Sanmati Library, Jaipur

Goraksh Paddhati

Sharma, Mahidhar · 2009/09

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“
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, कल्याण-मुंबई.
Gangavishnu Shrikrishnadass
LAXDI-VENKATESHWAR PRESS,
KALYAN-BOAIBA Y.
इस पुस्तकका रजिष्टरी सब हक १८६७ के ऍक्ट २५
बमुजब यन्त्राधिकारीने अपने स्वाधीन रक्खा है.
Registered for Copyright Under Act XXV of 1867.
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प्रस्तावना. समस्त साधनाओंका मूल योग है. तप, जप, संन्यास उपनिषत् ज्ञानआदि मोक्षहेतु अनेक हैं किंच सर्वोत्कृष्ट योगही है इसीके. प्र- भावसे शिव सर्वसामर्थ्य, ब्रह्मा का, विष्णु पालक है. इसके मुख्य- कर्ता शिवजीने पार्वतीजीसे कहा ब्रह्माजीके सेवन करनेपर योगि- याज्ञवल्क्यस्मृति बनी है. विष्णु (श्रीकृष्णजी) ने गीता, एवं भागवतके ग्यारहवें स्कंधमें कहा है. इसके मुख्यआचार्य आदिनाथ (शिवजी) हैं. इन्हीसे नाथसंप्रदाय प्रवृत्त भया. एक समय आदिनाथ किसी द्वीपमें 'पार्वतीको योग सुनारहेथे वह एक मछलीने सुनकरही दिव्यज्ञान तथा दिव्यदेह पाया यही मत्स्येंद्रनाथ भये और मत्स्येंद्रनाथ शाबरनाथ ( जिन्होंने सावरग्रंथ देशभाषामें बनाये हैं ) आनंदभैरवनाथ, चौरंगी आदियोंसे योग पाय यथेच्छ विचरतेथे कि, एक स्थानमें हातपाव कटेहुये चोरको देखा. रक्त महात्माओंके कृपावलोकनसे, उसके हातपाँव उगाये तथा ज्ञानभी होगया मत्स्येंद्रनाथके कृपासे योग पायकर चौरंगिया नाम योगी सिद्ध विख्यात भया और मीननाथ, गोरक्षनाथ, विरूपाक्ष, रिलेशय, मंथानभैरव, सिद्धबुद्ध, कंथडी, कोरंटक, सुरानंद, सिद्धपाद, चर्पटी, कानेरी, पूज्यपाद, नित्यानंद, निरंजन, कपाली, बिंदुनाथ, काकचंडीश्वर, अल्लाम, प्रभुदेव, घोडाचोली टिटिणी, भानुकी, नारदेव, खंड, कापालिक, तारानाथ इत्यादि योग- सिद्धि पायकर योगाचार्य हुए हैं. योगहीके प्रभावले महासिद्ध अखंडऐ- श्वर्यवान् होकर मृत्युको जीत ब्रह्मानंदमें मन रह ब्रह्मांड में विचरते हैं। इनमेंसे मुख्य मत्स्येंद्रनाथ गोरक्षनाथ योगविद्याके आचार्य भये. गोरक्षनाथने मुमुक्षुजनोंके उपकारार्थ राजयोग, हठयोग आदि बहु- विस्तार एवं बहुसाधनासाध्य जानकर, “यह गोरक्षपद्धति" नामा ग्रंथ २०० श्लोकमें सर्वसमुच्चय सारभूत प्रकट किया सर्वसाधारणके सुवोधार्थ महीधरशर्मा राजधानी टीहरी, जिला गढवालनिवासीने इसका भाषानुवाद करके प्रकाशित किया. इस ग्रंथके प्रथम मंगलाचरणसे ( ५ ) श्लोकमें विषयप्रयोजन संबंध अधिकारी कहे हैं. (१) में योगाभ्यासका फल, (१) में षडंगके नाम, (५) में आसन, (१२) में षट्चक्रनिरूपण, (८) 1 . २ में दशनाडी स्थानोंसहित, (१४ ) में दशवायु, (१०) में शक्ति- चालन, (२६) में महामुद्राआदि,(७) में प्रणवाभ्यास, प्राणाया.. मप्रशंसा, (१) में प्राणायामका प्रकार, (८) में नाडीशोधन, इतने विषय पूर्वशतकमें. तथा ( २१) में प्राणायामका विस्तार, (३०) में प्रत्याहारविधि, (९) में धारणा, (२४ ) में ध्यान, (१३) में समाधि, (१) में मुक्तिसोपान, योगशास्त्राभ्यासका फल इतने विषय उत्तरशतकमें कहे हैं. ऐसी यह गोरक्षपद्धति यो-. गमार्ग जाननेवालोंको अतिउत्तम तथा सुगम है. योगमार्गका प्रयो- जन सभी शास्त्रोंमें पडताहै. विशेषतः संध्या, पूजनआदि द्विजन्मा. ओंके नित्यकर्मभी विना इसके सिद्ध नहीं होते जैसे संध्यामें प्रथम " वद्धपद्मासनो मौनी प्राणायामत्रयं चरेत् " तथा पूजनमें " स्नातः शुचिः प्राङ्मुखोपविश्य प्राणानायम्य इत्यादि सर्वत्र विधिवचन है. यदि योग न जाने तो प्राणायाम पद्मासनआदि कहांसे जाने. इनके न जाननेसे समस्त संध्यावंदनादिसाधन निरर्थक हैं. इस सम- यमें बहुधा लोक नाकपर हाथ लगानेको प्राणायाम समझते हैं. पद्मा- सनादियोंका तो. नामभी नहीं है. तब कहांसे सिद्धि होवे इसी हेतु नास्तिकलोग असिद्ध तथा पोप ( ठग) आदि निंद्यशब्दोंसे अपने मुखविवरोंको दूषित करते हैं यदि योगाभ्यास करें तो सिद्धि प्रत्यक्ष होकर अपना उद्धार हो तथा दूषकोंके उन विवरों में मिट्टी पडे. और : योगग्रंथ बहुत तथा कठिन हैं. ये २ शतक थोडेहीमें ज्ञान देते हैं इस हेतु मैंने भाषाटीका की है कि सभी सज्जन इसे देख थोडाही गुरूपदिष्ट होकर सर्वार्थसाधनयोगमार्गकी महिमा जानजायँगे. पाठ- कोंके सुवोधार्थ मैंने अनेक प्रसिद्ध योगग्रंथोंसे इसे बढाकर गोरक्ष- पद्धति करदिया. और यह ग्रंथ " लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापेखानेके अधिकारी-गंगाविष्णु श्रीकृष्णदासजीको सर्व हक्कसहित देदि- याहै जो यह उन्होंने आपके छापाखानेमें छापकर प्रसिद्ध किया है.

श्रीगणेशाय नमः। अथ भाषानुवादसहिता गोरक्षपद्धतिः। .. श्रीआदिनाथं स्वगुरुं हरि मुनि गोरक्षशास्त्रस्य प्रणम्य योगिनम् । भाषाविवृत्तिं कुरुते महीधरो योगे सुबोधः खलु जायते यया ॥१॥ श्री आदिनाथ (शिवजी) तथा निजगुरु, हरिमुनि योगीको प्रणाम करके महीधरनामा गोरक्षयोगशास्त्र जो यो- गींद्रगोरक्षनाथने दो शतकमें शिष्योपकारार्थ बनाया है. उसकी भापाटीका करता है, जिससे योगमार्गमें सनीको सुगमतासे बो- ध होता है. योगपदका अर्थ मेल है जैसे 'ह' का अर्थ सूर्य 'ठ' का चंद्रमा है इनके योग (मेल) को हठयोग कह- तेहैं. इसीको राजयोगनी कहतेहैं, प्राण, अपानवायु जिनकी सूर्यचंद्रमा संज्ञा है, इनका ऐक्य करनेवाला जो प्राणायाम उसे हठयोग कहते हैं ॥१॥ श्रीगुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्दविग्रहम् । यस्य सान्निध्यमात्रेण चिदानन्दायते तनुः॥२॥ " .

६ गोरक्षपद्धति । शिष्यको आत्माके तत्त्वबोधनिमित्त गुरुस्वरूप धारणकर परम्गुरु श्रीपरमात्माको सहस्रदलकमलमें भावनापूर्वक प्रथम ग्रंथारंभमें विघ्नविघातार्थ प्रणाम करतेहैं, कि जीवब्रह्मकी ऐ- क्यता योगशास्त्रका प्रयोजन है. सद्गुरुके समीप भक्तिपूर्वक रहने- से शिष्यका पांचभौतिक शरीरभी आनंदमय होजाताहै. आनं-- दही परब्रह्मका रूप है जैसे श्रुतिमी कहती है कि आनन्दो ब्रह्म- णो रूपम्" यदि ऐसा न हो तो उसकी पहछाननी नहीं होसके क्यों कि "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तोन चादिर्न च संप्रतिष्ठा" इत्यादि गीता । एवं वेदांतग्रंथों में लिखा है कि उसका रूप तथा जन्म, मरण, मध्य और रंग चिह्न मूर्तिआदि कुछ नहीं है. के- बल आनंदमय स्वयंप्रकाशमान है. तथा निर्विकल्प आनंदमय होजानेकोही मक्ति कहते हैं. ऐसे परमआनंदस्वरूप परब्रह्मको (जिसका शरीरभी आनंदही है) वंदना करके ग्रंथारंभ कर- ते हैं जिसके सानिध्य (सम्मुख) होनेसे, अर्थात् ( केवला- नुभवानंद ) वह आनंदात्मा परमात्मा केवल मनके मनन अ- नुभव विचार करनेसे अपनेही बीच पाया जाता है. न कि इतस्त- तः तीर्थयात्रादि फिरनेसे, यह अनुभव केवल योगहीसे साध्य है. यह ज्ञानकी प्रथम भूमिका है. नाडीशोधन, वायुशोधन,, ध्यान, धारणा आदि विना एवं गुरुकृपा विना नहीं मिलता. विना ज्ञानके मुक्ति नहीं मिलती श्रुतिमी कहती है कि "ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः" मुक्तिपदार्थ वही आनंदमय होजाताहै. योगसे ज्ञान पायके जीवपरमात्माका एकभाव होनेमें वह आनंदस्वरूप पर- ७ भाषानुवाद । श० १ ब्रह्म साक्षात्कार होताहै इस ज्ञानगम्यके प्रत्यक्षमात्र होनेहीसे - परमचिदानंदमय आपही योगी होजाताहै. जैसे ज्ञानकी सात भूमिका है. ज्ञानभूमि १ विचारणा २ तनुमानसा ३ सत्त्वापत्ति ४ संसक्तिनामिका ५ पदार्थाभाविनी ६ तुर्यगा ७ ये सात हैं. विवेक वैराग्य हैं प्रथम जिसमें ऐसी तीव्र मुमुक्षारूप पहिली. श्र- वणमननरूपा दूसरी. मनमें अनेक अर्थ संकल्प विकल्प उत्पन्न तथा नाश होतेहैं. इन सभीको छोडके, सत् एकार्थमें वृत्ति होनी. तनुमानसा तीसरी. ये तीन साधनमामिये हैं इनसे जब अंतःकरण शुद्ध हो तब "अहं ब्रह्मास्मि" मैं ब्रह्म हूं ऐसा योगी कहताहै. समस्त साधन पूजनजपादिकमें “अहं ब्रह्मास्मीति चिरं भावयेत् "लिखाहै, यह भावनाविना उक्त तीन भूमिका साधे होतेही नहीं है इसलिये विना मार्गके कुछभी साधन नहीं होता है चौथी, सत्त्वापत्ति ज्ञानभूमि यही फलमि है इसमें जब योगी प्राप्त होवे तब ब्रह्मवित् कहाता है. इसी सत्त्वापत्तिमिमें समीपही वही जो सिद्धि उसमें आसक्त न होना, इसे असंसक्तिनाम पांचवीं ज्ञानभूमि कहतेहैं. इसमें जब योगी प्राप्त होवे तो उसे ब- ह्मविद्वर कहतेहैं, जिसमें परब्रह्मसे व्यतिरिक्त अर्थको भावना न करे वह पदार्थाभाविनी छठी ज्ञानभूमि है इसमें जब योगी प्राप्त होता है तो वह दूसरेके बोधन करनेसे मात्र प्रबुद्ध होता है. नहीं तो एकाग्रशून्याकारही रहता है उसे ब्रह्मविद्वरी- यान् कहते हैं. तर्यगा नाम सातवीं भूमि है इसमें योगी प्राप्त होनेसे ब्रह्मविदरिष्ठ कहते हैं. इतने साधनाओंसे स्वात्माराम गोरक्षपद्धति । चिदानंद, परमानंद, चिन्मय आदियोगी आपही होजाता है. का- लरहित होता है. "अन्तर्निचलितात्मदीपकलिकास्वाशरबन्धा- दिभिर्यो योगी युगकल्पकालकलनाचत्वं च जेगीयते । ज्ञाना- मोदमहोदधिः समभवद्यत्रादिनाथः स्वयं व्यक्ताव्यक्तगुणा- विकं तमनिशं श्रीमीननाथं भजे" जो मीननाथयोगीश्व- र मूलाधारबंध, उड्डीयानबंध, जालंधरबंध आदि योगाभ्या- ससे हृदयकमलमें निश्चलदीपककी ज्योतिसरीखी परमा- स्माकी कला साक्षात्कार करके श्वास, पल, घटी, प्र- हर, दिन, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, मन्वंतर, कल्प आ- दि निरंतर पुनः पुनः फिरनेवाला है स्वरूप जिसका ऐसे काल- को तथा जलादि २५ तत्त्वोंको पहचानके योगाश्याससे जी- तता है तथा ज्ञानानंदरूपी समुद्र होकर गुप्तप्रकट अर्थात् सगुण निर्गुण होनेकी सामर्थ्य रखनेवाला आदिनाथ शिवस्वरूपकी भावना नित्य करनेके अग्याससे; आपही साक्षात् शिव हो गया है. ऐसे योगीश्वर श्रीमीननाथको दिनरात नमस्काररूप से- वन करताहूं ॥२॥ नमस्कृत्य गुरुं भक्त्या गोरक्षो ज्ञानमुत्तमम् । अभीष्टं योगिनां ब्रूते परमानन्दकारकम् ॥३॥ योगी गोरक्षनाथ भक्तिपूर्वक गुरुको प्रणाम करके पूर्वजन्म- के योगसेवनसे इस जन्ममें पूर्णयोगमार्गका बोध देनेवाला योग- शास्त्र कहते हैं. जिससे योगियोंको अभीष्ट (मनोवांछित) मिल- भाषानुवाद । श०१ ता है तथा परमयोगानंद यद्वा ब्रह्मानंद होता है. कर्म और भक्तिसे जब चित्त शुद्ध होवे तब योगशास्त्र में अधिकारी होताहै ॥३॥ गोरक्षसंहितां वक्ति योगिनां हितकाम्यया । ध्रुवं यस्यावबोधेन जायते परमं पदम् ॥४॥ योगिजनोंके हितके लिये योगींद्र गोरक्षनाथ गोरक्षसंहिता नाम योगशास्त्र कहता है, जिसका बोध होनेसे योगीको (परमपद) जीवन्मुक्ति होती है यद्वा वह मिलता है जिसमें पहुंचकर पुनरा- बृत्ति फिर लौट आना नहीं होता ॥ ४ ॥ एतद्विमुक्तिसोपानमेतत्कालस्य वञ्चनम् । यद्यावृत्तं मनो भोगादासक्तं परमात्मनि ॥६॥ जब योगाभ्याससे मन विषयभोगोंसे हटजानेपर परमात्मा (ईश्वर) में आसक्त हो जावे तब योगी काल तथा मृत्युको जीतकर जरा (बुढापा) मृत्यु (मरण) को जीतता है मुक्तिका सोपान (सीढी) यही कर्म है, और कालकी वंचनाभी यही है । द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम् ॥ शमनं भवतापस्य योगं भजत सत्तमाः॥६॥ सज्जनको संबोधन करके, गोरक्षनाथ कहते हैं कि हे सत्तम श्रेष्ठजनो! वेदरूपी कल्पवृक्षके फल इस योगशास्त्रका सेवन करो. जिसके शाखा (टहनियां) योगिरूपी द्विज (पक्षी) अथवा मु- निजनोंसे सेवित हैं और संसारके तीन प्रकारके ताप (केशों) को शमन करताहै ॥ ६॥ h

गोरक्षपद्धति।
आसनं प्राणसंरोधःप्रत्याहारश्च धारणा ।
घ्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि वदन्ति षट् ॥७॥
प्रथम आसन सिद्ध करके क्रमशः प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान, समाधिका अश्यास करना ये योगके छः अंग हैं
इनके पृथक् विस्तार आगे कहेंगे. यमनियमसंपन्न योगीको
क्रमपूर्वक आयासकरके समाधिका लाभ होता है जिससे निर्वि-
कल्प समाधिसे राजयोग सिद्ध होता है. तब चिदानंदस्वरूप आप-
ही होके योगानंदको प्राप्त होता है ॥ ७॥
अथासनानि।
आसनानि च तावन्ति यावन्तो जीवजन्तवः।
एतेषामखिलान् भेदान् विजानाति महेश्वरः॥८॥
आसनोंका विस्तार कहते हैं कि जितने जीवमात्र अर्थात्
चौराशी लक्ष योनि हैं उतनेही आसननी उन्हींके शरीरचेष्टानु-
सार हैं इनके प्रत्येक भेदोंके जाननेहारे केवल शिवजी मात्र हैं
और कोई नहीं जानता ॥ ८॥
चतुराशीतिलक्षाणामकैकं समुदाहृतम् ।
ततः शिवेन पीठानां षोडशोनं शतं कृतम् ॥९॥
चौराशी लक्ष आसनोंके भेद मनुष्योंसे न जाने जायगे इस
प्रकार जानकर करुणामय शिवजीने सर्वसाधारणके उपकारहेतु
चौराशी (८४) मात्र आसन योगशास्त्रमें प्रगट किये. यही
सबमें सार हैं ॥ ९॥

. भाषानुवाद । श०१ ११ आसनेभ्यः समस्तेभ्यो द्वयमेतदुदाहृतम् । एक सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम् ॥१०॥ इन ८४ आसनोंमेनी बहुतविस्तार होनेसे योगधारण करने- वालोंके उपकारहेतु दोही आसन मुख्य कहेहैं. इससे इस ग्रंथमें सुगमताके लिये सर्वसंमत एक सिद्धासन दूसरा पद्मासन सविस्तार कहा जाताहै ॥ १०॥ योनिस्थानकमंत्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसे- न्मेढ़े पादमथैकमेव हृदये कृत्वा हनुं सुस्थिरम् । स्थाणुः संयमितेन्द्रियो चलद्दशा पश्येद्धवारन्तरं ह्येतन्मोक्षकपाटभेदजनक सिद्धासनं प्रोच्यते ॥११॥ सर्वोत्कृष्ट दो आसनों से प्रथम सिद्धासनकी विधि कहतेहैं कि, गुदा और लिंगके बीचमें योनि (कुंडलिनीका) स्थान है इसको वामपादकी एडीसे दृढ पीडन ( दबाव) करे दाहिने पैर- की एडी लिंगके ऊपर लगाकर दबावे दोनों पैरोंकी एडियां नीचे ऊपर बराबर होजाती हैं तथा दोनों पैरोंके अंगुष्ठ जंघा और गुल्फोंके बीच नीचे छिपजाते हैं इनके दबावसे योनिस्था- नके तले ऊपरके दो इंद्रिय गुदा, उपस्थ रुकजातेहैं. तदनंतर हृदयके चार अंगुल ऊपर चिबुक (ढोडी) स्थिर करे और समस्तइंद्रियोंसे हटाकर एकाग्र चित करे तथा दोनों नेत्रोंसे अ- चलष्टि कर चुकुटि (भूमध्य ) देखतारहे यह मोक्षरूपी द्वार (दरवाजे ) के कपाट (किंवाड ) को खोलकर मोक्षमार्ग दि- १२ गोरक्षपद्धति। खाताहै. यहा जो कुंडलिनीसे रुकाहुआ सुषुम्णाद्वार उसे खो- लकर मोक्षमार्ग (सुषुम्णा) के द्वारा मोक्षस्थान सहस्रदलक- मकर्णिकांतर्गत परमात्मामें पहुँचानेका यत्न करता है यह सिद्धासन है ॥ ११ ॥ वामोरूपरि दक्षिणं च-चरणं संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् । अंगुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकये- देतव्याधिविकारनाशनकरं पद्मासनं प्रोच्यते ॥१२॥ बाये ऊरु (जानुमूल) में दाहिना पैर उत्तान करके तथा दक्षिण ऊरु (जानमल) में वामपाद वैसेही स्थापन करके दाहिने हाथको पीठपीछे धुमायके दाहिने पैरके अंगूठेको ग्रहण करे तथा बाये हाथको पीठपीछे घुमायके दाहिने हाथ ऊपरसे लेजायकर बांये पैरके अंगुष्ठको ग्रहण करे. तब चिबुक (ढो- डी)को छातीसे लगाय, दोनों नेत्रोंसे नासिकाका अग्रभाग निरं- तर देखतारहे. यह योगियोंके समस्तरोगविकार नाश करनेवा- ला बद्धपद्मासन है ॥ १२ ॥ प्रकारांतरसेमी पद्मासन कहाहै इसलिये में ग्रंथांतरमतसे मत्स्येंद्रनाथके मतकाजी लिखताहूं- उत्तानौ चरणौ कृत्वा ऊरुसंस्थौ प्रयत्नतः। ऊरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी कृत्वा ततो दृशौ ॥१॥ नासाग्रे विन्यसेदाजदन्तमूले तु जिह्वया। उत्तम्भ्य चिबुकं वक्षस्युत्थाप्य पवनं शनैः॥२॥ .

भाषानुवाद । श०१ १३. इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधिविनाशनम् । दुर्लभं येन केनापि धीमतालभ्यते बुधैः॥३॥" ऊरु (जानुमूल) में पूर्वोक्तप्रकारसे चरण (जैसे दक्षिण ऊरुमें वाम, वाममें दक्षिणचरण, उत्तान अर्थात्, पैरोंके पीठ जानुपर लगी रहें.) स्थापन करके दोनों हाथ सीधे एडियोंके ऊपर नीचे वाम ऊपर दक्षिणहस्त रखके दृष्टि नासिकाके अग्रभागपर निश्चल रक्खे तदनंतर राजदंत (डाढों) के मूल दक्षिण वाम दोनों में जिह्वा कर ऊर्ध्वस्तमन करे ( यह जिह्वाबंध गुरुमुखसे जान- ना चाहिये जिह्वाबंध मूलबंधका विस्तार ५७।५८ श्लोकमें कहेंगे) तथा चिबुक (ढोडी) को चार अंगुल अंतर छोडकर छातीसे लगाय मंद मंद वायुको उठावे. यह मूलबंध है. (यहती गुरुमुखबोध्य हैं) यह पद्मासन मत्स्येन्द्रनाथके मतका है. संपूर्ण- रोगोंको नष्ट करताहैं. जो संसारमें भाग्यहीन हैं. उनको दुर्लभ है. बुद्धिमान् एवं पुण्यवान् पुरुषोंको गुरुकृपासे मिलताहै। ॥२३॥ अथषट्चक्रनिरूपणम् । षट्चक्रं षोडशाधारं द्विलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् । स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिनः १३॥ विषमवासनासे मन चंचल रहताहै रोकेसे रुकता नहीं विना मन रोके योगसिद्धि नहीं होती. मन रोकने के लिये कुछ निमित्त (अबलंबन) अवश्य होना चाहिये. इस हेतु छः चक, सोलह आधार, दो लक्ष्य, पांच आकाश, ये चार प्रकार भेद (सर्व उन- १४ गोरक्षपद्धति। तीस) कहते हैं, कि मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा ये छः चक्र हैं इनका विस्तार आगे कहेंगे आधार सोलह हैं इनके विशेषविस्तार अतिगुह्य होनेसे श्रीगोरक्षनाथने यहां प्रगट नहीं कहे और इनके प्रकटताविना सर्वसाधारणको बोध होना असंभव है इसलिये जैसा गुरुकपासे जाना. यहां ग्रंथा- तरीयमतसे प्रकट करता हूं.प्रथम आधार पादांगुष्ठ है इसपर एका- अदृष्टि करके ज्योति चैतन्य करे इससे दृष्टि स्थिर होतीहै । दू- सरा आधार मूलाधार. इसे पावोंकी एडीसे अचेतन करना इससे अनि दीप्त होतीहै २। तीसरा गुह्याधार. इसके संकोचविकाशके आयास करनेसे अपना वायु फिरके वजगनाडीमें प्रवेश कर बिंदुचक्रमें जाताहै इससे शुक्रस्तंभन एवं (वज्रोली) रेत योनिमें पात न करके पुनः आकोचनक्रमसे वज्रनाडीद्वारा बिंदुस्थानमें प्राप्त करनेकी सामर्थ्य होती है ३।४। पंचम उड्डीयानबंध आधा- र है. पश्चिमतान आसन बांधके गुदाको संकोचन करे इससे मल मूत्र कमिका नाश होताहै ५। छठा नाशिमंडलाधार. जिसमें चैत- न्य ज्योतिःस्वरूपका ध्यान करनेसे एवं प्रणवके जपसे नाद उत्प- न होता है ६। सातवां हृदयाधार. इसमें प्राणवायुको रोध करनेसे हृदयकमल विकासित होता है । आठवां कंठाधार. इसमें ढोडी हृदयपर दृढ लगायके ध्यान करे तो इडा पिंगलामें वहताहुआ वायु स्थिर होता है 1 नवम क्षुद्रघंटीकाधार. कंठमूल है इसमें जो दो लिंगाकार ऊपरसे लटकती हैं उनतक जिह्वा पहुंचावे तो ब्रह्मरंध्रमें चंद्रमंडलसे वहताहुआ अमृतरस मिलता है ९१ दशम - भाषानुवाद । श०.१ १५ जिह्वामूलाधार. इसमें खेचरीमुद्राके प्रकारसे जिह्वाग्रसे मथन क- रे तो खेचरीसिद्धि होती है ११ ग्यारहवां जिहाका अधोभा- गाधार. जिसमें जिह्वायसे मथन करके दिव्यकविताशक्ति होतीहै ११ । बारहवां ऊर्ध्वदंत मूलाधार. जिसमें जिह्वायस्थापनके अभ्याससे रोगशांति होती है १२। तेरहवां नासिकामाधार. जिसमें दृष्टि स्थिर करनेसे मन स्थिर होता है १३। चौदहवां नासिकामूलाधार. जिसमें दृष्टि स्थिर करनेसे छः महीनेके निरंतर अभ्यासकरके ज्योति प्रत्यक्ष होती है १४ । पंद्र- हवां नमध्याधार. जिसमें दृष्टि अचलदृष्टिके अभ्यास करके सूर्यकिरणोंके समान ज्योति प्रकाश होती है इसी अभ्यासके दृढ होनेपर सूर्याकाशमें मनका लय होता है १५ । सोलहवां नेत्रा- धार. जिनके मूलमें अंगुलिसे मीचतेमें वर्तुलाकार बिंदुसमान इंद्रधनुषके समान रंगकी ज्योति है इस ज्योतिके देखनेका अश्या- सकरके ज्योति प्रत्यक्ष होतीहै १६ ये सोलह आधार हैं. अथ- वा मूलाधार १ स्वाधिष्ठान २ मणिपूर ३ अनाहत ४ विशुद्ध५ आज्ञाचक्र ६ बिंदु ७ अदु ८ रोधिनी ९ नाद १० नादांत ११ शक्ति १२ व्यापिका १३ समनी १४ रोधिनी १५६वर्म- डल १६ ये सोलह (१६) आधार हैं ब्रह्म तथा अपनेमें अभेद समझकर भावना करनेसे सिद्धि होती है अब दो लक्ष्य कहते हैं ये दो प्रकार बाह्य आत्यंतरीय हैं देखनेके उपयोगी नासिका तथा नमध्य इत्यादि बाह्यलक्ष्य हैं मूलाधारचक्र, हृदयक- मल इत्यादि आभ्यंतरलक्ष्य हैं. अथ पांच आकाश इस प्रकार १६ गोरक्षपद्धति। हैं कि प्रथम श्वेतवर्ण ज्योतिरूप आकाश है इसके भीतर रक्त- वर्ण ज्योतिरूप प्रकाश है इसके भीतर धूम्रवर्ण ज्योतिरूप महा- काश है इसके भीतर नीलवर्ण ज्योतिस्वरूप तत्त्वाकाश है इसके भीतर विद्युत् (बिजुली ) के वर्णका ज्योतिस्वरूप सूर्या- काश है ये पांच आकाश हैं इतने ६ चक्र १६ आधार र लक्ष्य ५ आकाश शरीरमें हैं इन्हें जो योगी नहीं पहचानता उसको योगसिद्धि नहीं होती ॥ १३ ॥ एकस्तम्भं नवद्वारं गृहं पञ्चाधिदैवतम् । स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिनः॥१४॥ शरीरस्तंभरूपी गृह है इसमें सकलवासनाओंका आश्रय मन है यही खंगारूप होकर समस्तशरीरको थामे रहताहै जिस- के मुख १ नेत्र २ नासिका २ कर्ण २ गुह्य १ लिंग १ ये ९ द्वार हैं तथा पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश पंचतत्त्वोंके ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव अधिदेवता हैं ऐसे शरीररू- पी गृहको जो योगाश्यासी नहीं जानता वह योगसिद्धि कैसे पासकताहै ॥ १४ ॥ चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षड्दलम् । नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्यादलं हृदि ॥१५॥ कण्ठे स्यात् षोडशदलं चूमध्ये द्विदलं तथा । सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे।॥ १६॥ षट्चक्रोंके पृथक् वर्णन है कि प्रथम मूलाधारचक्र गुदद्वारमें १७ भाषानुवाद । श०१ पीले वर्णका अधोमुख कमल है जिसके ४ दलोंमें व, श, ष, स, बीज शोभित हैं आठों दिशामें आठ शूलोंसे वेष्टित पीतवर्ण मध्य कर्णिकामें चतुष्कोण शुमंडलके भीतर, हाथीके ऊपर आरूढ जिसके पार्श्व (बगल) में (लं) बीज है और चार हाथ चार मुखका ब्रह्मा कोटिसूर्य्यसमान प्रकाशमान एवं डाकिनीशक्तिसे युक्त है वहीं देदीप्यमान त्रिकोणाकार कामाख्य पीठ है तिसके मध्य- में पश्चिममुख स्वयंभू लिंग है उसके बीचमें बिजुली समान च- मकवाली साढे तीन फेरे (वृत्त) से वेष्टित होकर, सुषुम्णाके द्वा- रको रोकके सोया हुआ सर्प जैसी कुण्डलिनी महाशक्ति है जैसे पृथ्वीका आधार शेष तैसेही शरीरका आधार यह है विना इसके जागे और उपाय योगके व्यर्थ हैं. इसलिये प्रथम इसका बोधन करना मुख्य है १ । दूसरा स्वाधिष्ठानचक्र. लिंगमूलमें रक्तवर्ण ऊर्ध्वमुख षड्दल ब, भ, म, य, र, ल इन ६ वर्गों से शोभित कमल है शुक्रवर्ण कणिकामें अर्द्धचंद्राकार जलमंडल है इसक बीचमें (4) बीज है जिसके पार्श्व (बगल) में श्रीवत्सकौस्तुम पीतांबर वनमालाओंसे शोभित चतुर्भुज विष्णु शाकिनाशक्ति- सहित हैं ।तीसरा मणिपूरचक्र. नाभिमूलमें नीलवर्ण ऊर्ध्वमुख दशदल कमल ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, ५,.फ इन- १० व- गोसे शोभित है मध्यकर्णिकामें स्वस्तिकाकार तेजोमंडल है. इसके मध्यमें सूर्य के समान तेजधारी मेषवाहन (२) बीज चतुर्भु- ज है इसके पार्श्वमें रक्तवर्ण विऋतिभूषित, नीलवर्ण, चतुर्भुज लाकिनीशक्तिसहित महारुद्र हैं ३। चौथा अनाहतचक्र. हृदयमें २ . . गोरक्षपद्धति । द्वादशदलकमल ऊद्रमुख क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झत्र ट, ठ इन १२ बीजोंसे शोभित है उसके कर्णिकामें धूम्रवर्ण, षट्कोण वायुमंडलके मध्यमें धूम्रवर्ण, चतुर्बाहु, कृष्णमृगवाहन (1) बीज है. इसके पार्श्वमें अभयमुद्रा धारण करके काकि- नीशक्तिसहित ईश्वर हैं कर्णिकाके त्रिकोणमें सुवर्णवर्ण बाणलिंग है यह पूर्णागिरि पीठ कहाता है ४। पांचवां विशुद्धचक्र. कंठ- स्थानमें रक्तवर्ण, ऊर्ध्वमुख, षोडशदलकमल अ,आ,इ, ई, उ,ऊ, ऋ ऋ; ल; ल, ए, ऐ, ओ, औ, अं,अः इन १६ वाँसे शो- मित है स्फटिकवर्णकर्णिकामें वर्तुलाकार आकाशमंडल जिसमें निष्कलंक पूर्णचंद्रमा है इसके मध्यमें श्वेतहाथी वाहन, पाश, अभय, वर, अंकुश, धारण करता आकाश बीज (है) इसके पार्श्वमें शाकिनीशक्तिसहित सदाशिव हैं यह जालंधरपीठ कहा- ता है ५। छठा आज्ञाचक्र.चूमध्यमें श्वेतवर्ण ऊर्ध्वमुख द्विदलह, क्ष, इन २ बीजोंसे शोजित कमल है इसके कर्णिका हाकिनी- शक्तिसहित शिव है कणिकाके त्रिकोणमें, इतरलिंग नामा शिवलिंग है यही मनका स्थान है उड्डीयानभी इसीको कहते हैं । इसके ऊपर सहस्रदलकमल ब्रह्मरंध्रमें श्वेतवर्ण पूर्ण- चंद्रसमान मुख परमानंदस्वरूप ह, ल, क्ष इन ३ वाँसे शो- भित है त्रिकोणकर्णिकामें पूर्णचंद्रमंडल जिसके मध्यमें बिजुली- के समान चमकीला परमानंदरूप देदीप्यमान ज्योति है इसमें चिदानदस्वरूप परमशिव विराजमान हैं इनके पार्श्वमें सहस्रसू- र्यके समान तेजधारी प्रबोधस्वरूप अर्धचंद्राकार निर्वाणकला भाषानुवाद । श०१ १९ विराजमान है. इसके बीच में कोटिसूर्यसमान तेजधारी रोम- समान सूक्ष्म निर्वाणशक्ति विराजमान है इनके मध्यमें मन तथा वचनसे अगम्य केवलं योगसे गम्य चिदानंदस्वरूपसे पर क्या अतिपर परमं शिवपद है जिसको परब्रह्मपद कहते हैं विराजमान हैं जिसके निमेषोन्मेष अर्थात् पलक खोलने मीचनेमें सृष्टि उत्पन्न और नष्ट होती है ॥ १५ ॥ १६ ॥ आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् । योनिस्थान द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते ॥१७॥ पहिला मूलाधार स्वाधिष्ठान इन दो चक्रोंके बीचमें योनि- स्थान है यही कामरूप पीठ है. अर्थात् मूलाधारके कर्णिकामें कामरूप पीठ है ॥ १७॥ आधाराख्य गुदस्थाने पङ्कजं च चतुर्दलम् । तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता१८॥ मूलाधार (गुदा) में जो चतुर्दलकमल विख्यात है उसके । मध्यमें त्रिकोणाकार योनि है जिसकी वंदना समस्त सिद्धजन क- रते हैं पंचाशत् वर्णसे बनी हुई कामाख्या पीठ कहाती है॥१८॥ योनिमध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखस्थितम् । मस्तके मणिवदिम्ब यो जानाति स योगवित्॥१९॥ पूर्वोक्त त्रिकोणाकारयोनिमें सुषुम्णाद्वारके संमुख स्वयं | नाम करके जो महालिंग है उसके शिरमें मणिके समान देदीप्य- मान बिंब है यही कुंडलिनी जीवाधार शरीराधार मोक्षदार है । इसे जो सम्यक प्रकारसे जानता है उसे योगवित् कहते हैं॥१९॥ . -- .

२०. गोरक्षपद्धति। तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् । त्रिकोणं तत्पुरं वढेरधो मद्रात्प्रतिष्ठितम् ॥२०॥ मेढ़ (लिंगस्थान ) से नीचे मूलाधारकर्णिकामें रहता तो हुए सुवर्णके समान वर्ण, एवं बिजुलीके समान चमकदमकवा- ला जो त्रिकोण है वही कालानिका स्थान है ॥ २० ॥ यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् । तस्मिन् दृष्टे महायोगे यातायातान्न विन्दते ॥२१॥ इसी त्रिकोणविषय समाधिमें अनंत विश्व (संसार ) में व्यात होनेहारी परमज्योति प्रकट होती है वही कालामिका रूप है जब योगी ध्यान, धारणा, समाधिकरके उक्त ज्योतिको देखने लगता है तो उसको जन्ममरण नहीं होते अर्थात् अजरामर हो जाता है ॥ २१॥ स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः । स्वाधिष्ठानाश्रयादस्मान्ममेवाभिधीयते ॥२२॥ स्वशब्द प्राण (हंस) का बोधक है इसका आश्रय स्वाधिष्ठान (लिंगमूल ) है प्राणका अधिष्ठान होनेसे इसेही मेढ़ कहा जाता है ॥२२॥ तन्तुना मणिवत्प्रोतो यत्र कन्दः सुषुम्णया। तन्नाभिमण्डलं चक्र प्रोच्यते मणिपूरकम् ॥२३॥ नाभिमें एक कंद है. जिससे सर्वांगव्यापिनी सिरा. (नसे) नि- कली हैं जैसे १० नसें ऊपरको हैं जो शब्द, रस, गंध, श्वास, ज़ंभा, क्षुधा, तृषा, डकार, नेत्रदृष्टि, धारणा (मगजशक्ति) , - भाषानुवाद । श०१ इन दश कामोंको अपने २ स्थानोंमें दीपन करती हैं तथा १० नसें नीचेको हैं वात, मूत्र, मल, शुक्र, अन्न, पान, रसको नीचे पहुँचाना इनका काम है और चार जिनकी तिछी गति है. दो दाहिने बगल दो बायें बगल होकर अगणित सूक्ष्मशा- खा बनके सर्वांगमें जालेके नाई रोमरोम प्रति पूरित हैं उन्हींके मुखोंसे प्रस्वेद देहके बाहर रोमोंमें होके आता है. तथा उन्हींके मार्गोंसे लेप, मर्दनादि पदार्थ भीतर प्रवेश करते हैं. इस प्रकारका नाभिकंद जैसे सूत्रमें मणि पिरोया रहता है ऐसेही सुषुम्णानाडीमें पिरोया है इसे नाभिमंडलस्थ मणिपूरचक्र कहते हैं ॥ २३ ॥ द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते । तावज्जीवो भ्रमत्येव यावत्तत्त्वं न विन्दति ॥२४॥ हृदयमें द्वादशदल अनाहत चक्र है जिसमें तत्त्वातीत (सत्त्व- रजस्तमोगुणरहित) जीव है गुणातीत होनेसे पुण्यपापसेमी रहित है परंतु जब तत्त्वकी पहिचान योगाभ्याससे हो जावे तब ये गुण जीवमें आते हैं विना तत्त्वज्ञान जीव संसृतिमें भ्रमणही करता रहता है ॥ २४ ॥ अथ दशनाडीवर्णनम्। ऊच मेद्रादधो नाभः कन्दो योनिः खगाण्डवत् । तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणां द्विसप्ततिः॥२५॥ लिंगमूलसे ऊपर नाभिके कुछ नीचे कंदके सदृश समस्त ना- डियोंका मुल ( उत्पत्तिस्थान ) पक्षिके अंडेके समान आकार- - .

गोरक्षपद्धति । ૨૨ वाला है इससे बहचर (७२) हजार नाडी ऊपर नीचे तिर्टी होकर सर्वांग व्याप्त है ॥ २५ ॥ तेषु नाडीसहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृताः। प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तासु दश स्मृताः॥२६॥ उक्त ७२ हजार नाडियोंमें मुख्य बहत्तरही हैं इनमेंजी प्राणवाहिनी (वायु चलानेहारी) प्रधान दशही नाडी हैं ॥२६॥ इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तृतीयका । गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी॥२७॥ अलम्बुषा कुहश्चैव शजिन्नी दशमी स्मृता। एतन्नाडीमयं चक्र ज्ञातव्यं योगिभिः सदा ॥ २८॥ इडा १ पिंगला २ सुषुम्णा ३ गांधारी ४ हस्तिजिह्वा ५ पूषा ६ यशस्विनी ७ अलंबुषा ८ कुहू ९ शंसिनी १० ये उ- क मुख्यनाडियोंके नाम हैं. यह नाडीमय चक्र योगाभ्यासीको अवश्य जानने योग्य है तदनंतर इन नाडियोंमें चलनेवाले वा- युको जानना तब प्राणायामसे नाडीशोधन होता है।॥२७॥२८॥ इडा वामे स्थिता भागे पिङ्गला दक्षिणे स्थिता। सुषुम्णा मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि ॥ २९ ॥ दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे च दक्षिणे। यशस्विनी वामकणे ह्यानने चाप्यलम्बुषा ॥ ३०॥ नासिकाके वामभागमें इडा, दक्षिणक्षागमें पिंगला नाडी वहती है इनके मध्यमें सुषुम्णा नाडी रहती है इन तीनोंकी जड ५

२३
भाषानुवाद । श०१
मूलाधारचक्रकी कर्णिकाका त्रिकोण है. जिसके वामकोणसे
इडा, दक्षिणकोणसे पिंगला और पश्चिमकोणसे सुषुम्णा नाडी
उत्पन्न हुई है ये तीनों नाडी उक्तचक्रको अंकमाल किये हैं अ-
पने २ ओरके नासिका छिद्रसे वहती है मध्य सुषुम्णा मूलाधारसे
ब्रह्मरंध्रपर्यंत है अन्य नाडी उक्तचक्रके कंदसे उत्पन्न होकर प्र-
त्येक रंध्रमें है जैसे वामनेत्रमें गांधारी, दक्षिण नेत्रमें हस्तिजि-
ह्वा, दक्षिणकर्णमें पूषा, वामकर्णमें यशस्विनी, मुखमें अलं-
बुषा हैं ॥ २९ ॥ ३०॥
कुहूश्च लिङ्गदेशे तु मूलस्थाने च शशिनी।
एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ति दश नाडयः॥३१॥
लिंगदेशमें कुहू, मूलस्थानमें शंखिनी ये दो उस कंदसे अ-
धोमुख होकर नीचेको गई है और ऊर्द्धमुख होकर ऊपरको हैं
इस प्रकार ये दश नाडी प्राणवायुके एक एक मार्गमें आश्रय
करके स्थित हैं ॥ ३१ ॥
इडापिङ्गलासुषुम्णाः प्राणमार्गे समाश्रिताः।
सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः॥३२॥
चंद्रमा, सूर्य और अभि हैं देवता जिनके ऐसी इडा, पिंगला,
सुषुम्णा ये तीन नाडी प्राणवायुके मार्ग हैं ॥ ३२ ॥
अथ दशवायवः।
प्राणोपानः समानश्चोदानव्यानौ च वायवः ।
नागः कूर्मोऽथ कृकलो देवदत्तो धनंजयः॥ ३३ ॥

गोरक्षपद्दति । २४ प्राण १ अपान २ समान ३ उदान ४ व्यान ५ नाग ६ कूर्म ७ ककल ८ देवदत्त ९ धनंजय १० ये दश वायु शरी- रमें हैं ।। ३३ ॥ हृदि प्राणो वसेन्नित्यमपानो गुदमण्डले । समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमध्यतः॥३४॥ व्यानो व्यापी शरीरेषु प्रधानाः पञ्च वायवः । प्राणायाः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः॥३५॥ प्राणवायु हृदयमें रहकर श्वास वाहर जीतर निकलता तथा अन्नपानादिकोंका परिपाक करता है १ अपानवायु मूलाधारमें मलमूत्र बाहर निकालनेका काम करता है २ समानवायु ना- जिमें शरको शुष्क अर्थात् यथास्थान रखनेका काम कर रता है ३ उदानवायु कंठमें रहकर शरीरकी वृद्धि करता है ४ न्यानवायु सर्वशरीरमें लेना, छोडनाआदि अंगधर्म कराता है ५ वायु तो १० हैं परंतु इनमें प्रशन ये पांचहीं हैं शिवयोगशास्त्र- के मतसे मुख, नासिका, हृदय, नानिमें कुंडलिनीके चारों ओर तथा पादांगुष्ठमें सर्वदा प्राणवायु रहता है १ गृह्य, लिंग, ऊरु, जानु, उदर, पेडू, कटि, नानि इनमें अपानवायु रहता है २ कर्ण, नेत्र, कंठ, नाक, मुख, कपोल, मणिबंध व्यानवायु रहता है ३ सर्वसंधि तथा हाथ पैरोंमें उदानवायुं रहता है ४ उ- दराभिके कलाको लेकर सवागमें समानवायु रहता है ५ इस कारणसे प्राणादि पांच वायु प्रधान हैं नागादि पांच वायुका कर्म जो चर्म एवं हड्डीमें रहकर जो करते हैं आगे कहते हैं।॥३४॥३५॥ - -- - भाषानुवादः । १०१ २५ उद्दारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने स्मृतः। " कृकरःक्षुतकृज्ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे ॥३६॥ उद्गार (डकार) निकालना नागवायुका कर्म है नेत्रोंके पलक लगाना खोलना कूर्मवायुका तथा छींक करना ककरवायुका, ज़ुभा देवदत्तवायुका कर्म है ॥ ३६ ॥ न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापिधनंजयः। एते सर्वासु नाडीषु भ्रमन्ते जीवरूपिणः ॥३७॥ और धनंजयवायु सर्वशरीरमें व्याप्त रहता है मृतशरीरमेंनी रहता है अर्थात् मरेमेंभी चार घटीपर्यंत यह शरीरहीमें रहता है इस प्रकार ये दश वायु आपही जीवके अभ्याससे कल्पित होकर सुखदुःखका संबंध जीवको कराते हैं मैं सुखी हूं उत मैं दुःखी हूँ इत्यादि व्यवहारमय जीवकी उपाधि लिंगशरीरमें होनेसे आपही जीवरुप होकर समस्त नाडियोंमें फिरता रहता है यद्यपि अवि- यावच्छिन्न चैतन्य जीवही है तो इसका घूमना फिरना असंभ. है तथापि जैसे चंद्रमा तो.कंपायमान नहीं है. परंतु उसका प्र- तिबिंब जलमें जिस समय हो उस समय उस जलको हिलाया जाय तो चंद्रबिंब हिलता दीख पडता है ऐसेही व्यवहारसे दश वायुओंका घूमना तथा इनहीकी उपाधि जीवचैतन्यमें आरोपित करते हैं ॥ ३७॥ '. 'आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्छलति कन्दुकः । प्राणापानसमाक्षिप्तस्तथा जीवोन तिष्ठति ॥३८ ।। व '- " गोरक्षपद्धति। २६ जैसे कंदुक (गेंद) हाथसे भूमिपर ताडनकरके स्वतः उछ- लता है, तैसेही प्राणवायुके स्थान (हृदय ) में अपानवायु तथा अपानवायुके स्थान (गुदा) में प्राणवायुके प्राप्त होनेमें अपा- नवायु जीवको आकर्षण करके एकत्र स्थित नहीं रहने देता जै- से गेंद खेलनेवालेके वशमें गेंद रहता है ऐसेही अविद्या (माया)- के वशमें जीव रहता है ॥३८॥ प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च धावति । वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान दृश्यते ॥३९॥ जीवकारणसे जीवात्मा प्राणअपानवायुके आधीन है उसी कारणसे इडा और पिंगला नाडीके द्वारा गिरके नीचे मूलाधार- पर्यंत ऊपर मुख नासिकाछिद्रपर्यंत फिरताही रहता है इसके अ- तिचंचल होनेसे इतना कठिन है कि प्राणापानवायुके साधनविना वायु नहीं जीता जाता इसके जीते विना हृदयकमलमें ध्यान न- ही होता ॥ ३९॥ रज्जुबद्धो यथा श्येनो गतोऽप्याकृष्यते पुनः । गुणवद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कृष्यते ॥४०॥ जैसे वाजपक्षीके पैरमें डोरी बांधके हिलाके छोड देने- पर उडजाता एवं खींचनेपर फिर हाथमें आ जाता है ऐसेही मायाके अंश सत्त्वरजतमोगुणके वासनासे बंधा हुआ जीव बुद्धि- की लीन हुएमें उपाधिरहित शुद्धब्रह्म हो गया हो तौनी प्राणापा- नवायुकरके फिर खींचा जाता है जामअवस्थामें फिर प्रबुद्ध हु- एकी वृत्ति विषयमें पुनः जीवनावको प्राप्त किया जाता है।।४ ०.

भाषानुवाद । श०१
२७
अपानः कर्षति प्राणं प्राणोपानं च कर्षति ।
ऊर्ध्वाधः संस्थितावेतौ संयोजयति योगवित्॥४१॥
ऊपरसे आज्ञाचक्रगत प्राणवायु नीचे मूलाधारस्थित अपान-
वायुको तथा मूलाधारगत अपानवायु आज्ञाचक्रस्थ प्राणवायुको
परस्पर अपने २ ओर आकर्षण करते हैं योगाभ्यासी पुरुष प्रा-
णायामसे इनहींको जोडकर योग (जोडना) कहते हैं इसी योग
जोडनेको हठयोग कहते हैं जो सूर्यचंद्रमा ऐक्य कहाते हैं। ४१॥
हकारेण बहियाँति सकारेण विशेत्पुनः ।
हसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥४२॥
षट्र शतानि त्वहोरात्रे सहस्राण्येकविंशतिः ।
एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥४३॥
प्राणवायु सारूप्यको प्राप्त हो रहा चिदाभास जीव हकार-
करके स्वाधिष्ठानचक्रसे उत्पन्न होता है और सकारकरके
मूलाधारादि चक्रमें प्रवेश करता है एवंप्रकार 'हंस' मंत्र
(अजपागायत्री) का जप जीव नित्य करताही रहता है अर्थात्
श्वास बाहर निकलनेमें हकार भीतर प्रवेश होनेमें सकार
उच्चारण होता है सूर्योदयसे पुनः सूर्यास्तपर्यंत ६० घटीमें
इस मंत्रकी जपसंख्या२१६०० होती है इतना जप जीव स्वतः
करता है ॥ ४२ ॥४३॥
अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी।
अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैःप्रमुच्यते॥४४॥

२८ गोरक्षपद्धति ।। अनया सहशी विद्या अनया सदृशो जपः । अनया सदृशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति ॥४५॥ यह योगियोंको मोक्ष देनेवाली अजपा नाम गायत्री है इ- सके संकल्पमात्रसे योगी समस्तपापोंसे छूट जाता है संकल्पकी विधि यह है कि सूर्योदयसे पहिलेही शयनसे उठकर शुद्धवस्त्र यहन हाथ, पैर, मुख प्रक्षालन कर शुद्धआसनमें बैठ आचमन करके संकल्पकल्पना इस प्रकार करना कि अद्येह पूर्वारहो- रात्रचरितनासापुटनिःसृतोच्छासनिःश्वासात्मकषट्शवाधिकैक- विंशतिसहस्रसंख्याकाजपागायत्रीजपं मूलाधारस्वाधिष्ठानम- णिपूरानाहतविशुद्धाज्ञाचक्रब्रह्मरन्ध्रस्थितेत्यो गणपतिब्रह्मविष्णु- रुद्रजीवगुरुपरमात्मायः सिद्धिसरस्वतीलक्ष्मीगौरीप्राणशक्ति- ज्ञानशक्तिचिच्छक्तिसमेतत्यो यथासंख्यं षट्शतं, पट्सहस्र, षट्सहस्र, सहस्रमेकं, सहस्रमेकं, सहस्रमेकम् अजपागायत्री- जपं प्रत्येक निवेदयामि इति 'निवेद्य । पुनरय प्रातःकाल- मारस्य द्वितीयप्रातःकालपर्यन्तं नासापुटनिःसृतोच्छासनिःश्वासा- स्मकं षट्शताधिककविंशतिसहस्रसंख्याकमजपागायत्रीजममहो- रात्रेणाहं करिष्ये इति जायमानजपसंकल्पं कृत्वा स्वकत्यमाचरेत इस अजपाके समान जीवब्रह्मका अभेद कहनेवाला और कोई मंत्र नहीं है यह अल्पश्रममें उत्तम फल देनेवाला है इसके समान और जप नहीं. क्योंकि प्रातःकाल संकल्पमात्र करना है उपरांत खाते पीते चलते उठते बैठते सोते सर्वदा सब अवस्थाओंमें उक्त जप आपसे होताही रहता है और अद्वैतानुभव करानेवाला उसके

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भाषानुवाद । श०१
२६
समान अन्य कोई ज्ञानशास्त्र पहिलेभी नहीं था और पीछे
होनेवालांभी नहीं है ॥ ४४ ॥ ४५ ॥
कुण्डलिन्यां समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी।
प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स वेदवित्॥४६॥
कुंडलिनी महाशक्तिसे उत्पन्न हो रही. तथा प्राणवायुको
धारण करनेवाली यही अजपा गायत्री है. जीवात्माकी शक्ति
पाणविद्यास्वरूपभी यही है इसी कारण महाविद्यानी इसको
कहते हैं इसे जो योगी पहिचान सके वही योगशास्त्राभ्यासका
तात्पर्य जानता है ॥ ४६॥
अथ शक्तिचालनम्।
कन्दोर्चे कुण्डली शक्तिरष्टधा कुण्डलाकृतिः।
ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठति ॥४७॥
अब कुंडलिनीके भेद खोलने निमित्त एवं उसकी अधिकता
प्रकट करनेके लिये कुंडलिनीका और प्रकारभी स्थान कहते हैं
कि समस्त ७२००० नाडियोंका उत्पत्तिस्थान पूर्वोक्त कंद है
इसके ऊपर मणिपूरचक कर्णिकामें आठ वृतकरके वेष्टित
हो रही कुंडलिनीशक्ति ब्रह्मरंधद्वारके मुखको रोकके सर्वदा र-
हती है ॥४७॥
येन द्वारेण गन्तव्यं ब्रह्मद्वारमनामयम् ।
मुखेनाच्छाद्य तद्दारं प्रसुप्ता परमेश्वरी ॥१८॥
प्रबुद्धा बुद्धियोगेन मनसा मरुता सह ।
सूचीव गुणमादाय व्रजत्यूच सुषुम्णया ॥१९॥

गोरक्षपद्धति । जिस मार्ग ( सुषुम्णा) करके जन्ममरणके दुःख हरण क- रनेवाला अखंड ब्रह्मानंदपंद मिलता है उस मार्गको रोकके सोई हुई कुंडलिनी प्राणवायुके धौकने (उत्तेजन करने ) से काला- निके ज्योतिके संबंधसे प्रबुद्ध (जामत) होकर मन एवं प्राण- वायुके सहित होके सुषुम्णानामा मध्यनाडीसे ऊपरको जाती है जैसे सूची (सुई ) अपनेपर पिरोये तागेसहित होनेसे वस्त्रके अनेक सूत्रोंके मध्यमें प्राप्त होती है. तैसे आपही सृष्टि उत्पन्न करके षट्चक्र तथा उनके देवताप्रति सकलप्रपंचको उल्लं- घन करके ऊपर सहस्रदलकमलके सन्मुख होकर जाती है ॥४८॥४९॥ प्रसुप्तभुजगाकारा पद्मतन्तुनिभा शुभा। प्रबुद्धा वह्नियोगेन व्रजत्यूर्व सुषुम्णया॥५०॥ सोते सर्पके समान कुंडलिनी अपानवायुसे धमित (धौ- की गयी) जो मूलाधारमें रहनेवाली कालानिज्योतिके संबंधसे प्रबोध पायके अतिवेग (जोर) से चलते हुए सर्पके समान कुटिलगति होकर कमलनालके तंतु (सूत्र) समान सूक्ष्म ज्यो- तिर्मयस्वरूप होकर सुषुम्णामार्गसे ऊपरको जाती है ॥ ५० ॥ उद्घाटयेत्कपाटं तु यथा कुञ्चिकया हठात् । कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षदारं प्रभेदयेत् ॥५१॥ जैसे कूची (चावी) से ताला खुलकर कपाट (कवाड) खुल जाते हैं तैसेही कुंडलिनीकरके मोक्षद्वार सुषुम्णाके मुखको

भाषानुवाद । श०१
योगी अभ्याससे खोले जिससे कि कुंडलिनीके प्रबोधविना
कुंडलिनीका द्वार खुलता नहीं ॥ ५५ ॥
कृत्वा सम्पुटितौ करौ दृढतरं बध्वा तु पद्मासनम् ।
गाढं दक्षसि सन्निधाय चिबुकं ध्यानं च तच्चेतसि ॥
वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोचारयेत्पूरितम् ।
मुञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रभावादतः ॥५२॥
दोनों हाथ संपुटित करके (अंजली बांधके ) दोनों पर
(वाहुमध्यभाग) हृदयमें दृढ स्थापन करके पद्मासन करे चिबुक
(ठोडी) हृदयमें दृढतर लगायके अर्थात् जालंधरबंध करके
ज्योतिःस्वरूपका ध्यान करे केवल कुंभकप्राणायाम अघोद्दार
रोकके करे प्राणायामसे कुंशितवायुको अपानवायुसे एकत्व
करके यथाशक्ति कुंभक करे पुनः रेचकमाणायाम (जिसमें
वायु अतिमंद २ निकला) करे इस प्रकारसे कुंडलिनीका बोध
होता है तथा योगीको अपरिमित ज्ञान मिलता है. कुंडलिनीको
प्रबोध करनेवाली शक्ति चालनमुद्रा यही होती है परंतु प्राणाया-
मके अभ्याससे प्राणापानवायुको वशवर्ती करके इस मुद्राका
बहुत कालपर्यंत अभ्यास करना होता है ॥५२॥
अङ्गानां मर्दनं कृत्वा श्रमसञातवारिणा ।
कदम्ललवणत्यागी क्षीरभोजनमाचरेत् ॥५३॥
ब्रह्मचारी मिताहारी त्यागी योगपरायणः ।
अब्दादूच भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥५४॥

३२ गोरक्षपद्धति। शक्तिचालनमुद्राके अभ्यास के नियम कहते हैं कि प्राणा- यामादिकर्मसे जो अंगामें स्वेद (पसीना) आता है उससे अंगमर्दन करे लवण और खट्टा ये दो रस न खावे केवल दुग्धान्न खाया करे भोजनही एक प्रमाणसे करे ब्रह्मचर्य रक्खे कामक्रोधसे र- हित रहे त्यागवान् होवे योगास्यासका मात्र यास रक्खे इ- स प्रकार नियममें रहकर योगाभ्याससे शक्तिचालनमुद्राका अ- भ्यास करे एकवर्ष ऊपर जब इच्छा करे तभी कुंडलिनीके आयुत्थानकी सामर्थ्य होतीहै इसमें सिद्धि होती है वा नहीं ऐसा संदेह न करना अायाससे अवश्यमेव सिद्धि होती है॥५३॥५४॥ सुस्निग्धो मधुराहारी चतुर्थाशविवर्जितः । भुञ्जते स्वरसं प्रीत्यै मिताहारी स उच्यते ॥५५॥ मिताहारके लक्षण कहते हैं स्निग्ध (सचिक्कण ) मीठा भो- जन करे अम्ल (खट्टा) और लवणवर्जित करे दो भाग अन्न एक भाग जल खावे चौथा भाग उदरमें वायुसंचारके लिये छोड देवे. देवताको निवेदन करके दुग्धान्न भोजन करे इस प्रकार विधि करनेहारा योगी मिताहारी कहाता है ॥ ५५ ॥ कन्दोर्चे कुण्डली शक्तिः शुभमोक्षप्रदायिनी। बन्धनाय च मूढानां यस्तां वेत्ति सं वेदवित् ॥५६॥ कंदफे ऊपर मणिपुरचक्रके कर्णिका ८ फेरे वेष्टित होकर कुंडलाकार कुंडलिनी शक्ति है. यह मूर्खजनोंको वारंवार : ज- न्ममरणरूप बंधन देती है और योगाभ्यास जाननेवालेको श- भाषानुवाद । श०१ तिचालनका अग्यास जन्ममरणरूप बंधन छुटायके मोक्ष देती है ॥५६॥ अथ शक्तिचालनविधौ ग्रन्थान्तरे विशेषः। गङ्गायमुनयोर्मध्ये बालरंडा तपस्विनी। बलात्कारेण गृहीयात्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१॥ शक्तिचालनमें ग्रंथांतरमतसे कुछ विशेष कहते हैं कि, गंगा- यमुनाके बीच तपस्विनी बालरंडा बलात्कारकरके कुंडलिनीको ग्रहण करे तो विष्णुके परमपद (ब्रह्मांड) में प्राप्त करती है॥१॥ इडा भगवती गङ्गा पिङ्गला यमुना नदी। इडापिङ्गलयोर्मध्ये बालरण्डा च कुण्डली ॥२॥ इडा भगवती वामश्वासा नाडी ऐश्वर्यादिसंपन्न गंगा, दक्षिणश्वासा पिंगलानानी यमुना है इनके मध्यनाडी सुषुम्णा बालरंडा है ॥ २ ॥ ऊर्च वितस्तिमात्रं तु विस्तारं चतुरङ्गुलम् । श्वेतं तु मृदुलं प्रोक्तं वेष्टितं वरलक्षणम् ॥३॥ मूलस्थानसे वितस्तिमात्र ऊपर नामि एवं मेद के मध्यमें नवांगुल विस्तार, चार अंगुल आयाम, पक्षीके अंडाकार, श्वे- तरंग कोमल वस्त्रवेष्टित जैसा कंद है ॥ ३ ॥ सति वज्रासने पादौ कराभ्यां धारयेदृढम् । गुल्फदेशसमीपे च कन्दं तत्र प्रपीडयेत् ॥४॥ वज्जासनकरके हाथोंसे पैरोंकी एडी पकड कंदस्थानमें दृढ उगाय पीडन करे ॥४॥ ३

गोरक्षपद्धति।
वज्रासने स्थितो योगी चालयित्वा च कुण्डलीम् ।
कुर्यादनन्तरं भस्रां कुण्डलीमाशु बोधयेत् ॥५॥
योगी वज्रासनमें बैठ कुंडलीको शक्तिचालनमुद्रासे च-
लायमान करे तब मला नाम कुंभक कर कुंडलिनीशक्तिको
शीघ्र प्रबोधित करे ॥ ५ ॥
भानोराकुञ्चनं कुर्यात्कुण्डली चालयेत्ततः ।
मृत्युवक्रगतस्यापि तस्य मृत्युभयं कुतः॥६॥
नाभिस्थान (सूर्य) को आकुंचन कर कुंडलीको चलावे
इसका अश्यास सिद्ध हो जाय तो मृत्युके मुखमें पड गया हो तौ-
भी उसकी मृत्यु न होवे ॥ ६ ॥
मुहूर्तव्यपर्यन्तं निर्भयं चालनादसौ ।
ऊर्ध्वमाकृष्यते किञ्चित्सुषुम्णायां समुद्गता ॥७॥
चार घडीपर्यंत निर्भय होकर शक्तिचालन करे तो कुंड-
लिनी कछुक सुषुम्णामें ऊपरको उठती है ॥ ७ ॥
तेन कुण्डलिनी तस्याः सुषुम्णाया सुखं ध्रुवम् ।
जहाति तस्मात्प्राणोयं सुषुम्णां व्रजति स्वतः॥८॥
इससे कुंडलिनी ( जो सुषुम्णा रोक बैठी है ) सुषुम्णाके
द्वारको छोड देती है तब प्राणवायु आपही सुषुम्णामें प्रवेश
करता है ॥ ८॥...!
तस्मात्सञ्चालयेन्नित्यं सुखसुप्तामरुन्धतीम् ।
तस्याः सञ्चालनेनैव योगी रोगैः प्रमुच्यते ॥ ९॥

भापानुवाद । श०१ इससे नित्यप्रति सुषुम्गाद्वारमें सोती कुंडलिनीको चलाये तो योगी सर्व रोगोंसे छूट जावे ॥ ९ ॥ येन सञ्चालिता शक्तिः स योगी सिद्धिभाजनम् । किमत्र बहुनोक्तेन कालं जयति लीलया ॥ १० ॥ जिस योगाने शक्तिचालन किया वह अणिमादि सिद्धि- योका पात्र होता है और विशेष माहात्म्य क्या कहा जाय वह काल (मृत्यु) को सहजही जीत लेता है।॥ १० ॥ कुण्डली चालयित्वा तु भस्रां कुर्यादिशेषतः। एवमभ्यस्यतो नित्यं यमिनो यमभीः कुतः॥११॥ जो यमी नित्य कुंडली चलायके भलाकुंभकका अभ्यास विशेषकरके करता है तो उसको यमका भय नहीं होता ॥११॥ इयं तु मध्यमा नाडी दृढाभ्यासेन योगिनाम् । आसनप्राणसंयाममुद्राभिः सरला भवेत् ॥ १२॥ योगियोंको दृढाझ्याससे आसन प्राणायाम ‘महामुद्रादि करके मध्यनाडी (सुषुम्णा) सरल हो जाती है ॥ १२ ॥ अथ महामुद्राः। महामुद्रां नभोमुद्रां उड्डीयानं जलंधरम् । मूलबन्धञ्च यो वेत्ति स योगी मुक्तिभाजनः ॥१७॥ महामुद्रा १ खेचरीमुद्रा २ उड्डीयानबंध ३. जालंधर ४ मूलबंध ५ इनको करके शक्तिचालन करे तो योगी मुक्तिनाज- न होता है शक्ति चली वा नहीं इसके जानने का प्रमाण यह है कि

गोरक्षपद्धति ।
जैसे शरीरमें पिपीलिका (चींटी) चलनेमें उसकी गतिसे ज्ञात
होता है कि कुछ जीव चलता है ऐसेही सुषुम्णामें वायु जब च-
लने लगता है तो शक्ति चलायमान हो गयी जानना शक्तिचा-.
लनमुद्राके पीछेसी उक्त ५ मुद्रा करनी योग्य हैं ॥ ५७ ॥
वक्षोन्यस्तहनुः प्रपीडय सुचिरं योनि च वामांघ्रिणा
हस्ताभ्यामनुधारयेत् प्रसरितं पादं तथा दक्षिणम् ।
आपूयं श्वसनेन कुक्षियुगलं बद्धा शनै रेचये-
देषा व्याधिविनाशिनी सुमहती मुद्रा नृणां कथ्यते५८
महामुद्राकी विधि कहते हैं कि हृदयमें चिबुक जोरसे
धारण करके वामपादकी एडीसे योनिस्थानको अत्यंत दृढ करके
अचेते दहिना पाद लंबा करके दोनों हाथोंसे पादमध्यभाग
पकडके दृढ रोके तब पेटमें पूरक विधिसे वायु भरे कुछ काल
यथाशक्ति कुंभक करके मंद मंद वायुको रेचन करे. यह योगि
जनको समस्त रोगनाशक महामुद्रा कही है ॥५८॥
चन्द्राङ्गन समभ्यस्य सूर्याङ्गनाभ्यसेत्पुनः।
यावत्तुल्या भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥६९॥
इस महामुद्राके अभ्यासमें प्रथम वामांगसे अश्यास करके
पीछे दाहिने अंगसे करे तैसेही प्राणायामभी करता रहे जब दोनों
ओरके अग्याससे प्राणायामकी मात्रा बराबर हो जाय तब मु-
द्रा छोढनी तबतक उक्त आयास करता रहना ॥ ५९॥
नहि पथ्यमपथ्यं वा रसाः सर्वेपि नीरसाः।
अपि भुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीर्यते॥ ६० ॥

७
.
भाषानुवाद । श० १
क्षयकुष्टगुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः ।
रोगास्तस्य क्षयं यान्ति महामुद्रां च योभ्यसेत्॥६॥
कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम् ।
गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित् ॥१२॥
जब महामुद्राका अभ्यास दृढ हो जाय तो, पथ्यापथ्यविचार
कुछ नहीं रहता. मिष्ट, लवण, तिक्तआदियोंका स्वाद कुछ नहीं
रहता. जो (घृत, सहद बराबर मिलायके कृत्रिमविष होता है)
संयोगविरुद्धवस्तु वा घोरविषभी खावे तो अमृतके समान प-
चि जाता है तथा उदावर्त, गुल्म, अजीर्ण, क्षय, कुष्ठ आदि रोग
समस्त शांत हो जाते हैं. इसके आयासीको महासिद्धि देनेहारी
यह महामुद्रा कही है इसे बडे यनसे गुप्त रखना प्रकाश करनेसे
सामर्थ्यहीन होती है इस हेतु अनधिकारी, अयोग्य पुरुष, शठ,
दांभिकआदि जैसे कैसेको न देना ॥ ६० ॥६१ ॥ ६२॥
इसका विस्तार ग्रंथांतरसे पाठकोंके सुबोधार्थ लिखते हैं-
पादमूलेन वामेन योनि संपीड्य दक्षिणम् ।
प्रसारितं पदं कृत्वा कराभ्यां धारयदृढम् ।। १॥
वामपादकी एडीसे गुदा और शिश्नके मध्यमें योनिस्थानको
रोकके दाहिना पैर लंबा पृथ्वी में फैलाय जैसे एडी भूमिमें रहे
और अंगुली ऊंची दंडकेसे नाई रहे. तब हाथोंके अंगुष्ठ और
तर्जनीसे दक्षिणपादांगुष्ठ पकड के धारण करे ॥ १ ॥
कण्ठे बन्धं समारोप्य धारयेद्वायुमूलतः।
यथा दण्डाहतः सो दण्डाकारःप्रजायते ॥२॥

1
गोरक्षपद्धति ।
३८
तदनंतर कंठमें जालंधरबंध करके वायुको ऊपर सुषुम्णामें
धारण करे इससे मूलबंधनी हो जाता है जहां योनिस्थानको
पीडन और जिह्वाबंध करके मूलबंध हो जाता है ॥ २॥
ऋज्वीभूता तथा शक्तिः कुण्डली सहसा भवेत् ।
तदा सा मरणावस्था जायते द्विपुटाश्रया ॥३॥
जैसे सर्प दंडके प्रहारसे दंडाकार हो जाता है ऐसेही कुंडलिनी
शक्तिभी कुटिलताको छोडकर इस मुद्रासे सरल हो जाती है
और कुंडलिनीके बोधसे सुषुम्णामें वायुका प्रवेश होता है तब
दोनोंको प्राणके वियोगसे इडा पिंगला हैं आश्रय जिसके ऐसी
मरणावस्था होती है ॥ ३॥
ततः शनैः शनैरेव रेचयेन्नैव वेगतः।
महामुद्रां च तेनैव वदन्ति विवुधोत्तमाः॥४॥
इयं खलु महामुद्रा महासिद्धैः प्रदर्शिता ।
महाकेशादयो दोषाःक्षीयन्ते मरणादयः॥५॥
तदनंतर शनैः शनैः रेचन करे वेगसे करनेमें बलहानि होती है
इससे महामुद्राआदि नाथादि महासिद्धोंने दिखाई है इसके
अयोससे महाक्लेश, अविद्या, राग, द्वेषादिक, शोकमोहादिदोष
क्षीण होते हैं तथा जरामरणभी नहीं होते इससे ज्ञानिजन इसे
महामुद्रा कहते हैं ॥ ४ ॥५॥
चन्द्राङ्गे तु समभ्यस्य सूर्याङ्गे पुनरभ्यसेत् ।
यावत्तुल्यं भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥६॥

भाषानुवाद । श० १ इसका क्रम कहते हैं कि (चंद्रांग ) वामभागमे यास कर सूय्यांग ( दक्षिणताग) में अश्यास करे और वामांगाभ्यासके पीछे जबलौं वामांगमें कुंभककी संख्या समान हो तबलौं अ- भ्यास करे जब संख्या समान हो तब महामुद्रा विसर्जन करे इस- में यह क्रम है कि वामपादकी एडीको योनिस्थानमें लगाय दा- हिना पाद लंबा फैलाय अंगुष्ठको हाथके अंगुष्ठ तर्जनीसे पकड- के अयास करे यह वामांगाभ्यास है इससे पूरित जो वायु सो वामांगमें स्थित रहता है फिर दक्षिणपादको समेट तिसकी एडी योनिमें लगाय वामपाद लंबा फैलाय अंगुष्ठको हाथके अंगुष्ठ तर्जनीसे पकडके आयास करे इसे दक्षिणांगाभ्यास कहते हैं इससे पूरित वायु दक्षिणांगहीमें रहता है ॥ ६ ॥ नहि पथ्यमपथ्यं वा रसाः सर्वेपि नीरसाः। अपि भुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीर्यते ॥७॥ गुण कहते हैं कि महामुद्राके अभ्यासको पथ्यापथ्यविचार नहीं है कटु, अम्लादि समस्त रसादिक जो खाय वही पच जावे नीर- स, बासी, पर्युषित सब पचे. तथा दुर्जर घोर विष आदिक्षी अमृतके नाई पच जावे ॥ ७ ॥ क्षयकुष्ठगुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः। तस्य दोषाः क्षयं यान्ति महामुद्रां तु योभ्यसेत् ॥८॥ जो पुरुष महामुद्राका अभ्यास करे उसे क्षयरोग, कुष्ठ, गुल्म- रोग, अजीर्ण, ज्वर, प्रमेह, उदररोगआदि कभी न होवें ॥ ८॥ .y- ६ गोरक्षपद्धति। ४० कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम् । गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित् ॥९॥ और उस अभ्यासीको अणिमादि महासिद्धि देनेहारी यह महामुद्रा कही है इसे गुप्त रखना अर्थात् अनधिकारीको न देना ॥ ९॥ अथ खेचरीमुद्रा। कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा। भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥ ६३।। खेचरीमुद्राकी विधि कहते हैं कि,जिह्वाको उलटी फिरायके कंठमूलमें जो छिद्र (लिग्लिग्या) याने क्षुद्रघंटिका है उसमें प्रवेश कराना तदनंतर मध्यमें निश्चल दृष्टि स्थिर करना इसे खेचरीमुद्रा कहते हैं ॥ ६३ ॥ न रोगान्मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा । न मूर्छा तु भवेत्तस्य यो मुद्रांवेत्ति खेचरीम् ॥६॥ जो योगी गुरूपदिष्ट मार्गकरके छेदन, दोहन, कर्षण (ये कर्म आगे कहेंगे .) प्रकारसे खेचरीमुद्राको बहुतकालपर्यंत ग्यास करता है उसके रोग, निद्रा, क्षुधा, तृषा, मूर्छा और मरणतुल्य कष्ट दूर होते हैं ॥६४ ॥ पीज्यते न च शोकेन न च लिप्येत कर्मणा । बाध्यते न स केनापि यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥६५॥ जो योगी खेचरीमुद्रा जानके उत अभ्यास करके सिद्धि , , भाषानुवाद । श०१ ४१ करता है वह शोकसे पीडित नहीं होता. कर्मके फलमें बंधन नहीं । 'पाता और काल मृत्यु आदियोंसेभी बाधा नहीं पाता ॥६५॥ चित्तं चलति नो यस्माजिह्वा चरति खेचरी । तेनेयं खेचरी सिद्धा सर्वसिद्धनमस्कृता ॥६६॥ जिस कारण तहां परब्रह्मविषये एकाग्र होकर मन बुद्धि चित्तशून्यविषे फिरता है तथा जिह्वामी कंठमूल छिद्राकाशमें रहके ब्रह्मरंध्रांतर्गत चंद्रकलामृतका पान करती है इस हेतुसे मनबुद्धिके विषयबंधन निवारण करनेहारी खेचरी मुद्रा समस्त सिद्धजनोंसे अंत्यंत पूजित (नमस्य) है । ६६ ॥ बिन्दुमूलं शरीराणां शिरास्तत्र प्रतिष्ठिताः । भावयन्ति शरीराणामापादतलमस्तकम् ॥ ६७ ।। शरीरका मूल (कारण) बिंदु है इससे शरीरकी रक्षा है. पादसे शिरपर्यंत समस्त नाडीजाल बिंदुसे सेचन हो रहा है इसी हेतु उक्तनाडी सजीव स्वकर्मसामर्थ्य रहती हैं अर्थात् समस्त नाडी बिंदुके आधारमें हैं ॥ ६७ ॥ खेचा मुद्रया येन विवरं लम्बिकोव॑तः । न तस्य क्षरते बिन्दुः कामिन्यालिङ्गितस्य च।।६८॥ जिस योगीने कंठनालके छिद्रलंबिकाके ऊपर आकाशविर्षे खेचरीमुद्रासे रोक लिया तो चंद्रामृत रुकनेसे उस योगीको कामिनी (स्त्री) आलिंगन करे तौभी उसका मन चलायमान नहीं होता तथा बिंदु नहीं गिरता है॥ ६८॥ 4.hr

४२.
गोरक्षपद्धति।
यावद्विन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्योभयं कुतः।
यावद्धा नभोमुद्रा तावद्विन्दुर्न गच्छति ॥ ६९॥
जबलौं देहमें बिंदु स्थिर है. तावत् मृत्युकी भय नहीं होती
बिंदुका स्थान व्योमचक्र है इससे कालकी गति नहीं है. जबलौं
खेचरीमुद्रा दृढ है तबलौं बिंदु व्योमचक्रसे नहीं गिरता. इसके
स्वस्थानस्थ रहनेमें कालका वश नहीं चलता॥ ६९ ॥
चलितोपि यदा बिन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम् ।
बजत्यूर्व हृते शक्त्या निरुद्धो योनिमुद्रया.॥७०॥
कदाचित् एकाग्र न होनेसे बिंदु उत्तरके नाभिस्थान सू-
र्यमंडलमें पहुँच गया तो योनिमुद्राकरके कुंडलिनीशक्तिको
ऊपर उठायके उसके आघातसे उक्त बिंदु पुनः ऊपर लौटके
अपनेही स्थानमें प्राप्त होकर स्थिर रहता है ॥ ७० ॥
स पुनर्द्विविधो बिन्दुः पाण्डुरो लोहितस्तथा।
पाण्डुरः शुक्रमित्याहुलॊहिताख्यो महारजः॥ ७१ ॥
उक्त बिंदु दो प्रकारका होता है एक तो पांडुरवर्ण जिसे शुक्र
कहते हैं दूसरा (लोहित ) रक्तवर्ण इसे महारज कहते हैं ॥७१॥
सिन्दूरद्रवसंकाशं नाभिस्थाने स्थितं रजः।
शशिस्थाने स्थितो विन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम् ७२॥
तैल मिलायके सिंदूर (हिंगुल) का द्रवं (रस) के समान
रज सूर्यस्थान नाभिमंडल में रहता है तथा बिंदु (वीर्य) चंद्र-
माके स्थान कंठदेश षोडशारचक्रमें स्थिर रहता है इन दोनोंका
ऐक्य अत्यंत दुर्लभ है ॥ ७२॥

भाषानुवाद । श०१ बिन्दुः शिवो रजः शक्तिश्चन्द्रो बिन्दू रजो रविः । अनयोः सङ्गमादेव प्राप्यते परमं पदम् ॥७३॥ बिंदु शिव रज शक्ति है, इनके एक होने में योगसिद्धि होकर परमपद मिलता है चंद्रमा सूर्यका ( प्राणवायु अपानवायुका जीवात्मा. परमात्माका ) ऐक्य करना यही हठयोगपदका अर्थ है ॥ ७३॥ वायुना शक्तिचारेण प्रेरितं तु यदा रजः । याति बिन्दोः सहैकत्वं भवेहिव्यं वपुस्ततः॥ ७४ ॥ शक्तिचालनविधिसे वायुकरके जब रज बिंदुके साथ ऐ- क्यको प्राप्त होता है तब शरीर दिव्य हो जाता है अर्थात् उसे अग्नि जलाती नहीं शस्त्रसे कटता नहीं ॥ ७४ ॥ शुक्र चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्येण संयुतम् । तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगवित् ॥७५॥ शुक्र बिंदुरूप हो चंद्रमासे मिला और रज रक्तरूप होकर सूर्यसे मिला इनके समरसैकत्व (चंद्रसूर्य्यस्वरूप बिंदुरज- के समरसत्वभाव ) को जो योगी जानता है वह योगवित कहाता है चंद्रमा एवं सूर्यको योगको योग कहाते हैं ॥ ७५ ॥ शोधनं नाडिजालस्य चालनं चन्द्रसूर्य्ययोः। • रसानां शोषणं चैव महामुद्राभिधीयते ॥ ७६ ॥ नाडीजालके शोधनसे; इनमें रहनेवाले वात-पित्त-कफादि रोगोंका हरण होता है. चंद्रसूर्यके चालनसे इनके एकत्र होनेमें खाया अन्न, पिया जल इनका शोषण होता है ऐसा महामुद्राका

४४
गोरक्षपद्धति।
फल है अर्थात् इस मुद्राकरके नाडीजालका शोधन चंद्रसूर्य-
का चालन रसोंका शोषण होता है ॥ ७६ ॥
ग्रन्थान्तरेखेचरीमुद्राविधिः।
छेदनचालनदोहैः कलां क्रमेण वर्द्धयेत्तावत् ।
यावद्भूमध्यं तु स्पृशति तदा खेचरीसिद्धिः॥१॥
जिह्वा खेचरीयोग्य करनेकी विधि ग्रंथांतरसे कहते हैं कि
छेदन-चालन-दोहनकर्मसे जिह्वा बढती है, छेदन आगे कहेंगे,
चालन यह है कि अंगुष्ठ और तर्जनीसे जिह्वाको हिलाते रहना,
दोहन दोनों हाथोंके अंगुष्ठ तर्जनीसे जैसे गौके थनको दुहे
ऐसे खींचखींचके जिह्वाको लंबी करे जबतक बाहर निकल-
कर चुकुटीको स्पर्श न करे तबतक यह विधि करता रहे ॥ १ ॥ .
सुहीपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् ।
समादाय ततस्तेन रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥२॥
छेदन कहते हैं कि थूहरके पत्रके समान अति तीक्ष्ण,सचिक्कण
निर्मल शस्त्रसे जिह्वाके नीचेको नसको रोममात्र छेदन करे ॥२॥
ततः सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रघर्षयेत् ।
पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥३॥
तिसके पीछे सेंधा नमक और हरडका चूर्ण छेदित स्थानपर
मले, परंतु योगीको लवणनिषेध है इसलिये लवणके स्थान खदिर
(कत्था) से कार्य करना योग्य है ऐसे सायंप्रातः सात दिन
करके फिर पूर्वोक्त विधिसे रोममात्र काटे पुनः उक्त औषधी
लगाता रहे ॥३॥

भाषानुवाद । श०१ ४५. एवं क्रमेण षण्मासं नित्यं युक्तः समाचरेत् । षण्मासादसनामूलशिलांबन्धः प्रणश्यति ॥४॥ ऐसे छः महीनेपर्यंत नित्य युक्तिसे करे तो जिह्वामूलकी नाडी जो जिह्वाको कपालकुहरमें पहुंछानेसे रोकती है वह सुख- पूर्वक कट जाती है ॥ ४॥ कलां पराङ्मुखीं कृत्वा त्रिपथे परियोजयेत् । सा भवेत् खेचरी मुद्रा व्योमचक्रं तदुच्यते ॥५॥ जिहाको तिछी करके तीनों नाडियोंका मार्ग जो कपाल- छिद्र उसमें योजित करे यह खेचरीमुद्रा है इसीको व्योमचक्रनी कहते हैं ॥५॥ रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्धमपि तिष्ठति । विविमुच्यते योगी व्याधिमृत्युजरादिभिः॥६॥ तालुके ऊपर छिद्रमें जिह्वाप्रवेश करके एक घडीमात्र खेचरी मुद्रा स्थिर रहे तो योगीको सर्प विच्छूआदियोंका विष न लगे और बुढापा, रोग, मृत्युको जीते वलीपलित (जो बुढापेमें च- म ढीला होकर सलवटें पडती हैं) न होवें ॥ ६ ॥ ऊर्ध्व जिह्वःस्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः । मासान न संदेहो मृत्यु जयति योगवित् ॥७॥ तालुके ऊपर छिद्रके सन्मुख जिह्वा लगाय स्थिरकरके च- मध्यगत चंद्रमासे निकले अमृतका पान जो योगी करे वह १ पक्ष (१५) दिनमें मृत्युको निःसंदेह जीत लेता है यह निश्चय .

गोरक्षपद्धति। ४६ नित्यं सोमकलापूर्ण शरीरे यस्य योगिनः। . तक्षकेणापि दृष्टस्य विषं तस्य न सर्पति ॥८॥ और जिस योगीका शरीर नित्य उक्त चंद्रामृतकरके पूर्ण हो जाय तो तक्षकनागभी उसे डसे तौनी विष न लगे. दुःख न होवे ॥ ८॥ इन्धनानि यथा वह्निस्तैलवति च दीपकः। तथा सोमकलापूर्ण देही देहं न मुञ्चति ॥ ९ ॥ जैसे अग्नि काठको एवं दीपक तेलसहित बत्तीको नहीं छो- डता तैसेही चंद्रामृतपूरित देहको जीव कदापि नहीं छोडता॥९॥ गोमांस भक्षयेन्नित्यं पिवेदमरवारुणीम् । कुलीनं तमहं मन्ये इतरे कुलपातकाः॥१०॥ आचार्य कहते हैं कि जो योगी नित्य गोमांस भक्षण एवं अमरवारुणी पान करे तो उसे हम उत्तमकुलमें उत्पन्न समझते हैं अन्यथा कुयोगी, कुलनाशक हैं सत्कुलमें उत्पन्न हुएभी तो उ- नका जन्म व्यर्थ है।॥ १०॥ गोशब्देनोदिता जिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि। गोमांसभक्षणं तत्तु महापातकनाशनम् ।। ११॥ इस गोमांसशब्दका अर्थ कहते हैं कि गोशब्दकरके यहां जिलाका बोधक है जिह्वाको कपालछिमें प्रवेश करनेको गोमांस भक्षण कहते हैं. यह महापातकोंका नाश करता है॥११॥ जिह्वाप्रवेशसंभूतवह्निनोत्पादितः खलु चन्द्रात्स्रवति यः सारः सा स्यादमवारुणी ॥१२॥ ...

भाषानुवाद । श० १ अमरवारुणीका अर्थ है कि तालुके ऊपर छिद्रमें जिह्वाक प्रवेश उष्मा (गर्मी) से चुकुटिके भीतर वामभागस्थित चंद्रामृत द्रवित होकर जिह्वायमें प्राप्त होता है इसे अमरवारुणीपान कहते हैं ॥ १२॥ चुम्वन्ती यदि लम्बिकायमनिशं जिह्वा सरस्यन्दिनी सक्षारा कटुकाम्लदुग्धसदृशी मध्याज्यतुल्या तथा। व्याधीनां हरणं जरान्तकरणं शस्त्रागमोद्गीरणं तस्य स्यादमरत्वमष्टगुणितं सिद्धाङ्गनाकर्षणम्।।१३॥ जब पूर्वातकर्मोसे जिह्वा बढायके उक्त विधिसे चंद्रामृत पान करने लगती है तो मुखमें लवणसहित मरिचादि, चिंचा- फलादि, दूध, मधु, घृतके आदि स्वाद आपसे ज्ञात होते हैं तव योगीके रोग तथा वृद्धावस्थाका नाश होता है शस्त्र (जो अपने- को काटने आया) का निवारण होता है आठों सिद्धि मिलती है देवभाव मिलता है सिद्धांगनाओंके आकर्षणकी सामर्थ्य हो- ती है ॥ १३॥ मूर्ध्नः पोडशपत्रपद्मगलितं प्राणादवाप्तं हठा- दूर्ध्वास्यो रसनां नियम्य विवरे शक्तिं परां चिन्तयन् । उत्कल्लोलकलाजलं च विमलं धारामयं यः पिबे- निर्व्याधिः स मृणालकोमलवपुयोगी चिरं जीवति १४ जिह्वाको कपालछिद्रमें लगाय.मुख विपरीतकरणीके तरह ऊंचा कर कुंडलिनीके ध्यानसहित प्राणायामसे भुकुटीमध्य ४८ गोरक्षपद्धति । द्विदलकमलके नीचे कंठस्थ षोडशदलकमलमें हृदययोगसे प्राप्त जो निर्मलधारामय तरंगसहित चंद्रामृतरस है इसे जो योगी पान करे उसको ज्वरादिरोग न होते तथा कमलके गाभेकासा कोमल शरीर होकर बहुतकालपर्यंत जीवे ॥ १४ ॥ यत्पालेयं प्रहितसुषिरं मेरुमूर्धान्तरस्थं तस्मिन्तत्त्वं प्रवदति सुधीस्तन्मुखं निम्नगानाम् । चन्द्रात्सारः स्रवति वपुषस्तेन मृत्युनराणां तनीयात्सुकरणमथो नान्यथा कार्यसिद्धिः ॥ १॥ मेरुपर्वतसहश सबसे ऊंची सुषुम्णाके उपरीक्षागमें स्थित चं- द्रामृतरूप जल जिसमें स्थित है ऐसे छिमें सत्त्वगुणात्मा बुद्धि करके आत्मतत्त्व है और गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदासंज्ञक इडा, पिंगला, सुषुम्णा, गांधारी आदि नाडियोंका उक्तविवरमें मुख है इनके द्वारा चन्द्रमंडलागत अमृत व्यर्थ चले जानेसे शरीर जरामृत्युको प्राप्त होता है इसलिये प्रथम कह आये हैं कि सुकरण नाम खेचरीमुद्रा करके चंद्रामृत व्यर्थ सवित नहीं हो- नेसे मृत्यु नहीं होती, इस मुद्राके विना देहकी सिद्धि, लावण्य, बल, बजसमान दृढ शरीर नहीं होते ॥ १५ ॥ सुषिरं ज्ञानजनकं पञ्चस्रोतःसमन्वितम् । तिष्ठते खेचरीमुद्रा तस्मिन् शून्ये निरञ्जने ॥१६॥ इडा १ पिंगला २ सुषुम्णा ३ गांधारी ४ हस्तिजिह्वा ५ इनका प्रवाह ऊपरको है सो इनके प्रवाहसंयुक्त आत्माको सा-

भाषानुवाद । श०१
४९
क्षात् प्रकट रहनेवाला विवर है सो अविद्या एवं अविद्याके
कार्य शोक, मोहादि दूर होते हैं जिसमें ऐसे विवरमें खेचरी
मुद्रा स्थित होती है ॥ १६ ॥
एकं सृष्टिमयं बीजमेका मुद्रा च खेचरी।
एको देवो निरालम्ब एकावस्था मनोन्मनी ॥१७॥
समस्त बीजोंमें मुख्य सृष्टिरूप एक प्रमाण वह है समस्तदे-
वताओंमें भगवान् मुख्य है तैसेही समस्त मुद्राओंमें खेचरी मुख्य
है ॥ १७॥
उड्यानं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगम् ।
उड्डीयानं तदेव स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी ॥७७॥
जिस कारण उड्डियानबंधसे रुका प्राणवायु कहींनी विश्राम
न करके उडके जैसा सुषुम्णामें गति करता है उसी कारण तहां
मृत्युरूपी गजके ऊपर सिंह जैसा यही बंध कहाता है ॥७७॥
उदरात्पश्चिमे भागे अघो नाभेनिंगद्यते ।
उड्डियानो ह्ययं बन्धस्तत्र बन्धो निगद्यते ॥ ७८ ॥
उड्डीयानबंधका स्थान कहते हैं कि उदरसे पश्चिम और
नाभीसे नीचे इस बंधका स्थान योगी कहते हैं इसलिये यह बंध
उसी स्थानमें करना योग्य है ॥ ७८ ॥
ग्रन्थान्तरे।
उदरे पश्चिमं स्थानं नाभेरूच च कारयेत् ।
उड्डीयानो ह्यसौ बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी॥१॥

५० गोरक्षपद्धति। नामीका ऊपरला तथा नीचला भाग उदरमें लग जाय ऐसे पेटके पीछे खींचे इसे उड्डीयानबंध कहते हैं मृत्युरूपी गजको निवृत्त करनेके लिये सिंहसमान है ॥ १॥ उड्डीयानं तु सहजं गुरुणा कथितं सदा। अभ्यसेत्सततं यस्तु वृद्धोपि तरुणायते ॥२॥ हितोपदेशकर्ता गुरुकरके सहजस्वभाव कहा गया ऐसे इस बंधको निरंतर अग्यास करे तो वृद्धशी तरुण हो जावे ॥ २ ॥ नाभेरूलमधश्चापि स्थानं कुर्यात्प्रयत्नतः । षण्मासमभ्यसेन्मृत्यु जयत्येव न संशयः॥३॥ नानीऊधि भागोंको खींचकर पीठमें लगावे. ऐसे इस बं- धको छः महीनेपर्यंत निरंतर अभ्यास करे तो निस्संदेह मृ- त्युको जीते ॥३॥ सर्वेषामेव बन्धानामुत्तमो ह्युड्डियानकः । उड्डियाने दृढे बन्धे मुक्तिः स्वाभाविकी भवेत् ॥१॥ संपूर्ण बंधोंमें उड्डीयानबंध उत्तम है यह दृढ हो जाय तो स्वभावसिद्ध मुक्ति होती है. इसके करनेसे पक्षियोंकेसी गतिक- रके सुषुम्णाद्वारा प्राण मस्तिष्कमें ले जानेसे समाधिमें मोक्ष हो- ता है यही स्वाभाविकी मुक्ति है ॥ ४ ॥ बनाति हि शिरोचालं नाधो याति नभोजलम् । ततो जालंधरो बन्धो कण्ठदुःखौघनाशनः॥ ७९ ॥ जालंधरबंध कहते हैं कि यह बंध कंठस्थानमें होता है अनेक रोगोंको हरता है शरीरस्थ नाडीजालका बंधन करता है व्योम-

भाषानुवाद। श०१
चक्रस्थ चंद्रकलामृतको कपालकुंहरसे नीचे नहीं गिरने देता इ-
स कारण वह जालंधरबंध कहा है ॥ ७९ ॥
जालंधरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे ।
न पीयूपं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति ।। ८० ॥
कंठका संकोचन करके प्राणवायुकी गतिको रोकना जा-
लंधर बंध है इससे चंद्रकलामृत गिरके सूर्यरूप अनिमें नहीं
पडता एवं वायु कदाचित् विरुद्ध नहीं होता ॥ ८० ॥
ग्रन्थान्तरे।
कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेच्चिबुकं दृढम् ।
वन्धो जालंधराख्योयं जरामृत्युविनाशकः ॥१॥
ग्रंथांतरसे जालंधरबंध कहते हैं कि कंठ नीचे नवाय हृदयके
चार अंगुल अंतर ढोडी लगाय दृढ स्थापन करे यह जा-
लंधरबंध वृद्धावस्था तथा मृत्युनाशक है ॥ १ ॥
कण्ठसंकोचनेनैव द्वे नाड्यो स्तंभयदृढम् । .:
मध्यचक्रमिदं ज्ञेयं षोडशाधारबन्धनम् ॥२॥
दृढ संकोचनमात्र करके इडा पिंगला दोनहूं नाडी स्तंभित
होती हैं कंठस्थानमें जो विशुद्धनामा चक्र है वह अंगुष्ठादि ब्रह्म-
रंध्रांत षोडश आधारोंका मध्यम चक्र है इन १६ आधारोंका
वर्णन पूर्व १३ श्लोकके टीका कर आये हैं ॥ २ ॥
मूलस्थानं समाकुच्य उड्डीयानं तु कारयेत् ।
इडां च पिङ्गलां बवा वाहयेत्पश्चिमे पथि ॥३॥

गोरक्षपद्धति ।
૧૨
नाभिको पश्चिमतानरूप उड्डीयानबंध करे और कंठ न-
माय जालंधरबंधसे इडा पिंगला नाडीनको स्तंभन करे तदनंतर
पश्चिममार्ग सुषुम्णामें प्राणवायुको प्राप्त करे ॥ ३ ॥
अनेनैव विधानेन प्रयाति पवनो लयम् ।
ततो न जायते मृत्युर्जरारोगादिकं तथा ॥४॥
इस विधिसे वायुकी गति बंद होकर प्राणवायु स्थिर हो-
कर ब्रह्मरंधमें स्थित रहता है. इसे प्राणलय कहते हैं इससे मृत्यु,
जरा, रोग, देहकी त्रिवली, श्वेतरोगता, मूर्छा आलस्यादिक,.
नहीं होते हैं ॥४॥
बन्धत्रयमिदं श्रेष्ठं महासिद्धश्च सेवितम् ।
सर्वेषां हठतन्त्राणां साधनं योगिनो विदुः॥५॥
मूलबंध १ उड्डीयानबंध २ जालंधरबंध ३ ये श्रेष्ठ हैं
मत्स्येंद्रादि महासिद्ध वसिष्ठादिमुनि इन्हें सेवन करते हैं हठके
उपायोंके सिद्धिको प्रगट करते हैं इससे गोरक्षादि सिद्ध इन्हें:
जानते हैं ॥५॥
यत्किचित्त्रवते चन्द्रादमृतं दिव्यरूपिणः ।
तत्सर्व ग्रसते सूर्यस्तेन पिण्डो जरायुतः॥६॥
तालुके मूलमें स्थित दिव्यरूप चंद्रमासे कछुक अमृत स्रवित
होता है उसे नाभिस्थित अनिरूप सूर्य ग्रास कर लेता है तब
देहको वृद्धावस्था होती है ॥ ६ ॥
तत्रास्ति करणं दिव्यं सूर्यस्य मुखवञ्चनम् ।
गुरूपदेशतो ज्ञेयं न तु शास्त्रार्थकोटिभिः॥७॥

भापानुवाद । श०१ ५३ इस प्रकरणमें उक्तसूर्यके मुखवंचना अर्थात् जिससे उक्त अमृत सूर्यके मुखमें न पडे यह युक्ति कही है तथा विपरीतकरणी मुद्रानी (जो आगे कहेंगे ) इसके उपयोगी है ये सर्व गुरुमुखसे जाने जाते हैं विना गुरु कोटीसंख्याक शास्त्र के अर्थमंत्री न जाने जाते ॥ ७॥ पाणिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेगुदम् । अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबन्धो विधीयते ॥ ८१ ॥ अपानवायु ऊपर खींचके प्राणवायुसे योजित करना. पाद- की एडीसे गुदा, एवं लिंगके मध्य योनिस्थानको दृढ अचेतके गुदद्वारको दृढ संकुचित करना जिससे अपानवायु बाहर न नि- कसे इस प्रकार मूलबंध होता है ॥ ८१ ॥ अपानप्राणयोरेक्यात् क्षयो मूत्रपुरीषयोः । युवा भवति वृद्धोपि सततं मूलबन्धनात् ॥ ८२॥ अपान और प्राणवायुका ऐक्य कर जो निरंतर मूलबंधका अयास करता है उसके मल मूत्र क्षय होते हैं. और बूढाभी जवान हो जाता है ।। ८२ ॥ 'गोरक्षसंहितामें दशमुद्राओंमेंसे महामुद्रा १ खेचरी २ उड्डी- यान ३ जालंधरबंध ४ मूलबंध ५ मुख्य कही हैं अन्य महा- बंध १ महावेध २ विपरीतकरणीमुद्रा ३ बज्रोली ४ शक्ति- चालन ५ ये पांच इसी शतकमें साधारणप्रकार पूर्वही कह आये हैं तथापि विशेष प्रकटताके लिये मैं उन्हें ग्रंथांतरमत- सेभी लिखता हूं- गोरक्षपद्धति । तत्र प्रथमं महाबन्धः। पाणिवामस्य पादस्य योनिस्थाने नियोजयेत् । वामोरूपरि संस्थाप्य दक्षिणं चरणं तथा ॥१॥ वामपादकी एडीसे योनिस्थानको रोधके दक्षिणपाद उसके ऊपर स्थापन करे अर्थात् मूलबंधकरके ॥ १॥ पूरयित्वा ततो वायुं हृदये चिबुकं दृढम् । निष्पीड्य वायुमाकुच्य मनोमध्ये नियोजयत्॥२॥ तब जालंधरबंधकरके वायुको पूरकर मनको मध्यनाडी सुषुम्णामें प्रवृत्त करे ॥ २॥ धारयित्वा यथाशक्ति रेचयेदनिलं शनैः । सव्याने तु समभ्यस्य दक्षाङ्गे पुनरभ्यसेत् ॥३॥ यथाशक्ति कुंभक करके मंद २ रेचन करे ऐसेही वामांगमें अभ्यास करे दोनों अंगोंके अभ्यासकी संख्या समान करे॥३॥ अयं तु सर्वनाडीनामूर्ध्वं गतिनिरोधकः। अयं खलु महाबन्धो महासिद्धिप्रदायकः॥४॥ यह समस्त नाडियोंकी ऊपरकी गतिरोधक महासिद्धिदायक महाबंध है॥४॥ कालपाशमहाबन्धविमोचनविचक्षणः । त्रिवेणीसंगमं धत्ते केदारं प्रापयेन्मनः ॥५॥ मृत्युपाशको काटनेवाला है, इडा, पिंगला, सुषुम्णा तनिोंके सगम (त्रिवेणी) धारणकर मनको (केदार) चुकुटी शिवस्था- नमें प्राप्त करें ॥५॥ .

भाषानुवाद । श०१ रूपलावण्यसंपन्ना यथा स्त्री पुरुषं विना। महामुद्रामहाबन्धौ निष्फलौ वेधवर्जितो॥६॥ जैसे कांति, गुण, शोभायुक्त स्त्री पुरुष विना व्यर्थ है ऐसेही महावेधविना महामुद्रा और महाबंध निष्फल हैं इसलिये अब महावेध कहते हैं ॥ ६ ॥ अथ महावेधः। महाबन्धस्थितो योगी कृत्वा पूरकमेकधीः । वायूनां गतिमावृत्य निवृतं कण्ठमुद्रया॥१॥ एकाग्रबुद्धि करके योगि महावेध इस प्रकार करे कि, ना- । सापुटसे पूरक करके जालंधर बंधकर वायुकी ऊर्ध्वगतिको रोक कुंभक करे ॥ १॥ समहस्तयुगो भूमौ स्फिचौ संताडयेच्छनैः। पुटव्यमतिक्रम्य वायुः स्फुरति मध्यगः॥२॥ दोनहूं हाथोंके हथेलीसमान पृथ्वीमें धरके पादकी एडी योनिस्थानमें दृढ लगाय हाथोंके सहारे पृथ्वीसे कुछेक शरीर उठावे (परंतु जैसे मूलबंध मुद्रा न खुले) फिर मंद मंद पृथ्वीके अपने शरीरासन स्फिचको ताडन करे इससे वायु इडा-पिंगला- को उलंघन कर सुषुम्णामें प्राप्त होता है इस मुद्रा में स्वानुभबसे तथा हरिगुरूपदिष्ट मार्गसे कहता हूं कि शरीर पृथ्वीसे उठायकर पृथ्वीमें ताडन करनेमें उक्त मुद्रा दृढ नहीं रह सकती यदि बलसे रक्खाजी तो मूलब बिगड जाता है इससे सुगम तो पनासन- 1 M ..

५६ गोरक्षपद्धति। से यह कार्य सुखपूर्वक होता है औरभी सुभीता यह है कि हा- थोंके जोरसे शरीर उठानेमें मूलबंध सुगमताहीसे होता है ॥२॥ सोमसूर्यामिसंबन्धो जायते चामृताय वै । मृतावस्था समुत्पन्ना ततो वायुं विरेचयेत् ॥३॥ इस विधिसे सूर्यचंद्रमा अम्यात्मका इडा पिंगला सुषुम्णा- का संयोग मोक्षके हेतु हैं ऐसे होने में मरा हुआ जैसा मृतावस्था होती है तब नासिकापुटमें मंद २ रेचन करे ॥ ३ ॥ महावेधोयमभ्यासान्महासिद्धिप्रदायकः। वलीपलितवेपन्नः सेव्यते साधकोत्तमैः॥४॥ इस महावेधके अभ्यास करनेसे अणिमादि अष्टसिद्धि मि- लती है (वली) धुढापेमें मुखपर सलवटें पडनी (पलित ) बाल श्वेत होने (कंप ) बुढापेमें शरीर कांपना ये उक्त अध्यासीको नहीं होते ॥ ४॥ एतत्रयं महागुह्यं जरामृत्युविनाशनम् । वह्निवृद्धिकरं चैव एणिमादिगुणप्रदम् ॥५॥ ये महामुद्रा, महाबंध, महावेध, गोप्य हैं बुढापे तथा मृत्युको दूर करते हैं जाठराग्निको बढाते हैं अष्टसिद्धि देती हैं ॥५॥ अष्टधा क्रियते चैव यामे यामे दिने दिने । पुण्यं संभारसंधायि पापौषभिदुरं सदा । सम्यक्छिशावतामेवं स्वल्पं प्रथमसाधनम् ॥६॥ आठों प्रहरमें ८ ही वार इनका अभ्यास करे ये ज्यको बढाते हैं पापसमूहको बजके समान सूंकते हैं शि-

५७
भाषानुवाद । श०१
क्षावान् पुरुषको इस प्रकार दिन २ प्रहर २ में थोडा २ करके
अभ्यास करना योग्य है ॥ ६ ॥
अथ विपरीतकरणमुद्रा।
ऊच नाभरधस्तालोसूच भानुरधः शशी।
करणी विपरीताख्या गुरुवाक्येन लभ्यते ॥१॥
अब विपरीतकरणी मुद्रा कहते हैं कि, ऊपरको नानि नीचे
तालुकरके नाभिस्थ सूर्य ऊपरको भुकुटिस्थ चंद्रमा नीचेको
हो जाता है इससे चंद्रामृत सूर्य्यरूप अग्निमें नहीं पडने पाता यह
विपरीतकरणीमुद्रा है यहां ग्रंथकर्त्ताने उदाहरण कुछेक लिख-
कर लिखा गुरुलक्ष्यपर निर्भर छोड दिया । इसलिये मैं (भाषा-
कार) अपने अनुभव एवं हरिगुरूपदिष्टमार्गसे लिखता हूं कि,
दोनहूं पैरोंसे पद्मासन बांधकर दोनहूं हाथ और शिर (चोटी)
पृथ्वी लगाय,उक्त पद्मासनको ऊपर अंतरिक्षमें खडा करे अभ्यास
हुएमें कभी तो उस पद्मासनको सोल पांव आकाशमें लंबे करे
कमी फेर वैसेहीमें पद्मासन करे हाथ और शिरके सहारे उलटा
-खडा रहे तब यह मुद्रा होगी अग्याससे सुगम हो जाती है॥१॥
नित्यमभ्यासयुक्तस्य जठराग्निविवर्दिनी।
आहारो बहुलस्तस्य संपायः साधकस्य च ॥२॥
जो इस मुद्राका नित्य अभ्यास करता है उसकी जठरानि
बढती है, उस साधकको आहार बहुत (यथेच्छ ) करना
चाहिये ॥२॥

गोरक्षपद्धति ।
अल्पाहारो यदि भवेदग्निर्दहति तत्क्षणात् ।
अधाशिराश्चोर्ध्वपादः क्षणं स्यात्प्रथमे दिने ॥३॥
इस मुद्राका आयासी यदि भोजन अल्प करे तो जाठरामि
प्रज्वलित होकर देहको फूकती है. अब क्रिया है कि पहिले
दिन शिर पृथ्वीमें रखकर पैर ऊपरको क्षणमात्र करे ॥ ३ ॥
क्षणाच किंचिदधिकमभ्यसेच दिने दिने।
वलितं पलितं चैव षण्मासो न दृश्यते ।
याममात्रं तु यो नित्यमभ्यसेत्स तु कालजित् ॥४॥
फिर प्रतिदिन एक एक क्षण बढायके अभ्याससे साधे तो
सिद्धि भयेमें वली पलित छः महीनेसे दूर हो जाते हैं जो प्रतिदिन
एक२ प्रहरपर्यंत इसको करता है वह कालमृत्युको जीतता है४॥
अथ वज्रोली।
स्वेच्छया वर्तमानोपि योगोक्तनियमविना ।
वज्रोली यो विजानाति स योगी सिद्धिभाजनम् ॥१॥
अब वज्रोली मुद्रा कहते हैं कि जो योगोक्त नियम नहीं
जानता हुआभी अपनी इच्छासे वज्रोलीको जाने वह अणिमा
सिद्धि पाता है ॥ १
तत्र वस्तुद्वयं वक्ष्ये दुर्लभं यस्य कस्यचित् ।
क्षीरं चैकं द्वितीयं तु नारी च वशवर्तिनी॥२॥
इस मुद्रामें हर किसीको दो वस्तु दुर्लभ हैं विशेषतः ये २
अवश्य चाहिये. वज्रोल्यर्थ संगमोत्तर दुग्धपान, एवं वशवर्तिनी
खी २ उपयोगी हैं ॥ २॥

५९
भाषानुवाद । श०१
मेहनेन शनैः सम्यगू_कुञ्चनमभ्यसेत् ।
पुरुषोप्यथवा नारी वज्रोली, सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ३॥
संगमकरके मंद मंद क्षरितवीर्यको इंद्रियसंकोचनकरके ऊ-
पर खेंचनेके अभ्यास सिद्ध हुएमें बज्रोलीमुद्राकी सिद्धि प्राप्त
होती है ॥ ३॥
यत्नतः शस्तनालेन फूत्कारं वज्रकन्दरे ।
शनैः शनैः प्रकुर्वीत वायुसंचारकारणात् ॥४॥
इसकी पूर्वांगक्रिया कहे हैं कि चांदी वा कांचकी १४ अं-
गुल खोखरी शलाका सच्छिद्र करे जो १२ अंगुल सरल २अं-
गुल तिरछी रहे उसे लिंगछिद्रमें प्रतिदिन२।२ अंगुल प्रवेश कर
एक किनारेसे फूंककर वायु प्रवेश करते २ बारह दिनमें २४
अंगल प्रवेश करे इससे इंद्रियमार्ग शुद्ध होता है तब इस मार्गसे
जलके आकर्षणका अश्यास करे अश्यास सिद्ध हुएमें वीर्यका
आकर्षण करे तो सिद्धि होती है. जिसको खेचरी एवं प्राणजय
सिद्ध हो उसको वज्रोली सिद्धि होती है ॥४॥
नारीभगे पतद्विन्दुमभ्यासेनोर्ध्वमाहरेत् ।
चलितं च निजं बिन्दुमूर्ध्वमाकृष्य रक्षयेत् ॥५॥
स्त्रीसंयोगमें जब बिंदु (वीर्य) शरीरसे चलायमान होती
उसे उक्ताश्यांससे ऊपरको खींच लेवे अथवा जब भगमें गिर पडे
तब स्त्रीके रजसहित बिंदुको आकर्षण कर ऊपरको चढायकर
स्थापन करे ॥५॥

गोरक्षपद्धति । एवं संरक्षयेदिन्दु मृत्युं जयति योगवित् । मरण बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्॥६॥ याप्रकार जो बिंदुकी रक्षा करता है सो योगी मृत्युको जी- तता है बिंदुके पतनसे मृत्यु उसकी रक्षासे अमरत्व होते हैं उस- लिये इस विधिसे बिंदुको स्थापन करे ॥६॥ सुगन्धो योगिनो देहे जायते बिन्दुधारणात् । यावद्विन्दुः स्थिरो देहे तावत्कालभयं कुतः॥ ७॥ उक्त अभ्यासीके शरीरमें बिंदुधारणसे सुगंधि प्रकट होती है और जबलौं देहमें बिंदु स्थित है तबलौकालाय नहीं होता ॥७॥ चित्तायत्तं नृणां शुकं शुक्रायत्तं च जीवितम् । तस्माच्छुकं मनश्चैव रक्षणीयं प्रयत्नतः॥८॥ घर वीर्य चित्तके आधीन है. चित्तके चलायमान होनेसे वीर्य चलायमान और स्थिरतासे स्थिर होता है एवं शुक्रके आधीन जीवित है. इससे स्थिरतासे जीवित स्थिर और चलायमान होनेसे मरण होता है, इसलिये शुक्र और मनकी रक्षा करनी मुख्य है। ऋतुमत्या रजोप्येवं बीजं विन्दुं च रक्षयेत् । मेरुणाकर्षयेदू सम्यगभ्यासयोगवित्॥९॥ ऐसेही रजोवती स्त्रीके रजको विंदुसहित आकर्षणके ऊपर- को खींचके स्थापन करे ऐसे वजोलीका अभ्यास करनेवाला योगवेत्ता होता है ॥ ९॥ 'एक प्रकारके भेद वज्रोलीके सहजोली, अमरोलीभी हैं अतः प्रथम सहजोली कहते हैं।

भाषानुवाद । श०१
सहजोलिश्चामरोलिर्वज्रोल्या भेद एकतः।
जले सुभस्म निक्षिप्य दग्धगोमयसंभवम् ॥१॥
जो वजोलीके फल वही सहजोली, अमरोलोकेनी हैं
इसलिये येशी उसीके भेद हैं. गोवरके ( कंडे ) गोपटे जलायके
भस्म जलमें मिलावे ॥१॥
वज्रालीमैथुनादूर्व स्त्रीपुंसोः स्वाङ्गलेपनम् ।
आसीनयोः सुखेनैव मुक्तव्यापारयोः क्षणात् ॥२॥
वज्रोली अर्थ मैथुन करके क्षणमात्र सुखसे बैठके व्यवाय
व्यापार छोडके उक्त भस्म जलमें मिलाय स्त्रीपुरुष अपने २
सर्वांग लेपन करे ॥२॥
सहजोलिरियं प्रोक्ता श्रद्धेया योगिभिः सदा।
अयं शुभकरो योगो भोगयुक्तोपि मुक्तिदः॥३॥
यह मत्स्येंद्रादि योगीश्वरोंने सहजोली कही है यह योग शु-
भकारक है. अन्यत्र साधनाओंमें जहां भोग तहां मोक्ष नहीं
जहां मोक्ष तहां भोग नहीं इस मुद्राके अस्यासमें भोगसहित
मोक्षणी है ॥ ३ ॥
अयं योगः पुण्यवतां धीराणां तत्त्वदर्शिनाम् ।
निर्मत्सराणां सिद्धयेत नतु मत्सरशालिनाम् ॥ ४॥
जो योगी पुण्यवान्, धैर्यवान्, तत्त्वदर्शी और निर्मत्सरी है
उनको सिद्ध होता है जो मत्सरी (अन्यशुभद्वेषी) है उनको
सफल नहीं होता ॥४॥

गोरक्षपद्धति। 'अब दूसरा भेद व अमरोली कहते हैं- पित्तोल्बणत्वात्प्रथमाम्बुधारां विहाय निःसारतयान्त्यधाराम् । निषेव्यते शीतलमध्यधारा कापालिके खण्डमतेऽमरोली॥१॥ शिवांबुके प्रथमधारा पित्तके उष्णतासे तथा अंत्यधारा नि:- सारतासे त्यागकर निर्विकार मध्यधाराको ग्रहण कर सेवन करते हैं यह योगाभिमत कापालिकी क्रिया है इसे अमरोली कहते हैं यदा (कापालिक ) कनफटे जोगियोंका (जिसे खंडमत कहते हैं ) यह कर्म विशेषतः इष्ट है ॥ १ ॥ अमरीयं पिवेन्नित्यं नस्यं कुर्वन् दिने दिने । वज्रोलीमभ्यसेत्सम्यगमरोलीति कथ्यते ॥२॥ जो पुरुष अमरवारुणी (जो खेचरी प्रकरणमें कही है) का पान करते हैं एवं नासभी अमरवारुणीका लेते हैं तथा प्रतिदिन बजोलीका अभ्यास करें सोही कापालिकी अमरोली कही है२॥ अभ्यासानिःसृता चान्द्री विभूत्या सह मिश्रयेत् । धारयेदुत्तमाङ्गेषु दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥३॥ अमरोलीके अभ्याससे निःसृत चंद्रसुधाको पूर्वोक्त भस्ममें मिलायके उत्तमअंग-मस्तक, नेत्र, स्कंध, हृदय, भुजादिमें धारण करे तो भूत, भविष्य, वर्तमान देखनेयोग्य दिव्यदृष्टि हो जाती है ॥३॥ ।

भाषानुवादः। श०.१
अथ स्त्रीणां वज्रोली।
पुंसो बिन्दु समाकुम्च्य सम्यगभ्यासपाटवात् ।
यदि नारी रजो रक्षेदज्रोल्या सापि योगिनी ॥१॥
अब स्त्रियोंको वजोलीसाधन कहते हैं कि, जो स्त्री अभ्या-
सकी चतुराईसे पुरुषके बिंदुको खींचके अपने रजकी वजोली-
मुद्रा करके रक्षा करे वहमी योगिनी कहानी है ॥ १॥
तस्याः किंचिद्रजो नाशं न गच्छति न संशयः।
तस्याः शरीरे नाश्व बिन्दुता मे न गच्छति ॥२॥
उसके रजका नाश ( पतन ) निस्संदेह अल्पभी नहीं होता
तथा शरीरमें नादमी उत्पन्न होता है चंद्ररूप बिंदु सूर्यरूप रजके
बाहर संयोगसे सृष्टि (गर्म ) होती है जब ग्याससे भीतरही
योग होय तो योगसिद्धि होती है परमपद मिलता है इनके
संयोगमें समस्त देवता स्थित रहते हैं ॥२॥
स विन्दुस्तद्गजश्व एकीभूय स्वदेहगी।
वज्रोल्यभ्यासयोगेन सर्वसिद्धिं प्रयच्छतः॥३॥
रज, बिंदु वजोलीके अभ्याससे देहमें प्राप्त होनेपर सर्व
सिद्धि देते हैं ॥ ३ ॥
रक्षेदाकुञ्चनादूर्ध्व मा रजः सा हि योगिनी ।
अतीतानागतं वेत्ति खेचरी च भवेध्रुवम् ॥ ४॥
जो स्त्री भगको आकुंचन करते करते रजको ऊपर शरीरमें
चढाय रक्षा करे वह योगिनी होती है भूत, भविष्य, वर्तमान
जाने अंतरिक्षमें बीच रहनेहारी वैमानिकगति मिलती है ॥४॥

गोरक्षपद्धति।
देहसिद्धिं च लभते वनोल्यभ्यासयोगतः।
अयं पुण्यकरो योगो भोगे मुक्तेपि मुक्तिदः ॥५॥
वजोलीके अभ्यासयोगसे ( देहसिद्धि) रूप, लावण्य, बल
वजसंहननभाव मिलते हैं. यह योग पुण्य देनेवाला तथा विप-
योग भोगनमेंभी मुक्ति देता है ॥ ५ ॥
'इनमें दशम शक्तिचालनमुद्रा प्रथम अजपा गायत्रीके उप-
रांत कह आये हैं. अब इन १० का माहात्म्य कहते हैं-
इति मुद्रा दश प्रोक्ता आदिनाथेन शम्भुना।
एकैका तासु यमिनां महासिद्धिप्रदायिनी ॥१॥
ये दश १० मुद्रा आदिनाथ शिवने कही हैं इनमें एक
एक मुद्रा योगीको अणिमादि देनेवारी हैं ॥३॥
उपदेशं हि मुद्राणां यो दुत्ते सांप्रदायिकम् ।
स एव श्रीगुरुस्वामी साक्षादश्विर एव सः॥२॥
जो योगियोंको ( सांप्रदायिक ) गुरुपरंपरामाप्त इन मुद्रा-
ओंका उपदेश देवे वही सर्व गुरुनते श्रेष्ठ, स्वामी, साक्षात् ई-
श्वर है ॥२॥
तस्य वाक्यपरो भूत्वा मुद्राभ्यासे समाहितः ।
अणिमादिगुणैः सादै लभते कालवञ्चनम् ॥३॥
इनके उपदेशकर्ता गुरुके आसन, कुंजक, आहार, विहार,
चेष्टादि वाक्योंमें आदरपूर्वक ग्रहण कर तत्पर रहे तो अणिमादि
सिद्धियोंको जीतकर कालमृत्युको जीते ॥ ३ ॥

भाषानुवाद । श. १ अथ प्रणवाभ्यासः। पद्मासनं समारुह्य समकायशिरोधरः । नासायष्टिरकान्ते जपेदोङ्कारमव्ययम् ॥८३॥ अब प्रणयके अभ्यासकी विधि कहते हैं कि एकांत स्थलमें बैठकर दृढ पद्मासन बांधके शरीर कंठ शिर सम ( सरल) कर- के नासायष्टि निरंतर करके प्रणव जप करे ॥ ८३ ॥ भूर्भुवःस्वरिमे लोकाः सोमसूर्याग्निदेवताः। यस्य मात्रासु तिष्ठन्ति तत्परं ज्योतिरोमिति ॥४॥ जिस प्रणवके अकार उकार मकार तीन वर्णमें भूः भुवः २ स्वः३ ये लोक चंद्रमा १ सूर्य २ अग्नि ३ देवता रह- ते हैं वह प्रणव परमकारणरूप ज्योतिर्मय चैतन्य ॐकारस्वरूप है॥ ८४॥ त्रयः कालास्त्रयों वेदास्त्रयो लोकास्त्रयः स्वराः। त्रयो देवाः स्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति॥८६॥ जिस प्रणवमें भूत, वर्तमान, भविष्य ३ काल ऋक्, यजुः, साम तीनहूं वेद. स्वर्ग, मृत्यु, पाताल ३ लोक. उदात्त, अनुदात्त स्वरित ३ स्वर. ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तीन देवता रहते हैं. वह पणच (ॐकार ) स्वरूप परब्रह्म ज्योतिस्वरूप है ॥ ८५ ॥ किया इच्छा तथा ज्ञानं ब्राह्मी रौद्री च वैष्णवी । विधा शक्तिःस्थिता यत्र तत्परंज्योतिरोमिति॥८६॥ जिस प्रणवके अ, उ, म, तीन मात्रा ॐक्रिया, इच्छा, - ५

गोरक्षपद्धति।
ज्ञान, शक्ति भेदोंकरके ब्रह्माणी, रुद्राणी, वैष्णवी ये शक्ति
रहती हैं सो प्रणव ओंकारस्वरूप परब्रह्मज्योति है ॥ ८६ ॥
अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुसंज्ञकः।
त्रिधा मात्रा स्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति।।८७॥
त्रिलोकात्मा अकार उकार और बिंदुस्वरूप मकार तीनहूं
मात्रा रहती हैं जिसमें ऐसा ब्रह्मज्योतिस्वरूप प्रणव है ।।८७ ॥
वचसा तज्जपेद्धीजं वपुषा तत्समभ्यसेत् ।
मनसा तत्स्मरेन्नित्यं तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ ८८॥
इस प्रणवको सकल जगत्कारण भूतभावना करके वच-
नसे जप करना शरीरसे सिद्धासनादिसे सगुणब्रह्मकी भावना
करके प्रणवार्थ समझ अझ्यास करना तथा मनसे परब्रह्मस्वरूप.
प्रकाश चैतन्य समझके सर्वदा स्मरण करना ।। ८८ ॥
शुचिर्वाप्यशुचिर्वापि योजयेत्प्रणवं सदा।
नस लिप्यति पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ ८९॥
जोयोगी बाह्याभ्यंतर शौचयुक्त वा बाह्यशौचमात्र या जैसे
तैसे होकर प्रणवका अर्थ समझ अभ्याससे जप करता है उसको
शारीरकपाप स्पर्श नहीं करते. जैसे कमलदल जलमें रहता है
परंतु जल उसके पत्रको स्पर्श नहीं कर सकता ऐसेही उक्त वि-
धिका प्रणवाझ्यासीभी निर्लेप रहता है ॥ ८९ ।।
अथ प्राणायामप्रकारः।
चले वाते चलो विन्दुर्निश्चले निश्चलो भवेत् ।
योगी स्थाणुत्वमानोति ततो वायुं निरुन्धयत्॥९॥

भाषानुवाद । श० १ प्राणवायुके निश्वासोच्छ्रास होते रहतेमें बिंदुभी चलायमान स/होता है जो प्राणवायु स्थिर होगा तो बिंदु स्थिर हो जाता है जब प्राणायामसे प्राणवायु स्थिर हो गया तो योगी चिरकाल योगा- क्याससे समर्थ होता है दीर्घजीवी तथा ईश (शिव) भावको प्राप्त हो जाता है. इसलिये योगीको वायुनिरोध करना मुख्य है।९०॥ यावदायुः स्थितो देहे तावजी न मुञ्चति । मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत् ॥११॥ जबलौं शरीरमें वायु स्थिर रहता है तबलौ जीव शरीरको नहीं छोडता जब प्राणवायु शरीरसे निकल जाता है तो उसी अव- स्थाको मरण कहते हैं जीवन मरण प्राणवायुके आधीन है इस- लिये प्राणवायुका रोधन अवश्य विधिसे करना चाहिये ॥९१॥ यावद्धो सरुदेहे यावच्चित्तं निरामयम् । यावदृष्टिभ्रुवोर्मध्ये तावत्कालभयं कुतः॥९२॥ जवतक प्राणवायु कुंभकसे देहमें स्थिर है तथा जबतक चित्त विषयवासना त्याग अन्तःकरण ईश्वराकार निर्विकार है और जबतक मध्यमें दृष्टि निश्चल है तबतक कालकी भय नहीं होती है । ९२॥ - अतः कालभयाद्ब्रह्मा प्राणायामपरायणः । योगिनो मुनयश्चैव ततो वायुं निरोधयेत् ॥९३ ॥ जिस कारण जीवनमरण प्राणवायुके आधीन है इसी हेतु ब्रह्मा एवं सनकादिक सिद्ध, दत्तात्रेयादि मुनि, प्राणायामके सा- . 154

गोरक्षपद्धति ।
धनमें तत्पर हैं अन्य योगियोंकोभी इस आयाससे कालकी -
य नहीं होती इस हेतु प्राणायाम साधन करना योग्य है ॥९३॥
घटत्रिंशदंगुलो हंसः प्रयाणं कुरुते बहिः।
वामे दक्षिणमार्गेण ततः प्राणोऽभिधीयते ॥९४॥
प्राणवायु अपानवायुरूप हंस इडापिंगलाके मार्गसे छत्तीस.
अंगुल बाहर निकलता है इस हेतु 'बहिः प्रयाणं कुरुते प्राणः'
उक्तवायु प्राण कहाता है प्राणापानवायुरूप हंस है और नहीं९४
शुद्धिमेति यदा सर्वनाडीचक्र मलाकुलम् ।
तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणे क्षमः ॥ ९५ ॥
जब शरीरके मलसे व्याप्त नाडीजाल, नाडीशोधन प्राणाया-
मके प्रभावसे शोधके शुद्ध निर्मल होता है तब योगाभ्यासोपयो-
गी प्राणवायुको थामनेकी सामर्थ्य योगीको होती है अन्यथा
नहीं ॥ ९५॥
अथ नाडीशोधनप्राणायामविधिः ।
बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत् ।
धारयित्वा यथाशक्ति भूयः सूर्येण रेचयेत्॥९६॥
नाडीशोधन करनेवाले प्राणायामकी विधि कहते हैं कि एकांतमें
स्थूल और कोमल आसनमें बैठकर पन्नासन बांधे तब चन्द्र-
नाडी (इडा) से १२ संख्या प्रणव जप करते मन्दमन्द पूरक
तथा १६ संख्यासे दोनहूं ओर थामके कुंभकमें चन्द्रमण्डलका
ध्यान करना और १० संख्यासे सूर्यनाडी (पिंगला) से मन्द
मन्द रेचन करे यह चन्द्रांग ( वामांग) प्राणायाम है ॥९६॥

भाषानुवाद । श०१ अमृतदधिसंकाशं गोक्षीरधवलोपमम् । ध्यात्वा चन्द्रमसो विम्बं प्राणायामी सुखी भवेत्॥९७॥ चन्द्रांगाणायाममें दधि, दुग्ध, समान अतिशुक्लवर्ण अमृत- स्वरूप चन्द्रमाका कंठ तथा नाशिम ध्यान करनेसे आनन्दका अनुभव होकर सुख मिलता है ॥ ९७ ॥ दक्षिणे श्वासमाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः । कुम्भयित्वा विधानेन पुनश्चन्द्रेण रेचयेत् ॥ ९८॥ सूर्यनाडी (पिंगलामार्ग) से प्राणवायु १२ संख्यासे प्र- णवजपसहित पूरकके १६ संख्यासे कुंजकमें आदित्यमंडल- का ध्यान करना और १० संख्यासे प्रणवजप करके चंद्र- नाडी (इडामार्ग) से मंद २ रेचन करना यह दक्षिणांग (सूर्यांग) प्राणायाम है ।। ९८॥ प्रज्वलज्ज्वलनज्वालापुञ्जमादित्यमण्डलम् । ध्यात्वा नाभिस्थितं योगी प्राणायामी सुखी भवेत्र९९ सूांग प्राणायाममें कुंभकविषये जाज्वल्यमान अग्निज्वा- लासमुदायसमान अग्निमय सूर्यमंडलको अपने नाशिकमलमें ध्यानकरके जो योगी प्राणायाम करे तो आनंद पाता है।९९॥ प्राणांश्चेदिडयापि चेत्परिमितं भूयोन्यया रेचयेत् पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बद्धा त्यजेदामया। सूर्याचन्द्रमसोरनेन विधिना विम्बयं ध्यायतां शुद्धा नाडिगणा भवन्ति यमिनां मासत्रयादूतः॥

७० गोरक्षपद्धति । उक्त ४ श्लोकका अर्थ सूक्ष्मसे पुनः कहते हैं कि यदि प्रा. णवायुको वामनासापुटसे १२ प्रणव जपसे पूरक १६ जपसे चंद्रमंडल ध्यानसहित कुंजक और १० जपसे रेचन सूर्यनाडीसे करना यह एक प्राणायाम हुवा पुनः दक्षिण नाडीसे १२ जपि पूरक १६ से सूर्यमंडल ध्यानसहित कुं- भक और १० से रेचन करना दूसरा प्राणायाम हुवा पुनः वामसे पूरक दक्षिणसे रेचक करके तीसरा प्राणायाम हुवा इसी प्रकार चंद्रांग पूरकके कुंभकमें चंद्रबिंब प्राणवायुस्वरूपका और सूर्य्याग पूरकके कुंभकमें सूर्यबिंब अपानवायुस्वरूपका ध्यान करनेवाले योगीके समस्त नाडीजाल तीन महीने उपरांत शुद्ध ( निर्मल) होते हैं यह नाडीशोधनका उत्तम प्रकार कहा है जो संयमसे रहके धौती १ नेति २ नौली ३ वस्ती ४ त्राटक ५ भला ६ षट्कर्म में परिश्रम न करे नौजी इनही प्रा- णायामोंके अग्याससे उनका उक्तकृत्य संपादित हो जाता है जैसे कहानी है कि प्राणायामैरेव सर्वे प्रशुष्यन्ति मला इति । आचा- ाणां तु केषांचिदन्यत्कर्म न संमतम् ।। " अर्थात् प्राणाया- महीसे नाडीमल शुद्ध हो जाता है इसलिये याज्ञवल्क्यादियोंके अन्य धोत्यादि षट्कर्म संमत नहींहै ॥ १० ॥ ग्रन्थान्तरे। प्रातमध्यंदिनं सायमद्धरात्रे च कुम्भकान् । शनैरशीतिपर्यन्तं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥१॥ १

भाषानुवाद । श० १
अरुणोदयसे सूर्योदयपर्यंत ३ घटी प्रातःकाल दिनके पांच
विभाग कर मध्यभाग मध्याह्न, सूर्यास्तसे ३ घटी आगे पीछे
सायं संध्याकाल और अर्द्धरात्रिमें २ मुहूर्ण निशीथ काल हो-
ता है इन चारोंमें प्रत्येकमें ८०। ८० प्राणायाम करना अर्द्धरा-
त्रिमें न कर सके, तीनों कालमें अवश्य आयास करना. चारों
समयके ३२० और ३ समयके २४० प्राणायाम होते हैं। १॥
कनीयसि भवेत् स्वेदः कम्पो भवति मध्यमे ।
उत्तमे स्थानमाप्नोति ततो वायुं निबन्धयेत् ॥२॥
जिसमें प्रस्वेद आवे वह कनिष्ठ, जिसमें कंप हो वह मध्यम
है, जिसमें वायु ब्रह्मरंध्रमें प्राप्त हो सो उत्तम कहाता है इससे
योगी निरंतर वायुका अभ्यास करे और कुछ कम ४२
विपल कुंभक रहे सो कनिष्ठ, ८४ से मध्यम, १२५ में
उत्तम प्राणायाम काल कहते हैं जब प्राणायाम स्थिर हो जा-
य तब प्राण ब्रह्मरंध्रको प्राप्त होता है तहां २५ पिला स्थिर
रहे तब प्रत्याहार २५ पलापर्यंत रहे तो धारणा तथा ६ घटी
रहे तो ध्यान और बारह दिन रहे तो समाधि होती है ॥ २॥
जलेन श्रमजातेन गात्रमईनमाचरेत् ।
दृढता लघुता चैव तेन गात्रस्य जायते ॥३॥
प्राणायामश्रमसे जो पसीना आवे उसे सर्वांगमें खूब मले
इससे गात्र लघु और दृढ होते हैं अर्थात् जडताका अभाव
होता है ॥ ३॥

गोरक्षपद्धति ।
अभ्यासकाले प्रथमे शस्तं क्षीराज्यभोजनम् ।
ततोभ्यासे दृढीभूते न ताहनियमग्रहः॥४॥
अभ्यासकालमें दूध, घृत भोजन करे जब केवल कुंभका-
क्यास दृढ हो जाय तब उक्तनियमका कुछ आग्रह नहीं ॥४॥
यदा तु नाडीशुद्धिः स्यात्तथा चिह्नानि बाह्यतः ।
कायस्य कृशता कान्तिस्तदा जायेत निश्चितम् ॥५॥
जब नाडीशुद्धि हो जाती है तो बाहर चिह्न देहकी क-
शता, कांतिवर्द्धनआदि निश्चय देखनेमें आते हैं बहुतकालसम
कुंभक धारण करनेसे जाठराग्निप्रदीप्ति, नादकी प्रकटता और
निरोगिता होती है ये सर्व नाडीशुद्धिके गुण हैं ॥ ५ ॥
यथेष्ट धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् ।
नादाक्षिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडिशोधने ॥ १०१॥
इति गोरक्षशास्त्रे प्रथमशतकम् ॥ १ ॥
नाडिशोधन हुयेमें अपने समझेयोग्य मंत्र-जप-कालपर्यंत
प्राणवायुके धारणसामर्थ्य होती है उदराग्नि प्रदीत स्पष्टतर
नादका अवण और नैरुज्यता होती है ॥ १०१ ॥
इति महीधरकृतायां गोरक्षयोगशास्त्रभाषायां ससंग्रहायां
योगाङ्गपूर्वाश्यासविधिः ॥ १॥

अथ
गोरक्षपद्धतिः।
द्वितीयं शतकम् ।
1...
'जो पूर्व १०० श्लोकके टीकामें लिखा गया है कि धौती-
आदि ६ कर्मका कार्य प्राणायामसे हो जाता है इन्हे न करे
परंतु किसी २ आचार्योंका यहभी मत है कि-
मेदः श्लेष्माधिकः पूर्व षट्कर्माणि समाचरेत् ।
अन्यस्तु नाचरेत्तानि दोषाणां समभावतः॥
जिसका मेद और श्लेष्मा अधिक हों उसको प्राणायामसा-
धनमें अत्यंत कष्टसेभी आयास दृढ नहीं होता इसलिये उनको
प्रथम षट्कर्म करके तब प्राणायामका अभ्यास करना योग्य है
इसलिये षट्कर्मविधि कहते हैं.
तत्रादौ धौतिः।
चतुरडुलविस्तारं हस्तपञ्चदशायतम् ।
गुरूपदिष्टमार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैर्ग्रसेत् ॥१॥
चार अंगुल चौडी, पंद्रह हाथ लंबी, बारीक वस्त्र (पग-
डी) की पट्टी थोडे गरमजलमें निगोय मुखसे पहिले दिन एक
हाथ, दूसरे दिन दो हाथ, तीसरे दिन तीन एवं क्रमसे १५
दिनमें पूरी गुरूपदिष्टमार्गसे निगल जावे ॥ १ ॥
पुनः प्रत्याहरेचैतदुदितं घौतिकर्म तत् ।
कासश्वासप्लीहकुष्ठं कफरोगांश्च विंशतिः।
घौतिकर्मप्रभावेण प्रयान्त्येव न संशयः॥२॥

७४
गोरक्षपद्धति ।
उक्त बख पिछला किनारा मुखमें दांतोंसे दाब ओठोंसे ल-
गाय नौलीकर्म करे इससे छातीमें लगा वस्त्र उदर (अंतडि ) में
पहुँच साफ करता है तब थोडा २ बाहर निकाल डाले यह धौ-
तिकर्म है कास, श्वास, प्लीहा, कुष्ठादि, विषरोग, वीस प्रकारके
कफरोग इस धौतिकर्मके प्रभावसे निस्संदेह नाश हो जाते हैं॥२॥
अथ बस्तिः।
नाभिदन्ने जले पायौ न्यस्तनालोत्कटासनः ।
आधाराकुञ्चनं कुर्यात्क्षालनं बस्तिकर्म तत् ॥१॥
अब बस्तिकर्म कहते हैं कि नाभिमात्र जलमें उत्कटासन
बैठकर छः अंगुल लंबी और अंगुल प्रवेशयोग्य छिद्रवाली
बांसकी नली चार अंगुल गुदामें प्रवेशकर गुदा आकुंचन करके
पेटमें जल चढाय नौलीकर्म करके बाहर छोड देवे यह बस्तिकर्म
है. धौती बस्ति विना भोजन किये करने न चाहिये तथा इनके
उपरांत शीघ्र भोजन करना योग्य है ॥ १ ॥
गुल्मप्लीहोदरं चापि वातपित्तकफोद्भवाः।
बस्तिकर्मप्रभावेण क्षीयन्ते सकलामयाः॥२॥
बस्तिकर्मसे गुल्म, पीह, जलोदर, वात, पित्त, कफसे उत्पन्न
सर्वरोग नाश होते हैं ॥२॥
धात्विन्द्रियान्तःकरणप्रसाद
दद्याच्च कान्ति दहनप्रदीप्तिम् ।
अशेषदोषोपचयं निहन्या-
दभ्यस्यमानं जलबस्तिकर्म ॥३॥

भाषानुवाद । श०२
७५
जलमें बस्तिकर्मके अभ्याससे शरीरके सप्त धातु रस १
। रुधिर २ मांस ३ मेद ४ अस्थि ५ मज्जा ६ शुक्र ७ तथा
पांच ज्ञानेंद्रिय पांच कर्मेंद्रिय और अंतःकरण मन, बुद्धि,
चित्त, अहंकार, ताप, विक्षेप, शोकादि, मोह, गौरव, आवरण,
दीनता, राजसतामसका धर्म सभी निवृत्त होते हैं. प्रसन्नता कांति,
बढती है. जठरानि दीप्त होती है,वातादि समस्त दोषोंको दूरकर
नीरोगिता होती है ॥३॥
अथ नेतिः।
सूत्रं वितस्ति सुस्निग्धं नासानाले प्रवेशयेत् ।
मुखानिर्गमयेचेषा नेतिः सिदनिगद्यते ॥३॥
अब नेतिकर्म कहते हैं कि एक बालिस्त मुलायम, एवं यं-
थिरहित सूत्रका एक किनारा नासिकाके एक पुटमें प्रवेश कर
दूसरे पुटको बंदकर पूरक करे जब कुछ सूत्र ऊपर चढे तब
मुखश्वास छोडकर सूत्र बाहर निकाले तब एक नारा मुख-
के बाहर दूसरा नासिकाके बाहर दोनहूंको हाथोंसे पकड शनैः
शनैः चलाता रहे इसे नेतिकर्म सिद्धजन कहते हैं ॥ १॥
कपोलशोधिनी चैव दिव्यदृष्टिप्रदायिनी ।
जलजातरोगोषं नेतिराशु निहन्ति च ॥२॥
यह क्रिया कपोल तथा नासिकादियोंके मल दूर कर सू-
क्ष्मपदार्थदर्शी दिव्यदृष्टि देती है और जत्रू (कंठमूल) स्थानसे
ऊपरके समस्त रोगसमूहको शीघ्र शांत करती है. ॥ २॥

७६
गोरक्षपद्धति ।
अथ त्राटकम्।
निरीक्षेनिश्चलहशा सूक्ष्मलक्ष्यं समाहितः।
अश्रुसंपातपर्यन्तमाचाय्यत्राटकं स्मृतम् ॥ १॥
अब त्राटक कहते हैं कि एकाग्र दृष्टि से कुछ सूक्ष्म वस्तुको
जबलौं नेत्रोंमें पानी न आवे निरंतर देखता रहे. नेत्रों में जल
आनेपर छोड देवे इसे मत्स्येंद्रादि त्राटक कहते हैं. मैं (भाषाकार)
समझता हूं कि सूक्ष्म वस्तु के स्थानमें प्रथम नासाग्र अभ्यास
होनेपर चूमध्य देखे तो औरभी अच्छे गुण शीघ्र होंगे ॥ १ ॥
मोचनं नेत्ररोगाणां तन्द्रादीनां कपाटकम् ।
यत्नतस्त्राटकं गोप्यं यथा हाटकपेटकम् ॥२॥
यह त्राटककर्म नेत्ररोगनाशक, बल बढानेवाला, आल-
स्यनिद्रादियोंका कपाट (केवाड) है तंद्रा और तमोगुणी चित्तवृ-
त्तिके क्रोधादिकोंको दूर करता है जैसे सुवर्णकी पिटारीको
यनसे रखते हैं ऐसेही इस कर्मकोभी गोप्य रक्खे ॥ २ ॥
अथ नौलिः।
अमन्दावर्तवेगेन तुन्दै सव्यापसव्यतः।
नतांसो भ्रामयेदेषा नौलिः सिद्धःप्रचक्ष्यते॥१॥
अब नौलिकर्म कहते हैं कि दोनहूं कंधा नीचे नवाय
उदरको दक्षिणवामभागकरके जलके चमर (नौ रे) के नाई घुमावे
इसे सिद्धलोग नौलि कहते हैं. अनुभवसिद्ध यहनी है कि दक्षि-
णवामभागसे घुमायके अग्यास हुयेमें नीचे ऊपरकोनी चरखी-
के समान उदरानलको घुमाना चाहिये ॥ १ ॥

भाषानुवाद । श०२
मन्दाग्निसंदीपनपाचनादिसंघापिकानन्दकरी सदैव ।
। अशेषदोषामयशोषिणीच हठक्रियामौलिरियं हि नलिः२
यह क्रिया मंदाग्निको बढाय भोजन किये अन्नादिकोंको
शीघ्र परिपाक करनेवाली, समस्त वातादिरोगोंको सुखानेवाली,
आनंदको देनेवाली, धोत्यादि सर्व कर्मोंमें (श्रेष्ठ ) मुकुट है धौ-
ति, बस्ति, इन दो क्रियाओंमें नौलि कहनी होती है इस लिये
यहां नौलिकी विधि कही है ॥ २॥
अथ कपालभातिः।
भस्रावल्लोहकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमौ ।
कपालभातिविख्याता कफदोषविशोषणी॥१॥
अब कपालभातिकर्म कहे कि लुहारकी धौंकनी (खाल)-
के नाई शीघ्र शीघ्र रेचन जो रेचकपूरक करे इसे कपालभाति
कहते हैं इससे वीस प्रकारके कफरोग दूर होते हैं ॥ १ ॥
षटकर्मनिर्गतस्थौल्यकफदोषमलादिकः ।
प्राणायाम ततः कुर्यादनायासेन सिद्धयति ॥२॥
उक्त पट्कर्मोंकरके स्थूलनाव कफदोष मलपिचादि दूर
हो जाते हैं तब प्राणायाम करें तो विनाश्रमही योगसिद्धि
होती है ॥२॥
उदरगतपदार्थमुद्रमन्ति पवनमपानमुदीर्य कण्ठ-
नाले । क्रमपरिचयवश्यनाडिचका गंजकरि-
णीति निगयते हठज्ञैः ॥३॥

७८
गोरक्षपद्धति ।
अब गजकरणीमुद्रानी प्रसंगसे कहते हैं कि, अपानवायुको
कंठनालमें चढाय उदरगत भुक्तपीतअन्न जलादियोंको निकाले
इस अायाससेभी नाडिचक्र अपने आधीन (वशीतूत ) होता
है इसे हठज्ञ योगी गजकरणी कहते हैं ॥३॥
अथ उत्तराईग्रन्थः।
पूर्वोक्त प्रकारोंसे नाडिशोधन हुयेमें यम, नियम, आसन
साधक षट्चक्र षोडशाधारका कर्म जानकर नाडिजाल ना-
डिगत वायु ज्ञात हुयेमें चन्द्रतारानुकूल शुभदिन शुभ मुहूर्तमें
लग्ननवांशादि शुज साधके एकांतस्थलमें श्रीगुरु गोरक्ष;
गणेशका पूजन मंगलपाठ स्वस्त्ययन कराय योगाभ्यासोपदे-
शक श्रीगुरुको आराधनसे संतुष्ट कर उन्हीके आज्ञासे यो-
गाण्यामको आरंभ करना इसमें प्रथम प्राणायामका विस्तार
कहते हैं -
प्राणो देहे स्थितो वायुरपानस्य निरोधनात्।
एकश्वसनमात्रेणोद्घाटयेद्दगने गतिम् ॥ १॥
प्राणवायु जो देहमें स्थित है और मूलाधारस्थित अपानवा-
युको ऊपर उठाय रोधकर एकही श्वासमें कुंडलीकरके रुका हु-
आ सुषम्णादारको खोलके सुषम्णानाडिके चिदाकाशमें ऊर्ध्व-
गति कराता है सो प्राणायाम सुगम होता है ॥ ३ ॥
रेचकः पूरकश्चैव कुम्भकः प्रणवात्मकः।
प्राणायामो भवेत्रेधा मात्राद्वादशसंयुतः॥२॥

भाषानुवाद । श० २ रेचक, पूरक, कुंभकके भेदकरके प्राणायाम तीन प्रकारका होता है, बाहरके वायुको अध्यंतर प्रवेश करना पूरक. वा- युको भीतरही रोकना कुंभक. रुदवायुको बाहर निकालना रेचक होता है प्रणवका स्मरण करनेवाला प्राणायाम है ब्राह्मण- को प्रणवका क्षत्रिय वैश्यको एकाक्षर मंत्रजपका अधिकार है पूरकमें अकारका स्मरणपूर्वक १२ प्रणव जपके चंद्रनाठीसे पूरक उकारके स्मरणपूर्वक चन्द्रमण्डलका ध्यान सहित १६ प्रणवजपसे कुंभक और मकारके ध्यानपूर्वक १० प्रणवजपसे रेचक करना. यह एक प्राणायाम होता है ॥२॥ मात्राद्वादशसंयुक्तौ दिवाकरनिशाकरौ । दोषजालमपघ्नन्तौ ज्ञातव्यौ योगिभिः सदा ॥३॥ प्राणायामके अभ्यास करते २ यदि संयम पूरा न पहुँचे तो नाडी मलिन हो जाती है इसलिये पुनः नाडीशोधन प्राणायाम क- हते हैं कि चंद्रांग, सूांग, प्राणायाम, प्राणापानवायुसंयुक्त १२ प्रणवमात्राकरके पूरक चंद्रमंडल-सूर्यमंडलध्यानयुक्त १६ मा- त्राकरके कुंभक और १० मात्रासे रेचक करके चंद्रसूर्य नाडी मलको नाश करते हैं ऐसा योगियोंने जानना ॥ ३॥ पूरके द्वादशी कुर्यात्कुम्भके षोडशी भवेत् । रेचके दश ॐकाराः प्राणायामः स उच्यते॥४॥ प्रथमे द्वादशी मात्रा मध्यमे द्विगुणा मता । उत्तमे त्रिगुणा प्रोक्ता प्राणायामस्य निर्णयः ॥५॥ - 1 , गोरक्षपद्धति । पूरकमें १२, कुंभको १६, रेचकमें १०, मात्रा प्रणवकी यह प्राणायामप्रकार कनिष्ठ है. इससे द्विगुण अर्थात् पू० २४, कुं० ३२, २० २०, यह मध्यम और पू० ३६, कुं० ४०, २० ३० यह उत्तम प्राणायाम है ॥४॥५॥ अधमे चोद्यते धर्मः कम्पो भवति मध्यमे । उत्तिष्ठत्युत्तमे योगी ततो वायुं निरोधयेत् ॥६॥ कनिष्ठप्राणायाममें प्रस्वेद (पसीना) होती है. मध्यममें कंप होता है. उत्तममें योनिका आधार उठता है. इसलिये प्राणाया- मका अश्यास करना मुख्य है ॥ ६ ॥ बद्धपद्मासनो योगी नमस्कृत्य गुरुं शिवम् । भूमध्ये दृष्टिरेकाकी प्राणायाम समभ्यसेत् ॥७॥ ऊर्ध्वमाकृष्य चापानवायुं प्राणे नियोजयेत् । ऊर्ध्वमानीयते शक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ८॥ प्राणायामकी विधि कहते हैं कि एकांतस्थलमें मोटे दलवाला कोमलकंबलादि आसनमें पद्मासन बांधके बैठकर श्रीगुरु एवं शिवको प्रणाम करे अमृत स्रावित हो रहा, ऐसे चंद्रबिंबका ध्यान मध्यकरके दोनहूं दृष्टि भूमध्यमें स्थापन करे तदनंतर ब्राह्मण प्रणवका क्षत्रिय वैश्य ओम् इति एकाक्षरमंत्रका पूर्वोक्त मात्राके प्रकारसे पूरक, कुंभक, रेचक, प्राणायाम, चं- द्रांग, सूर्यांग, प्रकारकरके निरंतर करता रहे मूलाधार संको- चनपूर्वक अपानवायुको ऊपर खींचके प्राणवायुसे ऐक्य करे तब अपानवायुमिलित प्राणवायुको शक्तिचालनमुंद्रासे उठाई- भाषानुवाद । श० २ गई कुंडलिनीको सुषुम्णामार्गसे ऊपरको चढावे इतने विधि कर- नेसे योगी समस्तपापोंसे निर्मुक्त हो जाता है ॥ ७ ॥८॥ द्वाराणां नवकं निरुद्धय मरुतं पीत्वा दृढं धारितं नीत्वाकाशमपानवह्निसहितं शक्त्या समुच्चालितम् । आत्मस्थानयुतस्त्वनेन विधिवद्विन्यस्य मूर्ध्नि ध्रुवं यावत्तिष्ठति तावदेव महतां संपेन संस्तूयते ॥९॥ केवल कुंजकमाणायामका प्रकार कहते हैं कि षण्मुखीकरके पूरकवायुसे उदर पूर्ण करके ऊपरके ७ नीचेके २ इन नव द्वारोंको रोकके मूलाधारगत कालानि अपानवायुसहित शक्तिचालन- प्रकारसे प्रबुद्ध हो रही कुंडलिनीको ऊपरको उठाय आज्ञा- चक्रसे ऊपर उक्तवायुसे पूर्ण करके स्थिर करे सहस्रकमलमें रहते परमात्माका ध्यानसे ज्योतिः प्रत्यक्ष करके यावतका- लसम योगी निश्चल होकर परमात्माका ध्यान करता है, यही काल योगीका मोक्षसम है. आत्मध्यानतत्पर योगीश्वर सिद्ध इस योगीकी धन्यवादपूर्वक स्तुति करते हैं यही परम फल योगका है ॥९॥ प्राणायामो भवत्येवं पातकेन्धनपावकः । भवोदधिमहासेतुःप्रोच्यते योगिभिः सदा ॥१०॥ इस प्रकारका नित्य निरंतर आयाससे प्राणायाम करना अनेक पातकरूपी 'काष्ठको भस्म करनेवाला अभि होता है. सं- साररूपी समुद्रसे तारनेवाला महासेतु (बडा पूल ) योगिज- नोंकरके यही प्राणायाम कहा जाता है ॥ १० ॥ 5 ६

८२
गोरक्षपद्धति ।
आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम् ।
विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण मुञ्चति ॥ ११ ॥
पश्चिमतानआदि आसनोंसे शरीरके अशेष रोग नाश होते हैं
प्राणायामसे, समस्त पातक और प्रत्याहारते मानसिक अनेक
विकार नष्ट होते हैं ॥ ११ ॥
धारणाभिमतो धैर्य ध्यानाच्चैतन्यमद्भुतम् ।
समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वाकर्म शुभाशुभम्।।१२।।
धारणासे मनमें धैर्य बढने उत्तर उत्तम ज्ञान मिलता है
ध्यानसे अद्भुत. चैतन्य सर्वशारीरक ज्ञान मिलता है समाधिसे
अभिमान त्याग होकर जिसमें पुण्य-पाप लिप्त नहीं होते ऐसा
कैवल्य मोक्ष मिलता है ॥ १२॥
प्राणायामद्विषट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः।
प्रत्याहारद्विषट्केन ज्ञायते धारणा शुभा ॥१३॥
धारणा द्वादश प्रोक्ता ध्यानाध्यानविशारदैः ।
ध्यानद्वादशकेनैव समाधिरभिधीयते ॥१४॥
बारह प्राणायाम करके प्रत्याहारके फल देनेवाला प्रत्याहार
(१२) प्रत्याहार (१४४ प्राणायाम) का धारणाका फल
देनेवारी धारणा (१२) धारणा ( १७२८ प्राणायाम) का
प्राणायामरूप ध्यान (१२) ध्यान (२०७३६ प्राणायाम)
का प्राणायामरूप समाधि होती है ॥ १३ ॥ १४ ॥
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् ।
तस्मिन् दृष्टे क्रिया कर्म यातायातं न विद्यते ॥१६॥

-
भाषानुवाद । श० २
समाधिका स्वरूप कहते हैं. मूलाधारचक्र चतुर्दल कमल
कर्णिकामें सुषुम्णाद्वारके संमुख स्वयंभूलिंगके शिरमें देदीप्य-
मान बिंब है बिंदुस्वरूप कंडलिनीका है यह दीप्यमान विंब
समाधिमें अंत न मिलनेवाला, समस्त जगत् व्याप्त करनेवाला
उत्तम ज्योति कालामिस्वरूप प्रगट होता है इसके दर्शन, समा-
धिद्वारा मिलनेसे जन्ममरण नहीं होते कर्ममें लिप्त नहीं होता कै-
वल्यका अनुभव हो जाता है ॥ १५ ॥
संबद्धासनमेटमप्रियुगलं कर्णाक्षिनासापुटा-
वाराण्यङ्गुलिभिनियम्य पवनं बक्केण संपूरितम् ।
ध्यात्वा वक्षसि वयपानसहितं मूनि स्थितं धारये-
देवं याति विशेषतत्त्वसमतां योगीश्वरस्तन्मयः॥१६॥
समाधिकी प्रक्रिया दिखाते हैं प्रथम सिद्धासन बांधके दोनहूं
हाथोंके अंगुष्ठोंसे दोनहूं कर्णछिद्र, तर्जनियोंसे नेत्र, मध्यमा-
ओंसे नासिका और अनामिका २ कनिष्ठिका २ से मुख रो-
कके अधिमुखद्वारसे पूरित करके मूलाधारमें रहनेवाला अमि
तथा अपानवायुसहित प्राणवायुको हृदयकमलमें धारण कर
ऊपरको चढाय सहस्रदल कमलमें धारण करना इस प्रकार समा-
धिके आयात करनेवाला योगी अपानवायुसंमिलित प्राण-
वायुमय होकर सर्वद्रष्टा साक्षिात अंतरात्माके तुल्यताको प्राप्त
होता है ॥ १६॥
गगनं पवने प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान् ।
घण्टादीनां प्रवाद्यानां तदा सिद्धिरदूरतः॥ १७॥

८४
गोरक्षपद्धति ।
उक्त प्रकारसे प्राणवायु जब ( गगन ) सहस्रदल कमलमें प्राप्त
हो जाय तो घंटा नगारे आदि वाद्योंके ध्वनि प्रकट होती है इस
चिह्नके मिलनेपर योगसिद्धि समीप है जानना ॥ १७ ॥
प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत् ।
अयुक्ताभ्यासयोगेन सर्वरोगस्य संभवः॥ १८॥
यथायोग्य निरंतरात्यत्त प्राणायामसे सब रोग क्षय होता है
ऐसेही अविधि विच्छिन्नात्यासादि प्राणायामसे अनेक रोग
उत्पन्न होते हैं ॥ १८॥
हिक्का कासस्तथा श्वासः शिरःकर्णाक्षिवेदनाः।
भवन्ति विविधा रोगा पवनस्य व्यतिक्रमात् ॥१९॥
अयुक्त प्राणायामात्याससे वायु विरुद्ध होकर हिचकी,
कास, श्वास, शिरःपीडा, कर्णशूल, नेत्रव्यथाआदि रोग उत्पन्न
करता है ।। १९ ॥
यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेश्यः शनैः शनैः ।
अन्यथा हन्ति योक्तारं तथा वायुरसेवितः ॥२०॥
जैसे सिंह, व्याघ, गज इत्यादि दुष्ट जंतु मंदमंदकरके उन-
के अनुकूल क्रमकमसे करके पालकके वशमें रहते हैं तथापि
किसी समय थोडाभी उनमें विरोध होनेमें अपनेही पालकको
मार डालते हैं तैसेही पवननी युक्त अभ्याससे वशवती होता है
अयुक्तअत्याससे रोगादिकोंकरके अध्यासीको अनिष्ट हो
जाता है ॥ २०॥

भाषानुवाद । श०२ ८५ युक्तं युक्तं त्यजेद्वायुं युक्तं युक्तं च पूरयेत् । युक्तं युक्तं च बनीयादेवं सिद्धिरदूरतः॥२१ ॥ वायु शनैः शनैः रेचन करना जैसे नासाछिद्रके सामने रु- ईका फोहा रक्खा हुआ न उडे ऐसेही शनैः शनैः पूरकमी कर- ना युक्त युक्त पूरक करना जिससे चिचोद्वेग श्वासोत्कटता न होवे थोडेसे क्रम सहनयोग्य बढावना उचित है इससे सिद्धि नजदीक मिलती है ॥ २१ ॥ अथ ग्रन्थान्तरे प्राणायामभेदाः। 'प्राणायामस्त्रिधा प्रोक्तो रेचपूरककुम्भकैः । सहितः केवलश्चेति कुम्भको द्विविधो मतः॥१॥ ग्रंथांतरसे प्राणायामके भेद कहते हैं कि (प्राण) शरीरांत- गत वायुके रोधको प्राणायाम कहते हैं इसके रेचक, पूरक कुंजक ३ भेद हैं जीतरसे वायु बाहर छोडना रेचक, बाहरसे वायु उदरमें पूर्ण करना पूरक और पूरितवायुको घटवत् धारण करना कुंभक कहाता है कुंभककेनी केवल एवंसहित दो भेद हैं वे केवल योगियोंके संमत हैं और सहितभी दो प्रकारका है एक रेचकपूर्वक दूसरा कुंभकपूर्वक पहिला रेचकप्राणायामसे दूसरा पूरकप्राणायामसे भिन्न नहीं है इनके पूरे भेद प्राणायाम प्रकर- णसे जानने ॥ १॥ यावत्केवलसिद्धिःस्यात्सहितं तावदभ्यसेत् । रेचकं पूरकं मुक्त्वा सुखं यदायुधारणम् ॥२॥ जबलों केवल कुंभककी सिद्धि हो तबलौं सहितकुंभक सू- गोरक्षपद्धति। ८६ व्यांग प्राणायामसे करके सुषुम्णानके भेदनके पीछे उसके भीतर घटकासा शब्द हो तब केवल कुंभक सिद्ध होता है तदनंतर१०॥ १० बढायके ८० पर्यंत करे सामर्थ्य हो तो अधिक करे रेचक तथा पूरककोभी छोडके वायुधारण करना उसे केवल कुंभक कहते हैं ॥ २॥ प्राणायामोयमित्युक्तः स वै केवलकुम्भकः। कुम्भके केवले सिद्धे रेचपूरकवर्जिते ॥३॥ प्राणायाम जो कहा शुद्ध तो केवल कुंकही है, अन्य प्रकार नाडीशोधनार्थ हैं रेचकपूरकरहित केवल कुंभकके सिद्ध हो जानेमें ॥३॥ न तस्य दुर्लभं किंचित्रिषु लोकेषु विद्यते। शक्तः केवलकुम्भेन यथेष्टं वायुधारणात् ॥४॥ योगीको तीनहूं लोकमें कुछभी दुर्लक्ष नहीं है जब केवल कुंभकके सामर्थ्य होनेसे यथेच्छ (असंख्य)वायु धारण करे॥४॥ राजयोगपदं चापि लभते नात्र संशयः । कुम्भकात्कुण्डलीबोधः कुण्डलीबोधतो भवेत् ॥६॥ इस विधिसे निस्संदेह राजयोगपद प्राप्त होता है कुंजकके अत्याससे आधारशक्ति (कुंडलिनी) बोध होता है इससे निद्रा आलस्यादि मिटते हैं ॥५॥ अनर्गला सुषुम्णा च हठसिद्धिश्च जायते । इठं विना राजयोगो राजयोगं विना हठः। न सिद्ध्यति ततो युग्ममानिष्पत्तेः समभ्यसेत् ॥६॥ - भाषानुवाद । श० २ और सुषुम्णाके कफादि मल दूर होते हैं तब हठसिद्धि (मोक्ष) होता है. हठयोग विना राजयोग सिद्धि राजयोग विना हठयोग- सिद्धि नहीं होती इसलिये दोनहूंका अयास करना ॥ ६ ॥ कुम्भकप्राणरोधान्ते कुञ्चित्तं निराश्रयम् । एवमभ्यासयोगेन राजयोगपदं व्रजेत् ॥ ७॥ कुंभकसे प्राण संरोधके अंत्यमें चित्तको आश्रयरहित करे इस प्रकारके अभ्यासयोगकरके राजयोगपदको प्राप्त होता है॥७॥ वपुःकृशत्वं वदने प्रसन्नता। नादस्फुटत्वं नयने सुनिर्मले ॥ आरोग्यता बिन्दुजयोग्निदीपनं । नाडीविशुद्धिहठयोगलक्षणम् ॥ ८॥ हठयोगसिद्धि जब होती है तो देहमें कशता, मुखमें प्रसन्नता, नादकी प्रकटता, नेत्रोंकी निर्मलता, नीरोगिता, धातुका जय, उदरमें जठराग्निकी वृद्धि, नाडियोंकी शुद्धि ये लक्षण होते हैं॥८॥ चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम् । यत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते ॥२२॥ अब प्रत्याहार कहते हैं रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द ये पांच विषय हैं इनमें चक्षु, जिह्वा, प्राण, त्वक्, कर्ण, इन पांच ज्ञानेंद्रियोंके कर्म होते हैं अर्थात् उक्त ज्ञानद्रियोंके उक्त विषय क्रमसे हैं आसन, प्राणायाम सिद्धि करके जिस इंद्रियका जो विषय है.उसे दूसरेके समीप भावना कर क्रमशः शनैः शनैः त्याग गोरक्षपद्धति । करना अर्थात् इंद्रियसे उसके विषयका अनुनवकरके फेर इंद्रि- योंको विषयसे अलग करना प्रत्याहार कहाता है ॥ २२ ॥ यथा तृतीयकालस्थो रविःप्रत्याहरेत्प्रभाम् । तृतीयाङ्गस्थितो योगी विकारं मानसं तथा ॥२३॥ दिनके प्रातः, मध्याह्न, सायं ये तीन भागसे तीन काल हो- ते हैं. जैसे ( तीसरे ) सायंकालमें सूर्य अपनी (प्रभा) कांतिको क्रमशः हरण करता है ऐसेही योगीनी तीसरे अंग (आसन १ प्राणायाम २ प्रत्याहार ३) प्रत्याहारमें मानसविकार (विषय) में मनके अभिनिवेशको हरण करना अर्थात् विषयसंबंधसे चित्तको छुटाना ॥ २३ ॥ अङ्गमध्ये यथाङ्गानि कूर्मः संकोचयेद्रुवम् । योगी प्रत्याहरेदेवमिन्द्रियाणि तथात्मनि ॥२४॥ जैसे कूर्म (कछुवा ) अपने शिर पैर आदि अंगोंको संको- चन कर अपनेही भीतर छिपाय देता है.अंग तो उसीमें रहते हैं प- रंतु न हुयेके तुल्य हो जाते हैं ऐसेही योगीनेभी इंद्रियोंको विष- योंसे विमुख कर आत्मामें उनकी वृत्तियोंको थाम लेना अर्थात् इंद्रियोंको उनके विषयोंमें आसक्त न होने देना विषयोंसे तृप्त जैसा मानकर इंद्रियोंको अपने भीतर अंतरात्मामें आसक्त करना ॥ २४ ॥ यं यं शृणोति कर्णाभ्यामप्रियं प्रियमेव वा। तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित्॥२५॥ .

भाषानुवाद । श०२ ८९ अगन्धमथवा गन्धं यं यं जिघ्रति नासिका। : . तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित्॥२६॥ अमेध्यमथवा मेध्यं यं यं पश्यति चक्षुषा । तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित् ॥२७॥ अस्पृश्यमथवा स्पृश्यं यं यं स्पृशति चर्मणा। तं तमात्मति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित् ॥२८॥ लवण्यमलवण्यं वा यं यं रसति जिह्वया । तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित् ॥२९॥ कर्णसे मधुर वा कठोर जैसे शब्दोंको सुनता है ऐसे मनभी कर्णद्वारा शब्दमें आसक्त होता है योगीजन उक्त शब्दोंकोभी य- हनी आत्माही है, समझ वह मनमें निश्चय कर मनको उक्त शब्द विषसे प्रत्याग्रहण करे अर्थात् शब्दको विषय मानके जो मनमें ससंन्नम शब्द सुननेका नम होता है उस भमसे मनको उसे मिथ्या (विनाशी) जानकर मनको उससे हटावे जैसे ( रज्जु) रस्सीमें सर्पका एवं स्थाणु वृक्ष प्रस्तरादिकोंमें मनुष्य भूतादि नांति होती है तैसेही अखंडानंदस्वरूप आत्मचैतन्यमें संसार यद्दा देह है कहकर बुद्धि प्रांतिकरके कल्पना करती है वस्तुतः आ- त्मतत्त्वातिरिक्त कुछभी नहीं है इस कारण संपूर्ण जगत् आत्म- स्वरूप है ऐसेही शब्दादि उक्त विषयोंकोशी आत्माही है भा- वनापूर्वक निश्चय करके बाहर पीतर अद्वैतानंदस्वरूप आत्मा- से अन्य कोई नहीं है ऐसी धारणा स्थिर करके शब्दादि विष- योंको चलायमान हुएमभी उन्हें आत्मा माने विषय न माने । ९०. गोरक्षपद्धति । नासिकासे सुगंध वा दुर्गंध जो सूंघता है उसे आत्माही है निश्चय करके नासिकाकी वृत्ति जो गंधद्वारा मनको लुनाय नममें डालती है उसे हटावे नेद्रियसे जो जो पवित्र वा अपवित्र पदार्थ देखता है उन्हेंभी आत्माही है निश्चयकर रूपविपयसे मिथ्यानम छोडके नेत्रंद्रियवृत्तिको उक्त विषयसे हटावे त्वगिद्रियसे मृदु वा कठोर तप्त वा शीत आदि जिस२ पदार्थको स्पर्श करता है उसे- भी आत्माही है भावना निश्चयकर त्वगिंद्रि प्रवृत्ति जो स्पर्शसुखमें मनको लुभाती है उसको हटावे जिह्वासे सलोना, अलोना,मिष्ट,क- टुक आदि जिनररसोंको चखता है उन्हें आत्माही समझकर जि- बाकी वृत्तिको हटाये इस प्रकार योगी प्रत्याहारके अायास क- रके पंचेंद्रियवृत्तियोंको अपने २ विषयोंसे हटाय आत्मतत्त्वमें स्थिर करना जब प्रत्याहार सिद्ध हो जाता है तो योगी कानोंसे सुने मधुरशब्दके तुल्य मानता है कोईभी इसके चित्तको अपनी ओर नहीं ले जाय सकते. ऐसेही नेत्रोंसे देवता वा पिशाच,मनुष्य वा कुत्ता,ब्राह्मण वा चांडाल, गौ वा गदहा इत्यादि सभीको [तुल्य देखता है.नासिकासे कस्तूरी आदि सुगंधी वा पुरीषादि दुर्गंधियोंसे तुल्य सुख मानता है त्वचासे अमि वा जल षोडशीस्त्री कुच वा कृपाण (आरे) की धारा आदिकोंके स्पर्शसे तुल्य सुख मानता है और जिह्वासे मीठा वा कडुवा, तप्त वा शीत, तीक्ष्ण (मिर्च) वा दूध, मिट्टी, रेत, गोबर वा हलुवा, पूडीआदिकोंको तुल्य स्वादिष्ट मानता है ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ चन्द्रामृतमयीं धारां प्रत्याहरति भास्करः। , - भाषानुवाद । शं० २ यत्प्रत्याहरणं तस्याः प्रत्याहारः स उच्यते ॥३०॥ प्रत्याहारकी विधि कहनेउपरांत केवल हठयोगहीसेभी प्रत्या- हारकी विधि कहते हैं कि, षोडशदल कमलकार्णिकास्थित चंद्रबि- बसे जो अमृतधारा गिरती है उसे नाभिकमलस्थित सूर्य ग्रासकर लेता है.तो उक्त धाराको विपरीतकरिणीमुद्रा करके सूर्यसे हटाय अपने मुखमें पारे. इसे प्रत्याहार कहते हैं ॥ ३० ॥ एका स्त्रीभुज्यते दाभ्यामागता चन्द्रमण्डलात् । तृतीयो यः पुनस्ताभ्यां स भवेदजरामरः ॥३१॥ एका स्त्री पदसे कंठस्थानगत चंद्रमासे निकसी अमृतधाराका बोधन है (द्वाश्यां) पदसे सूर्यचंद्रमाका बोध है तृतीयपदसे आप ( योगी) है उक्त अमृतधारा कंठ एवं नाभिगत चंद्रसूर्य- से भोग करती है इसको तीसरा (आप) स्वयं विपरीतकरणीमू- द्रा करके उक्त चंद्रसूर्यसे बचायकर मांग करे तो अजरामर होता है ॥ ३१॥ नाभिदेशे वसत्येको भास्करो दहनात्मकः । अमृतात्मा स्थितो नित्यं तालुमूले च चन्द्रमाः॥३२॥ अनिमय एक सूर्य नाशिमें निवास करता है अमृतात्मक चंद्रमा विशुद्धचक्रमें रहता है ॥ ३२॥ वर्षत्यधोमुखश्चन्द्रो ग्रसत्यूर्ध्वमुखो रविः । ज्ञातव्या करणी तत्र यया पीयूषमाप्यते ॥३३॥ विशुद्धचक्रमें रहकर अधोमुख चंद्रमा अमृतधारा वर्षाता है उस धाराको नाभिस्थित ऊर्ध्वमुख सूर्य पी लेता है योगीकरके -- गोरक्षपति । उक्त सूर्यको वचनकर उक्त अमृतधाराको अपने मुख में प्रात किया जाता है उसे विपरीतकरणी जानना ॥ ३३ ॥ कार्य नाभिरधस्तालुरूच भानुरधः शशी। करणी विपरीताख्या गुरुवाक्येन लभ्यते ॥३४॥ जो नाजिगत सूर्यको ऊपर ( तालु) विशुद्धगत चंद्रमाको नीचे करे यह विपरीतकरणी गुरुमुखहीसे जानी जाती है।३४॥ लिखनेसे नहीं किंतु सुबोध योगियोंको इतना औरभी स्मरण कराते हैं कि यह मुद्रा प्राणायाम योग एवं खेचरीमुद्रासाधनके उपरांत इन्हीसे सुगम हो जाती है । त्रिधा बद्धो वृषो यत्र रोरवीति महास्वनः । अनाहतं च तच्चक्र हृदये योगिनो विदुः॥३५॥ तीन फेरा रस्सियोंसे बँधा वृषन जैसे पराधीन होकर शब्द करता है ऐसेही अनाहतचक्रमें सत्त्व-रज-तमोगुणस्वरूप मायाविषे प्रतिबिंबित हो रहा जीव परा-पश्यंति-मध्यमाविषे प्रतिबिवित हो रहा जीव परा-पश्यंति-मध्यमाके क्रममे हृदयमध्यमें नाद- सहित होकर निरंतर शब्द करता है अनाहत चक्रको हृदयमें योगिजन जानते हैं ॥ ३५॥ अनाहतमतिक्रम्य चाक्रम्य मणिपूरकम् । प्राप्ते प्राणे महापनं योगी स्वममृतायते॥३६॥ खेचरोमुद्राकरके अमृतपानको सूचित करते हैं कि प्राणापा- नवायुको एकत्व कर मणिपूर अनाहतचक्रोंको उल्लंघन करके

भाषानुवाद । श० २
९३
महापद्म (ब्रह्मस्थान) को प्राप्त करके योगीका अमृतमय शरीर
उक्तामृतपानसे हो जाता है ॥ ३६ ॥
ऊर्ध्वं षोडशपत्रपद्मगलितं प्रायादवाप्तं हठा-
दूर्ध्वास्यो रसनां निधाय विधिवच्छक्तिं परां चिन्तयेत्।
तत्कल्लोलकलाजलं सुविमलं जिह्वाकुलं यः पिबे-
निर्दोषः स मृणालकोमलवपुर्योगी चिरंजीवति ॥३७॥
उक्त प्रकारकरके ब्रह्मस्थानपर्यंत प्राणवायुको पूर्णकर
जो योगी शिरमें रहते सहस्रदल कमलसे विशुद्धचक्रमें गिरती
वेला प्राणवायुको ऊपर चढाय नासिका ऊर्ध्वविवरमें प्राप्त करे
ऊर्च विवरमें जिह्वा प्रवेश कर अपना मुखभी ऊपरको करके
सहस्रदलकमलमें प्राणवायुसहित प्राप्त हुई कुंडलिनीका ध्यान
करता कुंडलिनीका सहस्रदलमें प्रवेश होतेही जो अमृताकार
तरंग निकलता है उसका लेशभूत अतिनिर्मल जिताके
मथनसे निकले हुए अमृतको पान करे वह योगी अतिसुकुमार
शरीर पायके समस्त रोगदुःखोंसे रहित होकर बहुतकालपर्यंत
जीवित रहता है ॥ ३७॥
काकचंचुवदास्येन शीतलं सलिलं पिवेत् ।
प्राणापानविधानेन योगी भवति निर्जरः॥३८॥
अपानवायुको उठाय अपानवायुके साथ ऐक्य करनेवाले
प्रकारसे काक (कौवे) कासा चोंच मुखकर शीतल सलिल
(बाह्यवायु ) को जो योगी पूरक (पूर्ण) करता है वह वृद्धाव-
स्थासे रहित होता है अर्थात् सर्वदा युवाही रहता है ॥ ३८॥

४ गोरक्षपद्धति । रसना तालुमूलेन यः प्राणमनिलं पिबेत् । अब्दार्दैन भवेत्तस्य सर्वरोगस्य संक्षयः॥३९॥ जिह्वाके सहायकरके तालुमूलसे जो विवर (छिद्र) हैं इसक- रके जो योगी प्राणवायुको पूर्ण (पूरित ) करता है उसके छ: महीनेके अग्याससे समस्त रोगोंका नाश होता है ॥ ३९ ॥ विशुद्धे पञ्चमे चक्रे ध्यात्वासौ सकलामृतम् । उन्मार्गेण हृतं याति वञ्चयित्वा मुखं खः॥४०॥ पांचवां विशुद्धचक्र (जो कंठमें रहता है) में चंद्रकलामृतका ध्यानकरके क्रमसे ऊपरको हरण करता हुआ सूर्यके मुखके वंचनकर योगीके मुखमें उक्त चंद्रकलामृत पडता है इस प्र- कार जिहाद्वारा उदरमें प्राप्त होकर योगीके जरा रोगादियोंको हर लेता है ॥ ४०॥ विशब्देन स्मृतो हंसो नैर्मल्यं शुद्धिरुच्यते । अतः कण्ठे विशुद्धाख्यं चक्र चक्रविदो विदुः॥४१॥ 'वि' शब्द हसका और 'शुद्ध' शब्द निर्मलका बोधक है कंठमें अत्यंत निर्मल विशुद्धनामा चक्र है यह सर्वोत्कृष्ट है चक्रोंके तत्त्व जाननेवाले योगी जानते हैं ॥४१॥ अमृतं कन्दरे कृत्वा नासान्तसुषिरे क्रमात् । स्वयमुच्चालितं याति वर्जयित्वा मुखं खेः॥ ४२ ॥ विशुद्धचक्रस्थ चंद्रकलामृतको अपानवायुसहित प्राणवा- युको ऊपर चलायके लंबिका ऊर्ध्वविवरमें प्रवेश (पूर्ण) कर भाषानुवाद। श०२ ९५ क्रमसे नासिकाके ऊपर विवरमें पहुंचानेसे नाभिसूर्पके मुख (जो अमृतको भस्म करता है) को वचन (छलन) करके उ- तामृत उदरमें अन्नके समान पहुँचता है ॥ ४२ ॥ बद्धं सोमकलाजलं सुविमलं कण्ठस्थलादूर्वतो नासान्ते सुषिरे नयेच्च गगनद्वारान्ततः सर्वतः। ऊस्यिो भुवि सन्निपत्य नितरामुत्तानपादः पिबे- देवं यः कुरुते जितेन्द्रियगणो नैवास्ति तस्य क्षयः४३ कंठसे ऊपर निर्मल चंद्रकलामृतको पूर्वोक्त विधिसे रोकके नासा ऊर्ध्वविवरमें पूरित करे तब सर्वहारोंको रोकके ( गगन) आज्ञाचक्र में प्राणापानवायुसहित पूरण करके ऊर्ध्वमुख होकर भूमिमें उत्तान लेटकर पैरोंकोजी उत्तान करके जितेंद्रिय होकर उक्तामृतपान करना जो योगी निरंतर इस विधिको करता है उसका क्षय ( मृत्यु ) नहीं होती ॥ ४३ ॥ उर्व जिहां स्थिरीकृत्य सोमपानं करोति यः। मासान न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ॥४४॥ जिहाको ऊपर लंबी करके ऊपर स्थिर करके जो योगी अमृतपान करता है उस अभ्यासीको एकही पक्ष ( १५ दिन) में मृत्यु जीतनेकी सामर्थ्य होती है इसमें संदेह नहीं ॥ १४ ॥ बद्धं मूलविलं येन तेन विघ्नो विदारितः । अजरामरमाप्नोति यथा पञ्चमुखो हरः॥१५॥ जिस योगीने (मूलबंध) मूलद्वार रोका उसने जरामरणादि विघ्नका नाश कर लिया, इस हेतु जरामरणयुक्त देहमें आ- गोरक्षपद्धति । त्मभावको छोडकर जरामरणरहित शुद्ध आत्मभावको प्राप्त होता है जैसे पंचवक्र सदाशिव देहाहंकार जरामरणादिरहित विराजमान है ऐसेही उक्त अभ्यासीनी होता है ॥४५॥ संपीड्य रसनाग्रेण राजदन्तविलं महत् । ध्यात्वामृतमयीं देवी षण्मासेन कविर्भवेत् ॥ ४६॥ जो जिह्वायसे राजदंतके बिल (रंध्र) को अचेतन (पीडन) कर अमृतमयी वागीश्वरी देवीके ध्यानका अभ्यास करता है तो अभ्यास सिद्ध होनेपर छः महीनेमें विचित्र कवितासामर्थ्य कवि हो जाता है ॥ ४६॥ सर्वाधाराणि बनाति तदुवै धारितं महत् । न मुञ्चत्यमृत कोपि स पन्थाः पञ्च धारणाः॥४७॥ जिह्वाग्रसे पीडनकर राजदंतके छिद्रको रोकनेसे समस्त नाडियोंके मुख रुक जाते हैं. ऊपरके रुकनेसे अमृतधारा गिरके अन्यत्र नहीं गिर सकती पंच धारणाके अभ्यासी योगीकोनी जैसे इसी में चंद्रमासे निस्सरित अमृतका हरण प्रत्याहार कहा है तैसेही अमृतको लंबिकाके ऊर्ध्वविवरमें धारणा करना यह धारणा होती है ॥४७॥ चुम्बन्ती यदि लम्बिकाप्रमनिशं जिह्वा रसस्यन्दिनी। सक्षारं कटुकाम्लदुग्धसदृशं मध्वाज्यतुल्यं तथा ॥ . . व्याधीनां हरणं जरान्तकरणं शास्त्राङ्गमाद्गीरणम् । तस्य स्यादमरत्वमष्टगुणितं सिद्धाङ्गनाकर्षणम्॥१८ न भापानुवाद । श०२ ९७ जिह्वाको लंबिकाके निरंतर चुंबनान्यास करनेवाले योगीको कभी लवण, कभी चरपरा, कभी खट्टा, कभी दूधसा, कमी सहतकासा, कभी घीकासा स्वाद जिह्वामें अनुभव होते हैं ये लक्षण जब अश्यास सिद्ध हुएमें होने लगते हैं तब योगीके व्याधि ( रोग ) नाश होते हैं, वृद्धावस्थाका निवारण होता है, शास्त्रके व्याख्यान करनेका सामर्थ्य विनापढेनी होता है, अमृतमय शरीर होकर अष्ट सिद्धि मिलती हैं स्मरणमात्रसे सिद्ध गंधर्व, ना- गादिकन्याओंके आकर्षण करनेका सामर्थ्य होता है ॥४८॥ अमृतापूर्णदेहस्य योगिनो द्वित्रिवत्सरात् । ऊर्च प्रवर्तते रेतोप्यणिमादिगुणोदयः॥१९॥ उक्त प्रत्याहारका फल कहते हैं कि उक्त प्रकारसे अमृतसे परिपूर्ण जब देह योगीका हो जाता है तो २।३ वर्ष अश्याससे वीर्य (रेत ) ऊपरको चढ जाता है ऊर्ध्वरेता होकर कदाचित्- भी वीर्य स्खलित नहीं होता एवं अणिमादि सिद्धि उदय होती हैं ॥४९॥ इन्धनानि यथा वह्विस्तैलवति च दीपकः । तथा सोमकलापूर्णदेहं देही न मुञ्चति ॥५०॥ जैसे अनि शुष्ककाष्ठ एवं दीपक तैलवर्तिको समय भस्म किये विना नहीं छोडता तैसेही जीवात्मामी चंद्रकलामृतसे पूर्ण हुए योगीके शरीरको कदापि नहीं छोडता ॥ ५० ॥ नित्यं सोमकलापूर्णशरीरं यस्य योगिनः । तक्षकेणापि दृष्टस्य विषं तस्य न सर्पति ।।५१ ॥

९८ गोरक्षपद्धति। जिस योगीका शरीर नित्य सोमकलामृतसे पूर्ण रहता है उसे तक्षकनागनी डसे (काटे) तोगी शरीरमें विष नहीं फैलता ॥ ५३॥ इति प्रत्याहारप्रकरणम् । 'अब ९ श्लोकोंसे धारणाका विस्तार कहते हैं:- आसनेन समायुक्तः प्राणायामेन संयुतः। प्रत्याहारेण संपन्नो धारणां च समभ्यसेत् ॥५२॥ आसनका साधन प्राणायामका साधन प्रत्याहारका अन्यास स्थिर करके इंद्रियवृत्तियोंको रोकने के सामर्थ्य हुएमें धारण- का अत्यास करना ॥ ५२ ॥ हृदये पञ्चभूतानां धारणा च पृथक् पृथक् । मनसो निश्चलत्वेन धारणा साभिधीयते ॥५३॥ हृदयमें मन एवं प्राणवायुको निश्चल करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाशसंज्ञक पंच भूतोंको पृथक् पृथक् संधार करना धारणा कहाती है ॥ ५३ ॥ या पृथ्वी हरितालहेमरुचिरा पीता लकारान्विता संयुक्ता कमलासनेन हि चतुष्कोणा हृदि स्थायिनी। प्राणांस्तत्र विलीय पञ्चघटिकं चिन्तान्वितान्धारये- देषा स्तम्भकरी सदाक्षितिजयं कुर्याद्भुवो धारणा ५४ पहिले पृथ्वीधारणा कहते हैं कि जो पृथ्वी हरिताल यदा सुवर्णसमान रमणीयवर्ण अधिष्ठातृदेवता ब्रह्मासहित चतुष्कोणा- भाषानुवाद । श०२ कार मध्यमें (लं) बीजयुक्त है इस (लं) पृथ्वीतत्त्वको हृद- यमें ध्यान करके भावना करना उक्त भूमंडलमें आपनी लीन होना चित्तसहित प्राणको लीन करके पांच (५) घटीपर्यंत स्तंभन करनेवाली धारणा होती है इस धारणाके सर्वदा अभ्यास करनेसे पृथ्वीतत्त्व अपने वशवी होता है ॥ ५४॥ अद्धेन्दुप्रतिमं च कुन्दधवलं कण्ठेम्बुतत्त्वं स्थित यत्पीयूपवकारखीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना । प्राणं तत्र विलीय पञ्च घटिका चित्तान्वितं धारये. देपा दुःसहकालकूटदहनी स्याद्वारुणी धारणा॥५६॥ वारुणी (जल) धारणा कहते हैं कि अर्धचंद्राकार कुंदपु- "पसमान श्वेतवर्ण अमृतरूप (4) बीजमध्यसहित अधिष्ठातृदे- वता विष्णुसहित जलतत्त्वको विशुद्धचक्रमें ध्यान करना उक्त जलतत्त्वमें आपभी लीन होकर चित्तसहित प्राणको लीन कराय पांच घटीपर्यंत धारणा करना यह जलस्तंभन करनेवाली वारु- णीधारणा है इसके सर्वदा अश्यास करनेसे कालकूट विषकाशी भस्म हो जाता है विपका असर शरीरमें नहीं होता ॥ ५५ ॥ यत्तालुस्थितमिन्द्रगोपसदृशं तत्त्वं त्रिकोणानलं तेजो रेफयुतं प्रवालरुचिरं रुद्रेण सत्सङ्गतम् । प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकं चित्तान्वितं धारये- देषा वह्निजयं सदा वितनुते वैश्वानरी धारणा ॥५६॥ आनेयी धारणा कहते हैं कि इंद्रगोप (वीरबहूटी कीडे) के गोरक्षपद्धति । सदृश रक्तवर्ण त्रिकोणाकार प्रवाल (मूंगा) समान रमणीय ते- जोरूप (२)बीजमध्य शोभित अभिष्टातृदेवता रुद्रसहित आग्नेय- तत्त्वको तालुस्थानमें जावनाकरके उक्त आनेतत्वमें आपनी लीन होकर चित्तसहित प्राणको लीन कराय पांच घटीपर्यत तन्मय होना वैश्वानरी धारणा होती है इसके सर्वदा सेवन करनेसे योगी अमिको जीतनेवाला होता है अग्नि उसको दाह नहीं करता ५६ यद्भिन्नाञ्जनपुनसन्निभमिदं स्यूतं भ्रुवोरन्तरे तत्त्वं वायुमयं यकारसहितं तत्रेश्वरो देवता। प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकं चित्तान्वितं धारये- देषा खे गमनं करोति यमिनः स्याद्वायवी धारणा५७ वायवी धारणा कहते हैं कि वर्तुलाकार कज्जलके पुँजसमान । अतिनीलवर्ण (यं) बोजसहित अधिष्ठातृदेवता ईश्वरसहित वायुतत्वको चूमध्यमें ध्यानकर उक्त वायुतत्वमें आपसी लीन हो या चित्तसहित प्राणको लीन कर पांच घटीपर्यंत स्थिर रख- ना यह वायुतत्वकी धारणा है इस धारणाके नित्य ध्यास. करनेसे आकाशमें गति होती है ॥ ५७ ॥ आकाशं सुविशुद्धवारिसदृशं यद्ब्रह्मरन्ध्रस्थित तन्नादेन सदाशिवेन सहितं तत्त्वं हकारान्वितम् । प्राणं तत्र विलीय पञ्चपटिकं चित्तान्वितं धारये- देषा मोक्षकपाटपाटनपटुः प्रोक्ता नभोधारणा ॥१८॥ ननोधारणा कहते हैं कि बर्तुलाकार निर्मलजलसमान वर्ण (है) बीजसहित अधिष्ठातृदेवता सदाशिवसहित आकाशतत्व- भोपानुवाद । को ब्रह्मरंध्रमें ध्यान करना इस तत्वमें आपसी लीन हो चित्त- सहित प्राणको लीन कर पांच घटीपर्यंत स्थिर रखना यह नो- धारणा मोक्षरूपी द्वारके खोलनेमें चतुर है इसके नित्य अायास करनेसे मोक्षद्वार खुल जाता है ॥५८॥ स्तम्भिनी द्राविणी चैव दहनीभ्रामिणी तथा । शोषिणी च भवत्येषा भूतानां पञ्चधारणाः॥ ५९॥ पृथ्वीधारणाके आयास दृढ हुएमें जलपवनादि स्तंभनसामर्थ्य होती है वारुणीधारणाके अायास दृढ हुएमें समस्तद्रष्पमात्र- को द्रव (जल)समान करनेकी सामर्थ्य होती है एवं आनेयी- से विना अग्निही वस्तुमात्रको जलानेकी सामर्थ्य होती है वायु- धारणासे वस्तुमात्र किंवा समस्त जगत्को घुमानेकी सामर्थ्य होती है ननोधारणासे सर्व शोषण सामर्थ्य होती है ये पंच धार- •णाओंकी साधारण क्रियायें हैं ॥ ५९ ॥ कर्मणा मनसा वाचा धारणाः पञ्च दुर्लभाः। विज्ञाय सततं योगी सर्वदुःखैः प्रमुच्यते ॥६॥ कर्म (अनुष्ठान ) से मनके चिंतनसे वचन शास्त्राज्ञाके प्रमाण माननेसे निरूपण कर पांचों धारणाओंको स्थिराज्यास...करता है वह समस्त दुःखोंसे मुक्त होता है ॥ ६॥ इति धारणी| Be स्मृत्येव सर्वचिन्तायां धातुरेक प्रपद्यते । यचित्ते निर्मला चिन्ता तद्धि ध्यानं प्रचतिना।

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१०.२
गोरक्षपद्धति ।
'स्मृ' यह धातु चिंतासामान्यवाचक है सो चित्तमें यो-
गशास्त्रोक्तप्रकारसे निर्मलांतरकरके आत्मतत्वका स्मरण कर-
ना ध्यान कहाता है ॥ ६१ ॥
द्विविधं भवति ध्यानं सकलं निष्कलं तथा।
सकलं चर्साभेदेन निष्कलं निर्गुणं भवेत् ॥ ६२॥
यह ध्यान सगुण, निर्गुण भेदसे दो प्रकार है जैसे श्यामवर्ण
चतुर्बाहु वनमालामुकुटकुंडलपीतांबरधारी विष्णुका ध्यान कर-
ना सगुणध्यान है ॥ ६२॥
अन्तश्चेतो बहिश्चक्षुरधः स्थाप्य सुखासनः ।
कुण्डलिन्या समायुक्तं ध्यात्वा मुच्येत किल्बिषात्६३
एकांत पवित्रस्थानमें बैठके पद्मासन वा स्वस्तिकासन बांध
शरीर सरल बनाय आधारदिचक्रोंमें अंतःकरण (मन) ल-
गाय नासाग्रदृष्टि देकर निश्चल एकाग्र होकर कुंडलिनीसहित
ध्येयवस्तुका ध्यान करना इससे योगी समस्तपापोंसे निर्मुक्त
होता है यह ध्यानमुद्रा है ॥ ६३ ॥
आधारं प्रथमं चक्र स्वर्णाभं च चतुर्दलम् ।
कुण्डलिन्या समायुक्तं ध्यात्वा मुच्येत किल्बिषैः ६४.
योगिजनोंके ध्यान करनेयोग्य वनस्थान है इनमें प्रथम
मूलाधार चक्र सुवर्णवर्ण चतुर्दल कमल है इसके कर्णिकामें स्व-
यंजूलिंगके शिरमें बिंबांकार साढे तीन वृत्तवेष्टित हो रही कुंड-
लिनीसहित इस चक्र ध्यान करनेसे समस्त पापोंसे निर्मुक्त
होता है ॥ ६४॥

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भाषानुवाद । श०२ १०३
स्वाधिष्ठाने च षट्पत्रे सन्माणिक्यसमप्रभे।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा योगी सुखी भवेत्॥६६॥
द्वितीय स्वाधिष्ठानचक्र रक्तवर्ण षट्दलकमलकर्णिकामें
सगुण वा निर्गुण ज्योतिःस्वरूप आत्माको नासायदृष्टि करके
ध्यान करनेसे योगी आनंदावस्थाको प्राप्त होता है ॥ ६५ ॥
तरुणादित्यसंकाशे चक्रे च मणिपूरके
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा संक्षोभयेज्जगत् ॥६६॥
तृतीय मणिपूरचक उदय होते सूर्यमंडलसमान रक्तवर्ण
कमलकर्णिकामें सगुण वा निर्गुण ज्योतीरूप आत्माको नासा-
ग्रष्टिकरके ध्यान करनेसे योगी समस्त जगत्क्षोन करनेकी
सामर्थ्य पाता है ॥ ६६ ॥
हृदाकाशे स्थितं शम्भु प्रचण्डरवितेजसम् ।
नासाग्रे दृष्टिमाधाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥६७॥
चतुर्थ हृदयरूप आकाश अनाहतचक्रकर्णिकामें रहते प्रचं-
ड तेजवान् सूर्यसमान तेजस्वी बाणलिंग (शिव) का ध्यान
नासायदृष्टि देकर करनेसे योगी ब्रह्ममय होता है ॥ ६ ॥
विद्युत्प्रभे च हृत्पने प्राणायामविभेदतः।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥ ६८ ॥
ऐसेही विद्युत् (विजुरी) समान प्रमायुक्त हृदयकमल क-
णिकामें उक्त प्रकारसे नासाग्रदृष्टि देकर सगुण वा निर्गुण
ज्योतिःस्वरूप आत्माके ध्यान करनेसे योगी ब्रह्ममय ( जीव-
न्मुक्त) होता है ॥६८॥

गोरक्षपद्धति । १०४ सततं घण्टिकामध्ये विशुद्ध दीपकप्रभे। नासाग्रहष्टिरात्मानं ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥ ६९ ।। कंठस्थानमें दीपज्योतिसमान कांतिमान् विशुद्ध चक्रमें ना- सायदृष्टिकरके सगुण निर्गुण वा ज्योतिःस्वरूप आत्माके ध्यान करनेसे योगी अमर ( मरणरहित ) होता है ॥ ६९ ॥ भ्रुवोरन्तर्गतं देवं सन्माणिक्यशिखोपमम् । नासाग्रहष्टिरात्मानं ध्यात्वानन्दमयो भवेत् ॥ ७०॥ भूमध्ये आज्ञाचक्रमें माणिकशिखा (चूनीकी सूक्ष्म चमक) समान रक्तवर्ण आत्माको नासाग्रदृष्टि देकर ध्यान करनेसे योगी समस्त दुःखरहित आनंदमय होता है ॥ ७० ॥ ध्यायनीलनिभं नित्यं चूमध्ये परमेश्वरम् । आत्मानं विजितप्राणो योगी योगमवाप्नुयात् ॥७॥ आज्ञाचक्रमें नीलवर्ण शिवपरमात्माका ध्यान प्राणायाम प्रकार करके करनेसे योगी जीवात्मा परमात्माके ऐक्यको पाता है ॥ ७१ ॥ निर्गुणं च शिवं शान्तं गगने विश्वतोमुखम् । नासाग्रदृष्टिरेकाकी ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥७२॥ आज्ञाचक्रमें निर्गुणरूप, शांत, विश्वव्यापक, शिवके नासा- ग्रदृष्टि देकर ध्यान करनेसे जीवभावको देनेवाले गुणधर्मसे रहित होता है अर्थात् जीवभावका स्मरणमात्रनी नहीं रहता ॥ ७२ ॥ आकाशे यत्र शब्दः स्यात्तदाज्ञाचक्रमुच्यते । तत्रात्मानं शिवंध्यात्वा योगी मुक्तिमवाप्नुयात्।।७३॥

भाषानुवाद । श०२ १०५ जिस तत्त्वमें नाद प्रकट होता है ऐसा आकाशतत्त्वस्थान म- नका स्थान है सोही भूमध्यमें आज्ञाचक्र कहाता है इसमें रहते सदाशिवरूप आत्माके ध्यान करनेसे योगी कैवल्य मुक्ति पाता है ॥ ७३॥ निर्मलं गगनाकारं मरीचिजलसन्निभम् । आत्मानं सर्वगं ध्यात्वा योगी मुक्तिमवाप्नुयात्।।७४॥ आज्ञाचक्र ऊपर शून्यस्थानमें करनेयोग्य ध्यान कहते हैं कि, स्वरूपको आच्छादित करनेवाला, मलिनसंबंधसे रहित, आकाशसमान, एकाकार, सर्वव्यापक, प्रकाशमान तेज स्वरूपके ध्यान करनेसे योगी मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥ गुदं मेट्रंच नाभिश्च हृत्पनं च तदूर्ध्वतः । घण्टिका लम्बिकास्थानं घूमध्येच नभोबिलम्।।७५॥ ध्यानमुक्त नव(९) स्थानोंको पुनः स्मरण करते हैं कि, गुदा (मूलाधार) १ मेढ़ (स्वाधिष्ठान ) २ नाभि (मणिपूर) ३ हृत्पद्म (अनाहत) ४ तदूर्ध्व ( विशुद्ध )५ घंटिकाका मूल ६ लंबिकाका स्थान ७ आज्ञाचक्र ८ इसके ऊपरका शून्यस्थान ९ ये नव ध्यानयोग्य स्थान हैं ॥ ७५ ॥ कथितानि नवैतानि ध्यानस्थानानि योगिभिः । उपाधितत्त्वमुक्तानि कुर्वन्त्यष्टगुणोदयम् ॥७६॥ योगियोंने उक्त नव (९) स्थान ध्यानोपयोगी कहे हैं इन्हें उपाधि अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश पांच तत्वों- , गोरक्षपद्धति । करके सहित करनेसे अणिमादि अष्टसिद्धियोंका उदय होता है ॥ ७६॥ एषु ब्रह्मात्मकं तेजः शिवज्योतिरनुत्तमम् । ध्यात्वा ज्ञात्वा विमुक्तः स्यादिति गोरक्षभाषितम् ७७ उक्त नव (९) स्थानोंमें सर्वोत्कृष्ट शिव अनाहत आज्ञाच- कोंमें उक्त प्रकारसे साकार सगुणस्वरूपको अथवा निराकार निर्गुणब्रह्मको भावना करके उक्त स्थानोंमें ध्यान करनेसे योगी संसारसे मुक्त होकर पुनर्जन्ममरणरूप संतापसे छूटता है यह श्री- गोरक्षनाथ प्रतिज्ञा करके कहते हैं इसमें संशय न मानना ॥७७॥ नाभौ संयम्य चित्तं पवनगतिमधो रोधयत्संप्रयत्ना- दाकुच्यापानमूलं हुतवहसदृशं तन्तुवत्सूक्ष्मरूपम् । तद्धा हृत्सरोजे तदनु दलणके तालके ब्रह्मरन्ध्र भित्त्वा ते यान्ति शून्यं प्रविशति गगने यत्र देवो महेशः।। चित्त (अंतःकरण) को मणिपूरचक्रमें स्थिर करके अपा- नद्वारको बड़े प्रयत्नसे संकोच विकाश कर अपानवायुको अधो- गतिको रोकके ऊपरको उठाय मन एवं प्राणवायुसे ऐक्य करे सूत्रके ममान सूक्ष्म अमिसमान देदीप्यमान ज्योतिःस्वरूपको उक्त ऐक्यविषये चिंतन करनेसे उक्त ज्योति नाभि चक्रको वेधनकर हृदयकमलमें पहुँचता है पुनः अभ्यास सिद्ध हो वो हृदयकमलको वेधकर ब्रह्मरन्ध्रमें पहुँचता है इसी विधिसे योगियोंके शरीरत्यागसमयमें वही ज्योतिःस्वरूप ब्रह्मरन्धको भाषानुवाद । श०२ १०७ भेदनकर परमाशिव शून्याकार चिदाकाशमें प्रवेश कर परब्रह्ममें लीन हो जाता है ॥ ७८॥ नाभौ शुभ्रारविन्दं तदुपरि विमलं मण्डलं चण्डरश्मे संसारस्यैकरूपां त्रिभुवनजननीं धर्मदात्री नराणाम् । तस्मिन्मध्ये त्रिमार्गे त्रितयतनुधरां छिन्नमस्ता प्रशस्तां तां वन्दे ज्ञानरूपां मरणभयहरां योगिनीज्ञानमुद्राम् ।। मणिपूरचक्रमें शुक्लवर्ण कमल चिंतनपूर्वक उसके मध्यमें नि-- मल सूर्य्यमंडलका ध्यान करना इस मंडलके मध्यमें सत्त्व रज तम त्रिगुणरूप उपाधिोदसे तीन प्रकारको प्राप्त हो रहा सुषुम्णा- नाडीके द्वारमें संसारके कारणरूपा त्रैलोक्यके उत्पन्न करनेहारी जन्ममरणोपाधिग्रस्त मनुष्योंको उपासनामार्गसे मोक्षरूप परमधर्म देनेहारी त्रिगुणरूप हो रही ज्ञानस्वरूपिणी जिसकी स्तुति ब्रह्मादिदेवता सनकादि सिद्ध करते हैं तथा योगमात्रसे गम्या, ज्ञानमात्र उपाधिसे हो रही छिन्नमस्ता नाडीस्वरूप भासमान हो रही कुंडलिनीको स्तुति (अभिवादन) करता हूं इस प्रकार योगी छिन्नमस्ता महाविद्यारूप कुंडलिनीकी वंदना करे ॥ ७९ ॥ अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । एकस्य ध्यानयोगस्य तुलां नाईन्ति षोडशीम्॥८॥ सहस्रों अश्वमेध सैकडों वाजपेय यज्ञोंका फलभी केवल सा- त्त्विक एक ध्यानावस्थाका सोलहवें अंश (भाग) के समान नहीं है अर्थात् यज्ञादि साधनाओंमेंभी श्रेष्ठ ध्यानयोग है ॥८॥ इति ध्यानप्रकरणम् । Addons-

गोरक्षपद्धति ।
उपाधिश्च तथा तत्त्वं द्रयमेतदुदाहृतम् ।
उपाधिः प्रोच्यते वर्णस्तत्त्वमात्माभिधीयते ॥ ८१॥
अब १५ श्लोकमें समाधिविधि कहते हैं. आत्माके :-
काश होनेवालेको उपाधि तथा आत्मचैतन्यको तत्त्व कहते हैं
उपाधि और तत्व ये दोनों मुख विचार्य हैं उपाधि प्रणवरूप
वर्ण ॐ म् हैं तत्व आत्मा कहाता है ॥ ८१ ॥
उपाधेरन्यथा ज्ञानतत्त्वसस्थितिरन्यथा ।
समस्तोपाधिविध्वंसी सदाभ्यासेन जायते ॥ ८२।।
उपाधिस यथार्थ वैषयिक अन्यही हैं अर्थात् विपरीत बो-
धक है जैसे स्फटिक तो स्वच्छ श्वतमात्र है परंतु लाल, पीला,
नीला आदि रंग उपाधि संबंधसे उसी रंगकासा समान
होता है तैसेही शरीरमें निर्विकार शुद्ध आत्मा विषयवास-
नाओके संसर्गसे “अहं सुखी" "अहं दुःखी" इत्यादि भासमान
होता है जब अपनी निर्मलवुद्धिसे उपाधि पृथक् माने तब आत्म-
स्वरूपका यथार्थज्ञान होता है जैसे रक्तादिरंगमें स्फटिकली वैसा
होता है परंतु बुद्धिसे जो न कि स्फटिक तो शुक्लही है परंतु
रक्तादि रंगोपाधिवकारसे मिथ्या रंग देखा जाता है तैसेही ई-
द्रियधर्मोंसे आत्माजी जीवात्मा यथार्थज्ञानसे अद्वैतानंदस्वरूप है
सुखदुःखका इसमें संबंध नहीं है ऐसा ज्ञान योगाभ्याससे होता है.
तव योगी उपाधिजाल विनाश करनेमें समर्थ होता है ।। ८२ ॥
शब्दादीनां च तन्मात्रं यावत्कर्णादिषु स्थितम् ।
तावदेवं स्मृतं ध्यानं समाधिः स्यादतः परम् ॥८॥

भाषानुवाद । श०२ १०९ ध्यान एवं समाधिका अवस्थाभेद प्रकट कहते हैं कि ध्या- नावस्थामें स्थिर रहते योगीके कर्णादि इंद्रियोंविषे शब्दादि विषयोंका सूक्ष्मभाग जबलौं उपलक्ष्यमान होता है. तभीलों ध्यानावस्था कहाती है जब आत्मामें पंचेंद्रियवृत्ति लीन हो जाय तब आत्मामें अर्थमात्रका भान रहनेवाली अवस्था समाधि कहाती है ॥८॥ धारणा पञ्चनाडीभिर्ध्यानं च षष्टिनाडिभिः। दिनद्वादशकेन स्यात्समाधिः प्राणसंयमात् ॥ ८४ ॥ ध्यानधारणा समाधिका प्रमाण कहते हैं कि प्राणवायुके व्यापार रोकनेमें पांच घटीपर्यंत धारणा कहाती है ऐसेही ६० घटीसे ध्यान और बारह ( १२) अहोरात्रपर्यंत प्राणवायुके व्यापार निरंतर रोकनेसे समाधि कहाती है ॥ ८४ ॥ यत्सर्व द्वन्द्वयोरक्यं जीवात्मपरमात्मनोः। समस्तनष्टसंकल्पः समाधिः साभिधीयते ॥ ८५ ॥ दृष्टांवसहित समाधिका स्वरूप कहते हैं कि भूख प्यास, शीत उष्ण, सुख दुःख इत्यादि द्वंद्व कहाते हैं इनसे पीडा न होने तथा इनसे अपनेको उद्वेग न होनेका ऐक्य है इस अव- स्थाको पायके जीवात्मा परमात्माका कारणमात्ररूपसे ऐक्य जानना समस्त मानसीतरंगोंसे रहित समाधि होती है ॥ ८५ ॥ अम्बुसैन्धवयोरैक्यं यथा भवति योगतः। तथात्ममनसोक्यं समाधिः सोभिधीयते ॥८६॥ +

गोरक्षपद्धति।
११०
जीवात्मापरमात्माका तथा आत्मा और मनका ऐक्य न
हुएमें सिद्धि नहीं होती अतएव दृष्टांतसहित कहते हैं कि जैसे
जलमें सेंधानान (सैंधव) देनेसे दोनोंका ऐक्य दीखता है तैसेही
मन बाह्यविषयोंसे विमुख अंतर्मुख होकर आत्माकारवृत्ति
होनेसे आत्मा और मनका ऐक्य होता है ऐसे जीवात्मापर-
मात्माके ऐक्यको समाधि कहते हैं ।। ८६ ॥
यदा संक्षीयते प्राणो मानसं च प्रलीयते ।
यदा समरसत्वं च समाधिः सोभिधीयते ॥ ८७॥
मन एवं प्राणको एकत्र करके स्थिर होकर आत्माके मा-
वना करनेवाले योगीका जब प्राणवायु आत्माहीमें लीन होता
है तब अंतःकरणभी लीन होता है जल तथा सैंधवकीसी जी-
वात्मापरमात्माकी ऐक्यता (अभिन्नस्वरूपता) होती है इसी-
को समाधि कहते हैं। ८७ ॥
न गन्धं न रसं रूपं न च स्पर्श न निःस्वनम् ।
नात्मानं न परस्वं च योगी युक्तः समाधिना ॥ ८८॥
योगीके समाधिमें रहनेकी अवस्था कहते हैं कि जो योगी
समाधिमें एकत्वको प्राप्त हो जाता है तो सर्व इंद्रियगण मनमें
लीनताको प्राप्त होकर गंध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द इन पांच वि-
षयोंको नहीं जानता कोई वस्तुमात्र अपना वा पराया कुछ नहीं
जानता जीवात्मा तथा परमात्माको अलग नहीं मानता ए-
कही समझता है इसप्रकार ध्यानमें एकाग्र होनेसे और किसी .
प्रकार जान नहीं होता ॥८८॥

भाषानुवाद । श० २
१११
अभेद्यः सर्वशास्त्राणामवध्यः सर्वदेहिनाम् ।
अग्राह्यो मन्त्रयन्त्राणां योगी मुक्तः समाधिना ॥८९॥
जब योगी उक्त विधिसे समाधियुक्त हो जाता है तो समस्त
शस्त्रोंसे अभेद्य (न कटने योग्य ) होता है देही (मनुष्य )सिंह
गज, व्याघ्रआदियोंसे अवध्य नहीं मार जाता मंत्र यंत्र
मारणमोहनादि प्रयोग (जादू) भी उसपर नहीं चलता ॥ ८९॥
बाध्यते न स कालेन लिप्यते न स कर्मणा ।
साध्यते न च केनापि योगी युक्तः समाधिना॥१०॥
जब योगी समाधिमें स्थिर हो जाता है तो उसको जरा
(बुढापा) एवं मरण (मृत्यु) पीडन नहीं कर सकते अर्थात्
अजरामर हो जाता है उसपर कालका वश नहीं चलता पापपुण्य
हैं हेतु जिसके ऐसे कर्मबंधनोंसे लिप्त नहीं होता और कोई उसे
विषयवासनामें नहीं लगाय सकता किसीके साधनमें यह नहीं
आता ॥ ९ ॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वनावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ ९१ ॥
मिताहारयुक्त व्यवहारमें रहकर जो योगी समस्तकर्मों में युक्त
रहता है और निद्रा जागरणभी युक्त रखता है अर्थात् कोई
कामक्षी अयुक्त (अति) नहीं करता पूर्वोक्त क्रियाओंमें सावधान
रहता है उसका योग दुःखनाशक कहाता है ॥ ९३ ॥
निराधन्तं निरालम्ब निष्प्रपञ्च निरामयम् ।
निराश्रयं निराकारं तत्त्वं जानाति योगवित् ॥१२॥

गोरक्षपद्धति । ११२ जब योगी उक्त विधिसे समाधिमें स्थिर हो जाता है तब परमतत्व जिसका आद्यंत (जन्ममरण) नहीं किसीके आलंबन (निमित्तमें) नहीं मायाआदि किसीके आश्रयमें नहीं द्वैतक- ल्पनामें नहीं है जन्ममरणादि दुःखमें नहीं ऐसे जीवात्मा पर- मात्माके ऐक्य हो रहे आत्मस्वरूप तत्वको जानता है ॥ ९२॥ निर्मलं निश्चलं नित्यं निष्क्रिय निर्गुणं महत् । व्योमविज्ञानमानन्दब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ॥१३॥ निर्मल (कर्मके फल वासनारूप मलते रहित ) निश्चल (चेष्टारहित ) नित्य (परिणामरहित) निष्क्रिय (सर्वव्यापारशून्य) निर्गुण (सत्वादिगुणरहित ) महद ( जिसका परिमाण नहीं किया जाता ऐसे)व्योम (चिदाकाशस्वरूप) विज्ञान (बोधस्वरूप), आनंद ब्रह्म (अद्वैतानंदस्वरूप) ब्रह्मको ब्रह्मवित् (योगी) जानते हैं ॥ ९३॥ हेतुदृष्टान्तनिर्मुक्तं मनोबुद्धयोरगोचरम् । व्योम विज्ञानमानन्दं तत्त्वं तत्त्वविदो विदुः॥९४॥ साक्षात्कारताके लिये हेतु एवं दृष्टांतसे रहित तथा मन एवं बुद्धिकरके अगम्य चिदाकाशस्वरूप, बोधस्वरूप अद्वैतान- दस्वरूप तत्त्व (ब्रह्म) को ब्रह्मज्ञानी योगी जानते हैं ॥ ९४ ॥ निरातङ्के निरालम्बे निराधारे निरामये । योगी योगविधानेन परे ब्रह्मणि लीयते ॥ ९५॥ योगाभ्यासी पुरुष षडंगयोगको पूर्वोक्तविधिसे अायास क- - भाषानुवाद । श०२ १.१३ रके जन्ममरणादि दुःखके स्पर्श न होनेवाले अवलंबनरहित एवं जिसको कोई आधार नहीं अनिर्वचनीय रोगादिरहित परब्रह्ममें लीन होता है अर्थात् सायुज्यपदको प्राप्त होता है।९५॥ यथा घृते घृतं क्षिप्तं घृतमेव हि जायते । क्षीरे क्षीरं यथा योगी तत्त्वमेव हि जायते ॥९६॥ जैसे घृतमें घृत मिलायके घृत तथा दुग्धमें दुग्ध मिलायके दुग्धही होता है तैसेही तत्वस्वरूप परब्रह्ममें योगाभ्यास करके लीन होता हुआ योगीभी परब्रह्मस्वरूप सायुज्यको प्राप्त होता है तात्पर्य यह कि जीव और परब्रह्मका सांसारिकदशामें उपाधि- करके भेद हुएमभी उपाधि नष्ट होकर दोनों चिद्रूप होकर ऐक्य- ताको प्राप्त होता है ॥ ९६ ॥ दुग्धे क्षीरं घृते सपिरनौ वह्निरिवार्पितः । तन्मयत्वं बजत्येवं योगी लीनः परे पदे ॥ ९७॥ जैसे दुग्धमें दुग्ध घृतमें घृत दीपमें दीप मिलायके उन दोनोंका ऐक्य हो जाता है तैसेही योगीके आत्मा परब्रह्ममें लीन होकर परब्रह्ममय हो जाता है आत्मा परमात्मा एकही है परंच उपाधिो- दसे पृथक् मानते हैं जब अन्याससे उपाधिरहित होता है तब उनकी ऐक्यता आपही प्रकट होती है ॥ ९७ ॥ भवभयहरं नृणां मुक्तिसोपानसंज्ञकम् । गुह्याद्गुह्यतरं गुह्यं गोरक्षण प्रकाशितम् ॥ ९८॥ योगाभ्यास करनेवालोंके जन्ममरणादि भय हरनेवाला मुक्तिद्वारमें जानेके लिये सोपान (सीढी) संज्ञक एवं धर्म, अर्थ,

गोरक्षपद्धति।
११४
काम देनेवाला गुप्तसेभी अतिगुप्त यह योगशास्त्र श्रीगोरक्षनाथने
योगियोंपर कृपा करके संसारमें प्रकट किया ॥ ९८ ॥
गोरक्षसंहितामेतां योगभूतां जनः पठेत् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो योगसिद्धि लभेद् ध्रुवम् ॥ ९९ ॥
पूर्वोक्तप्रकारसे यहांपर्यंत मुक्तिसोपान अन्वयार्थ संज्ञक
गोरक्षसंहिता योगशास्त्रको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पढता है वह
समस्त पातकोंसे निर्मुक्त होकर निश्चय योगसिद्धिको प्राप्त
होता है ॥ ९९ ॥
योगशास्त्रं पठेन्नित्यं किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
यत्स्वयं चादिनाथस्य निर्गतं वदनाम्बुजात् ॥१०॥
जो जन योगशास्त्रको नित्य पढते हैं उन्हें और विस्तारशा
स्त्रोंसे क्या करना है योगशास्त्रका उक्त फल यथोक्त प्रत्यक्ष
मिलता है क्योंकि यह शास्त्र आदिनाथ (शिवजी )ने स्वयं
हृदयकमलमें अनुभूत होकर मुखकमलसे प्रकट किया इसके
अनुभवसिद्ध होनेसे अतिप्रामाणिक है ॥ १० ॥
स्नातं तेन समस्ततीर्थसलिलं दत्ता द्विजेभ्यो धरा
यज्ञानां च हुतं सहस्रमयुतं देवाश्च संपूजिताः।
स्वाइन्नेन सुतर्पिताश्च पितरः स्वर्ग च नीताः पुनः
यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि प्राप्नोति धैर्य मनः१०१
इति श्रीगोरक्षयोगशास्त्रे मुक्तिसोपानसंज्ञके
उत्तरशतकं संपूर्णम् ॥२॥

भाषानुवाद । श० २ ११५ साक्षात् मोक्षके प्रतिपादन करनेवाले योगशास्त्रको जो पढ़ते हैं वे कृतकृत्य हो जाते हैं जिसका मन ब्रह्मज्ञानविचारमें ब्रह्म- ध्यानविषय क्षणमात्रभी धैर्य से स्थिर होता है उसने गंगा, प्रयाग, पुष्करादि समस्त तीर्थोंके जलोंमें स्नान कर लिया समस्त पृथ्वी- का दान सत्पात्र ब्राह्मणको दे दिया सहस्र किंवा अयुत अश्व- मेध वाजपेयादि महायज्ञ कर लिये ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि स- मस्त देवता विधिपूर्वक पूजित कर लिये स्वादिष्ठअन्नसे पितर तृप्त करके स्वर्गनी पठाये दिये अर्थात् तीर्थस्नान, उक्त वस्तुओंसे जो जो फल मिलते हैं वे समस्त आत्मचिंतनरूप योगाश्याससे तत्क्षणमात्र हो जाते हैं ॥ १०१ ॥ इति महीधरकृतायां गोरक्षसंहिताभाषायां माही- धर्म्यामुत्तरशतकं परिपूर्णम् ॥ २ ॥ धैनाथीकृपया मया विरचिता भाषा स्वबुद्धयाल्पया सवैपामुपकारिणी बुधजनाः शब्दार्थसंधायिनः । भाषा इत्यवहेलनं कुरुत नो योगो हि न ज्ञायते शब्दार्थोविधैर्यतोहठयुगादीन् वीक्ष्य विस्तारिता ॥३॥ भाषाकारकी प्रस्तावना है कि मैंने श्रीनाथ (आदिनाथ) महादेवस्वरूप श्रीगुरु यहा श्रीनाथ (लक्ष्मीपति विष्णु) की उपासे सर्वसाधारणके उपकारार्थ अपनी अल्पबुद्धिसे इस योग- शास्त्र गोरक्षसंहिताकी भाषाटीका की है इसे देख न्यायव्याक- रणादि जाननेवाले बुधजन ' भाषा है। ऐसा कहकर अवहे- लन (अनादर) न करे यतः यह निश्चय है कि योगमार्गका बोध .

११६ गोरक्षपद्धति। अनेक प्रकारके शब्दार्थ एवं शास्त्रार्थ तर्कवितर्कादि करनेसे नहीं होता यह केवल गुरुलाय है कोई पंडित चाहे कि अपने पांडित्यके बलसे श्लोकार्थ करे तो यह प्रयोजन कदापि नहीं होता प्रथम गुरुलक्ष्य करके स्वानुभवसिद्ध करनेहीसे इसका ज्ञान होता है इसलिये गुरुप्रसादोत्तर हठमदीपादि ग्रंथ देखके यह ग्रंथ बढ़ा दिया तथा भावार्थभी यथामति प्रकट कर दिया ॥ १ ॥ वसुवेदाङ्कभू (१९४८) संज्ञे वत्सरे मासि बाहुले । महीधरेतिनाम्नेयं टीहऱ्या निर्मिता शुभा ॥२॥ वैक्रमीसंवत् १९४८ के कार्तिकमासमें महीधरशर्म सुंदर यह भाषा राजधानी टीहरीमें रची ॥ २ ॥ हरिशर्ममुनियोगी गुरुलब्धकृपोदयः । शोधनं पुस्तकस्यास्याकरोन्मत्यनुसारतः ॥३॥ निजगुरुरूपासे पाया है उदयः योगानन्द्रका प्रादुर्भाव ) जिसने ऐसे हरिशर्मा योगीने इस पुस्तकका स्वबुद्ध्यनुसार संशो- धन किया ॥३॥ इति गोरक्षपद्धतिः समाप्ता. पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना, कल्याण-मुंबई.

mararvacanamokersanartanarta Das नाम . वेदान्तग्रन्थाः। की.रु.आ.ट.म.रु.आ. ११ शारीरक (शाङ्करभाष्य) रत्नप्रभा- टीका व्यासाधिकरणमाला और भक्तिसूत्र सभाष्य अक्षर बडा....१०-० १२ पंचदशी पं० मिहिरचंदकृत अ- त्युत्तम भाषाटीका सहित ४-० १३ ब्रह्मसूत्र शारीरक भाषाटीका.......१।।-० ०-३ १४ गीता चिद्धनानन्दस्वामिकत गूढार्थदीपिका मूल अन्वय पदच्छेदसहित भा. टी. ७–० १-० १५ गीताश्लोकार्थदीपिका. अतिउत्तम टिप्पणीसहित तैयार है गीता वा- क्यार्थबोधिनी और गीता अमृत- तरंगिणीसेही अच्छी बनी है......१-४ १६ गाती आनन्दगिरिकतभाषाटकासह३-० १७ गीता भाषाटीका अन्वय दोहासहित १-४ १८ गीतारामानुजभाष्य १९ गीता भाषाटीका ०-१४०-२ १० पश्चदशी सटीक........ ०-४ २१ प्रश्नोत्तररत्नमाला २२ प्रश्नोत्तरी भाषाटीका २३ अध्यात्मप्रदीपिका २४ निर्वाणाष्टकं सटीकम् .... mananenetrenasamesemaaseemaanadeReMTERapana . - Cerererererererererererererererer merserveercises । :- Searanaaenarmerseranarasaramशिवलिटिशिशिरिरिरिnिaranasranamera riesmanaशिशिपिडिमि1ि की.रु.आ.ट.म.रु.आ. नाम. २५ सिद्धान्तचन्द्रिका सटीक वेदान्त ०-८ २६ प्रभोचरप्रकाश........ ७ हरिमीडेस्तोत्र सटीक......... ०-१४ २८ द्वादशमहावाक्यविवरण........... .-४ २९ त्रोटकसटीक ३० गोविंदनामगीता ३१ हठयोगप्रदीपिका भाषाटीका.... १-८ ३२ शिवस्वरोदय भाषाटीका ३३ शिवसंहिता योगशास्त्र भाषाटीका १-० ०-२ ३४ वेदान्तरामायण भाषाटीका ३५ अष्टावक्रगीता भाषाटीका ०-॥ ३६ श्रीरामगीता भाषाटीका पदप्रकाशिका अनुवादसमुच्चय और विषमपदी सहित०-८०-१ ३७ अपरोक्षानुभति संस्कृतटीका भाषाटीका सहित ३८ वेदान्तपन्थपञ्चक वाक्यप्रदीपः वा- क्यसुधारसः हस्तामलकः नीर्वाण- पञ्चकं गनषिपञ्चकं इमे सटीकाः०-८ ३९ वेदस्तुति भाषाटीका ४० रामगीता मूल -२ ४१ श्रीमद्भगवद्गीता पञ्चरत्न अक्षरमोटा गुटका रेशमी अतिउत्तम ७ पंक्ती १-८ areenaramanardevalemaniamernamendmARMYahan ..... ०-४ SEVERecemeetelecweeteserecescesereyreedeeyesrescern Enaanaanaamarsanarteneranarram00 नाम. !!!! " ५० mararesamarnata3NATranaiaRABAR252sanega2 12513 की.रु.आ.ट.म.रु.आ. ४२ तथा ८ पंक्तीवाला......... ४३ पञ्चरल अक्षरबडा खुला पाना संची छोटी ४४ पञ्चरत्न अक्षरवडा लम्बीसंचीखुली-० ४५ गीता श्रीधरीटीकासहित १-० ४६ गीता बड़े अक्षरकी १६ पेजी गु. १-० ०-२ ४७ गीता बडे अक्षरकी खुली ०-१२ ०-२ १८ गीता गुटका विष्णुसहस्रनामसहित ०-८ ४९ पञ्चरल और एकादशरल -१२ ०-२ पञ्चरत्न द्वादशरत्न ०-१० ०-१॥ पञ्चरत्न नवरत्न पाकिट बुक ०-७ ५२ पञ्चरत्न बुफेसन सप्तरत्न .......०-१२ ०-२ ३ पंचरल भापाटीका सहित बडा ५४ पंचरल गीता गुटका भा० टी० १-० ५५ केवल गीता भा० टी० पाकेटबुक ०-८ ५६ विज्ञानगीता कविकेशवदासकृत ०-८ ५७ पाण्डवगीता भाषाटीका..... • ०-३ ५८ पाण्डवगीता मूल मध्यम. .... ०-१॥ ०-॥ ५९ कपिलगीता आपाटीका ६. जीवन्मुक्त गीता भा० टी० ०-१ ६१ गीता गुटका पाकिट बुक........... ०-५ ०-१ ६२ शिवगीता भापाटीकासहित.. ०-१२ ०-२ ०. SECRUEURSESEvee ०. - - B Yearesereveresecseererecamerseerceeruta नाम. o- .. meaDEOS232633330aasava - की.रु.आ.ट.म.रु.आ. १६३ गणेशगीता भाषाटीकासहित ... ०-६ ६४ आत्मबोध,तत्त्वबोध, वेदस्तुतिभापा०-४ ६५ आत्मबोध भाषाटीका ६६ तत्त्वबोध भाषाटीका ०-२॥ ६७ भक्तिमीमांसा शाण्डिल्यऋषिप्रणीताआचार्य- स्वमेश्वरविरचितेन भाष्येण संयुता ०-८ ६८ नारदगीता ६९ वेदांतसार संस्कृतमूल और संस्क- तटीका तथा आपाटीकासहित ०-१२०-२ ७० अभिलाखसागर वेदांत ७१ गोरखनाथपद्धति नापाटीका (योग- साधन विधि)... ०-१२ ०-१ ७२ मुक्तिकोपनिषद् भा० टी० . ७३ कैवल्योपनिषद् भा० टी० ७४ पातंजलि (योगदर्शन)भा० टी० १-० ७५ सांख्यर्दशन अत्युत्तम भा० टी० १-४ अदितसुधा-संस्कृत सुगम् अपूर्व आजतक कहांभी न छपा वेदांत- ग्रंथ मुमुक्षुलोगोंको अत्यादरणीय हे की०१२ आ. पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना, कल्याण-मुंबई. - % . Sereness DEResecevecetweerecerecederersease

Goraksh Paddhati

Author
Sharma, Mahidhar
Title
Goraksh Paddhati
File name
Goraksh Paddhati
Text
OCR done
Citation
1898
Published
2009/09
Publisher
Kalyan - Bombay Laxmi Venkateshwer Press
Language
Sanskrit
Pages
119
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Goraksha
DLI number
345454
Barcode
99999990233794.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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Copyright permitted
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