ने बातचीत का प्रसंग बदलकर कहा, "मन खराव कर क्या करोगे भाई ? कुछ मत सोचो । मैं तो हूं ही। देखना, तुम्हारे घर का लड़का घर में ही रहेगा। चिन्ता की कोई बात नहीं है।" फिर भी नित्यानन्द जिस तरह बैठे थे उसी तरह सिर झुकाए चुपचाप बैठे रहे। क्षितीन बाबू जैसे किसी पाषाण-स्तूप से बातचीत कर रहे थे। युवक जिस तरह निर्विकार-निविरोध था, उसका बाप भी उसी तरह समाधि में लीन होकर किसी अचैतन्यलोक में पहुंच गया था। दोनों के दरमियान एकाकी क्षितीन बाबू जीवित हैं, जाग्रत हैं। लेकिन अगर वह अभी हार मान लें तो नहीं चलेगा। हालांकि रातुल इतने दिनों के बाद लौटा है, लेकिन उसकी मृत सत्ता उन लोगों के किस काम में आएगी? नित्यानन्द को फिर से दुनियादारी करनी है । रातुल और भी अधिक सिर ऊंचाकर वाप के यश-सम्मान, संपत्ति, प्रतिभा और प्रतिष्ठा का उत्तरा- धिकारी होगा। तभी बाप का मुंह उज्ज्वल हो सकेगा। "कोन ?" क्षितीन वावू ने वाहर की ओर देखा । सिटकनी बन्द दरवाजे के बाहर से जवाब आया, "मैं गोविन्द हूं।" "क्या खबर है ? सभी चले गए ?" १०६ "जी हां, सभी चले गए हैं ?" "बाहर अब कोई गड़बड़ी वगरह तो नहीं ?" "जी नहीं।" "अव तुम्हें एक काम करना है गोविन्द । झटपट मेरे घर जाकर एक पवर पहुंचानी है। हो सकता है कि घर पर सभी चिन्तित हों। खबर पहुंचा आओ कि मुझे लौटने में बाज रात हो जाएगी। इन लोगो के लिए खाने-पीने का इन्तजाम करके खिला-पिला लेने के बाद ही मुझे फुसंत मिलेगी।" "खाना तैयार है सरकार । वादू से पूछे कि अभी उनके लिए खाना ले माऊं?" इतनी देर के बाद नित्यानन्द के मुंह से आवाज वाहर आई । मिर झुकाए हो कहा, "बाज मैं खाना नहीं खाऊंगा।" "क्यों ?" गोविन्द के स्वर में उद्विग्नता थी। "अभी जाओ..." "लेकिन मुला बाबू ? वच्चा आदमी बिना पाए कब तक रहेगा?" नित्यानन्द ने कोई उत्तर नहीं दिया । उनके बदले क्षितीन बाबू ने जवाब दिया, "अच्छा होता अगर तुम खाना बा लेते नित्यानन्द!" नित्यानन्द ने धीमी आवाज में कहा, "मुझे भूख नहीं है ।" उसके बाद शंभुनाथ लेन में रात गह्राने लगी। रातुन ने एक सूराख से देखा कि गोविन्द कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर आया। उसके बाद वह सीधे पूरव की ओर चल दिया। रास्ता बिलकुल वीगन था। रातुल चुपचाप घर के अन्दर घुस गया । रातुल को लगा, हर पग पर उसे जैसे रोमांच का अनुभव हो रहा है । दोनो तरफ का अंधेरा उसका परिचित था । अंधकार के इस दायरे से उसकी जैसे बहुत दिनों से जान-पहचान है । बचपन में उस अधेरै ने उसे बहुत बार डराया है। और कभी-कभी उसी अंधेरे की ओर देखते रहना उसे अच्छा लगा है। इन्द्रधनुष के सात रंगों से मिला-जुला यह अंधेरा। लगता, उंगलियों से स्पर्श करते ही अंधकार रुनझुन शब्द कर उटेगा। मानो सतरंगी परी के पांवों. ।

के धुंघरू के बोल हों। बड़े ही अजीब किस्म से वह डराता भी था। सोने के कमरे की छोटी खिड़की से मांगन के कोने की ओर ताकते ही उसे लगता कि बुढ़िया डायन उसकी तरफ विस्फारित नेत्रों से ताक रही है। बुढ़िया डायन के कपाल पर सिंदूर हुआ करता था, कौड़ी की तरह सफेद उसकी आंखें हुमा करती थीं और जूट की बटी रस्सी की तरह खिचड़ी बालों से सिर भरा होता था। सदर दरवाज़ के पल्ले जिस तरह उढ़के हुए थे, उसी तरह उढ़काकर रातुल ने सीढ़ियां तयकर रेलिंग पर हाथ रखा। पहचाने हाथ के स्पर्श से रेलिंग जैसे चौंक पड़ी। कहीं कोई बदलाव नहीं आया है । तुम लोग भई, वैसे ही हो न? उसी तरह हो न ? और रेलिंग की सलाखें? वीच-बीच में एकाध टूट गई थीं। सबकी सब वैसी ही हैं । लाठी से मैंने तुम पर कितना ही प्रहार किया है। हां, उस वक्त जब तुम लोग पढ़ाये पाठ को बता नहीं पाती थीं। देखने में तो शान्त-शिण्ट, भले आदमी की बच्चियों जैसी लगती थीं, लेकिन तुम्हारे अन्दर बेहद शरारत भरी थी। मास्टर को कोई परवाह नहीं ! उन सीढ़ियों से चढ़ने और उतरने के क्रम में कितनी ही बार उसके पर फिसले थे। रेलिंग की तमाम सलाखें उसकी छात्राएं थीं और रातुल उन लोगों का मास्टर साहब था। सीढ़ियों से दोमंजिले पर चढ़ता हुमा रातुल मन ही मन हंस पड़ा । याद आने से हंस देना स्वाभाविक ही है। उस दिन फुटबॉल खेलकर लौटने में काफी देर हो गई थी। रसा के मैदान में खेलने गया था। हाथ-पैर और कुरते में कीचड़ लग गया था । मन में मतलव गांठा था कि सभी की आंखों में धूल झोंककर आहिस्ता-आहिस्ता वह मन्दर चला जाएगा और कपड़ा-लत्ता बदल लेगा। "कौन ? उधर से कोन जा रहा है ?" पीछे से गोविन्द की आवाज सुनाई पड़ी थी। गोविन्द से कतराकर तेजी से दौड़ने के क्रम में सीढ़ी के मुहाने पर आकर वह खड़ा हो गया था । वाबूजी सामने ही थे। उसने जैसे भूत देख लिया था। वाबूजी ने कहा, "गोविन्द, आकर देखो। यह किसका बच्चा है ?" राख फेंककर सूप लिए गोविन्द आया और उसकी नज़र मुन्ना पर पड़ी। । १०८ "हम लोगो का मुन्ना वावू ।" "नही; तुम गौर से देखो गोविन्द । तुमने जरूर ही गलत देता है।" नित्यानन्द सेन सिर हिलाने लगे थे। "आप क्या कह रहे हैं वायू ! यह हम लोगों का मुन्ना बाबू ही है, कोई दूमरा नहीं।" "तुम बेकार की बातें करते हो गोविन्द ! मेरा मुन्ना होता तो इस तरह कीचड़ सने कपड़े से लौटता ? गोविन्द की बात बर्गर सुने छिपकर भागता? कभी नहीं। यह मेरा मुन्ना नहीं है। तुम अच्छी तरह से देखो गोविन्द । पायद तुम्हारी आंखें पराव हो गई हैं । अहा-हा, इसी उम्र में तुम्हारी आंखें खराव हो गई?" "आप क्या कह रहे हैं बाबू ! देखिए, अच्छी तरह देखिए।" इतना कहकर उसने ज्यों ही रातुल का चिबुक पकड़ना पाहा कि रातुल रोता हुआ बाबूजी के पैरों पर गिर पड़ा। "मैं फिर कभी ऐसा नहीं करूंगा बाबूजी ! कभी नहीं.." याबूजी की सीख देने की रीति इसी तरह की यो। कभी गुस्से में नहीं आते थे, डांटते-डपटते नहीं थे, धमकिया नहीं देते थे। कभी किसी तरह का अन्याय करने से रोकते नहीं थे। बाबूजी उसके मित्र थे। कितने ही दिन दोनों एक साथ दोमंजिले के बरामदे पर फुटबॉल घेलते थे। खेलते-खेलते वह वाबूजी को हरा देता था । वावूजी के साथ गोली के खेल मे उनकी तमाम गोलिया जीत ली यो । 'चोर-पुलिस' के खेल में बहुधा वावूजी को ही चोर बनना पडता था। उसी वावूजी को और-और वक्त मे रातुल जैसे पहचान ही नहीं पाता था । बाबूजी अलस् सुवह सोकर उठा करते थे। एक दिन अचानक नीद टूट गई थी। तव सूर्योदय नहीं हुआ था। रजाई से निकलकर जब वह बगल के कमरे में आपा तो देखा कि बाबूजी एक बड़े 'महाभारत' को पढ़ने में व्यस्त हैं। चारों ओर घूप जल रही है। वह पाली बदन हैं, पहनावे में तसर । माया झुकाए पढने में व्यस्त हैं, कोई आवाज नहीं, वही किमी दूसरी ओर ध्यान नहीं। एकमात्र अपने मन के अतल में योए हुए हैं। कभी-कभी साहस करके जब वह बगल से गुजरने लगता, सामों को पुस्तक पर ही टिकाए बाबूजी दाहिने हाथ से रातुल को अपने पास खींच - लेते थे। पढ़ने का क्रम फिर भी नहीं रुकता था। बहुत देर के बाद पढ़ना खत्मकर वाबूजी पुस्तक को बन्द कर देते और रातुल से कहते, "सवेरे जगना बड़ा अच्छा होता है मुन्ना ।" "मैं हर रोज़ भोर के वक्त उठकर पढ़ा करूंगा।" वावूजी कहते, “उठना अच्छा लगे तो उठा करो वरना नहीं। इससे तुम्हारी सेहत खराब हो जाएगी।" रातुल सोकर भोर में उठ नहीं सका था । लेकिन आश्चर्य की बात है कि बावूजी ने इसके लिए कभी तंग नहीं किया। हालांकि रातुल यह अच्छी तरह जानता था कि भोर में उठकर पढ़ने से वावूजी बहुत ही खुश होंगे। फिर भी रातुल को लगता कि वह अपने बाबूजी को पूरे तौर से प्राप्त नहीं कर सका है। उसके मन में संतोप नहीं होता था । छुट्टी के दिनों में दोपहर के वक्त जब कोई घर पर नहीं होता, भूगोल के नक्शों को देखते-देखते उसका मन अलकतरे की सड़क को तयकर चील की पांखों का सहारा लिए एशिया माइनर पार करता हुआ, सिंगापुर, फिलिपाइन तथा दूसरे-दूसरे द्वीपों को लांघता हुआ उत्तरी ध्रुव के पेंगुइन और एस्किमो लोगों के देश में जाकर रुकता था। उसके बाद फिर उत्तरी ध्रुव को पारकर कहां किस रहस्य लोक के अन्दर, महल के अन्दर जाकर खो जाता, किसी को इस बात का पता नहीं . चलता था। - उसके बाद जब रातुल थोड़ा बड़ा हुआ, उसकी बातें किसी की समझ में नहीं आने लगीं। उस दिन जव खिदिरपुर घाट से जहाज रवाना हो गया, कोई भी परिचित चेहरा जेटी पर आकर उसे विदा करने नहीं आया । आता तो देखता कि जहाज के अनगिन पोर्ट-होलों में एक के अन्दर एक चेहरा है जिसकी निगाह किसी खास ओर अटकी हुई नहीं है। किन्तु उसकी एक आंख में हंसी है और दूसरी आंख में मांसू।

१६ रातुल आहिस्ता-आहिस्ता सीटियां तय करता हुआ ऊपर पहुंचा। यहां कुछ धुंधलका रेंग रहा था। दूर आकाश को चांदनी में अंधेरा राम के जैसा हो गया था। पहले का सुग्गा अब भी पिंजरे में मूल रहा था। रातुल ने अचानक स्वयं को छिपा लेने की कोशिश की। अभी तमको देख लेगा तो टायं-टायं करना शुरू कर देगा । इतने दिन हो चुके हैं। अब पहले की तरह नाम लेकर पुकारने में हो सकता है कि सिसकारी नहीं दे। हो सकता है कि अब डर जाए । चिड़ियां तो अंधेरे में भी देख पाती हैं। लेकिन जब वह छिपने जा रहा था तो उसे एकाएक याद आया कि गंगाराम की मृत्यु तो बहुत पहले ही हो चुकी है । उसे याद ही नहीं था । तो फिर उसकी याददास्त पूरी तरह वापस नहीं आई है? गंगाराम । वहुत दिन पहले की बात है । गोविन्द उस चिड़िया को अपने देस से ले याया था। तब कुल मिलाकर रातुल का जन्म हो चुका था । मां से बिछड़े रातुल और गंगाराम को जिलाये रखने की जिम्मेदारी गोविन्द ने एक हो माप ली थी। रातुल को हर कोई 'मुन्ना' कहकर पुकारता था। गंगाराम ने सुन-सुनकर सीखा, "मुन्ना, ए मुन्ना..." लेकिन उसकी विद्या की दौड वस यही तक थी। रातुल ने प्रथम भाग समाप्त कर याहिस्ता-आहिस्ता 'फस्टवुक' पढ़ना शुरू किया, गंगाराम ने तब ककहरा भी समाप्त न किया था। वही गंगाराम एक दिन मौत के मुह में समा गया । और रातुल? वह तो मर हो चुका है । जो जिन्दा है वह है कम नम्बर ४६ गंगाराम को मृत्यु की घटना अब भी जैसे आंखों के सामने नात्र रही गोविन्द पिंजरा उतारकर गंगाराम को नहसा रहा था। एकाएक वह रहा था! फूट-फूटकर रोने लगा । रुलाई सुनकर ऊपर से सभी नीचे उतर आए। देखा, गंगाराम पिंजरे के अन्दर की सलाख से छिटककर नीचे करवट के बल पड़ा है । उफ, गोविन्द कितना फूट-फूटकर रो रातुल को महसूस हुआ था कि उसकी छाती फटकर बाहर आ जाएगी। वह था और था गंगा- राम । लेकिन गोविन्द ने अन्ततः उसे कालीघाट की आदिगंगा में ले जाकर फेंक दिया। याद है, उस रात रातुल को ठीक से नींद नहीं आई। उसे सिर्फ यही. महसूस होता रहा कि गंगाराम को क्यों नहीं बचाया गया। घर में दैनिक युगवार्ता अखबारमाया करता था। उस दैनिक युगवार्ता के प्रथम पृष्ठ पर सुखियों में विज्ञापन निकलता था : 'मरे हुए आदमी को जिलाने का उपाय विजली सॉलेशन ।' चाहे कोई आदमी हो, चाहे जीव-जन्तु ही क्यों न हो, विजली सॉलेशन के गुण के कारण मरने के बाद फिर से जी सकता है। वह विज्ञापन रोज कई सालों तक देखने के बाद जवानी याद हो गया था। एक ही अखबार के एक ही स्थान में एक ही तरह की भाषा में एक जैसे विज्ञापन में कौन-सा : मोह है, पता नहीं। उस दिन रातुल के शिशु-मन में यह प्रश्न उठा था कि गंगाराम को 'विजली सॉलेशन' क्यों नहीं खिलाया गया । ऐसा होता तो गंगाराम फिर से जी उठता। एकाएक सदर दरवाजे को खोलने जैसी आवाज़ हुई। रातुल हड़वड़ाकर सीढ़ी की बगल के कमरे के अन्दर घुस गया । लगता है गोविन्द लौट आया है। इस कमरे में जैसे बहुत दिनों से किसी ने कदम नहीं रखा है । रातुल की मां संभवत: इसी कमरे में रहती थीं। अभी उसकी हालत देखकर लगा कि इस कमरे में विभिन्न प्रकार की वस्तुएं रखी हुई हैं । कमरा विलकुल अंधेरा है । पल्ले उढ़के हुए थे। पल्लों को ठेलते हो केंच-केंच जैसी आवाज़ हुई और फिर वह आवाज़ थम गई । देखें तो सही । बगल के कमरे में रोशनी जल रही है। शायद वहीं चर्चा चल रही है । सभी एक जटिल समस्या में 1 उलझे हुए हैं। लेकिन अगर कोई इस कमरे में आ जाए तो ? फिर सर्वनाश ही हो ११२ जाएगा। दुत्, सर्वनाश की कौन-सी बात है ! तुम अपने घर मे आए हो, इस पर पर तुम्हारा अधिकार है ! होगा ही क्या ! न तो जेल होगी, न हवालात ही भेजा जाएगा। जो जाली रातुल है वही यहा से विदा होगा। सीढी पर किसी के भारी परों की माहट होने लगी । रातुल ने क्षण बीतते-न वीतते स्वयं को संयत कर लिया। उसके बाद जब कही कोई आवाज नही रही, कुरसी को हटाकर एक बड़े सूटकेस के पास जाकर बैठ गया। दोनों कमरो के बीच एक दरवाजा है । दरवाजे के एक छोटे मूरात से उसने दूसरे कमरे में निगाह दौड़ाई । शुरू में साफ-साफ दिखाई नहीं पड़ा। उसके बाद उसके मन में पता नही क्या विचार माया कि उसने सूटकेस को ठेलकर हटा दिया। एक बड़ा सूराष दीख पड़ा । उस सूराख से झांकते ही रातुल को हैरानी महसूस हुई। उधर क्षितीन वाबू हैं और पीछे की ओर मुह घुमाय बाबूजी आराम-कुरसी पर लेटे हुए हैं । और जो फर्श पर बैठा है वह कौन है ? लगता है वही जाली रातुल है। आश्चर्य की बात है ! एकाएक रातुल को खुशियों के मारे इच्छा हुई कि वह कूद पड़े। अरे, वह तो हरिदास है ! "भवतोप बाबू का मिन हरिदास ! अब रातुल के सामने तमाम रहस्य स्पप्ट हो गया । छि.-छिः, इसीके चलते इतना काड ! जब वह अपने आपको प्रकट करेगा तो सभी को धारणा बदल जाएगी। व्यर्थ ही वेचारे हरिदास को लेकर खीचतान चण रही है । वह तो संन्यासी ठहरा । दुनियादारी उसे अच्छी नही लगती । वह भवतोप बाबू से यह बात सुन चुका है। अगर ऐसा न होता तो वह भवतोप बाबू को अकेला छोड़कर हिमालय की गुफा मे पहुंचने के लिए गायव ही क्यों होता ? धूम-फिर कर वह किस दुनिया के चक्कर में फंस गया ! रातुल ध्यान लगाकर सुनने लगा। क्षितीन बाबू कह रहे थे, "नखरेबाजी छोहो। तुम्हारे लिए एक आदमी मर रहा है, तुमसे बातचीत करने के लिए रात-दिन पागल की तरह प्लानचेट लेकर माथापच्ची कर रहा है, नौकरी छोड़ दी है और तुम..." वाहर से गोविन्द की आवाज आई, "वाबू !"

. फूट-फूटकर रोने लगा । रुलाई सुनकर ऊपर से सभी नीचे उतर आए। देखा, गंगाराम पिंजरे के अन्दर की सलाख से छिटककर नीचे करवट के बल पड़ा है । उफ, गोविन्द कितना फूट-फूटकर रो रहा था ! रातुल को महसूस हुआ था कि उसकी छाती फटकर बाहर आ जाएगी। वह था और था गंगा- राम । लेकिन गोविन्द ने अन्ततः उसे कालीघाट की आदिगंगा में ले जाकर फेंक दिया। याद है, उस रात रातुल को ठीक से नींद नहीं आई। उसे सिर्फ यही. महसूस होता रहा कि गंगाराम को क्यों नहीं बचाया गया। घर में दैनिक युगवार्ता अखबारमाया करता था। उस दैनिक युगवार्ता के प्रथम पृष्ठ पर सुखियों में विज्ञापन निकलता था : 'मरे हुए आदमी को जिलाने का उपाय विजली सॉलशन ।' चाहे कोई आदमी हो, चाहे जीव-जन्तु ही क्यों न हो, विजली सॉलेशन के गुण के कारण मरने के बाद फिर से जी सकता है। वह विज्ञापन हर रोज कई सालों तक देखने के बाद जवानी याद हो गया था। एक ही अखबार के एक ही स्थान में एक ही तरह की भाषा में एक जैसे विज्ञापन में कौन-सा मोह है, पता नहीं। उस दिन रातुल के शिशु-मन में यह प्रश्न उठा था कि गंगाराम को 'विजली सॉलेशन' क्यों नहीं खिलाया गया । ऐसा होता तो गंगाराम फिर से जी उठता। एकाएक सदर दरवाजे को खोलने जैसी आवाज़ हुई। रातुल हड़बड़ाकर सीढ़ी की बगल के कमरे के अन्दर घुस गया । लगता है गोविन्द लौट आया है। इस कमरे में जैसे बहुत दिनों से किसी ने कदम नहीं रखा है । रातुल की मां संभवतः इसी कमरे में रहती थीं। अभी उसकी हालत देखकर लग कि इस कमरे में विभिन्न प्रकार की वस्तुएं रखी हुई हैं । कमरा बिलकुद अंधेरा है । पल्ले उढ़के हुए थे। पल्लों को ठेलते हो केंच-केंच जैसी आवा हुई और फिर वह आवाज थम गई । देखें तो सही । वगल के कमरे में रोशन जल रही है। शायद वहीं चर्चा चल रही है । सभी एक जटिल समस्या . उलझे हुए हैं। लेकिन अगर कोई इस कमरे में आ जाए तो? फिर सर्वनाश ही ११२ जाएगा। दुत्, सर्वनाम की कौन-मी वात है ! तुम अपने घर में माए हो, इस घर पर तुम्हारा अधिकार है ! होगा ही क्या ! न तो जेल होगी, न हवालात ही भेजा जाएगा। जो जाली रातुल है वही यहां से विदा होगा। सीडी पर किमी के भारी परों की आहट होने लगी । रातुल ने क्षण बीतते-न बीतते स्वयं को संपत कर लिया। उसके बाद जब कही कोई आवाज नहीं रही, कुरसी को हटाकर एक बड़े सूटकेस के पास जाकर बैठ गया। दोनो कमरों के बीच एक दरवाजा है । दरवाजे के एक छोटे मूराख में उसने दूसरे कमरे में निगाह दौड़ाई। शुरू में साफ-साफ दिखाई नहीं पड़ा। उसके बाद उसके मन में पता नहीं क्या विचार आया कि उसने सूटकेस को ठेलकर हटा दिया । एक बड़ा सूराप दोष पड़ा । उस सूराप से झाकते ही रातुल को हैरानी महसूम हुई। उधर क्षितीन वाबू हैं और पीछे की ओर मुह घुमाय बाबूजी भाराम-कुरमी पर लेटे हुए हैं । और जो फर्श पर बैठा है वह कौन है ? लगता है वही जाली रातुल है। आश्चर्य की बात है ! एकाएक रातुल को खुशियो के मारे इच्छा हुई कि वह कूद पडे । अरे, वह तो हरिदास है ! .."भवतोप बाबू का मिन्न हरिदास ! अव रातुल के सामने तमाम रहस्य स्पप्ट हो गया । छि.-छिः, इसीके चलते इतना काड ! जब वह अपने आपको प्रकट करेगा तो सभी की धारणा बदल जाएगी। व्यर्थ ही वेचारे हरिदास को लेकर खीचतान चल रही है। वह तो संन्यामी ठहरा । दुनियादारी उसे अच्छी नहीं लगती । वह भवतोप बाबू से यह बात सुन चुका है। अगर ऐसा न होता तो वह भवतोप बाबू को अकेला छोड़कर हिमालय की गुफा में पहुंचने के लिए गायव ही क्यों होता ? घूम-फिर कर वह किस दुनिया के चक्कर में फंस गया । रातुल ध्यान लगाकर सुनने लगा। क्षितीन बाबू कह रहे थे, "नखरेवाजो छोड़ो। तुम्हारे लिए एक आदनी मर रहा है, तुमसे बातचीत करने के लिए रात-दिन पागल की तरह प्लानचंट लेकर माथापच्ची कर रहा है, नौकरी छोड़ दी है और तुम.. बाहर से गोविन्द की आवाज आई, "वाबू !"

। " "कोन गोविन्द ? आ गए ? घर पर खवर पहुंचा दी?" "जी हां।" इतनी देर के बाद नित्यानंद सेन के मुंह से आवाज़ वाहर निकली, "तुम खा-पीकर सो रहो गोविन्द !" "हां-हां; गोविन्द क्यों बैठा रहे ! मगर तुम क्यों नहीं खाना खाओगे नित्यानन्द ?" "मुझे भूख नहीं है।" "भूख रहना क्या है ? वह सब पागलपन छोड़ो। लड़का घर लौट आया है, कहां खुशियां मनाओगे कि उसकी जगह बावूजी ने कोई उत्तर न दिया। क्षितीन बाबू हरिदास की ओर ताकते हुए बोले, "तुम्हारा भी खाना परोसा जाए। बाबूजी के साथ ही बैठ जामो । पहले तो तुम लोग एक साथ ही खाना खाने बैठा करते थे। याद है कि तुम नहीं खाते थे तो नित्यानन्द भी भोजन नहीं करता था। यह वात तुम्हें याद नहीं है ?" उसके बाद क्षितीन वाबू ने गोविन्द को पुकारकर कहा, "मालिक और मुन्ना का खाना एक ही साथ परसो गोविन्द । यह क्या, इतने दिनों के बाद खोया लड़का मिला है और तुम लोगों को फिक्र ही नहीं ?" हरिदास ने अब अपना माथा उठाया और कहा, "मैं रात में कुछ भी नहीं खाता हूं।" "अयं यह क्या! रात में तो तुम हमेशा खाना खाया करते थे।" "पहले खाता था, लेकिन दीक्षा लेने के बाद से खाना बन्द कर दिया है।" "दीक्षा ? दीक्षा-वीक्षा भूल जाओ।" "जी नहीं, दीक्षा नहीं भूल सकता हूं । गुरु का आदेश है..." "गुरु ? तुम्हारा गुरु कोन है ? चलो, हम सब मिलकर तुम्हारे गुरु के पास चलते हैं। भलेमानस के लड़के को पकड़कर जहरीला मंत्र देते हैं ? तुम्हारा गुरु कहां है ?" "जी, वह जहाँ हैं वह स्थान काफी दूर है।" "सुनूं तो सही, कितनी दूर ?" "हिमालय के दक्षिण की तराई के जंगल में।" . .

"ठीक है, वहीं चलें। मैं सब कुछ सावित करके रहूंगा कि तुम्हारा ना रातुल सेन है, तुम्हारे बाबूजी का नाम नित्यानंद सेन, शंभुनाथ लेन का य मकान तुम्हारा मकान है, तुम अपने बाप को बिना सूचना दिए लड़ाई मे मत हुए थे। उसके बाद मालूम नही कि तुम कहां और कैसे किसी साधु के शिकं मे फंस गए और व्ययं की दीक्षा ली। हां, मैं सब साबित करके रहूंगा।" क्षितीन बाबू अव नित्यानन्द सेन के पास जाकर बोले, "साउथ कलक का डिप्टी पुलिस कमिश्नर मेरा खास दोस्त है । उसे एक वार टेलीफोन करूं चाहे हिमालय में हो या जहां भी कहीं-वह उसे अवश्य ही पकड़ लेगा।" नित्यानन्द पीछे की ओर मुडकर बैठे थे। वाव मुनकर भी वह ज्यों है त्यों बैठे रहे। अपना हाथ उठाकर इतना ही कहा, "नही छोड़ो, जरूर नहीं।" क्षितीन बाबू ने कहा, "फिर तुम क्या करना चाहते हो?" नित्यानन्द सेन ने कहा, "अभी 'तुम कुछ भी मत करो।" "मगर मैं यह कहे देता हूं भाई," क्षितीन बाबू ने कहा, "मुन्ना को मोर मिलेगा तो वह घर छोड़कर भाग जाएगा।" नित्यानन्द बाव बोले, "मुझे थोड़ा सोचने का मौका दो।" "इसमें सोचने की कौन-सी बात है ?" "मेरी समझ में कुछ भी नही आ रहा है।" "मगर तुम दोनों को ऐसी हालत मे छोड़कर मैं जाऊं ही कैसे ? तुम उ- तरफ मुंह घुमाए बैठे हो, इधर मुन्ना भी कह रहा है कि वह खाना नह खाएगा । तुम्हारे मित्र होने के नाते मुझे यह बरदाश्त हो सकता है ?" "फिर तुम उसे खाना खिलाकर ले आओ। मैं जरा बैठकर सोचू ।" "ठीक है, सोचो। लेकिन मैं तुम्हें बिना खिलाए नहीं जाऊंगा भाई। और क्षितीन बाबू ने हरिदास का हाय पकड़कर उसे उठाया। "चलो जी, चलो मेरे साय।" उन्होंने कहा। "कहा?" "चलो तो सही?" हरिदास को जबरदस्ती खीचते हुए क्षितीन वाव दरवाजा खोलक वाहर चले गए। उन दोनो के चले जाने के बाद रातुल को लगा कि बाबूज

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बाबूजी की ओर एकटक देखते-देखते रातुल की आय मी गोली हो गई। सचमुच वह बहा ही निष्ठुर है ! उसने निष्ठर सा काम किया है, वावूजी के स्नेह को अपमानित किया है, मर्यादाहीन किया है। रातुल उठकर सड़ा हुआ। अंधेरे में आहिस्ता-आहिस्ता चारों तरफ की चीजों का अन्दाज लगाते हुए दरवाजे से निकलने की कोशिश की। हो सकता है कि अभी सितीन बाबू हरिदास को रसोईघर में ले जाकर उसे खाना पिलाने की जी-जान से कोशिश कर रहे हों। हरिदास की क्या ही नियति है ! संसार से विमुष होकर, संन्यासी बनकर किसी गुफा में बैठे ध्यान में हुये रहने के बजाय वह घटनाचक्र में फंस गया है और विपति के दौर से गुजर रहा है। हो सकता है कि वह अज्ञात-कुल-शील होकर भारत के तीयों का परिभ्रमण कर रहा हो । भीड़ में आदमी के संपर्क में आने के कारण ही उसकी ऐसी दुर्गति हो रही है। रातुल को हरिदास द्वारा लिखी चिट्ठियों की याद हो आई । कहा बंगाल के किसी एक गाव की एक लड़की! नाम शैल। साल पर साल गुजरते गए हैं और वह अपने पल्टू दा को चिट्ठी पर चिट्ठी लियती गई है। हो सकता है पल्टू दा को चिट्ठी उसे किसी भी दिन न मिले। हो सकता है कि बूटा शिव के मंदिर में उसका पूजा करना सायंक नहीं हो सके। फिर भी एक बूडी और एक लहको, हो सकता है कि, आज भी हरिदास को प्रतीक्षा कर रही हो... हो सकता है अदन के मा-अला रोड पर भवतोप बाबू अब भी इस उम्मीद में हो कि रातुल किसी दिन लौट आएगा। हो सकता है कि उसके मन में उम्मीद हो कि उस दो लाख रुपये को चाहे जो कोई प्राप्त करे लेकिन उसका युछ न कुछ हिस्सा भवतोप याव को देगा ही। एक दिन अपने भाई का पर छोड़कर वह इस उम्मीद से विश्व के पथ पर निकल पहा कि वह एक स्नेहपूर्ण पर का निर्माण करेगा, लेकिन उसने जहा अपने घर का निर्माण किया वहां मिट्टी की ठोस जमीन नहीं बल्कि यालू है । न वह अपना देश है न अपनी धरती फिर भी दोस्त होने के नाते जिसे अपने साथ ले गया था वह भी एक दिन आंखों से ओझल हो गया। हो सकता है, अब रातुल पड़ाव पर आ गया है । पृथ्वी की परिक्रमा - करने के बाद आज जव कि वह अपने कोटर में प्रवेश करने जा रहा है, उसे एक और व्यक्ति की याद आई। वह है भोम्बल । भोम्बल जिन्दगी भर किस की तलाश में चक्कर काटता रहेगा? अपनी मां की तलाश में ? भोम्बल किस आदर्श से प्रेरित होकर निरुद्देश्य जीवन-यात्रा में सम्मिलित है ? ! वह क्या उसका मैजिक है ? ईश्वर, मां के पीछे-पीछे दौड़ लगाना समाप्त हो जाए और मैजिक ? बाजीगरी का मोह भी एक दिन समाप्त हो जाए ! आहिस्ता से दरवाजा खोलकर रातुल वाहर आया। तमाम बरामदा अंधेरे में डूबा था। वरामदे से होता हुआ वह बगल के कमरे के सामने जाकर खड़ा हुआ। उसके बाद उढ़के पल्लों को निःशब्द खोला और बावूजी के कमरे में प्रवेश किया। १७ वाहर चल रही बातचीत की आवाज़ से रातुल की नींद टूट गई। एक आदमी कह रहा था, "सुनने में आया कि बाबू का लड़का लौट आया है। कल अखवार में भी देखा था, इसलिए माज देखने आया हूं कि वात सही है या नहीं।" रातुल की आंखें उस बंद कमरे के गिर्द सतर्कता के साथ दौड़ने लगीं । फल रात इस कमरे में छिपकर उसने जो कुछ देखा था, याद करने की कोशिश की। फिर वह सपना नहीं था, बल्कि सत्य ही था। दरवाजे के बाहर की सूराख से दिन की रोशनी झांक रही थी। कब उसे थकावट ने दबोचकर नींद की बांहों में डाल दिया था, उसे याद नहीं है । आधी सपने में और आधी जागरण में देखी कल की तमाम वारदातें उसकी आंखों के सामने फिर से तैरने लगीं। भवतोप वाबू का मित्र हरिदास कहां गया ? क्षितीन बाबू और । ११८ उसके बाबूजी प्रोफेमर नित्यानन्द सेन कहां गए? अबकी एक दूसरे ही भलेमानस को आवाज सुनाई पड़ी, "मैंने भी अखबार में देखा है । युनिवमिटी इंस्टिच्यूट में मीटिंग होने की बात थी, उस मोटिंग में भी नित्यानन्द यादू नहीं गए क्योकि उनका सड़का वापस या गया है।" पहला आदमी बोला, "मैंने भी यही मोचा । वह लड़का अगर लौट आया है तो मैं-में उस लड़के को ठीक-ठीक पहचान ही लूंगा । आर-दम साल पहले देखा था। जब मैं इस घर में माता या, मेरी गोद में बहुत बार बैठ चुका है । इतने दिनों में बड़ा हो जाने पर भी मैं उसे देखते ही अवश्य पहचान लूंगा।" दूसरा आदमी बोला, "उसो वक्त मैंने कलमत्ता छोड़ा था। उसके बाद इधर थाना न हो सका । उम घटना के कारण मन वहा सरार हो गया था। एकलौते लड़के के मर जाने से प्राणों पर क्या गुजरती है वह कोई वाप ही बता सकता है।" पहला बादमी वौला, "ए गोविन्द, सुनो !" गोविन्द का स्वर सुनाई पड़ा, "जी, आपा! चावल की हांडी नीचे उतारकर याताहूं।" कुछ देर के बाद गोविन्द आया । बोला, "माप यमी आए हैं, पोड़ी देर और बैंटिए।" "कब निकले हैं ?" गोविन्द बोला, "लगभग आधा घंटा हुआ होगा। मेरे बाबू नही चाहते पे, हुजूर । बाबू पाना-पुलिस पमन्द नहीं करते, मगर क्षितीन बाबू ने ददाय हाला । उनके एक मिन पुलिस के बड़े अफसर हैं । बड़ा ही जोर हामा, शितीन बाबू खुद गाड़ी लेकर हाजिर हो गए, बोले : तुम्हें जाना ही होगा। मन खराव करोगे तो कैसे चलेगा?" "और तुम्हारा मुन्ना?" "उमे भी मोटर पर चढ़ाकर ले गए।" "उमका तो तुमने बचपन में ही लालन-पालन किया है । तुम जितना पहचान सकते हो उतना तो कोई भी नहीं पहचान सकता है। कही, टोक - .. है न ? वह सचमुच क्या तुम्हारा मुन्ना वावू ही है ?" गोविन्द वोला, "हुजूर, आप लोग बाबू के पुराने छान हैं, भले आदमी हैं ! आप ही लोग बताइए कि मैं नहीं पहचानूंगा तो कौन पहचानेगा ही ? मैंने ही उसे पहले कालीघाट में देखा था। आकर बाबू को खबर दी। उसके बाद क्षितीन बाबू खवर पहुंचाने आए । बाबू को यकीन हुआ ही नहीं। बोले : तुम्हारी आंखें खराव हो गई हैं, गोविन्द ! चश्मा लो । जो- सो बहुत कहा। अच्छा, आप ही लोग बताएं बाबू, अगर मेरी आंखें खराव हुई रहतीं तो आप लोगों को पहचानता ही कैसे ?" "सो तो है ही, तुम न पहचानोगे तो फिर पहचानेगा ही कौन ?" "यही बात तो मैंने कहा हुजूर, कि कामाख्या जाकर मंतर सीखने के कारण मुन्ना बाबू वैसे हो गए हैं। अभी सिपाही-पुलिस से क्या होगा, अभी तो मोझा बुलाकर झाड़-फूंक करवानी चाहिए जिससे कि भूत उसका पिंड छोड़ दे। देखिए न, मेरी बात कोई सुनता ही नहीं।" "तुम्हारे बावू का कहना क्या है ?" "कुछ भी नहीं बोल रहे हैं, हुजूर ! कल रात-भर उपवास करते रहे, कुछ भी नहीं खाया । उतना-उतना भात बरबाद तो कर नहीं सकता । भात ही अन्नपूर्णा माता है। मुन्ना को पेट भर खिला दिया और मैं दो व्यक्तियों का भात खाकर अव मर रहा हूं। पेट फूल गया है । बुढ़ापे में उतना खाना वरदाश्त नहीं होता है। सुबह से हाथ का पानी नहीं सूखा है। घर में एक ओर तो मुसीवत है ही और दूसरी मुसीबत में मैं फंस गया।" "तुम्हारे मुन्ना बाबू का क्या कहना है ?" "किसी में सामर्थ्य नहीं कि उसके मुंह से शब्द निकाल ले । वातचीत करने की सामर्थ्य ही कहां रहने दी है-टोना-टोटका करके दिमाग खराव कर दिया है । कल से मुन्ना वाबू ही क्या कम तकलीफ में हैं ?" वे दोनों भलेमानस बोले, "फिर तुम्हारे घर में बहुत बड़ी मुसीवत का दौर चल रहा है ?" "मुसीवत क्या ऐसी-वैसी बाबू ? कल रात लोगों ने मकान को घेर लिया था। अकेला गोविन्द शर्मा ही ऐसा आदमी था जो सबकी आंखों में धूल झोंकता रहा। फिर सुबह होते-न होते अखबारों के रिपोर्टर, वाहर के लोग, अपने पराये-लोगों का जैसे तांता लग गया। यह देखिए, मायू के नाम से एक बंडल तार आया है। मैं अकेला आदमी ठहरा । बागर कलं, रसोई पकाऊं, घर्तन मलूं या बैठकर सोचूं ! उसपर मेरे पेट को यह हालत. अच्छा, आप लोग बैठिए, चूल्हा पालो है, कोपला जल रहा है । उफ, कोपले की जो कीमत है !" गोविन्द चला गया। दोनों भलेमानम बैठकर गपशप करने लगे। एक आदमी बोला, "क्या कांड है ! अगर यह साबित हो जाता है कि यही मादमी उनका बेटा रातुम है तो फिर क्या होगा ?" दूसरे आदमी ने कहा, "सचमुच तव एक समस्या पड़ी हो जाएगी।" पहला आदमी बोला, "सिर्फ समस्या ही नहीं बल्कि हर की बात है। हालांकि हम चाहते हैं कि उनका लड़का लोट हो आए । रातुल के जिन्दा रहने की खबर सब साबित हो।" "मगर इसके दूसरे पहलू पर सोचकर तो देखो। मास्टर साहब की गया हालत होगी? इतना यश, नाम, डिग्री, रुपया-पैसा, पुस्तका-लेखन, प्रतिष्ठा --सब कुछ तो लड़के की मृत्यु पर ही आधारित है । लड़का अगर सचमुष सौट आता है तो इतने दिनों की कमाई मिट्टी में मिल जाएगी।" रातुल चंद कमरे से अब तक तमाम बातें सुन रहा था: नहीं, अब नहीं। अब उसे आगे बढ़कर अपना काम करना है । पहले उमे हरिदास का मुखौटा उतारना है। जिसको केन्द्र मानकर इतना बहस- मुवाहसा, इतनी कल्पना जारी है, जिसके कारण पुलिस-सिपाही के पास दौड़-धूप चल रही है. उसे प्रकाश मे माना है । बेचारे ने समाज-संसार छोड़ कर ईश्वर की सेवा में अपने प्राणो को संकल्पित किया था लेकिन पटनायक में फंसकर वह कितनी विपत्तियों के बीच गुजर रहा है । हरिदास के उदार होते ही सबका उद्धार हो जायेगा। वानी को भी शान्ति सौट आएगी। दरवाजे की सूराप से रातुल ने एकबार मांककर देवा । बगल के कमरे में वे दोनों हात उस वक्त भी आपस में बातचीत करने में मशगूल थे। बाहर का दरवाजा योलकर रातुल रफ्ता-रफ्ता बरामदे पर आकर खड़ा हुआ। यहां पोड़ा झुका जाए तो रसोईपर दिखाई पड़ता है।

है न ? वह सचमुच क्या तुम्हारा मुन्ना वावू ही है ?" गोविन्द बोला, "हुजूर, आप लोग वावू के पुराने छान हैं, भले आदमी हैं ! आप ही लोग वताइए कि मैं नहीं पहचानूंगा तो कौन पहचानेगा हो ? मैंने ही उसे पहले कालीघाट में देखा था। आकर वावू को खबर दी । उसके बाद क्षितीन बाबू खवर पहुंचाने आए । वावू को यकीन हुमा ही नहीं। बोले : तुम्हारी आंखें खराव हो गई हैं, गोविन्द ! चश्मा लो । जो- सो बहुत कहा। अच्छा, आप ही लोग वताएं वावू, मगर मेरी आंखें खराव हुई रहतीं तो आप लोगों को पहचानता ही कैसे ?" "सो तो है ही, तुम न पहचानोगे तो फिर पहचानेगा ही कोन ?" "यही बात तो मैंने कहा हुजूर, कि कामाख्या जाकर मंतर सीखने के कारण मुन्ना चावू वैसे हो गए हैं। अभी सिपाही-पुलिस से क्या होगा, अभी तो ओझा बुलाकर झाड़-फूंक करवानी चाहिए जिससे कि भूत उसका पिंड छोड़ दे। देखिए न, मेरी बात कोई सुनता ही नहीं।" "तुम्हारे बाबू का कहना क्या है ?" "कुछ भी नहीं बोल रहे हैं, हुजूर ! कल रात-भर उपवास करते रहे, कुछ भी नहीं खाया। उतना-उतना भात बरबाद तो कर नहीं सकता । भात ही अन्नपूर्णा माता है। मुन्ना को पेट भर खिला दिया और मैं दो व्यक्तियों का भात खाकर अव मर रहा हूं। पेट फूल गया है । बुढ़ापे में उतना खाना वरदाश्त नहीं होता है। सुबह से हाथ का पानी नहीं सूखा है। घर में एक ओर तो मुसीवत है ही और दूसरी मुसीवत में मैं फंस गया।" "तुम्हारे मुन्ना बाबू का क्या कहना है ?" "किसी में सामर्थ्य नहीं कि उसके मुंह से शब्द निकाल ले । बातचीत करने की सामर्थ्य ही कहां रहने दी है.---टोना-टोटका करके दिमाग खराव कर दिया है । कल से मुन्ना वावू ही क्या कम तकलीफ में हैं ?" वे दोनों भलेमानस बोले, "फिर तुम्हारे घर में बहुत बड़ी मुसीवत का दौर चल रहा है ?" "मुसीवत क्या ऐसी-वैसी बाबू ? कल रात लोगों ने मकान को घेर लिया था । अकेला गोविन्द शर्मा ही ऐसा आदमी था जो सबकी आंखों में धूल झोंकता रहा। फिर सुबह होते-न होते अखवारों के रिपोर्टर, बाहर के १२० । लोग, अपने पराये-लोगों का जसे तांता लग गया। यह देपिए, बाबू के नाम से एक बंडल तार आया है। मैं अकेला आदमी ठहरा । बाजार फलं, रसोई पकाऊं, वर्तन मलूं या बैठकर सोचूं ! उसपर मेरे पेट की यह हालत. अच्छा, आप लोग वैठिए, चूल्हा साली है, कोयला जल रहा है। उफ, कोयले की जो कीमत है !" गोविन्द चला गया। दोनों भलेमानस बैठकर गपशप करने लगे। एक आदमी बोला, "क्या कांड है ! अगर यह साबित हो जाता है कि यही आदमी उनका बेटा रातुल है तो फिर क्या होगा ?" दूसरे आदमी ने कहा, "सचमुच तय एक समस्या खड़ी हो जाएगी।" पहला आदमी बोला, "सिर्फ समस्या ही नहीं बल्कि हर की बात है । हालाकि हम चाहते हैं कि उनका लड़का लोट ही आए । रातुल के जिन्दा रहने की खबर सच साबित हो।" "मगर इसके दूसरे पहलू पर सोचकर तो देखो । मास्टर साहब की क्या हालत होगी? इतना यश, नाम, डिग्री, रुपया-पैसा, पुस्तक लेखन, प्रतिष्ठा --सब कुछ तो सड़के की मृत्यु पर ही आधारित है । लड़का अगर सचमुच लौट आता है तो इतने दिनो की कमाई मिट्टी में मिल जाएगी।" रातुल बंद कमरे से अब तक तमाम बातें सुन रहा पाः नहीं, अव नही। अब उसे आगे बढ़कर अपना काम करना है । पहले उसे हरिदास का मुखौटा उतारना है। जिसको केन्द्र मानकर इतना बहस. मुवाहसा, इतनी कल्पना जारी है, जिसके कारण पुलिस-सिपाही के पास दौड़-धूप चल रही है, उसे प्रकाश मे लाना है। वेचारे ने समाज-संसार छोड़- फर ईश्वर की सेवा में अपने प्राणों को संकल्पित किया था लेकिन घटनाचक में फंसकर वह कितनी विपत्तियों के बीच गुजर रहा है । हरिदास के उदार होते ही सबका उदार हो जायेगा। बाबूजी को भी शान्ति लौट आएगी। दरवाजे की सूराय से रातुल ने एकबार झांककर देखा । बगल के कमरे में वे दोनों छान उस वक्त भी आपस में बातचीत करने में मशगूल ये। बाहर का दरवाजा खोलकर रातुल रफ्ता-रफ्ता बरामदे पर भाकर खड़ा हुआ । यहा योड़ा का जाए तो रसोईघर दिखाई पड़ता है।

रसोईघर के अन्दर गोविन्द नहीं था । फिर वह अवश्य ही बाथरूम में है। कल उसने दो व्यक्तियों का खाना खा लिया है। उसकी तवियत खराव हो गई है । बार-बार वह वाथरूम में जाता है। एक सीढ़ी नीचे उतरकर उसने देखा । आंगन के पूरब-दक्खिन कोने के बाथरूम का दरवाजा बंद था। लगता है, अन्दर से ही बंद है। बाहर की सांकल खुली है । यही मौका है ! रातुल जल्दी-जल्दी सीढ़ियां उतर गया । सभी की निगाहों से खुद को छिपाकर आहिस्ता से दरवाजा खोला। बाहर निकलकर रातुल दरवाज़े को ठीक से बन्द करने जा रहा था लेकिन चारों तरफ गौर से देखने के बाद उसे गली के मुहाने से एक मोटर आती हुई दिख पड़ी । मोटर का हुड खुला हुआ था। दिन की रोशनी में, दोपहर के सूरज की धूप में उसे साफ-साफ दिखाई पड़ा कि गाड़ी के अन्दर क्षितीन वावू, बाबूजी और माथा मुड़ाए हुए गेरुए वस्त्र में हरिदास है। एक क्षण के अन्दर रातुल ने गली की उल्टी दिशा की ओर कदम बढ़ा दिए। आज और अभी हरिदास की समस्या को सुलझाना है । हरिदास की समस्या के निदान के बाद ही रातुल स्वयं के बारे में सोच पाएगा।... पोछे मोटर रुकने की आवाज़ हुई । पीछे की मोर मुड़कर ताकने के वजाय रातुल शंभुनाथ लेन की उलटी दिशा की ओर बढ़ने लगा। इस-उस रास्ते से चक्कर काटता हुआ रातुल भवानीपुर के पोस्ट ऑफिस के सामने खड़ा हुआ। रातुल भीड़ में खो गया। उसके बाद जिस काउंटर पर 'टेलीग्राफ' शब्द लिखा था, वहां जाकर एक आदमी से वोला, "ज़रा एक टेलीग्राफ का फार्म दीजिए।" भले आदमी ने फार्म दिया। रातुल को एकाएक याद माया कि उसके पास कलम भी नहीं है। "मेहरबानी कर ज़रा अपनी कलम दीजिएगा?" भले आदमी को शायद कलम देने की न तो फुर्सत थी और न इच्छा ही। एक हाथ से वह 'टरे-टक्का' कह रहा था और उसकी आंखें एक दूसरे व्यक्ति पर टिकी थी जिससे वह बातचीत कर रहा था। दूसरी तरफ ही तारता हुमा वह बोला, "कलम वहां रखी है, ले लीजिए।" बहत तलाशने के बाद उमे रेलिंग के एक किनारे टूटी निय यामी एक कलम रस्सी में टंगी हुई मिली । उमरे निकट हो सोहे की यही मंहवासी एक. दवात पी। रद्दी स्याही है । सो हो। तकदीर अच्छी थी कि भोम्बल ने उसे दस रुपये का एक नोट दिया था। भोम्बल के प्रति कृतज्ञता से रातुल का हृदय भर उटा । हरिदास कामना हो जाए, उसके बाद रातुल स्वयं को प्रकट करेगा योर बापूजी से महकर उसे एक अच्छी-गी नौकरी दिला देगा। भले यादमी ने फार्म लेकर अक्षरों की संख्या को दो बार गिनकर देखा। पूछा, "अदन?" "जी हां।" भले आदमी ने फिर दो चार यसरों को गिना और बोला, "आपरे पांच रपये तेरह माने लगेंगे। वह यहां स्टाम्प बिक रहा है। परोदकर यहां साटदें।" १८ उसके बाद... उसके बाद धूप में तपिन आ गई थी। उसी तपिग में गिरिपुर के डॉक के भीतर जाकर उसने भोम्बल के जहाज को पोरकर निकाला। बड़े- बड़े अदारों में जहाज पर लिया था : नेपच्यून-जनदेवता । भोम्बल को मधरज हुआ। "अरे, तुम अचानक ?" उसने पूछा। "क्यों, मुझे नहीं आना चाहिए था?" "क्यों नहीं; आकर अच्छा ही दिया । सो मूंगफनी यायो।" र से मूंगफली निकालता हुआ भोम्बल बोला, "कुछ देर पहले तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था। तुम लंबी उम्र जियोगे । तुम्हारी तबियत खराब है क्या ?" "नहीं"तुम लोगों का जहाज़ और कितने दिनों तक यहां रुका रहेगा ?" "ज्यादा से ज्यादा तीन या चार दिन ।" "इन तीन-चार दिनों के दरमियान मैं तुम्हारे पास रहूंगा । रहने दोगे ?" "क्यों ?" भोम्बल को बड़ा ही आश्चर्य लगा। "यह बात मुझसे पूछो मत। अभी मुझे कुछ खाना खिलाओ। कल रात से कुछ भी नहीं खाया है।" भोम्बल बोला, "दे रहा हूं, मगर मैं सोच रहा हूं..." रातुल बोला, "मैं रहने आया हूं । अपने पास रहने नहीं दोगे?" भोम्वल हैरत में आकर बोला, "रहोगे तो इसमें कोई बात नहीं। मगर ऐसा क्यों कर रहे हो?" "ऐसा क्यों कर रहा हूं, यह बात अभी मत पूछो। वक्त आने पर तुम्हें सब कुछ बताऊंगा । इतने दिनों तक हम एक साथ रहे, तुमने किसी दिन मेरा नाम नहीं पूछा । इसीलिए आज भी यह पूछने से मना करता हूं कि अपना घर छोड़कर तुम्हारे पास क्यों लौट आया हूं। तीन-चार दिन अपने पास रहने दो।" भोम्बल कुछ सोचने लगा। रातुल वोला, "तुम्हारे पैरों पड़ता हूं भोम्बल, मेरे लिए माथापच्ची करने की कोई जरूरत नहीं।" भोम्बल बोला, "और जहाज़ अगर इसके पहले ही खुल जाए? तब क्या करोगे?" "तुम लोगों का जहाज़ कब खुलने जा रहा है ?" "कोई ठीक नहीं है, मगर दो-तीन दिन के अन्दर ही।" रातुल बोला, "दो-तीन दिन ही रहना है । उसके पहले भी मेरा काम हो सकता है । जब कि तुमने मेरे लिए इतना किया है, थोड़ी और तकलीफ वरदाश्त करो । कम से कम दो दिन..." दो दिन! - १२४ । प में बड़ी ही तपिश है। पारों तरफ केवल पानी, द, क्रेन और कोपला है। कड़-कड़ शन्द करता हुआ न ऊपर और नीचे मा-जा रहा है। मोम्बल उसे डेक के नीचे अंधेरे में ले गया। एक छोटा-सा बिग-बोरम दिपाते हुए बोला, "तुम यही बैठे रहो । महराज से पूछकर देयता हूं कि मंहार में पाने की कोई चीज है या नहीं।" आहिस्ता-आहिस्ता रात उतर आई । रोगनी का हार पहनकर तमाम डॉक जैसे नये रूप से सज्जित हो उठा । और कितने दिन ! कितने दिनों तक इन्तजार करना है ? जहाज के अंधेरे डेक में बैठे रातुस ने आसमान की ओर यांखें फैला दी। संख्यातीत तारों को मोड़ । लगा, एक सारा गिरा। गिरते- गिरते बहुत नीचे आपा और कहीं शून्य में घो गया। एकाएक उसे लगा कि बहुत ऊंचाई पर एक तारा सीधे दवियन से उत्तर की ओर जा रहा है। वह तारा है या हवाई जहाज ? हवाई जहाज बहुत दूर का संवाद सेकर भा रहा है। अनजानी दुनिया के रहस्यों को यह उद्घाटित करेगा। मदन के उस बंदरगाह में सभी क्या ऊंट की पीठ पर सवार होकरक- पून जाता है ? या अरबी पून साइकिल या जीप पर पड़कर जाता है ? पाय घर में आज भी रेडियो बज रहा है क्या ? अभी रात का कौन-सा प्रहर है ? भवतोष बाबू से बंगला गीत मुनने का वक्त हो पुका है ? सार अब तक जरूर पहुंच गया होगा। एकाएक तार को पड़कर उसे अवश्य ही थोड़ा आश्चर्य होगा। हो सकता है, सोचे कि उसे किसने-कहाँ से सार भेजा है। इतने दिनों के बाद एकाएक हरिदास का पता मिलने को पशी में हो सकता है कि उसी क्षण दुकान मन्द मार दे। कहेगा, 'आज तुम लोगों को छुट्टी दे रहा हूं। दुकान बन्द करो और पर जायो।' दुकान के कर्मचारी कहेंगे, 'गाहक सोट जाएंगे।' 'लोटने दो। दुकान को मुझे जरूरत नहीं है। हरिदास मिम आए तो दुकान लेकर क्या होगा? भवतोप बाबू ऐसी-ऐसी सौ दुकानें घोल सेगा।' हो सकता है भवतोप वाव अभी जहाड को तलाश में मस्त हो । किन अगर हवाई जहाज मिल गया तो भवतोप वायू उसी से पायेंगे । रातुन ने उसे जल्दी से जल्दी आने के बारे में तार दिया है। रातुल को नींद नहीं पा रही है। रेक के अंधेरे में अपनी निपति के दर्भ में सोचने में उसे अच्छा लगता है। बड़ा ही मज़ा आएगा। इतने बड़े क नाटक का प्लॉट उसके जीवन में जमा होकर पड़ा था, इसका पता था कसे ? लेकिन कुल मिलाकर अभी चौथा अंक है। इसके बाद जव पंचम अंक की शुरुआत होगी तव मंच पर भवतोप वाबू उपस्थित होता हुआ दिख पड़ेगा । जाली रातुल की ओर इशारा करते हुए कहेगा, 'यह मेरा मित्र हरि- दास है। इसकी तलाश में बहुत सारी जगहों का चक्कर लगाया है । इसका नाम रातुल कभी नहीं था। आज अपने मित्र को पाकर मैं वेहद खुश हूं। डॉक्टर नित्यानंद सेन को अत्यन्त दुख के साथ सूचित कर रहा हूं कि यह उनका लड़का नहीं है।' पंचम अंक । उस पंचम अंक के अन्तिम यवनिकापात के पहले रातुल का आविर्भाव होगा। रातुल सेन नये सिरे से पुनर्जन्म ग्रहण करेगा। रातुल सेन यानी केस नम्बर ४६। अंधेरे डेक में बैठा रातुल उस दिन के क्षणों की गिनती करने लगा। वगल में भोम्बल गहरी नींद में खोया हुआ था। एकाएक भोम्बल को सिसकियों ने पूरे माहौल को अपने पाश में जकड़ लिया । अपनी रुलाई से भोम्बल उठकर बैठ गया। बोला, "वड़ा ही बुरा सपना देखा, जी। "सपने में तुमने क्या देखा?" रातुल ने "वड़ा ही बुरा सपना था भाई ? लगा, तुम डूब गए हो।" रातुल हंसता हुआ वोला, "क्यों, मैं क्यों डूब गया ?" भोम्बल वोला, "सपना झूठा था लेकिन "लगा, आंधी की चपेट में पड़- कर हम लोगों का जहाज़ उलट गया है। हम लोग पानी में वहे जा रहे हैं, चारों तरफ हंगर और मगरों का झुंड है। तुम और मैं दिन पर दिन वहते हुए चले जा रहे हैं। अन्त में एक जहाज़ आता है और हम लोगों को ऊप उठाता है। लेकिन जब मैं पीछे की ओर मुड़ता हूं तो तुम नहीं मिलते हो मैं आंखें फाड़-फाड़ कर देखता हूं। तुम तब भी पानी में बहे जा रहे हो। सबसे कहता हूं : उसे बाहर निकालो। मेरी बात पर कोई आदमी ध्या नहीं देता है । वे कहते हैं : उसकी मौत हो चुकी है। मुझे लगता है, हर के झूठ बोल रहा है। तुमको बचाने के ख्याल से मैं पानी में कूद पड़ता पूछा। - .. १२६

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भरवी उपन्यास जैसी नहीं है। इस पर आस्था न रखनेवाले लोगों ने ही मेरे विरुद्ध चक्रव्यूह रचकर हरिदास घोप नामक एक युवक को मेरा पुत्र कहकर प्रचारित करने का पड्यंत्र किया था-लोगों की निगाह में गिराकर मुझे असत्यवादी और ढोंगी सावित करने की कोशिश की थी। "दुनिया के तमाम धर्मों के मतों ने यह स्वीकार किया है कि हर आदमी की जड़ देह में सूक्ष्म देह- धारी एक ऐसी वस्तु है जो अमर है, जिसका विनाश नहीं होता । इसी अमर वस्तु को आत्मा कहा जाता है। बहरहाल जो लोग मेरी प्रेमी हैं वे निश्चित- रूपेण इस मिथ्या प्रचार के दलदल में नहीं फंसे हैं और न फंसेंगे । जिसको 'रातुल' कहकर उपस्थित किया गया था उसके मित्र भवतोप मित्र ने सुदूर मदन से आकर तमाम शंकाओं को दूर कर दिया है। सभी से अनुरोध है कि वे माज की सभा में आएं । वह स्वयं उपस्थित होकर आप लोगों के सामने वक्तव्य देंगे । आशा है, अब किसी के मन में सन्देह नहीं रहेगा कि मैं इतने दिनों से जो कहता आ रहा हूं वह पूर्णतः सत्य नहीं है। मेरे पुत्र ने जड़ देह त्यागकर फिलहाल सूक्ष्म मात्मा का वरण किया है और वह परलोक में वास कर रहा हैयह वात विलकुल सच है । यदि ऐसा न होता तो मेरी इतने दिनों की साधना, खोज, विद्या-बुद्धि, सब कुछ असत्य होता।..." पढ़ते-पढ़ते रातुल को फिर से हंसने की इच्छा हुई। सचमुच इस वार जब वह स्वयं को प्रकट करेगा तो अंतिम यवनिका गिरेगी। वही उसके नाटक का अंतिम अंक होगा। अनेक पथों पर चलने के बाद अब उसके सफर का अन्त आएगा। उसने किसी पुस्तक में पढ़ा था : पृथ्वी गोल है । वह गोलाकार पृथ्वी भूगोल की पृथ्वी है; आदमी की पृथ्वी बड़ी जटिल है । यहां अनगिन चढ़ाई-उतराई, मनगिन सतहे, अनगिन अवरोध, अनगिन दुख, अनगिन आंसुओं का समुद्र" भोम्बल आया। वोला, "तुम्हें जल्दी-जल्दी खबर पहुंचाने आया हूं।" । "क्या?" "आज रात हमारा जहाज रवाना होगा।" "कब, किस समय ?" रातुल ने पूछा। "कोई ठीक नहीं है, शाम को भी खुल सकता है या रात दो बजे भी।" रातुल बोला, "फिर माज तुमसे माखिरी मिलन है ? फिर कितने दिनों १२८ बाद आयोगे?" "कोई ठीक नहीं । हो सकता है दुवारा आऊं ही नहीं। या यह भी हो कता है कि टिम्बकटू या किम्बरली मे उतर जाऊ । खिंचाव रहे तो आखिर सके लिए? तुम्हारी तरह न तो मेरे मां-बाप न अपना देस । सभी जाति लोग मेरी स्वजाति के हैं, समो देश मेरे लिए स्वदेश की तरह है।" "मेरे जाने के पहले मेरा नाम पूटने का तुममें लोम नहीं जग रहा है ?" भोम्बल हंसता हुआ बोला, "मैं कभी रोया नहीं। मगर लगता है तुम में बिना रुलाए छोड़ोगे नही भाई।" और भोम्बल तत्क्षण तेज कदमों से आंपों से मोझल हो गया। फिर वह बारा लौटकर नहीं आया। समय बीतता गया। दोपहर में एक आदमी रातुल के लिए पाली में भाव लए आया । रातुल ने पूछा, "यह किसके लिए है ? किसने भेजा है ?" "मोम्बल ने।" उस यादमी ने बताया और वह यहां से पला गया । उसके बाद दोपहर का रूप और भी प्रसर हो उठा । विदिरपुर के डॉक की हवा के साथ कोयले का युरादा और तपिश के झोंके आने लगे और रातुल के चेहरे का स्पर्श करने लगे। भोम्बल एक बार भी नहीं आया। एक का घंटा बज उठा, उसके बाद दो का, उसके बाद तीन का, फिर चार का । अव इन्तजार नहीं किया जा सकता। उपर पांच बजे सभा शुरू होने वाली है । आहिस्ता-आहिस्ता जहाज़ के बाहर माकर भोम्बल उस परिचित चेहरे की चारों ओर तलाश करने लगा। लेकिन यह पकड़ में नहीं पाएगा, उसको पकड़ने की कोशिश करना व्यर्थ है। डॉक यो पारकर रातुल ट्राम में जाकर बैठ गया । अव ज्यादा देर नहीं है। बाबूजी समा में बाएंगे। भवतोप बाव भी आएगे। वह रातुल का तार पाते ही यहां पहुंच गए हैं। जरूर ही हवाई जहाज से आना हुआ है। आज भामने-सामने बड़े होकर मुकाबला करेंगे। जाली रातुल अपने स्थान पर सोट जाएगा और.. और "और..

गया, किस तरह २० विशाल सभा का आयोजन है। बीच में नित्यानन्द सेन बैठे हैं । आसपास और भी बहुत-से आदमी। भवतोप बाबू ने खड़े होकर भाषण दिया। उसने अपने भाषण के क्रम में बहुत कुछ कहा । बोला : "आप लोग जिसे रातुल सेन के नाम से जानते हैं वह मेरा मिन हरिदास घोप है। यह रही उसकी फोटो । हम दोनों एक ही गांव में पले-बढ़े हैं। हम एक ही साथ घर से भागे थे। एक ही साथ हमने चाय की दुकान खोली थी।" उसके बाद भवतोप बाबू ने उसके पूरे इतिहास पर प्रकाश डाला । कव गांव से वे भागे थे, कैसे-कसे अदन में पहुंचे। फिर हरिदास पर संन्यासी बनने की कसी झोंक सवार हुई। उसके बाद हरिदास एक दिन कैसे गायब हो भवतोप वाबू जगह-जगह का चक्कर काटता रहा। फिर दादा द्वारा दो लाख रुपये की वसीयत करने की बात भी बताई। उसके बाद भवतोप बाब ने कहा, "मैं प्रेततत्त्व या परलोकतत्त्व के बारे में कुछ भी नहीं जानता। मैं अपने मित्र को अपने साथ वर्मा ले जाने के लिए आया हूं, जहां जाने पर वह दो लाख रुपये का मालिक होगा। इसके अलावा मैं यह भी बताने आया हूं कि उसका नाम रातुल नहीं है और न प्रोफेसर नित्यानन्द सेन से उसकी कोई नातेदारी है। मेरा मिन हरिदास मापके सामने अपना परिचय देने को राजी हो गया है। पूरी सभा में सन्नाटा रेंगने लगा। गेरुए कपड़े पहने हरिदास अब सामने खड़ा हुआ और आंखें नीचे की ओर किए शांत स्वर में कहने लगा, "मैं हरिदास घोष हूं, मेरा नाम रातुल सेन नहीं है। मैं संन्यासी हूं । उचित नहीं है कि मेरी कोई अस्मिता हो। फिर भी सवों के अनुरोध की रक्षा करने के लिए मैंने अपने पूर्व परिचय पर प्रकाश डाला।" पुछ सुनाई पड़ा, कुछ अनसुना रह गया। फिर भी चारों तरफ तालियों की गड़गड़ाहट होने लगी। सभा में आज जनता नित्यानन्द सेन का भाषण सुनने के लिए उत्कंठित थी । वह उठकर यह हुए। आज उनके गले में दुबारा फूलों का हार मूल रहा था । आज उनकी आधों में स्वच्छ पानंद की झलक यो । आज वह सफलता के प्रकाश से प्रकाशमान हैं। रात के दुःस्वप्न के बाद माज उनके लिए नवजागरण की वेला है । वह बोले, "उपस्थित भाइयो एवं बहनो!" भी देयतेमा - पूरी सभा में ऐसा सन्नाटा छाया हुआ था कि अगर मुई भी गिरे तो आवाज सुनाई पड़ जाए। "भूक को जो वाचाल बनाते हैं, पंगु को गहन गिरि लापने की क्षमता प्रदान करते हैं, उन्ही अनन्त अनादि परमेश्वर को मेरा प्रणाम निवेदित है।" तालियों की गडगडाहट दुवारा मुखर हो गई। "मनुष्य की सृष्टि के प्रथम दिन से आज तक हम जो कुछ रहे हैं, उसके दौरान भारतवर्ष के पियो के द्वारा खोजे गए शानो में से दो विपयों का महत्त्व सबसे अधिक है। हमारे जीवन-संग्राम में उनकी उपयोगिता अनिवाम है। वे दो विषय हैं : अस्तित्व और मृत्यु का रहस्य।" उसके बाद नित्यानंद सेन आरम्भ से अन्त तक वेद-वेदान्त, उपनिषद्, ईश्वर, इहलोक आदि सभी विषयों पर प्रकाश डालने लगे। उन्होंने मागवल्लय को कहानी सुनाई, "याज्ञवल्क्य ने जब पर छोड़ने के समय अपनी दोनों पलियों को समग्र सम्पत्ति देनी चाही, मैनेयो ने उनसे पूछा, 'येनाहं नामृता स्याम् किमहं तेन कुर्याम् ?' यानी जिसके द्वारा में अमृत न हो पाऊंगी उरी लेकर क्या करूं? हम में से हर व्यक्ति के हृदय मे यही ध्वनि अलग-अलग भावी में गूंज रही है : 'किस तरह इस मृत्यु को वजित किया जाए!" इस्लाम मजहब मृत्यु को इन्तकाल कहता है । इस शब्द का अर्थ है परिवर्तन । इस मत के अनुमार आत्मा का विनाश नहीं होता है । पुरानशरीफ में लिया है : इम दुनिया में हमारी सृष्टि खिलौने की तरह नही हुई है. हम लोगों के देहावसान के बाद अनन्त जीवन की शुरुआत होती है। गीता के द्वितीय अध्याय में लिया है: 'न जायते नियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वान भूमः । मनो नित्यः शाश्वतोह्य पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।' आत्मा का जन्म होता है और न मृत्यु । जन्म-ग्रहण न करने यानीम पर भी इसका अस्तित्व है। यह जन्मरहित, शाश्वत एवं प्राचीन है। देह के विनाश होने से भी इसका नाश नहीं होता है । यह तो हुई आत्मा की बात।" इतना कहकर नित्यानन्द सेन ने रूमाल से अपना मुंह पोंछा । उसके बाद कहना शुरू किया, "आत्मा के अस्तित्व को स्वीकृति के संदर्भ में तीनों प्रमुख धमों के मत में तिल-मान भी अन्तर नहीं है । लेकिन मैं आज आपको दिखाऊंगा कि आत्मा न केवल अमर है बल्कि आत्मा को हम आंखों के सामने प्रत्यक्ष कर सकते हैं । अपने स्वर्गवासी पुत्र रातुल के बारे में ही कहूं। लड़ाई के मैदान में उसकी मृत्यु होने के बाद मैंने जो उसकी फोटो ली है, वह मेरे पास है । आज आप लोगों को यह दिखाने जा रहा हूं। आप लोगों के बीच कुछ ऐसे भी व्यक्ति होंगे जो इसके पहले मेरी बातों पर यकीन नहीं करते होंगे, मगर आज संभवतः उनका संदेह दूर हो गया होगा कि रातुल इस धरती पर जीवित है। पुत्रशोक पिता के लिए कितना बेधक होता है उसका अनुमान वही लगा सकते हैं जो पिता हैं । लेकिन विज्ञान आदमी के स्नेह-प्यार पर भरोसा नहीं रखता है । मेरा पुत्रशोक चाहे जितना बड़ा ही सत्य क्यों न हो, मेरा विज्ञान उसके वनिस्वत बड़ा है। उसी वैज्ञानिक सत्य के आधार पर आज मैं कह सकता हूं कि अपने पुत्र की मृत्यु के विनिमय में मैं लाखों पिता के शोक को दूर करने... अचानक एक बाघा खड़ी हो गई। वगल का एक आदमी अकस्मात् नित्यानन्द सेन के पास आकर बोला, "सर, जरा इस स्लिप को देख लें।" वाधा पड़ने के कारण नित्यानन्द सेन ने अपने भाषण का क्रम रोक दिया। बोले, "अभी नहीं, बाद में।" "एक युवक आपसे मिलना चाहता है। हमने उसे अन्दर नहीं आने दिया। कहा, वाद में मिलना। वह बोला : नहीं ; अभी तुरन्त यह स्लिप उनके पास पहुंचा दें। बहुत ही दबाव डालने लगा। लगा, कोई जरूरी काम "कहां है, देखू ।" चश्मा निकालकर वह स्लिप को पढ़ने लगे। कागज़ का एक छोटा-सा १३२ टुकड़ा था। पढ़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगना चाहिए था। लेकिन उनके पढ़ने का सिलसिला जैसे रुकने का नाम ही न ले रहा था । सभा में शोरगुल होने लगा। पल, दंड, मिनट-सुब कुछ चुपचाप खिसकते गए। नित्यानन्द सेन को बाहरी चेतना जैसे खो गई । एकाएक सिर पर बिजली गिरने से जैसा हो सकता है, उनकी स्थिति वैसी ही थी। और फिर अकस्मात् वह संजाहीन होकर गिर पड़े। पारों तरफ शोरभारावा मच गया। पानी लामो पानी, बरफ, भीड़ हटामो और एम्बुलेन्स के लिए खवर भेजो। यहां कोई डाक्टर है ? सर्वनाश हो गया! पर पर घबर भेजो। उनके घर में नौकर के सिवा है ही कोन ! फिर क्या होगा? यह कागज़ कहां है ? भीड़ में लोगों के पैरों के दवाव से वह कहीं साबूत रह सकता है ! स्लिप किमने भेजी थी ? उसी को खोजो। कहीं कोई नहीं है ! किसने उसे देखा था? स्लिप लेकर कोन आया था? पता नही, कौन-सा समाचार ले याया था! भीड मे खोज निकालना क्या आसान है. फाटक बन्द कर दो वरना भाग जाएगा। इसके अलावा पुलिस को खबर भैजनी पाहिए.. नित्यानन्द सेन तद भी उसी तरह पड़े हुए थे। २१ इधर जब इस तरह की स्थिति थी, दूसरी ओर हॉल के अन्दर एक दूसरी पटना पटित हो रही थी। बेशमार भीड़ थी। पादमी खचाखच भरे थे। रातुल उन्हीके बीच एक कुरसी पर बैठा चुपचाप देख रहा था। मंच पर रोशनी जल रही थी। उसकी आंखें एक मूर्ति पर टिकी थीं। वह मूति उसके पिता नित्यानन्द सेन की पी। आज उनकी आंखों से आनन्द छलक रहा था। यह जैसे उम दिन शंभुनाथ पंडित लेन मे देखा हुआ उनका पिता नही है । उस दिन बाबूजी गंभीर होकर चुपचाप बैठे थे, किसी से एक भी शब्द नहीं बोल रहे थे। लेकिन आज-आज उनको पूर्ण सफलता का दिन है | आज यह सफलता के गौरव से महान हैं। याज पड्यंत्र के महाजाल को छिन्न- भिन्न कर अपनी महिमा से दीप्तिमान हो उठे हैं। भवतोष बाबू निकलकर आया। लगा, जैसे कुछ वोला हो। कोई खास वात कानों में नहीं पहुंची। आज भवतोष वावू की भी खुशियों का कोई अन्त नहीं था। दो लाख रुपयों की जायदाद का थोड़ा-बहुत हिस्सा जरूर ही मिलेगा। उसके बाद हरिदास बोला। आजन्म संन्यासी भगोड़ा हरिदास । रातुल के जीवन के नाटक में प्रवेश करके उसने कितना संकट पैदा कर दिया ! अब वह फिर से राहु-मुक्त सूर्य की तरह रातुल को और भी चमका देगा। रातुल के जीवन में हरिदास राहु ही है। चाहे संपूर्ण राहु न हो लेकिन आंशिक राहु तो है ही। उसके बाद नित्यानंद सेन भाषण देने के लिए खड़े हुए। "मूक को जो वाचाल बनाते हैं, पंगु को गहन गिरि लांघने की क्षमता प्रदान करते हैं, उन्हीं अनन्त अनादि परमेश्वर को मेरा प्रणाम निवेदित है।" चारों तरफ तालियों की गड़गड़ाहट हुई। वह फिर से कहने लगे, "मनुष्य की सृष्टि के प्रथम दिन से आज.तक हम जो कुछ भी देखते आ रहे हैं, उसके दौरान भारतवर्ष के ऋपियों के द्वारा खोजे गए ज्ञानों में से दो विषयों का महत्त्व सबसे अधिक है । हमारे जीवन- संग्राम में उनकी उपयोगिता अनिवार्य है । वे दो विषय हैं-अस्तित्व और मृत्यु का रहस्य ।..." रातुल ध्यान लगाकर सुन रहा था। एकाएक बगल से एक आदमी ने कहा, "सब बोगस है।" एक और व्यक्ति पास ही बैठा सब सुन रहा था। वह बोला, "सब सुने वगर पहले ही से कैसे कहते हो कि सब बोगस है ?" "अरे भाई मेरे, ज्यादा विद्या होने से ही कोई अक्लमन्द नहीं हो जाता । विद्या और बुद्धि दोनों अलग-अलग चीजें हैं।" "कैसे ?" "मसलन नित्यानंद सेन । भला आदमी शिक्षित है मगर वैज्ञानिक बुद्धि जिससे जन्म लेती है उस चीज की इसमें कमी है । झोंक है तो केवल अलौकिक वातों पर और उन आलौकिक बातों को आदमी की आंख, नाक और कान से १३४ समझा नहीं जा सकता।" "लेकिन यह तो मानोगे हो कि "There are more things in heaven and carth, Horotio, than your philosoply can dream of." "यह अविशान हुआ, फहना जो है उसमें शामिक तोरणा पाहिए।" "लेकिन विज्ञान ही यया राय कुछ है ? हम लोगों के भारत- मुनियों में हजारों वर्ष की साधना के फल से जिसे.." नित्यानंद सैन तय यही मारा कह रहे ये: "यागवल्क्य ने जब पर छोड़ने में समय अपनी पत्नी को गतिशी पाही, मैत्रेयी ने उनसे पूछा, 'येनाहं मागृतास्माम् जिगह रोग पुगो पानी जिसके द्वारा मैं अमृत नहीं हो पाऊंगी उसे मेकर नया कहे? गोगों हरेक के हृदय में यही ध्वनि यार-मार गूंज रही है कि किस तरह मासुको वर्जित किया जाए।" भले भादमी ने फिर कहा, "देय रहे हो म, बड़ी-बड़ी बात कहकर धोया देने की कोशिश की जा रही है। जो कंक्रीट है उसकी मोर काही मही रहे बगल का आदमी बोला, "तुम्हें इस मीटिंग में नहीं माना पाहिए था। यह अत्यंत स्वाभाविक यात है, इसलिए उसकी पर्षा भी स्वाभाविक ही अन्त में घेद, वेदान्त, उपनिषद, ईश्वर, इहलोक सभी के बारे में उल्लेप करते हुए बोले, "आरमा के अस्तित्व को प्रमाणिकता के संदर्भ में तीनों प्रगुप धर्मों के मत में तिल भर मो अन्तर नहीं है। मेपिन में बाज मापने दियाऊंगा कि बारमा न केवल अमर है पल्लि मारमा को हम प्रत्यक्ष कर सकते हैं । अपने स्वर्गवासी पुत्र रातुल के बारे में ही कहूं | समाई के मैदान में उसकी मृत्यु होने के बाद मैंने जो उसकी फोटो ली है. यह मेरे पारा है। माप लोगों को मह फोटो दियऊंगा।" *होरोहियो, पृप्यो और स्वर्ग में ऐसो पोरें वायत में है कि मारे में तुम्हारा एन सपना तक नहीं देख सकता है।

. बगलवाला मादमी बोला, "अव-अब तुम्हारा कंक्रीट आया है, अब ह विज्ञान बता रहे हैं।" भला आदमी बोला, "ठहरो, आखिर तक देखें। यह विज्ञान क्या कोई जिक है ?--बाद में पूछंगा।" वगलवाला आदमी बोला, "विश्वास न रहने के कारण विज्ञान भी तुम्हें मैजिक ही लगेगा।" नित्यानन्द सेन का तव भाषण चल रहा था : "इस दुनिया में पिता के लिए पुन -शोक कितना वेधक होता है, इसका अनुमान वही लगा सकते हैं जो पिता हैं। लेकिन विज्ञान आदमी के स्नेह-प्यार पर भरोसा नहीं रखता है, मेरा पुन- शोक चाहे जितना ही बड़ा क्यों न हो, मेरा विज्ञान उसके बनिस्वत बड़ा है। उसी वैज्ञानिक सत्य के आधार पर आज मैं कह सकता हूं कि अपने पुत्र की मृत्यु के विनिमय में मैं लाखों पिता के शोक दूर करने भला आदमी बोला, "सब धोखा है धोखा! पुत्र शोक दूर करने-क्या कहने हैं। दरअसल पुत्रशोक को कैपिटल बनाकर मूलधन बढ़ा रहे हैं- कितावें विक रही हैं। सच पूछो तो इस दुनिया में स्नेह, प्रेम, दया, ममता सब पाखंड है।" "तुम नास्तिक हो।" "चाहे नास्तिक होऊ या और कुछ । आज अगर सभा में खड़ा होकर कोई एलान करे कि मैं रातुल हूं और जिन्दा हूं तो फिर क्या होगा ?" "अगर सचमुच उनका लड़का होगा तो नित्यानन्द सेन उसे कलेजे से लगा लेंगे।" "कभी नहीं। आज मैं कह रहा हूं, उसको देखकर हो सकता है कि वा बेहोश होकर गिर पड़ें। हो सकता है, आत्महत्या कर लें।" "असंभव बात है।" रातुल बहुत देर से इन लोगों की बातचीत सुन रहा था। बहुत पहले ही उसने तय कर लिया था कि बाबूजी का भापण ज्यों ही समाप्त हो वह खुद जाकर नाटकीय मुद्रा में प्रकट हो जाएगा। लेकिन उन भलेमान की बातें सुनकर वह हैरान हो गया। फिर स्नेह, प्रेम, माया-ममता- कुछ क्या पाखंड ही है ? दुनिया में उमकी कोई कीमत नहीं ? झूठी बात पिलरल झूठो बात । उसके पिता सस्पनिष्ठ दानिक है । उसकी मृत्यु की बावत अगर कहीं झूठा प्रचार हुआ है तो उसके लिए बापूजी जिम्मेदार नहीं हैं । प्यार के प्रवल आवेग के कारण ही इसकी सृष्टि हुई है। हो सकता है कि सगातार दिन-रात उसके बारे में सोचते-सोचते सरो सपने में देखते हों और उसी सपना को सत्य मानकर चलते हों। लेकिन रातुन के बनिस्वत 'उस रातुल' का सपना ही क्या उनको फ्यादा प्यारा है ? रातुल की अपेक्षा अपना यश, अर्य और ध्याति ही उनके लिए अधिक कीमत रयते हैं ? बगलवाला आदमी बोला, "कहां पले सर?' रातुल कुरसी छोड़कर घड़ा हो चुका था। बोसा, "जरा घूम-फिर या।" यह सीधे मंच की ओर बढा। उसके याद एक आदमी से कापड और कलम मांगफर उसने लिया : "मापूजी, मैं रातुल हूं। मैं आपके पास दुबारा राशरीर लौट आया हूं। मेरी मृत्यु नहीं हुई है । अवकी कोई जाली रातुल नहीं है । मेरो स्मरण गषित नष्ट हो गई थी और मैं यहुत दिनों से अस्पताल में पड़ा था। मेरी स्मरण-शक्ति फिर से लौट आई है । आप मुझे स्वीकार करने के लिए जब तैयार होंगे सभी में स्वयं को प्रकट करूंगा, अन्यथा नहीं। और मैं असली रातुल हूं इसके प्रमाण मे लिय रहा हूं कि यचपन में आपके चाकू से पंसिल काटने के पास मेरा अंगूठा कट गया था। वह दाग अब भी है । जवाब दीजिएगा। माज्ञाकारी, रातुल" उसको याद गेट के पास एक आदमी के पास जाकर रातुस योसा, "उरा इसे प्रोफेमर सेन फोदेदें।" "वह तो सभी व्यस्त है।" "सो रहें, भाषण के बीप ही उन तक यह पहपनी पाहिए। में उनके पर का आदमी हूं। बहुत ही जरूरी स्लिप है।" इच्छा न रहने के बावजूद यह यादमी स्लिप सेकर अन्दर गया। रातुम्न उत्कंठित होकर बाहर प्रतीक्षा करने लगा। रातुम ने ऐमा प्रमाण दिया। जिमे काटा नहीं जा सकता । अब उसके पिता उसे नमसी नमः . कर पाएंग। इसके अतिरिक्त अंगूठे के कटने की बात किसी दूसरे की जानकारी में नहीं है। आज परीक्षा हो ही जाए। फिर स्नेह, प्रेम, दया, माया सब कुछ पाखंड ही है ! सामने आकर वह सीधे अपने बाबूजी की मोर देखने लगा। नित्यानन्द सेन उस स्लिप को बेमन से पढ़ रहे हैं। छोटा-सा एक कागज का टुकड़ा है। पढ़ने में ज्यादा देर लगने की बात नहीं है । लेकिन पढ़ने का सिलसिला जैसे रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। पूरी सभा में शोरगुल की शुरुआत हो गई है। पल, दंड, मिनट मौन के बीच गुजर रहे हैं। बाबूजी को बाहरी चेतना जैसे लुप्त होती जा रही है। एकाएक जैसे विजली गिरी हो, ठीक वैसे ही । उसके बाद चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते नित्यानंद सेन बेहोश होकर मंच पर गिर पड़ते हैं। रातुल उसी क्षण बाहर निकल आया। अब वह क्षण भर के लिए भी नहीं रुका। सभा, भीड़, लोगों के शोरगुल सभी से परे होकर उसने सहसा दौड़ना शुरू किया । अब यहां एक क्षण के लिए भी रुकना न हो पाएगा। बाहर आकर खड़ा होने पर भी भय जैसे दूर नहीं हो रहा है। कोई पहचान ले सकता है। अब इस दुनिया से खुद को मिटा देना होगा। तमाम दुनिया का चक्कर लगाने के बाद रातुल ने जहां आश्रय की खोज की थी, एक मामूली-सी चोट से वह आश्रय दरारों से भर गया है। इस घटना के बाद इस दुनिया में रातुल के अस्तित्व की कोई जरूरत नहीं है। उसके मस्तित्व का अर्थ है उसके पिता के सम्मान, यश, संपत्ति और प्रतिष्ठा का मिट्टी में मिलना। रातुल दौड़ने लगा-इस दुनिया में नहीं, बल्कि कहीं और ही। दौड़ते-दौड़ते रातुल जब खिदिरपुर डॉक पहुंचा तब रात गहरा चुकी - थी। "मोम्बल ! भोम्बल !" रातुल उसको तलाशने लगा। भोम्बल आया। बोला, "बात करने की फुरसत नहीं है, ऊपर चले माओ । जहाज अभी-अभी खुलने जा रहा है।"

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रातुल को देखकर आजकल वह जैसे गूंगा हो गया है । उसकी मूक जिज्ञासा समुद्र, आकाश, जल, तारे, सीमाहीन दिक्-चक्र-काल से टकराती रहती है। कहती है, "हे प्रभो, हे अदृश्य महादेवता, प्रकाश दो, अंधकार दूर करो।" भोम्बल की मूक जिज्ञासा के उत्तर में नीले आकाश का देवता, लगता है और भी अधिक गूंगा हो जाता है। सूर्य उगता है और डूबता है, चांद उगता है और डूबता है, पानी की लहरें उठती-गिरती हैं, पक्षियों का समूह इस दिगंत से उड़कर उस दिगंत की ओर चला जाता है किन्तु कोई कुछ भी नहीं कहता। कोई रोशनी नहीं जलाता, अंधेरा जैसे और भी गूंगा हो जाता है। जहाज़ के रोज़मरे की ज़िन्दगी में पहले की तरह ही झगड़ा-टंटा चलता रहता है । शक्ति-लोलुप व्यक्तियों की जहरीली प्रतिद्वन्द्विता चलती रहती है। स्थल का आदमी जल में आकर भी जैसे अपने धर्म को छोड़ नहीं रहा है गोदाम बाबू और महराज का झगड़ा। बड़े-छोटे का प्रश्न । उच्च-नीच का प्रश्न । वंश-मर्यादा का प्रश्न ।.."अनादि-अनन्तकाल तक उन लोगों का ऐसे ही चलता रहेगा। रातुल देखता है और हंस देता है। इसी तरह एक दिन जहाज हिन्दमहासागर पार करता है और फिर बहुत दिन पहले का दृश्य आंखों के सामने नाचने लगता है । अदन का बन्दरगाह ! बन्दरगाह के भीतरी हिस्से से एक अरबी वजरा रफ्ता-रफ्ता बाहर के समुद्र की ओर चला जा रहा है। काले समुद्र का पानी सूर्य की रोशनी के कारण हल्की चमक लिए हुए है। धुंधलके से घिरे दूर समुद्र की छाती पर संभवतः एक उड़ने वाली मछली पानी से दस-बारह फीट ऊपर उछलकर फिर से पानी पर गिर पड़ी. उसके पीछे एक और उसके पीछे दूसरी एक और । जेटी से सटकर एक नाव आहिस्ता-आहिस्ता जा रही है। लगता है किसी द्वीप में जाकर लगेगी। मल्लाहों की जमात क्रमबद्ध डांड चला रही है और तेज आवाज में चिल्लाती है, "याहुदी अल्लाह, याहुदी अल्लाह!" सुबह की हवा के स्पर्श से समुद्र में छोटी-छोटी लहरें जग रही हैं। कोई एक जहाज तब संभवतः और भी दूर दक्खिन की तरफ जाकर सुवह के धुंधलके में एक स्याह धब्वे की तरह खो गया । १४० दिन और रात । रात और दिन । अन्ततः एक दिन निर्धारित दिन का यागमन हुआ। तब रात गहरा चुकी थी। घंटा बज उठा-हिंगडांग-डिंगडाग"नींद- बोशिल पलकें रहने के बावजूद वे लोग जिन्हें ड्यूटी पर जाना था, उठकर पड़े हो गए। बड़ा-बड़ा माल उतरने सगा घट-पटाक्, खट-पटाक् आवाज होने लगी। जेटी के फाटक पर एक पहरेदार घड़ा पा। टिकट देख लेने के बाद जाने की इजाजत दे रहा पा। एक दाढ़ी-मूंछ वाले यादमी के आते ही पहरेदार ने पूछा, "कौन है ? तुम कौन हो?" "मैं भोम्बल का आदमी हूँ। जाने दो।" तब तक दाढ़ी-मूछ वाला आदमी जेटी पारकर सीधे नारियल के पेड़ों से घिरे बंदरगाह के टोसे पर पहुंच चुका था। उसके बाद एक बार सतर्कता के साप पारों तरफ पाखें दौड़ाकर अस्पताल के भवन की तरफ तेज कदमों से बढ़ने लगा। दक्चिन के मेले के बगीचे से तेज हवा आ रही थी, लेकिन उसका ध्यान पाही-किसी ओर न था। उघर जहार के डेक के नीचे आधी रात में भोम्बल की नींद किसी आवाज से दूर हो गई । नीद टूटते ही उसने यगत को ओर मुड़कर देखा । कहां गया वह ? हो सकता है कि सभी लोटकर आए, भोम्बल ने सोचा। सेकिन जहाज जब घुलने पर हुआ, तब भी वह लौटकर नही पाया था। भोम्बल जिस तरह सेटा पा, उसी सरह सेटा रहा । जाए मरे । होता ही कोन है मेरा! एकदिन जिस तरह अप्रत्याशित रूप में आया था, उसी सरह बचानक पला भी गया। पता नहीं क्यों घसा गया ! बंगाली जात होती ही है मगर ताल-मेल की। पामधयासी जात । वह भी तो बंगाली ही था न ! जाए मरे । दुनिया में कोई किसी का नहीं होता-जाए मरे !... २३ अस्पताल में उस दिन फिर मुबह हुई। धूप सरकार अन्दर आ गई है। मुबह की मोठी-मोठी धूप। पारी धोर फले समुद्र की हवा से परदे हिल-डुल रहे हैं । फर्श पर लेटी कच्ची धूप का सोना झलमला रहा है । जो मरीज़ उठकर खड़े हो सकते हैं, वे डॉक्टर के आने के पूर्व ही खिड़की से सटकर बाहर आंखें दौड़ा रहे हैं। नारियल के पेड़ों की पंक्तियां जहां समाप्त हुई हैं वहीं से समुद्र की शुरुआत है। काले-काले मछुए पंक्तिवद्ध होकर चले जा रहे हैं। उनके कंधों पर एक-एक बड़ा बांस है, जिन पर मछली पकड़ने के बड़े-बड़े जाल झूल रहे हैं । वालूचर पर कुछ नौकाएं खड़ी हैं जो छोटे-छोटे धब्वे की तरह दिख रही हैं। चीनी सरदार ल्यां तोयां आज भी आया है । उसके हाथ में हिसाव का खाता है। लु"लु"लु'लु'लु'लु'लु'लु'" दोनों हाथों की उंगलियों को मुंह के अन्दर डालकर वे एक अजीव किस्म की आवाज़ निकालते हैं । वह आवाज़ इस मुहल्ले से उस मुहल्ले में जाती है और तमाम मुल्क को हैरत में डाल देती है । सभी जमात बांधकर आते हैं। "सरदार आ गया, सरदार आ गया।" उनके बीच उत्तेजना फैल जाती है। चीनी सरदार काला पाजामा पहने है, उसकी मूंछ लम्बी और सुई की तरह नुकीली हैं। ल्यां तोयां चिल्लाता है, "मक्फ पांच लुपिया, विशुख साढ़े तीन लुपिया, भिरमी दो लुपिया. अस्पताल की खिड़की से लगकर मरीजों का दल सब कुछ देखता है । जहाज से कपड़े, सिगरेट, तम्बाकू, चीनी वगैरह बहुत-सी चीजें उतरती हैं। साथ ही साथ खिलोने, चाय, दवा, सावुन, तमाम खुदरा माल । केल के घोद, दालचीनी, इलायची, लौंग, सागूदाना और सूखी मछलियों की लदाई होती है। कर्नल वाटसन रोज़मरे की तरह सीढ़ी के पास माकर ठिठककर खड़े हो गए, "वह सब क्या है ये चिथड़े ? इन्हें फेंका क्यों नहीं गया? सारा कूड़ा- कचरा..." सीढ़ी से उतरने के बजाय कल सीधे वाई तरफ से घूमकर आया । वाई तरफ स्याही से मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा है : केस नम्बर ४६ । साइनबोर्ड अब तक क्यों लगा हुआ है ? जब कि मरीज भाग गया है तो १४२ - पानी रखने से क्या फायदा? कर्नल बाटमन को ल्व महसूस हुई। उसके बाद कर्नल ने नोटबुक बाहर निकासी । मोटे परमे से पहने मगा । मेडिकल जरनन में इस केम की तस्वीर निकली है-तसवीर और केस की हिस्ट्री । इमी के बारे में कमरीको जरनल में मेघ छपते हैं, इसी को देखने के लिए बलिन से डॉक्टर सुल्जवर यहां आए थे और अमरीका से पाए मेडिकल बोर्ड के चेयरमैन डॉक्टर पियोहोर वलेपर । अभी तक इसके बारे में कोई रपट नहीं भेजी गई है। नगमग पन्द्रह-सोलह दिन हो चुके । कब कितनी देर की जा सकती है? इसके लिए मेट्रन को ही जिम्मे- दार ठहराना होगा। "हाट्स दैट ?-या है ?" "केम नम्बर ४६ मिल गया । याश्चर्य की बात है !" "कहां मिला? कैसे?" "मालूम नहीं, कमरे में जाने पर एकाएक नजर पड़ी कि वह पहले भी धरह ही लेटा हुआ है।" "पूटने से क्या कहता है ?" "ए भी बोल नहीं पाता है, सर! मैंने पूछा : तुम इतने दिनों तक यहां पे? तुम्हारा नाम क्या है ? पिता का नाम क्या है ? जवाद में सिर्फ फटी- फ्टी मांगों से ताकता रहता है।" "चलो, देय तो सही !" कहकर कर्नल वाटसन मैट्रन के पीछे-पीछे केबिन की ओर जाने सगा। माइपों एवं बहनो! अमर मार लोग कभी फिलिपाइन दीपपुंजों के नस दीप के अस्पताल में जाएं तो देयगे कि रातुल मेन मान भी वहाँ एक नम्दर केविन में मेटाहा है। वे सोग उसे म नम्बर ४६ के रूप में जानते हैं। अगर बार उनमे पू कि तुम्हारा नाम क्या है, तुम्हारा पर कहाँ है, तुम्हारे पिता का नाम क्या है तो वह भी जवाब न देगा । पटी-पटी बायों से यार सोगों की तरफ ठाकता रहेमा । रमे पुछ भी पार नहीं है। लेकिन बात ऐमी नहीं है। दरयमन वह पुरना नहीं है। मेग्नि नियति के अजीब दायरे में पिर जाने के कारण इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। इसी तरह उसने खुद को दुनिया से मिटा डाला है और पल-पल मृत्यु का वरण कर रहा है। सव कुछ जानने के बावजूद उसे झूठ बोलना पड़ता है-इसके लिए आप उसे क्षमा करें। उसके लिए दो बूंद आंसू बहाएं, उसके प्रति करुणा व्यक्त करें---मेरा आप लोगों से यही अनुरोध है !

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Martiyu Heen

Author
Mitra Vimal
Title
Martiyu Heen
File name
Martiyu Heen
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Delhi,rajpal & Sons.
Language
Sanskrit
Pages
152
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552067
Barcode
4990010032797.00
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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Copyright permitted
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