Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Trikal-devvandan Vidhi Samayik Poshad Vidhi Sahit

Kochar Ratanchand · 2011/02

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२५४४४ • श्री दारापाप ना। त्रिकाल-देवचन्दन विधि मामापिस पापय विधि दि.. मंमा रतनन कोवर Y- FIFA काला , उपपुर te:- श्री जिनवाणी प्रचार मन्थमाला. we ar ... tart.ite:., M- दो शब्द पार सकेगा। इस हम कई ग्रन्थमाला की तरफ से "त्रिकाल देव वन्दन विधि सामायिक पौषध विधि सहित' नामक पुस्तक भाई श्री रतनचन्दजी कोचर द्वारा संग्रह की हुई प्रकाशित कर रहे हैं। इस पुस्तक में सामायिक पौषध देववन्दन इत्यादि करने की क्रिया पूर्ण रूप से लिखी गई है जिससे प्रत्येक सज्जन जिसको क्रिया विधि का सही ज्ञान नहीं हो सही तरीके से की आवश्यकता को दिन से अनुभव कर रहे थे, परन्तु कागज़ की कमी और सरकार द्वारा कागज पर नियंत्रण होने से पुस्तक का प्रकाशन नहीं हो सका। हमारा विचार इस पुस्तक की अधिक से अधिक कापिया छापने का था परन्तु अधिक सहयोग न मिलने से फिलहाल थोड़ी ही पुस्तकें छाप रहे है। परन्तु अगर इसकी उपयोगिता सिद्ध हुई तो दूसरा संस्करण जल्दी ही प्रकाशित कर देंगे। इस पुस्तक को संग्रह करने का श्रेय श्री भाई रतनचन्दजी कोचर को है। और इन्हीं के प्रसंग से ही श्रीमान् वाडीलाल जीवराज शाह पालनपुर निवासी ने अपना अमूल्य समय देकर पुस्तक की शुद्धि अशुद्धि ठीक की है तथा प्रस्तावना भी लिखी है जिसके लिये दोनों सज्जन हार्दिक धन्यवाद के पात्र हैं। साथ ही भाई ईश्वरलालजी जैन ने अपने "आनन्द प्रेस" में इसको छापने और उसके प्रूफ संशोधन इत्यादि में जो सहायता दी है उसके लिये हम करते है । हमें आशा है कि इस पुस्तक से सज्जनवृन्द लाभ उठाकर हमारे परिश्रम को सफल करेंगे। इस पुस्तक में शुद्धियों का पूर्ण ध्यान रखते हुए भी दृष्टि दोष से या प्रमादवश कोई भूल चूक रह गई हो उनको सुधार कर पढ़ने की कृपा करें। इति शुभम् । विनीत-- प्रवन्धक-श्री जिनवाणी प्रचार ग्रन्थमाला, जयपुर। उनकी सराहना --

-
ग्रन्थमाला" जयपुर
* प्रस्तावना
सर्वारिष्टप्रणाशाय, सर्वाभीष्टार्थदायिने ।
मौलब्धिनिवानाय, श्री गौतमस्वामिने नमः ।।
इस "त्रिकाल देवनन्दन रिधि-सामायिक पापध
विधि सहित" नाम की पुस्तिका "श्री निनगाणी प्रचार
की तरफ से प्रकाशित की जा रही है
यह पडे हर्प की पात है। जो व्यक्ति विधि विधान के
लिये रुचि तो रखता है लेकिन अनपठित होने के कारण
या सत्रों के विस्मृत होने के कारण क्रिया नहीं कर सकता
उसके लिये यह पुस्तक अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होगी,
इममे संदेह नहीं।
गुजरात सौराष्ट्र में ऐसी पुस्तकें गुजराती भाषा में
दी जाती है किन्तु वे गुजराती भापा भापियों के लिये
ही उपयोगी है लेकिन हिन्दी भाषा भापियों के लिये ऐसी
पुस्तिका की अत्यन्त भावश्यकता थी ये मी अन इम
"ग्रन्थमाला" की तरफ से प्रकाशित की हुई इस पुस्तिका
से पूर्ण हो जायगी।
आगे से तो इस जडवाद के जमाने मे धर्म क्रिया के
प्रति जो अभिरुचि होनी चाहिये वो कम होती जा रही
है। जो क्रिया कर रहे हैं वे क्रिया का मर्म विप कम
ममझते हैं। परिणाम यह होता है कि क्रिया रस-वृत्ति
ज्यादा देखने में नहीं आती। याज तो एकान्त ज्ञान को

ता० २० जुलाई सन १६४ ( २ ) मानने वाले या एकान्त क्रियाकांडी बहुत मिलते हैं लेकिन वास्तव में ज्ञान के साथ २ क्रिया होने से ही उद्धार है । महान पूर्वधर श्री मद् उमास्वातिवाचक "तत्वार्थ सूत्र" में फरमाते हैं कि- सम्यकदर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्गः- ज्ञान क्रियाभ्यां मोक्षः-जैसे समुद्र में तरने का ज्ञान तो है किन्तु हाथ पांव नहीं हिलाने से वह कभी पार उतर सकता है ? तात्पर्य कहने का यह है कि ज्ञान और क्रिया दोनों ही साथ में होने से ही प्रात्मोन्नति का जीव साधक बन सकता है। मेरा ख्याल है कि इस छोटीसी पुस्तिका के लिये ऐसी प्रस्तावना क्यों ? लेकिन जो लोग ज्ञान के प्रति एकान्त ध्यान रखते हैं उनके लिये प्रथम क्रिया रुचि होने की आव- श्यकता है और क्रिया रुचि होने के बाद जो विधि विधान से अनभिज्ञ हैं उनके लिये ऐसी पुस्तिका सहायतारूप होगी। ये किंचित बतलाने के लिये ज्यादा विवेचन किया गया है। मुझे यह प्रस्तावना लिखने का जो अवसर दिया गया है उसके लिये "श्री जिनवाणी प्रचार ग्रन्थमाला" और मेरे दीर्घकालीन मित्र भाई रतनचन्दजी कोचर का आभारी हूं। वि० सं० २००७ आसाद दूजा भवदीय- शुक्ल पंचमी गुरुवार वाडीलाल जीवराज शाह, पालनपुर (गुजरात).. .

- अनुक्रमणिका * १ रिपय मामायिक लेने की विवि मामायिक पारने की विधि पापर रिधि पाऊगा पोरिमी की विधि ५ है २१ २३ गुरु रदन ४१ ४७ ४६ ४६ दर दर्शन विधि पगलाण पाग्ने की विधि पापध में एगामण करने की विधि पीपध म पगार (मात्रा पा म्यटिल)-जाने की विधि ४८ मिर्फ रात्रि के चार पहर का पीपर लेने की रिति मुबह चार पहर स पापध लिया हो और- पीड पाठ पहर का पीपर लेने की विधि पिछले पहर को पडिलेपण करने की विधि मधारा पोरिसी पढाने की विधि घाट पहर के तथा गति के पापध पारने की सिरि ६५ दिन के चार पहर का पापच पाने की विधि देवपन्दन विधि मह निगाग गज्माप ६६ ( ४ ) पृष्ट ३५ ३५ ३५ ३५ ३५ ३५ ३६ ३८ ४१ पंक्ति ११ १२ १४ १५ १७ १८ २० १६ १६ W w in অন্তঃ समभल अतिरसाल अभिंतर धणीयु सभी पोख सिद्धाए धम्मतित्थियरे धम्मतित्थियरे अंतरंत मम पारेमि पारिश्र पारेमि पारिश्र काल पंचम विरोधी नीमा समभाल अतिहिरसाल अभ्यंतर धडीयु' सवि पोप सद्धाए धम्मतित्थयरे धम्मतित्थयरे अतरंत मह पारूं पायु पारूं पायु कवड पंचमी विराधी नियमा जिन ६४ ५ ६७ ४ ७ ६७ ६८ ६८ १० w ७३ ८७ १४ १ 80 ६१ १२ ८ जन M पंक्ति अशुद्ध जागाजीप जापजी १२ अाठम श्राठम ने ४८ 8 उलठ उलट ६८ २१ कभर करभ नचे नाचे १३ अमृतदश अप्लदश १०४ भल्ली मल्ली ४ सथारे संथाये ६ परिहरी परिहारी १०५ परिहरीण निसरीए १०५ १३ दमामा ददामा ५ विकसत निकमत १०७ सानिध्य मानिध्य १६ गल मंगल १०७ २१ सुरुम स्वरूप शुद्धि परम् के अलामा निम्न लिसी बातों को ध्यान मे रखें- १-आचार्य प्रमुख की स्थापना होने से नकार पचिदिय की स्थापना करने की जरूरत नहीं। -पोपध लेने की क्रिया म्हे होकर करनी चाहिये । ३-पदिलेहण में मुहपत्ति के ५० वोल, घरवला का १०, आसन का २५ पदोरे का १०, धोती फा-५ और शेप बसों का २५,

-
३ मायाशल्य, नियागाशल्य, मिथ्यात्वशत्य परिह।
डावे कंधे पर प्रतिलेग्यना करते:
२ क्रोध, मान परिहरु ।
और जीमणे कंधे परः-
२ माया, लोभ परिह।
फिर मुँहपति नाभि नीचे नहीं लेजानी जिनने चरवले से
प्रति लेग्वना करनी उसमें टावे घुटने परः-
३ पृथ्वीकाय, अपकाय, तेउकाय, की जयगा करु।
और जीमणं घुटने परः-
३ वाउकाय, वनस्पतिकाय, त्रसकाय की रक्षा करूं ।
साधू व श्रावक ५० बोल गिने और साधी २ श्राविका ३
लेश्या, ३ शल्य और ४ कपाय छोड़कर बाकी ४० योल गिने ।
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श्री वीतरागाय नम * त्रिकाल-देववन्दन विधि (सामायिक फौपछ विधि सहित) (अथ सामायिक लेने की विधि) श्रावक श्राविका सामायिक लेने मे पहि ने शुद्व वस्त्र पहन कर चौकी (बाजोठ) आदि उस स्थान पर पुस्तक जपमाला (नरकार- वाली) आदि रसर, जमीन पूजफर, प्रासन निवाकर, घरवला और मुहपत्ति लेकर बैठे। बैठ के बॉये हाथ में मुहपत्ति मुसरे आगे रखकर दाहिने हाथ को स्थापन किये हुए पुस्तक श्रादि की स्थापना के समुप करके नरकारमत्र पढ़ें। नमो मरिहवाण । नमो सिद्धाण । नमो पायरियाण। नमो उपज्झायाण । नमो लोए सब्साहणं । एसो पच नमुपारो। सयपायप्पणसणो । मंगलाण च सन्वेसि । पढम हवइ मंगलं ॥१॥ (ऐसे एक नवकार गिनफर) , ( २ ) पंचिंदियसंवरणो, तह नवविवंभचेरगुत्तिधरो । चउ- विहकसायमुक्को, इअ अट्ठारस गुणेहिं मंजुनो ॥१॥ पंच मह- व्ययजुत्तो पंचविहायारपालणसमत्यो । पंचममियो तिगुत्तो. छत्तीसगुणो गुरु मज्झ ॥२॥ (ऐसे पंचिंदिय कहे, यदि प्रथमसे उस स्थान पर आचार्य प्रमुख की स्थापना की हुई हो तो वहां पंचिदिय नहीं कहना। पीछे) इच्छामि खमालमणो ! बंदिर जावणिजाए निसीहि- आए मत्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदियह भगवन् ! इरियावहियं पडिक- मामि ! इच्छं इच्छामि पडिकमिऊ, इरियावहियाए, विरा- हणाए गमणागमणे पाणक्कमणे बीयकमणे हरियकमणे श्रोसा उत्तिंग पणग दग मट्टी मकडासंताणा संकमणे, जे मे जीवा विरहिया, एगिदिया, वेइंदिया, तेइंदिया, चउरि- दिया, पंबिंदिया, अभिहया, वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघडिया, परियाविया, किलामिया, उद्दविया, ठाणाश्रो ठाणं संकामिया, जीवियाग्रो ववरोविया तस्स मिच्छामि दुकडं। तस्स उत्तरीकरणेणं, पायच्छित्तकरणेणं, विसोहीकर- णेणं, विसल्लीकरणेणं, पावाणं कम्माणं निघायणट्ठाए, ठामि काउस्सग्गं । अन्नत्य ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, बंभाइएणं, उडएणं, वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, . , । जिण च सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं, मुहुमेहिं खेलमंचालेहि, सुहुमेहि दिद्विसंचालेहि, एमाइएहि आगारहिं अभग्गो अचिराहियो हुज्ज मे काउस्मग्गो । जार परिहताणं भगवंताणं, नमुका- रेणं न पारेमि तार काय ठाणेण मोणेण झाणेणं अप्पाणं गोसिरामि। (यहा एक लोगरस का या चार नवकार का काउस्सग्ग करना पीछे प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे लिसे अनुसार) लोगस्म उज्जोगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहते फित्तइस्स, चउनीस पि केली ॥११॥ उमभमजिन च वदे, संभवमभिणदणं च सुमडं च । पउमप्पहं सुपास, चंदप्पहं वदे ।।२।। मुनिहिं च पुप्फदतं, मीअल- सिस वासुपज्जं च । विमलमणां च जिण, धम्म सति च वटामि ॥३॥ कुयुअर च मलिं, वंदे मुणिसुव्वय नमि- जिण च ।। वदामि रिट्टनेमि, पास तह बद्धमाण च ॥४॥ एन मए अभियुमा, पियरयमला पहीणजरमरणा । चउ- चीस पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयतु ॥शा फित्तिय- वदिय-महिया, जे ए लोगस्म उत्तमा सिद्धा । पारुग्गलो. हिलाभ, समाहिवरमुत्तम दिंतु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइचेसु अहिय पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धि मम दिमंतु ॥७॥ (पीछे समासमण देना) - ,

( ४ )
इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिज्जाए निसीहि-
आए मत्थएण चंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् !
सामायिक मुहपत्ति पडिलेहुँ ? " इच्छं"
(ऐसे कहकर मुहपत्ति पडिलेहना । पीछे)
इच्छामि खमासमणो बंदिउं जावणिज्जाए निसीहि-
आए मत्थएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् !
सामायिक संदिसाहुं ?" इच्छ" । इच्छामि खमासमणो
वंदिउं जावणिज्जाए निसीहिआए मत्थएण चंदामि ॥
इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! सामायिक ठाउं ? "इच्छं"
(ऐसे कहकर दोनों हाथ जोडकर एक नवकार नीचे मुजव गिनना)
नमो अरिहंताएं । नमो सिद्धाणं । नमो आयरि-
याणं । नमो उवज्झायाणं । नमो लोए सव्यसाहूणं ।
एसो पंच नमुक्कारो । सव्व पावप्पणासणो । मंगलाणं च
सब्वेसिं । पढम हवइ मंगलं ।।
[पीछे 'इच्छकारी भगवन् पसाय करी सामायिक दंडक उच्चरावोजी
ऐसे बोलकर 'करेमि भंते' स्वयं उश्चरे यदि गुरु या वडील हो तो
वे उच्चरावै]
करेमि भंते ! सामाइयं, सावज्जं जोगं पचक्खामि । जाव
नियमं पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए
कारणं न करेमि न कारवेमि तस्स भंते ! पडिकमामि
निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।।
.

( ५ ) [पीछे] इच्छामि समाममणो चंदिउं जावाणिज्जाए निसीहि- माए मत्थएण चंदामि ॥ इच्छाकारेण सदिसह भगवन् बेसणे सदिसाहु ? "इच्छ" इच्छामि समासमणो वंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए मत्थएण वंदामि ।। इच्छाकारेण सदिसह भगवन् बेसणे ठाउं ? "इच्छं" इच्छामि समास- मणो वदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए मत्थएण चंदामि ।। इन्छाकारेण सदिसह भगवन् सज्झाय संदिसाहु ? "इच्छ" इच्छामि समासमणो चंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए मत्थएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सज्झाय करु ? "इच्छं" [ऐसे कहकर दोनों हाथ जोडकर तीन नवकार गुणना] ॥ इति सामायिक लेनेकी विधि सपूर्ण । सामायिक लेने के बाद स्वाध्याय तथा नवकारवाली स्तवन श्रादि में समय व्यतीत करे, अथवा प्रतिक्रमण करे । ४८ मिनिट पूर्ण होने के बाद सामायिक पारे। - * अथ सामायिक पारने की विधि* इच्छामि समासमणो वंदिउं जागणिज्जाए निसीहि- आए मत्थएण वदामि ॥

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, फित्तइस्म, चउनीस पि केली ॥१॥ उपभमजिन च वदे, समयमभिणदण च सुमउंच । पउमामह सुपास, जिण व चंदप्पह पद ॥२ ।। सुरिहि च पुप्फदत, मीअलसिज्जंस- वामुपुज्ज च । पिमलमण। च जिण धम्म सति च वदामि ॥३॥कुंअरं च मल्लिं, पदे मुणिसुब्धय नमिजिण च । नदामि रिट्टनेमि, पास तह बद्धमाण च ॥ ४ ॥ एर मए अभियुना, निहुयरयमला पहीणजरमरणा । चउरीमं पि निणरा, तित्थपरा मे पमीयतु ॥ ५ ॥ कित्तिय पदिय महिया, जे ए लोगस्म उत्तमा मिद्वा । पारुग्गनोहिलाभ, समाहिवरमुत्तम दितु ॥६॥ चंदेमु निम्मलपरा, थाइच्चेसु अहियापनासमग्राम.गरमागभीरा, सिद्धा सिदि मम दिमतु ॥ ७ ॥ इच्छामि समासमणो नदिउ जारणिनाए निमीहिसाए मत्थएण वदामि ॥ इच्छाकारेण सदिसः भगवन् मुहपत्ति पडिलहुँ ? (ऐमे कहकर मुहपत्ति पडिलहना-पीछे ग्यमासमण देना-) ४च्छामि समाममणो वदिउं जाणिज्नाए निमीहियाए मत्थएण चंदामि || इच्छाकारेण संदिसड भगन् मामापियं पारेमि ? 'यथाशक्ति' इच्छामि समासमणो पदिउ जाणिज्जाए निमीहिनाए ( ८ ) मत्थएण वंदामि ।। इच्छाकारेण संदियह भगवन् ! मामायि ग्रं पारियं ' तहत्ति' (ऐसे कहकर दाहिने हाथको चरवले या आसन पर रखकर मस्तक झुकाकर एक नवकार मंत्र पढकर 'सामायिअवयजुत्तो' सूत्र पढे )- नमो अरिहंताणं । नमो सिद्धाणं । नमो आयरियाणं । नमो उवझायाणं । नमो लोए सब साहणं । एसो पंच नमुक्कारो । सब पावप्पणासणो । मंगलाणं च सन्चेनि । पढनं हवइ मंगलं ॥ सामायिअवयजु तो, जाव मणे होई नियमसंजुत्तो। छिन्नइ असुई कम्म, सामाइअजत्तिा वारा ॥१॥ सामाइ- अंमि उ कए, सनको इव सावो हवइ जम्हा । एएण कारणणं बहुसो सामाइयं कुज्जा ॥२॥ मैंने सामयिक विधिसे लिया, विधिसे पूर्ण किया, विधिमें जो कोई अविधि हुई हो तो मिच्छामि दुकडं । दस मनके, दस वचन के, बारह काया के ये कुल बत्तीस दोपोंमें से कोई दोष लगा हो तो मिच्छामि दुकडं । ।। इति सामायिक पारनेकी विधि समाप्ता।

(पौपधा जो श्राविक भाविका पौपर करना चाहे उनको सुबह राई प्रतिक्रमण करना चाहिये, पौषध करने में इस प्रकार वस्त्रादि उपफरण होने चाहिये -मुहपति, चरवला, उनी आमन, शुद्ध धोती, उनरासन, माना के लिये जाते समय पहनने की धोती, नायः साफ करने का रूमाल या पेडिया, सिर व पदन पर प्रोदने के लिये कम्बल, सथारियासोने के लिये, डडासण, गरम पानी, या चूना पाना में डालने के लिए, मोते वक्त दोना कानों के छेना में जीव जन्तु की यानना के लिए कु इल यानी रुई केनोफो। श्रार प्राविका पौषध लेने मे पहिले शुद्ध वस्त्र पहन कर चौरी (मानोठ) श्रादि उस स्थान पर पुस्तक जपमाला (नवकार- पाली) आदि रपर, जमीन पूजार, श्रासन निछाकर, चरवला और मुहपत्ति लेकर बैठे । बैठ के बॉये हाथ में मुहपत्ति मुसरे आगे रग्यपर दाहिने हाथ को स्थापन क्येि हुए पुस्तक प्रानि की ममुप कर नवकारमन पढ़ें। नमो मरिहताणं । नमो सिद्धाय । नमो थायरियाण। नमो उज्झायाण । नमो लोग मत्रमाण । यो पर नमुपागे । मयपारप्पणामणो । मगलाण च ममि । पटम इस मगल ॥१॥ (मे एर नपार गिनकर) । स्थापना के ( १० ) पंचिंदियसंचरणो, नह नबबिहबंभचेरगुनिधरी । चउ- विहकमायमुक्को, इअ अवारम गुणेहि मंजुनो ॥१॥ पंच मह- ब्लयजुत्तो पंचविहायारपालणसमत्थो । पंचसमियो तिगुनो, छत्तीसगुणो गुरु मज्झ ॥२॥ (ऐसे पंचिंदिय कहे, यदि प्रथमले उस स्थान पर आचार्य प्रमुख की स्थापना की हुई हो तो वहां पंचिदिय नहीं कहना। पीछ) इच्छामि खमालमणो ! चंदिरं जावणिजाए निसीहि- आए मत्थएण चंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! इरियावहियं पडिक्क- मामि ! इच्छं इच्छामि पडिक्कमिऊ, इरियावहियाए, विग- हणाए गमणागमणे पाणकमणे बीयकमणे हरियक्कमणे ओसा उत्तिंग पणग दग मट्टी मकडामंताणा संकमणे, जे मे जीवा चिराहिया, एगिदिया, बेइदिया, तेइंदिया, चउरि- दिया, पंचिंदिया, अभिहया, बत्तिया, लेसिया, संघाड्या, संघट्टिया, परियाविया, किलामिया, उद्दत्रिया, ठाणाम्रो ठाणं संकामिया, जीवियाओ चवरोविया तस्स मिच्छामि दुकडं। तस्स उत्तरीकरणेणं, पायच्छित्तकरणणं, विसोहीकर- गणं, विसल्लीकरणेणं, पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए, ठामि काउस्तग्गं। अन्नत्य ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं, उड्डएणं, वायनिसग्गेणं, ममलिए पित्तमुच्छाए, - . ( ११ ) सुहुमेहि अगसचालेहि, सुहुमेहि खेलमंचालेहि, सुहमेहि विद्विमचालेहि, एमाडएहिं आगारेहिं अभग्गो अरिगहिओ हुज्ज मे काउम्सग्गो । जार अरिहताण भगताण, नमुक्का- रेण न पारेमि तार काय ठाणेण मोणेण झाणेण अप्पारण योसिरामि। (यहा एक लोगस्स का या चार नरकार का काउस्सग्ग करना पीछे प्रगद लोगस्स कहना, वह नीचे लिगे अनुसार) लोगस्म उज्जोग्रागरे, धम्मतिस्थयरे जिणे । अरिहते फित्तडस, चउनीस पि केवली ||१|| उमभमजिय च दे, समवमभिणदण च सुमड च । पउमप्पह सुपासं, जिणं च चदप्पह पद ||२| सुविहिं च पुष्फटत, सीअल-सिज्जम वामुपुज्ज च । निमलमणत च जिण, धम्न सति च चढामि ॥३॥ कुयु अरं च मल्लि, दे मुणिसुव्यय नमि- जिण च ॥ उदामि रिटुनेमि, पाम तह बढमाण च ॥धा एवं मए अभियुया, नित्यरयमला पहीणजरमरणा । चल- पीस पि जिणपरा, तित्थयरा मे पमीयतु ॥शा फित्तिय- दिय-महिया, जे ए लोगस्य उत्तमा मिद्धा । पारगतो- हिलाभ, समाहिवरमुत्तम दितु ॥६॥ चढेसु निम्मलयरा, पाडच्चेसु अहिय पयाययग । मागरमग्गभीरा, सिद्धा मिद्धि मम दिमतु ||७|| (पीछे यमासमा दना)

( १२ )
इच्छामि खमासमणो चंदिउंजावणिज्जाए निमीहिआए
मत्थएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! पोपध
मुहपत्ति पडिलहुँ ? इच्छं"
(ऐसे कहकर मुहपत्ति पडिलेहना-पीछ समासमण दना-)
इच्छामि खमाममणो वंदिरं जावणिज्जाए निसीहियाए
मत्थएण बंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् पोपध
संदिसाहुँ ? "इच्छं" इच्छामि खमासमणो बंदिउं जावणि-
ज्जाए निसीहिआए मत्थएण बंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिग्रह
भगवन् ! पौफ्ध ठाऊ "इच्छं"
ऐसा कहकर दोनों हाथ जोड़कर एक नवकार नीचे मुजब गिनना ।
नमो अरिहंताणं । नमो सिद्धाणं । नमो आयरियाणं ।
नमो उवज्झायाणं । नमो लोए सब साहणं । एसो पंच
नमुक्कारो । सब्च पावप्पणामणो । मंगलाणं च सव्वेसि ।
पढमं हवइ मंगलं ॥
[पीछे 'इच्छकारी भगवन् पसाय करी पौषध दंडक उच्चरावोजी
ऐसे वोलकर निम्न पोसह दंडक स्वयं उमरे यदि गुरु या वडील
हो तो वे उच्चरावै]
'करेमि भंते ! पोसहं, आहार-पोसह देसो सव्यो,
सरीरसकार-पोसहं सबनो, बंभचेर-पोसहं सव्वो, अव्या-
वार-पोसहं सब्बो, चउबिहे पोसहे ठामि । जावदिवसं?
१ सिर्फ दिनका पौषध करना हो तो 'जावदिवसं" दिन रात.
का करना हो तो 'जाव अहोरत्तं' और सिर्फ रातका करना हो तो
'जावसेसदिवस अहोरत्तं' कहना चाहिये।
+-

( १३ )
पज्जुवामामि दुनिहं तिरिहण, मणेण वायाए कायेणं न
करेमि, न कारवैमि । तस्स भते ! परिकमामि, निंदामि,
गरिहामि अप्पाण वोसिरामि ॥१॥"
इच्छामि समाममणो वंटिउ जागणिज्जाए निसीहि-
आए मत्थएण बटामि || इच्छाकारेण मदिसह भगवन् !
सामायिक मुहपत्ति पडिलेहु ? " इच्छं"
(ऐसे कहकर मुहपत्ति पडिलेहना। पीछे)
इच्छामि खमाममणो दिउ जावणिज्जाए निमीहि-
माए मत्थएण वढामि ।। इच्छाकारेण मदिमह भगनन् ।
सामायिक सदिसाहु १"इच्छ" । इच्छामि समासमणो
वदिउं जागणिज्जाए निमीहिआए मत्थएण बढामि ॥
इन्द्राकारेण सदिसह भगवन् ! सामायिक ठाउ ? "इच्छं"
(ऐसे कहकर दोनों हाथ जोडकर एक नरकार नीचे मुजब गिनना)
नमो मरिहताए । नमो सिद्धाण । नमो यायरि-
याण । नमो उमझायाण | नमो लोए सञ्चसाहरण ।
एमो पच नमुकारो । सर पापप्पणामणो । मगलाण च
सम्वेमि । पढम हड मगलं ।।
[पीछे 'इच्छकारी भगवन पमाय फ्रीमामायिक दटा भरागोजी
मे बोलकर 'करमि भते' म्वय उभर यदि गुरु या पडील हो तो
चे उमरा]

. ( १४ ) करेमि भंते ! सामाइयं, मावज्जं जोगं पचक्यामि । जाव पोमहं पज्जुवामामि, दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि तस्य भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोमिरामि ।। [पीछे] इच्छामि खमासमणो चंदिउं जावणिज्जाए निमीहि- आए मत्थएण चंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिगह भगवन् वेसणे संदिमाई ? "इच्छ" इच्छामि खमासमणो बंदिङ जावणिज्जाए निसीहियाए मत्थएण बंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् वेसणे टांउं ? "इच्छं" इच्छामि खमाम- मणो बंदिडं जावणिज्जाए निमीहियाए मत्थएण बंदामि।। इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सज्झाय संदिमाहुं ? "इच्छं" इच्छामि खमासमणो बंदिउँ जावणिज्जाए निसीहिआए मत्थएण बंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सज्झाय करं ? "इच्छं" [ऐसे कहकर दोनों हाथ जोडकर तीन नवकार गुणना] इच्छामि खमाममणो वंदिउं जावणिज्जाए निसीहिआए मत्थएण वदामि ।। इच्छाकारेण सदिसह भगवन् ! बहुवेलंक यदि पौपध मे राई प्रतिक्रमण करे तो अढाईजेसु सूत्र पढने के पूर्व दो खमासमण देकर बहुवेलं संदिसाहूं और बहुवेलं करेसि, • का आदेश ले।

- मदिमा १ "न्छ" इन्छामि समाममणो दिउ जाणि- ज्जाए निमीहियाए मत्थएण वदामि || इच्छा कारण मटिमह भगवन ! बहुवेल कमि ? "इच्छ" इच्छामि समाममणो नदिउजापणिज्जाए निमीहिसाए मस्थएण पदामि ।। इन्छा कारण मटिमह भगान पडिलेहण करू ? "च्छ" पीछे मुहपत्ति, चरवला, प्रासन, कदोरा, (सूत की त्रागडी) और धोती, ये पाच चीजे पडिलहे । पीछे पडिलहनाको हुई धोती पहिन ले ओर उसरे नार- पुन यमाममग का हुन्धाकारेण मदिमह भगवन् ! इरियारहिय पडिव- मामि इच्छ । इन्छामि पडिकमिउ, इग्यिापहियाए पिराह- णाए । गमणागमणे, पाणधमणे, नीयकमणे, हरियकमणे, श्रोसा उत्तिंग-पणग-ग-मट्टी-मवडामताणा सक्रमणे, जे मे जीना निराहिया एगिढिया बेदिया, तेदिया, चउरि- दिया, पचिंदिया, अभिहया पत्तिया, लेमिया, मघाच्या, सघट्टिया, पग्यिापिया, फ्लिामिया, उद्दपिया, ठाणामोठाण मंकामिया, जीपियानो वनगेपिया तस्म मिन्छामि दुवड तम्म उत्तरीकरणेण, पायच्छित्तकरणेण निमोहिकरणेण, निमल्लीकररोण, पापाण कम्माण निग्यायणट्टाए, ठामि काउम्मग। . -

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( १६ )
अन्नत्य ऊमसिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं,
जंभाइएणं, उड्डएणं, वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए,
सुहुमेहिं अंगसंचालहिं, सुहुमेहिं खेलसंचालेहि, सुहुमेहि
दिट्ठिसंचालेहि, एवमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहियो
हुज्ज मे काउस्सग्गो । जाब अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्का-
रेणं न पारेमि ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं
चोसिरामि।
(यहां एक लोगस्स का या चार नवकार का काउस्सग करना
पीछे प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे लिखे अनुसार)
लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते
कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१।। उसभमजिअं च बंद,
संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमप्पहं सुपासं, जिणं च
चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल-सिज्जंस
वासुपुज्जं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्म संति च
वंदामि ॥शा कुंधु अरं च मल्लिं, बंदे मुणिसुव्वयं नमि-
जिण च ॥ वंदामि रिट्टनेमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥४||
एवं मए अभिथुआ, बिहुयरयमला पहीणजरमरणा । चउ-
वीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥॥ कित्तिय-
बंदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धां । आरुग्गवो-
हिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा,
आइच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धि
मम दिसंतु ॥७॥

1 (पीछे समासमण देना) इच्छामि समाममणो नदिउ नारणिज्जा निमीहिआए मत्यएण वदामि ।। इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! पमाय करी पडिलेहणा पडिलेहामोजी?"इन्छ" ऐसा कहकर ब्रह्मचर्य व्रतधारी किमी पडे के उत्तरासन की पडिलेहना करे। पीछे इच्छामि समाममणो नदिउ जागणिज्जाए निमीहि- आए मत्थएण वदामि ॥ इच्छाकारेण संदिमह भगवन् ! उपधि मुहपत्ति पडिले? ? "हुन्छ" (ऐसे कहकर मुहपत्ति पडिलेहना । पीछे) इच्छामि समाममणो नदिउ जारणिज्जाए निसीहि- पाए मत्थएण वदामि ॥ इच्छाकारण मदिसह भगवन् ! उपधि सदिमाहुँ ? "इच्छ" । इच्छामि समासमणो वदिउ जापणिज्जाए निसीहिसाए मत्थएण पदामि ।। इच्छाकारण सदिसह भगवन् ! उपधि पडिलेहुँ ? "इच्छ" कहकर प्रथम पडिलेहन से बाकी रहे हुए उत्तरासन (टुपट्टा। माना (पेशान) करने जानेका वस्त्र और रात्रि-पौषध करना हो तो सथारिया, कम्बल वगैरह वस्त्र पडिलहे । पीछे डडामा लेकर पडिलहण करके फिर- इच्छामि यमासमणो । यदिउ जारणिलाए निमीहि- आए मत्थएण पदामि।

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( २० )
णाए । गमणागमणे, पाणकमणे, बीयकमणे, हरियक्कमणे,
ओसा उतिंग-पणग-दग-मट्टी-मक्कडासंताणा संकमणे, जे
मे जीवा विराहिया एगिदिया बेइंदिया, तेइंदिया, चरि-
दिया, पचिदिया, अभिहया वत्तिया, लेसिया, संघाइया,
संघट्टिया, परियाविया, किलामिया, उदविया, ठाणाअोठाणं
संकामिया, जीवियानो ववरोविया तस्म मिच्छामि दुकडं ।
तस्स उत्तरीकरणेण, पायच्छित्तकरणेण विमोहिकरणेणं,
विमल्लीकरणेणं, पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए, ठामि
काउस्सगं ॥
अन्नत्य ऊमसिएणं, नीमसिएणं, खासिएणं, छीएणं,
जंभाइएणं, उएणं, वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए,
सुहुमेहिं अंगसंचालेहि, सुहुमेहिं खेलसंचालहिं, सुहुमेहि
दिविसंचालहिं, एवमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहियो
हुज्ज मे काउस्सग्गो । जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्का-
रेणं न पारेमि ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं
वोसिरामि।
(यहां एक लोगस्स का या चार नवकार का काउस्सग्ग करना
पीछे प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे लिखे अनुसार)
लोगस्त उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे | अरिहते
कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥शा उसममजिनं च बंद,
संभवमभिणंदमं च सुमई च । पउमप्पहं सुपामं, जिणं च

, - ( २१ ) चटप्पहं वद ॥२॥ सुनिहिं च पुष्फदत, सीप्रल-सिजस वामुपुजं च । विमलमणतं च जिण, धम्म संति च दामि ।।३।। कुयु याच मल्लिं, रदे मुणिसुव्यय नमि- जिण च ।। पदामि रिहनेमि, पास तह बढमाण च ॥४॥ गवं मए अभियुया, पियरयमला पहीणजरमरणा । च3- नीम पि जिणारा, तित्थयरा मे पनीयंतु |शा फित्तिप- अदिय-महिया, जे ए लोगस्म उत्तमा सिद्वा । आरुग्गयो- हिलाभ, समाहिवरमुत्तम दितु ॥६॥ चढेसु निम्मलयरा, याचेसु अयि पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिहा सिद्धि मम दिसतु ॥७॥ गान में लीन जगह "अणुजाण जस्पुगाहो" कह काजा परताना (दातना) और "योसिरे" तीन हफे यह फिर पहिल की जगह आर सपा का देव यदन करनामो इसी पुस्तक में है। वा म जब वह घडी दिन चढे वर पण पोरिसी पड़े। पऊण-पोरिसी की निधि इच्छामि समाममणो प्रदिउ जागणिज्जाए निसीहिपाए मत्थएण पदामि ॥इन्छ।कारण सदिसह भगवन रहुपडि- पुरणा पोरिमी ? उन्छ इच्छामि समासमणो नदिउ जावणिज्जाए निसीहि- पाए मत्थएण वदामि ॥ इच्छासारंग मदिसह भगमन् । इग्यिावहिय पडिकमामि इच्छ। इच्छामि पदिवामिऊं, , - - (२४ ) हणाए गमणागमणे पाणक.मण चीयकमणे हरियकमणे अोसा उत्तिंग पणग दग मट्टी मकडासंताणा संकमणे, जे मे जीवा विराहिया, एगिदिया, वेइंदिया, तेइंदिया, चउरि- दिया, पंचिंदिया, अमिहया, बनिया, लेसिया, संघाड्या, संघट्टिया, परियाविया, किलामिया, उद्दविया, टाणायो ठाणं संकामिया, जीवियायो ववरोविया तस्स मिच्छामि दुक्कडं । तस्स उत्तरीकरणेणं, पायच्छित्तकरणेणं, विसाहीकर- गणं, विसल्लीकरणेणं, पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए, ठामि काउस्सग्गं । अन्नत्थ ऊससिएणं, नीससिएणं, खासएणं, छीएणं, जंभाइएणं उड्डुएणं, वायनिसग्गेणं, भमलिए, पित्तमुच्छाए, सुहुमेहिं अंगमंचालहिं सुहुमेहि खेलमंचालेहि, सुहुमेहि दिट्ठी संचालहिं, एवमाइएहि आगारहिं अभग्गो अविराहियो हुज्ज मे काउस्सग्गो । जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमु- कारेणं न पारेमि, तार कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणणं अप्पाणं वोसिरामि । [एक लोगस्स या चार नवकार का काउस्सग्ग करना. काउ- स्सग्ग पारके प्रगट लोगस्स कहना] लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतिथियरे जिणे । अरिहंते कित्तइस्सं, चउनीसं पि केवली ॥१॥ उमभमजिअं च वंदे, संभवममिणंदणं च सुमई च । पउमप्पहं सुपामं, जिणं च ( २५ ) चंदप्पहं नंदे ॥२॥ सुनिहिं च पुष्पदंतं, मीअल-सिज्जम नासुपुज्ज च । विमलमणत च जिणं, धम्म संति च चंदामि ॥३॥ कुयुअर च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्ययं नमि- जिणं च ।। पदामि रिट्टनेमि, पाम तह पद्माण च ||४|| एव मए अभियुया, पियरयमला पहीणजरमग्णा। चउ- चीस पिजिणारा, तिथपरा मे पमीयतु ||शा फित्तिय- चदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्गयो- हिलाभ, समाहिवरमुत्तम दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, प्राडच्चेसु अहिय पपासपरा । मागरवरगभीरा, मिदा मिति मम दिमतु ॥७॥ इन्चामि समाममणो मंदिउ जाणिज्जाए निमीहि- श्राए मत्थएण बटामि ॥ इच्छाकारेण सदिमह भगवन् ! राइ मुहपनि पटिलेहुँ ? "इन्छ" (मुहपत्ति पडिलेहकर नीचे मुजर द्वादशावर्त बन्ना दरे) सुगुरुलटना सूत्र हुन्छामि समाममणो दिउ जारणिज्जाए निमीहि- आए अणुजाणह मे मिउग्गह निमीहि, अहोकाय काय- सफास, समणिज्जो मे फिलामो अप्पफिलताण नहुसुमेण भे रायपहातो ? जत्ता भे ? जाणिच्नं च भे? सामेमि समासमणो राहन वहम्म, श्रापस्मिनाए पउिवमामि, समासमणाण, गट्याए अामायणाए, तिनीमभ्यराए, ज

( २६ )
किंचि मिच्छाए मणदुकडाए वयदुक्कडाए काय दुक्कडाए
कोहाए माणाए मायाए, लोभाए, सव्यकालिबाए सव्य
मिच्छोवयाराए सव्ध धम्माइक्कमणाए प्रासायणाए जो में
अइयारो को तस्स खमासमणो ! पडिक्कमामि निंदामि
गरिहामि अप्पाणं चोमिरामि ॥ (फिर)
इच्छामि खमासमणो ! बंदिर जावणिज्जाए निमीहि-
आए । अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि, अहोकायं
कायसंफासं खमणिज्जो मे किलामो अप्पकिलंताणं बहु-
सुभेण भे, राइअबड़कतो ? जत्ता मे जबणिज्जं च मे खामेमि
खमासमणो राइझं बड़कम्म पडिकमामि खमासन गाणं,
राइआए अासायणाए तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए
मणदुक्कडाए बयदुक्कडाए कायदुकडाए कोहाए माणाए
मायाए लोभाए सब्बकालिआए सब मिच्छोश्याराए मध
धम्माइक्कमणाए अासायणाए जो मे अड्यारो को तस्स
खमासमणो ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं
वोसिरामि ।।
इच्छाकारेण संदिसह भगवन् राइग्रंथालोउं ? 'इच्छ
पालोएमि । जो मे राइनो अइआरोको, काइनो बाइयो
माणसियो उस्तुत्तो उम्मग्गो अकप्यो अकरणिज्जो
दुझाओ दुविचिंतित्रो अणायारो अणिच्छिअब्चो
असावगपाउन्गो नाणे दसणे चरित्ताचरित्तै सुए सामाइए।

(७ ) तिएहं गुत्तीणं, चउएहं कमायाणं पचराहमणुपयाण, तिरहं गुणव्ययाण, चउएह मिक्सापयाण पारसविहस्स मागधम्मस्म में सडिग्नं ज विगहिरं तस्म मिन्छामि सम्बस्सवि राड य दुच्चितिन दुब्भासिन दुच्चिट्ठिय, इन्छाकारेण मदिमह भगउन् । "इच्छ" तम्स मिन्छामि दुवड ॥ (पन्यास आदि पदस्थ हो तो उपर मुजन दो न्फे वादणा देना और पदस्थ न हो तो एक समासमण देकर) इच्छामि समासमणो नदिउ जागणिज्जाए निसीहियाए मत्यएण पदामि । "इच्छकारि मुहराड मुसतप शरीर निरापराध मुरासयम यात्रा निहते होजी । सामी माता हजी भात पाणी का लाभ देनाजी ।" इच्छामि समागमणो ! प्रदिउ जागणिजाए निमीहि- श्राए मत्थएण वदामि ॥ ग्यमासमण देकर सडा होये और दोनों हाथ जोडकर- इच्छाकारेण संदिमह भगन् । अमुट्ठियोमि अभि- तर राहय खामेउ ? "इच्छ साममि राज्य" किंचि अपत्तियं, परपत्तिय भत्तं पाणे पिणए वैयारचे श्रालावे ध्यारा बजे पीछे जहा "राइय" बोरना लिया है वहा "देवसि" योलना! - - - ( ३० ) सूरे उग्गए, अभत्तई परवाइ । तिविहपि आहार- असणं, खाइम, साइमंः अन्नन्थणाभोगेणं, सहमागारेणं, पारिट्ठावणियागारेणं, महत्तरागारणं, सब्बसमाहिवत्तियां- गारेणं । पाणहार पोरिसिं, साढपोरिसिं, मुंडिसहिग्रं पचक्खाइ; अन्नत्थणाभोगेणं, सहसागारेणं, पच्छन्नकालेणं, दिसामोहेणं, साहुवयणेणं, महत्तरागारेणं, सव्वसमाहिवत्ति- यागारेणं पाणस्स लेवेण वा, अलेवेण वा, अच्छेण वा, बहुलेवेण वा, ससित्थेण वा, अमित्येण वा वोसिरह । चउबिहार उपवास-पचक्खाण सूरे उग्गए अमत्तटुं पञ्चक्खाइ । चउबिहापि आहार- असणं, पाणं, खाइम, साइमं; अन्नत्थणाभोगेणं, सहसा- गारेणं, पारिद्वावणियागारेणं, महत्तरागारेणं सचममाहि- वत्तियागारेणं वोसिरह । *देव दर्शन विधि* पौषध लेने के पीछे श्री जिन मन्दिरजी में दर्शन करने को जरूर जाना चाहिये । इस वास्ते आसन को दायें कंधे पर रखना, उत्तरासण करना, चरवला दायीं वगल में और मुहपत्ति दाहिने हाथ में रखना, काल का वक्त हो तो कमली ओढ़ना, और उपाश्रय (पौषधशाला) में से निकलते हुए तीनदार "आवस्सहि" कहके मौन पने इरियासमिति (जीवजंतु) देखते हुए श्री जिन मन्दिरजी मे जावे । वहां तीन वार "निसीहि" कह करके। मूल नायकजी के सम्मुख होकर दूर से प्रणाम करके तीन प्रद- क्षिणा देवे ! पीछे रंग मंडप मे प्रवेश कर दर्शन, स्तुति करे- - -- . * दर्शन स्तुति * दर्शन देव देवस्य, दर्शन पापनाशनम् । दर्शनं स्वर्ग सोपानं, दर्शन मोक्षमाधनम् ।।१।। दर्शनाद् दुरितधमी, वन्दनाद् पाञ्छितप्रद । पूजनात् पूरक श्रीणा, जिन सानान् मुरहमः ॥२॥ निजग नायक तु वणी, मही महोटो महाराज, महोटे पुण्ये पामियो, तुम दरिमण हुँ अाज ||३|| श्राज मनोग्थ मपि फल्या, प्राया पुण्यरुखोल, पाप कर्म दूरे टल्या, नाठा दु.स ढदोल ॥४॥ ज्ञानापरणीय क्षय करी, दर्शनावरणीय कर्म, चंदनीय कर्म दूरे करी, टान्यु मोहनीय कर्म ॥५॥ इन्द्रामिप्यमायमणो हिउजारणिन्ना निमीहिलाए मत्यएण बंदामि। इच्छाकारेण मदिमह भगवन् ! हरियारहिय पडिक- मामि ! इन्छ इच्छामि पडिमिऊ, इरियानहियाए, निराइ- णाए । गमणागमणे, पाणपमणे, पीयपमणे, हरियमणे, श्रोमा उत्तिंग-पग-टग-मट्टी-मवडामाणा मकमणे, जे मे जीना निराहिया एगिटिया रेडटिया, ते दिया, चरि- दिया, पचिंदिया, अभिहया पत्तिया, लेमिया, मघाइया, सघट्टिपा, परियारिया, स्लिामिपा, उनिया, टाणामोठाण ममामिपा, जीरियायो परीविया तस्स मिन्ठामि दुवड । - . , ( ३२ ) तस्स उत्तरीकरणेणं, पायच्छित्तकरणणं विसोहिकरणेणं, विसल्लीकरणेणं, पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए, ठामि काउस्सरगं॥ अन्नत्य उससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं, उहुएणं, बायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेहिं अंगसंचालेहि, सुहुमेहिं खेलसंचालहिं, सुहुमेहिं दिद्विसंचालेहि, एवमाइएहि श्रागारहिं अभग्गो अविराहियो हुन्ज मे काउस्सग्गो । जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्का- रेणं न पारेमि ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं चोसिरामि । (यहां एक लोगस्स का य चार नवकार का काउस्सग्ग करना पीछे प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे लिखे अनुसार) लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतिथियरे जिणे । अरिहते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१॥ उसभमजिरं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं बंदे ॥२॥ सुविहिं च पुष्पदंतं, सीअल-सिज्जंस वासुपुज्जं च । विमलमणंतं च जिणं, धर्म संति च चंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मल्लिं, चंदे मुणिसुब्बयं नमि- जिणं च ॥ वंदामि रट्टनेमि, पासं तह बद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए अभिधुश्रा, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चउ- वीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥५॥ कित्तिय- , चंदिय-महिया, जे ए लोगम्स उत्तमा सिदा । आरुगगो- हिलाभ, ममाहिवरमुत्तमं दितु ॥६॥ चटेमु निम्मलपरा, पाइञ्चेमु अहिय पयासयरा । सागरवरगभीरा, सिद्धा सिद्धि मम दिसंतु ॥७॥ हुच्छामि समाममणो नंदिउ जागणिज्जाए निसीहि- याए मत्थएण वदामि ।। ( इस प्रकार तीन ग्रमाममण देकर) इन्छाकारेण सदिसह भगान् । चैत्यपदन रु ? "इच्छ" सफलकुशलगल्लि, पुष्करावर्तमेघो ॥ दुरिततिमिरभानु:, कल्प-वृक्षोपमान ||१|| भवजलनिधिपोत. सर्व सम्पत्ति हेतुः ।। स भरतु सात व. श्रेयसे शान्तिनाथ' यसे पार्श्वनाथः ॥२॥ ॥ चैत्यगन्दन ॥ आज देर अरिहन्त नमू, समरु तोरा नाम । ज्या ज्या प्रतिमा जिनतणी, त्या त्या करप्रणाम ॥१॥ शत्रुञ्जय श्री श्रादि देव, नेम नमू गिरनार । तारगे श्री अजितनाथ, या अपम जुहार ।।२।। अष्टापद गिरि उपरे, जिन चोवीसी जोय । मणिमय मूरति मान, भरते भराया सोप ।।३।। .

३४ ) , , समेत शिखर तीरथ बड़ा, ज्यां वीसे जिन पाय । वैभारक गिरि ऊपरे, श्री वीर जिनेश्वर राय || मांडवगढ़ नो राजियो, नामे देव सुपास । ऋपभ कहे जिन समरतां, पहुचे मन की आस ॥शा किंचि नामतियं, सग्गे पायालि माणुसे लोए। जाई जिणविंबाई, ताई सव्वाई बंदामि ॥१॥ नमुत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥ श्राइगराणं, तित्थयराणं, सयंसंबुद्धाणं ॥२॥ पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरीपाणं, पुरिसवरगंधहत्थीणं ।।३।। लोगुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहियाणं, लोगपईवाणं, लोगपज्जोअग- राणं ।। ४ ॥ अभयदयाणं, चक्खुदयाणं, मग्गदयाण, सरणदयाणं, चोहिदयाणं ।।शा धम्मंदयाण, धम्मदेसिवाणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचकवट्टीणं ॥६॥ अप्पडिहयवरनाणदंसणधराणं; विअट्टछउमाणं ॥७॥ जिणाणं जावयाणं, तिनाणं तारयाणं, बुद्धाणं बोहयाणं, मुत्ताणं मोअगाणं ॥८॥ सव्वन्नृणं सव्वदरिसीणं, सिवमय- लमरुअमणंतमक्खयमव्वावाहमपुणरावित्ति, सिद्धिगइनाम- धेयं, ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिअभयाणं ॥६॥ जे अ अइया सिद्धा, जे अ भविस्संतिणागए काले । संपइअ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण बंदामि ॥१०॥ - , जाति चेडाई, उड्ढेय अहे अतिरिय लोए । सलाइ ताई नंदे, डह सतो तत्थ सताई ॥१॥ इच्छामि समासमणो वदिउ जागणिज्जाए निसीहि- आए मत्थएण दामि ॥ जावत केरि साहू, भरहेरवय महानिदेहे अ। सब्वेसि तेसि पणयो, तिविहेण तिदंड विरयाण ||१|| नमोऽहत्सिद्धाचार्योपाध्यायसनसाधुभ्यः ।। श्री ऋपभदेवजी का स्तवन । जग जीवन जग वहाला हो, मारु देवांनो नंदलाल रे । मुस दीठे सुख ऊपजे, दर्शन अति ही पाणद लालरे ॥१॥ पाखडी अनुज पासडी, अप्टमी रासी समभल लालरे। चदन ते शारद चंदलो, चाणी अतिरसाल लालरे ॥२॥ लक्षण अगे निरानता, अडहीय सहस उदार लालरे। रेसा कर चरणा दिके, अभिंतर नहीं पार लालरे ॥३॥ उद्र चन्द्र रनि गिरितणा, गुण लइ धणीयुअगलालरे। भाग्य किया थकी पानीयु, अचिरज एह उत्तग लालरे॥४॥ गुण सघला अंगे कर्या, दूर कर्या सभी दोप लालरे । वाचक जश विजये धुण्यो, देजो सुसनो पोस लालरे॥५॥ उपसग्गहरं पास, पाम पदामि कम्मघणमुक्क । विसहर- चिमनिन्नास, मंगलकलाण-यापास ॥१॥निसहर फुलिंगमत, , - ( ३६ ) कंठे धारेइ जो सया मणुगो । तस्स गहरोगमारी, दुइजरा जति उवसामं ॥२॥ चिट्ठउ दुरे मंतो, तुझ पणामो वि बहुफलो होइ । नरतिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्खदोगचं ॥३॥ तुह सम्मत्ते लढे, चिंतामणिकप्पपायवमहिए। पाति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं ॥४॥ इय संथुनो महायस, भत्तिभरनिन्भरेण हिअएण। ता देव दिज्जबोहि, भवे भवे पामजिणचंद ॥५॥ (अव दोनों हाथ जोडकर जय वीराय कहना) जय वीराय ! जगगुरु !, होउ ममं. तुह पभावो भयवं ! भवनिव्वेश्रो मग्गाणुसारिश्रा इट्ठफलसिद्धि ॥१॥ लोगविरुद्धच्चाओ, गुरुजणपूा परत्थकरणं च । सुहगुरुजोगो तव्ययणसेवणा ग्राभवमखंडा ॥२॥ वारिज्जइ जइ वि निबाण बंधणं वीराय तुह समए। तह वि मम हुज्ज सेवा, भवे भवे तुम्ह चलणाणं ॥३॥ दुक्खखनो कम्मखयो, समाहिमरणं च बोहिलाभो अ । संपज्जउ महए, तुहनाह पणाम फरणेणं ॥४॥ सर्वमंगलमांगल्यं, सर्वकल्याणकारणम् । प्रधानं सर्वधर्माणां जैन जयति शासनम् ।।५।। अरिहंतचेइआणं, करेमि काउस्सग्गं, बंदणवत्तिाए, पूअणवत्तिाए, सकारवत्तिाए, सम्माणवत्तिाए, वोहि- लाभ वत्तिाए, निरुत्रसगवत्तिाए, सिद्धाए, मेहाए, धिईए, धारणाए, अणुप्पेहाए, · वड्ढमाणीए, ठामि काउस्सगं ॥ -- अन्नत्य ऊममिएणं, नीससिएण, सासिएणं, छीएणं, जमाइएण, उड्डएणं, वापनिसग्गेण, भमलीए, पित्तमुन्छाए, सहमेहि अगसचालेहि. मुहुमेहि खेलमचालेहिं, मुहमेहिं दिहिसचालेहि, एपमाडएहिं ग्रागारहिं प्रभग्गो अमिराहियो, हुज्ज मे काउस्सग्गो । जार अरिहंताणं भगवंताणं नमु- कारेणं न पारेमि तार कार्य ठाणेणं मोणेण झाणेणं अप्पाण गोसिरामि। (यहा एक नवकार का कारसग कर "नमोऽहसिद्धाचार्यो- पाध्याय सर्वमाधुभ्य " कह कर थुइ कहना)- आदि जिनपर राया जाम सोनन काया, मम्टेनी माया, घोरी लंछन पाया । जगत स्थिति निपाया, शुद्ध चारित्र पाया, केल सिगराया मोक्ष नगरी मिधाया ॥१॥ फिर प्रभु के सन्मुस पसरमाण करना, पीछे जिन मदिर जी से निकलते हुवे तीन दफे "श्रावस्सहि" पहना और उपाश्रय में तीन दफे "नसीहि" यह पर प्रवेश करना और १०० पावंडे भूमि से श्रागे गया हो तो इरियानहि फरके- इच्छामि समासमणो दिउ जाणिज्जाए निसीहियाए मत्थएण चंदामि? इच्छाफरेण सदिमह भगवन् ! हरियारहियं पडिय- मामि । इट इच्छामि पटियमिऊ, इरियारहियाए, निराह- " ( ४०) हुई होय, ते सविहुं मन वचन काया ए करी मिच्छामि दुकडं॥ (इसके पश्चात दोपहर में देववंदन करना चाहिए जो इस पुस्तक में आगे दिया हुआ है इस में सज्माय न बोले। देववंदन अकाल में (११॥ वजे से १२ वजे तक) न करें। यदि वर्षा ऋतु, (आषाढ सुदी १५ से कार्तिक सुदी १४ तक) मे दोपहर के देव- वंदन से पहिले भूमि प्रमार्जन करना आवश्यक है, इन दिनों में तीन वार पहिले भूमि प्रमार्जन करना चाहिए । उसकी विधि इसी पुस्तक के पृष्ट १७ की पृष्ठ १७ की १८ वी पंक्ति से प्रारम्भ होकर पृष्ठ २१ की १३ पंक्ति तक दिया है उसके अनुसार करें। पञ्चक्खाण पारने की विधि एगासण, एकलठाणा, आयंवील, आदि तिविहार उपवास के व्रत का पच्चक्खाण पारना होतो निम्न प्रकार से क्रिया करे । परन्तु मध्याह्न का देववन्दन करके पञ्चक्खाण पारे । इच्छामि खमासमणो वंदिउं जापणिज्जाए निसीहिआए मत्थएण चंदामि॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! इरियावहियं पडिक- मामि ! इच्छं इच्छामि पडिक्कमिऊं, इरियावहियाए, विराह- णाए , गमणागमणे, पाणक्कमणे, वीयकमणे, हरियक्कमणे, ओसा उतिंग-पणग-दग-मट्टी-मकडासंताणा संकमणे, जे मे जीवा विराहिया एगिदिया बेइंदिया, तेइंदिया, चउरि- , ,

-
.
,
+
दिया, पचिंटिया, अभिहया पत्तिया, लेसिया, मंगाडया,
मघट्टिया परियापिया, फिलामिया, उपिया, ठाणामोठाण
यकामिया, जीरियानो नगेरिया तस्स मिच्छामि दुबड ।
तस्म उत्तरीकरणेण ,पायच्छित्तकरणेण निमोहिकरणेण,
निमल्लीकरणेण, पागाण सम्माण निग्घायणट्ठाए, ठामि
काउस्मगं ॥
अन्नत्य उममिएण, नीसमिएण, सासिएण, छीएण,
जंभाइएण, उदुएण, नायनिसग्गेण, भमलिए पित्तमुन्छाए,
सुहुमेहि अगसचालेहिं, सुटुमेहिं सेलमचालेहिं, सुमेहिं
दिहिम चालेहि, एनमाइएहिं ग्रागारेहिं अभग्गो अरिराहियो
हुज्ज मे काउस्सग्गो । जार अरिहताण भगवताण, नमुबा-
रेण न पारेमि तार काय ठाणेण मोणेण माणेण अप्पाण
मोमिरामि ।
(यहा एक लोगस्स का या चार नवकार का काउस्मग्ग करना
पीछे प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे लिग्ने अनुसार)
लोगस्म उज्जोअगरे, धम्मतिथियरे जिणे । अरिहते
फित्तइस्स, चउनीम पि केली ॥१।। उसभमजिनं च दे,
ममनमभिणदणं च सुमड च । पउमप्पह सुपास, जिणं च
चटप्पहं वदे ||२|| सुविहिं च पुष्पटत, सीग्रल-सिज्जम
चामुपुज्जं च । निमलमणत च जिण, धम्म सति च
पदामि ॥३।। कुयु अर च मल्लिं, वदे मुणिसुब्बय नमि-

- ( ४२ ) जिणं च ॥ वदामि रिट्टनेमि, पासं तह बद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए अभियुवा, विहुयग्यमला पहीणजरमरणा । चउ- चीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥५॥ कित्तिय- चंदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा । यारुग्गवो- हिलाम, समाहिवरमुत्तमं किंतु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइचेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥७॥ इच्छामि खमासमणो वंदिर जावणिज्जाए निसीहि- आए मत्थएण चंदामि ॥ ( खमासमण देकर-) इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! चैत्यवंदन करूं ? "इच्छं" जगचिंतामणि चैत्यवंदन जगचिन्तामणि जगनाह, जगगुरु जगरक्खण, जगबंधव जगमत्थवाह, जगमावविअक्वण, अष्टावयसंठवियरूव, कम्मविणासण, चउवीसंपि जिणवर जयन्तु, अप्पडिहय- सासाणं ॥१॥ कम्मभूमिहिं कम्मभूमिहिं पढमसंघयणि, उक्कोसय सत्तरिसय, जिणवराण विहरंत लभइ । नव- कोडिहिं केवलीण, कोडीसहस्स नव साहु गम्मइ । संपड़ जिणवर वीस मुणि, बिहुकोडिहिं वरनाण, समणह कोडी- सहस दुअ, थुणिजिअ निच्च विहाणि ॥२॥ जयउ सामिय . , - " जयउ सामिय रिसह सत्तु जि, उज्जित पहु नेमिजिण, जयउ वीर सउरिमडण, भरुअच्छहिं मुणिसुव्यय, मुहरि- पास दुहदरिप्रसडण, अपरविदेहिं तित्थयरा, चिहु दिसि रिदिसि जि के पि तीग्राणागयसपडअ नदु जिण सव्वेगि ॥३॥ सत्ताणपड सहम्मा, लक्सा छप्पन्न अट्ट कोडीयो। बत्तिसप वासिम्पाई, तिमलोए चेहए वंदे ॥४॥ पनरस कोडिसयाई, कोडि बायाल लक्स अडपन्ना । छत्तीस सहस असिङ (असिग्राइ), सामयविनाइ पणमामि ॥५॥ जं किंचि नामतित्य, सग्गे पायालि माणुसे लोए । जाई जिणनिनाई, ताइ सव्वाई वदामि ।।१।। नमुत्युण अरिह ताण भगवंताणं ॥१॥ श्राइगराणं, तित्थयराण, सयंसयुद्वाण ॥२॥ पुरिसुत्तमाण, पुरिससीहाण, पुरिसनरपुडरीयाण, पुरिसरगंवहत्थीण ॥३॥ लोगुत्तमाणं, लोगनाहाण, लोगहियाण, लोगपर्दवाण, लोगपज्जोग्रग- राण ॥ ४ ॥ अभयदयाण, चक्युदयाण, मग्गदयाण, सरणढयाण, बोहिटयाण ॥५॥धम्मदयाण, धम्मदेसियाण, धम्मनायगाण, धम्मसारहीण, धम्मारचाउरतचक्रट्टीण ॥६॥ अप्पडिहयपरनाण्टसणधराण, पियट्ट उमाण ॥७॥ जिणाण जापयाण, तिनाण तारयाण, उद्धाण गोहयाण, मुत्ताण मोमगाणं ।।८॥ सपना सत्वदरिसीण, सिनमय- लमरुपमणतमस्सयमनानामपुणरावित्ति, मिद्विगहनाम- .

, - ( ४ ) धेयं, ठाणं सपनाणं, नमो जिणाणं, जियभयाणं ||ll जे अ अइया सिद्धा, जे अ भविस्मंतिणागए काले । संपइन वट्टमाणा, सब्बे तिविहेण बंदामि ॥१०॥ जाति चेड्याई, उड्डेय अहे अतिरित्र लोए अ। सब्याई ताई चंदे, इह मंतो तत्थ संताई ॥१॥ इच्छामि खमाममणो चंदिर जावणिज्जाए निमीहि- आए मत्थएण चंदामि ॥ जावंत केवि माहू, भरहेरवय महाविदेहे अ। मवेमि तेसिं पणयो, तिबिहेण तिदंड विरयाणं ।।१।। नमोऽहमिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुश्यः ।। उबसग्गहरं पासं, पास बंदामि कम्मघणमुक्कं । विसहर- विमनिन्नासं, मंगलकल्लाण-श्रावासं ॥१॥विसहर फुलिंगमंतं, कंठे धारेड् जो सया मणुप्रो । तस्म गहरोगमारी, दुद्रुजरा जति उचसामं ॥२॥ चिट्ठउ दूरे मंतो, तुझ पणामो वि बहुफलो होइ । नरतिरिएमु वि जीवा, पावंति न दुक्खदोगचं ॥३॥ तुह सम्मत्ते लढे, चिंतामणिकप्पपायवमहिए । पावं ति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं ॥४॥ इय संधुनो महायस, भत्तिव्मरनिम्मरेण हिअएण। ता देव दिज्जयोहिं, भवे भवे पासजिणचंद ॥५॥ ( अब दोनों हाथ जोडकर जय वीराय कहना) जय वीराय ! जगगुरु !, होउ ममं तुह् पभावो - . ( ४५ ) भयर । भनिन्वेयो मगगाणुसारिया इफ्लसिद्धि ॥१॥ लोगनिद्वचारो, गुरुजणपूना परस्थकरण च । सुहगुरुजोगो सत्ययणसेनणा श्राभरमसंडा ॥२॥ वारिज्जड जड नि निग्राण वण वीराय तुह समए । तह नि मम हुज्ज सेना, भरे भवे तुम्ह चलणाण ॥३॥ दुक्रवसम्रो कम्मसमो. समाहिमरण च बोहिलाभो अ । सपज्जउ महए, तुहनाह पणाम करणेण ॥४॥ सर्वमंगलमागन्य, सर्वकल्याणकारणम् । प्रधान मर्न वाणा जैन जयति शासनम् ॥५॥ इन्छामि समासमणो दिउ जागणिज्जाए निसीहिसाए मत्थएण पदामि ? इन्छाकरेण मदिसह भगवन् ! मज्झाय क" 'इन्छ" (एक नवकार नीचे मुजय गिनना ) नमो अरिहताण । नमो मिद्धाण नमो आयरियाण। नमो उपज्झायाण । नमो लोए सव्यसाहूण । एमो पच नमु- कारो । सब्यपारपणामणो । मंगलाणं च मनसि पढम हाड मगल ॥१॥ फिर मन्नह जिरणाण सज्भाय निम्न प्रकार से कहना- अथ मन्नह जिणाण सज्झाय । मनह जिणाणमार, मिन्छ परिहरर धरह सम्मत्त । छविह थानस्सयम्मि, उज्जत्तो होड पइदिवस ॥१॥ पवेमु पोमहरय, दाण सील तो य भागो । - .

( १८ )
मृह पूंछ कर ( प्रमार्जन कर ) हो म जब तक मुनि महाराज
को वोहरा कर निश्चल (स्थिर) आसन से सौन रव आहार
करना, अँठा नहीं डालना और थाली धोकर पीना. बगैर कारण
स्वादिष्ट आहार और लविंगादि तांबुल (मुखवास) न लेना और
मुख शुद्ध कर दिवस चरिम तिविहार का पञ्चक्खाण करना
और जिसको घर न जाना हो, वह पहले पुत्र नौकरादि को कहा
हो उसका लाया हुआ थाहार ऊपर लिखि विधि से पौपधशाला
में ही करें और फिर बाद पौपधशाला में आकर "इरियावहि
पडिकम' कर ( सो पावंडे हों तो गमरणागमणे आलोय कर)
पुनः जगचिंतामणि का चैत्यवंदन जयवीयराय तक करना ।
पोपट में पेशाव (मात्रा वा स्थंडिल) जाने की विधि ।
पेशाव व पाखाने जाने के वक्त पहनने को धोती पहनना,
कामली का काल हो तो सिर व वदन पर कामली अोढनी,
मुहपत्ति कंदोरे मे रखनी, चरवला डावी बगल में रखना,
रात का वक्त हो तो दंडासन से इरियासमिति सोधते चलना।
पेशाब करना हो तो कूडी पूजकर उसमें पेशाब कर परठवने
(पेशाब जसीन पर डालने) की जगह कूडी रखनी, निर्जीव
जगह देख “अणुजाणह जस्सुगो" कह कर पेशाव जमीन पर
डालना, फिर कूडी नीचे रख तीन दफे “वोसिरे” कहना और
कूडी अचित्त जल से धोकर उसके स्थान पर रख फिर अपने
हाथ धोना।
पाखाने जाना हो तो निर्जीव जगह देख "अणुजाणह

(४६)
जस्सुगो" कहकर पासाने जाना और शुद्धि करके तीन दफे
"योसिरे" कहना ओर वापिस आकर हाथ पग धोना और
पासाने की शमा दिनही को निवारण कर लेनी चाहिये क्योंकि
रात्रि को पासाने जाने मे जीव जतु की जतना न रहने से बहुत
दोप लागता है और जाना ही पडे तो १०० हाथ जगह के अदर
जाना, धोती बदलने वाद इरियावहि पडिक्मना ।
सिर्फ रात्रि के चार पहर का पौषध लेने की निधि ।
रात्रि के चार पहर का पोपध लेने वालों को पडिलेहण और
देववदन की मिया दिन में ही करने की है जिससे पौपध जल्दी
शुरु करना चाहिये । उसकी विधि इसी पुस्तक के पृष्ठ वे से
प्रारम्भ होकर पृष्ठ १५ की ३ पक्ति तक (बहुवेल करेमि ?
"इन्छ" तक ) दिया है उसके अनुसार कर के बाद में शाम के
पडिलेहण में इन्यामि० यमासमण देवर “पडिलहण करू ?
इच्छ" मे शुर करे । उमकी विधि इसी पुस्तक में आगे "पिछले
पहर को पडिलेहण करने की विधि" मे है, उसके अनु-
सार परें।
सुबह चार पहर का पौषध लिया हो और पीछे-
पाठ पहर का पौपच लेने की विधि ।
पिछले पहर को पडिलेहण करने की विधि में "गमरणा-
गमणे" पालोयार, फिर इसी पुस्तक के पृष्ट १० की ७ वी
पक्ति से प्रारम्भ होकर पृष्ट १५ की ३ पत्ति तक (बहुवेल करेमि ?
"इच्छ" तर) दिया है उसके अनुसार परे परन्तु "सग्माय

( ५० )
करू" की जगह "सज्झाय मे हूँ" कहना और तीन नवकार की
जंगह १ नवकार गिनना । फिर बाद में शाम के पडिलेहण में
"इच्छामि० खमासमण देकर "पडिलेहण करूं ? "इच्छं" से
शुरु करे। उसकी विधि इसी पुस्तक में आगे "पिछले पहर को
पडिलेहण करने की विधि में है । उसके अनुसार करे ।
पिछले पहर को पडिलेहण करने की विधि ।
(मुनिराज ने स्थापनाचार्य की पडिलेहणा की हो उसके
सामने छः घड़ी दिन रहे उस समय पडिलेहण करना, स्थापना-
चार्य की पडिलेहण किये पहिले पडिलेहण नहीं होती।
इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिज्जाए निमीहि-
आए मत्थएण चंदामि ॥ इज्छाकारेण संदिसह भगवन् !
बहुपडिपुराणा पोरिसी ? "इच्छं"
(पुनः खमासमण देकर इसी पुस्तक के पृष्ट ३७ के १८ वीं
पंक्ति से प्रारम्भ करके पृष्ठ ४० की २ पंक्ति तक ("गसणागमणे'
आलोय तक) दिया है उसके अनुसार क्रिया करे । पीछे:-
इच्छामि खमासमणो वंदिलं जापणिज्जाए निसीहि-
आए मत्थएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् !
पडिलेहण करूं ? "इच्छं"
इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिज्जाए निसीहि-
आए मत्थएण चंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् !
पोषधशाला प्रनाजू ? "इच्छं"
-

(कह उपयाम वाले को मुहपत्ति, चरवला, आमन,
पहिलेघना और एमासणादि करने वाले को कदोरा (सूत की
तागही) व धोती समेत पांच उपकरण पडिलेहन करके रमा-
समण देकर इरियारहि पडिषम करके)
इच्छामि खमासमणो वंदिउ जारणिज्जाए निसीहियाए
मत्थएण पदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगरन् ! पमाय
करी पडिलेहणा पडिलेहामोजी ? "इच्छ"
ऐसा पहकर प्रधचर्य प्रतधारी किमी रडे के उचरासन की
पहिलेहना करें। पीई
हुन्लामिखमाममणो पदिउं जारणिज्जाए निमीहिवाए
मरमाण वदामि। इन्गारेग सदिमह भगवन् ! उपधि
मुद्दपनि पडिलेहुँ ? "इन्छ"
गेमे पहरर मुत्पत्ति पटिलेहना। पीछे
न्छामि यमाममग्गो पदिउंजावणिज्जाएनिमीहिया
मत्याग पदामिन्जकरण सदिसह भगरन् । मझाप
कर " ""
यार पदार "मना विणण' की मग्माय उप
मैट (पई घुटने येठ) पर पाए।
नमो भगितागं । नमो मिद्धारा । नमो मायरिया।

( ५२ ) . . नमो उबज्झायाणं । नमो लोए सव्वसाहूणं । एसो पंच नमु- कारो । सबपावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसि पढमं हवइ. मंगलं ॥१॥ अथ मनह जिणाणं सज्झाय । मन्नह जिणाणमाण, मिच्छं परिहरह धरह सम्मत्तं । छविह आवस्सयम्मि, उज्जुत्तो होइ पइदिवसं ॥१॥ पव्वेसु पोसहवयं, दाणं सीलं तंबो अभावो | सज्झाय नमुक्कारो, परोवयारो अ जयणा अ॥२॥ जिणपूना जिणधुणणं, गुरुथु साहम्मिश्राण वच्छल्लं । ववहारस्स य सुद्धी, रहजत्ता तित्थजत्ता य ॥३॥ उवसम विवेग संवर, भासासमिई छजीव करुणा य । धम्मिग्रजणसंसग्गो, करणदमो चरणपरिणामो ॥ ४॥ संघोवरि बहुमाणो, पुत्थयलिहणं पभावणा तित्थे । सड्डाण किञ्चमेअं, निवं सुगुरूवएसेणं ॥ ५ ॥इति।। (फिर भोजन किया हो तो द्वादशावर्त वन्दना देवे, इसी पुस्तक के पृष्ठ २५ की १५ वीं पंक्ति से प्रारम्भ होकर पृष्ठ २६ की १६ पंक्ति तक दिया है उसके अनुसार करें। और तिविहार उपवास वाला सिर्फ खमास्रमण दे) इच्छामि खमासमणो चंदिउं जावणिज्जाए निसीहि- आए मत्थएम बंदामि ? इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! पसायकरी पञ्चक्खाण का आदेश दीजियेजी।

( ५३ )
ऐसा नहर पाणहार का पञ्चक्रसाण करे।
पाणहार-पचरसाण
पाणहार दिवसचरिम पचरसाइ । अन्नत्थणाभोगेणं,
सहसागारेणं, महत्तरागारेण,' सम्पसमाहित्तियागारेण
चोसिरह ।
इच्छामि समासमणो पदिउं जागणिज्जाए निसीहि-
आए मत्थएण वदामि १ उच्छाकारेण संदिसह भगवन् !
उपधि संदिसा: ? "इच्छ"। इच्छामि समासमणो वदिउँ
जावणिज्जाए निसीहिसाए मत्थएण वदामि ।। इच्छाकारेण
सदिसह भगवन् ! उपधि पडिलेहुँ ? "इच्छ"
कहकर प्रथम पटिलहन मे बाकी रहे हुए उत्तरासन (दुपट्ट)
माना (पेशान) करने जाने का वस्त्र और रात्रि-पौषध करना हो
तो सवारिया, कम्मल वगैरह वस्त्र पडिलेहे । पीछे डंडासण
लेकर पडिलेहण करके फिर समासमण देकर इरियावहि पडियम
परके कुडा क्चरा निकाले उसकी विधि इसी पुस्तक के पृष्ठ
१७ की १८ वीं पक्ति से श्रारम्भ होकर पृष्ठ २१ की १२वी
कचरबिहार-उपवास किया हो तो इस वक्त पचम्पारण
करने की जरूरत नहीं है, परन्तु मुबह तिनिहार का पगम्याण
किया हो और पानी न पिया होतो हम यत्त चविहार-उपवास
का पराक्साए परे। उस पञ्चासारण इस पुस्तक के पृष्ट ३०
में दिया है।

( ५४ ) पंक्ति तक दिया है उसके अनुसार करें । पीछे देववंदन करना, जो इस पुस्तक में आगे दिया हुआ हैं इस समय भी सज्झाय न बोले । जिसने आठ पहर का पोसह लिया हो या जिसने केवल रात्रि-पौषध किया हो वह देववंदन करके पीछे कुण्डल (कान में डालने के लिये रूई), डंडासन और रात्रि की शुचि के लिए चूना डाला हुआ अचित पानी याचना करके लेवे। पीछे- इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिज्जाए निसीहि- आए मत्थएण बंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! इरियावहियं पडिक्क- मामि ! इच्छं इच्छामि पडिक्कमिऊ, इरियावहियाए, विराह- णाए, गमणागमणे, पाणकमणे, वीयकमणे, हरियकमणे, ओसा उतिंग-पणग-दग-मट्टी-मकडासंताणा संकमणे, जे मे जीवा विराहिया एगिदिया वेइंदिया, तेइंदिया, चउरि- दिया, पंचिंदिया, अभिहया वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघट्टिया, परियाविया, किलामिया, उद्दविया, ठाणाओठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया तस्स मिच्छामि दुक्कडं । तस्स उत्तरीकरणेणं,पायच्छित्तकरणणं विसोहिकरणेणं, विसल्लीकरणेणं, पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए, ठामि काउस्सग्गं ॥ अन्नत्थ ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं, उड्डएणं, चायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, .

( ५५ ) सुगुमेहिं अंगसचालेहि, सुहुमेहिं खेलसचालैहिं, सुहुमेहि दिहिमचालेहि, एमाइएहिं प्रागारहिं अभग्गो मनिराहियो हुज्ज मे काउस्सग्गो । जार अरिहताण भगताण, नमुका- रेण न पारेमि तार कार्य ठाणेण मोणेण झाणेण अप्पाण पोमिरामि । (यहा एक लोगस्स का या चार नवकार का काउस्सग्ग करना पीछे प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे लिसे अनुसार) लोगस्म उज्जोयगरे, धम्मतिथपरे जिणे । अरिहते कित्तइस्स, चउनीसं पि केली ॥११॥ उमभमजिन च वदे, सभरमभिणदण च सुमड च । पउमप्पहं सुपास, चदप्पहं वदे ॥२॥ मुरिहिं च पुप्पटत, मीग्रल-सिज्जंस वासुपुज्जं च । निमलमणत च जिणं, धम्मं सति च वदामि ॥३।। कुखु पर च मल्लिं, चढे मुणिसुब्बय नमि- जिण च ।। वदामि रिट्टनेमि, पास तह पदमाण च ॥४|| एर मए अभियुया, पियस्यमला पहीणजरमरणा । चउ- पीस पि जिणारा, तित्ययरा मे पमीयतु ॥५॥ फित्तिय- चदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। पारुग्गयो- हिलाभ, समाहिवरमुत्तम दितु ॥६॥ चदेमु निम्मलयरा, भाइयेसु अहिय पयामपरा । मागरवरगभीरा, मिद्वा मिद्धि मम दिमतु ॥७॥ (ग्यमासमण देकर-) जिण च -

1:४६
इच्छामि खुमासमणो बंदिरं जावणिज्जाए निनाहि-
प्राए मत्थएण चंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् !
थंडिल पडिलहुँ ? 'इच्छ"
ऐसा कहकर नीचे लिखे अनुसार चौबीस मांडले करें।
ये मंडल रात्रि मे बड़ी नीति लघुनीति ( पाखाना, पेशाब
वगैरा परठवने लायक जगह देखने (प्रति लेखन करने) के लिये हैं,
१ आघाडे आसन्ने उच्चारे पासत्रणे अणहिलासे ।
२ आवाडे आसन्ने पासवणे अणहियासे ।
३ आघाडे मज्झे उच्चारे पासवणे अण हेासे ।
४ आघाडे. मज्मे पासवणे अणहिलासे ।
५ अाघाडे दूरे उच्चारे पासवणे अणहिासे ।
६ आघाडे दूरे पासवणे अणडिआसे ।
संथारा के पास की जगह इस साफिक छः मंडल करना:--
१ आघाडे आसन्ने उच्चारे पासवणे अहिासे ।
२ आघाडे आसन्ने पासवणे अहियासे ।
३ आवाडे मजके उच्चारे पासवणे अहियासे ।
४ अाघाडे मज्झे पासवणे अहिासे ।
५ आघाडे दूरे उच्चारे पासवणे अहिासे ।
६ अाघाडे दूरे पासवणे अहिासे ।
उपासरे के वारने के अन्दर की तरफ इस माफिक छ:मंडल करना:-
१ अणाघाडे अासन्चे उच्चारे पासवणे अणहिासे ।
२ अणाघाडे आसन्ने पासवणे अणहिलासे ।
-

-
( ५७ )
३ श्रणाघाडे मजमे उच्चारे पामरणे अणहियासे ।
४ अणाघाडे माझे पासरणे अणहिनामे ।
५ प्रणाघाडे दरे उच्चारे पासरणे अपहियासे ।
६ श्रणाघाडे दूरे पामरणे अणहिनासे ।
उपाश्रय के पारने के बाहर नजदीक रहकर छ मडल करना
१ अणाघाडे आमन्ने उच्चारे पासपणे अहिासे ।
२ अणापाडे यासन्ने पामरणे अहियासे ।
३ अणाघाडे मज्मे उच्चारे पासपणे अहियासे ।
४ अणाघाडे मज्मे पामरणे अहिासे।
५ प्रणाघाडे दर उच्चारे पामरणे अहिरासे ।
६ अखापाडे दरे पासपणे अहियासे ।
उपाश्रय मे सौ हाथ के अन्दाज दूर रहकर छ मडल करना
इन मडलों वाली जगह पहले से ही देस रसनी और मडल
स्थापनाजी के पास रहकर बोलते वक्त उन उन जगह पर दृष्टी
का उपयोग (ध्यान) रसना।
-४ महल करने के बाद इरियावहि पडिफम र चैत्यवन्दन
फे साथ देवसी या पाक्षिकादि (पम्पो वगैरा) प्रतिक्रमण करे।
सथारा पोरिमी पढाने की विधि
यदि रात्रि-यौपध हो तो पडिपमण करने के बाद सथारा
पोरिसी के ममय तक स्वाध्याय, ध्यान, धर्म-चर्चा वगैरह
करे। पीछे

(५८ ) इच्छामि खनाममणो दिउं जावणिज्जाए निमीहि- आए मत्थएण चंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! बहुपडिपुराणा पोरिसी ? तहत्ति इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिज्जाए निसीहि- आए मत्थएण. बंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! इरियावहियं पडिक- मामि ! इच्छं इच्छामि पडिक्कमिऊं, इरियावहियाए, विराह- णाए, गमणागमणे, पाणक्कमणे, बीयकमणे, हरियकमणे, ओसा उतिंग-पणग-दग-मट्टी-मकडासंताणा- संकमणे, जे मे जीवा विराहिया एगिदिया वेइंदिया, तेइंदिया, चरिं- दिया, पंचिंदिया, अभिहया वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघट्टिया, परियाविया, किलामिया, उद्दविया, ठाणाअोठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोबिया तस्स मिच्छामि दुक्कडं । :- तस्स उत्तरीकरणेणं,पायच्छित्तकरणणं विसोहिकरणेणं, विसल्लीकरणेणं, पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए, ठामि काउस्सगं॥ अन्नत्य ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं, उडएणं; वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेहिं अंगसंचालेहि, सुहुमेहिं खेलसंचालहिं, सुहुमेहिं दिहिसंचालेहि, एचमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहियो हुज्ज में काउस अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्का- - , - 7 - - . ( ५ ) रेण न पारेमि तार काय ठाणेणं मोणेण भाणेणं अप्पाण चोसिरामि । '(यहा एक लोगस्स का या चार नवकार का काउस्सग्ग करना पीछे प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे लिसे अनुसार) लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते' फित्तइस्सं, चउनीसं पि केली ॥१२उसभमजिनं च पदे, सभनमभिणंदणं च सुमइ च । पउमप्पहें सुपासं, जिणं च' चंदप्पहं वदे ॥२॥ मुविहिं च पुप्फदत, सीअल-सिज्जस वासुपुज्ज' च । सिमलमणतं च जिण, धम्म संति च चंदामिः॥३॥ कुंथु अरं च मल्लि, वंदे मुणिसुव्ययं नमि- जिण च ।। वदामि रिटनेमि, पास तह बद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए यभिथुया, पिहुयग्यमला पहीणजरमरणा) चउ- पीस पिजिणग, तित्थयरा मे पसीयतु ॥॥ फित्तिय- चदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा । आरुग्गी- हिलाभ, समाहिवरमुत्तम दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, श्राडच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्वा सिद्धि ममा दिसतु ॥७॥ इच्छामि समाममणो वंटिट जागणिज्जाए निसीहि- श्राए मत्थएण वदामि ॥ इच्छाकारेण सदिसह भगवन् ! बहुपडिपुराणा पोरिसी, राइयसथारए ठामि १ 'इच्छे" ये कहकर चउकसाय का चैत्यवन्दन करें- प ( ६० ) . . चउक्कसायपडिमल्लुल्लूरणु, दुज्जयमयणनाणमुसु- मूरणू । सरसपिअंगुवन्नु गयगामिउ, जयउ पासु भुवण- तयसामिउ ।।।। जसु तणुकतिकडप्प सिणिद्धर, सोहइ फणिमणिकिरणा लिद्धउ, नं नवजलहरतडिल्लयलंछिर, सो जिणु पासु पयच्छउ वंछिउ ॥२॥ नमुत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥ आइगराणं, तित्थयराणं, सयंसंबुद्धाणं ॥२॥ पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरीयाणं, पुरिसवरगंधहत्थीणं ॥३॥ लोगुत्तमाणं, लोगनाहाणं; लोगहिआणं, लोगपईवाणं, लोगपज्जोग- राणं ।। ४ ।। अभयदयाणं, चक्बुदयाणं, मग्गदयाणं, सरणदयाणं, बोहिदयाणं ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदेसियाणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टीणं ॥६॥ अप्पडिहयवरनाणदसणधगणं; विअदृछउमाणं ॥७॥ जिणाणं जावयाणं, तिनाणं तारयाणं, बुद्धाणं बोयाणं, मुत्ताणं मोअगाणं ॥८॥ सव्वन्नूणं सव्वदरिसीणं, सिवमय- लमरुअमणंतमक्खयमब्वावाहमपुणरावित्ति, सिद्धिगइनाम- धेयं, ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिअभयाणं ॥६॥ जे अ अशा सिद्धा, जे अ भविस्संतिणागए काले। संपइअ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि ॥१०॥ जावंति चेसाई, उड्ढे अहे अतिरिअ लोए अ। मव्वाई ताई बंदे, इह संतो तत्थ संताई ॥१॥ . , . - ( ६१ । इन्लामि समासमरे दिउं जापणिज्जाए निमीहि. पाए मत्याण पदामि। जात केरि माहू, मरहेरवय महानिदेह म सन्वेमि मि पणयो, तिम्हिण विद पिरयाणं ॥१॥ नमोऽहमिद्धाचार्योपाध्यायसरसाधुभ्य' । उपसगगहरं पाम, पामं पदामि कम्मघणमुपं (विसहर- चिमनिनाम, मगलकला-प्रानाम ||१|| पिमहरफुलिंगमत, कंटे धारद जो मया मणुयो । तस्म गहरोगमारी, दुजरा अवि उरगा ॥२॥ चिट्ठउ रे मतो, तुझ पणामी वि बहरलो होड | नरनिरिएम पि जीपा, पात्रति न दुकादोगनं ५३॥ तुह मम्मले लद्र, चिंतामणिसापपापरमहिए। पारति अनिग्येण, जीरा भयगमर टाणाय संधुयो मदायम, मनिमनिमग हिया। ना देर दिनरोहि, मर्व मने पायनिणद ॥५॥ (योहाय जोहालय यीप्रपय यहना) अपनीयगप ! जगगुरु !, होट ममं तुह पभाषयो मप मपनि यो ममगाणुमारिया पनमिदि 1988 लोगनिन्दगाची, गुरगपूमा पल्याण मुहगुरुनागो मनपरामेगा भामरमाडा गरिन नाशि निमा म पीनगप तह मम । इ नि मम जज सैग, भवं मचे तुम्ह गलगा दस्यममो समयमी, ( ६२ ) समाहिमरणं च घोहिलाभो असंपजउ महए, तुहनाह पणाम करणेणं ॥४॥ सर्वमंगलमांगल्यं, सर्वकल्याणकारणम् । प्रधानं सर्वधर्माणां जैन जयति-शासनम् ॥५॥ इच्छामि खमासमणो बंदिउँ जावणिज्जाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! राइय- संथारा सूत्र पढने के निमित्त मुहपत्ति पडिले हुँ ? "इच्छं" ऐसा कहकर मुहपत्ति पडिलेहण कर संथारा पोरिसि.का पाठ पढे । निसीहि, निसीहि, निसीहि, नमोखमासमणाणं गोय- माईणं महामुणीणं । • नमो अरिहंताणं । नमो सिद्धाणं । नमो आयरियाणं । नमो उवझायाणं । नमो लोए सव्यसाहूणं । एसो पंच नमु- कारो । सनपावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसिं पढम हवह मंगलं ॥१॥ करेमि भंते ! सामाइयं, सावज्जं जोगं पञ्चक्खामि । जाव पोसहं पज्जुवासामि, दुविहं -तिविहेणं मणेणं वायाएं काएणं न करेमि न कारवेमि तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पा बोसिरामि ॥ (अनुक्रम से ये तीनों पाठ तीन दफे बोलना।) अणुजाणह जिद्विज्जा! अणुजाणह परमगुरु ! गुरुगुणरयणेहिं मंडियसरीरा बहुपडिपुन्ना पोरिसि, राइयसंथारए ठामि ॥ १ ॥ 1- २ जह मे ( ६३ ) श्रणुजाणह सयार, पाहुमहाणेण चामपासेण । कुपुटिपायपमारण, शतरंत पमज्जए भूमि ॥२॥ मकोडम मंडामा, उमट्टते अ कायपडिलेहा । पार्टउपयोग ऊमामनिरुभगालोए ॥३॥ पमानो, इमम्म देहस्मिमा रयणीए । थाहाग्मुरहिदेह, सब्य तिनिहेण चोमिरिय ॥४॥ चत्तारि मगल-अरिहता मगल, मिद्धा मगलं, मामंगल, कालिपनतो धम्मो मगलं ॥ ५ ॥ चनारि लोगुतमा-परिहंता लोगुनमा, सिद्वा लोमुत्तमा, माह लोगुत्तमा, केरलीपन्न तो धम्मो लोगुत्तमो ॥ ६॥ चत्वारि मरण पानामि---परिहते मरण परज्जामि, मिढे मरण परज्जामि, माह मरणं परज्जामि, लीपनत्त धम्म मरण परज्जामि ॥ ७॥ पाणादायमलिय, चोग्गि मेहुगर दविणमुन्न । कोह माग माय, लोहं पिज्ज वहा दोम ॥८॥ क्नहं, अभिस्याण, पेगुल स-पर-ममाउत्त । परपग्विाय मापा-मोग मिन्द्रतमल च ॥६॥ चोमिरमु मार मुम्पमम्गमंमग्गनिमभूमा । दुग्गा निघगा, पट्टाग्म पारठागार ||१०|| एगोश नन्धि में रोड, नाहमनग कम्मर .. मदीगमगयो, अप्पागमणुमागः ॥१०॥ - .

( ६४ ) - एगो मे सासनी अप्पा, नाणदसणसंजुनो। सेसा मे बाहिरा भावा, मवे संजोगलक्खणा ॥१२॥ संजोगमला जीवेण, पत्ता दुक्खपरंपरो । तम्हा संजोगसंबंध, सब्वं तिविहेण बोसिरियं ॥१३॥ अरिहंतो मम देवो, जावज्जीवं सुसाहुणो गुरुणो । निनपन्नत्तं तत्तं, इअ सम्मत्तं मए गहियं ॥१४॥ ( यह १४ वीं गाथा तीन वार कहे, पीछे सात नवकार गुण कर नीचे की तीन गाथा कहे ) खमित्र खमावित्र मड़ खमह, सबह जीवनिकाय । सिद्धह साख आलोयणह, मुझह वइर न भाव ॥१५॥ सव्वे जीवा कम्मवस, चउदहराज भमंत । ते मे सब खमाविआ, मुज्झवि तेह खमंत ॥१६॥ जं जं मणेण बद्धं, जं जं वाएण भासिअं पावं । जं जं कायेण कयं, तस्स मिच्छामि दुकडं ॥१७॥इति।। रात्रि को पोरिसी पढाने के बाद जब तक निद्रा न आवे तब तक स्वाध्याय ध्यान करे, संथारा दूसरे श्रावक के संथारे से कम से कम एक बेंत छेटी (एक बिलात दूर) विछाना । बाद मे रात्रि के आखरी प्रहर में उठकर राई प्रतिक्रमण करना और सुबह स्थापनाचार्य जी का पडिलेहण और इरियावहि करने के बाद वस्त्र आदि का पडिलेहण करना उसकी विधि इसी पुस्तक के पृष्ठ १५ की ४ थी पंक्ति से आरम्भ होकर पृष्ठ २१ की १३ वीं पंक्ति तक दिया है उसके अनुसार करें। बाद देववंदन, सम्झाय - . करें यह पु तक मे आगे दिया हुआ है। देव दर्शन, गुर वदन करके मागे हुने डडामण, कुडी, पानी वगैरा गृहस्थ को वापिस सभलवा देना पीछे अाठ पहर का तथा रात्रि का पौषध पारना । पाठ पहर के तथा रात्रि के पौषध पारने की विधि । इन्द्रामि समाममणो वंदिलं जारणिज्जाए निमीहि- आए मत्यएण पदामि ।। इच्छाकारेण सदिमह भगवन् । इरियारहियं पडिक- मामि । इच्छं इन्छामि पडिक मिऊ, इरियारहियाए, निराह- पाए, गमणागमणे, पाणकमणे, वीयकमणे, हरियकमणे, अोसा उतिंग-पणग दग-मट्टी-मकडासताणा मकमणे, जे मे जीना सिराहिया एगिदिया बेदिया, तेदिया, चरि- दिया, पचिंदिया, अभिहया वत्तिया, लेसिया, संघाइया, मघट्टिया, परियापिया, फिलामिया, उपिया, ठाणाम्रोठाण मकामिया, जीपियानो सगेपिया तस्स मिच्छामि दुफड । तस्म उत्तरीकरणेण,पायच्छित्तकरणेण निमोहिकरणेणे, निगल्लीकरगणं, पावाण कम्माण निग्यायणट्टाए, ठामि काउस्मगं॥ अन्नत्य उससिएण, नीसमिएण, खासिएण, छीएण, अंभाइएण, उड्डुएण, वायनिसग्गेण, भमलिए पिनमुच्छाए, सुहमेहि अगसचालेहि, सुहमेहिं खेलसचालेहिं, सुमेहि दिहिसचालेहि, एपमाइएहिं प्रागारहिं भभग्गो अपिराहियो " - ( ६६ ) हुज्ज मे काउस्सग्गो । जात्र अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्का- रेणं न पारेमि ताव कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि । (यहां एक लोगस्स का या चार नवकार का काउस्सग्ग करना पीछे प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे लिखे अनुसार) लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥११॥ उसभमजिअं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुष्पदंतं, सीअल-सिज्जंस वासुपुज्जं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्म संतिं च वंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमि- जिणं च ।। वंदामि रिट्टनेमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए अभिधुश्रा, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चउ- वीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥शा कित्तिय- वंदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा । आरुग्गयो- हिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धि मम दिसंतु ॥७॥ इच्छामि खमासमणो वंदिरं जावणिज्जाए निसीहि- आए मत्थएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! मुहपत्ति पडिले ?

(६७) - (ऐसे कहर मुहपत्ति पडिलेहना-पीछे समासमण देना-) इच्छामि समाममणो दिउ जागणिज्जाए निसीहि- श्राए मत्थएण बंदामि ॥ इच्छाकारेण सदिसह भगवन् ! पोसह पारेमि ? 'यथाशक्ति इन्छामि समासमणो वैदिउं जारणिज्जाए निसीहि- आए मत्यएण वदामि १ इच्छाकारेण सदिसह भगवन् ! योमह पारिन 'तहति' (कहकर दाहिने हाथो घरवले पर रसर मस्तक भुकार ॥ नरकार मात्र बोल फ्रि "सागर चटो" की पोपध पारने की गाथा पहे नमो अरिहंताण । नमो मिट्ठाण। नमो यापरियाण। नमो उवझायाण | नमो लोए ससाहरण | एमो पंच नमुधारो । मन्त्र पारपणामणो । मंगलाण च मन्वेसि । पढम हाड मगल ।। "मागर चन्दो कामो, चन्दवडिसो मुदमणो धन्नो । जेमि पोसह पडिमा, असडिया जीपियते शिक्षा धन्ना सलाहगिना, मुलसा याण्ट कामटेगा य । जाम पससड भयर, ददययच महापीरो ॥२॥ पोमह विधि में निया विधि में पारा विधि परते जो फोर्ड अपिधि हुई हो यह मय मन वचन पाया पर मिन्दामि तुपई।

( ३८ )
इच्छामि खमासमणो बंदिउं जावणिज्जाए निसीहि-
आए मत्थएण वंदामि १ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् !
मुहपत्ति पडिलहुँ ?
( ऐसे कहकर मुहपत्ति पडिलेहना-पीछे खसासमण देना-)
इच्छामि खमासमणो चंदिउं जावणिज्जाए निसीहि-
पाए मत्थएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् !
सामायिरं पारेमि ? 'यथाशक्ति'
इच्छामि खमासमणो बंदिउँ जावणिज्जाए निसीहि-
आए मत्थए वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिमह भगवन् !
सामायिनं पारिश्र 'तहत्ति'
(ऐसे कहकर दाहिने हाथ को चरवले पर रखकर मस्तक
झुकाकर एक नवकार मंत्र पढकर 'सामायिअवयजुत्तो'
सूत्र पढे )-
नमो अरिहंताणं । नमो सिद्धाणं । नमो आयरियाणं।
नमो उवझायाणं । नमो लोए. सव्व साहूणं । एसो पंच
नमुक्कारो । सब पावप्पणामणो । मंगलाणं च सव्वेसि ।
पढमं हवइ मंगलं ॥
सामायिअवयजुत्तो, जाव मणे होई नियमसंजुत्तो ।
छिन्नइ असुहं कम्मं, सामाडअजत्तिा वारा ॥१॥ सामाइ-
अंमि उ कए, समणो इव सावो हवइ जम्हा । एएण
कारेणेशं बहुसो सामाइयं कुज्जा ॥२॥

( ६६ )
मैने सामयिक विधिसे लिया, रिधिसे पूर्ण किया,
विधिमे जो कोई अपिधि हुई हो तो मिच्छामि दुकट्ट ।
दस मनके, दम वचनके, बारह काया के ये कुल बत्तीस
दोपोंमे से कोई दोप लगा हो तो मिच्छामि दुकड्ड ।
दिन के चार पहर का पौपध पारने की विधि।
देवसी या पाक्षिकादि (पक्रती वगैरा) प्रतिक्रमण करने के
वाद पौषध पारने के पहिले मागे हुए डडासण कुडी, पानी वगैरा
गृहस्थ को वापिस सभलवा देना पीछे समासमण देकर
इरियावहि करके चउक्साय चैत्यवन्दन करे, उसकी विधि
के
पृष्ठ ५८ की ४ थी पक्ति से प्रारम्भ होकर
पृष्ठ ६ की ३ री पक्ति तक (जैन जयति शासनम् ।।शा तक )
दिया है उसके अनुसार करें। बाद में समासमण देकर पौषध
पारने की मुहपत्ति पडिलेहन करें उसकी विधि इस पुस्तक के
पृष्ठ ६६ की १६ वीं पक्ति से प्रारम्भ होकर पृष्ठ ६८ की ४ थी
पंक्ति तक दिया है उसके अनुसार पारें।
इति पोपध निधि समाप्त के
इमी पुस्तक

ॐ ॐ श्री वीतरागाय नमः * * त्रिकाल देवचन्दन विधि * ( अथ देववन्दन) देववंदन करने वाले श्रावक श्राविका पहिले शुद्ध वस्त्र पहन कर चौकी (वाजोठ) आदि उच्च स्थान पर पुस्तक जपमाला (नव- कारवाली) आदि रखकर, जमीन पूजकर, आसन विछाकर, चर- वला और मुहपत्ति लेकर बैठे। बैठ के बाँये हाथ में मुहपत्ति मुखके आगे रखकर दाहिने हाथ को स्थापन किये हुए पुस्तक आदि की स्थापना के संमुख करके नवकारमंत्र पढ़ें। नमो अरिहंताणं । नमो सिद्धाणं । नमो आयरियाणं । नमो उवज्झायाणं । नमो लोए सव्यसाहणं । एसो पंच नमुक्कारो । सबपावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसि पढमं हवइ मंगलं ॥१॥ पंचिंदियसंवरणो, तह नवविहवंभचेरगुत्तिधरो । चउ- विहकसायमुक्को, इअ अट्ठारस गुणेहिं संजुतो॥१॥पंच मह- , ( ७१ ) चयजुत्तो पंचपिहायारपालणसमत्थो। पंचसमिश्रो तिगुत्तो, छत्तीसगुणो गुरु मज्झ ॥२॥ (ऐसे पचिदिय कहे, यदि प्रथम से उस स्थान पर प्राचार्य प्रमुग्न की स्थापना की हुई हो तो वहा पचिदिय नहीं कहना। पीछे) . . 4 इच्छामि समासमणो वदिउ जारणिज्जाए निसीहि- आए मत्थएण पदामि ।। इच्छाकारेण सदिसह भगवन् ! हरियानहियं पडिक- मामि ! इच्छं इच्छामि पहियामिऊ, हरियारहियाए, चिराह- णाए, गमणागमणे, पाणामणे, वीयकमणे, हरियकमणे, मोसा उतिंग-पणग दग-मट्टी-मबडामताणा संकमणे, जे मे जीना पिराहिया एगिदिया बेड दिया, तेड दिया, चरि- दिया, पचिंदिया, अभिहया रत्तिया, लेसिया, सघाइया, सघट्टिया, पग्यिापिया, किलामिया, उद्दपिया, ठाणामोठाण सकामिया, जीपियायो नरोगिया तस्म मिच्छामि दुण्ड । तस्स उत्तरीकरणेण,पायच्छित्तकरणण निसोहिकरणेणं, विसल्लीकरण, पावाण फम्माणं निघायणट्ठाए, ठामि काउस्मग्ग॥ अन्नत्य उममिएण, नीमसिएण, सामिएण, छीएण, जमाइएण, उहुएण, यापनिमग्गेण, ममलिए पित्तमुन्छाए, मुहमेहिं भगमचालेहि, मुटुमेहिं खेलसंचालहिं, मुहुमेहिं दिद्विमंचालेहि, एमाइएहिं यागारेहिं ममग्गो परिराहियो .

- ( ७२ ) हुज्ज मे काउस्सग्गो । जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्का- रेणं न पारेमि ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं चोसिरामि । (यहां एक लोगस्स का या चार नवकार का काउस्सग करना पीछे प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे लिखे अनुसार) लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१॥ उसभमजिनं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल-सिज्जंस वासुपुजं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्म संति च वंदामि ॥३॥ कुंधु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमि- जिणं च ॥ चंदामि रिइनेमि, पासं तह बद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए अभियुवा, विहुयायमला पहीणजरमरणा। चउ- वीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥५॥ कित्तिर- चंदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्गयो- हिलामं, समाहिवरमुत्तमं किंतु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, श्राइच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धि मम दिसंतु ॥७॥ (अब उत्तरासन डालकर खमासण कर चैत्यवंदन करें) इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिज्जाए निसीहि- पाए मत्थएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् ! चैत्यवंदन करूं ? "इच्छं" . ( ७३ ) पैत्यवदन श्री शत्रुतय मिद्वत्तेत्र, दीठे दुर्गति पारे । भार धरी ने जे चढे, तेने भर पार उतारे ॥१॥ अनत मिद्धनो एह ठाम, मफल तीर्थनो राय । नागु' भूपभदेव, ज्या ठविया प्रभुपाय ।।२।। सुरज कु द सोहामणे, कालजनयमिराम । नाभिराय फुल मडयो, जिनपर कर प्रणाम ॥३॥ न मिचि नामवित्य, मगे पायालि माणुसे लोए । जाईजिस्बिाइ, ताइ मचाइ यदामि ॥१॥ नमुत्पुरग थरिहताण भगवंताण ॥१॥ यादगराण, वियपराण, मयमयुद्धाण ॥२॥ पृत्रिमुत्तमाण, पुग्गिमीहरण, पुरिमरपुटरीभाग, पुरिमागधहत्वीण ॥३॥ लोगुत्तमाण, लोगनाहाणं, लोगहियाण, लोगपर्डवाण, लोगपज्जोयग- गण ।। ४ ।। यमपटयाण, चरसुदपाय, मग्गदयाग, मगदयाण, योदिदयारा॥५॥ धम्मदयाण, धम्मटेमियाग, धम्मनायगाग, यम्ममारहीग, धम्मग्चाउतिरपट्टीण ॥६॥ यप्पटिहपयग्नागढमगधगण, पिसमाग ॥७॥ जिणाग बारपागं, निमाग ताग्याण, पद्धारा योहयाणं, मुतागं मोमगाण जामनगमबदग्मिीग, मिरमप- लमरममरानमस्वपम सराहनपुगगपिनि, मिद्विगानाम- धेय, टाग मपनाग, नमो विगाग, निममपाण || -

( ७६ )
दिद्विसंचालेहि, एवमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहियो
हुज्ज मे काउस्सग्गो । जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्का-
रेणं न पारेमि ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं
वोसिरामि ।
( एक नवकार का काउस्सग कर "नमोऽहत्सिद्धाचार्योपा-
ध्याय सर्वसाधुभ्यः" कहकर थुइ कहना---
कल्लाणकंदं पढमं जिणिंद, संति तयो नेमिजिणं मुगिदं।
पासं पयासं सुगुणिक्कठाणं, भत्तीड़ वंदे सिरिवद्धमाणं ॥१॥
लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते
कित्तइस्स, चउवीसं पि केवली ||१|| उसभमजिअं च वंदे,
संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमप्पहं सुपासं, जिणं च
चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल-सिज्जंस
वासुपुज्जं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्म संति च
वंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमि-
जिणं च ।। चंदामि रिट्टनेमि, पासं तह चद्धमाणं च ॥४॥
एवं मए अभियुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चउ-
वीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु १५ कित्तिय-
वंदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा । आरुग्गयो-
हिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा,
आइन्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धि
मम दिसंतु ॥७॥

- " सबलोए अरिहंतचेडपाणं, करेमि काउस्सगं वदण- वत्तियाए, पूरणवत्तियाए, सकारवत्तिमाए, सम्माणवत्ति- आए, चोहिलाभरतिमाए, निरुवसग्गरतिमाए, सद्वाए, मेहाए, धिईए, धारणाए, अणुप्पेहाए, यड्ढमाणीए, ठामि काउस्मगं। अन्नत्य ऊमसिएणं, नीससिएणं, सासिएगा, छीएण, जमाइएण, उइएण, वायनिसग्गेमा, भमलिए, पित्तमुच्छाए, मुहुमेहिं अंगसचालेहि, सुहुमेहि खेलसंचालेहि सुहुमेहिं दिद्विसचालेहिं, एवमाइएहि आगारहिं अभग्गो अविराहियो हुज्ज मे काउस्सग्गो, जार अरिहताण भगरताण, नमु- कारेण न पारेमि, नार काय ठाणेण मोणेण झाणे अप्पारण चोसिरामि ॥ (एक नवकार का काउस्सग्ग करके प्रकट कल्लाणकद की दूसरी थुइ नीचे हिरो अनुसार कहना ) अपारससारसमुह पार, पत्ता सिर दितु मुहबसार । सव्वे जिणिंदा सुरनिंदनंदा, कल्लापल्लीण निसालस्दा॥२॥ पुक्सरवरदीगड्ढ़े, धायडसडे य जीवेना भरहेरग्य- रिदेहे, धम्माइगरे नमसामि ॥१॥ तम तिमिर-पडल-पिद्धं सणस्म तुरगणनरिंदमहियस्म । मीमापरस्स पद, पप्फोडिन मोहजालस्स ।।२।। नाईजरामरणमोगपणामणस्म, कल्लाण- पुस्खल-पिमाल-सुहारहस्म को देवदाणपनरिदगणचिपस्म, ८० ) नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं । आइगराणं तित्थ- पराणं सयंसंबुद्धाणं । पुरिसुत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिस-बर पुंडरीयाणं पुरिसबर-गंधहत्थीणं । लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहियाणं लोगपईयाणं लोगपज्जोयगराणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयाणं बोहिदयाणं धम्म- दयाणं धम्मदेसयाणं धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्मवर- चाउरंत चकवट्ठीण अप्पडिहयवरनाणदंसणधराणं विअट्टछ- उमाणं जिणाणं जावयाणं, तिनाणं तारयाणं, बुद्धाणं बोहयाणं, मुत्ताणं मोअगाणं सब्वन्नूणं सचदरिसीणं, सिवमयलमरुअमणंतमक्खयमब्यावाहमपुणरावित्ति,सिद्धिगइ नामधेयं ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं जिअभयाणं । जे अअईया सिद्धा, जे अ भविस्संति णागए काले। संपइन वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि ।। अरिहंतचेइमाणं करेमि काउस्तगं, चंदणरत्ति पाए, पूअणवत्तिाए, सकारवत्तिाए सम्माणवत्तिाए वोहि- लाभवत्तिाए, निरुवसग्गवत्तिाए, सद्धाए, मेहाए, धिईए, धारणाए, अणुप्पेहाए, वड्ढमाणीए, ठामि काउस्सग्गं ॥ अन्नत्थ ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं, उड्डएणं, वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं, सुहुमेहिं खेलसंचालेहिं, सुहुमेहिं - , - - - . दिद्विसंचालेहि, एनमाइएहि-यागारहिं प्रभग्गो भनिराहियो हुज्ज मे काउस्सग्गो । जार अरिहनाणं भगरताण, नमुका- रेण न पारेमि ताव कायं ठाणेण मोणेणं भाणेण अप्पाणं गोमिरामि। (एक नवमार का काउग्सग्ग पर "नमोऽहत्सिद्धाचार्योपा- ध्याय सर्वमाधुभ्य " कहकर युइ कहना- शंखेश्वर पासजी पूनीए, नरभननो लाहो लीजीए, मनाछित पूरण सुरतरु, जय वामासुत अलवेमरु ॥१॥ लोगस्म उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहते फित्तइस्स, चउपीस पि केवली ॥१॥ उमभमजिन च वदे, संभवमभिणंदण च सुमड च । पउमप्पह सुपास, चदप्पई पदे ॥२॥ सुनिहिं च पुष्फटत, मीग्रल-सिज्जस चासुपुज्जं च । पिमलमणत च जिण, बम्म सति च वदामि ॥३॥ कुंषु अर च मल्लि, वढे मुणिसुव्यय नमि- जिण च ॥ वदामि रिट्टनेमि, पास तह बद्धमाण च ॥४॥ एवं मए अभियुया, पिहयरयमला पहीणजरमरणा। चउ- चीस पि जियरा, नित्ययरा मे पसीयतु ॥॥ फित्तिय- पटिय-महिया, जे ए लोगस्म उत्तमा सिद्धा । थारुग्गी- हिलाम, समाहिलरमुत्तम दितु ॥६॥ चदेमु निम्मलयरा, श्राडचेमु अहिय पयासपरा । सागरदरगभीरा, मिद्वा सिद्धि मम दिमतु ॥७॥ जिणं च .

. - सव्वलोए अरिहंतचेइमाणं, करेमि काउस्सग्गं बंदण- वत्तिाए, पूअणवत्तिआए, सकारवत्तिाए, सम्माणबत्ति- आए, चोहिलाभवत्तिाए, निरुवसग्गवत्तिश्राए, सद्धाए, मेहाए, धिईए, धारणाए, अणुप्पेहाए, वडढमाणीए, ठामि काउस्सगां। अन्नत्थ ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं, उड्डएणं, वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं, सुहृमेहिं खेलसंचालेहि, सुहुमेहि दिद्विसंचालहिं, एवमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहियो हुज्ज मे काउस्सग्गो । जार अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्का- रेणं न पारेमि ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि । (एक नवकार का काउस्सग्ग करके दूसरी थुइ नीचे लिखे अनुसार कहना) दोय राता जिनवर अति भला, दोय धोला जिनवर गुणनीला; दोय नीला दोय शामल कह्या, सोले जिन कंचन वर्ण लया ॥२॥ पुक्सरवरदीवड्ढे, धायइसंडे अजंबुदीवे अ। भरहेरचय- विदेहे, धम्माइगरे नमसामि ॥१॥ तम-तिमिर-पडल-विद्धं सणस्स मुरगणनरिंदमहियस्स । सीमाधरस्स बंदे, पप्फोडिअ मोहजालस्स ॥२॥ जाईजरामरणसोगपणासणस्स, कल्लाण- पुक्खल-विसाल-सुहावहस्स । को देवदाणवनरिंदगणच्चियस्स, . .

- - धम्मम्म मारमुपलभ करे पमाय ॥३॥ मिट्ठे भो ! पपयो णमो जिणमए नदी मया संजमे, देवनागसुवनकिन्नरगणस्म- भूयभारभिए । लोगो जत्थ पट्ठियो जगमिण तेलुकमचा- धम्मो वढउ मासस्रो विजयो धम्मुत्तर गड्ढउ ।।४।। मुसम्म भगरयो करेमि काउस्मग्ग । वंदणत्तिाए, पूरण- वत्तिमार, सकारसत्तियाण, सम्माणातिमाए, गोहिलाभर- त्तियाण, निरुपसग्गपत्तियाए । मदाए मेहाए घिद्वा धारणाए अणुप्पैदाए बदमाणीए ठामि काउस्मगं । अन्नत्य ऊममिएण नीससिएण, सासिएण छीएणा, जंभाइएगा, उहएण, चायनिसग्गेण, भमलिए, पित्तमुन्छाए, मुटुमेहिं अगमंचालहिं, मुहमहि, सेलमंचालेहि, मुहुमेहि टिट्ठिमंचालेहि, एपमाएहिं श्रागारहिं, अभग्गो अपिराहियो हुन्ज मे काउस्सग्गो || जार थरिहंताण भगरताण नमु- धारणा न पारमि, तार काय टोणेणा मोणेण झाणे अप्पारण वोमिरामि ॥ (एक नवकार काउम्साग तीसरी थुढ कहना ) भागम ते जिनपर भाखियो, गणधर ते हंडे राखियो, चनो रस जेणे चासियो, ते हुवो शिरमुख माखियो ॥३॥ मिद्वारा उद्धाण, पारगयाण परपरगया।लोयग्ग- सुबगयाण नमो मया म पमिद्धाण ||१|| जो देवाग्ग नि .

( ८४ ) देवो, जं देवा पंजली नमसंति । तं देवदेवमहिअं, सिरसा वंदे महावीरं ॥२॥ इको वि नमुक्कारो, जिणवरवसहस्स वद्धमाणस्स । संसारसागरात्रो, तारेह नरं व नारिं वा ॥३॥ उन्जितसेलसिहरे, दिक्खानाणं निसीहिया जस्स । तं धम्मचकवहि, अरिष्टनेमि नसामि ॥४॥ चत्तारि अह दस दो, य वंदिया जिणवरा चउब्बीस । परमट्ठ निटिअट्ठा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥५॥ वेयावच्चगराणं संतिगराणं सम्मदिविसमाहिगराणं करेमि काउस्सग्गं ॥ अन्नत्थ ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिए, छीएणं, जंभाइएण, उडुएणं, चायनिसग्गेणं, भमलिए, पित्तमुच्छाए, सुहुमेहिं अंगसंचालेहि, सुहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहिं दिद्विसंचालेहिं, एबमाइ एहिं श्रागारहिं अभग्गो अविराहियो हुज्ज मे काउस्सग्गो, जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमु- कारेण न पारेमि, ताय कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ ( एक नवकार का काउस्सग्ग पारकर "नसोऽहत्सिद्धाचार्यों- पाध्याय सर्वसाधुभ्य' कहकर चौथी थुइ कहना) धरणीधरराय पद्मावती, प्रभु पार्श्व तणां गुण गावती; सहु संघना संकट चूरती, नय विमलना बंछित पूरती ॥४॥ .

- नमुत्थुण अरिहंताणं भगवंताण ॥१॥ याइगराणं, तित्थयराणं, सयंसंबुद्धाण ॥२॥ पुरिसुत्तमाण, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुडरीयाणं, पुरिसबरगवहत्थीण ॥३॥ लोगुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहियाण, लोगपईवाण, लोगपज्जोयग- राण ॥ ४॥ अभयदयाण, चक्खुदयाण, मग्गदयाण, सरणदयाण, योहिदयाणं ॥॥धम्मदयाण, बम्मदेसियाण, धम्मनायगाण, धम्ममारहीण, धम्मपरचाउरंतचकवट्टीणं ॥६॥ अप्पडिहयवरनाणटसणधरीण, विग्रदृछउमाण ॥७॥ जिणाण जावयाण, तिन्नाण तारयाण, द्वाणं वोहयाण, मुत्ताणं मोअगाण ॥८॥ मव्यन्नृण सम्पदरिसीण, सिपमय- लमरुयमणतमस्सयमव्यागाहमपुणरारित्ति, सिद्विगइनाम- घेय, ठाण सपत्ताण, नमो जिणाण, जियभयाण ॥६॥ जे अ अइया सिद्वा, जे अ भनिस्सतिणागए। काले । संपइस वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण पदामि ॥१०॥ । जाति चेइयाई, उड्ढे अहे अतिरिम लोएं में। सव्वाह ताइ पदे, इह सतो तत्थ सताई ॥१॥ इन्छामि समाममणो दिउ जाणिज्जाए: निसीहि- आए मत्थएण वदामि ॥ जारत केपि साह, भरहेरचय महानिदेहे य । स-वेसि तेमि पणमो, तिनिहेण तिदड पिरया ॥१॥ नमोऽर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्य || . - T ( प ) नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं । आइगराणं तित्थ- पराणं सयंसंबुद्धाणं । पुरिसुत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिस-बर पुंडरीश्राणं पुरिसवर-गंधहत्थीणं । लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहिआणं लोगपईवाणं लोगपज्जोअगराणं अभयदयार्ण चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयाणं वोहिदयाणं धम्म- दयाणं धम्मदेसयाणं धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्मवर- चाउरंत चक्कवट्ठीणं अप्पडिहयवरनाणदसणधराणं विअट्टछ- उमाणं जिणाणं जावयाणं, तिनाणं तारयाणं, बुद्भाणं वोहयाणं, मुत्ताणं मोअगाणं सव्वन्नूर्ण सञ्चदरिसीणं, सिवमयलमरुपमणंतमक्खयमव्यावाहमपुणरावित्ति,सिद्धिगई नामधेयं ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं जिअभयाए। जे अअईया सिद्धा, जे अ भविस्संति णागए काले । संपइन वट्टमाणा, सब्वे तिविहेण चंदामि ।। (अव दोनों हाथ जोडकर जय वीराय कहना) जय वीराय ! जगगुरु !, होउ ममं तुह पभावो भयवं ! भवनिव्वेश्रो मग्गाणुसारिश्रा इट्ठफलसिद्धि ॥१॥ लोगविरुद्धच्चायो, गुरुजणपूआ परत्थकरणं च । सुहगुरुजोगो तब्बयणसेवणा आभवमखंडा ||२|| वारिज्जइ जइ वि निबाण बंधणं वीराय तुह समए । तह वि मम हुज्ज सेवा, भवे भवे तुम्ह चलणाणं ।।३॥ दुक्खखत्रो कम्मखत्रो, समाहिमरणं च बोहिलामो अ। संपज्जउ महए, तुहनाह

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(६०) जिणपूया जिणथुणणं, गुरुधु साहम्मिश्राण बच्छल्लं । ववहारस्स य सुद्धी,.. रहजत्ता तित्थजत्ता य ॥३॥ उवसम विवेग संवर, भासासमिई छजीव करुणा य । धम्मिअजणसंसग्गो, करणदमो चरणपरिणामो ॥ ४ ॥ संघोवरि बहुमाणो, पुत्थयलिहणं पभावणा तित्थे । सड्ढाण किञ्चमेअं, निचं सुगुरूंबएसेणं ।। ५ ।।इति।। -- ॥ श्री फ्यु पण पर्व का चैत्यवन्दन । पर्व पर्युषण गुणनीलो, नव कल्प विहार । चार मासांतर स्थिर रहे, एहीज अर्थ उदार ॥१॥ आपाढ शुद चौदश थकी, संवत्सरी पचास । मुनिवर दिन सीत्तेरमे, पडिकमतां चउमास ॥ २ ॥ श्रावक पण समता धरी, करे गुरुना बहुमोन । कल्पसूत्र सुविहित मुखे, सांभले थइ एकतान || ३ ॥ जिनवर चैत्य जुहारीये, गुरुभक्ति विशाल | प्राये अष्ट भवांतरे, वरीये शिव वरमाल ॥ ४॥ दर्पणथी निज रूपनो, जुए सुदृष्टि रूप । दर्पण अनुभव अर्पण, ज्ञान रमण मुनि भूप ॥ ५ ॥ आत्मस्वरूप.विलोकतां, प्रगट्यो मित्र स्वभाव । राय उदायी खामणां:- पर्व पयूषण दाव ॥ ६ नव वखाण पूजी सुणो; शुक्ल चतुर्थी सीमा । - , पंचमी दिन वाचे सुणे, होय पिरोधी नीमा ॥७॥ ए नहीं प पंचमी, सर्व समाणी चोथे । भवभीरु मुनि मानशे, भारव्यु परिहा नाथे ।। ८ ।। श्रु त केवली वयंणा सुणी, लही मानव अग्रतार । श्री शुभ वीरने शासने, पाम्या जय जयकार ॥६॥ ''। श्री वीश स्थानक तप चैत्यपन्दन ।। पहले पद अरिहंत नमु, पीजे सर्व सिद्ध । त्रीजे प्रचन मन धरो, आचारज सिद्ध ॥ १॥ नमो थेराण पाचमे, 'पाठक गुण छडे । नमो लोए सब्य साहण, जे छे गुण गरि ॥२॥ नमो नाणस्म आठमे, दर्शन पद ध्यानो । विनय करो गुणवंतनो, चारित्र मन भागो ॥३॥ नमो नभाय धारिण तेरमे फिरियाण । नमो तपस्म 'चौदमे, गोयम नमो जिणाण ॥४॥ ३चारित्र 'नाण "सुग्रस्मने ए, नमो तित्थस्म जाणी। जिन उत्तम पद पद्मने, नमता होप सुख पाणी ॥ ५ ॥ ।। दूज तिथिका चैत्यगन्दन ॥ दुविध धर्म जिणे उपदिश्यो, चौथा अभिनंदन । चीजे जन्म्या ते प्रभु, भर दुःस निरुदन ॥ १ ॥ १ स्थविर । २ उपाध्याय | ३ सयम । ४ ज्ञान । ५ श्रुतज्ञान, अथवा श्रुत-सिद्धात, जो १५ श्रागम है। .

-
(१२)
दुविध ध्यान तमे परिहरो, आदरो दोय ध्यान ।
इम प्रकाश्यु' सुमति जिने, ते चविया बीज दिन ।।२।।
दोय बंधन राग द्वष, तेहने भवि तजीये।
मुज परे शीतल जिन कहे, वीज दिन शिव भजीये ॥३॥
जीवाजीव पदार्थनु, करो नाण सुजाण ।
बीज दिने वासुपूज्य परे, लहो केवलज्ञान ॥४॥
निश्चय ने व्यवहार दोय, एकांते न. ग्रहीये ।
अरजिन वीज दिने चवी, एम जन आगल कहीये ॥ ५॥
वर्तमान चोवीशीए, एम जिन कल्याण ।
वीज दिने केइ पामीया, प्रभु नाण निर्वाण ॥ ६ ॥
एम अनंत चोवीशीए, हु बहु कल्याण ।
जिन उत्तम पद पद्मने, नमतां होय सुख खाण ॥ ७॥
ना पंचमी का चैत्यवन्दन ।
त्रिगडे बेठा वीर जिन, भाखे भविजन आगे ।
त्रिकरणशु त्रिहुँ लोक जन, निसुणो मन रांगे ॥१॥
आराधो भली भातसें, पांचम अजुआली ।
ज्ञान आराधन कारणे, एहज तिथि निहाली ॥२॥
ज्ञान विना पशु सारिखा, जाणो एणे संसार ।
ज्ञान आराधनथी लहे, शिवपद सुख श्रीकार ॥३॥
ज्ञान रहित क्रिया कही, काम कुसुम उपमान ।
लोकालोक प्रकाश कर, ज्ञान एक परधान ॥ ४॥

. ( ६३ ) ज्ञानी श्वासोश्वासमा, करे कर्मनो छेह । पूर्व कोडी वरसा लगे, अज्ञानी करे तेह ॥५॥ देश आराधक क्रिया कही, सर्व आराधक ज्ञान । ज्ञान तणो महिमा घणो, अग पाचमे भगवान ॥६॥ पच माम लघु पचमी, जावाजीव उत्कृष्टी। पंच परस पच मासनी, पंचमी करो शुभ दृष्टि ॥७॥ एकारन ही पचनो ए, काउस्सग्ग लोगस्स केरो। उजमणु करो भारशु', टालो भर फेरो ॥८॥ एणी परे पचमी श्राराधीए, पाणी भार अपार । वरदत्त गुणमंजरी परे, रंगविजय लहो सार ॥६॥ ॥श्री अष्टमी चैत्यवन्दन । माह शुदी आठम दिने, विजया सुत जायो। तेम फागण शुदि पाठमे, समर चची याव्यो ॥१॥ चत्र वदिनी पाठमे, जन्म्या ऋपम जिनट । दीक्षा पण ए दिन लही, हुमा प्रथम मुनिचंद ॥२॥ माधन शुदि पाठम दिने, पाठ कर्म कर्यां दूर । अभिनदन चौथा प्रभु, पाम्या मुख भरपूर ॥ ३ ॥ एहीज पाठम उजली, जन्म्या मुमति जिनद । आठ जाति कलशे की, नारा मुर इद ॥ ४ ॥ जन्म्या जेठ वदि थाठमे, मुनिमुत्रत सामी। नेम अपाड शुदि पाठमे, अटमी गति पामी ॥५॥ श्रावण बटनी अाठमे, नमि जन्म्या जग माण ।

(६४) . . तेम श्रावण शुदि आठमे, पासजीनु निरवाण ॥६॥ भाद्रवा वदी आटम दिने, चविया स्वामी सुपास । जिन उत्तम पद पाने, सेव्याथी शिवबास ।। ७॥ ॥ श्री एकादशी का चैत्यवन्दन ।। शासन नायक वीरजी, प्रभु केवल पायो। संघ चतुर्विध थापा, महसेन बन आयो ॥ १ ॥ माधव सित एकादशी, सोमिल द्विज यज्ञ । इन्द्रभूति आदि मल्या, एकादश विज्ञ ॥२॥ एकादशसो चउ गुणा, तेहनो परिवार । वेद अर्थ अवलो करे, मन अभिमान अपार ॥३॥ जीवादिक संशय- हरी, एकादश गणधार । वीरे थाप्या बंदीये, जिनशासन जयकार ॥ ४ ॥ मल्लि जन्म अर मल्लि पास, वर चरण विलासी । ऋषभ अजित सुमति नमि, मल्लि घनघाती विनाशी ॥५॥ पद्मप्रभ शिव वास पास, भव-भवना तोडी। एकादशी दिन आपणी, ऋद्धि सबली जोडी ॥ ६॥ दश क्षेत्र निहुँ कालनां, त्रणसें कल्याण । वरस अग्यार एकादशी, आराधो वर नाण ॥७॥ अगीयार अंग लखावीये, एकादश पाठां । पुंजणी ठवणी वीटणी, मपी कागल ने काठां ॥ ८॥ अगीयार अव्रत छांडयां ए, वहो पडिमा अगीयार । C , ॥ - चमाविजय जिनशामने, सफल करो अवतार ||६|| ॥ सिद्दचक्रजी का चैत्यनन्दन || पहले पट अरिहंतना, गुण गायो नित्ये । पीजे मिद तणा घणा, समगे एक चिते ॥१॥ श्राचारज बीजे पंदे, प्रणमो.निहुँ कर जोडी । नमीये श्रीउपझायने, चोथे मद मोडी ॥ २ पंचम पद मा साधुनु, नमता न आणो लाज । ए' परमेष्ठी पंचने, ध्याने अविचल राज ॥ ३॥ दसण-शकादिक रहित, पद, छ? वागे । मर्म नाण पद सातमे, क्षण एक न पिसारो ॥ ४ ॥ चारित चोगु चित्तथी, पढ अष्टम जपीये। सफल मेद वीच दान-फल, तप नामे तपीये ॥ ५ ॥ ए मिचक्र आराधता, पूरे पछित कोड ।' मुमतिविजय कपिरायनो, राम कहे को जोड ॥ ६ ॥ ।। दीपाली रात्परन्दन ।। सिद्धारथ नृप चुल-तिलो, निशला जम मात । हरि लहन तनु सात,हाथ, महिमा पिरयात ॥ १ ॥ जीश चरस गृहमाम छडी, लिये मयम भार । पाग बरस छदम्य मान, लही, केरल सार ॥२॥ ग्रीश बग्स इम मरि मली, यहोतेर थायु प्रमाण । दीपाली दिन शिर गपा, नप रहे ते गुग्ण साण ॥३॥ । -

(६ )
|| श्री पर्युपण पर्व का स्तवन ।।
सुणजो साजन संत पजुसण अान्यारे, तमे पुन्य करो पुन्यतः
भविक मन भाव्यारे, (प्रांकणी)
वीर जिणेसर अति अलवेसरवाहाला मारा परमेश्वर एम बोलेरे
पर्व माहे पजुसण महोटां, अवर न आवे तस तोलेरे;
पजुसण अाव्यां रे, तमे०१
चउपद माहे जेम केसरि मोटो, वा खगमां गरुड कहीए रे
नदी माहे जेम गंगा महोटी, नगमां मेरु लहीए रे, प० २
भूपतिमा भरतेसर भाख्यो, वा० देवमांहे सुर इन्द्र रे;
तीरथमाँ शेत्रुञ्जो दाख्यो, ग्रहगणमां जेम चन्द्र रे; प० ३
दशरा दीवाली ने वली होली, वा० अखात्रीज दीवासो रे;
बलेव प्रमुख बहुला छे वीजां, पण नहीं मुक्तिनो वासोरेप- ४
ते माटे तमे अमर पलानो, वा० अट्ठाइ महोत्सव कीजे रे
अट्ठम तप अधिकाइए करीने, नरभव लाहो लीजे रे; प०५
ढोल ददामा भेरी नफेरी, वा० कल्पसूत्र ने जगावो रे
झांझरनां झमकार करीने, गोरीनी टोली मली आवोरे; प०६
सोना रूपाने फूलडे वधावो, वा० कल्पसूत्रने पूजो रे;
नव वखाण विधिए सांभलतां, पाप मेवासी धू जे रे ५०७
एम अट्ठाईनो महोत्सव करतां वा० बहु जीव जग उद्धरियारे;
विबुध विमलवर सेवक एहथी, नवनिधि ऋद्धि सिद्धि
वरियारे; प०८
.

( १७ )
-
.
॥ श्री दूज तिथिका स्तपन ॥
जीरे मारे प्रणमी शारद माय, शासन वीर सुहंकर जी
जीरे मारे वीज तिथि गुणगेह, यादरो भरिपण सुन्दर जी
॥१॥ जीरे मारे एह दिन पंच कल्याण, पिरीने कहुं ते
सुणोजी | जी० मा० महाशुदि जे जाण, जन्म अभिनंदन
तणो जी ॥२॥ जी० आपण शुदिनी हो वीज, सुमति
चव्या सुरलोकयी जी । जी० तारण भनोदधि तेह, तम पद
सेवे सुर योकथी जी ॥३।। जी. ममेतशिसर शुभ ठाम,
दसमा शीतल जिन गणु जी । जी चैत्र पदिनी हो चीज,
चर्या मुक्ति तस सुख घणु जी ॥४॥ जी० फाल्गुन मासनी
पीज, उत्तम उज्वल मामनी जी । जी०परनाथ तस च्यवन,
कर्मचये भर पागनीजी ॥शाजी० उत्तम मार ज मास, शुदि
वीजे वासुपूज्यनो जीजी० एहीज दिन केवलनाण, शरण
फरो जिनराजनो जी ॥६॥ जी. करणीरूप करो सेत,
समफिलम्प रोपो तीहाजी । जी० सातर फिरिया हो जाण,
सेड समता परी जिहानी ॥७॥ जी० उपशम तप नीर,
सममित छोड प्रगट होवे नी । जी० संतोप करी ग्रहो
पाड, पचरमाण ना चोकी सोहे जी || जी० नासे कर्म
रिपु चोर, ममकिन पृत फल्यो तिह। जी । जी. मांजर
अनुमर रूप, उतरे चारित फल जिद्दा जी || जी. शात
मुघारम नीर, पान करी सुख लीजिये जी 1 जी० पोल

। हर सम ल्गो स्वाद, जीवने संतोष रस. कीजिये जी ॥१०॥ नी० बीज करो दोय मास, उत्कृष्टी बावीश मासनी जी। जी० चोविहार उपवास, पालिये शील वसुधासनी जी ॥११॥ जी० आवश्यक दोय वार पडिलेहण दोय लीजिये जी । जी० देववंदन त्रण काल, मन वच कायाए कीजिये नी ॥१२॥ जी० उजमणु शुभ चित्त, करी धरिये संयोगथी जी । जी० जिनवाणी रस एम, पीजिये श्रुत उपयोगथी नी॥१३॥ जी० इण विधि करिये हो बीज, राग ने कैप दूरे करी जी। जी• केवलपद लही तास, वरे मुक्ति उलठ धरी जी ॥१४॥ जी० जिनपूजा गुरुभक्ति, विनय करी सेवो सदा जी। जी० पद्मविजयनो शिष्य, भक्ति पामे सुख संपदा जी ॥१॥ . ॥ ज्ञानपंचमी का स्तवन ।। सुत सिद्धारथ भूपनो रे, सिद्धारथ भगवान । वारह परखदा श्रागले रे, भाखे श्री वर्धमानो रे भवियण चित्त घरो, मन वच काय अमायो रे, ज्ञान भक्ति करो।। ए आंकणी॥१॥ गुण अनन्त आतम तणा रे, मुख्यपणे तिहां दोय । तेहमा पण ज्ञानज वर्ल्ड रे, जिणथी दरसण होय रे म०॥२॥ज्ञाने चारित्र गुण वधे रे, ज्ञाने उद्योत सहाय । ज्ञाने थिविरपणु' लहे रे, प्राचारज उवझाय रे भ०॥३॥ ज्ञानी श्वासोश्वासमां रे, कठिन करम करे नाश । यहि जेम इन्धन दहे रे, (६) क्षणमा च्योति प्रकाशो रे, म०॥४॥प्रथम ज्ञान पछी दया रे, संवर मोह विनाश । गुण ठाणंग पंग थालीये रे, जेम चढे मोक्ष प्रावासो रे, भ०॥५॥ मह सुथ ओहि मणपञ्जवा रे पंचम केवलज्ञान । चउ मुंगा श्रुत एक छे रे, स्व पर, प्रकाश निदानो रे भ० ॥६॥ तेहना साधन जे कया रे, पाटी पुस्तक प्रादि । लखे लसावे साचवे रे, धर्मी धरी अप्रमादो रे भ०॥७॥ त्रिविध प्राशानना जे करे रे, भणता करे संतराय । अंधा रहेरा बोरडा रे, मुंगा पागला थाय रे, भ० ॥८॥ भणता गुणता न आवडे रे, न मले चल्लम चीज । गुणमंजरी घरदत्त परे रे, ज्ञान विराधन चीज रे, भ० 111 प्रेमे पूछे परखदा रे, प्रणमी जग- गुरु पाय । गुणमेनरी परदत्तनो रे, कहीं अधिकार पसायो रे, भ० ॥१०॥ ।। अष्टमी का स्तवन । हारे मारे टाम धरमना साडा पचनीश देश जो, दीपे रे त्या देश मगध सहुमा शिरे रे लोल । हा रे मारे नगरी तेहमा राजगृही सुपिशेप जो, राजे रे त्या श्रोणिक गाजे गज परे रे लोल ॥१॥ हां रे मारे गाम नगर पुर पारन करता नाथ जो, विचरता त्या प्रावी वीर समोसर्या रेलोल हा रे मारे चउद सहम मुनिपरनो साये साथ जो, सूवा रे तप संयम शियले अलका रे लोल | हारे मारे ( १०० ) फूल्या रसभर भूल्या अंब कदंब जो, जाणु रे गुणशील वन हसी रोमांचियो रे लोल .। हां रे मारे वाया वाय सुवाय तीहां अविलंब जो, वासे रे परिमल चिहुं पासे संचियो रे लोल ॥३॥ हां रे मारे देव चतुर्विध आवे कोडा कोड जो, त्रिगडुरे मणि हेम रजतनुते रचे रे लोल । हां रे मारे चोसठ सुरपति सेवे होडाहोड जो, आगे रे रस लागे इंद्राणी नचे रे लोल ॥४॥ हाँ रे मारे मणिमय हेम सिंहासन वेठा आप जो, ढाले रे सुर चामर मणिरत्ने जब्याँ रे लोल । हाँ रे मारे सुणताँ दुदुभि नाद टले सवी ताप जो, वरसे रे सुर फूल सरस जानु अन्याँ रे लोल ॥५॥ हाँ रे मारे ताजे तेजे गाजे घन जेम लुत्र जो, राजे रे जिनराज समाजे धर्मने रे लोल । हां रे मारे निरखी हरखी आवे जन मन लुब जो, पोपे रे रस न पड़े धोखे धर्मने रे लोल ॥ ६॥ हां रे मारे आगम जाणी जिननो श्रोणिक राय जो, आव्यो रे परिवरियो हय गय रथ पायगे रे लोल । हां रे मारे देह प्रदक्षिणा वंदी वेठो ठाय नो, सुणबारे जिनवाणी मोटे भागीये रे लोल ॥ ७॥हां रे मारे त्रिभुवन नायक लायक तव भगवंत जो, आणी रेजन करुणा धर्मकथा कहे रे लोल । हां २ मारे सहज विरोध विसारी जगना जंतु जो, सुणवा रे जिनवाणी मनमां गहगहे रे लोल ॥८॥ --

1] एकादशी का स्तरन ॥
समवसरण चेठा भगत, धर्म प्रकाशे श्रीअरिहंत ।
चार परपदा चेठी रुडी, मागसिर शुदी अंगीपारस वडी
॥ १॥ मल्लिनाथना वीन कल्याण, जन्मदीक्षाने केवलनाण।
अरजिन दीक्षा लीधी रुडी, मागसिर शुदी अगीयारस बड़ी
॥२॥ नमिने उपज्यु केवलज्ञान, पांच कल्याणक अति-
प्रधान ! ए विधिनी महिमा बडी, माग० ॥३॥ पांच
भरत ऐरावत इमही ज, पांच कल्याणक हुए तिमही न ।
पचासनी सस्या परगडी. माग० ॥४॥ भतीत अनागत
गपा एम, दोढमो कल्याणक पाय लेम । ऋण तिथि छे
ए तिथि जे रडी, माग० ॥ ५ ॥ अनत चोपीशी इण परे
गणो, लाभ अनंत उपमास तो । ए तिथि सह शिर ए
खडी, माग. ॥६॥ मौनपरणे रह्या श्रीमल्लिनाथ, एक
दिवस संयम बद माथ। मौन तणी परे त इम बडी,
माग०॥७॥ आठ पहोरी पोसह लीजिए, चौविहार
विधिशु कीजिये। पर प्रमाद न कीजे घडी, माग ||८||
चर्प डग्यार कीजे उपपाम, जात्र जीव पण अधिक उल्लाम ।
ए विधि मोक्ष तणी शवडी, माग०॥६॥ उजमणुकीजे
श्रीकार, ज्ञानोपसरण इग्यार इग्यार । करो काउस्सग गुरु-
पाये पडी, माग० ॥१०॥ देहरे स्नान कीजिजे चली,
पोपी पूनिजे मन रली । मुनिपुरी की ने टु'कडी, माग.

( १०२ ) ॥ ११ ॥ मौन अन्यारस मोटु पर्व, आगध्यां सुख लहीये सर्व । व्रत पञ्चक्खाण करो आखडी, माग० ॥१२ ।। जेसल सोल इक्यासी समे, कीधु स्तवन सहु मन गमे । समयसुन्दर कहे दहाडी, माग० ॥ १३ ॥ ॥ श्री वीश स्थानक स्तवन ।। हारे मारे प्रणमुं सरस्वती मागु वचन विलासजो, वीशरे तप स्थानक महिमा गाईशरे लोल ॥ हारे मारे प्रथम अरिहंत पद लोगस्स चोवीसजो, बीजेरे सिद्ध स्था- नक पन्नर भावशुरे लोल ॥१॥ हां. बीजे पवयणसुं गणशो लोगस्स सातजो, चउँथेरे अ.यरियाणं छत्रीसनो सहीरे लोल ॥हा॥ थेराणं पद पंचमे दस उदारजो, छ8रे उवझायाणं पचवीसनो सहीरे लोल ॥ २ ॥ हां० सातमे नमोलोए सब्बसाहु सत्तावीसजो, आठमे नमो नाणस्स पंचे भावशुरे लोल ।। हां नवमे दरिसण सडसठ मनने उदारजो, दशमे नमो विणयस्स दस वखाणीएरे ॥३॥ हां अगी- प्रारमे नमो चारित्तस्स लोगस्स सत्तरजो, वारमे नमो बंभस्स नवगुणे सहीरे लो० ॥ हां० ॥ कीरियाणं पदतेरमे वली पचवीसजो, चउदमे नमो तवस्स बार गुणे सहीरे लो० ॥ ४ ॥ हां० पंदरमें नमो गोयमस्स अठावीसजो नमो जिणाय चउबीस गणशु सोलमेरे लो० ॥ सत्तरमे नमी चारित्त लोगस्स सित्तेर जो, नापस्सनो पद गणशु एकावन ( १०३ ) अहारमेरे लो० ॥५॥ हां. श्रोगणीसमे नमो सुश्रस्त वीस पीस्तालीसजो, चीसमे नमो तित्थस्स धीम भावसुरे लो० ॥ हा० तपनो महिमा चारमें उपर वीमजो, पटमासे एक अोली पूरी कीजिएरे लो० ॥६॥ हो० तप करता पलीगणीये दोपहजार जो, नकारनाली वीसे स्थानक मानसुरे लो० ॥ हा० प्रभावना संघ स्वामी वच्छल सारजो, उजमणां निधि कीजिए निनय लीजिएरे लो० ॥७॥ तपनो महिमा कहो श्री वीर जिनरायजो, विस्तारे इम संबंध गोयम स्वामिनेरे लो ॥ हाँ तप करता चली तीयंकर पद होयजो, देवगुरु हम काति सान सोहामणोरे लो० ॥८॥ ॥श्री मिचक्र सपन ॥ श्री श्री पालकुमार श्वेतपर्ण अरिहंत बाराधे, वीतराग श्रातम गुण साधे, अमृतदश मल जार ॥ श्री १॥ सिद्ध बुद्र परमात्मा ध्या, रनवर्ण पालन पाये, सिद्ध पाठ गणधार ॥ श्री २॥ छत्तीस गुण प्राचारज सोहे, पीत वर्ण ध्याने मन मोहे, स्वपर तारणहार || श्री ३ ॥ पढ़े पढ़ारे योग्य घना, नील परण भातम गुण गारे पाठक पद अनधार || श्री ४॥ पचम पद को भोर से भजीए, श्याम वरण सब पाप को तजीए, धन साधु श्रणगार || श्री ५॥ दर्शन जान चरण तप चारे, श्वेतवर्ण साधन अवधारे निश्चय और व्यवहार ॥श्री ६॥ सिद्धचक्र गुण गाने भारे, श्रावम लक्ष्मी हर्ष मनावे, गल्लम जय जयकार ॥श्री ७॥ - - - । १०४ ।। दीवाली स्तवन ।। जयो जगस्वामी वीरजिनंद ।। टेर। नगर अपापड में प्रभु प्राये, भविजन को उपकार करंद ॥ ज०१॥ निज निरवान समय को जानी, सोलां पहर प्रभु धर्म कहंद, }} ज०२॥ कार्तिक यदि पंदरसको राते, प्रातः काल प्रभु मुक्ति लहंद ।। न०३ ॥ परमात्मा पद छिनक में लीनो, पाठ कर्म को दूर हरद ॥ ज०४॥ कल्याणक निर्वाण मोहत्सव, कारण मिलकर पायें सुरींद ॥ ज०५॥ पापा नगरी नाम कहायो, अस्त भयो जिहां ज्ञान दिनंद, ॥ ज०६॥ नव भल्ली नव लेच्छी राना, शोक अतिशय दिल में घरंद ।। ज० ७॥ भाव उद्योत गया अब नगसे, द्रव्य उद्योत को दीप करंद ॥ ज० ८। जिस कारण दीवाली होइ, ध्यान धरोप्रभु वीर जिनंद ॥६॥ कार्तिक सुदि एकम दिन थावे, गौतम केवल ज्ञान गहंद }} ज० १०॥ आत्मराम परमपद पावे, चल्ला चित्तमें हर्ष अर्मद। ज० ११॥ ॥ श्री सिद्धाचल जी का स्तवन }} नाया नवाणु करीए, विमल गिरि जात्रा नवाणु करीए । पुर्व नवाणु वार शत्रुजय गिरि, ऋषभजिणंद समोसरीए । वि० ॥१॥ कोटि सहस भव पातक त्रुटे, शत्रुजय सामाङग भरीए || वि०॥२॥ सात छट दोय (१०) अठम नपस्या, की नटिए गिरिवरीए । नि० या०॥३॥ पु डगिक पट जपिए मन हग्वे, अध्यवसाय शुम धरीए । ० या० ॥४॥पापी अभव्य न नजर देखे हिंसक पण उदए । वि० या० ॥१॥ भूमि मथारे ने नारी तणी मग, र यकी पी हरीए पि० या० ॥६|| एकल आहारी ने मचित्त परिहरी, गुरु साथै पद चरीए वि० या० ॥७॥ पडिक्मणा दोय विधिशु करीए, पापपडल परिहरीए पिः या० ॥३॥ कलिकाले ए तीर्थ मोटु , प्रवहण जेम भवदगए वि० या०118| उत्तम ए गिरिवर सेनता पहा कहे भा तरीए || वि० या० ॥१०॥ पयु पण पर्व की स्तुति मत्तर भेदी जिन पूजा रचीने, स्नात्र महोत्सव की जी। ढोल दमामा मेरी नफेरी, झलरी नाद मुणीजे जी ।। पीर जिन श्रागल भारना भावी, मानव भव पल लीज जी। पर्व पजुमग, पूरर पुएये, प्रायां एम जागीजे जी ||१|| मास पाम वली टसम दुवालम, नत्तारि भट्ट कीजे जी। ऊपर वली दश टोय करीने, जिन चोचीच पूजीज जी ।। पडा कन्पनो छ8 करीने, वीर वसाण मुगीजे जी। पडवेने दिन जन्म महोत्सन, धवल मंगल वरतीजे बी ||२|| अाठ दिवस लगे अमर पलानी, हमनो तप कीजे जी। नागकेतुनी परे क्वल लहीये, जो शुभ भा रहीये जी ।। . , नलाधर दिन त्रण कन्यागक, गणधरबाद बीज जी। पास नेमीमर अंतर तीज, ऋपम चन्त्रि मुणगी जी ॥३॥ वारसा सुत्र ने मामाचारी, मंचच्छरी पडियामिये जी । चैत्य प्रवाडी विधिशुकीने, मकल जंतु ग्वामी जी ।।. पारणाने दिन स्वामविलाल, की अधिक वडाई जी । मानविजय कहे सकल मनोरथ, पूरे देवी सिद्धायी जी ITE दुज तिथि की स्तुति दिन सकल मनोहर, बीज दिवस सुविशेष । गय राणा प्रणमे, चन्द्र तणी जिहां रख । विहां चन्द्र विमाने, शाश्व- ता जिनवर जेह ।हुँ बीज तणे दिन, प्रगम पाणी नह ।।१।। अभिनन्दन चन्दन, शीतल शीतलनाथ । अरनाथ सुमति जिन, वासुपूज्य शिव साथ ॥ इत्यादिक जिनवर, जन्म ज्ञान निर्वाण । हुँ बीज तणे दिन, प्रण ते सुविहाण ॥२॥ परकाश्यो चीजे, दुविध धर्म भगवंत । जेम विमल कमल दोय, विपुल नयन विकसत !! आगम अति अनुपम, जिहां निश्चय व्यवहार बीजे सवी कीजे, पातकनो परिहार ॥३॥ गजगामिनी कामिनी, कमल सुकोमल चीर । चक्कसरी केसर, सरस सुगंध शरीर ॥ कर जोडी चीजे, हुँ प्रणम तस पाय । एम लब्धिविजय कहे, पूरो मनोरथ माय ॥४॥ ॥ पंचमी की स्तुति ॥ श्रारण शुदि दिन पंचमीये, जन्म्या नेमि जिणंद तो! श्याम बरण तनु शोभतुं ए, मुख शारद को चंद नो !!

सइस वरस प्रभु पाउसु ए, ब्रह्मचारी भगवंत तो। अष्ट कग्म हेले हणीए, पहोता मुक्ति महंत तो ॥१॥ अष्टापद पर आदि जिन ए, पहोत्या मुक्ति मोझार तो । पामु पूज्य चंपापूर्ग ए, नेमि मुक्ति गिरनार तो ॥ पानापुरी नगरीमा चली ए, श्री चीर तणु निर्माण तो । सम्मेतशिसर वीश सिद्व हुआ ए, शिर वहुँ तेहनी श्राण तो ॥२॥ नेमिनाथ जानी था ए, भासे सार वचनतो । जीन दया गुण वेलटी ए, कीजे तास जतन तो मृपा न बोलो माननी ए, चोरी चित्त निवार नो। अनत तीर्थकर इम भणे ए, परिहरीय परनार तो॥३॥ गोमेघ नामे यत भलो ए, देवी श्री अनिका नाम तो । शामन मानिध्य जे करे ए, करे नली धर्मना काम तो ॥ तपगन्छ नायक गुग्णनीलो ए, श्री विजय सेन मरिराय तो । मृपमदास पाय सेवता ए, मफ्ल करो अवतार तो अष्टमी की स्तुनि मंगल माठ करी जम आगल, भाव धरी सुररान जी, श्राट जातिना ग्लश भरीने, नागवे जिनराज जी। चीर जिनेश्वर जन्म महोत्सर करता गित सुसमाधेजी, पाठमनो तपसरता श्रम घर, जगल कमला पाये जी ॥१॥ अष्ट काम चयरि गज गजन, अष्टापद पर लिया जी, पाठमे पाठ मुम्प विचारी, मद पाठे तम गलिया जी, अष्टमी गति से पहोता जिनार, परम पाठ नहीं यग जी, ,

( ११० )
-
।। श्री बीश स्थानक पद की स्तुति ।।
पूछे गौतम वीर जिणंदा, समवसरण वेठा सुखकंदा, पूजित
अमर सरिंदा । केम निकाचे पद जिनचंदा, किणविध तप
करतां भव फंदा, टले दुरितह दंदा ।। तब भाखे प्रभुजी गन
निंदा, सुण गौतम वसुभृति नंदा, निर्मल तप अरविंदा ।
वीश स्थानक तप कर महंदा जिम तारक समुदाये चंदा, तिम
ए तप सवि इंदा ||१|| प्रथम पदे अरिहंत भणीजे, बीजे
सिद्ध पबयण पद त्रीजे, प्राचारज थेर ठवीजे । उपाध्याय ने
साधु ग्रहीजे नाणदंसण पद विनय यहीजे, अगियारमे चारित्र
लहीजे ।। भवयधारिणं गणोजे, किरियाणं तबस्स करीजे,
गोयम जिणाणं लहीजे । चारित्र नाण श्रु त तित्यस्स कीजे
त्रीजे भन तप करत सुणीज, ए सबि जिन तप लीज ||२||
आदि 'नमो' पद सघले ठवीश, बार पनर बत्ती बार छत्रीश,
दश पणवीश सावीश, | पांच ने सडसठ तेर गणीश,
सित्तेर नव किरिया पचनीश, बार अट्टावीश चोवीस ।।
सतरा एकावन पीस्तालीश पांच लोगस्स काउस्सग्ग
रहीश, नवकारवाली वीश । एक एक पदे उपचास ज वीश,
मास छए एक अोली करीश, एम सिद्धांत जगीश।।३।।
शक्ते एकासणु तिविहार, छट्ट अट्ठम मासखमण उदार,
पडिकमणु दोय वार । इत्यादिक विधि गुरुगम धार, एक
पद अाराधन भव पार, उजमणु विविध प्रकार ॥ मातंग

यन पर मनोहार, देवी सिद्धार शामन रसपाल, मित्र मिटापण हार । सीमाविजय जन उपर प्यार, शुभ भरियण धौ याचार, वीरविजय जयकार in दीवाली की स्तुति मनोहर मूर्ति महातीर नगी, जिणे सोल पहोर देशना पमणी । नर मल्ली नर लन्डी नृपति सुणी, कही शिव पाम्या त्रिभुवन धगी ॥१॥ गिर पहोता पम चउदय भाने, गनीमलया गिर माम थिते । बहे गिर पाम्या वीर चली,कार्तिक वही अमापम्पा निर्मली ॥२॥ आगामी मानी मार या, दीपाली रन्पे पेह लगा। पुण्य पाप फल अमरगे रा, मरी नहनि कर्गने मया ॥३॥ मनी दर मिली उद्यान करे, परमाने गौम मान बगे। धानरिमन मदगुग पिम्ना, निशागनमा जयकार करे ॥२॥ श्री उपरान की स्तुति । वीर जिनेवर उपटिंग, मामला भरि मुजाग नो. उपनदिना नरकातो, गगयो श्रीनाकारी। गाय गुपोगी, मीर मुद्र उपचान नो गिपानी मानापन, नही मुगुरु पारनामा पगमगलागी गए पहेनु पान तो प्रनियम" जाए चीन उपरानना। FINTEMBER - होम ११२) चैत्य स्तवननु मानीये ए, ए चोथ उपधान नोः मवी तीर्थकर इम भणे ए, उपधान करो बहुमान नो ||२|| श्रुतस्तबर सिद्धस्तव३ ए, छट्ट वही उपवान तोः शक्रस्तवन जाये ए. धरीये तृतीय ध्यान तो । नाम स्तव लोमान जांच शुभ उपधान तोः श्री महादेशीय सूत्रमा ए भाव्यु श्री जिनराज तो ॥३॥ महा महोतवि.यावीय ए, श्री गुरुवरनी पास तो: नांद भंडारीदाठसुंए, पधरीबी जिनराज तो । श्रीफल सू चडोवीये ए, माणिक्यादि मार नो, संम्यग् दृष्टि मुवि समीर रेली-सिद्धायी सहाय तो ॥४|| चैत्री पूनम की स्तुति | पु'डरीक पंडण पाय प्रणमी जे, आदीश्वर चिनचंदाजी। नेमि विना त्रेवीश तीर्थकर, गिरि चढिया आणदा जी ॥ आगममाहे पुंडरीक महिमा, भाख्यो ज्ञान दिणंदाजी ॥ चैत्री पूनम दिन देवी चक्केसरी, सौभाग्य द्यो सुखकंदाजी॥११॥ १ अरिहंत चेइयाणं० अन्नत्य । २ पुषवरवर । ३ सिद्धाणां- बुद्धाणं । ४ नमुत्थुणं । ॐ यह स्तुति (थुई ) चार वखत भी कह सकते हैं। समाप्त

Trikal-devvandan Vidhi Samayik Poshad Vidhi Sahit

Author
Kochar Ratanchand
Title
Trikal-devvandan Vidhi Samayik Poshad Vidhi Sahit
File name
Trikal-devvandan Vidhi Samayik Poshad Vidhi Sahit
Text
OCR done
Citation
1950
Published
2011/02
Publisher
Jaipur, Shri Jinvani Prachar Granthavali
Language
Sanskrit
Pages
103
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
549869
Barcode
99999990030714.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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