Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Shri Muni Suvrat Kavya

Shastri,bhujvali · 2012/08

PDF Proofread

Front matter

भूमिका ke “कान् पृच्छामः सुराः स्वर्गे निवसामो वयं भुवि । किम्वा काव्यरसः स्वादुः किम्वा स्वादीयसी सुधा" ॥ संसार-सुमनोद्यान का काव्य ही फलकण्ठ अथवा फल्प लतिका है। सदाव. सम्पन्न सहृदय-गणों की मनस्तुष्टि अथवा अभीष्ट-प्राप्तिका एक मात्र साधन कान्य ही है। काव्य-कानन के काम पर्याटक तथा कविता-कामिनी के कटाक्ष कोर के लक्ष्य-भूत कवि- कएठीरव विज्ञवृन्द ने काव्य का हृदय से आदर किया है। मेरी तो यही धारणा है कि इस पञ्चम काल में दार्शनिक तथा धर्मशास्त्रीय गूढ रहस्यों के उपदेष्टा तथा ज्ञाना की विर: लता का विचार कर ही "कशाच्छलेन बालानां नीनिस्तदिह कथ्यते" के अनुसार आचा- प्यों तथा कवि-कुंजरोंने शब्दार्थालङ्कार से समलङकृत, प्रसाद माधुर्यादि गुणों से समु- द्वासित, लाटरी अथ च माधुरी आदि काव्योवित रीतियों से विजड़ित और बसन्त- तिलकादि वृत्तों से सम्बलित कान्यों के द्वारा कथा-कथानक-रूप में दर्शन तथा धर्म के मार्मिक सिद्धान्तों को दरसा कर सर्व साधारण शिक्षिनों को लोकोत्तर लाभ पहुचाया है। कौन ऐसे सहृदय-समुदाय हैं जो विमानानुमानादिकों से अभिव्यक्षिा, घोर वैराग्यादि रसों से समुच्छलित तथा ध्वनिव्यङ्गयाओं से मुखरित काव्यकल्लोलिनी में गोता लगाना अपना परम पुण्योदय नहीं समझते हैं अतः साहित्य-सदन का सहृदय स्वामी अथवा नाना- घी का दुर्दान्त केशरी यदि काव्य को माना जाय तो मैं समझता हूं कि, यह अनुचित नहीं होगा। प्रस्तुत पुस्तक भी काव्य ही है। इसका नाम "मुनिसुवन काव्य" भार नाम "काव्य रज" है। यह उत्तर पुराण के आधार पर रचिन हुआ है। इसमें दस सर्ग है। जन्म- कल्याणकसे मोक्ष-पल्याणक तक की जीवन-घटना श्रीमुनिसुबत देय फी यड़ी रोचकना तथा प्राञ्जल पद्धति से वर्णित है। आपके पिता का नाम राजा मुमिन तथा माता का महिषी पद्मावती था। मापकी राजधानी राजगृह में थी। राजगृह जैनियों का पैसा प्रसिद्ध तथा पवित्रतम तीर्थ-स्थान है यह यहां बताने की ज़रूरत नहीं हैं। यहां की शान्ति- शीलता, पवित्रता तथा प्रारतिया दर्शनीयता यह यात जतलाये देती है कि यहां जैन-राज- , t नीति प्रीति पालक रघराज- [क] धानी अवश्य थी तथा जैनाचार्यों तथा मुनियों ने अपनी अखण्ड तपस्याओं और चामत्का- रिक सिद्धियों से यहाँ को धूलि-पुंज के अणु-परमाणुओं तक को भी पूत कर दिखाया था अवश्य । तभी तो आज भी उस.दिव्य विभूति की झलक लोगों की आंखों को चका- चौंध किये देती है। अस्तु मुनिसुव्रत स्वामी गार्हस्थ्य-जीवन समाप्त फर विजय नामक अपने पुत्रको राज्य भार दे स्वयं मोक्ष मार्ग के पके पथिक बने। आपका विवाह यहां, किसकी कन्या से हुआ था तथा आपको विजय के अतिरिक्त और दूसरी फोई संतान थी कि नहीं आदि बातों का उल्लेख इस फाव्य में कहीं नहीं है। आपके विवाह के विषय में केवल यही लिखा हुआ मिलता है कि "पित्रा विनिवर्तितदारकर्मा" अर्थात् पिता ने इनकी शादी फरदी। इस काव्य के संकलयिता फधि-जर परम सम्मानार्ह श्री अईदास जी है। इनको कृतियों के द्वारा इनका समय निर्णय करना मेरे जैसे वहु-कार्य-घ्याप्त साधारण इतिहास संस्कृत-पण्डित के लिये नितान्त असम्भव है। हां-यदि फोई सावकाश इतिहासवेत्ता जैन विद्वान् इस अमर कवि की कविता की ओर कटाक्षपात करें तो अवश्य समय निर्णय : तथा समालोचनात्मक भूमिका होसकती है। इतनी घात में अवश्य पहंगा कि इनके समय- निर्णय करने में लोगों को आकाश-पाताल का फुलाया अव एक नहीं करना पड़ेगा। क्योंकि अभी तक इनके तीन फाव्य उपलब्ध हुए हैं। यह "मुनिसुव्रत काव्य" "पुरुदेव चम्पू" तथा " भव्य-कण्ठाभरण"। इन तीनों निम्नलिखित प्रशस्तियों से यह यात शात होती है कि आपने अपना काव्य-गुरु पण्डिताचार्य आशाधर जी को माना है। और आशाधर जी को ही कविता तथा उपदेश से प्रभावित तथा निनिमीलितचक्षु होकर यह अर्हदास फचि कविता-रचना में अग्रसर हुए हैं। "मिथ्यात्वकर्मपटले चिरमावृते मे युग्मं दृशोः कुपथयाननिदानभूते । पाशाघरोक्तिनसदजनसम्प्रयोगे: स्वच्छीकृते पृथुलसत्पथमाश्रितोऽरिम" (मु. का.) "सूक्त्येव तेषा मनभीसो ये राहाश्रमस्थाचरितात्मधर्माः । त एवं शेषामिणां सहाया धन्याः स्युराशाधरसरियाः" [ भव्य कराठाभरण ] "मिस्त्यालककलुषे मम मानसेऽस्मिन् प्राशायरोक्तिकत कासरैः प्रमन्ने । उल्लासितेन शरदा पुरुदेवभच्या तयम्पुदम्भजलजेन समुञ्जजम्भे । पु० च० ॥ पण्डित आशाधर का समय इतिहास-घेत्ताओं ने विक्रम सम्बत् १३०० निश्चित कर रक्सा है। अतः इनका भी समय यही या इसके लगभग मानना समुचित होगा। 1 [] "पुरुदेवचम्पू" के विज्ञ सम्पादक फड़कुले महोदय ने अपनी पाण्डित्य-पूर्ण भूमिका में लिखा है कि उल्लिखित प्रशस्तियों से कवियर अहदास पण्डिताचार्यः आशाधर जी के समकालीन निर्विवाद सिद्ध होते हैं। किन्तु कमसे कम मैं आपको इस समय निर्णायक सरणी से सहमत हो आपकी निर्विवादिता स्वीकार करने में असमर्थ हैं। क्योंकि प्रशस्तियों से यह नहीं सिद्ध होता कि आशाधर जी की साक्षात्कृति अर्हदास जी को थी कि नहीं। 'कि' और 'उक्ति' की अधिकता से यह अनुमान करना कि साक्षात् आशाधर सूरि से भद्दास जी ने उपदेश ग्रहण कर उन्हें गुरु मान रखा था यह प्रामाणिक नहीं प्रतीत होता। क्योंकि 'सूक्ति' और 'रक्ति का अर्थ रचना-बद्ध ग्रन्थ-सन्दर्भ का भी होसकता है। अस्तु मैं आपकी और अखण्डनीय धातों का खण्डन न फर सिर्फ आपको निर्विघादिता से सहमत नहीं होता हूं। प्रचुर पुण्य के परिपाक से ही प्रकृत कवि कहलाने की कीर्ति आदमी प्राप्त कर सकता है। कवियों के फसने के लिये क्या ही अलौकिक निन्तलिखित कसौटी है:- "प्रययः केवलकवयः कीराः स्युः केवलं धीराः । वीराः पण्डितकवयस्तानवमन्ता तु केवलं गवयः"॥ "शीला विज्जामारुलामोरिकायाः काव्यं कर्त्त मन्ति विज्ञाः खियोऽपि । विद्यां वेत्तुं चादिनो निविजेतुं विश्वं यत्तुं यः प्रवीणः स वन्यः'' || [ उमट० ] अस्तु उल्लिखित कसौटी पर कसे जाफर हमारे प्रस्तुत कविवर अईहासजी ने अपने काव्य-पलेवर को फमनीय कान्ति में किञ्चिन्मात्र भी पलङ्क नहीं लगने दिया है। आपने फाव्य-फलित कल्पना पुटीर में फमलासन लगाकर अपनी स्वर्णमयी अमर लेपनी से श्री. मुनिसुव्रत तीर्थङ्कर के चार चरित्र का चित्रण किया है। प्राक्तन पद्धति का अवलम्यन फर ही चरित्र-नायक के नामानुसार इस काव्य का भी नाम निर्देश किया है। आपका यह सारा फाव्य माधुर्य तथा प्रसादगुण से ओत-प्रोत है। प्रत्येक श्लोक में अलवार के पुट देने से इसकी शोमा और भी कई गुनी अधिक यह गयी है। आपके इस काव्य- फानन में विचरण करने से कहीं माधुर्य-मालती फी मोटी २ सुगन्ध से सने हुए प्रसाद- पयन फा हलका झोंका खाकर वित्त आप्यायित हो जाता है तो यहीं अन्त में पैराग्य की विरह-पिनादिनी घीणा फा विहाग सुन जड़ीभूत जीव जगजाल से छुटकारा पाफर मुक्ति-याटिफा फी विशुद्ध सरणी या मालम्बन करने के लिये माकुल हो उठना है। इस काव्य कुंज के सहृदय शैलानी को सदा गार हास्य, फरण तथा पैराग्य रस * नीति प्रीति पालक रघराज- [ ग] से ही सरायोर होना पडेगा। इसके अगर बगल में भयानम और बीभत्स की महर्फे भूल कर भी अनुभूत नहीं होती। श्रीमहदास जी गद्य पद्य दोनों के सिद्धहस्त लेखक है । 'पुदेवचम्पू की "दशकुमार चरित" तथा 'हर्षचरित के गधों से भी बाजी मारली है। जिन्हें गद्य पध फा गंगा यमुनी मेल देखना हो ये "पुरुदेवयम्पू" अवश्य देखें। आवश्यक्तानुसार रसा घतरण फरना तो आपके पायें दायें का खेल है। तीयङ्कर देव के "मुनिसुव्रत' नाम को साथकता निम्नलिखित श्लोक में घडी विशद रोति से दिखाई गई है। "करिष्यते मुनिमसिलव सुव्रत भविष्यति स्वयमपि सुब्रतो मुनि । विवचनादिति विभुरभ्यधाप्यसौ विडोजसा किन मुनिसुनताक्षर"। (६४ सर्ग ४३ श्लो) अय मैं सहृदय पाठकों को आपकी थलङ्कार प्रियता का परिचय निम्नलिखित तीन श्लोकों से फ्राता । "भट्टाकलङ्काद् गुणभद्रसूरे समन्तभद्रादपि पूयपादात । वचोऽकलक गुणभद्रमस्तु समन्तभद्र मम पूज्यपादम् ।" १ म० स०१६ श्लो० भुजगमेवागमवक्रमायो भुजगहारेऽप्यजिनानुराग । धव प्रदोपानुगमो रजन्या दिक्षयस्सोऽपि दिनाचमाने ॥१ म स०३६ श्लो० रतिक्रियाया विपरीतवृत्ती रतासाने क्लि पारवश्यम । बभूव मल्लेपु गदाभिघातो भयाकुलख रविच द्रयोश्च ।। ७ ग० स०३० श्लो०॥ उल्लिखित प्रथम श्लोक में यथासख्यालङ्कार" का ऐसा विशद उदाहरण है कि इसे देख कर एक साधारण सस्कृतज्ञ भी मुग्ध हो जायगा। उसके नीचे के द्वितीय और हनीय श्लोक यदि पक्षपात रहित आलङ्कारिक दृष्टि से देखे जाय तो यह अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि अहहास जीने इन दोनों श्लोकों में परिसख्यालङ्कार की निशुद्धना दिखा पर कविवर याण मट्ट की उन पक्तियों से टकर लिया है जिन्हें पढ़ घर फधिगण पडफ उठते है। यों तो भापगसमूचा 'मुनिसुनतशव्य" ही रन जडित अलङ्कारो से निजडित है किन्तु अपने काव्य में अपूर्वता लाने के लिये भापका प्रया प्रश् सनीय है। अब आपके एक हास्यरस्य का निन्तलिखित पद्य पाठकों के समक्ष उपस्थित परने का मैं लोभ सवरण नहीं कर सकता- [ घ ] मुग्धाप्सराः कापि चकार सानुकुल्लपक्रान्किल धूपचूर्णम् । स्थामवासिन्यरुणे क्षिपन्ति हसन्ति कागरचयस्य बुद्धया ।। ५मा स० ३१०। राजा महाराज आदि धन-सम्पन्न मनुष्यों की कविता द्वारा प्रशंसा करना आप श्री. जिनवाणी का अत्यधिक अपमान समझते थे। यह बात आपके अधोलिखित पद्य से प्रफटित होती है। "सरस्वती कल्पलता स को वा सम्वर्द्धयिष्यन् जिनपारिजातम् । विमुच्य काजीरतरूपमेषु व्यारोपयेत्प्राकृत-नायकपु" ॥१म स० १२ क्लो० ॥ इस श्लोक से आपकी निर्मीकता तथा देवगुरु शास्त्र-प्रियता प्रतिपद में प्रतीत होती है। आप अपनी कवित्वशक्ति का "दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा" जैसी स्वार्थ-सड्डुल रचना करने में दुरुपयोग नहीं करते थे एवं प्राकृत व्यक्ति की प्रशंसा करने वाले कवियों को आप बडी तुच्छ दृष्टि से देखते थे। अस्तु 'इस काव्यरत्न' की एक संस्कृत टीका भी है। टोका पडी ही सरल तथा कोश व्याकरण और अलङ्कारादिके दिग्दर्शन तथा प्रमाणों से सम्बलित है । हा जहा तहाँ अपेक्ष्य घातें रह गई हैं। दुप है कि पण्डित-चर्य टीकाकार ने अपना नाम तथा परिचय देने का फाष्ट नहीं उठाया। आजकल के जमाने में जब कि दूसरों की कृतियों को हड़पने या तथा इधर उधर कुछ उलट पुलट करके अपना नाम प्रख्यात करने वालों का याजार गर्म होने अथवा कविरतुहरति च्छायामर्थ कुफवि पदं चौर। अविश्लपरस्पहने साहसकर्ड नमः पित्रे" आदि प्राचीन दृष्टान्त की भरमार होने पर भी इस काव्यरत्न के टीफाफार फा अपना परिचय नहीं देना उनकी निस्सीम निस्वार्थता प्ररित करता है। आप केवल टीकाकार ही नहीं थे प्रत्युत एक सरस प्राञ्जल करि भी। क्योंकि टीका के प्रारम्भ में जो आपने निम्नलिखित मंगलाचरण-विधायफ दो श्लोक लिखे हैं ये पहेही सुन्दर है:- श्रीमदेवेन्द्रसन्दोहयहिणानन्ददायिनम् । सुव्रताम्बुभृतं नौमि दिव्यश्रव्यनिनादिनम् ।। तस्य गर्भावतारादिपञ्चकल्याणशसिनः। काव्यरत्नास्यकाव्यस्य पदये टीका स्वभक्तिः। उलिपित प्रथम श्लोक पर दृष्टि पडते ही मुझे "भारतेन्दु" हिन्दी प्राण घाबू हरिचन्द्र जी का निम्नलिखित दोहा पाद माता है:- . भरित नेह-नवनीर नित, परसत सुरस अयोर । जयति अप्रय घन कोड, लखि नाचत मन मोर ।। देखा पहले श्लोक तथा इस दोहे में फैसा पिम्ब-प्रतिविम्य भाव है? अस्तु जो कुछ हो टीकाकार थडे ही सरस विद्वान थे। कभी यह बात मेरे मन में आजाती है कि कहीं अर्थ के अनर्थ कर डालने के भय से अईदास जीने स्वयं 'काव्यरत्न" को टीका रच दी हो। यल्कि इसी लिये दूसरे पद्य में "स्यमक्ति" आपने लिखा है। तीर्थकर मुनिसुवत नाथ के चरितात्मक काव्य को साङ्गोपाग निर्विघ्न सम्पन्न कर देने से आपके मन में आत्म भक्ति उमड माना कोई अस्वाभाविक यात नहीं हैं। अथवा स्वर वित्त काव्य की भकि भी इस पद का अर्थ हो सकता है या स्चेप्ट देव मुनिसुव्रत नाथ की भी भकि सूचित होती है। दूसरी बात यह है कि आपने अपने काव्य-गुरु पण्डित माशा धरजी का अनुसरण किया हो। क्योंकि आशाधर सूरिने अपने सागरधर्मामृत" तथा "अन गारधर्मामृत' की टीका स्थय हो यनाई हैं। अत “यद्यदाचरति श्रेष्ठ" के अनुसार अईत्कवि ने भा अपने पाव्य की स्वय टीका पनाकर गुरु मार्गानुसरण का ज्वलन्त उदाहरण उपस्थित किया हो। आशा है कि सहृदय साहित्य रसिफ विक्षवृन्द टोकाकार के प्रहत परिवय पाने का प्रयास करेंगे। - विनीत- हरनाथ द्विवेदी (काव्य-पुराण तीर्थ) प्रकाशकीय वक्तव्य जय से श्री जैन सिद्धान्त भवन (The Central Jain oriental Irbiary) की सेवा में हाथ घटाने का शुभाघसर मुझे प्राप्त हुआ तभी से मेरी हार्दिक इच्छा थी कि इस संस्था से कोई ग्रन्थमाला निकाली जाय, जिस के द्वारा जैनावार्यों की धवल कीर्ति सम्पूर्ण भारतवर्ष ही में नहीं वरन् सुदूर प्रदेशों में भी प्रसारित और साथ ही साथ उसके रसास्वादन से भव्य जीवों का कल्याण हो। स्वर्गीय कुमार देवेन्द्र प्रसाद जी ने जो इस संसा के प्रधान सहायकों में थे इस ओर बहुत कुछ कार्य किया था और बहुत अंशों में यह उन्हीं को सेवाओं का फल है कि हमारे ग्रन्थों का प्रचार और प्रतिष्ठा याहर भी होने लगी है। एक समय यह था जय कि हमारे आचार्यो' की तूती बोलती थी, उन की प्रगाढ विद्वत्ता तथा पूर्ण पाण्डित्य के आगे सभी नत-मस्तक होते थे, वे ही आचार्यवर्य अपनी स्वाभाविक परोपकार घुद्धि से लोगों के हित के लिये तथा उन्हें सन्मार्ग पर लाने के लिये अपने उस अगाध ज्ञान भण्डार को अपनी मनामुग्धकारी सरस काव्य-कुशलता द्वारा ग्रन्थ- रूप में संकलित कर गये हैं। हमारे दुर्भाग्य से कुछ स्वार्थी जीवों ने सार्वजनिक परो. पकार की उस अमूल्य थाती के बहुत कुछ अंशों को अंधेरी कोठरी में सडार नष्ट भ्रए कर दिया है । फिर भी जो कुछ यचा खुचा है वह अपने प्राचीन गौरव को प्रकट करने के लिये पर्याप्त है। यद्यपि भय भी कुछ भाई छापे इत्यादि का विरोध कर इस अमूल्य औषधी से जनता मात्र को लाभ लेने देना नहीं चाहते तो भी अब वह समय गया। हर्ष का विषय है कि बहुतेरे जैन विद्वानों का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ है और हो रहा है। जिस के फल- स्वरूप दो-तीन सुरक्षित भवन तथा कई एक पुस्तक प्रकाशकीय संस्थाप' विगत वर्षों से श्रीजिनवाणी की रक्षा तथा प्रचार में फलवती हुई हैं। "पारा श्री जैन सिद्धान्त भवन” हमारे स्वगीय श्रीपूज्य पिता जी द्वारा विक १९०५ ई० में स्थापित हुआ था। और श्रीमान् पूज्य नेमी सागर जी वर्णी ( वर्तमान पद श्रीमदभिनव चारुकीर्त्ति पण्डिताचार्यचर्य स्वामी जी श्रवणेवेलगोल-पदाधीश ) तथा स्वगोंय याबू करोडी चन्द जी के उद्योग से बहुत कुछ उन्नति कर गया है। बल्कि उपर्युक्त पूज्य स्वामी जो की "भगन" पर अब भी सदा कृपा-दृष्टि बनी रहती है। वर्तमान में यह . नीति प्रीति पा- [ 1 ] अपने ही एक यहुन सुन्दर २५०००) रु. की लागत के भरन' में सुरक्षित है। इस समय इस म ३००० जैन एवं भजन अन्य ताट पाटिन तथा हस्त लिपित हैं। इन के अतिरिक छपे हुए जैन अजैन हिन्दी संस्थत पारनं यंगला, पनडी, गुजराती महाराष्ट्री तथा अंग्रेजी आदि भाषा के ग्रन्यों की संख्या ६००० के करीब है। "भवन" के उद्देश्यानुसार जैनप्रन्थों फी ही यहाँ अधिकता है। पिता जी अपनी अन्यान्य संस्थानों के साथ साथ इस के लिये भी १५००) २० सालाना आमदनी की ग्धायी जागीर देगये ह जिस से इसका साधारण व्यय होता रहता है और सदा होता रहेगा। कुछ दिन पहले में ने अपने पूर्व विचारानुसार एक ग्रन्थमाला निकालने का निधय किया तथा कार्यारंभ के लिये अपने पास से १९५०) २० भवन को दिये । मेरी हार्दिक इच्छा है और मैं चेष्टा करूंगा कि इस प्रत्य-माला-प्रकाशन का स्थायी प्रयन्थ सुदृढ़ हो जाय। कई विद्वानों की राय पहले " श्रीमुनिसुनत काव्य " के प्रकाशन की हुई। मेरा विवार था कि जो भी ग्रन्थ प्रकाशित हों चे हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद के साथ हो परन्तु अभी अंग्रेजी अनुवाद का साधन नहीं मिल सका। हिन्दी अनुवाद इस संस्था के प्राचीन फार्य कर्ता-"भास्कर" के सहायक सम्पादक फान्य-पुराणतीर्थ पण्डित हरनाथ द्विवेदीजी नथा पुस्तकालयाध्यक्ष पण्डित भुजवली शास्त्री जी एन. ए., एन. के. यी ने किया है। सम्पादन तथा संशोधन का कार्य भी दोनों महाशयों ने मिलकर ही किया है। प्रथम प्रयास के कारण प्रकाशन में बहुत कुछ भूलों का होना संभव है और खासकर मेरे जैसे व्यक्ति के द्वारा जो इस विषय में अनुभव-रहित तथा इस भाषा से भी एक प्रकार से अनभिज्ञ होई। संस्कृत टाइपों में संयुक्ताक्षर की पिरलता तथा पम्पोजिटरों की संस्कृतज्ञता के अत्य. न्ताभाव से भी अशुद्धियों की अधिकता संभव है। पर यह ज्यों त्यों प्रकाशित होकर विद्वानों की मेवा में पहुंच जाय, फिर उनके परामशांनुसार दूसरे संस्करण में सभी सापेक्ष्य थाते सम्पन्न कर दी जायेंगी यही मेरा सदा रक्ष्य रहा। टीका में जितने वोपों का नाम निर्देश किया गया है उन में से कई फोपों के अमुद्रित तथा अनुपलध होने के कारण जहां तहांसम्पादक द्वय से सन्देह-निरसन नहीं हो सका है। भवन की एक प्रति के अतिरिक्त मूडनिदी के भएडार से फेघल एक प्रति मिली थी जिसके लिये में भूडचिदी के महारफ श्रीपण्डिताचार्य चारुकीर्ति जी और पण्डित लोकनाथ शास्त्री जी का यडा ही मारी। इन्ही दो प्रतियों के आधार पर इसका सम्पादन किया गया है। अधिक प्रति मिलने से यत्किंचिन्मात्र जो दोष रह गया है वह दूर हो जाता।

मस्तु जो कुछ भी हो मेरा ध्येय यही है कि मैं अपने आवार्यों की किर्ति को अब भी
सब के ऊपर देखू। मुझे तो पूरी आशा है कि विद्वानों की इस ओर खास दृष्टि होने से
इस में सफलता अवश्य होगी।
अन्त में मैं विद्वान् पाठकों से अनुरोध करता हूं कि इस ग्रन्थमाला के प्रथम पुष्प को
अपनायेंगे और जो कुछ भी त्रुटियाँ हों उन्हें मुझ पर प्रकटित करने की कृपा करेंगे, जिससे
आगे के प्रकाशन में मुझे सहायता मिले।
इसके बाद मैं जैन-वैद्यक या जैन-ज्योतिष अन्य के प्रकाशन के लिये अत्यन्त
उत्सुक हूं और संभवतः ग्रन्थमाला की दूसरी माला येधक की रसमयी अथवा ज्योतिर्मयो
मौकिक मनिका की:पिरोयी हुई होगी।
श्रीजिनवाणीका
एक विनम्र सेवक
निर्मलकुमार जैन ।
मंत्री
श्रीजैन सिद्धान्त-भवन मारा।

ॐ मुनिसुव्रतकाव्यम् ॥ श्रोजिनाय नमः॥ श्रियं स वः श्रीवृपभो विशिप्यात् यस्यालिमालावृतवत्सभायाम् । बभौ नतेन्द्रोत्करमौलिनील--प्रभावलीलालितमजपीठम् ॥१॥ श्रीमद्देवेंद्रसंदोहयहिणानंददायिनं । सुव्रतांबुभृतं नौमि दिव्यश्रव्यनिनादिनम् ॥ तस्य गर्भावतारादिपंचकल्याणशंसिनः | काव्यरत्नाख्यकाव्यस्य यक्ष्ये टीको स्वभक्तितः ।। श्रियमित्यादि । यस्य आदिनाथस्य। सभायां समवशरणसदसि । नतेन्द्रोत्करमौलिनी. लप्रभावलीलालितं नर्मतिस्म नताः दन्ते परमैश्वर्यमनुभवंतीतीन्द्राः नताश्च इन्द्राय तथोक्काः तेषामुत्करः समूहः "पुञ्जराशी तूत्करः कूटमस्त्रियां" इत्यमरः तस्य मौलयः किरी. टानि “चूडा किरीट फेशाश्च संयता मौलयस्त्रयः" इत्यमरः तेषु किरीटेषु नीलानि इन्द्रनील रक्षानि तेषां प्रमाणां स्चीनां मावलिः श्रोणिस्तया लालितं सेवितम् । अब्जपीठं अब्जः कमल: उपलक्षितं पीठं तथोकम् । अलिमालावृतवत् अलोनां भ्रमराणां माला राजिः तया आवृत- मावेष्टितम् "मालमुन्नतभूर्मालापङ्क्तिपुष्पादिधामनि" इति भास्करः तद्वत् "सुप इवे" इति यत्प्रत्ययः । धभौ भातिस्म भा दोती लिट् । सः श्रीवृपमः वृषेण रतत्रयात्म. कधर्मेण मातीति वृषभः "सुकृते वृपमे वृपः" इत्यमरः श्रिया अंतरंगपहिरंगलक्ष्म्या उपलक्षितो वृपभस्तथोक्तः श्रीमान्पुरुपरमेश्वरः । यः युष्माकं * "पदाद्वाफ्यस्य" इत्यादिना युप्मदः षष्ठीबहुत्वे घसादेशः। श्रियं संपदम् पुण्ययतः पुरुपान् श्रयत्यानंयतीति श्रीस्ताम् । विशियात् विदध्यात्। शिप्लविशेषणे लिङ्। उपमालंकारः ॥१॥ भा ०अ०-जिनके समवशरण में ननीभूत इन्द्रों के मुकुट को नीलमणि से प्रदीत, अत एव भूमर-पक्कि से परिवेष्टितसा कमलपीठ शोभाशाली हुआ, ऐसे वे श्रीमआदिनाथ तीर्थकर इस "मुनिसुवत" फाष्य के माप पाठकों के ऐश्वर्य की वृद्धि करें ॥१॥ . • "रामे वा" इति कातन्सीयशास्तष मकारस्यानुस्वारो नै ल्यमवराज्य संातोऽत ।

* नीति प्रीति पालक रघरा- । २ मुनिसुमतकाव्यम् । चन्द्रप्रभ नौमि यदङ्ग कान्ति ज्योस्नेति मत्वा द्रवतीन्दुकान्तः । चकोग्यूथं पिबति स्फुटन्ति कृपणेऽपि पक्षे किल कैग्वाणि ॥२॥ चंद्रप्रभमित्यादि । यदंगकांति यस्य जिनेश्वरस्य संगस्य शरीरस्य कांति फिरणं "रंग गात्रांतियोपायपनीकेप्यप्रधानके" इति विश्ः। ज्योत्स्नेति चंदिकेति । मत्वा मननं पूर्व पश्चात्य चिदिति मत्वा वुद्ध वेत्यर्थः । इन्दुकानः चंद्रयांतः। कृष्ण पक्षेऽपि । यति यति दुस्सु गतो लाट। चोरइथं चयोराणां पक्षिविशेषाणां यूथं कुलं तथोक्तम् । पिपति पानं विदधाति पापाने लटि । देवाणि वुमुदानि “सिते फुमुदकरवे" इत्यमः। स्फुटति किल “घातांसंभाव्ययोः फिल"इत्यमर. क्लेित्यागमोक्को यथास्वमागमे श्रूयते इति यावत् स्फुट विकसने लटि । यदंगाति ज्योत्स्नति मत्वा कृष्ण पक्षेऽपि क्लेिति च प्रत्येकमभिसंघध्यते। तं चंद्रप्रभ चंद्रस्येव प्रभा कांतिर्यस्य सः तं अष्टमतीर्थशं। नौमि स्तौमि । गु स्तुतौ लडुत्तमपुरुषः। मातिमानलयारः।२। भा० १.--कृष्ण पक्ष में भी जिसे चाँदनी समझ फर चकोर पीते हैं, चन्द्रकान्त मणि द्रवीभूत होती है तथा कमल खिल उठते हैं ऐमे परमौदारिक दिव्य देहधु तिवाले उन आठ तीर्थडर श्रीचन्द्रप्रम स्वामी को नमस्कार करता हूं ॥२॥ तमांसि हत्वा जगतः पदर्थान् प्रकाशयन्तं यमिव प्रदीपम् । ननाश महादमिपत्य कामः पतङ्गवच्छान्तिजिनं भजे तम् ॥३॥ तमासीत्यादि । तमांसि तिमिराणि । हत्वा निवार्य । जगतः लोकस्य । पदार्थान् घटा- दिवस्तूनि । प्रकाशयंतं प्रकाशयतीति प्रकाशयंस्तं धोतयंतं । प्रदीपमिव प्रदीपयत् । तमोसि अज्ञानानि “शोकज्ञानध्यांतगुणस्वर्भानुदुरितेपु तमः” इति नानार्थकोगे। हत्या निहत्य । जगतः भुवनस्य । पदार्थान् । प्रकाशयंत ज्ञानेन प्रद्योतयंत । य जिनेशं । कामः मन्मथः। मोहात् अशानात "मोहमिच्छति मूच्छांयामविद्यायां च सूरयः" इति विश्वः । पतङ्गवत् पतंग र शलभवत् । अभिपत्य पनित्वा । ननाश अनश्यत् । नश अदर्शने लिटि । ते शांतिजिन। शमतात्पापानिल्याशास्यमानः शांतिः शांविश्वासो जिनध तथोकस्तं योडशतीर्घकर। भजे सेये। भज सेगयां लडात्मनेपदम् । श्लेषोपमालंकारः ॥ ३ ॥ मा० ०-संसार के अज्ञानान्धकार को हटा कर अनन्तानन्त पदाथों को प्रकाशित जिन पर अज्ञान से कामदेव स्वयं दीपया पर पतंग के ऐसा गिर कर भस्म हो गया, उन्ही सोलह तीर्थङ्कर श्रीशान्तिनाथ जी फी में माराधना करता है ॥ ३ ॥ .

२ -- जाति: गोत्रं यस्य तम् । गुणान्वितं गुणः फेवलज्ञानादिभिरचित उपेतस्तं। वृत्तात्मक प्रथमः सर्गः । श्रबोधकालोरगलीढमूढ-मबूबुधद् गारुडरत्नवद्यः । जगत्कृपाकोमलदृष्टिपातैः प्रभुः प्रसद्यान्मुनिसुव्रतो न: ॥४॥ अबोधेति । य: स्वामी! अबोधगलोरगलोढमूढं कालचासौ उरगश्च तथोक्तः अबोध एव अज्ञानमेव कालोग्गस्तथोक्तः रूपकालंकारः तेन लीढं दष्टं तेन मूढ मुग्ध यहिरात्मविस्थापन्नं मूर्छितं च अथवा अयोधकालोरगलीढं च तत् मूढं चेति कसः। जगत् लोकं । गारुडरतात् गरुडस्येदं गारुडं तच तद्न्नं च तद्वत् विपापहारमणिवत् । अवू. घुधत् अयोधयत् बुधि मनि ज्ञाने णिअन्ताल्लुङ् । प्रभुः सः स्वामी। मुनिसुव्रतः मन्यते केवलज्ञानेन लोकालोक्स्वरूपं युध्यत इति मुनि. शोभनं व्रतं यस्यासो सुव्रतः मुनिश्चासौ सुवतश्चेति कसः । कृपाकोमलदृष्ठिपातः। दृष्ट्याः पाता: व्यापारा: कृपया अनुकंपया कोमला: मृदुलास्ते च ते दृष्टिपाताश्च तैः “पातस्तु रक्षिते पतने" इत्यादि नानार्थरतमालायां। नः अस्माकं “पदाद्वाश्यस्य" इत्यादिना नसादेशः । प्रसद्यात् प्रसन्नो भूयातू पदुलरिशरणेत्यादौ लिङ्। उपमालंकारः॥४॥ भा० 70-जो अज्ञानरूपी काल सर्प से इंसे हुए इस मद संसार को विपापहारक गरुड़ मणि से चेतनावस्था में लाये, वे योसवे तथङ्कर श्रोमुनिसुनत प्रभु अपने सहज सौम्य दृष्टिपात द्वारा हम सयों पर प्रसन्न हो ॥४॥ त्रासादिदोपोज्झितमुद्घजातिम् गुणान्वितं मौलिमणिं यथैव । वृत्तात्मक भावलयाभिगमं कृतक्रियं मूनि दधामि वीरम् ॥५॥ प्रासादीत्यादि। प्रासादिदोषोज्झितं त्रासः रेपा आदियेषां ते त्रासादयः "नासो- भिमणिदोपयोः' इति भास्करः ते च ते दोपाश्च तैरजिझनोऽपगतस्तं । उप्रजाति उद्या प्रशस्ता जाति आकरजन्म यस्य तं "प्रमाडवाल नौ प्रशस्तवाचकान्यमूनि, जातिसा. मान्यजन्मनोः" इति चामरः । गुणान्वितं गुगः पिपापहारादिधमैरचितं युक्त "गुणस्त्वा. वृत्तिशब्दादिज्येन्द्रियामुख्यतन्तुपु” इति वैजयंतो। वृत्तात्मक वृत्तं वर्तुलं तदेव आत्मा स्वरूपं यस्य तं। "वृत्तं,पये चरिने विपतोते दृढनिस्तरे" इत्यमरः । भावलयामिराम भायाः कांते: “स्युः प्रभारुघुचितस्विड्भा" इत्यमरः वलयः संहतिस्तेन अमिरामो मास. मानस्त वलयः कंठरोगे स्यावलयं फंकणेपि च" इति विश्व, । कतक्रिय रता विहिता क्रिया शाणोल्लेखनादिविधिर्यस्य तं। मौलिमणिं चूडाग्लं। यथैव यद्वत्। प्रासादि- दापोज्झितं त्रासो भयमादिर्यपां ते तथोक्ता. तैझिन उत्सृष्टस्त। उग्रजाति उद्धा १ मुनिसुव्रतकाव्यम्। वृत्तं चारित्रं तदेव आत्मा स्यरूपं यस्य त। मावलयाभिरामं मायलयेन भामंडलेन ममिरामो विराजमानस्तं। कृतक्रियं कृतरत्य। घोर विशिष्टां लक्ष्मी राति धातीति घोरस्तं । "इकार उच्यते कामो लक्ष्मोरीकार उच्यते" इत्येकाक्षरनिघंटौ। तिमतीर्थेश्वरं । मूर्ध्नि मस्तके । दधामि दधे। धा धारणे च लटि । मस्तकेन नमस्यामीत्यर्थः। श्लेषोप. मालंका॥५॥ भा० अ०-प्रासादि दोपों से रहित, भामण्डल से शोभित केवल-शान-गुणयुक, उच्चयंशज तथा उत्तम चरित्रघाले तरुत्य श्रीमहावीर स्वामी को रेखादि दोप-रहित उपर्युक विशेषण-विशिष्ट शिरोभूषण के समान में मस्तक पर धारणा करता हूं ॥५॥ स्वार्थप्रकाशिद्युतयोऽशरीराः रत्नप्रदीपा इव मे वसन्तु । तमम्प्रहाण्यै हृदि दीप्यमानाः कृातधिवासा: पबनान्तरेऽपि ॥६॥ स्वार्थत्यादि । स्वार्थप्रकाशिद्युतयः स्वानि च अर्थाश्च तथोका: "स्यो शातावात्मनि स्वं निप्यात्मीये स्वः स्त्रियां धने । अर्थोभिधेयरेवस्तु प्रयोजननिवृत्तिषु" इत्युभयत्राप्यमरः सान्'प्रकाशत इत्येवं शोला स्वार्थप्रकाशिनी घुतिः झानप्रकाशो येषां ते तथोक्ताः । पवनांतरे पवनस्य तनुवानस्य तरे मध्ये। कृताधिवासा अपि कृतो विहितोऽधिवासो निलयो येषां ते तथोकाः शताधिष्ठाना अपि । दीप्यमानाः प्रकाशमानाः। अशरीराःन विद्यते शरीरं येषां ते तथोक्ताः सिद्धपरमेष्ठिनः । स्वार्थप्रकाशिधु तयः स्थपरप्रकाशकांतयः। पयनांतरे वायुमध्ये। कृनाधिवासा अपि विहिनाश्रया अपि। दीप्यमानाः रत्नप्रदीपाणां पायुमध्ये विद्यमानत्वेपि बाधकाभावात् दीप्यमानत्वमित्यर्थः रत्नप्रदीपा इच । मे मम । तिमयायेकत्वे" इत्यस्मच्छब्दस्य मे इत्यादेशः। हदि हृदये । तमःप्रहाण्ये तमसोऽज्ञानस्य प्रकृपदानिस्तमःप्रहाणिस्तस्यै "नः' इति नस्य ण: तमसो निरवशेषविध्यसाय । "शोका- शानध्यांतगुणस्वर्भानुदुरितेपु समः" इति नानार्थकोशे। वसंतु तिष्ठतु। घस निवासे लोटि। श्लेषोपमालंकारः ॥६॥ भा० ०-घायुमध्यवर्ती रतप्रदीप के समान प्रकाशनशोल तथा स्वपर-तत्त्य के द्योतक, शरीर-रहित सिद्ध परमेष्टोगण अज्ञान-विनाश के लिये मेरे हृदय में विराजमान हो॥६॥ निराकृतान्तरतमसो निषेव्या दिगम्बरैस्सन्ततवृत्तदेहाः। सुनिर्मला: साधुसुधांशवो मे हरन्तु सन्तापमदृष्टपूर्वाः ॥७॥ . ar प्रमः सर्गः। ५. निरायतेति । निराकृतांतस्तमसः तिराहतं तिरस्कृतमतस्तमोऽज्ञानं गुहाघभ्यंतरतिमिर पा यस्ते तथोकाः। दिगम्बर: अंघरं योनि वाससि" इत्यमरः। तैः। निन्याः नितरां सेवितु योग्या। संततवृत्तदेहाः संततमनधरतं वृत्तं चारित्र पक्षे चतुलं तदेव देहः स्वरूप- मवयवो या येषां ते तथोकाः । सुनिर्मला: मलान्निर्गताः निर्मला: सुष्ठु निमला: सुनिर्मला: "मलं पुरी फिच पापे व कपणे मलः" इति विश्वः । अद्दष्टपूर्वाः पूर्वमदृष्टा अष्टपूर्वाः परिदृष्टसुधांशाददष्टार्थद्योतनाददृष्टपूर्वत्यं । साधुसुधांशवः साधवोऽत्रसूर्युपाध्यायमुनय- यस्त एच सुधांशवश्चंद्राः। रूपकालंकारः। मे मम । संतापं संसारतापं तपनतापञ्च । हरतु अपहरतु हर हरणे लोटि। संकरालंकारः॥७॥ मा० अ०-भीतरी अज्ञान को हटानेवाले, मुनियों से सेव्य, सम्यकचारित्रयुक्त देहवाले अत्यन्त निर्मल तथा अलौफिक जो सूरि,उपाध्याय और साधु रूप चन्द्रमा है वे मेरे सन्ताप को दूर करें ॥७॥ रत्नत्रयात्मा सुचिराय धर्मः सार्थेन नाम्ना महितः स जीयात् । यो धारयत्यच्युतधाम्नि मग्नानुद्धृत्य सत्वान् भवबारिराशेः ॥८॥ रक्षश्येति। यः धर्मः । मग्नान् मज्जतिस्म मग्नास्तान । सत्वान् जीवान् । भवपारि- राशेः धारीणां राशिः वारिराशिः भवस्संसास स एव पारिराशिस्तथोक्तस्तस्मात रूपका- लंकारः। उद्ध,त्य अपनीय। अच्युतधानि न घ्युवत इत्यच्युतं नित्यं तब्ध तत् धाम स्थान न तस्मिन् मोक्षपद इत्यर्थः "गृहदेहत्विट्प्रभावा धामानि" इत्यमरः । धारयति स्थापयति धृ धारणे णि ताल । सः रत्नत्रयात्मा रतानीव समीहितफलत्वात् रत्नानां प्रय तथोक्त तदेव आत्मा स्यरूपं यस्य स तथोक्तः। अयमपि रूपकः। सार्थेन अर्थन सह वर्तत इति सार्थः तेन। नाम्ना अभिधानेन । महितः दीर्घकालं मातेस्म महितः । धर्मः। सुचिराय "चिराय धिररात्राय चिरस्याद्यश्चिरार्थकाः" इत्यभिधानाव्ययं । जीयात् सर्वो- त्कर्षेण वर्तताम् "सर्वोत्कर्षे त्वकर्मा स्याद्विजये तु सकर्मकः" इति वचनात् । जि अभिभवे लिङ् ॥८॥ o-गिरे हुये जीवों का संसार समुद्र से उद्धार कर मोक्ष में प्रवृत्त करानेवाले रतत्रयात्मक धर्म अपने सार्थक नाम से पूजित होता हुमा चिरकाल तक जयशील होये ॥८॥ वीरादिव क्षीरनिधेः प्रवृत्ता सुधेव वाणी सुधिया कलश्या । विधृत्य नीता विबुधाधिपैमें निषेविता नित्यसुखाय भूयात् ॥९॥ - भा०अ०- । मुनिसुनतकाव्यम् । पोरादिवेत्यादि। क्षीरनिधेरिव क्षीराणि निधीयतेऽस्मिन्निति क्षीराणां निधिरिति या क्षीरनिधिस्तस्मादिव। घोरात् घर्धमानस्वामिनः सकाशात् । प्रवृत्ता अवतीर्णा । विषु. धाधिपः विबुधानामधिपास्तैः सुरेंद्र गणेन्द्र श्च "चिबुधः पंडिते देवे' नि विश्वः । सुधिया शोभना धीस्सुधोस्तया सम्यग्ज्ञानेन। कलश्या अल्पः फलशः फलशी तया । विधुत्य विधरणं पूर्व पश्चात्किंचिदिति विधृत्य उंभित्या । नीता नीयतेस्म नीता प्रापिता सती। निपेविता नितरां संचिता आगधिता च । सुधेव अमृनमिव "सुधामृतेस्तु- हीमूलेपगाङ्गोष्टिकासु च" इनि विश्वः । पाणी सरस्वती। मे मम । नित्यसुखाय अनन्तसौख्याय। भूयात् भवतु। भू सत्तायां लिट् । दुग्धाब्धी सुधासंभय इति लौकिकी रूदिः। उपमालंकार: ॥६॥ भा० अ०-क्षीरसमुद्ररूपी श्रीमहावीर तीर्थङ्कर से निकली हुई तथा सुबुद्धिरूप कलश से देवेन्द्रों के से गणधरों के द्वारा लाकर सेवित हुई सुधारूपिणी सरस्वती मेरे अनन्त सुख की सम्पादिका होवे ] MEn भट्टाकलकाद् गुणभद्रसूरेः समन्तभद्रादपि पूज्यपादात् । बचोऽकलंकं गुणभद्रमस्तु समन्तभद्रं मम पूज्यपादम्॥१०॥ भट्टाकलंकेति। मम अर्हद्दासनाम्नः कवेः। घचः वचनं पतत्काध्यमित्याशयः । भट्टाफलंकात् भश्वासावकलंकश्च भट्टाकलंकस्तस्मात् भट्टाकलंकस्वामिनः प्रसादात् । अफलंक न विद्यते कलंकं श्रुतिकट्वादिरूपं कल्मपं यस्य तत् । अस्तु भवतु भुवि लोट् । गुणभद्रसूरः गुणभद्रश्यासो सूरिश्च तस्मात् गुणभद्रस्वामिनोऽपि । गुणमद्र गुण: सौकुमार्यादिभिर्भद्र मंगलं दृढं वा। अस्तु भवतु । समंतभद्रात् समंतभद्रस्खा मिनः। समतभद्र समंतात्सर्वतः भद्र मंगलं यस्य तत् “भद्र स्यान्मंगले हेम्नि पुस्तके करणांतरे। भन्दो रुद्र पे गमचन्द्र मेहकदंषयोः। इस्तिजात्यन्तरे भद्रों घाच्यवन्द्र प्ठसाधुनोः" इति विश्वः समंतशब्दोऽत्रानभिहितसाकल्यमातनोति। तस्मालक्षणरीति- रसालंकारादिसुन्दरमिति भाषः । तथा चोक्तं चन्द्रालोके-"निर्दोषा लक्षणवती सरोतिर्मु- णभूषिता । सालंकाररसानेकवृत्ति काव्यनामभाक्”। पूज्यपादात् पूज्यो पादौ चरणो यस्य स तस्मात । पूज्यपादं पूज्यः सत्पुरुषः पद्यते प्रतिपद्यत इति पादमुपादेयं । अस्तु भवतु। यथासंख्यालंकारः ॥१०॥ मा० म०--मेरा यह "श्रीमुनिसुव्रत फाव्य" भट्टाकलङ्क स्यामी की कृपा से निष्कलंक, गुणभद्र सूरि की कृपा से सौकुमार्यगुणयुक्त, श्रीसमन्तभद्र के प्रसाद से सर्वत्र मंगलमय तथा पूज्यपाद स्वामी की कृपा से सजनों से माननीय होवे ॥१०॥ . अस MPM प्रथमः सर्गः। वीराकरोत्थं मुनिसार्थनीतं कथामणि श्रीमुनिसुव्रतस्य । सुवर्णदीपं नवयुक्तिरम्यं विदग्धकर्णाभरणां विधास्ये ॥११॥ वीराकरोत्थमिति । योराकरोत्यं धीरः सन्मतिस्थामी स एवाफरः खनिस्तस्मात् "खनिः स्त्रियामाकरःस्यात्" इत्यमरः उत्तिष्ठतिस्म उत्य उत्पन्नस्तं रूपकालंकारः। मुनिसार्थनीतं मुनयो गणधरादयस्त एव सार्थो घणिग्निवहस्तेन नीत आनीतस्तं "सार्थो वणिक्समूहे स्यादपि संघातमात्रके" इति विश्वः । सुवर्णदीशोभनानि वर्णानि तैरक्षरः "वर्णो द्विजाः दौ शुक्लादो स्तुनो घणं तु वाक्षरे" इत्यमरः पक्षे सुवर्णेन हिरण्येन दीप्रदीपत इत्येवं शोलो दीपः प्रकाशनशीलस्त नमपन्यासित्यादिना शीलार्थ २: । नवयुक्तिरम्यं नवा नूतना युक्तिः सुप्निड्डतादिसंदर्भस्तया रम्यः ध्रुतिसुभगस्तं नवीनोपायबंधुरं च । श्रीमुनिसुव्र- तस्य श्रिया उपलक्षितो मुनिसुव्रतस्तस्य-तीर्थंकरस्य । कथामणि कथैव मणिस्तं गर्भावता. रादिकथारत रत्नं मणियोरश्मजातौ मुक्तादिकेऽपि च" इत्यमरः । विदग्धकर्णाभरणं विदग्धानां विदुषां चतुराणां च कर्णयोः श्रोत्रयोराभरणमलंकारं। विधास्ये फरिष्ये। डधाञ्धारणे च। लड्डुत्तमपुरुषः ॥११॥ मा० अ०-महावीरस्वामिरूप आकर से उत्पन्न हुई, गणधररूपी व्यापारियों से लायी दुई, नई युक्तियों के कारण रमणीय, वर्णसौष्ठवसम्पन्न तथा विशों के श्रवणभूपण-तुल्य श्रीमुनिसुव्रत स्वामी की रनकोसी कथा मैं करूंगा ॥ ११ ॥ सरस्वतीकल्पलतां स का वा संवर्धयिष्यन् जिनपारिजातम् । विमुच्य काजीरतरूपमेषु व्यारोपयेत्प्राकृतनायकेषु ॥ १२ ॥ सरस्वतीत्यादि । सरखतीकल्पलतां कल्पयति विदधाति वांछितमिति कल्पा सा चासो लता च कल्पलता कल्पस्य लतेति या तथोक्ता सर: प्रसरणमस्या अस्तीति सरस्वती संव कल्पलता तां । संवयिष्यन् वृद्धि निवेशयन् । जिनपारिजातम् जिन एव पारिजातः फल्प- घृक्षस्तं "मंदारः पारिजातकः" इत्यमरः । विमुच्य परित्यज्य । कांजीरतरूपमेषु कांजीर- श्वासौ तरुश्च तस्योपमास्समानास्तेषु विषवृक्षसमानेषु । प्राकृतनायकेषु प्रारुताश्च ते नाय- काश्च तेषु "प्राकृतश्च पृथग्जनः" इत्यमरः "नायको नेतरि श्रेष्ठे हारमध्यमणायपि” इति विश्वः अधमजनेप्नित्यर्थः । स को या को या पुरुष । व्यारोपयेत् अवलंबयेत् रुह पोजजन्मनि लिड्। न कोपि सुधीरित्यर्थः । किन्तु सरस्वतीकल्पलतां संवर्धयिष्यन् जिनपारिजातमेव व्यारोपयेदिति भावः ॥ १२॥ ।

मनिमुमतकालम् । भा० ०-सरस्वतीरूपिणी फल्पलता के आधारभूत जिन-कल्पवृक्ष को छोडकर फोन से विद्वान उन्हें विष वृक्ष के समान मघम नायफ का अवलम्बन फरायेंगे। अर्थात् कल्प- लतिका विष वृक्ष का तिरस्कार कर जिस प्रकार कल्पवृक्ष का आश्रय लेती है वैसे ही श्रीजिनवाणी अधम नायक की उपेक्षा कर श्रीजिनेन्द्र भगवान् का ही पाश्रय लेती है या गणाधिपस्यैव गणेयमेतत् भवामि चोद्यन्भगवच्चरित्रे । भक्तीरितो नन्वगचालनेऽपि शक्तोन लोके ग्रहिलो नलोकः॥१३॥ गणाधिपस्येत्यादि । एतत् चरित्रं। गणाधिपस्यैव गणानां द्वादशगणानामधिपः प्रभुः गणधरस्तस्येव । गणेयं गणितुं योग्यं तथोकप्रमितुं योग्यं । भक्तीरितः भक्त्या गुणानुरागेण ईरितः प्रेरितस्सन् । भगवच्चरित्रे भगवतो मुनिसुव्रतस्वामिनः चरित्र कथायां । उद्यन उद्यतश्च । भवामि अस्मि भू सत्तायां लट् । तथा हि-लोके भुवने। प्रहिल: पिशचपीडितः। लोकः जनः। अगवालने पर्वतकंपने। उद्यन उद्यतः सन् । न शक्तोपि न समर्थश्चेदपि । अगचालने न गच्छतोत्यगः वृक्षस्तस्य चालने कंपने । "शैलवृक्षो नगारगो" इत्यमरः । न शको ननु न .समर्थो न भवति मनु अपितु समर्थ एव । "दो ननो प्रकृतमर्थ गमयते".इति यवनात् । "प्रश्नाऽवधारणानुशानुनयामंत्रणे ननु" इत्यमरः। पतंच्चरित्रमाहात्म्यसर्वस्वं वर्णयितुं भकीरितस्सन् उद्यन्नपि यथाशकि वर्णयि- प्यामीति भावः। अर्थातरन्यासः ॥ १३॥ -गणधरों से वर्णनीय इस भगवच्चरित्रमय काव्य की रचना परने के लिये मैं भगवरक्ति से.प्रेरित होकर प्रयास करता हूं। क्योंकि, पिशावग्रस्त प्राणो यड़े २ पर्वतों फो भी फम्पित करने में समर्थ हो जाता है। उसी प्रकार पहुशान-साध्य भी यह कार्य अल्पर होता हुमा भो में भगवद्भक्ति पल से ही सम्पन्न करने में समर्थ हगा। ॥ १३ ॥ मनः परं क्रीडयितुं ममैतत्काव्यं करिष्ये खलु बाल एपः । न लाभपूजादिरतः परेषां न लालनेच्छाः कलभा रमन्ते ॥१४॥ 'मन इत्यादि। पालः पाल्फ । “घालः पचे शिशौ मू हीवर श्वेभपुच्छयोः" इति विश्व महाबुद्धिरित्यर्थः । एषः प्रत्यक्षभूतोऽहमईदासः । "स्वस्मात्परोक्षनिर्देशागमको मददैन्ययो."इनि पवनात् स्वस्यानोमुत्य सूच्यते । मम मे। मन. चित्तं। पर मधिकं । कोडयितुं संतोपयितुं । पतन दं। काध्यं क्येर्भावः सत्यं या काय मुनिसुपतस्वामि- परित्रासल स्फुटं। फरिष्ये विधास्ये। डुछत फरणे सुदुचमपुरुषः। परेषां लोक. भा०- सर्गः । भा० अ०- मनानां । लाभपूजादिरतः लाभश्च पूजा व लाभपूजे ते आदियेषां तेषु रतः प्रीतस्तथोकः सन्) न करिष्ये न विधास्ये। तथा हि कलमा करिपोता: "कलमः फरिशावकः" इत्यमः। परेषां मन्येषां । लालनेच्छाः लालने संतोपकरणे इच्छा अमिलापो येषां ते तथोकास्संतः । न रमते न कोडंति । रमु फोडायां लट् । किंतु स्वेच्छयैव रमन्त इत्यर्थः अनेन फपिनाह. दंद्रेतिप्रकर्पस्सूच्यते। अर्थान्तरन्यासः ॥१४॥ -मैं अहंदास अपना मनोरन्जन करने के लिये ही इस फाव्य फा प्रणयन फगा, नकि दूसरों से सम्मान पाने की परछा से। क्योंकि हाथी के बच्चे अपने मनफी उमंग से ही फलोल करते है नकि दूसरों को प्रसन्न करने की अभिलापा से ॥१४॥ श्रव्यं करोत्येप किल प्रबन्धं पौरस्त्यवन्नेति हसन्तु सन्तः । किं शुक्तयोऽद्यापि महापराय॑ मुक्ताफलं नो सुवते विमुग्धाः ॥१५॥ श्रव्यमित्यादि । एपः अयमहदासः । श्रव्यं श्रोतुं योग्यं श्रव्यं विद्वदिराफर्णनीयं । प्रय, फाय्यं । फरोति फिल विदधाति किल "चातांसंभाध्ययोःफिल" इत्यमरः। पौरस्त्यवत् पुरोभवाः पौरस्त्यास्त इव पौरस्त्यवत् पूर्यकयय इच। नेति न फरिप्यतीति अथवा पुरोभर्व पौरस्त्यं तदिव तथोक्त पूर्वकाल्यमिव "दक्षिणपश्चात्पुरस्त्यफ् "तस्याहं फत्ये यत्" इति पत् । नेति नभविष्यतीति । संतः सत्पुरुषाः । हसन्तु हास्यं कुर्वन्तु इस इसने लोट् । तेषामहं न प्रनिभट इत्यर्थः । विमुग्धाः भो विमूढा "मुग्धो मूढो जडो मेडो को मूर्पश्च पदः" इति धनंजयः यूयं हसनेत्यध्याट्रियते। शुक्तयः मुक्तस्फोटा: "मुक्तास्फोटः स्त्रियां शुक्तिः" स्यमरः महापराध्य महय तत् पराध्यंच तथोक्त "परार्ष्याप्रणामहरप्राग्रयानयाग्रोयम- प्रियम्" इत्यमरः अनयमित्यर्थः । मुक्ताफल मुक्तायाः फलं तथोक्त। अद्यापि अस्मिन्का. लेऽपि । नो सुवते कि नोत्पादयन्ति कि पूड प्राणिगर्भविमोचने लट् । अपितु जनयंत्येय अर्थान्तरन्यासः ॥१५० मा० अ० में अईहास इसे श्रव्य फाल्य यनाता । पूर्व फयियों फासा यह प्रपन्ध नहीं होता है, इसके लिये सजनगण मुझे भले ही हंसे, पर यह निधिन पात है कि, जाद तथा तुन्छ सोप आज भो अमूल्य मोती फो पैदा करते हैं। अर्थात् में अल्प तो भी सहदय विश मेरे इस तुन्छ फाष्य से तात्यिक यातें निकाल सयने है ॥१५॥ प्रबन्धमाकर्य महाकवीनां प्रमोदमायाति महानिर्दकः । विधूदयं वीक्ष्य नदीन एव विवृद्धिमायाति जडागया न ॥१६॥ प्रबंधमित्यादि। इस भस्मिनिद ममप्मिन मुग्ने । एकः । मदान् कोपि महापुरतः । महाफपोनी मदांत ते मयपध तयोकास्तरां । प्रबंध फायं । भारुप त्याप्रमाई - १० मुनिसुमतकाव्यम् । संतोष । मायाति प्राप्नोनि या प्रापणे लट् । तथाहि न दीन एच नदोन. अलुक्समासः । सत्पुरप एव इनि ध्वनिः पक्षे नदीनामिनः प्रभुः समुद्रः "इनः सूर्य प्रमों" इत्यमरः स एव । विधूदयं विधोश्चद्रस्योदयमुत्पत्ति । वीक्ष्य मालोक्य । विवृद्धिसमृद्धि। मायाति आग. छति। जडाशयाः जड आशयोऽभिप्रायो येषां ते तथोक्ता मदवुद्धय इति ध्वनिः "आशयः स्यादभिप्राये मानसाधारयोरपि" इति विश्वः पश्ये जलान्याशेरते एप्यिति जलाशयाः "जलाशयो जलाधाराः" इत्यमरः । न यांति विवृद्धिंन गच्छन्ति। “यमकश्लेपचित्रे घवयोर्डलयोर भेदः" इति यचनात् जडाशया जलाशया इत्युभयत्रापि श्लेषरूपेणान्चयः अर्या तरण्यासः ॥१६॥ भाषा टो०--चन्द्रोदय होने पर समुद्र ही उन्दोलित होता है, नकि छोटे २ जलाशय । उसी प्रकार महाकवियों का प्रयन्ध देखकर विज्ञ हो सन्तुष्ट होते हैं कि जड़ाशय ॥१६॥ उपेक्षितारोऽपि फलन्त्यनिष्टाभीष्टानि यद् दुर्जनसज्जनास्तत् । वृथा कृता विश्वसृजा श्रमाय विषद्रुकल्पद्रुमयोहि सृष्टिः ॥१७॥ उपेक्षितार इत्यादि । दुर्जनसजनाः दुष्टाः जना दुर्जनाः संतो जनास्सजनाः दुर्जनाश्च सजानाश्च तथोक्ताः । यत् यस्मात्कारणात् । "यत्तद्यतस्ततो हेतो" इत्ममरः। उपेक्षितारोऽपि उदासीनं कुर्वन्तोऽपि किंपुनस्तनिष्पादनामिमुपा इत्यपि शब्दार्थः । अनिष्टाभोष्टानि न पटान्यनिष्टानि तानि च तान्यभोटानि च नयोकानि अहितहितानि । फलंति निषादयंति फल निप्पत्तौ लट् । तन् नस्मात कारणात् । विपद्रुकल्पदुमयोः विपरूपो वृक्षानथोक्तः "पलाशिदुद्रुमाः" इत्यमरः कल्पश्चासौ द्रुमश्च पल्पस्य द्रुम इति वा तथोकस्तयोः विषवृक्ष. पल्पवृक्षयोः। सृष्टिः निर्माणं । विश्वसृजा ब्रह्मणा "विधाता विश्वसृइ विधिः" इत्यमरः । पृथा व्यर्थ । "वृथानिरर्थकाविध्योः" इत्यमरः । श्रमाय आयासाय । कृता चिहिना! घिपवृक्षवल्पवृक्षयो मृत्यं दुर्जनसजना एवं कुपंतीति भायः। अत्र ब्राह्मणः सृष्टिः कविता- समयेन फथ्यते ॥१७॥ मा० -सजन, दुर्जन तथा उदसीन प्राणी भी जय किसी के कार्य में हिताहित कर ही बैठते हैं, तय मैं समझता है कि ब्रह्मा ने पिवृक्ष तथा फल्पवृक्ष की व्यर्थ ही सृष्टि की। अर्थात् सज्जन और दुर्जन ये दो महाशय ही इन वृक्षों का फार्म-सम्पादन कर देते है ॥१७॥ सन्तः स्वभावाद् गुणरत्नमन्ये गृह्णन्ति दोपोपलमात्मीयम् । यथा पयोऽसं शिशवो जलौका: जनो वृथा रज्यति कुप्यतीह ।।१८|| संत इत्यादि । यथा । शिशः पालकाः । जलौकाः रकपाः "रचपास्तु जलौकायाम्" स्यमरः। पयः क्षीर। "पयःक्षीरं पयोऽम्" इत्यमरः । अस्र रक्त। रुधिरऽसग्लोहिताक्षर.

" प्रथमः सर्गः। कक्षतजशोणितम्" इत्यमरः। गृहन्ति स्वीकुर्वन्ति ग्रह उपादाने लटि । तथा सन्तः ये सत्पुरुषाः । स्वाभावात् निसर्गात् । आत्मकोयं आत्मन इदमात्मकीयं स्वकीयं । गुणरत्न गुण एव रत्न गृहन्ति । अन्ये दुर्जनाः । आत्मकीयं स्वकीयं । दोषोपलं दोष एवोपल: पायाणस्तं "पाषाणप्रस्तरमायोपलाश्मानः" इत्यमरः। गृह्णन्ति माददते। इह लोके । जनः लोकः । वृथा व्यथं । रज्यति तुष्यति । कुप्यति रुष्यति रजि रागे कुप कोधे लटि । सदसतोस्तत्स्वभावत्वात्तयोस्तोपरोपाविशेष न साधयत इति भावः ॥१८॥ मा० म०-जिस प्रकार स्तन में लगे हुए लड़के दूध तथा जोंक खून पीते हैं उसी प्रकार सजन स्वभाव से ही गुणग्राही तथा दुर्जन दोपग्राही होते हैं। इस विषय में लोगों का प्रसन्न अथवा अप्रसन्न होना व्यर्थ ला ज्ञात होता है ॥१८॥ तिक्तोऽस्ति निम्बो मधुरोऽस्ति चेक्षुः स्वं निन्दतोऽपि स्तुवतोऽपि तहत् । दुष्टोऽप्यदुष्टोऽपि ततोऽनयोर्मे निन्दास्तवाभ्यामधिकं न साध्यम् ॥१६॥ तिकोऽस्तीत्यादि । निम्बः निम्यवृक्षः। “पिचुमन्दस्तु निम्बः” इत्यमरः । स्वं आत्मानं । निन्दतोऽपि निन्दतीति निन्दन तस्यापि तिकः । स्तुक्तोपिस्तौतीति स्तुवन् तस्यापि स्तुति कुर्वतोऽपि तिक्तः तिक्तरसोपेतः अस्ति वर्तते । शुश्च रसालोऽपि । स्वं निन्दतोऽपि स्तुव- तोऽपि । मधुरः मधुररसयुक्तः । अस्ति भवति । दुष्टोऽपि दुर्जनोऽपि । अदुष्टोऽपि सजनोऽपि तद्वत् साविव निम्बेक्षुवृक्षौ इव। स्वं निन्दतोऽपिस्तुबतोऽपि अनिष्टेएफलं प्रकाशेत इत्यर्थः । ततः तस्माद्ध तोः। अनयोः सज़नदुर्जनयोः । निन्दास्तवाभ्यां निन्दनस्तवनाम्यां । मे मम अधिकं बहुलं । साध्यं फलं न नास्ति ॥ १६ ॥ भापा टी-जिस प्रकार अपनी प्रशंसा तथा निन्दा करनेवालों के लिये भी नीम तींती तथा ईख मीठी यनो रहती है, उसी प्रकार सजन और दुर्जन है। इनकी स्तुति अथवा निन्दा से मेरा कुछ साध्य सा नहीं दीख पड़ता ॥ १६ ॥ यद्वगर्यते जैनचरित्रमत्रमत्र चिन्तामणिभव्यजनस्य यच्च । हृद्यार्थरलैकनिधिः स्वयं मे तत्काव्यरत्नाभिधमेतदस्तु ॥२०॥ यदित्यादि । यत जैनवरित्रं जिनस्येदन तय तत् चरित्रं च तथोक । अत्र अस्मिन् काव्ये । पर्यते स्तूयते वर्ण वर्णनियादो कर्मणि लटि । यय चरित्र । मव्यजनस्य रसग्या- विर्मधनयोग्यो भन्यः स चासो जनश्च तस्य विनयजनस्य। चिन्तामणिः चिन्तितार्थप्रधानो मणिस्तथोक्ता नियतलिंगत्यात्पुंलिङ्गः। स्वयं खरूपेण। हृद्यार्यरत फनिधिः हदयस्य प्रियः दृधः "हृदयस्य हयाण्लासे" इति हृदयशदस्य यणि प्रत्यये हुदादेशः । हयधासापर्थोऽमि. - भस् भुषि मुनिसुव्रतकाव्यम् । प्रायस्स च तथोक्तः हृधार्थ एव रखानि तेषामेको मुख्यः स चासो निधिश्च तथोकः "एके मुख्यान्यकेवलाः" इत्यमरः । मे मम । तदेतत् काव्यं । काव्यरत्नाभि, फाल्यानां रखमिव काव्यरतमित्यमिधा अभिधानं यस्य तत् काव्यरक्षाभिध। अस्तु भवतु लोट् ॥ २०॥ मा० म०-इस काव्य में में जिस जिन-चरित्र का वर्णन करता हूं, वह मविकों के लिये चिन्तामणि और सुन्दर अभिप्राय रूपी रन की एकमान निधि है, अतः यह मेरा प्रपन्य काव्यरन नाम से प्रख्यात हो॥२०॥ यस्थापन्नं नाम भुवञ्च कालं द्रव्यञ्च भावं प्रति घटप्रकाराः । स्तुतिर्जिनस्य क्रियतेऽत्र तरमात् काव्यं ममैतत्स्तुतिरेव भूयात् ॥२१॥ यदित्यादि । यत यस्मात्कारणात् । मन्त्र काव्ये । स्थापनों स्थाप्यते स एष देव इदं प्रति- चियमिति स्थापनां वर्णप्रमाणसंसापनादिभिः प्रतिमा तदालयादि प्रशंसनं नाम जिनतज्जन- नीजनकाद्यभिधानं तग्नामनिवर्चनं च । भुवज जिनजन्मादिक्षेत्रं । चशब्दः समुच्चयार्थः । कालं जिनोत्पत्तिप्रमुखकाल : द्रव्यं च जिनजन्मसूवफस्वमादि इयं च मावञ्च फेवलशानादिगुर्ण प्रति भावमिति च "प्रतिपर्यनुमिः" इति द्वितीया। पट् प्रकारा भेदा पस्याः सा "प्रकारो मेदसादृश्ये" इत्यमरः । जिनस्य अर्हतः । स्तुतिः स्तोत्र । क्रियते विधीयते तथपागमश्च श्रूयते। "स्युनामस्थापनाद्रव्य-क्षेत्रकालाधयास्तराः। व्यवहारेण पञ्चादेकोमाघस्त. पोऽईताम्" इति । तस्मात्कारणात् । मम । एतत्काध्य। स्तुतिरेय स्तोत्रमेव । भूयात भयतु । भू सत्तायां लि॥ २१॥ भा० भ०-स फाव्य में जिन-स्थापन, जिन-नाम, जिन-जन्मादिक्षेत्र, जिन फेवल-सानादि गुण, जिनोत्पत्तिकाल तथा जिनजन्म-सूचफ स्यमादि छ: प्रकार की स्तुति की जाती है, इस लिये मेरा यह काव्य ही स्तुतिमय हो ॥ २१ ॥ यथास्ति जम्बू विटपिच्छलेन द्वीपेषु गर्वोन्नतमस्तकरय । द्वीपस्य भर्माभरणेऽन्न खण्डे रत्नायमानो मगधाख्यदेशः ॥२२॥ अयेत्यादि । भय पीठिकानंतर "मंगलानंतरारंभप्रश्नकाल्येप्ययो अध" इत्यमरः । द्वीपेठ । गंयूटिपिच्छन विटपोऽस्यास्नोति पिटपी वृक्षः "विटपी फलिनो नगः" इति धनंजयः। रिति रिटपो तथोक्तः स इति छल व्याजस्तेन । “पदं ध्यनिकर छलम्" इति धनंजयः। गर्योभनमस्लपम्य गर्योणोन्नतो मस्तशे यस्य नस्य । उत्प्रेक्षा । बीपस्य जम्बूदीपस्य । भर्मामरणे भर्मणा निर्मितमामरणतयो मोमरणमिर भर्मामरणं तस्मिन् -- ड प्रथमः सर्गः। मत्र अस्मिन पण्डे आर्यपण्डे । रत्नायमानः रत्नमिव आवरतीति रसायमानः। उपमा । मगधारयदेशः मगध इत्याख्या नाम यस्य स तथोक्तः स चासो देशश्च तथोक्तः । यस्ति वर्तते । संकरालंकारः ॥ २२ ॥ भा० अ०. जम्बूवृक्ष के कारण सभी द्वीपों में अभिमान से उन्नत मस्तवाले, जम्बूद्वीप के स्वर्णभूपण तुल्य आर्य-पण्ड में रत के समान एक मगध-नामक देश है। २२॥ यधरा भूतलसेव्यपादा भूपा इवाक्रान्तदिगन्तरालाः ॥ इन्दन्ति मत्तद्विपकैरवाक्षिकस्तूरिकाकाञ्चनरत्नखड्गैः ॥ २३ ॥ यदित्यादि। भूतलसेव्यपादाः भुवस्तलं भूतलं तेन सेव्याः संबद्ध योग्याः पादाः प्रत्य- न्तपर्वतामूलतलंचा येपां ते तथोक्ताः पक्षे "तात्स्थ्यात्तद्यादेश" इति भूतलेन भूजनेन सेव्याः . थाराधयितुं योग्याः पादाधरणा येषां ते तथोकाः । “पादो व्रध्ने तुरीयांशे शेलप्रत्यंत- पर्वते । चरणे च मयूखे च" इति विश्वः । शाकान्तदिगन्तराला: दिशां ककुभामन्तरालम- भ्यंतर आक्रांत व्याप्तं दिगन्तरालं येस्ते तथोक्ताः । यदपरा: यस्य मगधदेशस्य भूधराः, पर्वताः । मत्तद्विपकरवाक्षिकस्तूरिकाकांचनरलखनः मत्ताश्च ते द्विपाश्च मत्त- द्विपाः फेरवमिव अक्षिणी यासां ता: कैरवाश्यः मत्तद्विपाश्च फेरवाक्ष्यश्च कस्तूरिकाः कस्तूरिकागाध कस्तूरीच कांचनाः राजवृक्षाश्च कांचनं स्वर्ण च रतानि ध पङ्गाः पशिमगा असयश्च तथोक्तास्तः। उपमालंकारः । "काञ्चनः कांचनारस्याच्चपके नागके सरे उदुघरे च पुन्नागे हरिद्रायां च फाञ्चनी । कांचनं हेमि किंजल्क" इति। पड्गडफङ्गा- सियुद्धभेदेषु गंडक" इति च विश्वः । भूपा इव राजान इच। दिन्ति परमेश्वर्यमनुभवन्ति । इदु परमेश्वर्ये लड्। उपमालङ्कारः ।। २३ ।। भा० २०-सभी दिशाओं में व्याप्त तथा पृथ्वी के अन्तस्तल प्रदेश में जिन फे पर गड़े हुए हैं, ऐसे मगधदेश के पर्वत मतवाले हाथी, फेरवाक्षो, कस्तुरीमृग, और पड्गमृग से ऐश्वर्यशाली होते हु अन्यान्य राजाओं के समान शोमते हैं । ॥२३॥ नगेषु यस्योन्नतवंशजाताः सुनिर्मला विश्रुतवृत्तरूपाः | भव्या भवन्त्याप्तगुणाभिरामा मुक्ताः सदा लोकशिरोविभूषाः ॥२४॥ मगेपित्यादि । यस्य मगधदेशस्य । नगेपु न गन्छन्तीति नगाः तेषु । "शलक्षी नगा घगो" इत्यमरः । उन्नतवंशजाता: उन्नता महान्तः चंशा येणयोऽन्वयाय "वंशो घेणो पुले पर्ने पृष्ठस्यायययेऽपिच" इतिविश्वः । उन्नताच तशाच तथोक्तास्तषु जायन्तम्म तथोकाः।

मुनिसुव्रतकाव्यम् । सुनिर्मला: मलात् प्रासादिरूपान्निर्गता निर्मला: पक्षे मलाइर्शनमोहनीयान्निर्गता निर्मला: सुप्छु निर्मलाः सुनिर्मला:। विधृतवृत्तरूपाः विश्रुतं प्रसिद्ध तथ तवृत्तं यतुलं च तथोक तदेव रूपं यासा तास्तथोकाः पक्षे विशिष्टश्रुतं विश्रुतं धुतज्ञानं तच वृत्तं चारिप्रञ्च विच तवृत्ते ते एव रूपं स्वरूपं येषां ते तथोकाः । भन्याः तारादिगुणाविर्भधनयोग्याः भज्याः शुमरूपाः पक्षे रनत्रयाविर्भयनयोग्याः भव्याः विनेयाः। आप्तगुणाभिरामाः भाप्यतेस्म भाप्तः प्राप्तःस चासौ गुणस्तन्तुश्च तयोतस्तेन भभिरामाः शोभमानाः पक्षे "इहाप्यते तत्त्वयुभुत्सया भवनमोत्यदुःखापनिनीपया युधः। अनन्तसौल्यामृतमोक्षलिप्सया निरुच्यतेऽन्वर्थतयाप्त इत्यसो" इति घचनादाप्तस्सर्वशस्तस्य गुणाः क्षायिकसम्यक वादयस्तैरभिरामाः। मुकाः मौक्तिकानि पक्षे मुक्ताः मुक्तिमापन्ना: "मुक्का तु मौक्तिक मुकः प्राप्तमुक्त च मोचने" इति विश्वः । सदा सर्वस्मिन् पाले । लोकशिरोपिभूपाः लोकानां जनानां शिरांसि मस्तकानि तेशं विभूषाः भूषणरूपाः पक्षे लोकस्य जगतः शिरोऽप्रभागस्तस्य विभूषणः मंडनभूताः। "लोकस्तु भुग्ने जने" इत्यमरः । भवन्ति जायन्ते । लपालंकारः। यह शस्थपर्यतेषु घेणसमुद्र तानि मौकिमानि जनानां शिरसो भूपगानि भवन्ति तेषु मुकिमापन्ना भव्याधते प्रिलोकशिपरमंडनतां यान्तीति भावः ॥ २४॥ भा० अ०-जिस मगधदेश के पर्वतों में उस शज, अत्यन्त स्पच्छ अथवा निर्देषि शोर सुन्दर गोलाकार अयया शुतज्ञान तथा सचारित्र-गुणयुक्त, सुन्दर अथवा विनय और माप्न गुणों से युक मुका भथरा मुक्त जीव सदा लोगों के शिरोभूषण यने हुए थे। २४ । उत्तंगगोत्रप्रभवा भवत्यो भजन्तु भूचक्रवहिप्कृतं किम् इति स्रबन्तीरुदधि सरन्तीरवैमि यत्रालिगणो रुणद्धि ॥ २५ ॥ उसुमेत्यादि । यत्र मगधदेशे। थालिगणः थालीना सैतूनी सतीनां पा गणः समूह । "मालि: पंको घसयां च सेतो च परिमीनिता" इति विध्यः । उत्तुंगगोत्रममयाः उसुमाः उन्नालेय गोत्र पाय रुयोमा पोज्तुमानि लिभोलिपुलानि तथोक्तानि सेतु प्रभया जाताः। "गोत्र नाग्नि पुले क्षेत्र कानने चित्तरमनोः। संभायनीययोधेऽपि गोरः क्षोणीधर मतः । प्रमरो जलमूले स्यानन्मभूमो पराममे । माधोपलम्ब्रयोः स्याने" म्युभरत्रापिविधः । भरन्यः मान्नोति भरत्यः । "मातेत्यि" स्याणादिषोस्चतु प्रत्ययः "गिदित्यादिना डो। मायूर्य। भूवादिप्तंभुयधक पल भूवन तस्माददिपरनो दूरी কুলারিলিন মন্নিীশ্বাসনাবথলিনি লি:। থিবিজল।তিয়া जुगुप्मने" रयमरः । भजानु भयन्तु । भवन्दनोगे प्रथमपुरुषः । मा सेयापा लोट् । इति पर्य प्रसारणोकपा । उदधि उदयानिधीयन्तेऽस्मिन्नित्यधिस्त । नाम्न्युत्तरपदस्प " इति - प्रथमः सर्गः। । समासगतस्योदकशब्दस्योद इत्यादेशः पयोधि। सान्ती: गच्छन्तोः । सवन्तीः नदीः। "म्रवन्ती निम्नगापगा" इत्यमरः। रुणदि निवारयति । रुधिर भावरणे लोट । इत्ययमि जानामि निम्धिनोमि या । इण गतोल्ट्। उत्प्रेक्षालंकारः ॥ २५ ॥ भा० भ०-देश से निकाले हुए दुश्चरित्र नायक के पास जाती हुई फुलीन नायिका को जिस प्रकार उस की सखियाँ रोकती हैं उसी प्रकार भूमण्डल से तिरस्कृत समुद्र के पास जाती हुई नदियों को वहाँ के सय पुल रोकते हुए के ऐसे मालूम होते हैं । २५ ।। तरंगिणीनां तरुणान्वितानामतुच्छपद्मछदलाञ्छितानि । पृथूनि यस्मिन्पुलिनानि रेजुः कांचीपदानीव नखाञ्चितानि ॥२६॥ तरंगिणीनामित्यादि।यस्मिन् मगधदेशे।तरुणान्वितानां तरुणा वृक्षेण जात्येकवचनं पक्षे तरुणयुवभिरन्वितानां युकानां "विटपी पादपस्तरुः। वयस्थस्तरुणो युया" इत्युभयप्राप्यमरः। तरंगिणीनां तरंगास्संत्यासामिति तरंगिण्यस्तासां नदीनां । “तरगिणी शैवलिनी" इत्यमरः । अतुच्छपाछदलाञ्छितानि न तुच्छा अतुच्छाः सारभूताः महांतो वा पमानां कमलानां छदाः दलानि "दलं पर्ण' छदः पुमान्" इत्यमरः। अतुच्छाश्च ते पमच्छदाश्च तथोक्तास्तैः लांछितानि चिह्नितानि । पृथुनि स्थ लानि। पुलिनानि सैकतानि। "तोयोत्थितं तत्पुलिन सफत सिकतामयम्" इत्यमरः । नसाचितानि नयनखररचितान्यन्वितानि ।कांचीपदानीव कांचीनां रसनानां पदानि स्थानानि तथोक्तानि जघनानीवेत्यर्थः । “कांचीस्यान्मेखलाधान्नि गुआयां नीवृदन्तरे। पदं शन्दे च वाक्यं च व्यवसायापदेशयोः ।। पादपचिहयो स्थान प्राणयोरंकवस्तुनोः" । इत्युभयत्रापि विश्वः । रेजुः चभुः। राज दीप्ती लिट् । उत्प्रेक्षा- लंकारः ॥२२॥ •-जिस मगध देश में वृक्ष पङ्क्ति-से युक्त नदियों के, सुन्दर विकसित कमल- पत्रों से चिह्नित विस्तृत पुलिन, (जलसे निकला हुआ भूभाग) नायिका के नखक्षत जघन के समान शोभित होते हैं । २६ । तमोनिवासेपु वनेषु यस्य मरन्दसार्दास्तरणेमयूखा: । स्फुरन्ति शाखान्तरलब्धमार्गाः कुन्ताः प्रयुक्ता इव शोणिताHः॥२७॥ तमोनियासेम्वित्यदि। यस्य मगधदेशस्य। तमोनियासेपु तमसा तिमिराणां निवासपुनिल येषु । निविडचित्ययमर्थः। वनेषु उद्यानेषु। तरणे: सूर्यस्य । "शु मणिस्तरणिमित्र" इत्यमरः । मरंदसाः मरंदेन पुष्परसेन सार्दाः "मकरन्दो मरंदोऽस्य रस" इति चैजयन्ती । "आई"साद हिन्नम्" इत्यमरः । शाखान्तरलब्धमार्गाः शाखाना अन्तरे मध्ये लक्ष्य प्राप्तो भा०अ०- मुनिसुव्रतकाव्यम् । सुनिर्मला: मलात् प्रासादिरूपान्निर्गता निर्मला: पक्षे मलाद्दर्शनमोहनीयान्निर्गता निर्मला: निर्मलाः सुनिर्मलाः। विश्रु तवृत्तरूपाः विश्रुतं प्रसिद्ध तय तत्वृत्तं चतुलं च तथोक तदेव रूपं यासां तास्तथोक्ताः पक्षे विशिष्टश्रुतं विश्रुतं श्रुतशानं तच वृत्तं चारित्रञ्च विश्रुतवृत्ते ते एव रूपं स्वरूपं येषां ते तथोकाः। भव्याः तारादिगुणाविर्भवनयोग्याः भव्याः शुभरूपाः पक्षे रनत्रयाविर्भवनयोग्याः भन्याः विनेयाः। आप्तगुणाभिरामाः आप्यतेस्म आप्तः प्राप्तः स चासौ गुणस्तन्तुश्च तयोकस्तेन अभिरामाः शोभमाना: पक्षे इहाप्यते तत्त्ववुभुत्सया भवनमोत्यःपापनिनीपया घुधः। अनन्तसौख्यामृतमोक्षलिप्सया निरुच्यतेऽन्वर्थतयाप्त इत्यसौ" इति वचनादाप्तस्सर्वशस्तस्य गुणाः क्षायिकसम्यक्त घादयस्तैरभिरामाः। मुकाः मौक्तिकानि पक्षे मुक्ताः मुक्तिमापन्नाः "मुक्का तु मौक्तिक मुक्तः प्राप्तमुक्त च भोचने" इति विश्यः । सदा सर्वस्मिन् पाले । लोकशिरोचिभूपाः लोकानां जनानां शिरांसि मस्तकानि तेषां विभूपाः भूपणापाः पक्षे लोकस्य जगतः शिरोऽप्रभागस्तस्य पिभूगः मंडनभूताः । "लोकस्तु भुवने जने" इत्यमरः । भयन्ति जायन्ते । श्लपालंकारः। यह शस्थपर्वतेषु घेणुसमुद्र तानि मौक्तिकानि जनानां शिरसो भूपणानि भवन्ति तेषु मुकिमापन्ना भव्याश्चते त्रिलोकशिपरमंडनतां यान्तीति भावः ॥ २४ ॥ भा० २० जिस मगधदेश के पर्वतों में उथ घेशज, अत्यन्त स्वच्छ अथवा निर्देषि और सुन्दर गोलाकार अथवा शुतज्ञान तथा सारित्र-गुणयुक्त, सुन्दर अथवा विनय और थाप्न गुणों से युक्त मुक्का अथया मुक्त जीव सदा लोगों के शिरो-भूषण यने हुए उत्तंङ्गगोत्रप्रभवा भवत्यो भजन्तु भूचक्रवहिप्कृतं किम् । इति सवन्तीपदधिं सरन्तीरवैमि यत्रालिगणो रुणद्धि ॥ २५ ॥ उत्तुंगेत्यादि । यत्र मगधदेशे। आलिगणः आलीना सेतूनां सपीनां था गणः समूद। "आलि: पंकी च सरयां च सेतौ च परिकीर्तिता" इति विश्वः । उत्तुंगगोत्रप्रमत्राः उत्तुङ्गाः उन्मतारले घले यो पर्वलाय लपोका पक्षे उत्तुगलि श्रेष्ठलिपोत्राणि पुलानि तथोक्तानि तेषु प्रभयाः जाताः। "गोत्र नानि पुले क्षेत्र कानने चित्तवमनोः। संभावनीययोधेऽपि गोत्रः क्षोणोधरे मतः । प्रभो जलमूले स्याजन्मभूमी पराममे। माधोपलम्धयोः पाने" इत्युमरत्रापि विश्वः । भवत्यः भान्तीति भरत्यः । "भातेईयत्यि"त्योणादिको स्वतु प्रत्ययः "भूगिदि"त्यादिना डीया यूथ। भूयफाय हटनेमुवधांचलयं भूचना तस्माददिप्टनो दूरी पृतोऽवधिनियतस्तंदुधरवालोरयाधरन नायक मिति ध्वनिः 1 किंकिंधारण "पिच्छायो जुगुप्सने" हत्यमरः । भजन्नु भयन्तु । मयच्छन्दप्रयोगे प्रथमपुरुषः :भज सेयायां लोट् । इति एवं प्रसारणोकपा । उदधि उदकानि धीयन्तेऽस्मिन्निन्युधिस्त । "नाम्न्युत्तरपदस्म घ" इति । २४॥ गा - प्रथमः सर्गः। १५ समासगतस्योदकशब्दस्योद इत्यादेशः पयोधि। सरन्तीः गच्छन्तोः । स्रयन्तीः नदी: "स्रवन्ती निम्नगापगा" इत्यमरः । रुणद्धि निवारयति । रुधिर आवरणे लोट । इत्यवैमि जानामि निश्धिनोमिया । इण गती स्ट। उत्प्रेक्षालंकारः ॥ २५ ॥ भा० म०-देश से निकाले हुए दुश्चरित्र नायक के पास जाती हुई फुलीन नायिका को जिस प्रकार उस की सखियाँ रोकतो है उसी प्रकार भूमण्डल से तिरस्कृत समुद्र के पास जाती हुई नदियों को वहाँ के सय पुल रोकते हुए के ऐसे मालूम होते हैं ॥ २५ ॥ तरंगिणीनां तरुणान्वितानामतुच्छपद्मछदलाञ्छितानि । पृथूनि यस्मिन्पुलिनानि रेजु: कांचीपदानीव नखाञ्चितानि ॥२६॥ तरंगिणीनामित्यादि।यस्मिन् मगधदेशे। तरुणान्विताना तरुणा वृक्षेण जात्येकवचनं पक्षे तरुणयुवभिरन्वितानां युक्तानां "विटपी पादपस्तरुः । वयस्थस्तरुणो युवा" इत्युभयत्राप्यमरः। तरंगिणीनां तरंगास्संत्यासामिति तरंगिण्यस्तासां नदीनां । "तरंगिणी शैवलिनी" इत्यमरः । अतुच्छपमछदलाञ्छितानि न तुच्छा अतुच्छाः सारभूताः महांतो या पमानां कमलानां छदाः दलानि “दल पर्ण उदः पुमान्" इत्यमरः। अतुच्छाश्च ते पाच्छदाश्च तथोक्तास्तः लांछितानि चिह्नितानि । पृथूनि स्थूलानि। पुलिनानि सैफतानि। "तोयोत्थितं तत्पुलिनं सक्त सिकतामयम्" इत्यमरः । नखाञ्चितानि नपर्नपरैरचितान्यन्वितानि । कांचीपदानीव कांचीनां रसनानां पदानि स्थानानि तथोक्तानि जघनानीवेत्यर्थः । “कांचीस्यान्मेखलाधानि गुञ्जायां नीवृदन्तरे। पदं शब्द व वाक्यं च व्यवसायापदेशयोः ॥ पादपचिह्नयो स्थान प्राणयोरंकवस्तुनोः" । इत्युभयत्रापि विश्वः । रेनुः यभुः। राज दीप्ती लिट् । उत्प्रेक्षा- लंकारः ॥२६॥ भा० म०-जिस मगध देश में वृक्ष पङ्क्ति-से युक्त नदियों के, सुन्दर विकसित कमल- पत्रों से चिह्नित विस्तृत पुलिन, (जलसे निकला हुआ भूभाग) नायिका के नखक्षत जघन के समान शोभित होते हैं । २६ । तमोनिवासेपु वनेषु यस्य मरन्दसास्तिरणेमयूखाः । स्फुरन्ति शाखान्तरलब्धमार्गाः कुन्ताः प्रयुक्ता इव शोणिताः॥२७॥ तमोनियासेवित्यदि। यस्य मगधदेशस्य। तमोनियासेपु तमसां तिमिराणां निवासेपु मिल ये। निविडेवित्ययमर्थः । यनेषु उद्यानेषु। तरणेः सूर्यस्य । “धु मणिस्तरणिमित्र" इत्यमरः । मरंदसााः मरंदेन पुष्परसेन सााः "मकरन्दो मरंदोऽस्य रस" इति वैजयन्ती । आद"साद हिन्लम्" इत्यमरः । शाषान्तरलब्धमार्गाः शापाना अन्तरे मध्ये लब्ध प्राप्तो मुनिसुव्रतकाव्यम् । मार्गी यस्ते तथोक्ताः। मयूपा:किरणाः । “मयूसस्त्यिटकरज्वाला" इत्यमरः । शोणिताः शोणितेन रक्तन आः सार्द्राः । प्रयुक्ताः व्यापारिताः । कुन्ता इव आयुधविशेषा इव । “कुन्तः प्रासे चंडभाये क्षुद्वजन्ती गवेधुक" इति विश्वः । स्फुरन्ति विभान्ति । स्फुर स्फुरणे लटि । उत्प्रेक्षालंकारः। रिपुषु निकुञ्जगतेषु पृष्ठलग्नः प्रयुक्ताः कुन्ताः शोणिना भवन्ति यथा तथा अत्रापि तमोरिपुत्वात्तरणेरितिभावः। उत्प्रेक्षा ॥ २७ ॥ भा० अ०-जिस मगध देशके निविड़ अन्धकारमय वनों में मकरन्द-बिन्दु से भीगी हुई तथा पत्तों की ओट से छन २ कर आती हुई सूर्य की किरणें लक्ष्य को वेध फर आई हुई रुधिराक वर्छिओं सी है ॥ २७॥ अभ्रं लिहाग्राणि वनानि यस्मिन्नीयुर्बुवं नाकतरं निकर्तुम् । को दानवारिप्रतिपन्नवृत्तेः क्षमेत संकल्पितदानगर्वम् ॥ २८ ॥ अम्रलिहेत्यादि । यस्मिन् देशे । अभ्र लिहावाणि अन्न आकाश लेदि स्पृशतीत्यध्र लिहं। "वहाम्रालिह" इति खन् । "पित्याद्विपतश्चानव्ययस्य"ति मम्। अभ्र लिहमा येषां तानि तथोक्तानि । वनानि उद्यानानि । नाकतरु' नाकस्य स्वर्गस्य तवृक्षस्तं कल्पवृक्षमित्यर्थः । निकर्तुं निकरणाय निकर्तुं निराक्तुं मित्यर्थः । धुवं निश्चलं । ईयुः ययुः । इधगती लिट् । तथाहि-दानयारिप्रतिपन्नवृत्तः दानस्य त्यागस्य वारि जलं दानवारि वितीर्णजलं तेन प्रतिपन्ना अंगोमता वृत्तिजीवनं धर्तनं या यस्येति स तस्य देवतरो. पक्षे दानवानामनुरा- णामरयो रिपवस्तः सुरैः प्रतिपन्ना वृत्तिस्तस्याः। "प्रतिपन्नः स्योरुनेऽधीते विशातें- गीतेपि च" इति विश्वः। “वृत्तिर्वर्तनजीवन" इत्यमरः । संकल्पितदानगर्ष' संकल्प्यते स्म संकल्पितो वांछितस्तस्य दान वितरणं तस्माजातो गर्वस्त । को वा लोकः । क्षमेत सहेत। क्षमुप् सहने लिङ्। न कोऽपीत्यर्थः। दानवारिप्रतिपन्नवृत्तः संकल्पितदान- स्योभयत्र साम्ये सति तद्गर्वमेकत्र कः सदेतेति भावः। अर्थान्तरन्यासः ॥ २८ ॥ भा० भ०-जहाँ गगनचुम्मी धन कल्पवृक्ष को पददलित करते हुए के समान आकाश तक पहुँचे हुए हैं। क्योंकि कौनसा स्वाभिमानवृक्ष, दानके जलसे अपनी वृत्ति करने वाले कल्पवृक्ष के अमीष्ट घरतुप्रदान का गर्व सह सकता है ? ॥२८॥ पाकावनम्रा: कलमा यदीयाः पादावनम्ना इव मातृभक्त्या । श्राधायमाणाः स्वशिरस्सु भान्ति विकासिपमाननया धरित्र्या ॥२६॥ पाकाचनमा इत्यादि। मातृभक्त्या मातरि एता भक्तिः मातृभक्तिः तया मातरि विहि. तानुरागेण । पादावनमा इव अपनमन्तीत्येवंशीला: भवनमा.। "नम्यम्यजे" त्यादिना ।।

قام - मुनिसुव्रतकाव्यम् । पादयोरबनमास्तथोक्ताः पादनमनशीला इच। पाकावनमाः पाकेन परिणमनेन अवनमाः समंतान्नमनशीलाः। यदीयाः यस्य मगधदेशस्य संबंधिनस्तथोक्ताः। कलमाः भीहि- विशेषाः। चिकालिपराननया विकासतीत्येवं शीलं चिकासि तच तव पर च तदेवाननं यस्यास्सा तया । धरित्या भूदेव्या। स्वशिरस्सु स्वेषां शिरांसि मस्तकानि तेषु । आघ्रायमाणाः आघ्रायन्त इति । भान्ति राजन्ते। भा दीप्ती लटि। पाकेन विकासिपन- प्वयनतशिरतः संत एवं भान्तीति भावः। उत्प्रेक्षालंकारः ॥२६॥ भा० अ०-पकजाने से मातृभक्ति से प्रणत के समान पैर की भोर झुके हुए धान के गुच्छे, विकसित पममुखी पृथ्वी से मस्तक-द्वारा सूघे जाते हुए सिर पर शोभ रहे हैं। २६ । विभान्ति सस्यान्तरितानि यस्मिन् हेमारविन्दानि मधूल्यणानि । आपाययन्त्या इव शालिपुत्रानात्तानि धान्या करसेचनानि ॥३०॥ विभान्तीत्यादि । यस्मिन मगधे । सस्यान्तरितानि सस्यानामन्तर्यान्तिस्म तथोक्तानि । मधूल्वणानि मधुना पुष्परसेन उल्यणानि प्रवृद्धानि तथोक्तानि । “मधु मद्ये पुष्परसे क्षौद्र पि" "स्पष्टं स्फुट प्रयक्तमुल्वणम्" इत्यमरः। हेमारविदानि कनककमलानि । शालिपुत्रान शालय एव पुत्रास्तान । भापाययन्त्या आपाययतीत्यापाययन्ती तया पानं कारयन्त्या। धान या भूम्या उपमात्रा वा "धात्री स्यादुपमातापि क्षितिरप्यामलक्यपि" इत्यमरः । आत्तानि धृतानि । फरसेचनानि करस्थानि सेचनानि घरसेचनानि सेचनपात्राणि । "सेक. पान' तु सेचनम्" इत्यमरः। इव भान्ति विराजन्ते। भा दीप्तौ लटि। उत्प्रेक्षालंकार: . भा०-०-वहाँ धान्यरूपी पुत्रों को दूध पिलाती हुई धाई के दुग्धपान के समान, पारी के बीच २ के पुष्परस से भरे हुए फनककमल शोभते थे। ३०॥ यवेक्षुदण्डाः कुसुमाभिरामा वितन्वते पर्वचयाचिताङ्गाः । मनोजराजस्य जगजिगीषोरुचामरोड्डामरकुन्तलीलाम् ॥ ३१ ॥ यत्रत्यादि। यत्र मगधविषये। कुसुमाभिरामाः कुसुमैः पुप्परमिरामा विराजमाना स्तथोक्ताः। पर्वचयाचितांगाः पर्वणां प्रथिनां चयस्समूहस्तेनाचित निचितमंगमवयवो येषां ते तथोक्ताः । "आचितः शकटोन्मेये पलानामयुतद्वये। छन्नेपि संगृहीते स्यात्" इति विश्वः । इक्षदंडाः रसालयष्टयः । जगनिगीपोः जेतुमिच्छर्जिगीषुः "जेलिद . सनितिर पूर्वात्परस्य कवर्गः। जगतो जिगीपुस्तस्य । मनोजराजस्य मनसि जायत इति मनोजो ।

प्रथम स्वर्गः। १८ मन्मथः मनोजश्चासौ राजा च तथोक्तस्तस्य। “राजनसखे" रित्यत्प्रत्ययः। उचामरो. ड्डामरकुन्तलीला उद्गतानि चामराणि येषां ते उचामराः उन्मुखचामराः। “चामरं तु प्रकीर्णकम्" इत्यमरः। उड्डामरा निर्वाधास्ते च ते फुन्ताः प्रासाश्च तथोक्ता; उचामराश्च ते उड्डामरकुन्ताश्च तथोकस्तेिषां लीला तां। वितन्वते विस्तारयन्ति। तनु विस्तारे लट् । उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ३१॥ भा०-10-जहां गांठ से भरी हुई देहयाले और पुष्पोंसे समलन इक्षुदण्ड संसार को जीतने की इच्छा करने वाले कामदेव के उन्नत नामर तथा अचूक बों का दृश्य दिखाते हैं । ३१॥ भूदेवता यद्विभवं विलोक्य भूयोऽवधूततिदिवं दधाति । निलीनभृगस्थलपद्मदंभान्निप्पन्दताराणि विलोचनानि ॥ ३२ ॥ भूदेवतेत्यादि । भूदेवता भूरेव देवता तथोका भूमिदेवता । रूपकः । अयधूत- त्रिदिवं अवधूयते स्म अवधूतोऽवधूतो निराशतस्त्रिदियः स्वर्गो येनासी अवधूतत्रिदिवस्त । यद्विभव यस्य मगधदेशस्य विभवः ऐश्वर्य तथोक्तस्तम् । विलोप चीक्ष्य । निलीनभृगस्य लपमदभात् निलीयन्ते स्म निलीना अन्तःस्थिताः निलीना भृगाः मधुकराः यस्मिन तत् निलीनमृगस्थलपम स्थले भूतले जात पन' तथोक्त निलीनभृगं च तत् स्थलपमञ्च निलीन- भृगस्थलपा निलीनभृगस्थलपद्ममिति दंभो व्याजस्तथोक्तस्तस्मात् । निप्पंदताराणि निप्पंदा निश्चला तारा कनीनिका येषां तानि "ऋक्षाक्षिमध्ययोस्तारा सुग्रीवगुरुयोपितोः" इतिविश्यः । विलोचनानि नयनानि । भूयः पुनः । धाति दुधान धारणे लट् । उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ३२॥ भा० अ०-स्वर्गकी सम्पत्ति को भी तिरस्टत की हुई मगध देश को विभूति को देख कर भूदेवता मानों भ्रमरयुक्त खलकमल के व्याज से अपने अतृप्तनयनों से उसे निहार रहे हैं । ३२ । यस्योर्वरासारगुणस्य मूर्ताः पुजा इवाभान्ति समन्ततोऽपि । तिलातसीकोद्रवमुद्गमापगोधूमवलक्षवशालिशैलाः ॥ ३३ ॥ यस्येत्यादि । यस्य मगधजनपदस्य । समन्ततोऽपि समन्तात्समन्ततः परितोऽपि । तिला तसीकोद्रयमुद्गमापगोधमपलक्षवशालिशैला: तिलच अतसी च घ कोद्रवश्व मुद्गश्च मापश्च गोधूमध चलो निर्वाचः गुञ्जवृक्ष घलध क्षयो राजमापक्षवश्व शालिध तिला तसीकोद्रय मुद्गमापगोधूमवलक्षवशालयस्ते शैला राशयः राशेरोन्नत्ये शैलप्रयोगः । उपमापा ताश्च ता मुनिसुव्रतकाव्यम् । उर्वरासारगुणस्य सारःसमीचीनः सचासौ गुणश्च तथोक्तः उर्वरायाः सर्वसस्योत्पत्तिभूमेः सारगुणस्तस्य । "उर्वरा सर्वसस्याया” इत्यमरः । पुञ्जाः राशयः "स्यान्निकायः पुजराशि स्तूत्करः कूटमखियाम्" इत्यमरः । मूर्ता इच मूर्तिभूता इव । आभान्ति विराजन्ते । उत्प्रेक्षा लंकारः॥३३॥ भा० अ०-यहाँ चारो ओर तिल, तीसी, कोदो, मूग, उड़द, गेहू तथा धान आदि की ढेर मूर्तिमान उर्वरत्वगुण के समान दीख पड़ते हैं । ३३ । यत्रार्तवत्त्वं फलिताटवीपु पलाशिताद्रौ कुसुमे परागः । निमित्तमात्रे पिशुनत्वमासीत् निरोप्ठ्यकाव्येष्वपवादिता च ॥३॥ यत्यादि । यत्र मगधदेशे । आर्तवत्त्वं आतों मनोदुःखं तदस्यास्तीत्यार्तवान् तस्य भावः आर्तवत्त्वं दुःखयत्त्वम् नास्ति तच्छन्दप्रवृत्तिरपि नास्ति किमिति चेत् ऋतयः प्राप्ता आसामित्त्यार्तवत्यस्तासां भावः आर्तवत्त्वं पटकालनियमक्त्वं "ज्योत्सादिभ्योऽ" "ऋतुः स्त्री कुसुमे मासि पसंतादिपु धारयोः" इतिविश्वः । फलिताटवीपु फलानि संजातान्यासामिति फलिताः "संजातं तारकादिभ्य" इति इतप्रत्ययः भटव्यश्च तासु । आसीत् अभूत् । अस् भुवि लुङ् । पलाशिता पलं मांसं "पलमुन्मानमांसयोः" इति विश्वः । तदनातीत्येवंशीलः पलाशी पलाशिता मांसभक्षित्यं पक्षे पलाशः फिशुकः "पलाशः किंशुके पर्णे घातपोत" इत्यमरः । सोऽस्यास्तीति पलाशी तस्य भावः पलाशिता अद्री पर्वते यद्वा पलाशं पत्र तदस्यास्तीति पलाशी पर्णवत्ता "पत्र पलाशम्" इत्यमरः। अद्री तरी "भद्रयो द्रुमशैला|" इत्यमरः। अथवादी वृक्षे "द्रुदुमागमः" इत्यमरः । आसीत् अभवत् । परागः परं च तत् आगध तथोक्तः उत्कृष्टापराधः पक्षे परागः पुष्परेषाः "आगोपराधो मन्तुश्च" "परागः फुसुमे रेणो" इत्युभयत्राप्यमरः । कुसुमे पुष्पे। आसीत् अभवत् । पिशुनत्वं कर्णेजपत्य पक्षे सूचकत्वं "पिशुनौ खलसूचको" इत्यमरः । निमित्तमात्र निमित्तमेव निमित्तमात्र तस्मिन् शकुनमात्रे । आसीत् अभवत् । अपवादिता च अपयादोऽस्यास्तोत्यपवादी तस्य भावः अपवादितापि निन्दावत्यच "अपवादस्तु निन्दायामासावित भयोरपि” इतिविश्यः । पक्षे पश्च घश्च पवौ तावादिर्यस्य सः पवादिः न विद्यते पयादिर्यस्य सतथोकस्तस्य भावः अपवादिता घकारादिरहितत्वम् अथवा पं यदतीत्येवं शीलं पयादी न पवादी अपवाही तस्य भायस्तयोक्तः पव!क्तिरहितत्वं । निरोप्ठ्यकाव्येषु ओप्ठान्निगतो निरोष्ठः निरोठे भयानि निरो-प्टयानि "दिगाधंगांशाध." इति भवार्थे यप्रत्ययः । निरोप्ट्यानिच तानि फाव्यानि च तेषु मोप्टयाक्षररहितप्रयन्धेषु । आसीत् अभवन् । परिसंख्यालंकारः nen तस्य भावः तस्य भाव. पकार- प्रथम स्वर्गः। भा० अ०-यहाँ आवंवत्त्व (ऋतुओं का भाव या मानसिक व्यथा ) फले हुए यनों में था न कि मगधवासियों में, पलाशिता (पत्तों का लगना या मांसभक्षण) पेड़ों में थी न कि मगधवासियों में, पराग (पुष्पधूलि वा यड़ा अपराध ) फूलों में था न कि जनता में, पिशुनत्व (शकुन चा चुगलखोरी) शास्त्रों में था न कि यहां के लोगों में और अपवादिता (पकार तथा वकार का अभाव या निन्दा) निरोप्टय काव्य में थी कि मगधघासी मनुष्यों में ।३४। स्त्रीणां कचे माल्यमुरोजभारे श्यामाननत्वं जघने जडत्वम् । अपाङ्गत्ता केवलमक्षिसीम्नोर्मध्यप्रदेशेषु च नास्तिवादः ॥ ३५ ॥ स्त्रीणामित्यादि। माल्यं मलस्य भावः माल्यं "वर्णदृढादिभ्य" इतिषण अथवा मल्मेव माल्यं "भेष जाहि" इतिदयण मलभावः पक्षे माल्यपुष्प माला "माल्यं मालालजी" इत्यमरः । स्त्रीणां नारीणाम् । कचे शिरोरुहे। भासोदित्यत्राप्यन्धीयते। श्यामाननत्वं श्याममानन यस्य स श्यामाननस्तर भावस्वरयं निष्प्रभमुखत्यं पक्षे कृष्णमुखत्वं । उरोजभारे उरसि जायते इति उरोजे तयो यस्तयोक्तस्तस्मिन् पयोधरमण्डले । आसीत् । जडत्व पक्षे भारतत्त्वं । "जडो जारमध लिबुद्धी शन्देनालोच्यफारिणि" इति पैजयन्ती । जघने नितम्। आसीत् । भगंगना अवगतमग यस्य तरूप भावस्तधोका होनांगत्वं पक्ष कटाक्ष "मपांगमगहीने स्यालेत्रान्ते तिलोऽपि च" इति विश्वः। फेरले पर "केवलो शानभेदे स्यात्केवलय करनयोः । निणीते केवलं चौक केरल: फुदने पयचिन्" इति विश्यः । शक्षिमीनोः गो.स्तीमानो मर्याद तयो. "सीमसोमे खियामुभे" इत्यमरः । नेत्रावसानयो । भासीत्। नास्तिवाद नास्तीतिवचनं नास्तिपाद परलोकायपलय पक्षे मास्तिवाद अतिरशत्यादुपचारेण नास्तीतिरयनं या नास्तिवाद पदस्तिगादा "नप्रभाये निषेधे च स्वरूपार्थे पतिकमे । पदर्थे च" इति विश्व. । मध्यप्रदेश मध्यस्य प्रदेशस्तस्मिन् अयलग्नप्रदेशे। आसीत् । स्रोणामिति सर्यापाप्यन्वय । इयमपि परिसंप्या ॥ ३५ ॥ मा० भ०-माल्य [मालायें या मलिनता] यहाँ पी खियों के पेशगुच्छ में या न कि यहां के लोगों में, श्यामाननत्य [काला मुष या हृदय का कालापन ] मगधवासिनी त्रियों के स्तनों में पान कि लोगों में, जड़ता (गठीलापन या युद्धि को मन्दता ) स्त्रियों की जांघ में थी न कि पुरुषों में, भगाङ्गना [ पटाक्ष पा अङ्गकी विकलना ] स्त्रियों को आंखों में धो न कि मनुष्यों में श्रीर मालिराम (एशस्य या नास्तिकता ) पहाँ की स्त्रियों की पटी में पान कि मगधयापी जीचों में ।३५॥ ...

मुनिसुव्रतकाव्यम् । भुजंगमेष्वागमवक्रभावो भुजंगहारेऽप्यजिनानुरागः । प्रदोषानुगमो रजन्यां दिनक्षयस्सोऽपि दिवावसाने ॥ ३६॥ भुजंगमेष्वित्यादि। आगमवकभावः यकस्य भावो वकभावः आगमस्य आप्तप्रणीतम्य परमागमस्य धनभावस्तथोक्तः प्रवचनकुटिलत्त्व पक्षे अगमस्य चक्रभाव: "आगमः शास्त्र- आयाते" इति विश्वः । ध्रुघ निश्चयेन । भुजंगमेषु भुजेन गच्छन्तीति भुजंगमास्तेषु । "गमः प खड्डा" इति ख प्रत्ययः "सित्यरुः" इत्यादिना मम्। आसीदित्यत्राप्यनुवध्यः । अजि- नानुरागः न जिनः अजिनः हरिहरादिस्तस्मिन् अनुरागो भक्तिः पक्षे अजिने चर्मणि अनुरागः प्रीतिः "अजिनं चर्म कृत्तिः स्त्री" इत्यमरः । भुजंगहारे भुजंग एव हारो यस्य तस्मिन रुद्र। असीत् । प्रदोषानुगमः प्रकृष्टो दोषः प्रदोपः दुष्कर्म तस्य अनुगमः आस्रवः पक्षे प्रदोषस्य रजनीमुखस्य अनुगमः अनुगमनं "प्रदोषः कालभेदे स्यात् प्रदोषो दोष इप्यते" इति विश्वः । रजन्यां रात्रौ। भासीत् । सोऽपि । दिनक्षयः दिनस्य पुण्यस्य क्षयो नाशः पक्षे दिनस्य दिवसस्य क्षयो नाश । दिवावसाने दिवसान्ते । “दिवाहोत्यय दोषा च नक्तच रजनाविति" अभिधानाव्ययम् । आसीत् । इयमपि परिसंख्या ॥ ३६॥ भा० अ०---जहाँ आगमवक्रभाव ( टेढ़ी चाल वा शास्त्रका नियमोलन ) केवल साँपों में था न कि लोगों में, अजिनानुराग (मृगचर्म से प्रीति वा अजैन देवों में भक्ति ) शिवजी में था न कि जनता में, प्रदोषानुगम (सन्ध्या का आगमन वा दुष्कर्मों का आत्रब) रात में हो. ताथा न कि मगधवासी जीवों में और दिनक्षय ( दिनका अवसान वा दिन का व्यर्थ यापन) सायकाल में होता था नकि यहां के लोगों में। ३६ । तत्रास्ति सा राजगृहाभिधाना पुरी वनैः पृष्ठगतैरुदणैः ॥ पुरारिवैरप्रतिकारहेतोऱ्यांमुक्तकेशव्रतमादितेव ॥ ३७ ॥ तत्रत्यादि। तत्र मगधदेशे। या पुरारिवैरप्रतिकारहेतोः पुराणां त्रिपुराणाम् अरि: रिपुः रुदस्तस्य वैरं विरग्धत्तस्य प्रतिकारहेतुस्तस्मात् त्रिपुरसंहारिणः प्रतिकार- विधानायेत्यर्थः पृष्ठगतः पृष्ठमपरभागं गच्छन्तिस्म तथोक्तानि तैरित्यर्थः। उदग्नः उन्नतः। वन उद्यानः। मुक्तकेशवतम् मुक्ताः शिथिलिताः केशाः शिरोरुहा यस्मिंस्तत् मुक्त केशं तच तद्वतच तथोक्त मुक्तकेशाश्वतं नियमम् । आदितेय आदत्तेव । डुदान दाने लुङ । बनव्याजेन तद तमगृह्णादिय भातीत्यर्थः । सा रामगृहाभिधाना राज्ञां गृह राजगृह तदि. त्यभिधानं यस्यास्सा तथोक्ता । पुरी राजधानी । अस्ति वर्तते। उत्प्रेक्षालंकारः ॥३७॥ भा० भ०--उस मगधदेश में पीछे की ओर लगे हुए विशाल उद्यानों से त्रिपुरारि - २२ प्रथमः सर्गः। (शकर जी) ने जो तीनों पुरों को नष्ट कर डाला है मानों उसी अपकार का बदला लेने के लिये मुक्तकेश बत किये हुई कीसी राजगृह नाम की पुरी थी ॥३७॥ बहिर्वणे यत्न विधाय वृक्षारोहं परिष्वज्य समर्पितास्याः ॥ कृताधिकारा इव कामतत्रे कुर्वन्ति संगं विटपैतत्यः ३८|| यहिर्वण इत्यादि । यत्र पुय्यां । पहिर्वणे यहिरयाने चनाद् पहिर्वहिर्वणन्तस्मिन् । "मागन्त" रित्यादिना घनशन्दे नकारस्य णत्वम् । व्रतत्य लता । "व्रतती चल्लरी लतेति" धनञ्जय । कामिन्य इति ध्वनि । वृक्षारोहम् वृक्षाणामारोहस्तयोरुस्तम् वृक्षावलम्यनमित्यर्थ वृक्षारोह इति दम्पतीवन्धविशेष -अस्ति हि लतावेष्टनन्नामालिङ्गनम्। विधाय कृत्वा । परि ध्वज्य मालिङ्गय । समर्पितास्या समर्पितमास्य यामिस्ता समर्पितास्या समर्पितमुखा वा सत्य । कामतं कामस्य तन्व कामतन्त्र रहस्य तस्मिन् कामशाल। "तन्त्र प्रधाने सिद्धान्ते सूभयाये परिच्छदै" "इत्यमर । कृताधिकारा इव तो विहितोऽधिकारो याभिस्ता इय । विटपै शाखामि विटपुरुस्सह । 'बिटप पल्लो गे विस्तार स्तम्पशापयो" इति विश्य । संगम सम्बन्धम् । कुर्वन्ति विद्धति । श्लेषोपमालकार ॥ ३८॥ भा० भ०-यहाँ थाहरी उपवनो में वृक्षों पर चढ़ी हुई लताए फामशास्त्र में प्रवीण उपपतियों को आलिङ्गन तथा चुम्वन करती हुई कामिनियों के समान जान पडती है ॥ ३८॥ आरामरामाशिरसीन केलिशले लताकुन्तलमासि यत ॥ सकुङ्कुमा निझरवारिधारा सीमन्तसिन्दूरनिभा विभाति ॥३६॥ आरामेत्यादि। यत्र पुर्यो । एताकुन्तलमासि लता एच कुन्तला अलफास्तैर्मासत इति लताकुन्तलभारतस्मिन् । सान्त शब्द । भारामरामाशिरसीय आराम उपवन तदेव रामा स्त्री तस्या शिरस्तथोक तस्मिन्निव तमासमान इत्यर्थ । फेलिशैले फेले शेल फेलिशेस्तस्मिन् अथवा फेलिश्चासौ शैलश्चेतिकेलिशैलस्तस्मिन् क्रीडा- दावित्यर्थ । सकुड्खुमा फुडकुमेन सह वर्तत इति सकुडकुमा निमनद्वनितागलितेन कुन्ड्कमेन युक्ता। पान्यार्य इति पहुबोही सहस्य सभाय । निर्भरवारिधारा निर्भरस्य प्रवाहस्य पारि तस्य धारा तथोक्ता। सीमन्तसिन्दूरनिभा सीमन्तस्य सिन्दूरम्तथोक' तस्य निमेव निभा समा इत्यर्थ । "स्त्रीणा पुंसि च सीमन्त" इत्यमर । 'सिन्दूरस्तरुमेदे स्यात्सीन्दूर रकचूर्णके" इति विश्व । विभाति राजते शोभत इत्यर्थ । मा दीप्ती पर उत्प्रेक्षालंकार ॥३६॥ PH २ स्तम्भ." इत्यमरः। हस्तिपोताः हस्तिनां करिणां पोताः शावा इव । विमान्ति भा० अ०-जिस राजगृह के तालावों में कमल की डंटियों से खजुलाहट मिटाने के लिये वीत्थ्येत्यादि । यस्याः पुर्याः। विशाला: विस्तृताः। बाह्यालिभुवः पाया। धण्यागमनेनेत्यर्थः। गजानाम् करिणाम् । दशया मदावस्थया । “दशायर्ताववस्थायां वस्त्रांशे स्युर्दशा मपीति" विश्वः । भटानाम् योद्ध णाम् । थमेः शस्त्राभ्यासः। नटानाम् नर्तकानाम् । फरणैः नर्तनः। "करण साधनक्षेत्रकाचकायस्थकर्मसु गीतागवार सम्बेशक्रियाभेदेन्द्रियेषु च वालवादीच करणः स्मृतः" इति विश्वः। मल्लगणस्य मल्लानां गणस्तस्य। भुजाहतः भुजानामाहतानि तेभुजाधातैरित्यर्थः। जयन्ति सचिर्पण मुनिसुनतकाव्यम् । भा० म०-जिस राजगृहपुरी में स्त्रीरूपिणी वाटिकाओं में उनके मस्तक के समान घेणीरूपणी लताओं से मण्डित क्रीड़ा-पर्वतों पर स्त्रियों के स्नान करने से कुंकुम- मिश्रित जलधारा-झरने से गिरती हुई सीमन्त (मांग) के सिन्दूर के समान शोमती थी। कण्डूतिशान्त्यै निजकर्णमूलं संघर्षयन्तः सरसीषु मीनाः ॥ अम्भोजदण्डेपु विभान्ति यस्यामालानबन्धेष्विव हस्तिपोताः॥४०॥ फण्डूतीत्यादि । यस्यां पुाम् । सरसीपु सरोवरेषु । कण्डूतिशान्त्यै कण्डूयनं कण्डूति- स्तस्याश्शान्तिस्तथोक्ता तस्यै। निजकर्णमूलम् निज़ानांस्येपां कर्णास्तथोक्ताः यद्वा निजांच ते कर्णाध निजकर्णास्तेषां मूलं मूलप्रदेशम् । भम्भोजदण्डेषु अम्भसि जायन्त इत्यम्भोजानि तेषां दण्डा यएयस्तेषु। संघर्पयन्तः संघर्पयन्तीति तथोक्ताः। मीना: आलानयन्धेषु आलान नामालानान्येव या बन्धास्तेषु बन्धस्तम्भेषु। "आलान पन्धः विराजन्ते ॥ उत्प्रेक्षालंकारः॥४०॥ फर्णमूल घिसती हुई मछलियाँ खंभों से कनपट्टी रगड़ते हुए हाथी के यच्चों के समान शोभती थीं॥४०॥ वीत्थ्या हयानां दशया गजानां श्रमैर्भटानां करनटानाम् ॥ भुजाहतैर्मल्लगणस्य यस्या जयन्ति बाह्यालिभुवो विशालाः ॥११॥ लीनाम्भुवो भुमयो बहिःप्रदेशाः। यानाम् अश्यानाम् । । मत्स्याः। घीत्थ्या शिक्षागमनेन । घर्तन्ते। अतिशयालंकारः ॥ ४१॥ भा० अ०-उस पुरी फे याहर का विस्तृत मैदान घोड़ों के फतारों के चलने से, हाधिक भवन्ति । २४ प्रथम स्वर्गः। के मदनाय से, योद्धाओं की शस्त्र-शिक्षा से, नटों के नृत्य से तथा सुभटों के मल्लयुद्ध से अत्यन्त शोभायमान दीप पड़ता था ॥४॥ अहो नु तीरद्रुमराजिराजद्विचितपुप्पोद्गमविम्वितानि ॥ उतोल्लसत्पन्नगभोगरत्नातीनि यस्याः परिखाजलानि ॥४२॥ अहोन्वित्यादि। यस्याः पुर्याः । परिखाजलानि परिखायाः खातिकायाः जलानि तथोक्तानि । तीरद मराजिराजद्विचित्रपुप्पोद्गमविम्वितानि तीरेषु विद्यमाना द्रुमा वृक्षास्तीरद मास्तेपा राजिः पङ्क्तिस्तया राजन्ति इति राजन्ति विचित्राणि नानाविधानि विचित्राणि च तानि पुष्पाणि च विचित्रपुष्पाणि तीरनु मराजिराजन्ति च तानि विचिंत्र- पुष्पाणि च तथोकानि तेपामुद्गमा: पफरमुकुलानि तैर्विम्बितानि बिम्बासंजातान्येपामिति तथोक्तानि संजातप्रतिविम्यानि । "संजातं तारकादिभ्य" इति इतप्रत्ययः । अहोनु । उत अथवा । उल्लसत्पन्नगभोगरत्ना तीनि पन्नागाः सास्तेषां भोगाः फणाः "भोगः सुखेस्न्यादिभृतावहेश्व फणकाययोः" इत्यमरः। तेषां रत्नानि मणयस्तेषांधु तयः कान्तयः उल्लसन्तीत्युल्लसन्त्यः स्फुरन्त्यः पन्नगभोगरत्ना तयो येषान्तानि तथोक्तानि । अहोनु भवन्ति । किमिति विक्ल्पप्रभः । "अहो उताहो सन्देह" इति हलायुधः । “अहो उताहो किमुत विकल्पे किमुच्यते नु पृच्छायां वितर्फे चे"त्युभयत्राप्यमरः ॥ संशयालंकारः ॥ ४२ ॥ भा० अ०--जिस राजधानी की खाई का जल तीर की वृक्ष पंक्ति के विविध पुष्पों से अथवा सर्प के फण की मणियों से प्रतिविम्बित था ॥४२॥ माणिक्यकुम्भोञ्चलगोपुराणां रूपेण याम्मूर्तिचतुष्टयाप्तः ॥ आप्तस्समालक्ष्यविलक्षमास्ते पूर्वाचल: कूटविभासिभास्वान् ॥४३॥ माणिक्येत्यादि। फूटचिमासिभास्थान फूटे शिपरे भासत इत्येवं शील: फूटभासी भा अस्यास्तीति भास्थान सूर्यः फूटभासी भात्यान यस्यासी तथोक उदयार्फ इत्यर्थः। पूर्वाचलः पूर्वदिशि स्थितोऽचलस्तथोकः उद्याट्रिरित्यर्थः । याम् राज- गृहपुरीम् । समालश्य सम्यगालोक्स । माणिपकुम्भोञ्चलगोपुराणाम् माणिश्वरतन छताः कुम्माः कलशास्तरुञ्चलानि दीप्तानि माणिक्यकुम्भोज्यलानि च तानि गोपुराणि च तथोक्तानि तेषां । रूपेण स्वरूपेण । मूर्तिचतुष्टयाप्तः चत्वारोऽययवा अस्प चतुष्टयम् अश्ययात्त यदिति प्रत्ययः मूर्तिनामाकाराणाश्चतुष्टयन्तदामोतिस्मेति मूर्तिचतुष्टयाप्त मानोति स्मेत्याप्त आयात इत्यर्थः। "आप्तः सभ्ये च लब्धे चे" ति विश्वः । विलक्षम् विस्मयेन । -- शालस्य मुनिसुव्रतकाव्यम् । २५ युफ्तं यथातथा "विलक्षो विस्मयान्वित" इत्यमरः। अस्ति तिष्ठति । आस्उपवेशने लट् गाविम्ययुतः पूर्वादिरेव रत्नमयकलशोज्वलगोपुराणां चतुर्णामाकारेण तिष्ठतीति भावः । उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ४ ॥ भा० १०-उदयाचलपर्वत पर चमकता हुआ सूर्य मानों राजगृह नगरी को देखकर मणिमय फलशों से प्रदीप्त चारों गोपुरों को उदयाचलसहित स्वयं अपनी चार मूर्तियों के होने का सन्देह करता हुआ खड़ा था ॥४३॥ सुरापगापूरकृतान्तराणि शृङ्गाणि शालाग्रगतानि यस्याः ।। हैमानि हेमाम्बुरुहाणि बुद्ध्वा मुग्धा जिहीपन्ति सुरपिकान्ताः॥४४॥ सुरायगेत्यादि । यस्याः युर्याः । सुरापगापूरकृतान्तराणि सुराणामापगा सरसीः तस्योः पूर: प्रवाहस्तस्मिन् पूरे कृतमन्तरमवकाशो येषान्तानि तथोक्तानि । हेमानि नो विकाराणि हैमानि। "हेमादिभ्य" इत्यम् । शालानगतानि प्राकारस्यान शालानन्तद्गच्छन्तिस्म शालाग्रगतानि । शृङ्गाणि शिखराणि । मुग्धाः मूढाः। सुरर्पिकान्ताः सुराणामृपयः पूज्याः सुरर्पयः सुराश्यते ऋपयश्चेति वा कर्म- धारयस्तेषां कान्ता ललनास्तथोक्ताः। हेमाम्बुरुहाणि अम्बुनि रोहन्ति जायन्त इत्यम्यु. रुहाणि हेमरूपाणि अम्बुरहाणि तथोक्तानि । बुद्ध्वा मत्वा । जिहीर्षन्ति ग्रहीतु स्वीक- तुमिच्छन्ति। महेस्सन्नन्तालट "वशिव्यधिव्यची" त्यादिना यण इफ् । भ्रान्तिमान- लंकारः ॥४४॥ -जिस राजधानी की चहारदीवारी के देवगंगा तक पहुंचे हुए सुवर्ण शिखरों- को भोली भाली देवाङ्गनायें सुवर्णकमल समझकर लेना चाहती थीं । १४ । प्रतप्तचामीकरवैकृतानि प्राकारशीर्षाणि पुनर्न यस्याः ॥ पत्या दिशां भित्तिपु लिप्तशेषाः प्रतापपिण्डा वियदङ्गणे ते ॥१५॥ प्रसप्तेत्यादि। यस्याः पुर्याः। प्रतप्तचामीकरवशतानि मतप्तञ्च तचामोकरञ्चेति प्रतप्तचामीकरं विश्तान्येव चैतानि स्वार्थिकोऽप्रत्ययः प्रतप्तचामीकरण यस्तानि निम्मितानि प्रतप्नचामीकरवरतानि विकाराणि घा तथोक्तानि । भाकारशीर्षाणि प्राकारस्य प्रासादस्य शीर्वाणि गाणि तथोकानि । न न भवन्ति । पुनः पुनः कानीत्यर्थः पुरीप्रभुणा यस्याः पत्येतिचान्वयः। वियदङ्गणे वियत् आकाशस्याङ्गणेऽजिरे । दिशाम् ककुमाम् भित्तिपु फुड्डेपु । लिप्तशेषाः लिप्यतेस्म लिप्तः लिप्ताच्छेपास्तथोक्ता - भा०अ०- पत्या २६ प्रथमस्वर्ग: लेपनायशिष्टा इत्यर्थः। ते प्रसिद्धाः । प्रतापपिण्डाः प्रतापस्य पराक्रमस्य पिण्डा स्तथोकाः | भवन्तीत्यध्याहारः ॥४५॥ अपहवालंकारः। मा० अ०-जिस राजगृह नगरीके प्राकार के प्रतप्त सुवर्णमय शिखर आकाश प्राङ्गण की दिग्भित्तियों में लेप करने से बचे हुए नगराधिपति के प्रतापपिएड के समान दोख पड़ते थे।॥४५॥ न समा उत्तोरणानां किल मन्दिराणामुद्यद्ध्वजानामसमेपु यस्याः ॥ धनुप्मतो वारिभृतस्सशम्पानिय निर्माय नमः प्रमाटि ॥४६॥ उत्तोरणानामित्यादि । आंकाशम् । धनुष्मतः धनुरस्त्येषामिति धनुप्मन्तस्तान इन्द्रधनुस्सहितानित्यर्थः । सशम्पान शम्पया विधुता सह वर्तन्त इति सशम्पास्तान् । “शम्पाशतहुदा हुादीनो" त्यमरः। वारिभृतः धारि जलं विभुतीति- वारिभृतस्तान मेघानित्यर्थः। निर्माय निर्माय निर्माण पूर्व पश्यात्किञ्चिदिति निर्माय "प्रामाल" इत्यनेन कथा प्रत्ययः "तोऽनप्राप्य" इति प्यादेशः । वीप्सायां द्विः। यस्याः पुर्याः। उत्तोरणानाम् उद्गतानि तोरणानि येपान्तानि तेषाम् । उद्यद् बजानाम् उद्यन्ति उद्ग- च्छन्ति ध्वजानि येपान्तानि तेगम्। मन्दिराणाम् गृहाणाम् । असमेषु असमास्तेषु सत्सु । वारिभृद्विशेषणम् । प्रमादि परिहरतीत्यर्थः मृजू शुद्धौ लट् किल उत्प्रेक्षालंकारः ॥४६॥ भा० स०-राजगृह नगरी की अट्टालिकाओं की ऊंची नीची ध्वजाओं तथा तोरणों को देष कर मानों आकाश इन्द्रधनुप तथा विद्यु तुसहित धार २ मेघों की रचना करता हुआ उनकी समानता करने की चेष्टा करता है।४६ । यचन्द्रकान्तापलमन्दिराणां ज्योत्स्नाप्रवाहैः परिवाहिता धौः ॥ क्रीडाधियामप्सरसाम्विधत्ते दिवा दिवा दिव्यसरः प्रमोपम् ॥४७॥ यदित्यादि । यश्चन्द्रकान्तोपलमन्दिराणाम् चन्द्रकान्तश्चासायुपलश्च तथोक्तस्तेन निर्मितानि मन्दिराणि यस्याः पुप्यास्तानि यचन्द्रकान्तोपलमन्दिरागि.तेपाम् । ज्योत्स्ना- प्रवाह: ज्योत्स्नायाश्चन्द्रिकायाः प्रयादास्तः । परियाहिता परियाहेति रितस्य यमन सोऽस्यसजातेति तथोक्ता। घोः भाकशम् । "धादिघौद्ध स्त्रियामि"त्यमरः । मोहाधियाम् फ्रीड़ायां धीवुद्धिर्यासान्तास्तासाम् । अप्सरसाम् देवगणिकानाम् । दिष्यसरःप्रमोपम् दिवि मयं दिव्यं दिव्यञ्च तत्सराध दिव्यसरस्तदिति प्रमोपोमान्तिस्तम् ।

मुनिमुमतकाव्यम् । २७ दिवा दिवा दिने दिने । चीप्सायामितिद्विः। विधत्ते करोति । डधान धारण- पोपणयोर्लट् सङ्। भ्रा० लं० ॥ ४७ ॥ भा० अ०--जहाँ चन्द्रकान्त मणि से बने हुए भवनों के ज्योत्स्ना-प्रकाश से परिप्लावित आकाश सदा क्रीड़ासक अप्सराओं के दिव्य क्रीड़ोसरों की भ्रान्ति उत्पन्न करते हैं। ४७ । ताराफलायाम्वियदामलक्यां क्षेप्तुं व्रजन्तन्नतदारुबुद्ध्या ॥ यञ्चन्द्रशालागतबालचन्द्रम्बालं हसन्ति स्फुटमीशदासः ||४|| तारेत्यादि । वियदामलक्याम् वियदेवाकाशमेवामलकी तस्याम् । तारफलायाम् तारा एप फलानि यस्यां तस्याम् नक्षत्रफलायां सत्याम् । यचन्द्रशालागतवालचन्दम् चन्द्रशाला सौधशिरोगृहम् गच्छतिस्म चन्द्रशालागतः "चन्द्रशालाशिरोगृहमिति" विदग्धचूडा- मणी । यालश्वासी चन्द्रश्च तथोकश्चन्द्रशालागतश्चासौ चालचन्द्रश्च चन्द्रशालगतबालचन्द्रो यस्याः पुर्य्याः चन्द्रशालागतयालचन्द्रो यचन्दशालागतवालचन्द्रस्तम् । नतदारुवुद्ध या नतञ्च तदारु च नतदार वक्रयष्टिः नतदारु इति घुद्धिस्तया । क्षेप्तुम् क्षेपणाय क्षेप्तुम् । क्षेपो विलम्ब निद्रायां हेलापे रणलंघने गर्वेऽपि" इति विश्वः । वजन्तम् बजतीति व्रजन तं गच्छ- न्तमित्यर्थः। चालं माणवकम् । ईशदारा ईशस्य राशो दारा रमण्यः । "दारा: 'भूम्नि चाक्षता" इत्यमरः। स्फुटम् व्यक्तम् । हसन्ति हास्यं कुर्वन्ति । हस हसने लट् । भ्रान्ति- मानलंकारः । अनेन सोधानामोन्नत्यं कीर्त्यते ॥४८॥ भा० अ०-जहां आंवले के वृक्षरूपी आकाशमें फलरूपी ताराओं के उगने पर उसे तोड़ने फेलिये राजप्रासाद के शिखर पर उदित हुए घालचन्द्र को टेढ़ी छड़ी जानकर लेने को दौड़ते हुए बच्चों को देख कर राजमहिलायें हँसा करती थीं । ४८ । नैतानि ताराणि नभरसरस्याः सूनानि तान्यादधते सुकेश्यः ॥ यदुच्चसौधायजुषो मृषा चेमगे प्रो कुन निलीनमेभिः ॥ ४६॥ नेत्यादि। एनानि इमानि । ताराणि नक्षत्राणि! "भं नक्षत्र तारं तारके" इत्यादि हलायुधः। नन भवन्ति। किन्तु नभस्सरस्पाः नम एव व्योमेव सरसी कासारस्त. स्याः "कासारः सरसी सरः" इत्यमरः। सूनानि कुतुमानि । “सून प्रसवपुष्पयो"रितिविश्वः । भवन्तीति शेपः । यदुशसौधोग्रजपः उचाश्च ते सौधाश्चोचसौधास्तेपामग्रन्तज्जुपन्ति गच्छन्ति इति उच्चसौधाग्रजुपो यस्याः पुऱ्या यदुच्चसौधाप्रजुषस्तथोक्तः । सुकेश्यः सु शोभनाः केशा यासान्ताः सुमेश्यः स्त्रियः। तानि पुष्पाणि। आद्धते स्वीकुर्वन्ति । दुधाम धारणपोषणयोलंट तङ। मृपा चेत् अनृतञ्चेत् नक्षत्राण्येवेतिचेदित्यर्थः ।

P प्रथमः सर्गः । . . - "मृषा मित्थ्या च वितथे पक्षान्तरे चेद्यदि चे" त्युभयनापि अमरः । एभिः नक्षत्र: । मगे प्रगे प्रातःप्रात.। वीप्सायामिति दिः । "प्रगे प्रातःप्रभाते" इत्यमरः । कुत्र कस्मिन्निति कुत्र प्रदेशे। निलोनम् तिरोभूतमितिप्रश्न । अपनवालंकारः ॥ ४६॥ भा० अ०-ग्रन्थकार उत्प्रेक्षा करते हैं कि, ये तारायें नहीं है पतिक आकाशरूपी सरोवर के पुष्प हैं। जिन्हें राजगृह की अट्टालिकाओं पर चढ़ी हुई युवतियाँ चुन लेती थीं। नहीं तो प्रतिदिन प्रातःकाल ये कहाँ विलीन हो जाते थे।।४६ । विकासिनेत्रांशुभिरङ्गनानां विपत्तगात्रैरवसक्तगाताः ॥ विलासिनां सचिगृहान्धकारा वितन्वते यत्र सदा नियुद्धम् ॥५०॥ विकासीत्यादि। यत्र पुर्याम् । अवसक्तगात्राः अवसपतं सम्बद्ध गात्र' शरीरं येपान्ते तथोक्ताः। सूचिगृहान्धकाराः सुच्यने रहोऽस्मिन्निति सूचिः संकेतः सूचश्तेरोणा दिकः प्रत्ययः सूचिगृहाणां संकेतगृहाणामन्धकारा ध्वान्तानि । विपक्तगात्र: विपक्त' प्रणितं गात्र विग्रहो येपान्ते तैः। अङ्गनानाम् नारीणाम् । विकासिनेत्रांशुभिः बिक- सन्त्येवंशीलानि निकासीनि तानि च तानि नेत्राणि च विकासिनेत्राणि तेगमंशव विर. णास्तः । विलासिनाम् गिलासोस्त्येषामिति विलासिनस्तेषाम्पिटानाम् । नियुद्धम् याहयुद्धम् । “नियुद्धम्बाहयुद्ध स्यात्" इत्यमरः। सदा अनवरतम्। धितन्यते विस्तार यन्ति तनुविस्तारे लट् । उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ५० ॥ भा० अ०-जिस पुरी में विलासी ( लम्पटकामी ) पुरुषों के सायेतिक गृह की गाढी अँधियारी यहाँ की विलासिनी नायिकाओं की प्रफुल्ल आँखों फी चमक से वरावर यायुद्ध किया करती थी। अर्थात् कामियों के संकेतगृह के अभीष्ट गाढ़ान्धकार को अगनाओं की आँसों को चमक सदा दूर भगाने की चेष्टा किया करती थी।१०। सदा पठत्कोकिलनन्दनाढ्याः समुल्लंसत्पाण्डुकमद्रशालाः ॥ जिनालयाः सौमनसालयारते जयन्ति मेरूनपि यत्र चित्रम् ॥५१॥ सदेत्यादि। यत्र पुर्याम् । पठत्कोक्लिनन्दनाढराः पठन्तीति पठन्तः कोकिला र कोकिलाः कोकिलाच ते नन्दना अभंकाश्च कोकिलनन्दनाः पठन्तश्च ते पोषिलमन्दना ध पठत्कोकिलनन्दनास्तरादपाः पूर्णाः "दारको नन्दनोऽर्भक" इति धनजयः। पक्षे पठन्तो धनन्लः कोशिला यस्मिंस्तत्पठत्कोपिल तथतन्नन्दनञ्च तन्नामधनञ्च तथोक्त न्तैनाढवाः प्रपूर्णा । समुलसत्पाण्डकभद्रशालाः भद्रश्वासोशालच भद्रशालः पाण्डुरंच पाण्डुकः स्यार्धे क प्रत्ययः पाण्डुपचासौ भद्रशालय तथोक्तः 'पाण्डः कुन्तीपती सिते' इति ।

मुनिसुनतकाव्यम् । २६ विश्वः। स्कटिकचन्द्रकान्तरजतमयदृढप्राकार इत्यर्थः समुलसतीति समुल्लसन् प्रस्फुरन समुलसन पाण्डुकभद्रशालो येपान्ते तथोक्ताः पक्षे पाण्डुकञ्च भद्रशालश्चेति पाण्डुक- भदशाले तदभिधाने पने समुल्लसती पाण्डुकभदशाले येपान्ते तथोक्ताः । सौमन. सालयाः शोभनं मनो येपान्ते सुमनसः सुमनसां विदुपामिमे सौमनसाः सौमनसा मालया अध्ययनशाला येपान्ते तथोक्काः । “सुमनाः पुष्पमालत्योत्रिदशे कोविदेऽपि" इति विश्वः । पक्षे सौमनसस्य तन्नामवनस्यालयानिलाः सुमनसान्देवानामिमे सौमनसाः सौमनसा आलया येषु ते तथोक्ताः। जिनालयाः चैत्यगेहाः। मेरूनपि महामेरुपर्वतानपि । जयन्ति अभिभवन्ति । चित्रम् आश्चर्यम् । श्लेपालंकारः ॥५॥ भा: १०-आश्चर्य की बात है कि वहां पर कोकिल जैसी पढ़ती हुई बटु-मण्डली से युक्त, चा कोकिल से प्रतिध्वनित नन्दनयनसे युक्त, स्फटिक और चन्द्रकान्त मणिमय 'प्राकारसे परिवेष्टित वा पाण्डुक और भदशाला वनसे युक्त और भव्यों के आलयभूत या देवता- ओं के आलयभूत जिनचैत्यालय सुमेपर्वत की भी उच्चता को तिरस्कृत किये हुए थे॥५॥ यतास्मगर्भार्कजिनालयत्विट्च्छन्नेऽभ्रमध्ये तपनो हठेन ॥ दूर्वाम्बुबुड्या द्रवदश्वरोधक्लेशासहः किं कुरुतेऽयने द्वे॥ ५२ ॥ यत्रेत्यादि। यत्र पुर्याम् । अनमध्ये अनस्याकाशस्य मध्यन्तस्मिन् । अस्म- गर्भार्कजिनालयत्विट्च्छन्ने भस्मगर्भो नीलरत्नन्तच्चार्कः स्फटिकोपलस्स च तथोक्तः "अस्मगों हरिन्मणिः अर्कः स्फटिकसूर्य्ययोः" इत्युभयत्राप्यमरः। ताभ्यान्निर्मिता जिना- लयास्तथोक्ता: "मयूरव्यंस कादयः" इति तत्पुरुषत्वान्मध्यमपदलोपस्तेषां त्विट कान्ति- स्तया छन्न लिप्तन्तस्मिन् सति "स्युः प्रभारुग्रुचिस्त्विट्" इत्यमरः। दूर्वाम्बुबुद्ध्या दूर्वा चाम्बु च दूर्वाम्बुनी तयोस्ते इति वा बुद्धिस्तया हरिन्मणिस्फटिकयोः कान्त्या दूर्वाम्युनोर्बुद्धिर्जायत इत्यर्थः । द्रवदश्वरोधक्ल शासहः द्रवन्तीति द्रवन्तः प्रयान्त स्ते च ते अश्वाश्च तथोक्तास्तेषां निजयानवाजिनां रोधः स्थापनन्तेन जातः शस्त. न सहत इति द्रवदश्वरोधक्ल शासहः । तपन: सूर्यः। हठेन बलात्कारेण । “प्रसमस्तु घलात्कारो हठः" इत्यमरः। द्वेऽयने दक्षिणोत्तररूपे गती। "अयने दे गतिरुदफ दक्षिणार्कस्य वत्सरः" इत्यमरः । कुरुने विधत्ते। किमेवं स्यादिति शङ्का। संकरा. लंकारः॥५२॥ भा० १०-नीलमणि तथा स्फटिकमणि से मड़ित, चैत्यालयों की कान्ति से परिप्ला. वित आकाश में हरी घास और जल की ब्रान्ति से विमुग्ध हो उनकी और भागते हुए घोड़ों को रोकने में असमर्थ होकर ही मानों सूर्य ने उत्तरायण तथा दक्षिणायन का निर्माण किया। ५२॥

३० प्रथमः सर्गः। । चित्रं जिनेन्द्रावसथस्थलेषु प्रमोदवाप्पोदकपिच्छिलेपु ॥ भव्यैः किलोप्ता: सिततण्डुलारते फलन्ति यस्यां बहुशः फलानि ॥५३॥ चित्रमित्यादि । यस्यां पुर्याम् । प्रमोदयाप्पोदकपिच्छिलेषु प्रमादेन सन्तोपेण जातं वापस्यानोरुदफ प्रमोदवाप्योदफे "वाष्पोऽश्रुण्यमधूमे च" इति पैजयन्ती । तेन पिच्छिलानि पङ्कोभूतानि तेषु। "पिच्छिलं स्थाद्विजलके पङ्कः स्यात्" इत्यादि हलायुधः। जिनेन्द्रायसथस्थलेषु जिनानामिन्दास्तयोक्ता जिनेन्द्राणामावसथा मालयास्तेषां स्थलानि तेषु। भव्यः विनयः। उप्ता: उप्तन्तेस्म उप्ताः क्षिताः । ते प्रसिद्धाः। सिततण्डुलाः सिताश्च ते तण्डुलाश्च तथोक्ताः शुभ्रतण्डुला इत्यर्थः। बहुशः भनेकशः । फलानि अभीष्टफलानि । फलन्ति निष्पादयन्ति । फल निष्पत्ती लट् । चित्रम् अद्भुतम् ॥ ५३॥ भा० १०--जहाँ भकि-विगलित आनन्दाश्रु से पडोभूत जिनमन्दिरों में, भन्यों से योये गये स्वच्छत्रपडुल यार यार फटते हैं यह आश्चर्य था । ५३ । देवीनां मणिगृहमध्यवत्तिहैमप्रासादे सदलसकर्णिकाम्बुजाभे ॥ श्रावासे यदधिभुवः कृताधिवासा श्रीरासीद्धवमरबिन्दमन्दिरा सा ५४ देवीनामित्यादि । सदलसकर्णिकाम्बुजामे दलेन पर्णन सह पर्तत इति सदल कर्णिकया स६ वर्तत इति सकर्णिकम् अम्बुनि जायत इत्यम्बुज सदलश सकर्णिकञ्च तदम्युजञ्चेति सदलसकर्णिकाम्बुजन्तस्याभः समानस्तस्मिन् पर्णकर्णिकासहितारविन्द समान इत्यर्थः। देवीनाम् महिपीणाम्। मणिगृहमध्यवर्तिमनसादे मणिभीरत नि- र्मिता गृहा मणिगृहास्तेषाम्मध्यन्तस्मिन् वर्तत इत्येवं शीलो मणिगृहमध्यवती हेना . निर्मितो हैमः "हेमादिभ्यः" इत्यञ् प्रत्ययः हेममय इत्यर्थः स चासो प्रासाद्ध हैम- प्रासादः "हादि धनिनां वासः प्रासादो देवभूभुजाम्" इत्यमरः। मणिगृहमध्यवर्तिचा- सौ हैमप्रासादश्च तथोक्तस्तस्मिन् । यदधिभुवः यस्याः पुऱ्या अधिभूरधिपस्तस्य राजगृहाधिपस्य। आवासे आलये। कृताधिवासा कृतोऽधिवासो निलयो यया सा तथोक्ता विहिताश्रया । सा प्रसिद्धा। श्रीः लक्ष्मीः। 5 घम् निश्चयेन । अरविन्दमन्दिरा भरविन्दं कमलन्तदेव मन्दिरमावासो यस्यास्सा तथोक्ता कमलनिलयाभिधाना। असीत् अभवत् । अस मुवि लड् ॥ ५४॥ इत्यईदासरतेः काव्यरतटीकायां सुसयोधिन्यां भगवदभिजनवर्णनो नाम प्रथमः सर्गोऽय समाप्तः॥ भा० ०-जहाँ राजमहिपियों के आयासों के मध्य में पत्र तथा फर्णिका-युक्त कमल- कोसी आभाधाले मणिभय सुवर्ण प्रासाद में निवास करती हुई राजलक्ष्मी अपने कमलासना नाम को चरितार्थ किये हुई थी ।५४ । इति प्रथम सर्ग समाप्त ॥अथ द्वितीयः सर्गः॥ अथाभवत्तस्य पुरस्य राजा सुमिन इत्यन्वितनामधेय. ॥ क्रियार्थयो. क्षेपणपालनार्थद्वयादसत्सद्विपयात्सुपूर्वात् ॥३॥ अयेत्यादि । अथ राजधानीनिरूपणानन्तरे । तस्य पुरस्य राजगृहनगरस्य । क्रियार्थयो किया परिणति प्रवृत्तिर्वा सार्थो ययोस्तो तथोक्तो तयो । "क्रियार्यों धातु" इति सूत्र णात् धातुसरतोरित्यर्थ । असत्सद्विपयात् असन्तो दुर्जनाश्च सन्तस्सजनाचा सत्सन्तस्ते एघ विषयो गोचरो यरय तस्मात् । सुपूर्वात् सुशब्द एव पूर्व यस्प तत्सुपूर्व तस्मात् । क्षेपणपालनार्थद्वयात् क्षेपणन्निग्रहणञ्च पालन रक्षणञ्चेति क्षेपणपा लने तयोरों क्षेपणपालनायौं तयो यन्तथोक्त तस्मात् । सुमित्र इति सुमिनोति निगृहाति प्रायते पालयति इति सुमित्र । डुमिन् प्रक्षेपणे बेडपालने इति सुपूर्वकधातुद्वयादुत्पन्न त्वात् । अन्वितनामधेय इति अन्वित सार्थक नामधेय यस्यासौ तथोक्त । "नाम रूपभागधेय " इति धेय प्रत्यय । दुएनिग्रहशिष्टपालनसमर्थ इत्यर्थ राजा नृप । अम घत् आसीत् । भूसत्ताया लड्॥१॥ भा० अ०-सजनों का रक्षण और दुर्जनों का दमन करने के कारण अपने नाम को सार्थक करता हुआ उस राजगृह नगरी का सुमित्र नाम का राजा हुआ।१। य राजशब्दासहमन्यपुसि श्रुत्वा भयाढ्यः सुखरोचिरासीत् ॥ स्तुतिप्रमत्ता: कपयो वभृर्यक्षोऽपि सत्य धनदो बभूव ॥२॥ यमित्यादि। अन्यपुसि अन्यश्वासी पुमांश्चान्यपुमान् तस्मिन् पुरुषे । राजशदासहम् गजेतिशब्दो राजशन्दस्तन्न सहत इति राजशब्दासहस्तम् राजाभिधानमसहमानमित्यर्थ । यम् सुमित्रराजम् । । सुखरोचि सुषमावादनन्त प रोचि कान्तिर्यस्य स तथोक्त "रोचि शोचिरुमै को प्रकाशो घोत भातप" इत्यमर । चन्द्र इत्यर्थ । भयाढ्य भयेन भीत्या भात्य पूर्ण पक्षे भया फान्त्या आदयस्समृद्ध । आसीत् अभवत् । फवय कवीश्वरा । स्तुतिप्रसक्ता स्तुती स्तपने प्रसक्ता प्रीता । बभूवु आसन् । भू सत्ताया लिट! यक्षोऽपि फुरोऽपि । धनद धनन्ददातीति धनदो द्रयदायक । बभूव आसीत्। सत्यम् तत्थ्यम् । कवी स्वस्मात्पर श्रुत्वा आकर्ण्य ३२ द्वितीयः सर्गः। यक्षे मृगाङ्क च शक राजविभासित इत्यभिधानाचे प्रयोऽपि तथा कुर्युरिति भावः॥२॥ भा० अ०-यह सुमित्र राजा दूसरे किसी की राजोपाधि नहीं सहन कर सकता यह सुन कर ही भयभीत हो राजोपाधि विभूषित मानों चन्द्रमा कान्तियुक्त, कवि- गण स्तुति परायण तथा यक्ष धन देने में व्यस्त हो रहे थे ! १२। कोपारुणेऽप्यक्षिणि यस्य चित्रं सकञ्चुकैः कुण्डलिभिः सनाथम् शिवारपदं काञ्चनवजपूर्ण वभूव सर्व नगरं रिपूणाम् ॥ ३ ॥ कोपारुण इत्यादि। यस्य सुमित्रनृपस्य । अक्षिणि नेत्रे । कोपारणेऽपि कोपेन रोपेणारण रतन्तत्तस्मिन्नपि । “अपणो मास्करेऽपि स्याद्वर्णभेदेऽपि च त्रिपु" इत्यमरः । किंपुनर्युद्धाद्यत इत्यपि शब्दार्थः। रिपूणा शव णाम् । सर्वम् नगरम् पुरम् । सकञ्च फैः कशु फेन कवचेन सह घर्तन्त इति सकशुकास्तैः सकयचत्य- स्यात्र विरोध: कञ्च फेन निम्मौकेण सहवर्तन्त इति सपञ्च कास्तैः । “कञ्चको चारवाणे स्यान्निम्माके फवचेऽपि । घद्धापकगृहीताङ्गस्थितवस्त्र च चोलफे" इति विश्वः । कुण्डलिमिः कुएडलं फर्णवेष्ठनमस्त्यपामिति कुएडलिनस्तः। कुण्डल. त्वस्य विरोधः कुण्डलिभिः भुजगैः। "पुण्डली गूढपा चक्षुःश्रयाः" "इत्यमरः । सनाथम् गाथेन सहितम् । शिवास्पदम् शिवानां मंगलानामास्पदम् शिवास्पदम् मङ्गलास्पदत्य. स्य विरोधः शियानां शृगालानामास्पदम् तथोक्तम्। "शिवं मोक्षे सुखे भद्रे सलिले. ऽय शियो हरे। घेदे योगान्तरे कोले चालुके गुग्गुलेऽपि च। पुण्डरीक मे चापि शिवाझटामलोपधी। अमयामल की गौरी क्रोष्ट्री सक्त फलासु च"इति विश्वः। फाञ्चन- घजपूर्णम् फाञ्चनश्च यजञ्च काञ्चनवज ताभ्याम्पूर्ण काञ्चनवजपूर्णम्। सुवर्णय पूर्णत्यस्य विरोधः किन्तु पाचनर्धत्तूरैरन्यवृक्षविशेषों पत्र: सिहुएडादिभिध पूर्णम् । “काञ्चनः काञ्चनारे स्याचम्पके नागकेमरे उदुम्बरे च पुन्नागे हरिदायाच काश्चनी । काञ्चन हेनि फिनल्के पुनागे फायभाजने । घजु हीरफदम्भोलिबाल- कामलकेषु च" इत्युण्यत्रापि विश्वः । • “धत्तूरः फन काययः मिश्रे याप्यय सीहुण्डो पजः स्नुकत्रीस्नुही गुडे" इत्युभयत्राप्यमरः। यभूय जशे । भू सत्तायां लिट् । विरोधा- लंकारः॥३॥ मा० म०-सुमित्र राजा को आर्षे क्रोध से लाल होने पर शत्रुओं के सभी नगर सापों का पसेरा, सियारों की मांद और धत्तूर तथा सेतुड़के सघन पन हो गये थे। अर्थात् डर के मारे शत्रु भों के भागजाने से उनके नगर योहड़ बने हुए थे। ३। - २ तस्याः भा०अ०- मुनिसुव्रतकाव्यम् । प्रयाणभेरीश्रवणोन यस्य पलायमानानरिभूमिपालान् ।। पदाभिघाताक्षमयैव सद्यः प्रकाशयामास समीरकेतुः ॥२॥ प्रयाणेत्यादि। यस्य सुमित्रराजस्य। प्रयाणभेरीधवणेन प्रयाणस्य भेरी प्रयाणभेरी ध्रवणन्तेन प्रस्थानपटहध्वानाकर्णनेनेत्यर्थः। पलायमानान् पलायन्त इति पलायमानास्तान धायमानान् । "परापूर्वकादयधातोरानरो लोपाविति” पराशब्दस्य रेफस्य लः। अरिभूमिपालान् भूमि' पालयन्तीति भूमिपालाः भरयश्शश्वश्च ते चते भूमिपालाश्च तथोक्तास्तान् । पदाभिघाताक्षमयैव पदानाचरणानामभिधात. स्तथोकः न क्षमा भक्षमासहनम्पदाभिघातेन जाताक्षमापदाभिघातस्याक्षमा या तयैव। “क्षितिः क्षान्तौ क्षमा ख्याता हित शफ्ते च वाच्यचत्" इति विश्वः। समीरकेतुः समीरस्य पायोः केतुः ध्वनः समीरकेतुः ध्वजश्चिह्न धूलिरित्यर्थः । “नभस्थान मातरि- भ्वा च समीरच समीरणः" इति जयकीर्तिः। प्रकाशयामास प्रकटयामास। काट दीप्ती "णिजन्ताहयायित्यादीनाम्" तत्पलायनाध्वानन्दर्शयतिस्मेत्यर्थः । उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ४ ॥ 0-सुमित्र महाराज की प्रयाणभेरी सुन कर भागते हुए शत्रु ओं को उनके चरणाघात सहन करने में असमर्थ हुई धूलि ने ही प्रकटित कर दिया। अर्थात् शत्र ओं के भागने से जो उनके पैरों की धूलि उड़ी उसीसे ये पकड़ लिये गये । ४ । येनासिना युद्धशिरस्यरीणाम् साङ्गच्छिदे वर्मणि रक्तधारा ॥ विनियंती तेन यथा व्यराजीदुद्भुतकोपाग्निशिखेव तेपाम् ॥५॥ येनेत्यादि। येन सुमित्रगजेन। युद्धशिरसि युद्धस्य संग्रामस्य शिरो युद्ध- शिरस्तस्मिन्। रणाम इत्यर्थः । असिना चन्द्रहासेन पग नेत्यर्थः। भरीणाम् शत्र, णाम् । वर्मणि कवचे। साङ्गच्छिदे अङ्गन सह वर्तन इति साङ्ग' साङ्ग छिनत्ति साङ्ग- छित्तस्मिन् सति। छिन्नं छातं टून कृत्तं दात दितं छितं वृणम्" इत्यमरः । तेन यया तच्छिइमामगविनियंती निष्फ्रामन्ती निर्गच्छन्तीत्यर्थः। रकधारा रक्तस्य धारा प्रयाहस्तथोक्ता शोणितप्रवाहः। तेषाम् शत्रु भूपानाम् । उद्भूनकोपाग्निशिवेव उद्भूतोऽ. सौ फोपचोद्भूनकोपः स एयामिस्तस्य शिखेय ज्यालेय। ध्यराजीत् व्यवभासत राज दीप्तो लुङ् । उत्प्रेक्षालंफारः॥५॥ भा० अ०-युद्धक्षेत्र में सुमित्रराज से पग के द्वारा शत्रु ओं के फयच के साथ २ भङ्ग काटे जाने पर उस छिन्न भिन्न शरीर से निकली हुई रक्त की धारा उनकी झोपा. मि कोसी मालूम होती थी।५।

द्वितीयः सर्गः . रणेषु खगः करिकुम्भमुक्तासम्पृक्तधारोऽनुचकार यस्य ॥ विदारिते वक्तृरिले विघातुर्विधुन्तुदस्येन्दुकुटुम्बकानाम् ॥६॥ रणेचित्यादि। रणेषु संपामेषु । यस्य राक्षः। परिपुम्भमुक्तासम्पृकधार: यरिणां गजानां कुम्भाः करिकुम्मा: "कुम्भो घटेभमूधाशो" इत्यमरः । करिकुम्भेषु भवा मुका मांतिकानि तामिस्सम्पृक्ता युक्ता धारा यस्य स तथोकः। पड़ छपाणः। विदा. रिते विदीर्णे। यक्त घिले मुपच्चिद्र। इन्दुदयकानाम् इन्दोधन्द्रस्य फटुम्या- 'न्येच कुटुम्पफानि तेपाम् । विधातुः विधातीति विधाता तस्य फुर्घतः पतुः यदने प्रसितुं स्थापयितुगित्यर्थः। विधुन्तुदस्य विधुन्तुदतीति विधुन्तुदस्तस्य राहोः "विधायुरपदे नुव्ययनेऽस्मा विध्यातिलानुद" इत्यनेन पर प्रत्ययः पित्याः" इत्यादिना मन् । मनु वकार अनुकरोनिस्म । एत्र फरणे लिट् । इन्दुकुरम्पकानां विधातुर्विधन्तुदस्य घेन्युभयत्रापि मार्मपष्टया तस्य सदशोऽभूदित्यर्थः ॥ ६ ॥ मा० 80--महाराज सुमित्र के पहगी धार युद्रक्षेत्र में हाधियों के मस्तकों को विदीर्ण परते समय गजमुनामों से समला होनी दुई चन्द्रपरियार को प्रस्त करने के लिये समुचन ग के ममान जान पड़ती थी।। कृपाणमिन्नयुधिवैरिवीरै विभिन्न विम्ये सति यस्य भानौ ।। स्वयम्भयेनव बभूव भिन: शशी न चेदद्य बिली किमेपः ॥७॥ गणे त्यादि। युधि मंप्रामे । यस्य प्रभोः । पराणभिन्नः फापेन पग भिन्ना. शिन्नानः। पश्चिीः परिण पर पीरा पेरियोरास्तः शत्र पोरः । रूपयः। भानी गय। विभिन्नगि विभिन्न रिन्न निम्न मएडल यग्य तस्मिन् । शशी चन्दः । मयेन मीत्या । स्वयमेर मारमनरेय। मिन्नः शिोः। समूय मनिस्म । न घेम् मृगत् मदि। पर मुपांतः। विटी शिमग्यास्तोति शिटी जियामि पः। विम् पगमभूहिति विप्रिने यिनः न यमरः। गंयुगे संगितरवि मिरवा चौरासवर्ग प्रान्तीनिमित्तानः मनुमित्यलंपार: 10 मा० 10-निम मुमित्राज योग में मारे गरे गायों को मारमानों को पूर्व मण्डल को पिला कर जाते हुए देश कर मानों मप से चन्द्रमा पर्यही यिदी हो गया। परिषद पान नहीं होती तो पदमा पिली भान सच्छिपयों बदलाता101 बाहौ यदीयेऽधिमुन्द्रमेऽपि मन्येऽनियष्टि विपल्टिमन्याम नोचेत्तया वैरिणि वध्यमाने फिन्तपिर तम्य कुटुम्यवानि ॥८ सुद मोऽर्थिनां सुरद्रु मस्तस्मिन् पगाप्रम् तस्या विनिपातो घातस्तन भीतास्सन्त्रस्तास्ते तयोका पक्षे असिव- त्वरा धारा जलप्रवाहोऽसिधारा तस्या विनिपाताभीतास्तथोकाः। "धारा सन्यानि मस्कन्धसन्तत्योःपतनान्तरे। द्रवदश्यप्रयतेऽपि तुरंगातिपचके । खड्लादीनाच निशित- मुनिसुव्रतकाव्यम् वाहावित्यादि। यदीये यस्यायं यदीयस्तस्मिन् । “दोश्छ" इति छ प्रत्ययः। चाही भुजे। अर्थिसुद्रुमेऽपि अर्थयन्त्येवं शीला अर्थिनः सुरस्य द्रुमः सुद्धमः सुरम इव याचकजन कल्पवृक्षे सत्यप्युपमा। असियटिं. खड्गलताम्। अन्यां भिन्नां छिन्नां लोकातिगामित्यर्थः। विषवल्लिम् विपलताम् । मन्ये जाने । नोचेत्तया खड्गलतया। चैरिणि वैरमस्यास्तीति घेरी तस्मिन शत्रौ। वेष्टयमाने संश्रीयमाणे सति। तस्य वैरिणः । कुटुम्बकानि कुटुम्बानि । किम् किन्निमित्तम् । तेपिरे तपन्तिस्म । तप सन्तापे लिट् ॥ उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ८॥ भा० अ०-महाराज सुमित्र को भुनायें याचकों के लिये कल्पवृक्ष के समान अभीष्टप्रद होने पर भी उनकी तलघार को मैं विपलतिकासी समझता हूं। नहीं तो इसके लक्ष्य धने हुए शत्रु यों के परिवार वर्ग क्यों दुःखी होते।। यस्य प्रतापामिशिखावलीढं सर्व जगत्सत्यमिदं वदामि॥ नेदं द्विपो यं यमगुः प्रदेशं तप्ता बभूवुः किमु तत तत्र ॥ ६ ॥ यस्येत्यादि । इदं एतत् । सर्वं विश्वं । जगत् भुवनम्। यस्य सुमित्रनृपस्य । प्रतापाग्नि- शिखावलीढम् प्रतापः पराक्रमः स एवाग्निस्तस्य शिषा ज्याला तयावलोडं व्याप्तं प्रतापाग्नि- शिखावलोढम् । “सप्रताप' प्रभावश्च यत्तेज: कोपदण्डजम्" इत्यमरः। सत्यम् तथ्यम् । वदामि ब्रवीमि। इदपु वचनम् । न नचेत्तर्हि । द्विपः शत्रयः । "द्विविपक्षाहितामित्र- दस्युशात्रयशत्रवः” इत्यमरः । यं यम् प्रदेशम् । अगुः यन्तिस्म । इण गतौ लुङ् "गैत्योः” इति गादेशः । तत्र तत्र तस्मिन् तस्मिन् प्रदेशे। चीप्सायामिति द्विः। तताः तप्यन्तेस्म तताः। किं बभूयुः किन्निमित्तम्भवन्तिस्मेतिवितर्कः । अनुमित्यलंकारः ॥६॥ मा० अ०-मैं समझता है कि, सुमित्रराज के प्रतापरूरी अग्नि की ज्याला से सारा संसार व्याप्त हो रहा था। यदि यह नहीं होता तो इन के शत्रु जहाँ जहाँ जाते यहाँ २ क्यों सन्तत होते ।। यस्यासिधाराविनिपातमीतारत्यजन्तु पद्माकरसंगमानि ॥ विमुक्तवन्तः किल राजहंसाः स्वमुत्तराशाश्रितमानसञ्च ॥१०॥ यस्येत्यादि । यस्य भूपस्य। असिधारायिनिपातभीताः यसैघारा प्रसिधारा द्वितीयः सर्गः। । करस्य मुसे धारोऽपि कोयते" इति विश्वः। राजहंसाः राज्ञां हंसा: राजहंसाः श्रेष्ठाः राजहंसाः भूपेन्द्रा इत्यर्थः पक्षे राजहंसाः हसविशेषाः। “राजहंसो नृपश्रेष्ठे कादम्बकल- हसयोः" इनि विश्वः । पनाकरसंगमानि पना लक्ष्मी कुर्वन्तीति पमाफराणि सम्पद्विधाय- कानि तानि संगमानि संसर्गास्तथोक्तानि राज्यभोगादिसम्बन्धानीत्यर्थः पक्षे पद्मा- पमानामाकरस्तस्य तदाकस्य संगमानि सम्बन्धानीत्यर्थः। "पद्मः स्यात्पन्नगे व्यूहे निधो सख्यान्तरेऽम्बुजे पाके बिन्दुजालेऽपि पमा भाङ्गीधियोरपि" इति विश्वः । विमुञ्चन्तिस्म विमुक्तयन्तः। स्वं स्वकीयम्। उत्तराशाश्रितमानस उत्तरा भविष्यत्फल- रूपाशा पांछा तथोका उत्तराशामाधयतिस्म तथोक्तमुत्तराशाधितञ्च तन्मानसं चित्तश्च तथोक्तम् पक्षे उत्तरा चासायाशा च तथोक्ता उत्तरादिक् तामाभितमुत्तराशाधित. न्तवमानसं तनामसरश्चति तथोकम् । "आशा तृष्णादिशोः प्रोका, मानसं सरसि स्वान्ते" इत्युभयत्रापि विश्वः । त्यजन्तु मुञ्चतु। त्यजहानी लोट् । किल सम्भावितेऽर्थे । "घार्ता सम्भावयोः फिल" इत्यमरः। उत्तरदिशि धनदस्य चैत्ररथनामोद्याने मानसनाम सरोऽस्तीति लौकिकरुदिः।। श्लपोपमालंकारः ॥१०॥ भाषा अ0-सुमित्र महाराज के खड्गप्रहार से भयभीत होकर पढे २ राजाओं ने अपने राज्य के ऐश्वर्येपभोग तथा भावी भाशाओं को अपने हृदय से निकाल दिया। (दूसरा पक्ष ) अथवा राजहंस पक्षी ने सुमित्र महाराज के राज्य में तीन जलप्रवाह से मस्त होकर पद्माकर (सरोवर ) का आना जाना छोड़ दिया तथा उत्तर दिशा में विराजमान मानससरोवर को भी छोड़ दिया।१०। तेजोऽनले च्याप्तसमस्तकाष्ठे तन स्थिति कर्त्तमशक्नुवानाः ॥ यस्यारयो वारिधिवासमापुतॊचत्तथा के किल वारिमाः ॥११॥ तेज इत्यादि। यस्य नरेन्दस्य। तेजोऽनले तेजः प्रभावस्तदेवानलोऽग्निस्तस्मिन् । "तेजः ममाये दीप्तौ च पले शुषि" इत्यमरः । च्याप्तसमस्तफाठे समस्ताश्चताः काष्ठा दिशश्च तपोका व्याप्ताः परिपूर्णाश्च ताः समस्तकाष्ठा येन स तस्मिन् सति "काठोत्कर्षे स्थिती दिशि" इत्यमरः । इन्धनानि ध्यन्यन्ते । तत्र दिक्षु । खितिम् स्थानम् । कर्तुम् कर. णाय फतुं विधातुमित्यर्थः। अशचनुयानाः न शक्नुवन्तीत्यरायनुयानाः। "ययः शक्ति शील" इति शान प्रत्ययः। भशपनुयन्त इत्यर्थः । अरयः शत्रयः । धारिधिवासम् पारीणि धीयन्तेऽस्मिन्निति पारिधिस्समुद्रस्तस्मिन् यासो नियासस्तम् समुद्रायासमित्यर्थः । मापुः ययुः। श्यतिरेकः । तथा तेन प्रकारेण । नोचेत् यदि न मये। धारिमयाः मुनिसुव्रतकाव्यम् । ३७ पारिणि प्रपतमाना मांस्तथोका जलचरमनुष्याः ।। के किल के भवन्ति। किलेति प्रक्षः । अनुमित्यलंकारः ॥ ११ ॥ भा० अ०-इन महाराज को प्रतापाग्नि के सभी दिशाओ में व्याप्त होजाने पर इनके शत्रु भा ने स्थल पर स्थान न पा समुद्र को शरण ली। यदि ऐसा न होता तो जल्चा मनुष्यों का अस्तित्व ही मिट जाता । ११ । उपायनाश्वेभखुरप्रहारमदाम्बुनिम्नीकृतपूर्णमभ्यम् ॥ रत्नाङ्गयां यत्सदसो विशालम् क्रीडासरोगद्विरराज लक्ष्म्याः ॥१२॥ उपायनेत्यादि । यत्सदसः यस्य सदस्तस्य सुमित्रराजसभायाः । "आस्थानी लोपमास्थान स्त्रीनपुंसकयोः सदः" इत्यमरः । उपायनाश्मखुरप्रहारमदाम्बुनिम्नान- पूर्णमध्यम् अश्वाश्चेभाश्च * अश्वेभा उपायनार्थ उपहारनिमित्तमानीता अश्वेमा उपायनाश्वेभाः खुराणा महारः खुरप्रहारा मदस्याम्पु मदाम्बू परप्रहारश्च मदाम्पु च पुरप्रहारमदान्धुनी उपायनाश्वेभाना पुरप्रहारमदाम्बुनी तथोक्त प्रागनिम्नं इदानीं निम्न क्रिय हम निम्नारुतम् पूर्यतेस्म पूगम् उपायनाश्वेमखुरप्रहारमदाम्बुभ्यां निम्नोकृत- पूर्ण मध्यं यस्य तत्तयाक्तर। ययासंख्यालंकारः । अश्वखुरप्रहारेण निम्नीकृतम् इभमदाम्यु. ना पूर्णमध्यमित्यर्थः । विशालं विस्तृतम् । रत्नाङ्गगम् 'त्लेनिमितमङ्गणन्तथोक्तम् । "अङ्गणं चत्वराजिरे" इत्यमरः । लक्ष्म्याः श्रोदेव्याः । फ्रीडासरोवर प्रीडासर इच फ्रीडा. सरायत् । उपमा। मिरराज यभो। राजू दाप्ती लिट् ॥१२॥ भा० अ०-भंट में बाये हुए घोड़ा के खुर प्रकार तथा मदमत्त हाथियों की मदधारा- से सुमित्र महाराज को सभा के रत्नजडित प्रागण का मध्यभाग गड्ढासा हाकर लक्ष्मा महाराणो के काड़ासरोवर के समान ज्ञात होता था ॥ १२ ॥ प्राणेश्वरी तस्य बभूव राज्ञः पद्मावतीनामनरेन्द्रकन्या । ययाधिविन्नाजनि भूतधात्री या चाधिविन्नाजनि भृरिलक्ष्म्या ॥१३॥ प्राणेश्वररात्यादि । तस्य राक्ष सुमित्रस्य। यया रमण्या । भूतघाली भूदेवो । "भूतधात्र पन्धिमेपला” इति धनञ्जय । अधिायन्ना पयते-म दिन्न भघि उपरि यिन्न यस्याः सा अधिचिन्ना सानो "स्तसापातकाध्यूढाऽधिन्निाऽयस्वयम्व" इत्यमरः । अननि अभूत् । जनप्रादुभावे लुङ “दापूर्जनि"इत्यादिना नि: "न" इति तस्य लुक् ।या + जलजमाप्त इत्यर्थः। * मसारपेभाश्यतिविहे मनाचनाने कानावा भवितुमुचित मात् ।

. 'द्वितीयः सर्गः। चनारी । भूरिलक्ष्म्या भूरिश्वासौलक्ष्मीश्चेति भूरिलक्ष्मीस्तया । अधिविन्ना सपत्नी अजनि अभूत्।सापमावतीनामनरेन्द्रकन्या नराणामिन्द्रो नरेन्दः कश्चिद्भूपतिस्तस्य कन्या कुमारीपमा अस्या अस्तीति पद्मावतो पद्मावतीति नाम यस्याः सा तथोका सा चासौ नरेन्द्र- कन्या च तयोका। प्राणेश्वरी प्राणानामोश्वरी तयोका बलमा । यभूव भवतिस्म। भूत- धात्रीभूरिलक्ष्मीशं सरत्नी नत्वन्यामिरिति । अतिशयालंकारः ॥ १३ ॥ भा० म०-महाराज की प्राणवल्लभा पनावती एक राजकन्या थीं। इनकी केवल दोसौतें थीं। एक पृथ्वी और दूसरी राजलक्ष्मी ॥ १३ ॥ लावण्यवाराशितराङ्गकल्पलतां नृपस्त्रीमवलोक्य शके ॥ तत्काम्ययाद्यापि करोति लक्ष्मीस्तपोम्बुमध्ये कमलासनस्था ॥१४॥ लावण्येत्यादि । लायण्यवाराशितराङ्गकल्पलताम लावण्यमेव सौरूप्यमेव धाराशिः चारां जलानां राशिः समुदः “धाचारिजलमम्मोऽम्बु" इति धनञ्जयः । लावण्यवाराशि तरतीति लावण्यवाराशितरा प्लसमानेत्यर्थः कल्पलताया वाराशिप्रभवत्वप्रसिद्धः "स्वित्र जिह्वा इत्यच प्रत्ययः। अनमेय फेल्पलताङ्गकल्पलता लावण्यवाराशितरा चासायङ्गकल्पलता च तथोक्ता ताम् । नपस्नीम् नृन् पातीति नृपस्तस्य स्त्री ताम्पमावतीम् । अवलोक्प वीक्ष्य । लक्ष्मी: कमला। तत्काम्यया तल्लावण्यमिच्छत्यात्मन इति तत्काम्या तया तलावण्यलाभेच्छया "सुपः फर्तुः काम्यः" इति वाञ्छार्थ काभ्य प्रत्ययः। “प्रत्ययावत्" इति यत् । "ततोऽजायन्तामाप्" इति आए। कमलासनस्था कमलमेवासन कमलासनन्तस्मिन् तिष्यतीति कमलासनस्था पद्मासनस्येत्यर्थः। अद्यापि इदानीमपि । अम्बु- मध्ये जलमध्ये । तप. पारिवाज्यम् । करोति विदधाति । इति शंके मन्ये । शफि शंकायां लट् । उत्प्रेक्षालंकार १en मा० म०-मुझे सन्देह होता है कि सौन्दर्य-समुद्र में तैरनेवाली तथा फल्पलतिका सी भगवाली राजमदिपी पद्मावती को देखकर इनको सुन्दरता पाने की इच्छा से लक्ष्मी भाज मी समुद्र के मध्य में तपस्या कर रही हैं ॥१४॥ निशाकररफेटनिभानि तन्च्या नखानि पादाभालिसंगतानि ।। जगज्जिगीपोर्मकरध्वजस्य प्रपेदिरे खेटकभल्लकत्यम् ॥ १५ ॥ निशाफरेत्यादि । सन्ध्याः शाइयाः । निशाकरस्फेटनिमानि निशां करोति इति निशा. करो विधुस्तस्य स्फेटाः पएडानि ते निमानि समानानि वपोजानि। "निमो ।

सुनिसुव्रतकाव्यम् । प्याजसदृक्षयोः" इति विश्वः । उपमा । पादाङ्गुलिसंगतानि पादयोरंगुलयस्ताः संगच्छन्तेस्क तथोक्तानि । नखानि नखराणि "नखोऽस्त्रिनखरोऽस्त्रियम्" इत्यमरः। जगजिगीषो: जेतुमिच्छु जिंगीपुः "सम्भिक्ष्य” इत्यादिना उप्रत्ययः। जगतो जिगीपुस्तस्य । मकरध्वजस्य मकरोध्यजो यस्य स मकरध्वजस्तस्य मन्मथस्य । खेटकमल्लकत्वम् खेटकः फलकः स च भल्लकः फुन्तस्सव खेटकमल्लको तयोर्भावः खेटकभलकत्वम् । प्रपेदिरे प्रजग्मुः । पद गती लिट् उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ५॥ मा० म०-चन्द्रमाके खण्ड के समान रानी के पैर की अंगुलियों के नख, संसार को जीतने की इच्छा करने वाले कामदेव के अस्त्रभूत ढाल और भाले बन गये। १५॥ -स्वर्गापगारक्तसरोरुहाणां सजातमेतद्वयमित्यवैमि । सुरांगनानां कथमन्यथास्ताम् चिराय सेव्यौ चरणौ मृगाक्ष्याः॥१६॥ स्वर्गेत्यादि । मृगाक्ष्याः मृगस्येवाक्षिणी नयने यस्यास्तस्याः एणाश्या: पद्मावत्याः । एतद्वयम् एतयोश्चरणयोयम् तथोकम् । स्वर्गापगारक्तसरोरुहाणाम् स्वर्गस्यापगा नदी तथोक्ता सरसि रोहन्तीति सरोरुहाणि रक्तानि च तानि सरोरुहाणि च रक्तसरोरुहाणि स्वर्गापगायाः रकसरोरुहाणि तथोकानि तेषाम् । सजातम् सह जायतेस्म इति सजातम् सहोदरम् इति। अवैमि जानामि । इण गती लट् । अन्यथा एवं नोचेत् । सुरांगनानाम् सुराणामंगनाः सुरांगनास्तासाम् देवमानिनीनाम्। चरणी पादौ । “पदंनिश्चरणोऽस्त्रियाम्" इत्यमरः । चिराय मनवतरम् । “चिराय चिररात्राय दीर्घकाले प्रयुज्यते" इति हलायुधः । सेव्यो सेचितुं आराधितु योग्यो । कथं केन प्रकारेण । आस्ताम् अभवताम् । अस् भुवि लड उत्प्रेक्षालंकारः ॥ १६॥ आ• .-पद्मावती रानी के दोनों पैर स्वर्गीय नदी के रक्तकमलों के सहोदर से ज्ञात होते थे। यदि यह बात नहीं होती तो वे देवाङ्गनाओं से क्यों पूजित होते ।।१६। सपर्वरम्भासदृशोस्तदूर्वो: सजंघयोरंगजकाहला का । कियांश्च पञ्चायुधपृष्ठतूण: कियत्तरौ मन्मयदन्तिदन्तौ ॥१७॥ सपर्येत्यादि। सपर्वरम्मासदृशोः पर्वणा प्रन्थिना सह वर्चत इति सपर्या सा चासो रम्भा च सपर्वरम्भा तया सदृशौ तथोक्तो तयोः। “सदृक्षः सदृशः सहक"इत्यमरः । सन्धि- कदलीस्तम्भसमानयोरित्यर्थः । उपमा। सजंघयोः अंधाभ्यां स६ घर्तते इति सजंघो तयोः । ताः तस्याः पनावत्या ऊरू तद्रू तयोस्तों: पुरन इति शेषः । मंगजकाहला मंगे जायत इत्यंगजो मन्मथस्तस्य फाहला । का काकुंः तदृयोंः पुरः कामस्य काहलाफि- - - - द्वितीयः सर्गः यती भरतीत्यर्थः । पञ्चायुधपृष्टपूणः पशायुधानि यस्य स पञ्चायुधो मन्मथस्तस्य पृष्ठे शरीर चरममागस्तस्मिन् विद्यमानस्तूण युधिः पञ्चायुधपृष्ठतूणः । किया कि मानमस्यति फियान् “घत्पिदं किम" इति मानार्थे चतुप्रत्यय “द घड प फ" इत्यादिना घस्य इयादेशः "किमिदिमः कीश" इति कि शन्दस्य फ्यादेश उगित्यान्नुम् । मन्मथदन्तिदन्ती मन्मथ: कामस्तस्य दन्तो गजस्तस्य दन्ती रदौ रूपयाः । फियत्तरी प्रशष्टौ कियन्ती कियत्तरी। भवतः आक्षेपालंकारः॥ १७॥ भा० अ०-गांठ के साथ २ कदली के पभे के समान पद्मावती रानी की दोनों जांघों के आगे फामदेव का क्या पश था! कामदेव तरकस तथा इनके हाथी के देना दाँत भी रानी की जांच के आगे कुछ नहीं थे।१७। परिस्फुरत्काञ्चनकाञ्चिबन्धं निबद्धनीवीविलसदुकूलम् । कलत्रभारं कलिकायुधोऽस्याश्चकार वास्त्रं किल चक्रयानम् ||१८॥ परिस्फुरदित्यादि। कलिकायुध फलिका. कोरका एघायुधानि यस्य स तथोक्त पुष्पायुध इत्यर्थ.। स्या एतस्याः पभावत्याः । परिस्फुरत्काचनकाञ्चिरन्धर फाञ्च्या मेखलाया पन्धस्तथोक्त परचित् महता प्रयोगे इकारान्तकारान्तयोरभेदो लक्ष्यते । काञ्चनेन निर्मिन. काञ्चिन्ध कञ्चनक चिन्ध परिस्फुरतीति परिस्फुरन् परिस्फुग्न काञ्चनकाश्चि पन्धी यस्य म तथोक्कस्ता । निरखनीवीविलसदुदुकूलम् निघद्धा चासौ नीया च निघद्ध- नी तथा प्रन्थिरचनया विलमद्विराजद्दुकूल सश्मभ्यं तवस्त्र यस्य स तम् । “दुफुलन्तु क्षी सूक्ष्माशुनि तत्"इति भास्करः । कलप्रभारम् कलत्रस्य नितम्बर मारत। "कलत्र श्रोणिभार्यग.' इत्यपर । शास्त्रास्त्रंण उन्न वास्त्र"छन्ने रथ" इत्या प्रत्ययः । "Tथ हाम्रा सम्मादिभिगो" इत्यमरः । चकयानम् च रूढ यान चायानम् रतिपय । चकार विधौ । डुन करणे लिट। क्लि सम्भाव्यम् । उत्प्रेक्षालकार ॥१८॥ भा. अ.-सुवर्णमय ममा कटिभूषण और नीधी पन्धन-युक्त साडी से सुशा- भित महाराना पमा पती तम्ब-भार का कामदेव ने पत्र से ढंके हुए रथ का चका पना डाला।१८ वलित्यत्रासतरङ्गितेऽत्या बिलग्नसौन्दर्य्यमहाम्बुराशौ। उपर्युदस्तस्तनशैलतक्यों रराज सेतुर्नवरोमराजिः ॥ १६ ॥ पलिमयेत्यादि । अस्याः पद्मावत्याः । परिप्रयासतरलिने चलीना त्रयं चलित्रयं तस्य भासाचलनानि त एष तरङ्गास्तथाका यलियासतरङ्गाः राजाता स्मिमिति घालाय.

।
मुनिसुपतकान्नम्
प्रासतरङ्गितस्तस्मिन् । विलशमौन्दय्यमहाग्युगशौ पिलगसि मन्नतनि गतिरशत्वादिनि
पिलम मंध्यम्"मध्यमवायलग्नच मध्योऽस्त्री"इत्यमरः । तस्य सौन्दर्य मामप्यम् न्यानम्
अम्यूनां गशिरम्पुराशि: महांधासायम्युगशिध तथोको विलममौन्दर्यमेव महायुगशि.
स्तस्मिन् । उगरि अने। उदस्तस्तनशैलनपर्यः उद्स्येनेरम उदग्नी उन्नतोच तो स्तनी चोदम्न.
स्तनी तायव शैली ताभ्यां तरितु योग्यम्नपर्य गलयोक्तः । गवरोमगजि: नगानि ननानि
रोमाणि च भयरोमाणि ते रातिः श्रेणी नवरोमराजिः । सेतुः आलि सेतुबन्ध इत्यर्थः ।
रग यमौ राजदीप्ती लिट । सेतुः मीनापतिना महेन्द्रशेलायधिपः सत्यिदानीमम्युधि.
अलमग्नल्यादलत्योऽप्यममागे शेलं दृष्टया यथा यिनपर्यते नया बिलासीन्दप्मनाम्बुराशी
निमत्यादलत्योऽप्यस्या नवरोमगजिम्ममागे स्तनशैलमपलोम पितपयंत इति भायः।
ऊयकालंकारः ॥१६॥
भा० ० -त्रियलीरूपी तरंगवाले पटि-सौन्दर्य समुद्र में ऊपर की ओर उठे हुए पुच
रूपी पर्वतों से अनुमान की जाती हुई अंकुरित गेमायली तु के ममान शोमनी थी १६॥
भुजायता चम्पकमालिका ग्यान कुचोन्नतः पंकजकुड्मलश्च ॥
मृदुत्वकाठिन्यगुगौ मृगाक्ष्याः कथं दधीतोभयमप्युभय्याः ॥ २० ॥
भुजायनेत्यादि । मृगास्याः मृगस्याक्षिगी यस्याःमा मृगाक्षी नम्या मृगाः एणामाः।
অসাধনা সুনামিযেনী গন্ধা মা মুনাফা বাঘা। মানাসিয়া গাল
देमपुषस्य मालिफा नयोका । कुनोन्नतः कुचाथिभनम्नुहम्नयोनः। पंकजामश
पंके जायन इनि पंजे तस्य फुड्मलो मुफ्लम्नयोनाः । म्यान भनेन् । तथापि उगममपि
चषकमालिफापंकजाइमलदगमणि । उगव्याः उमायग्यवायग्या त्युगपो "टिणिनिदा"
तस्याः भुजानगम्य। मृदुत्यकाठिन्यगुणी मृदामांगो मृतुल्यं यठिनभ्य भावः
काठिन्य गत्यश काठिन्य मृत्वकाठिन्य ते पर गुणो पुम्ती। कपः। पचन
प्रकारेण । पीत स्वीकुव्यांत् । धान धारणेच लिद न । प्रदोषापारः ॥ २० ॥
मा. म.-मृगासी पनायनी पी गयी या यदि यसम को माला की आय भीर
उन्नत फुच पाल-कुलमल परे जायं नो पे दोनों भुज भीर कुरा को पृतानमा टिनना
कैमे पारण कर ममने है भया ये दोनों उपमार्य गपनी मापना मिस नो पर
सकती ॥२०॥
शुभेन रेखा त्रितयेन तन्व्याः कगठः स्फुटं कम्युममान एव ।
सुधासदाटेंग पुनः परंण विपचिकाप्यन्चत ण्य तम्य ॥ २१॥

प्रथमः सर्गः। . । मा...- शुमेनेत्यादि। तन्न्याः शशांग्याः । कण्ठः प्रीवा। शुभेन प्रशस्तरूपेण । रेखात्रितयेन रेखाणां प्रितयं रेखा त्रितयन्तेन । स्फुटम् व्यकम् । फम्बुसमान एव कम्युः शंखस्तस्य समान एय शेखसद्दश इत्यर्थः । "धम्बु वलये शंखः" इत्यमरः।पुनः किन्तु । मुधासदाण सदा अनवरतमादः सदाः सुधया पीयूपेण सदास्तेन । स्वरेण गादेन । "स्वरोऽकारादि- मानासु मध्यमादिपु व ध्वनौ। उदात्तादिष्वपि प्रोक्तः स्वरो नासासमीरणे"इति विश्वः । विपशिकापि चीणापि। तस्य कण्ठस्य । अश्वत एव अञ्चतोन्ततो दूरत एयेत्यर्थः "मशके लसदश्चः" इति प्रभजनचरित्रकार प्रयोगात् । किम्पुन: कम्युरिति मायः ॥ २१॥ ....हांगी पनायती रानी के कण्ठ में जो शुभ-सूचक तीन रेखाएं थीं इन से यह शंल के समान फण्ठ अमृतमय सुमधुर स्वर से घोणा को भी पददलित किये हुआ था।२१॥ यदजसौन्दर्यसख मुखञ्च यदम्बके मीनविडम्बके च । नमःश्रियः साम्यमुपागता या मर:श्रियः साम्यमतो गता सा ॥२२॥ यदित्यादि। यत् यस्मात्कारणात् । मुग्यम् धनम्।जमीन्दप्मयम् अजम्य चन्द्रस्य कमलस्य प सौन्दर्यन्तस्य सपा पर जमौन्दर्यसषम् “राजन्सपेः" इत्यट। जो धन्यन्तरी चन्द्र निचुले शंवासपोरन स्यात्"इति विश्वः। यश यस्माद्ध तोः। भम्य च नयने । “हगद्- टिनेप्रलोचनचक्षुर्नयनाम्योक्षणाक्षिणि" इति हलायुधः । मीनविडम्पके मोनस्य मत्स्यस्य मीनराशेध विपके तिरस्कारफे मीनो राश्यन्तरे मत्स्ये" इति विश्व.। अतः अस्मात् कार. णात् ।या देयी । नम शिप: नमसोध्योम्नः श्री: शोभा तथोक्ता तस्याःसाम्यम् समरय मायः साम्यम्। उपागना उपगच्छतिस्मेत्युपागता प्राहा। सा पसायती। सरधियः सरस: कासारस्प धो: शोभा तस्याः माम्यम् तुलाम् गता प्राप्ता । मुलनेत्रयोः पन्द्रमीनराश्योः तुलया मममः धीसाम्यम् पममत्स्ययोस्मात्तु मरम्धीसाम्यमिति नम:श्रीः परथी राशी चेति तिस्रोऽगि समाना इति मायः । उपमालंकारः ॥२२॥ मा. no-मायती का मुष, चन्द्रमा की सुन्दरता का सहचर था तया भाषे मछ- लियों को निरस्त किये थी गतएव यह रानी भाकाश की सुन्दरता को समानता करती हुई सरोवर की शोमा नीतुलना पिये हुई पो ॥ २२ ॥ विलोकनारीतिलकस्य तम्याः क्व केशपाशस्य पुरोभवामः ॥ इतीदमघाप्यभिनेतुमेते सधूतयश्चामरवालहस्ताः ॥ २३ ॥ प्रिलोकमारीत्यादि। विशेष मारोतिलपम्प अदक्षाने लोकात्रिलोकाम्लप पियमाना भा. अ०- मुनिसुव्रतकाव्यम् । नार्गस्त्रिलोकनार्यस्तालाम् तिलकं तथोकन्तस्य तिलकशवस्याविष्टलिङ्गत्त्वान्नपुंसकत्वम् उत्कशाया इत्यर्थः । तस्याः पावत्याः । फेशपाशस्य केशानां पाशः केशपाशस्तस्य धम्मिलस्य । पुरोऽच कुत्र याकुत्राह इति निपातनात्साधुः। भवामःस्मः । सदृशान भवाम इत्यर्थः। इतोदम् एतद्वचनम् ।अभिनेतुम् अभिनयायाभिनेतुं निजन्यापारण दर्शयितुम् । एते इमे । चामरवालहस्ता चमा इमे चामरास्ते च ते चालहस्ताध तथोक्तायामरवाल- धियः “वालहस्तश्चवालधिः" इत्यमरः । भयापि इदानीमपि । सधूतयः धयनं धूतिः धूत्यासह वर्तन्ते इति सधूतयः सकम्पना इत्यर्थः । भवन्तीति साध्याहार । उत्प्रेक्षालंकारः ॥ २३ ॥ त्रिभुयम की ललनागों में शिरोभूषण पभावतो रानी के पालों की तुलना हम नहीं कर सकते 1-इस बात को जताने के लिये ही मानों चामर भाज भी करिपत होते रहते है ॥ २३॥ मनोजसम्मोहनमंत्रचिन्ताफलं नु भूपालतप:फलं नु । जनेक्षणादृष्टफलं नु किञ्चिन्नवेद्मि सृष्टेः कलशाकृतिस्सा ॥२४॥ मनोजेत्यादि । एटः निर्मितः। कलशारुतिः फालशस्याझतिराकारो यस्यास्सा कलशारतिः ।सा पावती देवो । मनोजसम्मोदनमन्त्रचिन्ताफलम् मनसि जायत इति मनोज. स्तस्य सम्मोहनन्तस्य मन्त्रो मनोजसम्मोहनमन्त्रस्तस्यचिन्ता तथोका तस्याः फलम् मनोजसम्मोहनमन्त्रचिन्ताफलम् मन्मथवशीकरणमन्नध्यानसम्पादितफलमित्यर्थः। नु किम्वा । भूपालतपःफलम् भुवं पालयतीति भूपालस्तस्य तपो भूपालतपस्तस्य फलन्तथोकम् सुमित्रमहाराजस्य गतभवविदिततपश्चरणफलमित्यथः । नुफिम्या ।जनेक्षणाष्टकालम् जनाना. मीक्षणानि भनेक्षणानि तेषामगुएन्तस्य फलं तथोक्तम् प्रेक्षकलोकनेत्राणां पुण्यफलमित्यर्थः। किम्वेति । किश्चित् किमपि । न वेभि न जाने विद् शाने लट् । संशयालंकारः ॥ २४।। मा.अ.-सृष्टि के कलश के समान पामायती रानो कामदेव के मोहन-मंत्र फेभ्यान का फल स्वरूप है अथवा सुमित्र महाराज को पूर्व तपस्या का फल या जनता के दर्शन सौभाग्य का फल है यह यात में निश्चित रूप से नहीं कह सकता ॥ २४॥ निर्मलिताशेषविपक्षकक्षो निराकुलीभूतसमस्तभृतः । युवा स पुष्पायुधवाणकोणच्यधात्परं व्याकुलमानसोऽभूत ॥२५॥ निमलितेत्यादि । निमूल्यते स्म निलितमशेगध ते विपक्षाधाशेषविपक्षास्त एप कक्षमरप्यं तथोक्त निमंलितमशेषविपक्षस येन स तयोकः । "विपिन गहनं फक्षमरण्यम्" इति धनञ्जयः। समूलोइतसमस्तशत्रु विपिनः । निराफलीभूतसमस्तभूतः प्रागनिरा .

द्वितीयः सर्गः। कुला इदानों निराकुला भवन्तिस्मेति निराकुलीभूताः समस्तान ते भूताश्च समस्तभूता निरा. कुलीभूनाः समन्तभूता यस्मात्स तथोक्तः । याधारहितसकलपजानिकरः । "युक्तक्ष्मा दाबूते भूतं प्राण्यनीत समे त्रियु" इत्यमरः । युवा तरुणः । “वयस्थस्तरुणो युवा" इत्यमरः। सः सुमित्रमहाराजः । पुरायुधाणकोणयधात् पुप्पाण्येव आयुधानि यस्य स पुष्पा- युधः मनोभूस्तस्य याणः शरस्तस्य कोणोऽन तस्य व्यधनं ध्याधो घातस्तस्मात् मन्मथा. मानसाधनादित्यर्थः । “वादनदण्डास्त्रलगुडादिषु कोण” इति मानार्थरनको । परम् फेवलम् व्याकुलमानस व्याकुलं मानसं यस्य स तथोक व्याधीः। अभूत् अभवत् भूसत्तायां लुङ। रूपकालंकारः ॥२५॥ मा००--समो शत्रु रूप वनमा निर्मूल करसर्व प्राणिवर्ग का निराकुल करनेवाले नरयुथक सुमित्र महाराज कामदेव के याणा से ये जाने के कारण व्याकुल-चित्त हो गये।२५। कुलागते वर्पिणि दृष्टशौचे समंतिवर्गेऽपितराज्यभारः । तया समं भन्मथशासनानि बभार भावातिमनोहराणि ॥२६॥ फुलागत इत्यादि। कुलागते फुलादागतत्तस्ािन् वंशपरम्परायाते.। यर्षिणि वर्षाणि सन्त्यस्येति वषों वृद्ध भूतार्थे इन तस्मिन पर्षिणि । ज्यायसिद्ध इत्यर्थः। दृष्टशीचे दृष्टं शौच यस्मिन्तस्मिन्नुपधाशुद्ध इत्यर्थः। "धम्मार्थकामभयव्याजेन परचित्तपरीक्षामुपधा" इति राजनीतिवचनान् । मंत्रिवर्गे मंत्रियां सचियानां वर्गस्समूहस्तस्मिन् । अर्पितगज्यभारः राज्यस्य भारो राज्यभारोऽपितः संस्थापिनो राज्यभारो येन स तथोकः । सः सुमिप्रभूपः । तया महिप्या पद्मावत्या । समं साकम् । "साफ सत्रा समं सह" इत्यमरः । भावाति- मनोहराणि पश्यमाणा भावा लम्योगोहीपनकारणानि नागादयो भाषास्तरालम्बनादि- भिरतिमनोहरराणि अत्यन्त मनोहराणि तयो कानि। मन्मथशासनानि मन्मथस्य शासनानि तथोक्तानि कामराज्यानीत्यर्थः । यभार घरतिस्म भृन भरणे लिट् । परिघ्रत्यलंकारः ॥२६॥ भा. भ.तधा घंशपरंपरा से चले आते हुप और सूक्ष्मदशी तथा पूढे मंत्रियों पर राज्यभार सौंप कर विविध माधों सपनायती फेसाथ मनोहर कामदेव के शाशन का सह सम्पन्न करने लगे।२६॥ अगायदेपा स ततान तानमनृत्यदपा सतताड तालम् । श्रवादयहल्लकिकामथैपा स वल्लकीवानुजगी द्वितीया ॥२७॥ भगायदित्यादि । एपा इयम्पमायती । अगायत् गानमफरोव । के गर शन्दे लड् । सः मुमित्रनृपः। तानम् धनिम् । ततान विस्तारयतिम त विस्तार लिट् । एपा पनायी - . । - . - मुनिसुव्रतकाव्यम् । अनृत्यत् अनटत् नृ ते गात्र-विक्षेपे लङ् ।मः सुमित्रः । तालम् कांस् । तताड ताडयतिस्म तड ताडने लिट् । अथ अनन्तरे। एसपम यतो । बल्लकिकाम् वीणाम् । भवादयत् अनादयत् घद व्यकायां धानि लङ् । सः सुमित्रः। द्वितीया द्वयोः पूर्णा द्वितीया। बल्लकीय वीणेव । अनुजगी अनुगायतिस्म में शब्दे लिट् ॥२०॥ मा० अ०-महारानी पमायती यदि गाती थी तो सुमित्र महाराज तान छेड़ते थे, पह नृत्य करती थी तो ये बाजे यजाते थे और यह कही वीणा यजानी थी तो सुमित्र महाराज अपने दूसरी घीण, के समान सुमधुर कण्ठ से गाते थे ॥२७॥ सह प्रयातौ दयितौ वनान्तं सह प्रियौ कैलिसरः प्रविष्टौ । सहाधिरूढी रमणौ च दोलाम् सह स्थितौ सौयशिरस्सु कान्तौ ॥२८॥ सहेत्यादि । दयिती दयिता च दयितश्चेनि दयितो स्त्रीपुरुषो "समानमेकः" इत्येक शेषः । चनान्तम् वनमध्यासहसाकम् । “साक सग समं सह"इत्यमरः प्रयातो प्रिया च प्रियश्च प्रियो अयमप्येकशेषः। केलिसरः फेल्याः सरः फेलिस: झाडासरोवरम् । सह समम् । प्रविटी प्रविशतस्म । रमणी रमणी च रमणश्च रमणी दम्पती। अप्राध्येकशेषः । दोलाम् मान्दोलिकाम् । “आन्दोलन स्थादान्दोला दोलास्थाहोलिकापिच" इति वैजयन्ती । सह सत्रा। अधिरूढौ अधिरोहत स्म तथोक्तौ । कान्ती कान्ता च कान्तश्च कान्तो एकशेषः । सौधशिरस्सु सोधाना शिरासि तयोकानि तेपु हम्यानमागेषु। सह साकम् । स्थितो तिष्ठ- तःस्म ॥२८॥ भा० ० -कमनीय कलेर वाले ये युगल दम्पती साथ ही साथ धन में जाकर सरोवरों में जल फीडा करते । हिडोले पर झूलते थे और राजप्रासाद की छत पर बैठते . थे॥२८॥ उरोजयारणमदेन तस्याः कुतूहलीयं मकर लिलेख । विभावयामास स भावयोनेः स्थूलाग्रजाग्रन्मकरध्वजस्य ॥२६॥ उरोजयोरित्यादि । तस्याः पद्मावत्याः । उरोजयो: उरसिजायेते इत्युरोजी तयोः स्तनयो। पणमदेन एणस्य मद एणमदस्तेन फस्तूा । कुतूहलीयम् कुतूहलाय भवं कुतूहलीयम् । "कौतूहल कौतुपञ्च कुतुकञ्चकुतूहल" इत्यमर । मकरम् जलचरविशेषम् । लिलेख लिखतिस्म लिख अक्षाविन्यासे लिट् । सः मकरः । भावयाने; भाव एव योनिरुत्पत्तिस्थानं यस्य स तस्य मारस्य। स्थलाप्रजापनमकरध्वजस्य स्थूलस्य पटफुट्या अन स्थूलाग्र "दृष्यं स्थूले पट फुटी गुणलयनी केणिका तुल्याः” इति 4जयन्ती । अथवा स्थूलस्य दूष्यकटस्याम स्थूलाप्रम् द्वितीयः सर्गः "स्थूल स्यात्पीयर फूटे निष्पर्श पुनरत्यवत्" इति विश्वः । तस्मिन् जागतीति जाग्रत् प्रस्फुरन् मग यस्य स स्थलाप्रजामन्मपरस्त चासो जश्व तोक्तस्तस्य । फम्मणि पष्ठी। रिभाषयामास स्मारयतिस्म । भृकृपोरवकल्पने लिट् । पुनश्च कामोद्दीप्तिमकरोदिति भायः। भतिशयालंकारःnn भा० भ०-पमावती के दोनों स्तनों पर कस्तूरिकामय चन्दन से चित्रित कुतूहलकारक मकरचित कामदेव के तम्बू के मकरध्वज के समान दिखाई पड़ता था ॥२॥ सखीसभायां चतुरङ्गकलो चुचुम्ब संरक्षितुमादृतस्य । हयस्य याआकपटेन कामी मुहुर्मुहुः स्मेरमुखी कपोले ॥३०॥ सतीत्यादि । फामी फामाऽस्यास्तीति पामी सुमित्रः । सपीसभायाम् सखीनां सभा सपीसभा तस्याम् पयस्यानां गोठ्याम् । चतुरंगोली चत्वार्यङ्गानि यस्य तत् धतुरंगम् तस्य फेलिस्तस्याम् धतुरंगकोडायाम् । मातृतस्य माद्रियतेस्मेत्पादतस्तरय प्रीतस्य घोषितस्य या। "माहुनी सादराचिंती" इत्यमरः । यस्य भश्यस्य । संरक्षितुम् संरक्षणाय संरक्षितुम् । एनकामुकत्येति परमणि पष्ठी । पानाकपटेन यामाया. प्रार्थनायाः कपटेन घ्याजेन । स्मेरमुपीन स्मेरेण स्मिन युक्तमुच यस्यास्सा ताम् ददामबदनाम् । पपोले गएड. पले । मुगुर्मह. पुनः पुनः । घुम्य गुम्यतिरम । यि यपत्रसंयोगे लिट् ॥ ३० ॥ मा० -सतियों को मांडली में पनापती पं साथ चौसर खेलते हुए सुमिन महाराज भरने शारे पोटे (घो के नाम से विख्यात एष चौसर पी गोरी) पोरक्षा के लिये प्राधना के पदाने गन्द २ मुमकुगती दुई पनापती पा पाग्यार मुपचुम्यन पिया करते॥३०॥ मुक्तागुण्डायमिपेण तन्व्याः रमनलावगयमयेन पुणे । नाभिहद नायनिवेशितेन विलोचनेनानिमिण जज्ञे ॥३॥ मुपागुणेयादि। तम्या. एशाहयाः। लायण्यमयेन सायपरय विकारों वाय. पदमयस्लेन देहकान्तिमयेम। "लापण्यम् देहकान्निता घ" इत्यभिधानान्। रसन अमृत प्ररेणा रसोरागे पिणे या निनादौ पादेये। सम्माम्नाइने देम्मि लिप्यांसऽगन. शब्दयो."नि जयन्ती । मुमागुणमामिषेष मुलामा गुणादामानि माशंप्रधान"यादि नामा। ताया धिमुनागुणाय भनप्रतायुगो सेनामापाशालामुनिशा" इतिखानपुंगरपिशेमराठात् टोनपुर पापाराप्दस्य था मगपत्यम् मुन्सागुणच्याचस्प fit गाम्जेन "मायाचनान गाम्नी मिन गनिमीलनम्" एयभिपानात् । पूर्वी अवकृप्य- मुनिसुव्रतकाव्यम् । सम्पूर्ण । नाभिहदे नागिरेव हदस्तस्मिन् "तत्रागाधजलोदा" इत्यमरः । नाधनिवेशितेन पत्या निवेशित तथोक्तन्तेन । विलोचनेन नयनेन। अनिमिषेण मत्स्येन। रुपकः। जज्ञ जने प्रादुभार्वे कर्मणि लिट जातमित्यर्थः ॥३१॥ भा० ०--मौक्तिक कांची ( करधनी) मे प्रकाशित और सुन्दरता तथा अमृत रससे परिपूर्ण पद्मावती के नाभि-सरोवर पर सुमित्र महाराज की एकटक दृष्टि लगी हुई थी ॥३१॥ अमर्पणायाः श्रवणावतंसमपाङ्गविद्युद्विनिवर्त्तनेन ॥ स्मरेण कोशादवकृष्यमाणं रथाङ्गमुर्वीपतिराशशंके ॥३२॥ मर्पणाया इत्यादि । उर्वोपतिः उाः भूमेः पतिः स्वामी उर्वीपतिः सुमित्रविभुः । अम- प्रणायाः प्रणयकोपयुतायाः। अङ्गविध द्विनिवर्तनेन अपाङ्गः फटाक्षः स एव विद्युत् अपांग. विद्युत् तस्या विनिवर्तनं पुनर्व्यावर्त्तनं तेन । श्रवणावतंसम् श्रवणयोः कर्णयोरयतंसमाभूत पणम् "पुंस्युत्तंसावतंसी द्वौ कर्णपूरे च शेवरे" इत्यमरः । स्मरेण कामेन । कोशात्.. आयुधपिधानात् । “कोपोऽस्त्री कुड्मले पङ्गपिधानाधद्विव्ययोः" इत्यमरः । माणम् आकृष्यमाणम् । रथाङ्गम् चक्रायुधम् “चक रथाङ्गम्" इत्यमरः । आशशंके आशंकतेस्म शकि शंकायाम् लिट् ॥ उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ३२ ॥ -सुमित्र महाराज प्रणयकलयती पद्मावती के विजली के समान त्यौरी यदलने पर उसके कर्णभूषण फो कामदेव के द्वारा म्यान से निकला हुमा चक्रायुध समझते थे ॥ ३२ ॥ रहस्सु वस्त्राहरणे प्रवृत्ताः सहासगर्जाः क्षितिपालवध्वाः ॥ सकोपकन्दर्पधनुष्प्रमुक्तशरौघहुंकारग्या इवाभुः ॥ ३३ ॥ रहरिस्वत्यादि। क्षितिपालबध्याः क्षिति पालयति रक्षमीति क्षितिपालः सुमित्रनरेन्द: स्तस्य वधूर्नारी पमावनी राशो तस्याः । रहस्सु एकान्तेषु । "तथा रहः रहश्चोपांशु बालिङ्ग" इत्यमरः। पनाहरणे वस्त्रस्याहरणन्तयोक्त' तत्र चसनायकर्षणे। प्रवृत्ता जाताः । सहासगर्जाः हासेन हसनेन सह वर्तन्त इति सहासास्ते च ते गजा गर्जनानि च तथोक्ताः सकोपकन्दर्पधनुष्पमुक्तशरोघहकाररया इच कोपेन सह वर्तत इति सकोपः स चासो कन्दर्पश्च सकोपकन्दर्पस्तस्य धनुः चापं तस्मात्प्रमुच्यन्तेस्म प्रमुक्तास्ते शराश्चेति सकोपकन्दर्पधनुष्पमुक्तशरास्तेषामोधः समूहः परम्परा वा “ओघो वृन्दे पयोयेगे द्रुत- नृत्योपदेशयोः ओघः परम्परायां च” इति विश्वः। ९ करोतीति कारोऽनुकरणध्वनिः सकापकन्दर्पधनुष्पमुफ्तशरोघस्य हकारस्तथोक्तास्ते व ते रवाश्च तथोक्ताः त इव । भभुः भा००- - द्वितीयः सर्गः। ५८ मनकासुः शोभन्तेस्म भा दीसो लड्। उत्प्रेक्षालंकारः ॥३३॥ मा००-एकान्त में पद्मावती रानी का पत्रापहरण करते समय जो हंसी के साथ कुछ शब्द हुए घे शरसमूहों को छोड़ते समय फुद्ध कामदेव के हुंकार के समान शात होते थे।३३। इति किलाभिमतौ सुरदम्पतीप्रतिमरूपकलागुणशालिनौ ॥ विविधकेलिरसैः कृतसम्मदैः सफलतां युवतामुपनिन्यतुः ॥३॥ इतीत्यादि। इति पचं प्रकरण । फिल या दो। "किल शब्दस्तु यार्त्तायां सम्भाव्यानुन- यार्थयोः" इति विश्वः । अभिमती अभमन्यतेस्मेत्यभिमती अभीष्टावित्यर्थः। सुस्पती. प्रनिमरूप कलागुण सालिनी सुराणां दम्पती जायोरती सुग्दम्पती रूपं सौन्दर्य च कलाधाः कौशल्यश्च एणी नायकनायकीमावश्व रूपकलागुणा सुरदम्पत्याः प्रतिमाः समानाश्च ते रूपकलागुणास्तथोक्ताम्तः शालिनी समृद्धो देवमिथुनममानसौन्दर्यसंगीतादि- कविशिष्टगुणप्रपूर्णायित्यर्थः । कृतसम्मदः क्रियन्तेस्म कृतास्त च ते सम्मदाश्च तपोका. : निरोई “प्रोदा मेदिमम्मदा" इत्यमरः। शिविधा लिग्स: विविधाश्च ताः आध विधिको यस्पा रसास्त: नानाविधकोडास्वादनः। "रमो रागे विप वीट्ये तकादी दे रे रतस्यादने हे ने निशब्द." इनि वैजयन्ती। युवताम् यूर' मारः नामा युवा नाम् तरुण। सफाम् फलेन सह वर्तत इति सफरम नन्य व गफलता ताम् साथं गन्नम्। उनिग्नुः प्रापरतः स्म। जी प्रापण लिए । इत्यहामकृतकाव्यरत्नस्य टोकाया सुखयाधिन्या मगवनानोजनस्वर्णनो नाम द्वितायः सर्गोऽयं ममाप्त.। ३४॥ मा० ०-देवदम्पतो के समान कला नया गुण को धारण करने वाले सुत्रि महा- राज और रानी पनाचती जै- अमीट भादर्शभत दम्पती ने अत्यन्त मानन्दप्रद विविध केलि कोडाभी से अपना यौवनकाल सार्थक किया।३४। Amwwwantgammar इति द्वितीय सर्ग समाप्त amirmaamTERTAImms - अथ तृतीयः सर्गः - -- एपैकदा तु नवकल्पलतेब भृयो भूयः प्रपन्नऋतुकाऽपि फलेन हीना ॥ पालोक्य केलिकलहंसवधूं सगी दध्यौ धराधिपवधूरिति दीनचेताः ॥१॥ एपेत्यादि । एकदा एकस्मिन् काले एकदा तु विशेषोऽस्ति । नवकल्पलतेव कल्पा चासौ लता च तथोक्ता नवा चासो कलालता च नवकल्पलता सेव। भूयो भूयः पुनः पुनः । प्रान्नस्तुकापि प्रपन्ना: प्राणा: ऋषयः पतयो यस्यास्सा तथोका पक्षे प्रपन्ना ऋतु- रातवं यस्यास्सा तथोका "ऋतुः स्त्रोकुसुमे मासि चसन्तादिपु धारयोः" इति विश्वः । मृत्य- कः” इति हम्बादेशात् भरादेशो न भवति । फलेन सन्तत्या शलाटुना च । हीना रहिता। एषा इयम् । प्रराधिपवधूः धराया अधिपो धराधिपस्तस्य सुमित्रालस्य वधूलभा पभावतो देशी सगाम् गर्भेण सह घर्तत इति सगर्भा ताम् गर्मिणोमित्यर्थः । केलिकलहंसवधूम् कल. हंसस्य वधूत्तयोक्ता केल्याः कलहसवधू सा तापू काडाकादम्बास्त्रियम् । “कलहमस्तु कादम्बे राजहंसे नृरोत्तमे" इति विश्वः। आलोप घोक्ष्य । दीनचेताः दोनं चेती यस्यास्सा तथोक्ता अधीरचित्ता सती । इति पक्ष्यप्राणप्रकारे गदध्यो चिन्ता मास । ध्यै चिन्तायां लिट् ॥१॥ मा० अ०~-नय कल्प ठतासो राज महिषी पद्मावतो यार यार मृतुमती होती हुई भी फलहोनहाने के कारण एक दिन क्रोडासक्त कलहंसवधू को गर्भवती देखकर उदामीन. चित्त हो सोचने लगी ॥१॥ श्रायुप्पितापि विफलेव रसालयष्टि: मेनेव नायकगतापि जयेन शून्या ।। काले स्थितापि धनराजिरवर्पणेन मिथ्या दधामि हतकुतिमदृष्टतोका ॥२॥ आइत्यादि।रपालयदिइनुदण्ड; "रमाल इक्षुः"इत्यमरः ।पुष्पिनापि पुष्पं संजातमस्य इति पुष्पिता संज्ञानकुमुमानिल विफलेन विनष्ट फलं यस्याम्सा विफाला सेव । सेनाचमूः। नायकगनापि नेतृयुनापि नायकं गच्छ नेस्म नायकगतापि । जयेन विजयेन शन्येव रहिनेव। धनराजिः मेघणि: काले प्रावृटममये । स्पिनापि तिष्ठनिम्म स्थितापि। अषणेय न विद्यते वर्ष घृष्टियल्यास्सा अर्पणा सेर वृष्टिहीनेय । अहं पुष्पिनापि अनुमन्यपि नायकगनापि पतियुनापि काले घरसि स्थितापि अष्टनो का अदृष्ट तोक्मात्यं यया मा तथोक्ता भप्राप्तनन्दना “तुफ्तोफ चाटमजः प्रता" इनि धनञ्जयः । हताक्षिम् हन्यतेस्म हत: म चासो मुनिसुव्रतकाव्यम् कुक्षिश्च तं दग्धोदरमित्यर्थः । मिथ्या व्यर्थम् । दधामि धामि सुधा धारणे च लट् । आपीडायाम् । “आस्तु स्यात् कोषपीडयोः" इत्यमरः । उपमालंकारः ॥२॥ मा० आ०-पुष्पयुक होने पर भी फलहीन इक्षुदण्ड के समान, सेनापति से अधिष्ठित होने पर भी विजयशून्य सेना के तुल्य तथा वर्षा ऋतु में भी बिना वृष्टि की मेघमाला के समान मैंने व्यर्थ ही विना सन्तान का यह उदर धारण किया है। अर्थात् ऋतुमती पतियुक्ता और युवती होने पर भी निस्सन्तान होकर निरर्थक मी ॥२॥ चिन्ताभरादिति वहन्नयनोदकान्तां कान्तोऽनुपद्य करपल्लवदत्तगण्डाम् ॥ व्यग्रीभवत्परिजनादवगम्य सर्वमाश्वासयत्युचितसृक्तिरसेन यावत् ॥२॥ चिन्तेत्यादि । कान्तः सुमिनमहाराजः । इनि उक्तरीत्या । चिन्ताभरात् चिन्ताया भगस्तयोक्तस्तस्मात् “रोऽतिशयमारयो." इति विश्वः । करपल्लपदत्तगएडाम् कर एव पल्लरः करपल्ला करपल्लचे दत्तो गएडो यया सा तथोक्का ताम् हस्तकिसलयनि विष्ट कपोलाम् ।वहन्नयनोदकाम् नयनयोरुदकं नयनोदकं घहतीति वहत् निस्यन्दत नयनादक यस्यास्सा वहन्नयनोदका ताम् पनायत्तीम् । अनुपद्य अनुसदनं पूर्व पश्चाविञ्चिदिति अनुपद्य "क्तोऽनन प्य." इति क्त्वा प्रत्ययस्य प्यादेशः समीरमाश्रित्य । व्यतीभवत्परिजनात् मागध्यान इदानीं व्यसो भवतोति व्यग्रीभवन व्यतीभवश्चासौ परिजना ति व्यनीभवत्- परिजनस्तस्मात् । 'व्यनो व्यासक्त भाकुले" .इत्यमरः। सर्वम् हंसवधूप्रेक्षणादिसकल. वृत्तान्तम् । भरगम्य शात्वा । यावत् यन्मानमस्ययावत् कालमित्यर्थः । "यावत्तायय साकल्ये ऽयधी मानेऽवधारणे" इत्यमरः । उचितसूक्तिरसेन सुष्छु उक्ति. सूक्तिचिता चासो सूक्ति श्वोचितसूक्तिस्तस्या रसस्तेन योग्यसुवोऽमृतेन। 'रसोरागे निपे चीय तिक्तादी पारदे ये रेनस्यास्वादने हेन्नि निर्यातऽमृनशब्दयोः" इति धैगयन्ती। भाश्यासयति सान्त्वयति श्वस् प्राणने णिजन्तालिट् ॥ ३॥ भा-महाराज सुमित्र व्याकुल परिजनों से सभी वृत्तान्त जानकर चिन्ता की अधि कता से बरकमल पर कपोल रखे हुई भचपूर्ण नेपाली महारानी पसायतो के पास जाफर उन्हें अपनी सरल युक्तिपूर्ण मीठी २ यातों से समझाने लगे ॥३॥ तावत्तमम्बग्तलादवतीव्यं देव्या मित्रं दिनेन मितया रमया समेतम् ।। मुक्त्वा धिया मततसंगतया समाध भक्तुं सुमिवमिव दीधितयोऽधिजग्मुः।। तापदित्यादि। तापत् तन्मानमस्य सायन् तदाश्यासनापसरे। देव्यः देवानां भाय्यां देख्यो देयरमण्यः। सम्शरतलात् अम्बरस्य विहायसत्तलन्तपोतन्तस्मात् व्योमप्रदेशात् । - . तृतीय सर्गः। भवतीयं अवतरण पूर्व पश्चात्किश्चिदित्यवतीर्य आपत्य । दिनेन दिवसेन त्रिशइटिका- मिरित्यर्थः। मितया मीयतेस्म मिता तया प्रमितया । रमया लक्ष्म्या । समेतम् संयुतम् । मित्रम् सूर्यम् सखायम्बा । मुक्त्वा त्यक्त्वा सततसंगतयाअनवरतयुतया। श्रिया सम्पदा। सनाथम् युक्तम् । तं सुमित्रम् सुष्ठ मित्रः सुमित्रस्तम् विशिष्टरवि शोभनसुहृदं सुमित्र- महाराजम्बा "मित्र सुहृदि मित्रोऽर्फे" इति विश्वः। भक्तम्भजनाय भक्तम् सेवितुम् । दीधितय इव धु तय इच। अधिजग्मुः अधिगच्छन्तिस्म । गम्लगती लिट् । सहस्रकिरणस्य किरणा दिनमात्रप्रमिताधितत्वात् तं त्यक्त्वा सुमित्रनरेन्द्र श्रयन्ति वेतिदेव्यः उपजग्मुः -रितिभावः। उत्प्रेक्षालंकारः॥४॥ भाए. अ०-इतनेही में आकाश से देवांगनायें मानों किरणों के समान केवल दिन भर साथ देने घाले मिन (सूर्य) को छोड़कर सदा सहचरी लक्ष्मी से युक्त सुमित्र महाराज के निकट आई ॥४॥ भूपोऽथजीवजयनन्दपदारपदास्यारताः प्राञ्जलीरभिनिरीक्ष्य विलक्षचक्षुः । प्राप्तासनेषु विनिवेश्य मुदेदमूचे प्राप्ता:किमत्र सुरलोकसुखैकसाराः ॥५॥ भूपात्यादि। अथ अनन्तरे । विलक्षचक्षुः विलक्षे चक्षुपी यस्य स विलक्षचक्षु विचि. प्रोपेतनयनः । "विलक्षो विस्मयान्वितः" इत्यमरः । भूपः भुवम्पाति रक्षतीति भूपः सुमित्र. नरेन्द्रः। जीवजयनन्दपदास्पदास्याः जीव जीवतात् जीवप्राणधारणे लोट जय सर्वो. कर्पण वर्तस्व जिजि अभिभवे लोट् नन्द समृद्धो भव टु नदु समृद्धी लोट “उदित्वात्" नम् जीवेति जयेति नन्देति पदानि जीव जयनन्दपदानि तेषामास्पदं निलयः भास्यमुर्ख यासान्तास्तथोक्ताः । जीवेत्याद्याशीर्वादशदाधाराल्याः। प्राञ्जलीः प्रकृयोऽअलि- यासान्ता कृतकरफुड्मलाः। “ती युवतावञ्जलिः पुमान्" इत्यमरः । ताः देवकामिनीः। अभिनिरीक्ष्य अवलोक्प। प्राप्तासनेषु प्राप्तानि च तान्यासनानि च प्राप्तासनानि तेषु दत्तोचितासनेषु। विनिवेश्य उपस्थाप्य । सुरलोकसुखैकसाराः सुराणां लोकस्तुर- लोकस्तस्य सुखमानन्दस्तेनैका मुख्यास्ताच तास्ताराश्च तथोक्ताः स्वर्गसौख्य. फेवलनिर्यासाः यूयम् । “एके मुख्यान्यकेवलाः। सारो बले स्थिरांशे च न्याय्ये सोये घरे त्रिपु" इत्यमरः । अत्र अस्मिन्नत्र इह भुवि । किम् किं कारणम् । प्राप्ताः प्राप्नुवन्तिस्म प्राप्ताः शायाताः । इति एवं एतद्वचः । मुदा हर्षेण । ऊचे व्रतेस्म पूज व्यक्तायां चाचि लिट् । “अस्तित्र बोभू चौ" इति वचादेशः "श्च्यादिस्यन्यन् किति" इत्यनेन या इक् ॥५॥ भा0 10-चिरंजीयो हो, जयशाली हो तथा प्रसन्न रहो इत्यादि यवनों को उचारण - ५२ मुनिमुनतकाव्यम् । करती हाय जाहे हुई उन देवांगनाओं को आश्चर्य-भरी दृष्टि से देख कर तथा समुचित आमनों पर बैठा कर महाराज सुमित्र ने उनसे पूछा कि स्वर्गसुख की सारभूत आप यहाँ कसे आयीं ॥५॥ अाकर्ण्य वाचमिति तस्य सुरांगनाभि: श्रीरीहिता कथयदागमहेतुमेवम् ॥ मन्दरिमाद्विगुणमंजुलवामसूनवर्त्यत्फलं क्षितिपतेरिव सूचयन्ती ॥६॥ भाकपत्यादि । तस्य सुमित्रराजस्य । इति एवम् । वावर वाणोम् । भाकण्यं श्रुत्वा । सुरांगनामिः सुराणाम गनास्तयोकालाभिः सुरसामन्तिनीमिः। ईरिता ईर्यतेस्म ईरिता- प्रेरिता | श्रीः श्रादेवो। मन्दस्मितद्विगुगमनुलवाक्प्रसूनः मन्दश्च तत् स्मितञ्च मन्दस्मितान्द्रो गुगो येपान्तानि द्विगु गानि मन्दस्मितेपद्वसनेन द्विगुणानि तयोकानि चाच एवं प्रसूनानि कुसुपानि तथोक्कानि "प्रसून पुष्पफटयो." इत्यमरः। मंजुलानि मनो. शानि च तानि वाक्प्रसूनानि च तथाकानि “मना मंजु मंजुलम्" इत्यमरः । मन्दस्मित- द्विगुणानि च तामि मंजुलवामपूनानि च तथोकानि मन्दस्मितानि वाक्प्रसूनानि च तानि मिलिनत्वात् द्विगुगानीत्यर्थः। वपत्फलं यस्तोति वीत् भविष्यत् तच तत्फलं च तथोक्तम्। शिनिपते क्षित्या पतिः तस्य सुमित्रावनोदस्य। सूचपन्तीय सूत्रयतीति सूचयन्ती सेव- लता यथा प्रसूनयिष्यत् फलन्तयेयमपि ज्ञापयन्तीव । भागमहेतुम् आग- मनमागमस्तस्य हेतुस्तम् निजागतनिमित्तम् । एवम् वक्ष्यमाणप्रकारेण । भकथयत् अग्यात् । कथ याययप्रवन्धे लङ्॥६॥ भा० अ०-सुमित्र महाराज की यह बात सुनकर तथा भौर देवांगनाओं से प्रेरित होकर श्रदेयी ने मन्दहास्य से द्विगुणित मधुर भाषण रूप कुसुम-वर्षण राजा का भावी फल कहती हुई इस प्रकार अपने भाने का कारण कहा ॥६॥ भूपार्य्यखण्ड इह भूविदितऽङ्गदशे चम्पापुरे नृपवरो हरिवर्मनामा ॥ यासीद्यश:कवचितावनिरस्रधारासंप्लावितारिनृपतद्वनितावितानः ॥७॥ भूप इत्यादि । भूप भो सुमित्रनृप। इह अस्मिनिह । भार्यखण्डे आणि खण्डं भूभाग भायखण्डन्तस्मिन् धर्मखण्डे "मित्तं सकलखण्डे या" इत्यमरः । भूविदिते भुवि विदितस्त. स्मिन् भुवनप्रसिद्ध "वुद्ध' युधित मनितं विदितम्" इत्यमरः। अंगदेशे अंगश्वासी देशश्च तथोक्तस्तस्मिन् अग इति पा देशस्तस्मिन् । चारापुरे चम्पेति पुरन्तस्मिन् । यश फर्वाचतायनिः यशसा कोत्रयां फरविता घम्मिता नोका सारणिः क्षिनिर्यस्य स तथोक्तः कीर्तिव्याप्तभूनलः । अखबारासप्लाषितारिनुपतवनितावितानः मन्त्र रक्तम. द्वारा मानों नृतीयः सर्गः शुच "अनमश्र णि शोणिने नि विश्वः। अपश्चानमोति अत्रे "सुप्यन्येये" इत्ये. पोष: अप्रयोर्धारा नोयना धरयो रिपाच ते नृपाश्व तमोक्ताम्तेषां नितान्तद्धनिता अरि. मृपाश्च तदनिताश्चेत्यरिनृपतद्धनिता: नामां वितान ममूहः "पितानो गाविस्तारोलो. चे वृत्तमेदाधसरयोः" इति विश्वः । धनधाग्या मधिगधागा पापामुधारया च साविन सादरसमरिनृपनवनितावितान यस्य म तयोतः रक्ताद्रीयतशयुनिया भ्रसादीरत- तवनितानिवहश्चेत्यर्थः । हरिवर्मनामा हरिवर्म नाम यम्यामी हरिबर्मनामा । नृपयरः नृपेषु धरो नृपवरो नृपश्रेष्ठ इत्यर्थः । भासीन् अभवन् गम भुवि लट् । भतिशयालंकारः ॥७॥ मा० १०-हे राजन् ! इस लोक प्रसिद्ध आर्यपएट के अंगदेश के अन्तर्गत चंपापुर नगर में यश से भूमण्डल को भाच्छादित किये हुआ तथा शत्रुभून गजामों की स्त्रियों को उनकी अश्रु धारा से सित करनेवाला एक नृपष्ट हरिया नाम का राजा Arton ज्ञात्वा जिनाज्जननदुःखमनन्तवीर्यादेपोऽवगीतभवभोगशरीरंगगः ।। मत्या तृणाय निजराज्यपदं मनीपी नत्पादयोः किल बभार जिनेन्द्रमुद्राम् ।। जात्येत्यादि । मनीपी फोवियः । “धोरोमनीपी मामः" इत्यममा एप अयम् हरियम्मा । मनन्तवीर्यात् अनन्तमनयमान पीयं यस्य स नस्मात् । जिनात् दुर्जयकर्मठकम्मांगतीन जयति निमूल यतीति जिनस्तस्मात् । जननदुःपम् जनगस्य जन्मनो दु.गम् जननदुर्ग संसार. जनितम् । भारया विजाय। अवगोतमयमोगशाग्गगः गयथ भोगध शरीरञ्चेति भरमोगशरीराणि तेषां तेषु या गगो पिरागस्लयोक्तः गरगोनः फुट दिनी मनमोग- शरीररागोन सनयोक्त: “मगीनः यातगण 'त्यमरः निरम्नर्ममारमोगशरीरानुराग त्ययः “मायो मयच संसार: संपरणं च मंएलि: । नरमधनुरोधोरस्त्यजेन्नम्माजवजयम्" इनि धनंजयः । निजराज्यपदम् शोभायः एत्यम्मा राज्यन्तस्य पद राज्याद निजस्य भ्यम्य राज्यपद तपोतम् । हणाय मन्या मृणं मत्या तृणादपरमत्येत्यर्थः कादि इत्यादि धर्मणि धनुर्वी 1 तत्पादणे नस्य पादी तत्वदा तयोस्न पादयोः अनन्तयी. मशिनम्य पादयोः । जिनेन्द्रमुदाम् जिनानामिन्दानम्यामनादिक्षीणायायमानेपदेश. मिनानामीशम्याई तो मुदा तयोका सामूदिगम्यरमुताम् । गालि फिलदायित्ययः । भृम माणे लिट् । मत्र यिरागाय गयमोगशरीरमेदारिध्यमिप्यते ॥८॥ मा०1०-मनस्यो हरियमा राजा में मनालयोर्य मुनि में जन्मजन्य दुखों को जान कर मोहमायादि शारीरिक विपश्याममा यो पाना गा को मारकर उन मुनिमदागज की सेवा में हिनदीमा पार पाation “मन्ययावा.

एपः मुनिसुपतकाव्यम् सन्त्यक्तसर्वविपयोऽप्यवरोधमुक्तोऽप्येकाक्षरक्षणपरोऽप्यनिशं यतीशः ॥ सम्भक्तसर्व विषयोऽजनि साबरोधः पञ्चाक्षनिग्रहपरः परमेप चित्रम् ॥९॥ सन्त्यक्त्यादि। अयम् हरिवा। सन्त्यक्तमर्चविषयोऽपि सर्वेचते विषयाश्च सविषयाः सन्त्यकाः सर्वविपया येन स तथोकः सर्वपञ्चन्द्रियविषयरहितो. ऽपि। सम्भक सर्व विषयः सम्भकाः सर्व विषया येन स सयोकः संसेपितविश्यजन- पदः "विषयः स्यादिन्द्रियार्थे देशे जनपदेऽपिच" इति विश्वः । अवरोधमुक्तोऽपि टावरोधस्सम. वरोधस्तेन मुक्तस्त्यकोऽपि अन्तःपुरहितोऽपि। सावरोधः अवरोधेन सह वर्तत इति साबरोधः दुष्कर्मसम्बरमहितः । “अबरोधस्लिगेधाने शुद्धान्ते राजयेश्मनि" इति विश्वः । एकाक्षरक्षण- परोऽपि एफमक्षमिन्द्रियं येपान्ते तथाका एकेन्द्रियप्राणिनस्तेषां रक्षणन्तथोक तस्मिन् पर- स्तत्पर एफेन्द्रियजीवपालनशक्तोऽपि पिचानिग्रहपरः पञ्च चतान्यक्षाणि च पञ्चाक्षाणि पां स्पर्शनादीनां निग्रहः स्वविषयासंचरण तस्मिन् परस्तत्परः । “मक्ष कर्व तुपे च शकटे व्यवहारयोः । आत्मज्ञ पाशके चाक्षं तुत्यसौवर्चलेन्द्रिये" इति विश्वः। परं केवलम् ।"परोऽरिः परमात्मा च केवले परमव्ययम्" इति भास्करः। अजनि अजायत। जनैङ् प्रादुर्भावे कर्त्तरि लुङ्॥ चित्रम् अद्भुतम् । अत्र मेत्यतमर्वविषयस्य सम्भकसर्वविषयत्वम् अवरोधमुक्तस्य सावरोधत्वम् एकाक्षरक्षणपरस्य पञ्चाक्षनिग्रहत्वं च विरक्षम् तत्परिहारोऽर्थान्तरेण निश्चितमिति भावः। विरोधाभासालंकारः॥६॥ भा० अ०-आश्चर्य की यात है कि, उक्त मुनिमहाराज विषयों को त्यागकर भी सभी विषयों ( संसार के सभी जनपदों) की सेवा (मलाई) करने वाले, अवरोध ( अन्तःपुर) से मुक्त होने पर भी अवरोध ( दुष्कर्मों का सम्बर ) के साथ रहने वाले तथा एकाक्ष (एकेन्द्रियजीच ) के रक्षक होते हुए भी पंचाक्ष (पंचेन्द्रियों ) को दमन करनेवाले थेnen कुर्वस्तपो जिननिरूपितलमलक्षीभूतं प्रभृतविनयो विविधं मुनीन्द्रः ॥ एकादशांगकुशलोऽजनि हेतुयुग्मसामग्र्यसंजनिततीर्थकरत्वपुण्यः ११० कुर्वन्नित्यादि । जिननिरूपितलक्ष्मलक्षोभूतम् जिनेन निरूपित जिननिरूपित तय तल्लक्ष्म घ जिननिरूपितलक्ष्म प्रागलक्षमिदानी लक्ष भवतिस्म लक्षीभूतम् “चिह्न लक्ष्म व लक्षणं । लक्ष लक्ष्यञ्च इत्युभयत्राप्यमरः । जिननिरूपितलक्ष्मणो लक्षीभूत तथोकम् जिनप्रणीत चरणानुयोगलक्षणस्य लक्ष्यजातमित्यर्थः । घिविधम् नामाप्रकारम् । तपः इच्छानिरोध. स्तप इति पारिवाज्यम्। कुर्वन् करोताति कुर्वन् । प्रभूतविनयः प्रभूता यहुलो घिनयो यस्य स सपोक्तः प्रचुरमानादिविनयवान् । "प्रभूतं प्रवरं प्राज्यम्"इत्यमर. । मुनोन्द्रः मुनीना- MIM कृतीयः सर्गः मिन्द्रो मुनीन्दो मुनिभेष्ठ इत्यर्थः । एकादशांगकुशलः एकेनाधिका दश एकादश तानि च तान्यंगानि चैकादशांगानि आचारांगादीनि तेषु कुशलः प्राज्ञस्तथोक एकादशांग- शुतवेदीत्यर्थः । हेतुयुग्मसामग्यसंजनिततीर्थकरत्वपुण्यः हत्योर्याद्याभ्यन्तरसाधनयो- युग्म छन् तस्य समग्रस्य भावः ' सामग्यं साकल्यन्तथोक्तम् तेन संजनितं समुद्भूतं तत्राद्यो हेतुर्दशनविशुद्ध यादिरितरस्तु फेवलिनः श्रुतकेवलिनो चा सन्निधिः तीर्थ करोतीति तीर्थ करस्तस्य भावस्तीर्थकरत्वम् तय तत्पुण्यञ्च तथोक्तम् तीर्थकरत्वस्य नामकर्मेत्यर्थः । "तीर्थ प्रवचने पाने लब्धाम्नाये विदाम्बरे । पुण्यारपये जलोत्तार महासत्ये महामुनी" इति धनंजयः। हेतुयुग्मसामग्र्यसंजनितं तीर्थकरत्वपुण्यं यस्य स तथोक्तः । अजनि अजा- यत । जनैङ् प्रादुर्भावे कर्तरि लुङ् ॥ १० ॥ मा० भ०-जिन-प्रणीत चरणानुयोग की लक्ष्यभूत अनेक प्रकार की तपस्या करते हुए एकदशांग श्रुत के मर्मज्ञ मुनि महाराज ने अन्तरंग और बहिरंग साधनों की अधिकता से तीर्थङ्कर नाम फर्म का बन्ध किया ॥१०॥ अन्ते समाधिविधिसात्कृतदेहभारः स्वःपाणते तदभिधानविमानमध्ये ॥ स प्राणतेन्द्र इति सेन्द्रपतिबभूव लोकेपु तप्ततपसां किमसाध्यमस्ति ।११॥ अन्त इत्यादि। सः हरिया। अन्ते आयुरवसाने । समाधिविधिसात्कृतदेहभार: समाधेर्विधिस्समाधिविधिः समाधिविधायधीन क्रियतेस्मेति समाधिविधिसात्कृतः देह एव भारो देहमारः रूपकः समाधिविधिलात्कृतो देहमारा येन स तथोक्तः तत्राधीनार्थ सात्प्रत्ययः समाधिविधानेन स्वायत्तोकृतशरीरभार इत्यर्थः । "समाधिनियमे ध्याने नीचाके च समर्थने" इति विश्वः । प्राणते प्राणतनाम्नि । स्वः स्वर्गे। "स्वरव्ययम्" इत्यभिधानात् सर्वत्र सदृर्श रूपम् । तदभिधानविमानमध्ये तदेवाभिधानं यस्य नत् तच तद्विमानञ्च तदभि- धानविमातं तस्य मध्यं तदभिधानविमानमध्यम् तस्मिन् प्राणतनामध्यविमानमध्य इत्यर्थः। प्राणतेन्द्र इति प्राणतस्येन्द्रःप्राणतेन्द्रः स इति । सेन्द्रपतिरिति सन्द्राणा देवाना- म्पतिः सेन्द्रपतिः सुरेश्वर इत्यर्थः "निलिम्पाः स्वर्गिणः सेन्द्राः" इत्यभिधानात् । बभूव जज्ञे भूसत्तायां लिट् । तथाहि लोकेषु जगत्सु। तप्ततपसाम् तप्यतेस्मेति तप्त तप्त तपो येपा. न्ते तप्ततपसस्तेपान्तप्ततपसां योगीन्द्राणाम् । असाध्यम् न साध्यमसाध्यममाप्यम् । किमस्ति न किमपीत्यर्थः ।। अर्थान्तरन्यासः ॥११॥ भा० अ०-अन्त में वे मुनिराज समाधिमरण से शरीर त्याग कर प्राणत-स्वर्ग के प्राणत नामवाले विमान में प्राणतेन्द्र नाम के देवेन्द्र हुए। उत्तम तपस्वियों के लिये संसार में कोई वस्तु अलभ्य नहीं है ।। ११ ।।

मुनिसुव्रतकाव्यम्
मासानतीत्य पडयं गुडनिविशेषीभृतेतविंशतिनदीपतिसम्मितायुः ॥
सूनुभविष्यति च तेऽतुलपुण्यराशेस्तीर्थस्य विंशतितमो भविता च कर्त्ता १२
मासानित्यादि। गुडनिर्विशेषीभूतेतविंशतिनदीपतिसम्मितायुः प्रागनिर्विशेषमिदग्नी
निर्विशेषम्भवतिस्मेति निर्विशेषीभूतम् सदृशमित्यर्थ गुडस्यक्षुपाकस्य निर्विशेषी.
भूतं तथोक्तम् पतिस्म इतं गतं नदीनाम्पतयो नदीपतयः नदीपतय इव नदीपतयो विंशति
नदीपतयस्तथोकास्तैस्तम्मितं प्रमिनं विशतिनदीपतिसम्मितं गुडनिर्विशेषोभूतञ्च
तदितश्च तथोक्तम् तच विंशतिनदोपतिसम्मितमायुर्यस्य स तथोक्त: गुडपत्सुख-
प्रदत्वेनय गलिनविंशतिमागरोपमायुष्मानित्यर्थः । अयं हरिषर्मचरः प्रागतेन्द्रः।
पणमासान पर्वार्धम्। अतीत्य अत्ययनं पूर्व पश्चारिकश्चिदित्यतीत्य अपसायं । विशति-
तमः विंशतः पूर्णा विशनितमः मुनिसुवाजिनः। तीर्थस्य धर्मस्य प्रवचनस्य या
कर्ता प्रभुः। भविता भविष्यताति मविता तृप्रत्ययः भविष्यनित्यर्थः । भतुलपुण्यराशेः
म विद्यते तुला यस्य सोऽतुल: पुण्यानां राशिः पुण्यराशिरतुलः पुण्यराशियस्य स
तयोक्तस्तस्य अनुपमेयसुस्तोत्करस्य अतुलः पुण्यराशिर्यम्मात्तस्येति तीर्थस्य घा विशे-
पणम् । ते तव । सूनुः नन्दनः । भविष्यति जमिप्यते । भूसत्तायां लुट् ॥ १२॥
मा० अ.-रस-पाक के स्वादुनुल्य सुखपूर्वक व्यतीत होती हुई यीस सागर
प्रमाण को भायुवाले ये पाणतेन्द्र, छः मास के बाद से तुम्हारे जेमे पुण्यात्मा घर अवतीर्ण
होकर मुनिसुवत नाम के घीस तीर्थङ्कर होंगे॥१०॥
तरमादयं जिनपतेर्भुवनेकवन्द्यपादारविन्दयुगलस्य भविष्यतोऽये ॥
दास्यं विपुण्यजनदुर्लभमद्ययाता मातुर्विधातुममरेश्वरशाशनेन ॥१३॥
तस्मादित्यादि । तस्मात् पारणात् । भुवनेषयन्यपादारधिन्दयुगलस्य पादायेचारपिन्दे
पादारविन्दे तपोयुगलं तथोक्तम् भुयने एष यन्ध भुवनेषयन्ध भुवनेकघन्य पादारविन्दयुग
यस्पस सस्य । भन्ने पुरयिष्यतःमयिष्यतीनियिष्यन् तस्य । जिनयतः जिनधासोपतिश्च
सयोतः जिनाना पतियां तस्य मुनिसुपतस्यामिनः। मातुः जनन्या: पभापत्याः । विपुण्यजन.
दुर्लभम् यिनष्टं पुण्यं पंपान्त पिपुण्या:पिपुण्याश्चत जनाश्च सथोक्ताः दुःखेन महताकप्ठेन
लभ्यत इति दुर्लभम् सुरतियिहितलोकालभ्यम् । दास्यम् दासस्यमायोदास्यम् किपरत्वम्
अमरेश्वरशामनेन भमराणामीश्वरस्तधोकम्तम्य शासन तन देवेन्द्रालया। "शासनं राज.
दसोव्या लेवामा शास्त्रशास्त्रिय इति विश्ः। रिधातुम् विधानाय विधातु फत्तुम् । अयम्
ध्यादयोऽमात्रियः। मय अस्मिन् पाले भय दानीम् । याताः मागताः ॥ १३॥

तृतीयः सर्गः। : ५७ । भा० भ० -इसीलिये इन्द्रमहाराज की आशा से हम सब आज उस भावी तीर्थङ्कर महाराज की पूज्य माता की सेवा-जो बड़े बड़े पुण्यात्माओं को भी दुर्लभ है करने को आई हैं ॥ १३॥ इत्थं तदीयमुखचन्द्रमसरसमुद्यद्वाक्चन्द्रिकाम् श्रुतिपुटेन निपीय सद्यः॥ चेतस्ययाप चपलेक्षणया समेतो भूपश्चकोर इव भूरितरप्रमोदम् ॥१४॥ इत्यमित्यादि। चपलेक्षणया चाले चञ्चले ईक्षणे यस्यास्ता तया चञ्चललोचनया पद्मावत्या चकोय्यां च । समेतः समेतिस्म समेत: सहितः । भूपः सुमित्रनरेश्वरः। इत्था अनेन प्रकारेशोत्यम् उक्तरीत्या । तदीयमुखचन्द्रमसः तस्याः श्रीदेव्या इदं तदीयं "दोश्छ" इति छ प्रत्ययः । तत्र तत्तदीयमुखञ्च तदेवचन्द्रमास्तस्मात् । “चन्द्रमाश्चन्द्र इन्दुः" इत्यमरः। समुपदुवाक्चन्द्रिकाम् समुदेतीति समुयती बागेव चन्द्रिका याचन्द्रिका समुद्यतो चासो वाचन्द्रिका च तथोक्का ताम् समुत्पद्यमानज्योत्स्नाम् रूपकः । चकोर इय चकोर पक्षी इव उपमा। ध्रुतिपुरन श्रुतिरेवपुर तथोक्तन्तेन श्रोत्रपात्रेण । निपीय पीत्वा । सद्यः तस्मिन् काले सद्यः। चेतसि चित्ते । भूरितरप्रमोदम् प्रष्टो भूरिभूरितरः भूरितरश्चासौ प्रमोदश्च तथोक्तस्तम् बहुतरतोपम् । अवाप ययौ आप्लव्यासो लिट् ॥१४॥ भा० अ० --चंचल नेत्रवाली चकोरी रूप पदाचती से युक्त चकोर के समान सुमित्र महाराजाने उन देवांगनाओं के मुखरूप चन्द्रमा से निकली हुई बधन रूपी चन्द्रिका को पान कर तत्क्षण अपने चित्तमें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त की ॥ १४॥ भृमीपतेरनुमताभिस्थामराणां भ्रूवल्लरीविलमनेन विलासिकाभिः ॥ भृपालमौलिदयिता भृतसम्मदाभिर्भूलोकसेव्यचरणाम्बुरुहा सिपेवे ॥१५॥ भूमीपतेरित्यादि । अध अनन्तरे । भूमीपतेः भूम्याः पृथिव्याः पतिः स्वामीतस्य सुमित्र. भूभुजः। 5वल्लरीविलसनेन भ्रवावेव बल्लय्यौँ मम्जी भ्रूवल्लय्यौँ तयोविलसन तेन भूविक्षेपण। अनुमताभिः अनुमन्यन्तेस्मेत्यनुमतास्तामिः सम्मताभिन्नू भंगेन तत्से- पार्थप्रेरिताभिरित्यर्थः। भृतसम्मदाभिः भृतरसम्मदो याभिस्तामिः धृतहर्षाभिः । अमराणाम् देवानाम् । विलासिकाभिः चिलासिन्य एव विलासिकास्ताभिः सीमन्तिनोभिः। भूलोकसेव्य. चरपाम्बुरुहा भुवि विद्यमाना लोका भूलोकास्त:सेय चरणाम्बुल्हे यस्यास्सा तधोका भूज. नाराध्यपादकमला। भूगलमौलियिता भुव पालयन्ति रक्षन्तोति भूपाला: मौलिरिय मौलिः श्रेष्ठः भूपालानां मौलिस्तथोक्तस्तस्य सुमित्रनरेश्वरस्य दयिता पद्मावती देवी 'सयोक्ता । सिषेवे सेव्यतेस्म पेवृ संयने लिट् ॥ १५ ॥ ।

मुनिसुव्रतकाव्यम् । भा० ०-इसके बाद सुमित्र महाराज की आँखों के इशारे से अनुमत तथा अत्यन्त प्रसन्न वेदेवांगनायें संसार के सभी लोगों के पूजित चरण कमलयाली राजमहिषी पना. वती की सेवा करने लगी ॥१५॥ साधः कयाऽपि विधृतस्य सुरेन्द्रनीलच्छत्रस्य चारुवलयस्य महौषधीव ।। रेजे प्रकाण्डरुचिरस्य सुरुद्रमस्य धारान्तरस्य च घनस्य तटिल्लतेव ॥१६॥ सेत्यादि । कयाऽपि देवयनितयाऽपि । विधृतस्य भृतस्य । चारुवलयस्थ चारु सुन्दरं चलयं वृत्तं यस्य तथोक्तन्तस्य। सुरेन्द्रनीलच्छत्रस्य सुरेन्द्रनोलेन इन्द्रनीलरत्नेन निर्मितं छत्रमातपत्र' तथोक्तस्तस्य । अधः अधोभागे । सा पद्मावती देवी। प्रकाण्डरुचिरस्य प्रकाण्डः शाखाभिः रुचिरों मनोरमस्तथोक्तस्तस्य "प्रकाण्डो विटपे शस्ते मूलस्कन्धान्तरे तरी" इति विश्वः । सुरगुमस्य सुराणां द्रुमस्तथोक्तस्तस्य कल्पवृक्षस्य। अधः अधस्तले । मदोपधीय महती चासाबापधी व तथोक्ता सेव संजोवनवत्। धारान्तरस्य धाराणां जलधाराणामन्तरे विद्यमानोधारान्तरस्तस्य आसारमध्यगतस्य घनस्य मेघस्या अधः अधर- देशे। तटिलनेव तटितो लता नटिदेव लता वा सा तथोक्ता सेव विद्य वल्लीव । जे घमी राज दीप्ती लिट् । राशी महीपधी तटिल्लता व दीपाङ्गत्यात् गिथः समान इति भावः । उत्प्रक्षालंकारः ॥१६॥ भा० अ०-किसी देवांगना से लगाये गये सुन्दर वृत्ताकार तथा इन्द्रनील मणि जटित छन फे नीचे पमावतो शाखोपशाखा से सुमनोहर फल्पवृक्ष के नीचे संजीवनीपधी के समान शोभती थी॥ १६ ॥ दिव्याङ्गनावधुतचामरलालिताङ्गा तिष्ठन्त्यसावरुचदुन्नतरत्नपीठे ॥ लक्ष्मी सुधाब्धिचटुलोमिहतेव शेषे चान्द्रीकलेव शरदभ्रचितोदयाद्रौ॥१७॥ दिव्याङ्गनेत्यादि । उन्नतरत्नपीठे रत्नै निर्मित पीठं रनपीठ उन्नतश्च तद्रतपीठञ्च तथोक्त- न्तस्मिन् उत्तुङ्गमाणिक्यासने। तिष्ठन्ती तिष्ठतीति तिष्ठन्ती। दिव्याङ्गनायधुतचामरलालि. ताजा दिवि भवा दिव्यास्ताच ता भेडनाश्चेति दिव्याङ्गनास्ताभिरवधुतानिध तानि चामरा. णि च दिव्याङ्गनायधुतचामराणि तैलालितमङ्गं यस्यास्सा तथोका देवत्रीसुक्षिप्तप्रकीर्णक. शोभिताङ्गा । “भङ्ग गात्रान्तिकोपायप्रतीकेप्वप्रधान" इति विश्वः । असो पमावती। शेष महाशेपे "शेपोनन्तो धासुकिस्तु सर्पराजः' इत्यमरः । सुधाब्धिचटुलोर्मिदता सुधारूपो. ऽधिः सुधाब्धिश्चटुलाब्धता उर्मयस्तथोक्ताः सुधाग्यश्चटुलोर्मयस्ताभिहता तथोका क्षीरो. दधिच चलतरङ्गप्रोता ! लक्ष्मीरिवधीरिव । उदयाद्री उदयस्यादिन्दयादिस्तस्मिन् पूर्वाचले । शरदनचिता शरदोऽन शरदन तेन चीयतेस्मेति चिता शरत्कलानाश्रिता। चान्द्री चन्द्रस्येयं तृतीयः सर्गः । चान्द्री सुधासम्बधिनी। कलेव कलावत् । "कला स्यान्मूलविवृद्धौ शिल्पादावंशमात्रके। पोडशांशे च चन्द्रस्य कलनाकालयोः कला" इति विश्वः । अरुचत् रोचतेस्म । रुच्दीप्तो लुड् उत्प्रेक्षालंकारः। भा० 46--उन्नत रत्नजटित सिंहासन पर बैठी हुई तथा देवांगनाओं से लगाये गये छत्र से समुद्रासित शरीरवाली पद्मावती शेष नाग के ऊपर क्षीरसमुद्र की चंचल तरंगों की उछाल पाती हुई लक्ष्मी के समान और उदयाचल पर्वत पर शरत्कालीन निर्मलाकोश में उगी हुई घाँदनी की सी शोमती थी॥ १७॥ सा कुंकुमेन परया कुचयोविलिप्ता कपूरक्लप्ततिलका निटिले चकासे ॥ मम्बद्धकुन्तलभरा शिरसि हिरेफव्याप्तेव पल्लवितपुप्पितकल्पवल्ली ॥१८॥ सेत्यादि । परया अन्यया देवस्त्रिया । कुचयोः स्तनयोः । कुकुमेन काश्मीरेण । विलिप्ता विलिप्यतेस्मेति विलिप्ता । निटिले ललाटे। कर्पूरफ्लृप्ततिलका कपूरेणफ्लृप्त तिलकं यस्या. स्सा तथोक्ता घनसाररचिततिलका।शिरसि मस्तके। सम्पदकुन्तलभरा कुन्तलानां भरस्तथोक्तः सम्बध्यतेस्म सम्बद्धः सम्पद्धः कुन्तलभरो यस्यास्सा तथोक्ता नन्दितशिरोरुहातिशया। "भरो. ऽतिशयभारयो ” इति नानार्थरत्नमालायाम्।सा पद्मावती देवी । द्विरेफव्याप्ता द्विरेफेर्याप्ता भ्रमरैराश्रिता पल्लवितपुष्पितकल्पवली पलवः संजातोऽस्या इतिपल्लविता पुष्पं संजातमस्या इति पुष्पिता सा चालो कल्पवल्लो च पुष्पितकल्पवल्ली पल्लविता चासौ पुष्पितकल्पवल्ली च तथोक्ता कुकुमलेपनेन पल्लवितेव करितिलकेन पुप्पितेव कुन्तलभरेण द्विस्फव्याप्तकल्पवल्लीय चकासे घमासे काटदीप्तौ लिट् । उत्प्रेक्षालंकारः ॥ १८ ॥ भा० भ-किसो दूसरी देवांगना द्वारा दोनो कुचों पर कुंकुम और ललाट पर कर्पूर तिलक लगाये हुई तथा वेणी यांधे हुई महारानी पद्मावती भ्रमरों से परिवेष्टित पल्लवित और पुष्पित कल्पवल्लो के तुल्य शोभती थीं ॥१८॥ तस्याः शिरोरुहभरे विनियोज्यमानं कृष्णां कयाऽपि चमरीरुहमावभासे ॥ तापिच्छकच्छमुपसर्पदिवान्धकारं निलाजकुञ्जमुपयन्निव मुंगराशिः ॥१६॥ तल्या इत्यादि । तस्याः पमावत्याः। शिराहभरे शिरसि रोहन्ति इति शिरोरुहास्तेषां भरस्तथोक्तस्तस्मिन् कुन्तलसमूहे। कयापि देवस्त्रिया। विनियोज्यमानम् निक्षिप्यमाणम्। कृष्णम् श्यामलम् । चमरोगहम् आरोहतोत्यारोहश्चमर्यामारोहश्चमरोरुहस्तम् । तापिच्छक. च्छम् तापिच्छास्तमालाः “कालस्कन्धस्तमाल: स्यात्तापिच्छोऽपि" इत्यमरः । कच्छो वन प्रत्युक्तं च राघवपाण्डवीये "कच्छान्तरेषु मरुतः इतपुष्पवासा” इति । तापिच्छाना कच्छ- 1 मुनिसुव्रताव्यम् । -स्तयोकस्तम् नमाल ताजम् । उपमर्पत उपमर्पतीत्युपसर्पत् ममाप्रयत् । गन्धकारमय अन्ध करोनोस्यत्यकारस्तम् ध्यान्तमिय। “भन्यकारोऽसियां ध्वान्तम्" इत्यमरः ।नोलाज कुलम् नोलानि च नान्यजानि ते कुस' नधोनम् नोलोत्पलाडम् । उपयन् उपती. स्युपपन् उपगया। भृगराशिरिष भृगाणां भ्रमराणां शिम्ममुदस्तधोक्तः सह सायमामे रे भाग दोती लिट। उत्प्रेक्षालंकार:१६॥ मा. म. - महागा पायी. फेरागुप में किसी अन्य देशोगमा से लगाया गया घमणे का काला पाल समालोपनाना मन्धकार के समान तथा मोलपामाद के कुंभ में महान हुए भ्रमर ममूर के समान हात होना था ॥ १६॥ कपुरमीनिकम्वगेन्द्रमग्गिप्रकृप्तम्नाटकहाग्यलयरपगेपनीनः । दिगडीरित: क्यचन युयुदिनः पग्न शवालिनाक्यनिदाटो मुषमाधिरस्या:२० कपूरे पादि। मुरमाधिः एम्मैशन्धिः एम्माधिः देहफातिमाः। “सुम पापम मुस्मा पामय नौ" इति रिश्यः । भारोपनीत: মিসালি : भन्यायोमियत: । कर्पूरगौनियन्द्रमणिराज का मौनिय नगेजियनग्मोनिगमणपन्न सामानिनः बाग्मीकि. पदमाम पनामारगुहागरगोगामारचितः । मारहारपालः नारी हा ययानि मारहानानि में : कर्णभूगगारपण: । “पुलाय. सागो पारिभिः" जपली पान पर पनि पपना प्रदेो । गमावर सु पिन" TARI हिशेरिल मिसानोडर योग प्राष्टिीः । Misery " एपमाः परत परमम्मिनि पत्र भरपोदो। पदिशः STोगिदिश: जाना । पाविन् पोको। यालिग वाल पापा शेर सानिमाया जमातोशेगा:" यमरः । मदी पारम् । मरमगामेवाहाना बगार्थोडयो शाला: ॥२०॥ #srji.मोको ना पर मणि मे बने हुए कर्मभूषण, हार भोर मयों में शिदीमा देव सुतिन गो माता गुगमागमः ( सौन्दर निहित युन,नही दुश्मा नगा पहीं जाट पुनःप्रवीन होगाथा ॥२०॥ भामे फनव्याने व्यवनोन्यस्त्रीविवादनचलम्बिदनांगनायाः ।। यस्वेन्दुना मा.नगमभिशंक्य यातामुकापमान हर कान्निझरोग्याङ्ग:२१ थामेमा irritnाग: यानि शापित गा घामाचे। male पोस्मिन पोशामाता पितानमय प्रापि भयोग' तृतीयः सर्गः तेन चलस्तथोक्तः तंत्रीध्वनचंचलः । अन्यः कुचः दक्षिणपुचः । वयोन्दुना धपत्रमेवेन्दु. वक्त्रन्दुस्तेन वपनेन्दुना मुसचन्द्रेण । याताम् यातिस्मेति योताम् वियुक्ताम् । सहचरीम् सहचरतीति सहचरी ताम् प्राणकान्ताम् । अभिशंक्य आशंश्च । उत्कम्पमानः उत्कम्पत इत्युत्कम्पमानः विरहोद्रेकचकितः । कान्तिझरीरथाङ्गः कान्तिरेव झरी कान्तिझरी तस्यां प्रवर्त्तमानो रथाङ्गस्तथोक्तः किरणप्रवाहप्रवर्त्तमानचक्रवाकपक्षीच । "प्रवादो निर्भरो झरी" इत्यभिधानात् ई प्रत्ययान्तोऽप्यस्त्येव । व्यस्चत् व्यराजत् रुच्दीप्ती लुड् । उत्प्रेक्षालंकारः ॥२॥ भा० ०-वीणा को तुम्बीसे किसी एक देवांगना के वामकुच के ढक जानेपर वीणा. चादन से चलायमान दक्षिणकुच अपनी सहचरी चक्रवाकी को मुपचन्द्र से वियुक्त हुई मानकर फान्ति प्रवाह में प्रवाहित अत एव कम्पायमान चक्रवाक के समान ज्ञात होता था ॥ २१ ॥ ताभिर्यथावसरमित्थमुपास्यमाना सा नीततुर्य्यसबना किल तीर्थतायः ॥ शुभ्राम्बराभरणमाल्यविलेपनाच शिश्ये सुखेन रमणेन समानतल्पा॥२२॥ ताभिरित्यादि । इत्यम् भनेन प्रकारणेत्य पनत्प्रकारेण । यथावसरम् अवसरमनसिकम्य यथावसरम कालानुक्कलमित्यर्थः । ताभिः देववनिताभिः । उपास्यमाना उपास्यत इत्युपास्य. माना सेव्यमाना। तीर्थतोय: तीर्थानां तोयानि तीर्थतोयानि तेः पुण्योदः। नीततुर्य- सपना चतुर्णा पूर्ण तुय्यं “यछौ च श्श्लुक "इतिय प्रत्ययश्चकारलापश्च तुर्य्यञ्च तत्सवनश्च तथोक्त नीयतेस्मेति नीतं नीतं तुर्यसयन यस्यास्सा तथोक्ता प्रापितचतुर्थस्नाना। शुभ्रा- भ्यराभरणमाल्यविलेपना च अम्मरम्बस्त्रशाभरणच माल्यं पुष्पमाल्यञ्च विलेपनञ्चत्यम्बरा. भरणमाल्यविलेपनानि शुभ्राणि गम्परादीनि यस्यास्सा तथोक्ता अन घरनादीनां शुभ्रविशेषण. मिष्यते । सा पावती देवी। रमणेन सुमित्रनरेन्दण। समानतल्पा समान तल्पं यस्या. स्सा तधोका सदृशशयना सती। "तल्पं शय्याद्वारे" इत्यमरः। सुपेन सोएन । शिश्ये फिल सुप्याप फिल। शो स्थमे लिट् ॥२२॥ भा० भ०-उन देवांगनाओं से सेधित, तीर्थजलों से घाये दिन का स्नान किये हुई तथा सुन्दर कपड़े गहने गोर पुषमाला पहने हुई पमायती पति के साथ साय शम्या पर सोयी।॥२२॥ नाग वृपाधिपगजारिरमाच माले चन्द्रार्कमीनयुगकुंभयुगानि वापीम् ॥ शंभौनिधिच हरिपीठविमानभोगिस्थानानि रमनिकरं च विधृममग्निम् ॥२३॥ ।

तृतीयः सर्गः। नागं गजेन्द्रम्। वृपाधिपगजारिरमाश्च वृषाणामधिपो वृपाधिपो वृपमेन्द्रः गजा. नामरिस्तथोक्तस्सिंहो वृपाधिपश्च गजारिश्च रमा श्रीश्च वृषाधिपगजाग्गिास्ताः वृपमसिंहलक्षयश्च। माले माला च मालाच माले द्वंद्व कशेषः द्विवचनक्लेन माला- युगलमित्यर्थः । चन्द्रार्कमानयुगमयुगानि मीनयोर्युगं मीगयुगं फुभयोर्युगे कुंभयुगं चन्द्रश्च अश्य मीनयुगं च कुभयुगं च तथोक्तानि चन्द्रसूर्यमत्स्ययुग्मपूर्णकलशयुग्मानि । चापीम् सरोवरं । अमोनिधिं च मांसि नित्रोयनेऽस्मिन्नित्यंभोनिधिस्तं समुद्र च । हरिपीठ- विमानभोगिस्थानानि हरिभितं पीठं हरिपीठं भोगोऽस्त्येषामिति भोगिनस्तेषां स्थानं भोगिल्याने हरिपोठं च विमानं च भोगिस्थानं च तथोक्तानि सिंहासनव्यो- मयाननागेन्द्रयामानि । रत्ननिकर रखाना निकरः तथोकस्तं मणिराशिं । विधूमं विनिर्गतो धूमो यस्मात्स तं निर्धू भं। अग्नि पावकं च। एनान इमान् पोडश । सद्दशताप्रणयात् सदशस्य भावः सदृशता तस्याः प्रणयस्तथोक्तस्तस्मात् माविशेषणैः स्वस्मिन्नारोपितधर्म- स्नेहात्। "प्रणयः प्रेरिणविध भे यामाप्रसरयोरपि” इति विश्वः । स्वप्ने स्थपने। मामशः कामेण क्रमशः "वसायशसि" इति शस् प्रत्ययः । ददर्श पश्यतिस्म दृष्टप्रेक्षणे लिट् । त्रिमिः विशेषकम् । २३ । २४ । २५ । भा० अ०--पृशोदरी, ऐश्वर्यवती, सुकुमारांगी, गजगामिनी, चन्द्रमुपी, मीनाक्षी, उन्नत- स्तनी, गंभीरनाभिवाली, गंभीरता में आदर्शभूत, सुन्दरनितम्बवाली, मलरहिता, मनस्थि. नियों में शिरमार, धर्माधिपत्य प्रार किये हुई, अपने प्राणवल्लभ को सन्तुष्ट किये हुई तथा सभी देवताओं द्वारा सेवितरण समठोशली महारानी पद्मावती ने समानस्नेह के विकाश से गजेन्द्र, वृषभ, सिंह, महालक्षा, मालायें, चन्द्र, सूर्य, युगलकलश तथा मीन, सरोवर, समुद्र, सिंहासन, रथ, नागभवन, रत्नराशि तथा निर्धूमाग्नि ऐमे मोलह स्वप्नों को देखा। १३, १४ और २५ । राज्ञी विबुध्य सुरवल्छभिकासुगीतैः कादम्बिनीकलकलैरिव ककिकांता ॥ उत्थाय तल्पतलतः सुसमाप्य कृत्यं प्राभातिकं सपदि वल्लभमाससाद ॥२६॥ राज्ञीत्यादि । राशी राश भार्या राशो पायती महादेवी । सुरवल्लभि कासुगीतः सु शोभा नानि गीतानि सुगीतानि वा १२ बलमिका सुरागां बलभिकास्तथोक्तास्तासां सुगीतानि मुरवलनिकासुगीतानि तैः प्रभातप्रयुक्त: देवामगीसंगीतः । केकिकांता केकाऽस्यास्तीति केकी तस्य कांना तथोक्ता मयूरपत्नो। कादग्निीकल मलेरिय कार्दयिन्याः कलफलास्त: मेघमालाकोलाहलैरिव "कादंबिनी मेघमाला कोलाहला कलकल" इत्युमयत्राप्यमर.वियुध्य वियोधनं पूर्व पधात्किंचिदिति विवुध्य प्रमुध्या तत्पनलनः तस्य नलं तलातलं तल्पत.

-
॥
मुनिसुनतकाव्यम् ।
लातल्पतलता शम्यातलात् । उत्थाय उत्थानं पूर्व पश्वास्किंचिदित्युत्थाय । प्राभातिक प्रभा.
तस्पेदं प्राभातिक उदयकालसंधि । कृत्यं कर्तुं योग्यं कृत्यं स्नानदेवपूजादिकार्य। सुसमाप्य
सुसमापन पूर्व पश्चात्किंचिदिनि सुसमाप्य संपूर्ण अन्वा । वल्लभ माणकांत । सपदि
शोन। "दाङ् मंसु सादि द्रुते" इत्यमरः। आममाद ययौ पलविशरणगत्पवसादनेषु.
लिट् उत्प्रेक्षालंकारः ॥२६॥
भा० 10-कादम्बिनी (मेघमाला) की गंभीर ध्वनि के समान देवांगनायों के
संगीन से मयूरी के ममान प्रसन्न हो जाफर महारानी पावतो शय्या त्याग प्रातःकालीन
न्य सम्पन्न कर शीघ्र अपने प्रियतम के पास पहुंची ॥२६॥
अर्धासने प्रियनिवेशितवल्लभायै स्थित्या क्षणं श्रुतिसुखं विनिवेदितायाः ॥
स्वप्नावलेरिति जगाद फलं कुचांत दंतार्चिपा विरचयन्निव चर्चिकां सः॥२७॥
भर्यासन इत्यादि। आसनस्वार्धमर्धासन तस्मिन् “समेऽर्धम् इति समासः । प्रियनिधे.
যিশনার্য দিব বিবমিষা মিনিঘিনা না না ঘমা ব বিনিমিয়া প
माणकांतननिवेशितरमण्य । क्षण क्षगपर्यन्तम् । "कालाध्यमोयाप्ती" इति कालवाचिनो
पारपर्ये द्वितीया । पित्या स्थापनं पूर्व पधानिकचिदिति स्थित्याधुनितु शुस्योस्तुप
यया भवनिमयाकियाविशेषण विनिवेदिनाया: विनिवेदयतिस्म पिनिवेदिता तस्याः विशा.
पितायाः । स्वमाय: स्रमानामपलिस्तथोक्ता तस्। इति पत्यमाणप्रकारेण । फार।
मः । कुधांत फुचपोरंतः कुर्घातातम्मिन् मानयोमध्ये । दनाबिना दन्तानामचिस्तेन दन्त.
कात्या • भर्मियपशिग्नयो:"नि विश्यः । नको चर्चा चर्षिफा तो लेपन 'चर्चा तु
चापि ग्यासकः" इत्यमरः । चिरचापिय विश्वपतीनि पिरचयन् शुशिय। अगाद
उपान। गदश्यक्तायो याचिलिर् उत्प्रेक्षालंकारः ॥२७॥
भा. भ.-महागल सुमित्र ने मांगा पा पेठानी मापनी से धणण-तुपद
पूर्वान गोला बनों को मुनार तो इनपुति में उनके नलों के प्रतिफलिम पाने
हुए उनका फल पहा॥२७॥
नागेन तुंगवरितो तुपनो वृपात्मा सिंहन विक्रमधनो रमयाधिकश्रीः ।।
माभ्यां धृतभागिरमा मशिनासमन्दित्सूर्यण दीमिमहिनो झपनः मुरुपः ॥२८॥
कन्यागभायनशतः मम्मः मरम्तो गंभीरधीग्दधिनामनतम्तदीशः ।।
देवाहियानमणिगश्यनलः प्रतीनदेवांग्गागमगुगौद्गमकर्मदाहः ॥२६॥

तृतीयः सर्गः । ." एवंविधस्तव भविष्यति तीर्थकर्ता पुत्रो जगत्त्रयविनेयजनकमितं ।। मामरोरेगखगप्रमदातिशायिपुण्यातिशायनघनायितचारुमूर्तेः ॥३०॥ नागेन गजेन्द्रदर्शनेनेत्यर्थः । तुंगवरितः तुंगं चरितं यस्य स तथोक्तः यथारख्याताय. महाचारित्रः। वृपतो गवेंद्रात् । वृषात्मा वृष एव आत्मा यस्य स तथोक्तः धर्मस्वरूपः "धर्मोऽयं वृषरूपेण" इति धर्मस्य वृपत्वप्रसि: रूपकः। सिंहेन मृगेंद्रेण। विक्रपधनः विक्रम पय धनं यस्य सः तथोकोऽनतवीर्यः। रमया श्रीदेव्या। अधिकधीः अधिका श्रीर्यस्य स अधिक. स्नग्भ्यां मालाभ्यां । शिरमा मस्तकेन । धृतश्च भृतश्च धरतीति धृत इति कतरिक्तः उभयलक्ष्मीपरिणयाई इत्यर्थः । शशिना चंद्रण । क्लमच्छिन् क्लम छिनत्तीति लमच्छित् संसारक शनाशकः । सूर्येण दिवाकरण | दीप्तिमहितः दीप्त्या महितः देहकांतिसमृद्धः । रूपतः झपाभ्यां झपतः मीनयुगलतः। सुरूपः सु शोभनं रूपं यस्य स नथोक्तः मनोहररूपः ॥२८॥ कल्याणमागित्यादि। कलशतः कलशाभ्यां कलशतः पूर्णघटयुगलात् । कल्याणभाक् कल्याणानि भजतीति कल्याणभाक् "विणभज" इति विण् प्रत्यय: पंचकल्याणसेवितः। सरस्तः सरस: सरस्तः सरोवरात् सरसः रसेन सह वर्तत इति सरसः वात्सल्यसहितः । उदधिना उदकानि धीयतेऽस्मिन्नित्युदधिस्तेन समासत्यादुदादेशः समुद्रण गंभीरधी:गंभीरा धीर्यस्य स तथोक्तः गंभीरबुद्धिः । आसनतः आसनादासनतः सिंहासनात् । तदीशः तस्य ईशस्तथोक्तः सिंहासनाधिपः । देवाहिवासमणिराश्यनलेः देवाचायश्च देवाहयस्तेषां पासस्तयोक्तः मणीना राशिमणिराशिः देवाहिवासध मणिराशिध अनलश्च देवादियाममणिराश्यनलास्त: देवविमाननागभयनरतराशिवहिभिः । प्रतोतदेवोरगागमगुणोद्गमकर्मदाहः देवाचोरगा- थ तथोकास्तेपामागमस्तथोक्त उद्गमनमुद्गमो गुणानामुद्गमः प्रादुर्भावस्तथोक्तः दान दाहः कर्मणां दाहस्तथोक्तः देवोरगागमश्च गुणोद्गमश्च कर्मदाहश्च तथोक्का:प्रनीता जगद्विनुना देवोर. गागगगुणोद्गमकर्मदाहा यस्य सः तथोक्तः प्रसिद्धस्यमेवार्थि कल्पयामिदेवागमनभवनवासिदे. यागमन केवलज्ञानादिगुणोत्पत्तियुनोऽविधकर्मदाहकश्च ॥२En पविध इत्यादि । मामरोरगखगप्रमदातिशायिपुण्यातिशायनघनायितचारमूर्तेः मा. श्व भमराय उरमा गच्छंतीत्युरगा: नागाध से गच्छत्तीनि वगा विद्याधरास्ते च माम. गेरगखगास्तेषां प्रमहास्नयोक्तास्ता: अतिशेन इत्येवं शोलं तदनिशायि तथ तत्पुण्यं च मांगरोरगपगप्रमदातिशायिपुण्यं तम्यातिशायनं तेन धनायनेस्म घनायिता चायाँ चासो मूर्तिश्च चापमूर्तिः मत्ामरोरगावगप्रमदातिशायिपुण्यातिशायनघनायितचारमूर्तिर्यस्यास्सा तथोक्ता तस्याः मनुष्णकहरवासिभवनविद्याधरयनितात्युत्कसुस्तप्रवर्धनघनीभूतमनोरम- शरोरस्य । पविधः कथितप्रकारः । जगधययिनपजनकमित्र जगतां त्रयं जगत चिनेतुं योग्य - मुनिसुनतकाव्यम। घिनशाम्ने च ते जनाच तयोकाः जगधयस्य विनय मनास्तयोक्ता जगत्रपयिनेयानानामेक च तत् मित्रं च तयो सद्रमादेशेन श्रेयस्यमापकल्यात् शिलोकमय जनमुपपबंधुः "एके मुख्यान्यचला" इत्यमरः। मिशन्दस्यविशिष्टलिंगत्वानपुंमपत्वं। तीर्यकर्ता तीर्थस्य फत्ता नीर्थक मद्धर्मोतावक | तप ते गुष्मदस्मदोरलिंगत्यात् बिलिंग्यामेकत्वं । पुत्रः तनयः। भविष्यति जनियति । अतिशयालंकामः। नागेन्स्यादिपधत्रयेण विशेषकम् इत्यन्ययो विधातव्यः ॥३०॥ भा० .-अयि! मनुष्य-कल्पवासी मानसो नया विद्याधरों की नियों के पुण्य गो पद दलिन करने वाले पुर्य से सुन्दर मूर्ति घाली पमायनी! गजेन्द्र दर्शन से यधाण्यान महाचग्निवाला, वृपक्ष से धमादार सिंह धर्शन से पराक्रमी, रहमी से अधिक श्री-सम्पन्न, माला से मयों का शिरोधार्य, चन्द्रमा में मंसार के सत्ताप को दूर करने वाला, सूर्य मे अधिक नेतो, तया मोनदर्शन से सुन्दर आया ते याला, कलश से कल्याणास्पद अथात् पञ्चकल्याण द्वारा सेबिन, सरोवर से वात्सल्य रस-युक्त समुद्र से गांगीर बुद्धि वाला , सिंहासन से राज्यसिंहासनारोही, देवविमान, नाग. भवन, रताशि तथा अग्नि आदि के दर्शन से देवों का आगम, गागों का भागमन, गुणों के प्रकटीकरण तथा अष्टकर्म दहनादि गुणों से युक्त त्रिभुवन के विनीत मयों के एक मात्र मित्र ऐसा तीर्थङ्कर के रूप में तुम्हें पुन होगा ॥२८॥ २६ ओर ३०॥ एतन्निशम्य वचनं रुचितस्य देवी रोमांचकंचुकितचंचुरगातयष्टिः । अाकर्णितान्यभृतमंजुरवा बनाते माकंदवल्लिरित्र कोरकिता बभूव ॥३१॥ एतदित्यादि। देवी पद्मावती राशी। रुचितस्य रोचतेस्म रुचितत्तस्य प्राणकान्तस्य। एतन् इदं । यचनं भाषितं । निशम्य निशमन पूर्व पश्चात्किंचिदिति निशम्य ध्रु त्या । घनांत घनमध्ये। मादवलिः माफंदाचासो बलिध तथोक्ता मानता। आक्रर्धाितान्यभूतमनु रवा मंजुश्वासी रवश्च मंजुरवः अन्येन नियतेस्म अन्यभृतस्तस्य मंजुरवस्तथोक्तः आक. पर्यतेस्म आफर्णितोऽन्यभृतमजुरवो यया सा तथोक्ता आकर्णितकोकिल्लमनोहरध्वनियुता। “वनमियः परभृतः कोफिलः पिका, मनोज्ञ मनु मजुले” इत्युभपत्राप्यमरः। कोरकिता फोरक संजातोऽस्या इति फोरकिता सजातकलिफेव कोकिलनादस्य वसंतसूचकत्वाचन्नि मादेन कोरकिना यथा बभूव तथा इत्युपत्रागेक्तिः। रोमाचकंचुकिनचंचुरगात्रयष्टिः रोमां. चेन कंचुक. संजातोऽस्था इति रामांचकंचुकिना रोमांचकंचुकिता चंचुरगात्रयपिर्यस्याः सेति बहुपदाहुबीति: रोमांचसंजातकंचुकमनोहरदेहयष्टिः । घभूग भवतिस्म उत्प्रेक्षा. लंकार ॥ 1 तृतीयः सर्गः भा० अ०-अपने प्राणवल्लम को यह बात सुनकर कोयल की फुह २ की ध्वनि से जैसे उपवनो में आम्रवल्लो मुकुलित होती है उसी प्रकार महारानी पद्मावती की देहयष्टि रोमाञ्च- रूप कंचुकसे आच्छता हो गयीं ॥३२॥ देवोऽथ पूर्वगदितस्त्रिदिवादुपेतो देव्या वपुः करिवपुर्वदनादविक्षत् ॥ पक्षे परे नभसि मासि तिथी द्वितीये योगे शिवे श्रवसि भे विरतौरजन्याः॥३२॥ देव इत्यादि। अथ अनंतरे। पूर्वगदितः गंद्यतेस्म गदितः पूर्व स्मिन् गदितस्तथोक्तः प्रागुंक्तः । देव. हरिधर्मचर: प्राणतेंद्रः । नभसि श्रावणे । "श्रावणे तु स्यान्नभाः श्रावणिकश्च सः"इत्यमरः। मासि मासे पदनित्यादिना मासशब्दस्य मासादेशः। परे अपरे। पक्षे कृष्णपक्ष इत्यर्थः । द्वितीय द्वयो पूरणो द्वितीयस्तस्मिन् "तिथयोयो:"इत्यमरसिंहमामाण्याद्विशेष्यस्य पुंस्त्वेन विवक्षितत्वाद्विशेषणस्यापि पुंस्त्वं। तिथो दियसे। शिवे योगे शिवनामयोगे । श्रयसि श्रवणे-ज्योतिपिकप्रसिद्धप्रयोगोऽयं । भे नक्षत्रे । “नक्षनमृक्ष में तारा" इत्यमरः । रजन्या. निशायाः। घिरती विरमण विरतिस्तस्यामवसाने। त्रिदिवात् स्वर्गात् । उपेतः उपैतिस्म उपेतः आगतः सन् । करिवपुः करोऽस्यास्तोति करी करिणो धपुरिव वपुर्यस्य सः तथोक्तः गजाकारस्सन् । देया पद्मावती महादेयाः। वपुः शरीरं। वदनात् मुखात् घदनविवरात् । अविक्षत् आविशत् विशप्रवेशने लुङ् "वश्व भ्रस्ज" इत्यादिना शस्य पः "पढः कस्सि" इति पस्य कः ॥ ३२ ।। भा० अ०-पूर्वोक प्राणतेन्द्र स्वर्ग से आकर श्रावण कृष्ण द्वितीया को श्रवण-नक्षत्र तथा शिव-योग में रात बीत जाने पर गजाकार से मुखद्वारा पद्मावती के शरीर में प्रविष्ट हुए॥३२॥ विज्ञायासनकपतः सुरपतिस्तस्यावतारं प्रभोः स्वर्गादेत्य चतुर्विधैरसह सुरैरस्यांबिकां कल्पजैः । श्रकल्पांबरगंधमाल्यनिवहरभ्यर्च्यनाम रतवं गानं नर्तनमारचय्य जनकं चाहत्य भूयो गतः ॥३३॥ विज्ञायेत्यादि। सुरपतिः सुराणां पतिः सुरपतिः सौधर्मेन्द्रः । तस्य प्रभोः मुनिसुवततीर्थ- शस्य । अवतारं अवतरणमवतारस्तं गर्भावतरणं। आसनकंपतः आसनस्य कंपस्तथोक्त आसनफपादासनकपतः सिंहासनकपतः । विज्ञाय विबुध्य । चतुर्विधे चत्वारो विधा पां तः चतुःप्रकारः भवनव्यंतरज्योतिष्ककल्पवासिभेदेरित्यर्थः। सुरैः देवैः । सह साकं ।

मुनिमुवतकाव्यम् स्वर्गात् त्रिदिवात् । एत्य आगत्य । यस्य मुनिसुव्रततीर्थेशस्य । अधिकां जननीं । जनकं च पितरं च । कल्पज: कल्पे जायत इति कल्पनास्तैः स्वर्गसंभूतैः । आकल्पांवरगंधमाल्यनिवहेः आकल्पाश्च अंबराणि च गंधाश्च माल्यानिच आकल्पांवरगंधमाल्यानि तेषां निवहारतः आभ. रणदुकूलगंधमालासमूहः । “आकल्पयेपो नेपथ्यं प्रतिकर्म प्रसादनः" इत्यमरः । अभ्यर्च्य अभ्य. र्चनं पूर्व पश्चात्किचिदित्यभ्यर्च्य पूजयित्वा । मामं नमन नामस्त नमस्कार । स्तवं स्तोत्रं । गानं गीतं । नर्तनं आनंदनर्तनं च। आरचय्य मारचनं पूर्व पश्चात्किंचिदित्यारवय्य हत्या । भूयः पुनः। भव्यजन च भागृत्य सत्रत्य । गत: गच्छतिस्म गतः यातः ॥३॥ इत्यहद्दासरतेः काव्यरत्नटीकायां सुखबोधिन्यां भगवद्गर्भावतरणवर्णनो नाम तृतीयः सोऽयं समाप्तः भा० अ० -सौधर्मेन्द्र अपने सिंहासन के कम्पित होने से श्रीमुनिसुव्रत तोवर का गर्भावतार जान भवन, व्यन्ता, ज्योतिष्क तथा कल्पवासी देवों के साथ आफर स्वर्गीय भूषण, वसन, गन्ध तथा मालाओं से मुनिसुव्रत महाराज के पिता माता की पूजाकर चन्द ना, स्तुति तथा नृत्यकर के पुनः अपने स्थान को चले गये ॥३३॥ > इति तृतीय सर्गसमाप्त

॥ अथ चतुर्थः सर्गः॥
।
-
न्यग्रोधशाखेव रराज सांद्रच्छाया दधाना पुरुषोत्तमं तम् ॥
पत्रोदरेऽथाऽऽर्तवमुष्णशीतमुच्चैस्तनीय नुदति प्रियस्य ॥१॥
• न्यग्रोधेत्यादि । अथ अनंतरम् । सांद्रच्छाया सांद्रा छाया यस्या सा तथोक्ता निरंतरकां.
तियुता । “धनं निरंतरं सांद्रा छाया सूर्यप्रिया कांतिः प्रतिबिंयानातपः" इत्युभयत्राप्यमरः ।
'पोदरे पत्रमियोदर तथोक्त तस्मिन् पर्णवत्यशोदो । पुरुषोत्तम पुरुषेपूत्तमस्तथोक्तस्तं पुरु-
पष्ठम् । त मुनिसुनतस्वामिनं । दधाना दधा इति दधाना "सलउड्" इत्यादिना आनश
प्रत्ययः । प्रियस्थ माणनायर । आर्त ऋतुयु भवमात समस्तुसंभूतं । उष्णशोतं उष्ण
च शीत च उष्णशीतं तद्वन्देकत्वं उप्मशीतलं। नुदति नुदतीति नुदति अपहरति शतृप्रत्य-
यान्तात् "नृदुगिद्" इत्यादिना डो। उच्चस्तकी उच्च स्तनौ यस्याः सा तथोक्ता पीनोत्तुंग-
पयोधरा । इयं एपा देवी। सांद्रा छाया यस्या सा तथोक्ता निविडानातपयती। पत्रोदरे पत्र.
स्योदरं पत्रोदरं नरिमन पणांतर्भागे। तं प्रसिद्ध पुरुषोत्तम नारायणं "श्रीपतिः पुरुषोत्तमः"
इत्यमरः । दधाना धरन्ती। प्रियस्य प्रीतिमञ्जनस्य । आर्तवं ऋतुषु भव उष्णशीतं तुदति ।
उच्चतमी उच्चभैया तथोक्ता। "सायं निरं प्राप्रगेऽव्ययात्" इति अनट प्रत्ययः
अतिमहतीत्यर्थः । “अल्पे नीचर्महत्युचः” इत्यमरः । न्यग्रोधशाखा न्यग्रोधस्य शाखा तथोक्का
सेव । रराजराज दीप्तौलिट् ले पोपमा । यदाह-"शीतकाले भवेदुष्णमुप्णकाले तु शीतलं ।
फूपोदकं घटच्छाया सांबूलं तरुणीस्तनी" इति । सप्तसागराणां परतः विष्णुवंरपत्र शेत
इति लौकिकोतिरुपमीयते ॥१॥
भा० अ०-सदा ज्योतिर्मयी, उन्नतस्तनी पनवत् कृशोदर में तीर्थकर भगवान को
धारण किये हुई पद्मायती पत्रान्तर्भाग में नारायण भगवान को धारण किये हुई सघन
छागावली घटच्छाया के समान अपने प्रियतम का ऋतुसम्बन्धी शीतोष्णजन्य सन्ताप
अपहरण करती हुई शोमती थी ॥१॥
सा गर्भिणी सिंहकिशोरगर्भा गुहेब मेरोरमृतांशुगर्भा ।।
वेलेव सिंधोः स्मृतिरत्नगर्भा रेजेतरां हेमकरंडिकेव ॥२॥

मुनिसुत्रात काय्यम् । सेत्यादि । गर्भिणी गर्भोऽस्या अस्तीति गर्मिणी अंतर्वत्नी सा महादेवी । सिंहकिशोर- गर्भा सिंहस्य किशोर: पोतो गर्भेऽन्तर्भागे यस्याः सा तथोक्ता । “वाला किशोरः इत्यमरः । मेरो: मंदरपर्वतस्य । गुहेर गहरवत् । मृतांशुगर्मा अमृतरूपा अंशयो यस्य स तथोक्तस्स- एव गर्भे यस्यास्सा तथोक्ता चंद्रयुक्तांतर्भागा । सिंधो: समुद्रस्य। घेलेय तीरमिव । “चेला- धितोपराधियोः कालमर्यादयोरपि" इति भास्करः। स्मृतिरत्नगर्भा स्मृत्यर्थप्रधान रत्न स्मृतिरल तदेय गर्ने यस्यास्मा तमोक्ता चिंतामणिसहितातर्भागा । “गों भ्रूणेऽभफे फुक्षी संधी पनसकंटके" इति विभ्यः । हेमकरडिकेव हेना विरचिता करडिका तथोक्ता सुवर्षा- भाजनमिव । रेजेनरां धमासेतरी द्वयोविनश्ये चतरप्" इति तरप् प्रत्ययः । गर्भस्यस्य नस्य सिंदकिशोरामृतांशुस्मृतिरत्नद्रवातत्येन प्रामाददृश्यत्वगुणामिगम्यतागुणत्यागगुणभूयित्व सूचित भवति । तस्यास्तु मेरगुहासिंधुवेलामबरडिकाद्रष्टांतत्वेनानाकाम्यत्वगांभीर्य दिव्यो. पधशुद्धोरस्त्यानि सूचितानि भवन्ति उत्प्रेक्षालंकारः ॥२॥ भा० अ०-गर्भवती महादेयी पद्मावती सिंदशिशु को ग्यावे हुई गिरि गुहा के मुल्य, चन्द्रगर्मा ममुद्र चैलाके समान और चिन्तामणियुक्त सुवर्ण मंजूषा के मदृश शात होती - थीं ॥२॥ वल्ली वसंतात्सरसी घनांतासंपन्नयाच्चन्द्रममोऽधिवेला ।। यथा तथाऽजायत सा कृशांगी गर्भार्भकादुज्वलरूपसंपत ॥३॥ घल्लीत्यादि । शांगी फर्श भंग यस्याः सा तथोक्का तन्यो। मा पनायती। पर्वतात् 'वसंतकालात् । चली गता। धनानात् घनाग यातियोतस्तस्मात् घर्षकालांतात् शरत्मालादित्यर्थः । सरसी सरोवरः । नयात् नीतिमार्गात् । संपत् । चंद्रमसः चन्द्रात् । अधिवेला अधेला तधोका। यायेन प्रकारेण यथा। तथा तेन प्रकारण तथा । गर्ग भकात् गर्ने विद्यमानोऽभयो गर्भिकस्तस्मात् । उपलरूपसंपन् मापस्य संपत् रूपसंपन् उज्वला रूपमा स्थास्सा तोता। जान लभूत । जनै माधुरि नद। भा० अ०-यसन्तागमन से घल्ली के समान, शरत्काल ले मरसी के समान, सुन्दर. नय से सम्पत्ति के समान तथा चन्दमा से समुद्रघेला के समान गर्भपिन पालक मे एशोगी पद्मावती अत्यन्त उज्ज्यल सौन्दर्य-सम्पत्ति से सम्पन्न हुई ॥३ जिनस्य माहात्म्यपदेन हष्टौं मामिप्यलाभन कुचौ तदीयो। न विभ्रतुःश्यामलनां मुसेऽल्पामप्येए नो हर्पयतीह कांग्कान् ॥२॥ जिनरपेत्यादि। जिनरय जिमयालयस्य | सामिप्यलाभेन समीपमेष मामिप्य तस्य लागोस्नेन भायनताराम स्यपदेन मदांधापापात्मा च महात्मा तस्य चतुर्थः सर्गः। ७१ । - मावस्तथोक्त महात्म्यमेव पदं याजस्तेन महत्त्यव्याजेन । दृष्टो हप्येतेस्म हृष्टी संतुष्टौ । तदीयो तस्याः इमो तदीयो पद्मावतीसंबंधिनी । फुची स्तनौ । मुखे वक्त्र भने च चूचुक इत्यर्थः अल्पामपि स्तोकामपि । श्यामलतां श्यामलस्य भावः श्यामलता तां कृष्णत्वम् । न बिभ्रतुः न धरतःस्म भून भरणे लिन् । तथाहि-एप: अयं सामिप्यलामः । इह अस्मिन्निह । कास्कान् कान् कान “कांस्कान सीसम्" इति निपातनासिद्ध'नो हर्षयति न संतोषयति अपि तु सर्वान हर्पयत्येव । हषु अलीके लट् अतिशयालंकारः ॥४॥ भा० अ०-जिनेन्द्र भगवान के समीप रहने से अथवा जिनेन्द्र भगवान की महिमा की अधिकता से पद्मावती के दोनों स्तनों ने जरा भी कृपणता धारण नहीं को। जिनेन्द्र भगवान् का सामिप्य-लाभ इस संसार में भला किसको प्रसन्न नहीं कर सकता है ॥४॥ सुतस्य गंभीरतरस्य संगात्तस्योदरिण्या अपि राजपल्याः ।। नाभिन तत्याज गभीरमावं गुगणारत्यजेत्को गुणिसंगमेन ॥५॥ सुतस्येत्यादि । उदरिया अपि उदरमस्या अस्तीत्युदरिणी तस्या गर्भिपया अपि । राज. पत्न्याः गक्षः पती तथोक्ता तस्याः पमावत्याः । नाभि नाभिस्थानं । गंभीरतरस्य प्रायो गंभीरो गंभीरतरत्तस्य अत्यंतगंभीरस्य । तस्य सुतस्य जिनवालकरूप । संगात संसर्गात् । गमीरभावं गमीरस्य भावत्तयोक्तात निम्नत्वं गंभीरत्वं तत्याज न मुमच। त्यज हानी लिट् "निम्न गमोरं गंभीरम्" इत्यमरः । तथाहि -गुणिसगमेन गुणास्सत्यस्येति गुणी तस्य संगमस्तथोक्तस्तेन गुणवनस्संसर्गेण । गुणान् गांभोयांस्विभावान् । कः को चा पुरुषः । त्यजेत मुंत्रेत त्यज हानी लिट् । अर्थातरन्यासः ॥६॥ भा० -~-गर्भवतो होती हुई भी राजमहिषो पद्मावती की नामी ने गाभार्य गुणशाली उन तीर्थङ्कर-रूप पुत्र के समागम से अपनो स्वभाविक निम्नता नहीं छोड़ी। गुणों के आ जाने पर कौनसा व्यक्ति अपना गुण छोड़ सकता है १ ॥५॥ गर्नेऽपि बोवनयनायकोऽयमितीदमायेदयितुं किलास्याः ॥ बलिप्रभावादलयो न नष्टाः सनाभिनाशं भुवि के सहन्ते ॥६॥ गर्म इत्यादि । अब जिनवालकः ।गर्भेऽपि उदरेऽपि । योधनयनायकः बोधानां त्रयंयोधत्रयं तस्य नायकस्तयोक्तः मतिश्रुताधिरूपज्ञानत्रयस्य स्वामी। इति एवं प्रकारवचनं । आवेदयितुं झापयितुं । अस्याः पद्मावत्याः । वलयः त्रिवलयः । बलिप्रभावात् बलमस्यास्तीति यली तस्य प्रभावस्तस्मात् “यमकल पचित्रेषु घरयोईलयोरभेदः" इति वाग्भट्टभाषणात यययोरभेदः । पलयतोऽनतधीर्यघतोऽहंतः सामथ्र्थात् पक्षे पलिनां च प्रभावात् । न न न नश्यतिस्म न 1 ७२ मुनिसुनतकाव्यम् नष्टाः अदृश्यतां नापुः । तथादि-भुवि भुन । सनामिनाशं नाभिना सद पर्तत इति सना- मिलस्य नाशत्तयोकस्तं संयुननाभयरित्र ग्लयस्तनाशं पधुनाशं सपिडनाशमितिध्वनिः “सनामिस्सगोत्रो बंधुश्व इति धनजयः । सहन्त फे क्षमतन कऽपीत्यर्थः सह मर्पणे लोट । मयां तान्यास ॥६॥ मा० म.-मति-ध्रुनि अवधि शाम त्रय के धारफ ये मुनिसुमत-नापयह सूचित करने के लिये ही मानी पमायनी के गर्भ की रियलो ज्यों को त्यों रही। अर्थात् नए नहीं ईपी। ठोस संसार में मनानि (मोदर ) का नारा मीन सदन कर सकता है । तत्मंगमे मममृद्धिती निरन्तरं सत्यपि कुक्षिरस्याः ॥ ममृद्धिमल्यामपि न प्रपद भाग्यानुमारीणि फलानि काम ॥७॥ तसंगमइत्यादि । मर्यसनिदेनी पापा ममूहिस्सयसमुभिस्तस्या देतुस्तस्मिन सक. लोकादिनार । सरसंगमे नत्र संगमस्तांगमस्तरिमन् नजिनामारसंबधे । निरन्तर मंतरा निर्गत निरंतर भन त्यपि शिसोनिमा पसायतो-देहराः।अक्षि जठरः । मायामपि स्नोपामपि। मालिममूर्ति । न प्रो म प्राप पनगा लिट् । तपादि- पलानि लयर का यो काम प्रान पोन निकामेष्ट पधेसितम्" इत्यमरः । मायानुसारोणि भाग्यस्यमाणि मानुकलानि। भरतीत्यध्यावार । अधी- सरन्यासः। भा० .-ममी ममुखि के पारप भूत धामिगत भगवान के गर्भ में पदा विद्यमान रहने पर भी गर्भ को धोको भा पृद्धि नहीं हुई। पोशिप फल माग्यानुसार दी हमा परते स्माजनानामपि नारायंतमनन्तमा नृतनरत्नदीपम् ॥ साक्षाद दधत्या जिनमेनरम्या: ग्रष्टुं नमो नष्ट भिर जातु ॥८॥ মান্ননাবি। নানান সমসশাল' গাধা, पानामपि मनन भनियमान 7 माना नायगया। नूगनरपशेष मय पर नूनन अभिय दौर नूतनमामी ग्यानमग्नदीम मनोज सखान्नूलमयम् । म गनुपरेसमा नारा मत गमें। दादधजियो तास या मागपसायरान | " का गुणग्यमाधिप .TA मानाको र माय जिपैश माविम माम PEnen -

मुनिसुव्रतकाव्यम् ।
यावत् । तथाहि-स्वच्छतरं प्रष्ट स्वच्छ स्वच्छता निर्मलतरं। वस्तु स्फटिका.
दिपदार्थ: । उपाधियद्धि उपरंजकरद्धि । “उपाधिर्धर्मचिन्तायां कैतवेऽपि विशेषणे । कुटुय.
व्यापृतेऽपि स्यादुपाविाधिवक्रयोः" इति विश्यः । अर्थान्तरन्यासः ॥१०॥
भा० 10-अनादिकालीन दुःखों से व्याकुल जीव की मुक्ति के कारण तथा इन्द्रियजन्य
सुखों से विरत तीर्थङ्कर को पद्मावती उत्पन्न करेगो अतः यह पद्मावतो भी उन्हीं के समान
हो गयीं। अर्थात् गर्भस्थ जिनेन्द्र भगवान का शुद्ध प्रतिविम्ब पड़ने से पद्मावनी भी उनके
विशुद्ध गुणों को धारण कर जिनेन्द्र-तुल्प हो गयीं। फोकि उपाधि भेद से घस्तु में भी
स्वच्छता मा जाती है ॥१०॥
'- गुणान्वितोऽपास्ततमःप्रपंचः प्रकाशितात्मेतरवस्तुरेपः ।।
बभी जिनेन्द्रो जठरे जनन्याः दीपो यथा स्फाटिकपात्रमध्ये ।। ११ ।।
गुणान्वित इत्यादि । गुणान्वित गुणेरन्वितस्तथोक्तः केवलज्ञानादिगुणयुक्तः । अपा.
स्ततम.प्रपंचः तमसा प्रपंचः तथोक. अपास्तः तमामपंचो येन सः निराकृतसमस्ताहानवि-
स्तारः "विपर्यासे विस्तारे च प्रपंचः" इत्यमरः । प्रकाशितात्मेतरवस्तुः आत्मा व इतराणि
मात्मेतराणि तानि च वस्तूनि च तयोकानि प्रकाशितानि चात्मेतरवस्तूनि च येन सः
तथोक प्रकाशितस्वपरपदार्थः यहुवीहेराश्रयांगत्वात् पुलिङ्गवत्प्रकिया। एषः भयं । जिनेन्द्रः
जिनानामिन्द्रः जिनेन्द्रः 1 जनन्याः मातुः । जठरे उदरे । स्फारिकपात्रमध्ये स्फटिकेन निर्मित
स्फाटिकं तच्च तत् पात्र च तथोक्त तस्य मध्य' स्फटिकपानमध्य तस्मिन् । गुणान्वितः
गुणेन पर्तिकान्वितो युक्तः “गुणस्त्यावृत्तिशब्दादिज्येद्रियामुख्यतंतुयु” इति पैजयन्ती ।
अपास्ततमःमपंचः तमसा तिमिराणां प्रपंचः समूहस्तथोक्तः अपास्ततमःप्रपंचा यस्य सः
तथोक्तः । प्रकाशितात्मेतरवस्तुः प्रकाशितानि भात्मेतरवस्तूनि येन स तथोक्तः प्रकाशित-
स्वापदार्थः । दोपः प्रदोपः । यथा येन प्रकारेण । यमौ भातिम्मा तेन प्रकारेण । पमी
पराजत मा दीप्तौ लिट् । गात्पुरव सुरस्त्रीभिः दिव्योपधैः पृन्तशोधनत्वात् जठरस्थ
स्फाटिकपात्रष्ठांतत्यम् ॥ ११ ॥
भा० अ०-स्फटिकमय पात्र के भीतर प्रदीप के समान फेवलज्ञान गुण से युक्त हो
अज्ञानान्धकार को दूर किये हुए तथा स्थपर पदार्थ को समुद्रासित किये हुए ये जिनेन्द्र
भगवान अपनी माता के उदर में प्रतिफलित हुए ॥११॥
तद्गर्भवास निवसन्नपीशः स भास्वरांगो निहतांधकारः ।
तत्यांज बोधत्रितयं न तेजरत्यजेत्करडेऽपि मणिमहायः ॥१२॥

।
चतुर्थः सर्गः
७५
तद्गर्भवास इत्यादि। भास्वरोगः भासत इत्येवं शीलो भास्वरः गास्वरमंगं यस्य स
तधोक्तः "भंजमास्" इत्यादिना वर प्रत्ययः । निहतांधकारः निहतोऽन्धकारो येन स तथोक्त
निराकृतांतस्तमः। स: जिनबालकः । तद्गर्भवासे गर्भ चासो गर्भवासस्तस्या
गर्भयासस्तथोक्तस्तस्मिन् पशाचतीगर्भवासे । निवसन्नपि निवसतीति निवसन तिष्ठन्नपि ।
ईशः स्वामी । घोत्रितयं योधानां त्रितयं तथोक्त मतिश्रुतावधिरूपज्ञानप्रयं । न तत्याज न
मुमोच त्यज हानौ लिट् । तथाहि-गास्वरांग:भासुरावयव । निहतांधकारः निराकृनतिमिरः।
मदायः महानो यस्य सः महार्थ । “मूल्ये पूजाविधाययः” इत्यमरः । मणिः रत्नं ।
करंडे फरडके। वसन्नपि। तेजः प्रकाशं । न त्यजेत न मुंचेत् त्यज हानी लिड् ।
अर्थान्तरन्यासः ॥१२॥
भा० ०-प्रकाशमय शरीर वाले तथा अज्ञानान्धकार को विनष्ट किये हुए जिनेन्द्र भग-
पान ने गर्भ में पास करके भी मनिश्रुति अवधि ज्ञानत्रय को पिटारी में रक्खी हुई जाज्वल्य-
मान बहुमूल्य मणि जिस प्रकार अपने तेज को नहीं छोड़ती है उसी प्रकार नहीं छोड़ा॥१२॥
मासान्पुरे पंचदशानुसंध्यं बंधुर्महेशस्य वसून्यवत् ।
सौधा यदंशुच्छुरिता विरेजुः शैला यथा कवुरिताम्रलिप्ताः ॥१३॥
मासानित्यादि । महेशस्य ईशानस्य । बंधुः कुबेरः । “कुबेरस्यवकसखः" इत्यमरः । पुरे
राजपुरे। पंचदश पंचभिरधिका दश तथोक्तास्तान पंचदमितान् मासान् पर्यंत "काला
ध्वनोव्याप्ती" इति द्वितीया अनुसंध्यं संध्यां संध्यामनुसंध्यं । “शब्दप्रथा" इत्यादिनाव्ययीभावः
"सप्तम्या:" इति विकल्पेन त्रिसंध्यास्वित्यर्थः । वसूनि रत्नानि । “वसुर्मयूखाग्निधनाधिपेषु
योक्त्रे यके स्माद्वसुहटके च । वृद्ध यौषधश्यामधनेषु रते वसुस्मृतं स्यान्मधुरेन्यवच्च” इति-
विश्वः। अवर्पत् वृष सेचने लङ्। यदंशुच्छुरिता पां रतानामंशवः यदंशवः तैः छुरिता:
तथोक्ताः आच्छादिताः। सौधाः राजसदनानि । कवुरिताम्रलिप्ताः फर्बुरं संजालमस्येति
कर्युरितं करितं च तत् अनच तथोक्त तेन लिप्ता: नानावर्णमेघावृताः। शैला: पर्वताः ।
यथा येन प्रकारेण विरेजु. तथा घिरेजुरित्यर्थः उत्प्रेक्षालंकारः ॥ १३ ॥
भा० अ०-राजपुरी नगरी में कुबेर ने पन्द्रह माम तक तीनों सन्ध्या रत्न की वृष्टि की।
इसी से चित्रित मेघ से लिप्त पर्वत के ममान रत्न की चमक से प्रतिभासित कोठों की छतें
शोमने लगीं ॥१३॥
स्वनामसार्थीकरणाय भक्तिच्चलेन गत्वातिबलेन राज्ञा ॥
विधित्सितं पुंसवनादिकर्म पुरैव शक्रः स्वयमस्य चक्रे ॥१४॥

मुनिमुमतकारगम । : स्तावता 1 स्वनामेत्यादि। स्त्रनाम स्वस्य नाम स्वनाम शमोतीति शक इति निजनामधेयं साधी. करणाय प्रागसार्थकः इदानी मार्थस्य करणं तथोक्त तस्मै सफलफरणनिमित्तम्। शमः देवेद्रः । स्वयं गत्वा यात्वा । भक्तिच्छलेन भकिरेव छलं नथोक्त' तेन गुणानुरागव्याजेन । अतिबलेन अति प्रवलं यस्यामावनिकलनेन शक्तित्रयाधधिमसामर्थेन । "प्रकलंघने. प्यति" इत्यमरः । गज्ञा सुमित्रेण । विधिसित विधातुमि विधिसित कर्तुमिष्ट। अल्य मुनिसुव्रतस्वामिनः गर्भस्येति वा । पुंसवनादिकर्म पुंसवनमादिर्यस्य तत् पंसवनादिकर्म क्रियां। पुरव पूर्वमेव । चक विदधौ झुफ करणे लिट् ॥१४॥ मा० १०-इन्द्र अपने नामयो सार्थक करने के लिये भक्ति के व्याज से अत्यन्त बलशाली सुमित्र महाराज की करने योग्य जो पुंसवनादि क्रियाये हैं उन्हें स्वयं सम्पादित किया॥१४॥ मुग्धामरीगानसुधानिपानमुदच्छलान्मीलितचनुरेपा । विचिन्वती क्षेमवतोऽपि सुनोः क्षमित्वमायारसमयं प्रसूतेः ॥१५॥ मुग्धामरीत्यादि । मुग्यामरीगानसुधानिपानमुदच्छनात् मुग्ध: मनोहरांग्य- अमर्यश्च मुग्धामर्यस्तासां गानं तथोक्त "मुग्धः सुंदरमूहयोः" इति विश्वः । मुग्धामरोगानमेव सुधा तथोक्ता रूपकः नस्या निपान मुग्धामरीमान. सुधा निशानं तस्माजातो मुदः प्रमोदः मुद्हर्षे इति धातो: “जाप्रीगृगुपाल्यारकः" इति क प्रत्य यत्वाददतत्व म इनि च्छल तस्मात् मनोहरांगीदेवखीणां संगीतामृतमारल्यपानज- निनसंतोपव्याजात् । मीलितचक्षुः मीलिते चक्षुषी यस्यास्सा तथोका । क्षेमवतोपि क्षेम- मस्यास्तीति क्षेमवान् नम्य क्षेमयुक्तस्यापि । सुनोः नंदनस्य । क्षीमित्वं क्षेममस्यास्तीति क्षेमी तस्य भावः तथोक्त । विचिन्वती विचिनोतीति तथोक्ता "नदुगित्" इत्यादिना की शतृपत्ययः । सम्पादयन्ती। एषा इय पमाधनी । प्रसूते: प्रसवस्य । समयं फालं । आयात् आगच्छत् याप्रापणे लङ् ॥१५॥ भा० अ०-भोली भाली देवांगनाओं ये गानामृतपानजन्य हर्प प्रकर्ष से मांखें मूंदे हुई तथा मंगलमय होते हुए भी अपने पुत्र (मुनिमुयन ) का कल्याण चाहती हुई पद्मावती को प्रमव का समय मा उपस्थित हुआ ॥१५॥ अवाप्य चैवासितपक्षपूर्णामथो तिथिं गश्रवणामसूत ॥ असावहपृर्विकयेव सूनुं भानु यथैवेंद्रदिशा तथैव ॥१६॥ भवाप्येत्यादि। अयो अनतरे "मंगलानेतरारंभप्रश्नकात्स्न्येयधोऽ" इत्यमरः । चैत्रालि. तपक्षपूर्णी चैत्री पोर्णमामी अस्थास्तीति चैत्र: "माम्यपौर्णमासी"इत्यण चैत्रवासी मासध .

७७ चतुर्थः सर्गः। चैत्रमासः असितश्चासौ पक्षश्व असितपक्षः चैत्रस्यासितपक्षस्तथोकस्य पूर्णा तथोक्ता ताम् चैत्रमासे कृष्णपक्षे पंचायां नंदा भद्रा जया रिक्ता पूर्णा च तिथयः क्रमात्" इति निथीनां नामान्तरत्वातु । सश्रवणां श्रवणेन नक्षत्रेण सह वर्तत इति सश्रयपा तां श्रवणनक्षत्र- सहितां तिथिम् । अवाप्य अवापनं पूर्व पश्चात्किंबिदित्यवाप्य लब्ध्वा । असौ पद्मावती देवी । यथैव यस्मिन् काल एव । इन्द्रदिशा इन्द्रस्य दिशा इन्द्रदिशा पूर्वदिक "दिग्दिशादक्ष- कन्यागाराशाकाष्ठारित्वकुमः" इति जयकीर्तिः । भानु आदित्यं । असूत असूपत । तथैव तत्काल एव । अहंपूर्विकोव अहे पूर्वमहं पूर्वमित्युक्त रहपूर्विका तया इस परस्परस्पर्धयेव अह पूर्वमदं पूर्वमित्यहपूर्विका खियाम्" इत्यमरः । सूनुं जिननंदनम् असूत असूपन पूर प्राणिप्रसवे लुङ् ॥१६॥ भा० भ०-पूर्व दिशा से सूर्य के समान थीमुनिसुव्रतनाथ चैत्र कृष्ण पञ्चमी को श्रवण नक्षत्र में महारानी पद्मावतो के उदर से उत्पन्न हुए ॥१६॥ बभुः स्त्रियस्तन्निहतांधकार नबोदितं विश्वजनेकमित्रम् ॥ विलोकयंत्यः सरसीव सौधे फुल्लाक्षिपद्मा इव पुष्करिण्यः ॥१७॥ यभुरित्यादि। सरसीय सरोवर इव उपमा । सौधे राजसदने । निहतान्धकार निह. तोऽन्धकारो येन स तं निरस्ततिमिरं । नवोदितं नवश्वासौ उदितश्च नवोदितस्तं नूतना. नितम् । विश्वजनै कमित्र विश्व च ते जनाथ तथोक्ताः एकश्चासौ मित्रश्च एकमिभः विश्व. अनानामेकमित्रः तं । सुहृत्पक्षे मिनशब्दस्य नपुंसक्त्यात्तत्पक्षे समासस्तथावसीयः । सफलजनमुरयसूर्य सखायं च "धुमणिस्तरणिर्मिन्न । अथ मित्र'सखा सुहृत्"इत्युभयत्राप्य- मरः। तंजिनयालफं। पिलोकायंत्य दिलोफयंतीति चिलोकयंत्यः वीक्षामणाः। स्त्रियः यनिताः । फुल्लाक्षिपद्मा फुलानि च तान्यक्षीणि च फुलाक्षीणि तान्येय पद्मानि यासां ता: उन्मीलितलोचनकमलाः । पुष्करिण्य इव पुष्कराणि संत्यासामिति पुष्करिण्यः मलिन्य इव । पभुः रेजिरे भा दोती लिट् । लपोपमा ॥१७॥ भा० ०-सूर्योदय से सरोवर में विकसित कमलनेत्र वाली नलिनी के समान नियां राजप्रासाद में नवोदित तथा विश्वमात्र के मित्र श्रीमुनिसुवन भगवान को उदित देखकर शोभने लगी॥१७॥ गृहान्तराले शशिकान्तभित्तित्विपैव निर्वाततमःप्रपंचे सुरांगना कापि तदा प्रदीपानयोधयत्केवलमंगलार्थम् ॥१८॥ गृहांतराल इत्यादि । तदा तत्समये । कापि सुरांगना देयत्री। शशिकांतमित्तित्वि. व शशिकांतस्य मित्तिः शशिकांतमित्तिस्तस्याः विट् तथैव इंदुकांतकुञ्यकांत्येव।

७८ 1 नतु मुनिसुव्रतकाव्यम् । निर्वान्ततमःप्रपंवे तमसा प्रपंचस्तम प्रपंच: निवातस्तमः प्रपंचो यस्मिन् तत् तस्मिन् विह- तांधकारसमूहे । “विपर्यासे विस्तरे'च प्रपंचः" इत्यमर । गृहांतराले गृहस्यांतरालं तथोक्त तस्मिन राज-सदनमध्ये । केवलमंगलार्थ मंगलाय इदं मंगलार्थ फेवलं मंगलार्थ तथोचम् मंगलनिमित्तं । "निर्णीते फेवलमिति त्रिलिंग त्वेककृत्स्नयो " इत्यमरः। तमःप्रपंचापनयनाथ । प्रदीपान् । अवोधयत् योधयतिस्म धुधि वोधने णिजन्तालड् ॥१८॥ भा० 80--प्रसूतिका-गृह का भीतरी भाग चन्द्रकान्तमणिमय भित्ति की चमक से दी प्रज्वलित हो रहा था। उस समय यहां किसी देवांगना ने जो प्रदीप जलाया था घह फेवल मांगलिक विधि की पूर्ति के लिये था न कि प्रकाश के लिये ।१८। हतांधकारेऽपि शिशुप्रभावात गृहोदरे तद्युतिपूर्णमेतत् ॥ अजानती काचन रत्नदीपानतिष्ठपद् भक्तिभरेण मुग्धा ॥१६॥ तांधकार इत्यादि । गृहोदरे गृहस्योदरं तथोक्त तस्मिन् राजसदनमध्ये । शिशुप्रभावात् शिशोः प्रमायस्तथोक्तस्तस्मात् जिनकालकस्य देहकांतिसामर्थ्यात् । নাখাবি हतोंऽधकारो यस्मिन् नष्टांधकारे सत्यपि। एतत् गृहोदरं । अन्वादेशे पनदादेश । ता तिपूर्ण तस्य धुतिस्ता तिः तया पूर्ण जिनबालक- नीलदेहफांतिपूर्णमिति । अजानती अबुध्यमाना । पाचन फापि। मुग्धा मूहा। भक्तिमरण भक्तभरो भक्तिभरस्तेन भयत्यतिशयेन । रत्नदोपान् रतान्येव दीपा. स्तान । अतिष्ठपत्। अस्थापयत् । छा गतिनिवृत्ती लुड्। भ्रांतिमानलकारः ॥ १६ ॥ भा:०-गयोत्पन्न तीर्थङ्कर श्रीमुनिसुव्रतनाथ के प्रभाव से भयन का भीतरी भाग अन्धकार रहित होने पर भी प्रसूतिकागृह को प्रकाशमय नहीं जानती हुई किसी मुग्धा देवयालाने भक्ति भारसे रस का प्रदीप घाला 1 १६ अरिष्टहर्म्यस्य सवनवेदेकलांगनीलद्युतिपूरितस्य ॥ मध्ये विरेजुर्नवदीपमाला मालामणीनामिव वारिराशेः ॥२०॥ अरिष्टेत्यादि। सबजदेः यजुस्य पेदि तथा सह पर्तत इति सपनवेदिस्तस्य। सघजुपितर्धितस्य सयजलस्य च । यालांगनील तिपूरितस्य यालस्पांग. पालोगः नीला चासो द्युतिध नोलघु तिः तयोक्ता तथा पूरित तस्य । अरिएहर्म्यस्य गरिष्टच तम् इम्पं च तपोक्तस्य । “भरिप्ट एनिमगृह" इत्यमरः । मध्ये अंतरे । नय. दीपमाला मवाश्च ते दीपाश्च मवदोपास्तेपा माला तपोचा भूननप्रदीपपङ्क्तिः पारिरा पारीणां राशि: पारिराशिस्समुदस्तस्प। मणीनां रत्नानां मालेय पनि मुनिसुव्रतकाव्यम् । मुक्तावलिश्च माल्यं च टुकूलमुकावलिमाल्यानि सेः रम्या क्षोमयनमुक्ताफलमालाभि- मनोहरा । पुरश्रीः पत्तनलक्ष्मीः कामिनीति ध्वन्यते। मात्मपतेः आत्मनः पतिस्तथोक्तस्तस्य निजाधिपस्य । प्रियाय प्रोतिनिमित्तं । भृशं अत्यंत । यभूव भवतिस्म भू सत्तायां लिट् ॥२२॥ भा० ०-गन्धोदक से सिक, रजो रहित अथवा भार्तव विशुद्ध श्री चन्दन से लिप्तांग तथा साड़ी और मालाओं से रमणीयता धारण किये हुई पुरलक्ष्मी अपने प्रियशासक की प्रीतिप्रान हुई । २२ ॥ प्रत्यंगणं कल्पितपंचरत्नरंगालयश्चक्रुरनेकभंगाः ।। जिनेन्द्रजन्मावसरप्रणश्यत्पयोधरस्रस्तधनुर्विशंकाम् ॥२३॥ प्रत्यंगणमित्यादि। अनेकभंगाः भनेको भंगो यासां तास्तथोक्काः बहुविधाः । "भगस्तरंगे, दग्भेदे मेदे जयविपर्यये" इति विश्वः । प्रत्यंगण अंगणमंगणं प्रति प्रत्यंगणं । कल्पितपंचरतरंगालय: पंच च तानि रत्नानि च पंचविधानि रक्षानीति या पंचरतानि रंगाणामालयो रंगालयः पंचरतः कृता रंगालयस्तथोक्ताः कल्ल्यनिस्म कल्पितास्ताच ता: पंचरतरंगालय तथोक्ताः "रंगो रणे खले रागे नृत्ये रंगं अपुन्यपि" इति विश्वः । जिनेंद्र जन्मावसरप्रणश्यत्पयोधरमत्तधनुर्विशंकां जिनानामिदो जिनेंद्रस्तस्य जन्म जिनेंद्रजन्म तस्यापसरस्तथोकः प्रणश्यतीति प्रणश्यन् पयोधरतीति पयोधरः प्रणश्यचासो पयोधरश्च तथोक्तः जिनंदजन्मावसरे प्रणश्यत्पयोधरस्तथोक्तः तस्मात्तस्तं तपोक्त "बस्त ध्वस्त भ्रष्ट स्कन्न पन्नं व्युत गलितम्" इत्यमरः । तच तत् धनुश्च जिनेन्द्र जन्माय- सरमणश्यत्पयोपरत्रस्तधनुस्तस्य विशंका तां नयोक्ता जिनेश्वरस्योत्पत्तिकाले घिनश्यन्मे- पापनस्तसुरचापसंदेहम् । चकः कुर्वतिस्म दुर करणे लिट् । उत्प्रेक्षा ॥ २३ ॥ मा० म०-जिनेन्द्र भगवान के जन्म-समय में प्रत्येक प्रांगण में पंचरत से रचित विविध रंग के मण्डन (चित्रायली), विलीन होते हुए मेघ से इन्द्रधनुष गिरने की शंका किया करते थे।२३। उत्तिप्तचित्रध्वजपंक्तयोऽपि समीरमार्गे जिनजन्महटाः ॥ चंचत्पताकाग्रमिवाभ्यनृत्यत्परस्परं गाढमिवालिलिंगुः ॥२४॥ उत्क्षिप्तेत्यादि। समीरमार्गे समीरस्य यायोमार्गस्तथोक्तस्तस्मिन् माकाशे। समीरमारुतमकाजगत्माणसमीरणाः" इत्यमः । उत्क्षिप्तचित्रध्यमपंचयोऽपिचित्राणिच तानि ध्यजानि च तपोवानि उरिक्षतानि च तानि चित्रध्वजानि व उत्क्षिप्तचित्र. . 7 M भाधन भवति। किंतु-तदेव तत्समय एव । क्षितीन्द्रवंधः क्षित्याः इन्द्राः क्षितीन्द्राः वासना यस्य सः तथोकः दुस्सहगंधश्चासौ बंधश्च तथोकः मुकिमार्थयंत इत्येवं शिला मुक्त विनेयजनाः। विमुक्ति स्वात्मोपलब्धिं। यास्यति गमिष्यन्ति। यत्तत् यदेतद्वचः। चित्रन चतुर्थः सर्गः। ८१ जानि तेषां पंक्तयः तथोका उन्नमितविविधकेतनराजयः किंपुनरांगनादय इत्यपि शब्दार्थः। जिनजन्मदृष्टाः जिनस्य जन्म तेन हुणा तथोक्ताः। अभ्यनृत्यत् नर्तनं कुर्वत् । चंचत्पता- काप्रमिव चचत्यश्च ताः पताकाश्च चंचत्यताकास्तासामग्रं तथोक्तं विलसद्ध जयंत्ययम् तदिय । परस्परं अन्योन्यं गाडमिय ढमिव । आलिलिंगुः भालिंगतिस्म आलिलिंगुरिव चभुरितिवान्वय लिगु गतौ लिट ॥२४॥ भा० १० -आकाश-मार्ग में जिनेन्द्र भगवान के जन्म से प्रसन्न होकर मानों नृत्य करती हुई अनेक रंग की ऊंची २ पताकायें कम्पित वैजयन्ती के अग्रभाग के समान प्रतीत होकर परस्पर आलिंगन किया करती थीं ॥२४॥ मृदंगमन्द्रध्वनिमांसलेन गीतेन नृत्यद्गणिकानिकायः ॥ उद्देलमुज्जभितरागवार्धेस्तरंगमालाकृतिमाललम्बे ॥२५॥ मृदंगेत्यादि। नृत्यद्गणिकानिकायः नृत्यन्तीति नृत्यन्त्यः ताश्च ताः गणिकाश्च तथोक्तास्तासां निकायः नृत्यलज्जिकाप्रकरः । मृदंगमंद्रध्वनिमांसलेन मंद्रश्चासौ ध्वनि- श्व मंद्रध्वनिः मृदंगस्य मंद्रध्वनिस्तथोक्तः मृदंगमंद्रध्वनिना मांसलं तेन मुरजगंभीरनि- नादपुष्टेन "मंद्रस्तु गंभीरे । बलवान्मांसलोंऽसल" इत्युभयत्राप्यमरः ।गीतेन गानेन ।उद्वलं बेलामुद्गतं यथा भवति तथा । उज्जृम्भितरागवार्धेः राग एच वार्धिस्तथोकः उज्जभतेस्म उज्जभितः स चासो रागवार्धिश्च तथोक्तस्य प्रवृद्धप्रमोदसमुद्रस्य। तरंगमालाकृति तरंगाणां माला तरंगमाला तस्या आकृतिस्तथोक्ता तां ऊर्मिमालाकारं। माललंबे स्वीकरोतिस्म लघु अवस्रसने लिट् । उत्प्रेक्षालंकारः ॥२५॥ भा० अ०-मृदंग की गंभीर ध्वनिमय गान गा गा कर नाचती हुई अप्सरायें उत्ताल तरंगयुक्त तट चाले आनन्द-समुद्र की तरंग-माला के समान शोभती थीं । २५॥ भव्याश्चिरं दुःसहगंधबन्धमुक्क्यर्थिनोऽस्मिन्नुदिते विमुक्तिम् ।। यास्यति यत्तन्नययुस्तदैव क्षितीन्द्रवंद्यो यदिदं हि चित्रम् ॥२६॥ भव्या इत्यादि । अस्मिन् जिनेश्वरे । उदिते उदेतिस्म उदितस्तस्मिन् सति । चिर दीर्घकालं । दुस्सहगंधयंधमुक्यर्थिनः दुःखेन महता कष्टन सह्यत इति दुःसहा दुस्सहोगी थर्थिनः दुस्सदगंधर्वधंस्य मुक्यर्थिनस्तथोकाः। भव्या: रत्नत्रयाविर्भवयोग्याः भन्याः

--
८२
मुनिसुव्रतकान्यम्
तेषां यस्तथोक्ताः शत्रुभूपालकारार्यधनानि "प्रग्रहोपनही पंद्यां कारा स्पा घंधनालये"
इत्यमरः । विमुक्ति मोचनं "मुक्तिः स्यान्मोचने मोर्के” इति विश्वः । ययुः अगुः । यदिद
यदेतत् । चित्रं हि अथागुतं खलु ॥ २६ ॥
मा० म०~-चिर फाल को दुःसह चासना से मुक्ति पाने की इच्छा पाने वाले भव्य
जीव जिनेन्द्र-मार्तण्ड के उदित होने पर मुक्ति पायेंगे इस में तो कोई माश्चर्य ही नहीं है।
पर शत्रु भूत राजसमूह जो धन्दी हुए ये घे भी मुक्त हो गये यही आश्चर्य है। अर्थात्
जिनेन्द्र-जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में सभी यन्दी राजे छोड़ दिये गये।२६ ।
श्रीखंडपडेन जिनस्य गाते सौरभ्यमिभ्यं प्रहितोऽवगंतुम् ।। .
प्रभूतभीतेरिव कंपमानश्चचार चारुमलयाद्रिवातः ॥२७॥
श्रीखंडे इत्यादि। जिनस्य जिनेश्वरस्य । गाने शरीरे । इभ्यं प्रवृद्ध "इभ्य आढ्ये क.
रेपकां तु भवेदिभ्या तुशल्लको” इति विश्वः । सौरभ्यं सुरभिरेव सौरभ्यं परिमलं । भरगंतुम्
ये ये गत्यर्थास्ते ते ज्ञानार्थी इति न्यायायो । श्रीखंडपंडेन श्रीखंडानां पंडं तेन
श्रीगंधानां कदधेन "कदंबे पंडमखियाम्" इत्यमरः । प्रहितः प्रहीयतेस्म तथोकप्रेरितः।
चारः मनोहरः। मलयाद्रिवातः मलपश्चासी अदिश्च मलायाद्विस्तस्य घातस्तथोक्त ।
प्रभूतमीतरिव प्रभूता चासो भोतिश्च तथोक्ता तस्या इव प्रचुरमयादिय "प्रचुरं प्राज्यम्"
इत्यमर । पमानः पत इति कंपमान: चेपमान.। चचार विजहार घर गतिमक्षणयोः
लिट् उत्प्रेक्षा॥२७
भा० ०--श्रीजिनेन्द्र भगवान को देह से प्रवाहित होती हुई बढ़ी चढ़ी हुई स्वाभा.
विक सुगन्ध श्रीखएडकदम्ब से जानने के लिए भेजी गयो मलयादि घायु अत्यन्त भय.
अस्त दो काप २ कर पहती हुई कीसी ज्ञात होतीगी। २७ ।
प्रकाशते भानुसहस्रतुल्यं तथाप्यहो नेत्रसुखैकहेतुः ।।
कुमारकोऽसाविति लज्जितः किं बभूव मंदोप्णरुचिर्विवस्वान् ॥२८॥
प्रकाशत इत्यादि । वियस्वान् सूर्यः। मंदोदणरचि. मंदमुष्ण यस्यास्सा मंदोषणा
रुचिर्यस्यासाविति पुनर्यसः अल्पोष्णकिरण: "स्युः प्रभातमु चिस्विट् भा" इत्यमरः । यभूव
अभूत् । असौ अयं । कुमारः जिनबालकः । भानुसहनतुल्यं भानूना सहस्र मानुसहस्र
तेन तुल्यं भर्फसहस्रसम यथा तथा । प्रकाशते भासते का दोती लट् । तथापि.
नेत्रसुखैकहेतुः नेत्राणां सुख तथोक एफचासौ हेतुश्च पकहेतुः नेत्रसुखस्य एकहेतुस्तपोषः
नयनाहादनमुल्यहेतु । अहो भाश्चर्यमिति लजितः किं । संशयः ॥ २८ ॥

. - चतुर्थः सर्गः । मा० अ०-ये जिनकुमार हजारों सूर्य के तुल्य जाज्वल्यमान होते हुए भी नेत्र सुपद हो रहे थे यह जानकर ही मानों सूर्य लज्जित हो मन्दीष्ण कान्तियुक्त हो गया। २८॥ शुचित्ववृद्धेरसपत्नहेतोर्जिनस्य भक्त्या शुचयः कुरुध्वम् ॥ प्रदक्षिणं यूयमितीव वक्तुं प्रदक्षिणत्वेन शुचिर्दिदीपे ॥२॥ शुचित्वेत्यादि । शुचयः भो निर्मलाः यूयं शुद्धनिश्चयनयापेक्षया द्रव्यमावफर्मरदित. त्वादथवा घ्यवहारनयापेक्षया जातिकुलाचाराधमलिनत्वाजनाःशुचय इत्यामंत्र्यन्ते भवन्तः। शुचित्ववृद्धः शुचेर्मायः कृत्य या शुचित्वं तस्य वृद्धिश्शुचित्यवृद्धिस्तस्याः निर्मल. त्ववर्धनस्य। गमपत्नहेतोः न विद्यते सपतो यस्य सोऽसपतः स चासी हेतुध तयोक्तस्तस्य "शत्रुः सपतो भ्रातृव्यः प्रत्यनीको द्विपन्मतः" इति हलायुधः। अद्वितीयहेतुभूतस्येत्यर्थः । जिनस्य अर्हनाथस्य । प्रदक्षिणं परितिक्रियां । भक्त्या गुणानुरागेण । फुरुध्वं विदम् । इति यक मिय वचनाय घक्त एवमभिधातुमिय । शुचिः भग्निः । “शुचिः शुद्धेऽनुपहते शृगांरापाढयोस्सिते । प्रीष्मे हुतयहेऽपि स्यादुप. धाशुद्धमत्रिणि” इति विश्वः । प्रदक्षिणत्वेन प्रदक्षिणस्य भाव प्रदक्षिणत्वं तेन । दिदीपे ज्वलतिस्म। उत्प्रेक्षा ॥२६॥ भा० ४०--हे पवित्र धर्मात्माओ! तुम पवित्रता के एकमात्र कारण श्रीजिनेन्द्र भगवान की प्रदक्षिणा फरी। मानों ऐसा फहने को कटियद होकर ही अग्नि प्रदक्षिणा. रूप से प्रज्वलित हुई । २६ ॥ रजांसि धर्मामृतवर्पणेन जिनांबुवाहः शमयिप्यतीति । न्यवेदयन्नबुधरा नितांतं रजोहरैर्गधंजलाभिवर्षेः ॥३०॥ रजांतीत्यादि । अबुधराः अवदर्फ धरतीत्यंधराः मेघाः। रजोहरैः रजाति हरतीति रजोदरास्तः धूलिविनाशकैः । गंधजलामिवः गंर्धन युक्तानि जलानि तेग. ममियस्तिः परिमलसलिलवृष्टिमिः। जिनांयुबादः अयु घहतीत्यंयुयाहः जिन ए. यांपादस्तयोफ्तः जिनेश्वरमेघः। एफ धर्मामृतवर्षणेन रसात्रयात्मको धर्मस्स पया. मृत तस्य पर्पण तेन धर्मसुधापपणेन । माफः । रजांसि पूलीः पापपांयूनित्ययः । शम. पिप्यति दमयिष्यति शमू दमू उपशमने लूट । नितांत न्यवेदयन् । सूचयंतिस्म विद् शाने लङ्ग उत्प्रेक्षा ॥३०॥ मा० १०-जिनेन्द्र जलघर धर्मामृत पर्षण से सभी जीवों के पापपुंज को नष्ट करेंगे ऐसी यात जानने के लिये दी मानों मेय ने सुगन्ध जलवृष्टि से सभी धूलिममूद को नष्ट कर दिया।३०।.

। मुनिसुव्रतकाव्यम् जिनस्य कालारिरितिप्रसिद्धि चिबुच्य भीता इव सेवनाय ॥ बनाय सर्वे सहसावतेविसंतमुरख्याः सममेव कालाः ॥३१॥ जिनस्येत्यादि। कालारिरिति कालस्य यस्यारिश्शत्रुरिति समयारिरितिध्वनिः । "कृतांतानेसोः कालः' इत्यमरः । प्रसिद्धि ख्याति । विश्व योधन पूर्व पश्चारिकचिदिति विबुध्य विज्ञाय। भीता इव विभ्पतिस्म भीता इच। जिनस्य जिनेश्वरस्य । सेवनाय माराधनाय । वसंतमुरख्याः घसंतो मुरयो येषां ते तथोक्काः। सर्वे काला: समस्त. ऋतयः । सममेव सदेव । गनाय इत्यत्र “कर्मण." इनि कर्मणि चतुर्थी बनमलं कर्तुमित्यर्थः । सहसा शीघ्रण) "भतर्किते सहसा" इत्गमरः अवतेरु माजग्मुः । अपनतरणयोः लट् विभ्रमः ॥३१॥ भा० ०-कालारि ( यम के शत्रु ) ऐसो उपाधि जान मानों भयभीत होकर ही यसन्त आदि सभी ऋतुओं ने श्रीजिनेन्द्र भगवान् को सेवा करने के लिये एक ही साथ चन के लिये प्रस्थान किया।३१॥ अहो विभुक्ते सवितारमेषा तमीश्वरं हेष्टि च पश्यतेति ।। द्विरेफवृत्तिं जिनजन्मदभादंभोजिनीमुत्पलिनी जहास ॥३२॥ महो इत्यादि। एपा इयं । सवितारं भानु पितरं “सवित्री जननी माता जनकस्स. विता पिता। यमुना यमकानीनजनकसविता मतः' इत्युभयत्रापि धनंजयः । विभुंके अनु- भवति । तमीश्वरं तम्या:एनरीश्वरः पतिस्तं । “रजनो यामिनी तमी" इत्यमरः । पक्षेत प्रसिद्ध ईश्वरं ध । ष्टि चक्रध्यति च द्विप अप्रीती लट् । अहो हंत अद्भुत था। द्विरेफ वृत्ति द्विरेफाणी भ्रमराणांवृत्तिनीधनं यस्यास्सा तो "वृत्तिर्तनजीवने" इत्यमरः । पक्षे रेफे चते वृत्ती च रेफवृत्ती अधमवर्तने यस्यास्ता: "रफोरवर्ण सम्प्रोकः कुत्सिते वाच्यवत्पुनः" इति विश्वः। पित्तभोगपतिविद्वेषरूपिणीं च धर्तनद्वयवतीमित्यर्थ (अंभोजिनी अंभोजान्यस्या. संतोत्यंभोजिनी तां पशिनी कामिनीमिति धनि । पश्यतेति प्रेक्षध्वं लोका इति। जिनजन्म- दभात् जिनस्य जन्म तथोक्त जिनजन्मेव दमस्तस्मात् जिनेशोत्पत्तियाजात् । कपटो ऽस्त्री व्याजदभोपघयः" इत्यमरः । अन्यथा स्वस्याश्व तहोयोपपत्तः। उत्पलिनी पुमुदिनो उत्पला संत्यस्या इत्युत्पलिनी। जहास हसतिस्म हस हसने लिट । अगणोदये सत्यपि जिनेंद्रोदयप्रभावादस्फुटदिति भावः। विरोधालंकारः ॥३॥ भा० -देखो! कैसी आश्चर्यजनक घटना है कि, पहिली सूर्य ( अपने पिता) का उपभोग तथा चन्द्रमा पति से द्वेष करती है है-यह कहती हुई फुमुदिनी ने भ्रमरवृत्ति (मीचा घरण) घाली पमिनी की देसी उडायो । ३२॥

चतुर्थः सर्गः " अप्यद्ययावन्मधुपाननिष्ठाः संप्रत्यपापा इति गानभंग्या ॥ भंगा वदतो विविशुः प्रतीत्यै पद्माग्निकुंडेपु परीत्य विद्मः ॥३३॥ अपीत्यादि । यावदद्यापि एतत्कालपर्यन्तं । मधुपाननिष्ठाः मधुनः पुप्परसस्य पानं तस्मिन्निष्ठाः तत्पराः । “मधु मय पुष्परसे" इत्यमरः। संप्रति इदानी जिनजननोत्सव इत्यर्थः। अपापा इति न विद्यते पापं येषां ते तथोक्ताः। इति गानभंग्या गानस्य भंगी तथोक्ता तया संगीतरचनया "भंगा तु गणसंज्ञके भंगी प्रकर" इति नानार्थरतमालायां । वदन्तः वदंती- ति पदंतः। भृगाः मधुलिहः। प्रतीत्यै शपथाय । पदाग्निकुंडेपु अग्न कुंडानि अग्निकुं. डानि पनान्येवाग्निकुंडानि तयोकानि तेषु रक्तसरोरुहानलकुंडेपु। परीत्य पर्ययणं पूर्व पश्चात्किंचिदिति परीत्य प्रदक्षिणीकृत्य । विविशुः विशतिरुम इति । विदा जानीमः विद शाने लट् उत्प्रेक्षा ॥३३॥ मा० १०-जान पड़ता है कि अब तक मधुपान में लीन भ्रमरों ने "हम निष्पाप है। इस बात को अपने मधुर गानद्वारा सूचित करते हुए प्रतीति (शप) के लिये रक्त कमलरूप अग्निकुण्ड में प्रदक्षिणा करते हुए प्रवेश किया।३३। मुक्तारजोभिर्बहुकंटकैश्च जिनप्रभावेण समुज्ज्वलात्मा ।। वसुंधराऽपि प्रमदेन जाता सस्यच्छलांकुरितरोमराजिः ॥३॥ मुक्त त्यादि । जिनप्रभावेण जिनस्य प्रभावस्तयोक्तस्तेन जिनेश्वरसामर्थ्येन । रजोभिः धूलिभिः पापैश्च । बहुकटकैश्च पहनि कंटकानि तथोक्तानि तेः बहुफंटकः विनश्च । मुका मुच्यतेस्म मुक्ता विरहिता । समुज्वलात्मा समुज्वल आत्मा यस्यास्सा तथोक्ता । सम्यक्प्रकाशात्मा। वसुंधरापि भूम्यपि । प्रमदेन संतोपेण। सस्यच्छलांकरितरोमराजिः सस्थान्येघ छलं सस्यच्छलं अंकुरः संजातः अस्या इत्यंफुरिता रोग्णां राजिः तथोक्ता अंकुरिता चासो रोमाजिश्च तथोक्ता सस्यच्छलेनांकुरिता रोमराजियस्यास्सा तथोक्ता "अंकरश्यांफरः प्रोक्तः" इति हलायुधः । “अंकूरोंऽकुरमस्त्रियो" इति वैजयंती च । जायतेस्म जाता सम्भूता । श्लप: ॥३४॥ भा० म०-धूलि तया कंटकों का एकमात्र बहिष्कार किये हुई और जिनेन्द्र भगवान के प्रभाव से तेजोमय आत्मावाली पृथ्वी ने हाधिषपसे सस्यसम्पन्नता के यहाने आनन्द के रोंगटे प्रकटित किये ॥३४॥ स्वभावशुद्धा अपि सर्वजीवाश्चिरं रजोभिः परिभूयमानाः ।। न केवलं निर्गलितपु तेषु दधुः प्रसादं ककुभोऽपि सद्यः ॥३५॥ जाता मुनिसुपतकाव्यम् स्वभावत्यादि । स्वभावशुद्धा अपि स्वभावेन शुद्धास्तथोक्ता अपि स्वरूपेण निर्मलाश्च । रजोमिः ज्ञानापरणादिकर्मरजोभिः । विर बहुकालपर्यत परिभूयमाना: परिभूर्यत इति परिभ्यमानाः समाहियमाणाः। सर्वजीवाः सर्वे च ते जीयाय सर्वजीयाः। अखिल- भयानाः। तेषु कर्मरजस्। निर्गलितेपु जिनोदयप्रमायाद्विगलितेषु सत्सु । केवलं परं । प्रसाद प्रसन्नता । न दधुः नं यभुः । अपितु-स्त्रमावशुद्धा अपि स्वरूपेणामलाच चिरं दीर्घकाल । रजोमिः मेघरजोभिः परिभूयमाणा: व्याप्रियमाणाः । ककुमोऽपि दिशोऽपि । सयः तदेव । तेषु मेयावरणेषु । निर्गतेषु विगलितेषु। प्रसाद प्रसन्नता । दधुः परतिस्म । डुधा धारणे च लिट् सर्पभव्यप्राणिनो दिशश्च निर्मलता प्रापुरिति भावः ॥ ३५॥ भा० आo-स्वभावशुद्ध होने पर भी ज्ञानाचरणादि कर्मकालिमा से चिरकाल से कलंकित, फेवल सभी भव्य जीवों ने ही नहीं बल्कि सभी दिशाओं ने भी जिनजन्मोदय के प्रभाव से कमरज फे विनष्ट होने पर तुरत स्वच्छता धारण कर ली ॥३५॥ गृहेषु शंखा भवनामराणा बनामराणां पटहाः पदेषु ।। ज्योतिस्सुराणां सदनेषु सिंहाः कल्पेषु घंटाः स्वयमेव नेदुः ॥३६॥ गृहेपिनत्यादि । भवनामराणां भवने विद्यमाना अमरा भवनामरास्तेषां भवनया- सिदेवानां । गृहेषु सक्ने । शंखाः शंखवाद्यानि । धनामराणां धने विद्यमाना अमराव- मामरास्तेषां व्यंतरदेवानां । पदेषु स्थलेषु । पटहाः भेर्यः। ज्योतिस्सुराणां जोतिलोंके विद्यमानास्सुराः ज्योतिस्थरास्तेषां ज्योतिर्देवानां । सदनेषु भयनेषु । सिंहाः सिंह- नादाः । फल्पेषु स्वर्गेषु। घंटा: घंटायाद्यानि। स्वयमेव अनन्यप्रेरणयव । नेदुः रेणु नद अव्यक्त शब्द लिट् ॥ ३६ ॥ भा० अ०-जिनेन्द्र भगवान जन्म होते ही भवनमासी देवों के घर में शंख, घ्यन्तर- पासी अमरों के गृहों में भेरी तथा ज्योतिर्लोकवासी देवताओं के गृहों में सिंहनाद भाप से आप यजने लगे ॥३६॥ पुप्पाः पतंतो नभसः सुधांशोरेणस्य सिंहध्वनिजातभीतेः ॥ पदप्रहारः पततामुडूनां शंका तदा विद्रवतो वितेनुः॥३७॥ पुष्पा इत्यादि । तदा तत्समये । नमसः भाफाशात् । पतन्तः पतेतीति पतन्तः । पुष्पाः कुसुमानि । “पुष्पोऽस्रो फुसुमम्" इति पैजयन्ती । सिंहध्यनिजातमीतेः सिंहस्य ध्वनि- स्तयोक्तः सिंहध्वनिना जाता भीतिस्तपोक्ता तस्याः । ज्योतिर्गणसमुदत तसिंहनादममवा- यात् । घियतः चियतीति विद्रयन् तस्य पलायमानस्य । सुधांशोः सुधारूपा शवो पतुर्थः सर्गः पस्य सः तस्य निशाकरस्य संबंधिनः । एणस्य मृगस्य । पदप्रहारः पदानां प्रहारास्तैः चरणाभिधातः । पततां पत्तीति पतंतस्तेषां । उडूनां नक्षत्राणां । "तारकाप्युडुवा स्त्रिया. " इत्यमरः । शंकां संशयं । वितेनुः चकः। तनु विस्तारे लिट् उत्प्रेक्षा ॥३७॥ भा० १७-आकाश से जो जिनेन्द्र-जन्म-सूचक सुमन-वृष्टि हो रही थी यह सिंह गर्जन से भयमस्त अतः मागते हुए चन्द्र-मृग के पाद-प्रहार से गिरते हुए नक्षत्रों का सन्देद उत्पन्न कर रही थी ॥३७॥ अभ्रात्पतंतो मणयस्तदानीमुच्चंडघंटाध्वनिताडनेन ॥ भिन्नेन्द्रकोशालयतो जनानां मतिं वितेनुर्गलतां मणीनां ॥३८॥ : अभ्रादित्यादि। तदानीं तस्मिकाले तदानीं । अभ्रात् भामाशात् । पतन्तः पतंतीति पतन्तः । मणयः रत्नानि । उच्चडघंटाध्वनिताडनेन घंटानां ध्वनिः घंटाध्वनिः उच्चंडवा- सौ घंटाध्वनिश्च तथोक्तः उडघटाध्यनेस्ताडनं वेन प्रचंडधंटानिनादप्रहारेण । भिन्नेन्द्र- कोशालयत: फौशल्यालयः कोशालयः इन्दस्य कोशालयः इन्दकोशालयः , भिन्नश्वासी इद्रकोशालयश्च तथोक्तस्तस्मात्ततः स्फुटितशनामांडागागत् । गलता गलंतीति गलंतस्तेषां पततां । मणीनां रतनां । मति बुद्धि । जनानां लेोकानां । विर्तनुः विदधुः । तनू विस्तारे लिट् उत्प्रेक्षा ॥३८॥ भा० म०-इस समय कल्पलोक में होती हुई रत्नवृष्टि ने घंटा के गंभीरनाद से छिन्न मिन्न हुए इन्द्र के खजाने से गिरती हुई मणियों का भ्रम उत्पन्न कर दिया ॥ ३८॥ जाते जिने माजनि भूजनानां विपत्कणोऽपीति विभुत्वशक्त्या ॥ चंदीकृतानीव भुवि ग्रहाणां चलानि रेणुमणयो विकीर्णाः ॥३६॥ जात इत्यादि। विकीर्णाः विकीर्यतेस्म विकीर्णाः विक्षिप्ताः ।मणयः रतानि । जिले अहंदीश्वरे। जाने त्याने सति । भूजनानां मुशि विद्यमाना ना भूजनास्तेषां मात्र घानां। विपत्कणोऽपि विपदः कणः विपत्कण: आपत्तिलेशोऽपि । "लवलेशकणाणव" इत्यमरः । माजनीति मा भूदिति जनैङ् प्रादुर्भावे लुङ् “दित्यडिणपेदः" । विभुत्वशक्त या विभोर्भावो विभुत्वं तस्य शतिः विभुत्वशक्तिस्तया प्रभुत्वसामर्थेन । भुवि भूमौ । ग्रहाणां नवमहाणाम् पलानि सैन्यानि दीकृतानि यंदयः क्रियतेस्म यंदीकतानि तानीय कारागारे क्षिशानीव “प्रग्रहोषाही धंद्याम्" इत्यमरः । रेजः वभुः राज दीप्ती लिट् उत्प्रेक्षा ॥ ३६ ॥ भा० No-जिनेन्द्र भगवान के जन्म लेने पर रत्ल-वृष्टि से इधर उधर बिखरी हुई मणिपा-भूतलवासी जीवों को वनिक भी दुःख नहीं हो-ऐसी धारणा से मानों शासन.

८८ -- मुनिसुव्रतकाव्यम् । शति के द्वारा कष्टप्रद नवग्रहों की घंधी हुई सेना को सो ज्ञात होती हैं ॥ ३६॥ देवोत्तमांगान्यखिलोत्तमानामानम्यपादस्य विभोः प्रणामैः ।। साथ स्वनामैव विधातुकामानानेमुरत्यद्भुतमात्मनैव ॥४०॥ देवोत्तमांगानीत्यादि । अखिलोत्तमानां अखिलाश्च ते उत्तमाश्च तथोकाः तेषां समस्त जनानाम् । भानभ्यपादस्य आनंतुं योग्यो आनन्यौ पादौ यस्य सतस्य वा सक्लोरकष्टजनरपि चंद्यकमन्येत्यर्थः । विमोः मुनिसुव्रतस्य । प्रणामः नमस्करणैः । स्वनाम स्वस्य नाम तथोक खकीयमुत्तमांगाभिधान सार्थं गर्थेन सह घर्तत इति सार्थं सफलं । विधातुकामानिय विधातुं कामानिय विधातुफामानिय "तुमो मनस्कामः" इति तुमो मकारस्य लुकु । देवोत्तमांगानि देवानामुत्तमांगानि तथोकानि अमरेंद्र शिरांसि । आत्मनेव स्वेनैव । आनेमुः मानमंतिस्म । अत्यद्भुतं अत्याश्चयं ॥४०॥ भा० भ०-सभी सम्यों से चन्दनीय चरणवाले श्रीजिनेन्द्र भगवान् की धन्दना करके, अपने नाम सार्थक करने के इच्छुक इन्द्रों के मस्तक थाप से भाप झुक जाते हैं यह आश्चर्य है॥४॥ जिनामृतांशोरुदितात त्रिलोक्यामुत्कूलितस्य प्रमदाबुराशेः॥ प्रत्युच्चलहीचित्रशेन सत्यं भद्रासनानि घुसदां विचेलुः ॥४॥ जिनामृतांशोरित्यादि। उदितात् उदेतिस्म उदितन्तस्मात् । जिनामृतांशः ममृतरूपा अंशयो यस्य स तथोक्तः जिन पवामृतांशुर्जिनामृतांशुस्तस्मात् । त्रिलोक्यो प्रयाणा लोकानां समहारखिलाको तस्यां । उत्कूलितस्य उत्कूलयतिस्म उत्कूलितस्तस्य उदलितस्य। ममदाबुराशे अंबूनां राशिस्तथोक्तः प्रमद पवावुराशिस्तथोक्तस्तस्य संतोपायः। प्रत्युधलद्वीचिवशेन प्रत्युचलंतीति.मम्युचलंत्यस्ताव ता वीचयश्च तासां प्रत्युचलद्वौचित्रशस्तेन उचलत्तरंगाधीनत्वेन। घुसदा दिवि सीदतीति धु सदस्तेषां देवानां । भद्रासनानि भद्राणि च तानि आसनानि च भद्रासनानि । विचेल. चकपिर चल कपने लिट् । सत्यं तध्यं । उत्प्रेक्षा ॥४॥ मा० १०-श्रीजिनेन्द्ररूपी चन्द्रमा के उदय लेने से निभुवन में उद्वेलित हर्पसमुद्र की उत्तुंगतरंग की पश्यता से देवताओं के शुभासन कम्पायमान हुए ॥४॥ विज्ञाय तेनाधिपजन्मपीठादुत्थाय सप्तेत्य पदानि नत्या । प्रादापयन्मेघहयोऽतिमेघां प्रस्थानभेरीमभिपेक्तुकामः ॥४॥ विझायेत्यादि । मेघदयः मेघ एवं योऽश्यो यस्य स. मेघवाइनश्शनः । "संकदनो घशः rina ...

चतुर्थः सर्गः। ८६ दुश्च्यवनस्तुरापापमेघवाहनः" इत्यमरः । तेन भद्रासनकंपनेन । अधिपजन्म अधिक पातीत्यधिपः तस्य जन्म तथोक जिनेश्वरोत्पत्ति । विज्ञाय विबुध्य । पीठात् सिंहासनात् । उत्थाय उत्थापनं पूर्व पश्चात्किंचिदित्युत्थाय । सप्त पदानि । एत्य आयनं पूर्व पश्चातिकचिदित्येत्य “प्राकाले" इति फ्त्या प्रत्ययः । "क्त चोऽननः प्यः” इति प्यादेशः "हस्वस्य तक पिति कृति" इति तगागमः । "मोमाङिपरः” इति पररूपत्वं । नत्या बंदित्या । अभिषेक्त कामः अभिषेचनायाभिपेक्तुं तत् कामयतीति तथोक्तः। “तुमो मनस्कामः" इति मकारस्य लुफ् । अतिमेघां मेघमतिकान्ता अतिमेघा तां । निराकृतमेघों प्रस्थानभेरी प्रस्थानस्य भेरी तथोका तां प्रयाणभेरी । प्रादापयत् अताडयत् दाप लवने लड् ॥ ४२ ॥ भा० म०–इन्द्र महाराज ने आसन के कम्पित होने से जिनेन्द्र भगवान का जन्म जान सिंहासन से सात डेग आगे बढ़, बन्दना कर जन्माभिषेक करने की इच्छा से गंभीर ध्वनि से मेघ को भी पददलित करने वाली भेरी बजाई ॥४२॥ शंखादयोऽर्हज्जनन प्रणादैरेकैकलोकं स्वमवूबुधंस्ते ॥ तत्सर्वलोकानभिपेकयानां सा वोधयामीति मदादिवाप ॥४३॥ शंखादय इत्यादि। शंखादयः शंख गादिर्येपां ते तथोक्ताः शंखपूर्वाः। अईजननं अर्हतो जनन तथोक्त प्रणादः ध्वनिभिः । स्वं स्वकीयं । एकैकलोकं एफैकश्चासौ लोकञ्च एकैकलोकस्तं एकमेकं लोके । “वीप्सायाम्” इति द्वि । अबुधन अयोधयन् वुधिमनि ज्ञाने पिजन्ताल्लुङ् “रिक्त" इत्यादिना णिलुक् "कमूभि” इत्यादिना ट् प्रत्ययः "द्विर्धातुः” इत्यादिना द्वि. । “लयो.” इत्यादिना पूर्वस्य दीर्घः । सा भेरी। तत्सर्वलोकान् सर्वे च ते लोकाध तथोकाः ते च ते सर्वलोकाश्च तथोकास्तान भवना दिसकललोकान् । अभिषेकयात्रा अभिपेकस्य यात्रा तयोका तां जन्मामिपेकयानं । योधयामीति ज्ञापयामीव युधिमनि ज्ञाने लट् । मदादिव गर्वादिव । आप ययो आप्ल व्याप्ती लिट् । उत्पेक्षा : ४३॥ भा० अ०-शंप आदि वाद्योने अपने गम्भीर निनाद से श्रीजिनेन्द्र भगवान् के जन्म की सूचना अपने प्रत्येक लोफ को देदी। तत्पश्चात् “में सभी लोगों को जिन-जन्मामिरे को विज्ञप्ति से विज्ञप्त करती हूँ" मानों ऐसे आवेश में आकर ही भेरी बड़े अमिमान से घजी ॥४३॥ ज्योतिप्करन्योरगकल्पनाथा भेरीप्रणादादवगत्य यानाम् ।। विभूषितांगाः सपरिच्छदाः खे विलोक्यन्तः शतमन्युमस्थुः ॥१४॥ ज्योनित्यादि। ज्योतिप्करन्योरगकलानाथा: ज्योतीपि एच ज्योतिषा: चने.

मुनिसुव्रतकाव्यम् । भवाः पन्याः क्योतिषकाच धन्याश्च उरगाश्च कल्पानां नाया: कल्पनाथाश्च तपोकाः । भेरि- मणादात् भेर्याः प्रणादस्तस्मात् दुन्दुमिनादात् । यात्रा प्रयाण । अवगत्य ज्ञात्वा । विभूषि. तांगा: विभूष्यतेस्म विभूषित विभूषितमंग पपाते तथोकाः अलंग्तशरीराः । सपरिच्छदाः परिच्छदेन सद यतंत इति तथोकाः परिवारसहिताः । शतमन्यु देवेन्द्र । विलोकयंतः पिलोकयंतीति तथोकाः शतृप्रत्ययः । धीक्षमाणाः खे आकाशे। तस्थु: आसिरे छा गतिनिवृत्ती लुङ ।। ४४ ॥ भा० अ०-ज्योतिष्क, भवन तथा कल्पवासी सभी इन्द्र अपने परिवार सहित दुन्दुभिः निनाद से जन्माभिषेक यात्रा जान कर वस्त्राभूषणों से सुसजित हो आकाश में देवेन्द्र की प्रतीक्षा कर रहे थे ॥४४॥ सामानिकैदिक्पतिभिः पदातिगंधर्वहरत्यश्वरथाधनीकैः ।। शरीररक्षश्च समन्वितोऽयं शच्या सहाऽस्थाय गजं प्रतस्थे ।।१५।। सामानिकरित्यादि। सामानिकैः सामानिकदेवः । दिपातिभिः दिशां पतयस्तथो. कास्तः। पदातिगंधर्वहस्त्यश्वरथाद्यनीकः पदातयश्च गंधर्याश्च हस्तिनश्च अश्याश्च रथाश्च पदातिगन्धर्वहस्त्यश्वरथास्ते आदि तानि तयोक्तानि पदातिगन्धर्यदस्त्यश्वर. यादीनि च तान्यनीकानि च तथोक्तानि तैः आदिशब्दन वृपभमहिपनरीक्धानीक: शरीर- रक्षेश्च अंगरक्षासुरैश्च समन्वित: समन्वेतिस्म समन्वितः सहित. । शच्या इन्द्राण्या । समं सह । अयं सौधर्मेन्द्रः । गज ऐरावतगजेन्द' । आस्थाय आस्थान पूर्व पश्चात्किंचिदित्या. स्थाय आरुह्य । प्रतस्थे प्रथयो । छा गतिनिवृत्ती लिट् ॥ ४६॥ मा० 10--सामानिक देव, दिक्पाल, गन्धर्व, शरीररक्षक तथा शची के और पादाति, हयदल, गजदल तथा रथ-दल आदि सैनिकों के साथ लेकर सौधर्मेन्द्र ने ऐरावत पर चढ़ कर अमिपेकयात्रा के लिये प्रस्थान किया । ५५ । साथैस्सुरेन्द्ररतरिभिविमानस्सायात्रिकोयं जलधि विहायः॥ संतीर्य चिंतामणिमीशितारं संचेतुमेयाय खनि कुशाग्रम् ॥१६॥ सारित्यादि । अयं एषः देवः। सांयात्रिकः पोतश्रेष्ठी "सायात्रिका पोतवणिक" इत्यमर । सुरेंद्र शेपामरेंद्र।सा: चणिमियः। "सार्थों यणिपसमूहे स्यापिसंघात मात्र" इति विश्वः विमानः व्योमयान तरिमि:नौभिः । "स्त्रियां नौस्तरणिस्तरिम इत्यमरः। पिहायः व्योम | "पुंस्याकाशविदायसि" इत्यमरः । जलधि अमोनिधि | संतीयः संतरण पूर्व पश्चात्किंचिदिति संतोर्य तृप्लवनतरणयो; "प्राकाले" इति क्क वा " योनत्राप्य" इति प्या 41 . चतुर्थः सर्गः "तोपांतता" इति ऋधातोरिगिति दीर्घः । इशितारं इष्ट इतीशितारं "भत्तन्द्र इन ईशिता" इति धनंजयः । चिन्तामणि चिंतितार्थप्रदान मणिश्चिन्तामणिस्त। संचेतुं संचयनाय संचेतुं लधुं। कुशाग्न कुशाग्रापरनामधेयं राजपुरं । पनि आकर। एयाय इण गती आइपूर्वालिट् आययौ रूपकालंकारः ॥ ४६॥ भा० अ०-ये देवेन्द्र समुद्रयात्रि-रूप से व्यापारीरूप अन्यान्य सुद्दों के साथ नौका. रूपी विमानों के द्वारा समुद्ररूपी भाकाश को पार कर समस्त इष्ट पदार्थों को देनेशाली चिन्तामणिरूपी श्रीजिनेन्द्र भगवान् को प्राप्त करने के लिये रत्नद्वीपरूपी कुशाग्र नामक राजपुरी में आये। ४६ । इंद्रोऽथ रुंद्रविभवं गणिकानिकायसंगीतकेलिरुचिरं रचिताष्टशोभं ।। भक्त्या परीत्य पुरवन्नृपयासमीशं आनेतुमंतरचिरेण ससर्ज कांतां ॥१७॥ इन्द्र इत्यादि । अथ अनंतरं । इन्द्रः पुरंदरः । रुन्द्रविभवं रुद्रोविभयो यस्य तत् महासंपत्समेत । गणिकानिकायसंगीतफेलिरुचिरं गणिकानां निकायस्तस्य संगीत गीतवाद्यनृत्यत्रयं संगीतमितिफेवलगीतमात्रस्य गीतनृत्यवाद्यानामपि संशासंभवात् तस्य केलिः लीला तया रुचिरं सुन्दरं । रचिताएशाम अष्ट च ता शोमाञ्च अष्टशोभाः रचिताएशोभा यस्य तत् निर्मिततोरणाधएशोभासहित । नृपवासं मृन् पातीति नृपस्तस्य वासो नृपवासस्तं नरेन्द्रमंदिरं । पुरवत् पुरमिव पुरवत् पत्तनमिय। भक्त्या मजन भकिस्तया । परीत्य पर्यय पूर्व पश्यात्किंचिदिति परीत्य पूर्व पुरं प्रदक्षिणीरत्य पश्चाद्राज. मंदिरं च प्रदक्षिणीयत्येत्यर्थः । ईशं जिनेश्वर । आनेतुं मानयनाय आनेतुं संग्रहीतुं । अन्तः हमेस्याफ् । चिरेण शीघ्रण । फांतां शचीदेवीं। ससर्ज प्रेषयतिस्म । सृज विसर्ग लिट् ॥ ४७॥ इत्यईहासरते: काव्यरतस्य टीकायां सुखयोधिन्यां मगरजिननोत्सववर्णनी नाम चतुर्थ. सगोऽयं समाप्तः मा० अ०-इन्द्र ने यहुधन-सम्पन्न अप्सराओं के नृत्य तथा गीत से सुमनोहर और तोरण चन्दनवार मादि अशोभा से युक्त राजमन्दिर को प्रदक्षिणा के बाद भक्तिपूर्वक श्रीजिनेन्द्र भगवान् को लाने के लिये दाणो को शोध मन्तःपुर में मेगा । १७ । । इति चतुर्थ सर्ग समाप्त ॥अथ पंचमः सर्गः॥ अदृश्यरूपाथ गृहे प्रविश्य ददर्श बालामृतभानुमारात । शची जनन्याः स्थितमंवरांते सुधारसस्यंदिनमीक्षणानाम् ॥१॥ अदृश्यरूपेत्यादि । अथ अनतरम्। शची इंद्राणी। अदृश्यरूपा द्रष्टु योग्यं दृश्य ने दृश्यमदृश्य यदृश्यरूप यस्यास्सा तथोक्ता परोक्षरूपा। गृहे सदने प्रविश्य प्रदेश नं. पश्चारिक विदिति प्रविश्य अतर्गत्या । जनन्याः मातु । अबराते संवरस्य घनस्य गगनस्य घा अंतत्तस्मिन् “ताऽस्यव्यवहितौ मृत्यौ स्वरूपे निश्चयंति से। अयर घाससि ध्योनि" इत्यभिधानात्। स्थित तिष्ठतिस्म स्थितस्त। ईक्षणाना नेत्राणा। सुधारस- स्यदिनं सुघाया: रसस्सुधारसः स्यदत इत्येवं शील स्यदी सुधारसस्य स्यन्दी तोकस्त अमृतरसस्राविण । वालामृतभानु अमृतश भानयो यस्य स तथोक पाल एनामृतमानुस्तयोक्तस्तं पालचन्द्रमसं रूपक। "भानूरश्मिदिवाकरी' इत्यमरः । भाररात् समोपे । "शाराह रसमोपयो" इत्यमर । ददर्श पश्यतिस्म श्री प्रेक्षेणे लिट् ॥ १ ॥ भा० अ०-इसके बाद अलक्षित रूप से शची ने भीतर महल में प्रवेश कर आँखों के लिये सुधारस नाघी तथा अपनी ता के अंचल के भीतर बैठे हुए उस बालचन्द्र-रूप जिनचालक को देखा ॥१॥ वहंत्यसौ भक्तिरसप्रवाहे दिदृक्षमाणेव दृढावलंबम् ।। समर्प्य मायाशिशुमंबिकायाः पुरो जहारोन्नतवंशमेनम् ॥ २ ॥ घहतीत्यादि। भक्तिरसम्वाहे भक्तिरेव रसत्तयोचस्तस्य प्रगह भक्तिरसप्रवाहस्तस्मिन् गुणानुरागजलप्रवाहे। वहन्तीति वहन्ती मज्जती शत्प्रत्यय. "उगिदच" इत्यादिना नम् "नृदुगिद्" इत्यादिनाडी । असो इय शची महादेवी दाबल्य ह च तत् भवलंयं च तथोक्त मादाधा। दिदृक्षमाणेघ दिदक्षत इति दिनक्षमाणा "स्मृदश" इति तत्वादानश् द्रष्टु. मिच्छत्तीय । अयिकाया. जिनजनन्या । पुर. अग्ने मायाशिशु मायारूप शिशुस्तथोक्तस्त धपटयालक । समय समर्पण पूर्व पश्यात्किविदिति स्थापयित्वा । एन इमं "त्यदादिम्' न्यस्य मुनिसुनतकाव्यम् इत्यादिनान्यादेशः । उन्नतशे उन्नतो वंशो यस्य सः उन्नतधासो वंशश्च नथोक्तस्त "सद्गोत्रं प्रांशुवेणुं चा द्वौ वंशो कुलास्करो" इत्यमरः । जहार हरतिस्म हुञ् हरणे लिट् श्लेपः॥२॥ भा० अ०-भक्तिरस-प्रवाह में प्रवाहित होती हुई तथा प्रधान आधार को देखने को इच्छा करती हुई शची ने माता के आगे कपटगय बालक को रख कर उस उच्च वंशज जिनकुमार को उठा लिया ॥२॥ पाण्योर्जिनं न्यस्य निरीत्य हाजंत्यसौ बल्लभमाभिमुख्यात् ॥ द्विरेफमध्यायुरुहेव रेजे सरोजिनी भानुमभिस्फुरन्ती ॥ ३ ॥ पाण्योरित्यादि । पाण्योः हस्तयोः। जिनं जिनेश्वरं। न्यसनं पूर्व पश्चात्किंचिदिति न्यस्य समर्प्य । हात् सोधात् । निरीत्य निर्गत्य । वल्लभं निजप्राणकान्तम् । आभिमुख्यात् अभिमुपमेवामिमुख्यं तस्मात् सन्मु- खात् । प्रजन्ती बजतीति प्रजंती । अली इयं इन्द्राणी। द्विरेफमध्यांबुरुहा द्विरेफो मध्ये यस्य तत् तथोक्त अंधुनि रोहतीत्यंबुरुहं द्विरेफमध्यमवुरुहं यस्यास्सा तथोक्ता अंतर्विः धमानमधुकरकमलयुक्ता । भानुं सूर्य । अमिस्फुरती अभिमुखं स्फुरंनी भासमाना । सरो. जिनीय सरोजानि संत्यस्यामिति सरोजिनी पसिनी। रेजे यमौ राजृन्दीमी लिट् उत्प्रेक्षा ॥३॥ भा० अ०-जिनकुमार को दोनो हाथों में ले राजभवन से निकल कर अपने स्वामी इन्द्र के पास जातो हुई इन्द्राणी, गुभारमय भ्रमरों से अधिष्ठिन तथा सूर्य को रक्ष्य करके हर्प से कम्पित होती हुई फमलिनी के समान शोभती थी॥ ३ ॥ जिनास्यचंद्रेक्षणमात्रतोऽभृचतुर्निकायामररागसिंधुः ।। विशृंखलो यत्र मुखस्मितानि वितेनिरे फेनविभंगलीलाम् ॥१॥ जिनास्येत्यादि । चतुर्मिकायागररागसिंधुः चचारो निकाया येषां ते तयोक्ता चतुर्नि: फायाध ते अमराध तथोक्ताः राग एव सिंधुस्तथोक्तः चतुर्निकायामराणां रागमिंधुस्तयोक्तः चतुःसमूहदेवरागसमुद्रः। जिनास्यचंदेक्षणमात्रतः जिनम्यास्यं सयोक्त जिनाम्यद्रक्ष. णमेव जिनास्यचंद्रेक्षणमात्रं तस्मात् जिनास्यचंद्रेक्षणमात्रनः जिगमुग्मेन्दुदर्शगादेव । विपल: विगतापला यस्य सः तयोक्तः अतिक्रांतरेलः । अभूत् अभवत् । यत्र यस्मिन्या रागसमुद्र । मुपस्मितानि मुनानां स्मितानि भास्येपदसनानि । फैनधिमंग. लीला फेनानां विभंगा: फेनविभंगास्लेषां लोला तां हिंडिराडलीला भंगस्तरंगे मम्भेदे मे. दे जयविपर्यये" इति विश्वः । यिनेनिरे विस्तारयनिस्म तनू यिस्तारे लिट् या - चतुर्थः सर्गः भा० 46--भवन, व्यन्तर, ज्योतिष्फ तथा विमानवासी देवताओं का मानन्द-सागर श्रीजिनकुमार का मुख चन्द्र देखते ही उमड़ पड़ा और वहाँ उन ( देवों) की मुस्कुराहट समुद्र के फेन-भङ्ग का दृश्य दरसाने लगो ॥४॥ दिवौकसां बालसुधामरीचिर्जयस्वनापूरितदिक्तटानाम् ।। हृदक्षिहस्तान् कुमुदेंदुकांतकुशेशयार्थान कुरुतेस्म सद्यः ॥५॥ दिवौकसामित्यादि । घालसुधामरीचिः सुधारूपाः मरीचयो यस्य स तथोक्तः पाल एय सुधामरीचिस्तथोक्तः जिनशालेंदु: रूपकः। जयखनापूरितदिकटानां जयेति स्व. मस्तेन आपूरितानि जयस्पनापूरितानि दिशां तटानि दिक्टानि जयस्वनापूरितानि दिक्टानि येषां ते तथोक्तास्तेपां। दिवौकसां दिवि ओफःस्थान येपांते तथोक्तास्तेषां धमराणां "ओकल्पनाश्रयम्धीकाः" इत्यमरः। दक्षिहस्तान हच्च अक्षिणी च हस्तौ च हृदक्षिहस्तास्तान चित्तनेनपाणीन् । कुमुदॆदुकांतकुशेशयार्थान् कुमुश्च इन्दुकान्तश्च कुशेयञ्च तानि फुमुदेंदु. कांतकुशेशयानि तेषामस्तिान कुवलयचंद्रकांतकमलवाच्यानि "अर्थोऽभिधेयरवस्तु प्रयोजननिवृत्तिपु" इत्यमरः । सधः तदेव । फुरतेस्म चक्र । डुकुञ् करणे "स्मे च लड्" इति भूतानद्यतनेऽर्थे स्म योगे लट् । जिनचंद्रदर्शनादमयानां हृदयं कुमुदवद्विफसतिस्म अक्षिणी चंद्रकांत इयाद्यतां हस्तौ कुशेशयपत् मुकुलितो यभूयतुरित्यर्थः । यथासंप्या. । लंकारः॥५॥ भा० अ०-~-जयध्वनि से दिशाओं को प्रतिध्वनित किये हुए देवताओं के हृदय, तथा हस्तों को जिनकुमाररुप सुधाचन्द्रिका ने पुमुद, चन्द्रकान्त तथा कमल रूप में परिणत कर दिया। अर्थात् जिनेन्द्र-चन्द्र के दर्शन से देवों पे मन वुमुद के समान विक- सित, भांप चन्द्रकान्तवत् द्रषित तथा हस्त फमलचत् सम्पुटित हो गये ॥५॥ जिनांगलावण्यरसप्रपूर्णे निश्शेषमस्मिन् जगदन्तराले ॥ विभासुरं तन्नगरं सुराणामजीजनत्पाशिपुराभिशंकाम् ॥६॥ जिनांगत्यादि । निश्शेष शेशनिर्गतं यथा भवति तथा निश्शे। जिनांगलावण्यरस. प्रपूर्णे जिनस्यांग जिनांगं तस्य लावण्यं सौन्दर्य जिनांगलाघण्यं तदेव रसस्तथोक्तः जिना. गलावण्यरसेन पूर्णस्तस्मिन् जिनशरीरकांतिजनपरिपूर्णे। मस्मिनु एतस्मिन् । जगद्- सराले जगतामंतरालं तस्मिन् जगामध्ये विभासुर विभामतइत्येवं शील विभासुरं “भंजमा. समिदोघुर" इति घुर प्रत्ययः । तन्नगरं तय तत् मगरं च तनगरं राजपुरं । सुराणां देवानां । पाशिपुराभिशंका पाशोऽस्यास्तीति पाशी घणस्तस्य पुरं पाशिपुरं तस्यागिशंका तां।

- मुनिसुमतकाव्यम् । समुद्रस्थवरुणपुरसन्देहं “प्रचेता वरुणः पाशी" इत्यमरः । अजीजनत् अजनयत् जनै प्रादुर्भाव लुङ् उत्प्रेक्षा॥ ६॥ भा० अ०-श्रीजिनकुमार के शरीर सौन्दर्य रस से परिपूर्ण इस समस्त मंसार के बीच में अत्यन्त प्रकाशमय उस राज्य-गृह नगर ने देवताओं को वरुणपुरी की शङ्का उत्पन्न की ॥ ६॥ जिगाय शच्या शतमन्युहस्तद्वये कृतस्तन्नयनाचितांगः ॥ जिनाको भंगकुलाभिरामं दामोत्पलानां मणिभाजनस्थं ॥७॥ जिगायेत्यादि। शच्या इन्द्राण्या शतमन्युहस्तद्वये हस्तयोदयं हस्तद्वयं तस्मिन् पाक. शासनकरयुगले । कनः क्रियतेस्म कृतः विहितः । नन्नयनाचितांगः तस्येन्द्रस्य नयनानि तन्मयनानि तैराचिन अंगं यस्य स तगोकः शकस्य सहननेलालितशरीरः । जिनार्मक जिनचासावर्भकञ्च तथोक्तः जिनवालकः भृकुलाभिरामम् भृङ्गाणां फुलं तेनाभिराम तथोक्त भ्रमरसमूहविराजित । मणिभाजनस्य मणिभि. निर्मितं भाजनं मणिभाजन तस्मिन् तिष्ठतीति तथोक्त रत्नपात्रस्थितं । उत्पलानां पुबल. यानां । दाम माल्यं । जिगाय जयतिस्म जि अभिभव लिट् "जेलिंट्सन्" इनि ययदिशः। उत्प्रेक्षा ॥७॥ भा० अ०-इन्द्राणी के द्वारा मणिमय पात्ररूप इन्द्र के दोनों हाथों में रक्षे गये तथा इन्द्र के भ्रमररूप सहस्र दष्टिपात के लक्ष्यभूत कमलरूप श्रीजिनकुमार ने मणि-जड़ित पात्र में रपे हुए भ्रमरमण्डित कमल का माला को भी विजित कर दिया ॥७॥ जिनांगदीप्त्या पिहितम्वकांतिर्विकस्वरस्फारसहस्रनेत्रः ॥ सुराधिनाथः शुशुभेऽजनाद्रिर्यथैव फुल्लस्थलपुंडरीकः ॥८॥ निनांगेत्यादि। जिनांगदीप्त्या जिगस्यांग तथोक जिनागस्य दीमिस्लया जिनेश्वर- शरीरकांत्या पिहितस्यकांति: स्पस्य कांतिः स्थकांतिः पिहिना स्पानिर्यस्यासी तथोक माच्छादिना तिः । वियस्परस्कारसहस्रोतः विकमतीत्येवं शीलानि विस्राणि सदन पाणि तयोमानि विकस्वराणि सकाराणि सहस्त्रनेत्राणि यस्य सः इति यदुपदरस: "स्येश- मास" इत्यादिना पर प्रत्ययः विकापनशील विशालपाननयनयुनः । सुराधिनाथः सुराणा. मधिनायः सुराधिनापः पुत्रदा । फुलपलपुंडरीफ: स्यले विद्यमानानि पुंडरीकाणि तपोकानि फुलानि पददरोफाणि यस्य सःतयोतः विकसिनभूपमयुक्तः "पुंडरीक सितच्छ मिनामोज घ नद्रयोः" त्यमरः । मंजनादिः अंजनधासायद्रिय तपोक्तः मानगिरि। पर्यय -- -- चतुर्थः सर्गः न प्रकारेणेव । शुशुभे रराज शुभ दीप्ती लिट् । उत्प्रेक्षा ॥८॥ भा० अ-श्रीजिनकुमार की अङ्गन्दीप्ति से आच्छादिन शरीर कान्ति सु विशाल सहस्र नेत्र वाले इन्द खिले हुए स्थलकमल पाले भानगिरि शोभने लगे। करारविंदद्वय गराशि जिनं पदान्जद्वितये प्रणम्य ॥ चकार देवाधिपतिढितीयामनर्थ्यचूडामणिमुत्तमांगे ॥६॥ फरारेत्यादि। देवाधिपतिः देवानामधिपतिस्तथोक्त देवेन्द्रः । फरारविंदद्वयभू, फरायेगारविदे तपोक्त कारक: फरारचिदयोदय तथोक्त भृगाणां राशिस्तयोक्त भृग रिव उपमा फरारयिंदद्वयोर्षियमानो भृगराशिः तथोकतम् । जिनं जिगवाल, पदाद्वितये पदे एय अजे पदाइले रूपकः तयोदितयं पदाजद्वितयं तस्मिन् । प्रपाम्य स्त्य । उत्तमांगे मस्तके । द्विनीयां द्वयो पूरणां द्वितीया । मगपचूडामणि घि अध्यं यस्यास्सा माना चूडाया मणिः भनध्यां सा चासो चूडामणिय सयोका तो अमूले चूडारन "रत्न मणियोः" इत्यमरः । पकार पिधेपुरम् वरणे लिट् ।। भा. १०-सुरपति इन्द ने दोनों पर फमलों के भृगसमुद्र के समान धोजिनेन्द्र भग पान के पादपमाप पी पन्दना करके उन्दै भपने मस्तक पर को एक दूसरी दो अमूल्य मणिपना लिया En अथैप संसारमहांबुगशिं समुत्तितीपुर्जिनपोतमेनं ॥ दधत्कराभ्यां दृटमुत्सवेन स्वसिधुररकंधतटं निनाय ॥१०॥ भयंत्यादि। अप भनतरं । संमारमदापुराशि चतुर्गनिमणरुपस्तसारः माधा- सायंराशि महायुराशि एप महायुराशिस्तयावरन पंचसंसारमहा- समद । समुत्तितीसमुत्तमिच्चस्तथोक्त तरणेच्छुः । पनं इस 1 मिनरोत महंसा पोत शिशी पदिइति विश् । पराम्पा दस्ताम्यो । गाढम् । दधत् यधातीति या घरन् । एप इन्दः । उत्सरेन संचमेगा ससिंधुरस्कंधार स्यय सिंपुरस्स्वसिधुर. घस्य नर तथोक्त म्यसिंधुगस्य एकधर तथोक्त ऐरावता-समनिनाय नपतिर पो प्रापणे लिट् | १०|| मा. म०-दमफे थाइ संपारी मदासमुद्रको पार करने की इच्छा परते हुए इन्द्र ने घोजिनामार जान को दोनों हाथों मे हाता-पूर्वक पर रपटे सुत्सब में मारने पेरापनदायी के कन्धे पर डाया मंसार

मुनिसुव्रतकाव्यम
हात्रिंशदास्यानि मुखेऽटदेता देतेऽन्धिरब्धौ बिसिनी बिसिन्यां ।
द्वात्रिंशदब्जानि दलानि चाब्जे द्वात्रिंशदिंद्रहिरदस्य रेजुः ॥११॥
छात्रिंशदित्यादि। द्वात्रिंशन् द्वाभ्यामधिका त्रिंशत् तथोक्ता। "द्वामात्रयोऽनशीती"इति
द्वादेशः (आस्यानि मुखानि । मुखे चदने एकवचनवलादेकस्मिन् इति ज्ञायते । अष्टदता
अष्टदशनाः । दंते भन्धिः आपोधीयतेऽस्मिन्निति अग्धिःएक: कासारः। “भब्धिः समुद्रसरसि"
इति विश्वः । अन्धौ एकस्मिन्सरसि । विसिनी एका पद्मिनी । विसिन्यां अजानि अप्सु
जायत इत्यन्जानि कमलानि द्वात्रिंशत् अजानि । एकस्मिन् कमले द्वात्रिंशत् दलानि उदानि ।
च शब्दैन एका दले द्वात्रिंशत्सुरनभ्यः इति शेषः । रेजुः यभुः राजू दीप्ती लिट् । रूपकः ।
भा० अ० -ऐरावत हाथी के पत्तीस मुख थे, प्रत्येक मुप में आठ आठ दाँत थे,
प्रत्येक दाँत में एक एक तालाब था, प्रत्येक तालाब में एक एक कमलिनी तथा प्रत्येक
कमलिनी में क्चीस बत्तीस कमल और कमल के प्रत्येक पत्ते पर बत्तास बत्तीस देवां
गनायें नाचती थी । २५६ दाँत, ८१६२ कमल, २६२१४४ कमल-पत्र और ८३८८६०८
यांगनायें थीं ॥ १९ ॥
अस्पृष्टनीरेजदलं नटत्यो नट्यः सुराणामभितो नृसिंहं ।
रंभो वितेनुनिजवल्लभाशाप्रकाशमानाऽब्जनिवेशनानाम् ॥१२॥
अस्पृष्टेत्यादि। नृसिंह ना सिंहः इव नृयु सिंहस्तथोक्तः ते नरवरं पुरुषोत्तम ।
"स्युरुत्तरपदे व्याघपुंगवर्षभकुंजराः । सिंहशार्दूलनागाद्याः पुंलि अंधार्थगोचराः" इत्यमरः ।
अमितः समततः । “तस्पर्य भि" इत्यादिना अम् ! अस्पृष्टनोरेजदलं नोरे जायंत इति नीरजानि
"तत्पुरुये कृति बहुलम्” इति प्रत्ययस्य लुगभावः नीरजानां दलानि तथोकानि अस्पृष्टानि
गोरेजदलानि यस्मिन् कर्मणि तत् तथोक । नत्यः नतीति नटत्यः । सुराणां देवानां ।
नटयः नर्तक्यः।
निजवल्लमाशाप्रकाशमानाजनिवेशनानां निजाना घल्लभस्तस्याशा
निजवल्लभाशा तया प्रकाशंत इति प्रकाशमाना: अजमेव नियेशन यासां ताः तथोक्ताः ।
निजवल्लभाशाप्रकाशमानाश्च ता: अजनिवेशनाश्च तयोकास्तासां निजमायकाभिमायरकटी.
भवत्कमलनिलयानां लक्ष्मीणामित्यर्थः। रम्भः संभ्रम । यितेनुः विस्तारयतिस्म ।
तनुचिस्तारे लिट् । उत्प्रेक्षा ॥१२॥
मा० अ० -पुरुषोत्तम श्रीजिनकुमार के चारो तरफ फमल की पंसुरियों को पिना
छुए ही नाचती हुई देयांगनायें अपना पति घरने का अभिप्राय प्रकट करती हुई
लक्ष्मी (विष्णु-पती) सौन्दर्य का विस्तार करने लगीं ॥ १२ ॥

पतुः सर्गः १७ -- ईशाननाथः स्वयमातपत्रं दधौ तदूर्वोभयकल्पनायौ ॥ प्रकीर्णके प्राक्षिपता परेऽपि यथास्घमासन् करणीयभाजः ॥१३॥ ईशाननाथ इत्यादि । ईशाननाय ईशानस्य नाथस्तथोक्तः ईशानेंद्र। स्वयं आत्मा । आतपत्र छन । दधौ दधे । तदूष्योभयकल्पनाथौ तस्येशानस्योद्ध्वं तदूग्ध उभयो च तो कल्पौ च उभयकल्पो तदूचे विद्यमानायुभयकल्पी तोभयकल्पो तयो धौ तथोक्तौ । प्रकीर्णे चामरे "चामरं तु प्रकीर्णकम्" इत्यमरः । प्राक्षिपतां अधनुतां । क्षिए मेरणे ला परेऽपि शेपेद्रा अपि । यथास्यं स्वमनतिक्रम्य तथास्वं यथायोग्यं । फरणीयभाजः कर्तु योग्यं करणीयं तद्भजतीति तथोक्ताः कार्यकारिणः । आसन् मावन् अस् भुधि लङ् ॥१३॥ भा० अ०-ईशानेन्द्र ने धजिनेन्द्र भगवान् के जार स्वयं छत्र लगाया, इनके ऊपर के दोनों कल्पनाथों ने चंबर डोलाये और अन्यान्य इन्द्रों ने भी भिन्न भिन्न भाय- श्यक कार्यों को यथाशक्ति सम्पन्न किया ॥१३॥ संसारगर्तापतिताखिलैकहस्तावलंबं जिनराजमिन्द्रः ॥ हृदा च दोामवलंबमानः पया सुराणामथ संप्रतस्थे ॥१४॥ संसारेत्यादि । अथ अनंतरं । 'द्रः पुरंदर । संसारगापतितापिलेकहस्तायलय संतरा संसारः स एव गर्तस्तथोक्तः संसारगर्ते आपतंतिस्मेति संसारगापतिताः यदा गर्तायामपटे पतिता गर्तापतिताः। "गंडूपगर्जगरहालकिल जालच्छटारभसयर्तकगत गा" इति स्त्रीपुंसयोरभमः। संमारगता व ते अखिलाश्च तथोक्ताः हस्तस्याचलयो हस्तापलयः एकश्चासौ हस्ताचलंयध तथोक्तः संसारगर्तापतिताखिलानामेकहस्ताचलंयस्तधोक्तस्तं भगा- न्धकूपनिपतितनिःशेपमाणिनां मुख्यदस्तापलंयन । जिनराज जिनानां राजा मिनराजस्त "राजन् सखेः" इत्यद समासांतः । हुदा हृदयेन तद्गुणस्मरणरूपेण । दोभ्यां च भुजाभ्या- मगि। अपलबमानः अवलंपन इत्ययलंयमानः आश्लिष्यमाणस्सन् । सुराणा निर्जराणां। पया मार्गेण घिदायसा प्रतस्थ प्रययो छा गतिनिवृत्ती लिट् "संविप्रायात्" इनि तड्। संसारगतीपतितापिले कहस्तायर यत्यात् नत्पतितस्य यस्यावलंयकांक्षयेद्रो जिनराज हुदा नदीम्यांमवलयतेस्म इति मायः रूपक ॥१४॥ भा० अ०-संसाररूपी गर्ग में गिरे हुए प्राणियों के एकमात्र हस्ताबलम्यन धीजिन- कुमार को इन्द्र ने दोनों हाथों से हदय से लगाये हुए भाकाश मार्ग से प्रस्थान किया nten

८
मुनिमुमतकालय
भा००-
आकारमात्रेण तुपारशैल का कूटराशेस्तव तुल्यतेति ॥
याकर्णयिप्यन्निव विप्रलापानाकाशमार्गेऽक्रमताभ्रनागः ॥१५॥
प्राकारमात्रणेत्यादि । तुपारशैल तुपारेर्युक्तः शैलस्तस्य संबोधन हे हिमवत्पर्यत ।
कूटराशेः कूटानां शिवराणां कपटानां च राशियस्य सः तस्य शिखरनिवहयुक्तस्य माया
फदंययुक्तस्य च "मायानिश्चयंत्रपु कैतयानृतराशिपु । अयोधने शैलाटगे सीगंगे फूटम.
स्त्रियाम्" इत्यमरः । तय ते! आकारमात्रेण भाकार एव आकारमान तेन धवलारन्यय न
तु गुणैरितिशेषः । तुल्यता तुल्यस्य भावस्तुल्यता मया सर समानता । केति फा
भवतीनि। विमलापान विरोधवचनानि "विप्रलापो विरोधोक्तिः" इत्यमरः । आकर्णयिष्य-
निव आननागः ऐरावणः । आकाशमार्गे गगनाध्यने । अक्रमन आयात् कम् पादविक्षेपे लड्।
"मामोऽनुपसर्गात् इति तङ् ॥ १५ ॥
--हे हिम शैल ! पर्वत राज !! फ्यो तुम केवल अपनी आकृति से ही मेरी
घरायरी कर सकते हो ? मानो ऐमी व्यंगपूर्ण याते सुनाना हुआ ऐशयत हाथी आकाश
मार्ग से चला ॥ १५॥
पारुह्य नानाविधवाहनानि जिनाग्रवामेतरपृष्ठदिक्षु ॥
क्रमेण बन्योरगकल्पबासिज्योतिप्कनाथा व्यचलन्ससैन्याः॥१६॥
भारयेत्यादि। ससैन्याः सैन्येन सह वतंत इति समन्याः सेनासहिताः। धन्यो.
रगल्पनामिज्योतिएकनाथा: चन्याश्च उरगाश्च कल्पे चसंतीत्येवंशीला: फल्पयासिन.
व ज्योनिष्काध तयोकास्तेषां नाथास्तथोक्ताः व्यंतरभवनामरकल्पवासिज्योतिप्पेन्द्राः।
नानाविधयानानि नानाविधो येषां तानि तथोकानि नानाविधानिय तानि पाहनानि च
मानाविधवाहनानि । गारा आस्थाय । प्रमेण अनुकमतः । जिनाप्रथामेतरपृदिर
आपच चामश्च इतरो दक्षिणस्स च पृष्ठच तथोक्तानि शनयामेतरपृष्ठानां दिशस्तयोकाः
जिनस्थाप्रवामेतरपृष्ठदिशश्च तथोक्ताः तासु।. अर्हतः पुरोभागयामभागदक्षिणमागपश्चिम.
भागेषु । व्यचलन अचरन् । चल कंपने लड् फ्रमालंकारः ॥ १६ ॥
भा० १०-रन, कला, ध्यन्ता तथा ज्योतिक पासी समी देवेन्द्र अनेक प्रकार के
याहनों पर चढ़ कर श्रीजिनकुमार के चारो तरफ सैनिकों के साथ चले ॥१६॥
नभोऽन्तरे नाथतनुप्रभामिः प्रपूरित पोचलरनकूटाः ॥
बभुर्विमाना कुलिशास्रीतः समुद्रममा इव मानुमंतः ॥१७॥

चतुथ: सगा। यस्य सः नमोऽतराल इत्यादि । नाथतनुपमामिः तनोः प्रभाः तनुप्रभाः नाथस्य तनुपमास्ताभिः जिनेश्वरशरीरकांतिभिः प्रपूरित प्रपूर्यतेस्म प्रपूरित तस्मिन् आपूणे । नमोऽन्तरे नभसोंs- तरं नमोऽतरं तस्मिन् अयरांतराले । प्रोज्वलरत्नकूटा: रत्न निर्मितानि फूटानि तथोकानि प्रोज्वलानि रत्नानि येषां ते 'प्रस्फुरन्मणिशियराः । विमानाः व्योमयानानि योमयानं विनानोऽस्त्री" इत्यमरः । कुलिशास्त्रमीतेः कुलिशं पत्रमेयास्त्रं आयुध. कुलिशास्त्रशास्तस्माजाता भीतिस्तस्याः इंद्रस्य गोत्रभिन्नामप्रसिद्धिभयात् । समुद्रगनाः मज्जतिस्म मनाः समुद ममात्तयोक्ताः । सानुमंत इव सानुरस्स्येपां इति सानुमंतस्त इच अद्य इव "पर्वतः सानुमान गिरिः" इति धनंजयः। चभुः रेजुः भा दीप्ती लिट् उत्प्रेक्षा ॥१७॥ मा० म०--श्रीजिनेन्द्र देव की देहद्युति से आकाश-मएडल के प्रपूरित होने पर भत्यु- •त्तम रत्नमय शिखर चाले विमान वायुय से डर कर समुद्र में मग्न पर्वतों के समान चमकने लगे। १७॥ जिनांगदीप्त्या दधुरभ्रवीभ्यां तरंगितायां सितचामराणि ॥ सुरावधूतानि कलिंदकन्यातरंगदोलारतहंसलीलाम् ॥१८॥ जिनांगेत्यादि। जिनांगदीप्त्या जिनस्यांग जिनांगं तस्य दीप्तिस्तया अहंकाय तरंगितायां तरंगारसंजाता अस्या इति तरंगिता तस्यां संजात तरंगायां । अन्नवीथ्यां मनस्य मेघस्य वीथिरभ्रयीथिस्तस्यां व्योमयोगा। सुराधधूनानि भव. धूयंतेम्म अग्रतानि सुरेश्वधृतानि तथोक्तानि लेपनिक्षिप्तानि । जितचामराणि चमरी- भवानि चाममणि सितानि च तानि चामराणि च तथोक्तानि शेतप्रकीर्णकानि लिंदकन्यातरंगदोलारतहसलीला कलिंदस्य कन्या तस्यास्तरंगास्तयेच दोला रमतेस्म रता: रताश्च ते इंसाश्च रतहंसाः फलिंदकन्यातरंगोलायां रतहमास्नधोक्तास्तेषां लीलाता। यमुनानदीवीचिदोलायो कोडितमरालविलास "कालिंदी सूर्यतनया यमुना शमन- स्वसा" इत्यमरः । वधुः धरतिस्म डुधा धारणे च ल्टि। उपमा ॥१८॥ भा० अ०-जिनकुमार कीःशरीरकान्ति से तरंगित भाकाश चीयो में देवताओं से होलाये गये श्वेतच्छा कालिन्दी (यमुना) को तरङ्गरूपी दोला में लीन हंसों का अनुकरण १८ चलान्यलीयंत जिनांगरोचिबीचिप्रपंचे गरुधूमलेखाः ॥ हरेविभीताः फणिराजपन्यस्तरंगकुंजेविव यामुनेषु ॥१६॥ कात्या। P ।

मुनिसुव्रतकाव्यम् । चला इत्यादि। चला: चलंतीति चला चलंत्यः। अगधूमलेखा: भगराधूमास्त. थोकास्तेषां लेखा: कालागरुधूमश्रेणय: "रेखायामावली रेखा” इति वैजयंती। जिनांगरो- चिचीचिप्रपंचे जिनस्यांगं जिनांग तस्य रोचिस्तथोक्ता जिनांगरोचिरेव रोविषो वा वीचय- स्तेषां प्रपंचस्तस्मिन् जिनेंद्रशरीरकांतितरंगसमूहे। हरे: नारायणात् । विभीताः विविभ्य तिस्म विभीताः। फणिराजरत्यः फणा: सन्त्येषामिति फणिनस्तेषां राजा फणिराजस्तस्य पत्न्यः महाशेपवनिताः। यामुनेषु यमुनायाः संबन्धा यामुनास्तेषु यमुनानदीसंबन्धेषु । तरंगजेषु तरंगा एव. कुंजाः तरंग'जाः तेषु वोचिनिकुंजेपु । यमुनानदीतरंगाणां कृष्णवर्णत्वाजिनांगकांतिसमत्वं रूपकः । न्यलीयंत निलीयंतेस्म । लिङ्श्लेषणे ॥१॥ भा० भ० -इधर उधर चारो ओर फैली हुई भगक (सुगन्ध द्रव्य) की धूम्ररेखायें कृष्णचन्द्र से डर कर यमुना के तरङ्गकुंज में छिरी हुई सर्पराजको त्रियों के समान जिनेन्द्र महारोज की अङ्गयु निरूपिगी वोवि में प्रलोन हो गयी ॥१६॥ नभस्थले नागरुधूमलेखाः स्फुरतस्फुलिंगा शशिशंकयाऽमी ॥ सितातपलग्रसनाय धावद्विधुतुदा वातविपरफुलिंगाः ॥२०॥ नमस्थल इत्यादि । नमसः स्थलं तस्मिन् माकाशप्रदेशे। स्फुरत्स्फुलिंगाः स्फुरतीति स्फुरन्तः स्फुरन्त स्फुलिंगा येषां ते तथोकाः प्रज्वलदग्निकणयुक्ताः । ममी इमे । अगरु. धूमलेखाः भगरोखूमा अगरुधूमास्तेषां लेखास्तधोक्ताः कालागरुधूपराजयः । “लेखा लेख्ये सुरे लेखा लिपिराजिकयोर्मता” इति विश्वः। न न भवनि । पुनः किमिति चेत्- शशिशंकया शशीति शंका शशिशंका तथा चंद्र इति संशयेन । सितातपत्रप्रसनाय सितंच तत् सातपत्रं च तथोक्त सितातपत्रस्य प्रसनं तस्मै । वातविपस्फुलिंगाः विषमयाः स्फुलिंगाः विपस्फुलिंगाः वाताः विषस्फुलिंगा येषां ते तथोकाः । धायद्विधंदा: विधु तुदंतीति विधुतुदाः "विध्वस्तिलात्तुदः” इति खच "खित्यरः" इत्यादिना मम् धार्यतीति धावंतः धावतश्च ते विधुतुदाश्च तथोका: अभिगच्छद्रादयो भवतीत्यर्थः। अपनुत्य- लंकारः॥२०॥ मा० म०-आकाश में अग्निकण के साथ साथ अगरु आदि की धूम्ररेखामों ने विष की चिनगारी उगलते हुए राहु जिस प्रकार चन्द्रमा को प्रस्त करता है उसी प्रकार श्वेत. च्छत्र की प्रमा को आच्छादित किया ॥२०॥ अंगारनिक्षिप्तदशांगधूपः संक्रातसंताप इब क्षणेन ॥ पाश्लिप्यदुत्थाय पटीरहारकर्पूरकल्हारपयोरुहाणि ॥२१॥ -- मा० अ०- । चतुर्थः सर्गः। अंगारेत्यादि । अंगारनिक्षिप्तदशांगधुगः अंगारे निक्षिप्तः अंगारनिक्षितः दश अंगानि यस्य सः शॉगः स चासो धूगश्च दशांगधूपः अंगारनिक्षिप्तश्चासो दशांगधूपश्च तथोक्तः धूपघट- स्यांगारे प्रयुक्तदशांगधूए । “अथ न स्त्री स्यादंगार." इत्यमरः । क्षणेन क्षण इति कालभेदः तेन "तास्तुशिक्षणः" इत्यमरः । संकांतमंताप इन संकामतिरुम संक्रांतः संक्रात: संतापणे यस्यासी तथोक्तः संबद्धसंज्वर इव । “सन्तापः संज्वर: समी" इत्यमरः । उत्थाय उत्था पनं पूर्व पश्चात् किञ्चिदिति ऊर्य गत्वा। पटोरहारकर्पूरव हारपयोरुहाणि पटोरश्च हारश्च कर्पूरग्ध कहारं च पयारह च तथोकानि श्रीगंधमौक्तिकहारधनसारसौगंधिककमलानि । "श्रीखंडः स्यात्पटीरश्च" इति विदग्धचूडामणी । मालिप्यन्यालिगत् श्लिपमालिंगने लड् । एतेषां संतापहारकत्वात्तान्नाश्लिष्यदितियावत् । उत्प्रेक्षा ॥२१॥ -अग्नि में डाले गये दशांगधूपने सन्तप्त होकर शीघ्र ही श्रीपण्ड, कपूर तथा सुगन्धित कमल को आलिङ्गन कर लिया। अर्थात् -इन शीतल पदार्थों से मिल कर मानों उसने अपनी ज्वाला शान्त फरनी चाही॥ २१ ॥ गयेन पद्येन च दंडकेन शशंस गीतेन च गाथया च ॥ मरुद्गणोऽयन्न परं परोऽपि गुहामुखोयत्प्रतिशब्ददंभात ॥२२॥ गद्य नेत्यादि । अयं एषः । मरुद्गण. मरुतां गणो मरुद्गणः निर्जरनिकाय । “मस्तो पचना- मरी"इत्यमरः। गद्यन अनियतगणेन पारसकदधेन। पद्यन नियतगणे न छदेनियम। दंडकेन कथंचिन्नियतगणेन चंडवृष्ट्यादिना । गौतेन तालनियतेन संगीतेन । गाथया च मात्रानियतेन गाथासनियंधेन । पर मेवल "परोऽरिः परमात्मा च केवले परमव्ययम्" इति नानार्थरनमालायां । न शशस न तुष्टाघ । अपि तु परोऽपि-मरुद्गण. गिरिनिकरः। “धनुर मरानिलगिरिपुमरुत्” इति नानार्थरतकापे । नगः शिलशियोऽद्रिश्च शिखरी त्रिककुन्मस्त्" इति धनंजयश्च । गुहामुखोद्यत्प्रतिशब्दभात् गुहायाः मुप तथोक्त उद्देतीत्युदन गुहामुखे- नोधन तथोक्तः गुहामुखेनोद्य श्वासी प्रतिशम्दश्च तथोक्तः गुहामुखोद्यत्प्रतिशब्द इति दंभस्त. थोक्तत्तस्मात् कंदविवरसमुत्पद्यमानप्रतिध्यानयाजात् । शशस तुपाय शंसूड स्तुती लिट् । त्रिदशनिकरवददिनियोऽपि स्तुतिमफरोदिति भावः ॥ २२॥ मा० १०-मरगण (देवतादिगण) ने गद्य पथ, दण्डक, (एक प्रकार का उन्दो- विशेष) गीत तथा गाथा से और मरुद्गण (पर्वत) ने कन्दरा से प्रतिध्वनित शब्दों से भगवान् की स्तुति को ।। २२ ।। वियत्तलं वीतघनाघनौषमपि प्रपूर्ण जिनदेवभासा ॥ विभिन्ननीलांजनसंनिभेन पुनर्घनापूर्णमिवायभासे ॥२३॥ ।

मुनिसुव्रतकाव्यम् । 5753 १०२ वियत्तलमित्यादि। वीतधनाधनोघः धनाधनानामोघः घनाघनीयः चीतो धनाधनौधो यस्मात्तत् तथोक्तमपि “वर्षाब्दवासचमदगजेरावतसांद्रघनाघने” इति नानार्थरनकोपे। अपगतमेघसमवायमपि। वियत्तलं वियतस्तलं तथोक आकाशप्रदेशः। विभिन्ननीलांज. नसंनिभेन विभिद्यतेस्म विभिन्न तच तत नीलांजनं च तथोक विभिन्ननीलाजनस्य संनिभं तेन स्फुटितरुप्णकजलसमानेन “कजलदिग्गजानिलकांतास्वजनं" इति नानार्थरनोपे । जिनदेहमासी जिनस्य देहत्तस्य भासस्तेन जिनाधिपमूर्तिदीप्या। प्रपूर्ण प्रपूर्यतेस्म तथोक्त परिपूर्ण । पुनः भूयः। धनापूर्णमिर घनेनापूर्ण मेघेन परिपूरितमिव । आयभासे मासृड् दीप्तौ लिट् ॥२३॥ •मा० अ० ---आकाश मेघ-रहित होने पर भी फैले हुए कृष्णकजलतुल्य जिनेन्द्र भगवान को नोल देहकान्ति से परिप्लावित हो मेघ से परिपूर्ण ज्ञात होने लगा ।। २३ ।। जिनांबुदोऽसाविभदानवृष्टिनटीतडिद्वाद्यनिनादगर्जः ॥ विमानमालारुचिकार्मुको दिव्याकालिकी प्रावृषमाततान ॥२४॥ जिनांद इत्यादि । इभदानवृष्टिः इभस्य दान तथोक्त इभदानमेव वृष्टिर्यस्य स तथोक्तः ऐरावतमदजलवर्ष “युतस्त्यागगजमदशुद्धिपालनच्छेदेषु दानम्” इति नानार्थरतकोपे। नटीतडित् नक्ष्य एव तडिनो यस्य स नटीडित नर्तकीविद्यु त्सहितः । वाघनिनादगजेः घाद्यस्य निनादो वाद्यनिनादः स एव गजों यस्य सः तथोक्तः धादिअध्वनितस्तद्गीतफलितः । विमानमालारुविकार्मुकः विमानानां माला विमानमाला तस्या रुचिः विमानमाला. चिरेव कार्मुकं यस्य स तथोक्त विमानपंक्तिकातिसुरचापसहितः । “रुचिर्मयूये शो भायामभिपंगामिलापयो.” इति विश्वः । असो भय । जिनावुनः अंबु दधातीत्यंबु जिन ए- वायुदस्तथोक जिनेश्वरमेघः । दिवि आकाशे। माकालिकी अकाले भवा आफालिकी तां अकालाभूतां । "व्यादिपठण्णठी” इति ठण् । प्रावृप वर्षाकाल। आततान विस्तारयतिस्म तन विस्तारे लिट् ॥२४॥ भा० म०-विमान पंक्ति की कान्ति हो है धनुप जिसफा तथा घाद्य-ध्वनि है गर्जन जिसका, ऐसे नटोसपिणी बिजली और गजमद-प्रमाहरूपी वृष्टिवाले श्रीजिनेश्वर जलर ने भाकाश में असामयिक वर्षा ऋतु की उटा दिपला दी ।। २४ ।। अभ्राण्यभ्राणि सुरेभदन्तप्रोतानि रेजुः परितो जिनेन्द्रम् ॥ उत्क्षिप्यमाणानि मुदामुनेव चंद्राश्मदंडातपवारणानि ॥२५॥ भनाणीत्यादि । सुरेभदंतप्रोतानि सुरस्येमः सुरब्धासी इमतिया सुरेभस्त- स्य देतासरेभदंता: तैः प्रोतानि ऐरावणरदनसंबंधानि । अदम्राणि न दम्राज्यवाणि पृपु. 5753 ।

7 चतुर्थः सर्गः। लानि। “दभ्रशंतनु" इत्यमरः । अभ्राणि मेघाः। जिनेंद्रः जिनानामिंद्रोजिनेन्द्रस्त । परितः समंतात् । अमुना ऐरायतेन । मुदा संतोपेण। उक्षिप्यमाणानि उत्प्रेयमाणानि चंद्राश्मदंडातपधारणानि चंदाश्मना कृताः दंडा एषां तानि चंद्राश्मदंडानि तानि च तानि आतपवारणानि च तथोकानि तानिय चंद्रकांतशिलानिर्मितदंडयुकछत्राणीव । रैजुः यभुः राज दीप्ती लिट् । उत्प्रेक्षा ॥ २५ ॥ भा० म०-धीजिनेन्द्र भगवान् के चारो ओर ऐरावत हाथी के दांतों से ओत प्रोत तथा प्रसन्नता-पूर्वक अवलम्पित जो सधन मेघ थे वे चन्द्रकान्त-मणिमय दण्डयुक्त छत्र के समान शोभते थे। २५॥ सेनापदामर्दितपांडुमेघा मुक्तागुरूनभ्रतले विडालाः ॥ हठेन दध्यन्नधिया ब्रजंतः स्कंधादिरूढाननयंत मन्युम् ॥२६॥ सेनेत्यादि । अभ्रतले अभ्रस्य नलं अनतलं तस्मिन् आकाशप्रदेशे। मुक्तागुमन मुक्ताभिर्गरयः तान् मुक्ताफले स्थूलान मेघेऽपि मौक्तिकसंभव इति प्रसिद्धिः। सेनाप- दामर्दितपांडुमेधान् सेनानां पदानि तथोक्तानि सेनापदेरामर्दितास्तयोका. पांडयश्च ते मे- पाच पांडमेघाः सेनापदामर्दिताश्च ते पांडुमेघाश्च सेनापदामर्दितपांडुमेघास्तान सप्तानी- कचरणविभिन्नधपरमेघान् । “पांडः कुन्तीपतौ सिते" इति विश्वः । दध्याधिया ना मिश्रितमन्नं दध्यन्न तदितिधीः दध्यलधीस्तया दध्योदनवुझ्या । इठेन बलात्कारेण "प्रसभन्तु बलात्कारो ठम्" इत्यमरः । मर्जतः गच्छतः । विडालाः वाहनमार्जाराः। स्कंधाधिरूढान अधिरह अधिकढास्तधोक्ताः स्कंधमधिरूढा स्कंधाधिरूढास्तान् स्कंधमधिष्ठिनान देयान् । मन्यं रोष । “मन्युः क्रोधे प्रती दैन्ये" इति विश्व.। अनयंत प्रापयंतिस्म जी प्रापणे ला द्विकर्मकः । भ्रांतिमानले कारः ॥ २६ ॥ भा० ०-आकाश में मुकाओं के कारण गुरुतर तथा सेना के चरण-मर्दित होने से घपल मेले को ओर दक्षिमिश्रित भन्न समसकर दौड़ते हुए शहर पिडालों ने कशे पर बड़े हुए देवतामों को ऋद्ध कर दिया ॥ २६ ॥ प्रयाणवेगानिलनीयमानाः पयोधराः श्यामतनूनिभेन्द्रान् ॥ सगर्जिताभूजितदानवर्षान स्वबंधुयुद्ध्या ध्रुवमन्यरुन्धन ॥२७॥ प्रमाणेत्यादि । प्रयाणवेगानिलनीयमानाः प्रयाणस्य घेगः प्रयाणवेगस्तस्माजातोs- निल: प्रयाणवेगामिल: मीयंत इति नीयमानाः प्रयाणवेगानिलेन मीयमानास्तयोकाः नियां- णजवेन जातवायुना प्राप्यमाणाः । पयोधराः पयांसि धरतीति तपोक्ताः मेघाः । श्यामतनून - मुनिसुव्रतकाव्यम् । १०४ श्यामा तनुउँपां ते तान् । सगर्जितान् गर्जितेन सह वर्तत इति सर्जितास्तान ध्वनिसहितान्। ऊर्जितदानवान दानस्य व दानवर्ष अर्जितं दानवपं येषां ते तान प्रवृद्धमदजलवृष्टीन् “दानं गजमदे त्यागे पालनच्छेदशुद्धिपु" इति विश्वः । इभेन्द्रान इभानामिद्रा इभेद्रास्तान् गजेंद्रान् स्वयंधुघुया स्वेषां बंधवस्तथोक्ताः स्वबंधय इति धुद्धिस्वयंधुवुद्धिस्तया । ध्रुवं निश्चलं । अन्वरुधन अनुकूलमवर्तन्त ॥२७॥ भा० अ०--प्रयाणकालीन वेग से उत्पन्न हुई घायुसे सञ्चालित मेघों ने प्रवाहित मधारा-रूर वृष्टिचाले तथा गर्जन करने वाले श्याम शरीर गजराजों को अपने यन्धु समझ कर उनका अनुसरण किया ॥२७॥ सदाभियुक्ता वितदामरौघैः सहोत्पला भानुसुता प्रतीये ॥ जिनांगरोचिनिचयेन दिग्धा विवृद्धहेमांबुरुहा धुसिंधुः ॥२८॥ सदेत्यादि। जिनांगरोचिनिचयेन जिनस्यांग जिनांगं तस्य रोचीपि तथोक्तानि जिनां- गरोचिपां निचयो जिनांगरोचिचियस्तेन जिनेश्वरशरीरकांतिसमूहेन । दिग्धाः दिह्य- तेस्म दिग्धाः लिप्ताः। वियुद्धहेमाम्बुरुहा अंबुनि रोहतीत्यंबुरुह हेमरूपमंबुरहं तथोक्त वियुध्यतेस्म वियुद्ध धियुद्ध हेमायुरहं यस्यास्सा तथोक्ता विकसितारणारविंदा। घुसिंधुः दिघि विद्यमाना सिंधुर्यु सिंधुः देवगंगा । "देशे नदविशेषेऽन्धी, सिंधुः सरिति स्त्रियाम्". इत्यमरः । सदा सर्वस्मिन् काले सदा । अभियुक्तापि अभियुज्यतेस्माभियुक्ता परिचितापि । अमरौधेः अमराणां गोधा अमरोधास्त देवसमूहः । तदा तत्समये। सहोत्पला उत्पलैः सह वर्तत इति सहोत्पला नीलोत्पलसहिता। "धान्यार्थ" इति विषल्पेन सहस्य सभायः । भानुसुता भानोस्सुता तथोक्ता यमुनामदी । प्रतीये ज्ञायतेस्म । इण् गती कर्मणि लिट् ॥ २८॥ भा० ०-विकसित सुवर्ण-कमलयालो देवगहा यद्यपि देवताओं को चिरपरि- चिता थी तथापि श्रीजिनेन्द्र भगवान् की नीलदेह-कान्ति से समुद्भासित होने से यह उन्हें पापुज-मण्डित यमुना की सीप्रतीत हुई ॥२८॥ विशालमाकाशतले चकाशे विभुप्रभाश्यामलतारकौघम् ॥ विपाकनीलविपुलैः फलौघैः विलंबमानामभिभृय जंबूम् ॥२६॥ विशालमित्यादि । विभुभाश्यामलतारको विभोःप्रभा तथोक्ता पिभुप्रमया श्यामलः विभुप्रभाभ्यामल तारकाणामोधस्तारकोपः विभुममाश्यामलस्तारकीयो यम्मिन् तत् तथोक । विशालं विस्तृतं । आकाशतलं आफाशस्य तलं तधोनः गगनतलं ।

. भा०म०- चतुर्थः सर्गः। लानि। "दन शंतनु" इत्यमरः । अम्राणि मेघाः । जिनेंद्रः जिनानामिझोजिनेन्द्रस्त । परितः समंतात्। अमुना ऐरावतेन । मुदा संतोपेण। उत्क्षिप्रमाणानि उत्प्रेर्यमाणानि चंद्राश्मरंडातावारणानि चंद्राश्मना रुला दंडा एप तानि चंद्राश्मडानि तानि च तानि भातावारणानि च तयोकानि तानिय चंद्रकांतशिलानिर्मितदंडयुकछत्राणीव । रेजुः यभुः राज दीप्ती लिट् । उत्प्रेक्षा ॥२५॥ -धीजिनेन्द्र भगवान् के चारो ओर ऐरावत हाथी के दांतों से भोत प्रोत तथा प्रसन्नता-पूर्वक अपलयित जो सधन मेघधे घे चन्द्रकान्त मणिमय दण्डयुक्त छत्र के समान शोभते थे। २५॥ सेनापदामर्दितपांडुमेघा मुक्तागुरूनभ्रतले विडालाः ॥ हठेन दुध्यन्नधिया व्रजंतः स्कंधादिरूढाननयंत मन्युम् ॥२६॥ सेनेत्यादि । अभ्रतले अनस्य तलं ममतलं तस्मिन् क्षाकाशप्रदेशे। मुफागुरुन् मुकाभिर्गुरयः तान् मुक्ताफले स्थूलान् मेघेऽपि मौक्तियसभघ इति प्रसिद्धिः। सेमाप. दामर्दितपोभुमेधान सेनानां पदानि तथोमानि सेनापदेरामर्दितास्तथोक्ताः पांडपच ते मे- पाच पांडुमेघाः सेनापदामर्दिताय ते पांडुमेधाध सेनापदामादतपांडुमेघास्त न सतानी. फचरणायिभिन्नघचल मेघान् । “पांडः कुन्तीपतो सित" इति विश्वः । दध्याधिया धना मिश्रितमन्नध्यन्न तदिति धीः दध्यन्नधोस्तया ध्योदनयुदण्या घटेन पलात्कारेण "प्रसभन्तु बलात्कारो ठम्" इत्यमरः । यजत: गच्छतः । मिष्टालाः घाहनमार्जाराः। एकंधाधिकदान मधिरहनिस्म मधिमदास्तथोक्ताः स्कंधमधिरुडा स्कंधाधिरूढासान् स्कंधमधिधिमान देयान् । मन्यं रोच। "मन्युः प्रो मतो दन्ये" इति विभ्यः। धनयंत प्रापतिस्म जी प्रापणे ला द्विकर्मकः । भ्रांतिमान कारः ॥ २६॥ मा० अ०--माफाश में मुक्कामों के कारण गुरुतर तथा सेना के चरण मर्दिन दोने से पाल मेपों को ओर दधिमिधिन मन समझ पर दौड़ते हुए याहन पिडालों ने कन्धे पर चढ़े हुए देयताभों को पार कर दिया ॥ २६ ॥ प्रयाणवेगानिलनीयमानाः पयोधरा; श्यामतननिभेन्द्रान् ।। सर्जितामूर्जितदानवर्षान खबंधुयुद्ध्या धुवमन्धरल्धन ॥२७॥ प्रयाणेत्यादि । प्रयाणयेगानिल्नीयमामाः प्रयाणय घेगः प्रयाणगरनम्मामातो. मिलः प्रयाणगानिल:भोपंत इनिमीयमानाः प्रयाणरेगानिलेन मीयमानास्तयोक्ताः नियां. जन जातवायुना प्राप्यमाणाः पयोधरा, पांसि धरतीति तथोनाः मेघा श्यामननून 64 मुनिसुश्तकाव्यम् । १०४ श्यामा तनुर्येषां ते तान् । सगर्जितान् गर्जितेन सह पतंत इति सगर्जितास्तान ध्वनिसहितान्। ऊर्जितदानधन दानस्य व दानवर्ष अर्जितं दानवर्षयेषां ते तान् प्रवृद्धमदजर वृष्टीन् “दान गजमदे त्यागे पालनच्छेदशुद्धिपु” इति विश्वः । इमेन्द्रान इभानामिदा इभेद्रास्तान् गजेंद्रान स्वयंधुबुदुष्या स्येषां यंधवस्तथोक्ताः स्वबंधय इति युद्धिस्वयंधुवुद्धिस्तया । ध्रुवं निश्चलं । अन्वरधन अनुकूलमवर्तन्त ॥ २७ ॥ भा० म०-प्रयाणकालीन वेग से उत्पन्न हुई वायुसे सञ्चालित मेघों ने प्रवाहित मदधारा-रूर वृष्टिवाले तथा गर्जन करने वाले श्याम शरीर गजराजों को अपने वन्धु समा कर उनका अनुसरण किया ॥ २७॥ शभियुक्ता वितदामरौधैः सहोत्पला भानुसुता प्रतीये ॥ जिनांगरोचिनिचयेन दिग्धा विवृद्धहेमांबुरुहा धुसिंधुः ॥२८॥ सदेत्यांदि। जिनांगरोचिनिचयेन जिनस्यांगं जिनांगं तस्य रोचीपि तथोक्तानि जिनां. गरोचिषां निचयो जिनांगरोचिर्निचयस्तेन जिनेश्वरशरीरकांतिसमूहेन । दिग्धाः दिह्य. तेस्म दिग्धाः लिप्ताः। विधुद्धहेमाम्बुरुहा अंबुनि रोहतीत्यंधुरुह हेमरूपमंबुरुह तथोक्त. विबुध्यतेस्म वियुद्ध वियुद्ध हेमांधुरुहं यस्यास्सा तथोक्ता विकसितारुणारविंदा । धुसिंधुः दिघि विद्यमाना सिंधुध सिंधुः देवगंगा । “देशे नदविशेषेऽन्धौ. सिंधुर्ना सरिति स्त्रियाम्". इत्यमरः । सदा सर्वस्मिन् काले सदा । अभियुक्तापि अभियुज्यतेस्माभियुक्ता परिचितापि । अमरौधेः अमराणां ओघा अमरोधास्तै देवसमूहः। तदा तत्समये। सहोत्पला उत्पलैः सह वर्तत इति सदोत्पला नीलोत्पलसहिता | "वान्यार्थ" इति विकल्पेन सहस्य सभावः । मानुसुता भानोस्तुता तथोक्ता यमुनानदी । प्रतीये ज्ञायतेस्म । इण् गती कर्मणि लिट् ॥ २८॥ मा० अ०-विकसित सुवर्ण-कमलयाली देवगङ्गा यद्यपि देवताओं की चिरपरि- चिता थीं तथापि थी जिनेन्द्र भगवान् की नीलदेह-कान्ति से समुद्भासित होने से वह उन्हें पद्मपुज-मण्डित यमुना की सीप्रतीत हुई ॥२८॥ विशालमाकाशतलं चकाशे विभुप्रभाश्यामलतारकौघम् ॥ विपाकनीलैविपुलैः फलौघैः विलंबमानामभिभूय जंबूम् ॥२६॥ विशालमित्यादि । विभुप्रभाश्यामलतारकौधं विभोः प्रभा तथोक्ता विभुप्रभया श्यामल: विभुप्रभाश्यामलः तारकाणामोघस्तारकोघः विभुप्रभाश्यामलस्तारकोघो यस्मिन् तत् तथोक्तं । विशालं विस्तृतं । आकाशतलं आकाशस्य तलं तथोक गगनतलं ।

. १०५ चतुर्थः सर्गः। विपानीले विपाकेन नीला विपाकनीला तैः परिणत्या कृष्णः। विपुल रुन्द्रः। "कद्रोविपुलप्" इत्यमरः । फलोधैः फलानामोघा फलोधास्तैः । विलंयमाना दिलंयत इति चिलंबमाना तां विनमतोम् । जंबूम् अवृक्षं । अभिभूय अभिभवनं पूर्व पश्वास्किञ्चि. दिति तिरस्कृत्य । चकाशे विरजे का दोती लिट् । उत्प्रेक्षा ॥ २६॥ भा० अ०-भगवान को नोल प्रभा से श्यामस्वरूप तारागणयुक विशाल आकाश- मण्डल पड़े पड़े तथा पक जाने के बारमा नोने २ फलों से झुमे हुए जमूवृक्ष को तिर. स्कृत किये हुए थे ॥२६॥ स्वशून्यवादे परमागमेन सद्यो निरस्ते विशदांतरस्य ॥ च्योम्नो विरजुः पुलकोपमानि जिनप्रभाश्यामलतारकाणि ॥३०॥ स्वशून्यवाद इत्यादि । परमागमेन परमश्वासावागमय परमागमस्तेन परमागमभु तेन । स्त्रशून्यवादे शून्यस्य वादः शून्यवादः स्वस्य शून्यवादस्तथोकः तस्मिन् निजनास्तिपादे । सपः तस्मिकाले सयः ताप्तमये। निरस्ते सति निरस्पस्म निरस्तत्तस्मिन् सति । विशदातरस्य विशदमंतर यस्य ता नयोक तस्य निर्मलांत:करणयुक्तस्य । "अंतरं तु परी. धाने भेदेरंध्रावकाशयोः । आत्मांतधिविनात्मीयरहिर्मध्यावधियति ॥तादर्थेऽयमरे प्रोक्ताम्" इनि विश्वः । व्योमः आकाशस्य । पुल कोरमानि गेमविसमानानि । जिनप्रमाश्या मलतारकाणि तिनस्य प्रमा जिनप्रमा तया श्यामलानि तथोकानि जिनप्रभाश्यामलानि चतानि तारकाणि च तथोक्तानि जिननायशरोरकात्या नोलनक्षत्राणि । “नक्षत्रमृक्षमुडुभ ज्योतिर्धिष्ण्यं च तारका | तारातारकमित्ये कार्घः' इति जयकीर्तिः विरेजः पभुः । राजदी तो लिट् । उत्प्रेक्षालंकारः ॥३०॥ थी जिनेन्द्र भगवान को नील देशकान्ति से श्यामरंग को तारायें मानों परमागम के द्वारा नास्तिकवाद हरा देने से सच्चान्तस्तलयुक्त याकाश के रोमाश तुल्य प्रतीत होने लगीं ॥ ३०॥ मुग्धाप्सरा कापि चकार सर्वानुत्फुलवक्त्रान्किल धूपचूर्णम् ॥ रथाप्रवासिन्यहणे क्षिपति हसंतिकांगारचयस्य युद्ध्या ॥३॥ मुग्धेत्यादि। रयानवामिनि यसतीत्येयं शोलो यासी रथस्याग्रे वासो मम्मिन् स्यन्द- नमुखर्तिनि । अरुणे सूर्य पारयो । “यूएस्तोऽणोऽनूरः" इत्यमरः । ६संतिकांगारचयस्य हसंतिकायाः अंगारशाट्याः अंगारम्नेयं वरासंतिकांगारयस्तरुप "अंगारशकट प्रादु दसती पइसनिकाम्" इनिहायुधः। धुध्या म्नीया। धूपचूर्ण धूपम्य पूर्ण -

भा० अ०-
.
१०७
चतुर्थः सर्गः।
तस्यां जिनाधिपकांनियमुनानद्यां। "कालिंदी सूर्यतमया यमुना शमनस्सा" इत्यमरः । अघ.
च्छिदे अर्घ छिनत्तीत्यधच्छित् तस्मै पापविनाशाय । मनत्प्रतिहारसुराः प्रतिहाराश्च ते सुराश्च
अनिहारसुराः मज्जतीति मज्जंतश्च ते प्रतिहारसुराश्च तधोक्ताः । सुराणां देवानां ।
मनोक सेनां । सुराणामित्यत्राप्यन्वयः । अदि' महामेरुगिरि । रुपमपि केनचित्मकारण :-
अनैपुः थवापयन् । णीञ् प्रापणे लुङ् । द्विकर्मक- ॥३३॥
-ऐरावत की कान्तिरूपी गंगा की सहचरी श्रीजिनेन्द्र भगवान को देह-दीप्ति.
रूप यमुना में मनोन्मग्न होते हुए प्रतिहारदेव किसो २ तरह भानी सेना को पार विनाश
करने के लिये महामेरु पर्वत पर ले गये ॥३॥
गिरीशमुद्यविपदंतवृत्ति रवीन्दुतारामरसेव्यपादम् ॥
दिगंबररावृतमेनमारादपश्यदने प्रभुतुल्यमिन्द्रः ॥३४॥
गिरीशमित्यादि। इन्द्रः इदति परमैश्वर्यमनुभपतीनींद्रः सुर्वनायकः। उद्यद्विपदत
पृत्ति उद्यतीत्युद्यत: द्विपदस्य दता इव द्विपदंता उद्यतच ते द्विपदंताश्च तथोकाः तेषां
वृत्तिर्वर्तनं यस्य व प्रोगवद्गजदंतगिरिवर्तनयंतम् पश्ने उदेतीत्युद्यती विपदामंतो विपदंत-
उद्यती विदितस्य वृत्तिर्यस्य यस्मादिति या उद्यद्धिपदंतत्तिस्तं प्रोद्वपदापत्तिनाशवर्तनवंत
एतत्पक्षे ध्वजनच्युतकचित्राभिप्रायेण दकारो व्युदस्यते । तदुक्क घिदग्धमुखमडने-
"अन्योऽध्यर्थ स्फुटो यत्र मात्रादिध्युतकेयपि प्रतीयते विदुस्तदुशास्तन्मात्राच्युतकादिकम्"
रवींदुतारामरसेयपादं रविध दुध ताराधामराध तथोका सेयः पादः मूलं यस्य त पक्षे
रवींदुतारामरे. सेन्यो सेवनोयो पादौ चरणी यस्य तं “पादो प्रने तुरीयाशे शैलप्रत्यंत-
पर्वते । चरणे च मयूखे च” इति विश्यः । दिगंधरैः दिशध अपराणि च दिगंबराणि
दिगाफाशे. पक्षे दिश एवांवर येषां तैः मुनीश्वरः । भात आवियतेस्म आवृतस्त अवगा.
हित पक्षे संस्कृतं च । गिरोश गिरीणामोश गिरीशस्तं धराधरायोश्वरं पक्षे गिरामीश
गिरीशस्त पागीश्वर "गिरीश बापतौ रुद्र गिरोशोऽद्विषतावति" इति विश्व । प्रभुतुल्य
प्रमोस्तुल्यः प्रभुतुल्यस्त जिनेशसदृशं । एनं महामेरू । अप्रै पुरः। भारात् समीपे । अपश्यत्
ऐक्षन्त शिरप्रेक्षणे लट् श्लेष ॥३४॥
मा० 10~-इन्द्र ने गज़दन्त गिरियत्. ( उदीयमान विपत्तियों का नाशक) दिशाकाश
से (दिगम्पर मुनियों से ढके हुप, (घिरे हुए ) सूर्यचन्द्र तथा ताराओं से सेषित धरण
कमल धाले इस महामेरु पर्वत (यागीश्यर) को भाये समीप ही में श्रीजिनेन्द्र तुल्य देवा ॥३॥
सजातरूपोऽपि गिरिः प्रवृत्तदिगंवराक्रांतिरुदप्रकूटः ॥
अघांतकं पापभियाऽभ्ययासीत्किमित्यमय॑र्भणितः क्षणाप्तः ॥३५॥

। मुनिसुव्रतकाव्यम् । १०८ सजातरूप इत्यादि । सजातरूपोऽपि जातरूपेण मुनींद्राकारेण सह वर्तत इति सजात. कर: सोऽपि निग्रंथाकारवानपि पक्षे जातरूपेण हिरपणेन सह पर्तइति सजातरूपः कांचनमयः । “जातरूपं हिरण्ये स्यादिगंबरवराकृती" इत्यभिधानात् । प्रवृत्तदिगंपराक्रांति. रपि प्रवर्ततेस्म प्रवृत्ता दिशश्च अंबराणि च दिगंबराणि आकारणमाक्रांतिः प्रवृत्ता दिगम्बरा- णामाकान्तिर्यस्य सः विहितदिगाफाशातिकमोऽपि पक्षे प्रकृष्ट वृत्तं येषां ते प्रवृत्ताः दिशा एयावरं येषां ते तथोक्ताः प्रवृत्ताश्च ते दिगंपराश्च तथोक्ताः प्रवृत्तदिगंबराणामाक्रांतिर्यस्य सः तथोकः विशिष्टचारित्रयन्मुनीद्रातिकमवान् । उग्रकूटोऽपि उप्राण्युन्नतानि कूटानि शिष. राणि यस्यस, तथोक्तः अत्युचशिखरवानपि पक्षे उदग्र उत्कृष्टः फुटः कपटो यस्यासी तथोक्तः भत्यंतमायावान् । “माया निश्चलयंत्रेषु फेतवानृतराशिपु । अयोधने शैलगे सीरांगे फूट- मस्त्रियाम्" इत्यमरः । गिरिः मेरुनगेंद्रः। पापभिया पापस्य भी: पापणी तया निजविपद्ध- स्वभावदुष्कर्मभीत्या। अघांतकं अघानामंतकोऽधांतकस्त सकल कलिलवैरिण। अम्पया सीरिक आभ्यगमत्किं अभिमुखमभिगच्छतिस्म किमित्याशंका । इति एवं । अमत्यैः निर्जरैः । क्षणात क्षणेनाप्तः क्षणाप्तः क्षणारिमितकालेन संप्राप्तस्सन् । भणितः मण्यतेस्म भणितः भापितः। विरोधालंकारः ॥३५॥ भा० अ०-सुवर्णमय (निप्रन्यरूर ) दिशाकाश को आमाल किये हुए(उचम चरित्र पाले मुनियों को अतिक्रमण किये हुए ) और उनत शिखर वाले मायापूर्ण) महामेव पर्वत. को समीपस्य देखकर देवताओं ने कहा कि, मानों यह पर्वत पाप के भय से स्वयं ही पाप- घिनाशक भगवान के सामने उपस्थित हो गया है ॥ ३५ ॥ द्युमंडलं मध्यगतस्य मेरोमणिप्रभापंजेरभासमानं ॥ विभोरमुप्योपरि हेमदंडां बभार नीलातपवारणाभाम् ॥३६॥ घुमंडलमित्यादि । मध्यगतस्य मध्यं गच्छतिस्म मध्यगतस्तस्य मध्यभागस्थितस्य । मेरोः महामेरुनगेंद्रस्य । मणिप्रभापंजरभासमान मणीनां प्रमा मणिप्रभा सैव पंजरं तथोक्त मणिप्रभापंजरे भासत इति भासमान तथोक्त' रतयुतिपंजरे विराजमान गुमंडल दिवो मंडल तथोक आकाशमंडल। "यो दिवो खियामभ्रम्” इत्यमरः । यमुष्य अस्य । विभोः जिनेश्वरस्य। उपरिमाप्रमागे। हेमदंडा हेमा निर्मितो दंडो यस्यास्सा तां नीलातपधारणामाम् नील च तदातपवारणं च तथोक्त' गोलासपवारणास्य नामा नीलातपवारणामा ताईनील. छनेणेमा यभार दधौ दुभृधारणपोषणयालिट् । ननु हेमदंडामित्यातपवारणाविशेषत्वे किमामा-विशेषणत्यं व्यवहारदर्शनात् ॥३६॥ मा० xo-मध्यपत्ती महामेरू पर्वत की मणियों को ज्योति-राशि से चमकते हुए छाकाश मण्डल ने भगवान् के मागे सुवर्णदण्डयुक्त मील छत्र को शोमा घारण की। - ।

.. पञ्चमः सर्गः। अगाह्यतः पांडुवनं समंतादुपर्यटत्या सुरसेनयाऽद्रेः ।। सजीवचितांकितमंदवायुचलोत्तरीयश्रियमावहत्या ॥३७॥ अगाहीत्यादि। अतः अस्मादतः । यद मेरुगिरेः । उपरि भने । समंतात् परितः । अटत्या अस्तीत्यटती तया गच्छंत्या । सजीवचित्रांकितमंदवायुचलोत्तरीयधियं जीवेन सह वर्तत इति सजीवं तच तत् चित्रं च तथोक्तं सजीवचित्रांकित: सजीवचित्रां. कित: मेंदश्वासी वायुश्च तथोक सजीवचित्रांकितश्वासो मंदवायुश्च सजीवचित्रांकित. मंदवायुः तेन चले तपोक्त सजीवचित्रांकितमंदवायुचलं च तत् उत्तरीयं च तथोक्त तस्य श्रीः तथोक्ता त सचैतन्यचिनलक्षितमंमारुनचंचलसंयागलक्ष्मीम् । शायहत्या शायहतीत्यावहती तया विभ्रत्या। सुरसेनया सुराणां सेना तया अमयपृतनया। पांडुवन पांडु च तत् वने च तथोक्त तदाख्याविपिन। अगाहि प्रायशि। गाहङ विलोडने पर्मणि लुङ । "हनशि" इत्यादिना प्रिट ":" इति तस्य लुक् । उत्प्रेक्षा ॥३७॥ भा० अ०-इसलिये पर्वत के ऊपर चारों ओर भ्रमण करती हुई तथा मन्द चायु से फड़फडाती हुई मूर्तिमती अङ्कित चादर को शोभा धारण करती हुई सुर-सेनाने पाण्डुक चन में प्रवेश किया। ३७ । अनीकिनीमन वने समस्तां सुरद्रुमछायसुखे यथार्ह ॥ निवेशयन्पांडुशिलामवापत्पूर्वोत्तरस्यां दिशि तस्य जिष्णुः ॥३८॥ अनीकिनीमित्यादि । सुरदुमछायसुखे सुराणां दुमा सुग्दु मास्तेषां छाया मुद्रुमछायं अनभूतत्पुरुषे "सेनाछायाशालासुरानिशा" इति स्त्रीनपुंसकशेपत्यान्नपुंसयत्वम् सुरद्रुमछायेन सुष तस्मिन्, कारणे कार्यस्योपचारात् पहारक्षाणां तप सौख्योती। यत्र यने पांडुपयने । समस्तो सफलो। भनोकिनी चमूम् । “पृतनाऽनीयिनी मूः" इत्यमरः । यथा मईमनतिमाम्य यथाई यथायोग्यं । निवेशयन् निवेशयतीति निवेशयन् । जिष्णुः सुभामा । "जिष्णुलेखप. भश्शमः" इत्यमरः । तस्य पांडकवनस्य । पूर्वोत्तरस्यां पूर्वस्याश्च उत्तरस्याश्च यदिगंतरालं सा पूर्वोत्तरा तस्यां । दिशि ककुभि ईशान्यदिशीत्यर्थः । स्थिता । पांडुशिला पांडुक्यासी शिला च पांडुशिला तां । भरतजिनेंद्राभिषयोचितां पादुकामिप्यशिलां। श्वापत् आगमत् भाप्ल व्याप्ती लुड् । “सर्तिशास्ति" इत्यादिना भड् ॥३८॥ भा० ०-इन्द्रः फल्प वृक्ष की छाया से सुषद इस पाण्डक पन में सारी सेना को यथायोग्य स्थापित करते हुए ईशान दिशा में पाण्डुक शिलाके समीप पहुँचे। ३८ । शतार्धमष्टाशतमुचलाया विशालतामुन्नतिमायति च ॥ मेग यस्याः खलु योजनानि वदंति सर्वज्ञजिनेंद्रपादाः ॥३६॥ -

मुनिसुव्रतकाव्यम्।
शतार्धमित्यादि। सर्वशजिनेंद्रपादाः सर्व जानंतीति सर्वज्ञाः जिनानामिंद्रा जिनेंद्राः
जिनेंद्राश्च ते पादाश्च जिनेंद्रपादाः सर्वज्ञाश्च ते जिनेंद्रशादाश्च तथोक्ताः सर्वजिनेश्वरपूज्याः
तत्र भवान भगवानिति शब्दो विबुधैः प्रयुज्यने "पूज्ये पादाविति नामांते राजा भट्टारको
देव" इति इलायुधः । उज्वलायाः उद्धासमानाया: । यस्याः पांडुशिलायाः। विशालतां
विशालस्य भायो विशालता तां विस्तारतां । उन्नति उत्सेधं । मायति च आयाम च।
शताध शतस्याधं शताध पंचाशतमित्यर्थः । “अष्टी अष्टाङ्” इत्यादेशः। शतं च । फ्रमेण
परिपाट्या । योजनानि। पलु स्फुटं । वदति व वंति बद व्यक्तायां वाचि लट् । यथासंख्या.
लंकारः॥३॥
भा० अ०-सर्वज्ञ जिनेन्द्र देव ने समुज्ज्वल तथा विशाल पाण्डुक शिला की उँचाई
पचास योजन गीर लम्बाई माठ सौ योजन की यतलायी है । ३६ ।
श्रायद्विकंल्पेशपराय॑पीठमध्यस्थजनामनरम्यमध्या ॥
सतोरणा रत्नमयांचला या समंगला शुक्तिसमाकृतिश्च ॥१०॥
आयत्यादि। या पांडुशिला। आद्यद्विकल्पेरापरायपीठमध्यस्थजनासनरम्यमध्या
दोघ तो करणे च द्विकल्पोआदौ भवो आद्यौ"दिगाध गांशांद्य" इति भावार्थ य प्रत्ययः । तोच
तो द्विकल्पौ च माद्यद्विग्लो तयारीशी पराये च ते पोटे च पराय॑पीठे गाधद्विकल्पे
शयोः परार्थ्यपीठे तधोक्त "परानियाग्रहरप्राम्याग्र्यानीयमनियम्" इत्यमरः । मध्ये तिष्ठ.
तीति मध्यस्थ माद्यद्विपल्पेशरगर्थ्यपीठयामध्यस्य तथोक्त जिनस्येदं जैन जैनं च तत्
भासन च जनासन भाद्विकल्पेशरायपीठमध्यस्थं च तत् जैनासनं च तथोक्त तेन रम्यं
तथोक्त' भाद्विकल्पेशपरायपीठमध्यस्थजनामनाम्यमध्यं यस्यास्सा तथोक्ता अभिषेकनि-
युक्तयोः सौधर्मेशानेंद्रयारनपीठळयमभ्यस्थितजिनेंदधिष्टरमनोहरमध्यप्रदेशा । सतोरणा
तोरणेन सह वर्तत इति तयोका मणितोरणमहिना। रतप्रयांचला रतधिकारी रक्षामयः
रतमयः अंचलो यस्यास्पा तथोक्ता मणिमयाग्रमागा। समंगला अष्टमंगल: सह वर्तत
इति तधोका। शुक्तिसमाशनिश्च शुपत्या समा तथोक्का शुक्तिसमा भारनियम्यास्सा
तधोक्ता मुकास्फोटसमाकारा च आयभास इत्युत्तरपदेनान्वयः ॥४०॥
भा० अ०-इन्द्र तथा ईशानेन्द्र के यहुमूल्य आसन के मध्यपत्तों श्रीजिनेन्द्र भगवान्
के सिंहासन से सुन्दर है मध्यभाग जिसका ऐसी तोरणयुक्त रत्नमय चंचल पाली
पाण्डुशिला मौक्तिक गुच्छ के समान शोमती थी।४।
या चायभासेऽमरकल्पितेन महाभिपेकोत्सवमंडपेन ॥
चलन्मणिरतम्भसहस्रमुक्तावितानचित्रवजभूपितेन ॥४१॥

पञ्चमः सर्गः येत्यादि । या च शिला । ज्वलन्मणिस्तमसहस्रमुकावितानचित्रध्वजभूपिदेन उचलं- तीति ज्वलंतः मणिभिनिर्मिता स्तमा मणिस्तम्माः ज्वलंतश्च ते मणिस्तंभाश्च ज्वलन्मणि- स्तंभास्तेषां सहस्र तथोक्त ज्वलन्मणिस्तंभसहस्र च मुकाया वितानं तच चित्राणि घ तानि ध्वजानि च चित्रध्वजानि तानि च तथोक्तानि चलन्मणिस्तम्भसहस्रमुकावितान- चिभध्वज पितस्तेन प्रस्फुदत्नस्तंमसहस्रेण मौक्तिकवितानेन विविधकेतनश्च मंडितेन । अमरकल्पितेन अमरैः कल्पितस्तेन निर्जरनिर्मितेन। महामिपेकोत्सवमंडपेन महांधासा- घभिषेकश्च महाभिषेकस्तस्योत्सवस्तयोक्तः महाभिषेकोत्सवस्य मंडपस्तथोकस्तेन । मन्माभिपवादवमंडपेन । आवभासे रराज भासृड् दीप्तौ लिट् ॥४॥ भा० अ०-देवताओं से रचे गये हजारों मणिमय स्तंभो पर मुत्ता की चांदनी और चित्रित ध्यजाओं से समलंरुन महाभिषेक मण्डपसे पांडुक-शिला देदीप्यमान होने -- लगी।४१। अभ्रेऽवलंबरहिते सुचिरं सुमेरुक्ष्माभृत्यदक्षिणकृतिश्रमभारशांत्यै ॥ प्राप्तोप्टमिंदुरिव पांडुवनं शिलैपा प्रादात्सुरेन्द्रनयनोत्पलपण्डहर्षम् ॥१२॥ अम्रत्यादि । एषा इयं शिला पांडुशिला । अवलंयरहित गरलंयेन रहित तस्मिन् भाधाररहिते । अध्र प्योनि । सुविरं दीर्घकालं। सुमेरुक्ष्माभृत्मदक्षिणतिश्रमभारशांत्यै शोभनो मेरुः सुमेशः क्षमा यिमतीति क्षमाभृत् सुमेरुश्चासो क्षमाभृश तथोक्तः प्रदक्षिणस्य कृतिः प्रदक्षिणरुतिः सुमेरुश्माभृतः प्रदक्षिणकृतिस्तथोक्ता तया जातश्रमस्तस्य शांतिः भ्रमशांतिस्तस्यै मंदराचलप्रदक्षिणकरणजनितपरियोपशमाय। सुरेंद्रनयनात्पलपंडहर्ष सुराणामिदस्तस्य नयनानि ताकानि सुरेन्द्रनयनान्येय उत्पलानि तथोक्तानि सुरेंद्रनयनोत्पलानां पंई तस्य दर्पतधोक्तस्तं त्रिदशाधीशनेत्रकुवलयफदयपरितापं । प्रादात् प्रायच्छत् ॥ इदा दाने लुङ् ॥ ४२ ।। मा० अ०---इस पाण्डुक-शिला ने निराधार भाकाश में पहुत देर तक सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करने से उत्पन्न हुई थकावट को शत करने के लिए अष्टमी के चन्द्रमा के समान इन्द्र के नेत्र-कमल-पुंजको भानन्दित किया।४२ । इत्यईदासकनकायरतस्य टोकायां सुयोधिन्यां भगवन्मदरानयनवर्णनो नाम पंचम. सोऽये समाप्तः ॥५॥ * इति पञ्चम सर्गः समाप्तम् .

॥ अथ षष्ठः सर्गः॥ श्रथामरेन्द्रेण गजेन्द्रतो जिन: स नीयमानः प्रतिपांडुकं महत् ॥ निराकृतोयो मधुनेव मन्मथो नितंबमुच्चैः शुशुभे हराचलात् ॥१॥ अयेत्यादि । अथ मंदरानयनानंतरे । अमरेंद्रेण अमराणामिंद्रस्तेन लेपमुख्येन। गजेंद्रतः गजानामिदो गजेंद्र: गजेंद्रात् गजेंद्रतः ऐरावणात् । महत् पृथलं। पांडुकं पांडुकवनं प्रति उद्दिश्य । नीयमानः नीयत इति नीयमानः प्राप्यमाणः। स जिनः मुतिसुमताईदीशः । मधुना वसंतेन “मधु क्षीद जले क्षीरे मर्च पुष्परसे मधुः। दैत्ये चैत्रे वसते च जीयाशाके मधुदुमे" इति विश्व । हरावलात् हरस्याचलस्तोतस्तस्मात् कैलासनगात् । नितंयं तट । नीयमानः प्राप्यमाणः। निराकृतोनः निराक्रियतेस्म निराकृतः पराभूत उग्रो स्रो येन सः पक्षे निराहतो निधूत उग्रो रौद्ररसी येन सः तथोकः । “उग्रः शूदासुने क्षत्त्राच्छोकठे धोत्कटेऽन्ययत्” इति विश्वः । मन्मथ इव मनो मथनातीति मन्मा इव । उच्चः अत्यंत । शुशुभे वमी शुभ दीप्तौ लिट् । उत्प्रेक्षा ॥ १ ॥ मा० म०-इस के बाद इन्द्र-द्वारा ऐरावत हाथो से विशाल पाण्डु बन में पहुंचाए जाते हुए श्रीजिनेन्द्र भगवान फैलाश पर्वत के तट पर बसन्त ऋतु के द्वारा लाए गए तथा शिवजी का अपमान किए हुए कामदेव के समान अत्यन्त सोभने लगे॥१॥ नगेन्द्रभालस्थलबद्धपट्टिकाशिलापरिस्थापित एप जिपणुना ॥ जिनार्मकः प्रोतपुरंदरोपलस्फुरन्मनीषामपुपद्दिवौकसां ॥२॥ नगेंद्रेत्यादि ।जिष्णुना :जयतीत्येवं शोलो जिष्णुस्तेन पाकशासनेन । "भूजे: स्नुफ्” इति शोलार्थे स्तुर प्रत्ययः । नगेंद्रभालस्थलबद्भपहिकाशिलेपरिस्थापितः नगानामिदो नगेंद्रः भालस्य पलं भालस्थलं नगेंद्रस्य भालसलं तपोक्त पट्टिका इव पट्टिका नगेंद्रमाल. स्पले बद्धा तथाका नगेंद्रमालललयद्धा चासो पट्टिका च तथोक्ता सा चासो शिला च नगेंद्र. मालस्थलबद्धपट्टिकाशिला तस्याः उपरि साप्यतेस्म स्थापितः नगेंद्रभालस्यलयद्ध. पष्टिकाशिलोपरि स्थापितः पर्वतनाथमालस्थलरचितपट्टयंधामपांडकशिलापरिशनिवेशितः । एपः अयं । जिनार्मकः जिनालकः । दिवौकसां दिवि मोक: स्थानं येषां ते दिवौकसस्तेषा देवानां । मोतपुरंदरोपलस्फुरस्मनीषां प्रोयतेस्म प्रोत. पुरंदरतीति पुरंदर, पुरंदरमगन्दरे" .

पंटा सर्गः । इत्यादिना साधुः । पुरंदरस्पोपलः पुरंदरोपल: प्रोतश्चासौ पुरंदरोपलश्च तथोकः स्फुरतीति स्फुरंती साचासौ मनीपा च स्फुरन्मनीपा प्रोतपुरंदगेपल इति स्मुरन्मनीपा तथोक्ता तां संपनीलमिनिभासमानयुद्धि । अपुषत् अतुपद पुप पुष्ठी लट् ॥ उत्प्रेक्षा २॥ भा० १०-इन्द्र से के राश पर्वत के शिखर पर चद्वपट्टिका के समान पाण्डुकशिला पर प्रतिष्ठापित धोजिनेन्द्र भगवान ने ऐसा सन्देह देवताओं के मन में उत्पन्न कर दिया कि यह शिला इन्द्रनील मणि से विजडित है। तरंगितज्योतिपि तच्छिलातले सरोजरामद्विपवैरिविष्टरे ॥ तरंगिताम्बौ त्रिदिवौकसां सरस्यलिय॑थाकोकनदेऽशुभद्विभुः ॥३॥ तरंगितेत्यादि । तरगितज्योतिषि तरगस्मजातोऽम्येति तरंगित ज्योतियुतिर्यस्मिन्नि ति तरंगितज्योतिस्तस्मिन् । "ज्योनिर्भद्योतदृष्टि" इत्यमरः। तच्छिलातले सा चासो शि. ला च तच्छिला तस्याः स्थलं तच्छिातलं तस्मिन् । सरोजरामद्विस्वैरिविष्टरे सरोजस्ये घ रागोऽरुणा तिर्यस्य सः सरोजराग द्वाभ्यां पितीति द्विपास्लेषां वेरिणो द्विपवैरिणस्त. धृत विएरं द्विपवैरिविष्टर सरोजरागेण निर्मितं द्विपरिविष्टर तथोक्त तस्मिन् पर- रागमणिनिर्मितसिहासने । विभुः निषण्णोऽहत्प्रभुः । तरगितां तरंगास्संजाता मस्मि निति तरगित तरगितमवु यस्मिन् तत् तरगितांबु तस्मिन् संजाततरंगोदके। त्रिदिवौफसां त्रिदिव पर चोक येषां ते त्रिदियौ सस्तेषां देवानां । सरसिसरस्था। कोकनदे रकोत्पले । "आय रतसरोरुहे रक्तोत्पलं फोकनदम्" इत्यमर । अहिः भ्रमरः । यथा येन प्रकारेण तथा। अशुभत् शुम दीप्तौ लुङ् । “घुम्यो लुड." इति तिप् “सर्तिशास्ति इत्यादिना अड् ॥ ३ ॥ भा० म०-प्रदीप्त ज्योतिचाली उस पाण्डुक-शिला पर पद्मरागमणि से विजडित सिंहासन पर बैठे हुए थ्रोजिनेन्द्र भगवान तरंगित जलयालो देव-गगा में रक्त कमल पर धैठे हुए भ्रमर के समान शोमने लगे। जिनेश्वरः पांडुशिलाप्रभांतरे रराज माणिक्यमयासने स्थितः ।। हरिय॑था विद्रुमरागरंजिते फणीन्द्रभोगे कलशार्णवांतरे ॥४॥ जिनेश्वर इत्यादि । पांडुशिलाप्रमांतरे पांडुशिलायाः प्रभाः तासामंतर पाडुशिला प्रभांतरं लस्मिन् पांडुशिलाकिरणमध्ये । माणिस्यमयासने माणिक्यस्य विकार: माणिक्यमय तथ तत्भासन च माणिक्यमयासन तस्मिन् रतमयसिंहासने। स्थित तिष्ठतिस्म सितः । जिनेश्वरः । कलशार्णवांतरे कलशमयोऽर्णव कलशार्णवस्तस्मिन् क्षीरसमुद्रमध्ये । "मंथो. दधिस्तु क्षीराग्धि क्षीरोदः क्लशोदधिः” इति धैजयंती। विद्रुमरागरं जिते चिटुमस्य रागः विद्रुमरागः चिट्ठमरागेण रजितस्तस्मिन् प्रयालवरंजिते समुद्रातस्थितत्वादुचि. - मुनिसुव्रतकाव्यम् । तमिदं विशेषणं । फणीन्द्रभोगे फणीनामिंद्रस्तथोक्तः फणींद्रस्य भोगः फणींद्रभोगस्तस्मिन् महाशेपशरीरे । “भोगः सुखे स्न्यादिभृतापहेश्च फणकाययोः” इत्यमरः । हरिः नारायणः । यथा तथा । रराज यभी। राज दीप्तौ लिट् ॥ ४ ॥ भा० १०-पाण्डुकशिला की किरणों के बीच में मणिमय सिंहासन पर विराजमान धीजिनेन्द्र भगवान क्षीरसमुद्र में मूगे की लालिमा से प्रतिफलित हुई सर्पराज की देह पर विष्णु के समान सोभने लगे ॥४॥ जिनेन्द्रपांडोर्मणिपीठरश्मिभिः प्रवेणितः कांतिरयो व्यराजत ।। • यथा निमज्जवनितांगकुंकुमद्रवैर्जलौघो नमुनात्रिमार्गयोः ॥५ ॥ जिनेंद्रेत्यादि । जिनेंद्रपांडोः जिनानामिंद्रस्तथोक्तः जिनेंद्रश्च पांडुश्च जिनेंद्रपांडू तयो जिनेश्वरपांडुशिलयोः। कांतिरयः कांतीनां रयः कांतिरयः किरणप्रयाहः । "ओघःप्रवाही घेणी च धारा स्त्रोतो रयः स्मृतः" इति हलायुधः । मणिपीठरश्मिभिः मणिभिनिर्मितं पीठं तथोक्त मणिपीठस्य रश्मयो मणिपीठरश्मयस्तैः रतसिंहासनकातिभिः । प्रवेणितः प्रवेण्यतेस्म प्रोणितः जटिलितः। यमुनात्रिमार्गयोः यो मार्गा यस्यास्स। त्रिमार्गा यमुना च निमार्गा च यमुनानिमार्ग तयोः यमुनानदीगंगानयोः । “धर्मद्रवी निमार्गाच" इति. घेजयंती। जलौघः जलानामोधस्तथोक्त जलप्रयाहः" ओघो वृदेऽम्भसा रथ" इत्यमरः । निम- जवनितांगकुंकुमद्रवः निमज्जतिरुम गिमज्जत्यः निमजत्यश्च ता: वनिताश्च तथोक्ताः तासा- मंगानि निमनद्वनिनांगानि तेषां कुंकुम तथोक्त निमजदनितांगकुंकारस्य द्रवाः निम. जवनितांगकुंकुमद्रवास्तैः । प्रवेणिनः । तथा । व्यराजत व्यभासत राज दीप्ती लङ ॥ ५ ॥ भा० १०-श्रीजिनेन्द्र भगवान और पाण्डुक शिला का प्रमापुन रतपचित सिंहासन को कान्ति से मिल पर स्नान करती हुई ललनाओं के कुंकुम से मिश्रित गंगा और जमुना के प्रवाह के समान सोभने लगे ॥५॥ बभौ नगेंदः प्रभुपीठपांडुकप्रभावितानैः परितस्तिरोहितः ॥ यथैव तापात्ययसांध्यशारदैर्घनाघनौधैर्युगपत्समावृतः ॥ ६ ॥ यभावित्यादि । प्रभुपीठपांडुकप्रभावितानः प्रभुध पीठं च पांडुपाश्च प्रभुपीठपांडुफास्तेषां प्रभाः तथोक्ताः प्रभुपीठपांडुकप्रमाणां वितानानि प्रभुपीठपांडुकप्रभावितानानि त: जिने श्वरसिंहासनपांडकशिलाकांतिसमवायः। वितानो यज्ञविस्तारोलोचेपुक्रतुकर्मणि वृत्तभेधाव सरयोर्वितानं तुच्छपदयोः इति विश्वः । परितः समंतात् । तिरोहितः तिरोहतेस्म तिरोहितः पिहितः। नगेंद्रः महामेरुः । तापात्ययसांध्यशारदः तापस्यात्ययस्तापात्ययः तापत्ययस्यायं तापात्ययः संध्यायाः अयं सांध्यः शरदः अयं शारदः तापात्ययस्य ।

पप्टः सर्गः । . सांध्यश्च शारदश्व तापात्ययसाध्यशारदास्तैः वर्षाकालसंध्याकालशरत्कालसंबंधः । धनाधनौधेः धनाधनानामोधा घनाघनाधास्तैः मेघसमूहः । “घनापनो धनो मेशः इति- धनंजयः | जिनेश्वरपीठांडुशिलानां यथाक्रम कृष्णामश्वेतवर्णत्वात् तापात्यय. सांध्यशारदमेघवेतित्वं । युगपत् परन् । संवृतः सविपतेस्म संघृतः वेष्टितः । यथैव तथैव । वो मा दीप्तौ लिट् ॥६॥ भा० भ०-श्रीजिनेन्द्र भगयाग, सिंहासन तथा पाण्डुक शिला की प्रमा मे चारो ओर से बाच्छादित सुरु गर्बत एक ही समय में वर्षा, संध्या तथा शात्कालीन मेघों से परि वेष्टित सा सोभने लगा ॥६॥ अथेद्रवाचा मणिदंडभृद्विभुं दिक्षयोपनजतो मुहुर्मुहुः ॥ धनी दिगीशान्सपरिच्छदान हान्निजे निजे स्थापयदाशु धामनि ॥७॥ अथेत्यादि । अथ अनंतरे । इंद्राचा इद्रस्य वाफ वाय तया देवेशवचनेन । मणि. एंडभृत् मणिभिनिर्मितो दंडस्तथोकः मणिद विभीति मणिदंडभृत् रनदंडधरः । धनी धनमस्यास्तीति धनी कुरः। विभु जिनेश्वर । दिद्वक्षया द्रुष्टुमिच्छा दिक्षा तया दर्शनेच्छया। मुहुर्मुहुः पुन, पुनः। उपबजतः उपप्रतीत्युपवतस्तान समीपं गच्छनः । सपरिच्छदान परिच्छदेन सह धर्तन्त इति सपरिच्छदास्तान परिवारसहितान् । दिगोशान दिशामीशा दि. गीशास्तान दिक्पाल कान । हठात् बलात्कारात् । “समस्तु पलात्कारो हठः" इत्यमरः । मिजे निजे स्वकीपे। वीप्सायामिति निर्मायः । धामनि स्थाने। भाशु शी असापयत् अतिष्ठपत् ॥ ७॥ भा. 80-इस के बाद इन्द्र की आशानुसार रनमय-दण्डधारी कुचर मे जिनेन्द्र भगवान को देखने की इच्छा से पार चार समोष में गाते हुए सपरिवार दिक्पालों को हठात् अपने २ यथोचित रुपान पर बैठाया॥७॥ जिनाभिषेकाय सुरांगनाजनं सुरप्रतानं सुरनायकानपि । अशेषकृत्यं जिनभक्तिभावितान्यथाईमग्राहयदेव कृत्यवित् ।।८।। जिनाभिषेकायेत्यादि । त्यवित् एत्य येत्तीनि एत्ययित् पार्ययेदी। एप: धनः । जिना. निकाय जिनस्याभिषेको जिनामिस्तस्मै जिनामिरेफनिमित्तं । सुरांगनाजन मुराणा- भगनाः सुरांगनास्ता पय जनः सुरांगनाजनले मुरस्नोले । मुरप्रतानं सुराणा प्रतान तधेषित देवसमूह । जिनमकिभावितान् जिनस्य मतिः नयाका मान्यतेस्म भाषिता जिनामपत्या fraतोमातार मिशगुणानुरगतकृतान् । सुरनायकानपि सुराण मुनिसुव्रतकाव्यम् । नायकास्सुरनायकास्तान शेषसुरेंद्रानपि । अशेपत्यं अशेष च तत् कृत्यं च अशेषरत्य समस्तफार्य । 'यथाहं अईमनतिमाम्य यथाई यथायोग्यं । अग्राहयत् अस्वीकारयत् ग्रह उपादाने णित्रंतालड् ॥ ८॥ मा० १०-कार्य-विचक्षण कुवेर ने जिनेन्द्र भगवान के अभिषेक के लिये जिन-मक्ति लोन देवगनाओं, देवतागों तथा अवशिष्ट सुरेन्द्रों से अन्यान्य समस्त कृत्यों का यथायोग्य सम्पादन कराया ॥८॥ अनंतरं दक्षिणवामभागयोर्जिनस्य पूर्वाभिमुखस्य सुस्थिते ॥ शचीपतीशानपती ससंभ्रमौ निजासने सम्मुखमध्यरोहताम् ॥६॥ अनंतरमित्यादि । अनंतरं पश्चात् । ससंभ्रमौ संभ्रमेण सह वर्तते इति ससंभ्रमी संघ्रम- सहितौ । शचीपतीशानपती शच्याः पतिः शचीपतिः ईशानस्य पतिः ईशानपतिः शचीपतिश्च ईशानपतिश्च शचीपतीशानाती सौधर्मशानेंद्री। पूर्वाभिमुखस्य पूर्वस्याभिमुखं यस्य सः तस्य पूर्व दिग्मुखस्य। जिनेशस्य जिनेश्वरस्य। दक्षिणवामभागयोः दक्षिणम्य धामन्य दक्षिणवामौ तौ च तो भागौ च दक्षिणवामभागी तयोः दक्षिणवामपाययोः। सुस्थिते संतिष्ठेतेस्म सुस्थिते । निजासने निजयारासने पुनस्ते स्वकीयासने । सम्मुखं मिथोऽभिमुख यथा तथा । अध्यरोहतां आरूढी रह पीज मन्मनि लङ् ॥ ६॥ मा० १०-इसके बाद सौधर्मेन्द्र तथा ईशानेन्द्र पूर्वाभिमुखस्य श्रीजिनेन्द्र भगवान के सामने दाहिनी और याई भोर लगे हुए अपने २ आसन पर येठ गए ॥६॥ अनेकतीर्थोपहतैरथाम्बुभिः घटोतरनापयितुं जिनार्भकं ॥ यदारभतेरम मुदा सुरानकरतबाप्सरोगीतरवाप्तदितटं ॥१०॥ अनेकेत्यादि। अथ निजासनारोहणानतरे। अनेकतीर्थोपहतः न एकान्यनेकानि भनेकानि च तानि तीर्थानि च तथोक्तानि उपहियंतेस्म उपहृतानि अनेकतीर्थः उपहतानि तः। घटोद्ध तः उभियंतेस्म उद्ध तानि घटेः उद्ध तानि घटोद्ध तानि तेः कलशेर भितः। त्रुभिः सलिलैः। जिनामक जिनवासी जिनामफस्त जिनशालक। नापयितु अभिषेपितुं । यदा यस्मिन्काले यदा। सुरानकस्त. पाप्सरोगीतरयातदिनभानकाध स्तवाश्च आनफस्तयाः सुराणामानफस्तवास्तथोक्ताः अप्सरसांगीतानि तथोकानि सुरानबस्तयाप्सरोगीतानि तेषां रवा दिक्कट यस्मिन्धर्मणितत् तथोक देयटुंदुभिदेवस्तोत्रदेवगणिकासंगीतध्वनिभिः घ्याप्तदिगंतराल यथा मर्यात तथा। मुश संतोपेण । भारेभेनहम राम रामस्ये लट् “स्मे पलट” इति स्म योगे भूतार्थे लट् ॥१०॥ अकश्च पष्ठः सर्गः। - मा० अ०-- अनन्तर भनेक तीर्थो से लाये गये जल से परिपूर्ण कलसों से श्रीजिनेन्द्र बालक को मभिषेक कराना उन दोनों ने देवदुन्दुमि, स्तुति तथा अप्सरामों को गीतध्वनि यों से दिशाओं को परिपूर्ण करते हुए प्रसन्नता पूर्वक आरभ किया ॥ १० ॥ तदा ऋभृणामुभयी घटा घटः पयांसि नेतुं घटिता प्रयत्नतः ।। सुमेरुचूलादिसुधार्णवावधिप्रवद्धनीलोपलतीर्थपद्धतिः॥११॥ तदेत्यादि। तदा तत्समये । घटः कनककलशः।पयांसि क्षीराणि "पयः क्षीरं पयोऽबु" इत्यमरः। नेतुं आदातुं । सुमेरुचूलादिसुधार्णवावधिप्रवद्धनीलोपलनीर्थपद्धतिः सुमेरोश्यूला मादिर्यस्मिन् कर्मणि तत् सुधारूपोऽर्णवः सुधार्णय: स एयायधिर्यस्मिन् फर्मणि तत् तीर्थ. स्य पद्धतिः तथोका नीलाच ते उपलाय नीलोपला प्रवध्यतेस्म प्रधानोलोपल: निर्मिता तीर्थपद्धतिःतयोका तीर्थशास्त्राध्वरक्षेत्रोपायोपाध्यायन्त्रिपु। अतार्पिजुष्टाम्भः स्त्रीरजा- सु च विश्रु तम्" इति विश्वः । प्रयध्यतेस्म प्रद्धा सुमेरुचूलादिसुधार्ण धावधिप्रयद्धा नीलो- पलपद्धतिर्यस्यास्सा तथोक्ता मेरुगिरिचूलिकाभूतिक्षीराधिपयंतरचितेंद्रनीलमणिसो. पानमार्गवती । ऋभूणां निर्जराणां "आदित्या भोऽस्वताः" इत्यमरः। उभयो उभाष- घयवापस्था इत्युभयो द्विप्रकारा । घटा घटना।"घट: फुभे समाधी व घटा तु गजलहतो । घटनायां च गोप्ट्यां च" इति नानार्थरतमालायां । प्रयत्नतः प्ररुष्टो यतः प्रयत्नस्तस्मात् प्रयत्नतः । घटिता घट्यतेस्म घटिता रचिता तदा । मृणामित्यन "पदे तु संहिता नित्या सव वाक्ये विकल्पते" इति यवनान्नसंधिः कृतः ॥ ११ ॥ मा० अ०-उस समय सुमेरु पर्वत से लेकर क्षीरसमुद्र तक नीलरतनटित सोपान- मार्ग से जाती हुई विविध देवमण्डली सुवर्णकलसों से अभिषेक जल लाने के लिये प्रयतपूर्वक संघटित हुई ॥ ११ ।। बमुजतो मणिकुंभधारिणः सुधाशिनः पांडुवनात्पयोवनं ।। जिनेन्द्रभक्त्या जलनीतये स्वयं प्रवृत्तपात्रांगसुरद्रुमा इव ।।१२।। पभुरित्यादि । पांडवनात् पांड च तत् यनं च पांडुयन तस्मात्। पयोधन पयसो धनं पयोयन "दुग्धान्धिप्राणप्रवासनियासवारियोनारेषु धनम्" इति नानार्थकोशे। प्रत प्रजंतीति प्रजनः गच्छतः। मणिकुंभधारिणः मणिमिनिर्मिता: कुंमा मणिकुंभा मणिकुं. मान् धरतीत्येचं शीलास्तथोका । सुधाशिनः सुधामनन्तीति सुधाशिनः देवाः । जिनेंद्रभक्त या जिनेंद्र स्ता भक्तिर्जिनेंद्रमत्तिस्तया । स्वयं । जलनीतये जलस्य गपर्न जलनीतिस्तस्यै सलिलानयनाय । प्रवृत्तपात्रांगसुग्गुमा इष पात्रायंगेषु येषां ते तमोक्ताः इत्यमरः। स्वभावतः स्वस्य भाव. मुनिसुप्रतकाव्यम् । सुराणां द्रुमास्सुरद्रुमाः पात्रांगाश्च ते सुरद्रुमाश्च तथोक्ताः प्रवृत्ताश्च ते पात्रांगसुर. द्रुमाश्च तथोक्ताः प्रवृत्तपात्रांगकल्पवृक्षा इव । यभुः रेजिरे भा दीप्ती लिट् । उत्प्रेक्षा ॥१२॥ भा० अ० --पाण्डुक धनसे. क्षीर समुद्र तक चक्कर काटते हुए तथा मणिमय कलश लिये देवताप जिनेन्द्र भगवान की भक्ति से स्वयं जल लाने के लिये पंचाग कल्पवृक्ष के समान सोमते थेn १२॥ भुवा च भीत्या भिदुरात्मकं सुराः स्वभावतो व्यतमुखैविवर्जितम् ॥ विशालमाद्यतविदूरमद्भुतं गभीरमापुस्त्वरया पयोनिधिम् ।।१३।। •भुवेत्यादि। भुवा भूम्या । भीत्या च वेदिकयापि । भिदुरात्मक मिदुरमेवात्मा यस्य सः भिदुरात्मकस्तं चत्रमयं "कुलिशं भिदुर पविः" स्तस्मात् । व्यक्षमुखैः द्वे क्षे येषां ते व्यक्षास्त एव मुखमादिर्येपो ते ध्यक्षपुखास्तैः द्वीन्द्रियादिप्राणिमिः । “अक्षः कर्षे तुपे चक्र शकटे व्यवहारयोः । आत्मज्ञ पाशके चाक्ष तुत्सीयच्चलेंद्रिये" इति विश्वः । विवर्जितं विरहित निर्जतुयत्वात्परिशुद्धमित्यर्थः। विशाल विस्तीर्ण । भातपिदूरं आदिश्च अंतश्च आघतो ताभ्यां विदूरस्त गानादिनिधनमित्यर्थः । अद्भुत आश्चर्यभूत । गभीरं अगाध । पयोनिधि पयासि निधीयतेऽस्मिन्निति पयोनिधिस्तं सुधोदधि । त्वरया शीघ्र ण "संभ्रमस्त्वरा इत्यमरः । आपुः ययुः आप्लू व्याप्ती लिट् । जातिः ॥१३॥ भt० ०-ये (देवताए') स्वभाव ही से द्वीन्द्रिय जीवों से रहित, अनादि निधन भूमि और वेदिका से वजमय अद्भुत तथा अगाध सुधासमुद्र को शीघ्र माये ॥ १३ ॥ निपीड्य लक्ष्मीमपहत्य चक्रिरे ठकाः स्वकं जीवनमात्रशेपकं ॥ अपीदमायांत्यपहर्तुमित्यगादपांनिधिर्वेपथुमूर्मिभिन तु ॥ १४ ॥ निपीड्येत्यादि । ठका: कार्पटोप्रथिचारवः । निपीड्य निपीडनं पूर्व पश्चात्किंचिदिति वाधित्वा मथित्वेत्यर्थः । लक्ष्मी कमलां । अपहृत्य अपहरण पूर्व पश्चात्किञ्चिदिति स्वीकृत्य । स्वकं फुत्सितः स्वः स्वकस्तं निकृष्टमात्मानं "कुत्सिताल्पाशात." इति क प्रत्ययः । जीवनमानशेषकं जीवनमेव जीवनमात्रं प्राणमात्रमुदकमात्र या तदेव शेषमवशिष्ट यस्य तं "जीवनं वर्तने नीरे पुत्रजीवे तु जीवनः" इति विश्वः । चक्रिरे विदधिरे दुटप करणे लिट। इदमपि जीवनमात्रमपि अपहर्तु प्रहीतु। मायांति आगच्छंति या प्रापणे लट् । इति एवं भयादिति शेषः । अपानिधिः समुद्रः । "तत्पुरुषे कृतिबहुलम्" इत्यश्लुक । वेपथुम् कंपनं । र ये कंपने इति धातो: “टुडिब्तोऽथक्की"इतिकर्तर्यधुःप्रत्ययः । मगात् अगमत् ! इण् गती ।

पठः सर्गः। लुङ्गैत्योः" इति गादेशः। ऊर्मिभिस्तु तरंगेस्तु वेपथु नागात् । अपहवः ॥१४॥ भा० म०---धूती ने मथ तथा लक्ष्मी निकाल कर इसका जलमात्र भवशिष्ट रख छोड़ा है, इसे भी देवतालेोग अपहरण करने के लिये मानों भा रहे हैं, इसी भय से तरंगों के द्वारा समुद्र कम्पित हो रहा है ॥ १० ॥ मरुत्सु कुंभान्युगपत्क्षिपत्स्वलं जलाय संक्षोभमिपेण सागरः॥ जिनोत्सबार्होऽहमभूवमित्यभून्मुदा समुन्मेषित एष केवलं ॥१५॥ मात्स्वित्यादि । मरुत्सु देवेषु "मरुतो पवनामरौं" इत्यमरः । अलाय उदकाया फुमान फलशान् । युगपत् सरत् । भलं भृशम् । “अलं भूपणपर्याप्तिशक्तियारणवाचकम्" इत्यमरः । क्षिपत्सु सत्सु "यद्भायोभाषलक्षणम्" इति सप्तमी । सागरः पयोनिधिः। संक्षोभमिपेग संक्षोम एव मिपं तेन चलनव्याजेन "मिपं गनिमील नम्" इत्यभिधामात् । पपः मयं । जिनोत्सवाह: जिनस्य उत्सवः तोकः जिनोत्सवस्य महः जिनोत्सवाहः जिन जन्माभिषकोत्सवयोग्यः । अभूयं अभय भू सत्तायां लुड्। फेयल पर। मुदा संतोपेण । समुन्मेषितः प्रवृद्धः अभूत् म् सत्तायां लुट् ॥१५॥ मा०म०-जल भरने के लिये देयतामों के घट-क्षेपण करने से में जिन भगवान के उत्सप का योग्य हुमा इस घ्याज से समुद्र प्रसन्नता पूर्वक पढ़ने लगा ॥१५॥ विनिन्युरेकं मुखयोजनं घटैर्दधभिरष्टोदरयोजनानि च ॥ जेलानि सर्वाग्यपि दुग्धवारिधेः स्वकेन मार्गेण धराधरं सुराः ॥१६॥ यिनिन्युगित्यादि । सुगः देया. एरमुखयोजन एक मुषस्य योग्न तपोक्त । मष्टोदर योजनानि उदरस्प योजनानि उद्योजनानि मष्ट च तान्युदरयोमनानि च तपोकानि पुनस्तानि । धभिः धादिः । घटः कलशैः । दुग्धयारिधः पारोमि धीयते अस्मिन्निति पारिधिः दुग्धरूपो पारिधिश्व तथोक्तः तस्मात् । सर्वाग्यपि सकलान्यपि । जलामि सलिलानि । स्वकेन स्वकीयेम मार्गेण पथा माकाशमार्गन्यः। घाघरं घरी धरतीति घराघरस्त महामेकात । विनिम्यु. प्रापयतिस्म पोम्प्रापणे लिए १५ मा० म०-एक योजन चौड़े मुंह तथा माठ योजन चौड़े पदेयाले पटों के द्वारा देवनामों में क्षौर-समुद्र का जल अपने मात्रा मार्ग से सुमेर पर्वत पर पहुंचाया ३१६॥ जिनोऽयमक्षीणमहानसधिभाग्भविष्यतीत्यस्य विवक्षया स्फुट ॥ वित्तीर्णमप्यम्युधिना पयोऽखिल जिनाधिपायाचयतामयात्पुनः ॥१७॥ जिन स्यादि। अयं एरः। शिनः दुर्जयममंठकमायतीन् जयतीति नि:मिननाप । ममी.

. मुनिसुव्रतकाव्यम्। १२० णमहानसधिभाकक्षीयतेस्म क्षीणां न क्षीणमक्षीण अक्षीणं महानर्स यस्यास्ता तथोका अक्षीणमहानसा चासौ अमृद्धिश्च तथोक्ता अक्षीणमहानसधि भजतिस्मेत्यक्षीणमहान- सर्धिभाक् भज सेवायामितिधातो. "विग्भज" इति विणप्रत्ययस्तस्य लोपो दीर्घश्च । भविष्यतीति जनिष्यत इति । अस्य अर्थस्य । स्फुटं व्यक्त । विवक्षया वक्तुमिच्छा विवक्षा तया उच्चरितुवांछया बच परिभापणे इति धातोस्सनतात् स्नीलिंगे मत्प्र- हैं या जिनाधिपाय जिनश्चाणवधिपस्तस्मै मर्हदोशित्र । अबुधिना अनि धीयतेऽस्मिन्नित्यं वुधिस्तेन क्षीरवारिधिना । अखिल समस्त। पय. क्षीरं । वितीर्णमपि प्रदत्तमपि । पुन भूयः । अक्षयतां न क्षय भक्षयस्तस्य भावोऽक्षमता ता अन्यूनत्वं । भायात् भागच्छत् या प्रापणे ल्ड् ॥१७॥ भा० म०-यह जिनेन्द्र भगवान् क्षय धन-धान्य समृद्धिशाली होंगे इसी कारण से समुद्र ने जितने जल समर्पित किये थे उनकी पूर्ति फिर हो गयी ॥ १७ ॥ अथामरेंद्रौ सुरवृंदढौकितान्भुजैरनेकैविकृतैः पयोघटान् ॥ विधृत्य जन्माभिपवं विधित्सया सुनिर्मलस्यापि जिनस्य चक्रतुः ॥१८ मथेत्यादि । अथ जलानयनानतरेः। अमरेली सौधर्मशानेंद्रो । विस्त. विक्रियतेस्म वि. कृतास्तः विक्रियाशक्तिस्तैः । अनेक समस्तैः । भुजैः याहुभि । सुरवृदढोकितान सुराणा वृद तथाक' ढोकतेस्म ढोकिताः सुरवृ देन दौकिता. सुरवृदढौकितास्तान सुरसमूहेनानीतान्। पयोघटान् पयसा पूर्णा घटाः पयाघटास्तान क्षौरकलशान् । विधृत्य धृत्वा। सुनिर्मलस्यापि मलानिर्गतो निर्मल सुष्टु निमल सुनिर्मलस्तस्य निर्गतकरमयस्यापि । जिनस्य जिनेश्वरस्य जन्माभिपर्व जन्मनोऽभिषवो जन्माभिपरस्त जन्माभिषेफ। विधीच्या विधेरिच्छा विधी. च्छा तया। विधित्सेति पाठे विधातुमिच्छा विधित्लेति सनतः पर्तुमिच्छा तया । चक्रतुः विदधतु दुम् करणे लिट् ॥ १८॥ मा० म०-सौधर्म और ईशानेन्द्र ने देवताओं से समर्पित किये गये जलपूर्ण कल. सों को अपनी अनेक कल्पित भुजाओं से अत्यन्त स्वच्छ शरीरवाले मी जिनेन्द्रमगवान का अभिषेक किया ॥१८॥ सुवर्णगारुत्मतरूप्यकुंभिभिभजासहजैरमराधिपावुभौ ॥ व्यराजता पाकशलाटपुप्पमिलतासहसैरिवकल्पशाखिनौ ॥१६॥ सुपणेत्यादि । उमी अमराधिपी अमराणामधिपो सौधर्मेशानेंद्रो। सुवर्णगारत्म- तरुप्यकु मिमिः सुवर्ण च गारुत्मतं च रूप्यं च तयोकानि ते. निर्मितानि कुमानित । । - १२१ . - पाठः सर्गः। हिरण्यमरफनमणिरजनमयकलशयभिः "गात्मतं मरकतमश्मगौहरिन्मणिः” इत्यमरः । भुजासहस्रःभुजानां सहस्राणि भुजासहस्राणि तैः सहस्रयाहुभिः। “वाही पाणी भुजोर्ध्वयो" इति नानारतमालायां । पापिनी शाखास्सत्यनयोरिति शाखिनी पल्पी तो शाखिनौ चतयोक्ती कल्पवृक्षाविया पाकशलाटुपुप्पभिः पच्यतेस्म पाष:पाका मूलेऽपिन्याविकर्णादिम्यः कुणु जाहलावित्य न्यायं विपृण्यता कौशिककरण पाफः फलमित्युक्तं ततः परफलमित्यर्थः । पाफश्च शलाटुश्च पुप्पं च पाकश लाटुपुष्पाणि तानि प्रत्येषामिति पाकशलाटुपुष्पाणि ते: पकफलामलपुष्पसहितः । "पाकरिशशी जरानिष्ठापचनही दनेषु च इति विश्वः । “आमे फले शलाः स्यात्" इत्युमयमाप्यमरः । लतासहस्रः लतानां सहस्राणि लतामसाणि ते: सहस्रशानिमिः । "लता ज्योतिष्मती स्पृका शाखायल्लीप्रियंगुपु" इति विश्वः । व्यराजा माता राज दीप्ती लड् उत्प्रेक्षा ॥१६॥ मा० १०-ये दोनों सुवर्ण, मरकत मणि और चाँदी के घड़ों से युक्त सहस्र भुजाओं से सुपफ फल तथा मनोहर पुप्पों से लदी हुई हजारों लताओं से दो कल्पवृक्षों के समान शोमित हो रहे थे ॥१६॥ शिशुश्च शैलश्च धृति परीक्षितं ध्रुवं सुरेंद्रद्वितयेन वारिधेः॥ निपिच्यमानौ युगपत्सुधाजलैरुभावभूतांसमधैयसंपदौ ॥२०॥ शिशुरित्यादि । शिशुध जिनयालकः । शैलश्च महामेरुः । धृति धैर्य । “धृतिर्धारणर्य- योः' इत्यमरः । ध्रुव निधलं । परीक्षणाय परीक्षितुं परीक्षानिमित्तं । सुरेंद्रद्वितयेन सुरेन्द्रयोचि तयं सुरेंद्रद्विनयं तेन सौधर्मेशानेंद्रयुगलेन । पारिधः क्षीरसमुद्रस्य। सुबाजलैः सुधामयानि जलानि सुधाजलानि ते अमृतसलिलैः । युगपत् सरदेव । निपिच्यमानी निपि च्येते इति निषिच्यमानौ “माइलट" इत्यादिनी कर्मणान: "मगाने ' इति मगागमः। उभी दी। समधैर्यसंपदी धैर्यस्य संपत् ययोस्ती समानधृतियुक्तो। अभूनां मनिपातां भू सत्तायां लु॥ २० ॥ भा० अ०-धैर्य और निश्चलता की परीक्षा करने के लिये क्षीरसमुद्र के अमृतमय जलके द्वारा दोनों इन्द्रों से स्नान कराये जाते हुए धीजिन यालक और पाण्ड.क शिला- एक ही साथ समान धैर्य सम्पत्ति-शाली से हुए ॥ २० ॥ वहत्पयःपूरशतानि पांडुकात् बभुस्त्रिलोकैकगुरोजिनेशिनः ॥ भरे भिन्नादमितो विनिस्सरत्प्रभूतनिर्यासरसप्रवाहवत् ॥२१॥ पहदित्यादि ।। पांडकात् पांडकोपलात् । यहत्वयःपूरातानि पयसां पूरा: पयपूराः पहंतीति घईतः यह तश्च ते पयःपूराध तथोक्तास्तपां शतानि निर्गच्छत्क्षीरपूरशतानि - । मुनिसुनतकाव्यम् । १२२ त्रिलोकैकगुरोः प्रयश्च ते लोकाश्च तथोक्ताः एकश्वासी गुरुश्च एकगुरुः त्रिलोकानामेक- गुरुत्रिलोकैकगुरुस्तस्य त्रिभुवनस्य मुख्यगुरोः । "शुपर्निकादिकरे पिशादी सुरमत्रिणि । दुर्जराऽलघनोः प्रोक्तो गुमर्महति वाच्यवत्" इति विश्वः । जिनेशिनः नि ननाथस्य । भरण भारेण । भिन्नात् मिनन्तिम मिन्नं तस्मात् । अमितः सर्वतः । विनिस्सरत्प्रभूतनिर्यात- रसप्रवाहवत् निर्यासस्य रसः निर्यासरसः तस्य प्रवाहस्तथोक्तः प्रभूतश्चासौ निर्यास- रसप्रवाहश्च धोक्तः निस्सरतीति निस्सरन् स चासो प्रभूतनिर्यासरसप्रवाहश्च तथोक्तस्तद्वत् निगच्छत्यभूतनिर्यासरसप्रवाह इव "निर्यासस्स्यादानमरसः खपुरो चेटकोलशः" इति विदग्धचूडामणौ। प्रभुः। रेजुः भा दिप्ती लिट् ॥२१॥ भाए अ.--पाण्डफ-शिला से प्रवाहित होते हुए हैकड़ो जल प्रवाह मानो त्रिभुवन पति श्रोजिनेन्द्र भगवान के बोझ से दबकर चारो तरफ से निकलती हुई भाम्र-रसधारा के सदृश मालूम होते थे।॥२१॥ नगेंद्रसंपत्तिदिदृक्षया ध्रुवं पयःप्रवाहाः परितोऽपि संभ्रमात् ।। हटत्तटीयंगशिलागुहासरोवनेषु पर्याटुरनेकदा चिरं ॥२२॥ नगेंद्रोत्यादि । पयःप्रयाहाः पयसां प्रवाहाः तथोक्ताः क्षोरप्रयाहाः । नगेंद्रसंपत्तिदिदाया गगाना इंद्रो नगेंद्रस्तस्य संपत्तिः तथोक्ता द्रष्टुमिच्छा दिक्षा नगेंद्रसंपत्तितिक्षा तया, महामेरोः संपदं द्रष्टुमिच्छया। हटत्तदोगशिलागुहासरोवनेषु तटी च 'गं च शिला च गुहा च सरश्च वनं च तटोगशिठागुदासरोधनानि घटतीति इटन्ति इति । तानि तीटशिलागुदासरोवनानि च तेषु रमणीयतया प्रस्फुरच्छिखरशिलागहर- सरोवरफाननेषु। परितोऽपि। संभ्रमात् संवेगात् "समौ संगसंभ्रमौ” इत्यमरः । अनेकधा गनेकेन प्रकारेण अनेकधा अनेकविधेन । चिरं वहुसमयपर्यन्तम् । पर्यादः इलस्ततः परिजग्मुः। अट गती लिट् ॥ २२॥ मा० अ०--जलधाराभों ने सुमेह पर्वत की विभूति देखने की इच्छा से-नदी, शिखर, गिरिकन्दरा, तालाव तथा वन में चारों भोर पड़े वेग से देर तक चकर लगाया ॥२२॥ वहत्पयःपूरशतोऽभितो बभौ सुमेरुराच्छिद्य पततयोयं ।। पुनश्च केनापि चरिष्यतीत्ययं गिरिद्विपा राजतरज्जुबद्धवत् ॥२३॥ चदित्यादि। गिरिद्विपा गिरीणां द्विद तहस्तेन देवेंद्रण । पतनयोः पक्षयोः । द्वयं युगलं । आच्छिय खंडित्या । पुनश्च पश्चात् । अयं एषः पर्वतः। केनापि प्रकारेण । चरिष्यति गमिष्यति । राजतरज्जुश्यात् ग्जतस्येयं राजती राजती चासो रज्जुश्च राजनरज्नुः यध्यतेस्म पद्धः राजतरज्या पद्धस्तयोक्तस्स इव रूप्यरतरज्या धन इय। ।

पष्ठः सर्गः शभितः सर्धतः । वहत्पयःपूरशतः पयसां पूराः पयःपूराः तेषां शतानि पयःपूषा- तानि बहंतिपयःपूशतानि यस्यासौ तथोक्तः । सुमेरुः महामेरुः । धमी चिरराज! . भा दीप्ती लिट् । प्रागिरयः सपक्षाः शक्रवन चरतो गोत्रभिदा सपक्षच्छेदमधः पातिता इति हि लौकिकोकि स्तोत्रमुत्प्रेक्ष्यते ॥ २३ ॥ भा० १०-इन्द्र से दोनों पांख काटे जाने पर भी सुमेह पर्वन शायद फिर से किसी तरह चलने लग जाय- इस खयाल से इसे सैकड़ों जलधारा-रूपो राजतरजह से भाबद्ध के समान सोमता था ॥२३॥ विरेजुरुन्मग्ननिमममूर्तयो मुहुर्मुहुर्कोतिपलोकसंश्रिते॥ पयःप्रवाह परितोऽपि तारका यथैव विस्पष्टविनष्टयुदबुदाः ॥२४॥ चिरेजुरित्यादि । पयःप्रवाहे पयसां प्रधाहस्तथोक्तस्तस्मिन् । ज्योतिपलोक संधित ज्योतिपामयं ज्योतिषः स चासो लोक्य ज्योतिपलोषस्तं संश्रितस्तस्मिन्सनि । परितोऽपि सर्वतोऽपि । उन्मग्ननिमममूर्तय. उन्मजतिस्म उन्ममाः निमअन्तिम निमग्नाः उन्ममाश्च निमग्नाश्च तथाकाः उन्माननिमन्नाः मूर्तयो यानां तास्तथोक्ता उद्गतांतर्गता. वयवाः । तारका नक्षत्राणि "तारकाप्युडघाखियाम्" इत्यमरः । मुहुर्मुहुः पुनःपुनः । विस्पष्टचिनप्रदाः विस्पटाश्च विना विस्परविनष्टाः ते घ ते घुपदाध तथोक्ताः घ्यकाव्यक्तजल पुवुदाः। यथेष येन प्रकारेण । तथा तेनैव प्रकारेण । रेञ्जः धभुः राज़ दीप्तो लिट् उत्प्रेक्षा ॥२४॥ इस जलप्रवाह के ज्योतिलोक में पहुंचने पर इसमें मग्नोन्मन्न होती हुई ताराय उगते और विनशते जल घुरुदुद् के समान हीखती थीं ॥२४॥ निशाकराहस्करभार्गवासितैरलक्ष्यत क्षीरतरंगिणी क्षणं ॥ सिताब्जरक्ताचुजकैरवोत्पलैविराजमानेव वियत्तरंगिणी ॥२५॥ निशाकरेत्पादि। क्षीरतरंगिणी नरंगास्सत्यस्यामिति नरगिणी क्षीरस्य तरंगिणी "नदुफ्" इत्यादिना डी। निशाकहस्करभार्गवासितेः निशांकगेतीति निशाफर: "दियावि- भानिशेत्यादिना" कृप्रप्टप्रत्ययः मास्करोतोत्याहस्काः तेनैव स्प्रेण र प्रत्ययः भृगो भयो भागंय: निशा रश्न मार्गश्च यसित निशाकरिमार्गवासितास्त चद्र सूर्यशुक्रशनेधः सितारकाथुनकरयोहरलः अप्सु जायत इत्यज सिन च तत् अजघ सिताम्ज रफ्तं च तत् अंबुजं च फेरपंच "मित कुमुदकरये इत्यमरः उत्पलं च सिताम- रक्तायुजन्योतालानि तैः श्वेताश्यरत कमलसितोत्पलनोलोराले । विगजमामा विराजन इति पिराजमाना मास्टेत्यादिना" माना प्रत्ययः “मगाने" इति मः घियत्तरंगिणीय भा०० 1 मुनिसुनतकाच्यम् । १२४ वियती विद्यमाना तरंगिणी तथोक्ता सेव क्षणं क्षणपर्यतम् । अलक्ष्यत अदृश्यत । लक्षिः। दर्शनांकनयोः फर्मणि लङ् । उत्प्रेक्षा यथासंख्या च ॥ २५ ।। • मो० अ०-क्षीरनदी-लाल, काले, उजले कमल तथा कैरव से समाच्छादित होकर चन्द्र, सूर्य, शुक तथा शनिग्रह से परिवेष्टित देवनदी के समान कुछ क्षण तक सोमने लगी ॥२५॥ वहति नानामणिमेदिनीप्रभाप्रबद्धदुग्धांबुधुनीशतान्यभुः ॥ सुरेंद्रभीताचलपालिनेऽब्धये नगाधिपक्षिप्तविचित्रवरूावत् ॥२६॥ घहतीत्यादि । वहति यहंतीति वहति सति यहि प्रापणे इति धातोः शतृप्रत्ययः । नागार्मणिमेदिनीप्रमाप्रपद्धदुग्धांत्रुधुनीशतानि नानामणिमेदिनीप्रभाभिः प्रयध्यन्तेस्म प्रपद्धानि नथोक्तानि दुग्धरूपाण्यम्यूमि टुग्याम्बुनि तेषां धुन्यः दुग्धाम्बुधुन्यस्तासां शतानि तथोक्तानि नानामणिमेदिनीप्रमाणबद्धानि च तानि दुग्धाम्बुधुनीशतानि तथोक्तानि विविधरतकांतिभिः रजितक्षीरनीरनयनेकानि । सुरेंद्रमीताचलपालिने. सुराणामिंद्रः सुरेंद्रः तस्माद्वीता सुरेंद्रमीतास्ते च ते अचलाश्च तथोक्ताः सुरेंद्रभीताचलान पालयतीत्येचं शीलः पाली तधोक्तस्तस्मै गोत्रभिगोतपर्वतरक्षकाय । अब्धये भापो धीयतेऽस्मिन्नित्यध्रिस्तस्मै समुद्राय । नगाधिपक्षिप्तविचित्रवस्त्रयत् नगानामधिपत्तथोक्तः क्षिप्यतेस्म क्षिप्त नगाधिपेन क्षिप्त' सथोक्त विचित्र च, तत् वस्त्र च विचित्रवस्त्र नगाधिपक्षिप्त च तत् विचित्रवस्त्र' च तथोक्तं नगाधिपक्षिप्त- विधिमयस्त्रमिव तथोक्त। आभुः व्यराजन् । मा दीप्ती लट् । “माद्विषोभैर्जुस्या" इति विकल्पेन जुस् । उत्प्रेक्षा ॥ २६ ॥ भा०१०-विविध गणिमय मेदिनी को प्रभा से प्रतिमलित सैकड़ों दुग्धलए जल की नदियां इन्द्र से डरे हुए पर्वतों की रक्षा करने वाले समुद्र को पर्वतराज से दिये गये अपूर्व वस्त्र के समान सोभने लगीं ॥२६॥ महीभृता तेन तदोपधीकृताः पयरतटिन्यो भुवनैकपालकं ॥ सुगोत्रलावण्यनिवासमर्णवं समेत्य वर्याः स्वमयं व्यधुः क्षणात् ॥२७॥ महीभृतेत्यादि तेन महीभृता महीं विभाति महीभृत् तेन राशा पर्वतेन वा। तदा तत्समगे । उपधोकताः प्रागनुपधा इदानीमुपाधाः क्रियतेस्म तथोक्ता: "उपायन. मुपग्राह्यमुपधाचापि" इत्यमरः। पयस्तारिन्यः तटमस्त्यासामिति तटिन्यः पयसा तटिन्य. स्तथोक्ताः क्षीरनधः । पर्याः विशिष्टाः पतिघराध पुरस्यवशीकरणचतुरा इत्यर्थः। "पति- घरान पर्याय मुगवर्यवरेण्याच" इत्यमरः । भुवनेकपालक पकवासी पालकच एक- - १२५ पष्ठः सर्गः। पालक भुवनस्यैकपालको भुवनेकपालफस्त लोकस्य मुख्यरक्षक । सुगोत्रलावण्य- निवासं शोभनं गोत्र' विशिष्टान्वय पक्षे शोभना गोत्रा. सुगोत्राः महागिरय. सुगोत्र च सुगोत्राश्च लावण्य सौरूप्य लवणत्व तच सुगोलाचण्यानि तेपा निवासस्त "गोत्र मान्नि कुले क्षेत्रे कानने चित्तवमनोः सभायनीयवोधेऽपि गोत्र क्षोणिधर मतः। लाषण्यं देहकाती च लवणत्वे च कथ्यते” इत्युभयत्राप्यमिधानात् । अर्णवं अधुधि । समेत्य समयन पूर्वपश्यात्किश्चिदिति प्राप्य । क्षणात् अपकालात् । स्वमय स्वस्मादभिन्न स्वस्वरूप । व्यधु अकार्प दुधान धारणे च लुड् । श्लेपालंकार ॥ २७ ॥ भा० अ०-उस समय मानों गजा से ( पर्वत से) भेंट की गयीं सुन्दर पुग्धमय मदियों ने संसार के एकमात्र रक्ष तथा उच्चवंशजों (उत्तम पर्वतों) का सौन्दर्य स्थान समुद्र के पास जाकर तुरत्त उसे निजरूपमय यना डाला ॥२७॥ अथामरारतीर्थजलैस्सुरेश्वरद्वयेन सृष्टे जिनगंधवारिणि । पटीरकर्परनिपद्वराविलेऽप्यहो मम जुर्हतपापकर्दमे ॥२८॥ अथेत्यादि। अथ अभिपवान तरे। सुरेश्वरदयेन सुराणामीश्वरी तथोक्तो सुरे- श्यरयोदयं सुरेश्वरदय तेन सौधर्मेशानेंद्रयुगलेन । तीर्थजले तीर्थानि च तानि जलानि घ तीर्याना जलानि वा तीर्थजलानितः तीर्थसलिले । एसृज्यतेरम एएस्तम्मिन् कृते। पटीरकपूरनिपदायिले पटीश्च पर च तथोक्त पटोरवयोनिपरस्तथोक्तः । "निपद्धरस्तु जगाल." इत्यमर पटीरकपूरनिषद्वरेणायितस्तथोकस्तस्मिन् 'कलुषोऽनच्छ मापिल" इत्यमर श्रीगधरपके न पलुपेऽपि । हुतपापकर्दमे हियतेस्म हत पापमेव कदमस्तथोक्त हत पापकर्दमा येन स तस्मिन् । जिनगारिणि गधेन युतं पारि नधयारि जिनस्य गंधपारि तथोक तस्मिन् जिनपतिगधोदके। ममन्जु मज्जतिस्म हुमस्जो शुन्दी लिद । अहो अद्भुतं ॥२८॥ मा० म०-इस के बाद दोनों इन्दों से नोयं जलों द्वारा किये गये चन्दन नया फर्पूर- मय और पापपंकापहागे श्रीजिनेन्द्र भगवान के सुगन्धित गन्धोदक में देवताओं ने गोते लगाये ॥२८॥ बभौ तरां पांडुक्सज्ञिका शिला समीपीणः सपनोदबिंदुभिः ॥ यथा शरच्चद्रकलोडुभिः श्रितैर्यथा च शुक्तिनवमौक्तिकै च्युतैः ॥२६॥ पमावित्यादि । पाडसक्षिका पादुक इति संज्ञा यस्वास्सा तथोक्ता । शिला पर । समीपकोण. समीपे कोस्ममोपकोस्तै निपटे विषोणे । अपनादपिदुम अप. मस्योदकानि "भन्योदनसत्त बिंदुमजविषदभारद्वारगाह" इत्युदादेश। मंपा पिंश्य मुनिसुव्रतकाव्यम् । १२१ अपनोदपिदयस्तैः अभिपेकजलबिन्दुभिः । शितैः आश्रितैः । उद्धभिः नक्षत्रः। शरच्चंद्रकला शरदचंद्रशरच्चंद्रस्तस्य कला तथोक्ता शरत्कालशशिकला । यथा । घ्युतः च्ययंतेस्म ज्युनास्ता परित. परितः। नवमोक्तिः नवाश्य ते मौक्तिकाच गयमौक्तिकास्त: नूतनमोक्तिफमणिमिः । शुक्तिः यथा तथा । यो तरां प्रष्ट यमी यभीतरां "यार्विमन्ये च तरप्" इति तर "प्रत्ययेटिकम्" इत्यादिना चाम् मा दीप्ती लिट् ॥२६॥ मा० RO-गक्षत्रों से जिस प्रकार शारदो चन्द्रकला, तथा चारो तरफ पितरे हुए नूतन मोतियों से जिस प्रकार शुक्तिया शोभा पाती है, उसी प्रकार समीप में पड़े हुए मभिषेक-जल. तल-बिन्दुगों से पाण्डका क-शिला मी अत्यन्त सुशोभित होने लगी ॥२६॥ • प्रमार्य निर्मज्जनशीकरांस्तनौ दूकुलचेलांचलपल्लवेन तत् ॥ शची विमुग्धा जगदेकवृद्धमप्यलंचकाराऽखिलवालभूपणैः ॥३०॥ प्रमाज्येत्यादि । विमुग्धा यिमूहा । शची इंद्राणी। दुकूलचेलांचलपलयेन पुलं च तत् चेल च दुफूलचेलं तस्य भश्चल: स पय पलवस्तेन । तनी शरीरे। निर्मजनशिकरान निर्मजनस्य शिरास्तान् अभिषेकजराणान् । प्रमाग्य मार्जयित्या। जगदेकवृद्ध एकश्चा. सौ घृन एमवृक्षः जगतामेकयुद्धस्तयाक्तस्त जगतां मुख्यपडित घोधिक च। "बुधः वृद्धी पंडितऽपि" इत्यमरः । तं जिनेश । भपिलयालभूपणेः यालस्य भूपणानि यालभूपणानि अपिलानि च तानि पालभूषणानि च अपिलमालभूषणानि तेः। अलंचकार अलंकरो. तिस्म दुटाम् फरणे लिट् ॥३०॥ मा० 10-~मोली माली न्द्राणी ने देह में छुटे हुए मिपेक-जलकणों को चादर के मंचल से पोंछ कर संसार में एकमात्र शानद्ध श्रीजिनेन्द्र भगवान को यालोचित भूषणों से समलदहन किया ॥३०॥ निसर्गरंध्रः श्रुतिसंश्रयाम्यां राज रत्तोपलकुंडलाभ्यां ॥ जिनाधिपः पल्लवितद्विपायों यथा रसाल: शिशिरात्ययस्य ॥३१॥ निसर्गत्यादि । जिनाधिप: जिनेश्वरः। निसर्गरंध्रच निसंश्रयाभ्यां निसर्गेण र घ ते श्रुती च निसर्गरंध्रभुती से पवसंश्रयो ययोस्ते ताम्यां स्वाभाविकछिद्र कर्णाश्रयाभ्यां। रक्तोपलकुंडलाभ्यां रकवासायुपलश्च रकोपल: रकोपलेन रचिते कुंडले ताभ्यां पद्म- रागमणिनिर्मितकुंडलाभ्यां । शिशिरात्ययस्य शिशिरस्यात्ययः शिशिरात्ययस्तस्य घर्सतकालप्रारंभस्य । पल्लवितद्विपाचः पल्ल्यास्संजाता अनयोरिति पल्लविती द्वौ चतो पाथी च द्विपाश्यौँ पल्लवितो द्विपायौँ यस्यासो तधोक्त संजातपलययुक्तो. भयपाः "संजाततारकादिभ्यः" इति त प्रत्ययः। रसाल: माद: "मानश्चुतो रसालाs १२७ षष्ठः सर्गः। सौ सहकारोऽतिसोरम:"इत्यमरः । यथा तथा । रराज वो राज दीप्ती लिट् । रसालस्य पल्लवितद्विपार्श्वमात्यसमर्थनायव वसंतस्य शिशिरात्ययाभिधानग्रहणं । उत्मेक्षा ॥१॥ भा० अ०-धीजिनेन्द्र भगवान स्वाभाविक छिद्रयाले दोनों कानों में लगे हुए पाराग. मणि-निर्मित कर्णभूषणों से मानों वसन्त ऋतुमें दोनों ओर से पल्लवित मानवृक्ष के समान सोभने लगे ॥३१॥ हारस्य मुक्ता गलशंखमुक्ता इव प्रभोरंगमरीचिवश्याः ॥ उरःकवाटीयमुनाहृदांतर्वितेनिरे बुबुदपंक्तिलीलां ॥३२॥ हारस्येत्यादि । प्रमोः जिनाधिपस्य । गलसंचमुका इस गल एवं शंखः गलशंखः मुच्यतेस्म मुक्काः गलशखेन मुकाः तथोक्ताः फंठकंघुगलिना इय। अंगमरीविषश्याः अंग. स्प मरीचप: तपोक्ताः घशं गताः घश्याः । “पश्यपथ्यवयस्येत्यादिना" साधुः। रंगमरीची. नां घश्यास्तयोकाः शरीरस्य कात्यधीना: । हारस्य कठाभरणस्य । मुत्ताः मौक्तिकानि । उर:- फघाटीयमुनाहांतः उरसः पवाटी उगः फवाटी उर:कयाटयेच यमुना सथोक्ता उर:कयाटी. यमुनाया हद्स्तरांतः उर:प्रदेशयमुनानदीहन्मध्ये। घुयुदपंक्तिलीला घुयुदानां पंक्ति स्तधाता युद्यपंक्तयाः लोला तथोक्ता तां । धुवुदराजिविलास । पितेनिरे विस्तार. पंतिम तनु पिस्तार लिट् ॥ ३२ ॥ मा० 10-धोजिनेन्द्र भगवान के एठरूपी शव से अलग हुए तथा अंगों की चमक के अधीनस्प हार के मोतियो मानों पक्षपल हरी यमुना के भीतर जल की युयुद-लीला का दृश्य दिखला रहे हैं। अर्थात् भगवान के श्याम शरीर में हार के मोतियों दाने काली यमुमा के जल-युयुद से दीए पड़ने थे ॥३॥ महीधरे तत निपेधिवांसं तमालनीलाकृतिमुरहंतम् ॥ पयोदबुध्या श्रितमिंद्रचापमसिम्मरद्रनमयः कलापः ॥३३॥ महीधर इत्यादि। रखमय रतानां विकारो रसमयः । कलापः टिपू । “कलापो भूपणे पर्दे" इस्पमरः । तत्र तस्मिन तत्र। महोघरे पर्यने । निधियांस मिति इति मिधिपास स्थितघांस। तमालनीलारत तमाल घमोला तमाटनीला साधासाया- कृति मालनीलारतिस्तो तमालनीलपझ्यामाकार। उदित उद्दनीयुद्धाहन तपात जिनेश । पयोदधुद्धया पयोद इति पुद्धिः पयोद धुद्धिः तया मेयर था। धित माधित । इन्दघाव तस्य धामिया सुरधनुः । भलिस्मर भक्तिपर ध्ये स्मृतियां ताल्लुर । उत्प्रेक्षा ॥ ३३॥ मा० म०-रसमय रिभूषण में उस पर्पन पर विराजमान तमालपक्ष के समान पष्ठः सर्गः । . भा००-सपरिवार चन्द्रमा ने अपने कलङ्क की मुक्ति के लिये नख के बहाने से जिनेन्द्र भगवान के चरण की सेवा की। और उस कलंक ने भी सजनों (अथवा नक्षत्रों) के आश्रयभून उस चरण ( अथवा चन्द्रमा ) की "मैं इसे नहीं छोड़ता" इस विचार से नीलम से जड़ी हुई कि फिणी फे यहाने से सेवा को। अर्थात् जिनेन्द्र भगवान के चरण- नख चन्द्रमा के ऐसा समुज्वल था और नीलम से जड़ी हुई फिकिणी चन्द्रमा के कलंक के समान थी॥ ३५॥ मुहुविलिप्तोऽपि जिनेंद्रगाले शचीशरत्नोञ्चलभासि शच्या ॥ सिताप्रबिम्राजिपटीरपडः स्फुटोऽभवत्केवलसौरभण ॥३६॥ मुहुरित्यादि । शवोशरलोज्यलमासि शच्याः ईशश्शवीशस्तस्य रत्ने तयोपत्तं शचो. शरतमिव उज्यलाभाः यस्य तत् शनीशरतोज्वलभात्तस्मिन् दिनीलपदुज्यलकांतियुक्त । जिनेंद्रगाने जिनानामिंद्रस्तस्य गात्र जिनगा तस्मिन् जिनेश्वरशरीरे । शच्या दाण्या। मुहुः पुनः। विलिप्तोऽपि घिलिप्यतेस्म यिलिप्तोऽपि। सिताम्रविभाजिपटीरपद विभाजत इत्येवं शोलो यिभ्रामी सिताभ्रण प्रण विभ्रामी तधातः सितवासावश्च सिता. प्रश्शारदा ण स प विनाजी तथोक इति पा पटीरस्य पद्धः पटीरपदः सितायिभ्राजो चासी पटीरपदध तथोक्तः करण विराजमानः श्रीगंधकदमः सिताम्रो दिमपालुका" इत्यमरः । पलसीरभेण सुरभिरेव सौरभ फेवल सौरग ये पलसोरम तेन फेयलपरिमलेन । स्फुटः प्रत्यकः । अभयत् अभूत् । भू सत्तायां रख । मनु पणेनेत्यंगधारीत्यतिशयः। भनु. मित्यलंकारः॥३६॥ मा०1.--इन्द्रनील-मणि को कान्ति से युक्त घोजिनेन्द्र देव में इन्द्राणी से पार पार उपलित होने पर भी कपूरमय स्वच्छ तथा उग्यल श्रीपएट धन्दन केघल सुगन्ध से मालूम पड़ता था न कि मरने रंग सं॥३६॥ अथाखिलँदैः सहितोऽमरेंद्रः समर्चनाभिः स्तवनेम नाट्यैः ॥ समाप्तजन्माभिपवं समग्रं कुशाग्रमेनं पुनरानिनाय ॥ ३७ ॥ भयेत्यादि । पय मार्टफरणानंतरं । अपिलें मखिलाश्यते इंदाश्च पिलेंद्रात: समस्लम सहितः युक्तः । अमरेंदः अमराणामिस्तपोषः मोधर्मेन्द्रः। समर्चनाभिः पूमाभिः स्तवैध स्तोत्र शब्दसमुपयार्थः । भारः मतं: जम्माभिप जग्म- मोऽभिपयो अन्मामिस्त जम्मामिषेयं । समा साल। समाप्य समापन पूर्व पचारिक प्रिनिनिमित्यापन जिनेश । पुशाराहपुरं। पुनः मुः। मानिमाय प्रापर्याचार पोम् मापणे सिर । २०० .. - - मुनिसुजतकाथ्यम्। मा०no -इसके अनन्तर सभी अन्यान्य इन्द्रों के साथ सौधर्मेन्द्र पूजन, स्तुति तथा नृत्यादिक-द्वारा जन्माभिषेक सम्पन्न करके फिर जिनेन्द्र भगवान् को कुशान नामक राज. पुरी में लाये ॥ ३७॥ भुक्षिचक्षुद्युतिसिच्यमानो जिनो बभौ देवगजे निपण्णः ॥ तदापि पांडुपरिरत्नकुंभशतक्षरत्क्षीरनिपिच्यमानः ॥ ३८ ॥ मुक्षीत्यादि । देवगजे देवस्य गजेो देवश्चासौ गजश्चेति या देवगजस्तस्मिन् ऐगवतगजे। निषण्णः निषोदतिस्म निषण्ण: निविष्टः । ऋभुक्षिचक्षुद्युतिसिच्यमानः मुक्षिणश्च पि तथोक्तानि ऋभुक्षिचक्षुषां धुतिस्तथोक्ता सिच्यत इति सिच्यमानः ऋभुक्षिचक्षुद्युत्या लिच्यमानस्तथोक्तः । तथापि तस्मिन्कालेऽपि । पाण्डूपरिरत्नकुभ- शतक्षरत्क्षीरनिपिच्यमानः पाएडोरुपरि पाण्डुशिलाधार रखमयाः कुम्भास्तथोकाः रत्नकुम्भाना शतं तथोयतं क्षातीनि क्षरत् क्षरच्च नत् क्षीरं क्षरत्क्षीरं रत्नकुम्भ शतात क्षरत्क्षीर तथोक्तम् निषिच्यत इति निपिच्यमान: रत्नकुम्मशतक्षरक्षीरेण निपिच्य- मागस्तयोक्तः मणिमयकलशशतेन स्रवत्पयसा सिच्यमानः स इति अध्याहारः । यी रराज भा दीप्तौ लिट् ॥ ३८॥ भा००-ऐरावत हाथी पर पेठे हुए जिनेन्द्र भगवान इन्द्र की नेत्रधु ति से ओत प्रोत होते हुए उस समय भी मानों पाण्डु क-शिला पर मणिमय कुंभ की सैपड़ो क्षीर. धारा से अभिषिक्त होते हुए के समान सेभिते थे ॥ ३८॥ पुरं नृपागारमपि प्रविश्य पुरैव यक्षेन्द्रकृते सुरेन्द्रः ॥ निवेशयामास सहेमपीठे सभागृहे रत्नमये जिनेन्द्रं ॥३६॥ पुरमित्यादि। सुरेन्द्रः सुराणामिन्द्रः देवेन्द्रः । पुरं राजपुरम् । नृपागारमपि नून पातीति नृपस्तस्यागारम् नृपागरं नृपमन्दिरमपि अपिशब्दस्समुच्चयार्थः । प्रविश्य । पुरव प्रागेव । यक्षेन्द्रकृते यक्षाणामिन्द्रो यक्षेन्द्रस्तेन कृतं तस्मिन् कुबेरनिर्मिते । सहमपीठे हेना निर्मित पीठं तथोक्त ईमपीठेन सह वर्तत इति सहेमपोठ तस्मिन् सुवर्णसिंहासन. सहित । रत्नमये रतस्य विकारो रतमयं तस्मिन् रत्ननिर्मिते। सभागृहे समाया: गृह थास्थान सभागृह तस्मिन् मण्डपे । जिनेन्द्र जिनेश्वरं । निवेशयामास निवासयतिस्म । विश प्रवेशने णिमन्तालिट् ॥ ३६ ।। मा००-सुरेन्द्र ने राजपुरी तत्पश्चात् राजमन्दिर में प्रवेश करते ही के साथ पूर्व में ही कुर-निर्मित रतमप समागृह में सुवर्ण के सिंहासन पर श्रीजिनेन्द्र भगवान को पठाया ॥३६॥ ।

पष्ठः सर्गः। ततः सुतारयेंदुबिलोकमातप्रवृद्धहर्षामृतसिंधुमग्नौ ॥ विलोक्य मातापितरौ स्मितास्यो निवेदयामास समरतमिंद्रः॥४०॥ तत इत्यादि । इन्द्रः शक्रः । ततः तस्मिन तत: निवेशनानंनरे। सुतास्येंदु- थिलोकमानप्रवृद्धहामृतसिधुमनी सुतस्यास्यं सुतास्यं तदेवेंदु: रूपका घिलोक एय पिलोकमान सुनात्यैदेबि लोकमात्र प्रवर्धतेस्म प्रवृद्धः सुतास्येंदुचिलोकमाण प्रवृद्धः सुतास्येदुविलोकमात्रप्रवृद्धः अमृतमयस्सिंधुः अमृतसिंधु: हा एयामृत. सिंधुत्तधोक्तः सुतास्येषुधिलोकमात्रण प्रवृशः सुमास्यन्दुधिलोकमानच वासी हामृतसिंधुध तथोक्तः मजनस्म मनो सुतास्येंदुविलोषमात्रप्रवृद्धहामृतसिंधी मग्नौ तथोक्तो जिनबालबदनचद्रदर्शनमात्रेण समृद्धसंतोपक्षीरसमुद्र स्नातौ । माता पितगै माता च पिमा च मातापितरौ। “भाइ” इति सूत्रेण समासे पूर्वकारस्याडा- देश जननीजनकी। विलोक्य चोक्ष। सिमास्य: स्मितमास्यं यस्य सः तथोकः पद्धसमुपलहितस्सन । समस्तं मायाशिशुं निधाय स्वामिमंदरनयनादिसर्व निवेदपामाम भाज्ञापयामास विद ज्ञाने लिट् “दयायास्कासित्यादिना" आम् तद्योगे असमुवीति धाते. रनु प्रयोगः ॥४॥ 1 भा०म० - इसके बाद इन्द्र ने पुतु जिन-यालय के प्रफुल्ल मुविचन्द्र के दर्शन-मात्र से उमड़े हुए आनन्द-सुधा-समुद्र में गोता लगाते हुए माता पिता से मुस्कुराते हुए सारा वृत्तान्त निवेदन किया। अर्थात् मायामय शलक को रख कर जिनेन्द्र पालक को नुमेरु पर्वत पर पहुँचाने आदि का सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ४० ॥ माता स्वयं च परिरंभमिपेण देवं रोमांचनीपकलिकानिकरैः कृतार्ध्या ॥ प्रीत्याभ्यपिंचदमितप्रमदाश्रुनीरे: स्वच्छैरतुच्छकुचकुंभपयोहितीयैः ॥४१॥ मातेत्यादि। माता जिनजननी। स्वयं च । व शब्दसमुच्चयार्थः । रोमांचनी- पलिफानिकरः नीपस्य नीपवृक्षस्य फलि काम्तयोका: नीपलिकानां निकरा तथोक्ताः रोमांचा इच नीपलिकानिकगः रोमांचनीयकलिकानिफरास्तः रोमहर्पणकदय- कोरकसमूहः । कृतार्या क्रियतेन कृतं कृतमभ्यं यया सा तथाका पिहिताा । परिरंभ- मिपेण परिरभ इति पिपं तेन भालिंगनव्याजेन । स्वच्छः सुनिर्मलः । भतुच्छकुचकुंभपया. द्वितीयः न तुच्छी च तो कुचौ च अतुच्छकुत्रौ तावेष कुमो तथोक्तो भतुच्छ. कुचकुभयोः विद्यमान गयः तापत अतुच्छकुचकुंभपय एर द्वितीयं पा तानि अतुच्छकुचकुंभपयोद्वितीयानि तेः रूपक: पीवरस्तनक्षोर द्वितीयादकयुतः। अमिताम- दाधनोरः मध्रुणो गोराण्यधनीगणि न मितोऽमितः स बासी प्रमदय तोका अमित- . । मुनिसुनतफाव्यम् । प्रमदेन जातान्य नीराणि तेः बहुलसंतोषसंभूतनेत्रोदकैः प्रथमानंदाश्रुभिः पश्चात्कुच- कुंमपयोभि रित्यर्थः। देवं जिननाथ । प्रीत्या संतोपेण । अभ्यचित् अभ्यर्पिणात् । पिच सेचने लङ् । मातुरालिंगनहोत्कर्षात् रोमांचा याप्पकुचपया तया भवतीत्यर्थः ॥ ४ ॥ भा० अ०-आलिंगन के यहाने से रोमांचकप कदम्ब के कलिका समूह से पूजा किये हुई स्वयं माता ने उन्नत पयोधर की स्वच्छ दुग्ध-धारा तथा शानन्द की अश्रुधारा से श्री जिनेन्द्र भगवान को प्रीति पूर्वक अभिषिक्त किया ॥४१॥ मणिकांचनदिव्यवस्त्रदान: पटुभेरिपटहोत्थितारवैश्च ॥ युगपत्परिपूरिताखिलाशं विदधे स्व:पतिरस्य जातकर्म ॥१२॥ मणीत्यादि । स्वःपतिः स्वर्गस्य पतिः देवेंद्रः। मणिकांचनदिव्यवस्त्रदान: मणयश्च कांचनानि च दिवि भवानि दिव्यानि दिव्यानि च तानि वस्त्राणि च दिव्यवस्त्राणि तथोकानि मणिकांचनदिययस्त्राणा दानानि तयोक्तानि तेः रत्नहिरण्यदिव्ययसनत्यागैः। पटुमेरिपटहोत्थितारयैः भेर्यश्च पटहाश्च भेरिपटहाः पदयश्च ते भेरिफ्टहाश्च तथोक्ताः उत्थी- यंते स्म त्थिताः पटुभरिपटहरुस्थिताः तथोक्ताः पटुभेरिपटहोत्थिताश्च ते मारवाश्च पटुभेरि- पटहोत्थितारवास्तैः पटुदुन्दुभिपटहजनितध्वनिभिः । च शब्दस्समुच्चयार्थः। परिपूरिताखि- लाशं परिपूर्यन्तेस्म परिपूरिताः अखिलाच ता: आशाश्च अखिलाशा: अखिलाश्च अखिलाश्च अखिलाश्च तैरेकशेषः परिपूरिताः भखिलाशाः यस्मिन्कर्मणि तत् तथोक्त परिव्याप्त- समस्तदिश यथातथा संपूर्णीकृतसमस्तामिलापं च यथा तथा । "आशा तृष्णादिः प्रोक्ता" इति विश्वः। अस्य जिनयालकस्य । जातकर्म जातस्य कर्म तथोक्त। विदधे चकार । डुधाम् धारणे च लिट् ॥ ४२ ॥ भा० म०- देवेन्द्र ने सुवर्ण, मणि तथा उत्तम २ यस्त्रों के परिधापन से और दिव्य दुन्दुभि पटद के नाद से परिपूर्ण दिङ मण्डल में शास्त्रोक्त विधि से जात-धर्म संस्कार सम्पन्न किया ॥४॥ करिष्यते मुनिमखिलं च सुव्रतं भविप्यति स्वयमपि सुव्रतो मुनिः ॥ विवेचनादिति विभुरभ्यधाय्यसौ बिडोजसा किल मुनिसुव्रताक्षरैः ॥४३ करिष्यत इत्यादि । अली अयं । विभुः स्वामी। अखिलं च सफल । मुनि यतिजनाव समुच्चयार्थः। सुस्त सुशोभनं प्रतं यस्य तं सुष्टुप्रतयुक्त'। करिष्यते विधास्यते। स्वयमपि सुवतः समीवीनतयुक्तः । मुनिः मुनीशः । भविष्यति जनिष्यते भू सत्तायां लुट् । इति एवं विवेचनोत् निर्वचनात् । बिडीजसा देवेंद्रण 'विडोजाः पाकशासनः' इत्यमरः ।

पप्ठः सर्गः। । मुनिसुबताक्षरे: मुनिसुव्रत इत्यक्षराणि मुनिसुबताक्षराणि तैः मुनिसुननाक्षरः । अभ्यधादि। दुधाम् धारणे च कर्मणि लुङ् “कर्मभाये" इति प्र प्रत्ययः “मे” इति तस्य लुफ् आहूतः इत्यर्थः ॥४३॥ भा० अ०-स्वयम् उत्तम प्रतशाली होकर सभी मुनियों को प्रशस्त प्रत पाले बना येंगे ऐसा विचार कर अमरापिए इन्द्र ने 'मुनि सुग्रत' इन अक्षरों के आधार पर इन का मुनिसुत नाम रक्खा ॥४३n देव्यो मजनमंडनादिकरणे प्रौढाः प्रहृष्टाशयाः । देवांचापि विनोदकर्मणि समानाकृत्यवस्थागतान् । देवस्यास्य नियुज्य निर्जरपतिः प्रत्युद्ययौ स्वं जगत् । प्रीत्यानुव्रजतो विसृज्य वियुधान भालामबद्धांजलीन् ॥ १४ ॥ देव्य इत्यादि। निर्जरपतिः निर्जराणां पतिस्तथोक्तः देद्रः । अस्य एतस्य । देवस्य स्वामिनः । जनमंडनादिकरणे मजन च मंडन च मजनमंडने ते आदिर्यपां तानि मजन- मंखनादीनि तेपां करणं मजनमंडानादिपरणं तस्मिन् सानालंकारादिक्रियायां। प्रौढाः चतुराः । प्रहृष्टाशयाः प्रदर्षतिस्म प्रहः प्रहएः भाशयो यासा ता: संतुष्टाभिप्रायाः । देव्यः देवरमध्यः । विनोदकर्मणि घिनादस्य कर्म तस्मिन् विनोदकार्ये । समानारत्यवस्थागतान थाकृतिश्च भवस्या च आकृत्ययस्थे समाने च भारत्यवस्थे च समानाकृत्यवस्थे गच्छतिस्म गताः समानाकत्ययस्थे गतास्तथोकास्तान समानाकारययोगतान् । देवां- श्चापि सुरकुमारांश्चापि । च शब्दोऽत्र प्रौदान प्रहृष्टाशयानिति लिंगपरिणामेन समुचिनोति । नियुज्य नियम्य । प्रीत्या संतोषेण | मनुव्रजतः अनुवजेतीत्यनुयजतस्तान् पश्चादायातः । मालाप्रपदांजलीन् भालस्यान भालान' बध्यतेम्म धद्धः भालाने पद्धोऽजलिः येषां ते माल. प्रबद्धांजलयस्तान ललाटावरचितांजलीन् । विबुधान् चतुर्यिधान् देवान् । घिन्य प्रहित्य । स्वं स्वकीयं । जगत् लोकं । प्रत्युधयो प्रत्युजगामाया प्रापणे लिट् ॥४४॥ भा० म०-देवेन्द्र जिनेन्द्र भगवान के स्नानालङ्कार भादि शुमकृत्य सम्पादन में प्रवीण तथा उन्नत विचार याली देयांगनाओं और मनोरञ्जन कार्य में दक्ष तथा समान मारुति और अवस्था पाले हाय जोड़े गागे पीछे चलते हुए नतमस्तक देवताओं को यहाँ मियुक्त फर भाप अपने स्थान को चल दिये ॥४॥ इत्यहहासरते: काव्यरत्नस्य टोकायां सुबोधिन्यो मायजन्मा- भिषेकवर्णनो नाम षष्ठः सर्गोऽयं समाप्तः। m अथ सप्तमः सर्गः। . - 1 - ननिर्जरर्वजितसेवनाऽयं न कांतिसंभावितशुक्लपक्षः ॥ न च प्रदोपावसरं प्रपन्नः क विद्म बालेंदुरियाय वृद्धिम् ।।१।। नेत्यादि। अयं एपः। यालेंदुः पाल एव इन्दुः बालचंद्रः। निर्जरः जरायो निर्गना निर्जरास्तेः देवः। वर्जित सेवन चर्जितसेवन यस्य सः विरहितपूजनः निवृत्तभक्षणः । न न भवति । निर्जराश्चंद्रकलाः कृष्णपक्षे भक्षयति न तु शुक्लपक्ष इति प्रसिद्धः। कांतिसंभा. वितशुक्लपक्षः कात्या संभावितस्तथोक्तः शुक्लानां पक्षः शुक्लपक्षः कांतिसंभावितः शुक्लपक्षो यस्य सः पक्षे शुकथासौ पक्षश्च शुक्लपक्ष: कांतिलभाषितः शुक्लपक्षो यस्य सः किरण. संस्कृतस्फटिकादिधपलवस्तुसमूदः प्रभामोद्धावितपूर्वपक्षश्च । “पक्षे मासाद्ध के पाय महे साध्यविरोधयोः । केशाधः परता वृदै यले सखिसहाययोः । पतने चुलिरंधे च देहांगे राजकुंजरे। शुक्लो योगांतरे श्वेते शुक्ल चरजते मतम्" इत्युभयत्रापि विश्वः । न नभ. घति । प्रदेापाघसरं प्रकृष्टा दोषाः प्रदोपास्तथोक्ताः प्रदेोपाणामवसरस्तं पक्षे प्रदोषा- घसरस्याचसरस्तथोक्तस्तं प्रकृष्टपापचियवेला रजनीमुखकालं च । "सायं निश्यवर्य दोपाखिवासा दूषणाघया: इति भास्करः। प्रपन्नः प्रपद्यतेस्म प्रपन्नः प्रयातः । न च ने भ. पति । च समुच्चयार्थः । वृद्धि समृद्धि । इयाय जगाम । इण गती लिट् । पय कुत्र ! विश जानीमः । विद शाने लट् । "चिदो लटो वा इनि विकापेन णशाचादेशः । निर्जरैर्जितसेवना कांतिसंभाषितशुपक्षः प्रदोपावसरं प्रपन्नश्चैव स पुनः वृद्धि एति अयं तु तद्वि. लक्षणगुणः फर्य वृद्धिमायाति इतिभावः ॥ १॥ मा० Ro--यह मूतन जिन चालक चन्द्र देवताओं से विरहित सेवन नहीं है. अर्थात् इस जिन-चन्द्र कला को देवतायें भक्षण नहीं करते। क्योंकि चन्द्रकला को कृष्ण ही पक्ष में देवता लोग नहीं खाते है ऐसा लोक प्रसिद्ध सिद्धान्त है पेवल कान्ति से ही शुक्लपक्ष की सम्भावना नहीं की जाती अर्थात् जिन-चन्द्र-बालक की चांदनी सदा समुद्योतित रहती है। और यह चन्द्र प्रदोष अथवा पापानवको प्राप्त नहीं है तो मी यढ़ता ही जाता है यह आधर्य है। अर्थात् इस जिनचन्द्र तथा आकाश-चन्द्र के धर्म चरीत्य में मपान अन्तर है यह बड़े माश्चर्य की पात है ॥१॥ .

सर्ग:
करांगुलिं लिप्तसुधां स लिड्ड्या वबंध मातुः स्तनयोर्न धुद्धिं ॥
सुरेन्द्रवंद्यः सुरदेहतायां चिरानुभृतामृततृष्णयेव ॥ २ ॥
फरांगुलिमित्यादि । सुरेंद्रवंद्यः सुराणामिद्रास्सुरेद्राः चंदितुं योग्यो घंधः सुरेंद्रषय-
स्वयोकः देवेंद्रघंधः। स: जिननाथ । लिप्तसुधा लिप्यतेस्म लिप्ता लिसा सुधा यस्या-
स्सा तां उपलिप्तपीयूषां। करांगलि करस्यांगुलिः करांगुलिः तो हस्तांगुलिं । लिड्ड्या
लेहनपूर्व आस्वाघ। सुरदेहतायां सुराणां देहो यस्य सुग्देहस्तस्य भावः सुरदेहता तां
तस्यां धृतदिव्यशरीरत्ये । चिरानुभूतामृततृप्णयेव गनुभूयतेस्म अनुभूत चिरेण मनुभूत
चिरानुभूत तच्च तत् अमृतं च तथोक्त विरानुभूतामृतस्य तृष्णा तयेव पहुकालानुभूत-
सुधाछिये । मातुः जनन्याः । स्तनयोः। घुद्धि मति। न घबंध न चकार । घधि बंधने
लिट् ॥२॥
मा००-सुरेन्द्रों से चन्दनीय श्रीजिन-पालक ने मानों देव-शरीरपने की चिरकाल
से अनुभूत अमृत की तृष्णा से सुधालिप्त अपनी अंगुलियों को चाट कर माता के स्तन-
पान से रवि हटायो॥२॥
जिनार्मकस्येंद्रियतृप्तिहेतुः करे बभूवामृतमित्यचित्रं ।।
चित्रं पुनः स्वार्थसुखैकहेतुस्तच्चामृतं तस्य करे यदासीत् ॥३॥
जिना फस्येत्यादि। जिनार्मकस्य जिन पर गर्भकस्तस्य जिनवालकस्य । "दारको
नंदनोऽर्मकः" इति धनंजयः। पर इस्ते। अमृतं सुधा। इंद्रियतृप्तिदंतुः इद्रियस्य सृप्तिस्त-
थोका दिपतृप्त्याः हेतुस्तथोक्तः इद्रियसतर्पणकारणं यभूय भयतिस्म भूसत्तायां लिट् ।
इति एवं । धचन । अचित्र न चित्रमचित्र आश्चर्य न भवति । पुनः विमिति चेत्-तस्य जिम-
पालकस्य । करे हस्ते । यत् स्वार्थ सुक्षक हेतुः स्वस्म इदं स्वस्मै भयं पा स्वार्थ स्वार्थ च
तत् सुखच स्यार्थसुसं एवन्यासी हेतुश्च एक हेतुः स्यार्थसुवैषहेतुस्तथोक्तः स्वाधीन.
सुषस्य मुख्यकारणं । अमृत मोक्षः । “ममृतं पाशेपे स्यात्पीयूपे सलिले धुने । अयाचिने
च मोक्ष घ धन्वंतरिसुपर्वणोः" इति विश्रा इति । मासीदभयत् स्वाधीन पभूवेत्यर्थः
तच्यच समुच्चयार्थः । चित्र माधया
मा० १०-जिन पालक धोमुनिसुपत नाथ के हाथ में इन्द्रिय-तृप्ति लिये अमृत था
इसमें तो कोई माश्चर्य ही नहीं है। आश्चर्य पैघल इस रात के लिये कहा जा सकता है
कि अपने सुखका एक मात्र कारण-भूत गमत (मोक्ष) भी उनके हस्तगत या ॥३॥.
उल्लोकितैरत्पललोचनायाः ससंभ्रमोत्क्षेपणकौतुकेगु ॥
रराज राजांगभवोंऽतरिक्षे तडिल्हताश्लिष्ट इवांबुवाहः ॥१॥

मुनिसुव्रतकाव्यम् । उल्लोकितरित्यादि । राजांगमषः अंगे भवतीत्यंगभवः राज्ञोंऽगभवस्तथोक्तः राज: कुमारः। उत्पललेाचनायाः उत्पले इच लोचने यस्यास्तस्याः कुमुददलनिभनेत्रायाः पना- वत्याः । उल्लोकितेः उल्लोकंते स्म उल्लोकितानि तैः उर्ध्वदर्शनैः। ससंभ्रमाक्षेपणकौतुकेषु उत्क्षेपणान्येव कौतु कानि तथोक्तानि संभ्रमेण सह वर्तत इति ससंभ्रमाणि तानि च तान्यु- रक्षेपणकौतुकानि च तथोक्तानि तेषु संभ्रमसहितो_प्रापणको डासु। अंतरिक्ष आकाशे। तडिल्लतालिटः आश्लिष्यतेस्म आश्लिप: तडिल्लतया आश्लिष्टः तथोक्तः विधु लतालिंगितः। अंधुचाइ इव अंबु बहतीत्य'बुधाहो मेघः स इव । रराज यो। राजू दीप्ती लिट् उत्प्रेक्षा ॥ ४॥ मा० - o-पद्माक्षी पद्मावती जय राजकुमार को ऊपर की ओर दृष्टि किये हुई वार २ पलक गिरा कर देख रही थी तब वे आकाश में विद्यु टुता से आवेष्टित मेघ के समान सोमने लगे ॥४॥ नराधिपेनोरसि नीयमानो बभार हारांतरनायकत्वं ।। भेजे चलत्कुंडलतां भुजाग्रे चूडामणित्वं शिरसि प्रपन्नः ॥५॥ नराधिपेनेत्यादि । नराधिपेन नराणामधिपो नराधिपस्तेन सुमित्रमहाराजेन । उरसि घक्षसि । नीयमानः नीयत इति नीयमानः प्राप्यमाणः। हारातरनायकत्वं हारस्यांतर हारांतरं मापकस्य भायो नायकत्वं मारांतरे स्थित नायकत्वं पुनस्तत् हारमध्यगत. तरलमणित्वं । बमार धरतिसा भून् भरणे । भुजाय भुजयोरम भुजार तस्मिन् भुशिरसि । गोयमान. ) चलत्कुंडलतां चलत इनि चलंती चलन्ती च ते कुडले च चलकुडले तयोर्मावश्चलत्कुंडलता तां विलसत्कर्णवेष्टनत्व । भेजे निषेये। भज. सेवायां लिट् । शिरसि मस्तके। नोयमानः। चूडामणित्वं चूडामणे यश्चूडामणित्वं शिरोरतत्व ! "चूडामणिः शिरेरितम्” इत्यमरः । प्रपन्नः प्रपद्यतस्म प्रपन्नः नीतः ॥५॥ भा० म०-सुमित्र महाराज से छानी से लगाये जाने पर हार के मध्यमणित्व को, भुजाके गमभाग में लेने से चंचल कर्णभूषणत्व को तथा सिर पर लेने से चूड़ामणित्व को राजकुमार ने प्राप्त किया ॥५॥ कराकर बंधुजनरय गच्छन् रराज विभाजितहेमसूत्रः । सलेखबंद्यः कृतहेमलेखो घणिग्जनरयेव निकापपदः ॥ ६ ॥ करादित्यादि । घंधुजनस्य बंधुश्चासौ जनश्च घंधुजनस्तस्य । करात् हस्तात्। परं इस्तं । गच्छन् गच्छतीति गच्छन् यानं । स: जिनः । लेखबंध; लेपर्वधः देवेचंय!

सप्तमः सर्गः। . भा० . "आदितयादिविषदो लेखा अदितिनंदनाः" इत्यमरः । विमानितहमसूत्रः देना निर्मित सूत्र हेमसूत्र विम्राजते हम विनाजित विनाजित हमसूत्र यस्य सः तथोक्तः विराजितसुवर्णकटि सूत्रयुक्तः। घणिग्जनस्य घणिपचासौ जनश्च घणिजनस्तस्या कृतमलेवः क्रियते स्मकता देनो लेखाहेमलेपा फ्ता हेमलेवायम्यमः तथोक्तः एतस्वर्णलेखासहितः । "लेखा लेखये सुरे लेखा लिपिराजकयोमत" इति विश्वः । निकापपट्ट इघ निकापश्चासी पट्टश्च तथोक्तः निफपोपल इव । रराज पौ। राज दीप्ती लिट् । उत्प्रेक्षा ॥ ६ ॥ -सुवर्णकटिभूषण से सुशोभित तथा देवताओं से बन्दनीय रामकुमार मुनि. सुमन परिचार-गों के हाथों हाथ होते रहने से सोने की लकीर से समुद्रासित पणिक लोगों की कसौटी से जान पड़ते थे। अर्थात् कृष्णवर्ण मुमिसुमननाथ सुवर्ण के कार- भूपण से समलन होने पर सोने से कसी गयी घसीटी के समान दीखते थेn स जानुचारी मणिमेदिनीपु स्वपाणिभिः खप्रतिबिंबितानि । पुरः प्रधावत्सुरसूनुबुड्या प्रताडयन्नाटयति स्म बाल्यं ।। ७ ।। स इत्यादि। मणिमेदिनीपु मणिकीलिता मेदिन्यो मणिमेदिन्यस्तासु रत्नमय. भूमिपु । जानुचारी जानुभ्यां चरतीत्येवं शीलस्तथोक्त: जानुगमनशोल: याला स्थप्रति. विधिनानि स्वरुप प्रतिविषितानि तथाकानि स्वप्रतिमानानि स्थपाणिमिः स्वस्थ पाणयस्तः स्वकीयहस्तः। प्रतिपिंधवहुत्याहहुवचन । पुरः निजाग्रतः । प्रधापत्सुरस- बुद्ध या प्रयायतीति प्रधावत: सुराश्च ते सूनवश्व सुरसूनवः प्रधावतश्च ते हरसूनवश्च तथोक्ताः प्रधावरसुरसूनव इति युद्धिस्तथोका तया देयकालकरत्या। प्रनाडयन् प्रताप्ट यतीति प्रताडयन् । पाल्य यालत्यं । नाटयति स्म नर्तयति स्म। विज्ञानधरत्यादविद्यमान मविपाल्यावस्थापशाद्विद्यमानवल्लोके दर्शयतिस्मेत्यर्थः । म्रांतिमानलंकारः ॥ ७॥ --दोजानू होकर इधर उधर मणिमय भूभिपर डोलते हुए राजकुमार अपनी छाया को आगे दौड़ते हुए देवयालफ समझ कर अपने हाथों से ताड़ित करते हुए थाल्य. मावका अभिनय दिखाने लगे neu शनैस्समुत्थाय गृहांगणेषु सुरांगनादत्तकरः फुमारः ॥ पदानि कुर्वन्किल पंचपाणि पपात तहीक्षणदीनचक्षुः॥८॥ शनैरित्यादि। सुरांगनादत्तकरः सुराणामंगनाः सुरांगनास्ताभिः दत्तः करो यस्य सः तथोकः देवांगनाभिर्दचहस्तः । कुमार: जिनयालकः । शनै: मंदं यथा तथा। समुत्थाय समुत्थानपूर्व' पचारिकशित् । गृहागणेषु गृहस्यांगणामि गृहांगणानि ते सदना. । भा००- मुनिसुव्रतकाव्यम् । जिरेषु "गृहावग्रहणी देहल्यंगयां चत्वराजिरे" इत्यमरः । पंचपाणि पंच च पट व पंचपाणि "सुज्यार्थ" इत्यादिना समासः । “प्रमाणिसंख्याड्डुः" इति ड प्रत्ययः। "डित्यंत्याजादे." इत्यंन्याजादेलक। पदानि पदनिक्षेपणानि । तद्वीक्षणदीनचक्षुः तासां घीक्षणं तथोक्त' तद्वीक्षणे दीने चक्षुषो यस्य सः तथोक्तः देवांगनादर्शनेन सुदुःखितनेत्रः सन यद्वा तद्वोक्षणेन दीनं विगतहपं चक्षुर्यथा तथा । पपात पततिस्म पल्ल गती लिट् ॥ ८॥ मा० १० -कुमार धीरे से उठ सुरांगनाओं की अंगुली पकड़ और अंगने में पांच चार डेग चल कर ही उन्हें (सुगंगनाओं को ) देखने से थकित नेत्र (दुःखित नेत्र ) होते हुए गिर पड़े ॥८॥ 'स पांशुकेलौ सुरतर्नकानां करावकीर्णनवरत्नचूर्णैः ॥ कृतोपवीतो व्यरुचत्कुमारस्सदिव्यधन्वेव नवांबुवाहः ॥६॥ स इत्यादि । पांशुकेली पांशो. केलिः पांशुकेलिस्तस्मिन् धूलिक्रोडायां । सुरतर्न- कानां सुराध ते तर्नकाध सुरतर्न कास्तेषां देशवालकानां । फराचकीर्णः अवकीर्यन्ने स्म भवीणाः करैरवकीणीः करायकीर्णास्तैः हस्तैर्विकीर्णैः । नवरत्नचूर्णः नव च तानि रतानि च नघरत्नानि नवरत्नानांचूर्णाः मवरतवूर्णास्तैः। "चूर्णे क्षोदः” इत्यमरः। मोपयोतः फत उपवीतो यस्य सः तथोक्तः विदितवेष्टितः । सः कुमारः जिनकुमारः । सदिव्यधन्या विधि मघ दिव्यं दिव्य च तत् धन्य व दिव्यधन्य दिव्यधन्वना सह वर्तत इति सदिव्यधन्या तथोक्तः सुग्चापसहितः। “धनुश्चापी धन्यशरासनकोदंडकार्मुकम्” इत्यमरः । अधुवादः अयु घहतोत्यंधुवाद इव मेघ इव । व्यस्चत् । कवि गभिप्रोत्यां च लुङ् । “यो लुडः इति तिप्। उत्प्रेक्षा ॥६॥ मा० म०-यह राजकुमार धूलि फ्रोडा के समय देवबालकों के द्वारा फेंके गये नये रतों के चूर्ण से परि पेटित होकर इन्द्र चाप से प्रतिफलित नूतन मेघ के समान सोभते - थेnt अशेपविज्ञोऽनिमिपैः परीक्षाप्रपित्तयेवैप विधीयमानान् ॥ नियुहमुख्याखिलबालकलिं निरूपयामास नरेन्द्रसूनुः ॥१०॥ अशेषविश इत्यादि । अशेषविज्ञः अशेष विज्ञानानीत्यशेषविक्षः सह । भयं। मरनसूनुः नराणामिद्रो मरेंद्रस्तस्य सूनुः राजतनय.। अनिमियः न विद्यते निमियो येपो ते मनिमिपास्तैः धैिः । विधीयमानान् विधीयंत इति विघीयमानास्तान नियमा. गान् । नियुद्धमुण्पाखिलवालकेलीन यालामा पेलयः यालरेलय: मपिलाय ते यालफेलय सप्तमः सगः॥ यस्य तस्य सर्गः अखिलयाललयस्तान् थाहुयुद्धप्रमुपकेलयश्च अखिलपालकेलय: नियुद्ध मुख्यं येषां ते नियुद्धमुख्यास्ते च ते यखिलयालकेलयश्च नियुद्धमुख्याखिलपाल फेलयत्तान् समस्त- घालविलासान् । परीक्षाप्रधित्सये परीक्षा प्रधित्सतीति परीक्षाप्रधित्सा तथा विचार. परणेच्छयव निरूपयामास दर्श। रूप रूपमियायां लिट् ॥ १०॥ भा००-इस सर्वज्ञ राजकुमार ने देवताओं से की गयो सभी याल-पीडामों को परीक्षा करने के निमित्त देखा न कि सर्वज्ञ होकर मनस्तृप्ति के लिये ॥१०॥ गतोनपादायुतवत्सरस्य श्रितं ततो यौवनमस्य गातं ॥ मधुर्यथा नंदनपारिजातं शरद्यथासान्ध्यसुधामयूखम् ॥ ११ ॥ गतानेत्यादि। ततः तस्मिन् ततः तदनंतरं । गतोनपादायुतवत्सरस्य ऊनश्चाती पाश्च तथोक्तः गत ऊनपादो येषां ते अयुतप्रमिता वत्सरा अयुनवत्सरा गतोनपादाः अयुतवत्सरा गलिनन्यूनतुरीयभागदशमितसास्रप्रमितसंवत्सरस्य गलितविगलितपयशताधिसप्तमहनसंवत्सरस्येत्यर्थः । अस्य जिनकुमारस्य । यौवन यूनो भावो यौवनं । गात्रं देह । धितं प्राप्त । नंदनपारिजात नंदनस्य पारिजातस्तथोक्तस्तं नंदनफल्पवृक्ष । मधुः पसंतः । यथा शरत् शाहकालः । सांध्यमुधामयूर्व संध्याया भवस्सांध्यः सुधारूपी मयूखो यस्य सः सांध्यवासी सुधामयूखश्च तथोक्तस्तम् उद्यचद यथाश्रितः तथेति भावः ॥११॥ मा० अ०-जिस प्रकार वसन्त ऋतु नन्दन कल्पवृक्ष को और शरद् ऋतु सन्ध्याकाली- न चन्द्रमा को आलिंगन करती है उसी प्रकार जब मुनिसुव्रतनाथ साढ़े सात हजार वर्ष के हुए तय इनकी देह को युवावस्थाने आलिंगित किया ॥११॥ अधर्मता निर्मलता च नित्य पयरसुधापांक्तिकलोहितत्वं ।। समाकृति संहननं च पूर्व सुगंधिता निंदितणनाभिः ॥१२॥ अधर्मतेत्यादि । नित्यं अनवरत । अधर्मता धर्मस्य भावो घर्मता न धर्मता अधर्मता नि स्वेदत्य । निर्मलता मलान्निर्गत निर्मलं निर्मलस्य भावो निर्मलता निर्मलत्य । च समुच्चयार्थः। पयस्सुधापातिकलोहितत्व पपश्च सुधा च परस्सुधे पंको तिष्ठतीति निकटादिपु वसतीति" ठन्। पयस्सुघयोः पाकिस्तथोक पयस्तुधापांतिक व तत् लोहितत्वं च तथोक्त तस्य मावः पयस्सुधापातिक लोहितत्व क्षीरामृतराजस्थितगौराधिरत्य । विपि पदेषु बहुमोहिर्वा । समारुतिः समा वासावाकृतिश्च तथोक्ता समचतुरस्रसंस्थान । पूर्व प्राथमिकः। संहननं घन. पुपमनाराचसंहनन । निदितणनाभिः निघतेस्म निंदितः अत्यंत निदिती निदितक:

r मुनिसुमतकाव्यम्। "कुत्सिताल्पाहाते' इति कट । निंदितक पणतो नाभिर्यया तथोक्ता तिरस्कृतकस्तूरी। सुगंधितः शोमतो गंधोऽस्थेनि सुगंधिः "सूत्पूतिसुरभेग धादिइगुओं" इति अकार- स्येकारः। सुगंधर्भावस्सुगंधिता सौरभत्यम् ॥ १२ ॥ भा०16-निस्स्वेदता, स्वच्छता, क्षौर तथा अमृत के समान श्वेत रुधिरता, सम- चतुरस्नसंस्थान, यजयम रान सहनन तथा करती को विनिन्दित करने वाली सुगन्धिना आदि सल्लक्षण उनी अगों में थे। १२॥ परश्शतैरंबुजेक्युमत्स्यश्रीवत्समुख्यैवरलक्षणैश्च ॥ सद्व्यंजनैश्योनसहस्रकेण मसरिकाद्यैरुपलक्षितत्वम् ॥ १३ ॥ परश्शतैरित्यादि। अम्मुजयम्बुमत्स्यश्रीवत्समुख्यैः अंधुज च कंधुश्च मत्स्यश्च श्रीवत्सम्ध अंजकंचुमत्स्यास्ते मुख्या येषां तानि अंधुजघुमत्स्यश्रीवत्समुख्यानि तैः कमलशंखमत्स्य- धीवत्सप्रमुपः । परश्शतः शतात्परा संख्या येषां तानि परश्शतानि ते साएशतः "पर: शताधारने येषां पराला शताधिकात्" इत्यमरः । वरलक्षणैश्च घराणि च तानि लक्षणानि घ वरलक्षणानि तेः उत्सालक्षणः । मरिफाय: मसूरिका आधा येषां तानि मसूरिकाद्यानि, तैः मसूरिकादिभिः । जनसहस्ररेण ऊनं च तत् सहस्त्र च अनसहनके तेन कियदूनसह- स्रोण नवशतेरित्यर्थः । सव्यंजनैश्च संति च तानि व्यंजनानि च सयजनानि च तैः प्रशस्तव्यंजनश्च लक्षणः । उपलक्षितत्वं उपलक्ष्यते स्म उपलक्षितं तस्य भावः उपलक्षि- तय। १३॥ भा० ५०-एक सौ आठ कमल, शंख, मत्स्य और श्रीवत्स आदि प्रशस्त लक्षणों से तथा नौ सौ अच्छे २ व्यञ्जनों और मसूरिकादिसे वे ( जिन यालक ) उपलक्षित होते थे।१३॥ विलोचनासेचनकं सुरूपं बचांसि पीयूपरसारघट्टाः ॥ जगत्त्रयीमप्यतथा विधातुं पटीयसी काचन दिव्यशक्तिः ॥ १४॥ विलोचनेत्यादि । सुरूपं शोमन रुपं तथोक्त सौरूप्यमित्यर्थः। विलोचनासेच. नक चिलोचनयोरासेचनकं तथोक' नेत्रदर्शनेन तृप्त्यंतरहितं । “तदासेचनक तृप्तनास्त्यंतो यस्य दर्शनात्" इत्यमरः । पीयूपरसारघट्टाः पीयूषस्य रसास्तयोक्ताः, पीयूपरसानामरघट्टाः पीयूपरसारघट्टाः अमृतरसग्लयत्राणि। 'उद्धाटकं घटीयंत्र- पादावतारघट्टकः" इति हलायुधः । वांसि वचनानि सर्वप्रियहितवचनानीत्यर्थः ।-निय- तलिंगत्याद्विशेष्यविशेषणत्वेऽपि तादायस्थ्यं । जगत्त्रयी त्रयाणां पूरणी प्रयोजगतां त्रयो जगत्त्रयी तां ! अपि । अतथा विधातु तेन प्रकारेण तथा न तथा अतथा अतथा विधानायः सप्तमः सर्गः। यस्य तस्य अग्विलवाल फेलयस्तान पाहुयुधप्रमुप्रफेलयश्च अपिलपाल केलयः नियुद्ध' मुख्य येषां ते नियुद्धमुख्यास्ते च ते अपिलधालयलयध नियुद्धमुख्याखिलयालफेलयत्तान् समस्त. यालबिलासान् । परीक्षाधिल्सयेघ परीक्षा प्रधित्सतीति परीक्षाप्रधित्ता तया विचार- करणेच्छषेत्र निरूपयामास ददर्श रूप रूपमियायां लिट् ॥ १०॥ भा०म०-इस सर्व राजकुमार ने देवताओं से को गयो समी वाल-फोडामों को परीक्षा करने के निमित्त देखा न कि सर्वज्ञ होकर मनस्तृप्ति के लिये ॥१०॥ गतोनपादायुतवत्सरस्य श्रितं ततो यौवनमस्य गातं ॥ मधुर्यथा नंदनपारिजातं शरद्यथासान्ध्यसुधामयूखम् ॥ ११ ॥ गतानेत्यादि। लतः तस्मिन् ततः तदनंतरं । गतोनपादायुतवत्सरस्य जनश्चाती पादश्च तथोक्तः गत ऊनपादो येषां से अयुतपमिता वत्सरा अयुतवत्सग गतोनपादाः अयुतवत्सरा गलिनन्यूनतुरीयभागदशमितसहस्रमितसंवत्सरस्य गलितविलितपंचशताधिकसप्तमहसूसंयत्सास्येत्यर्थः । शस्य जिनकुमारस्य । यौवन युनो भायो योयनं । गार्थ देई । शितं प्राप्त । नंदनपारिजात नंदगस्य पारिजातस्तयोक्तस्तं नधनकल्पवृक्ष। मधुः घसंतः। यया शरत् शरदकालः । सांध्यसुधामयूषं संध्याय भवस्साध्या सुधारूपो मयूखो यस्य सः सांध्यश्वासो सुधामयूखध तथोकस्तम् अद्याचद यथाश्रितः तथेति भावः ॥११॥ मा० अ० --जिस प्रकार वसन्त ऋतु नन्दन कल्पवृक्ष को और शरद ऋतु सन्ध्याकाली- न चन्द्रमा को आलिंगन करती है उसी प्रकार जब मुनिसुव्रतनय साढ़े सात हजार वर्ष के हुए तब इनकी देह को युवावस्थाने मालिंगित किया ॥१९॥ अधर्मता निर्मलता च नित्य पयरसुधापांक्तिकलोहितत्वं ।। समाकृति संहनन च पूर्व सुगंधिता निंदितकैग्नाभिः ॥१२॥ भघर्मतेत्यादि । नित्यं अनवरत । अधर्मता धर्मस्य भावो घर्मता न घर्मता अधर्मता नि स्वेदत्वं । निर्मलना मलानिर्गत निर्मल निर्मलस्य मायो निर्मलता निर्मलत्य। च समुन्धयार्थः। पयस्सुधापांतिकलोहितत्वं पयश्च सुधा च पयस्सुधे पंको तिष्ठनीति निकटादिषु घसतीति" पयस्सुधयोः पाकिस्तथोक्त पयासुधापांतिक च तत् लोहितत्वं च तथोक्त तस्य भावः पयस्सुधापातिक लोहितत्वं क्षीरामृतराजस्थितगौररुधिरत्वं । विपि पदेषु यायोहिर्या । समातिः समा चासाबानिय तधोक्ता समचतुरस्रसंगानं । पूर्व प्राथमिकः । संहननं घच. धूपनाराचसंहनन । निदितणनाभिः निघतेस्म निदितः भत्यंत निंदितो निदितक: 1 - 17 .. - मुनिसुव्रतकाव्यम् । "कुत्सितालगाते" इति कट । निदिनक एणो नामिर्षया तथोक्ता तिरस्सतकस्तूरी । सुगंधित; शोमनी गंधोऽस्येति सुगंधिः "सूत्पूतिसुरभेग धादिदगुभो" इति अकार- स्येकारः। सुगंधमांयासुगंधिता सौरभत्यम् ॥ १२ ॥ भा०16-निस्स्वेदता, स्वच्छता, क्षार तया अमृत के समान श्वेत रुधिरता, सम. चतुरस्मसंस्थान, धवृषभाराव सदनन तथा कस्तूरी को विनिन्दित फरने थाली सुगन्धिता आदि सल्लक्षण उनके अंगों में थे । १२ । परश्शतैरंबुजेकयुमत्स्यश्रीवत्समुख्यैवरलक्षणैश्च ॥ सद्व्यंजनैश्चोनसहस्रकेण मसरिकाद्यैरुपलक्षितत्वम् ॥ १३ ॥ शतरित्यादि । अम्मुजफ्ग्युमत्स्यश्रीवत्समुख्यैः अंबुज प कंपुश्च मत्स्यश्च श्रीवत्सव अंबुजमघुमत्स्थास्ते मुख्या येषां तागि अधुनधुमत्स्यथै वत्ममुख्यानि तः कमलशंखमत्स्य- धीवत्सप्रमुपः । परश्यातेः शतात्परा संख्या येव तानि परश्शतानि ते. सामशतः परः शताधास्ने येषां परा संप शनाधिकात्” इत्यमरः । घरलक्षणेश्य चराणि च तानि लक्षणानि च घरलक्षणानि तेः उत्कृष्टलक्षणः । मषिकायमसरिफा बाधा येषां तानि मसूरिफायानि. तः मसूरिकादिभिः । ऊनसहस्रोण ऊन च तत् सहनकं च उनसहस्रक तेन कियदूनसह. रेण जयशतेरित्यर्थः । सव्यंजनैश्च संति च सानि व्यंजनानि च सयजनानि च : प्रशस्तव्यंजनेच लक्षणः । उपलक्षितत्वं उपलक्ष्यते स्म उपलक्षितं तस्य भाष: उपलक्षि. हत्य ॥१३॥ मा० म० -एक सौ बाट कमल, शंख, मत्स्य और श्रीवत्स आदि प्रशस्त लक्षणों से तथा नौसी अच्छे २ व्यञ्जनों गौर मसूरिकादिसे वे (जिन पालक) उपलक्षित होते थे।१३। विलोचनासेचनक सुरूपं वांसि पीयूपरसारघट्टाः ।। जगत्रयीमयतथा विधातुं स्टीयसी काचन दिव्यशक्तिः ॥ १४॥ पिलोचनेत्यादि । सुनय शोमन सर्प तपोक' सोमप्यमित्यर्थः । विलचिनासेच. मकर पिलोचनयोरासेवनकं तथोक मैत्रदर्शनेन तृप्त्यंतरहितं । तदासेचनक छुप्त नास्त्यंतो यस्य दर्शनात्" इस्यमाः। पीयूपरसारयाः पीयूपस्य रसास्तपोकाः, पीयूपरसानामरघट्टाः पीयपरसारथाः अमृतरसउलयंत्राणि । "उद्धारक घटीयंत्र- पाहायतारयः" इनिहलायुधः। पनासि पचनानि सर्वप्रियहितयचनानीत्यर्य: । निया सलिंगत्यादिशेयविशेषणत्वेऽपि तादायम् । जगत्त्रयी प्रयाणां पूरणी त्रयी जमतां यो जगत्त्रयी तो । मणिरामतया विघांतु तेन प्रकारेण तथा न तथा अतथा अतथा विधानाय: - सप्तमः सर्गः। . कृता १४१ अतथा विधातु कंपयितु । पटीयसी प्रहटा पटुः पटोयसी "गुणांगाद्वेष्ठेयसुः” इति इयसु प्रत्ययः नटुगित्" इत्यादिना ईप् । काचन काचित् । दिव्यशक्तिः दिवि भवा दिव्या सा चासौ शक्तिश्च तथोका अप्रमितवीर्यतेत्यर्थः ॥ १४ ॥ मा० अ०-जिनबालक का सुन्दर रूप आंखों को तृप्त करने वाला और पाणी अमृत- धार के जल-यन्त्र के समान थो। अर्थात् सारे संसार को विचलित (अत्याश्चर्यमग्न ) कर ने के लिये उन में कोई अपूर्व ही दिव्य शक्ति विद्यमान यो। १४ । युतः स्वभावातिशयैरमीभिः कृतोन्नतिविशंतिचापदंडैः ॥ विषाग्निशस्त्रादिविधातदूरस्त्रिदोपवैषम्यभवामयारिः ॥ १५ ॥ युत इत्यादि। अमीभिः एतेः । स्वभावातिशयः स्वभावात् जाता अतिशया: स्वभावातिशयास्तैः सहजातिशयः। युतः युक्तः । विंशतिचापदंड: चापान देसाधापदंडाः विंशतिश्च ते चापदंडाथ विंशतिचापदंडास्तः विंशतिधमुर्मिः । छतोन्नतिः उन्नतिः यस्यासौ यथोक्तः । विषाग्निशस्त्रादिविधानदूर विष चाग्निश्च शम्नं च विपानिशस्त्राणि तान्यादीनि येषां ते विषाग्निशस्त्रादयस्तेषां विघातस्तथोक्तः निपानिशस्त्रादियिघातात् दूरस्तथोक्तः गरलानलमारणादिधातरहित । त्रिदोषवेपम्यमवामयारिः प्रयश्च ते दोपाथ त्रिदोषाः विषमस्य भावो वैपाय त्रिदोपवैपम्यात् भवस्तथोक्तः त्रिदोषयेपम्यभवश्वासावामयध त्रिदेोपवैषम्यभवामयस्तस्यारि: तथोक्तः पातपित्तश्लेष्मवैपम्यात् तव्याधिनामगम्यत्वादिपुः निर्व्याधिरित्यर्पः ॥ १५ ॥ भा० ०-इन स्वाभाविक गतिशयों से युक्त, योस धनुष के प्रमाण उन्नत और विष, मग्नि तथा शस्त्रादिकों के घात से दूरय अर्थात् अकाल मृत्यु से रहित और पातपित्त- कफादि रोगों के शत्रु भूत श्रीजिन पालक थे। १५ । त्रिंशत्सहसीमितवत्सरायुः स्फुटातसीसूनसमानवर्णः ॥ तदायमुत्सृष्टधनुःशरस्य स्मरस्य शंकांजनयांबमूव ॥ १६ ॥ त्रिंशत्सहस्रीत्यादि । त्रिशत्सहस्रीमितवत्सरायुः त्रिशतः सहस्राणां समहार: शि. त्सहस्त्री तया मितं यत्सराणामायुः त्रिशत्साम्रोमितवत्सरायुः यस्य सः त्रिंशत्सह समितपत्सरायुष्का । स्फुरातसोसूनतमानवर्णः अतस्याः एन स्पर्ट च तत् पतसोसून यतस्य समानः स्फुटातसीसूनसमानो यौँ यस्य सः धिसितातसीकुसुमसदशपर्णः । भयं एषः। तदा यौवनसमये । उत्पष्टधनुः धनुथ शरश्च धनुश्शरी उत्एज्येते स्म उत्स्टी धनुश्शरी येनासाघुरएप्टयनुश्शरस्तस्य त्यक्तचापयाणस्य 1 स्मरर मन्मयस्य ।

मुनिसुव्रतकाव्यम् । शंका संदेह । जनयांवभूव उद्भावयतिस्म । जनङ प्रादुर्भाये। "प्रयुज्याप्याणि वा” इति णि ततो "दयायासकास्इत्यादिना भाम् तेनैव सूत्रण भूसत्तायामित्यस्यानुप्रयोगः णिअन्ताल्लिट् इति पंचभिः फुलकं ॥ १६ ॥ भा० अ०-तीस हजार वर्ष की आयुवाले और खिले मतसी-पुष्प के समान रंगवाले थोजिनवालक ने धनुर्वाण को अलग रखे हुए कामदेव की शङ्का उत्पन्न कर दी ॥१६॥ पित्रापि निवर्तितदारकर्मा ततः स यूनामधिपोऽपि वृद्धां ॥ अग्राह्यत स्वामधिराजलक्ष्मी पुरैव राजा जगतां त्रयाणां ॥१७॥ 'पित्रेत्यादि । ततः तस्मिन् ततः तदनंतरे । पुरेव प्रागेव । त्रयाणां जगतां त्रिलोकीनां । राजा स्वामी मुनिसुवतः। पित्रापि जनकेनापि । निर्वर्तितदारकर्मा दाराणां कर्म निर्व- य॑ते स्म निर्तित निर्वर्तितं दारकर्म यस्य सः तथोक्तः कृतविवाहकार्यः । "मार्या जायाऽय पुंभूग्नि दाराः स्यात्तु कुटुम्बिनी" इत्यमरः । यूनां तरुणानां अधिपस्तथोक्तोऽपि । वृद्धां वर्धते स्म वृद्धा तां जरामिति विरोधः समृद्धामिति परिहार: 1 स्वां स्वकीयां । अधिराजलक्ष्मी अधिको गजो अधिराज: “राजनसखेः' इत्यर् अधिराजस्य लक्ष्मीः अधीराजलक्ष्मीस्तां अग्राहत स्वीकार्यते स्म प्रही उपादाने इति धातोर्णिजन्ताकर्मणि लङ् । स्वामिनोगत्त्रय- राजत्वेपि स्वान्ययाधिराज्यग्रहण क्षत्रियकर्मपालनमितिमावः ॥ १७ ॥ मा० अ०-पहले ही से त्रिभुवन के राजा होते हुए श्रीमुनिसुव्रत-नाप ने पिता से विवहादि कृत्य कराये जानेपर तरुणों के शासक हो पर भी वृद्ध राज्यलक्ष्मी को ग्रहण किया अर्थात् पिताने विवाहादि कार्य सम्पन्न करके मुमि सुव्रतनाथ को युवराज्याभिषेक - क्रिया ॥१७॥ पुण्यैकलभ्योऽधिकसौख्यहेतुर्विचित्रवर्णो विशदांतरंगः ॥ नृपासनस्थोऽनमयस्त्रिलोकी स दीपवति निधिवत्पदाग्रे ॥१८॥ पुण्य फेत्यादि । पुण्यकलभ्यः पुण्यमेवेक पुण्यक लन्धु योग्यो लभ्यः पुण्यफेन लभ्यः सुकमेकेन प्रायः । अधिकसौख्यहेतुः सुखमेव सौख्यं अधिकं च तत् सौरव्यं च अधिक- सोप्यं अधिकसौरख्यस्य हेतुस्तयोकः प्रकृप्टावोद्रियसुषस्य हेतुः यहुलेंद्रियसुपस्य कारण च। विचित्रवर्ग: विचित्रो वर्णो यस्य सः तथोकः अद्भुतशेोभायुतः वियिध. मणिमयत्वान्नानावर्णसहितश्च । विशदांतरंग: विशदमंतरंगं यस्य सः निर्मलामिप्रायः निर्मलादिप्रांतर्भागा था। नृपासनस्थः नृपस्यासनं नृपासनं तत्र तिष्ठतोति नृपासमस्यः । सः। पदाने पदयोर पदा तस्मिन् घरणयोरुपरि पदस्या पदान तस्मिन् स्थानाने।

सप्तमः सर्गः। निधिवत् निधिरिध निधानमिव । दीपवर्ति दीपस्य धर्तिः दीपतिस्ता प्रदीपयतिका । चर्शिद्रोपदशादीपगात्रानुलेपनीच। घर्ति निर्माणनयनांजनलेखयोः" इति विश्वः । त्रिलोकी प्रयाणां लोकानां समाहारखिलोको तो "द्विगोः” इति डी त्रिभुवन । अनमयत् प्राहयत् णम् प्रहत्ये शन्दे णिजन्तालड ॥ १८ ॥ -पुण्य ही से प्राप्त करने योग्य, अतीन्द्रिय-मुखद अथवा अधिक सुखके कारण भूत, आश्चर्यजनक शोभा-सम्पन्न अथवा विविधर्माणमय होने से नानावणं से युक्त तथा स्वच्छान्तरंगनाले मुनिसुव्रतनाथ ने निधितुल्प दीपयर्तिका के समान त्रिभुवन को अपने परों पर अथवा निधिस्थानपर अवमत किया अर्थात् समस्त संसार उनके सामने प्रणत रहते मा०अ०- थे॥१८॥ । पारथानलक्ष्म्याः सगुणोरुकांतिपावलीमौक्तिकहारमध्ये ॥ स्थितो दधौ नायकरत्नशोभामसौ महानीलरुचिर्नृपेंद्रः ॥ १६ भास्थानलक्ष्म्या इत्यादि। आसानलक्षम्या: आस्थानस्य लक्षुमोस्तथोक्ता तस्याः समाप्रियः । भूपावलीमौक्तिकहारमध्ये नन पातीति नृपास्तपामावली नृपायली मौकि- कानां हारो नृपावल्येव मौक्तिकहारस्तस्य मयं तस्मिन् भूपतिसमूहमुक्काफलहारमध्ये। स्थित: तिष्ठति स्म स्थितः । गुणोरुकानिः उवींचासौ कांतिश्च तथोक्का गुणाश्चोरुकांत. यश्च गुणोरुकातयः गुणोरुकांतिभिः सह घर्तत इति सगुणोरुकांति संध्यादिगुणमहरका. निद्ररायुक्तः तंतुयु तियुनः । “मौर्यप्रधानपारदिदिपसूत्रसत्यादिसंध्यादिविद्यादिहरितादिषु गुणः" इति नानार्थकोशे । महानीलचिः मदश्च तत् नोल च महानीलं तस्य रुचिर्यस्य सः इन्द्रनीलरतकांनियुक्त' । अमी अयं । नृपेन्द्रः नृपाणामिंद्र योक्तः । नायकरत्नशामा नायक' च सत् रल च नायफरत्नं तस्य शोमां तलरतरोमा । धौ घरति स्म डुधा धारणे च लिट् ॥ १६॥ मा० अ० --गुणयुक्त अथवा तन्तुयुक्त, अत्यधिक प्रभाशाली और बहुनील कान्तिवाले इस राजा मुनिसुव्रतनाथ ने समालक्ष्मी के नृपसमूह कपी हार के बीच में रनों के स्वामित्व की शोभा धारण की ॥१६॥ स चंद्रपापाणसमापयोधौ सचामरोल्लोलतरंगमाले ॥ शेपोपमस्फाटिकविप्टरस्थः श्रिया सनाथो हरिवञ्चकाशे ॥२॥ सत्यादि। सचामरोल्लोलतरंगमाले उल्लोलाश्च ते तरंगाश्व उलोलतरंगा: चामरा- 'ज्येषोलोलतरंगा: चामरोल्लोलतरंगाः तेषां माला चामरोल्लोलतरंगमाला तया सहवर्तत मुनिसुव्रतकाव्यम् । इति सचामरोलोलतरंगमालस्तस्मिन् प्रकीर्णोपमार्मिपंक्तिसहिते । चन्द्रपापाणसमा. पयोधौ. चन्द्र गवाणेन निर्मिता समा तथोक्ता चन्द्रपाषाणसभेव पयोधिस्तस्मिन् चंद्र- कांतशिलारचितसभासमुहै। शेषोपमस्फाटिकविष्टरस्थः स्फटिफेन निर्मित स्फाटिक तश्च तत् थिटरं च स्फाटिकविष्टरं शेषस्योपमं शेषोपमं तय तत् स्फाटिकविरं च तस्मिन् तिष्ठतीति शेपोपमस्फाटिकविष्टरस्थः महाशेषोपमानस्फटिकनिर्मितसिंहासनस्यः । श्रिया संपत्त्या । सनाथ: सहितः । सः जिनः । श्रिया रमया । सनायः युक्तः । श्लेपः । हरिधत् हरिरिय हरिवत् नारायण इथे । चकाशे वभो । काशि दीप्ती लिट् उत्प्रेक्षा ॥२० मा० म०-चमररूपी चंचल तरंग की माला चाले चन्द्रकान्त-मणिनिर्मित समासमुद्र में शेष तुल्य स्फटिक रचित मासन पर पेठे हुए मुनिसुव्रतनाथ लक्ष्मी-युक्त विष्णु के समान देवीप्यमान होने लगे ॥२०॥ चकपिरे हेममयाः किरीटा मुहुः सभासौधसदा नृपाणां ॥ जिनोक्तिपीयूपजुषां यथामी मरुद्वशाज्जाह्मवपद्मकोशाः ॥२१॥ धपिर इत्यादि। सभासौधसदा सभायास्सोधस्तयोक्तः समासौधे सीदतीति सभासीघसदस्तेगं सभासदने विद्यमानानां । जिनोक्तिपीयूरज जिनस्याक्तिः जिनोक्तिस्सैच पीयूपं तथोक्तं जिनोक्तिपीयूपं जुपंतीति जिनोक्तिपीयूपपस्तेषां जिन. पचनामृतं प्रीत्या सेयमानानां । नृपाणां राज्ञां । हेममया: हेनो विकारस्तथोक्ताः सुनर्ग. मया: । किरीटा: मुकुटानि । मुगुः मुहुः पुनः पुनः । मरुदशात् मस्तो यशो मरुद्वशत्तस्मात् घाताधीनात् । मी इमे। “दमस्तु संनिकृष्टेऽर्थेऽदसो विप्रन्टोऽर्थः समीपतर पर्तिश्चेतही रूपं तदिति परीक्षे विजानीयात्" इति वचनात् । जाहनवपनकोशाः माहव्या रदं जावं तय तत् पन च तथोक्त' जाहवपनस्य पोशास्तथोक्ताः गांगेय- कमलकुड्मला: "काशोऽस्त्री कुड्मले खड्पियाने ऽघोघदिव्ययाः" इत्यमरः । यथा चपिर। चेलुः कपुङ चलने लिट् उत्प्रेक्षा ॥ २१ ॥ मा० म.-समागृह में पैठे हुए तथा जिनयचनामृत पान करते हुप राजामों के सुषर्ण मुकुट हया के झोंके लगी हुई जाहयो कमल-फलिका के समान धार पार कम्पित होने लगे ॥२१॥ जिनांबुदः पीठनगाधिरुटो दिवौकसामेप घिनोतु बुद। प्रवर्पणैर्वागमृतस्य चित्रं प्रमोदयामास च राजहंसान ॥२२॥ जिमायुदल्यादि। पीटनगाधिका पोठमेव नगः पर्षता वृक्षो घा तयोः पौठनगमधिरो.

सप्तमः सर्गः। पतिस्म तथोक्तः सिंहासनादिस्य मद्रासनद्रुमस्थिता वा । "शैलवृक्षौ नगावो 'इत्युभयत्रा. प्यमरः । एषः अयं । जिनांवुदः अंबु ददातीत्यंधुदः जिन एवांवुदः अईहिनीरदः । धाग. मृतस्य वागेवामृतं वागामृतं तस्य वचापीयूपस्य । प्रवर्पणः प्रकृष्टानि घर्षणानि प्रवर्ष- जानि तैः प्रसेचनः । दिवौकसा दिचि ओको येषां ते दिवौकसस्तेषां समानां वा तकानां च "दिवीकाश्चातके सुरे” इति विश्वः । वृदं निवयं धिनातु प्रीणातुधियुप्रीणने लोट् । किंतु राजहंसान राजाना इंसास्तान हंसपक्षिणः नरेंद्रवरांश्च । "नृपश्रेष्ठकाट्यकल. हंसेघु राजहंसः" इति नानार्थकोशे। च समुच्चयार्थः । प्रमोदयामास संतापयामास । मुदिह - जिताहिए । चित्र आधर्य मात्र मेघस्य हंसतापकत्वमद्भुतं । रूपकः ॥ २२ ॥ मा० ४०-सिंहासनाधिहढ़ अथया पर्वताधिरूढ़ होकर श्रीजिनेन्द्र रूपी मेघ ने देव- ताओं अथवा चातकों के समूह को प्रसन्न किया किन्तु आश्चर्य तो यह है कि पाकसुधा. वृष्टि के द्वारा राजाओं अथवा राजहंसो को भी तृप्त कर दिया ॥२२॥ स्वस्थैरदुःस्थोऽतनुसौख्यकृष्टैर्जुष्टामृतैरष्टगुणाभिरामैः ॥ वृतोऽजरैः सिद्ध इवैप रेजे विलोकयन् लोकगतिं समरताम् ॥ २३ ॥ • स्वस्थैरित्यादि। स्पस्थैः स्वस्तिष्ठ तीति स्वस्थाः देवास्त. "स्परित्यव्ययस्थस्य ? फस्य लुक" इति लुक पक्षे स्वस्मिंस्तिष्ठतीति स्वस्थास्तैः स्वात्मस्थितः। अतनुसौख्य- कृष्ट न विद्यते ततुर्यस्यासाचतनुः सुतमेव सौख्यं आता: सौख्यमतसोप्यं तस्य फाम.. सुखस्य नातनि भतनूमि अतननि च तानि सौख्यानि च तनु काये एशे चाल्पे विरलेऽपिच पाच्यवत्" इति विश्वः । कृप्यंत रुम फष्टाः अधीनाः भातसुखानां च कृष्टा अधीनास्तः । जुष्टामृतेः जुष्यते स्म जुष्टं जुष्टममृतं गैस्तः अनुभूतपोयूपे. प्राप्तनिर्याणेश्य । भष्टगुणा- भिगमे अष्ट च गुणाश्च तथोक्ताः अप्टगुणरभिरामास्तथोक्तास्तेः अणिमाघष्टगुणे: सम्यक् पायष्टगुणाभिरामैः । शजर न विद्यते जरा येषां ते अजरास्तैः देयः पक्षे जरारहितः उपलक्षणात् जातिजरामरणरहितः मुकात्मभिरित्यर्थः। घृतः मियते स्म पृतः परिवेष्टितः। मस्या दुःखे तिष्ठतीति दुस्थः म दुस्थः अदुस्थ: समृद्धः सुस्थितय । समस्तां सफलो। लोकगति लोपस्य गतिर्लोकगहिस्तां प्रजाजीवनापार्य भुवनस्थिति घ "निर्मार्गदशायां ध शाने यात्राभ्युपाययोः । माडीग्रणसायी च" इति विश्यः । विलोकयन् पिलोकयतीति यिलोफयन् विचारयन् । एष: अयं जिनराजः । सिद्ध इय सिध्यति स्म सिद्धः सिद्धपरमे. ठिनत् । रेजे पकाशे। राज दीप्ती लिट् ले पोपमालंकारः॥ २३ ॥ मा० .-स्यस्य मयया निजात्मस्थिन, मनन्तसुखानुभयो अपपा फाम-सुखलित, अमृतसेयी भयधा निर्याणानन्दमन, मणिमाद्यष्ट गुणों से युक्त मधधा सम्यक् धादि से मुनिसुव्रतकाव्यम् । मिश्रित, देवताओं से अथवा जराराहित्य से परिवेष्टित और समृद्ध अथवा सुस्थित श्री. मुनिसुयतनाथ प्रजाभों के जीवनोपाय का विचार करते हुए सिद्ध परमेष्ठी के समान लोभने लगे ॥२३॥ नरोरगस्वर्गिमनोरमाभिरुपास्यमानः स बभौ सभायाम् जयार्थमुन्मुद्रितशस्त्रकोशो जगत्त्रयाणामिव पुष्पकेतुः ॥२४॥ मरोरगेत्यादि । सभायां सदसि। नरोरगस्वर्गिमनारमाभिः नराश्च उरगाश्च स्वर्गोऽ. स्त्येषामिति स्वर्गिणस्ते च नरोरगस्वर्गिणः मनोरमयंतीति मनोरमाः नरोस्स्वर्गियां मनारमा. नरोरगस्वर्गिमनारमास्ताभिः मनुष्यभवनवामिककहावासिकनारीभिः । उपास्यमानः उपास्यत इत्युपास्यमानः सेव्यमानः। जगत्त्रयाणा प्रयोऽवयवाः सत्ये. पामिति प्रयाणि जगतां त्रयाणि जगत्त्रयाणि तेषां लोकत्रयाणां । "अग्यात्तय"इति तयट्। "द्वित्रिभ्यां लुग्या"इति तस्य लुफ् । जगत्त्रयाणामित्यने कान्यपि जगत्त्रयाणि जयेदिति पुष्पफेतोस्संभावनायहुत्वं । जयार्थ' जयायेदं जयार्थ' जयनिमित्त । उन्मुद्रितशस्त्रकोशः शस्त्राणां कोशः शस्त्रकोशः उन्मुदिनः शस्त्रकोशो यस्य सः तथोक्तः मुद्राविरहितायुध- मांडागारः। पुरकेतुः पुष्पाण्येय पेतुर्यस्य सः तथोक्तः मन्मथ इव बभौ रेजे। भा दीप्ती लिट् उत्प्रेक्षा ॥२४॥ भा० १०--मनुष्य स्त्री, भवन, और कल्पवासिनी अगनाओंसे सभा सेवित होते हुए मुनिसुव्रतनाथ त्रिभुवन को जीतने के लिये शस्त्रास्त्रसे सजिन कामदेव के समान साभते थे। उपायनीकृत्य गजाश्वरत्नान्युपागतानामधिपं नृपाणाम् न केवलं मार्गरुधो नगेंद्रा निपेतुरेषां दुरिताद्रयश्च ॥ २५॥ उपायनीकृत्यादि। गजाश्वरतानि गजाश्च अश्याश्च रत्नानि च तपोक्तानि समस्तानि पुंजरवाजिमणीन् । उपायनीकृत्य प्रागनुपायनमिदानीमुपायन करणं पूर्व पश्यात्किंचिदिति तथोक्त उपहारं कृत्वा । अधिपं स्वामिनं । उपागतानां उपायातानां । नृपाणां राशा । फेवलं परं । मार्गग्धः मार्ग रुधंतीति मार्गरुधः घर्मप्रतिबंधकाः । नगेंद्राः नगानामिन्द्रास्तोताः गिरिवरा । न निपेतुः न पतति स्म अपितु एपां नृणां मार्गहधः मोक्षमार्गनिरोधका: दुरितादयश्च दुरितान्येवाट्रयः निपेतुः पत्ल गती लिट् सहोक्तिः ॥२५॥ मा० १०-(मुनिसुपतनाथ को) हायी, घोहे तथा रत्नों का उपहार देकर लौटते हुए राजामों के मार्ग में रुकावट डालने वाले केवल पर्वत ही नहीं गिरे प्रत्युत मोक्षमार्ग के १४७ समप्तः सर्गः। याधक पापरूपी पर्यंत मी विनष्ट हो गये ॥२५॥ भक्तुं जिनेंद्रं बजतां नृपाणां चमूपातपरागपाल्या ॥ विहाय चेतांसि पलायमानकपोतलेश्याकृतिरन्वकारि ॥ २६ ॥ भक्त मित्यादि। जिनेंद्रम् जिनानामिंद्रो जिनेंद्रस्त । भक्त भजनाय भक्त सेयितु । यजतां प्रजंतीति तस्तेपो गच्छतां । नृपाणां नृन पांतीति नृपास्तेषां राज्ञां । चमुपदी. तपरागपाख्या चमूनां पदानि चमूपदानि चप्पदैद्धतास्तथोक्काः चमूपदेोद्ध ताश्च ते परागाश्च तथेतिाः चमूगोलु तपरागाणां पालिस्तया सेनावरणनिर्गतधूलिश्रेया । "परागः पुष्परजसि धूलिस्मानीययोरपि । गिरिप्रभेदे विख्याताघुपरागे च चंदने । पालि कर्ण- लनाऽश्री पताकप्रदेशयोः । पालि: प्रस्थे च यूकायां जातश्मधु स्त्रियामपि" इत्युभय. प्रापि विश्वः । चेतांसि हृदयानि । विहार विहान पूर्व पश्चादिनि । पलायमानकपासले. श्याति. पलायत इति पलायमाना पपीताचासो लेश्या च कपोतलेश्या पलायमाना वासी कपातलेश्या च तथोक्ता पलायमानकपोतलेश्यायाः आकृतिस्तथोक्ता धायरकपातलेश्या- परिणामाकारः । अन्यकारि अन्यकियत दुर करणे पर्मणि लुड् ॥२६॥ मा० 30-धीजिनेन्द्र भगवान का सेवन करने के लिये जाते हुए गजागों की सेना के पदाघात से उड़ी हुई धूलिरातियोंने चित्त को छोड़ कर भागती हुई कपोत-लेश्या का अनुकरण किया ॥२६॥ चित्र 'कृपालोर्जिनपस्य राज्यं यत्प्राप्तबंधानपि पापदस्यून् ॥ बाधां दुरंतां दधतो नितांत विमोचयामास जगज्जनानां ॥ २७ ॥ चित्रमित्यादि। यत् यस्मात्कारणात् । प्राय धानपि प्राप्यते स्म प्राप्ताले च ते चंधा प्रतिबंधाः पक्षे माता यंधाः येषां ते तान प्राप्तमतिस्पित्यादिधान् खलादि. बंधनयुक्तान् । जगजनानां जगनि विद्यमाना जनास्तेषां लोकजन्तूनां । दुरता अधिरहितां । पाधी पोहा। इधतः धनीति दधतस्तान् विनरतः । पापदस्यन् पापायेष दस्यव. स्तयोक्तास्मान् । “दस्युशात्रयशनः" इत्यमरः । निनांत अत्यत । विमोचगमास निगार पामास मुल मोचने जिंतालिए । “दयावास्येत्यादिना" माम् असमुधिति पातायोगः । सास्यास्तोनि मालुस्तस्य "राहदया:" मत्यय आलु प्रत्ययः दयायुक्तम्या जितपस्य जिमान पातीति जिनपस्नास्य जिननास्य ! राज्यं रामो मायः कृत्य धा राज्य प्रभुत्व । चित्रं माश्चर्यम् ॥ भा.म.-मसिरिक जीपों को निस्सीम पीड़ा पहुंचाने की वजह से प्रतिनित्यादि .. मनिमुमतकाष्यम् । १४८ पन्धनचतुष्टय अथवा शृङ्खलादि बन्धन को प्राप्त हुए पापहपी चोरों को एकदम मुक्त कर दिया गया यही दयालु जिनेन्द्र भगवान के राज्य की विवित्रता है ॥२७॥ जिनेऽवनी रक्षति सागरांतां नयप्रतापवयदीर्घनेते ॥ कस्यापि नासीदपमृत्युरीतिः पीडा च नाल्पाऽपि बभूव लोके ॥२८॥ जिन इत्यादि । नयमतापद्वयदीर्घने नयश्च प्रतापश्च नयप्रतापी तयोर्द्धय तथोक्त दीर्घ च नेत्रे च दीर्घ ने नयप्रतापद्वयमेव दोघनेने या म. नयप्रतापद्वयदोध नेत्रस्त- स्मिन् नीतिपराकमद्वयविशालनयनयुक्त । सरकः । जिने जिनेशे । सागरांतां सागर ए. धांतो यस्यास्सा तां ममुद्रावसानां । अवनी भूमि । रक्षति रक्षतीति रक्षन् तस्मिन् सति। लोके जगति । षस्यापि एकस्यापि । अपमृत्युः अकालमरण । ईतिः प्रयासः अतिवृष्ट्यादि । "ईतिः प्रवासे डिये स्यादतिवृष्ट्यादिषट्च" इत्युभयत्रापि विश्व । नासीत् नाभवत् । अलापि पीडा च । न बभूव न भवति स्म। भू सत्तयां लिए ॥२८॥ भा० १०-मोति तथा प्रतापरूपी विशाल नेत्रदयसे युक्त श्रीजिनेन्द्र भगवान के समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्षो के शासन करते रहनेपर संसार में किसी को भी अकालमृत्यु तथा अतिवृष्ट्यादि की थोडी भी पीडा नहीं हुई ॥२८॥ अधर्मता खड़गिनि तस्य राज्ये पयोधरे सत्पथरोध थासीत् ॥ वधूकटाक्षे श्रवणातिपाते। गजे कदाचियदि दानलेोपः ॥२६॥ अधर्मतेत्यादि । तस्य मुनिसुव्रतस्वामिनः । राज्ये राज्ञः कृत्ये। खगिनि । अधर्मता न विद्यते धर्मः पुण्यं यस्यासावधर्म पक्षे न विद्यते धर्मो धनुर्यस्यासावधर्मस्तस्य भावोऽधर्मता पुण्यराहित्यं चापरहितत्वं । "धर्मः पुण्ये यमे न्याये स्वभावचारयोः क्रतो । उपमायामहिंसा- यां चापे चोपनियते"इति विश्वः मासीत् अभवत् । सत्पथरोध संश्वासी पंथाश्च सत्पथ सन्मार्गः पक्षे सतां नक्षत्राणां पंथाः सत्पयः व्योम । “सत्प्रकाशे विद्यमाने त्रिषु लोवे सत्यतारयोः"इति शाश्वतः "ऋक्पू: पथपपोऽत्" इत्यत् प्रत्ययः । तस्य रोधो गिरोधः सन्मार्ग- निरोधः माकाशनिरोधः । पयोधरे पयांसि धरतीति पयोधरस्तस्मिन् मेघे । मासीत्। श्रव- णातिपातः श्रवणस्य परमागमश्रुतेः श्रवणानां दिगंबराणां वा पक्ष श्रवणयोः कर्ण- यो: मतिपातः अतिपतनमतिपातः उल्लंघनं । "श्रवणं स्यावृक्षभेदे श्रवणं श्रुतिकर्णयोः । श्रवणो मासपापण्डे दध्याल्यां भ्रवणीमता" इति विश्वः । वधूकटाक्षे वधूनां कटाक्षी वधूकटाक्षस्तस्मिन् । यदि चेत् । दानलोपः दानस्य लोपस्तथोक्तः त्यागरहितत्वं पक्ष मदजलाभावः। "त्यागगजमदशुद्धिपालनछेदनेषु दानम्" इति नानार्थकोशे । कदाचित कस्मिंश्चित्काले। गजे कुंजरे। आसीत् अभवत् । परिसंप्यालंकार: ॥ २६॥ -- सप्तमः सर्गः। - मा० १०-श्री मुनिसुव्रतनाथ के राज्य में खड्गधारियों में अधर्मता (धनहीनता या पुण्यरहितता ) थी कि यहां के लोगों में, मेघ मण्डल में ही सत्पथ-सन्मार्ग ( आकाश मार्ग) को रुकावट थी न कि यहाँ के जनों के, स्त्रियों के पटाक्ष पर ही श्रवण (कान) का उलङ्घन करना अर्थात् कान तक पहुंच जाना निर्भर था न कि वहाँ के लोगों में शास्त्रों का अथवा दिगम्बर मुनियों का अनादर करना, और हाथियों में ही कदाचित् दान (मद. 'धारा) का लोप हो सकता था न कि यहां के लोगों में।२६॥ रतिक्रियायां विपरीतवृत्ती रताबसाने क्लि पारवश्यं ॥ बभूव मल्लेषु गदाभिघातो भयाकुलत्वं रविचंद्रयोश्च ॥३०॥ रतीत्यादि । विपरीतवृत्ति, विपर्गना वृत्तिविपरीतवृत्तिः विरुद्धाचरण पक्ष पुरुष. घर्तन । रतिक्रियायो रत्याः किया रतिकिगतस्या। बभूव भवति स्म । पारवश्यं परस्य वशः परवशः तस्य भावः पारवश्य शरीरादिपरद्रव्याधीनत्य पक्षे मूपिराधीनत्यं । रतावसाने रतस्यावसानं रतावसानं नस्मिन् सुरताते । बभूप। गदामिघातः गदाना व्याधीनां पक्ष गदाया: दंडस्य अमिघातः प्रहार:रोगबाधा दंडायुधतिः । "आयुधामयभ्रातृविष्णुपु गदः" इति नानार्थकोशे । मलेपु मलभटेषु । यभ्व । भयाकुलत्त्व भोनाकुलो भयाकुलस्तस्य भावो भयाकुलत्व भीतिकातरत्वं । पक्षे भया कांत्या आफुलत्वं संकीर्णत्वं । रविचन्द्रयोः रवि. श्चचंद्रश्च रविचंदो तयोः सूर्यचद्रमसोश्च । यभूव किल । भू सत्तायां लिट् । परिसंख्यालंकारः ॥३०॥ भा० १०-रनिक्रिया में ही कदाचित् विपरीत वृत्ति ( पुष्पवृत्ति ) श्री पर वहाँ के लोगों में विरुद्धावरण नहीं था, संभाग के अन्त में ही पार वश्य (शिथिलता ) था पर यहां के लोगों में परद्रव्यपराधीनता न थी, मल्लों में ही गदा के प्रहार का प्रचार था न कि यहां के लोग गद (ध्याधि ) ग्रस्त थे और चन्द्र तथा सूर्य ही कदाचित् भा (कान्ति) से परिपूर्ण न थेन कि यहां के लोग भयाकुल थे।३०॥ इति निरुपमभत्क्या सानुरक्त्याऽवनम्रत्रिभुवनपतिचूडाचित्ररत्नांशुवा॥ विलिखितपदपीठराजपीठे स तस्थौ दशदशशतसंख्यान वत्सरान पंच चैव ॥३१॥ रतीत्यादि । सः मुनिसुव्रतप्रभु । सानुरफ्त्या अनुग्यत्या सह चर्तत इति सानुरक्ति तथा अनुरागरक्तया नियोजयेत्यर्थः । इति व प्रकारेण । निरुपमभक्त्या उपमाया निर्माता निरुपमा सा चासो भक्तिश्व निरुपमभक्तिस्तया उपमातीतभपत्या। अवनम्रत्रिमुवनपतिचूडा. चित्ररांशुवा प्रयाणां भुनानां समदारत्रिभुधन तस्य पतय प्रिभुधनपतयः अवन मंतीत्येचं शीला: छावनम्रा ते च ते त्रिभुधनपतयश्च तेषा चूडा तथोक्ताः चित्राणि च - ८ मुनिसुव्रतकाव्यम् । तानि रतानि च चित्ररतानि तेपामंशयः चित्ररतांशवः भवनम्रत्रिभुवनप- तिचूडानां चित्ररतांशवत्तथोक्ताः तयेव वर्तिस्तया अवनमनशीलत्रिलोक. पतिमुकुटरत्नकांतिवर्तिकया । “चर्तिीपदशादीपगात्रानुलेपनोपु च । यतिमपजनिर्माणनय- नांजनलेखयोः" इति विश्वः । विलिखितपदपीठे पदयोः पोठं पदपीठं चरणासनं विलिखित पदपीठं यस्य तस्मिन् । राजपीठे राज. पीठं राजपोट तस्मिन् । दशदशशतसंख्यान दश चारान् शतानि दशशताति पुनरपि दशवारान् दशशतानि दशदशशतानि तान्येव सं. या येषां ते दशदशशतसंख्यास्तान् । पंच चैव । वत्सरान् वर्णन् । पंचाधिकदशाहनवर्ष- पर्यंतमित्यर्थः । "कालाध्यानााप्तौ" इति व्याप्त्यर्थे द्वितीया। तस्थौ तिष्ठति स्म या गति निवृत्ती लिट् ॥ ३१॥ इत्पर्हहासाने: कायानस्य टीकाया सुखयोधिन्यां भगवत्कोमारयोवनदारकर्म साम्रा- ज्यवर्णन नाम सप्तमसगोऽयं समाप्त.। भा०810 ---इस प्रकार निश्छल तथा अनुपम-भक्ति से अवनत त्रिभुवनपतियों की मुफुटमणि से प्रतिविम्बित राजसिंहासन पर श्रीमुनिसुव्रत स्वामी ने आकढ़ होकर दस हजार पांच सौ यपी तक राज्य शासन किया।३१। - - अथ अष्टमस्सर्गः अत्रांतरे श्रुतवरः श्रुतधर्मतत्त्वैभन्येान्तमैर्दमवरारव्यमुमुक्षु मुख्यः ॥ श्रालोक्य यागकरिपुंगवमस्तहर्पमापृष्ट इत्यचकथद्गजराजवृत्तं ॥१॥ गरेत्यादि । अत्रांतरे अस्मिन्नवसर पतत्साम्राज्य काल इत्यर्थः । शुनधर्मतत्त्व ध्रुनधर्मस्य तवं यते स्म श्रुनं श्रुतं धर्मनत्य येस्तैः श्रुतधर्मस्वरूपः । भयात्तमः रन. प्रयाविभयनयोग्या: भयाः भव्येपूत्तमा भयात्तमास्तेः विनयजनमुख्यैः। अस्तवर्ष भत्तो इयों यस्य तं नष्टसंताप । यागकरिपुगवं पुमांश्वासो गौश्च पुगवस्तयोक्तः यागाह फरिपुंग- पस्तथोक्तस्तं पराधगजवरं । विलोम मालोक्य । आपृष्टः आपृच्छते स्म ऑपृष्टः विज्ञापितः। श्रुतधरः श्रुतं धरतीति ध्रुतधरः परमागमभृत् । दमघराण्यमुमुक्षमुरव्या दमस्य वरीदमवरः दमयर इत्यारय्या यस्य सः मोक्षमिच्छो मुमुक्षरलेषु मुख्यस्तयोकः दमवरारव्य. धातो मुमुक्षुमुरूपश्च तथोक्त; दमयरलामधेयमुनिश्रेष्ठः । इति वक्ष्यमाणप्रकारेण । गल. राजवृत्त गजानां राजा गजराजस्तस्य वृत्त करींद्रचरित्र ! अचीकयत् यत्रयीत्। कय यापय. प्रयंधे चुरादिभ्यो णिच् फथापानीत्यादिना अक् तस्य लोपः लुङ ओरिततोत्यादिना मिलुक् कंधत्यादिना डः द्विर्धातुरित्यादिना द्विविः सन्यलयाचित्यादिना अग्लुचिसन्वद्गा अष्टमः सर्गः। "सत्यत" इतीत्वभावः ॥१॥ मा० २०-एक समय इन्हीं मुनिसुव्रतनाथ के शासन काल में पट्टबन्धगजाधिपति को उदाली न देख कर धर्मतत्त्व को सुने हुए उत्तम मविकों से इसके विषय में पूछे गये दमयर नामक परमागमज्ञाता मुमुक्षुश्रेष्ठ यतिघर ने हाथी या वृत्तान्त यों कहा ।।। राजाभवन्नरपतिः पुरि पूर्वताले दानंददौ निकृतनिर्मलजैनधर्मः ॥ स्वैरं कुपात्रनिवहाय ततोऽजनिष्ट सोयं गजः स्मृतवनः कबलं निरंधे ॥२॥ राजेत्यादि। पूर्वताले पूर्वतालारव्ये । पुरि पत्तने । नरपतिः नराणां पतिस्तथोक नरपत्यारव्यः । राजा स्वामी । अभवत् अभूत् । भू सत्तायां ल । निकृतनिर्मलजैनधर्मः निक्रियते स्म निकृतःमलानिर्गती निर्मल जिनस्यायं जैन: संसारदुःखाक्रांतान जीयानुधृत्य मोक्षसुखे धरतीति धर्मः जैनश्चासौ धर्मश्च जैनधर्मः निर्मलश्वासी जैनधर्मश्च तथोक्तः निकृतो जैनधर्मो येन सः तयोका तिरस्कृतान यधरतत्रयात्मकधर्मः सन् । स्वैरं स्येष्ट'। "मंदस्वच्छंदयोः स्वैरः" इत्यमरः । कुराप्रनिवहाय कुत्सितानि पात्राणि तेषां निवहस्तथोक्तः तस्मै कुत्सितपात्रसमूहाय । दानं धनादित्यागं । ददो ददाति स्म । डुदा दाने लिट् । ततः तस्मात्कारणात्। सः नरपतिः । अयं एपः। गज. फरिपति । अजनिष्ट अजायत । जने मादुर्भाये लुङ् । स्मृनयनः स्मृतं धनं येन सः चितितपनस्सन् । कयलं माहार । निराधे निवारयते रुधिङ् माघरणे लट् ॥२॥ -पूर्वताल नामक नगर में यह गजराज पिशुद्ध जैन धर्म को तिरस्टत किये हुमा नरपति नामक एक राजा था। कुपात्रों को मन माना दान देने से इसने दापी की योनि में जन्म लिया है। इसे अपने पूर्व धन की पात याद भायोअतः भोजन नहीं करता ।। आकर्य तद्वचनमाप्तभवस्मृतिस्सन् सद्यः सदग्विकलसंयममग्रहीत् सः ।। श्रुत्वा जगत्रयगुरुस्तदिदं सभास्थो निर्वेदमात्महृदये बिभरा बभूव ॥३॥ माकर्षे त्यादि । सः पागहस्ती । सवयन तस्य पवनं तथोक मुमिययन ! भाकl ध्रुस्या। भाप्तमयस्मृतिस्सन् भाप्यते स्म आप्ता भयस्य स्मृतिः पाप्ता भयस्मृतिर्येन सः तपोक प्राप्तजातिस्मरणस्सन् । सयः तस्मिन्निति सघ.तत्क्षणे । सदग्धिकलसंयम दशा मह घर्तन इति सदृष स पासी विकासपमध सदग्धिकल्लसंयमस्त दर्शनयुकदेशसंयम । माहीत् मरणात् । प्रही उपादाने लुा । तदिदं तदेतत्सर्य। समाम्य: मभयां तिष्ठतोति समाप: भास्पाने स्पिन.1 जगत्त्रयगुरु: जगतां त्रयं जगतनयं तस्य गुरुः लोकत्रयस्यामी। भुत्या । भात्महदये आत्मना ६श्यं मात्महदयं तस्मिन् स्वस्य चित्ते । गियर पेराग्य । बिमारांवभूव हुभृभधारणपोषणयः। “मोहीभृदोः ल लदीति स यद । मा० 80- क . , मुनिसुव्रतकाच्यम् । वणिक । असि भवसि । तस्मात् कारणात्। भवांबुनिधेः भव एवांचुनिधिस्तस्मात् संसारसमुद्रात् । विमुक्तिद्वीपं विमुक्तिरेय होणे विमुक्तिद्वीपस्तम् मोक्षांतीपं । "व्यतरुप सर्गादिदपानात् इतीकारादेशः । अवश्य निश्चयं गमिष्यसि यास्यसि । गम्लु गती लिट् । रूरकः ॥७॥ भा० अ०-आप सम्यग्ज्ञान रूपी नाविक वाले, तपारूपी नाध वाले और मूलोत्तर गुणरुपी रत्न ढोने वाले है; इस लिये भविक रूप घोष्ठिय्या के साथ इस संसार-समुद्र को पार कर मुक्तिरूपी द्वीपको आप अवश्य जायंगे।७।, खं लोकमित्थमभिवंद्य गतेपु तेषु देवोऽपवर्गपुरसाधननिर्गमतं ।। बंधून्निवेद्य जननीजनको पराश्च प्राज्यं नियोज्य तनये विजये स्वराज्यं ॥८॥ स्वमित्यादि । इत्थं अनेन प्रकारेण इत्थं "कथमित्यमुः” इति साधुः । अभिवंध अभिवंदन पूर्व नुत्वा नत्वा च । स्य स्वकीयं । लोकं ब्रह्मलोकातेपु लोकांतिकेषु। गर्नपु यातेषु । देवः स्वामी । तं। अपयर्गपुरसाधननिर्गम अपवर्गमेव पुरं अपयर्गपुरं तस्य साधनं तथोक्त अपवर्गपुरमाधनाय निमः अपवर्ग पुरमाधनिर्गमस्तं मोक्षपुरसाधनाय बहिर्याणं | बंधू. न् स्वजनान् । जननीजनको जननी च जनकच जननीजनको मातापितरौ। परांश्च अन्यांश्च अमात्यादीन् । च समुच्चयार्थः । निवेद्य निवेदन पूर्व० शापयित्या। विजये विजयाये । तनये पुत्र । प्राज्यं प्रचुरं। राज्यं । राक्षो भायः कृत्य या राज्यं गज्यभारं । नियोज्य नियो। जनं पूर्व संस्थाप्य ॥ ८॥ मा० अ० - चन्दनापुरस्सर यों निवेदन कर लौकिकान्तिक देवों के अपने ब्रह्मलोक में जाने पर मुनिसुव्रत-नाथ गे मेक्षिपुर-साधन के निमित्त प्रस्थान को अपने माता, पिता, यन्धुवी तथा अन्यान्य अमात्यादिकों से कह विजयनामक पुत्र को सारा साम्राज्य का भार दे दिया। तीर्थाम्युनाय दिविजप्रभुणाभिपित्तो दिव्यांगरागरमनाभरणैः प्रसिद्धः ।। अग्रेभवां ग्रहविवर्त्तमिव स्फुरतीमध्यारोह शिविकामपगजिताग्व्यां |युग्मं॥ ती युनेत्यादि। अथ राज्यनियोजनानंतरे। दिविजप्रभुणा दियि जायंत इति दिविजा. स्तेषां प्रभुर्दिधिजप्रभुस्तैन । तीर्थापुंनो नीनायु तेन गंगादितीदिशेन । अमिपिन: अभिपिच्यने स्म अभिषिक्तः नापिनः । दिव्यांगरागयसनामरणः दिघि मघानि दिव्यानि अंग स्य गगोंऽगरागः अंगरागध यमनं चाभरणं च तथोक्तानि दिव्यानि च तान्यंगरायमना. मरणानि च दिव्यांगरागयमनामरणानि तैः म्यर्गभयानुलेगनरखामाणः । प्रसिद्धः मल- रुतः । "प्रसिद्धी रव्यातमूपितो" इत्यमरः । प्रदयिधर्नमिय ग्रहाणां वियतः प्रविवर्तन भएमः सर्गः। तया सभोगासक्तयुन्द या। विमुकिनार्या विमुक्तिरंय नारी विमुक्तिनारी तथा मोक्षयनिनया। रूपकः। यिष्याः विसृज्यंते स्म विएष्टाः प्रेरिताः । चरा व दूता श्य। संसार संप्रापर्ण पूर्व० समेत्य। साधु मनोहरं यथा तथा। जगदुः ऊचुः। गद व्यकायां धावि लिट् । उत्प्रेक्षा ॥५॥ -मुनिसुनतानाथ को अपने अन्तरंग में कर्तव्य-कर्म को पूर्ण रूप से निश्चित किये हुए जान फर साथ करने की इच्छा से मुक्ति-रूपिणी पनिता के द्वारा भेजे गये दूत के समान लोषिकान्तिश देवों ने इनकी सेवा में उपस्थित होकर इस प्रकार निवेदन किया। ५। अरमात्तृतीयजनने जननांधकूपाद-युद्धरेयमखिलं जगदित्युदीर्णा ॥ चित्तस्थले तव कृपान्छन कल्पवल्ली या साद्य देव फलिता जगदेकबंधोः ॥६॥ मम्मादित्यादि। देव स्रागिन् । जगदेवयंघो: एफवासी यधुध एफयंधु: जगतामेक. पंधुस्तस्य लोकानां मुरपयंधोः। तय मयतः। वित्तस्थले चित्तस्य स्थल चित्तस्यले तस्मिन् मन.प्रोशे। भस्मात् एतस्मात् । जगनात जन्मनः। तृतीयजाने प्रयाणां पूरणं तृतीय राध तत् जनन चतूनीयजनन सस्मिन् "द्विलियधश"नि तीयत् प्रत्ययः प्रशादेशचा दरि- पर्म घरे सूतीय मन्मनि भविल सबाल जगत् लोया । जननात्भधशासी पधधरुप. जननमेनरोधको जनमाधमत्तस्मात् संसारगिलपुराणकगत मन्युदरेय मयुद्धराणि। इमि एवं प्रकारण। उत्ताउाना। या हारवली येवल यस्यारसा ए. सापाला चासो घलो म तयांना मा | NP मा दागौ। फलिगा पतिस्म निष्पना ॥६॥ भा०० देय! इममेसोपरे म पार या पदाच्छाईयो कि में इस सारे संसार का जन्मान्ध फुप ने उझार कम से माम भार जैसे त्रिभुवन के पषमा साधु पो पर धाषिणी सालतिका फाभूत हो गयो ।।। सांयात्रिकत्वममि बोधनकर्णधारी यस्मात्तपप्रवणो गुणग्नवाही ।। तरमाधिनयवरमार्थयुता विमुक्तिद्वी गमिन्यनि भगांधुनिधेरवश्यं ॥७॥ सांयात्रिराया। याकारणान्। त्वं भवान् । धनपानधार: पोधनमे वर्ष. धारा यस्य सः ततः सम्परमाननायिस्युनः तयण. पर यहा यापमः নম্বকােণা।"ঘালালাঘিয়া মালা; জিম্বা। पप रक्षानि गुणरत्नानि नानियती गोरात सम्मानरगुणाजधाविय. साधंगुनः विनेपा एष साधा धिनयमास्युत: भरधं विभिगुस । सामाजि. प. - -- मुनिसुव्रतकाव्यम्। वणिक् । असि भवसि । तस्मात् फारणात्। भवांबुनिधेः भव एवांवुनिधिस्तस्मात् संसारसमुद्रात् । विमुक्तिद्वीपं विमुक्तिरेव द्वोपो विमुक्तिद्वीपस्तम् मेक्षिांतद्वीपं । "व्यतरुप सर्गादिदपानात्"इनीकारादेश. । अवश्य निश्चयं । गमिष्यसि यास्यसि । गम्लु गती लिट् । रूपकः ॥७॥ भा० १०-आप सम्यग्ज्ञान रूपी नाविक थाले, तपोरूपी नाप वाले और मूलोत्तर गुणरूपी रत्न ढोने वाले है। इस लिये भविक रूप श्रेष्ठिय्या के साथ इस संसार-समुद्र को पार कर मुक्तिरूपी द्वीपको माग अवश्य जायगे।७। स्वं लोकमित्थमभिवंद्य गतेपु तेपु देवोऽपवर्गपुरसाधननिर्गमतं ॥ बंधून्निवेद्य जननीजनको पगश्चं प्राज्यं नियोज्य तनये विजये स्वराज्यं ॥५॥ स्वमित्यादि । इत्य अनेन प्रकारेण इत्थ "कथमित्शमु."इति साधुः । अभिबंध भिवंदन पूर्व० नुत्या नत्वा च । स्व स्वकीयं । लोकं ब्रह्मलोकं ।तेपु लोकांतिप्पु । गतेपु यातेषु। देवः स्वामी । त। अपवर्गपुरसाधननिर्गम अपवर्गमेय पुरं अपवर्गपुरं तस्य साधनं तथोक्त अपवर्गपुरसाधनाय निमः अपय पुरसाधननिर्गमस्तं मोक्षपुरसाधनाय पहिर्याणं । बंधू न् स्वजनान् । जगनोजाको जननी च जनकच जननोजनको मातापितरौ। पराश्च अन्यांश्च अमात्यादीन् । च समुच्चयार्थः। निवेद्य निवेदन पूर्व ज्ञापयित्वा। विजये विजयाये। तनये पुत्र । प्राज्यं प्रचुरं । राज्यं । राज्ञो भावः कृत्य या राज्यं गज्यभार । नियोज्य नियो- जन पूर्व० संस्थाप्य ॥ ८॥ मा० अ० - चन्दनापुरस्सर यो निवेदन पर लौकिकान्तिक देवों के अपने ब्रह्मलोक में जाने पर मुनिसुव्रत नाथ ने मोक्षपुर-साधन के निमित्त प्रस्थान को अपने माता, पिता, यन्धुवा तथा अन्यान्य अमात्यादिकों से कह विजयनामक पुन फी सारा माम्राज्य का भार दे दिया। तीर्थाम्बुनाऽथ दिविजप्रभुणाभिपित्तरे दिव्यांगगगरसनाभरणैः प्रसिद्धः ॥ अग्रेभवां ग्रहविवर्त्तमिव स्फुरतीमध्यालरोह शिबिकामपगजितारच्या आयुग्मं18 तीर्धाधुनन्यादि। अथ राज्यनियोजनानगरे । दिविजाभुणा दिघि जायंत इति दिविजा- स्तपा प्रमुर्दिविजप्रभुस्तेन । नोर्थायुना तीर्थानायु तेन गंगादिनीर्थोदयग । अमिषिक्तः अभिपिच्यने स्म अभिपित्त:सापितः। दियागरागघसनामरणः दियि मघानि दिव्यानि स्य रागोंऽगरागः अंगरागध घमनं च मामाणंच तगोक्तानि दिव्यानि च ताम्यंगरागमना. भाणानि च दिव्यांगरागगनाभरणानि तैः म्वर्गमयानुलेगनरनामाः । प्रमिद्धः अल- छतः। "प्रसिद्धी रण्यातमूपिती" इत्यमरः । अघियतमिय ग्रहाणां विवर्तः प्रहपियस्त - - अष्टमः सर्गः। . नपरत्नखचितत्यान्नवग्रहपरिणाममिव । स्फुरन्ती म्फुरंतीति स्फुरती तां विराजती। अग्रेभवां भने भवतीत्यग्रभवाता पुरस्थितां। अपराजितारव्यां अपगजितेत्यारव्या यस्यास्सा अपराजि. तारख्या तो अपराजितनामधेयां। शिविका याप्ययानं । अध्यारोह अध्यागेतिस्म । रुह बीजजन्मनि लिट् ॥ ॥ भा० १०-इन्द्र के द्वारा गंगादितीर्थ जल से स्नान कराये जाकर तथा स्वर्गीय अंग संग और वस्त्राभूषणों से सुसजित होकर मुनिसुव्रत नाथ रत्नचित होने से देदीप्य. मान अपराजिता नाम की पालकी पर आरूढ़ हुए।। भूमिभृतामभृत सप्तपदानि भूमौ विद्याधृतां वियति सप्तपदानि वृदं ॥ थारब्धपांडवनमप्यतुभिः प्रपन्नैरानिन्यिरे तद्नु नीलवनं निलिंपाः॥१॥ भूमिभृतामित्यादि । भूमी अवनौ । भूमिभृतां भूमि विन नीति भूमिभृत. स्तेषां राज्ञां । वृद समूहः । सप्तपदानि सप्त च तानि पदानि च सप्तरदानि सप्तपइपर्यत । अभूत अधृत । विपति आकाशे । विद्याधृतो विद्यां धरतीति विद्याधृतस्तेषां । वृद। सप्तपदानि अभृत भृञ् भरणे लुड् । तदनु पश्चात् । निलिपा देवाः । "निलिंपाः स्प. गिणस्सेंद्री” इत्यभिधानात् । प्रपन प्रायनेस्म प्रपन्नास्तः । ऋतुमि वसंतादिषहतुमिः । प्रारब्धपाडुपनमपि घनशब्दोऽत्रपुष्पावकः तदाह विष्णूपर्यायव्युटात्तौ सुभूतिचंदोमर- सिंहटीकाकारो धनमालीति पुष्पमाला तद्योगाद्वनमालीति । आरभ्यतेस्मारब्धानि पानि च तानि धनानि च तथोक्तानि धारधानि पांडवनानि यस्य तत्तथोक्त प्रारब्धशुभ्रकुसुमयुक्त ऋतुभिरारधसितकुसुमस्यास्य नीलकुसुमवत्त्वं विद्विमित्यपिशब्दार्थः। नोलचनं नील च तत् धनं च नीलमितियनं या नीलयन नीलानि धनानि यस्य तन्नीलवन नीलपुष्पोपेत चेतिविरोध: नाना नीलोद्यान । मानिन्पिरे प्रापयामासु । णीम् प्रापणे। शिविकामिति सर्वत्राध्याहारः॥ १० ॥ मा० १०-पृथ्वी पर राजामों ने उस पालकी को सात डेग, विद्याधरों ने आकाश में सात पग तथा देवताओं ने प्रशस्य वमन्तादि छ. प्रतुओं से समाकुल और समुज्ज्वल पुषवाले नीलनामक उचान तक ढोया । १०॥ रेजे नभस्थल विराजिविमानराजिरश्मिप्रतानविततापविभागमेतत् ॥ अत्तुं फलप्रकरमापततः पतंगानानायविस्तृतमिवोपरि निग्रहीतुं ॥११॥ रेजे इत्यादि । नमस्थलविराजिविमानराजिरश्मिप्रतानवितताप्रविभागं नममः स्थल ममपलं विराजनीत्येवं शीला: विगजिनस्ते च ते पिमानाध विराजिविमानाः पराजित 1 *4 अष्टमः सर्गः। मभसले विराजिविमानरामिस्तथोक्ता तस्याः रश्मयः रश्मीनां प्रतानं ममस्थलविराजि. विमानराजिरशिमप्रमानन्तेन विततः भनत्य भागोऽप्रमागः नमस्थल विराजिविमानराज- रश्मिप्रतानविततोऽनभागो यस्य तत् तथोक्तं । एतत् गीलवन । फलप्रकरं फलानां प्रकरस्तथोक्तस्तं फलसमूह। अत्तुं अदनाय तपोत भक्षणाय। आपततः भापतं- तोत्यापतंतः तान् आगच्छतः। पतंगान् विहगान् । "पतंगो पक्षिपूर्णे च” इत्यमरः । निग्रहीतुं निग्रहणाय निग्रहोतु माफष्टुं । उगरि अग्रे। आनायविस्तृतमिव मानायेन विस्तृत तथोक्तं मालपच्छादितमिव । रेजे ची। राजू दीप्तौ लिट् । उत्प्रेक्षा ॥ ११ ॥ भा० no-भाकाश में विराजमान विमान-पंक्तियों के दीप्तिपुज में प्रतिफलित शिखर वाला यह नीलधन फल-समूह को पाने के लिये आने वाले पक्षियों को बझाने के लिये फैलाये गये जाल के समान मालूम होता था । ११ । रेजे बहिर्घटितरत्नविमानमेतदन्तश्चरामरि गलन्मकरंदधारं ॥ सेंदायुधं सचपलं च सवारिधारमभ्रच्युतं मिथ इवाहतमभ्रजालं आयुग्म।।१२॥ रंजे त्यादि। यहिटितरतधिमान यहिः याह्य घट्यते रूम घटिनः रत्ननिमिता: विमानास्तथोक्ताः घटिता रत्नधिमानो यस्य तत् । अंतश्चरामरि अंतश्चरतीत्यंतधराः गंतश्चरा अमर्यो यस्य तत् मध्ये विचरमरस्त्रीसहित । गलन्मकरंदधारं मकरंदस्य धारा तथोक्ता गलती मकरंदधारा यस्मिन् तत् स्रवत्पुष्परसप्रवाहसहित । एतत् घनं। सेंद्रायुध द्रायुधेन सह वर्तत इति तथापतं सुरवापसहित । सचपलं चालया सह वर्तत इति तथोक्तं विद्युत्सहितं "तडित्सौदामिनी विधु च'चला चाला अपि"इत्यमरः च समुद्ययार्थः। सवारिधारं धारिणां धाग तथोका वारिधारया सह घर्तत इति तथोक्त' घृष्टिसं. पातसहित । मियः भन्योन्यं । आहत संघृष्टं । अभ्रच्युतं अभ्राच्च्युतं तथोक्त आकाशा- स्पतितं । अभ्रजालं अभ्राणां जालं तोफ्त मेघसमूद इय। "अनं नम.स्वर्गवलाहक्षेपु" इति विश्यः । रेजे चकाशे ! रनविमानयुक्तत्यात्सुरचापसहित अंतश्चरामरीयुकत्याद्वियु त्स. हितं पुष्परसयुकत्याद घिसंपातसहित कृष्णवर्णत्वादनस्य मेघजालत्यं । उत्प्रेक्षा ॥१२॥ भा० म०-याहर रतजहित विमानवाला, जिसके भीतर देवांगनायें विचरण कर. रही है और जहां मकरन्द-धारा माहित हो रही है ऐसा यह वन इन्द्रचाप सहित विद्यु. लता-मण्डित तथा धारि-धारा-युक्त परस्पर संघर्पित मेघ-समूह के समान सामने लगा।१२।

मुनिसुप्रतकाव्यम्। १५७ - यानादथायमवतीर्य बनस्य मध्ये श्रीदेन दिव्यपटमंडपिका प्रक्लुप्तां ॥ आविश्य देवपतिदत्तकरावलंबः श्रीब्धमौक्तिकचतुष्कमलंचकार ।।१३|| पानादित्यादि। अथ गमनानंतरे । देवपत्तिदत्तकरावलंयः देवानां पनिर्देधपतिः करस्यावलयः करावलंयः देवपतिना दत्तस्तथोक्तः देवपतिदत्तः करावलंयो यस्य सः । अयं एषः मुनिसुव्रतस्वामी। यानात् शिविकायास्सवाशात् । अवतीर्य अवनर कृत्या। धनस्थ नीलधनस्य । मध्ये अंतःप्रदेशे। श्रीदेन श्रियं ददातीति श्रीदः तेन कुरेण । "श्रीदः पुण्यजनेश्वरः" इत्यमरः । प्रफलप्तां निर्मितां। दिव्यपटमंडपिका पटस्य मंडपिका दिवि भवा दिव्या सा चासो पटमंडपिका च तथोक्ता ता मनोहरदूप्यां । साविश्य प्रविश्य। धीद्व- ब्धपौक्तिकचतुर्फ मौक्तिवस्य चतुष्क श्रिया दृब्धं तय तत् मौक्तिकचतुष्कं च तथोक्त चोदेवीविरचितमौक्तिकरंगालिं । भलंचकार अलंकरोतिस्म अध्ययसदित्यर्थः । शञ् करणे लिट् ॥ १३॥ जाने के बाद, मुनिसुव्रन नाथ ने विमान से उतर कर वन के बीच में कुवेर से रचित घस्त्रमण्डप में इन्द्र का हाथ पकड़ पर प्रवेश पर रक्ष्मीजी से निर्मित मणिमय घेदी को विभूषित पिया ॥ १३ ॥ पष्ठोपवासनियमी सुरदिङ्मुखस्थः पल्यंकवान्परिहतांवरमाल्यवेपः॥ त्यताखिलोपधिरुपेतसहस्रभूभृदुच्चार्यमाणवरसिद्धनमस्कृतिश्च ॥१४॥ पाठ त्यादि। यठोपवासनियमी वष्णां पूरणः परः स चासाघुपवासय पाठोपवास: नियमोऽस्यास्तीति नियमी पटोपवास इनि नियमी तथोक्तः उपवासद्वयनियमी। त्रिश- इघटिकामामेक उपवास इत्यागमपरिसंभाषाश्रयणात् । सुरदिड्रमुखस्थः सुरस्य दिप सुरदिफ सुरदिशि मुख सुरदिग्मुख तस्मिन् तिनोति तथेतिः पूर्वाभिमुषः । पल्य- फवान् पल्यकोऽस्यास्तीति पक्ष्यफवान् पद्मासनः । परिहतांयरमाल्यवेप. परिहियंतेस्म परिहताः अंथरंच माल्यं च घेपश्च परमाल्यवेपाः परिता अंघरमाल्यवेपायेन स तथोक्ता परित्यकपनमालाभरण: "आकल्पोमंडन वेपःप्रनिधर्मप्रसाधनम्" इति हलायुधः। त्यक्ताखि. लोपधिः अखिलाश्च ते उपधयश्च अखिलोपधयः त्यज्यतेस्म त्यकाः त्यकाऽखिलोपधयों येन सः विएप्टयाजाभ्यंतरपरिग्रहः । उपेतसहस्रभूभृत् सहन' भूभृतः सहनभूभृतः बपतिस्म उपेतासहस्रभूभृता येन सः तथोक्तः। उमार्यमाणवरसिद्धनमस्टतिश्च उचार्यते इति अध्यार्यमाणा घराश्च ते सिद्धाश्च घरसिद्धाः नमस्करण नमस्कृतिः घरसिद्धानां नम- . Lav १५८ अष्टमः सर्गः। सतिस्तथोक्ता ज्यार्यमाणा परमिद्धनमस्कृतिः येन सः तथोक्तः "नमःसिद्ध भ्यः" इति प्रोचार्यमाणसिद्धनमस्कारध । च शब्द उत्तरविशेषणसमुश्चयार्थः ॥ १४ ॥ भा००-छठवें उपवास का नियम फरने घाले, घरमाला आदि का त्याग किये हुए, अन्तरंग तथा यहिरंग परिग्रह को छोड़े हुए और हजारो राजाओं से युक्त ॐ नमः सिद्धेभ्यः इस सष्टि नमस्कार मंत्र का उच्चारण करते हुए श्रीमुनिसुक्त स्वामी ने पूर्वाभिमान हो पमासम लगाये हुए । १४ । उत्खाय पंचभिरुचितमुष्टिबन्धैः कैश्य च पंच भवमूलचय यथैव । वैशाखकृष्णदशमीदिवसेऽपराणे दीक्षामुपादित युतश्रवणे सिताशौ ॥१५॥ उत्पायेत्यादि । मः मुनिसुव्रतस्थामी। मितांशी सिता अंशवो यस्य सः सितांशुस्त. स्मिन् चंद्र। युनश्रवणे युनाः श्रयणा येन सः युतश्रवणस्तस्मिन् श्रवणनक्षत्रमहिते । पैशाखकप्णदशमीदियले पैशासपूर्णिमाम्यास्तीनि वैशाखः “साऽस्यपौर्णमासी" इत्यण पेशाप्नस्य एष्ण दशागां पूरणा दशमो नामट टित्यार टिड्ढे भित्यादिना" डो दशमीदिवसे तथोक्तः पेशावकृष्णम्य दशमोदिवसस्तस्मिन् वैशाखमासकृष्णपक्षस्य दशम्यां तिथौ । अपराल : अपरः अपराहस्तस्मिन् “संख्याव्ययामशास्तत्" इत्यतदद्योगे हादेशश्च साया। पंचभिः। उदचितमुष्टियधः उदचंते स्म उदंचिताः मुन्धाः मुनिबंधाः उचिताश्च ते मुनिबंधाश्च उदंचितमुष्टियधास्तैः उन्नीनमुष्टियन्धः। पंचभवमूलचयं पंचच ते भयाध पंचभनास्तेषां मूलानि तेषां चयस्तं पंचसंसारममूटममूह । यथैव । केश्य केशानां समूहो केश्य पुगस्तत्"वेशादेः" इनि ण्यः । उत्खाय उत्खननं पूर्व ० उद्ध य । दीक्षा नेमध्यं । उपादित उपाधत्त । डु दाम् दाने लुङ् ॥ १५॥ भा० ० --द्रव्य, क्षेत्र, काल, भय नथा भाव-भरपंच संसार मूल-समूह केशों का पंचमुष्टियों से लोचकरके पैशाख कृष्णशमी को चन्द्रद्युत श्रवण में अपराह्न समय में दीक्षा सक्षम की।१५ लोकतयैकगुरेप पुरैव पूर्णचारित्रशीलगुणसंयमभारवाही ॥ प्राप्ताखिलर्बिरुपजातचतुर्थबोधिरत्यंतगौरवपदं पुनरासदेव ॥१६॥ लोकत्रयेत्यादि । पुरैव पूर्वमेय । लोकत्रयगुरुः लोकानां त्रयं लोकत्रयं गुरुरा. राध्यो भैरथा "गुरुस्तु निष्पत्ती श्रेष्ठे गुरौ पिनरि दुर्भरे इत्यभिधानात्, एफश्चासौ गुरुश्च एकगुरु लोकत्रयस्यैकगुरुस्तथोक्तः त्रिभुवनमुख्यगुकः । एषः अयं स्वामी । पूर्णचारित्र- शीलगुणसंवमभारवाही चारित्रं च शीलं २ गुणश्च संयमश्व चारित्रशीलगुणसंयमाः . गुण तथा मुनिसुव्रतकाव्यम् । पूर्यन्ते स्म पूर्णास्ते च ते चारित्रशोलगुणसंयमान तथोक्ताः यद्वा पूर्णञ्च तच्चारित्र'चेनि प्रोक्तस्तयेव भारस्तथोक्तः पूर्णचारित्रशीलगुणसंपममारे बहतीत्येवं शीलस्तथोक्तः पूर्णचारित्रं 'सकलचारित्र व्रतपरिरक्षणलक्षणं शीलं सम्यक् धादिलक्षणो गुणः इद्रियप्राणिद्विभेदस्संयमः एत पध भारस्तस्य याही । प्राप्तापिलद्धिःप्राप्यते स्म प्राप्ताः मखिलाश्च ताःद्धयञ्च अखिल. द्धयःप्राप्ता अपिलद्धयोयेन सःतथोक्तः प्राप्तयुद्धयादिसप्तर्द्धियुतः। उपगातचतुर्थयाधिः चतुर्णा पूरणचतुर्थः स चासो योधिश्च चतुर्थवाधिः उपजातश्चतुर्थबोधिर्यस्य सः तथोकः उत्पन्न मनापर्ययज्ञानः। पुनः । अत्यंतगौरवपदं गुगर्भावो गौरवं तय तत् पदं च गौरवपदं अत्यंत. गौरवपद तथोक्तं पुनस्तत् अधिकगुरुत्वस्थानं । आसदेव भागमदेव । पद्ल विशरणगत्य- यसादनेषु लुङ् “सदित्यादिना दित्वादङ् ॥१६॥ भा० १०--यह स्वामी त्रिभुवन के मुख्य गुरु पहले थे हो अब फिर पूर्ण चारित्र, शील संयम के धारक सारी ऋद्धियों को प्राप्त कर मनःपर्यय ज्ञान-पूर्षक गोरष पद पर आरूढ़ हुए।१६। रेजेतरां दशशतैः श्रवणैरुपेतो नेत्ररिवामरपतिः किरणैरिवार्कः ।। परिवावुजमरैखि चक्ररत्नं शेष: फणैरिव निधानमिवैष यतैः ॥१७॥ रेज इत्यादि । दशशतैः दश वारान् शतं दशशतास्तैः सहस्रमितः । श्रवणेः मुनिमिः। उपेतः उपैतिस्म ततः सहितः। एषः अयं स्वामी। अमरपतिः अमराणां पतिस्तथोकः देवेंद्रः । नेत्ररिव सहस्त्रनयनेरिव । अर्फः सूर्यः। किरणरिव सहस्रकातिभिरिव। अबुर्ज कमल पौरिव सहन्नदलेरिख । चक्ररत्नं चक्र' च तत् रत्नं च चारत्न । अरैरिव सहस्रधारा. मिरिव । शेषः धरणांदः । फणैरिव सहस्रफणामिरिव । "स्फुटायांतु फणामयोः इत्यमरः । निभान निधिः यक्षरिव सहस्रयक्षदेवैरिव । रेजे थमी राजु दीप्ती लिट् ॥ १७॥ मा० अ० हजारों मुनियों से युक्क यह मुनिसुव्रत स्वामी सहस्त्र नयनों से इन्द्र के समान सहस्त्र किरणों से सूर्य के समान सहस्र फणों से शपनाग के समान भोर सहस्र. पक्षों से निधि के समान सामने लगे। १७॥ यस्माद्भूब लवनं नियमेन तस्मिन्नेः पुष्पधन्धुनतः पुरतो जिनेन ॥ तस्मात्तदादि किल नीलवनाभिधानं तस्याभवनिभुवननथित वनस्य । १८ यस्मादित्यादि । यस्मात्कारणास् । तस्मिन् धने । जिनेन जिनेश्वरेण । ए: मन्मथस्य "कार सध्यते कामो समोरोकार उच्यते” इत्येकाक्षरनियंटो। नियमेन नियश्चयेन | लव माशनबभूवमषतिस्म भ सत्तापोरिद । तस्मात्कारणात् । तदादितदादियस्मिन् कर्मणि १६० अष्टमः सर्गः। ततततः प्रभृतिः। पुरतः अग्रे । पुष्पधन्यधुनतः पुष्यमेव धन्या यस्यासौ पुष्पधन्वा तं धुना. तीतिपुष्पधन्यधुनत् तस्य मन्मथनाशकस्य धनुश्यापौधयशरासनकोदंडकार्मुकम्"इत्यमरः। तस्य नीलयनस्य। नीलधनाभिधान नीलवनमित्यभिधानं नीलयनमितिनामधेयं विनि- यमेन एमन्मथस्य लघनं छेदनं यस्मिन् तत् नीलवनमिति व्युत्पत्तः। त्रिभुवनप्रथितं त्रिभुवनस्य प्रयित तथोक्त लोकत्रयप्रतीतं । अभवत्किल अभूत्किल। भू सत्तायां लङ् ॥१८॥ मा० अ०-इस वन में जिनेश्वर भगवान के द्वारा कामदेव का नाश हुमा है क्योंकि 'नी' का अर्थ काम तथा 'ली' का लय होना है। काम का नाश जिस वन में हुआ इसी कारण से इस कामदेव-नाशक घनका नाम जगत्प्रसिद्ध नीली यन पड़ा । १८॥ पश्चाग्जिनालकभरं मणिभाजनस्थ रक्तोत्पलस्थमिव/गकदंबमिंद्रः ।। चिक्षेप दुग्धजलधौ जयघोषपूर्णबंभाप्रणादबधिरीकृतसर्वलोकम् ॥१६॥ पश्वादित्यादि । पश्चात् पुनः । इद्रः देवराजः। रक्तोत्पलस्थं रक्त'च तत् उत्पलं रक्तोत्पल तस्मिन् तिष्ठतीति रक्तोत्पलस्थं अरुणारविंदस्थं । भृगकर्दो भृगाणां कदव तथोक्तं भ्रमरवृदमिव । मणिभाजनस्थ मणिमिनिर्मितं भाजनं तस्मिन् तिष्यतीति तथोक्तं रत्नमयपात्रस्थं । जिनालकमरं जिनरयालका जिनालफास्तेषां भरस्तं जिनेश्वरकुंतलनिवयं । जयघोपघूर्णद्वभाषणादयधिरीतसर्वलोकम् जय इति घोषः जयघोपस्तेन घूर्णन्तः जयघोपघूर्णन्तः माना शयानां प्रणादाः भप्रणादाः जयपोपपूर्णतश्च ते बंभाप्रणादाश्च तथोक्ताः सर्व च ते लोकाश्च सर्वलोकाः प्रागवधि: इदानी बधिराः कियंत इति षधिरीकृताः जयघोषपूर्ण भाषणादैः यधिरीकृताः सर्वलोकाः यस्मिन्कर्मणि तत् तथोक्त जयघोपेण प्रवर्धमान शंखध्वनिभिः यधिरोझतसकलभुवन यथा भवति तथा। दुग्घजलधौ दुग्धानां जलधिस्तथोक्तस्तस्मिन् क्षीरसमुद्री चिक्षेप निक्षेप । क्षिप प्रेरणे लिट उत्प्रेक्षा ॥ १६॥ भा० ० -इन्दने रक्त कमल पर बैठे हुए भ्रमर-समूह के समान दीपता हुमा मुनिसुव्रत स्वामी का मणिमय पात्रस्य याल जयघोष से परिवदित शंखध्वनि के द्वारा. सारे संसार को बधिर बनाते हुए दुग्ध समुद्र में परिहावित किया । १६ । यो यत्र यत्र जिनकुंतलकबरोऽभूत्शेवालमंजरितवत्स हि तत्र तत्र ॥ क्षीरांधुधिस्त्रिदशलोकमनांसि कर्पन्वातावधूर्णितघनावृतबद्वभासे ॥२०॥ यः इत्यादि । यः समुद्रः। यत्र यत्र यस्मिन् यत्र प्रदेशे। “धीप्सायाम इति द्विः । शेवाल. मजस्तियत् शेषालेन मजरित इघ तथोकः शेवालेन स्तक्ति य । जिनकुंतलकयुर:

मुनिसुव्रतकाव्यम् । जिनस्य बुंतलास्तैः कर्षरस्तथोक्त: जिनेश्वरालकमिधः। अभूत् गजनिष्ट ! भू सत्तायां लुङ। तत्र तत्र प्रदेशे । सः क्षीराधिः क्षोरसमुद्रः । त्रिदशलोकमनांसि त्रिदशाश्च ते लोकाश्च त्रिदशलोकाः तेषां मनांसि तथोक्तानि देवानां चित्तानि हि स्फुट । कपन फर्पतीति कर्पन स्वीकुर्वन । पाताचधूर्णितधनावृतवत् घातेन अबघूर्णितो वाता. वर्णित. स चामो धनश्य तथोक्तः वातावधूर्णितघनेनावृतः तथोकस्स इव तथोक्तः पायुना चलितमेधेनावृत इध । घमासे यभौ। भारङ् दोती लिट् । घना जलादानाय समुद्रमाश्रयंतीति प्रसिद्धिमत्प्रेक्ष्यते ॥ २०॥ भा० 10-जो समुद्र जहां जहां शैवाल मंजरी के समान जिन पुन्तल-मिश्रित हुभा वहाँ यहाँ यह क्षीर-समुद्र देवतागों के वित्त को माकर्पित करता हुआ घायु-संचालित मेघ फे ऐसा समुद्भासित होने लगा । २० । तं पारणांपभसेन इति प्रतीतो राजाऽथ राजगृहनामनि राजधान्याम् ।। श्रद्धादिसप्तगुणवान्नवभेदभिन्नैः पुण्यैरकारयदुपस्थितपूर्वपुण्यः ॥२१॥ तमित्यादि । अथ दीक्षोपासनानंतरे। राजगननामनि राजगृह इति नाम यस्यास्सा तथोक्ता तस्यां । राजधान्यां प्रधाननगरे। वृषसेन इति नाम्नतिशेषः । प्रतीतः प्रसिद्धः । "प्रतीते प्रथितख्यातवित्तविशातविध ताः" इत्यमरः । राजा भूपतिः । उपस्थितपूर्वपुण्य: पूर्वस्मिन् जन्मन्युपार्जित पुर्य उपस्थितं पूर्वपुण्यं यस्य सः फन्ददानपरिणतपूर्व- सुरुतः यदादिसप्तगुणयान श्रद्धा यादियोपा तेसयोक्ताः श्रद्धादिमागुणास्संत्यस्येति तथोक्तः श्रद्धादिसप्तगुणयुक्तः । नवभेदभिन्नः नय च ते भेदाश्च मयभेदास्तभिन्नानि ते: नव- प्रकारभिन्नः । पुण्यैः । ते जिनेश्वरं । पारणां । अफारयत् व्यधापयत् । डुरम् करणे णिता. “श्रद्धा शतिर्मतिर्विज्ञानमलुब्धता दया क्षांतिः । यत्यने सप्तगुणास्तं दातार प्रसिति । स्थापनमुच्च स्थान पादोदकमर्चन प्रणाम । पाकायहृदयशुद्धिरेषणशुद्धिश्च नयविध पुण्य" ॥२१॥ मा० १०-दीक्षा के बाद राजगृह नामक राजधानी के प्रसिद्ध वृपमसेन नामक राजा ने पूर्वापार्जित पुण्यवान् होकर भ्रवादि सप्त गुणों से युक्त नयधाभक्ति के द्वारा मुनिसुव्रत स्वामी को पारण कराया । २१ ॥ आश्रयपंचकमभृदथरनवृष्टिगच्छादितांचरतला च लतांतवृष्टिः । ध्यातश्रुतीवियुधदुंदुभिनिरवनाहोदानस्वनी सुरभिशीतलमंदवायुः॥२२॥ आथर्येत्यादि । अथ पारणानंतरे। रनवृष्टिः रत्नानां कृषिस्तथोक्ता। आच्छादिता- परतला भंपरस्प तलमंघरसलं माध्यादितमं परतलं यया सा तपोक्ता पिहिताकाश- ।

अष्टमः सर्गः। प्रदेशा। लतांतवृष्टिः लतांतानां पृष्टिस्तथोक्तापुष्पवृधिः। "पुष्पं सुमनस: फुल लतोतं प्रसपो- दमम्" इति धनंजयः । व्यासच ती व्यासान तयो याभ्यां तो तथोक्तो व्यासजगजनश्रोत्री। विद्युधदुंदुमिनिस्वनाहोदानस्वनी ढुंदुभीनां निस्वनः दुंदुभिनिस्वगः आहादानमितिस्वनः माहादानस्वनः दुदु'मिनिस्वनय महोदानस्वनश्च दुंदुभिनिस्वनाहोदानस्वनी विधानां दुमिनिःस्वनाहोदानस्वनौ तथोक्ती देवदु'दुमिध्वनिः आश्चर्यरूपं दानमिति उपलक्षणाद- दुभुतरूपमात्रमित्यादि प्रशंसाध्यनिः । सुरभिशीतलमंदवायुः मन्दश्यासौघायुधमन्यायुःशी तलवासी मंद्यायुश्च तथोक्ती सुरभिचासो शीतलमंदवायुश्चेति पुनः कसः । शेत्यसोरभ्यमांधगुणसहितमानः। इत्याश्चर्यपंचकं आश्चर्याणां पंच तयोगतं अमन अभवत् भू सत्तायां लुङ॥२२॥ भा० ० -पारण के क्षान्तर रतवृष्टि, नाफाश को भाच्छन्न करने वाली पुष्पवृष्टि चारो तरफ गूजने वाली देवदुन्दुमि ध्वनि “दा फैसा दान है" ऐसी आश्चर्य सूचक ध्वनि तथा शीतल मन्द सुगन्ध घायु का प्रवाहित होना ये पांच गाश्चर्य-मयी घटनाये हुई । २२॥ मुनिपरिबृढो निवत्यैवं तनुस्थितिमुत्तमां मृदुमधुरयावाचाशास्यं विधाय यथोचितं। मुनिसमुदयैरक्षित्रातैश्च पौरनृणामनुव्रजितचरमः पुण्याग्गय गजेंद्रगतिययौ २३ मुनीत्यादि । मुनिपरिवृतः मुगीनां परिवृहस्मयोक्तः मुनिनाथः प्रभुःपरियोऽ धिपः" इत्यमरः । उत्तमाम् योग्यां। तनुस्थिति तो स्थिनिस्तमुस्मितिः ता हायस्थिति। उपचरितत्यादादारमित्यर्थः। एवं इति। निर्वयं गिर्वर्तन पूर्व० एया। मृदुमधुरया मृद्रो चासो मधुरा मृदुमधुरा तया मदुमनोहरकरया। चाचा यो। यथोचित उचिम. मनतिकम्प योनितं यथायोग्यं । माशास्य धाशास्तुं योग्य माशास्य धाशोधांद। विधाय एन्या । मुनिसमुत्यैः मुनीनां समुदयास्तयोजास्त मुनिमापदः। पौरा पुरे भवा: पौरा: पोराश्च तं नाश्च पोरनरास्ने पुरजगागां। भक्षियात: मां माना मक्षियाताः। भनुमशिनचरमः अनुपम्यतस्म गनुपूजितः अनुप्रजिनानामो यस्य सः अनुपातपधामागः । गजेंद्रगति: गजानां दस्तपोक्तः गजेन्द्रम्य गनियम्य स: द. गमन इत्यर्थः। पुण्यारण्य पुण्य च तत् मरण्य' च पुष्पार तनिलयायाचित्र नीलयन । पयो जगाम 1 या प्रापणे लिए ॥ २३ ॥ मा० मुनिसुनतम्यागो ने पो भपनी शरीर-शिनि के हेतु उपाहारमन कर तथा सुमधुरवाणी से योचित माशोगांद देवर मुनिगम मोर पुरयामियों के मंत्र. समूह से अनुगर दोते हुए गजेन्द्र गति से तोयन का प्रमान किया ।२३।

मुनिसुव्रतकाव्यम् । चातेत्यादि। ग्रीष्मः निदाघः। वाताश्यवेगजरजापिहितानमार्ग वातश्च अश्वाश्च घाताश्चास्तपां वेगो पाताश्ववेगस्तस्माजायतेस्म वाताश्ववेगज तच्च तत् रजश्व घाताश्वेगजरजः तेन पिहितस्तथोक्तः अभूस्य भागोऽभूभागः वातावोगजरजसा पिहि- ताभुभागो यस्मिन् कर्मणि तत् वातयेगोत्यवाजिवेगजनितधूल्याच्छादितगगनप्रदेशं यथा तथा। मागत्य एत्य । सवं सकलं । अपहाय अपहानं पूर्व० परित्यज्य । द्रुतस्य यतिस्म द्रुतस्तस्य विनष्टस्य । "चिलीनशीघ्रविद्रायणेषु द्रुतं” इति नानार्थरनकोशे। मयोः वसंतस्य। पिफभृगयलानि पिकाच भृगाश्च पिकभृगास्त एव यलामि तथोक्तानि फोकिलभमरसन्यानि । तुतोद व्यथयतिस्म । तुदि व्यथने लिट् । केलियनानि केल्या वनानि तथोक्तानि क्रीडावनानि । अधाक्षीत् दहतिस्म दह भस्मोफरणे लुङ् । पुंडरीक सितांबुज श्वेतच्छत्रं च "पुडरीक सितांभोजमथ रकसरोरहे" इत्यमरः। रजतिस्म पमंज को भंगे"स्मे च लट्" इति भूतेऽर्थे स्मयोगालट् ॥२॥ मा० अ०-इस ग्रीष्म ऋतु ने और सयों को दवा तथा घोड़ों के वेग से उड़ी हुई धूलि से थाम्रयन के अप्रभागों को आच्छादित करती हुई गाकर नष्ट हुए वसन्त की कायल भमर तथा यनरूपिणी सेना को पीड़ित किया, फीडावन को जलाया तथा कमलों को भी तोड़ मरोड़ दिया ।२। तद्भाविदुःखमिव वीक्षितुमक्षमत्वात क्षिप्रं मधौ ब्रजति तीवनिदाघयोगात् ॥ संतप्यमानमखिल तरुवल्लिजातं तापचरीव ददृशे मधुविप्रयोगात् ॥३॥ तदित्यादि। ताधिदु.ख मविष्यतीति भावि मापि च तत् दुःसं च माविधुः तस्य भाविद पं तथोकम् भविष्यदुःखं । वीक्षितु पीक्षणाय धीक्षितुं दए। अक्षमत्वादिय मक्षमस्य भायोऽक्षमत्वं तस्मात् असमर्थत्वादिव । मधी घसते । क्षिन शीघ्रा मजति सति मजतीति प्रजन तस्मिन् गच्छति सति । तीयनिदाघयोगात् तीयवासी निदाघध तीपनिदायत्तस्य यमस्तीनियोगस्तस्मात् निष्ठरोमसंवाद । संतप्यमान। मपिल समस्त । तस्यालिजात तरवध पलपश्य तस्यलयस्तासां जा वृक्षलता "जात्योधजन्मसु जातम्" इति नानार्यरतकोशे। मधुविप्रयोगात् मधोधिप्रयोगस्तयोक- स्तस्मात् पसंतवियोगात् । तापयरीव तापेन युक्तो ज्वरस्तापज्यरः सेोऽस्याऽस्तीति वयोकः स इति घा। दहशे दश्यतेस्म द प्रेक्षणे कर्मणि लिए ॥३॥ मा० म०-प्रचण्ड प्रोम के योग से मापी दुःष को देखने में मसमर्थ होने के कारण घसन्त के पट चले जाने पर समो पेड़ पौधे सन्तप्त होते हुए मानो पसन्त के पियोग से उपर-प्रस्त से दीखने लगे। - मवमः सर्गः। 'ग्रीमे विदीर्णायनभूमिविशालदर्यो रेजुः कनकनकशेवधिदीप्रगर्भाः ॥ मान्याभिरुनकरपादहतेः प्रवेष्टुंक्लप्तानि कुण्डशतवद् वनदेवताभिः ॥४॥ ग्रीमे इत्यादि । ग्रीष्मे निदाधे । कनकनकशेवधिदीप्रगर्भाः कनतीति फनंति तानि कनकानि येपुते कनत्कन कास्ते च ते शेवधयश्च तपोका दोप्यत इत्येवं शोलो दोपः फमत्कनकशेवधिभिःप्रो गर्मो यासा तास्तथोक्ताः ज्यलटसुवर्णयुकनिधिभिः प्रकाश्यदंत. र्भागाः । विदीर्णवनभूमिविशालदर्यः घनत्य भूमिर्वनभूमिः विशालाच ता दर्यश्च विशा- लदर्यः विदीर्णा चासो धनभूमिश्च तथोक्ता तस्या विशालपर्यस्तयोकाः विभिन्ना- •रण्यावनिविशालरेषाः। मान्यामिः मानितुं योग्या माल्यास्तामिः पूज्यामिः। धनदेवतामिः घनस्य देवता बनदेवताः नाभिः न्यंतरदेवताभिः । उपकरपादहतः कराश्च पादान करणादा: उपाच ते फरणादाश्च तथोक्ताः पक्षे उमाः कराः यस्य सः उप्रकरः सूर्यस्तस्य पादाः रश्मयस्तेषां इति: उपकरपादहतिस्तस्याः निष्ठरहस्तपाद्घातात् रविकिरणोपहते. र्षा । "पलिहस्तांशव' फराः पादारभ्यप्रितुर्याशा ति उभयत्राप्यमरः । प्रवेष्टुं निपतितुं। पलप्सोग्निशतात् अग्नी फुडानि अग्निकुंदामि पल्मानि च तान्यग्निकुंडानि च तपातानि पलप्ताग्निदान शानि तथाकानि सानिय विरचितानलकुंडानेकवत् । रेजुः यभुः। राज दोनो लिट् उत्प्रेक्षा ॥ ४ ॥ मा० No-प्रोष्म ऋतु में चमकती हुई सुवर्ण-निधियों से समुद्भासित गर्मघाली विदीर्ण धनभूमिको विशाल पन्दरायें मानो सूर्य के पादाघात अथवा किरणों के माकपण से अग्निकुण्डवत् गीचे को गोर प्रवेश करने के समान सोमने लगी । ४। मिथ्यात्वकर्मकृतयाशुभयेव दृष्ट्या जंतुबजाः परमतत्त्वधियाप्यतत्त्वं ॥ ग्रैप्म्या तृपा मृगगणामृगतृपिणकांभः सेदुनंदीरयधिया वत धावमानाः॥५॥ मिथ्यात्वेत्यादि । जंतुबमा: तूनां प्रजास्तयोकाः जीवसमूहाः। प्रेषया प्रोमे मया प्रेमो तया निदाघजातया तृपा पिपासया "उदन्यातु पिपासातूट्" इत्यमरः। मृग- - सृष्णिकांभः मृगाणां तृष्णा तथोक्ता मृगतृप्प मृगणिकति स्वार्थे फ: मृगतृप्णिकांमः ; मरीचिकाजल सधोकम् । मिध्यात्वकर्मकृतया मिथ्याभायो मिथ्यात्यं तय तत् धर्म । मिथ्यात्यकर्मणा कता तया द्रव्यमिध्यात्यविदितया । भशुमया भप्रशस्तरुपया। दूष्टया "पा भार्यानिध्यात्पनेत्यर्थः । भतरयमपि न तत्वमतत्त्वमपि तत्त्वाभासमपि। परमतरर. घिपा परम तत् तस्य च परमतत्त्वं परमतत्यमितिधीस्तयोका तया सद्भुतपस्विति उदया। पायमामा धार्यत इति पायमानाः पलापमानाः । सेरिय यथा दुःलायतस्म।

मुनिसुव्रत काव्यम् । तथा मृगगणा: मृगाणां गणास्तथोक्ताः मृगसमूदाः। नदीरयधिया नद्या रयो नदीरयः नदीरय इति धीः नदीरयधोस्तया सरित्प्रवाह इति युद्धया । धावमानाः पलायमानाः संतः। सेदुः दुःखायंतेस्म पद्ल विशरणगत्यवसादनेषु लिट् । यत त ॥ ५ ॥ भा० अ०-जिस प्रकार सभी जीवगण द्रव्य-मित्थ्यात्व से किये गये भाव-मित्थ्यात्व के कारण मतत्त्व को भी परमतत्त्व के विचार से अपनाते हैं, उसी प्रकार परिण-समूह ग्रीष्म की तृपा से प्यासे होकर मृगतृष्णा के जल की ओर नदी की धारा समझ कर दौड़.२ कर दुःखित होते हैं । ५। . तृष्णातुरः स्वयमपिघुमणिर्बभूव संतापवांश्च समयेऽत्र न चेत्कराग्रैः ।। पंकाविलान्यपि जलान्यपिवकिमर्थं प्रालेयशैलतटमध्युषितश्च करमात ॥६॥ . तृष्णातुर इत्यादि। अन समये अस्मिन्निदाघे। पुमणिः सूर्यः । स्वयमपि । तृष्णा. तुरः तृणया मातुरस्तथोक्तः तृप्णापीडितः। संतापयांश्च संतापोऽस्यास्तीति संताप- पान व समुश्चयार्थः संतापयुक्तः । यभूव भवतिस्म 1 भ सत्तायां लिट् । न चेत् न भवति । फराग: करस्यागाणि फरागाणि तः किरणाः हस्तान। पंकाविलानि पंकनाविलानि .कर्दमकलुपाणि । जलान्यपि सलिलान्यपि। किमर्थकस्मै इदं किमर्थ। अपिस्त अपात्। अशो. पदिति यावत्। पा पाने लुङ् । प्रालेयशैलसर प्रालयसहितश्शेलः प्रालेयशैलस्तस्य तट सथोक्त हिमाचलसानु । कस्मात फारणात् । अध्युषितः अधिवसतिस्मेति तथोक्तः अधिष्ठितः उत्तरायणगत इत्याशयः । “घसेाऽनूपाध्याङ्" इत्याधारे द्वितीया । उत्प्रेक्षा ॥६॥ मा० १०-इस ग्रीष्म ऋतु में स्वयं सूर्य भी तुपातुर तथा सन्तापदग्ध हो गये, नहीं तो अपनी किरणों से ये गदले जलों को क्यों पीते अर्थात् सुखाते तथा हिमालय पर्वत के शिखरारूढ़ क्यों होते।६। शंकामयं जनितवान् जगतो वनांत:किं पाटलाः कुसुमिता:दवपावका:किं । किंमल्लिकाः स्तिमितभंगगणाः किमेते शांतोल्मका विशदभरमचया इतीत्थं।७॥ शंकामित्यादि । कुसुमिताः कुसुमानि संजातान्येषामिति तथोक्ताः संात. पुष्पयुताः । पाटलाः पाटलवृक्षाः। किं किन्नु । देवपायकाः दवाश्च ते पायाश्च तथोकाः दाचामयः । किं किंवा । स्तिमितभृगगणाः भृगानां गणा भृगगणाः स्तिमितो भूग. गणो यासु तास्तथोक्ता: निश्चलभृगकुलमिलिताः । "स्तिमिताया निश्चलो इति धैजयंती। मलिकाः मलिफानामपुष्पाणि | "मलिकाः बहुलं श्लुयपुप्पमाले" इति यहुल-प्रत्ययस्य 'श्लुक मलिकापुष्पाणि किंवा । एते इमे। शांताल्मुकाः शांतमुलमुर्क पपां ते तपोक्ताः - - नवमः १६७ स शांतांगाराः। "अलातमुल्मुफम्" इत्यमरः । विशदमस्मचयाः विशदानि च तानि भस्मानि च विशदभस्मानि तेषां चयाः शुनभूतिसमूहाः किंधा । इत्थं मनेन प्रकारेण इत्य । अयं एषः । घनांत: घनस्यांतर्वनांतः घनमध्ये अव्ययं । अयं प्रीप्मः । जगतः लोकस्य । शंकां चितक। "शंका नासे वितर्फे च” इति विश्वः । जनितवान् जनयतिस्म जनितवान् । जनैङ् प्रादुर्भावे णिशंतात् कवतु प्रत्ययः। संशयालंकारः ॥ ७॥ भा०प०-धन के योच में खिले हुए गुलाम क्या धनाग्नि है, निश्चल भुमर-समूह घाले मल्लिका पुष्प शान्त अंगार पाले भस्म-समूह है पया! इत्यादि शंकाएं इस ग्रीष्म ऋतु मे लोगों के मन में उत्पन्न करी।। संतप्तरेणुनिकरं कृपयेव वाता निन्युः सुशीतलजला धुनदी निदाचें ॥ एकांततप्तवसुधास्थितिभीतभीता द्रागद्रवन्निव तदा मृगतृपिणकौघाः॥ संतप्तत्यादि । निदाघे प्रोमे। पाता. बाययः । संतप्तरेणुनिकर संतप्यतेस्म संतप्तास्ते च ते रेणवश्च संतप्तरेणवस्तेषां निकरस्तथोक्तस्तं सम्यक्तप्तधूलिसमूह । रुपयेच अनुकंपयेव। शीतलजला शीतल जल यस्यां तां । धु नदीं दियो नदी धु नदी तां सुरगंगां । निन्युः प्रापयंतिस्म । णोञ् प्रापणे लिट् । तदा तत्समये। मृगतृष्णिकौघः मृगतृष्णिकानां शोधस्तथोक्तः । "मोघो घृदेऽभसा रये” इत्यमरः मरीचिकाप्रवाहः । एकांततप्तवसुधास्थितिमीतभीताः एकांतं तप्ता एकांनतप्ता सा चासौ घसुधा च एकांततप्तवसुधा तस्यां चितिः तथोक्ता भृशं भौता: भीतमोता: एकांततप्तवसुधा. स्वित्याः भौतमीतास्ताकाः अत्यंततप्तभूमिस्सित्याः त्रस्त मस्ताः भृशार्थे निः। अद्वन् शीन भवन अधावन् । हुगतौ र ॥ ८ ॥ भा००-मानो कपा फरफे हवामों ने ग्रीष्म ऋतु में सन्तप्त धूलियों को अत्यन्त शीतल जलपाली गंगा के पास पहुंचा दिया। उसी समय अतिशय तपी हुई पृथ्वी पर रहने से मानों याहुत डर कर मृगलाई भट मॉो सो ज्ञात हुई।८। हा हंत तृड्भरविदीर्णागला मृगालिः पंकाविलोपासलिलं बनपल्यलानां ।। अल्प कथंचिदपिबत्कृपयावगम्य केनाप्युपाहृतमिवोदकपायतोय || हेत्यादि । तृड्भरविदीर्णगला तृपो भरस्तथोक्तः विदरतिस्म विदीर्णः तुइ. भरैण घिदीर्णो गलो यस्यास्सा तथाका तृषातिशयेन स्फुटितर्फठा। मृगालिः मृगाणा- मालिस्तथोक्ता मृगसमूहः । घगपल्यलानां घनत्य पल्बलानि धनपल्यनानि तपां भरण्याएसरसा "पल्पल घाल्पसर इत्यमरः । अल्पं स्तोक पंकाविलोपसल्लिं मुनिसुव्रतकाव्यम्। .१६८ पंफेनापिलं पंकापिलं पंकाचिलं च तदुष्णं च तथोकम् तत्सलिलं च पंकाविलाणसलिलं च कर्दमेनानच्छोप्णजल । फेनापि येन केनापि सत्पुरुषेण । अवगम्य अवगमनं पूर्व० ज्ञात्या। कृपया यया। उपाहतं उपाहियतेस्म उपाहत । उद्धकपायतोयं उद्धश्चासौ कपायच उपायस्तस्य तायमिव । कथंचित् फेनचित्प्रकारेण । अपियत् अपात् पा पाने लङ् ॥६॥ भा० १०-प्यास की अधिकता से स्फुटित कण्ठवाले मृग-समूह ने धनकी यायही के गर्म जल को कृपा करके किसी सजन से दिये गये गर्म कडुए काढ़े के समान किसी तरह पिया || धात्रीदरीमुखगतैर्विपिनस्थलीनां व्यादीर्णवेणुगलितैर्मणिभिविरेजे ॥ मा लोकमित्र शिखिनामम पीडयेति दीनं प्रकाशितरदेव दिनाधिपाय ॥१०॥ घात्रीत्यादि । धात्री वसुधा। उपमाता वा । “धात्री स्यादुपमातापि क्षितिरप्यामल. पपि इत्यमरः । व्यायीर्णवेणुगलितं. ध्यादीर्यम्तेम्म म्यादीर्णास्ते च ते घेणवश्व सयोकास्तेभ्यः गलितास्तैः स्फुटितवंशतः पतिताः । विपिनस्थलीनां बिपिनस्य स्थल्यस्तथोक्तास्तासां विपिनस्थलीनां अरण्यप्रदेशानां। दरीमुखगतैः दर्या मुख दरीमुखें तद्गच्छतिस्म दरीमुखगतास्तैः दरी विवरप्राप्त । मौक्तिफैः मणिभिः । लोकमित्र' लोकस्य मित्रं तथोक्त तस्य संबोधनं हे लोफबंधो भानो। मम मे । शिदिनः शिखास्त्येषां इति शिखिनस्तान पुत्रान् वृक्षान्या "शिषी पुत्र वलीवह शरे केतुग्रहे दुमे” इति विश्वः। मा पीडयेति मा योधयेति । पोड गहने लोट । दिनाधिपाय दिनस्याधिपस्तथोक्तस्तस्मै सूर्याय। दीनं सदैन्यं यथा तथा। प्रकाशितरदेव प्रकाशिता रदा यस्यास्सा तथोक्ता प्रकटितदंतेव । विरजे धकाशे। राज दीप्तौ लिट् ॥ उत्प्रेक्षा ।१०। भा००-वसुधा (अथवा उपमाता) फटे हुए बांस से गिरे हुए तथा दरार के किनारे पर पड़े हुए मोतियों के कारण -हे सूर्य ! मेरे बच्चों ( अथवा वृक्षों को) मत पीड़ित करें पतदर्थ मानों सूर्य को प्रार्थना-सूचत दांत दिखलाती कोसो ज्ञात हुई । १० । संतापिताः स्वरिपुराहुमहारुपेव चंडांशुना सदृशराहुकुलाः फणीन्दाः॥ शंके गतान्यशरणाप्यलुठंरतदीये पादाय एव कृतवक्रपुटप्रमोकाः ॥११॥ संतापिता इत्यादि। चंडांशुना चंडा: संशवो यस्य सः तथोक्तस्तेन भास्करण । स्परिपुराहुमहारष स्वस्य रिपुः स्वरिपुः स चासो राहुश्च स्वरिपुराहुः महतो चासो. रुट् च महास्ट स्परिपुराही जनिता महारट् तथा निजशत्रु राहत्यमहामोधेन । संतापिताः नवमः सर्गः। सन्ताप्यन्तेस्म सन्तापिताः सम्माधिताः । सदशराहुकुला: रादोः कुलं राहुकुलं राहुफुलेन सदृशं फुलं येषां ते तथोक्तरः राहुपुलसमवंशाः। गतान्यशरणा: अन्यच तत् शरणं च थायशरणं गतं अन्यशरणं येषां ते तधोक्ताः अप्राप्तापरक्षकाः । "शारणं गृहरक्षित्रोः' इत्यमरः । कृतवत्पुटप्रमोका: प्रियतेस्म कुना वस्त्रस्य पुर्ट तस्य प्रमाको बत्रपुटप्रमोफः एता पतपुरप्रमोको यस्ते विहितवदनपुटविषसनाः । फणींद्राः फणीनामिंद्रास्तथोकाः महासर्पाः । तदीये तस्येदं तदीयं तस्मिन् तदीये "दोश्छः" इति छः सूर्यसंबंधिनि। पादाप्रमेव पादानां किरणानामग्न तस्मिन् चरणकिरणाने पप । व्यलुटन लुठतिरुम लुठ प्रतिघाते लड् ॥११॥ भा० ३०- ग्रीष्म सम्बन्धी प्रखर धूप में अनन्य-गतिक होकर सर्प-समूह मुंह खोले लोटते हुए मानो शत्रु भून राहु जन्य क्रोध से सूर्य के द्वारा सन्तापित किये जाफर राहु कुल के समान प्रतीत होते थे। ११ । इत्येप तीव्रतरभावनिपीड्यमाननिःशेषजीवनिवहोऽपि निदाघकालः ।। निन्येऽत्र जीवनिवहैः सुखमात्तयोगः पुण्ये जगद्गुरुरवास्थित यत्र शैले॥१२॥ इतीत्यादि। पुण्ये पुण्यहेतुत्वादेव पुण्यं तस्मिन पवित्र । यत्र यस्मिन्यत्र । शैले कस्मिंश्चित् पर्वते। आत्तयोग: आधीयतेस्म आत्तः आत्तो योगो येन सः स्थीरतध्यानः । "योगः सन्नहनोपायध्यानसंगतियुक्ति"इत्यमरः। जगद्गराः जगतां गुरुः तथोक्त लोक- गुरुः। अपास्थित तिष्ठतिस्म छा गतिनिवृत्ती लुड्। “संविप्रचात् तितड्। अत्र अस्मिन् गिरी। जीनिषदः नीधागां निवहा जीवनियहास्तैः प्राणिसमूहः। इति एवं प्रकारेण । तीवतरभाव. निपीड्यमाननिःशेषजीवनियहोऽपि प्रकृष्टस्तीयस्तीवतरः स चासौभाषश्च तीवतरमायः निपी. ध्यत इति निपं ध्यमानः तीस्तरमायेन मिपीध्यमानस्तथोक्तः जीयानां निघहो जीवनिधहः नि:शेपश्चासौ जीवनिवहन्ध निश्शेषजीवनिवहः तीव्रतरभाषनिपोऽयमानो नि:शेषजीयनि. घहो यस्य सः निष्ठुरस्वभावेन याध्यमानस्थावरजंगमाणिसमूहयुक्तोऽपि । एपः अयं । निदाघकालः निदाघश्चासौ फालश्च निदाघकाल प्रोप्मकालः। सुखं यथा तथा। निन्ये नीयतेस्म । पीम्मापणे लिट् ॥ १२ ॥ भा० १०-जिस गविन पर्वत पर ध्यागमा जगहरु मुनिगण रहते थे समो जीयों को दूसरी जगह निष्ठुर भाव से सत्तप्त किये हुई इस मीपण प्रतु को भी उस पर्वत पर वर्ग सुपपूर्वक बिताते थे ।१२।

. मुनिसुनतकाव्यम् । १७० गंभीरगर्जितभरादथ कंपमानचक्रांगबालविरहिव्रजमन्दकालः ॥ छिद्राविशत्फणिसनृत्यमयूरयूथमुन्मीलदोष्ठपुटचातकमुहभृव॥१३॥ गंभीरेत्यादि । अथ निदाघकालावसानानंतरे। अब्दकाल: अपो ददातीत्यन्दः स चासो फालश्च तथोक्तः वर्षाकालः । गंभोरगर्जितरात् गंभीरं च तत् गर्जितं च गंभीरगर्जितं तस्य भरो गंभीरगर्जितभरस्तस्मात् गंभीरस्तनिताशयात् । कंपमानचकांगवालविरविज चकांगानां पाला; चक्रांगगलाः विरहोऽस्त्येषामिति विरहिणः चक्रांगयालाश्च विरहि- णश्च चक्रांगवालविरहिणस्तेषां जस्तथोक्त: कंपत इति कंपमानः कंपमानश्चक्रांगयाल. विरहिवजो यस्मिन् कर्मणि तत् तथोक्त भयविचलद्धं सपातविरहिजनसमूहसहितं यथा भवति तथा । छिद्राविशत्फणिसनृत्यमयूरयूयं माविशतीत्याविशतः फणास्त्येषा- मिति फणिनः छिद्रमाविशंतश्छिद्राविशंतस्ते च ते फणिनश्च छिद्राविशत्फणिनः नृत्येन सद घर्तत इति सनृत्यास्ते च ते मयूराश्व सनृत्यमयूराः छिद्राविशत्कणिनश्च सनृत्यमयूरा- श्च तथोक्ताः छिद्राविशत्फणिसनृत्यमयूराणां यूथं यस्मिन् कर्मणि तथोक्त रंध्रप्रविशत्सु. नृत्यमयूरनियह यथा यया । उन्मोलदोष्ठपुटचातर्फ उन्मीलत इत्युन्मीलंती ओष्ठयोः पुटायोष्ठपुटी उन्मीलंतायोष्ठपुटी येषां ते तथोक्ता उन्मीलदोष्ठपुटाश्चातका यस्मिन्कर्म- णि तत् तथोक्त शिथिलीमवदोष्ठ चातक पक्षे विशेषयुक्त यथा तथा। उधभूय उदेतिस्म भूसत्तायां लिट् ॥ १३॥ भा००-इसके बाद गंभीर गर्जन से हंस-शावकों को तथा वियोगी जनों को कमिगत, विधुर सो को विल में घुसने के लिये वाध्य, मयूर समूह को नृत्य-मग्न तथा चातकों के गधर पुट को उन्मीलित करती हुई वर्षा ऋतु का प्रादुर्भाव हुआ । १३ ॥ प्राजीजनत् प्रसृतसर्वसमुद्रदेशाः शक्रेण सिंधुजलमग्ननगग्रहाय ॥ क्षिप्तोरुजालधिपणां पुनरुत्पतन्तः खनीयमाननगशेमुपिकां नवाब्दाः।१४। प्राजीजनदित्यादि । प्रसृतसर्वसमुद्रदेशाः प्रस्त्रियंतस्म प्रसृताः समुद्रस्य देशाः समुद्रदेशाः सर्वे च ते समुद्रदेशाश्च सर्वसमुद्रदेशा: प्रसृताः सर्वसमुद्रदेशा येस्ते तथोक्ताः व्याससमस्तसागरप्रदेशलहिताः। नवान्दाः नय च ते अन्दाश्च नचाब्दाः नूतनमेघाः । शकण निर्जरवरेण । सिंघुजलमग्ननगग्रहाय सिंधोर्जलं सिंधुजलं मज्जतिरुम मग्नाः सिंधुजले मनास्तथोक्ताः सिंधुजलमग्नाश्च ते नगाश्च तथोक्तास्तेषां प्रहः सिंधुगलमग्ननगप्रस्तस्मै समुद्रसलिलमग्नपर्वतग्रहणाय । क्षिप्तोरुजालधिपणां क्षिप्यतेस्म क्षिप्तं उस च तत् जालं च उरुजालं क्षिप्त च तस् उरुजालं च क्षिप्तोरुजाले तदिति धिपणा क्षितो.

१७१ नयमः सर्गः। राजालधिषणा तां निक्षिप्तपृयुलनायबुद्धि । प्राजीजनत् प्राजनयन् जनैङ् प्रादुर्भाव णि ताल्लुङ । पुनः भूयः। उत्पततः उदातंतोत्युत्पततः उपर्यागच्छतः । गवान्दाः प्रत्य- प्रांधुदाःख व्योग। नीयमाननगमुपिका नीयंत इति नीयमानास्ते च ते नगाश्च नीयमान- नगाः त इति शेमुपिका नोयमाननगशेमुपिका तो आकृपयमाणपर्वतबुद्धि । प्राजीजनत् प्राग्माययतिस्म ॥ १४ ॥ भा० ० --मानों सभी सामुद्रिक प्रदेशों में उमड़े हुए ननन मेघों ने समुद्र जल में मन पर्वतों को निकालने के लिये इन्द्र के द्वारा फेंके गये महाजाल की तथा ऊपर की ओर उठे हुए मेघों ने भाकाश को गोर पर्वत को बैंचने को प्रवीणता को प्रकटिन किया। १४॥ नो विदा साभ्रमुपराम्बुनिधेरटंती विद्युत्वतां किमु ततिर्वडवानलार्ता ॥ वादेतिसंततिरत धुनदीक्षणार्थ व्यारूढपाशिवनिता मकरीततिर्वा ॥१५॥ नो इत्यादि। अपरानिधेः अपरश्चासाचंयुनिधिश्च तपोकस्तस्मात् पश्चिमयाद.. पतेः सकाशात् । मन' सुरथम। अती अटंनीत्यरंतो गच्छंती। सा दृश्यमाना। विद्यु त्वतां विद्यु एस्ट्येषामिति विद्यु त्यतस्तेषां विधु त्यता भत्र मत्यर्थ इति जस्त्वाभावः। ततिः राजिः। किमु स्यावा । यडवानलार्ता बडवानलेनार्ता वनाग्निगाधिता। वादंतिसंततिः पारि विद्यमाना देतिनो चाईतिनस्तेषांसंततिः दन्तोपशोभितो जलगजसमूहः । उत भवेटिक'। घुन. दीक्षणार्थ दिवो नदी घुनही तस्याईक्षांधु नदीक्षणं धु नदोक्षणाय तयोक' गंगानदौदर्शनाय । पाकढपाशिवनिता: व्याहव्यन्तेस्म व्यारूढ: पाशोऽस्यास्तीति पाशी तस्य वनिता पाशि. पनिताः व्यारूढाः पाशियनिताः यस्यास्सा तयोका वाहनत्वादारूढचरुणस्त्रीसमेता। मकरीतति: मकरीणां ततिस्तपोका मकरस्रोनिकरो वेति। नाविन न जानीमः । विद्. शाने लः । “विदो लटो वा” इति मसो मादेशः। संशयालंकारः॥ १५॥ मा० १०-मैं नहीं समझता कि पश्चिम समुद्र से आकाश तक चक्कर लगाती हुई विद्युत्पंक्तियाँ है । अथवा पाडयाग्नि से पीड़ित हस्तिसमूह है ? या आकाश गंगा को देखने के लिये घरुण की त्रियों से सवारी को गयो मगरों की स्त्रियों का झुंड तो नहीं है॥ १५॥ नीरंध्रमभ्रपटलं पिहिताखिला भेजेतरां विधृतदीर्घतरांवुधारं ॥ देव्याः क्षितरुपरि लंबितदीर्घमुक्तामा विशालमिव धातृकृतं बितानं ।।१६।। मीरंभ्रमित्यादि । विहिताखिलघु पिधीयतेस्म पिहिता "धाम् इति ह्यादेशः ।

। - मुनिसुतकाव्यम् । "धानोराः इत्यपेरफारलेपः असिला चासो द्योश्च अविलयौः पिहिता अखिलधौर्येन मत् तथोक्त गपोऽत्रो हुस्यः" इति हुस्व:माच्छादितसमस्ताकाश विधृनदीर्घनरावुधार प्रष्टा दीर्घा दीर्घतरा अंधुनो धारा अंधुधारा दीर्घतगनासाधुधाराव तथोक्ता विधीयतेस्म विधना विधता दोर्धतरायुधाग येग तथोक्त भृशाधिकायनजलधारं । नौरंधु रंधानिर्गत नीरंधू निच्छिद्र। अभपटलं प्रमाणां पटलं तथोक्त मेघसमूहः। क्षितः भूम्याः। देव्याः देयताया: भूदेव्याः । उपरि भने। धातृरून धाया एतं महानिर्मितं। लंयितदीर्घमुक्तामा लंग्यतेम्म लविता मुक्तानां माला मुकामाला दीर्या कामी मुनामाला च दीर्घमुक्कामाला लगिता दीर्घमुक्कामाला यस्य तन्। विशालं विस्तीर्ण । वितानमिय चंद्रोषमानमिय। भ्रे जैतां प्राएं भेजे जैनगं भाजि घर्चिदीमा लिट् । “योधिमा म नग्" इति तरए प्रत्ययः । अपयेदित्यादिनाम्प्रत्ययः उत्प्रेक्षा ॥ १६ ॥ मा० अ०-सास्त नभा-मण्डल का भाच्छन्न किये हुगा, यडी प्रसर जल धाग फेर धारण किये हुमा, भगवती पृथ्वी के ऊपर लटकी हुई पडी २ मुका माला याला ब्रह्मा के द्वारा फैलाये गये विशाल छिरहित तापू के समान मेघ मण्डल मालूम पडना पा६॥ रेजुः प्रसृत्य जलधि परितोऽप्यशेपं मेघा मुहुर्मुहुरभिप्रसृताभ्रभागाः ॥ श्रादानवर्पणमिपात्पयसां पयोधि व्योमापि मान्त इव संशयिताशयेन ॥१७॥ रेजुरित्यादि। भशेष ग शेष भशेष मयलं । जलधिं जलागि धीयतेस्म अलधिस्न समुपरितःसर्यतः । प्रसृपप्रमाण पूर्य या मुहुः भूया भूगः। मिनामुमागाः मगितः प्रसूताः मम्प भागा: मुमागा: पिता भुमागा येम्ने सोना गमिपा- मगगमप्रदेशयुक्ताः। मेघा: जलधारः । पगमा जलानां । भादानयर्पणमाम् मादान प पर्वन च तपोभादामयर्पण एय मिपं मादागयर्पणमि तम्मात् म्योपरणपण. এরা। থিসাইন মধrn নথি: শাহাথিসামাল rি. नागिमार्पण) गाछि जलधि । ध्यामावि दिया | माता मनोनिमांतन मामाने शन: प्रमिनि कतिपय ! रेजु पनुः । गज दातो लिट् उन्प्रेक्षा ॥ १० ॥ मा. म-मार समुद्र के चारो तरफ यार पार पा र माinमण्डल का रे हुए मेघ मलों को लेने गौर वर्षण पाने के बागाने में मंदिप मित्त हो मानो मोर भाषाश को मापने है।।१७। कांनाभूमिषु विदीर्गदर्गविधानदेदीप्यमानमणिगशिमुपापविष्टाः ॥ भंगारपुंजमनमा क्लिमंयमानाः शाग्यामृगाःगुशुभिरेनरष्टियाः॥१८॥ - १७३ नवमः सर्गः। फांमारेत्यादि । कांतारभूमिषु कांताराणां भूमय: कांताग्भूमय: नासु यरण्यभूमिपु। मववृष्टिशीर्णाः नया चासो घृष्टिश्च मयवृष्टिस्तया शीर्णाः भूननवण कदयिताः । विदीर्ण- हरी मिधानदेदीप्यमानमणिराशिं विदीर्णाध ता दर्यश्य विदीर्णदर्यदेदीप्यंत इति देदीप्य- मानास्ते च से मणयश्च तथोक्ता विदीर्णदरीषु विद्यमाना देदीप्यमानमण यस्तेषां गशिस्तं प्रागनिदाघभरस्फुटितसुदगेषु भाभास्यमानरक्षराशि । उपोपविष्टाः उपोपविशतिस्म तपोकाः समीपस्थिताः । प्रोपोत्संपादपूरणे हिः । अंगार'जमनसा अंगाराणां पुंजस्तथोक्तः भंगारपुंज इति मनस्तेन अंगारराशियुद्ध या। सेधमाना: सेवंत इति सेवमाना: । शाखा- मृगाः कायः । शुशुमिरे किल धपाशिरे फिल । शुभ दीप्तौ लिट् । भानिमानलंबारः ॥१८॥ मा० म०–चन भूमियों में विक्षीर्ण कन्दराओं में विद्यमान रनपुज के निकट नई दृष्टि से भारी हो मगारपुंज के ख्याल से बैठे हुए बन्दर सोमते थे ॥ १८ ॥ नीलोपलो निलयमणितोरणाप्रैरंतर्बहिःपरिमुहुर्विचाद्वधूकैः ॥ किर्मीरिता जलधरारसुरचापरम्या विद्यद्यता विविदिरे नगरेपु वः ॥१६॥ गोलोपलेत्यादि। नगरपु पत्तनेषु । गतः मध्ये। यहिः वाघ । परि परितः। मुहुः पुनः पुनः। विचरद्वधूकैः विवरतीति विचात्यः विचरत्यो चध्या येषां ते विचाद्वधूफास्तैः संचरनितायुतेः । मगितारणा मणिमिनिर्मितास्तोरणास्तथोक्ताः मणितारणा अमे येषां ते मणितारणाप्रास्तैः भनमागे रत्नतोरणयुक्तः। नीलोपलानिलयः नौलश्वासी उपलच नीलोपलम्तेन निर्मिता ऊर्ध्वनिलयाः नीलेापलानिलयास्तः इंदनीलरत्नाचिन- सोधेः । किम्मोरिता मिश्राः । सुरचापरम्याः सुरचापेनरम्या: इंद्रधनुषा मनोहराः । विद्यु । पता: विद्युता युनास्तपोक्ताः तडिधु कताः । जलधगः जलानि धरतीति जलधरा: मेपाः। वृष्टिभिः । विविदिरे रेजिरे । विदाने लिट् । मनोपमानापमेयपदानां विप्रति- वियमावेन परस्परोपमा ।। १६॥ मा० म०-वाहर, भीतर तथा चारो तरफ जहाँ वार २ युवतियां विचरण कर रही हैं। ऐसी मणिमय तोरण चाली नीलम-जड़ित अट्टालियाओं से स्पृष्ट और इन्द्र धनुष तथा चंचला-युक्त मेघ शहरों में वृधि द्वारा ही जाने जाते थे अर्थात् आकाशस्पर्शिनी इन्द्रमणि- खचिन अटारियों से समुद्भासित स्वच्छाफाश के भी नील बने रहने की वजह से प्रश्न जलद वृष्टि होने पर ही प्रतीत होता था। १६ । उन्मार्गवर्त्यपि जगज्जनमान्यवृत्तिमलासभासुरकुजोप्युरुवाप्पसीतः ॥ भभोमुचामशमयत्प्रचयो जांसि प्रत्याहतामलदिगंबरदर्शनोऽपि ॥२० । । - मुनिसुनतकाव्यम्। उन्मागत्यादि । उन्मार्गवत्यति उद्गनो मार्गस्तस्मिन् यति इत्येयं शोला /मार्गवती दुर्गिवयपि पक्षे व्योममार्गवत्यपि । जगजनमान्यवृत्तिरपि जगतो जनाः जगननाः मानितु योग्या: मान्याः जगजनेर्मान्या तथोक्ता जगजनमान्या चियस्य सः लोक. जनपूज्यवर्तनायुक्तः। दुर्भार्गवर्तिनी जगञ्जनमान्यत्तित्यविरोधः भाकाशमार्गवति परिहारः। उल्लासमासुरफुजाऽपि उल्लसनमुल्लामस्तेन मासंत इत्येचं शीला उल्लासमा. सुरा की जायंत इति कुजा: उल्लासभासुराः फुजाः यस्य सः हणमासनशीलसीतायुतः। पक्षे उलासभासुराः पलयालाशनादिमिर्मासमाना: कुजाः वृक्षा यस्य सः तयोक्त. स्तोपि । उमापतितः उरु याप्पं यस्यास्सा तथोक्ता उत्यामा सीता यस्य सः महदय यु. तसीतादेवीसहित. पक्षे ऊष्मायमाणलांगलपद्धनिसहितः । “याप्पो नेत्रजलोरमणो सोता. रामफल स्यात्तथा लांगलपद्धती इत्युभयमातिविश्यः । उल्लासभासुरसोतायतः उरुपान सीतापत्वं विरोध । किन्तु उल्लसनभासनशीलवृक्षवत्वं नवष्टियशादुष्मायमाणलांगलत्य. पद्धनियत्त्वमिति परिहार. । प्रत्याहतामदिगंबरदशनोऽपि प्रत्यादन्यतस्म प्रत्यारत ने विद्यते मलं यस्य तदमलं दिश पवायरं येषा ते दिगपराः तेया दर्शन तथा प्रयाहत माल दिगपरदर्शनं येन सः तथोक्तस्सोऽपि निराशननिर्मलजिनमतयानपि पक्षे दिशध अपरं च दिगयराणि तेका दर्शन प्रत्याहत अमल दिगम्बरदर्शन पनमः इत्यत्रापि यहुपदो यसः । प्रक्षिप्तविशददिगाकाशपीक्षणयानपि । “दर्शनं नयनस्यमयुद्धिधमापनयि। शादर्पणयो. थापि” इति विश्वः । अंभोमुचा अमासि मुञ्चत्यम्भोमुचस्तपा मेवानां । प्रचयः प्रफरः । रजांसि पापानि रेणग्या । भरामयत् अदमयत् । शम् दम् उपशमने लम् । निराजिनमतस्य पापशमनत्यं पिराधः । प्रतिस्तलिमलदिगाकाशप्रक्षणस्याप्दकालस्य धूलिशमनत्यमिति- परिहारः । यिधमासालफारः॥ २०॥ भा० १०-विषय गामा (आकाश पथचारा ) होते हुए भा सांसारिक लोगों से मान्य पृत्ति होकर, हर्ष से प्रकाशन-शाल साता (वृक्ष) युक्त हाते हुए मा अत्यन्त बाप्प सम्मान लांगल (साता देश) सहित तथा स्वच्छ दिशावलापन (पवित्र जिनमन दर्शन) को अर- रुद्ध किए गए भी मेव-मंडल ने रजस्समूद (रजोगुण ) को शान्त किया । २० । • किंकेतकी कुसुमिता किमयं तडित्वान संवाघतो जलमुचां पतितः पृयिन्यां। किंवा तेंदुशक्लस्तममा समूहः किं शाकिनी शितरदा तरुणादनाय ॥२१॥ किमित्यादि । फुसुमिना युमुमानि संज्ञातान्यम्यामिनि तयाँका संज्ञानयुसुम- युक्ता । तिमी पक्षः । किं भवेन् पिंगु । अयं एजन्नसुयां जर मुंतति जरमुखम्ने । संपाधनः संयाधनं संपाधानम्माम् नयोक्तं परम्परसंमदननः । पृथिव्यां मन्यां पति

नवमः सर्ग
॥
पततिस्म पनित व्युत । तडित्यान तडिदस्यास्ताति तडित्वान् "स्तमत्वर्य" इति जस्त्वाभाव
नियु द्यु तमेघ । विस्यादुत । तदुराकर धोयतेस्म धृतं दो शफलमिदुशकल धृतमिदु.
शक्ल येन स धृतचद्रभाग । "मित्त शालखंडे या" इत्यमर । तमसा निमिराणा । समूह
निवह । कि वा भवेद्वा । तरुणादनाय तरणानामदन तरुणादन तस्मै कामोद्दीपनहेतु
वायु वजनभक्षणार्थमित्यर्थ । शिनरदा शिता रदा यस्यास्सा तथोक्ता निशितरदना
"शितं शात च निशिते कशे शन्तञ्च कर्मणि" इति विश्व । शारिना शाकिनी नाम देवी।
कि भवति कि। सशयालकार ॥२१॥
भा० अ०-क्या यह विकसित केतका की गाछ है या परस्पर मेघ के सघपेण से
जमीन पर गिरी हुई निजलो है अथया चन्द्रमा का टुकड़ा लिये हुआ अन्धकार-समूह है
या युवकों का भक्षण करने के लिए कटियद्ध उजले दाँत वाली राक्षसी तो नहीं है । २१ ।
गोनारिंगोपकरका व्यरुचन्धराया मघागमेन दयितेन कृताकपाल्याः ॥
व्योमश्रियः स्तनतटटितोरुहारस्रस्तावकीर्णनवावगुममौक्तिकाभाः॥२२॥
गोत्रारीत्यादि । मेघागमनेन आगमनमागम मेघस्थागमो यस्मिन् तेन प्राटकालेन
दयितेन प्राणनायकेन । एताकपाल्या नियतेस्मता ता अक्पालियस्यास्सा तथोक्ता
तस्या विहितालिगनाया । 'मोडधात्रिकापरिरभेष्वक्पालि "इति नानार्थकोशे। व्योमश्रिय
व्योम धो व्योमेर वा धोस्तस्या गगनरम्या । स्तनतट टितोरुहारम्नस्तावकीर्ण
मवविद्रुममौक्तिकाभा स्तनयोस्तट स्तनतट तस्मात् त्रुटिन तथोक्त उपचासौ हारश्च
तथोक स्तनतटत्रुटितश्चासौ उरहारश्च स्तनतत्रुटितोरुहार स्रस्ताश्च ते अवकीर्णाश्च
स्वस्तायकार्णा स्तनतनुटिनोरहारान् सस्तावकीर्णा विद्रुमाश्च मौक्तिकाश्च विद्रुम
मौकिका नवाश्च ते विद्रुममौक्तिकाश्च नाविद्रुममौक्तिका स्तनतत्रुटिनोरहाररस्ता
यकीर्णाध ते नवयिगुममौक्तिकाश्च तथोक्ता तेपामाभा फुचप्रदेशत्रुटितपृथुहाराच्छिथि
लितत्रिकीर्णनूतनप्रवालमुताफरसदृशा । गोनारिगोपकरया गोत्रारिगोपाध परकाय
तधोक्ता इन्गोपक्रिमियोपना । धराया भूमी। व्यरचन विशेषेण रेतु मिचि अभिनीत्याच
लुद् "धु घोलुङ्गे परस्मैपदम् । उत्प्रेक्षात्कार ॥२२॥
भा० अ०-वर्षा वाल रूपी बल्लम से आलिंगित आकाश रश्मी के स्तन प्रदेश से टूटी
हुई माला के गिरे हुए नये मोता और मूगे फो सो आभा घाले इन्द्र फीट तथा ओले पृथ्वी
परचमरने लगे।२२।
पालप्य खल्वतितरा चतुरैरमुग्मिन्नारूढधन्वनि सतामवमानहेतौ ॥
काले हि राजचिक्ले कलुपात्मनीति काम पिकोऽभवदुरीकृतमूकभावः॥२३॥

। । मुनिसुव्रतकाव्यम्। आलप्येत्यादि । पिकः कोकिलः । आरूढधन्वनि आरुह्यतेस्म आरूढं आरूढं धन्व यस्मिन् तस्मिन् आरूढधनुष्मति कलहतत्पर इत्यर्थः पक्षे प्ररुकेंद्रायुधचति। सतां सत्पुरु- पाणां पक्षे नक्षत्राणां । "सत्प्रशस्ते विद्यमाने त्रिपु स्त्रीसत्यतारयोः” इति शाश्वतः। अवमानहेती अवमानस्य हेतुस्तधोकः तस्मिन् तिरस्कारफारणे । राजविषले राजा विक्लस्तथोक- स्तस्मिन् उत्तमक्षत्रियहोने पक्षे चंद्रप्रभारहित “राजाचंद्रमहोपत्योः" इति धनंजयः। कलुपात्मनि कलुप आत्मा यस्य तस्मिन् पापात्मनि पझे मलिमसस्वभावे । अमुष्मिन् काले पक्षे एत. द्वर्षाकाले । चतुरः पंडितमनोरंजननिपुणेः पक्षे पंचमचनिनिपुणः । अतितरां अत्यंत । भालप्य आलपनं पूर्व० उक्त्या। खलु "निषेधेऽलं खलौ व्यतिक्त्या प्रत्ययः। "व्कोऽनत्राप्यः" इति प्यादेशः। "निषेधवाक्यालंकारजिज्ञासानुनये खलु" इत्यमरः । एचमाशयेन । दूरीकृतमूक- भावः दुरीक्रियतेस्म दूरीकृतः मूकस्य भावो भूकभावः दूरोकृतो मूकमायो येन सः अंगीकृत- मौननियमः। फार्म पर्यास । “कामं प्रकामं पर्याप्तम्" इत्यमरः । अभवत् भू सत्तायां लङ् ॥ २३॥ भा० अ०-कलह-तत्पर अथवा इन्द्र-चाप-युक्त, सज्जनों अथवा नक्षत्रों के अपमान के कारण उत्तम राजहीन अथवा चन्द्र-प्रकाश से रहित पापात्मा अथवा कृपणता युक्त इसवर्षाऋतु में कोकिलने पंचम राग से मनमाना कूजन कर अब एकदम चुप्पी साधली । २३ । प्रत्युन्मिपन्नवकदंबरजोभिरुच्चैश्चित्रं दिगंबरहृदप्यनुरक्तमाशु ॥ चित्तान्यरंजयत रागिजनस्य तस्यत्याश्चर्यमत किमु पश्चिमगंधवाहः॥२४॥ प्रत्युन्मिपमित्यादि। अत्र प्रापि । पश्चिमगंधचाहः पश्चिमश्चासौ गंधवाहश्च तथोक्तः पश्चिमवायुः । प्रत्युन्मिपन्नवकदंबरजोभिः प्रत्युन्मिपतीति प्रत्युन्मिपन नवश्वासो कदंबच नयादयः प्रत्युमिपंधासौ नवफदयश्च तथोक्तः प्रत्युम्मिपनयरबस्य रजां. सि तैः विकसत्कुसुमनूतननीपवृक्षस्य रजोभिः । दिगंबरहृदपि दिश एयांवर एषां ते दिगं. यरास्तेषां हुत् वित्तं तदपि पक्षे दिशश्च अंबराणि च दिगंबराणि तेपां हृदंतर्भागो मुनींद्र- हृदयमपि पक्षे दिगाकाशमध्यमपि। उच्च अधिक। आशु शीघ्र' । अनुरक्त अनुरज्यतेस्मानुरक्त प्रोणति पक्षे अरुणितं । चक्र विधे। तस्य प्रसिद्धस्य । रागिजनस्य रागोऽस्यास्तोति रागी स चासो जनश्च रागिजनस्तस्य कामुकजनस्य । चित्तानि मनांसि। अरंजयत अग्रीणयत् । इति एवं तत् । आश्चर्यं किमु अद्भुतं किं चित्रं न भवति इति यावत् ॥ २४ ॥ भा०अ--जय पश्चिमी वायु ने विकसित नूतन कदम्ब-पुष्प के परागों से आकाश के मध्यभाग अथया दिगम्बर मुनियों के चित्त को बहुत शोघ्र अधिक अनुरक्त कर लिया तब भला यह फामी जनों के हृदय को अनुरंजित करे तो क्या आश्चर्य है ।२४ । - नवमः सर्गः। १७ इत्यंबुवाहसमयोऽपि विज़ंभमाणो वज्रानलं जनपदपु समर्ज नेपत् ॥ चक्रेऽतिवृष्टिमितरांन च दुर्दिनानि तस्य गुमूलगतनोकपतःप्रभावात ॥२५॥ इत्येत्यादि । इति एवं प्रकारेण । विजृभमाणः प्रवर्धमानः। अंबुवाहसमयोऽपि अंबु वहतीत्यंयुवाहः स चासो समयञ्च नथोकः वर्षाकालोऽपि । दुमूलगतलोकपतेः दोर्मूले द्रुमूलं नद्गच्छतिस्म द्रुमूलगतः लोकस्य पतिर्लोकपतिः दुमूलगतश्चासौ लोक- पतिश्च हुमूलगतलोकपतिस्तस्य वृक्षमूलस्थितजिनेश्वरस्य । प्रभायात् सामर्थ्यात् । जन- पदेषु देशेषु। ईपत् स्तोकं च । बजानलं वजस्यानलो बजानलम्तं वजाग्निः । “वज़ हीरक- दंभोलिवालकामलकोयु च” इनि विश्वः । न ससर्ज न चकार । सृज विसर्गे लिट् । अतिवृष्टिं अधिकवृष्टिं। इतरांअनावृष्टिं। दुर्दिनानिच मेघद्यन्नदिनानि च। न चक्रे न विधे ॥२५॥ भा० अ०-यों बहुत बढ़े चढ़े हुए भी यर्पा-काल ने वृक्ष के नीचे स्थित श्रीजिनेन्द्र देव के प्रभाव हो से देशों में समा जगह यजपात, अतिवृष्टि, अनावृष्टि तथा दुर्दिन आदि बाधायें संघटित नही का । २५ । सुश्लिटकांतमथ सीत्कृतगर्भठं निस्वेददीर्घसुरतं स्वदमानवनि ॥ कर्पूरखंडविकलकमकोपभोग कश्चिद्वभृव विपयः समयो जनानां ॥२६॥ मुश्लिटत्यादि । अथ प्रावृट्कालानंतरे । कश्चित् कोऽपिसमयोऽपि । कालः हिमकाल इत्यर्थः। सुलिएकांतं कांता च कांतश्च कांतो एकशेषः सुश्लिप्यतेस्म सुश्लिष्टी कांती यस्मिन् कर्मणि तत् गाढालिंगितदंपति यथा तथा । सोत्स्नगर्भकंठं सीत्रनमेव गर्भ यस्य सः तथोक्तः सोत्कृतगर्भः कंठो यस्मिन् कर्मणि तत् सीत्कारांतसहितगलयुक्तं यथा तथा । "सीत्कृत भणितं कामे" इनिधनंजयः अनुकरणध्वनिः । निस्वेददीर्घसुरतं स्वेदानिर्गतं निःस्वेदं दीर्घच तत मुरतं च तथोक्तं निःस्येदं दोर्घसुरत यस्मिन्कर्मणि तत् धर्मरहितायतनिधुयनं यथा तथा । स्वदमानवहि स्वदते इति स्वदमानः स्वदमानो बहिर्यस्मिन् कर्मणि तन् अंगोकनाग्नियुक्तं यथा तथा । कर्पूरपंडविकालम मुक्कोपभोग फर्पूरम्य पंडं नथोक्तं कर्पूरपंडेन विकलः पपूर- खंडविकलः प्रमुकस्योपभोगः प्रमुकोपभोगः कर्पूरखंडविफलः प्रमुकोपभोगो यस्मिन् कर्मणि तत् शोतहेतुत्वेन धनसारडरहितमामुकोपभोगयुक्तं यथा तथा । जनानां लोकानां । विषय: गोयल "विश्यः स्यादिद्रियार्थे देशे जनपदेऽपि च । गोचरं च प्रयन्धाद्य यस्य शात. स्तु तत्र च" इनि विश्वः। यभूय भवनिस्म भू सत्तायां लिट् । रूपकः ॥ २६ ॥ भा० ५० वर्षा-काल के याद परस्पर दम्पनी को आलिङ्गन कराती हुई, अत्यन्त ठंढक सचित परने वाला सीत्कार (सीसीसी ऐसी ध्वनि ) गलेसे निकलयाती हुई, और अधिक मुनिसुव्रत काव्यम् । १७६ देर तक संभोग होते रहने पर भी खेद (पसीना) का अमाव दिखलाती हुई कर्पूर रहित सुपारी के सेवनोपयुक्त हेमन्त ऋतु लोगों की दृष्टि-गोचर हुई ।२६। उच्चाटनाय शरदः सितसर्पपौधो निर्दग्धुमब्जनिलयानिलयं तुषाग्निः ॥ पालंभचूर्णमसहायजनस्य कामं प्रालेयसीकर मिषेण कुतोऽप्यपतत् ॥२७॥ उच्चाटनायेत्यादि । शरदः शरत्कालस्य । उच्चाटनाय उच्चाटनकर्मनिमित्त । सित- सर्पपौधः सिताच ते सर्पपाश्च सितसर्पपास्तेषामोघस्तथोक्तः सिद्धार्थसमूहः । अञ्जनिलया. निलयं अजमेव निलयो यस्यास्सा तथोक्ता अजनिलयाया निलयस्तथोक्तस्तं लक्ष्मीनिवास कमलमित्यर्थः । रूपकः । निर्दग्धु निःशेषं दहनाय । तुपाग्निः तुपस्याग्निस्तथोक्तः पलालाग्निः । असहायजनस्य न विद्यते सहायो यस्य सः असहायः स चासौ जनश्च असहायजनस्तस्य अस. हायजनस्य वियोगिजनस्य। आलंभचूर्ण आलंभार्थं चूर्ण तथोक्तं मारणचूर्ण। "आलंभपि. जविशरघातोन्माथयधा अपि" इत्यमरः । प्रालेयसीकरमिषेण प्रालेयस्य सीकरास्तथोक्ताः प्रालेयसीकरा इति मिपं प्रालेयसीकरमिपं तेन हिमकणव्याजेन । “मिपं गजनिमीलनम्" इत्य- भिधानात् । फुतोऽपि कस्मादपि। अपनत् अपतत् । पल्टु गतौ लुङ् । “शर्तिशास्ति” इत्या. दिना अज् प्रत्ययः। "श्वयत्यश्यप्रतोऽड्यथ गुम्पम्" इति पमागमः ॥२७॥ भा० अ०---शरत्काल के उच्चाटन के लिए उजले सरसो, कमल को जलाने के लिए. तुपाराग्नि और जनो के लिए मृत्युचूर्ण ओस-के विन्दू के बहाने न मालूम कहां से आ जुटे ।२७। रेजु:प्रभातसमयेपु लतावनद्धाः क्षोणीमहन्तुहिनवारिकणैविकीगीः ।। श्रालिंगितस्तवकचारुकुचा रतांतप्रादुर्भवद्भिरिव धर्मलवैयुवानः ॥२८॥ रेजुरित्यादि। प्रभातसमयेषु प्रभानान्येव समयाः प्रभातसमयास्नेषु विमानकालेषु । लतावनद्धाः अवनह्यतेस्म अवनद्धाः लताभिरवनदास्तथोक्ता: बहरीमयताः। मालिन स्तबकचाकुचा चारू च तो फुचौ च नारुकुवो स्तयका एव चारकुची आलिया आलिंगितौ स्तयकचारुकुचौ यस्ते तथोक्ताः परिरंभगुच्छकमनोरमन्नना: “म्याद गुच्छक स्तु स्तयकः" इत्यमरः । क्षोणीरुहः क्षोण्यां भूम्यां कहतीति वियतो हवागनाः वृनाः विकी ग: चिप्रकीर्णः। तुहिनवारिकणः बारिणां कणाः बारिवणाः नुहिनम्य पारिगणाः तः हिमजलशीकरः । ग्तांतप्रादुर्भवद्भिः रतस्यांत रतांत प्रादुर्भवतीति प्रादुर्भयंता रहने प्रादुर्भवत: नथोक्तास्तैः निधुवनाबसानाधिर्भवद्भिः । धर्मलयः घरम्य लया धर्मलयाम्न हो 'बिंदुभिः। युवान इय नरुणा इत्र । रेजुः यभुः । राज़ दीमौ लिट ॥२॥ - नवमः सर्गः। . - - . भा० अ०-प्रातःकाल में लंनाभों मे लिपटे हुए नया - गुच्छम्पी सुन्दर कुचों का आलिंगन किए हुए वृक्ष विग्वरे हुए ओस के बिन्दुओं से संभोगान्त में निकले हुए पसीने के कणों से युवक गण के समान सोभने लगे।२८ । कालेऽव तीवहिममाजि न वामरेंद्रसांद्रांशुकोऽपि सहतेग्म हिमाद्रिवामम ॥ दूरस्थमप्यथ ययौ मलयाचलेंद्र गोशीपकोटरफणिश्वसितैः कवोंपाम ॥२६॥ काल इत्यादि । तीवह्मिभाजि तीच तत् हिमं च नयोक्तं तीवहिम मनिस्म तीव- हिमभाग् तस्मिन् नीग्रहिमभाजि निष्णुरहिमसहिने। अत्र अस्मिन् । काले समये । सांद्रां. शुकोऽपि मांद्रमशुकं यस्य सोऽपि दृढवस्त्रवानपि पने सांद्रोऽशुर्यम्य स तथोक्तः धनंकि रणोऽपि । वासरेंद्रः वासरम्येंद्रस्तथोक्तः सूर्यः । हिमाद्रिवास हिमेन युक्तोऽद्रिहिमाद्रिः हिमाद्रिवासस्तथोक्तः तं हिमवत्पर्वतथिति। न सहतेम्म न मर्षनिस्म । पह मर्पणे "स्मेच लिट्" इनिमूनार्थे लट्। अथ अननरे। दूरस्थमपि विप्राटदेशस्थितमपि । गोशीर्पकोटरफणिश्य- सित गौशीर्षस्य फोटर तथोक्तं गोशीपकोटरे स्थिताः फणिनः, गोशीकोटरफणिनस्तेषां यसिनास्तयोक्तास्नैः श्रीगंधवृक्षफोटरस्थितसर्पनिश्वासैः । कयोष्णं ईषदुष्णं कयोणं नथा "कायंचीयोणे" इति कोः कयादेशः। मलयावलेंद्र मलयाश्च ते अचलाश्च मलयाचलास्वेपा. मिंद्रो मलयाचलेंद्रस्त यद्वा अचलानामिंद्रस्तथोक्तः स चासाचिंद्रश्य मलयाचलेंद्रनं । ययौ प्राप। या प्रापणे लिट् ॥ २६ ॥ भा० अ०-इस मध्य-कालीन निठुर हेमन्त ऋतु में अत्यन्त. सघन किरण-रूप वस्त्र युक्त होते हुए भी सूर्य हिमाचल पर्वनर नहीं रह सके, प्रत्युन अत्याधिक दूरस्थ होत भी चन्दन वृक्ष के खोखले में बैठे हुए सांपों के फुकारों से कुछ कुछ उप्ण मलयाचल पर्वत को चल दिये 1२६ लौथूण सौरभसनद्रितदिङ्मुखेन रणोत्करण पिहितानि बानि रेजुः ।। लोकातिदुःसहमहस्यभयादिवात्तपत्रांगचारुतरभृरि निशारकागि ॥ ३० ॥ लौधणेत्यादि । सौरभसनद्रितदिङ्मुग्वेम सौरभेण सनद्रितं सौरभसनद्रित दिशां मुखं दिङ्मुख मौरभसनद्रित दिङ्मुपं यस्य सः सौरभसनद्रिनदिडमुखस्तेन परिमलव्याप्न- दिग्यियरेण । लौधे ण लोध्रम्यायं लोध्रस्नेन लोध्रसयन्धिमा 1 "गालयः शायरोलोस्तिरीट- स्तिल्लमार्जनो" इत्यमरः । रेणोत्करण रेणूनामुत्कगे रेणूत्करस्तेन । पिहिनानि अपिधीर्य- तेस्म पिहिनानि आच्छादितानि । चनानि अरण्यानि ! लोकामिदुःसहसहस्यभयात् अनि- दुःखेन महता फष्टने मद्यत इनि दुःसहस्तयोक्तः लोकेरनिदुःसहस्तयोक्तः स चासो महम्च लोकातिदुःसदमहतस्य भयं तस्मात् पौपे सैषसहस्योद्वौ"इत्यमः। जनानिदुःसहसहिष्णुहिम. - । .

१८० ... नवमः सर्गः1. कालस्य भीतः। आत्तपत्रांगधारुतरभूरिनिशारकाणीव आदीयन्तस्मात्ताः निशार एव निशा- रकाः भूरयश्च ते निशारकाच भूरिनिशारकाः प्रष्टाचारवश्चास्नराः पत्रांगेण चारुतराः पत्रां: गवारुतरा: आत्ताः पत्रांगवारुतरा भूरिनिशारका यस्तानि तथोक्कानोव "निशारः स्यात्प्रा. वरणे हिमानिलनिवारणे" इत्यमरः । स्वोकृतरागविशेषा मनोहरबहुलाच्छादनखरत्य इव । रेजुः षभुः । राजू दीप्तौ लिट् । उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ३०॥ भा० अ०-सुगन्ध से सभी दिशाओं को व्याप्त किए हुर ऐसे लोध्र के पराग-पुंज से आच्छादित चन लोगों के लिए अत्यन्त दुस्सह हेमन्त ऋतु के भय से मानो विविध रंग के वेष्टनों से आवेष्टित से सोभने लगे। ३० । संतापितारतिपतेस्त्रिजगज्जयाथ नाराचिका सुनिशिता इव निर्विचारम् ॥ कातर्यमंबुजदृशो दिदिशुर्जनानां काश्मीररेण कलितांगलता हिम। ।३.१ ।। संतापिता इत्यादि। हिमती हिमश्चासौ ऋतुश्च हिमस्तस्मिन् हेगंतकाले कामोर-., रेणुफलितांगलताः काश्मीरस्य रेणुः तेन कलिता अंगमेव लना तथोका कारनारशु- फलिता अंगलता यासां तास्तथोक्ता कुंकुमपरागोड़ लिनदेहयटमः। अनुगदशः मित्र दशौ यासां तास्तथोक्ताः सरोजाक्ष्यः । रतिपतेः रत्याः पतिः रतिपतिः तस्य कामस्या निजग- जयार्थ त्रीणि च तानि जगंति च शिजगति तेषां जयस्तयोक्तस्त्रिजगज्जयाय निजगज्यार्थ . लोकत्रयजयनिमित्तं । संतापिताः संताप्यतेस्म संतापिताः । सुनिशिताः अधिकताक्ष्गाः । नाराविका इव अयोनाराचा इव । जनानां लोकानां । निर्विचार विचाररहितं । कातर्य कात- रस्य भावः कातयं अधोरत्वं । दिदिशुः दधतिस्म । दिश अतिसर्जने लिट् ॥ ३१ ॥ । -हेमन्त ऋतु में फेशर को धूलो से परिलिप्त अंगलतिका चालो और कमल, कीसी आंख वाली युवतियां त्रिभुवन को जोतने के लिये कामदेव के अत्यन्त तीक्ष्ण तथा सन्तप्त लोहे के अस्त्र के समान विचार रहित होकर लोगों को अधोर करने लगा। ३१. कांतावियोगदहनेन नितांतदग्धाः पाथास्तुपारपतनेन विशीर्यदंगाः ।। ऊष्मायमाणवदना;श्वसितैरशंकंचूर्णोपलारसमभवन्सलिलोपसिक्ताः ॥३२॥ कांतेत्यादि । कांतावियोगदहनेन कांतायाः पियोग: कांतावियोगः स एव दहनः कांतावियोगदहनस्तेन वनितावियोगाग्निना । रूकः। नितांतदग्याः दयतेस्म दाधाः नितांतं दग्धास्तयोक्ताः अत्यंत दग्धाः । तुपारपतनेन तुपारस्य पतनं तेन हिमस्य पतनेन । पिशोर्यदंगा: विशोर्यतीति विशोर्यत् विशोर्यदंग येषां ते तथोक्ताः वाध्यमानावययाः । श्वसितेः उन्मासैः। ऊमायमाणवदनाः: ऊष्माणमुद्रमतीत्युप्मायते ऊमायते इति ऊष्मायमा । - भा० अ० M " 1 १७६ नवगामी भा० अ०-प्रात काल में लताओं से लिपटे हुए नथा गुडम्पी सुन्दर कुचों का आलिंगन किए हुए वृक्ष विपर बोस के बिन्दुनों से भोगान्त में निफ्ले हुए पमीने के फणों से युवक गण के समान सोभने लगे।२८ ॥ कालेऽव तीब्रहिमभाजि,न वामरेसांद्रांशुकोऽपि महतम्म हिमाद्रिवामम ।। दूरस्थमप्यथ ययौ मलयाचलंद्र गोशीपकोटरफणिश्वमितैः क्वाधाम ॥२६॥ फाल इत्यादि । नीदिमभाजि तीच तत् हिमं च नथोक्त तीवहिम मजतिस्म नीव हिमभाग नस्मिन् तीहिमभाजि निष्ठुरहिमसहिने। अत्र अस्मिन् । पाले समये । सांद्रा शुकोऽपि सांद्रमशुझं यस्य मोऽपि दृढवस्त्रगानपि पक्षे साठोंऽशुर्यम्य स तथोक्त घनकि रणोऽपि। घासरेंद्र वासरस्येंद्रस्तथोक्त सूर्य । हिमाद्रिनासं हिमेन युक्तोऽदिहिमाद्रि हिमाद्रियासस्तथोक्त तं हिमवत्पर्यनस्थिति। न सहनेस्म म मर्पनिस्म । पह मर्पणे "स्मे च लिट" इति भूतार्थे रुट। अथ अनतरे। दूरस्थमपि निप्रदेशस्थितमपि । गोशोर्पकोटरफणिश्व- सिता शोशीर्षस्य कोटर तथोक्तं गोशीर्पकोटरे स्थिता फणिन गोशीर्षकोटरफणिनस्तेय श्वसिस्तियोकास्तै श्रीगधवृक्षरोटरस्थितसर्पविश्वास। क्योष्णं ईषदुष्णं कोणं तथा "कायचीवोष्णे" इति को क्यादेश । मल्याचलेंद्र मल्याच ते अचलाश्च मन्दयाचलास्तेषा मिंद्रो मलयाचलेंद्रस्तं यदा अचलानामिंद्रस्तयोक्त म चासाविंद्रथ मल्याचदम्त । यो प्राय। या प्रापणे लिट ॥२६॥ भा० अ०-इस मय शलीन निष्ठुर हेमन्त ऋतु में अत्यन्न सघन किरण रूप घस्त्र युक्त होते हुए भी सूर्य हिमाचल पर्वतर नहीं रह सके, प्रत्युत भी चन्दन वृक्ष के खोखले में बैठे हुए साँपों के फुकारों से कुछ कुछ उपण मलयाचल पर्वत को चल दिये। २६ 1 लोधूण सौरभमनद्रितदिड्मुखेन रणोत्करेण पिहितानि वनानि रेजुः ।। लोगतिदुःसहमहस्यभयादिवात्तपनांगचारुतरभृरिनिशारकाणि ॥ ३० ॥ लौधेणेत्यादि । सौरभसनद्वितदिडमुवेम सौरभेण सनद्रित सौरभसनद्रित दिशा मुखं दिङ्मुख सौरभसनद्रितं दिङ्मुप यस्य स सौरभसनदिनदिडमुखस्तेन परिमलव्याप्त दिग्चिवरेण । लोण लोधम्याय लोधस्तेन लोध्रसवन्धिना । "माल्य शावरोलोस्निरीट स्तिवमार्जनौ" इत्यमरः । रेगोत्वरेण रेणूनामुत्क्रो रेणूत्करम्तेन । पिहितानि अपिधीय तेस्म पिहिनानि आच्छादितानि। चनानि अरण्यानि। लोकामिदु सहसहस्यभयात् अनि दुखेन महता कष्टन सहन इति दु सहस्तथोक. लोकरनिदु सहस्तयोक्त स चासो महश्च लोपातिदु सहसहस्तस्यभयं तस्मात् “पौषे तपसदस्यौहौ"इत्यमरः । जनानिदु सहसहिष्णुदिम- . अत्याधिक दूरस्य होत १५० नवमः सर्गः। : कालस्य भीतः । आत्तपत्रांगचारलरभूरिनिशारकाणीव आदीयन्तेस्म आत्ताः निशार एव निशा- एकाः भूरपच ते निशारकाच भूरिनिशारकाः प्रष्टाचारवश्वारुतराः पत्रांगेण चारुतराः पत्रां. गवारुतरा: आत्ताः पत्रांगवारुतरा भूरिनिशारका यस्तानि तथोक्तानीय "निशार: स्यात्प्रा. वरणे हिमानिलनिवारणे" इत्यमरः। स्नाकरागविशेषा मनोहररहुलाच्छादनानपत्य इव । रेजुः यभुः । राजू दीप्तौ लिट् । उत्प्रेक्षालंकारः ॥ ३० भा० अ०-सुगन्ध से सभी दिशाओं को व्याप्त किए हुए ऐसे लोध्र के पराग-पुंज से भाच्छादित वन लोगों के लिए अत्यन्त दुस्सह हेमन्त ऋतु के श्य से मानों विविध रंग के वेष्टनों से आवेटित से सोभने लगे। ३०। संतापितारतिपतेस्त्रिजगज्जयार्थ नाराचिका सुनिशिता इव निर्विचारम् ।। कातर्यमंबुजदृशो दिदिशुर्जनानां काश्मीररेण कलितांगलता हिमः ॥३३॥ संतापिता इत्यादि। हिमती हिमश्चासौ स्तुश्य हिमस्तिमिन् हेतिकाले । फागोर- रेणुफलितांगलताः काश्मीरस्य रेणुः तेन कलिता अंगमेव लना तथोका कारभार शु. कलिता मंगलता यासां तास्तथोक्ता कुंकुमपरागोलिन्देहयरः। अनुदशः मित्र दशौ यासां तास्तथोक्ताः सरोजाक्ष्यः । रतिपतेः रत्याः पति. रतिपतिः तस्य कामल्यो निजग- जयार्थ त्रीणि च तानि जगंति च निजगंति सेवा जयस्तयोक्तस्त्रिजगज्जयाय निजगज्जयार्थ , लोकत्रयजयनिमित्तं । संतापिताः संताप्यतेस्म सतापिताः । सुनिशियाः अधिकन क्ष्गाः। नाराचिका इव अयोनाराचा इव । जनानां लोकानां । निर्विचारं विवाररहितं । कातर्य कात. रस्य भायः फातयं अधोरत्वं । दिदिशु. दधतिस्म । दिश अतिसर्जने लिट् ॥ ३१ ॥ भा० अ०-हेमन्त ऋतु में केशर को धूलो से परिलिप्त अंगलतिका वाला और कमल, कीसी आंख वाली युवतियां त्रिभुवन को जोतने के लिये कामदेव के अत्यन्त तीक्ष्ण तथा सन्तप्त लोहे के अस्त्र के समान विचार रहित होकर लोगों को अधोर करने लगा । ३११, कांतावियोगदहनेन नितांतदग्धाः पाथास्तुपारपतनेन विशीर्यदंगाः ॥ ऊष्मायमाणबदना: श्वसितैरशंकंचूर्णोपलारसमभयन्सलिलोपसिक्ताः ॥३२॥ कांतेत्यादि । कांतावियोगदहनेन कांतायाः पियोग. कांतावियोग. स एव दहनः कांतावियोगदहनस्तेन पनितावियोगाग्निना। रूपकः । नितातदग्धा. दह्यतेस्म दग्धाः नितांतं दग्धास्तयोक्ता. अत्यंत दग्धा. [ तुपारपतनेन तुपारस्य पतनं तेन हिमस्य पननेन । पिशोर्यदंगा: विशोर्यतीति विशीर्यत् विशीर्यदंग येषां ते तथोक्ताः याध्यमानावयरा वसित: उज्मासैः। ऊमायमाणयदनाः: ऊष्माणमुद्रमतीत्युष्मायते ऊष्मायते इति ऊष्मायमा । - ।

मुनिसुमतकाव्यम् । घदन येषां ते तथोक्ताः ऊष्णोदमदानना: "वाप्पोमफेनादुद्वमि" इति त्यड् प्रत्ययः । पांथाः पंथानं नित्यं यांताः पांथा: "नित्यं णः पंथश्च" इतिण प्रत्ययः पंथादेशश्च पथिक्जनाः। सरिलो. पसिक्ताः सलिलेनोपसिक्काः तयोक्ताः जलेनोपसिक्ताः। चूणापलाः चूर्णस्योपलाः चूर्णोपलाः सुधाश्मानः । "चूर्ण क्षोदेक्षारभेदे चूर्णा निगामयुक्निपु" इति विश्यः । अशंकं न विद्यते शंका यस्मिन्कर्मणि तत् निस्संदेहं यथा तथा। समभवन समभूवन् । भू सत्तायां लङ्। मन्मथाकुलिनाः बभूवुरिनिमायः ॥ ३२॥ भा०म०--पथिकगण अपनी कान्ता के विरह से अत्यन्त दग्ध होते हुए ठंढक पड़ने- से जड़ी भून (विशीर्ण) अंगवाले हो तत्पश्चात् आह भरने से समाप्प मुख होते हुए जल- से सींचे गये चूने के पत्थर के समान होगये । ३२ । सत्य तुपारपटलैः शमिनी नरुडा: सिद्धेः पुनः परिचयाय हिमतुलक्ष्म्या ।। छन्ना दुकूलबसनैर्नु पटीरपंकैलिप्ता नु मौक्तिकगुणर्यदि भूपितानु ॥३३॥ सत्यनित्यादि । शमिनः शममस्त्येषामिति शमिनः यनयः कायोत्सर्गस्थिना इति शेषः । तुपारपटलः तुपराणां पटलानि तुपारपदलानि तै: हिमसमुदायैः “समूहे पटलं न ना" इत्यमरः । रुद्धाः राज्यंतेस्मरद्धाः आवृताः। न भवंति। सत्यं तथ्यमेय । पुनः पश्चा. त्किमिति चेत् । सिद्ध मोक्षलक्ष्म्याः। परिचयाय संगनिमित्त । हिमतुलक्ष्म्या हिमश्चासौ ऋतुश्च हिमर्नुः स एव लक्ष्मीस्तथोक्ता तया हेम स्त्रिया । दुकूलबसनः दुफूलानि च तानि वसनानि च तैः क्षामयस्त्रः । छन्नाः छाद्यतेस्म छन्नाः संवृताः । नु किमु । पटोरणः पटीरस्य पंकाः पटोरपंका. तै: श्रीगंधकर्दम। लिप्ताः लिप्यते स्म लिप्ताः उपदिग्धाः । नु किमु । यदि चेत् । मौक्निकगुणैः मौक्तिकानां गुणा मौक्तिकगुणास्त. मुक्नामालाभिः । "मौाप्रधानपारदेंद्रियसूत्रसत्त्वादिसंज्ञादिहरितादिपु” इति नानार्यरतकोशे । भूषिताः भूयतेस्म भूपिताः अलंशनाः । नु किमिति संशयः “नु पृच्छायां वितर्केच" इत्यमरः ॥३॥ भा० अ०-पङ्गासन-पूर्वक स्थित यनिगण हिमसमूह से आच्छन्न हैं ? या मोक्षलक्ष्मी का साथ करने के लिये हेमन्त-श्री के द्वारा महीन कपड़े से ढके गये तो नहीं है याश्रीचन्दन से उपलिप्त तो नहीं है अधया मुक्ता-माला से तो भूषित नहीं है । अर्थात् कायोत्सर्ग से खड़े हुए मुनिगणों को देह पर शीतकाल में तुषारपात होने से कवि उत्येक्षा फर. ते है कि चन्दन-लिप्त, मणिहार-भूपित अथवा समुचल दुकूलाच्छन तो ये मुनिगण महीं हैं। ३। + । १८२ 5757 नवमः सर्गः। इत्य सुदुरसहतुषारतुषावपातैर्निर्दग्धनीरजकुले समयेऽपि तस्मिन् ॥ म्लालानि नैव कमलानि महानुभावो यस्या:स्थितः स भगवान सरितःप्रतीरे।।३।। इत्यमित्यादि। इत्थं अनेन प्रकारेण “कथमित्थमुः" इति साधुः । सुदुस्सह्तुपार. तुपावपानः सुष्छ दुःखेन महता कप्टेन सुसह्यत इति सुदुस्सहः स चासौ तुपारश्व तथोक्तः सुदुःसहतुपारस्य तुपात्तयोक्तास्तेपामवपानाम्तैः सोदुमशक्यहिमदेशाननः । निर्दग्ध- नीरजकुले निर्दह्यतेस्म निर्दग्धं नीरे जायंत इनि नीग्जानि तेषां कुलं निर्दग्धनीरजकुल यस्मिन्तस्मिन् निःशेषभस्मीकनकमलयूथयुक्ते । नस्मिन् समये हिमवाले । यस्याः कस्याश्चि. त्।सरितः सरोवरस्य। पूतीरे तटे "कूलं रोधश्च तीरंचपनीरंच नट तिपु”इत्यमरः । महानुभावः महाननुभावो यस्य सः तथोक्तः उत्कृष्टसामर्थ्यसहितः। सः भगवान् भानवैराग्यसंपन्नः । खितः तिष्ठनिस्म स्थिनः । तत्र कमलानि सरोजानि । मालानि "क्तयोः" इत्यादिना यतस्य नः हर्षरहितानि । नैव नैवाभवन् ॥ ३४ ॥ भा० अ०---यों असह्य तथा जोरो की ठंढक पड़ने से सभी कमलों को जलाने वाले भी इस शीतकाल में महा प्रतापशाली यह श्रीमुनिसुव्रत नाथ स्वामी जिस नदी के तीर पर पधार ते थे वहां के कमल कभी लान नहीं होते थे । ३४ । कायक्लेशाभिधाने तपसि जिनपतिनिष्ठितो वर्षमेकम् । बाहान्तर्विग्रहहादशविधतपसां मध्यमेऽप्यन इत्थम् ॥ दीक्षाकल्याणमादौ समभवदभनद्यत्र तत्रैव भृयो । नीलारपये शरण्ये भवचकितधियामात्तपुगये बरेण्ये ॥३५॥ कायेत्यादि। जिनपति: मुनिसुव्रनाह दीश्वरः। वाह्यांनर्विग्रहद्वादशविधतपसां बाह्य च अंतरं च बाह्यांतरे ते एव विग्रहो येषां द्वाभ्यामधिका दश द्वादशविधा येषां तानि द्वादश- विधानि तानि च तानि तपांसि च तथोक्तानि वाह्य तर्विग्रहाणि च तानि द्वादशविधतपांसि च यायांतर्विग्रहद्वादशविधतपासि तेषां पहिरंगांतरंगद्वादशमेदतपसां। मध्यमेऽपि मध्ये भयं मध्यम तस्मिन् “मभ्यान्मः" इनि म प्रत्ययः मध्यगतेऽपि । अग्रेउत्तमे उपरि गते । “अन. मालंघने बाते परिमाणे पलस्य च। प्रांते पुरस्तादधिको प्रयाने प्रथगोद्ध्वयोः इति" विश्वः काय. क् शाभिधाने कायस्य क्लशस्तथोक्तः कायक्लश इत्यभिधानं यस्य नत्तस्मिन कायल शनाम- धेये। तपसि तपश्चरणे । इत्थं अनेन प्रकारेण इत्यं । एक वर्ष एकवर्षपर्यन "कालाध्यनोन्या- सो" इनि द्वितीया। निष्ठितः निस्तिष्ठनिस्म निष्ठिनः निष्पन्नः । यत्र यस्मिन्बने । आदौ पूर्वस्मिन् । . ।

। - मुनिसुव्रतकाव्यम् । दीक्षाफल्याणं दीक्षाया. कल्याण तथोक्तं परिनिष्कमणकल्याणं । समभवत् समजायत। तत्रैव तस्मिन्नेव । भवचकितधियां भवे भयाद्वा चकिताधीर्यपां तेषां संसारभीतबुद्धिनां । शरण्ये रक्षणभृते । “शरणंगृहरक्षित्रो" इत्यमरः । आत्तपुण्ये आदीयतेस्म आत पुष्यं यस्मिन् भव्योपार्जिनसुरते। घरेण्ये उभयकल्याणनिलयत्यादुरष्टे । “मुख्यवर्यवरेण्याश्च" इत्यमरः । नीलारण्ये नीलं च तत् अरण्यं च नीलारण्यं तस्मिन् नीलबने। भूयः पूर्वव. त्पुनश्च । इत्थं वक्ष्यमाण स्या। अभवत् भूसत्ताया लड्॥५॥ -मुनिसुयतनाथ स्वामी याह्य तथा आभ्यन्तर पारह प्रकार की नपस्या के गध्य होते हुए भी सर्वोत्तम फायल्लेश नामक तपश्चरण में यों एक वर्ष तक सन्नर तदन न्तर पहले जहा नया दीक्षाक्याणय हुआ संसार से प्रस्त जीवों के शरणद तथा सुक- तिलभ्य श्रेष्ठ उली नागमन में यह रहे। ३५ ॥ प्रत्यासरते काव्यरतस्य टीकाया सुखयोधिन्या भगवत्तपोवर्णनो नाम नवम सर्ग. भा० अ०--- अथ दशमः सर्गः। श्रीमंतमेनमखिलाचिंतमात्मधाम प्राप्त स्वयं सपदि तहनभूजपण्डम् ॥ शाखाको धृतपुष्पफलप्रतानमासीदिवाचयितुमुद्यतमादरेण ॥१॥ श्रीमंतमित्यादि । आत्मघाम आत्मनो धाम आत्मधाम पुनस्तत् परमात्मभावं “गृह- देहत्घिटप्रभावाधामानि" इत्यमरः । स्वयं आत्मनैव । प्राप्त प्राप्तोतिस्म प्राप्त कर्तरि क्तः। श्रीमन श्रीरस्यास्तीति श्रीमान् तं उभयलक्ष्मीनायर्फ । अखिलार्चितं आखिलरर्चितस्तं समस्त- मृसुरार्चितं । पनं मुनीशं मुनिसुवनतीर्थाधिनाथं । तद्वनभूजपंडं नच तन् धनं च तदनं भुपिजायत इति भूजाःतद्वनम्य भूजाःतद्वनभूजाः तेषां पंडं पुनस्तत् नीलवनवृक्षफदछ । आद. रेण भक्त्या । अर्चयितुं अर्चनाय अर्चयितुं पूजयितुं । उद्यतमिव उद्युक्तमिव । सपदि शीघ्रण। शाखाकरेषु शारवा पर कराः तेषु शास्वाहस्तेषु । रूपयः। धृतपुष्पफलप्रतानं पुष्पाणि च फ- लानि च पुष्पफलानि तेषां प्रताने तथोक्तं धृतं पुष्पफलपनानं येन तत्तथोक्तं आत्तकुसुम- फलनिषयं । आमीत् अभवत् अस भुवि लड । उत्प्रेक्षालंकारः॥१॥ मा० अ०--सत्रों से पूजित तथा परमात्म-भाव को प्राप्त श्रीमुनिसुवन नाथ को मानो आदर के साथ अर्चना करने के लिये ही उस नील वनके सभी वृक्ष समूह शाखारूपी हाथों में पुष्प और फल लिये हुए स्वयम् उद्यत थे।१। तस्यैव कीलकलनाः किमु पल्लवानि तस्य स्फुलिंगनिकरोननु कुड्मलानि ॥ तम्यैव धूमविततिन पुनर्हिरेफा गत्वा बने यमनलं मदनो निमनः॥ नस्येत्यादि । धने नीलवने । मदनः रतिपति । यं अनल यद्धयानानि । गत्वा मोहा- दुपेत्य । निमशः निपतितः । तस्य ध्यानाग्नः। फीलकलना एव कौलानां कलनाः फल इति धातुः कवीनां कामधेनुः ज्यालाफ लापा एघापलयानि क्सिलयानि । किमु किं था । तस्य यद्धया. नानस्य । स्फुलिंगनिकरेः स्फुलिंगानां निकरस्तथोक्त. अग्निकणंगणः। फुड्मलानि मुकुला- नि। ननु किंधा । पुनः तस्य ध्यानानः। धूमविनतिरेय धूमानां विनतिधूमविततिस्तथोक्ना धूमाजिरेव । द्विरेफाः भ्रमराः । न भवनि । अपह्न त्यलंकारः॥२॥ मा० म०--उस नीलारण्य में जिस मुनिसुव्रत नाथ की ध्यानाग्नि में गिर कर मदन- स्वयं भस्मीभूत हो गये उसी की अग्नि-ज्याला नो ये पत्तियां नहीं हैं ? उसकी चिनगागे. शायद ये फलियां हों और उसके धूम्रसमूह ही संभवतः ये भ्रमर हैं। २ । - .:. .

। मुनिमुमतकाव्यम्। १८५ अस्मिन्नमूनि न पलाशदलान्यघारेरुडेलशांतग्ससागरविद्रुमा नु ॥ वान्ता मृगश्चिरबिरोधलवा मिथो नु वन्यैरतताचनमणिप्रकरा नुरेजुः॥३॥ अस्मिन्नित्यादि । अस्मिन् एतस्मिन्वने । अमूनि इमानि । पलाशदलानि पलाशानां दलानि नयोक्तानि किंशुकपुष्पदलानि । न न भवंति। अधारेः अधानां अरिस्तथोक्तम्तम्य पापारिजि. नेशस्य । उद्वलशांतरससागरविद्रुमाः शांतम्य रसस्तथोक्तः शांतरम एव सागरः शांतरस- सागर: घेलामुद्गत उद्दलेस्स चासो शांतरसमागरश्च उद्वलशांतरमसागरः तस्य विद्रुमाः नथोक्ताः । नु "नु प्रश्नच वितर्के च" इत्यमरः । मृगैः। यांनाः वाम्यतेसा यांता: मुनींद्रमन्निधियशान् उद्गीर्णाः। मिथ: अन्योन्यं । चिरविरोधलयाः विरोधानां लयाः तथोकनाः चिरं स्थिताः विरोधलयास्तथोक्ताः बहुलस्थितविरोधणाः । नु किमु । घन्यः बने भवाः वन्याम्तै: वनवासिभिः। ननार्चनमणिप्रक्रा: नन्यतेम्म तताः अर्चनाय योग्या मणयस्तयोक्तास्तेषां प्रकरा: अर्चनमणिप्रकग: ननाच ते अर्चनमणिप्रकराच नयोक्ता: विस्तृतपूजायोग्यरत्नयिशराः। किमु नु रेजुः यभुः । राज़ दीमौ लिट् । संशया. लंकारः ॥३॥ भा० अ०--इस नील वन में ये पलाश पुष्प नहीं है बल्कि अघ-चिनाशक श्रीजिनेन्द्र- भगवान के उद्धे लिन शान्तरसमहोदधि के मूंगे है ? अथवा हरिणों से उद्गीर्ण किये हुए चिरसशिन पारस्परिक विरोधांश तो नहीं है? या वनवासियों से विपराये गये अर्च- नार्थ मणिसमूह तो नहीं सोभ रहे हैं। ३ । अध्यास्य चंपकतरोन्तलमात्तषष्ठो धाणि बिभ्रदवलंबितशुभ्रलेश्यः ॥ शुद्धात्मतत्त्वमिव जातविवर्तमीशो ध्यानं दधे दुरितननचुचु शुक्लं ॥४॥ अभ्यास्येत्यादि। चपकतरोः चंपकश्चासौ तरुश्व चंपकनरुः तस्य हेमपुष्पवृक्षस्य । ललं भूल शास्थासयारे" लिहिया अध्याय अध्यासन पूर्व पश्चात् स्थित्या भानपष्टः आदीयते म आत्तः आत्ता पठो येनासौनयोक्तः स्वीकृतपष्टोपवासः। श्राणि धर्मा. दनपेतानि नथोफ्नानि आशाविचयादिधर्मध्यानानि । विनन् विभीति विम्रत् खोकुर्वन् । अवलंबिनशुभ्रलेश्यः अयलंश्यतेम्म अबलंबिता शुभ्रा चासौ लेश्या च शुभ्रलेश्या अवलं. यिना शुभ्रलेश्या येन सः स्वीकृन शुक्लेश्यः। ईशः त्रिलोकस्वामी। शुद्धान्मतत्त्वमिव नस्य भावः तस्यं आत्मनस्तत्वं यात्मय नत्वमात्मतत्त्वं शुद्धञ्च नदात्मनस्त्वं च शुद्धात्मतत्त्वं पुनस्तलदिय निर्मलात्मस्वरूपवत् । जानविवर्न जातं विवर्त यस्मिन् नत् उत्तवपर्याय । दुग्लिननचुंचु दुरितम्य दूननं तथोक्तं दुरितदूननेन वितं दुरितननचुंषु “तेन विरोध .

दशमः सर्गः
चुचणो” इति चुंचु प्रत्ययः पापनाशप्रनीतं । शुबध्यानं शुक्लनामैकाग्रचिनां। दधे धरतिस्म।
दुधाम् धारणे लिट् ॥४॥
भा० अ-चम्पक वृक्ष के तल में स्थित हो धर्म-ध्यान करते हुए छठवें उपवास का
नियम लिये हुए शुरु लेश्या चाले मुनिसुव्रत नाथ ने शुद्धात्मस्वरूप के ऐसा उत्पन्नपर्याय
चाला पापनाशक शुहल्यान लगाया ।४।
स्त्यानत्रयं जिनपतिः क्रमशो रजांसि नाम्नि त्रयोदश पुग हतसप्तमोहः॥
मम् कविंशतिमपि क्षपयन्ददाह क्षीणोऽथ पोडशचिदीक्षणरोधविनान् ॥५॥
स्त्यानभयमित्यादि । पुरा तृतीयभये । हतसप्तमोहः सप्त च ते मोहाश्च सप्तमोहाः हता.
स्सप्तमोहा येन सः तथोक्नः विनष्टसप्तप्रकृतिः। जिनपति: जिनानां पतिस्तथोक्तः जिने-
श्वरः। क्रमशः कमात् कामशः “बड्वल्पाात्कारकाच्छीनिष्टानिष्टे"इति शस् प्रत्ययः ।क्षपक-
श्रेणिक्रमात । अथ आत्तशुलध्यानधारणानंतरं । म्त्यानत्रयं स्त्यानानां त्रयं निद्वानिद्रा
प्रचलामचला-स्त्यानगृद्धित्रयं । नानि नामकर्मणि । त्रयोदश त्रिभिरधिका दश तथोक्ता।
"द्राष्टात्रयोऽनशितो प्राक्छनादबहुव्रीहो" इत्यनेन त्रयादेशः । रजांसि कर्माणि मोहकविंशति-
मपि एकेनाधिका विंशतिस्तथोक्ता मोहानामेकविंशतिर्मोहेकविंशतिस्ता अप्राविंशतिमोहनीयेषु
सप्तपरतीनां तृतीयभवे विनष्टत्वात् शेवाणीत्यर्थः । क्षययन क्षपयतोति क्षपयन् अनिवृत्तिकर-
णसूक्ष्मसापरायगुणस्थानद्वये नाशयन्नित्यर्थः । क्षीणे क्षीणकपायगुणस्थाने। विदीक्षणरोध.
विमान चिन ईक्षणं च चिदीक्षणे रायोः रोधाः विदीक्षणरोधाः ते च विनाश्च चिदीक्षा
णरोधविनास्तान् ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयांतरायान्। पोडश पड्भिरधिका दश
तथोक्तास्तान् “एकादश पोडशपोडन्पोढा पदा" इत्यनेन साधुः । शानावरणीयपंचकं
दर्शनावरणीयप्रतिषु स्त्यानगृद्धित्रयस्य प्रागस्तत्वात्तेपु पर्क अंतरायपंचकं चेति षोडश.
प्रकृतयः । ददाह दहनिस्म दह भस्मीकरणे लिट् ॥५॥
भा० अ०-पहले ही तृतीय भव में अनन्तानुबन्धी क्रोधमान-भाया लोभादि सप्त
मेह को विनष्ट किये हुए जिनेन्द भगवान ने क्रमश. निद्वानिद्रा आदि स्त्यान त्रय को,
तेरह नामकर्मों तथा शेष इकोस मोहनीय फर्म प्रकृतियों को नष्ट करते हुए क्षीण कपाय
गुणस्थान में शानावरणीय और दर्शनावरणीय आदि सोलह अन्तराय कर्म-प्रकृतियों को
भस्मी भूत किया ॥५॥

। मुनिसुमतकाव्यम् । १८७ घातीन्यपि प्रबलशक्यतिगर्वितानि देवस्य योगकरवालदितान्यभूवन ।। वात्मनः किमिति चिंतनयेव दग्धरज्जूपमं मममघातिवलं बभूव ॥६॥ घातीत्यादि। प्रबलशस्त्यतिगर्वितानि प्रकला चासौ शक्तिश्च प्रयलशतिः अत्यन्त. गर्वितान्यतिगर्वितानि प्रबलशक्त्यतिगर्वितानि तथोक्तानि प्रयलसामध्ये नाहंकारि- तानि । घातीन्यपि घातयंत्येयं शीलानि घातीनि आत्मरवरूपतिरोधकानि कर्माण्यपि अपिशब्देन अघातिपु त्रिपष्टिपरिमितदुरितान्यपीत्यर्थः। देवस्य जिनेश्वरस्य । योगक- रवालदितानि योग एव करवालो योगकरवालः तेन दितानि खंडितानि तथोक्तानि शुहध्यानखड्गन छिन्नानि । अभूवन आसन् । भू सत्तायां लुड् । आत्मनः स्वस्य : वर्ल्स मार्गः । किं इति को वेति । चिंतनयेच चिंतनेन एव । अघातिवलं अघातिनां वलं तथोक्त' अघातिकमसेनासम सहयातिक्षयसमं एव इत्यर्थः । दग्धरज्जूपम दातेस्म दग्धा सा चासो रज्जुश्च दग्घरज्जुस्तस्यास्सम नि-शक्तिकमिति यावत् । बभूव भयनिस्म भू स. सायां। लिट् ॥६॥ भा० अ०-जिनेन्द्र मुनिसुव्रत भगवान् के शुक्लध्यान रूपी खड्ग से अत्यन्त शक्तिमचा. से सगर्व धातिया धर्म भी छिन्न भिन्न हो गये। तदनन्तर अपना कौन सा मार्ग रहा इस ..चिन्तन से ही जली हुई रस्सी के समान अधातिया कर्म भी शक्ति हीन हो गया।६। इत्यस्तपापरिपुराप महैब लब्धि वैशाखकृष्णदशमीश्रवणेऽपराह्ने ॥ सक्षायिकीर्णवदशातिशयारपदं च प्राप्तोदय नभसि पंचसहस्रदंडैः ॥७॥ इत्यस्तेत्यादि । इति उक्यकारेण । अस्तपापरिपुः पापमेव रिपुः पापरिपुः अस्तः पापरिपु येन सः तथोक्तः नष्टकर्मशत्रुः। स तीर्थकरपरमदेवः । पैशासकृष्णदशमीश्रवणे पैशाख्या पौर्णमास्यां युक्तो मास: वैशाख. “सास्यपौर्णमासी" इत्यण वैशापस्य कृष्णस्तथा- का वशाखकृष्णस्य दशमी तथोक्ता चैशाखकृष्णदशम्यां श्रवणस्तथोक्तस्तस्मिन् पैशाख. मासस्य छष्णपक्षस्य दशमीतियौ श्रवणे । अपराह्न अहोऽपरः अपराहस्तस्मिन् “संख्याव्य. यसर्वा शास्” इत्यष्ट् अहादेशश्च सायांह । क्षायिककर्मक्षयेन जाता नलिब्धिः सम्यक्रव.. चारित्रज्ञानदर्शनदानलामभोगोपभोगवोर्याणीति नवकेरललब्धिः दशातिशयान् दश च ते अतिशयाश्च दशातिशयास्तान् घातिक्षयजगब्यूतिशतवतुष्टयसुमिक्षादि-: दशातिशयान् । नभसि आकाशे | पंचसहनदंड: पंचच तानि सहस्राणि च पंवसहस्राणि पंचसहस्र प्रमिता दंडा तयोतात. अथवा पंचपापन् सहस्राणि पंचसहस्रा: "सुचा. " त्यादिना समासः पंचसइनाश्च ते दंडाश्च तथोकास्तः पंचसहस्रचापः। प्राप्तोदयं ।

१८८ नवमः सर्गः। प्राप्यते स्म प्राप्तः प्राप्त उद्यं यस्य नत् प्राप्तोदयं पुनस्तत् लामोमनिक। पदं पान। सहव युगपदेव । आप प्रामोनिस्म । आप्रय व्याप्ती लिद ॥ ७ ॥ भा० अ०-यो फर्म-रूपी शत्रु को नष्ट किये हुए उन तीर्थकर देव ने वैशाख कृष्ण दशमी को श्रवण नक्षत्र के अपराह में फर्म क्षयसे उत्पन्न हुए सम्यक चारित्र, शान, दर्शन; दान लाभादि नय फेवल लब्धियों को घाति-क्षयज चार सौ कोश तक मुभिसादि दस. अतिशयों तथा आकाश में पंचसहस्र चाप-प्रमित उन्नत स्थान को साथ हो साय प्राप्त किया ॥७॥ . अध अत्रांतरे सकललोकपतेरमुष्य शक्राज्ञया रचितवान्धनदः सभां ताम् ।। यस्याः प्रमाणमुदित मुनिभिः पुराणैरध्यर्धयोजनयुगं वहुरत्नमय्या॥८॥ अप्रत्यादि । यस्याः सभायाः । यारतमय्याः यहनि च तानि रतानि च यहुरक्षानि तेषां विकारो वरतमयो तस्याः नानारतनिर्मिनायाः । प्रमाण मानं । पुराणः पूर्वकाल- भनेः। “पुराणम्"इति साधु । मुनिभिः गणधरादिभिः। अध्यर्धयोजनयुगं योजनयोयुगंयोज- नयुग:अधिकमध यस्य तन् अध्यर्ध तथ तन् योजनयुगं च तथोक्नं साधिकाधंयोजनद्वयं । उदितं उयते । तां सभी समवसरणभूमि। सकललोकपतेः सकलाश्च ते लोकाश्य तथो. पता: तेको पतिस्तस्य समलजगत्स्यामिनः। अमुष्य एतस्य जिनपतेः। शमाया • शाम्याशा तथोक्ता तया देवेंद्राया। धनदः धनं ददातोति धनदः कुवेः । अस्मिन् । अंतरे भाकाशे। रचितवान् निर्मितवान् ॥ ८॥ मा० भ०-प्राचान गणधगदि आचार्या ने इस जगत्स्वामी जिनेन्द्र भगवान की जिस पतुरता-जटिन समशरण को उचना दाई योजन फी घतलाई है उसो की रचना इन्द फो आशा से कुयेर ने आकाश में फी ॥८॥ रेजेतरां दिविजराजपत्प्रतिष्ठा संसन्मही विनयसंकुचिताखिनांगा। व्योमस्थलीय भुवि यः समवाप्य संन्यः सोऽयं स्वयं गुणनिधिःममगन्तेति ॥९॥ रंजनरामित्यिादि । यः देयः । भुपिभमा। समवाय ममवाप्नं पूर्व प० समेत्य । मेन्यः रोपित योग्यः संयः आगध्यः । मोऽयं मः परः । गुणनिधि गुणानां निधिलयोपनगन. मानादिनिलयः । म्ययं आत्मय । समगति समेगादिनि । “समोऽनिपानि यिन मगच "नि तर गम्न गना लद । यिनयमपुचितागियांगा दिगोन मंचितानि निय. संधुचितानि भपिलानि च तान्यंगानि च पिलांगानि पिनएमगितानि भगिला. गानि पस्यास्सा तपोरना मगत्या संदृतसरलार नारयवा। यामालार प्यानः पटी चाम मुनिसुव्रतकाव्यम् । १८६ स्थली आकाशप्रदेशः सेव। दिविजराजदरत्प्रतिष्ठा दिविजानां राजा दिविजराजस्तस्य पन् तस्याः प्रनिष्ठा यस्यास्सा तथोक्ता इंद्रनीलाधिष्ठानयुक्ता। संसन्मही संसदो मही तयोक्ता सपरागभूमिः। रेजेस अधिकं यमी । राज दीप्ती लिट् ॥ ६ ॥ भा० अ०-जो जिनेन्द्र भगवान भूतल पर अवतीर्ण होकर अत्यन्त आराधनीय होते हैं "वे ही गुणनिधि जिनेन्द्र स्वयं मा मिले मानो इसी कारण से व्योमन्थली के समान तथा भक्ति से संकुचित अन्तरंगवालो इन्द्रनोल जड़ित समवसरण भूमि अत्यन्त सुशोभित हुई। ६ । प्रासादचैत्यपरिखालतिकाद्रुमक्ष्मा जाता ध्वजद्युकुजहर्म्यगणनमात्र । पीठानि चेति हरसंख्यभुवस्तदंतरेकातकेलिसदनं जिनबोधलक्ष्म्याः ॥१०॥ प्रासादेत्यादि । प्रासादचैत्यपरिसालतिकाद्रुमक्ष्माः प्रासादयुक्तं चैत्यं नथोक्त प्रासादचत्यं च परिखा व लतिका च द्रुमश्च प्रासादचैत्यपरिखालतिकागुमास्तेषां क्षमाः तथोक्ताः चैत्यप्रासादभूमि खानिकाभूमिः पल्लिकाभूमिः वनभूमिश्च । ध्वजा कुजहर्म्यगण- क्षमाश्च ध्वजश्व दिवः पुजो द्यु कुजो यु कुजश्च हयं च गणश्च ध्वजा कुजहर्म्यगणा. स्तेषां क्षमाः तथोक्ताः ध्वजभूमिः कल्पवृक्षभूमिः हर्म्यभूमिः गणभूमिश्च । पीठा- नि चेति विपीठानि चेति । हरसंख्यभुव. हराणां रुद्राणां संख्या यासां तास्तथोक्ताः हरसंख्याश्च ता. भुवश्च तथोका एकादश भूमयः । जाताः जायतेस्म जाताः। तदंतः तासामंतस्तदंतः भूमीनां मध्ये । जिनवोधलक्ष्म्याः बोध एव लक्ष्मीस्तथोक्ता . जिनस्य योधलक्ष्मीः नस्याः जिनेश्वरकैवल्यज्ञानश्रियः । एकांतफेलिसदनं केल्याः सदनं केलिसदनं एकांतां च तत्केलिसदन च तथोक्तं गंधकुटोत्यर्थः ॥१०॥ मा० अ०-प्रासाद चैत्य, खातिका, चलिका, वन, ध्यज, कल्पवृक्ष हर्ष और गण मूमि तथा त्रिपीठ आदि ग्यारह भूमियां थीं। इन्हीं के बीच में जिनेन्द्र भगवान् की मुक्ति-लक्ष्मो को एक मात्र क्रीडा-पली अर्थान् गन्धकुटी थी॥१०॥ प्रासादचैत्यनिकरः परिखा व्रतत्यो वृक्षा ध्वजाः सुरकुजाः क्रमशोऽभ्यु ॥ श्रासन गृहाणि च गणास्त्रिपु विष्टरेपु श्रीधर्मचक्रविविधध्वजमंगलानि ॥११॥ प्रासादेत्यादि । अष्टभूपु अष्ट च ता भुरश्च अष्टभुवस्तासु अष्टपृथिवीपु । क्रमशः ममात् क्रमशः परिपाट्या । प्रासादचैत्यनिकरः प्रासादश्च त्यानि च प्रासादत्यानि तेषां निकरस्तयोक्तः प्रथमभूमौ प्रासादबत्यसमूहः परिखा द्वितीयभूमौ यातिका । व्रतत्यः हनीयभूमी लगाः । वृक्षाः सुर्यभूमौ वृक्षा: 1 ध्यजाः पंवमभूमौ पनाकाः मुरकुजाः को भूमौ जायंत इति पुजाः सुराणां कुजास्तथोकाः पाठभूमो कल्पवृक्षाः । गृहाणि सप्तमभूमी . Pre- नवमः सर्गः भा. १०- हाणि । गणा: अटमभूमो द्वादशगणाः । त्रिषु विष्टरेषु निमेपलापोठेषु प्रथमे श्रीधर्म- चमाणि थिया उपलक्षितानि धर्मचकाणि विनोये अष्टमहाध्वजाः तृनोये अएमंगलानि । आमन् अभवन् । अस भनि लङ् ॥११॥ -आठो भूमियों में प्रमश प्रथम में प्रासादचैत्यालय-समूह, द्वितीय में परिखा, तृतीय में खानिका बल्ली, चतुर्थ में लतावृक्ष, पञ्चम में वृक्षध्वज, पष्ठ में पताका कल्पवृक्ष, सप्तम में हर्य, अएम में द्वादश गण और प्रथम पीठ में धर्म चक, हितोय में भष्ट महाम्बज तथा तृतीय में अष्ट मंगल थे। ११ । सप्लश्रतुभिरपि पंचभिरप्युदारवेदीभिरुन्नतिरवापि चतुगुणैव ।। . लोकोन्नतादपि जिनाधिपतेरमुप्माज्जैनप्रदक्षिणकृतेः फलमीदृशं हि ॥१२॥ सालग्त्यिादि। चतुर्भिरपि । सालः प्राकारैः । पंचभिरपि । उदारवेदीभिः उदाराश्च ताः वेद्यश्च उदारवेधस्तामिः महावेदिकाभिः । लोपोन्नतादपि लोकादुन्ननो लोगोमतो लोक- स्योन्नतो या लोकोन्नतम्तस्मादपि जगदुत्कृष्टाश्च । अमुष्मान् एतन्मुनिसुननतीर्थंकरात्। जिनपतेः जिनश्चासौ पनिश्च जिनानां पतिर्वा नस्मात जिननाथात् । चतुर्गुणैव चत्या- रो गुणा यस्यास्सा नथोक्ता चतुर्भिर्गुणैस्सहितव । उन्नतिः उत्सेधं श्रेष्ठत्वं च अशीति- चापोत्सेधमित्यर्थः । अवापि अवाप्यत आपलव्याप्ती कर्मणि लुङ् । तथा हि जैनप्रदक्षिणकृतेः प्रदक्षिणस्य कृतिः प्रदक्षिणतिः जिनस्येयं जैनी सा चासौ प्रदक्षिणनिश्च जैनप्रदक्षिण- तिम्तस्याः । फलं निष्पत्तिः । ईदृशं इदमिव दृश्यत इति ईदृशं एनादृशं । हि । अर्थान्तरन्यासः॥१२॥ भा० अ०--चार चहार दिवालियों तथा पांच वेदियों के द्वारा इस समयसरण भूमि ने संसार में सभी से समुन्नत श्रीमुनिसुव्रत स्वामी से भी चौगुनी उन्नति ( उंचाई ) प्राप्त की थी। ठोफ है जिनेन्द्र भगवान की प्रदक्षिणा का यहो फल होता है । १२! पाठ्य संसठबनीतलयारिवाहं प्रारभ्यमागासुकृतामृतपूग्वर्पम् ॥ सालेन सर्वमणिचूर्णमयेन तेने तेनावितानसुरकामुकसंपुटश्रीः ॥१३॥ आवेष्टयेत्यादि । प्रारभ्यमाणसुकृतामृतपूरवर्षं प्रारभ्यमाणं सुस्तमेवामृतं सुकृतामृत तत्य पूरस्तथोक्तः सुकृतामृतपूरस्य वर्षं तथोक्त प्रारभ्यमाणं सुस्तामृतपूरवर्ष येन सः तं उपक्रम्यमाणपुण्यकर्मामृतप्रवाहवर्पसंयुक्त । संसदद्वनीतलपारिवाह अवन्यास्तल मबनी-लं संसदोऽचनीरलं तथोक्त वारिवहतीति वारियाहः संसदोऽपनिटलमेव धारिया स्तथोक्तस्तं समवशरणभूतलमेघ । रूपकः । आवेष्टय विवरित्या । सर्वमणिचूर्णमयेन - 'सबसे मुनिसुव्रतकाव्यम् । १८६ स्यलो आकाशप्रदेशः सेव। दिविजराजपत्प्रतिष्ठा दिविजानां राजा दिविजराजस्तस्य दूपत् नस्या. प्रतिष्ठा यस्यास्सा तथोक्ना इंद्रनीलाधिष्ठानयुक्ता। संसन्मही मंसदो मही तृयोक्ता सपनागभूमिः। रेजेअधिकं यमी। राज दीप्ती लिट् ॥ ६ ॥ भा० अ० -जो जिनेन्द्र भगवान् भूनल पर अवतीर्ण होकर अत्यन्त आराधनीय होते हैं -घेही गुणनिधि जिनेन्द्र स्वयं आमिले मानो इसी कारण से व्योमन्थली के समान तथा भक्ति से संकुचित अन्तरंगवालो इन्द्रनोल जड़ित समवसरण भूमि अत्यन्त सुशोभित हुई। ६ । प्रासादचैत्यपरिखालतिकाद्रुममा जाता ध्वजाकुजहर्म्यगणक्षमान । पीठानि चेति हरसंख्यभुवस्तदंतरेकातकेलिसदनं जिनबोधलक्ष्म्याः ॥१०॥ प्रासादेत्यादि । प्रासादचैत्यपरिसालतिकाद्रुमक्ष्मा प्रासादैर्युक्तं चैत्यं नथोक्त प्रासादचत्यं च परिवा च लतिका च द्रुमश्च प्रासादचैत्यपरिखालतिकाद्रुमास्तेषां क्ष्माः तथोक्ताः चैत्यप्रासादभूमि खानिकाभूमिः यलिकाभूमिः वनभूमिश्च । ध्वजा कुजहर्म्यगण- क्षमाश्च ध्वजश्व दिवः कुजो धु कुजेर शुकुजश्च हयं च गणश्च ध्वजा कुजहर्म्यगणा- स्तेषां क्षमाः तथोक्ताः ध्यजभूमिः कल्पवृक्षभूमिः हर्म्यभूमिः गणभूमिश्च । पीठा- नि चेति त्रिपीठानि चैति । हरसंख्यभुवः हराणां रद्राणां संख्या यासां तास्तथोवताः हरसंख्याश्च ता. भुवश्च तथोका एकादश भूमयः । जाता: जायतेस्म जाताः। तदंतः तासामंतस्तदंतः भूमीनां मध्ये । जिनवोधलक्ष्म्याः योध एव लक्ष्मीस्तथोक्ता जिनस्य बोधलक्ष्मी तस्या. जिनेश्वरकैवल्यज्ञानश्रियः । एकांतफेलिसदनं केल्या. सदनं केलिसदनं एकांतं च तत्केलिसदन च तथोक्तं गंधकुटीत्यर्थः ॥ १०॥ भा० अ० --प्रासाद चैत्य, सातिका, बलिका, वन, ध्वज, कल्पवृक्ष हम्मे और गण मूमि तथा त्रिपीठ आदि ग्यारह भूमियां थीं। इन्हीं के बीच में जिनेन्द्र भगवान् फी मुक्ति लक्ष्मी को एक मात्र क्रीड़ा-स्थली अर्थान् गन्धकुटी थी ॥१०॥ प्रासादचैत्यनिकरः परिखा व्रतत्यो वृत्ता ध्वजाः सुरकुजाः क्रमशोऽटभृषु ॥ श्रासन् गृहाणि च गणास्त्रिपु विष्टरपु श्रीधर्मचक्रविविधध्वजभंगलानि ॥११॥ प्रासादेत्यादि । अपभूपु अष्ट च ता भुवश्च अष्टभुवस्तासु अष्टपृथिवीषु । प्रमशः प्रमात् समशः परिपाट्या । प्रासादचैत्यनिकर मासादध इत्यानि च प्रासादचैत्यानि तेषां निकास्तथोक्तः प्रथमभूमौ प्रासादचैत्यसमूहः । परिक्षा द्वितीयभूमी खातिका । प्रतत्यः तृतीयभूमो लताः । वृक्षाः तुर्यभूमौ वृक्षाः । प्रजाः पंचमभूमौ पताका: सुरकुजाः 'को भूमौ जायंत इति कुजाः सुराणां कुजास्तयोकाः पष्ठभूमौ कल्पवृक्षाः । गृहाणि सप्तमभूमौ नवमः सगः भा.80- 1 - हाणि । गणा: अएमभूमो द्वादशगः । त्रिपु विटरेणु त्रिमेपलापोठेषु प्रथमे श्रीधर्म- चमाणि धिया उपलक्षितानि धर्मचक्राणि दिनोये अष्टमहायजाः तृतीये अष्टमंगलानि । आमन् अभवन् । अस भृषि लङ् ॥११॥ -आठो भूमियों में क्रमश प्रथम में प्रासादचैत्यालय-समूह, द्वितीय में परिखा, तृतीय में सातिका चल्लो, चतुर्थ में लनावृक्ष, पञ्चम में वृक्षध्वज, पष्ठ में पताका कल्पवृक्ष, सप्तम में हर्य, अष्टम में द्वादश गण और प्रथम पीठ में धर्म चक्र, द्वितीय में अष्ट महावज तथा तृतीय में अष्ट मंगल थे। ११ । साम्लेश्चतुर्भिरपि पंचभिरप्युदारवेदीभिरुन्नतिरवापि चतुर्गुणैव ।। लोकोन्नतादपि जिनाधिपतेरमुप्माज्जैनप्रदक्षिणकृतेः फलमीदृशं हि ॥१२॥ सालरित्यादि। चतुर्भिरगि। सालैः प्राकारैः । पंचभिरपि । उदारवेदीभिः उदाराश्च ताः घेद्यच उदारवेद्यस्ताभिः महायेदिकाभिः। लोयोन्ननादपि लोकादुन्नतो लोकोन्ननो लोक- स्योन्ननो वा लोकोन्नतम्तरमादपि जगदुत्कृपाय। अमुष्मात् एतन्मुनिसुननतीर्थंकरात्। जिनपतेः जिनश्चासौ पतिश्च जिनानां पति तस्मात् जिननाथात् । चतुर्गुणैव चत्या. गुणा यस्यास्सा तथोक्ता चतुर्भिर्गुणस्साहितेय । उन्नतिः उत्सेध घेप्ठत्वं च अशीति- चापोत्सेधमित्यर्थः । अयापि अचाप्यत आप्ल व्याप्ती कर्मणि लुङ् । तथा हि जैनप्रदक्षिणकृतेः प्रदक्षिणस्य कृतिः प्रदक्षिणतिः जिनस्येयं जैनी सा चासो प्रदक्षिणकृनिश्च जैनप्रदक्षिण- कृतिम्तस्याः । फलं निष्पत्तिः । ईदृशं इदमिय दृश्यत इति ईदृशं एतादृशं । हि। अर्थान्तरन्यासः ॥ १२॥ भा० ०-चार चहार दिवालियों तथा पांच वेदियों के द्वारा इस समवसरण भूमि ने संसार में सभी से समुन्नत श्रीमुनिसुव्रत स्वामी से भी चौगुनी उन्नति (उंचाई ) प्राप्त की थी। ठीक है जिनेन्द्र भगवान को प्रदक्षिणा का यही फल होता है । १२ । पावेष्ट्य संमदवनीतलबारिवाहं प्रारभ्यमाणसुकृतामृतपूरवर्पम् ॥ सालेन सर्यमणिचूर्णमयेन तेने तेनावितानसुरकार्मुकसंपुटश्रीः ॥१३॥ आवेष्टयेत्यादि । प्रारभ्यमाणमुतामृतपूरवर्ष प्रारभ्यमाणं सुस्तमेवामृत सुस्तामृत तत्य पूरस्तथोक्तः सुकृतामृतपूरस्य वर्ष तथोक्त प्रारभ्यमाणं सुरनामृतपूरवर्ष' येन सः त उपक्रम्यमाणपुण्यकर्मामृतप्रवाहवर्षसंयुक्त । संसद्धनीतलवारियाहं अवन्यास्तल. मयनीतलं संसदोऽवनीतलं तथोक्त पारिवहतीति वारियाहः संसदोऽधनि लमैव पारियाह- स्तथोक्तस्तं समवारणभूतलमेघ । रूपयः । आयेष्ट्रय विपरित्या । सर्वमणिचूर्णमयेन सर्वेचते विशाल धनुप मुनिसुव्रतकाव्यम् । मणयश्च सर्वमणयस्तेपा चूर्ण समणिचूण नस्य विकारः सर्गमणिचूर्णमयस्तेन सकल रत्नधूलीकृतेन तेन । सालेन प्राकारेण । गरितानसुरकार्मुक्सपुरश्री न पिताने अविताने पृथुले “क्रतुविस्तारयोरस्त्री वितान त्रिषु तुच्छके" इत्यमर सुरस्य कार्मुके सुरकार्मुके अविताने च सुरफामुके च अस्तिानसुरकामुके तयोस्सपुटन तथोक तस्य श्रास्तथोक्ता रद्रचापयुग्मसपशोभा तेने विस्तार्यतेस्म तनूड् विस्तारे ॥१३॥ भा० अ०-पुण्यरूपी अमृत प्रवाह को वृष्टि प्रारभ क्येि हुए भूतल पर समवसरण रूपी मेघ को घेर कर उसी सर्व मणिमय चूर्णवाली चहार दिवाली ने रुद्र तथा इन्द्र के की शोभा फैलायी। १३ । लोकेषु कूटरहितेषु महामहिम्नो देवस्य तम्य निक्टेऽपि कृताधिनास ॥ प्रासादचैत्यनिलयाः प्रथयावभृयु कूटान्दिगबरपथप्रतिरोधिनो धिक्॥१४॥ लोकप्नित्यादि । देवस्य स्वामिन । महामहिम्ना महाश्चासौ महिमा च महामहिमा तेन महाप्रभावेण । लोकेषु जनेषु। कूटरहितेषु कूटनरहितास्तथोक्तास्तेषु कपारहितेषु गहीनेषु । "मायानिश्चलयत्र पु फैनरानृतराशिषु । अयोधने शैलश् गे सीरागे फूटमस्त्रियाम्' इत्यार । तस्य जिनस्य । निकटे समीपे। हनाधिपासा अपि न अधिवासो दोस्ले तथोक्ता निहि तस्पिनयोऽपि । प्रासादचैत्यनिलया चैत्याना निल्यास्तथोक्ता प्रासादाश्च चैत्यनिल्याश्च तथोक्ता प्रासादचैत्यारासा । दिगवरपथप्रतिरोधिन दिगेगायर येपाते दिगवरास्तेषा पथा दिगबरपथ अथया दिशश्च अंबराणि च दिगवराणि तेषा पथास्तथोक्ता त मधन्त्येव शोलास्तथोकास्तान मुनिमार्गविरोधिन दिगाकाशमार्गातिरोधकाश्च । फूटान् शिखराणि कपटान्। प्रथया यभूवु प्रकटयामासु । प्रथि प्रख्याने लिए । धिक निदाया "कुधिड निर्भमन निदयो "इत्यमरः। विरोधालंकार ॥१४॥ भा० अ०-श्रीमुनिसुव्रत नाथ के समुज्ज्वल प्रभार से लोगों के कपट रहित अथवा शिखर होल होने पर उस भगरान निकर यास किये हुए भी प्रासाद जिन चैत्यालयों ने आकाश मार्ग (दिगम्बर मुनिमार्ग ) को रोके हुए शिखरों (कपटों) को प्रकटिन किया अत उन्हें धिकार है।१४। मार्गप्वपि लिपु चिरभ्रमणेन भिन्ना भिन्ना पुरैव भवलालनयाधुसिंधुः ॥ शके जिनेंद्रचरण शरण प्रवेष्टु सप्राप सप्रतिसभा जलखातिकात्मा ॥१५॥ मार्गेप्यित्यादि । पुरैय पूर्वमेव । भवलारनया भवस्य संसारस्य ईश्वरस्य लालना भय लालना तयाससारस्य दस्यया तात्पर्येण। “जन्मभ्रेयशंधरेषु भव"। इति मानार्थ रनको दशमः सर्गः। पे। भिन्ना विदीर्णा । त्रिपु मार्गेष्वपि त्रिषु पयिष्यपि। विरभ्रमणेन चिरं भ्रमणं चिरभ्रमणं तेन चिरपर्यटनेन । भिन्ना क्लिन्ना ।धु सिंधुः सुरगंगा। "सिंधुर्ना सरिति खियाम्" इत्यमरः । जिनेन्द्रचरणं जिनानां इंद्रो जिनेंद्रस्तस्य चाणं तथोक्तं जिनेश्वरपादशरणं प्ररक्षणे। प्रवेष्टु प्रवेशाय प्रवे। संप्रति इदानीं । जलखातिकात्मा जलस्य खातिका जलखातिका सैव मात्मा स्वरूपं यस्यास्सा स्वीकृतजलपरिखाखरूपा । सभां समवसरणं। संप्राप संययो । आप्ल व्याप्ती लिट् । उत्प्रेक्षा ॥१५॥ मा० अ०-पहले ही संसार अथना शंकर से लालित पालित होकर पीछे मागों में बहुत देर तक भटकती रहने से खिन्न होती हुई देव-गंगा ने श्रीभगवान के चरणों की शरणीभूत होने के लिये ही मानों जल-खानि स्वरूप से समवशरण को प्राप्त किया ॥ १५ ॥ वल्लिक्षितौ सुमनसो रतिवल्लभस्य भल्लकियागतजगल्लयपातकानि ॥ संलप्य भुंगरणितेन विशुद्धिहेतोः किं लोकनाथमभजन्सुमनोनिषेव्यम् ॥१६॥ पल्लिशिनावित्यादि । बल्लिक्षिनौ वल्याः क्षितिल्लिक्षितिस्तस्यां । सुमनसः पुष्पाणि को- विदाश्च । रनिबल्लभस्य रत्यावल्लभस्तथोक्तस्तस्य कामस्य । भल्लनियागतजगल्लयपातकानि भल्लस्य क्रिया भल्लकिया तया गतः जगतां लयो जगलयः मलकियागतश्च जगलयश्चासौ भल्लक्रियागतजगल्लयस्तेन जातानि पातकानि तथोक्तानि पुनस्तानि वाणव्यापारण गत. जगल्लयजातपापानि। भृगरणितेनभृगानां रणितंभृगरणितं तेन भ्रमग्ध्वनिना । संलप्य संल. पनं पूर्व आलोच्य । विशुद्धिहेतोः विशुद्ध हेतुस्तथोक्तस्य प्रायश्चित्तनिमित्त । सुम नोनिपेव्यं शोभनं मनो येषां ते सुमनसः निषेवितुं योग्यः निषेव्यः सुमनोभिर्निपेव्यस्त वियुधजनैराराध्यं “कुसुमकोविदामरेषु सुमनः" इति नानार्थरनकोशे। लोकनाथं लोकस्य नाथस्तथोक्तम्त त्रैलोक्यम्वामिनं । अभजत् असेवत । भज सेवायां लङ । किं किमुत । उत्प्रेक्षालंकारः ।। १६॥ -वल्लीमयी भूमि पर पुष्पों ने कामदेव के पुष्पमय वाण से संसार का जो नाश किया है उस पातक को भृगों के गुंजार के द्वारा कह कर मानों प्रायश्चित्त के निमित्त ही देवताओं से सेव्य जगत्पति श्री मुनिसुव्रतनाथ को सेवा की ॥१६॥ ककेलिसप्तदलचंपकचूतपंडा: कामारिसन्निधिवशादिवशांतकामाः॥ पुष्पाणि वामनग्णाहतिचाटुवादच्छायाकटाक्षनिरपेक्षमधुर्बधूनाम् ॥१७॥ फकेलीत्यादि । केलिसप्तच्छदचंपकचूतपंडाः ककेलयश्च सप्त च्छदा येषां ते तथो. पता: सप्तच्छदाश्व चंपकाश्च चुताश्च कंकैलिसप्तच्छदचंपकचूतास्तेषां पंडा: भा०/- 2 मुनिसुमतकाव्यम् । अशोकरिपमन्छदपकचूतपंडाः दुसमूहाः । कामारिसन्निधियशात कामस्या- रिकामारि: कामारेस्सनिधिः कामारिसन्निधिस्तस्य वशस्तस्मात् मन्मथरिजिनेश्वरस्य सन्निधानाभीनात् । शांतकामा इव शांतः कामो येषां ते तथोक्ताः निःकामा इच। बधूनां नारीणां। चामचरणाहतिवाटुयादच्छायाक्दाक्षनिरपेक्षं पामश्वासौ चरणश्च नथोक्तः तस्याहतिस्तथोकना चाटुश्चासौ पादच चाटुवादः चामवरणाहतिध चाटुवादश्च च्छाया च फटाक्षश्च तथोक्ता: यामचरणाहतिवाटुवादच्छायाक्टाक्षाणां निरपेक्षं यस्मिन्या- मणि नत् घामपाताडनमनोहग्यचनच्छायोपांगदर्शनापेक्षारहितं यथा तथा अशोका. दीनां यथामम घामचरणाहत्यादिनिरपेक्षत्यमित्यर्थः । पुष्पाणि कुसुमानि। अधुः अधरन् डुधाइ धारणे लु। यथासंग्य्यालंकारः ॥ १७॥ मा० १०-काम-नाशमयोजितेन्द भगयान के निक्टरप होने के कारण मानो शान्त हुप पेसे अशोर, साउद, नगर नधा भान-समूह भंगनाओं के पास-चरण-प्रहार, सुमिष्ट पचन, छायारान और पटाक्ष-निक्षेप की अपेक्षा बिना पिये ही पुष्पित हो गये। अर्थात् यषियों के सिद्धान्तानुसार अशोक स्त्रियों के पायें पैर फेहार करने से क्या साउद स्त्रियों के सुमिए भाषण से, चम्पक स्त्रियों के छायापात से तथा आम्रवृक्ष स्त्रियों के पटाक्ष मात्र से पुष्पित होते हैं सो जिनेन्द्र भगवान् के यहां गहने से ये वृक्ष उल्लिवित उपचार एप पिना ही पुग्नुमिन हो गये ।। १७॥ अर्चा जिनग्य बनचत्यमहीमहागामग्छिन्नधारमकरन्दमुचा नलेषु ।। चक्रनिरत्ययतपात्यययोगनिष्ठा नकम्पगानजिनयोगिवगमिश ॥१८॥ अर्चेत्यादि । अन्छिनधारमारंदमुना न निघाग यम्य र अन्छिनधानधासी मारदध नयोक्तः न मुचनीति असिनधारमकरंदमुचम्नेपो भविधिप्रयायुक्त. पुष्पासर्त । पनत्यमदीनागा चैत्यर्यपता महोगदाश्चन्यमीरहाः पनन्य घेत्य. महोरहाम्ने यनभूमिभिचैत्यवृक्षाणां भले मले। जिनम्य जिनेश्वरमा अयोः प्रति एनयः। निरत्ययनपात्यययोगनिहानिप्पंगाजिनयोगिधमिशको पात्ययाय योग. लयोपनः निरत्यपरनामी नगन्यायोगध नथोपनः निरत्ययनपात्यपयोगस्य निष्ठा रायोक्ता योगोऽन्येषामितियोगिना जिना योगिना जियोगिनः ने घरानधापना: पानिर्गत नि निरत्ययनपायययोगनिष्टय निगा ये ने मथोपना निम्त्य. पनपत्यपयोगनिया: निपगात्रा ते जिनगध मोना निरस्ययनपत्यययोगनिधाः नियागाजिनयोगिरगर तथोक्ता: लेगमभिसा नपोषना न निगनिनाग्यांकादयो.

१६४ दशमः सर्गः। गनिष्पत्या निश्चलशरीरजिनमुनिवरेण्यसंशयं । चकः विदधुः डुकृञ् करणे लिट् । उत्प्रेक्षा ॥१८॥ भार अ-अविच्छिन्न रूप से मकरन्दधारा प्रवाहित करते हुए वनभूमिस्थ चैत्य वृक्षों के नोवे विराजमान जिनेन्द्र भगवान् को प्रतिमाओं ने मानों अनिवार-रहित कर्या-काल योग को सिद्धि से निश्चल शरीर वाले जिन मुनियर का सन्देह धारण किया ॥ १८ ॥ ज्ञानोदये जिनपतेः स्थिरभावमाप्ते लोके स्वयं च तडितःस्थिरभावमाप्ता॥ प्रायः प्रलंबितधनास्तमुपासतेस्म खत्पताककनकध्वजदंडदभात् ॥१६॥ ज्ञानोदय इत्यादि। लोके भुवने। जिनपतः जिनानां पतिस्तथोक्तस्तस्य जिनेशस्य । शानोरये मानत्योदय तोक्नस्तस्मिन् केवलज्ञानोत्पत्तो। स्थिरभाव स्थिरस्य भावस्तथो. क्तस्त स्थिरत्वं । आते आप्नोतिस्म आप्तस्तस्मिन् याते सति। प्रलंबिनधनाः प्रलंबितो घनी याभिस्तयोक्ताः संश्लिएमेघाः । तडितः विद्युतः । स्वयं च । प्रखत्पताफकनक- ध्वजदंडदमात् प्रताति प्रखंत्यः खंत्यः यताका येषां ते प्रेखत्पताकाः ध्वजानां दंडाः मजदंडाः कनकेन निर्मिता ध्वजदंडास्तथोक्ताः खत्पताकाश्च ते कनकध्वजदंडाश्च तथोक्ताः सत्यताककनकध्वजदंडा इति दंभस्तथोक्तस्तस्मात् चलद्धजसहितसुवर्ण. दंडव्याजात् । स्थिरभाव स्थिरस्य भावत्तयोक्तस्तं स्थिरत्वं । संशययुदासन तत्त्वेपु निश्चल. चित्तत्वं । व आप्ताः प्रयुताः सत्यः । प्रायः भृश । ततार्थनायक । उपासतेस्म सेवतेस्म । आसिउपवेशने लट् ॥१६॥ भा० अ०-श्रीजिनेन्द्र भगवान् के केवल ज्ञान उदय होने पर माना उमड़ हुए मेघ- पालो विपुलतिकार्य फड़कड़ातो हुई पताका के सुरण-धज दण्ड के बहाने से स्वयं थिला को प्राप्त होता हुई कासा जिनंद भगवान् का सवा करने लगी । १६ । भव्यावलेदेशविधामरभूजकृत्यं वान्छा विनय विधात्ययमेक एव ।। यत्तेतदेनमभितोऽप्यभजन जिनेंद्र रुंद्रा गुहि गुणिनः समुपाश्रयते ॥२०॥ भन्यावलेरित्यादि । यत् यस्मात् कारणात्। अयं एपः जिनः। भन्यावलेः भव्यानामावलिर्भ- न्यायलिस्तस्याः विनेयजनसमूहस्य। दशविधामरभूजरत्यं दशविधा येषां ते तथोक्काः अमराणां भूजा अमरभूजाः दशविधाश्च ते अमरभूजाश्च दशविधामरभूजास्तेषां सत्यं हि तथोक्तं पुनस्तन दशप्रकारकल्पवृक्षकार्य । यांछां अमिलापं विनय अंतरेणेव । विदधाति करो. ति। दुरुम् करणे लट् । तत् तस्मात्कारणात्। ते कल्पवृक्षाः। एनं जिनेदं जिनानामिद्रो जिनें- स्तं! अभितोऽपि परितोऽपि। अभजन असेचंत। भज सेवायां लड़ातया हि गुणिनः गुणाः . . मुनिसुव्रतकाव्यम् । संत्येपामिति तथोक्ताः गुणवंतः गुणः औदार्यादिभिः । रुंद्रान् महतः। समुपाभयंते सेवते हि श्रियं सेवायां लङ्। अर्थातरन्यासः ॥ २० ॥ भा० अ०-यह जिनेन्द्र स्वामी इकले विना इच्छा भी भविकों के दस प्रकार के कल्प वृक्ष के कार्य करते हैं। इसी से उन कल्पवृक्षों ने इनकी सब प्रकार से सेवा की। यह समुचित भी है क्योंकि गुणी लोग गुण-द्वारा ही बड़ो का आश्रय करते हैं ॥ २० ॥ श्राकीर्णकेतुचमरीक्षहतालवृतकालाचिकाब्दकलशातपवारणादिः ॥ हावनिर्जिनजितधृतपुष्पकतौ सेनानिवेश इव चेलकुटीचितोऽभात् ॥२१॥ आकोणेत्यादि।भाकीर्णकेतुचमरीरुहतालतकालाविकाब्दकलशातपवारणादिः आकी यतिरूम आकोर्णानि केतुश्च चमरीरुहं च तालवृतश्च कालाचिका च अन्दं च कलशश्च आतप- वारणं च केतुचमरोरुहतालनकालाचिकान्दकलशातपवारणानि आकीर्णानि तान्यादीनि यस्यां सा तथोक्ता संपूर्णध्वजचामरव्यजनपतद्ग्रहदर्पणकलशकवादिसहिता । हावनिः हाणामवनिस्तथोका प्रासादभूमिः । जिनजितधृतपुष्पकेतोः जीयतेस्म जित: जिनेन जितस्तथोक्ता धरतिस्म धृतः धृतश्चासौ पुष्पकेनुश्च तथोक्तः जिनजितश्चासी धृत- पुष्पकेतुश्च तथोक्तस्तस्य जिनेश्वरेण पराजितपलायितुकामस्य । चेलकुटोचितः चेलेन विरचिताः फुटयः चेलकुट्यस्तासु चितः तथोक्त: वस्त्रकुटांविकीर्णः । सेनानियेश इच सेना- या निवेशस्तथोक्तस्स इव शियिरगत इव । अभात् व्यराजत् । भादोप्तो लङ् उत्प्रेक्षा॥ २१ ॥ भा० अ०-ध्वजा, बामर, दर्पण, फलश और छत्रादि अष्टमंगल द्रव्य से युक्त प्रासाद- भूमि जिनेन्द्र भगवान् से विजित तथा पलायित कामदेव की वस्त्रमयी फुटो से रचित सेना की छावनी कोसी सोभने लगे ॥२१॥ देवेंद्रनेत्रकुमुदोत्सवचंद्रिकाया देदीप्यमानमणियकृतगंधकुट्याः ।। उच्चैर्ऋतोरिव विदिक्षु भृशं विरेजु: कोष्ठा:प्रकीर्णकवदुबलरूपभाजः ॥२२॥ देवेंद्र त्यादि । ऋतोषि ऋतुविमानस्येव देवेंद्रनेत्रकुमुदोत्सयचंद्रिकायाः देवाना- मिद्रस्नस्य नेत्राणि तथोक्तानि तान्येव फामुदागि देवेंद्रनेत्रकुमुदानि तेषामुत्सयो देवेंद्रनेत्र. युमुदोत्सवः तस्य चंद्रिका देवेंद्रनेत्रकुमुदोत्सयचंद्रिका तस्याः देवेंद्रनयनकुवलयो- त्सव फौमुद्याः। उच्च : अधिकं । देदीप्यमानमणिवैकृतगंधकुट्याः देदीप्यत इति देदीप्य- माना भृशं प्रकाशमाना विक्रियतेस्म विना विरुव घेता मणिभिरुता मणिकता गंधेनयुक्ता कुटोगधकुटो मनिकना चासो गंधकुटो व मणिकृतगंधकुटो देदीप्यमाना देशमः सर्गः। चासौ मणिपैकृतगंधकुटी व देदीप्यमानमणिकृतगंधकुटी तस्याः अत्यंतप्रकाशमानरत्ननिर्मि- तगंधकुट्याः। विदिक्षु कोणेषु । प्रकीर्णकवत् प्रकीर्णका इव प्रकीर्णकवत् "सुप इवे" इति वत्प्रत्ययः प्रकीर्णकविमाना इव । उज्जलरूपभाजः उज्यलं व नत् रूपं च उज्वलरूपं तद्भजं. तीत्युज्वलरूपभाजः प्रकाशमानरूपयुक्ताः । कोष्ठाः द्वादशकोष्ठाः । भृशं अत्यंत। रेजुः यभुः। राज दीप्तौ लिट् ॥ २२॥ मा० अ० -ऋतु विमान के समान देवेन्द्रों के नेत्ररूपी कुमुद के लिये चाँदनी कीसी समुन्नत रनमयो समवशरण सभा के चारो तरफ प्रकीर्णक विमान के सदृश समुज्वल यारह कक्षायें अत्यन्त शोभायमान हुई ।२२। तेषु प्रदक्षिणमनुक्रमतो मुनींद्राः कल्पांगनाश्च नृवधूसहितार्यकाश्च ॥ ज्योतिष्कभीमभवनामरिकाश्च भोगीभौमोडुकल्पसुरमर्त्यमृगाश्च तस्थुः ॥२३॥ तेपित्यादि। तेषु कोप्ठेषु । प्रदक्षिणं यथा तथा । अनुक्रमतः अनुक्रमानुक्रमतः परि. पाट्याः। मुनींद्राः मुनीनामिद्रास्तथोक्ता. महामुनयः । कल्पांगनाश्च कल्पानामंगना. स्तथोक्ताः स्वर्गस्त्रियः। च समुच्चयार्थः । नृपधूसहितार्यकाश्च नृणां वध्यः नृवस्वः ताभि- स्सहितास्तथोक्ताः नग्धूसहिताध ताः आर्यकाश्व तथोक्ताः मनुष्यस्त्रीसहितार्यकाः । ज्योतिष्कभीमभवनामरिकाश्च ज्योतिरस्त्येषामिति ज्योतिप्काः भूमौ भया भौमाः ज्योति- फारच भौमाश्च भवनानि च तयोक्तानि तेषां अमरिकाः ज्योतिर्लोकव्यंतरलोकभवन. लोकत्रियश्च । भोगोभीमोडुकल्पासुस्मर्त्यमृगाः भोगोऽस्त्येषामिनि भोगिनः भूमो भवाः भौमाः फल्पेषु विद्यमानास्सुराः कल्पसुराः भोगिनश्च भौमाश्च उडवश्च फल्यासुराश्च माश्च मृगाश्च तथोकाः भोग्युपलक्षणाद्भायनामरा उडूपलक्षणात् ज्योतिप्काश्च । तस्थुः तिष्ठतिस्म ॥२३॥ मा० अ० व्यन्तर, भवन, ज्योतिष्क तथा कल्प-वासी देव तथा चार प्रकार की देवां- गनाएं, नए, मुनीन्द्र आयिका मनुष्य स्त्री और मृगादि तिर्यच जीव उन यारह कक्षाओं में प्रदक्षिणा पूर्वक क्रमशः यठे हुए थे । २३ ॥ वीथीपु नाथचतुरानननिर्यदुक्तिपीयूपनद्युभयचारुतटानुकाराः ॥ अष्टायतस्फटिकभित्तय प्रावितेनुर्वृद्धेशभूतिविनिवेशितयष्टिशकाम् ॥२४॥ यीथीप्रित्यादि । विधीषु । नाथचतुरानननिर्यदुक्तिपीयूपना भयचास्तटानुफाराः चत्वारि च तान्याननानि च चतुराननानि नाथभ्य चतुराननानि तनिर्यतीति तथोक्ता नाथ- चतुरानननिर्यनी चासौ उक्तिश्च सथोक्ता नाथचतुरानननिर्यक्तिरेष पीयूष तथोवतं त्यः। निलमत्तकाव्यम् । तस्य नदी नाथचतुरानननिर्यदुक्तिपीयूपनदो चार च तत् तटं च चारनटं उभयं च तत् चारनटं च उभयचारुतटं नाथचतुरानननिर्यदुक्तिपीयूपनद्या उभयचारलट तथोक्तं तदनु. धुर्वतीति तथोक्नाः "कर्मणोऽण"इत्यण जिनाननचतुष्टयनिर्यदिव्यध्वनिसुधाधु भयतीरमनकु. यणायतस्फटिकभित्तयः स्फटिकेन निमिता भित्तयस्तथोक्ता: आयताच ता स्फटिकमित्तयश्च तथोक्ताः अप च ता आयतस्फटिकभित्तयश्च तथोक्ताः अष्टदीर्घ भित्तयः । वृद्ध शभूतिपिनिवेशितयष्टिशंकां ईशल्य भूतिरीशभूतिः वृद्धा अतिप्ररष्टा जरती वा सा चालौ ईशभूनिश्च तथोक्ता वृद्ध शभूत्या विनिवेशिताः तथोक्ताः ताश्च ताः यष्टयश्च वृद्ध शभूनिविनियेशितयष्टयस्तासां शंका नथोक्ता तां समृद्धजिननाविभूत्या स्थापित हस्नावलंबनदंडसंदेहं । आवितेनु तन्वंतिस्म तनूड् विस्तारे लिट् । उत्प्रेक्षा ॥२४॥ भा० अ०--समवसरण को रथ्याओं में जिनेन्द्र भगवान् के चतुर्मुप से निकली हुई दिव्य ध्वनिरूपिणी अनमयो नदियों के दोनों तटों का अनुकरण करने वालो जाट बड़ी२ स्फटिकमयो भित्तियाँ सम्वृद्ध जिनेन्द्र भगरान को विभूति से हस्तापलम्बननिमित्त स्थापित दण्ड का सन्देह सचित करती थी । २४ । यच्छ्यते सुरपयात्सुमनःस्त्रवती सरता तरंगिततनृरिति पुस्तकेषु ॥ तत्त्वात्तदित्यनुमिमे भगवत्सभाया यत्तीयपद्धतिचतुष्टयमर्कशिल्पं ॥२५॥ यदीत्यादि । तरंगिततनू. नरंग. संजातोऽस्यामिनि तरंगिता तरंगिता तनूर्यस्यास्सा तथोक्ता संजाततरंगस्वरूपयुक्ता । मुमन नांनीसुमनसा स्त्रातीति नधोक्ता देवगंगा। सुर- पथात् सुराणां पंथास्सुरपथस्तस्मात् "ऋषपू पथ्यपरोऽदत्यन्' इत्यनेनात् आकाशमार्गात् । स्रस्ना अवकीर्णा । इति एवं। पुस्तकेषु शास्त्र पु। यद्भवन। भ्रूयते आकर्ण्यते । तद्वचनं । भगवत्लभायाः भगवनस्सभा भगवत्सभा तस्याः समवसरणभूमे । अर्कशिल्पं अस्य शिल्यं यस्य तत् तथोक्त स्फटिकनिर्मितं मर्करूफटिकमूर्ययो." इत्यमरः। नीर्थपद्धतिचतुष्टयं तीर्थानों पद्धतयम्तीर्थपद्धतयः चत्वारोऽवया यस्य चतुश्यं तीर्थपद्धतीनां चतुण्यं तथोक्त सोपानमार्गचतुष्टयं । यत् एतदिति इदमिति । अनुमिमे अनुमन्ये माद् । माने रड् ॥२५॥ -तरंगित देव गंगा आकाश से गिरी है यह यात शास्त्रों में ही देखी जाती थी। में अनुमान धरनाह कि, भगवान् की समवसरण सभा को स्फटिकमयी चार सीढ़ियां इस यात को प्रत्यक्ष प्रमाणित कर रही हैं । २१ । चाराशितीर्थकरवारमासंख्यरूपा देवाद्रिरुद्रनगज्जलभृधरास्तं ॥ दैर्घ्यरहो निखिलदिग्गतहेमरुप्यनीलामगोपुरनिभादभजंत देवम् ॥ २६ ॥ भा०१०-

+
दशमासः।
वाराशीत्यादि । चाराशितीर्थकरवारणसंख्यरूपाः वारा राशि: तथोक्तः पाराशिश्च
तीर्थकराच चारणाश्च तेषां संख्या तथोक्ता वाराशितीर्थकरवारणसंख्येव रूपं येषां ते
तथोक्ताः चतुश्चतुर्विंशत्यष्टस्वरूपाः । दर्यस्पृहः देयं स्पृहंतीति तथाकाः महोन्नत्य-
भिलाषयुक्ताः संतः । देवाद्विदनगकरजलभूधराः देशनामद्विाद्रिः रुद्रस्य नगो य.
नगः फज्जलयासी भूधरश्च कज्जलभूधरः देवाद्रिश्च रदनगन्ध कज्जलभूधरश्च तथोक्ताः
महामेरुलासांजनपर्धनाः। निखिलदिग्गतहेमरूप्यनीलामगोपुरनिभात् निखिलाश्च ता: दिश.
श्श निसिलदिशः ता गच्छतिस्म निसिलदिग्गतानि हेमं च रूप्यं व नीलाश्मा च हेमरुप्य-
नीलाश्मानस्तैर्निमितानि गोपुराणि हेमरूप्यनीलामगोपुराणि निसिलदिग्गतानि हेममप्य-
नोलाश्मगोपुराणि तानीतिनिर्भतथोक्त तस्मात सफलदिग्न्यातसुवर्णरजतनीलगोपुरव्याजात् ।
तं देवं मुनिसुव्रतरवामिनं । अभयंत असंघत । भज सेवायां लङ्। यथासंरयालंकारः ॥२६॥
भा० अ०-बड़ी भारी उन्नति (ऊंचाई ) के इच्छुक चार सुवर्णमय महामेरु पर्वत
चौबीस रजतमय कैलाश और आठ नीलममय अंजन पर्वतों ने सभी दिशाओं में व्याप्त हो.
कर गोपुर के बहाने से श्रोजिनेन्द्र भगवान् को सेना की । २६ ।
संप्राप्य चारुगुणरत्ननिधिं जिनद्रं लोकैकमंगलम समपक्षरागात् ॥
शतानि मोक्तुमथ नो निधिमंगलानि द्वारेषु तस्थुरखिलेष्विह को वितर्कः॥२७॥
संप्राप्येत्यादि । चारगुणरत्ननिधि चारयश्च गुणाश्च चारगुणास्त एव रत्नानि चारगुण-
रतानि तेषां निधिम्तं मनोहरगुणमणिनिधिं । लौकैकगंगलं मंगं पुण्यं सनां लातीनि में
पापं गलयत्यपि मंगलं मंगलार्थज्ञरन्वर्थेन निरच्यते एकंच नत् मंगलं च एवमंगलं तथोक्त'
लोकानामे कमंगलं तथोक्त विभुग्नमुरयमंगलं । अमुं इमं । जिनेंद्र जिनानामिद्रस्तथोक्तम्नं
जिनेश्वरं । समपक्षरागात् समश्यामौ पक्षश्च समपक्षातम्य इति रागस्तम्मात् ममाननर्ग:
प्रीत्याः । प्राप्य संलभ्य । अथ अनंतरे । मोक्तुं मोचनाय मोक्तुं । नो शनानि सामर्थ्यरहि-
तानि। निधिमंगलानि निधयश्च मंगलानि न तथोक्तानि नानिम्यष्टमंगलानि। भरिरलेषु सम-
म्नेषु। द्वारेषु गृहनिर्गमनस्थानेर । तस्यु तिष्ठन्तिम । इह अस्मिन् इह । प्रातेऽर्थे
निरिचारः। न कोऽपो-त्यर्थः। उत्प्रेक्षालंकारः। ठा गनिनित्तौ लिट ॥ २७॥
भा० ४०-सुन्दर गुग-रूपो रज के निधि सभा तथा संसार के एकमात्र मंगला
श्रीजिनेन्द्र भगरान को समान वर्ग मे पाकर मानो मुक्त होने में असमर्थ होने में होना
निधि और अट-मंगल सभी दरवाजों पर विराजमान हुए तो इसमें धाश्चर्य हो गया है |
ज्योतिप्कयक्षणिकल्पसदः क्रमेण तेजस्विनः प्रतिदिशं मणिदंडहरताः॥
हारत्रयद्वितययुग्मयुगेषु तेनुर्पालकृन्यमपि जन्मशतैरलभ्यं ॥२८॥

मुनिसबत काव्यम् । ज्योतिष्यत्यादि । तेजस्विनः नेजोऽस्त्येषामिति तथोक्ताः पराक्रमिणः । मणिदंडहाना: मणिभिनिर्मिता दंडा: मणिदंडाः हस्ते येषां ते तथोक्ताः रनरचिनदंडपाणयः। "प्रहरणात्सप्तमी"इति पूर्वनिपातः । ज्योतिप्कयक्षफपिक्ल्पसदः ज्योतिप्काच यक्षाच फणिनश्च कल्पे सीदतीति पल्पसदः ते च ज्योतिप्कयक्षफणिकरासदः ज्योति मोरगप ल्य यासिनः। प्रतिदिश दिक्षु दिक्षु । फ्रमेण अधूलिशालाद्यनुप्रमेण । हारप्रयविनिययुग्मयुगेपु प्रयोऽवयचा अस्य त्रयं द्वारययायस्य द्वितयं त्रयं च द्वितयं च युग्मं च युगं च तथोक्तानि द्वाराणां त्रयहितययुग्मयुगानि तथोक्तानि तेषु द्वारत्रये द्वारद्वये द्वारयुग्मे द्वारयुगे च । जन्मशते. रपि जन्मनां शतानि तः जन्मानेकैरपि । अलभ्यं लन्धुमशक्यं । द्वालिरत्यं द्वार पालः द्वार्पाल: तस्य कृत्यं पुनस्तत् द्वारपालस्य कार्य । तेनुः विस्तारयामासुः तनू विस्तार लिट् ॥२८॥ भा० अ०-तेजस्वी ज्योतिष्क, यक्ष, उरग तथा करपयासी देयों ने हाथों में मणिमय दएड लेफर क्रमशः प्रत्येक दिशा में तीन दो, दो तथा दो दरवाजों पर जन्मजन्मान्तर में भी अलभ्य द्वारपाल का काम किया।२८ ॥ नुन्नांचरं प्रतिदिशं नवगोपुराणामष्टांतरेषु बहिरादिमगोपुराच्च ।। नानाविधाभिनवशिल्पमनोभिरामं माणिक्यतोरणशतं पृथगाबिरासीत् ॥२६॥ नुम्मायरमित्यादि । नरगोपुराणां ना च नानि गोपुराणि च नत्रगोपुराणि तेषां । अधांतरेषु । आदिमगोपुरात् आदौभयमादिमं आदिमं च तत् गोपुरं च आदिमगोपुरं तस्मा. त् “पश्चादाद्य तानादिम" इनिम प्रत्ययः । प्रथमगोपुरात् । पहिश्च याो च । प्रतिदिशं दिक्षु दिनु। नुन्नावरं नुन्नमवर येन तत् तथोक्त चुंरिताकाशं “नुत्तनुम्नास्तनिष्ट्य तापिद्धक्षिप्त रिता म्समाः" इत्यमरः । नानाविधाभिनवशिक्यमनोभिरामं नाना निधो यस्य तत् नानानिधं अभिनयं च तत् शिल्पं च अभिनवशिल्पं नानाविधं च तदमिनरशिपंच नानाविधाभिन. चशिल्पं च तन्मनसोऽभिराम तथोक नानाविधामिरामशिल्पेनाभिरामं नानाप्रकारकुशलेन मनोहरं । पृथक् । प्रत्येकमाणिक्यतोरणशतं माणिक्येन रचितानि तेषां शतं तथोक्तः रनतोरणानकं । आधिरासीत् प्रादुरभवत् । अस मुनि लट् ॥ २६ ॥ -नो दरवाजों में से आठ के भीतर तथा पहले दरवाजों के बाहर अनेक प्रकार की नूतन कारीगरी मे सुन्दर सैकडो मणिमय तोरण पृथक् २ शोभित हुए।२६ । श्रायंतरे निहतदुर्मतिमानगुंकाः स्तंभाश्चतुर्थ इह राजतनाट्यशालाः ॥ पष्ठेऽपि नाट्यनिलया: किल सप्तमेऽस्मिन् स्तूपाश्चतोरणशतांतरिता बभूवुः॥३०॥ आयंतरे इत्यादि। आद्य तरे आदि च तदनरं च आध'तरं तस्मिन् प्रथमांतराले।

- भा०अ०- २०० दशमः सर्गः। निहतदुर्मतिमानगुंफाः निहन्यनेस्म निहतः दुष्टा मतियेषां ते दुर्मतयः मानस्य गुंफो मानगुंफ: दुर्मतीनां मानगुंफस्तथोक्तः निहतो दुर्मतिमानगुंफो यैरते तथोका विनष्टमिथ्यादृष्टि- मानरवनयुक्ताः । स्तंभाः मानस्तंभाः । इह अस्मिन् इह । चतुर्थे चतुणी पूरणं चतुर्थ तस्मिन् चतुर्थवलये । राजतनाट्यशाला: नाट्यस्य शाला नाट्यशालाः रजतेन निर्मिता राजताः ताश्च ताः नाट्यशालाध तथोक्ताः रूप्यरचितनर्तनशालाः । पष्ठऽपि पपणां पूरणं तथोक्त नस्मिन् पाठांतरालेऽपि । नाट्यनिलयाः नाट्यस्य निलयास्तथोक्ताः नृत्यशाला: "निष्प्रतेर्वेनि" निरुपसर्गरकारस्यायिगतावित्यस्य योगे लकारादेशः । अस्मिन् एतस्मिन् । सममे सताना पूरणं सप्तम तस्मिन् सप्तमयलये । तोरणशतांतरिता: तोरणानां शतानि तथोक्तानि तोरण- शतैरतरितास्तथोक्ताः शततोरणव्यवहिनाः। स्तूपा नवस्तूपा । बभूवुः भवंतिम्म क्लि । भू सत्तायां लिट् । दशतोरणान्यतीत्य एकस्तूपस्तिष्यतीति क्रमोक्तानुसंधेयः ॥ ३० ॥ -पहले के भीतर मिथ्या दृष्टियों के मान नष्ट करने वाले मानस्तम्भ, चौधे में रज- तमयी नाट्यशाला तथा छठे में भी नृत्यशाला, और सातवे में सैकडो तोरण से आच्छन्न नौ स्तूप थे ।३०। दुःखौघसर्जनप,स्त्रिजगत्यजेयान साक्षानिहत्य चतुरोपि च घातिशत्रून् । स्तंभाजयादय इव प्रभुणा निखाता:रतंभा:अभुःप्रतिदिशं किल मानपूर्णः॥३१॥ दुःखौघेत्यादि । निजगति त्रयाणा जगतां समाहार स्त्रिजगत् तस्मिन् त्रिभुवने। दु.सौ. घसर्जनपटन दुःखानामायो दुःखौघस्तस्य सर्जन तथोक्त दुसौनसर्जने पटचस्तान् दु खपर- परासृष्टयसमर्थान् । "ओघो देपयोवेगे दुननृत्योपदेशयोः । ओघ परंपरायां च” इति विश्व । अजेयान जेतुं शक्या जेयाः न जेयास्तान् अभिभवितुमशययान् । चतुरोऽपि च चतु सं ख्यानपि । घातिशधून घात्नि एव शत्रवस्तथोक्तास्तान घालियर्मरिपून् साक्षात् युगपत् । निपात्य निपाननं पूर्वः विहत्य । प्रभुणा स्वामिना। निषाना: निमन्यनेम्म निपाता: म्यापिनाः। जयादयः जय एव आदियेपां ते तथोक्ताः जयश दादिसहिताः। स्नभा इव जयस्तंभा इत्यर्थः मानपूर्वाः मान एव पूर्वरिमनेषां ते तथोकाः भादो मानरादयुक्ताः मानस्लभा इति यावत् । प्रतिदिशं दिक्षु दिक्षु । यभु. किल चकाशिरे रिल। भा दीप्ती लिट् । रूपकः ॥ ३१॥ -त्रिमुवन में दुःखसमूह के निर्माण करने में निचक्षण तथा अजेय जो चार धानिया धर्म-रूपी शत्रु हैं उन्हें साक्षान् नष्ट करके ही मानो ग्नेिन्द्र देव से आरोपिन वि गये विजय-स्तंभ के ऐसे मानस्तंभ प्रत्येक दिशा में शोभायमान होते थे। ३१ । भा० ...- मुनिमुमतकाव्यम् । • संसारदुरतरमहार्णवममजन्तृत्तारैकनावि सदसीश्वरकर्णधारे ॥ स्तंभश्रियं विदधुरुम्बलरत्नमानस्तंभाः समीरचलकेतुपटाभिरामाः ॥३२॥ संसारेत्यादि । संसारदुस्तरमहार्णवमग्नतृत्तारकनावि चतुर्गतिभ्रमणः संसार: महाश्चासौ अवश्च महार्णवः दुःखेन तीर्यत इति दुस्तरस्स चासौ महार्णवच धोक्तः संसार एव दुस्नरमहार्णवस्तयोर्कः मजतिस्म मनाः ममाच ते अंतयश्च मनजतयः संसारदुस्तरमहार्णचे माजंतवस्तथोक्तः उत्तरणमुत्तारः संसारदुस्तरमहार्णवमग्नजंतूना- मुत्तारस्तथोक्तः एका चासो नौध एकनौः संसारदुम्नरमहार्णवमतृत्तारे एकनौस्त. रयां संसारदुःवनमहासमुद्रमनाखिलजीयोत्तरणे मुख्यवहिने । ईश्चरकर्णधारे ईश्वर एव फर्णधारो यस्य तस्मिन् जिनेंद्रनाविकयुक्तो। मदमि समवसरणे । समीरचलकेतुपटा- भिरामाः समीरेण बलाम्समीरचला: फेतूनां पटा: केतुपटा: समोरचलाश्च ते फेतुपटाच तभोक्ताः समीरचलकेतुपटैरभिरामा: वायुना चंचळव्यजयस्त्रमनोहराः । उचलरत. मानस्तंभा: रत्ननिर्मिता मानस्तंभा रतमानस्तंभाः उज्वलाच ते रतमानस्तंभाश्च तथोक्ताः प्रकाशमानमणिमयमानस्तंभाः । स्तंभधियं स्तंभस्य श्रीः स्तंभनीस्ता नोगुणलक्ष्मी। विदधुः चन: । दु धा धारणे लिट् । रूपाः ॥३२॥ भा० अ०--संसाररूपी दुस्तर महा-समुद्र में मन प्राणियों को पार लगाने में एक मात्र नौका के समान तथा जिनेन्द्र देव-पी कर्णधारवालो समयमरण ममा में हना से प्रकम्पित जपट से सुन्दर समुज्वल राजडित मानस्तंभों ने नाप को यूप-श्री की शोभा धारण की। ३२॥ मानाधिको कनकगोपुरम्प्यसालव्याजन मानमवितुं बहुरूपमाजौ ॥ मन्ये सुमेरविजयानगौ म मानरतंभानुपेत्य भजतचतुगेऽपि भीत्या ॥३३॥ मानाधिकावित्योदि। मानाधिको मानेन प्रमाणेन गणवाऽधिको प्रवृद्धी । “चित्तो. प्रनिग्रहगर्भप्रमाणप्रमादिषु मानम्" इति नानार्थरनरी () । बहुरूपभानो बानि च तानि पाणि च बुहुम्पाणि तानि भजन इति नधोकानि नानारूपमाजो। सुमेरविजयार्ध- नगौ सुमेध जियाच सुमेररिजयाधी तोच तो नगी च नभोक्तो महामेरविजया. धेगवंतो। मान गये । अवि रशियगरगोपुरमप्यशालाव्याजेन कनकन निर्मिनानि गो- पुराणि नोकरि म्प्येण निर्मिना माया (शाला) रुप्यमाला: फन गोपुराणि च सप्यसा- लाच नयोक्ताः पनागोपुरमप्यमाला इति व्याजस्तग्माम् सुवर्णगोपुररजनमाकारदंभा- न्। चतुरोऽपि चतुर्मग्यान् मानस्तंभान । भीत्या भयेन । ममीणं । उपेत्य यात्या। भजन: - 1 ।

5753 नवमः सर्ग: .२०२ स्म सेवेतेस्म । भज सेवायां लट् । इति मन्ये जाने । बुधमनिज्ञाने लट् उत्प्रेक्षा ॥३३॥ भा० अ०-गर्व से बढ़े चढ़े सुमेरु तथा विजयार्ध पर्वत अनेक रप धारण करके सुवर्णमय गोपुर तथा रजतमय प्राकार के व्याज से अपने मान की रक्षा के लिये ही मानों डर से चारो मानस्तंभों के पास जाकर उनकी सेवा करने लगे। ३३ । मज्जपुरंथ्रिकुचकुंकुमलालितानि पयंतखातसलिलानि वितेनुरेपाम् ॥ यालोकनेन सुचिरोपचिताभिमानलोकै विवांतदृढमानरसाभिशंकाम् ॥३४॥ मज्जत्पुरंध्रीत्यादि। मज्जत्पुरधिकुचकुंकुमलालितानि मज्जंतीति मज्जत्यः ताश्च ताः पुरंभयश्च तथोक्ता: मज्जत्पुरंध्रीणां सुचास्तथोक्तास्तेषां कुंकुम तथोक्त मज्जत्पुरं. भिकुचकुंकुमेन लालिनानि मज्जवनितास्तनकुंकुमेनरंजितानि । पर्यतखातसलिलानि पर्य- तम्य खाता पर्यंतसाता पर्यंतखातानां सलिलानि तथोक्तानि समीपलसरोवरजलानि । एपी मानस्तंभानां । आलोकनेन दर्शनेन । सुचिरोपविताभिमानः सुचिरेणोपचिनारसुचिरोपचिताः अभिमाना येषां ते सुचिरोपचिताभिमानास्तैः चिरकालेन संचिताभिमानसहितः। लोकः जनैः । विवांतदृढमानरसाभिशंकां विवम्यतेस्म विवांतः मानस्य रसः मानरसः दृढचासौ मानरसश्च दृढमानरस' वियांतश्चासौ दृढमानरसश्च विवांतदृढमानरसः स इत्यभिशंका विवांतदृढमानरसाभिशंका तां विशेषेण यांतगाढाहंकारद्रय इति शंकां । वितेनुः विम्ना. रयंतिस्म । तनु विस्तारे लिट् ॥ ३४ ॥ भा० अ० --समान करती हुई स्त्रियों के कुच कुंकुंमसेजिन नागे तरफ फैले हुए सा. निका के जल ने इन मानस्तंभों के देखने से ही मानो चिरसंचित अभिमान वाले लोगों से उद्गण दृढ़ मानरस की शंका प्रकटित की । ३४ । विश्रामसौंदरमृदंगनिनादगर्जा विद्युल्लतायिननिलिंपनटीगनाथाः ।। नाट्यालया विजितशारदवारिवाहाश्चित्तक्षितौ नवरसान्वपुजनानाम् ॥३५॥ विश्रामेत्यादि। विनाममुन्दरम्मृदंगनिनादगर्जाः विश्रामेण सौंदरो विश्रामसौंदरः मृदंगम्य निनादो मृदंगनिनादः विश्रामसौंदरश्चासौ मृदंगनिनादच नथोक्तः विश्राम- सौंदरमृदंगनिनाद एव गर्ज एषां ते तथोक्ताः विधामेण मनोदरमुग्जध्यनिस्तनित. युक्ताः । विद्युलनायितनिलिंपनटीसनाथाः विद्यु नो लता विद्यु लनेव आचरतीति वियु लतायतेस्म विद्युलनायिताः निलिंपानां नट्यो निलिंपन व्यः विद्युल्लनायिता. श्व ता: निलिंपनट्यश तथोक्ताः विद्युलनायितनटीभिम्सनाथाः तटिलानिभदेवनर्तकी. सहिनाः । विजितशारदयारियाहाः शरदि भवः शारदः पारि यहतीनि बारियाहः शारदा ran मुनिसुव्रतकाव्यम् । श्वासौ चारिवाहच तथोक्त. विजयतेस्म विजित गिजित शारदद्यारिवाहो यस्तै तथोक्का निरसितशारदमेवसहिना । नाट्याल्या नाट्यस्यालयास्नयोका नर्तनशीला । जनाना प्रेक्षालोकाना। वित्तक्षितो चित्तमेव क्षिति वित्तक्षितिस्तस्या मनोभूमी नवरसान् नर च ते रसाध नपरसास्तान् शृगारादिनररसान् अभिनरजलानि च । "रसो गधरसे स्थादे चित्तादौ विपरागयो । गारादौ दवे वार्ये देवधातौ च पारद" इति विश्व । वृषु सिपिचु । पु सेचने लिट । रूपक उपमापि ॥ ३॥ भा० अ० विश्राम समय के मृग की सुन्दर ध्वनि है गर्जन जिसके-विद्यु लनि का आचरण करना हुई देवागना नर्तिका से युस नथा शल्कालान मेघ को जोते हुई नाटयशालाओं ने लोगों की चित्तभूमि पर नत्र रस की वृधि की । ३५ । सौवर्णपटनिर्गतधूमजाल सौरभ्यशालि ददृशे जिनपूजनाय ॥ पायज्जनग्य सुचिर हृदयारविंदगंधादियासितमिर द्रवदंधकारम् ॥३६॥ सौवणेत्यादि । सोरभ्यशालि सुरभिरेव सौरभ्य तेन शालि तथोक्त परिमलेन मनोहर । सौवर्णरूपरनिर्गधूिमजार सुवर्णन निर्मिता सौवर्णा धूपस्य घग धूपघटा सौवर्णाश्वते धूपघाय तथोक्ता निर्गच्छतिस्म निर्मात धृमाना जाले धृमजाल सौवर्णधूपघटेर्निर्गत तथोक्त सौपर्ण मानिर्गन च तत् धूमजाल च तथोक हेमनिमिनधूपसमूह' । जिनपूजनाय जिनस्य पूजन जिनपूजन तस्मै । आयज्जनस्य एनीत्यायम् स चासो जनश्च तोवरय आगच्छतोकस्य । सुचिर दीर्घकार । हृदयारविंदगधादिवासिल हृदयमेव अरविंद दयारविद तस्य गधस्तथोक हरयारविंदगधेनाधियासिन तथोक्त चित्तकमरपरि मोन अभिसरत । दूरदधकारमित्र द्रवच्च तदधकार च तथोक धारदज्ञानांधकार मिर । ददृश ईक्षे। दूशिर नेक्षणे कमणि लिट। उत्प्रेक्षा ॥ ३६॥ भा० 10--सुगन्ध से सोभने बाग सुरर्णमय धूप घट से निक्रा हुआ धून समूह जिनदेव के पूजन के लिये आये हुए लोगों के हृदय पमर को गध से वासिन भागते हुए चिम्सचा अशानान्धकार के ऐमा दोष पडा । ३६ । जैनी नभा जिनपदानुजसे प्रयैर सेत्स्यति मनु नवकवललब्धयो च. n इत्येवमुन्नतनगागुलिसज्ञयोच्चैस्तूपच्छलादुपयता जिनसेचनार्थम् ॥३७॥ जैनीत्यादि। जैनो जिनम्येय जेना जिनेश्वरसधिनी। सभा ससत् । जिनपदावुजसे पेच जिनस्य पदे त एवानुजे जिनपदाधुजे तयोरसेवा जिनपरायुजसेगा तयैव जिनेश्वर चरणारविदसेग्नेनैव । य युप्माका पदादाययस्येत्यादिना पष्टी यसादेश । नकेललल्धय २०४ देशमः सर्गः - केवलाश्च ताः लम्धयश्च तथोक्ता: नव च ताः केवललब्धयश्च तथोक्ताः सम्यक्त्वा. दिनवक्षायिकभावः । मंक्षु शीघ्र । सेत्स्यति फलिप्यंतीति । विधु संराद्धौ लट् । जिनसेव- नार्थ जिनस्य सेवन तस्मै इदं जिनाराधननिमित्त । उपयतां उपयंतीत्युपयंतस्तेषां उपयतां आश्रयतां । उच्चस्तूपच्छलात उच्चश्च ते स्तूपोश्च तथोक्ताः स्तूपा इतिच्छल तस्मात् उद. ग्रनवस्तूपन्याजान् । उनतनयांगुलिसंशया नव च ताः अंगुलयश्च तथोक्ताः उन्नताश्च ताः' नयांगुलयश्च तथोक्ताः उन्नननवांगुलीनां संज्ञा तथोक्ता तया प्रांशुनवांगुलिसूचनया । एवं प्रकारेण वभौ इत्यध्याहारः । उत्प्रेक्षा ॥ २७॥ भा० अ०-जिनेन्द्र देव के चरण की सेवा करने से ही आप सबों के सम्यक्तवादि नरक्षायिक भावों की प्राप्ति शीघ्र होगी इस बात को समवसरण जिनशरणागत भक्तों को जिनेन्द्र की सेवा के लिये ऊचे २ नपस्तूपों के बहाने मानो लम्बो २ अँगुलियों से इशारा फरती हुई कोसी ज्ञात होती थी । ३७ । रेजे विशालगणभूतलवेष्टितस्य पीठत्रयस्य शिरसि द्विपवैरिपीठम् ॥ धर्तुं जिनेश्वरमुपागतभद्रशालरुद्धत्रिसानुकनकाचलचूलिकेव ॥३८॥ रेज इत्यादि । विशालगणभूतलवेष्टितस्य भुवत्त; भूतलं गणानां भूतलं गणभूतलं विशालं च तत् गणभूतलं च तथोक्त विशालगणभूतलेन येष्टितं तथोक्त तस्य | पीठत्रयस्य प्रयोऽवयवा अस्येति त्रयं पीठानां त्रयं पीठत्रयं तस्य निमेसलापीठस्य । शिरसि अग्न। द्विप- चैरिपीट द्विपानां गणानां गजानां वैरिणो द्विपवेरिणस्तधृतं पीठं सिंहासनं । जिनेश्वर जिननाथ । धर्तुधरणाय धतुं । उपागतभद्रशालरुद्धनिसानुकनवाचलचूलिकेव उपागच्छतिस्म उपागतः भद्रशालेन रुद्धो भदशालरुद्धः यस्सानवो यस्य सः निसानुः कनकरूपोऽचल: कनकाचलः त्रिसानुश्चासौ कनकाचलच तथोक्तः भद्रशालरुद्धश्चासौ निसानुकनकावलश्च तथोक्तः उपागतश्चासौ भद्रशालरद्धपिसानुकनकाचलच तथोक्तः उपागतभद्रशाल- रुद्धनिसानुकनकाचलस्य चूलिका तथोक्ता सेव उपायातभद्रशालयेष्टिनप्रस्थत्रयसहितमेरुचूलि- फेव । रेजे यभौ। राज दीप्तौ लिट । उत्प्रेक्षा ॥ ३८॥ भा० अ०-विशाल द्वादश गणों की भूमि से परिवेष्टित, तीन पीठिकाओं के ऊपर स्थित सिंहासन मानो जिनेन्द्र भगवान् को धारण करने के लिये आये हुए भद्रशाल से घटित तीन तटवाले सुमेरु की चूलिका के समान विराजमान हुआ। ३८ । तत त्रिकालविषयाखिलवस्तुवृत्तिसाक्षिप्रबोधमहसा सकलं सजानन् ॥ जिज्ञासयोपगतसंघचतुष्टयस्य तज्ज्ञापनोत्सुकतयेव चतुर्मुखोऽस्थात् ॥३॥ । ।

मनिममतकांच्यम्। २०५ तत्रेत्यादि। तत्र तस्मिन् सिंहपीठे। त्रिकालविषयाखिलवस्तुवृत्तिसाक्षिप्रयोधमहसा त्रयाणां फालानां समाहाः त्रिकालं तस्य विषयाः अखिलानि च तानि वस्तूनि च अखिलवस्तुनि त्रिकालविषयाश्च अखिलवस्तूनि च त्रिकालविषयाखिलवस्तूनि तेषां वृत्तिः उत्पादव्ययद्रव्यलक्षणवृत्तिः तोका तस्याः साक्षिप्रयोधस्तयोक्तः स एव महः त्रिकाल. विषयाखिलपस्तुवृत्तिसाक्षिप्रबोधमहस्तेन त्रैकाल्यधिपयनिखिलपदार्थसाक्षात्प्रबुध्यमान- केवलज्ञानतेजसा । सकलं निखिलं । जानन जानातीति जानन युध्यमानः सः मुनिसुवततीर्थ- फरपरमदेवः । जिज्ञासया ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा तया ज्ञातुमिच्छया । उपगतसंघचतुथ्यस्य संघानां चतुण्यं संघचतुष्टयं उपगच्छतिस्म उपगतं तच तत् संघनतुभ्यं च तथोक्तं तस्य आगतचतुस्संघस्य । तज्ज्ञापनोत्सुकतयेव तस्य ज्ञापनं उत्सुकस्य भावः उत्सुकता तज्ज्ञापने उत्सुकता तज्ज्ञापनोत्सुकता तया सकलवस्तुज्ञापनोयुक्ततयेव । चतुमुर्सः चत्वारि मुखानि यस्य सः चतुर्मुखः चतुराननः सन् । अस्यात् अतिष्ठत । टा गतिनिवृत्ती लुङ् । उपमालंकारः॥ ३६॥ भा० अ०- उस सिंहासन पर त्रिकाल-विषयक सभी पदार्थों का साक्षात् करने वाले केवल ज्ञान की प्रखरता से सभी बातों को जानते हुए मानो जानने की इच्छा से समुपस्थित चारो संघ को सूचित करने की उत्कएठासे ही चतुर्मुख होकर श्रीमुनिसुवननाथ आसीन भामंडलेन निकटोच्चलचामरेण संवेष्टितो दिवि जिनाधिपतिनकाशे ॥ हंसान्वितेन शरदंबुदमंडलेन नीलांबुवाह इव कोऽपि कृतोपवीतिः ॥१०॥ भामंडलेनेत्यादि । दिवि आकाशे। निकटोचलचामरण उशलनोत्युचलं तच्च त शामरं च सयोक्त निकटोचलयामरं तेन समोपे कपमानप्रकीर्णकसहितेन । भामंडलेन प्रभावलयेन । परिवटितः आवृतः। जिनाधिपतिः जिनानामधिपतिस्तयोक्तः जिनेशः। हंसान्वितेन हंसरन्चित हसान्नितं तेन हसपक्षियुक्तन । शरदबुदमंडलेन शरदोऽयुदास्त. पां मंडल शब्दवुमंडलं तेन शरत्कालमेघव्यूहेन । एनोपोनिः एता उपातिर्यस्य सः विहितावरणः । कोऽपि कश्चिन् । नोलाम्बुवाह इस नॉलचासौ अबुवाहश्च तथोक्तस्स इन चकारी भौ । काट दीप्तौ लिट् । उत्मेक्षा ॥४॥ भा० अ०-निकट में डोलते हुए और भामण्डल से परिवेष्टिन श्रीमुनिमुवत स्वामी आकाश में इस-युक्त शरत्कालीन मेघमण्डल से आच्छन मील जलद के समान लोमते 1 भुग्नस्य एकमल: मुग्नकमलः तं लोकमुण्यवीरें । अशरोरं न विद्यते शरीरं यस्य तं काम। योधासिना योध एवासि धालिस्तेन सम्यग्ज्ञानखड़ेन । हलवतः हंतिस्म हनवान् तस्य विनाशिनवतः । अस्य एकस्य । वारस्य शूरस्य । पाच । उपर्यति उपयंतीत्युपर्यति स्वपमेव समीपं गच्छति। नदीदिव्यायुधानि दिग्पानि व तान्यायुधानि च तथोक्तानि तस्येमानि सदीयानि सदोयानि च तानि दियायुधानि च तकानि पुनस्तानि कामसंबंधि. दिव्यशस्त्राणि । अनुवकार अनुकरोतिस्म । डुक परणे लिटा उत्प्रेक्षा ॥४॥ मा० अ०-उम समय पुपए में सिद्धपद वा कामदेव के पदको पाने की इच्छासे शिरोमणि श्रीमुनियन स्वामी के निस्ट आने हुए कामदेव के दिय अत्रों का अनुकरण हो संसार में एकमान शरीर फामदेरको सम्पासान की तलपारसे मारे हुए शूर- दिव्यध्वनिश्च सुग्ददुभिनिवनाथ संत्यत्त शासनतदीयफलाभिलापम् ॥ उत्पद्यमानमुभयं युगपज्जहार श्रीलं मनश्च सूता परिपज्जनानाम् ॥१२॥ दिव्यतिरित्यादि । दिव्यध्यनि. दिति भयो दिशा दिश्वासोचनिश्च तथाकः दियमा च ममुधपार्थः। सुग्इंद्रमिनिस्तान मुरम्पमतात मुरवुदुर्भः निस्वनस्त- शाकः देयदुंदुभिध्यनिश्च । मंत्यनशामनादेशमार्मा सम्पद तदीयं तच्च तत फलं सनदीयरले शासनं घसदोसार २ गामस मनिलायत्तयोकः संत्य- उपनेम्म संत्यनः संतानः शासननदीपारित पोपदेशामिला गिदीनननितयानिलामपूढानि APउत्पमानंजायमान। या समवसरणस्थित मन्यलोपानोni धा। मन मानमरातन। जहार दरामःसर्गः। प्रस्थाशरीरपदलिप्सुतयोऽशरीरं बोधासिना हतवतो भुवनैकमलम् ॥ वीरस्य पार्श्वमुपयांति तदा तदीयदिव्यायुधान्यनुचकारलतांतवृष्टिः ॥११॥ भायेत्यादि । सदा तत्समये । लतांनवृष्टिः लतांतस्य वृष्टिलथोक्ता पुणवृष्टिः । "पुष्प प्रसव फुसुम प्रसूनमपि सुमनसो स्टनोन: फुल." इनिजयकीर्तिः ।अधारीरपदलिप्सुनया भशरीरम्य पद तथोक्त लन्धुमिच्छुः लिप्मु अशरीरपदम्य लिप्सुः अशरीरपदलिप्सुः तस्य भावः तया अनंगपदवि सिद्धपदचि च लभ्रमिच्छुनया। भुवनैकमलं । एकश्चासौ मलश्चकालः किया ॥४॥ नत् विहितशा- कर्मा उभ एनायं । परिषजनानां परिवदिशा । भगदरनिम्मान किया मुनिमुमतकाम्यम् । २०७ भा० १०-शासन तथा उसकी फलप्राप्ति की इच्छा-निवृत्ति-पूर्यफ उस समय होती हुई दिव्यध्वनि तथा देव-दुन्दुमि-ध्वनि ने समवसरण में समागत समी जीयों के कान और मन हठात् सारष्ट कर लिये ॥४२॥ सर्वज्ञपादरतयो वयमप्यशोका मुग्धांघ्रिजातस्तयः किल तेऽप्यशोकाः ॥ इत्यालपन्नलिनिनादपदादशोकः प्रत्युन्मिपत्कुसुमकैतवतो जहास ॥४३॥ - सर्वशेत्यादि।सर्वपादरलयः सर्व जानातीति सर्वशः तस्य पादोसर्वपादो तयोरतिर्यपांते तथोक्ताः जिनेश्वरपादारविंदप्रीताः। घयमपि अशोका: न विद्यते शोको येषां ते तथोकाः शोकरहिता: अशोक्द्रुमाः।मुग्धांनिजातरतयः मुग्धानामध्यो मुग्धांधयस्तेषुजाता रतिर्यपाते तथोक्ताः रमणीनां पादप्रीतिसहिताः । तेपि इनरतरवध । अशोकाः फिल शोकरहिताः किल अशोकवृक्षा. किल । इति एवं अलिनिनादपदात् अलीनां निनादोऽलिनिनादः अलिनि. नाद इति पदं तथोक्त तस्मात् भ्रमरध्वनिव्याजात्। आलपन थलपनीत्यालपन ग्रुपन् । अशोकः अशोपवृक्षः। प्रत्युन्मिपत्कुसुमकेतवत: प्रत्युन्मिपति च तानि फुनुमानि च तथोक्तानि, प्रत्युन्मियत्कुसुमानीति केतयं तथोक्तं प्रत्युन्मिपत्कुसुमकैनवम् गतः विफसत्कु. सुमन्याजात् । जहास हसतिस्म । हसि हसने लिट् । मा० अ०-श्रीजिनेन्द्र भगवान् के चरणारधिन्द में भक्ति करनेवाले हम सय भी लाशोक (अशोषवृक्ष ) अर्थात शोक रहित हैं तथा ललनाओं के चरणों में रनि रपनेवाले साधारण अशोक वृक्ष भी अशोक ही है-ऐसा वाग्विलास समवसरणस्य अशोक वृक्षों ने आपस में क्यिा ॥४॥ छायां तिरस्कृतवतोजगदेकभर्तुः छायां प्रधातुमितमेतदलं ललज्जे ॥ छत्रतयं न यदिशारदनीग्दाभं श्यामं जिनांगरुचिसंगनिभात्कुतोऽभूत् ॥४४॥ छायामित्यादि। छायां प्रतिक्विं अनातपंच! तिस्रनवतः तिरस्करोतिस्म तिरस्कृ. तवान् तस्य निराकृतयनः । जगदेकभर्तुः एकश्चासौ भर्ता च एकमा जगतामेकर्ता तथो- कस्तस्य लोकानां मुष्यस्वामिनः । छायां प्रतिछायां । प्रधातुं प्रधानाय प्रधातुं । इतं एतिस्म इतं गतं । शारदनीरदाभ शरदोऽयं शारदः नोरं ददातीति नीद. शारदश्वासी नीरदश्च तथोक्तः शारदनीरद इवामातीति तथोक्तम् शरत्कालमेघसदृशं । एतत् इदं। छात्रय छत्राणां प्रय छत्रयं । यदि चेत् । अल अत्यंतं । न ललज्जेन जिहाय। तहि । जिनांगरुचिसंगनिभान जिनस्यांगं जिनांगं तस्य रुचिः जिनांगरचिः तस्यास्संगो.

। २०० दशमः सर्गः। जिनांगरविसंगः स एव निमस्तस्मात् जिनेश्वरावयवकांतिसंपर्कव्याजात् । श्याम नीलं । फुतः कस्मात् कारणात् । अभूत् अभवत् । भू सत्तायां लु। अनुमित्यलंकारः ॥४४॥ मा० अ०-प्रतिविम्य को तिरस्कृत किये हुए अर्थात् संसार के एकमात्र स्वामी श्री मुनिसुव्रतनाथ की कान्ति (छाया) की स्पर्धा करने के लिये समुपस्थित जो शरत्कालीन मेघवत् छात्रय हैं, ये यदि अत्यन्त लजित नहीं होते तो जिनेन्द्र देव की अंगकान्ति से श्याम क्यों होते ? ॥३॥ स्त्रीबालवृद्धनियहोऽपि सुखं सभा तामंतमुहूर्तसमयांतरतः प्रयाति ॥ निर्याति च प्रभुमहात्मतयाऽश्रितानां निद्रामृतिप्रसवशोकरुजादयो न ॥४५॥ स्त्रीत्यादि। स्त्रीवालवृद्धनियहोऽपि नियध वालाश्य वृद्धाश्च स्त्रीबालवृद्धास्तेषां निवहस्तथोक्तः यनितामाणवकवृद्धानां समूहोऽपि । तां सगां समवसरणं । अंतर्मुहर्तसमयां- तरत: मुहूर्तस्यांनः अंतर्मुहर्तस्स चासौ समयश्च तथोक्नः अंतर्मुहर्तसमयस्यांतर अंत. मुहर्तसमयांतर अंतर्मुहूर्तसमयांतरे अंतर्मुहर्तसमयांदरनः अल्मुहर्नकालमध्ये । प्रभुमहात्म- तया महांश्चासौ आत्मा च महात्मा तस्य भावो महात्मता प्रमोमहात्मता तया सामिसाम- चैंन । प्रयाति गच्छति । निर्याति च आगच्छति च । आधिनानां समवसरणगतमाणिनां । निद्रामृतिप्रसवशोकरज़ादयः निद्रा च मृतिश्च प्रसरश्च शोकश्च रक् च तथोक्ता: निद्रामृति. प्रसवशोकरजः आदयो येषां ते तथोक्ताः । न न भवेयुरित्यध्याहारः॥४५॥ भा० १०-स्त्री, वो और वृद्ध सब के सब उस समवसरण सभा में अन्तर्मुहर्त में ही सुग्यपूर्वक जाते आते थे। श्रीजिनेन्द्रदेव के प्रसाद से समवसरण में सम्मिलित किसी प्राणी को निद्रा, मृत्यु, प्रसव, शोक तथा रोगादिक नहीं होते थे ॥४५॥ मिथ्यादृशः सदसि तत्र न संति मिश्राः सासादनाः पुनरसंजिवदप्यमव्याः॥ भव्याः परं विरचितांजलयः सुचित्तास्तिष्ठति देवबदनाभिमुखं गणोाम्॥४६॥ मिथ्याश इत्यादि । तत्र तस्मिन् । सदसि समवसणे । मिथ्याशः मिथ्या दूर येषां ते तथोक्ताः मिथ्यादृष्टयः । मिश्राः सम्यग्मिध्यादृष्टयः। सालादनाः सासादनसम्यग्दृष्टयः । पुनः पश्चात् । असंशिवत संज्ञास्त्येषामिति संशिन न संनिनोऽसंशिनस्त इव तथोक्ताः असं. शिप्राणिनो यथा न संतीति तथा । अभव्याः रत्रत्रयाविर्भचनयोग्या भन्याः न भन्या अभन्याः तथोक्ता अपि अभव्या अपि । न संति । परं केवलं । विरचितांजलयः विरचितोऽजलियंस्ते तथोकाः संघटितकरफुड्मलाः । सुचित्ता सुप्छु शोभनं चित्तं येषां ते तथोक्ताः भद्रमानसाः । भव्या रसत्रयाविर्भयनयोग्या भव्याः । गणोा गणानाम्बी गणोर्यो नस्यां गणभूमौ ।

- अनिमुमतकाम्यम् । २०७ भा० १०-शासन तथा उसकी फलप्राप्ति की इच्छा निवृत्ति-पूर्वका उस समय होती दुई दिप्यध्यनि तपा देव-दुन्दुभि ध्यान ने ममयमरण में समागत सभी जीवों के फान और मन इटात् भारष्ट कर लिये ॥४२॥ सर्वज्ञपादरतयो ययमप्यशोका मुग्धांघिजातरतयः किल तेऽप्यशोकाः ।। इत्यालपन्नलिनिनादपदादशोकः प्रत्युन्मिपत्कुसुमतवतो जहास ॥४३॥ - सर्वोत्यादि।सांपादग्नयःमजानातीनि सर्पशः तम्य पादौ मनपादी तयोरतिर्यपाते तयोका: जिनेश्वरपादारविंदप्रीताः । पयमपि अशोकाः न विद्यते शोको येषां ते तथोकाः शोकरहिनाः अशोपद्रुमाः । मुग्धांग्रिजानरनय: मुग्धानामप्रयो मुग्धांप्रयम्नेषु जाता रनिर्येषां ते तथोक्ता रमणीनां पानीनिसहिताः । तेपि इनरतरवश्च 1 अशोकाः फिल शोकरहिताः फिल अशोकवृक्षाः किल । इति एवंा अलिनिनादपदात् अलीनां निनादोऽलिनिनादः अदिनि. नाद इति पदं तयो तस्मात् भ्रमरध्वनिव्याजात्।मालपन अलपतोत्यालपन यन्। अशोकः अशोषवृक्षः। प्रत्युन्मिपत्नुसुमकतयतः प्रत्युमिति य तानि कुसुमानि च तथोकानि, प्रत्युन्मिपत्युसुमानीनि कैनवं तथोक्तं प्रत्युन्मिपत्कुरनुमकैनवम् रानः विकसन्धु सुमव्याजात् । जहास हसतिस्म । हसि हसने लिट् । -धीजिनेन्द्र भगवान् के चरणारविन्द में भक्ति करनेवाले हम सय भी अशोक (अशोषवृक्ष ) अर्थात शोक रहिन हैं तथा ललनामों के चरणों में रति रग्यनेवाले साधारण अशोक वृक्ष भी अशोक ही है-ऐमा वाग्विलास समरमरणम्य अशोक वृक्षों ने आपस में किया ॥४॥ छायां तिरस्कृतवतोजगदेकभर्तुः छायां प्रधातुमितमेतदलं ललज्जे ॥ छतवयं न यदिशारदनीग्दा श्यामं जिनांगरुचिसंगनिभात्कुतोऽभूत्॥४॥ छायामित्यादि। छायां प्रतिविवं अनातपं च। तिरस्कृतवतः तिरस्करोतिस्म तिरस्क. तवान् तस्य निराकृतवतः। जगदेकभर्तुः एकश्चासौ भतां च एकभर्ता जगतामेकमा तयो- तस्तस्य लोकानां मुख्यस्यामिनः । छायां प्रतिछायां । प्रधातुं प्रधानाय प्रधातुं । इतं एतिस्म इतं गतं । शारदनीरदाम शरदोऽयं शारदः नोरं ददातीति नीरदः शारदश्चासौ नीरदश्व तथोक्तः शारदनीरद इराभातीति तथोक्तम् शरत्कालमेघसदृशं । एतत् इदं। छत्रयं छत्राणां प्रएं छत्रययं। यदि चेत् । अलं अत्यंत । न ललज्जे न जिहाय । तहि । जिनांगरुचिसंगनिमात जिनस्यांगं जिनांगं तस्य रुचिः जिनांगरचिः तस्यास्संगो- भा००- । । au दशमः सर्गः। जिनांगरविसंगः स एव निमस्तस्मात् जिनेश्वरावयवक्रांतिसंपन्याजात् । श्यामं नीलं। फुतः कस्मात् कारणात् । अभूत् अभवत् । भू सत्तायां लुङ् । अनुमित्यलंकारः ॥४॥ भा अ०-प्रतिविम्ब को तिरस्कृत किये हुए अर्थात् संसार के एकमात्र स्वामी श्री मुनिसुरतनाथ की कान्ति (छाया) की स्पर्धा करने के लिये समुपस्थित जो शरत्कालीन मेघवत् छनत्रय है, चे यदि अत्यन्त लजित नहीं होते तो जिनेन्द्र देव की अंगकान्ति से श्याम पयों होते ! ॥४॥ स्त्रीबालवृद्धनिवहोऽपि सुखं सभा तामतर्मुहूर्तसमयांतरतः प्रयाति ॥ निर्याति च प्रभुमहात्मतयाऽश्रितानां निद्रामृतिप्रसवशोकरुजादयो न ॥४५॥ स्त्रीयादि। स्त्रीवालवृद्धनिवहोऽपि स्त्रियश्च वालाश्य वृद्धाश्च स्त्रीवालगृद्धास्तेषां निवहस्तथोक्त: वनितामाणवकवृद्धानां समूहोऽपि । तां सां समवसरणं । अंतर्मुहर्तसमयां- तरतः मुहूर्तस्यांनः अंतर्मुहुर्तस्स चासौ समयन तथोक्तः अंतर्मुहूर्तसमयस्यांतर अंत. मुहर्तसमयांतर अंतर्मुहर्तसमयांतरे अंतर्मुष्तसमयांतरतः अंतर्मुहकालमध्ये । प्रभुमहात्म- तया महांधासौ आत्मा व महात्मा तस्य भावो महात्मता प्रभोर्महात्मता तथा स्वामिसाम. र्थेन । प्रयाति गच्छनि । निति च आगच्छति च । आधितानां समवसरणगतप्राणिनां । निद्रामृतिप्रसवशोकरुजादयः निद्रा च मृतिश्च प्रसश्च शोकश्च रुक् च तथोक्ताः निद्रामनि. प्रसवशोकरुजः आदयो येषां ते तथोक्ताः। नन भवेयुरित्यध्याहारः ॥४५॥ मा० १०-स्त्री, बच्चे और वृद्ध सब के सब उस समवसरण सभा में अन्तर्मुहूर्त में हो मुग्यपूर्वक जाते आते थे। श्रीजिनेन्द्रदेव के प्रसाद से समवसरण में सम्मिलिन किसी माणी को निद्रा, मृत्यु, प्रसव, शोक तथा रोगादिक नहीं होते थे ॥४॥ मिथ्यादृशः सदसि तत न संति मिश्राः सासादनाः पुनरसंज्ञिवदायभव्याः ॥ भव्याः परं विरचितांजलयः सुचित्तास्तिष्ठति देवबदनाभिमुखं गणोाम्॥४६॥ मिथ्याश इत्यादि । तत्र तस्मिन् । सदसि समवसणे । मिथ्यादृशः मिथ्या दृक् येषां ते तथोकाः मिथ्यादृष्टयः । मित्राः सम्यग्मिथ्यादृष्टयः। सासाइना: सासादनसम्यग्दृष्टयः । पुनः पश्चात् । असं शिवत संज्ञास्त्येषामिति संशिनः न संज्ञिनोऽसंशिनस्त. इव तथोक्ताः असं. शिप्राणिनो यथा न संतीति तथा । अभव्याः स्त्रयाविभवनयोग्या भव्याः न भव्या अमन्याः तथोका अपि अभव्या अपि । न संति। परं केवलं । विरचितांजलयः विरचितोंजलिपस्ते तथोक्ता: संघटितकरफुड्मलाः । सुचित्ता सुष्टु शोभनं वित्तं येषां ते तधोक्ताः भद्रमानसाः । भन्याः रतत्रयाविर्भयनयोग्या भव्याः । गणोळ गणानामी गणोर्यो तस्यां गणभूमौ ।

- गा-310 भूमिपुजाणम् । दरपदनागिन देशाय पानिपादनानिमिया या निसानिमामने। मिनितोमा गममा ममा मिष्टि, गगाष्टि, मापादन गष्टि भनी भोर भगानीय मी गा मिनु दाश मिल निल निगरि भारतीयादा जिमन्द्रदेव कपमा गl इत्यहुतां त्रिभुवनस्पतः समां तामागन्य वीक्ष्य निखिलं हरिणा जिनेंद्रम ॥ माफीपुष्पमवनम्य पुनर्ममजे हायुधौ भयममुद्रतितीपुंगापि ॥४७॥ एयनामियादि । प्रिमुग्नका. प्रयाणां भुनानां माटारग्निमुनं एप.धागो पनिश्च पपति: त्रिमुगना पकातित्रिमुपनपानि: नम्ग निजगन्नाथम्य । इति एवं प्रसारण । भादुर्गा मार्गमा । तो ममा ममारगरण । भागम्य धागमन पूर्व पधा० पट्य। निम्विन्द्र सम्ले पोटाष्टया! आपोर्णपुर्ण भाषिणानि पुष्पाणि यनिगममणि नन प्रकीपुर्ण यथा भनि तथा नियापिरोपणे नामामघुमम् । जिनेंद्र जिनेश्वरं । अयनभ्य अपनमनं पूर्व० प्रणम्य गरयमुद्रनितीjणापि भव पय ममुद्रो भरममुद्रः तमिच्ः निती: भयममुद्र ग्य गिनीमतयोनः गन मंगामागग्नरणामिन्यापूणापि। परिणा देयेंद्रण। पुनः भूयः । युधो दर्य एवायुधियुधिस्तम्मिन. मंटोरममुझे। ममन्ने मम्ने । मम्जो शुद्धों पर्मणि लिदा रुपफालंकार ४७ भा० अ०-त्रिलोकीपनि श्रीजिनेन्द्र देव फी उम अलौकिक सभा आममो पदार्थों फा देवफर देवेन्द्र पुप्प-पृष्टि-पूर्वक धीमुनिमुद्यतनाथ झी यन्दना करके मंमार-ममुद्र को तैग्नेकी इच्छा करते हुए भी हसमुद्र में गोता लगाने लगे ॥en सनायिकाचलदृशोग्चलसंयमेन सप्तधिसम्यगवबोधचतुष्कभाजा ॥ श्रीमल्लिषेणगणिनाथ तदीरितेन पृष्टः समस्तविदसौ निजगाद तत्त्वम् ॥४८॥ समायिफेत्यादि। अय अनंतरे। सहायिकाचलमा अचला चामो हक्च अचला क्षायिको चासो अवलहएच क्षायिकाचलहर नया सह पर्नत इति सक्षायिकायला तेन निश्चलक्षायिफसम्यक्त्वयुनान । उम्पलसंयमेन उज्वलः संयमो यस्य सः तेन निर. तिवारचारित्रसदिनेन । सप्तर्धिसम्यगरयोधवतुष्फभाजा सम्यचथ ते अवयोधाध स. म्यागययोधाः तेणं चतुष्क मस्यगययोधचतुष्कं सप्त च ता ऋद्धयश्च मार्धयः सप्तर्धयश्च सम्पगवयोधचतुष्कं च तथोनानि मजनिम्म साधिमायगयोधचतुप्कभाक् तेन । - APH देशमः सर्गः । , विदीर्ण किये हुई पड़ी२ भेरियों की चौयोस ध्वनियों ने त्रिभुवनपनि श्रीमुनिसुव्रतनाथ सुरपतिरपि सर्वान जैनसेवानुरक्तान कलितकनकददायोजयन्वस्वकृत्य।।५।। २१० तदीरितेन तेनेरितस्तदीरितस्तेन देवेंद्रण प्रेरितेन । श्रीमल्लिनाथगणिना गणोऽस्यास्तीति गणी निया उपलक्षितो मल्लिनाथः श्रीमल्लिनाथः स चासौ गणी च श्रीमल्लिनाथगणी तेन । शानवैराग्यसंपशु कालनाथगणधरेण । पृष्टः पृच्छतिस्म पृष्टः वशिव्यचीत्यादिना यम् इक् । विज्ञापितः। असौ अयं । समस्तविद् समस्तं वेत्तीति तथोक्तः सर्वज्ञः । तत्त्वं जीवादि. स्वरूपं। निजगाद निरूपयामास । गद् व्यक्तायां वाचि लिट् ॥४८॥ भा० अ०-स्थिर क्षायिक सम्यक्त्व से युक्त, निरतिवार चारित्रसहित, सात ऋद्धियों और चार सम्यग्ज्ञान के पात्र तथा देवेन्द्र से प्रेरित श्रीमल्लिनाथ गणि से प्रार्थित किये गये सर्वज्ञ देव ने जीवाजीवादि तत्त्वों को निरूपित किया ॥४॥ अथ समयविदींद्रादेशतो वाद्यदेवैर्विनिहतजिनसंख्योदारभरिप्रणादः॥ विघटितगिरिसंधिविश्वविश्वकभर्तुस्त्रिभुवनमपि यात्रारंभमावेदयत्तम् ॥१६॥ अयेत्यादि । अथ तत्त्वनिरूपणानंतरे। विघटितगिरिसंधिः गिरीणां संधिनिरिसंधिः विघटितो गिरिसंधिर्येन सः तथोक्तः । समयविदोन्द्रादेशतः समयं वेत्तीति तथोक्तः समय- पिच्चासाविंद्रश्च समयविदींद्रस्तस्यादेशतः श्रीविहारकालशदेवेन्द्राशया। वायदेवः वायस्य देवा वाद्यदेवास्तैः किल्विपदेवैः। विनिहत जिनसंख्योदारभेरिप्रणादः उदाराश्च ताः भेर्यश्च तयो- काः जिनानां संख्या यासा तास्तथोक्ताः जिनसंख्याच ताः उदारभेर्यश्च तथोक्काः विनिहन्यते स्म विनिहता. ताश्च ता जिनसंख्योदारभेर्यश्च विनिहतजिनसंरयोदारभेर्यस्तासां प्रणाद. स्तथोक्तः प्रहतचतुर्विशतिमहरिध्वनिः । विश्वविश्व कभर्तुः विश्वश्च विश्वश्च विश्व.. विश्व एकश्चासौ भर्ता च एकभर्ता विश्वविश्वस्य एकभर्ता तथोक्तस्तस्य समस्तमुख्य. स्वामिनः अथवा विश्वे च ते विश्वाश्च विश्वविश्वास्तेषां भर्ता तस्य त्रिलोकस्वामिनः । "नागरयोजगत्समस्तेषु विश्वः" इति नानार्थरनकोशे । तं प्रतं । यात्रारंभ यानाया आरंभी यात्रारंभस्त श्रीविहारप्रारंभ । त्रिभुवनमपि त्रिजगदपि । आवेदयत् अयेदि कश्चित्तमन्यः मायुंक्तत्यावेदयत् । विद शाने णिस्तालङ् ॥ ४६॥ भा० अ०-तत्यनिरूपण के बाद समयज्ञ अर्थात् भगवान् के विहारसम्बन्धी समय को जाननेवाले इन्द्रके आदेशानुसार किल्विष देवों-द्वारा बजायी गयो तथा पर्वनों को को यात्रा के समारंभ की घोषणा से समस्त संसार को विज्ञप्त किया HER समवसरणमभ्रे भव्यपुण्यैश्चचाल स्फुटकनकसरौजश्रेणिना लोकवंद्यः ।

। मुनिसुव्रतकाव्यम् । समवसरणमित्यादि। समवसरणं समवसतिः। भव्यपुण्यैः भव्यानां पुण्यानि भव्य- पुण्यानि तैः विनेयजनमुरुतः । अभ्र आकाशे । चचाल इयाय । चल कंपने लिट् । लोकवंद्यः लोकै यस्तथोक्तः त्रैलोक्यस्तुत्यो जिनः । स्फुटकनकसरोजश्रेणिना सरसि जायंत इनि सरोजानि कनकानि च तानि सरोजानि च तथोक्तानि स्फुटानि च तानि फनफसरोजानि च तथोक्तानि स्फुटकनकसरोजानां श्रेणिस्तेन विकसदरुणारविंदश्रेणिना। चचाल । कलित. कनकदंड: कल्यतेस्म कलितः कलितः कनकदंडो यस्य सः तथोक्तः स्वीटनसुवर्णदंडसहितः। सुरपतिः सुराणां पतिस्तथोक्तः। जैनसेवानुरक्तान जिनस्येयं जैनी साचासौ सेवा च जनसेवा मानियकायोरित्यादिना पुंबद्धायः अनुरज्यंतेस्म अनुरक्ताः जनसेवायामनुरक्तास्तान् जिनेचाराधनायां प्रीतान् । सर्वानपि सकलानपि । स्वस्वकृत्ये स्बे च स्वे च स्वस्व तेषां स्वस्वरूत्य तस्मिन् निजनिजकार्ये "वीप्सायाम्" इति दिः। योजयन् योजयतीति तथोक्तः प्रेरयन् । चवाल । मध्यदीपिकालकारः ॥ ५० ।। भा० अ.--भव्य जीवों के पुण्यों से समवसरणसभा आकाश मार्ग से चली और विकसित रत्न कमलों के ऊपर निभुरनवन्ध श्रीमुनिसुक्त नाथ भी चले तथा साथही साथ सुवर्णदण्डधारी इन्द्र भी जिनसेवानुरक सभी लोगोंको अपने २ काममें लगाते हुए बल पड़े ॥५॥ सिचमररुहाली पार्श्वयोश्चिक्षिपाते सुधिय उपरि शुभ्राण्यातपत्राणि देवैः ।। · उदधृयत तथाष्टौ भंगलान्यप्मरोभिर्दिशि दिशि धृतमधर्मचक्र च यःः॥५१॥ सिरयमरेत्यादि । सितचमररुहाली चमरेषु रोहनीति चमररहाणि "चमरं चामरे प्राहमंजरोमृगभेदयोः।" इति विश्वः । सितानि च तानि चमररहाणि च तथोवानि तेपामावली द्विरचनं शुभ्रचमरणो । सुधियः शोभना धोर्यस्मात भव्यजनानां भवतीत्यसौ सुधीः तस्य जिनेवास्य । पार्ययोः उभयपाययोः। चिक्षिपाते विक्षिपेतेस्म क्षिप प्रेरणे लिट् । शुभ्राणि श्वेतानि। आनपत्राणि। उपरि ऊर्बभागे। देवैः मुगः। उदधृषत उधियंतेस्म) धृङ्धारणे कर्मणि लु। नथा तेन प्रकारेण । दिशि दिशि दिशायां दिशायो अप्सऐभिः देवगणिकाभिः। अटमंगलानि भृगारामटमंगलानि। उदधृपत । अग्रे पुरः। यौः यक्षदेवैः । धर्मचर धर्मरूप चा तथोक्त । पृतं भूने ॥ ५९॥ भा० अ०--धीजिनेन्द्र देव के दोनों ओर चमर डुलाये जाने लगे, ऊपर से देवाने छत्र लगाया। अप्सरायें प्रत्येक दिशा में भृगारादि अष्टमंगल द्रव्य लेकर सड़ी थी तथा पक्षोने घड़ो हदनाके साथ धर्म-चर धारण किया था ॥११॥ ।

२१२ दशमः सर्गः। सपदि पवनदेवाः शर्कारालोष्टधूलिक्रिमितृणमपनिन्युर्भूतलान्मेघदेवाः ॥ सुरभिसलिलसेकं चक्रुरत्रेदमासीन्मुकुरदलवदच्छाकाशदिक्पर्धयेव ॥५२॥ सपदीत्यादि । पवनदेवाः पवनाच ते देवाश्च तथोक्ताः वायुकुमाराः । शर्करालो धूलिमितृणम् शर्करा च लोपश्च धूलिश्च कृमिश्च तृणञ्चापि तथोक्तानि तेषां समाहारस्तथोक्त । भूतलात् भुवस्तलं भूतलं तस्मात् भूप्रदेशात्। सपदि सत्वरं । अपनिन्युः निवारयांचाः । . गोङ् प्रापणे लिट् । अत्र अस्मिन् भूतले । मेघदेवाः मेधकुमाराः। सुरभिसलिलसेकं सुरभि चतत् सलिलं च तथोक्त सुरभिसलिलस्य सेक- स्तथोक्तः तं परिमलकलितजलसेवनं । चक्र : विदधुः। डुकृञ् करणे लिट् । इदं भूतलं । अच्छाकाशदियस्पर्धयेय आकाशश्च दिशश्च आकाशदिशः अच्छाध ता आकाशदिशश्च तथोक्ताः आच्छाकाशदिग्भिस्सह स्पर्धा तयेव निमेलगगनदिग्भिस्साकं मात्सर्येणेव । वभुरिति यावत् । मुकुरनलवत् मुफुरस्य तलं तथोक्त मुकुरतलमिव सम्मुखोनतलवत् । आसीत् अभवत् । अस भुवि लङ् । उपमा ॥५२॥ भा० अ०-पवन देवों ने पृथ्वीसे कंकड़ो, रोड़े धूलि, कोड़े, तथा तिनके शोघ्र हेटाकर जिनेन्द्र देव के प्रयाण-मार्ग-को परिष्कृत कर दिया। मेघो ने उसे सुगन्धित जलसे सिचन किया तथा भामाश और दिशायें मानों स्पर्शसे आयने की ऐसी स्वच्छ होगयी १५२१ धरणिरमरवृष्टैरुद्गमैस्सोपहारामुग्मणिमकुटाचिःशकचापार्चितं खम् ॥ सुरनरजयशब्दस्तोत्रकिर्मीरभेरीमुखरवमुखरं चाप्यास दिक्चक्रवालम् ॥५३॥ धरणिरित्यादि। अमरवृष्टः वर्षन्तिस्म वृष्टाः अमरेपृष्टा अमरवृष्टाः तैः । उद्गमः पुष्पैः। “लनांतं प्रसवोद्गमम् इनिधनंजयः। धरणिः भूमिः । सोपहारा उपहारेण सह वर्तत इति तथोक्ता पूजासहितो। आस बभूव। खं आकाशं । सुरमणिमुकुटार्चि-शाचापार्चित सुरागां मणिमकुटानि नयोक्तानि तेषां अवापि तथोक्तानि शकस्य चापं शकचापं सुर- मणिमफुटाचींप्येव शकत्रापं तथोक्त अर्यतेस्म अर्चितं सुरमणिमफुटार्चिःशकचापेनार्चितं तथोक देवानां रखमौलिकिरणेंद्रचापेन पूजितं । आस बभूव । दिक्चयालं चापि दिशां चक्रवातं तथोक्त दिग्मंडलं। "चवालं तु मंडलम्" इत्यमरः । सुरनरजयशब्दस्तोत्रकिम्मीर- भेरिमुखरयमुसरं च सुराश्च नराश्च सुरनराः जयेति शब्दो जयशद: जयशन्दय स्तोत्रच जयशब्दस्तोत्रे सुरनराणां जयश-दस्तोत्रे ताभ्यां किमीरस्तथोकः भेरीणां मुपं भेरीमुख तस्य रवः सुखरजयशस्लोनकिमारश्वासी भेरीमुखरयश्च तथोक्त सुरनरजयशब्दस्तोन.

अनिमुमतकाव्यम् । किौरभेरीमुखरवेण मुखर तथोक्त । देवमनुष्यजयनिनादस्तुतिमिधिनभेरिमुखरखच. निना वाचाट। आस बभूग। दीपकालंकार । ॥३॥ भा० अ०--देवतावों से की गयी पुष्पवृष्टि से पृथ्या उपहार सहित ज्ञान होने लगी। आकाश मण्डल भी देवताओं के मणिमय मुफुट की ज्योतिरूप इन्द्रधनुष से शोभित होता हुआ देवता और मनुष्यों की जयश-द स्तुनि मिथित भेरी भाकार से मुखरित होगया ॥५॥ । गलितचिरविरोधाः प्राप्तत मैत्री मिथ इव जिनसवालंपटासंपदिताः। पडपि च ऋतवन्ते तत्र तत्रान्वगच्छन व्यवहग्ढयमीशो यत्र यत्रैव देशे ॥५४॥ गलितेत्यादि । अयं एप । ईश स्यामी । यत्र यत्रर यस्मिन् यस्मिन्नेव। देशे जनपदे । व्यमहर व्यगमत् । तमनस्मिन् नम्मिन् घोप्सायामिति हि गलिनधिरतिरोधा गरनिस्म गलित चिर पितो विरोधचिरचिरोध गलिनधिरविरोधो येभ्यान्ते तथासा विगत पहुकालपिनविरोधभारा । मैत्री मित्रभ्य भावो मैत्री ना 'युवादिदायनान्तादण्" इत्यनेनाण मित्रभाव। मिथ अन्योन्यमित्र । प्राप्तयन्तध प्रानु तिम्म प्राप्तवन यातयन्त । जिसिया लपटात् जिनस्य सेवा जिनसेवा तम्या लपटरनथोतस्तस्मात् जिन्शम्याराधनाया आसन । संपदिद्धा सपदा रद्धास्तथोक्ता रोवर्येण प्रथिना । पडपि ते प्राव हेमतादिषवृतयोऽपि । अन्वगच्छन् अन्वायन् गम्तृ गतौ लापता युगपरागमनत्यमेवगिरोधरहितत्वमित्यर्थ ॥१४॥ मा० अ०-धीमुनिसुवन नाथ ने जहाँ पिहार पिया यहाँ २ ये जीयो ने चिरशाना छोडपर मैत्री फरली। जिनेन्द्र भगवा पी सेरा में अनुरत होने से रोग भट सम्पत्ति शाली हो गये | तथा छ हो तुएं परस्पर पर ही बार मिली-अर्थात् सभी ऋतुओं ने एबहा वार अपने २ सामयिक मनु मायधी दृश्य दिपाये ॥५४॥ न परमखिललोकः प्रातिकृल्य विताय त्रिभुवनतिलकं त वायुम्प्यन्चियाय ॥ दिविजसरसि ममः पुष्पगंधोराही मयुरफुलशब्दाना सन्तुसनः ॥५४॥ नेत्यादि । अपिललोय' अगिलभाषी लोपश्च नयोसपरउन । प्रातिकन्य प्रतिफलम्यभाव भातिय प्रतिकुलत्य। विहाय विहान पूर्व पधान्यि निदिनि त्यन यात त्रिभुपातिय त्रिभुनानिलय त्रिभुरीमान निजगलेछ पर पेपर। भन्धिपाय अगुजगाम । इण गतो रिट नितु पुगंधोपचाही पुप्यम्य गन्ध पुष्पगन्ध पुष्पमधमुपयानोन्येय जागतयोत पुमुमरिमरधाग । दिमिरामि दिविज सगे दिधिजसास्तस्मिन् दिल्यगधाया। मार मनतिरम मग्न बान । मधुवरपुलशन्दव्याना : है m २१४ दशमः सर्गः। मधुकराणां कुलं मधुकरपुलं नस्य शब्दस्तथोक्तः मधुकरफुलशन्द पर छा तथोक्त तेन । संस्तुवानः संस्तुवत इनि संस्तुवानः सन्नुवानः। घायुः माम्नोऽपि । अपिशब्दस्समुच्च. यार्थः । अन्चियाय अनुजगाम । अत्र यायोः शैत्यसौरभ्यमांद्यलक्षणानि लक्ष्यते । दीएकः ॥५५॥ भा० अ०-विरोध छोड़कर केलं. सभी लोगों ने ही त्रिभुवन-श्रीप्ट श्रीजिनेन्द्र देव का नहीं अनुसरण किया प्रत्युन दिव्य मुगन्ध में बनार पुष्पगन्ध को ढोती हुई. वायु ने भो भ्रमर-समूह के गुंजार के बहाने स्तुति द्वारा उनका अनुगमन किया ॥२५॥ अपि च सदसि भर्तुः कच्छपांकस्य रेजुः सवरुणबहुरूपिण्यन्वहाराधितस्य ॥ गणधरपदभाजोऽवादशैतच्छतांकानपरमवधिनेत्रांः केवलज्ञानिनोऽपि ॥५६॥ अपीत्यादि । अपि च किंतु । सबरुणयहुरूपिण्यन्वहाराधिनस्य वर्गणेन सह वर्तत इति स. घरुणा सा चासो बहुरूपिणी च सवरुणयहुरुपिणी अहरहरनु अन्वहं आराध्यनेस्म आरा. धितः अन्यहमाराधितस्तथोक्तः सवरुणवहुरूपिण्यन्वहाराधितस्तथोक्तस्तस्य परुणयक्ष- यहरूपिणीयक्षीभ्यां सततं पूजितस्य। कच्छपांकस्य कच्छप एव अंको यस्य सः तस्य फर्मला. छनस्य । भर्तुः जिनेश्वरस्य । सदलि सभायां । अष्टादश अष्टभिरधिका दश तथोक्ता: “दा. पटात्रय" इत्यादिनाष्टादेशः। गणधरपदभाजः गणान् धरतीति गणधरस्तम्य पदं गणधरपदं तदर्जनीति तथोक्ता. गणधरपदवी संप्राप्ताः गणारा इत्यर्थः । रेजुः यभुः । राजू दप्तौ लिट् । एतच्छतांकाः एतेषां शतं एतच्छतं तदेवांको येषां ते तथोक्ताः अष्टादशवाग्शतप्रमिनाः शताष्टकाधिकसहस्रप्रमिता इत्यर्थः। अवधिनेता अपधिरेव ने येषां ने नयोक्ताः । न परं न केवलं रेजुः । किंतु केवलज्ञानिनोऽपि केवलं चन्द् डानं च केवलज्ञानं नदारयेपा. मिति तथोक्ताः तेपि नावंत एवेत्यर्थः । रेजुः बभुः ॥१६॥ भा० अ०-वरुण, यक्ष नथा बहुपिणी यक्षी से प्रनिदिन पूजिन और कच्छर. लान्छनाशित श्रीमुनिसुवन नाथ की नमवसरण सभा में अट्ठारह गाधर विराजमान हुए थे। अट्ठारह सौ अवधिज्ञानी भा सुशोमिन हो रहे थे, केवल अधिशानी ही नहीं फेवल ज्ञानी भी उतने ही थे । शतविगलितमानावादिनरतुर्यबोधास्त्रिशतगलितमरख्या विक्रियधिप्रमिडाः ॥ यधिकशतचतुष्का फेवलियो बभृकुस्त्वधिगतदशपूर्वान्तुर्यबोधत्रिभागाः ॥७॥ शतेत्यादि । केलिभ्यः सकाशात् । शविगलितमाना: शतेन विलिनः नयान: शतविगलितः मानः येषां ते नयोक्ताः केवलगानप्रमाणाच्छनाहिनप्रमाणा: समशताधिपमह. - मुनिसुव्रतकाम्यम्। नप्रमिता इत्यर्थः । वादिनः महावादिनः । विशतगलितसंख्याः त्रीणि च तानि शतानि च त्रिशतानि तैर्गलिना संख्या येषां ते तथोक्ताः शतत्रयरहितकेवलज्ञानिप्रमाणाः पंचशताधिक. सहस्त्रमाना इत्यर्थः । तुर्ययोधाः चतुणी पूरणः तुर्यः तुर्यो योधो येषां ते तथोक्ताः मनःपर्ययज्ञानिनः। अधिकशनचतुफाः शतानां चतुर्क शतचतुष्कं अधिकं शतवतुष्कं येषां ते तथोक्ता चतुःशताधिरकेवलिप्रमाणाः द्विशताधिकठिसहस्रपरिमिता इत्यर्थः । विक्रियर्धिप्रसिद्धाः विनियो चासौ ऋद्धिश्च विनियर्धिस्तया प्रसिद्धाः विवियर्धिन- तीताः । तुर्यबोधविभागाः तुर्यो बोधो येषां ते तुर्यवोधास्तेषां त्रयो भागा येषां ते तथोक्ताः पंचशतप्रमिता इत्यर्थः। अधिगनदशपूर्वाः दश च तानि पूर्वाणि च दशपूर्वाणि अधिगम्य न्तेस्म अधिगतानि दशपूर्याणि यैस्ते तथोक्ताः शानदशपूर्याः दशपूर्वधराः । यभूयुः भनिस्म भू सत्तायां लिट् ॥ ५७।। भा० अ0-~-यहाँ घादी तथा महावादी सत्रह सो, मन.पर्ययशानी पन्द्रह सौ, विप्रिया. प्रद्धिसे प्रसिद्ध देवगण तथा मुनिगण थाईस सौ और पांच सौ यहां दशपूर्व थे. धारक थे॥५७॥ लिहतहयसहस्राण्यर्धलक्ष चलक्षं निगुणितमपि लक्ष शिक्षकाश्चार्यकाश्च ॥ उपगतगृहमेधाः श्राविकाश्चाप्यसंख्याः सुरसुरसुकुमार्यः प्राप्तसंख्या मृगाश्चा५८ त्रिहतेत्यादि । निहलायसहस्राणि हयसंग्याममितानि सहस्राणि हयसहस्राणि त्रिभिहतानि तानि च तानि सरस्माणि च तधोकानि एकविंशतिसहस्राणि । शिक्षकाः उप. देशकाः । अर्धलक्षं लक्षस्या अर्धलक्षं। आर्यकाः । लक्ष एकलक्षं। उपगतगृहमेधाः उपगता गृहमेधा येषां ने तथोनाः धारकाः। निगुणिनं निभिर्गुणितं रथोत । लक्षमपि विलक्षाणीत्यर्थः । धारिकाधापि । अनायाः न पियने संख्या यासां ताः तथोक्ताः असंख्याताः । सुरमुरसुकुमार्गध सुराणा सुकुमार्यः सुग्नुकुमार्यः सुगम मुरमुयुमार्यच तथोक्ताः देवदेव्यः। प्रासंख्या: प्राता मंग्या येस्ने तथोक्ताः संख्याताः । मृगात्र नियंवः। यभूः ॥ ५८॥ भा० अ०-यहां शोस हजार उपदेशक, पचास हजार आर्य का, एक लक्ष धारक, सीन लक्ष धारिकायें, असंख्य देर और देवांगनायें नधा प्राप्त संख्या घाले पशु पक्षी आदि नियंग्योनि के जीव भो थे ॥५८॥ इति विषयमशेपं विश्वबंद्यो विहृत्य त्रिचरणपरिशिष्टं नृनमन्दायुतं सः।। सुजमादयवप्रेपृप्ततत्त्वार्थमस्यः प्रविशदमणिचूलं प्राप संमेदशलम् ॥५॥ । - दशमासः। इतीत्यादि । विश्ववंद्यः विश्ववद्यः विश्ववंद्यः सक्लैः स्तुत्यः । सुजनहृदयवप्रेषु शोभना जनाः. सुजनाः तेषां हृदयानि तथोक्तानि सुजनहृदयान्येव वप्राणि सुजनहृदय- वप्राणि तेषु भन्यचित्तक्षेत्रेषु। उप्ततत्त्वार्थसस्यः तत्त्वानि चाांश्च तत्त्वार्थाः यद्वा तत्त्वानां अस्तित्त्वार्थास्त एव सस्यानि तथोकानि उप्यतेस्म उत्तानि तत्त्वार्थसस्यानि येन सः नथोक्तः उप्तसप्तनवनवपदार्थसस्यः। सःजिनेश्वरः। अशेषन विद्यते शेपो यस्य तं निःशेष। विषयं देश। त्रिचरणपरिशिष्ट' त्रयश्च ते चरणाश्च विवरणास्तैः परिशिष्ट तथोक्त त्रिपादावशिष्ट नूनं किंचिद्विहीनम् त्रयोदशमासविफलमित्यर्थः । अब्दायुतं अब्दानामयुतं दशवर्षसह- स्त्रपर्यंत । इति एवं प्रकारेण । विहृत्य विहरणं पूर्व पश्चात्किंचिदिति। प्रविशदमणिचूलं मणि- मयी चूला मणिचूला प्रविशदा मणिचूला यस्य तं । संमेदशैलं संमेदश्चासौ शैलश्च संमेदशैल- स्तं संमेदपर्वतं । माप प्रययौ । आप्ल व्याप्ती लिट् ॥५६॥ भा० अ० सभी भघिको के चित्त रूपी क्षेत्र में तत्त्वरूपी वीजको वपन किये हुए लोकपूज्य श्रीजिनेन्द्र देव तेरह महीने कम दसहजार वर्षों तक सभी देश में यों विहार कर मणिमय शिखर वाले श्री सम्मेदाचल को पधारे ॥५६॥ तत्र स्थित्वैकमास व्यपगतविहतिः फाल्गुने कृष्णपक्षे । द्वादश्यामधराने सदशशतमुनिर्जन्मभेऽघात्यरातीन् । आरूढायोगिधामा विचरमसमये सप्ततिं हिप्रयुक्तां । शुक्लध्यानारियष्टया सचरमममये वृत्तसंख्यान्जघान ॥६॥ नत्रेत्यादि। तत्र तस्मिन् पर्यते। व्यपगतनिहनिः व्यपगता बितिर्यस्य सः तथोक्तः निरुद्धश्रीविहारः । सदशरातमुनिः दश घारान् शता दशशतास्ते च ते मुनयश्च दशशत. मुनयस्तैः सह वर्तत इनि तथोक्तः लहस्रमुनिभिर्युक्त मन् । एकमासं एक्श्चासौ मासश्च एकमासस्तं एक्मासपयंत स्थित्वा । फारगुने फागुनमासे । कृष्णपने अपरपक्षे । द्वादश्यां । अर्धरात्रे रार्धमरानं तस्मिन् ! "पुण्यवर्यादीर्घसंख्यानकादाने." इत्यनेनात्प्रत्ययः । जन्मभे जन्मनो में जन्मभं नस्मिन् श्रवणनक्षने। थारुढायोगिधाम आरहतेम्म आरुदं योगिनो धाम अयोगिधाम आरूढ़ अयोगिधाम येन सः तथोक्तः आमदायोगिगुणस्थानस्सन् । सः जिनेश्वरः । द्विप्रयुक्तां द्वाभ्यां प्रयुक्ता तथोक्ता तां द्विसहिनां द्वालप्तनिमित्यर्थः । अधात्यरातीन अघातिन येवारयः तथोक्ताः नान् अधानिशम् ! हियरमसमने द्वौ चरमौ यस्य सः द्विवर- मचासो समयश्च तथोक्तः तस्मिन उपांत्यसमये । शुरुध्यानासियष्ट्या शुलंच तत् ध्यानं च शुक्लध्यानं असेर्यष्टिरसियष्टिः शुक्लानमेवासियष्टिस्तथोक्ता नथा शुलध्यान- मुनिश्मतकाव्यम् । खगलतया। जधान हतिरम हन हिंसागत्योः लिट् । चरमसममें चरमश्चासौ समयश्च । चरमसमयस्तस्मिन् । घृत्तसंख्यान वृत्तस्य त्रयोविधचारित्रस्य संख्या येषां ते तथोक्तास्तान् प्रयोदशघायरीन् । जघान ॥६०॥'. भा० अ०--एक हजार मुनियों के सहित श्रीमुनिसुव्रत-नाथ ने अपनी विहार-क्रिया '. समाप्त किये हुए एक महीने तक उस सम्मेदाचल पर्वत पर रह कर फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि तथा श्रवण नक्षत्र में अयोगिगुणस्थान को प्राप्तकर लगभग अन्त्य समय शुक्र ध्यानरूपी खड्ड से बहत्तर अघानिया शत्रुओं नयां नेरह घातियाँ शत्रुओं को नष्ट कर दियां ॥६०॥ ईपत्याग्भारसंज्ञेऽष्टमधरणितले मर्त्यलोकप्रमाणे । सिद्धक्षेत्रे विशुद्धः स जयति तनुवातात्यभागे कृतौकाः ।। किंचिंन्यूनांत्यदेहप्रमितिघननिजाकारभाक् क्षायिकैः खैः । सम्यक्त्वाद्यैरुपेतोऽष्टभिरमितसुखापादकरस्तकर्मा ॥६१॥ ईपदित्यादि पित्प्राग्भारसंज्ञईपत्माग्मार इति संज्ञा यस्य तस्मिन् ईपत्माम्भारनामधेये। अष्टमधरणितले अप्टमी चासो धरणिश्च अष्टमधरणिस्नस्यातलं तस्मिन् “मानिस्त्रै. फायोः” इत्यादिना पंचद्वारः अष्टमभूमिप्रदेशे। मर्त्यलोक्प्रमाणे मर्त्यस्य लोपस्तथोक्तः मर्त्यलोकस्य प्रमाणं यस्य तत् तस्मिन् मनुष्यलोकप्रमिते । सिद्धक्षेत्र सिद्धानां क्षेत्र सिद्धक्षेत्र तम्मिन् । तनुवातात्यभागे ननुरिति वानस्तनुपात: अंत्यश्चासौ भागश्च अंत्यभागः तनुवात. स्यांतभागस्तनुवातात्यभागस्तस्मिन् तनुपातचरमभागे। कृतीकाः क्रियतेस्म कृतं कृत. मोको येन सः तथोक्तनिहितनिलयः। अस्तका अस्यंतिम्म अरुनानि अत्तानि कर्माणि यम्य सः घ्यपगतसकलकर्मविशुद्धः अपगतद्रव्यभाषकर्मत्यादिविशुद्धः । किंचिन्यूनांत्यदेहप्रमिति- घननिजाकारभाक् किंचित् न्यूनः किंचिन्यूनः अत्यचासो देहश्च अंत्यदेहः तस्य प्रमिति. रंत्यदेहमिनिः किंचिन्यूनांत्यदेहप्रमितिर्यस्य सः नथोक्तः निजश्चासायाकारश्च नयोक्तः धनधाप्ती निजाफारश्च तथोक्तः किविल्य्नात्यदेहप्रमितिश्चासी धननिजा कारश्च स्तयोक्तः तं भजनिम्म तथोक्तः किंचिन्मात्रन्यूनवग्मदेप्रमाणयन. स्वाभाविकाकृतियुक्तः । अमिनसुखापादक: अमितानि च तानि सुखानि च अमिन. सुखानि तान्यापादयंतीत्यमिनसुग्वापादधास्ने: अनंतसुखापादयोः । क्षायिक क्षयेण जाता क्षायिकास्तः धर्मणां क्षयेण जातः । स्यैः सकीयः। सम्यन यायः सम्यक्त पमा ।

. . , देशमः सर्गः। येषां ते तैः सम्यक्त्वादिभिः । अष्टभिः अष्टगुणः । उपेतः उपैतिस्म तथोकः युक्तः। सः सिद्धः। जयति सर्वोत्कर्पण वर्तते ॥६॥ भा० अ०-ईपत्प्राग्भार नाम वाले आठवें भूप्रदेशमें; तनुवातवलयके अन्त्यभागमें, . मध्यलोक प्रमित सिद्धक्षेत्रमें विराजमान होते हुए अन्तिम शरीरसे कुछ कम तथा धनस्वभावा- कारवाले और द्रव्यकर्म से रहित, अनन्त सुखजनक क्षायिक सम्यक्तवादि अष्टगुणों से युक्त तथा द्रव्य और भावकर्मसे रहित होकर विजयशाली होते थे ॥ ६१ ॥ श्रान्ते तत्र स निर्वृतः सुखसुधां चर्वन् सदात्यंतिकीम् । स्वस्थः संमृतिनाटकं स्फुटरसं पश्यन्विभावादिभिः ॥ संपन्नैः सकलैगुणैरनुपमैः स्थानं सिताम्राकृतेः । कीर्तरात्मसमैः सहैव पुरुपैः शुद्धैश्चः बुद्धः परम् ॥१२॥ आस्त इत्यादि । · सः सिद्धः सभापतिश्च । निर्वृतः मुक्तः । व्यापारांतरानि त्तश्च । आत्यंनिकी अत्यंते भया आत्यंतिकी तां अनंतकालभाचिनी च । सुखसुधां सुखमेव सुधा सुखसुधा तां सुपामृतं । सदा सर्वस्मिन् काले । चर्वन् अनुभवन् । स्वतः कर्मरहितः स्वरूपे स्थितः निरातकम्ध सन् । विभावादिभिः विभाव आदिउँपां ते विभावादयः तः विभानुभावप्रमुखैः। स्फुटरसं स्फुटा रसा यस्मिन् तं प्रादुर्भूतस्थायिभावरूपगा- रादिरसयुक्त। संसृतिनाटकं संस्तेर्नाटकस्त संसारनर्तनं । प्रेक्षकजनानामिव मुक्तात्मनां सांद्रानंदविधानत्यात्संमृतिनाटकमभिनेयनाट्यविशेष इव । पश्यन् पश्यतीति पश्यन् प्रेक्ष. माणः । अनुपमैः न विद्यते उपमा येषां ते अनुपमास्त: उपमारहितैः। सकलैः सः। गुणैः सम्यक्त वादिगुणैः त्यागविशेषज्ञतायैश्च संपन्नः समृद्धः । सिताम्राकृतेः सिताभ्रस्यारुतिर्य- स्यास्सा सिताम्राकृतिः तस्याः कर्पूराकारायाः “सिनानो हिमवालुफा इत्यमरः कीर्तेः स्तवनस्य यशसश्च । स्थानं आस्पदं भूनस्सन्। आत्मसमैः आत्मनः समा आत्मसमास्तैः निवृतत्या. दिभिः स्वसमानः । शुद्धश्च शुध्यतेस्म शुद्धाः तैः फर्मविरहितः उपधाशुद्धश्च । बुद्धः बुध्यते स्म युद्धाः ते. । केवलशानिभिः लौकिकज्ञानिभिश्च । पुरूपः परमात्मभिरमात्यादिभिश्च। सहव साकमेव । तत्र सिद्धक्षेत्र। परं अत्यंतं । आस्ते वर्तते आस उपवेशने ॥ भा० अ०--यह सिद्ध अथवा नाट्याधिपति, मुक्त वा कार्यान्तरसे रहित होकर उस सिद्ध क्षेत्रमें अनन्त कालभाविनी मुक्तिरूपिणी सुधाका सदैव अनुभव करते हुए आत्ममुखमें टीन पा निराफुल विभाव अनुभाष तथा सञ्चारी भावादिकों से व्यक्त रसवाले संसाररूपी नाटक को दर्शक के समान देखते हुए, सभी अनुपम सभ्यतयादि गुणोंसे सम्पन्न तथा स्वच्छ - - । मुनिसुमतकाव्यम्। स्तुनि और कीर्ति के एकमात्र पात्र, अपने समान फर्मरहिन केवल-शानी परमात्माओंके साथ बड़े हर्पसे रहने लगे ॥१२॥ थहदासः सभत्त्युल्लसितमवसितं भूधरे तत्र कृत्वा । कल्याणं तीर्थकर्तुः सुरकुलमहितःप्रापदाप्मीयलोकम् ॥ अहहासोऽयमित्यं जिनपतिचरित गौतमस्वाम्युपझं । गुम्फित्या काव्यवधं कविकुलमहितः प्रापदुच्चैः प्रमोदम्॥६३॥ अईदास इत्यादि। मुकुलमहिनः मुराणां युल सुरवुलं तेन महितः देवसमूहपूजितः। सः अहंदासः अर्हनो दासः तथोक्तः जिनदासो देवेंद्रः । तत्र तस्मिन् । भूधर संमेद- पर्वते । तीर्थस्तुः तीर्थस्य कर्ता तथोक्त तस्य नोर्थफरम्य । भन्क्युलसित भक्त्या उल्लसितं तथोक भक्तिविराजितं । असिन अत्यंत । कल्याण परिनिर्वाणकल्याणं । छत्वा विधाय। आत्मीयलोफ आत्मन अयमात्मीयः स चासौ लोकश्य नधोक्तस्तं । प्रापत् मागच्छत् आप्ल व्याप्ती लुङ् “सर्ति शास्ति' इत्यादिना अद। कविकुलमहिनः फयोना पुल कविकुलं तेन मदिनः द्वित्समूदपूजित.! अयं एषः । अहंदासः भईदास मोश्चय । गौतमस्थाम्युपक्ष गौतमश्चासौ स्वामी गौतमम्मी रोन उपशन्नथोकन्तत् गौतमस्यामिना प्रोक्त। जिन. पनिचरितं जिनानां पनिर्जिनपति: जिनपनेधग्निं रायोक्त' जिनेश्वरचरित । इत्थं अनन प्रकारेण । फाव्ययंध फर्भाव. सत्य वा कान्यं नम्य यंधस्तं फाव्यप्रबंध। गुंफित्वा गुंफन पूर्वक पूरचित्या। उधः भृशं । प्रमोदं परमसंनोरं । प्रापन अगमम् ॥३३॥ भा० अ०-देताओंसे पूजित तथा आईनगवान् के दास इन्द्रदेव उस सम्मेद पर्वतपर तोङ्कर भगवान मुनिनुमतनाथ पा मोक्ष पाल्याणका सम्पानगर सानन्द अपने स्यालोकको लोट आये तथा पनिगुन्द-पूजित भईइस फरिने भी गौतमम्यामी से परे गये धोजिनेन्द्र चरित्र को काव्यरूप में प्रतिकार घडी मार्ग प्रसन्नता प्रात को ॥६॥ धावन्कापथमभृते भययने सन्मार्गमेकं परम् । त्यक्त्वा श्रांततरभिगय कयमप्यासाद्य कालादमुम् ॥ सद्धर्मामृतमुद्धृतं जिनवचाक्षीरोदधेरादगत् । पाय पायमितश्रमः सुखपदं दासो भवाम्यहनः ॥६॥ धावमित्यादि। फापयने पुस्मिताः पन्धान धापया: "पथ्यसयोः" इति पादेशः मनप एथ्योऽन्" इत्यत्रय यापर्ध. मंनाः तथोनः मन्मिन् मिध्यामार्ग मुनिसुनतकाव्यम् । २२० तुणमार्गे घा संकोणे। भवयने भव एव वने भवयन नस्मिन् संसारकानने। पर केवल एक। सन्मार्ग संश्वासौ मार्गश्च सन्मार्गः तं रतत्रयमार्ग यद्वा सद्भिग्यते संसारसमु. दोत्तारणार्थमन्विष्यत इति सन्मार्ग आतागमादिमयाहं समीचीनमार्ग वा । त्यक्त्वा विमुच्य। चिराय पहुकालपर्यंत । धावन धावतीति धापन् । श्रांततरः अत्यंतमायस्थः । कालात् फाल. लग्धिवशात् । अ# इमं सन्मार्ग । कथमपि केन प्रकारेणापि । आसाद्य आसादनं पूर्व प्राप्य । जिनवचःक्षीरोदधैः जिनस्य ववस्तदेव क्षीरोदधिस्तथोक्तस्तस्मात् परमागमक्षीरस- मुद्रात् । उद्धृतं उध्रियतेस्म तथोक्तन्तत पुनस्तत् आनीतं । सुखपथं सुखस्य पन्थाः तथोक सुषस्थानं । सद्धर्मामृतं संश्यासी धर्मश्च सद्धर्मः स एवामृतं पुनस्तत् सद्धर्मसुधां । आदरात संतोपात् । पायं पायं पीत्या पीत्वा । “पूर्वाग्न प्रथमाभिक्ष्ण्ये खमुञ्" इति खमु प्रत्ययः। इतश्रमः एतिस्म इतः श्रमो यस्मात्सः विगतपरिधमः । अहंतः अहतीत्यईन तस्य अईत्परमदेवस्य । दासः भृत्यः । भवामि अस्मि । भू सत्तायां लट् ॥६४॥ भा० अ०-मित्थ्यालयमार्ग तया तुमसल मार्गमय संसाररूपी वन में चक्कर लगात हुआ रत्नभयरूपी मार्ग अथवा समीचीन मार्ग को छोड़कर बहुत काल तक भटकता हुआ अत्यन्त थक कर किसी प्रकार काललब्धि से इस सन्मार्ग को पाकर जिनेन्द्र रूपी क्षीर-समु. इसे उद्धृत की गयी कल्याण-मार्गमयी सद्धर्मसुधा को पी पीकर परिश्रम रहित होता हुआ मैं अहानगवान् का दास होता है ॥ ६ ॥ मिथ्यात्वकर्मपटलैश्विरमावृते मे युग्मे दृशो: कुपथयाननिदानभृते ॥ आशाधरोक्तिलसदजनसंप्रयोगैरच्छीकृतं पृथुलसत्पथमाश्रितोऽस्मि ॥६५॥ मिथ्यात्वेत्यादि । मिथ्यात्वकर्मपरलैः मिथ्याभाचो मिथ्यात्वं कर्माप्येव पटलानि तथोक्तानि मिथ्यात्वेन जातानि कर्मपटलानि तथोक्तानि तैः अतस्वश्रद्धान- जनितदर्शनीयतिमिरैः । विर बहुकालपर्यंत । आवृते निरुधे । कुपथयाननिदानभूते कुत्सितः पंथाः कुपथस्तस्य यानं तथोक्त कुपथयानन्तस्य निदानं तद्भवतिस्म तथोक्त तस्मिन् । मे मम तेमयावेकत्ये"इति मयादेशः । दशोः द्रुष्ट्योः। व्यवहारनिरवयसम्यक् वयोर्नयनयोश्च । युग्मे युगले। आशाधरोक्तिलसइंजनसंप्रयोगः आशावास्योकि आशाधरोक्तिः लस तदननं व लसदजन आशायरोक्तिरेव लसद्जन तथोक्त आशाधरोकिलसदंजनस्य संप्रयोगात्तः आशाधरसूषिवनविशिष्टांजनसम्याव्यापारः। अच्छीकृते प्रागनच्छमिदानीमच्छं क्रियतेस्म अच्छी कृतं तस्मिन् निर्मलोसने सति । अय संप्रति । पृथुसतत्पर्य संचासौ पंथाश्च सत्पथः परामः सर्ग... पृथुश्वासौ सत्पथश्व रसधासौ सत्पथश्च तथोक्त सुन्दमहाजनमार्गस्त। आश्रित. आधीयतेस्म आधित आसेवित । अस्मि भवामि । अस भुवि लट् ॥६५॥ भा० म०-मित्थ्यात्व कर्मसमूह से अत्यन्त आच्छन्न तथा कुमार्ग गमनकी कारण- मेरी दोनों आंखों के आशाधर सूरि की उतिरूप अच्छे अंजन के प्रयोगसे स्वच्छ होने. पर मैं ने जिनेन्द्र भगवान् के सत्पथ का आश्रय लिया ॥६५॥ इस्यहहासनकाव्यरक्षस्य टीकाया सुखयोधिन्या भगवद्भयमुकिवर्णनो नाम दशमस्सर्ग। ० इति

Shri Muni Suvrat Kavya

Author
Shastri,bhujvali
Title
Shri Muni Suvrat Kavya
File name
Shri Muni Suvrat Kavya
Text
OCR done
Citation
1929
Published
2012/08
Publisher
Aara.,nirmal Kumar Jain Jain Sidhant Bhawan
Language
Sanskrit
Pages
237
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312599
Barcode
99999990321370.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
3xNVfI1gvCF
Download PDF

Shri Muni Suvrat Kavya