University Liberey Allahabad
Sanskrit Riju Vakarayan
Front matter
संस्कृत
ऋजुव्याकरण
प्रथम भाग
पण्डित मादित्यरान महावार्य ने
RIJU VYAKARANA
A
SANSKRIT GRAMMAR
IN
HINDI
PART I
BY
ADITYARAM BHATTACHARYA, MA."
Professor of Sanskrit, Muir Central College,
Eighth Edition.
ALLAHABAD.
PRINTED AT THE "INDIAN PRESS
1902
PREMustan
Registered under Act XXVof 1867.
8 ANNAS.]
[दाम भाट आने
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INSCRIRED
10
Dh G THIBAUT, PHD
SUPERINTENDENT OF SANSKRIT STUDIES,
NORTH WESTERN PROVINCES & OUDH,
WITH FLILINGS OF GRATEFUL REGARD
TOR HIS CORDIAL SYMPATHIES
WITH THE CAUSE OF THE ADVANCEMENT
OF SANSKRIT STUDIES
No text on this page.
PREFACE Ån elementary work on Sanskrit grammar together with evercises for the use of the lo ver forms in English schools preparing for the Middle Class Examination in the United Provinces is a great desidei atu ni The present book has been prepared to meet this want. The chief difficulty lindering the progress of this woik whici has tahen several months to plan and prepare was its adaptation to the capacities of the very young beginners of so complicated a system of grammar as that of the “language of the gods” That difficulty was intensified by iny having to take into consideration the average capacities of the youug pupils who read in the losai classes of our schools and the very low state of Sanskut education here in comparison to that in the schools of Bombay and Bengal For reasons, which it would be out of place to enumerate in this place, the vernacular ( Hindi ) and the classics of the Hindus of the United Provinces are in imminent davçei of falling into total disuse in the English schools The ever increasing preponderance of the number of candidates who take up Urdu and Persian in the Middle Class and higher examinations, over those who take up Llındı and Sanskrit, aftoids unmistahable signs of the approach of the doom of the people's secular and sacred language The only gratifying ray of hope amidst this gloom of despondency is that the Head of the Department of Public Instruction and his learned coadjuter, the Superintendent of Sanskut Studies, are both alive to the dangers that thieaten Sanskrit and are willing at heart to restore the Hindu classics to then proper status in the Schools and Colleges.
( 2 ) The present under taking is the outcome of an order issued by the Director of Public Instruction to introduce the study of Sanskrit in the lower forms prepaung for the Middle Class Examination It was pecessary therefoie to place before the young beginners, in their own vernaculai, an elementary text containing as much of granımai and illustiative exercises as would enable them to understand then Middle Class Sanskrit Reader The preparation of an abudgment of Sanskrit grammar fou young boys is not an easy task The compiler must, on the one hand, avoid the temptation of entering too deeply into details, which would make an excessive claim on the time and intelligence of the students And on the other hand, to reduce the bulk of the book, at the expense of thoroughness would maz its general usefulness and create difficulties to the studeuts by not supplying to them instructions on difficulties that ciop up in every page of their Reader. The language of the rules had also to be made as simple as possible, so as to suit the capacities of the average lad read. ing in the fifth class of an English school And this has to be done for the sake of popularising the study of Sanskrit even at the risk of incurring the ill opinion of the old class of Pundits who will perhaps ridicule it as a vulgai innovation "To further adapt it to the use of boys of an English school, all the declensions of cases have not been presented before them at once lest they be frightened at the long'ariay of forms to the like of which they have not before been used Only the first and second class declensions ( together with those of the vocative case which do not always differ from the class ) have been given in the first part of this work. The iemainder will form their second year's course ( 3 ) In the same way only the sarz adhatula conjugat:oes POpularly known as the first four conjugations, have been embodied in lessons together with the nominal declensions, and to the end of each lesson, a list of nominal bases and vei bal roots have been appended with instructions to decline and conjugate them respectively Sentences illustrating the use of the case and conjugational forms that have been given in their lessons have also been added The number of these sentences has been necessarily kept low as this Part will form the course of study for one year only. The rules of Sandhs have been given in footnotes (but not in small type ) illustrating the practical application of Sandha occurring in sentences at the end of each lesson. It is hoped that their study separately and incidentally as they may occur at 19- tervals and not en meresse vill iender at a less aksome task to master and remember them Altogether my own impiession is that this attempt to prepaie a kind of Principa Sanskrit in the vernacular of these Provinces will be attended with good results s Crack संस्कृत बजुध्याकरणमू মুভিজ। हिन्दीशाकारले वर्णविचार और सन्थिके नियनादि कुछ जोन लेनेके पीछे संस्कृत व्याकरणका भारम्भ पाठशालानोंकी ऊपरी कक्षाओं में होता है। इस कारण इस संस्कृतके ऋजुव्याकरण नाम पुस्तक में उन अंशों का मुख्य रूपसे विचार नहीं किया गया जिनको विद्यार्थी हिन्दीव्याकरण में पढ़ चुके हैं । संस्कृतव्याकरण में पहिलेही सन्धि पढाई जाती है इससे बालकोंके शिर पर अखरता बोझ सा पड़ जाता है। वे उसे रुचि से नही सीख सकते और वैसा लाभ भी नहीं उठाते हैं। इसी बातके ध्यान से इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में सन्धि के नियम एकत्र नही लिखे गये, किन्तु अवसर अनुसार स्थान २ पर डाले गये हैं। प्रसङ्ग से उन नियमों के अभ्यास करने में विद्यार्थियों को एक साथ अधिक अन न होगा, वरन् नियम सुखसे स्मरण रहेंगे । कुछ नायक संज्ञा और क्रिया शब्दों के रूप दिखा कर वाक्य रचनाके उदाहरण दिये गये हैं जिससे आगे चलके छोटी २ संस्कृत २ भूमिका ॥ पाठन पुस्तकें समझ में आने लगे। शब्दोंके रूप बनानेके नियमोंका जानना बालकोंको कठिन है सो उनके लिये रूपोंकी घोषके कणठ कर लेना वस है। हां जब ऊपरकी कक्षामें वे जायेंगे तब नियमोंको भी जान लेंगे। इस प्रथम भागमें संज्ञा और सर्वनाम शब्दोंके केवल प्रथमा, द्वितीया और सम्बोधनके रूप दिये गये हैं। और प्रत्येक गणके धातु रूप चुन २ कर वर्तमानादि चार लकारोमें दर्साये गये हैं ॥ बीच २ में बहुधा प्रचलित अव्यय शब्द भी लिखे गये हैं। व्याकरणके और २ अंश इस पुस्तकके अन्यभागोंमें रक्खे जांयगे ॥
सङ्कतोंका विवरण
ए-एकवचन
द्वि०= द्विवचन
इ०= इत्यादि
ब० = बहुवचन
(स.) सन्धि
संज्ञाशब्दोके रूपोमें
धातुओके रूपोमें
-प्रथमा
प्र० = प्रथम पुरुष
स= सम्बोधन
म०=मध्यम पुरुष
द्विती०= द्वितीया
उ०= उत्तन पुरुष
पुं० वा ०= पुलिङ्ग
परस्मैपद
स्त्रीलिङ्ग
वा परस्मैपदी
नपुं०= नपुंसकलिङ्ग
प्रात्मने आत्मनेपद
वा आत्मनेपदी
उभयः- उभयपद
वा उभयपदी
वर्त = वर्तमानकाल
अनः भूत= अनद्यतनभूत
परस्मै० =
स्त्री०=
यथास्थल
सूचना 9-यद्यपि आदेश स्थलों में उच्चारणशी सुगमतानिमित्त सस्वर बाञ्जन लिखित हैं तथापि वे स्वररहित ही स्वारहित व्यञ्जनोंके स्थानमें अथवा स्वरोंके स्थानमें आदेश होते हैं। २.-सन्धिके नियमोंके उदाहरणोको शिक्षक गद्यपद्यसंग्रहसे सङ्क- लित करके विद्यार्थियोंको अभ्यासके लिये सिखलावें ॥
संस्कृत ऋजुव्याकरणम् प्रथम भाग संस्कृत व्याकरणमें वर्णमाला और विभाग का क्रम प्राय: वैसाही है जैसा कि हिन्दीमें सिखाया जाता है । यथा स्वर, व्यञ्जन, हस्व, दीर्घ, पलुत, वर्गादिकोंका द शौर ब को उच्चारणस्यान इत्यादि ॥ संस्कृत में लिङ्ग तीन हैं। हिन्दीमे दो ही माने जाते हैं परन्तु पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्गसे अधिक संस्कृत मे नपुंसकलिङ्ग भी है। अगरेजीमें बहुत करके पुरुषवाचक प्राणिवाचक शब्द पुंलिङ्ग, स्नोबोधक प्राणिवाचक शब्द स्त्रीलिए और अमाणिवाचक शब्द नपुंसकालिन समो जाते हैं। पर संस्काराने पह लिङ्गकी पहिचानका ढङ्ग नहीं है। इसमें तो शब्दोंके लिड, शुद्धव्यवहार और प्रत्ययों से जाने जाते हैं जो व्याकरण और कोशोमें बतलाये गये हैं। संस्कृत में बधन तीन । हिन्दी और अगरेजी में केवल ऋजुव्याकरणम् ॥ एकवचन और बहुवचन होते हैं परन्तु संस्कृत में उनसे अधिक द्विवचन भी होता है जो दो व्यक्तियों का बोध कराता है ॥ संस्कृत में सज्ञाशब्दके उत्तर प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, और सप्तमी ये सात विभक्तियों लगती हैं जिनके चिन्ह विसर्ग, औ इत्यादि हैं। उनमेसे कौनसी विभक्ति किस अर्थ में आती है इसका निरूपण स्थल २ पर किया जायेगा। जिस संज्ञा शब्दके अन्त में स्वर रहता है उसे स्वरान्त और जिसके अन्तमें व्यञ्जन रहता है उसे व्यञ्जनान्त कहते हैं । अकारान्तादि क्रमसे विशेष सहज प्रचलित संज्ञा शब्दोंके और बीच २ मे सर्वनाम शब्दोंके रूप (अ) दिखाये जायेंगे ॥ जैसे अकारान्तादि विशेष्य शब्दोंके रूप होते हैं वैसे ही अका- रान्तादि विशेषण शब्दोंके भी होते हैं। विशेष्य और विशेषण शब्द समान ही लिङ्ग, वचन, और विभक्तिके होते हैं। (अ) इस ग्रन्थमे जो सज्ञा शब्द दिखाये गये है उनमे जिस स्वरान्त अथवा व्यञ्ज- नान्त शब्दको न पाओ तो समझो कि वैसा स्वरान्त वा व्यञ्जनान्त शब्द विशेष सहज प्रचलित नहीं है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ ५ प्रथमा बालकः बालकाः बालका प्रथम पाठ संज्ञा अकारान्त पुंलिङ्ग बालक शब्द एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् बालको सम्बोधनम् (अ) हे बालक बालको द्वितीया बालकम् बालको वालकान् प्रायः सब अकारान्त पुंलिङ्ग शब्दोंके रूप वालक शब्दके समान होते हैं। अकारान्त नपुंसकलिङ्ग पुस्तक शब्द ए द्वि पुस्तकम् पुस्तके पुस्तकानि सं० पुस्तकानि द्विती० पुस्तकम् (आ) पुस्तके प्रायः सब अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके रूप पुस्तक शब्द के समान होते हैं। हे पुस्तक पुस्तके पुस्तकानि (अ) सम्बोवन अर्थ मे प्रथमा विभक्ति लगती है। परन्तु उसके ए.व० मे बहुधा रूप भेद होता है। (आ) नपुसकलिङ्ग शब्दों के रूप प्रथमा विभक्ति में जैसे होते है वैसेही ऋमसे द्वितीया विभक्ति मे मी होते हैं। यथा पुस्तक शब्द में देखते हो।
আম্মাজ। हे विद्य आकारान्त स्त्रीलिङ्ग विद्या शब्द ए० द्वि विधा विन्ये विद्याः सं० विद्य वियाः द्विती विद्यान विद्य 'विद्याः (अ प्रायः नाकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप विघा शब्द के समान होते हैं ॥ आकारान्त स्त्रीलिङ्क अम्बा (माता) शब्दके २० के एक व में हे अब ऐसा रूपीद होता है। तीनों लिङ्गो में समान सर्वनाम शब्द युमद् (तू) द्विती० ति त्वह सुवाम त्वान, युवा। गुणाज, त्वा वास वः तीनों लिङ्गों में रामान सर्वनामशब्द अहमद (सैं) ए० द्वि अहम् मावान माम्। भावास मान, द्विती० युष्मद इत्यादि सर्वनाम शब्दोका प्रयोग सम्वोधन विभक्ति में नहीं पाया जाता है॥ (अ) स्त्रीलिङ्ग शब्दोकी द्वितीयाके बहु० ब० के अनमे नकार कमा नहीं होना । यथा विद्याः इत्यादिक रूपोमे ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ । द्वितीय पाठ क्रिया जैसे बहुतसे दूव्यादिवाचक सज्ञाशब्द हैं वैसे बहुतसे क्रिया- वाचक शब्द भी हैं। उनको संस्कृत में धातु कहते हैं । धातुके उत्तर, कालादि अर्थ बोध कराने के लिये क्रियाकी ति, ते, इत्यादि विभक्तियां आती हैं। वे दो प्रकारको होतो हैं । एक पुरस्मैगड़ दूसरी आत्मनेपद ॥ कुछ धातु ऐसे हैं जिनके उत्तर, केवल परस्मैपद विक्तियां आती हैं इससे वे परस्मैपदी कहलाते हैं। जैसे पठ् इत्यादि । कुछ धातु ऐसे हैं जिनके उत्तर, केवल आत्मनेपद विभक्तियां आती हैं इससे वे भात्मनेपदी कहे जाते हैं। जैसे भाष् इत्यादि। और कुछ धातु ऐसे भी हैं जिनके उत्तर, उ ऊ दोनों प्रकारको विभक्तियां आती हैं इस से वे उभयपदी कहाते हैं । जैते वय इत्यादि धातु ॥ हिन्दी तो लिङ्ग के कारण क्रियाके रूपमें विकार होता है परन्तु संस्कृत में नहीं होता है। क्रियाकी विभक्तियों के समुदाय दश हैं जो भिन्न २ अर्थ बोध करानेके लिये लगाये जाते हैं । उनके प्रत्येक समुदायका नाम सस्कृतव्याकर "लकार" कहा जाता है। धातुपारी दो सहस्रके लगभग धातु हैं और वे दश विभा- गोमें विभक्त हैं। कारण इस विभाग के करने का यह है कि
ऋजुव्याकरणम्
१
वर्तमानकाल, भाज्ञा, विधि और अनद्यतनभूत (अ) इन चार लका-
रोंमें धातुओं के रूप दश भिन्न २ रीतिसे बनते हैं। उक्त दश विभा-
गोका नाम गण है।
इस ग्रन्थके प्रथम भागमें उन वर्तमानादि धार लकारों में दशों
गणोंके चुन २ के ऐसे धातुओंके सिद्ध रूप रक्खे गये है जिनके अनु-
रूप बहुतेरे सहज प्रचलित धातुओं के रूप होते हैं ।
गणके नायकधातुके उत्तर, आदि शब्दको लगाके गणका नाम
व्यवहार किया जाता है। जैसे भू + आदि = भ्वादि यह एक गणका
दशो गणके नाम यथा ग्वादि, तुदादि, दिवादि, चुरादि, स्वादि
तनादि, क्यादि, रुधादि, अदादि, और हादि ।
दशो गणोंके धातुओंके अभी वे रूप लिखे जाते हैं जिनका
का प्रथमा और कर्म द्वितीया विभक्ति पाता है।
(अ) अनद्यतनभूत उस काल को कहते है जिस की क्रिया बोलने से आठ प्रहर
पहिले हो चुकी हो अथवा जो भासन्नभूत, वा पूर्णभूतका अर्थ देती हो ।
ऋजुव्याकरणम् ॥ ९ प्र० वपतु भ्वादिगणका उभयपदी धातु वप (बोना) परस्मैपदमें मात्मनेपद में वर्तमान वर्तमान एक द्वि० एक द्विर प्र. वपति वपतः वपन्ति प्र. वपते वयेते वपन्ते म. वपति बपथः वपथ म. वपसे वपेथे वयश्वे उ वपामि वपावः 3 वर्षे वपावहे वपामहे माज्ञा সন্নিা वपताम वपन्तु प्र० वयताम् वपेताम् वपन्ताम् नावण वपतम् वपत सवपस्व वपेथाम् वपश्वम् उ० वपानि वपाव वपाव वपाम बपावहै वपामहै विधि विधि प्र० वपेत् वपेताम वपेयुः प्र. वपेत वपेयाताम् वपेरन् म. वपेः वपेतम् वपेत म. वपेथाः वपेयाथाम् वऐश्वम् उ० वपेयम् वपेव वपेम उ. यपेय वपेवहि वपेमहि अनद्यतनभूत अनद्यतनात प्र० अवपत् अवपताम् अवपन प्र. अवपत अवताम् अवपन्त म. अवपः भवपतम् प्रवपत म० भवपथाः अयपेयाम् अपध्वम् 3. अवपम् अवपाव प्रवपास उ० अवये अवपावहि अवपामहि ਚ ਬੜੇ ऋजुव्याकरण n वाक्य रचना कुछ अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द बुध ( पण्डित ), नर, शिष्य, पुत्र, शृगाल, कृषक, पवन, हस्त, पाद, व्याघ, गज, कुवर, मृग, अश्व, रासभ (गर्दभ), वृक्ष इत्यादि । कुछ अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्द फल, वीज, औषध, सत्य, सुख, दुःख, धन, वन, ज्ञान, शस्त्र, (१) शास्त्र, पत्र, वस्त्र, जल, अनृत ( फूठ ), मुख, नयन, नक्षत्र इत्यादि ॥ कुछ अ.कागन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द लता, वार्ता, धरा (पृथ्वी), माला, बाला, कन्या, भिक्षा, शिक्षा बुभुक्षा ( भूख ), पिपासा (ग्यास), गङ्गा, यमुना, इत्यादि । ( सं०) (१) किसी पदके बीच ऋ, ऋ, र, वा ष, इनमेंका कोई अक्षर हो और उसके मनलर दन्त्य नकार आवे तो उस (नकार)- के स्थानमें मूर्द्धन्य खकार अाश होता है। और यदि एक ही पदके बीच ऋ, ऋ, र, वा ष इनके उत्तर कोई स्वर, कवर्ग, पवर्ग, अथवा य, र, व, ह वा अनुस्वार इनसे एक वा अनेक आवें और उनके अनन्तर दन्त्य नकार आवे तो भी उस ( नकार ) के स्थानमैं मूर्द्धन्य सकार आदेश होता है। जैसे शस्त्राणि इत्यादि रूपोमें ॥ पदके अन्तके दन्त्य नकार है स्थानमें मूर्धन्य णकार आदेश नही होता है जैसे नरान इत्यादि रूप में ॥ त, थ, द, ध वा प, भ इनके पूर्व में इनसे संयुक्त दन्त्य नकारके स्थानमें मूर्धन्य प्रकार प्रदेश नहीं होता है। यथा सन्ध इत्यादि में । . . de ऋजुव्याकरणम् ॥ . ग्वादिगणके कुछ परस्मैपदी धातु जिनके रूप परस्मैपद में थप धातु के समान होते हैं। पठ् ( पढ़ना), हस् (हॅसना), वद् (बोलना), पत. ( गिरना), वस ( बसना), चल ( चलना), फल ( फलना ), वज ( चलना), दह (दाह करना), ज्वल ( जलना), त्यज ( छोड़ना), रक्ष ( रखना), नन् (नमस्कार करना ) इत्यादि । कुछ अात्मनेपदी धातु जिनके रूप श्रात्मने में वप् धातु के समान होते हैं। लभ ( पाना), स ( सहना ), सेव ( सेवना), बन्द ( प्रणाम- करना ), यत् ( यत्न करना ), कार ( कांचना ), शिक्ष ( सीखना), बाथ ( पीड़न करना वा सताना), भाव ( बोलना ) इत्यादि । कुछ उभयपदी धातु जिनके रूप दोनों पदों में वप धातुके समान होते हैं। पच ( पकना वा पकाना अथवा पचना), याच ( मांगना), खन (खनना), राज ( विराजमान होना). वह (बहना, वा ढोना) इत्यादि।
१२ ऋजुव्याकरणन ॥ वाक्य (भ) (संस्कृत) (हिन्दी) बालकः पुस्तकं ( २ ) पठति दो लड़कियां हँसती हैं । फले पततः ॥ हे मित्र तू सत्य बोल ॥ बुधाः सत्यं वदन्ति ( ३ )॥ मैं दुःख को सहता हूं। तू सह ॥ अम्ब (आ) त्वां वन्दे (इ)॥ बेटो तुम बिद्या सीखो॥ त्वमौषधं (४) सेवस्व ॥ सूर्या चमकता है। (अ) संस्कृतसे हिन्दी मे और हिन्दीसे सस्कृतमे उत्था करने के लिये ॥ ( सं०) (२) पदके अन्तमें सकारको अनुस्वार करके भी पढ़ सकते हैं। यथा ( पुस्तकम् ) इसको पुस्तकं कहके भी पढ़ सकते हैं। ( सं० ) (३) पदके मध्य में स्पर्श वर्णके पूर्व में अनुस्वार कभी नही रहने पाता किन्तु जिस वर्ग का अक्षर उस (अनुस्खार) के उत्तर हो उसी वर्गका पञ्चम अक्षर उस (अनुस्वार) के स्थानमें आदेश होता है। जैसे वदन्ति सदा ऐसा ही होगा, वदंति ऐसा नही। (आ) सम्बोधन पदके पहिल "हे" शब्द रक्खा जाता है पर चाहे उसे न भी रक्खें तो उसका अर्थ समझ लिया जाता है। (इ) मध्यम वा उत्तम पुरुष की क्रियाके साथ युष्मद् अथवा अस्मद् शब्दका प्रयोग जब नही किया जाता है तब वहां अपने मनसे वह समझ लिया जाता है। जैसे बन्दे इस क्रियाका कर्ता अहपद अध्याहार कर लिया जाता है ।। ( सं० ) (४) स्वररहित व्यञ्जनके अनन्तर जो अक्षर भाता है उस अक्षरसे उस स्वररहित व्यञ्जनको मिला देते हैं । जैसे त्वम् + औषधम् = त्वमौषधम् इत्पादि उक्त नियममें यदि किसी सन्धि की प्राप्ति हो तो उस सन्धिको पहिले करके तब मिला देते हैं।
ऋजुव्याकरणम् ॥ वाक्य सरत हिन्दी वयं वीजान्यवधामहि (५)॥ शिर कांपता है। हे कृषका (६) यूयं वध्वम् ॥ लड़की अन्न रोंधती है। शिष्या ज्ञानं लभन्ते ॥ भूख मुझको सताती है॥ (स ) (५) ह्रस्व वा दीर्घ इकार, उकार, अथवा ऋकारके अनन्तर कोई असवर्ण स्वर श्रावे तो उस हस्व वा दीर्घ इकार, उकार, अथवा ऋकारके स्थानमें क्रमसे यकार, वकार अथवा रेफ आदेश होता है यथा वीजानि + अवपामहि वीजान्यवपामहि इत्यादि । ( सं०) (६) पदके अन्तमें आकारके अनन्तर विसर्ग हो और उसके अनन्तर स्वर, किसी वर्गका तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम अथवा य, र, ल, व, ह इनमें से कोई अक्षर आवे तो उस विसर्गका लेप हो जाता है और लोप हो जाने पीछे फिर कोई सन्धि प्राप्त हो तो भी वह नहीं होती है। यथा (६) से अङ्कित बाक्यमें कृषकाः + यूयम् = कवका यूयम् इत्यादि। । mume- ऋजुव्याकरणम् ॥ पुं० कवि प्र. कवयः प्र० तृतीय पाठ संज्ञा हस्व इकारान्त शब्द पुं० सखि ( सखा) द्वि द्वि० कविः कवी सखायौ सखायः सं० हे कवे कवी कवयः । सं० हे सखे सखायौ सखापः। द्विती० कविम् कवी कवीन् द्विती० सखायम् सखायौ सखीन प्रायः हस्व इकारान्त पुंलिङ्ग शब्दोंके रूप कवि शब्द के समान होते हैं। सखि शब्दके कुछ रूप इकारान्त शब्दोंके रूपोंसे भिन्न होते हैं । सो ऊपर दिखा दिये हैं। हस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग स्तुति इत्यादि शब्दोंके भी रूप कवि- शब्दके समान होते हैं। केवल द्वितीयाका बहुब० स्तुतीः इत्यादि ऐसा होता है। हस्व इकारान्त नपुंलिङ्ग शब्द वारि ( जल ) द्वि० অামি वारिणी শ্রান্তি सं० हे वारि, वारिणी बारिख हे वारे द्वितीय वारि वारिणी कारिणि हस्व इकारान्त नपुंलिङ्ग शब्दोंके रूपवारि शब्दके समान होते हैं।
ऋजुव्याकरणम्॥ १५ ए० द्वि नदी नद्यौ नद्यः व० स्त्री दीर्घ ईकारान्त शब्द स्त्री० नदी स्त्री श्री ए० द्वि श्रियो श्रियः सं० हे नदि नद्यौ सं० हे श्रीः श्रियौ श्रियः द्विती० नदीम नद्यौ नदीः द्विती० त्रियम् श्रियो श्रियः स्त्री० स्त्री एक द्वि० स्त्रियो स्त्रियः स्त्रि स्त्रियो स्त्रियः दिती० स्त्रियः स्त्रियो स्त्रीः दीर्घ ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दोके रूप नदी शब्द के समान होते हैं। लक्ष्मी शब्द की प्रथमाके एक व० में लक्ष्मीः ऐसा रूपोंद होता है। शेष रूप नदीके समान होते हैं । श्री इत्यादि शब्दों के और स्त्री शब्द के रूपमें जो कुछ भेद होता है सो दिखा दिया। पुल्लिङ्ग सुधी इत्यादि शब्दोंके रूप श्री- शब्द के समान होते हैं। ter स्त्रियम् स्त्रीम् ऋजुव्याकरणम् चतुर्थ पाठ क्रिया उभयपदी नी (ले जाना वा पहुंचाना) परस्मैः आत्मने वर्तमान वर्तमान प्र० नयते मा नयसे उ० नये प्र० नयतु उ० नयै द्विर ब द्वि० प्र० नयति नयतः नर्यान्त नयेते नयन्ते म. नयसि नयथः नयथ नयेथे नयध्वे उ. नयानि नयावः नयामः नयावहे नयामहे माज्ञा नयताम् नयन्तु प्र० नयताम् नयेताम् नयन्ताम् नयतम् नयत म. नयस्व नयेथाम् नयध्वम् उ० नयानि नयाव नयाम नयावहै नयामहै विधि विधि प्र० नयेत् नयेताम् नयेयुः प्र० नयेत नयेयाताम् नयेरन् नयेतम् नयेत म० नयेथाः नयेयाथाम् नयेध्वम् उ नयेयम् नयेव नयेस ऊ नयेय नयेवहि नयेमहि अनद्यतनभूत अनद्यतनभूत प्र० अनयत् अनयताम् अनयन प्र० अनयत अनयेताम् अनयन्त स. सनयः अनयतम् अनयत म अनयथाः अनयेथाम् अनयध्वम् 30 अनयम् अनयाव भनयान उ० अनये अनयावहि अनयामहि श्रि (सहारा लेना) सेवाधारमा ह ( पुकारना) परस्मै० मात्मने परस्मैक आत्मने वर्तमा० अयति श्रयते वर्तमा० हयति हयते म. नये:
ऋजुव्याकरणम् ॥
नीके उभयपदके समान रूप होते हैं।
परस्मैपदी में ( गान करना ) के गायति इ. और सामनेपदी
त्रै (त्राण करना) के त्रायते इ. रूपं नीके समन ले जाओ।
वाक्यरचना
संज्ञाशब्द
हस्व इकारान्त
-
पुं०-अग्नि, कपि ( वानर ), ऋषि, मुनि, पति, ( अ ) भूपति
इत्यादि।
स्त्री-लिपि ( वर्णमाला वा हस्ताक्षर ), वृत्ति ( जीविका ).
गति, बुद्धि, रात्रि, वल्लि ( लता ) इत्यादि ।
दीर्घ ईकारान्त
स्त्री-जननी, पुत्री, भगिनी, सखी, कुमारी इत्यादि ।
धातु
परस्मैः जि ( जीतना ), ग्लै ( खिन्न होना ), ग्लै (मुरझाना)
और ध्यै (ध्यान करना) इत्यादि ।
शात्मने स्मि (मुसक्याना) इत्यादि
.
(अ) इस भागमे जो रूपोंके सादृश्य वा भेद कहे जायगे उन्हे सज्ञाशब्दो की प्रथमा
द्वितीया और सम्बोधन इन तीन विभक्तियोमे और धातुओ के वर्तमानादि चार लकारोंने
समझना चाहिए।
१८ ऋजुन्याकरणम् ॥ संस्कृत हिन्दी दासी कुम्भ नदी (अ) नयति ॥ मा लड़कीको पुकारती है सस्यो (७) गीतं गायन्ति । बेटी तू पाथी लेजा। स्त्री पति श्रयते॥ बहिन मुझको बचा ॥ मुनिरीश्वरं (८) ध्यायति ॥ लता मुआती है। सखायः स्मयन्ते॥ सखाओ तुम मुसक्याते हो। (अ) संस्कृतमे नी धातुके दो कर्म होते है इसी हेतुसे कुम्भ और नदी दोनो शब्दोने द्वितीया विभक्ति पाई है (सं०) (७) पदके अन्त में विसर्गके पूर्व में यदि हस्व प्रकार हो और उसी विसर्ग के अनन्तर हस्व प्रकार, किसी वर्गका तृतीय, चतुर्थ वा पंचम अथवा य, र, ल, व, ह इनमेसे कोई अक्षर हो तो पूर्व- का प्रकार और विसर्ग दोनों मिल के एक प्रोकारके रूप में हो जाते हैं और जो अनन्तर हस्ख अकार हो तो उसका लोप करके उस लोप का ऽ ऐसा चिन्ह लिख दिया जाता है । यथा सख्यः + गायन्ति = सख्यो गायन्ति इ० । कृषकः + अवपत् = कृषकोऽवपत् इत्यादि ॥ (सं) (८) पदके अन्त में यदि विसर्ग के पूर्व हस्व वा दीर्घ अकारको छोड़ के शेष स्वर वर्णीमेंसे कोई आवे और उसी विसर्गके अनन्तर स्वर, किसो वर्गका तृतीय, चतुर्थ वा पंचम, किंवा य, ल, व, ह इनमें से कोई अक्षर आवे तो उस विसर्गके स्थानमें रेफ आदेश हो जाता है। यथा मुनिः+ईश्वरं मुनिरीश्वरं इत्यादि ।
ऋजुव्याकरणम् ॥ १९ पञ्चम पाठ संज्ञा ब सं० हे मधु, हव उकारान्त शब्द पुंलिङ्ग शिशु नपुंसकलिङ्ग मधु द्विर द्वि মিয়: স্নািয়ু शिशवः मधु, मधुनी मधूनि सं० हे शिशो शिशू शिशवः मधुनी मधूनि मधेा द्विती०शिशुम् शिशू शिशून् । द्विती० मधु मधुनी मधूनि हस्व उकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दोंके रूप शिशु शब्दके समान होते हैं। हस्व उकारान्त स्त्रीलिङ्ग धेनु इत्यादि शब्दोंके भी रूप वैसेही होते हैं परन्तु द्विती० के बः व में धेनूः ऐसा रूपोद होता है ॥ हूख उकारान्त नपुंलिङ्ग शब्दोके रूप मधु शब्द के समान होते है । दीर्घ अकारान्त शब्द स्त्री० बधू ( बहू) स्त्री० भू (पृथ्वो) द्विर एक द्वि भुवः वश्वौ २० हे भूः भुवो शुवः द्विती० वधूम् वध्वौ वधः द्वितीः भुवम् भुवौ झुवः भू शब्द के रूपोमें जो वेद होता है से ऊपर दिखा दिया है । पुल्लिङ्ग प्रतिभू (जामिन्दार ) इत्यादि शब्दोंके रुप भू शब्दके समान होते हैं। एक बर वधूः वध्वौ वध्वः प्र० भूः भुवौ सं० हे वधु वतः মালাক্কা ৪ 11 उ०प्लव प्र० भवनु भक्त क्रिया परस्मैपदी भू (होना) आत्मनेपदी पलु ( पौड़ना) वर्तमान वत्त मान द्वि एक द्वि० प्र. भवति भवतः भवन्ति प्र० प्लवते प्लवेते प्लवन्ते म. भवति भवथः পথ स० प्लगसे प्लवेथे प्लवध्वे उ भवामि भवावः भवामः प्लवावहे प्लवामहे সাজা भवतामू অন্য प्र० प्लवताम् प्लवेताम् प्लवन्ताम् मा भव भवताम् म प्लषस्व प्लवेथाम् प्लवध्वम् उ० भवानि सवाव नु प्ल प्लवावहे प्लवामहे দ্বিাধ विधि प्र. भवेत भवेताम् भवेयुः भवेयुः । प्र. प्लवेत प्लवेयाताम् म. भव: भवेत म. प्लवेथाःप्लवेयाथाम् प्लवेध्वम् उ भवेयम् मवेव भवेम उ० प्लवेय प्लवेवहि लवेमहि अनद्यतनभूत मनद्यतनभूत प्र० अभवत् अभवताम् अभवन प्र० अप्लवत अप्लवताम् अप्लवन्त म अभवः अभवतम् अभवत म अप्लवथा: अलबेथाम् अप्लवध्वम् त अभवम् अभवाव अभवाम त अप्लवे प्लवावहि अप्लवामहि কা प्लवेरन भवेतम् ऋजुव्याकरणम्॥ २३ वाक्यरचना संज्ञा शब्द ७ . हस्व उकारान्त पुं० प्रभु विधु (चन्द्र), बन्धु, साधु, शत्रु उत्यादि । स्त्री० रेणु (धूलि), तनु, रज्जु, (रस्सी) इत्यादि । नपु वस्तु, जतु (लाह) इत्यादि । दीर्घ अकारान्त पुं० स्वयम्सू (ब्रह्मा) इत्यादि । स्त्री तनू (शरीर), खज्र्जु ( खाज ), दद् ( दाद ) इत्यादि ।। धातु परस्मैः मात्मने दू, (दौड़ना ), त्रु (चूके वहना) च्यु ( पतन होया )॥ संस्कृत हिन्दी विधू (९) राजते ॥ मुझको दाद सताती है। नद्यः सागरं (अ) ब्रजन्ति गायें दौड़ती हैं। साधुरपसधान् क्षमते॥ दो लड़के पड़ते थे। मण्डकाः प्लवन्ते ॥ बहू रसरीको ले जाती ॥ शत्रुः प्रभुरभवत् ॥ हे प्रभु तू मुझको बचा ॥ स०) (९) यदि विसर्गके परे रेफ रहे तो विसर्गका लोप होता है और उस विसर्ग के पूर्वका इस्व स्वर दीर्घ हो जाता है। यथा-विधुः + राजते= विधूराजते इत्यादि । (अ ) गत्यर्थक धातु सस्कृत में सकर्मक भी होते है इसी हेतु से सागर शब्द ने द्वितीया विभाक्ति पाई है ।।
२२
ऋजुव्याकरणम् ॥
षष्ठ पाठ
संज्ञा
दातृ ( दाता)
पिट (पिता)
द्वि०
प्र० दाता दातारौ दातारः प्र० पिता पितरौ पितरः।
दातारौ दातारः | सं० हे पितः पितरौ पितरः
द्वितो० दातारम् दातारौ दातृन द्वितीः पितरम् पितरौ पितॄन
हस्व प्रकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दोंके रूप बहुधा दातृ शब्दके समान,
होते हैं । पितृ शब्द के रूपों में जो भेद हैं सा ऊपर दिखा दिए ।
भात ( भाई ), जामात ( दामाद ) आदि शब्दोके रूप पितृशब्द के
समान होते हैं॥
हख अकारान्त स्त्रीलिङ्ग मातृ भादि शब्दों के रूप पितृशब्द के
समान होते हैं परन्तु द्वितीयाके ब० व3 में मातः ऐसा रूपभेद होता
है। और स्वस्ट (बहिन ) शब्दके रूप दातृ ब्द के समान होते हैं ।
पर द्वितीयाके ध० चा में स्वसः ऐसा रूपभेद होता है ।
क्रिया
उभयपदी ह,( हरना ) धातुके रूप परस्मैः मैं हरति इ० वपति
इ० के समान, और आत्मने में हरते इ०, वपते इ० के समान क्रम
से होते हैं ।
REFENTa"
TTE
१३
पतीया का हल करना)
Press Meta
m
TH
मा
HD MPUR
ལུ་ མི༌
बीन
भास्की काय पाटिका)
ཚེ་
चलत
पत्ताग
उक्ष २ पावसाल बन पा पातु समान नही है।
गलत
THA
Orang
Sureshem.
Fa
4.
दुपारी , पर्स, ( काली) ३० ।।
सनी दुनिष्ट (टी). नगर (नगम ). शाह (देवरानी
का निडानी)
COM
परसौ--- लस पारला), र (मामा), तु (पार करना
हा तैरना), वय (बराना), विदा), र रेज) ३०
मात्र ने मुह (पढ़ना) इत्यादि ॥
অফিs &
"
লাইফ লখকছু ? - স্বত্র হয়ে ম হ হ 24
সৰৱত্ৰা (৭) অতীষ্ট (s) 2 | ই লন্ত স্থানে রে ঐ স্থল ন ।
ভাল লাল ককলি । किलान खेत बोलना
ভয় দূল ববি। প্লাল दो सांप रंगते हैं।
সুল কব ?
বৎ আহি ।
ৰাল স্কুল অব ৭
মযীল(৩৭)ছবি হক (স্ত্রী) ঃ
*,
(?) (3) ব হ মীজাৰ জৰ হ ক হ যন
না ইঙ্ক হল স্নাহ ৰে স্বীকাল স্যাল গা কাজ ক
पस्तु प्रस्तुत
লক্ষ पदान्त লে দিল ই ক্সী ন ই
স্বী না বল। কিন্তু স্বজ দি পাখি ছানী ই হল -
=াহালু লা লং , দুশি।
(अ) यद्यपि क्रियाका प्रयोग नरी किया गया है तथापि भवाव इस क्रियापक
बोचकार लेना चाहिये।
() () স্ব স্ব মুক্তি , ও, স্ব স্ব, চাই । নিজ
ক্ষ = হ ৪। স্নগ্ধ হল () জ ল , ও
না , না হয় । এথস্থ হয়ে হা= যান; বা না -
হন হত্বানু দু।
{ } বলা নর্থ দ খ (ক) শনি ও লবল ত্ৰিশ্ন
অসুল অান্ধা সন্তা।
ऋगुव्याकरणम् ॥ सान पाठ गंगा होकारान्त शब्द জীজহা হা ( नावः तु वा स्त्री गो (गाय या देत स्ने नाब) द्वि गौः गावो नीः नावी सं. हे गौः गावी गायः सं हे नौः नादौ द्वितीय गाम् गावी इति स्वरान्तन:शब्द হি परस्सेपदी रुह (LE र उगना) नावम् नावी ma वत्त प्राए रोहति रोहतु रहेन रोहत् मात्मनेपदी रुघ (धनकना माच्या लगना) क्षतः प्रा रोचते रोधताम् अरोचत पृथक र धारो लकारोमें चले जानो। वाक्यरचना জাহান্তু स्त्री द्यो अाकाश ॥ दुग्ला (चन्द्र)॥
২
ফকহ
Frg
স্বর
স্বর্ণ
দুস্থ ( মুদী আল ),
যু ( লাল ), ক (খি
জয় (বলা হয় হিলা) ছত। ল), মুহ(ফ্রী পল স্থল) ভুe
আজ
-
संस्कृत
লাল (২) লাহুক () সুক্ষ্ম:। আৰু স্নায় ।
ৰাৰী শ্ৰী শ্ৰী ।
ও স্ব কােন যুক্তি ।
() (২) ই হল অবক (মালু সূৰ হল
ভজ ফী ঃ মুম্বক ক্রিস ত্ব নিয়ে সাল
সায় সহ বিস্ত শ্লথ হয়ে হাজির } নীলা ই
বন্ধী ব্যক্তি, হকি ( ৪ ) . অৰী মায়ায় লাভ
খি সে বিহু এ অল নিহী বজ দ্বী ই জয় ।
হ রৈ এই ট ক এর (ও) ম য়হৰ কমি হা ।
এর : (ঘ) + দ = লত্ব, ভল: (ম) + = "ল
দুবাই।
(अ) निपेवाचक अव्यय मा स्म शब्दोके साथ मानेसे अनयतन मूल लकारमे
धातुके पूर्व अकार नहीं लगता है इस लिये मा स्न+ अमोच. ऐसा रूप नहीं किन्तु
मा स्म शोच. ऐसा रूप भया । मा स्म के लगानेसे अनबन भूतका अर्थ नहीं होता किन्तु
সাজা বা বিবি কাজী নও হানা । যা মানণা হল – মায়া গন্ধ
बहुव्याकरलम्॥ संस्रुत हिन्दी कृषका बीजान्यवपन्त । अड्डुरा दो घर डाले हैं । रोहेयुः (अ)॥ लड़की कोकमत करो सिंहो गानकर्षत् । वत्ता अद्भवल। मेदिख दुहितदिन । भातरी हर्ष वारो धनानि लभन्ते॥ दो नावें बहती हैं। नक्षत्राणि धोतन्ते। द्यौः मते अहम पाठ संज्ञा सर्वनाम शब्द तद् (वह) एतद् (यह) एपः एतौ Wrfine ए ते एते द्वितीय तम् तौ तान द्वितीय एम् एलो एतान स्त्रीलिङ्ग ते प्रश एते एताः द्विती० साम् ते हिती एसाम् एले एताः नपुंसकलिङ्ग ते तानि एतरा ए तानि हिली. एतरा पते एतानि (अ) सम्भावना और शनिक अर्थमे भी विपिलवाराच्योग होता है। नपु सशलिङ्ग एतानि maNP ते ऋजुव्याकरणम् ॥ दृश (देखना) क्रिया परस्मैपदी गम् (जाना) वर्तमान वर्तमान ए द्वित ब द्वि० प्र० पश्यति पश्यतः पश्यन्ति प्र० गच्छति गच्छतः गच्छन्ति म० पश्यसि पश्यथः पश्यथ म. गच्छसि गच्छथः उ० पश्यामि पश्यावः पश्यामः उ० गच्छामि गच्छावः गच्छामः प्राज्ञा आज्ञा प्र० पश्यतु पश्यताम्पश्यन्तु प्र० गच्छतु गच्छताम् गच्छन्तु सः पश्य पश्यतम् पश्यत म. गच्छ गच्छतम् उ. पश्यानि पश्याव पश्याम उ० गच्छानि गच्छाव विधि विधि प्र० पश्येत् पश्येताम् पश्येयुः प्र० गच्छेत् गच्छेताम् गच्छेयुः पश्येतम् पश्येत म० गचः गच्छेताम् गच्छेत उ० पश्येयम् पश्येव उ० गच्छेयम् गच्छेव गच्छेम अद्यतनभूत সুনালমুন এ অনুজ্জ্বল ত্বত্ব অন্য प्रअगच्छत् अगच्छताम् अगच्छन বঃ স্বঃ মই সৰু সৰূঃ, কল্প: স্বাসু সুন অ মই ইসু আদায় নুহ | তালু প্রথা म. पश्यः पश्येन
मनुध्याकरणम् ॥
वर्तमान
विधि अनद्यतनभूत
( पीना ) पिवति पितु पिवेत् अपिबत्
प्र. ए. स्य। ( उरना) तिष्ठति लिष्ठतु लिष्ठेत अतिष्टत
प्र० ए, घ्रा ( सूचना ) जिप्रति जिघ्रतु जित অঞ্জলিল
प्र. ए. ना ( कूकना) धनति
धन
अधमत
प्र० ए० दन्ग ( इंसना) दशति दशनु
दशतु दर्शत
अदरुत्
प्र. ए१ सद (दुखपानाः) सीदति सीइतु सीदेत असीइत
यों कम से पृथक् २ चारो लकारो रुप ले जानी॥
धमेत
वाक्यरचना
कुछ सहज प्रचलित अध्यय (अ ) शब्द ।।
ध (और), वा, न, तु किन्तु, परन्तु (तो), पुनर (फिर ),
बहिम ( बाहिर ) (१३) अपि ( भी) ॥
कुछ धातु
जिनमें रूप सीदति इ. की नाई होते हैं-
जीव-( जीना), कीड़ ( रोलदा ), नील ( आंखें मूंदनी ) इ. ॥
इति वादिगण के धातु
परस्मैः
(अ) अव्यय गनो के उन्नर विभक्तिया नही लगती ! तथापि वे पद कहे जाने हैं।
(सं०) (१३) पदान्तमें स्थित रेफ वा सकारके स्थान में विसर्ग
आदेश होता है । यथा पुनर= युनः । बहिम= बहिः इत्यादि
ऋगुप्याकररम् ॥
aan.
बाम ॥
-
हिन्दी
स पश्यति । एश क्रीडति (१४)॥ आगको फूको। मै भी दूध पीऊं।
स्वमपि गृहं गच्छ ।।
वह वालक भार देखता और
ते पुप्पाण्यजिनन् । वयं मध्यपि- हर्ष करता है।
गाय खेतको गई थी। उसका
पुत्रा जीवन्तु । विद्यां धनञ्च सापने सा॥
(१५) लभन्ताम् ॥
देखा लड़के पाठशालाको जाते
सो बालकमदगत् । जीवति
ये लड़कियां खेलती हैं। वे तो
सशस धमति ॥
पढ़ती हैं।
उस फूल को सूछो। उन पेड़ों को
देखो।
( स० ) ( १४ ) सः वा एपः को परे हख प्रकारको छोड़ के
दूसरा कोई अक्षर आवे तो सः वा एपः के विसर्ग का लोप हो जाता
है ॥ यथा सः + पश्यति=स पश्यति । ए५:+कीइति= एप कीड़ति
इत्यादि।
(सं.) (१५) पदके अन्त में स्थित अनुखारके स्थान में उसी वर्शका
पञ्चन अक्षर भी आदेश हो सकता है जिस वर्ग का ( रपर्श ) अक्षर
उस अनुस्वारके अनन्तर हो । यथा धनं + घ= धनय र धनं च इ० ॥
ऋपुव्याकरणम् ॥ नवम पाठ संज्ञा ब हे त्वक चकारान्त शब्द स्त्री त्वच (त्वचा) वाला एक द्विर त्वक त्वची द्विती० त्वचम् त्वची प्रायः चकारान्त पुं० अथवा स्त्री० शब्दोके रूप रवच शब्दके समान होते हैं। जकारान्त शब्द पु वणिज ( बनिया) पुं० सम्राज्ञ ( चक्रवर्ती राजा) ए द्वि प्र० वणिक वणिजै बणिजः सं० हे वणिक् बसिजो वणिजः सं हे सन्नाट सम्माजी द्वितो वरिजम् बखिजी बशिजः द्वितीय सन्नाम् सम्मान सम्माजः न अरज ( लोटू) ए० ञ्जि प्रति द्वती० সহ্ন মঃ মা জালা हे अस्सुक % 3D प्र.सुजी ऋजुव्याकरणम् ॥ रुषतः कपन्ति क्रिया तुदादि गा उभयपदी का (खापना वा हल जोतना) परस्ने आत्मने वर्तमान वर्तमान द्वि० ए० द्वि ब प्र. कृषति 3. कृषते कृषेते कृषन्ते म. कषसि कृयथः कृषथ म० कृषसे हषेथे कृषध्वे उ. कृषामि कृपावः कृषामः ३० कृषे कषावहे कृषामहे प्राज्ञा आज्ञा प्र. कृषतु कृषताम् कृषन्तु प्र० कृषताम् कृषेताम कृषन्ताम् कृष कृषतम् कृषत म. कृषस्व कषेथाम् कृषध्वम् कृपाणि कृषाव कृषाम कृषै कषावहै कृषामहै विधि विधि प्र. कृषेत् कृषेत म् कृपेः प्र० कृषेत कृषेयाथाम् करन् मा कषः कृषेतम् कृपेत म० षेथाः रुषेयाथाम् कृषध्वम् उ. कृपेयम् कृपेव कषेम उ० कृधेय कृषेवहि कषेमहि अनद्यतनभूत अनयतनत प्र कृषत् अषताम् अकुपन्अलपत अकृताम् अकृषन्त प्रकषतम् अरुपत म० अश्वथाःअकृषेथाम् अकृषश्वम् 38 अपम् अषाच भाजगान १० अकृपे अकृषावहि अकृषामहि - ऋजुव्याकरणम् ॥ ३ im लज्जते प्र० ए. लज्जेत अमज्जत अलज्जत परस्मैः नागन'मात्मनेः परस्मैः आत्मने उभयः तुद् ( कोंचना) मज्ज (ना) लज्ज (लजाना) प्र० ए, वर्त तुदति तुदते मज्जति प्र० ए. आज्ञा तुदतु तुदताम् मज्जतु लज्जताम् विधि तुदेत् तुदेत मज्जेत प्र० ए अभूः अनुदत अतुदत वर्तमान आज्ञा विधि अनद्यतनभूत परस्मै इष (इच्छाकरनी) प्र० ए० इच्छति इच्छतु इच्छेत् ऐच्छत ( परस्मैः प्रच्छ (पूछना) प्र० ए० पृच्छति पृच्छतु पृच्छेत अपृच्छत (मुञ्चति मुञ्चतु मुञ्चेत् उभयमुच (छोड़ना) प्र. ए. मुञ्चते मुञ्चताम् मुञ्चेत अञ्चत उभ० सिच ( सींचना ) प्र० ए सिञ्चति सिञ्चतु सिञ्चेत् असिञ्चत (सिञ्चते सिञ्चताम् सिञ्चेत असिञ्चत परस्मैक कृत् (काटना) के कन्तति इ०, उभय लिप (लीपना ) के लिम्पति, लिम्यते इ० रूप, मुञ्चति सञ्चो इत्यादिके समान होते हैं। अञ्चत - (अ) अनयतनभून लकार मे धातु के आदि में स्थित इ, ई वा ए के स्थानमें ए. और उ ऊ वा ओ के स्थानमे भी आदेश होता है । यथा इष- ऐच्छत इ०। परन्तु मा स्म इन अव्यय शब्दो के साथ आनेसे यह नियम नहीं होता है। किन्तु धातुके आदिम स्थित अक्षर ज्याका त्या रहता है। यथा मा स्म इच्छत इ० ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ वाक्यरचना मंशा शब्द चकारान्त पु जलाच ( मे) ३: । स्त्री रुच् ( कान्ति ), शुव ( शोक ) इत्यादि। जकाराप्त पुं० ऋत्विज ( याशिक ), भिषज् ( वैद्य ) इ.। स्त्री० रुज (रोग ), सन् ( माला ) इ० परिजझे समान ॥ पु विराज ( विश्वरूप भगवान ), विश्वज ( विश्वकर्ता ), परिवाज ( संन्यासो ) इ. सन्ना के समान ॥ धातु परस्ना हज (सजना), स्पृश् (ना), रुज ( भग्न करना) ३०॥ वाक्य हिन्दी विश्वयूद (36) विजयजत् ॥ संन्यासी बन्दको जाता जनचा व सिधति को मत छ॥ (६) ११) पदान में स्थित क के स्थानमें ग, ट के स्थानमें इ. और तुको स्थानने द हो जाता है जब स्वर या बिसी वर्गका तृतीय, चतुर्थ, सम अथवा य, र, ल, व, ह इनमे से कोई अक्षर परे रहे। जथा-विरम + विश्व = विश्वमा विश्वम् । भिषक् + औष- धम् = निगोयधमइत्यादि ,
ऋजुव्याकरणम् ॥
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
ग्वधूलज्जते । वाचञ्च न बदति ॥ लजाता हूं।
वणिक्छुच गुञ्च (१७)॥ वह फूल उतराता है। पर यह
एषा स्त्रक शोभते॥
फल बूड़ता ह॥
खजू स्त्वचन्तुदति ॥ ( १८) हमारती राजाने पृथ्वीको जय
सापाणो भग्नति काष्ठन्तु प्लवते॥ कर लिया है।
रुङ् मां (११) रुजति ॥
भियावन्दिशति॥
(सं० ) (१७) पदानमें स्थित क, ट, त, द, वा न इनमेसे
किसी अजरके परेश रहे और उस श के परे स्वर म. य, र, ल,
अथवा ब इनमेंसे कोई अक्षर हो तो उस ज्ञ के स्थान छ भी होता
है। यथा वशिक+शुधम् = वणिक् छुचम् या वशिक्षा इ० ॥
( स०) (१८) विसर्ग अनन्तर घ व छ त श, दवा
उ हो तोष, त वाथ हो तो स उस विसर्ग के स्थान में प्रदेश हो
जाता है। यथा स: + त्वधम् = सरत्वधम् इ० ।।
(स) (१९) पदान्तमे स्थित क के स्थान में गवा ड, च के
स्यानमें ज व अ, ८ के स्थानमें ड दाण, त के स्थानले द व न
और प के स्थान व वा म आदेश होता है यदि न व म परे हो।
यथा रुक्मां= रुग्लां वा रुङ् साम् । प्रच+नातिनाति वा
अनास्ति। अमज्जत+नौः= अमज्जनौः वा अमज्जन्नौः । नौर
लुप +न= लुब्न दा लुम्न इत्यादि ।
ऋजुव्याकरणम् ॥ दशम पाठ .संज्ञा तकारान्त इब्द नो सरित ( नदी) पुं० धावा ( दौड़ता हुभा) द्वि ए० द्वि० मरित् सरितौ सरितः प्रक धावन धावन्तौ धावन्तः मं हे सरित् सरितौ सरितः सं हे धावन धावन्तौ धावत: द्विती सरितम् सरितो सरितः द्वितीयावन्तम् धावन्तौ धावतः सर्वनाम यु० भवत् (आप) पुं० महत ( बड़ा) भवान् भवन्ती भवन्तः प्र० महान महान्तौ महान्तः भवन्तौ भवन्तः सं० हे मान महान्तौ महान्त: द्वितीय भवन्तम् भवन्ती भवतः द्विती महान्तम् महान्तौ महतः तकारान्त पुं० कुछ शब्द धावरके और कुछ भवतके समान कर पाते हैं। महत् शब्दो रूपोके खेद दर्शा दिथे । शेष तकारान्त पुंलिङ्ग वा शब्दोंके स्प रित् शब्दले समान होते हैं । मं. हे भवन नपुं जगत् द्वि जगत् जगती অি सं. हे जगत जगती অন্যদি जगती जगन्ति प्र० सं० और द्वितीके ब० व०में नपुं० महत्का रुप महान्ति हता है शेष रुप जगत्के समान होते हैं। द्विती. जगत
ऋजुव्याकरणम् ॥
वर्तमान
अनः भूत
क्रिया
उभर० क्षिण ( फेंकना)
विधि
परस्मै
हिपति क्षिपतु जिप्त् अक्षिपत्
मात्मने० ० ए
क्षिपत्ते
शिपताम् क्षिपेत भक्षिपत
व धातुको समान रूप होते हैं।
मात्मने मृ ( मरना)
म्रियते इत्यादि रूप नो धातुके आत्मने के नयते इत्यादिके
समान होते हैं।
परस्० क (विखेरना वा छितराना)
आज्ञा विधि
अन भूत
प्र० ए०
किरति किरतु किरेत् अकिरत् इ० रूप ले जानो।
परस्मै० ग
गृ ( निगलना ) के रूप क के समान होते हैं और
गिरति इ० रूपोंके समान गिलति इ. गो रूप होते हैं।
वर्तमान
mavayara
ই ক্ষনে
.
संवाद-तकारान्त
-टून (पहाडका मा) इ० सरितके रामान ॥
o-गच्छन् (जाला झा), परन (रीयता हुना), हसत्
( मता हुमा), भात् (हावा हुर) () ६० धावत् के समान ॥
और श्रीग, २ र ऐश्वर्य शुस) T० यत् (नाप) के रामान ॥
धातु
उनि (देना), शिल (किरापर),
परम्स निल् (लिसना), शिव (देश भरना) ३० ॥
इति तुदादि गरो शा
पत्रक
भोः (है), शियः (पररर), ला (निषेधावक), एवं
( ऐसा, इन प्रसारले), ग्ध (ही), कथं (ो, किस प्रकारसे),
यावत् ( जमलों), तान् ( सलों), यदि तर्हि ( तो), हि (हेतु-
बोधक), किम् (दबा, क्यों), नाम (प्रतिद्धिबोधक)॥
(अ) यह भवत शब्द जिसका अर्थ होता हुआ है उस भवत् शब्दसे जिसका अर्थ
आप हे भिन्न है। और संस्कृतम भवत् (आप) शब्द प्रथम पुरुष माना जाता है यथा
भवान लिखति इ० प्रयोगामे देखो।
ऋजुव्याकरणम् ।।
३
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
भ्रातर्मा क्षिप लोष्टं।
आप क्यों नहीं लिखते॥
तद्धि (२०) गच्छन्तं बालकमदेत् ॥ तमसा नाम नदी है ।
यावद्भवाल्लिखति ( २१ ) पत्रं,
आपको नमस्कार करता हूं।
तावदहं पुस्तकं पठामि ॥ वट नामका पेड़ बड़ा होता है ।
किं हससि । गुरुस्त्वां पश्येत् ॥
हिमालया नाम महान्
भूभृद् वर्तते ॥
(सं०) (२०) पदान्तमें स्थित किसी वर्ग के प्रथम वा तृतीय अक्षर
के अनन्तर हकार आवे तो दोनों मिलके क्रमसे ग्घ, वा गह उझ वा
जह, ड्ढ वा इह, द वा दुह, और ब्भ वा बह हो जाते हैं। यथा
तत् + हितद्धि वा तहि इ
(सं) ( २१) नकारके अनन्तर ज, झ वा श, इनमेंसे कोई
हो तो अ, ड वा ढ, इनमेंसे कोई हो तो ण; और ल हो तो लँ,
उस नकारके स्थान में आदेश होता है। यथा राजन् + जय= राजज्जय,
अधावन् + शशा:-अधावजशशाः अधावञ्छशाः. भवान् +
ढुढगति= भवागढुण्ढति । भवान् + लिखति= भवाल्लिखति इ० ॥
,
४० ऋजुव्याकरणम् ॥ पुं० सुहृद् हृत् हृदी सं० हे सुहृत् hot she वाक्य संस्कृत हिन्दी भो (२२) बालका मिथो मिलध्वम् । किस लिये फूलोंको छितराते हो। एकादश पाठ संज्ञा दकारान्त शब्द नपुं० हृद् (हृदय) ए द्विर ए. द्वित सुहत सुहृदौ सुहृदौ सुहृदः सं० हे हृत् हृदी द्वितीसुहृदम् सुहृदौ सुहृदो रहृदः द्विती० हृत् हृदी दकारान्त पुं० वा स्त्री० शब्दोंके सूप स्हृद् शब्द के समान होते हैं । धकारान्त शब्द स्त्री० तुध ( भूख ) क्षुत् दुधौ दुधः दुत् दुधौ क्षुधः द्विती० दुधम् दुधौ दुधः धकारान्त पुं० वा स्त्री० शब्दोंके रूप तुध शब्दके समान होते हैं । (सं०) (२२) भोः शब्दके विसर्गके स्थानमें आठवीं सन्धिके नियमसे रेफ नहीं होता किन्तु उस ( विसर्ग ) का लोप हो जाता है यदि स्वर, किसी वर्गका ततीय, चतुर्थ वा पञ्चम अथवा य, ल, व, ह इनमेसे कोई अक्षर उस विसर्गके उत्तर हो । यथा भोः+ बालकाः= भी बालकाः इ०॥ chatr into ऋजुव्याकरणम् ॥ ४१ वर्तमान -- उ मन्ये प्र० नृत्यतु, क्रिया दिवादि गण परस्मैः धातु-नृत ( नाचना) आत्मने० धातु मन् ( समझना) वर्तमान द्वि० द्वि० प्र० नृत्यति नृत्यतः नृत्यन्ति प्र० मन्यते मन्येते मन्यन्ते म. नृत्यसि नृत्यथः नृत्यथ म० मन्यसे मन्टेथे मन्यश्वे उ० नृत्यामि नृत्यावः नृत्यानः मन्यावहे मन्यामहे माज्ञा प्राज्ञा नृत्यताम् नृत्यन्तु प्र० मन्यताम् मन्येताम् मन्यन्ताम् म. नृत्य नृत्यतम् नृत्यत मा सन्यस्व मन्येथाम् मन्यध्वम् उ० नृत्यानि , नृत्याव नृत्याम, नृत्याव त्याम, उ० मन्यै मन्यावहै मन्यामहै विधि विधि प्र० नृत्येत् नृत्येताम् नृत्येयुः 'प्र० मन्येत मन्येयाताम् मन्येरन् म० नृत्यः। नृत्येतम् नृत्येत म. मन्येथाः मन्येयाथाम् मन्येवम् उ० नृत्येयम् नृत्येव सत्येन उ. सन्येय मन्येवहि मन्येमहि अनद्यतनभूत अनद्यतनभूत प्र अन्त्यत् अन्त्यताम् अन्त्यन प्राधमन्यत अमन्येताम् अमन्यन्त म० अनृत्यः अनृत्यतम् मनत्यत म०अमन्यथाः अमन्येथाम् अमन्यत्र उ० अनत्यम् अन्त्याव अनंत्यास उ०अमन्ये अमन्यावहि अमन्यामहि वर्त आज्ञा विधि अनभूत परस्मैः श्रम् (श्रम करना) प्र० ए० श्राम्यति श्राम्यतु श्राम्येत् अश्राम्यत् परस्मैः व्यध ( वेधना ) प्र० ए० विध्यति विध्यतु विध्येत् अविध्यत् परस्मै० ज (जीर्ण होना) प्र० ए० जीर्थति जीर्यतु जीर्यत् अजीर्यत्
ऋजुव्याकरणम् ॥
वर्तमान प्राज्ञ विधि अनभूत
परस्मादिव (जूना खेलना) प्र०ए० दीव्यति दीव्यतु दीव्यत् अदीव्यत्
परस्मैः क्रम् (चलना) प्र० ए० क्राम्यति काम्यतु काम्पेत् अक्राम्यत्
परस्मैः ष्ठिव (थूकना) प्र० ए० ष्ठीव्यति ष्ठीव्यतु ष्ठीव्य त् अष्ठीव्यत्
क्रम् और ष्ठिव ये दोनों धातु स्वादिगणमें भी पठित हैं और
उनके रूप क्रमसे कामति इ० और प्ठीवति इत्यादि होते हैं।
मात्मने० जन् (जन्म पाना) के जायते इत्यादि स्वादिके
त्रै धातुके त्रायते इत्यादिके समान रूप होते हैं ।
डी (उड़ना) के डोयते इत्यादि स्वादिके नी धातुके आत्मने
के नयते इ० रूपोंके समान होते हैं ।
परस्मै० नश् ( नष्ट होना) के नश्यति इ० रूप स्वादि के दृश्
धातु के पश्यति इ० के समान होते हैं ।
वाक्यरचना
संज्ञा
शब्द
दकारान्त
स्त्री०-प्रतिपद् (पड़िवा), मृद् (मिट्टी), दृषद् ( चटान ),
शरद् ( एक ऋतु ) इ०॥
धकारान्त
स्त्री०- ऋध ( क्रोध), युध ( युद्ध), समिध (यज्ञकाष्ठ) इ० ॥
ऋजुव्याकरणम्
४३
धातु
परस्मैः क्रुध (क्रोध करना ), कुछ ( कोप करना), सुध
(भूखा होना ), सिध (सिद्ध होना वा पूरा होना), रथ ( रोंधना )
इ० नृत् धातुके समान
शम् ( शान्त होना), मद् ( मत्त होना) इ. श्रमके समान ॥
मात्मने युध् ( युद्ध करना ), बुध ( समझना ), खिद् ( खेद
करना), विद् ( होना) इ. मन् धातुके समान ॥
इति दिवादि गणके धातु
मव्यय शब्द
अत्र ( यहां), तत्र ( वहां ), कुत्र ( कहां ), यत्र ( जहां ),
सर्वत्र ( सब ठौर )॥
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
दुध्यत्येष बालकः । माता किं न क्यों खेद करते हो ।
रध्यत्यन्तम् ॥
शत्रु तो मरा॥
बालका अक्षान्मा दीव्यत ॥ हम तुमको सहृद् समझते हैं।
नश्यन्त्येतानि धनानि॥ वहां मयूर नाचता है।
कि पुत्रोऽजायत कन्या वा ॥ जहां लड़के जूआ खेलते हैं
बहवो विना विद्यन्ते ।
वहां मत जानो।
४४ ऋजुव्याकरणम् ॥ संस्कृत कथमेतांस्तरेयम् (२३)॥ अनृत्यनत्र (२४) मयूराः ॥ द्वादश पाठ नकारान्त शब्द राजा युवन् ( जवान ) युवानः प्र० श्वा श्वानः प्र० सं हे श्वन् श्वानः पुं० राजन् पुं० आत्मन् एक द्वि द्वि० राजानौ राजानः प्र० आत्मा आत्मानौ आत्मानः मं० हे राजन् राजानी राजानः स. हे आत्मन् आत्मानौ आत्मानः द्वितीराजानम् राजानी राजानी राज्ञः द्विः आत्मानम् आत्मानौ आत्मनः श्वन् ( कुत्ता) युवा युवानी ৪ালী सं० हे युवन् युवानी युवानः खानो द्विती० युवानम् युवानौ यूनः द्वितीःश्वानम् श्वानौ शुनः (सं०) (२३ ) पदान्तमें स्थित न के अनन्तर च छ, ट्र, त वा थ भावे तो उस न के स्थान में अनुस्वार होता है, और च इत्यादि के स्थानमें क्रमसे श्च, श्छ, ष्ट, ष्ठ, स्त वा स्य आदेश होते हैं। यथा एतान् +तरेयम् = एतांस्तरेयम् इ० ॥ (सं०) (२४) पदान्तमें हस्व स्वरके अनन्तर नकार हो और उस नकारके अनन्तर कोई स्वर हो तो उस नकारको दो कर देते हैं यथा अनृत्यन् +अत्र =अनृत्यनत्र इ०॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ द्विर पन्थाः जिन नकारान्त पु वा स्त्री शब्दोंके अन्तमें अन् हो प्रायः उनके रुप राजन् शब्दके समान होते हैं। युवन् और श्वन् शब्दोंके रूपमें जो भेद होता है से दिखा दिया ॥ जिन नकारान्त पुं० वा स्त्री० शब्दोंके अन्तमें मन् बा वन् हो और उस मन् अथवा वन के पूर्व में कोई व्यञ्जन वर्ण मन् अथवा वनके मकार वा वकारसे संयुक्त हो ऐसे शब्दोंके रूप आत्मन् शब्दके समान होते हैं। स्वामिन पधिन ( पथ ) एक एक द्विर प्र० स्वामी स्वामिनी स्वामिनः प्र० पन्थानौ पन्थानः स० हे स्वामिन् स्वामिनौ स्वामिनः स० हे पन्थाः पन्थानी पन्थानः द्विः स्वामिनम स्वामिनौ स्वामिनः द्विः पन्थानम् पन्थानौ पथः जिन नकारान्त शब्दोंके अन्तमें इन् हो उनके रूप स्वामिन् शब्दके समान होते हैं। पथिन शब्द के रूपोंमें जो भेद होता है सो दिखा दिया । नपुंसकलिङ्ग जन्मन् नामन् द्विर नामनी, नामानि जन्मनी जन्मानि नानी सं नामानि जन्मनी जन्मानि नासन नानी जन्मन् द्विती० नाम नामानि द्विती. जन्म जन्मनी जन्मानि एक zি प्र० नाम नाम, नामनी, हे जन्म, सं० नामनी, नानी
ऋजुव्याकरणम् ॥
ए
ब
अहनी,
अहन (दिन )
ক্লি
महानि
अही
सं
अहः
अहनी,
अहानि
अही।
द्विती अहः
अहनी अहानि
नही
जिन नकारान्त नपुं० शब्दोंके अन्तमें अन् हो उनके रूप नामन्
शब्दके समान होते हैं।
अहन और जन्मन् शब्दोंके रूपोंमें जो भेद होता है उसको
दिखा दिया ॥
आत्मन् शब्द जिस प्रकारके नकारान्त पुं० शब्दोंका नायक है
जन्मन् शब्द उसी प्रकारके नकारान्त नपुं० शब्दोंका नायक है जिन
के अन्त में उक्तविध मन अथवा वन हो॥
नकारान्त नपुं० जिनके अन्तमें इन हो, यथा स्थायिन इत्यादि,
उनके सूप वारि शब्दके समान होते हैं। केवल सं० के ए० व० में
स्थायि वा हे स्थायिन इतना भेद होता है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ ४७ সন वर्तमान चुरादि गण उभयपदी रच ( रचना करनी) परस्नैः নবল ए हि एक प्र० रचयति रचयतः रथयन्ति रचयते रचयेते रचयन्ते मरचयसि चयसि रचयथः रचयथ म. रचयसे रचयेथे रचयश्वे उ. रचयामि रचयावः रचयामः उ. रचये रघयावहे रचयामहे प्राज्ञा प्र० रचयतु रचयताम् रथयन्तु प्र रचयताम् रघयेताम् रचयन्ताम् भर रचय रचयतम् रघयत प्ररथयस्व रघयाम् रचयध्वम् उरचयानि रचयाव रचयाम उ० रचयै रचयावहै रथयामहै विधि विधि प्र० रचयेत् रचयेताम् रचयेयुः प्र० रचयेत रचयेयाताम् रचयेरन् म. रचयः रचयेतम् रचयेत म. रचयेथाः रचयेयाथाम् रचयध्वम् उ रचयेयम् रचयेव रचयेम उ रथयेय रचयेवहि रचयेमहि अनद्यतनभूत अन्नद्यतनभूत ग्र अरचयत् अरचयताम् अरचयन् प्र० अरचयत अरचयेताम् अरचयन्त म. अरचयः अरचयतम् अरचयत म० अरचयथाः अरचयेथा अरचयध्वम् उ० अरचयम् अरचयाव अरघयाम उ० अरचये अरचयावहि अरचयामहि उभयपदी लल् (लाड़ करना) तिज (तीदण करना) परस्मै० सामने परस्मै० मात्मने प्र० ए० वत लालयति लालयते प्र० ए० वत तेजयति तेजयते
४८
ऋजुव्याकरणम्
परस्मै
मात्मने
নঃ স্বলন
प्र०ए० प्राज्ञा लालयतु लालयताम् । प्र०एनाज्ञा तेजयतु तेजयताम्
प्रए विधि लालयेत् लालयेत
प्रएविधि तेजयेत् तेजयेत
प्र०ए०अन भूतअलालयअलालयत प्र०एअनभूतमतेजयत् अतेजयत
यों रचयति और रचयते इत्यादिके समान रूप ले जानो।
वीज ( पङ्खा झालना ) के वीजयति और वीजयते इ० ।
चुर ( चोरी करनी) के चारयति और चोरयते इ० ।
पूज ( पूजा
करनी ) के पूजयति और पूजयते इ० । वज् ( वर्जना ) के वर्जयति
और वर्जयते इ.। स्पृह (चाहना) के स्पृहयति और स्पृहयते.
इ० । व (आड़ करनी ) के वारयति और वारयते इ० क्रम से रूप
ले जाओ।
परस्मै ज्ञा ( जतलाना ) के ज्ञापयति इ० रूप ले जानो।
वाक्यरचना
संज्ञा शब्द
नकारान्त
पुं० महिमन् मूर्धन् (शिर वा मस्तक ) इ० । स्त्री० सीमन् इ०
राजन् के समान ॥
पुं० अश्मन् ( पत्थर ) अध्वन् ( मार्ग ) इ० आत्मन् के समान ॥
नपुं० धामन् ( घर वा तेज ) इ० नामन्के समान ॥
ऋजुव्याकरणम्
४९
नपुं० शर्मन ( सुख) (न), वर्मन् (कबच) (आ) कर्मन्,
वर्मन् (बाट), पर्वन (पीर वा पौर्णमासी तिथि अथवा त्योहार),
धर्मन् (चाम वा ढाल) इ. जन्मन् के समान ॥
धातु
उभयः अर्च (पूजा करनी), अर्ज (उपार्जन करना) इ० ।
परस्मै० कथ् (कहना), गण (गिनना) भक्ष (खाना), लक्ष (लखना),
दण्ड् (दण्ड देना) इ० । आत्मने० अर्थ (मांगना), तर्ज (डांटना),
भर्क्स (धिकारना), वञ्च (ठगना ) इ० रच के समान
परस्मैः
तड़ (ताड़ना करना) इ. ललके समान॥
परस्मैः पीइ (पीड़ा देनी) इ. वीजके समान॥
तुल (तौलना) इ० चुरके समान ॥
परस्मैः चूर्ण (चूर्ण करना) इ. पूजके समान॥
इति चुरादि गणके धातु
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मणो राजान- धन कमानो और खायो ।
मर्थयते ॥
कवि ग्रन्थ रचता है।
(अ) ब्राह्मणों के नाम का भी वाचक पु. है।
(आ) क्षत्रियोके नाम का भी वाचक पु० है ।।
ऋजुव्याकरणम् ॥
संस्कृत
हिन्दी
राजा चौरं भर्त्सयते दण्डयति च। लड़के फलोंको गिनते और
शठः साधुमसाधुश्च वञ्चयते ॥
खाते हैं।
मातरो लालयचिशून् ॥
उसने पत्थर फेंका और कुत्ते को
भोः शिष्य तत्त्व चिन्तय। सच्च- मारा।
रितं (२५) घर ॥
राजागरणयज्जनान् ।
द्विजा न भक्षयेल्लशुनम् ॥
त्रयोदश पाठ
संज्ञा
स्त्री० अप (पानी) शब्दके रूप केवल बहुवचन में होते हैं ।
प्र०व० आपः । सं० ब० हे प्रायः। द्विती० ब० अपः ।
।
(सं.) (२५) त वा द के अनन्तर च, छ वा श, इनसेंसे कोई
हो तो छ, ज वा झ, इनमेंसे कोई हो तो ज, ट वा ठ इनमेंसे कोई
हो तो ट, और ड वा ढ, इनमें से कोई हो तो ड, और ल हो तो
(नित्य ) ल, उस त वा द के स्थान में आदेश होता है। यथा सत् +
चरितम् = सच्चरितम् । अगणयत् + जनान् =अगणयज्जनान् । भक्षयेत् +
लशुनम् = भक्षयेलशुनम् इत्यादि।
व्याकरणम्॥ १६ सर्वनाम शब्द या याः द्विती० यम् द्वितो याम् या: ४ ये यद् ( जो) पुं० स्त्री ए० ए. यो ये यान् नपु० द्वि यत् यानि द्विती यत् यानि क्रिया स्वादिगण उभयः व ( वरण करना) परस्मैः मात्मने वर्तमान द्वि० ए० द्विः प्र० बणोति वृणुतः वृण्वन्ति प्र० वृणते वरवाते म. वृणोषि(२६) वृणुथः वृणुथ म० वृणुषे वरवाथे वृणुध्वे उ० वणोमि (वृणुवः वृणुमः वृणुवहे (वणुमहे उ० वृण्वे वृरावः वणवहे वृण्महे स०) ( २६ ) म वा पा को छोड़ के शेष स्वर, कवर्ग अथवा रेफ इनमेंसे किसी अतरसे परे प्रत्ययके दन्त्य सकारके स्थानमें मूर्धन्य षकार आदेश हाता है । यथा कृणो+सि= कृणोषि इ० ॥ वर्तमान वृण्वते ऋजुव्याकरणम् ॥ म० वर्ष A आज्ञा द्विर द्वि० प्र० वृणोतु वृणुताम् वृण्वन्तु प्र० वृणुताम् वृण्वाताम् वरावताम् . वणतम् वृणुत म. वणव वरवाथाम् वणुध्वम् उ० वणवानि वृणवाव वणवाम उ. वणवै वणवावहै वणवामहै विधि विधि प्र० वणुयान् वृणुयाताम् वृणुयुः प्र०ववीत वृण्वीयाताम् वृण्वीरन म० कृणुयाः वृणुयातम् कृणुयात मावण्वीथाःवरवीयाथामवण्वीयम् उ० वृणुयाम् वणुयाव वृणुयाम उ० वरवीय वरवीवहि वरवीमहि अनद्यतनभूत अनद्यतनभूत प्र० अवणोत् प्रवृणुताम् अवरवन् प्र० अवणात अवरवाताम् अवृण्वत म० अवणोः अवणुतम् अवणुत मश्रवणुथाः अवरवाथाम् अवृणुध्वम् । प्रवृणुव । अणुम उः अववि अणुवहिप्रवणुमहि उ०प्रवृणावमा अवण्व : अण्म अवण्यहि अवरामहि वर्तमान प्राज्ञा विधि अन भूत परस्मै० प्र० ए० श्रु ( मुनना ) शणोति शृणोतु शृणुयात् अशृणोत् इत्यादि परस्मै वृणोति इ. के समान रूप होते हैं। परस्मैक आप (पाना ) वर्तमान द्वि० एक द्वि० प्र० श्राप्नोति आप्नुतः आप्नुवन्ति । प्र० आप्नोतु आप्नुताम् प्राप्नुवन्तु म० प्राप्नोषि प्राप्नुथः प्राप्नुथ म. भाप्नुहि आप्नुतम् आप्नुत उ. नाप्नोमि आनुवः आप्नुमः उ. मानबानि मानवाव आमवाम । साज्ञा
ममुख्याकरणम् ।।
ब०
विधि
अनद्यतनभूत
एक द्विर
प्रमाप्नुयात्माप्नुयाताम्माप्नुयुः
प्र. प्राप्नोत् आप्नुताम् आप्नुवन्
माप्नुयाःआप्नुयातम्झाप्नुयात मः प्राप्नो भानुतम् प्राप्नुत
उन्माप्नुयाम्ाप्नुयाव प्राप्नुयाम उ० भामवम् भाप्नुव आप्नुम
वाक्यरचना
धातु
परस्मैक
चि (वटोरना) व के समान ॥ शक (सकना) आप के समान ॥
इति स्वादि गण के धातु
उभया
शनैः ( धीरे २), इव ( नाई ), ह्यः ( कल का दिन जो बीत
गया ), अद्य ( आज ), सम्प्रति ( इस समय), यदा ( जब ), कदा-
( कब ), तदा ( तब ), सदा, सर्वदा ॥
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
धर्म शने (२७) श्चिनुयाद्वल्मीक- यहां पानी है। क्या तुम उसे
मिव पुत्तिकाः (अ)
नहीं पाते हो।
(सं०) (२७) विसर्ग के अनन्तर च वा छ हो तो विसर्गके स्थानमे
तालव्य श, ट वा ठ हो तो मूर्धन्य ष, त वा हो तो दन्त्यस;
श्रादेश होता है यथा-शनैः + चिनुयात् = शनैश्चिनुयात् इ० ॥
(अ) पुत्तिका-कीटविशेष । वल्मीक-बमोठा।
का मुव्याकरणम् ॥ मंस्कृत हिन्दी मदा धर्ममेव शृणुयात् । जिन फूलोंको कल हमने बटोरा कदाप्यधर्म न चरेत् ॥ था वे कहां हैं। हयो यानि फलानि (अ) अधिनवं स्वयंवरा कन्याने वर को वरण तान्यद्य भक्षयामि॥ यो विद्यां शिक्षते स ज्ञानं कल मैंने यह पोथी पाई॥ सुखञ्चाप्नोति॥ मुनिः कथयति राजन् वरं किया है। वृणुष्व ॥ चतुर्दश पाठ संज्ञा रेफान्त शब्द से हे पू: स्त्री० गिर् ( वाणी) स्त्री० पुर् ( नगर) द्वि द्विा गी: गिरी: गिरः प्र० पूः पुरी सं० हे गीः गिरौः गिरः पुरी पुरः द्विती० गिरम् गिरीः गिरः द्विती० पुरम् पुरी पुरः (अ) वाक्यमे चाहे सन्धि न भी करे तो गेष नहीं है। यथा-फलानि अचि- नव इस वाक्यमें इके स्थान मे य आदेश नही करे तो भी अशुद्ध नहीं है। इसी प्रकार- से अन्यत्र भी वाक्यामें सन्धिका करना वा न करना बक्ताकी इच्छा के अधीन है ।
ऋजुव्याकरणम् ॥ स्त्रीद्वार wahg एक द्वाः हे द्वाः द्वारौ द्वारी द्वारी द्विती० द्वारम् सर्वनाम इदम् ( यह ) स्त्री पुं० द्वि० द्वि० इमे इमाः इमान् इमाः इमाम अयम इमौ द्विती 'इमम् इमौ (एनम् एनौ इमे एने द्विती० एनान एनाम एनाः नपुं० ए. द्वि० इमे इमे इमानि इमानि एनानि द्विती एनत् एने 5 व्याकरणम् ॥ आत्मने জিয়া तनादि उभयः तन (तानना) परस्मैः वर्तमान द्विर ए तनोति तनुतः तन्वन्ति प्र० तनुते तनाषि तनुथ. तनुथ मा तनुपे तनामि तनुवः तनुमः ३. तन्वे वर्तमान द्विर तन्वाते तन्वते तन्वाथे तनुध्वे तनुवहे तनुमहे तन्वहे तन्महे तनोतु तनुतान तन्वन्तु प्र० तनुताम् तन्वाताम् तन्वताम् तनु तनुतम् तनुत म. तनुप्व तन्वाथाम् तनुध्वम् तनवानि तनवाव तनवाम उ. तनवै तनवावहै तनवामहै विधि विधि तनुयात् तनुयाताम् तनुयुः म तन्वीत तन्वीयाताम् तन्वीरन तनुयाः तनुयातम् तनुयात मा तन्वीथाःतन्वीयाथाम् तन्वीध्वं तनुयाम् तनुयाव तनुयाम उ तन्वीय दन्दीबहि तन्वीमहि अन्नद्यतनभूत सनद्यतनभूत अतनात् अतनुताम् अतन्वन् प्र अतनुत अतन्वाताम् अतन्वत अतनेाः अतनुतम् अतनुत म० अतनुथाः दन्वाथाम्जतनुध्वं अतनुव अतनुम अतनवम् अतन्व अतन्म अतन्वहि तन्महि ३० अतन्धि अतनुवहि अतनुमहि ऋजुव्याकरणम् ॥ ५७ ए० कुरुष्वे आज्ञा म. कुरु उभयः कृ (करना) परस्मै आत्मने वर्तमान वर्तमान द्विर द्वि प्रः करोति कुरुतः कुर्वन्ति प्र० कुरुते कुर्वाते कुर्वते मः करोषि कुरुथः कुरुथ म. कुरुषे कुर्वाथे ऊ करोमि कुर्वः कुर्मः उ. कुर्वे कुर्वहे कुर्महे आशा प्र० करोतु कुरुताम् कुर्वन्तु प्र० कुरुताम् कुर्वाताम् कुर्वताम् कुरुतम् कुरुत म. कुरुष्व कुर्वाथाम् कुरुध्वम् उ. करवाणि करवाव करवाम उ. करवै करवावहै करवामहै विधि विधि प्र० कुर्यात् कुर्याताम् कुर्युः प्र० कुर्वोत कुर्वीयाताम् कुर्वीरन म. कुर्याः कुर्यातम् कुयात म० कुर्वोथाः कुर्वोयाथाम् कुर्वीध्वम् उ० कुर्याम् कुर्याव कुर्यामउ कुर्वीय कुविहि कुर्वीमहि अनद्यतनभूत अनद्यतनम्त प्र. अकरोत् अकुत्ताम् अकुर्वन् प्र० अकुरुत दुर्वाताम् अकुर्वत म अकरोः अकुरुतम् अकुरुत मसकुरुथाः अकुर्वाथाम् अकुरुध्वम् उ० अकरवम् अकुर्व अकुर्म उ. अकुर्षि अकुर्वहि अकुर्महि इति तनादि गण के धातु वाक्यरचना संज्ञा स्त्री० धुर (बोझा), पुर् शब्द के समान
ऋजुव्याकरणम्॥
अव्यय शब्द
ननु (प्रश्नवाचक ), नूनम् . (निश्चयवाचक), आशु (शीघ्र )
प्रम्, उच्चैः (ऊंचा), नीचैः (नीचा), उपरि (ऊपर), छ (कहां), अधः
नीचे ), पुरा ( पूर्वकालमें ), अधुना ( अब )।
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
हिमिमां काशी नाम पुरं लड़को इस कामको शीघ्र करो।
श्यामि
अच्छा, अभी करते हैं।
वमपि पश्थैनाम् (२८) (अ) ॥ बताओ कल तुमने क्या किया ।
(मं.) (२८) अ के परे ए वा ऐ हो तो दोनो मिल के एक ऐ
हो जाता है। यथा पश्य + एनाम् = पश्यनाम् । आ के परे ए वा ऐ
हो तो दोनो मिल के एक ऐ हो जाता है। यथा राजा + ऐच्छत् =
राजैच्छत् ॥ अ के परे ओ वा औ हो तो दोनो मिल के एक औ हो
जाता है । यथा पच + मोदनम् = पचौदनम् । आके परे भो वा औ हो
तो दोनेा मिल के एक शो हो जाता है। यथा सेवस्व + औषधानि =
सेवस्वौषधानि ॥
(अ) जव वाक्यमें इदम् शब्दका एक वार कथन हो गया हो और फिर भी उतीका
प्रयोग करना हो तो उस ( इदम शब्द ) के दूसरे रूपका प्रयोग करना चाहिये ।
यथा इमा पुर पश्यामि, त्वमपि पश्य गनां, इत्यादि ।।
है
।
ऋजुव्याकरणम् ॥
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
त उपरि ( २९) तिष्ठन्ति । क्या अयोध्या नाम नगरी को
अहमस्तिष्ठामि ॥
देखा॥
सोऽहं कदिलप्टीका तनामि॥ व्याधने जालको फैलाया ॥
पञ्चदश पाठ
वकारान्त शब्द
स्त्री दिव (स्वर्ग)
एक
द्वि०
द्यौः
दिवौ दिवः
हे द्यौः दिवौ दिवः
द्विती० दिवम् दिवौ दिवः
( सं०) ( २९) ए वा ओ के परे काई स्वर हो तो उस ए वा
ओ के स्थानमें क्रमसे नय वा अव आदेश होता है। परन्तु पदान्तमें
स्थित ए वा ओ के स्थान में न आदेश भी हो सकता है और फिर
संधि नही होती है। यथा ते + उपरि तयुपरि अथवा त उपरि
इत्यादि ॥
और पदान्तमें स्थित ए वा ओ के उत्तर यदि हस्व प्रकार हो
तो उस (ह्रस्व अकार) का लोप हो जाता है और उस लोप का सूचक
ऐसा चिह्न लिख दिया जाता है। तथा ते+अपि तेऽपि इ०॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ ब वर्तमान शकारान्त शदद स्त्री. तादृश (वैसा वा वैसी) नपुं० तादूग ( देसा) ति तादृक् तादृशौ तादृशः प्रतादृक् तादृशी तादशि हे तादृक् तादृशौ तादृशः । सं हे तादृक् तादृशी तादूशि तादृशम् तादृशौ तादृशः द्विती० तादृक् तादृशी ताशि क्रिया क्यादि गण उभयपदी को ( मोल लेना) परस्मै प्रात्मने वर्तमान ए० द्वि० प्र. क्रोणाति क्रीणीतः कोणन्ति प्र० क्रीणीते क्रीणाते क्रीणते म. क्रीणासि कोणीथः कोणीध म. क्रीणीषे क्रीणाथे कोणीध्वे उक्रीणामि क्रीणीवः क्रीणीमः उ. क्रीणे क्रीणीवहे क्रीणीमहे आज्ञा শান্না प्र. क्रोणातु क्रीणीताम् क्रोणन्तु प्र० कोणीताम् क्रीणाताम् क्रीणताम् म. क्रीणीहि क्रीणीतम् क्रीणोत म० क्रीणीष्व क्रीणाथाम् क्रीणीध्वम् उ० क्रीणानि क्रीणाव क्रीणाम उ० क्रीणै क्रीणावहै क्रीणामहै विधि विधि प्र. क्रोणीयात् क्रीणीयाताम् क्रीणीयुः प्र० क्रीणीत क्रीणीयातास् क्रीणीरन् म० कोणीयाः क्रोणीयातस् क्रीणीयात म० क्रोणीयाः क्रीणीयाथास् क्रीणीध्वम् उ० क्रीणीयास् क्रोणीयाव क्रीणीयाम उ० क्रोपीय क्रीशीवहि क्रीणीमहि ऋजुव्याकरणम् ॥ परस्मै० प्र० एक अनद्यतनभूत अनद्यतनभूत एक ए० द्वि प्र० अक्रोणात प्रक्रीसीताम् সুঙ্গী । प्र० प्रक्रीणीत अक्रीणातास् अक्रीणत म० प्रकोणाः अक्रीणीतम् अक्रोणीत म० अक्रीसीथाः अक्रोणाथाम् अकोणीध्व उ० प्रक्रीणाम् अक्रीणीव अक्रोणीम उ० अकीणि अकोणीवहि अकाणीमहि उभयपदी ज्ञा ( जानना वत आज्ञा विधि अनभूत जानाति जानातु जानीयात् अजानात् आत्मने। प्र० ए. जानीते जानीताम् जानीत अजानीत इत्यादि क्रीधातुके उभयपदके समान रूप ले जानो। रप्रस्मैपदीबन्धु । ( बांधना ) वर्तमान माज्ञा ए. ए. प्र. बध्नाति बनीतः बध्नन्ति प्र० बनातु बनीताम् बघ्नन्तु प्र. बध्नासि बनीथः बनीथ मा बधान बनीतम् वनीत उ० बध्नामि बनीवः बनीमः 30 बध्नानि बध्नाव बध्नाम अनद्यतनभूत प्र० बनीयात् बनीयाताम् बधीयुः प्र० अबध्नात् अवनीताम् अबध्नन म. बन्नीयाः बनीयातम् बनीयात म० अबधाः अवनीतम् अबनीत उ० बघ्नीयाम् बन्नीयाव बनीयाम उ० अबध्नाम् अबध्नीव अबध्नीम उभयपदी ग्रह ( ग्रहण करना) प्राज्ञा विधि अन०भूत परस्मै० प्र० ए० ग्रहाति गृहातु गृड्डीयात् अगृहात् आत्मने प्र० ए० गृहीते गृहीताम् गृहीत अगृहीत अनेतनभूत विधि वर्तः
२
ऋजुव्याकरणम् ॥
इत्यादि परस्मैपदमें बन्धु धातु के परस्मैपदके रूपोंके समान
और आत्मनेपदमें की धातुके आत्मनेपदके रूपोंके समान ले जाओ।
परस्मैः अश (खाना)
वत
विधि
अनभूत
प्र० एक प्रश्नाति
प्रश्नातु
अश्नीयात् आश्नात्
बध्नाति इत्यादिके समान रूप ले जाओ।
आज्ञा
वाक्यरचना
বঁধু
सदृश, ईदृश् (ऐसा वा ऐसी ), यादृश् ( जैसा वा जैसी,)
मादृश् ( मुझसा वा मुझसी ), स्वादृश ( तुझसा वा तुझसी ), भवा-
दृश् ( आपसा वा आपसी ), इत्यादि ऐसे शब्द जिनके अन्तमें दृश्
पाया जावे तीनों लिङ्गोंमें । और स्त्री० में दूश (ख), दिश् (दिशा),
इ० तादृश्के समान ॥
धातु
उभयः ग्री (प्रसन्न होना वा करना) इ. क्रीके समान ॥
परस्मै० पुष ( पोषण करना ) मुष (चोरी करनी), इ० अशके समान ।
परस्मै० ग्रन्थ (गूंथना), मन्थ ( मंथना ) ३० बन्धके समान ॥
इति क्यादिगणके धातु ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ ६३ अव्यय वरम् ( अच्छा वा कुछ अच्छा), वाढम् ( हां, अच्छा ), नाम् ( हां), यथा ( जैसा), तथा ( वैसा ), इत्थम् ( ऐसा), हन्त ( हर्ष वा शोकबोधक ), इति (समाप्ति, हेतु मादि भोंका बोधक), अरे, अहो, आश्चर्य श्रादि बोधक )॥ वाक्य संस्कृत शुको यादृशं गिरं शृणोति तादृशं वदति ॥ वत्स जानासि गणितम् । श्राम् जानामि गुरो॥ अद्याहं (३०) क्रीणामि हिन्दी गाय बाधा और दधि मंथो॥ इस पेड़को काटो फूलोंको चुनो। लड़का जैसा सुने वैसा बोले। क्या नहीं जानते है। कल मैंने कपड़े मोल लिये॥ - ( सं2 ) (३०) के परे भ वा झा, अथवा आ के परे अवा आ हो तो दोनो मिल के एक प्रा हो जाता है। यथा अद्य - अहम् = अद्याहम् ॥ इ के परे इ वा ई, अथवा ई के परे इ वा ई हो, तो दोनों मिलके एक ई हो जाता है। यथा मुष्णाति + इति=मुष्णातीति॥ उ के परे उ वा ज, अथवा ऊ के परे उ वा ऊ हो, तो दोनों मिल के एक ज हो जाता है। यथा कुरु + उन्नतिम् = कुरून्नतिम् ॥ ऋ के परे ऋ वा ऋ, अथवा ऋ के परे ऋ वा ऋ हो, तो दोनों मिलके एक हो जाता है। ।
ऋजुव्याकरणम् ॥
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
(अ) पत्रं लेखनी मबीञ्च ॥ मुझसा मनुष्य आपसे मनुष्योंकी
मुष्णातीति मूषकः । चोरयतीति सेवा करे।
चोरः॥
यः पितरम्प्रीणाति स प्रियः पुत्रः ॥
यथा ते कुर्वन्ति तथा कुरुन्नतिम्॥
पोड़श पाठ
संज्ञा
षकारान्त शब्द
ए०
विट
सं० हे द्विट्
द्विर द्विषम्
पु० द्विष ( शत्रु)
द्वि०
द्विषो
द्विषो
द्विषौ
द्विषः
द्विषः
द्विषः
(अ) निकटके भूत व भविष्यके बोध करानेके लिये वर्तमानकालकी क्रियाका
भी प्रयोग किया जा सकता है। यथा “ अद्य क्रीणामि " इसका तात्पर्य है कि आज
शीघ्र मोल लेगा।
ऋजुव्याकरणम् ॥ सकारान्त शब्द प्र० प्र० पुं० चन्द्रमस ( चन्द्र) पुंजटायुस ए द्वि द्वि० चन्द्रमाः चन्द्रमसौ चन्द्रमसः प्र. जटायुः जटायुपी जटायुषः सं० हे चन्द्रमाः चन्द्रमसौ चन्द्रमसः सं हे जटायुः जटायुपी जटायुषः दिः चन्द्रमसम् चन्द्रमसौ चन्द्रमसः द्विः जटायुषम् जटायुधौ जटायुषः पुं० विद्वस ( विद्वान ) पुं० पुम्स ( पुरुष ) द्वि० विद्वान् विद्वांसौ विद्वांसः प्रक पुमान् पुमांसौ पुमांसः सं० हे विद्वन् विद्वांसौ विद्वांसः सं० हे पुमन् पुमांसौ पुमांसः द्विती० विद्वांसम् विद्वांसौ विदुषः द्वितो. पुमांसम् पुमांसौ पुसः प्रायः पुंलिङ्ग सकारान्त शब्दोंके रूप चन्द्र मम श्ब्दके समान होते हैं। विद्वस इत्यादि शब्दोंमें जो भेद होता है सो दिखा दिया । स्त्री० आशिस ( आशीर्वाद ) द्विर आशीः शाशिवा आशिषः सं० हे प्राशीः भाशिषा माशिषः द्विती आशिषम् भाशिषा সায়িম:
ऋजुव्याकरणम् ॥ प्र० धनुः चतूषि . नपु मनस ( मन) नपु चतुम् ( प्रांख ) ए द्विर द्वि० सनसी मनांसि प्र० चक्षुषी चतूंषि सं हे मनः सनसी मनासि से हे चक्षुः चक्षुषी द्विती०मनः मनसी मनांसि द्विती० चतुः चक्षुषी चहूषि प्रायः नपुंसकलिङ्ग सकारान्त शब्दोके रूप ननस् शब्दके समान होते हैं। जहां पूर्व स्थित इकारादि स्वर वर्णके कारणसे स को मूर्धन्य होना सम्भव है वहां चतुमके समान रूप होते हैं। यथा ज्योतिम शब्दके ज्योतिः, ज्योतिषी, ज्योतीषि इत्यादि ॥ क्रिया रुधादि गण उभयपदी धातु भुज (पालन वा भोजन करना)॥ पालन अर्थमें परस्मैः भाजन अर्थमें आत्मने वर्तमान द्विर ए० द्विर प्र० भुनक्ति भुक्तः भुञ्जन्ति प्र० भुङक्त भुजाते भुञ्जते म. भुनक्षि भुङ्क्थः शुक्थ म० मुझे भुञ्जाथे भुवे उ० भुनज्मि भुज्वः सुनमः उ० भुञ्ज भुज ज्वहे भुज महे মামা प्र० भुनक्त भुताम् भुञ्जन्तु प्र० भूक्ताम् भुजाताम् भुजताम् म० भुग्धि भुक्तम् भुङ्क्त म० भुभव भुञ्जाथाम् भुङ्गाध्वम् उ० भुनजानि भुनजाव भुनजाम उ० भुनजै भुनजावहै अनजामहै वर्तमान ब SITET ऋजुव्याकरणम् ॥ अनः पूत विधि নিখি प्र० सुज्यात भुज्याताम् भुज्युः प्रभुञ्जीत अजीयाताम् भुञ्जीरन् म० भुज्याः भुज्यातम् भुञ्यात मै भुञ्जीथाःशुञ्जीयाथाम् भुञ्जीध्वम् उ. भुज्याम् भुजयाव भुज्यान उ भुञ्जीय शुञ्जीवहि भुजीमहि अनः मृत प्र० अभुनक्मभुक्ताम् अभुज्जन् प्र० अभुड क्त अभुजाताम्मभुञ्जत म० अ नक् अभुक्तम् अभुड्ल माअाइमाःअभुञ्जाथाम्प्रभुत्वं ० अभुनजम् अभुजव अभुजम उअजि अक्षुञ्ज्वहि अभुङ्ग्महि भिद् ( भिन्न करना) लगा परस्मै मात्मने वर्तमान ए० द्वि० द्वि प्र० भिनत्ति भिन्तः भिन्दन्ति प्र० भिन्ते भिन्दा भिन्दते मा भिनत्सि लिन्थः भिन्थ म भिन्त्से भिन्दाथे भिन्भ्वे उ० भिननि भिन्द्वः भिन्टनः उ भिन्दे भिन्द्वहे भिन्महे वर्तमान वन आज्ञा प्र० मिनत्तु भिन्ताम् भिन्दन्तु | प्र० मिन्ताम् भिन्दाताम् भिन्दताम् म० भिन्धि भिन्तम् भिन्त म० भिन्तस्व भिन्दाथाम् भिन्ध्वम् उ० मिनदानि भिनदाव भिन्दाम उ० भिनदै मिनदावहै भिनदामहै विधि विधि प्र० भिन्द्यात् भिन्द्याताम् भिन्यु : प्र० भिन्दीत भिन्दीयाताम् मिन्दीरन् म० भिन्द्याः भिन्द्यातम् भिन्द्यात माभिन्दीथा:मिन्दीयाथाम् भिन्दीध्वं उ० भिन्द्याम् भिन्द्याव भिन्द्यान उ भिन्दीय भिन्दीवहि भिन्दीमहि ऋजुव्याकरणम् ॥ अनद्यतनभूत अनद्यतन भूत प्र० अभिनत् अभिन्ताम् अभिन्दन म अभिन्त अभिन्दाताम् अभिन्दत न अभिन्या अभिन्दाथाम् अभिन्ध्वं अभिनः ० अभिनदम् अभिन्न अभिन्न उ अभिन्दि अभिन्द्वहि अभिन्नहि अभिनत् अभिन्तम् अभिन्त रुध ( रोकना) যুদে প্লালন वत्तमान द्वि० 6 द्वि० ब० etung- प्र० रुणझु सन्याम् न्वन्तु म सन्धि प्र. सणद्वि रुन्धः रुन्धन्ति प्रसन्चे रुन्धाते सन्धते मर गतिम म. रुन्टले सन्धाथे सन्ध्व उ. राधिम उन्धे रुन्ध्वहे सन्ध्महे प्राज्ञा SIST प्र० रुन्धाम् रुन्धाताम् रुन्धताम् रुन्धम् रुन्धाथाम् हन्ध्वम् उरुगधानि रुराधाव रुण्याम তও দুধ ঘন্যই विधि विधि ग्र० सन्ध्यात् सन्ध्याताम् रुन्ध्युः ६० रुन्धीत सन्धीयाताम् रुन्धीरन् म० रुन्ध्याः सन्ध्यातम् रुन्ध्यात म० सन्धीथाः सन्धीयाथाम्न्धीध्वम् उ० रुन्ध्याम् रुन्च्याव तन्ध्याम उ० रुन्धीय सन्धीवहि सन्धीमहि अनद्यतनभूत अनद्यतनभूत प्र अरुणत् अरुन्धाम् अरुन्धन् प्र० अरुन्ध अरुन्धाताम् अरुन्धत अरुणत् अरुन्धम् म. अरुन्धाःअरुन्धाथाम् अरुन्ध्वम् अरुणः उ. अरुणधम् अरुन्ध्व उ० अरुन्धि अरुन्ध्वहि अरुन्धमहि अरुन्ध
जुम्याए ।
वाक्यरचना
संज्ञाशब्द
स्त्री विष ( दीप्ति ), प्रावृष (वर्षा ऋतु) इ. द्विष्के समान ॥
पु वेधम् ( ब्रह्मा), स्त्री अस्सरस ( अप्सरा) इ. चन्द्रमस के
समान ॥
नपुं० यशसु, तमम्, पयम ( दूध वा पानी ) इ. मनस के
समान ॥
नपुं० आयुस्, धनुस्, वपुम् ( शरीर ) इ० चक्षुमके समान ॥
धातु
उभय युज ( योग करना ) इ. भुजके समान ॥
परस्मैः भज (तोड़ना) के भनक्ति भइतः इत्यादि रूप होते हैं ।
उभय छिद् (छिन्न करना) भिक्के समान ॥
वृथा, हा (शोकवधिक), इदानीम् (इस समय), तदानीम्
उस समय)॥
इति रुधादि गणके धातु
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
द्विषो जय । यशो लभस्य ।। राजा राज्यको पालन करता
यः पुमान् न विद्वान् न च
और सुख शेगता है।
धार्मिकः स वृथा जीवति ।। हे विद्वान समयको काट ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
द्विषो व्यहमभिन्दन् । पुरञ्चारु-
हाय शत्रु राज्य भोग रहे हैं ।
न्धन् ।
इस दण्डे को लो और तोडे।
चन्द्रमात भिनत्ति ॥
वृथा अच्छिनः (३१) शाखाम् ॥
सप्तदश पाठ
संज्ञा
हकारान्त शब्द
पुं० मधुलिह ( भ्रनर) स्त्री० उपानह ( जूता)
द्विर
द्विर
प्र० मथुलिट् मधुलिहो मधुलिहः ० उपानत् उपानही उपानहः
सं० हे मधुलिट् मधुलिहौ मधुलिहः सं० हे उपान्त् उपानहै। उपानहः
द्वि० मधुलिहम् मधुलि है। मधुलिः उपानहम् उपानहै। उपानहः
(सं.) (३१) स्वरके अनन्तर छकार हो तो छकारके स्थान में
च्छ हो जाता है। यथा अ+गिनः= अच्छिनः इ० ॥
पदान्तमें स्थित दीर्घ स्वरके अनन्तर छकार हो तो उसके स्थान
में च्छ नहीं भी होता है। यथा वृथा+दिनसि= वृथाच्छिनसि वा
वृथा छिनत्सि इत्यादि।
ऋजुव्याकरणम् ॥ सर्वनाम शब्द पुर 1515 किम् (कान) स्त्री के का का. द्विती० कम् को कान् द्विती काम् काः नपुं० प्र० किं कानि द्विती कि के कानि জিব্রা हादि गणके उभयपदी धातु दा ( देना) परस्मै आत्मने वतमान वर्तमान द्वि० प्र० ददाति दत्तः ददति प्र० दत्त ददाते ददते म० ददासि दत्थः दत्थ म० दत्से ददाथे दवे उ० ददामि द्मः उ० ददे दवहे दद्महे সন্নিা आज्ञा दत्ताम् प्र० दत्ताम् ददाताम् ददताम् म० देहि दत्तम् दत्त ददाथाम् दध्वम् उ० ददानि ददाव ददावहै ददामहै प्र० ददातु म० दत्स्व ददाम उ० दद 6 ७२ ऋजुव्याकरणम् ॥ म० दद्याः प्र० अददात म. अददाः विधि विधि प्र० दद्यात् दद्याताम् दद्य: प्र० ददीत ददीयाताम् ददीरन् दद्यातम् दद्यात म० ददीथाः ददीयाथाम् ददीद्ध्वम् उदयाम् दद्याव दद्याम | उ० ददीय ददीवहि दहीमहि अनद्यतनभूत अनद्यतनभूत अदत्ताम् अददुः प्र० अदत्त अददाताम् अददत अदत्तम्. अदत्त म अदत्थाः श्रददाथाम् अश्वम् उ. अददाम् अदद अदम उ० अददि अदद्वहि अदद्महि' धा (धारण वा पोषण करना) परस्मैः आत्मने वर्तमान वर्तमान द्वित द्वि० प्र० दधाति दधति प्र० धत्तं दधाते दधते म० दधासि घत्थः म० धत्से दधाथे दश्वे उ० दधामि ध्वः दध्मः उ० दधे दध्वहे दध्महे প্লামা आज्ञा प्र० धत्ताम् दधाताम् दधताम् म. देहि धत्तम् धत्त मा धत्व दाथाम् दद्ध्वम् उ० दधानि दधाव दवावहै दधामहै विधि विधि प्र० दध्यात् ध्याताम् दध्युः प्र० दधीत दधीयाताम् दधीरन् दध्यातम् दध्यात म दधीथाः दधीयाथाम् दधीद्ध्वम् ० दध्या दृध्याव दध्याम उ० दधीय दधीवहि दधीमहि प्रदधातु दधाम उदधै मा ध्याः
ऋजुव्याकरणम् ॥
કરે
अनद्यतनभूत
अनद्यतनभूत
द्वि०
प्र अधात् अधत्ताम् अदधुः
। प्रधत्त प्रदाताम् अद्धत
म अधाः अधत्तम् अधत्त म. अधत्थाः अदधायाम् अदध्वम्
उ अदधाम् अध्व अधम उ अदधि अध्वहि अदध्महि
इति हादि गणके धातु ॥
वाक्यरचना
अव्यय
चित् वा धन ( ये अव्यय, प्रश्नवाचक शब्दोंके सिद्ध रूपोंके
अनन्तर लगके उनके प्रयोगोंको अनिश्चयवाचक बना देते हैं), चेत्-
( यदि ), नो ( नहीं)॥
वाक्य
संस्कृत
विद्या ददाति विनयं ॥
कानि कानि दुःखानि नाददा-
हिन्दी
कौन २ फल तुमने कल खाये ॥
मा आशीष दे मैं विद्या और
धन पाऊं ॥
च्छत्रुः॥
।
उपानहं धारय । नो चेत्
कण्टकानि पादौ विध्येयुः ॥
७४ ऋजुव्याकरणम् ॥ वाक्य संस्कृत हिन्दी कः कोऽत्र भोः अत्रेद (३२) भगवान् विश्वको पोषण करते हैं। पुस्तकं देहि ॥ यहां वह कौन पेड़ है जिसमें मधुलिण माद्यति (अ)॥ फूल नही लगे हैं। अष्टादश पाठ प्र० द्विती० अमूम् सर्वनाम शब्द सकारान्त अदस ( वह) स्त्री० द्वि० एक द्वि० प्रसौ अमू अमी असौ द्वितीअम्म् असू अमू अमू: ( स०) (३२) के परे इ वा ई हो तो दानो मिल के एक ए हो जाता है। यथा अत्र+इदम् = अत्रेदम् इ० ॥ श्रा के परे इ वा ई हो तो दोनों मिल के एक ए हो जाता है। यथा सखा + इच्छति= सखेच्छति इत्यादि । भ के परे उ वा ऊ हो तो दोनों मिल के एक ओ होता है। यथा गच्छ+उपरि= गच्छोपरि ६०॥ मा के परे उ वा ऊ होवे तो दोनों मिलकर एक ओ हो जाता । यथा पिता+ उषितं वदति=पितोचितं वदति इ०॥ (अ) (स.) (१९) के निधमानुसार सन्धि भई है।
* ॥
असूनी
नयु
असूनी नमूनि
द्विती०
अमूनि
सर्व ( सब) (अ)
सर्व शब्द के पुंलिङ्गमें बालक शब्दके समान रूप होते हैं केवल
प्रथमाके बहुवचनमें सर्वा ऐसा नहीं किन्तु सर्वे ऐसा रूप होता है ।।
स्त्रीलिङ्गमें विद्या शब्द के समान और नपुंसकलिङ्गमें पुस्तक
शब्द के समान रूप होते हैं ।
पूर्व शब्दके रूप तीनों लिङ्गोंमे सर्व शब्द के समान होते हैं
केवल पुं० प्रथमाके बहुबधनमें पूर्व और पूर्वाः यों दो २ रूप होते हैं।
अन्य शब्दके रूप तीनों लिङ्गोमें सर्व शब्दके समान होते हैं
केवल नयु के एक वा में अन्यम् ऐसा नहीं किन्तु अन्यत् ऐसा रूप
होता है।
(अ । वाक्यरचनाके लिये सर्वनाम शब्दोके अति प्रयोजनीय अस्मादि शब्दोके रूप
पहिलेही दिखला चुके । शेष सर्वादि, पूर्वादि और अन्यादि शब्दो का भी परिचय इस
भागमे यहा दिया जाता है।
७६ ऋजुव्याकरणम् प्र. अत्ति म. असि उ. अनि म. यासि उ० यामि प्र० अत्तु प्र० यातु क्रिया अदादिगण परस्मैः परस्मै अद् (खाना) या (जाना) वर्तमान वर्तमान द्वि० ए० द्वि अदन्ति प्र० याति यातः यान्ति याथः अत्थ याथ अत्थः याव: यान्ति मनः माम आज्ञा माज्ञा अत्ताम याताम् यान्तु म० अद्धि यात म० याहि यातम् अत्तम् याव याम उ अदानि अदाव विधि विधि प्र० अद्यात अद्याताम् अद्युः प्र० यायात् यायाताम् यायुः मा प्रद्याः यायात अद्यात म० यायाः प्रद्यातम् यायातम् यायाव यायाम उ० अद्याम् अद्याव अद्याम उ० यायाम् अनद्यतनभूत अनद्यतनभूत द्वि० द्वि० ए० प्र० आदत प्रात्ताम् आदन् प्र० अयात् अयाता अयान अयुः मा प्रादः प्रयात मात्तम् आत्त म० प्रयाः अयातम् उ आदम् आद माझा अयाम उ. अयाम् अयाव अदाम उ० यानि ऋजुव्याकरणम् ॥ उभयपदी ब्रू ( बोलना) वर्तमान त्रु वन्ति । आहयुः बेथ बेवः ब्रूमः परस्मैः आत्मने वर्तमान द्वि प्र० ब्रवीति ब्रूतः प्र० ते वाते ७वते माह आहतुः आहुः म. ब्रवीषि म० पे त्रु वाथे ध्वे मात्थ उ. ब्रवीमि 30 ब्रुवे . बेवहे ब्रूमछे, माज्ञा प्रज्ञा प्र० ब्रवीतु बेताम् ब्रुवन्तु प्र. ब्रूताम् जुवाताम् त्रुवताम् म. बहि ब्रूतम् ब्रूत मात्र प्व ब्रुवाथाम् ब्रूध्वम् उ.ब्रवाणि ब्राव वाम ऊवै बवावहै ब्रवामहै विधि विधि प्र० ब्रूयात् बयाताम् ब्रू युः प्र० ब्रुवीत ब्रुवीयाताम् वीरन् म. ब्रूयाः ब्रूयातम् ब्रू यात मब्रुवीथाःब्रुवीयाथाम् त्रुवीध्वम् ब्रूयाम उ० ब्रुवीय ब्रुवीवहि ब्रुवीमहि अनद्यतनभूत अनद्यतनभूत एक द्वि० एक प्र० अब्रवीत् अब्रू ताम् अत्रु वन् प्र० अब्रूत अत्रु वाताम् अत्रुवत म० अब्रवीः अब्रू तम् अब्रूत मा अब्रू थाः अत्रु वाथाम् अब्रु ध्वम् उ अब्रवम् अब व अब्रूम उ० अब्रु वि अत्रु वहि नत्र महि उ० ब याम् ब्र याव
ऋजुव्याकरणम् ॥
वाक्यरचना
संज्ञाशब्द
विश्व ( सब ), एक, इनके रूप सर्व शब्दके समान होते हैं ।
पर, अपर, स्त्र, प्रथम, परम (अन्तिम), अल्प, कतिपय (कुछ)
इत्यादि शब्दोके रूप पूर्व शब्दके समान होते हैं ।
इतर (अन्य), कतर (दोमेंसे कौनसा), कतम (तीन आदिको ।
मेंसे कौन सा ) इत्यादि शब्दों के रूप अन्य शब्द के रूपों के समान
होते हैं।
धातु
स्ना (नहाना), ख्या (बोलना), मा (मापना), वा (वायुका
बहना), द्रा (भागना वा सोना), भा (चमकना ) इ. याके समान॥
अव्यय
अथ ( इसके अनन्तर ), अतः ( इस कारणसे ), यतः ( जिस
कारणसे ) ततः ( उससे वा उस कारणसे ), कुतः ( कहासे वा किस
कारण से)
ऋजुव्याकरणम् ॥ वाक्य संस्कृत हिन्दी ननुसर्वः ( ३३ ) सर्वन्न जाना- वायु बहता है। कैसे मैं नहाऊं ॥ तोति ब्रदोषि किम् । श्राम एवं मै कहताहूं तुम कहां गये थे ब्रवीमि ॥ और क्या खाया था । . (स) (३३) स्वरके अनन्तर रेफके उत्तर स्पर्श, अथवा य, ल, व इनमेसे कोई अक्षर हो तो वह दो भी हो सकता है। यथा सर्वः अथवा सर्व ये दोनों ठीक हैं ॥ स्वरके उत्तर स्पर्श, वा य, ल, व इनमेंसे किसी अक्षरके अनन्तर यदि वर अक्षर न पाया जावे तो वह (स्पर्श वा य, ल, व) दो भी हो सकता है। यथा विध्यति=विधध्यति वा विध्यति इत्यादि । किसी वर्गका द्वितीय अक्षर यदि दो किया जाय तो उन दोनों मेंसे प्रथनके स्थानमें उसी वर्गका प्रथम अक्षर आदेश होता है। और यदि किसी वर्ग का चतुर्थ अक्षर दो किया जाय तो उन दोनों मेंसे पहिलेके स्थानमे उसी वर्ग का तृतीय अक्षर आदेश होता है। यथा विध्यति=विद्धनति इत्यादि ।
ऋजुव्याकरणम् ॥
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
भाइयो, नहाम्रो खाओ, तब
अहो अमी (३४) अश्वा यान्ति ।
जानो,॥
रासम नाह। न त्वं जानासि
सब बनिये और ब्राह्मण बोले
गीतं । अत इद ब्रवीमि ।
कि लड़के तो जीते हैं। इसने
शृगाल आह माम अस्त्येत् ॥
किस लड़के को खा लिया ।
रात्रिरयात् । अथ
पश्य पूर्वा
दिग्घसतीव (अ)॥
यह तो दूसरी बस्तु है. इसको
मैं न लूगा ॥
(सं०) (३४) अदस् शब्दके रूपमें मकारके उत्तर दीर्घ ई अथवा
जिस किसी शब्दके द्विवचनान्त सिद्ध रूपके अन्तमें दीर्घ ई, ऊ वा
ए इनमें से कोई स्वर हो तो उस ( ई, ऊ वा ए) के साथ उनके
अनन्तर स्थित किसी स्वरकी सन्धि नहीं होती है। यथा अमी+
अश्वाः= अमी अश्वाः, अमू + अर्भको अमू अर्भका; कवी + इमा
कवी इमो, शिशू + अत्र=शिशू अत्र, पचेते + एतौ पचेते एतौ इत्यादि
ऐसेही रहेंगे। इनको सन्धि नहीं होगी ।
ओकारान्त अव्ययके उत्तर स्थित स्वरके साथ उस (अव्यय) के
अन्त में स्थित श्रोकारकी भी सन्धि नहीं होती है। यथा अहो+अमी
अहो अमी इत्यादि ऐसे ही रहेंगे। इनकी सन्धि नहीं होगी।
(अ) (स) (२०) के अनुसार दिक् + हसति-दिग्यसति ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ ८१ ऊनविंश पाठ सख्यावाचक शब्द (अ) अकारान्त एक शब्दके रूप तीनों लिङ्गों में सर्व शब्दके समान 'प्रायः एक वचनही में होते हैं । इकारान्त द्वि (दो) शब्दके केवल द्विवचनही में प्रयोग होते हैं। यथा नपुर me पुं० स्त्री द्वि द्वि० द्वि० द्वौ सं० द्विती० त्रि (तीन) शब्दके और इसके अनन्तरके चतुर (चार) इत्यादि दशन (दश) शब्द पर्यन्त संख्यावाचक शब्दोंके रूप केवल बहुवचन- ही में होते हैं यथा- द्वे द्वे द्वे द्वे द्वौ - (अ) इस भाग के चतुर्थ पृष्ठमे कह आये है कि विशेष्य और विशेषण शब्द समान ही लिङ्ग वचन, और विभक्ति के होते हैं। पर सख्यावाचक विशेषण शब्दों के लिङ्ग वचन मे उक्त नियम सर्वदा नही माना जाता है, किन्तु किसी २ सख्यावाचाक विशेषण ने उक्त नियम पाया जाता है और किसी २ में नहीं। इस भेदका निर्देश इस पाठ मे और आगक पाठ मे भी स्थल २ पर किया जावेगा।
८२ जुव्याकरणम् ॥ त्रि स्त्री पुं० न etter त्रयः तिस्त्रः तिस्त्रः तिस्त्रः त्रीणि श्रोणि त्रीणि द्वित जोन् रेफान्त चतुर स्त्री न चतस्त्रः चत्वारः चत्वारि हे चत्वारः चत्वारि द्विती० चतुरः चत्वारि नकारान्त पञ्चन् (पांच) पञ्चन् शब्दके और इसके अनन्तरके संख्यावाचक षष तथा नका. रान्त सप्तन्, अष्टन्, नवन्, दशन् इत्यादि शब्दोंके रूप तीनों लिङ्गो समान होते हैं, चाहे उनके विशेष्य किसी लिङ्ग में क्यों न हों। नपुं० वा स्त्री० अष्टन् (आठ) अष्टी, प्रह हे पञ्च अष्टौ, अष्ठ अटी द्विती द्वितीय ऋजुव्याकरणम् ॥ सप्तन् ( सात ), नवन् ( नव ), दशन् इत्यादि नकारान्त सख्या- वाचक शब्दोके रूप पञ्चन के समान होते हैं । षकारान्त वप (छ) पुं० नपुं० वा स्त्री धाम ( बैठना) प्र. अस्ति কঃ স্বনি उ अस्नि षट सं० हे षटे द्वितीय पद कियो परस्मैक प्रात्मने अस् (होना वा रहना) वर्तमान द्वि० ए० द्विर सन्ति प्र. प्रास्ते आसाते आसते म. प्रास्से आसाथे आध्ये उ आसे आवहे प्रास्महे आज्ञा आज्ञा स्ताम् सन्तु प्र० आस्ताम् भारताताम् आसताम् म एधि स्तम् माआव प्रासाथाम् आध्वम् उ० असानि असाव आसाम उपासै पासावहै भासामहै विधि विधि प्र० स्यात् स्याताम् प्रामासीत पासीयाताम् आसीरन् मा स्याः स्यातम् स्यात मासासीथाः आसीयाथाम् प्रासीध्वम् उ० स्याम् स्थाव स्याम उनासीय मासीवहि आसीमहि प्र० अस्तु ८४ ऋजुव्याकरणम् ॥ अनद्यतनभूत अनद्यतनभूत प्र० आसीत् आताम् आसन् प्र० आस्त आसाताम् प्रासत म. शासी: मालम् मा आस्थाः आसाथाम् साध्वम् उ.आसम् उ. आसि आस्वहि आस्महि वाक्यरचना वाक्य संस्कृत हिन्दी एक ( ३५ ) आस्तेऽपरो याति। यहां पांच लड़के बैठे हैं । विभक्तयः सप्त । लिङ्गानि वच- वहां तीन स्त्रिया बैठी हैं नानि च त्रीणि । दश लकारा सात घोड़े और छ गायें दशैव च गणाः । समासाः कार- कल हमने मोल लीं ॥ काणि तु षट् षड् भवन्ति । एक- तीन लड़कियां और दो लड़के श्चन्द्रो द्वौ पक्षौ त्रया गुणाश्चत्वारो खेल रहे हैं। वेदाः पञ्च प्राणाः षड़ ऋतवः चार पाथियां मैंने पढ़ ली। सप्त भुवनान्यष्टी वसवो नवग्रहा उसने तो दोही पढ़ी ॥ दश दिशो भवन्ति ॥ मा बैठी है। एक लड़की और दो लड़के खेलते हैं। (सं.) ( ३५ ) पदान्तमें स्थित विसर्ग के पूर्व में यदि अकार हो और उस विसर्गके अनन्तर अकारको छोड़ के यदि कोई दूसरा स्वर आवे तो उस विसर्गका लोप हो जाता है और फिर सन्धि नहीं होती है। यथा एकः+ आस्ते एक प्रास्ते इ० ॥ रेफके स्थान में जो विसर्ग होता है उसके लिये यह नियम नहीं है। यथा भ्रातः+आगच्छ- भ्रातरागच्छ इत्यादि।
ऋजुव्याकरणम् ॥ ८५ विश पाठ संख्यावाचक इकारान्त स्त्री० "विंशति ( बीस ) (अ) शब्दके रूप स्तुति शब्दके समान होते हैं । षष्टि ( साठ), सप्तति ( सत्तर ), अशीति ( अस्सी ), नवति ( नब्बे ) इन संख्यावाचक शब्दोंके रूप विंशतिशब्दके समान स्त्री० में ही होते हैं और विंशति इत्यादि शब्द जिनके अन्तमें हों उन (एकविंशति इत्यादि) संख्यावाचक शब्दोंके रूप भी विंशति ईत्यादि ही के समान स्त्री० में होते हैं । तकारान्त स्त्री० त्रिंशत् ( तीस ) शब्दके रूप सरित् शब्दके समान होते हैं। चत्वारिंशत् (चालीस ), पञ्चाशत् ( पचास ) इन संख्या- वाचक शब्दोके रूप त्रिंशत् शब्दके समान स्त्री हीमें होते हैं और ये शब्द जिनके अन्तमें हों उन ( एकत्रिंशत् इत्यादि ) संख्यावाचक शब्दोके रूप भी त्रिंशत् शब्दहीके समान स्त्री० में होते हैं । (अ) विशति और इसके अनन्तरके सख्यावाचक शब्द विशेषण और विशेष्य दोनों होते है। जब विशेषण होते है तब एक ही वचन मे उनका प्रयोग होता है चाहे उनका विशेष्य किसी वचनमे क्यो न हो। और लिङ्ग भी उनका अपना ही रहता है चाहे विशेष्यका लिङ्ग जो कोई क्यों न हो। यथा-विशति. पुरुषा गच्छन्ति. विशतिमश्वान् क्रीणामि विशति फलानि भक्षयामि इत्यादि । इसी प्रकार सहल स्त्रियः, लक्षं अश्वा. कोटिर्मनुष्याः इत्यादि प्रयोग होते है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ प्र० अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शत ( सौ) शब्दके रूप फल शब्दके समान होते हैं। सहस्त्र (हज़ार), अयुत (दश हज़ार ), लक्ष ( लाख ), नियुत ( दश लाख ) इनके रूप शत शब्दके समान नपुं० ही में होते हैं । हख इकारान्त स्त्री० कोटि ( करोड़) शब्द के रूप स्तुति शब्दके समान होते हैं। हख इकारान्त कति ( कितना) शब्दके रूप तीनों लिड्डोंमे समान और सदा ब० व० में होते हैं । यथा पुं० न वा स्त्री० ० कति सं० हे कति द्वितीय कति ऐसे ही यति (जितना), तति (तितना) इन शब्दोंके भी रूप होते हैं । किया परस्मै रुद् ( रोना) हन (हनना) वर्तमान ए. द्वि द्वि प्र. रोदिति रुदितः रुदन्ति प्र० हन्ति हतः सन्ति म० रोदिषि रुदिथः रुदिथ म० हंसि उ० रोदिमि रुदिवः रूदिमः उ० हन्मि हन्वः वर्तमान ब ऋजुयाकरणम् ॥ 4 प्राज्ञा प्र० रोदितु रुदिताम् रुदिताम् रुदन्तु प्रा हन्तु हताम् घ्नन्तु म० रुदिहि रुदितम् रुदित म. जहि हतम् उ० रोदानि रोदाव रोदाम ३० हनानि हनाव हनाम विधि विधि प्र० रुद्यात् रुद्याताम् रुद्य: प्रःहन्यात् हन्याताम् हन्ः मारुद्याः रुद्यातम् रुद्यात मा हन्या: हन्यातम् हन्यात उरुद्याम् रुद्याव रुद्यास उहन्याम् हन्याव हन्याम अनद्यतनभूत अनद्यतन भूत प्र० अरोदीत् । प्र. प्रह अहताम् अनन् अरुदिनाम् अरुदन् अरोदत् म. महन् उत्तम् म. अरोदीः । उ० महनम् महन्त्र अरुदितम् अरुदित अरोदः उ० अरोदम् अरुदिव अरुदिन स्वप ( सोना) प्राज्ञा विधि स्वपितु स्वप्यात् अखपीत् वा अस्वपत् इत्यादि रोदिति इत्यादिके समान रूप होते हैं । परस्मैः धार ( जागना ) शी (सेना वा लेटना । वर्तमान द्वि० द्विर प्र० जागति जागृतः অাৰ সঃ शेते शयाते शेरते म० जागर्षि जागृथः जागृथ शेध्वे शेषे मा शयाथे जागृवः जागृमः शये शेनहे शेवहे वतं० अनः भूत प्रगए. स्वपिति सालने० वर्तमान उ० जागर्मि
८८
ऋजुव्याकरणम् ॥
TET
श्याथाम
जागृत म० शेव
उ. शयै
आज्ञा
वि
वि०
प्र० जागर्त्त जागृताम् जाग्रतु प्र० शेताम् शयाताम् शेरताम्
मर जागृहि जागृतम्
शेध्वम्
उ० जागराणि जागगव जागराम
शयावहै शयामहै
विधि
विधि
प्र. जागृयात् जागृयाताम् जागृयुः प्र० शयीत शयीयाताम् शयीरन्
म. जागृयाः जागृयातम् जागृयात म० शयीथाः शयीयाथाम् शयीध्वम्
उ० जागृयाम् जागृयाव जागृयाम उ० शयीय शयीवहि शयीमहि
अनद्यतनभूत
अनद्यतनभूत
प्र० अजागः अजागृताम् अजागरूः प्र० अशेत अशयाताम् अशेरत
म. अजागः अजागृतम् अजागृत म० अशेथाः अशयाथाम् अशेध्वम्
30 अगागरम् अजागृव अजागृम उ० अशयि अशेवहि भशेनहि
इति अदादि गणके धातु
ऋजुव्याकरणम् ॥
.
वाक्यरचना
श्वम् ( सांस लेना) अन् (जीना ) इनके रुप स्वपके समान
होते हैं।
वाक्य
संस्कृत
हिन्दी
स वीरः शतं शत्रूनजयत् । सहस्रं मैंने पचाम पुस्तकोंको कल पढ़
च शत्रवाऽधुनापि विद्यन्ते ॥ डाला। तूने तो तीस ही पढ़ी
राजन् लक्षं मुद्रा गृहाण मुञ्च भला यह पूछता हूं कि इसने
माम् । यामि स्व गृहम् ॥ कितनी पढ़ी
कतिचित्पक्षिणस्तिष्ठन्ति ।
यदि एक लाख मनुष्य और दश
कतिचिड्डीयन्ते ॥
सहस्त्र घौड़े हों तो मैं अवश्य
पञ्चाशतं पत्राण्यपठं । त्रिंशत- लड़ाई करूं ।
न्तु अद्य पठामि ॥
इसने तो दश लाख कमाये ॥
शतं सैनिका जाग्रति। अन्ये सर्वे
तुमने कितने कमाये ॥
स्वपन्ति॥
न हन्यान्न मतिं दद्यात् ॥
इति
।
Printed at the INDIAN PRESS, Allahabad.
संस्कृत
ऋजुव्याकरण
द्वितीय और तृतीय
पण्डित आदित्यराम भट्टाचार्य्यने
बनाया
RIJUVYAKARAN
SANSKRIT GRAMMAR
IN
IIINDI
PARTS II & III
BY
ADITYARAM BHATTACHARYA, NI .1,
Professor of Sanskrit, Mur Central College
Second Edition.
ALL1HABAD
PRINTED 42 TIE "INDI IN PRES,'
1801
Registerred under .icr XIV of 186%
PRICE S ANNAS ]
[ बम आरपा
शुद्धिपत्र ॥ द्वितीय भाग KI इन अशुद्धियों को शोधकर विद्यार्थी पाठ आरम्भ करे। पक्ति अशुद्ध शुद्ध ५ २० ७ १ ८ or १७ २३ इकारान्त लेखिताबःलेखितावः लेखितास्वः लेखितास्मः करनेवालों करनेवाले दा धातु दा धानुके लभ्यने लप्स्यते आत्मने ( सेट) आत्लने० ( सेव) Vindravan Trindavar १४ २४ १५ १४ 99 ८ Coquer Conquir १५ earc Itars ४ चर्के ६ कुर्के क्यों औ आदेश ५२ पृ० ( अ ) अङ्कमे ४४ क्यां आ आदेश अङ्क ४८ पृ०( अ )से २३ २३
(२)
99
अकृतम्
४४ पृ०
चतुर्ध्याम्
५२
अकृवम्
४० पू०
चनाम
१३
१४
स्यायेयेत्
स्थापयेत्
५८
होते हैं।
६१
होते हैं। द्वितीय तथा
तृतीय शब्दके शेष रूप
बालक शब्दके समान
होते हैं।
२१
तृतीय भाग
कृदन्तकियाका कृदन्तक्रियाके
ईयस
ईयस्
कालीदास
कालिदास
9
१४
संस्कृत
ऋजुव्याकरणम्
द्वितीय भाग ॥
एकविंश पाठ॥
संज्ञा
अकारान्त पुंल्लिङ्ग बालक शब्द ॥
ए०
वि
तृतीया 'बालकन
बालकाभ्याम्
बालकैः
चतुर्थी बालकाय बालकाभ्याम्
बालकेभ्यः
पञ्चमी बालकात वालकाभ्याम् बालकेभ्यः
षष्ठी
बालकस्य बालकयोः
बालकानाम्
सप्तमी
। बालके
बालकयोः बालकेषु
प्रायः अकारान्त पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके रूप (अ)
बालक शब्दके समान होते हैं (आ) ॥
,
--
(अ) इन रूपोंके घोखते समय विद्यार्थियोंको ध्यान देके देखना चाहिये कि सज्ञा
शब्दोंके रूप तृतीया, चतुर्थी, तथा पञ्चाके द्विवचनमें सदा समान और षष्ठी तथा
सप्तमीके द्विवचनमें सर्वदा समान होते है ।। और युष्मद् तथा अस्मद् शब्दोंको छोड़ के
शेष शब्दोंकी चतुर्थी और पञ्चाके बहुवचनमें सर्वदा समान रूप होते हैं ।
(आ) इस भागमें सज्ञा शब्दोंके रूपोंने जो सादृश्य वा भेद बतलाया जायगा वह
तृतीया विभक्ति एकवचनते लेके सप्तमी विभक्तिके बहुवचनपर्यन्त समझा जायगा ।।
२ ऋजुव्याकरणम् ॥ आकारान्त स्त्रीलिङ्ग विद्या शब्द । विद्यया विद्याभ्याम् विद्याक्षिः विद्यायै विद्याभ्याम् विद्याभ्यः पं० विद्यायाः विद्याभ्याम् विद्याभ्यः विद्यायाः (अ) विद्ययाः विद्यानाम् विद्यायाम् विद्ययाः विद्यासु प्रायः आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दोंके रूप विद्या शब्दके समान होते हैं। सर्वनाम ॥ तीनों लिङ्गों में समान शब्द ॥ युष्मद् अस्मद् द्वि ए० द्वि० तृ त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः तृ० मया आवाभ्याम् अस्माभिः च० तुभ्यम् , युवाभ्यां, युमभ्यम् , च० मह्यम्, आवाभ्यां, अस्मभ्यम्, ते । वाम् । मे नौ नः युवाभ्याम् युप्मत् पं० मत् आवाभ्याम् अस्मत् षतव, युक्याः, युष्माक, घ० मम, आवयाः, अस्माक, । ते । वाम् । वः मे नौ । नः सप्तः त्वयि युवयोः युष्मासु सप्त० मयि आवयोः अस्मासु (अ) अकारान्त शब्दोको छोड के बहुधा सजाशब्दोंके रूप पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें समान होते है । यथा आकारान्त विद्या इत्यादि शब्दोके विद्यायाः इत्यादि रूप होते है। ब पं० त्वत् ऋतुव्याकरणम्॥ विश पाठ॥ क्रिया प्रथम भागमें वर्तमानादि बार नकारों सारज प्रचलित धातु के रूप दिखाये है । इस भागमें अनद्यतन भविष्य, सामान्य भविष्य, क्रियातित्ति, परोक्षभूत, सामान्यभृत और शिस् इन शेप कलकारोमे चुने २२ तुक रूपको दिखावेगे। इन लकारामें धातुोक रूप गणके अनुसार विभक्त नहीं होते है, किन्तु इनके कर बनानेमे यह दूसरी रीतसे विभाग किया जाता है। वह रीति यह है कि विमति के लगानेके पूर्व किसी२ धातुके अन्तमें इकार लगता है और किमी २ के नहीं। सा जिनके अन्त में बहुधा इ लगता है उनको सेट् कहते हैं । यथा भू इत्यादि । और जिनके अन्त में बहुधा नहीं लगता है उनको अनिट् कहते हैं । यथा कृ इत्यादि । ग्रार कुछ ऐसे भी धातु हैं जिनके अन्तमें इकार लगता भी है और नहीं भी लगता है, वे वेट कहाते है । यथा नश इत्यादि ॥ निदान इस भागमें शेष छः लकारोके रूप में धातुओके तीन विमाग अर्थात् सेट् अनिट् और वेट् देख पड़ गे॥
ऋजुव्याकरणम्॥
अनद्यतन भविष्य (अ)।
स्वरान्त अनि धातु (आ)॥
उभयपदी ॥
नेतार
(नी)
परस्मैपद ॥
आत्मनेपद
द्वि०
प्र० नेता
नेतारी
प्र० नेता (इ) नेतारी
नेतारः
म० नेतासि नेतास्थः नेतास्थ
मा नेतासे
नेतासाथे नेताध्वे
उ० नेतासि नेतास्वः
नेतास्मः
उ० नेताहे
नेतास्वहे नेतास्महे
उभयपदमें क्रमसे कृ धातुके कर्ता कर्तारी कर्तारः इत्यादि ॥
दा धातुके दाता दातारौ दातारः इत्यादि रूप होते है ।
परस्मैपद में गै के गाता इत्यादि रूप होते हैं (ई)॥
(अ) बोलने के आठ प्रहर के उपरान्त जो क्रिया होगी।
(आ) दीर्घ उकागन्त और दीर्घ ऋकारान्त वातु, और श्रि, डी, शी, वृ इत्यादि
कई धातुओ को छोड शेष स्वरान्त धातु अनिट् होते है ।
(इ) परस्मे और आत्मने मे अनद्यतन भविष्य लकारके प्रथम पुरुषके रूप तीनों
वचनोमे पृथक् २ सदा समान होते है ॥ -
( ई ) अनद्यतन भविष्य, मामान्यभविष्य, क्रियातिपत्ति और परोक्षभूत इन लकारो में-
एकारान्त, ऐकारान्त, और ओकागन्त चातु आकारान्त धातुओ के समान रूप पाते है।'
ऋजव्याकरणम्॥ स्वरान्त सेट् धातु॥ उभयपदी॥ (श्री) परस्म० प्रान्मने द्वि० प्र.श्रयिता श्रपितारी श्रयितारः এs স্বষি ঋষিরা। ধ্বষণা मायिनामि श्रयितास्थ श्रयितास्थ, म०श्रयिताने श्रयितासाथे श्रयिताध्ये उ० अनिमामि विश्रयितास्सः उ० श्रयिताहेश्रयितास्वहे थयिताम्... भू इत्यादि धातुओ के भविता भवितारी भवितारः इत्यादि। त्रयोविंश पाठ॥ संज्ञा इकारान्त शब्द। पुं० वि॥ सखि ॥ हि० द्वि० नृ० कविना कविभ्याम् कविभिः तृ० सख्या सखिभ्याम् सखिभिः चकत्रये चिम कविभ्यः च० सख्ये सखिभ्याम् सखिभ्यः प०कवेः कविभ्याम् कविभ्यः पं० सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः ५० कवेः कव्योः कवीनाम् प. सरयुः सख्यो. सखीनाम् स० का कव्योः कविपु ससस्या सख्योः सविपुः हम्व इकारान्त पुं० शब्दो के रूप कवि शब्द के समान होते हैं, केवल सखि शब्द के एक वचन में जो भेद तृतीयादि विभक्तियों में होता है सा ऊपर दिखा दिया ! तृतीयादि विभक्तियों में पति शब्द के रूप सखि शब्द ६ ऋजुव्याकरर॥ के समान हैहे हैं। पर पति शब्द जब समाल के अन्त में प्राता है, यथा भरभि, नृपति महीपति इत्यादि शब्दो में, नब उसके सबसप कविशाब्द ही के समान होते है । यथा भूपतिना भूपत्ये इत्यादि ॥ स्त्री स्तुति द्वी० तु स्तुत्या स्तुतये, स्तुत्यै स्तुतेः, स्तुतिभ्याम् निभ्याम् स्तुतिभिः स्तुतिभ्यः पं० स्तुतिभ्याम् स्तुतिभ्यः and पं स्तुत्योः स्तुतीनाम् स्तुते, स्तुत्याः स्तुती, स्तुत्याम् सं स्तुत्योः स्तुतिधु न वारि॥ नपु० दधि ॥ द्वि० तृ० वारिणा वारिभ्यां वारिभिः तृ दना दधिभ्याम् दधिभिः च० वारिणे वारिभ्यां वारिभ्यः दन .दधिभ्यां दाधिभ्य पं० वारिणः वारिभ्यां वारिभ्यः प० दन्नः दधिभ्यां दधिम्यः १० नः दनोः प० वारिणः वारिणः वारीणाम् दर्शन, स चारिणि वारियाः वारिपु दनोः दधिषु ।" दर्धान मुव्याकर राम्। हृस्व इकारान्त नपुं० शब्दों के रूप वारिशद ये समान हाद है। दधि इत्यादि शब्दों के रूप में जाभेद होते है ता ऊपर दिखला दिये ।। हस्व इकारान्त विशेषण नपुंसक अनादि इन्साइ शब्दों के चतुथी, पञ्चमी, षष्ठो और सप्तमो के एकवचन में और पछी और सप्तमो के द्विवचन में एक वार कवि शब्द के समान और दूसरी वार वारि शब्द के समान यों दो २ रूप होते हैं । क्रिया॥ अनद्यतन भविष्य काल । व्यञ्जनान्त अनिट् धातु॥ परस्मै उभयपदी॥ (वा) मान्मने ए० द्वि० प्र०वमा वतारी म० वप्ताने वालार्थ बनावे वतास्मः उ० वप्ताहे वतास्व कप्तानहे ए० वातारी ०वता म. वतालि उ० वतास्मि कमास्वः चन्तास्वः इलो प्रकारसे स्वम् धातु के स्वता स्वतारी इत्यादि और आप धातु के प्राप्ता इ० रूप होते है। परस्मै० में शक् धातु के शक्ता इत्यादि ; त्यज धातु के त्यक्ता इत्यादि उभय में क्रमले पच् धातु के पक्का इत्यादिः भुज धातुके भाक्ता इत्यादि और मुच् धातुके मेोक्ता इत्यादि रूर होते है ।
ऋजुव्याकरणम् ॥
.
परस्मै० में गम्के गन्ता इत्यादि ; हनके हन्ता इत्यादि ; दृशके
द्रष्टा इत्यादि ; सृजके स्रष्टा इत्यादि ; और प्रच्छके प्रप्टा इत्यादि रूप
होते है॥
व्यञ्जनान्त सेट् धातु॥
परस्मै
परस्मै
पठ्
लिख
द्वि०
द्वि०
प्र० पठिता पठितारौ पठितारः प्र० लेखिता लेखितारी लेखितार:
म. पठितासि पठितास्थः पठितास्थ । मलेखितासिलेखितास्थ लेखितास्थ
उ० पठितास्सि पठितास्वः पठितास उल्लेखितास्मि लेखितास्वःलेखिताम:
इसी प्रकारसे प्रात्मने० में सेव धातुके सेविता इत्यादि और वृत्के
वर्तिता इत्यादि रूप होते है । उभयपद में क्रमसे चुर के चारयिता इत्यादि
और ग्रहके ग्रहीता इत्यादि रूप होते है ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ वाश्यरचना॥ अव्यय ॥ श्व ( कलका दिन जो आवेगा), परश्वः ( परमाका दिन जो आवेगा) हिन्दी कल मैं चिट्ठी लिम्बूगा I shall nut a letter tidur- संस्कृत शिक्षक श्वः परीक्षा कर्ता, अत्र कः कर्ता, किञ्च कर्म (अ) ।। रामः श्वो वन गन्ता॥ परश्वः सूर्यग्रहण भविता ॥ कृषाणा वीजानि वप्ता ॥ परमां हम दोनों काशी को जायेंगे। We ( tity) chal! go to fasi day after tulburrow मैं दो पुस्तक मोल लुगा। एक व्याकरगडलरीचारयनोति ॥ I hall runchte a couple- (if bereh tumortuitmaranla Chanakva-zaiti. -ram- ( अ ) क्रियांक करनेवान को कर्त्ता कहते है । और जो किया जाता है वह कर्म कहाता है॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ चतुर्विंश पाठ॥ संज्ञा ॥ श्रीभिः तृ० नद्या च० नये श्रिये, श्रीभ्यः ईकारान्त शब्द॥ स्त्री० नदी॥ स्त्री श्री। द्वि ब० द्वि० नदीभ्याम् नदीभिः नदीभिः तृश्रिया श्रीभ्याम् नदीभ्याम् नदीभ्यः श्रोभ्यां पं० नद्याः नदीभ्याम् नदीभ्यः श्रिये प० नद्याः नद्योः नदीनाम् श्रियाः, ប៉ុប श्रीभ्यां सप्त० नद्याम् नद्योः नदीषु श्रियः स्त्री० स्त्री श्रियाः, श्रिया: तृ० स्त्रिया स्त्रीभ्याम् स्त्रीभिः श्रियः च. स्त्रियै स्त्रीभ्याम् स्त्रीभ्यः श्रियाः पंखिया स्त्रीभ्याम् स्त्रीभ्यः श्रियाम् । प० स्त्रियाः स्त्रियोः स्त्रोणाम् स० स्त्रियाम् स्त्रियाः स्त्रीषु श्रीभ्यः श्रियाम्, श्रीणाम् श्रियि, श्रीषु दीर्घ ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दोके रूप नदी शब्दके समान होते हैं । स्त्री और श्री शब्दोके रूपोंमें नदी शब्दले भेद दिखला दिये । स्त्रीलिङ्ग धी इत्यादि शब्दोके रूप श्री शब्द के समान होते हैं ।
ऋनुव्याकरणम् ॥ पुलिङ्ग सुधी शब्द के रूप चतुर्थी, पचनी. चटो, और सामी के एक चनमें और पष्ठोके बहुवचन में केवल एक हो एक मुधिय सुधियः सुधियः और सुधियि और सुधियां ये रूप हाल है: दुसरे कर नहीं होते। सर्वनाम ॥ at: तृ० तेन च० तस्मै च० तस्यै तास्तु तद् शब्द पुं० तथा नपुं० द्वि० य द्वि ताभ्याम् तृतया ताभ्याम् तभिः ताभ्याम् तेभ्यः ताभ्याम् ताभ्यः पं० तस्मात् ताभ्याम् पं० तास्याः ताभ्याम् ताभ्यः प० तस्य तयाः तपाम् तयाः तासाम् सं० तस्मिन् तया. तेषु स० तस्याम् तयाः क्रिया॥ सामान्य भविष्य (अ)॥ स्वरान्त अनिष्ट धातु ॥ उभयपदी (नो) परस्मै० प्रात्मने० द्वि० ब० द्विर प्र० नेष्यति नेष्यतः नेष्यन्ति प्र० नेच्यते नेष्यते नेप्यन्ते म. नेष्यसि नेष्यथः नेष्यथ म. नेयस नेप्येथे नेप्यध्वे उ० नेष्यामि नेष्याव: नेष्यामः उ नेष्ये नेप्यावहे नेप्यामहे उभय० में क्रमसे दा धातु के दास्यति दास्यते और ह्र धातु के हास्यति हास्यते इत्यादि रूप और परस्मै० में गै धातु के गास्यति इत्यादि रूप होते हैं।
ऋजुच्याकरणम् ॥
स्वगन्त सेट् धातु ॥
उभयपदी (श्रि)
परस्मै
आत्मने०
द्वि०
द्वि०
प्रश्रयिष्यति श्रयिष्यतः श्रयिष्यन्ति प्र० श्रयिष्यते श्रयिम्येते श्रयिष्यन्ते
माधयिष्यसि श्रयिष्यथः श्रयिष्यथ म० श्रयिष्यले श्रयिष्येथे श्रयिष्यध्वे
उश्रयिष्यामिश्रयियावःश्रयिष्यामः उ० श्रयिष्ये श्रयिष्यावहे श्रयिष्यामहे
परस्मै में भू धातुके भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति इत्यादि रूप
होते है (अ)॥
ऋकारान्त धातु सामान्य भविष्य और क्रियातिपत्ति में सेट होते
हैं। यथा कृके उभय में क्रमसे करिष्यति, करिम्यते इत्यादि रूप
हैं
(अ) सामान्य भविष्य मे भ्वादि धातुओं के उत्तर वर्तमानकाल की विभक्तियो के
समान विभक्तिया अन्तमे पाई जाती है। स्पो मे देखो।
ऋहव्याकरणम् ॥ पञ्चविंश पाठ॥ पुं० (शिशु) उकासन्त शब्द ॥ स्त्री (धनु) द्वि० द्वि० तृ शिशुना शिशुभ्याम् शिशुभिः तृ० धन्या धेनुभ्याम धनुभि च० शिशवे शिशुभ्याम् शिशुभ्यः धन्वै. धेनुभ्याम् धेनुभ्यः धेनवे धेन्वाः, पं० शिशोः शिशुभ्याम् शिशुभ्यः पं० धेनुभ्याम् धेनुभ्य धनाः धन्वा, शिशूनाम् ५० धनाः प० शिशा शिश्वो धेन्वाः धेनूनाम् धेन्वाः धेन्वाम्, स० शिशौ शिश्वोः शिशुधु धेनु धना नपुं० ( मधु) द्वि तृतीया मधुना मधुभ्याम् मधुभिः चतुर्थी मधुने मधुभ्याम् मधुभ्या पञ्चमी मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्य. षष्ठी मधुनः मधुनाः मधूनाम् सप्तमी मधुनि मधुनः मधुपु ह्रस्व उकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दों के रूप शिशु शब्द के समान, स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप धेनुशब्द के और नपुसक शब्दो के रूप मधु शब्द के समान होते हैं।
२४ ऋतुव्याकरणम् ॥ ह्रस्व उकारान्त नपुंसक विशेषण स्वादु इत्यादि शब्दों के रूप चतुर्थी, पञ्चमी, पप्ठो और नमी के एकचन में और षष्ठी, सप्तमो के द्विवचन में एक बार शिनु शब्द के समान और दूसरी वार मधु शब्द के समान येई दो २ रूप हात है सर्वनाम एतद् शब्द तः एतेन पुं० तथा नपुं० ए० द्वि० एताभ्याम् एतैः च० एतरमै एताभ्याम् एतेभ्यः पं० एतस्मान् एताभ्याम् एतेभ्यः प० एतस्य एतयोः লা स० एतस्मिन् एतयाः एतेषु स्त्री० द्वि० ४० एतया एताभ्याम् एताभिः च. एतस्यै एताभ्याम् एताभ्यः प० एतस्याः एताभ्याम् पताभ्यः प० एतस्याः एतयोः एतासाम् स० एतस्याम् एतयोः एतामु क्रिया॥ सामान्य भविष्य॥ अनिट् धातु (वा) परस्मै प्रात्मक द्वि० द्वि० प्र. वप्स्यति वस्यतः वयन्ति प्रवप्स्यते चप्स्येते वप्स्यन्ते म. वयस्यसि वप्स्यथः घप्स्यथ म. वप्स्यथे वप्स्येते वस्यध्वे उ० वस्यामि वप्स्यावः वपस्यामः उ० वस्ये वप्स्यावहे वस्यामहे परस्मैक में आपके प्राप्स्यति इत्यादि; क्षिपके उभय में क्रमसे क्षेप्स्यति क्षेप्स्यते इत्यादि और प्रात्मने में लभ्के लप्स्यते इत्यादि रूप होते हैं ।
ऋजुव्याकरणम्॥
वच और वह्के भो वक्ष्यति, वक्ष्यते इत्यादि रूप उभय० में क्रममे होते
हैं। इसी प्रकार से शक्के शश्यति और त्यज के त्यभ्यति इत्यादि परस्मै में
रूप ले जाओ।
वस् इत्यादिके वत्स्यति इत्यादि रूप होते हैं। ऐसेही अद् इत्यादि के
अत्स्यति इ० रूप ले जायो ।
उभय में क्रमसे भुज्के भाक्ष्यति, भक्ष्यिते इ०, मुच्के मोक्ष्यति,
मोक्ष्यते इत्यादि रूप और परस्मै में दृश्के द्रक्ष्यति इत्यादि रूप होते है।
ऐसेहो सृजके नश्यति इत्यादि और प्रच्छके प्रक्ष्यति इत्यादि रूप ले
जामो॥
परस्मै में मज्ज के मझ्यति इत्यादि, ऐने हो भञ्ज के भइ पनि
इ०, और अनिट् नश् के नक्ष्यति इत्यादि और नम् इत्यादि के नम्ब
इत्यादि और मन् इत्यादिके मंस्यते इ० रूप होते हैं ।
.
सेट् धातु॥
परस्मै० (पठ्)
आत्मने (सेव)
द्वि०
ए०
द्वि०
प्र० पठिष्यति पठिप्यतः पठिष्यन्ति प्र० सेविप्यते सेविष्येते सेवियन्ने
म. पठष्यसि पठिष्यथः पठिप्यथ म० सेविष्यसे सेवियेथे सेविप्यध्वे
उ० पठिष्यामि पठिष्यावः पठिष्यामः उ० सेविष्ये सेविण्यावहे सेविष्यामहे
परस्मै में लिख इत्यादि के लेखिष्यति इत्यादि, कुप इत्यादि के
कोपिष्यति इत्यादि, कथ इत्यादिके कथयिप्यति इत्यादि, और उभयपद में
क्रमसे चुर् इत्यादिके चारयति, चारयिभ्यते इ० रूप होते हैं ।
.
2
ऋजुव्याकरणम् ॥ उभय में क्रम में ग्रहके ग्रहोष्यति, ग्रहीष्यते इत्यादि रूप ले जाओ। गम् और हन् ये धातु सामान्य भविष्य और क्रियातिपत्तिमे सेट होते है और उनके क्रमसे गमिष्यति और हनियति इत्यादि रूप होते है। हप इत्यादि के हर्पिति इत्यादि रूप होते है ॥ वृत्के वर्तिभ्यते वा वय॑ति इत्यादि और वृधके वाध्यते वा वत्स्य॑ति इत्यादि रूप होते है (अ)। ऐसे ही नृत् इत्यादिके परस्मैक में नर्तिप्यति वा नयति इत्यादि दो २ रूप होते है ॥ (अ) वृत् और वृध ये सामान्य भविष्य और क्रियातिपत्ति मे उभयपदी होते है । परन्तु परस्मैपद मे अनिट् और आत्मनेपद मे सेट होते है ।
ऋव्याकराम संस्कृत में infatuart वाक्यरचना। अव्यय-मन (निश्चय करके ) ॥ दृषणाम् (चुप ॥ वाय॥ हिन्दी कं करिष्यन्ति वक्तारा यदि मथुगको कत्र जानोगे? प्रोता न विद्यते॥ IYout: Mithurts योऽपराधं करि प्यति स ध्रुवं कब में श्रीवृन्दावन देखूगा ? दण्डयो भविष्यति ॥ When shall I see Vrimtarit अवश्यमविमृश्यकारी अनुवापं तुमको पुस्तक देऊंगा; तुम मुझे गमिष्यति ॥ उसका मूल्य देना। हिरण्यको वदति, छेत्स्यामि I shall give fress the book. You wl. ISH It it'. पाशान्दन्तेन (अ)॥ देवदत्त तुभ्यम् (प्रा) पुस्त- यदि पत्र लिखागे तो उसका कमद्य दास्यामि ॥ उत्तर देऊंगा। If you will write a letter tille, कथं मम (इ) मनोरथाः सेत्स्यन्ति ॥ Itali reply to it. यदि चुप रहोगे तो मैं भी चुप रहूंगा। If you keep silent I toe shall the stu. (अ) क्रियाके सिद्ध करने में जो कर्ता का सबसे बड़ा सहायक हो उसे करण कहते है। करण मे तृतीया विभक्ति लगती है। (आ) देय वस्तु जिस पात्रको दी जाती है वह संप्रदान कहाता है। संप्रदान मे चतुर्यो विभक्ति लगती है। (इ) सम्बन्ध अर्थ मे षष्ठी विभक्ति लगती है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ षइविंश पाठ ॥ संज्ञा ऊकारान्त शब्द स्त्री० ( वधू) स्त्री० (भू) द्वि० द्वि० वधूभ्याम् वधूभिः तृ० भुवा भूभ्याम् भूमि भुवे, वधूभ्याम् वधूभ्यः भूभ्याम् भूभ्यः भुवै । तृ० वध्वा , च० वश्व पं० वध्वाः वधूभ्याम् वधूभ्यः भुवः, भुवाः भूभ्याम् भूभ्यः प० वध्वाः वध्वोः वधूनाम् ष० भुवः, भुवाः भुवो भुवाम्, भूनाम् स० वध्वाम् वध्वोः वधूषु भुवि, भुवां भुवाः ~ भ्रू इत्यादि शब्दों के रूप भू शब्द के समान होते हैं । दीर्घ ऊकारान्त पुल्लिङ्ग प्रतिभू इत्यादि शब्दोके रूप चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी और सप्तमोके एकवचनमें और षष्ठोके बहुवचनमे केवल एक ही एक प्रतिभुवे, प्रतिभुव, प्रतिभुवः और प्रतिभुवि और प्रतिभुवां ये रूप होते है दूसरे रूप नहीं होते है ॥
अमूभ्याम् प्रमाभ्यः ष० प्रमुग्य ऋजुव्याकरणम् ॥ सर्वनाम-पदस शब्द ॥ पुं० तथा नपुं० स्त्रो० द्वि० द्वि० तृ० अमुना अमूभ्याम् अमोभिः तृ० प्रमुया अमूभ्याम् अमूभिः च० अमुष्मै च० अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः पं० अमुष्मात् प्रमभ्याम् अमीभ्यः प० अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः अमुयो अमोपाम् प० अमुप्याः प्रमुयोः अमूषाम् स. प्रमुष्मिन् प्रमुयोः प्रमोषु स० अमुप्याम् प्रमुयोः अमूषु क्रिया। क्रियातिपत्ति (अ)॥ स्वरान्त पनिट धातु ॥ उभयपदी ( नी)। परस्मै प्रात्मने ए० द्वि० द्वि० प्र०पनेष्यत् (प्रा) अनेष्यताम् अनेष्यन् प्र०अनेप्यत अनेप्येताम् अनेष्यन्त म०प्रनेष्यः अनेप्यतम् अनेण्यत म०प्रनेण्यथाः अनेष्येथाम् अनेप्यध्वम् उ०अनेष्यम् अनेष्याव अनेप्यामउसनेये अनेष्यावहि अनेप्यामहि (अ) कारण क्रियाके न होनसे कार्य क्रियाका न होना बतलाने के लिये क्रियातिपत्ति लकारका प्रयोग किया जाता है । यथा-सुवृष्टिश्चदर्भावष्यत् तदा गर्नु भजमविध्यत् र्याद सुवृष्टि होती तो सुभिक्ष होता । अर्थात न वृष्टि अच्छी भई न अनाज सस्ता भया। यहा कारणरूप वाष्टके न होने से कार्यरूप शस्यका न होना बोध होता है । (आ। क्रियातिपत्तिमें अनद्यतनभृतके समान धातुओं के पूर्वमें अ लगता है। तथा वातुके आदि में स्थित इ, ई, वा ए, के स्थान में ए और 3, ऊ, वाओं के स्थानमें औ आदेश होता है। क्रियातिपत्तिमें धातुओंके उत्तर सामान्य भविष्य के समान स्य लगता है। अनद्यतनभृतकालकी विभक्तियों के समान विक्तिया मी इसके अन्त में पाई जाती है । कपो में देवा ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥
ऐसे हो उभय० में दा धातुके क्रम ने अदास्यत्, अदास्यत इत्यादि और
परस्मै०में गै धातु के अगास्यत् इत्यादि रूप होते है ।
स्वरान्त सेट् धातु।
उभयपदी॥
(श्रि)
परमै
मात्मने
.
का
প্ল সুগযিমৰ ত্ৰিতা মাহমুদ प्र० अधयिष्यत अधयिष्येताम् अयिष्यन्त
ও গাথা अवयिष्यतम् अविषपत ও সুবিধা অসুবিধা সুখি
अ० अधयिष्यम् अवयिष्याव যােত ক্ষতি সুস্বচ্ছায় হিচ্ছালায়
परस्मै भू धातुके अभविष्यत् इत्यादि और उभय० में कृ इत्यादिके
क्रमसे अकरिग्यत् इ० और प्रकरिष्यत इत्यादि रूप क्रमसे होते है ॥
व्यञ्जनान्त अनिट् धातु ॥
उभयपदी वपके क्रमसे अवप्स्यत् इत्यादि और अवप्स्यत इत्यादि रूप
होते हैं।
परस्मै में आपके प्राप्स्यत् इत्यादि और प्रात्मने में लभके अलप्स्यत
इत्यादि रूप होते है और उभयपद में क्रमसे वच्के प्रवक्ष्यत् अवक्ष्यत
इत्यादि और वह के भी रूप वचके तुल्य हो हात है । ऐसे हो शक्के
अशधयत् इ० और त्यज्के प्रत्यक्षत् इत्यादि रूप ले जाओ।
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२१ ऋजुव्याकरणम् । व्यञ्जनान्त सेट् धातु ॥ आत्मनेपदी सेक्के असेविष्यत इत्यादि; परस्मैपदी पठ्के अपठिन्यत् इत्यादिः गम्के प्रगमिप्यत् इ० और इनके अहनिष्यत् इत्यादि रूप होते हैं। वाक्यरचना॥ वाक्य॥ संस्कृत हिन्दी यद्यहं तत्र नाभविष्यं चारः सर्व- यदि मैंने दिया होता तो तुम पाते। महरिष्यत् । It 1 hul olen you theu voli यदि त्वं स्वयमेतन्नावदिष्यस्तर्हि स्वwould late got it म्योपमर्दकोऽभविष्यः (अ) यदि वह विष खारे होता तो अवश्य अस्माकं सुहृच्चेदजीविप्यत् अनाथा मर जाता। नाभविष्याम (प्रा)। It be liad taken poison he would then certainly have died यदि त्वं म्वजातिं नात्यक्ष्यस्तहीदृश- मपमानं किमलप्स्यथाः। यदि वह पढ़ता तो विद्वात् होता। If he had studied he would are become a learned man. यदि तुम मांगते तो पाते। If you had asked you roull liar obtained it -- (अ) स्व (आप वा अपना शन्द ए पूर्व शब्द के समान होते है । देखा ऋजुन्या० द्वितीय भाग ३६ पाठ में प्रव शब्द का रूप रचना ॥ ( श्रा) अनद्यतन भावध्यादि छलकाग में अस धातुके रूप नहीं होते, परन्तु उनके स्थान में भू धातुके रूप आदेश होते है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ सप्तविंश पाठ॥ संज्ञा॥ ऋकारान्त शब्द॥ B । पुं० (दातृ) oি दात्रा दातृभ्याम् दातृभिः दात्रे दातृभ्याम् दातृभ्यः प. दातुः दातृभ्याम् दातृभ्यः दातुः दात्रोः दाताणाम् सप्त दातर दात्रो दातृषु ह्रस्व ऋकारान्त पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्दोंके रूप दातृ शब्द के समान होते है। केवल नृ शब्दको षष्ठी के बहुवचनमें नृणाम् वा नृणाम् यां दो रूप होते हैं इतना भेद सर्वनाम ॥ ( यद् ) शब्द ० तथा नपु० स्त्री० द्वि० द्वि० याभ्याम् यः तृ० यया याभ्याम् याभिः याभ्याम् येभ्यः याभ्याम् याभ्यः प० यस्मात् याभ्याम् येभ्यः पं० यस्याः याभ्याम् याभ्यः ययाः येपाम् ष० यस्याः ययोः यासाम सक्षः यस्मिन् ययोः येषु सप्तः यस्याम् ययाः यासु तृ० येन च० यस्मै च० यस्यै
ऋजुव्याकरणम्॥
२३
क्रिया॥
प्राशिस् ॥
मनिट धातु (अ)॥
द्वि०
उभयपदी ॥
(नो)
परस्मैपद ॥
मान्मनेपद ॥
द्वि०
प्र० नीयात् नीयास्तां नीयासुः प्र. नेपोष्ट नेषीयास्ताम् नेपोरन्
म. नीयाः
नीयास्तम् नीयास्त म. नेपोष्ठाः नेपोयास्थाम् नेषोढवम्
उ० नश्यासं नोयास्व नीयास्म उ० नेषीय नेषोवहि नेषीमहि
ऐसे हो परस्मै० में जि, श्रि इ० के जोयात्, श्रीयातू इत्यादि और भू
के भूयात् इत्यादि रूप होते हैं ।
परस्मैपदमें दा के देयात् इत्यादि और स्था के स्थेयात् इत्यादि रूप
होते है।
पानार्थक पाके पेयात् इत्यादि, पालनार्थक पाके पायात् इत्यादि, परन्तु
झा इ० कई धातुओं के ज्ञायात् और शेयात् इत्यादि दो २ रूप होते है ।
कृ धातुके परस्मैपदमे क्रियात् इत्यादि, परन्तु स्मृ इत्यादि कई धातुओं
के स्मर्यात् इत्यादि रूप होते है ॥
प्रात्मनेपदमें दा इत्यादिके दासीष्ट इत्यादि और कृ इत्यादि के कृपोष्ट
इत्यादि रूप होते हैं।
(अ) परस्मैपदियो के बीच इस लकार में कोई भी धातु मेट नहीं है ।।
२४
ऋजुव्याकरणम् ॥
ब०
व्यञ्जनान्त धातु ॥
( वप)
परस्मै
प्रात्मने
द्वि०
द्वि०
प्र० उप्यात् उप्यास्ताम् उप्यासुः प्र०वप्सीप्ट वप्लीयास्ताम् वसीरन्
म० उप्या: उप्यास्तम् उप्यास्त म०वप्सीष्ठाःवप्सोयास्थाम् वपलीध्वं
उ० उप्यासम् उप्यास्व उप्यास्म | उ० वपसोय वपसीवहि वप्सीमहि
परस्मैपद में वच् वद् वस और वह इत्यादि धातुओं के क्रमसे
उच्यात्, उद्यात्, उष्यात्, उह्यात् इत्यादि पृथक् २ रूप होते हैं ।
परस्मैपदी पके पठ्यात् इत्यादि और लिखके लिख्यात् इत्यादि रूप
होते है॥
सेटधातु ॥
स्वरान्त॥
अात्मनेपद में श्रि इत्यादि के श्रयिषोष्ट श्रयिषोयास्ताम् श्रयिषीरन्
इत्यादि और पू इत्यादिके पविषोष्ट इत्यादि रूप होते हैं ।
व्यञ्जनान्त ॥
प्रात्मनेपदमें सहके सहिषीष्ट इत्यादि और सेवके सेविषीष्ट इत्यादि
रूप होते है।
ऋजुव्याकरसम्॥ वाक्यरचना। वाक्य। संस्कृत। हिन्दी॥ सुखं युमभ्य ( अ ) विद्यार्थियों हे वीर तुम शत्रुओ को जोतो। भूयात् ॥ Outrity tat)! on ner ईशस्त्वाम् पायात् ॥ त्वं सर्वोपरि स्थेयाः॥ हे मित्र तुमको सुख हो । शाग्दास्माकबदने सन्निधि (Other Intye st till obtain hap- क्रियात् ॥ int हे विद्वन् दाता तुमको धन देवे॥ O leadvent will may the guerulis I DIW ten riclie's हे पायुप्मन् सैो वर्ष जोनो॥ O chini, miltst thu live a hugdeed yeus (अ) मुख हित इत्यादि शो के योग मे चतुयी विक्ति होती है ।।
२६ ऋजुव्याकरणम् ॥ च० गवे प० गो षक सप्त गवि अष्टाविंश पाठ॥ संज्ञा॥ मोकारान्त और नौकारान्त शब्द ॥ पुवा स्त्री० गो स्त्रो० नौ द्वि० ए० द्वि० तृ० गवा गोभ्याम् गोभिः तृ० नावा नाभ्याम् नाभिः गोभ्याम् गोभ्यः च० नावे नोभ्याम् नाभ्यः गोभ्याम् गोभ्यः पं० नाव नोभ्याम् नैौभ्याम् नाभ्यः गोः गवा: गवाम् नाव: नाव: नावाम् गवो गोषु सप्त० नावि नावाः नौषु मोकारान्त और नौकारान्त शब्दों के रूप गो शब्द और नौ शब्दके समान क्रम से होते हैं। सर्वनाम ॥ इदम् शब्द॥ पुं० तथा नपुं० स्त्री० द्वि० द्वि० अनेन । अनय प्राभ्याम् पभिः तृ प्राभ्याम् ग्राभिः एनया अस्मै प्राभ्याम् अस्यै प्राभ्याम् प्राभ्यः पं० अस्मात् ग्राभ्याम् एभ्यः प० अस्याः प्राभ्याम् प्राभ्य: अनयाः अनयाः एषाम् प० अस्याः प्रासाम् एनयाः एनयाः अनयाः प्रनयोः सप्तक अस्मिन् सप्त० अस्याम् प्रासु एनयाः एनयाः एनेन | च० ऋजव्याकरणम्॥ २७ क्रिया॥ परोक्षभूत (अ)॥ स्वरान्त धातु। म० आकारान्त उभयपदी दा॥ परस्मै० अात्मने द्वि० द्वि० प्र० ददौ प्र० ददे ददाते ददिरे ददिथ, म. ददिषे ददाथे ददिध्वे ददाथ उ० ददौ ददिव ददिम । उ० ददे ददिवहे ददिमहे उभयपदी धा धातुके क्रमसे दधी इत्यादि और दधे इत्यादि, हा धातु के जो इत्यादि और जज्ञे इत्यादि रूप होते हैं । परस्मै धातुके तस्था इत्यादि रूप होते हैं। या यया बमा जनो दमा दया जगो " गै (अ)जो क्रिया बोलने के समय से आठ प्रहर पूर्व हो चुकी हो और बक्ताके प्रत्यक्ष नहीं हुई हो, उसका प्रयोग प्ररोक्षमृत लकार में किया जाता है ।
ऋजुव्याकरणम्॥ इकारान्त उभयपदी श्रि परस्मै प्रात्मने० ए० fo द्वि० प्र० शिश्राय शिश्रियतुः शिश्रियुः प्र शिश्रिये शिश्रियाते शिश्रियि शिश्रियः म. शियिथ शिधियथुः शिश्रियमशिधियिषे शिश्रियाथे शिश्रियित् शिश्राय, शिश्रियिव शिश्रियिम उ० शिश्रिये शिश्रियिवहे शिश्रियिम. शिश्रय ईकारान्त उभयपदी नी परस्मै प्रात्मने द्वि० द्वि० प्रा निनाय निन्यतुः निन्युः निन्याते निन्यिरे निनयिथ, निन्यिध्वे, निन्यथुः निन्य म. निन्यिषे निन्याथे निन्यित्वे प्र० निन्ये निनेथ । निनाय, निन्यिव निन्यिम निनय उ० निन्ये निन्यिवहे निन्यिमहे परस्मैपदी जिके जिगाय जिग्यतुः इत्यादि; और आत्मनेपदी स्मि धातुके सिमिये इत्यादि तथा शोके शिश्ये इत्यादि; और उभयपदी क्रोके क्रमसे चिकाय और चिक्रिये इत्यादि रूप होते है ।
ऋजुन्याकरणम्॥ २९ हस्व उकारान्त परस्मै० श्रु -- शुश्राव शुश्रुवतुः शुश्रुत्रुः शुश्रोथ যঃ शुश्रुव शुश्राव, शुश्रुव शुश्रुम शुधव परस्मै ऊकारान्त भू ऋकारान्त त द्वि० बभूवतुः बभूवुः प्र० ततार तेरतुः मा तेरिथ तेरथुः म० बभूविथ बभूवयुः बभूव ततार, तरिव उ० बभूव बभूविव बभूविम ततर उभयपदी प्र० बभूव तेरुः तेर तेरिम परस्मै० द्वि० चक्रतुः चक्रथुः प्रात्मने० द्वि० चक्राते चक्रिरे चक्राथे चकूद चक्रुः प्र.चके म.चकृपे म. चकर्थ उचक्र वकृवहे चकृमहे परस्मै० सके ससार सनतुः इत्यादि रूप होते हैं।
३०
ऋजुव्याकरणम् ॥
उभय हके परस्मै में जहार जहतुः इत्यादि और आत्मनेपद में जह
जहाते इत्यादि रूपमसे होते है । परन्तु परस्मैक और प्रात्मके उ०
पु० के द्वि० और ब० व० में क्रमसे जहिव, जह्निम, जहिवहे और
जाहिमहे ये रूप होते है । और पात्मने के म० पु० ए० व०में जहिषे ऐसा
कप होता है।
।
ऋजुब्याकरणम् ॥ ३१ ऊनत्रिंश पाठ॥ संज्ञा॥ चकारान्त शब्द॥ स्त्री० त्वच॥ तृक ए० द्वि० त्वचा त्वरस्याम् त्वग्भिः त्वचे त्वग्भ्याम् पं० त्वचः (अ) त्वग्भ्याम् त्वग्भ्यः त्वचाः त्वचाम् सत्ता त्वचि त्वचाः त्वक्षु प्रायः चकारान्त पुं० नपुं० वा स्त्री० शब्दों के रूप त्वच शब्द के समान होते हैं। जकारान्त शब्द। पुं० वणिज पुं० सम्राज़ ए० द्वि० द्वि० तृ वाणिजा वणिग्भ्याम् वणिग्भिः तृ सम्राजासम्राड्भ्याम् सम्राभिः च० वणिजे वणिग्भ्याम् वणिग्भ्यः च० सम्राजे सम्राड्भ्याम् सम्राड्भ्यः पं० वणिजः वणिग्भ्याम् वणिग्भ्यः पं० सम्राजः सम्राड्भ्याम् सम्राड्भ्यः ष० वणिजः वणिजार वणिजाम् प० सम्राजः सम्राजोः सम्राजाम् सप्त वणिजि वणिजोः वणिक्षु सप्त सम्राजि सम्राजोः सम्राट्सु ब० (अ) व्यञ्जनान्त शब्दों के रूप प्रथ० द्विती० के ब० व० मे और प०प० के ए. व० मे बहुधा समान होत परन्तु कहीं २ भेद भी होता है । 8 ऋजुव्याकरणम् ॥ जकारान्त पुं० नपुं० वा स्त्रीलिङ्ग शब्दोके रूप वणिज शब्दके समान होते है । सम्राज शब्दके रूपोंमें जो भेद होता है सेा दिखा दिया । परिवाज इत्यादि शब्दोके रूप सम्राजके समान होते है ॥ किया। परोक्षभूत॥ व्यञ्जनान्त धातु॥ व परस्मै प्रात्मने द्वि० ऊपाते ऊपतुः Cउवाप 4. ऊपे पिरे उपिथ, -ऊपथुः म ऊपिषे ऊपाथे ऊपिध्वे उवप्थ mymarr ऊपिव उ० ऊपे पिनहे पिमहे ऐसे हो उमय० वचके पर में ज्वान उचतुः इत्यादि, मध्यमपुरुष कवचन उवचिथ वा उवक्थ । आत्मनेपद में ऊचे ऊवाते चिरे इत्यादि। पटक बस् के उवास ऊपतुः इत्यादि । मध्यम पु० ए० व० में उवलिथ वा उवस्थ ॥ उभय वह के परम में उवाह उहतुः इत्यादि । मध्यम पु० १०० में हिथ वा उवोट । प्रात्मनेपदमें ऊहे ऊहाते इत्यादि ॥ परस्म वद् के उवाद ऊदतुः इत्यादि रूप होते है। मध्यम पु० ए०२० में केवल उदिध ऐसा एकही रूप होता है ।
ऋजुव्याकरणम्॥ द्वि० पेचतुः यात्मने द्वि० पेचाते प्र० पपाच पेचुः प्र० पेचे पेचिरे पेचिथ, पेचथुः पेच मा पेचिषे पेचाथे पेचि वे पपाच, पेचिव पेचिम उ०पेचे पेचिवहे पेचिमहे एसे हो परस्लैमें शकके समाक शेकतुः इत्यादि । मध्यम पु० के एक व० में किथ वा शशस्थ ॥ दद् के ददाह देहनुः इत्यादि । मध्यम पु० ए० ब० में देहिथ वा ददग्या । पत्के पपात पेनतुः इत्यादि । मध्यम गु० एक व० में पेतिथ । नशके ननाश नेशतुः इत्यादि । मयम पु० ए० व० में शिथ वा बनष्ट रूप होते है ॥ चर्चचार चेरतुः इत्यादि । मध्यम पु० ए०६० मैं चेरिय । ऐले डो पठ् इत्यादि के पपाठ पेठतुः ३० म० पु० ए० ० पेठिथ रूपले जायो। आत्मनेपदी रम् के रेमे रेमाते इत्यादि। ऐसेही मन् के मेने मेनाते इत्यादि । सह के सेहे सेहाते इत्यादि । और लम् इ० के लेभे लेभाते इत्यादि रूप होते हैं। उभयप० तन् के ततान तेनतुः इत्यादि। मध्यम पु० ए० व० में तेलिय। और मात्मनेपद में तेने तेनाते इत्यादि रूप क्रमसे ले जाओ।
३४ ऋजुव्याकरणम्॥ परस्मैपदी (गम्) द्वि० प्र० जगाम जग्मतुः जगमिथ, जग्मथुः (हस्) द्वि० जहसतुः जहसुः प्र० जहास जग्म म. जहसिथ जहसथुः जहस जगाम, जग्मिव जहास, जग्मिम उ० जहस जहसिव जहसिम हन् के जघान जन्नतुः इत्यादि । मध्यम पुरुष एकवचन में जघनिथ वा अधन्थ । गद् के जगाद जगदतुः इत्यादि । मध्यमपुरुष एकवचन में जगदिथ । त्यज के तत्याज तत्यजतुः इत्यादि । मध्यमपुरुष एकवचन में तत्यजिथ वा तत्यक्थ॥ (ग्रह) जगृहिध्वे, परस्मैपदी आत्मनेपदी oি एक द्वि० प्र०जनाह जगृहतुः जगृहुः प्र० जगृहे जगृहाते जगृहाते जगृहिरे म० जग्रहिथ जगृहथुः जगृह म. जगृहिषे जगृहाथे जग्राह, जगृहिढवे जगृहिव जगृहिम जग्रह उ० जगृहे जगृहिवहे जगृहिमहे ऐसेही वृत के ववृते ६० रूपले जायो । मध्यमपुरुष बहुवचन में केवल ववृतिध्वे ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ भि परस्मैपदी आत्मनेपदी॥ द्वि० द्वि० प्र० बिभेद बिभिदतुः बिभिदुः प्र० विभिदे बिभिदाते बिभिदिरे म० विभेदिय बिभिदथुः बिभिद म बिभिदिषे विभिदाथे बिभिध्वेि उ० बिभेद बिभिदिव बिभिदिम उ० बिभिदे बिभिदिवहे बिभिदिमहे उमय० छिद् इत्यादिके चिच्छेद चिच्छिदतुः इत्यादि और चिच्छिदे इत्यादि; क्षिप् इत्यादिके चिक्षेप, चिक्षिपतुः इत्यादि और चिक्षिपे इ० दिश इत्यादि के दिदेश इत्यादि और दिदिशे इत्यादि क्रमसे रूप होते हैं तथा परस्मैपदी विशके विवेश इत्यादि रूप ले जायो । परस्मैपदी॥ प्र० ससर्ज म. दृश सृज द्वि० ए० द्वि० प्र० ददर्श दहशतुः ददृशुः ससृजतुः ससृजः ददर्शिथ, सर्जिथ, दृशथुः दद्दश ससृजथुः ससृज सनष्ठ उ० ददर्श दशिव ददृशिम उ० ससर्ज समृजिव ससृजिम कृष् इत्यादिके चकर्ष, चकृषतुः इत्यादि मध्यमपुरुष एकवचन चर्षिय । हृष इत्यादि के जहर्ष इ० । म० पु० ए० व० जहर्षिथ। स्पृश इत्यादिके पस्पर्श, पस्पृशतुः इ० । म पु० ए० व० पस्पर्शिथ ।
ऋजुव्याकरणम्॥ त्रिंश पाठ॥ संशा॥ तकारान्त शब्द। स्त्री० सरित् ॥ द्वि० सरिता सरिभ्याम् सरिद्भिः सरिते सरिभ्याम् सरिद्भ्यः सरितः सरिभ्याम् सरिद्भ्यः सरितः सरिताः सरिताम् सरिति सरिताः सरित्सु ऐसेही सब तकारान्त शब्दोके रूप होते हैं। पं० दकारान्त शब्द॥ पुं० सुहृद् द्वि सुहृद्भ्याम् सुहृद्भिः सुहृदे सुहृद्भ्याम् सुहृद्भ्यः सुहृद्भ्याम् सुहृद्भ्यः सुहृदाः सुहृदाम् सुहृदि सुहृदाः ऐसेही सब दकारान्त शब्दोंके रूप होते हैं सप्तक ऋजुव्याकरणम् ॥ धकारान्त शब्द॥ स्त्री० क्षुधा द्वि० क्षुधा क्षुद्भ्याम् क्षुद्भिः क्षुधे क्षुभ्याम् क्षुद्भ्यः क्षुद्भ्याम् क्षुभ्यः क्षुधः क्षुधाः क्षुधाम् क्षुधि क्षुधाः ऐसे ही सब धकारान्त शब्दों के रूप होते हैं। पं० क्रिया॥ परोक्षभूत ॥ परस्मैपद ॥ द्वि० वारयाञ्चक्रतुः चारयाञ्चक्रथुः 띵 핑녕 चारयाचक्रुः चारयाञ्चक्र चारयाञ्चकार चारयाञ्चकर्थ चारयाञ्चकार, चारयाञ्चकर चारयाचकृव चारयाश्चम ए० चारयाञ्चके चारयाञ्चकृषे चारयाञ्चके आत्मनेपद ॥ द्वि० चारयाश्चक्राते चारयाचक्राथे चारयाञ्चकृवहे चारयाञ्चक्रिरे चारयाञ्चकृढ्वे चारयाञ्चकमहे ऋजुव्याकरणम् ॥ चुरादिके सब धातुओंके और शेष नव गणेके उन धातुओंके जिनमें एकसे अधिक स्वर पाये जावे और अय् (गत्यर्थक आत्मनेपदी भ्वादि) प्रास् (आत्म० पदादि ) आदि कुछ भातुओ के रूप परोक्षभूत में चुर् के समान होते हैं । परस्मैपदी धातु हो तो परस्मैपदके समान, और प्रात्मने- पदी धातु हो तो आत्मनेपद के समान, और उभयपदी धातु हो तो दोनों पदों के समान रूप होते हैं । यथा-चुरादिगणोय कथ धातु के रूप कथयाञ्चकार इत्यादि। अदादिगणीय परस्मै० चकास् (चमकना) के चकासाञ्चकार इत्यादि, और पास् के पासाञ्चक्रे इत्यादि रूप होते हैं । ऊपर दिखाये रूपों से अतिरिक्त चुर् धातुके और भी दो २ रूप होते हैं। यथा- परस्मैपद॥ Sune एक प्र० चारयाम्बभूव म० चारयाम्बभूविथ उ० चारयाम्बभूव द्वि० चोरयाम्बभूवतुः चारयाम्बभूवथुः चारयाम्बभूविव चारयाम्बभूवुः चारयाम्बभूव चारयाम्बभूविम परस्मैपद् ॥ द्वि० चारयामास म. चोरयामासिथ चारयामास चारयामासतुः चारयामासथुः चारयामासिव चारयामासुः चारयामास चारयामासिम ऋजुव्याकरणम्॥ ऐसेहो चुरादिके सब धातुओं के और शेष नव गणोंके उन धातुओं के जिनमें एकसे अधिक स्वर पाये जावें और अय् प्रास् मादि कुछ धातुओं के रूप भी परोक्षभूत में ऊपर दिखाये चुर् धातुके रूपोंके समान होते हैं । यथा-कथयाम्बभूव, कथयामास इत्यादि । और चकासाम्बभूव, चकासामास इत्यादि । प्रासाम्बभूव, आसामास इत्यादि । धातु चाहे किसी पदका क्यों न हो परन्तु बभूव व पास वाले रूप नित्य परस्मैपद हो में होंगे।
ऋजुव्याकरणम्॥ वाक्यरचना॥ अव्यय-प्रसह्य ( वलात्कारसे), ह (प्रसिद्धिबोधक) वाक्य॥ संस्कृत हिन्दी चिक्रीडु ालकास्तत्र उन्होंने उसके पानेका प्रयोजन ननृतुंर्जहसुश्च ते ॥ पूछा। फलानि पेतुर्वृक्षेभ्यो (अ) He asked him the object of his जगृहुस्तानि बालकाः visit मोदकान् सा ददौ तस्मै कुरुक्षेत्रके युद्ध में पाण्डवोंने जीता। भक्ष्यांश्च विविधाञ्छुभान् ॥ ऊचतुस्तौ महात्मानं The Pandavas gained the victory in the war of Kurukshetra. विश्वामित्रमिदं वचः॥ शय्यायां स शिशुः शिश्ये॥ अगस्त्यने सर्व वृतान्त कहा और प्रागते च ततो विप्रे मुनियोंने सुना ॥ देवः साधो ववर्य ह॥ Agastya related the whole story बाल्मीकिः पूजयामास and the Munis listened to it. नारदं ब्रह्मणः सुतम् ॥ उन दोनोंने आपस में परामर्श नागाझिगाय गरुड़ो किया। उनमें से एक बोला। भक्षयामास तांस्ततः ॥ The two persons counselled सचिरं चिन्तयामास among themselves And one of शोकेन ब्याकुलस्तदा ॥ them spoke (अ) जिस सकाश (समीप) से विभाग होता है उसको अपादान कहते है । अपादान अर्थ में पञ्चमी निभक्ति लगती है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ ४१ वाक्यरचना॥ वाक्य॥ संस्कृत हिन्दी ते मिथा मन्त्रयाञ्चक्रिरे हृदमें मगरने हाथो के पैरको भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ॥ पकड़ा और उसे खींचा॥ इमं श्लोकं जगुः शिष्याः The alligator seized the ele- शुश्रुवुश्च महर्षयः (सं) (३६) phant by his leg and drew ham शशंस सर्वमादित्य into the lake सीताने मृगको देखा और राम- शर्मा स शिवशर्मणे (अ)॥ से कहा, इसे पकड़ा गिरा संस्कृतया राजा दो॥ प्रश्नं पप्रच्छ पण्डितम् (आ)॥ Sita saw the deer and said to प्रसह्य सिंहः किल गाञ्चकर्ष ॥ Rama “catch it and present it और मुझे to me (स) (३६) अ वा श्रा के अनन्तर यदि ऋ आवे तो दोनों मिलके अर् हो जाता है। यथा देव+ऋषि -देवर्षि., महा+ऋषि महर्षि. ॥ (अ) जिस उद्देश्यसे वा जिसके उद्देश्यसे क्रिया किई जावे वह चतुर्थी विभक्ति लेता है ॥ (आ) प्रच्छ इत्यादि धातुओं के दो २ कर्म होत हैं । इस वाक्य मे प्रश्न और पण्डित दोनों पप्रच्छ के कर्म है।
હર ऋजुव्याकरणम्॥ एकत्रिंश पाठ॥ संशर॥ नकारान्त शब्द। • জন पुं० प्रात्मन् द्वि० ब राजभ्याम् राजभिः तृ० ग्रात्मना प्रात्मभ्याम् अात्मभिः राजभ्याम् राजभ्यः च आत्मने आत्मभ्याम् पात्मभ्यः राजभ्याम् राजभ्यः पं० प्रात्मनः प्रात्मभ्याम् प्रात्मभ्य' राज्ञो राज्ञाम् प. प्रात्मनः प्रात्मनः प्रात्मनाम् च. राजे पं० राज्ञः राजनि, सप्तक যদি राज्ञोः राजसु सप्त प्रात्मनि प्रात्मनः प्रात्मसु पुं० श्वन् पुं० युवन् द्वि० द्वि० तृ० शुना च० शुने तृ० यूना युवभ्याम् युवभिः च. यूने युवभ्याम् युवभ्यः पं० यूनः युवभ्याम् युवभ्यः यूनाः यूनाम् सप्त० यूनि यूनाः युवसु पं० शुनः ष० शुनः श्वभ्याम् श्वभिः श्वभ्याम् श्वभ्यः श्वभ्याम् श्वभ्यः शुनाः शुनाम् शुनो ध्वसु ष० यूनः सप्त० शुनि ४३ ऋजुव्याकरणम्॥ पुं० स्वमिन् पथिन् द्वि० द्वि० तृ स्वामिना स्वामिभ्यां स्वामिभि. • तृ० पथा पथिभ्यां पथिभिः च० स्वामिने स्वामिभ्यां स्वामिभ्यः च० पथे पथिभ्यां पथिभ्यः पं० स्वामिन स्वामिभ्यां स्वामिभ्यः पं० पथः पथिभ्यां पथिभ्यः ष० स्वामिनः स्वामिनाः स्वामिनाम् प० पथः पथा: पथाम् सप्त स्वामिनि स्वामिनाः स्वामिषु पथा पथिषु नकारान्त पुल्लिङ्ग वा नपुंसक शब्द जिनके अन्त में इन् हो उनके रूप स्वामिन् शब्दके समान होते हैं । पथिन् शब्दके रूपोंमें जो भेद होता है से ऊपर दिखा दिया । सप्त पथि नकारान्त पुल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्ग वा नपुंसकलिङ्गमें जो शब्द राजन् शब्दके गणके हैं उनके राजन् के समान और जो आत्मन् शब्दके गणके हैं उनके आत्मन्के समान रूप होते हैं। नपुं० प्रहन् ए० द्वि तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठो सप्तमी अहोभ्याम् अह अहोभ्याम् अहोभ्याम् अह्नो अह्नि, वा अहनि अह्नो प्रहाभिः अहोभ्यः अहोभ्यः अहःसु, वा अहस्स ऋजुव्याकरणम् ॥ क्रिया सामान्यभूत (अ) स्वरान्त धातु॥ प्र० अदात् म० अदाः उ० प्रदाम् वि० अदाताम् अदातम् प्रदाव प्रात्मने द्वि० प्र० अदित अदिषाताम् अदिपत प्रदात म अदिथाः अदिषाथाम् अदिढ्वम् अदाम उ० अदिषि अदिष्वहि अदिष्महि ऐसे ही धा के अधात् इत्यादि और अधित इत्यादि रूप क्रम से होते है ॥ पानार्थक पा और स्था इनके रूप क्रम से अपात् इत्यादि और अस्थात् सत्यादि पर० में होते है। परस्मै प्राताने द्वि द्वि० ৪০ সাল অনিলু সাবি: সু খুজার মাদারা জান म. अज्ञानीः प्रजासिष्टम् अज्ञासिष्ट मा प्रज्ञास्थाः अज्ञासाथाम् अज्ञाध्यम् उ अशामिपम् प्रशासिव जाति उ० प्रज्ञासि अज्ञास्वहि अज्ञासहि (अ) सामान्यभूत लकारमे भी अनद्यतनभूत लकार की भाति धातुके पूर्व प्रकार लगता है तथा धातुके आदि मे स्थित इ, ई, वा ए के स्थानमे ऐ और उ, अ, वा ओ के स्थान मे औ आदेश होता है । परन्तु निषेध वानक "मा” अव्यय के साथ सामान्यभूत लकारका प्रयोग जब होता है तब इस नियम में उन बातो मे से एक बात भी नहीं होती है। देखो ऋ० व्या० २ भाग अङ्क ५२ पृ. (अ) ले अदित वाक्य ।।
ऋजुव्याकरणम्॥
घ्राके रूप क्रमसे एक बार दाके समान अघ्रात् इत्यादि और दूसरी
चार ज्ञाके समान अघ्रासोत् इत्यादि होते हैं। शेप आकारान्त धातुओके
रूप ज्ञाके समान होते हैं।
गैके अगासीत् इत्यादि शाके ही समान होते हैं। ध्यै के रूप अध्यासीत्
इ० ले जायो॥
नी
দম
प्रात्मने
द्वि०
oি
प्र० अनैषीत् अनेष्टाम् अनेषुः प्र. अनेप्ट अनेषाताम् 'अनेपत
म. अनैषीः अनैष्टम् ' अनेष्ट मा अनेष्ठाः अनेपाथाम् अनेड्वम्
उ० अनैषम् अनैव अनैम उ० अनेषि अनेटवहि अनेमहि
ऐसे हो जि इत्यादि और भी (डरना ) इत्यादि के परस्पद में और
चि इत्यादि तथा को इत्यादि के उभयपद्म आपले बनाने क्रमसे रूप ले
जाओ॥
परस्मै
द्वि
श्रु
भू
द्वि०
प्र० अश्रौपीत् अश्रोष्टाम् अधौषुः प्र अभूत् अभूताम् अभूवन्
म० अश्रौपीः अश्रोष्टम् अनौट
অবসু অসুর
उ० अश्रोषम् अनोव
अश्रोम उ० अभूवम् अभूव
म० अभूः
ऋजुव्याकरणम्॥
ब
पू
परस्मै
प्रात्मने
द्वि०
द्वि०
प्र० अपावीत् अपाविष्टाम् अपाविषुः प्र० अपविष्ट अपविषाताम् अपविषत
अपविध्वम्
म० अपावीः अपाविष्टम् अपाविष्ट म०अपविष्टाःअपविषाथाम् अपवित्वम्
उ० अपाविषम् अपाविष्व अपाविष्म उ० अपविषि अपविष्वहि अपविष्महि
क
ब०
ब०
ए०
परस्मैपदी
आत्मनेपदी
द्वि०
द्वि०
प्र० अकार्षीत् अकार्टाम् अकार्षः प्र० प्रकृत अकृषाताम् अकृषत
म अकार्षीः अकाष्टम् अकाष्ट म० अकृथाः अकृषाथाम् अकृढ्वम्
उ० अकार्षम् अकाल
अकार्म उ० अकृषि अकृष्वहि अकृष्महि
ऋकारान्त धातुओंके ऐसे ही रूप ले जाओ। परन्तु वृ के परस्मैपदमें
अवारीत् अवारिष्टाम् इत्यादि रूप होते हैं ।
दीर्घ ऋकारान्त तृ इत्यादि के प्रतारीत्, अतारिष्टाम् इत्यादि रूप
होते हैं।
ऋजुव्याकरणम् ॥ द्वात्रिंश पाठ॥ संज्ञा॥ पकारान्त शब्द ॥ स्त्री अप् ॥ ब० व. तृ० अद्भिः च. अभ्यः प०अभ्यः ५० अपाम् सात अप्सु रेफान्त शब्द॥ स्त्री० पुर स्त्रो० गिर ए० द्वि० तृ० गिरा गीाम् गोभिः च० गिरे गीाम् गोर्यः पं. गिरः गोर्ध्याम् गीर्यः प० गिरः गिरोः गिराम् सप्तगिरि गिरोः गोषु द्वि० तृ० पुरा पूाम् च० पुरे पूर्ध्याम् पं० पुरः पूर्ध्याम् ष० पुरः पुरोः सप्तपुरि पुरोः पूर्भिः पूभ्यः पूर्यः पुराम् पूर्वा स्त्रीद्वार तृ० द्वारा च० द्वारे द्वि० द्वार्ध्याम् द्वााम् द्वाभ्या॑म् द्वारोः द्वारोः पं० द्वारः द्वाभिः द्वाभ्यः द्वार्यः द्वाराम् द्वाएं द्वारः सप्त द्वारि ऋजुव्याकरणम्॥ वकारान्तशब्द। स्त्रो० दिव ए. द्वि० दु० दिवा च. दिवे पं० दिवः दिवः सात दिवि धुभ्याम् धुभ्याम् धुस्वाम् दिवाः दिवा द्यभिः धुभ्यः द्यभ्यः दिवाम् घुघु क्रिया॥ सामान्यभूत व्यञ्जनान्त॥ वप् परस्मै० आत्मने द्वि० द्वि० प्र० अवाप्सीत् अवाप्ताम् अवाप्सुः प्र० अवप्त अवष्साताम् अवप्सत म अवाप्सीः अवाप्तम् अवाप्त म० अवस्थाः अवप्लाथाम् अवध्वम् उ० अवाप्सम् अवाप्स्व अवाप्स उ० अवप्सि अवस्वहि अवमहि आत्मने० में लभ के प्र० पु० ए० में अलब्ध और म० पु० ए० में अलब्धाः रूप होता है। शेष अलप्सानां इत्यादि रूप वप के समान होते है ।
ऋजुव्याकरणम् ॥
वद ।
ए०
परस्मै
हन् ( बध)
द्वि०
प्र० प्रवादीत् अवादिष्टाम् अवादिषुः प्र० अबधीत् अबधिष्टाम् अवधिषुः
म० प्रवादी प्रवादिष्टम् प्रवादिष्ट म० अबधी अवधिष्टम् अबधिष्ट
उ० प्रवादिषम् अवादिष्व अवादिष्म उ० अबधिषम् अबधिष्व अबधिष्म
ब्रज के और चर इत्यादि रेफान्त और चल् इत्यादि लकारान्त धातुओं
के रूप वद् धातु के समान होते है ।
क्रम् इत्यादि मकारान्त और हस, श्वस् तथा रक्ष् इत्यादि धातुओं के
रूप बध के समान होते है ।
और
सह के असहिष्ट इत्यादि; सेव के असे विष्ट इत्यादि, मुद् के अमेादिष्ट
इत्यादि रूप अपविष्ट इत्यादि के समान लेजाओ । नश, शक, गम्, श्रम्,
आप इ० कई धातुओ के रूप पठ् धातु के अनद्यतनभूत
के समान
होते है । यथा अनशत् इ०, अगमत् इत्यादि । पद् का प्र. पु० ए० अपादि;
शेष रूप अपत्साताम् इत्यादि । जन् का प्र० पु० ए० अजनि वा अजनिष्ट;
शेप रूप अजनिषाताम् इत्यादि ।
ऋजुव्याकरणम् ॥ त्रयस्त्रिंश पाठ॥ संज्ञा॥ ाकारान्त शब्द पुनपु० वा स्त्री० तादृश तादृशा ताशे ताहराः तादृशः सनः तादृशि द्वि० ताहरभ्याम् ताहरभ्याम् ताहरभ्याम् तादृशाः तादृशाः ताग्भिः ताहरल्या ताहग्स्यः तादृशाम् तादृक्षु तालव्य शकारान्त शब्दों के रूप तादृश् शब्द के समान होते हैं । षकारान्त शब्द ॥ पुं० द्विप द्वि० द्विपा द्विड्भ्याम् द्विभिः द्विये द्विड्भ्याम् द्विड्भ्यः पं० द्विषः द्विड्भ्याम् द्विड्भ्यः द्विषः द्विषः द्विषाम् सप्त द्विपि द्विषोः द्विसु प्रायः मूर्द्धन्य प्रकारान्त शब्दों के रूप द्विष शब्द के समान होते हैं।
ऋजुव्याकरणम् ॥
क्रिया॥
सामान्यभूत ॥
चुरादिगणोय धातु ॥
उभय०
रच
परस्मै
प्रात्मने
द्वि०
द्वि०
प्र. पररचत् अररचताम् पररचन् प्र० अररचत पररचेताम् अररचन्त
म० अररचः अररचतम् अररचत म०पररचथाःभररचेथाम् अररचध्वम्
उ० अररचम् पररचाव अरर चाम उ० अररचे अररचावहि पररचामहि
मन्त्र
प्रात्मने
द्वि०
अममन्त्रत
अममन्त्रेताम्
प्रममन्त्रन्त
श्रममन्त्रथाः अममन्त्रेथाम्
अममन्त्रध्वम्
अममन्त्र
अममन्त्रावहि
अममन्त्रामहि
ऐसे ही परस्मै० कथके अचकथत् इत्यादि; आत्मनेपदी वञ्चके
अववञ्चत इ० ; भर्स के अबभर्त्सत इत्यादि ; उभयपदी चुके क्रमसे
अचूचुरत् और अचूचुरत इत्यादि, और परस्मै० गण्के अजगणत्
इत्यादि वा अजोगणत् इत्यादि रूप होते हैं ।
,
ऋजुव्याकरणम् ॥
वाक्यरचना।
अव्यय-पुरा (प्राचीनकालमें)
वाक्य
संस्कृत॥
हिन्दी॥
अहं भैरवमाकारमकार्षम् ॥
जब राम सीता और लक्ष्मण
श्रीदत्तं तस्य सुहृदः स्वदेशस्य के साथ वनको गयेथे तब अयो.
राजानमकाए।
ध्याके लोग उनके पीछे (ई
मास्माकमन्तिके स्थाः (अ)॥
ते नगरादु बहि (प्रा) रावासम When Rama with Sita and
Lakshmana, went to the forest
तानि फलानि सर्वेभ्यो-
the people of Ayodhya followed
रोचिषत (इ)॥
him
चलेथे॥
(अ) देखो ऋजुच्या० द्वि० भाग ४४ पृ० का (अ) से अङ्कित नियम । मा अस्था
ऐसा रूप नही हुआ किन्तु मा स्था ऐसा रूप हुआ ॥ माके लगाने से सामान्यभूत का
अर्थ नहीं होता किन्तु आज्ञा वा विधिका अर्थ होता है ।
(आ) अन्यशब्द के अर्थवाले जितने शब्द है और ऋते (बिना) बारात् (दूर वा
समीप पृथक् २ दोनो अर्थ ) बहिः इत्यादि शब्दोके प्रयोग मे पञ्जमी विभक्ति लगती है।
(इ) रुच धातु के अर्थवाले जितने धातु है उनके प्रयोग मे जिसको रुचे उसके
वाचक सज्ञा शब्द के उत्तर चतुर्थी विभक्ति होती है ॥
(ई) अनु ( पीछे), अभि ( सम्मुख), उप ( समीप ), प्रति (निकट ), परितः
(चारो ओर ), अभित. ( उभय पार्श्व ) , धिक् (धिकार ), इनके योग मे सज्ञा शब्द के
उत्तर द्वितीया विभक्ति होती है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ वाक्य संस्कृत ॥ हिन्दी॥ महासत्व मा मां बधीः । मयि प्राचीन काल में देव और दानवों में कृपां कुरु॥ बड़ी लड़ाई हुई थी। स तेषां नामानि नाशासीत् ॥ In times of yore there was a अपाम सामममृता प्रभूम ॥ great war between the Devas and यथाहमकृषि तथा त्वमकृथाः ॥ Danavas राजा तस्मिन्नुद्याने त्रीणि दिनानि एक भिक्षु जो प्रांख का काना (ई) था अपने लँगड़े मित्र के साथ नगर अस्थात् (अ) अगमंस्ते पथा तेन कपया दक्षिणे के बाहिर चला॥ दिशम् ॥ A beggar blind of one eye went out of town with bis lame friend प्रभूत् प्रकृत्या (आ) मधुरो रामो गुणवता (इ) वरः॥ प्रदाद् द्विजाय तत् सर्व वित्तं राजा रघुर्महान् ॥ (अ) अत्यन्त (निरन्तर) सम्बन्ध बतलाने के लिये कालवाचक अथवा मार्गवाचक शब्द के अनन्तर द्वितीया विभक्ति लगती है। (आ) प्रकृति इ० शब्दो और सह तथा तुल्य इन अर्थोके वाचक शब्यॊके योगमे तृतीया विभक्ति लगती है ।। (इ) समान प्रकार की वस्तुओं के समुदाय में से किसी विशषता के कारण कुछ व्यक्तियों को पृथक् करना निर्धारण कहलाता है। जिनके समुदाय मे से पृथक किया जाता है उनके अनन्तर षष्ठी वा सप्तमी विभक्ति लगाई जाती है, यथा-रामो गुणवता घर , कविषु कालिदास श्रेष्ठ इ०॥ ( ई ) जिस किसी अङ्गके दोष हो जाने से अङ्ग बिगड जाता है उस अङ्गके वाचक शब्द के उत्तर तृतीया विभक्ति लगती है यथा-अक्षणा काण, पादेन खञ्ज इत्यादि ।
५४ ऋजुव्याकरणम् ॥ चतुस्त्रिंश पाठ॥ संज्ञा लकारान्त शब्द। पुं० चन्द्रमस् द्वि० तृ० चन्द्रमसा चन्द्रमाभ्याम् चन्द्रमाभिः च० चन्द्रमसे चन्द्रमाभ्याम् चन्द्रमाभ्यः पं० चन्द्रमस: चन्द्रमाभ्याम् चन्द्रमेभ्यः प० चन्द्रमसः चन्द्रमसा: चन्द्रमसाम् सन चन्द्रमसि चन्द्रमसाः चन्द्रमासु वा चन्द्रमस्सु पुं० विद्वस् पुं० पुम्ल द्वि० द्वि० तृ० विदुषा विद्वद्भ्याम् विद्वद्भिः भ्याम् पुभिः तृ० पुसा पुम्भ्याम् पुम्भिः च० विदुषे विद्वद्भ्याम् विद्वद्भ्यः च० से पुभ्याम् पुस्भ्याम् पुम्भ्यः पं० विदुषः विद्वद्भ्याम् विद्वद्भ्यः पं० पुसः पुभ्याम् . पुभ्यः ष० विदुषः विदुषोः विदुषाम् पुम्स्याम् पुम्भ्यः ष० पुसः पुंसाम् सप्त विदुषि विदुषोः विद्वत्सु सप्त० पु सि पुसाः पुंसु दन्त्य सकारान्त पुं० वेधस इत्यादि ; नपुं० मनस् इ० और स्त्रीलिङ्ग अपसरस इ० शब्दों के रूप चन्द्रमस शब्द के समान होते है । विद्वस और पुस शब्दों मे जो भेद होता है सा ऊपर दिखा दिया । पुभ्यः पुसाः an ऋजुव्याकरणम् ॥ PANETAHMEmpir ब० ब० स्त्री० आशिस् नपुं० हविस द्वि० दि० तृ० आशिषा आशीर्थ्याम् पाशोभि तृ. हविषा हविया॑म् हविर्भिः च० आशिषे आशााम् प्राशीभ्यः च हविषे हविया॑म् हविद्यः पं० आशिषः आशीर्ष्याम् पाशीर्यः पं० हविषः हविाम् हविर्यः १० आशिष प्राशिषोः प्राशिषाम् प० हविषः हविषाः हविषाम् आशीष्षु, हविष्षु, सप्त० आशिषि प्राशिषाः सप्त० हविपि हविषाः- মুহঃ हविःषु दन्त्य सकारान्त शब्द जिनके अन्त में "इल" इतना अंश पाया जावे उनके रूप हविस् शब्दके समान होते हैं। आशिस शब्द के द्विवंचन, और बहुवचनमें जो भेद है सा दिखा दिया । नपुं० चक्षुस् द्वि० तृ० चक्षुषा चक्षुाम् चक्षुभिः चक्षुषे चक्षुाम् चक्षुर्व्यः चक्षुषः चक्षुर्ध्याम् चक्षुर्व्यः चक्षुषाः चक्षुषाम् चक्षुष्षु सप्त० चक्षुपि चक्षुषाः चक्षुःषु दन्त्य सकारान्त शब्द जिनके अन्तमें “उस' इतना अंश पाया जावे, जैसे जटायुस, चिरायुस् इ०, उन शब्दोके रूप तृतीयादिक विभक्तियों में चक्षुस के समान होते ह ॥
१६
ऋजुव्याकरणम् ॥
क्रिया॥
प्रेरणार्थक प्रत्यय ॥
प्रेरणा अर्थ बतलानेमें दो गणके धातुओंके रूप सब लकारमें
चुरादिगणके धातुओं के समान होते है ।
स्वरान्त धातु॥
नौ के नाययति इत्यादि ॥
शी के शाययति इत्यादि ( केवल परस्मै में रूप होते हैं ) ॥
उभय में पानार्थ पाके क्रमसे पाययति इ० और पाययते इत्यादि ।
पालनार्थ पाके पालयति इत्यादि ।
दाके दापयति इत्यादि, गैके गापयति इत्यादि ॥
ज्ञाके एक वार ज्ञापयति इत्यादि और दूसरी बार अपर्यात इत्यादि
रूप होते है ऐसे ही स्नाके स्नापयति और नपयति इत्यादि ॥
भूके भावयति इ०, कृके उभय में क्रमले कारयति इ० और कारयते
इ०; तृके तारयति इत्यादि और जागृके जागरयति इत्यादि रूप ले जाओ ॥
गमनार्थक ऋके अर्पयति इत्यादि रूप दान अर्थ में होते है ।
व्यञ्जनान्त धातु॥
पटके पाठयति इत्यादि; वपके उभ में क्रमसे वापयति इत्यादि और
वापयते इत्यादि; गम्के गमयति इत्यादि, जन्के जनयति इत्यादि ( केवल
परस्मै में ) नम् के नमयति वा नामयति इत्यादि; और ज्वल के ज्वलयति
वा ज्वालयति इत्यादि रूप होते है ।
ऋजुव्याकरणम् ॥ लिख के लेखयति इत्यादि । कुप के कोपयति इत्यादि । रुह के रोहयति या रोपयति इत्यादि । दृश के क्रमसे दर्शयति और दर्शयते इत्यादि । सामान्यभूत में स्थाके अतिष्ठिपत् इत्यादि । वाक्यरचना॥ अव्यय-अजन (निरन्तर ), पुरः (आगे), यत् (कि), वाक्य। संस्कृत ॥ हिन्दी॥ तृषितं जलं पाययेत् क्षुधितश्चान्न लेखकसे एक पत्र लिखामो॥ भोजयेत् (अ)॥ Get a letter written by a writer. गृहस्थः पालयेद्दारान् शास्त्रञ्च धार्मिक राजा प्रजाको पालते है। पाठयेत् सुतान् ॥ Good kings protect their sub- भृत्यं भृत्येन (ग्रा) वा कट कार jects यति देवदत्तः॥ (अ) किसी क्रियाके करने मे कर्ताको जो प्रेरणा करता है वह प्रयोजक कर्ता कहलाता है। यथा-माता शिशु दुग्ध पाययति इस वाक्य मे माता प्रयोजक है । प्रयोजक कर्ता क्रियाक करने मे जिसकी प्रेरणा करता है उसे प्रयोज्य कर्ता कहते है। यथा--उक्त वाक्यमे शिशुशब्द । गत्यर्थक, बुद्रयर्थक, भोजनार्थक शब्दार्थक, वा शिक्षणार्थक तथा अकर्मकसे जो प्रेरणार्थक बनते है उनके प्रयोज्य कर्ता के अनन्तर द्वितीया विभक्ति लगती है। शेष धातुओं के प्रयोज्य कर्ता के अनन्तर तृतीया विभक्ति लगती है । यथा-व्यासो मुनीन वेदानपीपठत्, देवदत्तो यज्ञदत्तेनान पाचयति इ.॥ (आ) कृ और हृ धातुके प्रयोज्य कर्ता के उत्तर पारीपारा द्वितीया और तृतीया दोनो विभाक्तया लग सकती है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ । वाक्य॥ संस्कृत ॥ हिन्दी। अध्ययनस्य काले विद्यार्थी कोपं उसको जता दो कि मैं असुस्थ हू। व्याकरणञ्च प्रात्मनः समीपे स्था Let him know that I am unwell पयेत् ॥ न उसे वायु सुखाता है और न पश्य अजस्रौंचालयति लागूलं जल भिगाता है। श्वा यत् तस्य स्वामी तुष्येत् ॥ Wind does not dry it up nor water देवदत्तो यज्ञदत्तेनान पाचयति ॥ moisten it व्यासा मुनीन् वेदानपीपठत् ॥ युधिष्टिरने एक सभामण्डप मय- नाम दानवस बनवाया। Yudhishthira got a mandapa made by a Danava whose name was Maya इतिहास वा भूगोल पढ़ते समय विद्यार्थी मानचित्र अपने साम्हने रख लेवें। Students should place an atlas before them when reading history or geography
ऋजुव्याकरणम्॥
पञ्चत्रिंश पाठ॥
संज्ञा ॥
हकारान्त शब्द॥
स्त्री० उपानह ।।
द्वि०
पु० मधुलिह
द्वि०
१० मधुलिहा मधुलिड्भ्याम् मधुलिड्भिः १० उपानहा उपानद्भ्याम् उपानाद्भ
च० मधुलिहे मधुलिड्भ्याम् मधुलिड्भ्यः च. उपानहे उपानद्भ्याम् उपानद्भ्यः
१० मधुलिह मधुलिड्भ्याम् मधुलिड्भ्य प. उपानहः उपानम्याम् उपानट्भ्यः
प० मलिह मधुलिहो मधुलिहाम् प. उपानह उपानहो
उपानहामू
सप्त० मधुलिहि मधुलिहो मधुलिट्सु सप्त० उपानहि उपानहो उपानत्सु
हकारान्त शब्दो के रूप मधुलिह शब्द के समान होते है ।
क्रिया॥
नाम धातु॥
संशा वा अव्यय शब्दों से जो धातु बनाये जाते हैं वे नामधातु कहाते
हैं। यथा-तपस् शब्द से तपस्य् (तपस्या करनी ) और नमस् अव्यय से
नमस्य (नमस्कार करना) ० । इनके वर्तमानादि चार लकारोमें तपस्यति
और नमस्यति इत्यादि रूप दिवादिगण के धातुओं के समान
होते है॥
अनघतनभविष्यमें तपसिता इत्यादि ।
भविष्यमें तपसिष्यति इत्यादि ।
क्रियातिपत्तिमें प्रतपसिष्यत् इत्यादि ।
प्राशिसमें तपस्यातू इत्यादि ।
६० ऋजुव्याकरणम् ॥ परोक्षभूत मैं तपसाञ्चकार वा तपसाम्बभूव अथवा तपसामास इत्यादि रूप होते है॥ सामान्यभूत में अतपसीत् अतपसिष्टाम् इत्यादि रूप होते है। ऐसे हो नमस्य् इत्यादि के रूप ले जाभो ॥ चिर शब्द से चिरय् (विलम्ब करना) परस्मैपदी धातु और शब्द से शब्दाय (शब्द करना) आत्मनेपदी धातु बनता है । इनके क्रमसे चिरयति और शब्दायते इत्यादि रूप होते ह ॥ अनद्यतन भविष्यादि में चिरयिता और शब्दायिता इत्यादि रूप क्रम से होते हे ॥ वाक्यरचना ॥ me वाक्य॥ संस्कृत ॥ हिन्दी॥ आसो तपस्यत्यपरस्तपस्वी॥ सुनो गाय रम्भाती है। नमस्यामा देवान् ॥ Listen, the cow is bellowing शब्दायन्ते गोष्ठेषु वृषभाः ॥ खल के वचन हमको दुःख देते है। कथ चिरयति जानकी । बलवदुत्क- The words of the wicked pain पिठताऽस्मि (अ) तस्यादर्शनाय ॥ सुखयति मा शिशिरोधातः॥ तुमने बिलम्व किया। क्यो शीघ्र नहीं आये। (अ) क्रियाविशेषण शब्द का नपु० You have delayed long. Why द्वितीया विभक्तिके एकवचन मे प्रयोग होता | did you not come soon ? बच्चो की बोली हमारे कानोंको सुख है । यया बलवत् इस प्रयोग मे देखते हो देती है परन्तु जो क्रियाविशेषण अव्यय होते है The lispings of children deliglit उनके लिये यह नियम अनावश्यक है। ? my ears
ऋजुव्याकरणम् ॥
६१
षट्रात्रिंश पाठ ॥
संज्ञा॥
सर्वनाम ॥
पु० और नपुं० अकारान्त सर्व स्त्रो० आकारान्त सर्वा
द्वि०
हि०
तृ० सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः तृ० सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः
च० सर्वस्मै सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः च सर्वस्यै सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः
प० सर्वस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः प० सर्वस्याः सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः
प. सर्वस्य
सर्वयोः सर्वां ष० सर्वस्याः सर्वयोः सर्वासाम्
सप्त सर्वस्मिन् सर्वयोः सर्वेषु सप्त सर्वस्याम् सर्वयाः सर्वासु
पु० और नपु० मे प्रथम प्रादि शब्दोको छोडके शेष पूर्वादि शब्दों की
पञ्चमी और सप्तमोके ए० व० में एकवार बालक शब्द के समान दूसरी बार
सर्वशब्द के समान, यो दो २ रूप होते
यथा-पञ्चमी-पूर्वात् वा पूर्वस्मात् इ० ॥
सप्तमी--पूर्व वा पूर्वस्मिन् इ० ॥
पूर्वादि शब्दोके शेष रूप सर्व शब्दके समान पु० और नपुं० में होते
हैं । परन्तु प्रथमादि शब्दोके रूप पु. और न में बालक शब्दहीके
समान होते हैं। द्वितीय और तृतीय इन दो शब्दोंकी चतुर्थी, पञ्चमी और
सप्तमी के ए०वमें एकवार बालक शब्दको नाई और दूसरी वार सर्व
शब्दको नाई', यों दो २ रूप पु० और नपु० में होते हैं ॥ द्वितीय तथा
तृतीय शब्दके शेष रूप बालक शब्दके समान होते है ।
प्रथमा आदि शब्दोको छोड़के शेष पूर्वा आदि प्राकारान्त स्त्रीलिङ्ग
शन्दोके रूप सर्वा शब्दके समान होते है । प्रथमा आदि आकारान्त
ऋजुव्याकरणम् ॥
स्त्रीलिङ्ग शब्दोके रूप विद्या शब्दहोके समान होते हैं। स्त्री० द्वितीया
और तृतीया इन दो शब्दोकी चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी और सप्तमी के एक
वचन में एकवार विद्या शब्द के और दूसरी वार सर्वाशब्द के समान, य
दो २ रूप होते हैं । यथा-
पुवा न.
स्त्री०
-
च. द्वितीयस्मै वा द्वितीयाय
च० द्वितीयस्यै
वा द्वितीयायै
प० द्वितीयस्मात् वा द्वितीयात् प० द्वितीयस्याः वा द्वितीयाया.
प० द्वितीयस्याः वा द्वितीयायाः
सप्तद्वितीयस्मिन् वा द्वितोये सप्तद्वितीयस्याम् वा द्वितीयायाम्
ऐलेही तृतीय और तृतीया शब्दके रूप होते है ॥ द्वितीया तथा तृतीया
शब्द के शेष रूप विद्याशब्दके समान होते है ॥
क्रिया ॥
इच्छार्थक प्रत्यय॥
धातुके अर्थकी इच्छा प्रकाश करने अर्थमें धातुके उत्तर पहिले "स"
प्रत्यय लगाया जाता है तिसके अनन्तर विभक्तियां जोड़ी जाती है।
धातुके उत्तर "स" प्रत्यय लगाने से धातुके रूपमे अवश्य हेर फेर होता
है। जो धातु जिस पदको विभक्तियां पाता है वह उक्त "स" प्रत्यय
के लगने पर भी उसी पदको विभक्तियां पाता है (अ)॥
"स" प्रत्ययके लगाने अनन्तर परस्मैपदी धातुओके रूप पठ् धातु
के रूपोंके समान होते है, और आत्मनेपदी धातुप्रोके रूप लभ् धातु
के रूपोंके समान होते है ॥ यथा-
(अ) परन्तु ज्ञा, श्रु, स्मृ और दृश् ये धातु "स" प्रत्यय के लगनेपर आत्मनेपद की.
विभक्तिया पाते है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ परस्मै में पा के प्र० ए० पिपासति, पिपासतु, पिपासेत्, अपिपासत्, पिपासिता, पिपालिप्यति, अपिपालिप्यत् , पिपास्यात्, पिपासांचकार या पिपासास्वभूव अथवा पिपासामाल, अपिपासीत्, यो क्रमसे ॥ और आत्मने में शाके जिज्ञासते, जिज्ञासताम्, जिज्ञासेत, अजिज्ञासत, जिज्ञासिता, जिज्ञालिप्यते, अजिज्ञालिप्यत, जिज्ञा सिपोष्ट, जिज्ञासाञ्चक्रे या जिज्ञासाम्यभूव अथवा जिज्ञासामास, अजिज्ञासिष्टं यो क्रमसे वर्तमानादि दशी लकारामे पृथक् २ रूप होते है। कृ के क्रमसे चिकीर्षति, और चिकीर्षते इत्यादि ॥ ऐसे ही हके क्रमसे जिहोर्पति और जिहीर्यते इत्यादि रूप होते हैं। भूके बुभूपति इत्यादि और श्रुके शुश्रूयते इत्यादि, रूप क्रमसे ले जानो। पठके पिपठिपति इत्यादि, गम्के जिगमिपति इत्यादि और दृशके दिदृक्षते इत्यादि रूप होते हैं । दाके क्रमसे दित्सति और दिल्लते इ०, आप के ईप्सति इ० अौर लम्के लिप्सते इत्यादि रूप होते हैं ।
ऋजुव्याकरणम् ॥ वाक्यरचना॥ वाक्य॥ संस्कृत॥ हिन्दी॥ पिपठिषामि कृत्स्नं व्याकरणम् ॥ नहानेके लिये नदीको जाना अध्ययनाय काशो जिगमिपामि ॥ चाहता हू॥ अहमाचार्य धर्मस्य तवं जिज्ञासे ॥ I wish to go to the river to कथयामि वत्स यत् त्वं शुश्रूषले ॥ bathe भा ब्राह्मण पिपासामि ॥ जो सुख पाने चाहे वह विद्या कथं पानीयं न दित्ससि ॥ लाभ करे। जिब्रासामि पुष्पाणि ॥ He who wishes to obtain hap- दिदृक्ष उपवनस्य शोभाम् । piness should acquire learning. व आरोग्यं लिप्यते स पथ्यं चि- मे पुत्रका मुख देखना चाहता हू और उसका भाषण सुनना चाहता हू॥ I wish to see the face of my child and to hear bis lispings विश्वामित्र ब्राह्मण होना चाहते थे। इसलिये उन्होने तप किया Visvamitia wished to become a Brahman and for this object he piactised penances. कोर्पते ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥
सप्तत्रिंश पाठ॥
में
au
संख्यावाचक
अकारान्त संख्यावाचक "एक" शब्द के रूप पु वा नपु में बहुधा
केवल एकवचनही में प्रयुक्त होते है और सर्वशब्द के समान होते हैं ।
आकारान्त संख्यावाचक स्त्रो० "एका" शब्द के रूप केवल एकवचन
ही में प्रयुक्त होते है और सर्वा शब्द के समान होते हैं ।
इकारान्त संख्यावाचक द्वि शब्द के रूप पुं० नपु० वा स्त्री० में
समान होते है और केवल वे द्विवचन ही
प्रयुक्त
होते है ॥ यथा-
पुं० नपुं० वा स्त्री०
द्विवचन
तृतीया द्वाभ्याम्
चतुर्थी
द्वाभ्याम्
पचमी द्वाभ्याम्
षष्ठी द्वयोः
सप्तमी द्वयाः
तीनों लिङ्गों में समान संख्यावाचक कति शब्द के रूप कविशब्द के
समान केवल बहुवचनही में होते है ॥ कति शब्द के समान यति
(जितने ) और तति (तितने) इन शब्दों के रूप भो सब विभक्तियों के
बहुवचन ही में होते हैं।
६६ ऋजुव्याकरणम् ॥ - हस्व इकारान्त संख्यावाचक त्रि शब्द के रूप तीनों लिङ्गों में केवल व० ब० में ही होते हैं और पु० तथा नपु० मे समान होते है । यथा- पुं० वा नपु० स्त्री तृ० त्रिभिः तितृभिः त्रिभ्यः तिसृभ्यः पं० त्रिभ्यः तिसृभ्यः प० त्रयाणाम् तिसृणाम् सता त्रिषु तिसृषु रेफान्त संख्यावाचक चतुर् शब्द के रूप तीने लिङ्गों में केवल बहुवचनहीमें होते है और पु० तथा नपुं में समान होते है ॥ यथा- पुं० वा नपुं० स्रो० company चतुभिः चतसृभिः चतुर्व्यः पं० चतुर्व्यः चतसृभ्यः चतुर्णाम् चतसृणाम् चतुर्यु অনন্ত पञ्चन् शब्दसे लेके दशन् शब्दपर्यन्त संख्यावाचक शब्दों के रूप तीनों लिडों में समान केवल बहुवचनही में होते हैं । यथा- सप्त० m ६ ऋजुव्याकरणम् ॥ पुं० नपुं० वा स्त्री अष्टन् ष० ष० ब ४० पञ्चभिः तृ० अष्टभिः वा अष्टाभिः पञ्चभ्यः अप्टभ्यः वा अप्टाभ्यः पं० पञ्चभ्यः ថ្មីៗ अष्टभ्यः वा अष्टाभ्यः पञ्चानाम् अष्टानाम् सप्त पञ्चसु सप्त० अष्टसु वा अष्टासु नकारान्त सङ्ख्यावाचक शब्दों के रूप पञ्चन् शब्द के समान होते हैं । अष्टन् शब्द में जो भेद होता है सा दिखा दिया ॥ एकादश-(ग्यारह) इ० शब्दो के लिये वही नियम है जो दशन् शब्द के लिये है ॥ षष पुनपुवा स्त्री० तृ० पड्भिः च० षड्भ्यः पं० षड्भ्यः पण्णाम् सप्त० पट्स ह्रस्व इकारान्त नित्य स्त्रीलिङ्ग सङ्ख्यावाचक विंशति इत्यादि के और एकविंशति इत्यादि शब्दों के भी रूप स्तुति शब्द के समान होते हैं ।
६८ ऋजुव्याकरणम् ॥ तकारान्त नित्य स्त्रीलिङ्ग संख्यावाचक त्रिंशत् इत्यादि के और एक- त्रिंशत् इत्यादि शब्दों के भी रूप सरित् शब्द के समान होते हैं । प्रकारान्त संख्यावाचक शत इत्यादि शब्दों के रूप नित्य नपुं० तृती- यादि विभक्ति में बालक शब्द के समान होते हैं। घाक्यरचना। अव्यय-खलु (निश्चय ), किल (प्रसिद्धिबोधक)॥ वाक्य ॥ संस्कृत॥ हिन्दी॥ पूर्व वैयाकरणा द्वादशभिर्वर्षे (अ) दश विद्यार्थियों को पारितोषिक देना ाकरणं पठन्ति स्स किल। चाहता हू॥ विंशतये विद्यार्थिभ्यः पुस्तकानि I wish to present reward to ten दित्सामि॥ students राजा एकविंशतिं दिनानि दिनानि बने हमारे प्राचार्य चारों वेदों के तत्वों चचार॥ को जानते थे॥ शतं वर्षाणि जीव My teacher knew the substance घायुष्मन् ॥ गतेषु चतुर्दशसु वर्षेषु (आ) रामो of the four Vedas भूयोग्याध्यां ददर्श॥ (अ) फलप्राप्ति का बोध कराने में कालवाचक वा मार्गवाचक शब्दो के अनन्तर तृतीया विभक्ति होती है। (आ) जो अपनी क्रिया के काल से किसी दूसरी क्रिया के काल की समानता बोध कराता है उसके उत्तर सप्तमी विभक्ति लगती है।
ऋजुव्याकरणम्॥ ६९ वाक्य ।। संस्कृत ॥ हिन्दी॥ भागवतस्य सप्तभिः रामायणस्य तु, रामसिंह दश गांव के परन्तु लक्ष्मण नवभिरहोभिः पौराणिका पारायणं सिह बीस गांवके ठाकुर है॥ कुर्वते खलु ॥ Ram singh is the lord of ten त्रिभिर्मासैस्त्रिभिः पौस्त्रिभिर्व-villages and Lakshman Sinogh ot twenty त्रिभिर्दिनैः अत्युत्कटस्य पापस्य- पांच तत्त्वोंके नाम बतायो । पुण्यस्य (वा) फलमश्नुते (लोकः)। Give the names of the five देवदत्तो यज्ञदत्ताय सहन धारelements. यति ॥ (इ) अट्ठारहों पुराण का पाठ इन्होंने किया है। He has recited the eighteen Puranzas (इ) ऋणिया जिसके ऋणको उधारता है उसके उत्तर चुरादिगणीय धृ धातुके योगमे चतुर्थी विभक्ति लगती है ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ अष्टात्रिंश पाठ॥ कर्मवाच्य और भाववाच्य ॥ यहांला जो क्रियाओं के रूप बतलाये गये उनका कर्ता प्रथमा और कर्म द्वितीया विभक्ति पाता है और वे कर्तृवाच्य कह जाते है। जद सकर्मक क्रियाका कती तृतीया विभक्ति और कर्म प्रथमा विभत्ति पाता है, अथवा अकर्मक क्रियाका कर्ता तृतीया विभक्ति पाता है, तब उस क्रियाके धातु के उत्तर सदा यात्मनेपदकी विभक्तिया लगती है। और सकर्मक क्रियाओके वैसे उन रूपों को कर्मवाच्य और अकर्मक किया मोके वैसे उन रूपोंको भाववाच्य कहते है ॥ संस्कृतमें भी हिन्दोहोकी नाई कर्त्त वाच्यमें कर्त्ताके और कर्मवाच्यमें कर्मके वचन अनुसार क्रियाके वचन होते हैं, परन्तु भाववाच्यमें क्रियाका प्रयोग नियम से प्रथम पुरुपके एक वचन में होता है। वर्तमानादि चार लकारोंमें बहुत करके समस्त धातु दिवादि गणके धातुओं के समान रूप पाते है । यथा भू धातुके भूयते इत्यादि, पठ् धातु के पठ्यते इ०, क्षिपके क्षिप्यते इ०, दाके दोयते इ०, स्था स्थोयते इत्यादि, पाके पोयते इत्यादि, गै के गीयते इ०, वपके उप्यते इ० स्वपके सुप्यते इ०, वच्के उच्यते इ०, वह् के उद्यते इत्यादि, स्मृके स्मर्यते इत्यादि, शाके शय्यते इ०, ग्रहके गृह्यते इ० प्रच्छके पृच्छयते इ०, बन्धके बध्यते इe, ग्रन्थ इत्यादिके ग्रथ्यते इत्यादि रूप होते है । अनद्यतन भविष्य से लेके परोक्षभूत पर्यन्त लकारों में कर्मवाच्य वा भाववाच्य में प्रायः धातुओ के रूप नित्य आत्मने में वैल हो और ऋजुव्याकरणम् ॥ ७१ होते है जैसे उनके कत्र्तवाच्य मे होते हैं । यथा-दा के दाता, दास्यते, अदास्यत, दासीष्ट और ददे इत्यादि । सामान्यभूत में भी बहुधा नित्य पात्मने में वैसे ही रूप होते हैं जैसे उनके कर्तवाच्य में होते है । केवल प्र० पु० के ए० वचन में सर्वदा भेद होता है । यथा-नोके सामान्यभूत के प्र० पु० के ए० ० में अनायि ऐसा रूप होता है और शेष अनायिपानाम् इ० रूप पूर्ववत् होते हैं। ऐसे हो पठ् इ० के अपाठि, अपठिषाताम् इ० रूप होते हैं । वाक्यरचना॥ वाक्य ॥ संस्कृत॥ हिन्दो॥ कोलाहलात् तस्य स्वरो नाश्रयत ॥ जो पाथी आपने लिखने के लिये वसन्ते वनेषु कोकिलानां कला गिरः दी थो सेा लिखी जाती है। शुश्रुविरे॥ The book which you gave me is प्रज्ञया सर्व साध्यते ॥ being copied. किमुच्यते कृतघ्नानां चरितम् ॥ जो पत्र तुमने लिखा था सेा सभा नाहं दोपेण स्पृश्ये॥ में अाज पढा गया। अनेन मनाकरणमपाठि॥ The letter you wrote was read in the meeting to day मेरा छाता चारी गया ॥ उसको खाज की जावे॥ My umbrella has been stolen Let it be searched जो पराये का उपकार करता है वह साधु कहाता । He who does good to others is called a Sudhu - १२ ऋजुव्याकरणम्॥ . है एकोनचत्वारिंश पाठ ॥ उपसर्ग प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निर्, दुर्, वि, श्रा, नि, अधि, अपि, प्रति, सु उत्, अभि, प्रति, परि, उप, ये सब प्रादि अव्यय शब्द हैं । इनमें से जब जो किसी धातु के पूर्व में लगाया जाता तब वह उपसर्ग कहा जाता है । धातु के पूर्व में एक हो उपसर्ग लगाने का नियम नहीं है, परन्तु कभी कई उपसर्ग भी लगते हैं। यथा-नयति से पानयति और प्रत्यानयति इत्यादि रूप बनते हैं। धातु के पूर्व में उपसर्ग के लगने से कभी २ तो धातु का अर्थ ज्यों का त्यों समझा जाता है। जैसे-प्रयच्छति ( देता है ) इस प्रयोग में उपसर्ग के लगने से दाण ( देना ) धातु का अर्थ ज्यों का त्यों बना रहा । परन्तु बहुधा धातु के पूर्व में उपसर्ग के लगने से धातु का मूल अर्थ छुटके और ही कुछ का कुछ अर्थ हो जाता है। जैसे-भूसे बने हुए प्रभवति का, समर्थ होता है-ऐसा अर्थ हो जाता है । क्योकि प्र उपसर्ग के लगने से भू धातु का मूल अर्थ होना नहीं रहता, किन्तु समर्थ होना अथवा उत्पन्न होना ऐसा अर्थ हो जाता है। कभी २ तो धातु के पूर्व में किसी उपसर्ग के लगने से धातु के मूल अर्थ के ठीक विपरीति अर्थ होता है। जैसे-स्मृ धातु का मूल अर्थ स्मरण करना है परन्तु उसके पूर्व में जब वि उपसर्ग लगता है तब मूल अर्थ के ठोक विपरीत अर्थात् भूल जाना अर्थ हो जाता है। यथा-विस्मरतिभूल जाता है । ।
ऋजुव्याकरणम्॥ कहीं २ धातुके पूर्वमें किसी विशेष २ उपसर्गके लगनेसे विभक्तियोंके पद (अर्थात् परस्मैपद वा आत्मनेपद) पलट जाते है । जैसे-स्था धातु परस्मैपदो है, परन्तु जब उसके पूर्व में प्र, सम्, अव, वि, इनमेंसे कोई उपसर्ग लगता है तब वह आत्मनेपदी हो जाता है । यथा-प्रतिष्ठते =प्रस्थान करता है इत्यादि ।
ऋतुव्याकरणम् ॥ वाक्यरचना॥ उपसर्गख धात्वर्थो बलादन्त्र नोयते। प्रहाराहारसंहार विहारपरिहारवत् ॥ वि+तु = देना; वि+रम् = ठहरना, प्र + स्था= चलना; अनु + स्था अनुष्ठा )= करना; अनु + इष (दिवादि )= ढूंढ़ना; वि + धा=करना; भ+धा= कहना; परि+धा=पहिरना; पा+नो-लाना: प्रा+दा 'T, व्या+दा= बाना (मुखादिका) ; आ+गत्यर्थक धातुआना, अव गत्यर्थक धातु =जानना; आ + रम् प्रारम्भ करना ॥ वाक्य॥ संस्कृत ॥ हिन्दी ॥ पोतं कुक्कुटाश्चञ्च्वा चरणेन च तुमने कब संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ किया। हार्पः॥ When did you begin the study पस्वी कानिचित् फलान्यानेपोत्॥ of Sinsluit 'ज्ञापयाम्यत्र कुशलं भाः॥ अपने देशके कपड़ों को पहिना शंसे तत्र तत्तवास्तु॥ करो॥ निपुर्ण निरीक्षते ॥ Use cloths manufactured in your राध्यायश्छात्रान् परीक्षते ॥ own country णमहं प्रतीक्षे॥ रत्न मनुष्य को नहीं ढूंढता, पर चुकोपारये (अ) राजा लोगोसे वह ढूंढा जाता है । Jewels do not seek after men, ड्रेन प्रजधान च ॥ वेहि मा किरमप्टमूर्तः ॥ but they are sought after by men भूखेको अन्न पियासेको पानो (अ) क्रोधार्थक वातुओ के योग में नगेको वस्त्र देहु तुम दानी ॥ O generous man,give food to the जसपर क्रोध किया जाता है उसके अनhungry, dink to the thusty; तर चतुर्थी विक्ति होती है। clothing to the naked. ३
ऋजव्याकरणम्॥
७५
चत्वारिंश पाठ ॥
पदत्यवस्था ॥
उभयपदी धातुओ के प्रयोग में जब क्रिया का फल कर्त्ता ही को प्राप्त
होता है तब उसके उत्तर आत्मनेपद की विमक्तियां लगाई जाती है।
अन्यथा परस्मैपद को विभक्तिया लगाई जाता है। यथा-अब बोनेवाला
अपने प्रयोजन से बोता है तब वपत इत्यादि रूप वाले जाते हैं। अन्यथा
वपति इत्यादि व्यवहार किये जाते है ।
वि+की-बेचना
वि अथवा परापूर्वक जि
इनके उत्तर सदा आत्मनेपद
मा+दा
स्वरादि वा स्वरान्त उपसर्ग पूर्वक युज
को विक्तियां लगती है।
सम् + गम् (अकर्मक)
वि, आ, वा परि पूर्वक रम्
इनके उत्तर सदा परस्मैपद को
अनु वा परा पूर्वक कृ
विभक्तियां लगती है।
उप+रम् उभयपद की विभक्तियां पाता है।
मृ धातु वर्तमानादि चार लकारों में और सामान्यभूत, तथा आशिस
में प्रात्मनेपदको विभक्तियां और शेष लकारादिकों में परस्मैपदको वि-
भक्तियां पाता है ॥ यथा-परोक्षभूत में मसार इ० और सामान्यभविष्य
इ० में मरिष्यति इत्यादि रूप होते है।
ऋजुव्याकरणम् ॥ वाक्यरचना॥ रियेगा॥ वाक्य। संस्कृत हिन्दी॥ कुमारी कन्या पितुर्गहेऽवतिष्ठेत ॥ आप प्रयाग से काशो को कब पधा- रामो दक्षिणां दिशं प्रतस्थे ॥ लङ्कायां रणे रावणं विजिग्ये च ॥ When will you go from Prayaga विद्यार्थी विद्यामादत्ते ॥ to Kasi ? साधु विक्रमते वाजी॥ पाठ का मोल लिया और दश माणवकमुपनयत प्राचार्यः॥ पर बैंचा भार्यामुपयच्छने देवदत्तः ॥ What he purchased for eight भुवं भुनक्ति भूपालः॥ rupees, he sold for ten मोदनं भुङ्क्ते वटुः॥ अब तुम ठहरो दूसरा प्रारम्भ करे॥ वृद्धो जनो दुःखशतानि भुङ्क्ते ॥ You stop now. Let the next beyla वत्स रोदनाद् विरम (अ) मुखं पोथो लामो। चलो चलें। व्यादेहि; मोदकं ते ददामि ॥ Bring the book Let न्यायवान् विचार कर्त्ता घूस (उत्कोच पु०) नहीं लेते ॥ An honest judge does not take a bribe. us go. (अ) विराम, प्रमाद और जुगुप्सा (घिन ) अर्थवाले धातुओ के योग मे जिससे विरामादि होवे उसके उत्तर पञ्चमी विभक्ति होती है। जिससे पडते सुनते, लजाते, हारते, चूकते, वा छपते है उसके उत्तर भी पञ्चमी विभक्ति होती है।
ऋजुव्याकरणम्॥ तृतीय भाग॥ धातुके उत्तर ति, तः, अन्ति और ते इत्यादि प्रत्यय जैसे लगाये जाते है वैसे हो ति त, तव्य, तु, त्वा इत्यादि प्रत्यय भी लगाय जाते है। इनको व्याकरणमे कृत् प्रत्यय कहते है। धातुके उत्तर कृत् प्रत्यय लगानेसे जो शब्द बनते है उन्हे कृदन्त कहते है। कृदन्त सिद्ध शब्द कोई २ तो क्रियावाचक संज्ञा, कोई २ किया- वाचक विशेषण और कोई २ अव्यय होते है । . किसी २ कृत् प्रत्यय परे रहते किली २ धातुके उत्तर इ लगता है, किसी २ के उत्तर नहीं लगता और किसो २ को एक वार लगता है एक वार नहीं लगता। सेा व्यवहार से जानोगे। कृत् प्रत्यय लगने से धातुओके रूपमे भी हेर फेर होता है। सेा आगे उदाहरणांमें देखोगे। क्रियावाचक संज्ञा॥ धातुका अर्थ बतलानेके लिये अ, अन, ति वा त इत्यादि प्रत्यय होते है॥ अ प्रत्ययान्त प्रायः पुल्लिङ्ग, ति प्रत्ययान्त स्त्रीलिङ्ग, अन और त प्रत्ययान्त नपुंसकलिङ्ग होते है ॥
२ ऋजुव्याकरणम् ॥ अप्रत्ययान्त यथा-भू से भावः, जि से जयः, भो से भयं इ० ॥ अन प्रत्ययान्त यथा- गम्से गमनं, भुजसे भोजनं इत्यादि ॥ ति प्रत्ययान्त यथा- स्थासे स्थितिः, कसे कृतिः, गम्से गतिः इ०॥ त प्रत्ययान्त यथा-म्से गतं, जीवसे जीवितम इत्यादि ॥ क्रियावाचक विशेषण ॥ और कुछ . वर्तमान कालको क्रियाका कर्ता बतलाने के लिये परस्मैपदी धातुके उत्तर अत् होता है ॥ यथा-भूसे भवत्, गम्से गच्छत्, पच्से पवत् ॥ और आत्मनेपदो कुछ धातुरोके उत्तर आन, धातुओके उत्तर मान प्रत्यय लगता है ॥ यथा- दाले दान, सेक्से सेवमान इत्यादि ॥ भविष्यकालकी क्रिया का कर्ता बतलानेके लिये परस्मैपदी धातुके उत्तर स्यत् और आत्मनेपदी धातुके उत्तर स्यमान प्रत्यय लगता है ॥ यथा कृसे-क्रमसे करिप्यत् और करिष्यमाण इत्यादि ॥ वर्तमानकालकी क्रियाका कर्म बतलाने के लिये धातु मात्रके उत्तर यमान लगता है ॥ यथा-पच्से पच्यमान, सेबसे सेव्यमान इत्यादि और भविष्यत्काल की क्रियाका कर्म बतलाने के लिये स्यमान लगता है ॥ यथा-से करिप्यमाण, लभसे लप्स्यमान इत्यादि । भूतकालको क्रियाका कर्ता बतलाने के लिये धातुमात्रके उत्तर तवत्; और अकर्मक धातुके उत्तर तथा गति आदि कई एक अर्थवाले धातुके उत्तर त प्रत्यय लगता है। यथा-कृसे कृतवत्, गम्से गत इत्यादि। भूतकालको क्रियाका कर्म बतलाने के लिये सकर्मक धातुओंके उत्तर त प्रत्यय लगता है । यथा-कसे कृत, सेवसे सेवित इत्यादि ॥
ऋजुव्याकरणम् ॥ ३ क्रिया का कर्ता बतलाने के लिये धातु के उत्तर इन्, प्रक, अ इत्यादि प्रत्यय लगते है। यथा-कृ से कारिन्, कारक, (कुम्भ )-कार इत्यादि ॥ क्रियाका कर्म बतलाने के लिये तव्य, अनीय, वा य प्रत्यय लगता है (अ)। यथा-दातव्य, दानोय, देय, कार्य, कृत्य इत्यादि । क्रियावाचक अव्यय निमित्त बतलानेके लिये धातुके उत्तर तुम् होता है । यथा- दासे दातुम्; गम्से गन्तुम्, पत्ले पतितुम् इत्यादि । पूर्वकाल बोध कराने मे धातुके उत्तर त्वा प्रत्यय होता है। यथा-कृसे कृत्वा, पत्से पतित्वा, और क्रोले क्रोत्वा इत्यादि। परन्तु धातुके पूर्व उपसर्ग अथवा नमः इत्यादि शब्द रहे तो त्वा न लगके य होता है। यथा-तिपत्य, विक्रीय, नमस्कृत्य इत्यादि । - (अ) केवल धात्वर्थ अथवा औचित्य अर्थ बतलाने के लिये भी तव्य, अनीय वा य प्रत्यय लगता है। 6 व्याकरगाम्॥ वाक्यरखना। वाक्य (अ) संस्कृत हिन्दी रामस्य पञ्चवटयां गानं तत्र च मुझको यह काम करना है। सोताया हरणं (प्रा) जटायुपश्च This work is to be done by me मरणं इत्यादिकथा अरण्यकाण्डे तुमको वहां जाना है ॥ वर्णिना॥ You have to go there गृद्धं च निहतं दृक्ष लडका साया हुआ है। हतां श्रुन्या च मैथिलीम् । + + + The child is asleep. राघवो बिलाप दौडते हुए हरिणको सिंहने पकड़ा । गृधं इग्ध्वा बने भ्रमन् The liou seized a stag that was रामा राक्षसं ददर्श। + + + तंच running निदत्य दाह॥ शवया॑ पूजितो रामः पम्पातीरे हनूमता संगतः॥ www. (अ) नाचेके हिन्दी वाक्यो का मस्त ने अनुबाड करते समय स्मरण रखना कि बयाराम्भव कृदन्त शब्दका प्रयोग करना चाहिये । (आ) धातुके उत्तर कालादिबोधक ति इत्यादि जो प्रत्यय लगते है वे प्रख्यात कहलाते है । यद्यपि कृदन्त शब्दका प्रयोग सज्ञादि के रूपमे व्यवहार किया जाता है परन्तु कमी २ उससे आख्यात की नाई अर्थ मिलता है। ऐसे स्थलमे आख्यात की क्रियाकी नाई कृदन्त क्रियाका कर्ता वा कर्मकी विभक्ति होती है, यथा-मया कार्याणि कर्त्तव्यानि । तेन पुस्तकानि लिखितानि । स पत्र पठितवान् । बालका पाठशाला गताः ॥ परन्तु धात्वर्थमात्र बोधक कृदन्तका प्रयोग केवल नपुतक प्रथमाके एकवचन मे होता है, यथा- मया गन्तव्य, त्वया कर्त्तव्य इत्यादि ॥
ऋजुव्याकरणम्॥ वाक्य ।। संस्कृत हिन्दी लाऽभिगम्य महात्मानं पाठशाला में पहुच कर गुरु के कृत्वा राम प्रदक्षिणं (अ) + + + सम्मुख जाकर उनको पहिले प्रणाम सोता दृष्टेति न्यवेदयत् ।। करो। पोछे पाठ प्रारम्भ करो। अभिषिच्य (३७) च लङ्कायां On reaching your school, go to राक्षसेन्द्र विमोषणम् । + + + Jo te chei aud salate him Then रामः प्रमुमदे॥ begin your lesson देवताभ्यो वरं प्राप्य पत्र पढकर उत्तर लिखा। समुत्थाप्य च वानरान् । + + + Hiring reach the letter reply to अयोध्यां प्रस्थिता रामः॥ पुष्पक तत्समारुह्य नन्दिग्राम यया तदा॥ नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिः सहिताऽनघः। रामः सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान् ॥ उपर कहे प्रयोगोने भिन्न प्रयोगोके स्थलो मे कृदन्त क्रियाके कर्ता वा कर्म बहुत करके षष्ठी विभक्ति पाता है । यथा रामस्य जन्म, गवणस्य वध , अनस्य पाकः, ब्राह्मणाना भोजन इत्यादि । यहा तृतीया वा द्वितीया विषाक्त न होकर षष्ठी हुई ॥ (अ) जो रहिनी अलग हो उसे प्रदक्षिण कहते है। प्रदक्षिण यह प्रयोग अव्ययीभाव समास का है। इस समास का वर्णन ऋजुच्या० ४० भाग १३ पृ० मे देखो ॥ (सं० ३७) जिस उपसर्ग के अन्त में इ, वा उ हो उसके उत्तर लिच इत्यादि सकारादि धातुओं के दन्त्य सकार के स्थान में मूर्धन्य षकार मादेश होता है, यथा अभि + सिच्य= अभिषिच्य इत्यादि ।
ऋजुव्याकरणम्॥ तडित - - संज्ञाशब्द वा किली २ अव्यय शब्द के उत्तर अ, इ, इक, वत्, मत्, व, ता इत्यादि प्रत्यय अपत्य ( सन्तान ), अधिकार, योग्यता इत्यादि अर्थ तिलानेके लिये लगाये जाते हैं, उनको तद्धित कहते हैं । तद्धित प्रत्यय लगाने पर प्रकृति (अ) के स्वरूप में बहुधा हेर फेर होता है। तद्धित प्रत्ययान्त शब्द कोई २ तो संज्ञा, कोई २ विशेषण और कोई २ अव्यय होते है। तद्धितान्त संज्ञा उत्पत्ति वा अपत्य अर्थ बतलाने के लिये अ, एय, प्रायन, इन प्रत्ययों में से कोई प्रत्यय लगता है। यथा-कुशिकस्य अपत्य कौशिकः । धृतराष्ट्रस्य अपत्यं धार्तराष्ट्रः । द्वीपे भवः द्वैपायनः इत्यादि । अकारान्त और सुमित्रा इत्यादि कई शब्दोंके उत्तर अपत्य अर्थ बतलाने के लिये इ प्रत्यय लगता है । यथा-दशरथस्य अपत्यं दाशरथिः। सुमित्रायाः अपत्यं सौमित्रिः॥ भावादि अर्थ बतलाने के लिये त्व, ता, अ, य, इमन् इत्यादि प्रत्यय लगते है। यथा-लघु से लघुत्व, लघुता, लाघव, लघिमा और धीर से धैर्य इत्यादि। कभी २ प्रत्यय तो लगता है पर मूल शब्द का अर्थ नहीं बदलता, यथा-चार से चार, बन्धु से बान्धव इत्यादि । (अ) जिसके उत्तर प्रत्यय आता है उसको प्रकृति कहते है ।।
ऋजुव्याकरणम्॥ तद्धितान्त विशेषण सम्बन्धादि अर्थ बतलाने के लिये अ, इक, य, इय, ईय, ईन इत्यादि प्रत्यय होते हैं । यथा इन्द्र से ऐन्द्र, विष्णुसे वैष्णव, वर्षसे वार्षिक, धर्मसे धर्म्य ( धर्मयुक्त ) और धार्मिक, क्षत्रसे क्षत्रिय, नारदसे नारदीय, ग्रामसे ग्रामीण इत्यादि। हिन्दी में संज्ञा शब्द के उत्तर जो अर्थ बतलाने के लिये "वाला" प्रत्यय लगता है वही अर्थ बतलानेके लिये संस्कृत में किसीके उत्तर मत्, किसीके वत्, किसीके इन् और किसीके विन् प्रत्यय लगता है । यथा-बुद्धिसे बुद्धिमत्, धनसे धनवत्, गुण से गुणिन्, तेजस्से तेजस्विन्, मेधासे मेधा- विन इत्यादि शब्द सिद्ध होते है । उत्कर्ष बतलानेके लिये तर वा ईयस और अति उत्कर्ष बतलाने के लिये तम वा इष्ठ प्रत्यय शब्दके उत्तर लगता है, यथा-गुरु से गुरुतर वा गरीयस् और गुरुतम वा गरिष्ठ इत्यादि । दोके मध्य एकका उत्कर्ष भी बतलाने के लिये तर वा ईयस् और बहुत में एकका उत्कर्ष बतलानेके लिये भी तम वा इष्ठ प्रत्यय लगता है। यथा- भीमार्जुनयोर्मीमा ज्यायान् ॥ पाण्डवावां युधिष्ठिरो ज्येष्ठः । अ, तोय, थ, म, और तम ये पूर्ण अर्थ बतलाने के लिये संख्या- वाचक शब्दोके उत्तर आते है। इनमेंसे जिस किसीको किलो सख्यावाचक शब्दके उत्तर पाना उस शब्द को उस संख्याको पूर्ति बतलानेवाला विशेषण समझना । यथा-द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम, षष्ट, एकादश, विंश वा विंशतितम इत्यादि । .
ऋजुव्याकरणम् ॥ तद्धितान्त अव्यय॥ उपमा अर्थ बतलाने के लिये वत् प्रत्यय लगता है । यथा ब्राह्मणवत्, शूद्रवत् इत्यादि। प्रकार अर्थ बतलानेके लिये संख्या शब्दके उत्तर धा प्रत्यय लगता । यथा-पञ्चक्षा, नवधा इत्यादि ॥ बहुतसे तद्धितान्त अव्यय शब्द इस व्याकरण के वाक्यरचनाके प्रकरण में दिये गये है । यथा-यदा, कदा, यत्र, कुत्र, अत्र, तत्र, इत्यादि ॥ वाक्यरचना॥ वाक्य (अ) संस्कृत॥ हिन्दी॥ अपत्यं पाण्डवः पाण्डो हे कुन्तीके पुत्र तुम युद्ध करो। रपत्यं राघवा रघोः। नहीं तो धृतराष्ट्र के पुत्र तुपको सौमित्रिश्च सुमित्रायाः भीरु समझेगे॥ पर्वतस्यापि पार्वतो॥ Fight, O son of Kuntı, lest the विनताया वैनतेयः sons of Dhutarashtia take you कुन्त्याः कोन्तेय उच्यते । for a coward द्रोणस्य पुत्री द्राणिः स्याद् दशरथके दो बेटोंने अपनी माता- रावणस्यापि रावणिः॥ पोका दर्शन किया ॥ यस्य हन्ता दाशर्राथ- The yo sons of Dasarath saw रासीदशरथात्मजः॥ then mothers इत्यादया ह्यपत्यार्थ. कवियों मे कालिदास सबसे बड़ा है। तद्धितान्ता उदाहृता.॥ Kalidasa is the best of poets, अ) हिन्दीसे सस्कृतमे अनुवाद करते समय स्मरण रखना कि यथासम्भव तद्धितान्त शब्दोका प्रयोग करना चाहिय ॥
ऋजुब्याकरणम् ॥ संस्कृत ॥ इन्द्रस्येदं भवेदैन्द- मस्त्रादि यद्विवक्षितं। वायव्यं च पाशुपत- माग्नेयं वैष्णवं तथा। पितुर्यत् पैतृकं तत् स्या- न्मातुश्च मातृकं तथा। कायिकं कायसम्बन्धि वाक्लम्वन्धि च वाचिकं ॥ तार्किकस्तर्कवेत्ता स्या- न्मान्त्रिको यान्त्रिकस्तथा । रथिकः स्याद्रथचरो धम्मै चरति धार्मिकः ॥ लघोर्भावो लघुत्वं स्या- लघुता लाघवं तथा। लघिमा च भवेद्रूपं गुरुत्वादि गुरोरपि ॥ बुद्धिमान् बलवान् वाग्मी यशस्वी वत्सली धनी। हृदयालुदयालुश्च मानो दानी च राघवः॥ तद्धितान्तानि शब्दानां रूपाण्येवं भवन्ति हि॥ वाक्य हिन्दी॥ फलवन्त पेड़ों पर पक्षी बहुधा बैठते है॥ Buds generally resort to trees that bear fruit सोंगवाले पशुओंसे दूर रहा करो। Keep off from horned animals गुरु शिष्य को पुत्र की नाई देखे ॥ A teacher ought to look upon his pipil like his own son गुरु के साथ शिष्य पुत्र की नाई आचरण करे॥ A pupil ought to beba ve like a son towards his teacher पराये द्रव्यको मिट्टी के तुल्य देखना चाहिये ॥ One ought te iegaid another's property as though it were lump of clod.
ऋजुव्याकरणम्॥ समास ॥ अनेक पदोंकी विभक्तियों का लेप करके (अ) एक पद बनाने को समास काइते हैं। समास से सिद्ध शब्द कोई तो संज्ञा होते हैं, कोई विशेषण होते है और कोई अव्यय होते है । लमाल करने में समास के घटक पदों के स्वरूप में कहीं २ हेर फेर होता है और कहीं २ अन्त में अ, क इत्यादि प्रत्यय भी लगते है। । समास छः प्रकार के होते है । अव्ययोभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, बहुव्रीहि और द्वन्द्व ॥ समास-संज्ञा तत्पुरुष जिस समास में प्रथमा और सम्बोधन को छोड़ के और कोई विभक्ति बहुधा पूर्वपद के अन्त में रहे तो उसको तत्पुरुष समास कहते है । तत्पुरुष का लिङ्ग अन्तपद के अनुसार होता है । यथा-दुःखमतीतो दुःखातीतः, शंकुलया (सरौंते से ) खण्डः शंकुलाखण्डः; यूपाय (यज्ञ के खम्भे के लिये) दारु यूपदारु; चाराद्भयं चारभयं, राज्ञः पुरुषो राजपुरुषः, स्थाल्यां पक्कः स्थालीपक्कः इत्यादि । (अ) समास मे क्वचित् पूर्वपद की विभक्ति का लोप नहीं भी होता-यथा वनेचर, दिवोदास. इत्यादि ऋजुव्याकरणम्॥ कर्मधारय और द्विगु विशेषण और विशेष्य (अ) के समास को कर्मधारय कहो यथा-नीलम् उत्पलं नीलोत्पलं । परन्तु जब संख्यावाचक विशेषण ई साथ विशेष्य का समास हो और उसका प्रयोग स्रोलिङ्ग वा नपुंसव लिङ्ग के एकवचन में हाय, तब उस समास को द्विगु कहते हैं । यथा- त्रयाणां लोकानां समाहारः ( समूहः ) त्रिलोकी, त्रयाणां भुवनान समाहारः त्रिभुवनम् इत्यादि । जिस समास में प्रत्येक पद का अन्वय किसी एक क्रिया से है उसे द्वन्द्व कहते है। द्वन्द्व समास दो प्रकार का होता है। इतरेतर यो और समाहारद्वन्द्व । समाहारद्वन्द्व सदा नपुंसकलिङ्ग एकवचनान होता है और इतरेतर योग द्वन्द्वका लिङ्ग अन्तिम पदके अनुसार होता है समाहारद्वन्द्व का उदाहरण यथा-अहोनां नकुलानां च समाहारः अहि नकुलं, रथानां अश्वानां गजानांच समाहारः रथाश्वगजं इ० । इ रेतर योग द्वन्द्वका उदाहरण यथा-हरिश्च हरश्च हरिहरी; हरिश्च हर गुरुश्च हरिहरगुरवः इत्यादि ॥ कभी २ द्वन्द्व समास न होके उसके घटक पदों में से और २ शब्दोंव लोप हो कर कोई एक शब्द शेष रह जाता है । यथा माता च पिर च पितरौ ॥ हंसश्च हंसी च हंसौ ॥ इस प्रक्रिया को एक शेष कहते एकशेषको समास में नहीं गिनते ॥ (अ) कभी २ केवल विशेषण पदोका भी परस्पर कर्मधारय समास होता है- यथा-शीतञ्च तदुष्णश्च शातोण्णम्, महाश्चासौ राजा च महाराजः इत्यादि ।