Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Uktiratnakar
Front matter
राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर umana donary • राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्थापित राजस्थानमें प्राचीन साहित्यके संग्रह, संरक्षण, संशोधन और प्रकाशन कार्यका महत् प्रतिष्ठान राजस्थानका सुविशाल प्रदेश, अनेकानेक शताब्दियोसे भारतका एक हृदयस्वरूप स्थान बना हुआ होनेसे विभिन्न जनपदीय सस्कृतियोका यह एक केन्द्रीय एवं समन्वय भूमि सा संस्थान बना हुआ है। प्राचीनतम आदिकालीन वनवासी भिल्लादि जातियोके साथ, इतिहासयुगीन आर्य जातिके भिन्न भिन्न जनसमूहों का यह प्रिय प्रदेश वना हुआ है। वैदिक, जैन, बौद्ध, शैव, भागवत एवं शाक्त आदि नाना प्रकारके धार्मिक तथा दार्शनिक सप्रदायोके अनुयायी जनोका यहा स्वस्थ और सहिष्णुतापूर्ण सन्निवेश हुआ है। कालक्रमानुसार मौर्य, शक, क्षत्रप, गुप्त, हूण, प्रतिहार, गुहिलोत, परमार, चालुक्य, चाहमान, राष्ट्रकूट आदि भिन्न भिन्न राजवशोकी राज्यसत्ताएं इस प्रदेशमें स्थापित होती गई और उनके शासनकालमें यहाकी जनंसस्कृति और राष्ट्र पम्पत्ति यथेष्ट रूपमें विकसित और समुन्नत वनती रही। लोगोंकी सुख-समृद्धिके साथ विद्यावानोकी विद्योपासना भी वैसी ही प्रगतिशील बनी रही, जिसके परिणाममें, समयानुसार, सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश और देश्य भाषाओमें असंख्य ग्रन्थोकी रचनारूप साहित्यिक समृद्धि भी इस प्रदेशमे विपुल प्रमाणमे निर्मित होती गई। इस प्रदेशमें रहनेवाली जनताका सास्कृतिक और आध्यात्मिक अनुराग अद्भुत रहा है, और इसके कारण राजस्थानके गाव-गावमे आज भी नाना प्रकारके पुरातन देवस्थानों और धर्मस्थानोंका गौरवोत्पादक अस्तित्व हमे दृष्टिगोचर हो रहा है। राजस्थानीय जनताके इस प्रकारके उत्तम सास्कृतिक आध्यात्मिक अनुरागके कारण विद्योपासक वर्गद्वारा स्थान-स्थान पर विद्यामठों, उपाश्रयों, आश्रमों और देवमन्दिरोमे वाङ्मयात्मक साहित्यके सग्रहरूप ज्ञानभण्डार-सरस्वतीभण्डार भी यथेष्ट परिमाणमें स्थापित थे। ऐतिहासिक उल्लेखोके आधारसे ज्ञात होता है कि राजस्थानके अनेकानेक प्राचीन नगर - जैसे घाट, भिन्नमाल, जावालिपुर, सत्यपुर, सीरोही, वाहडमेर, नागौर, मेडता, जैसलमेर, सोजत, पाली फलोदी, जोधपुर, बीकानेर, सुजानगढ, भटिंडा, रणथंभोर, माडल, चितौड, अजमेर, नराना, आमेर, सागानेर, किसनगढ, चूरू, फतेहपुर, सीकर आदि सेकडो स्थानोंमें, अच्छे अच्छे ग्रन्यभण्डार विद्यमान थे। टन भण्डारोम सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और देश्य भाषाओमें रचे गये हजारो ग्रन्थोंकी हस्तलिखित, मल्यवान पोथिया सगृहीत थी। इनमें से अब केवल जैसलमेर जैसे कुछ-एक स्थानोंके ग्रन्यभण्डार ही किसी प्रकार सुरक्षित रह पाये हैं । मुसलमानों और इंग्रेजो जैसे 'विटेशीय राज्यलोलुपोंके संहारात्मक आक्रमणोके कारण, हमारी वह प्राचीन साहित्य-सम्पत्ति बहुत कुछ नष्ट हो गई । जो कुछ बची-खुची थी वह भी पिठले १००-१५० वपाके अन्दर, राजस्थानसे वहार- काशी, कलकत्ता, बम्बई, मद्रास, बगलोर, पूना, बडौदा, अमदावाढ आदि स्थानोंमे स्थापित नूतन साहित्यिक सस्थाओंके संग्रहोंमे वडी तादादी जाती रही है। और तदुपरान्त युरोप एवं अमेरिकाके भिन्न भिन्न ग्रन्थालयोंमें भी हजारों अन्य राजस्थानसे पहुंचते रहे हैं । इस प्रकार यद्यपि राजस्थानका प्राचीन साहित्य भण्डार एक प्रकारसे अब खाली हो गया है, तथापि, खोज करने पर, अव भी हजारों अन्य यत्रतत्र उपलब्ध हो रहे हैं जो राजस्थान के लिये नितान्न अमूल्य नित्रि स्वरूप हो कर अत्यन्त ही सुरक्षणीय एवं सग्रहणीय हैं। ।
हर्ष और सन्तोषका विषय है कि राजस्थान सरकारने हमारी विनम्र प्रेरणासे प्रेरित हो कर, इस राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर (राजस्थान ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्टीटयूट) की स्थापना की है और इसके द्वारा राजस्थानके अवशिष्ट प्राचीन ज्ञानभण्डारकी सुरक्षा करनेका समुचित कार्य प्रारंभ किया है। इस कार्यालय द्वारा राजस्थानके गाव-गावमें ज्ञात होने वाले ग्रंथोकी खोज की जा रही है और जहा कहाँसे एवं जिस किसीके पास उपयोगी अन्य उपलब्ध होते हैं उनको खरीद कर सुरक्षित रखनेका प्रवन्ध किया जा रहा है। सन् १९५० में इस प्रतिष्ठानकी प्रायोगिक स्थापना की गई थी, और अब पिछले वर्ष, १९५६ के प्रारंभसे, सरकारने इसको स्थायी रूप दे दिया है और इसका कार्यक्षेत्र भी कुछ विस्तृत बनाया गया है । अब तकके प्रायोगिक कार्य के परिणाममें भी इस प्रतिष्ठानमें प्राय. १०००० जितने पुरातन हन्तलिखित ग्रन्थों का एक अच्छा मूल्यवान संग्रह संचित हो चुका है । आशा है कि भविष्यमें यह कार्य और भी अधिक वेग धारण करता जायगा और दिन-प्रति-दिन अधिकाधिक उन्नति करता जायगा। १ जिस प्रकार उक रूपसे इस प्रतिटानके प्रस्थापित करने का एक उद्देश्य राजस्थानकी प्राचीन साहि- त्यिक संपत्तिका सरक्षग करनेका है वैसा ही अन्य उद्देश्य इस साहित्यनिधिके बहुमूल्य रत्नस्वरुप ग्रन्थोको प्रकाशमें लानेका भी है। राजस्थानमे उक्त स्पमे जो प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, उनमे सेकडो ग्रन्थ तो ऐसे है जो अभी तक प्रकागमें नहीं आये हैं; और सेफडो ही ऐसे हैं जिनके नाम तक भी अभी तक विद्वानोको नात नहीं है । यह सब कोई जानते है कि इन ग्रन्थोमे हमारे राष्ट्रके प्राचीन सास्कृतिक इतिहासकी विपुल साधन-सामग्री छिपी पड़ी है। हमारे पूर्वज हजारो वो तक जो ज्ञानार्जन करते रहे उसका निष्कर्ष और नवनीत नीकाल नीकाल कर, वे अपनी भावी सन्ततिके उपयोगके लिये इन ग्रन्था- त्मक कृतियोंमे सचित करते गये । व्याकरण, कोष, काव्य, नाटक, अलंगार, छन्द, ज्योतिष, वैद्यक, कामविज्ञान, अर्थशास्त्र, शिल्पकला आदि लौकिक विद्याओके ज्ञानके साथ श्रुति,रमृति, पुराण, धर्मसूत्र, न्याय, वैशेषिक, साख्य, योग, मीमासा, जैन, बौद्ध, शाक्त, तंत्र, मंत्र आदि धार्मिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विद्याओके रहस्य भी इन ग्रन्थोमें नाना वरूपोंमे ग्रथित-किये हुए हैं । इसी प्रकार, युग युगमें होने वाले अनेक शर-वीर, दानी-ज्ञानी, सन्त-महन्त, त्यागी-वैरागी, भक्त-विरक्त आदि गुण विशिष्ट नर-नारी जनोके जीवन और कार्योंके विविध वर्णन -चित्रण भी इन्ही ग्रन्थोंमें अन्तर्निहित हैं। अर्थात् हमारे राष्ट्रकी सर्व प्रकारकी गौरव-गरिमाविषयक कथा-गाथाकी रक्षा करने वाला हमारा यही एकमात्र प्राचीन साहित्यसंग्रह है। इसीके प्रकाशसे संसारमें भारतका गुरुपद ज्ञात हुआ और स्थापित हुआ है । यद्यपि आज तक इनमेंसे हजारो ही प्राचीन ग्रन्थ, प्रकाशमें आ चुके हैं, फिर भी हजारों ही ऐसे ग्रन्थ और वाकी हैं जो अन्ध- कारके तलघरमें दटे पड़े हैं। इनका उद्धार करना और इन्हे प्रकारामें रखना यह अव इस नूतन जीवन प्राप्त नव्य भारतके प्रत्येक व्यक्ति और सस्थाका परम कर्तव्य है। इसी कर्तव्यको लक्ष्य कर, इस संस्था द्वारा ‘राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला' के प्रकाशन का आयोजन भी किया गया है । इसके द्वारा सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और देश्य भापाओंमें निबद्ध विविध विषयोके प्राचीन ग्रन्थ, तज्ज्ञ एवं सुयोग्य विद्वानोंसे सशोधित और संपादित हो कर प्रकाशित किये जा रहे हैं । अब तक कोई छोटे बडे २० ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं और प्राय ३० से अधिक ग्रन्थ प्रेसोंमें छप रहे हैं। राजस्थान सरकार वर्तमानमें, इस कार्यके लिये प्रतिवर्ष २०००० रूपये खर्च कर रही है-पर हमारी कामना है कि भविष्यमें यह रकम वढाई जाय और तदनुसार अधिक संख्या में इन प्राचीन ग्रन्थोका समुद्धार. और प्रकाशन कार्य किया जाय। साहित्यका प्रकाश ही प्रजाके अज्ञानान्धकारको नष्ट कर, उसे दिव्यताका दर्शन कराता है। माघ शुक्ला १४, वि० सं० २०१३, (जीवनके ७० वें वर्षका प्रथम दिन ३} मुनि जिन विजय [३ राजस्थान पुरातन ग्रन्थमालाके कुछ ग्रन्थ प्रकाशित ग्रन्थ ३ करुणामृतप्रपा-ठकुर सोमेश्वर ४ वालशिक्षाव्याकरण-ठकुर संग्रामसिंह संस्कृत ५ पदार्थरत्नमलपा-पं० कृष्णमिश्र १ प्रमाण मञ्जरी-तार्किक चूडामणि सर्वदेवा- चार्य प्रणीत । तीन व्याख्याओसे समलंकृत। ६ काव्यप्रकाश, संकेत- भट्ट सोमेश्वर ७ वसन्तविलास - फागु काव्य २ यन्त्रराजरचना-जयपुर नरेश महाराज ८ नृत्यरत्नकोश-राजाधिराज कुंभकर्ण देव सवाई जयसिंह समारचित । १ महर्पिकुलवैभवम् - विद्यावाचस्पति स्व. ९ नन्दोपाख्यान - संस्कृत और राजस्थानी श्रीमधुसूदन ओझाविरचित । १० रनकोश-विविधवस्तुसंग्रह विचारात्मक ४ तर्कसंग्रह-फकिका - पं० क्षमाकल्याणकृत। ११ चान्द्रव्याकरणम् - आचार्य चन्द्रगोमि ५ कारकसंवन्धोद्योत-पं० रभसनन्दिकृत । १२ स्वयंभू छंद-स्वयंभू कवि ६ वृत्तिदीपिका-पं० मौलिकृष्णभट्ट कृत । १३ प्राकृतानन्द-कवि रघुनाथ ७ शब्दरत्नप्रदीप- संक्षिप्त संस्कृत शब्दकोप। १४ मुग्धाववोध आदि औक्तिक संग्रह ८ कृष्णगीति-कवि सोमना यकृत गीतिकाव्य। १५ कविकौस्तुभ-पं० रघुनाथ मनोहर ९ शंगारहारावलि-हर्षकवि विरचित । १६ दुर्गापुप्पांजलि-पं० दुर्गाप्रसादजी १० चक्रपाणिविजयमहाकाव्य-पं० लक्ष्मी- १७ दशकण्ठवधम् - धरभट्ट रचित । १८ कर्णकुतूहल नाटक ११ राजविनोद काव्य-कवि उदयराज रचित। १९ कृष्णलीलामृत काव्य १२ नृत्तसंग्रह-नाट्यविषयक पठनीय ग्रन्थ । १३ नृत्यरत्नकोश- महाराणा कुम्भकर्ण प्रणीत । राज्यस्थानी भाषाग्रन्थ १४ उक्तिरताकर-पण्डित साधुसुन्दरगणी कृत। १ वांकीदासरी वाता- चारणकवि वांकीदास १५ कविदर्पण -प्राकृत छन्दोरचनात्मक ग्रन्थ । २ मुंहता नैणसीरी ख्यात-जोधपुरके १६ वृत्तजातिसमुच्चय-विरहाङ्क कवि कृत । मुंहता नेणसी लिखित १७ ईश्वरविलास महाकाव्य-पं० कृष्णभट्ट ३ गोरा वादल-पदमिणी चउपई - जैन कविकृत। यति कवि हेमरतन कृत राजस्थानी भाषा ग्रन्थ ४ राठोड वंशरी विगत-राठोडोंके १ कान्हड दे प्रवन्ध-कवि पद्मनाभ रचित । इतिहासकी कथाएं। २ क्यामखां रासा-मुस्लिम कवि जानकृत । ५ राजस्थानी साहित्य संग्रह - राजस्थानी ३ लावारासा-चारणकविया गोपालदानकृत । भाषा मे लिखित विविध वृत्तान्त । प्रेसोंमें छप रहे ग्रन्थ ६ दाढाला एकल गिडरी वात-राजस्थानी भाषाकी एक सरस प्रहसनात्मक रचना । (क) संस्कृत ग्रन्थ ७ सुजान संवत- कवि उदयराम रचित १ त्रिपुराभारती- लघुपंडित ८ चन्द्रवंशावलि-कवि मतिराम कृत २ शकुनप्रदीप - लावण्य शर्मा ९ राजस्थानी दूहा संग्रह इन ग्रन्थोंके अतिरिक्त अनेकानेक संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, प्राचीन राजस्थानी - हिन्दी भापामें रचे गये ग्रन्थोंका संशोधन - संपादन आदि कार्य किया जा रहा है। इसी तरह राष्ट्र - भाषा हिन्दीमें भी उच्च कोटिके ग्रन्थोंके प्रकाशनका आयोजन चल रहा है।
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान संपादक-पुरातत्त्वाचार्य, जिनविजय मुनि
[सम्मान्य संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर]
,
1
साधुसुन्दर गणी विरचित
उक्ति रत्नाकर
xxxx प्रकाशक xxxx
राजस्थान राज्य संस्थापित
राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
जयपुर (राजस्थान)
उक्तिरत्नाकर-अनुक्रम
पृ. १-४५
४६-५८
१ उक्तिरत्नाकर
२ अज्ञात विद्वत्कर्तृक उक्तीयक
३ अज्ञात विद्वत्संगृहीतानि
पुरातन औक्तिक पदानि
४ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत शब्दानुक्रम
५९-८२
८३-११८
"
प्रस्तावना , स्व-संपादित 'सिंघी जैन ग्रन्थमाला में हमने एक 'उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण' नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया है, जिसकी भूमिकामें निम्न प्रकारका उल्लेख किया है - "महात्मा गांधीजीके मुख्य नेतृत्वमें स्थापित अहमदावादके राष्ट्रीय गुजरात विद्यापीठके 'पुरातत्त्व मन्दिर' नामक विशिष्ट विभागके आचार्यपद पर, सर्व प्रथम, जब मेरी विशिष्ट नियुक्ति हुई, तभीसे मैंने औक्तिक प्रकारके साहित्यका संकलन करना निश्चित किया था और यथाशक्य उसको प्रकाशमें लानेका प्रयत्न चलाया था। ई. स. १९२३-२४ के अरसेमें, मैं एक वार पाटण गया और वहाँसे कुछ अन्यान्य औक्तिक प्रकरणों के प्राचीन आदर्श प्राप्त किये । उक्त गुजरात पुरातत्त्व मन्दिर के तत्वावधानमें संस्कृत, प्राकृत, पाली, अपभ्रंश आदि भारतीय प्राचीन भाषाओंके, उच्चकोटीय अध्ययनके साथ, गुजराती भाषाके प्राचीन इतिहास और साहित्यके अध्ययनकी भी विशेष व्यवस्था की गई थी। उसके पाठ्यक्रममें आवश्यक ऐसे एक सन्दर्भ ग्रन्थका संकलन करनेकी दृष्टि से 'प्राचीन गुजराती गद्य संदर्भ' के नामसे एक संग्रहात्मक ग्रन्थ मैंने तैयार करना प्रारंभ किया, जिसमें वि. सं. १३०० से ले कर १६०० तकके ३०० वर्षोमें लिखे गये, प्राचीन गुजराती (अर्थात् पश्चिमी-राजस्थानी) भापाके चुने हुए उद्धरणोंका एक अच्छा प्रमाणभूत संग्रह संकलित करनेका उद्देश्य रखा था। इसके लिये मैंने बहुत कुछ आधारभूत सामग्री एकत्र करनी शुरू की। पाटण, अहमदाबाद आदिके भण्डारोंमें प्राप्त प्राचीन ताडपत्रीय एवं वैसी ही प्राचीन कागजीय पुस्तकोंमे, यत्र तत्र उपलब्ध फुटकल गद्य उद्धरणोंके साथ, कुछ स्वतंत्र प्रकरणरूप कृतियोंका भी मैंने संग्रह किया ।" इत्यादि । इन प्रकरणरूप कृतियोंमें, प्रस्तुत 'उ क्ति र ना क र' भी एक थी, जो अब इस प्रकार, 'राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला' द्वारा प्रकाशित हो रही है। इस ग्रन्थकी सर्वप्रथम प्रतिलिपि पाटणके भण्डारमेसे प्राप्त प्राचीन पोथी परसे उसी समय कराई गई थी। इसका मुद्रण कार्य प्रारंभ करनेका निश्चय होने पर बीकानेरके जैन भण्डारमेसे भी एक अन्य प्रति, श्रीयुत अगर चन्दजी नाहटा द्वारा प्राप्त हुई। अन्यान्य ग्रन्थसंग्रहोंमें भी इस ग्रन्थकी प्रतियां उपलब्ध होती है, अतः ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक प्रसिद्ध एवं पठनोपयोगी ग्रन्थ रहा है। इस ग्रन्थके कर्ता साधुसुन्दर नामक जैन यतिजन हैं जो बहुत करके राजस्थान निवासी थे। इनके गुरु साधुकीर्ति पाठक-पदधारी यतिवर्य थे जो बहुत बडे पण्डित और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। प्रस्तुत ग्रन्थकारने अपने गुरुके विषयमें, ग्रन्थान्तकी प्रशस्ति में कहा है कि 'इनने यवनपति (बादशाह अकबर ) की सभामें, अन्यान्य पन्थोंके पंडितोंके इस प्रतिके अन्तमें निम्न प्रकार लिपिकारका परिचायक उल्लेख किया हुआ है- 'संवत् १७५० वर्षे आषाढ सुदि ८ दिने बुधवारे पं. कनकवल्लभ लिपीकृतम् । शिष्य अमीचन्द शिष्य कृष्णानै लिपिकृत दत्तम् । श्रीरस्तु लेखकपाठकयोः।' 1 ६ प्रस्तावना साथ वाद-विवाद करनेमें खूब ख्याति प्राप्त की थी; इस लिये बादशाहने इनको 'वादिसिंह'- का इल्काब प्रदान किया था। ये हजारों शास्त्रोंका सार जानने वाले असाधारण विद्वान थे- इत्यादि । ग्रन्थकार साधुसुन्दरका बनाया हुआ 'धातुरनाकर' नामका एक अन्य बहुत वडा संस्कृत ग्रन्थ उपलब्ध होता है जिसमे संस्कृतके प्रायः सब धातुओंका संग्रह किया गया है और उनके रूपाख्यानोंका विशद आलेखन किया गया है । वह धातुरत्नाकर वि० सं० १६८० में वन कर पूर्ण हुआ था। इनकी बनाई हुई एक संस्कृत स्तुति भी प्राप्त होती है जिसमें जैसलमेरके किले में प्रतिष्ठित पार्श्वनाथ जैन तीर्थंकरकी स्तवना की गई है । यह स्तुति वि० सं० १६८३ में बनी है। इससे साधुसुन्दर गणिका जीवन- समय विक्रमकी १७ वीं शताब्दीकी अन्तिम पचीसी निश्चित होता है। इन्हीं साधुसुन्दरके एक शिष्य उदयकीर्ति नामक यति थे जिनने विमल- कीर्तिकी बनाई हुई 'पदव्यवस्था' नामक ग्रन्थकृति पर वि. सं. १६८१ में, व्याख्या की है । इससे यह भी ज्ञात होता है कि ग्रन्थकर्ताकी गुरु-परंपरा एवं शिष्य-परंपरा दोनों ही विद्याकी उपासनामें दत्तचित्त थीं। ग्रन्थगत विषयका अवलोकन करनेसे विद्वानोंको ज्ञात होगा कि ग्रन्थकारने, अपनी देश-भापामे प्रचलित, देश्य-स्वरूपवाले शब्दोंके संस्कृत प्रतिरूपोंका ज्ञान करानेकी दृष्टि से इसका संकलन किया है। भारत महाराष्ट्रकी सर्व काल एवं सर्व देश व्यापिनी प्रधान साहित्यिक भाषा संस्कृत रही है। भारतीय वाङ्मयके इतिहासके आदि युगसे ले कर वर्त- मान समय तक, संस्कृतकी प्रतिष्ठा और प्रभुता अक्षुण्ण रही है । वीच-बीचमे कालक्रमानु- सार, संस्कृतके सन्तत प्रवाहके साथ साथ, उससे उत्पन्न एवं उससे सहकारप्राप्त मागधी, शौरसेनी, पैशाची, महाराष्ट्री आदि अनेक प्राकृत भाषाओंका प्रादुर्भाव हो कर धीरे धीरे उनका विकास होता गया। फिर बादमे उनका स्वरूपान्तर हो कर, उनके स्थानमे तत्तत देशीय अपभ्रंश भाषाओंका-जिनको मध्यकालीन वैयाकरणोंने 'देश्यभाषा' के सर्व-सामान्य नामसे उल्लिखित किया है-आविर्भाव हुआ। भारतके समग्र उत्तरापथकी वर्तमान प्रादेशिक भापाएं-हिन्दी, बंगाली, मराठी, पंजाबी, सिंधी, राजस्थानी (-गुजराती, मारवाडी, मालवी) आदि लोकभापाएं उसी अपभ्रंशके नूतनखरूपप्राप्त-विकसित भापा विभाग हैं। इन भापाओंमे, सेंकडों ही संस्कृत मूल शब्द, भिन्न भिन्न देश और जातिके लोगोंके पारस्परिक संपर्कके कारण, उच्चारण-भेद एवं व्यवहार-भेद द्वारा, अन्याकार खरूपको प्राप्त होते गये । खास करके संस्कृतके जिन मूल शब्दोंमे संयुक्ताक्षर अधिक होते हैं उन शब्दोंके प्राकृत-अपभ्रष्ट रूप विशेष रूपमें परिवर्तित होते रहे । स्वयं 'संस्कृत' शब्दका रूपान्तर 'संखय' 'सक्कय' 'संगड' आदि और प्राकृत शब्दका रूपान्तर 'पागय' 'पाइय' 'पायर्ड' आदिके रूपमें परिवर्तित हो गया । 'उपाध्याय' शब्दका अपभ्रष्ट रूप, 'ओझा' 'झा' 'वझे आदि बन गया । संस्कृत शब्दोंके ये प्राकृत - अपभ्रष्ट रूप, किस प्रक्रिया द्वारा बनते गये, इसका विचार प्राकृत-अपभ्रंशके व्याकरण ग्रन्थोंमे बहुत कुछ किया गया उक्तिरत्नाकर ७ है । जिन व्यक्तियोंको संस्कृत एवं प्राकृत भाषा-साहित्यका विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करना अपेक्षित होता है वे तो इन भाषाओंके व्याकरण ग्रंथोंका यथायोग्य अध्ययन द्वारा ही उसे प्राप्त करनेका प्रयत्न करते रहते हैं। पर जो व्यक्ति सामान्य रूपसे, देश्य भाषा और संस्कृत भापाका, व्याकरणकी दृष्टिसे परस्पर कितना साम्य है और कितना विभेद है; तथा जो शब्द देश्य रूपमें लोकप्रचलित हो कर, संस्कृत रूपसे भिन्नाकार दिखाई देते हैं, उनका संस्कृत प्रतिरूप कैसा होता है- यह बात जानना चाहते हैं उनके लिये, संक्षेपमे कुछ अवबोध करने करानेकी दृष्टिसे, पूर्व कालीन विद्वानोंने औक्तिक संज्ञावाले ग्रन्थों-प्रकरणोंकी फुटकर रचनाएं की हैं। इन रचनाओंमें सबसे प्राचीन कृति जो हमे उपलब्ध हुई है, वह उक्त सिंघी जैन ग्रन्थमालामें प्रकाशित 'उक्तिव्यक्ति प्रकरण है। हमारे मतानुसार विक्रमकी १२ वीं शताब्दीके अन्त भागमें उसकी रचना हुई होगी। उस ग्रन्थका कर्ता दामोदर पण्डित उत्तर प्रदेशके बनारस नगरका रहने वाला था। उसने वनारसके बाल विद्यार्थियोंको, अपने समयमें प्रचलित बनारसकी देश्य भापाका अर्थात् तत्कालीन जनपदीय भापाका, व्याकरणकी दृष्टिसे संस्कृत भापाके साथ कैसा संबन्ध है और किस प्रकार देश्य शब्दोंका संस्कार करनेसे संस्कृतका शुद्ध रूप बनता है - यह बतानेके लिये, उस ग्रन्थकी रचना की है। बनारसकी गणना उस समय कोशल देशकी राजधानीके रूपमें होती थी, अतः विद्वानोंने वहांकी लोकभाषाका नाम कोशली रखना उचित समझा है । उस ग्रन्थकी प्रस्तावनामें इस विषयके बारेमें हमने जो उल्लेख किया है, उसे यहां संबन्धित समझ कर, उद्धृत किया जाता है- "इस ग्रन्थमें इस प्रकार केवल प्राचीन कोशली भाषाका नमूना ही हमें नहीं मिल रहा है - परंतु उसके साथ, व्याकरण शास्त्र विषयक कई अन्य महत्त्वकी बातोंका भी इसमें उल्लेख है। ग्रन्थकार इसमें प्रयुक्त देश भाषाका कोई विशिष्ट नाम निर्देश नहीं करता है । वह इसे केवल, सामान्य रूपसे 'अपभ्रंश' के नामसे उल्लिखित करता है। उस समय, संस्कृत एवं प्रौढ प्राकृतके सिवा लोकव्यवहारकी प्रचलित देशभाषाके लिये विद्वान् जन अपभ्रंश नामका व्यवहार करते थे। अपने समयमें - अपने देशमें प्रचलित, लोकव्यवहृत अपभ्रंश भाषाका, संस्कृत व्याकरणकी पद्धतिसे किस प्रकारका संबन्ध है और किस प्रकार लोकभाषाके लोकरूढ उक्तियों शब्दप्रयोगो द्वारा संस्कृतके व्याकरणका आधारभूत स्थूल ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है - इसका विचार पण्डित दामोदरने इस ग्रन्थमें निबद्ध किया है। इसमे प्रयुक्त 'उक्ति' शब्दका अर्थ है 'लोकोक्ति' अर्थात् लोकव्यवहारमें प्रयुक्त भाषापद्धति; जिसे हम हिन्दीमें 'बोली' कह सकते हैं। लोकभाषात्मक 'उक्ति'की जो 'व्यक्ति' अर्थात् व्यक्तता स्पष्टीकरण- तत्संबन्धी विचारका विवेचन- इस ग्रन्थमे किया गया है अतः इसका नाम 'उक्तिव्यक्तिशास्त्र' रखा गया है।"
प्रस्तावना , "लोकभापामें प्रचलित अधिक शब्द, वास्तवमें तो प्रायः संस्कृत भापाके ही मूल शब्द हैं, परंतु पामरजन अर्थात् अपठित एवं अशिक्षित जनोंके अशुद्ध वागव्यापारके कारणसे, उन शब्दोंके वर्णो, अक्षरों आदिमे परिवर्तन हो हो कर, उनके मूल स्वरूपका भ्रंश हो गया अर्थात् वे शब्द अपने असली रूपसे भ्रष्ट हो गये। इसलिये इस लोक- व्यवहार में प्रचलित शब्दस्वरूपवाली भापाको पण्डित दामोदरने अपभ्रंश या अपभ्रष्ट नामसे उल्लिखित किया है, और किस तरह इन अपभ्रष्ट शब्दप्रयोगोंका, संस्कृतके व्याकरणनिवद्ध क्रिया, कारक, कर्म आदि उक्ति प्रकारोंके साथ, संवन्ध रहा है, उसका स्वरूपप्रदर्शन, इस ग्रन्थमे किया है। इसीलिये इसका दूसरा नाम 'प्रयोग प्रकाश ऐसा भी रखा गया है।" "ग्रन्थमे प्रतिपादित इस महत्त्वके विषय पर यहां अधिक लिखनेका अवकाश नहीं है। सद्भाग्यसे इस विषयके प्रतिपादक, इसी शैलिमें लिखे गये, अनेक छोटे वडे ग्रन्थ, हमे राजस्थान एवं गुजरातके प्राचीन ग्रन्थभण्डारों में से प्राप्त हुए हैं और उनके संग्रहात्मक ऐसे दो-तीन संग्रह-ग्रन्थ हम और प्रकाशित करना चाहते है। इनमेंसे, 'उक्तिरत्नाकर' आदि, ऐसी ही ४-५ कृतियोंका संग्रहस्वरूप, एक ग्रन्थ तो, राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्थापित एवं प्रकाशित तथा हमारे द्वारा संचालित एवं संपादित 'राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला मे शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है।" "इस प्रकारकी उक्तिव्यक्ति विषयक भिन्न भिन्न कृतियोंका और उनमें प्रथित भाषा विषयक सामग्रीका विस्तृत विचार, हम किसी अन्यतम ग्रन्थमें करना चाहते हैं। हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी, बंगाली आदि भारतीय-आर्यकुलीन-देशभाषाओंके विकास-क्रमके अध्ययनकी दृष्टिसे यह औक्तिक-साहित्य-संग्रह बहुत उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करेगा।" - इत्यादि उपर दिये गये उद्धरणमें जिन ४-५ कृतियोंका निर्देश सूचित किया गया है उनमें से प्रस्तुत संग्रहमें तो मुख्यतया साधुसुन्दर रचित 'उक्तिरत्नाकर' ही मुद्रित है। अन्य मुख्य रचनाएं, इसके द्वितीय भागके रूपमे छप रही हैं, जिनमें कुलमण्डन सूरिका बनाया हुआ 'मुग्धाववोध-औक्तिक' आदि संगृहीत हैं। साधुसुन्दर गणीने अपनी प्रस्तुत रचनामे, प्रारंभमें संस्कृत व्याकरणके षटकारक विपयक प्रकरणका निरूपण किया है। संस्कृत भापाका प्रारंभिक परिचय प्राप्त करने- वालेके लिये यह जानकारी प्रथम आवश्यक होती है कि कौन सी विभक्तिका प्रयोग किस अर्थमें किया जाता है । अतः प्राथमिक विद्यार्थियोंको विभक्तिके ज्ञानके साथ ही कारक अर्थों का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक रहता है। इस लिये इस प्रकारके जो औक्तिक प्रकरण रचे गये हैं उनमे प्रायः प्रथम कारक अर्थोंका निरूपण किया हुआ होता है। प्रस्तुत उक्तिरत्नाकरमे भी उसी शैली अनुसार प्रारंभमे कारक प्रकरण लिखा उक्तिरत्नाकर ९ गया है। बादमें प्रायः २४०० जितने देश्य शब्द और उनके संस्कृत प्रतिरूप बतलाने वाले शब्दोंका विशाल शब्दसंग्रह दिया गया है। प्रस्तुत संग्रहमें उक्तिरत्नाकरके बाद दो अन्य ऐसी ही पुरातन रचनाएं दी गई हैं। इनमें पहली रचनाका नाम सामान्य रूपसे 'उक्तीयक' ऐसा लिखा मिला है और दूसरी रचनाका नाम 'औक्तिकपदानि' ऐसा लिखा मिला है । इन रचनाओंके कर्ता या संग्राहकके नाम नहीं उपलब्ध हुए। जिन प्राचीन प्रतियों परसे इनका मुद्रण किया गया है वे प्रतियां विशेप प्राचीन हैं । अर्थात् उक्तिरत्नाकरके कर्ताके समयसे भी पूर्व लिखी गई ज्ञात होती हैं । इस प्रकारके और भी अनेक फुटकर संग्रह हमें प्राप्त हुए हैं जिनका प्रकाशन द्वितीय भागमें करना सोचा गया है । इन रचनाओंमें प्रतिपाद्य विषय तो एक ही प्रकारका होता है पर संकलन करनेकी शैली पृथक् पृथक् होती है। इसमें दी गई 'उक्तीयक'नामक रचनामें प्रारंभमें 'वर्तमानकालिक' धातुरूप दिये हैं। उसके बाद कृदन्तसाधित शब्द दिये हैं। तदनन्तर 'तव्य' प्रत्ययान्त शब्दरूप दिये गये हैं। वादमें सर्वनाम आदि शब्दोंका संग्रह दिया गया है। इसमें 'कारकविचार' प्रकरण नहीं दिया गया । 'औक्तिकपदानि' नामक रचनामें, प्रारंभमें 'कारकविचार' आलेखित किया गया है । साधुसुन्दर गणीने अपनी रचनामें 'कारकविचार' शुद्ध संस्कृतमें लिखा है तब इस रचनामें यह प्रकरण अपनी देश्य भाषामें लिखा गया है। कारकविचारके बाद, इसमें वर्तमान, भूत, भविष्य आदि 'कालविचार' दिया गया है। बादमें शब्दसंग्रह है। तदनन्तर क्रियावचन' दिये गये हैं। फिर 'कर्मणिवाक्य' प्रयोग हैं। इसके अनन्तर विभक्ति-अर्थ और उनके वाक्य-प्रयोग दिये हैं। फिर 'समासप्रकरण' दिया गया है और इसके बाद तद्धित शब्दोंका विचार किया गया है । अन्तमें क्रियाओंके प्रेरक रूप और सनन्त रूपोंका दिग्दर्शन कराया गया है। इस प्रकार इस रचनामे व्याकरणके मुख्य मुख्य सभी विषयोंका विवेचन दिया गया है। हमारे राष्ट्रके किसी भी प्रदेशकी मातृभाषा संस्कृत नहीं है । मातृभाषाएं तो तत्तत् प्रादेशिक भाषाएं हैं, जिनका स्वरूप वर्तमानमें संस्कृतसे बहुत कुछ भिन्न मालूम होता है। मनुष्यके ज्ञानके विकासका क्रम सर्व प्रथम मातृभाषा द्वारा शुरू होता है । मातृभाषा द्वारा ही प्राप्त शब्दज्ञानके आधार पर, मनुष्य अन्यान्य भाषाओंका ज्ञान प्राप्त करता रहता है, और उनके द्वारा वह अपनी ज्ञानसमृद्धि बढाता जाता है। हमारे देशकी सर्व प्रकारकी प्राचीन ज्ञानसमृद्धि, संस्कृत वाङ्मयरूप भंडारमें निहित है। हजारों वर्षोंसे हमारे पूर्वज अपने अनुभव और बुद्धिबलसे प्राप्त समग्र ज्ञानसमृद्धिको, इसी संस्कृत वाङ्मयके भण्डारमें अर्पण करते रहे हैं और इस लिये हमारा यह वाङ्मय भण्डार, संसारके अन्यान्य भाषाकीय प्राचीन ज्ञानभण्डारोंकी अपेक्षा, सबसे १० प्रस्तावना अधिक समृद्ध रहा है। आज भी इस भण्डारकी महत्ता और प्रतिष्ठा कम नहीं हुई है। अतः भारतके प्रत्येक विकासोन्मुख और संस्काराभिलाषी मनुष्यके लिये संस्कृत भाषाका ज्ञान प्राप्त करना परापूर्व कालसे, परम कर्तव्यरूप माना गया है । अन्य किसी प्रकारके विशेप ज्ञानके लिये न सही, पर, केवल वाणीकी शुद्धिके लिये-जिह्वाके सुसंस्कारके लिये-सुशब्द और कुशब्दका भेद समझनेके लिये ही, संस्कृत भाषाका अल्पखल्प भी परिचय प्राप्त करना परम आवश्यक माना गया है । इसी लिये हमारे पूर्वज यह एक अमूल्य शिक्षासूत्र बना गये हैं कि- यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् । मा भूत् वजनः श्वजनः, स्वराज्यमपि च श्वराज्यं यत् ।। हमारे पूर्वज हमें कह रहे हैं कि-हे पुत्रो ! यदि तुम कुछ अधिक न पढ सको, तो खैर, पर थोडा सा व्याकरण तो अवश्य ही पढना, जिससे तुम 'स्वजन'को 'श्वजन' और 'स्वराज्य' को 'श्वराज्य' कह कर अपशब्दभाषी मूर्ख नर बनने से वच सको।' जिनको थोडा सा भी शुद्ध भाषा ज्ञानका परिचय होगा, वे इस कथनके मर्मको ठीक समझ ही गये होंगे। इस प्रकार वाणीकी शुद्धि एवं ज्ञानकी वृद्धिके निमित्त संस्कृत भाषाका स्वल्पज्ञान प्राप्त करना भी परम हितावह है । इसी हितको उद्देश्य करके पूर्वकालीन विद्वानोंने प्रस्तुत कृतिके समान सामान्य मुग्धजनोंके बोधके लिये अपनी रचनाएं की हैं- 'उक्तीनां संग्रहं वक्ष्ये स्वान्ययोहितहेतवे।' उपर हमने सूचित किया है कि हमारी देश्य भाषाओं में हजारों ही मूल संस्कृत शब्दोंके, देश एवं काल आदिकी भिन्न भिन्न परिस्थितियों के कारण, विचित्र रूषान्तर हो गये हैं । कुछके अक्षर बदल गये, कुछके अर्थ बदल गये और कुछके उच्चार ध्वनि ही बदल गये हैं। ऐसे रूपान्तरित देश्य शब्दोंके संस्कृत प्रतिरूप क्या हैं, मुख्य तया यही प्रदर्शित करनेके लिये साधुसुन्दर गणीने इस रचनामें प्रयत्न किया है । जैसा कि हमने उपर सूचित किया है ग्रन्थकार प्रायः राजस्थान निवासी हैं अतः इन शब्दोंमे राजस्थान एवं उसके समीपवर्ति गुजरात, सौराष्ट्र, मालवा, सिंध, पंजाव आदि प्रदेशोंमें प्रचलित देश्य शब्दोंका अधिक संग्रह होना स्वाभाविक ही है । पर इनमें सेंकडों शब्द ऐसे भी मिलेंगे जो सुदूर पूर्वके एवं दक्षिणके देशोंमे भी प्रचलित होंगे । अतः हम आशा करते हैं कि यह संग्रह, भारतकी प्रादेशिक भाषाओंके तुलनात्मक अध्ययन करने वालोंकी दृष्टिसे, तथा राष्ट्र भाषाके पद पर प्रतिष्ठित नूतन भारतकी राष्ट्र-भारती हिन्दीके विकास एवं विस्तारके ज्ञानकी दृष्टिसे भी उपयोगी सिद्ध होगा। भारतीय विद्याभवन, बंबई मुनि जिन विजय, -- साधुसुन्दर गणी कृत उक्ति र त्नाकर
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पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत उक्ति रत्नाकर म ऍनमः स्मृत्वा श्रीभारती देवी गुरुपादांश्व भक्तितः। उक्तीनां सङ्ग्रहं वक्ष्ये खान्ययोहितहेतवे ॥१॥ तावत् तदुपयोगिविभक्तिखरूपं निरूप्यते । तत्र कर्तृकर्मकरण- सम्प्रदानापादानाधाररूपाणि षट् कारकाणि । सप्तमः सम्बन्धः। उक्ता- नुक्तभेदेन द्विधा षट् कारकाणि । तत्रोक्तेषु प्रथमैव विभक्तिः । अनुक्ते- ध्वनुक्रमेणैताः स्युः। कर्मणि द्वितीया । कर्तृ-करणयोस्तृतीया । सम्पदाने चतुर्थी । अपादाने पञ्चमी । आधारे सप्तमी । सम्बन्धे षष्ठी । इति संक्षेपेण विभक्तयः कथिताः । विस्तरोऽग्रेऽभिधास्यते। करोतीति कर्ता। स त्रिविधः-खतन्त्रः, हेतुकर्ता, कर्मकर्ता च । यो न परैःप्रेर्यते स स्वतत्रकती। यथा गौर्गच्छति । योऽन्यं कारयति स हेतु- कोच्यते । अनेककर्तृके मुख्यं कर्तारं प्रत्ययो वक्ति । यथा-राजा सूपकारे- णौदनं पाचयति।योनापरैःप्रयुक्तः परान् प्रेरयति स मुख्यः। यथा-राजा चैत्रेण श्रियं पोषयति । हेतुकर्ता बिधा-प्रेषकः, अध्येषकः, आनुकूल्य- भागी च । यः प्रभुत्वेन प्रेरयति स प्रेषकः। यथा-राजा सेवकैः संग्राम कारयति । यः सत्कारपूर्वकं प्रेरयति सोऽध्येषकः। यथा-श्रद्धावान् पुमान् गुरुं भोजयति । यो न प्रेषते नाध्येषते सोऽनुकूलभागी। चेतनाचेतन- त्वेनानुकूलभागी द्विधा । चेतनो यथा-पुत्रो जनकं हर्षयति । अचेतनो यथा-कारीषोऽग्निर्ब्राह्मणमध्यापयति । यदा कर्ता खव्यापारं कर्मण्या- रोपयति तदा कर्मकर्ता। यथा-पच्यते शालयः खयमेव । अत्र प्रस्तावाद- नुक्तभेदोऽपि कथ्यते । यथा - छात्रवृन्देन सरखती वन्द्यते । यत् क्रियते तत् कर्म । एतदनेकधा । निर्वयं-विकार्य-प्राप्यभेदेन त्रिधा । इष्टानिष्टानुभयभेदात् पुनस्त्रिधा। तथा अकथितं कर्म कर्तृकर्म चे। यत्पूर्वमसज्जायते जन्मना वा प्रकाश्यते तन्निय॑म् । असजायते यथा कारः कटं करोति । जन्मना प्रकाश्यते यथा-माता सुतं सूते । यत् सतो गुणान्तराधानात् प्रकृत्युच्छेदतो वा विकारं प्रतिपद्यते तद्विकार्यम् ।
पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत गुणान्तराधानात् यथा-वर्णकारः स्वर्णं कुण्डली कुरुते । प्रकृत्युच्छेदतो यथा-अग्निः काष्ठं दहति । यत्र क्रियाकृतो विशेषो नास्ति तत् प्राप्यम् । यथा-चाक्षुषः सूर्यं पश्यति । यदीप्सितं तदिष्टम् । यथा-वालो मृष्टान्न- मत्ति। यद् द्विष्टं सत्प्राप्यते तदनिष्टम् । यथा- अन्धः सर्वं लङ्घयति। यद्वा कण्टकान् मृगाति । यत्रेच्छाद्वेषौ न स्तस्तदनुभयम् । यथा-पान्थो ग्राम गच्छंस्तरोर्मूलान्युपसर्पति। दुहादीनां धातूनां प्रयोगे यद् द्वितीयं कर्म तद- कथितम् । तच यथा-गोपो गां पयो दोग्धि । मुख्य-गौणकर्मभेदमाह- यच्चोपज्युयमानं पयःप्रभृति तन्मुख्यं कर्म । यत्र निमित्तमपरं तद्गौणं कर्म । तच गोप्रभृति नीयमानं भारादि । नीवह्यादेर्धातुगणस्य प्रधानं कर्म। तत् तव्यादौ प्रत्यये उक्तसञ्जम् । यथा-देवदत्तेन भारो ग्रामं नेयः। दुहि याचि रुधि प्रच्छि भिक्षि त्रुवि शासि चिअर्थाः, नी वहि जि मोषि दण्डि मोदि कृषि मन्थि हृञ् प्रभृतयश्च धातवोऽपादानादिविधि बाधित्वा द्विकर्मका भवन्ति । यथा-मुनिः कृतकोपं शमं याचति । अविनीतं विनयं याचति । अत्र याचिरनुनयार्थो ग्राह्यस्तेनास्य भिक्ष्यर्थाद् भेदः । सत्ता शुद्धि समृद्धि वृद्धि शयन स्थानासन दीप्ति लज्जा जीवन रोदन हदन नृत्य प्रलाप क्रोध सन्तोष रुचि शोक दोष मरण स्पर्धा विहार भय मदोन्माद प्रमादाद्यर्थी अकर्मका धातवः । यदुक्तम् सत्ताशुद्धिसमृद्धिवृद्धिशयनस्थानासने भासने, लज्जा जीवनरोदने च हदने नृत्ये प्रलापे क्रुधि । सन्तुष्टौ रुचिशोकदोषमरणस्पर्धाविहारेषु च, ज्ञेयो धातुरकर्मको भयमदोन्मादप्रमादेषु च ॥१॥ सकर्मकाकर्मकयोर्लक्षणमिदम् -- यदा कर्तक्रियारूपपदद्वन्द्वात् पृथक किमपेक्षा स्यात् तदा सकर्मको धातुरन्यथा अकर्मकः । यदुक्तम्- कर्तृक्रियापदद्वन्द्वात् किमपेक्षा यदा पृथक् । तदा सकर्मको धातुर्विपरीतस्त्वकर्मकः॥१॥ अण्यन्तकर्ता ण्यन्तेषु कर्म स्यात् तत् कर्तृकर्म ज्ञेयम् । पुनरेष्वेव नी- खाद्यदिह्वाशब्दायक्रन्दिवर्जितेषु बोधाहारगतिशब्दकर्मनित्याकर्मकधातु- प्वेतद् भवति । यथा-आचार्यः शिष्यं तत्त्वं बोधयति । बोधार्थाः सामान्य- न ज्ञानार्थाः । इन्द्रियगम्यार्थी अपि दृश् घा स्पृश ध्यै स्मृ तुल्याश्च । मैत्री उक्तिरत्नाकर . भर्तारं रमणीं गमयति । अत्र गमिर्भजनार्थस्तेन न कर्तृकर्मत्वम् । विष्णुः पार्थ समरं गमयति । अत्र गत्यर्थ एव । नयत्यादिवर्जनम् । नयतेः प्राप- णोपसर्जनप्राप्त्यर्थत्वेन गत्यर्थत्वात् , खाद्यद्योराहारार्थत्वात्, हाशब्दा- यक्रन्दां च शब्दकर्मकत्वात् प्राप्ते कर्तृकर्मत्वे प्रतिषेधार्थम् । नयति भारं चैत्रः । नाययति भारं चैत्रेण मैत्रः। खादयति पिता पुत्रेण खाद्यम् । आदयत्यन्नं चैत्रेण मैत्रः। हाययति चैत्रं मैत्रेण देवदत्तः। शब्दाययति 'चैत्रं मैत्रेण देवदत्तः। क्रन्दयति चैत्रं मैत्रेण देवदत्तः । कर्मसंज्ञाप्रति- षेधात् खव्यापाराश्रयं कर्तृत्वमेव । वहेरसारथिकर्तृत्वे तथा भक्षरहिं- सायां च न कर्तृकर्मत्वम् । यथा- भूपतिर्भूत्येन भारं ग्रामं वाहयति । सारथिकर्तृत्वे तु कर्तृकर्मत्वमेव । यथा-सारथिरुक्षाणं सस्यं ग्रामं वाह- यति । चैत्री मैत्रेण मोदकान् भक्षयति । हिंसायां तु कर्तृकर्मत्वमेव । यथा-व्याधो गृहकुक्कुटं कीटकान् भक्षयते । हृक्रोः कर्ता णिगि वा कर्म भवति । यथा-खामी भृत्यं भृत्येन वा भारं ग्रामं हारयते । वणिक् कारं कारुणा वा कटं कारयते। दृश्यभिवाद्योः कर्ता आत्मनेपदे वा कर्म भवति। यथा-राजा लोकं लोकेन वाऽऽत्मानं दर्शयते। पिता पुत्रं पुत्रेण वा पूज्य- मभिवादयते । केचिच्चौरादिकस्याप्यभिवादेः कर्म वेच्छन्ति । अविवक्षि- तकर्मधातोरणि कर्तुर्णौ वा कर्मत्वम् । यथा-मैत्रेयश्चैत्रं चैत्रेण वा पाच- यते । पिता पुत्रेण पाचयति । आख्यात-समास-तद्धित-कृद्भिः कर्मण उक्तत्वं स्यात् । आख्यातेन यथा-कुम्भकारेण कुम्भः क्रियते । समा- सेन यथा-आरूढवानरो वृक्षः। तद्धितेन यथा-शत्यः शतिकश्च पटः। शतेन क्रीतः शत्यः शतिकश्च । कृता यथा-तैः कटः कृतः। अथवा एकस्य द्विकर्मणो धातोरुभयत्राप्युक्तत्वम् । बोधाहारार्थशब्दकर्मवतां णिगि सति पर्यायेणोभयत्राप्युक्तत्वम् । बोधार्थादीनां यथा-गुरुणा शिष्यो धर्म बोध्यते, शिष्यं वा धर्मो बोध्यते । दात्रा अतिथिः ओदनं भोज्यते, अतिथि वा ओदनो भोज्यते । गुरुणा शिष्यो ग्रन्थं पाठ्यते, शिष्यं वा ग्रन्थः पाव्यते । गत्यकर्मणां णिगि मुख्यं कर्म उक्तं स्यात् । यथा-तैमैत्री तैमैत्रो । षट् कारके तु णिगि प्रोक्तमन्यद्वा कर्म कर्मजःप्रत्ययो वक्ति । यथा-स तैमैत्रं ग्रामो गम्यः। तैमैत्रं मास आस्यते । क्रियाविशेषणस्यापि सकर्मकधातुषु नपुंसकत्वमेकत्वं कर्मत्वं च प्रयुज्यते । यथा-एषा ब्राह्मणी स्तोकं पचति सर्व खादयति च । कुम्भः शीघ्रमुत्पद्यते । गलिगौः सुखं जीवति । कर्मोपसंहारः कथ्यते । इत्येतत् प्राप्यं निर्वयं विकार्य चेति त्रिधा इष्टानिष्टानुभयभेदैर्नवधा स्यात् । तत्पुनःमधानेतरभेदाभ्यामष्टादशधा। इति संक्षेपेण कर्मप्रपञ्चो दार्शतः। ग्रामं गम्या, मासमास्यते पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत अथ करणम्।येन क्रियते तत् करणम् । तद् द्विधा-बाह्यमाभ्यन्तरं च । बाह्यं यथा-दात्रेण ब्रीहीन लुनाति । आभ्यन्तरं यथा-मनसा मेरे गच्छति । अस्य करणस्य कारकान्तरतः स्वकाङ्क्षया प्रकर्षो न । यथा-दात्रैः शस्त्रैर्नखैर्चयो लूनाः । तद्वहुधाऽपि । एष रुद्राय पशुं ददातीत्यर्थे कर्मणः करणसंज्ञा संप्रदानं च कर्म स्यात् । एष पशुना रुद्रं यजति । तथा समविषमयोः कर्मत्वे करणं भवति । यथा समेन धावत्यश्वः । विषमेण धावत्यश्वः। अथ संप्रदानम् । तत् संप्रदानं यस्मै पूजानुग्रहकाम्यया दित्सा। संप्रदानं त्रिधा-अनुमन्तु प्रेरकं अनिराकर्तृ चेति । ददामीति वचनं श्रुत्वा एवं कुर्वित्यनुमन्यते तदनुमन्त । यथा-यजमानो गुरवे गां ददाति। यच देहीत्युक्त्वा दातारं प्रेरयति तत् प्रेरकम् । यथा-द्विजाय गां देहि । यन्नानुमन्यते नापि प्रेरयति किन्तु मूकवदास्ते तद् अनिराकर्तृ । यथा- देवाय हेम दत्ते, राज्ञो दण्डं दत्ते, नतः पृष्ठिं दत्ते । अत्र दित्सा नास्ति । भदृस्य शतं दत्ते । अत्र च नार्चानुग्रहकाम्यया दानं तेन न सम्प्रदानम् । तदेव संप्रदानं यत् त्यागभावयुक्तं स्यात् । दीयमानेन संयोगाद् यदि खामित्वं लभते।रजकस्य वस्त्रं दत्ते। अत्र त्यागाभावस्तेन न सम्प्रदानम्। द्विजस्य भाटकेन गृहं दत्ते । अत्र स्वामिता न । गृहस्य खामी द्विजो न भवतीति न सम्प्रदानम् । अथापादानम् । यस्मादपायस्तदपादानम् । तदचलं चलं च । अचलं यथा-वृक्षात् पर्ण पतति । चलं यथा-धावतोऽश्वादपतदश्ववारः। अथाधिकरणम् । आधारोऽधिकरणम् । तत् षट्प्रकारम् । वैषयि- कम् १, औपश्लेषिकम् २, आभिव्यापकम् ३, नैमित्तिकम् ४ सामीप्य- कम् ५, औपचारिकम् ६, चेति । विषयो नान्यत्र भावः । यथा-दिवि देवाः सन्ति । यत्रैकदेशसंयोगः स उपश्लेषः। यथा-चैत्रः कटे आस्ते; गृही गृहे तिष्ठति । यत्र सर्वाङ्गसंयोगस्तदभिव्यापकम् । यथा-तिलेषु तैलम्, दनि घृतम् । यस्य यन्निमित्तं तन्नैमित्तिकम्। यथा-शूरो युद्धे संनह्यते, व्याधो दन्तयोः कुञ्जरं हन्ति । समीपमेव सामीप्यम् । यथा- गङ्गायां घोषः, गङ्गासमीपे घोष इत्यर्थः। शकुनिराकाशे याति, भक्ति- मान् गुरौ नमति । यदुपचाराद्भवेत्तदौपचारिकम् । यथा-अङ्गुल्यग्रे करिशतमास्ते। अस्थायमिति सम्बन्धः । षष्ट्युत्पत्तिस्तु मुख्यात् । तस्माद्विवक्षया सर्वाणि कारकाणि भवन्ति । खखामित्वादिभेदेन षष्ट्यधिकशतमाः उक्तिरताकर सन्ति । स्वस्वामित्वे यथा-राजा भूमेः पतिः, अयं गवां खामी जन्यजनकसम्बन्धे यथा-पार्वतीपरमेश्वरौ जगतः पितरौ। वध्यवधकभावे यथा-हरिः कंसस्य हिंसका। भोज्यभोजकभावे यथा-मयूरोऽहेर्भोक्ता। धार्यधारकभावे यथा-भृत्यश्छत्रस्य धारकः । उक्ता अनुक्तविभक्तयः। अथोक्तविभक्तीराह । तत्रोक्तः कर्ता यथा-जिनो जयति । कारको देवदत्तः । वैयाकरणः पुरुषः । कृतप्रणामो जनः । एवमादिष्वाख्यात- कृत्-तद्धितप्रत्ययानां समासस्य च कर्तरि विहितत्वादुक्तः कत्युच्यते। उक्त कर्तरि प्रथमैवेति न्यायात्, प्रथमा । १। 'जैनेन जीवदया क्रियते' इत्युक्तं कर्म ।२। 'लात्यनेनेति लानीयं चूर्णम्' इत्युक्तं करणम् । ३। 'दीयतेऽस्मै इति दानीयो ब्राह्मणः, एवं दक्षिणीयो ब्राह्मणः' इह संप्रदाने ईयप्रत्ययः, एवं 'दत्तमोजनोऽतिथिः समासोऽत्र संप्रदाने। एक- मादिषूक्तत्वात् संप्रदाने प्रथमा ।४। उक्तमपादानं यथा-"विभेत्यस्मादसौ भीमो राक्षस', एवं 'उच्छिन्न- जनपदो देश' समासोनापादाने । एवमादिषूक्तत्वादपादाने प्रथमा।५। उक्तमधिकरणं यथा- 'आस्यतेऽस्मिन् तदासनम्' करणाधिकरण- योश्चेत्यधिकरणे युट् । एवं विटकिनी पौर्णमासी' प्रायेण वटकानि भुज्यन्तेऽस्यामित्यधिकरणे तद्धितेऽन् प्रत्ययः । एवं 'मत्तबहुमातङ्गं वनम्' समासोऽत्राधिकरणे । एवमादिषूक्तत्वादधिकरणे प्रथमा।६। उक्तसम्बन्धो यथा-गावो विद्यन्तेऽस्य गोमान् देवदत्तः, एवं चित्र- गुर्देवदत्तः। समासोऽत्र सम्बन्धे । एवमादिषूक्तत्वात्सम्बन्धे प्रथमा।७। इत्युक्तविभक्तयः। अथोत्त्युपयोगिनस्तदक्षरशब्दसंस्काराः केचित्तदर्थशब्दसंस्कारा अपि दश्यन्ते- [देश्यशब्दाः तेषां संस्कृतरूपाणि च ।] अरिहंत अर्हन् । सूरिज सूर्यः । सुहगुरु शुभगुरुः। मगसिरनषत्र मृगशिरोनक्षत्रम् । ओझड उपाध्यायः । आचारिज आचार्यः। असलेस अश्लेषा । ठवणारी स्थापनाचार्यः। सनीचर शनैश्चरः। साध साधुः। राह राहुः। आदरा आर्दा । 1.
पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत केत केतुः। भइरव भैरवः । सुषमाअरउ सुषमारकः। गोरी गौरी। दुषमाअरउ दुःषमारकः। चाउंडा चामुण्डा । मुहूरत मुहूर्तः। श्रीवच्छ श्रीवत्सः। अंधारउ अन्धकारम् । लखमी लक्ष्मीः । अमावस अमावास्या। सरसती सरस्वती। पोस पौषः। सारद शारदा। माह माघः। सूगडांग सूत्रकृताङ्गम् । फागुण फाल्गुनः। ठाणांग स्थानाङ्गम् । चेत चैत्रः। सज्झाय खाध्याय । वइसाख वैशाखः। पहेली प्रहेलिका। जेठ ज्येष्ठः। वातचीत वा चिन्ता। आसाढ आषाढः । ऊतर उत्तरम् । असोई उपश्रुतिः । सावण श्रावणः। चाटुकारिया चाटुकारिकाणि भाद्रवउ भाद्रपदः। वचन वचनानि । काती कार्तिकः । साच सत्यम् । छ रितु षड् ऋतवः । कूड कूटम् । ऑलंभउ उपालम्भः। सरतकाल शरत्कालः । आण आज्ञा। वरसालउ वर्षाकालः। वाजिन वादित्रम् । वरस वर्षम् । वाजउ वाद्यम् । अहोरात अहोरात्रः। अवाज आतोद्यम् । ततकाल तत्कालम् । पडहउ पटहः । आगास आकाशम् । आशंक आशङ्का । मेह मेघः। चोज चोद्यम् । करा करकाः। अचरिज आश्चर्यम् । पूरव दिश पूर्वा दिक् । आंसू अशुः। दक्खिण दक्षिणा । नींद निद्रा। पच्छिम पश्चिमा। स्वस्थपणउ खास्थ्यम् । उत्तर उत्तरा। उच्छुकपणउ औत्सुक्यम् । विदिस विदिक् । आलस आलस्यम् । अपछर अप्सरसः। जिणचंदभट्टारक जिनचन्द्रभट्टारकाः । जउराणउ यमराजः । छावडउ शावकः । आसू आश्विनः। - उक्तिरनीकर जीरउ जीरकः। हींग हि । चाबण चर्बणम् । कलेवउ कल्यवर्तः। धायउ ध्रातः । आपणी धायर आत्मीयध्रातः । धेठउ धृष्टः । विलखउ विलक्षः। खास कासः। खाज खज़ंः । गड गडुः । . कोढ कुष्ठः कुंअर कुमारः। जोवन यौवनम् । बूढउ वृद्धः। वडपण वाचकम् । सीख्यउ शिक्षितः। विन्यानी वैज्ञानिकः । कुच्छित कुत्सितः । कायर कातरः । घातकू घातुकः । चोरी चौरिका। वणीमग वनीपकः । रीसालू ईर्ष्यालुः । भूखियउ बुभुक्षितः। भूख बुभुक्षा। त्रिसियउ तृषितः। भात भक्तम् । मांड मण्डः। तीमण तेमनम् । घेवर घृतवरः। दूध दुग्धम् । दही दधि। खीरि क्षरेयी। मांखण म्रक्षणम् । रांध्यउ राद्धम् । सीधउ सिद्धम् । कांजी काञ्जिकम् । वेसवार वेषवारः। चूक चुक्रम् । आमलवेतस आम्लवेतसः । राई राजिका। धाणा धान्यकम् । पीपलि पिप्पली। निगडू त्रिकटु । हिडकी हिका। फोडउ स्फोटकः। व्याऊ विपादिका । लेहउ लेखकः। मसि मषी मसी वा । सेठि श्रेष्ठी। जूआरउ द्यूतकारकः। पासउ पाशकः । सुआसणी सुवासिनी। वहू वधू। जानी जन्याः। पणीहारि पानीयहारिका । डोहलउ दोहदम् । पूत पुत्रः। भात्रीजउ भ्रात्रीयः । भाणेजउ भागिनेयः । पोत्रउ पौत्रः । दोहीत्रउ दौहित्रः। गोल गोलकः। भाई भ्राता । पीतरियउ पितृव्यः।
पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत तालुयउ तालुकम् । घांटी घण्टिका । गावडि ग्रीवा। खांधर स्कन्धः । काख कक्षा। पासउ पार्श्वम् । कुहणी कफणिः । कलाई कलाचिका। हाथ हस्तः। आंगुली अङ्गुलिः। अंगूठउ अङ्गुष्ठः । विहथि वितस्तिः । ताली तालिका । मूठि मुष्टिः। चलू चलुकः । वाम व्यामः । सालउ श्यालः। साली श्याली। माउलउ मातुलः। बहिणि भगिनी। नणंद ननान्दा। वाप बप्पः। माइ माता। धाई धात्री। सासू श्वश्रूः। सुसरउ श्वशुरः। पितर पितरः । सयणाचार खजनाचारः। आपण आत्मीयः। सगउ खकः। सयर शरीरम् । मडउ मृतकः । मुंड मुण्डः । माथइ भमरउ मस्तके भ्रमरकः । सिमथउ सीमंतः। पली पलितम् । मुहडउ मुखकम् । निलाड ललाटः। कान कर्णः। आंखि अक्षि । कीकी कीका। मिउडी भृकुटिः। नाक नक्रम् । होठ ओष्ठः। गाल गल्लः । मूंछ श्मश्रु । दाढी दाढिका। दाढ दाटा। जीभ जिह्वा । पुरस पौरुपम् । पूठउ पृष्ठम् । उच्छंग उत्सङ्गः। कालिजउ कालेयम् । तिली तिलकः । प्लीह प्लीहा । आंत्र अन्त्राणि । कडि कटिः। पूंद पुतौ । चूति च्युतिः । आंड अण्डम् । साथलि सक्थि । जांघ जङ्घा । पीडी पिण्डिका। धूंटी घुण्टकः। पान्ही पाणिः । लोही लोहितम् ।
उक्तिरनाकर ९ . 1 खट्वा । हाड हडम् । पांसुली पशुका। मीजी मजा । चांमडी चर्मिका। नस स्त्रसा। लाल लाला। वीठ विष्ठा । गृह गूथम् । वेस वेषः। मांडणउ मण्डनम् । पडवास पटवासकः । - कपूर कर्पूरः । अगर अगुरु। जाइफल जातिफलम् । कुंकू कुङ्कुमम् । लांग लवङ्गम् । मउड मुकुटम् । गुंथिवउ ग्रन्थनम् । सेहरउ शेखरः । वाली वालिका। कडउ कटकः । नेउर नूपुरम् । तंत्र तन्त्रकम् । चलणी चलनी। कांचली कञ्चलिका। साडी शाटी। कच्छोटउ कच्छापटः। काछडी कच्छाटिका। नातणउ नक्तकः । पछेवडउ प्रच्छदपटः। गूणि गोणी।। पालथी पर्यस्तिका। नउद नवतः। आथर आस्तरः। चंद्रूयउ चन्द्रोदयः। गुलणी गुणलयनिका । मांचउ मञ्चकः। खाटि उसीसउ उच्छीर्षकम् । आरीसउ आदर्शः। अलतउ अलक्तकः । लाख लाक्षा। काजल कज्जलम् । दीवउ दीपः । दसी दशा। वीझणउ व्यजनकम् । कांकसी कङ्कतिका । तंबोलरी थई ताम्बूलस्य स्थगी । महतर महामात्यः । सुंक शुल्कः । अंतेउर अन्तःपुरम् । बइरी वैरी। मित्राई मैत्री। हेरू हैरिकः। लांच लञ्चा । गूझ गुह्यम् । असवार अश्ववारः। अंगरखी अङ्गरक्षी। धनुष धनुः। वेझ वेध्यम् । खयडर खेटकः। मोगर मुद्गरः। प्रयाणउ प्रयाणकम् । राडि राटिः। धाडि धाटी। सराध श्राद्धम् । उ०र०२ आर आरी। नाव नौः। १० पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत दीख दीक्षा। कातरि कर्तरी । ईधण इन्धनम् । कातरणी कर्तनिका। राख रक्षा। त्राकलउ तर्कुः। छार क्षारः। पीजणउ पिञ्जनम् । जनोई यज्ञोपवीतम् । वरता वरत्रा। वणिज वाणिज्यम् । मूल मूल्यम् । सूत्रहार (सूथार) सूत्रधारः । संचकार सत्यङ्कारः। वांसोली वासी । करवत करपत्रकम् । वेडी बेडा । टांकुलउ टङ्कः । उधार उद्धारः। लोहार लोहकारः। पडहू प्रतिभूः । कंदोई कान्दविकः । साखी साक्षी। नावी नापितः। गाउ गव्यूतम् । आहेडउ आखेटकः । कोस क्रोशः। आहेडी आखेटिकः । जोअण योजनम् । वागुर वागुरा । गोवाल गौपालः। वागुरी वागुरिकः। आहीर आमीरः। पासी पाशिका। करसर कर्षकः। भील भिल्लः । खेती क्षेत्री। भूइ भूः। हलरी ईस हलस्य ईषा । धरती धरित्री। मई मत्यम् । सींधव सैन्धवम् । कोदालउ कुद्दालः। विडलूण विडलवणम् । खणेत्रउ खनित्रम् । जवखार यवक्षारः। पराणी प्राजनम् । साजी खर्जिका। जोत्र योत्रम् । खलहाण खलधानम् । मेढी मेधी। खलउ खलम् । कारू कारुः । खेड खेटम् । माली मालिकः । खंधार स्कन्धावारः। कोट कोहः । कलाल कल्यपाल: मद मद्यम् । वाणारसी वाराणसी। सूई सूची। अउज अयोध्या । सूईउ सौचिकः। ऊजयणी उज्जयिनी।
उक्तिरताकर हथिणाउर हस्तिनापुरम् । आगरउ अर्गलापुरम् । लाहउर लाभपुरम् । सरसउपाटण सरखतीपत्तनम् । बीकानयर विक्रमनगरम् । जालउर जाबालपुरम् । साचउर सत्यपुरम् । भरुअच्छ भृगुकच्छपुरम् । सुरंग सुरङ्गा । मसाण श्मशानम् । सीहदार सिंहद्वारम् । मढ मठः। परव प्रपा । बार द्वारम् । घर गृहम् । आगल अर्गला मउणि मणिकः । गागरी गर्गरी। मंथाणउ मन्थानकः। हिमालउ हिमालयः। सेव॒जउ शत्रुञ्जयः। सोवनगिरि सुवर्णगिरिः। पाहाण पाषाणः । पाथर प्रस्तरः। आगर आकरः । खाणि खानिः। गेरू गैरिकम् । सोनागेरू सुवर्णगैरिकम् । खडी खटी। सिंघाण सिंहानः। काटी कट्टिका। काट कट्टः। तांवउ ताम्रम् । उअउ त्रपुकम् । कथीर कस्तीरम् । रूपउ रूप्यम् । पीतल पित्तलम् । कांसउ कांस्यम् । पारउ पारतः (द)। सोरठी सौराष्ट्री। तूरी तुवरी। हरियाल हरितालम् । हींगलू हींगुलः । रावटउ राजावर्तः। परवाली प्रवाली प्रवालम् । मोती मौक्तिकम् । अथाह अस्थाघम् । आछउ अच्छम् । ओस अवश्यायः। कुंची कुञ्चिका। तालउ तालकम् । कवाड कपाटम् । छावति छदिः। मतवारण मत्तवारणम् । पूतली पुत्रिका पुत्रिला वा। सउगडउ समुद्रकः । मंजूस मञ्जूषा। बुहारी बहुकरी। ऊखलउ उदूखलः। किडउ कटः। मूसल मुशलः। चूल्ही चुल्लिः । घडउ घटः। अंगारसगडी अङ्गारशकटी। भाठ भ्राष्ट्राः। कडाहउ कटाहः।
१२ पण्डितप्रघर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत पालउ प्रालेयम् । वहेडउ बिमीतकः। हीम हिमम् । हरडइ हरीतकी। धूअरि धूमरी। चांपउ चंपकः। फीण फेनः । जाइ जातिः । घाट घट्टः। । बीजोरउ वीजपूरकः । वेरा विदारकाः। कयर करीरः ।। परनालि प्रणाली। धाहडी धातकी। कूल्ह कुल्या । कउछ कपिकच्छूः। कादम कर्दमः । धत्तूरउ धत्तूरकः । उमाड उत्सुकम्। कउठ कपित्थः । धूअउ धूमः। नालेर नालिकेरः। वीजली विद्युत् । वांस वशः । वाउ वायुः। नागरवेलि नागवल्ली। वाडी वाटी। द्राख द्राक्षा। वेलि वल्ली। बालउ वालकम् । साठी षष्टिकः। जड जटा। छालि छल्ली। चणउ चणकः। काठ काष्ठम् । मूंग मुद्गः । मांजरि मञ्जरिः । मउठ मकुष्ठः। पान पर्णम् । गोहू गोधूमः । कली कलिका। वाल वल्लः। गोछउ गुच्छः। कुलथ कुलत्थः । विकस्यउ विकसितम् । कुलथी कुलथिका । गांठि ग्रन्थिः। तूंअरि तुंवरी। पीपल पिप्पलः। सामउ श्यामकः। कांग कङ्गुः। वड वटः। उंवर उदुम्बरः। चीणउ चीनकः । आंवउ आम्रः। सरिसव सर्पपः। वील विल्वः । वथूअउ वास्तुकम् । केसू किंशुकः । कारेलउ कारवेल्लः। कपास कसः। कोहलर कूष्माण्डः । वोरि वदरी। चीभडी चीभिटी। महूअउ मधूकः । कंकोडउ कर्कोटकः , - उक्तिरत्नाकर १३ वाग वल्गा। , पलाण पल्ययनम् , पर्याणं वा । ऊंट करहउ करभः । उष्टः। गद्दहउ गर्दभः ! बलद बलीवर्दः। मूलउ मूलकम् । रोहीस रोहिषः। डाभ दर्भः। ध्रोव दूर्वा । मोथ मुस्ता। त्रिणउ तृणम् । खड खटः । विस विपः । वच्छनाग वत्सनागः। कीडउ कीटः। जलो जलौकाः । कवडउ कपर्दः। कउडी कपर्दिका। बांभणी ब्राह्मणी। घीवेलि घृतेली। उदेही उपदेहिका। लीख लिक्षा। जू यूका। छप्पई षट्पदी। माकण मत्कुणः। वीरू वृश्चिकः । भमरउ भ्रमरः । खजूअउ खद्योतः। मयण मदनम् । माखी मक्षिका। तिथंच तिर्यड् । हाथी हस्ती। सूंड शुण्डा। आंकुस अङ्कुशः। घोडउ घोटकः। पूछ पुच्छम् । दामण दामाञ्चनम् । पाखर प्रक्षरः। सांड षण्डः, षण्ढः । धोरी धौरेयः। पोठीयउ पृष्टयः। सींग शृङ्गम् । वांझ गाइ वन्ध्या गौः। ऊहाडउ ऊधः। छाणउ छगणम्। गोउल गोकुलम् । खीलउ कीलकः । हालउ छगलः। बाकरउ बर्करः। मीढउ मेण्ढकः। कूकर कुकुरः। सीह सिंहः। वाघ व्याघ्रः । सादूल शार्दूलः । चीत्रउ चित्रकः। गइंडउ गण्डकः। सूअर सूकरः। रीछ ऋच्छः, ऋक्षो वा। स्याल शृगालः। लकडी लोमटिका । सिसलउ शशः । गोह गोधा। गोहीरउ गोघेरः। मूसउ मूषकः। ऊंदिरउ उन्दुरः। .
१४ पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत जाहज जाहकः। नउल नकुलः। विसहर विषधरः। सउण शकुनः । पंखी पक्षी। चांच चञ्चः। पींछ पिच्छम् । पांख पक्षः। मोर मयूरः, मोरो वा। चांदलउ चन्द्रकः। कोइल कोकिलः। कोइली कोकिला। घूघू घूकः । कूकडउ कुक्कुटः। चास चाषः । वावीहउ बप्पीहः। टींटोहडी टिट्टिभः। चिडउ चटकः। चिडी चटका। बगलउ बकः । चील्ह चिल्लः । सूडउ शुकः । सारी शारिका। चामाचेड चर्मचटका। वागुलि वल्गुलिका। आडि आटिः । पारेवउ पारापतः। तीतिर तित्तिरिः । माछलउ मत्स्यः। तन्तुअउ तन्तुः। काछवर कच्छपः। सास श्वासः । आउषत आयुः। कुंअलउ कोमलः। सूआलउ सुकुमालः। नीठुर निष्ठुरः । महुरउ मधुरः। मीठउ मृष्टम् ( मिष्टम् )। पांडरउ पाण्डुरः। कविलउ कपिलः। सामलउ श्यामलः । काबरउ कर्बुरम् । पांति पतिः। थोडउ स्तोकम् । ऊजलउ उज्वलम् । चोखउ चोक्षम् । नयडउ निकटम् । सासतउ शाश्वतम् । माझ मध्यम् । विचालउ विचालम् । सारीखउ सक्षम् झांप झम्पा । भखर भरितम् (भृतम्)। वींव्यउ वेष्टितम् । दाधउ दग्धम् । वीध्यउ विद्धम् । फाडियउ पाटितम् । छेदियउ छेदितम् । लाधउ लब्धम् । पठावियउ प्रस्थापितम् । कामण कार्मणम् । सांकडउ संकटम् । उच्छव उत्सवः। मेलउ मेलकः । . दादुर दर्दुरः। जनम जन्म।
उक्तिरनाकर विघन विघ्नः। परिचउ परिचयः। काज कार्यम् । ऊपरि उपरि। आगइ अग्रतः। सांप्रत सांप्रतम् । अरिहंतभणी नमो अहंते नमः । सद्दहियउ द्धितम् । वांकर वक्रम् । कूपल कुड्मलम् । मणसिल मनःशिला। सुमिणउ खप्तः । पीहर पितृगृहम् । आलउ आर्द्रम् । सिढिल शिथिलम् । करीस करीषः । गुहिरउ गम्भीरम् । विहूणउ विहीनः। पीठ पीठम् । मउर मुकुरम् । गरुय गुरुकम् । भिंगार भृङ्गारः। वीट वृन्तम् । सिंगार शृङ्गारः। रिणउ ऋणम् । गारवड गौरवम् । गउरवान गौरं गौरवर्णं च । सांकलउ शृङ्गलम् । छांह छाया । नीमी नीवी । झीणउ क्षीणम् । खोडउ वो(क्षौ.) टकः। जट्ट जतः भसम भस्म । दाहिणउ-दक्षिणः। कोहली कूष्माण्डी। सलाह श्लाघा। हलुअउ लघुकः। सीप शुक्तिः । मइलउ मलिनम् । छोति छुप्तिः । अछूतउ अच्छुप्तः । हेठइ अधः। तुम्ह केरउ युष्मदीयः। अम्ह केरउ अस्मदीयः। एकलउ एकः (एककः)। नवलउ नवः । पीलर पीतम् । काठउ गाढम् । जेवडउ यावान् । तेवडउ तावान् । वीच वर्म। वहिलउ शीघ्रम् । झगडा झगटकः । कोड कौतुकम् । जुआ जुआ पृथक् पृथक् । समधात समधातुः। गीत धातइ गायउ गीतं धातुना गीतम्। आगइ वाघ अग्रे व्याघ्रः । पाछइ दोतडि पश्चादुस्तटी। वरतरकाटिवउ वरनाकर्तनम् । सज्य शटितम् । मांडी मण्डिका । लापसी लपनश्रीः । गुलमंडा गुडमण्डका। वीनती विज्ञप्तिः ।
सेल शल्यः। १३ पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत कच्चोलउ कचोलकः। वीह विभीपिका। डोइलउ दारुहस्तकः । तलार तलारक्षः। कुघाट कुघाटः । कावडि कावाकृतिः । साल शल्यम्। चूकट चुक्कितः। चूणि चूर्णिः । आरती आरात्रिकम् । फाटर स्फाटितम् । मंगलेवउ मङ्गलदीपकः। गोफणि गोफणी। धतूरियड धत्तरितः। ओठी औष्टिकः । वृंब वुम्बा । कापडी कार्पटिकः । सार सारा । विसोआ विंशोपकाः। गलणउ गलनकम् । सींगडी शृनिका। दंतसूकट दन्तशकटः। चाकी चक्रिका । खीचडउ क्षिप्रचटः। चकरडी चक्रिका । राव रब्बा। दोहणी दोहिनी । कणहतर कणभक्तम् । पूत्रेलउ पुत्रकः । वेगउ वेगवान् । ऊधारइ उद्धारके। गूजरी गूर्जरी । वाहरू व्याहारकः । नाथियउ नस्तितः । हेडाऊ हेडावित्तः । अखाडउ अक्षपाटकः । धरणइ धरणके। दाणमंडही दानमण्डपिका । कूचउ कूर्चकः । मूली मूलिका। पोटली पोलिका । सूली शूलिका । पोटलिया पोट्टलिकाः । ध्रुवउ ध्रुवकः। नीसाण निःखानः। मढी मठिका। कांठलउ कण्ठकः। भमरडउ भ्रमरकः। गोमूत्री गोमूत्रिका। पीठी पिष्टिका । पूलउ पूलकः। अखत्र अक्षत्रम् । पुडर पुटकः । ऑलग अवलगा। दाणउ दानकः। संधूख्यउ संधुक्षितः । सींगउ शृङ्गकम् । किवाडी कपाटिका । लालि लल्लिः । कांवडी कंबाष्ठिका। किलकिलाट किलकिलायितम् । सरणी शकुनिकः। गूजर गूर्जरः। 1 पाहरू प्राहरिकः । 4 . पहुरइ प्रहरके।
उक्तिरताकर १७ " पावटउ पादावर्तः। गदहिला गर्दभिल्लाः। लात लत्ता। सेरी सेरिका । सीरवी सीरपतिः । नाहर नाखरः । रोझ रोह्यः । आखलउ आस्खलकः । निसरावउ निश्रावः । डहर दहरः। मुजल मुखजलम् । महुआल मधुजालम् । सिलावटउ शिलावर्तकः । जाडर जाड्यम् । मुखास मुखास्या । दंतूसल दन्तमुसलः। रती रक्तिका। बीयउ बीजकः। अंकोडर अंकुटकः । लठूला। वडी वटिः। धणिया धनीयम् । कहाणी कथानिका । खटमल खट्टामल्लः । भडिथ भडित्रम् । डाकर डात्कारः। लींडी लिण्डिका। पाणी पानीयम् । पाण पानम्। जडी जटी, जटिका । सीअल शीतलिका। पाइणि पद्मिनी । पमोडी पनकर्कटी। वही वहिका । पान्हउ प्रस्तवः। आलावउ आलापकः । अहेसउ उद्देशकः । रतांजणी रक्तचन्दनम् । खीरणी क्षीरिका। पतंग पत्राङ्गं पतझं वा । कुंभट कुजकण्टकः । बहेडउ बहेटिकः, बिभेदको वा । धामण धर्मणः । लेसूडउ लेखशाटकः। गोखरू गोक्षुरः। कांडी कण्डी। भांखडी भक्षटः। मरूअउ मरुबकः । एलियउ ऐलेयम् । बेल बेला । खरहडी खरकाष्ठिका। देवालि देवताली । कासुंदउ कासमदः। संद स्यन्दः । बीजाबोल बीजकबोलः । सातपरिया सप्तपर्यायाः। पवित्री पवित्रकम् । मुहछण मुखक्षणः। हाक हक्का। हासी हासिका। नवारसउ नवायसम् । चील्हसाग चिल्लीशाकम् । पाइली पल्ली। कुंभी कुंभिका। कंसाल कंसालः । त्राकडीवेल तुलावेलकः । : १ उ०र०३ पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगाणि-कृत कुंपी कुम्पिका । कचोलड कच्चीलकम् । कांगउ कगः । ग्वालेर गोपालगिरिः। घिसि घृष्टिः । परसु परश्वः । जमवारउ जन्मवारकः । गिलगिली गिलगिलिका । बकोर बर्करिका । खयर वडी खदिरवटिका । धनागरउ धान्यनागरम् । काकडीरउ गिर कर्कट्या गिरः । कोरियउ पात्र कोरितं पात्रम् । कोरिवउ कोरवणम् । सूंहाली सुकुमारिका। चीठी चीष्ठिका । दसेआगलउ दशभिरर्गलः । गादी गब्दिका। धीया न पुत्ता धीदा न पुत्रः । चाथ(प्र. वाघ)रि च(प्र० व )स्तरी । तूणियउ कापडउ तूर्णित कर्पटम् । अढारइ नात्रा अष्टादशनात्रकाणि । नहरणी नखहरणी, नखरदनिका वा । नखारउ समारिवउ नखाना समारणं समारचनं वा। सांज मात्राविना निरोध न करइ संयतो मात्रकं विना निरोधं न करोति । केलि कदली । केला कदलीफलानि । चवलारी फली चपलकानां फल्यः । धोवणी धावनिका । जयणा यतना । सीलउ आहार वाइलउ हवइ शीतल आहारो वातलो भवति । वाछडउ गाइ धायउ वत्सको गां धावितवान् । पात्रांरउ काप पात्राणां कल्पः । मूठउ मुष्टः । रूठउ रुष्टः तूठउ तुष्टः । राखडी रक्षाटिका। काकरउ कर्करः । संदेसउ संदेशकः । सोनारउ मणियउ सुवर्णस्य मणिकः । विख्यउ विरूपकम् । संथारउ संस्तारकः । पहिलउ आपइ पछइ बापड़ प्रथममात्मनः पश्चाहप्पस्य । वरसोला वर्षोपलः। तको आयउ तकः आगतः । तका मुहपती तका मुखपोतिका । दाम करइ काम द्रम्मः करोति कर्म । गहिलउ घणुं उतावलउ हवइ पहिलो घनमुत्तालो भवति । आगी वीझाई अग्निर्विध्यातः । गुल गुलियउ गुडो गुल्यः । साकर मीठी शर्करा मिष्टा । आखा त्रीज अक्षततृतीया । भाउ वीज भ्रातृद्वितीया । दीवाली दीपालिका। होली होलिका। आंवइरा मउरा आम्रस्य मयूरा । लेसाल लेखिशाला। पोसाल पोपधशाला। थांपणि स्थापनिका ।
उक्तिरत्नाकर १९ बाउची बाकुची। घर गृहं घरो वा । ओवउ अपवर कः। अंतेउरी अन्तःपुरिका । पातली लोवडी प्रतला लोमपटी। ऊतारणउ अवतारणकम् । तंबोली ताम्बूलिकः। गांधी गान्धिकः । तेली तैलिकः । हेवउ हेवाकः। मिठाई मृष्टादिका। सूंखडी सुखादिका। ऊभउ अर्द्धः। बइठउ उपविष्टः । थांभर स्तम्भः। सीविवउ सीवनम् । सांडसउ संदंशः। मणिआर मणिकारः। आंबिली आम्लिकी। गाडी गत्री। डांस दंशः। मसउ मशकः । अरडूसउ अटरूषः। मोरसिखा मयूरशिखा। महुलेठी मधुयष्टिः । अरीठउ अरिष्टः। लहसण लशुनः। गाजर गुञ्जनम्। किरातउ किरातः । जीवापोता पुत्रजीवकः । थूथउ तुच्छम् । दीवडी इतिः । भांगरउ भृङ्गराजः। अतिविस अतिविषा। धाणी धानाः । सातू सक्तवः। घररी जाली गृहस्य जालिका । गउख गवाक्षः । बाण संधियर बाणः सन्धितः । ऊंचउ ऊछालियउ उच्चमुच्छालितः । फलहउ फलिहकः। झाड झाटः। सूआर सूपकारः। रसोई रसवती। सोनाररी मूस सुवर्णकारस्य मूषा । कुंभार हांडी घडइ कुम्भकारो हण्डिका तंबोल बीडउ ताम्बूलबीटकम् । आलजाल बोलइ आलजालं ब्रवीति । सीकारा मूकइ सीत्कारान् मुञ्चति । पोईस पूतिकेशः। छानर छन्नः । परताति परतप्तिः । राइणि राजादनी। कुंअरि कुमारी। गिलो गडूची। आंबारी कातली आम्रकर्त्तलिका । पहुंक पृथुकम् । पहूआ पृथुकाः। टांक टङ्कः । मासउ माषकः । - आक अर्कः। नींबू निम्बुकः । सिरघू शिग्नुः। छीक शिक्यम् । थूणी स्थूणी। घटयति ।
२० पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत सांखडि संखडिः संस्कृतिर्वा । दीह दिवसः। वीवाहपगरण विवाहप्रकरणम् । राति रात्रिः । पढमाली प्रथमालिका। वरसात वर्षारात्रः । कोठार कोष्ठागारम् । रखवालउ रक्षपालः । भंडार भाण्डागारम् । वासर वासकः । अरहट अरघट्टः। कोठर कोष्ठकः । घरटी घरिट्टिका । ओही वीट उपधिवेण्टलिका, घरट घरट्टः । उपधिवेष्टिका वा। चमार चर्मकारः । वेसावाडउ वेश्यापाटकः। वाणही उपानत् । दंडाउंछणउ दण्डकपुञ्छनम् । सूपडउ सूर्पकम् । घीरी तरी घृतस्य तरिका । चालणी चालनी। ऊकुडउ उत्कुटुकः। नीसा निश्रा । ऊकडू (प्र०) उत्कुटकः । लोढर लोष्टकः । गिलोई गिरोलिका। ढल दलिः। गोआडइरउ खात्र गोवाटकस्य क्षात्रम् । नीसरणी निःश्रेणिः । पडजीभी प्रतिजिह्वा । पोली पोलिका। फोडी स्फोटिका। पूडा पूपकाः। • आजिकाल्हि जतियारउ घण ठाणउ वडी वटिका। छई अधकल्ये यतीनां घनस्थानकमस्ति। वडा वटकाः। दयामणउ दयामनकः । लाडू लड्डुकाः। निसूग निःशूकः । खाजा खाद्यकानि। ससूग सशूकः । ऊकरडी उत्कुरुटिका । निद्धंधस निर्द्धन्धसः । दुक्खइ करालियउ दुःखेन करालितः । भाणउ भाजनम् । साधुसंघाडउ साधुसंघाटकः । थाल स्थालम् । वेगति (डि ) त्रिकाष्टिका । थाली स्थालिका। तेरइ काठिया त्रयोदश काठिकाः । रांधणउ रन्धनम् । सूतउ घोरइ सुप्तो घोरयति । कातती कर्तन्ती। सीयालड शीतकालः। पींजती पिञ्जन्ती। उन्हालउ उष्णकाल: । पीसती पिंपन्ती। घडियाल घटिकालयः। मूंदडी मुद्रिका । घडी घटिका । सांकली संकलिका। सरसवेल मापनेलम् । पहर प्रहरः।
उक्तिरत्नाकर २१ अलसिवेल अतसीतैलम् । जावेल जात्यतैलम् । कडुछी कटुच्छकिका। कडुछउ कटुच्छकः । उवाणउ ठाण उद्वानं स्थानम् । चेलउ कहियइ घेणू गाइ चेल्लकः कथ्यते धेनु!ः । वाउलि वातोली। लूणकयरा लवणकरीराणि । पाउंछणउ पादपुञ्छनकम् । ओघउ ओघः। निसेजा निषद्या। चोलवटउ चोलपट्टः। पछेवडी प्रच्छादपटी। पडघउ पतहहम् । वींटणउ वेष्टनकम् । कीटी किट्टिका। वानी वर्णिका। वानगी वर्णिका। पलीवणउ प्रदीपनकम् । राजवी राजबीजी। काज नीवडियउ कार्य निर्वटितम् । जोगवटर योगपट्टः। नवकारवाली नमस्कारमालिका । जपमाली जपमालिका । ऊछीनउ उच्छिनम् । खत उपरि खार दीघउ क्षतस्योपरि क्षारो दत्तः । कडू कटुकम् । निसोत निःश्रोतः । वज वचा। तज त्वक। राठऊड राष्ट्रकूटः। पमार परमारः। सोलंकी चौलुक्यः । पोरवाड प्राग्वाटः । भाट भट्टः । ऊड उडः । ओंड ओड्डूः । थूभ स्तूपम् । थडउ स्थलकम् । रूंख रुक्षः (वृक्षः !) वाडी वाटिका । देवदत्त अधूरउ पूरिसइ देवदत्तः अद्धं पूरयिष्यति । आठउ अष्टकः । लेव लेपः । चूंटउ घट्टकः । आंबाफाड आम्रपाली। पूगीफाड पूगीफलफाली। गवाणि गवादनी। रूतउ रुप्तः । कुपियउ कुपितः । ऊग्रहणी उद्हणिका। छींडी खण्डी। पुत्रि जायइ वधामणउ पुत्रे जाते वर्द्धमानकम् । घूघुरउ घुर्धरः। सेई सेतिका। मुंडउ मुण्डकः । कूटणउ कुट्टनम् । पीटणउ पिट्टनम् । दीवाकाणउ दीपकाणः । फरलउ फरलः । कोटवाल कोट्टपालः। ऊघाडिवउ उद्घाटनम् ।
दादर दर्दरः पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत गुलपापडी गुडपर्पटिका। साथ सार्थः । गुलधाणी गुडधानाः। पह पथः । वलउ वलकः । माजणउ मज्जनम् । पीढी पीठी। जुवान युवानः। छाजउ छाधकम् । पोथउ पुस्तकम्। देहरइ आमलसारउ त्राफ्ट तर्पः। देवगृहे आमलसारकः । रांपी रम्पा । गजथर गजस्तरः । वेढिमी वेष्टिमा । साभरमती साभ्रमती नदी। करंबउ करम्बः । जउणा यमुना । खेडउ खेटकः। पारस पाहाण स्पर्शपाषाणः । पाद्र पद्रम् । चित्रावेलि चित्रकवल्ली। सीर सिरा। गदगदवचन गद्गदवचनम् । पांजरउ पञ्जरः। मणमणउ मन्मनः । दोरउ दवरकः दोरो वा। छीतर छित्वरः । जाजरउ जर्जरः। चोरइ खात्र पाड्यउ झालरि झल्लरिका । चौरेण खात्रं पातितम् । मरमरसबद मर्मरशब्दः। तमक तमकः । बाउल बब्बूलः। राजान राजानकः । हीडि हिण्डिः। रोहीडउ रोहीतकः। कडणि कटिनिः। नारिंग रूंख नारङ्ग रु( वृक्षः। धींगउ धींगः। कारटउ कारटकम् । अनाड अनाटः। कारटियर कारटिकः। ऊकरडउ उत्कुरुटः। धड धटः । अखोड अक्षोटः खण क्षणः । भांड भण्डः । डहरउ दहरः । चोरडउ चोरटः। पीडार पिण्डारः। लउडउ लकुटः। खारउ क्षारम् । चीकणउ चिक्कणः । खप्पर खर्परम् । मायउ मात ॥ खापरउ खर्परः। गाह गाथा। चरू चरः। सीथ सिक्यः। गात्री गात्रिका। मादल मर्दलः। पापड पर्पटः।
उक्तिरताकर २३ मई मदी। चीखल चिक्खल्लः। पाटउ पट्टः ॥ राजार पटउ राज्ञः पट्टः । खाली खिल्ली (प्र० खल्ली)। ताल तल्लः। गोलड गोलकः । वाउल वातूलः । भमलि भृमलः, भ्रमिळ । कमलउ कामलः । हींगवणि हिपर्णी । आरति अतिः । नीठि निष्ठा । धूआ ध्रुवा । धूभुवः। माणी मानिका । नीक नीका। कणी कणिका । मजीठ मजिष्ठा । ऊन ऊर्णा । प्रतीठ प्रतिष्ठा। पाज पद्या। सेस शेषा। ईस ईषा। भालि भल्लिः । पालि पल्लिः । चाचरि चञ्चरिः । खली खलिः। तूली तूलिः। फूटी काकडी स्फुटिकर्कटी । कांवी कम्बिः । वेठि विष्टिः । गिरठि गृष्टिः। काणि कानिः । पासाकेवली पाशककेवली । संधूखण संधुक्षणम् । नाणउ नाणकम् । पींगाणउ पिंगाणम् । पिंगाणी पिङ्गाणिका । सयरह वलि शरीरे वलिः । कुढि कुष्ठी। कुट्टि कुट्टी। हुडुक हुडुक्कः । मोगरउ मुद्गरम् । अंकोल अङ्कोठः। वाटि वतिः । आखउ अक्षतः । आखा अक्षताः। आबू अर्बुदः। खीरणी क्षीरिणी। क्यारउ केदारः। दीवमंदिर द्वीपमन्दिरः । पुडउ पुटः । पडल पटलम् । कांदउ कन्दः। डोडी दोडी। काठीहारउ काष्ठाहारकः । हींडिया हिण्डिकाः। राउलउ राजकुलम् । वाटली वर्तुलिका । थली स्थली। सालवी शालापतिः । प्रत्यन्तरे टिप्पनकन्- हस्तपादावमर्दनो रोगः । २ सारिणिः।
. खजूरउ खजूरकः । २४ पण्डितप्रवर श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत जोडउ यौटकम् । छट्ठीलिखित षष्ठीलिखितम् । अणहारउ अनुहारः। तापसरी कुण्डी तापसस्य कुण्डी । आंक अङ्कः। तीरथइ कुंड तीर्थे कुण्डः । कोडिटंका भाडउ कोटिंका भाटकम् । खंडी थाली खण्डी स्थाली । रांक रङ्कः। खांडउ गोधउ खंडो गोधवः । साग शाकम् । पिण्डखजूर पिण्डीखर्जूरम् । हरी हरितकम् । प्रसादरा खण प्रासादस्य क्षणाः । सूग शूका। कुंभीउपरि थांभउ कुम्भ्या उपरि स्तम्भः। वधूवर पुंखियउ वधूवरं पुखितम् । वस्तुरी वाणि वस्तुनो वाणिः । सिघ शिखा। जायउ पूत जातः पुत्रः । गूंद गोन्दः । रातउ रक्तः । खजूर खजूरम् । विरतउ विरक्तः । लोकांरी सोइ लोकानां श्रुतिर्वाती । राई राजिः । वस्त्रगांठि वनग्रन्थिः । सांन सज्ञा । गलगांठी गलग्रन्थयः । आटउ अट्टः । मांदउ मन्दः। चून चूर्णम् । रांधउ धान रन्ध्यं धान्यम् । गंगेटी गल्लेष्टिका। कुंढ कुण्ठम् । गाभरू गर्भरूपम् । कूड कूटम् । वाछरू वत्सरूपाणि । व्रणरउ पाटर व्रणस्य पट्टः । वाछडा वत्सकाः। सिलापट शिलापट्टः। ठाणउ स्थानकम् । मांचइरी वडी मञ्चकस्य वटी । वणी वनी, हखं वनम् । वाटभोजन वाटभोजनम् । कांसीवाजउ कांस्यवाद्यम् । वाडि वृतिः । सीख शिक्षा । कूआकंठइ कूपकण्ठे। छुरउ छुरः। तपरी काष्ठा तपसः काष्ठा । खुरउ क्षुरः। कुंढगोठि कुण्ठगोष्टी । कुंभाररउ चाक कुम्भकारस्य चक्रम् । कुंठसस्त्र कुण्ठं शस्त्रम् । कपीलउ काम्पिल्यम् । कोठउ असुद्ध कोष्ठः अशुद्धः । टार टारः । निवायड कोठर निर्वातः कोष्ठः । धानघीरी तरी धान्यवृतस्य तरी अवस्था। नीठ कियर निष्टया कृतः । सापरउ दर सर्पस्य दर.। भली निष्टा भव्यनिष्ठा। डर दर.। चूनउ चूर्णकः ।
उक्तिरनाकर २५ नेत्रउ नेत्रम् । सीहरी फाल सिंहस्य पालः । फालरज परिधान फाटस्य परिधानम् । घररा बला गृहस्य वव्यः । रुखर हनन् । पासउ पार्धम् । खाटकी खधिक। हाटडी हरिका। माथइ खोल गस्तके ग्वादक सेजगंडूआ गप्पागण्डका.। धणिया ओसड पनिका ओषयम् । घरधणियाणी गृहधनिका । पाडर पाटक। सावियर खस्तिकः । भस्मसूत भस्ममृतकम् । सूआमूचका । वीजी भूमि द्वितीया भूमिका । भूमिका रचना। काकीडउ ककिंडः, काकपिण्डः । दोहडउ द्रोहाटः। चीपिडा चिपिटः। गायांरउ चरउ गवां चरणम् । मकनउ हाथी मत्कुणो हस्ती । करमदर करमर्दकः। घूधुरी घूर्युरी। तिल पील्या तिलाः पीडिताः । गलहथउ गलहस्तः । गामरउ गोयरउ ग्रामस्य गोचरः । कुंआरीरी घाघरी कुमार्या घरी । कुंमारउ सोनउ कुमारं सुवर्णम् । कूवडउ कूवरः । दादुर वाजउ द१रवाद्यम् । देहरइरउ निकरउ देवगृहस्य निकरः । वालर काकडी बल्लरकर्कटी। कुचेल कुचेलः । पुप्फपडली पुष्पपटली । मयणहल गदनफलम् । खडगरर पडीआर ग्यास्य प्रत्याकारः। वाहर न्याहरा। बाहरू व्याहारकः । गुणणी गुणनिका । घाघर नदी वरिका नदी । चउपज चतुप्पदम् । छीकणी छिकिका। कसी कपीका, कशी था। कुसि कुशा। समि कियउ समीकृतः । सिम कियउ सिमीकः । पालण पालनकम् । परचूरणि लेखउ प्रचूर्णि लेख्यकम् । बावनर चंदन द्विपञ्चाशकं चन्दनम् । पादरियर पाद्रिकः । गामडिउ ग्रामटिकः । धूणियउ धूनितम् । कुरुटतउ कुरुटन्, कुरुट धातुः । रुलियउ रुलितः, रुल धातुः । खेलणउ खेलनकम् । क्रयाणारी भरणी क्रयाणकानां भरणिका। वलतउ वलन् । ऊवलतउ उद्वलन् । गलहथियउ गलहस्तितः । लाहणउ लाभनकम् । हाडफूटि हडस्फोटिः। झामलउ ध्यामलम् । नीठियउ निष्ठितम् । नांगर नागरम् । उ०र०४ २६ पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत कांठउ कण्ठकः । मासिहाई मातृष्वनीयः । गोहूंरी थूली गोधूमानां स्थूला । मामउ मामकः । रवऊ रवकः । मामी मामकी । पाजणी पर्यायणिका। पाटूआली पादप्रहारिणी। अंधमूंधपणइ अन्धमुग्धिकया । अरत परत वाप सरीखउ वणवउ वयनम् । आकृत्या प्रकृत्या बप्पसदृशः। पहिस्खउ परिहितम् । अंगीठउ अग्निपीठम् । आधासीसी अर्द्धशीर्षी । उघड दूघडउ उद्घटदुर्घटम् । काकडासींगी कर्कटशृङ्गिका। चीफाड चित्तस्फोटकः। नासिवा करतउ नष्टुं कुर्वन् । निलखण निर्लक्षणः। मेथीरा लाडू मेथ्या लड्डुकानि । अही' अघेनुकम् । पीपलरी पीपी पिप्पलस्य पिप्पका । उपरि ठाई उपरिस्थायी। विहाणउ विभातम् । कांकसी कचाकर्षणी। वहिरउ बधिरः। हथीयार हस्ताधारः । सिरीस शिरीषः। कउसीसउ कपिशीर्षकम् । फूटरउ स्फुटतरः। मुखामुखि मुखामुख्यता। जानीवासउ जन्यावासकः । गोगीडउ गोकीटः। ऊधंधलु उद्धूलिकम् । ऑलउ उपालयः। उसीआलु अस्पृष्टालयम् । नीकर निष्कः । चूंघटउ अवगुण्ठनम् । कल्होडल कलभोत्कटः। आहर जाहर एहिरे याहिरा। आलीगारउ अलीककारः । चांद्रिणु चन्द्रिकालयम् । पाटू पादघांतः । धणीवउ धन्यवयाः । दीवी दीपिका । नीखणियामउ निःक्षणकर्मा । भंजवाड भङ्गपातः । मेराईउ मेराधकम् । पडाई पताकिका। वादलउ वारिदपटलम् । पेलावेलि प्रेराप्रेरि। अभोखउ अभ्युक्षणम् । वियारियउ विप्रतारितः । ऑलखर उदकोदञ्चनः । छेतरियउ छलान्तरितः । पछोकडउ पश्चादोकः । दडवडाइट द्रवकघातितः । उपवासीउ उपोपितः। खाजहलउ खाद्यफलम् । पोसहधर पोपधस्थः । पीजहलर पेयफलम् । हियाविउं दृदयापितम् । वाउलउ वार्तालयः । फुईहाई पितृष्वन्नीयः । ऊजाणी उद्यानिका ।
उक्तिरनाकर २७ ताहरुं त्वदीयम् । माहरु मदीयम् । तुम्हार युप्मदीयम् । अम्हारु अस्मदीयम् । किसउ कीदृशः। जिसउ यादृशः। तिसर तादृशः। इसउ ईदृशः । भोगल मुजार्गला। मेहरू महत्तरः । देखाविखि दृष्टापेक्षा। वरांसियर विपर्यस्तः । आज अध। काल्हि कल्ये। परम परे धपिः । अरीम अपरेयुः । अन्यस्मिन्नहनि । अन्येचुः । आजूणउ अधतनम् । काहणउ कल्यतनम् , बस्तनम् । हिवडा इदानीन् । अहुण अधुना। हिवडांगें आधुनिकम् । मुहिया मुधा । जिम यथा । तिम तथा । जां यावत् । तां तावत् । एकवार एकदा। अनेसउ अन्यादृशः। अम्हसरीपउ अस्मादृशः। तूंसरीपट त्यादृशः। मूंसरीपउ मादृशः। तुम्हसरीपउ युप्मादृशः। जेतलु यावन्मात्रम् । तेतलु तावन्मात्रम् । एतलु एतावन्मात्रम् , इयन्मात्रम् । केतलुं कियन्मात्रम् । औरहुं अर्वाक् । परहर परतः। बाहिरि बहिः, बाह्ये । एकपरि एकधा। विहंपरि द्विधा। इत्यादि। 'जडपणउ' इत्यादी भावे त-त्वौ यण वा । जडता, जडत्वं, जाड्यम् । अहुण ऐषमा, परुः परुत् । एक एकत्वसंख्यायामित्येकः । 'तीशोली'ति कः। बि द्वौ पुमांसौ, स्त्रियो, कुले च। दउढ व्यर्द्धः । अढी अर्द्धतृतीयः। . सवइवार सर्वदा। जहियइ यदा। तहियइ तदा, तदानीम् । कहियइ कदा। अनेरीवार अन्यदा। किहां कुत्र, क। जिहां यत्र । तिहां तत्र । इहां अत्र । अनेतइ अन्यत्र । सगलइ सर्वत्र । झटकइ झटिति । जूउ युतः। 1 , , - ૨૮ पण्डितप्रघर-श्रीसाधुसुन्दरमणि-कृत त्रिह त्रयः, तिस्रः, त्रीणि,पुमांसा, वीस द्वौ दशतो मानमेषां संख्ये- स्त्रियः,कुलानि वा। 'उभेनौं' यानामस्य वा संख्यानस्य वेत्यनेन 'उभ पूरणे इत्य- विंशतिः। विंशत्यादय इत्य- स्मादिः प्रत्ययोऽस्य च द्वने नेन द्वेदशदर्थे विभावः । त्यादेशौ । शतिश्च प्रत्ययः। चारि चत्वारः, चतस्रः, चत्वारि । इकवीस एकविंशतिः। 'चतेरुर' इत्यनेन 'चतेग या बावीस द्वाविंशतिः। चने' इत्यस्मादुरप्रत्ययः। त्रेवीस त्रयोविंशतिः। पांच पञ्च 'पचुङ व्यक्तीकरणे चउवीस चतुर्विंशतिः। 'उक्षि-तक्षीत्यन् प्रत्ययः । पंचवीस पञ्चविंशतिः। छ षट् 'सहेः षष् च' इत्यनेन 'पहि छावीस षड्विंशतिः। मर्षणे' इत्यस्मात् किम्, षष् सत्तावीस सप्तविंशतिः। चास्यादेशः। अट्ठावीस अष्टाविंशतिः। सात सप्त 'षप्यशौटिभ्यां तन् इगुणत्रीस एकोनत्रिंशत् । इत्यनेन 'षप् समवाये' इत्य- त्रीस त्रयोदशतो'मानमेषांसंख्ये- स्मात्तन् प्रत्ययः। यानामस्य वा 'संख्यानस्य आठ अष्ट 'अशौटि व्याप्तौ' इत्य त्रिंशत् । 'विंशत्यादयः' इत्य- स्मात् 'षप्यशौटिभ्यां तन्' नेन नेस्त्रिन् भावः । शच इत्यनेन तन् प्रत्ययः। प्रत्ययः। नव निधान, नव निधानानि, एकत्रीस एकत्रिंशत् । 'णुक स्तुतौ' इत्यस्मात् 'उक्षि- बत्रीस द्वात्रिंशत् । तक्षी त्यन् । तेत्रीस त्रयस्त्रिंशत् । दस दृश्यन्ते दश । 'लूपूयूवृषी ति चउत्रीस चतुत्रिंशत् । किदन् । पइंत्रीस पश्चत्रिंशत् । इग्यारइ एकादश। छत्रीस षत्रिंशत् । वाइर द्वादश। सइंत्रीस सप्तत्रिंशत् । तेरइ त्रयोदश। अठत्रीस अष्टात्रिंशत् । चउद चतुर्दश। इगुण चालीस एकोनचत्वारिंशत् । पनर पञ्चदश। चालीस चत्वारो दशतो मानमेषां सोल षोडश। संख्येयानामस्य वा संख्या- सतर सप्तदश। नस्य चत्वारिंशत् । 'विंश- अढार अष्टादश। त्यादयः' इत्यनेन चतुरश्चत्वारि इगुणवीस एकोनविंशतिः। भावः शच प्रत्ययः। यो दशतः त्रिवारदशतः वारत्रयदशतः, इति भावः । .
उक्तिरक्षाकर २९ इगतालीस एकचत्वारिंशत् । बयालीस द्विचत्वारिंशत् । प्रतालीस त्रिचत्वारिंशत् । चउमालीस चतुश्चत्वारिंशत्। पचतालीस पश्चचत्वारिंशत् । छयालीस पटचत्वारिंशत् । सहतालीस सप्तचत्वारिंशत् । अठतालीस अष्टचत्वारिंशत् । इगुणपचास एकोनपञ्चाशत् । पचास पञ्च दशतो मानमेपां संख्येयानामस्य वा संख्या- नस्य पञ्चाशत्, 'विंशत्या- दयः' इत्यनेन शत्प्रत्ययः, पञ्चन आत्वं च । इकावन एकपञ्चाशत् । बावन द्विपञ्चाशत् । त्रिपन त्रिपश्चाशत् । चउपन चतुष्पश्चाशत् । पंचावन पञ्चपञ्चाशत् । छपन षट्पञ्चाशत् । सत्तावन सप्तपञ्चाशत् । अठावन अष्टपश्चाशत् । इगुणसठि एकोनषष्टिः । साठि षष्टिः मानमेषां संख्येयानामस्य वा संख्यानस्य षष्टिः, 'विंशत्या- दयः' इत्यनेन षषस्तिः षश्च । इगसठि एकषष्टिः। वासठि द्वाषष्टिः। त्रेसठि त्रिषष्टिः। चउसठि चतुःषष्टिः। पईसठि पश्चषष्टिः। छासठि षट्षष्टिः। सतसठि सप्तपष्टिः। अडसठि अष्टषष्टिः। इगुणहत्तरि एकोनसप्ततिः। सत्तार सप्त दशतोमानमेषां संख्ये- यानामस्य वा संख्यानस्य सप्ततिः । 'विंशत्यादयः' इत्य- नेन सप्तनस्तिः। इगहत्तरि एकसप्ततिः। बिहत्तरि द्विसप्ततिः। त्रिहत्तरि त्रिसप्ततिः। चउहत्तरि चतुःसप्ततिः। पंचहत्तरि पञ्चसप्ततिः। छहत्तरि षट्सप्ततिः। सतहत्तरि सप्तसप्ततिः। अठहत्तरि अष्टसप्ततिः। इगुण्यासी एकोनाशीतिः। असी अष्टौ दशतो मानमेषां संख्येयानामस्य वा संख्या- नस्य अशीतिः, 'विंशत्या- दयः' इत्यनेन तिप्रत्ययः, अष्टनोऽशी च। इक्यासी एकाशीतिः। व्यासी यशीतिः। त्र्यासी त्र्यशीतिः। चउरासी चतुरशीतिः। पंचासी पश्चाशीतिः। छयासी षडशीतिः। सत्यासी सप्ताशीतिः । अव्यासी अष्टाशीतिः। नव्यासी नवाशीतिः, एकोननव- षट् दशतो तिर्वा । निऊ नव दशतो मानमेषां संख्ये- यानामस्य वा संख्यानस्य ३० पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत नवतिः विंशत्यादयः' इत्यनेन क्तसंख्याशब्दा उत्तरशब्द- नवनस्तिः। परा योज्याः। इकाणू एकनवतिः। सहस सहस्रम् । बाणू द्विनवतिः। लाख लक्षम् । कोडि कोटिः। त्र्याणू त्रिनवतिः। बीज द्वितीयः । चउराणू चतुर्नवतिः। त्रीजउ तृतीयः । पंचाणू पश्चनवतिः। चउथउ चतुर्थः । छिन्नू षण्णवतिः। पांचमउ पञ्चमः । सताणू सप्तनवतिः। छट्टउ षष्ठः । अठाणू अष्टनवतिः। सातमउ सप्तमः । नवाणू नवनवतिः। आठमउ अष्टमः। सउ दश दशतो मानमेषां संख्ये- नवमउ नवमः । यानामस्य वा संख्यानस्य दसमउ दशमः। शतम् । 'विंशत्यादयः' इत्य- इग्यारमउ एकादशः। नेन दशानां शभावः तश्च बारमउ द्वादशः। प्रत्ययः॥ तेरमउ त्रयोदशः। एकोत्तर सउ एकोत्तरं शतम् । चउदमउ चतुर्दशः। बिडोत्तर सउ द्वयुत्तरं शतम् । पनरमउ पञ्चदशः। तिडोत्तर सउ त्र्युत्तरं शतम् । सोलमउ षोडशः । चउडोत्तर सउ चतुरुत्तरं शतम् , सतरमउ सप्तदशः। इत्यादि नवनवतिं यावत्पूर्वो अठारमउ अष्टादशः। प्राच्यानां मते-एकादशमः, द्वादशमः, त्रयोदशमः, चतुर्दशमः, पञ्च- दशमः, षोडशमः, सप्तदशमः, अष्टादशमः, इति सपूर्वपदादपि नन्ताद मो भवति । इगुणीसमउ एकोनविंशतितमः, एकोनविंशो वा। वीसमउ विंशतितमः, विंशो वा । एकवीसमट एकविंशतितमः एकविंशो वा । एवं नवनवतिं यावत्सर्वत्र डट्-तमटौ पर्यायेण योज्यौ । षष्टिसप्तत्य- शीतिनवतिशब्देभ्यः संख्यापूर्वपदेभ्यः संख्यापूरणे तमडेव, न डट् । पष्टितमः, सप्ततितमः, अशीतितमः, नवतितमः। सोपपदेभ्यस्तूभावपि एकषष्टितमः एकषष्टः, एकसप्ततितमः एकसप्ततः, एकाशीतितमः एका- शीतः, एकनवतितमः एकनवतः।
उक्तिरवाकर समउ शततमः । सहसमा सहन्नतमः । लाखमउ लक्षतमः । कोडिमर कोटिनमः । मासमउ दिहाडड मासनम दिनम् । इग्यारमी एकादशी, एकादशमी वा । वीसभी विंशतितमी, विशी वा । त्रिवायड त्रिपादः। चारोली चारकुलिका । धाहडी धातकी । वीणउ घी स्त्यानं घृतम् । मकोडर माकोटः। थुड स्थुडम् । उगमुगउ अवाग्मूकः । इंडउ अण्डकः । ऑलखाणउ उपलक्षणम् । सामाई सामायिकम् । एकासणउ एकासनकम् । ग्यासणउ व्यासनकम् । आंविल आचाम्लम् । निवी निर्विकृतम् । पाडिहारू प्रातिहारिकम् । नोहली नवफलिका। राइतउ राजिकातिकम् । केवलउ क केवलः क । कानइ का कर्णे का। पच्छिम कि पश्चिमायां कि । अगिम की अग्रिमायां की। लहुडइ कु लघुके कु। वृद्धौ कू। एमात्र के एकमात्रायां के। बिमात्र के द्विमात्रयोः कै। कानमात को कर्णमात्रयोः को विमातकाना को द्विमानकर्णेषु कौ। मस्तकमीढइ के मस्तकबिन्दौ कं । आगलमीढइ कः अग्रे विन्द्रोः कः। पडिवा प्रतिपत् । बीज द्वितीया । तीज तृतीया । चरथि चतुर्थी । पांचमि पश्चमी। छठि पष्टी। सातमि सप्तमी। आठमि अष्टमी। नवमि नवमी। दसमि दशमी। अग्यारसि एकादशी। वारसि द्वादशी। तेरसि त्रयोदशी। चउदसि चतुर्दशी । पूनिम पूर्णिमा । अमावसि अमावास्या। जइ किम्हइ यदि कथमपि, चेत् । पछइ पश्चात् । पाछिलउ पाश्चात्यम् । साम्हउ संमुखम् । सूगामणउ शूकाजनकम् । परायउ परकीयम् । अजी अद्यापि । तांइ तथापि । सांझ सन्ध्या । पडूंचउ प्रातिभाव्यम् । चउघडिउ चतुर्घटिकम् । उसूर उत्सूरः। दीरघइ कू आधु अर्द्धः । पूरउ पूर्णः।
. थण स्तनौ। दूबलर दुर्बलः। पाइक पादातिकः। १२ पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत उइलउ अर्वाचीनम् । कडिदोरउ कटीदवरकः । परलउ पराचीनम् । पग पदः। अऊठ अर्द्धचतुर्थः । लीह रेषा। साढापांच सार्द्धपञ्चकम् । हीअउ हृदयम् । कांइ कुतः, कस्मात्, किम् वा । रूं रोम । रलीयामणउ रतिजनकम् । भूहिरउ भूमिगृहम् । उदेगामणउ उद्वेगजनकम् । सोहामणउ सौभाग्यवान् । सागडी शकटिकः । अगेवाण अग्रानीकः । दडउ कन्दुकः। चउकीवट चतुष्कपट्टः । तलाउ तटाकः। औरीसउ अवघर्षः। बहेडउ द्विघटकम् । सालणउ शालनकम् । चहुंटी चन्नूपुटिका। सिली शिलाका। कावडि कपोती ।। पडसाल प्रतिशाला। गरढउ गतार्धवयाः। आंगणउ अङ्गणम् । वेगड विकटशृङ्गः। बारवटद्वारपट्टः। पयंतरउ प्रत्यन्तरम् । भारउट भारपट्टः । डोकरउ दोलत्करः। सीरामण शीताशनम् । डेहली देहली। सउडि संवृतिः । भीति भित्तिः । सीरख शीतरक्षिका । टीपणउ टिप्पनकम् । तुलाई लिका पाटी पट्टिका । मासी मातृष्वसा । पोथी पुस्तिका। फुई पितृष्वसा। छोह सुधा । भउजाई भ्रातृजाया। भीतरउ अभ्यन्तरम् । विउणउ द्विगुणम् । चउगठि चतुष्काष्ठिका । तिउणउ त्रिगुणम् । पहिरणउ परिधानम् । आडण अङ्गमण्डनम् । पांगुरणउ प्रावरणम् । कडव कणावा। टीलउ तिलका। दोटी द्विपटी। वहुरखउ वाहुरक्षकः । निद्रालखउ निद्रालक्षः। मुंदडी मुद्रिका । सांडसउ सदंशकः। खूणउ कोणकम् । चउगुण चतुर्गुणम् । वुहरउ व्यवहती।
उतिरनाकर मांची मञ्चिका। नही नखिका। वइंगणु वृन्ताकम् । हलद हरिदा। आदउ आईकम् । चउरसउ चतुरसः । धोयण धावनम् । मोकलउ मुत्कलः। पिहुलउ पृथुलः । गाडरि गडरी। जुआरि युगन्धरी। पूअरउ पूतरकः । भइरव भैरवी । भाथडी भरला । खाट मनिका । घडामांची घटमञ्चिका । आरती आरात्रिका। पोली प्रतोली। गंभारउ गर्भागारम् । देउली देवकुलिका । भमती भ्रमावती। सूणहर शयनगृहम् । चाचर चत्वरन् । चउरी चतुरिका । चउसाला चतु:शालम् । दारीवाडर दारिकावाटकः । ऊवट उद्वर्म । रान अरण्यम् । वाफबाप्पः । आधरण आध्राणं, अधिश्रयणं वा । सेवंती शतपत्रिका । कणयर करवीरः। वेउल विचकिलः । पाउल पाटला। पुंआड प्रपुनाटः । जव यवः। कोठीभडउ कोष्ठभेदकः । मांडा मण्डका । साकुली शकुली। वालहली बल्लफलिका । खीच क्षिप्रः । खीचडी क्षिप्रचटिका । खारिक खाद्यारिका। टोपरउ टोपपरः । काढउ काथः। तंगोटी तंगपटी। साथरउ सस्तरः । भीखारी भिक्षाचरः । दांतिलउ दन्तुरः। खोडर खोडः। मातर मत्तः । दोसी दौयिकः। सांवलउ शम्बलम् । पाहुणउ प्राधुणः। लाज लज्जा । पजूसण पर्युपणा। चउमासउ चतुर्मासकम् । अठाही अष्टाहिका। पाखखमण पक्षक्षपणम् । पोरसी पौरुषी । नवकारसही नमस्कारसहितम् । पचखाण प्रत्याख्यानम् । पडिकमणउ प्रतिक्रमणम् । पडिलेहण प्रतिलेखना। वांदणउ वन्दनकम् । खामणरक्षामणकम् । काउसग कायोत्सर्गः। खमासण क्षमाश्रमणम् । . उ०र०५ ४ पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत वखाण व्याख्यानम् । पउंजणी प्रमार्जनिका । कम(व)ली कपरिका, कपलिका वा । ठवणी स्थापनी। पायठवणउ पात्रस्थापनकम् । गोछउ गोच्छकम् । पायकेसरी पात्रकेशरिका। पडलउ पटलकम् । रयताणउ रजनाणम् । त्रिपणउ तर्पणकम् । कडहटउ कटाहटकम् । लेखणि लेखनी। मसीजणउ मषीभाजनम् । वेहणउ वेधनकम् । दांडी दण्डिका । आचार्यास आचार्यमिश्राः । उपाध्यायांस उपाध्यायमिश्राः । वणारिस वाचनाचार्यः । पंड्यांस पण्डितमिश्रः । गणीस गणिमिश्रः। ओली आली । सींभ श्लेष्मा । पांमडी पक्ष्माटिका। आलाणथंभ आलानस्तम्भः । मरहठ महाराष्ट्रः। ताठउ त्रस्तः । सीख शिक्षा। जस यशः। विमासिवउ विमर्शनम् । डस्य दरितः। चक्यउ चकितः। पीपलीमूल पिप्पलीमूलम् । जोतिषी ज्योतिषिकः। निमित्ती नैमित्तिकः। ऊठिवउ उत्थानम् । ताली तालिका । तिलउ तिलकः। मसउ मषः। ऊवटणउ उद्वर्त्तनम् । सन्यासी सान्यासिकः । बांभण ब्राह्मणः। हुंछउ उञ्छः। पाथउ प्रस्थः । आढउ आढकः। हाथ हस्तः । एवाल जावालः। कुडुवी कुटुम्बी। दात्रउ दात्रम् । सूंवरी वडी शुवस्य वटी। सुंचल सौवर्चलम् । कुरुखेत कुरुक्षेत्रम् । कामरू कामरूपः। काछर कच्छः । मालवउ मालत्रः । बोर बदरम् । नोमाली नवमालिका। फोफल पूगफलानि । मयगल मदकलः। अलसी अतसी । सालवाहन सातवाहनः । पलीवणउ प्रदीपनकम् । लाठि यष्टिः । कणियार कर्णिकारः। कानी कर्णिका। माटी मृत्तिका। विसंतुल विसंस्थुलः। उछाह उत्साहः । वंग बनाः।
३ सु तद् सः । उक्तिरलाकर अंग अङ्गा.! साइणि शाकिनी। मारू मारवः । भुइफोड भूमिस्फोटः। कसमीर कश्मीराः । ऑधाहूली अधःपुप्पी। कणउज कन्यकुजम् । संखाहोली शहपुष्पी। कोसंबी कौशाम्बी । सोवा शतपुष्पी । चाप बम्पा। कूडी कुदः । जो यद् यः । करवती करकपत्रिका। 'तनित्यजियजिभ्यो डद्' इति डद् । घांट घण्टा । अउ इदम्, अयम् । थूथ तुच्छन् । हीरट हीरकः । 'इणो दमक' इति दमक । वेलू वाटका । एह एतद् एपः 'इणस्तद' इति तद् । फुलिंग स्फुलिङ्गः । कुण किम् , कः । ताड तालः। 'को डिम' इति डिम् । पीलू पील। तुं, तुम्हे युष्मद् - त्वम् , यूयम् । गूगल गुग्गुलः। युपः सौत्रः सेवायाम् । गलियार गलिः । विलाडट विडालः । हुं, अम्हे अस्मद् - अहं, वयम् । मंजार मार्जारः । 'असूच क्षेपणे' 'युष्यसिभ्यां पाढ पाठः। क्यद्' इति क्यद् । टसर तसरः। आणंद आनन्दः । अथ क्रियाविधिविभागः । त्रिविधो धातुः परस्मैपदी, आत्मनेपदी, उभयपदी चेति । तत्र परस्मैपदिधातोः कर्तरि परस्मैपदम् , आत्मनेप- दिधातोः कर्तरि आत्मनेपदम् , उभयपदिधातोः कर्तरि उभयपदम् । कर्मणि भावे च त्रिभ्योऽप्यात्मनेपदमेव । प्रत्येक विभक्तिप्राप्तिमाह- 'हवइ, दियइ, लियइ, करइ, इत्यादौ वर्तमानायाः परस्मैपदम् । 'दीजइ, लीजइ, कीजई' इत्यादौ कर्मणि वर्तमानाया आत्मनेपदम् । 'देजे, लेजे, करिजे' इत्यादौ एकारान्तवचने सप्तमी। 'देइ, लेइ, करि' इत्यादौ अनुमति पञ्चमी । क्रियासमभिहारे सर्वकालेषु पञ्चम्या मध्यमपुरुषैकवचनम् । क्रियासमभिहारः पौनःपुन्यं भृशार्थो वा। यथा माघकाव्ये- यो रावणः । 'पुरीमवस्कन्द लुनीहि नन्दनं, मुषाण रत्नानि हरामराङ्गनाः।' अत्रातीते काले हि। 'दीजउ, लीजउ, कीजउ' इत्यादौं कर्मणि पञ्चम्या आत्मनेपदम् ।
, , पण्डितप्रघर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत 'दीधउ, लीधउ, कीधउ' इत्यादी वस्तन्यद्यतन्यौ परोक्षा च । 'काल्हि दीधउ' इत्यादौ शस्तन्येव, न परोक्षाद्यतन्यौ। 'आज दीघउ, आज लीधउ' इत्यादी अद्यतनी, न परोक्षाह्यस्तन्यौ। 'म देइ, म लेइ, म करि, म देसि, म लेसि, म करिसि' इत्यादौ माशब्दयोगेऽद्यतनी, मास्म योगेास्तन्यद्यतन्यौ, मायोगे तु यथाप्राप्ते पञ्चमी भविष्यन्ती च । 'म दीधु, म लीधु, म कीधु' इत्यादौ कर्मणि माशब्दयोगे अद्यतन्याः, मास्मयोगे ह्यस्तन्यद्यतन्योः, माङ्योगे तु पञ्चम्या आत्मनेपदम् । 'जइ देत, जइ लेत, जइ करत' इत्यादौ क्रियातिपत्तिः। 'जइ दीजत, जइ लीजत, जइ कीजत' इत्यादौ कर्मणि क्रियातिपत्तेरा- त्मनेपदम् । 'देसिइ, लेसिइ, करिसिइ' इत्यादौ, 'नही दियइ, नही लियइ, नही करई' इत्यादौ च भविष्यन्ती। 'दीजिसिइ, लीजिसिइ, कीजिसिई' इत्यादौ, 'नही दीजइ, नही लीजइ, नही कीजइ' इत्यादौ च कर्मणि भविष्यन्त्या आत्मनेपदम् । 'काल्हि देसिइ, काल्हि लेसिइ' इत्यादौ श्वस्तनी। 'वर्षशत जीविसिइ, वही जिणिसिइ' इत्यादौ आशीर्युक्ते भविष्यति काले आशी। अथ कृत्प्रत्ययप्राप्तिमाह- 'देतउ, लेतउ, करतउ' इत्यादौ कर्तरि वर्तमाने शतृशानौ परस्मैपद्यात्मने- पदिनो। उभयपदिन उभावपि । 'दीजतउ, लीजतउ, कीजतउ' इत्यादौ कर्मणि शानः। देणहार, दायकः दाता; लेणहार, लायक: लाता; करणहार, कारकः कर्ता इत्यादौ वर्तमाने अकतृबौ। 'दीधउ' दत्तः दत्तवान् ; लीधउ, लातः लातवान् ; कीधउ, कृतः कृतवान् इत्यादौ अतीते क्त-क्तवंतू कर्मणि क्तः, कर्तरि क्तवन्तुः । गत्याकर्मका- दिभ्यः कर्तरि क्तोऽपि । यथा-अयमागतः आगतवानपि । तथा परस्मैप- दिनः कसुः, आत्मनेपदिनः कानः, उभयपदिन उभावपि । 'देइउ, लेइड, करीउ' इत्यादी क्त्वा, 'देवा, लेवा, करिवा' इत्यादी दातु- मित्यादि शक्लज्ञायोगे क्त्वा प्रत्ययोक्तौ तुम् । 'करी जाणुं, पढी सकउं' का जानामि पठितुं शक्नोमि, इति । 'देवउ, लेबउं, करिवर्ड' इत्यादौ कर्मणि तव्यानीयौ-दातव्यं दानीयम् , कर्तव्यं करणीयम् । कचित् क्यप् घ्यणावपि-कृत्यं, कार्य चेति । 'देणाहरु, लेणाहरु, करणाहरु' इत्यादी भविष्यति काले तुमन्तात् काम- मनसो, तुमो मलोपश्च । दातुकामः दातुमनाः, कर्तुकामः कषुमनाः । .
अतिरक्षाकर अथ क्रियापदानि- हबइ भवति। कलइ कलयति । गिणइ गणयति । गुणइ गुणयति। चीत्रइ चित्रयति । दूपइ दूपवति। मूत्रइ मूत्रयति । रचइ रचयति । विरचइ विरचयति । वर्णवइ वर्णयति । कहइ कययति । परूवइ प्ररूपयति । चांटइ वण्टयति । हीडोलइ हिंदोलयति । धमइ धमति । पियइ पिबति । जायइ याति । लियइ लाति । वायइ वाति । न्हायइ नाति । चिणइ चिनोति । ऊडइ उड्यते । धूणइ धूनयति । करइ करोति, करति वा। जागइ जागति। आदरइ आद्रियते । धरइ धरति । भरइ भरति । मरइ म्रियते । वरइ वृणुते। हरइ हरति । तरइ तरति । गायइ गायति । ध्यायइ ध्यायति । ध्रायइ भ्रायति । संकड़ शहते। हीकइ हिकति । लिखइ लिग्वति । मागइ मार्गयति । अरथइ अति । लांघइ लरते। अरचइ अर्चयति । संकुचइ संकुचति । चरचइ चर्चयति। पचइ पचति । लुंचइ लुश्चति । वाचइ वाचयति । वंचइ वञ्चयते । सोचइ शोचति । सींचइ सिञ्चति । पूछ। पृच्छति । वांछइ वाञ्छति । उपारजइ उपार्जति । गाज गर्जति आंजइ अनक्ति । गुंजइ गुञ्जति । कूजइ कूजति । तर्जइ तर्जति । तिजइ त्यजति । पीजइ पिञ्जयति । भांडइ भण्डयति । भांजइ भनक्ति। भाजइ भज्यते । . गिरइ गिरति । मांजइ मार्टि, मार्जति वा।
३८ . पण्डितप्रवर श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत लाजइ लज्जते । मर्दइ मृद्गाति । सरजइ सृजति । रोयइ रोदिति । कूटइ कुट्टयति । खेडइ खेटयति । वांदइ वन्दते। वेयइ वेत्ति । घटई घटयति । चूंटइ चुण्टयति । हगइ हदते। तोडइ त्रोटयति । ऊपजइ उत्पद्यते। नीपजइ निष्पद्यते । त्रूटइ त्रुटति । मोडइ मोटयति । संपजइ संपद्यते। लूटइ लुण्टयति । बांधइ बध्नाति । फोडइ स्फोटयति । बूझइ बुध्यते। फूटइ स्फुटति । झूझइ युध्यते। रूंधइ रुणद्धि । लुठइ लुठति । ओलंडइ ओलण्डयति । रांधइ राध्यति । क्रीडइ क्रीडति । आराधइ आराध्यति । खंडइ खण्डयति । सूझइ शुध्यति । जोडइ जोडयति । सीझइ सिध्यति । साधइ सानोति । बूडइ-डति । वीधइ विध्यति । मांडइ मण्डयति । पीडइ पीडति । खणइ खनति । कीर्तइ कीर्तयति । जामइ जायते । चीतवइ चिन्तयति । मानइ मानति । हणइ हन्ति । नाचइ नृत्यति । आपइ अर्पयति । पडइ पतति । कुपइ कुप्यति । आपडइ आपतति । कांपइ कम्पते। ऊपडइ उत्पतति । कलपइ कल्पते । कुहइ कुथ्यति । जपइ जपति । मथइ मनाति। तपइ तपति । भाकंदइ आक्रन्दयति । दीपइ दीप्यते । कूदइ कूर्दते। धूपइ धूपयति । खायइ खादति । लीपइ लिम्पयति । निंदइ निन्दति । लोपइ लुम्पति ! पादइ पर्दते । चुंबई चुम्बति ।
उक्तिरताकर विलंबई विलन्त्रते। खुभइ क्षोभते। खोभड क्षोभाति लहइ लमते । सोभइ शोभने । सीवइ सीव्यति । सेवइ सेवति । नासइ नश्यति। विणसइ विनश्यति । डसइ दशति । पइसइ प्रविशति । फरमइ स्पृशति । काढइ कर्षति । खसइ खपति । खमइ क्षमते घसइ घर्षति घोसइ घोषति । चूसड़ चूपति । पोसइ पुष्यति । जीमइ जेमति । नमइ नमति । दमड़ दाम्यति । भमइ श्रमति । रमइ रमते। वमइ पमति । कामह कामयते । आक्रमइ आक्रमते । खिरइ क्षरति । विचारइ विचारयति । चोरइ चोरयति । पूरह पूरयति । मंत्रइ मन्त्रयते । निजंत्रइ नियन्त्रयति । फुरइ स्फुरति । गालइ गालयते। गिलइ गिलति । टलइ टलति। फलइ फलति । आफलइ आस्फलति । हालइ हल्लति । हीलइ हीलयति । चावइ चर्बयति । जीवइ जीवति । धावइ पही धावति पथिकः बालक मा नइ धाव वालको मातरं धावति । भखइ भक्षति । भीखइ भिक्षते । भाषइ भाषते । भपइ भपति। मुसइ मुष्णाति । रूसइ रुप्यति । राखइ रक्षति । हीसइ हेषति । लखइ लक्षयति । वरसइ वर्षति । सुसइ शुष्यति । सीखइ शिक्षते। हरपइ हृष्यति । तूसइ तूषति । खासइ कासते। त्रासइ त्रस्यति । निरभरछइ निर्भर्सयति । नीससइ निःश्वसिति । ऊससइ उच्छृसिति । प्रसंसइ प्रशंसति ।
४०. पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत छाजइ, रिजइ राजते। खूपइ मज्जति । पूंजइ पुञ्जयति । विढवइ अर्जयति । जूपइ युनक्ति । उखुडइ उलूरइ त्रुटति । घोलइ घूर्णति । विरोलइ मथ्नाति । ऊदलइ आच्छिदइ आछिनत्ति । फंदइ स्पन्दते । मलइ मृगाति । झूरइ खिद्यते। ग्रहइ गृह्णाति । गरहइ गर्हति । दोहइ दोग्धि । दहइ दहति । मूझइ मुह्यति । वहइ वहति । नीसरइ निस्सरति । ऑसरइ अपसरति । फाडइ पाटयति । ठंभीजइ स्तभ्यते । बजरइ कथयति । दुगुंछइ जुगुप्सते। सद्दहइ श्रद्धत्ते । उंघइ निद्राति । मिलायइ म्लायति । ढांकइ छादयति । दूमइ दावयति । धवलइ धवलयति । तोलइ तुलयति । मेलवइ मिश्रयति । भमाडइ भ्रमयति । नसावइ नाशयति । दाखवइ दर्शयति । ऑगालइ रोमन्थयति । प्रकासइ प्रकाशयति । कंपावइ कम्पयति । विसूरइ हाकइ निषेधते । झखइ संतपति । समाणइ समापयति । घातइ क्षिपति । लोटइ खपिति । बडबडइ विलपति । आढवइ आरभते। जंभाआइ जम्भते । आभिडइ संगच्छते । . फीटइ भ्रंशते । लुकइ निलीयते । नीवडइ पृथक् स्पष्टो वा भवतीत्यर्थः । आछोटइ आछोटयति । वीसरइ विस्मरति । महमहइ मालती मालतीगन्धः प्रसरति । साहरइ, संवरइ संवृणोति । समारइ समारचयति । भुल्लइ देखइ पश्यति । छिवइ स्पृशति । ढंढोलइ गवेषयति । चोपडइ म्रक्षयति । डरइ त्रस्यति । पलोटइ पर्यस्यति । चडइ आरोहति । थाकइ थक्कति, नीचां गतिं करोति, - विलम्बयति वा।
४१ उक्तिरक्षाकर विद्यालइ अन्त्यसग कोनि । यसइ असते । चांपड आकाति। अभ्यसइ अभ्यस्यति । पमावद प्रमाायति । विमासइ विमृशति । हाथी गुलगुलायइली गुलगुलायते । पडीगइ प्रतिकरोति । अललियइ उहालयनि। छइ अस्ति। होकइ दौशयति । आखइ आल्याति । पधारउ पादाऽवधार्यताम् । आवइ एति, आयाति वा । संभालइ नभालयनि । ऊगइ उदेति । पलाणइ पर्याणयति। आथमइ अस्तमेति । लालइ लालयति। पूजइ पूजयति। सांधइ संधयति, संधत्ते था। नमस्करइ नमस्करोति । हेरइ हेरयति । कुसणइ कुप्णाति । धीरवइ धीरयति । वीनवइ विज्ञपयति । भलिसुं भलिये। वापरइ व्याप्रियते। ऊछलइ उच्छति । पावइ प्रापति (प्रामोति?) ऊछालइ उच्छालयाते। पामइ प्रपूर्वोऽमिः प्राप्ती, प्रामति । साहइ साहयति । वीखरइ विकिरति । संवाहइ संवाहयति । परिणइ परिणयति । कृकइ कूत्करोनि कुर्वते था। वीवाहइ वीवाहयति । इकड़ टौकते। पूरइ पूर्यते । थांभइ स्तन्नाति । ताकइ तर्कति । निर्धाटइ निर्धाटयति । ऊलडइ उल्डयति । विकुर्वइ विकुर्वति । पालइ पालयति । पायइ पाययति । वोलइ ब्रवीति । जीपइ जयति । जाणइ जानाति । आरंभइ आरभते । सांभरइ स्मरति । परीछइ परेरिपेः, परीच्छति । वीहइ बिभेति । वीहावइ भापयते । उल्लावइ उल्लवति । उल्लींचइ उल्लञ्चति । सूंघइ शिंघति । छांडइ छर्दयति । निरखइ निरीक्षते । परखइ परीक्षते। ऊवेखइ उपेक्षते । उध्रकइ उद्रेकते। पडखइ प्रतीक्षते। समरइ स्मरति । बलइ ज्वलति । उ०र०६ वणइ वयते। कृन्तति । पण्डितप्रवर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत बालइ ज्वालयति । सूअइ खपिति । मोलइ मृदु लुनाति । फेडइ स्फेटयति । विढइ विध्यति । पसीअइ प्रसीदति । माचइ माद्यति । ऑढइ अवगुण्ठते । दूमइ दुनोति । प्रोअइ प्रवयति । सुणइ शृणोति । दीखइ दीक्षते । प्रेरइ प्रेरयति । सुहायइ सुखायति । वलइ वलते विगोवइ विगोपयति, विगूयति । आलिंगइ आलिंगति । विगूयइ विगूप्यति । वाअइ वादयति । नरनरइ नदति । छायइ छादयति । थवइ स्थगयति । लाडइ ललति । करडइ मनावइ मानयति । काट द्रउडइ द्रुताटयति । नांखइ निःक्षिपति । कुसइ क्रोशति । पखालइ प्रक्षालयति । निउंजइ नियोजयति, नियन्त्रयति वा । धोअइ धावति । कसइ कपति । संधूखइ संधुक्षते। लुणइ लुनाति । सांचइ संचिनोति । कींगायइ केकायते । अउगनाइ अपकर्णयति । खोडायइ खोडायते । ऊजालइ उज्वलयति । विहडइ विघटते। गांठइ ग्रन्थते (अध्नाति ? )। मीचइ मीलति । ऊजाइ उद्याति । थीजइ स्त्यायते। अवहथइ अपहस्तयति । वीझायइ विध्यायति । मानइ मन्यते । वीझावइ विध्यापयति । वासइ वासयति । वाधइ वर्द्धते। आलूजइ अलमुज्जति । खीलइ कीलति । पहिरइ परिदधाति । ऊमटइ उन्मज्जति । छेदइ छेदयति। पसवइ प्रसवति । पसीजइ प्रखिद्यते । मायइ माति । तीमइ तेमयति । भणइ भणति । अडवडइ अधःपतति, अधःपूर्वः पतः । पढइ पठति । सिणमिणइ शनर्मिनोत्सम्बुदः। ? चूअइ चोतति ।
उक्तिरताकर ४३ वसवसइ बहु स्वन्दति भूमिः । उंजइ उदलयति । ऊघडइ उद्धटते। फीटइ रिफटते। सूकई शुष्कति । खूदइ सुन्ते, क्षुणत्ति वा । सीदाअइ सीदनि । ऊगटइ उद्वर्त्तयति । भेदइ भिनत्ति । मरवइ यति । स्वीजइ खिद्यते । विआरइ विप्रतारयति । विहचई विभजति। खडहडइ खटत्पतति । गलअलइ गलगिलनि । पतीजइ प्रत्ययते, प्रत्येति, प्रतीयते वा । पवीत्रइ पवित्रयति । पालटइ परावर्तयति, परिवर्तयति वा । हडहडइ हटाद्धसति, हडहडयति वा । परीसइ परिवेषयति । वीटइ वेष्टते।. ऊवेढइ उद्वेष्टते। समेटइ समेटयति । वीसमइ विश्राम्यति। चडइ चटति। अउलवइ अपलपति । आचमइ आचामति । ऊपणइ उत्पवते। वीकइ विक्रीणाति । ऊघडइ उद्धटते। ऊघाडइ उद्घाटयति । ऊठइ उत्तिष्ठति । नीठइ निस्तिष्ठति । अडइ अइति । वावइ वपति । छिवइ छुपते, स्पृशति वा। छुटइ छुति । उखेलइ उत्कीलयति । स्त्रीलइ कीलति । वघारइ व्याधारयति । वखाणइ व्याख्यानयति। सकइ शक्नोति । दंभइ दभोति । परवारइ प्रपारयति । वारइ वारयति । निवारइ निवारयति । वरांसीयइ विपर्यस्यति । पल्हालइ पर्याद्रवयति । पालबइ पल्लवयति । पचारइ प्रत्युच्चारयति । थाहरइ स्थानमाहरति । आयसइ आदिशति । टलवलइ टलद्वलति । कलकलइ कलकलयति । झणझणइ झणझणयति । वाधइ वर्द्धयति । हसइ हसति । सहइ सहते। आखुडइ आस्खलति । रंजइ रञ्जयति । सपइ शपति । फडफडइ पटपटायते । कडकडइ कटकटायते, चक्षुः । उदेगइ उद्वेगयति । हीडइ हिडते। ऊकदइ उत्कूदते ।
. पण्डितप्रघर-श्रीसाधुसुन्दरगणि-कृत द्रमद्रमइ द्रमद्रमति । निराकरइ निराकरोति । तडफडइ तटत्पटति, तडफडयति वा । रहइ रहति । त्रडनडइ तटत्रुटति । छेकइ छेत्करोति । लोटइ लुट्यति, लोट्यति, लोटति वा । लेटइ लेट्यति । छींकइ छीत्करोति । धडहडइ घटत्करोति । नाथइ नाथति, वृषं तु नस्तयति । भडहडइ भटत्करोति, भडहडयति वा । धूंसइ ध्वंसते। हाकइ हात्करोति । पाठवइ प्रस्थापयति । फूंक फूत्करोति । ससइ श्वसिति । वीससइ विश्वसिति । चीचूअइ चीत्करोति । गूंथइ ग्रन्थयति । झाकइ झात्करोति । थूकइ थूत्करोति । मारइ मारयति । झंपावइ झम्पामाप्नोति । चूकइ चूत्करोति । 'पुकारइ पूत्करोति । पीसइ पिनष्टि । मागइ मार्गयति । गाहइ गाहते। विहाइ विभाति । याचइ याचते। आभिडइ आभ्यटति । घूमइ 'धूर्णयति। सरइ सरति । वधावइ वर्द्धयति । उइसइ ऑलखइ उपलक्षयति । अथ कर्मकर्तरि- मोकलावइ मुत्कलापयति । राचइ रच्यते । गंधाअइ गन्धायते । पाचइ पच्यते । पडूछइ प्रतिपृच्छति । दाझइ दह्यते। ऑठंभइ अवष्टम्नाति, अवष्टम्भते । वाजइ वाद्यते। पलाणइ पर्याणयति । खाजइ खाद्यते । सूजइ श्वयति । लुणाइ ल्यते। सूजवइ शोफयति । घसाइ धृष्यते । कराअइ क्रियते। परतइ परिवर्त्तयति । जणाइ ज्ञायते। खडखडइ खटत्करोति खडखडयति वा । वधाअई वर्ध्यते ।। उपगरइ उपकरोति । ॥ इति कतिचित् क्रियापदानि ।। बइसई } उपविशति । वाटइ वर्त्तयति ।
- अथ प्रशस्तिः। " राजन्वती श्रीजिनराजिसन्ततिं कुर्वत्सु शश्वजिनचन्द्रसूरिषु । सूरीकृतश्रीजिनसिंहसूरिषु युगप्रधानेषु महोगभस्तिषु ॥१॥ खरतरगणपाथोराशिवृद्धौ मृगाङ्का, यवनपतिसभायां ख्यापितार्हन्मताज्ञाः । प्रहतकुमतिदर्पाः पाठकाः साधुकीर्त्ति- प्रवरसदभिधाना वादिसिंहा जयन्तु ॥ २ ॥ तेषां शास्त्रसहस्रसारविदुपां शिष्येण शिक्षाभृता भक्तिस्थेन हि साधुसुन्दर इति प्रख्यातनाम्ना मया । ग्रन्थोऽयं विहितः कवीश्वरवचोबुद्धयोक्तिरत्नाकरः स्वान्यानां हितहेतवे बुधजनैर्मान्यश्चिरं नन्दतु ॥ ३ ॥ ॥ इति पं० साधुसुन्दरगणिविरचित उक्तिरत्नाकरग्रन्थः सम्पूर्णः ॥
अज्ञातविद्वत्कर्तृक उक्तीयक ॥६॥श्रीशारदायै नमः॥ * आरोपइ आरोपयति । आरोहइ आरोहति । उन्मूलइ उन्मूलयति । ऊठइ उत्तिष्ठति । ऊठाडइ उत्थापयति । थापइ स्थापयति । स्पर्द्धइ स्पर्द्धति । ऊलालइ उल्लालयति । ऊललइ उल्ललति । ऊछालइ उच्छलति । ऊडइ उड्डीयते । आथमइ अस्तमेति, अस्तमयति, अस्तं गच्छति, अस्तं याति । प्रकासइ प्रकाशयति । सूझइ शुध्यति । सूझवइ शोधयति । दूहवइ दुनोति, दुःखीकरोति । आश्रइ आश्रयति, आश्रयते । पा(खा)सइ कासति । प(ख)मइ क्षमते, सहते, क्षाम्यति । निंदइ निन्दति, जुगुप्सति । पडीगरइ चिकित्सति । पूं(खूदइ क्षुण्णति । पीसइ पिनष्टि । परिसीजइ परिथिद्यति । दो गुंछइ निर्भर्त्सयति । त्रासवइ त्रासयति । त्रासइ त्रस्यति । कांपइ कंपते। फिरइ भ्रमति, परिभ्रमति । विहसइ विकसति । मेलइ मिश्रयति । रमइ रमते, क्रीडति । चुंकलइ तुदति । प्रेरइ प्रेरयति, नुदति । भुंजइ भृजति । वांछइ वाञ्छति, इच्छति, अभिलषते । नमस्करइ नमस्करोति, नमस्यति, प्रणमति । वांदइ वन्दते । पूजइ पूजयति, अर्चयति, महति । छांडइ त्यजति, जहाति, उज्झति । वीहइ विभेति । नीकोलइ निःकुणाति । वीससइ विश्वसिति । ससइ खसति (श्वसिति ?)। नीससइ निःश्वस(सिति । वारइ वारयति । निवारइ निवारयति । निषेधइ निषेधयति । आलोचइ आलोचयति, पर्यालोचयति । जायइ गच्छति, याति । आवइ आगच्छति । नीकलइ निर्गच्छति, निःसरति, निर्याति । वोलइ ब्रूते, वदति, वक्ति । चालइ चलति । जीमइ जिमति, मुंक्के, अत्ति । पीयइ पिवति ।
हुइ भवति । अशातविद्वत्कृत उक्तीयक ४७ आस्वासइ आखाश्रयति (आश्वासयति)। जीवइ जीवति । सूंघइ जिवति। वापरइ व्याप्रियते। सांभलइ शृणोति, आकर्णयति । छइ अस्ति, वर्त्तते, विद्यते। जोयइ पश्यति, ईक्षति (ते), विलोकयति । दिपा(खा)डइ दर्शयति । जागइ जागति। संभलावइ श्रावयति । जगाडइ जागरयति । जिमाडइ जेमयति, भोजयति । सूइ खपिति, शेते, निद्राति । करइ करोति, कुरुते । वइसइ उपविशति । करावइ कारयति । छींकइ क्षौति । सर्जइ सृजति । तेडइ आकारयति, आह्वयति, आह्वयते । लेइ लाति, गृह्णाति, गृहीते, आदत्ते । प्रीणइ प्रीणयति, पृणाति । लिवरावइ ग्राहयति । नांप(ख)इ विकीरति । दिइ ददाति, दत्ते, यच्छति, वितरति । घालइ क्षिपति । दिवरावइ दापयति । घलावइ क्षेपयति । जाणइ जानाति, अवगच्छति । काढइ कर्पति। जणावइ ज्ञापयति आकर्षइ आकर्पति । कहइ कथयति, शंसति । पे(खे)डइ कर्पति, कृषति । स्तवइ स्तौति, स्तवीति । संक्षेपइ संक्षिपति । श्लाघइ श्लाघते। लिखइ लिखति । वरइ वृणोति । लिवा(खा)वइ लेखयति । तरइ तरति । उपकरइ उपकरोति, उपकुरुते, उपकरति । तारइ तारयति। विचारइ विचारयति । घसावइ धर्पयति । विमासइ विमर्शति । आप अर्पयति कापइ कर्त्तति, कर्त्तयते । धरइ धरति । धरावइ धारयति, अवधारयति । मंडइ मण्डयति, भूषयति । ढांकइ स्थगति, आच्छादयति, पिदधाति, वेचइ विक्रीणाति । वेचावइ विक्रापयति । विसाहइ विसाधयति । ऊवटइ उद्वर्त्तयति। लाभइ लभते, प्राप्नोति । न्हवारइ स्नपयति, स्नापयति । वंचइ वंचयति वावइ वपति। मरइ म्रियते, विपद्यते। परिणइ परिणयति, विवाहयति । घसइ धर्पति । पिधत्ते । न्हाइ स्वाति ।
अज्ञातविद्वत्कृत उक्तीयक हेजु करइ स्निह्यति । पहिरइ परिदधाति । प्रयुंजइ प्रयुंक्ते । सींचइ सिञ्चति, अभिपिञ्चति । पहिरावइ परिधापयति । ओटइ अवगुंठयति । वरसइ वर्षति । मानइ आमनति । पांगुरइ प्रावृणोति । बूझइ बुध्यते। पांगुरावइ प्रावारयति । मनावइ प्रसादयति । वहइ वहति । चोरइ चोरयते, अपहरति । वाहइ वाहयति । औलवइ अपलपति, अपहृते । मारइ हन्ति । शापइ शपते, आक्रोशति । मरावइ घातयति । छेदइ छिन्दति । अपराधइ अपराध्यति, विराध्यति । भांजइ भनक्ति । तस्करइ तस्करयति । राष(ख)इ रक्षति, पाति, त्रायते, गोपायति पडइ पतति । [पाडइ] पातयति। आणइ आनयति । अणावइ आना[य]यति । आपडइ आपतति । परिणावइ परिणाययति । वारइ वारयति, निवारयति । चडइ चटति । [मूकइ] मुञ्चति । ऊचाटइ उच्चाटयति । भणइ भणति, पठति, अध्येति । अवतरइ अवतरति, अवतारयति । भणावइ भाणयति, पाठयति, अध्यापयति। चुंटइ चुण्टति, अवचिनोति । आक्रमइ आक्रमते, पराक्रमते । ऑलखइ उपलक्ष्यते। चिणइ चिनोति । गिणइ गणयति। लुणइ लुनाति.। लुणावइ लावयति । गुणइ गुणयति । वषा(खा)णइ व्याख्याति । घडइ घटते, घटयति । ऑलगइ अवलगति, सेवते । पूछइ पृच्छति । नासइ नश्यति, पलायते । नाचइ नृत्यति। अलंकरइ अलङ्करोति । नचावइ नर्त्तयति। वांधइ बध्नाति । गाइ गायति । छूटइ छुट्टति । वाइ वादयति। फूटइ स्फुटति । वाजइ वादति। विहरइ विहरति । वीनवइ विज्ञपयति, विज्ञापयति । हसइ हसति । संदिसइ सन्दिशति, आदिशति । हसावइ हासयति । जोडइ युनक्ति, युंक्ते । मवइ मिनोति, माति ।
. अज्ञातविद्वत्कर्तृक उक्तीयक सीवइ सीवति । उपचईइ उपचीयते। गूंथइ प्रश्नाति । वाधइ वर्द्धते। गुंफइ गुम्फति । वधारइ बर्द्धयति। ऊलसह उल्लसति । ॥ इति वर्तमानकालक्रिया ॥ हरषी(ष)इ हृष्यति, माद्यति, मोदते । आरोग्यउ आरोपितम् । शोचइ शोचते। आरुह्यउ आरूढः, चटितः । कूपइ कुप्यति, ऋध्यति । उन्मूल्यउ उन्मूलितः। विलवइ विलपति । रहिउ स्थितः। रोइ रोदिति । रहाविउ स्थापितः। कूटइ कुट्यति । ऊठिउ उत्थितः, उत्थितवान् । ताडइ ताड[य]ते, ताडयति । [ठिउ] तस्थिवान् । वर्तइ वर्तते । गयउ गतः, यातः। प्रसवइ प्रसूते, जनयति । आव्यउ आगतः। ऊपजइ उत्पद्यते, जायते। नीकल्यउ निर्गतः। ऊपजावइ उत्पादयति । नीसरिउ निःसृतः। दूषइ दूष्यति । पइठउ प्रविष्टः। पादइ पर्दते, कुनाति। बइठउ उपविष्टः, निषण्णः, आसीनः । हगइ हते। पूछिउ पृष्टः। पचइ पचति । दीठउ दृष्टः । भजइ भजते । जोइउ निरीक्षितः, अवलोकितः । शोभइ शोभते । जाण्यउ ज्ञातः, बुद्धः, अवगतः। जिणइ जयति, पराजयति । निवारिउ निषेधितः, निराकृतः । सूकइ शुष्यति । सूतउ सुप्तः, शयितः, शयितवान् । तपइतपति, उत्तपति। जाग्यउ जागरितः, जागरितवान् । उद्यमइ उद्यमते। रूंधइ रुणद्धि । लाज्यउ लज्जितः। घाइउ घ्राणः। भरइ भरति । रमिउ रतः (रतः), क्रीडितः, क्रीडितवान् । फाडइ स्फाटयति। हूउ भूतः, भूतवान् , जातः, जातवान् । रुचइ रोचते। ऊतन्य अवतीर्णः। कल्पइ कल्पते। तय तीर्णः। आकलइ आकलयति । निस्तयउ निस्तीर्णः। वापरिउ व्यापृतः। भागउ भग्नः॥ बीहावइ भापयति । ष(ख)ईइ क्षीयते । उ०र०७ ५० अज्ञातविद्वत्कर्दक उक्तीयक लागउ लग्नः । . साजउ सज्जः । संपन्नउ सम्पन्नः । जरिउ जीर्णः। न्हाउ स्नातः दाधर दग्धः। पडिउ पतितः । हर्ण्यउ हृष्टः, आनंदितः । विचारिज विचारितम् । विमासउ विमृष्टम् । अवधारिउ अवधारितम् । धरिउ धृतम् । भरिउ भृतम् । कीधुं कृतम् , कृतवान् । लीधुं लातम् , गृहीतम्, आत्तम् । दीधुं दत्तम् , दत्तवान् । षा(खा), अत्तम् , जग्धम् । भष्य(ख्य)उ भक्षितम् , खादितम् । जीमिउ जिमितम्, भुक्तम् । पी, पीतम् । सूंध्यउ आघातम् । सांभल्यउ श्रुतम्, श्रुतवान् । फरिस्यउ स्पृष्टः। वेच्यउ विक्रीतम् । विसाहिउ विसाधितम्, क्रीतम् । आलोच्यउ आलोचितम् । लाधउ लब्धम् । पामिउ प्राप्तम् । वंच्यउ वंचितः। अपराध्यउ अपराद्धः । मनाव्यउ प्रसादितः। चायउ चारितम् । नाठउ नष्टः। लुटिउ लुष्टितः। मुस्यउ मुष्टः। राषि(खि)उ रक्षितः। आण्यउ आनीतम् । अणाव्यउ आनायितम् । मूंकिङ मुक्तम् । त्यजिउ त्यक्तम् । लुणिउ लुणितं, लूनम् । रंग्यउ रञ्जितम् । घडिउ घडितम् । होमिउ हुतम् । हकारिउ आकारितः। ऑलग्यउ अवलगितः, सेवितः, निषेवितः । वंछिउं इष्टम् , वांछितम् , अभिलषितम् । बांधिउ बद्धः। छोडिउ छोटितः। जिण्यउ जितः, निर्जितः, पराजितः । भण्यउ भणितः, पठितः, पठितवान्, अधीतः। भणाव्यउ भाणितः, पाठितः, अध्यापितः । पालिउ पालितः, लालितः। ताडिउ ताडितः। स्तविउ स्तुतः। वीनव्यउ विज्ञप्तः । आदिस्यउ आदिष्टः, संदिष्टः । आथम्यउ अस्तमितः। ऊगिउ उदितः । त्राठउ त्रस्तः । वीहिउ मीतः । वीहाविउ भापितः ।। [वासिउ] वासितः । आक्रमिउ आक्रांतः। ऑलखिउ उपलक्षितः । - अशातविद्वत्कर्तृक उक्तीयक - तोडिउ त्रोडितः। गोपिविउ गोपितः, गुप्तः। वर्तिवउ वर्तितः, वर्तितवान् । प्रसविउ प्रसूतः, जातः। ऊपजाविउ उत्पादितः, जनितः । कुहिउ कुथितम् , विनष्टम् । फाड्यउ स्फाटितम् । मेदिउ मेदितम् , भिन्नम् । भेटिउ मेटितः। सूकउ शुष्कः । तपिउ तप्तः। रुधिउ रुद्धः । गुणिउ गुणितम् , गणितम् । वषा(खा)णित व्याख्यातम् । नाचिउ नृत्तम् । रोइउ रुदितम् , विलपितम्। विलोइड विलोडितम् ,मर्दितम् , विलूरितम्। दोही दुग्धा । लीधी नीता। आक्रुसिउ आक्रुष्टः, शप्तः । प्रजूंजिउ प्रयुक्तः, नियुक्तः । जोज्यउ योजितः। परिण्यउ परिणीतः, विवाहितः । चडिउ चटितः । ऊचाटिउ उच्चाटितः। चुंटिउ चुण्टितः। चिणिउ चितः। अलंकरित अलङ्कृतः, मण्डितः । विहसिउ विकसितः । फूटउ स्फुटितः। हसिउ हसितः। वमिट वान्तः। मविउ मातः। सीव्यउ स्यूतः, सीवितः। गूंथ्यउ प्रथितः। [गूफिउ ?] गुम्फितः । भमिउ पर्यटितः। थाकर श्रान्तः। वूठउ वृष्टः। तूठउ तुष्टः। संतोषिउ संतोषितः। कुपिउ कुपितः, क्रुद्धः । कूटिउ कुट्टितः। मारिउ मारितः । मूउ मृतः, विपन्नः। वीसरि विस्मृतम् , विस्मारितम् । विराध्यउ विराद्धः। [आराध्यउ] आराद्धः । वंदिउ वंदितः, नमस्कृतः, नतः। शोभिउ शोमितः। आकलिउ आकलितः।। परीसिउ परिवेषितम्। छमकारिउ छमत्कारितम् । वाधिउ वर्द्धितः। क्षमिउ क्षान्तः । शमिउ शान्तः, उपशान्तः । सहिउ सोढः। वहिउ व्यूढः । ऑलविउ अपलपितम् । [होमिउ] हुतम् । परिसीनउ परिखिन्नः। प्रेरिउ प्रेरितः, नोदितः। ऊडिउ उड्डीतः, उत्पतितः । कहिउ कथितम् , उक्तम् , उक्तवान् । धोईउ धौतः, धौतवान् । मेलिड मेलितम्, मिश्रितम् । , . वान् । ५२ अज्ञातविद्वत्कर्तृक उक्तीयक पडिगरिउ प्रतिजागरितः, पटूकृतः, ऊवेषि(खि)उ उपेक्षितः। चिकित्सितः। आरोपिवउ आरोपणीयम्, आरोपयित- विरासिउ विपर्यस्तः । व्यम् , आरोग्यम् । मुंडिउ मुण्डितः। आरोहिवउं आरोहणीयम् , आरोहितव्यम् , लिषि(खि)उ लिखितम् । आरोह्यम् । चोपड्यउ मर्षितः। करिवलं कर्त्तव्यम् , करणीयम् , कार्यम् । वलिउ ज्वलितः, दग्धः। लेवू ग्रहीतव्यम् , ग्रहणीयम् , ग्राह्यम् । चालिउ चलितः, प्रस्थितः । देवू दानीयम् , दातव्यम् , देयम् । कांपिउ कम्पितः । रहि स्थातव्यम् , स्थानीयम् , स्थेयम् । चेति चेतितम् । [ऊपडिवू] प्रस्थातव्यम्, [प्रस्थानीयम् , पांगुऱ्याउ प्रावृतः। प्रस्थेयम् ] । पहिरिउ परिहितः। पा(खा)वउं भक्षितव्यम् , भक्षणीयम् , पहिराविउ परिधापितः। भक्ष्यम् । ढांकिउ स्थगितम्, छन्नम् , आच्छादित आस्वादिवू आखादयितव्यम् , आखाद- नीयम् [आखाद्यम्] । [ऊपन] उत्पन्नः । पी, पातव्यम् , पानीयम् , पेयम् । धमिरं धमितम् । रांधिवर्ड राधनीयम् , पक्तव्यम्, पच- तेजिउं उत्तेजितम् । नीयम् , पाक्यं (पाच्यम्)। खुभिउ क्षुब्धः। परीसिव्यु परिवेषणीयम् , परिवेषितव्यम् , आपडिउ आपतितः। परिवेषयितव्यम् । नांषि(खि)उ निक्षिप्तः । सूंघq घ्रातव्यम् , घ्राणीयम् । घालिउ क्षिप्तः । सांभलेव्यु श्रोतव्यम्, श्रवणीयम् , श्रव्यम् , विषे(खे)रिउ विकीर्णम् । आकर्णयितव्यम् , आकर्णनीयम् । विदारिउ विदारितः, विदीर्णः । देषि(खि)व्यु दर्शनीयम् , दर्शयितव्यम्, गालि गालितम् , छाणितम् । दृश्यम् । हणिउ हतः, घातितः । जोइवें विलोकयितव्यम् , विलोकनीयम्, नहुतरिउ निमन्त्रितः। ईक्षितव्यम् । धाईउ धावितः । पहिरवू परिधातव्यम्, परिधानीयम् । [श्लाघिउ] श्लाषितः । पांगुरि, प्रावरितव्यम्, प्रावरीतव्यम्, आश्लेषिउ आलिङ्गितः । प्रावरणीयम् , प्राधृत्यम् । आपिउ अर्पितम् । धरिवू धर्त्तव्यम् , धरणीयम् , धार्यम् , मागिर मार्गितम् , याचितम्, प्रार्थितम् । धारयितव्यम् । धोईड धौतः, धौतवान् । वहिवू वहनीयम् , बोढव्यम् , वाह्यम् । .
अमानचिहत्कर्टक उक्तीयक ५३ मूकिवु मोक्तव्यम् , मोच्यम् । छांडिवं त्यक्तव्यम् , त्यजनीयम् । हणिवु हन्तव्यम् . हननीयम् । भांजिq भक्तव्यम् , भजनीयम् । भेदिव्यु मेदितव्यम् , मेत्तव्यम् . मेदनीयम् , भेद्यम् । वारिQ वारयितव्यम् , वारणीयम् , बार्यम्। पडिवं पतितव्यम् , पननीयम् , पायम् , पातयितन्यम् , पातनीयम् । नमस्करिव्यु नमस्कर्त्तव्यम्, नमस्कर- णीयम् , नमसत्यम् । वांदि, बन्दनीयम् , बन्दितव्यम्, वन्धम्। श्लाधिवू लाधनीयम्, श्लाधयितव्यम्, लाध्यम् । पूजिवं पूजनीयम् , पूजितव्यम्, पूज्यम् । अर्चनीयम् , अर्चयितन्यम् , अय॑म् । जिमि, भोकव्यम् , भोजनीयम् , भोज्यम् , भोजयितव्यम् । पढिवू पठितव्यम् , पठनीयम् , पाठ्यम् , अध्येतव्यम् , अध्ययनीयम्, अध्येयम् । भणिवं भणनीयम् , भणितव्यम् , भाण्यम् , भणयितव्यम्, पाठनीयम्, पाठयि- तव्यम्, अध्यापनीयम् , अध्यापयि- तव्यम् । [गुणिवू ] गुणनीयम्, गुणयितव्यम् । गुण्यम् । णिगवू गणनीयम् , गणयितव्यम् , गण्यम् । उलषि(खि)बुं उपलक्षणीयम् , उपलक्षि- तव्यम् , उपलक्ष्यम् । परीपि(खि)वू परीक्षितव्यम्, परीक्षणी- यम्, परीक्षयितव्यम् । वखाणिवू व्याख्यातव्यम्, व्याख्यानीयम्, व्याख्येयम् । [कहि] कथयितव्यम्, कथनीयम् । कथ्यम् । [निवेदिवं] निवेदयितव्यम् , निवेदनीयम् , निवेद्यम् । वीनविq विज्ञापयितव्यम् , विज्ञापनीयम् , विज्ञाप्यम् । संदिस, सन्देष्टव्यम्, सन्देशनीयम्, सन्देश्यम् । आदिश आदेष्टव्यम्, आदेशनीयम् , आदेश्यम् । वोलिq वक्तव्यम् , वचनीयम् , वाच्यम् , वदितव्यम् , वदनीयम् । पूछियूँ प्रष्टव्यम् , पृच्छनीयम् , पृथ्यम् । वाचिद्वाचयितव्यम्, वाचनीयम् ,वाच्यम्। अउधारि, अवधारयितव्यम् , अवधारणी- यम् , अवधार्यम् । धरि, धरणीयम्, धारयितव्यम् , धार्यम् । भरि भरणीयम् , भरितव्यम् । नियोजिq नियोजितव्यम् , नियोजनीयम् । नियोग्यम् । जोडिबुं योजनीयम् , योजयितव्यम् , योज्यम् । गाइq गातव्यम् , गानीयम्, गेयम् । नाचिq नर्तनीयम् , नर्तितव्यम् , नृत्यम् । वाइवें वादयितव्यम् , वादनीयम् , वाद्यम् । लिखिq लिखनीयम् ,लिखितव्यम् ,लेख्यम् , लेखनीयम्, लेखयितव्यम् । मनाविq मन्तव्यम् , मननीयम् । जाणिवं ज्ञातव्यम् , ज्ञानीयम् , ज्ञेयम् , अवगन्तव्यम् , अवगमनीयम् , अवगम्यम्। बूझिवू बोधव्यम् , बोधनीयम् , बोध्यम् । विमासिवु विमर्शनीयम् , विमर्शम् । तरि, तरितव्यम् , तरणीयम् , तार्यम् । " .
अज्ञातविद्वत्कर्तृक उक्तीयक नाहिदुं स्नातव्यम् , स्नानीयम् , स्नेयम् । विचारितुं विचारयितव्यम् , विचारणीयम्, विचार्यम् । , वेचिर्बु विक्रेतव्यम् , विक्र[य]णीयम्, विक्रे- यम् । विसाहिq विसाधयितव्यम् , विसाधनीयम् , विसाध्यम्। लहिq लब्धव्यम् , लभनीयम् , लभ्यम् । पामि, प्राप्तव्यम् , प्रापणीयम्, प्राप्यम् । आपिवं अर्पितव्यम् ,अर्पणीयम् , अर्म्यम् । वंचि वञ्चयितव्यम् , वञ्चनीयम् , वश्यम् । अपराधिq अपराधितव्यम् , अपराधनीयम् , अपराध्यम् । मनाविq प्रसादयितव्यम् , प्रसादनीयम् , प्रसाधम् । चोरिवं चोरयितव्यम् , चोरणीयम् , चौर्यम् , अपहर्त्तव्यम् ,अपहरणीयम् , अपहार्यम्, तस्करणीयम् । राषि(खि), रक्षितव्यम् , रक्ष्यम् , [रक्ष- णीयम् ] परित्रातव्यम् । पालिवू पालयितव्यम् , पालनीयम् , पाल्यम्, गोपवितव्यम् , गोपनीयम् , गोप्यम् । आणिq आनेतव्यम् , आन[य]नीयम्, आनेयम्, आनाय्यम् । परिणवू परिणेतव्यम्, परिण[य]नीयम्, परिणेयम् , परिणाय्यम् , उपयन्तव्यम्, उपयमनीयम् , उपयम्यम् । अवतरितुं अवतरितव्यम्, अवतरणीयम् , अवतार्यम् । चुंटिवू अवचेतव्यं, अवचयनीयम् , अवचे- लूणिवू लवितव्यम्, लवनीयम् , लव्यम्, लाव्यम्। रमियूँ रंतव्यम् , रमणीयम्, क्रीडितव्यम्, क्रीडनीयम् । घडिवू घटयितव्यम् , घटनीयम् । होमियूँ होतव्यम् , हवनीयम् , हव्यम् । ऑलगिq अवलगितव्यम् , अवलगनीयम्, सेवनीयम्, सेव्यम् । वांछियूँ वाञ्छितव्यम्, वाञ्छनीयम्। नासिवु पलायितव्यम् , पलायनीयम् , नष्ट- व्यम् । अलंकरिवं अलङ्कर्त्तव्यम् , अलङ्करणीयम् , अलङ्कार्यम् । विपराविq व्यापारयितव्यम् , व्यापार- णीयम् , व्यापार्यम् । उच्छाहिवउ उत्साहनीयः, उत्साहयितव्यः, उत्साहाय्यः, प्रेरणीयः, प्रेरयितव्यम्, प्रेयः, नोदनीयः, नोदयितव्यः, नोद्यः । अनुमोदिवं अनुमोदनीयम् , अनुमोदयि- तव्यः, अनुमोद्यः । क्रिया च कर्ता च तथा च कर्म, अनुक्तमुक्तं पुरुषत्रयं च । संख्या परस्मैपदलिङ्गकानि, तथात्मने कालविभक्तयश्च ॥१ संख्याविभक्तिलिङ्गपुरुषत्रयश्च यदुक्तं भवति तस्यैव ग्राह्यम् । क्रियाकादिकं सर्व पूर्वश्लोकप्रदर्शितम्। सारखतमितान्नेयं संस्कृतं ज्ञातुमिच्छता ॥२ त्यम्, चिणि, चेतव्यम्, चयनीयम्, चेयम् ।
अज्ञातविद्वत्कर्तृक उक्तीयक ५५ तुं हुं इत्यर्थे वं अहम् । तुम्हि तुम्हे अम्हि अम्हे इत्यर्थे यूयं वयम्। तई मई त्वया मया । तुम्हि अम्हि तुम्हे अम्हे इ कीजइ युप्माभिः अस्माभिः क्रियते । तूंहइ मूंहइ तब मम । तुम्हनई अम्हनइं युष्माकम् , अस्माकम् । ताहरूं तावकम् , तावकीयम्, तावकीनम् , त्वदीयम् । माहरूं मदीयम्, मामकम् , मामकीनम् , मामकीयम् । तुम्हारुं युष्मदीयम् , यौष्माकम् , यौष्माकी- नम् । अम्हारु अस्मदीयम् , अस्माकीनम् , अस्मा- कम् । आपणूं आत्मीयम् , खयम् , निजम् । परायउ परकीयम् । तिहातणूं तत्रत्यम् । इहांतणूं अत्रत्यम् । जिहांतणूं यत्रत्यम् । किहांतणूं कुत्रव्यम् । वाहिरल्युं बाह्यम् । माहिल्यु मध्यवर्ति, आभ्यन्तरम् । छेहिलं अन्त्यम् , अन्तिमम् । पहिलं प्रथमम् । कांई किञ्चित् , किमपि । कोई कश्चित् , कोऽपि । पाछिलु पाश्चात्यम् । पछइ पश्चात् । आगिलं अग्रेतनम् । जिम यथा । किम कथम् । किसउ किम् । एतलु एतावत् , इयत् । जेतलं यावत् । तेतलं तावत् । जिसउ यादृक् , यादृशः, यादृक्षः । अनेरिसिउ अन्याय, अन्यादृशः, अन्यादृक्षः। तुम्हासित युष्मादृशः, भवादृशः । अम्हासित अस्मादृशः। केतलड कतिपयः, कति। केतलुं कियत् । इणि परि इत्थम् , अनया रीत्या । इम एवमेव । विणा, पाषइ विना, ऋते, अन्तरेण, व्यतिरेकेण । कहियइ कदा। जहियइ यदा। तहियइ तदा। अन्येरीवार अन्यदा। हिविडा अधुना, इदानीम् , सम्प्रति, साम्प्र- तम् । आज अध। काल्हि कल्ये। परमइ परेद्युवि । अहूण ऐषमस्य । पुरु परुत् । किहां कुत्र । जिहां यत्र । तिहां तत्र । तउ तत्। जउ यत् । अउ इत्यर्थे असौ अयं एषः । तिम तथा ।
तां तावत् जां यावत् । ५६ अज्ञातविद्वत्कर्तृक उक्तीयक जु, यो, ये यः। उंचानीचुं उच्चावचम् । तु, सु, ते सः। लहुडुं लघु । आपइणी आत्मना, खयम् । भारी गुरु । वडर वृद्धम् । अउंगउ मुगउ अवाक् मूक)। उहरर अंतर्धाकार । कूका हेवाका। परहर पराक्। कन्हइ पासि पार्श्वे, समीपे, निकटे । आघउ अतस्ततः । माहि मध्ये। तिरछउ आडउ, तिर्यक् , तिरश्चीनम् । विचालु अन्तरालम् । एतला ऊपरूं अतः ऊर्द्धम् । ठालर रिक्तम् । आजु लगइ अद्य प्रभृति। भरि निचितम् । आजूनुं अद्यतनम् । जिमणं दक्षिणम् । काल्हन कल्यतनम् । डावर वामम् । ऊपरिलु उपरितनम् । ढील शिथिलम् । हेठिलुं अधस्तनम् । पालटिउ परावर्तः। ऊपरि उपरि, उपरिष्टात् । वापड वराकः । वाहिर हुंतउ बहिस्तात् । नहींत नो वा। विसिमिसि प्रतिस्पर्द्धा, अहमहमिका । एह ठाम हुंतउ अमुष्मात्, अस्मात् , एत- माणसामउ मनुष्यात्मकः । स्मात् स्थानात् । सामुहु सन्मुखः । जेह ठाम हुंतउ यतः, यस्मात् स्थानात् । उपराठउ पराङ्मुखः। अनेरु अन्यत्, अपि च, अपरं च । तेह ठाम हुंतउ ततः, तस्मात् स्थानात् । किहां हुंतउ कुतः, [कस्मात् ] स्थानात् । अजी अद्यापि । आगइ अग्रे, तत्पुरः। अनेरी परि अन्यथा । अग्रेतनु पुरः। सर्व परि सर्वथा । सदा सर्वदा नित्यं प्रत्यहं निरन्तरं सततम् । एक परि एकधा। विडं परि द्विधा । त्रिहुं परि त्रिधा । सर्वत्र संख्याशब्देषु 'संख्यायाः इ, ए इदम्, एतत् , अदः । प्रकारेण' इति सूत्रेण 'धा' प्रत्ययः। अलजु उत्कण्ठा। पहिलउ प्रथमः । ऊंच उच्चैः। वीजउ द्वितीयः। नीच नीचैः। त्रीजउ तृतीयः । तुहइ तदपि। जइ यद्यपि । तउ तर्हि ।
अज्ञातविद्वत्कर्तृक उक्तीयक त्रिणि त्रयः। पांच पञ्च । चउथउ चतुर्थः । द्वि द्वौ। पांचमउ पञ्चमः । छट्टउ षष्ठः। च्यारि चत्वारः। सातमउ सप्तमः। आठमउ अष्टमः। छः षट्। नवमउ नवमः । सात सप्त। दसमउ दशमः । इत्यादि । आठ अष्टौ। वीसमउ विंशतितमः। नव नव । त्रीसमउ त्रिंशति (त्तमः । दश दश चालीसमउ चत्वारिंशति(त् !)नमः । इग्यार एकादश। विंशतिप्रभृतिशब्दात् 'तम' बार द्वादश । तेर त्रयोदश। प्रत्ययः। चवदइ चतुर्दश। पालउ पादचारः। जोहारः जोत्कारः। पनरइ पञ्चदश। सोल षोडश सोहिलं सुखावहम् । सतर सप्तदश। दोहिलं दुःखावहम् । अठार अष्टादश। लाई लम्पकः । उगणीस एकोनविंशति । रलियामणुं रतिजनकम् । विंशति, एकविंशति, द्वाविंशति, उदेगामणुं उद्वेगजनकम् । जूउ भिन्नः, पृथक् । त्रयोविंशति, चतुर्विंशति, पञ्चविं- शति, षड्विंशति, सप्तविंशति, अष्टा- अरणइ अरतिः । किर किल । विंशति, एकोनविंश (? त्रिंशत्, साधुपणूं साधुत्वम् , साधुता । त्रिंशत्, एकत्रिंशत्, द्वात्रिंशत्, निश्चयार्थे एव शब्दः। त्रयस्त्रिंशत्, चतुत्रिंशत्, पञ्चत्रिं- च समुच्चये शत्, पत्रिंशत्, सप्तत्रिंशत्, परिवारिउं प्रपारितम् । अष्टात्रिंशत्, एकोनचत्वारिंशत्, मउडई २ शनैः २ मन्दम् २ । चत्वारिंशत्, एकचत्वारिंशत्, पुण पुण वारं वारम् । द्वाचत्वारिंशत्, त्रयश्चत्वारिंशत्, विलखउ विलक्षः, वक्रमयः, वक्रमयम् । चर्तुश्चत्वारिंशत्, पञ्चचत्वारिंशत्, लोहमू लोहमयम् । षट्चत्वारिंशत्, सप्तचत्वारिंशत्, अष्टाचत्वारिंशत्, एकोनपश्चाशत्, केवडूं कियन्मात्रम् । पञ्चाशत्, एकपञ्चाशत्, द्वापश्चा- एक एकः। शत्, त्रिपञ्चाशत्, चतुःपञ्चा- , अनेथि अन्यत्र । उ०र०८ अज्ञातविद्वत्कर्तृक उक्तीयक - शत्, पञ्चपञ्चाशत्, षट्पञ्चाशत्, पञ्चसप्ततिः, षट्सप्ततिः, सप्तस- सप्तपञ्चाशत्, अष्टापञ्चाशत् , एको- प्ततिः, अष्टासप्ततिः, एकोन[-] नषष्टिः, षष्टिः, एकषष्टिः, द्वाषष्टिः, शीतिः, [अशीतिः]; एकाशीतिः, त्रिषष्टिा, चतुःषष्टिः, पञ्चषष्टिः, द्वाशीतिः, त्रयोशीतिः, चतुरशीतिः, षट्षष्टिः, सप्तषष्टिः, अष्टाषष्टिः, पञ्चाशीतिः, षडशीतिः, सप्ताशीतिः, एकोनसप्ततिः, सप्ततिः, एकसप्ततिः, अष्टाशीतिः, एकोननवतिः, नवतिः। द्वासप्ततिः, त्रिसप्ततिः, चतुःसप्ततिः, नवनवतिः। ॥ इत्यज्ञातविद्वत्कर्तृकमुक्तीयकं समाप्तमिति ॥ ॥ शुभं भवतु॥ , अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि पुरातन-औक्तिकपदानि [कारकविचार] अथ षट् कारकाणि लिख्यन्ते- संबंधि षष्ठी। छ कारक, सातमउ संबंधु। अधिकरणि सप्तमी । कर्ता, कर्म, करणु, संप्रदानु, संबंधु, जउ पाधरी उक्ति तउ उक्त कर्ता। अधिकरणु। उक्ते कर्तरि प्रथमा। जु करइ तु कर्ता। अनुक्तुं कर्म। जं कीजइ तं कर्म । अनुक्ते कर्मणि द्वितीया। जीण करी क्रिया कीजइ तं करणु । जु वांकी उक्ती तउ अनुक्त कर्ता, उक्तं कर्म । येह देवातणी वाञ्छा, येह रूषइ काई, धरीइ अनुक्ते कर्तरि तृतीया, उक्ते काई; तं कारकु संप्रदानसंज्ञकु हुइ । कर्मणि प्रथमा। जेहतउ अपाय विश्लेषु हुइ, जेहतउ भयु कालि भावि सप्तमी । वेला, दीसु, पक्षु, हुइ, जेहतउ आदान ग्रहणु हुइ, तं कार मासु, वरसु, ऋतु इत्यादि कालः। कु अपादान संज्ञकु हुई। अमुकई इंतई अमुकुं होउं इत्यादि जेह कन्हइ, जेह माझि, जेह पासि, जेह भावः। तणउ, जेह तणी, जेह तणउं, जेहरहिं पाखइ, विना, किशा पाखइ, जेह, त्यहां- इत्यर्थे संबंधु । विनायोगे द्वितीया-तृतीया- गामि, पादि, पलइ, क्षेत्रि, वनि, पर्वति, पञ्चम्यः। यावद्योगे द्वितीया। माझि, बाहिरि इत्यर्थे आधार । परितो योगे द्वितीया। अनं- का प्रथमा । भिप्रति योगे द्वितीया । प्रभृ- कम्मि द्वितीया । तियोगे पञ्चमी । अर्वाक योगे करणि तृतीया। पञ्चमी। संप्रदानि [चतुर्थी।] एक आगलि एक वचनु, बिहु आगलि [अपादानि ] पंचमी। द्वि वचनु, घणां आगलि बहु वचनु । त्रुटितप्रत्यन्तर प्राप्त पाठभेद । अथ षट् कारकमभिलिख्यते । यथा --छ कारक, सातमउ संबंध । कर्ता १, कर्म २, करण ३, संप्रदान ४, अपादान ५, संबंध ६, अधिकरण ७ । जे करइ ते कर्ता । जं कीजइ तं कर्म । जेणइ करी क्रिया कीजइ ते करण । जेह भणी धरीइ काई तं कारक संप्रदान । जिह हुँतु अपाय विश्लेष हुइ जेह तु भय हुई जिह तु आदान ग्रहण कीजइ तं कारक अपादान । जिह कन्हइ, जिह माहि, जिह पासि, जिह तणू, जिह तणी, जिह तणू, जिहनइ, जिहकिहि, इत्यादि सर्वधः । गामि पाद्रि क्षेत्रि खलइ वनि पर्वति माहि वाहिरि इत्यादि आधार । कर्ताई प्रथमा । कमि द्वितीया । करणि तृतीया । संप्रदानि चतुर्थी । अपादानि पंचमी । संवधि षष्ठी । अधिकरणि सप्तमी।
६० ग्यरं गतम् । पूछतउ पृच्छन् । . - अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि [शब्दसंग्रह] पढतउ पठन् । [१] वोलतउ वदन्, जल्पन् । कीधुं कृतम्। मारतउ घ्नन्। लिधुं गृहीतम् । जाणतर जानन्। दीधउं दत्तम् । जिमतउ भुञ्जन् । अछतर तिष्ठन् । आव्यरं आगतम् । रहतउ आण्यउं आनीतम् । देखतउ पश्यन् । पढिरं पठितम् । वोल्य उक्तम् । [३] मारि हतम् । कीजत क्रियमाणम् । जाणिउं ज्ञातम् । लीजतउं गृह्यमाणं, लीयमानम् । यमि भुक्तम् । दीजतउं दीयमानम् । रहि रहितम् । जईतउं गम्यमानम् । थाकर आवीत आगम्यमानम् । स्थितम् । थ्यु आणीत आनीयमानम् । दीठउं दृष्टम् । पढीत पृठ्यमानम् । पूछि पृष्टम् । वोलीत उच्यमानम् । [२] मारीत हन्यमानम् । करतउ कुर्वन् । जाणीत ज्ञायमानम् । लेतु गृह्णन् । यमीतउं भुज्यमानम् । देतउ ददन् । रहित स्थीयमानम् । जातउ गच्छन् । अछी आवतर आगच्छन् । दीसतउं दृश्यमानम् । आणत आनयन् । पूछीतउं पृच्छ्यमानम् । [१] मारतु घ्नन् । दीजतूं दीयमानम् । कीधुं कृतम् । पूघ्यु पृष्टम् । जिमतु भुञानः । अशने तु जईतूं गम्यमानम् । लीधुं गृहीतम् । [२] आत्मनेपदीउ। दीधुं दत्तम् । सावीतूं आगम्यमानम् । माणीतूं आनीयमानम् । ग्य गतम् । करतु कुर्वन् । छतु रहितु तिष्ठन् । पढीतूं पट्यमानम् । भाव्यु आगतम् । देतु ददन्। देपतु पश्यन् । बोलीतूं उच्यमानम् । माण्युं आनीतम्। खातु खादन् । पूछतु पृच्छन् । मारीतूं हन्यमानम् । पव्ययं पठितम् । जातु गच्छन् । जाणीतूं जायमानम् । बोल्यु उचम्। [३] भावनु आगच्छन् । जिमीतूं भुज्यमानम् । जाण्युं नातम् । साणतु आनयन् । कीजतं क्रियमाणम् । जिम्युं भुक्तम् । रहीतूं स्थीयमानम् । रहिट थारट रहितं पठतु पठन् । लीजतूं गृह्यमाणं नीयमानं दीसतां दृश्यमानम् । थि स्थितं च बोलतु बदन । पूठीतूं पृच्छयमानम् । 4 दीठडं दृष्टम् । वा।
अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि ६१ बोलिवा वक्तुम् । मारिवा हन्तुम् । जाणिवा ज्ञातुम् । यमिवा भोक्तुम् । रहीवा अग्विा } स्थातुम् । [४] करी कृत्वा । लेई गृहीत्वा । देई दत्वा । जाई गत्वा । आवी आगल्य । आणी आनीय । पढी पठित्वा । वोली उक्त्वा। भारी हत्वा । जाणी ज्ञात्वा । यमी भुंक्त्वा । रही थै } स्थित्वा। } देखी दृष्ट्वा । पूछी पृष्ट्वा । [५] करिवा कर्तुम् । लेवा ग्रहीतुम् । देवा दातुम् । जाइवा गन्तुम् । आविवा आगन्तुम् । आणिवा आनेतुम् । पढिवा पठितुम् । देषिवा द्रष्टुम् । पूछिवा प्रष्टुम् । [६] करणहार कर्तुकामः । लेणहारु ग्रहीतुकामः । देणहारु दातुकामः । जाणहारु गन्तुकामः । आवणहारु आगन्तुकामः । आणनहारु आनेतुकामः। पठणहारु पठितुकामः । बोलणहारु वक्तुकामः। मारणहारु हन्तुकामः । जाणनहारु ज्ञातुकामः । पूछणहारु प्रष्टुकामः। [७] करिवं कर्त्तव्यम् । लेवर ग्रहीतव्यम् । देवू दातव्यम् । करी कृत्वा । लेई गृहीत्वा, नीत्वा । देई दत्त्वा । जई गत्वा । भावी आगत्य, एल्य । भाणी आनीय । पढी पठित्वा। बोली उक्त्वा। मारी हत्वा । जाणो ज्ञात्वा । जिमी भुतवा। खाई भक्षयित्वा। रही स्थित्वा । देपी दृष्ट्वा । पूछी पृष्ट्वा । [५] करिवा कर्तुम् । लेवा ग्रहीतुम् । देवा दातुम् । जाइवा गन्तुम् । पठणहार पठितुकामः। आवित्रा आगन्तुम् । बोलगहार वक्तुकामः। पूछिया प्रष्टुम् । मारणहार हन्तुकाम। [६] जाणहार ज्ञातुकामः। पूछणहार प्रष्टकामः। करणहार कर्तुकाम । लेणहार हतुकाम। [७] जाणहार गंन्तुकाम । करिवू कर्तव्यम् । आवणहार आगन्तुकामः। लेवू ग्रहीतव्यम् । माणनहार आनेतुकामः। देवू दातव्यम् ।
૨૨ आजु अद्य। अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि जाइवरं गन्तव्यम् । शक ज्ञा धातु प्रयोगे स्वास्थाने तुम्- आविq आगन्तव्यम् । करी जाणउं कर्तुं जानामि । आणिव आनेतव्यम् । पढी सकुं पठितुं शक्नोमि । पढिरं पठितव्यम् । करणहारु बोलिवर वक्तव्यम् । इत्यादौ शतृ-कानशौ मारिवलं हन्तव्यम् । देणहार जाणिव ज्ञातव्यस् । यमिव भोक्तव्यम् । करिवू लेवू इत्यादौ तव्यानीयौ। स्थातव्यम् । देवू देषिवउं द्रष्टव्यम् । कालि कल्ये। पूछिवर्ड प्रष्टव्यम् । परम परेद्यवि । अरिरम अपरेयुः। कीधर लीधर इत्यादौ निष्ठाक्तः। आजूणर्ड अद्यतनम् । दीधर काल्हूण कल्यतनम् । करतुं हवडा अधुना, इदानीं, सांप्रतं, संप्रति । लेतुं हवडांगें आधुनिकं, सांप्रतीनम् । देतुं नहीं तु नो वा, नो चेत् । कीजतुं लगइ प्रभृति, आरम्य । लीजतुं पाखइ विना, ऋते । दीजतुं मुहीयां मुधा । करी यिम यथा । लेई इत्यादौ क्वा। तिम तथा । देई किम कयम् । करिवा लेवा इत्यादौ तुम् । ईणपरि इत्यम् । देवा जहींय यदा। } इत्यादी आनश् । पापइ विना, ऋते। मावि आगन्तव्यम्। माणिवू आनेतव्यम् । बोलिवू वचाव्यम् । मारियूं हन्तव्यम् । जाणिवू जातव्यम् । जिमि भोक्तव्यम् । रहिवू स्थातव्यम् । देपियूं दृष्टव्यम्। पूछिबू प्रष्टव्यम् । पढिवू पठितव्यम् । माज अद्या काल्हि कन्ये। परम परचवि। भरीरम अपरेवि। साजूनूं अद्यतनम् । कालनूं कल्यतनम् । हवढांनूं आधुनिकं, साम्प्र- मुहीमा मुधा। तीनम् । जिम यथा। हवढां अधुना, इदानीम् , तिम तथा । सम्प्रति,साम्प्रतम्। किम कथम् । नहि तु नो वा, नो चेत् । इणी परि इत्यम् । लगइ प्रभृति, आरभ्य। जहीई यदा। .
जां यावत् । च्यह परि चतुर्धा । तु ततः। अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि तहीय तदा। अम्हारर अस्मदीयम् । कहींय कदा। ताहरउ तावकः, तावकीनः। अनेकवार अनेकधा। माहरउ मामकः, मामकीनः। ज्यार अन्यदा। सवईवार सर्वदा, सदा। तां तावत् । जेतलं यावन्मात्रम् । एकवार एककृत्वः। एवं वारस्य संख्यायाः कृत्वसू । तेतलुं तावन्मात्रम् । एकपरि एकधा। एव९ एतावन्मात्रम्। व्यहु परि द्विधा, द्वैधम् । केतलडं कियत् । तृहु परि त्रेधा, त्रैध्यम् । केवडं कियन्मात्रम् । एतलडं इयत् । किहां कुत्र, क। जु यदि, यतः। यहां यत्र । तिहां तत्र । जं यत्। ईहां अत्र, इह । अनेति अन्यत्र । जइकिमइ यदि किमपि चेत् । सघले सर्वत्र । इमै अन्यथा । वली व्याहृत्य । इसु इति । तिमइ तत्कालम् । होउ एवम् । झटकई झटिति । हवं अथ। जूलं पृथक् । हावलि प्रत्युत। ताहरूं तदीयम् । पूठिं अनु । माहरसं मदीयम् । सामहु अभिमुखः। तम्हारसं युष्मदीयम् । डाबउ वाम। कहीइं कदा। बिहु परि द्विधा। जूउ पृथक् । केतलू कियत् । अनेकवार अनेकदा। त्रिहुं परि त्रिधा। ताहरूं त्वदीयम् । ज्यार अन्यदा। चिहुं परि चतुर्धा। माहरु मदीयम् । जईयइ किमइ यदि सवई वार सर्वदा। किहां कुत्र। तम्हारु युष्मदीयम् । किमपि, यदि चेत् । एक वार एककृत्वः । जिहां यत्र। अम्हारूं अस्मदीयम् । ईमहइ अन्यथा। बि वार द्विकृत्व.। तिहां तत्र। इस्यउं इति। त्रिणि वार त्रिकृत्वः । ईहां अत्र, इह । ताण तावत्। हा एवम्, अथ। च्यारि वार चतुःकृत्वः। भनेथि अन्यत्र। जेतलं यावन्मात्रम् । हावलि प्रत्युत। सउ वार शतकृत्वः। तेतलं तावन्मात्रम् । पूठि अनु। वारस्य सङ्ख्यायां कृत्वस्। वली व्यावृत्य । एतलं एतावन्मानम्, एक परि एकधा। झटकई झटति। तं तत् । जु यदि। याण यावत्। सघलइ सर्वत्र। सामहु अभिमुख। इयत्। डावउ वाम।
६४ अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि . यमणु दक्षिणः। वांकउ कुटिलः । पाधरु ऋजु, सरलः। लांबउ दीर्घः। हेठि अधः। ऊपरि उपरि । आडउ तिर्यक् । तिरछउ तिरश्चीनः। आगिलु अग्रे, पुरः। पाछिलु पाश्चात्यः। सरीषउ सदृक्, समानः, सदृक्षः। किसउ कीडर, कीदृशः, कीदृक्षः । इसउ ईदृक्, ईदृश, ईदृक्षः। यसउ याहक, यादृशः, यादृक्षः। तिसउ ताइक्, तादृशः, तादृक्षः । अनेसउ अन्यसदृक्, अन्यसदृशः, अन्यसदृक्षः। तूंसरीषउ त्वादृशः। मूंसरीषउ मादृशः। तम्हंसरीषउ युप्मादृशः। अम्हंसरीषउ अस्मादृशः। परहु पराक् । पाखलि परितः, सर्वतः, विष्वक्, समन्तात्, समन्ततः। उगउमुगउ अवाड्मूकः। झलझांषसउ चलवाक्षम्। ऊधांधलं उद्धूलिकम् । सूगामणउं शूकाजनकम्। अहिवा अधवा, विधवा। सूहव सुधवा। ऊतरिण्यु उत्तारिततृणम् । पद प्रतिभूः। पहूचउं प्रतिभाव्यम् । उपरीयामणु उत्कटिकाकुलं रणरणकं वा। ओल्यउ अर्वाचीनः। पयलु पराचीनः। विलखउ विलक्षः। द्रहद्रहवार जयद्रथवेला तांगणी तनुगमनिका । गोई गोसली गोप्यसिलाका । ऊकरडी अवकरोत्करिका। पूंजउ अवकर। अरहु अाक् । जिमणउ दक्षिण। किसउ कीदृशः, कीहक् । अम्हसरीषउ अस्मादृशः। उत्तराणउं उत्तारिततृणम् । वांकु कुटिल। जिसड याकू, यादृशः, उरहु अर्वाक् । पद प्रतिभूः, लग्नकः । पाधरु ऋजु, सरल। यादृक्षः। परहु पराक् । पहूचूं प्रतिभाव्यम्। लांवउ दीर्घः । तिसउ तादृशः, ताक्, पापलि परितः, सर्वतः, अफिरीयामणू उत्कलिका- हेठि अधः। ताहक्षः। विष्वक्, समन्तात्। कुलं रणरणकं वा। ऊपरि उपरि। ईसउ ईदृक्, ईदृगः, ईदृक्षः। उगमूगउ अवामूकः । उरलिउं अर्वाचीनम् । पराचीन. । पहलउ मन्यसरीषउ अन्यसहक्, झलझांखसउ चलत(द्) विलखउ विलक्षः । तिरिछड तिरश्चीनः। अन्यसहगः । ध्वाक्षम् । द्रहदहवार जयद्रथवेला। भागलि अग्रे, पुरः। [ तुम्हसरीप? ] भवा- अधाधलं उलिकम् । तांगणी तनुगमनिका । मागिलड अग्रेसरः। दृशः, भवाक्षः । सूगामणउं सूकाजननम् । गोई गोसली गोप्यसि(श) पाछिलट पाश्चात्यः। तूंसरीपट त्वादृशः। पीप नही क्षेम क्षितिर्न हि। लाका । सरीपु सहक, समानः, मूंसरीपठ माहगः । अहिवा अथवा। उकरडी अवकरोत्करिका । सहगः, सक्षः। तम्हसरीपु युप्मादृशः । सूहव मुधवा। पुंजउ अवकरः सहरथ। भाड तिर्यक् ।
, अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि ६५ उक्ति च्यहु प्रकारि-कर्ता, कम्मि, भावि, करतउ, लेतउ, देतउ; करता, लेता, देता; कर्मकता । जउ उक्ति पाधरी हुइ-उक्तिमाहि करती, लेती, देती; करतउं, लेतउं, देतउं; इसइ कर्ता कर्मु हुइ ते उक्ति कर्ता जाणिवी । बोलिवइ अतीत कालु । ह्यस्तनी अद्यतनी परो- जु बांकी उक्ति हुइ तु माहि कर्ता हुइ, कर्म क्षार्नु परस्मैपदु दीजइ । न हुइं तर ते उक्ति भावि जाणिवी। जु कर्म कीg, लीg, दीg; कीधा, लीधा दीधा; फीटी का आविउ हुइ, ते उक्ति कर्मकर्ता कीघी, लीघी, दीघी; इसइ वोलिबइ अतीत कालु। जाणिवी । कर्ता परस्मै पद दीजइ । कमि भाविं ह्यस्तनी अद्यतनी परोक्षानु आत्मनेपद दीजह । आत्मनेपद दीजइ । करिसिइ, लेसिइ, देसिइ; करसुं, लेसुं, देखें; पुरुष केता?३ । कुण कुण? प्रथमु, मध्यमु, करिस्यउं, लेस्यउं, देस्यउं; इसइ बोलिवइ भविष्यु उत्तमु । नामि बोलावीय ते प्रथमपुरुष । तुं काल । भविष्यन्ती- परस्मैपदु दीजइ । करीसिइ, लीजसिइ, दीजसिइ; इसइ वोलि तम्हि मध्यम पुरुष हुइ । हुं अम्हि उत्तम पुरुष । भविष्य काल । भविष्यन्तीनुं आत्मनेपदु दीजइ । काल केता ? ३ । कुण कुण? वर्तमानु, भविष्यकालि आशीर्वादयोगी आशीविभक्ति अतीतु, भविष्यु । वर्तइ वर्तमानु, वयु अतीतु, वर्त्तसिइ भविष्यु । वर्तमानकालि ३ विभक्ति विभक्ति दीजइ । भविष्यंतीनी वाणी वोलीइ । हुइ-वर्तमाना, सप्तमी, पंचमी । अतीत कालि जउ-जु करत, जु लेत; जु देत; इसिइ ४ विभक्ति-शस्तनी, अद्यतनी, परोक्षा, स्म बोलिवइ अतीत कालु। क्रियातिपत्तीनउं परस्मैपद संयोगि वर्तमाना । भविष्यकालि ३ विभक्ति- दीजिइ । भविष्यन्ति, आशिः, श्वस्तनी । जु कीजत, जु दीजत, जु लीजत; इसिइ करइ, लिइ, दिइ; करत, ल्यथ [धथ ?]; करं बोलिवइ अतीत काल । क्रियातिपत्तिनउं आत्मने- ल्युं, युं, इसइ बोलि वर्तमान काल । वर्तमानातुं पद दीजइ । कता परस्मैपद दीजइ, कर्मि परस्मैपदु दीजइ । आत्मनेपदु दीजइ । कीजइ, लीजइ, दीजइ; कीज, लीज, दीज अथ त्यादि विभक्ति केती ? १० । कुण कीजें, दीजें, लीजु; इसइ बोलि वर्तमान काल । कुण? वर्तमाना १, सप्तमी २, पंचमी ३, वर्तमानानु आत्मनेपदु दीजइ । ह्यस्तनी ४, अद्यतनी ५, परोक्षा ६, श्वस्तनी ७, करिजे, लेजे, देजे; इसइ बोलि वर्तमानु आशीः ८, भविष्यन्ती ९, क्रियातिपत्ती १० । काल । सप्तमीनु परस्मैपद दीजइ । अकेकी विभक्तिं १८ वचन-९ परस्मैपद तणां, कीजिजे, लीजिजे, दीजिजे; इसइ बोलि ९ आत्मनेपद तणां । वर्तमान कालु । सप्तमीनु आत्मनेपदु दीजइ । ति, तस्, अन्ति, सि, थस,थ, मि, वस् , करइ, लिइ, दिइ करउ, लिउ, दिउ; इसइ मस्,इं नव परस्मैपद तणा। ते, आते, अन्ते, बोलिवइ वर्तमान काल । पंचमीन परस्मैपदु से, आथे, ध्वे; ए, वहे महे; ई नव आत्मने- - - दीजइ । पद तणां। कीजउ, लीजउ, दीजउ; इसइ बोलि वर्त्त- मानु काल । पंचमीनु आत्मनेपदु दीजइ । ति तस्, अन्तिः इति प्रथमपुरुषः । सि, थस्, थ; इति मध्यमपुरुषः । उ०र०९ , ६६ अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि मि, वस्, मस्, इति उत्तमपुरुषः। ते, खिसरहंडी क्षिप्रसरहिंडिका। आते, अन्ते; इति प्रथमपुरुषः । से, ओरसु अवघर्षः । आथे, ध्वे; इति मध्यमपुरुषः। ए वहे, घरटु घर्षकः। महे; इति उत्तमपुरुषः। वेसरु द्विशरीरः। ति, एक वचनु; तस् , द्विवचनु; अन्ति अरतपरत वापसरीषउ आकृत्या प्रकृत्या बहुवचनु । सि, एकवचनु; थस् , द्विवचनु; च पितृसदृशः। थ, बहुवचनु । मि, एकवचनु; वस् , अग्गेवाणु अग्रानीकम् । द्विवचनु; मस् , बहुवचनु । एवं सर्वत्र पाछेवाणु पश्चादनीकम् । जु का प्रथम पुरुप हुइ तु क्रियां प्रथम मौ मार्गीकाः, मुक्तौकाः। पुरुष हुइ । जु कर्ता मध्यम पुरुप हुइ तु क्रियां वेगडि विकटशृङ्गी। मध्यम पुरुप हुइ । जुकर्ता उत्तम पुरुप हुइ तु मीढी मिलितशृङ्गी। क्रियां उत्तम पुरुप हुइ । फाडी प्रसुतशृङ्गी। जु कर्त्ता आगलि एक वचनु हुइ, तु क्रिया कुंडली कंटलितशृङ्गी। आगलि एक वचनु । जु का आगलि द्विवचनु, मुहषायी परोक्षवादः। तु क्रिया आगलि द्विवचनु । जु कर्ता आगलि लिपसणसं लिप्स्यायनम् । वहुवचनु, तु क्रिया आगलि वहुवचनु । वहलि वीतवेत्रा। जु कर्ता उक्ति हुइ तु [क्रिया आगलि ?] पटांतरं प्रत्यन्तरम् । कर्त्तानी अपेक्षां विभक्ति दीजइ ।जु कम्मि उक्ति हुइ विज्जाहरी विजयगृही। तु क्रिया आगलि कर्मनी अपेक्षां विभक्ति दीजइ। कोठउ कोष्ठक। [शब्द संग्रह] डोकरु डोलत्करः। चउकीवटु चतुष्कपट्ट । छींडणि छिद्राटनी । वटवालनुं वर्मपालनम् । छेकडि छिद्रकरी। वेहडडं द्विघटम् । सीरामणु शीताशनं, शरीराप्यायनकं वा । गुढउं गुदगूढम् । सउडि संवृत्तपटी। चउकीवटा चतुष्कपट.। भरत परत वाप सरीपउ गरढउ गतार्धवयाः । मुहुखाई परोक्षवादी। वाटवालणूं वर्मपालनम्। आकृत्या प्रकृया पित्रासदृशः चछीयायित वस्तुवित्तः । लिपसणूं लिप्सायिकम् । खीसउ क्षिप्तखकः । वेहडूं द्विघटम् । नीक नीरक्ता। वरहलि वीतवेत्रा। कोथली कोगस्थली। गुढउं गुदगूढम् । ऊसलसीधुं उल्लासितसन्धि- वरसवियारणि समासमीना। सगेवाणू अग्र्यानीकम् । कम् , उत शलंध्र वा। पिसरहिडी क्षिग्रसरही- पटांतलं प्रत्यन्तरम् । पाठेवाणूं पश्चादनीकम् । मऊ मार्गोंकाः, [मुक्तीका ण्डिका। बूसट [चपेटा। [विजाहरी] विजयगृहा। पोरस अवधर्यकः । कोठठ कोष्टक । चुहुटली चभुपुटिका। चेगडी विकटगी। घरट पर्यफ। कावजि कायाटनी, काया. मीढी मिलितशती ढोकरट डोलत्करः। चेसर द्विशरीरः। वालिनी वा। फाडी प्रसृतानी। छीडणि छिद्राटिनी। . वा] अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि ६७ , सीरष शीतरक्षा। तुलाई तूलिका । ऊसीस उपधानम् । शलाटु शिलाघटकः । मडि मड्डिका । खंडायितु खड्गवित्तः । भथायितु तणवित्तः, भत्रवित्तो वा । पूर्णी पिचुमर्दी। आंगडणु अंगमंडनम् । कागु काकः, वायसो वा। वावि वापी। कूट कूपः, अन्धुः। तलागु तडाग, जलाधारः । खडोखली दीर्घिकाः पडूकरणम् । वगाई जूमिका । चीपडीउ चिपटः । गूहली गोमुखा। कोसीटउ कोपसमृद्धः। कालियु कालिकः । व(च?)णहडीउ चणकवर्तकः । लुकडि लोमकटिका। सवार सवेला। मांकुण मत्कुणः। कालाखरिउ कालाक्षरितः, दाणी । धणिउ झणितः। दीवाली दीपालिनी, दीपोत्सवो वा । त्रुटी त्रिपुटी। धुलहडी धूलिपटिका, धूलितटी, रजोत्सवो वा। धुंकु निष्ठीव । आभूयार्नु उद्भिद्यमानम् । झगडउ उद्गदः। छयकार गेयकारु । चिणोठी चित्रपृष्ठा, गुंजा, कृष्णलवा । ऑडक अपराख्या । ढांकणउं स्थागनकम् । सूणहरउं शयनगृहम् । पथरण प्रस्तरणम् । ओढण आच्छादनम् । नणंद ननन्दा। नणदोई ननान्हपतिः । जमाई जामाता। नाणिद्रउ ननान्द्वसुतः । भत्रीजउ भ्रातृजः, भ्रातृसुतः । परीयटु निर्णेजकः । छीपउ रजकः । कुतिगीउ कौतुकिकः। अणगुक अनग्निपक्कः । फिरक स्फुरितचक्रिका। पाटूआली पादप्रहारवती। पाणीकण षा(खा)दनपरम् । परमूणउं परमदिवसीयम् । पुरोकउं प्राक्वर्षीयम् । सरलउ दीर्घः, प्रलंबः । ऊघडदूघडउ उद्धटदुर्घटः। कहूआलउ कोलाहलः। देसानी छायाकरः। मोली । मूर्द्धवेष्टनम्, मोसंधीयु उष्णीषं वा । निलाड ललाट, निटिलं वा । पोठीउ पृष्ठवाहक । अरणइ अरति । राजगुल राजत्कुलम् । किरि किल । बिमणउं द्विगुणम् ।
६८ अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि त्रिगुणु त्रिगुणम् । चउगुणउं चतुर्गुणः। चीपलालुं कईमाकुलं, पङ्किलं वा । परिवायुं प्रपारितम्। मुडई मन्दं मन्दम् । वली वली पुनः पुनः। पालटउ परिवर्तः । पालदिउ परिवर्तितः। वापडउ वराकः । विहरउ व्यतिकरः। लागु लग्नः । लगाडिउ लगितः। पाटलउ पाटचारः । जुहारु नमस्कारः। सोहिलङ सुखावहम् । दोहिलङ दुःखावहम् । रुलीयामणउं रतिजनकम् । ऊदेगामणलं उद्वेगजनकम् । राउताई राजपुत्रता । राउत राजपुत्र। द्रम्मामु द्रम्ममय । असुणिउ अपशकुनिका सुण शकुन। स(सु)ण स्वप्नम् । अंवोडर धम्मिल्ल । वीणि वेणि । मांडहिय बलात्कारेण, हठाद्वा । घायिंस सहसैव । देहरासरु देवतावसरः । आरतीयासरु आरात्रिकावसरः । सर्वोसह सर्वावसरः। नान्हउ लघु, हवा कडब कणीम्बा। आरती आरात्रिका। धूपधाणउं धूपधाम, धूपदहनपात्रम् । वरांसिउ विपर्यस्त । वरांसउ विपर्यास । आखुडिउ अवस्खलित । घोडाहडि वाजिशाला, अश्वकुटी वा । रसोयि रसवती, पाकस्थानं, महानसं वा । भंडारु भांडागारः, कोशो वा । मंत्रासरु [मंत्रावसरः] । हथसाल हस्तिशाला, गजसदनं वा । श्रीगरणु श्रीकरणम् । वयगरण व्ययकरणम् । घडांमंची घटमञ्चिका। दावडउं जलयंत्रम् । अरह१ अरघट्टक । परव प्रपा। छमकाव्यउं छमत्कारितम् । अवाडूउ प्रतिकूल । सवाडूउ सानुकूलः। पडीसारउ प्रतीसारक। गुडिउ गुडितः। पाव(ख?)रिउ प्रक्षरितः। कु जि को जानाति । वलहि बालदधि, बालहिता वा । वरगड वराकर्यक। जानुत्र यज्ञयात्रा। जानावासउ यज्ञावासक। एकउडउ एकपटिक। घूघटिउ अवगुण्ठन । गमाणि गवादिनी। मोटउ त्यूल ।
अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि ६९ आहरजाहर आगमनगमनिका । दीवटीउ दीपवर्तिक । खाजलु खाद्यफलम् । चांद्रिणानी लांप चंद्रायलिप्सा । , पीजहलु पेयफलम् । धातस्वायु धातुखादकः। मसाहणी महासाधनिक । साध (थ?) संस्था। आखउंडली अंक्षपटलिका । आद्रहणु अधिश्रयणम् । वलवलीउ वाचाल, वाबदूक । अहिनाणु अभिज्ञानम् । मेरायीयु मेराधकम् । हराविउ पराजित । अभोखणु अभ्युक्षणम् । विदाणउ वितानप्रभाव। 'अलिषउ उदकोल्लञ्चन । कोटीलउ कुट्टनक। पच्छोकडु पश्चादोकस्तटम् । परालु पलालम् । पडोसु प्रत्योकस् । अरडकमल्लु अर्यटक[म?]ल्ल । उपवासी उपोपित । सूआडि सूतिकागृहम् । फुई पितृष्वसा । भोलउ मुग्धः । मासी मातृष्वसा । पाहरी प्राहरिकः । बहिन खसा। गउखु गवाक्ष । मु(माउ?)लाणि मातुलपत्नी । नीद्रालूखउ निद्रारुद्धक। भुजाई भ्रातृजाया । ऊंडहणुं उद्वहनकम् । सासू श्वश्रू । खोडउ खञ्जः। पीत्राणी पितृव्यपत्नी। पलेवलर्ड प्रदीपकम् । पीत्रीयु पितृव्यक। न्युजणउं नियन्त्रकम् । माउलउ मातुल । गउंछणउं गुच्छनकम्। फुईहायी पितृस्वस्नीय । न्युंछण न्युञ्छनकम् । माईय (°हायी) छाणावलि कारीषावली। मास्याही मातृण्वस्त्रीय । ऊदेही उद्भेदिका । मा[उ?]लाही मातुलीय । आडाबंग तिर्यक्सूत्रिका। देशांतरी देशान्तरिक । ऊटाटीयु उट्टीकनम् । पलवटि परिवलितपटी। कूडछी कूर्मोच्छूयिका। पिराणउ प्रतोदः,प्राजिनं,तोत्रं,प्रवयर्णया। जोत्रु योक्त्रम्। चंदौउ चंद्रोदय, उल्लोच । जूंसरू युगम्। परीयच्छि तिरस्करिणी। तीन्हढं तीक्ष्णम् । बाउल्लु बब्बूल। कोटडउं प्राकारम् । आंबिली चिंचा, चिचिणी वा गढ़ दुर्गः।
अविज्ञातविद्धत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि अथ क्रियावचनानि थाकइ स्थानमाहरति, स्थानयति । मांजइ प्रमाष्टिं । फूटइ स्फुटति। जागइ जागर्ति । पतीजइ प्रत्येति, प्रत्ययति, प्रतीयते गायइ गायति । वरासीयि विपर्यस्यते । होमइ जुहोति । जाम(य?)इ जायते। गूंथइ गुथ्यति । हुइ भवति । करइ करोति, कुरुते, विदधाति, विधत्ते । खाजइ कण्डूयति । धरइ दधाति, धत्ते, धरति, धारयति । ऑलंभइ उपालभते । दि यच्छति, राति, दत्ते, दाति । ऊटंटइ उद्बन्धयति । लि नयति, आदत्ते, गृह्णाति, विगृह्णाति । क्रमइ कामति । ऊडइ उत्पतति, उड्डीयते। आयसिइ आदिशति। आचरइ आचरति । वाधइ वर्द्धते । पवित्रइ पवित्रयति, पुनाति । निवीजइ निर्विज्यते । ऊपणइ उत्पुनाति । कुपइ कुप्यते, क्रुध्यति, रुष्यति । धूपइ धूपायति । तोलइ तूलयति। क्षरइ क्षरति । सहइ क्षमति, तितिक्षति, सहते, क्षाम्यति, वीकइ विक्रीणाति, विक्रीते । मृष्यति । मर्दइ मुद्राति ( मृगाति !)। मरइ म्रियते, विपद्यते । मिलइ मिलते। आषुडइ आस्खलति । अडइ अडते। फडफडइ फटफटायते। छूटइ छुट्यति । शपइ शपति, शप्यते इत्यादि । तिष्ठति गम्ल दृशूज्वलौ नीठइ निस्तिष्ठति । स्पृहस् पृच्छति नी पचक् पठौ । किरगिरइ किरगिरति। क्षिप् भणौ विश मुंच षिच कृषौ वषाणइ व्याख्यानयति। त्यज दही तरति स्तु चल त्रमौ ॥ १ छिछ(प?)इ छुपति, मृशति । लिखन् मोखन् जिघ्रति वर्षे वावइ वपति । पिव् पतेऽय जि जीव परस्मै । चोरइ मुण्णाति, चोरयति । यज् वपौ बद् वेञ् वसौ ऊखेडइ उत्कीलयति । वहत्युभयमाह भवादिगणानाम् ॥ २ डांभइ दन्नाति । वर्तते च रमते वृध्व्यथौ वारइ वारयति, निवारयति, निषेधयति । याचते च लभते च शोभते । पल्हालइ प्रक्लिद्यति । कंपते च घटते सुखायते पालुइ पल्लवयति। प्रारभते सहते तदात्मने ॥ ३ ऊठइ उत्तिष्ठति ।
वयरी मरीइ अरिणा म्रियते । अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि ७१ अद् हन् इण भा खा शास्ति वा जागृ त्वया सुप्यते । बालेन रम्यते । दानिना माति खप रुद वच वायाम्नात्यदादिः परस्मै। शोभ्यते । कर्तरि कर्मण्यपि कर्म नागच्छति । दुह लिह च दा धत्ते भयं स्तुडू भी ह्री अथ द्विकर्मको भावः। निगदित इह लोके आत्मने पूङ् धातुः ॥ ४ दुहि याचि रुधि प्रच्छि मिक्ष व्यध् हृष्टौ कुप् तृत्यनशो मुष चित्रानुपयोगिनिमित्तमपूर्वविधौ । म्लिप् दुषौ क्लिब शाम्यति तुष्यति ।। ब्रुवि शासिगणेन च यत्सते (१ भ्रम कुपौ च दिवादि परस्मै तदकीर्तितमाचरितं कविना ॥ १ तम विदो गदौ गदितस्तु किलात्मा ॥५ जयत्यर्थयती मन्थि चतुर्थो दण्डयत्यपि । विञ् वृञ् किल दुन शकापौ एभिः सह बुधैर्जया द्वादशैव दुहादयः ॥२ खादिगा निगदितास्तु परस्मै । नीवह्योहकृपोश्चापि गत्यर्थानां तथैव च । रुदभिदा छिद भुंजयुजौ वा द्विकर्मकेषु ग्रहणं ण्यन्ते कर्म च कर्मणः ॥ ३ भुजयुता उभयं च रुधादिः ॥६॥ असौ गां दोग्धि पयः । विप्रो राजानं गां तनोति डुकृञ भयं तनादिः याचते। असौ गामवरुणद्धि ब्रजम् । पान्थरछात्रं स्तृपू ग्रह ही मुप लूड विक्री । पन्थानं पृच्छति । असौ वृक्षमवचिनोति फलानि। क्रियादयः पार्युभयं च चिंति विप्रः शिष्यं धर्म ब्रूते । पण्डितः शिष्यं धर्म- लोके सभाजिश्चुरताडि भिक्षौ ॥ ७ मनुशास्ति । कोऽपि बुद्ध्या ग्रामं छात्रशतं अविकरण कर्तरि । दिवादेर्यत् । नु खादेः । जयति । प्रार्थयति राजानं ग्रामं गुरुः। मथ्नन्ति तनादेरुः । ना क्रयादेः । चुरादेश्च । इमानि स्म जलधिं देवासुराः । सर्वाणि विकरणसूत्राणि । परस्मैपदे ह्यस्तनी यावत् । आत्मनेपदे सर्वत्र [द्विकर्मक वाक्य] एयु देवदत्तु गग्गनुं सउ दंडइ असौ लज्जासत्तास्थितिजागरणं देवदत्तो गर्गान् शतं दण्डयति । वृद्धिक्षयभयजीवितमरणम् । ए छाली गामि लिइ अजां नयति ग्रामम् । शयनक्रीडारुचिदीप्त्यर्था ए कुंभतणु भारु हरइ असौ कुंभं भारं धातव एते कर्मविहीनाः ॥ १ हरते । वहति ग्रामं भारं देवदत्तः । कर्षति [कर्मणि वाक्य] शाखां ग्रामं देवदत्तः। ईणं लाजीइ अनेन हीयते । इनन्तेऽपि द्विकर्मका भवन्ति- तई भलई हुईइ त्वया भव्येन भूयते । भोजयति पायसं छात्रं कश्चित् । मई रहीइ मया स्थीयते । बोधयति बटुं ग्रन्थं गुरुः। पाहरी जागीइ यामकेन जागर्यते । वाचयति श्लोकं पुत्रं पिता । एयु वाधइ असौ वर्द्धते । कर्मण्यपि द्विकर्माका भवन्ति- एयु जीवइ असौ जीवति । दुह्यते गौः पयो गोपालेन । याच्यते राजा गां विप्रेण । सार्वधातुके यण् ।
श्रेष्ठाः । ७२ अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि रुद्धयते गौरृज गोपालकेन । ददाति, असौ ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां वित- पृच्छयते छात्रः पंथानं पान्थेन । रति, इत्यर्थे पारलौकिके निःस्पृहे चतुर्थी । अवचीयते वृक्षः फलानि पुरुपेण । भूतंतउ प्राणीया भला भूतानां प्राणिनः अनुशिष्यते छात्रो धर्म पण्डितेन । प्रार्थ्यते राजा ग्रामं गुरुणा । प्राणीयां तु मतिजीवी भला प्राणिनां एवं सर्वत्र । मतिजीविनः श्रेष्ठाः । पूर्वकर्तरि पष्ठी, कर्मणि षष्ठी, करणषष्ठी, इव्यर्थे अपादाने । संप्रदानषष्ठी, अपादानषष्ठी, संबंधिपष्ठी, निर्धा- निर्धारणे षष्ठी, सप्तमी च भवति- रणषष्ठी, काले भावे षष्ठी, अधिकरणपष्ठी-एते मनुष्यमाहि ब्राह्मण श्रेष्ठ मनुष्येषु षष्ठीभेदाः । सर्वत्र पष्ठीबाधकानि कारकाणि । ब्राह्मणाः श्रेष्ठाः । तई गामि जाइवउं गन्तव्यं ते प्रामे । गाईमाहि काली गाइ घणु दूधु गोषु 'मइ घरि रहिवडं मम गृहे स्थातव्यम् । कृष्णा संपन्नक्षीरा गौः। .. कृत्यानां कर्तरि वा पष्ठी- इति सप्तमी च भवति । बांभणन घर ब्राह्मणस्य गृहम् । एयु शास्त्र वाचणहारु असौ शास्त्राणां वाचयिता। व्यासनउं ग्रामु व्यासस्य ग्रामः । इति संबंधिषष्ठी। एयु वेद पढणहारु असौ वेदानामध्येता। लोक विक्रमादित्यु राउ स्मरइ लोको णक्तृचोः कर्मणि षष्ठी, इतरेषां द्वितीया । विक्रमादित्यराज्ञः स्मरति । एयु अन्ति ध्रायु असौ अन्नानां तृप्तः । एयु बोल्या प्रयोग संभारतउ श्लोक विसनर काष्टि न ध्रायु अग्निः काष्ठानां नींपजावइ असावुक्तानां प्रयोगानां . न तृप्यति । स्मरन् श्लोकान् निष्पादयति । पाणी भरिलं सरोवर जलस्य पूर्ण तडा- श्रीवासुदेव दैत्य मारइ श्रीवासुदेवो गम् । दैत्यानां निहन्ति । कोठर कणि भरिउ कणानां पूर्णोऽयं राउ वांभणना वयरि मारइ राजा विप्राणां वैरिणां नाति (हन्ति)। इत्यर्थे पूरिसुहितार्थानां करणे पष्ठी । इत्यर्थे स्मरणहिंसार्थानां प्रयोगे कर्मणि एयु प्रधानरहि लांच भइसि दि असा- वमात्यस्य लञ्चया महिषीं ददाति । एयु देवतणइ अर्थि फूलपत्री मेलइ एयु पोष्यवर्गरहिं यावज्जीबु भरणु असौ देवताभ्यः पुष्पपत्राणामुपस्कुरुते। पोषणु दि असौ पोप्यवर्गस्य याव एयु श्राद्धतणइ अर्थि चोपा मुग जीवं भरणपोपणं ददाति । मेलइ असौ श्राद्धाय तन्दुलमुद्दानामु- ऐहिकफलार्थसंप्रदाने पष्ठी, पारलोके च पस्कुरुते । चतुर्थी । यथा-कश्चित् ब्राह्मणेभ्यो गां इति करोतेः प्रतियत्ने कर्मणि पष्टी। . . 7 कोष्ठकः । पष्टी।
घृतस्य जानीते। - अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि ७३ एयु दोरी सापु भणी जाणइ असौ गत्यर्थकर्मणि चतुर्थी वा- रज्जु सर्पस्य जानीते। ग्रामं गच्छति, ग्रामाय गच्छति असौ । एयु तेलु घीउ भणी जाणइ असौ तैलं कर्मप्रवचनीयैश्च । अनु-अभि-प्रति एते कर्मप्रवचनीयाः । एषां योगे द्वितीया । एयु एकलउ विदेशि जातउ भयतउ अनुशब्दः पृष्ठे अभिज्ञाने मध्ये सन्मुखे समीपे पीलउ पुरुषभणी जाणइ असौ सहार्थे- एकाकी विदेशं व्रजन् भयात् कीलकं तु पूठि त्वामनु । नरस्य जानीते। पर्वतनइ अहिनाणि गामु वसई इत्यर्थे संभ्रान्तिज्ञाने जानातेः कर्मणि षष्ठी। पर्वतमनु नगरं वसति । आंबामाहि कोइलि वासइ सहकारमनु- सुखदुःखाभ्यां करणे द्वितीया- एयु सुखिहिं दीहाडा नींगमइ असौ कोकिला कूजति । सुखं दिनानि निर्गमयति । वृक्ष सामहुं आभउं वृक्षमन्वभ्रपटलम् । एयु दु:खिं द्रव्यु उपार्जइ असौ दुःखं देवालय कन्हलि तीथु छ। देवालयमनु तीर्थ तिष्ठति । द्रव्यमुपार्जयति । हेत्वर्थे तृतीया- तइसउं वात करइ त्वामनु वार्ता करोति। राउ लोकपाहिं करसणु करावइ राजा गुरु साम्हु ऊठइ असौ गुरुमभ्युत्तिष्ठति। लोकैः कर्षणं कारयति । ग्रामि दीहाडी प्रति एकु द्रम्मु लहइ ग्रामे प्रतिदिनं द्रम्मैकं लभते । ब्राह्मणु शिष्यपाहिं पोथउं लिखावइ विप्रः शिष्येण पुस्तक लेखयति । एयु ब्राह्मणप्रति भक्ति बोलइ असौ प्रतिविप्रं भक्तिं जल्पति । इति हेतु कर्ता। उभयतः परितः सर्वतो योगे द्वितीया- कालाध्वभावदेशानां कर्मसंज्ञा- वैष्णवु रातिंच्यारइ पुहुर जागइ रज- देवालय बिहुंगमे वड दीसई देवालय- मुभयतो न्यग्रोधो दृश्यते। न्याश्चतुरो यामान् जागर्ति वैष्णवः । घरपालि वाडि करइ गृहं परितो वृति सात मसवाडा नइ वहइ सप्तमासान्नदी गाम सविडं गमा क्षेत्र वाव्यां ग्राम कापि कृतो हीने कर्मणि प्रधानक्रियापेक्षया सर्वतः क्षेत्राण्युप्तानि । द्वितीया न भवति- उपर्यधोऽधीनां सामीप्य एव कर्मद्वित्वे- तई वयरी आणी बांधीवउ त्वया ऊपरि ऊपरि गामु उपर्युपरि ग्रामम् । हेठलि हेठलि नगरु अधो अधो नगरम् । 'विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतम्।' अदूरे एनोऽपञ्चम्याः, एनप्रत्ययान्तयोगे द्वितीया- ईणं हुव्यारीउ द्रव्यु लीधर अनेनाऽहं गाम दाहिण गमइ हूकडी वाडी ग्राम विप्रतार्य द्रव्यं गृहीतः। दक्षिणेन निकटं वाटिका । - - J वहति । करोति । रिपुरानीय बध्यताम् । उ०र० १० ७४ - अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि गाम बिहुं विचि नदी गामद्वयमन्तरा नदी। स्यातां यदि पदे द्वे तु, यदि वास्य बहून्यपि नगरनई उत्तर गमई दूकडउ पर्वतु तान्यन्यस्य पदस्यार्थे बहुव्रीहिः समस्यते ॥ नगरमुत्तरेण निकषा पर्वतः । (४) जीणइं समासि बि पद अथ समयाहाधिगन्तरान्तरेण युक्ता द्वितीया घणां पद अनेरा पद तणइ अर्थि तू कन्हलि त्वां समया। मेलाई तेयु समासु ब्रहुव्रीहि एयु मुंडउ एनं धिम् । जाणिवउ, अनइ बहुव्रीहि समासि तू पापड त्वामन्तरेण। यद् शब्द छेहि प्रयुंजीइ। मूं पापड मामन्तरेण । (क) घणउ गुड छइ जीण लाडू [समाल प्रकरण] प्रभूतो गुडो यस्मिन् मोदके स प्रभू- द्विगुर्द्वन्द्वोऽव्ययीभावः कर्मधारय एव च । तगुडो मोदकः । तत्पुरुपो वहुव्रीहिः पटू समासाः प्रकीर्तिताः ।। (का) सदाचार बांभणु जीणई गामि पदे तुल्याधिकरणे विज्ञेयः कर्मधारयः। सदाचारा विप्रा यस्मिन् ग्रामे स (१) जीणं समासि वि पद तुल्या सदाचारविप्रो ग्रामः । धिकरण हुई सु समासु कर्मधार (कि) घणां निर्मला पाणी जीणं नदि यसंज्ञिक हुइ। प्रभूतानि निर्मलानि उदकानि यस्यां नीलं उत्पलं-नीलोत्पलम् । उत्तमः पुरुपः- नद्यां सा प्रभूतनिर्मलोदका नदी । उत्तमपुरुपः। (की) पामी विद्या जेहि पुरुषि संप्राप्ता [संख्यापूर्वो द्विगुरिति ज्ञेयः ] विद्या यैनरैः ते संप्राप्तविद्या नराः । (२) जीणई समासि संख्या गणितु (कु) निर्मलवुद्धि विप्र वैद्य सुभट पूर्वपदि वोलाइ ते समास द्विगु अछई जीण राज भुवनि निर्मलबु- जाणिवउ । द्धिका विप्रा वैद्याः सुभटा यस्मिन् राज- सप्तऋपयः । पञ्चाम्राः। पञ्चानां मूलानां भुवने तद् निर्मलबुद्धिविप्रवैद्यसुभटं समाहारः-पञ्चमूली । राजभुवनम् । विभक्तयो द्वितीयाद्या नाम्ना परपदेन तु । (कू) रुलीयायित कीधा जीणं वांभण समस्यन्ते, समासो हि ज्ञेयस्तत्पुरुपस्य च ॥ तोपिता विप्रा येन स तोपितविप्रः । (३) जीणं समासि द्वितीयालगइ छ विभक्ति आगिलई पदि सरसी (के) ऊगिउ वृक्षु जीणई क्षेत्रि मेलीयि सु समासु तत्पुरुषु प्ररूढो वृक्षो यस्मिन् क्षेत्रे तत् प्रख्ढ- जाणिवउ । वृक्षं क्षेत्रम् । ग्रामं गतः- ग्राम गतः, नखैर्निभिन्नः-नखनि (कै) दूकडी गंगा जीणई देशि आसन्ना भिन्नः । ब्राह्मणाय देयं ब्राह्मणदेयम् । गंगा यस्मिन् देशे स आसन्नगंगो देशः । मञ्चात्पतितः-मञ्चपतितः। राज्ञः पुरुपः (को) सरीप नामुंजेहनउं सदृशं नाम राजपुरुषः । अक्षेषु शौण्ड:-अक्षशौण्डः। यस्य ससनामा।
ब्राह्मणसि अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि ७५ (कौ) सरीषउं गोत्रु जेहनउं सदृशं गोत्रं ये ये लहुडा ते ते यमिवा बइसई यस्य स सगोत्रः। यथालघु भोक्तुमुपविशन्ति । द्वन्द्वसमुच्चयो नाम्नोर्बहूनां वापि यो भवेत् । एयु जेतला बांभण तेतला निर्वाप (५) जीणं समासि बिहुं नामनउ दिइ असौ यावद्विग्रं निर्वापान् ददाति । समुच्चयुः अथ घणां नामनउ जेतलां खांडां तेतला राजपुत्र याव- समुच्चयु ते समासु द्वंद्व जाणिवउ खङ्गं राजपुत्राः। नरश्च नारायणश्च-नरनारायणौ । पीठं जेसला छात्र तेतला पोथां यावच्छात्रं च छत्रं च उपानच्च पीठछत्रोपानहम् । पुस्तकानि । ब्राह्मणाश्च क्षत्रियाश्च वैश्याश्च शूद्राश्च ब्राह्म- जाइ सविप्रो याति । णक्षत्रियविट्शूद्राः। साकरसिउं दूध पीइं सशर्करं पयः पिवति। -चकारबहुलो द्वंद्वः। पुत्रसिउं यमइ सपुत्रो भुते। ' पूर्व वाच्यं भवेद्यस्य सोऽव्ययीभाव इष्यते ॥ अव्ययीभावे सहशब्दस्य सभावः । (६) जीणं समासि अव्ययपदसंयुक्त पारे मध्ये अन्ते योगे द्वितीया- पूर्वपद वाच्यु हुइ सु समासु अव्ययी समुद्रमाहि रत्न नीपजई मध्येसमुद्र भाव जाणिवु । रत्नानि निप्पद्यन्ते। गामनइ पाषइ अधिकरी प्रवर्तइ नइमाहि माछा हीडई मध्येनदी मत्स्या विचरन्ति । सामीप्ये अव्ययीभावः- पाणीनइ पारि देवालयु पारेजलं देवा- घर कन्हलि वृक्षु उपगृहं वृक्षः। लयानि । वृक्ष कन्हलि घर उपवृक्षं गृहम् । पाणीनइ छेहि वृक्षु अन्तेजलं वृक्षः। बांभणनउ अभावु ब्राह्मणानामभावः तलाव विचि देहरर अन्तस्तडागं देव- अब्राह्मणम् । गृहम् । माषीनउ अभावु मक्षिकानामभावो गाम विचि वडु मध्येग्रामं वटः । परिशब्दो बजने- अनुयोगः पश्चादर्थे- पाटण टाली किहां वसीइ परिपत्तनं बांभण पाछलि शिष्य अनुवित्रं शिष्यः। कापि नोष्यते । राजा पाछलि सेना अनुराजं सेना । नास्तिक टाली कुण पापीउ परिनास्तिकं वर पाछलि गीत गाती स्त्री अनुवरं कोऽपि न पापी । गानगायन्त्यो नार्यः । आड् यावदर्थे मर्यादाभिविधौ-आ गृहं केदारसमीपि सरस्वती अनुकेदारं सर- यावद्गृहम्, आ ग्रामं यावद्ग्रामम् । एवं अव्ययीभाव समास नपुंसक- ये ये वडा ते ते मान लहई यथावृद्धं लिंगीयु जाणिवर । अधिग्रामं नरः। निर्माक्षिकम् । -- खती। मानं लभन्ते।
७६ अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि अथ तद्वितप्रत्यया लिख्यन्ते- जननउ समूह जनता। मजीठ राती साडी माजीष्ठा साटिका । वंधुनउ समूहु वन्धुता। हलद्रूआं वडां हारिद्राणि वटकानि । इति सहायीयांनउ समूहु सहायता । रोगयोगात् अण् । गजात् समूहे घटा- मघाभियुक्ता रात्रिः दिनं मासो वा-माघी हाथीयांनउ समूहु गजघटा । रात्रिः, माघ दिनम् , माघो मासः । धेनुहस्तिशब्दात् समूहे कण्- फागुण मासतणी पूनिम फाल्गुनी धेनुनउ समूहु धेनुकम् । पूर्णिमा । हाथीयांनउ समूहु हास्तिकम् । एवं सर्वत्र नभत्रयोगे अण् । गुणतत्त्वभूतेन्द्रियविषयशव्दास्त्रकरणानां लाष रातउ कांवलउ लाक्षिकः कम्बलः । समूहे ग्रामो वक्तव्य:- लाक्षिकी साडी। गुणनु समूह गुणग्रामः । एवं तत्त्वग्राम:, इति लाक्षारक्तार्थे इकण् । भूतग्रामः, इंद्रियग्रामः, विषयग्रामः, कागनर टोल वायसं वृन्दम् । शव्दग्रामः, अस्त्रग्रामः, करणग्रामः, अंगनान वृंदु आगनं वृन्दम् । केशशब्दात् समूहे हस्तपक्षपाशा पुरुषतणुं समवायु पौरुपम् । भवन्ति- इति समूहे अण् । केशनउ समूहु केशहस्तः, केशपक्षः, पुरुषात् समूहे एयण- केशपाशः। पुरुषतणड समूह पौरुषेयम् । तरुपद्मिनीकुमुदकमलादिभ्यः समूहे स्त्रीतणउ समूहु स्त्रैणं वृन्दम् । खण्डो वक्तव्यः। समस्तवृक्षतृणगुल्म- स्त्रीनी सभा स्त्रैणी परिपत् । जातिभ्योऽपि- स्त्रीनुं धनु स्त्रैणं धनम् । तरूनउ समूह तरुखण्डम् । [ एवं ] पुरुषनई वृंदु पोस्नं वृन्दम् । पद्मिनीखण्डम् , कुमुदखण्डम् , कमल- स्त्रीपुंसाभ्यां नण - स्नणौ। खण्डम् । उष्ट्रा उन राजन्य राजन् वत्स मनुष्याणां कर्मदूर्वादितृणादिभ्यः काण्डोवक्तव्यः- समूहेऽकण- कर्मनउ समूहु कर्मकाण्डम् । ऊंटनउ समूहु औष्ट्रकम् । दूर्वानउ समूहु दूर्वाकाण्डम् । तृणानु समूह तृणकाण्डम् । रायतणउ समूहु राजन्यकं, राजकम् । आदिग्रहणात्- वत्सनु समूहु वात्सकम् । अंधारानउ समूह तमस्काण्डम् । मनुष्यन समूह मानुष्यकम् । ग्रामजनवन्धुसहायानां समूहे तल्- गणिकानां समूहे यण- ग्रामतणु समूह ग्रामता। गणिकानु समूहु गाणिक्यम् । - वृपभनउ समूहु औक्षकम् । - - ७७ ... । अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि अश्वानां समूहे ईय:- कूडीरहिं हितूर चर्म तव्यं चर्म । अश्वनउ समूहु अश्वीयः । प्रासाद योग्य हितूई ईंट प्रासादीया प्रमाणे अर्थे द्वयसट् दनट् मात्रट् प्रत्यया इष्टिकाः। भवन्ति- भाणा योग्य हितूउं कांसउं भाजनीय कडि समा गहूं कटिदना गोधूमाः । कांस्यम् । गूडां समी पाइ जानुद्वयसी परिखा । गाडा योग्यु हितूउं लोहडउं शाकटीयं कांध समुं पाणी स्कन्धद्वयसं जलं लोहम् । स्कन्धमात्रं वा। करवतरहिं हितूउं चर्मु .. पदन्त्यात् इति अदितिभ्यो यण् । विसनररहिं हितूर काष्ठ कृशानव्यं दैत्यानां समूहो दैत्यम्, आदित्याना काष्ठम् । समूह आदित्यम् । पांड योग्य हितूई सेलडी खण्डव्या इक्षुः। इति उवर्णान्तशब्दात् यः हितेऽर्थे । एयु व्याकरण जाणइ इत्यर्थे वैयाकरणः। अन्यत्र ईय:- सूत्रपुराणन्यायमीमांसेतिहासवेदेभ्यो वेत्त्य- धीतेऽर्थे वत्सरहिं हितूर वत्सीयः । इकण्- घोडारहिं हितूउ अश्वीयः। सूत्रु पढइ जाणइ असौ सूत्रिकः । एवं पुरुषु राजानी परि दीसइ इत्यर्थे उप- पौराणिकः, नैयायिकः, मैमासिकः, माने वति, पुरुषो राजवत् दृश्यते । ऐतिहासिकः, वैदिकः। चपलपणउं इत्यर्थे तत्त्वौ भावे चपलता, सुवर्णनां आभरण सौवर्णान्याभरणानि । चपलत्वं, चापल्यम् । रूपानां पात्र राजतानि पात्राणि । अभिव्याप्तौ संपद्यतौ च सातिर्वा देये कर्पासनां वस्त्र कार्पासानि वस्त्राणि । हरिणनउं चांबडउं हारिणं चर्म । राजा गामु बांभणायतुं करइ राजा मृगतणउं मांसु मार्ग मांसम् । ग्रामं श्रोत्रियसात्करोति । वाघतणां पद वैयाघ्राणि पदानि । देव आयतुं करइ देवत्राकरोति । तस्येदमर्थेऽण् । वरुआयती कन्या संपजइ वरत्रासंप- विकृतिवाचिनः प्रकृतावभिधेयायां हितेऽर्थे ईयो यश्च- क्षेत्रु बिमणइ त्रिमणइ [करइ] द्विगुणा- अंगाररहिं हितूर काष्ठ अंगारीयाणि करोति त्रिगुणाकरोति क्षेत्रं-इत्यर्थे डाच् । काष्ठानि । दाडिमु नींकोलइ निःकुला करोति दाडि- पीला योग्य हितूर लाकडउं शङ्कव्यं दारु। मृगु वींधइ सपत्राकरोति मृगम् । वाणरहिं हितूउ शरकड इषव्यः शरः- महिषु वाणि आहणइ निप्पत्राकरोति काण्डः। महिषम् । , त्रा च- द्यते कन्या। मम् ।
- अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि कणनउ संचकारु आपइ सत्याकरोति जु करत, जु लेत, जु देत इत्यर्थे क्रिया- कणान् । तिपत्तिः। आंर्षि ग्रहियि रूपु चाक्षुषं रूपम् । यद्-यदि-चेयोगे क्रियातिपत्तिः । कानि सांभलीयि शब्दु श्रावणः शब्दः। पाते वा सप्तमी। पाहणि पीस्या सातू दार्षदाः सक्तवः । जु किमइ हुँ घरि जात, तु एयु मई ऊखलि पांड्या मुग औदूखला मुद्गाः । गामि न मोकलत यदि अहं गृहं घोडे वहीयि रथु आश्वो रथः । यायां तदयं मां ग्रामं न प्रस्थापयेत् । च्युहु वहीयि गाडं चातुरं शकटम् । जु किमइ एयु गामि न जात, [तु] चौदसिं दीसइ राक्षसु चातुर्दशं रक्षः । चोरु बलद न लयेत यदि असौ ग्राम इत्यर्थेऽण् । न गच्छेत् ततश्चौरो बलीवन्न हरेत् । गामेचउ ग्राम्यः, ग्रामेयः, ग्रामीणः । जे किमइ एयु[गहुं !] लेत, तु द्राम नदीन जलु नादेयं जलम् । न पडत असौ गोधूमाश्चेद् गृह्णीयात् दक्षिणदिशिउ दाक्षिणात्यः । द्रम्मास्ततो न । पश्चिमीउ पाश्चिमात्यः । अतीते स्मृत्युक्तौ अभिज्ञा भविष्यन्ती- पूर्वीयु पौरस्त्यः । जाण अहो पुरुष आपणि लहुडा थ्या अहांनउ इहत्यः । [......] वस्त्र पहिरता स्मरसि तिहांनउ तत्रत्यः । पुरुष वयं लघुत्वे बहुमूल्यानि वासांसि किहांनउ कुत्रत्यः । परिधास्यामः । यहांनउ यत्रत्यः । पुरअहे दीहाडे मिष्टान्न यमता पार्वतीयानि जलानि [....] मिष्टान्नं भोक्ष्यामः । वर्षाकालनउ मेघु प्रावृषेण्यो मेघः । ननु शब्दयोगे पृष्ठप्रतिवचनोत्तरे अद्यतनी शरत्कालनउ तिडकउ शारदिक आतपः। पूर्वादेः उत्तरपदे वर्तमानाभावात् । हस्तलेख्यं हैमंतनु वायु हैमनः पवनः । अकार्षीत् । ननु करोमि भोः । कथं ब्राह्मणं सांझूणर्ड सायंतनम् । शूद्रान्नं भोजयेत् । अन्यायमेव । क्रियासमभिहारे घणदीहुँ चिरन्तनम् । सर्वत्र हि-खौ भवतः । घणे दिहाडे आव्यु चिरेणागतः । ब्राह्मण यमिसिं यमिसि ब्राह्मणा मुंश्व भुक्ष्व थोडे दिहाडे आविउ अचिरेणागतः । तम्हि कहउ कहउ आपणी वात यूयं वडी वार लगाडइ विलम्वते । कथय कथय निजां वार्त्ताम् । अम्हि गामि जास्युं जास्युं वयं ग्राम म दीधु, म लीधु, म कीधु आक्षेपना गच्छ गच्छ (१)। योगे शतृडानशौ। कालपुरुपत्रयेऽप्येवम् । क्रियासमुच्चयेऽ- मा योगेऽन्वाक्रोशे इति सूत्रम् , मा कुर्वन् प्येवम् । नाम्न आत्मेच्छायायां यन् काम्य च मा कुर्वाणः, मा ददत् , मा ददानः । गृहीते । गृहकाम्यति । 1 साहइ अवलम्बते ।
७९ क्षोदिमा । ३ स्थेमा । अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि दासी वहूवत् मानइ वधूयति दासी नरः। एयु अति वेगलउ असौ दवीयान्, एयु लहुडउ लघीयान् लघिष्ठः । इत्यर्थे दविष्ठः, दविमा । गुणादिष्टे गुण्यसौ वा पृथ्वादिभ्यो भावेऽर्थे एयु अति लहुडउ असौ यवीयान् , यविष्ठः, इमनु वा । यविमा । एयु अति पुहुलउ असौ प्रथीयान् , प्रथिष्ठः, एयु अति वहिलउ असौ क्षेपीयान् , क्षेपिष्ठः, प्रथिमा । क्षेपिमा । एयु अति कुंअलउ असौ म्रदीयान् , म्रदिष्ठः, एयु अति क्षुछ असौ क्षोदियान् , क्षोदिष्ठः, म्रदिमा । एवं लघिमा अणिमा महिमा वरिमा गरिमा द्रढिमा कालिमा मलिनिमा । इष्ट ईयस् ईमनु वा प्रत्यये प्रशस्यस्य श्रो' एयु अति घणउ असौ भूयान् , भूयिष्ठः, भूयिमा । भवति । वृद्धस्य च ज्य'। अन्तिकबाढयोर्नेद- साघौ।युवाल्पयोः कन्य[व]] । स्थूलदूरयुवक्षि- एयु अति प्रियु प्रेयर्नु हुयि, असौ प्रक्षुद्राणां अन्तस्थादेर्लोपो गुणश्च । बहोर्लोपि भू प्रेयान् , प्रेष्ठः], प्रेमा । च । प्रियस्थिरस्फिरोरुगुरुवहुलतृप्रदीर्घहखवृद्ध एयु अति स्थिर असौ स्थेयान् , स्थेष्ठः, वृन्दारकाणांप्रस्थस्फवर्गबहत्रपदाघहखर्पवृन्दाः। तद्वदिष्ठेमेयस्य बहुलं प्रत्ययादिलोपश्च । एयु [अति गरूड वरीयान् , वरिष्ठः, व एयु अति प्रशस्यु असौ श्रेयान् , श्रेष्ठः, रिमा । गरीयान् , गरीष्ठः, गरिमा । एयु अति बहुलु असौ वंहीयान् , बंहिष्ठः, एयु अति वडउ असौ ज्यायान् , ज्येष्ठः, [बंहिमा] ज्यायिमा । एयु अति लज्जालु असौ त्रपीयान् , त्रपिष्टः, एयु अति दूकडउ असौ नेदीयान् , [त्रपिमा ] । नेदिष्ठः, नेदिमा । एयु अति दीर्घ दीर्घनउ हुयिवउं असौ एउ अति गाढउ साधीयान् , साधिष्ठः, द्राधीयान् , द्राधिष्ठः, द्राधिमा । साधिमा । एयु ह्रस्वु असौ ह्रसीयान् , हसिष्ट., हसिमा। एउ अति लहुडउ अति थोडउ असौ अति वृद्ध वीयान् , वर्पिष्ठः । कनीयान् , कनिष्ठः, कनिमा । एकखराणामदन्तानां च आपागमः । एयु अति मोटउ असौ स्थवीयान् एयु प्रशस्यु कहइ. स्थविष्ठः, स्थविमा । असो श्रापयति । एतद्वाक्यसंवादकानि पाणिनिव्याकरण- ५ स्थूलदूरयुवहखक्षिप्रक्षुद्राणां यणादिपरं गतान्यमूनि सूत्राणि- पूर्वस्य च गुणः । ६-४-१५६. १ प्रशस्यस्य श्रः। ५-३-६०. ६ वहोर्लोपो भू च बहोः । ६-४-१५८. २ वृद्धस्य च । ५-३-६२. ७ प्रियस्थिरस्फिोरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्ववृन्दा- ३५-३-६३. रकाणां प्रस्थस्फवबहिगर्पित्रपटाविवृन्दाः, ४ युवाल्पयोः कनन्यतरस्यां ५-३-६४. ६-४-१५७. श्रेमा । , ८० मोमोक्ति। , सेसेक्ति। तात्यक्ति। अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि एयु वडु कहइ असौ स्थापयति । अतिहिं प्रेरइ चेक्षिप्यते, चेक्षिपीति, एयु दूकडउ कहइ असौ नेदयति । चेक्षिप्ति । एयु गाढउ कहइ असौ साधयति । अतिहिं लिखइ वावश्यते, वावशीति, एयु तरुणउ कहइ असौ यवयति वावष्टि । कनयति । अतिहिं मूकइ मोमुच्यते, मोमुचीति, अतिहिं हुइ बोभूयते, वोभूवीति, बोभोति । अतिहिं जाइ, वली वली जाइ जङ्ग- अतिहिं सींचइ सेसिच्यते, सेसिचीति, म्यते, जङ्गमीति, जङ्गन्ति । अतिहिं ज्वलइ जाज्वल्यते, जाज्वलीति, अतिहिं छांडइ तात्यज्यते, तात्यजीति, जाज्वल्ति । अतिहिं हसइ जाहस्यते, जाहसीति, अतिहिं दहइ दन्दह्यते, दन्दहीति, जाहस्ति । दन्दग्धि । अतिहिं रहइ तेष्ठीयते, तास्थायते । अतिहिं जपई जञ्जप्यते, जञ्जपीति, अतिहिं देषई दरीदृश्यते, दरीदृशीति, जनप्ति । दरीदृष्टि । अतिहिं दोहइ दोदुह्यते, दोदुहीति, रीस्थाने लुकि रिरौ वा दरिदृष्टि, दEि । दोदोग्धि । अतिहिं नाचइ नरीनृत्यते, नरीनृतीति, अतिहिं गात्रु नामइ जञ्जभ्यते, जञ्जभीति, नरीनति, नर्ति । जञ्जब्धि । अतिहिं वरसइ वरीवृपीति, वरीवृष्टि, अतिहिं रमइ रम्यते, रमीति, ररन्ति । वरिवर्टि, वर्वटिं। अतिहिं नमइ ननम्यते, नंनमीति, नंनन्ति । अतिहिं पूछइ परीपृच्छ्यते, परीपृच्छीति अतिहिं तरइ तेतीर्यते, तेतरीति, तेतति । परिपटिं, पर्पष्टिं । अतिहिं पिसइ शनीश्रस्यते, शनीश्रसीति, अतिहिं जाइ सरीस्रियते, सरीसरीति, शनीश्रस्ति । सरीसति, ससति । अतिहिं पडइ पनीपत्यते, पनीपतीति, अतिहिं मरइ मरीम्रियते, मरीमरीति, पनीपत्ति । मरीमति, मर्मति । अतिहिं लाइ पनीपद्यते, पनीपदीति, अतिहिं लिइ नेनीयते, नेनेति । पनीपत्ति । अतिहिं पचड़ पापच्यते, पापचीति, अतीहिं सूकइ चनीस्कद्यते, चनीस्कन्दीति, पापक्ति। चनीस्कन्ति । अतिहिं पढइ पापठ्यते, पापठीति, पापट्टि । अतिहिं चूंटइ, विणइ, चिणइ चेकीयते, अतिहिं भणइ बंभण्यते, वभणीति, वभण्टि । चेकीयति, चेकेति ।
m . , . " , युयुत्सति । - शुशुक्षति . " । "" अविशातषिद्धत्संगृहीतानि औक्तिकपदानि हुईवा वांछई बुभूषति । वायिवा वांछह विवासति । रहिवा थाकिवा थाइवा [वांछ।] आश्रयिवा आशिश्रीपति। तिष्ठासति । सूयिवा शिशयिषति । जाइवा वांछइ जिगमिषति । दोहिवा', दुधुक्षति । देषिवा , दिदृक्षति । चाटिवा लिलिक्षति। बलिवा जिज्वलिषति । वीहिवा विमीपति । हसिवा 'जिहसिषतिः। लेवा 'निनीषति । लाजिवा जिद्दीषति । पचिवा पिपक्षति । जूझिवा पढिवा पिपठिषति । सुकिवा लाषिवा चिक्षिप्सति। नमिवा निनसति। भणिवा विभणिषति । खणिवा चिखास(चिखनिपति। पइसिवा प्रविविक्षतिः । सूंघिका मेल्हिवा पीवा सीचिवा सिसिक्षति । जीपिवा छांडिवा तित्यक्षति । जीविवा जिजीविपति । दहिवा दिधक्षति । मरिवा मुमूर्षति । तरिवा सांभलिवा धरिवा चालिवा चिचलिषति । आरंभिवा फिरिवा बिभ्रमिषति । लिखिवा लहिवा लिलिखिषति। चरिवा चुचूर्षति । सेकिवा पूछिवा पिप्रच्छिषति । पडिवा पिपतिषति । धरिवा दिधरिषति । पामिवा रमिवा रिरंसति । फाडिवा बिभित्सति । मारिवा जिघांसति । जमिवा लेवा जिघृक्षति । कहिया चिख्यासति । पूजिवा अचिचिषति । बोलिवा विवक्षति । निकोलिवा वांछइ निश्चुकोषिषति । , मुमुक्षति । जिघ्रासति। पिपासति । जिगीषति। तितीर्षति । " , शुश्रूषति । देवा दित्सति । धित्सति । आरिप्सति । लिप्सति । सिसिक्षति । " ईप्सति । नाहिवा सिष्णासति । , बुभुक्षति । उ०र० ११ " " अविज्ञातविद्वत्संगृहीतानि औक्तिकंपदानि रोयिवा वांछइ रुरुदिषति । करिवा वांछइ चिकीर्षति, चिकीर्षितवान्, जाणिवा विविदिषति । :: चिकीर्षन् , चिकीर्षमाणः, चिकीर्षिता, चोरिवा ,, मुमुषिषति । चिकीर्पितुम् , चिकीर्षणाय, चिकीर्षितु- चिणिका चिचीषति । कामः, चिकीर्षितुमनाः, चिकीर्षिता, चिकीर्पकः, चिकीर्षितव्यम्, चिकीर्ष- चूटिवा णीयम् , चिकीर्ण्यम् । वीणिवा अतिहि होउ बोभूयितः, बोभूयितवान्, तुणिवा वांछइ लळूषति । बोभूयमानम् , बोभूयते, बोभूयमानः, पवित्रु करवा वांछइ पुपूषति । बोभूयिता, बोभूयितुम्, बोभूयितुकामः, स्तविवा वांछइ तुष्ट्रपति । बोभूयितुमनाः, बोभूयिषति, बोभूयित- स्मारिवा वांछइ सुस्मर्षति । व्यम् । एवं सर्वत्र । ' :" " T १ ॥ अविज्ञातविद्वत्संग्रहीतानि औक्तिकपदानि समाप्तानि ॥ ॥शुभं भवतु॥ * उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत शब्दानुक्रम । . -- . + } अउ ३५, २, ५५,२ अउगनाइ ४२, १३ अउज १०७२- अउधारि ५३, २ अउलवइ ४३," अउंगड मुगउ.५६,.२ अऊठ.३२,१'. अखत्र १६,१ अखाडउ.१६,२ अखोड २२, १. अगर ९,१ अगेवाण ३२,... अगेवाणू (प्र०) १६२ अग्गिम की ३१,१ अग्गेवाणु ६६,.२. अग्यारसि३१,२. अतनु ५६ अचरिज ६,२ अछह ७४, २, अछतउ ६०,'२. अछिवळ ६२," अछिवा ६,२ अछीउं ६०,२ अछुतउ १५,.२. अजी ३१, २.५६," अट्ठावीस २०,२ अठतालीस. २९, अठत्रीस २८, २. अठहत्तरि २९, २ अठाणू ३०, १; अठार ५०, २. अठारमउ ३०, २ अठावन २९," अठाही ३३, २ अट्यासी २९,२, अडइ ५३, २.७०," अडवडा ४३२ अडसठि २९, २ अढार २८,१ अढारइ १८,१ अढी २७, २. अणगुक ६७,२ अणहारउ २४, अणावइ ४८, २ अणाव्यउ ५०, २. अति ७९, १. ७९,२ अतिविस १९,३ अति वृद्ध ७९,२ अतिहि होउ ८२,२ अतिहिं गात्रु नामइ ८०,२ अतिहिं चूंटइ, ८०,२ विणइ,चिण अतिहिं छांडइ ८०,२ अतिहिं जपह ८०,२ अतिहिं जाइ, वली जाई अतिहिं ज्वलइ ८,१ अतिहिं तरइ:८, अतिहिं दहइ ८०,२ अतिहिं देषइ ८०," अतिहिं दोहइ.८०,२ अतिहिं नमइ ८०,२ अतिहिं नाचइ ८०,१ अतिहिं पचइ. ८०," अतिहिं पडइ ८०,२ अतिहिं पढइ ८०," अतिहिं पूछ। ८०,१ अतिहिं प्रेरइ ८०,२ अतिहिं भणइ ८," अतिहिं मरइ ८०," अतिहिं मूकइ ८०,२ अतिहिं रमइ ८०,२ अतिहिं रहइ ८, अतिहिं लाइ ६०,२ बली अतिहिं लिइ ८०, अतिहिं लिखइ ८०,२ अतिहिं वरसई ८०," अतिहिं षिसइ ८०,२ अतिहिं सिंचइ ८०,२ अतिहिं सूकइ.८०,२ अतिहिं हसइ ८०," अतिहिं हुइ ८०," अथाह ११,२ अद्देसउ १७, २ अधिकरी ७५, अधूरउ २१, २ अनाड २२,१ अनुमोदिवू ५४,२ अनेकवार ६३,.. अनेतइ २७," अनेति ६३," अनेथि ५७, १.६३, २ अनेरिसिउ ५५, २ अनेरि परि ५६, २ अनेरीवार २७, १ अनेरुं ५६,१ अनेसउ २७, २. ६४, १ अनि ७२,१ अन्यसरीपट (प्र०) ६४, २ अन्येरीवार ५५, २ अपछर ६,१ अपराधइ ४०,२ अपराधिQ ५४," अपराध्यउ ५०, १ अभावु ७५, अभोखड २६, १ अभोखणुं ६९, " अभ्यसइ४१,२ अमावस ६,१. अमावसि ३१,२ अम्ह केरउ १५,२ अम्हनई ५५," १ fic.२ . 1 । . - अंकोडउ १५, भरह९ ६८,२ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत अम्हसरीषउ २७, २.६५, ३, असवार ,२ अम्हंसरीषउ ६४,१ असी २९,२ अम्हारळ ६३, २ असुणिउ ६८," अम्हारु २७, २. ५५, ३ असुद्ध २४, ३ अम्हारूं (प्र०) ६३, ३ असोई ६,२ अम्हासित ५५,२ अहांनउ ७८, १. अम्हि ५५, १७८, २ अहिनाणि ७३,२ अम्हे ३५, २. ५५ अहिनाणु ६९, २ अरचइ ३७,२. अहिवा ६४, २ अरडकमल्लू ६९,२ अही' २६,३ अरडूसउ १९,२ अहुण २७, १. २७, २ , अरणइ ५७, १.६७, २ अहूण ५५, २ अहो ७८,२ अरत ६६,२ अहोरात ६,,, अरतपरत ६६, २ अरतपरत २६,२. ६६, २' अंकोल २३, २ अरथइ ३७, २ अरहट २०, अंग ३५,१ अंगन ७६, अंगरखी ९,२ अरहु ६४,१ अंगार.. अरिरम ६२,२ अंगारसगड़ी, अरिहंत ५, १५, १ अंगीठउ २६,२ अरीठठ १९,२ अरीम २७," अंतेउर ९, २ अरीरम (प्र०):६२, २ अंतेउरी' १९, अर्थि ७२, २ अंधमूंधपणइ २६, अंधारउ'६" अलतउ ९,३ अंधारानउ ७६,२. अलसिवेल २१, ? अंबोड ६५," अलसी ३४, १ अर अलंकरइ १८,२ आउषट १४,२ अलंकरिउ ५१,१ आक १९," अलंकरिवू ५४, २. आकर्पइ ४७,२ अवतरह ४८, २ आकलइ १९," अवतरि ५४,' आकलिउ ५१,२ अवधारिउ ५०,३ आक्रमइ ३९, ३.१८," आक्रमिउ ५,२ अवहथइ ४२, २ अवाज ६, २ । आनंदइ ३०," आक्रुसिउ ५.,.. अश्व ७७,,,,: आखइ १,२ असलेस ५,०२.. आखट २३,२ . आखउंडली ६९," आखलंड १७," आखा २३, २ आखात्रीज १८,२ आखुडइ.४३, २ आखुडिउ ६८२ आगइ १५, १.१५, २.५५ आगर ११,२ आगरउ ११,० आगल ११,१.३१,२ आगलि (प्र०) ६४," आगास ६,१ आगिलड (प्र०) ६४,१ आगिलुं ५५, १. ६४, आगी १८,२ आघउ ५६,१ आचमइ ४३," आचरइ ७०," आचारिज ५,' आचार्यांस ३," आच्छिदइ ४०,२ आछउ ११,२ आछोटइ ४०, आज २७,१.५५, २. ६२१ आजिकाल्हि २०, २० आजु ६२,२, आजु लगद ५६," आजूणउ २७,". आजूण १२,२ आजून ५६," आजूनूं (प्र०) १२, २ आटउ २४,१ आठ २८,१:५७, २ आठउ २७, २' आठमउ ३०, २. ५७," आठमि ३१,२ आडउ ५६, १.६५,' आडण ३२," आडावंग ६९,२ याडि .. आड (प्र०).६४, . अलजु ५६, १ . + अवाडूउ ६८,२ शब्दानुक्रम आवू २३, २ आदउ ३४,२ आफलइ ३९,१ आवतउ ६०," आढवइ ४०,२ आवतु (प्र०) ६०,२ आण ६,२ आभउं ७३, २ आविउ ७८, आणइ ४८,२ आभरण ७७,१ आविवा ६१," आणतउ ६०,१ आभिडइ ४०, २. ४४.१ आविq ६२, १ आणतु (प्र०) ६०,२ आभूयार्नु ६५, १ आविवू (प्र०) ६२, १ आणनहार (प्र०) ६१, ३ आमलवेतस ७, १ आवी ६१," आणनहारु ६१,२ आमलसारउ २२, आवीतउं ६०, २ आणंद ३५, २ आयउ १८,२ आवीतूं (प्र०) ६०,४ आणिवङ ६२, ३ . आयती ७७, २ आव्यउ ४९,२ आणिवा ६१,१ आयतुं ७७,२ आव्यर्ड ६०,१ आणिवू ५४,१ आयसइ ४३, २ आव्यु ७८, आणिवू (प्र०) ६२," आयसिइ ७०,२ आव्यु (प्र०) ६०, १ आणी ६१, १. ७३,१ आर १०, २ आषुडइ ७०,२ आणीत ६१,२ आरति २३ १ आशंक ६,२ आणीतूं (प्र०) ६०, ५ आरती १६, १.३३, १. ६८,२ आश्रइ ४६, " आण्यउ ५०,२ आरतीयासरु ६८, १ आश्रयिवा ८१,२ आण्यङ ६०," आरंभइ ४१," आश्लेषिउ ५२,१ आण्यु (प्र०) ६०," आरंभिवा वांछइ ८१,२ आसाढ ६,१ आथमइ ४१, २. ४६,१ आराधइ ३८,२ आसू ६,१ आथम्यउ ५०, २ [आराध्यउ] ५१, २ आस्वादिवू ५२,२ आरीसउ ९, २ आथर ९,२ आस्वासइ ४७,१ आदउ ३३,२ आरुह्यउ ४९,२ आहणइ ७७, २ आदरइ ३७, १ आरोपइ ४६, १ आहर जाहर २६, १.६९, १ आरोपिवउं ५२,२ आहार १०,२ आदरा ५, २ आदिश ५३,२ आरोप्यउ ४९, २ आहीर १०, आदिस्य ५०,२ आरोहइ ४६, १ आहेडउ १०,२ आद्रहणु ६९,२ आरोहिवळ ५२, २ आहेडी १०,२ आंक २४, १ आधरण ३३,१ आलउ १५,१ आंकुस. १३, १ आधासीसी २६, १ आलजाल १९,१ आंखि ८,१ आलस ६,२ आधु ३१, २ आंगडणु ६७,१ आपइ १८, २.३४, २.४७,२ आलाणथंभ ३४, २ आंगणउ ३२,१ आपइणी ५६,३ आलावउ १७,२ आलिंगइ ४२,२ आंगुली ८,२ आपडइ.३८,... ४८,१ आपडिउ ५२,१ आलीगारउ २६, २ आंजइ ३७, २ आंड ८,२ आपणउ ८,१ आपणी ७८, २ आलोचइ ४६,२ आंत्र ८,२ आपणी धायउ ७२ आलोच्यउ ५०, १ आंबइरा १८,२ आपणुं ५५, ३ आवइ ४१, २. ४६, २ आंवउ १२, १ आवणहार (प्र०)६३,३ आंवा १९,१ आपिवु ५१, ३ आवणहारु ६१,२, आंवाफाड २१,२ १ म आलूजइ ४२, २ आपिउ ५२, उक्तिरनाकरादि अन्तर्गत इधण १०, ईमहइ (प्र०) ६३,१ इस २३, १ ईसर (प्र०) ६४,२ ईहां ६३, १. ६३,२ ईडउ ३१,३ - . 4- उ । उइलउ ३२,१ उइसइ ४४, उकरडी (प्र०) ६४,४ उखुडइ ४०,२ उखेलइ ४३, २ उगउमुगउ ६४,२ उपराठउ ५६,१ उपरि २१, १..२४,२, उपरि ठाई २६, २ उपरियामणु ६४,२ उपवासी ६९, १ उपवासीउ २६, उपाध्यायांस ३४, उपारजइ ३७,२ उमाड १२,१ उरलिङ (प्र०) ६४,४ उरहु (प्र०) ६४, ३ उलषि(खि)वू ५३, १ उलूरइ ४०,२ उल्लावइ ४१, २ उल्लींचइ ४,२ उवाणंउ २१, उवेखइ ४१,२ उसीयालु २६, उसीसउ ९,२ । M - . आंबामाहि ७३,.२ आविल ३१,१ आंविली १९,२ ६९,१ आंर्षि ग्रहियि रूपु ७८, १ आंसू ६,२ इ इ ५५, १. ५६,१ इकवीस २८,२ इकाणू ३०, इकावन २९,१ इक्यासी २९, २ इगतालीस २९, १ इगसठि २९, १ इगहतरि २९,२ इगु इगुणचालीस '२८,२ इगुणत्रीस २८, २ इगुणपचास २९, १ इगुणवीस २८, इगुणसठि २९, १ इगुणहत्तरि २९,२ इगुणीसमउ ३०, इगुण्यासी २९,२ इग्यार ५७,२ इग्यारइ २८, १० इग्यारमउ ३०, २ इग्यारमी ३१,१ इणि परि ५५, २. ६२, ४ इम ५५,२ + उगणीस ५७, २. . . । उसूर ३१,२ उहरउं ५६, १ उंघइ ४०," उंचउं ५६, उंचानीचुं ५६,२ उंजइ ४३,१ उबर १२, 44 ऊकडू (प्र०) २०, २ उगमुगउ ३१, १ उग्रहणी २१,२ उघड दूघडउ २६,२ उच्छव १४,२ उच्छाहिवडं ५४,२ उच्छुकपणउ ६,२ : उच्छंग ८, २ उछाह ३४, १ उजालइ ४२,१ उठिउ ४९,२ उतावलउ १८, २ उत्तर ६,१ उत्तराणउ (प्र०) ६४, ४ उदेगइ ४३, २ उदेगामणउ ३२, ३ उदेगामणुं ५७,१ उदेही १३,१ उद्यमइ ४९,१ उधार १०,१ उध्रकइ ११,२ उन्मूलइ ४६, १ उन्मूल्यड ४९,२ उन्हालउ .२०,१ उपकरइ १७,२ उपगरइ ४४,१ उपचईइ १९,२ - इमै ६३,२ इसउ २७ २.६४,१ इसुं ६३,२ इस्य (प्र०) ६३,४ इहां २७,१ इहांतणूं ५५, १ ऊकदइ ४३, २ ऊकरडउ २२, ऊकरडी २०, १. ६४, २ ऊकुडउ २०,२ ऊखलउ११, ऊखलि पांड्या ७८,१ ऊखेडइ ७०," ऊगइ ४१,२ ऊगटइ ४३, १ ऊगिउ, ५०,२ ऊगिउ वृक्षु ७४, २ ऊघडइ ४३," ऊघडदूघडउ ६७,२ ई ईट ७७,२ ईणपरि ६२, २ ईणं लाजीइ ७१, ईर्ण हु व्यारीट ७३, शब्दानुक्रम ८७. . क्षुद्रु ७९, २ . , - - ऊडिउ ५१,२ ऊघाडइ ४३, ऊपरि १५, १. ५६, १, ६४,१ एकवार २७, १. ६३, १ ऊघाडिवउ २१,२: ऊपरि ऊपरि ७३, २ एकवीसमउ ३०," ऊचाटइ ४८,२ ऊपरिलं ५६, १ एकासणउ ३१,१ ऊचाटिउ ५१, .. ऊपरूं ५६, १ ऊच्छालियउ १९,२ उपार्जइ ७३, एकोत्तर सउ ३०,१ ऊछलइ ४१," ऊफिरीयामणू (प्र०) ६४, ४ एतलडं ६३, २ ऊछालइ ४३, १. ४६," ऊमउ १९,१ एतला ऊपरूं ५६, १ ऊछीनड २१, ऊमटइ ४२, १ एतलु २७, २. ५५, २ ऊजयणी १०,२ एतलू (प्र०) ६३, ३ ऊलडइ ४१, १ ऊजलउ १४,२ एमात्र के ३१,१ ऊललइ ४६,१ ऊजाइ ४२, २ ऊललियइ ४१, १ एयु ७८, २ ऊजाणी २६,२ एयु अति कुंअलउ ७९, २ ऊलसइ ४९, १ ऊटंटइ ७०,२ एयु अति ऊलालइ १६, १ ऊटाटीयु ६९,२ ऊलिषउ ६९, १ एयु[अति] गरूउ ७९, २ ऊठइ ४३, १. ४६, १.७०,१. ऊवट ३३, १ एयु अति घणउ ७९,२ ऊठाडइ ४६," एयु अति दूकडउ ७९, १ ऊवटइ ४७, २ ऊठिवउ ३४, २ ऊवटणउ ३४, २ एयु अति दीर्घ ७९,२ ऊड २१, २' एयु अति पुहुलड ७९, १ ऊवलतउ २५, २ ऊडइ ३७, १. ४६, १. ७०, १ ऊवेढइ ४३, १ एयु अति प्रशस्यु ७९, १ ऊवेषि(खि)उ ५२, २ एयु अति प्रियु ७९,२ ऊतर ६,२ ऊसलसीधुं (प्र०) ६६, ३ एयु अति बहुलु ७९,२ ऊतरिण्यु. ६४, २ एयु अति मोटउ ७९, १ । ऊससइ ३९, २ ऊतन्यउ ४९, २ ऊसीसङ ६७,१ एयु अति लजालु ७९, २ ऊतारणउ १९, १ एयु अति लहुडउ ७९, २ ऊहाडउ १३,२ उत्तर ७४, ऊंचउ १९,२ एयु अति वडउ ७९, १ ऊदला ४०,२ ऊंट १३, २ एयु अति वहिलउ ७९, २ ऊदेगामणउं ६६१ ऊंटनउ ७६, १ एयु अति वेगलउ ७९,२ ऊंडहणुं ६९, २ एयु अति स्थिर ७९,२ ऊधंधलु २६, १ ऊंदिरउ १३,२ एयु अनि भ्रायु ७२, १ ऊधारइ १६, १ एयु एकलउ ७३, ऊधांधलु ६४, २६ ए ५६, १.७१, २ एयु गाढउ कहइ ८०," ऊधांधलू (प्र.) ६,३ एउ अति गाढउ ७९, १ एयु जीवइ ७१, १६ ऊन २३, १ लहुडउ एयु जेतला ७५, २. ९,१ ऊपजइ ३८, २. ४९.१५ अति थोडउ । एयु इकडउ ८०,७ ऊपजापइ ४९, एक २७, २. ५७,१. एयु तरुणउ ८० एकउडउ ६८,२.' एयु तेलु ७३, १ ऊपडइ'३६१ एकत्रीस २८, २ एयु दुखि द्रव्यु ७३, १ एकपरि २७, २. ५६, २. एयु देव तणइ ७२, २ ऊपणइ ४३, १.७०, ६३, १ एयु देवदत्तु ७१, ३. [ऊपन] ४२,१३ एकलउ १५, २.७३,१... एयु दोरी सापु.७३, .. d स . ऊदेही ६९,२ . एउ अति }. ७९, ऊपजाविउ ५१, २ ." : [ऊपडिबुं] ५२, २ + na . .
उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत r - M १ औरहुं २७, २ ऑरीसउ ३२, १ ऑलउ २६, २ . औलखइ ४४, १.. ४६,... औलखउ २६, १ ऑलखाणउ ३१, १ ऑलखिउ ५०, २. ऑलग १६, १ ऑलगइ ४८, २ औलगि ५४,२ ऑलग्यउ ५०, २ ऑलवइ ४८, ऑलविउ ५१, २ औलंभइ ७०, २' औलंभउ ६,२ ऑली ३४, १ ऑसरह ४०, १ . ५ , क एयु पोष्यवर्गरहिं. ७२, १ एयु प्रधानरहि ७२,१ एयु प्रशस्यु कहइ ७९, २ एयु बोल्या प्रयोग ७२, २ एयु ब्राह्मणप्रति ७३, २ एयु भुंडउ ७४, १ एयु लहुडउ ७९, १ एयु वडु कहइ ८०, एयु वाधइ ७१,१ एयु वेद पढणहारु ७२, १ एयु व्याकरणु जाणइ ७७, १ एयु शास्त्र वाचणहारु ७२, १ एयु श्राद्धतणउ ७२, २ एयु सुखिहिं ७३, १ एयु हस्खु ७९, २ एलियउ १७, २ एव ५७, १ एव९ ६३, २ एवाल ३४, २ एह ३५, २ एह ठाम हुँतउ ५६, २ ओघउ २१, ओझउ ५,१ ओटइ ४८, १ ओठी १६, २ ओढणउं ६७, २ ओरस (प्र०) ६६, १ ओरसु ६६, २ ओलंडइ ३८, १ ओल्यउ ६४,२ ओवउ १९, १ ओस ११, २ ओसड २५, १ मोही २०,२ आँगालइ ४०, १ औठंभइ ४४, ऑड २१, २ ऑडक ६७,२ औंढइ ४२, २ औधाइली ३५, २ कणयर ३३,१; .. कणहतउ १६, कणि ७२, १ कणियार ३४, १ कणी २३, १ कथीर ११, २ . कन्या ७७,२. कन्हइ ५६, २ कन्हलि ७३, २. ५४० १.७५, १, कपास १२, १ कपीलउ २४, २ कपूर ९, १ कमलउ २३,१ कम(व)ली ३४, १ कयर १२, २ करइ १८,१.१८, २. ३७.१.. करड ४२, १, करणहार ३६, पं०२२.६१, ३, करणहारु ६१, २. ६२६२, करणाहरु ३६, पं०३३ : - करत ७८,२ करतउ २६, १..'७०, करतु (प्र०) ६०,२ करतुं ६२, १ करमदउ २५, करवत १०,२ , करवतरहिं हितूउं ७७र करवती ३५, करवा ८२,१ करसड १०,१ करसणु ७३, करहउ १३, २. करंवउ २२, २ करा ६,१ करालियउ २०," कराय४४, २ करावइ ४७, १.७३, प -* . । . . . . क३१,१ कउछ १२, २ कउठ १२, २ कउडी १३, १ कउसीसउ २६, २ कचोलउ १८, कच्चोलउ १६, १ कच्छोटउ ९, १ कडउ ९,१ कडकडा ४३, २ कडणि २२, २ कडव ३२, २. ६६,२ कडहटउ ३४, कडाहउ ११,१ कडि ८,२ कडिदोरउ ३२,२ कडि समा ७१, कडुछउ २१, कडुछी २१ कड़२, कणउज ३५.१ कणनउ ७८,१ - ago . . करि ३५ करिजे ३५ करिवर्ड ३६, ५० ३१.५२,२ शब्दानुक्रम ८९ करीउ ३६ करिवा ३६. ६१, १.६२, १ कंकोडउ १२, २ करिवा वांछइ ८२, १. ८२, २ कंपावइ ४०, १ करिवा होउ ८२,२ कंसाल १७, २ करि ६१, २. ६२,२ का ३१, १ करिवू (प्र०) ६१, ४ काउसग ३३, २ करिसिइ ३६ काकडासींगी २६, १ करी ६१, १. ६२, १ काकडी २३, १. २५, २ काकडीरउ १८, १ करी जाणउं ६२, २ काकरउ १८,२ करी जाणुं ३६, पं० २९ काकीडउ २५, १ करीस १५, १ काख ८,२ कपासनां वस्त्र ७७, १ कागनउं टोलङ ७६, १ कर्मनउ समूहु ७६, २ कागु ६७, १ काछउ ३४,२ कलइ ३७, १ काछडी ९,१ कलकलइ ४३, २ काछवउ १४,१ कलपइ ३८,२ काज १५, १.२१,१ कलाई ८,२ काजल ९, २ कलाल १०,१ काट ११,२ कली १२, १ काटइ ४२,१ कलेवउ ७, २ काटी ११,२ कल्पइ ४९,१ काठ १२, २ कल्होडउ २६, २ काठउ १५, २ कवडउ १३,१ काठिया २०, १ कवाड ११,१ काठीहारउ २३, २ कविलउ १४, २ काढइ ३९, २. ४७, २ कसइ ४२, २ काढउ ३३,१ कसमीर ३५, १ काणि २३, २ कसी २५, २ कातती २०,२ कहइ ३७, १.४७, १. ७९, २. कातरणी १०, २ कहउ ७८,२ कातरि १०, २ कहाणी १७, १ कातली १९, १ कहिउ ५१, २ काती ६, १ कहियउ २१, १. २७,१. ५५,२ कादम १२, १ कहिवा वांछइ ८१, १ कान ८,१ [कहि] ५३, २ कान का ३१,१ कहीइं (प्र०) ६३, १ कानमात को ३१,१ कहींय ६३, १ कानि सांभलीयि ७८, १ कहूआलउ ६७, २ कानी ३४,१ कं ३१, २ काप १८, २ कंदोई १०, २ कापइ ४७, २ उ०र० १२ कापडइ १८,१ कापडी १६, २ कावरउ १४, २ काम १८, २ कामइ ३९, १ कामण १४,२ कामरू ३४, २ कायर ७, १ . कारटउ २२, २ कारटियउ २२,२ कारू १०,१ कारेलउ १२, २ कालाखरिउ ६७, कालि ६२, २ कालिजउ ८,२ कालियु ६७,१ काली ७२, २ कालूनूं (प्र०) ६२, ३ काल्हन ५६, १ काल्हि २७, १.५५, २ काल्हूणउ २७, १ काल्हूणउं ६२,२ कावजि (प्र.) ६६,२ कावडि १६, १. ३२, २ काष्टि ७२, १ काष्ठ ७७, १.७७, २ काष्ठा २४, १ कासुंदउ १७, २ कांइ ३२, १ कांई ५५, १ कांकसी ९, २. २६, २ कांग १२, २ कांगउ १८, १ कांचली ९, १ कांजी ७,१ कांठउ २६, १ कांठलउ १६, १ कांडी १७,२ कांदउ २३, २ कांध समुं पाणी ७७, १ ९० उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत कु ३१,१ कुघाट १६, १ कांपइ ३८, २. ४६, १ कीधुं ५०, १. ६०, १ कांपिउ ५२, १ कीर्तइ ३८, १ कांवडी १६, २ कींगायइ ४२, २ कांवलड ७६, १ कांवी २४,१ कांसउ ११, २ कुचेल २५, २ कांसडं ७७, २ कुच्छित ७, १ कांसीवाजउ २४, २ कु जि ६६,२ कि ३१, १ कुट्टि २३, २ किडउ ११,१ कुडी ३५, १ किम ५५, १.६२,२ कुडीरहिं हितूउं ७७, २ किमइ ७८,२ कुडुवी ३४, २ किम्हइ ३१,२ कुढि २३, २ कियउ २४, १.२५, २ कुण ३५, २.७५, २ किर ५७, १ कुण्डी २४, २ किरगिरइ ७०, १ कुतिगीउ ६७, २ किरातउ १९, २ कुपइ ३८, २. ७०, २ किरि ६७, २ कुपिउ ५१,१ किलकिलाट १६, १ कुपियउ २१,२ किवाडी १६, २ कुरुखेत ३४, २ किसउ २७, २.५५, १.६४, १ कुरुटतउ २५, २ किहां २७, १. ६३, १.५५,२ कुलथ १२, २ किहांतणू ५५, १ कुलथी १२,२ किहांनड ७८, १ किहांडंतर ५६,२ कुसणउ ४१,२ की ३१, १ कुसि २५, २ कीकी ८, कुहइ ३८, १ कीजइ ३५.५५, १ कुहणी ८,२ कीजउ ३५ कुहिट ५१, २ कीजतउ ३६ कुंअर ७,१ कीजतडं ६०, २ कुंअरि १९, १ कीजतुं ६२, १ कुंअलड १४, २ कीजतूं (प्र०) ६०, ३ कुंआरीरा २५, १ कीजिसिइ ३६ कुंकू ९, १ कीटी २१,१ कुंची ११,१ कीडउ १३,१ कुंठसस्त्र २४, १ कीघउ ३६, पं० २४ कुंड २४, २ कीघउ ६२, १ कुंठ २४, कीधा ७४, २ कुंढगोटि २४,१ कुंपी 14, कुंभतणु ७१, २ कुंभार १९,२ कुंभाररउ.२४, २ कुंभी १७,२ कुंमारउ २५, १ कू ३१, १ कूआकंठइ २४,१ कूड ६७, १ कूकइ ४१, १ कूकडउ १४, १ कूकर १३, २ कूका ५६, २ कूचउ १६,१ कूजइ ३७, २ कूटइ ३८, १.४, १ कूटणउ २१,२ कूटिउ ५१,१ कूड ६, २. २४, २ कूडछी ६९, २ कूदइ ३८, १ कूपइ ४९, १ कूल्ह १२, १ कूवडउ २५, १ कुंअलउ ७९, १ बूढली ६६,२ कुंपल १५, कुंभट १७,२ कुंभी २४,२ कुसइ ४२, २ के ३१,१ केत ६,१ केतलउ ५५, २ केतलडं ६३, २ केतलं २०, २५५, २ केतलूं (प्र०) ६३, ४ केदार ७५, १ केला १८,१ केलि १८, केवटुं ६३, २ केवई ५७, १ केवलड क ३,१ कीधु ७८,१ शब्दानुक्रम ९१ १ खातु (प्र०) ६०,२ खात्र २०, २. २२, २ खापरउ २२, २ खामणउ ३३, २ खायइ ३८, १ खार २१,१ खारउ २२,२ खारिक ३३, १ खाली २३, १ खास ७,२ खासइ ३९, २ कोढ ७, केशनउ समूहु ७६, २ ख केसू १२, १ खजूअउ १३, १ कै ३१,१ खजूर २४, १ को ३१,१ खजूरउ २४, १ कोइल १४, १ खटमल १७, १ कोहलि ७३, २ खड १३, १ कोइली १४, १ खडखडइ ४४,१ कोई ५५, १ खडगर २५, २ कोट १०, २ खडहडइ ४३, १ कोटडङ ६९, २ खडी ११, २ कोटवाल २१,२ खडोखली ६७, १ कोटीलउ ६९, २ खण २२, २. २४, २ कोठउ २०, २. २४, १. ६६, २ खणइ ३८, २ कोठड कणि भरिउ ७२, १ खणिवा ८१, २ कोठार २०, १ खणेत्रउ १०, १ कोठीभडउ ३३, १ खत २१,१ कोड १५, २ खप्पर २२, २ कोडि २४, १.३०,२ खमइ ३९,१ कोडिमउ ३१, १ खमासण ३३, २ खयडउ ९,२ कोथली (प्र०) ६६,२ खयरवडी १७, १ कोदालउ १०,१ खरहडी १८,२ कोरियउ १८, खलउ १०,२ कोरिवउ १८, १ खलहाण १०,२ खली २३, १ कोसंबी ३५, १ खल्ली (प्र०) २४, १ कोसीटउ ६७,१ कोहलउ १२, २ खंडइ ३८, १ कोहली १५, २ खंडायितु ७६, १ खंडी २४,२ का ३१, २ खंधार १०, २ क्यारउ २३, २ खाई (प्र०) ६१,२ क्रमइ ७०, २ खाज ७,२ क्रयाणा २५, २ खाजइ४४, २. ७०, २. खाजलु ६९, १ खाजहलउ २६, २ क्षरइ ७०, खाजा २०, क्षुद्रु ७९,२ खाट ३३, १ क्षेत्र ७३, २ खाटकी २५, १ क्षेत्रि ७४,२ खाटि ९,२ क्षेत्रु ७७,२ खाणि ११,२ खांडउ २४,२ खांडां ७५, २ खांधउ ८,२ खिरइ ३९, १ खिसरहंडी ६६,२ खीच ३३, १ खीचडउ १६, १ खीचडी ३३, १ खीजइ ४३, १ खीरणी १७, २. २३, २ खीरि ७,१ खीलइ ४२, १. ४३, २ खीलउ १३,२ खीसड (प्र०) ६६,२ . कोस १०, खसइ ३९, २ कौ ३१,२ खुभइ ३९, १ खुभिउ ५२, ३ खुरउ २४, २ खूण ३२, १ खूपइ ४०,२ खूदइ ४३, १ १ क्रीडउ ३८, १ क्षमिउ ५१,२ खेड १०,२ खेडइ ३८, १ खेडड २२,२ खेती १०, १ खेलणड २५,२ खोडउ १५, १.३३, २. ६९,२ खोडायइ ४२,२ खोभइ ३९, १ खोल २५, गउखु ६९, २ गुड ७४, २ गदु ६९, २ गुरु साम्हु ७३, २ गुल १८, २ गुलगुलायइ ४१, ११ ९२ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत गिरइ ३७, १ ग गाइQ ५३, २ गइंडउ १३, २ गाईमाहि ७२, २ गिरठि २३, २ गउख १९, २ गाउ १०,१ गिलइ ३९, १ गागरी ११, २ . गिलगिली १८, १ गउर १५, १ गाजइ ३७, २ गिलो १९, १ गउछणड ६९, २ गाजर १९, २ गिलोई २०,२ गाडरि ३३, २ गीत १५, २. ७५, १ गजथर २२,१ गाडा योग्यु हितूंउ ७७, २ गड ७,२ गाडी १९, २ गुडिउ ६८,२ गणिकानु समूहु ७६, २ गाड़े ७८, १ गुढउं ६६, १ गाढउ ७९, १.८०,१ गणिवू ५३, १ गुणइ ३७, १. ४८, १ गणीस ३४,१ गाती ७५, १ गुणणी २५, २ गात्री २२, २ गदगद वचन २२, १ गुणनु समूह ७६, २ गदहिला १७, १ गात्रु ८०,२ गुणिउ ५१, १ गादी १८, १ गद्दहउ १३, २ [गुणिवू ] ५३, १ गावडि ८,२ गमइ ७३, २ गाभरू २४, २ गमई ७४, १ गामढिउ २५, २ गमा ७३, २ गमाणि ६८,२ गाम दाहिण गमइ ७३, २ गुलणी ९, २ गामनइ पाषइ अधिकरि ७५, १ गुलधाणी २२, १ पउ ४९, २ गाम बिहु विचि ७४, १ रढउ ३२, २. ६६,३. गुलपापडी २२, गामरउ २५, १ 'गरहइ ४०,१ गुलमंडा १४,२ गाम विचि वडु ७५, २ गरुयउ १५,१ गाम सविहुँ गमा ७३, २ गुलियउ १८,२ गरूड ७९,२ गामि ७१, २. ७२, १.७४, २ गुहिरउ १५, १ गर्गनुं ७१,२ गुंजइ ३७, २ गामु ७३, २. ७७, २ गलअलइ ४३, १ गुंथिवउ ९, १ गलमांठी २४, २ गूगल ३५, १ गलणउ १६,१ गूजर १६, २ गलहथउ २५,१ गूजरी १६, २ गलहथियउ २५, २ गूझ ९, २ गलियार ३५, १ गूंडा समी ७७, १ गवाणि २१, २ गूणि ९, १ गहिलउ १८,२ गृह ९,१ [गहुँ] ७८,२ गूंथइ ४४, १.४९, १.७०, १ गहुँ ७७, १ गूंथ्यउ ५१, १ गंगा ७४,२ गूंद २४,१ गंगेटी २४,२ गुंफा ४९, १ गंधाअइ ४४, १ [गूफि] ५१,१ गंभारड ३३,१ गाइ१८,२.२१,१.१८,१.७२,२ गिर १, गामेचड ७८,१ गायद ३७, २. ७०, गायउ १५,२ गायवउ २५, १ गारवउ १५, गाल,१ गालउ ३९,१ गालिड ५२, १ गाह २२, १ गाहद ४४, १ गांठद ४२, १ गांठि १२,१ गांधि १९,१ गिणइ ३७, १.४८, १ -- , गूंहली ६७," गेरू ११, २ शब्दानुक्रम }७४, २ घूधुरी २५, १ घूघू १४, १ घूमइ ४४,२ ७४, २ बूंघटउ २६, १ बूंटउ २१, २ चूंटी ८, २ } घणु ७२, २ घरटु ६६, २ गोलउ च गोआडइरउ २०, २ घणउ गुड छह गोई गोसली ६४,२ जीण लाडू घणदीहुँ ७८, १ गोउल १३, २ घणां निर्मला पाणी गोखरू १७, २ जीणं नदी गोगीडउ २६, २ गोछउ १२, १.३४, १ घणुं १८,२ घेवर ७, १ गोत्रु ७५, १ घणे दिहाडे आव्यु ७८, १ घोडउ १३, गोधउ २४, २ गोपिविउ ५१, २ घर ११, १.१९, १ घोडारहिं हितूउ ७७, २ घर कन्हलि वृक्षु ७५, १ घोडाहडि ६८,२ गोफणि १६, २ घरट २०,१ घोडे वहीयि रथु ७८, १ गोमूत्री १६, २ घरटी २०, घोरइ २०, १ गोयरउ २५, १ घोलइ ४०,२ गोरी ६, २ घरधणियाणी २५, १ घोसइ ३९, २ ७, २. २३, १ घरपालि वाडि करइ ७३, २ घाइउ ४९, २ गोवाल १०,१ घररा २५,१ गोह १३, २ घररी १९, २ गोहीरउ १३, २ च ५७, १ घरि ७२, १.७८,२ चउकीवट ३२, १ गोहू १२, २ घरु ७२, २. ७५, १ चउकीवटा (प्र०) ६६, १ गोहरी २६, १ चउकीवटु ६६, १ ग्य ६०,१ चउगठि ३२, १ ग्रसइ ४१, २ चउगुणउ ३२, २ ग्रहइ ४०,१ चउगुणउं ६८, १ ग्रहियि ७८, १ चउघडिट ३१,२ ग्रामतणु समूहु ७६, १ घाघरी २५, १ चउडोत्तर सउ ३०, १ ग्रामि दीहाडी प्रति ७३, २ चउत्रीस २८,२ ग्रामु ७२, २ चउथउ ३०, २. ५७,१ ग्वालेर १८, १ चउथि ३१,२ घायिंस ६८,१ चउद २८, १ घटइ ३८, १ चउदमउ ३०, २ घडइ १९, २. ४८, २ घालिउ ५२, १ चउदसि ३१,२ घडउ ११,१ घांट ३५, १ चउपउ २५, २ घडामांची ३३, १ घांटी ८,२ चउपन २९,१ घडांमंची ६८,२ घिसि १८,१ चउमालीस २९, १ घडिउ ५०,२ घी ३१,१ चउमासउ ३३, २ घडियालउ २०, १ घीउ भणी ७३, १. चउरसउ ३३, २ घडिवू ५४, २ घीरी २०, २ चउराणू ३०, घडी २०, घीवेली १३, १ चउरासी २९, २ घूघटिउ ६८,२ चउरी ३३, १ चवीस २८,२ घलावइ ४७, घसइ ३९, २. ४७, २ घसाइ ४४, २ घसावइ ४७, २ घाघरनदी २५, २ घाट १२,१ घातइ ४०, २ घातक ७, १ घालइ ४७, २ घण २०, २ घणउ ७९, २ घूघुरउ २३, २ ९४ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत चूअइ ४२,१ चूक ७,१ चूकइ ४४, २ चूकउ १६,१ चून २४,१ चून २४, चूसइ ३९,२ चलू ८,२ चउसठि २९, १ चालीस २८,२ चुंटिड ५१, १ चउसालउ ३३, १ चालीसमउ ५७, १ चुंटिवू ५४, १ चउहत्तरि २९,२ चावइ ३९, १ चुंवइ ३८,२ चकरडी १६, २ चास १४,१ चक्यउ ३४,२ चांच १४, चडइ ४०, २. ४३, १. ४८,२ चांदलउ १४, १ चडिड ५१,१ चांद्रिणानी लांप ६९,२ चणउ १२, २ चांद्रिणु २६, चूटिवा वांछइ ८२, १ चपलपणउँ ७७, २ चांप ३५, १ चूणि १६, २ चमार २०,१ चांपइ ४१, १ चूति ८, २ चरउ २५,१ चांपउ १२,२ चरचइ ३७, २ चांवड ७७, १ चरिवा वांछइ ८१,१ चांमडी ९, १ चूल्ही ११,१ चरू २२, २ चिडड १४, चर्म ७७, २ चिडी १४, १ चूंटइ ३८, १. ८०,२ चर्मु ७७, २ चिणइ ३७, १.४९, २.८०,२ चैत ६, १ चलणी ९, १ चिणिउ ५१,१ चेति ५२, ३ चिणिवा वांछइ ८२, १ चेलउ २१, चवदइ ५७, २ चिणिवू ५४,१ चोखउ १४, चवलांरी १८, १ चिणोढी ६७,२ चोज ६,२ चहुंटी ३२,२ चित्रावेलि २२,१ चोपडइ ४०,२ चंदन २५, २ चंदौउ ६९, १ चिहुं परि (प्र०) ६३, २ चोपड्यउ ५२, १ चीकणउ २२, चोरइ २२, २. ३९, १.४८,२ चंद्रूयउ ९,२ चीखल २३, १ चोरडउ २२, १ चाउंडा ६,२ चोरिवा वांछइ ८२, १ चीचूअइ ४४,२ चाक २४,२ चाकी १६, २ चीठी १०, चोरि ५४,१ चीणउ १२, २ चाचर ३३,१ चोरु ७८,२ चाचरि २३, १ चीत्रइ ३७, १ चोलवटड २१,१ चाटिवा वांछइ ८१,२ चीत्रउ १३,२ चोषा ७२,२ चाटुकारिया वचन ६.२ चीपडीड ६७, १ चौदसिं दीसइ राक्षसु ७८,१ चाथ (प्र० वाघ) रि १८, १ चीपिडउ २५, १ चीफाड २६, २ च्यहु परि ६३, १ चावण ७,२ चीभडी १२, २ च्यारइ ७३,१ चामाचेड १४,१ चील्ह १४, १ च्यारि ५७, २ चारि २८, चारोली ३१,१ चील्हसाग १७, २ च्यारिवार (प्र०) ६३, १ चीपलालू ६८,१ च्युहु वहीयि गाडु ७८, १ चायड ५०,१ चीतवइ ३८,१ चालणी २०,१ चुहुटली (प्र०) ६६,२ छ २८,१ चालिड ५२,१ चुंकलइ ४६,२ छइ २०, २.४१,२.१७, २. चालिवा वांछइ ८१, चुंटइ ४८,२ छट्टर ३०, २. ५७," १ चोरी ७,१ चालइ ४६,२ शब्दानुक्रम ९५ छुरउ २४, २ ५०, २ जलो १३, १ २ छट्ठीलिखित २४, २ छींडणि ६६, २ जणावइ ४७,१ छठि ३१, २ छींडी २१, २ जतियारउ २०,२ छतु (प्र०) ६०,३ जननड़ समूह ७६,२ छत्रीस २८, २ छूटइ ४३, २. ४८, २०७०, जनम १४, १ छपन २९,१ छेकइ ४४,२ जनोई १०, छप्पई १३, १ छेकडि ६६,२ जपइ ३८, २.८०,२ छमकारिउ ५१, २ छेतरियड २६, २ जपमाली २१, १ छमकाव्यउं ६८,२ छेदइ ४२, २. ४८, ९ जमवारउ १८,१ छयकारु ६७, २ छेदियउ १४, २ जमाई ६७, २ छयालीस २९, १ छेहि ७५, २ जमिवा वांछइ ८१, २ छ रितु ६, १ छेहिलं ५५, १ जयणा १८,१ छहत्तरि २९, २ छोडिउ जरिउ ५०, छाजइ ४०, २ छोति १५,२ जल ७८,१ छाजउ २२,१ छोह ३२, १ छाणउ १३,२ छः ५७, २ जव ३३,१ छाणावलि ६९, च्यासी २९, २ जवखार १०,२ जस ३४, २ छात्र ७५, २ जहियइ २७, १. ५५, २ छानउ १९,१ जइ ५६, १ जहीई (प्र०) ६२, ४ छायइ ४२, २ जइ करत ३६ जहींय ६२,२ छार १०,१ जइ किमइ ६३, २ जं ६३, २ छालउ १३, २ जइ किम्हइ ३१,२ जइ कीजत ३६ जंभाआइ ४०,२ जइ दीजत ३६ जाइ १२, २. ७५, २. ८०, १ जाइफल ९,१ जइ देत ३६ जाइव ६२, १. ७२, जइ लीजत ३६ जइ लेत ३६ जाइवा (प्र०) ६१,१ जई (प्र०) ६१, १ जाइवा वांछइ ८१, १ छांडइ ४१, २. ८०, २. ४६,२ जईत ६०, २ जाई ६१, १ जागइ ३७, १.४७, २.७० १. जईतूं (प्र०) ६०, ४ जागीइ ७१,१ जईयइ किमइ (प्र०) ६३, ४ जाग्यउ ४९,२ जउ ५५,२ जाजरउ २२, जउणा २२, जाडउ १७,१ छिन्नु ३०,१ जउराणउ ६,१ छिवइ ४०, २. ४३, २ जाण अहो पुरुष जगाडइ ४७, २ जट्ट १५, १ थ्या [...] वस्त्र ७८,२ जड १२,१ पहिरता जडपणउ २७, २ जाणइ ४१, १.४७, १. ७३, १. जडी १७, १ जाणड ६२,२ जणउ ३४, १ जाणतउ६०,२ छींकइ ४४, २. ४७, २. जणाइ ४४,२ जाणनहारु ६१,२ छालि १२, १ छाली ७१, २ छावडउ६, २ छावति ११, १ छावीस २८, २ छासठि २९, १ छांडिवा वांछइ ८१, १ छांडिवू ५३, १ छांह १५, १ छिछ (प?) इ ७०, आपणि लहुडा छीकउ १९, १ छीकणी २५, २ छीडणि (प्र०) ६६, ४ छीतर २२,२ छीपउ ६७, २ 1 - ७५, २ ७५, २ जानी ७,२ ९६ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत जाणहार (प्र०) ६१, ३. जिमिवू ५३, १ जूंसरू ६९, २. जाणहारु ६१, २ जिमिवू (प्र०) ६२, जे किमइ एयु जाणिलं ६०,१ जिमी (प्र०) ६१,२ [गहुं] लेत, ७८,२ जाणिव ६२, १ जिमीतूं (प्र०) ६०, ४ तु द्राम न पडत जेठ ६,१ जाणिवा ६१,२ जिम्युं (प्र०) ६०,१ जेतला ७५, २ जाणिवा वांछइ ०२, २ जिसउ २७, २. ५५, २ जेतला छात्रा जाणिवू ५३, २ जिहां २७, १. ५५, २ तेतला पोथां जाणिवू (प्र०) १२,१ जिहांतणू ५५, १ जेतलां खांडां जाणी ६१,१ जीण ७४, २. ७४, २ तेतला राजपुत्र जाणीतउं ६०,२ जीणइं ७४, २ जेतलु २७, २. ५५, २. ६३, २. जाणीतूं (प्र०) ६०, ४ जीणं ७४, २. ७४, २. जेतलूं (प्र०) ६३,३ जाण्यउ ४९,२ जीपइ ४१, १ जेवडउ १५,२ जाण्यु (प्र०) ६०,१ जीपिवा वांछइ ८१,२ जेह ठाम हुंतउ ५६, २. जात ७८,२ जीभ , जेहनउं ७४, २.७५, १. जातड ६०, १.७३, १. जीमइ ३९, १. ४६, २. जेहि ७४, २ जातु (प्र०) ६०,२ जीमिउ ५०, १ जो ३५, २ जानावासउ ६८,२ जीरउ ७, २. जोअण १०,१ जीवइ ३९, १.४७, २. ७१, १. जानीवासउ २६, १ जीवापोता १९, २ जोइउ ४९,२ जानुत्र ६८,२ जीविवा वांछइ ८१, २ जोइq ५२,२ जोगवट २१, १ जामइ ३८,२ जीविसिइ ३६ जाम (य?)इ ७०,२ जोडइ ३८, १.४९, १. जु ५६, १.६३, २. जायइ २१, २.३७, १.४६, २. जुआ जुआ १५, २ जोडउ २४, १ जायउ २४,२ जुआरि ३३, २ जोडिQ ५३,२ जालउर ११,१ जु करत ७८, २ जोड्यउ ५१,१ जाली १९, २ जु किमइ एयु गा- जोतिषी ३४, २ जावेल २१, १ मिन जात, चोरु ७८,२ जोत्र १०,१ जास्यु ७८,२ वलद न लयेत जोत्रु ६९, २ जाहउ १४,१ जु किमइ हुं घरि जोयइ ४७,१ जां २७, १.५६, १. ६३, २. जात, तु एयु मई गामि न मोकलत जोहार ५७, १ जिणइ ४९, ३ जु देत ७८, २ ज्यार ६३,१ जिणचंद भट्टारक ६, २ जु लेत ७८,२ जिणिसिह ३६ जुवान २२,२ ज्वलइ८०, जिण्यट ५०,२ झ जिम २७, १. ५५, १. झखइ ४०, २ जिमणड (प्र०) ६४,१ झगडट १५, २.६७,१. जिमणुं ५६, २ जूउ २७, १.५७, १. झटकइ २७," जिमतट ६०, २ जूडं ६३, १ झटकई ६३, १ जिमतु (प्र०) ६०,३ जूझिवा वांछइ ८१,२ झणझणइ ४३,२ झलझापसउ ६४,२ - ७८,२ जोवन ७, १ जांघ ८,२ जुहारु ६८,१ जू १३, १ जूआरउ ७,२ जिमाडर ४७,१ जूपइ ४०,२ शब्दानुक्रम ९७ झंपावइ ४४, १ झाकइ ४४, २ झाड १९, २ झामलउ २५, २ झालरि २२, १ झांप १४, २ झीणउ १५, १ झुझइ ३८, २ झूरइ ४०, २ ७८, २ ट टला ३९, १ टलवलइ ४३, २ टसर ३५,१ टंका २४, १ टार २४, २ टाली ७५,२ टांक १९,१ टांकुल १०,२ टीपणउ ३२, १ टीलउ ३२, १ टीटोहडी १४, १ टोपरउ ३३, १ टोलड ७६, १ डाकर १७, १ तपरी २४, १ डावट ६३,२ तमक २२, १ डाबर्ड ५६, २ तम्हसरीषु (प्र०) ६४, २ डाभ १३,१ तम्हसरीषउ ६४, १ डावउ (प्र०) ६३, ४ तम्हारळ ६३, १ डांभइ ७०, १ तम्हारं (प्र०) ६३, ३ डांस १९, २ तम्हि कहउ कहउ डेहली ३२, १ आपणी वात डोइलउ १६, १ तरइ ३७, २. ४७, १. ८०,२ डोकरउ ३२, २ तरिवा वांछइ ८१, १ डोकरु ६६, २ तरि ५३, २ डोडी २३, २ तरी २०, २. २४, २ डोहलउ ७,२ तरुणउ ८०,१ तरूनउ समूह ७६, २ ढल २०, तर्जइ ३७, २ ढंढोलइ' ४०, २ तन्यउ ४९, २ ढांकइ ४०, १, ४७, २. तलाउ ३२,२ ढांकणडं ६७, २ तलागु ६७, १ ढांकिउ ५२, १ तलार १६, २ ढीलडं ५६, २ तलाव विचि देहर ७५, २ दूकइ ४१, १ तस्करइ ४८, २ दूकडउ ७४, ७९, १. तहियइ २७, १. ५५, २ दूकडी ७३, २ तहींय ६३, १ दूकडी गंगाजीणइंदेशि ७४,२ त ६३, २ ढोकइ ४१, १ तंगोटी ३३, १ तंत्र ९, १ त तंबोल बीडउ १९, १ तइस वात करइ ७३, २ तंबोलरी थई ९, २ तई ५५, १ तई गामि जाइव ७२, १ तंबोली १९, १ तई भलई हुईइ ७१,१ ताकइ ४१,१ तई वयरी आणी ताठउ ३४, २ बांधीवउ ७३, १ ताड ३५,१ तउ ५५, २. ५६, १. ताडइ ४९, १ ताडिउ ५०, २ तक १८,२ ताण (प्र०) ६३,३ तका १८,२ तापसरी २४, २ तज २१,१ तडफडइ ४४,१ तारइ ४७,१ ततकाल ६,१ ताल २३,१ तन्तुअउ १४, १ तालउ ११,१ तपइ ३०, २. ४९, १ ताली ८, २. ३४, २ तपिउ ५१, २ तालुयउ ८,२ ठ ठवणारी ५, १ ठवणी ३४, १ ठंभीजइ ४०, ठाई २६, २ ठाण २१,१ ठाणउ २०, २. २४, २ ठाणांग ६, २ ठाम ५६, २ ठालउ ५६, २ [ठिउ] ४९, २ डर २४,२ डरइ४०, २ डस्यउ ३४,२ डसइ३९, २ डहर १७, डहरउ २२, २ उ०र० १३ त्रिणि ५७, २ तूसइ ३९, २ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत ताहरउ ६३, २ तुलाई ३२, २. ६७,१ त्रासइ ३९, २. ४६, १ ताहरु २७, २. ५५, १. ६३, १ तुहइ ५६, १ त्रासवइ४६,१ ताहरूं (प्र०) ६३, ३ तुं ३५, २. ५५, १ त्रिगडू ७, १ तां २७, १. ५६, १. ६३,२ तू कन्हलि ७४, १ त्रिगुणु ६८, १ तांइ ३१,२ तूठउ १८, २. ५१, १ त्रिणउ १३, १ तांगणी ६४, २ तूणियउ १८, १ तांवउ ११, २ तू पाषइ ७४, १ त्रिणि वार (प्र०) ६३, १ तिउणउ ३२,२ तूरी ११, २ त्रिण्ह २८, १ तिजह ३७, २ तूली २३, १ त्रिपणउ ३४, १ तिडकउ ७८,१ त्रिपन २९, १ तिडोत्तर सउ ३०,१ तूंअरि १२, २ त्रिमणइ ७७, २ त्रिवायउ ३१, १ तिम २७, १. ५५, १. ६२, २ तूंसरीषउ २७, २. ६४, १ तिमइ ६३, १ तूंहइ ५५, १ त्रिसियउ ७, १ तिरछउ ५६, १. ६४, १ तृणानु समूह ७६, २ त्रिहत्तरि २९, २ तिरिछउ (प्र०) ६४, १ तहुपरि ६३, १ त्रिहुं परि ५६, २ तिर्यंच १३,१ तेजिउं ५२, १ त्रीजउ ३०, २. ५६,२ तेडइ ४७, २ त्रीस २८, २ तेतला ७५, २ त्रीसमउ ५७, १ तेतलं २७, २. ५५, २. ६३, २ त्रुटी ६७, १ तिसउ २७, २ ६४, १ तेतलूं (प्र०) ६३, ३ तिहां २७, १. ५५ २. ६३, १ ते ते ७५, १. ७५, २ वेगति (डि) २०, तिहांतणूं ५५, १ त्रेवीस २८, २ तेत्रीस २८, २ तिहांनउ ७८, १ तेर ५१, २ त्रेसठि २९, १ तेरह २०, १. २९, १ त्रोडिउ ५१, २ तेरमउ ३०, २ तीन्हउँ ६९, २ तेरसि ३१, २ ज्यासी २९, २ तीमइ ४२, २ तेली १९, १ तेलु ७३, १ थडउ २१,२ तीरथइ २४, २ तेवडर १५, २ थण ३२, २ तीर्थे ७३,२ तेह ठाम हुंतउ ५६, २ थली २२, ३ तु ५६, १.६३, २. ७८, २ तोडइ ३८, १ तुणिवा वांछइ ८२, १ तोलइ ४०, १. ७०,२ थाइवा ८१, तु पूठि ७३, २ त्यजिउ ५०, २ थाकई ४०, २. ७०, २ तुम्हकेरउ १५,२ त्रउअउ ११,२ थाकउ ५१,१ तुम्हनई ५५, १ बडन्नडइ ४४,१ थाकिवा ८१, १ तुम्हसरीपउ २७, २ त्रतालीस २९, १ थापड ४६, १ तुम्हारुं २७, २. ५५, १ त्राकडीवेलड १७,२ थाल २०, २ तुम्हासित ५५,२ त्राकलउ १०, २ थाली २०, २, २४, २ तुम्हि ५५, १. ५५, १ बाठउ ५०,२ थाहरइ ४३, २ तुम्हे ३५, २. ५५, १.५५, १ त्रापउ २२, २ थांपणि १८, २ तिल २५, १ तिलड ३४,२ तिली ८,२ यूटइ ३८, . तीज ३१, २ तीतिर १४, १ ज्याणू ३०,१ थ तीमण ७, थवइ ४२, १ थांभइ ४१, १ थांभउ १९, २. २४, २ थिउं (प्र०) ६०,१ थीजइ ४२, १ थीणउ घी ३१, १ थुम ३१, १ थूकइ ४४, २ थूणी १९, ५ थूथउ १९, २. ३५, १ थूभ २१, २ थूली २६, १ धुंकु ६७,१ दीर्घन ७९, २ थे ६१, १ थोडउ १४, २. ७९, १ थोडे दिहाडे आविउ ७८, १ थ्या ७८, २ थ्युड ६०, १ hor शब्दानुक्रम दाखवइ ४०,१ दीधु ७८, १ दाझइ ४४,२ दीधुं ५०, १ दाडिमु नींकोलइ ७७, २ दीपइ ३८, २ दाढ८,१ दीरघइ कू ३१, १ दाढी,१ दाणउ १६, २ दीर्घ ७९, २ दाणमंडही १६, २ दीवउ ९, २ दात्रउ ३४,२ दीवटीउ ६९,२ दादर २२, १ दीवडी १९, २ दादुर १४, १ दीवमंदिर २३, २ दादुर वाजउ २५, १ दीवाकाणउ २१,२ दाघउ १४, २. ५०, १ दीवाली १८, २. ६७, १ दावडउं ६८, २ दीवी २६, २ दाम १८, २ दीसइ ७३, २. ७७, २. ७०,१ दामण १३, १ दीसत ६०, २ दारीवाडउ ३३, १ दीह २०, २ दासी बहू वत् मानइ ७९, १ दीहाडा ७३, १ दाहिणउ १५, २ दीहाडी ७३, २ दाहिण गमइ ७३, २ दीहाडे ७८,२ दांडी ३४, १ दांतिलउ ३३, २ दुक्खइ २०, १ दुःखि ७३, १ दि ७०, १. ७२, १. ७२, १ दिइ ४७, १. ७५, २ दुगुंछइ ४०, १ दियइ ३५ दुषमाअरउ ६, १ दिवरावइ ४७, १ दिषा (खा) डइ ४७,१ दूध ७, १. ७५, २ दिहाडउ ३१, १ दिहाडे ७८, १ दूबलउ ३२, १ दीख १०,१ दूमइ ४०, १. ४२, १ दीखइ ४०, १ दूर्वानउ समूहु ७६, २ दीजइ ३५, दूषइ ३७, १. ४९, १ दीजउ ३५ दूहवइ ४६, १ दीजतउ ३६ देइ ३५ दीजतउं ६०, २ देई ६१, १. ६२, १ दीजतुं ६२, १ देउली ३३, १ दीजतूं (प्र०) ६०,४ देखइ ४०,२ दीजिसिइ ३६ देखतउ ६०,२ दीठउ ४९, २ देखाविखि २७, १ दीठउं ६०,१ देखी ६१, १ दीधउ २१, १३६, पं. २४ दीघउं ६०, १. ६२,१ देणहार ३६, पं० २२ दूघडउ २६, २ दउढ २७, २ दक्षिण ६,१ दक्षिणदिशिउ ७८, १ दडउ ३२, २ दडवडाइउ २६, २ दमइ ३९, १ दयामणउ २०, २ दर २४, २ दश ५७, २ दस २८, १ दसमउ ३०, २. ५७, दसमि ३१, २ दसी ९, २ दसे आगलड १८, १ दहइ ४०, १.८०, २ दहिवा वांछइ ८१,१ दही ७,१ दंडइ ७१, २ दंडाउंछणउ २०,२ दंतसूकट १६, १ दंतूसल १७, १ दंभइ ४३,२ दूधु ७२ २, देजे ३५ १ धान घीरी १०० उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत देणहारु ६१, २. ६२, २ दोतडि १५,२ धरि ५२, २. ५३, २ देणाहरु ३६, पं० ३३ दोरड २२, २. ३२, २ धवलइ ४०, १ देत ७८, २ दोरी ७३, १ धाई ८, १ देतड ३६. ६०, दोसी ३३, २ धाईड ५२, १ धाडि ९,२ देतु (प्र०) ६०, २ दोहइ ४०, १. ९०, २ देतुं ६२, १ दोहडउ २५, १ धाणा ७,१ देव आयतुं करइ ७७, २ दोहणी १६, २ धाणी १९, २ देवउं ३६, पं० ३१ दोहिलड ६८, १ घातइ १५,२ देवतणइ ७२, २ दोहिलं ५७, १ धातस्वायु ६९, २ धान २४, २ देवदत्त २१, २ दोहिवा वांछइ ८१, २ देवदत्तु ७१,२ दोही ५१,१ धामण १७, २ देवा ३६, पं० २८६१, १.६०,१ दोहीत्रउ ७, १ धायउ ७, २.१८,२ देवालय कन्हलि ७३, २ द्रउडइ ४२,२ धावइ ३९, द्रमद्रमइ ४४," देवालय विहंगमे धाहडी १२, २. ३१, १ ७३, १ द्रम्मामु ६८, १ वड दीसह धीया न पुत्ता १८, १ द्रम्मु ७३, २ देवालयु ७५, २ धीरवइ ४१, १ द्रव्यु ७३, १ देवालि १७,२ धींगत २२, १ द्रहद्रहवार ६४, २ देवा वांछइ ८१, २ धुलहडी ६७, १ द्राख १२, २ देवू ६१, २. ६२, २ द्राम ७८, २ देवू ५२, २ धूअरि १२, १ द्वि ५७,२ देषइ ८०, १ ध देपतु (प्र०) ६०, ३ देषिवर्ड ६२, १ घड २२, २ धूणियउ २५, २ देषिवा ६१,२ धडहडइ ४४,२ धूपइ ३८, २.७०, १ देषिवा घांछइ ८१, १ धणिड ६७,१ धणिय १७, १. २५, १ देषिवू (प्र०) ६२, १ घणीवउ २६, १ देपिन्यु ५२,२ घेणू २१, १ देपी (प्र०) ६१, २ धेनुनउ समूहु ७६, २ देशांतरी ६९, १ धचूरियउ १६, १ घोअइ १२, १ देशि ७४, २ धनागरउ १८, धोईउ ५१, २. ५२, १ देसानी ६७,२ घोयण ३३, २ देसिइ ३६ घोरी १३, २ घोवणी १८,७ धमइ ३७, १ देहरइ २२, धमिउं ५२, १ ध्यायइ ३७, २ देहरइरउ २५, २ घरइ ३७, १.४७, १.७० १ ध्रायइ ३०,२ देहरउं ७५, २ देहरासरु ६८,१ धरती १०, २ ध्रुवउ १६, २ देत्य ७२,२ दो [गुं] छइ ४६, १ धरिउ ५०, १ दोटी ३२,२ धरिवा वांछइ ८१, १.८१, २ ध्रोच ३, धूअउ १२, १ धूआ २३, १ धूणइ ३७, १ धूपधाणउ ६८,२ धूंसइ ४४१ धतूरउ १२, २ , धनु ७६, १ धनुष ९, २ देहउ ३६ धरणइ १६,१ ध्रायु ७२, १ धरावइ ४१,१ धू २३, १ धेठउ ७,२ १०१ निरोध १८, ७४,१ इकडउ पर्वतु १ १ शब्दानुक्रम न नहीं तु ६२, २ निमित्ती ३४,२ न १८,१.७२, १.७८, २ नहुतरिउ ५२, १ नियोजिर्बु ५३,२ नइ ७३, १ नाक८,१ निरखइ ४१,२ नइमाहि माछा हीडई ७५,२ नागरवेलि १२, २ निरभरछइ ३९,२ नउद ९,१ नाचइ ३८, १. ४८, १.८०, १ निराकरइ ४४, २ नाचिउ ५१, १ नउल १४,१ नखारउ १८,१ नाचिर्बु ५३, २ निर्धाटइ ४१, १ निर्मलवुद्धि ७४, २ नगरनइं उत्तर गमई नाठउ ५०, निर्मलां ७४, २ नाणउ २३, २ नगरु ७३, २ नाणिद्रउ ६७, २ निर्वाप ७५, २ निलखणड २६, २ नचावइ ४८, १ नातणउ ९,१ नणदोई ६७,२ निलाड ८, १.६७, २ नात्रा १८,१ नणंद ८ १.६७, २ निवडियउ २१, १ नाथइ ४४, १ नदि ७४, २ नाथियउ १६, २ निवायउ २४, १ नदी २५, २. ७४, १ निवारइ ४३, २. ४६,२ नान्हड ६८,२ नदीनउं जलु ७८, १ निवारिउ ४९, २ नामइ ८०,२ निवी ३१, १ नमइ ३९, १.८०, २ नामु ७४, १ नमस्करइ ४१, २. ४६, २ नारिंग रूंख २२, १ [निवेदिबुं] ५३, २ नमस्करिव्यु ५३, १ नालेर १२, २ निषेधइ ४६,२ नमिवा वांछइ ८१,२ निष्ठा २४, १ नाव १०,१ नावी १०,२ निसरावउ १७, १ निसूग २०,२ नयडउ १४,२ नासइ ३९, २. ४८,२ नरनरइ ४२, १ नासिवा २६, १ निसेजा २१, १ नव २८, १. ५७, २ नासिवु ५४, २ निसोत २१, १ नवकारवाली २१, १ नास्तिक टाली । निस्तयउ ४९, २ नवकारसही ३३, २ निंदइ ३८, १. ४६, १ नवमउ ३०,२. ५७, १ नाहर १७, १ नीक २३, १.६६, ३ नवमि ३१, २ नाहिवा वांछइ ८१, १ नीकउ २६, २ नवलउ १५, २ नाहिQ ५४,१ नीकलइ ४६, २ नवाणू ३०, १ नांखइ ४२, १ नीकल्यउ नवारसउ १७, २ नांगर २५, १ नीकोलइ ४६, २ नव्यासी २९,२ नांष (ख) इ ४७,२ नीखणियामउ २६, १ नांषि (खि) उ ५२, १ नीचउं ५६, १ नस ९,१ नसावइ ४०, १ निउंजइ ४२, २ नीठ २४,१ नहरणी १८, १ निऊ २९, २ नीठइ ४३, १. ७०, १ नहि तु (प्र०) ६२, ३ निकरउ २५, २ नीठि २३, १ निकोलिवा वांछइ ८१,२ नीठियउ २५, २ नही करइ ३६ निजंत्रइ ३९, १ नीठुर १४,२ नहीं दियइ ३६ निबंधस २०, २ नीद्रालूखउ ६९, २ नही लियइ ३६ निद्रालखउ ३२,२ नीपजइ ३८,२ नहींत ५६,२ निबीजइ ७०,२ नीपजई ७५, २ नमो १५, १ कुण पापीउ ७५,२ ४९,२ नही ३३, २ १ पजूसण ३३, २ १ पढूच पढूचूं (प्र०) ६४, ४ १०२ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत नीमी १५, १ पच्छिम कि ३१, १ पढइ ४२, १. ७७, १.८०, नीवडइ ४०, १ पच्छोकडु ६९, १ पढणहारु ७२, १ नीसरइ ४०,१ पछइ १८, २. ३१, २. ५५, १ पढतउ ६०, २ नीसरणी २०, १ पछेवडइ ९, १ पढमाली २०, १ नीसरिउ ४९, २ पछेवडी २१, १ पढिडं ६०, १. ६२, १ नीससइ ३९, २. ४६, २ पछोकडड २६, १ पढिवा ६१,१ नीसा २०, १ पढिवा वांछइ ८१, १ नीसाण १६, १ पटउ २३,१ पढिवू ५३, १, नींकोलइ ७७, २ पटांतरं ६६,२ पढिवू (प्र०) ६२, २ पढी पटांतलं (प्र०) ६६, ४ नींगमइ ७३, १ ६१,१ नींद ६,२ पठणहार (प्र०) ६१, ४ पढीतड ६०,२ पठणहारु ६१, २ पढीतूं (प्र०) ६०, ४ नींपजावइ ७२, २ पठतु (प्र०) ६०, २ पढी सकट ३६, पं० २९ नींवू १९, १ पठावियउ १४, २ पढी सकुँ ६२,२ नेउर ९, १ नेत्रउ २५, १ पडइ ३८, १.४८, १. ८०, २ पढू ६४, २ पडखइ ४१,२ ६४, २ नोमाली ३४, १ पडघउ २१,१ नोहली ३१, १ पडजीभी २०, २ न्युंछणउं ६९,२ पढ्य (प्र०) ६०, १ पडत ७८,२ न्युंजण ६९, २ पणीहारि ७,२ पडल २३, २ न्हवारइ ४७, २ पतीजइ ४३, १ ७०,२ पडलड ३४,१ न्हाइ ४७, २ पतंग १७, २ पडली २५, २ न्हाउ ५०, १ पथरणउं ६७, २ पडवास ९, १ न्हायइ ३७, पद ७७, १ पडसाल ३२, १ प पधारउ ४१,१ पडहउ ६,२ पनर २८,१ पइठउ ४९, २ पडहू १०, १ पइलउ (प्र०) ६१,४ पडाई २६, २ पनरइ ५७, २ पइसइ ३९, २ पनरमउ ३०, २ पइसिवा वांछइ ८१, १ पडिकमणड ३३, २ पमार २१, ૨ पइंत्रीस २८, २ पडिगरिउ ५२, १ पमावइ ४१,१ पइंसठि २९, १ पडिलेहण ३३, २ पमोडी १७, १ पउंजणी ३४,१ पडिवा ३१, ३ पखालइ ४२, १ पडिवा वांछइ ८१,२ पयंतरउ ३२, २ पग ३२, २ पडिवू ५३, १ परखइ ४१,२ पचइ ३७, २. ४९, १.८०, १ पडीआर २५, २ परचूरणि २५, २ पचखाण ३३, २ पडीगइ ४१, २ परत २६, २.६६, २ पचतालीस २९, १ पडीगरइ ४६, १ परतइ ४४,१ पचारइ ४३, २ पडीसारड ६८,२ परताति १९, १ पचास २९,१ पडूछा ४४, १ परनालि १२, १ पचिवा वांछइ ८१,१ पडूंचउ ३३,२ परम २७, १.६२, २ पच्छिम ," पडोसु ६९, १ परमइ ५५, २ पडिट ५०, १ पयलु ६४,२ शब्दानुक्रम पाचइ ४४, २ पाछइ १५, २ पाछलि ७५, १ पाछिलउ ३१, २, ६४, १ पाछिलु ६४, १ पाछिलु ५५, १ पाछेवाणु ६६, २ पाछेवाणूं (प्र०) ६६, २ पाज २३, १ पाजणी २६, १ पाटउ २३, १.२४, १ पाटण टाली। किहां वसीइ पाटलउ ६८,१ पाटी ३२, १ ७५, २ पाहू २६, २ परमूणउं ६७,२ पल्हालइ ४३, २. ७०, १ पवित्रइ ७०, १ परलउ ३२,१ पवित्री १७, २ परव ११, १.६६, २ परवारइ ४३, २ पवित्रु करवा वांछइ ८२, १ परवाली ११, २ पवीत्रइ ४३, १ परसु १८, १ पश्चिमीउ ७८, १ परहउ २७, २. ५६, १ पसवइ ३२,१ परहु ६४, २ पसीअइ ४२, २ पराणी १०, १ पसीजइ ४२, २ परायउ ३१, २. ५५, १ पह २२, २ पहर २०, १ परालु ६९, २ परि ५५, २ ७७, २ पहिरइ ४२, २, ४८,१ परिचउ १५, १ पहिरणउ ३२, १ परिणइ ४१, २. ४७,२ पहिरता ७८,२ परिणवू ५४, १ पहिरवु ५२, २ परिणावइ ४८, २ पहिरावइ ४८, १ परिण्यउ ५१, १ पहिराविउ ५२, १ पहिरिउ ५२, १ परिधान २५, १ पहियउ २६, १ परिवारिउं ५७, १ पहिलउ १८, २, ५६, २ परिवान्यु ६८,१ पहिलं ५५, १ परिसीजइ ४६, १ पही ३९,१ परिसीनउ ५१,२ पहुरइ १६, १ परीछइ ४१, १ पहूआ १९, १ परीयच्छि ६९, १ पहेली ६, २ परीयटु ६७, २ पंखी १४, १ परीषि (खि) ५३, १ पंचवीस २८, २ परीसइ ४३, १ पंचहत्तरि २९, २ परीसिउ ५१, २ पंचाणू ३०, १ परीसिव्यु ५२, २ पंचावन २९, १ परूवइ ३७, १ पंचासी २९, २ पर्वतनइ अहिनाणि। पंड्यांस ३५, १ }७३, २ गामु वसइ पर्वतु ७४, १ पाइणि १७, १ पलवटि ६९,१ पाइली १७, २ पलाण १३, २ पाउल ३३, १ पलाणइ ४१, १.४४, १ पाउंछणउ २१, १ पली ," पलीवणउ २१, १.३४, १ पाखखमण ३३, २ पलेवल ६९, २ पाखर १३,१ पलोटइ ४०, २ पाखलि ६४,२ पाटूआली २६, २. ६७, २ पाठवइ ४४, १ [पाडइ] ४८, पाडउ २५,१ पाडिहारू ३१, १ पाड्यउ २२, २ पाढ ३५, १ पाण १७,१ पाणी १७, १.७४, २. ७७, १ पाणीनइ छेहि वृक्षु ७५, २ पाणीनइ पारि देवालयु ७५, २ पाणी भरि सरोवर ७२, १ पातली १९, १ पात्र ७७,१ पात्रउ १८,१ पात्रांरउ १८, २ पाथउ ३४, २ पाथर ११,२ पादइ३८, १४९, १ पादरियउ २५, २ पाद्र २२, २ पाधरु ६४, १ पान १२,१ पान्हउ १७, २ पान्ही ८, २ पाइक ३२, २ पाखइ ६२, २ १०४ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत पील्या २५, १ पीचा वांछइ ८१,२ पीवू ५२, २ पीसइ ४४, १. ४६, १ पीसती २०, २ पीस्या ७८, १ पीहर १५, १ पींगाणउ २३, २ पींछ १४, १ पीजइ ३७, २ पीजणउ १०,२ पीजती २०, २ पीडार २२, २ पीडी ८,२ - पारि ७५, २ १ पापड २२, २ पांख १४, १ पापीउ ७५, २ पांगुरइ ४८, १ पामइ४१,२ पांगुरणउ ३२, १ पामिउ ५०, १ पांगुयउ ५२, १ पामिवा वांछइ ८१, २ पांगुरावइ ४८, १ पामि ५४, १ पांगुरि ५२, २ पामी विद्या जेहि पुरुषि ७४, २ पांच २८, १. ५७, २ पांचमउ ३०, २. ५७, १ पायइ ४१,१ पायकेसरी ३४, १ पांचमि ३१, २ पायठवणउ ३४, १ पांजरउ २२, २ पांडरउ १४, २ पारउ ११,२ पारस पाहाण २२, १ पांति १४, २ पांभडी ३४,२ पारेवउ १४, १ पांसुली ९, १ पाला ४१, १ पिण्डखजूर २४, २ पितर ८, १ पालड १२, १ ५७, १ पालटइ ४३, १ पियइ ३७, १ पिराणउ ६९, १ पालटउ ६८,१ पालटिउ ५६, २. ६८, पिहुलउ ३३, २ पालणउ २५, २ पिंगाणी २३, २ पालथी ९, १ पीई ७५, २ पालवइ ४३, २ पीजहलउ २६, २ पालि २३, १ पीजहलु ६९, १ पालिउ ५०, २ पीटणउ २१, २ पालिq ५४, १ पीठ १५, १ पीठी १६, १ पीडइ ३८, १ पीढी २२, १ पावटउ १७,१ पाव (ख?) रिउ ६८, २ पीतरियड ७,२ पीतल ११, २ पापड ६२, ४. ७४, १७५, १ पापलि (प्र०) ६४, ३ पीत्राणी ६०, १ पाष (ख) ह ५५, २ पीत्रीयु ६९, १ पास ७, २.८,२. २५, १ पीधुं ५०, १ पासाकेवली २३, २ पीपल १२, १ पासि ५६, २ पीपलरी २६, १ पासी १०, २ पीपलि ७,१ पाहणि पीस्या सातू ७८, १ पीपलीमूल ३४, २ पाहरी ६९,२ पीपी २६, १ पाहरी जागीइ ७१,१ पीयइ ४६, २ पीलउ १५, २ पीलू ३५, १ पुकारइ ४४,२ पुडउ १६, २. २३, २ पुण पुण ५७, १ पुत्रसिउं यमइ ७५, २ पुत्रि २१, २ पुप्फपडली २५, २ पुरअहे दीहाडे । 'मिष्टान्न यमता ७८, २ पुरस ८,२ पुरु ५५, २ पुरुष ७८, २ पुरुषतणउ समूहु ७६, १ पुरुषतणुं समवायु ७६, १ पुरुषनउं वृंदु ७६, १ पुरुषभणी ७३, १ पुरुषि ७४, २ पालुइ ७०, १ पावइ ४१, २ १ ७७, २ दीसह पुरोकउं ६७, २ पुहुर ७३, १ पुहुलउ ७९, १ पहुंक १९, १ पुंआड ३३, १ पुखियउ २४, १ पुंजउ (प्र०) ६४, ४ पूअरअ ३३, २ पूगीफाड २१,२ पाहरू १६,१ पाहाण ११,२ शब्दानुक्रम १०५ पोटली १६, १ प्रेरइ ४२, २. ४६, २, ८०, २ प्रेरिउ ५१, २ प्रोअइ ४२, २ प्लीह ८, २ पोत्रउ ७,२ पोथउ २२, २ पोथळ ७३, १ पोथी ३२, १ फडफडइ ४३, २. ७०, २ फरलउ २१, २ फरसइ ३९, २ पोरसी ३३, २ फरिस्यउ ५०, फलइ ३९, १ फलहउ १९, २ फली १८, १ फंदइ ४०,२ फागुण ६, १ फागुणमास तणी पूनिम }७६, १ १ पूछ १३, १ पूछइ ३७, २. ४८, १.८०, १ पोठीउ ६७, २ पूछणहार (प्र०) ६१, ४ पोठीयउ १३, २ पूछणहारु ६१, २ पूछतउ ६०, २ पूछतु (प्र०) ६०,३ पूछिउ ४९,२ पोथां ७५, २ पूछिउं ६०," पूछिवर्ड ६२, १ पोरवाड २१, २ पूछिवा ६१,२ पूछिवा वांछइ ८१, १ पोली २०, १.३३, १ पूछिq ५३, २ पोषणु ७२, १ पूछियूँ (प्र०) ६२, २ पोष्यवर्गरहिं ७२, १ पूछी ६१, १ पोस ६,१ पूछीतउं ६०, २ पोसइ ३९, २ पूछीतूं (प्र०) ६०, ४ पोसहथउ २६, १ पूछ्युं (प्र०) ६०,२ पोसाल १८,२ पूजइ ४१, २. ४६, २ प्रकासइ ४०, १.४७, १ पूजिवा वांछइ ८१, २ प्रजूंजिउ ५१, १ पूजिवू ५३, १ पूठउ ८,२ प्रतीठ २३, १ पूठि ६३, ४. ७३, २ प्रधान रहि ७२, १ पूटिं ६३, २ प्रयाणउ ९, २ पूडा २०, १ प्रयुंजइ ४८, २ पूणीं ६७, १ पूत ७, २ २४, २ प्रवर्तइ ७५, १ पूतली ११, १ प्रवाली ११, २ पूत्रेलउ १६, २ प्रशस्यु १९, १. १९, २ पूनिम ३१, २.७६, १ प्रसवइ ४९, ५ पूरइ ३९, १. ४१, २ प्रसविउ ५१, २ पूरउ ३१, २ प्रसंसइ ३९,२ पूरव दिश ६, १ प्रसाद रा २४, २ पूरिसइ २१, २ प्राणीया ७२, २ पूर्वीयु ७८, १ प्राणीयां तुमति- ७२, २ पूलउ १६, २ जीवी भला पूंजइ ४०,२ पूंजउ ६४, २ पाहुणउ ३३, २ प्रियु ७९,२ प्रीणइ ४७, २ प्रेयर्नु ७९,२ उ०र०१४ प्रति ७३, २ प्रयोग ७२, २ फाटउ १६, २ फाडइ ४०, १. ४९ १ फाडियउ १४, २ फाडिवा वांछइ ८१, २. ८२, १ फाडी ६६, २ फाड्यउ ५१, २ फाल २५, १ फालरउ २५, १ फिरइ ४६, २ फिरक ६७, २ फिरिवा वांछइ ८१, १ फीटइ ४०, २. ४३, १ फीण १२, १ फुई ३२, २. ६९, १ फुईहाई २६, १. ६९, १ फूटइ ३८, १.४८, २. ७०, २ फूटउ ५१,१ फूटरउ २६, फूटी २३, १ फूरइ ३९, १ फूलपत्री ७२, २ फुलिंग ३५, १ फूकई ४४,२ फेडइ ४२, २ फोडी २०, २ प्रासाद योग्य हितूई ईट } ७७,२ पूंद ८,२ पेलावेलि २६, २ पोईस्त १९, १ पोटलिया १६, १ १०६ उक्तिरनाकरादि अन्तर्गत बीज ३१, २ बीजउ ५६,२ बीज ३०, २ बीयड १७, १ बील १२, १ १ फोडइ ३८, बापडउ ५६, २..६८, १ बिहुँ ७४, १ फोडउ ७,२ वापसरीषउ ६६, २ बिहुँ गमे ७३, २ फोफल ३४, १ वाफ ३३,१ बिहुं परि २७, २. ५६, २ ब वाबीहउ १४, १ बीकानयर ११,१ बार ११, १.५७, २ बइठउ १९, २. ४९, २ बहरी ९, २ बारइ २८,१ बारमउ ३०, २ बइसइ ४४, १.४७, २ बइसई ७५, २ बारवट ३२,१ बीजली १२, १ बकोर १८, १ बारसि ३१, २ बीजाबोल १७, २ बगलउ १४,१ बालइ ४२, १ बीजी भूमि २५, १ बगाई ६७, १ वालउ १२, २ बीजोरउ १२,२ वालक ३९, १ बजरइ ४०, १ वावन २९,१ बडबडइ ४०, २ बत्रीस २८, २ बावनउ चंदन २५, २ बीह १६, २ बयालीस २९, १ बावीस २८, २ बीहइ ४१, २. ४६, २ बलइ ४१, २ बासठि २९, १ बीहावइ ४१, २. ४९, १ बलद १३, २. ७८, २ बाहिरल्यु ५०, बीहाविउ ५०,२ वलबलीउ ६९, १ बाहिरहुंतउ ५६, १ बीहिल ५०,२ बलहि ६८, २ बाहिरि २७, २ बीहिवा वांछइ ८१, २ बलिउ ५२, १ बांधइ ३८, २. ४८, २ बुद्धि ७४, २ बलिवा वांछइ ८१, १ वांघिउ ५०, २ बुहारी ११,१ बसवसइ ४३, १ बांधीवउ ७३, १ बूझइ ३८, २. ४८, २ बहिणि ८,१ बांभण ३४, २.७४, २. ७५, २ बूझिउँ ५३, २ वहिन ६९, १ वांभणनउ अभावु ७५, १ बहिरउ २६, १ बांभणउं घरु ७२, २ बहुरखउ ३२, १ वाभणना ७२, २ वूव १६, १ बांभण पाछलि शिष्य ७५, १ बेडी १०, १ बेल १७, २ बहेडउ १२, २. १७, २. ३२, २ बांभणायतुं ७७, २ बंग ३४,२ वांभणी १३, १ बेहडउं ६६,१ बंधुनउ समूहु ७६, २ वांभणु ७१, २ वेहडू (प्र०) ६६, १ बाउची १९, १ वि २७, २ बोर ३४,१ विउणउ ३२, २ बोरि १२,१ विडोत्तर सउ ३०, वोलइ १९, १.४१, १.७३, २ बाउलउ २६,२ विमणइ ७७, २ वोलणहार (प्र०) ६१, ४ विमणडं ६७, २ वोलणहारु ६१,२ वाकरउ १३.२ विमातकाना को ३१,२ वोलतउ ६०, २ वाण १९, २ वोलतु (प्र०) ६०,२ वाणरहिं हितूउ शरकड ७७, १ विमात्र कै ३१, १ वाणि ७७, २ विलाडड ३५, १ वोलिव ६२, १ वोलिवा ६१,२ विवार (प्र०) ६३, १ विहत्तरि २९, २ बोलिवा वांछह ८१, वाप८,१.२६, २.६६, २ विष्णु परि (प्र०) ६३, २ वोलिवू ५३,२ बूडइ ३८, १ बूढउ ७,१ बहुल ७९, २ बाउल २२, २ वाउलु ६९, १ ।' वाणू ३०," यापह१८,२ शब्दानुक्रम १०७ ७३, १ भण्य (ख्य) उ ५०, १ १ बोलिवू (प्र०) ६२, १ भरइ ३७, १.४९, १ बोली ६१,१ भरणी २५, २ बोलीत ६०,२ भरण पोषणु ७२, १ वोलीतूं (प्र०) ६०, ४ भरिउ ५०, १. ७२, १ वोल्य ६०,१ भरिङ ५६, २. ७२, १ बोल्या ७२,२ भरि ५३, २ बोल्युं (प्र०) ६०,१ भरुअच्छ११,१ व्यासणउ ३१,१ भस्यउ १५, २ ब्यासी २९, २ भलई ७१, १ ब्राह्मण ७२, २ भला ७२, २ ब्राह्मण प्रति ७३, २ भलिसुं ४१, १ ब्राह्मण यमिर्सियमिसिं ७८,२ भली २४, १ ब्राह्मणसिउं जाइ ७५, २ भषइ ३९, २ ब्राह्मणु शिष्यपाहि। पोथउं सिखावह भलम १५, २ भ भस्मसूत २५, १ भइरव ६, २. ३३, २ भंजवाड २६, २ भइसि ७२, १ भंडार,२०, १ भउजाई ३२, २ भंडारु ६८,२ भाई ७, २ भखइ ३९, २ भाउ बीज १८, २ भजइ ४९, १ भागउ ४९, २ भडह (भ) डइ ४४, २ भाजइ ३७, २ भाट २१, २ भणइ ४२, १.४८, १.८०, १ भाठ ११, १ भणावइ ४८,१ भाडउ २४,१ भणाव्यउ ५०, २ भाणउ २०,२ भणिवा वांछइ ८१,१ भाणा भणिवू ५३, १ भाणेजउ ७, २ भण्यउ ५०, २ भात ७,१ भात्रीजउ ७,२ भाथडी ३३, १ भमइ ३९, १ भाद्रवउ ६.१ भारउट ३२,१ भारी ५६, २ भमरडउ १६, २ भारु ७१, २ भालि २३, १ भमाडइ ४०, १ भाषइ ३९,२ भांखडी १७, २ भांगरउ १९, २ भांजइ ३७, २. ४८, १ भांजिवू ५३, १ भांड २२, १ भांडइ ३७,२ भिउडी ८,१ भिंगार १५, १ भीखइ ३९, २ भीखारी ३३, २ भीतरउ ३२, १ भीति ३२, १ भील ३०,२ भुइफोड ३५, २ भुजाई ६९, १ भुल्लइ ४०,२ भुवनि ७४, २ भुंजइ ४६, २ भुंडउ ७४, १ भूइ १०, २ भूख ७, १ भूखियउ ७,१ भूतंतउ प्राणीया भला ७२, २ भूहिरउ ३२, २ भेटिउ ५१,२ भेदइ ४३, १ मेदिउ ५१, २ भेदिव्यु ५३, १ भेलइ ४६, २ भोगल २७, १ भोलउ ६९,२ भक्ति ७३, २ भडिथ १७, १ भणी १५, १. } ७७,२ ७३,१ भत्रीजउ ६७, २ भथायितु ६७, १ भमती ३३, १ भमरउ १३१ मइ घरि रहिवड ७२, १ मइलउ १५, २ मई ५५, १.७८, २ मई रहीइ ७१," मई १०, १. २३, . मउठ १२, २ मउड ९,१ मउडई ५७, ५ मउणि ११,२ मउर १५,१ मउरा १८, २ भमलि २३, १ भमिउ ५१,१ भमतउ ७३, १ १०८ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत माणी २३, १ मकोडउ ३१," मान ७५, १ मडि ६७, १ मढी १६, २ मारिउ ५१, १ मऊ (प्र०) ६६,३ म लीधु ३६. ७८, १ मकनउ २५,१ म लेइ ३६. मातउ ३३, २ म करि ३६ मलेसि ३६ मात्रा विना १८, १ म करिसि ३६ मवइ ४८, २ माथइ २५, १ म कीधु ३६. ७८, १ मविउ ५१,१ माथइभमरउ ८, मसउ १९, २.३४, २ मादल २२, २ मगसिर नषत्र ५, २ मसवाडा ७३, १ मजीठ २३, १ मसाण ११,१ मानइ ३८, २. ४२, २ ४८, २. मजीठ राती साडी ७६, १ मसाहणी ६९, १ मा नई ३९, १ मडउ८,१ मसि ७,२ मामउ २६, २ मसि [भा?] जणउ ३४, १ मामी २६, २ मढ ११,१ मस्तक मीढइ के ३१,२ मायइ ४२,१ महतउ ९, २ मायउ २२,१ मणमणउ २२, १ महमहइ मालती४०, १ मारइ ४४, १. ४८, १.७२, ३ मणसिल १५, १ महिषु बाणि आहणइ ७७, २ मारणहार (प्र०) ६१, ४ मणिआर १९, २ महुआल १७, १ मारणहारु ६१, २ मणियउ १८,२ महुरउ १४,२ मारतउ६०, २ मतवारणउ ११, १ महुलेठी १९,२ मारतु (प्र०) ६०,३ मतिजीवी ७२, २ महूअउ १२, १ मंगलेवउ १६, १ मथइ ३८, १ मारिड ६०, १ मद १०,१ मारिवडं ६२, १ म दीधु ३६. ७८, १ मंजूस ११,१ मारिवा ६१, २ म देइ ३६ मंडइ ४७, २ मारिवा वांछइ ८१,१ म देसि ३६ मंत्रइ ३९, १ मारिवू (प्र०) ६२, १ मनावइ ४२, २. ४८, २ मंत्रासरु ६८,२ मारी ६१,१ मनावि, ५३, २. ५४,१ मथाणउ ११,२ (प्र०) मनाव्यउ ५०, १ माइ, मारीत ३०, २ मनुष्यनउ समूहु ७६, १ माईय [हायी] ६९, १ मारीतूं (प्र०) ६०, ४ मनुष्यमाहि ब्राह्मण श्रेष्ठ ७२,२ माउलउ ८, १. ६९, १ मारू३५, १ मा [उ?] लाही ६९, १ मालती ४०, १ मयगल ३४,१ मालवउ ३४, २ माकण १३, १ मयण १३,१ माखी १३, माली १०, १ मयणहल २५, २ मापीनउ अभावु ७५, १ मरइ ३७, १. ४७, १. ७०, २. मागइ ३७, २. ४४, २ मागिउ ५२, १ मासउ १९,१ मरमर सबद २२, १ मासतणी ७६, १ माचइ ४२, १ मरहठ ३४,२ माछलउ १४,१ मासमउ दिहाडउ ३१,. मासिहाई २६, २ मरिवा वांछह ८१, २. ८२, १ माछा ७५, २ मासी ३२, २. ६९, १ माजणउ २२, २ मरीइ ७१,१ मास्याही ६९, १ माझ१४, २ मरूअउ १७, २ माटी ३४, १ माह ६,१ मर्दइ ३८, २. ७०, १ माणसामउ ५६, १ माहर ६३, २ मला १०, २ मंजार ३५, १ १ " मरावइ ४८, १ शब्दानुक्रम मुहूरत ६,१ मांड ७, १ मेरायीयुं ६९,१ मेलइ ७२, २ मेलउ १४, २ मेलवइ ४०,१ मेलिउ ५१,२ मेल्हिवा वांछइ ८१,१ मेह ६, १ मेहरू २७, १ मोकलउ मोकलत ७८,२ मोकलावइ ४४, १ मोगर ९,२ मोगरउ २३, २ मोटउ ६८, १. ७९, १ मोडइ ३८, १ मोती ११, २ मोथ १३, १ मोर १४, १ मोरसिखा १९,२ मोलइ ४२,१ मोली ६७,२ मोसंधीयु ६७, २ मौ ६६, २ सूउ ५१, १ २ १ मूठउ १८, २ माहरडं ३३, १ मुस्यउ ५०, २ माहरु २७, २. ५५, १. ६३, ३ मुहछण १७, २ माहि ५६,२ मुहडउ ८,१ माहिल्युं ५५, १ मुहपती १८, २ मांकुण ६७, १ मुहषायी ६६, २ मांखण ७, मुहिया २७, १ मांचउ ९, २ मुहिआं (प्र०) ६२, ४ मांचइरी २४, १ मुहीयां ६२,२ मांची ३३, २ मुहुखाई (प्र०) ६६, ४ मांजइ ३७, २.७०, . मांजरि १२, १ मुंड ८, १ मुंडउ २१,२ मांडइ ३८, १ मुंदडी ३२, १ मांडणउ ९, १ मांडहिय ६८, १ मूकइ १९, १. ८०, [मूकइ] ४८,१ मांडा ३३,१ मूकिवू ५३, १ मांडी १५,२ मूझइ ४०, १ मांदउ २४, २ मांसु ७७, १ मूठि ८,२ मूत्रइ ३७, मित्राई ९,२ मिलइ ७०, १ मूलउ १३, १ मिलायह ४०, १ मूली १६, २ मिष्टान्न ७८,२ सूस १९, २ मीचइ ४२, २ मूसउ १३, २ मीठउ १४, २ मूसल ११,१ मीठी १८, २ मूंकिउँ ५०,२ मीढी (प्र०) ६६, ३ मूंग १२, २ मीजी ९, १ मूंछ ८, १ मीढइ ३१, २ मूंडिउ ५२, १ मीढउ १३, २ मूंदडी २०, २ मीढी ६६, २ मूं पाषइ ७४, १ मुखामुखि २६, २ मूंसरीषउ २७, २. ६४, १ मुखास १७, १ मूंहइ ५५, १ मुग ७२, २.७८, १ मृगतण मांसु ७७, १ मुगउ ५६, २ मृगु विधइ ७७,२ मुजल १७," मेघु ७८, १ मुडई ६८," मेढी १०, १ मु (माउ?)लाणि ६९, १ मेथी रा लाडू २६, १ मुसइ ३९, २ मेराईउ २६, १ मिठाई १९, १ मूल १०, १ य १ यमइ ७५, २ यमणुं ६४, १ यमता ७८,२ यमिङ ६०,१ यमिव ६२,१ यमिवा ६१, २, ७५, २ यमिसिं ७८, २ यमी ६१, १ यमीत ६०,२ यसउ६४,१ यहां ६३, १ यहांनउ ७८, १ याचइ ४४,२ याण (प्र०) ६३, ३ यावजी ७२, १ यिम ६२, २ ११० उक्तिरनाकरादि अन्तर्गत ये मे बडा हेते यो ५५, २ - - A ७३, रती १७, १ ७४, २ ये ये लहुडा ते ते राइणि १९, १ यमिवा वससई राइतउ ३१,१ ये ये वडा ते ते राई ७, १. २४, १ ७५, १ मान लहई राउ ७२, २ राउत ६८,१ योग्य ७७, १. ७७, २ राउताई ६८, १ योग्यु ७७, २ राउ वांभणना वयरि मारउ ७२, २ रखवालउ २०, २ राउलउ २३, २ रचइ ३७,१ राउ लोकापाहि रतांजणी १७, २ करसणु करावा राक्षसु ७८, १ राख १०,१ रत ७५, २ रथु ७८,१ राखइ ३९, २ रमा ३९, १. ४६, २. ८०,२ राखडी १८, २ रमिड ४९, २ राचइ ४४, २ रमिवा वांछइ ८१, १ राजगुल ६७, २ रमि, ५४, २ राजपुत्र ७५, २ रयताणउ ३४, १- राजभुवनि ७४, २ रलियामणुं ५७, १ राजवी २१, १ रलीयामणउ ३२, १ राजा गामु बांभ- ७७, २ णायतुं करइ रवऊ २६,१ रसोई १९, २ राजान २२, १ रसोयि ६८,२ राजानी परि ७७, २ राजा पाछलि सेना ७५, १ रहइ ४४, २.८०, राजारउ २३,१ रहतउ ६०, २ रहाविउ ४९, २ राठऊड २१,१ रहिउ ४९, २ राडि ९, २ रहिट ५२, २. ६०,१ रातउ २४, २.७६, १ रहित ६०,२ राति २०,२ रहितु (प्र०) ६०,३ राति ७३, १ रहिवड ६२, १. ७२, १ राती ७६, १ रहिवा थाकिवा, रान ३३, १ ८१,१ थाइवा वांछ) राव १६,१ रहिवू (प्र०) ६२, १ रायतणउ समूहु ७६, १ रही ६१, १ रावटउ ११,२ रहीइ ७१,१ राष (ख) इ ४८, २ रहीतूं (प्र० प्र०) ६०, राषि (खि) उ ५०, २ रहीवा ६१,२ रापि (खि) बुं ५४, १ रंग्यड ५०, २ राह ५,२ रंजइ ४३, २ रांक २४,१ रांधइ ३८, २ राघउ २४, २ रांधणउ २०, २ रांधिवढं ५२,२ रांध्यउ ७,१ रांपी २२, २ रिजइ ४०,२ रिणउ १५, १ रीछ १३, २ रीसालू ७, १ रुचइ ४९, १ रुलियउ २५, २ । रुलीयामणउं ६८,१ रुलीयायित कीधा। जीणं बांभण रुधिउ ५१, २ रूखउ २५,१ रूठउ १८,२ रूतउ २१,२ रूपउ ११,२ रूपानां पात्र ७७, १ रूपु ७८, रूसइ ३९, २ रूं ३२, २ रूंख २१, २ रूंधइ ३०, २. ४९, १ रोइ ४९, १ रोइउ ५१,१ रोझ १७, १ रोयइ ३८,२ रोयिवा वांछइ ८२, १ रोहीडउ २२, १ रोहीस १३, १ . लउडउ २२,१ लकडी १३, २ लउंग ९, १ लखइ३९, २ लखमी ६,२ लगइ ५६, १. ६२, २ लगाडइ ७८, १ लजालु ७९, २ लि ७०, १ लेइड ३६ लेजे ३५ लेतउ ३६ लीख १३, १ शब्दानुक्रम लगाडिउ ६८,१ लांवउ ६४, १ लूणिर्बु ५४, २ लेइ ३५. ४७, १ लिइ ७१, २. ८०, १ लयेत ७८,२ लिखइ ३७.२.४७, २. ८०, २ लेई ६१, १.६२, १ लिखावइ ७३, १ लेखउ २५, २ लहइ ३९, १.७३, २ लिखिवा वांछइ ८१, १ लेखणि ३४, १ लहई ७५, १ लहिवा वांछइ ८१, २ लिखिवू ५३, २ लहिवू ५४, १ लिधुं ६०, १ लेटइ ४४, १ लिपसणड ६६, २ लेणहार ३६, पं० २२. ६१, ३ लहुडइकु ३१, १ लिपस' (प्र०) ६६, ४ लेणहारु ६१, २. ६२, २ लहुडउ ७९, १. ७९, २ लियइ ३५. ३७, १ लेणाहरु ३६ लहुडा ७५, २. ७८,२ लहु९ ५६, २ लिवरावइ ४७, १ लेत ७८,२ लिषा (खा) वइ ४७, २ लाइ ८०,२ लाई ५७, १ लिपि (खि) उ ५२, १ लेतु ६०, १ लेतुं ६२, लाकडउं ७७, १ लेव २१,२ लीजइ ३५ लाख ९, २. ३०, २ लीजउ ३५ लेवउं ३६. ६१, २ लाखमउ ३१,१ लीजतउ ३६ लेवा ३६. ६१, १. ६२, १ लागउ ५०,१ लीजतउं ६०,२ लेवा वांछइ ८', १. ८१, २ लागु ६८, १ लीजतुं ६२, १ लेवू ६२, २, लाज ३३, २ लीजतूं (प्र०) ६०, ३ लेवू ५२, २. ६१, ४ लाजइ ३८,१ लाजिवा वांछइ ८१, २ लीजिलिइ ३६ लेसाल १८, २ लाजीइ ७१,१ लीधउ ३६.७३, १.३६,पं० २४ लेसिह ३६ लीघउं ६२, १ लेसूडड १७, २ लाज्यउ ४९,२ लाठि ३४, १ लीधी ५१, १ लेहउ ७, २ लीधु ७८, १ लोकपाहिं ७३, लाडइ ४२, २ लोक विक्रमादित्यु लाडू २०, १. २६, १.७४, २ लीधुं ५०, १ लीह ३२, २ राउ सरह लात १७,१ लीडी १७, १ लोकांरी २४, २ लाघउ १४, २. ५०, १ लापसी १५,२ लीपइ ३८, २ लोटइ ४०, २. ४४, लोढड २०, १ लाभइ ४७,१ लुका ४०, १ लुठइ ३८, १ लोपइ ३८, २ लोवडी १९, १ लालइ ४१, १ लणइ ४२, २. ४८, २ लोहडउं ७७, २ लुणाइ ४४, २ लोहसू ५७, १ लाष रातउ कांबलउ ७६, १ लुणावइ ४८, २ लाषिवा वांछइ ८१,१ लुणिउ ५०,२ लोहार १०, २ लाहउर ११,१ लुकडि ६७,१ लोही ८, २ लाहणउ २५, २ लुंचइ ३७,२ लहसण १९, २ लांघड ३७,२ लुटिउ ५०,२ लांच ९, २. ७२," वइरी ३६ लांप ६९,२ वइसाख ६, ७२, २ लालि १६,१ १ व लूटइ ३८,१ लूण कयरा ३१, उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत वर पाङ्गलि गीत वही १७,२ वहीयि ७८, १ १ . वंच्यउ ५०, १ वंछिडं ५०,२ घरसोला १८,२ वरांसउ ६८,२ वरांसिउ ६८,२ ७७, २ १ वर्णवइ ३७, १ वागुर १०,२ वइंगणु ३३, २ वरता १०,२ वखाण ३४, १ वर पाछलि गीत गाती स्त्री ७५,१ वखाणइ ४३, २ वहू ७, २ वखाणिवू ५३, वरस ६,१ वहूवत् ७९, १ वरसइ ३९, २.४८, २.८०, १ वघारइ ४३, २ वरसवियारणि (प्र०) ६६, ४ वंचइ ३७, २. ४७, वच्छनाग १३, १ वंचिवु ५४, १ वछीयायित (प्र०) ६६, ३ वरसात २०,२ वरसालउ ६,१ वज २१,१ वटवाल- ६६, १ वंदिउ ५१,२ वड १२, १.७३, २ वरहलि (प्र०) ६६, ४ वरसीयि ७०, २ वाअइ ४२,२ वडउ ५६, २. ७९, १ वाइ ४८,१ वडपण ७,१ वाइलउ १८,२ वडा २०, १.७५,१ वडा ७६, १ वरांसिवयउ २७, १ वाइ, ५३, २ वाउ१२,१ वडी १७,१.२०,१.२४,१.३४,२ वरांसीयइ ४३, २ वाउल २३, १ वडी वार लगाडइ ७८, १ वरुआयती कन्या संपजइ वाउलि २१,१ वडु ७५, २. ८०, १. वाग १३, २ वणइ ४२, २ वर्तइ ४९, १ वणवउ २६,१ वर्तिवउ ५१, २ वागुरी १०,२ व (च?) णहडीउ ६७, १ वर्षशत ३६ वणारिस ३४,१ वागुलि १४," वर्षाकालनउ मेघु ७८, १ वाघ १३, २. १५, २ वणिज १०,१ वाघ तणां पद ७७, वणी २४, २ वलइ ४२, २ वाचइ ३७, २ वलउ २२,१ वणीमग ७,१ वलतउ २५, २ वाचणाहरु ७२, १ वत्सनु समूहु ७६, १ वाचिq ५३,२ वत्सरहिं हितूउ ७७,२ वला २५, १ वलि २३, २ वाछडड १८, २ वली ६३, १ वाछडा २४, २ वधाअइ ४४, २ वाछरु २४,२ वधामणउ २१, वली वली ६८, १.८०, . २ वधारइ ४९, २ वषा (खा)णइ ४८, १.७०,१ वाजइ ४४, २. ४८, १ वाजउ ६,२२५,१ वघावइ ४४,२ वषा (खा) णिउ ५१, १ वाजिन ६,२ वमइ ३९,१ वसीइ ७५, २ वाटभोजन २४, १ वमिउ ५१,१ वाटली २३, २ वयगरणु ६८,२ वस्त्र ७७, १. ७८,२ वाटवाल' (प्र०) ६६, । वयरि ७२, २ वस्त्रगांठि २४,२ वयरी ७३, १ वहइ ४०, १. ४८, १.७३, ५ वाटि २३,२ वयरी मरीइ ७१, वहलि ६६, २ वाडि २४, १. ७३, २ वहिउ ५१,२ वाडी १२, १.२१, २. ७३, २ वहिलउ १५, २. ७९, २ वाणही २०, वहिवू ५२,२ वाणारसी १०,२ वथूअउ १२, २ वधूवर २४, १ वसइ ७३, २ वाटइ ४४,१ १ वस्तुरी २४, २ . वरइ३७, १.४७, १ वरगडु ६८,२ वरतर काटिवट १५, २ शब्दानुक्रम वियारियउ २६, २ विरचइ ३७, १ विरतउ २४, २ विराध्यउ ५१, २ विरासिउ ५२, १ विरूयउ १८,२ विरोलइ ४०,२ विलखउ ७, २.५७, १.६४, २ विलवइ ४९, १ विलंबइ ३९, १ विलोइउ ५१,१ विषे (खे) रिउ ५२, १ विस १३, १ १ विसनरहिं हितूङ ७७,२ वाणि २४, २ वांटइ ३७, १ वात ७३, २.७८,२ वांदइ ३८, २. ४६, २ वातचीत ६, २ वांदणउ ३३, २ वादलउ २६,१ वांदिवू ५३, १ वाधइ ४२, १.४३,२. ४९, २. वांस १२, २ ७०, २.७१, वांसोली १०,२ वाधीउ ५१, २ विआरइ ४३, १ विकस्यउ १२, १ वान १५,१ वानगी २१,१ विकुर्वइ ४१, १ वानी २१, १ विक्रमादित्यु ७२, २ वापरइ ४१, २ ४७, २. विगूयइ ४२, १ वापरिउ ४९, २ विगोवइ ४२, १ वाम ८,२ विघन १५, १ वायइ ३७, १ विचारइ ३९, १.४७, १ वायिवा वांछइ ८१,२ विचारिउ ५०,० वायु ७८, १ विचारि ५४, १ वार ७८,१ विचालउ १४,२ वारह ४३, २.४६, २. ४८, विचि ७४, १.७५,२ विचालुं ५६, २ वारि ५३, " विजाहरी ६६,२ वाल १२, २ विद्यालइ ४१, १ वालरकाकडी २५, २ विडलूण १०, २ घालहली ३३, १ विढइ ४२, १ विढवइ ४०,२ वावह ४३, २. ७०, १ विणइ ८०,२ वावइ ४७, २ विणसइ ३९, २ विणा ५५, २ वीणिवा वांछह ८२,२ वासह ४२, २ ७३, २. विदाणउ ६९,२ घासउ २०, २ विदारिउ ५२, १ [वासिउ] ५०,२ विदिस ६,१ बाहइ १८ विदेशि ७३," बाहर २५,२ विद्या ७४, २ वाहरू १६, १. २५, २ विन्यानी , वांकउ १५, १. ६४, १ विपराविवू ५४, २ पांकु (प्र०) ६४, १ विप्र ७१, २ वांछ। ३७, २. ४६, २.८१, १. विमासह ४१, २. ४७, १ ८१, २. ८२, १..८२, २ विमासउ ५०,१ विमासिवउ ३४,२ बांझ गाइ १३,२ विमासिवू ५३,२ उ०र०१५ वाली ९, बावि ६७,१ याव्यां ७३,२ काष्ठ विसनरु ७२, १ विसनरु काष्टिन भ्रायु ७२, २ विसहर १४, १ विसंठुल ३४, १ विसाहइ ४७, १ विसाहिउ ५०, १ विसाहिवू ५४, १ विसिमिसि ५६, १ विसूरह ४०,२ विसोआ १६, २ विहडइ ४२,२ विहथि ८,२ विहरह ४८,२ विहरउ ६८, १ विहसइ १६, २ विहसिउ ५१, १ विहाइ ४४, १ विहाणउ २६, १ विहूणउ १५, १ विधइ ७७, २ विंहचइ ४३, १ वीकइ ४३, १.७०, ५ वीखरइ ४१, २ वीच १५, २ वीळू १३, १ १ वांछिy ५४, २ उक्तिरताकरादि अन्तर्गत वीझणउ ९,,२ वीझाइ १८,२ वीझायइ ४२, १ वीझावइ ४२, १ वीठ ९,१ वीणि ६८, १ वीधइ ३८,२ वीध्यउ १४, २ वीनति १५, २ वीनवइ ४१, २. ४८, १. वीनविq ५३, २ वीनव्यउ ५०,२ वीवाहइ ४१, २ वीवाहपगरण २०, १ वीस २८, २ वीसमइ ४३, १ वीसमउ ३०, २. ५७, १ वीसमी ३१,१ वीसरइ ४०, १ वीसरिङ ५१, २ वीससइ ४४, १, ४६, २ वीट १५, १. २०, २ वीटइ ४३, १ वीटणउ २१, १ वीट्यउ १४, २ वेचइ ४७,१ शोभइ ४९, १ वेचावइ ४७, १ शोभिउ ५३,२ वेचिर्बु ५४, १ श्राद्धतणइ ७२, २ वेच्यउ ५०,१ श्रीगरणु ६८,२ श्रीवच्छ ६, २ वेझ ९, २ वेठि २३, २ श्रीवासुदेव दैत्य मारइ ७२, २ वेढिमी २२, २ श्रेष्ठ ७२,२ श्लाघा ४७, १ वेद ७२, १ [श्लाघिउ] ५२," वेयइ ३०,२ लाधिवू ५३, १ वेरा १२,१ श्लोक ७२, २ वेलि १२, १ ष वेलू ३५, १ ष (ख) ईइ ४९, १ वेस ९, ष (ख) मइ ४६, १ वेसर (प्र०) ६६,१ षा (खा) इ ७७, १ वेसरु ६६, २ षा (खा) णीकणउं ६७, २. वेसवार ७,१ षा (खा) धुं ५०, १ वेसावाडउ २०,२ षा (खा) वर्ड २,२ वेहणउ ३४, १ षा (खा) सइ ४६, १ वैद्य ७४, २ वैष्णवु राति च्यारह हिंतूई सेलडी पुहुर जागइ पां (खां) ज्या ७८, १ व्यह परि ६३, १ षि (खि) सइ ८०,२ व्याऊ ७, २ पि (खि)सरहिडी (प्र०) ६६,१ व्याकरणु ७७, १ षी (खी) लउ ७३, १ व्यारीउ ७३, १ षी (खी)लायोग्य व्यासन ग्रामु ७२,२ हितूउं लाकडउं व्रणरउ २४,१ षी (खीख)षनही (प्र०)६४,३ श बूं (खू) दह ४६, १ (खे) डइ ४७, २ शपइ ७०,२ शब्दु ७८,१ शमिउ ५१, २ सइतालीस २९, " शरकड ७७, १ सइंत्रीस २८,२ शरत्कालनउ तिडकउ ७८, १ सउ ३०, १.७१, २ सउगडउ११,१ सउडि ३२, २. ६६, २ सउण १४,१ शास्त्र ७२,१ शिष्य ७५,१ सउणी १६,२ शिष्यपाहि ७३, १ सउमउ ३१, शोचह ४९, १ सउ वार(प्र०)." ७७, २ ७७,१ बुहरउ ३२,२ वूठउ ५१,१ वूसट (प्र०)६६,२ वृक्ष कन्हलि घरु ७५, १ वृक्ष सामहुं आभउं ७३, २ वृक्षु ७४, २. ७५, १ वृद्ध ७९, २ वृषभनउ समूहु ७६, १ वृंदु ७६, १ शलाटु ६७,१ शापड ४८,२ वेउल ३३,१ वेगउ १६, १ वेगड ३२,२ वेगडि ६६, २ वेगडी (प्र०) ६६, ३ वेगलड ७९,२ शब्दानुक्रम . - संपन्नउ ५०, सकइ ४३, २ सकुँ ६२, २ सगउ ८,१ सगलइ २७, १ सघलइ (प्र०) ६३, २ सघले ६३,१ सज्झाय ६,२ सड्यउ १५, २ स (सु) णउं ६८, १ सतर २८, १.२७, २ सतरमउ ३०, २ सतसठि २९, २ सतहत्तरि २९, २ सताणू ३०, १ सत्तरि २९, २ सत्तावन २९, १ सत्तावीस २८, २ सत्यासी २९, २ सदा ५६, १ सदाचार बांभणु ७४,२ जीणई गामि सहहइ ४०, १ सहहियउ १५, १ सनीचर ५, २ सन्यासी ३४,२ सपइ ४३, २ सभा ७६,१ समधात १५, २ समरइ ४१, २ समवायु ७६, १ समा ७७, १ समाणइ ४०,२ समारइ ४०,१ समारिवउ १८,१ समि कियउ २५, २ समेटइ ४३, १ संखाहोली ३५, २ सयणाचार, संचकार १०, १ सयर८,१ संचकारु ७८,१ सयरइ २३, २ संतोषिउ ५१,१ संथारउ १८,२ सरइ ४४, २ सरजइ ३८,१ संद १७, २ सरतकाल ६,१ संदिसइ ४८, १ सरलउ६७,२ संदिसवु ५३, २ संदेसउ १८, २ सरवइ ४३, १ संधियउ १९,२ सरसउपाटण ११,१ सरसती ६, २ संधूखइ ४२, १ सरसवेल २०, २ संधूखण २३, २ सरस्वती ७५, १ संधूख्यउ १६, १ सराध ९, २ संपजइ ३८, २. ७७, २ सरिसव १२, २ सरीखउ २६, २ संवाहइ ४१, १ सरीषउ ६४, १.६६, २. संभलावइ ४७, १ सरीषडं गोत्र जेहनउं ७५, ५ संभारतउ ७२, २ सरीष नामु जेहन ७४,१ संभालइ ४१, १ सरीषु (प्र०) ६४, १ संवरइ ४०, १ सरोवर ७२, १ साइणि ३५, २ सर्जइ ४७, १ साकर १८, २ सर्व परि ५६, २ साकर सिउ दूध पीई ७५, २ सर्वोसरु ६८, १ साकुली ३३, १ सलाह १५, २ सवइवार २७,१ साग २४, सवईवार ६३, १ सागडी ३२,२ सवाडूड ६८,२ साच ६,२ सवार ६७, १ साचउर ११, १ सविडं गमा ७३, २ साजउ ५०, १ ससइ ४४, १.४६, २. साजी १०, २ ससूग २०, २ साठि २९, १ सहइ ४३, २. ७०, २. साठी १२, २ सहस ३०, २ साडी ९, १.७६, १ सहसमउ ३१,१ साढापांच ३२, १ सहायीयांनउ समूहु ७६, २ सात २८, १. ५७, २ सहिउ ५१, २ सातपरिया १७, २ संकइ ३७, २ सातमउ ३०, २. ५७, १ संकुचइ ३७, २ सात मसवाडानइ० ७३, १ संक्षेपइ ४७, २ सातमि ३१, २ L साखी १०,१ समी ७७, १ समीपि ७५,१ समुद्रमाहि रत्न० ७५, २ समुं ७७, १. समूह ७६, १. ७७, १ ११६ १ उक्तिरत्नाकरादि अन्तर्गत १ सातू १९, २. ७८, १ साथ २२, २ साथरउ ३३, १ साथलि ८,२ साथियउ २५, १ सादुल १३, २ साध५,१ साध (थ?) ६९, २ साधइ ३८, २ साधुपY ५७, १ साधुसंघाडउ २०, सापरउ २४, २ सापु भणी ७३, १ साभरमती २२, १ सामउ १२, २ सामलउ १४, २ सामहु ६३, २ सामहुँ ७३,२ सामाई ३१,१ सामुह ५६, १ साम्हउ ३१,२ साम्हु ७३, २ सार १६,१ सारद ६,२ सारी १४, १ सारीखउ १४, २ साल १६, २ सालउ८,१ सालणउ ३२,१ सालवाहन ३५, सालवी २३, २ साली ८१ सावण ६,१ सास १४, २ सासतउ १४,२ सासू८, १.६९,१ साहइ ४१, १. ७८, " सांकडउ १४, २ साहरइ ४०,१ सांकलउ १५, १ सांकली २०,२ सांखडि २०, १ सांचइ ४२, १ सांजउ १८, १ सांझ ३१, २ सांझूणउ ७८,१ सांड १३, २ सांडसउ १९, २. ३२, २ सांधइ ४१,१ सांन २४,१ सांप्रत १५, १ सांबलड ३३, २ सांभरइ ४१, १ सांभलइ ४७, १ सांभलिवा वांछह ८१, १ सांभलीयि ७८, १ सांभलेब्यु ५२, २ सांभल्यउ ५०, १ सिघ २४, १ सिढिल १५, १ सिणमिणइ ४२,२ सिमकियउ २५, २ सिमथउ ८,१ सिलापट २५, १ सिलावटउ १७, १ सिरघू १९, १ सिरीस २६,१ सिसलउ १३,२ सिंगार १५, १ सिंघाण ११, २ सिंचइ ८०,२ सीअल १७, १ सीकारा १९,१ सीख २४, २. ३४,२ सीखइ ३९, २ सीख्यउ ७, १ सीचिवा वांछइ ८१,१ सीझइ ३८,२ सीथ २२,२ सीदाअइ ४३, १ सीधउ ७,१ सीप १५, २ सीयालउ २०, १ सीर २२, २ सीरख ३२, २ सीरवी १७,१ सीरष ६७, १ सीरामण ३२,२ सीरामणु ६६, २ सील १८,२ सिली ३२, १ सीवइ ३९, २. ४९, १ सीविवउ १९, २ सीव्यउ ५१,१ सीह १३, २ सीहदार ११, १ सीहरी २५, १ सींग १३, २ . सींगउ १६, २ सींगडी १६,२ सींचइ ३७, २. ४८,२ सींधव १०,२ सीभ ३४,२ सु३५, २. ५६, १ सुआसणी ७,२ सुई १०,१ सुईउ १०, सुकिवा वांछइ ८१, २ सुखिहिं ७३, १ सुण ६८,१ सुणइ ४२, सुभट ७४, २ सुमिणउ १५, १ सुरंग ११,१ सुवर्णनां आभरण ७७, १ सुपमाअरउ ६,१ सुसइ ३९, २ सुसरउ ८,१ सुहगुरु ५, १ सुहायइ ४२,१ शब्दानुक्रम । ५ सुंक ९,२ सुंधिवा वांछ। ८१, २ सुंचल ३४, २ सूअइ.१२, २ सूअर १३, २ सूआ २५, १ सूआडि ६९, २ सूआर १९, २ , सेलडी सूकइ ४३, १.४९, १.८०, २ सूकउ ५१,२ सूग २४,१ सूगडांग ६, २ सूगामणउ ३१, २ सूगामण ६४,२ सूजइ ४४, १ सूजवइ ४४, १ सूझइ ३८, २ ४६, १ सूझवइ ४६, १ सूडउ १४, १ सूणहर ३३, १ सूणहरङ ६७,२ सूतउ २०, १. ४९, २ सूत्रहार (सूथार) १०,२ सूत्रु पढइ जाणइ ७७, १ सूपडउ २०,१ सूयिवा वांछह ८१, २ सेकिवा वांछइ ८,२ सेजगंडूआ २५, १ सेठि ७,२ सेव॒जउ ११,२ सेरी १७, १ सेना ७५, १ सेल १६, २ ७१,२ सेवइ ३९, २ सेवंती ३३,१ सेस २३, १ सेहरउ ९, १ सोई २४, २ सोचइ ३७, २ सोनउ २५, १ सोनागेरू ११, २ सोनारउ १८, २ सोनारी १९, २ सोभइ ३९, १ सोरठी ११,२ सोल २८, १.५७, २ सोलमउ ३०,२ सोलंकी २१, २ सोवनगिरि ११,२ सोवा ३५, २ सोहामणउ ३२," सोहिलङ ६०,१ सोहिलं ५७, १ स्तवइ ४७,१ स्तविउ ५०,२ स्तविवा वांछइ ४२, १ स्त्री ७५, १ स्त्रीतणउ समूहु ७६, १ स्त्रीनी सभा ७६, १ स्त्रीनुं धनु ७६, १ स्थिरु ७९, २ स्पर्द्धइ ४६, १ स्मरइ ७२, २ स्मारिवा वांछइ ०२, २ स्याल १३, २ स्वस्थपणउ ६, २ हकारिउ ५०,२ हगइ ३८, २. ४९, १ हडहडइ ४३, १ हणइ ३८, २ हणिउ ५२, १ हणिवू ५३, १ हथसाल ६८,२ हथिणाउर ११, १ हथीयार २६, २ हरइ ३७, १.७२, २ हरडइ १२, २ हरषइ ३९, २ हरपी(ष)इ ४९, हराविउ ६९, २ हरिणनउं चांबडउं ७७, १ हरियाल ११,२ हरी २४, १ हलद ३३, २ हर्यउ ५०, १ हलद्रूआं वडा ७६, १ हलरी ईस १०,१ हलुअउ १५, २ हवइ १८, २. ३५. ३७," हवडा ६२, २ हवडांनुं ६२, २ हडवडांनूं (प्र०) ६२,३ हवं ६३, २ हसइ ४३, २. ४८, २.८०,१ हसावइ ४८, हसिउ ५१,१ हसिवा वांछइ ८१, १ हा (प्र०) ६३, ४ हाक १७,२ हाका ४०, २.४४, २ हाटडी २५, १ हाड ९,१ हाडफूटि २५, २ हाथ८, २.३४, २ सूली १६, २ सूहव ६४, २ सूरिज ५,२ सूंआलउ १४, २ सूंखडी १९, १ सूंघइ ४१, २. ४७, १ सूंघवु ५२, २ सुंध्यउ ५०, १ सूंड १३, १ सूंबरी वडी ३४,२ सूहाली १८, १ सेई २१, २ उक्तिरनाकरादि,अन्तर्गत २ हाथी १३, १. २५, १ हाथी गुलगुलायइ ४१,' हाथीयांनउ समूहु ७६, २ हालइ ३९, १ हा वलि ६३, २ हासी १७,२ हांडी १९, २ हिडकी ७,२ हितूई ७७, २ हितूउ ७७, १.७७, २ हितूर ७७, १.७७, २ हिमालउ ११, २ हियाविउं २६, १ हिवडा २७, १ हिवडांनुं २७, १ हिविड़ां ५५, २ हीअउ ३२, २ . हीकइ ३७, २ हीम १२, १ हीरउ ३५, १ हीलइ ३९, १ हीसइ ३९, २ हींग ७,२ हींगलू ११,२ हींगवणि २३, १ हीडइ ४३, २ हीडइं ७५,२ हीडि २२, २ हीडिया २३, २ हीडोलइ ३७, १ हु ७३, १ हुइ ४७, २. १७, २. ८०, १ हुइवा वांछइ ८१, १ हुईइ ७१, १ हुडुक २३, २ हुयिवळ ७९,२ हुयितुं ७९, २ हुँ ३५, २. ५५, १.७८, २ हुं छउ ३४, २ इंतउ ५६, २ हेजु करइ ४८, हेठ १५, २ हेठलि हेठलि नगरु ७३, २ हेठि ६४, १ हेठिलु ५६,' हेडाऊ १६, १ हेरइ ४१," हेरू ९,२ हेवड १९, हैमंतनु वायु ७८, १ होउ ६३, २. ८२, २ होठ ," होमइ ७०,१ होमिउ ५०, २ [होमिउ] ५१,२ होमिवू ५४,२ होली १८,२ १ . हखु७९, २
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