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Dashkumaracharit Bhasha

Pandit Ramsvarup Shudlen · 2009/09

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॥ श्रीगणेशाय नम: ना.
परिवर्तिनि संसारे मृतः कोवा न आयते ।
सजातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ॥
* दशकुमारचरित भाषा *
पंडित रामस्वरूप शुक्लेन
सङ्क्षिप्तकाव्य मवलम्व्य निर्मितासेयम् ।
मुरादाबादे
"लक्ष्मीनारायण" मुद्रणालये मुद्रिता.
पता-पंडित रामस्वरूपशुक्ल
बीच कठगर
मुरादाबाद.
जनवरी सन् १९००
प्रथमबार १०००
533

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भूमिको। दोहा-सिये सुमिर पग कमलको, यातें विघ्न न होय । दशकुमार या काव्यकी, भाषा रच्यों बनाय । मभ्यवर ! उक्त दशकुपारचरित कान्यके रचयिता भीमान् दण्ड्याचार्य जी हैंस नोंने अपने इस काव्य में पद कालित्यता दर्शायी है अर्थात् जिनके उच्चार- ण करने से वाणीकी विचित्र शोभा होती है, संसारमें जन्म लेने के यही दो फल हैं कि काव्यामृत रसस्वादं संगमंसुजनासह, अर्थात् सुन्दर काव्यरूपी अमृनको पान करना और सज्जनों की संगति करना यदि इस पवित्र कलिं- मज दहन जीराग्रगण्यदेह मेष को धारणकर विविध प्रकारके किरातार्जुनीय मायादि काव्यों को नहीं दृष्टिगोचर किया तो इस शरीरका धरना वृथा है कारण कि-इनका मर्म इतना सहज करदिया है कि-जिन के अनुवादको देख साधारण मनुष्य भी भली प्रकार समझसता है परंतु ब्राह्मण जातिपर यह दशा है कि-जिनके बालक संस्कार विहीन हो (संस्कृत) विद्याका नाममात्र न यावनिक अंग्रेजी भाषाध्यन करनेमें कटि पद रहते हैं ठीक है कि हमारे प्राचीन ऋषि मुनियोंके गर्भाधान पुस्चनादि क्रिया करने का यही फल था कि जिससे उनकी वृदि वाल्यावस्था सेही मुघरती रहै परंतु हा शोक ! आज कलिकाल में वह रीति लप्त होगई और अनेक प्रकार के मत प्रचलित होगये इसीकारण मनुष्यों की मवि भ्रम में पडगई शिवादि की प्रतिमामृत पूर्व जीवों का श्राद्ध करने का निषेध जोकि प्राचीन महर्षियों ने निर्माणकर कर्म विधि कथन की है उसे धूताने लुप्त कर ने की कमेटीवनाई है उसका यही कारण है कि वे जन्मसेही कुसंस्कार विहितहैं ।। हमने इस ग्रंथ का भापानुवाद इसकारण निर्माण किया कि यह ग्रंथ क्लिष्ट होने के कारण हर किसी की समझ नहीं आताथा और अतिविस्तृतथा तो इसकी संक्षिप्त सरलपापा बनाई जिसकारस हरेक पानकर लाभ उठावें परंतु इसके मुद्रण समय में तुच्छ गनुप्यों ने चंडं २ विघ्न डालने चाहे बहुतही १-हमने इस ग्रंथ के ५ सर्ग का भाषा परीक्षावाले विद्यार्थियों के लाभार्थ बनाया है वह कल्याण बंबई में छपा है इच्छा है कि पूर्ति करेंगे ।

(२) कुकरधोंस की कुछभी न हुआ, कारण कि विघ्न विनाशाय मंगलमाचरेत्- इस पंक्ति के अनुसार हमने पूर्व में ही मंगलाचरण कररखाथा इस से यो. ग्यो कि सबही अपने प्रयके पूर्व मंगलाचरण करें, नीच पुरुषों की यह प्रकृति है कि वे उच्चपदचीको पाकरभी अपनी स्वाभाविक कुल क्रमागव तुच्छेता को नहीं छोड़ते जसे कोई शृगान किसी रंगेज के रंगमें गिरपड ने से नीलवर्ण युक्त होगया भारण्य में गया तो सब देखकर भाग उसने चि- ल्लाकर कहा कि मुझे साक्षात् ईश्वर ने इस बनका राजा बननेको भेजा यह सुन सब जीवों ने निकट आय राज्यदिया एक समय सब सिंहादि उ. सके भृत्य बने बैठे थे आपने गीदडों का शब्द सुना तो वह भी इबा २ ऐसा कोलाहल करनेळगा, वस हमको इतनेसेही प्रयोजन या शेष हमारे निर्मा- ण किये संस्कृतसागर गूथ में देखलो और विशेषकर जिसने ऊंचा बनाय जात्यादि की गणना में कररख्खा है और भुर्जी आदि शब्द छिपार- ख्खे हैं उन के विषय ही विघ्नेच्छा होती है इस में भी, हम को एक दृष्टान्त स्मरण हुआ मुनिये जी ! किसी तपोवन में कोई महर्षि रहतेथे एक समय उनके समीप कुटीस्थ मूषक, विडालको देख भागा. यह देख ऋषिने दयां से तप प्रभाव द्वारा विलावही बनाया फिर भी दैव दुर्विपाक से कोई कुत्ता आया उसे देख यह भागा तो ऋषिने इसे अपने तपोबल से इसको कुत्ता बनादिया एक समय सिंह को देख वह भागने लगा तो ऋषिने उसे गेर पनादिया तव इसके मन में यह अहंकारोत्पन्न हुआ कि यद्यपि मैं इस दशा में सिंह हूं तथापि लोग यही कहेंगे कि चहे से इस ऋषिने उसको सिंह वनादिया इस से प्रथम इन ऋषिकोही भोजन करूं यह विचार उन के ऊपरको चला तभी ऋषिने उसे शाप दिया कि चहा हो उनके शापसे बह फिर भी चूहा होगया, यहां अब कोई जाति में नहीं बूझता इत्यादि उदाहरण अच्छीमकार समझ लो ॥ पं० रामखरूप शुक्ल. (बीव) कठगर मुरादाबाद.

EM श्रीः॥ इराकमार चरित। (केवल भाषा) -- मंगलाचरणम् । बन्देमुरारिंकिलकुंडलाभ्यां नृत्यंतमाभूषितकर्णभागम् विनोदभूतामपितस्यराधामनोज्ञवीणारवमोहितांताम् एक मगधदेश में पुष्पपुरी का राजा राजहंस था उसकी वसुमती स्त्री थी, धर्मपाल पद्मोद्भव, सितवर्मा यह तीन मंत्री थे, धर्मपाल के सुमंत्र सुमित्र कामपाल प- मोद्भव के सुश्रुत रत्नोद्भव सित वीके सुमति सत्यवर्मा, यह पुत्र उत्पन्न हुये सत्यवर्मा संसारको असार जान देशा न्तरको चलागया कामपाल किसीकी आज्ञान मान वेश्या संगमादि करनेलगा रलोद्भवभी वाणिज्यमें निपुणहो अन्य देशमें चलागया और सब मंत्रि पुत्र पिताओं के पितृलोक जानेपर निजर धर्ममें तत्पर हुये थोड़ेही दिनोंपीछेराजा राज हंसका मानसार के साथ परस्पर द्वन्द युद्धहुआ तबही राज हंसने मानसारको पराजयकर दयासे फिरभी उसका राज्य उसीको देदिया एकसमय सिंहासनपर बैठेहुए राजाको एक गूढ़ पुरुष वर्णलिङ्गी आकर निवेदन करनेलगा देव ! मानी मालवेंद्र आपसे पराजय को प्राप्त हो शिवका आराधन कर एक वीरघातिनी गदापाय फिर युद्ध में कटिवद्ध होरहा है आपका शत्रु देवसहाय युद्धको अाताहै इसले अव युद्ध कर- (२) ना योग्य नहीं इस प्रकार मंत्रियों से बहुवार कहाहुआ भी राजा उनके वाक्यको न मान अखर्व गर्वसे युद्धको संनद्ध हुआ जातेही उस प्रचण्डवल शत्रुको झटही रोकादिया फिर विजयाभिलाषी मालवेंद्रमगधेन्द्रके ऊपरउस शिवदत्त गदा का प्रहारकियाकिसीतरह घोड़ेरथले राजाको एक विंध्याटवी में लेगये विजय श्रीसनाथ मानसारभी उस अनाथ राज्यको निज अधिकार में करलिया इसतरह पराजितहुये राजहंसने ऋषिवामदेवके आश्रममें प्रवेशकिया और कहाभी भगवन् ! मालवेंद्र प्रवल देववलले सुझको जीत अभीतहो राज्य कर- रहाहै सो मैं भी जैसे उसको जीतूं वह यत्न वताइये यह सुन मुनि बोले राजन् कुछदिन धैर्य कीजिये लकल रिपुकुल म. ईन. राजनंदन देवी के गर्भ में हैं राजा यह मुनिका वचन मान मौनहो स्थित रहा कुछदिनों वाद सुमती जो वसुभती सो सुकुमार कुमारके तुल्य पुत्रको उत्पन्न करतीहुई फिर थोड़े ही दिनोंके पीछे सुमति सुमंत्र, सुमित्र, सुश्रुत इन मंत्रियों के प्रमति मंत्र गुप्त मित्रगुप्त विश्रुतु यह चार पुत्र हुये यही राजकुमार राजवाहननामवाला इन चारौ सचिव कुमारों के साथ वाल क्रीड़ा करतार शशिकलावत् बढ़ने लगा ॥ उपहार वर्मोत्पत्तिकथा। एकसमय कोई सुनि राजाको एक कुमार समर्पणकर योला राजन् ! मैं बनमें जाय एक वृद्धा स्त्रीको देख पूंछा वह रोकर सुझसे कहनेलगी सौम्प! एकसमय मिथिलेश्वर प्रहारवर्मा राजहंसके पुरको अपने पुत्रोत्सव में आयाथा तभी मानसारके साथ युद्ध में राजहंस सहित पराजित हो

।'
(३)
निज प्रिया प्रियम्बदाकसाथ निज नगरको जाताहुआ मार्ग
हीमें किरातोंसे
लुट भागगया इसके यमज दो पुत्रथे मैं
और मेरी पुत्री ही दोनों धायें थी हम राजा को न पकड़
सके तभी एक सिंह सन्मुख देखा मैं तो भय भीत हो
धरणीपर गिरपडी कुमार मेरे करसे छुटकर किसी कपी-
लाशवके भीतर गुप्ताहा उसीसमय किसी किरात के मुक्त
शरसे वह सिंहभी मरगया उस कुमारको किरातही लेगये
हैं दूसरे कुमार को लिये पुत्री भी मेरी नजाने कहां गई
फिर मुझे किसी गोपलने अब्रण किया सो मैं व्याकुलहो
मिथिलाही को जाती हूं मैं भी आप के मित्रका पुत्र जान
फिरता२ चंडी मंदिरके निकट किरातों के समीप जाय कहा
भोर किराता मैं वृद्ध ब्राह्माण हुं, मेरा पुत्र खोगया है जो
आप किसी ने देखा हो तो वताइये मुनते ही कुमार को
मुझे देदिया मैं आपके पास लेभाया राजा भी निज मित्र
प्रहारवर्माके पुत्रको जान पुत्रवत्ही पालन लालन करनेलगा
अपहार वर्मोत्पत्तिकथा।
कभी गजा किसी तीर्थ स्नानको जाताहुआ भिल्लनीकी
गोद में एक बाला देख वोला किसका यह कुमार है सत्य
कह यह सुन वह बोली राजन् इसी मार्ग में जातेहुये मिथिले
श्वर का धन हर किगत लाये परन्तु यह पुत्र हमरे पति को
देदिया राजा मुनि वचनानुसार प्रहार वर्मा के द्वितीय पुत्र
को चिन्ता में निश्चयकर शवरी को कुछ धन दे उस कुमार
का अपहारवर्मा नाम रख बमुमती को देदिया ॥

(४)
"पुष्पोद्भवोत्पत्ति कथा"
कभी ऋषि वामदेवका शिष्य सोमदेव शर्मा किसी कु-
मारको राजा के अर्पणकर कहनेलगा राजन् मैं रामतीर्थ से
आताहुआ वन में एक बृद्धा
को देख किसका यह कुमार है
यह कही वह रुदनकर बोली मुने ! कालयवन द्वीप में काल
गुप्त एक वैश्यथा रत्नोद्भव वहीं जाय उस वैश्यकी सुवृत्ता
कन्याको विवाह कुछदिनोंकवाद गर्भ होनेसे श्वसुर से पूछ
जहाजपर चढ़ पुष्पपुरको चलनेलगा दैव दुर्विपाक से वह
जहाज टूटगया मैं किसीतरह उसकी स्त्रीको पार लाई न
जाने अव रत्नोद्भव कैसे है-
सुवृत्ताने यहीं इस पुत्रको उत्पन्न किया न जाने वह .
कहां गई मैं इसको यहां लेआई यह वात करते २ ही एक
बनगज आगया स्थविरा हाथी के भयसे वह यहीं इसको
छोड़ कहीं चली गई मैं तो एक वृक्ष की छाया में छिप रहा
ज्योंहीं इस कुमारको हाथीने सूंड से पकड़ा त्योंही एक सिंह
को हाथी के ऊपर दौडते देखा यह इस वालकको छोड़सिंह
के युद्ध में प्राणों का भी त्याग मरगया सिंह भी कहीं चला
गया तभी एक वानरने फल इसको जान ग्रहणकर वालक
है यह पहिचान छोड भागगया मैं फिर उस स्त्रीको न पाय
गुरुकी आज्ञासे आपके पास लाया राजाने उस रनोद्भव के
पुत्र का नाम पुष्पोद्भव रख सुश्रुतको बुलाय यह तेरे भ्राता
का पुत्र यह कह देदिया उसने भी पुत्रवत् पाला ॥
"अर्थपालोत्पत्तिकथारम्भः"
कभी गजा वसुमती के पास एक कमार को देख बोला

(५)
देबी ! यह किसका पुत्र है यह सुन रानी चोली देव ! रात
मुझे कोई यक्षणी जगाकर कहने लगी देवी मैं मणिभद्रकी
पुत्री तुम्हारे मन्त्रि पुत्र कामपाल की स्त्री तारावली हूं
कुबेर की आज्ञानुसार इस निज कुमार को आपकी सेवा में
अर्पण करती हूं यह कह चली गई राजा सुमन्त्र को बुलाय
अर्थपाल यह तेरेभ्राता का पुत्र है यह कह अर्पण किया ।
सोमदत्तोत्पत्तिकथारम्भः।
कभी मुनि बामदेव का शिष्य एक कुमारको दे बोलाराजन्
कावेरी के किनारे किसी स्थविरा को रुदन करते देखा और
क्यों तु रोरही है यह पूछा भी तोवहबोली सुने!एक ग्राम में
सत्यवमी किसी ब्राह्मणकी पुत्री काली कोविवाह उसके
सन्तान के न होने से उसीकी पुत्री गौरीको विवाह एक
पुत्र उत्पन्न कियाएकदिन काली भगिनीकी हिरससे मुझ
धाय के साथ इस कुमारको लाच ( मयेमेरे ) कावेरी के
किनारे फेंक के चलीगई मैं नदी में उतर इस कुमरको
पकड़ किसी बहते हुए पेड़पर चढ़गई वहां सर्पने मुझे
इसलिया वृक्ष भी किनारे बालगाइस कुमारकी आपरक्षा
करो यह कह वह परलोक को सिधारी मै भी इसकुमार
को आपकेही पास लेआया उसका सोमदत्त नामधर
सुमति को बुलाय यह तेरे भ्राताका पुत्र है यहकह
अर्पण किया फिर सब कुमारों से संयुक्त राजबाहन को
राजा देख परमानन्द को प्राप्तहुआ ।
इतिश्री मत्पण्डिन गणेशप्रसादसूनुनारामस्वरूपशर्मणाकृतायांदशकमार
चीनभापायांमागेतचि पापमोच्छामः ।

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(६)
एकसमय वामदेवजी राजहंस से कहने लगे राजन् ।
मित्रों से संयुक्त इस तेरे पुत्र का यह दिग्विजय का समय है
सो तू इस को भेज ऐसे मुनि से कहा हुआ क्षितिपति
शुभ मुहूर्त में सपरिवार निज कुमारको दिग्विजयार्थ आज्ञा
दी चलते २ राजवाहन ने एक बन में जाय किरातरूप एक
ब्राह्मणकुमार को देखा, कौन है तू किस वास्ते बियावान जं.
गल में घूमरहा है यह राजबाहन से पूंछाहुआ बोला महा-
भाग ! मैं मातंग नाम ब्राह्मण हूं ब्राह्मणकी रक्षा के करने
से बीती हुई इस रात में मुझको प्रसन्न हुए शिवजी स्वप्न
में बोले मातंग ! दंडकारण्य की नदी के तट के निकट
कोई चौमुखी गुफा है उसी बिल से पाताल जा तू वहां का
राजा होगा तेरा सहायकारी एक राजकुमार भी कल वा
परसौं यहीं आवैगा सो मैं आपके आकार से जानता हूं कि
वही आप हैं मेरी सहाय कीजिये यह सुन अंगीकार कर
राजकुमारने निद्रा परतन्त्र मित्रवर्ग को छोड मातंगके साथ
उसी विल द्वारा पातालको प्रवेश किया और उस महेश्वर
दत्त ताम्रपत्रके अनुसार मातंग राजबाहन के देखतेरज्वाला
जालों से प्रज्वलित अग्नि में मंत्र पूर्वक देहको हवन करदि-
व्य मूर्तिको प्राप्त हुआ शीघही कोई कालिन्दी नाम अ.
सुर नन्दनी उसको बरलेती हुई, मातंग भी राजबाहन की
आज्ञानुसार यथाविधि पाणिग्रहण कर पाताल के राज्यको
निज अधिकार कर परम आनन्द को अनुभव
राजवाहन भी कालिन्दी प्रदत्त भूख प्यासकी नाशक मातंग
से मणिको लेकर उसी बिल द्वारा निकला वहां मित्रगण
करने लगा

समेत एक (७) को न देख उद्विग्न चित्त हो धरणी में भ्रमण करने लगा फिरता २ विश्रामार्थ एक बगीचे में प्रवेश होतेही रमणीय जनों के साथ रमण करते सोमदत्तको देखा और पूछा यह स्त्रीआदि कौन हैं वह भी निजवृत्तान्तको कहने लगा- इतिश्रीमत्पण्डितगणेशप्रसादसूनुनारामस्वरूपशमणाकृतायां दशकुमारचरितेभापायांद्विजोपकृतिन मद्वितीयउच्छासः। देव ! आपको दृढ़ते २ मैंनेभी प्यास से व्याकुल एक नदीके जलको पीतेहुये उज्जल रत्नको देखा उसे उठाकर विश्रामार्थ किसी मंदिर में गया वहां बहुतनय दीन वृद्ध ब्राह्मणको देख पूंछा आप कौन हैं और यह सेना किसकी है यह सुन ब्राह्मण वोला सौम्य ! माता रहित इन पुत्रोंको भिक्षासे पालता यहां वसता हूं और यह सेना मत्तकाललाटेश्वर की है यही मत्तकाल इस पटने के राजा वीरकेतु की तरुणी रत्नवाम लोचना कन्याको सुन वला. स्कार से हरलाया है अव यह सिकार के वास्ते यहां ठैर- रहा है और वीरकेतु कामानपाल नाम मंत्रीभी जयकी अ. भिलाषा से गुप्तहो यत्न कररहा है यह सुन मैंने इस बा. ह्मणको निधन जान रल देदिया और वह चलाभी गया मेंभी वहां सोगया कुछ देर बाद वहीं ब्राह्मण ने राजदूतों के साथ आकर मुझको चोर वताया वह दूत मुझे बांध कारागार में जाय यह तेरे मित्र हैं ऐसे किनीको दिखाया आप यहां क्यों दुःख भोगरहे हो यह सुनकर चोर वीर मुझसे कहने लगे सौम्य ! वीरकेतु के मंत्री मानपाल के हम किंकर हैं मंत्री की आज्ञानुसार सुरंग द्वारा यहां आ- Gana-. -

(८)
कर राजाको न पाय धन चुराकर लेगये, येही धन चुरा-
कर लेगये हैं यह मत्तकाल जान हमको पकड़ धन छीन
एक रत्नके न मिलने से कारागार में डाल दिया वह आप
के पास रत्न मिलने से यह तेरे मित्रहैं इस प्रकार आपको
कहा में भी यह सुन अपने और उनके बंधनों को काट मा-
नपाल के पास पहुँचा इस मेरे पराक्रम को देख वह मंत्री
वड़ा प्रसन्नहुआ कुछीदेर बाद मत्तकाल के दूत आये और
कहा आपके यहां हमारे चोर आयेहँ सो भेजदीजिये नहीं
तो बड़ा अनर्थ होगा यह सुन कौन मत्तकाल है हम कुछ
नहीं समझते यह मंत्रीका वाक्य सुन वह दूत मत्तकाल
को बुलाय युद्ध करने को प्रवृत्त हुये मैं भी मत्तकालका सिर
काट उसकी सेना मार मंत्री समेत वीरकेतुके पास आया
राजाने भी अति प्रसन्न हो निज राज्य और कन्या बाम:
लोचना भी मेरे अर्पणकी यह मित्रवृत्त सुन राजवाहन अति
प्रसन्न हुआ और पुष्पोद्भव को भी सन्मुख देख आलिंगन
किया कहो तुमभी अपना वृत्त यह सुन पुष्पोद्भव भी निज
चरित कहने लगा-
इतिश्रीमत्पण्डितगणेशप्रसादसूनुनारामस्वरूपशर्मणाकृवायां
दशकुमारचरितेभाषायांतृतीयनच्छास समाप्तः।
देव ! आपके जानेपर मेंभी भूमीपर फिरता २ सूर्यकी
गर्मीसे एक पेड़के नीचे बैठा वहां एक पर्वतसे पतित किसी
पुरुष को देख वीचहीमें पकड़ होशमें करके पूंछा आप क्यों
गिरे वह कोला सौम्य ! मैं रत्नोद्भव हूँ कालयव द्वीपमें एक
वैश्यकी पुत्रीको विवाह पुरको आता हुआ जहाज टूटने से

(६) किसी तरह किनारे आलगा और तपस्वी के वाक्य से पो. इशवर्ष विताय स्त्रीके वियोग से प्राणोंको छोड़ता हूँ उन को समझाय बैठाला फिर स्त्री का रुदन सुन वहां जाय एक वृद्धाके साथ जल्दी स्त्रीको पकड़ आप कौन हैं यह पूछा वृद्धा बोली सौम्य ! यह कालगुप्तकी कन्या पतिके साथ पुष्पपुरको जाती हुई जहाज टूटने से किसी तरह निकलाई अबतक पतिको न पाय अग्निमें जलती है यह सुन माता पिताको प. हिचान प्रणाम किया और अपना वृत्तान्त भी कहा, माता पिताओं को किसी मुनिके आश्रममें बिठाय मुनिके अंजन के प्रताप से भूमीसे असर्फियां निकाल व्योपारियों के समीप जाय बैल और थैले लाय वह धनभर चन्द्रपाल वैश्यसे मैत्री कर पिता माताको साथ उसके ही उज्जयनीको गया और आपके ढुंढनेकी वार्ता इसीचन्द्रपालके पिता बंधुपालसे कही वह मुझे ढूंढने में प्रवृतजान नहीं तुमसर्वभूमी भ्रमणमें समर्थ हो में शकुनआपके मित्रके आगमनकोविचारताहूं फिर उसने एक मास पीछे आपको तुमारामित्र मिलेगा यह सुन उसीके साथ बनमें जाय उसीकी पुत्री बालचन्द्रा दुःखित देख मैंने पूंछा वह कहनेलगी मुझसे एकान्तमें हे स्वामिन् ! यहाँका दर्पसार राजा पिताके वृद्धहोनेसे राज्यपाय फिर बुआके ल- के चण्डवर्माको राज्य दे तपकरणार्थ गया है इसीका भ्रा. ता दारुवर्मा मुझको बलात्कार रमणकी इच्छा कररहा है सो मैं आपकी शरणहूँ यह वर सुन मैं बोला हेप्रिये ! कोई यक्ष बालचन्द्रिका को चाहताहै यह स्वकुटुम्वियोंसे प्रसिद्ध करआजोयहभी नहीं निश्चयकरेगा तो मैं सखी बन तेरेसाथ (१०) जाय वहींउसको मारडालूंगा। यहसुन वह चलीगई एकदिन बालचन्द्रिकाकोदारुत्राने निजरातिमंदिरमेंबुलायामें सखी वेश धार प्रियाके साथ जाय रतिकी इच्छावाले उस दुष्टको मुष्टि और पैरों से सार बहांसे निकल, अरे नगरवासियो! दारुवाको यक्ष मारेडाले हैं यह वहांभीड़ होनेसे प्रियाको ले मैं घर आया कुछ दिनों पीछे बालचन्द्रिकाको विवाह और आपका दर्शन पाया यह सुन राजाहन प्रसन्नहो स्त्री सहित सोमदत्तको पुष्पपुरभेज पुष्पोद्भव के साथ उज्जयनीमें प्रवेश कर बन्धुपाल से मैत्री कराई और घर ले आया । इतिश्रीमत्पण्डितगणेशप्रसादसूनुनारामस्वरूपशर्मणाकृतायां दशकुमारचरितपाषायांचतुर्थ उच्छासासमाप्तः । कभी बसन्त के आरम्भ में मानसारकी नन्दनी अवन्ति सुन्दरी प्रियसखी पुष्पोद्भव प्रिया बालचन्द्रिकाके साथ रम्य उद्यानमें कामार्चनको आई वहीं पुष्पोद्भवके साथ राजवाहन ने देखी वालचन्द्रिका के इशारे से बुलाया हुआ यह. राज कुमार भी वहां गया। और मैं शांवहूं यह पूर्व जन्मकी मेरी जाया जायावती है यह राजवाहन और अवन्तिसुंदरी जान परस्पर प्रेमहुआ वहकन्या माताके साथ निजगृहकोभी चली गई फिर राजबाहन बालचन्द्रिकाके मुखस कन्याका अधिक प्रेम जान अब मैं क्याकरूँ? यह विचारतेही कोई विद्येश्वर नाम एन्द्र जालिक राजवाहनसे भेजाहुआ मानसार के घर जाय आशीर्वाद दे पिच्छिका घुमाय अद्भुतनाटक दिखाय राजा बोला राजन् ! कोई सुन्दर नाटक देखिये किसी आपकी कन्याकेतुल्य स्त्री और एक चक्रवर्तीकुमार इन दोनों (११) का विवाह दिखाऊँ राजाकी आज्ञा पाय राजबाहन और पूर्व सङ्केतित भवन्ति सुन्दरी ही का सबके सम्मुख विवाह कर दिया यह नाटक देख मानसार प्रसन्न हो विद्यश्वर को बहु धनदे विदा किया राजवाहन भी कान्यान्तपुर में प्रवेश कर चतुर्दश भुवनों की कथा कह २ प्रिया को आनन्द क- राता हुआ ॥ इतिश्रीमत्पण्डितगणशमसादसूनुनारामस्वरूपशर्मणाकृतायांदशकुमार चरितभाषायांपंचमा उच्छासंः। कभी सोते हुये राजवाहन का चरणयुगल रजतश्रृंखला से बँधादेख राजवाला विकलहो मुक्तकंठ रुदनकरने लगी तभी सकल कन्यांतःपुर भी व्याकुल होगया वहां मंत्रियों ने राजबाहनको देखा और चण्डवमासे जाय सबबृत्तकहा वह चण्डवर्माभी कोपसे आकरके यहपापाहै अवन्तिसुन्दरी इस दुष्ट पुष्पोद्भव के मित्र से अनुरक्त हुई देखो अभी इस को शूली देताहूँ यहकह बांधलिया राजबाहन भी पूर्वजन्म प्राप्त मुनिदत्त शापको यादकर प्रियाको समझाय रिपु के वश होगया महादेवी और मालवेन्द्र भी जामाताकी किसी तरह रक्षा करतेथे चण्डवर्मा तो तपकरते दर्पसारकोसन्देशा भेज राजवाहनको पीजर में डालदिया और पुत्रीके न देने से चपेश्वरसिंह वर्मासे युद्धभी करनेलगा फिर पकड़लिया प्रचण्डरणमें सिंहवी को, चण्डवमा ने उसी रात अ- म्बालिका के साथ विवाहकर रहाथा वहीं काई दर्पसारका दूताय सन्देशा कहनेलगा मूढ़.? क्या ऐसी भी दुष्टपर कृपा करनी चाहिये शीघ्र ही इस दुष्टका मारना मुझे सुना ..

( १२)
यह सुन चंडवर्मा ने प्रातःकालही करि चरणदलन से
यह राजवाहन मारने योग्य है ऐसे किसी दूतसे कहा उसी
समय राजवाहन के चरण युगल से यह रजत शृंखला छुटे
कोई अप्सरा हो कुमारको प्रदक्षिणा कर कहने लगी देव !
मेंहू शशाङ्क रश्मि संभव सुतर मंजरी नाम सुरसुन्दरी मा.
कण्डेय के शापसे इस अवस्था को प्राप्त हुई फिर वह प्र.
सन्न कियेहुये मुझे आपके पाद पनकी मास द्वयमात्र शृं.
खला बनाते हुए आप प्रसन्न हो क्या मैं आपका उपकारकर
उद्धार होऊ यह वात अवन्ति सुन्दरीको कह दे राजवाहन
: यह कहकर उस सुरत मंजरी को विदा करताहुआ उसी अ.
वसर में किसी चोर वीरने चंडवर्माको मारडाला यह शब्द
कर्णगोचर हुआ सुनकर राजवाहन किस महापुरुष ने यह
परुषकर्म किया वह मेरे पास निर्भय हो आवै यह वोला क्या
यह अपहार वर्माही है यह जान आलिंगन कर मिले तभी
धनमित्र आय-अपहारवर्मा,अर्थपाल, प्रमति, मित्रगुप्त, मंत्र
गुप्त, विश्रुत, प्रहारवर्मा, कामपाल, सिंहवर्मा, इनसवकोलाय
प्रणामकर बैठा राजवाहन भी सिंहवर्मा की सहाय के अर्थ
आये सबसे यथा योग्य मिल परमहर्षको प्रात हुआ, अपना
और सोमदत्त पुष्पोद्भव का भी चरित वर्णन कर मित्रों का
वृत्तान्त यथाक्रम सुननेको प्रारम्भ करता हुआ प्रथम तो
अपहारचर्मा अपने वृत्तान्त को सुनाने लगा-
इति श्रीमत्पण्डिसगणेशप्रसादस्नुनारामस्वरूपशमणाकृतायां
दशकुमारचरितभाषायाँहिजोपकृति मघटयोच्छासः ।

प्रथम उच्छासः।
उत्तर खण्डम् ।
में
जाय
क्या
"अपहार वर्मचरितम्"
देव ! मेंभी आपको ढूँढता २ चंपापुरी के निकट मरीचि
मुनिके आश्रम किसी दुःखित मुनिको देख,
वह मुनि हैं यह मैंने कहा तो वह वोलाकि एक मुनि इसी
आश्रममें था एक समय काम मंजरी मातृ समूह के साथ
माय मुनिके चरणों में गिरी आप कौन हो यह मुनिसे पूंछी
हुई उसकी मा वोली मुने ! मैं जातिकी वेश्या हूँ और यह
मेरी पुत्री है हमारी आज्ञा न मान रूपवान् ब्राह्मण कुमार
से रमण करने लगी विनाही धन, हमने वहुवार कहा
यह क्रोधित हो वन में चली आई यही हमारी आजी-
विका जीवन मूल है यह सुन मुनि वोले भद्रे ! यह
वनवास बड़ा. दुख दायक है मुनि वचन सुन काम मंजरी
ने कहा जो आप मुझको चरण सेवामें न रखोगे तो में अब
ही प्राण त्यागदूंगी यह मुनि सुन आप सब जामो थोड़ेही
दिनोंमें तप क्लेश दिखाय समझाय भेजदूंगा फिर वह सब
यहां से चलींगई तब उस वेश्या ने नृत्य गीतादिकों से
मुनिका मन रखनकर उसको राज सभामें लेगई वहां कोई
स्त्री उठ वोली राजन् ! आजसे लेकर में इस की दासी
हुई फिर राजासे सत्कार की हुई काम मंजरी आप जाइये
ऐसा हाथ जोड़ मुनिसे बोली मुनिभी उस पणवंधको देख
:

(१४)
चकित हो चलेआये सौम्य वही मैं मुनि हूँ इसीसे में दु:-
खित हूँ मेंभी वहीं रात्रि विताय प्रातःकाल कुछ दूरजाय
एक क्षपणक को दुःखित देख क्यों आप मलीन हैं यह
पूंछा यह सुनक्षपणक मुझ से वोला सौम्य ! इसी चंपा में
निधिपालित का पुत्र वसुपालित कुरूपसे विरूप कभी नाम
था यही कोई सुन्दरक यथार्थ नाम वैश्यथा और धृतों ने
उनदोनों का वैर करायं जिसको काममंजरी चाहे वही सु.
न्दर है यहकह मुझी को काममंजरी दिलाय सव धनहर
लिया वो मैंहीं हूं सो मेरा यह कदन का कारण है यह सुन
मैं यत्न करताहूं वह वेश्या आपही आपको सब धन देजा-
यगी यहकह उसी देशकी धूनसमाज में जाय किसी
धूतानभिज्ञ पुरुषका हास्यकरा तो वहांसे एकपुरुष उठ आ
तेरे चतुरके साथ हम खलेंगे यह कहा मैं भी उसकेसाथ जुआ
खेल १६०० सौल्हेसौ दीनार ( अशी ) जीत आधी द्यूता-
ध्यक्षादिकोंको दे चलाआया फिर यत मित्रत्रिमर्दक से सब
उसदेशकाहाल पूंछ एकधनीके चोरीकर रात्रि में एक कन्या
को देख तू कौनहै यह पूंछा वह कांपती मुझसे बोली आर्य !
मैं कुवेरदत्तकी कन्याहूं मेरेमाता पिताने धनमित्रनामजोउ.
दारकहै उसकेसाथ सगाईकरदीथीउसके निधन होनेसेकिसी
अर्थ पतिक साथ कल मेरा विवाह निश्चित है यह सुन मैं धन
मित्रही के पास जाती हूं मैं भी उसी के साथ चला तभी कोई
मसाल लिये राजदूत देख मैं उससे बोला प्रिये ! यह इन से
कहदेना कि यह मेरा पति है सर्पने इसको डसलियाहे मैं यहां
सोयाजाताहूं वैसाही उसनेकरा मुझे वह दूत मराहुआजान

(१५) वहांसे चलेगये फिर मैं उस कन्याको ले उदारकके समीप पहुंच सब वृत्त कह मैत्री करी और वह मेरे कहने से चंपा में आया अर्थपति और कुवेरदत्तके चोरीकरी प्रातःकाल कुवेरद तको समझाय मासांत में उदारतके विवाहका निश्चय क. राय एक चर्मरत्न भस्त्रिका बनाय धनमित्रसे कहनेलगा मित्र ! तू राजासे जाके कह राजन् ! कुवेरदत्त कुलपालिका निज कन्याको मेरे निर्धन होनेसे अर्थपतिको देगा मैं और आप मुझ वसुमित्र के पुत्र धन मित्रको जानतेहीहो मैं बनमें जाय शस्त्रसे शिर काटने लगी तभी एक मुनिने मुझे देख द- याकर यह चर्मरत्न भस्त्रिका दी और कहा कि यह वैश्य और वेश्याको ही पूजन करीहुई जो जिसका कपट से लियाहो वह उसको देदे और सब घरका धन जो प्रदान करे उसको यह प्रतिदिन लक्ष मुद्रा देगी सो मैं आपके पास लाया हूं यह सुन राजा प्रसन्न हो तुझीको देदेगा फिर तू कहिये कोई इसको चु- रावै नहीं यह भी मानलगा.फिर हम रात्रिमें चोरी कर दिन में पूजाकर सबको वही धन दिखा देंगे यह सुन कुबेरदत्त भी निज कन्याको तुझे देही देगा वैसेही उसने किया, फिर मैं विमईक मित्रको अर्थपतिका अनुचर बनाय धनमित्र अर्थप- तिका बैर कराय धनमित्रको कुलपालिका दिलाय तभी काम- मञ्जरी की भगिनी रागमञ्जरीको देख बिनाही धन प्रतिदिन रमणकरनेलगा फिर मैंने दूती धर्म रक्षिताकेद्वारा काममंजरी और माता मागध सेना से कहा जो तू मुझे राग मंजरी को दे देतो मैं तुझे यह धर्ममित्रकी चर्मरल भस्त्रिका चुराकर देदूं उन्होंनेअङ्गीकारकिया औरइन्होंनेवैसाहीकियाफिरमेरामित्र (१६) विमई क मेरेहीकहनेसेधनमित्रसे युद्धकरनेकोउद्यतहुआ और कहाअरे!तू चर्मरलिकाके गर्वसे कुवेरदत्तकोलुभाय पराई स्त्री कीइच्छा करताहै इसी राततेरी यह चुराय गर्वनाश करूंगा, धन मित्रने यह वृत्त राजासे कहदिया राजाने भी अर्थ पति को वुलाय कहा कोई आपका परम मित्र विमईक है हाँ महाराज परममित्र है भच्छा उसको यहांलामो यह सुन उसको सवजगह ढूंढा न मिला कहीं तब'आय अपने आपही चर्मरत्नकी चोरी स्वीकार कर बंधन में बंधगया हेराजवाहन! वो विमईक तो आपके ढूंढनेको उज्जयनी गया था वह इसे क्योंकर मिलता एकदिन काममंजरी चर्मरत्न दुहनेकी इच्छा से उसीसमय क्षपणकको धनदे और अपना धन लुटाने लगी तभी धन मित्र ने मेरे कहने से राजाके पास जाय कहा मैं भनुमान करता हूं कि-चर्मरत्न काममंजरी के पास हैं न तो यह क्यों अपना धन लुटाती यह सुन राजाने काममंजरी को बुलाय चलतीदफे मैंने कहा जो तू मेरा नाम लेगी तो मुझे राजा मरवाडालेगा और फिर तेरी भैन भी रागमंजरी मेरेही वियोगमें प्राण छोड़ देगी इस से तू मुझे, यह चर्म भस्त्रिका अर्थ पतिने दी है यह जाकर कहिये राजा से बार २ पूंछी हुई काममंजरी अर्थ पतिने हमै दी यही कहा यह सुन राजा ने अर्थपतिको प्राणदण्ड की आज्ञा दी तभी धनमित्र बोला राजन् ! प्राणदंड देना इस कसूरपर धर्मशास्त्रसे विरुद्ध है सो आप इसको देश निकाला देदीजिये वैसेही राजा ने किया फिर यथेच्छ वहां से हमने धन चुराया एकदिन दैव दुर्विपाक सें मैं मदिरा पीकर शृगालिका के साथ उन्मत्त हो निकला ( १७) तभी राज दुतों ने मुझे चोर जान पकड़ा फिर मुझे होश भी हुमा मेरे पकड़ने से रागमञ्जरी धनमित्र भी पकडेहीजांय गे यह विचार शृगालिकाको झिड़ककर कहा मेराशत्रुधन गर्व से धन मित्र रागमंजरी को चाहता है यह सुन शृगा. लिका राजदूतों से कहा मेरा धन यह चुरालायाहै । सो मैं इससे पूंछ देखू वह मेरे पास आई मैंनेभी होले २ उसको उ- पाय बताया फिर दूतोंने मुझे चोर जान कैदमें डाल दिया फिर धनमित्रने राजा से सब वृत्त कहा राजाने भी कान्तक कोतवाल को भेजा फिर मुझसे कोतवाल ने कहा तू इस की चर्म रत्नभस्त्रिका और रागमंजरीका आभूषण देदे नहीं तो तुझे बड़ी दुखदाई सजा मिलेगी फिर मैंने रागमंजरी का आभूषण तो शृगालिकाको बतादिया परन्तु अजिन रत्न न दिया फिर एकदिन शृगालिका मेरे पास कारागार में आय वोली कि हे अपहार वर्मन ! मैंने यह उपाय किया है दूती मांगलिका के द्वारा रागमंजरी और राजपुत्री अं. वालिका की मैत्री करदी है और एक दिन उस राजपुत्री का यथावत् भी कर्णपूरथा तौभी मैंने यह गिरा इस बहाने. से समालते २ नीचेगेर दिया कर्णपूरका के गिरने से नीचे चुगते कबूतरभी उड़गये यह देखराजपुत्री हँसी उसीसमय कान्तकभी नकशाखींचने वहां आयाथा और यह राजकन्या मुझेही देखहसी है यह उसने मनमें जाना काम वशहोकर घरको चलागया मैंभी सखीराजमंजरी के वास्ते राजपुत्री सभेजी हुइ पिटारी कोले कान्तक के घर जाय कहने लगी यह आपको राजपुत्रीने दीहै और कहा आपशीघही सुरज २

(१८)
खुदवाय वहां चलिये यह सुन वड़ा प्रसन्न हो कौन सुरङ्ग
खोदसता है यह पूंछा फिर मैंने कहा जोधन मित्र के अ.
जिनरत्न का चोर है वही खोदसताहै आपयह उससे कहो
मैं अवश्य छुटादूंगा फिर कार्य होजाने पर कैद में डालदी
जिये सो मुझे कान्तकने भेजा है वहभी द्वारेही खडा है मैं
यह शृगालिका का उपाय देख बड़ा प्रसन्न हुभा और का.
तक के कहने से वहां सुरंग खोदी जवयह सुरंगमें घुस मुझे
पकडने लगा तभी उसीके खड्गसे शिर उसका काटसुरंगके
द्वारा राजपुत्री को देख कामवशहो किसी तरह वहांसे नि-
कल कारागार में आय किसी सिंहघोष को कान्तकका वृत्त
सुनाय राग मंजरी के.घर जायउसे समझाय उदारक को
साथले मरीचि मुनिके आश्रम में गया सिंह घोषभी सव वृ.
त्तान्त सुनाय प्रसन्न हुये राजासे कान्तकही की पदवी पा.
य मुझे अंबालिकाके पास लेगया उसी सिंह वर्मा को चंड
वर्मा जीत अंशलिका को छीन विवाहको उद्यतहै मैं भी
विवाहगृहमें जाय उसको मार अपनी प्राणप्रिया अंबालिका
को लाया तभी आपके दर्शनभी मुझे हुये यह सुन राज
बाहन प्रसन्नहो भापभी अपना वृत्तकहो यह उपहारवासे
बोला उपहारषाने भी अपना चरित कहना प्रारंभ किया।
इति श्रीमत्पंडितगणशपसादमूनुनारामखरूपशर्मणाकृतायां
दशकुमारचरित भाषायां द्वितीय उच्छासासमाप्तः ||
"उपहारवर्म चरित प्रारभ्यते"
देव ! मैं भी आपको ढूंढ़तार विदेह देशके निकट जाय
किसी रोतीदुई वृद्धतापसीको देख.पूंछा वह कहनेलगी आयु।

- (१६) प्मन् ! एकसमय प्रियंवदा निज पति प्रहारवाके साथ व: सुमतीस मिलनेको पुष्पपुर में गई उसी समय मानससार के युद्ध में राजहंसके साथ पराजयहो घर आताहुआ प्रहारव र्मा किरानोंसे लूटागया फिर मैं उसके कनिष्ठ पुत्रको लिये बनमें सिंहकोदेख गिरपड़ीन जाने वो वालक कहांगया तभी एक गोपालने मुझको अबण किया मेरी पुत्रीभी किसी युवा के साथ आय बड़े कुमारका खोजाना किसी पुरुषका मेरे साथ रमण करतेहुये का सिर प्रहारवा के मंत्रीने काटा यह पुत्री का वाक्यसुन उसी युवाके साथ पुत्रीका विवाहभी करदिया फिर यही सववृत्त प्रहारवासेकहा फिर भ्राता संहारवर्मा के पुत्र विकट वादिकोंने राज्य छीन प्रहारवर्मा प्रियंवदा कोबांधदिया मैं यह दुख देख प्राण त्यागन करती हूं मैं भी रो- कर वोला जो तेरे हाथ से छूटाहूं सो वही मैं हूं यह सुन वृद्धा वह मुझे आलिंगनकर वहीं रात्रिविताई प्रात होतेही उसकी पुष्करिकापुत्री वहींआई कुछ अन्तःपुरके प्रवेशकीयुक्ती वताय यह सुन पुष्करिका बोला कुमार ! कलिन्दवर्मा की पुत्री कल्प सुन्दरी कुरूपी पतिसे प्रतिकूल है यह सुन निज चित्रलिख पु-- करिकाके द्वारा कल्प सुन्दरी को दिखाया मुझको इस कुमा रका अवश्य दर्शन करा यह कह कुछ गुप्त कथा सुनाने लगी सखिपुष्करिके मेरेपिता और प्रहारवाकी वडीमैत्रीथी मेरी मातामानवती और प्रियंवदाकीभी, दोनों एकसाथ गर्भहोने से पुत्रवती को अपनी पुत्रीदेंगे यह पणबन्ध हुआ प्रियंवदा के पुत्र नष्ट होनसे मेरी माताने मुझे विकटबर्माको विवाह दिया इससे भाजपा कल इसयुवासे अवश्य मुझे मिला यह (२०) सववृत्तसुन पुष्करिकाने मुझसे कहा मैं कैसे परस्त्रीगमनकरूं यह विचार करता २ सोगया तभी शिवने सुझसे स्वप्न में यह कहा हे उपहार बर्मन् ! मत संशयकर तू मेरा अंश है यह कल्प सुन्दरी गंगाहै गणेशके शापसे विकटवर्मा वड़े मेरे अं. शसे भोगकर फिर तेरेही साथ रमण करेगी यह स्वप्न देख सं केतस्थानमें रमणकर अधिक उसकी प्रीतिका यह उपायरचा कहाभी प्रिये ! तू विकटवर्मा को मेरी तस्वीर दिखाय कह मुझे यह चित्रपट एकतापसी ने दिया है और कहाभीहै जो इसे मंत्र पूर्वक हवन करैगी तो यही मूर्त्तितेरे पतिकी होजा. यगी वैसेही उसने किया वहभी मूढमति कथनानुसार हवन करनेलगा मैंभी स्त्री का वेशधर चौकपर बैठ वतामो श्राप की कौनसी गुप्तवार्ता है आपका अवरूप बदलता है यह सु.. न निज प्रिया मुझेजान वोला प्रिये ! प्रहार वर्मा को विष सेमरवाना और उसके मित्रशतहलीकोअनन्तशीरसेमरवा- ना.थोडेही मूल्य से एकरन लेना पुड़देश के जयार्थ विशाल वर्मा को भेजना यह सुन इतनीही तेरी आयुहै यह कह खड़ से दोटुकड़े कर हवन में डाल, प्रियाके साथ रणवास में जाय रात विताय प्रातःकाल होतेही सभामें जायमंत्रियों से कहा मेरी मूर्तिही नहीं किन्तु स्वभावभी बदलगया है इससे मेरे चचाको भी कारागार से छोडदो और रत्नभी यथावत् मूल्य से लेलो शतहलीको भी अनन्तशीरसे चढाई न करावो वहां दुर्भिक्ष है इससे विशालवा भ्रातासेभी कहदो वहभी च. ढाई न करें मंत्रीभी मुझे विकटबाही जान यथावत् कार्य करने लगे, फिर पिता के पास जाय सब वृत्त सुनाय पिताही

(२१)
को राज्य देदिया फिर सिंहवाके पत्र से मचा में आया
और आपका दर्शन पाया यह सुन राजबाहन हर्षित हो आप
भी अपना वृत्त कहो यह अर्थपाल से कहा वह भी प्रणामकर
निज कथा कहने लगा।
इतिश्रीमत्पण्डिागणेशमपादसूनुनारामस्वरूपशर्मणाकृतायां
दशकुमारचरितभाषायांतृतीय उच्छांस:समासः ।
"अर्थपाल चरितम्"
में भी देव ! आपको ढूंढ़ता २ काशीपुरी में मणिकर्णिका
के निकट जाय शिव की प्रदक्षिणाकर किसी दुःखी पुरुषको
देख पूंछा वह मुझ से कहने लगा सौम्य ! मेरा नाम पूर्णभद्र
यही में किसी दिन चोरी करते पकड़ागया और मंत्री
कामपालकी आज्ञा से मेरे ऊपर मत्तगज छोड़ा मैंने भी दौड़
ऐसा.प्रहारा कि-हाथी चींघताहुआ भागा यह मेरा वीरत्व
देख प्रसन्न हो कामपालने कहा सौम्य ! यह आप चोरी
करनी छोडदो पैसेही मैंने किया फिर वह अपना भी वृत्त
मुझे सुनाने लगा मित्र ! राजहंस के मंत्री धर्मपालका में
पुत्र हूं इसी काशीमें आय राजा चण्डसिंह की कान्तिमती
कन्या के साथ गुप्तही रमण किया एक पुत्र भी हुमा उसको
दूतीकेहाथ श्मशानमें फिकवानेको भेजा वहमार्गमें राजदूतों
से पकड़ीगई मेरावृत्त उससे सुना,मुझे राजाने पकड़ बँधवाय
श्मशान में लेजाय शिर काटनकी आज्ञारी उसी तलवार से
दूतों को मार भाग एक बन में गया और एक स्त्री को भी
देखा वह कहने लगी प्रिय ! मैं तारावली यक्षणी हूं श्मशान
में एक कुमार को देख कुवेर के पास गई उसने मुझ से कहा

(२२) कामपाल पूर्व जन्मका तेरा पति कान्तिमती सपत्नी है यह तेरा पुत्र है यह सुन कुमार को वसमती के अर्पणकर आपकी चरण सेवामें आई हूँ फिर उसीके थलसे सोतहुये राजाके पासजाय खड्ग उतराय यहमें तुह्मारा जामाता हूं यह कहनेल- गा राजाने मेरे भयसे कन्या और राज्यभी मेरे अर्पण किया ममेभी यक्षणी और कान्तिमती के साथ यथेच्छ रमणकरता था चंडसिंह तत्पुत्र चंडघोपके मरनेपर पांच वर्षके सिंहघोष काही मैंने राज्यपर विठादिया यह यौवनोन्मत्त हो आपकी भगिनी को इसने वलात्कार छीना यह सुन उसी कामपाल के मरवाने को यत्न करता था तभी वहांसे यक्षणीका जाना सुन कामपाल के नेत्र निकालने की आजादी है उसीके शो- कौमी प्राण त्यागन करता हूं यह पिताका वृत्त सुन वही में यक्षणी द्वारा घसुमती का पालाहूं यह कह कुछ रोकर एक सर्पको देख मेंने पकड़ लिया, में पूर्ण भद्रसे बोला हे तात! में इसी सर्पको पिताके ऊपर छोड़ विपस्तंभन करदूंगा यह वात मेरे मातासे आप जाकर कहदीजिये उसने वसेही किया उसी समय बंधे मेरे पिताको लाय इस अपराधसे में- त्रीकी आंखें निकाली जायहँ यह तीन दफे ढंडोरा विटवा आ, तभी मैंने वही सर्प छोड़ा वह पिताको भार मातंगको भी काट भागगया मैंने भी विपस्तंभन करदिया पिताको मरा जान मेरी माता राजासे सती होनेकी आज्ञाले पिताको घर लेआई मैंनेभी पिताका वहीं भाय विय उतार दिया फिर माता, पितासे सव वृत्त कह आलिंगन कर मिला फिर पिताकी आज्ञानुसार सुरङ्ग खोदी और बीचही में एक म- (२३) न्दिर देख वहां जाय स्त्री समूहको देख अपना नाम कह तुम कौन हो यह पूछा तो एकवृद्धा वाली 'हे भत्तदारक ! चंडघोष के मरने पर उसकी स्त्री आचारबती भी सती होगई उसी की यह मणिकर्णिका पुत्री है फिर आप के नाना सिंहने मरते समय कान्तिमतीके वृत्तसे डेर मुझे बु लाय कहा हे ऋद्धिमतिके! तू इसको इस स्थान में लेजा बड़ी होनेपर दर्पसार के साथ विवाह करदीजिये हमें यहां बारह१२ वर्ष रहते२ वीतगये और कांतिमती नेभी इस कन्याको द्यूतमें जीतलिया था सो आप इसको ग्रहण कीजिये यह सुन राज भवनमें जाय राजाको पकड़लाया और पिताकी आज्ञानुसार इस मणिकर्णिका को विवाहा फिर सिंह वर्माकी पत्रिकासेय हाभाया और आपका दर्शन पाया यहसुन राजवाहन परमानं दहो सिंहघोषको छुटाय अपना वृत्तकहो यह प्रमतिसे कहा वह भी निज चरित कर जोड़ सुनाने लगा। इतिश्रीमत्पंडित गणेशप्रसादसूनना रामस्वरूपशर्मणा कृताथां दशकुमारचरित भाषायां चतुर्य उच्छासासमाप्तः ॥ "प्रमति चरितम्" देव ! मैंभी ढूंढतार संध्या को वृक्षके नीचे बैठे इस बन देवताकी मैं शरण हूं यह कह सोगया कुछदेरबाद करवट ले- नेसे एक राजमंदिर सुंदर शय्या वही राजकन्याको भी देख मोहितहों कुछ नींद न आने से वही वन वही भू शय्या देख मैं जन्मभर ही भूमिमें सोऊंगा यह विचारते २ ही एक सुर सुन्दरी आय मुझसे कहनेलगी वत्स! मैं कामपाल की स्त्री य- क्षणी हूं पतिके कहने से किसी राक्षससे एक वर्ष के शापको (२४) पाय स्रावस्तीके उत्सवको जाताईतुम्हें निज अथपालकापुत्र जान कन्या के पास सुलाय आतीबार भगवती से शाप दूर होनेसे तुमें यहां लिवायलाई आप उसकन्याका यत्नकर वि. वाह कीजिये में अब पतिके पाद मूलमें जातीहूं यह कह वह चलीगई में काम संतप्त हो स्रावस्ती के निकट कुकुट युद्ध देख वृद्ध विट मार्गही में मैत्रीकर एक बगीचे में जाय चित्र पट लिये स्त्रीको देख उससे चित्र पटले उसी कन्याको प- हिचान तद्वारा अपने में उसकी अभिलाषा जान उसी वृद्ध विटके. निकट आ सव वृत्त कह वह अपनी मुझे पुत्री वना य राजाके पास जाय यह मेरी पुत्रीहै सो आपही जबतक मेरा जामाता आवै तबतक पालिये यह कह वृद्ध चला आया मुझे भी राजाने कन्याही जान निज पुत्री नवमालिकाकेही पास रक्खा मैं भी बहुत दिनोंतक उसके साथ रमण करता एक दिन स्नानके वहाने से वृद्ध वेश्यके पास आय वही पुरुष वेषधर वह मुझे साथले यह मेरा जामाता भागया यह राजासे जाकहा यह सुन राजा मंत्रियों के साथ आप कहने लगा सौम्य ! जो चाहें उसके बदलेमें लो परन्तु पुत्री तो आपकी कहीं खोगई यह सुन इसी वृद्धकी चिता वनाय पुत्री . के विना में भस्म होता हूं यह साहस देख नवमालिकाही विवाहदी मुझे, फिर चंपेश्वरकी पत्रिका देख यहां आया और आपको देख परमानन्द पाया यह सुन राजवाहन प्र. मतिकी प्रशंसाकर मित्रगुप्तको आज्ञादी वह भी निज कहने लगा। इतिश्रीमत्पंडित गणेशप्रसादमूनुना रामस्वरूपशर्मणा कृतायां दशकुमारचरित भाषायां पञ्चमउच्छास:समाप्त:

.
( २५ )
"मित्रगुप्त चरितम्"
देव ! मैंभी ढूढ़ता हुभा दामलिप्त देशके समीप उत्सव
से अलग दुःखित, वीणा करगहे, क्यों आप दुःखित हैं यह
पूंछा हुआ वह कहने लगा सौम्य ! कौश्यदास मेरा नाम
है इस देशका राजा तुंगधन्धा देवीकी आराधना कर भीम
धन्वा पुत्र और कन्दुज्ञारती कन्या यह दो मेदनी स्त्री से
उत्पन्न हुई उसी राजकुमार ने चंद्रसेना नाम मेरी स्त्री व
लात्कार प्रहणकी है वही सुके दुःख है तभी वह चंद्रसेना
भी भाय मुझे और कोश्यदास को उत्सव में लिवाय गई
वह कन्दुक खेलती हुई कन्या मुझे देख मोहित हुई फिर
घरआय भोजन पाय मुझखिलाय मेरेही सन्मुख कोश्यदास
से कहने लगी प्राणनाथ ! हमारा आज कार्य सिद्ध होगया
जो राजपुत्री इन्ही मित्रगुप्त को चाहती है यह देवीका
वरदानही है जो इसको विवाह करेगा उसीके वश यह
भीमधन्धा फिर हमें भी यह नहीं ग्रहण करसकेगा तभी
यह भगिनी इसको चाहती है तो मैं भी इसीके वशीभूत
हूंगा यह जान मुझे बंधवाय समुद्र मे डलवादिया फिरमुझे
दया से एक रामवाण नामनौका पतिने निकलवा लिया
तभी एक चोर ने हमारी नौका वालों से युद्ध कर पराजय
किया #भी उनसे निज बंधन खलवाय उसी चोरको वहां
से उछल कर पकड वहीं यह भीमधन्दा है यह जान नौका
वालों ने मुझे प्रशंसा कर मेरे.ही बंधन से उस को बांध .
लिया फिर वायु वेगले वह नोका एक पर्वत के निटक जा
पहुंची वहां से उतर एक रमणीय सरोबर को देखते २ ही
२

. (२६) कोई ब्रह्मराक्षस मैंने देखा वता मेरे प्रश्न, नहीं अभी खा लूंगा यह कहाभी यह उसका वाक्य सुन कहिये कौन प्रश्न आपके हैं यह मेरा वचन सुन वह राक्षस यह कहने लगा ॥ (प्रश्न )किंक्रूर(उत्तर)स्त्री ह्रदयं (प्र.)किंगृहिणः(उ)प्रिय हितायदारगुणाः (प्र.) कः कामः(उ.)संकल्पः(प्र.)किंदुष्कर साधनम्( उ०)प्रज्ञा ॥१॥ प्रथम प्रश्नोत्तर कादृष्टान्त-घूमनी, गोमनी निम्ब वती नितम्वबती, इन चार स्त्रियों का इसमें सम्बाद है एक समय त्रिगर्तक नाम जनपद में दुर्भिक्ष होनेसे उसदेश निवासी धनक, धान्यक, धन्यक सब धनपशु पुत्रोंको खाय मध्यमा ज्येष्ठा स्त्रियोंको भी खाय तीसरी स्त्रीके खाने को उद्यत देख धन्यक स्त्री को साथ ले किसी फल फूलवाले वनकोजाय वहीं एक विकल पुरुष को देख यह उसे भी साथ ले कुटी बनाय वहां रहा और धन्यकने तेल मलर उस बिकल को आराम और पृष्ट किया किसी दिन यही गो- मनी पानी भरते निज पति को कूपमें गेर विकल के साथ ब- लात्कारसे रमण किया, और किसी देशमें जाय अपने को पं. तिव्रता बताय वहीं रहीं धन्यक भी किसी दयालु पुरुषसे नि- कालाहुआ वहीं आया, यह उसको देख, यही मेरे इस पति के विकल करनेवाला है यह राजाले कह धन्यक को शूली की आज्ञा दिलाई तभी राजासे पूंछाहुआ वह विकल रोकरवोला राजन् ! यह मेरा परमहितैषीहै इसी पापनीने इसको कूपमें पत्तन किया मुझसे बलात्कार रमणभी किया, यह राजा सुन काक कान काट इस घूमनी धन्यकको छोडदिया।

ܚ ܙ (२७) द्वितीयप्रश्नोत्तर-किसी काञ्ची नगरी का शक्ति कुमार, वैश्य गुणवाली स्त्री मिले तो विवाह करूं यह विचार किसी देश में जाय सेरभर जौ ले एक कन्याको दिये उस कन्याने बड़ाही स्वाद भोजन बनाय संतुष्टकरा फिर वही शक्तिकुमार वैश्य उसको विवाह घरलाय एक वेश्याको भी लाया परन्तु उस कन्याका कुछभी मन विकार न देख पतिव्रता जान उस के ऊपर प्रसन्नहो सुखपाया ॥ तृतीय प्रश्नोत्तर दृष्टांत-एक वल्लभी नगरीमें बलभद्र नाम किसी वैश्यने गृहगुप्त नाम नाविक पतिकी कन्या रत्नावली के साथ पाणिग्रहण कर कुरूपा अपनी स्त्री को प्रतिकूल रहा रत्नावली दुःखित हो किसी सन्यासिनीको देख बोली हेमातः! तुमें कनकवती अभिलाषा करतीहै यह बात मेरे पतिसे कहदे उसने वैसेहीकहा बलभद्रभी वहांगया रत्नाव- ली भी उसी के घर जाय श्रृंगारकर बैठगई बलभद्रभी उ. सको कनकवतीजान देशांतर को लेगया और खेटकपुर जी य बहुत धन संचय किया यह वलभद्र निधिपतिकी स्त्री क- नकवती को भुलायलायाहै यह राजाने जान इसको दडंकी आज्ञा दी, तभी बलभद्रको दुःखी जान मैं वही रत्नावलीहूं यह सुन बलभद्रने राजासे कहा आप हमारे नगरवासियों से पूंछ देखिये यह वही मेरी रत्नावलीहै नहीं कनकवती, राजा ने वैसेही किया इसको भी छोडदिया.फिर यही बलभद्र अप नी स्त्री को सरूपाजान मैंने वृथाही इसको कुरूपा बताया यह विचार यथा सुख घरजाय परमानन्दको प्रासहुआ। .. चतुर्थ प्रश्नोत्तर दृष्टांत-मथुरापुरीमें कोई रसिक वैश्य कि 1 (२८) सीके पासचित्रपट में एक कामिनी को देख कामशहो यह कौन है इस प्रकार चित्रपटबालेसे कहा वह बोला मित्रा यह उज्जयनीक अनन्तकीर्तिकी नितम्बवतीहै यहसुन वहांजाय श्मशानका ठेका लिया और एक संन्यासिनी दूतीको भेजक हा हे नितम्बवती!मैने सुनाहै तेरापति क्षयरोगग्रस्त है सो मैं एक पुरुष को लाऊंगी तू उसका पैर पकड़ हास्यसे पतिको मा रदीजिये, वह निरोग होजायगा उसने वैसेही मानलि- यावह वैश्य रात्रिमें जाय पैर पकड़तेही पायजेव निकाल छुरी से पैरको चिह्नितकर भागगया, फिर वही धूर्त अनन्त कीर्ति उसके पतिके पास जाय पैजेव बेचनेलगा, यह तो मेरी स्त्री की पायजेवहै यहजान नगरवासियों को इकटाकर बारर पूछा यह सुन वैश्य ने कहा मैं श्मशानमें बैठाहीथा वहीं एक स्त्री जले मुरदेको निकालतीहुई देख मैंने उसकी यहपायजेब छी- न और पैरने बुरी.भी मारी फिर वह चलीगई अनन्तकीर्ति यह सुन शाकिनी अपनी स्त्रीको जान निकाला. वही श्मशान में प्राणत्यगार्थ गई तभी यह वैश्य उस नितम्बवतीको सब वृत्तसुनाय अपने घर मथुरा नगरीको लेआया यह प्रश्नोत्तरहे। हेराजबाहन ! ब्रह्मराक्षसने मेराबड़ाही सन्मानकिया तभी आकाशमें ब्रह्मराक्षसले गृहीत एकत्रीको देखायह ब्रह्मराक्ष. सदौड़ उससे स्त्री छीन युद्धकर दोनों मरगये मैं भी वही कन- वतीहूं यह जान आपही के शोकसे संतप्त मुझको इस ब्रह्मरा क्षस ने बनपकड़लिया यहसुन राजकन्याकोभी उसीनौका में विठाय फिर दामलिप्त नगरमें आय प्राणत्यागनमें उद्यत तुंगधन्का को दिखाय कन्दुकवती को विवाह और उसी को- M

(२९)
+
शदास तथा उसकी स्त्री चंद्रसेनादि को लाय फिर सिंहव
मां की पत्रिका पाय आपका दर्शन किया यह सुन राजबाह
न ने कुछ हँस मंत्रगुप्त को आज्ञा चरित सुनानेकी दी ॥
इतिश्रीमत्पंडित गणेशमसादसूनुना रामस्वरूपशर्मणा करायां
दशकुमारचरित भाषायां षष्ठ उच्छासःसमाप्तः ।
मंत्रगुप्त चरितम्
देव ! मैंभी आप को ढूंढता २ कलिंग देश को गया और
श्मशान के निकट किसी वृक्ष के नीच सोय भी गया आधी
रात बीतने पर यह मैंने सुना देखो वह दुष्ट तपस्वी मुझे
भेजता है कोई इसका विन्न करने को समर्थ यह सुन वही
में जाय हड्डियों की माला गले मे डाले चिता में हवन करते
किसी जटा धारी को देख और सामने किसी किंकर'
को भी देखा मैं उस दुष्ट जटाधारी को इसी कलिंग
देश के राजा की, किंकरसे लाईहुई कनकवतीकन्या
का शिर काटते देख उसी तलवार से इसी जटाधारी का
मुझ से शिरकाटा देख वह किंकर प्रसन्नहो. मुझ से बोला
सौम्य ! भाज भापंने मुझे इस दुष्ट से छुटाया अब मुझ
किंकरको कोई कार्य बताइये सो मैं करूं यह सुन मैंने उस
कहा मित्र ! इसी कन्या को यथा स्थान पहुंचादे तभी
वह कन्या भी मुझसे बोली प्राणरक्षक ! इस मुझे काल
से बचाय क्यों शोकसागर में डुबोतेहो मैं आपही की सेवा
करूंगी यह सुन मैं भी उसी कन्या के साथ कन्यान्तःपुर में
जाय यथेच्छ आनंद भोगा कभी विहारार्थ निज कान्ता के
साथ बगीचे में वसन्तानुभव करते कलिंगनाथको देख पूर्व
से

( ३०)
बैर से कलिध्रनाथ जयसिंह ने राजाको पकड़ कनकवतीको
भी ले निज नगर में गया, मेरे वियोग में यह राजपुत्री भ.
वश्य प्राण छोडदेगी यह विचारतेही किसी अंध्रदेश से आये
ब्राह्मण को देखा और उसने कहा कोई यक्ष कनक लेखाको
चाहता उसीके यह जयसिंह मंत्र तंत्रादिकों को कररहा है
यह सुन मैं सन्यासी का वेशधार शिष्य समूह कुछ साथ ले
जयसिंह के देशको जाय किसी तालाबके किनारे धूनीरमाय
इसका भूत प्रेत मंत्रतंत्र विद्या में बहुत चातुर्य है यह प्रकट
शिष्यों के द्वारा मैंने कराया यह सुन वहां राजा भी आया
राजाको देखतेही मैं बोला राजन् ! कन्या रत्न के लाभ में
आपका प्रश्न है वह यक्ष निवारण करना तो अशक्य है तो
भी आप तीन दिन ठहरिये मैं यत्न करता हूं वह भी तीन
दिन विताय फिर आया मैं भी धूनी से लेकर सरोवर तक
पहलेही सुरंग खोद बैठा था मैं उसे देख बोला राजन इस
तालावको पूर्व सफा कराय आधीरांतमें स्नानकर गोतामार
जो शब्द होगा उसको सुन फिर निकलतेही मापके प्रताप
को न सह वह यक्ष भाग जायगा, वैसेही राजाने किया में
भी तभी उसी सुरंग द्वारा सरोवरमें जाय जयसिंहको गुफा
में लाय उसका शिर काट फिर उसीसरोवर से निकल राज
भवन में जाय प्रातःकाल सिंहासन पर बैठ मंत्रियों से
बोला देखी आपने देवी शक्ति जो मेरा शरीर और स्वभाव
यह दोनोही बदल गये आज अवश्य नास्तिकोंका अधोमुख
होगा यह सुन मंत्री भी जय २कार कर यथा स्थान स्थापित
हुए फिर मैं प्रियाकी सखी शशांक सेनाको बुलाय निजं वृत्त

( ३१) सुनाय तद्वारा प्रिया से भी कह वह राज्य कलिंगनाथकोदे उसी की आज्ञासे कनकलेखा को विवाह में यहां पत्रसे आया वह राजबाहन सुन प्रसन्नानन हो कहो अपनी कथा यह वि- श्रुत से कह वह भी कहने लगा। इतिश्रीमत्पंडित गणेशप्रसादसूनुना रामस्वरूपशर्मणां कृताया दशकुमारचरित मापायां ससमउच्छास समाप्त: विश्रुत चरितम् देव ! मैं विध्याटवी के निकट अटन करते २ मुझे एक राजकुमार देख रोकर बोला सौम्य ! मेरे पिपासार्थ एकवृद्ध जल लेने को गया था वह भी गिरपडा यह सुन मैंने उसको निकाल कुमारको जल पिलाय कुछ खिलाय पूंछा आप कौन हैं तभी वहवृद्ध बोला सौम्य ! विदर्भ देशके राजाव्युण्यवर्मा का पुत्र अनन्तवर्मा था वह कभी मंत्रियोंसे दण्डनीतिकोपढ़ अन्तःपुर में जाय आज मुझे दण्डनीति पढ़ाई है यह कहा तमी कोई पूर्णभद्रनाम कंचुकीबोली राजन् ! यही ब्राह्मण लोक नीति के बहाने धनही लूटतेहैं इससे इस सम्पत्ति और नवीन वयको क्यों नाश करते हो इन अप्सरों के साथ शरीर प्राप्तका सुख अनुभव कीजिये राजा ने वैसेही किया, कभी अश्मकेन्द्र, वसन्तभानु का मंत्रिपुत्र चंद्रपालित मुझे पिता ने निकाल दिया है यह वात बनाय कुछ गूढ़ पुरुषों को साथ ले राजाको कामशास्त्रकीही शिक्षा करने लगा.राजाभी उसका उपदेश शास्त्रों के समान मानता था तभी राजा को प्रमत्त देख राज्य नष्टभ्रष्ट होनेलगातभी वसन्तभानुने किभी

( ३२)
भानुवर्मा को सहायक कर राज्यको आक्रमण किया तबयही
राजा अनन्तवर्मा ने कुंतलपति अवन्तिदेशकै राजाकी वेश्या
को बलात्कार बुलाय नृत्य देखा यह सुत कुन्तलपति वसन्त
भानु यह दो मैत्रीकर मुरलापतिवीरसैनको बुलाया और
राजा ऋचीकेश को वा कोंकणपति कुमारगुप्त को सासि
क्याधिपति नागपाल इत्यादिको साथले अनंतवर्मा से युद्ध
किया और उसको मार भी दिया तभी वसु रक्षितमंत्री राजा
को नष्ट जान उसके पुत्र इस भास्करवर्मा और पुत्री मंजुवा-
दिनी और मातारानी वसुंधरा कोसाथले आतेरज्वरके कारण
वह स्वर्गलोकको सिंधारा तबहमसब माहिष्मती नगरीको
जाय अनंतवर्माके सौतेले भाई मित्रवर्माके इनसवको पहुंचा
दिया मंजुवादिनी का ग्रहण और कुमार भास्करवाके मार
ने की इच्छा यह देवी वसुंधरा जान मुझं नाली के साथ
इस कुमार को भेज दिया है फिर मैंने कहा क्या इसकी
जाती है ? तभी वहनाली जघकहने लगा सौम्य ! पटने
के वैश्य वैश्रवणकी पुत्री सागरदत्ता का पति कुसुमधन्वा
उसकी जो पुत्री है वह इस राजकुमार की माताहै फिर मैं
उस वृद्ध से बोला इस की माताकी और मेरे पिताकी एक
- हीननसाल है और विश्रुत मेरा पिता है. यह कह उस
को आलिंगन करा तभी एक किरातने दो मृगों के दो बाण
मारें पर वह न मरे तभी में उससे धनुष ले एक ही वाण
से उन दोनो मृगों को मार एक मृग किरात को दे अपर
का भोजन कर सब को खिलायाः फिर वही व्याध मुझ
से कहा हुआ माहिष्मती के वृत्तान्त को कहने लगा सौम्य

(३३ )
में अभी शेर की खाल बेच वहांही से चला भाता हूं वह
मित्रवमी भास्करवा को मार अपने आधीन राज्य करना
चाहता है किरात वाक्य सुन मैं नालीजंघसे बोला मंनिन् !
यह देवी से कहो मंत्र गुप्तकुमार की रक्षामें नियुक्त है और
देश मे यह प्रकट करो कि कुमार को सिंह खागया यह सुन
मित्रवमा मनमें आनन्द हो ऊपरसे दुःख कर देवी को
समझायेगा और राजपुत्री को अभिलाषा करेगा तभी देवी
एक पुष्पमालामेंविषलगाय,जो मैं पतिव्रताहूं तोयह अभीनष्ट
हो, यह तो विषसे मरी जायगा फिर वही माला जलमें धो
निज पुत्रीको पहरावै यह देख सब नगर वासी आश्चर्य में
होजायगे फिर यही देवी आपके द्वारा यह कहै चंडवर्मा से
यह कन्या और अनाथ यह राज्य आपही ग्रहण कीजिये
और हम दोनों कपाली फकीरी का वेशधर श्मशान में र.
हँगे फिर देवीसे यह प्रगट करै यह पांचवें दिन चंडवर्मा
मरजायगा और सिंहरूप से अब तो इस कुमार भास्कर
वर्माकी मैंने रक्षा किया है एक ब्राह्मण के साथ इसी मेरे
मंदिरमें से यह लड़का निकल राज्य करैगा और उसका
सहायक यह ब्राह्मण का कुमार इसी मंजुवादिनी को वि.
वाहैगा यह रात्री में रानी वसुंधरा को विन्ध्यवासिनी देवी
ने स्वप्न दिया है, वह सुन नैसेही उस नाली अँघ वृद्धने कि-
या, जो माला चंडवा के गलेमें विष होगई वह मंजु-
वादिनी के गले में चन्दन लम शीतल होगई यह पातिवा
हीका प्रताप है यह जान उस देशबासी सत्र देवीकी आ.

( ३४ ) ज्ञानुसार चलते थे फिर कभी रानी हमें फकीर रूपमें प- हिचान यह मैंने स्वप्न देखा है सो ठीकहै यह कह में नाली जंघ द्वारा राज भवनमें राजाको जान किला कूद उसको मार एक सुरंग खोद आभूषणादि पहर राज पुत्र के साथ वहांगना, तभी सब मनुष्यों के सम्मुख देखतेही वहां श- निने पूजाकी फिर कपाट कुपाट भेड़ जभी द्वारे निकली तभी हम दोनों उली सुरंग द्वारा निकल मंजुवादिनी के साथ विवाह कर फिर उस सुरंग को भरदिया यह नाग- रिक जन भास्कर शर्माको पहिचान मुझे देवीदत्त जान भय मानने लगे फिर वहांका भास्करवर्मा को राज्यदे मेंभी बड़े आनन्द को अनुभव करता २ वहांरहा ॥ इतिश्रीमत्रांडिन गणेशप्रसादमृनुना रामस्वरूपशर्मणा कृनायां दशकुमारचरित भाषायां भष्टा उच्छाम समाप्त: "उत्तर पीठिका" यह सब देश निवासी देव्यंश मुझको जान मेरेही प्र. तापले भयभीत होकर भास्कर वमाको राज्य देने की अ. भिलाषा करने लग और वलन्त बर्माक भी किंकर सब इमारी तरफ आय २ मिलने लगे तभी वसन्तवर्मा सेना ले युद्धार्थ माया तभी एकाएकी ही मैंने खड्गम उसका शिर काट इसी राजकुमार को वह राज्य देदिया फिर देवी की आज्ञाले चण्डवा के राज्यको निजाधीन कर मंजुवा- दिनीको वहीं सौंप यहां आपका दर्शन किया, इस कथाके भीतनेही पर पुष्पपुर से एक पत्रिका आई लाजवाहन उस को खोल सबको सुनाने लगा- .

( ३५ ) स्वस्ति श्री पुष्पपुरसे राजहंसकी राजशाहन को आशी- दि में सब कुमारों का राजवाहन का वनमें वियोग सुन वामदेव के आश्रम में जाय कैसे शकुन से आपने राज- वाहन को विजयार्थ भेजा न जाने वह कहांगया यह कह निज प्राण त्यागकी मैने अभिलाषा की यह सुन उन त्रि- कालवेदी मुनिने कहा राजन् ! धैर्य धरिये सब कुमार दशों दिशाओंको जीत चंपामें आय मिलेंगे, अब आपके आनेकी खबर सुन मैंने आपके पास पत्रिका भेजी इसको देखतेही देखते जल्दी आप चले आओ नहीं तो अपनी माता और मुझे जिन्दा न देखोगे यह पत्र सब कुमार सुन अपने २ राज्यों में मंत्रियों को स्थापनकर मान सारको जीत उसी के कारागार से पुष्पोद्भव को छुटाय अवन्ति सुन्दरी को ले पुष्प पुरमें आय राजहंस को प्रणामकर बैठे और अपना २ वृत्तान्तभी सुनानेलगे फिरभी एकबार राजहंस की आज्ञा नुसार दशोदिशाओं को जीत आये तभी वामदेवकी आज्ञा पाय राजहंसने संन्यास लिया और यथा योग्य सबकुमारोंको दशोदिशों का राज्य दिया और मगधदेशका अभिषेक, राज वाहन को किया फिर वही कुमार परस्पर मैत्री से स्वराज्यों को करतेहुए परमानन्द को प्राप्त हुये ॥ . इति श्रीमहनगणशपमाद मनुनारामस्वरूपशुक्लन कुनायां दशकमार चरितभाषाया मुत्तरपीठिका समाप्ता. --

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प्रकटहो कि-जिन साहवोंको इकट्ठी किताबैं खरीदनी
होवें हमसे पत्रव्यवहार करें तो उनको बहुत किफायत के
साथ देंगे नीचे लिखी पुस्तकें हमारे यहां मिलसकी है।
संस्कृतसागर भाषाटीका।
इसमें संस्कृत सीखनेकी रीति व शिक्षा इतिहास अनेक
प्रकारकी बातें भरी हैं देववाणी संस्कृत विद्या सीखनेवालों
के बहुत उपयोगी है।
श्रुतबोध सान्वय भाषाटीका।
इस में प्रथम श्लोक नीचे पदच्छेद फिर अन्वय नीचे सं-
स्कृत टीका तिसके नीचे भाषाटीका इस रीतिसे स्थापित कि
याहै कि विद्यार्थियों को पूर्ण सहारा पहुंचता है ।
परीक्षाचक्रावली
P,
जन्माष्टमी कथा भा० टी०
आदित्यनत कथा
सूर्यकवच
शीलनिरूपणाध्याय भा० टी०
पत्रादि इसपते से भेजना चाहिये।
पं० रामस्वरूप शुक्ल
कठगर (बीच)
मुरादाबाद. (सिटी)
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Dashkumaracharit Bhasha

Author
Pandit Ramsvarup Shudlen
Title
Dashkumaracharit Bhasha
File name
Dashkumaracharit Bhasha
Text
OCR done
Citation
1900
Published
2009/09
Publisher
Muradabad
Language
Sanskrit
Pages
42
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322465
Barcode
99999990252936.00
Scanning centre
Banasthali University
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