Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Paiya-gajja-samgaho
Front matter
प्रकाशक:
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रत्ना सागर:
महाजन टोली, नं०२
आरा (बिहार)
पिन : ८०२३०१
द्वितीय संस्करण, सन् १९८७ ई०
२००० प्रतियाँ
मूल्य : १५.०० रुपये
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मुद्रक :
एकेडेमिक प्रेस
पटना: ८००००६
है आमुख भारतीय गद्य के इतिहास में प्राकृत-गद्य का विशिष्ट स्थान है। वैसे तो ई० पू० की छठी शती के पूर्व से ही प्राकृत-गद्य के अस्तित्व का अनुमान किया जाता है, लेकिन उपलब्ध सामग्री के आधार पर ई० पू० की तीसरी शती से इसका प्रारम्भ-काल माना जाता है। भारतीय आर्यभाषा-परिवार की प्राचीनतम भाषा वेदों में सुरक्षित मानी जाती है । कालान्तर में, कुछ संस्कार करके: वैदिक संस्कृत को लौकिक संस्कृत में परिवत्तित किया गया। प्राच्यभाषाविदों के अनुसार, लौकिक संस्कृत के ही समानान्तर रूप में प्रचलित तत्कालीन जनभाषा 'प्राकृत' के नाम से प्रख्यात हुई। वही प्राकृत देशभेद से अर्द्धमागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री आदि विभिन्न नामों और रूपों में ढलकर जनग्राह्य बनी। प्राकृत के रचनाकारों का मूल उद्देश्य अपना पाण्डित्य-प्रदर्शन नहीं, वल्कि जनजीवन की यथार्थता को चित्रित करना था। लोककल्याण की भावना से अभिभूत प्राकृत के कृतिकारों ने कल्पना-विलास से प्रायः अलग रहकर समाज के हर्ष-विषाद की गहरी अनुभूतियों के माध्यम से लोकजीवन की जटिल एवं विषम समस्याओं का समाधान तो प्रस्तुत किया ही, विभिन्न युगों में प्रतिफलित सामाजिक एवं राष्ट्रीय भावात्मक एकता का अनुकरणीय आदर्श भी उपन्यस्त किया। जैसा कहा गया, प्राकृत और संस्कृत दोनों दो भूमियों-लौकिक तथा अतिलौकिक-का प्रतिनिधित्व करते हुए भी समानान्तर-प्रवाहिणी भाषाएँ रही हैं, इसलिए संस्कृत और उससे प्रसूत इतर भाषाओं की गद्यशैली के उद्भव, विकास और विस्तार के परिज्ञान के निमित्त प्राकृत-गद्य का समानान्तर अध्ययन अत्यावश्यक है। इसी उद्देश्य से, महाविद्यालयों के छात्रों के लिए, ( ख ) प्रस्तुत कृति पाइय-गज्ज-संगहो' (प्राकृत-गद्य-संग्रहः) का प्रस्तवन किया गया है । इसमें प्राकृत भाषा के विकास-क्रम के अनुसार सरल, रोचक तथा शिक्षाप्रद पाठ संकलित किये गये हैं। संकलन के लिए स्वीकृत पाठों में नैतिक एवं सामाजिक कथाओं के अतिरिक्त सिकन्दर और अरस्तू जैसे कुछ ऐतिह्य व्यक्तियों की कथाएं भी सम्मिलित की गई हैं। इस गद्यसंग्रह में प्राकृत- नाटकों के भी कुछ अंश संकलित हैं; ताकि उनके माध्यम से प्राकृत के मुख्य रूपों के साथ ही मागधी एवं पैशाची-प्राकृत के रूपों से भी छात्रों को परिचित होने का अवसर उपलब्ध हो सके। मैं पूज्यातिशय मुनि श्रीकस्तूरविजयजी के प्रति विनम्र आभार व्यक्त करता हूँ, जिनकी 'पाइयविण्णाणकहा' से कतिपय छात्रोपयोगी कथाएँ इस कृति में समाकलित की गई हैं ।।। अन्त में, मैं प्राकृत के सभी प्राध्यापकों एवं अपने प्राकृत-प्रेमी सहृदय मित्रों को हार्दिक धन्यवाद देता हूँ, जिनके सौजन्य सहयोग से इस कृति का समीचीन प्रकाशन हो सका। उन ग्रन्थकारों एवं सम्पादकों के प्रति भी आभार व्यक्त करता हूँ, जिनकी कृतियों से मुझे इस पुस्तक की तैयारी में प्रेरणा और सहायता प्राप्त हुई है। विश्वास है, प्राकृत-गद्य के क्षेत्र में प्रविविक्षुओं के लिए यह स्वल्प प्रयास अवश्य ही परितोषप्रद होगा। - A राजाराम जैन महाजन. टोली, नं० २ आरा:८०२३०१
विषयानुक्रम
(क) गद्य-खण्ड
१. पंच सालिकणाणं सत्ति : १
२.. रमणीए पराभूअ-सिकंदरस्स कहा : २
३. विउसीए पुत्तवहूए कहाणगं : ६
४. कस्सेसा भज्जा : ९
५. ससुरगेहवासीणं चउजामायराणं कहा : १०
६. सिप्पिपुत्तस्स कहा : १४
७. अमंगलियपुरिसस्स कहा : १५
८. गेहेसूरो : १६
९. गामिल्लओ सागडिओ : १९
१०. पुत्तेहिं पराभविअस्स पिउस्स कहा : २०
११. भारियासीलपरिक्खा : २२
१२. छक्खंडागमलेहणकहा : २६
१३. उज्जममेव फलदाणे पमाणेइ : २९
१४. कुमारमंतिस्स दंडविहि : ३१
१५. चोरिक्कविसए दुण्हं विउसाणं कहा : ३२
१६. वसुदेवस्स गिहच्चाओ : ३४
१७. नलकहा : ३६
१८. महुर्विदु-दिद्रुतं : ३९
१९. सुभद्दापत्तलेहणं : ४०
२०. कूरो चेडो य पहसणं : ४३
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(ख) समीक्षा-खण्ड
१. धान के पाँच बीजों की शक्ति : ४६
२. रमणी द्वारा पराजित सिकन्दर की कथा : ५४
३, विदुषी पुत्रवधू की कहानी : ६५
४. यह किसकी पत्नी : ७४
५. ससुर के घर में रहनेवाले चार दामादों की कथा : ८१:
६. शिल्पी-पुत्र की कथा : ९२
७. अमांगलिक पुरुष की कथा : ९८
८. गृहशूर : १०२
९. ग्रामीण गाड़ीवाला : १११
१०. पुत्रों द्वारा अपमानित पिता की कथा : ११६
११. भार्या के शील की परीक्षा : १२२
शुद्धिपत्र : १३२
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१ .पंच सालिकणाणं सत्ति रायगिहे नयरे महाधणो धणो सेट्ठी . होत्था । तस्स .य पयइ- भद्दाए सुभद्दाए गेहिणीए चउरो पुत्ता-धणपालो, धणदेवो, धणगोवो, धण- रक्खिओ य । सव्वेवि ते सुंदेरं मंदिरं कलाकुसला सोजन्नपुन्ना य । घरिणीओ तेसि पहाणकुलभवाओ कमेणं सिरी, लच्छी, धणा, धन्ना य। ते जणय- पसाएण निच्चं सुहिया विहरति । अन्नया सेट्ठी परिणयवओ परलोगहियं काउकामो चितेइ-"एए पुत्ता मए एत्तियं कालं सुहिणो कया, संपयं पुण जइ सुण्हा काई गिहकज्जाइं चितेइ, तो मइ पव्वइएवि सुत्थिया हति । का पुण एयासि गिहचिंताए उचियं त्ति हु नायं, जा पुन्नाहिया । सा कहं नायव्वा ? बुद्धीए। जओ लोयवाओ-"बुद्धी कम्माणुसारिणी होइ।” एमाइ चितिऊण सेटिणा पारखा तेसि बुद्धीए परिच्छा। पवत्तिओ गिहे संवो। निमंतिओ तासि- मप्पणो सयणवग्गो, भोयाविओ सगोरवं । भुत्तुत्तरे य सुहनिविट्ठो चित्तसालिगाए। संमाणिओं कुसुमविलेवण- तंवोलाइणा। तस्समक्खं च धणेणाहूया सुहाओ, पंच पंच सालिकणे दाऊण भणियाओ य-'एए सम्म पालेयव्वा । जया य मग्गामि तया मम समप्पियव्वं' ति। तओ विसज्जिओ सयणवग्गो। 'किमेत्थं तत्तं' ति ? सवियक्को गओ सट्ठाणं । तत्य जेट्ठसुण्हाए एते पंचवि उज्झिया, जया जाइस्सइ तया जो तो अप्पिसामि त्ति कटु । वीयाए एयं चेव चितियं । नवरं छोलिऊण मुहे पक्खित्ता। तइयाए सुद्धवत्थे बंधिऊणाभरणकरंडिगाए ठविया, तिसंज्झं पाडियारिया य । . चउत्थीए पुण समप्पिया कुलहरे, पत्ते पाउसे वविया, उक्खया य, पडिउक्खया य कया । तेसिं पढमवरिसे जाओ कुलओ। वीए वरसे आढगं । तइयवरिसे खारि । चउत्थे कुंभा । पंचमए कुंभसहस्साणि । पुणोवि सयणसमवायपुव्वं मग्गिया जेट्टसुण्हा। तीए. वि किच्छेण सरिऊण समप्पिा कुओ वि पंच कणा। सवहसावियाए अन्ने एए ति साहिओ २ पाइयगज्जसंगहो - सव्भावो। वीयाए वि एव चेव । नवरं ते मए छोल्लिऊण भुत्त त्ति । तइयाए गंठिवद्धा चेव समप्पिया, किर मए एवं चेव रविखय त्ति। चउत्थीए कुंचियाओ समप्पिऊण भणियं-"मम जणयगिहेसु चिट्ठति । सगडाइपेसणेण आणावेउ ताओ त्ति ।" सेटिणा भणियं, पुत्ति ! कीस तए एवं कयं? तीए भणियं- "ताएण समाइट्ठ पालेयवा एए, ते एवं चेव सम्म पालिया भवंति। तओ सेटिगा नियाहिप्पायं साहिऊण भणिया तब्बंधुणो, किमेत्थ उचिय त्ति ? तेहिं भणियं---"तुम्भे चेव वुद्धिनिउणा पमाणं ।" सेट्टिणा वुत्तं- "जेट्ठा उज्झणसीला, ता जं किंचि मज्झगिहे छारछगणकयवराइ उज्झियव्वं तत्य एयाए अहिगारो। जं किंचि रंधणकडणसोहणाइ तमि वीयाए निओगो। तइया भंडागारसामिणि। चउत्थी सव्वाहिगारिणी, एयाए आएसेण सेसाहिं हिंडियव्वं । एवं चेव एयाओ सुहभाइणीओ भविस्संती त्ति जायमणुमयमेयं सव्वेसि । तप्पभिइ तासि नामपसिद्धी जाया-उज्झिया, भोगवई, रक्खिया, रोहिणी ति। जायं च सेटिघरं सुत्थं । तओ सलाहिओ सेट्ठी लोएण । तेणावि क़यं हियइच्छियं परलोगहियं ति । एरिसो दीहदंसी धम्मारिहो त्ति। २. रमणीए पराभूअ-सिकंदरस्स कहा दुसहस्सवासाओ पुव्वं गीसविसए साहसिओ महासूरो सिकंदरो नाम महाराया आसि। वालत्तणाओ आरव्भ तस्स अज्झावगो रायनीइ-वियवखणो सम्मग्गदंसगो 'एरिस्टोटलो' नाम असाहारणो विउसवरो गुरु अहेसि । सो सिकंदरो सया गुरुसेवापरो आणाएं वट्टमाणो जोव्वणे वि चत्तकामभोगाहिलासो परंगणासु वि दिट्टि अकुणतो, केवलं जस-कित्ति-विजयकंखिरो गुरुणो पहावेण अणेगदेसविजयं कासी। वीसपसिद्धो सो एगया सव्वदिसाविजयं काउं इच्छंतो पवलसेणापरिवरिओ गुरुणा सह नियनयराओ निग्गओ। मग्गे खुहापिवासा-परिस्समं अगणतो पवलूसाहजुओ दूसहेज्ज-नरिंदवग्गे जयंतो कमेण इराणदेसे समागओ, तत्थ काओ महानयराओ वाहिरं सिविरं ३ रमणीए पराभूअ-सिकंदरस्स कहा विअ सयं उज्जाणमझे भवपासाए ठिओ। एगया आसारूढो सो गिरि- सिहरमालालंकिय-विविहपएससोहं निरिक्खंतो अग्गओ गच्छमाणो नियरूव- निज्जिभदेवंगणं महरिसीणं पि चित्तवखोहकारिणि एगं सुंदर पासेइ। सा अच्चव्भुयरूवा सुंदरी त्ति ससिणेहनयणकडवखेहिं ताडित्ता कामविसयविसमुच्छियं करेइ। सो वि कामग्गहगसिओ तं चिय पासेमाणो सवलो वि विमूढमणो अग्गओ गंतु असमत्यो तत्थच्चिय निच्चलो ठिओ। सा वाला विमोहित्ता नियट्ठाणे गया। समीवट्टिणा गुरुणा सव्वा एव तस्स चेट्ठा निरिविखया। सो वि नरिंदो गुरु दळूण जायक्खोहो पुणरवि सावहाणचित्तो संजाओ। एगया नियपवलसेणामज्झे उवविट्ठो सो सिकंदरो मंतिसेणावइ- पमुहसुहडवराणं अग्गओ नियपरक्कमवत्तं कहेइ, तम्मिय काले तस्स गुरु तत्थ समागंतूण सहासमक्खं तं अवहेलेइ-"जं विज इक्करसियाणं पुरिसाणं इत्थी- रूवावलोगणं पि भयकरं, जाओ दंसणमेत्ताओ वीरियं हणेइरे, हलाहलमिव कज्ज कुणंति । वीरपुरिसाण नरिंदाणं च नरगदुवारसमा सा सत्थेसु गणिआ, तासि सुंदरं पि विसमविसाओ व महाभयजणगं ।" एवं अवहिलित्ता नियावासे गओ। सो महानरिंदो वालत्तणाओ गुरुस्स उवगारं सुमरंतो सहासमक्खं एवं निदिओ गरिहिओ वि मउणेण अहोदिट्टि काऊण सव्वं सहेइ। किंतु मणमि अच्चंतदूमिओ विविहविगप्पे कुणतो कियंतं कालं तत्थेव ठाऊण सहं विसज्जित्ता नियपासाए आगओ। तत्य वि खणं दिट्ठसुंदरीए सुंदरयं, खणं अप्पणो निव्वलयं, खणं गुरुओ दढिमं वियारंतो एवं निण्णयं करेइ-'कयावि तीए रमणीए मुहं न पासेमि'. त्ति नियचित्तं थिरीकरेइ। तह वि अणाइकाल- मोहब्भासेण इंदियाणं च पवलत्तणेण निव्वलस्स तस्स चित्ते सच्चिय रमणी आगच्छ। तया सो त चिय रमणीरूवं झायंतो विम्हरियनियकज्जो सहसा निय- मासरयणं आरोहित्ता तीए सुंदरीए घरंमि समुवागओ। सा वि सिकंदरं पासित्ता अच्चंतहरिसचित्ता तं सक्कारेइ सम्माणेइ य । तया: सो संभरियगुरुवयणो पाइयगज्जसंगहो - हा! अहं किं करेमि ? नियरज्जाओ जगज्जयणपिवासाए निग्गओ हं एईए रमणीए पराइओ, मज्झ सव्वं नट्ठ, लोगा वि किं मं वइस्संति ? अलाहि एंयाए।'--एवं वियारित्ता पच्चागंतुं पवट्टइ । तया सा सुंदरी इंगियागारेण तस्स मणोभावं जाणित्ता कहेइ-"कि पच्छा गच्छेह ? अत्थ आगमणे तुम को निवारेइ ? सच्चं मम कहेह, हं तु नियरूव-मइ-कला-संपयाए महरिसीणं पि चित्तं खोहेउं समत्था । मम अग्गओ सो वरागो को ? खणेण तस्स गव्वं विणासेमि । अहं वीसमोहिणी इराण- नरिंदपुत्ती अम्हि, मज्झ चरणेसु महापुरिसा वि निवडंति, तया सो तुम्हाणं. निवारगो को ?” सिकंदरस्स गुरूणं उवरि अवियला सद्धा, आयरो सम्माणो य. अपुव्वो, तह वि तीए रूवासत्तो सो गुरुकयनियतिरक्कारवुत्तंत सव्वं कहेइ । तस्स मुहाओ गुरुकयनारी विसयावमाणं सोच्चा कोहेण अईव पयंडा रोहसरूवा संजाया। सा तं पइ वएइ-- "हे कुमार ! तुम्ह गुरुणा समत्तत्थीणं. सुंदरस्स सत्तीए साहसस्स य अवमाणं कयं, तेण अज्जाहं पइण्णं करोमि-- 'जंकल्ले तुम्हाण गुरु अहं रूवेण सत्तीए साहसेण य मम पायपडणसीलं न काहं, तया अल मे जीविएणं ।' मम नयणवाणपुरओ तस्स वयस्स नाणस्स अणुभवस्स य का गणणा !" सिकंदरो वएइ-"सो मम गुरु सव्वपोग्गलियसुहाओ परं वट्टइ, सएव अज्झप्पचितणपरो धम्मत्थसलिहणतल्लिच्छों कालं गमेइ। तं कावि रूववई सुंदरी चालिउं असमत्या।" तया सा रमणी वएइ-“सो वि किं मणूसो न सिया? तस्स हिंययं किं न ? हियए कि विसयउम्मीओ न जाति? कया वि तस्स मयप्पायं हिययं होज्जा; तहवि अहं तस्स हिययं सरेण रूवेण नयण- कडक्खेहि य सजीवियं सोम्मायं अवस्सं करिस्सं" ति कहित्ता नियकज्जकरण- परा जाया। सिकंदरो वि तीए साहसकम्मं दद्रु इच्छंतो नियट्ठाणे समागओ। बीयदिणंमि पच्चूसकाले तस्स गुरु धम्मसत्थत्यचितणिवकपरो वट्टइ, तयाः सा सुंदरी अच्चम्भुयवसधारिणी तस्स उज्जाणे समागंतूण महुरसरेण गाएइ, तीए गानसवणे पसुपविखणो वि खणमेत्तं मूढा जाया । तस्स गुरु वि सत्यत्थाई ५ रमणीए पराभूअ-सिकंदरस्स कहा चिंतमाणो तीए महुरज्झुणीए अक्खित्तो समाणो तग्गीयसवणेण आकड्ढियचित्तो खणमि वामूढो संजाओ, तस्स य गत्ताई सिढिलीभूयाई, चित्तं पि संखुद्धं जायं । मणसा चितेइ'का एसा गाएइ' त्ति निरूवणत्थं वायायणे ठाऊण वाहिरं पासेइ, तया उग्घाडियमत्थयं नियंवयावलंवमाणदीहकेसि गयगामिणि मंदं मंद संचरमाणि' अच्छरगणाणं पि रूवेण पराभवंति दिव्वसरेण गायंति रमणिज्जरूवं रमणि पासित्ता जराजज्जरिअदेहो वि जायतिव्वकामाहिलासो मूढमणो सो उज्जाणमज्झे गच्छइ । तत्थ गंतूण तीए रूवसोहं दळूण मयणानलदद्धो सो सुंदरीखंधे हत्थं ठवेइ, सा वि तं पासित्ता चित्तखोहेण हिट्ठम्मि पासेइ। तया सो कहेइ-'अहं तुमं कामेमि, मए सह कामभोगाई भुंजसु ।' सा वि रमणी ईसि विहसिअ लज्जं धरती वएइ.--'जइ मम पइण्णं पूरसु, तया अहं अहोनिसं तुम सेविस्सामि ।' तीए रूवविमोहिओ स पुच्छइ- 'का तुम्ह पइण्णा ?' सा कहेइ-"जइ तुम्हे तुरंगीभूअ चिट्ठह, घोडगी भूअं तुम्हाणमुवरि उववेसित्ताणं हत्थे कसं धरित्ता वाहेमि तया जावज्जीवं तुम्ह आणाए पट्टिस्सं।" सो एवं सोच्चा तिव्वरागपासवद्धो तुरंगीभूओ। जया सा तुरंगीभूमं तं आरोहित्ता वाहेइ, तया तीए सणापेरिओ सो सिकंदरो तत्थागतूण तयवत्थं गुरुं पासेइ । सावि सुंदरी सिकंदरं दठूणं कहेइ-"ट्ठि मज्झ माहप्पं । मम पुरओ सत्तिमंत्ता वि पुरिसा तणायंति।" विम्हरियगुरु- सिणेहो सो सिकंदरो वि पुव्वुत्तं गुरुवायं-"जे इत्थीओ नरगदुवारसमाओ इच्चाई सुणावित्ता तुम्हाणमुवएसो कत्थ गओ ?" त्ति उवहसेइ । तया गुरु नायपरमट्ठो सिकंदरं कहेइ-"तं हे वच्छ ! तुं मोहाओ खलियं मं दळूणं हसेसि, परं तु तुमंमि मए दिण्णं गाणं वियारियं सिया, हिययंमि सुठ्ठत्तणेण धरियं होज्जा, तया एवं न उवहसेज्जा । किं च वियारेसु तुं "जइ एसा रमणी मारिसं वुद्धं धीरं गंभीरं सया नाणज्झाणासत्तं पि एरिसि अवत्थं काउं समत्था, तया जुव्वणुम्मत्तस्स तुम्ह किं न करिस्सइ ? एसा सुंदरी किंकरीभूए अम्हे 'मए मइसामत्थेण केरिसं कयं' ति उवहसेइ । एयाए सुंदरीए अग्गओ अम्हे दुण्णि वि मुरुक्ख' त्ति कहित्ता सो गुरु नियावासे: रूवमत्ता ६ पाइयगज्जसंगहो गंतूण पुव्वं पिव झाणमग्गो जाओ। तया सो सिकंदरो सा वि सुंदरी वियारिति--'एसो किल धीरो . गंभीरो तत्तण्णू महापुरिसो अस्थि, एयाणं पुरओ अम्हे अवुहा बालग च्चिय' त्ति। ३. विउसीए पुत्तबहूए कहाणगं कालो गओ जो धम्मम्मि सो णेओ सहलो च्चिस । निप्फलो सयलो सेसो वहू एत्थ निदंसणं॥ कम्मि नयरे लच्छीदासो सेट्ठी वरीवट्टइ। सो बहुधणसंपत्तीए गविट्ठो आसि। भोगविलासेसु एव लग्गो कयावि धम्म ण कुणेइ। तस्स पुत्तो वि एयारिसो अत्थि। जोव्वणे पिउणा धम्मिअस्स 'धम्मदासस्स जहत्थनामाए सीलवईए कन्नाए सह पाणिग्गहणं पुत्तस्स कारावियं । सा कन्ना जया अट्ठवासा जाया, तया तीए पिउपेरणाए साहुणीसगासाओ सवण्णधम्मसवणेण सम्मत्तं अणुव्वयाइं य गहीयाई, सव्वण्णधम्मे अईव निउणा संजाआ। जया सा ससुरगेहे आगया तया ससुराई धम्माओ विमुहं दठूण तीए वहुदुहं संजायं । कहं मम नियवयस्स निव्वाहो होज्जा ? कहं वा देवगुरुविमुहाणं ससुराईणं धम्मोवएसो भवेज्जा, एवं सा वियारेइ । एगया 'संसारो असारो, लच्छी वि असारा, देहोवि विणस्सरो, एगो धम्मो च्चिय परलोगपवन्नाणं जीवाणमाहार' त्ति उपएसदाणेण नियभत्ता सव्वण्णधम्मेण वासिओ कओ। एवं सासूमवि कालंतरे वोहेइ। ससुरं पडिवोहि सा समयं मग्गेइ । एगया तीए घरे समणगुणगणालंकिओ महव्वई नाणी जोवणत्थो एगो साहू भिक्खत्थं समागओ। जोवणे वि गहीयवयं संतं दंतं साहुँ घरंमि आगयं दळूण आहारे विज्जमाणे वि तीए वियारियं-'जोव्वणे महव्वयं महादुल्लहं, फहं एएण एयंमि जोव्वणत्तणे गहीयं ?' ति परिक्खत्थं समस्साए पुठ्ठ- ।
७ विउसीए पुत्तवहूए कहाणगं 'अहुणा समओ न संजाओ, किं पुव्वं निग्गया ?' तीए हिययगयभावं नाऊण साहुणा उत्तं- “समयनाणं-कया मच्चू होस्सइ त्ति नत्यि नाणं, तेण समयं विणा निग्गओ।" सा उत्तरं नाऊण तुट्ठा। मुणिणा वि सा पुट्ठा-'कइ वरिसा तुम्ह संजाया ?' मुणिस्स पुच्छाभावं नाऊण वीसवासेसु जाएसु वि' तीए 'वारसवास' त्ति उत्तं । पुणरवि 'ते सामिस्स वाइ वासा जात' त्ति? पुढें । तीए पियस्स पणवीसवासेसु जाएसुवि पंचवासा उत्ता, एवं सासूए 'छम्मासा' कहिया । ससुरस्स पुच्छाए सो 'अहुणा न उप्पण्णो अत्यि' ति भणिआ । एवं वहू-साहूणं वट्टा अंतट्टिएण ससुरेण सुआ। लद्धभिक्खे साहुमि गए सो अईव कोहाउलो संजाओ, जओ पुत्तवहु मं उद्दिस्स 'न जाउ' त्ति कहेइ । रुट्ठो सो पुत्तस्स कहणत्थं हटें गच्छइ । गच्छन्तं ससुरं सा वएइ-'भोत्तूणं हे ससुर ! तुं गच्छसु ।' ससुरो कहेइ-'जइ हं न जाओ म्हि, तया कहं भोयणं चव्वेमि- भक्खेमि' इस कहिऊण हट्ट गओ। पुत्तस्स सव्वं वुत्तंतं कहेइ---'तव पत्ती दुरायारा असम्भवयणा अत्यि, अओ तं गिहाओ निक्कासय ।' सो पिउणा सह गेहे आगओ । वहुं पुच्छइ-'कि माउपिउणो अवमाणं कयं ? साहुणा सह वट्टाए कि असच्चमुत्तरं दिण्णं ?' तीए उत्तं-'तुम्हे मुणि पुच्छह, सो सव्वं कहिहिइ ।' ससुरो उवस्सए गंतूण सावमाणं मुणि पुच्छइ- 'हे मुणे, अज्ज मम गेहे भिक्खत्थं तुम्हे किं आगया ?' मुणी कहेइ-'तुम्हाण घरं ण जाणामि, तुमं कुत्य वससि ?' सेट्ठी वियारेइ 'मुणी असच्चं कहेइ ।' पुणरवि पुटुं-'कत्य वि गेहे वालाए सह वट्टा कया कि ?' मुणी कहेइ–'सा वाला अईव कुसला, तीए मम वि परिक्खा कया ।' तीए हं वुत्तो-'समयं विणा कह निग्गओ सि ?' 'मए उत्तरं दिण्णं-"समयस्स-'मरणसमयस्स' नाणं नत्थि, तेण पुत्ववयम्मि निग्गओ म्हि ।" मए वि परिक्खत्थं सव्वेसि'ससुराईणं वासाई पुढाई। तीए सम्म कहियाई। सेट्ठी पुच्छइ- 'ससुरों न जाओ इअ तीए कि कहियं?' मुणिणा उत्तं-'सा चिय पुच्छिज्जउ, जो विउसीए तीए जहत्थो भावो नज्जइ।
८ पाइयगज्जसंगहो ससुरो गेहं गच्चा पुत्तवहुं पुच्छइ-~'तीए मुणिस्स पुरओ किमेवं वुत्तं मे ससुरो. जाओ विन।' तीए उत्तं-"है. ससुर, धम्महीणमणुसस्स माणवभवो पत्तो वि अपत्तो एव, जओ सद्धम्मकिच्चेहि सहलो भवो न कओ सो मणुसभवो निप्फलो चिय । तओ तुम्ह जीवणं पि धम्महीणं सव्वं गयं । तेण मए कहिअं-मम ससुरस्स . उप्पत्ती एव न।" एवं सच्चत्थाणे तुदो धम्माभिमुहो जाओ। पुणरवि पुढ–'तुमए ‘सासूए छम्मासा कह कहिआ ?' तीए उत्तं-'सासुं पुच्छह' ।' सेट्टिणा सा पुट्ठा । ताए वि कहिअं- "पुत्तवहूणं वयणं सच्चं, जओ मम सवण्णुधम्मपत्तीए छम्मासा एव जाया, जओ इओ छम्मासाओ पुव्वं कत्थ वि मरणपसंगे अहं गया। तत्थ थीणं विविहगुणदोसवट्टा जाया।" एगाए वुड्ढाए उत्तं-"नारीण मज्झे इमीए पुत्तवहू सेट्ठा । जोवणवए वि सासूभत्तिपरा धम्मकजम्मि स एव अपमत्ता, गिहकज्जेसु वि कुसला जन्ना एरिसा। इमीए सासू निभगा, एरिसीए भत्तिवच्छलाए पुत्तवहूए वि धम्मकज्जे पेरिज्जमाणावि धम्म न कुणेइ, इमं सोऊण वहुगुणरंजिआ तीए मुहाओ, धम्मो पत्तो। धम्मपत्तीए छम्मासा. जाया, तओ पुत्तवहूए छम्मासा कहिआ, तं जुतं ।" पुत्तो वि पुट्ठो, तेण वि. उत्तं- "रत्तीए समयधम्मोवएसपराए भज्जाए संसारासारदसणेण भोगविलासाणं च परिणामहदाइत्तणेण वासाणईपूरतुल्ल- जुव्वणतणेण य.देहस्स खणभंगुरत्तणेण जयम्मि धम्मो एव सारु त्ति उदिट्ठो हं सवण्णुधम्माराहगो जाओ, अज्ज पंचवासा जाया। तो वहूए मं उहिस्स पंचवासा कहिआ, तं सच्चं ।' एवं कुडुवस्स धम्मपत्तीए वट्टाए विउसीए य पुत्तवहूए जहत्थवयणं सोऊण लच्छीदासो वि पडिवुद्धो. वुड्ढत्तणे वि धम्म आराहिम सगई पत्तो सपरिवारो। उवएसो- सीलवई ससुराइविवोहगं । सोच्वा धम्मेण अप्पाणं वासि कुण सव्वया ।। दिढतं ४. कस्सेसा मज्जा हत्थिणाउरे नयरे सूरनामा रायपुत्तो नाणागुणरयण-संजुत्तो वसइ । तस्स भारिया गंगाभिहाणा सीलाइगुणालंकिया परमसोहन्गसारा। सुमइनामा तेसिं धूया। सा कम्मपरिणामवसओ जणय-जणणी-भाया-माउलेहिं पुढो पुढो वराणं दिन्ना। चउरो वि ते वरा एगम्मि चेव दिणे परिणेउं आगया परोप्परं कलहं कुणन्ति । तो तेसिं विसमे संगामे जायमाणे वहुजणक्खयं दठूण अग्गिम्मि पपिट्ठा सुमइकन्ना । तीए समं निविडणेहेण एगो वरो वि पविट्ठो। एगो अट्ठीणि गंगप्पवाहे खिविउं गओ। एगो चिआरक्खं तत्थेव जलपूरे खिविऊण तदुक्खेणं मोहमहागह-गहिओ महीयले हिण्डइ। चउत्थो तत्थेव ठिओ तं ठाणं रक्खंतो पइदिणं एगमन्नपिंडं मुअंतो कालं गमेइ । अह तइओ नरो महीयलं भमन्तो कत्थवि गामे रंधणघरम्मि भोअणं कराविऊण जिमिउं उवविट्ठो। तस्स घरसामिणी परिवेसइ । तया तीए लहुपुत्तो अईव रोइइ । तओ तीए रोसपरव्वसं गयाए सो वालो जलणम्मि खिविओ। सो वरो भोयणं कुणंतो उठ्ठिउं लग्गो। सा भणइ-"अवच्चरूवाणि कस्स वि न अप्पियाणि होति, जेसि कए पिउणो अणेगदेवयापूयादाणमंतजवाई किं किं न कुणन्ति । तुमं सुहेण भोयणं करेहि। पच्छा वि एयं पुत्तं जीवइस्सामि ।' तओ सो वि भोयणं विहिऊण सिग्धं उठ्ठिओ जाव ताव' - तीए नियघरमज्झाओ अमयरस-कुप्पयं आणिऊण जलणम्मि छडुक्खेवो कओ। वालो हसंतो निग्गओ। 'जणणीए उच्छंगे नीओ। तओ सो वरो झायइ-"अहो अच्छरिअं ! अहो अच्छरिअं ! जं एवंविहजलणजलिओ वि जीविओ । जइ एसो अमयरसो मह हवइ ता अहमवि तं कन्नं जीवावेमि" त्ति चितिऊण धुत्तत्तेण कूडवेसं काऊण रयणीए तत्थेव अवसरं लहिऊण तं अमयरसकूवयं गिहिऊण हत्थिणाउरे आगओ। तेण पुण तीए जणयादिसमक्खं चिआमज्झे अमयरसो मुवको। सा सुमइ कन्ना सालंकारा . जीवंती उठ्ठिया। तया तीए समं एगो वरो- वि जीविओ। ठिओ।
पाइयगज्जसंगहो १० - कम्मवसओ पुणो चउरो वि वरा एगओ मिलिआ। · कन्नापाणिग्गहणत्थमन्नोन्न विवायं कुणंता वालचंदरायमंदिरे गया । चउहिं वि कहिलं राइणो नियनियसरूवं । राइणा मंतिणो भणिया जहा- “एयाणं विवायं भंजिऊण एगो वरो पमाणीकायव्वो।' मंतिणो वि सव्वे परोप्परं वियारं कुणंति । न पुण केणावि विवाओ भज्जइ । जओ- आसन्ने रणरंगे मूढे मंते तहेव दुन्भिक्खे । जस्स मुहं जोइज्जइ सो पुरिसो महियले विरलो ।। तया एगेण मंतिणा भणियं-."जइ मन्नह ता विवायं भज्जेमि ।" तेहिं जंपियं-“जो रायहंसव्व गुणदोसपरिक्खं काऊण पक्खवायरहिओ वायं भंजइ तस्स वयणं को न मन्नइ ?" तओ तेण' भणियं-- जेण जीविया, 'सो जम्म- हेउत्तणेण पिया जाओ। जो सहजीविओ सो एगजम्मट्ठाणेण भाया । जो अट्ठीणि गंगामज्झम्मि खिवि गओ सो पच्छापुण्णकरणेण पुत्तसमो जाओ। जेण पुण तं ठाणं रक्खियं, सो भत्ता।" एवं मंतिणां विवाए भग्गे, चउत्थेणः वरेण कुरुचंदाभिहाणेण सा परिणी । - ५. ससुरगेहवासीणं चउजामायराणं कहा कत्थ वि गामे नरिंदस्स रज्जसंतिकारगो पुरोहिओ आसि । तस्स एगो पुत्तो, पंच य कन्नगाओ संति । तेण चउरो कन्नगाओ विउसमाहण-पुत्ताणं परिणाविआओ। कयाई पंचमीकन्नगाए विवाहमहूसवो पारद्घो। विवाहे चउरो जामाउणो समागया। पुण्णे विवाहे जामायरेहिं विणा सव्वे संबंधिणो निय- नियघरेसु गया। जामायरा भोयणलुद्धा गेहे गंतुं न इच्छंति । पुरोहिओ विमारेइ'सासूए अईव पिया जामायरा, तेण अहुणा पंच छ दिणाइं एए चिठंतु, पच्छा गच्छेज्जा ।' ते जामायरा खज्जरसलुद्धा तओ गच्छिउं न इच्छेज्जा। परुप्परं ते चितेइरे-'ससुर-गिहनिवासो सम्गतुल्लो नराणं' किल एसा सुत्ती सच्चा, एवं चितिऊणं एगाए भित्तीए एसा सुत्ती लिहिआ। ..
ससुरगेहवासीणं चउजामायराणं कहा ११ - एगया एवं सुत्ति ससुरेण वाइऊण' चितिसं-'एए जामायरा खज्जरसलुद्धा कयावि न गच्छेज्जा, · तओ एए वोहियव्वा' एवं चितिऊण तस्स सिलोग- पायस्स हिट्ठमि पायत्तिगं लिहिलं- "जइ वसइ विवेगी पंच छव्वा दिणाई। दहिघयगुडलुद्धा मासमेगं मासमेगं वसेज्जा स हवइ खरतुल्लो माणवो माणहीणो॥" तेहिं जामायरेहिं पायत्तिगं वाइ पि खज्जरसलुद्धत्तणेण तओ गंतु नेच्छति। ससुरो वि चितेइ 'कहं एए नीसारिअव्वा? साउभोयणरया एए खरसमाणा माणहीणा संति, तेण जुत्तीए निक्कासणिज्जा ।' पुरोहिओ. नियं भज्ज पुच्छइ-'एएसि जामाऊणं भोयणाय कि देसि ?' सा कहेइ-'अइप्पिय- जामायराणं तिकालं दहि-घय-गुडमीसिअमन्नं पक्कन्नं च सएव देमि ।' पुरोहिओ भज्ज · कहेइ-'अज्जयणामो आरभ तुमए जामायराणं वज्जकुडो थूलो रोट्टगो घयजुत्तो दायब्बो।' पियस्स आणा अगइक्कमणीभ त्ति चितिऊण सा भोयण- काले ताणं थूलं रोट्टगं घयजुत्तं देइ । तं दठूणं पढमो मणी-- रामो जामाया मित्ताणं कहेइ--"अहुणा एत्थ वसणं न जुत्तं, नियघरंमि अओ साउभोयणं अत्यि, तओ इओ गमणं चिय सेयं । ससुरस्स पच्चूसे कहिऊण : गमिस्सामि।" ते कहिति-"भो मित्त ! विणा मुल्लं भोयणं कत्थ सिया, एयं वज्जकुडरोट्टगं साउं गणिऊण भोत्तव्वं, जंओ'परन्नं दुल्लहं लोगे' इ. सुई तए कि न सुआ? तव इच्छा सिया तया गच्छसु, अम्हाणं ससुरो कहिही तया गमिस्सामो।" एवं मित्ताणं वयणं सोच्चा पभाए ससुरस्स अग्गे गच्छित्ता सिक्खं आणं च मग्गेइ। ससुरो वि तं सिक्खं दाऊण 'पुणावि आगच्छेज्जा" एवं कहिण किंचि अणुसरिऊण अणुण्णं देइ । एवं पढमो जामायरो 'वज्ज- कुडेण मणीरामो निस्सरिओ। पुणरवि भज्जं कहेइ- 'अहुणा अज्जयणाओ जामायराणं तिलतेल्लेण । जुत्तं रोट्टगं दिज्जा।' सा भोयणसमए जामायराणं तिलतेल्लजुत्तं '१२ पाइयगज्जसंगहो रोट्टगं देइ। तं दळूण माहवो नाम जामायरो चितेइ-'धरंमि वि एवं लव्भइ, तओ इओ गमणं सुह, मित्ताणं पि कहेइ-'हं कल्ले गमिस्सं, जओ भोयणे तेल्लं समागयं ।' तया ते मित्ता कहिंति-"अम्हकेरा सासू विउसी अत्थि, तेण सीयलं तिलतेल्लं चिम उयरग्गिदीवणेण सोहणं, न घयं, तेण तेल्लं देइ, अम्हे उ अत्थ ठास्सामो।' तया माहवो नाम जामायरो ससुरपासे गच्चा सिक्खं अणुण्णं च मग्गेइ। तया ससुरो 'गच्छ गच्छ' त्ति अणुण्णं देइ, ‘न सिक्खं । एवं "तिलतेल्लेण माहवो' वीओ वि जामायरो गओ। तइअचउत्थ- जामायरा न गच्छंति । 'कहं एए निक्कासणिज्जा' इस चितित्ता' लखुवाओ -ससुरो भज्ज पुच्छेइ--'एए. जामाउणो रत्तीए सयणाय कया आगच्छति ?' 'तया पिया कहेइ–कयाइ रत्तीए पहरे गए आगच्छेज्जा, कया दुतिपहरे गए आगच्छति ।' पुरोहिओ कहेइ---'अज्ज रत्तीए दारं न उग्घाडियवं, अहं जागरिस्सं ।' ते दोण्णि जामायरा संझाए गामे विलसिउ गया, विविहकीलाओ कुणंता नट्टाइं च पासंता, मज्झरत्तीए गिहद्दारे समागया। पिहिलं दारं दळूण दारुग्घाडणाए उच्चसरेण अक्कोसंति-'दारं उग्घाडेसु' त्ति, तया दार- समीवे सयणत्थे पुरोहिओ जागरंतो कहेइ---'मज्झरति जाव कत्थं तुम्हे थिआ ? 'अहुणा न उग्घाडिस्सं, जत्थ उग्धाडिअद्दारं अत्थि, तत्थ गच्छेह' एवं कहिलण मोणेण थियो। तया ते दुण्णि समीवत्थियाए तुरंगसालाए गया । तत्थ आत्थरणाभावे अईसीयवाहिया तुरंगमपिट्ठच्छाइआवरणवत्थं गहिऊण भूमीए सुत्ता। तया विजयरामेण जामाउणा चितिअं-'एत्थ सावमाणं ठाउं न उइ।' तओ सो मित्तं कहेइ-~~-'हे मित्त ! अम्हं सुहसज्जा का? इमं भूलोट्टणं च' कत्थ ? अओ इओ गमणं चिअ वरं।' स मित्तो वोल्लेइ-'एआरिस- दुहे वि परन्नं कत्थ ? अहं तु एत्य ठाहिस्सं। तुम गंतुमिच्छसि जइ, तया गच्छसु ।' तओ सो पच्चूसे पुरोहियसमीवे गच्चा सिक्खं अणुण्णं च मग्गीअ । तया पुरोहिओ सुठ्ठ त्ति कहेइ। एवं सो विजयरामो 'भूसज्जाए विजयरामो' 'वि निग्गओ।
ससुरगेहवासीणं चउजामायराणं कहा अहुणा केवलं केसवो जामायरो तत्थ थिओ संतो गंतुं नेच्छइ । पुरोहिओ वि केसवजामाउणो निक्कासणत्थं जुत्ति विआरेइ। एगया नियपुत्तस्स कण्णे किंचि वि कहिंऊण जया केसवजामायरो भोयणत्थं उवविट्ठो, पुरोहिअस्स य पुत्तो समीवे ठिओ वट्टइ, तया पुरोहिओ समागओ समाणो पुत्ते पुच्छइ~'वच्छ ! एत्थ मए रुप्पगं मुत्तं, तं च केण गहिरं?' सो कहेइ- 'अहं न जाणामि ।' पुरोहिओ बोल्लेइ-'तुमए च्चिय गहिरं, हे असच्चवाइ ! पाव ! धिट्ठ 4 देहि ममं तं, अन्नहा तुम मारइस्सं हं' ति कहिऊण सो उवाणहं गहिऊण. मारिउ धाविओ। पुत्तो वि मुट्ठि बंधिऊण पिउस्स सम्मुहं गओ। दोणि ते जुज्झमाणे दळूण केसवो ताणं मज्झे गंतूण-'मा जुज्झह, मा जुज्झह त्ति कहिण ठिओ । तया सो पुरोहिओ हे जामायर ! 'अवसरसु अवसरसु' कहिऊण तं उवाणहेण पहरेइ । पुत्तो वि 'केसव ! दूरीभव दूरीभव' ति कहिऊण मुट्ठीए तं केसवं पहरेइ। एवं पिउपुत्ता केसवं ताडिति। तओ सो तेहिं धक्कामुक्केण ताडिज्जमाणो सिग्धं भग्गो, एवं 'धक्कामुक्केण केसवो' सो. अकहिऊण गओ। तद्दिणे पुरोहिओ निवसहाए विलंवेण गओ। नरिंदो तं पुच्छइ- 'किं विलंवेण तुमं आगओ सि ।' सो कहेइ-"विवाहमहूसवे चउरो जामायरा समागमा । ते उ भोयणरसलुद्धा चिरं ठिआवि गंतुं न इच्छंति । तओ जुत्तीए. सव्वे निक्कासि ते एवं- वज्जकुडेण मणीरामो, तिलतेल्लेण माहवो । भूसज्जाए विजयरामो, धक्कामुक्केण केसवो ॥" त्ति, सव्वो वुत्तंतो नरिंदस्स अग्गे कहिओ। नरिंदो वि तस्स बुद्धीए अईवः तुहो। उवएसो- जामायरचउक्कस्स . सुणिऊण. पराभवं । ससुरस्स गिहावासे सम्माणं जाव संवसे ॥ .. - -- ६. सिप्पिपुत्तस्स कहा पिउणा सिक्खिओ पुत्तो पारं जाइ कलद्धिणो। वण्णिओ जइ नो होज्जा जह सिप्पिअअंगओ।। अवंतीए पुरीए इंददत्तो नाम सिप्पिवरो अहेसि, सो सिप्पकलाहिं सव्वमि जयंमि पसिद्धो होत्था । इमस्स सरिच्छो अन्नो को वि नत्थि । एयस्स पुत्तो सोमदत्तो नाम । सो पिउस्स' सगासंमि सिप्पकलं सिक्खंतो कमेण पिअराओ वि अईव सिप्पकलाकुसलो जाओ। सोमदत्तो जाओ जाओ पडिमाओ निम्मवेइ, तासु तासु पिया कंपि भुल्लं दंसेइ, कया वि सिलाहं न कुणेइ। तओ सो सुहमदिट्ठीए सुहुमसुहुमं सिप्पकिरियं कुणेऊण पियरं दंसेइ, पिया वि तत्थ वि कपि खलणं दरिसेइ, 'तुमए सोहणयरं सिप्पं कयं' ति न कयाइ तं पसंसेइ । अपसंसमाणे पिउम्मि सो चितेइ-'मम पिआ मज्झ कलं कहं न पसंसेज्जा ?' तओ एआरिसं उवायं कहेमि, जेण पियरो मे कलं पसंसेज्ज । एगया तस्स पिआ कज्जप्पसंगेण गामंतरे गओ, तया सो सोमदत्तो सिरि- गणेसस्स सुंदरयमं पडिमं काऊण, पडिमाए हिट्ठमि गूढं नियनामंकियचिन्हं करिऊण, तं मुत्ति नियमित्तद्दारेण भूमीए अंतो निक्खेवं कारेइ। कालंतरे ‘गामंतराओ पिया समागओ। एगया तस्स मित्तो जणाणमग्गओ एवं कहेइ- 'अज्ज मम सुमिणो समागओ, तेण अमुगाए भूमीए गणेसस्स पहावसालिणी पडिमा अस्थि ।' तया लोगेहि सा पुढवी खणिआ, तीए पुहवीए गणेसस्स सुंदरयमा • अणुवमा मुत्ती निग्गया । तद्दसणत्थं वहवे लोगा समागया, तीए सिप्पकलं अईव पसंसिरे। तया सो इंददत्तो वि सपुत्तो तत्थ समागओ। तं गणेसपडिमं दह्णं पुत्त कहेइ "हे पुत्त ! एसच्चिम सिप्पकला कहिज्जइ.। केरिसी पडिमा निम्मविआ, इमाए निम्मावगो खलु धण्णयमो सलाहणिज्जो य अस्थि । पासेसु, कत्व वि भुल्लं खुण्णं च अत्यि ? जइ तुमं एआरिसी पडिमं निम्मवेज्ज, तया ते सिप्पकलं पसंसेमि, नन्नहा।" - .
सिप्पिपुत्तस्स कहा १५ पुत्तो वि कहेइ-“हे पियर ! एसा गणेसपडिमा मम कया। इमाए हिट्ठमि गुत्तं मए नामंपि लिहिअमत्थि।" पिआवि लिहिअनाम वाइऊण खिज्जहियओ पुत्तं कहेइ-"हे पुत्त अज्जयणाओ तुं एरिसं सिप्पकलाजुत्तं सुंदरयमं पडिमं कया वि न करिस्ससि, जओ हं तव सिप्पकलासु भुल्लं दंसंतो, तया तुम पि सोहणयरकज्जकरणतल्लिच्छो सण्हं सोहं सिप्पं कुणतो आसि; तेण तव सिप्पकलावि वड्ढंती हुवीअ। अहुणा 'मम सारिच्छो नन्नो' इह मंदूसाहेण तुम्ह एवारसी सिप्पकला न संभविहिइ।" ' एवं सो सरहस्सं पिउवयणं सोच्चा पाएसु पडिऊण पिउत्तो पसंसाकरावणरूवनिावराहं खामेइ, परंतु सो सोमदत्तो तमओ आरम्भ तारिसिं सिप्पकलं काउं असमत्थो जाओ। उवएसो- दिद्रुतं सिप्पिपुत्तस्स . नच्चा गुणगणप्पयं । पुज्जाणं वयणं सोच्चा पडिऊलं न चितह ।। - पउरा वि ७. अमंगलियपुरिसस्स कहा अमंगलमुहो लोगो नेव कोवीह भूयले । वहाइटण भूमीसो अमंगलमुहो को ॥ एगंमि नयरे एगो अमंगलिओ मुद्धो पुरिसो आसि। सो एरिसो अत्थि, जो को वि पभायंमि तस्स मुहं पासेइ, सो भोयणं पि न लहेज्जा । पच्चूसे कया वि तस्स मुहं न पिक्खंति । नरवइणा वि अमंगलियपुरिसस्स वट्टा सुणिआ। परिक्खत्थं नरिंदेण एगया पभायकाले सो आहूओ, तस्स मुहं दिळं। जया राया भोयणत्यमुवविसइ, कवलं च मुहे पक्खिवइ, तया अहिलंमि नयरे अकम्हा परचक्कभएण हलवोलो जाओ। तया नरवइ वि भोयणं चिच्चा सहसा उत्थाय ससेण्णो नयराओ वाहि निग्गओ । भयकारणमठूण पुणो पच्छा आगो समाणो नरिदो चितेइ-'अस्स अमंगलियस सरूवं मए पच्चक्खं दिठें, तओ एसो हंतव्यो' एवं चितिऊण .
-- १६ पाइयगज्जसंगहो अमंगलियं वोल्लाविऊण वहत्थं चंडालस्स अप्पेइ । जया एसो रुयंतो, सकम्म निंदंतो चंडालेण सह गच्छंतो अत्थि, तया एगो कारुणिओ बुद्धिनिहाणो वहाई नेइज्जतमाणं तं दळूणं कारणं णच्चा तस्स रक्खणाय कण्णे किंपि कहिऊण उवायं दंसेइ। हरिसंतो जया वहत्थंभे ठविओ, तया चंडालो तं पुच्छ- 'जीवणं विणा तव कावि इच्छा सिया, तया मग्गियंव्वं ।” सों कहेइ-'मज्झ नरिंदमुहदसणेच्छा अत्थि' तया सो नरिंदसमीवमाणीओ । नरिंदो तं पुच्छइ- 'किमेत्थ आगमणपओयणं ?' सो कहेइ-“हे नरिंद, पच्चूसे मम मुहस्स दंसणेण भोयणं न लभइ, परंतु तुम्हाणं मुहपेक्खणेण मम वहो भविस्सइ, तया पउरा किं कहिस्संति ? मम मुहाओ सिरिमंताणं मुहदसणं केरिसफलयं संजा, नायरा वि पभाए तुम्हाणं मुहं कहं पासिहिरे।" एवं तस्स वयणजुत्तीए संतुट्ठो नरिंदो वहाएसं निसेहिऊणं पारितोसिमं च दच्चा तं अमंगलियं संतोसीम । उवएसो- अमंगलमुहस्सेवं रक्खणं धीमया कयं । सोच्चा तुम्हे तहा होह मईए कज्जसाहगा.।। - ८. गेहेसूरो एगंमि गामे एगो सुवण्णयारो वसइ । तस्स रायपहस्स मज्झभाए हट्टिगा विज्जइ।. सया मज्झरत्तीए सो सुवण्णभरियं मंजूसं गहिऊणं नियघरंमि आगच्छइ । एगया तस्स भज्जाए चिति-"एसो मम भत्ता सव्वया मंजूसं. गहिऊणं मज्झरत्तीए गेहे आगच्छइ, तं न वरं, जओ कयावि मग्गे चोरा मिलेज्जा तया कि होज्जा ?" तओ तीए नियभत्तारो वुत्तो-"हे पिअ ! मज्झरत्तीए तुज्झ गिहे आगमणं न . सोहणं ति, मज्झभाए कयावि को वि मिलेज्जा तया कि होज्जा ?" सो कहेइ--"तुं मम वलं न जाणासि, तेण एवं गेहेसूरो १७ वोल्लेसि । मम पुरओ नरसयं पि आगच्छेज्ज', ते किं कुणेज्जा ? ममग्गओ ते किमवि का न समत्था । तुमएं भयं न कायव्वं ।एवं सुणिऊण तीन चिंतिअंगेहेसूरो मम पिओ अत्थि, समए तस्स परिक्खं काहिमि ।' एगया सा नियघरसमीववासिणीए खत्तियाणीए घरे गंतूण - कहेइ- "हे पियसहि ! तुं तव भत्तुणो सव्वं वत्यभूसं मज्झ अप्पेहि, मम किं पि पओयण अस्थि ।' तीए खत्तियाणीए अप्पणो पिअस्स असिसहिअ-निरवेढण-कडिपट्टाइ- सुहडवेसं सव्वं समप्पिअं । सा गहिऊण गेहे गया । जया रत्तीए एगो जामो गओ, तया सा तं सव्वं सुहडवेसं परिहाय; असिं गहिऊण निस्संचारे रायपहमि निग्गया। पिअस्स हट्टाओ नाइट्रे रुक्खस्स पच्छा अप्पणं आवरिअ ठिआ। कियंतकाले सो सोण्णारो हट्ट संवरिय, मंजूसं च हत्थेण गहिऊण सो भयभंतो इओ तओ पासंतो सिंग्धं गच्छंतो जांव तस्स रुक्खस्स समीदं आगओ, तया पुरिसवेसधारिणी सा सहसा नीसरिऊण मउणेण तं निभच्छेइ-'हुं हुं, सव्वं मुंचेहि, अन्नहा मारइस्सं ।' सो अकम्हा रुधिओ भएण थरथरंतो 'मं न मारेसु, मं न मारेसु' इअ कहिऊण मंजूसा अप्पिआ। तओ सा सव्वपरिहिअवस्थग्गहणाय करवालग्गं तस्स वच्छंमि ठविऊण सन्नाए वसणाई पि. कड्ढावेइ। तया सो परिहिअकडिपट्टयमेत्तो जाओ। तओ सा कडिपट्टयं पि मरणभयं दंसिऊण कड्ढावेइ । सो अहुणा जाओ इव नग्गो जाओ। सा सव्वं गहिऊण घरंमि गया, घरदारं पिहिऊण अंतो थिआ। सो सुवण्णयारो भएण कंपमाणो इओं तओ अवलोएंतो मग्गे आवणवीहीए गच्छंतो कमेण जया सागवावारिणो हट्टसमीवमागओ, तया केण जण पक्क- चिभडं वाहिरं पक्खित्तं, तं तु तस्स सुवण्णयारस्स पिट्ठभागे लग्गि। तेण नायं केणावि अहं पहरिओ। पिट्ठदेसे हत्येण फासेंइ, तत्थ चिन्भड़स्स रस वीआइंच फासिऊणं विआरिअ--"अहो हं गाढयरं पहरिओ म्हि, तेण धारण सह सोणि पि निग्गयं, तम्मज्झे कीडगावि समुप्पन्ना, एवं अच्चंतभयाउलो तुरिसं तुरिमं गच्छंतो घरद्दारे समागओ।
१८ पाइयगज्जसंगहो पिहिमं घरहारं पासिळण नियभज्जाए आहवणत्थं उच्चसरेण कहेइ- हे मयणस्स मायरे, दारं उग्घाडेहि, दारं उग्घाडेहि।' सा अभंतरत्थिआ सुणंती वि असुणंतीव किंचि कालं थि। अइवक्कोसणे सा आगच्च दारं उग्घाडिअ एवं पुच्छइ-कि बहु अक्कोससि ?' सो भयभंतो गिहमि पविसिअ भज्ज कहेइ- 'दारं सिग्धं पिहाहि, तालगं पि देसु ।' तीए सव्वं काऊण पुढे-'किं एवं नग्गो जाओ ?' तेण वुत्तं-- अभंतरे अववरए चल, पच्छा मं पुच्छ।' गिहस्स अंते अववरए गच्चा निच्चितो जाओ। तीए पुणो वि पुढ-'कि एवं नग्गो आगओ ?' तेण कहियं-"चोरेहि लुंठिओ, सव्वं अवहरिअ नग्गो कओ।' सा कहेइ-"पुव्वं मए कहियं, हे सामि ! तए एव मज्झरत्तीए मंजूसं गहिकण न आगंतव्वं, तुमए न मन्नि तेण एवं जायं ।” सो कहेइ-"अहं महाबलिट्ठो वि किं करोमि ? जइ पंच छ वा चोरा आगया होज्जा, तया ते सव्वे अहं जेउ समत्थो, एए उ सयसो थेगा आगया, तेणाहं तेहिं सह जुज्झमाणो पराजिओ, सव्वं लुंठिऊण नग्गो कओ, पिट्ठदेसे य असिणाहं पहरिओ। पासेसु पिट्ठदेस, घाएण सह कीडगावि उप्पन्ना।" तीए तस्स पिट्ठदेसं पासित्ता णायं-चिन्भडस्स रसं वीयाइं च इमाइं संति । भत्तुस्सं वि कहिअं-“सामि ! भयभंतेण तए एवं जाणियं, केण वि अहं पहरिओ एवं तओ सोणिसं निग्गयं, तत्थ य कीडगा वि समुप्पन्ना, तं न सच्चं । तुं चिन्भडेण पहरिओ सि, तस्स रसं वीयाइ च पिट्ठदेसे लग्गाई" ति। तओ तस्स देहपक्खालणाय सा जलं गहिऊण आगया, नियपइस्स देहसुद्धिं करेऊण परिहाणवत्थप्पणे ताई चेव वत्थाई अप्पेइ। सो ताई वत्थाई पासिऊणं धिद्वत्तणेण कहेइ- 'हुं हुं, मए तयच्चिय तुमं नाया, मए चितिअं- मम भज्जा कि करेइ ? तेणाहं भयभंतो इव तत्थ थिओ, सव्वावहरणमुवेक्खि, अन्नहा मम पुरओ इत्थीए का सत्ती ?" सा कहेइ-“हे भत्तार ! तव वलं मए तया चेव नायं, गेहेसूरो तुमं असि, अओ अज्जयणाओ तुमए मज्झरत्तीए मंजूसं गहिऊण क्याविन आगंतव्वं" ति भज्जाए वयणं सो.अंगीकरे ।
९. गाभिल्लओ साडियो .. - अस्थि कोइ कम्हिइ गामेल्लओ गहवइ परिवसइ । सो य अण्णया कयाई सगडं घण्णभरियं काऊणं, सगडे य तित्तिरि पंजरगयं बंधेत्ता : पढिओ नयरं । नयरगओ य गंधियपुत्तेहिं दीसइ। सो य तेहिं पुच्छिओ-'कि एयं ते पंजरए ? त्ति। तेण लवियं-'तित्तिर' ति। तओ तेहिं लवियं-'कि इमा सगडतित्तिरी विक्कायइ?' तेण लवियं- "आमं, विक्कायइ।' तेहिं भणिओ-"किं लभइ ?' सागडिएण भणियं- 'काहावणेणं' त्ति। तओ तेहिं काहावणो दिण्णो, सगडं तित्तिरं च घेत्तुं पयत्ता । तओ तेणं सागडिएणं भण्णइ--'कीस एयं सगडं नेहि ?' त्ति । तेहिं भणियं-'मोल्लेणं लइयय त्ति। तओ ताणं ववहारो जाओ जितो सो सागडिओ, हिओ य सो सगडो तित्तिरीए समं। सो सागडिओ हियसगडोवगरणो जोग-खेम-निमित्तं आणिएल्लियं वइल्लं घेतूणं विक्कोसमाणो गंतुं पयत्तो, अण्णेण य कुलपुत्तएणं दीसइ, पुच्छिओ य- 'कीस विक्कोससि?' तेण लवियं-'सामि ! एवं च एवं च अइसंधिओ हं ।' तओ तेण साणुकपेण भणिओ-'वच्च ताणं चेव गेहं एवं च एवं च भणाहि' ति। तओ सो तं वयणं सोऊण गओ, गंतूण य तेण भणिआ-"सामि ! तुम्भेहिं मम भंडभरिओ सगडो हिओ ता इमं पि वइल्लं गेण्हह । मम पुण सत्तुया- दुपालियं देह, जं घेत्तूण वच्चामि त्ति । न य अहं जस्स व कस्स व हत्थेणं गेहामि, जा. तुज्झ. घरिणी पाणेहि वि पिययरी सव्वालंकारभूसिया तीए दायव्वा, तओ में परा तुट्ठी भविस्सइ। जीवलोगभंतरं वः - अप्पाणं मन्तिस्सामि।"
पाइयगज्जसंगहो ततो तेहिं सक्खी आहूया, भणियं च-‘एवं होउ' ति। तओ ताण पुत्तमाया सत्तुयादुपालियं घेत्तूण निग्गया, तेण सा हत्ये गहिया, घेत्तूण य तं पटिओ। तेहिं वि भणियो-'किमयं करेसि ?' तेण भणियं-~-'सत्तुयादुपालियं नेमि ।' ततो ताणं सण महाजणो संगहिओ,पुच्छिया-'किमेयं ?' ति । ततो तेहि जहावत्तं सव्वं परिकहियं । समागयजणेण य मज्झत्थेणं होऊण ववहार- निच्छओ सुमओ, पराजिया य ते गंधियपुत्ता सो य किलेसेण तं महिलियं मोयाविओ, सगडो अत्येण सुवहुएण सह परिदिण्णो । -- संति। १०. पुत्तेहि परामविअस्स पिउस्स कहा जाव दव्वं विइण्णं न पुत्ता ताव वसंवया । पत्त दवे य सच्छंदा हवंति दुक्खदायगा । कमि नयरे एगवुड्ढस्स चत्तारि पुत्ता सो, थविरो सव्वे पुत्ते परिणाविऊण नियवित्तस्स चउभागं किच्चा पुत्ताणं अप्पियं । सो धम्माराहण- तप्परो निच्चितो कालं गमेइ । कालंतरे ते पुत्ता इत्थीणं वेमणस्सभावेण-भिन्नघरा संजा। वुड्ढस्स पइदिणं पइधरं भोयणाय वारगो निवद्धो। पढमदिणमि जेठस्स पुत्तस्स गेहे भोयणाय गओ। वीयदिणे वीयपुत्तस्स घरे जाव चउत्थ: दिणे कणिट्ठस्स पुत्तस्स घरे गओ। एवं तस्स सुहेण कालो गच्छइ । कालंतरे थेराओ धणस्स अपत्तीए पुत्तवाहि सो थेरो अवमाणिज्जइ । पुत्तवहूओ कहिति-- "हे ससुर ! अहिलं. दिणं घरंमि किं चिट्ठसु? अम्हाणं, मुहाई. पासिउं कि ठिमओ सि ? थीणं समीवे वसणं पुरिसाणं न जुत्तं, तव लज्जाविन आगच्छेज्जा, पुत्ताणं हट्टे गच्छज्जसु ।" एवं पुत्तवहिं अवमाणिओ सो पुत्ताण हट्टे गच्छइ ।
, पुत्तेहिं पराभविमस्स पिउस्स कहा २१ तया पुत्तावि कहिति-- "हे वुड्ढ ! किंमत्थं एत्थ आगओ? वुड्ढत्तणे घरे वसणमेव सेयं, तुम्ह दंता वि. पडिआ, अक्खितेयं पि गयं, सरीरं वि कंपिरमत्थि, मत्थ ते किंपि पओयणं नत्यि, तम्हा घरे गच्छाहि ।” एवं पुत्तेहिं तिरक्करिओ सो घरं गच्छेइ तत्थ पुत्तवहूओ वि तं तिरक्करंति । पुत्तपुत्ता वि तस्स थेरस्स कच्छुट्टियं निक्कासेइरे; कयावि मंसुं दाढियं च करिसिन्ति । एवं सव्वे विविहप्पगारेहिं तं वुड्ढं अवहसिति । पुत्तवहूओं भोयणे वि रुक्खं अपक्कं च रोट्टगं दिति । एवं पराभविज्जमाणो वुड्ढो चितेई-'कि करेमि, कह जीवणं निब्बहिस्सं ?' एवं दुहुमणुभवंतो सोनियमित्तसुवण्णगारस्स समीवे गओ । अप्पणी पराभवदुहं तस्स कहेइ, नित्थरणुवायं च पुच्छइ । सुवण्णगारो वोल्लेइ-"भो मित्त ! — पुत्ताणे वीसासं करिऊण सव्वं धणमप्पि, तेण दुहिनो जाओ तत्थ किं चोज्जं? सहत्येण कम्मं कयं, तं अप्पणा भोत्तव्वं चि।' तह वि मित्तत्तेण सो एवं उवायं दंसेइ-"तुमए पुत्ताणं एवं कहिमव्वं-'मम मित्तसुर्वण्णगारस्स गेहे रुप्पयदीणारभूसणेहिं भरिया एगा मंजूसा भए मुक्का अत्थि, अज्ज, जाव तुम्हाणं न कहिअं, अहुणा जराजिण्णो हं, तेण सद्धम्मकम्मणा सत्तक्खेत्ताईसुं लच्छीए विणिओगं काऊण परलोगपाहेयं गिहिस्सं ।' एवं कहिऊण पुत्तेहिं एसा मंजूसा रत्तीए गेहे आणावियव्वा । मंजूसाए मझे तं रुप्पगसयं मोइस्सं तं तु मज्झरत्तीए पुणो पुणो तुमए सयं च सहस्सं च रणरणयारपुव्वं गणेयव्वं, जेण पुत्ता मन्निस्संति- 'अज्जावि वहुधणं पिउणों समीवे अस्थि ।' तओ धणासाए ते पुन्वमिव भत्ति करिस्संते। पुत्तवहूओ वि तहेव सक्कारं काहिंति । तुमए सव्वेसि कहियवं- 'इमीए मंजूसाए बहुधणमत्यि। पुत्तपुत्तवहूणं नामाइं लिहिऊण ठवियमत्थि । तं तु मम मरणंते तुम्हेहिं नियनियनामवारेण गहिअव्वं ।' धम्मकरणत्थं पुत्ते- हितो धणं गिहिऊण सद्धम्मकरणे वावरियव्वं । मम रुप्पगसयं पि तुमए न विस्सारियव्वं, एयं अवसरे दायव्वं ।' सो थेरो मित्तस्स वुद्धीए तुट्ठो गेहे. गच्चा रत्तीए पुत्तेहिं मंजूसं आणाविऊण. रत्तीए तं रुप्पगसयं सय-सहस्स-दससहस्साइगुणणेण तं चिय गणिति ।
२२ पाइयगज्जसंगहो .. पुत्ता वि विआरिति-पिउस्स पासे बहुधणमस्थि, ते वहूणं पि कर्हिति । सत्वे ते थेरं वहुं सक्कारिति सम्माणिति य अईवनिव्वंधण तं पुत्तवहूआ वि अहमह- मिगयाए भोयणाय निति, साउं सरसं भोयणं दिति, तस्स वत्थाई पि सएव पक्खालिंति, परिहाणाय धुविभाइं वत्थाई अप्पिंति । एवं वुड्ढस्स सुहेण कालो गच्छन् । एगया आसन्नमरणो सो पुत्ताणं कहेइ-"मज्झ धम्मकरणेच्छा वट्टइ, तेण सत्तखेत्तेसुं किंचि वि धणं दाउमिच्छामि।" पुत्तावि मंजूसा-गयधणासाएं अप्पिति । सो वुड्ढो जिण्णमंदिरुवस्सयसुपत्ताईसु जहसत्तीए देइ। अप्पणो परममित्तसुवण्णगारस्स वि नियहत्थेण रुप्पयसंयं पच्चप्पेइ, एवं सद्धम्म- कम्ममि धणव्वयं किच्चा, मरणकालंमि पुत्ताणं पुत्तवहूणं च बोल्लाविऊण कहिअं-"इमीए मंजूसाए सव्वेसि नामग्गहणपुटवयं धणं मुत्तमस्थि । तं तु मम मरणकिच्चं काऊणं पच्छा जहनामं तुम्हेहिं गहिअव्वं” ति कहिळण समाहिणा सो वुड्ढो कालं पत्तो। पुत्ता वि तस्स मच्चुकिच्चं किच्चा नाइजणं पि जेमाविळण वहुधणासाइ जया सव्वे मिलिऊण मंजूसं उघाडिति तया तम्मज्झमि नियनियनामजुत्तपत्तेहिं वेढिए पाहाणखंडे तं च रुप्पगसयं पासित्ता अहो वुड्ढेण अम्हे वंचिआ वंचिन त्ति, किल अम्हाणं पिउत्तिपरंमुहाणं अविणयस्स फलं संपत्तं । एवं सव्वे ते दुहिणो जाआ। उवएसो-- पुत्तेहि पत्तवित्तेहि पिअरस्स पराभवं । सोच्चा तहा पयट्टज्जा सुहं वुड्ढत्तणे वसे ।। -. • ११. मारियासीलपरिक्खा अत्थि अवंती नाम जणवओ। तत्थ उज्जेणी नाम नयरी रिद्धिस्थिमिय- समिद्धा । तत्थ राया जितसत्तू नाम । तस्स रन्नो धारिणी नाम देवी। तत्थ य उज्जेणीए नयरीए दसदिसिपयासों इभो सागरचंदो नाम । भज्जा य से भारियसीलपरिक्खा २३ सो य चंदसिरी। तस्स पुत्तो चंदसिरीए अत्तओ समुद्ददत्तो नाम सुरुवो। सागरचंदो परमभागवउदिक्खासंपत्तो भगवयगीयासु सुत्तओ अत्थओ य विदित परमत्यो। सो य तं समुद्ददत्तं दारगं गिहे परिव्वायगस्स कलागहणत्थे ठवइ "अण्णसालासु सिक्खंतो अण्णपासंडियदिट्ठी हवेज्जा ।" तओ सो समुद्ददत्तो दारगो तस्स परिव्वायगस्स समीवे कलागहण करेमाणो अण्णया 'कयाइ फलग' ठवेमि त्ति गिहं अणुप्पविट्ठो । नवरिं च पासइ नियगजणणी तेण परिवायगेण सद्धि असम्भं आयरमाणी। ततो सो निग्गओ इत्थीसु वीरागसमावण्णो 'न एयाओ कुलं सीलं वा रक्खंति' त्ति चितिळण हियएण' निव्वधं करेइ, जहा-'न मे वीवाहेयन्वं' ति । तओ से समत्तकलस्स जोव्वणत्यस्स पिया सरिसकुल-रुव-विहवाओ दारियाओ वरेइ। सो य ता पडिसेहेइ । एवं तस्स कालो वच्चइ । अण्णया तस्स सम्मएणं पिया सुरटुदेसं आगओ ववहारेणं । गिरिनयरे धणसत्यवाहस्स धूयं धणसिरि पडिरूवेण सुकेणं समुद्ददत्तस्स वरेइ । अन्नायं एव तिहिगहणं काऊण नियनगरं आगओ। तओ तेण भणिओ समुद्द- दत्तो-"पुत्त ! मम गिरिनयरे भंडं अच्छइ, तत्थ तुमं सवयंसो वच्च । तओ तस्स भंडस्स विणिओगं काहामो” त्ति वोत्तूण वयंसाण य से दारियासंबंध संविदितं कयं । तओ ते सविभवाणुरूवेणं निग्गया, कहाविसेसेण य पत्ता गिरिनयरं वाहिरओ य ठाइऊणं धणस्स सत्थवाहस्स मणुस्सो पेसिओ, जहा- 'ते आगओ वरो' ति। तओ तेण सविभवाणुरूवा आवासा कया, तत्थ य आवासिया । रत्तीए आगया भोयणववएसेणं धणसत्यवाहगिहे, धणसिरीए पाणिग्गहणं कारिओ। तओ सो धणसिरीए वासगिहं पविट्ठो। तओ णेणं पइरिक्कं जाणिळण तीसे धणसिरीए चम्महि दाऊण निग्गओ वयंसाण च मज्झे सुत्तो। ततो पभायाए रयणीए सरीरावस्सकहेउ सवयंसो चेव निग्गो बहिया गिरि- नयरस्स । तेसि वयंसाणं अदिट्ठओ चेव नट्ठो। तओ से वयंसेहिं. आगंतूणं [सागरचंदस्स] घणसत्यवाहस्स य परिकहियं 'गओ सो'। तेहि समंततो तस्स य २४ पाइयगज्जसंगहो - मग्गिओ, न दिट्ठो। तओ ते दीणवयणा कइवयाणि दिवसाणि अच्छिऊण धणसत्यवाहं आपुच्छिऊण गया नियगनयरं । इयरो वि समुद्ददत्तो देसंतराणि हिडिऊण केणइ कालेण आगओ गिरि- गयरं कप्पडियवेसछण्णो परूढनह-केस-मंसु-रोमो। दिट्ठो पेण धणसत्थंवाहो आरामगओ। तओ तेणं पणमिऊण भणिओ-"अहं तुम्भं आरामकम्मकरो होमि ।" तेण य भणिओ. 'भणसु, का ते भत्ती दिज्ज" ति?- तओ तेण भगियं-"न मे भईए कज्जं। अहं तुज्झ पसादाभिकंखी। मम तुट्ठीदाणं देज्जह" त्ति । एवं पडिस्सुए आरामे कम्मं आरद्धो काउ। तओ सो रुक्खाउव्वेयकुसलो तं आराम कइवएहि दिवसेहिं सव्वोउय- पुप्फ-फल-समिद्धं करेइ। तओ सो धणसत्थवाहो तं आरामसिरिं पासिऊणं परं हरिसमुवगओ। चितियं च णेणं-"किमेएणं गुणाइसयभूएण पुरिसेण आरामे अच्छतेण ? वरं मे आवारीए अच्छउ” त्ति। तओ ण्हवियपसाहिओ दिण्णवत्थजुयलो ठवियो आवणे । तओ .तेण आय-वयकुसले , गंधजुत्तिनिउणत्तणेण पुरजणो उम्मत्ति गाहिओ । तओ पुच्छिओ जणेणं-'कि ते नामधेयं ?' पभणइ य-'विणीयओ त्ति मे नामधेयं ।' एवं सो विणीयओ विणयसंपन्नो सम्बनयरस्स वीससणिज्जो जाओ। तओ तेण सत्थवाहेण चितियं-"न खेमं मे एस आवणे य अच्छंतो। मा एस रायसंविदितो हवेज्ज, ततो राएण हीरइ त्ति । वरमेस गिहे. भंडारसालाए अच्छंतो।" तओ तेण सगिहं नेऊण परियणं च सद्दावेऊण भणियं-"एस वो विणीयओ जं. देइ त भे पडिच्छियव्वं, न य से आणा कोवेयव्व" ति। तओ सो विणीयओ घरे अच्छइ, विसेसओ य धणसिरीए जं चेडीकम्मं तं सयमेव करेइ। तओ धणसिरीए विणीयओ सव्ववीसंभट्टाणिओ जाओ। तत्य य नगरे रायसेवी एक्को डिंडी परिवसइ। इओ य सा धणसिरी पुब्वावरण्हसमए सत्ततले पासाए अट्टालगवरगया सह . विणीयगेणं तंबोल संमाणयंती अच्छइ। सो य डिंडी पहाय-समालद्धो तम्स भवणस्स आसपणेणं गच्छइ । धणसिरीए तंवोलं निच्छूढं पडियं डिडिस्सुवरि। डिडिगा निज्झाइया य, -- भारियासीलपरिक्खा २५ "दिट्टा य णेणं देवयभूया:। तओ सो अणंगवाणसोसियसरीरो तीए समागमुस्सुओ संवुत्तो। चितियं च णेणं-"एस. विणीयओ एएसि सव्वप्पवेसी, एयं उवतप्पामि । एयस्स पसाए. एईए सह समागमो भविस्सई" त्ति । तओ अण्णया तेण विणीयओ नियगभवणं नीओ। पूया-सक्कारं च काउं पायपडिएण विण्णविओ- 'तहा चेट्ठसु, जेण मे धणसिरीए सह संजोगं करेसि' त्ति। तओ सो ‘एवं होउ' त्ति वोत्तूण धणसिरीए सगासं गओ। पत्यावं च जाणिऊण भणिया णेणं धणसिरी डिडिवयणं । तओतीए रोसवसगयाए भणिओ- "केवल तुमे चेव एवं संलत्तं, अण्णो ममं ण जीवंतो" त्ति । तओ सो विइयदिवसे निग्गो, दिट्ठो य डिडिणा । भणिओ णेणं-"कि भो वयंस ! कयं कज्जं?" त्ति । तओ तेण तव्वयणं गृहमाणेणं भणियं-'घत्तीहं' ति। तओ पुणरवि तेण • दाणमाणेणं संगहियं करेत्ता विसज्जिओ। तओ सो आगंतूण धणसिरीए पुरओ विमणा तुहिक्को ठिओ अच्छइ । तओ तीए धणसिरीए तस्स मणोगयं जाणिऊण भणिओ-"कि ते पुणो डिंडी किंचि भगइ ?" तेण भणियं-'आम' ति । तीए निवारिओ-"न ते पुणा तस्स दरिसणं दायव्वं ।" पुणो य पुच्छिज्जमाणो तहेव तुण्हिक्को अच्छइ । तओ तीए तस्स चित्तरक्खं करेंतीए भणिओ-"वच्च, देहि से संदेसं जहा-'असोग- वणियाए तुमे अज्ज पओसे आगंतव्वं" ति । तेण तहा कयं । तओ सा असोगवणियाए सेज्ज पत्थरेऊण चोगमज्जं च गिण्हिऊण विणीयगसहिया अच्छइ । सो आगओ। तओ तीए सोवयारं मज्जं से दिण्णं । सो य तं पाऊण अचेयणसरीरो जाओ। ताए तस्सेव य. संतियं असिं कढिऊण सीसं छिण्णं। पच्छा विणीयओ भणिओ. 'तुमे अणत्थं कारिया तुज्झ वि सीसं छिदामि' त्ति । तेण पायवडिएण मारसाविया । विणीयगेण घणसिरिसंदिट्ठणं कूवं खणित्ता निहिओ। तओ अन्नया सुहासणवरगया धणसिरी विणीयगेण पुच्छिया-'सुदरि। तुमं कस्स दिन्ना ?" तीए भणियं-- उज्जेणिगस्स समुद्ददत्तस्स दिण्णा ।" तेण भणियं-'बच्चामि, अहं तं गवेसित्ता आणेमि' त्ति भणिउं निग्गओ। संपत्तो य पाइयगज्जसंगहो पाए य भूमीए उवरि जओ तओ घंसेइ, परंतु गाढयरबंधत्तणेण जया सो न छुट्टिओ, तया तं निइयवाई विउसो कहेइ-किं मुहा उज्जमेण कएण, एसो निविडो वंधो कया वि न छुट्टिहिइ? निप्फलेण वलहाणिकारणायासेण किं ? खुहापिवासापीलिआणं पि अम्हाणं नियईए सरणं चिअ वरं।" एवं सोच्चा उज्जमवाइपंडिओ छुट्टणपयासं न चएइ । . छुट्टणाय अईव पयासं कुणेइ। एवं तेसिं दुवे दिणा अइक्कंता। भोयणाभावेण सरीरं पि ताणमईव खीणं संजायं, कज्जकरणे वि असमत्थं जायं, तह वि उज्जमवाई ‘पयासहीणाववरगे इओ तो भममाणो वंधणाओ मोअणाय जत्तं न मुंचे। नियइवाई तं वएइ-'अहुणा परमेसरस्स नामं गिण्हसु, किमायासकरणेण फलरहिएण?' तया सो उज्जमवाई कहेइ-'समावन्ने वि मरणे उज्जमो कया वि न मोत्तव्यो, सया वि उज्जमसीलेण जणेण होयव्वं ।' . नियइवाई बोल्लेइ- 'नइ एवं ता अंधारिए एयंमि अववरगे पाए हत्थे य घंसमाणा भमंता चिट्ठइ, किं उज्जमो फलं दाही ?' तह वि सो उज्जमवाई पंडिओ खीणसरीरवलो तइअदिणंमि भित्ति- 'दिसाए भमंतो हत्थे पाए य घंसमाणो पडतो पुणरवि' घसंतो भमंतो दइववसाओ अववरगस्स कोणगे तत्थ पडिओ जत्थ उंदुरस्स विलं तस्स हत्था विलोवरि समागया। तत्थ · रंधमज्झट्ठिओ मूसओ वाहिरं निग्गंतुमचयंतो दंतेहि तस्स हत्थवंधणं छिदेइ, तया सो छुट्टिओ समाणो नेत्तपडं पायवंधणं च अवसारेइ, सो तया अववरगे गाढयरतमेण किमवि न पासेइ। अस्स अववरगस्स दारं कत्थ अत्यि त्ति भित्तिफासणेण निरिक्खतेण तेण कमेण दारं लद्धं । वाहिरओ पिणद्धं तं पासिळण कट्ठण तं दारं मूलाओ उत्तारिय वाहिरं सो निग्गओ। पच्छा देव्ववाइं पंडिअंपि बंधणाओ ओमोएइ। पच्छण्णट्ठाणे ठिओ कालियासो सव्वं निरूवेइ । जया ते दुवे वाहिरनिग्गए पासेइ, पासित्ता ते घेत्तूण नियघरंमि गओ। सम्म अन्नपाणेहि सक्कारिता सम्माणित्ता य निवसहाए ते विउसे गहिऊण समागओ। भोयनारद वट्टइ।
उज्जममेव फलदाणे पमाणेइ ३१ -- कहेइ- 'उज्जमेण जिअं, भग्गेण पराइस' ति; जओ उज्जमवाई पंडिओ उज्जमेण छुट्टिओ, अवरो उज्जमाभावाओ न छुट्टिओ। जो दइव्वमेव पहाणं मन्नेइ सो · पमाई कहिज्जइ।' जत्थ पमाओ आलस्सं तत्थ खुहा-पिवासा- दुक्खं-मरणं च अवस्सं संभवेइ । जो उज्जम कुणइ, सो कयाइ दुक्खाओ मुच्चइं, कि पि.य फलं पावेइ। दइव्ववाई उज्जमेण विणा फलं न लहेज्जा। तओ उज्जमो पहाणो णायव्वो। तओ भोयनरिंदो उज्जमवाइपंडिअंदव्व- वत्थाहूसणेहि सम्माणेइ। नीइसत्थे वि—'उज्जमे णत्थि दालिद्दा' अओ उज्जमो कयाविन मोत्तब्वो। उवएसो-- उज्जमस्स फलं नच्चा विउसदुगनायगे । जावज्जीवं न छुड्डज्जा उज्जम फलदायगं । १४ कुमारमंत्तिस्स दंडविहि नायग ॥ । देइ। - जारिसो माणवो होइ सिक्खणं तत्थ तारिसं । समावराहचोरेसुं कुमारस्सेह पाडलिउत्तनयरे जियसत्तुनरिंदस्स कुमारो नाम चउवुद्धिनिहाणो पहाणो मंती आसि । सो जारिसा अवराहिणो आगच्छंति ताणं परिक्खिअ, तारिसं दंडं एगया कोट्टवालेण चउरो. चोरा कुमारमंतिणो पुरओ ठविआ। कुमारमंती तेसिं वुद्धीए परिक्खं करिऊण दड दाहीअ, जहा पढमचोरस्स' उत्तं- "तुं भद्दो वि होऊण, एरिसं अकज्ज़ काउं तुम कि जुत्तं ? किं तव एवं सोहेइ ? गच्छसु तुं, मा कयावि एवं कुणेज्जा' इअ वोत्तूण सो विसज्जिओ। वीअं चोरं आहूय मंतिणा सावमाणं परुसक्खर-पुरस्सरं वुत्तं-“हे मुरुक्ख- सेहर. सुकुलुप्पन्नेणावि तुमए एरिसं कज्ज कयं, किं. ते लज्जा वि नागया? गच्छसु, मुहं मसीए लिंपसु, मा मुहं पुणो दंसेसु" त्ति सो वि विसज्जिओं।
। २६ पाइयगज्जसंगहो नियगभवणं पविट्ठो, दिट्ठोय अम्मापिऊहिं, तेहिं य कयंसुपाएहि उवगूहिओ। तओ तेहिं धणसत्यवाहुस्स लेहो पेसिओ 'आगओ से जामाउओ' त्ति । तओ सो वयंसपरि- गहियो मायापिईहिं य सद्धि ससुरकुलं गओ । तत्थ य पुणरवि वीवाहो कओ। तओ सो अप्पाणं गृहेतो धणसिरीए विणीयगवेसेणं अप्पाणं दरिसेइ । परं तु तीए तस्स रूवदसणणिमित्तं पच्छण्णदीवं ठवेऊण तस्स रूवोवलद्धी कया। दिट्ठो य णाए विणीयओ। तओ तेण सव्वं संवादितं । । १२. छक्खंडागम-लेहण-कहा तेण महावीरेण केवलणाणिणा कहिदत्थो तम्हि चेव काले तत्थेव खेत्ते खयोवसम-जणिद-चउरमल-बुद्धि-संपण्णेण वम्हणेण गोदम-गोत्तेण सयलदुस्सुदि- पारएण जीवाजीव-विसय-संदेह-विणासणट्ठमुवगयवड्ढमाण-पादमूलेण इंद- भूदिणावहारिदो । उत्तं च- गोत्तण गोदमो विप्पो चाउव्वेय-सडंगवि । णामेण इंदभूदि त्ति सीलवं वम्हणुत्तमो । पुणो तेणिंदभूदिणा भाव-सुद-पज्जय-परिणदेण वारहंगाणं चोद्दस-पुटवाणं च गंथाणमेक्केण चेव मुहुत्तेण कमेण रयणा कदा । तदो भाव-सुदस्स अत्थ-पदाणं च तित्थयरो कत्ता। तित्थयरादो सुद-पज्जाएण गोदमो परिणदो त्ति दव- सुदस्स गोदमो कत्ता। तत्तो गंथरयणा जादेत्ति । तेण वि गोदमेण दुविहमवि सुदणाणं लोहज्जस्स संचारिदं । ., तेण वि जंवूसामिस्स संचारिदं । परिवाडि- मस्सिदण एदे तिष्णि वि सयल-सुद-धारया भणिया। अपरिवाडिए पुण सयल- सुद-पारगा संखेज्ज-सहस्सा। गोदमथेरो लोहज्जाइरियो जंबूसामी ‘य एदे तिण्णि वि सत्त-विह-लद्धि-संपण्णा सयल-सुय-सायर-पारया होऊण केवलणाण-. मुप्पाइय णिव्वुइं पत्ता । तदो विण्हू दिमित्तो अवराइदो गोवद्धणो भद्दवाहु त्ति एदे पुरिसोली-कमेण पंच वि चोद्दस-पुव्वहरा। तदो विसाहाइरियो पोठिलो खत्तियो जयाइरियो णागाइरियो सिद्धत्वथेरो धिदिसेणो विजया- छक्खंडागम-लेहण-कहा २७- इरियो बुद्धिल्लो गंगदेवो धम्मसेणो त्ति एदे पुरिसोलीकमेण एक्कारस वि आइरिया एक्कारसण्हमंगाणं उप्पायपुव्वादि-दसण्हं पुव्वाणं च पारया जादा, सेसुवरिम-चदुहं पुत्वाणमेगदेसधरा य । तदो णक्खत्ताइरियो जयपालो पांडुसामी धुवसेणो कंसाइरियो त्ति एदे पुरिसोलीकमेण पंच' वि आइरिया एक्कारसंगधारया जादा, चोद्दसण्हं पुव्वाणमेगदेसधराय। तदो सुभद्दो जसभद्दो जसवाहू लोहज्जो त्ति एदे चत्तारि वि आइरिया आयारंग-धरा सेसंग-पुन्वाणमेगदेसधरा य । तदो सव्वेसिमंग-पुटवाणमेगदेसो आइरिय- परंपराए आगच्छमाणो धरसेणाइरियं संपत्तो। तेण वि सोरट्ठ-विसय-गिरि-णयर-पट्टण-चंदगुहा-ठिएण' अलैंगमहा- णिमित्तपारएण गंथ-वोच्छेदो होहिदि ति जादभएण पवयण-वच्छलेण दक्खिणावहाइरियाणे महिमाए मिलियाणं लेहो पेसिदो। लेहट्ठिय-धरसेणा- इरिय-वयणमवधारिय तेहि वि आइरिएहि वे साहू गहण-धारण-समत्था धवला- मल-वहुविह-विणय-विहूसियंगा सील-माला-हरा गुरु पेसणासण-तित्ता देस-कुल- जाइसुद्धा सयल-कला-पारया तिक्खुत्तावुच्छियाइरिया अंधविसय-वेण्णायडादो पेसिदा । तेसु आगच्छमाणेसु रयणीए पच्छिमभाए कुंदेंदु-संखवण्णा सव्व- लक्खण-संपुण्णा अप्पणो कय-तिप्पदाहिणा पाएसु णिसुढिय-पदियंगा वे वसहा सुमिणंतरेणं धरसेणभडारएण दिट्ठा। एवंविहसुमिणं दळूण तुह्रण धरसेणाइरिएण 'जयउ सुय-देवदा' त्ति संलवियं । . तद्दिवसे चेय ते दो वि जण संपत्ता धरसेणाइरियं । तदो धरसेण-भयवदो किदियम्म काऊण दोष्णि दिवसे वोलाविय तदियदिवसे विणएण धरसेणभडारओ तेहिं विण्णत्तो-'अणेण कज्जेणम्हा दो वि जणा. तुम्हं पादमूलमुगक्या' त्ति। 'सुठ्ठ भद्द' त्ति भणिऊणः धरसेण-भडारएण दो वि आसासिदा । तदो चितिदं भयवदा- सेलघण-भग्गघड-अहि-चालणि-महिसाऽवि-जाहय-सुएहि । मट्टिय-मसय-समाणं वक्खाणइ जो सुदं मोहा ॥ दढ-गारव-पडिवतो विसयामिस-विस-वसेण घुम्मंतो। सो भट्ट-वोहि-लाहो भमइ चिरं भव-वणे मूढो ॥
२८ पाइयागज्जसंगहो इदि वयणादो जहाछंदाईणं विज्जा-दाणं संसार-भय-वद्धणमिदि चितेऊण सुहसुमिणदंसणेणेव अवगय-पुरिसंतरेण धरसेणभयवदा पुणरवि ताणं परिक्खा काउमाढत्ता 'सुपरिक्खा हियय-णिन्वुइकरेति' । तदो. ताणं तेण दो विज्जाओ दिण्णाओ। तत्थ एया अहियक्खरा, अवरा विहीणवखरा। एदाओ छट्ठोव- वासेण सहेहु त्ति । तदो ते सिद्धविज्जा विज्जा-देवदाओ पेच्छंति, एया उद्दतुरिया अवरेया काणिया । एसो देवदाणं सहावो ण होदि त्ति चितेऊण मंत- व्वायरण-सत्य-कुसलेहिं हीणाहियवखराणं छुहणावणयण-विहाणं काऊण पढ़तेहिं दो वि देवदाओ सहाव-रूवट्ठियाओ दिट्ठाओ। पुणो तेहि धरसेणभयवंतस्स जहावित्तेण विणएण णिवेदिदे सुठ्ठ तुट्टेण धरसेणभडारएण सोम्मतिहि-णक्खत्त- चारे गंथो पारद्धो। पुणो कमेण वक्खाणतण तेण आसाढ-मास-सुक्क-पक्ख- एक्कारसीए पुवण्हे गंयो समाणिदो। विणएण गंथो समाणिदो त्ति तुझेहि भूदेहि तत्थेयस्स महदी पूजा पुप्फ-वलि-संख-तूर-रव-संकुला कदा। तं दळूण तस्स 'भूदवलि' त्ति भडारएण णामं कयं । अवरस्स वि भूदेहि पूजिदस्स अत्थ-वियत्य-ट्ठिय-दंत-पंतिमोसारिय भूदेहि समीकय-दतस्य 'पुप्फयंतो' ‘णाम कयं । पुणो ते तद्दिवसे चेव पेसिदा संता ‘गुरु-वयणमलंघणिज्ज' इदि चितिऊणागदेहि अंकुलेसरे वरिसा-कालो कओ। जोग समागीय जिणवालियं दठूण पुप्फयंताइरियो वणवासि-विसयं गदो। भूदवलिभडारओ वि दमिल-विसयं गदो। तदो पुप्फयंताइरिएण जिणवालिदस्स दिक्खं दाऊण विंसदि-सुत्ताणि करिय पढाविय पुणो सो भूदवलिभयवंतस्स पासं पेसिदो। भूदवलिभयवदा जिणवालिद- पासे दिट्ठ-विसदि-सुत्तेण अप्पाउओ त्ति अवगय-जिणवालिदेण महाकम्म-पयडि- पाहुडस्स वोच्छेदो होहदि त्ति समुप्पण्ण-बुद्धिणा पुणों दव्व-पमाणाणुगममादि काऊण गंथ-रयणा कदा । तयो एयं खंड-सिद्धतं पडुच्च भूदवलि-पुप्फयंताइरिया :वि कत्तारो उच्चति ।
- १३. उज्जममेव फलदाणे पमाणेइ एगया भोयनरिंदस्स सहाए दुण्णि विउसा समागया, तेसु एगो नियइवाई- जं भावी तं नन्नहा होइ', अओ सो उज्जम विणा भावि चिय मन्नेइ।. न्लिो पंडिओ 'उज्जममेव फलदाणे पमाई', जओ अलसा कं पि फलं न हंति, जओ वुत्तं- “उज्जमेण हि सिझंति कज्जाइं न पमाइणो । न हि सुत्तस्स सिंहस्स पविसंति मिगा. मुहे ॥" एवं वीओ उज्जमेण फलवाई अत्थि। भोयनरिदेण ते दोवि आगमण- योयणं पुट्ठा। ते कहिति-'विवायनिण्णयत्थं तुम्हाणमंतिए अम्हे आगया।' रण्णा वुत्तं-'तुम्हाणं जो विवाओ अत्थि तं कहेह।' तया ते दुण्णि वि नियं नियं मयं जुत्तिपुरस्सरं निवइणो पुरओ ठवेइ । राया विआरेइ- राया विआरेइ-'एत्थ कि परमत्यओ सच्चं ? तं च कहं जाणिज्जइ।' तया निण्णेउमसमत्थो कालियासं पंडिलं पुच्छइएएसिं नाओ. कहं किज्जइ ? . किं वा उत्तरं दिज्जइ ?'' कालियासो कहेइ-“हे नरिंद ! .जह दक्खाए रसो चक्खिज्जमाणो महुरो खट्टो वा नज्जइ, तह य एयाण विवाओ कसिज्जइ, तेण सच्चो असच्चो वा जाणिज्जइ।" राया कहेइ-.-"कसण-कियाए अस्थि को वि उवाओ? जइ सिया, तया कसिज्ज।" कालियासो तया ते दुण्णि विउसे वोल्लाविऊण तेसिं नेत्ताई पडेण वंधित्ता, दुवे ये हत्थे पिट्ठस्स पच्छा वंधिअ, पाएं गाढयरं निअंतिम अंध- यारमए अववरगे ते दुणि विउसा ठविआ कहियं च-"जो दइव्ववाई, सो दइव्वेण छुट्टउ, जो उज्जमवाई, सो उज्जमेण छुटेजा।" एवं कहिऊण कालियासो पच्छा नियत्तो। तओ सो नियइवाई ‘जं. भावि तं होहिइ' ति मन्नमाणो निचितो समाणो सुहेण तत्य सुत्ता। उज्जमवाई जो, सो छुट्टणाय वहुं उज्जमं कुणेई, हत्थे पाइयगज्जसंगहो पाए य भूमीए उवरि जओ तओ घंसेइ, परंतु गाढयरबंधत्तणेण जया सो न छुट्टिओ, तया तं निइयवाई विउसो कहेइ-कि मुहा उज्जमेण कएण, एसो निविडो बंधो कया वि न छुट्टिहिइ ? निप्फलेग वलहाणिकारणायासेण किं ? खुहापिवासापीलिआणं पि अम्हाणं नियईए सरणं चिअ वरं।" एवं सोच्चा उज्जमवाइपंडिओ छुट्टणपयासं न चएइ । . छुट्टणाय अईव पयासं कुणेइ। एवं तेसिं दुवे दिणा अइक्कंता। भोयणाभावेण सरीरं पि ताणमईव खीणं संजायं, कज्जकरणे वि असमत्थं जायं, तह वि उज्जमवाई “पयासहीणाववरगे इओ तओ भममाणो वंधणाओ मोअणाय जत्तं न मुंचेइ । नियइवाई तं वएइ-'अहुणा परमेसरस्स. नामं गिण्हसु, किमायासकरणेण ‘फलरहिएण?' तया सो उज्जमवाई कहेइ-'समावन्ने वि मरणे उज्जमो कया वि न मोत्तव्वो, सया वि उज्जमसीलेण जण होयव्वं ।' . नियइवाई बोल्लेइ-~'जइ एवं ता अंधारिए एयंमि अववरगे पाए हत्थे य. घसमाणा भमंता चिट्ठ'इ, किं उज्जमो फलं दाही ?' तह वि सो उज्जमवाई पंडिओ खीणसरीरवलो तइअदिणमि भित्ति- 'दिसाए भमंतो हत्थे पाए य घसमाणो पडतो पुणरविः घसंतो भमंतो दइववसाओ अववरगस्स कोणगे तत्थ पडिओ जत्थ उंदुरस्स विलं तस्स हत्था विलोवरिं समागया। तत्थ रंधमज्झढिओ मुसओ वाहिरं निग्गंतुमचयंतो दंतेहि तस्स हत्थवंधणं छिदेइ, तया सो छुट्टिओ समाणो नेत्तपडं पायवंधणं च अवसारेइ, सो तया अववरगे गाढयरतमेण किमवि न पासेइ। अस्स अववरगस्स दारं कत्थ अत्थि त्ति भित्तिफासणेण निरिक्खतेण तेण कमेण दारं लद्धं । वाहिरओ पिणद्धं तं पासिऊण कट्ठण तं. दारं मूलाओ उत्तारिय वाहिरं सो निग्गओ। पच्छा देव्ववाई पंडिअंपिबंधणाओ ओमोएइ। पच्छण्णट्ठाणे ठिओ कालियासो सव्वं निरूवेइः। जया ते दुवे वाहिरनिग्गए पासेइ, पासित्ता ते घेत्तूण नियघरमि गओ। सम्म अन्नपाणेहि सक्कारिता सम्माणित्ता य निवसहाए ते विउसे गहिऊण समागओ भोयनरिदै बट्टइ। .:.
उज्जममेव फलदाणे पमाणेइ ३१ कहेइ- 'उज्जमेण - जिसं, भग्गेण पराइ' ति; जओ उज्जमवाई पंडिओ उज्जमेण छुट्टिओ, अवरो उज्जमाभावाओ न छुट्टिओ। जो दइव्वमेव पहाणं मन्नेइ सो पमाई कहिज्जइ।' जत्य पमाओ आलस्सं तत्थ खुहा-पिवासा- दुक्ख-मरणं च अवस्सं संभवेइ। जो उज्जम कुणइ, सो कयाइ दुक्खाओ मुच्चई, किं पि य फलं पावेइ.। . दइव्ववाई उज्जमेण विणा फलं न लहेज्जा। तओ उज्जमो पहाणो णायव्वो। तओ भोयरिंदो उज्जमवाइपंडिअं दव्व- वत्थाहूसणेहि सम्माणेइ। नीइसत्थे वि-उज्जमे णत्थि दालिद्दा' अओ उज्जमो कयाविन मोत्तव्यो। उवएसो-- उज्जमस्स फलं नच्चा विउसदुगनायगे। जावज्जीवं न छुड्डज्जा उज्जम फलदायगं ।। १४ कुमारमंत्तिस्स दंडविहि कुमारस्सेह नायग ॥ जारिसो माणवो होइ सिक्खणं तत्थ तारिसं । समावराहचोरेसुं पाडलिउत्तनयरे जियसत्तुनरिंदस्स कुमारो नाम चउवुद्धिनिहाणो पहाणो मंती आसि । सो जारिसा अवराहिणो आगच्छंति ताणं परिक्खिअ, तारिसं दंडं देइ। एगया कोट्टवालेण चउरो चोरा कुमारमंतिणो पुरओ ठविआ। कुमारमंती तेसि बुद्धीए परिक्खं करिकण दड दाहीअ, जहा पढमचोरस्स उत्तं- "तुं भद्दओ वि होऊण, एरिसं अकज्ज काउं तुमं कि जुत्तं ? किं तव एवं सोहेइ ? गच्छसु तुं, मा कयावि एवं कुणेज्जा" इअ.वोत्तूण सो विसज्जिओ। वीअं चोरं आहूय मंतिणा सावमाणं परुसक्खर-पुरस्सरं वुत्तं-“हे मुरुक्ख- सेहर. सुकुलुप्पन्नेणावि तुमए एरिसं कज्ज कयं, किं. ते लज्जा वि नागया ? गच्छसु; मुहं मसीए लिंपसु, मा मुहं पुणो दंसेसु" त्ति सो वि विसज्जिओ ३२ पाइयगज्जसंगहों तइ चोरं बोल्लाविऊण, लत्ताए पहरिअ, 'तुम्हाओ पाहाणो वि सोहणो' इअ सतिरक्कारं अद्धचंदेण निक्कासिओ। चउत्थं तु पच्छामुहं किच्चा गद्दभारोहिऊण सव्वनयरंमि भमाडिउमाइट्ठो। अवराहस्स एगत्ते भिन्नभिन्न- दंडो एएसि कह दिन्नो कुमारमंतिण त्ति अच्छरिअसंजुआ सवे सहाजणा जाया। तेसि हिययगयभावं नाऊण 'चउण्हं चोराणं किं जायं' ति निरूवणत्थं रण्णा चरपुरिसो पेसिओ। एगपहरंमि गए सो चरपुरिसो समागओ समाणो नरिंदं कहेइ- 'महाराया ! पढमो कोमलेण वयणेण उवालंभिओ संतो गेहे गंतूण; अप्पं पि उवलंभं असहंतो जीहं दंतेहिं पिसिऊण मच्चु पत्तो। वीओ परुसक्खरेहि तिरक्करिओ सो 'अहं कयावि मुहं न दंसिस्सं' ति कहिऊण विएसंगओ। तइओ जो सहामज्झे ताडिओ, सो गिहाओ वाहिर गंतुं न इच्छेज्जा। चउत्थो उ जो गहहमारोहिऊण नयरभमणमाइट्ठो सो उ गद्दहोरि परंमुह- मुववेसिम नयरं भमाडिज्जमाणो, विविहावमाणक्यणेहिं च पउरेहि हिलिज्जमाणो निल्लज्जो नियघरसमीवं समागओ संतो तक्कोउहल्लदसणत्यागयनिअभज्जं. कहेइ–'अहुणाहं अवसिट्ठदुण्णिरच्छाओ भमिउं सिग्घं आगमिस्सं, तओ तुम जलं सिग्छ उण्हं कुणेसु'-इअ चरपुरिसकहिअवुत्तंतं सुणिऊण सव्वे कुमार- मंतिस्स वुद्धिं पसंसन्ति । १५. चोरिक्कविसए दुण्हं विउसाणं कहा कुडुंबपरिपोसत्थं चोरकम्मोज्जया वुहा । परदुक्खं पि छिदंति वुहजुम्म नियंसणं ।। भोयनरिदस्स अवंतिनयरीए देवसम्मो विण्हुसम्मोय नाम माहणा दुणि भायरा विउसवरा छद्दसणणिउणो वेयवेयंगपारंगया संतिः । लच्छी-सरस्सईणं एगत्यठाणाभावाओ ते विउसा अईव निद्धणा संति । ताणं भज्जाओ विपइ- भत्तिपरा सुसीलाओ आसि ।
चोरिक्कविसए दुण्हं विउसाणं कहा एगया भोयणाभावेण दुहिया ते . भज्जाओ निय-नियप्पियं कहेइरे- "चउसठ्ठिकलासु तुम्हे चोरियकलं जाणेह न वा, अओ चोरिक्कं काऊणं पि-कओ धणं आणएह। एवं सोच्चा ते धणपत्तीए अन्नुवायं अलहमाणा किंपि चिंतिऊण भोयरिंदमंदिरे रत्तीए चोरियं काउं गया । रायपासाए पच्छण्णं पवेसिआ। तत्थ सुवण्ण-रयय-मणि-माणिक्क-पवालरासि पासित्ता 'एयाणं हरणमईव पावं' ति सत्थे कहियं, एवं वियारं, किच्चा धन्नागारेसु गच्चा सालीणं दुपोट्टलिगं बंधिऊण मत्थाएसु ठविऊण जया निग्गया, तया भोय- नरिंदो महारिहसयणेसु सुत्तो अस्थि । पल्लंगसमीवंमि एगो मक्कडो हत्थे असिं घेत्तूण सावहाणो नरिंदं रक्खइ। ताहे । पल्लंगुवरि एगो सप्पो मंदं मंदं संचरमाणो निग्गओ। तस्स छाया नरिंदोवरि पडिया, तं दळूण पवंगमो सप्पबुद्धीए नरिंदं जया पहरिउं लग्गों, तया ते विउसा तारिसं असंजमसं दठूण सिग्घयरं मक्कडं निग्गहिउं लग्गा । मक्कडो वि असि घेत्तूण तेहिं सह जोद्धपउत्तो। एवं हलवोले जाए जग्गिओ नरिंदो माहणे पुच्छइ- 'के तुम्हे ? कत्तो आगमण ?' ते सच्चं कहिति-"अम्हे चोरिक्कत्थं एत्थ समागया, तुण्णं गच्छंतो अम्हे. एणं कवि सप्पभमेण असिणा तुमम्मि पहरमाणं पासिऊण रक्खणत्थं अणेण सह जुद्धं किच्चा तुम्हे रक्खिओ।" निवेण पुच्छियं-'किं अवहरियं?' तेहिं वुत्तं-सालीणं पोट्टलगा भरिया, जओ'-'सुवण्णाइदव्वहरणे. महापाव' अत्थि, तओ भोयणत्थं सालिधण्णं चिय अवहरियं । तओ नरिंदो चितेइ'--"मुरुक्खो मक्कडो अत्थि, अणेण अप्पणो रक्खा किल अप्पवहाइ होइ । जइ चोरिक्कत्थं एए पंडिआ मम मंदिरे न आगच्छंता, तया हं एएण कविणा अवस्सं हओ होतो। अओ एए विउसा सक्कारारिहा चेव।" तओ विउसे कहेइ-'तुम्हाणं जं इट्ट, तं मग्गेह ।' : एवं कहित्ता बहुधणं ताणं .
३४ पाइयगज्जसंगहो दाविऊण विसज्जिआ। पच्छा नरिदेण मक्कडाओ अप्परवखणं चत्तं ति । एवं विउसा चोरिक्कं कुणंता वि परवाहं चयंति । उवएसो-सोच्चा विउससिट्ठाणं चरियं जणवोहगं । सया हिए पयट्टेज्जा संतोसं माणसे धरे ॥ १६. वसुदेवस्स गिहच्चाओ अहमवि जोव्वणस्स उदये नवनवेहिं तुरग-झय-णेवहिं विसामि निज्जामि उज्जाणसिरिमणुभविऊण नागरजणेण विम्हयविय सियणपणेण पसंसिज्जमाणो रूवमोहियजुवइयण-दिट्ठिपहकराणुवज्झमाणो । अण्णता य मं जेट्ठो गुरु सद्दावेऊणं भणइ-मा कुमार ! दिवसं भमाहि बाहिरओ, धूसरमुहच्छायो दीससि, अच्छसु गिहे। मा ते कलाओ अहुणा गहियाओ सिढिलियाओ होहिंति । ततो भया एवं करिस्सं' ति पडिस्सुयं । कयाइं च रण्णो धाईए य भगिणी खुज्जा गंधाहिगारणिउत्ता वण्णगं पीसंती मया पुच्छिया-'कस्स इमं विलेवणं सज्जिज्जइ ?' ति। सा भणइ- 'रण्णो।' मया भणियं-'अम्हं किं न होइ ?' त्ति। सा भणइ--'कयावराहस्स राया तुभ ण देइ विसिट्ठपि वत्थमाभरणं विलेवणं व ति। गहिओ से बला वण्णओ वारंतीए । सा रुट्टा भणइ-'एएहिं चेव आयारेहि रुद्धो, तहावि न विरमसि अविणयाओ।' मया पुच्छिया-'साह, केण अवराहेण रुद्धो मि ?' सा न साहइ 'रण्णो बोहेमि' ति। अंगुलियगदाणेण अभत्थियाणुगमिया साहइ-"राया विरहे णेगमेहि विण्णविओ-देव ! सुणह, कुमारो सारयचंदो विव जणणयण- सुहओ सुद्धचारित्तो जाए जाए दिसाए निज्जाइ ततो ततो तरुणिवग्गो तेण समं तक्कम्मो भमति । जा य तरुणीओ ताओ वायायण-गववख-जालंतर-दुवारदेसेसु 'नियत्तमाणं पस्सिस्सामो' . त्ति पोत्थकम्मजक्खीओ : विव दिवसं गमेंति, सिमिणायंतीओ वि भणंति-‘एस.. वसुदेवो, इमो. वि वसुदेवो'. त्ति । जातो पत्त-साग-फलानि गेण्हति ताओ भणंति 'कइ वसुदेवो देसि' ?' त्ति ! दारगरूवाणि . ...
वसुदेवस्स गिहच्चाओ ३५ कंदमाणाणि वि कुमारदिण्णदिट्ठीओ विवज्जत्थं गेण्हंति-'वुट्ट वच्छो' त्ति दामेहिं वंधति । एवं देव ! उम्मत्तओ जणो जातो घरकज्जमुक्कवावारो देवातिहिपूयासु. मंदायरो, तं कुणह पसायं, मा अभिक्खं णीउ उज्जाणाणि त्ति । रण्णा भणिया-'वच्चह वीसत्या, णिवारेमि णं ति।' भणियो य जो तत्थासि परियणो, जहा–'कोइ कुमारस्स न कहेइ एयं परमत्थं । तं निहुओ होहि' . त्ति, ततो रण्णो उबालभो न भविस्सइ । मया भणिया-‘एवं करिस्सं ति।" । चितियं च मे पुणो-'अहं जइ पसाएण णिग्गंतो होतो तो मि वंध पावेतो, अहवा एस वंधो चेव, तण्ण मे सेयं इहमच्छिउं' ति संपहारेऊण सर- वण्णभेयगुलियाओं काऊण वल्लहेण दारगेण सह निग्गतो संझाकाले नयरवाहि। सुसाणासण्णं च अणाहमयगं दळूण भणिओ मया वल्लहओ-'गेण्हसु दारुगाणि, सरी परिच्चायं करिस्सं ।' तेण आणावियाणि कट्टाणि, रइया चिया, भणिओ य वल्लहओ-'वच्च' सिग्धं, रयणक रंडगं मम सणिज्जाओ आणेहिं, दाणं दाऊण : अग्गि पविसिस्सं ।' सो भणइ-'जइ एस निच्छओ भे तो देव ! अहं पि अणुपविासस्सं ।' मया भणिओ-'जं ते रोयइ तं करिस्ससि, मा य रहस्सं भिदसु, सिग्धं च एहि' त्ति । सो गतो 'जहा आणवेह' त्ति वोत्तूण। मया वि' अणाहमयगं पक्खिविऊण आदीविया चियगा, सुसाणोज्झिय- 'मलत्तगं गहेऊण खमावणलेहो लिहिओ गुरूणं देवीणं य–'सुद्धसहावो होऊण णागरेहि मइलिओं' त्ति निवेदणं काऊण 'वसुदेवो अग्गि अइगतो।' मसाणखंभे पत्तं बंधिऊण दुयमवक्कतो, उम्मग्गेण यं दूरं गंतूण मग्गमोइण्णो । जाणेण य एगा तरुणजुवई ससुरकुलाओ कुलघरं निज्जइ, सा ममं दळूण वुड्ढं वितिज्जियं भणइ--'अम्मो ! एस माहणदारगो परमसुकुमारो परिस्संतो आरुभउ जाणं। अम्हं गिहे वीसत्थो अज्ज सुहं जाहिइ त्ति।' भणिओ य मि वुढ्ढाए-'आरुहह सामि ! जाणं, परिस्संतत्य ।' · मया चितियं-'जाणद्वितो पच्छण्णं गमिस्सं' ति-आरूढो मि। पत्ता' सुगाम सूरत्यमणवेलाएं। तत्य मज्जिय-जिमिओ अच्छामि । .
पाइयगज्जसंगहो तस्स य गिहस्स नाइदूरे जक्खाययणं, तत्थ लोगो संठिओ। आगया य नयराओ पुरिसा । ते कहंति-"सुणह जमज्ज वत्तं नयरे- वसुदेवो कुमारो अग्गि पविट्ठो। तस्स वल्लभगो नाम चेडो वल्लभगो। सो किर चितं जलंति दळूण अक्कंदमाणो पुच्छिओ जणेण भणइ-वसुदेवो कुमारो अग्गिमइगओ जणवायभीओ, तस्स य वयणं सुणमाणो समंतओ जणो कंदिउमारद्धो। तं च रुण्णसह सोऊण रायाणो णव वि भायरो निग्गया। दिट्ठ च णेहि कुमारस्स हत्थलिहियं खमावणपत्तं। तं च वाएऊणं रुवंता घय-महुणा परिसिंचित्ता चितं, चंदणागुरु-देवदारुक?हिं छाएऊणं पुणो पज्जालिउ कयपेयकज्जा सगिहमगुपविट्ठ त्ति।" तं च मे सोऊण चिंता समुप्पण्णा--गूढो संधी, निव्वसंका मे गुरवो 'मओ' त्ति परिमग्गणायरं न काहिति । ततो सच्छंद निविग्धं जायं वियरियव्वं ति । रत्तिमतिवाहयित्ता अवरेण पट्टिओ, कमेण पत्तो विजयखेडं नयरं । नातिदूरे य नय रस्स समासण्णे एगम्मि पायवे दुवे पुरिसा चिट्ठति, ते मं भणंति-'सामि! वीसमह ति।' अहं संठिओ। ते पुच्छंति-'के तुम्भे ? कओ वा एह ?' मया भणिया--'अहं माहणो गोयमो, कुसग्गपुराओ विज्जागमं काउं निग्गओ।' ? १७. नलकहा नलेण वुत्तं--'देवि ! जोयणसयं अरण्णं एयं। अज्जवि पंच जोयणाई लंघियाई। धीरा होहि ।' . एवं उल्लवंताणं ताणं पहे वच्चंताणं पडियार काउं असक्को अक्को लज्जतो व निलुक्को अत्थगिरिसिहरं। काणणेसु कंकेल्लिपल्लवेहिं विहिओ पसत्थो सत्थरो नलेण । भणिया दमयंती-..'देवि! सुविऊण एत्य देहि दिन्नदुक्खमुद्दाए निदाए अवसरं। अलं आयंकसंकाए, अहं ते पाहरिओ' त्ति खित्तं सत्थरे नलेण नियनिवसणद्धं। नंदिऊण देवं अरहंतं सरिऊण पंचपरमिट्ठिमंतं पसुत्ता तत्थ दमयंती। निहायंतीए तीए नलेण चितियं- ...
नलकहा ३७ "जेसि ससुरो सरणं लहंति पुरिसा न ते पुरिसलीहं। दमयंतीइ पिइहरं ता कह वच्चामि निभग्गो ॥१॥ काऊण कुलिसकढिणं हिययं. मुत्तुं पियं पि दमयंतिं । रंको व्व कहिं पि अन्नत्थ जामि घेत्तूण अत्ताणं ॥२॥ दमयंतीइ अवाओ न कोवि सलिप्पभावओ होही। सव्वंगरक्खणकरं कवयं . सीलं चिय सईणं ॥३॥" तओ छुरिएण छिन्नं वसणद्धं । दमयंतीवत्थंचले लिहियाई नियरुहिरेण अक्खराइं- "वडरुक्खह दाहिणदिसिहिं जाइ विदभिहिं मग्गु । वामदिसिहि पुण कोसलिहि जहि रुच्चइतहिं लग्गु ॥४॥" 'अहं पुण अन्नत्य वच्चिस्सं ।' तो असद्द रुयंतो व्व निहुयक्कमो गंतुं पयट्टो नलो। 'पियपणइणि पसुत्तं वलियकंधरं पलोयंतो गंतूण केत्तियं पि 'भूमिभागं चितिउं पवत्तो-'आहारत्थी पसुत्तं वालं एवं अणाहं वग्यो सिंघो वा जई भवखेज्ज ता मे का गई ? अओ सूरुग्गमं जाव रक्खामि एयं। पच्चूसे वच्चउ.एसा सइच्छाए' त्ति। तओ पड़ियरित्थो पुरिसो व्व नियत्तो तेहिं चेव पएहि नलो। भूमिसुत्तं दठूण दमयंति चिंतियं तेण- "हा ! दमयंती एगवत्था एगागिणी सुवइ सुन्नारणे । अहो ! नलस्स. अंतेउरं असूरियंपस्सं । कम्मदोसेण इमं अवत्थं गया एसा कमललोयणा । ता किं करेमि, हयासो है। अणाहं पिव पिययमं महिवीढलुढियं पिच्छंतो वि जं न निल्लज्जो विलज्जामि ता नूणं वज्जघडियो म्हि। एसा अरण्णे मए मुक्का पडिबुद्धा समाणी.मम पाडिसिद्धीए जीविएणावि मुच्चिस्सइ । ता पइव्वयं एयं मुत्तूण अन्नत्य गंतुं न उच्छहइ मे मणं। जीवियं मरणं वा मे. इमीए समं होउ । अहवा अवायसयसंकुले अरण्णे अहमेव दुहभायणं होमि । एसा पुण वत्थलिहियं मम आएसं मुणंती गंतूण सयणभवणे सुहेण चिट्ठिस्सइ।" एवं कयनिच्छओ गमिऊण रयणि पिययमापडिवोहसमए तिरोहिओ तुरियपयक्खेवं नलो। उन्निद्दकमलामोयसुरहिसमीराभिरामे. रयणीविरामे दमयंतीए दिट्ठो सुविणो (जहा) आरूढा अहं फलफुल्लमणहरे चूयपायवे। भक्खियाइं मए मम ३८ पाइयगज्जसंगही । तस्स पेसलाई फलाइं, सहस त्ति वणहत्थिणा उम्मूलिओ सो तो पडिया अहं अंड व्व पक्खिणो खोणीयले। तओ पडिवुद्धा दमयंती नलं अपेच्छिऊण जूहन्भट्ठा हरिणि व्व दिसाओ पलोयंती चितिउं पवत्ता-"हा ! अच्चा हियं पडियं जं अरणे असरणा पिएण विमुक्कम्हि। अहवा पहाए मह वयण- सुद्धिसलिलाणयणत्थं कत्थ वि जलासए गो भविस्सइ पिययमो। अहवा निरुवमरूवलुद्धाए कीए वि खेयरीए रमणत्थं नीओ भविस्सइ नलो। ते दुमा, ते पव्वया, तं च अरणं, एक्को चेव चंदसुंदरमुहो न दीसइ नलो।" एवं अणप्पवियप्पपज्जाउलमणा कयादिसालोया नलं अपेच्छंती · भीया सुविणत्थं भाविउ पवत्ता-जो चूयदुमो पुप्फफलसमिद्धो, सो नलो राया। जं मए फलासाओ कओ, तं रज्जसुहमाणणं । जं च सो वणहत्थिणा उम्मूलिओ, तं दिव्वेण रज्जन्भंसं लहाविओ नलो। जं पुण पडिय म्हि तत्तो, तं नलाओ. चुक्कम्हि । तो इमिणा सुविणेण दुल्लहं मे दसणं ति । ता रोविउं पवत्ता दमयंती मुक्ककंठमुच्चसरं । कायरमणाण इत्थीण धीरिमा होइ न हि वसणे ॥४॥ "हा नाह ! कि तए हं चत्ता ! किं तुज्झ होमि भारकरी । नहि भोगिणो कयावि हु नियकंचुलिया कुणइ भारं ॥५।। भो वणदेवयाओ ! पत्थेमि तुम्भे सेह मे पाणनाहं, तस्स पयपंकएहिं पवित्तियं पहं वा। अहवा पक्कवालुकं व फुट्ट हि. धरणि ! पविसिऊण पायाले पावेमि निव्वुई।" एवं विलवंती वाहजलसारणीहिं अरण- दुमे सिंचंती नलं विणा जले थले कत्थ वि रई अपावंती सिंचयंचले अक्खराइ दळूण दमयंती वियसंतवयणा वाएइ-"नूणं पिययमेण चत्ता अहं देहमित्तेण न चित्तण। कह अन्नहा आएसदाणेण अणुग्गहिय म्हि ता. गुरुवयणं न पाइणो. आणं कुणंतीए से निम्मलो इहलोओ। अओ वच्चामि पिउणो घरं। जं पइणो भवणं तं पई विणा पराभवभवणं चेय , नारीणं" ति निच्छिऊण चलिया वडदुमस्स दाहिणदिसामग्गेण, नलं व पासट्टियं पिच्छंती नलक्खराणि । तीए विमलसीलप्पभावेण पहवंति कदा नोवदवा । .
१८. महुबिंदु-दिहतं कोइ पुरिसो बहुदेसपट्टणवियारी अडविं सत्थेणं समं पविट्ठो। चोरेहिं य सत्थो अव्भाहओ। सो पुरिसोः सत्थपरिभट्ठो मूढदिसो परिव्भमंतो दाण- दुद्दिणमुहेण वणगएण अभिभूओ। तेण पलायमाणेण पुराणकूवो तणदव्भ- परिच्छन्नो दिट्ठो। तस्स तडे महंतो वडपायवो। तस्स पारोहो कूवमणु- पविट्ठो । सो पुरिसो भयाभिभूओ पारोहमवलंविऊण ठिओ कूत्रमज्झे आलोएइ य-अहो तत्थ 'अयगरो महाकाओ वियारियमुहो गसिउकामो त पुरिसमवलोएइ। तिरियं पुंण चउद्दिसि सप्पा भीसणा डसिउकामा चिट्ठति । पारोहमुवरि किण्हसुक्किला दो मूसया छिदंति । हत्थी हत्थेण केसग्गे परामुसइ । तम्मि य पायवे महापरिणाह महु ठियं । गयसंचालिए य पायवे वायविहूया महुविंदु तस्स पुरिसस्स केइ मुहमाविसंति, ते य आसाएंइ। महुरा य डसिउ, कामा परिवयंति समंतओ। तस्स एवंगयस्स किं सुहं होइ ? जे महुविंदु अहिलसइ तत्तियं तस्स सुहं सेसं दुक्खं ति । उवसंहारो पुण दिद्रुतस्स.-- जहा सो पुरिसो, तहा संसारी जीवो। जहा सा अडवी, तहा जम्मजरान रोगमरणबहुला संसाराडवी। जहा वणहत्यी, तहा मच्चू । जहा कूवो, तहा देवभवो मणुस्सभवो य । जहा अयगरो, तहा नरगतिरियगईओ। जहा सप्पा, तहा कोहमाणमायालोहा चत्तारि कसाया दोग्गइगमणनायगा। जहा पारोहो; तहा जीवियकालो। जहा मूसगा, तहा कालसुक्किला पक्खा राइंदियदसणेहिं परि- विखवति जीवियं । जहा दुमो, तहा कम्मवंधणहेऊ अन्नाणं अविरई मिच्छत्तं च । जहा महुँ, तहा सइंफरिसरसरूवगंधा इंदियत्था। जहा महुयरा, तहा आगंतुगां सरीरुग्गया य.बाही। तस्सेव भयसंकडे वट्टमाणस्स कओ सुहं ? महुविंदुरसासायओ केवलं मुहकप्पणा।
१९. सुमद्दापत्तलेहणं (ततः प्रविशत्युपविष्टा सोत्कण्ठा. सुभद्रा मन्दारिका च) सुभद्रा-(दीर्घ निःश्वस्य सखेदमात्मगतम्) अइ मूढहिअअ, तस्स जणस्स सुमरणं तुह एक्कंतसंतावइत्तसं जाणंतो वि कीस तुमं पुणो वि तं चेअ सुमरेसि । अम्मो चवलाइ लोअणाइ, जस्सि दावः संणिहिदे संपुण्णं दंसणं पि कार्यु ण पहवेह, तं चेअ दाणि दंसि, अहिलसंताइ कुदो मं आआसेध। हंहो दुविदद्धहत्थ, जेण गहिंदो तुम दुम्माणवसणपरवंतो मोएदुकामो आसी, तस्स पुणो वि फंससुहं णिल्लज्जो कह इच्छसि। अंग वम्मह, अण्णाणुराअपराहीणे वि जणे मं खलीकरतो कि ति तुह सराणं विणोदलक्खीकरेसि । मन्दारिका-पिअसहि, किं चितेसि ? सुभद्राण किं वि। मन्दारिका-किं तदो अण्ण । सुभद्रा कुदो। मन्दारिका-जं तुए अविच्छिण्णं चितिज्जइ। सुभद्रा-(सलज्जम्) जाणंती एव्व कुदो मं पुच्छेसि । मन्दारिका-पण्हो वि तहिं विसए तुह रमइत्तओ त्ति । सुभद्रा हला, पराहीणे तस्सि जणे समुस्सुअंकीस में उवहसेसि । मन्दारिका सहि; दक्खिण्णमेत्तदिण्णुत्तरं, तं किं ति पुण ण पत्तेसि । (सस्मितम्) अहव विरुद्धोवण्णासच्छलेण असाहारणि तुवम्मि तस्स बहुमई अघाडेती अत्ताणं सलाहेसि । सुभद्रा-(सविलक्षस्मितम्) पिअसहि, एसो अंजली। मा खु म उवहसेसि । मन्दारिका-इअंम्हि तुहिक्का ।
४१ सुभद्दापत्तलेहणं सुभद्रा-(सखेदमात्मगतम्) हंत, किं णु खु. एअस्स मअणरोअस्स अवसाणं ! जेण णिद्दअपीडिआए भारो मे सरीरं चंपणाअ पडिभाइ । अहव कुदो मे तारिसा भाअवेआ जदो एवं कल्लाणं परिणमिस्सदि। (रोदिति) मन्दारिका-सहि, कुदो दे ओवाअसंका। अहरहं सिझंति णिमित्ताइ । सुभद्रा-पिअभासिणीओ खु सहीओ। मन्दारिका-मा तह चितिअ । सव्वहा ण विसंवदंति णिमित्ताइ । सुभद्रा-होदु। मन्दारिका-पिअसहि, किं ते मणो लिहइ ? सुभद्रा हला, सुठ्ठ भणिों । लेक्खं चेअ खु तं । मन्दारिका-कि अणंगलेहकव्वं ? सुभद्रा-(सलज्जम्) तं विज । 'मन्दारिका-सहि, भणाहि भणाहि । सुभद्रा-जइ ण मं उवहसिस्ससि; एसा भणिस्सं । मन्दारिका-~ण एअं उवहासट्ठाणं । सुभद्रा-तेण हि सुणाहि। मन्दारिका-अवहिद म्हि । सुभद्रा-(अनुस्मृत्य) लज्जदि भणिदं जीहा। मन्दारिका-तेण हि अहिलिहिअ दंसेहि । सुभद्रा सहि, तह। मन्दारिका-कुदो दाणि उवअरणाइ । सुभद्रा हला, एक्कं असोअपल्लवं उवणेहि। जदो तहिं णिवडतवाह- सलिलोल्लिएण इमिणा थणंगराअहरिचंदणरसेण णहरगतूलिआधरिएण लिहिस्सं।
४२
पाइयगज्जसंगहो ।
मन्दारिका-सहि, सोहणाइ अणंगलेहोवअरणाइ । ता एसा आणेमि ।
(उत्थाय नाट्येन निकृत्योपनयति)।
(सुभद्रा आदाय तथा विलिखति)
मन्दारिका-सहि देहि, वाचइस्सं ।
सुभद्रा-वाहेदि मं लज्जा । जाव' तुहिक्का मणेण वाएहि ।
मन्दारिका-तह करिस्सं । (लेखमादाय, निरीक्ष्य; मनसा वाचयित्वा)
सहि, साहु साहु । गहीरमहुरा वाचोजुत्ती। (तथा करिष्यामि)
सुभद्रा-पसंसा वि. उवहासो मे पडिभासइ ।
मन्दारिका-एसा अहं ण पसंसिस्सं । सो एव्व परं पसंसेदु ।
सुभद्रा- (सलज्जम्) किं तेण वि जणेण एवं दक्खिदव्वं ।
मन्दारिका-~-अण्णहा कहं अणंगलेहो भवे ।
सुभद्रा-हला, कुदो मं लहूकरेसि ।
मन्दारिका-(लेखं विलोक्य) जह एदाइ अक्खराइ सुत्थिदाइ भविस्संति
तह एवं करअलफंसासहं एत्थ एब्द असोअक्खंधे मुहुत्त पि समप्पिस्सं ।
सुभद्रा-हला, कदम
खु सो भूमि महागओ अलंकरेदि ।
मन्दारिका-जा वा का वा होदु णिवासभूमि ।
कि तेण। पुण
महाभाअं इह एव दक्खिस्ससि । जदो तुह दंसणादो पहुदि एसा तस्स
विणोदभूमि ।
सुभद्रा-(आत्मगतम्) अवि णाम पिअसहीवअणं समस्सासणमेत्तं ण हवे।
२०. कूरो चेडो य पहसणं क्रूर:-(मदं नाटयन्, सवहुमानम्) अवि जश्श णामहेयं शुलाशुला निशमिऊण वेवंति । एशे शे खु क्कूले विज्जाहलभेलवे अहके ॥१॥ अह य- मंतेण व जंतेण व तंतेण व णत्थि दुक्कलं णाम । मह एत्तियम्मि लोए के अण्णे मालिशे पुलिशे ॥२॥ चेटः- (उपसृत्य) शामिअ एशे अहके पणवेमि । क्रूरः-पियशिश्शा, जावज्जीवं मं शुश्शूशेहि । चेटः-एशे दाशे अणुगहिदे । एदाइ णवुउप्पलाइ। क्रूरः-अले हिंतालअ, एत्तिसं वेलं किं ति तुमे विलंविसं चेटः-शामिअ, अय्ये खु लहूदी जिण्णुज्जाणए दाणि तुमं पडिवालेंते चिट्ठइ। तं खु दळूण चिलाइदं । क्रूर:-कि ति एण्हि तुहिक्के चिट्ठशि? वाशेहि दाव उप्पलेहिं. कुंभाशवं। चेट:-(हास्यं निरुन्धन, आत्मगतम्) शु कहाणं जाणिदे मए अवशले । (प्रकाशम्) जं शामी आणवेदि । (यथोक्तमनुतिष्ठति) क्रूर:-अले हिंतालअ, एहि दाव । उल्लाशते तिशूलअ णच्चंते अ.जहाशमी हि । गाअंते महुलं धुवं विहिए विहलेमि शंपदं ॥३॥ (परिकामतः) क्रूर:-(सहर्ष गायति) शुहं पिवंतए शाहुपशण्णसं पए पए खलंते अविशंथुलं । महाणुभावए णिभलमत्तए शदा.विजेदु विज्जाहलभेलवे. ॥४॥ .
-- 4-MI -४४ पाइयगज्जसंगहो अह अ- शलशं णिहिदुप्पलों शुल पिविऊण मए वि घडतशुभे। विहले मि चलेमि खलेमि अले अहके कुलुले कुलुले कुलुले ॥५॥ (स्खलन) अले कहं चलेदि पुढवी- (सहासम्) होदि विइ खु एवं मं बलिअं मदभलेण णिन्भलिकं । अशमत्था धालेदुं शच्चं खु वशुंधला चलइ ॥६॥ अले हिंतालअ, आवज्जेहिं एत्य आपाणअचशअम्मि कुंभएण वालुणि । अहव तेण एव्व कुंभएण आअलं पिविश्शं । (तथा कृत्वा) अले शविशेशं खु शुलशा एशा. शुला.। (मदं. नाटयन्) कहं मं विणा एक्कं महापुलिशं शामण्णमाणुशं शुलोएदि वलाए लोए । ता पडिवोहिश्शं दाव । शुणुथ शुणुथ शव्वे शव्वहा शज्जणा ए। . :मह चित्र चलणाणं शाहु शुश्शूशएह ॥ पिविअ पिविअ हालं खेलखेलं खलंते । विहलइ चलते जे शलीलं शलीलं ॥७॥ चेटः-(निर्वर्ण्य) कहं अदिभूमि आलूढे शामिणो मदभले । - तह हि- गंडूशिअ शंपदं शुलं मुह गिट्ठीवाइ शोहलच्छडं । विज्जाहलभेलवे श शशलीले शले पिहं पिहं ।।८।। क्रूर:-(परितोऽवलोक्य) अले कहं पलिदो वि पलावेदि शुलाशमुद्दए । चेट:-कहं शुलामअभावदाए शव्वदो इमश्श पलाशमुद्दए पडिहाअइ । क्रूरः-(वीचिसम्पातं नाटयति) कहं उव्वेलआ एदे तलंगआ। अले हितालम, एहि तलिश्शम्ह । (तरणं नाटयन्) ४५ कूरो चेडो य पहसणं शमुच्चलते लहलीशदेहि शुलासमुद्दे शहशम्हि मग्गे । अले अले कि अहके कलिश्शं कह तलिश्शं अहवा पिविश्शं ॥८॥ (श्रमं नाटयन्) अले वलिअ खुदाणि अहके पलिश्शंते । ता एवं पलि- रेशम इमिणा मंतजवेण शमइश्शं । शुंडा शुला पशन्ना कल्ला काअंवली महू शीहू । मइला मज्जं महुला मेलेई वालुणी हाला ॥१०॥ (पुनः पुनः पठति) चेट:-कहं पलिश्शते दाणि शामी। क्रूरः-अले कुत्थ एण्हि विश्शमिश्शं । चेटः-(आत्मगतम्) पलिश्शते विअ शामिणो मदे। ता विण्णविश्शं दाव। (प्रकाशम्) शामिआ, अज्जे खु लद्धहूदी जिण्णुज्जाणम्मि को कालो शामिणं पडिवालेदि। क्रूरः-अले हिंतालअ; किं ति खु एत्ति वेलं तुम्हे ण भणिदं । चेट:-शामिआ, भणिदं खु मए पुव्वं । शामिणा मदभलपलवशेण णः आअण्णिदं। क्रूरः-हुँ, मे पमादे। जाव तहिं गमिश्शामो। चेटः-इदो इदो। चेट:-शामिआ, एअंखु जिण्णुज्जाणं । (उभौ प्रविशतः) चेट:-(अङ गुल्या निर्दिश्य) शामिआ, एशे खु अज्जलद्धहूदी तुह आअमणं पडिवालेदि।
- १. पंच सालिकणाणं सत्ति (धान के पाँच बीजों की शक्ति) प्रस्तुत पाठ का महत्त्व : भारतीय परिवारों में जो भी समस्याएं अथवा 'विपमताएँ देखी जाती हैं, उनका बहुत कुछ सम्वन्ध स्त्रियों से बताया गया है। विश्लेपण करने से इसका कुछ औचित्य भी सिद्ध होता है; क्योंकि स्त्रियाँ जन्म से ही अपने माता-पिता के घरों में विविध संस्कारों के बीच पलती हैं और उन्हीं से प्रभावित भी रहती हैं। विवाहोपरान्त जव वे अपनी ससुराल आती हैं, तव कुछ तो अपने को उस परिवार के अनुसार बना लेती हैं और कुछ अपने को तदनुरूप नहीं ढाल पातीं, जिससे विपमताएँ उत्पन्न होती हैं। प्रस्तुत कथानक में ऐसी चार पुत्रवधुओं की कथा वणित है, जो विविध संस्कारों के साथ अपने पतिगृह में आती हैं। लेखक ने उनका बड़ा ही मनो- वैज्ञानिक चित्रण प्रस्तुत किया है । लेखक ने चतुर्थ कनिष्ठा पुत्रवधू रोहिणी का चित्रण वहुत ही सुन्दर, एवं रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी गृहस्थी की छोटी-से-छोटी तुच्छ वस्तु को भी व्यर्थ नहीं समझती; क्योंकि उसकी धारणा है कि जिस प्रकार एक-एक बूंद से घड़ा भर जाता है और उसकी उपयोगिता स्वयं सिद्ध है, उसी प्रकार छोटी-से-छोटी तुच्छ वस्तु भी गृहस्थी के निर्माण एवं संचालन में बहुमूल्य सिद्ध हो सकती है। इसके अतिरिक्त, रोहिणी की अन्य प्रमुख विशेषता यह है कि छोटे-से- छोटे अवसर का भी वह मूल्यांकन करती है । धान के पाँच बीजों को वह अपनी जेठानियों की तरह तुच्छ समझकर उनकी उपेक्षा नहीं करती, अपितु वह उन्हें भी वहुमूल्य समझकर उसका सदुपयोग करती है। यही कारण है कि परिवार में कनिष्ठा होने पर भी रोहिणी को प्रमुखता मिल गई और उसकी ज्येष्ठाओं (जेठानियों) को अपमानित होना पड़ा। प Mm ( . .४७ . ) कथासंक्षेप : राजगृह नाम की नगरी में धन्य नाम का एक महाधनी सेठ निवास करता था। उसकी प्रकृति से भद्र सुभद्रा नाम की गृहिणी थी। उसके धनपाल, धनदेव, धनगोप एवं धनरक्षित नाम के चार पुत्र थे । वे सभी अत्यन्त सुन्दर, कलाओं में कुशल एवं सौजन्यपूर्ण थे। उनकी पत्नियाँ भी श्रेष्ठ कुलों में उत्पन्न कन्याएँ थीं उनके नाम क्रमशः इस प्रकार थे : श्री, लक्ष्मी, धना एवं धन्या। वे अपने पिता, अर्थात् ससुर की कृपा से निरन्तर सुख का अनुभव करती रहती थीं। : जव सेठ वृद्धावस्था को .. प्राप्त हुआ, तब किसी एक दिन उसने अपना परलोक सुधारने की चिन्ता करते हुए विचार किया : "इन पुत्रों को मैंने ‘इतने समय तक सुखी रखा है। अभी ये पुत्रवधुएँ भी मेरे सामने मेरे घर में हैं, अतः ये मेरे मन के अनुसार ही काम करती हैं। किन्तु मैं तो, घर की चिन्ता से -तभी मुक्त हो सकूँगा, जव ये मेरे बाद भी मेरी इच्छा के अनुकूल बनी रहें । किन्तु, इसका ज्ञान मुझे अपनी बुद्धि से अभी ही कर लेना चाहिए।" इस प्रकार विचार कर, उस सेठ ने उन पुत्रवधुओं की बुद्धि की परीक्षा के लिए अपने घर में एक उत्सव किया, जिसमें उसने उन पुत्रवधुओं के रिश्तेदारों एवं घर के लोगों को निमन्त्रित किया और उन सभी को भोजन कराकर गौरव का अनुभव किया। “भोजनोपरान्त उस धन्यं नामक सेठ ने उन सभी रिश्तेदारों को अपनी चित्रशाला (ड्राइंग रूम) में सुखपूर्वक बैठाया और पुष्प, गन्ध, ताम्बूल आदि से सभी को सम्मानित किया। फिर, उनके समक्ष उसने अपनी चारों पुत्रवधुओं को बुलाया और उन्हें धान के पाँच-पाँच वीज देकर इस प्रकार कहा : “इन बीजों को भली भाँति सुरक्षित रखना और जब मैं उन्हें माँगू, तब मुझे दे देना।" यह कहकर उसने उन सभी को विदा कर दिया। पुत्रवधुओं ने वहाँ से लौटकर अपने मन में तर्क-वितर्क किया कि धान के इन वीजों को देने में क्या रहस्य है ? सबसे बड़ी पुत्रवधू ने उन धान के पाँचों ( ४८ ) वीजों को फेंक दिया और यह सोचने लगी कि ससुर धान के उन पाँच वीजों को जब भी मांगेंगे, तव मैं उन्हें कहीं से भी लाकर दे दूंगी। दूसरी पुत्रवधू ने भी ऐसा ही विचार किया, किन्तु उसने उन्हें फेंका नहीं, बल्कि छीलकर खा गई। तीसरी पुत्रवधू ने एक शुद्ध वस्त्र में उन्हें वाँधकर अपने आभूषणों की पेटी में रख दिया और तीनों सन्ध्याओं में वह उनका दर्शन करने लगी। चौथी पुत्रवधू ने उन वीजों को अपने नहर भेज दिया। वर्षा ऋतु के आते ही उन्हें खेतों में वो दिया गया और उत्क्षेपण-प्रतिक्षेपण की क्रिया प्रारम्भ कर दी गई। इस कारण पहले वर्ष में ही एक कुलक धान हो गया, दूसरे वर्ष में एक आढ़क; तीसरे वर्ष में एक खारी, चौथे वर्ष में एक कुम्भ और पांचवें वर्ष में एक हजार कुम्भ धान से भर गए। पाँच वर्षों के बाद उस धन्य सेठ ने पुनः सभी रिश्तेदारों को बुलाकर सभी के आगे अपनी बड़ी पुत्रवधू से धान के उन पाँच वीजों को मांगा। उसने बड़ी ही कठिनाई से स्मरण कर कहीं से धान के पांचों वीजों को लाकर देते । हुए कहा : “धान के उन पाँच वीजों को तो मैं सुरक्षित नहीं रख सकी थी, उन्हें मैंने दूसरी जगह से लाकर दिया है।" दूसरी पुत्रवधू ने भी ऐसा ही किया और कहा : "मैंने तो उन पाँच वीजों को फेंका नहीं था, वल्कि खा गई थी।" तीसरी पुत्रवधू ने वस्त्र में बंधे धान के उन पांच बीजों को समर्पित करते हुए कहा : मैं उनकी सुरक्षा करती रही।" चौथी पुत्रवधू, रोहिणी ने चाबी सौंपते हुए कहा : “धान के पाँचों वीज मेरे पिता के घर में सुरक्षित हैं। गाड़ी आदि भेजकर मेरे पिताजी के पास से मँगवा लीजिए।" यह सुनकर सेठ ने पूछा : "हे पुत्री, तूने यह कैसे किया ?" रोहिणी ने उत्तर दिया। "मैंने अपने पिता को धान के पाँचों वीज़ भेजते समय उनकी सुरक्षा के लिए कहा था। उन्होंने मेरे संकेत को समझकर ठीक तरह उनकी रक्षा की है।" तव सेठ ने अपने अभिप्राय को पूरा होते देख उन पुत्रवधुओं के घरों से आए हुए बन्धुओं से पूछा : “इन चारों पुत्रवधुओं ने धान के पांचों बीजों की सुरक्षा अपने-अपने ढंग से की ही। उसके आधार पर उन्हें आगे से गृहस्थी की जिम्मेदारी किस रूप में सौंपी जाय? ܕ ܀ . ." ब ।
( ४६ ) . यह सुनकर उन लोगों ने कहा : "इस विषय में तो आप ही बुद्धिमान् हैं, अतः आपका निर्णय ही प्रामाणिक होगा।" तव सेठ ने अपना निर्णय करते हुए कहा : “मेरी सबसे बड़ी पुत्रवधू तो चीजों को फेंक देती है, इसलिए अब आज से घर में राख, गोइठा (कण्डे) आदि जो सामग्री है, वही सब उसके अधिकार में रहेगी। घर में जो भी अनाज, वरतन आदि सामग्री है, और घर की सफाई तथा भोजन आदि बनाने के जो भी कार्य हैं, वे सब दूसरी पुत्रवधू के अधिकार में रहेंगे। · तीसरी पुत्रवधू भाण्डागार की स्वामिनी वनकर रहेगी। किन्तु, चौथी पुत्रवधू समस्त चल-अचल सम्पत्ति की स्वामिनी होगी। उसके आदेश से ही घर-परिवार के सभी लोग कार्य करेंगे। अन्य सभी पुत्रवधुएँ उसके सुख' से सुखी रहने का अनुभव करती रहेंगी। इस प्रकार, उस सेठ ने सबका निर्णय कर दिया। उसी समय से उन सभी पुत्रवधुओं के नाम बदलकर इस प्रकार प्रसिद्ध हो गये-उज्झिता, भोगवती, रक्षिता एवं रोहिणी। इसके बाद धन्य सेठ का घर सुव्यवस्थित हो गया। सभी लोगों ने उस सेठ की बड़ी प्रशंसा की। दीर्घदर्शी एवं धर्म करने में समर्थ व्यक्ति ही घर की ऐसी व्यवस्था सोच सकते और कर पाते हैं। कठिन शब्दों के अर्थ सालिकणाणं =धान के वीजों की चउरो= =चार सत्ति = शक्ति पुत्ता-पुत्र रायगिहे =राजगृह में धणपालो धनपाल घणदेवो=धनदेव महाधणो महाधनी घणगोवो=धनगोप सेट्ठी=सेठ धणरक्खिओ=धनरक्षित होत्या था सव्वेविसभी पयइभदाए=प्रकृति से भद्र काई कितने सुभद्दाए=सुभद्रा गिहकज्जाइं= गृहकार्य आदि गेहिणीए=गृहिणी, पत्नी के कलाकुसला= कलाकुशल नयरे-नगर में t -- -- ( ५० ) एमाई-ये - %3- सोजन्नपुन्ना-सौजन्यपूर्ण पुन्नाहिया=अधिक पुण्य घरिणीओ= गृहिणी नायव्वा-जानना चाहिए पहाण प्रधान लोयवाओ-लोकापवाद कुलुन्भवाओ= कुलोत्पन्न कम्माणुसारिणी कर्म के अनुसार कमेणं-क्रम से सिरी-श्री चितिकण-विचार कर लच्छी-लक्ष्मी पारद्वा-प्रारम्भ किया जणयपसाएण=पिता की कृपा से दाऊण देकर निच्चं-नित्य सम्म-ठीक प्रकार से सुहिया = सुखी पालेयव्वा = पालना, सुरक्षित रखना विहरंति रहते थे, विचरते थे जया-जव परिणयवओ= वृद्धावस्था आने पर मग्गामि= मांगू परलोगहियं = परलोक-हित समप्पियव्वं ति दे देना काउकामो=करने की इच्छा तासिमप्पणो= उनका अपना एत्तियं-- इतना सयणवरगोस्वजनवर्ग कया=किया, की भोयाविओ-भोजन कराया परिच्छा-परीक्षा सगौरवं गौरवसहित ऊसवो '-उत्सव भुत्तुत्तरे= भोजनोत्तर सुहनिविट्ठो-सुखपूर्वक बैठे पव्वइएवि= वैराग्य लेने पर भी चित्तसालिगाए -चित्रशाला में सुत्थिया= सुस्थित, प्रसन्न समाणिओ-सम्मान किया हवंति =होते है कुसुमविलेवण = पुष्प-विलेपन एयासि = इसके लिए तंबोलाइणा=ताम्बूल आदि से उचिय ति= उचित है तस्समक्खं-उसके समक्ष =धन्य ने नायं =जान लिया सुहाओ= पतोहुएँ. मइ-मेरा धणेणाहूया % .. बुलाया ( ५१ ) भुत्तत्ति , सालिकणे =शालिकण सभावो-सद्भावपूर्वक नवरं-कभी नहीं छोल्लिऊण-छीलकर छोलिऊण-छीलकर =खा लिया पक्खित्ता-फेंक दिया कुलहरे-कुलगृह में तइयाए-तीसरी ने.. पाउसे-वर्षा ऋतु में सुद्धवत्थे = शुद्ध वस्त्र में वविया-बो दिया वंविऊण वाँधकर पढमवरिसे =प्रथम वर्ष में करंडिगाए=पेटी में आढगं-आढ़क (माप) ठविया = रख दिया तइयवरिसे-तीसरे वर्ष में विसज्जिओ-विदा दी. खारी-खारी (माप) किमत्थं यह क्या कुंभा=कुम्भ (माप) सवियक्को-वितर्क-सहित कुंभसहस्साणिः हजारों कुम्भ 'तत्थ वहाँ जणयगिहेसु-पिता के कर में जेसुण्हाए- ज्येष्ठा पुत्रवधू ने सगडाइपेसणेण= गाड़ी आदि भेजकर उज्झिया= फेंक दिया, उपेक्षा कर दी आणावेउ= मंगवा लें जाइस्सइ मांगेंगे ताओ=पिता ने कीस =किसका पुणोवि=पुनः पालेयव्वा = पालन करना चाहिए मगिया माँगा जेट्ठसुण्हा= जेठी पुत्रवधू सम्म-ठीक तीएवि= उसने भी नियाहिप्पायं = अपना अभिप्राय किच्छेण = कष्टपूर्वक, कठिनाई से साहिऊण भणिया =जानकर कहा ! सरिऊण स्मरण कर तव्बंधुणो= उसके बन्धुओं को समप्पिा समर्पित किया किमेत्य- इसमें क्या कुओवि = कहीं से भी गंठिवद्धा=गाँठ में वाँधकर कणाकण कुंचियाओ-चाभी, कुंजी % 3D कट्ठ-करके एए-ये. .
( ५२ ) सुहभाइणीओ तेहिं - उन्होंने आएसेण आदेश से वुद्धिनिउणा=बुद्धिनिपुण सेसाहिशेष सभी पमाणं प्रमाण, सबूत हिंडियन्वं = काम करना, घूमना-फिरना वृत्तं = कहा सुखभागिनी उज्झणसीला-फेंकनेवाली भविस्संति = होंगी जं-जो तप्पभिइ- उसी समय से मज्झगिहे = मेरे घर में तासिं- उनकी अहिगारो अधिकार भोगवई =भोगवती किंचि= कुछ भी उज्झिया- उज्झिता रंधणकंडणसोहणाइ= भोजन बनाना, रोहिणी-रोहिणी चुनना, सफाई करना आदि लोएण=लोगों ने तंमि=उसमें सलाहिओ=प्रशंसा की निओगो= नियोग (नियुक्ति) तेणावि-उसने भी भंडागारसामिणी =भाण्डार की हियइच्छियं= हृदय से इच्छित स्वामिनी दीहदंसी दीर्घदर्शी, दूरदर्शी सब्वाहिगारिणी= सर्वाधिकारिणी धम्मारिहोत्ति-धर्म करने में समर्थ, - गृहकार्य के लिए अभ्यासार्थ प्रश्न १. प्रस्तुत पाठ से मिलनेवाली शिक्षाओं पर प्रकाश डालिए। २. “पारिवारिक कथाओं में 'पंचसालिकणाणं सत्ति' नामक कथा का महत्त्व- पूर्ण स्थान है।" इस कथन की समीक्षा कीजिए। ३. पठित पाठ के आधार पर निम्नांकित पाँचों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए: १. धण्णो,, २. उज्झिया; ३. भोगवई, ४. रक्खिया, ५. रोहिणी । ४. "जीवन में कोई भी वस्तु एवं अवसर तुच्छ नहीं।" प्रस्तुत कहानी के आधार पर इस उक्ति की समीक्षा कीजिए। । .
( ५३ )
..
अभ्यासार्थ कुछ महत्त्वपूर्ण शब्द
सालिकणाणं, सत्ति, होत्था, पयइ, सुण्हा, ऊसवो, चित्तसाला, छोलिऊण,
पक्खित्ता, कुलओ, आढगं, खारी, मग्गिया, गंठिबद्धा, साहिओ, नवरं,
कुंचिया, कीस, अहिप्पायं साहिऊण, कुंभा।
कुछ शब्दों पर व्याकरणबोधक टिप्पणियां
तेणं कालेणं तस्मिन् काले-विभक्ति-नियम के अनुसार, आर्ष-प्राकृत
में सप्तमी के स्थान पर तृतीया विभक्ति होती है, अतः यहाँ सप्तमी के स्थान
पर तृतीया विभक्ति हो गई है।
होत्था : अभूत्-भू धातु के स्थान पर प्राकृत में 'हो' आदेश और
'भूतकाल
में 'त्या' प्रत्यय होता है। अतः, प्रथमपुरुष
के एकवचन
में
भूतकाल का रूप होत्या' वनता है
जत्थ : यत्र-संस्कृत शब्द के आदि में आनेवाला . 'य' :प्राकृत में 'ज'
हो जाता है तथा यथानियम 'त्र' के स्थान पर विकल्प से 'त्य' आदेश होता है।
अतः, 'यत्र' का 'जत्थ' बन जाता है।
पासिऊण : दृष्ट्वा-दृश् + तूण; दृश् धातु के स्थान पर पास् आदेश
होता है और प्रत्यय के पूर्व इकार का आगम होने तथा तकार का लोप होने
से पूर्वकालिक क्रिया का रूप 'पासिऊण' बनता है ।
तम्मि : तस्मिन्-तत् शब्द के सप्तमी के एकवचन में तम्मि रूप
बनता है।
पगड्ढिज्जमाणे : प्रकृष्यमाण:-प्र के र और कृ के ऋ का लोप होने से
प्र के स्थान पर प, और कृ के स्थान पर क, और फिर क के स्थान पर.
शौरसेनी की प्रवृत्ति के अनुसार ग हो गया है। पुनः. प्रेरणार्थक प्रयोग
होने से इज्ज का संयोग और कृत्-प्रत्यय 'माण' जुड़ने से ‘पगडिढज्जमाणे
रूप वना है। अर्धमागधी का प्रयोग होने से विसर्ग का एत्व हुआ है।
:
( ५४ ) उवागच्छित्ता : उप+ गम् + ल्यप् प्राकृत में संस्कृत के प के स्थान पर व होता है। 'गम्' धातु के स्थान पर आर्प-प्राकृत में ‘गच्छ' आदेश होता है और ल्यप् प्रत्यय के स्थान पर 'इत्ता' होता है। अतः, 'उपागत्य' के स्थान पर 'उवागच्छित्ता' रूप बना है। वंदित्ता : वन्दित्वा-'वद्' धातु के स्थान में 'वंद' आदेश होता है तथा . पूर्वकालिक कृत्-प्रत्यय 'इत्ता' जोड़ देने से 'वंदित्ता' सिद्ध होता है। वयासी : अवदत्-'वद्' धातु के द का लोप और अ स्वर शेष तथा 'य' श्रुति होने पर वय हुआ, पश्चात् भूतकाल का 'सी' प्रत्यय तथा उसके पूर्व स्वर का दीर्घ कर देने से 'वयासी' रूप बना है। : २. रमणोए पराभूअ-सिकन्दरस्स कहा [रमणी द्वारा पराजित सिकन्दर को कथा] महत्त्व : विश्व के राजनीतिक इतिहास में सिकन्दर का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ईसा-पूर्व की चौथी सदी के विश्व इतिहास तथा विशेष रूप से उत्तर- पश्चिम-एशिया एवं भारत के इतिहास को उसने अत्यधिक प्रभावित किया है। उस समय यदि भारत में चन्द्रगुप्त मौर्य का अभ्युदय न हुआ होता, तो भारत-भूमि पर भी उसकी विजय-पताका फहराने लगती। किन्तु, महामति चाणक्य की अभूतपूर्व प्रतिभा एवं चन्द्रगुप्त मौर्य के पराक्रम ने उसे भारत की उत्तरीय सीमा पर ही आतंकित कर दिया और देश के बाहर खदेड़ दिया था। कथावस्तु : प्रस्तुत पाठ में सिकन्दर के जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना का अंकन किया गया है। जब वह विश्व-विजय की आकांक्षा से, यूनान से प्रशिक्षित विशाल सेना के साथ निकलता है, तव अनेक देशों पर विजय प्राप्त करता हुआ ईरान देश आ पहुँचता है और वहाँ विजय प्राप्त कर वह रान देश की राजधानी में घूमने की इच्छा से घोड़े पर बैठकर निकल ..
( ५५. ) घूमते-घामते वह उस स्थान पर निकल जाता है, जहाँ ईरान के राजा की राजकुमारी निवास करती थी। वह देखने में बड़ी सुन्दर थी। सिकन्दर को अपनी ओर आते देख वह बड़ी आश्चर्यचकित होती हैं। सिकन्दर जैसे ही उसकी ओर बढ़ने लगता है कि उसे अपने गुरु के उपदेशं याद आ जाते हैं । ' गुरु ने एक बार उसे उपदेश देते हुए बताया था कि "जो व्यक्ति अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है, उसे' चाहिए कि वह दूसरों की बहू-बेटियों की ओर कुदृष्टि से न देखे, बल्कि उम्र में बड़ी महिलाओं को माता के समान, समान उम्रवाली महिलाओं को बहिन के समान एवं अपनी उम्र से छोटी महिलाओं को बेटी के समान माने । जो व्यक्ति इस उपदेश को ध्यान में नहीं रख सकता, वह जीवन में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता।" सिकन्दर को जैसे ही ये गुरुवाक्य स्मरण आते, वैसे ही वह उस सुन्दरी से बात किये बिना ही वापस चला जाता । सिकन्दर की स्थिति बड़ी ही उलझनों से भरी हुई रहती है। वह बार- बार उस युवती के निवास पर जाता है, किन्तु गुरुवाक्य स्मरण आते ही वापस चला जाता है। एक वार अवसर पाकर वह युवती कन्या सिकन्दर से उसका कारण पूछती है, तो सिकन्दर उसे स्पष्ट कह देता है कि महिलाओं के प्रति हमारे गुरु अरस्तू की धारणा बड़ी प्रतिकूल है। वे उनका सम्पर्क :सफलता- प्राप्ति के मार्ग में विघ्नकारक मानते हैं। अरस्तू की इस विचारधारा पर युवती को बड़ा क्रोध आ जाता है और उसे इसकी सीख देने का विचार करती है। एक दिन अवसर पाकर वह अपनी साज-सज्जा कर अरस्तू के निवास के समीप आकर सुन्दर गाना गाती है, जिसे सुनकर अरस्तू उसपर मोहित हो जाता है। सिकन्दर तो यह चाहता ही था। जव गुरु-शिष्य का आमना-सामना होता है, तब सिकन्दर गुरु से कहता है कि क्या उपदेश दूसरों के लिए ही होते हैं ? क्या वे स्वयं अपने ऊपर लागू नहीं होते? अरस्तू अपने शिष्य के रहस्यपूर्ण कथन को सुनकर तिलमिला उठता है, किन्तु फिर समझाता हुआ उसे कहता हैं : “जो . ...
५६ ) युवतियाँ वृद्धावस्था से जर्जर साधुओं को भी मोहित कर सकती हैं, वे फिर युवकों को तो सहज ही आकृष्ट कर सकती हैं। किन्तु, जिस युवक के सामने विश्वविजय का महान कार्यक्रम हो, वह यदि प्रारम्भ में ही उनके मोह- जाल में पड़ जाय, तो क्या वह सफल हो सकता है ?" गुरु के स्नेहपूर्ण वचनों से प्रवोधित सिकन्दर अपने अपराधों के लिए गुरु से क्षमा याचना करता है और आगे से उस गलती को न दुहराने की प्रतिज्ञा करता है। कथानक के कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य इस कथानक से निम्नांकित तथ्यों पर प्रकाश पड़ता है : १. सिकन्दर एक महान् वीर एवं पराक्रमी युवक था, जो अपनी महत्त्वा- कांक्षा से प्रेरित होकर प्रशिक्षित विशाल सेना लेकर विश्वविजय के लिए निकल पड़ता है। २. वह वीर होकर भी अहंकारी नहीं, वरन् विनम्र और गुरुभक्त है। युद्ध-प्रसंगों में गुरु के पथ-प्रदर्शन की आकांक्षा से वह अपने विद्यागुरु अरस्तू को साथ लेकर चलता है। ३. अपनी युवावस्था के उन्माद में वह एक बार ईरान की राजकुमारी पर मोहित होकर अपने लक्ष्य से भ्रष्ट होने की स्थिति में आता है और गुरु द्वारा अपमानित होकर उनसे रुष्ट हो जाता है, किन्तु शीघ्र ही वह अपनी भूल समझकर उनसे क्षमा-याचना कर लेता है। लघुता नहीं, अपितु हृदय की विशालता ही मानी जायगी। ४. प्रस्तुत कथानक में सिकन्दर एक महान् सेनापति के रूप में उपस्थित हुआ है। मौर्यकालीन इतिहास से पता चलता है कि वह कई लाख सैनिकों को लेकर विश्वविजय के लिए निकला था। विदेशों पर विजय, विशाल सेना का संचालन, अनुशासन, प्रशासन एवं सन्तोषजनक सैन्य-व्यवस्था के कारण वह प्राचीन काल के सर्वश्रेष्ठ सेनापतियों में अग्रगण्य माना जाता है। यह उसकी ( ५७ ) "५. प्रस्तुत कथा की घटना अन्यत्र नहीं मिलती। अतः, सिकन्दर के प्रामाणिक जीवन को चित्रित करने की दृष्टि से यह प्राचीन प्राकृत-कथा भारतीय इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान रखती है और इतिहास की शृंखला की एक टूटी हुई कड़ी को जोड़ती है। कठिन शब्दों के अर्थ % 3D 4 दुसहस्सवासाओ=दो हजार वर्ष आरम्भ प्रारम्भ कर, लेकर गीसविसए = ग्रीस (यूनान) देश में अज्झावगो -अध्यापक महाराया-महाराज. सम्मग्गदंसगो सन्मार्ग दिखानेवाला वालत्तणाओवचपन से ही असाहारणो असाधारण तस्स उसका विउसवरो-श्रेष्ठ विद्वान् रायनीइवियक्खणोराजनीति में अहेसि =था विचक्षण (चतुर) गुरुसेवापरो-गुरु की सेवा में तत्पर 'एरिस्टोटलो' =अरस्तू(यूनान जोवणे =युवावस्था में का एक महान् दार्शनिक) परंगणासुपरस्त्रियों में सया सदा दिट्टि = दृष्टि, नजर आगाए वट्टमाणो आज्ञा के अधीन . अकुणंतो= नहीं डालकर चत्तकामभोगाहिलासो=कामभोग गुरुणो=गुरु के आदि की अभिलाषा छोड़कर पहावेण प्रभाव से अणेगदेसविजयं=अनेक देशों पर विजय "कित्ति-कीत्ति कासी कर ली विजयकंखिरो=विजय का आकांक्षी एगया=किसी एक दिन पुत्वं पहले काउं-करने की. साहसिओ-साहसी इच्छंतो= इच्छा करता हुआ महासूरो-महान् वीर नियनयराओ=अपने नगर से आसि हुए, थे. निग्गओ=निकला: 'जस -यश ( ५८ ) % 3D क्षुब्ध कर खुहा=क्षुधा, भूख तत्य = वहाँ परिस्सम परिश्रम महानयराओ=महानगर से पवलूसाहजुओ=प्रवल उत्साह के साथ सिविरं शिविर जयंतो=जीतता हुआ सयं स्वयं कमेणं = क्रम से भव्वपासाए=भव्य प्रासाद (राजमहल) में समागओ=आया, आ पहुँचा गिरिसिहरमालालंकियं = गिरिशिखरों काओ=किया, बनाया की पंक्ति से अलंकृत वाहिरं= बाहर की ओर निरिक्खंतो=निरीक्षण करता हुआ ठविसं = रखकर, स्थापित कर नियरूवनिज्जिअदेवंगण =अपने रूप- उज्जाणमज्झे = उद्यान के मध्य में सौन्दर्य से देवांगनाओं को भी आसारूढो=अश्व पर सवार होकर पराजित कर देनेवाली विविहपएससोहं प्रदेश की विविध चित्तक्खोहकारिणि =चित को शोभा को देनेवाली गच्छमाणो=चलता हुआ, जाता हुआ सुंदरि= सुन्दरी को महरिसीणं =महर्पियों के अच्चव्भुयरूवा=अति अद्भत रूपवाली वीसपसिद्धो विश्व में प्रसिद्ध ताडित्ता=मारकर, त्रस्त कर सबदिसाविजयं = सभी दिशाओं पर कामविसयविसमूच्छियं = कामविषय के विजय को विप से मूच्छित पवलसेणापरिवारिओ=प्रवल सेना के सवलो=सवल, वीर साथ असमत्यो= असमर्थ मग्गे मार्ग में निच्चलो=निश्चल पिवासा= प्यास विमोहित्ता=विमोहित कर अगणंतोन मानकर समीववट्टि =समीपवर्ती दूसहेज्जनरिंदवग्गे = दुस्सह (दुर्जेय) चेट्ठा=चेष्टा नरेन्द्र (राज)-वर्ग को दळूण = देखकर इराणदेसे = ईरान देश में जायक्खोहो=क्षुब्ध होकर .
...... warmirmirmirmiri.......... ( ५९ ) रसिक, संजाओ=हो गया इत्थी=स्त्री, महिला नियपरक्कमवत्तं =अपने पराक्रम की रूवावलोगणं = रूप-सौन्दर्य का अवलोकन्छ वातों की हणेइरे हरण कर लेता है तम्मिय = उसी नरिंदाणं नरेन्द्रों, राजाओं का सहासमक्खं =सभा के समक्ष हलाहलमिव =हलाहल विष के समान विजइक्करसियाणं =केवल विजय के सत्थेसु= शास्त्रों में लिए उत्सुक, गणिआ= गिना, माना गया है दसणमेत्ताओ=दर्शनमात से विसमविसाओ=विषम विष से वीरियं = वीर्य, शक्ति अवहिलित्ता = अपमानित कर एग= एक नियावासे =अपने आवास में पासेइ =देखता है गुरुस्स=गुरु के ससिणेहनयणकडक्खेहि = स्निग्ध नेत्र- सुमरंतो स्मरण करता हुआ कटाक्षों से निदिओ=निन्दा की कामगहगसिओ= काम-रूपी ग्रह से ग्रस्त मउणेण = मौनपूर्वक पासेमाणो देखे जाने पर काऊण करके विमूढ़मणो=किंकर्तव्यविमूढ सहेइ तत्थच्चिय = वहीं पर अच्चंतदूमिओ = अत्यन्त दुःखी ठिओ-ठहर गया, रुक गया नियट्ठाणे =अपने स्थान पर ठाऊण = ठहरकर, रुककर सव्वा=सभी. आगओ=आ गया निरिक्खिआ=देखा, निरीक्षण किया दिट्ठसुंदरीए = देखी हुई सुन्दरी के पुणरवि=पुनः, फिर भी अप्पणो अपनी मंतिसेणावइपमुहसुहडवराणं = श्रेष्ठ दढिमं= दृढ़ता को मन्त्री, सेनापति और प्रमुख योद्धाओं के निण्णयं =निर्णय समागंतूणं = आकर थिरीकरेइ-स्थिर किया अवहेलेइ=अपमान करने लगा इंदियाणं = इन्द्रियों की पुरिताणं-पुरुषों के पवलत्तणण -प्रबलता से सहन किया कियंतं = कुछ % 3D
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( ६१ ) सोच्चा=सुनकर पइण्ण % 3D घरंमि-घर में अच्चंतहरिसचित्ता-अत्यन्त हर्षित अईव= अतीव, अत्यन्त चित्तवाली रोड्सरूवा रौद्रस्वरूप संभरियगुरुवयणो गुरु. के वचनों का समत्तत्थीणं-समस्त स्त्रियों के स्मरण कर अवमाणं= अपमान को पराइओपराजित हो गया प्रतिज्ञा नट्ठ नष्ट काहं = कर लूं वइस्संति- कहेंगे जीविएणं जीवित रहने से एयाए-इसको, इसके लिए वयस्स-व्रत, व्रती का वियारिता विचार करके नाणस्स-ज्ञानी का पवट्टई-उद्यत हुआ गणणा-गिनती मणोभावं -मन के भाव को सव्वपोग्गलियसुहाओ=समस्तु पुद्गल गच्छेह-ज़ाओ, जाते हो वस्तुओं के सुख से निवारेइ निवारण किया धम्मत्थसल्लिहणतल्लिच्छो=धर्मार्थ संपयाए सम्पदा से के कार्यों में संलग्न खोहे क्षुब्ध, विचलित करने के लिए रूववई-रूप-सौन्दर्यवाली वरागो-वेचारा असमत्था=असमर्थ विणासेमि-विनष्ट कर दूं सिया-हो इराणनरिंदपुत्ती-ईरान नरेन्द्र की पुत्री कयावि-कभी, कदापि चरणेसु चरणों में जायंति= उत्पन्न होते हैं। उवरि-ऊपर : मयप्पायं-मृतप्राय सद्धा श्रद्धा तहवि तो भी रूवासत्तोः -रूप के प्रति आसक्त गुरुक्यनारीविसयावमाणं-गुरु द्वारा मुहाओ-मुख से किये गये नारी सम्बन्धी अपमान को गुरुकयनियतिरक्कारवुत्तंत-गुरु द्वारा कोहेण = क्रोधपूर्वक किये गये अपने तिरस्कार-सम्बन्धी पयंडा=प्रचण्ड वृत्तान्त को वएइ-बोला ( ६२ ) - वट्टइहै सत्तीए =शक्ति से गाणसवणे = गान सुनने में अज्जाहं =आज मैं खणमेत्तं =क्षणमात्र में पायपडणसील पैरों में गिरा हुआ सत्यत्थाई = शास्त्रों के अर्थ आदि नयणवाणपुरओ=नेत्ररूपी वाणों के सामने महुरज्झुणीएमधुर ध्वनि से अणुभवस्स =अनुभव का समाणो होने पर वएइ-कहा आकड्ढियचित्तो=आकृष्टचित्त खणंमि=क्षणभर में अज्झप्पचितणपरो-अध्यात्म-अपनी =अध्यात्म-अपनी गत्ताई= शरीर आदि आत्मा के चिन्तन में तत्पर वायायणे =वातायन में कावि=कोई भी वाहिरं बाहर चालि=विचलित करने में उघाडियमत्थयं =माथा उघारे हुए मणूसो= मनुष्य गयगामिणि = गजगामिनी हिययं = हृदय को संचरमाणि= चलती हुई विसंयउम्मीओ=विषय-वासना का अच्छरगणाणं = अप्सराओं के उन्मीलन दिव्वसरेण =दिव्य स्वर से होज्जा हो सकता है पासित्ता=देखकर सरेण =स्वर से सोम्मायं =मदोन्मत्त नयणकडखेहि = नेत्र के कटाक्षों से नियकज्जकरणपरा=अपने कार्यों के सजीवियं =जीवनपूर्ण, सरस करने में तत्पर अवस्सं अवश्य पच्चूसकाले =सवेरे-सवेरे साहस कम्मं = साहसिक कर्म को अच्चन्भुयवसधारिणी =अत्यन्त बीयदिणंमि= दूसरे दिन अद्भुत किये हुए धम्मसत्थत्थचिंतणिक्कपरो= धर्मशास्त्रों संमागंतूण = आकर के अर्थ के चिन्तन में एकाग्र रूप से तीए = उसने संलग्न पसुपक्खिणो=पशु-पक्षियों के ভলাসী -उद्यान में मूढा=मूढ, मोहित, विस्मृत महुरसरेण = मधुर स्वर से चितमाणो चिन्तन करता हुआ % 3D वेष धारण . ( . ६३ ) को भुलाकर L दठूण =देखकर अक्खित्तो आकृष्ट वाहेमि=हाँकू तग्गीयसवणेण = उसके गीत सुनने से जावज्जीवं जीवनपर्यन्त वामूढोव्यामूढ, मोहित वट्टिस्सं = रहूँगा, रहूंगी सिडिलीभूयाई शिथिल हो गये आरोहित्ता=सवार होकर निरूवणत्थं = देखने के लिए वाहेइ=हाँका ठाऊण-रुककर, ठहरकर तत्थागंतूण = वहाँ आकर संखुद्धं = अधिक क्षुब्ध माहप्पं माहात्म्य, महत्त्व को पासेइ-देखा पुरिसा=पुरुष नियंवयावलंवमाणदीहकेसि नितम्बों विम्हरियगुरुसिणेहो= गुरु के स्नेह तक लटकनेवाले लम्बे केशोंवाली पराभवंति = पराजित करती हुई इत्थीओ-स्त्रियाँ रमणिज्जरूवं = रमणीय सौन्दर्य को उज्जाणमज्झे= उद्यान के मध्य में जराजज्जरिअदेहो= वृद्धावस्था से जर्जरित देह सुंदरीखंधे - सुन्दरी के कन्धे पर जायतिव्वकामाहिलासोतीव्र कामा- हिट्ठम्मिनीचे, धरती की ओर भिलाषा की उत्पत्ति कामेमि = चाहता हूँ रूवसोहं =रूप-शोभा को भुंजसु = भोग करो मयणानलदद्धो-मदनाग्नि से दग्ध विहसि हँसकर, मुस्कराकर चित्तखोहेण=चित्त के क्षुब्ध होने से धरती =धारण करती हुई कामभोगाईकामभोगादि पइण्णं-प्रतिज्ञा को ईसि = मन्द-मन्द, कुछ-कुछ अहोनिसं = अहर्निश, प्रतिदिन लज्जलज्जा को रूवविमोहिओ= रूप से विमोहित तुरंगीभूअ-घोड़ा जैसा बनकर पूरसु= पूरा करो पइण्णा-प्रतिज्ञा . सेविस्सामि-सेवा करूगी उववेसित्ताणं-बैठाकर घोडगीभूयतुम्हाणमुवरि = घोड़े के धरित्ताधारण कर समान बने हुए तुम्हारे ऊपर आणाए=आज्ञा से % 3D वएइ-बोली wa- ( ६४ ) सुनाकर तिब्बरागपासवद्धोतीव्र राग-रूपी नियावासे = अपने आवास पर जाल में बँधा हुआ झाणमग्गो- ध्यान में मग्न सण्णापेरिओ= संकेत पाकर तत्तण्णू-तत्त्वज्ञ तयवत्थं - उस अवस्था में एयाणं = इनके तणायंति= तृण के समान तुच्छ अवुहा=अवुध, मूर्ख पुवुत्तं = पूर्वोक्त तुम्हाणमुवएसो-तुम्हारा उपदेश गुरुवायं = गुरु-वाणी को उवहसेइ-हँसी उड़ाई नरगदुवारसमाओ= नरक के द्वार के वच्छ = वत्स, पुत्र समान खलियं-स्खलित, चूका हुआ सत्तिमंता= शक्तिवाले दिण्णं दिया इच्चाई= इत्यादि हिययंमि= हृदय में सुणावित्ता- धरियं =धारण किया कत्थ = कहाँ उवहसेज्जा=हँसी उड़ाते नायपरमट्ठो=परमार्थ जानकर एसा=यह मोहाओ= मोह से अवत्थं =अवस्था को तुमं= तुम काउं-करने में नाणं-ज्ञान जुव्वणुम्मत्तस्सयौवनोन्मत्त का सुठुत्तणेण= ठीक से, भली भाँति किंकरीभूएसेवक वनकर होज्जा होता, हो मइसामत्थेण= बुद्धि के सामर्थ्य से दुण्णि = दोनों ही मारिसं=मेरा जैसा कहित्ता= कहकर नाणज्झाणासत्त=ज्ञान-ध्यान में आसक्त गंतूण=जाकर समत्था-समर्थ वियारिति-विचार करते हैं करिस्सइ-करेगी महापुरिसो=महान् पुरुष पुरओ=सम्मुख उवहसेइ-हँसती है वालग =बालक मुरुक्ख == मूर्ख च्चिय= निश्चय जइयदि मए = मेरा ( ६५ ) गृहकार्य के लिए अभ्यासार्य प्रश्न १. प्रस्तुत पाठ से मिलनेवाली शिक्षाओं पर प्रकाश डालिए। २. सिकन्दर कौन था ? वह किस उद्देश्य से अपने राज्य से निकला था ? ३. उसका गुरु कौन था? उसने विश्व-विजय के आकांक्षी सिकन्दर को क्या शिक्षा दी थी? ४. पठित पाठ के आधार पर सिकन्दर के चरित्र पर प्रकाश डालिए। ५. अरस्तू एवं ईरान की राजकुमारी के चरित्र पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ प्रस्तुत करें। ६. निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी-रूप प्रस्तुत करें (इनके अर्थ कठिन शब्दों के प्रकरण में खोजें): पराभूअ, स्वासत्तो, गीसविसए; वरागो, अज्झावगो, पइण्णं. कासी, सव्वपोग्गलियसुहाओ, निग्गओ, मणूसो, सिविरं, वट्टइ, ठिओ, ..संखुद्धं, सावहाणचित्तो, इत्थीओ; अवहिलित्ता, मुरुक्ख, पासेमि, तत्तण्णू, सच्चिय, पुरओ, झायंतो, अवुहा, इंगियागारेणं । -- ३. विउसोए पुत्तवहूए कहाणयं (विदुषी पुत्रवधू की कहानी) कथावस्तु : किसी नगर में लक्ष्मीदास नामक एक समृद्ध सेठ निवास करता था। बहुत अधिक धन-सम्पत्ति के कारण वह अहंकारी हो गया था। निरन्तर भोग-विलास में आसक्त रहने के कारण वह कभी धर्मकार्य नहीं करता था। उसका पुत्र भी उसी के समान था । उसका पुत्र जव युवावस्था को प्राप्त हुआ, तब उसने धर्मदास नाम के एक धर्मात्मा की शीलवती नाम की (६६) पुत्री के साथ उसका विवाह कर दिया। वह पुत्री यथानाम तथागुण थी। वह कन्या जब आठ वर्ष की थी, तभी उसने अपने पिता की प्रेरणा से एक साध्वी के पास सर्वज्ञ-धर्म का श्रवण कर विधिपूर्वक अणुव्रतों को धारण कर लिया था और इस प्रकार वह सर्वज्ञ-धर्म में बहुत ही निपुण हो गई थी। कुछ समय के वाद जब वह अपनी ससुराल आई, तब ससुर आदि को धर्म से विमुख देखकर अतीव दुःखी हुई। 'यहाँ मेरे व्रत का निर्वाह कैसे होगा, देव एवं गुरु से विमुख ससुर आदि के लिए धर्मोपदेश कैसे दिया जाय ? इसी विषय में वह विचारमग्न रहने लगी। किसी एक समय 'यह संसार असार है, यह लक्ष्मी भी सारविहीन है, यह देह भी विनाशशील है, केवल एक धर्म ही है, जो निश्चय से परलोक सुधारने की इच्छा रखनेवाले जीवों के लिए श्रेष्ठ आधार के समान है', इस प्रकार का उपदेश देकर उसने अपने पति को सर्वज्ञ-धर्म का उपासक बना दिया। इसी प्रकार, कुछ समय के बाद उसने अपनी सास को भी प्रतिवोधित किया और अपने ससुर को प्रतिबोधित करने के अवसर की खोज में वह रहने लगीं। अन्य किसी एक दिन उस विदुषी पुत्रवधू के घर श्रमण-गुणसमूह से अलंकृत, महाव्रती और ज्ञानी एक युवक साधु भिक्षा माँगने के लिए आये । युवा- वस्था में भी. व्रतों को धारण कर लेनेवाले, शान्त एवं दान्त साधु को घर में आया हुआ देखकर और उनके आहार ले चुकने के बाद उसने अपने मन में विचार किया : "युवावस्था में महाव्रतों को ग्रहण करना अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी, इन्होंने इस युवावस्था में इन व्रतों को कैसे ग्रहण कर लिया?" ऐसा सोचकर परीक्षा लेने के लिए उसने समस्या के रूप में साधु से पूछा : "अभी समय नहीं आया, फिर भी उसके पूर्व आप कैसे निकल पड़े ?" उस साधु ने भी उस विदुषी पुत्रवधू के हृदय के गूढ भाव को जानकर उत्तर देते हुए कहा : "ज्ञान ही समय है । मृत्यु कब हो जायगी, इसका कुछ पता नहीं, इसीलिए समय आये विना ही मैं निकल पड़ा हूँ।" - ( ६७ ) वह पुत्रवधू उनके उत्तर को सुनकर तथा उसके रहस्य को समझकर सन्तुष्ट हो गई । पुनः मुनि ने भी उससे पूछा : "तुम कितने वर्ष की हो?" मुनि के पूछने के रहस्य को जानकर उसने उत्तर में, स्वयं वीस वर्ष की हो जाने पर भी, अपनी उम्र केवल बारह वर्ष की ही बताई। पुनः उस साधु ने पूछा : "और, तुम्हारा पति कितने वर्ष का हो गया है ?" यह पूछे जाने पर उस पुत्रवधू ने, अपने पति के पच्चीस वर्ष के होने पर भी, उसकी उम्र केवल पाँच वर्ष की ही बताई और इसी प्रकार उसने अपनी सास की उम्र भी छह महीने की ही बताई । जव उससे ससुर की उम्र पूछी गई, तब उसने उत्तर में कहा : “उनका तो अभी जन्म ही नहीं हुआ पुत्रवधू एवं साधु में जब इस प्रकार का वार्तालाप हो रहा था, तभी भीतर बैठे उसके ससुर ने उसे ध्यानपूर्वक सुन लिया। - भिक्षा ग्रहण करने के बाद जब साधु चला गया, तब उसके घर में बड़ा कोलाहल होने लगा; क्योंकि पुत्रवधू ने ससुर के उत्पन्न नहीं होने के सम्बन्ध में कहा था। इस कारण ससुर अपनी वहू से रूठ गया और अपने पुत्र को उस बात की सूचना देने के लिए वह दुकान की ओर जाने लगा। अपने ससुर को इस प्रकार भूखा जाते हुए देखकर पुत्रवधू ने कहा: "हे ससुरजी, आप भोजन करने के वाद जाइए।" यह सुनकर ससुर ने उत्तर दिया : “जब मेरा जन्म ही नहीं हुआ है, तब मैं भोजन कैसे कर सकता हूँ ?" इस प्रकार कहकर वह. दूकान चला गया। वहाँ. अपने पुत्र से समस्त वृत्तान्त सुनाते हुए सुनाते हुए उसने कहा : "तुम्हारी पत्नी दुराचारिणी तथा असभ्य वचन बोलनेवाली है। अतः,, उसे घर से निकाल बाहर करो।' वह पुत्र भी पिता के साथ-साथ अपने घर चला आया। उसने पुत्रवधू, अर्थात् अपनी पत्नी से पूछा : “तुमने माता-पिता का अपमान क्यों किया है और साधु के साथ होनेवाली वार्ता में झूठे उत्तर क्यों दिये थे ?" यह सुनकर उसने कहा : “तुम जाकर मुनि महाराज से स्वयं पूछ लो। वही सेव कुछ कह देंगे।" तब ससुर ने उपाश्रय में जाकर उन मुनि का अपमान करते हुए उनसे पूछा : “हे मुनिराज; आज भिक्षा मांगने के ( ६८ लिए क्या आप ही मेरे घर आये थे ?" यह सुनकर उसने कहा :"तुम्हारा घर मैं नहीं जानता, तुम कहाँ रहते हो?" यह सुनकर सेठ ने मन में विचार किया : “यह मुनि असत्य बोलता है।" फिर भी, उसने उससे पूछा : "आज आपने किसी घर में किसी वालिका के साथ कुछ वार्तालाप किया था ?" यह सुनकर मुनि ने उत्तर में कहा : "हाँ, वह बालिका तो अत्यन्त कुशल है। उसने मेरी परीक्षा ली थी। अतः, उसने जव मुझसे पूछा कि "समय के विना क्यों निकल पड़े ?" तव, मैंने उत्तर देते हुए कहा था : “समय का, अर्थात् मरने के समय का किसी को भी ज्ञान नहीं है, अतः मैं समय के पूर्व की उम्र में ही घर से बाहर निकल पड़ा हूँ।" मैंने भी उसकी परीक्षा लेने के लिए उसके घर के ससुर आदि सभी की उम्र पूछी थी। तब उसने सबके बारे में उत्तर भी ठीक-ठीक दिये थे।" सेठ ने पूछा : "ससुर का जन्म ही नहीं हुआ है, यह पुत्रवधू ने कैसे कहा ?" यह सुनकर मुनिराज ने उत्तर में कहा : “यह प्रश्न तो उसी से पूछा जाय; क्योंकि विदुषी कन्या ही उसके यथार्थ भाव को जानती है ।" तब, ससुर ने घर आकर उस पुत्रवधू से पूछा : "उस मुनि के सम्मुख तुमने यह कैसे कहा था कि "मेरे ससुर का अभी जन्म ही नहीं हुआ है।" तव पुत्रवधू ने कहा : “हे ससुर, धर्महीन का मनुष्य-जन्म प्राप्त करना भी उसके लिए नहीं प्राप्त करने के ही समान है; क्योंकि सत्य-धर्म के आचरण से ही यह जीवन सफल होता है। यदि उसने अपना मनुष्य-जन्म सफल नहीं किया, तो उसका वह जीवन निष्फल ही है। अतः, जब मैंने आपका जीवन धर्म के बिना ही व्यतीत होते हुए देखा, तभी मुनिराज से यह कहा था कि "मेरे ससुर का तो अभी जन्म ही नहीं हुआ।" इस प्रकार, सत्य अर्थ का ज्ञान प्राप्त कर वह ससुर सन्तुष्ट हो गया और उसी समय से'. धार्मिक बन पुनः उसने पूछा : 'तुमने सास की उम्र छह महीने की कैसे कही ?" यह सुनकर उसने कहा : "इसका उत्तर आप सास से ही पूछे।" तब सेठ ने सेठानी से उस प्रश्न को पूछा। उसने भी उत्तर में कहा : “पुत्रवधू का वचन . गया।
( ६६ ) - ही सत्य है; क्योंकि सर्वज्ञ-धर्म का अनुसरण किये हुए मुझे अभी केवल छह महीने ही हुए हैं और इन छह महीनों के पहले मैं मृतक-समान ही थी, अर्थात् मेरा सारा जीवन धर्म के विना व्यर्थ ही व्यतीत हो रहा था।" उस नगर में जिस समय उस पुत्रवधू के विविध गुणों की चर्चा होने लगी थी, तभी एक वृद्धा ने कहा था : "नारियों में यही पुत्रवधू श्रेष्ठ है। यह युवावस्था में भी अपनी सास की भक्ति करती है और धर्मकार्यों में कभी प्रमाद नहीं करती। गृहकार्यों में भी यह कुशल है। इस जैसी पुत्रवधू दूसरी नहीं है । इसकी सास अभागी है, जो इस प्रकार के भक्ति-वात्सल्य से युक्त पुत्रवधू द्वारा धर्मकार्य में प्रेरित किये जाने पर भी धर्म नहीं करती। यह सुनकर सास ने वहू के गुणों से प्रसन्न होकर उसके समक्ष धर्मज्ञान प्राप्त कर लिया था। जब उसने छह महीने तक का धर्मकार्य पूरा किया था, तभी उसकी पुत्रवधू ने उसे छह माह की उम्रवाली वताया।" पुत्र से पूछे जाने पर उसने उत्तर में पिता से कहा : “रात्रि में सदैव धर्मोपदेश देने के क्रम में आपकी पुत्रवधू ने मुझे बताया कि यह संसार असार है। भोग-विलास का परिणाम दुःखदायी है । वरसाती नदी के प्रवाह के समान यौवनावस्था से युक्त देह की क्षणभंगुरता से उत्पन्न होनेवाले दुःखों से व्याप्त इस संसार में एकमात्र धर्म ही सहायक होता है। ऐसा उपदेश दिये जाने पर मैं सर्वज्ञ-धर्म का अनुरागी हो गया हूँ। इसमें मुझे पाँच वर्ष हो गये, इसीलिए आपकी बहू ने मेरी उम्र जो पाँच वर्ष की बताई है; वह सत्य है।" इस प्रकार, कुटुम्ब की धर्मप्राप्ति-सम्बन्धी वार्ता तथा विदुषी पुत्रवधू के यथार्थ वचनों को सुनकर वह लक्ष्मीदास प्रतिवुद्ध हो गया और वृद्धावस्था में भी 'धर्म- आराधनापूर्वक घर-परिवार के अन्य लोगों के साथ धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगा। शिक्षाएँ : जीवन में धार्मिक एवं नैतिक जीवन ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सभी सम्प्रदायों के साधक-तपस्वियों ने उच्च स्वर से यह उद्घोष किया है कि ( ७० यदि जीवन में सत्य, करुणा, अहिंसा, सन्तोष, दान, उदारता आदि की प्रवृत्ति नहीं आई, तो मनुष्य-योनि में जन्म लेना ही व्यर्थ है। धर्महीन मनुष्य एवं पशु में कोई अन्तर नहीं होता। धर्म दिखावा-मात्र नहीं है। वह आत्मा के गुणों के विकास का सर्वोच्च साधन है। धार्मिक जीवन से न केवल परिवार एवं समाज, अपितु राष्ट्र भी नैतिक बल प्राप्त कर अपना विकास कर • सकता है। धार्मिक जीवन से व्यक्ति दूसरों का विश्वास आसानी से प्राप्त कर सकता है । आज संसार में इसी भावना के लुप्त हो जाने के कारण जनजीवन में विविध प्रकार की विषमताएं आ रही हैं, इसीलिए प्रत्येक प्राणी आंज निराश, उदास एवं दु:खी है। लेखक ने इसी भावना को व्यक्त करने के लिए इस पाठ को लिखा है तथा इस पाठ के सभी पात्रों को विविध परिस्थितियों में रखकर धार्मिक-अधार्मिक जीवन का तुलनात्मक चित्रण किया है और प्रत्येक मानव को धार्मिक जीवन व्यतीत करने की शिक्षा प्रदान की है। - कठिन शब्दों के अर्थ सेट्ठी=सेठ कम्मि नयरे=किसी नगर में पाणिग्गहणं = पाणिग्रहण लच्छीदासो लक्ष्मीदास कारावियं करा दिया अट्ठवासा =आठ वर्ष का वरीवट्टइ = रहता था साहुणीसगासाओ=साध्वी के निकट वहुधणसंपत्तीए बहुत धन-सम्पत्ति से सम्मत्तं = सम्यक्त्व, सत्य तत्त्व पर श्रद्धा गविट्ठो= गर्विष्ठ, अहंकारी गहीयाई = ग्रहण कर लिये आसि=था संजाआ=हो गया लग्गो-लगा हुआ ससुराइंससुर आदि को एयारिसो=ऐसा विमुहं =विमुख पिउणा=पिता से वहुदुहं =बहुत दुःख धम्मदासस्स =धर्मदास का भोगविलासेसु=भोग-विलास में सीलवईए=शीलवती का कयावि-कदापि, कभी युवावस्था में उत्तं = कहा 3- .4 ( ७१ ) जोवणे जोव्वणत्थो-युवावस्था में स्थित धम्मिअ-धार्मिक गहीयवयं व्रतः ग्रहण करके : जहत्यनामाए यथार्थ नामवाली संतं दंतं-शान्त-दान्त कन्नाए- कन्या का एएण= इसने पुत्तस्स-पुत्र का नाऊण-जानकर जया जब पिउपेरणाए-पिता की प्रेरणा से मच्चू-मृत्यु सवण्णधम्मसवणेण = सर्वज्ञ-धर्म के मुणिणा= मुनि से द्वारा श्रवण से वारसंवासं-बारह वर्ष अणुव्वयाई अणुव्रत आदि को अंतट्ठिएण= भीतर बैठे हुए निउण-निपुण कोहाउलो-क्रोध से व्याकुल आगया=आई पत्ती-पत्नी धम्माओ=धर्म से असम्भवयणाः= असभ्य वचन बोलनेवाली देवगुरुविमुहाण = देवगुरु से विमुख निव्वाहो= निर्वाह : असारो=सारहीन होज्जा हो जाय देहोवि देह भी भवेज्जा-हो जाय च्चिय=निश्चय वियारेइ-विचार करती है जीवाणमाहरु-जीवों का आधार लच्छी-लक्ष्मी नियभत्ता=अपना पति विणस्सरो= विनश्वर सासूमवि =सास को भी परलोगपवन-परलोक को प्राप्त वोहेइ =समझाया; समझाता है उपएसदाणेण= उपदेश देने से समणगुणगणालंकिओ-श्रमण-गुणसमूह कओ-किया से अलंकृत कालंतरे=कुछ समय बाद नाणी-ज्ञानी पडिवोहिउंप्रतिवोधित करने के लिए भिक्खत्थंभिक्षा के लिए. महव्वई=महाव्रती घरंभि-घर में दळूण = देखकर : %33D ( ७२ ) नारीण-नारियों के इमीए-इस एरिसीए ऐसी पेरिज्जमाणाविप्रेरित किये जाने पर भी % 3D महादुल्लहं=महादुर्लभ हिययगयभावं= हृदय के भाव को साहुणा-साधु द्वारा समयनाण=समय-ज्ञान होस्सइ-होगा पुच्छाभावं पूछने का भाव छम्मासा-छह मास लद्धभिक्खे-भिक्षा प्राप्त कर कहणत्यं = कहने के लिए दुरायारा-दुराचारिणी माउपिउणो-माता-पिता से अवमाणं- अपमान असच्वमुत्तरं-असत्य उत्तर सावमाणं = अपमान-सहित मुणी=मुनि, साधु . वट्टा-वार्ता मुहाओ= मुख से संसारासारदसणेण = संसार की असारता दिखाने से परिणामदुहदाइत्तणेण = परिणाम में दुःखदायी होने से कहिहिइ = कहेगी भिक्खत्थं =भिक्षा के लिए वियारेइ-विचार करती है वालाए-वालिका ने अईवकुसला अतीव कुशल जहत्थो यथार्थ नजइजाना जाता है किमेवं = क्या ऐसा है ? माणवभवो-मानव-जन्म सद्धम्मकिच्चेहि =सद्धर्म के कार्यों से मणुसभवोमनुष्य-भव. चिय-निश्चय सेट्ठिणा=सेठ द्वारा मरणपसंगे -मरण के प्रसंग में विविहगुणदोसवट्टा=विविध गुण-दोपों की बात मज्झे मध्य में, बीच में %D पुच्छिज्जउ= पूछे भावा भाव गच्चा-जाकर वृत्तं- कहा अपत्तो-अप्राप्त सहलो सफल निष्फलो=निष्फल उप्पत्ती- उत्पत्ति पुट्ठा-पूछा थीणं-स्त्रियों के (सम्बन्ध में) वुड्ढाए-वृद्धा ने -
( ७३ )
निभगा=अभागिन
जयम्मि-संसार में
भत्तिवच्छलाए भक्तिवत्सला द्वारा उवदिट्ठो= उपदिष्ट
बहुगुणरंजिआअनेक गुणों से प्रकाशित कुडुवस्स = कुटुम्ब का
समयधम्मोवएसपराए =ज्ञान और धर्म के सोऊण सुनकर
उपदेश में तत्पर पडिबुद्धा=प्रतिवुद्ध, ज्ञानप्राप्त
भोगविलासाणं-भोग-विलासों का सग्गई =स्वर्ग-गति (स्वर्गति) को
देहस्स-देह का
सारु-सार
खणभंगुरत्तणेण =क्षणभंगुरता से सव्वण्णुधम्माराहगो=सर्वज्ञ-धर्म का
आराहिम-आराधना कर
सपरिवारो-परिवार के साथ जहत्थवयणं यथार्थ वचन
वासाणईपुरतुल्लजुव्वणत्तणेण =वरसाती वुड्ढत्तणे =वृद्धावस्था में
नदी की बाढ़ के समान युवावस्था से पत्तोप्राप्त किया
आराधक
-
गृहकार्य के लिए अभ्यासार्थ प्रश्न
१. विदुषी पुत्रवधू के कथानक से मिलनेवाली शिक्षाओं पर प्रकाश डालिए ।
२. “विदुषी पुत्रवधू-कथा की नायिका का चरित्र नारी-समाज के उत्थान
के लिए एक अनुकरणीय आदर्श है।" इस कथन की समीक्षा कीजिए।
३. प्रस्तुत कथा की नायिका के किन्हीं ऐसे दो मार्मिक प्रसंगों पर प्रकाश
डालिए, जिनमें उसकी चतुराई, धैर्य एवं सहनशीलता की झलक आपको
दिखाई पड़ती हो।
४. निम्नांकित शब्दों के हिन्दी-रूप प्रस्तुत कीजिए :
विउसी, सेट्ठी, धम्मिअस्स, अणुव्वय, लच्छी, एगो, एएण, नाऊण,
समओ, तुळं, पंचवासा, छम्मासा, पुट्ठः, सुआ, कुत्थ, वियारेइ, कया,
उत्तं, सोऊण, उवदिट्ठो।
( ७४ ) ४. कस्सेसा भज्जा (यह किसकी पत्नी) कथावस्तु : हस्तिनापुर में शूर नामक राजपुत्र के सुमति नाम की एक सुन्दरी कन्या थी। जब वह विवाह के योग्य हुई, तव उसके पिता, भाई, मामा और माता ने चार विभिन्न राजकुमारों के साथ उसका विवाह सम्वन्ध एक ही तिथि को निश्चित कर दिया। विवाह की नियत तिथि पर वे चारों राजकुमार वरात सजाकर उस नगर में आए । अव माता-पिता के सामने बहुत विकट समस्या उपस्थित हो गई कि इस कन्या का विवाह किस राजकुमार के साथ किया जाय। वे चारों ही राजकुमार अपना-अपना अधिकार जताते हुए युद्ध करने को धमकी देने लगे। जब कन्या को यह पता लगा कि उसके कारण ही भयानक युद्ध होने- वाला है, तब वह लकड़ियों की चिता बनाकर उसमें प्रविष्ट हो गई और देखते-देखते ही चिता की लपटों ने उसे भस्म कर दिया। वे चारों राजकुमार सोचने लगे कि अव क्या किया जाय । एक राजकुमार तो इस दृश्य से इतना दु:खी हो गया कि वह स्वयं ही उस चिता में कूदकर जल मरा । दूसरा राजकुमार कन्या के भस्म को समीपवर्ती नदी में प्रवाहित करने के लिए चला गया और तीसरा राजकुमार उसके विरह से व्यथित होकर परदेश जाने को तैयार हो गया एवं चौथा राजकुमार वहीं रुककर उस चिता की रखवाली करने लगा। जो राजकुमार परदेश चला गया था; वह घूमता-घामता एक नगर में पहुँचा और वहाँ एक गृहस्थ का अतिथि बन गया। सन्ध्या के समय उस गृहस्थ के घर जब वह भोजन कर रहा था, तभी उस (गृहस्थ) का छोटा बच्चा रोता-कलपता वहाँ आया। उसके करुण क्रन्दन से रुष्ट होकर उस गृहस्थ की ( ७५ ) - पत्नी ने उसे जलते हुए चूल्हे में झोंक दिया। परिणाम स्वरूप, वह लड़का जलकर भस्म हो गया । गृहस्थ-पत्नी के इस क्रूरतापूर्ण कार्य को देखकर उस अतिथि राजकुमार को वड़ा दुःखः हुआ। उसे उस महिला के प्रति इतनी घृणा उत्पन्न हुई कि वह अधूरा भोजन छोड़कर ही वहाँ से भागने लगा। उसे भूखा उठते देख उस गृहस्थ-पत्नी ने उससे कहा : "हे अतिथिदेव, आप भूखे मत जाइए। आप मुझे निर्दयं न समझिए, सन्तान किसे नहीं प्रिय है। आप जानते ही होंगे कि सन्तान- प्राप्ति के लिए माता-पिता कितने लालायित रहते हैं । अतः, मैं ऐसी दुर्लभ वस्तु को यों ही नहीं जला सकती हूँ। भोजन करने के पश्चात् मैं इस. वालक को अवश्य ही जीवित कर लूंगी।' जव सभी लोग भोजन कर निश्चिन्त हो गये, तब उस गृहस्थ-पत्नी ने अपने पास सुरक्षित अमृत-कलश से कुछ अमृत लिया तथा उसे चूल्हे में छिड़ककर उस मृत वालक को जीवित कर दिया। आश्चर्यचकित और देनेवाले इस कार्य को देखकर वह राजकुमार सोचने लगा कि इस अमृत-कलशं से यदि मुझे भी थोड़ा-सा अमृत मिल जाय, तो मैं भी उस राजकुमारी को (जो कि चिता में जलकर भस्म हो गई है) जीवित कर लू ।' अतः, किसी युक्ति से रात्रि में अमृत-कलश चुराकर वह राजकुमार वहाँ से भागा और हस्तिनापुर आया । वहाँ उसने राजकुमारी की चिता पर अमृत छिड़ककर उस कन्या को जीवित कर दिया। उसी समय उस कन्या के साथ भस्म हुआ वह राजकुमार भी जीवित हो उठा। संयोग से तीनों राजकुमार पुनः वहाँ एकत्र हो गये। जो राजकुमार गंगा में भस्म प्रवाहित करने के लिए गया हुआ था, वह भी लौटकर वहाँ आ गया। इस प्रकार, उन चारों राजकुमारों में उस कन्या के साथ विवाह करने के लिए पुनः विवाद होने लगा। किन्तु, उन चारों राजकुमारों ने विचार किया कि आपस में लड़ने की अपेक्षा राजा के यहाँ जाकर इस विवाद का निर्णय करा लेना ही उचित है। अतः, वे सभी राजदरवार में गये ।
( ७६ ) उन्होंने अपनी-अपनी बात राजा के समक्ष प्रस्तुत की। इस पेचीदे मुकद्दमे को सुनकर न्यायी राजा ने अपने प्रधान मंत्री से इस मुकद्दमे का निर्णय करने को कहा। बहुत सोच-विचार के पश्चात् मन्त्री ने निर्णय किया कि “जिसने अमृत छिड़ककर इस कन्या को जीवित किया है, वह जीवन-दान देने के कारण इस कन्या का पिता हुआ। अतः, पिता के साथ कन्या का विवाह कैसे हो सकता है ?" "जो राजकुमार अमृत डालते ही राजकुमारी के साथ जीवित हुआ है, वह साथ जन्म लेने के कारण इस कन्या का सहोदर भाई हुआ। अतः, सहोदर भाई के साथ इस कन्या का विवाह कैसे किया जा सकता है ?" "जिसने इस कन्या का भस्म गंगा में प्रवाहित किया है, वह व्यक्ति पुत्र का कार्य करने से इस कन्या का पुत्र कहलाया। अतएव, पुत्र के साथ भी इस कन्या का विवाह नहीं हो सकता।" "ऐसी स्थिति में विवाह का एकमात्र अधिकारी वही राजकुमार है, जो घूम-घूमकर चिता की रखवाली करता रहा है।" मन्त्री के इस निष्पक्ष निर्णय को सुनकर सभी राजकुमार एवं अन्य उपस्थित लोग बड़े प्रसन्न हुए और उस कन्या का विवाह सर्वसम्मत निर्णय के अनुसार उक्त चौथे. राजकुमार (कुरुचन्द्र) के साथ कर दिया गया । कहानी-कला की दृष्टि से समीक्षा : कहानी-कला की दृष्टि से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि इस कहानी के पात्र पारम्परिक ही हैं। आज की कहानी जहाँ सामान्य जनजीवन का चित्रण करती है, वहाँ प्रस्तुत कहानी को हम. प्राचीन पद्धति पर लिखी गई एक पौराणिक कथा कह सकते हैं। किसी भी कहानी में प्रधानतया तीन तत्त्वों की अवस्थिति मानी गई है : १. कौतूहल-वृत्ति, २. कथानक और ३. चरित्र-चित्रण। .
( ७७ कौतूहल-वृत्ति की दृष्टि से यह कथा अपने-आप में अद्भुत है। कहानी आरम्भ होते ही पाठक के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि उस सुन्दरी राजकुमारी का विवाह किसके साथ होगा। क्या ये चारों राजकुमार आपस में लड़कर मर जायेंगे? इस प्रकार कौतूहल-वृत्ति की दृष्टि से यह कथा पर्याप्त मनोरंजक है। मंत्री के निर्णय को सुनने के लिए राजकुमारों के समान पाठक भी उत्सुक रहते हैं। प्रस्तुत कहानी का कथानक भी अद्भुत एवं प्रशंसनीय है। कथा का क्रम एक प्रवाह में बँधा हुआ चलता है। इस कथा को हम चार भागों में. विभक्त कर सकते हैं : १.: राजकुमारी का विवाह । २. राजकुमारी का चिता में जलः मरना, उसके साथ एक राजकुमार का भी जल मरना और अन्य तीन राजकुमारों का उसके वियोग में बिसूरना और भटकना। ३. परदेश में भटकनेवाले राजकुमार का किसी नगर में पहँचकर एक गृहस्थ के यहाँ अतिथि बनना और वहाँ से अमृत-कलश चुराकर उससे राजकुमारी को जीवित करना। ४. राजकुमारी का जले हुए राजकुमार के साथ जीवित होना और मन्त्री के निर्णय के अनुसार राजकुमारी का विवाह चिता की रखवाली करनेवाले राजकुमार (कुरुचन्द्र) के साथ होना। प्रथम खण्ड का कथानक पाठकों को आनन्द से दुःख की ओर ले जाता है, दूसरे खण्ड का कथानक सीधी रेखा के समान चलता है, तीसरे खण्ड में कथानक साँप की गति से चलता है, और चौथे खण्ड का कथानक मन्त्री की बुद्धि के चमत्कार पर प्रकाश डालता है, जो यथार्थतः इस कहानी की प्राणवन्त परिणति है। म ( ७८ चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह कथा अत्यन्त रोचक है । इसमें तीन ही ऐसे पात्र हैं, जिनके चरित्र की झाँकी यहाँ मिलती है। सर्वप्रथम सुमति नामकी राजकुमारी का चरित्र आता है । राजकुमारी में त्याग-गुण सर्वाधिक है । वह दूसरों की सुरक्षा के लिए अपने प्राण भी न्यौछावर कर देती है। दूसरा चरित्र उस राजकुमार का है, जो भ्रमण करता हुआ गृहस्थ का अतिथि वनता है तथा वहाँ से अमृत-कलश चुराकर उससे राजकुमारी को जीवित करता है। यह कार्य धूर्ततापूर्ण होते हुए भी उसके साहस, शौर्य एवं धैर्य का प्रतीक है । इस राजकुमार के चरित्र में तीन बातें प्रमुख हैं : १. प्रेम के लिए सर्वस्व-त्याग । २. दया, जो कि मानवता की जननी है, इसमें वर्तमान है। वह गृहस्थ के पुन को जलता हुआ देखकर दुःखी होता है और खाना छोड़कर वहां से भाग जाना चाहता है। ३. यह राजकुमार न्याय में विश्वास करता है। राजसभा में उसके मन के विपरीत फैसला होने पर भी वह उसे सिर झुकाकर मान लेता है। इसके बाद उस महामन्त्री का चरित्न आता है, जो अपनी बुद्धि के चमत्कार से सभी को आश्चर्य में डाल देता है। राजमन्त्री का चरित्र निप्पक्ष न्याय के लिए प्रसिद्ध है । यदि इस मन्त्री से जरा-सी भी भूल हो जाती, तो उन चारों, राजकुमारों का आपस में लड़ मरना सुनिश्चित था। अतः, वृहस्पति के समान मन्त्री का ज्ञानोज्ज्वल चरित्न भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं। यह चरित्र भी कहानी के पाठक को अपनी ओर आकृष्ट करने की पूर्ण क्षमता " रखता है। इस प्रकार, इस कहानी में हमें पौराणिकता के साथ-साथ कहानी के यथोक्त तत्त्व भी मिल जाते हैं। आज से हजारों वर्ष पूर्व लिखी जाने के बावजूद इस कथा में जीवन को आन्दोलित करने की पूर्ण क्षमता और प्रासंगिकता विद्यमान है।
(७९) कठिन शब्दों के अर्थ धूया =पुत्री हत्थिणाउरे हस्तिनापुर में सुमइनामा=सुमति नाम की सूरनामा= शूर नाम का रायपुत्तो=राजपुत्र, राजकुमार जणयजणणी= जनक-जननी वसई निवास करता था भाया-माउलेहि =भाई और मामा द्वार- 'भारिया-पत्नी दिन्ना=दे दी गई गंगाभिहाणा = गंगा नाम की एगम्मि दिणे = एक ही दिन में “परमसोहग्गसारा=श्रेष्ठ सौभाग्य की आगया = मा गये सारभूता कलहं = कलह तेसिं= उनकी तओ तव, कम्मपरिणामवसओ=कर्मों के फल के संगामे = संग्राम में कारण जायमाणे हो जाने पर पुढो= पृथक्, अलग. दळूण देखकर वराणं-वरों को अग्गिम्मि-अग्नि में 'चउरो-चारों सम-साथ परिणेउं =परिणय करने के लिए एगो-एक परोप्परंपरस्पर अट्ठीणि हड्डियों को. कुगन्ति करते है गंगप्पवाहे= गंगा के प्रवाह में विसमे विपम (स्थिति में) .: गओ= गया बहुजणक्खयं = वहुत सारे लोगों का क्षय तत्थेव= वहीं पर पविट्ठा प्रवेश कर गई तदुक्खेणं = उसके दुःख से निविडणेहेण = प्रगाढ स्नेह के कारण महीयले = पृथ्वी पर हिंडइ= भटकने लगा नाणागुणरयणसंजुत्तो नाना प्रकार के रक्खन्तो=रक्षा करता हुआ गुणरूपी रत्नों से युक्तं एगमन्नपिंडं अन्न के एक पिण्ड को सीलाइगुणालंकिया=शील आदिः गुणों अह-इसके वाद .' से अलंकृत महीयलं पृथ्वीतल पर से वरो-वर ( ८० .. कत्थवि =किसी घरसामिणी = गृहस्वामिनी रंधणघरम्मि = रसोईघर में तया- उसी समय जिमिउंजीमने, खाने के लिए रोइइरोने लगा परिवेसइ परोसती है गयाए :- गई हुई लहुपुत्तो=छोटा पुत्र खिविओ-फेंक दिया रोसपरव्वसं = रोष के अधीन भण-वोली जलणम्मि-अग्नि में होन्ति होते हैं लग्गो लगा पिउणो-माता-पिता अवच्चरूवाणि= वच्चे जीवइस्सामि-जीवित कर लूंगी कए लिए विहिऊण करके अणेगदेवयापूआदाणमंतजवाई अनेक सिरपं- शीघ्र देवों की पूजा, दान, मन्त्रजप आदि नियघरमज्झाओ अपने घर के भीतर से अमयरस-कुप्पयं =अमृतरस का घड़ा आणिऊणले आकर खिविउं-डालने के लिए जलणम्मि=अग्नि में चिआरक्ख-चिता की राख कओ-किया जलपूरे -जल के प्रवाह में जणणीए=माता ने मोहमहागह = मोहरूपी महाग्रह नीओले लिया ठाणं-स्थान को अच्छरिअं= आश्चर्य पइदिणं-प्रतिदिन जीविओ-जीवित मुअन्तो-छोड़ता हुआ गमेइ = व्यतीत करने लगा तइओ तीसरा हवइ हो जाय कन्न -कन्या को गामे-गाँव में धुत्तत्तेण= धूर्तता से कराविऊण-कराकर काऊण करके, बनाकर जा-यदि अमयरसो-अमृतरस भमन्तो-घूमता हुआ . ( ८१ . ) भाग्य से मयरसकूवयं =अमृतरस का घड़ा गिव्हिळण =लेकर, चुराकर पागओं =आया जणयादिसमक्खं-पिता आदि के समक्ष चआमज्झे-चिता में सालंकारा=आभूषण-सहित कुक्को-छिड़का, छोड़ा उडिया = उठी जीवंती जीवित होकर कन्नापाणिग्गहणत्थं = कन्या के साथ कम्मवसओ पाणिग्रहण के लिए विवायं-विवाद कहिलं -कहा अन्नोन्नं परस्पर भंजिऊण-सुलझाकर बालचंदरायमन्दिरे-बालचन्द्र नामक मंतिणो मन्त्रिगण राजा के दरवार में केणावि-किसी से भी पमाणीकायव्वो-प्रमाणित कीजिए आसन्ने-समीप भज्जइ-सुलझा, सुलझ पाया मूढ़े = किंकर्तव्यविमूढ रणरंगे =रण, युद्ध तहेव तथैव, उसी प्रकार : विरलोविरला, दुर्लभ छडुक्खेवो= छिड़काव जइ मन्नह यदि मानो तो हसंतो-हँसता हुआ. . रायहंसराजहंस उच्छंगे = गोद में गुणदोसपरिक्खं गुण-दोषों की झायइ विचार किया परीक्षा को एवंविहजलणजलिओ-इस प्रकारअग्नि वायं =वाणी, वचन में जला हुआ सहजीविओ=साथ में जीवित एगजम्मट्ठाणेण= एक साथ जन्म लेने मह - मुझे, मेरे पास के कारण अहमवि= मैं भी खिविउं=डालने के लिए जीवावेमि =जीवित कर लूंगा विवाए -विवाद में कूडवेसं = कपटवेश कुरुचंदाभिहाणेण=कुरुचन्द्र नामक रयणीएरात्रि में राजकुमार के साथ दुभिक्ले = दुर्भिक्ष में जोइज्जइ देखा जाय, जोहा जाय मंते-सलाह एसो-यह ( २ ). जंपियं = कहा मंतिणा=मन्त्री ने भाया = (सहोदर) भाई अट्ठीणि= हड्डियाँ व्व = (के) समान पच्छापुण्णकरणेण =श्राद्ध-पुण्य करने से पक्खवायरहियो= पक्षपातरहित भग्गे सुलझने पर जम्महेउत्तणेण= जन्म देने के कारण परिणीआ = विवाह दी गई कुछ महत्त्वपूर्ण शब्दों पर व्याकरणबोधक टिप्पणियां तीए (तस्याः-तत् शब्द से स्त्रीलिंग में षष्ठी के एकवचन में यह रूप वनता है । तत् के स्थान पर प्राकृत में ती आदेश होता है और षष्ठी के एक- वचन में ए प्रत्यय जोड़ देने से 'तीए' रूप वना है। संजाओ<संजात:-तकार का प्राकृत में लोप होने से अकार शेष रहा है और विसर्ग के स्थान पर ओत्व हो गया है। अतः, 'संजाओ' रूप वना है। दिण्णं <दत्तम्- प्राकृत में, संस्कृत के 'दत्तम्' के स्थान पर 'दिण्ण' आदेश होता है। मच्चु <मृत्युं—प्राकृत में संस्कृत ऋ के स्थान पर अकार आदेश होता है और 'त्यु' के स्थान पर ‘च्चु' । अतः; द्वितीया एकवचन में 'मच्चु रूप वना है । सोच्चा <श्रुत्वा-संयुक्त रेफ का लोप, तालव्य श के स्थान पर दन्त्य स और उकार का ओत्व तथा त्व के स्थान पर च्च आदेश होने से 'सोच्चा' रूप वना है। गंतूण <गत्वा--संस्कृत में पूर्वकालिक क्रिया को बताने के लिए 'त्वा' कृत्-प्रत्यय होता है, पर प्राकृत में इसके स्थान पर 'तूण' प्रत्यय होता है । अतः, गम्' धातु में 'तूण' प्रत्यय लगने से 'गंतूण' यह पूर्वकालिक रूप बना है। " हत्थिणाउरे <हस्तिनापुरे---संस्कृत के स्त के स्थान पर प्राकृत में त्य आदेश होता है। यहाँ न के स्थान पर णत्व तथा पकार का लोप होने से पुरे का 'उरे' :रूप वना है । अतः, हस्तिनापुरे का 'हत्थिणाउरे' रूप हो गया है।
. ( ८३ ) भारिया <भार्या--स्वरभक्ति या विश्लेपण के नियमानुसार प्राकृत में संयुक्त व्यंजन पृथक् हो जाते हैं और बीच में स्वर का आगम होता है। अतः, यहाँ र और या पृथक् हो गये हैं और इ का आगम होने से 'भारिया' रूप बना है। हिंडइ <हिण्ड् धातु से प्रथमपुरुप एकवचन में इ प्रत्यय जोड़ने से हिंडइ रूप बनता है। परोप्परं<परस्परम्-द्वितीय वर्ण रकार के उत्तरवर्ती अकार के स्थान पर ओत्व तथा संयुक्त सकार का लोप और प को द्वित्व करने से 'परोप्परं' रूप बना है। ठूण < दृष्ट्वा-दृश् धातु के स्थान पर 'द?' आदेश तथा पूर्वकालिक क्रिया का अर्थ वताने के लिए 'त्वा' कृत्-प्रत्यय की जगह 'ऊण' होने से 'दळूण' रूपवना है। खिविउं <क्षिप्तुम्-क्षिप् धातु के क्ष के स्थान पर ख और प को व आदेश तथा इकार का आगम और तुम् प्रत्यय के त का लोप होने से 'खिविउं' रूप वना है। अवच्च <अपत्य-प्राकृत में प के स्थान पर व और त्य को च्च हुआ है; अतः अपत्य का 'अवच्च' रूप बना है। जेसि <येषाम्-प्राकृत में; संस्कृत के यत् शब्द के स्थान पर ज आदेश होता है और अकार को एत्व तथा सि' प्रत्यय 'जुड़ने से षष्ठी बहुवचन में 'जेसि' रूप वना है। पच्छा <पश्चात्-प्राकृत में अन्त्य हलन्त व्यंजन नहीं रहता, उसका लोप हो जाता है। अतः, त का लोप होने से 'पश्चा' शेष रहा है। इस स्थिति में 'श्च' के स्थान पर 'च्छ' करने से ‘पच्छा' रूप वना है। अच्छरिअं <आश्चर्यम्-आकार का अ और श्च के स्थान पर च्छ, र और य का पृथक् विश्लेपणं तथा इ स्वर का आगम होने से अच्छरिअं” रूप वना है। लहिऊण <लब्ध्वा-लभ के स्थान पर लह, तथा इत्व और ऊण- तूण प्रत्यय जोड़ने से 'लहिऊण' रूप वना है।
( ८४ ) पमाणोकायचो <प्रमाणीकर्तव्यः'प्र' का 'प' संयुक्त रेफ और मध्यवर्ती त का लोप, म शेप और उसकी यश्रुति, पूर्वस्वर का दीर्घ तथा 'प्य' का 'स्व' होने से 'पमाणीकायवो' रूप वना है । पुच्छइ <पृच्छति-संस्कृत की ऋकार ध्वनि प्राकृत में उकार में बदल गई है तथा तकार का लोप हो जाने से इ स्वर शेष रह गया है। अतः, 'पृच्छति' संस्कृत शब्द से 'पुच्छई' प्राकृत में बना है। तेसि <तयोः, तेषाम्-प्राकृत में द्विवचन नहीं होता, अतः द्विवचन के स्थान में बहुवचन हो जाता है । पष्ठी विभक्ति बहुवचन में तत् शब्द के अन्त्य हलन्त्य व्यंजन त् का लोप हो गया है और पूर्व त के अ स्वर का एत्व तथा बहुवचन का 'सिं' प्रत्यय जुड़ जाने से 'तेसि' रूप बना है। धूया <दुहिता-हैमव्याकरण के सूत्र 'दुहित-भगिन्योधूआ-बहिण्यो' (८।२।१२६) से 'दुहितृ' के स्थान में विकल्प से 'धूमआ' आदेश होता है। मा स्वर के स्थान पर यश्रुति होने से 'धूया' बना है। गृहकार्य के लिए अभ्यास-प्रश्न १. प्रस्तुत पाठ की कथावस्तु अपनी भाषा-शैली में प्रस्तुत करें। २. प्रस्तुत कथा से मिलनेवाली शिक्षाओं पर प्रकाश डालें। ३. प्रस्तुत कथा के विकास में किस वर का योगदान महत्वपूर्ण है ? सोदाहरण सिद्ध करें। ४. चारों वरों के पारस्परिक विवाद को किसने शान्त किया और कैसे ? अपनी भापा में लिखें। ५. निम्नांकित शब्दों के हिन्दी-रूप लिखें (इन शब्दों के अर्थों को कठिन शब्दों के अर्यों में खोजें): रायपुत्तो, आणिऊण, धूया, उच्छंगे, पुढो-पुढो, कूडवेसं, परोप्परं, मुक्को, अट्ठीणि, परिवेसइ, पिया, लहुपुत्तो, भाया, जलणम्मि, गओ, अमयरसकुप्पयं, ठाणं।
(. ८५ ) ५. ससुरगेहवासीणं चउजामायराणं कहा (ससुर के घर में रहनेवाले चार दामादों की कथा) .. .. - कथासंक्षेप : किसी ग्राम में एक राजपुरोहित निवास करता था। उसके एक पुत्र था और पाँच कन्याएँ थीं। उनमें चार कन्याओं का विवाह उसने योग्य ब्राह्मणपुत्रों के साथ कर दिया था और पाँचवीं कन्या का विवाह भी उसने शुभ मुहूर्त में आयोजित किया । उस विवाह में उसने अपने चारों दामादों को निमन्त्रित किया। विवाह की समाप्ति पर सभी रिश्तेदार तो चले गये, किन्तु वे चारों ही दामाद खाने-पीने के लालच में वहीं रह गये । यह देखकर पुरोहित ने अपने मन में विचार किया कि "ये दामाद अपनी सास के अत्यन्त प्रिय हैं, अतः ये अभी पाँच-छह दिन और रुक सकते हैं, वाद में चले जायेंगे।" किन्तु, खाद्यरस के लालची वे दामाद नहीं गये और परस्पर विचार करने लगे : “मनुष्यों के लिए ससुराल का निवास स्वर्ग के समान सुखदायी होता है।" निश्चय ही, यह सूक्ति सत्य है। इस प्रकार विचार कर उन्होंने उस सूक्ति को दीवार पर लिख दिया । अन्य किसी एक दिन उस सूक्ति को पढ़कर उनके ससुर ने सोचा : “हमारे ये दामाद मधुर खाद्यरस के लोभी हैं, ये कभी नहीं जायेंगे, अतः इनको सावधान करना चाहिए। इसी विचार से उसने सूक्ति के नीचे तीन चरण (पंक्ति) और लिख दिये "यदि विवेकी जन पाँच-छह दिन ही रहे। दही, घी एवं गुड़ का लोभी व्यक्ति यदि एकाध महीना रह जाय, तो वह निर्लज्ज मनुष्य गदहे के समान मानहीन हो जाता है। चारों दामादों ने यद्यपि उन तीनों पंक्तियों को पढ़ लिया, तथापि खाने- पीने के लालची होने के कारण उनकी इच्छा जाने की नहीं हुई। यह देखकर उनके ससुर ने सोचा : "इन लोगों को घर से कैसे निकाला जाय ? क्योंकि :
( ८६ ) स्वादिष्ट भोजन में रमे हुए ये निर्लज्ज गदहे के समान हैं, अत: इन्हें बुद्धिमानी से निकालना चाहिए।" उस पुरोहित ने अपनी पत्नी से पूछा : “इन दामादों को भोजन में क्या-क्या देती हो ?" यह सुनकर उसने उत्तर दिया : 'मैं अपने इन प्रिय दामादों को तीनों समय दही, घी एवं गुड़ से बने हुए मधुर पकवान निरन्तर परोसती रहती हूँ।' यह सुनकर पुरोहित ने कहा : आज से तुम इन दामादों के लिए बाजरे से बनी हुई मोटी रोटी पर घी लगा कर दिया करो।" अपने पति की आज्ञा को अनुल्लंघनीय समझकर उसने उन्हें भोजन में घी लगी हुई बाजरे की मोटी रोटी परोसना प्रारम्भ कर दिया। उसे देखकर मणिराम नाम के जेठे दामाद ने अपने मित्रों से कहा : "अब इस घर में रहना उचित नहीं; क्योंकि इससे अधिक स्वादिष्ट भोजन तो हमें अपने घर में ही मिलता है, अतः अव यहाँ से चला जाना ही अच्छा । अतः, मैं सवेरे ससुर से पूछकर चला जाऊँगा।' मणिराम का कथन सुनकर मित्रों ने कहा : 'अरे मित्र, मुफ्त का भोजन कहाँ मिलेगा? बाजरे की इन मोटी रोटियों को भी स्वादिष्ट मानकर खाते रहना चाहिए। क्या तुमने यह नहीं सुना कि इस संसार में दूसरों के यहाँ भोजन मिलना दुर्लभ है । यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो तुम चले जाओ, हमसे तो जवतक ससुर नहीं कहेंगे, तबतक नहीं जायेंगे।" इस प्रकार, मित्रों का कथन सुनकर मणिराम सवेरा होते ही ससुर के पास गया और अपने लिए शिक्षा माँगकर घर जाने की आज्ञा माँगी। ससुर ने उसे शिक्षा दी और आते-जाते रहने का आग्रह किया, फिर उसके साथ कुछ दूर जाकर उसे विदा किया। इस प्रकार, वाजरे की रोटी खिलाकर उसने मणिराम नाम के जेठे दामाद को निकाला। इसके पश्चात् ससुर ने अपनी पत्नी से कहा । “अब आज से तुम अपने दामादों को तिल के तेल से चुपड़ी रोटी खिलाया करो।" पत्नी ने भी भोजन के समय उन दामादों को तिल के तेल से चुपड़ी रोटी देना प्रारम्भ कर दिया । उसे देख कर माधव नाम के दामाद ने विचार किया : “ऐसा भोजन तो हमें ( ८७ .. घर में भी मिल जाता है, अतः अव यहाँ से चला जाना ही अच्छा।" उसने अपने मित्रों से कहा : "मैं कल घर चला जाऊँगा; क्योंकि अब यहाँ भोजन में तेल आ गया है ।" माधव. का कथन सुनकर उसके मित्रों ने कहा : “हमारी सास: बड़ी विदुषी है। उसने शीत ऋतु के कारण तिल का तेल खिलाना प्रारम्भ किया है, ताकि हमारी पाचन-शक्ति ठीक बनी रहे । अतः, हम तो यहीं रहेंगे।” तव माधव नाम का वह दामाद ससुर के पास गया और उनसे शिक्षा माँगते हुए जाने की आज्ञा चाही। ससुर ने उसे 'चला जा, चला जा' कहकर जाने की आज्ञा तो दे दी, किन्तु शिक्षा नहीं दी। इस प्रकार तिल का तेल खिलाकर उसने माधव नाम के दूसरे दामाद को भी भगा दिया। तीसरा और चौथा दामाद नहीं गया। इन्हें कैसे निकाला जाय, इस समस्या का समाधान खोजकर पुरोहित ने अपनी पत्नी से पूछा : “ये दामाद रात्रि में सोने के लिए कब आते हैं ?" तब उसकी पत्नी ने कहा : "कभी एक पहर रात वीत जाने पर आते हैं और कभी-कभी दो-तीन पहर रात बीत जाने पर।" तव पुरोहित ने कहा : “आज रात में तुम दरवाजा नहीं खोलना, मैं रात में जागंगा।" वे दोनों दामाद सन्ध्या के समय मनोरंजन के लिए गाँव में निकल गये और विविध क्रीड़ाएँ करते हुए तथा नाटक आदि देखते मध्यरात्रि में लौटे। घर के दरवाजे को बन्द देखकर वे उसे खोलने के लिए जोर-जोर से चिल्लाकर कहने लगे : “दरवाजा खोलो, दरवाजा खोलो।" दरवाजे के समीप ही वह पुरोहित जागता हुआ भी नहीं वोला। किन्तु, बार-बार आवाज देने पर उसने पूछा : “आधी रात के समय तक तुम कहाँ थे ? अभी दरवाजा नहीं खोलूंगा, जहाँ का दरवाजा खुला हो, वहीं चले जाओ।" यह कहकर वह मौन हो गया । तब वे दोनों ही दामाद समीप में स्थित एक घुड़साल में चले गये । वहाँ विस्तर के अभाव में वे ठण्ड लगने के कारण घोड़ों की पीठ पर डाले जानेवाले टाटों को ओढ़कर जमीन पर सो गये। यह देखकर विजयराम नाम के दामाद ने. सोचा : 'इस प्रकार अपमानित होकर ८८ ) यहाँ रहना उचित नहीं ।" तब उसने अपने मित्र से कहा : "हे मित्र, कहाँ तो हमें पहले सुखासन मिलता था और अब यहाँ जमीन पर सोना पड़ रहा है ! अतः, यहाँ से चला जाना ही अच्छा।" यह सुनकर उसके मित्र ने कहो : “इस प्रकार के दुःख में भी पराया अन्न खाने को कहाँ मिलेगा ? अतः, मैं तो यहीं रहूँगा, यदि तुम्हारे जाने की इच्छा हो, तो तुम चले जाओ।" तव वह सवेरे-सवेरे उठकर पुरोहित के समीप गया और उससे शिक्षा तथा जाने की आज्ञा माँगी । तव पुरोहित ने उसे तत्काल जाने की आज्ञा दे दी। इस प्रकार जमीन पर सुलाकर उसने विजयराम नाम के तीसरे दामाद को भी भगा दिया। अव केवल केशव नाम का चौथा दामाद वहाँ रह गया। वह जाना नहीं चाहता था, किन्तु पुरोहित ने उसे भी निकालने का उपाय सोच लिया। एक दिन उसने अपने पुत्र के कान में कुछ कहा और जब वह केशव नाम का दामाद भोजन करने के लिए बैठा, तभी पुरोहित का पुत्र भी उसके पास बैठ गया। वहाँ पुरोहित ने आकर पुन से पूछा : "पुत्र, यहाँ मैंने कुछ रुपये छोड़ दिये थे, वे किसने उठाये हैं ?" पुत्र ने कहा। "मैं नहीं जानता।" पुरोहित ने कहा : "तुम्हीं ने रुपये चुराये हैं । अरे झूठे, पापी, ढीठ, तू उन रुपयों को लौटा दे, नहीं तो मैं तुझे मारूंगा।" यह कहकर उसने जूता उठाकर पुत्र को मारना प्रारम्भ कर दिया । पुन भी मुट्ठी वाँधकर पिता के सामने आ गया। पिता-पुत्र को आपस में जूझते देखकर केशव उन दोनों के बीच में पहुंचा और 'मत लड़ो, मत लड़ो' इस प्रकार कहकर उन दोनों के बीच में खड़ा हो गया, तभी उस पुरोहित ने “हे दामाद, हे दामाद, हटो-हटो !' कहकर उसे जूते से पीटना प्रारम्भ कर दिया। पुत्र ने भी 'केशव, दूर हटो, दूर हटो !' इस प्रकार कहकर उसे चूंसे मारना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार, पिता-पुत्र दोनों ही केशव को पीटने लगे। उन दोनों की धक्का-मुक्की से पिटता हुआ वह केशव वहाँ से शीघ्र ही भाग गया। इस प्रकार, धक्का-मुक्की से पिटकर वह चौथा दामाद केशव पुरोहित से विना पूछे ही अपने घर चला गया।
( .८९ ) उस दिन वह पुरोहित राजसभा में कुछ विलम्ब से पहुँचा। तब राजा ने पूछा : "आज तुम इतने विलम्ब से क्यों आये हो ?" यह सुनकर पुरोहित ने कहा : “विवाहोत्सव में हमारे चार दामाद आये थे, खाने-पीने के लालची होने के कारण वे चिरकाल तक घर में रह गये। जाना नहीं चाहते थे, किन्तु उन सवको मैंने युक्तिपूर्वक निकाल वाहर किया। उन्हें मैंने इस प्रकार निकाला : बाजरे की रोटी खिलाकर मणिराम को, तिल का तेल खिलाकर माधव को, जमीन पर सुलाकर विजयराम को, और धक्का-मुक्की देकर केशव को।" इस प्रकार, पुरोहित ने समस्त वृत्तान्त राजा से कह सुनाया। राजा भी उसकी चतुराई से बड़ा सन्तुष्ट हुआ। . उपदेश : चारों दामादों के अपमान की घटना सुनकर यदि कोई दामाद अपना सम्मान चाहता है, तो उसे चाहिए कि वह लम्बे समय तक ससुराल में न रहे। कठिन शब्दों के अर्थ कत्य- कहीं, किसी भोयणलुद्धा भोजन के लोभी नरिंदस्स =राजा के विआरेइ-विचार करने लगा रज्जसंतिकारगो-राज्य.. में शान्ति खज्ज-खाद्य स्थापित करनेवाला रसलुद्धा= रस के लोभी पुरोहिओ-पुरोहित परुप्परंपरस्पर आसि-था, रहता था सग्गतुल्लो स्वर्ग के तुल्य कन्नगाओ- कन्याओं का नराणं-मनुष्यों के लिए पारद्धो-प्रारम्भ साउभोयणरया-स्वादिष्ट भोजन में जामाउणोजामाता आसक्त समागया-आये लिहिआ-लिखा/लिख दिया ___ ९० ) - . - कयावि = कदापि, कभी अणइक्कमणीम= अनुल्लंघनीय बोहियव्वा=समझाना चाहिए रोट्टगं = रोट, बड़ी रोटी सिलोगपायस्स =श्लोक के चरण का मुल्लं = मूल्य, कीमत हिट्ठमिनीचे अणुण्णं =आज्ञा, अनुज्ञा पायत्तिगं=तीन पाद, चरण सिया=है, हो छव्वा= अथवा छह पुणरवि= पुनरपि दहिषय = दधि-घृत गणिऊण = गिनकर, मानकर गुडलुद्धा=गुड़ के लोभी तिलतेल्लेण-तिल के तेल से मासमेगं =एक मास तक कल्ले =कल खरतुल्लो = गदहे के समान विउसी= विदुषी माणवो-मानव, मनुष्य ठास्सामो= रहेंगे माणहीणो=मान से रहित तुरंगमपिट्ठच्छाइ घोड़े की पीठ पर नेच्छंति = नहीं चाहते हैं डाला जानेवाला नीसारिअव्वा-निकालना चाहिए आवरणवत्थं -आवरण-वस्त्र खरसमाणा= गदहे के समान विजयरामेण =विजयराम ने माहवो = माधव नाम का दामाद तइअचउत्थ तीसरा एवं चौथा निक्कासणिज्जा= निकाल देना चाहिए जामायरा=जामाता अज्जयणाओ = आज से ही लढुवाओ = उपाय खोजकर वज्जकुडो-वज्रकूट, बाजरा सयणाय = सोने के लिए थूलो स्थूल, मोटी कयाइ-कभी, कदाचित् घयजुत्तो=घृतयुक्त दुतिपहरे-दो-तीन प्रहर देइदेती है दोणि =दोनों दायव्वो =देना चाहिए विविहकीलाओ= विविध क्रीड़ाएँ कुणता=करते हुए नट्टाई = नृत्य आदि पच्चूसे =सवेरे. पासंता=देखते हुए वसणं रहना आणा=आज्ञा ( ९१ ) गिहद्दारे घर के दरवाजे पर केसवो=केशव उच्चसरेण = उच्च स्वर से असच्चवाइ=असत्यवादी अक्कोसंति =चिल्लाते हुए मारइस्सं मारूंगा. तुरंगसालाए= घुड़साल में, अश्वशाला में उवाणहेण = उपानह से, जूते से आत्थरणाभावे विस्तर के अभाव में ताडिति == मारते हैं सिक्खं सीख, शिक्षा उवएसो= उपदेश अम्हकेरा हमारा चउक्कस्स =चारों का उयरग्गिदीवणेण=जठराग्नि के उद्दीपन से परान्न =पराया अन्न भूसज्जाए=भूमि-रूप विछावन पर वुत्तंतोवृत्तान्त पाव !=पापी! अईव =अतीव अवसरसु-हट, हट तुट्ठोसन्तुष्ट दूरीभव =दूर हट, सावमाणं = अपमानपूर्वक अकहिऊण=बिना कहे ही उइअं= उचित जाव-जबतक, तक भूलोट्टणं = भूमि में लोटना संवसे = रहना चाहिए वच्छ ! =वत्स ! . गृहकार्य के लिए अभ्यास-प्रश्न १. प्रस्तुत पाठ से मिलनेवाली शिक्षाओं पर प्रकाश डालें। २. लेखक ने स्वाभिमानी दामादों को ससुराल में अधिक-से-अधिक कितने दिनों तक रहने की सलाह दी है ? ३. चारों दामादों में आपकी दृष्टि में कौन-कौन से दामाद प्रशंसनीय हैं और क्यों? ४. पुरोहित ने अपने दामादों के प्रति जो व्यवहार किया, आप. उससे सहमत हैं अथवा असहमत ? अपने विचार व्यक्त करें।
( ९२ ) ५. “सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन की विपमता की दृष्टि से यह कथा यथार्थवादी एवं श्रेष्ठ है।" इस कथन की समीक्षा करें। ६. निम्नांकित प्राकृत-शब्दों के हिन्दी-रूप लिखें: पुरोहिओ, नियं, आसी, सएव, एगो, अस्थि, पुत्तो, निस्सारिओ, भोयणलुद्धा, गमिस्सं, सुत्ती, मित्ता, लिहिआ, रत्तीए, खज्जरसलुद्धा, नट्टाई, खरसमाणा, सयणत्थे, मोणेण, धक्कामुक्केण, निक्का सिआ। " ६. सिप्पिपुत्तस्स कहा (शिल्पी-पुत्र की कथा) पाठसंक्षेप : पिता द्वारा सिखाया गया पुत्र अपनी कलाओं में पारंगत हो जाता, यदि उसमें शीघ्र ही आत्मख्याति प्राप्त करने की प्रवृत्ति जागरित न होती। एतद्विषयक एक शिल्पकार की कथा इस प्रकार प्रस्तुत की गई है । अवन्ती नाम की नगरी में इन्द्रदत्त नाम का एक श्रेष्ठ शिल्पकार निवास करता था । वह अपनी शिल्पकला के कारण समस्त संसार में प्रसिद्ध हो गया था। उसके समान कोई दूसरा शिल्पकार न था। उसके एक पुत्र था, जिसका नाम सोमदत्त था । अपने पिता के समीप शिल्पकला को सीखता हुआ वह क्रमश: पिता से भी अधिक शिल्पकला में कुशल हो गया। किन्तु, सोमदत्त जिन-जिन प्रतिमाओं का निर्माण करता, उनमें कोई-न-कोई भूल उसका पिता अवश्य दिखा देता। पिता उसकी कभी प्रशंसा नहीं करता था, फिर भी वह सूक्ष्म दृष्टि से सूक्ष्मातिसूक्ष्म शिल्पक्रिया करके अपने पिता को दिखाता। फिर भी, उसका पिता उसमें भी कोई-न-कोई भूल अवश्य दिखा देता और कहता : "तुमने सुन्दरतम शिल्पक्रिया नहीं की है।" इस प्रकार, वह कभी उसकी प्रशंसा नहीं करता था। पिता द्वारा प्रशंसा न मिखने पर उसने इस प्रकार विचार किया - ( ९३ . ) 'मेरे पिता मेरी कला की प्रशंसा कभी नहीं करते, अतः अब मैं कोई ऐसा उपाय करूं, जिससे वह मेरी कला की प्रशंसा करने लगें।' अन्य किसी एक दिन उसका पिता किसी कार्यवश दूसरे गांव में गया। उसी समय उस सोमदत्त ने गणेशजी को एक सुन्दरतम प्रतिमा का निर्माण कर, उसके निचले भाग में छोटे-छोटे अक्षरों में अपना नाम अंकित कर उस मूत्ति को अपने मित्र द्वारा भूमि के नीचे गड़वा दिया। कालान्तर में दूसरे गाँव से उसका पिता भी वापस आ गया। अवसर पाकर उस सोमदत्त के मित्र ने लोगों के आगे जाकर इस प्रकार कहा : "आज मुझे एक स्वप्न आया है कि अमुक भूमि में एक प्रभावशालिनी गणेशजी की प्रतिमा गड़ी हुई है।" लोगों ने उसी समय जाकर उस पृथ्वी को खोदा, जिससे गणेशजी की एक सुन्दरतम अनुपम मूत्ति निकली। उसका दर्शन करने के लिए अनेक लोग वहाँ आये। उन्होंने उस मूत्ति की शिल्पकला की बड़ी प्रशंसा की। उसी समय वह इन्द्रदत्त शिल्पकार भी अपने पुत्र सोमदत्त के साथ वहाँ पहुँचा। गणेश की उस प्रतिमा को देखकर शिल्पकार ने अपने पुत्र से कहा : "हे पुन ! शिल्पकला इसे ही कहते हैं। कितनी सुन्दर प्रतिमा बनाई गई है ! इसका बनानेवाला निश्चय ही धन्यतम एवं प्रशंसा के योग्य है । देखो, इसमें कहीं भूल अथवा कमी दिखाई देती है ? यदि तुम इसी प्रकार की प्रतिमा का निर्माण करोगे, तभी मैं तुम्हारी शिल्पकला की प्रशंसा करूँगा, अन्यथा नहीं।" यह सुनकर पुत्र ने उत्तर दिया : "हे पिताजी ! गणेशजी की यह प्रतिमा मैंने ही बनाई है। इस प्रतिमा के निचले भाग में सूक्ष्म अक्षरों में मेरा नाम भी लिखा हुआ है।" उसका पिता लिखे हुए नाम को पढ़कर खिजलाये हुए मन से उससे वोला : “हे पुत्र ! अव आज से तुम इस प्रकार की शिल्पकला से युक्त सुन्दरतम प्रतिमा का निर्माण कभी नहीं कर सकोगे; क्योंकि मैं तुम्हारी शिल्पकला में जव-जव भूलें दिखाता था, तभी-तभी तुम भी सुन्दरतम शिल्पकला के कार्य करने में तल्लीन होकर धीरे-धीरे श्रेष्ठ शिल्पक्रिया करते रहते थे। इसी कारण तुम्हारी शिल्पकला भी बढ़ती जा !
९४ ) रही थी और अव 'मेरे समान दूसरा कोई नहीं है' इस प्रकार के विचार से उत्साह मन्द हो जाने पर तुम श्रेष्ठ और सुन्दर शिल्पक्रिया नहीं कर सकोगे।" सोमदत्त अपने पिता के इन रहस्यपूर्ण वचनों को सुनकर उनके चरणों में गिर पड़ा और उनसे छलपूर्वक अपनी प्रशंसा कराने के अपराध के लिए क्षमा याचना करने लगा। पिता ने उसे क्षमा भी कर दिया, किन्तु वह सोमदत्त उसके बाद से फिर उस प्रकार की सुन्दरतम शिल्पक्रिया करने में सदा-सदा के लिए असमर्थ हो गया। उपदेश : शिल्पी-पुत्र का दृष्टान्त देखकर और अपनी आत्मा के गुणों को समझकर तथा पूज्य पुरुषों की वाणी को सुनकर उनके प्रतिकूल आचरण कभी नहीं करना चाहिए। कठिन शब्दों के अर्थ “अवंतीए अवन्ती में होत्था हो गया सिप्पिवरो=श्रेष्ठ शिल्पकार सरिच्छो =समान "सिप्पकलाहिं शिल्पकला द्वारा को वि कोई भी “पसिद्धो प्रसिद्ध एयस्स = इसका इमस्स इसके पिउस्स-पिता के अन्नो= अन्य सिप्पकलं शिल्पकला को नत्थिन था कमेण = =क्रम से 'पुत्तो= पुत्र पिअराओ=पिता से सगासंमि-समीप में जाओ-हो गया सिक्खंतो- शिक्षा लेते हुए, सीखते हुए पडिमाओ=प्रतिमाएँ, मूत्तियाँ अईव-अत्यन्त, अतीव. उनमें पुरीए= नगरी में कंपि = कोई भी अहैसि=था, रहता था दंसेइ = दिखाता- सव्वमि= सभी में प्रशंसा, श्लाघा जयम्मि-संसार में तओ= उसके बाद से %D % 3D % 3D : तासु सिलाह- D ( ९५ ) मज्झमेरी कह-क्यों कलं सुहुमदिट्ठीए = सूक्ष्म दृष्टि से पियरं-पिता को सिप्पकिरियं =शिल्पक्रिया, शिल्पकर्म तुमए-तुमने खलनं = त्रुटि, गलती, चक कयं =की है सोहणयरं=सुन्दरतर तं- उसकी कयाइंकमी अपसंसमाणे-प्रशंसा न किये जाने के पसंसेइप्रशंसा करता था कारण पिउम्मि-पिता के चितेइ विचार किया =कला की एआरिसं= इस प्रकार पससेज्जा-प्रशंसा करें पसंसेज्ज-प्रशंसा करें उवाय-उपाय करेमि= करूँ जेण = जिससे पियरा-पिता एगया=एक समय, एक दिन गामंतरे= दूसरे गाँव में कज्जपसंगण कार्यवश सिरीगणेसस्स=श्रीगणेशजी की तया=तव, तभी काऊण-बनाकर सुंदरयम == सुन्दरतम हिट्ठमि = नीचे, निचले भाग में पडिमाए प्रतिमा के नियनामंकियचिन्हं करिऊण =अपना गूढं =गुप्त; रहस्यपूर्ण नाम लिखकर मुत्ति-मूर्ति को, प्रतिमा को नियमित्तद्दारेण= अपने मित्र द्वारा निम्मवेइ वनाता निक्खेवो कारेइ-छिपवा दिया, पिआ=पिता दिया भुल्लं = भूल समागओ=आ गया, लौट आया कयावि-कभी. अज्ज आज कुणेइ-करता था अमुगाए-अमुक स-वह पहावसालिणी=प्रभावशालिनी सुहुम-सूक्ष्म पुढवी = पृथ्वी कुणेऊण= करके अणुवमा= अनुपम छिपवा दिया, गड़वा 3- मए-मैंने ( ९६.'). तहसणत्थं = उसके दर्शनों के लिए सिप्पकलं-शिल्पकला सपुत्तो-पुत्र के साथ पसंसिरे प्रशंसा करने लगे एसच्चिय = ऐसी ही दठूण = देखकर केरिसं-कैसी कहिज्जइ = कही जाती है इमाए इसका निम्मविआ =निर्मित की है धण्णयमो= धन्यतम निम्मावगो बनानेवाला, निर्मापक, सलाहणिज्जो प्रशंसनीय, प्रशंसा का बनवानेवाला पात्र पासेसु-देखो निम्मवेज्ज =वना सको भुल्लं, खुण्णं = भूल, कमी, गलती नन्नहा=अन्यथा नहीं गुत्तं = गुप्तरूप में, सूक्ष्मरूप में मम कया= मैंने वनाई है पिआवि= पिता भी लिहिअमत्यि-लिखा हुआ है वाइऊण वाँचकर, पढ़कर लिहिअनाम-लिखे हुए नाम को अज्जयणाओ-आज से खिन्नहिओ= खिन्नहृदय, दुःखी हृदय- तुं तुम वाला कयावि-कभी एरिसं-ऐसी भूमीए = भूमि के करिस्ससि = करोगे, कर सकोगे अंतो=भीतर जओ-क्योंकि कालंतरे= कुछ समय के बाद सोहणयरकज्जकरणतल्लिच्छो= समागओ=आया, लौटा सुन्दरतर (शोभनतर) कार्य जणाणमग्गओ-लोगों के आगे करने में तल्लीन सुमणो-स्वप्न वड्ढ़ती हुवीअबढ़ती रहती थी भूमीए = भूमि में नन्नो= दूसरा नहीं लोगेहि लोगों द्वारा मंदूसाहेण = उत्साह मंद हो जाने के कारण खणिआ-खोदी गई सरहस्सं = रहस्यपूर्ण निग्गया=निकली पाएसु-पैरों में, चरणों में •.
( . ९७ ) -- पिउत्तो-पिता से खामेइ क्षमा कराता है तो आरभ-तव से तारिसिं-वैसी असमत्थो असमर्थ उवएसो= उपदेश दंसंतो-दिखाता : सह-सण्हं-धीरे-धीरे, शनैः-शनैः कुणंतो=करते हुए आसि= रहते थे : अहुणा= इस समय इह- इस प्रकार एआरिसी = इस प्रकार की संभविहिइ = सम्भव' होगी पिउवयणं =पिता के वचन को पडिऊण =गिरकर पसंसाकरावणरूवनिआवराहं प्रशंसा कराने के अपने अपराध को काउं-करने में जाओ हो गया - गृहकार्य के लिए अभ्यास-प्रश्न १. शिल्पी-पुत्र की कया के अध्ययन से मिलनेवाली शिक्षाओं पर सामीचीन प्रकाश डालें। २. प्रस्तुतं पाठ की कथावस्तु अपनी भाषा-शैली में प्रस्तुत करें। ३. प्रस्तुत पाठ के आधार पर सिद्ध करें कि 'सन्तोष प्रगति का वाधक है।' ४. प्रस्तुत पाठ के आधार पर वतायें कि पिता की विचारधारा अपने पुत्र के उपयुक्त थी अथवा अनुपयुक्त? ने पिता के व्यवहार से रुष्ट होकर जो षड्यन्त्र किया, उससे आप कहाँतक सहमत हैं ? अपने विचार प्रस्तुत करें। ६. निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी-रूप लिखें: सव्वम्मि, कारुण, पसिद्धो, हिलमि, सरिच्छो, मुत्ति, सगासस्मि, सुमिणो, पि, पुढवी, सिलाई, निग्गया, कुणेऊण, पासेसुः उवाय, नन्नहा, सिंरिगणेसस्स, गुत्तं । प्रति ५.. पुन ( ९८ :) ७. अमंगलियपुरिसस्स कहा ( अमांगलिक पुरुष को कथा) सारांश : इस संसार में कोई भी व्यक्ति अमंगलमुख नहीं है। अमंगलमुख कहकर राजा ने उसके वध का आदेश दिया, किन्तु वह राजा स्वयं ही अमंगलमुख बन गया। किसी नगर में एक अमांगलिक मूर्ख व्यक्ति रहता था। वह इतना असगुनिया था कि सवेरे-सबेरे जो कोई भी उसका मुख देख लेता था, उसे भोजन भी नहीं मिलता था। नगर के लोग भी सवेरे-सवेरे उठकर उसका मुख नहीं देखते थे। उस नगर के राजा ने भी उस अमांगलिक पुरुष के विषय में वात सुनी, तो उसने परीक्षा के लिए किसी एक दिन सवेरे-सवेरे उसे बुलवाया और उसका मुख देख लिया । जव राजा भोजन के लिए बैठा और उसने पहला ही कौर मुख में रखा, तभी पूरे नगर में अकस्मात् ही शत्रु के आक्रमण के भय से कुहराम मच गया। उसी समय राजा भोजन छोड़कर सहसा उठ खड़ा हुआ और सेना-सहित नगर से बाहर निकल गया। किन्तु; भय का कोई कारण न देखकर वह पुनः वापस चला आया और इस प्रकार विचार करने लगा : "आज. उस अमांगलिकमुख व्यक्ति का सच्चा रूप मैंने स्पष्ट ही देख लिया है, अतः इसे मार डालना चाहिए।" इस प्रकार विचार करके उसने उस अमांगलिक व्यक्ति को बुलवाकर उसका वध करने के लिए चण्डाल को सौंप दिया। जब वह अमांगलिकमुख व्यक्ति रोता-कलपता और अपने भाग्य की निन्दा करता हुआ चण्डाल के साथ-साथ जा रहा था, तभी एक कारुणिक एवं बुद्धिमान् व्यक्ति वहाँ आया और वध के लिए ले जाते हुए. उस व्यक्ति को उसने देखा । तब उसने उसके कारण को जानकर, उसकी रक्षा के लिए उस व्यक्ति के कान में कुछ कहकर, कोई उपाय बता दिया।..वह अमांगलिकमुख व्यक्ति हर्षित होता हुआ जब-वध के खम्भे पर खड़ा किया गया, तभी. चण्डाल ने उससे पूछा : "जीवन को छोड़कर यदि तुम्हारी अन्य कोई इच्छा हो, तो उसे माँग सकते हो।" यह सुनकर उस अमांगलिकमुख ने कहा : "मुझे राजा के ( ९९ ) दर्शन करने की इच्छा है। उसी समय उसे राजा के समीप लाया गया । राजा ने उससे पूछा : “तुम्हारा यहाँ आने का क्या प्रयोजन है ?'' यह सुनकर उसने कहा : "हे राजन् ! सवेरे-सवेरें मेरा मुख देखने से तो आपको केवल भोजन नहीं मिल सका, किन्तु आपका मुंह देखने से तो मुझे मृत्यु का दण्ड मिल गया है । इसे सुनकर नगर के लोग क्या कहेंगे ? मेरे मुख-दर्शन की अपेक्षा श्रीमान् के मुख-दर्शन का कैसा फल मिल रहा है ? नागरिक लोग सवेरे- सवेरे आपके मुख का दर्शन कैसे करेंगे ?' इस प्रकार, उस अमांगलिकमुख व्यक्ति की तर्कसंगत वातों को सुनकर राजा वड़ा सन्तुष्ट हुआ। उसने उसके वध के आदेश को रद्द कर उसे' पारितोषिक देकर सन्तुष्ट किया । उपदेश : इस प्रकार एक बुद्धिमान् व्यक्ति ने अमांगलिकमुख व्यक्ति की रक्षा की। उसे सुनकर हे सज्जनो, आप भी बुद्धि के अनुसार अपने कार्य का साधक वनें। कठिन.शब्दों के अर्थ सो-वह एगम्मि नयरे एक नगर में परिक्खत्थं -परीक्षा के लिए अमंगलिओ= अमांगलिक,.. अमंगल एगया एक समय करनेवाला मुद्धो = मूर्ख, मुग्ध दिळं = देखा आसि = रहता था भोयणत्थं = भोजन के लिए जो-जो कवलं-ग्रास, कौर पभायंमि=प्रभातकाल में. एगो-एक लहेज्जा प्राप्त करता पुरिसो=पुरुष पच्चूसे=प्रातःकाल में अस्थि =था, पिक्खंति -देखते कोविकोई भी अमंगलियपुरिसस्स अमांगलिक पुरुष का पासेइ देखता पउरा नगर के निवासी है - - वट्टावांत, वार्ताः ....
( १०० ) . कयाविःकभी अस्स- इसका नरवडणा=राजा ने सरूवं =स्वरूप, आकार, चेहरा सुणिआ=सुनी दिळं देखा नरिदेण =राजा ने. हंतव्वोमारना चाहिए पभायकाले =प्रातःकाल में. वहत्थं वध के लिए. आहूओ=बुलाया नेइज्जमाणं ले जाते हुए जया-जव. णच्चा-जानकर उवविसइ' =बैठा कण्णे = कान में पक्खिवई = रखा, खाया- कहिऊण = कहकर अहिलंमि-समस्त दंसेइ = कह दिया, बता दिया परचक्कभएण= शत्रु के आक्रमण के जया=जव भय से ठविओ= खड़ा किया गया जाओ= उत्पन्न हो गया, मच गया जीवणं-जीवन, प्राण नरवई राजा कांवि कोई भी सहसा= शीघ्र ही ससेण्णो-सेना के साथ मुहे = मुख में वाहिं बाहर तया तभी पच्छा=पश्चात् अकम्हा=अकस्मात् चितेइ-सोचने लगा हलवोलो= शोरगुल, कोलाहल अमंगलिअस्स= अमांगलिक के तया तभी, तव पच्चक्खं-प्रत्यक्ष चिच्चा =छोड़ करके तओ= इसलिए उत्थाय-उठकर वोल्लाविऊण =बुलवाकर नयराओ=नगर से चंडालस्स =चण्डाल को भयकारणमदठूण भय का कारण ; अप्पेइसौंप दिया न देखकर स्यंतो-रोता हुआ पुणो फिर 'सकम्मं अपने भाग्य को आगओ समाणो=आने पर निदंतो निन्दा करता/कोसता हुआ • • % 3D 3- ( १०१ . ) सह-साथ . ' . % 3D % 3D धीमया-बुद्धिमान् व्यक्ति द्वारा गच्छंतो अत्यि=जा रहा था तुम्हे-तुम भी. कारुणिओ= दयालु होहवनो वुद्धिणिहाणो बुद्धिमान् : कज्जसाहगा=कार्यों के साधक वहाइ = फाँसी के लिए मज्झ=मेरी दळूणंदेखकर आणीओ-लाया रक्खणाय = रक्षा के लिए किमेत्थ = क्या यहाँ किपि कुछ भी पओयण-प्रयोजन ..उवायं = उपाय तुम्हाणं -तुम्हारे हरिसंतो हर्षित होता हुआ वहो = फाँसी, वध वहत्थंभे= फांसी के तख्ते पर कि क्या पुच्छइ-पूछा सिरिमंताणं =श्रीमान् का विणा = छोड़कर, विना सिया हो मग्गियव्वं = मांगो वयणजुत्तीए वचनयुक्ति से, कुशल नरिंदमुहदसणेच्छा = राजा के मुख : को देखने की इच्छा वहाएसं = फाँसी के आदेश को आगमणपंयोअणं आने का प्रयोजन निसेहिऊण: निसेहिऊण = निषेध करके, रुकवाकर कहेइ उतर दिया पारितोसि=पारितोषिक, इनाम मुहपेक्खणेण = मुख देखने से दच्चा= देकर भविस्सइ होगा संतोसीअसन्तुष्ट किया कहिस्संति = कहेंगे अमंगलमुहस्स= अमंगल मुखवाले की. केरिसफलयं = कैसा फल कयं =किया नायरा=नागरिक पासिहिरे= देखेंगे तहा=उसी प्रकार. रक्खणं रक्षा मईएमति से, बुद्धि के अनुसार संजाओ-हुआ कहं = कैसे सूझ-बूझ से . सोच्चा-सुनकर 7- ( १०२ . ) % गृहकार्य के लिए अभ्यास-प्रश्न १. 'अमांगलिक' शब्द से आप क्या समझते हैं ?.' क्या सृष्टि में अमांगलिक पुरुष उत्पन्न हो सकते हैं ? अपने विचार प्रस्तुत करें। २. प्रस्तुत पाठ की कथावस्तु अपनी भाषा-शैली में प्रस्तुत करें ३. क्या राजा ने अमांगलिक व्यक्ति को मृत्युदण्ड देकर न्यायसंगत कार्य किया? राजा को उसका क्या फल मिला? अपने शब्दों में लिखें। ४ अमांग लिक व्यक्ति की कारुणिक व्यक्ति ने किस प्रकार सहायता की ? ५. निम्नांकित शब्दों का हिन्दी-रूप प्रस्तुत करें: मुद्धो, पओयणं, एरिसो, मुहपेक्खणेण, पच्चूसे, वहो, वट्टा, भविस्सइ, अहिलंमि, तया, पच्चक्खं, पउरा, वहत्थं, नायरा, वहत्थंभे, दच्चा। ६. व्याकरणबोधक टिप्पणियाँ लिखें: नयरे, जया, नायरा, दच्चा । ८. गेहेसूरा (गृहशूर) पाठसंक्षेप : संसार में कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो वीरता की केवल डोंग हाँकते हैं। लेकिन, समय पड़ने पर उनकी वीरता काफूर हो जाती है। प्रस्तुत कहानी गेहेसूरा' इसी प्रकार की है। इसका नायक स्वर्णकार घर में वीरता की लम्बी-लम्बी बातें करता है। वह अपनी पत्नी से कहता है कि मेरा सामना सैकड़ों योद्धा भी नहीं कर सकते । कहानी का आरम्भ करते हुए कहानीकार ने बताया है कि एक नगर में एक सुनार रहता था। उसकी दुकान वाजार के मुख्य राजपथ पर थी। वह प्रति दिन स्वर्णाभूषणों से भरी हुई अपनी सन्दूक (मंजूषा) घर लाया करता था। उसकी पत्नी ने उसे कई दिन समझाया कि “मध्यरात्रि के समय स्वर्णाभूषणों से भरी सन्दूक लेकर आना निरापद नहीं। यदि रास्ते में चोर और ( १०३ ) डाकू मिल जायेंगे, तो तुम कुछ नहीं कर सकोगे।" सुनार ने उत्तर दिया : "तुम्हें मेरे पौरुप का ज्ञान नहीं है । मैं अकेला ही सैकड़ों व्यक्तियों को चकनाचूर कर सकता हूँ। सामान्य व्यक्तियों की तो बात ही क्या, बड़े-बड़े : शूरवीर भी मेरा मुकाबला नहीं कर सकते ।" पति की इन बातों को सुनकर पत्नी चुप हो गई। पर, उसके मन में यह आशंका बनी रही कि चोरों के मिल जाने पर मेरा यह पति कुछ भी नहीं कर सकेगा । अतः, वह उसकी परीक्षा के लिए अपने पड़ोस की एक क्षत्रियाणी से मर्दाने कपड़े और तलवार आदि माँग कर ले आई। अगले दिन वह स्वयं ही इन वस्त्रों को धारण कर, हाथ में नंगी तलवार लेकर रात्रि की नीरवता में जिस मार्ग से उसका पति लौटता था, उसी मार्ग के एक वृक्ष के पीछे छिपकर खड़ी हो गई । जव सुनार स्वर्ण की सन्दूकची लिये हुए उसके पास आया, तव उसने संकेत द्वारा ही स्वर्णभरी सन्दुकची ले ली। पश्चात् तलवार की नोंक उसकी छाती में लगाकर 'हूँ-हूँ' के संकेत से ही उसके सारे वस्त्र उतरवा लिये। अब वह छोटे बच्चे के समान नग्न हो गया। पत्नी शीघ्रतापूर्वक अपने घर आई और वस्त्र बदलकर निश्चिन्त हो दरवाजा वन्द कर भीतर जाकर लेट गई। इधर, वह सुनार अपने को किसी प्रकार छिपाता हुआ, दुकानों के पीछे-पीछे जाने लगा। कुंजड़े ने खीरों की टोकरी सँभालते हुए उसमें से एक सड़ा खीरा वाहर फेंका, जो कि सुनार की पीठ में जाकर लगा । सुनार ने समझा कि मेरी पीठ में गोली लगी है और उसके घाव से खून भी निकल रहा है। खीरे के बीजों को देखकर उसने समझा कि घाव में कीड़े भी पड़ गये है। वहः शीघ्रतापूर्वक दूसरों की दृष्टि से, अपने को बचाता हुआ घर की ओर भागा। घर के दरवाजे पर पहुँचकर उसने देखा कि घर वन्द है। भीतर से अर्गला चढ़ा दी गई है। उसने जोर-जोर से किवाड़ पीटे और चिल्ला-चिल्लाकर अपनी पत्नी को बुलाया। पत्नी ने किवाड़ खोलकर उसे भीतर किया और पूछा कि "यह कैसी तुम्हारी दशा हो रही है ? गहनों की सन्दूक कहाँ है ?". सुनार ने उत्तर दिया: "भीतर चलो, मैं .
( १०४. ) - . अन्दर के कमरे में पहुँचने पर ही तुम्हें सारा समाचार बताऊँगा। किवाड़ में ताला भी लगा दो।"सुनार वड़ा आतंकित था और उसका शरीर काँप रहा था। वह कहने लगा : "क्या करूं, सौ-डेढ़ सौ चोर मेरे सामने आ गये थे । दस-पाँच होते, तो मैं उनका मुकावला स्वयं करता, पर इतने अधिक लोगों का मैं सामना न कर सका । उन्होंने मेरी सन्दूकची छीन ली और मेरे सारे कपड़े भी उतरवा लिये । इतना ही नहीं, मेरी पीठ में बन्दूक की गोली लगी है और उससे बने घाव में कीड़े भी पड़ गये हैं । उससे खून निकल रहा है।” पत्नी ने देखकर कहा कि "अरे, यह घाव नहीं है, सड़े हुए खीरे के वीज और रस लगे हुए हैं और तुमने रस और इन बीजों को ही खून और कीड़ा समझ लिया है।" पत्नी ने उसे स्नान के लिए जल दिया। स्नान कर उसने पहनने के लिए वस्त्र माँगे । पत्नी ने उसके वे ही कपड़े दिये, जो उसने उससे उतरवाये थे और उसकी वीरता की खिल्ली उड़ाते हुए सारे रहस्य का उद्घाटन कर दिया। इसपर वेशर्मी से वह सुनार वोला : “अरे, मैंने तो तुम्हें उसी समय पहचान लिया था। इसी से तो आसानी से सारी चीजें दे दी थीं। मैंने सोचा कि पत्नी के साथ लड़ना उचित नहीं।" तव स्त्री ने हाथ जोड़कर कहा : "आपकी वीरता तो जगत्प्रसिद्ध है, परं कृपया कल से रात्रि में आभूषणों की मंजूषा घर नं लाया करें। चरित्र-विश्लेपण की दृष्टि से यह कहानी बहुत ही मार्मिक है । कायर की इससे अच्छा चरित्र और क्या हो सकता है ? कहानी.में हास्य-व्यंग्य के साथ कौतूहल-तत्त्व का बहुत ही सुन्दर संयोजन किया गया है। लेखक ने अपने ही 'आँगन में शूर वननेवाले कायरों के चरित्र पर चुभता हुआ व्यंग्य किया है। वार्तालाप अल्प मात्रा में होते हुए भी वह स्वाभाविक वन पड़ा है और कहानी को गतिशील वनाने में सक्षम है। कहानी-कला की दृष्टि से भी इस कहानी को एक सफल मार्मिक कहानी कहा जा सकता है। समीक्षा : 'गेहेसूरा' कथा में लोकमान्यताओं और रूढ़ियों का सुन्दर .
( १०५ ) . चित्रण किया गया है। इसमें यों तो एक कायर व्यक्ति का चरित्न ही अंकित है; पर वस्तुतः इसमें ऐसे लोगों की भी मनोवृत्ति पर समुचित प्रकाश डाला गया है, जो परिश्रम तो नहीं करते, पर लम्बी-चौड़ी बातें अवश्य करते हैं। इस कथा में निम्नलिखित गुण और तत्त्व पाये जाते हैं : १. कौतूहल का समावेश, २. मनोरंजन का सुनियोजन, ३. कथा की आरोह-अवरोहजन्य गतियों का सुनियोजन, ४. चरित्र का विश्लेषण; ५. संवाद-तत्त्व का समावेश; ६. शिक्षा अथवा परिणाम की घोषणा और ७. कथारस की सम्प्राप्ति । प्रस्तुत कहानी में जितनी भी घटनाएँ घटित हुई हैं, वे सभी किसी एक लक्ष्य से बँधी हुई हैं। घटनाओं का क्रम भी सुनियोजित है। एक के बाद दूसरी घटना स्वाभाविक रूप से घटित होती जाती है। 'गेहेसूरा' पाठ के नायक स्वर्णकार को उसकी पत्नी निर्जन स्थान में सोने-चांदी की पेटी लेकर चलने से मना करती है। पर, वह कायर व्यक्ति अपनी झूठी डींग हाँककर पत्नी के समक्ष अपने को शूरवीर सिद्ध करना चाहता है । उसकी परीक्षा के लिए उसकी पत्नी भी दृढ़ संकल्प करती है और एक दिन उसका कायरपन पकड़ा ही जाता है। कथाकार ने इन दोनों घटनाओं का सम्बन्ध बड़े ही चमत्कारपूर्ण ढंग से जोड़ा है, जिससे कथावस्तु में कौतूहल और मनोरंजकता, ये दोनों ही गुण अक्षुण्ण रूप से उपलब्ध हो जाते हैं। कथा में एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आगे कौन-सी घटना घटित हुई ? यदि पाठक के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न न हो, तो कथा प्रायः नीरस हो जाती है और पाठकों को रुचिकर नहीं प्रतीत होती। प्रस्तुत कथा में जिज्ञासा-गुण सर्वाधिक व्याप्त है । जव कायर व्यक्ति की स्त्री नंगी तलवार लेकर अपने पति की परीक्षा करती है, तब पाठक भी ( १०६ ) . यह जानना चाहता है कि गृहशूर व्यक्ति अपनी कथनी और करनी, दोनों में कहाँतक सफलता प्राप्त करता हैं। तात्पर्य यह कि प्रस्तुत कथा में एक ऐसी जिज्ञासा छिपी हुई है, जिसके कारण पाठक का मन कथा में रम जाता है। जिज्ञासा के साथ मनोरंजन भी इस कथा में निहित है। घर में नंग-धडंग लौटने पर गृहशूर व्यक्ति जब अपने उन्हीं वस्त्रों को पुनः प्राप्त करता है, तब वह सहज में ही यह जान लेता है कि प्रस्तुत घटना मेरी पत्नी द्वारा ही सम्पादित हुई है । अतः, वह पुनः डींग हाँकने लगता है और अपनी झूठी वीरता प्रकट करने के लिए पत्नी से कहता है कि 'मैंने स्त्री समझकर ही तुम्हारा मुकावला नहीं किया, अन्यथा मेरे समक्ष सैकड़ों योद्धाओं को भी ठहरने की शक्ति नहीं।' इस सन्दर्भ को पढ़कर कौन ऐसा पाठक होगा, जो उस कायर के चरित्र पर एक बार हँसेगा नहीं ? कहाँ तो इतना भय कि सड़े हुए खीरे के बीजों को घावों के कीड़ें समझना और कहाँ तथाकथित · लम्बी-चौड़ी डींग हॉकना? चरित्र के इस विरोधाभास को लेखक ने बड़े ही मनोरंजक ढंग से उपस्थित किया है । अतः; संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि इस कहानी में जिज्ञासा, कौतूहल और मनोरंजन इन तीनों गुणों की त्रिवेणी प्रवाहित है। चरित्र-विकास की दृष्टि से भी यह कथा महत्त्वपूर्ण है। लेखक ने इस छोटी-सी कहानी में पति-पत्नी के संवाद द्वारा एक कायर व्यक्ति के चरित्र को स्पष्ट किया है। प्रायः यह देखा जाता है कि जो व्यक्ति कोरी बातें करता है, वह काम नहीं कर पाता। काम करनेवाला व्यक्ति वातें नहीं बनाता। गृहशूर घर में ही लम्बी-चौड़ी वातें करनेवाला व्यक्ति है और जव वीरता-प्रदर्शन का अवसर आता है, तब वह दुम दवाकर भाग खड़ा होता है। है। इस प्रकार, कथातत्त्वों की दृष्टि से यह कहानी पूर्णतया सफल है । शिक्षा : १. प्रस्तुत कहानी से मिलनेवाली शिक्षा इस प्रकार है। वीरता ही जीवन और कायरपन ही. मरण है। . जो कायर व्यक्ति अपने कायरपन को छिपाने के लिए व्यर्थ की बातें करता है, वह कभी जीवन में सफल नहीं होता। जीवन की सफलता का मूल सिद्धान्त कथनी और करनी ( .:१०७ : ) - का एक होना है। जो कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं, ऐसे व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी पशुतुल्य हैं। २. इस कथा से सबसे बड़ी शिक्षा यह मिलती है कि मनुष्य को वीरता, साहस और सहिष्णुता अपनानी चाहिए। हितकारी अच्छी बात यदि अपनी पत्नी भी कहे, तो उसे स्वीकार करना चाहिए। जीवन में वे ही व्यक्ति उन्नति कर सकते हैं, जो वीरता और त्याग अपनाते हैं। मनुष्य के जीवन का लक्ष्य मानव बनने का होना चाहिए। मानव बनने के लिए सेवा, त्याग, वीरता एवं वचन के अनुसार ही कार्य पूरा करने जैसे गुण अपेक्षित हैं । कहानीकार ने इस छोटी-सी कहानी में ऐसे चरित्र का चित्रण किया है,. जो जीवन को निरन्तर प्रभावित करता है। क्योंकि, जो व्यक्ति कायर हैं, वे कभी उन्नति नहीं कर सकते । पुरुषार्थ करना वीर व्यक्तियों का ही कार्य है। एक कहावत प्रसिद्ध है कि वीर व्यक्ति, जीवन में एक बार ही मृत्यु को प्राप्त करता है, जब कि कायर व्यक्ति प्रतिक्षण मृत्यु को प्राप्त करता रहता है। मृत्यु का अर्थ यहाँ असफलता और भय है। जो हर क्षण भयाक्रान्त रहता है, वह भय के कारण निरन्तर ही मृत्युतुल्य कष्ट प्राप्त करता रहता है । अतः निर्भय होने की शिक्षा भी इस कथा से मिलती है। कठिन शब्दों के अर्थ गेहेसूरा = गृहशूर, घर में ही शूरता एगंमि गामे = एक गांव में और वीरता दिखानेवाला 'सुवण्णयारो=स्वर्णकार, सुनार वसइरहता था. रायपहस्स= राजमार्ग के मज्झभागे मध्य भाग में हट्टिगा=बाजार, दुकान विज्जइ =थी मज्झरत्तीए-मध्यरात्रि में सुवण्णभरियं = सोने से भरी हुई मंजूसं=मंजूषा, पेटी को नियघरंमि-अपने घर में गहिऊणं-लेकर भज्जाए = भार्या ने, पत्नी ने. आगच्छइ =आता है, सव्वया-सर्वदा भत्ता= भर्ता, पतिः . मिलेज्जा=मिल जाय .. कयावि = कभी. •.
- ( १०८ . ) वोलते हो % होज्जा हो संनाए-संकेत से "नियभत्तारो-अपने पति से वुत्तो-कहा "आगमणं- आगमन जाणासि = जानते हो वोल्लेसि पुरओ= सामने नरसयं-सैकड़ों व्यक्ति आगच्छेज्ज आ जायँ कुणेज्जा करें ममग्गओ-मेरे आगे काउं=करने में समत्था समर्थ कायव्वं = करना चाहिए सुणिऊण =सुनकर काहिमि= करूँगा. नियघर= अपना घर समीववासिणीय-समीप में खत्तियाणीए क्षत्रियाणी से रहनेवाली भत्तारो-पति वत्थभूसं= वस्त्र-आभूषण को पओयणं प्रयोजन सिरवेढण-सिर ढकनेवाला कडिपट्टाइसुहडवेसं = कटिपट्ट आदि योद्धा रायपहमि = राजपथ में की वेशभूषा को हट्टाओ= बाजार से, दूकान से कियंतकाले =कुछ ही समय में सोण्णारो=सुनार हत्थेण=हाथ से भयभंतो भयभीत पासंतो-देखता हुआ सिग्घं = शीघ्र पुरिसवेसधारिणी-पुरुष-वेश धारण: नीसरिऊण-निकलकर करनेवाली मउणेण= मौनपूर्वक निभच्छेइभर्सना की हुँ हुँ-हे-हे, अरे अरे : मारइस्सं-मारूंगा अकम्हा- अचानक हंधिओ-रुध गया यरथरंतो थरथर कांपता हुआ मारेसुमारों . सव्वपरिहिअवत्थग्गहणाय-छोड़े हुए करवालग्गं= तलवार की नोंक सभी वस्त्रों को लेने के लिए वच्छंमि- छाती पर नाइद्रे समीप .
( १०९ ) . . वसणाईवस्त्र आदि ... कंपमाणो=काँपता हुआ कड्ढावेइ= निकलवा लिये आवणवीहीए बाजार-मार्ग से कडिपट्टयं = कटि पट्ट को हट्टसमीवमागओवाजार के समीप पिहिऊण = ढककर, छिपाकर : आ गया ट्ठिा खड़ी हो गई पिट्ठभागे=पीठ में अवलोएंतो= देखता हुआ लग्गि =लगा सागवावारिणो-सब्जी के चिभडस्स-खीरे का व्यापारी का . .फासिऊणं =छू करके पक्कचिन्भडं पके हुए खीरे को, म्हि-हूँ फासेइ स्पर्श किया तम्मज्झे= उसके बीच में वीआईबीज आदि समुप्पन्ना = उत्पन्न हो गये हैं. गाढयर-अत्यन्त घरदारे घर के द्वार पर सोणिसं खून उच्चसरेण = उच्च स्वर से कीडगावि = कीड़े भी मायरे=माता अच्चंतभयाउलो अत्यन्त भयाकुल'', अभंत रस्थिआ=भीतर ही छिपी रही मदन की... अइवक्कोसणे बहुत चिल्लाने पर उग्घाडेहि = खोलो, उघाड़ो अक्कोससि-चिल्लाते हो। सुणती=सुनती हुई गिहंमि= घर में असुणंतीव =अनसुना करती हुई देसुदे दो, लगा दो आगच्च-आकर पुच्छ = पूछो तालगं-ताला निच्चितो निश्चिन्त अववरगे दालान में, बरामदे में लुंठिओ= लूट लिया गया चोरेहि= चोरों द्वारा अवहरिअले लिया परिहिअकडिपट्टयमेत्तो=छोड़ा हुआ हे सामि != हे स्वामिन् ! कटिपट्ट-मान मनि मान लिया अंतो-अन्त में जइ-यदि मयणस्स - , ( ११० ) % 3D ... पासेसु D - ये येणा-चोर एए उ=और ये जुज्झमाणो= जूझता हुआ तेणाहं = उसी से मैं पिट्ठदेसे-पीठ में लुंठिऊण = लूटकर पहरिओ= प्रहार किया असिणाह = तलवार से मैं कीडगावि = कीड़े भी पासेसु देखो पासित्ता देखकर उप्पन्ना-उत्पन्न भत्तुस्स = पति का णायं-जान लिया सच्चं सत्य इमाई लग्गाईलगे हुए जाणियं =जान लिया नियपइस्स =अपने पति के लिए .:: समुप्पन्ना= उत्पन्न देहसुद्धि = देहशुद्धि को चिभडेण-खीरे से वत्थाई-वस्त्र आदि देहपक्खालणाय = देह धोने के लिए तयच्चिय -तभी परिहाणवत्यप्पणे = पहनने के लिए वस्त्र मए = मेरे सव्वावहरणमुवेविख-सर्वस्व अप-: नाया हरण की उपेक्षा को तेणाहं उसी से मैंने अज्जयणामो-आज से अन्नहा- अन्यथा पुत्वं = पहले, पूर्व सत्ती-शक्ति आगंतव्वं - आना नायं-जान लिया महावलिट्ठो- महान् वलवान् । -अंगीकरेइ-स्वीकार किया गृहकार्य के लिए अभ्यास-प्रश्न १. प्रस्तुत कहानी की कथावस्तु अपनी भाषा-शैली में लिखें। २. कथातत्त्वों की दृष्टि से प्रस्तुत कहानी की समीक्षा करें। ३. प्रस्तुत पाठ से मिलनेवाली शिक्षाओं पर प्रकाश डालें। ४. प्रस्तुत पाठ की किन्हीं दो रोचक घटनाओं का अपनी भाषा में वर्णन देते समय जान लिया . करें।
( १११ . )
-
५. निम्नांकित शब्दों के हिन्दी-रूप लिखें,
गेहेसूरा, वसणाई, विज्जइ, पिहिऊण, भत्ता, वीओ, सोहणं, पासिऊण,
कुणेज्जा, दारं, परिक्खं, पुच्छ, कहिमि, थेणा, खत्तियाणीए, नाया,
पयोअणं, कयावि, संवरिअ, अओ।
६. व्याकरणबोधक टिप्पणियाँ लिखें:
मिलेज्जा, मउणेण, आगच्छेज्जा, कुणेज्जा, सुणिऊण, विज्जइ, रायपहम्मि ।
९. गामिल्लो सागडिओ
( ग्रामीण गाड़ीवाला)
पाठसंक्षेप : किसी ग्राम में एक
ग्रामीण
गृहस्थ रहता था। वह किसी
एक
दिन गाड़ी में धन-धान्य भरकर तथा एक तीतर को पिंजड़े में रखकर और उसे
गाड़ी से बाँधकर नगर में प्रविष्ट हुआ। नगर में आते ही उसे गन्धी-पुत्र ने
देखा। उन्होंने उससे पूछा : "तुम्हारे इस पिंजड़े में क्या है।'' यह सुनकर उस
गाड़ीवाले ने कहा : "तीतर।"
तदन्तर, उस गन्धी-पुन ने पुनः पूछा : "क्या यह गाड़ी-तीतर विक्री के
लिए है ?". यह सुनकर उसने (गाड़ीवाले ने) कहा : "हाँ विक्री के लिए है।"
इसे सुनकर उस गन्धी-पुत्र ने कहा : "क्या लोगे ?' गाड़ीवाले ने उत्तर दिया:
"एक कापिण।
उस गन्धी-पुत्र ने उस गाड़ीवाले को एक कार्षापण दे दिया और गाड़ी एवं
तीतर दोनों लेकर चलने लगे। यह देखकर गाड़ीवाले ने पूछा : "इस
गाड़ी को क्यों ले जा रहे हो ?" यह सुनकर गन्धी-पुत्र ने कहा : "हमने इसे
मोल जो लिया है ?" इसके बाद उन दोनों का झगड़ा निबटाने के लिए
( ११२ ) पंचायत वैठी। उस पंचायत में वह गाड़ीवाला हार गया। उसकी गाड़ी और तीतर दोनों ही छीन लिये गये। अव वह गाड़ीवाला गाड़ी और तीतर छीन लिये जाने के कारण कुशल- क्षेम के निमित्त लाये गये अपने वैल को लेकर रोता-कलपता जब जा रहा था, तभी उसे एक दूसरे कुलपुत्र ने देखा और पूछा : "रो क्यों रहे हो ?" यह सुनकर उस गाड़ीवाले ने कहा : "स्वामिन् ! मैं ठग लिया गया तब, उस दयालु पुरुष कहा : "तुम उन्हीं के घर जाओ और उनसे इस-इस. प्रकार से कहना ने ।' सत्तू उस दयालु पुरुष के वचनों को सुनकर वह गाड़ीवाला उस गन्धी-पुत्र के यहाँ गया और बोला : “हे स्वामिन् ! आपने सामग्री से भरी हुई मेरी गाड़ी छीन ली है। अब इस बचे-खुचे वैल को भी ले लें। - किन्तु, इसके बदले में दो पैली सत्तू दे दें, जिसको लेकर मैं घर जा सकू। फिन्तु, वह मैं जिस-तिसके हाथ से नहीं लूंगा। आपकी प्रागों से भी प्यारी जो. पत्नी है, वह जब सभी प्रकार के वस्त्रालंकारों से विभूषित होकर अपने हाथों से मुझे देगी, तभी मुझे तुष्टि होगी और मैं इस संसार में अपने को गौरवशाली भी मानूंगा।" उसी समय गवाह बुलाये गये और उनके समक्ष गन्धी-पुत्र ने 'तथास्तु" कहकर गाड़ीवाले की शर्त स्वीकार कर ली। इसके बाद उस गन्धी-पुत्र की पत्नी वस्त्रालंकारों से विभूपित होकर दो पैली सत्तू लेकर गाड़ीवान को देने के लिए वाहर निकली। उसे गाड़ीवाले ने पकड़ लिया और साथ लेकर वह चलने लगा। यह देखकर उस गन्धी-पुत्र ने पूछा : 'यह तुम क्या कर रहे हो?" इसे सुनकर उस गाड़ीवाले ने कहा : 'दो पैली सत्तू ले जा रहा हूँ।" इसके बाद उन दोनों के झगड़ने की आवाज सुनकर कुछ महाजन वहाँ एकत्र हो गये और पूछने लगे : “यह क्या, यह क्या ?" इसके बाद उन दोनों ने ( ११३ ) जैसी-जैसी वातें हुई थीं, वैसी-वैसी सब कह सुनाईं। वहाँ आये हुए लोगों ने मध्यस्थ वनकर न्याय किया और उसके अनुसार गन्धीं-पुत्र पराजित हो गया । उसने बड़ी कठिनाई से अपनी पत्नी को छुड़ाया। किन्तु, उसके बदले में गाड़ी, बैल, व्यापारिक सामग्री, तीतर आदि सारी द्रव्य-सम्पत्ति वापस कर देनी पड़ी। इस पाठ से निम्नांकित शिक्षाएँ मिलती हैं : १. पारस्परिक व्यवहार में सीधी-सादी एवं सरल भाषा का प्रयोग करना चाहिए। दाव-पेंच या छल-कपट से भरी हुई भाषा का प्रयोग करने से व्यक्ति की वही दुर्गति होती है, जो कि गन्धी-पुत्र की हुई। जब उसे गाड़ी में भरी हुई सामग्री एवं तीतर खरीदना था; तब उसे गाड़ीवाले से स्पष्ट पूछना चाहिए था कि गाड़ी में भरी हुई सामग्री एवं तीतर की क्या कीमत लोगे? किन्तु, उसने छल-कपट से भरी हुई भापा में पूछा कि 'गाड़ी-तीतर का क्या लोगे ?' वेचारे ग्रामीण गाड़ीवाले ने केवल सामग्री का मूल्य एक कार्षापण बता दिया और उसी के शब्दों को पकड़कर उसने सामग्री के साथ-साथ उतनी ही कीमत में गाड़ी और तीतर भी छीन लिया । अतः, गाड़ीवाले ने भी अवसर पाकर उसको ऐसी सीख दी कि आगे से वह छल-कपट से भरी भाषा का प्रयोग करना भूल गया। २. गाँववाले भोले-भाले होते हैं। सीधी-सादी भाषा बोलते हैं। वे छल- कपट नहीं जानते। परिश्रमी होते हैं, सभी पर विश्वास कर लेते हैं तथा अपने साथियों के सुख-दुःख में निश्छल सहायता करते हैं। जव कि शहर के निवासी ग्रामीणों को मूर्ख एवं पिछड़ा हुआ ही मानते हैं। वे भहंकारी होते हैं और छल-कपट की भाषा बोलने में अपनी बुद्धिमानी समझते हैं। गन्धी-पुत्र इसका साक्षात् उदाहरण है। इस कहानी से यह स्पष्ट है कि भारतमाता का सही रूप शहरों में नहीं, ग्रामों में ही देखने को मिल सकता है, क्योंकि शहरों में जहाँ कृतिमता है, वहाँ ग्रामों में सहज स्वाभाविकता।
( ११४ ) कठिन शब्दों के अर्थ ६ 1 गामेल्लओ=ग्रामीण घेत्तूणं = लेकर कम्हिइ = कहीं कुलपुत्तएणं = कुलपुत्र से परिवसइ रहता था अइसंधिओ= ठग लिया गया सगडं = शकट, गाड़ी वयण -वचन को काऊणं = करके गंतूण =जाकर पंजरगयं-पिंजड़े में बन्दकर भंडभरिओ-सामग्री से भरा हुआ नयरगओ= नगर में गया हुआ गेण्हह ले लो पंजरए = पिंजड़े में हत्थेणं हाथ से लवियं कहा घरिणी = गृहिणी, पत्नी काहावणेणं = कार्षापण से, रुपये से सव्वालंकारभूसिया=सभी अलंकारों हियसगडोवगरणो= गाड़ी एवं सामग्री से विभूषित के छीन लिये जाने पर जीवलोगभंतरं मनुष्यलोक में वइल्लं = वैल को सत्तुयादुपालियं= दो पैली सत्तू सागडिओ= गाड़ीवान सद्देण= शब्द से गहवाइ गृहस्थ, गृहपति जहावत्तं = जैसी वात थी कयाई-कभी मज्झत्थ मध्यस्थ धण्णभरियं-धान्य से भरा होऊण होकर तित्तिरि-तीतर को वंधेत्ता=बाँधकर किलेसेण-क्लेश से गंधियपुत्तेहिं = गन्धी-पुत्रों द्वारा मोयाविओ= छुड़ाया विक्कायंइ= विकेगा सुवहुएण=बहुत, प्रचुर मोल्लेणं = मूल्य देकर विक्कोसमाणो चिल्लाता हुआ लइयं लिया कीस =किससे जोग-खेम-निमित्तं = योगक्षेम के लिए साणुकंपेण = कृपापूर्वक आणिएल्लियं = लाये गये सुओ=सुना सोऊण =सुनकरः (११५ .) तुम्भेहिं = तुम्हारे द्वारा वइल्लं-वैल को सत्तुयादुपालियं =दो पैली सत्तू गेण्हामि = लूंगा पिययरी-प्रियतमा दायव्वा=देना चाहिए भविस्सइ होगी. मनिस्सामि =मानूंगा आहूया=बुलाया किमयं = यह क्या संगहिओ=इकट्ठा हुआ समागयजणेण= आये हुए लोगों से ववहारनिच्छओ=न्याय का निश्चय महिलियं == महिला को अत्थेण = अर्थ से, धन से परिदिण्णो दिया . गृहकार्य के लिए अभ्यास-प्रश्न १. प्रस्तुत पाठ की कथावस्तु अपनी भाषा-शैली में लिखें। २. प्रस्तुत पाठ के आधार पर ग्रामीण एवं शहरी संस्कृति पर समीचीन प्रकाश डालें। ३. भोले-भाले ग्रामीण गाड़ीवाले से शहर के युवक गन्धी-पुत्र ने किस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया? दोनों के संवाद को अपनी भाषा- शैली में चित्रित करें। ४. इस पाठ से मिलनेवाली शिक्षा पर एक टिप्पणी लिखें। ५. निम्नांकित शब्दों के हिन्दी-रूप लिखें: गहवइ, सत्तुयादुपालियं, सगडं; गहिया, पंजरगयं, नेमि, लदियं, संगहिमओ, काहावणेणं, महिलियं, . घेत्तुं, मोयाविओ, वइल्ल, सह, सामि, परिदिण्णो। ६... व्याकरणबोधक-टिप्पणियाँ लिखें: अत्थि, सुंओ, वयणं घेत्तुं, तीए । .. .
( ११६ ) १०. पुत्तेहिं पराभविअस्स पिउस्स कहा (पुत्रों द्वारा अपमानित पिता की कथा) कथासंक्षेप : “जबतक पुत्रों को द्रव्य-सम्पत्ति प्रदान न की जाय, तभी तक वे वश में रहते हैं और द्रव्य-सम्पत्ति प्राप्त करते ही स्वच्छन्द होकर माता-पिता को दुःख देने लगते हैं।" किसी नगर में एक वृद्ध रहता था। उसके चार पुत्र थे। उस वृद्ध ने सभी पुत्रों का विवाह कर, अपनी धन-सम्पत्ति को चार भागों में विभक्त कर, सभी के लिए वरावर-वरावर दाँट दिया और स्वयं वह निश्चिन्त होकर धर्माराधना में संलग्न रहकर समय व्यतीत करने लगा। कुछ समय के बाद स्त्रियों के पारस्परिक वैमनस्य के कारण वे चारों पुत्र अलग-अलग रहने लगे। उस समय यही नियम बन गया कि वह वृद्ध प्रतिदिन वारी-बारी से एक-एक पुत्र के घर में जाकर भोजन करे। पहले दिन वह बड़े पुत्र के यहाँ भोजन करने के लिए गया । दूसरे दिन दूसरे पुत्र के घर गया। तीसरे दिन : तीसरे पुत्र के यहाँ और चौथे दिन छोटे पुत्र के यहाँ गया। इसी प्रकार, उसका समय सुखपूर्वक व्यतीत होने लगा। कुछ दिनों के वाद जब पुत्रवधुओं को उस वृद्ध से धन प्राप्ति की आशा न रही, तब उन्होंने उस वृद्ध को अपमानित करना प्रारम्भ कर दिया। वे पुत्रवधुएँ उससे कहने लगी : "हे ससुर, पूरे दिन घर में क्यों बैठे रहते हो ? क्या हमलोगों का चेहरा देखने के लिए ही बैठे रहते हो ? स्त्रियों के समीप पुरुषों का रहना उचित नहीं । तुम्हें लज्जा भी नहीं आती, खा-पीकर अपने पुत्रों की दुकान पर क्यों नहीं चले जाते ?' इस प्रकार, पुत्रवधुओं से अपमानित वह वृद्ध भोजन करने के बाद अपने पुत्रों की दुकान पर बैठने लगा। कुछ समय के वाद पुनों ने भी उससे कहा : "हे वृद्ध, यहाँ किसलिए आ जाते हो, वृद्धावस्था में तो घर में रहना ही श्रेष्ठ है। तुम्हारे दांत भी गिर गये हैं। आँखों की रोशनी भी चली गई है, शरीर भी कांपता रहता है; यहां दुकान में तुमसे हमारा कोई प्रयोजन भी पूरा नहीं होता, अतः घर पर ही ( ११७ . ) .... -- - . . रहा करो।" इस प्रकार, पुत्रों से भी तिरस्कृत होकर वह अपने घर पर ही रहने लगा। घर पर पुत्रवधुओं ने पुनः उसका तिरस्कार किया। पोते-पोतियाँ भी कभी उसकी कछौटी खोल देते और कभी उसकी दाढ़ी-मूंछ नोचने लगते। इस प्रकार, विविध रूपों से उस वृद्ध की हँसी उड़ाई जाने लगी। पुत्रवधुएँ भोजन में रूखी-सूखी कच्ची रोटियाँ देने लगीं। इससे पीड़ित और दुःखी होकर वह वृद्ध अपने मन में सोचने लगा कि 'अव मैं क्या, करू, कैसे अपने जीवन का निर्वाह करूँ ?' इस प्रकार, दुःख का अनुभव करता हुआ वह अपने एक स्वर्णकार मित्र के पास गया और उसे अपने अपमान का दुःख कह सुनाया तथा उसके निवारण का उपाय भी उससे पूछा वह स्वर्णकार मित्र वोला : "हे मित्र, पुत्रों में विश्वास करके तुमने अपना समस्त धन उन्हें दे दिया, इसी से तुम्हें यह दुःख भोगना पड़ा है। इसमें आश्चर्य ही क्या है ? अपनी भूल से जब तुमने यह काम किया है, तो फिर तुम्हें इसे स्वयं भोगना ही चाहिए।" तो भी, उसने मित्रता के कारण उसे एक उपाय बताते हुए कहा : “तुम जाकर अपने पुनों से इस प्रकार कहो कि 'मैंने अपने स्वर्णकार-मित्र के घर में रुपयों, दीनारों एवं आभूषणों से भरी हुई एक पेटी रख छोड़ी है। अवतक तो मैंने तुमलोगों को यह बात नहीं वताई, किन्तु अव मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ, इसीलिए धार्मिक कार्यों द्वारा सप्त- क्षेत्रों में अपनी लक्ष्मी का विनियोग करके परलोक का मार्ग ग्रहण करूंगा।' इस प्रकार कहकर तुम पुत्रों को रात्रि में ही पेटी ले आने की आज्ञा देना। पेटी में तुम मुझसे प्राप्त ये सौ रुपये रख देना और आधी रात के समय बार- बार उन्हें सैंकड़ों और हजारों बार वजा-वजाकर गिनते रहना, जिससे तुम्हारे पुत्र यह मानने लगें कि हमारे पिता के पास अभी वहुत धन है ।' इसी आशा से वे तुम्हारी पहले जैसी ही भक्ति करने लगेंगे। पुत्रवधुएँ भी पहले के समान ही तुम्हारा सम्मान करने लगेंगी। तुम सभी से यह कहना कि इस पेटी में बहुत-सा धन है, जिसे अलग-अलग पुत्र एवं पुत्रवधुओं के नाम लिखकर रख दिया गया है। मेरे मरने के बाद तुमलोग अपने-अपने नाम के अनुसार ( ११८ ) - निकालकर धन ले लेना।' इस तरह कहने के बाद धर्मकार्य करने के लिए तुम पुत्रों से धन लेकर धार्मिक कार्यों में खर्च करते रहना। किन्तु, मेरे इन सौ रुपयों को मत भुला देना, समय आने पर इन्हें लौटा देना।" वह वृद्ध मित्र द्वारा दी गई वुद्धि से सन्तुष्ट होकर अपने घर लौटा और रात्रि में ही पुत्रों द्वारा स्वर्णकार के घर से धन की पेटी मंगवाकर, उन सौ रुपयों को सैकड़ों, हजारों बार ठोक-ठोककर गिनने लगा। यह सुनकर पुत्र भी अपने मन में विचार करने लगे कि पिता के पास तो अभी बहुत धन है। यही वात उन्होंने अपनी-अपनी पत्नियों से भी कह सुनाई। उसी समय से वे पुत्रवधुएँ पुनः उस वृद्ध का बहुत सम्मान करने लगीं। वहुत अधिक स्नेह में पगकर वे 'पहले मैं भोजन कराऊँगी', 'पहले मैं भोजन कराऊँगी' इस प्रकार कहकर उसे अपने-अपने घर लाने लगी, और स्वादिष्ट एवं सरस भोजन देने लगीं। उसके वस्त्रों को वे स्वयं धोने लगी और पहनने के लिए शुद्ध धुले वस्त्र देने लगीं। इस प्रकार, उस वृद्ध का समय फिर सुख से बीतने लगा। पुत्रों से किसी एक दिन जब वह मरणासन्न हो गया, तब उसने अपने कहा : "मेरी धर्म करने की इच्छा है, इसलिए मैं सातों तीर्थक्षेत्रों में थोड़ा- थोड़ा धन दान करना चाहता हूँ।" पुत्रों को मंजूषा में रखे हुए धन के मिल जाने की आशा तो थी ही, इसीलिए उन्होंने उसकी इच्छा के अनुसार उसे धन दे दिया। उस वृद्ध ने भी धन को मन्दिरों के जीर्णोद्धार के लिए एवं अनेक सत्पात्रों में अपनी शक्ति के अनुसार दान कर दिया, और अपने परम मित्र स्वर्णकार को भी उसके वे सौ रुपये अपने हाथ से लौटा दिये । इस प्रकार, धार्मिक कार्यों में धन का व्यय करके उस वृद्ध ने मरणकाल में अपने पुत्रों एवं पुत्रवधुओं को बुलाकर पुनः कहा : “मैंने इस मंजूषा में सभी लोगों के नाम लिखकर धन रख दिया है, तुम लोग मेरे मरणोत्तर कृत्यों को पूरा करने के बाद अपने नाम से अंकित धन को ले लेना।" इस प्रकार कहकर वह वृद्ध समाधिपूर्वक मृत्यु को प्राप्त हुआ। पुनों ने भी उसके मरणोत्तर कार्यों को पूरा किया और स्वजनों को मृत्यु-भोज भी दिया। बाद में, प्रचुर धनप्राप्ति की आशा से सभी ने मिलकर ( ११९ ) जव उस मंजूपा को खोला, तभी उसमें अपने-अपने नाम के साथ एक-एक वस्त्र खण्ड में बंधे पत्थर के टुकड़े और सौ रुपये युक्तिपूर्वक बँधे हुए देखकर उन पुत्रों और पुत्रवधुओं ने चिल्लाकर कहा : "अरे, उस धूर्त वुड्ढे ने तो हमें ठग लिया ! किन्तु, यह ठीक ही है कि पितृभक्ति से विचलित एवं अविनीत हमलोगों के लिए तो यह सीख मिलनी ही चाहिए थी।" यह सोचकर वे सभी दुःखी हो गये। उपदेश : धनप्राप्त पुत्रों से पिता के पराभव को सोचकर, वृद्धावस्था में उसी प्रकार कार्य करना चाहिए, जिससे सुखपूर्वक रहा जा सके । कठिन शब्दों के अर्थ • - आज्ञाकारी .. विइण्णं वितरण किया गया वेमणस्सभावेण = वैमनस्य-भाव से वसंवया भिन्नघरा=अलग-अलग घर सच्छंदा- स्वच्छन्द पइदिणं प्रतिदिन दुक्खदायगा=दुःखदायक पइघरं=प्रतिघर एगवुड्ढस्स=एक वृद्ध का भोयणाय =भोजन के लिए चत्तारि-चार वारगोवारी थविरो= वृद्ध; स्थविर कणिट्ठस्स=छोटे का परिणाविऊण = विवाह कराकर अहिलं =अखिल, समस्त नियवित्तस्स =अपनी सम्पत्ति का अम्हाणं -हमारा चउभाग. =चार भाग, चार हिस्से पासिउं-देखना अवमाणिज्जइ=अपमानित किया जाता थीणं-स्त्रियों का मुहाई=मुख आदि आगज्छज्जा आये अप्पियं-दे दिया, अर्पित किया गच्छिज्जसुजाओ धम्माराहणतप्परो=धर्माराधन में तत्पर वसणमेव = रहना ही इत्थीणं-स्त्रियों का दंता-दाँत - - ( १२० .) % 3D पडिआ= गिर पड़े पराभविज्ज अपमानित होकर अक्खितेयं = आँखों का तेज, आँखों की दुहुमणुभवंतो=दुःख अनुभव करता हुआ रोशनी सुवण्णगारस्स-स्वर्णकार का कंपिरमत्थि = काँपता है नित्थरणुवायं-निस्तार (उवरने) का पओयण-प्रयोजन उपाय निक्कासेइरे-निकाल दिया वीसास-विश्वास कच्छुट्टियं = कछौटी को धणमप्पि-धन दे दिया. मंसु-मूंछ को चोज्जं-आश्चर्य दाढियं दाढ़ी को सहत्थेण = अपने हाथों से करिसन्ति = खींचते हैं (थे) रणरणयारपुव्वं = झनझनाहट के साथ भोत्तव्वं खाना चाहिए गणेयव्वं- गिनना मित्तत्तण-मित्रता के कारण मन्निस्संति-मानेंगे रुप्पयरुपए अज्जावि-आज भी दोणार-दीनार नामाई नाम आदि भूसणेहिं आभूषणों से ठवियमत्थि- रखा है भरिआ-भरकर नियनिय अपने-अपने जराजिण्णो-जरा से जीर्ण नामवारेण = नाम के अनुसार सद्धम्मकम्मणा=सद्धर्मकार्य से गहिअवंले लेना सत्तक्खेत्ताईसु-सात तीर्थक्षेत्रों. धम्मकरणत्थं धर्म करने के लिए 'आदि में.. सद्धम्मकरणे-सद्धर्म करने में लच्छीए= लक्ष्मी का विणिोग= विनियोग, खर्च विविह विविध गिहिस्सं ले लेना पगारेहि-प्रकारों से. गुणा करने से गणिति = गिनता है अपक्कं कच्चा; अपक्व विआरिति-विचारते हैं। रोट्टगं-बड़ी रोटी सम्माणिति सम्मान देते हैं + गुणणेण रुक्खं - रूखा-सूखा ( १२१ ) सएव-सदैव निव्वंधण =बँधने से, स्नेह से गच्चा-जाकर अहमहमि गयाए =पहले मैं, पहले मैं, दससहस्साई=दस हजार इस आग्रह से सुपत्ताईसुं=सत्पात्रों में साउं-स्वादिष्ट जहसत्तीए=यथाशक्ति नियहत्थेण = अपने हाथ से पक्खालिति-धोते हैं रुप्पयसयं-सौ रुपये परिहाणाय =पहनने के लिए पच्चप्पेइ वापस करता है वत्थाईवस्त्र आदि जहनाम=यथानाम नाइजणं =जाति के लोगों को मच्चुकिच्चं = मृत्युकर्म जेमाविऊण-जिमाकर धुविआई=धुले हुए उग्घाडिति = उघाड़ते हैं, खोलते हैं आसन्नमरणोशीघ्र मरण नामजुत्तपत्तेहिं = नाम से युक्त पिअरस्स=पिता का कागजों से पयट्टेज्जा=प्रवत्तित होवे वेढिए-वेष्टित; लिपटे सुहं सुख को वंचिआ =वंचित हो गये, ठगे गये तम्मज्झमिउसके वीच में पाहाणखंडे =पाषाणखण्ड पत्तवित्त =प्राप्त वित्तवाला पिउभत्ति= पिता की भक्ति वावरियव्वं = खर्च करना परंमुहाण= पराङ्मुख, विपरीत विस्सारियव्वं = भुला देना दुहिणो= दुःखी अविणय = उद्दण्डता गुहकार्य के लिए अभ्यास-प्रश्न १. प्रस्तुत पाठ की कथावस्तु अपनी भाषा-शैली में प्रस्तुत करें। २. प्रस्तुत पाठ से मिलनेवाली शिक्षाओं पर प्रकाश डालें। ३. प्रस्तुत पाठ के आधार पर वृद्ध पिता एवं उसके पुत्रों तथा पुत्रवधुओं के व्यवहार की समीक्षा करें।
( १२२ ) ४. स्वर्णकार मित्र ने वृद्ध पिता की किस प्रकार सहायता की ? आप उसके द्वारा बताये हुए उपाय की प्रशंसा करेंगे अथवा निन्दा ? सरल भाषा में. उत्तर दें। ५. कथा के विकास में स्वर्णकार-मित्र का स्थान निर्धारित करें। ६. निम्नांकित शब्दों का हिन्दी-रूप लिखें: विइण्णं, लिहिऊण, वसंवया, गच्चा, वसणं, वावरियध्वं, हट्टे, आणाविऊण, अक्खितेयं, रुप्पगसयं, थेरो, साउं, मंसु, अप्पणो, करिसंति, वोल्लाविऊण, रुक्खं, पच्छा, अपक्कं, वेढिए, चोज्जं, सुहं । ७. व्याकरणबोधक टिप्पणियाँ लिखें: जत्य, तेणं कालेणं, पासिऊण, होत्था, तम्मि, पगढिज्जमाणे । - ११. मारियासीलपरिक्खा ( भार्या के शील को परीक्षा) कथासंक्षेप : अवन्ती-जनपद की उज्जयिनी नाम की नगरी में सागरचन्द्र नाम का एक सार्थवाह (वड़ा व्यापारी) रहता था। वह भागवत-सम्प्रदाय का उपासक था। उसके पुत्र का नाम था समुद्रदत्त । पिता ने समुद्रदत्त को पढ़ाने के लिए एक परिव्राजक (संन्यासी) की.. नियुक्ति की । वह परित्नाजक कुसंस्कारी था। एक दिन समुद्रदत्त ने अपनी माँ के प्रति उसका असभ्य आचरण देख लिया। उसी दिन से स्त्रियों के प्रति विरक्त समुद्रदत्त ने अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा कर ली। एक बार सागरचन्द्र व्यापार करने के उद्देश्य से सौराष्ट्र के गिरिनगर (गिरनार) नाम के नगर में गया। वहाँ अपने एक साथी की धनश्री नाम की सुन्दर कन्या को अपनी बहू बनाने का उसने निर्णय कर लिया और विवाह : की तिथि पक्की करके अपने घर लौट आया।
( १२३ ) उसने विवाह की बात समुद्रदत्त को न बताकर उसके साथियों से कही। वे साथी भी समुद्रदत्त को फुसलाकर गिरिनगर ले गये और वहाँ उन्होंने वलपूर्वक उसका विवाह धनश्री के साथ करा दिया। - समुद्रदत्त ने दवाव में आकर विवाह तो कर लिया, किन्तु इच्छा के विपरीत कार्य हो जाने तथा धनश्री के शील की परीक्षा करने के निमित्त वह अगले ही दिन विना किसी को वताये, वहाँ से चुपचाप भाग गया। उसके साथियों एवं ससुर ने उसकी बहुत खोजवीन की, किन्तु उसका कुछ पता नहीं चला। इधर, समुद्रदत्त ने अज्ञात प्रवास में रहकर दाढ़ी-मूंछे बढ़ा लीं और अपना वेश ददल लिया। संयोग से उसके ससुर को एक माली की आवश्यकता थी और समुद्रदत्त ने गुप्त वेश में उसके यहाँ माली का काम करना प्रारम्भ कर दिया। वहाँ समुद्रदत्त ने सभी को अपना नाम 'विनीतक' बताया। विनीतक की चतुराई और कार्यदक्षता से सभी प्रसन्न थे। ससुर. ने उस माली को धीरे-धीरे अपनी दुकान का; उसके बाद अपने घर के भाण्डार का संरक्षक वना दिया। फिर, अत्यन्त विश्वस्त जानकर उसे अपनी पुत्री के सेवक के रूप में नियुक्त कर दिया। एक दिन धनश्री महल के छज्जे पर विनीतक से बातचीत कर रही थी। उसी समय एक डिण्डी (आरक्षी-पदाधिकारी) धनश्री को देख उसकी सुन्दरता पर मोहित हो गया और उससे परिचय करा देने के लिए वह विनीतक को डराने- धमकाने और फुसलाने लगा। विनीतक तो धनश्री के शील की परीक्षा लेना चाह ही रहा था। उसने यह उपयुक्त अवसर समझा। अतः; उसने डिण्डी की इच्छा धनश्री को वताई। धनश्री ने पहले तो विनीतक को बुरी तरह डाँटा-फटकारा और उसे डिण्डी से कभी वातें नहीं करने का आदेश दिया। किन्तु, वाद में कुछ विचार करके उसने डिण्डी को अपनी अशोकवाटिका में बुलवाया । डिण्डी उसका सन्देश सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ।
( १२४ ) गया था। धनधी योगमद्य के साथ अशोकवाटिका में पहुंची और उसने डिण्डी को अतिशय मद्यपान कराया, जिससे वह वेहोश हो गया। तभी, धनश्री ने डिण्डी के ही खड्ग से डिण्डी का वध कर दिया । विनीतक धनधी के इस साहसी व्यवहार से मन-ही-मन वड़ा प्रसन्न हुआ। क्योंकि, उसे उसके शीलव्रत के पालन करने का प्रत्यक्ष उदाहरण मिल अतः, उसने अपना गुप्त वेश हटाकर अपने पूर्वरूप को प्रकट कर दिया और धनश्री साथ सुखपूर्वक रहने लगा। लोककया-तत्त्व : 'भार्याशीलपरीक्षा की कथा एक प्राचीन भारतीय सरस लोककथा है। इसे आचार्य संघदास गणी द्वारा रचित 'वसुदेवहिण्डी' नामक कथा- ग्रन्थ से आकलित किया गया है । यों तो, प्राकृत की सभी कथाओं में लोककथा के तत्त्व पाये जाते हैं, पर 'वसुदेवहिण्डी' की अधिकांश कथाएँ लोककथाएँ ही हैं । 'हिण्डी' शब्द का अर्थ ही है-धूमना-भटकना । अतः, यह शब्द इस बात का साक्षी है कि वसुदेव ने विविध यात्राएँ करके अपने जीवन में जो अनुभव संचित किये थे, उन्हीं अनुभवों को परम्परा से प्राप्त करके लेखक ने उक्त ग्रन्थ में आवद्ध किया था। 'वसुदेवहिण्डी' की समस्त कथाओं की समीक्षा तो यहाँ सम्भव नहीं, किन्तु उक्त भार्याशीलपरीक्षा की कथा, जो कि पाठ्यक्रम में निर्धारित है, उसी पर संक्षेप में विचार किया जा रहा है। प्रस्तुत कथा में अभिजात-कथा और लोककथा, इन दोनों प्रकार के कथा- तत्त्वों का मिश्रण हुआ है। अभिजात-कथा में सेठ, साहूकार और राजा- महाराजाओं के वैभव, उनके रहन-सहन और आचार-विचार-सम्बन्धी तत्त्व पाये जाते हैं। 'वसुदेवहिण्डी' में इन कथातत्त्वों का विन्यास संस्कृत के उपन्यास-ग्रन्थ 'कादम्बरी' और 'दशकुमारचरित' की शैली में ही हुआ है। अतः, भार्याशीलपरीक्षा' के कथातत्त्व अभिजात कथातत्त्व से ही सम्बन्ध रखते हैं। लोककथा-तत्त्व की दृष्टि से इस कथा में यथानिदिष्ट तत्त्वों का समावेश हुमा है:
( १२५ ) १. लोकमानस का आदिम रूप : इस कथा में लोकमानस का आदिम रूप प्रतिफलित हुआ है। प्राचीन मानव प्रकृति के जिन रहस्यों और चमत्कारों पर विश्वास करता था, इस कथा में भी वे चमत्कार वर्णित हैं। जिस प्रकार लोककथाओं में वालक जन्म लेकर कव वड़ा हो जाता है, यह पता नहीं लगता, उसी प्रकार, कुछ ही दिनों के वाद वेश बदलकर सागरदत्त जव ससुराल लौट आता है, तब ससुरालवाले उसे पहचान नहीं पाते। आश्चर्य तो यह है कि इतने परिमित काल में ही उसके बाल इतने अधिक बढ़ जाते हैं कि जिससे वह पूरा संन्यासी ही प्रतीत होने लगता है। किन्तु, यह कैसे सम्भव है ? अतः; लोकमानस के आदिम रूप की इस कथा में स्वाभाविक झलक मिलती है। २. अप्राकृतिक घटनाएँ : यथा; शीलवती नारी के रूप में रहकर भी धनश्री का एक अज्ञातकुलशील भृत्य. से हँस-हँसकर वार्तालाप करना, उसे विश्वासी समझना आदि । ३. श्रद्धा : यथा; विवाह के तुरन्त वाद भाग जाने पर भी धनश्री का अपने पति के प्रति आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास का पूर्ववत् वना रहना। ४. उपदेशात्मकता : यथा, डिण्डी द्वारा बार-बार बुलाये जाने पर भी विनीतक को धनश्री द्वारा उसके पास न जाने का उपदेश देना। इसी प्रकार, अन्य कथातत्त्व भी प्राप्त होते हैं। जैसे : ५. कथाशैली की प्राचीन रूढ़िवद्धता; ६. पात्रों का प्रेय से श्रेय की ओर प्रस्थान ७. कुतूहल और मनोरंजन; ८. स्वस्थ शृगार-भावना; ६. रहस्यात्मकता; १०. नारी के छल-कपटमय आचरण और ११. अद्भुत तत्त्व। इनसे यह स्पष्ट है कि भार्याशीलपरीक्षा' एक लोककथा है।
( : १२६ ) चरित्न-चित्रण : 'भार्याशीलपरीक्षा' कथा की प्रमुख नायिका धनश्री है। उसका जैसा अद्भुत चित्रण इस कथा में प्राप्त होता है, वैसा अन्यत्र शायद ही प्राप्त हो सके। उसमें वे सभी गुण मिलते हैं, जो एक भारतीय नारी के लिए आवश्यक एवं अनिवार्य माने गये हैं। पतिभक्ति, आत्मविश्वास, निर्भीकता, दृढशीलता, कार्यकुशलता, चारित्रिक उत्कर्ष, नैतिक बल, व्यवहारज्ञता आदि "उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएं हैं। प्रस्तुत कथा में धनश्री उस समय रंगमंच पर उपस्थित होती है, जब कथा का पूर्वार्द्ध समाप्त हो जाता है। धनश्री से उसका सम्बन्ध जोड़ने के लिए उसे इसकी भूमिका माना जा सकता है। रंगमंच पर आने के बाद फिर वह अन्त तक कथा में वर्णित समस्त घटनाओं पर छाई रहती है। उसके चरित्र-सम्बन्धी तथ्यों को निम्नांकित प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है : पतिव्रता धनश्री : वह एक धनी सार्थवाह की बेटी है तथा सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं में पलकर सर्वगुणसम्पन्न बनी है। उसका पिता उसका विवाह उज्जयिनी के एक ऐसे सार्थवाह-पुत्र के साथ सुनिश्चित कर देता है, जिसे उसने कभी देखा-सुना भी नहीं था। फिर भी, वह कन्या उसे ही अपना -सर्वस्व मानने लगती है। यह उसके पतिव्रता होने का सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है। कष्टसहिष्णु धनधी : समुद्रदत्त धनश्री के घर पहुँचता है और दोनों का विवाह कर दिया जाता है । जव वे नव वर-वधू सुहागरात्रि के समय मिलते हैं, तभी अवसर पाकर समुद्रदत्त धनश्री को चकमा देकर भाग जाता है। निस्सन्देह, यह दुर्घटना भारतीय नारी के सुकोमल हृदय के लिए घोर वज्रपात से कम नहीं, किन्तु इस वेदना को वह अपने अन्तस्तल में छिपाये हुए जिस किसी प्रकार कठिनाई से समय व्यतीत करती है। यहाँ उसकी कष्टसहिष्णुता चरम सीमा पर पहुँचती दिखाई पड़ती है। शीलवती धनधी : दाढ़ी-मूंछ, नख, केश आदि बढ़ाये हुए दरिद्र के वेश में जव समुद्रदत्त धनश्री के पिता से नौकरी की' याचना करता है और उसे नियुक्त भी कर लिया जाता है, तब वहाँ समुद्रदत्त विनीतक के नाम से जाना ( १२७ ) - "जाता है। वह अपने मधुर एवं विनोदी स्वभाव, ईमानदारी, कार्यकुशलता आलस्यहीनता आदि गुणों के कारण परिवार के सभी लोगों के साथ-साथ धनश्री का भी विशेष विश्वासपात्र बन जाता है। विनीतक से घनिष्ठता के कारण धनश्री के चरित्र-स्खलन के लिए पर्याप्त अवसर उपस्थित हो सकते थे; किन्तु, वहाँ भी वह निष्कलंक रहती है, यह उसके चरित्र की विशेषता है। निर्भीक एवं साहसी धनश्री : उज्जयिनी का एक डिण्डी (आरक्षी-पदा- धिकारी) धनश्री के सौन्दर्य पर आसक्त हो जाता है। वह विनीतक (समुद्रदत्त) को माध्यम बनाकर अपना स्वार्थ पूरा करना चाहता है। जब डिण्डी अपनी उतावली के कारण विनीतक को अधिक कष्ट देने लगता है, तब धनश्री से यह सव छिपा नहीं रह पाता । अतः, धनश्री इस काँटे को शीघ्र ही निकाल डालने का संकल्प कर लेती है। वह विनीतक द्वारा सन्देश भेजकर उस डिण्डी को अपनी अशोकवाटिका में बुलवाती है और वहाँ समाज के कलंक एवं विषय- वासना के कीट-स्वरूप उस डिण्डी का निर्ममता के साथ वध कर डालती है। वध करना यद्यपि अधम कोटि का काम है, तथापि अपने शील-संरक्षण एवं अपने भृत्य (विनीतक) के कुशल-क्षेम के लिए वह उस कृत्य को भी आवश्यक समझती है। . इस घटना से धनश्री की व्यवहारकुशलाता एवं साहस की सूचना मिलती है। यदि धनश्री चाहती, तो डिण्डी की शिकायत अपने पिता अथवा राजा से करके उसे दण्डित करा सकती थी, लेकिन इसमें डिण्डी की शिकायत के साथ ही स्वयं उसके चरित्र की बदनामी भी सम्भव.थी, इसीलिए उसने वह साहसिक कार्य अपने हाथों से ही कर डालना उचित समझा.। इस प्रसंग में उसका आत्म: विश्वास, दूरदर्शिता, व्यवहारज्ञता, निर्भीकता एवं साहस प्रशंसा के योग्य है। इस प्रकार, धनश्री का चरित्र प्रारम्भ से अन्त तक अतिशय उदात्त और अवदात रूप में प्राप्त होता है। भारतीय नारी का. तो पति ही सर्वस्व है, उसके प्रति आत्मसमर्पण ही उसके जीवन का परम लक्ष्य और सर्वोत्कृष्ट ऋद्धि-सिद्धि है तथा पति का वियोग ही उसके जीवन का घोर अन्धकार एवं महान् दुर्भाग्यपूर्ण ..
( . १२८ ) संकट है । ऐसी स्थिति में भी धनश्री अत्यन्त दुःखी रहने के बावजूद रुदन और विलाप के साथ हाय-हाय करते हुए आकाश को सिर पर नहीं उठाती। अपनी इस कष्टसहिष्णुता से वह पाठकों की सहानुभूति बरवस स्वायत्त कर लेती है। समुद्रदत्त की संक्षिप्त चारित्रिक विशेषताएं: १. पलायनवादी-जो सांसारिक भोगों को न भोगता है और न छोड़ता ही है। . २. प्रारम्भ में गृहस्थी के प्रति अनुत्तरदायी, किन्तु अन्त में उसकी इस दशा में सुधार हो जाता है। ३. प्रत्युत्पन्नमति-परिस्थितियों के अनुसार बुद्धि का स्फुरण। ४. परीक्षक एवं कष्टसहिष्णु-धनश्री के शील की परीक्षा के लिए वह स्वयं को कष्ट में डाल लेता है । ५. कर्तव्यशीलता। कठिन शब्दों के अर्थ रिद्धिस्थिमियसमिद्धा-ऋद्धि और एयाओ=ये (स्त्रियाँ) समृद्धि से सम्पन्न निव्वंधं करेइ=निश्चय करता है दसदिसिपयासो-दसों दिशाओं में समत्तकलस्स-कलाप्राप्त (समुद्रदत्त) के प्रसिद्ध दारियामओ-लड़कियाँ अत्तओ-आत्मज.. वरेइपसन्द करता है ठवइ-रखा पडिसेहेइ-नापसन्द, निषेध कर देता है अण्णपासंडियदिट्ठी अन्य धर्मों की वच्चइबीतता रहा पाखण्डपूर्ण दृष्टि सुरढदेसं सौराष्ट्र देश को हवेज्जा हो जाय ववहारेणं- व्यापार के निमित्त फलगं-लेखनपट्टिका, स्लेट धूयं-पुत्री को असम्भं-आयरमाणी=असम्य आचरण पडिरूवेण सुकेणं = उचित शुल्क करते (कन्यानिरीक्षण-शुल्क) के साथ वीराग-वैराग्य अन्नायं-अज्ञात . ( १२९ ) वाला, माली रात में .. तिहिगहणं काऊण =तिथि निश्चित आरामगओ=बगीचे में उपस्थित करके आरामकम्मकरो- उद्यानकर्म करने- भंडं=धन (माल) सवयंसो-मित्रों-सहित, साथियों सहित भत्ति = वैतन विणिओग=लेनदेन भईए-वेतन से वोत्तूण = कहकर तुट्ठीदाणं = तुष्टिदान ठाइऊणं ठहरकर देज्जहदें, देंगे पेसिओ=भेजा, प्रेषित किया पडिस्सुए स्वीकृति देने/मिलने पर आवासिया ठहराया आरद्धो-आरम्भ रत्तीए: रुक्खायुब्बैय =वृक्षायुर्वेद ववएसेणं = बहाने से, व्याज से सव्वोउय =सभी ऋतुएँ पइरिक्कं = एकान्त आय-वय-आय-व्यय चम्मदि-चकमा अच्छंतेण == रहते हुए दाऊण-देकर आवारीए दूकान में वयंसाण =साथियों के ठवियो- रखा सुत्तो=सो गया आपणे = दुकान में पभायाए रयणीएरात बीतने और गंधजुत्ति =इन तैयार करने की कला सुवह होने पर निउणत्तणेन = नैपुण्य के कारण अदिट्ठओ नट्ठो= नजर बचाकर गायव वीससणिज्जो विश्वसनीय हो गया हीरइहरण करा लेगा, वुलवा लेगा मग्गिओ-खोजा सद्दावेऊणः बुलवाकर आपुच्छिऊण = अनुमति लेकर आणा=आज्ञा हिंडिऊण = भ्रमण करके वीसंभट्ठाणिओ= विश्वसनीय कप्पडियवेशछण्णो भिखमंगे. का : डिंडी-आरक्षी-पदाधिकारी -प्रच्छन्न वेश धारण करनेवाला, 'पुव्वावरण्हसमए दिन के अन्तिम प्रहर में कपट-वेशधारी "अट्टालवरगया == ऊँची अटारी पर बैठी ( १३० ) वाद में, पश्चात् . तंबोल संमाणयंती-पान चवाती हुई गिहिऊण = लेकर पहाय-समालद्धी-स्नात और अलंकृत अच्छा प्रतीक्षा करने लगी निच्छूढं -- फेंका गया; छोड़ा गया तस्सेव संतियं - उसी के पास स्थित समागमुस्सुओ= समागम के लिए उत्सुक कड्ढिळण = खींचकर संवुत्तो-हो गया पच्छा- सवप्पवेसो-सर्वत्र प्रवेशवाला अणत्थं -अनर्थ उवतप्पामि = पास जाता हूँ, सन्तुष्ट मरिसाविया क्षमा मांगी करता हूँ निहिओ= गाड़ दिया, डाल दिया एयं- यह सुहासणवरगया - श्रेष्ठ सुखासन पर बैठी संलत्तं-कहा, वोला दिना=दी गई हो विइयदिवसे= दूसरे दिन वच्चामि = जाता हूँ धत्तीहं = उपाय ढूंढ़ रहा हूँ. गवेसित्ता-खोजकर संगहियं करेत्ता-सम्मान करके कयंसुपाएहि = अश्रुपात करके विसज्जिओ-विदा किया उवगूहिओ-आलिंगन किया विमणा-उदास लेहो-लेख, चिट्ठी तुण्हिक्को सद्धि-साथ आमं-हाँ गूहतो-छिपाते हुए चित्तरक्खं मनोभाव. की रक्षा अप्पाणं-अपने को करेंतीए करती हुई दरिसेइ-दिखाता है पोसे-शाम में, साँझ होने पर : कयं-किया पच्छण्णदीवं छिपे हुए दीपक को सेज्ज पत्थरेऊण -विछावन विछाकर ठवेऊण = रखकर जोगमज्ज-योगमद्य (नशीली चीजों. णाए = इस (स्त्री) द्वारा को मिलाकर बनाई गई श राव) संवादितं- बता दिया गृहकार्य के लिए अभ्यास-प्रश्न १. “भारियासीलपरिक्खा' शीर्षक की सार्थकता सिद्ध करते हुए प्रस्तुतः पाठ की कथावस्तु अपनी भाषा-शैली में प्रस्तुत करें। चुपचाप विज्झवेऊण = बुझाकर
. .
( १३१ )
२. 'भारियासीलपरिवखा' नामक कथा में उपलब्ध लोककथा-तत्वों पर
संक्षिप्त प्रकाश डालें।
३. धनश्री का चरित्न-चित्रण करें
४. समुद्रदत्त एवं सागरदत्त के चरित्नों पर अलग-अलग संक्षिप्त टिप्पणियाँ
लिखें।
५. निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी-रूप लिखें:
जणवओ, करेमाणो, नयरी, फलगं, तस्स, निबंध, इन्भो, भज्जा,
नट्ठो, दारगं, भत्ती, परिव्वाय गस्स, पसाद, हवेज्ज, नामधेयं, डिण्डी।
६. व्याकरणबोधक टिप्पणियां लिखें:
, भारिया, ठवियो, विट्ठो, पत्ता, पच्छा; तीए, होमि, कओ, दिण्णं,
कायव्वो, सुणिऊण, नीसरिऊण ।
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शुद्धिपत्र पंक्ति पृष्ठ शुद्ध : जायंति .४. २० ४ वहूए ६ अशुद्ध जाति बहूए उत्त निरवेढण गाभिल्लओ उत्तं ૧૧ सिरवेढण १७ ६ गामिल्लओ १९ १ मत्तिस्स मंतिस्स ३१ १२. दिद्रुतं १ ३९ दिट्ठतं