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Vedhantha Paribhasha
Front matter
प्रकाशकसंस्था
अखिलभारतीयसंस्कृतपरिषत्
महात्मागांधीमार्गः
हजरतगञ्जः
लन्दनगरम् ।
प्रकाशनं परिषदायत्तम्
मूल्यम्-सार्धचतुर्दशरौप्यमुद्राः
मुद्रक:
लखनऊनगरान्तर्गतगौतमबुद्धमार्गस्थः
'स्टारप्रेस' इति मुद्रणालयः
प्रकाशकीय अखिल भारतीय संस्कृत - परिषद्, लखनऊ को प्रकाशन - योजना के अन्तर्गत श्रीमदाचार्य पं. आनन्द झा प्रणीत 'भगवती' नाम्नी टीका से संवलित श्री धर्मराज अध्वरीन्द्रकृत 'वेदान्तपरिभाषा' का यह संस्करण संस्कृत-साहित्यानुरागी विद्वत्समाज के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए हमें हर्ष और सन्तोष का अनुभव हो रहा है । प्रस्तुत प्रकाशन उपर्युक्त योजना के अन्तर्गत परिषद् का सातवां प्रकाशन है । इस स्थान पर अखिल भारतीय संस्कृत - परिषद्, लखनऊ और उसके विविध क्रियाकलाप का थोडा सा परिचय दे देना अनुपयुक्त न होगा। इस समय परिषद् का लखनऊ नगर में संस्कृत, पालि और प्राकृत तथा सम्बद्ध विषयों का एक पुस्तकालय और वाचनालय है । यह पुस्तकालय अपने स्थापना-काल से ही एक ऐसे शोध-सस्थान के रूप में कार्य करता आ रहा है जहां शोधकर्ताओं के लिए सभी प्रकार की मुविधाए उपलब्ध है । परिपद् हस्तलिखित ग्रन्थों का अन्वेषण और संकलन, प्रौढ़ो के लिए संस्कृत - शिक्षण की व्यवस्था, विद्वद्गोष्ठियों और भाषणों का आयोजन, वेद-मंत्रो, संस्कृत के गानों तथा संस्कृत के विशिष्ट विद्वानों के भापणो की टेप-रेकाटिंग और संस्कृत, पालि तथा प्राकृत के ग्रन्थों के सम्पादन और प्रकाशन में भी संलग्न है। 'वेदान्तपरिभाषा' वेदान्त का एक मुविख्यात और बहुपठित ग्रन्थ है और इस पर अनेक विद्वत्तापूर्ण टीकाएं प्रकाशित हो चुकी है। अतः सहज ही प्रश्न उठता है कि दम नयी टीका की क्या आवश्यकता थी ? 'वेदान्त परिभाषा' के रचयिता धर्मराज अध्वरीन्द्र वेदान्त और न्याय दोनों के ही प्रकाण्ड पंडित थे और इसलिए उनके इस अद्वैत वेदान्त के ग्रन्थ में न्याय का पुट पर्याप्त मात्रा में है। मूल लेखक की भौति 'भगवती' टीकाकार आचार्य पं० आनन्द झा भी न्याय और वेदान्त के विशिष्ट विद्वान् हैं और इसीलिए न्याय की सहायता से इस वेदान्त- ग्रन्थ की अनेक जटिल गुस्थियों को सुलझाने में समर्थ हुए हैं। परिषद् के संस्थागकों में लखनऊ तथा वाराणसेय संस्कृत - विश्वविद्यालयों के भूनपूर्व उपकुलपति, प्रोफेसर को० अ० सुब्रह्मण्य अय्यर महोदय का प्रमुख स्थान ( २ ) है। परिषद् ने अब तक जो भी उन्नति की है उसमें उनका बहुत बड़ा हाथ रहा प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रकाशन उन्हीं की प्रेरणा से हाथ में लिया गया था और उसमें परिषद् को निरन्तर ही उनका सक्रिय सहयोग भी प्राप्त होता रहा है, यहां तक कि स्वास्थ्य के ठीक न रहते हुए भी ग्रन्थ की भूमिका का पुनरीक्षण और ग्रन्थ के अधिकांश फार्मों के प्रथम और अन्तिम प्रूफों का संशोधन उन्हीं ने किया है। हमें विश्वास है कि परिषद् पर उनकी कृपा सदा ही बनी रहेगी। परिषद् के वर्तमान् अध्यक्ष, डा० सत्यव्रत सिंह भी, जो इस समय लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत-विभाग के भी अध्यक्ष हैं, सदा ही परिषद् की सब प्रकार की सहायता करते रहते है। प्रस्तुत ग्रन्थ की भूमिका का वर्तमान् रूप उन्हीं के पुनरीक्षण और संशोधन का परिणाम है । इस ग्रन्थ की भूमिका गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्राध्यापक, श्री हेमचन्द्र जोशी ने लिखी है; अन्त में दी हुई शब्दानुक्रमणी का प्रणयन "श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी हिन्दी - संस्थान, आगरा" के प्राध्यापक डा. श्याम प्रकाश ने किया है और प्रेस कापी शोधछात्रा श्रीमती सरोजबाला खरे ने तैयार की है । इसके अतिरिक्त श्रीमती खरे ने प्रूफ -संशोधन भी बड़ी सहायता की है । ग्रन्थ के प्रकाशन मे लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्राध्यापक, डा. जगदम्बा प्रसाद सिनहा और उत्तर प्रदेश शासन के भाषा- विभाग के विशेष कार्याधिकारी, श्री पुरुषोत्तम लाल श्रीवास्तव से भी पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई है। । परिषद् के उपर्युक्त सभी हितैषियों ने सभी काम अत्यन्त लगन और सेवा- भाव से किया है। अतः हम इन सभी सज्जनों के अत्यन्त आभारी और कृतज्ञ हैं । हम स्टार प्रेस के स्वामी और व्यवस्थापक, श्री रामचन्द्र के भी कृतज्ञ हैं, क्योंकि उन्होंने इस ग्रन्थ के मुद्रण में जिस सहिष्णुता, सहयोग और तत्परता का परिचय दिया है वह सर्वथा सराहनीय है। वसन्त पञ्चमी संवत् २०२० वि० गोपालचन्द्र सिंह, मन्त्री VEDĀNTA PARIBHĀSĀ: THE BHAGAVATTCOMMENTARY INTRODUCTION The importance of Dharmarāja Adhvarindra's Vedānta Paribhāṣā as a manual of Advaita logic and metaphysics can hardly be overemphasised. It brings together in a systematic manner a good deal of matter that lies scattered in different works of Advaita philosophy. Nevertheless, the work bears unmistakable stamp of originality. As will be clear subsequently, the author was a great Naiyāyika. This, together with the fact that he wrote in the seventeenth century, constrained him to use the language of Nyāya. The work is divided into eight chapters. The first six chapters deal with the six ‘Pramāṇas' or means of knowledge in the day-to-day world, admitted by the Advaitins, vine *Pratyakşa' (perception), 'Anumāna' (inference), 'Upamāna' (analogy), Agama (written tradition),Arthāpatti' (presumption) and 'Anupalabdhi' (non-apprehension). The remaining two chapters respectively deal with 'visaya' (subject-matter) and 'prayojana' (purpose of enquiry). This portion, though written with great profundity, is necessarily brief as the objective world with which it concerns itself, has only empirical existence. The chapter on Pratyakşa' is the most detailed one and the author has brought all his philosophical acumen and dialectical skill to bear upon the discussion of the topic as it is the most important of all topics for an Advaitin. Brahma-jiāna' or the knowledge of Brahman is the summum bonum of one's life. It is reckoned as the 'parama puruşārtha'. The mcdiate knowledge of Brahman is of no avail. It is the immediate knowledge or 'a-paroksa jñāna' of the Absolute that is sought after by those who are desirous of attaining salvation. Instead of using the more familiar word ‘pratyakşa' tlic author uses the word “a-paroksa' for perception. It is, perhaps, due to the fact that the word 'pratyakşa' somehow pre- ( 2 ) eminently brings to the mind the instrumentality of the sense-organs in the matter of perception and the word 'a-parokşa' brings in the idea of immediacy to the fore more easily. Although in the case of the perception of external objects the instrumentality of the sense-organs is unquestioned, the mental perception of internal states of pain, pleasure and the like is not due to the instrumentality of scosc-organs. "Citta' (the same as the 'manas of the Naiyāyikas) is not recogniscd to be an 'indriya' by Dharmarāja. Even if "Citta' is regarded as an 'indriya' it could not give us the perceptual knowledge of the Brahman. The preceptual knowledge of Brahman is possible only through intuition and 'Citta' does not play any direct role in the task. The word a-parokşa' conveys better the idea of immediacy, the common element of both intuition and ordinary perception. Dharmarāja holds the view that immediate knowledge is possible through verbal statemeats also. This is true not only in the wellknown example of daśamastvamasi' but also in the case of the 'mahā. vākayas' viz. 'tat tvam asi' and the like! Here our author follows the view of the 'Vivarana' school in the matter. According to Prakāśātınan and others of the school "Sravaņa' or 'vākya-vicārā’ is the principal means of liberation. 'Mana na' and 'Nididhyāsana' arc auxiliary to it. There is vedic imperative (vidhi”) with reference to "Sravana', "Manana' and 'Nididhyāsana' and as such they are of the nature of mental operation.* According to Vacaspati neither is 'Śravana' † Pañcadasi Trpti-dſpa-prakarana-verscs, 27, 69-70 त्वमेव दशमोऽसीति गणयित्वा प्रदर्शित: अपरोक्षतया ज्ञात्वा हृष्यत्येव न रोदिति ॥ 27॥ अवान्तरेण वाक्येन परोक्षा ब्रह्मधीभवेत् । सर्वत्रव महावाक्यविचारादपरोक्षधीः ॥ 69॥ ब्रह्मापरोक्ष्यसिद्ध्यर्थं महावाक्यमितीरितम् । वाक्यवृत्तावतो ब्रह्मापरोक्ष्ये विमतिनंहि ॥ 70 ।। * Siddhānta-bindu--Acyuta Granthamālā-2nd Ed. p. 180 बत एव मनननिदिध्यासनसहिते श्रवणारव्ये वेदान्तवाक्यविचारे 'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इत्यादिविधिरुपपद्यते ।
(3) directly conducive to immediate knowledge of Brahman nor is there vedic impcraive with regard to "Śravaņa’ etc. for they are of the nature of mental states. The author also points out that in the case of 'surabhi candanam', which is quoted as an instance of Walaukika pratyaksa' by the Naiyāyika, the cognition of the 'candana' is immediate whereas the cognition of its 'saurabha' or fragrance is mediate or 'paroksa'. Similarly, in the case of the stock example of inference, viz., "the hill is fiery", the cognition of the hill is immediate-in case the hill is visible-while the existence of the fire is inferred. In the event of the bill (i.c. the paksa) also being invisible the cognition of both the hill and the existence of fire thereupon would be 'paroksa' or mediate. We have taken note of some of the special points raised by the author of the Vedānta Paribhāṣā. For a critical study of some of the other more important topics dealt with in the text the reader is referred to the excellent works of Dr. D. M. Datta (a) and Dr. V. P. Upadhyaya(b) on the subject. Dharmarāja Adhvarindra and His Works Dharmarāja was a native of Kançaramāņikkan village in the Tanjore District. His elder brother's name was Trivedi.Narayana Yajvan and he belonged to the Kauninya gotra. He was a Rg-vedin | Bhāmati on Samkara's commentary on B. S. 3.IV. 26 अपि च चतस्रः प्रतिपत्तयो ब्रह्मणि। प्रथमा तावदुपनिषद्वाक्यश्रवणमात्राद् भवति । यां किलाचक्षते श्रवणमिति । द्वितीया मीमांसासहिता तस्मादेवोपनिषद्वाक्याद यामाचक्षते मननमिति । तृतीया चिन्तासन्ततिमयी यामाचक्षते निदिध्यासनमिति । चतुर्थी साक्षात्कार- वती वृत्तिरूपा, नान्तरीयकं हि तस्याः कैवल्यमिति । (a) Six Ways of Knowing (Calcutta University 2nd cd.); (b) Lights on Vedanta (Chowkhambha, Varanasi) 1. इति श्रीमत्कण्डरमाणिक्यग्रामवासिना त्रिवेदिनारायणयज्वानुजेन धर्मराजा- ध्वरीन्द्रेण कौण्डिन्येन विपश्चिता विरचिते तर्कचूडामणी शब्दखण्डः समाप्तः । Colophon of the ms. of his 'Tarka-cudamani vide Vol. XI of the Catalog uc of Sanskrit mss. deposited in the Tanjore Library, (6) Prakaśikā. He was also a pupil of Dharmarāja." It has been published by the Government of Travancore (1928). 3. Nārāyaṇa Bhatta Šāstrin wrote a commentary called Bhūşaņa. It has not been published yet. 4. Yet another commentary called 'Arthadipikā' was written by Śivadatta. It is a brief but lucid commentary and has been published thrice in the Haridas Sanskrit Series (Banaras) 5. Pandit Krishộanātha Nyāya-Paricānana wrote a commentary called 'Āśubodhini', a name which is in conformity with its lucid style. It has been published by the author himself (two editions), 6. His holiness, the Sankarācārya of Sāradāpſtha, also wrote a commentary called 'Padārtha-manj sa'a 7. By far the most learned commentary on Vedānta Paribhasa published so far is 'Paribbāsā' by Mahāmopadhyāya Pandit N. S. · Ananta Krishna Šāstri, one of the most renowned living authorites on Advaitā Vedānta. The commentary together with the text of the Vedānta Paribbāşā has been twice published by the Calcutta University. The commentator has prefixed his commentary with a long introduction in Sanskrit dealing with the kindred topics of Vedānta. 8. The late Sri Rām Varmā, a former Maharaja of Cochin, compiled a compendium of the different topics discussed in the Paribbāşa. The compendium is called “Paribhāşā Samgraha' and has been published in the Cochin Sanskrit Series 1. यत्प्रसादप्लवेनैव शास्त्राब्धिमतरं सुखम् । तं धर्मराजाध्वरिणं वन्दे सर्वार्थसिद्धये ।। II Introductory verse to Prakašika. ܟܬ शान्त्यानन्दसरस्वती भूतपूर्वशारदापीठाधीशः पदार्थमञ्जूषया चायूयुजत् । Pandit Trayambaka Ran Sastri in his Introduction to the Vedānta Paribhāṣā and Arthadipikā' of Śivadatta.
(7) 9. Yet another useful edition of the text together with its English translation has been published by the Theosophical Library, Adyar. The editor SrI S. S. Suryanārāyana śāstel has added an informative introduction and notes to the text. 10. The latest commentry on the Paribhāṣā, the Bhagavati by Nya. yācārya Pandit Amanda Jhā of the Oriental section of the Department of Sanskrit of the University of Lucknow, is being published by the Akbila Bharatiya Sanskrit Parishad, Lucknow. It comes from the pen of a scholar who is well versed in both the Navya-Nyāya and Vedānta Darśanas. He is a pupil of scholars of repute like M. M. Pandit Phaņibhūşaņa Tarkavāgića, M. M. Pt. Balakrishna Jha and Pandit Vāmācharana Bhattāchārya. He has several published and unpublished works to his credit. His Pādārthaśāstra, a work on Vaiseșika Philosophy written in Hindi, is a good introduction to the students of the Vaiścsika'. His commentary on the Paribhāṣā is being published for the first time. The 'Bhagavati' is written in simple Sanskrit and explains the text abounding in many knotty points admirably. The author has aptly pressed the Nyāya into the service af the Vedānta of the Sankara school. It will, undoubtedly, prove to be of immense use to the students and scholars alike.
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वेदान्तपरिभाषा। (भगवतीसहिता) (१) चरणप्रणताऽशेष-हृदावरणवारिणी । उदेतु हृदये काऽपि सवीणा करुणा मम । ( २ ) यदीयवदनस्फुरन्नवनिशाकरप्रोज्वला- मुपास्य सुरभारतीमहमभूवमेतादृशः । तदीयचरणारुणाम्बुजपरागपुजे कथं न मत्प्रणतिसन्ततिभ्रमरभामिनीवोल्लसेत् ।। प्रारब्धुमिष्टस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थं मङ्गलमाचरन् शिष्यप्रवृत्ता- वुपयोगि विषयप्रयोजनसम्बन्धाधिकारिस्वरूपानुबन्धचतुष्टयप्रदर्शनं करोति धर्मराजाध्वरीन्द्र:- तत्र भवान् यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः । तं नौमि परमात्मानं सच्चिदानन्दविग्रहम् ॥ १ ॥ तु यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः (भवन्ति) सच्चिदानन्दविग्रहं तं परमात्मानं नौमीत्यन्वयः । यस्याविद्या यदविद्या, यदविद्यायाः विलासः यदविद्या- विलासः, तेन यदविद्याविलासेन । यस्येत्यत्र षष्ठ्यर्थः सम्बन्धः, स च मिश्रमते निष्ठत्वम्, विवरणकृन्मते विषयित्वं बोध्यम् । विलासस्तु ईक्षणसङ्कल्पात्मको वृत्तिविशेष: परिणामित्वं वा । भूतभौतिकसृष्टय इत्यत्र सृष्टिपदस्य प्रत्येकं सम्बन्धः । तथा च भूतानां सृष्टयः भाति-मा सृष्टय इत्यर्थः । भूतसृष्टि: तन्मात्रसृष्टिः, भौतिकसृष्टि: स्थूलवियद्धटपटादिसृष्टि: । सृष्टय इत्यत्र बहुवचनं सृष्टिमात्रस्य आविद्यकत्वद्योतनाय । भूतसृष्टिरीश्वरकृता भौतिकसृष्टिहिरण्यगर्भकृतेतिमत- वेदान्तपरिभाषा । २ निरासाय पृथक् भौतिकग्रहणम् । नौमीत्यस्य नमस्करोमीत्यर्थः । परमश्चासो आत्मा परमात्मा, तं परमात्मानम् । परमत्वमुत्कर्षः स च जगदध्यासाधिष्ठानत्व जगत्परिणामिमायाधिप्ठानत्वं वा । सच्चिदानन्दविग्रहमित्यत्रापि विग्रहपदस्य प्रत्येकमन्वयः । अर्थस्तु तस्य स्वरूपम् । तथा च सत्स्वरूपं चित्स्वरूपं आनन्दस्वरूपम् इति तदर्थः । तथा चायं समुदितार्थ:-यवाश्रितायाः यद्विर्षायण्या वा भावात्मि- कायाः अविद्यायाः वृत्तिविशेषेण भगवदीयेनेक्षणेन सङ्कल्पेन च सम्भवन्ति समस्ताः सृष्टयः स्थितयः प्रलयाश्च तं सत्स्वरूपम् चित्स्वरूपम् आनन्दस्वरूपं परमात्मानं नौमि, तस्मै नमस्करोमीत्यर्थः । विलासपदस्य परिणामित्वार्थकत्वे तु यदाश्रितायाः यद्- विषयिण्या वा मायायाः परिणामित्वाभिन्नाः समस्ताः सृष्टिस्थितिलयाः, तं परमात्मानं नौमि इत्यर्थः । स्थितिसंहारयोः ग्रहणं सृष्टिपदस्य तयोरप्युपलक्षकतया । यद्यपि श्लोकपूर्वार्धेन जगत: मिथ्यात्वं, " परमात्मानम् " इत्यनेन जीवब्रह्मणोरक्यं, सच्चिदानन्दविग्रहमित्यत्रानन्दपदेन मोक्षञ्च प्रतिपादयता अध्वरीन्द्रेण विषयप्रयोजने एव प्रदर्शिते । तथापि सम्बन्धाधिकारिणोरपि तत एव सुबोधतया न न्यूनता । अयं भावः विषयेण सह ग्रन्थस्य प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावः सम्बन्धो भवति । एवं यः प्रयोजनकामः स एव ग्रन्थाध्ययनाधिकारी भवति इति सुप्रसिद्धमेव । तथा च नियोriया: स्पष्टीकरण सम्बन्धाधिकारिणावपि स्पष्टीकृतावेव भवतः, इति पृथक् तदुमयस्य प्रकाशनप्रयासो व्यर्थ एव । अद्वैततत्त्वस्यात्मनः विषयत्वे नौमीति नमस्कारोऽनुचितः। नमस्कार्यनमस्कर्तृ- भावस्य भेदाधीनत्वात् इति तु नाशङ्कनीयम्, कल्पितभेदसूचनायैव परमात्मान- मित्यत्र परमपदप्रक्षेपात् । अत्र श्लोकान ब्रह्मणः तटस्थलक्षणं जगदुत्पत्तिस्थितिभङ्गकर्तृ त्वरूपम्, एव श्लोकोत्तरार्धेन तस्य स्वरूप लक्षणं सूचितं वेदितव्यम् । यत् लक्ष्यावृत्ति सत् लक्ष्यबोधकं तत् तटस्थलक्षणम्, यच्च लक्ष्याभिन्नं सत् लक्ष्यबोधकं भवति तत् स्वरूपलक्षणम् । जगदुत्पत्तिस्थितिभङ्गकर्तृत्वं न वस्तुतो ब्रह्मण्यस्ति तथापि ब्रह्म बोधयति अतो भवति तत् तटस्थलक्षणम् ब्रह्मणः । "जन्माद्यस्य यतः" इति शारीरकसूत्रमपि एवमेव तटस्थलक्षणं प्रतिपादयति । सत: चितः आनन्दाच्च नास्ति भेदो ब्रह्मणः, इति भवति तेषां स्वरूपलक्षणत्वं प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ३ - ब्रह्मणः । अथवा यदविद्येति पधं अस्माभिः अन्यथैव विगृह्य व्याख्यायते यथा- यस्याविद्या यदविद्या, यदविद्यायाः अविलासो यदविद्याविलासः । तस्मिन् यवविद्याविलासे (सति) भूतभौतिकसृष्टयो न भवन्ति सच्चिदानन्दविग्रहं तं परमात्मानं नौमीत्यन्वयः । इतरो विचारः पूर्ववद् अवसेयः । तथा च यदाश्रितायाः यद्विषयिण्या वा अविद्यायाः वृत्तिविशेषस्य विलासस्य, परिणामरूपस्य वा तस्य असत्त्वे भूतभौतिकसृष्टयो न भवन्ति, तं सच्चिनान्दस्वरूपं परमात्मानं नौमीति सरलार्थः। मङ्गलस्य क्वोपयोगः इति विचार: वैशेषिकदर्शनोपस्कारादिषु विलोकनीयः। परमगुरुं प्रणमति- यदन्तेवासि-पञ्चास्यनिरस्ता भेदिवारणाः । तं प्रणौमि नृसिंहाख्यं यतीन्द्रं परमं गुरुम् ॥ २ ॥ यदन्तेवासिपञ्चास्यैः भेदिवारणा: निरस्ताः, तं यतीन्द्र नृसिहाख्यं परमं गुरु प्रणौमि इत्यन्वयः । यस्य अन्तेवासिनः यदन्तेवासिनः, त एव पञ्चास्याः यदन्ते- वासिपञ्चास्याः, तैः यदन्तेवासिपञ्चास्यः। निरस्ताः इत्यस्य विजिताः इत्यर्थः । भेदिनः एव वारणा भेदिवारणाः द्रुतमतावलम्बिस्वरूपाः हस्तिनः इत्यर्थः । पञ्चास्यः सिंहः । नृसिंह इति आख्या यस्य तं नृसिंहाख्यं नरसिंह श्रमनामानमि- त्यर्थः । यतीनाम् इन्द्रः यतीन्द्रः तं यतीन्द्रं, सन्यासिवर्यम् इत्यर्थ. । द्वितीयान्तपरम- पदसमभिव्याहृतस्य द्वितीयान्तस्य गुरुपदस्य परमगुरुम् इत्यर्थः । परमगुरु: अध्यापकस्य अध्यापकः, तथा च परमगुरुम् इत्यस्य अध्यापकस्य अध्यापकम् इत्यर्थः । एवञ्च शास्त्रकाननसञ्चारिभिः यस्य शिष्यसिंहः सर्वे द्वैतवादिनो हस्तिनो निरस्ताः अर्थात् पराजय प्राप्ता बभूवः, सन्यासिश्रेष्ठं नरसिंहानमनामानं तं परमगुरु प्रकृष्टतया नोमि इति सरलोऽर्थः । . अत्र श्लोकपूर्वार्धन इदं द्योत्यते यद् अस्मत्परमगुरवः न केवलं नाम्नव सिंहाः आसन् अपितु द्वैतिगजगण्डकण्डूतिखण्डनपाण्डित्यगुणतोऽपि । कथमन्यथा तद्विद्यावंशसम्भूतैः अन्तेवासिपञ्चास्यैः कृतं स्याद् भेदवादिवारणानां वारणम् ?
वेदान्तपरिभाषा । स्वगुरुप्रभृतीन् तच्छिष्यान् पञ्चास्यान्, भेदवादिनश्च वारणान् ब्रुवता अध्वरीन्द्रोण ग्रन्थादस्मात् द्वैतमतनिरासस्य असन्दिग्धत्वं सूचितम् । पञ्चास्यस्य भगवतो महेश्वरस्य वारणाजिनावरणतायाः पुराणप्रसिद्धत्वात्, विजिगीषुकथाया प्रवर्तमानायां पञ्चास्यकर्तृ कैकास्यनिरासस्य सर्वानुभवसिद्धत्वाच्च । भूयसी संभावना यवयं नसिंह एव नरसिंहाथमः, येन संक्षेपशारीरकटीका भेदधिक्काराद्वैतदीपिकावयो दुब्हा प्रन्थाः रचिता इति गवेषकाणां मतम् । एतस्य जीवनकाल: शाकषोडश- शताब्दी। तेनासौ मधुसूदनसरस्वतीस्वामिनां निकटपूर्ववर्तीति लक्ष्यते । भूयते यत् किल पूर्व वृद्वैतवादी अप्पयदीक्षितः एतेनैवाश्रमचरणेन विचारद्वारा अद्वैतवावी सम्पादित इति । इदानीं गुरुं प्रणमति- श्रीमद्वेङ्कटनाथाख्यान् विलङ्ग डिनिवासिनः । जगद्गुरूनहं वन्दे सर्वतन्त्रप्रवर्तकान् ॥ ३ ॥ यः विलङ्गडिनिवासिनः सर्वतन्त्रप्रवर्तकान् श्रीमद्वेङ्कटनाथाख्यान् जगद्गुरूनहं वन्दे इत्यन्वयः । विलङ्गडिः दाक्षिणात्यो ग्रामविशेषः । खलु चोलभूमी कावेरीनद्याः दक्षिणे कुम्भकोणस्य प्राच्या विद्यते, तनिवासिनः, तत्र निवासशीलान् । श्रीमद्वकटनाथ इति आख्या येषां ते श्रीमद् वेङ्कटनाथाख्याः, तान् । अथवा श्रीमत्त्वं आख्यायामेव विशेषणं बोध्यम् । आख्या - नाम । जगतां गुरवः जगद्गुरवः तान् जगद्गुरुन् । जगत्पदम् अत्र तदानीतन iमाटोकं बोध्यम्, अन्यथा असङ्गत्यापत्तेः । अनन्तरभाविविद्वज्जनगुरुत्वस्य कथंचित् परम्परया संभवेऽपि भूतविद्वदविलम्मात् । जगद्गुरूणां स्वं प्रति गुरुत्वं तु कैमुतिकन्यायसिद्धम् । वेदान्तमात्रविदुषां कथम् अन्यशास्त्रविद्वद्गुरु- त्वम् ? इत्याशङ्कय विशिनष्टि " सर्वतन्त्रप्रवर्तकान् " इति । सर्वाणि तन्त्राणि सर्वतन्त्राणि, सर्वतन्त्राणां प्रवर्तकाः सर्वतन्त्रप्रवर्तकाः, तान् । तन्त्र शास्त्रम् । प्रवर्तकत्वञ्चात्र व्याख्यातृत्वं अध्यापकत्वमिति यावत् । पाउतका श्रीमफूट- नावेन भनेन गीतायाःब्रह्मानन्दी टीका रचिता । मन्ये विद्वतोऽयं तुरीये बयसि तुरीयाथमितामपि भेजे । अत एव जगदगुरुन् इति विशेषणदानस्यापि सङ्गतिः । तुरीयाश्रमिना पूर्वाभमिगुरुत्वस्य स्वाभाविकत्वात् । अत्र जगद्गुरुपदेन शहरा- ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ५ चार्यपदारूढ़ता छोयत्ते इत्यपि केषाश्चित् मतम् । अनेकत्र मधुसूदनवाक्यालोचनायाः अनेन कृततया मधुसूदनसमसामयिकत्वम् अल्पपरकालीनत्वम् वा इति लक्ष्यते । स्वकीर्त्यनुवृत्तये स्वस्य ग्रन्थस्य च नाम प्रदर्शयन् ग्रन्थनिर्माणस्य प्रयोजनं प्रतिपादयति- येन चिन्तामणौ टीका दशटीकाविभञ्जिनी । तर्कचूडामणि म कृता विद्वन्मनोरमा ॥ ४ ॥ तेन बोधाय मन्दानां वेदान्तार्थावलम्बिनी । धर्मराजाध्वरीन्द्रेण परिभाषा वितन्यते ॥ ५ ॥ । येन चिन्तामणी दशटीकाविभञ्जिनी तर्कचूडामणि म विद्वन्मनोरमा टीका कृता, तेन धर्मराजाध्वरीन्द्रेण (मया) मन्दानां बोधाय वेदान्तार्थावलम्बिनी परिभाषा वितन्यते इत्यन्वयः । चिन्तामणौ इत्यत्र सप्तमी षष्ठ्यर्था । चिन्तामणे: टीका इत्यर्थः । चिन्तामणिः नव्यनैयायिकवर्यमैथिलगङ्ग शोपाध्यायरचितः तत्त्वचिन्तामणिम्रन्थः । यद्यपि अध्वरीन्द्रः तत्त्वचिन्तामणे: टीका न विहिता किन्तु कुसुमाञ्जलिप्रकाशमकरंदकृत: रविदत्तोपाध्यायस्य चिन्तामणिटीकायाः टीका रचिता, तथापि साक्षात् परम्परया वा चिन्तामण्यर्थप्रकाशकतया तर्कचूडामणि- टीकाया: चिन्तामणिटीकात्वोक्तिरिति पेद्ददीक्षिताः । प्रभामयूखालोकादिदशटीका: विभञ्जयतीति दशटीकाविभञ्जिनी । विभञ्जकत्वं त्वत्र तत्तट्टीकाप्रतिपाद्यदूषकत्वं, स्पष्टतया तत्तदधिकार्थप्रकाशकतया व्यर्थीकृतत्त्वं वा। तर्कचूडामणिरिति टीकायाः नाम । विदुषां मनांसि रमयतीति विद्वन्मनोरमा । मनः पदं त्वत्र अन्तःकरण- त्वसामान्यात् बुद्ध्यर्थक बोध्यम् । अन्यथा सङ्कल्पविकल्पमात्रवतो मनसः सुखात्मक- रमणासम्भवेन असङ्गत्यापत्तेः । बोधायेत्यत्र बोधः ब्रह्मज्ञानोपयोगि वेदान्तप्रतिपाद्य- पदार्थज्ञानम्, न तु ब्रह्मतत्त्वसाक्षात्कार:, एतद्ग्रन्थाध्ययनमात्रेण तदसम्भवात् । मन्दो बुद्धिविभवहीन: अप्राप्तबुद्धिप्रकर्ष इति यावत् । वेदान्ताः उपनिषद: शारीरक- सूत्राणि च, तदर्थानवलम्बते प्रतिपाद्यतया विषयीकरोति इति वेदान्तार्थावलम्बिनी। परिभाषा सङ्कतः । वितन्यते इत्यत्र वितननं विस्तार: नानाजनसम्बन्धः । तथा च वेदान्तप्रतिपाद्यविषयकसङ्केतः नानाजनसम्बद्धो विधीयते इति 'वेदान्तार्थाव- लम्बिनी परिभाषा वितन्यते इत्यस्यार्थः । अथवा वेदान्तार्थावलम्बिनी परिभाषा ६ वेदान्तपरिभाषा । वेदान्तपरिभाषानामकग्रन्थ., वितन्यते क्रियते इत्यर्थः । तथा च येन (मया) धर्मराजाध्वरीन्द्रेण अतिदुरूहन्यालयाचनामणः दशटीका - खण्डिनी तर्कचूडा- मणिनाम्नी विद्वन्मनोरमा टीका रचिता, तेन मया वेदान्तार्थविषयकसङ्केतः नानाजनसम्बद्धो विधीयते । अर्थात् बहुजनकर्तृकनिरुक्तसङ्केतविषयकज्ञाना- परिभाषाशब्दस्य ग्रन्थवाचकत्त्वे तु वेदान्तपरिमाषाग्रन्थो विरच्यते इति सरलार्थः । प्रकृतग्रन्थकर्तुः स्वस्य चिन्तामणिटीकाकर्तृत्वकथनेन गौतमीयन्यायाध्ययनं बिना न प्रकृतग्रन्थप्रतिपाद्यार्थज्ञानं भवितुमर्हतीति सूचितम् । चिन्तामणिकृतां गङ्गशोपाध्यायानां अस्तित्वं शाकद्वादशशताब्धामासीदिति इतिहासविदां कथनम् । तिर्वनन्तपुरविमुद्रते परिभाषाकृच्छिाप्यपेद्ददीक्षितकृतटीकायुते पुस्तके पद्ययोरेतयोर्मध्ये- नुकूलव्यापारः क्रियते। टीका शशधरस्यापि बालव्युत्पत्तिदायिनी । पदयोजनया पञ्चपादिका व्याकृता तथा ॥ इत्यधिकपद्यमेकमुपलभ्यते । तत्पाठस्य प्रामाणिकत्वे, येन शशधरस्य बालव्युत्पत्ति- दायिनी टीकापि कृता, तथा पदयोजनया पञ्चपादिकापि व्याकृता तेन, इत्यादिक्रमे- णान्वयो बोध्य: । शशधरस्येत्यस्य शशधरकृतसिद्धान्तदीपाख्यग्रन्थस्य इत्यर्थः । टीका विशिनष्टि-बालव्युत्पत्तिदायिनीति । व्युत्पत्तिर्बोध:, दातृत्वं त्वत्र समुत्पादकत्वं बोध्यम्, अन्यथा स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकपरस्वत्वोपादनात्मकदानवाचिदान- शब्दप्रयोगानुपपत्तेः । पदानां योजना पदयोजना तया। पञ्चपादिकेति शारीरक- भाष्यव्याख्या-विशेषस्य नाम । व्याकृता इत्यत्र व्याकरणं व्याख्यानम् । एवञ्च व्याकृता इत्यस्य व्याख्याता इत्यर्थः । ननु किमत्र क्रियते ? निरूपणमिति चेत् कस्य ? ब्रह्मतज्ज्ञानप्रमाणानामिति चेत् । ब्रह्मप्रमाणयो: जगदुत्पतिज्ञप्तिप्रयोजनकत्वेऽपि ब्रह्मज्ञानस्य निष्प्रयोजन- तया निरूपणं व्यर्थम् । मोक्षस्तत्प्रयोजनमिति चेत् त्रिवर्गफलकत्वमेव न कुतस्तस्य ? इत्यादि कलवलालनाय मोक्षात्मकप्रकृष्टफलस्य ब्रह्मज्ञानात्मकप्रकृष्टसाधन साध्यत्त्वम् इति स्पष्टयन् निरूपणं प्रतिजानीते- प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ७ इह धर्मार्थकाममोक्षाख्येषु चतुर्विधपुरुषार्थेषु मोक्ष एव परम पुरुषार्थः, 'न च पुनरावर्तते' इत्यादिना तस्य नित्यत्वावगमात् । इतरेषां त्रयाणां प्रत्यक्षेण 'तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते एवमेवामुत्र पुण्यचितोऽपि लोकः क्षीयते,' इत्यादिश्रुत्या अनित्यत्वावगमात् । स च ब्रह्मज्ञानात् इ ति ब्रह्म तज्ज्ञानं सत्प्रमाणञ्च सप्रपञ्चं निरूप्यते । शिखामणिकृद्भिस्तु निःश्रेयसप्रयोजनवत्या शारीरकमीमांसया सह स्वकीय- ग्रन्थस्य एककार्याकारित्वरूपा सङ्गति बोधयितु इहेत्यादिग्रन्थारम्भ इति प्रतिपादितम्, तत्तु विभावनीयमेव । एककर्तृकयोः अव्यवहितयोरेव निरूपणयोः प्रसङ्गादिसङ्गतेरपेक्षणात् । शारीरकमीमांसावेदान्तपरिभाषाग्रन्थयोस्तु भिन्नकर्तृक- त्वाद् अव्यवधानाभावाच्च तथाविधसङ्गत्यपेक्षाभावात् । आशुबोधिनी तु कस्य कस्य पदार्थस्यात्र निरूपणं करणीयमिति जिज्ञासया एतद्ग्रन्थारम्भ इति प्रतिपादयति, तदपि विवेचनीयमेव, सामान्यतो निरूपणप्रतिज्ञा- पूर्वम् तादृग्विशेषजिज्ञासाया: अनुदेकात् । उद्रेके वा 'ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं निरूप्यते' एतावन्मात्रस्यैव वक्तव्यत्वापातात् । पेद्ददीक्षितस्तु पुरुषार्थभेदप्रदर्शनाय ब्रह्मज्ञानस्य स्वर्गादिफलकत्वमेव कुतो न स्वीक्रियते इति प्रश्ननिरासाय वा एतद्ग्रन्थारम्भ इति प्रतिपादितम् । तदपि विभावनीयमेव । प्रथमकल्पे धर्मार्थकाममोक्षाख्या: चत्वारः पुरुषार्थाः एतावन्मा- त्रस्य वक्तव्यात्वापातात् । यदि च पुरुषार्थभेद इत्यत्र भेदो भिन्नता अर्थात् कर्मादिसाध्य. स्वर्गादिप्रतियोगिको भेदः, तदा धर्मार्थकाममोक्षेषु चतुर्विधपुरुषार्थेषु इति प्रभेद- प्रदर्शनासङ्गतेः । द्वितीयकल्पे स्वर्गादिरेव कुतो न प्रयोजनं तेषामेव कुतो न परम- प्रयोजनत्त्वम् ? इति प्रश्नानन्तरमेव प्रकृतग्रन्थस्योत्थापनीयतया असङ्गतितादव- स्थ्यात् । पुरुषार्थभेदप्रदर्शनस्य विशेषतो निरूपणप्रतिज्ञायाश्च अनौचित्यापातात् । अलमिदानी परकथाचिन्तया अध्वरीन्द्रप्रतिपाद्यार्थजिज्ञास्वनेकछात्रप्रार्थनया ग्रन्थव्याख्यामात्रप्रवृत्तस्य मम । इह-अत्र ग्रन्थे । सप्रपञ्च इत्यस्य निरूप्यते इत्यनेन सम्बन्धः । न तु इहेत्यस्य जगति ससारे इत्याद्यर्थकत्त्वम्, वैयर्थ्यांपत्तेः । न च 'खलु' शब्दवत् वेदान्तपरिभाषा वाक्यालङ्कारार्थकता, तदर्थं कुत्राप्यप्रयोगात् । नहि प्रत्यक्षप्रकरणे, इत्यप्यर्थः । परिच्छेदान्तराणामपि प्रमाणनिरूपकत्वात् । धर्मार्थकाममोक्षाख्येषु इत्यत्र आख्यापदस्य प्रत्येकं सम्बन्धः । तथा च धर्माख्येषु अर्थाख्येषु इत्येवमर्थः धर्मों यागादि कर्म वा तज्जन्यादृष्टात्मकगुणो वा तज्जन्यं सुखं वा। अर्थ: धनं तज्जन्यं मुखं वा । काम: विलक्षणसंयोगामिका रतिः तज्जन्यं सुखं वा। यद्यपि न्यायसूत्र- वृत्तिद्भिः "कामो रिरंसा, रतिश्च विजातीय: संयोगः, नारीगताभिलाषा इत्यपरे, तन्न स्त्रियाः कामेऽव्याप्तेः" इत्याद्युक्तम् तथापि नात्र तादृगर्थो विवक्षितः। इच्छाया: पुरुषार्थत्वानभ्युपगमात्, अत एव 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इत्यादिस्थले जिज्ञासाया: विचारलक्षकत्वाक्गम: । केचित्तु काम्यते इति काम: विषय इति यावत् इति वदन्ति, तन्नात्र समीचीनम्, धर्मार्थमोक्षाणामपि कामनाविषयत्वात् । - - मोक्षस्तु शुद्धब्रह्मात्मको निरतिशयानन्दरूपः । परमपुरुषार्थ इत्यत्र पुरुषार्थे परमत्वं तु नित्यत्वात्मक उत्कर्षः । 'न स पुनरावर्तते' इत्यत्र आवृत्तिः संसारः । तस्य मोक्षस्य । नित्यत्त्वावगमात् इत्यत्र अवगमो निश्चयः, तथा च नित्यत्वनिश्च- यादिति तदर्थः । 'इतरेषां त्रयाणाम्' धर्मार्थकामानाम् । त्रयाणामिति कथनं केवलं स्पष्टताय, अनुक्तावप्यक्षतेः । 'प्रत्यक्षेण' प्रत्यक्षप्रमाणेन । तद्यथेहेति श्रुती 'इह' इत्यस्य मानुषाद्यदिव्यशरीरे इत्यर्थः, सप्तम्यर्थः अवच्छेद्यत्वम् । कर्मणा चित: सञ्चितः प्राप्तः इति कर्मचितः । लोक्यते इति लोक: फलम् प्रयोजनमिति यावत् । फलत्वं तु गाणमुरणं वेदितव्यम्, तेनोपायभूतानां लक्चन्दनवनितादीनां, उपेयभूतस्य सुखस्य च संग्रहः । अमुत्र स्वर्गादिदिव्यशरीरे । यद्यपि पुण्यचितस्यापि कर्मचितत्वात् भेदाभावात् दृष्टान्तदान्तिकभावानुपपत्तिः । तथापि कर्मचितत्वं अदृष्टाद्वारकं कर्मचितत्वं बोध्यमित्यदोषः, पुण्यचितस्यातथात्वात् । दुःखोत्पादका पुण्यचितत्वस्याभावात् कचितरपुत्रियोः समनियतत्वाभावेन अभेदा- भावात् दोषासम्भव इति तु न सदुत्तरम्, श्रुतौ पुण्यपदस्य पुण्यापुण्यसाधारणा- दृष्टार्थकत्वस्य ध्रुवं वक्तव्यत्वात् । ननु इतरेषां त्रयाणां प्रत्यक्षेणेति लेखासंगतिः धर्मार्थकाममोक्षाणामित्यत्र धर्मपदस्य अन्त:करणवृत्तिगुणवाचित्वे तस्यातीन्द्रियत्वेन तनाशस्यापि प्रत्यक्षायोग्यत्वात् इति चेत्, सत्यम्, अत एव तद्यथेहेत्यादिश्रुत्यात्मक प्रमाणान्तरप्रदर्शनम् ।
उत्पमपारछेदः । शिखामणिकृद्भिस्तु अत एव प्रत्यक्षेणेति 'प्रत्यक्षसिद्धकार्यत्वलिङ्गेन' इत्येवं व्याख्यातम्, तत्तु न मनोरमम्, क्लिष्टकल्पनापत्तेः । प्रत्यक्षशब्दस्यानुगानावाचितया लक्षणाया अवश्यमाश्रणीयत्वात् । 'यथायोगमिति पाठं पूरयित्वा अर्थकामयोः प्रत्यक्षेण, धर्मस्य श्रुत्या' इति प्रकाशिकाव्याख्यानं त्वसमञ्जसम् । प्रत्यक्षश्रुत्योः प्रमाणबलाबलविचारे क्रियमाणे, श्रुतेः प्रबलतायाः अवश्यमभ्युपेयतया पूर्वोक्तदिशा त्रयाणां तदाक्रान्तत्वे प्रत्यक्षस्याप्रसरात् बलवद्देशे दुर्बलाकिञ्चित्करत्वस्य सर्वानुभवसिद्धत्वात् । तथा च श्रुत्या चेत्यत्र चकारो वाकारार्थः । तेन च प्रत्यक्ष- कल्पेऽस्वरसूचनं वेदितव्यम् । न च श्रुतौ पुण्यचितो लोक: क्षीयते इत्युच्यते न तु पुण्यं क्षीयते इति, तथा च कथं पुण्यापरनामधेयस्य क्षयित्वे श्रुति: प्रामणमिति शङ्कनीयम्, प्राक्प्रदर्शितगौणमुख्यसाधारणफलत्वस्य पुण्येऽप्यक्षतेः । स च-मोक्षश्च । चस्त्वर्थे । तथा च धर्मार्थकाममोक्षाख्याः चत्वारः पुरुषार्थाः । तत्र नित्यतया मोक्षस्य परमपुरुषार्थत्वम्, यत: धर्मार्थकामानां पुरुषार्थत्रयाणाम् अनित्यत्वे प्रत्यक्ष श्रुतिश्च प्रमाणम् । च ब्रह्म परमपुरुषार्थस्य मोक्षस्य साधनं तु ब्रह्मज्ञानम्, अतस्तनिरूपणीयम् । तस्मिंश्च निरूपणीये ज्ञानविषय भूतस्य ब्रह्मणः निरूपणसाधनस्य च निरूपणमावश्यक इति ब्रह्म, ब्रह्मज्ञानं प्रमाणं चात्र मया धर्मराजाध्वरीन्द्रेण निरूप्यते इति सरलार्थः । निरूप्यते इत्यत्र निपूर्वकरूपधात्वर्थो ज्ञानानुकूलो व्यापारः । मयेति अध्याहारः, तत्र तृतीयार्थः कर्तृकत्वम् । तच्च कृतित्वावच्छिन्नजनकतानिरूपितजन्य- तारूपम् । कृतित्वे मत्पदार्थस्य स्वाश्रितताश्रित्वसम्बन्धेनान्वयः । जन्यत्वस्य व्यापारे स्वरूपसम्बन्धेन । निरूप्यते इत्यस्य निरभ्यासः, प्रमाण-ब्रह्म-तज्ज्ञानतत्रितय- विषयकस्य एकस्य निरूपणस्यासम्भवात् । तथा निरूप्यते तज्ज्ञानं निरूप्यते तत्प्रमाणञ्च निरूप्यते इत्यर्थः । रूपधात्वर्थकदेशज्ञाने ब्रह्मतज्ज्ञानतत्प्रमाणानान्तु विषयितयाऽन्वयः । 'एवञ्च ब्रह्म निरूप्यते इति वाक्यात् स्वधिताधितत्वसम्बन्धेन अस्मत्पदार्यविशिष्ट तित्वावच्छिन्नजनकतानिरूपितजन्य- तावान् विषयितया ब्रह्मविशिष्टज्ञानानुकूलो व्यापारः इति शाब्दबोधः । एवमेव तज्ज्ञानं निरूप्यते इत्यादावप्यूहनीयम् । व्यापारस्तूपदेशो ग्रन्थरचनात्मको विज्ञेयः । सप्रपञ्चमित्यत्र प्रपञ्चो विस्तारः, तस्य विशेषणत्वं धात्वर्थक्रियायाम् । पुण्यकृतस्यापि लोकस्य विशेषतः क्षयित्व- विवेचनं सांस्यतत्त्वकोमुद्यामवलोकनीयम् । .
१० वेदान्तपरिभाषा । पदार्थस्य लक्षणप्रतिपत्त्यधीनप्रतिपत्तिकतया लक्षणज्ञापनस्यापि च विभाजनवत् निरूपणैकदेशतया प्रमाणं लक्षयति- - तत्र प्रमाकरणं प्रमाणम् । । , तत्रेत्यस्य तेष्वित्यर्थः । ब्रह्मतज्ज्ञानतत्प्रमाणेष्विति भावः। तत्रेत्यस्य प्रमाणे निरूपणीये इत्यर्थः इत्यपि वदन्ति केचित् । प्रमाया: करणं प्रमाणं इति षष्ठी- समासः । तथा च ब्रह्म तज्ज्ञानतत्प्रमाणाना मध्ये प्रमाणस्य प्रमाकरणत्वं सामान्य- लक्षणमिति सरलार्थ. । करणत्वं तु असाधारणकारणत्वम् । कारणतायामसाधारण्यं कार्यत्वन्यूनवृत्तिधर्मावच्छिन्नकार्यतानिरूपितत्वम् । तन्निवेशप्रयोजन धर्माधर्मात्मका- दृष्टे प्रमाणलक्षणातिव्याप्तिवारणं वेदितव्यम् । प्रकृते प्रमापदसमभिव्याहारात् कार्यत्वन्यूनवृत्तिधर्मपदेन प्रमात्वस्य ग्रहणम् । तथा च प्रभावामानरू- पितकारणत्वं प्रमाणत्वं इति लक्षणं सम्पद्यते । मनसि तु नातिव्याप्तिशङ्का, तस्य प्रमा प्रत्यपि हेतुत्वेन तनिष्ठकारणतानिरूपितकार्यतायां प्रमात्वावच्छिन्नत्वा- भावात् । एकात्श्रयाश्रितावच्छेद्यावच्छेदकयोः समनियतत्वनियमाङ्गीकारात् । करणलक्षणे व्यापारवत्त्वस्य न निवेशः वैयर्थयात् । यत्तु लिङ्गपरामर्शेऽतिव्याप्ति- वारणाय व्यापारवत्वं निवेशनीयमिति शिखामणिकृभिरुक्त, यच्चेन्द्रियसरिकर्षेऽति व्याप्तिवारणाय तग्निवेश इति आशुबोधिन्यामुक्त तत्तु चिन्तनीयमेव अध्वरीन्द्रः परामर्शकारणत्वस्यैव खण्डनीयतया व्यापारवत्वांशानिवेशेऽपि तत्रातिव्याप्त्यभावात् । इन्द्रियसन्निकर्षस्य तु प्रमाणत्वाभ्युपगमेऽपि क्षत्यभावात् । प्राचीन यायिकरपि तथाभ्युपगमात् । तथा हि न्यायभाष्यम् :- "यदा सन्निकर्षस्तदा ज्ञानम्, यदा ज्ञानं तदा हानोपादानोपेक्षाबुद्धयः फलम् ।" इति । अयमर्थ:-यदा विषयेन्द्रियसन्निकर्षः प्रमाणं तथा विषयज्ञानं प्रमा यदा तु विषयज्ञानं प्रमाणं तदा विषयधर्मिकहानोपादानोपेक्षाज्ञानं प्रमा इति । ननु "ननु चैतन्यमनादि तत्कथं चक्षुरादेः तत्करणत्वेन प्रमाणत्वमिति" ग्रन्थविरोध:, चक्षुरादेः प्रामाण्यानुपपत्तिशङ्कया चक्षुरादेः प्रामाण्याभ्युपगमसूचनात् इति चेत्, अस्वरससूचनायैव "आदिपददानात्" । तथा च-इन्द्रियसन्निकर्षस्यैव प्रमाणत्वं अन्थकाराभिप्रेतम् । अत एव तदव्यवहितोत्तरमेव "तदभिव्यञ्जकान्त:करणवृत्ति- रिन्द्रियसन्निकर्षादिना जन्यते ।" इति ग्रन्थकृल्लेखः संगच्छते । अन्यथा इन्द्रियादिना जन्यते इत्येवोक्तं स्यात् । गाणरणत्व भिप्रायेण वा "कथं चक्षुरादेस्तत्करणत्वेन प्रमाणत्वं" इति ग्रन्थः ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । न च चक्षुषा पश्यतीति प्रयोगानुपपत्तिः, चक्षुषः करणत्वानभ्युपगमे तद्वाचकात् करणत्वार्थकतृतीयाभावापातात् इति वाच्यम्, हेतुत्वमात्रार्थे तृतीयाभ्युपगमात् । यदि च चक्षुरादेरिति यथाश्रुतपक्षपातः चक्षुरादेरित्यादिपदस्य चानुमानाद्यर्थक- त्वाग्रहः, "इन्द्रियसन्निकर्षादिना जन्यते" अत्रैव च हेतौ तृतीयाभ्युपगम: तदा सन्निकर्षादिभिन्नत्वमेव निवेशनीयम्, व्यापारत्त्वापेक्षया तस्यातिलघुत्वात् । व्यापर- स्वस्य तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वरूपतया व्याप्तिघटितजन्यताद्वयघटितत्वेनाति- गुरुत्वात् । न चेन्द्रियसन्निकर्षस्य प्रमाणलक्षणलक्ष्यत्वपक्षे इन्द्रियेऽतिव्याप्तिः, तस्याप्यसाधारणकारणत्वात् इति वाच्यम्, तस्याप्रमा प्रत्यपि हेतुत्वेन तन्निप्ठ- कारणतायां प्रमायाचितवार्यतानिरूपिताशात् । एवञ्च व्यापारवत्त्वनिवेश- व्यासङ्गिनी प्रकाशिकापि प्रकाशमानीता वेदितव्या एतेन ननु विषयेऽतिव्याप्तिः । तत्रापि प्रमाकरणत्वसत्त्वात् इत्यपि परास्तम्, तनिष्ठकारणतायाः अपि प्रमात्वावच्छिन्नकार्यत्वानिरूपितत्वात् । ननु कार्यतायां प्रमात्वावच्छिन्नत्वनिवेशे असम्भवः, प्रत्यक्षादिप्रमाणानां मध्ये कस्यापि प्रमात्वावच्छिन्नयावत्प्रमा प्रति करणत्वाभावात् इति चेत्, तथा सति प्रमात्वावच्छिन्नकार्यतेत्यस्य प्रमात्वन्यूनवृत्तिवर्मावच्छिन्नकार्यतेत्यर्थकतायाः वक्तव्यत्वात् । यत्तु अन्यप्रमाणस्यान्यप्रमाणत्ववारणाय प्रमाकरणं प्रमाणमित्यत्र प्रमापदं प्रमितिविभाजकजात्यवच्छिन्नपरमिति प्रोक्तमाशुबोधिन्यां तत्त्वसमञ्जसम्, प्रमापदेन अन्यप्रमाग्रहणे तत्कारणताया एवान्यप्रमाणेऽभावात् । यदि च स्वीयप्रमा- ग्रहणं तदा तत्कारणतामादाय "प्रत्यक्षं प्रमाणम्", "अनुमान प्रमाणम्", इति प्रमाणसामान्यव्यवहारस्तु इष्ट एव । अत्र प्रमाणसामान्यलक्षणस्यैव कृतत्वात् । एवञ्च प्रमात्वन्यूनवृत्तिधर्मावच्छिन्नकार्यतानिरूपितकारणताशालित्वं प्रमाणत्वं इति पर्यवसितोऽर्थः । प्रमात्वन्यूनवृत्तिधर्मः ज्ञानगतं प्रत्यक्षत्वम्, तद्धर्मावच्छिन्नकार्यता तत्रैव प्रमिती, तादृशकार्यतानिरूपिता कारणता इन्द्रियार्थ- सन्निकर्षे इन्द्रिये वा, इति लक्षणसमन्वयः । एवमनुमानादिष्वपि । माणलक्षणस्य माघटितत्वेन प्रमात्वज्ञानं बिना प्रमाणत्वं दुरधिगम इति किं नाम प्रमास्वमिति प्रश्नः स्वाभाविकः, तन्निरासाय प्रमात्वं लक्षणीयम् । किन्तु वेदान्तपरिभाषा । १२ प्रमात्वस्य स्मृतिसाधारण्ये विवादेन सर्ववादिसम्मतमेकं प्रमात्वलक्षणमसम्भवीति मतभेदेन लक्षणद्वयं प्रदर्शयति- तत्र स्मृतिव्यावृत्तं प्रमात्वमनधिगताबाधितार्थविषयकज्ञानत्वम् । स्मृतिसाधारणं त्वबाधितार्थविषयकज्ञानत्वम् । तत्रेत्यत्र तत्पदेन प्रमाणलक्षणग्रहणम् । घटकत्वं सप्तम्यर्थः । तथा च प्रमाणलक्षणघटकं इत्यर्थः । प्रमात्वमित्यनेन सम्बन्धः । स्मृतेः व्यावृत्तं स्मृतिव्या- वृत्तम् । व्यावृत्तिः अवृत्तित्वम्, वृत्तित्वाभाव इति यावत् । निरूपितत्वं पञ्चम्यर्थः, तथा च स्मृतिनिरूपितवृत्तित्वाभाववदित्यर्थः । अनधिगताबाधितार्थविषयकज्ञानत्वं तत्र स्मृतिव्यावृत्तं प्रमात्वमित्याशयः । न अधिगत: अनधिगतः। न बाधितः अबाधितः । अनधिगतः अबाधितश्चासौ अर्थः अनधिगताबाधितार्थः । अनधिगताबाधितार्थों विषयो यस्य तत् अनधिगताबाधि- तार्थविषयकम्, तादृक् च ज्ञानं अनधिगताबाधितार्थविषयकज्ञानम्, तत्त्वं अनधिग- ताबाधितार्थविषयकज्ञानत्वम् । अनधिगतत्वं पूर्वोत्पन्नवृत्त्यात्मकज्ञानाविषयत्वम् । यदि च यत्र एकदा घटस्य प्रमात्मकोऽनुभव:, व्यवधाय दिनान्तरेऽपि च तद्घटविषयक एव द्वितीयः प्रमानुभवः, तत्र द्वितीयप्रमानुभवेऽव्याप्तिः । तस्य पूर्वदिनोत्पन्नानुभव- विषयविषयकत्वेन अनधिगतत्वाभावात् इत्युच्यते, तदा पूर्वोत्पन्नशानजन्यज्ञाना- विषयत्वमनधिगतत्वमिति निर्वचनीयम् । तत्र प्रथमानुभवस्य द्वितीयानुभवाजनकतया निरुक्ताजन्यत्वस्य उक्तद्वितीयानुभवेऽक्षुण्णतया अव्याप्त्यभावात् । स्वपूर्वक्षणावच्छिन्ना- ज्ञानविषयत्वमनधिगतत्वमिति केचित्, तच्चिन्त्यम् । अनधिगतपदानुक्ती स्मृतावतिव्याप्ति: स्यात् । उक्तौ च तस्या अधिगतविषयकत्वेन अतिव्याप्त्यभावात् । फलतः अनषिगतपदानुक्तौ लक्षणस्य स्मृतिव्यावृत्तिहानिः स्यात् । अबाधितत्वं वाधाविषयत्वं, तदप्रवेशे बाधितस्य शुक्तिरूप्यादिभ्रमस्यापि प्रमात्वापत्तिः। फलत: लक्षणेऽतिव्याप्तिः स्यात् अतः तत्प्रवेशः । विकल्पस्या स्वतंत्रवृत्तित्वान्युपगमपक्षे तत्रातव्याप्तिवारणावार्थप म् । अर्थपवप्रक्षेपे च विकल्पस्य 'शवज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प इति पातजलसूत्रा. सारं तस्य वस्त्वविषयकत्वेन तत्रातिव्याप्त्य- भाकः। विषयकत्वानुक्तौ त्वसंमव एव । आशुबोधिनी तु 'अर्थपदं स्वरूपकीर्तनमात्रम्' इति वर्णयति तच्चिन्त्यम् । मतान्तरेणापि संभवन्त्यां सार्थकतायां रूपान्तरेण निरर्थकत्वस्वीकारस्यान्याय्यत्वात् । 'अमावप्रत्ययालम्बनावृत्रिनिद्रेति' योगसूत्रा- नुसार निद्रायाः स्वतंत्रवृत्तित्वाभ्युपगमपक्षे तवातिव्याप्तिरतः भानपदम् । तरतुक्ती प्रत्यक्षपरिच्छेदः । इच्छादौ तु नातिव्याप्तिसंभावना, अनधिगतपदेनैवेच्छायबारमातृ । इच्छा- प्रयत्लादीनामपि स्मृतेरिव अधिगतविषयकत्वात् । तेषामपि कारणीभूतज्ञानविषय- विषयकत्व नियमाभ्युपगमात् । शिखामणिकृतस्तु ज्ञानपदस्यानतिप्रयोजनकत्वमेव वर्णयन्ति । "तत्र स्मृतिव्यावृत्तम्" इत्यत्र तत्र त्यस्य 'प्रमाणलक्षणावगमाय प्रमायां निरूपणी- यायां' इत्यर्थ निगदन्ति शिखामणिकृतः । 'प्रमाणे निरूपणीये' इति पेट्दीक्षिताः । स्वमतन्तु पूर्व मेवोक्तं मया । ननु तद्वति तत्प्रकारकानधिगतविषयकज्ञानत्वं प्रमात्वमिति नैयायिकपद्धत्यैव कथं न प्रमात्वलक्षण निरुच्यते इति चेत्, तथा सति तत्त्वावेदकमहावाक्यजन्यबोधे- व्याप्त्यापत्तेः, तस्य निर्विकल्पकतया किञ्चित्प्रकारविशेष्यकत्वाभावात्। यदुक्तमद्वैत- सिद्धौ मधुसूदनसरस्वतीस्वामिचरणः 'श्रुतिशिखोत्थाखण्डधीगोचर' इति । धीयि अखण्डत्वं तु संसर्गाविषयकत्वरूपं निर्विकल्पकत्वमेवेति स्पष्टं प्रतिपादित 'संसर्गाविषयकमनोवृत्तिविशेषविषयीभूत' इत्युक्तवद्भिः मौडब्रह्मानन्दपादैः । संसर्गाविषयकत्वे तु उक्तबोधस्य प्रकारत्वविशेष्यत्वानवगाहित्वं सुतरामेव । स्मृत्यवृत्तिप्रमात्वलक्षणमुक्त्वा स्मृतिसाधारणप्रमात्वलक्षणमाह-स्मृतिसाधारणे- त्यादि। स्मृतिसाधारण्यन्तु स्मृतिवृत्तित्वे सति स्मृतिभेदसामानाधिकरण्यम् । न बाधित: अबाधितः तादृशश्चासौ अर्थ: अबाधितार्थ:, सोऽस्ति विषयोऽस्य ज्ञानस्य इति अवाधितार्थविषयकं ज्ञानम् तत्त्वं इत्यर्थः । अबाधितत्वपरिष्कार: पूर्ववदवसेयः । रजतं विशेष्यीकृत्य जायमानात् 'इवं रजतम्' इत्याकारकज्ञानात्परं न भवति प्रामाणिकानां 'नेदं रजतम्' इति बावनिश्चयः। अतस्तत्र रजतपदार्थस्याबाधिततया अबाधितार्यविषयकत्वस्य तत्रत्ये 'इदं रजतम्' इति ज्ञाने सत्वात् लicat शुक्तौ जायमानात् 'इदं रजतम्' इति प्रातिमासिकरजतविषयकज्ञानात् परं प्रामाणिकानां ने रजतमिति व्यवहारमावेन तत्रत्यरजतस्य बाषिततया ज्ञानस्य बाधितार्थविषयकत्वेन अबाधितार्थविषयकस्वाभावात् नातिव्याप्ति सीति लक्षणस्य सौष्ठवम् । तत्तत्पदव्यावृत्तिः पूर्ववद् बोध्या। नन्वेवं सति व्यावहारिकार्थविषयकज्ञानत्वमेव प्रमावलक्षणमुच्यतामिति चेत् न। अहं ब्रह्मास्मीति वृत्तावव्याप्त्यापत्तेः । न च व्यावहारिकपारमार्थिकान्यतरविषयक- ज्ञानत्वमेव प्रमात्वलक्षण वाच्यमिति वाच्यम् अन्यतरत्वस्य भेदद्वयावच्छिन्नप्रतियोगि- नाकभैदवत्वस्य गुरुशरीरस्य प्रवेशे गौरवात् । दृष्टिसृष्टिपक्षे व्यावहारिकसत्ता- १४ वेदान्तपरिभाषा । विरहेण तद्घटितलक्षणस्य निर्वक्तुमशक्यत्वाच्च । एवमपि अप्रातिभासिकार्थविषयक- ज्ञानत्वमेव प्रमात्वलक्षणं निर्वाच्यमिति चेत् सत्यम् । सत्ताभेदमनङ्गीकुर्वतामजानतां वा पुरत: तादृशलक्षणस्य दुरधिगमतया अन्यथा निर्वचनात् । अत्रेदं तत्त्वम् ये खलु प्रमाणकरणं प्रमाणमिति यथाश्रुतरीत्या प्रमाकरणत्वमा प्रमाणत्वमङ्गीकुर्वन्ति तेषां मते स्मृतेः प्रमात्वाभ्युपगमे तत्करणानामनुभवानां प्रामणत्वापत्ति: न च सेष्टा, प्रत्यक्षानुमित्याद्यनुभवानां स्मृति प्रमात्वेनादाय तत्करणत्वस्वरूपप्रमाणत्वस्य इन्द्रियानुमानादिप्रमाणकरणकत्वरूपप्रमात्वस्य चानिरुद्ध- तया प्रमात्वप्रमाणत्वयोः विरोधाभावप्रसङ्गात् । कार्यत्वकरणत्वयोः विरोधस्य च सर्वानुभवसिद्धत्वेन प्रमाणत्वप्रमात्वयोविरोधस्य अवश्यं स्वीकर्तव्यत्वात् । अतस्ते प्रमालक्षणघटकार्थपदार्थे अनधिगतत्वं निवेश्य स्मृतेः प्रमात्वमेव खण्डयन्ति । तथा च स्मृतिकरणानामनुभवानां प्रमाणत्वाभावेन नोक्तविरोधाभावप्रसङ्गो न वा प्रमाणविभागव्याघातापत्तिः । परन्तु ये प्रमाकरणं प्रमाणमिति प्रमाणलक्षणे प्रमापदेन अनुभवात्मकप्रमायाः एव ग्रहणं कृत्वा प्रमानुभवकरणत्वे प्रमाणलक्षण एव अनुभवपदं प्रवेशयन्ति तेषां मते प्रमानुभवानां अनुभवकरणत्वाभावेनैव प्रमाणत्वा- पत्त्यसम्भवात्, प्रमालपान्तयोवरोधाभावस्य प्रमाणविभागव्याघातस्य चा- प्रसङ्गात् प्रमात्वस्य स्मृतिसाधारण्येऽपि क्षत्यभावः । इति सूक्ष्मेक्षिकयैव स्मृति- व्यावृत्त-तत्सावारण-लक्षणमुपक्षिप्तवान् तत्र भवानध्वरीन्द्रः । - यत्र अव्यवधानेन ऋमिककविषयक नानाज्ञानोत्पादः तत्र सर्वेषां ज्ञानानां समानविषयकत्वेन द्वितीयादिज्ञानानां पूर्वोत्पन्नज्ञानविषयविषयकत्वेन अधिगतविषय- कत्वात् अनधिगतत्वघटितस्य प्रथमलक्षणस्याव्याप्तिः ।सा क्षणभेदभिन्नस्य कालस्य प्रत्येकज्ञानविषयतां नवनवक्षणानाञ्च पूर्वपूर्वज्ञानविषयत्वेनानषिगतत्वम्, क्षणात्मकानधिगतार्थविषयकत्वञ्च धारावाहिकबुद्धिष्पपाद्य निराकर्तव्या । तत्र तार्किकै: नीरूपस्य कालस्य प्रत्यक्षाविषयत्वव्यवस्थापने तभिराकरणं नोपपन्नं स्यात् अतः प्रथमं कालस्य प्रत्यक्षविषयत्वं व्यवस्थापयति- नीरूपस्यापि कालस्येन्द्रियवेद्यत्वाभ्युपगमेन- अयं माकः नौरूपस्य सामान्यतः प्रत्यक्षाविषयत्वं चाक्षुषप्रत्यक्षाविषयत्वं वा अभिमतं ताकिकाणाम् ? आवं चेत् सगोत्रकलहः, रूपे व्यभिचारणच, नीरूपस्य प्रत्यक्षपरिच्छेदः । बायोः स्पार्शनप्रत्यक्षस्य नव्यनैयायिकर रभ्युपगमात् । द्वितीयं चेत् रूपे व्यभिचारस्त- दवस्थः, गुणे गुणानङ्गीकारेण रूपे रूपाभावेऽपि तस्य चाषुभप्रत्यक्षविषयत्वात् । न च विषयतासंबन्धेन द्रव्यचाक्षुषप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति समवायसंबंधेन रूपं कारणमिति कार्यकारणभावाङ्गीकारात् काले रूपाभावेन चाक्षुषप्रत्यक्षाविषयत्व- मावश्यकमिति वाच्यम्, कार्यतावच्छेदककोटौ द्रव्यत्वप्रवेशे गौरवात् । यदि चानुभव- सिद्धतया गौरवमबाधकमिति प्रोच्यते, तदा इदानी घट: तदानी घट: इति प्रत्यक्षस्य सर्वानुभवसिद्धत्वेन इदानी इदानी इत्यादिरूपेण कालस्य प्रत्यक्षविषयत्वस्वीकारः आवश्यक: । न वयं वेदान्तिन एव कालस्य प्रत्यक्षविषयतां ब्रूमः, अपितु त्वत्सगोत्रा नव्यनैयायिका अपि कालप्रत्यक्षं स्वीकुर्वन्त्येव । तथा चानुभवितुराधिक्यात् अनुभवाधिक्येन नीरूपवाय्वादिप्रत्यक्षानुभववत् कालप्रत्यक्षानुभवस्त्वदनुभवापेक्षयाऽ- दुर्बल इति न त्वदनुभवसिद्धः विषयतया प्रत्यक्ष चाक्षुषप्रत्यक्षं वां प्रति समवायेन रूपं कारणमिति कार्यकारणभावः स्वीकार्यः । इन्द्रियेण वेद्यत्वं इन्द्रियवेद्यत्वं तस्याभ्युपगमः इन्द्रियवेद्यत्वाभ्युपगमः, तेन । इन्द्रियेण इत्यत्र तृतीया करणार्थे । वेद्यत्वघटकवेदनपदार्थे तदन्वयः। वेद्यत्वं वेदन- विषयत्वम् । अभ्युपगमः स्वीकारः। तथा च इन्द्रियकरणक-ज्ञानविषयत्वस्वीकारेण इति वाक्यार्थः । इन्द्रियकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षविशेषः । धारावाहिकी बुद्धिः धारावाहिक- बुद्धिः, तस्याः । बुद्धौ धारावाहिकत्वञ्च स्वाव्यवहितपूर्व स्वाव्यवाहितोत्तरदा- न्यतरसंबन्धेन ज्ञानविशिष्टत्वम्, न तु अव्यवहितपूर्वापरीभावोत्पन्नज्ञानगतबहुत्वम् अव्यवहितोत्पन्नज्ञानद्वयासंग्रहेण तत्राव्याप्तितत्परिहारानुक्त या ग्रन्थकर्तृ- न्यूनतापातात् । द्वितीयादिज्ञानानाम् अनधिगतविषयकत्वं सम्पाद्य अव्याप्त्यभावं ख्यापयति- धारावाहिक-बुद्धेरपि पूर्वपूर्वज्ञानाविषयतत्तत्क्षणविशेषविषयकत्वेन नाव्याप्तिः। न विषयः अविषयः पूर्वपूर्वज्ञानानामविषयः पूर्वपूर्वज्ञानाविषय: तादृशश्चासौ तत्तत्क्षणविशेष: पूर्वपूर्वज्ञानाविषयतत्तत्त्क्षणविशेषः, सोऽस्ति विषयो यस्याः सा पूर्वपूर्वज्ञानाविषयतत्तत्क्षणविशेषविषयका, तत्त्वेन इत्यर्थः । अयं भावः सर्वत्र ज्ञानानां न केवलं घटपटावियत्किञ्चित्वस्तुविषयकत्वम् अपि तु यस्मिन् क्षणे ज्ञानमुत्पद्यते तत्क्षणविशिष्ट घटादिवस्तुविषयकत्वम् । तथा च घटावियत्किञ्चिदेकविषयकाणा- वेदान्तपरिभाषा। मपि ऋमिकक्षणोत्पन्नानां ज्ञानानां भिन्नभिन्नक्षणविशिष्टघटविषयकत्वेन अनधिगतविषयकत्वमव्याहतम् । अवच्छेदक मेदे अवच्छेद्य भेदनोव्यात् । एकत्वेन प्रत्यभिज्ञायमानस्यापि घटस्य ज्ञानोत्पत्तिक्षणात्मकावच्छेदकमेवेन भेदाभ्युपगमस्य युक्तिसिद्धत्वात् । एवञ्च न धारावाहिकबुद्धावव्याप्तिः। तथा चायं सरलार्थ:-ननु धारावाहिज्ञानान्तर्गतद्वितीयादिज्ञाने स्मृत्यवृत्ति- प्रमात्वलक्षणाव्याप्तिः, तस्य ज्ञानस्य पूर्वज्ञानविषयविषयत्वेन अधिगतार्थविषयक- तया अनधिगतार्थविषयत्वाभावात् इति चेत् न । ज्ञाने घटादिविषयस्येव ज्ञानोत्पत्तिक्षणस्यापि भानाभ्युपगमेन उत्तरक्षणस्य पूर्वज्ञानाविषयतया तद्विशिष्ट- घटादेरपि अनधिगतत्वेन ज्ञानस्यानधिगतार्थविषयकत्वोपपत्तेः। न च कालात्मकस्य क्षणस्य रूपरहितत्वेन प्रत्यक्षाविषयतया तं विशेषणत्वेनादाय तद्विशिष्टघटा- देरनधिगतत्वं संपाद्य ज्ञाने अनधिगतार्थविषयकत्वव्यवस्थापनमयुक्तमिति वाच्यम् । नौरूपवाय्वादेरिव कालस्यापि प्रत्यक्षविषयत्वाभ्युपगमात् । तादृशस्य चाभ्युपगमस्य नव्यनैयायिकरपि समादरणीयतया अनुभवसिद्धत्वादापत्तेरभावात् इति । कालवदा- काशप्रत्यक्षापत्तिरिष्टव, इहाकावे वलाकेतिप्रतीतेः । ननु विषयतासंबधेन प्रत्यक्षत्वाच्छिन्न प्रति समवायसामानाधिकरण्यान्यतर- संबन्धेन उद्भूतरूपस्पर्शान्यतरत्वेन कारणतेति कार्याकारणभावाङ्गीकारे रूपवाग्वादि- प्रत्यक्षे व्यभिचारवारणसंभवात् धारावाहिकबुद्ध्यव्याप्तिर्दुर्वारा अयं भाव वायौ उद्भूतस्पर्शः समावयेन तिष्ठति, अतः तस्य स्पानिप्रत्यक्षे बाधाकाभावः, स्वसामानाधिकरयरः स्वस्मिन्नक्षततया रूपेपि उद्भूतरूपं सामानाधिकरण्य- संबंषेन अस्तीति तत्त्रत्यक्षेऽपि न काचित् बाधा । परन्तु काले उद्भूतरूपं स्पर्शो वा न समवायेन न वा सामानाधिकरण्येन अस्तीति तस्य इन्द्रियवेधत्वम् अभ्युपेत्य द्वितीयाविज्ञानेमनधिगतविषयकापसम्पादनयुक्ताव्याप्तिवारणमसंग..म् इत्यत आह- किञ्च सिद्धान्ते धारावाहिकबुद्धिस्थले न ज्ञानभेद: । किन्तु यावद्घटस्फुरणं तावत् घटाकारान्तःकरणवृत्तिरेकं व न तु नाना । वृत्तेः स्वविरोधिवृत्त्युत्पत्तिपर्यन्तं स्थायित्वाभ्युपगमात् । तथा च तत्प्रतिफलितचैतन्यरूपं घटादिज्ञानमे मेवेति नाव्याप्तिशङ्कापि ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । १७ सिद्धान्ते - वेदान्तसिद्धान्ते । ज्ञानस्य भेदो ज्ञानभेद: । घटस्य स्फुरण घटस्फुर- णम् । स्फुरणं स्फूर्तिः विषयत्वमिति यावत् । घटस्य इत्यत्र षष्ठ्यों निष्ठत्वम् । तथा च यावद्घटस्फुरणमित्यस्य विषयता यावत्कालं घटनिष्ठा भवति इत्यर्थः । अन्त:करणस्य वृत्ति: अन्त:करणवृत्तिः, घटाकारा अन्त:करणवृत्तिः घटाकारान्त:- करणवृत्तिः । वृत्ति: परिणामः । नानाभावमुपपादयति वृत्तेः स्वस्रोिधीत्यादिना । स्वस्य विरोधिनी स्वविरोधिनी, तादृशी च वृत्तिः स्वविरोधिवृत्तिः, तस्या उत्पत्तिः स्वविरोधिवृत्त्युत्पत्तिः, तत्पर्यन्तम् । स्थायित्वस्य अभ्युपगमः स्थायित्वाभ्युपगमः तस्मात् । स्थायित्व एकत्वम्, तस्य अभ्युपगम: स्वीकारः । वृत्तेरेकत्वेऽपि ज्ञानस्य कथं एकत्वं इत्याशङ क्याह तथा चेति । तत्र प्रतिफलितं तत्प्रति- फलितं, तादृक् च चैतन्यं तत्प्रतिफलितचैतन्यं तद्रूपम् अर्थात् तदात्मकं यद् घटादेर्ला- नम् । अव्याप्तेः शङ्का अव्याप्तिशङ्का । तथा चायमर्थः यावत्कालपर्यन्तं घटादौ एका विषयता तिष्ठति तावत्कालपर्यन्तं इन्द्रियप्रणालिकया बहिनिःसृत्य घटादि- विषयाकारतामादधानस्य तेजसस्यान्तःकरणस्य परिणामात्मिका वृत्तिः एकैव स्वीकार्या, अनेकत्वे व्यर्थ गौरवापातात् । वृत्तरेकत्वे च तत्प्रतिविम्बितं चैतन्या- त्मकं ज्ञानमपि लाघवात् युक्तिसिद्धत्वाच्च एकमेव स्वीकार्यम् । तथा च तद्विषयस्यानधिगतत्वेन ज्ञाने अनधिगताबाधितार्थविषयकत्वस्याक्षते: अव्याप्तेरभावः । ननु वृत्तेः परिणामरूपत्वे तत्र चैतन्यस्य प्रतिफलतासंभव: अवस्थायाः अद्रव्य- त्वात् अस्वच्छत्वाच्च इति चेत्, सत्यम्, पूर्वोक्तान्त:करणपरिणामेत्यस्य परिणामा- त्मकमन्तःकरणमर्थों बोध्यः । तथा च तैजसे स्वच्छे च तत्र प्रतिफलनस्य संभवात् । समानविषयके व्यवहिते द्वितीयज्ञानादौ अव्यवहितपूर्वोक्तदिशैव निराकार्या अव्याप्तिः । द्विविधप्रमात्वलक्षणघटकं यदबाधितत्वं तस्य पारमाथिकसत्त्वाभावरूपतामभिमत्य लक्षणद्वयस्य अव्याप्तिमाश ते- ननु सिद्धान्ते घटादेमिथ्यात्वेन घटादेमिथ्यात्वेन बाधितत्वात् कथं तज्ज्ञानं प्रमाणम् ? सिद्धान्ते-वेदान्तसिद्धान्ते । मिथ्यात्वेन अध्यस्तत्वेन । बाधितत्वात् पारमार्थिक त्वाभावात् । तस्य ज्ञानं तज्ज्ञानं घटज्ञानमित्यर्थः। प्रमाणं प्रमा। तथा चायन वेदान्तपरिभाषा प्रश्नाशयः यत् यद् अध्यस्तं न कथमपि तत् परमार्थसत् भवितुमर्हति । एवञ्चेत् प्रपञ्चमात्रस्य ब्रह्मण्यध्यस्तत्वेन पारमाथिकत्वाभावरूपं बाधितत्वं प्रपञ्चान्त पासिनो घटाः अबाधितम् इति घटाविज्ञानस्य बाधितार्थविषयकत्वेन अबाधितार्थविषयकज्ञानत्वस्वरूपं अनषिगताबाधितार्थविषयकज्ञानत्वस्वरूपं प्रमात्वलक्षणं तत्र तत्राव्याप्तम्, इत्यव्याप्तिदोषदुष्टतया कथं प्रोक्तलक्षणयोः साधुता? इति। प्रकृते बाधितत्वं न केवलं पारमार्थिकत्वाभावरूपं विवक्षितं अपि तु व्यावहारिक- सत्त्वाभावसमानाधिकरणपारमार्थिकत्वाभावरूपम्, प्रातिभासिकसत्त्वरूपं वा इत्याशयेन दोषमुद्धरति- उच्यते, ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरं हि घटादीनां बाधः । “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्कं केन पश्येत्” इति श्रुतेः । न तु संसारदशायां, 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितरंः इतरं पश्यति' इति श्रुतेः । तथा चाबाधितपदेन संसारदशायामबाधितत्वं विवक्षितमिति न घटादिप्रमायामव्यापिः। उच्यते इत्यस्य मयेत्यादिः । कारकपदं विना क्रियापदस्य बोधासामर्थ्यात् । ब्रह्मणः साक्षात्कारो ब्रह्मसाक्षात्कारः, तस्य अनन्तरं इति ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरम् । बाप इत्यनन्तरं भवतीत्यध्याहार: पूर्वोक्तहेतोः । बाध:-ब्रह्मात्मकाधिष्ठाने अध्यस्त- त्वनिश्चयः । श्रुतौ यत्रत्यस्य यदेत्यर्थः। यस्यामवस्थायामिति फलितोऽर्थः । सर्व-भिन्नतया अवभासमानः प्रपञ्चः, आत्मैवाभूत् =अध्यासाधिष्ठानभूतात्मदृष्टि- विषयताङ्गतः, अर्थात् अधिष्ठानभूतस्य आत्मन एव दर्शनेन दृष्टिविषयत्वाभाववान् जातः । तत्तदा क =घटादिविषयं, केन = करणेन पश्येत् ? इत्यर्थः । न तु इत्यत्र तुकारो भिन्नक्रमः। घटादीनां बाध इत्यनुषङ्गः तथा च संसारदशायां न तु बाप इत्यन्वयः । दशा अवस्था । यत्र होत्यादिश्रुतौ पूर्वश्रुतिवत् यत्रेत्यस्य यदेपर्यः । दैतमिवेत्यत्र सादृश्यार्थक इवशब्दो द्वैतस्यापारमार्थिकत्वद्योतनाय पूर्ववत् तदित्यस्य तदेत्यर्थः । इतरः इतरं पश्यतीत्यस्य द्रष्टदृश्यभावो भवतीत्यर्थः । फलितार्य वक्ति तथा चेति । संसारदशा=अज्ञानकालः एवञ्चाबाधितत्वघटकबाधे बज्ञानकालिकास्वविशेषणं देयं इति सरलार्थः ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः। तथा चायं भावः, सत्यं घटादीनां बाधितत्वम्, किन्तु न संसारवशायां, अपि तु 'अहं ब्रह्मास्मीति' वृत्त्यात्मकब्रह्मसाक्षात्काराना, रम् । अन्यथा 'यत्र त्वस्य' 'यत्र हि द्वैतमि' त्याविश्रुतिविरोधापातात् । लक्षणद्वये च सांसारिक-बापाविषयत्व रूपमेवाबाधितत्वम् अर्थात् व्यावहारिक-पारमाथिकान्यतर-सत्तावत्स्वा प्रदान प्रविष्टम् । तथा च क्वाव्याप्तिः ? व्यावहारिकसत्त्वस्य घटादौ सत्त्वेन तेषामप्य- बाधितत्त्वात्, घटादिज्ञानस्याबाधितार्थविषयकज्ञानत्वाक्षतेरव्याप्त्यभाव: । तथा च अनुभवाजन्यज्ञानविषयत्वसमानाधिकरणब्यावहारिक - पारमाथिकान्यतर-सत्त्ववदर्थ- विषयकज्ञानत्वं स्मृतिव्यावृत्तस्य प्रमात्वस्य, व्यावहारिकपार मलयहरसस्व- बदर्थविषयकज्ञानत्वं स्मृतिसाधारणस्य प्रमात्वस्य लक्षणम् । यदि च अन्यतरत्व- प्रवेशे गौरवबोषः तदा व्यावहारिक-पारमार्थिक-सत्वान्यतरवत्वस्थले प्रातिमासिक- सत्त्वामावरूपमेवाबाधितत्वम् अर्थविशेषणं बोध्यम् । एतेन दृष्टिसृष्टिकल्पे व्यावहारिकसत्तानम्युगमात् व्यावहारिकसत्त्वघटितमबाधितत्वं दुनिया परास्तम् । यहा ननु दृष्टिसृष्टिवावं व्यावहारिकसत्ताया अमावेन घटादेरपि प्राति- मासिकतया शुक्तिरूप्यवन्मिथ्यात्वेन बाधितत्वात् घटाविधारावाहिकबुधेरपि प्रमात्वलक्षणालक्ष्यतया तत्राव्याप्तिदानम्, कालस्य प्रत्यक्षताम्, Larkषयताम- भ्युपेत्य, धारावाहिकबुद्धीनमेकत्वं वा स्वीकृत्य तद्वारणं सर्वमेवासङ्गतम् इत्यभिप्रायेण आशकृितम् 'मनु 'ननु सिद्धान्ते घटादेमिथ्यात्वेनेत्यादि । श्रुतिसाहाय्येन प्रतिकर्मव्यवस्थामभ्युपेत्य दृष्टिसृष्टिपक्षानावरेण दृष्टिसृष्टिपक्षानावरेण व्यावहारिकसत्तां पुरस्कृत्य समाहितम्, उच्यते, इत्याविना, इत्यमिनवः पन्थाः । व्याल्या पूर्ववत् बोध्या । ननु विषयसन्निकर्षस्थलविशेषे अध्वरीन्द्रेणापि अन्यथाख्यात्यभ्युपगमात् तस्याश्च व्यावहारिकसद्विषयकत्वेन तत्र प्रमात्वलक्षणद्वयातिव्याप्तिः दुरा, अबाधितार्थ- विषयकत्वस्याक्षतेः इति चेत् सत्यम् । तथा सति अविद्यातिरिक्तदोषाजन्यत्वेनापि ज्ञानं विशेषणीयम् तस्या आगन्तुकदोषजन्यतया तदजन्यत्वस्वरूपाविद्यातिरिक्त दोषाजन्यत्वाभावेन अतिव्याप्तेरिणात् । अभियुक्तोक्तिमुपक्षिपति- तदुक्तं- देहात्मप्रत्ययो यद्वत्प्रमाणत्वेन कल्पितः । लौकिक तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वात्मनिश्चयात् ।। .
२० वेदान्तपरिभाषा। देहे आत्मप्रत्ययः देहात्मप्रत्ययः । देहविशेष्यक : आत्मत्वप्रकारकः प्रत्ययः । प्रत्ययो ज्ञानम् । अथवा आत्मनः प्रत्ययः आत्मप्रत्ययः, देहेन आत्मप्रत्ययः देहात्मप्रत्ययः । वैशिष्ट्ये तृतीया । तथा च देहविशिष्टतया आत्मप्रत्ययः इत्यर्थः । यद्वा देहो देहधर्मः स्थौल्यकाादिकम्, तद्विशिष्टतया आत्मप्रत्ययो देहात्मप्रत्ययः । 'अहं स्थूलः' 'अहं कृशः' इत्यादि प्रत्यय इति फलितोऽर्थः । घद्वत् - यथा । प्रमाणत्वेन - प्रमात्वेन । कल्पितः - निश्चितः, स्वीकृत इति यावत् । सर्वैरिति शेषः । तद्वत् = तथा। लौकिकं अर्थात् व्यावहारिकं इदं घटादिज्ञानम्, आ आत्मनिश्चयात् आत्मनिश्चयपर्यन्तं, फलत: ब्रह्मसाक्षात्कार- पर्यन्तं प्रमाणम् अर्थात् प्रमा एव भवतीति शेषः । अयं भावः अज्ञानावस्थायां यथा अहं गौरः अहं कृशः इत्याविज्ञानमपि प्रमा अभ्युपेयते, तथा बगसाला ारात प्राक् जायमानम् 'अयं घटः, अयं पटः अयं मठ' इत्याविज्ञानमपि प्रमैव भवति । शाने प्रमात्वम् अप्रमात्वच आपेक्षिकमाम्युपयते । ऐकात्म्यज्ञानापेक्षया अयं घट: इत्याविज्ञानानाम् अप्रमात्वेऽपि शुक्तो 'इवं रजतं', इति शुक्तिरूप्यज्ञानापेक्षया प्रभावमव्या तं इति गूढाशयः । 'आत्मनिश्चयात्' इत्यत्र मा आत्मनिश्चयात् इति विग्रहं स्पष्टयति ब्रह्मात्म- निश्चयादित्यादि । लौकिकमित्यस्य लौकिकसन्निकर्षजन्यार्थकत्वे अलौकिकप्रत्यक्षस्य अनुमित्यादेश्च प्रमात्वमबोधितं भवेत् अतः लौकिकं इत्यस्यार्थमाख्यापयति टादीति । उद्दिष्टस्य लक्षणं लक्षितस्य विभागवचनम् इत्यभियुक्तोक्त्यनुसारं प्रमाण- लक्षणानन्तरं अवान्तरधर्मपुरस्कारेण कथनात्मक विभागं करोति तानि चेत्यादि । अवान्तरधर्मों व्याप्यधर्म: । प्रकृते प्रामाणत्वव्याप्यधर्माः प्रत्यक्षत्वादय : - तानि च प्रमाणानि षट् प्रत्यक्षानुमानोपमानागमार्थापत्त्यनुपलब्धि- भेदात् । समासः प्रत्यक्षानमा द्वन्द्वः | "द्वन्द्वान्ते द्वन्द्वादी वा धूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसंवद्ध्पते" इति नियमात् भेदादित्यस्य . प्रत्येकमन्वयः । तथा च प्रत्यक्ष भेदात् अनुमानभेदात् इत्येवमन्वयः प्रमाणानि षट् इत्येव पाठः शोभन: तनि चेत्यस्य वैयर्थात् । पूर्व यत्सदाश्रुतेः तानीतिनित्यसापेक्षतत्पदप्रयोगस्यासंगतेश्च ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः। २१ - यदि च प्रकृततत्पदस्य प्रसिद्धार्थकता ततो नासंगतिरित्युच्यते तथापि न साधुता । यतः तर्हि अप्रसिद्धानामन्येषां प्रमाणानां स्वीकृतिसूचनापातः । अशंखचक्रो हरिरिवि कथनेन सशंखचक्रस्य हरेरन्यत्रसत्त्वसूचनमिव अत्रापि अप्रसिद्ध- प्रमाणास्तित्वसूचनमबाधितं स्यात् । तच्चानिष्टम् । ज्येष्ठत्वात् प्रमाणान्तरोपजीव्यत्वेन श्रेष्ठत्वात् सर्ववादिनामविप्रति पत्तिकत्वाच्च प्रथमं प्रत्यक्षप्रमाणलक्षणमुपक्षिपति- तत्र प्रत्यक्षप्रमायाः करणं प्रत्यक्षप्रमाणम् । तत्रेत्यस्य तेषु प्रत्यक्षादिषु प्रमाणेषु मध्ये इत्यर्थ :, प्रत्यक्षमेव प्रमा प्रत्यक्षप्रमर, तस्याः, प्रत्यक्षप्रमायाः प्रत्यक्षरत्मिकायाः प्रमायाः इत्यर्थः । करणलक्षणं तु पूर्वमेव प्रतिपादितम् । तथा च प्रत्यक्ष- प्रमात्वावच्छिन्न-कार्यता-निरूपितकरणत्त्वं प्रत्यक्षप्रमाणत्वम् । इन्द्रियसनिकर्षस्य प्रत्यक्षप्रमाणत्वं नानिष्टमित्यादिकं पूर्वस्मादनुसंधेयम् । लक्षणे प्रत्यक्षपदानुक्ती अनुमानादावतिव्याप्ति:, अनुमित्याद्यात्मकप्रमायाः करणत्वस्य अनुमाना- दावक्षतेः । प्रमापदानुक्ती प्रत्यक्षप्रमाणकरणस्यापि प्रत्यक्षप्रमाणत्वभ्रमापत्तिः, अतस्तदुक्तिः । करणत्वमपहाय कारणत्वमात्रप्रवेशे कालादिसाधारणकारणा- नामपि प्रत्यक्षप्रामाण्यापत्तिः । तन्निवेशे च करणत्वस्यासाधारणत्वघटिततया कालादावसाधारणकारणत्वविरहेणापचेरभावात् । ननु शब्देऽतिव्याप्तिः, महावाक्यात्मकशब्दात् प्रत्यक्षात्मक - प्रमाभ्युपगमेन प्रत्यक्षप्रमाकरणत्वस्य तादृशशब्देऽपि सत्त्वात्, इति चेत् इष्टत्त्वात् । यदि च महावाक्यजबोधस्य प्रत्यक्षप्रमात्वेऽपि महावाक्स्य प्रत्यक्षप्रमाणत्वम् आगमत्व प्रत्यक्षत्वयोः विरोधानुभवबाधिततया न रुचिविषयं तदा प्रत्यक्षप्रमायां महावाक्यज - बोध - भिन्नत्वं विशेषणं देयम् । यत्तु इन्द्रियार्थ - सन्निकर्षजं ज्ञानं प्रत्यक्षप्रमेति तार्किकलक्षणमभिप्रेत्य प्रत्यक्ष - प्रमाणलक्षणकरणं ग्रन्थकतु रिति तदसत्, अव्यवहितोत्तरमेव प्रत्यक्षप्रमा तु आत्मचैतन्यमेवेति प्रतिपादनात् । ननु प्रत्यक्षप्रमायाः ज्ञानं विना तत्करणतापन्नं प्रत्यक्षप्रमाणं दुरधिगमम् अतः प्रथम प्रत्यक्षप्रमैव लक्षणीया, तदभावे कुतः प्रत्यक्ष -प्रमाण - ज्ञानम् अत आह- ?
२२ वेदान्तपरिभाषा। प्रत्यक्षप्रमात्वत्र चैतन्यमेव । - एवकारः अन्ययोगव्यच्छेदार्थः । व्यवच्छेद्यभूतोऽन्यपदार्थ : इन्द्रियार्थ- मन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षमितिसूत्र- मूचित: इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजन्य-ज्ञान-पदार्थः । तथा च इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य- जानत्व प्रत्यक्षप्रमात्वमिति न प्रत्यक्षलक्षणम् । अपि तु आत्मचैतन्यमेवेति भावार्थः । न चात्र बीजाभाव: "तदक्षत" इति श्रुति-सिद्ध महावाक्यजे च प्रत्यक्षे अव्याप्स्यापत्तेः । अकरणकत्वेन पूर्वस्य, शब्दकरणकत्वेन चापरस्य इन्द्रियार्थ - सन्निकर्षजत्वाभावात् । न च तहि ज्ञानाकरणक - ज्ञानत्वं प्रत्यक्ष- प्रमात्वमित्येव लक्षणमास्ताम्, उभयोनिकरणकत्वाभावेन ज्ञानाकरणक - ज्ञानतया लक्षणसंगमनादिति वाच्यम्, आत्मचैतन्येऽव्याप्त्यापत्तेः । किञ्च ज्ञानाकरणकं जानमित्यत्र उत्तरज्ञानपदेन किमभिप्रेतम् ? वृत्त्यात्मकं ज्ञानं स्वरूपज्ञानं वा ? आद्यञ्चेत् आत्मचैतन्ये अव्याप्तिः, तस्य वृत्त्य नात्मकत्वात् । द्वितीयञ्चेत् विशेषण- वैयर्थ्यम् । ननु चैतन्यस्य प्रत्यक्षप्रभात्वमेवाप्रामाणिक, इत्याशंक्य श्रुति-प्रमाणेन तस्य प्रत्यक्ष-प्रमात्वं साधायितु श्रुतिमुपन्यस्यति- - यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म इति श्रुते : । अपरोक्षादित्यस्यापरोक्ष- मित्यर्थः । यत् साक्षादपरोक्षं तद् ब्रह्म इति श्रुत्यर्थः । साक्षादित्यस्य प्रत्यक्षज्ञानम- पुरस्कृत्य इत्यर्थः । तेन विषयसाधारणप्रत्यक्षत्वव्युदासः । विषय - प्रत्यक्षत्वस्य भानगत - प्रत्यक्षत्वप्रयुक्तत्वात् । ननु पंचम्यन्तात् अपरोक्षशब्दात् कथं प्रथमान्त- ब्रह्मपदबोध्यस्य आत्मचैतन्यस्य · अपरोक्षरूपत्वं लब्धं शक्यम् ? इत्यत आह अपरोक्षादित्यस्य अपरोक्षमित्यर्थ इति । प्रथमार्थे एव पंचमीप्रयोग इति भावः । अपरोक्षत्वं प्रत्यक्षत्वम् । यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्मति श्रुत्या ब्रह्मापरपर्यायस, नित्य-ब्रहातल्या प्रत्यक्ष- प्रमाणरूपताय स्वीक्रियमाणायां प्रत्यक्षप्रमाणलक्षणस्यासंभवः। नित्यपदार्थ प्रति करणासंभवेन चक्षरादीनां नित्य - चैतन्यात्मकप्रमा प्रति करणत्वासंभवात् । इत्याशयेन शखते- प्रत्यक्षपरिच्छेदः । २३ ननु चैतन्यमनादि तत्कथं चक्षुरादेः करणालेन प्रमाणत्वम् ? अत्र यद्यपि प्रमायाः करणं प्रमाणमिति प्रमाणसामान्य - लक्षणस्याप्यव्याप्ति : वक्त मुचिता तदभावात् ग्रन्थकतु!नता दुर्वारा, तथापि विशेषलक्षणा- संभवस्य सामन्यलक्षणाव्याप्तिव्याप्यता स्वाभाविकी इति कैमुतकन्यायसिद्धव सामान्यलक्षणाव्याप्तिरित्यभिप्रेत्य प्रत्यक्षलक्षणासंभव एवात्र दर्शितः । केचित्तु कथं चक्षुरादेः तत्करणत्वेन प्रमाणत्वमिति प्रामाणस्यैव प्रतिक्षेपणात् प्रमाण-सामान्य-लक्षणासंभव एव ग्रन्थतात्पर्यम् । अन्यथा कथ चक्षुरादे : तत्करणत्वेन प्रत्यक्षप्रमाणत्वमित्येवोक्त स्यादिति वदन्ति । तदसत्, एवं सति प्रमाण- सामान्यविचारावसर एव प्रकृतविचारस्य उचिततया तथापि ग्रन्थकर्तुयूँनताया : अपरिहार्यत्वात् । चक्षुरादेरित्यत्रादिपदेन घ्राणादीनामुपग्रहः । तत्करणत्वेन प्रत्यक्षप्रमाकरणत्वेन । तृतीयार्थः प्रयुक्तत्वम्, तस्य प्रमाणत्वपदार्थे अन्वयः । प्रमाणत्वमित्यस्य प्रत्यक्षप्रमाणत्वमित्यर्थः । तथा च कथं चक्षुरादीनां प्रत्यक्ष- प्रमाणत्वमिति शङ्का-ग्रन्थार्थः । शङ्कां निरस्यति- - उच्यते, चैतनमानसलेऽपि तदभिव्यंजकान्तःकरणवृत्तिरिन्द्रियार्थ- सन्निकर्षादिना जायते इति वृत्ति विशिष्टचैतन्यमादिमदित्युच्यते । अनादेर्भाव: अनादित्वं नित्यत्वमित्यर्थः । अनादेः प्रागभावस्य ध्वंसप्रतियोगित्वेना- नित्यतया अनादित्वनित्यत्वयोरभेदासंभव इति तु नाशंकनीयम् । सिद्धान्ते प्रागभावानगीकारात् । तस्याभिव्यंजिका तदभिव्यंजिका, अन्तःकरणस्य वृत्तिः अन्तःकरणवृत्तिः तदभिव्यञ्जिका चासो अन्त:करणवृत्तिः तदभिव्यञ्जकान्तःकरणवृत्तिः । तत्पदेन चैतन्यस्य ग्रहणम्, तथा च तदभिध्यञ्जकेतिपदस्य चैतन्याभिव्यञ्जकेत्यर्थः । इन्द्रियञ्च अर्थश्च इति इन्द्रियाथी, तयोः सन्निकर्षः, इन्द्रियार्थसनिकर्षः, तदादिना इत्यर्थः । जायते इत्यत्र जातिः उत्पाद: आदिपदेन सन्निकर्ष द्वारीकृत्य कारणतामादधतां इन्द्रियाणां संग्रहः । सन्निकर्षादिनेत्यत्र तृतीया करणत्वे हेतुमात्रे वेति विचार: पूर्वोक्तो वेदितव्यः। इतिशब्दो हेतुवाची । वृत्तिभिर्विशिष्टं वृत्तिविशिष्टम्, तादृक् च चैतन्यं वृत्तिविशिष्टचैतन्यम् । वैशिष्ट्यमवच्छिन्नत्वम् वेदान्तपरिभाषा। नथा च वृत्त्यवच्छिन्नचंतन्यमित्यर्थः । आदिमत् सकारणकम् । इत्युच्यते इत्यत्र इतिगन्दो एवमर्थः । उच्यते इत्यस्य उपचर्यते इत्यर्थः । तथाचायं "उच्यते" इत्याविग्रन्थभावार्थ:- सत्यं यद्यपि चैतन्यमनायेव इति निरवच्छिन्नस्य तस्य न किञ्चित्करणकत्वम् । तथापि यामिरन्तःकरणवृत्तिमिः तदभिव्यज्यते, अभिव्यञ्जिकानां तासामिन्द्रिय- सन्निकर्षादिना जायमानत्वेन सादितया, सादिभूत - तादृश - वृत्तिविशिष्ट चैतन्यमपि भजते "आदिमत्" पदव्यवहारमिति व्यावहारिकं सावित्वं तत्र वक्तव्यमेव । सति चैवं तत्करणत्वमपि व्यावहारिकमहत्येव भवितुमिन्द्रियाणाम्, तत्सन्निकर्षाणां वा, इति प्रत्यक्षप्रमाकरणत्वस्य तत्राक्षतः न प्रत्यक्षप्रमाण- लक्षणासंभवः प्रमाणसामान्यलक्षणाव्याप्तिति । अभियुक्तोक्तिप्रदर्शनपूर्वकं प्रकृतोपयोगिनी चैतन्यावच्छेदकतां व्यवहारेण द्रहयति- - ज्ञानावच्छेदकत्वाच्च वृत्तौ ज्ञानत्वोपचारः। तदुक्त विवरणे- "अन्त:करणवृत्तौ ज्ञानत्वोपचारात् ।" इति । ज्ञानं चैतन्यं तदवच्छेदकत्त्वात् । उपचारः व्यवहारः । तथा च वृत्ती व्यावहारिक ज्ञानत्वमिति सरलार्थ: | विवरणे : पंञ्चपादिकाविवरणाख्य- अन्थे । एतेन वृत्तौ ज्ञानत्वोपचारस्वीकारेऽपि न प्रकृतसिद्धिः, शुक्तो रजतत्वो- पचारेऽपि ततो राजतकार्यानिष्पादात् इति परास्तम् । प्रकृते औपचारिकत्वस्य व्य वहारिकत्वपर्यवसिततया शुक्तिरूप्ये तादृगुरूपत्वे वा व्यावहारिकत्वाभावात् । दृष्टान्तदाटन्तिकयोः सामग्र्याभावात् । चैतन्याभिव्यजिका अन्तःकरणवृत्तिः, तस्याः सादित्वात् चैतन्येऽपि तदवच्छिन्ने सादित्वमौपचारिकमित्युक्त, वत्र का नाम वृत्तिः ? तस्याः परिस्पन्दात्मकत्वे "अन्त:करणं घटाद्याकारेण परिणमते" इति स्वसिद्धान्त- विरोषः । परिणामरूपत्वे तु अन्त:करणवृत्ति - शब्दस्य बाधितार्थत्वम् । नित्यस्य परमाणुपरिमाणस्य मनसः एवान्तःकरणपदार्थतया निरवयव- स्य तस्य परिणामासंभवात् इत्याशयेन शकते- ननु निरवयवस्य न्तःकरणस्य परिणामात्मिका वृत्तिः कथम् ? .
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । २५ तथा चायं प्रश्नाशय : अन्तःकरणम् अपरिणामि, निरवयवद्रव्यत्वात् इत्यनुमानेन अन्तःकरणस्य परिणामित्वसिद्धौ परिणामात्मिकायाः तवृत्तेरभा- वात् “वृत्तेः सादिता, तया च तद्विशिष्टचैतनस्यौपचारिकी सादिता, तत्- करणतया इन्द्रियादेः प्रामाण्यम्" इत्यादि सर्वमेवाकुलितमिति । अन्त.करणमपरिणामि निरवयवद्रव्यत्वात् इत्यत्र स्वरूपासिद्धिमुद्भाव्य समाधत्त- इत्यम्, न तावत् अन्तःकरणं निरवयवम् सादिद्रव्यत्वेन सावयवत्वात् । अयं भाव :- अन्तःकरणं सावयवं साविद्रव्यत्वात् इत्यदुष्टेनानुमानेन अन्तःकरणस्य सावयवत्वसिद्धी सावयवस्य च द्रव्यस्त परिणामसंभवात् संभवितुमर्हति तस्य परिणामात्मिका वृत्तिः, तया चावच्छेवमप्यर्हति चैतन्यम्, इति तत्करणतया इन्द्रियस्य प्रमाणत्वमनाकुलम् । अन्तःकरणस्य सादित्वासिद्धी सादिद्रव्यत्वात्मकविशिष्टहेतो: पक्षे असिद्धतया "अन्तःकरणं सावयवम् सादिद्रव्यत्वात्" इत्यनुमानमपि स्वरूपा- सिद्ध्यात्मक - दोषग्रस्तमेवेति पूर्वोक्ता सर्वा आकुलता तदवस्थैव, अतः मनोपर- पर्यायस्य अन्त: करणस्य सादित्वं श्रुत्या समर्थयति- सादित्वञ्च "तन्मनोऽसृजत" इत्यादिश्रुतेः । तत् = ब्रह्म, मनः असृजत सृष्टवत् इति श्रुत्यर्थः । मनः पदस्य प्रकृते द्वितीयान्ततया ब्रह्म मनस. मृष्टिञ्चकार इति भावार्थः । - "ज्ञानावच्छेदकत्वाच्च वृत्तौ ज्ञानत्वोपचारः" इत्यनेन वृत्ते; गौणं ज्ञानत्वमिति प्रतिपादितम् । अन्तःकरणस्य ज्ञानात्मिका वृत्तिरित्यनेन ज्ञानस्य अन्तःकरण- धर्मत्वं प्रतिपादितम्, तदसङ्गतम् । ज्ञानस्यान्त:करणधर्मत्वे प्रमाणाभावात् इत्यत आह- वृत्तिरूपज्ञानस्य मनोधर्मत्वे च काम: संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा, धृतिरधृतिः ह्रीः धीः भीः सर्व मन एव" इति श्रुतिर्मानम् ।
२६ वेदान्तपरिभाषा। कामः कामना, इच्छेति यावत् । सङ्कल्पः “इदं मया अनेन कर्मणा साधनीयमि". त्याकारा वृत्तिः । विचिकित्सा संशयः । श्रद्धा विश्वासः । अश्रद्धा अविश्वासः । धृतिः धैर्यम् सहनशीलतेति यावत् । अवृतिः अधैर्यम् असहिष्णुतेत्यर्थः । ह्रोर्लज्जा, अप्रतिभतेति यावत् । धीः ज्ञानं निश्चय इति यावत् । भी: भयम् । मन एव मनसः एव इत्यर्थः । मन एवेति कथनं धर्ममिणोरभेदविवक्षया तेन नासंगतिः । यद्यपि मनसः अन्तःकरणप्रभेदतया तस्य च सङ्कल्पमात्र- वृत्तिकत्वाभ्युपगमेन व्याख्यायाः सम्प्रदायविरोधापत्तिः, तथापि मनो- बुढ्यहङ्कारचित्तेतिप्रभेदस्य औपाधिकत्वं न तु तेषां वस्तुतो भेदः वेदान्ताभिमत इत्यत्र श्रुतितात्पर्यात् नासंगतिः एवं व्याख्यायाम् । ननु श्रुती ज्ञानपदस्याश्रवणात् ज्ञानस्यान्त:करणधर्मत्वमप्यसिद्धमेव इत्यत आह- धी शब्देन ज्ञानाभिधानात् । अत एव कामादेरापं. मनोधर्मत्वम् । धी: शब्देन - ह्रीः धी: भीरिति श्रुतिस्थ - धीशब्देन । ज्ञानस्य अभिधानं ज्ञानाभिधानं तस्मात् । अभिधानं अभिलपनं कथनमिति यावत् । अत एवं इत्यस्य निश्चयात्मकज्ञानस्य मनोधर्मत्वादेव इत्यर्थः । कामादेरित्यत्र आदि- पदेन सङ्कल्पविचिकित्सादीनां धीभिन्नानां संग्रहः । अयं भावः यौव पूर्व सङ्कल्पो विचिकित्सा वा तत्रैव पश्चात् निश्चयः, तत्रैव च पश्चात् इच्छा, एतेषां सामानाधिकरण्यात् । न त्वन्यः सन्दिग्धे निश्चिनोति चान्यः, इच्छति चापरः । तथा च स्वयत्वानभ्युपगमे कामाघधिकरणत्वमप्यन्तःकरणस्य न स्थात् अतः तदाकरण :पि स्वीकर्तव्यमेवान्तःकरणस्य । तथा च इत्थं-न तावदन्त:करणमित्यारम्य कामादेरपि मनोधर्मत्वम् इत्युत्तरप्रन्थस्यायं माव:- यत कामसंकल्पादीनामन्तःकरणषमंत्वं श्रुतिसिद्धम् । धर्मता पन परिणामत्वान्या । एवञ्च सिद्ध एव अन्तःकरणस्य परिणामः । परिणामामावसाधकं निरवयत्वं तु-"अन्तःकरणं निरवयत्वाभाववत् सादि- द्रव्यत्वात्" इत्यनुमान-बाषिततया स्वरूपासिमिति न तस्य परिणामाभाव- सापकत्वम् । सावित्वं तु अन्तःकरणस्य "तन्मनोऽसृजत" इति अतिसिद्धम् । ननु कामसंकल्पयोः को भेद: द्वयोरपि इच्छास्वरूपत्वात् इति चेत् सत्यम्, सत्यप्युभयो- रिच्छारूपत्वे लौकिकत्वालौकिकत्वाभ्यां भेदात् । अर्थात् शास्त्रानिषिद्धच्छा सक्कल्पः । शास्त्रनिषिदेच्छा कामः इति ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । २७ ननु कथं कामादेरन्तःकरणधर्मत्वम् ? यतः अहं जानामि अहं न जानामि इत्यादिप्रत्यक्षविरोधः। अत: सत्यामपि काम: संकल्प इत्यादिश्रुतौ तस्याः औपचारिकत्वमस्तु इत्यभिप्रायेण शङ्कते- ननु कामादेरन्तःकरणधर्मत्वेऽहं इच्छामि अहं जानामि अहं विभेमि इत्याद्यनुभवः आत्मधर्मत्वमवगाहमानः कथमुपपद्यते । अन्त:करणस्य धर्मत्वं अन्तःकरणधर्मत्वम् । षष्ठ्यर्थो निष्ठत्वम् । धर्मत्वं वृत्तित्वम् । तथा च अन्त:करणनिरूपितवृत्तित्वे इत्यर्थः । स्वीक्रियमाणे इति शेषः । आत्मनो धर्मत्वं आत्मधर्मत्वम् आत्म-निरूपित-वृत्तित्वमित्यर्थः । इच्छादेरिति शेष: अवगाहमानः=विषयीकुर्वन् । तथा चायं सरलार्थ:-यदि इच्छादेरन्तःकरणधर्मत्व- मभ्युपेयते तदा कथमहमिच्छामि इत्यादि प्रत्ययः सङ्गतः ? अस्मत्पदस्य वेदान्त- मतेऽपि प्रमातृवाचकतया अन्तःकरणावाचकत्वात् । अतो न कामादेरन्तःकरण- धर्मत्वम् । श्रुतिस्तु औपचारिको इति । श्रुतेरौपचारिकत्वकल्पनापेक्षया अनुभवस्यैव औपचारिकत्वकल्पना न्याय्या इत्यभिप्रायेण उत्तरयति- - अयःपिण्डस्य दग्धृत्वाभावेऽपि दग्धृत्वाश्रयवाहात्म्मामासात् यथा अयो दहति इति व्यवहारः तथा सुखदुःखाद्याकारपरिणाम्यन्त- करणक्याध्यासात् अहं सुखी अहं दुखी इत्यादिव्यवहारः। अय:पिण्डस्य इत्यत्र षष्ठी सप्तम्यर्था । दग्धृत्वं दाहनिमित्तत्वम्, तस्याभाव: दग्धृत्वाभावः तस्मिन् सति इत्यर्थः । दग्धृत्वाश्रयो वह्निः दग्धृत्वाश्रयवह्निः, तेन तादात्म्याध्यासः, तस्मात् । अध्यास आरोप: । सुखदु:खद्याकारेण परिणमते इति सुखदुःखाद्याकारपरिणामि, तादृक् चान्तःकरणं सुखदुःखाद्याकारपरिणाम्यन्त: करणम्, तेन सह ऐक्याध्यासः । ऐक्यमभेदः। तथा च ऐक्याध्यासोऽभेदाध्यास: तस्मात् । व्यवहारः अनुभवः । तथा चायं भावार्थः, वह्निना असंपृक्तस्य लोहस्य न वाहकत्वमिति सर्वानुमूतम्, परन्तु तस्य वह्निसंयोगे सति द्वयोर्भेदमवधूय लोहं वह्नित्वेनामिमत्य यथा लोहस्थ- बह्निपति इति प्रत्ययं व्यवहारं वा अकृत्वा लोकः "भयो वहति" इति प्रत्यय वेदान्तपरिभाषा। व्यवहार वा करोति, तथा अन्तःकरणचैतन्ययोः अवच्छेयावच्छेदकभावमवधूय एकत्वमध्यस्य अहं सुखी अहं दुःखी इत्यादिव्यवहारं प्रत्ययं वा विदधाति लोकः । अन्त:करणावच्छिन्नचैतन्यात्मकस्य प्रमानुरेवाहमर्थतया चैतन्यावच्छेदकीभूतान्त:- करणधर्मस्थ सुखादेरवच्छिन्नताशालिचतन्यधर्मत्वेन प्रत्ययो व्यवहारो वा निरुक्ताध्यासशीलस्य जनस्य सुकर एव । चक्षुरादिवत् अतीन्द्रियतया अन्तःकरणस्य विषयगत - प्रत्यक्षत्वाभावेन तद्विशिष्टचैतन्यरूपस्य प्रमातुः प्रत्यक्षत्वमसङ्गतम् । प्रमातुः प्रत्यक्षत्वमसङ्गतम् । न हि दण्डस्याप्रत्यक्षत्वे दण्डी पुरुष इति विशिष्टप्रत्यक्षं कस्याप्यनुमतम् । तथा च कथं निरुक्तप्रमातारमव. गाहमान: अह सुखी इत्यादिप्रत्यय: संभवमर्हतीत्यभिप्रायेण शङ्कते- ननु अन्त:करणस्य इन्द्रियतया अतीन्द्रियत्वात् कथं प्रत्यक्ष- विषयता? इन्द्रियत्वं अतीन्द्रियत्वे हेतुः । कथमित्याक्षेपः । तथा च न प्रत्यक्षविषयता भवितुमर्हत्यन्त:करणस्य इत्यर्थः । प्रत्यक्षविषयता विषयगत प्रत्यक्षता । अयं भावः, अधिष्ठाने आरोप्य-धर्मभानं सार्वत्रिका, एवञ्च आरोप्यान्त:करणधर्मस्येव भानमन्तःकणाजतन्यात्मक-प्रमातरि अहंपदवाच्ये वाच्यम्, तदसम्भूतम् । प्रत्यक्षत्वस्य करणवत्वाभावात् । अन्त:करणस्य इन्द्रियत्वमेव नास्ति, कुतस्तन्मूलकमतीन्द्रियत्वम् ? कथञ्च तदधीना अप्रत्यक्षता ? एवञ्च नोक्तप्रश्न: सावकाशः इत्याशयेन समाधत्त. उच्यते, न तावदन्त:करणमिन्द्रियमित्यत्र मानमस्ति । मानं प्रमाणम् । तथा च अन्त:करणस्य अतीन्द्रियत्वाभावेन प्रत्यक्षताया: सुवचतया तदवच्छिन्नचैतन्यात्मकप्रमातर्यपि ऐक्याध्यासमूलकः अहं सुखी अहं दुःखी इत्यादि व्यवहारः प्रत्ययो वा निराबाध इति भावः । - अन्तःकरणस्य इन्द्रियत्वे भगवद्गीतावचनं प्रमाणत्वेनादाय ततो विरोध: माशंक्य अविरोधमुद्भावयति- "मनःषष्ठानीन्द्रियाणि" इति भगवद्गीतावचनं प्रमाणमिति चेत् न, अनिन्द्रियेणापि मनसा षट्त्वसं-पूरणाविरोधात् । नहीन्द्रियगतः संख्यापूरणमिन्द्रियेण नियमः।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः। २९ अनिन्द्रियेण इन्द्रियभिन्न इत्यर्थः । षट्त्वमेव संख्या षट्त्वसंख्या तस्याः पूरणं पूर्ति: सम्पत्तिरिति यावत् । ततो अविरोध: विरोधाभावः । इन्द्रियगता संख्या इन्द्रियगतसंख्या, तस्याः पूरणम् । अयं भावः, अन्तः करणस्य अनिन्द्रियत्वं मन:- षष्ठानोनियागीति भगवद्गीता - वचनविरुद्धं फलतः तह बाधितमिति लाइ नीयम् । यतः मनःषष्ठानि इत्यादिगोतावाक्यस्य मनः षष्ठं येषामिन्द्रियानां तानि मनःषष्ठानि इति विग्रहानुसार मन आवाय पछानि अर्थात् षत्वसंख्यावन्ति इन्द्रियाणि इत्यर्थकतया मनसः अन्तःकरणस्य अनिन्द्रियत्वेऽपि तबादाय पंच, ज्ञानेन्द्रियाणां षट्त्वसंख्यापूर्तः योग्यतया प्रोक्तभगवद्गीतावाक्यस्य इन्द्रियत्व- व्यवस् नास्ति । मनःषष्ठानि इत्यत्र मनसः षष्ठानि मनःषष्ठानि इति का विग्रहः । तृतीयार्थः प्रयोज्यत्वम्, तच्च प्रकृते मनोमिकापेक्षाबुद्धिजन्यत्वरूपं बोध्यम् । अन्वयश्च तस्य षट्त्वे । सजातीय-गतसंख्या-संपादनस्य सजातीय-साध्यत्व-नियमे पुनः, अन्त:- करणस्य इन्द्रियत्वमुक्तगीता-वचन-प्राप्तमित्यार्थक्य प्राप्तो नियमः खण्डितो नहीन्द्रियेत्यादिना। तत्र नियमस्य व्याप्तिरूपतया तदभावस्य व्यभिचारनयत्येन व्यभिकारप्रदर्शनं विना व्याप्त्यभावो नासन्दिग्ध इति व्यभिचारमुद्भावयति- -- "यज्ञमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति" इत्यत्र ऋत्विग्गतपञ्चत्व- संख्यायाः अनुत्विजापि यजमानेन- "वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्" इत्यत्र वेदगतपञ्चत्व- सख्यायाः अवेदेनापि भारतेन पूरणदर्शनात् । यजमान: पञ्चनः पञ्चत्वसंख्यापूरको येषां ते यजमानपञ्चमाः । कत्विज इति विशेष्यवाचकपदाध्याहारः । इड़ा = यज्ञसम्बन्धि-द्रव्य-प्रभेदम् । तृत्विजा ऋत्विग्भिन्नेन । यजमानेन इत्यस्य "पूरणदर्शनात्" इति व्यवहितेन सम्बन्धः। महाभारतपञ्चमान् वेदान् अध्यापयामास इत्यन्वयः, अत्रापि विग्रहः पूर्ववत् । अवेदेनापि भारतेन वेदगद्रपञ्चत्व-संख्यायाः पूरणदर्शनात् इति योजना अयं भावः, संख्यापूतिः सजातीयगतकत्वप्रकारक-बुद्धिस्वरूपपिक्षाबुद्धिसाध्यै- वेति यदि नियमोऽभ्युपेयते, तदा यजमानपत्रमा इड़ा मायन्ति इति वैविक- वचन-बापः । न हि यजमानः ऋत्विकत्वधर्मवान् येन सजातीयतया तमादाय तर-विशेष्यकत्वप्रकारकति-साध्य-पाल-संख्या ऋत्विग्गता भविसमत । - ३० वेदान्तपरिभाषा । न केवलं वैदिक-वाक्य-स्थल एव उक्त-नियम-व्यभिचार:-अपितु "वेदान् अध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्" इति भारतवाक्यस्थलेऽपि । न हीतिहासभूतस्य महाभारतस्य भगवद्वैपायनप्रणीतस्य कथमपि वेदत्वम् । सत्यप्येवं महाभारत- विशेष्यकापेक्षाबुद्धि-साध्य-पञ्चत्व-संख्या वेदे प्रोक्तवचनेन बोध्यते । एवञ्च "मनः षष्ठानोन्द्रियाणीत्यस्य अनिन्द्रिय-मनोविशेष्यकापेक्षा - बुद्धिसाध्य - षट्त्व-संख्यायाः इन्द्रियगतषवल्यापकत्वाभ्युपगमेन दोषानवकाशात् । न च पुरुषत्वमादाय यजमानस्य शास्त्रत्वमादाय महाभारतस्य च ऋत्विग्वेदसाजात्यमक्षुण्णयमिति वक्तव्यम्, पञ्चत्व - कथन - विरोधापातात् । अध्यस्तत्वादि यत्किञ्चिद्धर्ममादाय अनिन्द्रिय- स्यापि मनसः इन्द्रियसाजात्यस्य सुवचतया संख्यापूर्तिः साजातीयेनैवेति नियमाभ्यु- पगमेऽपि प्रोक्त-गीता-वचन-बलेन मनस: इन्द्रियत्वासिद्धः । एवं न चातीन्द्रियत्वा- धीना इन्द्रियत्वसिद्धिः यया प्रत्यक्षविषयत्वाभावापादमनन्त:करणस्येति । युक्त्या मनस: इन्द्रियत्वाभावमुपपाद्य श्रुत्या तदुपपादयति- -- "इन्द्रियेभ्यः परा ह्या अर्थेभ्यश्च परं मनः ।" इत्यादिश्रुत्या मनसोऽनिन्द्रियत्वाभ्युपगमात् । शिष्टैरिति शेषः । श्रुत्या इत्यत्र तृतीया हेतो। तथा च इत्यादिश्रुत्या शिष्ट: मनसः अनिन्द्रियात्वाभ्युपगमात् इति योजना । शेषानभ्युपगमे श्रुत्येत्यत्र तृतीयायाः कतरि अभ्युपगमपदवाच्ये स्वीकारे वेदकतुंकत्वासंभवेन अयोग्यत्वापातात् । अथवा अभ्युपगम - पदस्य प्रतिपादने लक्षणा, तत्र श्रुति- कर्तृकत्वस्यान्वयः । वक्तव्यतया ननु इन्तिधावधिकोहलन्तः अर्थाः, अर्थावधिकोत्कर्ष..'नः इत्यस्यैव इन्द्रियेभ्य इति श्रुत्यर्थतया, तस्याः श्रुतेः प्रकर्षमात्रबोधक, न त्विन्द्रिय- भिन्नत्वरूपमनिन्द्रियत्वबोधकत्वम् यदि चोकपिकप भेदनियती, न चान्तरेण भेदम्, उत्कर्षापकों संभवतः, अतः इन्द्रियभिन्नत्वं मनसः, तदा युक्त्यैव तत्साधनमिति श्रत्येति लेखासङ्गतिरिति चेत् सत्यम्, श्रुत्येत्यस्य श्रुतिमूलक-युक्त्या इत्यर्थकरणाददोषात् । आदिपदेन ज्ञानेन्द्रियपञ्चक-कर्मेन्द्रियपञ्चकबुद्धिमनोयुक्तं लिङ्गशरीरम्, इत्यादे- ग्रहणमवगन्तव्यम् । ननु मनसः इन्द्रियत्वं वक्तव्यमेव । अन्यथा सुखदुःखादेः प्रात्यक्षिक- विषयत्वानप्रति:। न हि बाह्यन्द्रियाणां सुखदुःखाद्यान्तर - पदार्थप्रकाशकता- प्रत्यक्षपरिच्छेदः। ३१ संभवः। सुखदुःखादेः प्रात्यक्षिकविषयत्वानभ्युपगमे सुखं साक्षात्करोमीत्याद्यनु- व्यवसायाभावप्रसङ्गः । न चेदं वक्तुं शक्यं यत् अनिन्द्रियमनोजन्यत्वादेव अहं सुखी इत्यादि ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम्, यतः इन्द्रियजन्य - ज्ञानत्वं प्रत्यक्षत्वमित्येव सर्वविदितम् इति शङ्कामपनयति- न चैवं मनसोऽनिन्द्रियत्वे सुखादिप्रत्यक्षस्य साक्षात्वं न स्यादिति वाच्यम् न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । सुखादेः प्रत्यक्षं सुखादिप्रत्यक्षम्, तस्य । आदि- पदात् दुःखेच्छादीनामुपग्रहः। तथा च अहं सुखी, अहं दु:खी, अहं जाने, अहं यते इत्यादिप्रत्यक्षस्य इत्यर्थः । साक्षात्वं प्रत्यक्षत्वम् । अवाच्यतायां हेतुमाह- - न हीन्द्रियजन्यत्वेन ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् । । हिः हेतौ । तथा च यत इति तदर्थः । तृतीयार्थः प्रयोज्यत्वम् । ज्ञानस्येत्यत्र षष्ठ्यर्थों विषयत्वम् । तथा च ज्ञाननिष्ठप्रत्यक्षत्वं यस्मात् नेन्द्रिजन्यत्व- प्रयोज्यम् इत्यर्थः । अयं भावः इन्द्रियजन्य ज्ञान प्रत्यक्षम् इति प्रत्यक्ष-लक्षणमभ्युपेत्य अहं सुखी इत्यादिज्ञानस्य प्रत्यक्षवाभावापादनं यत् क्रियते तन समीचीनम् । यतः प्रत्यक्षस्य नोक्तं लक्षणमस्माभिर्वेवान्तिभिः अभ्युपेयते । एवं च मनसः इन्द्रियत्वामावेऽपि मनोजन्यस्य "अहं सुखी" इत्यादिज्ञानस्य प्रत्यक्षतायां न किञ्चिद्, बाधकम् इति । ननु कुतो नोक्तप्रत्यक्ष - लक्षणाभ्युपगमः ? इत्याशङ्कायामाह- अनुमित्यादेरपि मनोजन्यतया साक्षात्वापत्तेः । आदिपदेन उपमितिशाब्दबोधाद्यनुभवस्मृतीनां उपग्रह :। अयमभिप्रायः न खलु मनोरूपान्तःकरणं विना काचन वृत्तिरदेति । इति मनसः इन्द्रियत्ववादिनां मते वृत्तिमात्रे प्रत्यक्षत्वापत्तिः, प्रत्यक्षलक्षणातिव्याप्तिर्वा दुर्वारा । मनसः इन्द्रियत्वेन सकलानुमित्यादि - ज्ञानेच्छा - प्रयत्लादीनामिन्द्रियजन्यत्वात् । मानपद - प्रक्षेपेण इच्छादीनां तद्वारणेऽपि अनुमित्यादि मानानां प्रत्पक्षत्वं दुर्वारम् । - वेदान्तपरिभाषा। - मनु इन्द्रियजन्यमित्यस्य इन्द्रियत्वावच्छिन्न - जनकता निरूपित-जन्य- ताशालीत्यर्थः । तत्र जनकता करणतारूपा विवक्षिता । एवं च इन्द्रियत्वावच्छिन्न- करणता-निरूपितकार्यता - शालिज्ञानं प्रत्यक्षम् इत्यस्यैव पर्यवसन्नप्रत्यक्ष - लक्षणतया नानुमित्यादिज्ञाने प्रत्यक्षत्वापत्तिः । अनुमित्यादि - ज्ञानं प्रति मनसः मनस्त्वेन कारणत्वेऽपि इन्द्रियत्वेनाकारणत्वात् । तेन रूपेण तस्य कारणत्वाम्पुपगमेऽपि अनुमित्यादि - कार्य प्रति मनसः करणत्वानभ्युगमात् । वेदान्तिभिरपि व्याप्तिज्ञान- स्वरूपानुमानादीनामेवानुमित्यादिकरणत्वाभ्युपगमात् । इत्यतो दोषान्तरमाह- ईश्वरज्ञानस्याजन्यस्य साक्षात्त्वानापत्तेश्वः । - । ईश्वरस्य ज्ञानं ईश्वरज्ञानम् । षष्ठयाः सम्बन्धोऽर्थः स च कर्तृत्त्वरूपोऽवसेयः । अजन्यत्वं नित्यत्वम् । आपत्तिरापादनं सम्पादन मिति तदर्थः, न तु दोषरूपा आपत्तिः। तथा च अनापत्तिः अनुपपत्तिः। अजन्यस्येति हेतुत्वगर्भ विशेषणम् । तथा च ईश्वरकर्तृ कस्य ज्ञानस्याजन्यत्वात् प्रत्यक्षत्वानुपपत्तेरित्यर्थः । अयं भावः विशेषामाया तामान्यामावनियतः। सत्येवं नित्यतया जन्यत्व - सामान्यामावति किञ्चिद्विशेषजन्यत्वाभावः अवश्यंभावी। सति चवं भगवत्प्रत्यक्ष मनोजन्यत्वामावा दुर्वारः। यत्र च मनोजन्यत्वमेव नास्ति तत्र का प्रत्याशा मनःकरणकत्वस्य ? इति इन्द्रियत्वाभावेन तस्य प्रत्यक्षत्वानुपपत्तिः स्यात्, यदीन्द्रियजन्यत्वस्य प्रत्यक्षताप्रयोजकत्वमभ्युपेयात् । अव्याप्तिर्वा स्यात् प्रोक्तलक्षणस्य भगवत्प्रत्यक्षे। न चेष्टापत्तिः शक्यते कर्तुम्, भगवतः परोक्षज्ञानानन्युपगमात् । इन्द्रियजन्यत्वस्य प्रत्यक्षत्व - प्रयोजकता नाभ्युपेयत चेत् अवारमा कि मानस्य प्रत्यक्षत्वम् ? आहोस्वित् अभ्युपेयते किञ्चित् तत्प्रयोजकम् ? अभ्युपेयते चेत् किं तत् इति पच्छति- सिद्धान्ते प्रत्यक्षत्वप्रयोजक किम् । सिद्धान्ते = वेदान्त-सिद्धान्ते, तव मते इत्यर्थः । प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं प्रत्यक्षत्व- प्रयोजकम् । किमित्यस्य जिज्ञास्यमित्यर्थः । ममेति शेषः । तथा च वेदान्त-सिद्धान्त सिद्धं प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक मम जिज्ञास्यमित्यर्थः । विकल्प्य उत्तरयति- कि इति चेत् किं ज्ञानगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं छिपृच्स वा विषयगतस्य?
प्रत्यक्षपरिच्छेदः। ३ ३ इतीत्यस्य एवमित्यर्थः । चेत् इत्यस्य यदीत्यर्थः । तथा च प्रत्यक्षत्वप्रयोजकं मम जिज्ञास्यमिति यत् त्वयोक्तं तत्रोत्तरदानाय प्रथमं ममापि इदं जिज्ञास्यं यत् "घटस्य मे प्रत्यक्ष ज्ञान" इत्यनुभवसिद्धस्य ज्ञानगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं तव जिज्ञास्यम्, आहोस्वित् "घटो मे प्रत्यक्षः" इत्याद्यनुभवसिद्धस्य घटादिविषयगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य ? इति सरलार्थः । अयं भावः प्रत्यक्षत्वं विविघं विषयिगतं विषय- गतञ्च, उभयविधस्य प्रत्यक्षत्वस्य नैकं प्रयोजकं यत् “प्रत्यक्षत्वप्रयोजकं किम्" इति सामान्यतः प्रत्यक्षत्व - प्रयोजकविषयकस्य प्रश्नस्य एकमुत्तरमहं दद्याम् । अत: विशिष्य प्रश्नो युक्तः । यद्यपि ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्वविचारस्यैव प्रस्तुतत्वात् प्रश्ने तत्प्रयोजकविषयकत्वस्य प्रकरण - प्राप्तत्वात् विकल्पोऽयमसाधुरिव भाति, तथापि ज्ञान-गत-प्रत्यक्षत्वस्येव विषयगत-प्रत्यक्षत्वस्यापि प्रयोजकं न ज्ञानगत- मिन्द्रियजन्यत्वं इति ज्ञापनाय विकल्पः, इति मन्तव्यम् । आद्यपक्षं जिज्ञास्यत्वेनादा- योत्तरयति- . आये, प्रमाणचैतन्यस्य विषयवतन्काभेद इति ब्रूमः । अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नं चैतन्यं प्रमाणचैतन्यम् । विषयावच्छिन्नं चैतन्यं विषयचैतन्यम् । प्रमाणचैतन्यस्येत्यत्र षष्ठ्यर्थो निष्ठत्वम् । विषयचैतन्यात् अभेदः विषयचैतन्याभेद: । चैतन्यात् इत्यत्र पञ्चम्यर्थः प्रतियोगिकत्वम् । अभेद: अवच्छेदकयोरेकदेशस्थतामूलकम् अवच्छेद्य क्यम् । प्रत्यक्षत्वप्रयोजकमिति शेषः । अयं भावः अन्तःकरणं तेजसं वस्तु । गृहात वायुसंश्लिष्टाग्निकण इव इन्द्रिय- संश्लिष्टं तत्, शरीरात् बहिनिर्गच्छति । निर्गतं विषयदेशं प्राप्नोति, ततः अन्तः- करणस्य तस्य तदबहिर्वेशस्थ - घटादि - विषयाकाराकारिता भवति । सैव विषया- काराकारिता, वृत्तिविशेषात्मकज्ञानविशेषरूपा। कि च चैतन्यं ब्रह्म एकमेव व्यवहारकल्पित-घट-पट-वृत्त्याद्यवच्छेदक- भेदादेव घटाकाशपटाकाशादिवत् व्यवहारकल्पितं घटावच्छिन्नचैतन्य-पटावच्छिन्न- चैतन्यादिरूपेण भिन्नं भवति । अर्थात् वृत्त्यवच्छिन्न - चैतन्य - घटावच्छिन्नचैतन्ययोः वृत्ति-घटाशयोरेव भेदः, न तु चैतन्यांशे। फलत: अवच्छेद्यमेकमवच्छेदकमनेकम् । एवञ्च अन्त:करणस्य विषयाकाराकारिता यदि इन्द्रियद्वारेण बहिरेत्य भवति, तदा एकदेशस्थतामूलकं ऐक्यम्, तदाकाराकारितात्मकवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यरूपप्रमाण- चैतन्यस्य घटादि - विषयावच्छिन्नचैतन्यात् स्फुटीभवति । अतः तादृशी तदाकारा- ३४ वेदान्तपरिभाषा। कारिता रूपा वृत्तिः प्रत्यक्षपदवाच्यतां भजते । अनुमित्यादिस्थले तु नान्त:- करणस्य इन्द्रिय-द्वारेण विषयदेशगमनमिति न वृत्तिविषययोः चैतन्यावच्छेदकयोः एकदेशस्थता, तन्मूलकैक्यस्फुटीभवनं वा इति नानुमित्यादौ प्रत्यक्षत्वापत्तिः, इति फलतः वृत्ति - देशस्थ - विषयनिष्ठावच्छेदकतानिरूपितावच्छेद्यतावत् - चैतन्याभिन्न- चैतन्यनिष्ठावच्छेद्यता - निरूपितावच्छेदकतावस्वमेव इन्द्रियद्वारकान्त:करणवृत्ति- रूपस्य ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम्, तत् प्रयोजकं वा इति । अवच्छेदकत्वं भेदकत्वम् अवच्छेद्यत्व भेद्यत्वम् । ननु सिद्धान्ते ब्रह्मात्मकस्य चैतन्यस्य एकत्वेन भेदाभावात् प्रमाणचैतन्य- विषयचैतन्येत्यादेः वक्तुमशक्यत्वेन "प्रमाणचैतन्यस्य विषयचैतन्याभेद इति ब्रूमः" इति कथनासंगतिः अत आह- - तथा हि त्रिविधं चैतन्यं, प्रमातृ-चैतन्यं प्रमाण-चैतन्यं विषय- चैतन्यञ्चति । तत्र घटाद्यवच्छिन्नचैतन्यं विषयचैतन्यम् । अन्त:- करणवृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्यं प्रमाण-चैतन्यम् । अन्त:करणावच्छिन्न- चैतन्यं प्रमातृचैतन्यम् । तिस्रो विधाः सन्ति अस्येति त्रिविधम् । विधा=प्रकारः प्रभेद इति यावत् । तथा च त्रिविधमित्यस्य त्रिप्रकारमित्यर्थः । चैतन्यं त्रिविधमिति व्यत्यासे- नान्वयः । तेन न "अनुवाद्यमनुक्त्वैव न विधेयमुदीरयेत्" इत्यभियुक्तोक्तिविरोधः । तत्र इत्यस्य तेषु इत्यर्थः । अन्तःपातित्वं सप्तम्यर्थ: तस्य प्रतिचैतन्यमन्वयः । घटादीत्यत्र आदिपदेन पटमठतटादिविषयाणां ग्रहणं वेदितव्यम् । यद्यपि घट- पटादीनां अवच्छेदक - पदार्थानाम् असंख्यत्वात् विषयचैतन्यं असंख्यं इति त्रित्वमनुपपन्नम्, तथापि विषयत्वेन विषयान् अनुगमय्य तनिष्टावच्छेदकतानिरूपिता- वच्छेद्यताशालित्वेन विषय - चैतन्यमेकमिति गीयते, नात: त्रित्वव्याघात-शङ्का । एवमेव चैतन्यान्तरेऽपि बोध्यम् । अन्तःकरणस्य वृत्तिः अन्त:करणवृत्तिः, तया अवच्छिन्नं अन्त:करण - वृत्यवच्छिन्नं तादृक् च चैतन्यं अन्तःकरण-वृत्त्यवच्छिन्न- चैतन्यम् । अन्त:करणावच्छिन्नमित्यत्रापि अन्तःकरणेन अवच्छिन्नं इति विग्रहः । अन्तःकरणवृत्तिः प्रमाणम्, तदवच्छिन्नचैतन्यं प्रमाण - चैतन्यम् । अन्तः करणमेव प्रमातृ तदवच्छिन्नं चैतन्यं प्रमातृ - चैतन्यम् इत्यभिप्रेतोऽर्थः । तथा चायं भाव:- सत्यपि स्वरूपचैतन्यस्यैकत्वे सबभ्यस्तान विषयान्तःकरणवृत्यन्तःकरणानां प्रत्यक्षपरिच्छेदः। ३ व्यवहाराय कल्पितानां अवन्धदकानं भेदात् तववच्छिन्नचैतन्यमपि शक्यते वक्तुं भिन्नतया, इति नोक्त - शंकावकाशः । यद्यपि त्रिविधमित्यादि विभागावसरे प्रमातृ- चैतन्यस्यैव प्रथममुल्लेखात् तल्लक्षणमेव प्रथममुपन्यसनीयम्, न विषयचैतन्यस्य । तथापि विषयदेशे एव अन्तःकरणतद्वृत्त्योः धावनात् प्रत्यक्षस्थले विषयस्य तदवच्छिन्नचैतन्यस्यैव च प्राधान्यमिति द्योतनाय प्रथमं विषयचैतन्यमेव विवृतमिति। इतोऽपि च विषयचैतन्यस्य प्राधान्यं प्रत्यक्षस्थले भवति यद् अन्त:- करणवृत्तिः अन्त:करणञ्च अनुमित्यादौ अपि उपयोगं भजते. विषयस्तु प्रत्यक्ष एवेति । न च वृत्तिनिर्विषयत्वानभ्युपगमेन अस्त्येवोपयोगो विषयस्यानु- मित्यादावपीति वाच्यम् । सत्यपि अनुमित्यादीना सविषयकत्वे, न तदानीं विषय. सत्त्वापेक्षा, अतीतानागत-साध्ययोरप्यनुमानात् । ननु चैतन्ययोः कीदृशोऽभेदः प्रत्यमत्त्वप्रयोजकः,किञ्चित्प्रयुक्तः किञ्चिदप्रयुक्तोवा? नाद्यः एकस्यैव चैतन्यस्य सर्वाध्यासाधिष्ठानत्वेन किञ्चिद्प्रयुक्तस्य तस्य सार्वदिकतया अनुमित्यादेरपि प्रत्यक्षत्वस्य दुरितापत्तेः। द्वितीयञ्चेत् प्रयोजक-प्रदर्शनमुचितम् । अन्त:करणस्य घटाद्याकारपरिणमनात्मिका वृत्ति. प्रयोजिकेति चेत्, अन्तःकरणस्य शरीरे विषयस्य च बहिः सत्त्वेन अन्तःकरणस्य विषयाकारधारणाद्यसम्भवः इत्यादि समाशक्य आह- - भवति, तत्र यथा तडागोदकं छिद्राग्निर्गत्य कुल्यात्मना केदारान् प्रविश्य तद्वदेव चतुष्कोणाद्याकारं तथा तैजसमन्तःकरणमपि चक्षुरादिद्वारा घटादिविषयदेश घटादिविषयाद्याकारण परिणमते । स एव परिणामो वृत्तिरित्युच्यते । गत्वा तत्र इत्यस्य प्रत्यक्षस्थले इत्यथैः । तड़ाग:-कासारः, तस्य उदकं - जलम् । कुल्या = जलप्रणाली, तदात्मना तद्द्वारेण । केदार: %3D क्षेत्रम् । तद्वदेव = क्षेत्रवदेव । अयम्मावः न किञ्चिवप्रयुक्तः चैतन्यामेवः प्रत्यक्षत्रपोज स्वीकयते, अपि तु किञ्चित्प्रयुक्त एव । कि नामामेवप्रयोजकं तत् इति चेजिज्ञासा, चैतन्यावच्छेवकयोः वृत्ति-विषययोः एकदेशता, इत्यवधार्यताम्, सैव कमिति चेवित्यम् । यथा ससुषिरस्य तडागस्य जलं निर्गमार्थनिर्मितया प्रणाल्या तडागात् क्षेत्र समेत्य, क्षेत्राकाराकारि भवति । अर्थात् क्षेत्रं यदि त्रिकोणं भवति, तहि जलमपि त्रिकोणाकारं भवति । क्षेत्रं चेत् 'चतुष्कोणं भवति, जलमपि चतुष्कोणाकारम् । वा सच्छिद्रात् अझकरणाशयात् शरीरात् चक्षुःप्रणाल्या ३ वेदान्तपरिभाषा। बहिः निर्गतमन्तःकरणं विषयदेशं गत्वा विषयाकाराकारि भवति । सत्येवं अन्तःकरणवृत्ति - स्वरूपस्य प्रमाणस्य पटाद्यात्मकविषयस्य च चैतन्यावच्छेदकस्य सम्पान्नायां एकदेशस्थताया तत्प्रयुक्तः प्रमाणावच्छिन्नचैतन्य-विषयावच्छिन्नचैतन्ययोः अभेदः स्वीक्रियते । स एवाभेद: वृत्यात्मक - ज्ञाननिष्ठ-प्रत्यक्षत्वप्रयोजकः अङ्गीक्रियते । परिणमते = परिणतं भवति । सत्यप्यन्तःकरणस्य परिणामे अन्तःकरणवृत्तः किं जातम् ? इति शङ्कानिरासायोक्त “स एव परिणामो वृत्तिरित्युच्यते" इति । परिणामस्यैव वृत्तित्वात् विषयाकाराकारित्वरूपायाः तस्याः विषयकदेशस्थताया न सन्देहावकाश इति । अनुमित्यादिपरोक्षवृत्तिस्थले कथं न प्रमाणचैतन्य-विषयचैतन्ययोरभेदः ? इत्याशङ्कामपनयति- - अनुमित्यादिस्थले तु नान्तःकरणस्य बहिर्देशगमनम् । वहन्यावे: क्षुराद्यसनिकर्षात् । आदिपदेन उपमिति-शाब्दार्थापत्यानुपलब्धिक-वृत्तीनां ग्रहणम् । क्षेत्रपर्यन्तं प्रणाल्याः अभावे यथा न जलं क्षेत्रपर्यन्तं गच्छति, न वा तदाकाराकारितां लभते, तथैव व्यवहित-विप्रकृष्टाऽतीतानागतविषयः सह चक्षुषः सन्निकर्षाभावेन कथं चक्षुरादिद्वारा भवितुमर्हति बहिर्देशगमनमन्तःकरणस्य ? कथं वा स्वीकत्तुं शक्यते विषयाकाराकारितारूपा वृत्तिः ? सति चैवं कुतः सम्भावना चैतन्यामेदप्रयोजकस्य वृत्तिविषययोरेकदेशस्थत्वस्य ? इति नानुमित्याद्यात्मक - वृत्ती ज्ञानगत- प्रत्यक्षत्वावकाशः। तदापत्य- ननु "प्रत्यक्षपरिकलितमप्यर्थमनुमानेन बुभुत्सन्ते तकरसिकाः" इति टीका कृदुक्तेः इन्द्रियसनिकृष्टविषयकानुमितो प्रत्यक्षत्वापत्तिः कथं वारणीयेति चेत् टीकाकृदुक्तेर्मतान्तराभिप्रायकतया, तादृशस्थलेऽनुमित्यनभ्युपगमेन सम्भावात् । अत एव पर्वतो बह्विमानित्यनुमितेः पर्वतांशे प्रत्यक्षत्वमिति वक्ष्यति ग्रन्थकार अनुमानपरिच्छेदे । यद्वा अन्यवृत्त्यसहकृतस्यैव निरुक्तचैतन्याभेदस्य ज्ञप्तिगत - प्रत्यक्षत्व - प्रयोजकतया प्रोक्तानुमितिस्थलीयचैतन्याभेदस्य व्याप्त्य- नुभवात्मकवृत्तिसहकृतत्वेन तदसहकृतत्वाभावात् तत्रत्यस्य चैतन्याभेदस्य प्रत्यक्षत्वप्रयोजकत्वाभावात् न प्रोक्तदोषावकाशः ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ३७ ननु अव्यवहितस्य किञ्चिद्वरवत्तिनोऽपि पदार्थस्य चाक्षुषप्रत्यक्षोत्पत्या विषयसन्निकर्षार्थ विषयदेशपर्यन्तं रश्मिरूपेण चक्षुर्गमनस्य, तत्प्रणाल्या अन्त:- करणस्यापि च बहिविषयदेशगमनस्यावश्यकत्वेऽपि, प्रत्यक्षान्तरस्थले विषय- स्यैवेन्द्रियदेशसमागमस्यानुभवसिद्धतया कथमिन्द्रियप्रणाल्या अन्तःकरणस्य बहिर्देशगमनमिति चेत्, न तादृशस्थले सन्निकर्षार्थ विषयस्यैव समागमनाभ्युपगमेऽपि इन्द्रियाधिष्ठानभूतपिण्डदेश एवागमनम्, न त्वतीन्द्रियस्येन्द्रियस्य देश इति इन्द्रिय- स्थानभूतपिण्डसंयुक्तेन विषयेण सह सम्बन्धार्थ इन्द्रियस्य तद्रेणान्तःकरणस्य च निर्गमस्यावश्यमभ्युपेयतया प्रश्नानवकाशात् । न चैवं द्रव्यप्रत्यक्षस्थलेऽन्त:- करणस्य विषयाकाराकारित्व - सम्भावनायामपि "इदं रूपम्" इत्यादिगुणविषयक- प्रत्यक्षस्थले तदाकाराकारिताया अभावेन प्रत्यक्षलक्षणाव्याप्तिर्वारेति वाच्यम् । सिद्धान्ते गुणगुणिनोरभेदेन रूपादेरप्याकारयुक्ततया अन्त:करणस्य तदाकाराकारिता- सम्भवात् । ज्ञप्तिगत - प्रत्यक्षत्व - प्रयोजको य: चैतन्याभेदः तत्प्रयोजक अवच्छेदकयोरेक- देशस्थत्व दर्शयति- तथा चायं घट इति प्रत्यक्षस्थले घटादेः तदाकारवृत्तेश्च बहिरेकत्र देशे समवधानात् तदुभयावच्छिन्नचैतन्यमेकमेव । घटावच्छिन्नचैतन्यं अन्त:- समवधानं - स्थितिः ततः, । तदुभयावच्छिन्नचैतन्यं करणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यं चेति । ननु अवच्छेदकत्वं विशेषणत्वनियत, विशेषणत्वं च भेदकत्वनियतम् तथा चावच्छेदकत्वेन भेदकयोरन्त:करणवृत्ति-घटादि - विषययोः कथम् अवच्छेद्यभूत- चैतन्याभेदप्रयोजकत्वम् ? इत्याशङ्कयाह- विभाजकयोरप्यन्तःकरणवृत्ति-घटादिविषययोः एकदेशस्थत्वेन भेदाजनकत्त्वात् । विभाजकयोरित्यस्य भेदकयोरित्यर्थः । भेदाजनकत्वं भेदजनकत्वाभावः । भेदजनकत्वं - भेदज्ञापकत्वम् । तथा च भेदाजनकत्वादित्यस्य भेदज्ञापकत्वा- भावात् इत्यर्थः । अयं भावः न स्ववच्छेदकयोर्मेदकत्वनियमः अपि तु व्यधि- वेदानपरिभाषा करणयोस्तयोः । प्रकृते तु प्रागुक्तक्रमेण द्वयोरेकदेशस्थत्वात् वैयाधिकरण्या- मावेन न मेदासात । व्यधिकरणयोरेवावच्छेदकयोरवच्छेद्य-भेदकत्वं इत्यत्र प्रमाणं वर्शयति- अत एव मठान्तत्र्तिघटावच्छिन्नाकाशोन मठाकाशाद् भिद्यते। अत एव = अवच्छेदकयोरेकदेशस्थयो दाजनकत्वादेव इत्यर्थः मठस्यान्तः वर्तते इति मठान्तर्वर्ती, स चासो घटः मठान्तर्वत्तिघटः, तदवच्छिन्नाकाश इत्यर्थः । घटाकाशात् = घटावच्छिन्नाकाशात् । अयं भावः-व्याप्यदेशे व्यापक- सत्त्वस्यावश्यकतया व्याप्यस्य मान्ततितो घटस्य देशे व्यापकस्य मठस्य विद्यमानतया वैयधिकरण्यामावेन यथा न मठघटयोः आकाशभेदकत्वं तथा प्रकृतेऽपि बहिरेकदेशे विद्यमानतया अप्यधिकरणयोः अन्तःकरणवृत्तिघटयोरपि न चैतन्यभेदकत्वमिति । मठान्तर्वत्तिघटाकाशो मठाकाशात् भिन्न एवेति न तं दृष्टान्तीकृत्य चैतन्याभेदः सुसम्पाद्यः, इति तु नाशङ्कनीयम् । भेदाभ्युपगम- स्यानुभवविरोध-गौरवदोषाभ्या पराहतत्वात् । - . शिष्यमुबोधाय स्थान-विशेषं परिगृह्य ज्ञप्तौ प्रत्यक्षत्वं विशदयति- तथा च "अयं घटः" इति प्रत्यक्षस्थले घटाकारवृत्तेचंटसंयोगितय घटावच्छिन्नचैतन्यात् तद्वृत्यवच्छिन्न -चैतन्यस्याभिन्नतया घटज्ञानस्य घटांशे प्रत्यक्षत्वम् । घटाकारा वृत्तिः घटाकारवृत्तिः, तस्याः। वृत्तिपदेन अन्तःकरणस्य वृत्ति- विवक्षिता । तथा च घटाकाराया अन्त:करणवृत्त : इति तदर्थः । "घटसंयोगितया" इत्यनेन चैतन्याभेदप्रयोजकस्य वृत्तिघटयोरेकदेशस्थत्वस्य प्रदर्शनम् । तत्रति घटाशे इत्यस्य विशेषणम् । ननु ज्ञानात्मिकाया वृत्ते रद्रव्यत्वेन, तदवयवाभावेन, कथं "घटज्ञानस्य घटांशे प्रत्यक्षत्वम्" इति कथनं सङ्गतम् ? अंशशब्दस्य अवयव- शब्दापरपर्यायत्वात् इति चेत् न, सिद्धान्ते वृत्तिवृत्तिमतोरभेदाभ्युपगमात् तैजसस्यान्त:करणस्य सांशतया तद्वृत्तिरूपस्य ज्ञानस्य सांशत्वकथनासङ्गत्यभावात् । तथा च तद्विषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नचैतन्यावच्छेदकतावती अंतःकरणवृत्तिः तदंचे प्रत्यक्षमिति सरलं निर्वचनं ज्ञप्ति-प्रत्यक्षस्य ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । न च "तदंशे" इति कथनं व्यर्थम् । तथा सति "अयं घट" इति चाक्षुषज्ञानस्य घटगतगुरुत्वांशेऽपि प्रत्यक्षत्वापत्तेः । न च सा कथमपीष्टा गुरुत्वस्यातीन्द्रियत्वात् । न च हस्तन्यस्तवस्तूनां गुरुत्वस्य त्वचा समुपलम्भात् कथमतीन्द्रियत्वं गुरुत्वस्ये- ति वाच्यम् । तुलास्थल इव तत्रापि गुरुत्वानुमानस्यैवाभ्युपगमात् । कथञ्चिन्नयाय- लीलावतीकृदुक्तदिशा तत्स्पार्शनाभ्युपगमेऽपि वृत्तेः तदंशे चानुपपलपास्य कथञ्चिदपि स्वीकारानहतया तद्वारणाय "तदंशे" इति कथनस्य सर्वथा सार्थक्यात् । ननु "अहं सुखी" इति सुखप्रत्यक्षे अव्याप्तिः, तत्र वृत्तिविषयस्य सुखस्य बाहरवाहियालेन चक्षुरादिसन्निकर्षस्य, चक्षुरादिद्वारा अन्त:करणनिर्गमस्य चाभावेन सुखावच्छिन्नचैतन्यान्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्ययोरभेदप्रयोजकस्य सुखतवृत्त्योर्वहिरेकदेशस्थत्वस्याभावात्, इत्याशंक्याह- सुखाद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य तवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य च नियमेन एकदेश- स्थितोपाधिद्वयावच्छिन्नत्वात् नियमेनाहंसुखी" इत्यादिज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम्। - तदृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य = सुखवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य । नियमोऽव्यभिचारः। तथा च, अव्यभिचरितभावेन एकदेशे स्थितं यत् उपाधिद्वयं, तदवच्छिन्नत्वात् इति "नियमेनकदेशे" त्यादिपञ्चम्यन्तवाक्यार्थः अयंभावः-न बहिरेकवेशस्थत्वं अवच्छेदकयोः, अवच्छेव्यामेवप्रयोजकमस्माभिरुच्यते, अपि तु एकदेशस्थत्वमात्रम् । एकश्च वेशो वाह्यो वा भवतु, आन्तरो वा, इत्यत्र नाप्रहः । तथा च अहं सुखी इति वृत्तिस्थले वृत्तिनिर्गमावभावेऽपि, शरीरान्तरेव अन्तःकरणात्मकैकदेशे, सुखात्मक- विषयतवृत्त्योरस्तितया चैतन्यावच्छेवकयोः एकवेशस्थत्वेन प्रयोजकसत्त्वात् चतन्ययोरमेदात् "अहं सुखो" इत्याविज्ञाने प्रत्यक्षत्वस्य सूपपावत्वात् । “नियमे- नाह" मित्यत्र नियमेन इत्यस्य प्रत्यक्षत्वेन सम्बन्धः । नियमोक्त्या नाव्याप्ति- शकिल कूलेशोऽपीति सूचितम् । अवच्छेदकयोः एकदेशस्थत्वमात्रस्य अवच्छेद्याभेदप्रयोजकत्वे तादृशचैतन्या- त्मकावच्छेद्याभेदस्य च प्रत्यक्षत्वप्रयोजकत्वे, "अहं सुखी" इतिप्रत्यक्षजन्ये अतीत- सुखविषयके 'अहं सुखी" इति स्मरणे प्रत्यक्षत्वापत्तिर्दुरा । सुखतद्वृत्त्योः दानपरिभाषा । सुखावच्छिन्नचैतन्यतवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्ययोरभेदात् अन्न.करणात्मकदेशस्थन्वेन इत्यभिप्रायेण शङ्कते- - स्ववृत्ति-सुखादि-स्मरणस्यापि सुखाद्यंशे प्रत्यक्षत्वापत्तिः । मुखादेः स्मरण सुखादिस्मरणम् । स्ववृत्ति तत् सुखादिस्मरणं स्ववृत्तिमुखादि- म्मरणम्, तस्य । अन्यदीयसुखविषयकस्य अन्यदीयस्मरणस्य भिन्नान्तःकरणात्मक- देशस्थत्वेन एकदेशस्थत्वाभावात् आपात्तिरसङ्गता स्यादतः स्ववृत्तीत्युक्तम् । अयं भावः- अहं सुखीति प्रत्यक्षात्मकवृत्ति - तद्विषयसुखयोर्यथा अन्तःकरणात्म- कंकदेशस्थता अहंसुखीति स्मरणात्मकवृत्ति- तद्विषयसुखयोरपि तथैवैकदेशस्थता । सति चैवं तत्तदवच्छिन्नचैतन्ययोरप्यभेदो निराबाधः इति, कथं न "अहं सुखी' इति स्मरणस्य प्रत्यक्षत्वापत्तिः ? इति । उत्तरति इति चेन्न । तत्र स्मर्यमाणमुखस्यातीतत्वेन, स्मृतिरूपान्तःकरण- वृत्तेर्वर्त्तमानत्वेन तत्रोपाध्योर्वर्तमानकालीनतया तत्तदवच्छिन्न- चैतन्ययोर्भेदात् । उपाध्योरेकदेशस्थत्वे सति एककालीनत्वस्यैव उपधेयाभेदप्रयोजकत्वात् । . स्मर्यमाणं च तत् सुख, स्मर्यमाणसुखम्, तस्य । स्मृतिरूपा अन्तःकरणवृत्तिः, सुखस्मृतिरूपान्तः करणवृत्तिः, तस्याः । तदवच्छिन्नचैतन्ययोरित्यस्य सुखावच्छिन्न- चैतन्यतवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्ययोः इत्यर्थः । उपाध्योः अवच्छेदकयोः। सति सप्तम्या: वैशिष्ट्यमर्थः, तथा च एकदेशस्थत्वविशिष्टैककालीनत्त्वस्य इत्यर्थः । उपधेयाभेदः अवच्छिन्नपदार्थाभेदः । तस्य प्रयोजकत्वात् । अयं भावः- न खलु एकदेशस्थत्वमा अवच्छेदकयोः अवच्छेद्यभेदप्रयोजकं अपि तु एककालिकत्वसहितं तत् । एवं सति सुखस्मृतिकाले सुखस्यातीतत्वेन सुखतत्स्मृत्यात्मकवृस्योः एककालिकत्वाभावेन, एककालिकत्वविशिष्टकदेशस्थत्वस्वरूपमेवचैतन्याप्रयोजक- स्याभावात्, सुखप्रत्यक्षस्थले तु तदानीं सुखस्य वर्तमानतया सुखतवृत्योरेक- कालिकत्वेन तद्विशिष्टकदेशस्थत्वस्य तयोः सत्वात् नातिव्याप्त्यव्याप्तिशा- वसरः इति ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः। अतिव्याप्तिवारणोपायान्तरमाह- यदि चैकदेशस्थत्वमात्रमुपधेयाभेदप्रयोजकं तदा "अहं सुखी"- त्यादिस्मृत्यतिव्याप्तिवारणाय वर्तमानत्वं विषयविशेषणं देयम् । देयमित्यनन्तरं "प्रमाणचैतन्यस्य विषयचैतन्याभेदं ब्रूमः" इत्यत्रेति शेषः । तथा च अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य वर्तमानविषयावच्छिन्न चैतन्यामेवः ज्ञप्तिगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजक इति सरलार्थः । एवं च सुमिनियले विषये सुखे वर्तमानत्वाभावेन अन्तःकरणवृत्त्यात्मकप्रमाणावच्छिन्नचैतन्यस्य सुखा- वच्छिन्नचैतन्यामेदेऽपि वर्तमानसुखावच्छिन्नचैतन्याभेदाभावात् प्रत्यक्षत्वप्रयोजका- भावेनातिव्याप्त्यभावात् न दोषावकाश इत्यभिप्रायः । यदि चेत्यनेनास्वरस सूचनम् । तद्वीजं तु इदमवगन्तव्यम्-न हि विभिन्नकालिकयोः कयोश्चित् सम्भूय किञ्चित्कार्यकारित्व क्वचिदुपलभ्यम्, इति कथं विभिन्नकालीनयोरेकदेशस्थयो- रुपाध्योः उपधेयाभेदात्मककार्यकारित्वम् ? अतः एकदेशस्थत्वे सति एककालिकत्वं विशेषणं दातव्यमेवेति विफला तावदुपायान्तरचिन्ता इति । एककालीनत्वे सत्येकदेशस्थत्वस्य अवच्छेदकद्वयगतस्य अवच्छेद्याभेदप्रयोजकत्वे प्रमाणावच्छिन्नचैतन्यनिष्ठवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभेदस्य ज्ञप्तिगत- प्रत्यक्षत्वप्रयोजकत्वेऽपि च स्वीकृते स्वगतधर्माधर्मविषयकशाब्दबोधे प्रत्यक्षत्वा- पत्तिरिति शङ्कते- तत्र नन्वेवमपि स्वकीयधर्माधमौं वर्तमानौ यदा शब्दादिना ज्ञायते तदा तादृशशाब्दादावतिव्याप्तिः धर्माद्यवच्छिन्नचैतन्यतद्वृत्त्य- वच्छिन्नचैतन्ययोरेकत्वात् । एवमपि = एकदेशस्थत्वे एककालिकत्वविशेषणस्य, विषये वर्तमानत्व- विशेषणस्य वा दानेऽपि । स्वकीयधर्माधमौं वर्तमानी इत्यत्र व्यत्यस्य "वर्तमानौ स्वकीयधर्माधौ" इत्यन्वयः । “शब्दादिना" इत्यत्र आदिपदेन अनुमानार्थापत्त्यो- रुपग्रहः । तादृशशाब्दादौ तादृशशाब्दबोधादी आदिपदेन अनुमित्यर्थापत्त्योहणं वेदितव्यम् । धर्माद्यवच्छिन्नेत्यत्र आदिपदेन अधर्मस्य ग्रहणम् । अयं भावः-कमपि धार्मिक पुरुष सम्बोध्य यत्र "अहो भवान् धार्मिकः" इति केनाप्युक्तम्, तेन च वाक्येन तस्य धामिकस्य "अहं धार्मिकः" इति वाक्यार्थ- बोषो जातः, तादृशे शाब्दबोधे, प्राप्तफलकशुभाचरणादिहेतुके "अहं धार्मिक": . - ४२ वेदान्तपरिभाषा। इत्यनुमितो, "अहं धर्माधर्मवान् जोवनायथानुपपत्तेः" इत्यर्थापतौ चातिव्याप्तिः । यतो वर्तमानधर्माधर्मावपि अन्तःकरणधमों, तद्विषयिणी निरुक्तवृत्तिरपि अन्तःकरणस्यैव धर्मः, इति विषयवृत्त्योः एककालीनत्वे सति एकदेशस्थत्वं नराबाधम् । एवं च सत्तदवच्छिन्नचैतन्ययोरपि अमेदो निराबाध इति । समाधत्त- इति चेन्न, योग्यत्वस्यापि विषयविशेषणत्वात् । अयं भावः । न केवलं वर्तमानत्वं विषयविशेषणम्, अपि तु योग्यत्वमपि । तथा च प्रमाणावच्छिन्नचैतन्यस्य वर्तमान-योग्य-विषयावच्छिन्नचैतन्याभेदः प्रत्यक्ष- स्वप्रयोजक इति पर्यवसितार्थो भवति । धर्माधर्मयोस्तु कदाचिदपि प्रत्यक्षविषयत्व- स्याभावेन योग्यत्वाभावात् योग्यवर्तमानविषयपदेन धर्माधर्मयोरग्रहणात् न तत्तवृत्तिषु प्रत्यक्षत्वापत्तिः । उक्ततत्तवृत्त्यात्मक-प्रमाणावच्छिन्नचैतन्यस्य वर्तमान- योग्यविषयावच्छिन्नचैतन्याभेदाभावात् । या या योग्यता सा सा किञ्चिद्धर्माव- च्छिन्नेति नियमात् । कि नाम योग्यतावच्छेदकमिति चेत् अनतीन्द्रियत्व तद्वेदितव्यम् । ननु काम-सङ्कल्प-विचिकित्सादे: अन्त:करणधर्मस्य योग्यत्वमिव, धर्माधर्मयोरपि योग्यत्वमेवोचितम् । कथमयोयग्यत्वम् ? इत्याशङ्क क्याह- अन्तःकरणधर्मत्वाविशेषेऽपि, किञ्चत् योग्यं किञ्चदयोग्यम्, इत्यत्र फलबलकल्प्यः स्वाभाव एव शरणम् । - - अन्तःकरणधर्मत्वं = अन्तःकरणवृत्तित्वम् । अविशेषः = साम्यम्। किञ्चित् = कामसङ्कल्पादिकम्, योग्यं = प्रत्यक्षयोग्यम् । किञ्चित् धर्माधर्मात्मकमदृष्टं अयोग्यम् । फलं = कायं, तस्य बल = सामर्थ्यम्, अनुमापकत्वम् । कल्प्यः इत्यस्य साध्य: इत्यर्थः । कल्प्य इत्यत्र कल्पनापदस्य अर्थापत्तिपरत्वे फलस्य बलं उपपाद्यत्वरूपं प्राह यम्, तथा च "धर्माधर्मात्मकमवृष्टं प्रत्यक्षायोग्यत्वानुकूलस्वभाववत्, विषयत्वसम्बन्धावच्छिन-प्रतियोगिताक- प्रत्यक्षामाववत्वात्" इत्यनुमानम्, "अदृष्ट प्रत्यक्षायोग्यत्वा कूल-स्वभाववत् प्रत्यक्षामांवाग्यथा पपत्तेः" इत्यर्थापत्तेर्वा स्वभावसिदिः । अतः अन्तःकरण- धर्मत्वाविशेषेऽपि, धर्माधर्मयोः प्रत्यक्षायोग्यत्वम् । काम-सङ्कल्पादेस्तु तथा स्वभावाभावात् न तत्त्रोयोज्यमयोग्यत्वमिति भावः।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ४३ स्वभावस्य नियामकत्वानङ्गीकारे दोषमाह- अन्यथा न्यायनयेप्यात्मधर्मत्वाविशेषात् सुखादिवत् धर्मादेः प्रत्यक्षत्वापत्तिर्दुर्वारा। "अन्यथा" इत्यस्य किञ्चिद्धर्मेण साम्येपि, स्वभावविशेषात् किञ्चिद्रूपेण वैषम्यमपीति स्वीकाराभावे इत्यर्थः। नयो मतम् । आत्मधर्मत्वेन अविशेपः आत्मधर्मत्वाविशेषः, तस्मात् । अविशेषः साम्यम् । धर्मत्वं तु वृत्तित्वरूपमवि शेषात् । सुखादीत्यत्र आदिपदेन दुःखेच्छादीनाम्, धर्मादीत्यत्र च अधर्मस्य उपग्रहः । तथा चायं सरलार्थ:-न्यायमते काम-सङ्कल्पधर्माधर्मादीनां, अन्तःकरणधर्मत्वानङ्गी- कारेण तदावाय धर्माधर्मयोः प्रत्यक्षयोग्यत्वापादनानवकाशेऽपि, आत्मधर्मत्वस्य कामसङ्कल्पधर्माधर्मादिषु सर्वेषु तैरभ्युपगमात् आत्मधर्मत्वेन साम्यात् कुतो न धर्मावः प्रत्यक्षत्वापत्तिः ? विलक्षणः स्वभाव एवायोग्यत्वप्रयोजकः प्रोक्तापत्ति- वारणसमर्थ इति चेत्, तदा अस्माकमपि मते तथैव धर्मादेः प्रत्यक्षत्वापत्तिः सुवारा इति क्व दुरिता तदापत्तेः ? इति । धर्मादेरित्यस्य धर्मादिविषयकवृत्ते - रित्यर्थः, तेन नासङ्गतिः । अन्यथा ज्ञप्तिगतप्रत्यक्षत्वविचारसञ्चारे ज्ञेयगत प्रत्यक्षत्वापत्तिदानस्यायुक्तत्वापातात् । . यदा देवदत्तः सुखी, तदा यदि यज्ञदत्तः तं सम्बोध्य, "त्वं सुखी" इति वाक्यं ब्रूते, तदा तादृशवाक्यजन्ये देवदत्तीये "अहं सुखी" इति शाब्दबोधे, कथं न प्रत्यक्षत्वापत्तिः ? तदानी सुखात्मकस्य विषयस्य वर्तमानत्वेन, सुखात्मकवर्तमान- विषय-तदृत्त्योः, अन्तकरणात्मकैकदेशस्थत्वस्य अवच्छेद्यचैतन्याभेदप्रयोजकस्य अक्षुण्णत्वात् इत्याशङ्कां इप्टापत्त्या परिहरति- - - न चैवमपि सुखस्य वर्तमानतादशायां "त्वं सुखी" तिवाक्यजन्य- ज्ञानस्य प्रत्यक्षता स्यादिति वाच्यम्, इष्टत्वात् । न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । इतिपदं एतत्परम्, नत्वाकारपरम्, वाक्ये आकाराभावात् । तथा च "त्वं सुखी" एतत् वाक्यं, त्वं सुखीति वाक्यम्, तेन जन्यं ज्ञानं तज्जन्यज्ञानं, तस्य । यद्वा इति पदमाकारपरमेव, वाक्याकारस्त्वानुपूर्व्यव, इति नासङ्गतिः । इष्टत्वात् 3D अभ्युपेयत्वात् ।
४४ वेदान्तपरिभाषा । ननु वाक्यार्थबुद्धित्वं प्रत्यक्षत्वं च विरुद्धम्, इति कथ इष्टता ? तथा सति एकशेषापत्तिः सति चैवं शब्दप्रत्यक्षयोः पृथक्प्रमाणत्वाभ्युपगमोप्यसगतः इति विचिन्त्याह- - शब्दादप्यपरोक्षज्ञानाभ्यु- दशमस्त्वमसीत्यादौ सनिकृष्टविषये पगमात् । इत्यादौ = इत्यादिवाक्यप्रयोगस्थले । आदिपदेन सनिकृष्टघटादिविषयक- बोधमुद्दिश्य प्रयुक्त "अयं घट" इत्यादिवाक्यप्रयोगस्थलपरिग्रहः । अपरोक्ष च तत् ज्ञानम्, अपरोक्षज्ञानं प्रत्यक्षज्ञानम्, तस्याभ्युपगमः, स्वीकारः, तस्मात् । अयं भावः-यत्र दश जनाः कांचन नदी सन्तर्तुमारब्धाः, परपारगमनानन्तरं तदन्तर्गतः कश्चित् स्वं विस्मृत्य गणयन् संख्यापूतिमलभमानो विषीदति । तत्र अन्यः कश्चन "दशमस्त्वमसि" इति यदा कथयति, तदा विषीदतस्तस्य "दशमोहमिति" यज् ज्ञानं जायते, तत्, शब्दजन्यतया शाब्दं भवदपि, प्रत्यक्ष- रूपमेव भवतीति मन्तव्यमेव । अन्यथा अवमासे स्फुटत्वापलापप्रसंगात् । “वशम- त्वेन आत्मानमहं साक्षात्करोमि" इति अनुव्यवसायाभावप्रसङ्गाच्च । एवं च तहदेव "त्वं सुखो" इति वाक्यजन्ये "अहं सुखी" इति ज्ञानेऽपि प्रत्यक्षत्वमभ्यु- पगन्तव्यमेवेति । - विषयसन्निकर्षे विद्यमाने ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं मन्तव्यमेवेति स्पष्टयति- - अत एव पर्वतो वह्निमान इत्यादिज्ञानमपि वन्ाशे परोक्षम्, पर्वतांशे- परोक्षम् । अत एव इत्यस्य सन्निकृष्टविषयकज्ञाने प्रत्यक्षत्वाभ्युपगमादेव इत्यर्थ.। अपिकारी भिन्नक्रमः । तथा च "इत्याद्यपि ज्ञानम्" इति इत्यादिज्ञानमपीत्यस्यार्थः । आदिपदेन सन्निकृष्टविषयकज्ञानान्तरग्रहणम् वह्न यंशे इत्यत्रासनिकृष्टे, पर्वतांशे इत्यत्र च सनिकृष्टे इति शेषः। पर्वतांशे अपरोक्षत्वप्रयोजकमुद्धाटयति- पर्वताद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य बहिनिःसृतान्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्न- चैतन्यस्य चाभेदात् ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४५ - पर्वतादिना अवच्छिन्न पर्वताद्यवच्छिन्नं, तादृक् च चैतन्यम्, पर्वताद्यवच्छिन्न- चैतन्यम्, तस्य । अन्त.करणस्य वृत्ति: अन्त.करणवृत्तिः, बहिनिःमृता अन्त:करणवृत्तिः बहिनिःसृतान्त:करणवृत्तिः, तया अवच्छिन्नं चैतन्यम्, तस्य । अभेदात् इत्यस्य भेदाभावात् इत्यर्थः । अयं भावः-"प्रमाणचैतन्यस्य विषयचैतन्याभेदमिति ब्रूमः" इत्यनेन अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यविषयचंतन्ययोः अमेवः, ज्ञप्तिगत- प्रत्यक्षत्वप्रयोजकः इति पूर्वमेव प्रतिपादितम् । तादृशस्य चैतन्यामेवरूपस्य प्रत्यक्षत्वप्रयोजकस्य विद्यमानतया "पर्वतो वह्निमान्" इत्यनुमितेः पर्वताशे अपरोक्षत्वे को नाम सन्देहावसरः? इति । निरूक्तानुमितेः वह्नयशे कुतो न प्रत्यक्षत्वम् इति स्पष्टयति- वह्नयंशे त्वन्तःकरणवृत्तिनिर्गमाभावेन, वस्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमाणचैतन्यस्य च परस्परं भेदः - अन्तःकरणस्य वृत्तिः, अन्त.करणवृत्तिः, तस्या. निर्गम., तस्य अभावः । प्रमाण - अन्त:करणवृत्तिः, तदवच्छिन्न चैतन्यं प्रमाणचैतन्यम्, तस्य । अयं भावः- विषयेन्द्रियसन्निकर्षामावे नेन्द्रियद्वारा अन्तःकरणवृत्तिनिर्गमनसमवः, अतः पर्वतो- वह्निमानित्यनुमितिस्थले बढेर्व्यवहिततया इन्द्रियसन्निकर्षाभावात् नान्तःकरणस्य वह्नयाकाराकारितासम्भवः । तथा च वह्नितद्वृत्त्योरवच्छेवकयोः एकदेशस्थत्वा- भावेन, प्रयोजकामावेन न वह्नयवच्छिन्नचेतन्य-तवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्ययोरभेदः । सति चवं का सम्भावना निरुक्तज्ञानस्य वह्न यशे अपरोक्षत्वस्य ? पर्वतांशे तु चक्षुस्सन्निकर्षस्याबाधतया, इन्द्रियद्वारा अन्तःकरणवृत्तेः बहिनिर्गमात्, पर्वततद्वत्योरेकदेशस्थत्वेन पर्वतावच्छिन्नचेतन्यतत्यवच्छिन्नचतन्ययोरभेदात निरुक्तज्ञानस्य पर्वतांशे अपरोक्षत्वं निराबामिति । ननु इन्द्रियसन्निकृष्ट- त्वाच्चेत् पर्वतांशे प्रत्यक्षत्वं तदा वह्निना सह सन्निकर्षस्थले सत्यामपि वह्नयनुमि साया ज्ञानस्य वह्न यशे प्रत्यक्षत्वापत्तिर्दुारा । इन्द्रियसनिकर्षस्य वह्नौ सत्त्वेन प्रोक्तप्रकारेण अवच्छिन्नचैतन्यद्वयस्याभेदात् इति चेन्न, इष्टापत्तः। तदंशे परोक्षज्ञानं प्रति तदंशे अपरोक्षज्ञानसामग्र्या प्रतिबन्धकत्वाभ्युपगमात् । न खलु वयमक्षचरणपक्ष- रक्षिण इव पर्वतो वह्निमान् इति ज्ञानस्य पर्वताशेऽपि अनुमितित्वमभ्युपगच्छामः येनानुमित्सामुत्तेजकीकृत्य तद्विरहवैशिष्टयेनावश्य विशेपणीया स्यात् प्रतिबन्धक- त्वेनाभिप्रेता अपरोक्षसामग्री।
वेदान्तपरिभाषा । ४६ परम्पर भेद इत्यत्र भेदस्य मप्रतियोगिकत्वरव्यापनाय परस्परग्रहणम् । अन्यथा भेदशब्दम्य प्रकारवाचित्वान् स्यात्कस्यचन भ्रान्तिः । इति । परोक्षत्वापरोक्षत्वे न विरुद्ध इत्यत्र अनुभव एकस्या वृत्ती अशभेदेन प्रमाणयति- तथा चानुभवः, पर्वतं पश्यामि वह्निमनुमिनोमीति । अंशभेदेनापि परोक्षत्वापरोक्षत्वयोः विरोधाभ्युपगमे, नायमनुभव: सर्वजन- माक्षिक: सम्पत्तिमहतीति भावः । ननु न्यायमतेऽपि दोपाभाव इत्याशङ्कयाह- न्यायमतेऽत्र पर्वतमनुमिनोमीत्यनुव्यवसायापत्तिः । - . चस्त्वर्थे, आपत्ति. प्रसङ्गः । यद्यपि "वह्निमत्तया पर्वतमनुमिनोमि' इत्य नुव्यवसाय स्वीकुर्वन्त्येव तार्किकाः । तथापि "पर्वतमनुमिनोमि'' इति न स्वीक- नमर्हन्ति । अयं भाव:- व्यवसायीयविषयतायाः व्याप्यत्वं अनुव्यवसायीय- विषयतायाः व्यापकत्वम् । सति चैवं "वह्निमनुमिनोमि" इतीव "पर्वतमनु- मिनोमि" इत्यनुव्यवसायः कथं न स्यात् ? न चोद्देश्यताख्य-विषयताभिन्नाया एव व्यवसायीयविषयतायाः तथाविधानुव्यवसायीय विषयताव्याप्यत्वम्, सामान्य- रूपेण व्याप्यव्यापकभावसम्भावनाया विशेषरूपेण तदनभ्युपगमात् । एवमपि च "संयोगमनुमिनोमि" इत्यनुव्यवसायापत्त': दुर्वारत्वात् । ननु तर्हि वेदान्तमते किं सकलानुमितिस्थले पक्षाचे अपरोक्षत्वं विधेयांशमात्रे अनुमितित्वमभिमतम् ? तथा सति, "पिशाच: स्तम्भभिन्नः, मृदनुपादानत्वात्" इत्यत्र पिशाचांशे अपि प्रत्यक्षत्वापतिः । एवं "वह्निः एतत्पर्वतनिष्ठः जनकता- सम्बन्धेन एतद्भूमविशिष्टत्वात्" इत्यत्र असनिकृष्टवह्न यंशेऽपि प्रत्यक्षत्वापत्तिः, . अत आह- असन्निकृष्टपक्षकानुमितौ सर्वाशेऽपि ज्ञानं परोक्षम् । न सनिकृष्ट: असनिकृष्टः, तादृशः पक्षो यत्र, तादृशी अनुमिति:, असनिकृष्ट- पक्षकानुमितिः, तस्याम् । अपिः एवार्थकः । तथा च सर्वाचपि इत्यस्य सर्वाशे एव, प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ४७ इत्यर्थः । अयमाशयः- क एवमाह यत् सर्वत्रानुमिते पक्षांशे प्रत्यक्षत्वमिति ? अतः अनुवतोपालम्भनमेतत् यत् पिशाचस्य व्यवहितस्य वा पक्षस्य प्रत्यक्षत्वा- पत्तिरिति । यत्र प्रत्यक्षत्वे प्रयोजकसम्भवः तत्र प्रत्यक्षत्वमेव, नानुमितित्वमित्ये- वास्माकं वक्तव्यम् इति । नन्वेवं सति "सुरभि चन्दनम्" इति ज्ञानस्य सौरभाशे प्रत्यक्षत्वं न स्यात्, धर्माधर्मयोः प्रत्यक्षत्ववारणाय प्रमाणचैतन्यस्य विषयचैतन्याभेदात्मके प्रत्यक्षत्व- प्रयोजकशरीरे विषये योग्यत्वविशेषणस्य प्रोक्तत्वात् इत्याशङ्का इप्टापत्त्या परिहरति- सुरभि चन्दनमित्यादिज्ञानमपि चन्दनखण्डांशेऽपरोक्षम्, सौर- भांसे तु परोक्षम् । सौरभस्य चक्षुरिन्द्रियायोग्यतया योग्यत्वघटितस्य निरुक्तलक्षणस्याभावात् । आदिपदेन "घटो वायुमान्" "घटो गुरुः" इत्यादिज्ञानपरिग्रह. । घटितत्वं योग्यत्वप्रत्ययव्यतिरेक-प्रतियोगिप्रत्ययकत्वरूपमवज्ञेयम् । ननु सौरभांश परोक्षमित्यस्य कोऽर्थः ? न तावदनुमितिरूपमिति । सौरभव्याप्तहेत्वज्ञानात् । न च चन्दनत्वमेव हेतुः, सुरभि चन्दनमितिज्ञानस्यैकतया, तत्पूर्व चन्दनत्वानुपस्थिते: हेत्वज्ञानात् तावताप्यनुपपादनात् । एतेन अर्थापत्तिरूप तत् इत्यपि निरस्तम्, उपपाद्यान्यथानुपपत्त्या तदुपपादककल्पनस्यैवार्थापत्तिप्रमाणतया, प्रकृते सौरभोप- पाद्यस्य कस्यचित् ज्ञानाभावेन तदन्यथानुपपत्त्या सौरभकल्पनायाः असम्भवात् । न च चन्दनत्वमेवोपपाद्यम्, सुरभि चन्दनमितिज्ञानस्यैकतया चन्दनत्वरूपस्योप- पाद्यस्यापि पूर्वमज्ञातत्वात् । न चाज्ञातेनोपपाद्य नोपपादककल्पनम्, अतिप्रसङ्गात् । चन्दनत्वस्य वालचन्दनपादपेऽपि सत्त्वात् तत्र सौरभाभावेन उपपाद्योपपादकभावस्या- प्यभावात्, इति चेत् मैवम्, सौरभांशे स्मृतिरूपताभ्युपगमात् । यद्यपि संस्कारो- द्वोधकाभावात् तथाभ्युपगमस्यापि दुष्करतव, तथापि स्मारकादृष्टस्योद्बोधकताम- भ्युपेत्य तस्य सुवचत्वात् । त्वत्र परोक्षत्वापरोक्षत्वयोः एकज्ञाननिष्ठत्वाभ्युपगमे तयोः साङ्कर्यरूपात वाधकात् जातित्वाभावापत्तिः, इत्याशङ्का इष्टापत्त्या परिहरति- न चैवमेकत्र ज्ञाने परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरभ्युपगमे तयोर्जातित्वं न स्यादिति वाच्यम्, इष्टत्वात् ।
४८ वेदान्तपरिभाषा । न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । एकत्रेति ज्ञानविशेषणम् । तथा च एकस्मिन् जाने, इत्यर्थः । नयोः = परोक्षत्वापरोसत्वयोः । साङ्कर्यादिति शेप. अयं तावदत्राशयः पूर्वपक्षिणः, यत्. व्यक्तरेभेद: तुल्यत्वं, सङ्करोऽथानवस्थितिः । रूपहानिरसम्बन्धो जाति-बाधक-संग्रह इत्यत्र साङ्कर्यस्यापि जातिबाधकत्वाङ्गीकारात्, परोक्षत्वापरोक्षत्वयोः प्राप्तसाङ्कर्ययोः न जातित्व शक्यं म्यादम्युपगन्तु भूतत्व-मूर्तत्वयोरिव । एकत्र ज्ञाने परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरङ्गीकारे भवति तयोः साङ्कर्यमिति वेदान्तसिद्धान्ते तयोः जातित्वं न स्यात् । तथाहि-परस्परात्यन्ताभावसमानाधिकरणयोरेकत्र समावेशः साङ्कर्यमिति नल्लक्षणम् । अय घट: इति केवलापरोक्षज्ञाने परोक्षत्वं विहाय अपरोक्षत्वमस्ति, अप्रत्यक्षपक्षसाध्यके सर्वाशानुमितौ अपरोक्षत्वं विहाय परोक्षत्वमस्तीति तयोः परस्परात्यन्ताभावसामानाधिकरण्यम् । इदानीं पर्वतो वह्निमान् इति प्रत्यक्षपक्षके ज्ञाने परोक्षत्वमपरोक्षत्वञ्चाङ्गीक्रियते, इति एकत्र समावेशः । एव च सार्यलक्षणसद्भावात् साङ्कपित्त्या परोक्षत्वापरोक्षत्वयोः जातित्व न स्यात् इति । इष्टत्वे हेतुमाह- जातित्वोपाधित्वपरिभाषायाः सकलप्रमाणागोचरतया अप्रामाणिकत्वात् । नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वं जातित्वम्, जातिभिन्नानुगतधर्मत्वं उपाधित्वम्, इति या नैयायिकसङ्के तरूपा परिभाषा, तस्याः। सकलप्रमाणागोचरतया इत्यस्य तत्तत्प्रमाणगोचरत्वाभावकूटवत्तया इत्यर्थः । तेन न हेत्वर्थकतृतीयाया असङ्गतिः । सकलप्रमाणागोचरत्वस्यवाप्रामाणिकत्वपदार्थतया ज्ञाप्यज्ञापकभावो- त यसङ्गत्यापत्तेः। अप्राणिकत्वं प्रमाणगोचरत्वसामान्याभावः । विशेषाभावकूटस्य सामान्याभावहेतुता प्रसिद्ध व । वस्तुतस्तु साङ्कर्यस्य जातिबाधकन्वमेव नास्ति । नव्यवैशेषिकरपि तथोक्तः। तथा च नापत्तिगन्धोऽपि । अन्यथा प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ४९ ननु जाती प्रत्यक्षप्रमाणगोचरत्वसत्त्वात् कथं उक्तविशेषाभावकटसिद्धि : ? - अत आह- घटोयमित्यादि प्रत्यक्षं हि घटत्वादिसद्भावे मानम्, न तु तस्य जातित्वेऽपि । आदिपदेन पटोऽयम्, मठोऽयम् इत्यादिप्रत्यक्षपरिग्रहः । घटत्वादीत्यादिपदेन पटत्वादिपरिग्रहः । सद्भावे = अस्तित्वे । मानं. = प्रमाणम् । अयमाशयः- धर्मिप्रत्यक्षं न धर्ममविषयोकृत्य भवितुमर्हतोति, घटोऽयमिति प्रत्यक्षं न घटत्वम- विषयीकृत्य भवितुमर्हति । तथा च प्रत्यक्षमेव घटत्वजाती प्रमाणमिति यत् पूर्वपक्षिणाममिप्रेतं तन्न युक्तम् । यतः धर्मिप्रत्यक्षे धर्मस्य विषयत्वेऽपि घटत्व जातिरिति न सिद्धिमहति, घटत्वस्य उपाधित्वेऽपि विषयत्वाक्षतेः । ननु तथापि न तत्प्रमाणगोचरत्वाभावकूटात्मक-सकलप्रमाणागोचरत्वहेतोः सिद्धिः, घटत्वादौ जातित्वस्यानुमानप्रमाणगम्यत्वात् । किमाकारकमनुमानमिति चेत् "घटत्वं जाति: घटत्वत्वात् इति ज्ञायताम् अत आह- जातित्वरूपसाध्याप्रसिद्धौ तत्साध्यकानुमानस्याप्यनवकाशात् । जातित्वरूपं यत्साध्यं, तस्याप्रसिद्धौ । अपिना अर्थापत्त: परिग्रहः । अवकाशः 3 सम्भवः । अनवकाशः = असम्भवः, तस्मात् । प्रसिद्धस्यैव साध्यस्य प्रसिद्ध पक्षे अनुमितिर्भवति, नाप्रसिद्धस्य । पटत्वादावपि सर्वत्र जातित्वप्रसिद्धमेवेति कथं घटत्वे जातित्वस्य साधनं सुशक्यं कर्तुमिति । इदमत्रानुसन्धेयम्- "घटत्वं जाति: घटत्वत्वात्" इत्यस्य नानुमानत्वम्, अन्वयदृष्टान्ताभावेन अन्वयित्वाभावात् केवलव्यतिरेक्यनुमानस्य वेदान्तिभिरनभ्युपगमात् । न चेदमपि वक्तव्य यत् अर्थापत्यवास्तु घटत्वस्य जातित्वसिद्धिरिति, घटत्वत्वजातित्वयोः उपपाद्योपपादक- भावाभावात् । उपपाद्यज्ञानेन उपपादककल्पनमेवार्थापत्तिः । न च तस्याः सम्भवः प्रकृते । ननु नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वं जातित्वम्, तादृशस्य जातित्वस्यास्ति घटत्वे सिद्धिसम्भवः । अनुमानाकारस्तु घटत्वं नित्यं सदनेकसमवेतम्, अनुवृत्त- प्रत्ययहेतुत्वात् पटत्ववदिति । दृष्टान्तेऽपि च दृष्टान्तान्तरेण साध्यसिद्धिः, अत आह- समवायासिया ब्रह्मभिन्ननिखिलप्रपञ्चसानत्यतया नित्यत्वसमवेतत्वघटितजातित्वस्य घटत्वादावसिद्धेश्च ।
वेदान्तपरिभाषा। समवायः अयुतसिद्धप्रतियोग्यनुयोगिक: सम्बन्धः, तस्याः सिद्धिः, तया । निखिल: प्रपञ्चो निखिलप्रपञ्चः, ब्रह्मभिन्नश्चासौ निखिलप्रपञ्च: ब्रह्मभिन्ननि- खिलप्रपञ्चः तस्य अनित्यता, तया । प्रपञ्चो विस्तार: मायापरिणामः, तस्य ब्रह्मभिन्नत्वेनासिद्धावपि परिणामिन्याः मायाया: ब्रह्मभिन्नत्वं न निराकृतं भवतीति निखिलपदग्रहणम् । परिणामिनः परिणामानुस्यूतेः तस्य निखिलत्वमिति बोध्यम् । अन्यथा निखिलपदोपादानानर्थक्यापत्तः । अनित्यत्वं ध्वंसप्रति- योगित्वम् । नित्यत्वं च समवेतत्वं च निन्यत्वसमवेतत्वे, ताभ्यां घटितं यत् जातित्व तस्य । नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वरूपस्य जातित्वस्येत्यर्थः । घटत्वादावसिद्धेः घटत्वादावभावात् । अयमाशयः-घटः गुणवान्, घटः क्रियावान् इत्यादि- विशिष्टबुद्धिः विशेषण-विशेष्य-सम्बन्धविषया, विशिष्टबुद्धित्वात् दण्डी पुरुष इति विशिष्टबुद्धिवत् इत्यनुमानेन यत् समवायसिद्धिमुद्घोषयन्ति ताकिक- वैशेषिकाः तन्न मनोरमम् । ततः सम्बन्धमात्रसिद्धः । स्वरूपस्यापि तावृश- सम्बन्धत्वसम्भवात् न ततः समवायसिद्धिः । ततः समवायसिद्धिः । यच्च लाधवज्ञानसहकृतेनोक्ता- नुमानेन समवायसिद्धिरिति कथनं तदपि न शोभनम्, समवायस्यकत्वाम्युपगमेनव लाघवज्ञानसम्भवेन, रूपस्पर्शसमवाययोरमेवात् वायू रूपवानिति प्रतीत्यापत्तेः । समवायस्य एकत्वेऽपि प्रतियोग्यनुयोगिभेदात् औपाधिकं तद्भदं प्रकल्प्य, कल्पितस्यैव च तादृशसमवायस्य विशिष्टप्रतीतिनियामकत्वमिति चाभ्युपेत्य प्रोक्तापत्तिवारणमपि न मनोरमम्, अस्मन्मते ब्रह्मभिन्नस्य सर्वस्यैव कल्पितत्वेन स्वरूपस्यापि कल्पितत्वात् भिन्नतया कल्पितेन स्वरूपेण गुणवद्व्यमित्यादिप्रतीति- निर्वाहे यतो न समवायसिद्धिः। सति चैवं समवायसम्बन्धावच्छिन्नाधेयतारूपस्य समवेतत्वस्याप्यभावात् न नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वरूपस्य जातित्वस्य सिद्धि- सम्भावना । प्रलये गोघटादिध्वंसे निष्पद्यमाने गोत्वघटत्वादिध्वंसोप्यनिवार्य एव । न हि तदानीं गोघटाद्यनाश्रित्यापि गोत्वघटत्वादिकं तिष्ठतीति वाच्यम्, अगोरपि गोत्वप्रसङ्गात् । अघटस्यापि च घटत्वप्रसङ्गात् । “यतो वा इमानि भूता- नि जायन्ते" इत्यादि श्रुत्यापि जातेनित्यत्वाभावः स्वीकर्तव्यः । नन्वास्तां जातित्वपरिभाषायाः असिद्धिः, असिद्धिः, उपाधित्वपरिभाषायाः कुतः अप्रामाणिकत्वम् ? अत आह- ग्वमेवोपाधित्वमपि निरसनीयम् । एवकारो भित्रक्रमः । निरसनीयमित्यनन्तरं तस्य योजना । एवमित्यस्य तथा सतीत्यर्थः । अयं भाव.-जातिभिन्नानुगतधर्मत्वमुपाधित्वम् इत्येवोपाधित्व- प्रत्यक्षपरिच्छेदः । परिभाषा कार्या । सा च जातित्वसिद्ध यधीना, अत: जातित्वासिद्धिमुपदर्य नदपि निरसनीयमिति । । ननु तिष्ठतु जात्युपाधिकथा । पर्वतो वह्निमान् इत्यत्र विरुद्धयोः परोक्षत्वा- परोक्षत्वयोः कथमेकत्र सम्भवः ? इत्यत आह- पर्वतो वह्निमान् इत्यादौ च पर्वतांशे वयंशे च वृत्तिभेदाङ्गी- कारेण तत्तद्वृत्त्यवच्छेदकभेदेन परोक्षत्वापरोक्षत्वयोः एकत्र चैतन्ये वृत्तौ न विरोधः। तत्तद्वृत्तिरेवावच्छेदकधर्मः, तस्य भेदेनेत्यर्थः । वृत्तौ = अस्तित्वे । विरोधः - नानुभवविरोधः । अयमभिप्राय:- अन्तःकरणनिर्गमानिर्गमाभ्यां पर्वताकारायाः वह्नयाकारायाश्च वृत्तेः मेवः आवश्यकः, किन्तु तदुमयावच्छिन्नं चैतन्यं एकमेव । तथा च एकस्मिन्नेव वृक्षे यथा शाखावच्छेदेन कपिसंयोगः मूलावच्छेदेन तु कपिसंयोगाभावः, तथा एकत्र चैतन्ये वृत्यात्मकावच्छेदकमेवेन परोक्षत्वापरोक्षत्वयोः अव्याप्यवृत्तितया सत्त्वे न कापि बाधेति । “अत एव पर्वतो वह्निमानिति जानमपी" त्यादि स्थले ज्ञानपदेन वृत्तिद्वयावक्छिन्नं एक चैतन्यं प्राहाम्, ततो नासङ्गतिः। ज्ञप्तिगतप्रत्यक्षलक्षणमुपसंहरति - तथा च रत्तानेन्द्रिययोग्य-वर्तमान-विषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वं तत्तदृत्त्यवच्छिन्नज्ञानस्य तत्तदंशे प्रत्यक्षत्वम् । तथा च = योग्यत्व-वर्तमानत्वादीनां निवेशे पक्षत्वापरोक्षत्वयोरवच्छेदक- भेदादेव एकज्ञानवृत्तित्वस्वीकारे । तत्तत् इन्द्रियं, तत्तदिन्द्रियं, तस्य योग्यः, तत्तदिन्द्रिययोग्यः, तथाविधो यो वर्तमानो विषयः, तदवच्छिन्नं यच्चतन्यं तस्मादभिन्नत्वम् । सा सा वृत्तिः, तत्तवृत्तिः, तया अवच्छिन्न यत् ज्ञानं, अर्थात् चैतन्यं तस्य । इमत्रावधातव्यम् ज्ञप्तिगतप्रत्यक्षत्वमित्यत्र शप्तिपदेन चैतन्यस्य प्रहणे स्वावल्कवृत्तिावषयावकितन्यामिन्नत्वं प्रत्यक्षत्वमिति लक्षणं बोध्यम् । तथा हि-अयं घट इनि प्रत्यक्षस्थले स्वं = अयं घट इति वृत्यात्मकशानावच्छिन्नं चैतन्यं तदवच्छेविका वृत्तिः अयं घट इति वृत्तिः, - वेदान्तपरिभाषा । तद्विषयो घटः, तादृशघटावच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वं अयं घट इति वृत्त्यवच्छिन्न- चतन्यात्मकज्ञप्तः, इति लक्षणसमन्वयः। कुतः चैतन्ययोः तयोः अभिन्नत्त्वमिति प्रश्नोत्थिती, अवच्छेदकयो योरेकदेशस्थत्वं चैतन्यद्वयाभेदप्रयोजकमित्यादि- पूर्ववृत्तस्मरण विधेयम् । निरुक्तज्ञप्तिपदेन वृत्तेविवक्षणे तु स्वविषय-निष्टावच्छेदकता- निरूपितावच्छेद्यतावच्चैतन्याभिन्नचैतन्यनिष्ठावच्छेद्यतानिरूपितावच्छेदकत्वं प्रत्यक्षत्व- मितिलक्षण वेदितव्यम् । तथा हि - अयं घट इतिवृत्त: प्रत्यक्षत्वे । विवक्षिते स्वं तादृशी वृत्तिः, स्वविषयो घट:, तनिष्ठावच्छेदकतानिरूपितावच्छेद्यतावत्, चैतन्यं, तदभिन्नं चैतन्यं “अय घट" इतिवृत्त्यवच्छिन्नं चैतन्यं, तनिष्ठावच्छेद्यता निरूपितावच्छेदकता "अय घट" इति वृत्ती, इति लक्षणसमन्वयः । किं ज्ञानगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं पृच्छसि कि वा विषयगतस्य ? इत्येवं विकल्पितस्य विषयगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकमाह- घटादेविषयस्य प्रत्यक्षत्वं तु प्रमातृचैतन्याभिन्नत्वम् । घटादेरित्यत्र विशेषणविभक्त यर्थः अभेदः । तथा च घटाद्यभिन्नविषयस्येत्यर्थः । विशेषणविभक्तः सर्वत्र साधुत्वमात्रार्थकत्वे अभेदस्य संसर्गतया भानं बोध्यम् । विषयस्येत्यत्र षष्ठ्यर्थो निष्ठत्वम् । विशेष्यसंगतस्य तुकारस्य अन्ययोगव्य- वच्छेदोऽर्थः । तेन पूर्वोक्तज्ञप्तिगतप्रत्यक्षत्वनिरास: । प्रभातृचैतन्यं अन्तःकरणा- वच्छिन्नं चैतन्यम्, तस्मादभिन्नत्वम् । तथा चान्तःकरणावच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वं घटादिविषयनिष्ठं प्रत्यक्षत्वमित्यर्थः । ननु ग्रन्थकृदुक्तिरियं “आम्रान् पृष्ट: कोविदारानाचष्टे" इति लोकोक्तिविषयतामेव भजते । न खलु प्रयोजकप्रश्ने प्रयोज्यचर्चात्मकमुत्तरं युक्तम्, इति चेत्, सत्यम् । प्रत्यक्षत्वमित्यस्य प्रत्यक्षत्व प्रयोजकमित्यर्थकत्वात् असङ्गत्यभावः । यद्वा “प्रत्यक्षत्वं तु" इत्यत्र तुकारेण न शप्तिगतप्रत्यक्षत्वस्य व्यवच्छेदोऽभिप्रेतः, अपि तु इन्द्रियजन्यज्ञानविषयत्वस्य । तथा च “घटो मे प्रत्यक्षः" इत्यनुभवसिद्ध घटगतप्रत्यक्षत्वं किमिति प्रश्ने, "इन्द्रियजन्यज्ञानविषयत्व" तदिति वदन्ति स्म नैयायिकाः, तश्विरासायैव प्रति- पादयन्त्यध्वरीन्द्राः घटादेविषयस्येत्यादि । तथा चायं भाव:-विषयगतप्रत्यक्षत्वं नेन्द्रियजन्यज्ञानविषयत्वम् । तथा सति पर्वतांचे प्रत्यक्षरूपता इन्द्रियाजन्यज्ञान- पदेन "पर्वतो वह्निमान्" इत्यनुमितिज्ञानमादाय तद्विषयत्वस्य वह्नावपि सत्त्वात् वह्वरपि प्रत्यक्षत्वापत्तः । अपि तु प्रमातृचैतन्याभिन्नत्वं तथा च न वह्वावतिव्याप्तिरिति । १ प्रत्यक्षपरिच्छेदः। ५३ ३ ननु कथं घटादे: जडस्य घटादेः एव प्रकाशात् चैतन्यात् कथमभेद: ? इत्याशङ्कते- अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्याभेद: ? अहमिम जानामीति भेदानुभवविरोधात् । अन्त:करणेन अवच्छिन्न चैतन्यम्, अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यं, तस्मादभेदः, तादृशचैतन्याभेदः । भेदस्यानुभवो भेदानुभव: तेन विरोधः, बाधः। तथा च भेदानुभवबाधात् इत्यर्थः । अयमाशयः-अहमिमं जानामोत्यत्र अस्मदथतदर्थयोः भेदः अवश्यं वक्तव्यः । तथा च भेदानुभवेनानेन बाधितं घटादेः जडस्य स्वप्रकाशात् चैतन्यादभिन्नत्वम्, इति कथं प्रन्यकृदुक्तियुक्ता । यद्यपि 'अयमहमायातः" इत्यादिवाक्यप्रयोगस्थले दृश्यत एवैकार्थबोधकत्वमस्मदिदमोः, तथापि असमान-विभक्ति-प्रकृतिभूतयोस्तयोः नैकार्थबोधकत्वम् । यदि च "अहमिममात्मानं जानामि" इत्यादिप्रतीतिरनुभवसिद्धा, तदा निरुक्तस्थले अस्मत्पदस्य स्वप्रकाशार्थकत्वम्, इदमश्च जडार्थकत्वमभ्युपेत्य ग्रन्थः सङ्गमनीयः, जडाजडयोरभेदासम्भवात् । उत्तरयति- प्रमात्रभेदो नाम न तावदेक्यम् किन्तु प्रमातृसत्तातिरिक्त- सत्ताकत्वाभावः । सत्ता चात्र न प्रमात्रा अभेदः प्रमात्रभेदः । ऐक्य तादात्म्यम्, अभिन्नत्वमित्यर्थः । प्रमातुः सत्ता प्रमातृसत्ता, ततोऽतिरिक्ता, अर्थात् तद्भिन्ना या सत्ता, सा प्रमातृसत्तातिरिक्त- सत्ता, तत्कत्वं तदात्मकत्वम्, तदभावः, प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावः, स एव प्रमात्रभेदपदार्थः । न्यायवैशेषिकसमयसिद्धा जातिः, न वा बौद्धबुद्ध युगारूढा अर्थक्रियाकारिता, अपि तु वस्तुत्वम् । तथा च अन्त:करणा- वच्छिन्नचैतन्यगतवस्तुत्वाश्रयत्व घटपटादेविषयस्य प्रमात्रभिन्नत्वमित्यर्थः। सिद्धान्ते चैतन्यस्यैवैकस्याकल्पितस्य वस्तुत्वेन घटादिविषयेषु अधिष्ठानभूत- चैतन्यगतमेव वस्तुत्वं कथञ्चिदवभासते, न तेषा स्वातन्त्र्येण वस्तुत्वम् इत्यभ्यु- पगमात् । घटपटादिविषयावच्छिन्न अन्त:करणावच्छिन्नं च चैतन्यमेकमेवेति स्वावच्छिन्नचैतन्याध्यस्तमपि घटपटादिक फलतः अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्य एवाध्यस्तमिति स्वीकारात् अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यात्मकवस्तुगतमेव वस्तुत्वं ५४ वेदान्तपरिभाषा घटादौ विद्यमाने, न तदतिरिक' वस्तुत्वमिति अन्त:करणावच्छिन्नचैतन्यगत- वस्तुत्वातिरिक्तवस्तुत्वानाश्रयत्वस्वरूपः प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभाव: सुसम्पन्नो घटादिप्विति । - अत्रेदं चिन्तनीयम् यद्यपि अतिरिक्तसत्तायाः कुत्राप्यभ्युपगमे तत्रैव प्रत्यक्षत्व-प्रयोजकामावापातः, अनवगमे तत्कत्वाभावज्ञानाभावापातः, प्रतियोगिबुद्धिमवधूय अमावज्ञानाभावात्, न च गुरुत्वाद्यतीन्द्रियपदार्थगता सत्ता अतिरिक्तसत्तापदेन धर्तुं शक्या, तत्र तत्कत्वाभावाभावेऽपि क्षत्यमावात् तेषामप्रत्यक्षत्वादिति वाच्यम्, द्वैतापत्तिभिया गुरुत्वादावप्यतिरिक्तसत्ताभ्यु- पगमासम्भवात नथापि प्रमातृगतसत्ताप्रकारकारोपविशेष्यतैवात्र ग्रन्थकृद- मिप्रेता, अतो नासङ्गतिः। . प्रकृतमुपपादयति- तथा हि घटादे: स्वावच्छिन्नचैतन्येऽध्यस्ततया विषयचैतन्यसत्तैव घटादिसत्ता। आदिना पटादीनां ग्रहणम् । स्वावच्छिन्नचैतन्ये घटाद्यवच्छिन्नचैतन्ये । अयमर्थः-वेदान्त-सिद्धान्ते चैतन्यातिरिक्तत्वेनाभिमताना समस्तवस्तूनां चैतन्ये अध्यस्तता । अतः न तेषु पारमार्थिकी सत्ता । सति चैव घटादौ चैतन्यसत्तातिरिक्त- मत्ताकत्वाभाव: सुसम्पन्नः । ननु कथं तर्हि "सन् घटः" इत्यादि प्रतीतिः ? अतः घटादिगतसत्ताप्यङ्गीकार्यव । इत्यतो हेतुमाह- अधिष्टानसत्तातिरिक्तायाः आरोपितसत्तायाः अनङ्गीकारात् । अधिष्ठान चैतन्यं तनिष्ठा सत्ता, तदतिरिक्तायाः । आरोपिते सत्ता आरोपितसत्ता, तस्याः । न अङ्गीकारः अनङ्गीकारः अस्वीकारः, तम्मात् । अयं भावः-घटादिसत्तापदेन किमभिमतं परेषाम् ? सत्ता जातिश्चेत् न साभ्युपगता अस्माभिः । अर्थक्रियाकारित्वं चेत् ब्रह्मभिन्नवस्तुना मिथ्यात्ववादिनां वेदान्तिनां पस्तुतीक्रियाधमान न तदपि क्षममभ्युपगन्तुम् । वस्तुत्वं चेत्, तत्त चैतन्यरूपतया चैतन्यगतमेव भवितुमर्हति न घटादिगतम् । अतः चैतन्यारोपितेषु घटादिषु न काचन सत्ता स्वातन्त्र्येण स्वीकतं व्या। अधिष्ठानभूतचैतन्यगतैव प्रत्यक्षपरिच्छेदः। आरोपिता सत्ता चैतन्याध्यस्तघटादौ भजते इति । "सन् घटः" इत्यादिप्रत्ययविषयतां ननु सत्यप्येवं घटादेः स्वावच्छिन्नचैतन्याध्यस्ततया तत्सत्तातिरिक्तसत्ता- कत्वाभावस्य घटादिविषये, अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यात्मकप्रमातृसत्तातिरिक्त- सत्ताकत्वाभाव: तावतापि घटादेरसिद्ध एव, इत्यत आह- विषयचैतन्यं च पूर्वोक्तप्रकारेण प्रमातृचैतन्यमेवेति प्रमातृ- चैतन्यस्यैव घटायधिष्ठानतया प्रमातृसत्तैव घटादिसत्ता, नान्येति सिद्धं घटादेरपरोक्षत्वम् । विषयचैतन्यं घटादिविषयावच्छिन्नचैतन्यम् । पूर्वोक्तप्रकार एकदेशस्थयो- विभाजकयोरप्युपधेयाभेदप्रयोजकत्वाभ्युपगमः । प्रमातृचैतन्यं अन्तःकरणवृत्त्य- वच्छिन्नचैतन्यम् । तथा च अयंभावः-सत्यं घटादेविषयस्य स्वावच्छिन्न एव चैतन्ये अध्यासः, किन्तु चक्षुारा अन्तःकरणवृत्तः बहिः घटदेशगमनानन्तरं वृत्तः, तद्वारा अन्तःकरणस्य, घटस्य च एकदेशस्थत्वेन उपधेयभूतचैतन्यामेव- प्रयोजकतया, घटावच्छिन्नचैतन्यं वृन्यन्यनदैतन्यम्, अन्त: करणावच्छिन्नचैतन्य- कमेव सम्पद्यते । सति चैवं घटादेविषयस्य स्वावचिनचेतना फलतः प्रमातभूतान्तःकरणावच्छिन्नचैतन्य एवाध्यासः । तथा च अधिष्ठान- सवाव्यस्तसत्ता इति स्वीकारे प्रमातसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावस्य प्रत्यक्षत्व- प्रयोजकस्य घटादौ साधुतया सम्पन्नत्वेन न तेषां अपरोक्षत्वव्याघातशङ्कापोति । ननु चैतन्यमात्रस्यैकत्वेन अनुमेयवह्न यवच्छिन्नचैतन्यस्यापि अन्त:करणावच्छिन्न- चैतन्यात्मकप्रमातृचैतन्याभेद: अङ्गीकर्तव्य एवेति वह्न यादेरपि फलतः प्रमातृ- चैतन्याध्यस्ततया प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावस्य वह्नयादावपि सत्त्वेन पर्वतो वह्विमान् इत्यादौ कुतो न वह्वरपरोक्षत्वप्रयुक्तानुमेयत्वव्याधातः ? इत्यत आह- अनुमित्यादिस्थले तु अन्तःकणरस्य वह्नि यादिदेशे निर्गम- नाभावेन वह्नयपान्छनैतन्यस्य प्रमातृचैतन्यानात्मकतया वह्यादि- सत्ता प्रमातृसत्तातो भिन्नैवेति नातिव्याप्तिः ।
५६ वेदान्तपरिभाषा । । %3D आदिपदेन शाब्दानुपलब्धिकादीनामुपग्रहः । निर्गमनस्य अभाव: निर्गमनाभाव:, तेन प्रमातृचैतन्यानात्मकतया अन्त:करणावच्छिन्नचैतन्यभिन्नतया । अयमाशयः-न चैतन्यगत स्वाभाविकमेकत्व चैतन्योपाधिभूत-विषयगतापरोक्षत्व- व्यवहारनियामकमङ्गोक्रियते, अपि तु उध्योरेशस्थत्वप्रयुक्तमोपाधिकमेक- त्वम् । तथा च परोक्षस्थले विषयेन्द्रियसनिकर्षाभावात् इन्द्रियद्वारा अन्तःकरणस्यो. पाधिमूतविषयदेशगमनामावेन वह्नयन्तःकरणयोरुपाध्योनकदेशस्थता, इति न तत्प्रयुक्त उपधेययोः चैतन्ययोरेकत्वमिति न वह्नःप्रत्यक्षत्वापत्तिः । वाह्यपदार्थस्यानुमेयतास्थले अन्तःकरणस्य वहिनिर्गमाभावात् उपाध्योरन्त:- करणविषययोरेकदेशस्थत्वाभावेऽपि आन्तरपदार्थस्यानुमेयतास्थले तयोरेकदेश- मुसम्पाद्यतया अनुमेयस्यान्तरपदार्थस्य विषयापरोक्षत्वापत्तिर्दुर्वारा, इत्यभिप्रायेण शङ्कते- स्थत्वम्य नन्वेवमपि धर्माधर्मादिगोचरानुमितिस्थले धर्माधर्मयोः प्रत्यक्षत्वा- पत्तिः । धर्माद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्याभिन्नतया धर्मादिसत्तायाः प्रमातृसत्तानतिरेकात् । धर्माधर्मादिः गोचरो विषयो यस्याः सा धर्माधर्मादिगोचरा, तादृशी या अनुमिति: । अयमभिप्राय.- धर्माधमौं तादात्म्येन अन्तःकरणे एव विद्यमानौ, अन्त:करणं च स्वस्मिन् तादात्म्येन वर्तत एवेति धर्मात्मकविषयान्तःकरणयो- रुपाध्यो: एकदेशस्थतया, तदुभयावच्छिन्नचैतन्ययोरभेदस्य दुरितया, धर्माधर्मादेः अन्त:करणावच्छिन्नचैतन्य एवाध्यासात् अन्तःकरणावच्छिन्नचंतन्यात्मक- प्रमातृसत्तातिरिक्त-सत्ताकत्वाभावस्य धर्माधर्मयोः सुघटत्वात् कथं नापरोक्षत्वाप- त्तिस्तयोरिति । फलतः अतिव्याप्ति वारयति- - इति चेन्न योग्यत्वस्यापि विषयविशेषणत्वात् । विषयस्य योग्यत्वेन विशेषणीयत्वात् इत्यर्थः । न प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वा- भावः, विषयनिष्ठ: तादृशाभावो वा, प्रत्यक्षत्वस्वरूपभूतः । अपि तु योग्यविषयनिष्ठ- प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावः। तथा च धर्माधर्मयोरयोग्यतया तनिष्ठ- - प्रत्यक्षपरिच्छेदः। प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावस्यापरोक्ष्यरूपस्याभावेन नातिव्याप्तिः । योग्यत्व- ञ्चानतीन्द्रियत्वं अखण्डधर्मविशेषः, तेन नामाश्रयापत्त्यवकाशः । एवमपि अनेकगुणकस्यैकद्रव्यस्य एकगुणविशिष्टतया प्रत्यक्षस्थले प्रत्यक्ष- विषयगुणसमानाधिकरणस्य अपरस्य गुणस्य, तादृशगुणविशिष्टतया द्रव्यस्य वा प्रत्यक्ष दुर्वारमित्याशङ्कते- नन्वेमपि रूपी घट इति प्रत्यक्षस्थले घटगतपरिमाणादेः प्रत्यक्ष- त्वापत्तिः । रूपावच्छिन्नचैतन्यस्य परिमाणावच्छिन्न चैतन्यस्य चैकतया रूपावच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्याभेदे, परिमाणावाचनतन्यस्यापि प्रमात्रभिन्नतया परिमाणसत्तायाः प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावात् । एवमपीत्यस्य योग्यत्वस्य विषयविशेषणत्वेऽपीत्यर्थः । रूपमस्यास्तीति रुपी, स चासो घटश्चति रूपी घटः । इति प्रत्यक्षस्थले = इत्याकारकप्रत्यक्षकाले । घटगतपरिमाणादेः = तद्घटनिष्ठपरिमाणादेः। आदिपदेन संख्यादीनां ग्रहणं वेदितव्यम् । रूपावच्छिन्नचैतन्यस्येत्यादिना प्रत्यक्षत्वापत्ती हेतूपादानं बोध्यम् अयमभिसन्धिः-एकदेशस्थयोरवच्छेदकयोः अवच्या योजत्वमिति बहुशः प्रतिपादितमेव । एवञ्च प्रकृतेऽपि रुपपरिमाणयोः घटात्मकैकदेशस्थयोः स्वावच्छेद्यतन्यामेवप्रयोजकत्वमाष्णम्, इति रूपावच्छिन्नचंतन्यं परिमाणा- वच्छिन्नं च चैतन्यं एकमेव । स्वावच्छिन्नतन्ये अध्यस्तोऽपि विषयः फलतः अन्तःकरणावच्छिन्नचतन्ये एव अध्यस्तः । अधिष्ठानसत्ताभिन्ना च नाध्यस्त- सत्ता वेदान्तसिद्धान्तसिद्धा, इत्याविपद्धतिः पूर्वप्रसिद्धव । तथा च रूपे यदि अन्तःकरणावच्छिन्नचंतन्यात्मक-प्रमातृसत्तातिरिक्त-सत्ताकात्वामावो विद्यते, तहि परिमाणेऽपि ताशरूपसमानाधिकरणे सा विद्यत एवेति "रूपी घटः" इति प्रत्यक्षे. कुतो न परिमाणावभास:? इति । उत्तरयति- इति चेन्न,तत्तदाकारवृत्त्युपाहतत्वस्पर प्रमातृविशेषणत्वात् । विभिन्नविषयाकारा, या वृत्तिः तया उपहितत्वम्, तस्य । अपिकारेण विषयगतयोग्यत्वादेरुपग्रहः । प्रमाविशेषणकाल प्रमातृ- तत्तदाकार- वेदान्तपरिभाषा। सत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावघटक-प्रमातृविशेषणत्वात् । तथा च तत्तदाकार- वृत्त्युपहितप्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावो विषयस्य प्रत्यक्षत्वप्रयोजकः, इति पर्यवसितार्थः। प्रमातरि प्रोक्तोपहितत्वविशेषणदाने कथमतिव्याप्तिवारणमिति विशदयति- -- रूपाकारवृत्तिदशायां परिमाणाकारवृत्त्यभावेन परिमाणाकार- वृत्त्युपहितप्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्वाभावेनातिव्याप्त्यभावात् । अयमभिप्रायः- भवतु नाम रूपावच्छिन्नपरिमाणावच्छिन्नचैतन्ययोरैक्यम् । अस्तु च प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावः प्रोक्त युक्तया परिमाणेऽपि । किन्तु रूपाकार- परिमाणाकारवृत्त्योभिन्नत्वस्य, युगपन्नानावृत्त्यनुदयस्य च सर्वानुभवसिद्धतया, रूपाकारवृत्तिकाले परिमाणाकारवृत्त्यभावेन रूपी घट इति प्रत्यक्षस्थले परिमाणे रूपाकारवृत्युपहितप्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वस्याभावेऽपि परिमाणाकारवृत्त्युपहित. प्रमातृचैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावस्याभावेन, प्रयोजकाभावात् उक्तातिव्याप्त्या- पादनासम्भव इति । पुन शङ्कते- . नन्वेवं वृत्तावव्याप्तिः अनवस्थाभिया वृत्तिगोचरवृत्त्यनङ्गीकारेण तत्र स्वाकारवृत्त्युपहितत्वघटितलक्षणाभावात् । एवं प्रमातरि स्वाकारवृत्त्युपहितत्वविशेषणदाने । अव्यवस्थितपरम्पराभ्यु- पगमोऽनवस्था, तद्भिया । वृत्तिः गोचरो विषयो यस्याः वृत्त: सा वृत्तिगोचरवृत्तिः, तदनङ्गीकारेण । तत्र - वृत्तौ। स्वाकारवृत्त्युपहितत्वघटितं यत् उक्तं लक्षणं तत्तदाकारवृत्त्युपहितप्रमातृचैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावरूपं तस्य, अभावात् = असत्वात् । अत्र वृत्तित्वं स्वरूपज्ञानभिन्नज्ञानत्वम् । अयं भावः-यथा घटपटादिविषयिणी "अयं घटः" "अयं पट:" इत्याचाकारा अन्तःकरणवृत्तिरुपेयते, न तथा-वृत्तिविषययिणो वृत्तिरुपेतच्या । अन्यथा वृत्तित्वाविशेषात् वृत्तिविषयकवृत्तिवत् वृत्तिविषयकवृत्तिविषयिणी अपि वृत्तिः, पुनस्तद्विषयिणी अपि, पुनस्तद्विषयिष्यपि वृत्तिरन्युपेया स्यादिति दुर्वारा स्यात् वृत्तिविषयवृत्तिमावप्रयुक्ता अनवस्था। सति चैवं वृत्याकारवृत्यप्रसिद्ध्या, वृत्ती वृत्याकारवृत्युपहितप्रमातचैतन्यसत्ताति रिक्तसत्ताकस्वामावस्याप्रसिद्ध्या तब- भावेनाव्याप्तिरिति।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ५९ निराकरोति- इति चेन्न । अनवस्थाभिया वृत्तेर्वृत्त्यन्तराविषयत्वेऽपि स्वविषय- त्वाभ्युपगमेन, स्वविषयवृत्त्युपहितप्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्वस्य तत्रापि भावात् । तत्रापि = वृत्तावपि । भावात् सत्त्वात् । अयमाशयः-अनवस्थाभीस्तु तवृत्तिविषयकतन्निवृत्तिस्वीकारे भवेदिति न सा अस्माभिः स्वीक्रियते, अपि तु तदृतिविषयिणी सैव वृत्तिरिति नानवस्था, न वा मृत्पाकालत्यप्रापया प्रदाशिता अव्याप्तिरिति । न च स्वविषयत्वं स्वस्यासिद्धम्, स्वरूपज्ञानं तत्प्रसिद्धः । "वृत्तिज्ञानं स्वविषयक ज्ञानत्वात् स्वरूपज्ञानवत्" इत्यनुमानप्रमाणस्यापि सद्भावात् । न च "ज्ञान न स्वविषयक वस्तुत्वात् घटवत्" इति सत्प्रतिपक्षापत्तिः । स्वरूपज्ञाने व्यभिचारेण वस्तुत्वहेतोर्दुर्बलत्वात् । समानबलयोर्मल्लयोरिव विरुद्ध- साधकयोर्हेत्वोः समानबलतायामेव सत्प्रतिपक्षप्रसरात् । न च स्वरूपज्ञानस्य स्वविषयत्वाभ्युपगमे अप्रसिद्धान्तापात: । तस्य फलव्याप्यताया एवाभावस्य वेदा- न्तसिद्धान्तसिद्धत्वात् । वृत्तिविषयत्वस्य तत्रापि मान्यतया, वृत्तेश्च स्वावच्छिन्न चैतन्याध्यस्ततया, अध्यस्तस्य चाधिष्ठानातिरिक्तसत्तानभ्युपगमेन वृत्तिविषयत्व- स्यापि फलतः चैतन्यविषयत्वरूपत्वात् । अन्त:करणतद्धर्माणां केवलसाक्षिविषयत्वेन तदाकारवृत्त्यनङ्गीकारेण तत्रतत्रा- व्याप्तिः तथापि दुरुद्धरा, इत्याशङ्कां निराकुरुते- - तत्तदा- एवञ्चान्त:करणतद्धर्मादीनां केवलसाक्षिविषयत्वेऽपि कारवृत्त्युपगमेनोक्तलक्षणस्य तत्रापि सत्त्वान्नाव्याप्तिः । "एवञ्च" इत्यस्य अन्त:करणधर्मविशेषरूपायाः वृत्तेः स्वविषयत्वाभ्युपगमे च इत्यर्थः । अयमभिप्राय:--प्रोक्तयुक्त्या वृत्तेर्वृत्तिविषयत्वसिद्धौ, वृत्तिवृत्तिमतोर- मेदाद् अन्तःकरणस्यापि वृत्तिविषयत्वं दण्डापूपायितम् । एवमन्तःकरणधर्मत्वा- विशेषात वृत्तिवत् सुखदुःखादीनामन्तःकरण धर्मान्तराणामपि तत्त्वं निराबाधम्, इति न तत्तवाकारवृत्तिविगमप्रयुक्ता तत्रतत्राव्याप्तिशति । न च स्वप्रका- शत्वमेवास्तु सुखस्य, अलं वृत्तिविषयत्वाभ्युपगमेन इति वाच्यम् । स्वरूपज्ञानात्मकस्य सुखस्यैवैकस्य तथात्वात् । अन्यथा दुःखादीनामपि तथात्वापातात् ।
वेदान्तपरिभाषा। ६० ननु अन्तःकरणवृत्त्यविषयत्वे सति साक्षिविषयत्वं केवलसाक्षिवेद्यत्वम् । एवञ्चान्तःकरणवृत्तिविषयत्वाभ्युपगमे तेषां केवलसाक्षिवेद्यत्वाभ्युपगमविरोधः इत्याशङ्कां निराकरोति- न चान्तःकरणतद्धर्मादीनां वृत्तिविषयत्वाभ्युपगमे केबलसाक्षि- विषयत्वाभ्युपगमविरोध इति वाच्यम् । आदिपदेन प्रातिभासिकोपग्रहः । वृत्तिः अन्त:करणवृत्तिः, तस्य विषयत्वं वृत्तिविषयत्वम्, तस्य अभ्युपगमः, तस्मिन् सति । अभ्युपगम:=स्वीकारः। अयमाशयः अन्तःकरणतधर्मादिषु यदान्तिभिः केबलसाक्षिवेद्यत्वमभ्युपेयते, तत्र केवलपदेन ध्रुवं अन्तःकरणवृत्त्यविषयत्वमेव विवक्षितं वक्तव्यम्, तच्चेदानी- मसमञ्जसम्, अन्तःकरणधर्माद्याकारवृत्तेः स्वीकारेण तद्विषयत्वस्यय तेषु सत्तया, तदविषयत्वघटितस्य केवलसाक्षिवेद्यत्वस्य तेषु गमनासम्भवात् इति न खलु वक्त- व्यम् इति । हेतुमाह- नहि वृत्ति विना साक्षिविषयत्वं केवलसाक्षिविषयत्वम् । हि-यतः। विना-अद्वारीकृत्य । तथा च वृत्त्यविषयत्वे सति साक्षिविषयत्वं नास्माभिरुच्यते "केबलसाक्षिवेद्यत्वम्" येन तदाकारवृत्तिस्वीकारे अन्त:करण- तद्धर्मादीनां भवेनाम केवलसाक्षिवेद्यत्वाभावः, तादृशवेद्यत्वाभ्युपगमविरोधो वा । केवलसाक्षिवेद्यत्वस्य तथाविधोऽर्थ एव नास्माभिरुच्यते इति भावः। - तर्हि किं नाम निर्वचनं केवलसाक्षिवेद्यत्वस्य ? इत्याकांक्षायामाह- किन्तु इन्द्रियानुमानादिप्रमाणव्यापारमन्तरेण विषयत्वम् । साक्षि- आदिपदेन उपमानागमार्थापत्त्यनुपलब्धीनामुपग्रहः । प्रमाणव्यापारमन्तरेण- तयाविषप्रमाणाधीनवृत्तिविषय विनेत्यर्थः । साक्षी स्वन्त:करणोपहितचैतन्य- रूपः इति स्वयमेव वक्ष्यति । तथा च इन्द्रियानुमानोपमानागमायांपत्यनुपल. धौनान्त:करणकृत्यायः सति सविसरमा केवलसाक्षिवेद्यत्वमित्यर्थः ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । अन्त:करणतद्धर्मादीनां सम्मतिमाह- स्वाकारवृत्तिविषत्वाभ्युपगमे पद्मपादाचार्य- अत एवाहंकारटीकायामाचार्यैरहमाकारान्तःकरणवृत्तिरङ्गीकृता । अत एव अन्त:करणतद्धर्मादीनां स्वाकारवृत्त्यभ्युपगमादेव । अहङ्कारटी- कायाम् =अहंकारपदार्थविवेचनपरपञ्चपादिकाभागे आचार्य: पद्मपादैः । अहमाकारा= "अहम्" इत्याकारा । अङ्गीकृतेत्यनन्तरं “अहंकारवृत्त्यवच्छिन्न- मेवान्तःकरणं चैतन्यस्य विषयभावमापद्यते" इति ग्रन्थेनेति शेषः । अन्येषामपि प्राचीनाना सम्मतिमुपदर्शयति- अत एव च प्रातिभासिकस्थले रजताकाराऽविद्यावृत्तिः साम्प्रदायि- करङ्गीकृता। अत एवेत्यस्यार्थः पूर्ववत् । प्रातिभासिकस्थले इत्यस्य प्रातिभासिकरजतो- त्पादस्थले इत्यर्थः। तेनान्यविधप्रातिभासिकोत्पादस्थले रजताकारवृत्त्यभ्युपगमा- भावेऽपि नासङ्गतिः । सम्प्रदीयते=उपदिश्यते गुरुभि. शिष्येभ्यः इति सम्प्रदायः, परम्परासिद्धः पदार्थः, त जानन्तीति साम्प्रदायिका:-प्राचीनाः तैः । - अव्याप्तिवारणेनोपसंहरति- तथा चान्तःकरणतद्धर्मादिष केवलसाक्षिवेद्येषु वृत्त्युपहितत्वघटित- लक्षणस्य नाव्याप्तिः। तथा च इत्यस्य अन्तःकरणतद्धर्मादिषु तत्तदाकारवृत्तिविषयत्वाभ्युपगमे चेत्यर्थः यदा निरुक्तकेवलसाक्षिवेद्यत्वनिर्वचनाम्युपगमे च इत्यर्थः । वृत्त्युपहितत्वघटित- लक्षणस्य = अनुपदमुच्यमानस्य । घटितत्वं च तदविषयकप्रतीत्यविषयत्वं बोध्यम् । तत्तद्विशेषणप्रक्षेपानन्तरं सम्वृत्तलक्षणाकारप्रदर्शनेच्छया आह- तदयं निर्गलितार्थः-स्वाकारवृत्त्युपहित-प्रमातृचैतन्यसत्तातिरिक्त- तन्यारे सति योग्यत्वं विषयस्य प्रत्यक्षत्वम् ।
६२ वेदान्तपरिभाषा। निर्गलितार्थः=पर्यवसितार्थः । सतिसप्तम्या: वैशिष्ट्यमर्थः । तथा च तादृश- शून्यत्व-विशिष्ट-योग्यत्वं विषयस्य प्रत्यक्षत्वम् इत्यर्थः । वैशिष्ट्यञ्च सामाना- धिकरण्यं तच्च स्वरूपेण तदधिकरणे स्वरूपेण वृत्तित्वरूपमेव वाच्यम् । एवञ्च विनिगमनाविरहेण तदुभयप्रतियोग्यानुयोगिकत्वस्यानिवार्यतया योग्यत्व-विशिष्ट- नादृशशून्यत्वमपि विषयगतप्रत्यक्षलक्षणं भवितुमर्हतीति बोध्यम् । ननु निरुक्तप्रत्यक्षत्वे सन्निकर्षस्य उपयोगोऽस्ति न वा ? नास्ति चेत् इन्द्रिया- सनिकृष्टेऽपि विषये प्रत्यक्षत्वव्यवहारापत्ति: । न च सेष्टा अनुभवविरोधात् । अस्तित्वे च कथम् ? इत्यत आह- सन्निकर्षाणां चैतन्या- तत्र संयोग-संयुक्ततादात्म्यादीनां भिव्यञ्जकवृत्तिजनने विनियोगः । तत्र-विषयेषु। आदिपदेन संयुक्ततदात्मतादात्म्य-तादात्म्य-तदात्मतादा- म्यानामुपग्रहो वेदितव्यः । चैतन्यस्य-विषयाविच्छिन्नचैतन्यस्य अभिव्यञ्जिका या वृत्तिः, तस्याः जनने इत्यर्थः । विनियोगः= उपयोगः । अयमभिप्रायः- विषयैरिन्द्रियसनिकर्ष विना नेन्द्रियप्रणालिकया अन्त:करणस्य विषयदेशगमनं तदाकाराकारित्वञ्च सुसम्पादम् । तद्विना च नोक्तप्रत्यक्षत्वसम्भवो विषयस्येति प्रत्यक्षत्वघटकविषयाकारवृत्ती सन्निकर्षोपयोगात्, तद्वारा प्रत्यक्षत्वेऽपि तदुपयो- गोऽनिवार्य एवेति नेन्द्रियासनिकृष्टपदार्थप्रत्यक्षत्वापतिः । घटादिद्रव्यगतप्रत्यक्षत्व- स्थले संयोगस्य, तद्वत् रूप-रस-स्पन्द-घटत्वादिप्रत्यक्षस्थले संयुक्ततादात्म्यस्य, रूपत्वादिप्रत्यक्षस्थले संयुक्ततदात्मतादात्म्यस्य, श्रोत्रात्मक-गगनगतशब्दप्रत्यक्षत्व स्थले तादात्म्यस्य, शब्दत्वप्रत्यक्षत्वस्थले तदात्मतादात्म्यस्य सन्निकर्षत्वं बोध्यम् । यदि च कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नतया परिच्छिन्नस्य शब्दाश्रयपरिच्छिन्ननभोदेशपर्यन्त- गामिन एव नभस: श्रोत्रत्वं इति सुसूक्ष्म निरीक्ष्यते, तदा शब्द-प्रत्यक्षत्व-स्थलेऽपि संयुक्ततादात्म्यस्यैव सन्निकर्षता भविष्यति । सति चैवं शब्दत्वस्य प्रत्यक्षेऽपि संयुक्त- तदात्मतादात्म्यस्यैव सन्निकर्षति तदा सयोगादयः त्रय एव सन्निकर्षाः इत्यनुसन्धे- यम् । एवमेव ज्ञप्तिगतप्रत्यक्षत्वस्थलेऽपि सन्निकर्षोपयोगो वेदितव्यः । अभावस्थले चानुपलब्धेरेव प्रमाणत्वं नातो विशेषणविशेष्यभावस्य सन्निकर्षता । सन्निकर्षत्वञ्च बाहविषयाकारवृत्ति-प्रयोजकसम्बन्धत्वक विज्ञेयम् ।
प्रत्यक्षपरिच्छेद । ६३ ननु सा वृत्तिः एकविधा अनेकविधा वा ? आये एकमात्रप्रकारकत्व-विरुद्ध- नानाप्रकारकत्वाद्यनुभवविरोधः । अन्त्ये च कतिविधा का का च सा ? इत्यत आह- सा च वृत्तिः चतुर्विधा, संशयो निश्चयो गर्वः स्मरणमिति । संशयत्वं तु नकर्मिक - विरुद्ध - भावाभावप्रकारकज्ञानत्वम् । किमिदमिति- वृत्तावव्याप्तेः। न च तस्याः अनध्यवसायरूपत्वम्, पञ्चमवृत्त्यनभ्युपगमात् । किन्तु जिज्ञासाजनकवृत्तित्व तत्त्वम् । निश्चयत्वञ्च सशयविरोधिवृत्तित्वम्, जिज्ञासानिवर्त्तकवृत्तित्वं वा । न तु सशयान्यवृत्तित्वम्, अभिमानेऽतिव्याप्तेः । न का नदभावाप्रकारकत्वे सति तत्प्रकारकवृत्तित्वं एकमात्रप्रकारकस्मरणेऽतिव्याप्त्या- पत्तेः। निर्विकल्पकेऽव्याप्त्यापत्तेश्च । न च निर्विकल्पके निवर्तकत्वानभ्युपगमेन त्वदुक्तं द्वितीयलक्षणमपि तत्राव्याप्तमेवेति वाच्यम् । निर्विकल्पकस्यापि निवर्त- कत्वात् । अन्यथा "अहं ब्रह्मास्मी' तिवृत्ते: अज्ञाननिवर्तकत्वानुपपत्ते. । अभिमान: अहमित्याकारा वृत्तिः । स्मृतिस्तु सस्कारमात्रजन्यं ज्ञानम् । नन्वेवं सति वृत्तिमत: अन्तःकरणस्य एकत्व अनेकत्वं वा ? इत्याशङ्कय वस्तुत: तस्यैकत्वेऽपि वृत्तिभेदात् वाचनिकं तस्य चातुर्विध्यमित्याह एवं बृत्तिभेदेनैकमन्तःप्यकरण मन इति बुद्धिरिति अहङ्कार इति चित्तमिति चाख्यायते। आख्यायते इति प्रतीतीत्यनन्तरं सम्बद्धयते । अत्राभियुक्तोक्ति प्रमाणयति- तदुक्तम्- मनोबुद्धिरहंकारः चित्तं करणमान्तरम् ।। सशयो निश्चयो गर्वः स्मरणं विषया इमे ॥ इति आन्तरंआभ्यन्तरम्, करणम् इत्यन्वयः । विषया इत्यस्य व्यापारा इत्यर्थः । धमिधर्मयोः कथञ्चित् भेदाङ्गीकारे, एतेषा यथासंख्यं मन आदीना लक्षणत्वं वेदितव्यम् । तच्च प्रत्यक्षं द्विविधं सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदात् ।
वेदान्तपरिभाषा । तच्च-प्रमात्मकं च । चकारस्त्वर्थे भिन्नक्रमश्च । तथा च तत् प्रत्यक्षं द्विविध- मित्यन्वयः । यद्यपि निर्विकल्पकस्य मोक्षहेतुतया प्राधान्यात् प्रथममुपन्यास उचितः, नथापि व्यवहारे सविकल्पकस्यैव साधकतया मोक्षस्य च व्यवहारपूर्वकत्वेन पूर्व- साधनभूतस्य सविकल्पकस्य प्रथममुपन्यासो युक्त एव । सविकल्पकस्य लक्षणोदाहरणे दर्शयति- तत्र सविकल्पकं वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानम् । यथा घटं जानामी- त्याकारकम् । सविकल्पकनिर्विकल्पकयोर्मध्ये । वैशिष्ट्यं = विशेषवस्तुप्रतियोगिको विशेष्यानुयोगिक: सम्बन्धः, तदवगाहित्वम्, तद्विषयकत्वम् । तथा च सम्बन्ध- प्रतियोग्यनुयोगिविषयकज्ञानत्वं सविकल्पकत्वमिति तल्लक्षणम् । घटं जानामिति ज्ञानस्यघटत्वावच्छिन्नविषयतानिरूपितविषयिताशालिज्ञानत्वावच्छिन्न तादात्म्य- सम्बन्धमाजाविरूपितस्वनिष्ठ विशेष्यताकत्वेन ज्ञानात्मकविशेषण प्रतियोगिकान्त:करणानुयोगिकतादात्म्यसम्बन्धपिषयकतया, निरुक्तसम्बन्धावगा- हित्वात्मकसविकल्पकत्वं "घटं जानामि" इति ज्ञाने सुघटमिति भावः । निर्विकल्पकस्य लक्षणं प्रतिपादयति- - निर्विकल्पकं तु संसर्गानवगाहिज्ञानम् । एवार्थक: तुकारो भिन्नक्रमः । तथा च संसर्गानवगाहयेव ज्ञानं निर्विकल्पक- मित्यन्वयः । एतेन यत्किादिनः सविकल्पकस्या संसर्गा- न्तरानवगाहितया निर्विकल्पकत्त्वापत्तिरिति परास्तम् । फलतः संसर्गसामा- न्यानवगाहिज्ञानत्वं निर्विकल्पकत्वमित्यत्र पर्यवसानात् । उदाहरति- यथा सोऽयं देवदत्तः, तत्त्वमसीत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानम् । ननु कथं सोऽयं देवदत्तः इति ज्ञानस्य संसर्गानवगाहित्वम् ? तत्प्रतियोगिकस्य देवदत्तानुयोगिकस्याभेदसम्बन्धस्य तादृश इति चेन्न, विशेषण- विभक्तोः सार्थकत्वे निरुक्ताभेदस्यासंसर्गतया संसर्गानवगाहित्वस्य तत्राक्षमत्वात् ।
प्रत्यक्षपरिच्छेद। ६५ न च संसर्गत्वपदार्थत्वयोः सामानाधिकरण्याभ्युपगमे दोषस्तदवस्थ एव । वैय- धिकरण्याभ्युपगमे तु "अभेदः ससर्गः" इति व्यवहारानुपपत्तिः, इति वाच्यम् । पद- प्रतियोगिकवृत्त्यनुयोगित्वरूपस्य पदार्थत्वस्य ससर्गत्वस्य च कालिकाव्याप्यवृत्तित्व- स्वीकारात्. पदार्थत्वाभावकाले निरुक्तव्यवहारस्य मुसम्पादत्वात् । पदार्थत्वकाले तादृशव्यवहार इष्ट एव । न च पदार्थत्वस्याव्याप्यवृत्तित्वमेव दुर्घटम्, तथा हि पदजन्यबोधविषयत्वप्रकारकेच्छाविषयत्वं वा वाच्यवाचकभावापरनामा स्वतन्त्र- पदार्थो वा ? नाद्यम्, भिन्नकालिकयोरपि विषयविपयिभावाभ्युपगमेन इच्छाभावका- लेऽपि तद्विष् यत्वरूपस्य पदार्थत्वस्य अभेदेऽक्षतत्वात् । नापि द्वितीयः लाघवेनाति- रिक्तस्य तस्य अनादित्वे सति ब्रह्मज्ञाननाश्यतायाः कल्पनीयत्वेन अभेदादी ततः पूर्व तत्सातत्यात् इति वाच्यम्, प्रोक्तसंसर्गत्वव्यवहारानुपपत्त्या अतिरिक्तपदार्थभूतस्या- पि तस्य अव्याप्यवृत्तित्वाभ्युपगमावश्यकत्वात् । वस्तुतस्तु न संसर्गाविषयकत्वमात्र- ज्ञानस्य निर्विकल्पकत्वम्, अपि तु अभिमतससर्गाविषयकत्वम्, एवं च 'सोऽयं दवेदत्तः' इति स्थले अभेदस्यानभिमततया, बोधस्य तद्विषयकत्वेऽपि तादृशसंसर्गानवगाहित्वस्या- क्षततया अव्याप्त्यसम्भवात् । "तत्त्वमसि' इति महावाक्यम्, तत्र तत्पदस्य सर्वज्ञत्वाद्यात्मकश्वर्यविशिष्टे, त्वत्पदस्य च अल्पज्ञत्वाद्यात्मकजीवत्वविशिष्टे शक्तिः । निरक्तशक्त्योः तत्त्वंपदयोः विशेषणांशविनाकृतात्मवस्तुनि जहदजहल्ल- क्षणाभ्युपगमेन शुद्धात्मवस्तुमात्रस्यैव बोधो जायते इति वेदान्तसिद्धान्तः । सति चवमभिमतसंसर्गानवगाहित्वस्य तत्त्वमसीति वाक्यजन्ये बोधे सत्वात् निर्विकल्प- कत्वमिति भावः । लौकिकवैदिकभेदेन उदाहरणद्वयप्रदर्शनमिति बोध्यम् । ननु संसर्गानवगाहित्वस्य निर्विकल्पकज्ञाने एव सम्भवः। निर्विकल्पकत्वं च प्रत्यक्षत्वव्याप्यम् । तत्त्वमसीति वाक्यजन्यस्य ज्ञानस्य शब्दजन्यत्वेन शाब्द- बोधरूपतया पारोक्ष्यमनिवार्यम् । तथा च कुतोऽपरोक्षत्वव्याप्यस्य संसर्गान- वगाहित्वस्य तत्त्वमसीतिवाक्यजे बोधे सम्भवः ? इत्यभिप्रायेण शङ्कते- शाब्दमिदं ज्ञानं न प्रत्यक्षम्, इन्द्रियाजन्यत्वात् । शाब्दं - शब्दजन्यम् । इदं तत्त्वमसीतिवाक्यजं सोऽहमिति ज्ञानम् । तथा च तत्त्वमसीति महावाक्यजं ज्ञानं प्रत्यक्षत्वाभाववत, इन्द्रियजन्यत्वाभावात् गामान- येतिवाक्यजबोधवत् इति प्रयोगः । फलत: व्यापकविरुद्धोपलब्ध्या प्रोक्तस्य वाक्य- जस्य बोधस्य संसर्गानवगाहित्वाभावः इत्यभिप्रायः ।
६६ वेदान्तपरिभापा । समाधत्ते-- इति चेन्न न हीन्द्रियजन्यज्ञानत्वं प्रत्यक्षत्वे तन्त्रम्, दूपितत्वात् । न हीत्यत्र हीति हेतौ । तन्त्र नियामकम् । मानसप्रत्यक्षे मनस: इन्द्रियाना- त्मकतया अनिन्द्रियजन्येऽव्याप्त्या इन्द्रियजन्यज्ञानत्वस्य प्रत्यक्षासाधारणधर्मस्वा- भावात् इत्यर्थः । - ननु तर्हि किं नाम तन्त्र प्रत्यक्षत्वे ? इत्याकांक्षाया पूर्ववृत्तं स्मारयति- किन्तु प्रमाणचैतन्यस्य योग्यवर्तमानविपयचैतन्याभिन्नत्वमित्युक्तम् । प्रमाणचैतन्य =अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यम्, तस्य । तत्त्वमसीति वाक्गज ज्ञानं प्रत्यक्षत्वाभाववत् इन्द्रियजन्यत्वाभावात् इत्यनुमानमनुकूलतर्काभावादप्रयो- जकम् इति न ततोभीष्टसिद्धिः इति भावः । नन्वास्तां प्रमाणचैतन्यस्य विषयचैतन्याभेद: प्रत्यक्षत्वे तन्त्रम्, किन्तु कथं तावता "सोयं देवदत्तः" इति ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् ? इत्याशङ्कां पूर्वोक्तप्रक्रिया- स्मारणेनापनुदति- तथा च सोऽयं देवदत्त इति वाक्यजन्यज्ञानस्य सन्निकृष्टविषयतया वहिनिःसृतान्तःकरणवृत्त्यभ्युपगमेन देवदत्तावच्छिन्नचैतन्यात् वृत्यव- च्छिन्नचैतन्यस्याभिन्नतया सोऽयं देवदत्त इति वाक्यजन्यज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् । तथा च = इन्द्रियजन्यत्वस्य प्रत्यक्ष त्वातन्त्रत्वे च । प्रथमज्ञानस्येत्यत्र पप्ठ्यर्थों निष्ठत्वम् । तस्य सन्निकृष्टविषयतया अन्वयः। सन्निकृप्टो विषयो यस्य ज्ञानस्य तत्सनिकृष्टविषयम् । तस्य भावः सनिकृष्टविषयता, तया। तृतीयायाः प्रयोज्यत्व- मर्थः । सम्बन्धस्य तस्य वहिनिःसृतान्तःकरणवृत्त्यभ्युपगमेन । अवच्छेद्याभेदप्रयोजकस्य अवच्छेदकयोरेकदेशस्थत्वस्य सत्त्वादिति शेषः । लौकिकं वृत्तं वैदिके अतिदिशति- - एवं तत्त्वमसीति वाक्यजन्यज्ञानस्यापि ।
प्रत्यक्षपरिच्छेद। ૬૭ एवं = सोय देवदत्त इति वाक्यजन्यज्ञानवत् । प्रत्यक्षत्वमिति पूर्वान्वयः । प्रत्यक्षत्वप्रयोजक चैतन्याभेदं विशदयति- तत्र प्रमातुरेव विषयतया तदुभयाभेदस्य स्पष्टत्वात् । प्रमातुः = अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यस्य । विषयतया-विषयावच्छिन्नचैतन्य- तया। ननु वाक्यजन्यज्ञान-शाब्दज्ञान-अन्वयबोध-संसर्गबोधादिशब्दानां पर्यायत्वं प्रसिद्धम् । सति चैव निरुक्तयोः वाक्यजन्ययोः ज्ञानयोः ससर्गानवगाहित्वरूपं निर्विकल्पकत्वं दुर्घटम् । निरुक्तवाक्यद्वयजं ज्ञानं प्रत्यक्षत्वाभाववत् वाक्यजन्यत्वात् इत्यनुमानेन निर्विकल्पकत्वव्यापकविरुद्धोपलब्धेः इत्यभिप्रायवानाशङ्कते- पदार्थसंसर्गावगाहितया कथं ननु वाक्यजन्यज्ञानस्य निर्विकल्पकत्वम् ? - पदार्थयोः संसर्ग: पदार्थसंसर्गः, पदार्थद्वयसम्बन्ध इति यावत् । तदवगाहितया तद्विपयकतया । अयं भावः-पदार्थयोः संसर्गबोध एव शाब्दबोधः । तथा च निरुक्तवाक्यद्वयजन्यज्ञानद्वयस्य ससर्गावगाहित्वमनपलपम् । संसर्गावगाहित्वे च निर्विकल्पकत्वं दुर्लभम् । तयोविरोधात् इति । समाधत्ते- उच्यते, वाक्यजन्यज्ञानविषयत्वे हि न पदार्थसंसर्गत्वं तन्त्रम् । अनभिमतसंसर्गस्यापि वाक्यगम्यतापत्तेः । तन्त्रं = नियामकम् । पदार्थसंसर्गत्वं = पदार्थप्रतियोग्यनुयोगिकसम्बन्धत्वम् । न अभिमतः, अनभिमतः, स चासौ संसर्गः, अनभिमतसंसर्गः, तस्यापि । अपिभिन्नक्रमः । तथा च अनभिमतस्यापि संसर्गस्य इत्यन्वयः। अयभाशयः संसर्गत्वं पदार्थप्रतियोग्यनुयोगिकसम्बन्धत्वं वान शाब्दबोधीयविषयतानियामकम् । अन्यथा अनभिमतसंसर्गेष्वपि शाब्दबोधविषयत्वापत्त्या अतिप्रसङ्गापत्तेः । श्रौतसिद्धान्ते तात्पर्यविषयवस्तूनामेव शाब्दबोधविषयत्वाङ्गीकारेण 'ष्टापत्तेरयोगात् । वाक्यजन्यत्वं शाब्दबुद्धित्वं च नकं न वा समनियतम् अपि तु वाक्यजन्यत्वं व्यापक वेदान्तपरिभाषा। शाब्दबुद्धित्वं व्याप्यम् । सति चैवं "सोयं देवदत्तः" "तत्वमसि" इति वाक्यजन्ये ज्ञाने शाब्दबुद्धित्वाभावेऽपि चक्यजन्यत्वसम्भवात्, वाक्यजन्यत्वेन शाब्दबुद्धित्वसाधना- सम्भवात् । न चैव सति प्रत्यक्षत्वस्य साङ्कपत्या जातित्वाभावापत्तिः, तथा हि- वाक्यजन्यत्वं विहाय प्रत्यक्षत्वं चाक्षुषे "अयं घट" इति ज्ञाने वर्तते प्रत्यक्षत्वं विहाय वाक्यजन्यत्वं असनिकृष्टविषयकशाब्दबुद्धौ, सन्निकृष्टविषय कशाब्दबुद्धौ वाक्यजन्यत्वं प्रत्यक्ष त्व चोभयमिति वावयजन्यायप्रत्यक्षत्वयोः परस्परात्यन्ताभाव- समानाधिकरणत्वे सति एकाधिकरणवृत्तित्वं सुघटमिति वाच्यम् । जात्युपाधि- परिभाषाया: साडूर्यस्य जातिबाधकतायाश्चानभ्युपगमात् । ननु तर्हि किं तावत्तन्त्रं वाक्यजन्यज्ञानविषयत्वे ? इत्याकांक्षायामाह- किन्तु तात्पर्यविषयत्वम् । - ननु तात्पर्य प्रकृते वक्तुरिच्छाविषयत्वरूपमेव ग्राह्यम् न तु तत्प्रतीतिजनन- योग्यत्वरूपम्, योग्यताया निर्विषयतया 'तात्पर्यविषयत्वम्" इति विषयत्व- श्रुत्यसङ्गत्यापत्तेः । इच्छास्वरूपतात्पर्यग्रहणं चासङ्गतम्, अग्रिमतात्पर्यनिर्वचन- विरोधापत्तः इति चेन्न तत्प्रतीति-प्रातीतिकविषयतामुपेत्य औपचारिकतया विषयत्वश्रुतिसामञ्जस्यात् । किमायात ततः प्रकृते ? इत्याकांक्षायामाह- - प्रकृते च "सदेव सोम्येदमन आसीत्" इत्युपक्रम्य "तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो !” इत्युपसंहारेण विशुद्धे ब्रह्मणि वेदान्तानां तात्पर्यमवर्सितमिति कथं तात्पर्याविषयं संसर्ग बोधयेत् ! इदं = व्याकृतनामरूपं जगत्, हे सोम्य । अग्रे= नामरूपव्याकरणात् पूर्व, सदेव = अव्याकृतनामरूपं ब्रह्मव, आसीत्, इत्युपक्रमश्रुत्यर्थः । उपक्रमः-प्रस्तावः । तत् सदाख्यं कारणम् सत्यं = परमार्थसत्, स एव चात्मा, हे श्वतकेतो! त्वमपि तदेवासि, इत्युपसंहारश्रुत्यर्थः । जीवब्रह्मणोरभेद एव, ब्रह्मभिन्नं चान्यत् सर्व मिथ्या, इति भावार्थः । उपसंहार:= उपसंहरणम् विराम इति यावत् । विशुद्धिः = निर्मलता । वेदान्तानाम् = अकर्मपरश्रुतीनाम् । अयमाशयः-तात्पर्यविषय एव पदार्थः शाब्दबोधीयविषयतावान् भवति, इति वेदान्तसिद्धान्तः। प्रकृते संसर्गस्तु न तात्पर्यविषयः, इति कुतस्तस्य शाब्दबोधविषयत्व सम्भवः ? सति चासम्भव प्रत्यक्षपरिच्छेद। ६९ संसर्गानवगाहिबोधजनकत्वं वाक्यजबोधेप्यक्षतम्, इति न काप्यनुपपत्ति. तस्व- मसोत्यत्र संसर्गस्य तात्पर्याविषयत्वं उपक्रमोपसंहाराभ्यां गम्यते । एवं सति तत्त्वमस्यादिवाक्याना अखण्डार्थत्वमनायाससिद्धं भवतीति प्रतिपादयति- - इदमेव तत्त्वमस्यादिवाक्यानामखण्डार्थत्वं गाहि-यथार्थज्ञानजनकत्वम् । यत् संसर्गानव- इदं ससर्गानवगाहि-यथार्थ-ज्ञानजनकत्वमेव तत्त्वमस्यादिवाक्यानां अखण्डार्थत्व- मित्यन्वयः । ससर्ग एकापरपदार्थप्रतियोगिकसम्बन्ध नावगाहते =न विषयी- करोतीति संसर्गानवगाहि । तादृक् यत्. यथार्थज्ञानं तज्जनकवाक्यत्वमित्यर्थः । ज्ञाने याथार्थ्यन्तु स्वव्यधिकरणप्रकारावच्छिन्ना या या विषयता तदनिरूपकत्वम् । न तु तद्वति तत्प्रकारकत्वम् । ननु अहन्त्ववति अहन्त्वप्रकारकतया यथार्थ "अह गौरः" इति ज्ञानमादाय तज्जनके "अहं गौरः" इत्यादिवाक्ये अतिव्यप्तिः । संसर्गानव- गाहित्वानुक्ती "घट कुरु" इत्यादिवाक्ये अतिव्याप्ति या । ज्ञानपदानुक्तौ इच्छाविषये पटादावतिव्याप्तिः । विषयत्वानुक्ती त्वसम्भव एव । ससर्गे पदार्थ- प्रतियोग्यनुयोगिकत्वानिवेशे यत्किञ्चिदुदासीनससर्गानवगाहिबोषजनके घटमानयेति वाक्ये अतिव्याप्तिः । ननु तथापि भोजननिवृत्तिबोधके "विष भुंक्ष्वे"तिवाक्ये अतिव्याप्तिः, तत्र निरुक्तनिवृत्तिवाचकपदाभावेन तत्रत्यससर्गस्य पदार्थप्रतियो- ग्यनुयोगकित्वाभावात्, इति चेन्न, लक्षणामाश्रित्य तत्रापि पदार्थत्वसम्पादनात् । प्रकृतार्थे प्रत्यक्तत्त्वप्रदीपिकोक्ति प्रमाणयति- - तदुक्तम्- संसर्गासङ्गिसम्यग्धीहेतुता या गिरामियम् । उक्ताऽखण्डार्थता यद्वा तत्प्रातिपदिकार्थता ॥ चित्सुखमुनिभिः, इति शेषः । “सा" इत्यस्याध्याहारः । तथा च गिरां या इयं संसर्गासङ्गिसम्यग्धीहेतुता, सा, अखण्डार्थता उक्ता, इत्यन्वयः । संसर्गासङ्गिनी सम्यग्धी: संसर्गासङ्गिसम्यग्धी: तस्याः हेतुता। संसर्गासङ्गित्वं निरुक्तसंसर्गाविषयक- त्वम् । सम्यक्त्वं निरुक्त याथार्थ्यं वच्चोभय धियि विशेषणं विज्ञेयम् । गिरामित्य- ७० वेदान्तपरिभाषा । म्यापर्यायशब्दानामित्यर्थ. 'तेन वस्त्रमम्बरमित्यादिदाक्ये नातिव्याप्ति: । यद्वोत्यादि परभागेन लक्षणान्तरव्यक्तिः । यद्वा प्रातिपदिकार्थता तत् इत्यन्वय । तदिति लिङ्ग- व्यत्यये लक्षणान्तरत्वद्योतनमिति नायुक्तता । तत् = अवण्डार्थत्वम् । तथा च प्रातिपदिकार्थमात्रबोधकत्वमखण्डार्थत्वम् इति लक्षणान्तरम् । मात्रादानुनो घटमानयेत्यादिवाक्ये अतिव्याप्तिर्बोध्या । घटात्मकप्रातिपदिकार्थबोधकत्वस्य तत्राणि भावात् । इममेवार्थ विवृणोति- प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्वं वाऽखण्डार्थत्वमिति चतुर्थपादार्थः । पाद: = पद्यचतुर्थाश. । प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्व तु विशेष्यभूतप्रातिपदिकार्थ- मात्रपरत्वं बोध्यम्, तेन जातिविशिष्टव्यक्तीनां प्रातिपदिकार्थत्वाभ्युपगमपक्षेऽपि नासम्भवः। - सविकल्पकत्व-निर्विकल्पकत्वाभ्यां यथा प्रत्यक्षविभागः, किमन्येनापि केनचित्प्रकारेण तद्विभाग: ? इत्याकांक्षायामाह- तच्च प्रत्यक्षं पुनर्द्विविधं जीवसाक्षीश्वरसाक्षि चेति । तत्-प्रमाणम् । चकारः एवार्थको भिन्नक्रमश्च । प्रत्यक्षप्रमाणमेव पुनः जीवसा- क्षोश्वरसाक्षिरूपेण द्विविधम् । जीवसाक्षीत्यादिशब्द: पारिभाषिको न यौगिक: तेन न समासविशेषाकांक्षा। जीवतत्साक्षिणोः भेदस्य स्पष्टीकरणाय जीवस्य स्वरूपं निर्वक्ति- - तत्र जीवो नामान्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यम् । तत्रैत्यस्य तयोः जीवतत्साक्षिणोर्मध्ये इत्यर्थः। यत्तु तत्रेति घटकत्वं सप्तम्यर्थः तथा च जीवनिरूपणं विना तद्धटितसाक्षिनिरूपणं न सम्भवतीति प्रथम जीवो नामे- त्यादिना जीवनिरूपणमिति केषाञ्चित् कथनं,तदसङ्गतम् जीवतत्साक्षिणोः स्वातंत्र्यात् घटकघटितभावाभावात् । अवच्छिन्नत्वं वैशिष्टयम् । तथा चान्तःकरणविशिष्ट चैतन्यं जीव इति फलितम् । जीवसाक्षिणो लक्षणमुपक्षिपति- तत्साक्षि त्वन्तःकरणोपाहत-यम् ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ७१ तत्पदं जीवबोधकम् । अन्तःकरणेन उपहितमन्तःकरणोपहितम् । अन्त:- करणात्मकोपाधियुक्तमिति सरलार्थः । ननु उभयघटकमुख्यभूतचैतन्यैक्यात् कथं भेदोक्तिसङ्गति: ? अत आह- . . अन्तःकरणस्य विशेषणत्वोपाधित्वाभ्यामनयोर्भेदः । अनयोः चैतन्यभूतजीवजीवसाक्षिणोः । एकत्रान्तःकरणं चैतन्यविशेषणम् अपरत्र तु तन्न विशेषणमपि तु उपाधिभूतमित्यत एव तयोर्भेद इति भावः । ननु अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यस्य जीवत्वे सुषुप्त्यवस्थजीवे जीवत्वं न स्यात् तदानीमन्तःकरणाभावात् इति चेन्न, सूक्ष्मरूपेण तदानीमपि अन्त.करणसत्त्वाम्यु- पगमात् । ननु विशेषणीभूतमन्त.करणं साधनादि वा ? आद्य तदुत्पत्तः पूर्व जीवाभावप्रसङ्गः । न चेष्टापत्तिः । जीव ईशो विशुद्धा चित् तथा जीवेशयोभिदा । अविद्यातच्चितोर्योगः पडस्माकमनादयः ।। इत्यभियुक्तोक्तिविरोधप्रसङ्गात् । अन्त्ये अपसिद्धन्नापातः, इति चेन्न । अन्त:करणप्रवाहाभ्युपगमात् । ननु कि नाम लक्षण्यं विशेषणोपाध्यो.? इत्याकाक्षायामाह- विशेषणं कार्यान्वयि व्यावर्त्तकम् उपाधिस्तु कार्यानन्वयी व्यावतको वर्तमानश्च । कार्य अन्वयो यस्य तत् कार्यान्वयि । कार्य-स्वान्वितविधेयं तत्रान्वयो यस्य इति सरलार्थः। व्यावर्तकत्व व्यावृत्तिबोधकत्वम् । व्यावृत्तिः तदितरभेदः । च स्वान्वितविधेयभूतक्रियान्वितत्वे सति स्वधर्मीतरभेदानुमापकत्वं विशेषणत्वम् । उपाधित्वं तु स्वान्वितविधेयानन्वितत्वे सति वर्तमानत्त्वे सति धर्मीतरभेदानुमापकत्वम् । अयमभिप्रायः यो धर्मः विशेष्ये तद्विधये च उभयत्र अन्वेति स विशेषणत्वेन गीयते । यस्तु केवलं विशेष्ये एवान्वेति न तु विशेष्यविधेये स उपाधित्वेनाभिधीयते,न तु विशेषणत्वेन । द्वयोः उदाहरणमाह- रूपविशिष्टो घटोऽनित्यः इत्यत्र रूपं विशेषणम् । कर्णशष्कुल्यव- च्छिन्नं नभः श्रोत्रमित्यत्र कर्णशष्कुल्युपाधिः । तथा ७२ वेदान्तपरिभाषा। "रूपविशिष्टो घटोऽनिन्य." इत्यत्र स्वपदेन विशेषणीभूतस्य रूपस्य ग्रहणम्, तदन्वितो घटः, तत्र विधेयभूतमनित्यत्व, तत्र घटस्येव रूपस्यापि तादात्म्यावच्छिन्ना- धेयतासम्बन्धेनान्वयोऽस्तीति रूपस्य कार्यान्वयित्वमक्षुण्णम् । एवं रूपस्योत्पत्तिका- लावच्छिन्ने घटेऽभावात् तत्प्रतियोगिकस्य स्वाश्रयीभूतघटनिष्ठस्य भेदस्यानुमापक- तया व्यावर्तकत्वमप्यस्ति । लक्षणेऽनुक्तमपि वर्तमानत्वमर्थत एव प्राप्तं भवति इति रूपे विशेषणलक्षणसमन्वयः । “कर्णशष्कुल्यवच्छिन्न नभ: श्रोत्रम्" इत्यत्र उपाधि- भूतायाः कर्णशप्कुल्या नभोविधेयश्रोत्रत्वेन समन्वयाभावात् भवति कार्यानन्वयित्वम्, अपरिच्छिन्नाकाशप्रतियोगिकस्य स्वावच्छिन्ननिष्ठभेदस्यानुमापकतया व्यावर्तकत्वं वर्तमानत्त्व चास्तीति भवत्युपाधिलक्षणसमन्वयः । विशेषणलक्षणे कार्यान्वयित्वानुक्ती उपाधिभूते, तल्लक्षणे च कार्यानन्वयित्वानुक्तौ विशेषणे अतिव्याप्तिर्बोध्यिा। विशेषणलक्षणे व्यावतकत्वानुक्तौ "घटपटौ नीलो" इत्यत्र घटे अतिव्याप्ति: । उभयत्वस्यकविशिष्टत्वरूपताभ्युपगमे तस्य स्वान्विते पटे विधेयभूतेन नीलत्वेना- न्वयात् वर्तमानत्वाच्च । तदुक्तौ च तस्य पटाव्यावर्त कतया नातिव्याप्त्यवकाशः । उपाधिलक्षणे व्यावर्तकत्वानुक्तौ तु वर्तमानेषु कार्यान्वये उदासीनपदार्थमात्रेपु अतिव्याप्ति: । तेषां कार्यान्वयित्वात् वर्तमानत्वाच्च । वर्तमानत्वानुक्तो कालान्तरीणे कार्यानन्वयिनि व्यावत के उपाधिलक्षणातिव्याप्तिः । ननु "कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नमः श्रोत्रम्' इत्यत्र कर्णशष्कुल्या: विशेषणत्वा- भावेऽपि परिचायकत्वमेवास्तु कथमुपाधित्वम् ? इत्याशङ्कायामाह- अयमेवोपाधिनैयायिकैः परिचायक इत्युच्यते । . - अयं निरुक्तलक्षणाक्रान्तो धर्मः । नैयायिकैः= गौतमानुयायिभिः । तथा च उपाधिरित्युच्यताम्, परिचायक इति वा प्रोच्यताम्, नार्थतो भेदः, इतीष्टापत्तिरेव । नन्वस्तु विशेषणोपाध्योर्भेदः, अस्तु च भवदुक्त तल्लक्षणम्, जीवसादयुपाधिभूते अन्तःकरणे कथ तल्लक्षणसमन्वयः ? इत्याकांक्षायामाह- प्रकृते चान्तःकरणस्य जडतया विषयावभासकरवायोगेन विषयाव- भासकस्य चैतन्यस्योपाधित्वम् । - अयमभिप्रायः-"अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यं विषयावभासकम्" इत्यत्र चैतन्ये धम्मिणि विधेयभूतस्य विषयावभासत्वस्य नान्त:करणे अन्वयः, तस्य जडत्वात् । एवञ्च कार्यानन्वयित्वं तत्राक्षतम्, वर्तमानत्वं चैतन्यपरिचायकतया व्यावर्तकत्वञ्च प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ७३ --- तत्रास्त्येवेति सर्वथा सुसम्पादः उपाधिलक्षणसमन्वयः अन्तःकरणे। विधेयता च प्रमीया ग्राह्या नातो भ्रान्तिमादाय दोषावकाशः । जीवसाक्षिगत-संख्याविप्रतिपत्ति निराकरोति- अयं च जीवसाक्षी प्रत्यात्सं नाना । अयं अन्त:करणोपहितचैतन्यरूप: । प्रत्यात्म प्रतिदेहम् । नाना = व्याव- हारिकभेदवान् । देहभेदात् भिन्न इत्यर्थः । साक्षिणो बहुत्वाभ्युपगमे जीवस्य बहुत्वं दण्डापूपायितं बोध्यम् । यद्वा प्रत्यात्ममित्यत्र आत्मपदेन जीवस्यैव ग्रहणम् । तथा- चान्त:करणविशिष्टचैतन्यात्मकजीवभेदात् तत्साक्षिणोऽपि भेदः इति भावः । एवञ्च जीवतत्साक्षिणोः द्वयोरपि बहुत्व शब्दत एव लब्धम् । नानात्वे हेतुमाह- एकत्वे चैत्रावगते मैत्रस्याप्यनुसन्धानप्रसंगः । अवगति: अनुभवः । अनुसन्धानं स्मरणम् । सर्वानुभवसिद्ध: तयोरेककर्तृकत्व- नियमो भज्येत इत्यर्थः । इदमुपलक्षण कृतहानाकृताभ्यागमदोषी अप्यपरिहायो । ईश्वरसाक्षिणं परिचाययति- ईश्वरसाक्षि मायोपहितं चैतन्यम् । प्रपञ्चात्मकस्य परिणामस्य परिणामिभूतं भावात्मकमज्ञानं माया । तया उपहितं अर्थात् तदुपाधिकम्, फलतः तत्परिचायकं यत् चैतन्यं तदेव ईश्वर- साक्षि । अयमभिप्राय:-स्वतः प्रकाशभूतं अत एव विषयावभासकं चैतन्यमेकमेव । तदेवान्तःकरणोपाधिकं सत् जीवसाक्षीत्युच्यते मायोपाधिकं च सत् ईश्वरसाक्षी- त्युच्यते । मायासद्भावे-"मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" इति, तस्याः भावरूपताया च "देवात्मशक्ति स्वगुणैनिगूढाम्" "अनृतेन हि प्रत्यूढाः" "अनीशया शोचति मुह्यमान." "कामा अनृताभिधानाः" अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः" "नीहारेण प्रावृताः" "अज्ञानेनावृत्तं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः" इत्याद्याः श्रुतिस्मृतयः प्रमाणानि । मायाविद्ययोः न कश्चिद्भदो मानाभावात् । प्रयोगभेदः कथमिति चेत् मायाविद्याशब्दयो: पर्यायतया घटकलशादिशब्दवत् प्रोक्तुरिच्छाभेदात् । यद्वा आवरणशक्तिप्रधाना अविद्या, विक्षेपशक्तिप्रधाना माया, इति भेदेन प्रयोगः । ईश्वरसाक्षिणोऽपि कि जीवसाक्षिवन्नानात्वम् ? इत्याशंका निराकरोति- तच्चकं तदुपाधिमायाया एकत्वात् । - ७४ वेदान्तपरिभाषा । चकार. अवधारणार्थको भिन्नक्रमश्च । तच्चकमित्यस्य तदेकमेवेत्यर्थः । तत् ईश्वरचैतन्यम् । तस्य उपाधि तदुपाधिः तदुपाधिश्च माया तदुपाधिमाया तस्या. । एकत्वात् इत्यस्य अभेदात् इत्यर्थः । अयममिप्रायः-जीवसाक्षिस्थले उपहितस्य चैतन्यस्याभेदेऽपि अन्तःकरणात्मकोपार्भेदात् बहुत्वमङ्गीकरणीयम् । प्रकृते तु उपाधिभूतायाः मूलाविद्यात्मिकायाः मायायाः न भेदः यदधीना बहुत्व- शङ्का स्यात् । . ननु मायायाः बहुत्वे "इन्द्रो मायाभि." इति श्रुतौ मायापदाव्यवहितोत्तरतया श्रूयमाणं बहुवचनमेव प्रमाणम् । तथा च कथ न जीवसाक्षिवत् ईश्वरसाक्षिणो- प्युपाविभेदाद्भद इत्याह- "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" इत्यादिश्रुतौ मायाभिरिति बहुवचनस्य मायागतशक्तिविशेषाभिप्रायकतया, मायागतसत्त्वरज- स्तमोगुणाभिप्रायकतया वोपपत्तेः । - इन्द्रः = परमेश्वरः, मायाभिः = विविधविशेषवत्या मायया, मायावयवभूत- सत्त्वरजस्तमोगुणैर्वा, पुरुरूपः = प्रपञ्चरूपः, ईयते = भवति । प्रपञ्च- रूपं प्राप्नोतीत्यर्थः मायागतो मायानिष्ठो यः शक्तिविशेषः, विलक्षणसामर्थ्य तत्र योऽभिप्रायो बुबोधयिषा तत्कतया, इत्यर्थः । अयं भावः सत्यपि मायायाः एकत्वे विभिन्नकार्यजननसामार्थ्यरूपस्य शक्तिविशेषस्य बहुत्वमङ्गीकरणीयमेव अन्यथा कार्यगतवैचित्र्यानुपपत्तेः । तथा च तादृशशवितविशेषगतबहुत्वबोध- नायव “मायाभिः" इत्यत्र श्रुतौ बहुवचनम् इति । अत्र ननु कार्यवैचित्र्य- कल्प्यानां तेषां शक्तिविशेषाणां समनयत्यमस्ति न वा ? आद्य बहुत्वासिद्धिः गौरवेण समनियतनानाधर्मानभ्युपगमात् । द्वितीये धर्मधर्मभेदोऽपि मान्य: समापतेत्, तथा च कथमुक्तसङ्गतिः ? इत्याशङ्कानिरासाय "मायागतसत्वेत्यादिना पक्षान्तर- मागृतम् । सत्त्वं रज: तमश्चेति सत्त्वरजस्तमांसि, त एव गुणाः तदभिप्रायकतया इत्यर्थः । मायागतत्वं च मायावयवभूतत्वं बोध्यम् । अयमभिप्राय:- सत्त्वरजस्तमसा गुणानां साम्यं गतानामेव अपरं नाम “माया" इति । तथा च मायायाः अवयवभूतेषु सत्त्वरजस्तमस्सु विद्यमानं यद्वहुत्वं, तोषनायव श्रुतौ "मायामिः" इत्यत्र बहुवचनप्रयोगः, न तु मायागतबहुत्वबोधनाय इति । उपपत्तेः इत्यस्य असङ्गत्यभावात् इत्यर्थः।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ७५ ननु कि नाम तत्प्रमाण येन मायाया: एकत्वं निश्चीयते ? इति जिज्ञासाया- माह- - "मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" "तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते । योगी मायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः" "अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजा:जनयन्तों सरुपाः अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः । इत्यादिश्रुतिष्वेक- वचनबलेन लाघवानुगृहीतेन मायायाः एक त्वं निश्चीयते । उभयत्र तुकार: अवधारणार्थः । तथा च मायामेव प्रकृति विद्यात्, मायिनमेव महेश्वर विद्यात् इत्यन्वयः । विद्यात् इत्यस्य जानीयात् इत्यर्थः । तथा च एक मज्ञानमेव भावात्मक प्रकृतिशब्दवाच्यम्, न ततोऽतिरिक्त किञ्चित् यथा साङ्ख्या- भिमतम् । तादृशाज्ञानस्यैव मायाशब्दवाच्यत्वात् इत्यपि ध्वनितम् । यस्मिन् हृदि निवेशिते सति, योगी विततामविद्या मायां तरति, तस्मै विद्यात्मने नमः इत्यन्वयः । अत्र तरण नाशः । तथा च तरतीत्यस्य नाशयतीत्यर्थः । पारगमनात्म- कस्य तरणस्य प्रकृते असम्भवात् । मायां अविद्यां इत्युक्ति: उभयोरभेद- द्योतनाय । हृदि निवेशनं चात्र हृदोन्त:करणस्य अहं ब्रह्मास्मीत्याकारकजीवब्रह्मा- भेदविषयकवृत्तिरूपं बोध्यम् । गृहादौ घटादिविनिवेशनवत् मुख्यनिवेशनासम्भवात् । "विद्यात्मने" इत्यत्र विद्यापद स्वरूपज्ञानपरं बोध्यम् । तेन हृदि विनिवेशनात्मक- वृत्तिविषयात् तस्मात् अविद्यानाशः अवश्य भवतीति प्रतिपादितम् । अविद्यायां विततत्वं प्रपञ्चाकारेण परिणतत्वं बोध्यम् । अन्यथा अमूर्तीयास्तस्याः पटादिवत् वैतत्याभावात् असंगत्यापत्तः । अमेयाय इत्यत्र अमेयत्वं फलव्याप्यताशून्यत्वं बोध्यम्, न तु वृत्त्यविषयत्वम्, येन हृदि निवेशनेन सह विरोधशङ्का स्यात् । योगीत्यत्र योगस्त्वत्र अन्तःकरणस्य वहिर्मुखता विच्छेदमात्ररूपोऽवसेयः न तु चित्त- वृत्तिसामान्यनिरोधरूपः। अन्यथा "अह ब्रह्मास्मि' इति श्रुतिशिखोत्थाखडवृत्त - रप्यनुदयेन अविद्यासन्तरणानुपपत्त: । अजामित्यादेरर्थः एवमवसेय:- न जायते इत्यजा, ताम्, अनुत्पाद्यां, फलतः कस्याप्यपरिणामभूताम् । लोहितं रजः रंजनात्कम- त्वात् । शुक्लं सत्त्वं प्रकाशात्मकत्वात् । कृष्ण तमः आवरणशीलत्वात् । एतत् त्रितयमेव (स्वरूप) यस्याः सा लोहितशुक्लकृष्णा, ताम् एतेन सत्त्वरजस्तमसा साम्यावस्थैव माया, सैव च प्रकृतिरिति प्रतिपादितम् । सरूपा: = सजातीयाः अर्थात् सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिकाः प्रजाः = सन्ततीः, जनयन्ती - उत्पादयन्ती .
७६ प्रत्यक्षपरिच्छेदः तेन रूपेण परिणममानामिति यावत् । एकत्वञ्चोभयत्र सजातीयद्वितीयराहित्यरूपं बोध्यम् । जुपमाण: =सेवमानः, अनुशेते = संसरति । सेवा चात्र वृत्तिप्रतिफलन- रूपा बोध्या, अन्यविधायाः तस्याः प्रकृतेऽसम्भावात् । संसारश्च "अहं मुखी, अहं दुःखी, अहं मूढः” इत्याद्याकारप्रत्ययप्रयोजकान्तःकरणत त्यादिगतप्रतिविम्ब- तानिरूपितबिम्बतारूपोऽवसेयः, तेन नासङ्गतिः । भुक्तभोगां -- भोगापवर्ग- प्रसवरहितां फलत: परिणामशून्यामित्यर्थः । अन्वयस्तु-एको ह्यजः वह्वीः सरूपाः प्रजा: जनयन्ती लोहितशुक्लकृष्णा एकां अजां जुषमाण: अनुशेते । अन्य. अज: भुक्तभोगा एनां जहाति इति । लाघवानुगृहीतेनेतिपदं तण्डुलबहुत्वेपि यथा तण्डुले 'इदमक्षतम्' इति भवत्येकवचनप्रयोगः तथा मायाबहुत्वेऽपि एकवचनप्रयोगो भवितु- महत्येवेयाशङ्कापनयनाय प्रोक्त वेदितव्यम् । लाघवे = कल्पनालाघवम् । तदनु- गृहीतत्वं तदेककार्यकारित्वम् । एतच्च एकवचनबलस्य विशेषणम् । एकवचनस्य बलं तु तद्गतो वाचकताख्यः शक्तिविशेषः । एकवचनत्वं तु प्रकृतिप्रत्ययसाधारणं ग्राह्यम् । तेन पूर्वश्रुतिद्वयान्तर्गतस्य "माया" "अविद्या", इत्येकवचनस्य, अजामेकामित्य- कपदस्य च ग्रहणम् । अयमाशयः-मायां, अविद्या, इत्यत्र प्रकृतिभूतमायागतंकत्व- प्रतिपादक 'सु' पदप्रयोगात, अजामेकामिति श्रुतौ मायात्मकविशेष्यगतैकत्व- प्रतिपादककामितिप्रयोगदर्शनाच्च मायायाः एकत्वं श्रुतिसिद्धम् । न केवलं श्रुति- सिद्धमेव मायाया एकत्वं अपि तु युक्तिसिद्धमपि ! तथा हि-एकस्यामेव मायायां स्वीक्रियमाणायां सकलकार्यनिवहि कृतं गौरवदूषितेन मायाबहुत्वेन इति । उपसंहरति- ततश्च तदुपहितं चैतन्यं तच्चेश्वरसाक्षि । - यतः प्रोक्तश्रुतिततिसिद्धा खलु एका माया ततः इत्यर्थः, तच्चत्यत्र चकारोs- वधारणार्थकः । तथा च तदेवेश्वरसाक्षीति तदर्थः । तस्येश्वरसाक्षिणः अनादित्वं साधयति- तच्चानादि तदुपाधिभूतमायाया अनादित्वात् । तत् = ईश्वरसाक्षि । अनादि = उत्पादास्यविकारज्जितम् । यतस्तस्यो- पाधिभूतायाः मायाया: अनादित्वं अजामेकामिति श्रुतिसिद्धम् । अयं माव:-उपधेय- स्यानादित्वं उपाधेश्च सादित्वमिति तूपलभ्यते, यथा कर्णशष्कुल्यवच्छिन्ननभ सः वेदान्तपरिभाषा। ७७ श्रोत्रत्वस्थले उपधेयस्य नभस: अनादित्वं उपाधिभूतायाः कर्णशप्कुल्याञ्च सादित्वम, परन्तु नात्र कोप्युपलभ्यते दृष्टान्तो यत् उपाधेरनादित्व उपधेयस्य च सादित्वमिति ! तथा उपाध्युपधेययोः सत्यपि समसामयिकनियमे उपधेयस्य उपाधिकालान्यूनकालस्थितिकत्वमावश्यकम् । अत: अनादित्वमीश्वर- साक्षिणः इति । ईश्वरतत्साक्षिणोर्भेदमाह- मायावच्छिन्नचैतन्यं च परमेश्वरः । चकारस्त्वर्थकः। तथा च न मायोपाधिकं चैतन्यं परमेश्वरः येन परमेश्वर- तत्साक्षिणोः पृथक् निर्देशानौचित्यशङ्का कस्यचित् स्यात् इति भावः । ननु ईश्वरतत्साक्षिणोरपि यदि परस्पर भेदः स्वीक्रियते तदा जीवेश्वरभेदो जीवब्रह्मभेदश्च दण्डापूपन्यायसिद्धः । तथा चापसिद्धान्तः इत्याशङ्कायामाह- मायायाः विशेषणत्वे ईश्वरत्वम्, उपाधित्वे साक्षित्वमितीश्वरत्व. साक्षित्वयोर्भेदः, न तु र्मिणोरीश्वरतत्साक्षिणोः । विशेषणत्वे = अवच्छेदकत्वे । ईश्वरत्वमित्यनन्तरं तस्यैव चैतन्यस्येति शेषः । उपाधित्वे - परिचायकमात्रत्वे । साक्षित्व तस्यैव चैतन्यस्येतिभावः । तथा च वस्तुतः एकमेव चैतन्यं तत्र मायानिष्ठावच्छेदकतानिरूपितावच्छेद्यत्वस्य, माया- निष्ठोपाधितानिरूपितोपधेयत्वस्य च धर्मद्वयस्य स्वीकारात् ईश्वरत्वेश्वरसाक्षि- त्वयोरेव परस्परं भेदः; तादृग्धर्मद्वयमादायैव ईश्वरः, ईश्वरसाक्षी, इति पृथक्- व्यपदेशः, इति नापसिद्धान्तः। जीवतत्साक्षिस्थलेऽपि इयमेव रीतिरनुसरणीया । - ननु उपाधितभूतायाः मायायाः एकत्वात् यथा ईश्वरसाक्षिणः एकत्वं तथा मायात्मकावच्छेदकैक्यात् लाधवानुगृहीतात् परमेश्वरस्याप्येकत्वमेव । सति चैवं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरासिद्धिः । तथा च तद्वोधकशास्त्राप्रामाण्यम् इत्याशङ्कायामाह- स च परमेश्वरः एकोऽपि स्वोपाधिभूत-मायानिष्ठ-सत्त्वरजस्तमो- गुणभेदेन ब्रह्मविष्णुमहेश्वरादिशब्दवाच्यतां भजते ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । स्वस्य उपाधिभूता या माया, तनिष्ठा ये सत्त्वरजस्तमोगुणाः तद्भदेन । शब्दवाच्यतायाः प्रत्येकमन्वयः। तथा च ब्रह्मशब्दवाच्यता विष्णुशब्दवाच्यतां महेश्वरशब्दवाच्यता भजते प्राप्नोति इत्यर्थः । एवं च एकस्मिन् एव परमेश्वरे मायागततत्तद्गुणदृष्टिमाश्रित्य ब्रह्मविष्ण्वादिपदव्यवहारः। ननु अत्र परमेश्वर- पदेन कि मायावच्छिन्नस्य ग्रहण उत मायोपाधिकस्य ? मायावच्छिन्नम्य ग्रहणे "तदुपाधिभूतमाया" इत्यत्र उपाधिपदप्रयोगानुपपत्ति: । अवच्छेदकपदव्यवहारी- चित्यात् । मायौपाधिकस्य ग्रहणे ईश्वरसाक्षिणः ब्रह्मविष्ण्वादिपदवाच्यतापत्तिः ईश्वरे च तद्व्ययवहारानुपपत्तिः इति चेन्न, साक्षिसंग्रहायवोपाधिपदप्रक्षेपाता अयं भावः-चैतन्यावच्छेदकीभूतमायावयवगुणगतोत्कर्ष दृष्टिविषयीकृत्य यथा मायावच्छिन्नचैतन्ये ब्रह्मविष्णवादिपदव्यवहारः तथा चैतन्योपाधिभूतमायवयव- गुणगतोत्कर्षे दृष्टिमुपक्षिप्य ईश्वरसाक्षिण्यपि ब्रह्मविष्वादिपदव्यवहारः इष्ट एव । अत एव न प्रकृते परमेश्वोधभूतेतिपदप्रयोगविरोधावकाशः । प्रतिपादितमीश्वरतत्साक्ष्यनादित्व समाक्षिपति- - नन्वीश्वरतत्साक्षिणोरनादित्वे "तदक्षत बहु स्यां प्रजायेयेत्यादौ सृष्टिपूर्वसमये परमेश्वरस्यागन्तुकमीक्षणमुच्यमानं कथमुपपद्यते ? तत् - ब्रह्म, ऐक्षत ईक्षणं चक्र । ईक्षण । ईक्षण = संकल्पः । तथा च संकल्पं कृतवदित्यर्थः । सकल्पाकारो "बहु स्या प्रजायेय" इति । प्रजायेय इत्यस्य प्रकर्षणोत्पद्य य इत्यर्थः । अयमभिप्रायः जीवसाक्षीश्वरसाक्षिभेदेन प्रत्यक्षं द्विविधमिति प्रतिपादित पूर्वम् । तथा च साक्षित्वं प्रत्यक्षगतो धर्म इति प्रत्यक्षमेव साक्षीति फलितम् । तदक्षत इति श्रुतौ ईक्षणं प्रत्यक्षरूपमेव वक्तव्यम्, भगवत: परोक्षज्ञानासम्भवात् । तदेव च प्रत्यक्षं ईश्वरसाक्षीति प्राप्तम् । उपाधिभूतायाः मायायाः अनादित्वात् यदि तस्यानादित्वमभ्युतेत तदा प्रपञ्चव्याकरणत्पूर्व तत् सतं ब्रह्म ईक्षणं प्रत्यक्ष कृतवत् इत्यर्थकस्य तदैवत इति श्रुतैः कथं प्रामाण्यम् ? अनादिकर्मककरणासम्भवात् । उक्तश्रुतेर्वा प्रामाण्याभ्युपगमे कथं साक्षि अनादित्वाभ्युपगमसंगतिः ? इति । समाधत्त- यथा विषयेन्द्रियसन्निकर्षादिकारणवशेन जीवोपाध्यन्त:- करपस्य वृत्तिभेदा जायन्ते, तथा सृज्यमानप्राणिकर्मवशेन परमेश्वरो- वेदान्तपरिभापा। ७९ पधिभूतमायायां वृत्तिविशेषाः इदमिदानी स्रष्टव्यं इदमिदानी पाल- यितव्यं इदमिदानी संहर्त्तव्य इत्याद्याकारा जायन्ते । तासां च वृत्तीनां सादित्वात् तत्प्रतिबिम्बित चेतन्य सादीत्युच्यते । । परमेश्वरोपाविभूतमायायां इदमिदानी स्रप्टव्यं इदमिदानी पालयितव्यं इदमिदानी सहर्तव्य इत्याकाराः वृत्तिविशेषाः जायन्ते इत्यन्वयः । सादीत्युच्यते इत्यनन्तरं तदैक्षत इति श्रुत्येति शेषः । वृत्तिविशेषा परिणामभेदाः । वृत्ते. स्वरूपं प्रदर्शितं इदमिदानीमित्यादि । अयमभिप्रायः-सत्यं तदक्षत इति अतिप्रतिपाद्यमीक्षणं प्रत्यक्षरूपतया साक्षिरूपमेव । साक्षिणश्च मायोपाधिक-नित्यचैतन्यरूपतया यदनादित्वं पूर्वमुक्तं तदपि स्थिरसत्यमेव । किन्तु ईक्षणं कृतवत् इत्यथिकायाः "तक्षत" इति श्रुतेस्त्वितो नाप्रामाण्यं यतः सा "ऐक्षत" इत्यनेन भूतस्य चैतन्यस्य न साविता प्रतिपादयति, अपि तु उपाधिभूतायाः मायायाः तस्याः ये इदमिदानी सृष्टव्यं इत्याधाकाराः परिणामप्रभेदाः तेषामेव सादिताम् । तथा चायं सरलार्थः मायोपाधिकचैतन्यं साक्षीत्यस्य वृत्तिमन्मायोपाधिकचैतन्यं साक्षीत्यर्थः । तत्र वृत्ते.-सादित्वे एव श्रुतिः तात्पर्यवती, न तु चैतन्यस्य सादित्वे । नातः श्रुतेरप्रामाण्यशङ्कापि । ननु सृष्टिप्राक्काले सृष्टव्यपदार्थाभावेन 'इदमिदानी स्ष्टव्यम्' इत्याकारकवृत्तेः कय सम्भवः, अविद्यमानपदार्थाना इद- मोऽविषयत्वात् ? कालस्यापि च तदानी सृष्टव्यतया कथमिदानीमित्यपि प्रतीतिः ? इति चेत् न, आरम्भवादस्याश्रौततया प्रश्नानवकाशाद् अयमभिप्रायः न खलु वेदान्तसिद्धान्ते सृष्टिः अपूर्वोत्पत्तिख्या, अपि तु अव्याकृतस्य व्याकराणम् तथा च सूक्ष्मतयाऽवस्थितपदार्थमावाय तथावृत्त्युदये दोषामावः इति । उपसंहरति- एवं साक्षिभेदेन प्रत्यक्षज्ञानद्वैविध्यम् । प्रत्यक्षत्व' च ज्ञेयगतं ज्ञप्तिगतं च निरूपितम् । तत्र ज्ञप्तिगतप्रत्यक्षत्वसामान्यलक्षणं चित्त्वमेव । -- प्रत्यक्षसामान्यलक्षणजिज्ञासानिवृत्त्यर्थमुक्त तत्र ज्ञप्तीत्यादि। अयमभिप्रायः- "यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म" इति श्रुत्या ब्रह्म व ज्ञप्तिस्तं प्रत्यक्षमित्यनाविलम् । सच्चिदानन्दात्मके ब्रह्मणि चित्त्वं निराबाधमेवेति चित्त्वमेव ज्ञप्त्यात्मक-प्रत्यक्षस्य सामान्यलक्षणमिति ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ननु चित्त्वमेव यदि प्रत्यक्षत्व तदा पर्वतो वह्निमान् इत्यनुमितावतिव्याप्तिः । परोअज्ञानात्मकानुमितेरपि चिद्रूपतया चित्त्वस्य तत्राऽपि सत्वात् इत्याशङ्का- निरासायाह- पर्वतो वह्निमान् इत्यनुमितावपि वह्नयाद्याकारत त्त्युपहित- चैतन्यस्य स्वात्माशे स्वप्रकाशतया प्रत्यक्षत्वात् । वह्न याद्याकारा या वृत्तिः, तया उपहितं यच्चैतन्य तस्य । स्वात्मांशे इत्यत्र आत्म- पदग्रहण त्वस्य स्वरूपज्ञानत्वद्योतनाय । तथा च तस्य लक्ष्यत्वव्यञ्जनम् अयमभिप्रायः यत्र पर्वतो वह्निमानित्याद्यनुमिती अतिव्याप्तिमापादयसि, तां त्वं पतित्वेनामिप्रेषि वृत्युपहितचैतन्यत्वेन वा ? आये वृत्तेरपि जडतया विषयत्वे जप्त्यात्मक-विषय-धर्मस्य चित्त्वस्य तत्रामावाद् अतिव्याप्त्यभावेन पर्यनुयोगा- सम्भवः । द्वितीये पर्वतो वह्निमानितिवह्न यद्याकारवृत्त्युपहितचैतन्यस्यापि ज्ञप्ति- पदार्थतया लक्ष्यत्वेन तत्र चिस्वात्मकलक्षणगमनं समुचितमेवेति सर्वथा वोषानवकाशः। ननु वह्नयाकारवृत्तेः विषयत्वे इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यज्ञानविषयत्वस्वरूप- विषयगतप्रत्यक्षलक्षणस्याव्याप्तिः, स्वोपहितचैतन्यनिष्ठविषयितानिरूपितविषय- त्वस्य तत्र सत्त्वेऽपि स्वोपहितस्य चैतन्यस्य इन्द्रियार्थसन्निकर्षाजन्यत्वेन तादृश- ज्ञानविषयत्वस्य वृत्तावभावात् इत्यत आह- तत्तद्विषयप्रत्यक्षत्वं तु पूर्वोक्तमेव । अयमभिप्रेतीर्थ:-न खल्वस्मन्मते विषयगतप्रत्यक्षत्वमिन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य- ज्ञानविषयत्वम् अपि तु प्रमात्रमेवः । स च प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वामावरूप इति प्रतिपादितमेव । एव च वृत्तेरपि स्वावच्छिन्नचैतन्य एवाध्यस्ततया पृयक्सत्तायाः अस्वीकारात् प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावस्य अनुमित्यात्मक- वृत्तौ सत्त्वात् न विषयगतप्रत्यक्षत्वहानिः । न चैवं सति वृत्तौ पारोक्ष्यापारोक्ष्य- व्यवस्थानुपपत्तिः, एवं क्रमेण सर्वत्र वृत्तौ आपरोक्ष्यसम्भवेनपारोक्ष्यस्य कुत्राप्य- भावात् इति वाच्यम् । अनुमित्यादौ वृत्त्यंशे प्रत्यक्षत्वसत्त्वेऽपि वह्नयादिविषयांशे परोक्षत्वसत्त्वेन परोक्ष्यव्यवहारोपपत्तेः। तथा हि-वृत्ती विषयांशे प्रत्यक्षत्वं नाम प्रमाणचैतन्यस्य विषयचैतन्याभेदः । तादृशाभेदे प्रयोजकं च चैतन्यावच्छेदकयोरेक- प्रत्यक्षपरिच्छेदः । देशस्थत्वम् । वह्नयाद्यनुमितिस्थले चक्षुरादिद्वारकवृत्तिनिर्गमद्वारा अन्तःकरणा- वच्छिन्नचैतन्यात्मकप्रमाणचैतन्यावच्छेदकीभूतान्तःकरणवृत्त: वहिर्देशागमनेन चैतन्यावच्छेदकयो: अन्तःकरणवृत्ति-वह्नयोः एकदेशस्थत्वाभावेन न प्रमाणचैतन्य- वह्निचैतन्याभेदः । अत एव न वह्न यशेऽनुमित्यात्मकवृत्तेरपरोक्षत्वमपि तु परोक्ष- त्वमेवेति । न चैकस्यां वृत्तावशकल्पनानुपपत्तिः, पर्वतो वह्निमानित्यादौ पर्वतांशेऽपरोक्षत्वस्य वह्न यशे परोक्षत्वस्य सम्पादनाय वृत्तिद्वयस्वीकारात् । तथा चायं सरलार्थः-बैह्न यनुमितिशब्दस्य वह्नयाकारवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यमर्थः । तत्र चतन्याशे चित्त्वरूपं प्रत्यक्षत्वम् वृत्त्यशे प्रमातृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावात्मकं प्रत्यक्षत्वम् । बह्न यशे च प्रमाणचैतन्यनिष्ठविषयचैतन्याभेदात्मकस्य "विषयांशे प्रत्यक्षत्वस्य" अभावेन परोक्षत्वमिति सर्व समञ्जसम् । नन्वेवमपि चित्त्वमेव यदि प्रत्यक्षलक्षणं. तदा भ्रान्त्यवच्छिन्नचैतन्येऽतिव्याप्तिः । चित्त्वस्य तत्रापि सत्त्वात् इत्याशङ्कामिष्टापत्त्या परिहरति- च भ्रान्तिमूलप्रत्यक्षेऽतिव्याप्तिः । भ्रमप्रमासाधारण- प्रत्यक्षसामान्यनिर्वचनेन तस्यापि लक्ष्यत्वात् । - अस्य - लक्षण- अस्येत्यस्य चित्त्वलक्षणस्येत्यर्थः । भ्रान्तिमूलत्वं भ्रान्त्यध्यासाधिष्ठानत्वम् । तथा च भ्रान्तिमूलप्रत्यक्षे इत्यस्य भ्रान्त्यवच्छिन्नचैतन्ये इत्यर्थः । भ्रमप्रमयोः साधारणं यत् प्रत्यक्षं चैतन्यं तत्सामान्यस्य निर्वचनेन इत्यर्थः । अयं भाव:- चित्त्वमितिलक्षणं न चैतन्यविशेषस्य अपि तु चैतन्यसामान्यस्य । तथा च प्रमावच्छिन्नचैतन्यमिव भागवतन्यमपि लक्ष्यमेव । अतस्तत्र समन्वयो युक्त एवेति नातिव्याप्तिशङ्काबकाशः । केचितु "भ्रान्तिरूपप्रत्यक्षे" इति पाठ स्वीकृत्य भ्रान्तावतिव्याप्तिमाशंक्य प्रकृतग्रन्थं संगमयन्ति । मनोरमम् । अव्यवहितपूर्वमेव "वृत्युपहितचैतन्यस्य स्वात्मांशे स्वप्रकाशतया प्रत्यक्षत्वात्" इत्यनेन चित; स्वप्रकाशत्ववर्णनेन, वृत्तश्च जडतया जडाया भ्रान्ति- वृत्तौ चित्त्वगमनासम्भवेनातिव्याप्तिदानस्य, इष्टापत्त्या तत्परिहारस्य चासङ्गत्या- पत्त: । अन्ये तु अस्य स्थाने तस्येतिपाठमुपकल्प्य विषयांशप्रत्यक्षलक्षणस्या- हलिमिष्टापत्त्या तत्परिहारं चोपवर्णयन्ति । तदपि न समञ्जसम् । यतः प्रमाण- चैतन्यस्य विषयचैतन्याभेद इत्येव तल्लक्षणम् । रूप्यादिभ्रमस्थले वाह्यदेशे रूप्याद्यभावेन अन्त:करणस्य तदाकारवृत्त्यसम्भवेन तादृशवृत्तिरूप्ययोरेकदेश- स्थत्वाभावेन प्रयोजकाभावात् नावच्छेद्यभूतचैतन्ययोरभेदसम्भव इति क्व लक्षणा- ५२ वेदान्तपरिभाषा। तिव्याप्त्यवकाशः ? प्रातिभासिकरूप्योत्पत्तावपि अविद्यावृत्त्यैव तस्य ग्रहणम् अतो नान्त:करणस्य तदाकारा वृत्तिः। तदाकारान्तःकरणवृत्यभावे च न कथमपि विषयांशप्रत्यक्षत्वसम्भावनेति। यद्वा प्रमात्रभेदात्मक-विषयगत-प्रत्यक्षलक्षणस्यातिव्याप्ति मनसि निधाय परिजहार ग्रन्थकारः अस्य चेत्यादिना । अयमाशयः-भ्रान्तेरपि साक्षिणा विषयी- करणेन विषयगतप्रत्यक्षत्वं तत्रापीष्टमेव । ननु नास्माभिः चित्त्वलक्षणस्य न वा विषयगतप्रत्यक्षत्वलक्षणस्य नहि वा विषयांशे प्रत्यक्षत्वलक्षणस्यातिव्याप्तिरापाद्यते अपि तु तद्वतितत्प्रकारकत्वस्वरूप- प्रमालक्षणस्य । भवन्मते भ्रमस्थलेपि रजतादिविषयोत्पादस्वीकारेण तद्वति- तत्प्रकारकत्वस्य तत्रापि सुसम्पादत्वात् इत्याशंकां अबाधित्वघटितं पूर्वोक्त- प्रमालक्षणमुपस्थाप्य वारयति- यदा तु प्रमाया एव लक्षणं वक्तव्यं तदा पूर्वोक्तलक्षणे अबाधि- तत्व विषयविशेषणं देयम् । वक्तव्यमित्यनन्तरं भ्रान्तिवारणायेति शेषः । तथा चायं भाव:-न खलु मया प्रत्यक्षप्रमालक्षणं तद्वति तत्प्रकारकत्वं अनधिगतार्थविषयकज्ञानत्वमात्र वा प्रोच्यते, येनापत्तिः केनाऽप्यापादिता स्यात् । किन्तु अनधिगताबाधितार्थविषयकज्ञानत्वम् । भ्रमस्थले रूप्योत्पादेऽपि तस्य बाधिततया, अबाधितत्वाभावेन इदं रूप्यमिति भ्रमे अबाधितार्थविषयकज्ञानत्वाभावेन नातिव्याप्त्यवकाशः । ननु किं नाम अबाधितत्वम् ? तस्य बाधितत्वाभावरूपत्वे हट्टस्थरूप्यादेरपि ब्रह्मज्ञानबाध्यतया बाधितत्वेन हट्टस्थरजतविशेष्यकेदंरजतमितिप्रमायाम- व्याप्तिः तत्रानधिगताबाधितार्थविषयकज्ञानत्वाभावात् इत्याक्षेपनिरासाय हेतुभङ्गया आह- शुक्तिरूप्यादिम्रमस्य संसारकालीनबाधविषयप्रतिभासिकरजतादि- विषयकत्वात् । शुक्तिरूप्यादेः भ्रमः शुक्तिरूप्यादिभ्रमः, तस्य । संसारकालीनो यो बाधः तादृशबाधविषयो यः प्रातिभासिकरजतादिः तविषयकत्वादित्यर्थः ।
प्रक्षत्यपरिच्छेदः । ८३ अयमाशयः-अनधिगताबाधितार्थविषयकज्ञानत्वं प्रमात्वमिति प्रमालक्षणे अबाधितत्वं नाधिगतत्वसामान्याभाववत्त्वम् अपि तु ब्रह्मज्ञानेतराबाध्यत्वरूपं संसारकालीन- बाधाविषयत्वम् । शुक्तिरूप्यादेः ब्रह्मज्ञानेतरेण नेदं रजतमिति वृत्तिज्ञानेन बाधात् संसारकालीन-बघ एमादेन अवाधितत्वामा रजतमिति भ्रमे अबाधितार्थविषयकत्वाभावेन अतिव्याप्त वसर इति । अन्यथाख्यातिवादी शङ्कते- ननु विसम्वादिप्रतीत्या भ्रान्तिज्ञानसिद्धावपि तस्य प्रातिभा- सिकतत्कालोत्पन्न रजतादिविषयकत्वे न प्रमाणम् देशान्तरीयरजतस्य क्लुप्तस्यैव तद्विषयत्वसम्भवात् । विसम्वादिनी या प्रवृत्तिः तया । प्रवृत्तौ विसम्बादित्वं निष्फलत्त्वम् । भ्रान्ति- रेव ज्ञानं भ्रान्तिज्ञानं तस्य या सिद्धिः, तस्याम् । तस्य = भ्रान्तिज्ञानस्य प्रातिभासिको यः तत्कालोत्पन्नो रजतादिः, तद्विषयकत्वे । क्लृप्तस्य = निश्चितस्य । तद्विषयत्वसम्भवात् भ्रान्तिविषयत्वसम्भवात् । प्रातिभासिकत्वं - प्रति- भाससिद्धत्वम्, प्रतीतिबलेन स्वीक्रियमाणत्वम् । अयमाशयः-प्रामाकराः यद्- ज्ञानमात्रस्य यायायं मन्यन्त तत्तु न युक्तिसिद्धम्, कार्यवैजात्यात् । तथा हि हट्टस्थरजते "इदं रजतम्" इति ज्ञानं कृत्वा तद्ग्रहणाय प्रवृत्तो रजतार्थी प्राप्नोति रजतं राजतपात्रादिनिर्माणयोग्यम् । परन्तु शुक्तौ रजतमिति ज्ञानं कृत्वा तद्ग्रहणाय प्रवृत्तो रजतार्थी नासादयति रजतं पात्रादिनिर्माणयोग्यम् । इति समानाकारके इदं रजतमिति ज्ञानद्वये अवश्यं किञ्चित् वलक्षण्यं मन्तव्यम् कथमन्यथा भवेत् तज्जन्यायां प्रवृत्तौ साफल्यवैफल्यात्मकं लक्षण्यम् ? एवं- रूपेणास्तु सिद्धिान्तिज्ञानस्य । परन्तु प्रतीतिसमकालं व्यावहारिकेतररजतो- त्पादकल्पनस्य का आवश्यकता? शुक्तौ जायमानमिदं रजतमिति ज्ञानं पूर्वाव- गतहट्टा विदेशस्थरजतमेवावगाहताम् इति अन्यथा ख्यात्यैव निर्वाहे नाङ्गीकार्या खल्वनिर्वचनीयख्यातिरिति सरलार्यः। उत्तरयति- इति चेन्न । तस्यासनिकृष्टतया विषयत्वायोगात् । तस्य - हट्टदिदेशान्तरस्थरजतस्य । तदानीमित्यादिः, तेन कालान्तरे सनिकृष्टत्वेऽपि न क्षतिः । असन्निकृष्टतया=सनिकर्षानाश्रयतया । अयोगोऽभावः ।
८४ वेदान्तपरिभाषा । तथा च प्रत्यक्षविपयत्वाभावादित्यर्थः । अयममिप्रायः-प्रात्यक्षिकी विषयता सन्नि- कर्षव्याप्या भवति । व्यापकाभावे च न कथमपि व्याप्यमुपस्थातुमुत्सहते । शुक्तौ यदा इदं रजतमिति विभ्रमो न तदेन्द्रियेण चक्षुषा सह संयोग-संयुक्त्त- तादात्म्यादिकः सन्निकर्षों देशान्तरवत्तिनो व्यावहारिक-रजतस्यास्तीति कथं हट्टादिदेशान्तरस्थं रजतं तादृशेदं रजतमितिप्रतीतिविषयतामासादयेत् ? भवति च प्रतीतिः रजतस्य, इत्यगत्या प्रातिमासिकरजतोत्पादो ध्रुवमङ्गीकार्यः। यदि यात् मास्तु रजतभानम् रजतत्वेन शुक्तिकायाः भाने किं बाधकम् ? तदाप्येवमेव प्रतिवक्तव्यं यद् रजते चक्षुस्संयोग विना रजतत्वेऽपि सयुक्ततादात्म्यात्मक: सन्नि- कर्षः असम्भूत एवेति तुल्ययुक्त या सन्निकर्षाभावात् रजतत्वभानमपि न वक्तुं शक्यम् इति। ननु दूरस्थचन्दनखण्डे यत् चक्षुषा सुरभि चन्दनमिति ज्ञानं जायते तत्र सौरभेण सह चक्षुष: संयोगादिसन्निकर्षाभावेऽपि यथा सौरभ-स्मरणात्मक-ज्ञान- लक्षणसन्निकर्पण चाक्षुषं प्रत्यक्षं सौरभस्य सम्भवति, चाक्षुषप्रत्यक्षविषयता सौरभे समायाति, तथा भ्रमस्थलेऽपि रजतस्मरणात्मक-सन्निकर्षवलात् हट्टस्थरजतभानं कथं न स्यात् ? इत्याशङ्कामपनयति- न च ज्ञानं प्रत्यासत्तिः ज्ञानस्य प्रत्यासत्तित्वे तत एव वह्नयादेः प्रत्यक्षत्वापत्तो अनुमानाधुच्छेदापत्तेः । प्रत्यासत्तिः = सन्निकर्षः । तत एव = ज्ञानात्मकसन्निकर्षादेव । उच्छेदो विलोपः । अयमाशयः-ज्ञानस्य सन्निकर्षत्वं न स्वीकर्तुमर्हम् । ज्ञानस्य सन्निकर्ष- तायां अनुमानादीनां प्रामाण्यामावप्रसङ्गात् । तथा हि पर्वतो वह्निमानित्यनुमिति:- स्थले, पर्वतदर्शनात् धूमवर्शनाद्वा वह्निविषयक-संस्कारोबोधे वहिस्मरणस्य स्वाभाविकतया, तादृशस्मरणं सन्निकर्षीकृत्य बतिप्रत्यक्षस्यैव चक्षुषा सम्भवात् अनुमानप्रमाणस्वीकारस्याप्रयोजनकत्वापा.: । न केवलमनुमानस्यव, एवं क्रमेण शब्दावीनामपि प्रमाणानाम् । ननु सुरभि चन्दनमित्यत्र का गतिरिति चेत्, न खल्वस्माभिः तादृशस्थले सौरभे प्रात्यक्षिकी विषयता स्वीक्रियते । सौरभस्मरण- चन्दनखण्डचाक्षुषयोस्तत्र स्वीकारात् । न च तहि-शुक्तौ जायमाने इदं रजतमिति भ्रमेऽपि सैव पद्धतिरस्तु । तत्रापि ज्ञानद्वयकल्पने बाधकाभावात् इति वाच्यम् । रजतमहमद्राक्षमित्यनुभवविरोधभयात् तत्र तथा वक्तुमशक्यत्वात् । सुरभि चन्दन- मिति स्थले तु सौरभांशे तथानुभवाभावेन ज्ञानद्वयकल्पने बाधकाभावात् । न चेन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षमिति प्रत्यक्षलक्षणास्वीकर्तृवेदान्तिभवने किं नाम प्रत्यक्षपरिच्छेदः। प्रयोजनं सन्निकर्ष स्य ? चक्षुषो रजतसन्निकर्षाभावेऽपि कथं न रजतस्य भ्रमात्मक प्रत्यक्षमिति शङ क्यम् । सन्निकर्षाभावे इन्द्रियप्रणालिकया विषयपर्यन्तमन्त.करणस्य गमनासम्भवेन विषयाकाराकारितारूपायाः तद्वृत्तेरनुदयेन, अन्त:करणवृत्त्यवच्छिन्न- चैतन्यस्य विषयचंतन्याभेदासम्भवेन विषयाशे प्रत्यक्षलक्षणस्यासम्भवापातात् । अथासम्भवेन भ्रमस्थले रजताद्युत्पत्तिमाक्षिपति- ननु रजतोत्पादकानां रजतादीनामभावे शुक्तौ कथ तवापि रजतमुत्पद्यते ? तवापि शुक्तो रजतं कथमुत्पद्यते इत्यन्वयः। तवापीत्यत्र मध्ये "मते" इति शेषः । तथा च तवापीत्यस्य तव वेदान्तिनो मतेपीत्यर्थः । अयमाशयः-कपालाभ्यां घटः, तन्तुभिः पटः उत्पद्यते इति सार्वजनीनानुभवो न भवद्भिरप्यन्ययितुं शक्यः । तथा चावयविद्रव्यं प्रति अवयवद्रव्यस्योपादानत्वमवश्यं मन्तव्यम् । शुक्तिषु इदं रजतमिति भ्रमस्थले रजतसामान्याभावेन, अवयवभूतरजताभावेन, अवयविभूतरजतोत्पादः कथं शक्यो वक्तुमिति । उत्तरयति- - इति चेत् उच्यते । न हि लोकसिद्धसामग्री प्रातिभासिकरजतोत्पा- दिका । अपि तु तद्विलक्षणव । लोक्यते अवलोक्यते इति लोको व्यवहारः ततः तस्मै वा सिद्धा या सामग्री । यद्वा लोक्यते इति लोक: फलं कार्य घटादि वस्तु, तदर्थ सिद्धिः अपेक्षा यस्या. सा लोकसिद्धा सामग्री। सामग्री फलोपधानवत् कारणकूटम् । प्रातिभासिकं यद्रजतं तदुत्पत्तौ । प्रतिभास: प्रतीतिः, तत्सिद्धः प्रातिभासिकः । प्रातीतिक इति यावत् । रजतपदं वस्तुमात्रोपसंग्राहकम् अतो न न्यूनता । अयमभिसन्धिः-आहरणादितत्त- क्रियासमर्थवस्तुनिष्पादनाय या अपेक्ष्यते लोकः सामग्री, नापेक्षिता सा प्रातीतिका- व्यावहारिकमागिकवस्तूत्पत्तो, यतः औचित्यमावहवयमाक्षेपो यदवयवामावे कथमवयव्युत्यत्तिरिति । अवयव्युत्पत्ती अवयवप्रयोजनमस्माभिरप्यभ्युपगम्यते । किन्तु प्रातिमासिकं तु रजतं नावयवि यतस्तत्र भवेत्प्रयोजनमवयवस्य । किञ्च व्यावहारिकवस्तूत्पत्तौ अवृष्टद्वारा प्राणिविशेषस्यैव भवति निमित्तत्वम् न तु ८६ वेदान्तपरिभाषा। मामान्येन सर्वेषां प्राणिनाम् । प्रातीतिकवस्तूत्पत्तौ तु सर्वेषां प्राणिनां निमित्तत्व- योग्यत्वमिति महद्वलक्षण्यं व्यावहारिक-प्रातीतिक कार्ययोः। सति चैवमुपादान- वलक्षण्यमपि स्वामाविकमेवेति न व्यावहारिकोपादानावयवापेक्षा प्रातीतिक- वस्तूत्पत्ताविति निगूढाशयः । विलक्षणव = लोकसामग्रीभिन्नव । । ननु का तहि प्रातीतिकवस्तूत्पादप्रणाली ? इत्यत आह- तथा हि काचादिदोषदूषितलोचनस्य पुरोवृत्तिद्रव्यसंयोगादिदमा- कारा चाकचिक्याकारा च काचिदन्तःकरणवृत्तिरुदेति । तस्यां च इदमवच्छिन्नचैतन्यं प्रतिबिम्बते । तत्र पूर्वोक्तरीत्या वृत्तेर्बहिनिर्गमनेन इदमवच्छिन्नचैतन्यं वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यं प्रमातृचैतन्यं चाभिन्न भवति । ततश्च प्रमातृचैतन्याभिन्न-विषयचैतन्यनिष्ठा शुक्तित्वाऽवरिका ऽविद्या चाकचिक्यादिसादृश्यसन्दर्शनसमुद्रोधितसंस्कारसधीचीना काचादि- दोषसमवहिता रजतरूपाकारेण रजतज्ञानाभासाकारेण च परिणमते । " काचादिरेव दोषः, तेन दूषित लोचनं यस्य, तस्य पुरोवृत्ति यत् द्रव्यं शुक्त्यादि तेन सह संयोगात् । तथा च सदोषेन्द्रियविषयसन्निकर्षात् इत्यर्थः । काचिदित्यनेन वृत्तिगतैकत्वव्यञ्जनम् । आकारो विषयित्वम् तथा च इदंनिष्ठविषयतानिरूपित- विषयितावती चाकचिक्यनिष्ठविषयतानिरूपितविषयितावती च "चाकचिक्य- वदिदम्" इयं वृत्तिः उदेति = सम्पद्यते । पूर्वोक्तरीत्या एतस्म "अभिन्नं भवति" इत्यनेन सम्बन्धः । पूर्वोक्तरीति: = अवच्छेद्यचैतन्याभेदप्रयोजकं अवच्छेदकक- देशस्थत्वमिति नियमः । चाकचिक्यादिसादृश्यसन्दर्शनसमुद्रोधित-संस्कारसध्रीचीना, काचादिदोषसमवहिता, प्रमातृचैतन्याभिन्नविषयचैतन्यनिष्ठा शुक्तित्वावरिका अविद्या रजत रूपाकारेण रजतज्ञानाभासाकारेण च परिणमते इत्यन्वयः । प्रमातृचैतन्याभिन्नं यद्विषयचैतन्यं तनिष्ठा इत्यर्थः । शुक्तित्वमावृणोति इति शुक्तित्वावरिका । चाकचिक्यादिरूपं यत् सादृश्यं तस्य यत् सन्दर्शनं = प्रत्यक्ष तेन समुद्वोषितो यः सस्कारः, तत्सध्रीचीना - तत्साहाय्यमादधाना इत्यर्थः । काचादिरेव दोष: तत्समवहिता तयुक्ता इत्यर्थः । रजतरूपो योऽर्थः = विषयः तदाकारेण = तेन रूपेण । रजतस्य यः ज्ञानाभासः आभासभूतं ज्ञानम्, फलतः भ्रान्तिज्ञानम्, तदाकारेण = तेन रूपेण । चः समुच्चये । परिणमते - परिणत - - प्रत्यक्षपरिच्छेदः। ८७ भवति । तथा च काचाविदोषः, रजतादिविषयकसमुद्धसंस्कारः, शुक्तिवाद्य- ज्ञानमिति त्रितयमेव ईश्वरेच्छाविसचिव विलक्षणसामाग्री, यया भवति खलु समुत्पत्तिः शुक्तिरजतादिभ्रान्तिज्ञानस्य तद्विषयशुक्तिरजतादेन इति सामग्र्यां अज्ञानं परिणाम्युपादानम्, शुक्त यवच्छिन्नचैतन्यं वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्य- प्रमातृचैतन्याभ्याममेव नुपगत आरोपाधिष्ठानोपादानम्, अन्यच्च प्रोक्तं सर्व- निमित्तभूतमित्यवगन्तयम् । समुच्चयार्थकेन चकारेण रजत-तज्ज्ञानाभासाकार- परिणत्योः समसामयिकत्वं द्योतितम् । रजतमित्युपलक्षणम्, तेन सर्वत्र भ्रान्तिज्ञानस्थले इयमेव रीतिरवगन्तव्या। ननु परिणमते इत्युक्तम्, तत्र को नाम परिणामशब्दार्थ: ? इत्यत आह- परिणामो नामोपादानसमसत्ताककार्यापत्तिः । "नाम" इति वाक्यालङ्कारे। उपादानेन समाना सत्ता यस्य, तदुपादानसम- सत्ताकम् । तादृक् यत् कार्य, तस्याः आपत्तिः - अभिव्यक्तिः । उपादानं-परिणामि, अधिष्ठानाज्ञानमित्यर्थः। अयमाशयः-यावदेव शुक्तित्वाज्ञानं तावदेव शुक्तिरूप्यं तज्ज्ञानामासश्च तिष्ठति, इति निरूक्ताज्ञानात्मकपरिणामिनः शुक्तिरूप्यादेः परिणामस्य च अस्तित्वरूपा सत्ता समानव । ननु मृद्धटादौ व्यभिचारः तत्र मृद्धटयोः समसामायिकत्वाभावात् इति चेन्मैवम् । न वयमारम्भवादिनो यदेवं स्यादभियोगः । कुलालव्यापारात्पूर्व मुद्गरपाताद्यनन्तरमपि च अनभिव्यक्तरूपेण घटस्य विद्यमानतया समसामयिकत्वाभावाभावात् । यद्वा त्रिविधा सत्ता पारमार्थिकी व्यावहारिकी प्रातिभासिकी च । तत्र पारमार्थिकी ब्रह्मणि, व्यावहारिकी घटादिपु प्रातिभासिकी शुक्तिरूप्यादिषु । एवं च मृद्धटयोरुभयोः व्यावहारिकसत्ताश्रयतया समसत्ताकत्वम् । एकविषयकस्याप्यज्ञानस्य बहुत्वाभ्युपगमपक्षे शुक्तित्वाज्ञानशुक्ति- रूप्ययोः तद्भ्रान्तिप्रतिभाससमयमात्रवृत्तितया तयोरपि समसत्ताकत्वमिति न व्यभिचारावकाशः रजतावयवशुक्तिरूप्योः, शुक्तित्वाज्ञानहट्टस्थरजतयोः ब्रह्मघटयोः, ब्रह्मशुक्तिरूप्ययोर्वा न समसत्ताकत्वमिति न तत्र तत्र परिणामपरिणा- मिभाव: । ननु समसत्ताकत्त्वं यदि परिणामपरिणामिभावप्रयोजकं मन्यते तदा वैप- रीत्यमपि स्यात् । परिणामस्य परिणामित्वं परिणामिनश्च परिणामत्वमपातेत् । घटपटाद्योरपि वा तद्भावापत्ति: स्यादिति चेन्न । न खलु समसत्ताकत्वे परिणाम- परिणामिभावव्याप्यत्वमभ्युपगम्यते येनैवं स्यात् । अपि तु तद्यापकत्वम् । तथा च ययोर्न समसत्ताकत्वं न तयोः परिणामपरिणामिभावः इत्येव नियमः समायाति, ।
वेदान्तपरिभाषा। नु यत्र यत्र समसत्ताकत्त्वं तत्र तत्र परिणामपरिणामिभाव इति। तथा च नोक्त- दोपावकाशः । वस्तुतस्तु कार्ये विद्यमानमुपादानसमसत्ताकत्व परिणामः । उपादानसमसत्ता च उपादानान्यूनसत्तारूपा न विवक्षितेति न प्रोक्तप्रश्नावकाशः । उपादेयत्वस्य परिणामविवत्तॊभयसाधारणतया स्मृतिविषयत्वेन, उपेक्षानहत्वेन च विवर्त्तमुपदिशति- विव? नामोपादानविषमसत्ताककार्यापत्तिः । उपादानं - अध्यासाधिष्ठानम् । वैषम्यं विरोधः । आपत्तिपदं सम्पाता- पातम् । तथा च आरोपाधिष्ठानगतसत्ताविरुद्धसत्तावत्कार्यमेव विवर्त इति फलितम् । यथा ब्रह्म उपादानम्, घटादिको विवर्तः, उभयगतसत्तयोस्तु न सामा- धिकरण्यम् । ब्रह्मणि पारमार्थिकसत्तायाः, घटादौ च व्यावहारिकसत्तायाः सत्त्वात् । यद्वा ब्रह्मणि अधिकसत्तायाः, घटादौ च ततो न्यूनसत्तायाः विद्यमानत्वात्। एवञ्च उपादानभूतब्रह्मसत्ताविषमसत्ताककार्यपदेन घटादेर्ग्रहणात् लक्षणसमन्वयः । विवर्त्तत्व कार्यत्वसमनियतमवज्ञेयम्, तेन प्रातिभासिकेऽपि विवर्त्तत्वम् इति ननु परिणामत्वविवर्त्तत्वयोः यदि समनियतत्व कृतमुभयोः भेदस्वीकारेण व्यर्थगौरवान् इत्यत आह- प्रातिभासिकं रजतन्त्वविद्यापेक्षया परिणाम: चैतन्यापेक्षया विवर्त्त इति चोच्यते। तुकारः अध्यर्थकः । तेन व्यावहारिकस्यापि संग्रहः । रजतपदं कार्यमात्री- पलक्षकं पूर्ववदेव । अयमाशयः-सत्यं विवर्तभूते परिणामिभूते च धर्मिणि न कोऽपि भेदः, एकस्मिन्नेव घटे शुक्तिरप्ये वा परिणामत्वविवर्तत्वयो भयोः सत्त्वात् । किन्तु धर्मभूतयोः विवर्तवपरिणामत्वयोः व्यावहारिको भेदो मन्तव्य एव, तयोधि- मिन्नापेक्षत्वात् । यतो हि चैतन्यापेक्षं विवर्त्तत्वं परिणामत्वं तु न तदपेक्षम्, अपि तु अविद्यापेक्षम् । तथा च एकस्मिन्नेव द्रव्यत्वपृथिवीत्वादी आपेक्षिक परस्वमपरत्वं च यथा मन्यते नैयायिका तथा अत्रापि धर्मद्वयस्वीकारेन किञ्चि- बाधकम् उपधेयसंकरेप्युपारसकरात् ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ८९ विवर्तशब्दस्य योगरूढत्वं व्यनक्ति- अविद्यापरिणामरूपं च तद्रजतं अविद्याधिष्ठाने इदमवच्छिन्न- चैतन्ये वर्तते । तु अयमर्थ :-न केवलं घटादेः प्रातिभासिकस्य च उपादानविषमसत्ताकतया विवर्तपदवाच्यत्त्वम् । अपि विशेषेण वर्तनादपि तेषां विवर्त्तपदवाच्यत्वम् । विशेषेण वर्तते इति विवर्तः इति हि योगार्थः । ते हि घटादयः अध्यासाधिष्ठाने चैतन्ये वर्तन्ते इत्यतोऽपि तेषां विवर्त्तत्वम् । - अविद्यापरिणाममात्रस्य विवर्तत्वे हेतुमाह- अस्मन्मते सर्वस्यापि कार्यस्य स्वोपादानाविद्याधिष्ठानाश्रितत्व- नियमात् । %3- - अस्मन्मते- वेदान्तिमते । सर्वस्य व्यावहारिकस्य प्रातिभासिकस्य चेत्यर्थः । स्वं कार्य, तदुपादान = तत्परिणामिनी या अविद्या, तदधिष्ठानं - तदाश्रयः- यत् चैतन्यं, तदाश्रितत्वनियमात्, इत्यर्थः । अयमाशय : परिणामपरिणा- मिनोस्तादात्म्यमनुभवसिद्धम् , सति चैवं परिणामिन्यविद्या यदा चैतन्या. श्रिता, यदा तत्तादात्म्यापन्नस्य परिणामस्यापि चैतन्याश्रितत्वं दंडापूपायितम् । एवञ्च चंतन्ये विशेषेण वर्तमानतया परिणाममात्रस्य विवर्त्तत्वमबाघम् । ननु तर्हि यत् यन्निरूपितवृत्तितावद्भवति तत्तस्य विवत्तं इति लभ्यते । तथा च भूतलादिवृत्तिघटादेः भूतलादिविवर्त्तत्वापत्तिरिति चेन्मैवम् । न यत् यनिरुपित- वृत्तितावद्भवति तत्तस्य विवत्त इति लभ्यते, अपि तु यत् विशेषेण यन्नि रूपितवृत्तितावद्भवति तत् तस्य विवत्तं इति । विशेषश्च सम्बन्धगतः । स च आध्यासिकत्वरूपो बोध्यः । तथा च आध्यासिकेन यत् यत्र तस्य विवत्त इति फलितोऽर्थः । न खलु घटादिराध्यासिकेन सम्बन्धेन भूतलादौ वत्त ते, येन भूतलादि विवर्त भूतं स्यात् । नन्वेवं सति अविद्याया अपि ब्रह्मविवर्तत्वापत्तिः । आध्यासिकेनैव सम्बन्धेन तस्या अपि चैतन्याश्रितत्वात् इति चेत् इष्टापत्तः । न च विवर्त्तत्वस्य परिणामत्वसमनैयत्यक्षतिः । परिणाम- परिणामिनोस्तादात्म्यमादाय तदुपपत्तेः। वर्तते तत् ९० वेदान्तपरिभापा । प्रत्तीत्यनुपपत्तिमाशंकते- ननु चैतन्यनिष्ठरजतस्य कथमिदं रजतमिति पुरोवत्तिना तादात्म्यम्? अग्रे, भूतलादिदेशे वर्तते इति पुरोवत्ति = शुक्त्यादि, तेन । तादात्म्यं = तादात्म्यावगाही प्रत्ययः । अत एवानुपदमुत्तरग्रन्थे "पुरोवत्तिसंसर्ग- प्रत्यय उपपद्यते' इत्युच्यते न तु “तादात्म्यमुपपद्यते” इति । अयं भावः-अविद्यायाः परिणामभूतं रजतं चैतन्याश्रितमिति चैतन्यस्य विवर्त्तभूतं तत् इत्युक्तम् । एव सति भूतलादिसयुक्तेन शुक्त्यादिना चैतन्याश्रितस्य प्रातिमासिकरजतादेः वैधिकरण्यात् कथं तयोः तादात्म्यावगाही"इदं रजतमिति सामानाधिकरण्य- प्रत्ययः ? कथं वा तादृप्रजतं प्रकारीकृत्य भूतले "रजतवदिवं भूतलम्" इत्यादि- प्रत्ययः ? इदपदार्थादिना तस्य सम्बन्धाभावात् इति । उत्तरयति- उच्यते । यथा न्यायमते आत्मनिष्ठस्य सुखादेः शरीरनिष्ठत्वेनो- पलम्भः, शरीरस्य सुखाद्यधिकरणावच्छेदकत्वात् । तथा चैतन्य- मात्रस्य रजतं प्रत्यनधिष्ठानतया, इदमवच्छिन्नचैतन्यस्य तदधिष्ठान- त्वेन, इदमोऽवच्छेदकतया रजतस्य पुरोवत्तिसंसर्गप्रत्यय उपपद्यते । . . शरीरस्य सुखाद्यधिकरणावच्छेदकत्वात्, आत्मनिष्ठस्य सुखादेः, न्यायमते यथा शरीरनिष्ठत्वेनोपलम्भः इत्यन्वयः । सुखादीत्यत्र आदिपदेन दु:खज्ञानेच्छाप्रयला- दीनां परिग्रहः । सुखाद्यधिकरणं = जीवात्मा, तस्यावच्छेदकत्वात् । उपलम्भः = प्रत्ययः, “ससुखं शरीरम्" इत्यादिरूपः । मात्रपदं कैवल्यार्थकम् । तथा च केवल- चैतन्यस्य = निरवच्छिन्नचैतस्य । रजतं प्रति - प्रातिभासिकरजतं प्रति । तदधिष्ठानत्वेन - प्रातिभासिकरजताधिष्ठानत्वेन । इदमः - इदंपदार्थस्य शुक्तरित्यर्थः । पुरोवत्तिनि शुक्तो यः संसर्ग: = तादात्म्यं तस्य प्रत्ययः अयं भावः-अक्षपादानुयायिमते सुखदुःखाविक समवायनामकेन सम्बन्धेन जोवा- मन्येव तिष्ठति, एवं च तत्समदं “तव मते ससुखं शरीरमिति" प्रत्ययः कथं सम्पद्यते ? इत्येवं कश्चिज्जिज्ञासिते, ते एवं वदन्ति यत् सत्यमस्मन्मते समवायेन सुखादिकं जीवात्मन्येव तिष्ठति, किन्तु नानवच्छिन्ने शरीरेतरावच्छिन्ने वा तस्मिन ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः। तथा च शरीरस्यावच्छेवकतया अवच्छेदकतानामकेन सम्बन्धेन सुखादेः शरीरे सत्त्वात नोक्तप्रत्ययानुपपत्तिरिति । एवं च तथाकल्पितेन सम्बन्धेन सुखादिकं शरीरे समानीय "ससुखं शरीरम्" "सुखबच्छरीरम्" इत्यादिप्रत्ययं समुपपादयन्ति ते, तथा अस्माभिरपि “इदं रजतमिति प्रत्ययः समुपपाधः । तथा हि-प्रातीतिक रजतं नानवच्छिन्ने चैतन्ये समाश्रित न वा इदंपदार्थातिरिक्तावच्छिन्ने, इति, इदं- पदार्थशुक्तेरवदकतया, कल्पिलेलाबन्छस्तासम्बन्धन प्रातीतिक रजतं पुरोत्तिशुक्तौ समागतमेवेति क्वानुपपत्तिरक्तप्रत्ययस्य ? नतु दृष्टान्तवैषम्यम्-तथा हि-तत्रावच्छेदकतासम्बन्धेन सुख शरीरे समानीय "ससुखं शरीरम्" "सुखवच्छरीरम्" इति सुखशरीरयो: भेदावगाह्य व भवति प्रत्ययः, न तु प्रकृत इव तादात्म्यावगाही इति चेत् न, रजतं रजततादात्म्यं चैकमेव वस्तु, सति चैवं इदमवच्छिन्नचैतन्ये रजताध्यासस्य रजततादात्म्याध्यासस्य चैकतया, इदं पदार्थशुक्तौ रजततादात्म्यमः च्छेदकतासम्बन्धेन समानीय तथा प्रत्ययस्य सम्पा- दनीयत्वात् । इदं रजतमित्यस्य "रजततादात्म्यवदिदम्" इत्यर्थकत्वात् । ननु 'इदमवच्छिन्नचैतन्ये रजताध्यासः" इत्यस्य शुक्त्यवच्छिन्ने, फलत: विषयावच्छिन्नचैतन्ये अध्यासः इत्यर्थः । तथा च घटादिक यथा स्वावच्छिन्नचंत- न्यात्मकविषयावच्छिन्नचैतन्याध्यस्त तथा प्रातिभासिकं रजतमपि इदमवच्छिन्न- चैतन्यात्मकविषयावच्छिन्नचैतन्याध्यस्तमिति घटादिवत् कथं नान्यवेद्यत्वम् ? कथं वा केवलसाक्षिवेद्यत्वम् ? इत्याशङ्कापरिहाराय आह- तस्य विषयचैतन्यस्य तदान्तःकरणोपहितचैतन्याभिन्नतया विषय- चैतन्येऽध्यस्तमपि रजतं साक्षिण्यध्यस्तं केवलसाक्षिवेद्यमिति चोच्यते । तस्य विषयचैतन्यस्य शुक्त्यवाच्छन्नचैतन्यस्य । तदा = प्रतिभासकाले । अन्तःकरणोपहितचैतन्याभिन्नतया - साक्षिचैतन्याभिन्नतया । साक्षिण्यध्यस्तमिति हेतुगर्भविशेषणम् । तथा च यतः साक्षिण्यध्यस्तमत: केवलसाक्षिवेद्य सुखवत् अनन्यवेद्यं चेत्यर्थः । साक्षिण्यध्यस्तमित्यनेन प्रमाणादिव्यापारमन्तरेण साक्षिविषयत्वं द्योतितम् । तदेव हि केवलसाक्षिवेद्यत्वमित्युक्त प्राक् स्वयमेव । अयं भावः- घटादीनां स्वावच्छिन्नचैतन्यमात्राध्यस्तत्वं प्रालिदोळ तु स्वभिन्न- शुक्तित्वादीदमावच्छिन्नचैतन्यामिन्नान्त:करणोपहितचतन्याध्यस्तत्वमिति द्वयोः मह- वेदान्तपरिभाषा । ९२ द्वलक्षण्यन, अतो न घटादिदृष्टान्तेन प्रातिमासिकरजतादीनां केवलसाक्षि- स्वानन्यवेद्यत्वानुपपत्तिः । स्वानच्छिन्नचैतन्याध्यस्तत्वं अनन्यवेद्यत्वप्रयोज- कम् । सत्यपि सर्वत्र चैतन्याभेदे अवच्छेदकभेदप्रयुक्तव्यवस्थोपपत्तिः । घटादि- पूर्वसद्धिव्यावहारिकवस्तुनि प्रमाणादिव्यापारसम्भावनया न प्रमाणादिव्यापार- मन्तरेण सामिविषयत्वम् । तथा च कथ तेषां केवलसाक्षिवेद्यत्वम्, ततश्चानन्यवेद्यत्व- मापतेत् ? सुखप्रतिभासिकादीनां तु प्रतिभासमात्रकालावस्थापित्वेन पूर्वमसिद्धत्वात् प्रमाणव्यापारासम्भवात् प्रमाणव्यापारमन्तरेण साक्षिविषयत्वात् केवलसाक्षिवेद्यत्वं ततश्चानन्यवेद्यत्वमिति । अनवच्छिन्नशुद्धचैतन्ये एव घटपटाद्यध्यासस्वीकारे तु घटपटयो: अनेकपुरुषवेद्यत्वेऽपि यथा तदुभयगता संख्या अनन्यवेद्या भवति, अनेक- पुरुषीयचक्षुस्संयुक्तसमवायस्य सन्निकर्षस्य समानत्वेऽपि, तथा प्रकृतेऽपि भवितुमर्हति एकचैतन्याध्यस्तत्वेऽपि घटप्रातिभासिकरजतादेः अन्यवेद्यत्वानन्यवेद्यत्ववलक्षण्यम् । तथा च नैयायिकर्यथा फलबलात् तत्पुरुषीयापेक्षाजन्य-द्वित्वादिक तेनैव ग्राह्यमिति नियम: स्वीक्रियते तथाऽस्माभिरपि यदीयदोषक्षुब्धा अविद्या यदाकारेण परिणमते तस्य तद्दोषवत्पुरुषग्राह्यत्वम् इति नियमोभ्युपगन्तव्य, तथा च नोक्त दोषः इति । ननु घटादिकं स्वावच्छिन्नचैतन्ये अध्यस्तं प्रातिभासिकरजतादिकं न तथेत्यस्य कोऽर्थः इति चेत् अयमर्थः-अविद्यमानं नावच्छेवकं अपि तु विद्यमानमेवेति विश्व- जनीनोनुभवः । घटादेः प्रतिमासात् पूर्व घटादेः व्यावहारिकतया विद्यमानत्त्वेन भवितुमर्हति तेषां चैतन्यावच्छेदकत्वम् । अतस्तदवच्छिन्नचेतन्ये एव पुनर्घटा- ध्यासस्तवानकाले | प्रातिमासिकरजतादीनां तु अपूर्वपदार्थतया, प्रतिमासात्पूर्वम- विद्यमानतया चैतन्यावच्छेदकत्वाभावात् न तदवच्छिन्नत्वं चैतन्यस्येति न तन्याध्यासः । इदंपदार्थस्य व्यावहारिकस्य चैतन्यावच्छेदकत्वात् तववच्छिनचैतन्ये तेषामध्यास: 1 घटादिकल्पना अव्यवहितानादिसिद्धा, इति यश्चतन्यांशो विषयतया जडेन पूर्वकल्पितेन घटेन आवृतः, तस्मिन्नेव चैतन्यांशे पुनर्घटकल्पनं भवति, इत्येव "स्वावच्छिन्नचैतन्ये तवध्यास इत्यस्य सरलार्थः। प्रातिमासिकरजतादिकल्पना अनादिसिद्धापि नाव्यवहितानादिसिद्धा, इति न तदावृतचैतन्यांशे पुनः पुनस्तत्कल्पनम् । अपि तु इदंपदार्थावृतचैतन्यांशे, इत्यतस्तेषां स्वानवच्छिन्नचैतन्ये अध्यासः । घटादेरावरकत्वमविद्याऽविद्यकयोय- भेदाभावात् । व्यावहारिकसत्तानङ्गीकर्तृणां मते तु प्रश्नस्यैव नावकाशः । तेषां मते घटादीनामपि प्रातिमासिकतया अनन्यवेद्यत्वात् । व्यावहारिकसत्ताङ्गीकर्तृमते सुखादेः प्रातिमासिकत्वापत्तिरिति तु न शकूयम् इष्टत्वात् इत्यभिनवः पन्थाः।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः। سه पुनः शङ्कते- ननु साक्षिण्यध्यस्तत्वे अहं रजतमिति प्रत्ययः स्यात् अहं- सुखीतिवत्- शुक्तिरजतादेः इत्यादिः । अयं भावः-साक्ष्यध्यस्तसुखदुःखादिप्रत्यये नियमत: अस्मदर्थविषयकत्वं भासते । शुक्तिरजतादेरपि साक्ष्यध्यस्तत्वे तद्विषयकप्रत्ययेऽपि अस्मदर्थविषयकत्वं स्वीकर्तव्यम् । न चेष्टापत्तिः । अहं सुखी अहं दुःखी इत्यादि- प्रयोगवत् "अहं रजतम्" इत्यपूर्वप्रयोगापत्तः । उत्तरयति- तस्य इति चेत्, उच्यते -न हि सुखादीनामन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्य- निष्ठाविद्याकार्यत्वप्रयुक्तमहं सुखीति ज्ञानम् । सुखादीनां घटादिवच्छुद्ध- चैतन्य एवाध्यासात् । किन्तु यस्य यदाकारानुभवाहितसस्कार- सहकृताविद्याकार्यत्व तदाकारानुभवविषयत्वमित्येवानुगतं नियामकम् । तथा चेदमाकारानुभवाहितसंस्कारसहकृताऽविद्याकार्य- त्वात् घटादेरिदमाकारानुभवविषयत्वम् । अहमाकारानुभवाहितसस्कार- सहकृताऽविद्याकार्यत्वात अन्तःकरणादेः अहमनुभवविषयत्वम् । शरीरेन्द्रियादेरुभयाकारानुभवाहितसंस्कारसहकृताऽऽविद्याकार्यत्वात् उभयविधानुभवविषयत्वम् । तथा चोभयविधानुभव:-इदं शरीर- मयं देहः, अहं मनुष्यः, अहं ब्राह्मणः, इदं चक्षुरहं काणः, इदं श्रोत्र- महं बधिर इति । यदाकारः यः अनुभवः, तेनाहितो यः संस्कारः तेन सहकृता या अविद्या, तत्कार्यत्वम् । एवमेव परत्रापि बोध्यम् । कार्यस्वपरिणामत्वम् । तथा च पूर्ववर्ती- समानाकारकोऽनुभवः संस्कारसम्बन्धेन अन्तःकरणे विद्यमानः परवत्तिसमाना- कारकानुभव-प्रयोजकः । अतः यद्विषयको यदाकारोनुभवः आनादेः कालात् भवनागच्छति परवत्तिकालेऽपि तदाकारक एवानुभवो भविष्यति, नान्यथेति सरलार्थः । एवं च घटविषयक: प्रत्ययः अनादिकालात् इदमर्थावगाही "अय घटः" इत्येवं भवन्नागच्छति, ततः परवत्तिकाले वर्तमानकालेऽपि वा तविषयकः तथैव वेदान्तपरिभाषा । प्रत्ययो भवितुमर्हति, न त्वस्मदर्थावगाही "अहं घटः" इति । प्रातिभासिकरजता- देरपि इदमर्थावगाही "इट रजतम्" इति प्रयत्य एव अनादे:कालात् भवन्नागच्छति, नतः परवत्तिकालेऽपि नाहं रजतमित्यापादयितु शक्यते सत्यपि तस्य साक्ष्यध्यस्तत्वे । न चाद्यनुभवे व्यभिचारः, संसारस्यानादितया अनुभवे प्राथम्यानभ्युपगमात् । मनुष्यत्वब्राह्मणत्वयोः शरीरधर्मतया-"अहं मनुष्यः" "अह ब्राह्मणः" इति प्रतीत्योः शरीरविषयकत्वम् । पूर्वप्रतीत्योस्तु शरीरविषयकत्वं स्पष्टमेव । काणत्व- वधिरत्वयोः चक्षुष्कर्णवृत्तितया चक्षुष्कर्णविषयत्वम् । । दृष्टान्तसिद्ध वृत्त दार्टान्तिके स्मारयति- प्रकृते च प्रातिभासिकरजतस्य प्रमातृचैतन्याभिन्नेदमवच्छिन्न- चैतन्यनिष्ठाऽऽविद्याकार्यत्वेऽपि इदं रजतमिति सत्यस्थलीयेदमा- कारानुभवाहितसंस्कारसहकृताऽविद्याकार्यत्वादिदमाकारानुभवविषयता न त्वह रजतमित्यहमाकारानुभवविषयतेत्येदमनुसन्धेयम् । प्रमातृचैतन्याभिन्न यद् इदमवच्छिन्नं चैतन्यं तनिष्ठा या अविद्या, तत्कार्य- त्वेऽपि । इदं रजतमिति सत्यस्थलीयः इदमाकारानुभवः, तदाहितेत्यादि पूर्ववत् । सत्यपद उभयसाधारणं यद्रजतत्वम्, अनुगतरूपेण तदवच्छिन्नानुभवग्रहणाय । अन्यथा वैयर्थ्यापत्तः । पूर्वपूर्वसिद्धशुक्तिरजतविषयकानुभवाहितसंस्कारमादायव व्यवस्थोपपत्त: । सत्यानुभव इव असत्यानुभवेऽपि प्राथम्यस्य वक्तुमशक्यत्वात् । व्यावहारिकघटादेः स्वावच्छिन्नचैतन्याध्यासपक्षऽपि परवर्त्यनुभवाकारव्यवस्था- पकतया अयमेव नियमोवसेय: । स्मृत्याकारनियामकत्व त्वनुभवाकारस्य सर्वप्रसिद्ध- मेव । अविद्या रजताकारेण रजतज्ञानाभासाकारेण च परिणमते इत्युक्तम् तत्र ज्ञानाभासाकारपरिणमनमसहमान आह- नन्वेवमपि मिथ्यारजतस्य साक्षात्साक्षिसम्बन्धितया भानसम्भवेन रजतगाचरज्ञानरूपायाः अविद्यावृत्तेः अभ्युपगमः किमर्थः ? साक्षात्साक्षिसम्बन्धितया प्रतिभाससमय एव साक्षिचैतन्याध्यस्ततया । HM:-घटादयो व्यावहारिका: पदार्थाः तद्भानादनेककालपूर्वं मूला:- D प्रत्यक्षपरिच्छेदः । विद्यावशात् कल्पिताः । मध्ये चिद्घटयोर्मध्ये घटाविद्यात्मकतूलाविद्यायाः समागततया न चिता पूर्वसिद्धघटभानम् । व्यवहिततया चिदनुपरक्तत्वात् । घटाका- रायामन्तःकरणवृत्तौ स्वीक्रियमाणाया तेजसतया स्वच्छस्यान्त.करणस्य स्वच्छायां वृत्तौ जले सूर्यस्येव भवति प्रतिबिम्बनम् । एवञ्च वृत्तेफ्टाकारायाः चित्प्रतिबिम्बनात् प्रतिबिम्बाकान्तजलप्रदेश इव प्रकाशकता समायाति । ततो घटाविद्याया: खडन वृत्तिप्रतिबिम्बितचिता तस्य पूर्वसिद्धघटस्य सम्बन्धश्च संजायते इति तादृशस्थले स्वीक्रियता नाम आवरणभंगार्था चिदुपरागार्था वा वृत्तिः । प्रातिभासिकस्थले कि प्रयोजनम् अविद्यावृत्त्यभ्युपगमस्य ? इति वृत्तिस्वीकृतिव्यतिरेकेण रजते तादृशे विषयगनप्रत्यक्षत्वानुपपत्तिपरिहाराय वृत्त्यभ्युपगमः, इति समाधत्ते- - इति चेत् । उच्यते । स्वगोचरवृत्त्युपहितचैतन्यभिन्नसत्ताकत्त्वा- भावास्य विषयापरोक्ष्यरूपतया रजतस्यापरोक्षत्वसिद्धये तदभ्यु- पगमात् । . स्वं विषय., तद्गोचरा या वृत्तिः, तदुपहितं यच्चैतन्यं, तद्भिन्नसत्ताकत्वा- भावस्य । तद्भिन्नसत्ताकत्वाभावश्च तत्सत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावरूप: पूर्ववत् बोध्यः । विषयं गत यत् आपरोक्ष्य = प्रत्यक्षत्वं, तद्रूपतया प्रत्यक्षत्वं, तद्रूपतया - तल्लक्षणतया । अपरोक्षत्वस्य सिद्धये अपरोक्षत्वसम्पादनाय । तदभ्युपगमात् - रजतज्ञाना- भासात्मकाविद्यावृत्त्यभ्युपगमात् । अयमाशयः-पूर्व यः विषयगतप्रत्यक्षत्वस्य परिष्कारः प्रामतृसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभाव इति विहितः, तत्र चैतन्ये स्वगोचर- वृत्त्युपहितत्वमपि ध्रुवं विशेषणं देयम् । अन्यथा वृत्ति विनाऽपि प्रत्यक्षो घट इति प्रतीत्यापत्तेः । चैतन्याभिन्नसत्ताकत्वस्य तत्र सर्वदेव विद्यमानत्वात् । न चेष्टापत्तिः अतीन्द्रियेऽपि तथा व्यवहारप्रसंगात् । चैतन्याभिन्नसत्ताकत्वस्य तत्रापि वर्तमानत्वात् । एवं च यदि प्रातिभासिकरजताकारा काचन वृत्तिर्न स्वीकार्या, तहि स्वाकारवृत्त्यप्रसिद्ध या निरुक्तलक्षणगमनाभावेन प्रातिमासिकस्य रजतस्य न कथमपि विषयगतापरोक्ष्यं सम्भवितुमर्हतीति । ननु वृत्युपहितत्वविशेषणदाने अनुमिते घटे, प्रत्यक्षो घट इति प्रतीत्यापत्तिारेति चेत् , सत्यम् । वृत्तिपदेन इन्द्रियसन्निकर्षाधीनवृत्तर्ग्रहणात्, अनुमित्यादिपरोक्षवृत्त स्तादृशत्वाभावात् । न चान्त:करणस्यैव स्वीक्रियता रजताकारा वृत्तिः । कथमभ्युपगम्यते अविद्यावृत्तिः?
९६ वेदान्तपरिभाषा। इति चेत्, अन्त करणवृत्ते रिन्द्रियद्वारकत्वस्यान्वयव्यतिरेकसिद्धतयाप्रवृत्तेर्वाह्यदेशे रजताभावेन इन्द्रियसन्निकर्पाभावात् तद्वारकान्तःकरणवृत्त रसम्भवात् । अपसिद्धान्तापात शङ्कते- नन्विदंवृत्तेः रजताकारवृत्तेश्च प्रत्येकमेकैकविषयत्वे गुरुमतवद्वि- शिष्टज्ञानानभ्युपगमे कुतो भ्रमज्ञानसिद्धिः ? इदंवृत्तिः = इदम् इत्याकारा वृत्तिः । रजताकारवृत्तिः "रजतम्" इत्याकारा वृत्ति.। प्रत्येकमेकैकविषयत्वे = विभिन्नविषयकत्वे। गुरुमतवत्-प्रभाकरमतवत् । विशिष्टज्ञानानभ्युपगमे = विशेषणविशिष्टविषयकैकज्ञानानभ्युपगमे । कुत: इति आक्षेपे । तथा च न सिद्धिरिति भावः । अयमर्थ:-अनिर्वचनीयोत्पावस्थले यत्र "इदं रजतम्" इति वृत्तिर्भवति, तत्र सा रजतत्वविशिष्टेदंविषयिणी एका वृत्तिः वृत्ति- द्वयो वा? नैकेति वक्तुं शक्यम् 'इदम्" इत्येतस्य इन्द्रियसन्निकर्षाधीनतया अन्तःकरणवृत्तित्वात् । रजतमित्यस्य अविद्यावृत्तित्वात् । वृत्तिद्वित्वाभ्युपगमे अख्यातिवादिगुरुमतप्रवेशात् भ्रमासिद्धिः इति । वृत्तिद्वयस्वीकारेऽपि न गुरुमतप्रवेशो न वापसिद्धान्तापातः इति समाधत्ते- इति चेन्न । वृत्तिद्वयप्रतिबिम्बितचैतन्यस्यैकस्य सत्यमिथ्यावस्तु- तादात्म्यावगाहित्वेन भ्रमत्वस्वीकारात् । - । - । "इदम्" इत्येका, "रजतम्" इत्यपरा वृत्तिः । सत्यम् इदंपदार्थः । मिथ्या- रजतादिः । तादात्म्यावगाहित्वेन =उभयतादात्म्यस्य विषयीकरणेन । अयं भाव:- न केवलं वृत्तिद्वयस्वीकारमात्रेण प्रभाकरमतप्रवेशः शक्यते वक्तुम् । यतस्ते हि भ्रमस्थले हट्टस्थस्य रजतस्य स्मृति वदन्ति। अस्माभिस्तु तत्र तत्कालोत्पन्न- प्रातिभासिकरजतस्य प्रत्यक्षमभ्युपेयते न स्मरणमिति महद्वैलक्षण्यम् । नापि विशिष्टज्ञानक्यानुपगमात् भ्रमासिद्धिः । यतो नास्माभिः परमते इव भ्रमत्वं तदभाववति तत्प्रकारकत्वरूपं अभ्युपेयते । अपि तु विषयाकारवृत्तिप्रतिबिम्बित- चैतन्यस्य मिथ्यातादात्म्यावगाहित्वम् । प्रकृते च इदमित्याकारान्तःकरणवृत्ती रजतमित्याकाराविद्यावृत्तौ च प्रतिबिम्बितं यदैकचैतन्यं, तस्य व्यावहारिकेदमर्थ- प्रत्यक्षपरिच्छेदः । प्रातिभासिकरजतपदार्थोभयतादात्म्यावगाहित्वेन मिथ्यातादात्म्यावगाहित्वात् । चैतन्ये मिथ्यातादात्म्यावगाहित्वं तु मिथ्यार्थप्रकाशकत्वम् । ननु घटादेमिऽथ्यात्वमुपेयते न वा ? आये हट्टस्थरजतघटादिवृत्तेरपि अविद्या- वृत्तित्वापत्तिः । द्वितीये द्वैतापत्तिः, इत्यभिप्रायेण शङ्कते- ननु सिद्धान्ते देशान्तरीयरजतमप्यविद्याकार्यमध्यस्तं चेति कथं शुक्तिरूप्यस्य ततो वैलक्षण्यम् ? सिद्धान्ते-वेदान्तसिद्धान्ते । देशान्तरीयरजतं हट्टादिदेशस्थरजतम् । अपिकारेण-प्रातिभासिकरजतपरिग्रहः । कार्य - परिणामभूतम् । अध्यस्त- मित्यनन्तरं "चैतन्ये" इति शेषः। कथमित्याक्षेपे । ततः - हट्टस्थरजतात् । न कथमपि वैलक्षण्यमित्यर्थः । उमयोः सर्वथा साम्यात् "इवं" "रजतम्" इति वृत्तिद्वयस्य अविद्यावृत्तित्वमेवास्तामन्तःकरणवृत्तित्वमेव था। ओमित्युक्तौ आये "चैतन्यस्यैकस्य सत्यमिथ्यावस्तुतादात्म्यावगाहित्वेन" इत्यत्र सत्यावगाहित्य- कयनासङ्गतिः । द्वितीये पुन_मासिद्धिरिति निगूढामिप्रायः । एकरूपेणाविशेषे न सवर्था विशेषलोप: कैरप्यभ्युपगम्यः । अन्यथा अतिप्रसङ्गात् । विशेषप्रयोजक-जिज्ञासा चेत् सर्ववादिसिद्ध स्वभावमेवावधारयेति समाधत्ते- इति चेन्न । त्वन्मते सत्यत्वाविशेषेऽपि केषाञ्चित्क्षणिकत्वं केषाञ्चित्स्थायित्वमित्यत्र यदेव नियामकं तदेव स्वभावविशेषादिक ममापि । त्वन्मते नैयायिकमते । सत्यत्वं = अविद्यापरिणामत्वाभावः, चैतन्याध्य- स्तत्वाभावो वा । अविशेषः = साम्यम् । केषाञ्चित् जन्यज्ञानेच्छाशब्दा- दीनाम् । क्षणिकत्वं = तृतीयक्षणवृत्तिध्वंसप्रतियोगित्वम् । केषाञ्चित् = उत्पन्न विनष्टातिरिक्तघटपटादीनां परमाण्वाकाशादीनां च। स्थायित्वं निरुक्त- क्षणिकभिन्नत्वम् । स्वभावविशेषादिकमित्यस्य यदेव तदेवेत्युभयत्रान्वयः । ममा- पीत्यनन्तरं नियामकमित्यस्य संबन्धः । अयमभिप्राय:-नैयायिकानां मते घट- पटादीनामनेककालस्थायिनां जीवज्ञानेच्छा-शब्दादीनां च सत्यत्वं समानमेव ।न चैकमपि काल्पनिकम् । किन्तु सत्यप्येवंरूपेण साजात्ये, घटपटावीनां यथा अनेक- ९८ वेदान्तपरिभाषा । कालस्थायित्वं न तथा जीवज्ञानेच्छादीनाम्, तथैव अस्माकमपि मते घटपटादीनां यथा अनेककालावस्थायित्वं न तथा जीवज्ञानेच्छादीनाम्, - तथैव अस्माकमपि मते घटपटावीनां व्यावहारिकाणां शुक्तिरूप्यादीनां प्रातिमासिकानां च चिवध्यस्तमाया- परिणामत्वादिना साम्येऽपि घटादीनां वृत्तिपूर्वपश्चाद्वर्तित्वं शुक्तिरूप्यादेः वृत्ति- कालमात्रस्थायित्वम् इति भवितुमर्हति विशेषः। प्रयोजकप्रश्ने भवदाश्रयणीयः स्वभावविशेष एवाश्रयणीयः प्रयोजकतया अस्माभिरपि इति । तथा च शुक्तिरूप्या- पेक्षया घटादेः सत्यत्वात् न सत्यपदप्रयोगासङ्गतिः । ब्रह्मापेक्षया मिथ्यात्वेन न वा वैतापत्तिः । येषां ज्ञानानां ब्रह्मघटायुमयापेक्षया फलतः सर्वापेक्षया मिथ्याभूत- शुक्तिरप्यादिविषयकत्वं तेषां भ्रमत्वमिति न भ्रमासिद्धिः । इति । प्रतिवन्द्युत्तरमनुत्तरमिति कृत्वा आह- यद्वा घटाद्यध्यासेऽविद्यैव दोषत्वेन हेतुः । शुक्तिरूप्याद्यध्यासे तु काचादयोऽपि दोषाः । यद्वा = अथवा । एवकारः अन्ययोगव्यवच्छेदार्थः । तथा चाविद्यामात्र- मित्यर्थः । घटाद्यध्यासे हेतुरित्यन्वयः । काचादयोपीत्यपिकारेण अविद्यायाः संग्रहः । अयमभिप्रायः-अध्यासमात्र दोष: कारणम् । अध्यासन द्विविधः मूलाज्ञानमूलक: तूलाज्ञानमूलकश्व । घटादिव्यावहारिकवस्त्वध्यासो मूलाज्ञानमूलकः । तत्र घटादि- परिणाम-परिणामिमूता अविद्यैव दोषोऽपि । दोषान्तराभावात् । तूलाज्ञानमूलके शुक्तिरूप्याद्यध्यासे तु न परिणामिमात्र दोषः, अपि तु इन्द्रियविषयादिगतं काच. चाकचिक्यादिकमपीति न व्यावहारिक-प्रातिभासिकयोरविशेषापत्तिः । तन्मूलकपूर्वविकल्पित-दोषावकाश इति । न वा - एतत्कल्पे प्रातिभासिकत्व-प्रयोजकं स्पष्टतया आह- तथा चागन्तुकदोषजन्यत्वं प्रातिभासकत्वे प्रयोजकम् । आगन्तुको यो दोष: तज्जन्यत्वमित्यर्थः । आगन्तुकत्वं परिणामिभिन्नत्वम् । दोषजन्यत्वं च दोषत्वावच्छिन्नजनकतानिरूपितजन्यतारूपम् । तेन न दोषध्वंस- दोषप्रत्यक्षादौ वा अतिव्याप्तिः । तत्रत्यजनकतायाः प्रतियोगित्वविषयत्वाद्य- वच्छिन्नत्वात् ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । अन्यथा सिद्धान्तहानिमाह अत एव स्वप्नोपलब्धरथादीनामागन्तुकानदादिदोषजन्यत्वात् प्रातिभासिकत्वम् । अत एव - आगन्तुकदोषजन्यत्वस्य प्रातिभासिकत्वे प्रयोजकत्वादेव । स्वप्ने उपलब्धाः ये रथादयः तेषाम् । आगन्तुको यो निद्रादि: दोष: तज्जन्यत्वात् । आगन्तुकदोषजन्यत्वस्य प्रातिमासिकता-प्रयोजकतानभ्युपगमे वेदान्तसिद्ध स्वाप्नरथादीनां प्रातिमासिकत्वं कथं स्यात् ? मायापरिणामत्वचैतन्याध्यस्तत्वा- दीनां व्यावहारिकसाधारण्यस्य पूर्वमेव वशितत्वात् इति भावः । नन्वास्ता जाग्रच्छुक्तिरूप्यादीनां प्रातिभासिकत्वमुक्तयुक्त्या, स्वाप्नरथादे: प्रातिभासिकत्वाभ्युपगमः किमर्थः ? व्यर्थगौरवात् इत्याह- ननु स्वप्नस्थले पूर्वानुभूतरथादेः स्मरणमात्रेणैव व्यवहारोपपत्तो न रथादिकल्पनं गौरवात् । स्वाप्नं ज्ञानं स्मरणमेवास्तु का क्षतिः ? इति भावः । न च संस्कारानुद्वोधे कथं स्मरणम् ? असति चोद्वोधके कथं संस्कारोद्वोधः ? न खलु निद्रवोद्वोधिकेति वक्तुमर्हम्, सत्यामपि निद्रायां सर्वदा स्मरणाभावात् इति वाच्यम् । अदृष्टविशेष- स्यैवागत्या उद्बोधकत्वकल्पनात् इति अनुभवविरोधेनोत्तरयति- इति चेन्न । रथादेः स्मृतिमात्राभ्युपगमे रथं पश्यामि स्वप्ने रथ- मद्राक्षमित्याद्यनुभवविरोधापत्तेः । मात्रपदेन अनिर्वचनीयरथाद्य त्पादव्यावृत्ति: । यद्यपि स्मृत्यभ्युपगम इत्युक्ता- वपि अनिर्वचनीयव्यावृत्तिर्भवत्येव, स्मृतेः परोक्षज्ञानत्वात् , तथापि स्पष्टतार्थ तदुक्ति: । ननु निद्रापदेन किमभिप्रेतम् ? विलक्षणा वृत्तिर्वा अज्ञानं वा ? आये अनुभवबाधितवृत्तिद्वययोगपद्यप्रसङ्गः द्वितीये जाग्रत्प्रातिभासिकस्यापि स्वाप्नत्त्वापत्तिः । अज्ञानात्मक-दोषजन्यत्वस्य तत्राप्यक्षतत्वात् इति चेत् न, इन्द्रिय- विलयस्यैव निद्रापदार्थत्वात् । न च तस्य सुषुप्तावपि सत्त्वेन तदानीं स्वाप्नसृष्ट्या- - वेदान्तपरिभाषा । पत्ति: । अन्तःकरणविलयकालिकेन्द्रियविलयस्यैव तथात्वस्वीकारात् । यदि सत्यपीन्द्रियमात्रविलोपे न सर्वदा स्वाप्नवृत्तिरनुभवसिद्धा तदा निद्रापदेन अदृष्ट- विशेषस्य ग्रहणं वेदितव्यम् । अत एव- अदृष्टमप्यर्थमदृष्टवैभवात् करोति सुप्तिर्जनदर्शनातिथिम् । इति नैषधीय- खण्डनखण्डखाद्यकृदुक्तिरपि सगच्छते । एतेन स्वप्ने स्वशिर:कर्तनादिदर्शनानुपपत्तिः, प्रातिभासिकोत्पत्तौ उद्घ सस्कारसध्रीचीनाया एवाविद्यायाः परिणामित्वेना- पेक्षितत्वात् । संस्कारस्य चानुभवसापेक्षतया स्वशिर:कर्तनानुभवस्याभावेन तादृशसस्कारस्याप्यसम्भवात्, इत्यपि निरस्तम् । जाग्रत्प्रातिभासिकस्थले अविद्याया: उद्घ द्धसंस्कारसाचिव्यस्य, स्वाप्नप्रतिभासस्थले तु अदृष्टविशेष साचिव्यस्यापेक्षितत्वात् । न च सामग्र्यननुगम इति वाच्यम् । निद्रायाः दोषत्वपक्षेऽपि स्वाप्नप्रतिभासे निद्राघटिता सामग्री, जाग्रत्प्रतिभासे तु तदघटिता सामग्रीति तदनुगमस्याशक्यत्वात् । दोषत्वेन निद्रा-काच-चाकचिक्यादीन् एकीकृत्यानुगमे सामग्र्याः प्रकृतेऽपि तथा सम्भवात् । न खल्वनुभवविरोध एव श्रुतिविरोधोपीत्याह- "अथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते” इति रथादिसृष्टिप्रतिपादक- श्रुतिविरोधापत्तेश्च । रथयोगः रथप्रतियोगिकमार्गानुयोगिकसंयोगः। अथवा रथयोगो येषां ते रथयोगाः रथ्याश्वसारथिप्रभृतयः । किं वा रथस्य योगः = संयोगो यतः ते रथयोगाः उत्तरोत्तरमार्गानुयोगिकरथसंयोगकारणभूताः क्रियाः , तथा च रथयोगो रथकम्पनमित्यर्थः । आदिपदेन अन्येषां संग्रहः । रथादिसृष्टे: प्रतिपादिका या प्रोक्तश्रुतिः तद्विरोधापत्तरित्यर्थः । श्रुतिविरोधः श्रुत्यप्रामाण्यम्, तदापत्तिः । अथवा श्रुतिविरोध : = श्रुतिबाधितत्वम् । तथा च स्वप्ने पूर्वानुभूतपदार्थस्य स्मरणं श्रुतिबाधितमित्यर्थः । उपसंहरति- तस्माच्छुक्तिरूप्यवत् स्वप्नोपलब्धरथादयोऽपि प्रातिभासिकाः यावत्प्रतिभासमवतिष्ठन्ते । - प्रत्यक्षपारछदः । १०१ . निद्रादिदोषजन्यत्वस्य प्रातिभासिकत्वप्रयोजकत्वम्, अनुभवविरोधः, श्रुत्यप्रमा- ण्य च तत्पदार्थः । प्रातिभासिका इत्यनन्तरं यत इत्यध्याहार्यम्, तथा च यावत्प्रति- भासमवतिष्ठन्ते इत्यनेन योगशक्त्या तेषां प्रातिभासिकशब्दवाच्यत्वमपि स्पष्ट मेवेति दर्शितम् । ननु शुक्तिरजतादिस्थले इदम्पदार्थशुक्त्यादिदैशिकपदार्थस्य रजताद्यध्या- साधिष्ठानस्य सत्त्वेन अध्याससम्भवाद् अस्तु तत्र तत्र प्रातिभासिकवस्तूत्पादाभ्यु- पगम: स्वप्ने तु अधिष्ठानाभावात् अध्यासाभावेन कथं प्रातिभासिकरथावत्पादा- भ्युपगमः ? इत्याशयेन शङ्कते- ननु स्वप्ने रथाधिष्ठान-देशविशेषस्यापि तदाऽसन्निकृष्टतया- ऽनिर्वचनीयप्रातिभासिकदेशोभ्युपगन्तव्यः । तथा च रथाद्यध्यासः कुत्र ? D S रथादेः अधिष्ठानतया उपलभ्यभानो यो देशविशेष: तस्यापि । असनिकृष्ट- तया इन्द्रियसन्निकर्षानाश्रयतया । अनिर्वचनीयः सत्त्वेनासत्त्वेन च निर्वक्त • मनर्हः । एतावता अवयविभिन्न इति फलितम् । प्रातिभासः प्रतीतिः तत्रभवः तद्विषयः प्रातिभासिक. । तथा च इदन्त्वेनानुभूयमान इति फलितम् । तेन नार्थ- पुनरुक्तिः । अयं भावः -जाग्रत्प्रतिमासस्थले यथा प्रतीति: इदमर्थात्मकाध्या- साधिष्ठानावगाहिनी भवति, स्वप्नेऽपि "अयं रथः" इत्याविप्रतीतिः इवमर्थावगाहि- न्येव भवति । परन्तु तत्र कार्यरजतापेक्षया अधिकसत्ताकत्वेन सत्यस्य इदमर्थ- शुक्त्यादेः अधिष्ठानत्वमर्हति भवितुम् । स्वप्ने तु इवमर्थोऽपि न व्यावहारिकः अपि तु प्रातिमासिक एव वक्तव्यः। आरोप्याधिकसत्ताकस्य सत्यस्यैव चाध्या- साधिष्ठानत्वमिति नियमः । तथा चाधिष्ठानामावात् कस्मिन्नधिष्ठाने रथस्य इदमर्थस्य वा अध्यासः स्यात् ? असति चाध्यासे कथं स्वाप्नरथादीनां प्राति- मासिकत्वम् इत्यतः स्मृतिरेव स्वीकर्तव्या इति । सिद्धान्तानवबोधप्रयुक्त व इयं शङ्का इति समाधत्ते- इति चेन्न। चैतन्यस्यैव स्वयम्प्रकाशस्य रथाद्यधिष्ठानत्वात् । रथाद्यधिष्ठानेत्यत्र आदिपदेन देशस्य ग्रहणम् । रज्जुत्वादिविशेषरूपेण ज्ञातायां रज्जो न साध्यासः, तथा नात्यन्तमज्ञातायां रज्जो इत्यधिष्ठानप्रकाशो- १०२ वेदान्तपरिभाषा। प्यावश्यकः इति शङ्कानिरासायोक्तम् ' स्वप्रकाशस्य" इति । अयंमाशयः-शुक्ति- रूप्यादिभ्रमस्थले नास्माभिरिदंपदार्थे रजतमध्यस्यते, अपि तु इदमर्थावच्छिन्न- चैतन्ये । जडस्यानविष्ठानत्वात् । सति चैव नाधिष्ठानविरहशङ्कोति । नन्वत्यन्तवृत्त्यविषयपदार्थस्याप्यधिष्ठानत्वाभ्युपगमे सुषुप्तावपि रथादि- सृष्ट्यापातः। स्वयंप्रकाशस्य चैतन्यस्य तदाप्यधिष्ठानत्वसम्भवात् । न चेदं वक्तुं शक्यं यदविद्या तत्र नास्ति । यतस्तहि सुषुप्तस्य मुक्तत्वापातः, इत्यत आह- प्रतीयमानो हि रथादिरस्तीत्येव प्रतीयते, इति सद्रूपेण प्रतीयमानं चैतन्यमेवाधिष्ठानम् । सत: रूपं - धर्मः सत्त्वं, तेन । अयं भावः-न स्वाप्नस्थलेपि अत्यन्तावच्छिन्ने चैतन्ये रथाध्यासः उच्यत्ते, अपि तु "इद रजतम्" इत्यत्र व "रथ:" "अस्ति" इति वृत्तिद्वयसत्त्वेन, इदं रजतमित्यत्र यथा इदमर्थावच्छिन्नचैतन्ये रजताध्यासः, प्रकृतेऽपि अस्तिपदार्थावच्छिन्ने अध्यासः । इति चैतन्यावच्छेदकीभूतास्तित्त्ववृत्तरावश्यकतया न सुषुप्तौ रथाद्यध्यासापत्तिः । रथवृत्त प्रतीयमाने देशविशेषे प्रातिभासिकरथादिष्ठेिन्द्रियग्राह्यत्वे चा- तिदिशति- - देशविशेषोऽपि चिदध्यस्तः प्रातिभासिकः । रथादाविन्द्रियग्राह्यत्व- मपि प्रातिभासिकम् । तदा सर्वेन्द्रियाणामुपरमात् । देशविशेषः = मार्गादिः । रथादी इत्यत्र सप्तम्यर्थो वृत्तित्वम् । तथा च रथादिवृत्तीन्द्रियग्राह्यत्वमित्यर्थः । अयं भावः-चक्षुरादिना घटादेः "अयं घटः" इति प्रत्यक्षानन्तरं "चक्षुषा घटमहं जानामि" "मच्चक्षु ह्योऽयं घटः" इत्याद्य- व्यवसायविषयीभूतं घटादिनिष्ठं चक्षुर्ग्राह्यत्वं, कथञ्चित् भवितुमर्हति व्यावहारिकम् । आश्रयम्य घटादेः व्यावहारिकत्वात् । स्पप्ने "अयं रथः" इति ज्ञानानन्तरं जायमानस्य "रथश्चक्षुषा गृहीतः" "रथं चक्षुषा पश्यामि" इत्यादि- ज्ञानस्य विषयभूतं रथादिगतं चक्षुर्माह्यत्वं न भवितुमर्हति कथमपि व्यावहारिकम् । धर्मिप्रातिभासिकत्वे धर्मव्यावहारिकत्वस्यानुभवबाधितत्वात् । अत: प्रातिभासिक- प्रत्यक्षपरिछेदः । १०३ रथादिगतेन्द्रियग्राह्यत्वमपि प्रातिभासिकमेव मन्तव्यम् । किञ्च यदा इन्द्रियाणा- मेवोपरमः, तदा का सम्भावना व्यावहारिकस्येन्द्रियग्राह्यत्वस्य ? इति । ननु यदि शुद्धचैतन्ये फलतः साक्षिचैतन्ये एव स्वप्नरथगजादेरध्यासः तदा कथं न "अहं गजः" "अहं रथः" इत्यादिप्रतीति: ? इति शङ्कां निराकर्तु पूर्वोक्तसमाधि स्मारयति- अहं गज इत्याद्यापादनं तु पूर्ववन्निरसनीयम् । पूर्व = अहं रजतमिति प्रतीत्यापादनम्, तद्वत् । निरसनीयम् - निराकरणी- यम् । यस्य यदाकारानुभवाहित-संस्कारसहकृताविद्याकार्यत्वं तस्य नुभवविषयत्वमिति नियम स्वीकृत्य यथा पूर्व अहं रजतमित्यापावनस्य वारणं कृतमासीत् तथैवाहं गजः इत्याखापावनस्यापि वारणं करणीयम् इति भावः । तदाकारा- सर्वाण्येव कार्याण्यविद्यापरिणामभूतानि इति पूर्व मवगतम् । तथा च स्वप्नगजा- दीनामपि तत्परिणामत्वं दण्डापूपायितम् । किन्तु स्वाप्नस्थले अन्तःकरणस्यापि द्वारत्वं मायाया: परिणमने इति मतभेदं प्रदर्शयति- स्वप्नगजादयः साक्षान्मायापरिणामाः इति केचित् । अन्तःकरण- द्वारा तत्परिणामाः इत्यपरे । ननु अधिष्ठानतत्त्वसाक्षात्कारे हि प्रतिभासनाशे प्रतिभास्यनाश इति प्रसिद्धो वेदान्तसिद्धान्तः । प्रकृते च शुद्धचैतन्यस्यैव स्वप्नगजाद्यधिष्ठानत्वमुक्तम् । तथा च शुद्धचैतन्यज्ञानपर्यन्तं स्वप्नगजादेः तज्ज्ञाननाश्यस्य सत्त्वमनिवार्यम् । शुद्धचैतन्य- ज्ञानं च अनेकजन्मानन्तरं कषायपाके एव सम्भवितुमर्हेत् । सति चैवं जामत्काले- ऽपि स्वप्नगजादेः सत्त्वात् तज्ज्ञानापत्तिर्दुर्वारेत्याशयवान् शंकते- ननु गजादे: शुद्धचैतन्याध्यास्तत्वे इदानीं तत्साक्षात्काराभावेन जागरणेऽपि स्वप्नगजादयोऽनुवर्तेरन् । इदानी = रागषमोहात्मकदोषकाले । अनुवर्तेरन् - स्युः । "अनेक- जन्मसंसिद्धः ततो याति परां गतिम्" इति महदुक्तेः न सटिति शुद्धचैतन्यात्मकस्य १०४ वेदान्तपरिभाषा। स्वप्नगजाधधिष्ठानस्य ज्ञानसम्भावना । अधिष्ठानज्ञानं विना च न स्वप्नगजादेः प्रातिभासिकस्य नःश इति जागरणेऽपि तत्सत्वमावश्यकम् । प्रातिमासिकस्य प्रतिभाससमकालत्वपिति स्वयमेव "यावत्प्रतिभासमवतिष्ठन्ते" इत्यनेनोक्तम् । तथा च जाग्रत्काले स्वाप्नगजादिमानवारणस्य कस्तावदुपायः ? इति भावः । नाश विध्यमुपगम्य समाधते- उच्यते कार्यविनाशो हि द्विविधः । कश्चिदुपादानेन सह कश्चित् विद्यमान एवोपादाने । आद्यो बाधः द्वितीयस्तु निवृत्तिः । आद्यस्य कारणमधिष्ठानतत्त्वसाक्षात्कारः । तेन विनोपादानभूताविद्याया अनि- वृत्तः । कार्यत्वं = परिणामत्वं, व्यावहारिकप्रातिभासिकोभयसाधारणं बोध्यम् । उपादानेन सह इत्यस्य उपादानाशोत्पत्तिक्षणोत्पत्तिमान् इत्यर्थः । विद्यमान एवोपादाने इत्यस्य उपादानकालवृत्तिस्वप्रतियोग्युभयकः इत्यर्थः । बाध: = बाध- संज्ञक: । निवृत्ति निवृत्तिसंज्ञक. । आद्यस्य = बाधस्य । अधिष्ठानमेव वस्तु, तस्य य. साक्षात्कारः । स्वप्रतियोग्यध्यासाधिष्ठानवस्तुसाक्षात्कार इत्यर्थः । अधिष्ठानस्य परोक्षज्ञानात् नाध्यस्तबाध इत्यत उक्तं साक्षात्कारेति । तेन अध्यासाधिष्ठानतत्त्वसाक्षात्कारेण । उपादानभूता या अविद्या तस्याः। उपादानं परिणामि। तत्त्वं D - ननु प्रकृते इत: को लाभ: ? इत्यत आह- तदिह ब्रह्मसाक्षात्काराभावात् स्वप्नप्रपञ्चो मा बाधिष्ट, मुसल- प्रहारेण घटादेरिव विराधिवृत्त्यन्तरोदयेन स्वजनकोभूतनिद्रादिदोष- विनाशने वा गजादिनिवृत्तौ को दोष: ? तत् = तस्मात्, नाश विध्यस्वीकारात् इत्यर्थः । इह = प्रपञ्चकालान्तः- पातिजाग्रत्काले । स्वप्नप्रपञ्चः = स्वप्नकालिकप्रातिभासिकपदार्थनिकरः । मा बाधिष्ट = मा भवतु बाधितः । मुसलस्य प्रहारः प्रहरणं = सवेगं निपातः, तेन घटादेरिव = घटादेनिवृत्तिरिव । अस्य गजादिनिवृत्तौ को विरोध इत्यनेना- न्वयः । अन्या वृत्तिः वृत्त्यन्तरं = विरोधिवृत्त्यन्तरं, तस्य उदयः = उत्पादः, प्रत्यक्षपरिच्छेदः। १०५ तेन । स्वं - स्वप्नगजादिः, तस्य जनकीभूतो यो निद्रादिदोषः, तस्य यो विनाश:, तेन । वाकारो विकल्पार्थकः । एकस्य विरोधिन: समुदये अपरस्य तद्विरोधिनः अकिञ्चित्करत्वरूपः तूष्णीभाव एवानुभवसिद्धो न तु विनाशः इत्याशंक्य स्वजनकी- भूतेति परकल्पानुसरणम् । पक्षेऽस्मिन् कारणविघटने कार्यविघटनमावश्यक- मित्यनुभवः । तथा चायं समुदितार्थः । स्वप्नोपलब्धगजादयोऽनुवर्तेरन् इत्यनेन कीदृशस्य स्वप्नगजादिनिष्ठस्यानुवर्तनस्यापत्तिरभिमता भवताम् ? अबाधि- तत्वरूपस्य आहोस्वित् अनिवृत्तत्वरूपस्य ? अबाधितत्वस्येति चेत् इष्टव सा । शुक्तिरूप्यस्थले शुक्तिमत्वसाक्षात्कारानन्तरं यथा “नेदं रूप्यमपि तु शुक्तिका" इति बाधप्रतीतिर्मवति, तथा स्वप्नगजाविस्थले "नायं गजः अपि तु चैतन्यम्" इति बाधप्रतीतेरजायमानत्वात् । अनिवृत्तत्वस्य चेत् ? न तत्सम्भावना, मुसलप्रहारात्मकविरोधिप्राप्त्या यथा घटस्य निवृत्तिभवति स्वप्नगजावेरपि तथा जाग्रत्कालिकव्यावहारिक-घटपटादिवृत्त्यात्मकविरोधिनः प्राप्स्या निवृत्तेः सुसम्भूततया निवृत्ति प्रति प्रतियोगित्वरूपस्य निवृत्तत्वस्यव तत्र गतत्वात् । प्रतियोगिप्रतीत्यभावप्रयोजकता तु प्रत्येकमुभयविधस्यैव नाशस्य, न ततो जाग्रत्कालेऽबाधितत्वेऽपि स्वप्नगजादेः प्रतीतिप्रसंगः । यद्वा जगजाटरूपेण परिणामिन्या अविद्यायाः परिणमने साहाय्यमाचरन्त्याः दोषरूपाया अविद्यायाः विनाशेनैव स्वप्नगजादेनिवृत्तिः, तत एव च न तत्प्रतीतिर्जासत्काले इति । ननु तर्हि प्रातिभासिकत्वाविशेषात् शुक्तिरूप्यादेरपि निवृत्त्यैव भवितव्यं न बाधेन इत्याशकायामाह- एवञ्च शुक्तिरूप्यस्य शुक्त्यवच्छिन्नचैतन्यनिष्ठतूलाविद्याकार्यत्व- पक्षे शुक्तिरिति ज्ञानेन तदज्ञानेन सह रजतस्य बाधः । मूलाविद्याकार्य- त्वपक्षे मूलाविद्याया: ब्रह्मसाक्षात्कारमात्रनिवर्त्यतया शुक्तितत्त्व- ज्ञानानिवृत्तिमात्रं मुसलप्रहारेण घटस्येव । शुक्त्यवच्छिन्नं यत् चैतन्यं, तनिष्ठा या तूलाविद्या, तस्याः कार्यत्वं परिणामः । तत्पक्षे = तत्स्वीकारे । तूलावियेत्यस्य साद्यविद्येत्ययः । तदज्ञानेन सह = शुक्त्यज्ञानेन सह । मूलाविद्या नाम अनाद्यविद्या । यथोक्तमभियुक्त:- वेदान्तपरिभाषा। जीव ईशो विशुद्धा चित् तथा जीवेशयोभिदा । अविद्या तच्चितोर्योग: षडस्माकमनादय.। इति । ब्रह्मसाक्षात्कार: "अहं ब्रह्मास्मि" इत्याकारकः, तन्मात्रनिवर्त्यत्वं तदेकबाध्य- त्वम् । अयमभिप्रायः-शुक्तिरूप्यादीनां मूलाज्ञानस्य परिणामत्वं तूलाज्ञानस्य वा परिणामत्वमत्र वर्तते वैमत्यं स्वगृहेपि, तत्र यदि मूलाविद्याकार्यत्वमभ्युपेयं तदा परिणामिन्याः तस्याः शुद्धचैतन्यमाश्रयीकृत्यैव वर्तमानतया, शुक्तिरूप्यादेरपि स्वप्नगजादिवत् शुद्धचैतन्यमेवाधिष्ठानम् । सति चैवं शुवत्यवच्छिन्नचैतन्यस्य तदनधिष्ठानतया, तत्साक्षात्कारो नाधिष्ठानसाक्षात्कारभूत इति न शुक्तिरूप्यादेरपि बोधः, मपि तु अव्यवहितोत्तरकालनिवृत्तिरेव । तथा च यथा शुक्तिरूप्यस्वप्न- गजयोः प्रातिभासिकत्वेनाविशेष:, तथा प्रपञ्चसमसामयिकबाधाविषयत्वरूपेणा- बाधितत्वेनापि । मूलाविद्या शुद्धचैतन्यमेवाश्रिता। यथोक्तम्- आश्रयत्वविषयत्वभागिनी निविभाचितिरेव केवला । इति । शुक्तिरूप्यादेः तूलाविद्याकार्यत्वपक्षे तु शुक्त्याच्यातचतन्योरधिष्ठानम् । अतस्तत्साक्षात्कारोऽपि भवति तद्वाघसम्पादकः । पक्षेस्मिन् प्रातिभासिकत्व-व्यवहार- कालबाध्यत्वयोर्मध्ये प्रातिभासिकत्वं व्यापकम्, निरुक्तबाध्यत्वं व्याप्यम् । पक्षान्तरे तु बाध एकविध एव, न तु व्यवहारकालीनः सः, अतः बाध्यत्वं व्यापक प्रातिभासिक- त्वमेव व्याप्यम् इति । प्रातिभासिकत्वाभ्युपगमे प्रतीतिविरोधं शङ्कते- ननु शुक्तौ रजतस्य प्रतिभाससमयसत्त्वाभ्युपगमे इदं न रजत- मिति कालिकनिषेधज्ञानं न स्यात् । किन्तु इदानीमिह न रजत- मिति । इदानीं घट: श्यामो नेतिवत् । प्रतिभासः = इदं रजतम् इति प्रतीतिः तत्समये यत् सत्त्वं - वर्तमानत्वं, तस्याभ्युपगमे । कालिकनिषेधः कालविशेषानवच्छिन्नो भेदः । सामान्यधर्म- मात्रावच्छिन्न प्रतियोगिताकभेद इति सरलार्थः । अयमाशयः-आविद्यकस्य शुक्तिरूप्याकेः प्रतीतिसमसामयिकत्वमुच्यते । तथा सति प्रतीतेः पूर्व, ततः परं प्रत्यक्षपरिछेदः । १०७ च तत् रूप्यं न तिष्ठति किन्तु मध्ये किञ्चित्काल तिष्ठति, इत्येवं सिद्धं भवति । सति चैवं इदं न रजतम् अपि तु शुक्तिकेति यत् सर्वेषां बाधज्ञानं जायते तन्न स्यात् । न खलु नेदं रजतमिति प्रतीतेरयं विषयो, यत् "इयं शुक्तिका पूर्व शुक्तिकासीत्, तत्परं इयं रजतममवत्, अनन्तरमिदानी पुनः शुक्तिका सजाता न रजतमस्ति" इति । अपि तु "इयं पूर्वमपि शुक्तिकंवासीत् इदानीमपि सैवास्ति, परस्तादपि संव स्थास्यति, अतः सर्वथा रजतमिन्नेयम्" इत्येव विषयः । यदि मध्ये रजतास्तित्वमभिप्रेयात् ज्ञाता, तदा "इवानीमिदं न रजतम्" इत्येव जानी- यात् । मध्ये किञ्चित्कालं लब्धश्यामता घट विषयीकृत्य यथा “इदानीमयं घटो न श्यामः" इति करोति परस्ता बाधप्रत्ययं इदानींकालावच्छिन्ननिषेधावगा- हिनम्" । परन्तु प्रकृते सामान्यतो रजतनिषेधावगाहिनः "नेदं रजतमित्यस्यैव बाधप्रत्ययस्य सर्वानुभवविषयत्वमिति कथंकार स्वीकरणीयं मध्ये सत्त्वं प्रातिमा- सिकस्य ? इति । . समाधत्ते- इति चेन्न । न हि तत्र रजतत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावो निषेधधीविषयः, किन्तु लौकिकपारमार्थिकत्वावच्छिन्न-प्रातिभासिक- रजत-प्रतियोगिताकः । तत्र = : शुक्तिकायाम् । रजतत्वधर्मेणावच्छिन्ना या प्रतियोगिता तन्निरूपका- भावः । निषेधधीः = नेदं रजतमिति निश्चयः, तस्याविषयः । लौकिकपारमार्थिक- त्वं = व्यावहारिकसत्त्वं तदवच्छिन्ना या प्रातिभासिकनिष्ठा प्रतियोगिता तन्निरूपकः । अभावो निषेधधीविषयः इत्यनेनान्वयः । अयमाशयः इवं रजतमिति भ्रमानन्तरं जाते शुक्तितत्त्वसाक्षात्कारे, यदिदं न रजतमिति बापज्ञानं जायते, तन्न रजतत्वावच्छिन्नरजतसामान्यनिषेधविषयक नापि कालविशेषावच्छिन्न- रजतविषयकम् येन स्यातां भवदुक्ते ने रजतमिति प्रतीत्यनुपपत्तिः इदानी- मिदं न रजतमिति प्रतीत्यापत्तिश्च । अपि तु व्यावहारिकत्वेन प्रातिमासिकरजत- भेदविषयकम् । तादृशस्य तस्य कालिकतया नावकाशः कस्यापि दोषस्य । व्यावहारिकत्वेन प्रातिमासिकरजतं नेत्यस्य व्यावहारिकत्व-विशिष्ट-प्रातिमासिक- रजतं नेत्यर्थः । मध्ये यदा प्रतिमासकाले प्रातिमासिकरजतस्य सत्त्वमासीत् न १०८ वेदान्तपरिभाषा। तवाऽपि तस्य व्यावहारिकत्व-विशिष्टतया आसीत् सत्त्वम् । व्यावहारिकत्वस्य सर्वथा सर्वदैव च प्रातिमासिकावृत्तितया प्रातिमासिके व्यावहारिकत्ववैशिष्टया- सम्भवात् । एवं च व्यावहारिकत्वविशिष्ट-प्रातिमासिकरजत न कदाप्यासीत् नास्ति न स्थास्यतीति सर्वथा सम्भवः तनिषेधस्य तादृशनिषेधावगाहिन्याः प्रत.तेश्चति । ननु प्रतियोग्यवृत्तिधर्मस्य प्रतियोगितावच्छेदकत्वमसङ्गतम् । व्यावहारिकत्वं प्रातिभासिकावृत्तीति तस्य प्रातिभासिकगतनिषेधप्रतियोगितावच्छेदकत्वमसम्भवि । तथा च कथं तद्धर्मावच्छिन्नप्रतियोगिताकप्रातिभासिकभेदः, तदवगाही च प्रत्ययः शक्यो वक्तुम् ? इत्यत आह- व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावाभ्युपगमात् । वैयधिकरण्यं प्रतियोगित्वासामानाधिकरण्यम् । तथा च प्रतियोगित्वा- समानाधिकरणो यो धर्मः, तदवच्छिन्ना या प्रतियोगिता, तन्निरूपको योऽभावः, तस्याभ्युपगमात् = स्वीकारात् इत्यर्थः । प्रकृते व्यधिकरणधर्मो व्यावहारिकत्वं, तदवच्छिन्ना या प्रतियोगिता सा प्रातिभासिकरजते, तनिरूपकोऽभावो भवति तादृशरजताभावः । अयमाशयः-अस्माकं मते परमार्थसत्तु केवलं स्वरूपचैतन्यमेव नान्यत् किञ्चित् अन्यपदार्थकल्पना व्यवहारनिर्वाहाय प्रतीतिनिहाय वा क्रियते । सत्यां चैवं वस्तुस्थिती घटपटादयो भावपदार्थाः तत्सामान्यविशेषामावादयो अभाव- पदार्थाः यथा व्यवहारप्रतीत्योनिर्वाहाय स्वीकर्तव्याः, तथा घटवत्यपि देशे घटत्वेन पटो नास्तीति व्यवहारप्रतीत्योनिहाय व्यधिकरण विनियामावः कथं न स्वीकर्तव्यः ? सति चैवं यथा न दोषस्तथोपपादितमवस्तात् । स्वीयप्रति- योगितावच्छेदकत्वं प्रति स्वाभाववन्निष्ठाधिकरणतानिरूपित-निरूपकतावच्छेदकत्वं प्रयोजकमिति व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न-प्रतियोगिताकाभावानङ्गीकर्तृणां मतम् । किन्तु नास्ति तत्र किञ्चिन्मानम्, प्रत्युत वर्तते तद्वाषको व्यवहारः प्रोक्तः प्रत्ययश्चति । यस्तु तैः घटत्वेन पटो नास्तीत्यस्य पटे घटत्वं नास्तीत्यर्थ: कल्प्यते, सोऽपि तादृशप्रयोगस्थले सप्तम्यर्थवृत्तित्वादिभासकशब्दाभावादनुभवविरुद्ध एव । सति चैवं समानविषयकव्यवहार-प्रतीत्योः समानाकारकतानियमेन तादृशप्रत्ययस्यापि तद्विषयकत्वासम्भवः।
प्रत्यक्षपरिछेदः । १०९ पुनः प्रतीतिविरोधमुज्जीवयति- ननु प्रातिभासिकरजते पारमार्थिकत्वमवगतं न वा ? अनवगमे प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नाज्ञानादभावप्रत्यक्षानुपपत्तिः । अवगमेऽ परोक्षावभासस्य तत्कालीनविषयसत्तानियतत्वात् रजते पारमार्थि- कत्वमप्यनिर्वचनीयं रजतवदेवोत्पन्नमिति तदवच्छिन्नरजतसत्वे तद- वच्छिन्नाभावस्तत्र कथं वर्तेत ? अवगमो ज्ञानम् । तथा च अवगतं न वेत्यस्य ज्ञातं न वा इत्यर्थः । अनवगमे- अज्ञाने । प्रतियोगितावच्छेदकं व्यावहारिकत्वं तदवच्छिन्नस्य = तद्विशिष्टस्य प्रातिभासिकनिषेधस्य । प्रत्यक्षानुपपत्तिः प्रत्यक्षाभावप्रसंग. । अवगमे - ज्ञाने सति अपरोक्षावभासस्य - प्रत्यक्षज्ञानस्य । तत्कालीना - - अपरोक्षावभास- कालीना, या विषयनिष्ठा सत्ता, तत्समनियतत्वात् । निरुक्तसत्तासमनियतत्वं च निरुक्तसत्ताव्यापकापरोक्षावभासव्यापकत्वम् । प्रथमव्यापकतावच्छेदकः सम्बन्धो विषयत्वम् । द्वितीयव्यापकतावच्छेदकसम्बन्धस्तादात्म्यम् । यद्वा व्यापकत्वमात्रम् । व्याप्यतावच्छेदको व्यापकतावच्छेदकश्च सम्बन्ध:कालिकः । स च खण्डकालानुयोगिको ग्राह्यः, नातो महाकालमादाय दोषावकाश: । तदवच्छिन्नरजतसत्त्वे - व्यावहारिकत्वावच्छिन्नप्रातिभासिकरजतसत्त्वे । तदवच्छिन्नाभावः = व्यावहा- रिकत्वावच्छिन्नप्रातिभासिकरजताभावाः अयं भावः-प्रतियोगिताबछेदकविशिष्ट- प्रतियोगिज्ञानं अभावप्रत्यक्षे कारणम् । न हि घटत्वावच्छिन्नघटज्ञानं विना घटत्वा- वच्छिन्नाभावप्रत्यक्षं जायते, तथा सति अतीन्द्रियामावस्यापि प्रत्यक्षापातात् । एवं च व्यावहारिकत्वावच्छिन्न-प्रातिमासिकरजताभावज्ञाने कर्तव्ये व्यावहारिक- त्वावच्छिन्न-प्रातिमासिक-ज्ञानमावश्यकम् । अवच्छेदकं नावर्तमानं भवतीति तस्य वर्तमानत्वं रजतेऽभ्युपेयम् । किन्तु पटे घटत्वमिव प्रातिमासिके तन्नास्तीत्यगत्या तस्यापि प्रातिमासिकं सत्त्वमुपेयम् । तथा च नेदं रजतमिति बाधपूर्वकालिकेद- रजतमिति ज्ञानकाले तज्ज्ञानविषयीभूतस्य रजतस्येव प्रातिमासिकरजते व्यावहा- रिकत्वस्याप्रातिमासिकसत्तावतः स्वीकर्तव्यतया, व्यावहारिकत्वस्य प्रतियोगि- वृत्तित्वेन व्यधिकरणधर्मत्वामावेन, स्वीकृत्यापि व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नामावं, न ने रजतमिति कालिकनिषेधप्रत्ययोपपादनसम्मव: । प्रातिमसिक- वेदान्तपरिभाषा । व्यावहारिकत्व-विशिष्ट-प्रातिमासिकरजतस्य प्रतिमासकाले सत्त्वेन तनिषेधस्य त्रिकालसम्बन्धासम्भवस्याक्षतत्वात् । भवति तु तादृशनिषेधप्रत्ययः सर्वेषामिति तद्विरोधात् प्रातिमासिकरजतोत्पादः कल्पयितुमनहः । इति । स्थलविशेपेऽन्यथाख्यातिमभ्युपेत्य समाधत्ते- इति चेन्न पारमार्थिकत्वस्याधिष्ठाननिष्ठस्य रजते प्रतिभास- सम्भवेन रजतनिष्ठपारमार्थिकत्वोत्पत्त्यनभ्युपगमात् । पारमार्थिकत्वस्य = व्यावहारिकत्वस्य । अधिष्ठानं शुक्तिका तनिष्ठस्य । प्रतिभाससम्भवेन = ज्ञानसम्भवेन । रजतनिष्ठं = व्यावहारिकरजतनिष्ठं यत् पारमाथिकत्वं व्यावहारिकत्वं, तदनभ्युपगमात् तस्यास्वीकारात् । अयमाशयः--निषेधज्ञाने प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगिज्ञानमावश्यक- मित्यस्माभिरपि मन्तव्यमेव । नेदं रजतमिति निषेधज्ञानार्थ प्रतियोगिनि प्राति- मासिकरजते व्यावहारित्वरूपस्य व्यधिकरणधर्मस्य यांच्यावर वैशिष्ट्यं तज्ज्ज्ञानस्यावश्यकत्वेऽपि, निषेधज्ञानकारणीभूतं तत् व्यावहारिकत्वप्रकारक प्रातिमासिकरजतविशेष्यकं ज्ञानं न प्रतिभासभूतमभ्युपेयते, येन प्रातिमासिक- रजतमेव तस्मिन् व्यावहारिकत्वमपि समुत्पद्येत, ततश्च प्रतियोगितावच्छेवका- वच्छिन्न प्रतियोगिना, मध्ये किञ्चित्कालसत्त्वप्रम तया कालिकत्वस्य निषेधेऽभावात् युक्तः स्यात् भवदुक्त आक्षेपः । परन्तु इदं रजतमित्यत्र इदंपदार्थभूता या प्राति- मासिकरजताध्यासाधिष्ठानभूता तववच्छेदकभूता या शुक्तिका तनिष्ठं ययावहा- रिकत्वं, तस्य ज्ञानं रजतान्ययाख्याति-- पम् । अन्यथाख्यातिस्थले च न विषयस- मुत्पावः, ततोऽनेकपूर्वमेव अज्ञानस्य तेन रूपेण परिणततया, इदानी तत्परिणा- मात् । सति चैवं शुक्तिकानिष्ठस्य व्यावहारिकत्वस्य कस्मिन्नपि काले प्रातिमासिक- रजतेऽसत्त्वेन तववच्छिन्ननिषेषस्य त्रिकालसम्बन्धितया प्रातिमासिकरजतोत्पादा- भ्युपगमेऽपि नेदं रजतमिति कालिकरजतनिषेधप्रतीतेः सुसम्पावतया नाक्षेपा- वकाश इति । तथा च प्रथम इदं रजतमिति प्रतिमासः, तत्समसमयमेव च प्राति- भासिकरजतोत्पत्तिः, ततो "रजतमिदं व्यावहारिकम्" इति व्यावहारिकत्वात्मकान्य- धर्मपुरस्कारेण पूर्वसमुत्पन्नप्रातिभासिकरजतस्य ख्यातिः, तदनन्तरं शुक्तितत्त्व- साक्षात्कारः, ततो नेदं रजतमिति कालिकनिषेधज्ञानमिति न काप्यनुपपत्तिः ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । १११ ननु प्रातिभासिकवस्तूत्पादमङ्गीकृत्यापि यदि अन्यथाख्यातिस्वीकार आवश्यकः कृतं तर्हि प्रातिभासिकसृप्टिस्वीकारेण, इत्याशङ्कानिरासायाह- यत्रारोप्यमसनिकृष्टं तत्रैव प्रातिभासिकवस्तूत्पत्तेरङ्गीकारात् । आरोप्यं = रूप्यादि । असनिकृष्टं इन्द्रियसन्निकर्षाभाववत् । तत्रैवेत्येव- करेणागतिय॑ज्यते । अयं भावः-न खल्वन्यथाख्यातिप्रद्वेषात् स्वीक्रियतेऽस्माभि- रनिर्वचनीयख्यातिः, किन्तु यत्रान्यथाख्यातिन भवितुमर्हति तत्रागत्या स्वीक्रियते सा । अन्यथाख्यातिहीन्द्रियसन्निकर्षाधीना । न हि हट्टस्थरजतेन तद्गतरजतत्वेन वा सह सम्भवी कश्चन सन्निकर्षः केवल शुक्तिसन्निकृष्टचक्षुष इत्यगत्या अनिर्वचनीयरजततत्प्रतिमाससृष्टिरभ्युपेयते । व्यावहारिकेदंपदार्थनिष्ठव्यावहारिक- त्वस्य चक्षुस्संयुक्ततादात्म्य-सन्निकर्षवत्तया तेन रूपेण प्रातिमासिकरजतज्ञानात्मक- प्रतियोगितावच्छेनाविनवप्रतियोगिज्ञानसम्मवेन नाङ्गीकरणीया गौरवग्रस्ता प्रातिमासिकव्यावहारिकत्वोत्पत्तिरिति । अपसिद्धान्तापातशङ्कां निराकरोति । अत एवेन्द्रियसनिकृष्ट-जपाकुसुमगत-लौहित्यस्य स्फटिके भान- सम्भवान्न स्फटिकेऽनिर्वचनीयलौहित्योत्पत्तिः । अत एव = सन्निकृष्टारोप्यस्थले अन्यथाख्यातिस्वीकारादेव । इन्द्रिय- सन्निकृष्टं यत् जपाकुसुमगतं लौहित्यं तस्य । अनिर्वचनीयं यत् लौहित्यं, तस्यो- त्पत्तिर्नेति सम्बन्धः । स्वीक्रियते वेदान्तिभिरिति शेषः । मयमाशयः अनावृतजपा- कुसुमसमीपवत्तिनि स्फटिकशकले यत् सकलस्यारण्यमानं जायते तदन्यथाख्याति- रेवेति स्वीक्रियत एव वेदान्ताचार्यः । तथा चारण्येन सह सनिकृष्टत्वाविशेषात् कुतो न प्रकृतेऽपि इदंपदार्थनिष्ठस्य व्यावहारिकत्वस्य प्रातिमासिकरजत- निष्टतया भानुमुपेयम् ? दृष्टान्तलामानापसिद्धान्तापातशङ्का, इति । प्रातिभा- सिकमनन्यवेद्य भवतीति, पूर्वमुक्तं जपाकुसुमसन्निहितस्फटिकारुण्यं नानन्यवेद्य- मिति युक्तमेव तस्याप्रातिभासिकत्वम् । इदमर्थसन्निहितप्रातिभासिकरजत- व्यावहारिकत्वमनन्यवेद्यमन्यवेद्य वेति तु चिन्तनीयम् ।
११२ वेदान्तपरिभाषा । यदि आरोप्येन्द्रियसग्निकर्पस्थल एवान्यथा ख्यातिः, इतरथा अनिर्वचनीयख्याति:, तदा यत्रानव्यवहिती जपास्फटिको विद्यते, किन्तु जपाचक्षुषोर्मध्ये वर्तते व्यवधानम् , स्फटिकचक्षुषोर्मध्ये चाव्यवधानम् , तादृशस्थले स्फटिकविशेषणतया भासमान- मारुण्यं पुनरनिर्वचनीय स्यात् इत्याह- नन्वेवं यत्र जपाकुसुमं द्रव्यान्तरव्यवधानादसनिकृष्टं स्फटिकमात्र सनिकृष्टं तत्र लौहित्यप्रतीत्या प्रातिभासिकलौहित्यं स्वीक्रियताम् । अन्यत् द्रव्यं द्रव्यान्तरं, तदेव व्यवधानं व्यवधायकम्, तस्मात् । असन्निकृष्टं - सन्निकर्षाभाववत् । चक्षुषः इति शेषः । अव्यवहितजपाकुसुम- स्फटिकखण्डस्थल एव द्विविधाकल्पना न युक्त ति भावः । आपत्तैरिप्टतामभ्युपगच्छन् परिहरति- इति चेन्न, इष्टत्वात्। अयमाशयः-पूर्वमेवेदं प्रतिपादितं यत् सन्निकृप्टारोप्यस्थल एवान्यथाख्याति- सम्भावना नान्यत्र । तथा च प्रकृते स्फटिके जपाकुसुमारुण्यप्रतिफलनसाम्येऽपि जपारुण्येन्द्रियसन्निकर्षाभावात् नान्यथाख्यातिसम्भावना । तस्मादनिर्वचनीयख्याति- रादरणीयैवेति नापत्ति: सन्निकर्षाभावश्चारुण्ये चक्षुषो जपासंयोगाभावादवसेयः । वृत्तां प्रक्रियां स्थलान्तरे सञ्चारयति- प्रत्यक्षभ्रमान्तरेष्वपि प्रत्यक्षसामान्यलक्षणानुगमो यथार्थप्रत्यय- लक्षणासद्भावश्च दर्शनीयः । प्रत्यक्षभ्रमान्तरेषु = रज्जुसादिभ्रमेषु । प्रत्यक्षस्य यत् सामान्यलक्षणं तस्यानुगमः समन्वय: । लक्षणे सामान्यत्वं च भ्रमप्रमोभयरूिपितवृत्तित्वम् । ज्ञप्तिगतप्रत्यक्ष- सामान्यलक्षणं चित्त्वम् । तत्तद्विषयांचे प्रत्यक्षत्वम्-तत्तदाकारवृत्त्यवच्छिन्न- चैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्याभेदः । भ्रमप्रमासाधारणमिदं लक्षणद्वयं शुक्तिरूप्य- भ्रम इव रज्जुसादिभ्रमेऽपि समन्वेति । प्रत्यक्षप्रमालक्षणं तु अनधिगताबाधितार्थ- प्रत्यक्षपरिच्छेदः । विषयकज्ञानात्वम्, तस्य च न तत्र तत्रातिव्याप्तिः । इति भावः। विषयस्य बाधितत्वात् यद्वा-ननु यद्यन्यथाख्थातिरपि स्वीक्रियते तर्हि वक्तव्यमिदं यत् तत्रापि प्रत्यक्षसामान्यलक्षणाक्रान्तिर्भवति न वेत्याकांक्षायामुक्तं प्रत्यक्षभ्रमान्तरेण्वित्यादि । तथा चान्यथाख्यातिष्विति तदर्थः। अन्यथाख्याती प्रत्यक्षप्रमालक्षणातिव्याप्त्यभावं दर्शयति प्रत्यक्षप्रमेति । अव्याप्त्यभावेऽसम्भवाभावः कैमुतिकन्यायसिद्धः इति अव्याप्त्यतिव्याप्त्यसम्भवाभावेन प्रत्यक्षलक्षणमदुष्टमिति भावः । अन्ययाख्यातिस्थले वैशिष्ट्यांशे बाध., प्रातिभासिकस्थले विशिष्टांशे इति विशेषः । प्रपञ्चितस्य प्रत्यक्षस्य इन्द्रियजन्यत्वेन्द्रियाजन्यत्वाभ्यां द्वविध्यं दर्शयति- उक्तं प्रत्यक्ष प्रकारान्तरेण द्विविधम् इन्द्रियजन्यं तदजन्यं चेति- तत्रेन्द्रियाजन्यं सुखादिप्रत्यक्षम् मनस इन्द्रियत्वनिरासात् । तदजन्यम् = इन्द्रियाजन्यम् । मनसः इत्यनन्तरं पूर्वमेवेति शेषः । मनस: इन्द्रियत्वे अनुमित्यादेरपि मनोजन्यत्वेन इन्द्रियजन्यतया प्रत्यक्षत्वापत्ते रिति भावः । ननु तर्हि सिद्धान्तेऽस्मिन् कतीन्द्रियाणि कानि च तानि ? इत्याकांक्षयामाह- - इन्द्रियाणि पञ्च घ्राणरसनचक्षुःश्रोत्रत्वगात्मकानि द्वन्द्वान्तथूयमाणस्य स्वरूपार्थकस्यात्मशब्दस्य प्रत्येकं सम्बन्धः । तथा च घ्राणं रसनं चक्षुः श्रोत्रं त्वक् इत्येतानि पञ्चेन्द्रियाणीत्यर्थः । गन्धग्राहकमिन्द्रियं प्राणम् । रसग्राहकमिन्द्रियं रसनम् । रूपग्राहकमिन्द्रियं चक्षुः, शब्दग्राहकमिन्द्रियं श्रोत्रम् । स्पर्शग्राहकमिन्द्रियं त्वक् इति तत्तल्लक्षणमवसेयम् । ननु श्रोत्रलक्षणस्य सर्पचक्षुषि अतिव्याप्तिः तस्य पृथक् कर्णाभावेन चक्षुष एव शब्दग्राहकत्वात् इति चेन्न न खलु गोलकस्यैव चक्षुष्ट्वं येनेयमाशङ्का स्यात् किन्तु गोलकाद्यतिरिक्तमतीन्द्रियं तत् । सति चवं एकस्मिन्नेव सर्पगोलके इन्द्रियद्वयावस्थानकल्पनात् । न च तस्मिन् चक्ष श्रवेति व्यवहारानुपपत्तिः गोलकैकाभिप्रायेण तथा व्यवहारात् ।
११४ वेदान्तपरिभाषा। इन्द्रियः व्यवहितविप्रकृष्टादिप्रत्यक्षं कुतो न जायते ? इत्याकांक्षायामाह- सर्वाणि चेन्द्रियाणि स्वस्वविषयसंयुक्तान्येव प्रत्यक्षज्ञानं जनयन्ति । विषयसंयुक्तत्वं विषयसम्बद्धत्वम् । तेन घटरूपादिना चक्षुषः संयोगा- भावेऽपि नासङ्गतिः । स एव च सम्बन्धः सन्निकर्षः । स पञ्चविधः । संयोगः, संयुक्ततादात्म्यं संयुक्ततदात्मतादात्म्यं, तादात्म्यं, तदात्मतादात्म्यं चेति । घटादिप्रत्यक्षजनने संयोगः । तद्गतरूपादिप्रत्यक्षजनने संयुक्ततादात्म्यम् । रूपत्वादि प्रत्यक्षे संयुक्ततदात्मतादात्म्यम् । शब्दप्रत्यक्ष तादात्म्यम् शब्दत्वप्रत्यक्ष सदात्मतादात्म्यम् सनिकर्षकार्यतावच्छेदकसम्बन्धी विषयत्वम् श्रोतव्यशब्दाश्रयस्य श्रोत्रत्वमभिप्रेत्य । परिच्छिन्नस्य श्रोत्रस्य शब्दाश्रय- पर्यन्तगतिस्वीकारे तु त्रय एव सन्निकर्षाः । शब्दाश्रयेण श्रोत्रसंयोगात् शब्दे श्रोत्र- संयुक्ततादात्म्यस्यैव संभवात् । शब्दत्वेन श्रोत्रसंयुक्ततदात्मतादात्म्यस्यैव सम्भवात् । इदं तु स्वसिद्धान्तसिद्ध सन्निकर्षघटकसंयोगे प्रतियोग्यनुयोगिवैचिश्यं प्रतिपादयति- । तत्र घ्राण-रसन-त्वगिन्द्रियाणि स्वस्वस्थानस्थान्येव गन्धरसस्प- झेपलम्भान् जनयन्ति । चक्षुःश्रोत्रे तु स्वत एव विषयदेशं गत्वा स्वस्व- विषयं गृहीतः । तेषु पञ्चसु इन्द्रियेषु मध्ये । घ्राणं च रसनं च त्वक् च घ्राण- रसनत्वचः, तानि चेन्द्रियाणि प्राणरसनत्वगिलिपाणि । गन्धोपलम्भादीनां यथा- संख्यमन्वयः। तथा च स्वस्थानस्थितं घ्राणं गन्धोपलम्भं जनयति इत्यर्थः । एवमेव रसादिष्वपि । तथा च घ्राणादिना स्वस्वावषयोपलम्भयले सन्निकर्षघटक: संयोगः स्वानुयोगिको ग्राह्यः । चक्षुःश्रोत्राभ्यां विषयोपलम्मस्थले तु संयोगता- दात्म्ये चक्षुःोत्रप्रतियोगिके प्राो । संयोग एव वा चक्षुःश्रोत्रप्रतियोगिक इति निगूढाशयः । ननु धोत्रस्याकाशस्य गमनासम्भवेन कथं भवदुक्तियुक्ता ? इत्यत आह- - श्रोत्रस्यापि चक्षुरादिवपरिचिता भेर्यादिदेशगमनसम्भवात् ।
प्रत्यक्षपरिच्छेदः । ११५ परिच्छिन्नतया - अव्यापकतया । व्यापकत्वे अतिदूरवत्तिशब्दस्यापि ग्रहणप्रसङ्गात् तस्याव्यापकत्वमवश्यं वाच्यम् । अव्यापके च पदार्थे गमनं नासम्भवि, इति युक्तं तस्य शब्ददेशगमनमिति भावः । उक्तेऽर्थेऽनुभवं प्रमाणयति- - अत एवानुभवो भेरीशब्दो मया श्रुत इति । अत एव श्रोत्रस्य शब्ददेशगमनादेव । अयमाशय:-श्रोत्रस्य शब्ददेशगमना- स्वीकारे न भवितुमर्हति कथमप्ययमनुभवः, भेर्युत्पन्नप्रथमशब्दस्याकाशगुणस्य गमनासम्भवेन स्वस्थानस्थितेन श्रोत्रेण ग्रहणासम्भवात्। शब्दाच्छन्दान्तरोत्स- त्तिक्रमेण कर्णविवरे शब्दादुप्तनस्य शब्दस्यव श्रोत्रण ग्रहणं भवतीति स्वीकार्यतया शब्दजशब्दस्य श्रुतत्वेन भेरीजन्यशब्दस्याश्रुतत्वात् श्रोत्रस्य शब्ददेशगमनस्वीकारे तु भेर्युत्पन्नस्यैव शब्दस्य श्रोत्रेण गृहीतत्वात् सम्पद्यते तथानुभवः । ? - ननु भेरीशब्द इत्यस्य न भेरीजन्यप्रथमशब्द इत्यर्थः किन्तु भेरीजन्यशब्द- सजातीयशब्दः । तथा च नानुभवबाधः, इति कथं श्रोत्रस्य गमनं कल्प्यम् इत्या- शक्कायामाह- वीचीतरङ्गन्यायेन कर्णशकालोपतोऽनन्तशब्दोत्पत्तिकल्पना- गौरवम्, भेरीशब्दो मया श्रुत इत्यादिप्रत्ययस्य भ्रमत्वकल्पना- गौरवञ्च स्यात् । तदेवं प्रत्यक्षं समाप्तम् । तथा चानन्त-शब्दोत्पत्तिकल्पनागौरवात् न तार्किकमतस्य सौष्ठवम् । किञ्च भेरीशब्दो मया श्रुतः इति व्यवहारस्थले भेरीशब्दशब्दस्य यथा श्रुतार्थकत्वे तज्जन्य- शाब्दबोधस्य भ्रमत्वकल्पनापत्तिः बाधितार्यविषयकत्वात् । यदि च मेरीशब्द- सजातीयशब्दोऽर्थः तवा लक्षणापत्तिः इति सर्वथा गौरवमिति भावः । प्रत्यक्षपरिच्छेदभगवती इति समाप्ता ।
११६ 'वेदान्तपरिभाषा। अथानुमान-परिछेद-भगवती इन्द्रियं तत्सन्निकर्षो वा प्रत्यक्षप्रमाणमिति विवेचितं प्राक् । नियतसाहचर्यात्मि- कायाः व्याप्तेः प्रत्यक्षस्यैव धूमादिलिङ्गकवयादिप्रसिद्धविधेयकानुमितिस्थले अनुमानपदार्थतया प्रत्यक्षप्रमाण कारणं, व्याप्तिप्रत्यक्षात्मकमनुमान कार्यमिति कारणकार्यभावसङ्गत्या अनुमानं निरूपयितु प्रतिजानीते- अथानुमानं निरूप्यते । । अथ == अनन्तरं। प्रत्यक्षनिरूपणानन्तरमित्यर्थः । अनुमानं अनुमिति- करणात्मकमनुमानप्रमाणम् । निपूर्वकरूपधात्वर्थों ज्ञानानुकूलो व्यापारः । आश्रयत्वं तिर्थः । मयेति शेषः । तदर्थो मत्कर्तृ कत्वम्-तस्य च अथार्थंकदेशप्रत्यक्ष- निरूपणे निपूर्वकरूपधात्वर्थे चान्वयः । धात्वर्थव्यापाराश्रयत्वञ्चानुमाने स्वजन्यज्ञान विषयत्वसम्बन्धेन । अथार्थानन्तर्य च निरूपणान्तरव्यवधानराहित्यम् । न तु सामान्यतो व्यवधानराहित्यरूपं व्यापारान्तरव्यवधानाभावस्य निश्शन वक्तुमशक्यत्वात् । व्यापारश्च ग्रन्थग्रथनात्मको बोध्यः । ज्ञानञ्चोपदेश्यनिष्ठमव- सेयम् । तथा चास्मत्कर्तृको यः उपदेश्यनिष्ठप्रत्यक्षविषयकज्ञानानुकूलो व्यापारः, तदव्यवहितोत्तरवर्ती यः अस्मत्कर्तृ कोपदेश्यनिष्ठज्ञानानुकूलो व्यापारः, स्वजन्य- ज्ञानविषयतासम्बन्धेन तद्विशिष्टमनुमानम् इति वाक्यार्थबोधः । एवमेवान्यत्रा- प्यूह यम् । ज्ञानं लक्षणपरीक्षाधीनमिति अनुमानप्रमाणलक्षणमाह- अनुमितिकरणमनुमानम् । अनुमितेःकरणं अनुमितिकरणम्, तदेवानुमानम् । करणत्वमसाधारणकारणत्वम् । तथा चानुमितित्वावच्छिन्नकार्यतानिरूपितकारणतावत्वमनुमानत्वम् इति तल्लक्ष- णम् । तेनानुमितिसाधारणकारणीभूतानां ईश्वरादृष्टादीनां वारणम् । कार्यतायामनु- मितित्वावच्छिन्न त्वनिवेशान्मनस: अनुमानत्वनिराकरणम् । न चैवं व्याप्तिसंस्कारे अनुमित्यसाधारणकारणेऽतिव्याप्तिः । तस्य लक्ष्यत्वाभ्युपगमात् । न चानुमिति कारणं च व्याप्तिज्ञानमित्युत्तरग्रन्थ विरोधः, फलायोगव्यवच्छिन्नस्यैव कारणस्य अनुमानपरिच्छेदः । ११७ करणत्वमिति सिद्धान्तादरे तस्यान्यथाव्याख्यास्यमानत्वात् । सस्कारस्य कारणता- वच्छेदकसम्बन्वत्वं न तु प्रकृत कारणत्वमिति कारणपदादेव तद्वारणम् । अत्र करणमनुमानमित्युक्तौ दण्डादावतिव्याप्तिः । मितिकरणमनुमानमित्युक्तौ प्रत्यक्ष प्रमाणादावतिव्याप्तिरिति । ननु अनुमितिमविज्ञाय न शक्यं ज्ञातुमनुमितिकरणत्वमित्यत आह अनुमितिश्च व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्या । . व्याप्तेः ज्ञानं व्याप्तिज्ञानं तेन जन्या । व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकतानिरूपितजन्यता- वती इत्यर्थः । तत्र व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकताया व्याप्तिज्ञानत्वेनेति तृतीयान्तार्थस्या- न्वयः । तृतीयार्थोऽवच्छिन्नत्वम् । तथा च व्याप्तिज्ञानत्वावच्छिन्ना या जनकता, तादृशजनकतानिरूपिता या जन्यता, तादृशजन्यतावत्वमनुमितेर्लक्षणम् । पर्वतो वह्निमानित्यत्र व्याप्तिज्ञानं = महानसे जायमानं यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्नि- रित्याद्याकारकं-धूमनियतवृह्निसमानाधिकरणो धूम इति ज्ञानम् । तादृशज्ञानत्वा- वच्छिन्ना या जनकता सा प्रोक्तज्ञाननिष्ठेव जनकता, तन्निरूपितजन्यत्वस्य पर्वतो वह्निमानित्यनुमितावायाततया लक्षणसमन्वयः। जनकतायां व्याप्तिज्ञानत्वावच्छिन्नत्वनिवेशप्रयोजनमाह- व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायादे तत्त्वेन जन्यत्वाभावान्नानुमितित्वम् । व्याप्तिज्ञानस्यानुव्यवसाय: व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायः, तदादेः । आदिपदेन ध्वंसेच्छा- प्रयत्नादीनां संग्रहः । अयमाशयः-यदि जनकतायां व्याप्तिज्ञानत्वावच्छिन्नत्वमनिवेश्य केवलं व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकतानिरूपितजन्यत्वमानं लक्षणमुच्येत तवा "धूमनिष्ठ- वह्निव्याप्तिमहं जानामि" । इति धूमनिष्ठवह्निव्याप्तिविषयकज्ञानात्मकानु- व्यवसायेऽतिव्याप्तिर्दुर्वारा स्यात् । प्रत्यक्ष प्रति विषयस्य कारणतया व्याप्तिज्ञान- प्रत्यक्षात्मकानुव्यवसायं प्रति व्याप्तिज्ञानस्यापि विषयविधया जनकतया व्याप्ति- ज्ञाननिष्ठजनकतानिरूपितजन्यत्वस्य निरुक्तानुव्ययसायेऽपि गतत्वात् । एवं व्याप्ति- ज्ञानेच्छायां, व्याप्तिज्ञानविषयकप्रयत्लेऽतिव्याप्तिः; तत्र तत्र व्याप्तिज्ञानस्य विषय- विधया कारणत्वात् । किञ्च व्याप्तिज्ञानध्वंसेप्यतिव्याप्ति: । ध्वंसं प्रति प्रतियोगिनः कारणतया, व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकतानिरूपितजन्यत्वस्य व्याप्तिज्ञानध्वसेऽपि गतत्वात् । जनकताया व्याप्तिज्ञानत्वावच्छिन्नत्वदाने च अनुव्यवसाये, ११८ वेदान्तपरिभाषा । जिज्ञासायां प्रयले च विषयत्वावच्छिन्नजनकतानिरूपित जन्यतायाः ध्वंसे च प्रतियोगिलातिनजनकतानिरूपिताया एव सत्त्वेन व्याप्तिज्ञानत्वावच्छिन्न- जनकतानिरूपितजन्यतायाः अभावात् नातिव्याप्तिः । अनुमानलक्षणलक्ष्यमाह विशेषत:- अनुमितिकरणं च व्याप्तिज्ञानम् । - हेतौ या साध्यनिरूपिता व्याप्तिः तज्ज्ञानमनुमिती करणम् । यथा पर्वतो वह्नि- मानित्यत्र महानसे जायमानं "धूमो वह्निव्याप्यः" "धूमव्यापकवह्निमाकरणो धूमः" इत्याद्याकारकं ज्ञानम् । इदन्तु संस्कारस्य कारणतावच्छेदकसम्बन्धतापले, करणलक्षणे व्यापारवत्वनिवेशाभ्युपमे वा । यदि च फलायोज्यसकारणस्यैव करणत्वं, संस्कारस्य न कारणतावच्छेदकसम्बन्धत्वं, तवा "ज्याप्तिः ज्ञायते स्मर्यते अनेन इति व्याप्तिज्ञानम्" व्याप्तिविषयकः संस्कारः इत्यर्थः। तथा च व्याप्तिसंस्कार एव करणमिति भावः । न चानुपदं "तत्संस्कारोऽवान्तरव्यापारः" इत्यस्य वक्तव्यतया नास्य पक्षस्य ग्रन्थकृत्सम्मतत्वमिति वाच्यम् । एतत्पक्षे तत्र सनिकर्थिकव्यापारशब्दप्रयोगेन सन्निकर्षस्थानीयत्वसूचनात्, मध्यवत्तिता- सूचकावान्तरपदेन अनुमित्यव्यवधानसूचनात् फलायोगव्यवच्छिन्नत्वस्य व्यक्तीकृतत्वेन प्रकृतार्थस्यैव तेन ग्रन्थेन ज्ञानात् । करणं चेत्यत्र चकारोऽप्यर्थकः, तेन व्याप्यत्वेन ज्ञायमानस्य हेतोरपि अनुमितिकरणत्वं शक्यते वक्तुमिति सूचितम् । न चातीतानागत- हेतोर्जायमानायाः अनुमितेरभावापत्तिः। व्याप्त्यनुभवकरणत्वपक्षे अतिव्यवहितस्या- पि तस्य यथा संस्कारसम्बन्धेन अनुमित्यव्यवहितपूर्ववत्तित्वं सुसम्पादं तथा हेतोरपि अतीतानागतादेः तेन सम्बन्धेन अनुमित्यव्यवहितपूर्ववत्तित्वस्य सुसम्पादत्वात् । तार्किकमते परामर्श अतीतादिहेतुजन्यत्वासम्भवेन तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्व- रूपस्य व्यापरत्वस्यैवानपेक्षणात् । सत्यामपि वा व्यापारापेक्षायां संस्कारस्यैव तथा- स्वेन तत्रातीतानागतहेतुजन्यत्वस्यापि सम्भवादित्यभिनवा दिक् । ननु अतिपूर्वध्वस्तस्य व्याप्तिज्ञानस्य अनुमित्यव्यवहितपूर्ववत्तित्वाभावात्- कारणत्वमप्यसम्भवि, कुतः पुनः करणत्वमितिशङ्कानिरासाय प्रोक्तव्याप्तिज्ञान- पदार्य विवृणोति- तत्संस्कारोऽवान्तरव्याप। तत्संस्कारः = व्याप्तिसंस्कारः। अवान्तरव्यापारः - प्रत्यक्षस्थले अवान्तर- व्यापारो यः सन्निकर्षः तत्स्थानीयः । एतेन फलायोगव्यवच्छिन्नत्वं प्रदश्य अनुमानपरिछेदः । । असाधारणत्वं ध्वनितम् । इति तु संस्कारकरणत्वपक्षे । संस्कारस्य करणतावच्छेदक- सम्बन्धत्वपक्ष तुपूर्वोक्तशङ्कयर्वतद्ग्रन्थावतारः। एतत्पक्षे अवान्तरव्यापार इत्यस्य, मध्यवर्ती-सन्निकर्षः, सम्बन्ध इति पर्यवसितोऽर्थः । तथा च पूर्वध्वस्तस्यापि व्याप्त्य- नुभवस्य तथैवानुमित्यव्यवहितपूर्ववत्तित्वं सुसम्पावं, यथा स्मृतिस्थले विषयानु- भवस्य, स्वर्गादिस्थले च चिरध्वस्तस्य यागादेः इति भावः। करणस्य व्यापार- सापेक्षत्वकल्पे तु व्याप्तिज्ञानं करणं चेत् व्यापारः कः ? इत्याकांक्षायामेवास्य ग्रन्थस्यावतारः । अत्र कस्मिन् पक्षे ग्रन्थकारस्वरस इति विवेच्यमाने संस्कारकरणत्व- पक्षस्यैव ग्रन्थकृत्सम्मतत्वं प्रतिभाति । अन्यथा "तत्संस्कारोऽवान्तरव्यापारः" इत्यस्याव्यवहितोत्तरं "न तु तृतीयलिङ्गपरामर्शोनुमितिकरणम्" इत्युक्त्या परामर्शस्यानुमितिकरणत्वखण्डनमनुचितं स्यात् । करणचर्चायाः व्यवहित- त्वात् । तथा च "तृतीयलिङ्गपरामर्शों न व्यापार:' इत्युक्तियुक्ता स्यात् । अथवा 'तत्संस्कारोऽवान्तरव्यापारः" इत्यतः पूर्वमेव "अनुमितिकरणं च व्याप्तिज्ञानम्" इत्यनन्तरं एतदुल्लेखः संगत: स्यात् । ननु तार्किकविशेषमत इव तृतीयलिङ्गपरामर्शस्यैव कुतो नानुमितिकरण- त्वमभ्युपेयते इत्यत आह- न तु तृतीयलिङ्गपरामर्शोऽनुमितिकरणम् । हेतुत्वासिया तत्करण- त्वस्य दूरनिरस्तत्वात् । लिङ्गस्य हेतो: परामर्शो ज्ञानम् लिङ्गपरामर्शः । तृतीयस्य तस्यानुमिति करणत्व- मभ्युपगच्छन्ति तार्किकाः । तेषां मते-"महानसं धूमवत्" इति लिङ्गज्ञानं प्रथम तदनन्तरं धूमवान् पर्वत इति द्वितीयम् । अनन्तरं वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वत इति तृतीयं लिङ्गज्ञानं भवति । तदेव तैलिङ्गपरामर्श इत्यभिधीयते । लिङ्गपरामर्शोऽसौ नानुमितिकरणम् इत्यर्थः । तस्य = परामर्शस्य । अनुमितेहेतुत्वं अनुमिति- हेतुत्वम्, तस्यासिद्धिः, तया । तत्करणत्वस्य = अनुमितिकरणत्वस्य । दूरनिरस्त- त्वात् = असम्भूतत्वात् । करणत्वस्य कारणत्वघटिततया, यत्र परामर्श कारणत्व- मेव नास्ति अनुमितिं प्रति, का प्रत्याशा तत्र तत्करणत्वस्य ? व्यापकाभावे व्याप्या- भावस्य स्वभावसिद्धत्वात् । अयं भावः-व्याप्यसत्वे व्यापकसत्वमावश्यकमिति नियमः सर्वानुभवसिद्धः। तथा च यत्राधिकरणे व्याप्यस्य शानं भवति तत्र १२० वेदान्तपरिभाषा । व्यापकज्ञानात्मिका अनुमितिर्जायते । सति चैवं “यत्र वह्निव्याप्यो धूमः" इत्येक स्मरणात्मक ज्ञानम् धूमवान् पर्वतः इत्येवं च द्वितीयं स्मरणत्मक ज्ञानं, अथवा "वह्निव्याप्यो धूम" इति संस्कारोद्वोधः धूमवान् पर्वतः इति प्रत्यक्षं, तत्राऽपि प्रोक्तनियमबलेन अनुमितेरभ्युपगन्तव्यतया व्याप्तिविशिष्ट-वैशिष्टयावगाहिपरामर्श- मन्तरेण अनुमित्युत्पत्त्या व्यतिरेकव्यभिचारान्न तस्य कारणत्वं वक्तुं शक्यमिति । न च प्रोक्तस्थलद्वये कादाचित्के वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वत पति परामर्शस्थले च प्रोक्तनियमबलेनानुमितिः स्वीकर्तव्या । तन्निर्वाहाय अनुगतः कञ्चित्कार्यकारण- भाव: अङ्गीकर्त्तव्य:. स चासिद्ध इति वाच्यम् । उद्बुद्धव्याप्तिसंस्कारसहकृत- हेतुतावच्छेदकावच्छिन्नप्रकारकपक्षविशेष्यकज्ञानत्वेन हेतुत्वस्य वाच्यत्वे भावात् । न च वह्निव्याप्यो धूम: पर्वते इति परामर्शासग्रहः । इप्टत्वात् । न च वह्निव्याप्यवानिति ज्ञानासग्रहः । व्याप्तिप्रकारकसंस्कारविशेप्यप्रकारकज्ञानत्वेन हेतुत्वस्य वक्तव्यत्वात् । वस्तुतस्तु किञ्चिदनुयोगिकसम्बन्धवद्विशेष्यकव्याप्ति- प्रकारकोढुद्धसंस्कारत्वेनैव जनकत्वम् । तादृशसम्बन्धवत्त्वं च तादृशाम्बन्धवत्तया ज्ञातत्वम् तथा च नासंग्रहगन्धोऽपि । अनुमितेः संस्कारजन्यत्वाङ्गीकारे स्मृतित्वापत्तिरित्याशङ्कय परिहरति- क्षत्य । - % 3D न च संस्कारजन्यत्वेनानुमितेः स्मृतित्वापत्तिः, संस्कारमात्र- जन्यत्वस्य स्मृतिप्रागभावजन्यत्वस्य वा स्मृतित्वप्रयोजकतया संस्कार- ध्वंससाधारणसंस्कारजन्यत्वस्य तदप्रयोजकत्वात् । संस्कारनिष्ठ निमित्तकारणता-निरूपित कार्यत्वं संस्कारजन्यत्वं, तेन । स्मृतित्वा- पत्ति: स्मरणत्वप्रसंगः। संस्कारेतरासाधारणकारणाजन्यत्वे सति संस्कारजन्यत्वं संस्कारमात्रजन्यत्वं विवक्षितम् । अन्यथा स्मृतेरपि स्मृतित्वानापत्तिः । तस्या अपि ईश्वर-तदिच्छादृष्टादिसाधारणकारणजन्यत्वात् । स्मृतेः प्रागभावः स्मृतिप्रागभावः,: तज्जन्यत्वस्य । स्मृतित्वप्रयोजकतया = स्मृतित्वव्यवस्थापकतया । संस्कारस्य ध्वंस संस्कारध्वंसः, तत्साधारणं तत्रापिवृत्ति, यत्संस्कारजन्यत्वं तस्य । तदप्रयोजकत्वात् = स्मृतित्वाप्रयोजकत्वात् । अयममिप्रायः-संस्कारजन्यत्वमात्रं न स्मतिलक्षणम् । तथा सति संस्कारध्वंसस्यापि स्मृतित्वापत्तेः। संस्कारस्य प्रतियोगिक्रिया तं प्रत्यपि जनकत्वात् । संस्कारत्वावच्छिन्नजनकता- निकापतजन्यत्व क्त्या तहोषवारणेऽपि, त्वन्मतसिद्धप्रात्यमिज्ञायामतिव्याप्तिः । अतः संस्कारमात्रजन्यत्वं स्मृतित्वमिति वक्तव्यम् । तथा च संस्कारपक्षधर्मताशानाम्या- अनुमानपरिच्छेदः । १२१ - । जायमानायां नन्वनुमितो नावकाशः स्मृतित्वापादनस्य, तत्र संस्कारमात्रजन्यत्वा- भावात् । अथवा-कारणेन न कार्य भवति, अपि तु सामग्र्या। सामग्र्यां च सर्वत्र स्वप्रागभावस्यापि प्रवेशः । सति चैवं स्मृतिसामग्रीकुक्षिनिक्षिप्तस्य स्मृतिप्रागभावस्य यत् जनकत्वं, तन्निरूपितजन्यत्वस्य स्मृतावेव सत्त्वेन, अनुमितौ तदभावेन न तत्र स्मृतित्वापादावकाशः। तथा च स्मृतिप्रागभावसहकृतसस्कारजन्यत्वमेव स्मृतित्वं तत्प्रयोजकं वा । अनुमितो सस्कारजन्यत्वसत्त्वेऽपि स्मृतिप्रागभावसहकृतसंस्कार- जन्यत्वाभावेन नापत्त्यवकाश इति । प्रागभावानङ्गीकर्तृ मते पक्षस्य॑तस्य क्षोदक्षमत्व- मित्यस्वरससूचनाय वाकारः। ननु यत्र “वह्निव्याप्यो धूमः" इति व्याप्तिस्मरणम्, "धूमवान् पर्वतः" इति च पक्षधर्मताज्ञानम् तत: अनुमितिः, तत्र स्मृत्या संस्कारनाशेन, संस्काराभावेऽपि अनुमित्युत्पादेन, व्यतिरेकव्यभिचारात् कथं संस्कारस्य अनुमितिहेतुत्वम् ? इति शङ्खां निराकरोति- - न च यत्र व्याप्तिस्मरणादनुमितिस्तत्र कथं संस्कारोऽनुमिति- हेतुरिति वाच्यम् व्याप्तिस्मृतिस्थलेऽपि तत्संस्कारस्यैवानुमितिहेतु- त्वात्। न हि स्मृतेः संस्कारनाशकत्वनियमः, स्मृतिधारादर्शनात् । न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । यत्र = यादृशस्थले । व्याप्ते: स्मरणं व्याप्तिस्मरणम्, वह्निव्याप्यो धूम इति स्मरणात्मकं ज्ञानं, तस्मात् पक्षधर्मताज्ञान- सहकृतादिति शेषः तत्संस्कारस्यैव = हेतुनिष्ठव्याप्तिसंस्कारस्यैव । संस्कारस्य यन्नाशकत्वं, तस्य नियमः न हीत्यन्वयः। स्मृतिधारादर्शनादिति भावः । अयमाशयः-न संस्कारस्य फलसामान्यनाश्यत्वम्, अपि तु फलविशेषनाश्यत्वम् । अन्यथा तद्विषयकस्मरणोत्तरं पुनः तद्विषयकस्मरणं न स्यात् । प्रथमस्मरणेनैव संस्कारनाशे, कारणाभावेन कार्योत्पादासम्भवात् । सम्भवति च क्रमेण तद्विषयकं नानास्मरणम् । सति चैवं नास्याः शङ्कायाः अवसरो यत्, व्याप्तिस्मरणस्थले तेन संस्कारनाशात् कारणामावे सर्वानुभवसिद्धा अनुमितिः, कथं स्यात् संस्कारकारणत्ववादि- नाम् ? इति । चरमस्मरणस्येव संस्कारनाशकत्वेन व्याप्तिस्मरणकालेऽपि संस्कार- सत्वात् ततोऽनुमितेः शक्यसम्पावत्वात् । इदमुपलक्षणम् । सामान्यतः संस्कारत्व- स्मृतित्वाभ्यां नाश्यनाशकभावाभ्युपगमेऽपि नानुपपत्तिरनुमितेः । तथा हि-यस्मिन् मते १२२ वेदान्तपरिभाषा । सामन्यत: तयोः नाश्यनाशकभावः, तस्मिन् मते न संस्कार प्रति अनुभवत्वेन हेतुता, अपि तु तद्विषयकज्ञानत्वेन । सति चैवं व्याप्तिस्मरणस्य यथा पूर्वसंस्कारनाशक- त्वं तथा परसंस्कारजनकत्वमपि । एवञ्चोवृद्धतादृशसंस्कारपक्षधर्मताज्ञानाभ्यां क्षणविलम्बेन अनुमित्युत्पादस्य सम्भवात् । न च क्षणविलम्बकल्पनागौरवमिति वाच्यम् । तादृशस्थले परामर्शकारणत्ववादिभिरपि क्षणविलम्बस्यागत्या कल्पनीयतया तादृशगौरवस्यापोद्यत्वात् । न च संस्कारकरणत्वपक्षे एतस्य सुवचत्वेऽपि व्याप्त्यनु- भवस्य करणत्वपक्षे न तथेति वाच्यम् । स्वजन्यवृत्त्यैतद्विषयकसंस्कारत्वावच्छिन्नस्य कारणतावच्छेदकसंसर्गतोपगमात् । करणत्वस्य व्यापारघटितत्वपक्षे तु नेयं गतिरिति। अनुबुद्धव्याप्यसंस्कारपक्षधर्मस्वाभ्यां अनुमितिमाशङ्कय निवारयति- न चानुबुद्धसंस्कारादप्यनुमितिः, तदुद्बोधस्यापि सहकारित्वात् । अनुमित्यापत्तिर्न चेत्येवं सम्बन्धः । उद्बोधं प्राप्त: उद्बुद्धः, न उद्द्धः अनुवृद्धः तादृशो यः संस्कारः तस्मात् । संस्कारे उद्बोधः स्मृतिजनकतावच्छेदकः शक्तिविशेषः, सहकारित्वात्, जनकतावच्छेदकत्वात् । अन्यथा भिन्नयोरेव सहकार्यभावादसङ्गत्या- पत्तः । अयमाशयः-- खलु संस्कारमात्रस्य अनुमितिकारणत्वयुच्यते येनानुवृद्ध- संस्कारादापादिता भवेवनुमितिः अपि तु उद्बुद्धसंस्कारस्य । तादृशसंस्कारपक्षधर्म- ताज्ञानयोः सत्वे त्वनुमितिरिष्टव इति । फलतिार्थमुपसंहरति- एवं च धूमवान् पर्वत इति पक्षधर्मताज्ञाने धूमो वह्निव्याप्य इत्यनुभवाहितसंस्कारोदोघे च सति वह्निमानयमित्यनुमितिर्भवति । तु मध्ये व्याप्तिस्मरणं, तज्जन्यं वह्निव्याप्यधूमवानयमित्यादि- विशिष्टज्ञानं वा हेतुत्वेन कल्पनीयम् । गौरवात् मानाभावाच्च । एवंच = व्याप्तिस्मरणतृतीयलिङ्गपरामर्शयो: कारणत्वे खण्डिते च "धूमो. वह्निव्याप्यः" इति योऽनुभवः, तेन आहित: उत्पादितो य: संस्कारः, तस्य उद्वोधे। न तु कल्पनीयमिति सम्बन्धः । मध्ये संस्कारानुमित्योः = अनुभवानु- मित्योरिति शेषः । अयं भावः-तद्विना कार्यानुत्पत्तिरेव कस्यापि कारणत्वाभ्युपगमे न अनुमानपरिच्छेदः। १२३ 'भवति मानम् । प्रकृते व्याप्तिस्मरणतृतीयलिङ्गपरामर्शयोः कारणत्वमनङ्गीकृत्यापि यदशक्यत एव सम्पादयितुमनुमितिः, तहि कि प्रयोजनं तयोः कारणत्वाभ्युपग- मस्य गौरवदोष दूषितस्य ? इति । ननु वह्निमानयमित्यनुमितिर्भवितुमर्हतीति प्रतिपादितं भवता, तत्रायमित्य- नेन, ध्रुवं पक्षोऽभिप्रेतः, तथा च पर्वतो वह्निमान् इत्याद्यनुमितिर्भवतीति तदर्थः फलितः । तत्रेदं तावद्वक्तव्यम् यत्, “पर्वतः, वह्निमान्" इत्येकव वृत्तिः कै वा ते ? वृत्तेरेकतायां तदनन्तरं जायमानस्य “पर्वत पश्यामि" इत्यनुभवस्य विरोधः । वृत्त्यनैक्ये "वह्निमानयमित्यनुमितिर्भवतीति भवदुक्तिरयुक्ता इत्याशंकां परिजिहीर्घ- राह- " - तच्च व्याप्तिज्ञानं वह्निविषयकज्ञानांश एव कारणम् न तु पर्वत- विषयकत्वांशे, इति पर्वतो वह्निमान् इति ज्ञानस्य बढ्यंश एवानु- मितित्वं न पर्बतांशे। व्याप्तिज्ञानम् = व्याप्तिविषयकानुभवः । ज्ञानस्यांशो ज्ञानांश: वह्निविषयको यो ज्ञानांशः तस्मिन् । न तु पर्वतांशे %D न तु पर्वतविषयकज्ञानांशे। इतिशब्दो हेतुवाची । अयं भावः-पर्वतो वह्निमान् इति नैका वृत्तिः, अपितु वृत्तिद्वयी। तत्र पर्वत इति प्रत्यक्षात्मिका वृत्तिः, वह्निमान् इत्यनुमित्यात्मिका । कुत एवमिति चेत् ? यतः कारणीभूतव्याप्तिज्ञानस्य न पर्वतवृत्तिजननसामर्थ्य तत्र । यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निरिति साहचर्यावगतिसम्पन्नव्याप्तिज्ञाने पर्वतस्यात्यन्त मनुल्लेखात् । तथा चानुमितित्वप्रयोजकीभूतव्याप्तिज्ञानजन्यत्वस्याभावात् न "पर्वतः" इति वृत्तौ अनुमितित्वसम्भवः । एवं च न पर्वतं पश्यामीत्यनुभव- विरोधः इति । न च वह्निमानयमित्यनुमितिर्भवतीति प्रतिपादनविरोधः, वह्निमान् इत्यंशस्यैववानुमितित्वाभिप्रायेण तथोक्तः । वृत्तिद्वयावच्छिन्नचैतन्य- स्यैक्यात् वृत्तिद्वये एकज्ञानत्वमुपगम्य तत्रानुमित्वैक्यादिव्यवहार इति सरलार्थः । एतेन ज्ञानस्य निरंशतया "ज्ञानांशे" त्युक्त्ययुक्तिः इत्यपि निरस्तम् । वृत्तिद्वये एकस्मिन् ज्ञानत्वे अभ्युपेते एकैकस्याः तस्या अंशत्वव्यवहारस्य सादृश्यसिद्धत्वात् । न च सर्वत्र वृत्तिद्वयानियमापत्तिः, कार्यस्य सामग्रीनियम्यत्वात् । ननु पर्वतवृत्तावनुमितित्वानभ्युपगमे तत्र किमनुभवत्वम् ? इत्यत आह- १२४ वेदान्तपरिभाषा। तदंशे प्रत्यक्षत्वस्योपपादितत्वात् । तदशे = पर्वतांशे । इन्द्रियप्रणालिकया अन्तःकरणस्य पर्वताकारधारणात् अन्तःकरणवृत्तिपर्वतयोः एकदेशस्थतया तदुमयावच्छिन्नचंतन्याभेदात् विषयभूत- घटस्य प्रत्यक्षत्वमिति पूर्वमेवोक्तमिति भावः । ननु व्याप्तिज्ञानमनुमिति प्रति करणमिति प्रतिपादितम्, तत्र का नाम व्याप्तिः ? इत्याकाक्षायामाह- व्याप्तिश्चाशेषसाधनाश्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यरूपा । A न मिथ्यात्व- अशेषत्वं साधनाश्रये विवक्षितम् । सावनं हेतुः । तथा च अशेषो यः साधनस्य = हेतोराश्रयः तदाश्रितं यत् साध्यं, तत्समानाधिकरण्यं हेतो व्याप्तिः । प्रपञ्चो मिथ्यादृश्यत्वात् इति सद्धेतुस्थले साधनं दृश्यत्वम्, तस्याशेषाश्रयः प्रातिमासिकव्यावहारिकाविः, तवाश्रितं साध्य - मिथ्यात्वं, तवधिकरणे यावति व्यावहारिकप्रातिमासिकपदार्थे दृश्यत्वहेतो तितया सामानाधिकरण्यस्य दृश्यत्वहेतौ सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः । सर्वमिथ्या-सत्त्वात् इत्यत्रा साधनस्य सत्त्वस्याशेषाधिकरणान्त:पाति ब्रह्मापि, तदाश्रितं साध्यं न मिथ्यात्व, ब्रह्मणः सत्यत्वात् । तथा चाशेषसाधनाश्रयाश्रितसाध्या प्रसिद्ध्या, तत्सामानधिकरण्यस्याप्यप्रसिद्ध्या हेतौ तदभावान्नातिव्याप्तिः । अव्याप्त्यभावे तु असम्भवस्य सुतरां नावकाशः, नावकाशः, इति अव्याप्त्यतिव्याप्त्यसम्भवात्मकदूषणत्रय- शून्यतया लक्षणस्यादुष्टत्वमिति । साधनाश्रये अशेषत्वानुक्ती सर्व मिथ्या सत्त्वात् इत्यत्रातिव्याप्तिः सत्वाधिकरणव्यावहारिकप्रातिभासिकान्यतराश्रितमिथ्यात्व- सामानाधिकरण्यस्य सत्त्वहेतौ गतत्वात् । एवमेव पर्वतो वह्निमान्धूमात् इत्यादावपि लक्षणसमन्वयादिकं बोध्यम् । साधनाश्रयत्वसाधननिष्ठनिरूपकतानिरूपिताधिक- रणत्वम् । तत्र निरूपकता साधनतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्ना ग्राह्या । अन्यथा स्वाधिष्ठानत्व-स्वपरिणाम्यधिष्ठानत्वादिसम्बन्धेन दृश्यत्वहेतोब्रह्मण्यपि सत्त्वेन साधनाश्रयब्रह्माश्रितत्वस्य मिथ्यात्वसाध्येऽभावात् अव्याप्ति: स्यात् । तदुक्तौ च स्वरूपेण सम्बन्धेन दृश्यत्वस्य ब्रह्मभिन्ने एव पदार्थे सत्त्वेन तत्र मिथ्यात्वस्य साध्यस्याश्रितत्वेन अव्याप्त्यभावात् । आश्रितत्वं वृत्तित्वम् तच्च साध्यतावच्छेदक- सम्बन्धावच्चिन्नं पाह्यम् । अन्यथा सर्व मिथ्या सत्त्वात् इत्यत्र साधनाश्रयब्रह्मणि अनुमानपरिच्छेदः । १२५ स्वाध्यस्ताश्रितत्वसम्बन्धेन साध्यस्य मिथ्यात्वस्याश्रिततया अतिव्याप्त्यापत्ते. । तदुक्तौ च स्वरूपसम्बन्धेन ब्रह्मणि मिथ्यात्वसाध्यस्यानाश्रितत्वेन अतिव्याप्त्ययोगः । एवमेव साध्यसामानाधिकरण्यमित्यत्र साध्यनिष्ठं निरूपकत्व साध्यतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्नं साधननिष्ठ वृत्तित्वं च साधनतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्न वोध्यम् । अन्यथा प्रोक्ताव्याप्त्यतिव्याप्त्योः तादवस्थ्यापत्ते.। साधनाश्रितेत्यत्र साधनपदं साधनतावच्छेदकत्वावच्छिन्नपर बोध्यम् । अन्यथा “घटो ब्रह्मज्ञान बाध्यः पारमाथिकप्रातिभासिकान्यत्वविशिष्टसत्वात् इत्यत्राच्याप्त्यापत्तेः । विशिष्ट: शुद्धान्नातिरिच्यते” इति नियमेन सत्त्वात्मकसाधनाधिकरणे ब्रह्मणि ब्रह्मज्ञान- वाध्यत्वस्यानाश्रितत्वात् । साधने साधनतावच्छेदकावच्छिन्नत्वनिवेशे तु विशिष्ट शुद्धधर्मावच्छिन्नाश्रयत्वयोर्भेदात् साधनाधिकरणपदेन व्यावहारिकस्यैव 'धनु शक्यतया तत्र साध्यस्याप्याश्रितत्वेनादोषात् । विशिष्टशुद्धयोरभेदानभ्युपगमे तु यथाश्रुतमेव सम्यक् । साव्यपदं साध्यतावच्छेदकावच्छिन्नपर वोध्यम् । अन्यथा पर्वतो वह्निमान्धूमादितिनानाव्यक्तिसाध्यहेतुकसद्धेतुस्थले तत्तद्वह्निसामानाधिकरण्यस्यानुगततया अनुगतव्याप्त्यलाभप्रसङ्गात् । नन्वेवमपि सामानाधिकरण्यस्य तदाधिकरणवृत्तित्वरूपतया तस्य च वृत्तिभेदाद्भिन्नतया व्याप्तिरक्याभाव इति चेत्, तादृशसाध्यसामानाधिकरण्यावच्छेदकहेतुतावच्छेदक स्यैव व्याप्तित्वाभ्युपगमात् । एतेन अशेषधूमाश्रयाश्रितवह्निसामानाधिकरण्यस्य पर्वतवृत्तिरासभादिसाधारणतया “वह्निव्याप्यो रासभः" इति व्याप्तिज्ञानाहित- संस्कारसहितात् रासभवान् पर्वत इति ज्ञानादभ्रान्तस्याप्यनुमित्त्यापत्तिरिति- निरस्तमिति दिक् । ननु व्याप्त्यनुभवं विना यदि नानुमितिरसादाहि तदाव्याप्त्यनुभवोपागो वक्तव्यः इत्यत आह- तत्तद्ध मात्मकसाधने सा च व्यभिचारादर्शने सति सहचारदर्शनेन गृह्यते । व्याप्ति: गृह्यते इत्यन्वयः । व्यभिचारस्यादर्शनं व्यभिचारादर्शनम् तस्मिन् सति । व्यभिचारः साध्यवदन्यवृत्तित्वम् । तस्य अदर्शनं दर्शनाभावः, ज्ञानाभाव इति फलितोऽर्थः । सहचरणं सहचारः सामानाधिकरण्यमिति यावत् । तस्य दर्शनं ज्ञानम् च माध्यवदन्यवृत्तित्वज्ञानामावसहितसाध्यवद्वृत्तित्वज्ञानम् व्याप्तिज्ञापकमिति फलितोऽर्थः। । तथा १२६ वेदान्तपरिभाषा । - ननु सहचारदर्शने भूयस्त्वं व्याप्तिज्ञानाय समीक्षितं न वेति जिज्ञासायामाह- तच्च सहचारदर्शन भूयोदर्शनं सकृद्दर्शन वेति विशेषो नादरणीयः । सहचारदर्शनत्वस्यैव प्रयोजकत्वात् । % 3D तत् व्यभिचारादर्शनसहितम् । सहचारदर्शने भूयस्त्व अनेकत्वम् । सकृत्-एकम् । विशेषो नादरणीयः वैलक्षण्यं नादरणीयम् । सहचारदर्शनत्व- स्य व्यभिचारादर्शनसहकृतसहचारदर्शनत्वस्य । प्रयोजकत्वात् = व्याप्त्यनु- भवोपायताप्रयोजकत्वात् । अयं भावः-भूयोदर्शनात्मकादेव सहचारदर्शनात् व्याप्ति- निश्रयः सम्भवतीति न नियमः पार्थिवत्वलोहलेख्यत्वयोः शतशः सहचारदर्शनेऽपि एकत्र होरके व्यभिचारदर्शनेन व्याप्त्यनिश्चयात् । अतः व्यभिचारज्ञानं न चेत्, सकृत्सहचारवर्शनादपि सम्भवितुमर्हति व्याप्तिनिश्चयः । सत्येवं व्यभिचारज्ञान विगमस्थले यदि भूयः सहचारवर्शनं, तर्हि तत्र व्याप्तिनिश्रयो वण्डापूपायित एव। ननु तार्किकरिव केवलान्वयि-केवलव्य तिरेक्यन्वयव्यत्तिरेकिभेदेन लिङ्गस्य वैविध्यमुपेयते न वा? अभ्युपेयते चेत् हेतुगतस्य केवलान्वयिसाध्यकत्वरूपस्य केवलान्वयित्वस्य, साध्यगतकेवलान्वयित्वाधीनतया, तस्य चात्यन्ताभावाप्रतियोगित्व- रूपतया, अत्यन्ताभावाप्रतियोगिनो वाच्यत्वज्ञेयत्वादेरभ्युपगमे तमादाय द्वैतापत्ति: । प्रोक्तव्याप्तेः पृथिवीतरभेदसाधकगन्धवत्त्वादिहेतावसिद्ध्या अव्या- प्त्यापतिश्च । नाम्युपेयते चेत् लक्षणस्येतरभेदानुमापकत्वासिङ्ख्या लक्षणसामान्या- सिद्धिरिति व्याप्त्यादिलक्षणमप्यसिद्धम्-अत आह- तच्चानुमानमन्वयिरूपमेकमेव न तु केवलान्वयि । तत् = अनुमितिकरणभूतम् । अनुमान = व्याप्त्यनुभवः तत्संस्कारो वा । अन्वयो - निरुतान्वयव्याप्ति: अस्ति अस्मिन् हैतौ इति अन्वयी हेतुः । तेन अन्वयिना विषयभूतेन रूप्यते = परिचीयते इति अन्वयिरूपम् । तथा च निरूक्तान्वयव्याप्तिविशिष्टहेतुविषयकम् इत्यर्थः । एकमेव एकविधमेव । केवलान्वयः = अत्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यसामानाधिकरण्यरूपा व्याप्तिः अस्ति अस्मिन हेतो, असौ केवलान्वयी हेतुः, असौ विषयतया यस्य ज्ञानस्य, तत् व्याप्ति- ज्ञानं केवलान्वयि, तत् न तु अभ्युपेयते इति शेषः । इदन्तु एवकारार्थस्यैव विवरण- अनुमानपरिच्छेदः । १२७ भूतम् । अयं भावः- हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यसामानाधिकरण्य- रूपां व्याप्तिं वह्निमान् धूमात् घटोभिधेयः प्रमेयत्वात् हर मयस्थलसाधारणों वदन्ति यद्यपि ताकिकाः तथापि-घटोभिधेयः प्रमेयत्वादित्याविस्थलीयलक्षणे अमावे हेतुसामानाधिकरण्यनिवेशस्यानावश्यकतया, अत्यन्तामावाप्रतियोगि- साध्यसामानाधिकरण्यं हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यसामानाधिक- रण्यमिति लक्षणद्वये निगूढाशयस्तेषाम् । तथा च तेषां मते अत्यन्ताभावाप्रतियोगि- साध्यसामानाधिकरयम् केवलान्वयव्याप्तिः । हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताभावा प्रतियोगिसाध्यसामानाधिकरण्यम् अन्वयव्यतिरेकव्याप्तिः । सकलसाध्याभाव- वनिष्ठाभावप्रतियोगित्वं केवलव्यतिरेकव्याप्तिः इति व्यप्तित्रयो, इति तद्विष- यकस्य व्याप्तिज्ञानस्यापि त्रैविध्यम्, व्याप्तिविशिष्टहेतोरपि च त्रैविध्यं स्वाभावि- कम् । अस्मन्मते तु हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यसामानाधिक- रण्यापरपर्याया अशेषसाधनाश्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यरूपैव व्याप्तिरूपेयते, इति तादृशव्याप्तिज्ञानरूपमनुमानमप्येकमेव, तादृशव्याप्तिविशिष्टलिङ्गमप्येक- विधमेव न त्रिविधमित्यभिनवः पन्थाः यद्वा-तच्च व्याप्तिज्ञानमित्यत्राप्यर्थकचकारसूचितहेतोः अनुमानपक्षत्वस्वीकारा- भिप्रायेणोक्तं तच्चानुमानेत्यादि । तथा च "अन्वयि" इत्यस्य अन्वयिलिङ्ग- मित्यर्थः । न तु केवलान्वयीत्यस्य न तु केवलान्वयिलिङ्गमित्यर्थः । लिङ्ग केवलान्व- यित्वमत्यतन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यकत्वम् । ननु कुतो न व्यप्तेः तज्ज्ञानस्य, व्याप्तिविशिष्टलिङ्गस्य वा वैविध्यमित्यत आह- सर्वस्यापि धर्मस्यास्मन्मते ब्रह्मनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वेनात्य- न्ताभावाप्रतियोगिकत्वरूपकेवलान्वयित्वासिद्धेः । अपिकारः एवार्थकः । प्रमेयत्वादिसंग्रहसूचनाय सर्वपदम् । धर्मस्य = धर्म- त्वेनाभिमतस्य । बह्मणि निष्ठा वृत्तिर्यस्य, तादृशो यः अत्यन्ताभावः, तत्प्रति- योगित्वेन । अत्यन्ताभावस्याप्रतियोगि = प्रतियोगिभिन्नं यत् साध्यं तत्कत्वम् = तत्सामानाधिकरण्यम् । तद्रूपस्य = केवलान्वयित्वस्य या अप्रसिद्धिः, ततः। तद्रूपत्वं = तदात्मकत्वम् । तद्विषयकत्वं वा। आद्यस्य लिङ्गे द्वितीयस्य व्याप्तिज्ञाने सम्भवः । अयं भावः-अस्मन्मते केवलब्रह्मण एव परमार्थसतया तदतिरिक्तस्य सर्वस्यैव तस्मिन् ब्रह्मण्यभावसत्वात् साध्यत्वे नाभिप्रेते प्रमेयत्वलाका प्रतियोगित्व- १२८ वेदान्तपरिभाषा स्यव सत्त्वात् निरुक्ताप्रतियोगिसाध्याप्रसिद्ध्या तादृशसाध्यकत्वरूपस्य केवला- न्वयित्वस्याप्रसिद्धिरिति न केवलान्वय्यनुमानकेवलान्वयिलिङ्गाभ्युपगमसम्भवः । न वा द्वैतापत्तिः, निरुक्ताप्रतियोगिभूतपदार्थाप्रसिद्धः इति । कथमेकविधत्वोक्तिसङ्गतिः नन्वेवमप्यनुमानलिङ्गद्वैविध्यं निराबाधमिति इत्याकाक्षायामाह- नाप्यनुमानस्य व्यतिरेकिरूपत्वं, साध्याभावे साधनाभावनिरूपित- व्याप्तिज्ञानस्य साधनेन साध्यानुमितावनुपयोगात् । अनुमानस्य = व्याप्तिज्ञानस्य लिङ्गस्य वा, अयं भावः-व्यभिचारादर्शन- सहकृतेन सहचारदर्शनेन व्याप्तिज्ञानं भवतीति पूर्वमेव सिद्धम् । व्यतिरेकसहचार- शानं च "यत्र यत्रासाध्याभावः तत्र तत्र हेत्वभावः" इत्यात्मकमेव सर्ववादि- सिद्धम् । एतेन च सहचारज्ञानेन साध्यामावनिष्ठायाः हेत्वमावनिरूपितायाः अन्वयव्याप्तेरेव ज्ञानं भवति भवितुमर्हति वा । सैव च व्याप्तियदि साध्याभावात्मक- व्यतिरेकनिष्ठत्वेन व्यतिरेकव्याप्तिरित्युच्यते तहि-नाममात्राधिक्यं न तु वस्तु- वैचित्र्यम् । साध्याभावनिष्ठाया: तस्याः व्याप्ते: प्रकृतहेत्वनिष्ठत्वेन हेती ज्ञानात्मकस्थानुमानस्य वा व्यतिरेकित्वासम्भवः । स्वाश्रयव्यापकीभूताभावप्रति- योगित्वसम्बन्धेन हेतौ तस्याः नयनेऽपि परम्परात्मतादृशसम्बन्धेन साध्याभाव- निष्ठायाः अन्वयव्याप्तेरेव तत्र गतत्वेन अन्वययोगादन्वयित्वमेव तस्य वक्तु- मुचितम् । सकलसाध्याभाववनिष्ठाभावप्रतियोगित्वरूपा चेल्लिङ्गनिष्ठा व्यतिरेक- व्याप्तिः, न तस्याः प्रोक्तव्यतिरेकसहचारदर्शनेन ज्ञानसम्भवः । साध्याभाव- निष्ठान्वयव्याप्तेरेव ततो ग्रहस्यानुभवसिद्धत्वात् इति । व्यतिरेकव्याप्त्यनङ्गीकारे अनुपपत्तिमाशङ्कते- - कथं तर्हि धूमादावन्वयव्याप्तिमविदुषोऽपि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञाना- दनुमिति:? तहि अनुमितिः कथमित्यन्वयः । तर्हि व्यतिरेकव्याप्तितदनुमानानङ्गी- कारे। धूमादावित्यत्र आदिना आलोकादिपरिग्रहः। अन्वयव्याप्तिं यावद्धमा- श्रयाश्रितवह्निसामानाधिकरण्यरूपाम् । अविदुषोऽपि = अजानतः अपि । S अनुमानपरिच्छेदः। १२९ - - व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानात् वयभावध्यापकीभूताभावप्रतियोगी घूम इति ज्ञानात् । अयं भावः-केषांचित् “यत्र यत्र घूमः तत्र तत्र वह्निः" इत्यन्वयसहचार- ज्ञानाधीना "शेषधूमाश्रयाश्रितवह्निसमानाधिकरणो धूम" इति व्याप्त्यनुभवादनु- मितिभवति। केषांचिच्च "यत्र यत्र वह्नयभावः तत्र तत्र धूमाभाव" इति व्यतिरेक- सहचारज्ञानाधीन "वह्नयभावव्यापकोभूताभावप्रतियोगी धूम” इति ज्ञानात् पर्वतो वह्निमान् इत्यनुमितिर्जायते इति सर्वानुभवसिद्धम् । इदानीं यदि व्यतिरेक- व्याप्तिरेव नाभ्युपेयते, तदाऽन्वयव्याप्तिम गृह्णतां जनानां या बह्निमान् इत्यनु- मितिर्मवति सा कथं सम्पयेत? इति । । यस्य ज्ञानस्यानुपपत्तिरापाद्यते न तदनुमितिरूपम् । अपि तु तदर्थापत्तिरूपम् । अर्थापत्तिरेव प्रमाणं, तस्मात् । अन्वयव्याप्तिमविदुषः पर्वतो वह्निमानितिज्ञान- मुत्पद्यत इतीति पूर्व योज्यम् । वक्ष्याम इत्यनन्तरं अर्थापत्तिपरिच्छेदे इति शेषः । अयमाशयः-व्यतिरेकव्याप्त्यस्वीकारे युक्तिरक्तव । अन्वयव्याप्तिमविदुषस्तु यत् पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानमुत्पद्यते, तत्तु नानुमानप्रमाणात्, अपि तु अर्थापत्ति- प्रमाणात् । अतो न तत्सम्पादनाय व्यतिरेकव्याप्तेः तज्ज्ञानरूपस्य वानुमानस्य स्वीकरणावश्यकता । न चेदमाशङ्कयं यत् तहि पर्वतो वह्निमानित्याद्यनुमितेः । अर्थापत्तिप्रमाणादेव सम्पादसम्भवेऽन्वयव्याप्तितज्ज्ञानरूपानुमानस्वीकारोऽपि -योजना इति । अनुपपत्तिज्ञानानधीन-पर्वतोवह्निमानिति ज्ञानसम्पावनाय "व्यावहारिको ब्रह्मज्ञानवाध्यः मायापरिणामत्वात् इत्यादि जन्यजनकमावनापन्न- हेतुसाध्यकस्थलोयानुमितिसम्पावनाय तस्य स्वीकरणायत्वात् इति । व्यतिरेकासिद्धौ तद्धटितान्वयव्यतिरेकित्वासिद्धिरपि लिङ्गस्थदण्डापूपायिता इत्याह- अत एवानुमानस्य नान्वयव्यतिरेकित्वम् । व्यतिरेकिव्याप्तिज्ञान- स्यानुमित्यहेतुत्वात् । अत एव = अव्यवहितोरन्तरवक्ष्यमाणाहेतोरेव । अनुमानपदस्य व्याप्तिज्ञान- परत्वं लिङ्गपरत्वं च पूर्ववदवसेयम् । अयम्भाव:-लिङ्ग वा अनुमाने वा कि नामान्वय- व्यतिरेकित्वम् ? इति प्रश्ने अन्वयित्वे सति व्यतिसिमित्या वक्तव्यम् ? तच्चान्वयव्याप्तिविशिष्टत्वे सति व्यतिरेकव्याप्तिविष्टस्वरूपमेव वक्तव्यम् १३० वेदान्तपरिभाषा। तदसिद्धम्, व्यतिरेकव्याप्तेरेव खण्डितत्वात् इति । किञ्चेदमपरमत्रावधेयम् यत्रान्वयव्यतिरेकसहचारज्ञानाभ्यां व्याप्तिज्ञानं ततोऽनुमितिः, तत्रानुमानस्या- न्वयव्यतिरेकित्वमुपेयं ताकिकः, तत्रेदं प्रष्टव्यम्-किमुभाभ्यां सहचारज्ञानाभ्यां एक व्याप्तिज्ञानं जननीयं द्वे वा ? नैमिति वक्तुमर्हम् तथाविधव्याप्तिज्ञानं प्रति कस्यापि सहचारज्ञानास्यासामर्थ्यात् । अभ्युपगते वा सामर्थ्यऽन्यतरवैया- पातात् । नापि वै व्याप्तिज्ञाने इति । तथा सति एकविधसहचारज्ञानानन्तरं तज्जन्यव्याप्तिज्ञानं, ततोऽपरसहचारज्ञानं, ततस्तज्जन्यापरव्याप्तिज्ञानं, तत एक विधानुमितिरिति वक्तव्यम् । न तत्समञ्जसम्, ज्ञानक्षणिकत्ववादिनां नैयायिकानां मते परवत्तिव्याप्तिज्ञानकाले पूर्ववत्तिज्ञाननाशात् अनुमितेस्तज्जन्यत्वानुपपत्तिः। अपेक्षाबुद्धिन्यायेन तदा तस्थितावपि नौचित्यम् । अनुमितिसमर्थव्याप्तिज्ञान- कालक्षेपायोगात् । प्रथमव्याप्तिज्ञानाव्यवहितोत्तरकाल एवानुमित्युत्पत्त्या अपर- सहचारज्ञानस्यानुमितिपश्चाद्भावित्वापातात् । न चेदं वक्तव्यं यत् परामर्शकारण- त्ववादिनां तेषां मते तदानी तदभावान्नानुमितिरिति । तथापि परामर्शोत्पादप्रसङ्ग- स्यापरव्याप्तिज्ञानक्षणेऽपरसहचारज्ञानात्पूर्वमेवानुमित्युत्पादप्रसंगस्यानिराकरणीय- त्वादिति व्यतिरेकव्याप्त्यादिस्वीकारपक्षेऽपि न सम्भवस्त्वदुक्तान्वयव्यतिरेक्यनुमिति- तदनुमान-तल्लिङ्गानामिति का प्रत्याशा व्यतिरेकव्याप्त्याद्यस्वीकारे इति । प्रोक्तमनुमान प्रकारान्तरेण विभजते- - तच्चानुमानं स्वार्थपरार्थभेदेन द्विविधम् । तच्चेत्यत्र चकारः एवकारार्थो भिन्नक्रमश्च । तद् अनुमानं स्वार्थपरार्थभेदेनैव द्विविधम्, न तु अन्वयव्यतिरेकिभेदेन इत्यर्थः। यद्वा त्वर्थकोऽसौ । तथा च अन्वयित्वेन एकमपि तदनुमानं स्वार्यपरार्थभेदेन तु भवति द्विविधम् इत्यर्थ.। स्वेन अर्थ्यते इति स्वार्थः, स्वार्थभूतं अनुमान स्वार्थानुमानम् । एवं परेण अर्थ्यते इति परार्थः, परार्थभूतमनुमानं परार्थानुमानम् । फलतः परवाञ्छितमनुमानं परार्थानुमानम् । परार्थानुमितिस्थले परानुमितिजननक्षम व्याप्तिज्ञानं वाञ्छन् परो न्यायप्रयोग करोतीति सर्वानुभवसिद्धम् । वृत्तं स्मारयन् स्वार्थ बोधयति- तत्र स्वार्थ तूक्तमेव ।
१ - - अनुमानपरिच्छेदः । १३१ स्वार्थानुमानपरार्थानुमानयोर्मध्ये । उक्तमेव "एवं चायं धूमवानि- तिपक्षधर्मताज्ञाने धूमो वह्निव्याप्य इत्यनुभवाऽहितसंस्कारसमुद्वोधे च सति वह्निमानय- मित्यनुमितिर्भवती" ति ग्रन्थेनेत्यर्थः । अयं मावः-या परोक्तप्रतिज्ञादिन्यायोपदेश- मन्तरव महानसगृहीतवह्निव्याप्त्यनुभवस्येवुद्धसंस्कारधूमवान् पर्वत इति धर्मताज्ञानाभ्यां भवत्यनुमितिः, सा स्वार्थानुमितिः, तत्करणभूतो व्याप्त्यनुभव: तदुत्थसंस्कारो वा स्वार्थानुमानमिति । पक्ष- परार्थ लक्षणमुखेन बोधयति- परार्थ तु न्यायसाध्यम् । % 3D परार्थ परार्थानुमानम् । न्यायेन साध्यते इति न्यायसाध्यम् । साध्यत्व- ञ्चात्र प्रयोज्यत्वरूपं बोध्यम् न तु जन्यत्वम्, प्रत्येकावयवार्थबोधानन्तरं व्याप्तिज्ञानस्य जायमानतया अवयवसमुदायरूपस्य न्यायवाक्यस्य व्याप्तिज्ञानं प्रति स्वार्थबोधव्य- वहिततया जनकत्वाभावात् । तथा च न्यायवाक्यनिष्ठप्रोयोजकतानिरूपित- प्रयोज्यतावदनुमानं परार्थानुमानम् । ननु न्यायस्यावयवसमुदायरूपतया अनुपदं वक्ष्यमाणतया पक्षे साध्यवैशिष्ट्यबोधकप्रतिज्ञावाक्यघटितन्यायवाक्यजबोधत्व स्यैवानुमितित्वेनाभिप्रेतज्ञाने स्वीकारसम्भवेन तत्करणभूतस्य परार्थानुमानस्यासिद्धि- रिति चेन्न । प्रतिज्ञादितत्तद्वाक्यार्थबोधानन्तरं व्याप्तिपक्षधर्मताज्ञानाभ्यां जाय- मानाया अनुमितेः अनुमिनोमीति साक्षिकायाः अपलपितुमशक्यत्वात् । न च व्याप्तिज्ञानस्यानुमानतया तस्य च केवलोदाहरणवाक्यसाध्यतया अनुमानस्य अवयव- समुदायात्मकन्याय-साध्यत्वाभिवानस्यासङ्गततया लक्षणासङ्गतिरिति वाच्यम् । अनुमानत्वघटकस्य जनकत्वस्य फलोपधानरूपस्य विवक्षितत्वात् पक्षधर्मताज्ञान- सहितस्यैव च व्याप्तिज्ञानस्य तथाविधत्वसम्भवेन केवलोदाहरणासाध्यत्वात् । एतेन ननु न्यायवाक्याद् वाक्यार्थबोधो गृहीताग्निधूमानां जनानां भविष्यति, अन्येषां वा ? नान्येषाम्, अनुपस्थित्या असम्भवात् । गृहीताग्निधूमानां तु पूर्वमेव व्याप्तेमहानसे गृहीततया तत्संस्कारस्य परवत्तिकाले स्वत एव सत्त्वेन व्याप्तिज्ञानात्मकानुमाने न्यायप्रयोज्यत्वाभावाल्लक्षणमिदमसम्भवदुक्तिकमित्यपि निरस्तम् । संस्कारोद्वोधपक्षधर्मताज्ञानार्थ न्यायस्यापेक्षणीयत्वात् । न्यायज्ञानं विना न्यायप्रयोज्यत्वज्ञानमशक्यमिति न्याय प्रतिपादयति- न्यायो नामावयवसमुदायः ।
१३२ वेदान्तपरिभाषा। निगमन- समुदिता अवयवा न्याय इत्यर्थः । समुदितत्वं च विलक्षणाव्यवहितपूर्वापरी- भावापन्नत्वम् । तथा च प्रतिज्ञावाक्याव्यवहितोत्तरहेतुवाक्याव्यवहितोत्तरोदाहरण- वाक्यत्वम्, उदाहरणवाक्याव्यवहितपूर्वहेतुवाक्याव्यवहितपूर्वप्रतिज्ञावाक्यत्वम्, उदाहरणवाक्याव्यवहितोत्तरोपनयवाक्यावहितोत्तरनिगमनवाक्यत्वम्, वाक्याव्यवहितपूर्वोपनयवाक्याव्यवहितपूर्वोदाहरणवाक्यत्वं वा न्यायात्वमित्यर्थः । अव्यवहितोत्तरत्वादिकं तु तेन रूपेण ज्ञायमानत्वं न तु तथात्वेनोत्पन्नत्वम् । अव्यवहितोत्पत्तावपि व्यवहितत्वज्ञानवत: अनुमित्यनुत्पादात् । व्यवहितोत्पत्तावपि चाव्यवहितत्वज्ञानवतस्तदुत्पादात् । ननु कति तावदवयवाः के च ते ? इत्याकांक्षायामाह- - अवयवाश्च त्रय एव । प्रतिज्ञाहेतूदाहरणरूपाः । उदाहरणोपनयनि- गमनरूपा वा। एवकारः अन्यव्यवच्छेदार्थः । तेन दशावयव-पञ्चावयव-वादानभ्युपगः । प्रतिज्ञा हेतुःउदाहरणमिति त्रयः, उदाहरणं उपनयः निगमनम् इति त्रयो वा इत्यर्थः । तथा च पर्वतो वह्निमान् (१) धूमवत्वात् (२) यो यो धूमवान् स स वह्निमान् (३) यथा महानसम् इति वाक्यत्रयाभिन्नावयवत्रयात्मकन्यायज्ञानाधीनपक्षधर्मता- ज्ञानोदुखसाध्यव्याप्यहेतुसंस्काराभ्यां पर्वतो वह्निमानित्यनुमितिर्भवति । यो यो धूमवान् स स वह्निमान् यथा महानसं तथा चायं तस्मात्तयेति वाक्यत्रयामिन्नावयव- त्रयात्मकन्यायाधीनपक्षधर्मताज्ञानोदखतादृशसंस्काराभ्यां वाऽनुमितिर्भवतीति भावः । स्पष्टं पञ्चावयववादमपाकुर्वन् तत्र हेतुमुपन्यस्यति... न तु पञ्चावयवाः । अवयवत्रयेणैव व्याप्तिपक्षधर्मतयोरुपदर्शन- सम्भवेनावयवद्वयस्य व्यर्थत्वात् । व्याप्तिश्च पक्षधर्मता चेति व्याप्तिपक्षधर्मते, तयोः उपदर्शनं ख्यापनम्, तस्य सम्भवः सम्भवनम् तेन । अवयवद्वयस्य - उपनयनिगमनरूपस्य प्रतिज्ञाहेतु- रूपस्य वा । व्यर्थत्वात् = निष्प्रयोजनत्वात् । अयं भावः-उपवेष्टा उपवेश्यस्यानु- मितिमत्तयाभिप्रेतस्य अनुमितिसापनीभूतव्याप्तिपक्षषमताशानार्थमेव अवयवसमु. दापात्मकस्य न्यायस्योपदेशं करोतीत्युभयवादिसिद्धम् । सति चवं यावयवत्रयेवर्ण अनुमानपरिच्छेदः । तोनिष्पत्तिः सम्भवेत् किं प्रयोजनमधिकस्यावयवद्वयस्वीकारस्य ? इति । पञ्चावयवादस्यैवानभ्युपगमे दशावयववादाभ्युपगमस्य प्रत्याशैव का ? के नाम दशावयवाः तद्वादिनये ? इति चेत् जिज्ञासा-संशय-शक्यप्राप्ति-प्रयोजन-संशयव्यु- दासाः पञ्च, प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानि पञ्च, ततो दश । शक्यप्राप्तिः = साधकप्रमाणम् । संशयव्युदासः - तर्कः । एतेषां जिज्ञासादीनां पञ्चानां शब्दानात्मकत्वादेव न न्यायावयवत्वम् न्यायस्य वाक्यसमष्टिरूपतया शब्दानात्मकानां तेषां न्यायावयवत्वानुपपत्तिः । पक्षधर्मता तु पक्षनिरूपितवृत्तिता। तत्र पक्षत्वं सिषाधयिषा-विरहसहकृतसिद्ध्यभावरूपम् । सिद्धिः साध्यप्रकारक- निश्चयः । प्रकारता साध्यतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्ना विवक्षिता। तेनान्यसम्बन्धेन पक्षे साध्यनिश्चयसत्त्वेऽपि नानुमित्यनुपपत्तिः । सिद्धौ सहकृतान्तविशेषणानुक्तो सिषाधयिषा-सिद्ध्योरुभयोः सत्त्वदशायां जायमानाया अनुमितेरनुपपत्तिः । सिद्धि- निष्ठा प्रतियोगिता विशेष्यत्वसम्बन्धावच्छिन्ना ग्राह्या तेन न सिद्धिस्थलेऽपि सम्बन्धान्तरावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावमादायानुमित्यापत्ति: साध्यसन्देह- विशेष्यत्वं सिषाधायिषाविशेष्यत्वं वा न पक्षत्वम् तयोरभावेऽपि घनगर्जनेन मेघानुमानदर्शनात् । पक्षताया: स्वातन्त्र्येण नानुमितिहेतुत्वम् अनुमितिजनकपक्ष- धर्मताज्ञानसम्पादकतयाऽन्यथासिद्धरवात् । विहितस्यानुमानिनिरूपणस्य फलमाह- एवमनुमाने निरूपिते ब्रह्मभिन्ननिखिलमिथ्यात्वसिद्धिः । । एवं = पूर्वोत्तरीत्या । ब्रह्मभिन्नस्य निखिलस्य प्रातिभासिकस्य व्यावहा- रिकस्य च यन्मिथ्यात्वं तस्य सिद्धिः । अयं भावः-प्रत्यक्षस्य व्यावहारिकगतसत्यत्व- समर्पकतया ततो मिथ्यात्वसिद्ध्यसम्भवेन, परोक्षप्रमाणेनैव प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं साध्यम् । तत्र श्रुतेरिव अनुमानस्यापि मिथ्मात्वसाधकत्वम् । अतो नानुमाननिरूपण- वैयशिङ्का, इति । प्रपञ्चमिथ्यात्वसाधकव्याप्तिपक्षधर्मताज्ञानसम्पादकन्यायप्रयोगं दर्शयति- - अभिनीय- तथा हि ब्रह्मभिन्नं सर्व मिथ्या, ब्रह्मभिन्नत्वात् यदेवं तदेवम्, यथा शुक्तिरूप्यम् ।
१३४ वेदान्तपरिभाषा । अत्र ब्रह्मभिन्नं सर्व मिथ्या इति प्रतिज्ञावाक्यम् । ब्रह्मभिन्नत्वात् इति हेतु- वाक्यम् । यदेवं तदेवं यथा शुक्तिरूप्यम् इति उदाहरणवाक्यम् । तथा च ब्रह्म- मिन्नस्य सर्वस्प व्यावहारिकस्य प्रातिमासिकस्य च पक्षत्वम् । मिथ्यात्वस्य साध्य- त्वम् । ब्रह्ममिन्नत्वस्य हेतुत्वम् । अत्र सर्व मिथ्या इत्येतावन्मात्रोक्तो ब्रह्मण्यपि मिथ्यात्वोवत्या प्रयोजनव्याघातः शून्यवादपर्यवसानापत्तेः । किञ्च पक्षकदेशे ब्रह्मणि ब्रह्मभिन्नत्वरूपहेतोरसत्वापत्या भागासिद्धिः, अतः ब्रह्मभिन्नत्वमुक्तम् । ब्रह्म- मिन्नं मिथ्येतावन्मात्रोक्तो बाधापत्तिः तुच्छस्यापि गगनकुसुमादेः तदानों पक्षकुक्षि- नि.क्षिप्ततया तत्र मिथ्यात्वस्य साध्यस्याभावात्, मिथ्यात्वस्य सद्धर्मतया असति तुच्छे तदभावात् । सर्वपदं च सत्त्वेन प्रतीत्यहपरम् । तथा च असतः सत्त्वेन प्रतीत्य- नहतया पक्षतावच्छेदकत्वे तेन सह हेतोरभेदापत्तिरिति फलतः सिद्धसाधनमिति वाच्यम्, ब्रह्मभिन्नत्वविशिष्टसत्त्वेन प्रतीत्यर्हत्वस्य पक्षतावच्छेदकतया शुद्धब्रह्म- भिन्नत्वहेतोस्ततो भेदात् । यद्वा प्रकृते ब्रह्मभिन्नपदं अविद्यातत्परिणामपरम् तथा च नापत्तिगन्धोऽपि । पक्षेऽस्मिन् रज्जुसद्यिादाय सिद्धसाधनवारणाय सर्वमित्युक्तिः । तदुक्तौ अवच्छेदकावच्छेदेनानुमितिलाभः । अवच्छेदकावच्छेदेनानुमिती सामानाधिकरण्येन सिद्धिर्न प्रतिबन्धिकेति न सामानाधिकरण्येन सिद्धिरूपरज्जु- सर्पगतमिथ्यात्वनिश्चयमादाय सिद्धसाधनावसरः । मिथ्यात्वं च कालिक निषेधप्रतियोगित्वम् । ब्रह्ममिन्नत्वं चिन्नित्वम् । एतेन दृश्यत्व-जड़त्व-परिच्छिन्न- त्वादीनां हेतूनामुपसंग्रहो वेदितव्यः । 1 ननु दृष्टान्तत्वं तस्यैव यत्र साध्यहेतूभयनिश्चयो वादिप्रतिवादिनोरुभयोरपि । तथा च शुक्तिरूंप्यस्य न दृष्टान्तत्वसम्भवः, असिद्धत्वात् तस्यापि प्रतिभाससत्त्वस्य वेदान्तसिद्धान्तसिद्धतया त्रैकालिकनिषेधायोगेन त्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वरूपमिथ्या. त्वनिश्चयाभावाच्च इति शङ्कां निराकुरुते । न च दृष्टान्तासिद्धिः । तस्य साधितत्वात् । दृष्टान्तस्यासिद्धिः दृष्टान्तासिद्धिः, सा च नेत्यर्थः । तस्य = दृष्टान्तस्य । साधितत्वात् = निश्चितत्वात् । यद्वा तस्य - कालिकानिषेधप्रतियोगित्वरूपस्य मिथ्यात्वस्य । तस्येत्यनन्तरं तत्रेति शेषः । शुक्तिरूप्ये इति तदर्थः । अयं भाव:- प्रातिमासिकस्य किञ्चत्कालसत्वेऽपि व्यावहारिकत्वेन तस्य तदानीमसत्त्वात्, अनुमानपरिच्छेदः । व्यावहारिकत्वात्मक-व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नप्रतियोगिताक -प्रातिमासिकाभावप्रति- योगित्वस्य न क्षतिः शुक्तिरूप्यादौ, इति कथं दृष्टान्तासिद्धिः? इति । ननु हेतुः साध्यव्यभिचारी इति निश्चयसत्त्व इव, हेतुः साध्यव्यभिचारी न वा ? व्यभिचारसशयसत्त्वेऽपि न व्याप्तिनिश्चय इति वस्तुस्थितिः । सति चैवं सत्यां हेतुः साध्यव्यभिचारी न वा ? इति शङ्कायां न दृश्यत्वे मिथ्यात्वव्याप्तिनिश्चय इति व्याप्तत्वासिया कथमुक्तानुमानप्रयोगस्य साधुत्वम् ? इति शंका निराकरोति- न चाप्रयोजकम्, शुक्तिरूप्य-रज्जुसर्यादीनां मिथ्यात्वे ब्रह्मभिन्न- त्वस्यैव लाघवेन प्रयोजकत्वात् । अप्रयोजकत्वं = अनुकूलतर्कविरहः तत्प्रयुक्ता व्यभिचारशंका वा । न चेत्य- न्वयः । ब्रह्मभिन्नत्वस्यैव प्रयोजकत्वादिति सम्बन्ध: प्रयोजकत्वादित्यस्य आपाद्य- भूताभावप्रतियोगित्वात् इत्यर्थः । तया च "शुक्तिरूप्यादिकं यदि मिथ्या न स्यात् ब्रह्ममिन्नं न स्यात्" इति तर्केण व्यभिचारशंकाखण्डनम् । खण्डितायां च व्यभिचारशं- कायां व्याप्तिनिश्चयाप्रतिबन्धेन सदनुमितिसम्पत्त्या नानुमानप्रयोगस्यासाधुत्व- सम्भावनेति भावः । ननु कि नाम साध्यभूतं मिथ्यात्वं यदनुगततया व्यावहारिके प्रातिभासिके च स्थास्यति ? इत्यत आह- मिथ्यात्वं च स्वाश्रयत्वेनाभिमत-यावद्वस्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रति- योगित्वम् । स्वं = मिथ्यात्वेनाभिमतः पदार्थः, तस्य आश्रयत्वेनाभिमतं यत् यावद्वस्तु, तन्निष्ठो य: अत्यन्ताभावः, तत्प्रतियोगित्वं मिथ्यात्वमित्यर्थः । यथा स्वं - घटादिक, तदाश्रयत्वेनाभिमतं कपालादिकं, तन्निष्ठः अत्यन्ताभावः = घटाद्यत्य- न्ताभावः, तत्प्रतियोगित्वं घटादेरिति भवति तत्र मिथ्यात्वलक्षणसमन्वयः । ननु कपाले घटस्य तादात्म्येन व्यावहारिकसत्तायाः वेदान्तिभिरप्यभ्युपेततया कथं कपाले घटाभावः ? असति च तस्मिन् कथं प्रोक्ताभावप्रतियोगित्वलक्षणसम- न्वयो घटादौ ? कालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावोऽत्यन्ताभाव इति नैयायिकरभ्युपगमात् । व्यवहारकालसतश्च घटादेः कालिकनिषेधायोगात् वेदान्तपरिभाषा इति चेत्, न । प्रतिभासकालसतः प्रातिभासिकस्य कालिकनिषेधवत् व्यावहारिक- स्यापि त्रैकालिकनिषेधसम्भवात् पारमार्थिकत्वेन व्यावहारिकस्य घटादेः कदापि कुत्रापि चासत्त्वेन कपालेऽपि तदत्यन्ताभावस्य सुवचतया लक्षणसमन्वयात् । पदकृत्यमाह- अभिमतपदं वस्तुतः स्वाश्रयाप्रसिद्धिवारणाय । अभिमतत्वं= अभिमानविशेष्यत्वम् । अभिमानश्च "कपालं घटवत्" इत्यादि- बोघल्पो बोध्यः । स्वं मिथ्यात्वाभिमतपदार्थः । तस्य यः आश्रयः, तस्य या अप्रसिद्धिः, तद्वारणाय । अयं भावः-अभिमतपदानुक्तौ लक्षणासम्भवः-तथा हि- मिथ्यात्वेनाभिमतस्य घटस्याश्रयत्वं यदि कपाले स्वीक्रियते तदेव स्वाश्रयपदेन कपालस्य ग्रहणं भवितुमर्हति, तथा च तनिष्ठात्यन्तामावपदेन न घटात्यन्ताभावो घर्तुं शक्यते, स्वाश्रये स्वात्यन्ताभावाभावात् । एवञ्च न स्वाश्रयनिष्ठात्यन्ता- भावप्रतियोगित्वस्वरूपमिथ्यात्वस्य घटे समन्वयः। एवं पटादावपि । अभिमत- पदोपादाने च कपालादौ घटादेराश्रयत्वाभिमानमात्रम्, न वस्तुतस्तत्र घटसत्त्वम् । अभिमानविषये च न घटाभावादिसत्त्वे वाधकं रज्जो साभावस्येव, इति तत्प्रतियो- गित्वस्य घटादौ सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः। ननु स्वाश्रयत्वेनाभिमतनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वमेवोच्यताम् स्वाश्रयत्वेना- भिमते यावत्वविशेषणं किमर्थमित्यत आह- यावत्पदमन्तिरव रणाय । प्रकृतादर्थात् अन्यः अर्थः अर्थान्तरम् । प्रकृतपदार्थासिद्धिरिति सारार्थः, तस्य वारणाय । अयं भावः-संयोगेन घटस्याश्रयो भूतलं, समवायेन तादात्म्येन वा आश्रयः कपालम् । सति चैवं भूतलं स्वाश्रयत्वेनाभिमतमादाय तनिष्ठात्यन्ताभावसियैवानु- मानचारितार्थेन कपालनिष्टात्यन्ताभावप्रतियोगित्वासिद्ध्या प्रकृतमिथ्यात्वा- सिद्धिः । यावत्पदोक्तौ च निरुक्ताभिमतपदेन कपालस्यापि संग्रहात् तानष्ठात्यन्त.. भावप्रतियोगित्वस्यापि घटे सिद्धी प्रकृतमिथ्यात्वसिद्धिः सम्पद्यते, इति । एतादृशस्य मिथ्यात्वनिर्वचनस्य प्राचीनसम्मतत्वमाह- - तदुक्तम्- । अनुमानपरिच्छेदः । १३७ सर्वेषामेव भावानामाश्रयत्वेन सम्मते । प्रतियोगित्वमत्यन्ताभावं प्रति मृषात्मता ॥ तत् = प्रदर्शितं मिथ्यात्वलक्षणम् । उक्तमित्यनन्तरं प्रत्यक्तत्वप्रदीपिकायां चित्सुखाचार्यैरिति शेषः । स्वाश्रयत्वेन सम्मते अन्यन्ताभाव प्रति प्रतियोगित्वम् सर्वेषां भावानां मृषात्मता, इत्यन्वयः । सम्मते इत्यत्र सम्मतत्वमभिमतत्वम् । सप्तम्यर्थो वृत्तित्वम् । तथा च स्वाश्रयत्वेनाभिमतवृत्यत्यन्ताभाव प्रतीत्यर्थः । सर्वेषां प्रातिभासिकानां व्यावहारिकाणां च इत्यर्थः । मृषात्मता = मिथ्यात्वम् । अपिकारेण सदसदनधिकरणत्वाविलक्षणान्तरस्य संसूचनम् । स्वाश्रयत्वेनाभिमत- निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वरूपं मिथ्यात्वम्, न नूतनमस्माभिरेवोच्यते, अपि तु चित्सुखमुनिभिरपि कारिकयतया इदमेव मिथ्यात्वलक्षणं प्रतिपादितमित्याशयः । प्रपञ्चमिथ्यात्वसाधकविशेषानुमानकूटस्य दिग्दर्शनं कारयति- यद्वा अयं पट: एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगी पटत्वात् पटान्तरवत् इत्यनुमानं मिथ्यात्वे प्रमाणम् । यद्वा = अथवा । एततन्तुत्वम् = एतत्पटावयवतन्तुत्वम् । तथा च एतत्प- टावयवभूताः ये तन्तवः, तनिष्ठो योऽत्यन्ताभावः तत्प्रतियोगी इत्यर्थः। अत्र एतत्प- टस्य पक्षत्वम् एतत्पटावयवतावत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वस्य साध्यत्वम् पटत्वस्य हेतुत्वम् पटान्तरस्य दृष्टान्तत्वम् । पूर्वानुमाने समस्तव्यावहारिक-प्राति- भासिकवस्तु पक्षत्वेनादाय तत्र निरुक्तवस्त्वाश्रयत्वाभिमत-ब्रह्मनिष्ठात्यन्ताभाव- प्रतियोगित्वस्य मिथ्यात्वस्य सकृदपि सिद्धिः । अयं भावः-पटत्वं पटान्तरेऽपि विधते किन्तु एतत्पटावयवनिष्ठत्व तत्र नास्ति इति त्वयाप्यभ्युपगम्यते । सति चवं तस्यव पटत्वस्य एतत्पटेऽपि विद्यमानतया अत्राप्येतदवयवत्वाभिमततत्तन्तुनिष्ठात्यन्ता भावप्रतियोगित्वरूपं मिथ्यात्वं कुतो नागच्छेत् ? इति । एतदनुमानप्रकारे चित्सुखाचार्यस्यापि सम्मतिरिति दर्शयति- तदुक्तम् अंशिनः स्वांशगात्यन्ताभावस्य प्रतियोगिनः । अंशित्वादितरांशीव दिगेषव गुणादिषु ।।
१३८ वेदान्तपरिभाषा। अंशित्वं = अवयवित्वेन लोकव्यवहृतत्वम् । अंशत्वं अवयवत्वेन लोक- व्यवहृतत्वम् । स्वस्यांशः स्वांश : स्वाशे गच्छतीति स्वांशगः, स्वांशनिष्ठ इत्यर्थः । तादृशो योऽत्यन्ताभावः, तस्य । इतरांशीव अपरांशीव । दिगेषेव इत्यत्र एवकारो- ऽप्यर्थकः, भिन्नक्रमश्च । तथा च गुणादिष्वपि एषैव दिक् इत्यन्वयः । दिक् पद्धतिः मार्गः । अंशिन इत्यादिबहुवचनोक्तिः अनमानप्रयोगबहुत्वसूचनाय । तथा च अनमानकूटेन प्रपञ्चमिथ्यात्वसिद्धिरित्यभिप्रायः। ननु अवयविन: स्वावयवनिष्ठा- त्यन्ताभावप्रतियोगिनः अवयवित्वात् इत्येकानुमानस्याप्यत एव सूचनसम्भवे कथमु- च्यते तत्तदनुमानकूटसूचकतैवेति चेन्न इतराशीवेति दृष्टान्तगतस्य इतरपदस्यासङ्ग- त्यापत्तेः । सर्वेषामेवावयविनां पक्षपरिग्रहेण तदितरावयव्यप्रसिद्धः । इवञ्च बोध्यम् एतत्कारिकासूचितानुमानः व्यावहारिकाणामेव मिथ्यात्वसिद्धिः न तु प्राति- मासिकानाम् । तेषामवय विस्वाभावात् । न चैतन्मन्तव्यं-भ्रान्तस्य प्रतिभासकाले प्रातिमासिकेष्वपि अवयवित्वव्यवहारात् अवयवित्वेन व्यवहतत्वरूपस्यावयवित्व- स्य प्रातिमासिकेऽप्यक्षततेति न तदसंग्रह इति । व्यावहारिकनिषेधन्यूनसत्ताकस्य प्रातिमासिकस्यापि केवलभ्रान्तव्यवहारमादाय व्यावहारिकत्वकल्पनेऽन्यतर- सत्ताविलोपापत्तेः । यद्वा अंशित्वं नावयविस्वेन व्यवहृतत्वम् अपि तु अवयवित्वेन भासमानत्वम् । तथा च भ्रमप्रमासाधारणभानमादाय व्यावहारिकप्रातिभासिकयो- रुभयोरपि प्रकृतावयवित्वसिद्धिः, ततश्च सिद्धिमिथ्यात्वस्य प्रातिभासिकानामपीति । "गुणादिषु" इत्यत्र मादिपदेन कर्मग्रहणम् । तत्रानुमानप्रकारस्तु रूपं स्वाश्रय- त्वेनाभिस्तनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगि गुणत्वात् रसवत् । उत्क्षेपणं स्वाश्रयत्वेना- भिमतनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगि कर्मत्वात् अपक्षेपणवत् इत्यादिरूपोऽवसेयः व्यभिचारविरोधासिद्धिबाधसत्प्रतिपक्षाणामन्यवमाभावेन हेतोरदुष्टतया निर्विघ्नं पक्षे प्रपञ्चे मिथ्यात्वस्य साध्यस्य सिद्धिः-तथाहि-"नेह नानास्ति किञ्चन" "एकस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति" "अथात आदेश:" "नेति नेति" इत्यादिवेदान्तशतेन प्रपञ्चे मिथ्यात्वस्याबाधिततया साध्याभाववत्पक्षरूपबाध- दोषासम्भवः । अत एव च न सत्प्रतिपक्षसम्भवः, तस्य बाघोत्थापकतयैव दोषत्वेन वाधस्थलमात्रसम्भाव्यत्वात् । मिथ्यात्वाभाववति तुच्छे ब्रह्मणि वा दृश्यत्वहेतोर- वृत्तितया साध्याभाववद्वृत्तित्वरूपव्यभिचारस्यापि न सम्भवः । मिथ्यात्वदृश्यत्वयोः साध्यहेत्वोः व्यावहारिक-प्रातिभासिकयोरेकत्रवृत्तितया हेतौ साध्यासामानाधिकरण्य- रूपस्य विरोधस्यापि नावकाशः। पक्षे प्रपञ्चे दृश्यत्वहेतोः सत्त्वेन हेत्वभाववत्पक्षरूप- स्वरूपासिद्धः अशेषदृश्यत्वाश्रयाश्रितमिथ्यात्वसामानाधिकरण्यरूपाया: व्याप्ते: दृश्यत्वहेती सत्त्वेन, निरुपाधिकतया च व्याप्यत्वासिद्धः, पक्षसाध्यहेतुषु पक्षतावच्छे- अनुमानपरिच्छेदः । दक-साध्यतावच्छेदक-हेतुतावच्छेदकानां च सत्त्वेन पक्षसाध्यसाधनाप्रसिद्धीनामपि पक्षतावच्छेदकभाववत्पक्षसाध्यतावच्छेदकाभाववत्साध्यहेतुतावच्छेदकाभाववद्ध'तु- रूपाणां नावकाश इति । एवमन्येष्वपि प्रदर्शितानुमानेषु दोषसामान्याभावो बोध्यः । ननु घटादीनामपि मिथ्यात्वे कथं सर्वेषां अबाधितः घटः सन् इत्यादिप्रत्यय: सम्पद्यते ? इत्याशङ्का निराकरोति- न चास्य घटादेमिथ्यात्वे सन् घट इति प्रत्यक्षेण बाधः । अधिष्ठान- सत्ताया एव तत्र विषयतया तत्र घटादेः सत्यत्वासिद्धेः । न चेत्यस्य बाध इत्यनेनान्वयः । अयं भावः-घटादेमिथ्यात्वे घट: सन् इति सर्वसिद्धप्रतीतिव्यवहारयोः अनुपपत्तिः, किं वा प्रोक्तयथार्थप्रत्ययबलात् घटपटादि- प्रपञ्चसत्यत्वे तत्र मिथ्यात्वरूपसाध्याभावादुक्तानुमाने बाध इति न शक्यते वक्तुम् । यत: घट: सन् पटः सन् इत्यादिप्रत्ययविषयभूता सत्ता न घटपटादिनिष्ठा, अपि तु यस्मिन् सति चैतन्ये घटपटादिकं कल्पितं तनिष्ठव । एवञ्च न तां सत्तामादाय घटपटादेमिथ्यात्वबाधोद्भावनसम्भवः, न वा प्रोक्तप्रत्ययानुपपत्तिः । चैतन्यगतसत्ता- विषयकतयैव तत्सम्पत्तेः । ननु चैतन्यगतैव सत्ता तत्र तत्र विषयीक्रियते न स्वग- तैवेत्यत्र किं विनिगमकमिति चेत् लाधवमेव । एकां चैतन्यगतां सत्तामादायैव सर्वत्रानुगतसद्वयवहारोपपत्ती अनन्तसत्ताकल्पनस्यानुभवविरुद्धत्वात् । ननु सद्भ तब्रह्मणः सत्ता ततो भिन्ना अभिन्ना वा ? आये दंतापत्तिः। द्वितीये ब्रह्माभिन्नतया नीरूपतया तस्याः, “सन् घटः" इति चाक्षुषप्रत्यक्षविषयतानुपपत्ति: इत्याशंका निराकरोति- - न च नीरूपस्य ब्रह्मणः कथं चाक्षुषादिज्ञानविषयतेति वाच्यम् । नीरूपस्यापि रूपादेः प्रत्यक्षविषयत्वात् । न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः। नीरूपस्य - रूपरहितस्य । चाक्षुषादीत्यादिपदेन त्वाच् परिग्रहः । कथमित्यनन्तरं स्यादिति शेषः । तथा च चक्षुषादिरूपं यज्ज्ञानं तद्विष- यता । तदभाववत्त्वाद्ब्रह्मणः, ब्रह्माभिन्नसत्तायाः सा कथं स्यात् ? इति पूर्वपक्षाभि- प्रायो, यस्यात्र न च वाच्यमित्यनेन खण्डनम् । अयं भावः-वहिरिन्द्रियजन्यप्रत्यक्षत्वा- वच्छिन्नं प्रति रूपं कारणमिति यद्युच्यते तर्हि प्राणश्रोत्रादिना गन्धशब्दावेरप्रत्यक्ष- त्वापत्तिः । गुणे गुणानङ्गीकारेण गन्धशब्दयोः रूपाभावात् । यदि च स्वतान्यतरे- १४० वेदान्तपरिभाषा। न्द्रियजन्यप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति रूपं कारणमित्युच्यते तदा रूपरूपत्व-स्पर्शस्पर्शत्व- प्रत्यक्षताऽनुपपत्तिः, त्वयापि तत्र तत्र रूपानंगीकारात् । सति चैवं रूपरहितब्रह्मा- भिन्नायाः सत्तायाः प्रत्यक्षत्वे न किञ्चिद्वाधकमिति नानुपपत्तिः सन् घट इत्यादि प्रत्ययस्येति । ननु बहिरिन्द्रियजन्यप्रत्यक्षमात्रे चक्षुस्त्वगन्यतरेन्द्रियजन्यप्रत्यक्ष वा रूपं कारण- मिति नोच्यते, अपि तु बहिरिन्द्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्ष रूपं कारणमिति । तथात्र रूप- रूपत्वयोः रूपाभावेऽपि न चाक्षुषत्वानुपपत्तिः। आत्मभूतब्रह्मणस्तु द्रव्यतया तत्प्रत्यक्षे रूपस्यापेक्षितत्वेन तस्य तदभिन्नसत्त्वस्य च प्रत्यक्षोक्त्यसम्भवेन प्रोक्त "सन् घट" इत्यादिप्रत्ययानुपपत्तिर्दुर्वारा इत्याशंकानिरासायाह- - न च नीरूपस्य द्रव्यस्य चक्षुराद्ययोग्यत्वनियमः । मन्मते ब्रह्मणो द्रव्यत्वासिद्धेः। न चेत्यस्य नियम इत्यनेनान्वयः । नीरूपस्य = रूपरहितस्य । चक्षुरादेरयोग्यत्वं चक्षुराद्ययोग्यत्वम्, तस्य नियमः = अव्यभिचारः । आदिपदेन त्वपरिग्रहः । तथा च चक्षुस्त्वगन्यतरेन्द्रियजन्यप्रत्यक्षाविषयत्वनियम इत्यर्थः । मन्मते = वेदान्त- मते । ब्रह्मणः =आत्मनः । द्रव्यत्वस्यासिद्धिः द्रव्यत्वासिद्धिः, तस्याः । अयं भाव:- न खल्वस्माभिर्युष्माभिरिवात्मनःस्वीक्रियते द्रव्यत्वम् । तथा च कार्यकारणभावस्वी- कारेऽपि ब्रह्मतत्सत्तयोः प्रत्यक्षत्वे बाधकामावेन नानुपपत्तिः “सन् घटः" इत्यादि- प्रत्ययस्य, इति। ननु कथं न स्वीक्रियते द्रव्यत्वमात्मनः ? इत्यत आह- गुणाश्रयत्वं समवायिकारणत्वं वा द्रव्यत्त्वं तेऽभिमतम् ? न हि निर्गुणस्य ब्रह्मणो गुणाश्रयता । नाऽपि समवायिकारणता । समवाया- सिद्धः। गुणाश्रयत्वं - समवायसम्बन्धावच्छिन्न-गुणत्वावच्छिन्ननिरूपकतानिरूपिता- धिकरणत्वम् । समवायिकारणत्वं समवायसम्बन्धावच्छिन्नकार्यतानिरूपित- तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नकारणत्वम् अयमाशय:-तार्किकः द्रव्यत्वं कि रूपमभि- अनुमानपरिच्छेदः। १४१ . प्रेत्य आत्मनो द्रव्यत्वं सम्पादनीयम् ? समवायसम्बन्धेन गुणाश्रयत्वं तदित्यभिप्रेत्य चेत्, न प्रत्याशा आत्मनो द्रव्यत्वे । अद्वैतमते ब्रह्मणो निर्गुणतया, समवायासिद्ध्या च समवायसम्बन्धेन गुणाश्रयत्वस्य ब्रह्मण्यात्मनि असम्भवात् । समवायिकारणत्वं द्रव्यत्वमिति निरूक्तिमभिप्रेत्येति चेत् तथापि न सम्भावना तदभिमतसिद्धः । प्रोक्त- क्रमेण समवायिकारणत्वस्य समवायसम्बन्धघटिततया समवायस्यैव मानाभावेना- सिद्ध्या, आत्मनि समवायिकारणत्वस्याप्यभावात् । ननु वेदान्तिभिरपि समवायस्थाने तादात्म्यसम्बन्धस्वीकारात् समवायनाम- मात्रप्रद्वेषात् न समवायिकारणत्वानुपपत्तिब्रह्मणः। समवायस्थाने तादात्म्यमादाय निरुक्तस्य समवायिकारणत्वस्य ब्रह्मणि सत्त्वे बाधकाभावेन, ततस्तस्य द्रव्यत्व- सिद्ध्या, तत्प्रत्यक्षत्वस्यापि निरूक्तकार्यतावच्छेदकाक्रान्ततया कारणीभूतरूपा- भावेन प्रोक्तप्रत्यक्षानुपपत्तिर्दुरिव, इत्यत आह- अस्तु वा द्रव्यत्वं ब्रह्मणः, तथापि नीरूपस्य कालस्येव चाक्षुषादि- ज्ञानविषयत्वे न विरोधः। अथवा सामान्यविशेषसमवायानान्तु अस्मिन् मते स्वीकार एव नास्ति । तदाधाराभावात् न गुणत्वं कर्मत्वमपि वा । सत्येवं यदि द्रव्यत्वमपि न तत्र स्वीक्रि- यते तहि अभावत्वापत्त्या शून्यमतप्रवेशापत्तिरित्यतः उच्यते अस्तु वेत्त्यादि । अयं भावः-वहिरिन्द्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्ष प्रति रूपं कारणम् इत्यपि कार्यकारणभावो न निर्धारणाहः, रूपामाववतोऽपि कालस्य इवानी घट इत्यादिप्रत्यक्षविषयत्वात् । तथा च व्यभिचाराग्निरुक्तकार्यकारणभावे खण्डिते, आत्मनो द्रव्यत्वाभ्युपगमे प्रत्यक्षानुपपत्त्यभावेन “सन् घटः" इत्याविप्रत्यक्षाभावापादनानवकाशः इति । ननु “सन् घटः" इत्यादी आत्मनः प्रत्यक्षविषयत्वाभ्युपगमे प्रपञ्चाध्यासा- धिष्ठानभूतस्य आत्मनः साक्षात्कारेण इदानीमेव द्वैतविलयापत्तिः, तथा चानुभव. विरोधः, इत्यतः सत्तात्रैविध्यमुपगम्य “सन् घटः" इत्यादि प्रत्ययमुपपादयति- यद्वा त्रिविधं सत्त्वं, पारमार्थिकं सत्त्वं ब्रह्मणः । व्यावहारिक सत्त्व- माकाशादेः । प्रातिभासिकं सत्त्वं शुक्तिरूप्यादेः । तथा च घट: सन्निति प्रत्यक्षस्य व्यावहारिकसत्त्वविषयत्वेन प्रामाण्यम् ।
१४२ वेदान्तपरिभाषा। तिस्रो विधा अस्य इति त्रिविधं - त्रिप्रकारम् । सत्त्वं पारमार्थिकं व्यावहा- रिक प्रतिभासिकं च । तत्रेति शेषः । पारमाथिकसत्वं त्रिकालाबाध्यत्वम् व्यावहा- रिकसत्त्वं = ब्रह्मज्ञानातिरिक्ताबाध्यम् ।प्रातिमासिकं सत्त्वं = ब्रह्मज्ञानाति- रिक्तबाध्यत्वम् । तथा च वेदान्तसिद्धान्ते केबलं ब्रह्मण एव त्रिकालाबाध्यतया तस्य पारमार्थिक सत्त्वम् । घटपटादे: बह्मज्ञानोदय विना अबाधितत्वेन तत्र व्यावहारिक सत्त्वम् । शुक्तिरूप्यादेः ब्रह्मज्ञानातिरिक्तेन आरोपाधिष्ठानचैतन्यावच्छेदीभूत- शुक्त्यादिज्ञानेन बाधात् प्रातिभासिकसत्त्वम् । सति चैवं "घटःसन्" इत्यादी घट- गतव्यावहारिकसत्तायाः विषयीकरणेन प्रमाप्रतीतिनिर्वाहः । न च द्वैतापत्ति: पार- मार्थिकसत्ताकवस्त्वन्तरराहित्यस्यैवाद्वैतपदार्थत्वात् । ? नन्वेवमपि कुतो न द्वैतापत्तिः घटादेरपि पारमार्थिक-सत्त्वसम्भवात् तथा हि-त्रैकालिकनिषेधाप्रतियोगित्वमेव हि पारमार्थिकं सत्त्वम् । घटादेरपि च ब्रह्मज्ञानोदयात्पूर्वमबाधितत्व-स्वरूपसत्ताभ्युपगमेन तनिषेधस्याकालिकत्वापत्त्या कालिकानिषेधाप्रतियोगित्वस्य तत्र तत्राप्यक्षतत्वात् इत्याशंकानिरासायाह- अस्मिन् पक्षे च घटादेनिषेधो न स्वरुपेण, किन्तु पारमार्थिक- त्वेन । तथा च न विरोधः । - अस्मिन् पक्षे % त्रिविधसत्ताभ्युपगमपक्षे । चकारस्त्वर्थे । घटादे: स्वरूपेण न निषेध इत्यन्वयः । स्वस्य धर्मो रूपं तेन । घटत्वादिव्यावहारिकधर्मेण इत्यर्थः । पारमार्थिकत्वेन इत्यनन्तरं निषेध इति शेषः। तथा च = पारमार्थिकत्वेन व्यावहा- रिकस्य निषेधे च । न विरोध: न पारमार्थिकाद्वैताभ्युपगमविरोधः । अयं भाव :- व्यावहारिकस्य घटादेः व्यवहारकालसत्त्वाभ्युपगमे तेषां स्वगतघटत्वाविधर्मपुर- स्कारेण व्यावहारिकसत्वाविना वा न शक्यते वक्तुं त्रैकालिको निषेध इति तु सत्यम् । तथापि स्वव्याधिकरणपारमार्थिकत्वधर्मपुररस्कारेण तनिषेधत्य अकालिकत्वे बाधकामावः न हि पारमार्थिकत्वधर्मपुस्कारेण कस्मिन्नपि काले तिष्ठति व्यावहारिकमिति घटादो कालिकनिषेधप्रतियोगित्वसस्वेन मिथ्यात्वावपारमार्थिक- त्वेन नावकाशो द्वैतापत्तेः । पारमार्थिकसत्ताकवस्तुद्वयस्वीकारे हि दैतसम्मवात् इति । स्वर्थकेन चकारेण कवलपारमार्थिकसत्तागुगमपले तु घटादेः स्वरूपत एव निषेध इति सूचितम् ।
अनुमानपरिच्छेदः । १४३ प्रकृते त्रिविधसत्ताभ्युपगमपक्षे अनुमेयस्य मिथ्यात्वस्य स्वरूपपरिचयाय पर्यव- सित लक्षणं सूचयति- अस्मिन् पक्षे मिथ्यात्वलक्षणे पारमार्थिकत्वावच्छिन्नप्रतियोगिता- कत्वमत्यन्ताभावे विशेषणं देयम् । मिथ्यात्वलक्षणे सर्वेषामेवभावानामित्यादिना चित्सुखोक्ते । पारमार्थिक- त्वावच्छिन्न या प्रतियोगिता, तत्कत्वम् = तादृशप्रतियोगितानिरूपकत्वम् । अत्यन्ताभावे स्वाश्रयत्वेनाभिमतनिष्ठात्यन्ताभारे। तथा च स्वाश्रयत्वेनाभिमत- निष्ठात्यन्ताभावीय पारमार्थिकत्वावच्छिन्न प्रतियोगित्वं मिथ्यात्वमिति तल्लक्षणं पर्यवसन्नम् । व्यावहारिकप्रातिमासिकयोः कदापि कुत्रापि च पारमार्थिकत्वेना- सत्त्वात् पारमार्थिकत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकतवत्यन्ताभावमादाय, तदीय-पारमा थिकत्वावच्छिन्न-प्रतियोगिस्वस्य तयोः सावाल्लक्षणसमन्वयः । पर्यवसितमिथ्यात्वनिरूक्तिफलमुपसंहरति- तस्मादुपपन्नं मिथ्यात्वानुमानमिति । D तस्मात् ब्रह्म कसत्त्वस्वीकारात् मिथ्यात्वनिरूक्तिघटकप्रतियोगितायां पारमार्थिकत्वावच्छिन्नत्वनिवेशाद्वा । मिथ्यात्वानुमानम् = ब्रह्मभिन्नं सर्व मिथ्या दृश्यत्वात् इत्यादि पूर्वोक्तमनुमानम् । उपपन्नम् = अदूषणत्वेन निश्चितम् । मिथ्यवात्व- घटकप्रतियोगितायां पारमार्थिकत्वावच्छिन्नत्वनिवेशेन 'ननु सत्तात्रैविध्योपगमे ब्रह्मणि पारमार्थिकत्वेन व्यावहारिकादेरिव व्यावहारिकत्वेन ब्रह्मणोऽपि प्रपञ्चगत- मत्यन्ताभावमादाय तत्प्रतियोगित्वात् ब्रह्मणोऽपि कथं न मिथ्यात्वापत्तिः' इत्यपि परास्तम् । इदानी व्यावहारिकत्वावच्छितियोजिसवस्य गृहीतुमश- क्यत्वात् । इत्यनुमानपरिच्छेदभगवती।
१४४ वेदान्तपरिभाषा । अथोपमानपरिच्छेदभगवती । अवसरसंगत्या उपमानप्रमाणनिरूपणं प्रतिजानीते- अथोपमानं निरूप्यते । तत्रोपमितिकरणमुपमानम् । अथ = अनन्तरम् । अनुमानप्रमाणनिरूपणाव्यवहितोत्तरम् इत्यर्थः । अव्यवधानं पूर्ववत् बोध्यम् । उपमानं = उपमितिकरणभूतोपमानप्रमाणम् । निरूप्यते इत्याद्यर्थः पूर्ववत् । अतो वाक्यजबोधप्रकारोऽपि स एव । तत्र = किमुपमानमिति शिष्याकां- क्षायाम् । उपमिते: करणमुपमितिकरणम् । करणलक्षणं पूर्वोक्तं वेदितव्यम् । तथा चोपमितित्वावच्छिन्नकार्यतानिरूपितकारणतावत्वमुपमानत्वमिति फलितम् । लक्ष्ये लक्षणसङ्गमनावबोधाय प्रक्रियां दर्शयति - तथा हि-नगरेषु दृष्टगोपिण्डस्य पुरुषस्य वनं गतस्य गवयेन्द्रियसन्नि- कर्षे सति, भवति प्रतीतिः अयं पिण्डो गोसदृश इति। तदनन्तरं भवत्य- नेन सदृशी मदीया गौरिति निश्चयः। तत्रान्वयव्यतिरेकाभ्यां गवयनिष्ठगोसादृश्यज्ञानं करणम् । गोनिष्ठगवयसादृश्यज्ञानं फलम् । नगरेषु = गवयपशुशून्येषु प्रामादिषु । गौरेव पिण्डो गोपिण्डः, दृष्टो गोपिण्डो येन असौ दृष्टगोपिण्डः, तस्य । गोत्वादेः शरीरवृत्तित्वानोक्तकर्मधारयविरोधः । वनं = गवयपशुशालिदेशम् । गवयेन सह इन्द्रियस्य = चक्षुस्त्वगन्यतरस्य, सन्निकर्षः संयोगः गवयेन्द्रियसन्निकर्षः, तस्मिन् । अयं पिण्डो गोसदृश इति प्रतीति- र्भवतीत्यन्वयः । तदनन्तरं - तदव्यवहितोत्तरम् । अनेन पशुना सदृशी मदीया गौ: इति निश्चयो भवतीत्यन्वयः । तत्र =गवयपश्वनुयोगिकगोप्रतियोगिकसादृश्यज्ञान- गोपश्वनुयोगिकगवयपशुप्रतियोगिकसादृश्यज्ञानयोर्मध्ये । तत्सत्त्वे तत्सत्त्वमन्वयः तदभावे तदभावो व्यतिरेकः, ताभ्याम् । तथा च अयं गोसदृश इति ज्ञानसत्वे एतर- सदृशी मवीया गोः इति मानम्, अयं गोसवृश इति ज्ञानामावे एतत्सदृशी मदीया गौरिति ज्ञानामावः, इत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां गवयानुयोगिकसावृश्यप्रत्यक्ष करणतया उपमानम् । गोपदार्थानुयोगिकसादृश्यशानं परोक्षरूपमुपमितिः फलम् इत्यर्थः । गवयनिष्ठं यत् गोसादृश्यं तस्य ज्ञानम् । गवयनिष्ठत्वं तदनुयोगिकत्वम् । प्रत्यक्षम्, तेन न गोसदृशो गवय इति वाक्यजज्ञानात् उपमित्यापत्तिः । फलं = कार्यम् । - उपमानपरिच्छेदः। १४५ . ननु गवयप्रतियोगिकगोपदार्थानुयोगिकसादृश्यज्ञानमेव चेत् फलम्, तर्हि तत्तु प्रत्यक्षमेव, गोगवयोभयसादृश्यक्यात् गवयनिष्ठस्य तस्य प्रत्यक्षाभ्युपगमे गोनिष्ठ- स्यापि तस्य प्रत्यक्षविषयत्वात् इति कृत प्रमाणान्तरेणोपमानेनेति साख्यपूर्वपक्ष- मपाकरोति- -- न चेदं प्रत्यक्षेण सम्भवति, गोपिण्डस्य इन्द्रियासन्निकर्षात् । न च सम्भवतीत्यन्वय, । इद = एतत्सदृशी मदीया गौरिति विलक्षणज्ञानम् । प्रत्यक्षेण प्रत्यक्षप्रमाणभूतेन्द्रियादिना । गोपिण्डस्य = गोशरीरस्य । इन्द्रिया- सन्निकर्षात् इन्द्रियसन्निकर्षानाश्रयत्वात् । अयमाशयः-भूयोधर्मरूपस्य सादृश्य- स्य गोगवययोरेकत्वेऽपि गोपदार्थासनिकृष्टचक्षुषः पुरुषस्य न गोनिष्ठतया तद्भानं भवितुमर्हति तनिष्ठधर्मप्रत्यक्षे तद्घटितस्यैव सभिकर्षस्य कारणत्वात् । अन्यथा तवाऽपि मते घटगतव्यक्तत्वस्येव वाग्वाविगतस्यापि तस्य चाक्षुषत्वापातात, अभेदाइयक्तत्वस्य । सति चवं गवयेन सह चक्षुस्सन्निकर्षकाले गवा सह चक्षुः- संयोगाभावात् गोनिष्ठ धर्मप्रत्यक्षकारणीभूतस्य चक्षुःसंयुक्ततादात्म्य-रूपस्य सन्निकर्षस्याभावात् न प्रत्यक्षसम्भवः इति । ननु मास्तु गोनिष्ठसादृश्यज्ञानं प्रोक्तस्थलीयं प्रत्यक्षम् । तथापि न प्रमाण- न्तरमुपमानमुपेयम् । फलस्यानुमितिरूपत्वात् इत्याक्षेपं निरस्यति- नाप्यनुमानेन । गवयनिष्ठगोसादृश्स्यातल्लिगत्वात् । इदं सम्भवतीति सम्बन्ध: । अनुमानेन अनुमानप्रमाणेन । गवयनिष्ठ यत् गोसादृश्यं तस्य । न तल्लिगत्वं अल्लिगत्वम् तस्मात् । लिगत्वं = अनु- मापकत्वम् । तथा च गोनिष्ठगवयसादृश्यानुमापकत्वाभावात् इति अल्लिगत्वात् इत्यस्यार्थः । अयं भावः-गोनिष्ठं गवयसादृश्यमनुमेयं चेत् न लिंगमन्तरेण । गवय- निष्ठसादृश्यमेव प्रत्यक्षीक्रियमाणं धूम इव बढेलिगं भविष्यतीति चेत् नवं शक्यते वक्तुम् । उभयनिष्ठसावश्यक्याभ्युपगमे भेदाश्रययोरनुमेयानुमापकत्वयोरसम्भवात् । भेदे च मिन्नाश्रययोस्तयोः समानाधिकरण्यासम्भवेन अशेषसाधनाश्रयाश्रित- साध्यसामानाधिकरण्यरूपव्याप्तिज्ञानासम्मवेन व्याप्यत्वेनावातात् तस्मात् अनु- मित्यसम्भवात् । नाऽपि व्याप्तिभ्रमेण तत्सम्पादनम् । अभ्रान्तस्य तादृशज्ञानानुदय- प्रसंगात् इति ।
वेदान्तपरिभाषा । ननु विशेषतो व्याप्तिज्ञानाभावेऽपि सामान्यव्याप्तिज्ञानाद् अनुमिति: सम्पत्स्यते, इत्याशङ्कानिरासाय आह- - नापि मदीया गौरेतत्सदृशी एतनिष्ठसादृश्यप्रतियोगित्वात्, यो यद्गतसादृश्यप्रतियोगी स तनिष्ठः, यथा मैत्रनिष्ठसादृश्यप्रतियोगी मैत्रसदृशः इत्यनुमानात्सम्भव इति वाच्यम् । एवविधानुमानानवतारेऽपि "अनेन सदृशी मदीया गौरितिप्रतीतेरनुभवसिद्धत्वात् । A - नापीति वाच्यमिति व्यवहितेन सम्बन्धः । मदीया गौः एवत्सदृशी असौ गवयः एतद्गवयः तस्य सदृशी, = एतत्प्रतियोगिकसादृश्यानुयोगिनी, इत्यर्थः । एतनिष्ठसादृश्यप्रतियोगित्वात् इत्यस्य एतनिष्ठं = गवयनिष्ठं यत् सादृश्यं तत्प्रति- योगित्वात् इत्यर्थः । यो यद्गतेत्यादि सामान्यव्याप्तिज्ञानाऽऽकारः । तत्सम्भवः = अनुमितिसम्भवः । एवंविधं यद् अनुमानं सामान्यतो व्याप्तिज्ञानं तस्यानवतारः = अनुत्पादः, तस्मिन् । अयं भावः-'यो यद्गतसादृश्यप्रतियोगी स तत्सदृशः यथा मैत्रनिष्ठसावृश्यप्रतियोगी चैत्रो मैत्रसदृशः" इति सामान्यव्याप्तिज्ञान- बलेन इन्द्रियासनिकृष्टे गवि गवयसादृश्यज्ञानरूपं "एतत्सदृशी मदीया गौः" इति शानं अनुमितिरूपमेव भविष्यतीति किं प्रयोजनं अतिरिक्तोपमानप्रमाणापगम- स्येति न शक्यते वषतुम् । येषां निरक्तसामान्यव्याप्तिज्ञानं न जातं तेषामपि एतत्सदृशी मदीया गौरिति ज्ञानदर्शनेन व्यभिचाराद् निरुक्तव्याप्तिज्ञानस्य कारण- त्वासम्भवेन प्रोक्तगोनिष्ठसादृश्यज्ञानस्य अनुमितियागात् । तथा च विलक्षण- तादृशप्रमितिकरणभूतमुपमानमपि स्वीकर्तव्यमेवरित - एतत्सदृशी मदीया गौरिति ज्ञानस्य प्रमित्यन्तरत्वे युक्त्यन्तरमप्याह- उपमिनोमीत्यनुव्यवसायाच्च । गां उपमिनोमि इति योऽनुव्यवसायः, व्यवसायविषयकज्ञानम्, तस्मात् इत्यर्थः । अनुमित्यनन्तरं "साध्यमनुमिनोमि" इत्येव भवत्यनुव्यवसायात्मिका प्रतीति: न तूपमिनोमि इति । प्रकृते तु न हि भवति अनुमिनोमीति, अपि तूपमिनो- मीति तस्मादुपमितिनामकविलक्षणप्रमितिरवश्यमभ्युपेयेति भावः । ।
उपमानपरिच्छेदः । १४७ उपसंहरति- तस्मादुपमानं मानान्तरम् । तस्मात् = यस्मादुपमितिरतिरिक्तप्रमितिः तस्मात् इत्यर्थः । अन्यन्मानं मानान्तरं, प्रमाणान्तरमित्यर्थः । अयं भाव:-प्रोक्तसामान्यव्याप्तिज्ञानं विनापि जाय- मानाया: उपमिनोमीति रूपेण अनुमितिभिन्नत्वेन गृह्यमाणायाः एतत्सदृशी मदीया गौरिति प्रतीते: स्वतन्त्राप्रमितेः अवश्यमभ्युपेयतया तदर्थमुपमानं प्रमाणमभ्युपेय- मेव । प्रमितिस्वातन्त्र्यस्य प्रमाणस्वातन्त्र्यनियतत्वात् । मार्किकास्तु संज्ञासंज्ञिसम्बन्धज्ञानमुपमितिः, तत्करणभूतं उपमेयनिष्ठसादृश्य- प्रत्यक्षमुपमानमिति वदन्ति । तथा हि कश्चिद् गवयपदार्थज्ञाता गवयविशेषज्ञ- पुरुषात् "गोसदृशो गवयो भवति" इति श्रुत्वा कदाचित् सन्निकृष्टगवयपशुशरीरे अयं गोसदृश इति सादृश्यस्य प्रत्यक्षं करोति, तत: पूर्वोक्तवाक्यस्यार्थ “गोसदृशो गवयो भवति" इति स्मरति । ततः अयमेव गवयपदस्य वाच्य इति जानाति । तत्र सादृश्यप्रत्यक्षं, मतभेदेन वाक्यार्थस्मरणं वोपमानम् । अयं गवयपदवाच्य इति गवय- पदवाच्यता ज्ञानमुपमितिरिति । तन्न युक्तम् आप्तवाक्यस्यापि शक्तिप्राहकतया गोसदृशो गवयो भवतीति वाक्यादेव गोसदृशपशी गवयपदवाच्यत्वनिश्चयस्य वाक्यश्रवणानन्तरमेव निष्पन्नत्वात् । न च शक्तिज्ञाने धामचाभुषस्य धर्मीन्द्रिय- सन्निकर्षस्य वा नियतापेक्षा शक्यते वक्तुम्, तथा सति स्वर्गापूर्वदेवतादरम- वाचकभावज्ञानासम्भवन तत्तत्पवघटितवाक्यार्थबोधानुपपत्तेः । न च पुरुष आम्हल्सनयात् वाच्यवाचकमावज्ञानामाव इति वाच्यम् । तथा सति गवयसग्नि- कर्षानन्तरमपि वाच्यवाचकमावनिश्चयानुपपतेः । सन्निकर्षकालेऽपि पुरुषेण तेन सत्यमुपदिष्टं मिथ्या वेति सन्देहवता अयमेव गवयपदवाक्य इति निश्चयस्य कर्तुमशक्यत्वात् । इति दिक् । इत्युपमानपरिच्छेदभगवती।
१४८ वेदान्तपरिभाषा । अथागमपरिच्छेदभगवती । क्रमप्राप्तमागमं प्रमाण निरूपयितु उपदेश्यमनस्समाधानाय प्रति जानीते- अथागमो निरूप्यते। S अथ अनन्तरं उपमानप्रमाणनिरूपणानन्तरम् । आगमः - शब्द- प्रमाणम् । निरूप्यते = ज्ञानानुकूलव्यापारविषय: क्रियते । ज्ञानस्य लक्षणसापेक्ष- त्वात् आगमप्रमाणस्य लक्षणमाह- यस्य वाक्यस्य तात्पर्यविषयीभूतसंसर्गो मानान्तरेण न बाध्यते तत् वाक्यं प्रमाणम् । वाक्यस्येत्यत्र षष्ठ्यर्थो निष्ठत्वम्, तात्पर्य तदन्वयः । तात्पर्य वक्ष्यमाणं तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वरूपं विवक्षितम् । ननु शब्दनिष्ठतादृशतात्पर्यविषयत्वा- सम्भवात् संसर्गे तदसम्भवेन लक्षणासम्भव इति चेत्, शक्तिरूपाया. शब्दनिष्ठाया: निरूक्तयोग्यतायाः जनकतारूपत्वेन तादृशजनकतानिरूपितजन्यतावत्प्रतीति- विषयत्वस्यैव तात्पर्यविषयत्वपदेन विवक्षितत्वात् । तथा च यद्वाक्यनिष्ठतात्पर्य घटक-प्रतीतिविषयः संसर्गः न प्रमाणान्तरेण बाध्यते, तद्वाक्यमागमप्रमाणमित्यर्थः। प्रमाणान्तराबाधितसंसगाव यतीतिजननयोग्यतावद्वाक्यमागमप्रमाणमिति फलि- तोऽर्थः । निरर्थके शब्देतिव्याप्तिवारणाय प्रतीतिजननयोग्यत्वनिवेश: अग्निना सिञ्चतीति वाक्यवारणाय प्रमाणान्तराबाधितत्त्वनिवेशः । नातिरात्रे षोडाशिनं गृह्णातीति बाधितातिरात्रे षोडशिनं गृह्णातीति वाक्यप्रामाण्याय अन्तर- पदम् । ननु “स प्रजापतिरात्मनो वपामुदाखिदत्" इति वाक्याव्याप्तिरिति चेन्न प्राशास्त्यसंसर्गप्रतीतिजननयोग्यत्वमादाय लक्षणसमन्वयात् । अत एव तात्पर्यपद- प्रक्षेपस्यापि सार्थक्यम् । ननु प्रमाणवाक्याधीनप्रतीतौ वाक्यातिरिक्तमन्यत् किञ्चिदपेक्षितं न वा ? अपेक्षितं चेत् किं तत् ? इत्याकांक्षायामाह- वाक्यजन्ये च ज्ञाने आकांक्षायोग्यताऽऽसत्तयः तात्पर्यज्ञानं चेति चत्वारि कारणानि।
आगमपरिच्छेदः । १४९ वाक्येन जन्यते इति वाक्यजन्यं, तस्मिन् ज्ञाने, शाब्दबोधे इत्यर्थः । आकाक्षा च योग्यता च आसत्तिश्चेति आकांक्षायोग्यतासत्तय. । एतेषा स्वरूपत एव हेतुत्व शाब्दबोधे, न तु तज्ज्ञानापेक्षेति द्योतनाय तात्पर्यज्ञानेन सहासमासकरणम् । तार्किक- रीतिभेद एतेनोपदर्शितः तत्र प्रथमामाकांक्षा परिचाययति- - तत्र पदार्थाना परस्परजिज्ञासाविषयत्वयोग्यत्वमाकांक्षा । चतुर्पु मध्ये । ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा, तस्याः विषयः जिज्ञासाविपयः तस्य भावस्तत्त्वम् । परस्पर यत् जिज्ञासाविषयत्वं तद्योग्यत्वम् । पदार्थानामित्यत्र षष्ठ्यर्थो निष्ठत्वम् । तस्य योग्यत्वेन सहान्वयः । पदार्थानामित्यत्र बहुवचनेन अनेकपदार्थनिष्ठत्व जिज्ञासाया सूच्यते । तथा च इष्टतज्ज्ञानव्यतिरेकप्रयुक्त- व्यतिरेकप्रतियोगिज्ञानविषयत्वयोग्यत्वमाकांक्षा । यथा गामानयेत्यत्र आनयनज्ञान- व्यतिरेक-प्रयुक्त-व्यतिरेकप्रतियोगिप्रतीति-विषयत्वयोग्यत्वं च आनयने, इति भवति परस्परं तयोराकाक्षा। लक्षणसमन्वयमुपपादयति- क्रियाश्रवणे कारकस्य, कारकश्रवणे क्रियायाः, करणश्रवणे इतिकर्तव्यतायाश्च जिज्ञासाविषयत्वात् । क्रिया = तद्वाचकं पदम्, तस्य श्रवण = श्रावणप्रत्यक्षम्, तस्मिन् । यद्वा क्रियायाः श्रवण क्रियाश्रवणं, तस्मिन् । - पदश्रवणजन्यक्रियात्मक- पदार्थोपस्थितिः, तस्यां सत्याम् । कारकस्य = क्रियासम्बन्धिनः। एवमग्रेऽपि । करणं क्रियाव्यापारवत्कारणम् । यथा कुठारेण छिनत्तीत्यत्र कुठारः । तस्य धात्वर्थ छेदनं प्रति व्यापारवत्कारणत्वात् । इतिकर्तव्यता करणाश्रितो व्यापारः । यथा कुठाराश्रिते उद्यमननिपातने | जिज्ञासाविषयत्वात् इत्यस्य त्रितयत्रान्वयः। तथा च त्रियाश्रवणे कारकस्य जिज्ञासाविषयत्वात्, कारकश्रवणे क्रियाया जिज्ञासाविषयत्वात्, करणश्रवणे च इतिकर्तव्यतायाः जिज्ञासाविषय- त्वाद् इत्यन्वयः । अयं भाव:- केवलं छिनत्तीति क्रियाश्रवणे न ततो बोधपरिसमा- प्तिर्जायते । किमिति जिज्ञासायाः उत्थितत्वात् । काष्ठमिति कारकप्रयोगे च "काष्ठं छिनत्तीति बोधो जायते इति सर्वानुभवसिद्धम् । अतः छिनत्यपंवेदनापायां छेधकाष्ठज्ञानव्यतिरेकप्रयुक्त-व्यतिरेकप्रतियोगिज्ञानविषयत्वयोग्यत्वमायातमिति लक्षणसमन्वयः। एवमेवान्यत्राप्यवसेयम् । श्रवण 3S १५० वेदान्तपरिभाषा । ननु परस्परजिज्ञासाविपयत्वमेवासत्त्वाकांक्षा, कि तद्योग्यत्वनिवेशेन ? इत्यत आह- अजिज्ञासोरपि बाक्यार्थबोधात् योग्यत्वमुपात्तम् । ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा, सा अस्ति यस्य स जिज्ञासुः । न जिज्ञासुरजिज्ञासुः, तस्य तादृशस्य पुरुषस्येत्यर्थः । उपात्तं = आकांक्षालक्षणे निवेशितम् । अयं भावः- यत्रौको वाक्यं वदति, अपरः श्रुत्वार्थबोधं करोति जिज्ञासुः, तत्राजिज्ञासुरपि चेदुप- विष्टः कश्चित् तृतीयो व्युत्पन्नः, तर्हि तस्यापि जिज्ञासोरिव वाक्यार्थबोधो जायत एव । योग्यत्वानुपादाने तृतीयस्याजिज्ञासोस्तस्य वोधानदयप्रसङ्गात् । तस्य जिज्ञासाभावेन तद्वोधप्रयोजकजिज्ञासाविषयत्वरूपाया आकांक्षायाः पदार्थ- भावात् । योग्यत्वपदोपादाने च तस्यापि जिज्ञासासम्भावनया तदीयजिज्ञासाविषय- त्वयोग्यत्वस्याक्षततया, आकांक्षासम्पत्त्या तदीयस्य बोधस्य नासम्भव इति । ननु या या योग्यता सा सा किञ्चिद्धर्मावच्छिन्नेति नियमात, प्रकृते किं धर्मा- वच्छिन्नत्वमस्या योग्यतायाम् ? अथवा तद्योग्यत्वं तदवच्छेदकधर्मवत्त्वम्, एवं सति प्रकृते कः खलु विषयताया निरूक्ताया अवच्छेदको धर्म: ? इत्याशङ्कायामाह- तदवच्छेदकं च क्रियात्वकारकत्वादिकं इति नातिव्याप्तिः गौरश्वः पुरुषो हस्तीत्यादौ । तदवच्छेदकं - जिज्ञासाविषयत्वयोग्यतावच्छेदकम् । कारकत्वादिकमित्य- त्रादिपदेनेतिकर्तव्यतापरिग्रहः। गौरश्वः पुरुषो हस्तीत्यादौ नातिव्याप्तिरित्यन्वयः । "इति नातिव्याप्तिः" इत्यत्र इतीत्यस्य स्वरूपसत्याः परस्परजिज्ञासाविषयत्वयोग्य- त्वरूपायाः आकांक्षायाः शाब्दबोधहेतुत्वाभ्युपगमात् इत्यर्थः । तथा चायं भाव:- यदि निरुक्तरूपायाः आकांक्षायाः शाब्दबोधहेतुता न स्यात् गौरश्वः पुरुषो हस्तीति निराकांक्षवाक्यादपि शाब्दबोधापत्तिः स्यात् । वस्तुतस्तु इतीत्यस्य क्रियात्वकारक- स्वादेः निरूक्तयोग्यतावच्छेदकत्वस्वीकारात् इत्यर्थः । तथा चायं भावः-यदि क्रियात्व कारकत्वमनावाय पवार्थत्वमानं निरत्तयोग्यतावच्छेदकं स्यात् तदा शाब्दबोधा- जनकगीरश्व - इत्यादिवाक्यघटकगवाश्वाविपदार्थप्याकांक्षालक्षणातिव्याप्तिः स्यात् इति । अत एव नातिव्याप्तिरिति लेखोऽपि संगच्छते । अन्यथा न शाब्दापत्तिरि- त्येव ब्रूयादध्वरीन्द्रः । क्वचित्पुस्तके "नाव्याप्तिरिति" एतावानेव पाठः समुपल- म्यते । तथा चेत् नाव्याप्तिरित्यस्य अजिज्ञासुश्रोतृपुरुषबोधानुकूलस्य तज्जिज्ञासा- आगमपरिच्छेदः । १५१ विषयत्वरूपस्याकांक्षालक्षणस्य बोधविषयपदार्थे नाव्याप्तिरित्यर्थोऽवसेयः। अयम. भिप्रायः-यदि क्रियात्वकारकत्वादिरूपनिरक्तविषयतावच्छेदकधर्मवत्वरूपायाः योग्यतायाः लक्षणे प्रवेशो न स्यात् तदा अजिज्ञासुश्रोतःषजिज्ञासाविषयत्वरूपाया आकांक्षायाः पदार्थे अव्याप्तिः स्यात् । न चेष्टापत्तिरिति शक्यते वक्तुम् । अजिज्ञा- सोरपि श्रोतुः तत्तत्पदार्थानुभवस्य सनुभवासद्धत्वात् । यत्त्. पेद्ददीक्षितैः नाव्याप्ति- रित्यस्य "यतो वाक्यान्न कदाचिदप्यन्वय बोधो जायते तत्र पदार्थे नोक्तलक्षणा- व्याप्तिः" इतिव्याख्यातं वाचोभग्या, तन्न मनोरमम्, तादृशपदार्थे आकांक्षा- भावेऽपि क्षत्यभावात् । ननु क्रियात्वकारकत्वेतिकर्तव्यतात्वानामेव योग्यतावच्छेदकत्वे तत्त्वमसीति महावाक्यस्थले तत्त्वंपदार्थयो: आकांक्षालक्षणाव्याप्तिः तत्त्वंपदार्थयो. क्रियाकारक- भावाद्यभावात् इत्यत आह- अभेदान्वये च समानविभक्तिकपदप्रतिपाद्यत्वं तदवच्छेदकमिति तत्त्वमस्यादिवाक्येषु नाव्याप्तिः । अभेदान्वये - अभेदान्वयबोधस्थले । समानविभक्तिकाभ्यां पदाम्यां उपस्था- प्यत्वं न विशेष्यवाचकपदसमानविभक्तिकविशेषणवाचकपदोपस्थाप्यत्वं विशेषण- पदार्थ, विशेषणवाचकपदसमानविभक्तिक-विशेष्यवाचकपदोपस्थाप्यत्व विशेष्य- पदार्थे । तथा सति तत्त्वमसीति वाक्यस्थलेऽव्याप्तेर्दुरितापत्तः। तत्राखण्डपदार्थ- मात्रबोधाभ्युपगमेन विशेष्यविशेषणभावाभावात् । अभेदान्वये इत्यस्यापि वस्तुतः भेदानन्वयस्थले इत्यर्थः । तेन नीलो घट: तत्त्वमसीत्युभयोरपि लक्ष्यत्वम् । अन्यथा तत्वमसीत्यत्र संसर्गविधया प्रकारविधया वा अभेदबोधने अखण्डार्थविषयकत्वा- नुपपत्त्या तद्वाक्यजन्यबोधे अभेदान्वयबोधत्वाभावेन तादृशस्थलासंग्रहापत्याऽ- सङ्गत्यापत्त: । तदवच्छेदकम् जिज्ञासाबिषयत्वयोग्यतावच्छेदकम् । तथा चायमर्थः-यदि क्रियात्वकारकत्वादिकमेव सर्वत्र स्याज्जिज्ञासाविषयत्वयोग्यता- बच्छेदकं तदा स्यादेव तत्त्वमसीति महावाक्यजबोषजनकोपस्थितविषये तत्त्वं पदार्थ, नीलो घट इत्यादिवाक्यजबोधजनकनीलघटादिपदार्थे च । किन्तु संसर्गा- विषयकबोधजनकतत्तद्वाक्यस्थले समानविभक्तिकपवप्रतिपाद्यत्वस्य योग्यता- वच्छेदकत्वाभ्युपगमेन तत्त्वंपदयोरुभयोः नीलघटपदयोरुभयोश्च सुविभक्त्यन्त- तया समानविमक्तिकत्वेन तत्त्वंपदार्थभूताखण्डवस्तुनः नीलघटपदार्ययोश्च समान- विभक्तिकपवप्रतिपाद्यत्वरुपयोग्यतावच्छेदकधर्मवत्तया निरुक्तजिज्ञासाविषयत्व- योग्यत्वस्य तत्राक्षते व्याप्त्यवकाशः । अवच्छेदस्तावच्छेदकनियतत्वात् ।
१५२ वेदान्तपरिभापा। समानविभक्तिकपदप्रतिपाद्यत्वरूपावच्छेदक - जिज्ञासाविषयत्वयोग्यत्वरूपे अभेदान्वयस्थलीयाकाक्षालक्षणे कर्ममीमांसासम्बादमाह- - एतादृशाकांक्षाभिप्रायेणैव बलाबलाधिकरणे "तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा वाजिभ्यो वाजिनम्" इत्यत्र वैश्वदेवयागस्य आमिक्षान्वितत्वेन न वाजिनाकांक्षेति व्यवहारः । । एतादृशाकांक्षाभिप्रायेणैव-समानविभक्तिकपदप्रतिपाद्यत्वावच्छेदकनिरुक्तयोग्यता- रूपाकांक्षाभिप्रायेणैव। बलाबलाधिकरणे-श्रुतिलिङ्गादिप्रमाणानां प्राबल्यदौर्बल्य- विवेचनात्मके कर्ममीमासादर्शनतृतीयाध्यायस्थेऽधिकरण इति व्यवहार इति व्यवहितेन सम्बन्धः । तेन तप्ते पयसीत्यस्य निरुत्तदर्शनीयद्वितीयाध्याये- एवोल्खात् तृतीयाध्यायस्थबलाबलाधिकरणेऽनुल्लेखेऽपि नासङ्गतिः । अनुल्लेखेऽपि व्यवहारस्य सम्भवात् । उणे दुग्धे दधि आतञ्चनभूतं दद्यात् । तथाकृते यः खलु घनीभूतो दुग्धाशः स आमिक्षा पदार्थः । स च वैश्वदेवनामकस्य यागस्य साधनभूतः । यश्च जलबहुलस्तरलो दुग्धाशः तदेव वाजिनद्रव्यम्, वाजिना- मकवैश्वदेवातिरिक्तयागस्य साधनभूत भवति इति तप्ते पयसीति वाक्यस्य सरलार्थ. । वैश्वदेव्यामिक्षेत्यत्र वैश्वदेव्यामिक्षयो: क्रियाकारकभावो नास्ति समान- विभक्तिकपदप्रतिपाद्यत्वं परमस्तीति नाकाक्षानुपपत्तिरित्यर्थः । अयं भावः-यद्यमेवा- स्वयस्थले समानविभक्तिकपदप्रतिपाद्यत्वं जिज्ञासाविषयत्वयोग्यतावच्छेदकं नाभ्युप- गम्यते क्रियात्वकारकत्वरूपमेव, तदा न केवलं तत्त्वमसीत्यत्रैवानुपपत्तिः अपितु सा वैश्वदेव्यामिक्षा इत्यत्रापि पैश्वदेवसमजयोः क्रियाकारकभावाभावेन अनाकांक्षत्वा- पत्त्याऽनन्वयेन आमिक्षाद्रव्यस्यैव वश्वदेवयागसाधनत्वं न तु वाजिनस्येति कमिणां निर्णयस्यापि भङ्गापत्तिःस्यात् । तत्त्वमसोत्याद्यर्थ तथोक्तो तु तादृङ निर्णयभङ्गा- पत्तिरपि वारिता भवति इति । ननु सर्वत्र क्रियात्वकारकत्वयोः योग्यता- वच्छेदकत्वानभ्युपगमेऽपि आमिक्षाया एव वैश्वदेवनामकयागसाधनत्वं न वाजिन- द्रव्यस्येत्यत्र नियामकाभावः । आमिक्षेत्यस्येव वाजिनमित्यस्यापि सुविभक्त्यन्ततया समानविभक्तिकपदप्रतिपाद्यत्वस्य आमिक्षायामिव वाजिनद्रव्येऽपि सत्त्वात् ।
आगमपरिच्छेदः। १५३ - इत्याशङ्कते- तत्रापि वाजिनस्याजिज्ञासाविषयत्वेऽपि तद्योग्यत्वमस्त्येव प्रदेय- द्रव्यत्वस्य यागनिरूपितजिज्ञासाविषयतावच्छेदकत्वात् । तत्रापि वैश्वदेवयागेऽपि । वाजिनस्य वाजियागसाधनस्य वाजिननामक- द्रव्यविशेषस्य । तद्योग्यत्वं = जिज्ञासाविषयत्वयोग्यत्वम् । प्रदेयेत्यादिना योग्यता- ऽस्तित्वे हेतुरूपदर्शितः । वाजिनद्रव्यनिष्ठस्येति शेषः । यागनिरूपिता या जिज्ञासा, तस्याः या विषयता, तदवच्छेदकत्वादित्यर्थः । अयं भावः-द्रव्यत्यागसाधनकयाग- मात्रे कि द्रव्यं प्रदेयमिति जिज्ञासोदयस्य सर्वानुभवसिद्धतया प्रदेयद्रव्यत्वस्य तादृश- जिज्ञासाविषयतावच्छेदकधर्मभूतस्य च आमिक्षायामिव वाजिनेऽपि सत्त्वात् कयं न वाजिनद्रव्यस्य वैश्वदेवयागेनान्वयः तदङ्गतयेति । समाधत्त- इति चेन्न । स्वसमानजातीयान्वयबोधविरहसहकृत-प्रदेयद्रव्यत्वस्यैव तदवच्छेदकत्वेन वाजिनद्रव्यस्य स्वसमानजातीयान्वयबोधसहकृतत्वेन तादृशावच्छेदकभावात्। स्वं अन्वयित्वेनापाद्य:तस्य यः समानजातीयः तेन योऽन्वयः, तस्य यो बोधः तस्य च यो विरहः - अभावः, तत्सहकृतं यत्प्रदेयद्रव्यत्वं तस्यैवेत्यर्थः । तदवच्छेदक- त्वेन = जिज्ञासाविषयत्वयोग्यतावच्छेदकत्वेन । स्वसमानजातीयान्वयबोधविरह- सहकृतत्वेन वाजिनद्रव्यस्य तादृशावच्छेदकाभावादित्यन्वयः । स्वं वाजिनद्रव्यम् तत्समानजातीयः - आमिक्षा, तस्य यो वैश्वदेवयागेन सहान्वयः, तद्वोधसहकृतत्वेन इत्यर्थः । अयं मावः-प्रदेयद्रव्यत्वमानं यदि यागनिरूपिण्यायोया- वच्छेवकमभ्युपगम्यते स्यादापत्तिरामिक्षाया इव वाजिनस्यापि अन्वयापत्तिश्व- देवयागे, परन्तु तन्नाभ्युपगम्यते । अपि तु स्वसमानजातीयान्वयबोधविरहसहकृत- प्रदेयद्रव्यत्वम्, तन्नास्ति वाजिने इति न तदन्वयापत्यवकाशो वैश्वदेवयागे । कथं तनास्ति वाजिन इति चेत् ? इत्यम्-सा वैश्वदेव्यामिक्षा वाजिम्यो वाजिन- मित्यत्र सा वैश्वदेव्यामिक्षेति श्रवणादेव श्रोतुः वैश्वदेवयागः आमिक्षा-द्रव्याङ्गक इति बोषो जायते तदनन्तरं वाजिनमिति वाक्यं श्रुतं भवति । तथा च वाजिद्रव्य- बोषात् पूर्वमेव वैश्वदेवयाग आमिक्षान्वित इति बोधस्य वृत्तत्वेन वाजिनद्रव्यसमान- जातीयारिलायले सहकृतं प्रदेयद्रव्यत्वं वाजिने अवगम्यते । नतु तादशबोष- वेदान्तपरिभाषा । १५४ विरहसहकृतं प्रदेयद्रव्यत्वम्, इति अवच्छेदकभूतस्य निरुक्तबोधविरहसहकृत- प्रदेयद्रव्यर पस्यविनोदकस्याभावप्रयुक्तायाः तदवच्छेद्याया योग्यतारूपायाः आकांक्षाया वाजिने अभावेन नावकाशो वैश्वदेवयागे वाजिनान्वयस्य । ननु पूर्वोक्तस्य "एतदभिप्रायेणैव" इति ग्रन्थस्य कोऽर्थः ? यदि प्रदर्शितरूपः तदा निरुक्तप्रदेयद्रव्यत्वरूपयोग्यतावच्छेदकोक्तिः, तदा तादृशावच्छेदकमादाय वाजिनस्य वैश्वदेवयागानन्वयप्रश्नतत्समाधाने असङ्गते । यदि च प्रदेयद्रव्यत्वघटिताकांक्षाभि- प्रायेणेति तदर्थः तदा एतादृशेति पदोल्लेखासङ्गतिः पूर्वोदाहृत एव तथा व्यवहारात् इति चेत् "एतादृश"पदेन समानविभक्तिकपदप्रतिपाद्यत्वघटिताकांक्षायोग्यताया एव ग्रहणम् । आमिक्षावैश्वदेव्योः तादृशाकाक्षासद्भावप्रयुक्तमेव निरुक्तबोधासहकृत- प्रदेयद्रव्यत्वस्य वाजिने अभाव: सम्पद्यते । यदि क्रियात्वकारकत्वादिकमेव सर्वत्र योग्यतावच्छेदकमभ्युपेतं स्यात् तदा वैश्वदेव्यामिक्षेति श्रवणेऽपि श्रोतुर्न स्यात्कथमपि वैश्वदेवयागे आमिक्षान्वयबोधः, इति तत्सहकृतप्रदेयद्रव्यत्वमेवावगच्छेत् वाजिने जनः, अतो निष्कृष्टप्रदेयद्रव्यत्वरूपायाः आकांक्षाया अपि तन्मूलकतया न काप्य- सङ्गतिः । वस्तुतस्तु प्रदेयद्रव्यत्वरूपं योग्यतावच्छेदकं व्याप्यम् व्यापकं च समानविभक्ति- कपदप्रतिपाद्यत्वम् । यागासम्मृक्ते हि नीलो घट इत्यादिवाक्यस्थले प्रदेय- द्रव्यत्वाभावेऽपि समानावभक्तिकपदप्रतिपाद्यत्वस्य बोधप्रयोजकत्वात् । तथा यागस्थलेपि व्याप्यभूतेन प्रदेयद्रव्यत्वेन ज्ञापितं समानविभक्तिकपदप्रतिपाद्यत्वं अभेदान्वयबोधनियामकमित्यत्र ग्रन्थतार्पयमिति नावकाशो-दोषलवस्येति । यद्वा- एतादृशाकांक्षाभिप्रायेणेत्यस्य पदार्थनिष्ठायाः स्वरूपसत्या: निरुक्तयोग्यतारूपायाः आकांक्षायाः हेतुत्वाभिप्रायेणेत्यर्थः । ननु तर्हि आमिक्षायाः कथं वैश्वदेवान्वयः ? इत्याशंका निराकरोति- आमिक्षायां तु नैवम् । वाजिनान्वयस्य तदानुपस्थापनात् । नैवम् न स्वसमानजातीयान्वयबोधविरहसहकृतप्रदेयद्रव्यत्वाभावः । तत्र हेतुः वाजिनान्वयस्येत्यादि । तदा = आमिक्षावैश्वदेवयोरन्वयबोधकाले ।
आगमपरिच्छेदः । वाजिनान्वयस्यानुपस्थापनादित्यन्वयः । एतेन स्वसमानजातीयान्वयबोधविरहो दर्शितः । अयं मावः-"सा वश्वदेव्यामिक्षा" इति श्रवणकाले श्रोतुः "बाजिम्यो वाजिनमिति श्रवणाभावेन वाजिनद्रव्यपदार्थनुपस्थित्या वैश्वदेवयागे तत्तवन्वया- सम्भवन स्वपदार्थामिक्षासमानजातीय-वाजिनद्रव्यान्वयबोधाभावेन आमिक्षा- निष्ठस्य प्रदेयद्रव्यत्वस्य तादृशबोधविरहसहकृतप्रदेयद्रव्यत्ययान्वयनमायाः जिज्ञासाविषयत्वयोग्यतारूपायाः आकांक्षायाः आमिक्षापदार्थक्षततया न तस्याः वैश्वदेवयागान्वयानुपपत्तिशङ्काऽपीति । वृत्तमन्यत्रातिदिशति- - उदाहरणान्तरेष्वपि दुर्बलत्वप्रयोजक आकांक्षाविरह एवमेव द्रष्टव्यः । अन्यान्युदाहरणानि उदाहरणान्तराणि, तेषु श्रुतिदुर्बलवाक्यातिरिक्तेषु । श्रुत्या- दिदुर्बललिङ्गादिष्वपि इत्यर्थः एवमेव आकांक्षाविरहो दुर्बलत्वप्रयोजको द्रष्टव्यः इत्यन्वयः । अयमभिप्राय:-श्रुति-लिङ्ग वाक्य-स्थान-प्रकरण-समाल्याख्यानि षट्- प्रमाणानि अङ्गाङ्गिमावनिर्णायकानि स्वीक्रियन्ते कर्ममीमांसकः । तत्र पूर्ववत्तिनां परवयंपेक्षया प्राबल्यमिति परवत्तिनां पूर्वपूर्वा पेक्षया दौर्बल्यमुच्यते तैः । परन्तु वेवान्तिमिः परवत्तिनां प्रमाणानां दौर्बल्ये प्रयोजकंन परवात्तत्वमात्र पेयते अपि तु आकांक्षाविरहः तत्प्रयोजक उच्यते । तत्र अतिप्रमाणापेक्षया वाक्यप्रमाणस्य दौर्बल्यप्रयोजकः आकांक्षाविरहः प्रदर्शितः सा वश्वदेव्यामिक्षेत्यत्र । यथाहि- वैश्वदेव्यामिक्षा इत्यत्र तद्धितप्रत्ययश्रवणरूपा श्रुतिः, वाजिभ्यो वाजिनमिति वाक्यम्, तत्र श्रुतिप्रमाणकामिक्षायां आकांक्षासत्त्वं न वाक्यप्रमाणके वाजिनपदार्थे इति आकांक्षाविरहप्रयुक्तमेव दौर्बल्यं फलतो वाक्यप्रमाणस्य सञ्जातम् । अत एव च न वाजिनान्वयो वैश्वदेवे अपि तु साकांक्षामिक्षान्वय एव । एवञ्च सति एवं यत्र श्रुति- लिङ्गाद्योः स्वस्वविषयस्थापनाय एकत्र सन्निपातः तत्र लिङ्गादिदौर्बल्यप्रयोजक: आकांक्षाविरह एवानुसन्धेयः । तथा हि-"ऐन्द्र्या गार्हपत्यमुपतिष्ठते" इति स्तवविधिः । ऐन्द्र या इत्यस्य इन्द्रसम्बन्धिन्या ऋचा इत्यर्थः । उपतिष्ठते इत्यस्य स्तवं कुर्यादित्यर्थः । तत्र कस्य स्तवमित्याकांक्षायां गार्हपत्यमित्यत्र द्वितियाविभक्ति- प्रत्ययश्रवणरूपा श्रुतिः गार्हपत्यनामकमग्निं स्तोतव्यं प्रतिपादयितुं प्रवर्तते । किन्तु परत: ऐन्द्र या इत्यत्र इन्द्रशब्द-प्रकाशनसामर्थ्यरूपरूढ़यात्मकं लिङ्ग इन्द्रं १५६ वेदान्तपरिभाषा। स्तोतव्यत्वेन प्रतिपादयितुं प्रवर्तते । सति चैवं तत्र श्रुतिप्रमाणप्राबल्येन लिङ्गस्य दौर्बल्येन गार्हपत्यस्तवस्यैव विधानमिति सर्वेषा सिद्धान्तः । लिङ्गदौर्बल्यप्रयोजका- काक्षायां श्रुतिज्ञापनद्वारा स्वार्थसाधकत्वेन प्रत्यक्षश्रुत्यपेक्षया विलम्बेन स्वार्थ- साधनप्रवृत्तत्वं दौर्बल्यप्रयोजकमित्यध्वरमीमांसकाः अस्माभिर्वेदान्तिमिस्तु तत्रापि लिङ्गदौर्बल्यप्रयोजकः आकांक्षाविरह एव वक्तव्यः अनुगमेन लाघवात् । कथं तत्राकाक्षाविरह इति चेत् इत्यम्-कर्ममीमांसकोक्तदिशा इन्द्रस्य स्तुत्यन्वयात- पूर्वमेव गार्हपत्यस्य तदन्वितत्वेन इन्द्रसमानजातीयगार्हपत्यान्वयबोधविरहसहकृत. देवतात्वरूपावच्छेदकाभावेन जिज्ञासाविषयत्वयोग्यतारूपाया आकांक्षायाः लिङ्गे विरह इति । योग्यतां प्रतिपादयति- - योग्यता च तात्पर्यविषयसंसर्गाबाधः । तात्पर्यविषयो यः संसंग: तस्याबाधः = बाधाभावः । तात्पर्य वक्तुः । संसर्गः एकपदार्थप्रतियोगिकः अपरपदार्थानुयोगिकः । बाधः - अभावज्ञानम् । तथा च वक्तृतात्पर्यविषयक-पदार्थप्रतियोगिकापरपदार्थानुयोगिकसंसर्गज्ञानामावःश्रोतृनिष्ठो योग्यतेति फलितार्थः । नीलोत्पलमित्यादिवाक्यस्थले "नीलप्रतियोगिकाभेदसंसर्गा- भाववदुत्पलम्" इति ज्ञानाभावरूपयोग्यतासत्त्वे सम्भवति बोधः श्रोतुः । असत्त्वे च न भवतीत्यन्वयव्यतिरेकाभ्याम् तस्याः कारणत्वमभ्युपगम्यते । । योग्यतायाः कारणत्वानुपगमे दोषं सूचयति- - अग्निना सिञ्चेदित्यादी तादृशसंसर्गबाधात् । अग्निनेत्यत्र तृतीयायाः करणत्वार्थकतया अग्निकरणकत्वप्रतियोगिकः सेचनानु- योगिकः संसर्गः तादृशसंसर्गः, तस्य बाधात् = अभावज्ञानात् इत्यर्थः । ज्ञानाकार- स्तु सेचनं न वह्निकरणताकमित्याकारं। बाधादित्यनन्तरं न बोधापत्तिरिति शेषः । तथा च निरुक्तयोग्यतायाः कारणत्वानभ्युपगमे तत्र-शाब्दबोधापत्तिः स्यादिति भावः । ननु निरुक्तयोग्यतायाः शाब्दबोधकरणत्वाभ्युपगमे " प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्" इत्यत्र शाब्दबोधानुपपत्तिः। एतद्वाक्यस्य सा प्रजापतिदेवता आत्मनः आगमपरिच्छेदः । १५७ = स्वस्य वपा = उदखिदत् -उत्पाटितवती" इति बाधिर्ताथकत्वेन स्वकीय- वपाप्रतियोगिकोत्पाटनानुयोगिकसंसंगस्य बाधितत्वेन संसर्गाबाधाभावात् इत्याशङ्का- निरासायाह- - स प्रजापतिपतिरात्मनो वपामुदखिददित्यादावपि तात्पर्यविषय- भूत-पशुप्राशस्त्याबाधात् योग्यता। । । स प्रजापतिरितिवाक्यस्य लक्षणया प्रजापतिदेवताकः तूवरपशुः प्रशस्त इत्यर्थः । तात्पर्यविषयभूतं यत् पशुप्राशस्त्यं तस्याबाधात् - तद्वाधाभावात् इति तात्पर्यार्थः । योग्यता इत्यनन्तरं अस्त्येवेति शेषः । अयमर्थः-तात्पर्यविषयभूत एवार्थों वाक्यार्थः तात्पर्यविषयोऽर्थस्तु पशुप्राशस्त्यम् । तस्य च न बाधितत्वम्, इति पशुप्रतियोगिक- प्राशस्त्यानुयोगिकसंसर्गस्याबाधितत्वेन नोक्तयोग्यतायाः अभावमूलकशाब्दबोधानु- पपत्तिः इति । नन्वेवमपि तत्त्वमस्यादिवाक्यस्थले शाब्दबोधानुपपत्तिः । सर्वज्ञत्वविशिष्ट- चैतन्यात्मकतत्पदार्थाल्पज्ञत्वविशिष्टचैतन्यात्मक-त्वंपदार्थयोरभेदसंसर्गस्य बाधितत्वेन ससर्गाबाधरूपायाः योग्यतायाः अभावात्' इत्याशङ्का निराकरोति- - तत्त्वमस्यादिवाक्येष्वपि वाच्याभेदबाधेऽपि लक्ष्यस्वरूपाभेदेऽबाधात योग्यता। वाच्ययोः सर्वज्ञत्वविशिष्टचैतन्ययाल्पात्वविशिष्टचैतन्ययोः यः अभेदः तस्य बाधे- ऽपि = लक्ष्यं यत् स्वरूपं स्वरूपचैतन्यं, तस्याभेदे बाधाभावात् इत्यर्थः। अयमभिप्राय:- तत्त्वमस्यादिमहावाक्यस्थले न सर्वज्ञत्वविशिष्टचतम्याल्पज्ञत्वविशिष्टतन्ययोर- भेदसंसों बोधविषयत्वेन तात्पर्यविषयः, अपि तु अखण्डचैतन्यमभिन्नम् । अन्यथा बोधस्य तस्य सविकल्पकत्वापत्तेः । तादृशस्य च तात्पर्यविषयस्याबाधितत्वेन बाधाभावरूपायाः योग्यतायाः सत्वेन शाब्दबोषाः पपत्तेरपर्यनुयोज्यत्वात् । न चैवमप्यनुपपत्तिस्तदवस्था । एकस्याभिन्नचैतन्यस्याबाधितत्वेऽपि संसर्गस्य बाधित- त्वात् संसर्गभानस्य पदार्थभेदभाननियतत्वेन तत्र चाभिन्नचैतन्यस्यैव तात्पर्यविषयार्थत्वे १५८ वेदान्तपरिभाषा। पदार्थद्वयस्यातथात्वेन संसर्गस्याप्यतथात्वात् इति चेत् संसर्गपदस्य तत्सम्भव- स्थलाभिप्रायेणोक्त : तात्पर्यविपयाबाधस्यैव वस्तुतो योग्यतालक्षणत्वात् इति । आसात्ति निर्वक्ति - आसत्तिश्चाव्यवधानेन पदजन्य-पदार्थोपस्थितिः । अव्यवधानेनेत्यस्योपस्थितावन्वयः एकपदजन्यपदार्थोपस्थित्यव्यवहितोत्तर- पदजन्यपदार्थोपस्थितिरित्यर्थः पदजन्ययोः पदार्थोपस्थित्योरव्यवधानमिति सरलार्थः । एतदकारणत्वे अद्योक्तनीलपदार्थनील-परदिनोक्तोत्पलपदार्थोत्पलयोरप्य- न्वयबोधापत्ति: स्यात् । एतत्कारणत्वे च नापत्ति. पदार्थोपस्थित्यो: अव्यवधानरूपायाः आसत्तरभावात् । उपस्थिती पदजन्यत्वविशेषणस्य कृत्यमाह- मानान्तरोपस्थापितपदार्थस्यान्वयबोधाभावात् पदजन्येति । अन्यन्मानं मानान्तरं शब्दातिरिक्तप्रमाणं तेनोपस्थापितः = स्मारितो यः पदार्थः = वस्तु, तस्य योऽन्वयबोधः = शाब्दबोधः तदभावादित्यर्थः । अयं भाव:- यद्यासात्तघटकोपरितो पदजन्यत्वं न दीयते तदा चक्षुषा समुपस्थापितानां घट- पटादीनामपि शाब्दबोधापत्ति-प्रसङ्गः । न चोपस्थितिरिति वाच्यम् उद्घोषकान्त- रोपस्थापितपदार्थबोधापत्तेदुरितापत्तरिति पदजन्यत्वं च पदवृत्तिज्ञान- जन्यत्वम् । अन्यथा एकसम्बन्धिज्ञानमपरसम्बन्धिनं स्मारयतीति नियमात् घटपदात् समवायसम्बन्धेनाकाशोपस्थित्या घटमानयेत्यादी आकाशस्यापि शाब्दबोधविषय- तापत्तः। ननु यत्र वक्त्रा द्वारकमकपिधानबोधनेच्छया "द्वारम्" एतावन्मात्रमुक्तं तत्र श्रोतुः पिधानरूपाध्याहारेण द्वारकमकपिधानबोधस्यानुभविकत्वेन उपस्थिती पदजन्यत्वनियमो व्यभिचरितः । इत्यत आह- अत एवाश्रुततत्तत्पदस्थले तत्तत्पदाध्याहारो द्वारमित्यादौ ।
आगमपरिच्छेदः । १५९ तत्र। अत एव = मानान्तरोपस्थितपदार्थस्य शाब्दबोधापत्तेरेव । अश्रुतं तत्तत्पदं यत्र स्थले तत्तत्पदं विधेहीत्यादि। अयं भाव:-अर्थाध्याहारमात्रेण न शाब्दबोधो भवति किन्तु शब्दाध्यार: कृत्वैव । शाब्दोपयोग्युपस्थितिगतपदजन्यत्वनिवेश- विगमप्रयुक्तलाघवात् यदि तथाभ्युपगमः स्यात्, तदा मानान्तराद्युपस्थापितानामपि पदार्थानां शाब्दबोधापत्तिरुक्ता दुनिवारा स्यात् इति । वैदिकपदाध्याहारस्थलमाह- अत एव ईषे त्वेत्यादौ छिनीति पदाध्याहारः । अत एवेत्यस्यार्थः पूर्ववत् । ईषाच्छेदनाङ्गभूतेषेत्येति मन्त्रार्थबोधोऽपि श्रोतु: छिनीति पदाध्याहारपूर्वक एव भवति । अन्यथाभ्युपगमे पूर्वोक्तदोषतादवस्थ्या- पातादिति भावः । ननु प्रोक्तस्थलयोः पदाध्याहारो भवति न वेति सन्देह एव, विप्रतिपत्तरित्यत आह- अत एव विकृतिषु सूर्याय जुष्टं निर्वपामीति पदप्रयोगः । - अत एव अनुक्ततत्तत्पदस्थले शब्दाध्याहारादेव । विकृतिषु = समग्राङ्गो- पदेशरहितेषु यागेषु । निर्वपामीति पदप्रयोगः = निर्वपामीत्यत्र सूर्यायेति पदस्यापि प्रयोगः । अयं भावः = प्रकृतियागे "भग्नये जुष्टं निर्वपामी"ति मन्त्रस्य यागाङ्गता भवति । प्रकृतिबद्विकृतिः कर्तव्येत्यतिदेशेन, सौर्यनामके विकृतियागे तु प्रोक्तमन्त्रस्याङ्गतायां प्राप्तायां "अग्नये" इति पदस्थाने सूर्यायेति पदं योजयित्वा "सूर्याय जुष्टं निर्वपामी"ति मन्त्रस्म भवत्यङ्गत्वेन प्रयोगः । यदि अर्थस्मृतेरेव महत्त्वं स्यात् तदा तत्रापि सूर्यस्मृत्यैव कार्यसम्पत्त्या सूर्यायति पवप्रयोगस्य किमपि प्रयोजनं न स्यात् इति । न चेदं वक्तव्यं कर्मणः साङ्गतार्थ प्रोक्तस्थले स्यापेक्षा, शाब्दस्थले पदस्य न सप्रयोजनतेति । तथा सति प्रोक्तापत्तनिवारता- पातात् । भवतु प्रयोग- ननु पदजन्यपदार्थोपस्थितिरासत्तिरित्युक्तं तत्र कि नाम पदार्थत्वम् ? कति- विधत्वं च तस्य ? इत्याशङ्कापरिहाराय आह- १६० वेदान्तपरिभाषा। पदार्थश्च द्विविधः शक्यो लक्ष्यश्च । प्रथमश्चस्त्वर्थः । द्वितीय: समुच्चये । तथा च शक्यलक्ष्यभेदेन पदार्थस्य द्वैविध्यात् शक्यलक्ष्यान्यतरत्वं पदार्थत्वमिति तल्लक्षणं द्योतितम् । न च व्यङ्ग य- पदार्थासंग्रहः, व्यञ्जनावृत्तेरस्वीकारात् व्यञ्जकपदाभावेन व्यङ्ग यार्थान्तराभावात् । न च व्यञ्जनानुपगमे "गङ गायां घोष." इत्यत्र लक्षणया तीरपदार्थोपस्थित्या "गङ्गातीरे धोषः" इति बोधानन्तरं सर्वानुभवसिद्धो घोषे शैत्यबोधो न स्यात् । न स्याच्च पावनत्वानुभव इति वाच्यम् । अनुमानेन तत्सम्पत्तः । तथा "अयं घोषः शैत्यपावनत्ववान् गङ्गातीरवृत्तित्वात्" इति । अन्वयानवतारे तु अर्थापत्त्यातत्सम्पत्ति- रवसेया। ननु शक्यत्वं शक्तियोगित्वम् । तत्र का नाम शक्तिः ? इत्याकांक्षायामाह- तत्र शक्तिर्नाम पदानामर्थेषु मुख्या वृत्तिः । तत्रेत्यत्र घटकत्वं सप्तम्यर्थः । शक्यत्वं च तत्पदार्थः । तथा च शक्यत्वघटिकेति तदर्थः। अर्थेषु पदानां मुख्या वृत्तिः शक्तिरित्यन्वयः । अर्थेषु इत्यत्र सप्तम्यर्थों वृत्तित्वम् । पदानामित्यत्र षष्ठ्यर्थः प्रतियोगिकत्वम् । तथा चार्थवृत्तिः पदप्रति- योगिका मुख्या वृत्तिः शक्तिरित्यर्थः । वृत्तिरित्यस्योपस्थापकः सम्बन्ध इत्यर्थः । मुख्यत्वञ्च वृत्तौ शक्यतोषिकाला । तेन लक्षणानिराकरणम् । तस्याः शक्यसम्बन्यत्वेन शक्यप्रतियोगिकत्वात् । तथा चार्थनिष्ठः पदप्रतियोगिकः शक्य- सम्बन्धभिन्नः पदार्थोपस्थापकः सम्बन्धः शक्तिरिति तदर्थः । लक्षणन्तु शक्याप्रति- योगिकपदार्थोपस्थापकसम्बन्धत्वमात्रम् । अधिकन्तु वस्तुस्थितिज्ञापनाय । लक्ष्ये लक्षणसमन्वयं दर्शयति- यथा घटपदस्य पृथुबुध्नोदराद्याकृतिविशिष्टे वस्तुविशेषे शक्तिः । - - पृथू यो बुध्नोदरी, तदाद्या या आकृतिः आकार:, तद्विशिष्टे तद्युक्ते। बुध्नो मूलम् । वस्तुविशेषे = विलक्षणवस्तुनि । अयं भाव:-श्रोतृविशेषः घटपदं श्रुत्वा घटं स्मरति। तच्च घटस्मरणं घटे घटपदशक्त यनभ्युपगमे नावकल्पते । अतः घटपदस्य निरुक्तलक्षणा शक्तिः स्वीकार्या, इति ।
आगमपरिच्छेदः। ननु शक्तिरियं न्यायवैशेषिकमत इव सङ्केतरूपा वा, कर्ममीमांसकमत इव पदार्थान्तरं वेति जिज्ञासायामाह- - सा च शक्ति: पदार्थान्तरम् । सा = अव्यवहितपूर्वोक्ता । पदार्थान्तरं स्वतन्त्रपदार्थभूता । न तु न्यायादिमत इव इच्छादिरूपा । अपि तु कर्ममीमांसादर्शन इव पदार्थान्तररूपवेति भावः। - ननु पदार्थान्तरतायां गौरवात् कुतो न सङ्केतरूपतैवेति शङ्कायामाह- सिद्धान्ते कार्यानुकूलशक्तिमात्रस्यैव पदार्थान्तरत्वात् । सिद्धान्ते = वेदान्तसिद्धान्ते । कार्य प्रति अनुकूला या शक्तिः तन्मात्रस्यैवे- त्यर्थः । मात्रपदमशेषतार्थकं । तथा च कार्यानुकूला या अशेषशक्तिरित्यर्थः । आनुकूल्यं जनकतावच्छेदकत्वरूपम्। पदार्थान्तरत्वात् स्वतन्त्रपदार्थत्वात् । अय भाव:-कर्ममीमांसकमत इव बेदान्तमतेऽपि कार्यमा प्रत्यनुकूलशक्तिमत्वेनैव लाघवात् कारणत्वमिति शक्तेर्जनकतावच्छेदकत्वम् । तथा च मवावी सदजनक- तावच्छेदकशक्तेरिव पदेऽपि बोषजनकतावच्छेदकशक्तिरवश्यस्वीकर्तव्यतया सकताविरूपशक्त्यन्तरस्य कल्पनानर्थक्यात् गौरवपराहतत्वात् इति, अस्मिन्नेव मते लाघवम् । किं च अस्मात्पदादयमों बोद्धव्य इति सङ्कतस्य शक्तित्वे गङ्गायां घोष इत्यत्र गंगापदात् तीरं बोद्धव्यमिति सङ्कतमादाय तीरस्य गङ्गापदवाच्यत्वापत्तिः । यदीश्वरसङ्केतः शक्तिः, ईश्वरस्य न तादृशः सङ्केत इत्युच्यते तदा ईश्वरमनम्यु- पगच्छतां पदार्थबोधानुपपत्तिः । सादिदेवदत्तादिवाच्यदेवदत्तादावव्याप्तिश्च । तत्र "देवदत्तपदाद्देवदत्तो बोद्धव्यः" इत्याकारिकायाः भगवदिच्छायाः अभावात् न च परिभाषया तत्र बोध इति वाच्यम् । तदधिककल्पनया गौरवापत्तेः । न च सङ्कतेऽनादित्वं विशेषणं देयं तथा च न लक्ष्येऽतिव्याप्तिः । स्वारसिकलक्ष्ये ततोऽतिव्याप्तिवारणसम्भवेऽपि निरूढलक्ष्येऽतिव्याप्तेर्दुरित्वात् । तत्र तादृश- सङ्केतस्यानादित्वात् । "अस्माच्छब्दादयमर्थों बोध्यः" इति सकेतस्य शक्तित्वं तु कैमुतिकन्यायपराहतम् । वाक्यार्थस्यापि वाच्यत्वापत्तेः । तदाकारवक्तृतात्पर्यस्यादि तादृशसङ्कतत्वात् । सकतस्य शक्तित्वे तस्यान्तःकरणनिष्ठतया असम्भवोऽतिव्या- १६२ वेदान्तपरिभाषा। प्तिश्चेति तु न सदुत्तरम् । विशेष्यतासम्बन्धस्य तैः तदाश्रयतानियामकत्वाङ्गीकारेण तषणासम्भवात्। ननु बोधजनकतावच्छेदिकाया: शक्तेः शब्दगतत्वेन अर्थनिष्ठत्वोक्त्य- सङ्गतिरिति चेत् पदनिरूपताया एव शक्तेः अर्थे अनुपयोगितया विद्यमानत्वेन सम्बन्धभेदेन एकस्या एव शक्तेः वाच्यत्ववाचकत्वोभयरूपत्वसम्भवात् । इत्यल- मधिकेन । ननु किम्प्रमाणसिद्धा सा शक्तिरित्याकाक्षायामाह- सा च तत्तत्पदजन्यपदार्थज्ञानरूपकार्यानुमेया। सा = पदनिष्ठा शक्तिः । तत्तत्पदजन्यं यत्पदार्थज्ञानं तद्र पं यत्कार्य तदनुमेया इत्यर्थः । “पदं अर्थज्ञानजनकतावच्छेदकवत् अर्थज्ञानजनकत्वात् अन्तःकरणवत्" इत्याद्यनुमानाकारोऽवसेय: । यदि च पदार्थज्ञानरूपकार्यानुमेयेति लेख विरोध इति विभाव्यते तदा जनकत्वं हेतुतावच्छेदकसम्बन्धीकृत्य पदार्थज्ञानस्यैव हेतुत्वं ग्राह्यम्। शक्यत्वं परिचाययति- - शालिवियत्वं शक्यत्वम् । - पदार्था- तादृशी या शक्तिः तद्विषयत्वं = तदाश्रयत्वमित्यर्थः । तादृशी न्तररूपा उपस्थितिजनकतावच्छेदकरूपा वा। जनकतावच्छेदकतावच्छेदकसम्बन्धी निरूपकत्वम् । ननु कस्य घटादिपदशक्यत्वम् ? जात्याकृतिव्यक्तीनाम् त्रयाणां द्वयोर्वा एकस्य वा ? अन्त्येऽपि केवलं जातेः आकृतेर्व्यक्तेर्वा ? इति जिज्ञासानिरासायाह- - तच्च जातेरेव। तच्च = शक्यत्वं च । एवकारेण जात्यन्यस्य शक्यत्वव्यवच्छेदः । ननु ब्रह्म- भिन्ननित्यानभ्युपगमेन समवायासिन या च नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वरूपपर- लक्षणलक्ष्यभूतायाः जातेरत्र सिद्धान्तेऽनभ्युपगमात् कथं जातेरेवेति लिखनं सङ्गच्छते मागमपरिच्छेदः। इति चेत्सत्यम् । प्रकृते जातिपदस्य सामान्यपरत्वाभ्युपगमात् । अत एव न गगन- त्वादेर्गगनपदवाच्यत्वानुपपत्तिः । न चैवमप्यसङ्गतिः गगनत्वादेरेकव्यक्तिकत्वेन सामान्यत्वस्याप्यभावात् । समानानां भावः सामान्यमिति व्याख्यया अनेकवृत्तिधर्म- स्यैव सामान्यत्वात् गगनत्वादेस्तथात्वाभावात् इति वाच्यम् । जातिपदस्य प्रकृते प्रवृत्तिनिमित्तमात्रार्थकत्वात् । न च तथाप्यनुपपन्न प्रतिनिमित्तस्य शक्यता- वच्छेदकरूपत्वेन शक्यत्वासम्भवादिति वाच्यम् । परमते तथात्वेऽपि मतेऽस्मिन् शक्यस्यैव प्रवृत्तिनिमित्तत्वात् । प्रवृत्तिनिमित्ते कञ्चिच्छक्यत्वस्य परैरप्युपगमात् । अन्यथा "वाच्यत्वे सति वाच्यवृत्तित्वे सति वाच्योपस्थितीयप्रकारसाश्रयत्वमि" ति प्रवृत्तिनिमित्तलक्षणे वाच्यत्वविशेषणदानं तेषामसङ्गतं स्यात् इति । एवपदव्यवच्छेद्य स्पष्टयति- न व्यक्तौ। शक्यत्वं न व्यवती इत्यर्थः । व्यक्तिपदञ्चात्राकृतेरप्युपलक्षकम् तेन नैवकारा- सङ्गतिः । एवकारस्य स्वसमभिव्याहृतपदार्थान्यमात्रव्यवच्छेदकत्वव्युत्पत्तेः । कुतो न व्यक्ती शक्तिरुपेयते ? इत्याशङ्कापरिहाराय हेतुमाह- व्यक्तीनामानन्त्येन कल्पनागौरवात् । व्यक्तीनाम् = गवादिधर्मिणाम् । आनन्त्येन = असंख्यत्वेन । कल्पना- गौरवात् अनन्तशक्तिकल्पनागौरवप्रसङ्गात् । अयम्भावः-यदि गवाविपदानां गोत्वादिसामान्ये शक्तिमनङ्गीकृत्य गवादिव्यक्तावेव शक्तिरङ्गीकृता स्यात् तदा व्यक्तिमेदात् शक्तिभेदेन असंख्यगवादिव्यक्तिनिष्ठ स्यातास्तीवारीपायो कल्पनागौरवं स्यात् । सकलगवाधनुगतगोत्वादी शक्तिस्वीकारे तुन व्यक्तिभेद- प्रयुक्तशक्तिमेवस्वीकारमूलककल्पनागौरवावकाशः । यदि शक्त्यानन्त्यमयात् यत्किञ्चिद् गवानिध्यातरी एव शक्तिरङ्गीकृता स्यात् तवा गवादिपदात सकल- गवादिबोधानुपपत्तिरापतिता स्यात् । न चेष्टा सेति शक्यते वक्तुमनुभवविरोधात् इति । शङ्कते- - कथं तर्हि गवादिपदा व्यक्तिभानम् ? तहिं व्यक्तिशक्यत्यनुपगमे । व्यक्तिमानम् = गवादिवस्तुभानम् । अर्थ भावः-शाब्दबोधविषयत्वे वाच्यत्वस्य प्रयोजकता ध्र वमुपेया । अन्यथा घटपदात् १६४ वेदान्तपरिभाषा। पटबोधस्य दुरितापत्त': । सति चैवं व्यक्तिशक्त्यनभ्युपगमे वाच्यतास्वरूपप्रयोजका- भावेन बोधविषयताऽपि व्यक्तेः पराङ मुखी स्यात् । न चेष्टत्वं शक्यते वक्तुम्, 'गां दद्यादित्यादौ" गोव्यक्तिकर्मकदानविधेयतायाः सर्वानुभवसिद्धत्वात् इति । समाधत्त- इति चेन्न । जातेर्व्यक्तिसमानसम्वित्संवेद्यत्वात् । समाना या सम्वित् तत्सम्वेद्यत्वादित्यर्थः । समानत्वं एकत्वं अनयोः समानाभासे- तिवत्, सम्वेद्यत्वं विषयत्वं । सम्वित्पद ज्ञानार्थकम् । तथा चैकज्ञानविषयत्वात् इत्यर्थः । अयं भावः-अग्नेरौष्ण्यमिव गोत्वाविसामान्यानामयं स्वभावो यत् व्यक्तिधर्मतयव ते बोषविषयतां भजन्ते न स्वातन्त्र्येणेति, यदा पदाज्जातिमान तदा नियमतो व्यक्तेरपि भानमिति नानुपपत्तिय॑क्तो बोधविषयतायाः । एतेन जातेरिति हेतुग्रन्थासङ्गति: फलत: जातो व्यक्तिज्ञानविषयत्वानुपपत्तरेव पूर्वपक्षत्वा- दिति पराहतम् तस्य व्यक्तिभाननियामकजातिगतस्वभावास्तित्वप्रदर्शनपरत्वात् । शक्ति विध्यस्वीकारेण उत्तरान्तरमाह- यद्वा गवादिपदानां व्यक्तौ शक्तिः स्वरूपसती न तु ज्ञाता। जातो तु सा ज्ञाता। व्यक्ती गवादिपदानां स्वरूपसती शक्तिः ज्ञाता तु नेति सम्बन्धः । अयं भाव:- पदशक्तिद्विविधा ज्ञाता अज्ञाता च । या पदार्थबोषजनकोपस्थितिजनविषया सा ज्ञाता । या च निरुक्तज्ञानाविषयाऽपि दाहे अग्निगतोष्ण्यमिव स्वरूपतः पदार्थोपस्थि- त्यनुकूला सा अज्ञाता । सति चैवं व्यक्ती शक्त्यभ्युपगमेऽपि सा द्वितीयैव न तु प्रथमा। अतः जातिगताया एव शक्तेर्ज्ञानं शाब्दबोधानुकूलं न तु व्यक्तिनिष्ठशक्तेरिति । एतत्कल्पफलितार्थमाह- न तु व्यक्त्यंशे शक्तिज्ञानं कारणम् । गौरवात् । न तु कारणमिति सम्बन्धः । अयं भावः-कथंचित् व्यक्तौ शक्तिस्वीकारागृहेऽपि जातिगतप-efinxxस्य कारणतामभ्युपेत्य बोधान्न कार्यनिर्वाहे गौरवापादकस्य व्याक्तिजनहेतुली सस्य सर्वथा प्रयोजनविरह एव ।
आगमपरिच्छेदः । १६५ ननु यदभावप्रयुक्तो यत्कार्यविरहः तस्य तत्कार्य प्रति हेतुत्वमावश्यकम् । सति चैवं व्यक्तिशक्तिज्ञानं विना शाब्दबोधाभावे, व्यक्तिशक्तिज्ञानस्यापि शाब्दबोध- कारणत्वं पदार्थोपस्थितिद्वारकमभ्युपगन्तव्यमेवेति कथं व्यक्तिशक्तेरज्ञातत्वमित्यत आह- जातिशक्तिज्ञाने सति व्यक्तिशक्तिज्ञानं विना व्यक्तिधीविलम्बा- भावाच्च । जाती या शक्तिः तस्याः ज्ञाने सति । व्यक्ती या शक्तिः तस्याः ज्ञानं विना। व्यक्तेर्या धी: शाब्दबोध: तत्र यो विलम्ब: व्यक्तिशक्तिज्ञानापेक्षित्वं तदभावा- दित्यर्थः । अयं माव:-यदि गोत्वं गोपाल जातिशक्तिज्ञानसत्वेऽपि "गोर्गोपदशक्या" इति व्यक्तिशक्तिज्ञानामावे "गौः" इति शाब्दबोधाभावः सर्वानु- भवसिद्धः तहि स्यादेव व्यक्तावपि शक्तिः जाता। तादृशशक्तिज्ञानं च शाब्दबोध- कारणम् । स एव तु नास्ति, इति कथं कार्यव्यतिरेकप्रयोजकव्यतिरेकप्रतियोगित्व- रूपं कारणत्वं गवादिव्यक्तिशक्तिज्ञानस्य स्वीकार्यम् ? कथं च स्वीकार्या व्यक्ति- शक्तेतिता? इति। . ननु व्यक्तिशक्तिख़ता शक्तित्वात् जातिशक्तिवत् इत्यनुमानेन व्यक्तिशक्ते- तित्वमनुमेयमित्याशङ क्याह- अत एव न्यायमते अन्वये शक्तिः स्वरूपसतीति सिद्धान्तः । अत एव = शक्तित्वस्य ज्ञातत्वव्यभिचारादेव । न्यायमते = गौतममते । अपिना - वैशेषिकपरिग्रहः । अन्वये = शक्तिभास्यसम्बन्धे । स्वरूपसती = अज्ञाता । सिद्धान्तः अभ्युपगमः । अयं भावः-या या शक्तिः सा सा शातेति न शक्यतेऽभ्युपगन्तुम् गो गोत्वादेः समवायादिसम्बन्धे व्यभिचारात् । न खलु तत्र शक्तिरेव नास्तीति शक्यते वक्तुं ताकिक: "जात्याकृतिव्यक्तयः पदार्थाः" इति सूत्रेण सम्बन्धेऽपि शक्तिस्वीकारात् । आकृतिपदस्य सम्बन्धपरत्वात् । न च तत्रापि ज्ञातव सेति शक्यते वक्तुम् गोपदं गोत्वावच्छिन्ने शक्तमिति जाnिind. तैः शाब्दबोधस्वीकारात् । तथा च समवायादौ विद्यमानायां शक्तो व्यमिचारिणा शक्तित्वहेतुना नाशंकालेशोऽपि व्यक्तिश तेतित्वसाधनस्यति । यदि चाकृतिर्न गो- १६६ वेदान्तपरिभाषा। , गोत्वसमवायः अपि तु अवयवसंयोगः तदा तत्रैव व्यभिचारः । वस्तुतस्तु गुणकर्मादिपदस्थले नावयवसंयोगस्याकृतिवाच्यत्वसम्भवः, इति प्रोक्तसूत्रस्थाकृति- शब्दस्य शक्तिभास्यसम्बन्धमात्रार्थकत्वं वक्तव्यम् । तथा च द्रव्यादिपदस्थले द्रव्य- द्रव्यत्वादिसमवायावयवद्वयसयोगयोरुभयो: आकृतिशब्दवाच्यता। गुणादिपदस्थले तु समवायमात्र सेति तत्र तत्र प्रोक्तनियमस्य व्यभिचारो बोध्यः । ननु मास्तु व्यक्तौ शक्तिख़ता। तावताऽपि शक्त्याश्रयत्वरूपं शक्यत्वं व्यक्ते- दुरिमिति कथ जातावेव वाच्यत्वमिति डिण्डिमघोष: ? स्वरूपसत्त्याः शक्तेः त्वयाऽपि व्यक्ती स्वीकारात् इत्यत आह- ज्ञायमानशक्तिविषयत्वमेव वाच्यत्वमिति व्यक्तिरेव वाच्या । ज्ञायमाना या शक्तिः तद्विषयत्वं = तदाश्रयत्वम् । अवाच्या वाच्यभिन्ना । अयं भावः-बहि शक्त्याश्रयत्वं वाच्यत्वमिति तल्लक्षणमुच्यतेऽस्माभिः, येनादाय शक्ति स्वरूपसती तवाश्रयत्वेनापन्नं स्यात् वाच्यत्वं गवादिव्यक्तेः। अपि तु ज्ञान- विषयशक्त्याश्रयत्वम् । तन्नास्ति व्यक्ताविति न दोष इति । न च स्वरूपसत्यामपि शक्ती अनुमितिशाब्दादिविषयत्वमादाय ज्ञातत्वमस्त्येवेति शङ्कनीयम् । ज्ञानविषय- तेत्यत्र ज्ञानपदेन शाब्दबोधजनकज्ञानस्य विवक्षितत्वात् । न चैवमपि "स्वरूपसती शक्तिः" इति वाक्यजन्योपस्थितिमादाय दोषतावदवस्थ्यम् । पदार्थबोधपदेन शक्ति- पदार्थातिरिक्तपदार्थबोधस्य विवक्षितत्वात् । सामान्यतः शक्त्याश्रयत्वमेव शक्यत्वमिति तन्निर्वचनमनुसृत्यापि न व्यक्तेर्वाच्यते- त्यभिप्रायेणाह- अथवा व्यक्तेलक्षणया लाभः । व्यक्तेः % गवादेः । लक्षणया = लक्षणानामकवृत्त्या लाभः । - शाब्दबोधा- नुकूलपदार्थोपस्थितिः । अयं भाव:-यदि न ज्ञानशक्त्याश्रयत्वं शक्यत्वमपि तु शक्त्या- श्रयत्वमात्रम्, तावतापि न व्यक्तेर्वाच्यतापत्तिः येन जातिशक्तिवाद: स्यानिराकृतः । शक्त्यनभ्युपगमे कथं "गां दद्यात्" इत्यादौ गवादिव्यक्तरुपस्थितिशाब्दबोधौ ? इति चेत् न शानद्वारकया शक्त्या, अपि तु तथाभूतया लक्षणया । तथा च स्वरूपसत्त्या अपि शक्तेर्व्यक्तावनभ्युपगमेन न तदाश्रयत्वरूपवाच्यत्वस्यापत्यवकाश- स्तत्रेति ।
आगमपरिच्छेदः । १६७ दृष्टान्तप्रदर्शनेन व्यक्ती लक्षणामुपपादयति- यथा नीलो घट इत्यत्र नीलशब्दस्य नीलगुणविशिष्टे लक्षणा। तथा जातिवाचकस्य तद्विशिष्टे लक्षणा ! इत्यत्र इति वाक्यस्थले । नीलो गुण: नीलरूपम् । तद्विशिष्टे तदाश्रये घटादौ । जातिवाचकस्य = जातिशक्तिकस्य । तादृशशक्तिनिरूपकस्येत्यर्थः । पदस्येति शेषः । अयं माव:-नीलो घट इति वाक्यं श्रुत्वा श्रोता नीलामिन्नो घट इति बोधं करोति यच्च नोपपद्यते नीलघटशक्त्याश्रयणेन । नीलपदस्य नीलरूपा- त्मकगुण एव शक्तया तेन सह च घटस्य तद्धर्मिणोऽभेदासम्भवात् । अतः श्रोता लक्षणानामिकां वृत्तिमपाश्रित्य नीलपदेन नीलरूपगुणयुक्तं घटं स्मृत्वा तवभिन्नं घटं जानाति । तथा गां दद्यादित्यादिस्थलेपि गोपवशक्तेः गोत्वजातादेव विद्यमानत्वेऽपि शक्यभूतगोत्वजात्याश्रयतया लक्षणावृत्या गोव्यक्ति स्मृत्वा गोकर्मकदानक्रियामर्हति ज्ञातुमिति नाङ्गीकार्या स्वरूपसत्यापि पवशक्तिः गवादिव्यक्ती। तथा च न शक्त्याश्रयत्वमूलको व्यक्तौ वाच्यत्वापत्तिः इति । इदं च क्वचित् कोशस्थशक्त्यग्राहकतामुपगम्य । अन्यथा “गुणो शुक्लादयः पुसि गुणिलिङ्गास्तुतद्वती"तिकोशेन शक्त्यैव नीलपदात् तद्विशिष्टद्रव्योपस्थितिरिति नोदाहरणमिदम् । ननु लक्षणावृत्तिज्ञानाधीनैव गवादिव्यक्तयुपस्थितिः न गवादिव्यक्त्युपस्थितिः न शक्तिज्ञानाधीना इत्यत्र विनिगमकाभावेन कथं तत्र शक्त्यनाश्रयत्वनिश्चयः ? इत्यत आह- तदुक्तं अनन्यलभ्यः शब्दार्थः इति । अभियुक्तैरिति शिष्टेनोक्तमित्यस्य सम्बन्धोऽवसेयः । अन्यया = शक्तिभिन्नया वृत्त्या न लभ्यः = नोपास्थाप्यो यः सोनन्यलम्यः । एतादृश एव वस्तुविशेषः शब्दार्थः शब्दस्य वाच्यः । अर्थात् पदनिरूपितशक्त्याश्रयः इत्यर्थः । अयं भावः यत्र गौणोपायावलम्बनेन न कार्यसम्पादनं तत्रैव मुख्योपायावलम्बन- मिति सहन् । तथा च यदि गोण्या लक्षणावृत्त्यैव व्यक्तिवस्तूपस्थिति. शाब्दबोधनिर्वाहसम्भवः तदा कथं तत्र मुख्या शक्तिवृत्तिरङ्गीकार्येति । सति चैवं तस्याः शक्त्याश्रयत्वं येन सम्पद्यत तत्र वाच्यत्वम् । अवसरसङ्गत्या लक्ष्यपदार्थोऽधुना निरूप्य इति प्रतिजानीते- अथ लक्ष्यपदार्थों निरूप्यते ।
वेदान्तपरिभाषा । अथ- शक्यपदार्थनिरूपणानन्तरम् । निरूप्यते इत्यनन्तरं मयेति शेषः । तथा च मत्कर्तृ कजिज्ञासुबोधानुकूलव्यापारविषयः, इति तदर्थः । प्रतिज्ञानुरूपं लक्ष्यलक्षणमाह- तत्र लक्षणाविषयो लक्ष्यः । तत्र - - शक्यलक्ष्ययोः । यद्वा = प्रतिज्ञायां सत्याम् । लक्षणायाः विषयः आश्रयः । तथा च लक्षणाश्रयत्वं लक्ष्यत्वम् इति लक्ष्यलक्षणम् । लक्षणापदार्थः कः इति चेत् पदबोध्यसम्बन्धः । “गङ्गयां घोषः” इत्यत्र गङ्गापदबोध्यो भगीरथरथखातावच्छिन्नो जलप्रवाहः, तस्य सामीप्यनामक: सम्बन्धोऽस्ति तीरे, इति गङ्गापदस्य निरुक्तप्रवाहे शक्तिरिव तीरे लक्षणावृत्तिरस्ति । तत एव गङ्गा- पदश्रुत्या श्रोता स्वबोध्यप्रवाहसामीप्यसम्बन्धस्यानुयोगिनं तीरं स्मृत्वा गङ्गातीरे घोष इति बोधं करोति । ननु शक्यसम्बन्ध इत्यनुक्ता स्वबोध्यसम्बन्ध इत्युक्ती कि बीजमिति चेत् तथा सति अर्थवादवाक्यलक्ष्यार्थभूतयोः स्तुतिनिन्दयोरव्याप्त्या- पत्तः । वाक्यस्य कुत्रापि शक्त्यभावेन शक्यसम्बन्धरूपायाः लक्षणायाः निरूक्त- स्तुतिनिन्दयोरभावात् । वक्ष्यते चायमर्थः स्वयमपि ग्रन्थकृता । तथा च पदं लक्षक, अर्थों लक्ष्यः । पदं तु सुबन्तादिरूपमेव ग्राह्यन तु शक्तिनिरूपकं येन वाक्यस्य पदत्वानुपपत्त्या बोध्यत्वनिवेशेऽपि वाक्यार्थभूतयोः निन्दास्तुतयोरव्याप्ति- माशङ्कितं स्यात् । उद्दिष्टस्य लक्षणं लक्षितस्य विभागवचनमित्यभियुक्तोक्तिदिशा लक्षणाविभाग- माह- लक्षणा द्विविधा केवललक्षणा लक्षितलक्षणा चेति । द्विविधा = द्विप्रकारा । केवला लक्षणा केवललक्षणा। लक्षितस्य लक्षणा लक्षितलक्षणा। ननु किं नाम कैवल्यं लक्षणायाम् ? इत्याकांक्षायामाह- तत्र शक्यसाक्षात्सम्बन्धः केवललक्षणा, आगमपरिच्छेदः । १६९ तत्र=द्वर्योमध्ये । शक्यस्य साक्षात्सम्बन्धः शक्यसाक्षात्सम्बन्धः । सम्बन्ध साक्षात्त्वं च सम्बन्धान्तराप्रयोज्यत्वम् । तदेव सम्बन्धरूपायां लक्षणायां कैवल्यम् । शक्यपदमत्र पदबोध्यपरं बोध्यमिति प्रागेवोक्तमस्माभिः । उदाहरणेन लक्षणस्य समन्वयमुपदर्शयति- यथा "गङ्गायां घोष" इत्यत्र प्रवाहसाक्षात्सम्बन्धिनि तीरे गङ्गा- पदस्य केवललक्षणा। प्रवाहसाक्षात्सम्बन्धिनिः -प्रवाहस्य यः साक्षात्सम्बन्धः-सामीप्यसम्बन्धः तद्वति। इदं तीरे इत्यस्य विशेषणम् । अयं भावः-गङ्गापदस्य यः शक्यार्थःप्रवाहः तन्निरूपितः सामीप्यात्मकः सम्बन्धः तीरे विद्यते । अतः गङ्गापवस्य तोरे या लक्षणा सा भवति केवललक्षणा । सामीप्यस्य सम्बन्धान्तरागर्भशरीरतया सम्बन्धान्तरा- प्रयोज्यत्वरूपस्य साक्षात्वस्याक्षतत्वात् । लक्षितलक्षणामाह- यत्र शक्यपरम्परासम्बन्धेनान्तरप्रतीतिः तत्र लक्षितलक्षणा। यत्र यादृशस्थले । शक्यस्य बोध्यस्य यः परम्परासम्बन्धः, तेन, अर्थात् तदनुयोगितया। अर्थान्तरस्य = शक्यभिन्नार्थस्य ।प्रतीतिः बोधः । यत्र-ताशस्थले । तथा च स्वबोध्यनिरूपितपरम्परालम्बन्धः शब्दस्य अर्थनिष्ठा लक्षतिलक्षणा । सम्बन्धे परम्परात्वं च सम्बन्धान्तरप्रयोज्यत्वम् । उदाहरणमाह- - यथा द्विरेफपदस्य रेफद्वययुक्तभ्रमरपदघटितपरम्परासम्बन्धेन मधुकरे वृत्तिः । रेफद्वययुक्त यत् भ्रमरपदं, तद्धटितो य: परम्परासम्बन्धः तेन । युक्तत्वं घटितत्वम् । सम्बन्धे भ्रमरपदघटितत्वं तु भ्रमरपदवाच्यत्त्वरूपम् । सम्बन्धेनेत्यत्र तृतीयार्थोऽभेदः । वृत्तौ तदन्वयः । द्विरेफपदस्य स्ववाच्यरेफद्वयमापनापरव- सम्बन्धरूपावृत्तिः मधुकरपदार्थे तिष्ठति, सैव द्विरेफपदस्य लक्षितलक्षणा । द्विरेफपदेन लक्षितं यत् भ्रमरपदं, तस्य सम्बन्धरूपा या लक्षणा सा भ्रमरवस्तुन्यस्ति।
१७० वेदान्तपरिभाषा। उक्तस्य च सम्बन्धस्य सम्बन्धान्तरप्रयुक्तत्वात् परम्परात्वम् । वाच्यत्वादिसम्बन्धस्य तच्छरीरपातित्वात् । यद्वा पदान्तरघटितपदसम्बन्धत्वमेव परम्परासम्बन्धत्वम् । स्ववाच्यरेफद्वयघटितभ्रमरपदवाच्यत्वस्य द्विरेफातिरिक्तभ्रमरपदघटितत्वेन परम्परा- त्वम् । सामीप्यादेरतथात्वेन साक्षात्त्वम् । एतेन प्रवाहसामीप्यं तीरे प्रवाहसंयुक्तत्वं, तच्च संयोगसमवायित्वमिति समवायात्मकसम्बन्धान्तरप्रयुक्तत्वेन तस्यापि कुतो न परम्परासम्बन्धत्वाल्लक्षितलक्षणात्वमिति निरस्तम् । तस्य पदान्तरघटितत्वाभावात् इति । परत्वेताकल्पस्य क्षोदक्षमत्वं "सिंहो माणवकः" इत्यादेर्लक्षितलक्षणा- नुदाहरणत्वे । तत्त्वे तु पूर्वलक्षणस्यैव साधीयस्त्वम् । सामीप्यादेरखण्डधर्मतयव ससर्गताभ्युपगम इति न तत्र समवायप्रवेशमादायोक्तदोषावकाश इति । ननु वृत्तिविभागव्याघातः, सिंहो माणवक इत्यादी बोधसम्पादनाय गोण्या अप्यतिरिक्तवृत्तित्वाभ्युपगमावश्यकत्वात् । इत्यत आह- गौण्यपि लक्षितलक्षणव । एवकारेणातिरिक्तवृत्तित्वशङ्कानिरासः । सिंहपदलक्षितस्य क्रौर्यस्य स्वरूप- सम्बन्धात्मिकाया लक्षणायाः माणवके सत्त्वादिति भावः । हेतुमाह- सिंहशब्दवाच्यसम्बन्धिक्रौर्यादिसम्बन्धेन माणवकस्य प्रतीतेः । सिंहशब्दवाच्यो यः सिंहः, तत्सम्बन्धियत्क्रौर्यादि तत्सम्बन्धेन इत्यर्थः । माणवक: उपनीयमानो वटुः । अयं भाव:-"सिंहो माणवकः" इत्यत्र माणवके सिंहपदस्य लक्षितलक्षणात्मिकंव वृत्तिः । न गौणी नाम्नी काचनातिरिक्तवृत्तिः । लक्षितलक्षणायाः फलतः परम्परासम्बन्ध पतया कथं तत्सम्पत्तिस्तस्येति तु न शनीयम्, सिंहशब्दस्य, स्ववाच्यसिंहसम्बन्धिकीर्यानुयोगित्वरूपस्य परम्परा- सम्बन्धस्य माणवके सत्त्वात् । न च क्रौर्यस्य सिंहसामान्यतया सामान्यशक्तिवादि- वेदान्तिमते तत्र सिंहशब्दवाच्यत्वमेवास्तीति कथं तद्वाच्यसम्बन्धित्वमिति वाच्यम् । सिहगतक्रौर्यस्य माणवकानिष्ठत्वात् । माणवकनिष्ठस्य क्रौर्यस्य न सिंहशब्दवाच्यता अपि तु वाच्यभूतक्रौर्यसम्बन्धित्वमेव । सम्बन्धश्च सादृश्यमिति नासङ्गतिः । यद्वा सिहगते क्रौर्येऽपि न सिंहशब्दवाच्यत्वम् प्रत्येकसिंहनिष्ठौर्यस्य भिन्नत्वेन सिंहसामान्यत्वाभावात् । लक्षणासामान्यस्यैव प्रकारान्तरेण वैविध्यं प्रतिपादयति- प्रकारान्तरेण त्रिविधा।
आगमपरिच्छेदः। . - लक्षणेति शेषः । अन्यः प्रकार: प्रकारान्तरं तेन । प्रकारो धर्मः । अन्यत्वन्तु केवललक्षणात्वलक्षितलक्षणात्वाभ्याम् । तादृशधर्मस्तु जहल्लक्षणात्वाजहल्लक्षणात्व- जहदजहल्लक्षणात्वरूपोऽवसेयः । त्रिविधा त्रित्वसख्यावती। त्रित्वं दर्शयति- जहल्लक्षणा अजहल्लक्षणा जहदजहल्लक्षणा चेति । साक्षाद्व्याप्यधर्मरूपेण कथनं भवति विभागः । तथा सति लक्षणाविभागे क्रियमाणे लक्षणात्वसाक्षाद्व्याप्यधर्मरूपेण यदि केवललक्षणात्वलक्षितलक्षणात्वयो- ग्रहणं तदा लक्षणायाः द विध्यम् । यदि च जहल्लक्षणात्वाजहल्लक्षणात्वजहदजहल्ल- क्षणात्वानां ग्रहणं तदा तस्यास्तित्वमिति भावः । जहल्लक्षणां परिचाययति- तत्र शक्यमनन्तर्भाव्य यत्रार्थान्तरप्रतीतिः, तत्र जहल्लक्षणा, यथा विषं भुंक्ष्वेति । तत्र स्वार्थ विहाय शत्रुगृहभोजननिवृत्तिलक्षणात् । तत्र जहल्लक्षणादिषु त्रिषु । यत्र शक्यमनन्तर्भाव्य यत्र अर्थान्तरप्रतीतिः तत्र जहल्लक्ष्ण ति सम्बन्धः यादृशवाक्यस्थले । शक्यं = वाच्यार्थम् । अनन्तर्भाव्य = अविषयीकृत्य । अर्थान्तरस्य शक्यभिन्नार्थस्य प्रतीतिः बोधः । तथा च-प्रकृतपदाशक्यमात्रविषयकबोधानुकूला लक्षणा जहल्लक्षणेति तल्लक्षणम् । विषं मुंश्वेत्यत्र वक्तृतात्पर्यविषयभूतस्य शत्रुगृहाधिकरणकभोजनाभावरूपस्यार्थस्य प्रकृतपदाशक्यतया तादृगर्थविषयकबोधानुकूलत्वस्य निरुक्तभोजनामावनिष्ठ- लक्षणायामक्षतत्वेन लक्षणसमन्वयः । इदमेव दर्शितं "तत्र हि स्वार्थ विहाये"त्यादि- लिखता ग्रन्थकृता। ननु शत्रुगृहाधिकरणकभोजननिवृत्तिनिष्ठे सम्बन्धे लक्षणा- लक्षणाव्याप्तिः, विषभोजननिष्ठकत्र्तव्यत्वरूपबोध्यप्रतियोगिकत्वस्य तत्रासम्भवात्, इति चेत्, भोजननिवृत्त: भोजननिष्ठकर्तव्यत्वाभावरूपतया तनिष्ठस्य विरोधसम्बन्धस्य प्रकृतबोध्यभूतकत्र्तव्यत्वनिरूपितत्वस्य सत्वात् । न च तर्हि विषभोजननिष्ठकर्त्तव्यत्वाभावस्यैव बोध: स्यादिति वाच्यम् । लक्षणाद्वयाङ्गीकारेण तद्वारणात् । अयं भाव:-प्रोक्तवाक्यप्रयोगस्थले विषपदस्य शत्रुगृहाधिकरणकभोज्ये लक्षणा । भुङ्क्ष्वेत्यस्य प्रोक्तरीत्या कर्तव्यत्वाभावे लक्षणा । प्रथमा अनिष्टकारित्व- स्योभयत्रसत्त्वात् सादृश्यसम्बन्धरूपा । द्वितीया तु पूर्वोक्तविरोधसम्बन्धरूपेति नानुपपत्तिगन्धः । तार्किकमते तु अशक्यान्वितपदशक्यपदार्थबोधानुकूल- लक्षणात्वमेव जहल्लक्षणालक्षणम् । तथा च तन्मते "गङ्गायां घोष" इत्यपि । यत्र - १७२ वेदान्तपरिभाषा। जहल्लक्षणोदाहरणम् । तत्राशक्यतीरपदार्थान्वितघोषपदार्थबोधानुकूललक्षणायाः तीरे सत्त्वात् । तन्मते लाक्षणिकत्वं पदस्यैव । अजहल्लक्षणामाह- यत्र शक्यार्थमन्तर्भाव्यवार्थान्तरप्रतीतिस्तत्राजहल्लक्षणा। अन्तर्भावः अत्रापि विषयीकरणम् । तथा च स्वशक्यतदन्यस्वार्थोभयबोधानु- कूला लक्षणा अजहल्लक्षणा । लक्षणानां बोधानुकूल्यं तु बोधजनकोपस्थितिजनक- ज्ञानविषयत्वम् । वृत्तिज्ञानाधीना पदार्थोपस्थिति: तज्जन्यश्च शाब्दबोधो भवतीति- वृत्तिभूतत्यां लक्षणायां तादृशानुकूल्यसत्त्वम् । यथा शुक्लः पट इत्यत्र हि शुक्लशब्दः स्वार्थगुणमन्तर्भाव्यव तद्वति द्रव्ये लक्षणया वर्तते । स्वार्थः = शुक्लपदार्थः, शुक्लगुणवृत्तिशुक्लरूपत्वं, तं अन्तर्भाव्यैव तमपरित्यजन्नेव, फलतः शक्त्या तमर्थमुपस्थापयन्नेव, तद्वति शुक्लरूपवति द्रव्ये पटे, लक्षणया वर्तते = लक्षणासम्बन्धन सम्बध्यते इत्यर्थः । अयं माव:- शुक्लपट इति वाक्यात्, शुक्लरूपयवभिन्नः पट इत्येव बोधो भवति, न तु द्रव्यं पट एतावन्मात्रम् । अतस्तत्राजहल्लक्षणा । शक्याहानात् इति । तत्र लक्षण- समन्वयस्त्वित्थम्-स्वंशुक्लपदम्, तच्छक्यः शुक्लरूपात्मकमगुणवृत्तिशुक्लरूपत्वम् तदन्यः स्वार्थः शुक्लगुणाश्रयः पटः, तदुभयबोधानुकूलत्वं पटनिष्ठायां लक्षणायाम् । इदमुदाहरणं "गुणे शुक्लादयः पुंसि गुणिलिङ्गास्तु तद्वति" इति कोशोक्तिमविग- णय्य । तदादरे तु व्यक्तिलक्षणा समुदाहर्तव्या। सामान्यमवधूय व्यक्तिबोधानङ्गी- कारात् । काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामिति तार्किकोदाहरणं तु नात्र मते घटते । दध्युप- घातकत्वधर्मेण तत्र काकबोधात् । तादृशधर्मस्य काकपदाशक्यत्वात् । शक्यस्य च काकत्वस्य हानात् जहल्लक्षणाग्रस्तत्वात् । क्रमप्राप्तां जहदजहल्लक्षणामाह- यत्र हि विशिष्ट वाचकः शब्दः एकदेशं विहाय एकदेशे वर्तते तत्र जहदजहल्लक्षणा।
आगमपरिच्छेदः। १७३ वर्तते - विशिष्टं = एकवस्तुसहकृतापरवस्तु उच्यते येन स विशिष्टवाचकः । वृत्तिमद्भवति, फलतः सम्बद्ध भवति । तथा च स्वशक्तार्थांशमात्रबोधा- नुकूला लक्षणा जहदजहल्लक्षणा इति तल्लक्षणम् । उदाहरणमाह- यथा सोऽयं देवदत्त इति । अत्र तत्पदस्य देवदत्तपदसमभिव्याहृतस्य वाच्यार्थः तत्कालसम्बन्धवान् देवदत्तः । तत्र कालसम्बन्धरूपं विशेषणांश परित्यज्य केवलदेवदत्ते या विद्यते लक्षणा सा जहदजहल्लक्षणा। एवमेवेदं पदस्याप्येतत्कालविशिष्टदेवदत्तवाचकस्य केवलदेवदत्त या लक्षणा साऽपि । लक्षणसङ्गतिस्त्वित्थम्-स्वं तदिदं पदम् । तच्छक्यार्थपदेन तत्कालसम्बद्धदेवदत्त तत्कद्वयनयोहणम् । तदंशपदेन केवलदेवदत्तपरिग्रहः, तद्बोधानुकूला लक्षणा देवदत्त । प्रकृता लक्षणा स्ववाच्य- घटकत्वसम्बन्धरूपा बोध्या। एतादृशस्थले लक्षणास्वीकारप्रयोजनमाह- अत्र पदवाच्ययोविशिष्टयोद्धयोरैक्यानुपपत्त्या पदद्वयस्य विशेष्य- मात्रपरत्वम् । अत्र-सोऽयं देवदत्त इति वाक्यस्थले। पदवाच्ययोः तदिदं पदशक्यार्थयोः । विशिष्टयो योः तत्कालसम्बद्धदेवदत्तं तत्कालसम्बद्धदेवदत्तयोः । एक्यानुपपत्त्या- अनुभूयमानाभेदानुपपत्त्या । पदद्वयस्य-तदिद पदयोः । विशेष्यमात्रपरत्वं देवदत्तमात्रलक्षकत्वम् । अयं भाव:-प्रोक्तवाक्यस्थले अखण्डदेवदत्तपदार्थबोधो भवति स चानुपपन्नः शक्तिमुपाश्रित्य बोषने । यतो हि तादृशे बोधे शक्यभूतकाल- सम्बन्धमानमावश्यकम् । अतः शुद्ध देवदत्ते लक्षणामाश्रित्य अखण्डबोधनिर्वाह कर्तव्य इति । अवयवार्थस्त्वेवम् या शक्यार्थ जहाति आश्रयत्वेन न बोधयति सा जहल्लक्षणा । या च शक्यार्थ न जहाति आश्रयतावच्छेदकत्वेन न बोधयति किन्तु आश्रयत्वेन बोधयति सा जहदजहल्लक्षणा । ननु तदिदं पदयोः जहदजहल्लक्षणा देवदत्ते वक्तुमशक्या, सामान्यशक्तिमङ्गी- कुर्वतां नये देवदत्तशक्यत्वस्यैवाभावात् तस्य व्यक्तित्वात् इति चेत्-कुब्जशक्तिवादे स्वरूपसत्त्याः शक्तेः व्यक्तावपि स्वीकारात्; शक्याश्रयत्वरूपस्य शक्यत्वस्य व्यक्तावक्षते । न च पूर्वतनवाच्यत्वानभ्युपगमग्रन्थविरोधः । एतत्कल्पे वाच्यत्व- शक्यत्वयोर्भेदाभ्युपगमात् । यद्वा सामान्यविशिष्टव्यक्ती शक्तिमभ्युपगम्यैवैतदुल्लेखः।
वेदान्तपरिभाषा। १७४ अत एवाग्रे "विशिष्टवाचकानां पदानां एकदेशपरत्वे न लक्षणे "त्यग्रिमग्रन्थे, पदानामि यस्य विशिष्टवाचकानामिति विशेषणं संगच्छते ।यदि च शक्यत्व- वाच्यत्वयोरक्यम्, व्यक्तौ च शक्तिसामान्याभावः तदा सोऽयं देवदत्त इत्यत्र तदिवं पदयोः समानाधिकरण्यसम्बन्धन तदेतत्कालसम्बन्धविशिष्टे शक्तिः । तत्र काल- सम्बन्धांशपरित्यागात् जहदजहल्लक्षणोदाहरणताऽवसेया । अन्यथा विगतेः । ग्रन्थकृताऽपि 'पदद्वयस्य विशेष्यमात्ररपत्व" मित्युक्तम् । न तु देवदत्तमात्रपरत्व- मिति येन ग्रन्थासङ्गतिराशङ्कयते । न च तर्हि "तत्त्वमसी"त्यत्र जहदजहदल्लक्ष- णया चैतन्यत्वस्य बोधः स्यान्न तु चैतन्यस्य । तथा चासङ्गतिरिति वाच्यम् चैतन्यतत्त्वयोरभेदात् अखण्डार्थमात्रविषयकनिर्विकल्पकबोधस्यैव तत्र स्वीकर्तव्य- तयाऽसङ्गत्यभावात् । लौकिकमुदाहरणं दत्त्वा वैदिकं तदाह- - यथा वा तत्त्वमसीत्यादौ तत्पदवाच्यस्य सर्वज्ञत्वादिविशिष्टस्य त्वं पदवाच्येनान्त:करणादिविशिष्टेनैक्यायोगात् ऐक्यसिद्ध्यर्थ स्वरूपे लक्षणेति साम्प्रदायिकाः । स्वरूपे शुद्धचैतन्ये । साम्प्रदायिका इत्यन्तरं वदन्तीति शेषः । अयं माव:- तत्पदस्य वाच्यं सर्वज्ञचंतन्यं ईश्वरपदाभिधेयम् । त्वं पदस्य चाल्पज्ञचैतन्यं जीव- पदाभिधेयम् । तयोरभेदो बाधितः । विरुद्धाभ्यां सर्वज्ञत्वाल्पनत्वाभ्यामाक्रन्तत्वात् । बोध्यते च तस्वमसीत्यनेन तयोरमेवः। तदुपपादनं जहवसल्लक्षणामनभ्युपगम्य सुसम्पावम् । तदुपगमे च विरुड्याः सर्वज्ञत्वाल्पज्ञत्वयोः हानेन चैतन्यमात्रग्रहणेन सम्पद्यते चैतन्यस्यामेदात् । न च चैतन्ययोरभेदबोधने अमेरसंसर्गाववाहितया बोधस्य सविकल्पकत्वापत्त्या अखण्डार्थविषयकत्वक्षतिरिति वाच्यम् सम्बन्धस्य भेदनियतत्वेन अभेदस्य संसर्गत्वाभावात् विवेचितञ्चेदं प्रागपि । "साम्प्रदायिकाः" इत्यनेन ध्वनितमस्वरसं स्पष्टीकर्तुं स्वसम्मतमर्थमाह- - वयं तु ब्रूमः-सोऽयं देवदत्तः तत्त्वमसीत्यादी विशिष्टवाचकानां पदानामेकदेशपरत्वे न लक्षणा । शक्त्युपस्थितविशिष्टयोरप्यन्वयानु- पपत्ती विशेष्ययोः शक्त्युपस्थितयोरभेदान्वयाविरोधात् ।
आगमपरिच्छेदः। १७५ एकदेशपरत्वे एकदेशबोधनेच्छयेच्चरितत्वे । शक्त्या उपस्थिती यौ विशिष्टी तयोः अन्वयस्यानुपपत्तो उपपत्त्यविषयत्वे । अपीति शेपः । विशेषयोः विशेषणांशरहितयोः केवलधर्मिणोः । अभेदान्वयाविरोधात् अभेदबोधाभ्युपगमे विरोधाभावात् । अयमभिप्रायः-सं.ऽयं देवदत्त इति वाक्यप्रयोगस्थले तत्काल- विशिष्टदेवदत्तस्य तत्पदात्, एतत्कालविशिष्टदेवदत्तस्यैतत्पवात् उपस्थितिभवति । तत्र देवदत्तव्यक्तेरेकत्वात् विशेषणाशंयोः तत्कालतत्कालवैशिष्ट्ययोः समानाधि- करण्यासम्भवे न विरोधोः वाच्यः। एवं सति यदंशे विरोधेन अमेवासम्भवः तं विशेषणांशं परित्यज्य शक्त्या देववत्ताभेवबोधने का क्षतिरनुपपत्ति ? न कापि । अधिकन्तु लाघवं वृत्त्यन्तरानाश्रयणात् । अतो न तादृशस्थले जहदजहल्ल- क्षणाभ्युपगमः इति । प्रकृतार्थे दृष्टान्तमाह- - यथा घटोऽनित्य इत्यत्र घटपदवाच्यैकदेशघटत्वस्यायोग्यत्वेऽपि योग्यघटव्यक्त्या सहाभेदान्वयः । त्वयः - घटपदवाच्यो घटत्वविशिष्टो घटः, तदेकदेशो यद्धटत्वं तस्यायोग्यत्वेऽपि अनित्याभेदान्वयायोग्यत्वेऽपि । योग्यघटव्यक्त्या = अनित्यघटव्यक्त्या । अभेदा- अनित्यपदार्थाभेदान्वयः । तथा "सोऽयं देवदत्तः" इत्यादावपीति वयं ब्रूम इति पूर्वेण सम्बन्धः । अयं भाव:-अनित्यो घट इत्यादिवाक्यस्थले अन्यरपि "अनित्याभिन्नोघटः" इत्येव बोधः स्वीकर्तव्यः । न तु अनित्यं घटत्वमिति । घटत्वस्य नित्यतया अनित्याभवस्य तत्र बाधात् । किन्तु घटपदस्य शक्तिर्न केवल. शुद्धघटे अपितु घटत्वविशिष्टे घटे । तथा सति सत्यपि घटपदवाच्यत्वस्य घट इव घटत्वेऽपि समाने यथा घटत्वं विहाय विशेष्यभूतघटेन सहव अनित्यामेवान्वयः स्वीक्रियते, तथा सोऽयं देवदत्त इति स्थले तत्कालैतत्कालांशी विहाय देवदत्ताभेद- बोधस्वीकारः सर्वयाऽपरिहार्य एवेति कृत तत्सम्पत्तपे जहवजहल्लक्षणाऽऽश्रयणेनेति । न च सोऽयं देवदत्त इत्यत्र विशेष्यभूते देवदत्त द्वित्वमेकत्वं वा? आद्य भेदाभ्युपगमा- पत्त्या अभेदान्वयबाधः । द्वितीये "विशेष्ययोः शक्त्युपस्थितयोरभेदान्वयाविरोधादि"- त्यत्र विशेष्योरिति प्रयोगासङ्गतिरिति वाच्यम् । विशेष्ययोरिति द्विवचनस्य साधुत्वमात्रार्थकत्वात् । द्वित्वबोधे तात्पर्याभावात् । यद्वा विशेष्यभूतदेवदत्त क्येऽपि तदेतत्पदोपस्थितत्वात्मकधर्मद्वयवैशिष्ट्याभिप्रायमादाय कथञिचत् द्विवचनसङ्गतिः ।
१७६ वेदान्तपरिभाषा। ननु तर्हि शक्त्या "नित्यो घट" इति प्रयोगस्याप्यापत्तिः । घटत्वे नित्याभेदान्वय- योग्यत्वाभतेः । अनित्यो घट इति विशेषणत्याग नित्यो घट इत्यत्र विशेष्यत्यागे बाधकाभावात् । इत्यत आह- यत्र पदार्थंकदेशस्य विशेषणतयोपस्थितिः तत्रैव स्वातन्त्र्येणो- पस्थितये लक्षणाभ्युपगमः । यथा नित्यो घट इत्यत्र घटपदात् घटत्वस्य स्वातन्त्र्येणानुपस्थित्या तादृशोपस्थित्यर्थः घटत्वे लक्षणा। स्वातन्त्र्येण - -किञ्चिदविशेषणतया । लक्षणायाः अभ्युपगमः स्वीकारः। घटत्वस्येन्यनन्तरं शक्येति शेषः । तादृशोपस्थित्यर्थम् = किञ्चिदविशेषणतयो- पस्थित्यर्थम् । अयं भावः-फलानुसारिण्येव हि कल्पना भवतीति नियमः । अनित्यो घट इति सर्वेषां भवति प्रतीतिव्यवहारौ इति तत्र शक्त्या विशेष्यभूत- केवलघटत्वोपस्थितिरङ्गीकार्या । नित्यो घट इति न भवति स्वरसवाहिनी लोकानां प्रत्ययव्यवहाराविति न तत्र शक्त्या विशेष्यांशमवधूय केवलघटत्वो- पस्थितिः स्वीकार्या । तथा चायमभिप्रेतार्थ:-किञ्चिद्धर्मावच्छिन्नविशेष्यतासम्बन्धन तत्पदजन्योपस्थिति प्रति विशेष्यतासम्बन्धेन शक्तिप्रमाकारणम् । तदन्योपस्थिति प्रति तत्पदलक्षणाज्ञानं कारणम् । एवं सति "घटोऽनित्य" इत्यत्र "घटत्वावच्छिन्नो घटपदशक्य" इति शक्तिप्रकारकप्रमाज्ञानस्य घटत्वात्मककिञ्चिद्धर्मावच्छिन्नविशेष्यता- सम्बन्धेन धर्मिणि घटे सत्वात् केवलघटोपस्थितिः ततस्तत्र अनित्याभेदान्वयः । घटत्वे तु न विशेष्यतासम्बन्धेन उक्तशक्तिप्रमा । घटांशे तस्य विशेषणत्वात् इति कारणाभावात् न केवल घटत्वोपस्थितिः । येन तत्र नित्याभेदान्वयापत्तिराशङ्किता भवेत् । लक्षणाज्ञानेन तु केषाञ्चित् सम्भवत्येवेति । - प्रक्रिया तत्त्वमसीति प्रकृतस्थले सञ्चारयति- एवमेव तत्त्वमस्यादिवाक्ये न लक्षणा। शक्त्या स्वातन्त्र्येणो- पस्थितयोस्तत्त्वं पदार्थयोरभेदान्वये बाधकाभावात् । स्वातन्त्र्येणोपस्थितयोः सर्वज्ञत्वाल्पज्ञत्वाभ्यामविशेषिततयोपस्थितयोः । तत् त्वं पदार्थयो:-चैतन्ययो. । अयं भावः तत्पदेन सर्वशत्वविशिष्टच न्याय आगमपरिच्छेदः १७७ तथोक्तेः । त्वंपदेनाल्पज्ञत्वविशिष्टचंतन्यस्योपस्थितिः । ततस्तत्र विशेषणांशयोः सर्वज्ञत्वा- ल्पज्ञत्वांशयोः विरोधात् तदंशं परित्यज्य शुद्धचैतन्ययोरभेदान्वयः। ननु स्वातन्त्र्येणो- पस्थितयोरित्यसङ्गतम् स्मरणरूपाया उपस्थितेरनुभवसमानविषयकत्वनियमेन विशिष्टे शक्तिमहात् विशिष्टस्यवोपस्थितिध्रौव्यात् । धर्मधमिणोः शक्तिभेदाभिप्रायेण यदि विशिष्टशक्त्यभिप्रायेण ग्रन्थः सङ्गमनीयः तदा स्वातन्त्र्येणेत्यस्य नोपस्थितावन्वयोऽभिप्रेतः । अपि तु अभेदान्वये । तथा च उपस्थितयोः तत् त्वं पदार्थयोः स्वातन्त्र्येणाभेदान्वयबोधसम्भवात् इत्यन्वयो बोध्यः । अबाधितान्वययोः शक्यैकदेशयोरप्यन्वयबोधाय तत्र पदलक्षणाभ्युपगमारहे आपत्तिमाह- अन्यथा गेहे घट!; पटे रूपम्, घटमानयेत्यादावपि घटत्वगेहत्वा- देरभिमतान्वयबोधायोग्यतया तत्रापि घटादिपदानां विशेष्यमात्रपरत्वं लक्षणयैव स्यात् । अन्यथा- विशिष्टशक्तिकस्यापि पदस्य एकदेशे लक्षणाभ्युपगमे । अभिमतो योऽन्वयाबोधस्तदयोग्यतया । घटो गृहवृत्तिः, रूपं पटवृत्ति, घटकर्मकमानयनम्, इत्यादिशाब्दबोधायोग्यतया इत्यर्थः । तत्रापि = तेष्वपि स्थलेषु । विशेष्यमात्र- परत्वम् = घटपटादिर्मिमात्रबोधकत्वम् । लक्षणयैव स्यात् = लक्षणां विना न स्यात् । अयं भावः-"गेहे घटः" इतिवाक्यस्थले गेहघटपवयोः गृहत्वावशिष्टपू.- घटत्वविशिष्टघटबाचकत्वेऽपि, बोषः माधेयतया "गृहविशिष्टो घटः" इत्येव भवति न तु "गृहवृत्तिघटत्वम्" इति किंवा "गृहत्ववृत्तिर्घटः" इति, अथवा गृहत्व- विशिष्टं घटत्वमिति । अयोग्यत्वात् । तादृशबोधीपयिकी गृहघटादिपदार्थोपस्थितिः शक्तिज्ञानाधीनैव भवति सर्वेषाम्, न व्यक्तिलक्षणाज्ञानाधीना अनुपपत्तिप्रतिसन्धाना- ननुभवात् । यदि च सोऽयं देवदत्तः तत्त्वमसीत्यादी विशिष्टवाचकस्यापि पदस्य व्यक्ती लक्षणा स्वीक्रियते, तदातुल्ययुक्त्या सर्वत्रापि तथा स्वीकारप्रसङ्गः स्यात् इति । एवमेव पटे रूपं इत्यादावपि बोध्यम् । परन्तु सर्वोऽयं विचारः विशिष्ट- शक्तिवादमनुसृत्य । सामान्यमात्रशक्यत्वे तु सर्वत्र व्यक्तिबोधो लक्षणयव भवति इति तथा प्रसङ्गदानानुपपत्तिः। ननु तर्हि प्राचीनानामाचार्याणां तत्त्वमसीत्यादी जहदजहल्लक्षणोक्त्ययुक्ति- रित्यत आह- १७६ वेदान्तपरिभाषा। तस्मात्तत्त्वमसीत्यादिवाक्येष्वाचार्याणां लक्षणोक्तिरभ्युपगमवादेन । आदिना सोऽयमित्यादिपारग्रहः । लक्षणोक्तिः जहदजहल्लक्षणोक्तिः । अभ्युपगमवादेन = प्रौढ्या । वस्तुतो न तत्र लक्षणादर आवश्यक इति भावः । ननु जहदजहल्लक्षणव नोपेया आहोस्वित् तस्या उदाहरणन्तरकत्वं विवक्षितम् ? इत्याकांक्षयामाह- जहदजहल्लक्षणोदाहरणं तु काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यादावेव । तत्र काकत्वपरित्यागेनाशक्यदध्युपघातकत्वपुरस्कारेणाकाके काकशब्दस्य प्रवृत्तः। तत्र = काकेम्यो दधि रक्ष्यतामित्यत्र । शक्यं = काकपदशक्यं यत् काकत्वं तत्परित्यागेन । अशक्यं = काकपदस्याशक्यं यत् दध्युपघातकत्वं = दधिभक्षकत्वं, तत्पुरस्कारंण = तद्धर्मप्रकारेण । प्रवृत्त: बोधयितुं प्रवृत्तत्वात् । अकाक- स्यापि बोधकत्वादित्यर्थः । अयमभित्रायः-- जहबजहल्लक्षणा नास्तीति मतम् । अपि तु न तत्त्वमसीत्यादिकं तदुदाहरणमिति । कि तहि तबुगहरणमिति चेत् काकेभ्यो दधि रक्यतामित्यादि । तथाहि-काकेभ्यो बषि रक्यतामित्युक्त वक्त्रा- श्रोता व घातकेन्यो बधि रक्ष्यतामिति जानाति । अन्यथा विगलादिभ्योऽपि बधिरक्षां न कुर्यात् । अतस्तत्र काकपदस्य काकाकाकसाधारणं बध्युपधातकेषु लक्षणोपेया। सान जहल्लक्षणा, बध्युपधातकत्वेन शक्या तकाकस्यापि ग्रहणेन शक्यापिरित्यागात् । नाप्पजहरूलक्षणा, काकपरशक्यस्य काकत्वस्य परित्यागात् । अतो जहाजहल्लक्षणा वाच्या। काकपदशक्यभूतकाकत्वविशिष्टकाकमध्ये काकत्वांश- परित्यागात्, काकांशस्य चापरित्यागात् । काकत्वापरित्यागे दध्युपधातकत्वेन विडालादीनामुपसंग्रहानुपत्तरिति । ननु काकेभ्यो दधि रक्ष्यतया लक्षणैव नास्ति काकाबाहिरक्षणस्य योग्यतया, लक्षणाबीजत्वेन स्वीकृतस्यान्वयानुपपत्तेरभावात् । इत्यत आह- लक्षणाबीजं तु तात्पर्यानुपपत्तिरेव ।
आगमपरिच्छेदः । १७९ लक्षणाबीज लक्षणाज्ञानबीजम् = लक्षणाया ज्ञानस्य श्रोतृनिष्ठस्य कारणम् । तात्पर्यानुपपत्तिरेव = तात्पर्यानुपपत्तिज्ञानमेव । तात्पर्यस्य = वक्त्र- भिप्रायस्य या अनुपपत्तिः = बाधितार्थविषयकत्वं तज्ज्ञानम् इत्यर्थः । यथा श्रुते असङ्गत्यापत्तः । तथा हि लक्षणाबीजमित्यत्र कस्तावद्वीजपदार्थ: ? जनक इति तीरनिष्ठप्रवाहसामीप्यरूपायाः लक्षणाया: वक्तृतण्यानुपायावासमवात् । अभिप्रायगतस्य बाधितार्थविषयकत्वस्य तीरनिष्ठसामीप्याजनकत्वात् । सापक इति तदर्थः, बीजपदस्योत्पादके रूढत्वात् । यद्वा बीजशब्दो हेतुपरः । तथा च हेतुपदस्य शापकार्थेऽपि शक्तेः । लक्षणाबीजमित्यस्य लक्षणाज्ञापकमित्यर्थः एवपदस्य व्यवच्छेदार्थकतया व्यवच्छेद्याकांक्षायामाह- नत्वन्वयानुपपत्तिः। काकेम्यो दधि रक्ष्यतामयापकनुपपत्तेर- भावात्। अभासदत्या सर्वानुभवसिद्धदघ्युपधातकत्वमात्रावधिकदधिरक्षणबोध्याप- लापापत्तरिति शेषः । अन्यथा पूर्वपक्षिणः इष्टापत्तः । तथा च यद्यन्वयानु- तिजं स्यात् तदा काकेभयो दधि रक्ष्यतामित्यादी अन्वयानुपपत्तरभावात् लक्षणा न स्यात् । असत्त्यां च तस्यां उपयुक्तबोधानुपपत्त्या, अनुभवसिद्धाया श्रोतृ- कर्त्त कविडालाद्यवधिकदधिरक्षायाः अभावप्रसङ्गः स्यादिति भावः । एवं यष्टी: प्रवेशयेत्यादावपि बोध्यम् । न्यायमते काकेभ्य इत्यादौ अजहल्लक्षणव । ननु अन्वयानुपपत्त: लक्षणाया अबीजत्वे अन्वयानुपपत्तिसाध्यायाः गङ्गायां घोष इत्यत्र तीरनिष्ठाय : गङ्गापदलक्षणायाः अभावप्रसङ्ग स्यादित्यत आह- गङ्गायां घोष इत्यादौ तात्पर्यानुपपत्तेरपि भावात् । तात्पर्यानुपपत्तेः = वक्तृतात्पर्यानुपपत्तः । अभावादित्यनन्तरं न तत्र लक्षणा- नुपपत्तिरिति शेषः । अयं भाव:-गङ्गायां घोष: इत्यत्रं अन्वयानुपपत्तरिय तात्पर्यानुपपत्तिरत्यस्त्येव । यथा श्रृतबोधानतात्पर्य बाधितार्थविषयकत्व- ध्रौव्यात् । एवं च श्रोता अन्वयानुपपत्तिमनभिसन्धाय तात्पर्यानुपपत्तिमेव प्रति. सन्धाय लक्षणां ज्ञात्वा शक्नोति कत्तुं "गलातीरतातिर्थोष" इति बोधमिति ।
वेदान्तपरिभाषा। १८० तार्किकाः शक्तेरिव लक्षणाया अपि पदमात्रनिरूपितत्वमभ्युपगच्छन्ति तन्मतनिरासायाह- लक्षणा च न पदमात्रवृत्तिः । किन्तु वाक्यवृत्तिरपि । यथा गंभीरायां नद्यां घोष इत्यत्र गंभीरायां नद्यामिति पदद्वयसमुदायस्य तीरे लक्षणा। " न पदमात्रवृत्तिः == न पदमात्रनिरूपिता वृत्तिः । वाक्यबृत्तिरपि = वाक्य- निरूपितापि वृत्तिः । पदद्वयं = गभीरायां नद्यामिति सप्तम्यन्तद्वयम् । तादात्मको यः समुदायः = वावयम् तस्य । अन्यथा समुदायपदवैयर्थ्यापत्त: । समुदायपदेन "सुप्तिङन्तमयो वाक्यम्" इति वाक्यलक्षणे इङ्गितम् । अयं भाव:-गंभीरायां नद्या घोष इति वाक्यस्थले गम्भीरामिन्ननदीतीरवृत्तिर्घोष इति बोधो भवति श्रोतुः। वाक्यलक्षणानन्युपगमे सोऽनुपपन्नः स्यात् । न च नदीपदस्य नदीतीरे लक्षणेति शक्यते वक्तुम् । पदार्थः पदार्थेनान्वेति न तु पवाथकदेशेनेति नियमविरोधापातात् । न च नियमसङ्कोच इति वाच्यम् विनिगमनविरहेण अर्थवादार्थभूतप्राशस्त्यादि- बोधानुपपत्त्या च वाक्यलक्षणाया एव स्वीकारोचित्यात् न च नदीपदस्यैव गम्भीराभिन्ननदीतीरे लक्षणे ति वाच्यम् । गम्भीरपदवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । तात्पर्य- ग्राहकत्वोवतेरसारत्वात् । अन्यथा सर्वत्रैव वाक्यघटकैकपदस्य समनार्थलक्षणामाश्रित्य बोधाभ्युपगमप्रसङ्गात् । शक्यसम्बन्धो लक्षणोति मत्वा न आशङ्कते- ननु वाक्यस्याशक्यतया कथं शक्यसम्बन्धरूपा लक्षणा ? - . न शक्यः अस्ति अस्येत्यशक्यः, तस्य भावः अशक्यता, तया । तथा च वाक्यस्याशक्यतया इत्यस्य वाक्यस्य शक्तिवृत्यनिरूपकतयेत्यर्थः । लक्षणा कथमित्य- न्वयः। उपपद्यते इति श्रेषः । अयं भाव:-शक्यसम्बन्धो लक्षणा इनि लक्षणा- लक्षणम् । सति चैवं वाक्यलक्षणा तदैवोपपन्ना स्यात् यदि वाक्यस्य कोऽपि शक्यः स्यात् । न चैवमभ्युपगम्यते वेदान्तिभिरपि । तथा सति "शक्तिः पदानामर्थे मुख्या वृत्तिरिति” पूर्वोक्तिविरोधापत्तेः । इति । शक्यसम्बन्धो लक्षणेति न लक्षणालक्षणम् अपि स्वबोध्यसम्बन्धत्वम् इत्यभिप्रायेणोत्तरयति- । तु आगमपरिच्छेद.। १८१ : उच्यते । शक्यः यत् पदसम्बन्धेन ज्ञाप्यते तत्सम्बन्धो लक्षणा । शक्तिज्ञाप्यश्च यथा पदार्थः तथा वाक्यार्थोऽपीति न काचिदनुपपत्तिः । पदसम्बन्धेन शक्त्या यत् ज्ञाप्यते तत्सम्बन्धो लक्षणेत्यन्वयः । पदसम्बन्धेनेति शक्या इत्यस्य विशेषणम् । अजहल्लिङ्गतया न लिङ्गविपर्ययः । तत्सम्बन्धो लक्षणेत्यत्र तस्य सम्बन्ध इति विग्रहः । षष्ठ्याश्च निष्ठत्वमर्थः । तथा च तन्निष्ठ- सम्बन्ध इति तदर्थः । ज्ञाप्यते इत्यस्य तज्ज्ञानजन्यज्ञानविषयी क्रियते इत्यर्थः । एवञ्च पदसम्बन्धात्मकशक्तिज्ञानाधीनज्ञानविषयनिष्ठसम्बन्धो लक्षणा। यथा गङ्गायां घोष इत्यस्य गङ्गापदसम्बन्धात्मिका या प्रवाहनिष्ठा शक्तिः, तज्ज्ञानाधीनं यज्ज्ञानं तत्तीरस्मरणरूपमपि 1 तस्यापि प्रवाहे गङ्गपदशक्तिमजानताऽसम्भवात् । तद्विषयः तीरम् , तनिष्ठं सामीप्यं लक्षणा । न च तीरनिष्ठकालिकादेरपि लक्षणात्वापत्तिः । सम्बन्धे पदप्रतियोगिकत्वस्यापि विशेषणीयत्वात् । न चैवमपि पदप्रतियोगिककालिकादिकमादाय दोषः, प्रोक्तग्रन्थस्य भंग्या शक्तिभिन्नत्वे सति उपस्थितिजनकपदार्थप्रतियोग्यनुयोगिकसम्बन्धत्वं लक्षणात्वमित्यत्र- तात्पर्यात् । यद्यपि पदलक्षणास्थले "तत्सम्बन्ध" इत्यत्र षष्ठ्यर्थतया निष्ठत्वम- परिगृह्य प्रतियोगिकत्वं परिगृह्य भवितुमर्हति लक्षणसमन्वयः, प्रवाहनिष्ठशक्ति- ज्ञानाधीनोपस्थितिपदेन प्रवाहोपस्थितिमादाय तत्प्रतियोगिकस्य सामीप्यसम्बन्धस्य तीरे सत्त्वात् । तथापि वाक्यलक्षणास्थलीयलक्षणसमन्वयावबोधकस्य "शक्ति ज्ञाप्यश्च यथा पदार्थः तथा वाक्यार्थोपीति" ग्रन्थस्यालम्बकतापत्तः । वाक्यनिरूपित- शक्तिरभावेन वाक्यार्थपदेन वाक्यलक्ष्यार्थस्यैव ग्राह्यतया तत्प्रतियोगिकसम्बन्धस्य लक्षणात्वाभिधानानुपपत्तः । न च वाक्यार्थ इत्यस्य वाक्यघटकपदार्थ इत्यर्थः । दृष्टान्तदाान्तिकभावेन तथोल्सेखासङ्गत्यापत्तः । यदि च वाक्यार्थोऽपीत्यत्र वाक्यार्थपदेन वाक्यघटकपदार्थघटितोऽर्थोऽभिप्रेतः, स च यथा श्रुतार्थरूपः । तत्प्रतियोगिकः सम्बन्धो लक्षणेत्युच्यते तदापि न सङ्गतिः, तस्य बाधितसम्बन्धकत्वेन किञ्चिग्निरूपितवृत्त्याश्रयत्वाभावेन चार्थपदानभिधेयतया वाक्यार्थपदेनोल्लेखायोग्यत्वात् । तौरवृत्तिघोषादिबाधितसंसर्गकार्थपरिग्रहे तु न तत्प्रतियोगिकसम्बन्धस्य लक्षणात्वोक्तिसङ्गतिरिति पूर्वमेवोक्तम् । न च लक्ष्यार्थमेव वाक्यार्थतयोपादाय तत्प्रतियोगिकाभेदसम्बन्धमादाय लक्षणसङ्गतिः । अभेदस्य सम्बन्धत्वाभावात् । वाक्यार्थपदेन लक्ष्यार्थग्रहणे लक्षणानिर्वचनस्य लक्षणाज्ञानसा- पेक्षत्वापत्त्या आत्माश्रयाद्यापत्तश्च । ननु तथापि वाक्यलक्षणात्वानुपपत्तिरिति चेत् १६२ वेदान्तपरिभाषा। न । वस्तूपरिस्थितिजनकत्वे सति शब्दविशिष्टसम्बन्धत्वे तात्पर्यात् । वैशिष्टयञ्च स्वनिरूपितशक्तिज्ञानाधीनोपस्थितिविषयत्वम् । स्वघटकपदनिरूपितशक्तिज्ञाना- घीनोपस्थितिविषयत्वान्यतरसम्बन्धेन । शक्तिज्ञानाधीनत्वं तूपस्थिती जन्या- जन्यसाधारणं प्रयोज्यत्वरूपम् । तेन तीरोपस्थितेरपि न प्रवाहनिष्ठगङ्गापदशक्ति- शानाधीनत्वक्षतिः । न काचिदनुपपत्तिः-न गङ्गायां घोष इत्यादी बोधा- नुपपत्तिः । वाक्यलक्षणास्वीकारे तरवमसीत्यादी वाक्यलक्षणयाऽपि अखण्ड- चैतन्यबोधो निर्विकल्पकरूपः सुसम्पाद इत्यपि बोध्यम् । वाक्यलक्षणोदाहरणान्तरमाह- एवमर्थवादवाक्यानां प्रशंसारूपाणां प्राशस्त्ये लक्षणा । सोऽरोदीत् इत्यादि निन्दार्थवादवाक्यानां निन्दितत्वे लक्षणा। एवं गम्भीरायां नद्यां घोष इत्यादाविव । प्रशंसारूपाणामिति अर्थवादवाक्याना- मित्यस्य विशेषणम् । प्रशंसाधवानवा "वायुर्वं क्षेपिष्ठा देवता" इत्यादिकं बोध्यम् । सोऽरोदीदित्यादीनि यानि निन्दार्थवादवाक्यानि तेषाम् । वाक्यलक्षणा- स्वीकारे ''वायुर्व क्षेपिष्ठा देवता" इत्यादेः वायुदेवताकं कर्मप्रशस्तमित्यर्थः । "सोऽरोदीत्" इत्यादेः "रजतदक्षिणा निन्दिता" इत्याद्यर्थः । अर्थात् रजतदक्षिणाकं वहिर्यागकर्म निन्दितमिति भावः । द्वयोः प्रधा वाक्यं क्रमेण वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामः, बहिषि रजतं न देयम् इति बोध्यम् । न चार्थवादवाक्यानां प्राशस्त्य- निन्दालामाणिकत्वाभावे का क्षतिरिति वाच्यम् । तथा सति 'आम्नायस्य क्रियार्थ- त्वा नर्थक्यमतदर्थानाम्" इति सूत्रानुसारं अर्थवादवाक्यानां निष्प्रयोजनकत्वापत्तेः । ननु अर्थवादघटकस्य यस्य कस्यचन पदस्यवास्तु प्राशस्त्यादी लक्षणा कि वाक्यलक्षणया ? तावताऽपि विध्येकवाक्यतासम्भवेन अर्थवादानष्प्रयोजन Kia. क्षतेः, अत आह- अर्थवादगतपदानां प्राशस्त्यादिलक्षणाभ्युपगमे एकेन पदेन तदुपस्थितिसम्भव पदान्तरवैयई स्यात् । अर्थवादे गतानि = तखटकानि यानि पदानि तेषाम् । प्राशस्त्यादी या लक्षणा, तस्याः अभ्युपगमः स्वीकारः तस्मिन् मादिपदेन निन्दित्वग्रहणम् । पदानामित्यस्य लक्षणान्वये तात्पर्यम् । तदुपस्थितिसम्भवे । प्राशस्त्याच पस्थिति- आगमपरिच्छेदः। १८३ सम्भवे। इदमुपलक्षणम्-विनिगमनाविरहेण कस्यापि पदस्य प्राशस्त्यादिबोधकत्वं न स्यात् इत्यपि द्रष्टव्यम् । नन्वर्थवादस्थले वाक्यलक्षणास्वीकारे शेषशेषिवाक्ययोः वाक्यकवाक्यतानियम- भङ्गः प्राशस्त्यार्थकप्रशस्तपदमिव अर्थवादवाक्यस्यापि तथा सति पदभावापन्नत्वात् इत्याशङ्कां इष्टापत्त्या परिहरति- एवञ्च विध्यपेक्षितप्राशस्त्यरूपपदार्थप्रत्यायकतयाऽर्थवादसमुदायस्य पदस्थानीयतया पदस्य 'सतः विधिना सहैकवाक्यत्वं भवतीत्यर्थवादानां पदैकवाक्यता। एवञ्च = अर्थवादघटकपदानां प्राशस्त्यादिलाक्षणिकत्वे च । विधिः विधेयं कर्म, तत्रापेक्षितो यः प्राशस्त्यरूपः पदार्थः, तस्य प्रत्यायकतया - बोधकतया इत्यर्थः । इदं च प्रत्यायकता पदस्थानीयतायां हेतुः । समुदायपदं तु वाक्यपरमपद- समूहस्य वाक्यत्वात् । पदस्य सतः = पदतां गतस्य । इदं समुदायस्य विशेषणम् । विधिना सह = विधिवाक्येन सह । एकवाक्यत्वं सम्भूयैकार्थप्रतिपादकत्वम् । इतीति हेती । अर्थवादपदानां विधिना सह पदैकवाक्यतेति सम्बन्धः । अयं माव:- सर्वत्र शेषशेषिवाक्ययोः वाक्येकवाक्यतयव भवितव्यमिति न नियमः इति अर्थवाद. वाक्यस्य प्राशस्त्यापि.Dोषकत्वेन पदस्थानीयतया तेन सह विषिवाक्यस्य पदकवाक्यतापब सम्भूयार्थबोषकता । अतस्तत्र वाक्यंकवाक्यत्वाभाव इष्ट एवेति । वाक्यैकवाक्यतोदाहरणजिज्ञासामाह- क्व तर्हि वाक्यैकवाक्यता? क्व = कुत्र । यदि वाक्ययोरेकवाक्यतापि पदकवाक्यतास्पैव तदा वाक्यक- वाक्यता कुत्र लब्धावकाशा भविष्यति ? इति प्रश्नाशयः । उत्तरयति- यत्र प्रत्येक भिन्नसंसर्गप्रतिपादकयोरुभयोर्वाक्ययोराकांक्षावशेन महावाक्यार्थबोधकत्वम् । यथा दर्शपार्णमासा यतेत्यादिवाक्यानां समिधो यजतीत्यादि वाक्यानां च परस्परापेक्षिताङ्गाङ्गिबोधकतयैक- वाक्यता। - वेदान्तपरिभाषा। यत्र- यादृशस्थले । प्रत्येक = स्वातन्त्र्येण । भिन्नो यो संसर्गों तत्प्रति- पादकयोः = तद्वोधकयोः । संसर्गे भिन्नत्वं तु विभिन्नप्रतियोग्यनुयोगिकत्वम् । यथा “दर्शपौर्णमासाभ्यां यजेत" इति वाक्यस्य तद्धटकपदोपस्थाप्य प्रतियोग्यनु- योगिकसंसर्गबोधकत्वम् । तया च भिन्नससर्गप्रतिपादकोरित्यस्य विशेषणम् । आकांक्षावशेन = उपकार्योपकारकाकांक्षावशेन । परस्परेत्यादेः परस्परमपेक्षिती यो अङ्गाङ्गिनौ तद्वोधकतया इत्यर्थः । अयं भावः-यत्राङ्गिवाक्यात् एकः अङ्ग- वाक्याच्यापरो बोधः प्रथमं सम्पद्यते, तदनन्तरमन्याकांक्षावशेन वे ते वाक्ये मिलित्वा महावाक्यतामासाथ पुनरेक बोषं जनयतः तत्र महाबोधानुकूलमहावाक्यता- सम्पत्तये या अङ्गाङ्गिवाक्ययोरेकवाक्यता सम्पद्यते सा खलु भवति वाक्यंकवाक्यता। अर्थवादवाक्यातुन प्रथमं स्वातन्त्र्येण शाब्दबोधः । अपि तु प्राशस्त्याधुपस्थिति- मानन्, इति न तेन विषिवाक्यस्यैकवाक्यता वाक्येकवाक्यता, किन्तु पदकवाक्यतैव । अर्थवादे कञ्चित् वाक्यत्वस्य सत्त्वेऽपि वस्तुतः पदत्वमेव । वस्तुतस्तु अर्थवाद- विधिवाक्ययोः पदैकवाक्यत्वाभिधानमिदं कर्ममीमांसापद्धतिमभ्युपेत्य । अतएव वेदान्तग्रन्थे तत्र तत्र पदैकवाक्यतोदाहरणरूपेण "न सुरां पिवेत्" इत्यादेरेवोल्लेख उपलभ्यते । यत्र पदयोः पदानां व सम्भूय एकार्थप्रतिपादकता तत्रैव पदैकवाक्यता। 'न सुरा पिवेत्' इत्यत्र पदकवाक्यत्वानभ्युपगमे केवल सुरां पिवेदित्यत: सुरापान- विधिबोधप्रसङ्गः । अतस्तादृशस्थले पदकवाक्यता समभ्युपगम्यते । अर्थवादस्य स्थले पदकवाक्यताभ्युपगमे भूतार्थवादस्यापि तथात्वापात: । न चेष्टापत्तिः तथा सत्यवान्तरार्थबोधाभावप्रसक्त्या अपसिद्धान्तापात: । वजहस्तः पुरन्दर इत्यादितो वज़धारिदेवेन्द्रबोधस्य वेदान्तसिद्धान्तसिद्धत्वात् तत्र वाक्यकवाक्यत्वस्य स्वीकारात्। तथा चार्थवादवाम्यस्य सत्यामपि पदस्थानीयतायां सुप्तिअन्तत्रयरूपं वाक्यत्वान- पलापेन अर्थवादविधिवाक्ययोः एकवाक्यताऽपि वाक्यैकवाक्यतैव । अर्थवादविधि- वाक्ययोः यथा न पदकवाक्यत्वं तथा प्रतिपादितं देवताविकरणे भाष्यतट्टीका- कारादिभिः सुस्पष्टम् । अयमाशयः-कर्ममीमांसकानां मते अर्थवादवाक्यं न स्वातन्त्र्येण किञ्चिदर्यबोधकम् अतस्तन्मते तस्य पदत्वमेव न तु वाक्यत्वम् । ब्रह्ममीमांसकाना मते अवान्तरतात्पर्यबलेन मयंबावस्यापि स्वातन्त्र्येण स्वार्थ- बोधकतया तत्र वाक्यत्वमव्याहतमिति तस्य विधिवाक्येन सह सम्भूर्यकार्थप्रति- पादकत्वे वाक्यकवाक्यत्वमेव । वयन्तु ब्रूमः-नैकवाक्यता द्विविधा अपि तु त्रिविधा । पदैकवाक्यता वाक्यक- वाक्यता, पदवाक्यकवाक्यता च । तत्रानेकपदनिष्ठं सम्भूयकार्यप्रतिपादकत्वं आगमपरिच्छेदः । १८५ . पदैकवाक्यत्वम् । अनेकवाक्यनिष्ठं सम्भूयैकार्थप्रतिपादकत्वं वाक्यकवाक्यत्वम् । पदवाक्ययोरेकार्थप्रतिपादकत्वं पदवाक्यैकवाक्यत्वम् । प्रथमं न सुरां पिवेदित्यादौ । द्वितीयं भूतार्थवादविधिवाक्ययोः, अङ्गाङ्गिक्रियाबोधकवाक्ययोश्च । तृतीयं “वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता" 'वायव्यं श्वेतमालभेत' इत्याद्यर्थवाद-विधिवाक्ययोः । युक्तञ्चतत्- अर्थवादस्य पदस्थानीयतया पदत्वेऽपि विधिवाक्ये पदत्वाभावेन पदयोरेकवाक्यत्वं पदैकवाक्यत्वं । पदैकवाक्यत्वमिति व्याख्यानुरूपस्य पदकवाक्यत्वस्य तत्रासम्भूतत्वात् । अर्थवादस्य पदत्वेन विधिवाक्यस्य च वाक्यत्वेन पदवाक्ययोरेकवाक्यत्वं पदवाक्यक- वाक्यत्वम् इति व्याख्यानुरूपं पदवाक्यैकवाक्यत्वं तत्र सङ्गच्छत एव । यदि च पदस्य पदयोः पदानां वा विधिना सह एकवाक्यत्वं पदकवाक्यत्वम् । तथा च "न मुरां पिवेत्" इत्यादौ "न" "सुरां" इति पदयोः पिवेदिति विधिना सहकवाक्यत्वम् । तथा वायुर्वं क्षेपिष्ठा देवतेत्यादी वाक्यस्य पदस्थानीयतया तेन सह विधिवाक्य- स्यैकवाक्यत्वमिति पदैकवाक्यत्वमित्युच्यते, तदा वाक्यकवाक्यतानभ्युपगमापातः । अङ्गावाक्यस्मापि पदसमूहात्मकतया पदानां विधिना सहैकवाक्यत्वरूपस्य पदैकवाक्यत्वस्यैव तत्रापि सम्भवात् । तथा चाध्वरीन्द्राणां अत्र पदैकवाक्यतोक्तिः पदवाक्यकवाक्यताभिप्राया बोध्या । गुणवादानुवादयोरपि पदवाक्यकवाक्यता बोध्या । न च भाष्यादिप्रन्थविरोधः एकवाक्यता विध्याभिप्रायेण तथोक्तोरिति । अङ्गाङ्गिबोधकवाक्ययोः वाक्यैकवाक्यत्वे सम्वादमाह- - तदुक्तं भट्टपादै : स्वार्थबोधे समर्थनामङ्गाङ्गित्वाद्यपेक्षया । वाक्यानामेकवाक्यत्वं पुनः संहृत्य जायते ॥ इति स्वार्थबोधे समर्थानां वाक्यानां अङ्गाङ्गित्वाद्यपेक्षया संहत्य पुनः एकवाक्यत्वं जायते इत्यन्वयः । स्वार्थबोधो समर्थानाम् =जनितस्वार्थबोधानाम् । वाक्यानां= अङ्गाङ्गिबोधकवाक्यानाम् । अङ्गाङ्गित्वाद्यपेक्षया कर्मणः अङ्गाङ्गित्वाद्याकांक्षया। आदिपदेन कथम्भावाकांक्षारूपेतिकर्तव्यताकांक्षापरिग्रहः । संहत्य = मिलित्वा । पुनः एकवाक्यत्वं जायते-सम्पद्यते इत्यर्थः । उपोदघातसङ्गत्या आसत्तिघटकस्य विविधस्य पदार्थस्यात्र निरूपितत्वे अव्यवधानेन तदुपस्थितिरासत्तिरिति स्पष्टयति- वेदान्तपरिभाषा। एवं द्विविधोऽपि पदार्थो निरूपितः । तदुपस्थितिश्वासत्तिः । सा च शाब्दबोधहेतुः तथैवान्वयव्यतिरेकदर्शनात् । एवं प्रोक्तप्रकारेण । द्विविधः=वाच्यो लक्ष्यश्च । तदुपस्थिति.=वाच्यलक्ष्यार्थी- पस्थिति. । अव्यवधानेनेति योज्यम् तेन नासङ्गतिः । सा च = आसत्तिश्च । तथैवान्वय- व्यतिरेकदर्शनात् = अव्यवधानेन वाच्यलक्ष्यान्यतरानेकोपस्थितिसत्त्वे शाब्दबोधः, तदभावे शाब्दबोधाभावः इत्यनुभवात् । विरोधोऽपीत्यनेन तथैवान्वयेत्यनेन च अत्र मते न व्यञ्जनायाः वृत्तित्वम् । तेन न व्यङ्ग यभ्रमः तृतीयः पदार्थः । क्वचिल्लक्षणया क्वचिदर्थापत्त्या क्वचिच्चानुमानेनैव व्यङ्गत्वेनाभिमतपदार्थभानसम्भवात् । इति मूचितम् । वाक्यार्थबोधे यथा अव्यवहितानेकपदार्थोपस्थितिरूपायाः आसत्तेर्हेतुता महावाक्यार्थबोधस्थले अव्यवधानेनानेकखण्डवाक्यार्थबोधस्य हेतुता इत्याह- तथा - एवं महावाक्यार्थबोधेऽवान्तरवाक्यार्थवोधो हेतु: तथैवान्वयाद्यव- धारणात् । %D एवं = वाक्यार्थबोधे प्रोक्तपदार्थोपस्थित्यात्मकासत्तिरिव । महावाक्यत्वमत्र वाक्यकवाक्यतापन्नशब्दत्वम् । न तु जीवब्रह्म क्यबोधवाक्यत्वमात्रम् । न्यूनतापत्त: । अवान्तरवाक्यं = खण्डवाक्यम् । तदर्थबोधः = तज्जन्यः शाब्दबोधः। हेतु: कारणम् । अयं भावः-यदि शाब्दबोधमात्रं प्रति अव्यवहितपदार्थोपस्थितिरूपाया आसत्तेः कारणत्वमुच्यते तदा व्यभिचारः। वाक्यैकवाक्यतास्थले वाक्यद्वयार्थी- पस्थितीनां खण्डवाक्यार्थबोधने व्यवधानात् महावाक्यार्थबोधाव्यवहितपूर्व प्रोक्तासत्तेरभावात् । अतो वाक्यार्थबोध एव प्रोक्तरूपाया आसत्तेर्हेतुता वाच्या । महावाक्यार्यबोधे तु अनेकखण्डवाक्यार्थबोधस्यैव हेतुताऽभ्युपगन्तव्येति । तात्पर्यनिरूपणे सङ्गतिमाह- क्रमप्राप्तं तात्पर्य निरूपयति । क्रमप्राप्तमित्यनेन अवसरसङ्गत्या तात्पर्यनिरूपणमिति प्रोक्तम् । अवसरस्तु विरोषिजिज्ञासानिवृत्तिरूपः । वाक्यार्थबोधप्रकारः पूर्ववदवसेयः ।
आगमपरिच्छेदः। १८७ स्वाभिमतलक्षणप्रकाशाय पूर्वमपराभिमतं तात्पर्यलक्षण दूषयति- तत्र तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वं न तात्पर्यम् । तत्र - निरूपणप्रतिज्ञायाम् । तस्य प्रतीतिः तत्प्रतीतिः, तस्याः या इच्छा तया। तत्पदेन उद्देश्यज्ञानविषयस्य ग्रहणम् । उच्चरितत्वं उच्चारणविषयत्वम् । यथा घटकर्मकानयनबोधनेच्छया उच्चरितत्वं घटमानयेति वाक्ये तात्पर्यम् । श्रोता वाक्ये तादृशतात्पर्यप्रकारकं ज्ञान विधाय ततो विदधाति बोधम् । तात्पर्य- ज्ञानाकारस्तु “घटमानयेति" वाक्यं सम्बद्धघटकर्मत्वानयनवोधनेच्छयोच्चरितमिति बोध्यः । न तु घटकर्मकानयनबोधनेच्छयोच्चरितमिति । तथा सति वाक्यार्थस्या- पूर्वविषयकत्वानुपपत्तः इति परमतसिद्ध तात्पर्यलक्षणं न साधुतामहतीत्यर्थः । कुतो नार्हति साधुतामित्यत्र हेतुमाह- अर्थज्ञानशून्येन पुरुषेणोच्चरितात् वेदादर्थप्रत्ययाभावप्रसङ्गात् । अर्थपदं न केवलवस्तुपरम्, अपि तु वृत्तिविशिष्टवस्तुपरम् तेन न न्यूनता । तथा अर्थज्ञानशून्येनेत्यस्य पदनिरूपित्तवृत्तिविशिष्टार्थज्ञानरहितेनेत्यर्थः । अर्थस्य प्रत्ययो ज्ञानं, तदभावप्रसङ्गात् । अयं भावः-यत्रागृहीतपदपदार्थवृत्तिको वक्ता अन्यवाक्यमनुवदति, व्युत्पन्नश्चेच्छोता तदा तदनुवाक्यादपि बोधो भवतीत्यनुभव- सिद्धः । स चेदानी न स्यात् । अव्युत्पन्नस्य वक्तुः तदर्थप्रतीतीच्छाया एवाभावात् तयोच्चरितत्वरूपस्य तात्पर्यस्य वाक्ये असम्भवात् । ननु मास्तु वाक्ये निरुक्ततात्पर्यम् विशेष्यभूते वाक्ये तत्प्रकारकं भ्रमात्मकं ज्ञानं भवितुमर्हति व्युत्पन्नस्य श्रोतुरिति कुतो बोधाभावप्रसङ्ग इत्याशङ्कायामाह- अयमध्यापकोऽव्युत्पन्न इति विशेषदर्शने तत्र तात्पर्यभ्रमस्याप्य- सम्भवात् । तत्र = वाक्ये । वक्तृगतवृत्यज्ञानज्ञातुरपि व्युत्पन्नस्य श्रोतुः भवति निरुक्तानु- वादवाक्यात् बोधः । तदनुपपत्तिर्दुरिव । श्रोतुनिरक्ततात्पर्यभ्रमस्यापि वाक्ये असम्भवात् । न हि विशेषदर्शिनः सम्भवो भ्रमस्येति भावः ।
१८० वेदान्तपरिभाषा। ननु भगवदिच्छायाः कार्यमा प्रति कारणत्वेन अव्युत्पन्नकर्तृकवाक्योच्चारण- स्यापि तदधीनतया भगवत्प्रतीतीच्छामादाय तादृशतत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वं अव्युत्पन्न वाक्येप्यक्षतम् । तस्य प्रमात्मकं ज्ञानं विधाय शक्नोति कर्तुं श्रोतावाक्यार्थबोधमित्याशंका- रिहाराय- न चेश्वरीयतात्पर्यज्ञानात् तत्र बोध इति वाच्यम् । ईश्वरानङ्गी- कर्तुरपि तद्वाक्यादर्थप्रत्ययदर्शनात् । न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । ईश्वरीयं यत्तात्पंय तज्ज्ञानात् । तात्पर्ये ईश्वरीयत्वन्तु अव्युत्पन्नोच्चारणे श्रोतृप्रतीत्यनुकूलं वक्त्रुच्चारणं भवत्वितीच्छा- जन्यत्वं बोध्यम् । तत्र-अव्युत्पन्नवक्तृकस्थले। ईश्वरं नाङ्गीकरोतीति ईश्वरानङ्गी- कर्ता, तस्य। तद्वाक्यात् =अव्युत्पन्नपुरुषोच्चारितवाक्यात् । अर्थप्रत्ययदर्शनात् = शाब्दबोधदर्शनात् । यः पो ता नाङ्गीकरोतोश्वरं स कथं तदिच्छयोच्चरितत्वरूपं तात्पर्य वाक्ये शक्नुयात् गृहीतुम् ? असति तात्पर्यग्रहे कथं स्यात्तस्य शाब्दबोषः ? भवति चासो । तस्मात् न तात्पर्ये ईश्वरीयत्वमादाय अनुपपत्तिवारणसम्भव इति भावः। ननु किं नाम तात्पर्य भवदभिमतम्, यज्ज्ञानं भवेद् हेतुश्शाब्दबोधे ? इत्या- काक्षायामाह- - उच्यते । तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वं तात्पर्यम् । तस्य प्रतीतिः तत्प्रतीतिः, तादृशप्रतीतिजनकत्वम् । शब्दनिष्ठमिति शेषः । तेन नादृष्टादिनिष्ठजनकत्वमादाय दोषः । तरप्रतीत्यत्र तत्पदेन पदार्थद्वयप्रतियोग्यनु- योगिकसंसर्गस्य गृहणम् । तेन न प्रत्येकपदनिष्ठोपस्थितिजनकत्वमादाय दोषः । जनकत्वं च जननयोग्यत्वरूपं बोध्यम् । अन्यथा श्रोतृदोषात् प्रतीत्यभावे वाक्यस्य तात्पर्याभावत्वप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्तिः। अन्यदोषस्यान्यत्राभ्युपगमेन अतिप्रसङ्गा- पातात् । न हि श्रोतृदोषेण वाक्यस्य वक्तुर्वा सदोषता युक्ता । यत्तु फलोपधायक- स्वरूपजनकत्वनिवेशेऽन्योन्याश्रयापत्तिः । कार्यभूतायाः तत्प्रतीतेः कारणीभूत- तात्पर्यशरीरे प्रवशादिति तन्न मनोरमम् । योग्यतानिवेशेऽपि तदवारणात् । तत्प्रतीतेः तात्पर्यशरीरप्रवेशस्य समानत्वात् ।
आगमपरिच्छेदः। १८९ वा ? वस्तुतस्तु सम्भावनैव नास्त्यत्रान्योन्याश्रयस्येति कथं तद्वारणाय योग्यता. निवेशसम्भवः। तथा हि-अन्योन्याश्रयापत्तिश्चेत्, उत्पत्त्याश्रिता ज्ञप्त्याश्रिता नाद्या, यत्र द्वयोरुत्पत्तौ द्वयोरपेक्षा भवति तत्रैव तत्प्रसरात् । प्रकृते तु तत्प्रतीत्युत्पत्तो तात्पर्यज्ञानोत्पत्त्यपेक्षायां सत्त्यामपि तात्पर्यज्ञानोत्पादे तत्प्रतीत्युत्पादा- पेक्षाऽभावात् । नापि ज्ञप्त्याश्रिता, द्वयोनियोः द्वयोर्ज्ञानापेक्षायामेव तत्प्रसरात् । प्रकृते तात्पर्यज्ञाने तत्प्रतीतिज्ञानापेक्षायामपि न तु तत्प्रतीतिज्ञाने तात्पर्यज्ञानम- पेक्षितम्, अपि तु तत्प्रतीत्युत्पादे, इति । अन्यथाऽपि च न तदापत्तिसम्भावना, तात्पर्यघटकतत्प्रतीतिपदेन सामान्यतो यत्किञ्चित्प्रतियोग्यनुयोगिकसंसर्गत्वेनैव संसर्गस्य प्रवेशात् । वाक्यार्थरूपायाः तत्प्रतीतेस्तु विशेषसंसर्गविषयकत्वात् इति । लक्ष्ये लक्षणं सङ्गमयति- - गेहे घट इति वाक्यं गेहे घटसंसर्गप्रतीतिजननयोग्यं न तु पट- संसर्गप्रतीतिजननयोग्यमिति तद्वाक्यं घटसंसर्गपर न तु पटसंसर्गपर- मिति व्यपदिश्यते । योग्यमित्यनन्तरं भवतीति योजना। इतीत्यनन्तरं व्यपदिश्यते इत्यत्र व्यपदेशो हेतुः । अय भावः-गेहे घट इति वाक्ये गेहानुयोगिकघटप्रतियोगिकसंयोगविषयक- शाब्दबोधस्वरूपयोग्यतव विद्यते न तु गेहानुयोगिकपटप्रतियोगिकसंयोगबोध- स्वरूपयोग्यतेति अत एव लौकिकाः "गेहे घट" इति वाक्यं घटसंसर्गे तात्पर्यवत् न तु पटसंसर्गे" इति व्याहरन्ति । तस्मात् सुस्पष्टमिदं यत् तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वमेव वाक्यनिष्ठं तात्पर्यम् तज्ज्ञानमेव च शाब्दबोधहेतुरिति । योग्यतानिवेशेऽतिप्रसङ्गमुद्भावयति- - ननु संन्धवमानयेति वाक्यं यदा लवणानयनप्रतीतीच्छया प्रयुक्त तदाप्यश्वसंसर्गप्रतीतिजनने स्वरूपयोग्यतासत्त्वात् लवणपरत्वज्ञान- दशायामप्यश्वादिसंसर्गज्ञानापत्तिः । =यस्मिन् काले । लवणस्य यत् आनयनं, तस्य या प्रतीतिः, तस्याः, या इच्छा तया । प्रयुक्त उच्चारितम् । तदापीत्यनन्तरं "सैन्धवमानयेति वाक्ये" इत्यध्याहारः । अयं भाव:-तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वमित्यस्य तत्प्रतीविजनकतावच्छेदक- वेदान्तपरिभाषा । शक्तिमत्वमेवार्थों वक्तव्यः । शक्तिश्च यावदाश्रयकालस्थायिनी सैन्धवपदे लवण- निरूपितेवाश्वनिरूपिताऽपि विद्यत एवेति सैन्धवपदे लवणप्रतीतिजननयोग्यताया इव अश्वप्रतीतिजननयोग्यताया अप्यक्षतत्वेन लवणाश्वकर्मकानयनबोधद्वयस्य नियत- त्वापत्तिः । न च सेप्टा, अनुभवविरोधात् । परमेदमिहावधेयम्-दोषोऽयं तात्पर्यस्य स्वरूपसत एव शाब्दबोषहेतुत्वमभ्युपगम्य शक्यः सङ्गमयितुम् । न खलु तात्पर्यज्ञानस्य शाब्दबोधकारणत्वपक्षे। योग्यतायाः वाक्यगतशक्तिरूपत्वेऽपि नक्यं शक्यतावच्छेदकभेदेन तद्धदात् । तथा च लवणबोधजनकतावच्छेदकशक्ति- अश्वबोधजनकताबच्छेदकशक्तिरूपयोर्योग्यतयो देन नोभयज्ञाननियमः । नियतकज्ञानेऽप्यपराज्ञानसम्भवात् । सामग्रीवैचित्र्यात् । तथा चा "कांक्षायोग्यताऽऽ- सत्तयः तात्पर्यज्ञानञ्चेति चत्वारि कारणानो" ति प्रागुक्तमूले ज्ञानपदं तत्प्रतीतीच्छ- योच्चरितत्वरूपपराभिमततात्पर्याभिप्रायेणोक्तमिति मन्तव्यम् । अत एवानुपदमेव "एव तत्प्रतीतिजदनयोग्यत्वरूपस्य तात्पर्यस्य शाब्दज्ञानहेतुत्वे" इति वक्ष्यति । यद्वा यत्रकसम्बन्धिन्यायेनोभयशक्तित्वरूपयोग्यताज्ञान तादृशस्थलविशेपे दोषः सङ्गमनीय इति । उत्तरयति- - इति चेन्न । तदितरप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्वस्यापि तात्पर्यविशेप- णत्वात् । तथा च यद्वाक्यं यत्प्रतीतिजननस्वरूपयोग्यत्वे सति यदन्यप्रतीतीच्छया नोच्चरितं तद्वाक्यं तत्संसर्गपरमित्युच्यते । -- - ततःवक्त्रभिप्रेतादर्थात् इतरस्य या प्रतीतिः तदिच्छया । अनुच्चरितत्वं उच्चारणविषयत्वाभावः । इच्छयेत्यत्र तृतीर्याथप्रयोज्यत्वस्य तदेकदेशे उच्चारणे अन्वयः । तात्पर्यविशेषणत्वादित्यत्र तात्पंय तत्प्रतीतिजननयोग्यत्व, तत्र विशेषण- त्वात् इत्यर्थः । तदन्यप्रतीतीच्छयानुच्चरितत्वे सति सत्प्रतीतिजननयोग्यत्व- मित्यस्यैवार्थस्य स्फुटीकरणं "तथा च यद्वाक्यमित्यादि । तथा च सैन्धवमानयेति" वाक्यस्थले लवणकर्मकानयनबोधकाले न नियमतः अश्वबोधापत्तिः। तथा हि- तत्पदेनाश्वग्रहणे तदितरस्य लवणस्य या प्रतीति:= शाब्दबोधः, तदिच्छयोच्चरित- त्वमेवायाति सैन्धवमानयेति वाक्ये, न तु तदितरप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्वम् । एवं विशेषणांशाभावेन तद्विशिष्टतत्प्रतीतिजननयोग्यत्वस्याभावेन तात्पर्याभावात् आगमपरिच्छेदः । १९१ नाश्वबोधापत्तिः । लवणप्रहणं तु समायाति वाक्ये तात्पर्यमिति भवति लवणकर्म- कानयनबोध इति । तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वस्य पराभिमतस्य तात्पर्यत्वे शुक्राव्युत्पन्नवाक्योर्य: तात्पर्याभावात् तादृशस्थले शाब्दवोधानुपपत्तिरापतति स्म सा नेदानीमापततीति स्पष्टयति- च शुकादिवाक्येऽव्युत्पन्नोच्चारितवेदवाक्यादौ प्रतीतीच्छाया एवाभावेन तदनन्यप्रतीतीच्छयोच्चरितत्वाभावेन लक्षणसत्त्वान्नाव्याप्तिः। शुकादीत्यादिपदेन सारिकादिपरिग्रहः । व्युत्पत्तिः वृत्तिज्ञानं तदप्राप्तोऽव्युत्पन्नः । अगृहीतवृत्तिक इति यावत् । तेनोच्चारित यद्वेदवाक्यं तदादौ । आदिपदेन तादृशवेदातिरिक्तवाक्यपरिग्रहः । प्रथमाभावो द्वितीयाभावे हेतुः। विशेषणाभावस्य विशिष्टाभावविशेषहेतुत्वात् । आयं भावः-शुकावयः अव्युत्पन्ना जना वा कस्यापि कोऽपि बोधो जायताम् इतीच्छया न समुच्चारयन्ति वाक्यानि । सति चैवं यथा तत्प्रतीतीच्छया न तदुच्चारणं तथा तदन्यप्रतीतीच्छयाऽपि न तदुच्चारणम् इति तदुच्चारितवाक्ये तदन्यप्रतीतीच्छपानुच्चरितत्वमक्षुण्णम् । आनुपूर्वीमत्तया शक्तिमत्वेन तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वमप्यस्त्येवेति न लक्षणाव्याप्तिः शाब्दबोधानुप- पत्तिर्वेति । नन्वेवं सति "एतदस्मद्वाक्यात् लवणकर्मकानयनबोधः अश्वकर्मकानयनबोधश्च जायतामितीच्छया यत्र सैन्धवमानयेति वाक्यप्रयोगः तत्र बोधाभावप्रसङ्गः । लवणेतराश्वप्रतीतीच्छया, अश्वेतरलवणप्रतीतिच्छयोच्चरितत्वस्यैव सैन्धव- मानयेति वाक्ये सत्त्वेन सत्त्वेन तदन्यप्रतीतीच्छयानुच्चरितत्वस्याभावात् इत्यशंका निराकरोति- न चोभयप्रतीतीच्छयोच्चारितेऽव्याप्तिः । तदन्यमात्रप्रतीतीच्छ- यानुच्चरितत्वस्य विवक्षितत्वात् । न चेत्यस्याव्याप्तिरित्यनेनान्वयः । उच्चरिते इत्यनन्तरं वाक्ये, अव्याप्तिरित्य- नन्तर च तात्पर्यस्येति शेषः। उभयप्रतीतीच्छयोच्चरिते वाक्ये न तात्पर्याभाव- प्रसङ्ग इत्यर्थः । तदन्यमात्र त्यत्र मात्रशब्दो भिन्नक्रमः । तथा च तदन्यप्रतीतीच्छा- १९२ वेदान्तपरिभाषा। यथा मात्रेणानुच्चरितत्त्वाभाव इत्यर्थः। उभयप्रतीतीच्छयोच्चरितवाक्ये तदन्यप्रतीतीच्छयेवा तत्प्रतीतीच्छयाप्युच्चरितत्त्वसत्त्वेन तदन्यप्रतीतीच्छामात्र णानुच्चरितत्त्वस्याक्षतिः । मात्रपदस्य श्रुतत्वे तदन्येतरा विषयिणी सती तदन्यविषयिणी या प्रतीति: तदिच्छयानुच्चरितत्त्वपर्यवसानेन दोषतादवस्थ्यापातात् । लवणाश्वकर्म- कयो: प्रतीत्यो दे द्वयोरिच्छयोस्तादृगिच्छात्वेन तदनुच्चरितत्वस्य वाक्ये अभावात् । यत्र चोभयप्रतीतिविषयिणी एकवेच्छा तत्रापि नानुपपत्तिः । तस्या इच्छायाः तदन्य- प्रतीतीच्छेतरेच्छापदेनाग्रहणेन अन्यस्या एवेच्छायाः तादृशत्वेन प्रकृतवाक्ये तत्प्रयुक्तो- च्चारितत्वाभावाक्षतेः । सकृदुच्चरितः शब्द: सकृदर्थ गमयतीति नियमपक्षे तु शङ्काया एव नावकाश इति विवक्षितत्वादित्यस्य तात्पर्यपदेनेति शेषः । ननु या या योग्यता सा सा किञ्चिद्धर्मावच्छिन्ने ति नियमात् तात्पर्यतया अभिप्रेता तत्प्रतीतिजननयोग्यता किञ्चिद्धर्मावच्छिन्ना इत्यस्य प्राप्ततया नावच्छेदक- ज्ञानं विना योग्यताज्ञानमित्यत आह- उक्तप्रतीतिजननयोग्यतायाश्चावच्छेदिका शक्तिः । समानाधिकरणयोः पदार्थयोरवच्छेद्यावच्छेदकभावस्य सर्वानुभवसिद्धतया तयोः स्थिरस्यावच्छेदकत्वं कल्पितस्यत्वावच्छेद्यत्त्वमिति नियमेन योग्यतायाः अवच्छेद्यत्वं शक्तरवच्छेदकत्वमिति भावः । नन्वच्छेदकभूतायाः शक्तेः कल्पने गौरवमित्यत आह- अस्माकं मते सर्वत्र कारणतायां शक्तेरेवावच्छेदकत्वात् इति न कोऽपि दोषः। सर्वत्र = कार्यकारणभावस्थले । यद्वा सर्वत्रेति कारणतायामित्यस्य विशेषणम् । तथा च सर्वस्यां कारणतायामित्यर्थः । अयं भाव:- अरण्यरणिसंयोग- मणिकिरणसंयोगतृणफूत्कारसंयोगादीनां वह्निमात्र प्रति कारणत्वाभ्युपगमे व्यभिचारः । कार्यवैज्ञात्यमभ्युपगम्य कार्यकारणभावत्रयस्वीकारे गौरवम् । अतो वढ्यनुकूलैकशक्तिमत्त्वेन तेषां कारणत्वं वाच्यम् । तथा च न व्यभिचारगौरवयो- रवकाशः । सति चैवं सर्वत्रैव एकरूपेण कार्यकारणनिर्वाह इति धारणात टिका शक्तिः क्लप्तव न कल्पनीया। यत: कल्पनागारः पदमादध्यात् इति आगमपरिच्छेदः १९३ । तात्पर्यज्ञानकारणत्वनिरासात् नन्वेवं सति विवरणग्रन्थविरोधः इत्याशङ्कां निराकरोति- एव तात्पर्यस्य तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वरूपस्य शाब्दज्ञानजनकत्वे चतुर्थवर्णके तात्पर्यज्ञानहेतुत्वनिराकरणवाक्यं तत्प्रतीतीच्छ्योच्चरितत्व- तात्पर्यनिराकरणपरम् । एवमित्यस्य शाब्दबोधजनकत्वे इत्यनेन सम्बन्धः । निर्णीते इति शेषः । चतुर्थ- वर्णके पञ्चपादिकाविवरणभागविशेपे । तात्पर्यज्ञानस्य यद्ध तुत्वं = शाब्दबोध- कारणत्वं, तस्य यन्निराकरणं = अस्वीकारः तत्परम् = तत्ख्यापकम् । नैयायिका- भिमतस्य तत्प्रतीतोच्छयोच्चरितत्वरूपस्य तात्पर्यस्य अस्वीकारपरो विवरणग्रन्थः । न तु तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वरूपस्य स्वतन्त्र सिद्धान्तभूतस्य तात्पर्यस्यास्वीकारपर इति भावः। ननु किमत्र विनिगमकमित्यत आह-- अन्यथा तात्पर्यज्ञानफलकवेदान्तविचारवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । अन्यथा = तात्पर्यमात्रस्य हेतुत्त्रास्वीकारे । तात्पर्यज्ञानं = तन्निर्णयः स एव फलं यस्य एतादृशो यो वेदान्तविचारः तस्य वैयर्थ्यप्रसङ्गात् इत्यर्यः । अयं भाव:- उपक्रमोपसंहारावभ्यासोपूर्वताफलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्ग तात्पर्यनिर्णये । इत्युक्तदिशा पड्विधलिङ्गः तात्पर्यनिर्णय एव वेदान्तविचारस्य फलम् । यदि तात्पर्यस्य तज्ज्ञानस्य वा कारणत्वमेव नाभ्युपगम्यते श्च त्यर्थवोधाय तात्पर्यनिर्णयो नापेक्षितः स्यात् । सति चैवं किं प्रयोजनकः स्याद्वेदान्तविचार इति । मतान्तरेण विवरणग्रन्थं सङ्गमयति- केचित्तु शाब्दज्ञानत्वावच्छेदेन तात्पर्यज्ञानं न हेतुरित्येवं परं चतुर्थ- वर्णकवाक्यम् । तात्पर्पसंशयविपर्ययोत्तरशाव्दज्ञानविशेषे च तात्पर्य- १९४ वेदान्तपरिभाषा। ज्ञानं हेतुरेव । एतद्वाक्यं एतत्परमुतान्यपरमिति संशये तद्विपर्यये च तदुत्तरवाक्यार्थविशेषनिश्चयस्य तात्पर्य विशेषनिश्चयं विनाऽनुपपत्तेरि- त्याहुः। केचिदित्यस्य आहुरित्यनेन सम्बन्धः। शाब्दज्ञानत्वावच्छेदेन = शाब्दबोधत्वा- वच्छिन्न प्रति। न हेतु: नोत्पादकम् । इत्येवम्पर एतदभिप्रायकम् । तात्पर्यस्य यः संशयः यश्च विपर्यय., तयोरनन्तरं यच्छाब्दज्ञानम्, तादृशज्ञानविशेषे इत्यर्थः । हेतुरेव उत्पादकमेव । अत्र प्रतिज्ञायां "इदं वाक्यमि"त्यारभ्य अनुपपत्ते रित्यन्तं हेतुवावयम् । तात्पर्यनिश्चयं विना तदुत्तरवाक्यार्थविशेषनिश्चय- स्यानुपपत्तेः इत्यन्वयः । अनुपपत्तरित्यस्याभावादित्यर्थः। अयमाशयः-शाब्दबोधं प्रति तात्पर्यज्ञानस्य कारणत्वं कथमभ्युपेयम् ? वक्त्रमिताद्वाक्यावन्योऽर्थों मा बुध्यतां श्रोता इत्येतदर्थमिति चेत् सत्यम् ।किन्तु तहि यत्र वाक्यस्यानेकार्थकपद- घटितत्वेन श्रोतुरनेकार्थोपस्थित्या इदं वाक्यं एतदर्थबोधानाभिप्रायेणोक्तम् आहो- स्वित् अमुकार्थबोधनाभिप्रायेणेति श्रोतुः तात्पर्यसंशयः तत्रैव तात्पर्यनिश्चयस्य हेतुत्वं वाच्यम्-यथा सैन्धवमानयेत्यादौ । यत्र वा-एतद्वाक्यं नैतवर्थबोधने- च्छयोच्चरितमिति तात्पर्यव्यतिरेकनिश्चयः तत्र निर्णायकजन्यस्य तात्पर्यनिर्णयस्य कारणत्वं शाब्दबोधं प्रति । तदर्थ तत्रस्थे शाब्दबोधे कालावलम्बस्या भवसिद्धत्वात् । परन्तु शाब्दबोधत्वावच्छिन्नं शाब्दबोधसामान्य प्रति तात्पर्यज्ञानस्य कारणत्वान्पगमो नियुक्तिकः । इत्यत्रैवाभिप्रायः पञ्चपादिकान्तर्गतस्य तात्पर्यजानकारणत्वनिराकरण- अन्यस्येति नत तो विरोधः । शाब्दबोधसामान्य प्रति तात्पर्यज्ञानस्य हेतुत्वानभ्युप- गमेऽपि शाब्दबोधविशेषताकारणत्वस्वीकारात् । अत्राहुरित्यनेनास्वरसोद्भावनम् । तीजन्तु शक्तरिव लक्षणावृत्त रपि अर्थत्वप्रयोजकतया सर्वेषामेव वाक्यानां वानार्थकपदघटिततया तात्पर्यसन्देहसम्भवेनविनिगमनाविरहात् शाब्दबुद्धित्वावच्छिन्नं प्रत्येव तात्पर्यज्ञानकारणत्वाभ्युपगमापातात् इति । ननु तात्पर्यस्यावधारणं कथं स्यात् इत्याकाक्षायामाह- तच्च तार्पयं वेदे मीमांसापरिशोधितन्यायादवधार्यते । लोके तु प्रकरण दिना। वेदे वेदवाक्ये । सप्तम्यर्थो वृत्तित्वम्, तथा च वेदवृत्तीत्यर्थः । एतत्तात्पर्य- विशेषणम् । तात्पर्यमवधार्यते इति सम्बन्धः । मीमांसा तर्कः, तेन परिशोधितः= आगमपरिच्छेदः। १९५ हेतुनिष्ठव्यभिचाराभावं गमित: यो न्यायः= अनुमानन्, तस्मात् । तथा हि- "कपिजलानालभेत" इति विधिवाक्यम्, तत्र ' बहुषु बहुवचनमि"त्यनेन श्यादि- परार्चपर्यन्तायाः संख्यायाः द्वितीयावहुवचनेन प्राप्तिसम्भवात् अशेषकपिजला- लम्भनविधेयतापरमेतद्वाक्यमिति निश्चयो भवति । अनुमानाकारस्तु-"कपिजला- निति बहुवचन त्रित्वादिसंख्यापरम् अलाक्षणिकबहुवचनत्वात् इत्येव रूपः । तर्कस्तु अशेषोपादानासहकृतप्रथमोपस्थितत्वरूपः ।" लोके लौकिकवाक्ये । सप्तम्यर्थः पूर्ववत् । प्रकरणादिना-यथा सैन्धवमानयेत्यादौ भोजनकाले मैन्धवपदस्य लवणपरतामिति निश्चयः, यात्राकाले चाश्वपरत्वमिति निश्चयः इति । . - लौकिकवैदिकवाक्ययोः सत्यपि ततितत्प्रकारकज्ञानजनकत्वेन साम्ये द्वयोःलक्षण्यमाह- तत्र लौकिकवाक्यानां मानान्तरावगर्ताथकतयाऽनुवादकत्वम् । वेदे तु वाक्यार्थस्यापूर्वतया नानुवादकत्वम् । - तत्र= लोकवेदयोर्मध्ये । अन्यन्मानं मानान्तरम्, प्रकृतवाक्यातिरिक्तयत्किञ्चि- त्प्रमाणमित्यर्थः तेन अवगत:ज्ञात: अर्थों यस्य, असौ मानान्तरावगतार्थकः, तस्य भावस्तत्ता, तया । प्रकृतवाक्यातिरिक्तयत्किञ्चित्प्रमाणजन्यप्रमितिविषयत्वेनेति यावत् । अनुवादकत्वं ज्ञातज्ञापकत्वम् । अपूर्वतया पूर्वमज्ञाततया । नानुवादकत्वं = न ज्ञातज्ञापकत्वम् । आयं भावः-शब्दगतं हि प्रामाण्यं द्विविषम्, अबाधितार्थ- ज्ञानजनकत्वरूपमेकम्, अज्ञातार्थज्ञानजनकत्वरूपमपरम् । तत्र प्रथमं वेदवाक्य- मात्रनिष्ठम् । लौकिकवाक्यस्य नियमतः अनुवादरूपत्वे न ज्ञातज्ञापकत्वात् इति । इदं पुनरिहावधेयम्-ननु किं नाम अज्ञातज्ञापकत्वमित्यत्राज्ञातत्वम् ? यदि केनापि पुरुषेण केनापि प्रमाणेन ज्ञातत्वाभावः, तदा वेदस्यापि ज्ञातज्ञापकत्वापत्तिः । तदर्थस्यापि पूर्वपूर्ववेदार्थज्ञातत्वात् । यदि च केनचित् पुरुषेणज्ञातत्वमभिप्रेतम् तदालौकिकवाक्यस्याप्यननुवादित्वापत्तिः तदर्थस्यापि केनचिदज्ञातत्वात् । तेन पुरुषेणाज्ञातार्थकत्वं तं पुरुष प्रत्यननुवादकत्वमिति चेत् लौकिकस्यानुवादकत्व वैदिकस्याननुवादकत्वमिति विभागानुपपत्तिः उभयोरप्युभयाश्रयत्वसम्भवात् । नापि प्रत्यक्षवृत्त्यविषयत्वम् । ब्रह्मणोऽपि चरमवृत्तिविषयत्वेन तद्वाक्यभूतस्य वेदस्यापि ज्ञातज्ञापकत्वापत्तेरिति चेत्, केनाऽपि पुरुषेण वाह्य न्द्रियजवृत्त्या अविषयीकृतत्वस्यै- वाज्ञातत्वपदार्थत्वात् । न च 'अग्निहिमस्य भेषज मिति वेदस्य तहिं ज्ञातज्ञापकत्वेन वेदान्तपरिभाषा । "वेदे तु वाक्यार्थस्यापूर्वतया नानुवादकत्वम्" इति वेदत्वावच्छेदेन अननुवादकत्व- प्रतिज्ञाहानिरिति वाच्यम् । प्रकृतस्य वेदपदस्य तादृगतिरिक्तविषयकत्वात् इति । ननु कार्यतावाचि लिङ लोट्तव्यप्रत्ययादिघटितवाक्यस्य शाब्दबोधजनकतया प्रामाण्येऽपि "नित्य विज्ञानमानन्द ब्रह्म" "तत्त्वमसी"त्यादिवाक्याना प्रामाण्यं दुरुपपादमेव, प्रमा प्रति कर्तृत्वकरणत्वयोरभावात् । सति चैव "वेदे तु वाक्यार्थस्यापूर्वतया नानुवादकत्वमिति ग्रन्थासङ्गतिरित्यत आह- तत्र लोके वेदे च कार्यपराणामिव सिद्धार्थानामापि प्रामाण्यम् । पुत्रस्ते जातः इत्यादिषु सिद्धार्थेऽपि पदानां सामर्थ्यावधारणात् । अत एव वेदान्तानां ब्रह्मणि प्रमाण्यम् । यथा चैतत्तथा विषयपरिच्छेदे वक्ष्यते । कार्यपराणामिव =किञ्चिनिष्ठ-कृतिसाध्यत्वज्ञापकानामिव । सिद्धार्थानां - कृतिसातत्वेनाननुज्ञातार्थकानाम् । प्रामाण्यं अग्रहीतार्थज्ञापकत्वम् । इत्यादिषु= इत्यादिवाक्यप्रयोगस्थले सिद्धः कृतसाध्यो योऽर्थः तस्मिन्नपि । पदानां सामर्थ्यावधारणात् शक्त्यवधारणात् । अयमाशयः-यदि कोऽपि चैत्रसमीपमागत्य 'हे चैत्र! तब गृहे पुत्रः समुत्पन्नः' इति ब्रूते तहि तच्छ त्वैव चैत्रमुखं विकसितं भवतीति प्रत्यक्षसिद्धं सर्वेषाम् । तन्मुखविकासस्तु नाकस्मात् भवितुमर्हति कार्यस्य सकारणकत्वनियमात् । इति मुखविकासकारणं सुखं चैत्रात्मनि समुत्पन्नमित्यवगन्त. व्यम् । अवगम्यस्य सुखस्यापि च कार्यतया तेनापि सकारणकेन भवितव्यम् । तच्च कारणं न "चत्र पुत्रस्ते समुत्पन्नः" इति वाक्यजन्याच्छाब्वबोधात् अन्यत् किमपि वक्त शक्यते । अन्यस्य कस्यापि तत्र सुखान्वयव्यतिरेकाननुविधायित्वात् । सति चवं "चत्र पुत्रस्ते समुत्पन्नः" इति वाक्यात् कार्यतावाचकलिङ लोट्तव्यप्रत्यया- घटितात् शाब्दबोधो भवतीति इत्यपलपम् । एवं च 'चैत्र पुत्रस्ते जातः' इत्यादि- सिद्धवाक्यवत् 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म 'नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म 'तत्वमसि' इत्यादीनां सिद्धार्थकानां वेदान्तवाक्यानामपि शाब्दबोधजनकत्वं तेन च प्रामाण्य- मक्षुण्णमिति 'वेवे तु वाक्यार्थस्यापूर्वतये'त्यादिग्रन्थस्य नासङ्गतिरिति । ननु वेदे प्रमाण्यस्यानिश्चये वेदान्तःपातिनां वेदान्तवाक्यानामपि प्रामाण्यम- निश्चितमेव स्यात् । अत: प्रथमं वेदस्य प्रामाण्यं व्यवस्थाप्यम् । न खलु शाब्दबोजनक- आगमपरिच्छेदः । १९७ वाक्यत्वमात्रेण वेदप्रामाण्यं वक्तुं सुकरम् । तथा सति लौकिकानुवादकवाक्यात् वेदस्य वैलक्षण्यं न स्यात्, शाब्दबोधजनकत्वस्य समानत्वात् । अतस्तत्स्थापनाय प्रथमं गौतममतमाह- नित्यसर्वज्ञपरमेश्वरप्रणीतत्वेन प्रामाण्यमिति वेदानां नैयायिकाः। तत्र लौकिकवेदवाक्ययोर्मध्ये । नित्यं = सदा, सर्व जानातीति नित्यसर्वज्ञः, तत्प्रणीतत्वेन त्तत्कत कत्वेन । योगिव्यावृत्तये नित्यपदम् । अस्मदादिव्यावृत्तये सर्वज्ञपदम् । अयं भावः-नित्यसर्वज्ञस्य परमेश्वरस्य न भ्रमप्रमादकरणापाटवादि- दोषसम्भव इति दोषाभावात् तस्य प्रामाण्यमक्षुण्णम् । सति चैवं आप्तवाक्य- त्वरूपस्य शब्दगतस्य प्रामाण्यस्य वेदे सत्ता अबाधितेति ।न चाप्तवाक्यत्वरूपस्य प्रामाण्यस्य वेदेऽभ्युपगमे लौकिकवैदिकवाक्ययोरविशेषापत्तिः। लौकिकवाक्यकत्त- नित्यसर्वज्ञत्वाभवेन कत्त वैलक्षण्यप्रयुक्तस्य वैलक्षण्यस्य तयोः सुवचत्वात् इति। -- राप्तस्य वेदप्रामाण्यविषये कर्ममीमांसकमतमाह- वेदानां नित्यत्वेन निरस्तसमस्तदूषणाशंकतया प्रामाण्यमित्य- ध्वरमीमांसकाः। नित्यत्वेन प्रागभावध्वंसयोरप्रतियोगितया । समस्तानि दूषणानि समस्त- दूपणानि तेषामाशंका समस्तदूषणाशंका, सा निरस्ता यत्रासौ निरस्तसमस्तदूषणाशंकः, तस्य भावस्तत्ता, तया। नित्यत्वं निरस्तसमस्तदूषणाशङ्कतायां हेतुः । अयमभिप्राय:- वर्णात्मक: शब्दो नित्यः, तथा च तदात्मकतया वेदोऽपि नित्य इति न कोऽपि लत्कर्ता । सति चवं न भ्रमप्रमादकरणापात्टादिदोषप्रयुक्तदोषलेशाशङ्का वेदे इत्यतस्तेषां प्रामाण्यम् । यद्यपि वर्णनित्यत्वस्य प्रामाण्यप्रयोजकत्वाभ्युपगमे लौकिकवैदिकवाक्ययोरविशेषापत्तिः, तथापि वेदस्थले सानुपूर्वीकवर्णाना नित्यत्वम् । अन्यत्र तु न तथेति नाविशेषापत्तिलौकिकवैदिकवाक्ययोः । यद्वा न केवलं नित्यवर्णात्मकत्वस्य प्रामाण्यप्रयोजकतायामभिप्रायः अपितु अज्ञातज्ञापकत्वे सति नित्यवर्णात्मकत्वस्य । तथा च न लौकिकवाक्यानां वैदिकवाक्याविशेषापातः ।
वेदान्तपरिभाषा । अपौरुपेयत्वात् वेदवाक्यानां प्रामाण्यमित्युपसंहत प्रथम कर्ममीमांसकमतं दूपयति- - अस्माकं तु मते वेदो न नित्यः, उत्पत्तिमत्त्वात् । अस्माकं - वेदान्तिनाम् । उत्पत्तिमत्त्वात् प्रागभावप्रतियोगित्वात् । अयमभिसन्धिः-यद्यत् प्रागभावप्रतियोगि तत्तदनित्यमिति दृष्टा व्याप्ति: प्रागभावसर्वत्र जन्यपदार्थे सति चैवं वेदस्यापि प्रतियोगितया ध्वसप्रतियोगित्वरूपमनित्यत्वमभ्युपेयम् । व्याप्यसत्त्वे व्यापकसत्त्वावश्यकत्वात् । तथा च न नित्यत्व वेदानां यन्निरस्तसमस्तदूषणतायां भवेद्ध'तुः । स्थापयेच्च वेदाना प्रामाण्यामति । ननु पक्षे वेदे प्रागभावप्रतियोगित्वरूपमुत्पत्तिमत्त्वमेवासिद्धमिति स्वरूपासिद्धिरत आह- उत्पत्तिमत्त्वं च "अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् यदृग्वेदो यजुर्वेदः” इत्यादिश्रुतेः । अस्य महतो भूतस्य = परमेश्वरस्य । नि:श्वसितम् = श्वासप्रश्वासवत अप्रयत्ननिर्गतम् । ऋग्यजुर्वेदात्मकं वस्तु इत्यर्थः । - ननु तहि वेदानित्यत्वाभ्युपगमे न्यायमतप्रवेशः इत्याशङ्कायामाह- नापि वेदानां त्रिक्षणावस्थायित्वम् । य एव वेदो देवदत्तेनाधीतः स एव मयापीत्यादिप्रत्यभिज्ञाविरोधात् । त्रिक्षणावस्थायित्वमपि वेदानां नेत्यन्वयः । त्रिक्षणावस्थायित्वन्तु तृतीयक्षण- वृत्तिध्वंसप्रतियोगित्वस्पं बोध्यम् । तेन नासङ्गतिः । अन्यथा नैयायिक: प्रथमतृतीयक्षणयोः शब्दोत्पादनाशाभ्युपगमेन मध्यक्षण एव तत्स्थितिस्वीकारेणा- सङ्गतिप्रसङ्गात् । “य एव वेदो देवदत्तेनाधीत: स एव मयापी"ति प्रत्यभिज्ञाकारः । आदिपदेन य एव तेन श्रुतः स एव मयापीत्यादिप्रत्यभिज्ञापरिग्रहः । नन्वेवं सति आनुपूविशि सिलसिल्पपि वर्णनित्यत्वासिद्धिः इत्यत आह- आगमपरिच्छेदः। अत एव गकारदिवर्णानामपि न क्षणिकत्वं सोऽयं गकार इति प्रत्यभिज्ञाविरोधात् । अत एव -प्रत्यभिज्ञाविरोधादेव । न क्षणिकत्वं = न तृतीयक्षणवृत्तिध्वंस- प्रतियोगित्वम् । यथा प्रत्यभिज्ञाविरोधात् आनुपूर्वीविशिष्टशब्दात्मकवाक्यस्य न नित्यत्वं तथा तदवयवभूतस्य वर्णात्मकशब्दस्यापि न नित्यत्वमिति भावः । ननु यदि क्षणिकत्वमपि नाङ्गीक्रियते वेदानां, नित्यत्वमपि च तहि कीदृकमङ्गीक्रियते ? इत्याकाक्षायामाह- - तथा च वर्णपदवाक्यसमुदायरूपस्य वेदस्य वियदादिवत् सृष्टिकाली- नोत्पत्तिकत्व प्रलयकालीनध्वंसप्रतियोगित्वञ्च । न तु मध्ये वर्णानामु- त्पादविनाशौ । अनन्तगकारादिकल्पनायां गौरवात् । तथा च=नित्यत्वक्षणिकत्वयोरनङ्गीकारे च वर्णाश्च पदानि च वर्णपदवाक्यानि, तत्समुदायरूपस्यतत्समुदायात्मकस्य । वर्णानां पदानाञ्च पृथगुल्लेखः तत्रानित्य- त्वस्पष्टीकरणार्थः । वियदादिवत् आकाशादिवत् । आदिपदात् वाय्य्वादीना- मुपग्रहः । सृष्टिकालीना उत्पत्तिर्यस्य तत् सृष्टिकालीनोत्पत्तिकम्, तस्य भावस्तत्त्वम् । प्रलयकालीनो ध्वंसः प्रलयकालीन:ध्वंसः, तत्प्रतियोगित्वम् । अयं भावः-शब्दानां तृतीयक्षणे नाशाभ्युपगमे असंख्यककारविकल्पनायां महद् गौरवम्, सोऽयं ककार इत्याविप्रत्यभिज्ञाविरोधश्च । सर्वथा नित्यत्वाम्पगमे "नेह नानास्ति किञ्चन" इत्याद्यद्वतश्रुतिविरोषः। अतो नात्यन्तनित्यत्वं न वा अत्यन्तानित्यत्वं । तथा च नत्यत्वधवा स्तस्य एकसृष्टावविनाशित्वात् । अनित्यत्वन्तु प्रागभावव्वंसप्रतियोगि- . त्वात् इति । नन्वेकसृष्टावकककारादिस्वीकारे सततं कथं न तच्छ्वणम् ? इत्याशङ्कायामाह- अनुच्चारणदशायां वर्णानामनभिव्यक्तिस्तूच्चारणरूपव्यञ्जका- भावान्न विरुध्यते, अन्धकारस्थपटानुपलम्भवत् । अनुच्चारणदशाया =कण्ठताल्वाद्यनभिघातदशायाम् । अनभिव्यक्तिः =अज्ञानं अश्रवणमित्यर्थः । उच्चारणं = कण्ठताल्वाद्यभिघातः, तद्रूपः तदात्मको योऽभि- व्यञ्जक:-आविर्भावकारणम, तदभावात। न विरुध्यते-नानुपपद्यते । प्रदीपात्मक- २०० वेदान्तपरिभाषा। व्यञ्जकाभावात् यथा अन्धकारस्थघटादीना न ज्ञानं, कण्ठताल्वाद्यभिघाताभावात् तथा विद्यमानस्यापि ककारादेः न श्रवणमिति भावः । घटाद्यनुपलब्ध्या यथा आवरणात्मकस्य तमसः स्वीकारः तथा ककाराद्यनुपलब्ध्या ककाराद्यावरकमपि किञ्चिवभ्युपेयम् कण्ठताल्वाधमिधातानिवृत्तिरिति कल्पनागौरवम् अनन्तककारादिकल्पनातस्तथापि लाघवात् इत्यभिप्रायः । यस्य भावः । - ननूत्पन्नो गकार इत्यनुभवविरोधः इत्याशकां परिहरन्नुपसंहारमाह- उत्पन्नो गकार इत्यादि प्रत्यक्ष तु "सोऽयं गकार" इति प्रत्यभिज्ञा- विरोधादप्रमाणम् । वर्णाभिव्यञ्जकध्वनिगतोत्पत्तिनिरूपितपरम्परा- सम्बन्धविषयकत्वेन प्रमाणं वा । तस्मान्न वेदानां क्षणिकत्वम् । - आदिपदात् नष्टो गकार इत्यादिपरिग्रहः । अप्रमाणं = भ्रमः। अयं भावः- उत्पादविनाशविषयकप्रत्यक्षस्य प्रामाण्याभ्युपगमे अनन्तगकारादितत्प्रागभावध्वंसादि- करना: सोऽयं गकार इति प्रत्यभिज्ञा विरोधश्च सोऽयं गकार इति प्रत्यभिज्ञा- प्रामण्यस्वीकार च केवलं वर्णोत्पादनाशविषयकप्रतीत्यप्रामाण्याभ्युपगमः, तेन महल्ला- घवम् । अतः एकसृष्टौ एककारादिकल्पनैव साधीयसी । द्वयोः प्रत्ययोः कथञ्चित् प्रामाण्यसम्पादनाय वर्णाभिव्यञ्जकेति कल्पान्तरानुसरणम् । वर्णस्याभिव्यञ्जको यो ध्वनि: तद्गता या उत्पत्ति. तन्निरूपित. अर्थात् तत्प्रतियोगिको य. परम्परासम्बन्धः, तद्विषयकत्वेन । वाकारानन्तरं "उत्पन्नो गकार इति प्रत्यक्षम्" इत्यस्य सम्बन्धः । स्वाश्रयाभिव्यङ्गयत्वसम्बन्धेन न ध्वनिगता उत्पत्ति वर्णे समानीय उत्पन्नो गकार इत्यादि प्रत्यक्षम् । निरुक्तपरम्परया उत्पत्त: वर्णोऽपि सत्त्वात् उत्पन्नो गकार इत्यस्य परम्परयोत्पत्तिविषयकस्य प्रामाण्यमित्यभिप्रायः । तस्मात् वर्णानामेकसृष्टी नानोत्पादविनाशानभ्युपगमात् न क्षणिकत्वम् = न तृतीयक्षणवृत्तिध्वंसप्रति- योगित्वम् । सर्गाद्यन्तयोरुत्पादविनाशाभ्युपगमेऽपि वदस्य पौरुषेयत्वापत्त्या अपौरुषेयत्व- सिद्धान्तभङ्गः कथं न ? इत्याशङ्कते- ननु क्षणिकत्वाभावेऽपि वियदादिप्रपञ्चवदुत्पत्तिमत्वेन परमेश्वर- कत्तूंकतया पौरुषेयत्वापत्तौ अपौरुषेयत्वं वेदानामिति तव सिद्धान्तो भज्यते ।
आगमपरिच्छेदः । २०१ माऽस्तु क्षणिकत्वं तथाऽपि सृष्टेरादौ यदि वर्णाना तत्समुदायस्य वेदस्य योत्पत्तिः स्वीकृता तदा अवश्यं परमेश्वरकृतिजन्यता तत्रोपेया । कार्यमात्र प्रति कृते कारणत्वस्यानपलापात् । तथा च परमेश्वरात्मकपुरुषजन्यतया वेदाना पौरुषे- यत्वमापतितम्, इत्यपसिद्धान्तापातः । वेदान्तिभिरपि वेदेपौरुषेयत्वाभ्युपगमात् इति भावः । उत्तरयति- इति चेन्न । न हि पुरुषेणोच्चार्यमाणत्वं पौरुषेयत्वम् । गुरुमतेऽपि पौरुषेयत्वापत्तेः । नापि पुरुषाधीनोत्पत्तिकत्वम् । नैयायिकाभिमतपौरुषेय- त्वानुमानेऽस्मदादिना सिद्धसाधनतापत्तेः । न होत्यस्य पौरुषेयत्वमित्यनेनान्वयः । पुरुषेणेति तृतीयार्थो जन्यत्वम्, तस्यो- च्चारणे अन्वयः । उच्चारणं तु कण्ठताल्वादिसंयोगविभागरूपम् । तथा च पुरुषजन्यवर्तमानकालककण्ठताल्वानियोगविभाग विषयत्वं न पौरुषेयत्वमित्यर्थः । विषयत्वन्तु तदभिव्यङ्ग्यत्वरूपं बोध्यं तेन नासङ्गतिः । नापीत्यनन्तरं पौरुषेय- त्वमित्यस्य सम्बन्धः । पुरुषाधीनोत्पत्तिकत्वमपि पौरुषेयत्वं नेति सम्बन्धः । पुरुषाधीना उत्पत्तिर्यस्य असौ पुरुषाधीनोत्पत्तिका, तस्य भावस्तत्त्वम् । नैयायिकानां गौतममतानुयायिनां अभिमत यत् पौरुषेयत्वानुमानं वेदो पौरुषेयो वाक्यात् भारतादिवत् इत्यादिरूपम्, तत्र अस्मदादिना पौरुषेयत्वघटकेन पुरुषपदेन वेदनिष्पाद- नादृष्टवज्जीवमुपगृह्य । अयमभिप्रायः--यादशस्य पौरुषेयत्वस्यापादनं वेदे समभीष्टं, किं नाम तत् ? यदि वर्तमानकालिकं किञ्चित्पुरुषकर्तृकं यदुच्चारणं तद्विषयत्वम् ? तदा वेदापौरुषेयत्वाग्रहिणां कर्ममीमांसकानामपि तन्नाभिमतं स्यात् । वर्तमानकाले वेदोच्चारणस्य तैरप्यङ्गीकारात् । यदि किञ्चित्पुरुषसमवेत- कृतिजन्यत्वरूपम् ? तदा तत्कर्तृतया परमेश्वरं साधयतां नैयायिकानां स्वयं नाभीष्ठ- सिद्धिः । अदृष्टद्वारा अस्मदादेर्जीवस्यापि तत्कर्तृतया, अनुमानानां वेद: पौरुषेयो वावयत्वात् भारतादिवत् इत्यादीनां सिद्धसाधनदोषग्रस्तत्वात् । नथा च किं विघं पौरुषेयत्वमादाय अपौरुषेयत्वभङ्गः तार्किकाभिमतः ? इति । , स्वीकरणीयं पौरुषेयत्वस्वरूपमाह- सजातीयोच्चारणानपेक्षोच्चारणविषयत्वम् ।
२०२ वेदान्तपरिभाषा। यत् उच्चारणं सजातीयमुच्चारणं नापेक्षते तत्सजातीयोच्चारणानपेक्षोच्चारणं, तद्विषयत्वमित्यर्थः उच्चारणो साजात्यन्तु एकानुपूर्वीकवाक्याभिव्यञ्जकत्वम् । तथा च इदानीन्तन कण्ठताल्वादिविभागादिव्यङ ग्यवाक्यगतानुपूर्वीमत्प्राक्तनवाक्या- भिव्यञ्जककण्ठताल्वादिविभागानभिव्यर क्तित्वम् इति सरलार्थः । प्रकृते ततः किं फलम् ? इत्याकांक्षायामाह- तथा च सर्गाद्यकाले परमेश्वरः पूर्वसर्गसिद्धवेदानुपूर्वीसमानानु- पूर्वीकं वेदं सजातीयोच्चारणानपेक्षोच्चारणविषयत्वं पौरुषेयत्वम् । - सर्गाद्यकाल: - अवान्तरसृष्ट्यादिकाल., तस्मिन् । पूर्वसर्गसिद्ध = पूर्वसृष्टी ज्ञातो यो वेद. तदानुपूर्व्या समाना = अभिन्ना आनुपूर्वी यस्य तम् । न तु तद्विजातीयं = न तु भिन्नानुपूर्वीमन्तं । इतीति हेतौ। पौरुषेयत्वमित्यनन्तरं वेदस्येति शेषः । अनादे: कालात् एकवानुपूर्वी वेदानां सत्यपि सृष्टिभेदे, तत्तदुत्पन्न- सृष्टिभेदेऽपि च । तथा चानुपूर्व्या एकत्वमादाय वेदानामपौरुषेयत्वप्रवादो न तु वेदाभेदादिति परमार्थः । आनुपूर्वीपरतन्त्र एव परमेश्वरो वेदकर्ता इति । महाभारतादीनां तु न तथा अपौरुषेयत्वमित्याह- महाभारतादीनां तु सजातीयोच्चारणमनपेक्ष्यवोच्चारणमिति तेषां पौरुषेयत्वम् । -- महाभारतादीनां न सर्व पूर्वपूर्वसतिमिति का प्रत्याशा तदानुपूयकत्व- स्येति न तेषु वेदवत् सजातीयोच्चारणविषयत्वमिति पौरुषेयत्वं तस्येति भावः । प्रतिज्ञातमुपसंहरति- एवं पौरुषेयापौरुषेयभेदेन द्विविध आगमो निरूपितः । स्मृत्यादिरूपः पौरुषेयः । वेदात्मकस्त्वपौरुषेयः । निरूपितः = बोधानुकूल- व्यापारविषयः कृतः। इत्यागमपरिच्छेदः।
अर्थापत्तिपरिच्छेदः । २०३ अर्थापत्तिपरिच्छेदः। ये अर्थापत्ति स्वतन्त्रप्रमाणतया नाभ्युपगच्छन्ति तन्मतनिरासायाह- इदानीमापत्तिनिरूप्यते । इदानी - आगमप्रमाणनिरूपणानन्तरम् । वाक्यार्थबोधप्रकारः पूर्ववदवसेय.। सङ्गतिश्च अवसरः, श्रुतार्थापत्तिमादायोपजीव्योपजीवकभावो वा । लक्षणाकांक्षाया तत्सौलभ्याय प्रथममर्थापत्तिप्रमामाह- तत्रोपपाद्यज्ञानेनोपपादककल्पनमापत्तिः । - तत्र - अर्थापत्तौ निरूपणीयायाम् । ज्ञानेनेत्यत्र तृतीयार्थः करणकत्वम् । तस्य कल्पनपदार्थे अन्वयः । तथा च उपपाद्यस्य यत् ज्ञानं, तत्करणकं यत् उपपादकस्य कल्पनं तदेवार्थापत्तिप्रमा । इदमत्रावधेयम्-अर्थापत्तिशब्द: उभयवाची-प्रमावाची प्रमाणवाची च । तत्र अर्थस्य = वस्तुन. आपत्ति: = आपादनं सम्पादनं - प्रमाज्ञानं अर्थापत्तिः प्रमा। अर्थस्यापत्तिः प्रमाज्ञानं यतः तत् अर्थापत्तिप्रमाणम् । ननु प्रस्तुतत्वात् प्रमाणस्य प्रमालक्षणाभिधानमनुचितमित्यत आह- तत्रोपपाद्यज्ञानं करणम् । अर्थापत्तिप्रमायाम् । उपपाद्यस्य ज्ञानं उपपाद्यज्ञानम् । करणमित्यर्थः । तथा चार्थापत्तिप्रमाकरणमर्थापत्तिप्रमाणमिति भावः । तत्र - प्रागुक्ता अर्थापत्तिप्रमामेव फलत्वेन परिचाययति- उपपादकज्ञानं फलम् । उपपादकस्य ज्ञान उपपादकज्ञानम्, तत् फलं कार्यम् अर्थापत्तिप्रमाणस्य इत्यर्थः। ननु को नाम उपपाद्योपपादको ? इत्याकांक्षायामाह- येन विना यदनुपपन्नं तत्तत्रोपपाद्यम् । यस्याभावे यस्यानुपपत्तिः तत्तत्रोपपादकम् ।
वेदान्तपरिभाषा । २०४ अत्र प्रथमयत्पदस्य द्वितीयतत्पदेन, द्वितीययत्पदस्य च प्रथमतत्पदेन सम्बन्धो बोध्यः । तथा च तदभावप्रयोज्याभावप्रतियोगित्वं उपपाद्यत्वम् । तदभावप्रयोजका- भावप्रतियोगित्व उपपादकत्वम् । प्रथमतत्पदेन प्रयोजकस्य द्वितीयतत्पदेन प्रयोज्यस्य ग्रहणामादाय लक्षणसमन्वयो विधेयः । दृष्टान्तद्वारा उपपाद्य परिचाययति- यथा रात्रिभोजनेन विना, दिवाऽभुञानस्य पीनत्वमनुपपन्नमिति तादृशपीनत्वमुपपाद्यम् । - दिवाऽभुञानस्य = दिनाधिकरणकभोजनाभाववत: पुरुषस्येति यावत् । भोजनाभावे पीनत्वाभावात् भोजनाभावप्रयोज्योऽभावः पीनत्वाभावः, तत्प्रतियोगित्वं पीनत्वस्येति तत्र प्रागुक्तोपपाद्यत्वलक्षणसमन्वयः । एवं उपपाद्यमवबोध्य उपपादकमवबोधयति- यथा वा रात्रिभोजनस्याभावे तादृशपीनत्वस्यानुपपत्तिः इति रात्रि- भोजनमुपपादकम् । वाकारः स्वर्थकः । तादृशपीनत्वस्य =दिवाभोजनरोगाद्यप्रयुक्तस्य पीनत्वस्य इत्यर्थः । तेन न तादृशपदवैयर्थ्यम् । अत्र "तत्" पदेन तादृशपीनत्वमुपगृह्य प्रदर्शितोपपादकत्वलक्षणसमन्वयोऽवसेयः । तथा हि-तदभावः-दिवाऽभोजिगत- पीनत्वाभावः, तस्य प्रयोजक: अभाव. = रात्रिभोजनाभावः, तत्प्रतियोगित्वं रात्रिभोजनस्यति । एक: अर्थापत्तिशब्द: प्रमा प्रमाणं च कथं बोधयति ? इत्याशंकानिरासाय प्रमाबोधिका व्युत्पत्तिमाह- रात्रिभोजनकल्पनारूपायां प्रमिती अर्थस्य आपत्तिः कल्पना इति षष्ठीसमासेन अर्थापत्तिशब्दो वत्तंते । प्रमिती अर्थापत्तिशब्दो वर्तते इति योजना। सप्तम्यर्थों निरूपितत्वम् । वर्तते इत्यस्य वृत्तिमान् भवतीत्यर्थः । तत्र वृतौ निरूपितत्वस्य अन्वयः । तथा च रात्री योजनं तस्य या कल्पना, तद्रूपा या प्रमितिः = यथार्थज्ञानं, तन्निरूपितावयव- अर्थापत्तिपरिच्छेदः। २०५ शक्तिमान् अर्थापत्तिशब्दः, इत्यर्थः । अवयवशक्तिः स्पष्टीकृता "अर्थस्य आपत्तिः = कल्पना इति षष्ठीसमासेन" इत्यनेन । षष्ठीसमास: षष्ठीतत्पुरुषसमासः, तेन प्रमाणबोधिका व्युत्पत्तिमाह- कल्पनाकरणे पीनत्वादिज्ञाने तु "अर्थस्य आपात्तिः कल्पना यस्मात्" इति बहुब्रीहिसमासेन वर्तते । कल्पनायाः-प्रमितेः, करणं = असाधारणकारणं प्रमाणं तस्मिन् । किन्तत् ? इत्याकांक्षायामुक्त "पीनत्वादिज्ञाने" इति । उपपादकज्ञाने इति तदर्थः । तेन नान्य- स्थलासंग्रहः । “वर्त्तते" इत्यर्थः । तदन्वयश्व पूर्ववत् बोध्यः । उपसंहरति- इति फलकरणयोरुभयोस्तत्पनयोगः । इति एवं प्रकारेण । फलं उपपादकज्ञानम्, करणं-उपपाद्यज्ञानं तयोः, उभयोः । तत्पदस्य अर्थापत्तिशब्दस्य । प्रयोगः=व्यवहारः इत्यर्थः । उक्तामर्थापत्ति विभजते- सा चार्थापत्तिद्विविधिा, दृष्टार्थापत्तिः श्रुतापत्तिश्चेति । साम्प्रोक्तप्रमितितत्करणरूपा । दृष्टो योऽर्थः तदापत्ति:=दृष्टार्थापत्तिः । श्रुतो योऽर्थस्तदापत्तिः = श्रुतापत्तिः । तद्भेदात् वैविध्यमिति भावः । तत्र प्रथमां उदाहरति- दृष्टार्थापत्तिर्यथा-इदं रजतमिति पुरोवत्तिनि प्रतिपन्नस्य रजतस्य, नेदं रजतमिति तत्रैव निषिध्यमानत्वं सत्यत्वेऽनुपपन्नमिति, रजतस्य सद्भिन्नत्वं सत्त्वात्यन्ताभाववत्त्वं वा मिथ्यात्वं कल्पयति- .........." .................... रजतस्य सत्यत्वे अनुपपन्न निषिध्यमानत्वं तत्र मिथ्यात्वं कल्पयतीति व्यवहितेन सम्बन्धः। पुरोवत्तिनि इदं रजतमिति प्रतिपन्नस्येति सम्बन्धः । पुरोवत्तिनि-शुक्तिकादो। "इदं रजतम्" इत्याकारा या प्रतीतिः तां गतः -- प्राप्तः-इदं रजतमिति प्रतिपन्नस्तस्य । इदं २०६ वेदान्तपरिभाषा। - रजतमित्याकारकज्ञानविषयस्येत्यर्थः । एतेन तत्रत्यरजतस्य प्रातिभासिकत्वमुक्तम् । सत्यत्वे-प्रातिभासिकेतरत्वे । तत्रैव-शुक्तिकादौ । नेदं रजतमिति निषिध्यमानत्वं- "इदं पुरोवत्ति रजतं न" इत्याकारकवुद्धिविषयत्वम् । अनुपपन्न = असम्भवि । सद्भिन्नत्वं = प्रातीतिकेतरसत्त्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकभेदवत्त्वम् । सत्त्वात्यन्ताभाव- वत्त्वं तादृशसत्त्वत्वावछिन्नप्रतियोगिताकात्यन्ताभाववत्त्वम्। व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न- प्रतियोगिताकाभावाभ्युपगमे तु प्राक् मिथ्यात्वानुमाने प्रतिपादितमत्रापि बोध्यम् । कल्पयति निश्चाययति । अयं भावः-शुक्तिकादी प्रतीयमानं रजतं यदि सत्यं स्यात, कथं परक्षण एवं ने रजतमिति निषेधधियं कुर्यात् प्रमाता ? करोति च तथेति शुक्तिकादौ प्रतीयमानं रजतं न सत्यमपितु मिथ्यैवेति यनिश्चिनोति जनः, तत्र दृष्टानुपपत्तिर्बोध्या । निषिध्यमानत्वज्ञानं प्रमाणभूता अर्थापत्तिः "प्रतीयमानं रजतं मिथ्या" इति निश्चयः फलमूता अर्थात् प्रमाभूता अर्थापत्तिः । भवतीति शेषः । - श्रुतापत्तिमुदाहरति- श्रुतार्थापत्तियथा-यत्र श्रूयमाणवाक्यस्य स्वार्थानुपपत्तिमुखेना- न्तरकल्पकत्वम् । यथा तरति शोकमात्मविदित्यत्र श्रुतस्य शोकशब्द- वाच्यबन्धजातस्य ज्ञाननिवर्त्यत्वस्यानुपपत्त्या बन्धस्य मिथ्यात्वं कल्प्यते । यत्र =यादृशस्थले । वाक्यस्य अर्थान्तरकल्पकत्वमिति सम्बन्धः । स्वं = श्रूयमाण- वाक्यं, तस्य योऽर्थः, तस्य या अनुपपत्तिः अनुपपद्यमानता, तन्मुखेन तद्वलात् इत्यर्थः । इत्यत्र अस्मिन् वाक्ये । श्रुतस्य शाब्दबोधविषयस्य । तेन नासङ्गतिः । शोकशब्देन वाच्यः-वचनीय:-कथनीयो यो बन्घजातः = शरीरादिबन्धसमुदायः, तस्य । ज्ञानेन निवर्त्यत्वं ज्ञाननिवर्त्यत्वम्। तस्य अनुपपत्ति:, ज्ञाननिवत्य॑त्वानु- पपत्तिः । ज्ञाननिवर्त्यत्वञ्च ज्ञानसाधनकबाधविषयत्वम्, तेन नासङ्गतिः । अयं भाव:- भूयते खलु "तरति शोकमात्मवित्" इति । आत्मवित्-आत्मज्ञानवान्, शोक तरतिबन्धरहितो भवति इत्यर्थः । श्रुत्यानया आत्मज्ञानं बन्धविगमहेतुः । आत्मज्ञानेन हेतुना धायसो भवति इत्याद्यर्थः प्रतीयते । किन्तु शाग्दी प्रतीतिरियं तदेव घटते यदि शोकशम्बवाच्यस्य बन्धस्य मिथ्यात्वं भवति, नान्यथा । न हि तात्विकस्यार्थस्य येन केनचित् बानेन विगमः शक्यसम्पा: । अतः कल्प्यते यत् न अर्थापत्तिपरिच्छेदः। २०७ . बन्धस्तात्विकः, अपि तु मृषवेति । अत्र तरति शोकमात्मवित् इति वाक्यार्थबोधा- नुपपत्त्या बन्धमिथ्यात्वं कल्पितं भवतीति श्रुतापत्तिः । श्रौतमुदाहरणं प्रदर्य लौकिकमुदाहरणमाह- यथा व जीवी देवदत्तो गृहे नेति वाक्यश्रवणानन्तरं जीविनो गृहासत्त्वं बहिः सत्त्वं कल्पयति । वाकार: विकल्पार्थकः । तथा च यथा वा इत्यस्य अथवा इत्यर्थः । जीवी- जीवनवान्, समर्थ इत्यर्थः । न तु अमृत इत्येतावन्मात्रम् । अमृतस्यापि निरीहादे- बहिर्गमनासामर्थ्येन बहिस्सत्त्वनिश्चयस्य दुस्साध्यापत्तेः । गृहे नेति वाक्यश्रवणा- नन्तरं-गृहे नास्तीति वाक्यश्रवणानन्तरम् । अयं भाव:-जीवन् जनः गृहे तिष्ठति बहिर्वा । नेतस्तृतीया गतिरस्ति । तत्र जीवी देवदत्तः गृहे नास्तीति श्रवणे, जीवनो गृहासत्त्वं बहिः सत्त्वं विनाऽनुपपन्नमिति जानतः "देवदत्त: बहिः सत्त्ववान्" इति निश्चयो भवतीति नात्र भवितुमर्हति केषामपि काचन विप्रतिपत्तिः । अतो जीवित्वसमानाधिकरणगृहनास्तित्वरूपस्य शाब्दबोधविषयस्य तदहिः सत्त्वं विनानुपपत्तिज्ञानं अर्थापत्तिप्रमाणम् । "देवदत्त:" बहिस्सत्त्ववान् इति निश्चयः अर्थापत्तिप्रमेति । श्रुतापत्तिमपि विभजते- श्रुतार्थापत्तिश्च द्विविधा अभिधानानुपपत्तिः अभिहितानुपपत्तिश्च । अभिधानं = शब्दः तदनुपपत्नि: अभिधानानुपपत्तिः । अभिहितः = अर्थः, तदनुपपत्तिः अभिहितानुपपत्तिः । अयं भावः-शाब्दबोधानुपपत्तिस्थले श्रुतापत्ति- र्भवतीति प्रतिपादितम्, तत्र शाब्दबोधानुपपत्तेरपि मूलं द्विधा शब्दानुपपत्तिः अर्थानुपपत्तिश्च । अतः तद्भदात् श्रुतार्थापत्तेरपि वैविध्यमावश्यकमिति । प्रथमामुदाहरति- यथा द्वारमित्यत्र पिधेहीतिपदाध्याहारः। अयं भावः-यत्र वक्ता द्वारकर्मक-पिधान-क्रियाबोधनाय प्रवृत्तोऽपि "द्वारम्" एतावदेव वक्ति, न पिधेहीति, तत्र श्रोता पिघेहीति पदमध्याहृत्य शाब्दबोधं २०८ वेदान्तपरिभाषा। करोतीति अनुभवसिद्धम् । तत्र पिधेहीति पदात्मकाभिधानं विना शाब्दबोधानुपपत्त्या पिधेहीति पदकल्पना भवति । सा अभिधानानुपपत्तिरूपा श्रुतार्थापत्तिर्भवतीति । लौकिकं दृष्टान्तं प्रदर्श्य वैदिकं तमाह- यथा "विश्वजिता यजेत" इत्यत्र स्वर्गकामपदाध्याहारः । -- अयं भाव:-"विश्वजिता यजेत" इति विश्वजिद्यागस्य उत्पत्तिविधिः । केवलेन चोत्पत्तिविधिना न यागे प्रवृत्तिः फलस्वाम्यानिर्णयेन अधिकार्यनिर्णयात् । न स्यविज्ञाय कोऽपि कस्यामपि क्रियायां प्रवर्तते इति विश्वजनीनम् । अतः "स्वर्गकामः" इति पदं कल्पयित्वा, "विश्वजित यजेत स्वर्गकामः" इत्यानुपूर्वीक उत्पत्त्यधिकारविधिवााथमवबुध्य प्रवर्तते । तत्र "स्वर्गकाम" पदकल्पना अमितापपातरूपा श्रुतापत्तिप्रमेति बोध्यम् । ननु केवला- दुत्पत्तिवाक्यादपि शाब्दबोधनिष्पत्तौ न शाब्दबोधानुपपत्ति: इति क्व श्रुतार्थानुपपत्ति- सम्भावना ? इति तद्विशेषाभिधानानुपपत्तिसम्भावना सुदूरपराहतैवेति चेन्न । केवलादुत्पत्तिवाक्यान शाब्दबोधः । को यजेत इत्याकाक्षाया जागरूकतया अधिकारादिविध्येकवाक्यता सम्पत्तिव्यतिरेकेण तदसम्भवात् । ननु पदकल्पनात. पूर्व शाब्दबोधात्मकान्वयामिधानाभावात् "इदमन्वयामिधानं पिघेहीति पदकल्पना विना अनुपपन्नम्" इत्यनुपपत्तिज्ञानाभावेन कथं ततः पदकल्पनारुपा श्रुतार्थापत्ति: ! इत्याशयेन शङ्कते- ननु द्वारमित्यादौ अन्वयामिधानात्पूर्व इदमन्वयामिधानं पिधानो- पस्थापकपदं विनाऽनुपपन्नमिति कथं ज्ञानम् । द्वारमित्यादौ-द्वारमित्येतावदुक्तिस्थले । अन्वयाभिधानात्पूर्व द्वारपिधानयोः संसर्गबोधात्पूर्वम् । कथं ज्ञानम् ? केन प्रकारेण ज्ञानसम्भव: ? समाधत्ते-- इति चेन्न । अभिधानपदेन करणव्युत्पत्त्या तात्पर्यस्य विवक्षितत्वात् । तथा च द्वारकर्मकपिधानक्रियासंसर्गपरत्वं पिधानोपस्थापकपदं विनाऽनुगममामेति ज्ञानं तत्रापि सम्भाव्यते ।
अर्थापत्तिपरिच्छेदः। २०९ अयं भावः-सत्यं पदकल्पनातः पूर्व शाब्दबोधाभावेन “इदमन्वयामिधानं पिधानवाचकपदं विनाऽनुपपन्नम्" इति ज्ञानं न भवितुमर्हति । किन्तु "द्वार इत्येतावन्मात्रस्य द्वारकर्मकपिधानपरत्वमनुपपन्नम्" इति वक्तृतात्पर्यज्ञानं तु सम्भवति । तत एव पदकल्पनारूपा प्रमा भवितुमर्हति इति । इदं पुनरिहावधेयम्- " इदं अन्वयामिधानमनुपपन्नम् " अय शाब्दबोधोऽनुपपन्न. इतीदन्त्वेन। विशेषरूपेणानुपपत्तिज्ञानाभावेऽपि "द्वारं एतावन्मात्रात् शाब्दबोधोऽनुपपन्नः अन्वया- भिधानमनुपपन्नम्" इत्यनुपपत्तिज्ञानस्य सामान्यतः कुतोऽनुपपत्तिसम्भावना ? सति चैवं प्रश्न एव निरवकाशः । अन्यथा तात्पर्यानुपपत्तिज्ञानेन लक्षणव स्यादिति अपित्तिस्वीकार एव प्रकृते न सङ्गतिमीयात् इति । " द्वितीयां अभिहितानुपपत्तिमाह- अभिहितानुपपत्तिस्तु यत्र वाक्यावगतोऽर्थोऽनुपपन्नत्वेन सन्नर्थान्तरं कल्पयति तत्र द्रष्टव्यः । ज्ञातः वाक्यावगत: इत्यत्र भूतत्वमविवक्षितम् । तथा च वाक्यजन्यभाव्यवगतिविपयः इति तदर्थः । अन्यथा पूर्व शाब्दबोधाभावेनासङ्गतिः स्यात् । ननु भवतु शाब्दबोधा- नन्तरं एव तदर्थेऽनुपपद्यमानताज्ञानमिति चेन्न। तथा सति अनुपपत्तिज्ञानमवधूय तदुपकरणतदिष्टसाधनत्वज्ञानादिमतः अदृष्टकल्पनाव्यतिरेकेणैव प्रवृत्त्यापत्तेः । अपि च यथा लक्षणाास्थले तात्पर्यानुपपत्त्या शाब्दबोधविलम्बः सर्वसम्मतः तथैव प्रकृतेऽपि स्वीकार उचितः । अन्यथा तत्रापि तात्पर्यज्ञानसत्त्वेऽपि विनंव लक्षणा- ज्ञानं शाब्दबोधापत्तिः स्यात् इति । कल्पयतीत्यनन्तरं जन इति कर्त पदाध्याहारः । तत्र तादृशस्थले । द्रष्टव्य-ज्ञातव्यः- - उदाहरणमाह- यथा "स्वर्गकामो ज्योतिष्टोमेन यजेत" इत्यत्र स्वर्गसाधनत्वस्य क्षणिकयागगतस्यानुपपत्त्या मध्यवर्त्यपूर्व कल्प्यते । क्षणिक:=कियत्कालमात्रस्थायी यो यागः, तद्गतस्य तनिष्ठस्य । स्वर्गसाधनत्व- स्योति सम्वन्धः । साधनत्वं-कारणत्वम् । मध्यवत्ति यागस्वर्गयोः अन्तरालवत्ति । अपूर्व=पुण्यात्मकमदृष्टम् । अयं भावः-"स्वर्गकामो ज्योतिष्टोमेन यजेत" इत्युत्प- वेदान्तपरिभापा। त्यधिकारविधिवाक्यं ज्योतिप्टोमनामकयागात्मकेन कारणेन स्वर्ग भावयेत् इति तदर्थः । तद्वोधानन्तर च लोकाना ज्योतिष्टोमे प्रवृत्तिरिति वस्तुस्थितिः । किन्तु अव्यवहितपूर्ववर्तित्वरूपस्य कारणत्वस्य मरणानन्तरभाविस्वर्गादतिव्यवहिते यागे अनुपपत्त्या शाब्दबोध एवानुपपन्न इति क्व प्रवृत्तिसम्भावना ? अतस्तत्र मध्यवर्त्य- पूर्द प्रकल्प्य तद्वारा, ज्योतिष्टोमेन यागेन स्वर्ग भावयेत् इति वाक्यार्थबोध विधाय वागे जन. प्रवर्त्तते इति वक्तव्यम् । तत्रादृष्टकल्पना अर्थापत्तिप्रमा । यागस्य साक्षात्कारणत्वानुपपत्तिज्ञानं अर्थापत्तिप्रमाणमिति । अर्थापत्तिर्न प्रमाणान्तर अनुमाने एवं गतार्थत्वात् इति न्यायवैशेपिकबौद्ध- साइ ख्ययोगमतानुयायिनः । तन्मतनिरासायाह- न चेयमर्यापत्तिरनुमानेऽन्तर्भवति । अन्वयव्याप्तिज्ञानेन अन्वयिन्यनन्तर्भावात् । . इयमर्थापत्ति: अर्थापत्तिप्रमा । अनुमाने =अनुमितौ । अन्तर्भवति =गतार्थतां भजते । अन्वयश्चासौ व्याप्ति: अन्वयव्याप्तिः, तस्य अज्ञानेन । अन्वयिनि- अन्वय्यनुमिती । अनन्तर्भावात् =अगतार्थत्वात् । अन्वय्यनुमितित्वाभावात् इति तदर्थ. । तेन नासङ्गतिः । अन्यथा हेतुसाध्ययोरक्यापत्तेः । - नन तर्हि व्यतिरेकित्वमेवास्तु इत्यत आह- व्यतिरेकिणश्चानुमानत्वं प्रागेव निरस्तम् । अनुमानत्वं = अनुमितित्वम्। प्राक् अनुमानपरिच्छेदे । अयं भाष:-अर्थापत्ते- रतिरिक्तत्वे विवहृता कीदृगनुमाने अर्थापत्तिप्रमाणस्य, कीदृगनुमितौ च अर्थापत्तिप्रमाया: अन्तर्भावोऽभिप्रेतः ? अन्वय्यनुमाने-अन्वय्यनुमितौ चेति चेत् नासौ शक्यसम्पाद: । दिवाभोजित्वे सति पीनत्वरात्रिभोजित्वयोः कुत्राप्यधिकरणे सामानाधिकरण्यात्मकमन्वयमगृहीतवतोऽपि जनस्य रात्रिभोजनकल्पनाया अनुभव- सिद्धत्वात् । न च व्यतिरेक्यनुमाने व्यतिरेक्यनुमितौ चेति चेति वक्तव्यम् । न व्यतिरेकमनुमानं व्यतिरेक्यनुमितिश्चेति प्रथममेवानुमानग्रन्थे प्रतिपादितत्वात् इति ।
अर्थापत्तिपरिच्छेदः । २११ उक्तमर्थ द्रढयति- अत एवार्थापत्तिस्थलेऽनुमिनोमीति नानुव्यवसायः, किन्तु अनेनेदं कल्पयामीति । अत एव = अर्थापत्तेरनुमानेऽन्तर्भावादेव । अनुव्यवसाय: = व्यवसाय- प्रत्यक्षम् । अनुमिनोमि इति = इत्याकारकं न । भवतीति क्रियाध्याहारः । अनेन अनुपपद्यमानेन । इद कल्पयामि इति = इत्याकारकम् । भवतीति नेप. । अयं भावः-निविकल्पक तिरिक्तस्थले सर्वत्र वसायानन्तरं तादृशव्यवसायविषयक अनुव्यवसायनामक मानस प्रत्यक्ष भवति, येन तद्विषनभूतस्य व्यवसायात्मकज्ञानस्य . स्वरूपं स्पष्टीकृत भवति । यथा “अयं घः" इति व्यवसायालकप्रत्यक्षानन्तरं "घटं साक्षात्करोमि" इति"घटस्य मे प्रत्यक्ष ज्ञान मूत्" इत्यनुव्यवसाये जाते, ततः तद्विषयभूतमव्यदहितपूर्वरिकानं प्रत्यकल्पनेव न त्वनुमित्यादिरूप दसोयते । सति चवं अापत्तिः यदि अनुमितिरूपा भवेत्, तहिं तदनन्तरं "अनुमिति मानहम्" "अनुमिनोमि" अनुनितिज्ञानं मे जातम्" इत्यादिरूप एवानुजवनायः सम्पद्येत । निर्णीतञ्च भवेदिदं यत् इतः पूर्वसमितिरेव सम्वृत्तेति । किन्तु न भवति तयानुष्यवसायः । अपि तु कल्पवान.त्येव भवति सः, इति कथं कोऽपि शक्नु गाग्नि- गेतुं यदनुमितिः सम्वृतेति ? तस्मादत्यन्तं भिन्ना खल्वपत्तिः, सकाशादनु- मितेरिति। "येन विना यदनुपपन्नं तत् तेनाक्षिप्यते" इति सामान्यतो गृहीतवत: “इद एतेन विना अनुपपन्न" इति ज्ञानरूपार्थापत्तिप्रमाणं तदवयवभूतानुपपन्नत्वज्ञानसा- पेक्षम् । तच्चेदनिर्वचम्, न तदाभिमतसिद्धिरित्यभिप्रायेग शङ्कते- नन्वर्थापत्तिस्थले इदमनेन विनाऽनुपपन्नमिति ज्ञानं करणमित्युक्तम् । तत्र किमिदं तेन विनाऽनुपपन्नत्वम् ? करणं - अर्थापत्तिप्रमाणम् । तत्र तद्विपयभूतम् । इदं तेन विनानुपपन्नत्व कि ? इति सम्बन्धः । समाधत्ते- तदभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वमिति बमः ।
२१२ वेदान्तपरिभाषा । तस्याभावः = तदभाव:, तस्य तदभावस्य व्यापको योऽभावः स तदभाव- व्यापकाभावः, तस्य यः प्रतियोगी, स तदाभावव्यापकाभावप्रतियोगी। तस्य भावस्तत्त्वम् । एतदेव तेन विना अनुपपनत्वम् इत्यर्थः । तत्पदेन उपपादकपरिग्रहः । यथा पीनत्वेन रात्रिभोजनकल्पनास्थले तत्पदेन रात्रिभोजनपरिग्रहः । तदभाव: रात्रिभोजनाभावः, तद्वयापकीभूतोऽभाव: दिवाऽमोजिपीनत्वाभावः, तप्रतियोगित्वं दिवाऽभोजिगतपीनत्वस्य, इति तस्य रात्रिभोजनं विना अनुपपन्नत्व- मुपपन्नं भवति । एवमेव सर्वत्र योज्यम् । व्यापकत्वलक्षणं अनुमानपरिच्छेदोक्तम- वसेयम् । ननु प्राप्तस्तहि अपित्त रनुमानाभेदः, साध्याभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगि- त्वस्यैव व्यतिरेकव्याप्तिरूपत्वेन तज्ज्ञानप्रमाणाधीनप्रमारूपायाः अर्थापत्ते: व्यति- रेक्यनुमितिभेदस्य वक्तुमशक्यत्वात् इत्याशंका निरस्यति- एवमर्थापत्तेर्मानान्तरत्वसिद्धौ व्यतिरेकिनानुमानान्तरम् । - एवं कल्पयामीति विलक्षणानुव्यवसायस्यानपलपत्वेन । मानान्तरत्वसिद्धौ प्रत्यक्षानुमानोपमानागमानुपलब्धिभिन्नत्वसिद्धौ । नानुमानान्तरं = नान्वयि- भिन्नमनुमानम् । अयं भाक:-अस्मदुक्तमनुपपन्नत्वमेव व्यतिरेकव्याप्तिनाम्ना अभिधा- यापि तव व्यतिरेक्यनुमितिसाधनप्रयासो न कथमपि गन्तुमर्हति साफल्यम् । कल्पयामीत्यनुव्यवसायविरोधापातात् । तस्मानावकाशलेशोऽपि त्वदुक्तप्रश्नस्य । न वानुमानपरिच्छेदोक्तो व्यतिरेक्यनुमानास्वीकारोऽसङ्गत इति । ननु तर्हि पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धत्वात् इत्यत्र पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते इत्यस्य कथमनुमितित्वम् ? अन्वय्युदाहरणाभावेन अन्वयव्याप्तिज्ञानाजन्यतया अन्वयत्वासम्भवात् । अनुमानान्तरस्य च त्वयाऽनम्युपगमात् इत्याशङ्कायां हेतुमुद्रया आह- पृथिवी इतरेभ्यो मिद्यते इत्यादी गन्धवत्वं इतरभेदं विनाऽनुपपन्न- मित्यादिज्ञानस्य करणत्वात् । इतरभेदं विना = पृथिवीतरभेदं बिना । अनुपपन्नमित्यनन्तरं पृथिव्यामिति शेषः । आदिपदेन "गन्धवत्त्वं इतरभेदाभावव्यापकाभावप्रतियोगि" इति ज्ञान-
अर्थापत्तिपरिच्छेदः।
२१३
रिग्रहः । करणत्वात् = प्रमाणत्वात् । तथा च सापि प्रमा अर्थापत्तिरूपंव
अनुमितिरिति अनुमित्वाभावस्त्वदुक्त इष्ट एव न प्रसङ्गरूप इति भावः ।
उक्तामेव युक्ति स्मारयति-
अत एवानुव्यवसायः पृथिव्यामितरभेदं कल्पयामीति ।
अत एव = अनुमितित्वाभावादेव । अनुव्यवसायः इत्यनन्तरं भवतीति शेषः।
मित्रावषेयम्-यदा पृथिवीत्वावच्छेदेन इतरभेदसिद्धिरभिमता, तदा तु अनुमिति-
गाभ्युपगमेपि न काऽपि हानिः। अवच्छेदकावच्छेदनानुमिति प्रति सामानाधिकरण्येन
द्धः अविरोधित्वेन पक्षकदेशे सिद्धिसत्त्वेऽपि सिद्धसाधनाभावे अन्वय्युदाहरणप्राप्तेः
यित्वेनैवाक्रान्तत्वात् इति ।
इत्यार्थापत्तिभगवती
२१४ वेदान्तपरिभापा। अथानुपलब्धिपरिच्छेदभगवती अवमरसंगत्या अनुपलब्धिप्रमाणं निरूपयितु प्रतिज्ञा करोति- इदानीं षष्ठं प्रमाणं निरूप्यते । इदानीं अनुपलब्धीतर-यावत्प्रमाणजिज्ञासाया थोतृनिष्ठायां निवृत्तायाम् । एतेन विरोधिजिज्ञासानिवृत्तिरूपावसरसङ्गतिः अनुपलब्धिप्रमाणनिरूपणप्रयोजिका इति सूचितम् । षष्ठं = षट्त्वसंख्यापूरकम् । इदं प्रमाणविशेषणम् । यद्यपि पट्त्वसंख्यापूरकत्वस्य अन्यस्मिन्नपि प्रमाणो सम्भवः । तथापि योग्यतया अनुपलब्धि- परिग्रहो बोध्य: । अन्येषां निरूपितत्वेन, तत्र तत्र जिज्ञासानुदयात्। निरूप्यते इत्यस्यार्थः पूर्ववद्बोध्यः । लक्षणमाह- ज्ञानकरणाजन्याभावानुभवासाधारणकारणं अनुपलब्धिरूपं प्रमाणम् । ज्ञानकरणजन्यो यः अभावानुभवः, तस्य असाधारणं यत् कारणम्, तत् अनुपलब्धिनामकं प्रमाणमित्यर्थः । तथा च ज्ञानत्वावच्छिन्नकरणतानिरूपित = कार्यत्वाभावावच्छिन्ना सती अभावानुभवत्वावच्छिन्नाया कार्यता, तन्निरूपिता साधारणकारणत्वं अनुपलब्धिप्रमाणत्वमिति फलितम् । भूतले घटो नास्तीत्यभावानु- भवासाधारणकारणे घटोपलम्भभावरूपे । घटानुपलब्धिप्रमाणे लक्षणसमन्वय- स्वित्थम्-ज्ञानं = व्याप्तिज्ञानादिकं, तत्त्वावच्छिन्नकरणतानिरूपिता कार्यता अनुमित्यादौ, तदभाव: "भूतले घटो नास्ती"त्यभावप्रत्यक्षे कार्यभूते, इति कार्यतायाः कार्यत्वाभावस्य च सामानाधिकरण्येन अवच्छेद्यावच्छेदकभावात् तादृशाभावविषयक- बोधनिष्टकार्यतायाः निरुक्ताभावावच्छिन्नतया, तादृशकार्यतानिरूपितासाधारणकारण- स्वस्य घटानुपलब्बौ विद्यमानत्वम् । अयं भावः-न केवलचक्षुःपातमात्रेण भूतलादौ घटाभादेः प्रत्यक्ष जायते । अपितु भूतलाद्यधिकरणकचक्षुःपातसहकृतया 'भूतले यदि घटः स्यात् उपलभ्येत्, नोपलभ्यते" इत्येवं ज्ञातया घटानुपलब्ध्या । अतस्तस्याः करणत्वं वाच्यम् । तल्लक्षणजिज्ञासायां, प्रोक्तं तल्लक्षणम् प्रोक्तप्रकारेण च तत्समन्वयः। नन्च भावानुभवासाधारणकारणम्" इत्येवास्तु तल्लक्षणम्, कृतं अजन्यान्त- निवेशेन इत्याशंकायामाह- अनुपलब्धिपरिच्छेदः। २१५ अनुमानादिजन्यातीन्द्रियाभावानुभवहेतावनुमानादावतिव्याप्ति- वारणायाजन्यान्तम् । वारणाय अतीन्द्रियस्याभावस्यानुभवः अतीन्द्रियाभावानुभवः । अनुमानादिजन्यश्चासौ अतीन्द्रियाभावानुभव. अनुमानादिजन्यातीन्द्रियाभावानुभवः, तद्धतौ । अतिव्याप्ति- = लक्षणनिपेधाय । अजन्यान्तम् = ज्ञानकरणाजन्यपदम् इत्यर्थः । अयं भावः-यत्र सुखाभावेन हेतुना अन्तःकरणो पुण्याभावः साध्यते, तत्र “अहं पुण्याभाववान्" इति अभावविषयकानुभवं प्रति असाधारणकारणभूते “यत्र यत्र सुखाभावः तत्र तत्र पुण्यामावः" इति व्याप्तिज्ञाने अनुपलब्धिलक्षणातिव्याप्तिः । "अहं पुण्याभाववान्" इत्यनुमितेरपि अभावविषयकानुभवतया तदसाधारणत्वरूपस्य निरुक्तकरणत्वस्य निरुक्तव्याप्तिज्ञाने सत्त्वात् । तन्निवेशे तु अनुमितेः व्याप्तिज्ञान- जन्यत्वेन ज्ञानात्मककरणजन्यतया तदजन्यत्वाम वेन लक्षणागमनादतिव्याप्तेरभाव इति । ननु तर्हि-ज्ञानकरणाजन्याभावविषयकयानुभवकारणमित्येवोच्यताम्, अलम- साधारण्यनिवेशेनेति शङ्कायामाह- अदृष्टादौ साधारणकारणे अतिव्याप्तिवारणायासाधारणेति । आदिपदेन ईश्वरतदिच्छादेः परिग्रहः । अतिव्याप्तिवारणाय = अनुपलब्धित्व- वारणाय । अयं भावः । कालादृष्टेश्वरतदिच्छादे: कार्यमात्र प्रति कारणत्वेन ज्ञानकरणाजन्याभावानुभवकारणत्वस्य तत्र तत्र सत्त्वादतिव्याप्तिः। निवेशे तु न तेषां अभावानुभवे असाधारणकारणत्वमिति न तत्र तत्रातिव्याप्तिः । नन्वेवमपि ज्ञानकरणाजन्याभावज्ञानसाधारणकारणमित्येवोच्यताम्, किमनुभव- निवेशेन इति शङ्कायामाह- . अभावस्मृत्यसाधारणहेतुसंस्कारे अतिव्याप्तिवारणाय अनुभवेति विशेषणम् । अभावस्य या स्मृतिः, तस्य योऽसाधारणो हेतुः संस्कारः तस्मिन् । अतिव्याप्ति- वारणाय = अनुपलब्धिलक्षणातिव्याप्तिवारणाय । अयं भावः यत्र घटाभाव वेदान्तपरिभाषा। इति प्रथममनुभवः ततस्तज्जन्यः तदाकार एव संस्कारः, ततः “घटाभाव" इति स्मरणं भवति, तत्र संस्कारे अनुपलब्धित्वापत्तिः। संस्कारजन्यतया ज्ञानकरणजन्य- ज्ञानपदेन "घटाभाव" इति स्मरणस्यापि धर्तुं शक्यतया, तदसाधारणकारणत्वस्य "घटाभावः" इत्याकारकसंस्कारेऽपि सत्त्वात्, तस्य च भावरूपतया लक्ष्यत्वाभावात् । अनुभवपददाने तु नातिव्याप्तिः । स्मृतेरनुभवत्वाभावेन, अनुभवासाधारणकारणत्वस्य संस्कारे अभावात् । अदृष्टाद्यतीन्द्रियपदार्थाभावस्यापि अनुपलब्धिप्रमाणेनैव ग्रहणे स्वीकृते तदनु- मितेरभावेन अनुमानेऽतिव्याप्त्यभावात् ज्ञानकरणाजन्यत्वनिवेशो लक्षणे व्यर्थ एव कुतो नेति पूर्वपक्षं निराचष्टे- न चा भावानुमितिस्थलेऽप्यनुपलब्ध्यवाभावो गृह्यतामविशेषात् - इति वाच्यम् । अभावस्य या अनुमितिः अनुमितित्वेनाभिप्रेतं ज्ञानं तत्स्थलेऽपि । अभाव: अनुमितिविषयत्वेन स्वीकृतः अदृष्टाद्यभावः । गृह्यताम् = ज्ञानविषयो भवतु । इति च न वाच्यमिति सम्बन्धः । तत्र हेतुमाह- धर्माधर्माद्यनुपलब्धिसत्त्वेऽपि योग्यानुपलब्धेरभावात्, तस्या एवाभाव- ग्राहकत्वात्। धर्माधर्माद्यनुपलब्धिः धर्माधर्माद्यनुपलब्धिः । तस्याः सत्त्वेऽपि । योग्या चासो अनुपलब्धिः योग्यानुपलब्धिः तस्या अभावात् । तस्या एव = योग्यानुपलब्रेव । अभावग्राहकत्वात् - अभावप्रमापकत्वात् । अयं भाव:-न अनुपलम्भमात्रमभाव- आहकं अपितु योग्यानुपलब्धिः । धर्माधर्मादेरयोग्यतया तद्विषयिणी अनुपलब्धिः न योग्यानुपलब्धि: । या योग्यानुपलब्धि: न सा धर्माधर्मादेः, इत्यगत्या "अहं धर्माभाववान् सुखाभावात्" इत्यादिप्रकारेण तदनुमितिरेवाभ्युपेया । सति चैवं सत्करणे अनुमाने व्याप्तिज्ञाने अतिव्याप्तिनिरासाय ज्ञानकरणजन्यत्वविशेषणं देयमेव इति।
अनुपलब्धिपरिच्छेदः । योग्यानुपलब्धिपरिभाषाज्ञापनाय पृच्छति- ननु केयं योग्यानुपलब्धिः? किं योग्यस्य प्रतियोगिनः अनुपलब्धिः, किं वा योग्ये अधिकरणे प्रतियोग्यनुपलन्धिः?नायः स्तम्भे पिशाचादि- भेदस्याप्रत्यक्षापत्तः इयं = प्रकृता । योग्यत्वं ग्राह्याभावप्रतियोगिनो विशेषणम् ? आहोस्वित् अभावाधिकरणतया ग्राह्यस्य विशेषणम् इति विकल्पद्वयार्थः । प्रथमे पक्षे "स्तम्भे न पिशाचः' इति जायमानस्य प्रत्यक्षस्यानुपलब्धिकस्यानुपपत्तिः, भेदात्मकाभावप्रति- योगिनः पिशाचस्यायोग्यत्वात्, तदनुपलब्धे योग्यानुपलध्धित्वाभावात् । द्वितीयपक्षे आत्मगतस्य धर्माद्यभावस्यापि प्रत्यक्षसम्भवात् ज्ञामकरणाजन्यत्वनिवेशवैयर्थ्य मिति भावः। सिद्धान्तयति- इति चेन्न । योग्या च सा अनुपलब्धिश्चेति कर्मधारयाश्रयणात् । नानुपपत्तिः । ज्ञानकरणाजन्यत्वनिवेशवैयर्थ्य वा । अयं भाव:-योग्यानु- पलब्धिपदे न षष्ठीसमासः, नापि सप्तमीसमासः येन प्रोक्ता अनुपपत्तिः प्रोक्तं वैयर्थ्य वा आपतेत् अपितु कर्मधारयः इति । ननु का नाम योग्यता? यया कर्मधारयसमासपक्ष नोक्तदोषद्वयम् ? इत्या- शङ्कायामाह- अनुपलब्धे योग्यता च तर्कितप्रतियोगिसत्त्वप्रसजितप्रतियोयित्व- कत्वम् । तकित आरोपितं यत्प्रतियोगिसत्त्वं तेन प्रसञ्जितः प्रतियोगी यस्य, तस्य भावस्तत्वम् । प्रथमप्रतियोगिपदेन ग्राह्यस्याभावस्य प्रतियोगी ग्राह्यः। द्वितीयेन च प्रतियोगिपदेन उपलम्भाभावरूपायाः अनुपलब्धेः प्रतियोगी कर्तव्यः ।
२१८ वेदान्तपरिभाषा। स्वयमेव स्पप्टयति- योऽभावो गृह्यते तस्य यः प्रतियोगी, तस्य सत्त्वेन अधिकरणे तकितेन प्रसञ्जितं आपादनयोग्यं प्रतियोग्युपलब्धिस्वरूपं यस्यानु- पलम्भस्य तत्त्वं तदनुपलब्धियोग्यत्वमित्यर्थः । " यस्य पदार्थस्य अभावो गृह्यते = अनुपलब्ध्या ग्रहविषयीक्रियते तस्य अभावस्य सः प्रतियोगी भवति । यथा अनुपलब्ध्या यदि घटाभावो गृह्यते तर्हि घटस्य प्रतियोगी भवति । एवमन्यत्रापि । "अधिकरणे तकितेन" इति तस्य सत्त्वेन इत्यस्य विशेषणम् । अधिकरणे = अभावाश्रयत्वेन विवक्षिते भूतलादौ । तकितेन "भूतले यदि घट: स्यात्" इत्याकारकारोपविपयेण । प्रसञ्जित इत्यस्य व्याख्या आपादनयोग्य मिति = "तहि उपलभ्येत" इत्यापादनस्वरूपयोग्यतावदिति । "प्रतियोग्युपलब्धिस्वरूपं यस्यानुपलम्भस्य" इत्यत्र उपलब्धिस्वरूपं प्रतियोगी यस्य अनुपलम्भस्य इति सम्बन्धः । "तदनुपलब्धियोग्यत्व" मित्यत्र तस्याः अनुप- लब्धः योग्यत्वमिति विग्रहः । तत्त्व निरुक्तप्रतियोगिकत्वम् । तथा च गृह्य माणाभाव- प्रतियोगिसत्तारोपापावितसत्ताकप्रतियोगिनिरूपितानुयोगित्वं अनुपलब्धौ योग्यत्वं फलितम् । " दृष्टान्तप्रदर्शनेन सुबोघं करोति- तथाहि स्फीतालोके भूतले यदि घट: स्यात् तदोपलम्भः स्यादित्या- पादनसम्भवात्, तादृशभूतले घटाभावोऽनुपलब्धिगम्यः । स्फीतः आलोकः = प्रकाशो यस्मिन् भूतले तत्स्फीतालोक, तस्मिन् । इत्या- पादनसम्भवात् = इत्याकारकापादनसम्भवात् । तादृशभूतले - अधिकरणत्वेना- रोपविषयभूतले । घटाद्यनुपलब्धौ योग्यत्वसमन्वयस्त्वित्थम्-गृह्यमाणः अभावः - घटाभावः, तस्य प्रतियोगी घट:, तस्य सत्ता घटास्तित्वं, तस्य आरोपः = भूतले यदि घट: स्यात् इत्याकारकः तेन आपादिता या सत्ता स "उपलम्भः स्यात्" इत्यापादनविषयीभूता उपलम्भनिष्ठा सत्ता, तादृशसत्ताकः प्रयियोगी = घटोपलम्भः, तन्निरूपिता अभावत्वरूपा अनुयोगिता घटोपलम्माभावे, इति । घटोपलम्भाभाव एव च घटानुपलब्धिः इति ।
अनुपलब्धिपरिच्छेदः । २१९ कारणतायाः अन्वयव्यतिरेकगम्यतया, तयाहीत्यादिना अन्वयः प्रदर्शित: इदं व्यतिरेकं प्रदर्शयति- अन्धकारे तादृशापादनासम्भवात् नानुपलब्धिगम्यता । तादृशापादनासम्भवात् "भूतले यदि घट: स्यात्........" इत्याद्यापादनासम्भवात् । नानुपलब्धिगम्यता घटाभावादेः इति शेषः । तथा च नानुपलब्धिमात्रेणाभावनिश्चयः अपितु योग्यानुपलब्ध्या। अन्धकारे या अनुपलब्धिः सा न योग्या, निरुक्तारोपासम्भवात् इति भावः । - ननु योग्यस्य प्रतियोगिनोऽनुपलब्धि: योग्यानुपलब्धिः इत्येव कुतो नार्थः ? इत्याकाक्षायामाह- अत एव स्तम्भे तादात्म्येन पिशाचसत्त्वे, स्तम्भवत् प्रत्यक्षतापत्त्या तदभावोऽनुपलब्धिगम्यः । अत एव = निरुक्तायाः पारिभाषिक्या: योग्यतायाः स्वीकारादेव । प्रत्यक्षता- पत्त्या -पिशाचस्य प्रत्यक्षतापत्त्या । तदभाव: तादात्म्येन पिशाचाभावः, पिशाचभेद इति यावत् । अयं भाव--स्तम्भो न पिशाचः इति आनुपलब्धिकं ज्ञानं सर्वानुभवसिद्धम् । प्रतियोगिगतायाः योग्यत्तायाः विवक्षणे तत्पीडयेत् । भेदप्रति- योगिन: पिशाचस्यायोग्यत्वात् । अनुपलब्बिगतायाः पारिभाषिक्यास्तस्याः विलक्षणे तु "स्तम्भो यदि पिशाच: स्यात् पिशाचत्वेन उपलभ्येत्, न तथोपलभ्यते अपि तु स्तम्भतया, तस्मानासौ पिशाचः" इति पिशाचभेदग्नहणमुपपद्यते । इति भावः । प्रकृते ततः किमायातमिति जिज्ञासायामाह- आत्मनि धर्मादिसत्वेऽपि अस्यातीन्द्रियतया निरुक्तोपलम्भापादना- सम्भवात् न धर्माद्यभावस्यानुपलब्धिगम्यत्वम् । % 3D अस्य = धर्मादेः । आदिना अधर्मपरिग्रहः अतीन्द्रियतया - इन्द्रियाग्राह्यतयां। निरुक्तोपलम्भापादनासम्भवात् = आत्मनि यदि धर्मः स्यात् उपलभ्येत इत्यापादना- सम्भवात् । धर्माद्यभावस्य न अनुपलब्धिगम्यत्वमिति सम्बन्धः । अनुपलब्धिगम्यत्वम् अनुपलब्धिप्रमाणकत्वम् । अयं भावः-धर्माधर्माद्यनुपलब्धेः निरुक्तयोग्यत्वा- २२० वेदान्तपरिभाषा। भावेन न योग्यानुपलब्ध्या तद्ग्रह इति, तदभावास्यानुमानिकत्वस्वीकार आवश्यकः । एवञ्चानुमानेऽतिव्याप्तिवारणाय अनुपलब्धिलक्षणे अभावानुभवे ज्ञानकरणाजन्यत्त्वविशेषणमावश्यकम् इति । इन्द्रियेणैव करणेन अभावज्ञानसम्भवे कृतमनुपलब्धेः प्रमाणत्वाभ्युपगमेन, इत्याशयेन शङ्कते- ननूक्तरीत्या अधिकरणेन्द्रियसन्निकर्षस्थले अभावस्यानुपलब्धि- गम्यत्वं त्वदनुमतम् । तत्र क्लुप्तेन्द्रियमेव अभावाकारवृत्तावपि करणम्, इन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधानात् । "उक्तरीत्या" इत्यस्य अभावस्यानुपलब्धिगम्यत्वमिति व्यवहितेन सम्बन्धः । अधिकरणेन = ग्राह्याभावाधारेण इन्द्रियस्य यः सन्निकर्षः तत्स्थले । त्वदनुमतं तवानुमतम् । तत्र - तादृशस्थले । क्लुप्तं चेन्द्रियं क्लुप्तेन्द्रियं तदेव । क्लुप्तमित्यस्य अभावाधिकरणग्राहकतया स्वीकृतमित्यर्थः। अभावाकारा या वृत्तिः अन्तःकरणस्य परिणामः सा अभावाकारवृत्तिः, तत्रापि । करणमित्यनन्तरं अस्तु इति शेषः । इन्द्रियसत्त्वे इन्द्रियेण अभावज्ञानजननम् इन्द्रियान्वयः। इन्द्रियाभावे तेनाभावज्ञानाजननम् इन्द्रियव्यतिरेकः, तयोः अनुविधानं दर्शनं तस्मात् । इन्द्रियसत्त्वे तेन अभावज्ञानजननम् इन्द्रियान्वयः । इन्द्रियाभावे तेनाभावज्ञानाभावः इति व्यतिरेकानुविधानमित्यपव्याख्यानम् । इन्द्रियव्यतिरेकानुविधानात् इत्येकवचनानुप- पत्तेः । अयं भाव:-अभावज्ञाने कर्तव्ये कुत्राप्यधिकरण एव तत्कर्तव्यम् । तच्चा- धिकरणज्ञानं नानुपलब्धिकम् । भूतलादेविपदार्थत्वात् । तथा चाधिकरणज्ञान- करणतया अवश्यापेक्षणीयेन चक्षुराविनव आधारभूताभावज्ञानस्यापि सम्पत्ति- सम्भवे कुतमतिर तानुलिसिनामाणान्तराङ्गीकारेणेति । समाधत्ते- । इति चेन्न । तत्प्रतियोग्य पलब्धरेपि अभावग्रहे हेतुत्वेन क्लुप्त- त्वेन करणत्वमात्रर' कल्पनात् । तस्य = ग्राह्यस्याभावस्य य: प्रतियोगी, तस्य या अनुपलब्धिः, तस्या अपीत्यर्थः । अभावग्रहे = अभावप्रत्यक्ष इत्यर्थः । हेतुत्वेन क्लुप्तत्वेन करणतया अनुपलब्धिपरिच्छेदः। २२१ नैयायिकादिभिरपि स्वीकर्तव्यतया । करणत्वमात्रस्य = केवलमसाधारण्यस्य । कल्पनात् = स्वीकारात् । वेदान्तिभिरस्माभिरिति शेपः । अयं भावः-अन्धकारे घटाभावादिप्रत्यक्षानुदयेन अनपलब्धेरिन्द्रियं प्रति सहायकत्वं नैयायिकादिमिरपि स्वीक्रियत एवेति नास्माभिरनुपलब्धौ कारणत्वमपूर्व स्वीक्रियते, अतितु तैरपि अभावज्ञानकारणतया स्वीकृतायामेवानुपलब्धो असाधारण्यमानं वृत्तिवेजात्यानुरो- धेन अभ्युपगम्यते इति । हेत्वन्तरमाह- इन्द्रियस्य चाभावेन समं सन्निकर्षाभावेन अभावग्रहाहेतुत्वात् । "इन्द्रियस्य" इत्यस्य "सन्निकर्षाभावेन" इत्यनेन, "अभावग्रहाहेतुत्वात्" इत्यनेन च सम्बन्धः। सन्निकर्षाभावेन-प्रत्यक्षप्रयोजकसम्बन्धाभावेन । अभावस्य ग्रहः प्रत्यक्ष, तदहेतुत्वात् = तदकारणत्वात् । अयं भावः-इन्द्रियसम्बद्ध- मेवेन्द्रियेण शक्यते ग्रहीतुं नासम्बद्धम् अतिप्रसङ्गात् । सति चैवं संयोगसंयुक्त- तादात्म्यायन्यतमसम्बन्धस्य इन्द्रियप्रतियोगिकस्य प्रत्यक्षप्रयोजकस्याभावे अभावात् नाभावस्य इन्द्रियग्राह्यता सम्भवः । तस्मात् अभावग्रहानुपलब्धः प्रमाणान्तरत्वं स्वीकार्यमेवेति । - ननु कारणत्वव्यापकयोः अन्वयव्यतिरेकयोः तर्हि का गतिः ? इत्यत आह- इन्द्रियान्वयव्यतिरेकयोः अधिकरणज्ञानाद्युपक्षीणत्वेनान्यथासिद्धेः । इन्द्रियान्वयव्यतिरेकयोः इन्द्रियसत्त्वे अभावज्ञानम्, इन्द्रियाभावे अभावज्ञानाभावः इत्येतयोः । अधिकरणज्ञानादिना उपक्षीणत्व - चारितार्थ्य तेन । अन्यथासिद्धः = कारणत्वविरोधिनो धर्मस्य तत्र ज्ञानात् । अयं भाव:- अन्वयव्यतिरेकाम्या ग्राह्यघटाभावाद्यधिकरणीभूतभूतलादेर्शानमेव जन्यते इत्यभ्युप- गमेऽपि नान्वयव्यतिरेकयोर्वेयर्यम इति चारितार्थ्यात् नामावल्यापनायाग्रहस्तस्य भवेत् । प्रत्युत निर्मित हात् अभावग्रहं प्रति कारणीभूतस्य अधिकरण- ज्ञानस्य पूर्वमपेक्षणीयत्वेन तं प्रति मावज्ञानानन्तरमेव अभावज्ञान प्रति नियमतः पूर्वभावज्ञानस्य इन्द्रिये कर्तव्यतया "अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्व- भावविज्ञानम्" इति तृतीयान्यथा सिद्धिपातस्य इन्द्रियाणामशक्यनिरोधतया अभाव- वेदान्तपरिभापा । २२२ ज्ञानं प्रति अनन्यथासिद्धनियतपूर्ववत्तित्वरूपस्य कारणत्वस्य न सम्भावनालेशो- पीति । अन्यस्मिन् फलाननूकूल लत्वनिवेशे तु चतुर्थान्यथासिद्धिर्योज्या। प्रत्यक्षपरिच्छेदे प्रोक्तया प्रत्यक्षजननप्रक्रियया घटाभाववद्भ तलमित्याद्यभाव- ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं दुरपलपम् । सति चैवं तत्प्रमाणेनापि प्रत्यक्षेणैव भवितव्यम् । प्रमाभेदादेव प्रमाणभेदात् । तथा च कथमनुपलब्धेः प्रमाणत्वम् ? इत्याशयेन शङ्कने- ननु भूतले घटो नेत्याद्यनुभवस्थले भूतलाशे प्रत्यक्षत्वमुभयसिद्ध- मिति तत्र वृत्तिनिर्गमनस्यावश्यकत्वेन भूतलावच्छिन्नचैतन्यवत् तन्निष्ठ- घटाभावावच्छिन्नचैतन्यस्यापि प्रमात्रभिन्नतया घटाभावस्य प्रत्यक्षतव सिद्धान्ते । - - घटो न = घटो नास्ति । अनुभवस्थले = अनुमित्यादिभिन्नानुभवस्थले । तेन नासङ्गतिः । भूतालाशे प्रत्यक्षत्व = इन्द्रियकरणकत्वम् । उभयसिद्ध - न्यायवेदान्तोभयमनसिद्धम् । नत्र = तथाविधानुभवस्थले । तनिष्टघटाभावावच्छि- नचैतन्यस्यापि = भूतलनिष्ठघटाभावाद्यवच्छिन्नचैतन्यस्यापि । प्रमात्रभिन्नतया अन्तःकरणवच्छिन्नचतन्याभिन्नतया। अयं भावः तात्त्विकचंतन्यामेवस्य प्रत्यक्षत्व- प्रयोजकत्वे अतिप्रसङ्गमिया अन्तःकरण-तवृत्ति-विषयाणां चैतन्यावच्छेदकानां एकवेशस्थतायां तत्प्रयुक्तःचैतन्याभेदः वृत्ति-विषयगतप्रत्यक्षत्वयोः प्रयोजकः इति प्रतिपादितं सप्रपञ्चं "विषयचंतन्यस्य प्रमाणचंतन्याभेदः, तत्सत्तारिक्तसत्ताकरवा- भावः इत्यादिना ग्रन्थेन प्रत्यक्षपरिच्छेदे । सति चैवं-भूतलान्तःकरणतवृत्तीनां एकदेशस्थतेव घटामावान्तःकरणतवृत्तीनाप्येकदेशस्थतायाः इन्द्रियाप्रणालिकया अन्तःकरणपरिणमनेन दुरितया विषये वृत्तौ च प्रत्यक्षत्वस्याप्यबाधितत्वेन फलामेदात् प्रमाणेनापि इन्द्रियात्मकेन अभिन्ने नैव भवितव्यमिति कथमनुपलब्धेः प्रमाणता? इति। समाधत्ते- इति चेत् सत्यम् । अभावप्रतीतेः प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करणस्यानु- पलब्धेः मानान्तरत्वात् ।
अनुपलब्धिपरिच्छेद. । २२३ % 3D अभावप्रतीतेः = इन्द्रियपाताधीनाया., भूतले घटो नास्तीत्यादिप्रतीते: । प्रत्यक्षत्वेऽपि प्रत्यक्षप्रमात्वेऽपि । तत्करणस्य = प्रत्यक्षकरणस्य । इदमनुप- लब्धिविशेषणम् । अजहल्लिङ्गतया असमानलिङ्गत्वेऽपि विशेप्यविशेषणभावो न विरुद्धः। मानान्तरत्वात् - अभाववृत्तिनिरूपितप्रामाण्यात् । ननु यत्र यत्र प्रत्यक्षप्रमात्व तत्र तत्र इन्द्रियकरणकत्वमिति सहस्रशो गृहीत- सहसाचारदर्शनप्रवृत्तव्याप्तिबलेनाभावप्रत्यक्षे इन्द्रियकरणकत्वस्यानुमेयतया कथमनु- पलब्धेः तत्प्रमाणत्वम् ? इत्याशंक्याह- न हि फलीभूतज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वे तत्करणस्य प्रत्यक्षप्रमाणता- नियतत्वमस्ति । दशमस्त्वमसीत्यादि वाक्यजन्यज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करणस्य वाक्यस्य प्रत्यक्षप्रमाणभिन्नप्रमाणत्वाभ्युपगमात् । फलीभूतज्ञानस्य = प्रमायाः । प्रत्यक्षप्रमाणतानियतत्व : नियमेन प्रत्यक्ष- प्रमाणत्वम् । प्रत्यक्षप्रमाणभिन्नप्रमात्वाभ्युपगमात् = शब्दप्रमाणत्वाभ्युपगमात् । अयं भावः-यत्र यत्र प्रत्यक्षप्रमात्वं तत्र तत्र प्रत्यक्षप्रमाणकत्वमिति न व्याप्तिः । भूतवशकनदीसन्तरणस्थले स्वमगणयितुः एकस्य जलनिमग्नतासन्देहेन तन्निश्चयेन वा विदूनहृदयम्य वैदून्यापनोवाय 'दशमस्त्वमसि" इति केनचिदुक्त दशमोऽहमिति प्रमायां निरुक्तवाक्याज्जायमानायां प्रत्यक्षप्रमात्वसत्त्वेऽपि वाक्यप्रमाणकतया प्रत्यक्षप्रमाणकत्वाभावेन व्यभिचारनिश्चयात् । सहसशः सहचारकर्शनेऽपि एकत्र- व्यभिचारदर्शने व्याप्त्यनिश्चयान् । व्यभिचारज्ञानविरहसहकृतसहचारज्ञानस्यैव व्याप्तिग्राहकत्वात् । तथा च प्रमायाः प्रत्यक्षत्वेऽपि प्रमाणस्यानुपलब्धित्वस्वीकारे वाधकामाव इति ? दृष्टान्तस्थले दशमस्त्वमसीत्यादावपि कुतस्तथा ? इति शङ्कते- फलवैजात्यं विना कथं प्रमाणभेदः ? दशमस्त्वमसीत्यादौ प्रमायाः शाब्दत्वमेवास्तु । प्रत्यक्षत्वे प्रमाणस्य वाक्यत्वं दुर्वचमेव स्यात् । तथा च नानुपलब्धिः प्रमाणान्तरमिति भावः।
२२४ वेदान्तपरिभाषा। परिहरति- इति चेन्न वृत्तिवैजात्यमात्रेण प्रमाणवैजात्योपपत्त: । तथा च घटाद्यभावाकारा वृत्तिर्नेन्द्रियजन्या इन्द्रियस्य विषयविशेषेणासन्नि- कर्षात् । किन्तु घटाद्यनुपलब्धिमानान्तरजन्येति भवत्यनुपलब्धेर्माना- न्तरत्वम् । वृत्तेः वैजात्यं वृत्तिवैजात्यम् = भावाभावाकारतास्प बैलक्षण्यम् तन्मात्रेण । मात्रपदेन प्रमागतप्रत्यक्षत्वादिनिरास: । प्रमाणस्य अभावग्राहकस्य वैजात्योपपत्तेः। - भावसाधकप्रत्यक्षादिमानान्तरभिन्नत्वोपपत्तेः। तथा चेत्यस्य व्यवहिते "माना- न्तरत्व"मित्यनेन सम्बन्धः । । घटाद्यभावाकारा वृत्तिरिति पक्षस्यापनम्, "नेन्द्रियजन्या" इति साध्यख्याप- नम् । विषयेणासन्निकर्षात इति च हेतुख्यापनम् । नेन्द्रियजन्या इत्यस्य इन्द्रियजन्य- त्वाभाववती इत्यर्थः । विषयेण इन्द्रियस्यासन्निकर्षात् इति सम्बन्धः । इन्द्रियस्य इत्यत्र षष्ठ्यर्थः प्रतियोगिकत्वम् । तथा च इन्द्रियप्रतियोगिकसन्निकर्षाभाववतो विषयस्य हेतुत्वं बोध्यम् । हेतुतावच्छेदकसम्बन्धस्तु विषयित्वं तेन नासङ्गतिः । एवञ्च घटाघमावाकारा बृत्तिः इन्द्रियप्रमाणकत्वाभाववती इन्द्रियप्रतियोगिक- सनिकर्षाभाववद्विषयवत्वात् घटवत् इत्यनुमाकारो बोष्यः । प्रमाणकत्वं च प्रमाणजन्यत्वं, न तेन बाधशङ्कावसरः । नन्वेवपि-"घटाभाववद्भ तलम्" इत्यादिवृत्तेरेकत्वेन बाधः स्वरूपासिद्धिश्च । भूतलवृत्तेः इन्द्रियजत्वात् इन्द्रियजन्य- वत्तिविषयभूतलवत्त्वात्, इति चेत् सत्यम् । तथा सति हेतौ साध्यांशे च "अभावांशे" इति योजनीयम् । तथा च नोक्तदोष इति । अनुपलब्धेः प्रमाणान्तरत्वे बाधकं शङ्कते- नन्वनुपलब्धिरूपमानान्तरपक्षेप्यभावप्रतीतेः प्रत्यक्षत्वे घटवति घटाभावभ्रमस्यापि प्रत्यक्षत्वापत्तौ तत्राप्यनिर्वचनीयघटाभावोऽभ्यु- पगम्येत । अनुपलब्धिरूपं यन्मानान्तरं तत्पक्षऽपि = तत्स्वीकारपक्षेऽपि । प्रतीते: फलभूतायाः प्रमायाः । प्रत्यक्षत्वे - साक्षात्काररूपत्वे । घटवति = घटनिष्ठ- अनुपलब्धिपरिच्छेदः । २२५ निरूपकतानिरूपिताधिकरणतावति भूतलादौ । घटाभावभ्रमस्यापि = घटाभाव- वढू तलमित्याकारकभ्रमस्यापि । प्रत्यक्षत्वापत्ती - प्रत्यक्षात्मकज्ञानस्वीकारावश्य- कत्वे । तत्रापि = तादृशभ्रमस्थलेऽपि । अनिर्वचनीयघटाभावः = प्रातिभासिको घटाभावः। अभ्युपगम्येत स्वीकत व्यः स्यात् । भवतु तथा का नाम क्षति: ? इति सम्भावितां कस्याप्युक्ति स्वयमेव निराकरोति- न चेष्टापत्तिः । तस्य मायोपादानकत्त्वेऽभावत्वानुपपत्तिः। मायो- पादानकत्वाभावे मायायाः सकलकार्योलतानत्वानुपपत्तिः । . आपत्तिर्न चेष्टा इत्यन्वयः तस्येत्यत: पूर्व यत: इत्यध्याहारः तस्य = घटा- भावस्य मायोपादानकत्वे =3D मायापरिणामत्वे । अभावत्वस्य अनुपपत्तिः = अभावप्रसङ्गः । माया उपादानं परिणामि यस्य तन्मायोपादानकं, तस्य भावः तत्त्वम्, तदभावे । सकलकार्योपादानत्वानुपपत्तिः निखिलपरिणाम- निरूपितपरिणामित्वानुपपत्तिः । अयं भावः-अनुपलग्निप्रमाणन प्रत्यक्षप्रमोत्पाद इत्यम्युपगमे घटादिप्रतियोगिमति भूतलादी जायमाना "घटामाववभूतलम्" इति प्रमाऽपि प्रत्यक्षमेवेति स्वीकार्य स्यात् । ओमित्युक्ती-घटवति घटामावस्य व्यावहारिकस्य असम्भवेन प्रातिमासिकोऽसौ इति वक्तव्यं भवति । तस्मिन्नप्यन्युपगम्यमाने अनुपपत्तिरापतति । तथा हि-गतिमासिक नाम अविद्यापरिणामत्वम् । तरखम् । परिणामपारणामिनोः साजात्य- नियमात् । अज्ञानमविद्या, बेदान्तनये भावः, तत्परिणामत्वेन घटवति प्रतीयमान- घटामावावेः सहिखममावत्वं तत्रानुपपत्तिमीयात् । घटामावावेः तादृशस्य अविद्या- पी जामत्वाभावे प्रातिमातिमानुपपन्नं भवति । अन्यतमसहिषयकत्वे एव ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं सम्भवितुमर्हति । तबमावे तस्तस्यानुपलाधकस्य घटवति "घटामावबतलम्" इति ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं सुशक्यं वक्तुमिति । समाधत्ते- इति चेन्न । घटवति घटाभावभ्रमो न तत्कालोत्पन्नघटाभाव- विषयकः । किन्तु मूलबाल्पाद विद्यमानो लौकिको घटाभावो भूतले आरोप्यते । इत्यन्यथा ख्यातिरेव । - वेदान्तपरिभाषा। २२६ - - घटाभावस्य भ्रमः घटाभावभ्रमः। तत्काले प्रतीतिकाले उत्पन्नः तत्कालो- त्पन्नः । प्रातिभासिको यो घटाभावः स विषयो यस्य, स तथा । भूतलरूपादी इत्यादिपदेन रसगन्धघटत्वादिपरिग्रहः लौकिकः - व्यावहारिकः । आरोप्यते बुद्धिविषयीक्रियते । इतीति हेतौ । अन्यथाख्यातिरेव इत्यनन्तरं घटवति घटाभावबुद्धिरिति शेषः । अयं भाव:-भ्रमप्रत्यक्षं द्विविधं अनिर्वचनीय- ख्यातिः अन्यथाख्यातिश्च । अनिर्वचनीयख्यातौ विषयः प्रातिमासिको भवति अन्यथास्यानी तु व्यावहारिकः इति विशेषः । प्रकृतस्थले आनुपलब्धिकं घठवति घटाभावप्रत्यक्षं नानिर्वचनीयल्यातिरूपमभ्युपेयते येन प्रोक्तोऽनुपपत्तिविकल्प आपतेत् । एवं न तद्वारणोपायः । किन्तु अन्यथाख्यातिरूपम् । तथा च नोक्तानु- पपत्त्यवकाशः । घटवति घटाभावस्यैवाबाधिकत्वात् । प्रतीतेः पूर्वमन्यत्र विद्यमान- स्यैवान्यत्र प्रतीतेरन्यथाख्यातिरूपतया कथं प्रकृते तत्सम्भव इति चेत् इत्थम्- भूतले संयोगेन घटसत्त्वेऽपि न भूतलरूपे भूतलत्वे वा तस्य संयोगेन सत्त्वम् । द्रव्ययोरेव संयोगात् । रूपघटत्वादेः तथात्वाभावेन तत्र संयोगसम्बन्धावच्छिन्न- प्रतियोगिताकः घटाभावः प्रतीते: पूर्वमपि विद्यते,तस्य घटवति प्रतीतिविधीयते इति घटवतो भूतलस्य घटाभाववत्तया प्रतीतिकरणेन घटवति घटाभावबुद्धः अन्यथा- ख्यातितेति । ननु कुत्र तर्हि अन्यथाख्यातिः कुत्र चानिर्वचनीयख्यातिः ? कश्च द्वयोनियामकः । इति जिज्ञासायामाह- आरोप्यसन्निकर्षस्थले सर्वत्रान्यथाख्यातेरेव व्यवस्थापनात् । सर्वत्रेति स्थलविशेषणम् । आरोप्य:-भ्रमीयविधेयतावान्,तेन सह चक्षुरादेरिन्द्रिय- स्य सन्निकर्षों यत्र, तादृशस्थले इत्यर्थः । अयं भावः-यत्राधिष्ठानेन सर्वच मारोप्ये- मापि चक्षुस्सन्निकर्षः तत्र नानिर्वचनीयल्यातिः । यथा अपास्फटिकयोरुभयोः परम्पवधान स्फटिके जायमानमारण्यज्ञानं नानिर्वचनीयख्यातिरूपम्, अपितु अन्यवाल्यातिरूपमेव, तद्वत् घटरूपेण घटत्वेन वा सह चक्षुस्सन्निकर्षे जायमाने तनिष्ठेन व्यावहारिकेण घटाभावेनापि चक्षुस्सन्निकर्षात् सन्निकृष्टं तथाविधं घटाभावं घटवद्ध तलविशेषणीकृत्य सम्पाद्यमाने "घटाभाववढू तलम्" इति ज्ञाने अन्यथाख्यातित्वमेव नानिर्वचनीयख्यातित्वम् इति तदानीं घटाभावोत्पत्त्यनभ्यु- पगमेन मायोपादानकत्त्व-तदभावाधीनानुपपत्तेनविकाश इति ।
अनुपलब्धिपरिच्छेदः। २२७ ननु विशेष्यविशेषणभावस्य प्रत्यक्षप्रयोजकसन्निकर्षत्वानङ्गीकारपक्ष एव योग्यानु- पलब्धः प्रमाणतया कथं तादृशसनिकर्षमादाय अन्यथाख्यातिसम्पादनम् ? कथं च ततोऽनुपपत्तिवारणम् ? इत्यत आह- अस्तु वा प्रतियोगिमति तदभावभ्रमस्थले तदभावस्यानिर्वचनीय- त्वम् । तदुपादानं मायैव । न ह्य पादानोपादेमयोः अत्यन्तसाजात्यम् । तन्तुपटयोरपि तन्तुपरवादिना वैजात्यात् । यत्किाञ्चित्साजात्यस्य मायायाः अनिर्वचनीयघटाभावस्य मिथ्यात्वधर्मस्य विद्यमानत्वात् । अन्यथा व्यावहारिकघटाभावं प्रति कथं मायोपादानमिति कुतो न शङ्कथाः ? - प्रतियोगिमति घटादिमति । तदभावभ्रमस्थले घटाद्यभावभ्रमस्थले । तदभाव- स्य = घटाद्यभावस्य । अनिर्वचनीयत्वं प्रातिभासिकत्वम् । तदुपादानं तादृशघटाभावाशुपादानम् । मायव = अविद्येव । साजात्यमित्यनन्तरं अपेक्षित- मिति शेषः । तथा च उपादानोपादेययोः अत्यन्तसाजात्यं न हि अपेक्षितमिति सम्बन्धः । तन्तुपटयोरपि वैजात्यात् इत्यन्वयः । वैजात्यं सादृश्यविरोधीधर्मविशेषः । मायायाः अनिर्वचनीयस्य घटाभावस्य च यत्किञ्चित्साजात्यस्य = मिथ्यात्व- धर्मस्य विद्यमानत्वादिति योजना । षष्ठीद्वयस्य प्रकृते सप्तम्यर्थता । तथा च मिथ्यात्वधर्मात्मकस्य यत्किञ्चित्सादृश्यस्य मायायां अनिर्वचनीये घटाभावे च विद्यमानत्वात् इति तदर्थः । अन्यथा = उपादानोपादेययो अत्यन्तसाजात्या- पेक्षायाम् । माया कथमुपादानमिति सम्बन्धः । अयं भावः-घटादिमति घटाभावाविभ्रमस्थले घटामावादेः अनिर्वचनीय. त्वाभ्युपगमेऽपि नानुपपत्तिः। मायाघटामावयोः उपागनोपादेययाः अपेक्षितस्य साजात्यस्यापि सत्वात् । तथा हि-उपादानोपाययोः अत्यन्तसा जात्यमपेक्षितम् आहोस्वित् साजात्यमात्रम् ? आये उपासनोपरिसावोच्छेवप्रसङ्गः। द्वयोरत्यन्त- साजात्याभावात् । न हि तन्तुपटयोरपि सन्तुत्वेन पटत्वेन वा सादृश्यम् । उमयत्र तन्तुत्वस्य पटत्वस्य चानावात् । अतः परकल्प एव समाश्रयणीयतामावहति न च तदनुपपत्तिः प्रकृतेऽपि । मिथ्यात्वधर्मस्य मायामायिकयोरुभयोरपि सत्त्वेन माया- घटाभावयोः सत्त्वात् । पूर्वकल्पमुपेत्य शक्का चेत् न सा युक्ता । उपादानोपादेय- २२८ वेदान्तपरिभाषा। - भावमात्रसमुच्छेदेन व्यावहारिकघटाभावाद्यनुत्पत्तेरपि पर्यनुयोज्यतया तत्त्यागेन न्यूनतापत्ते : इति । तथा च नानुपलब्धेः प्रमाणान्तरत्वानुपपत्तिरिति । तथा सति ब्रह्मपरिणामवादापत्तिरिति शंकामपाकरोति- न च विजातीययोरप्युपादानोपादेयभावे ब्रह्मैव जगदुपादानं स्यादिति वाच्यम् । प्रपञ्चभ्रमाधिष्ठानत्वरूपस्य तस्येष्टत्वात् । परिणामित्वरूपोपादानत्वस्य निरवयवे ब्रह्मण्यनुपपत्तेः । तथा च प्रपञ्चस्य परिणाम्युपादानं माया, न ब्रह्मति सिद्धान्तः । इत्यलं प्रसङ्गागतप्रपञ्चेन। न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । विजातीययोरपि = किञ्चिद्रू पेण साजात्याभाववतोरपि । उपादानोपादेयभावे एकस्योपादानत्वे अपरस्य चोपा. देयत्वे । प्रपञ्चस्य यो भ्रमः, तस्य यत् अधिष्ठानं = आलम्बनं, तत्त्वरूपस्य । तस्य - जगदुपादानत्वस्य । इष्टत्वात् - स्वीकृतत्वात् । अनुपपत्तेः असम्भवात् । तथा च ब्रह्मणि अध्यासाधिष्टानत्वस्य सिद्धौ च । अलं = व्यर्थम् । प्रसङ्गन आगतः यः उपादानत्वविचारः, तस्य प्रपञ्चः - विस्तारः, तेन । असौ व्यर्थ इत्यर्थः । अयं भावः-विजातीययोरपि यद्यपादानोपादेयभावः अविद्या- प्रातिमासिकघटामावयोः स्वीकार्यः, तवा पारमार्थिकब्रह्म-प्रातिमासिकजगतोर. पादानोपादेयभावाभ्युपगमे बाधकामावः। स्वीकारे चापसिदान्तः, इत्याबानेपो नाहः । जगवारोपापारत्व-परिणामित्वमेवेन भिन्नयोः उपादानत्वयोः प्रथमस्यान्यु- पेयत्वात् । द्वितीयस्य च सावयवत्वव्याप्यतया, व्यापकाभावेन व्यायामावस्य च सिद्धतया सम्भावनाया अप्यमावात् इति । अलमित्यादिना ग्रन्थगौरवभिया प्रासङ्गिकविचारे बाहुल्यविरतिः सूचिता। प्रमाणविचारमुपसंहृत्य प्रमेयविचारविभागमुखेन आरभते- सा चाभावश्च विधः । प्रागभावः प्रध्वंसाभावोऽत्यन्ताभावोऽन्यो ऽन्याभावश्चेति । सः = अनुपलब्धिप्रमेयभूतः । चतस्रः विधः अस्येति चतुर्विधः ।
अनुपलब्धिपरिच्छेदः । २२९ प्रागभावः कः इत्याकाक्षायामाह- मृत्पिण्डादौ कारणे कार्यस्य घटादे: उत्पत्तः पूर्व योऽभावः स प्रागभावः। कार्यस्य घटादेः इत्यस्याभ्यासः । तथा च कार्यस्य घटादेः उत्पत्तेः पूर्व कार्यस्य घटादेः कारणे मृत्पिण्डादौ, यः कार्यस्य घटादेः अभावः स प्रागभाव इति पर्यवसितोऽर्थः । इति तु परिचयः। लक्षणं तु विनाश्यभावत्वं प्रागभावत्वम् इति बोध्यम् । प्रतियोग्युत्पादे प्रागभावनाशात् । ननु अत्यन्ताभावविशेष एवास्तु सः इत्याशंकायामाह- सच भविष्यतीति प्रतीतिविषयः। च त्वर्थे । स च = प्रागभावस्तु । प्रागभाव एवेत्यर्थः । “घटो भविष्यति" इत्याकारिका या प्रतीतिः तद्विषय इत्यर्थः । अयं भाव:-"नास्ति" "भविष्यति" इति प्रतीतिभेदः सर्वानुभवसाक्षिकः स च न सम्भवितुमर्हति ऋते विषयभेदात्, इति प्रागभावः स्वतन्त्रः अभ्युपेयः । ध्वंसमाह- तत्रैव घटे मुद्गातानन्तरं योऽभावः स प्रध्वंसः। - कपाले मुद्गरपातानन्तरं तत्रैव घटस्य योऽभाव इति सम्बन्धः । तत्रव एव । मुद्गरपातानन्तरमित्युक्त्या जन्यविनाश्यभावत्वं ध्वंसत्वम् इति ध्वंसलक्षणं सूचितम् । तथा च प्रागभावध्वंसयोः उभयोरपि प्रतित्वविनाविलयां साम्येपि उत्पत्तितदभावाभ्यां वैलक्षण्येन भेद इति सूचितम् । ननु प्रागभावस्य प्रतियोगिना विनाशः । ध्वंसस्य च न विनाशः, इति विनाशित्वाविनाशित्वाम्यामेव तयोर्भेदोऽस्तु इति तार्किकशङ्कायामाह- - ध्वसस्यापि स्वाधिकरणकपालनाशेन नाश एव । % 3D स्वं घटध्वंस:, तदधिकरणं = कपालः, तस्य नाशेन । प्रध्वंसस्यापि नाश एवेति सम्बन्धः । अयं भाव:-सत्यं यद्यपि तयोस्तथा भेदः सम्भवितुमर्हति, तथापि २३० वेदान्तपरिभाषा। ध्वंस्याविनाशित्वं न शक्यमभ्युपगन्तुम् । कपालाश्रितस्य घटध्वंसस्य कपालनाशे स्थानुमशक्यत्वात् । तस्य कालिकातिरिक्तसम्बन्धेन तन्मात्राश्रितत्वस्वाभाव्यात् । ध्वंसध्वसाभ्युपगमे परैरुद्भावितामापत्ति परिहरति- न च घटोन्मज्जनापत्तिः । ध्वसध्वंसस्यापि घटप्रतियोगिक- ध्वसत्वात् । न चापत्तिरिति सम्बन्धः । घटस्य उन्मज्जनं = तस्यैव पुनरुत्पत्तिः, सैव घटोन्मज्जनापत्तिः । ध्वसस्य ध्वसः = ध्वसध्वसः, तस्यापि अपिना प्रथमध्वंसपरिग्रहः । घटप्रतियोगिकत्वात् = घटविरोधित्वात् । अयं भाव:- ध्वंसध्वंसाभ्युपगमे यत्रादृढमुद्गरपातादिना घटध्वंसः, पुनर्मुद्गरपातादिना च कपालध्वंसः, तत्र कपालध्वंसेन घटध्वंसस्यापि ध्वंसाभ्युपगमे तस्यैव घटस्य पुनरुत्पादापात्तः। घटविरोधिनो घटध्वंसस्य ध्वस्तत्वेन तद्घटबाधकामावात् इति यताकिरुपन्यस्यते स्वीयस्यापि घटविरोधित्वमुपेयते । तथा च घटध्वंस- ध्वंसात्मकविरोग्जिागरणस्थल बाधकसत्वात् न तटोत्पादापत्तिसम्भवः इति । वस्तुतस्तु उक्तापतेरवकाश एव नास्ति । तथा हि-कपालसंयोगमात्रनाशस्थले घटध्वस्येव नस्तघटात्पावबाधकत्वम् । कपालनाशस्थले च कपालात्मकसमवायि. कारणस्यवाभावात् क्व पुनस्तद्धटोत्पावः सम्भवतीत्यमिनवः पन्याः। द्वितीतध्वंसस्य प्रयमध्वंसविरोधानुपगमे दण्डमाह- अन्यथा प्रागभावध्वंसात्मकस्य घटस्य विनाशे प्रागभावोन्मज्जना- पत्तिः। अन्यया - घटादिध्वंसध्वंसस्य बटादिबाधकत्वानुपगमे । प्रागभाव:-घटप्राग- भावः, तस्य ध्वंस: आत्मा = स्वरूप यस्य, एतादृशो यो घट: तस्य । विनाशे - ध्वंसे। प्रागभावोन्मज्जनापत्तिः = घटप्रागभावोन्मज्जनापत्तिः । अयं भाष:- सम्पन्नायां घटसामयां घटोत्पादे घटप्रागमावध्वंसः इति घट-घट गमावध्वंसयाः लाघवादमेवः स्वीकरणीयः । तथाच घटध्वंसघटप्रागभावध्वंसध्वंसयोरप्यमेवः । सति यदि तिीयता प्रयमध्वंसविरोषितान स्वीकरणीया तदा घटध्वंसा- स्मकघटप्रागभावध्वंसध्वंसोदये घटप्रागमावध्वंसरूपस्य घटप्रागभावविरोधिनोऽमावेन अनुपलब्धिपरिच्छेदः । २३१ घटप्रागभावोन्मज्जनं निराबापमापतेत् इति ध्रुवं द्वितीयध्वंसस्य प्रथमध्वंस- विरोषित्वमुपेयम् । तथा च कपालनाशस्थले घटध्वंसध्वंसे न घटोन्मज्जनापत्तिरिति । ननु ध्वंसमात्रस्य विनाशित्वं भवदभिप्रेतं यत्किञ्चिद्ध्वंसस्य वा ? आये असम्भवः द्यणुकध्वंसस्य नित्यपरमाण्वाश्रितत्वात् । द्वितीये द्वैतापत्ति. नित्यस्य यत्किञ्चिद्ध्वंसस्य स्वीकारात् इत्यभिप्रायेण चोद्यमानां शङ्का निराकरोति- न चैवमपि यत्र ध्वंसाधिकरणं नित्यं तत्र कथ ध्वंसनाश इति वाच्यम् । तादृशमधिकरणं यदि चैतन्यव्यतिरिक्तं तदा तस्य नित्यत्वम- सिद्धम् । ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य सर्वस्य ब्रह्मज्ञाननिवर्त्यतायाः वक्ष्यमाणत्वात् । यदि च ध्वंसाधिकरणं चैतन्यं तदा असिद्धिः। आरोपितप्रतियोगिक- ध्वंसस्य अधिष्ठाने प्रतीयमानमात्रत्वात् । रिक्तं = - न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । एवमपि घटध्वंसध्वंसनित्यत्वेऽपि । यत्र - यादृशस्थले । नित्यं = ध्वंसाप्रतियोगि । चैतन्यं - ब्रह्म ब्रह्म। तद्व्यति- तद्भिनं परमाण्वादिब्रह्मव्यतिरिक्तस्य - ब्रह्मभिन्नस्य । ब्रह्मज्ञान- निवर्त्यतायाः अहं ब्रह्मास्मीति वृत्तिबाध्यतायाः । आरोपितः अध्यस्तः प्रति- योगी यस्य एतादृशो यो ध्वंसः तस्य । अधिष्ठाने प्रतीयमानत्वात् - तत्त्वत. अधिष्ठानमात्ररूपत्वात् । अयं भावः-परमाणोः व्यणुकध्वंसाश्रयत्वेनाभिप्रेतत्वे तस्यापि ब्रह्मभिन्नतया घटाविववनित्यत्वेन परमाणुनाशे परमात्म्य इयणुक- नाशस्य नाशो निराबाध एव । ब्रह्मणस्तत्वे नाभिप्रेतत्वे अधिष्ठानस्य ब्रह्मणो नित्यत्वेन तदाश्रिततया तदात्मकस्य व्यणुकध्वंसस्य नित्यत्वमिष्टमेव । तापत्तर- भावात् इति। आरोपितप्रतियोगिकध्वंसस्य अधिष्ठानमात्रत्वं परोक्त्या पुष्णाति- तदुक्तं- अधिष्ठानावशेषो हि नाश: कल्पितवस्तुनः इति । हिरेवकारार्थः । तथा च कल्पितवस्तुनो नाशः अधिष्ठानावशेष: - अधिष्ठानमात्ररूप एव इत्यर्थः ।
वेदान्तपरिभाषा। २३२ तु न केवलं कल्पितप्रतियोगिकायाः निवृत्तेः अधिष्ठानमात्ररूपता, अपि यथाविधस्य बाधस्यापि इत्याह- एवं शुक्तिरूप्यनाशोऽपि इदमवच्छिन्नचैतन्यमेव । एवं = द्यणुकनाश इव । इदमवच्छिन्नचैतन्यं = शुक्त्यवच्छिन्नचैतन्यम् । क्रमप्राप्तमत्यन्ताभावमाह- यत्राधिकरणे यस्य कालत्रयेऽप्यभावः सोऽत्यन्ताभावः । यथा वायो रूपात्यन्ताभावः । योति सप्तम्यर्थोऽभेदः। तथा च यत्राधिकरणे इत्यस्य यदभन्ने अधिकरणे इत्यर्थः। कालत्रयेऽपि यस्याभाव इति सम्बन्धः। सोऽत्यन्ताभाव इत्यत्र मध्ये तस्येति शेषः। वायौ रूपं नासीत्, नास्ति, न भविष्यतीति वायो विद्यमानो रूपा- भावः अत्यन्ताभावो बोध्यः । एवं गुडे तिक्ताभावः पाषाणे सौरभाभाव: इत्यादिकः अत्यन्ताभावो बोध्यः । तथा च त्रैकालिकाभावत्वमत्यन्ताभावत्वमिति फलितम् भवति । ननु तर्हि अत्यन्ताभावस्य कालिकतया तमादायैव द्वतापत्तिः, अत आह- सोऽपि वियदादिवत् ध्वंसप्रतियोग्येव । सोऽपि = अत्यन्ताभावोऽपि । वियत् आकाशम् । अयं भाव:-कालिक- त्वम् = व्यावहार कालत्रयावच्छिन्नत्वम् । वियदादे: तत्सत्त्वेऽपि यथा न पारमार्थिकत्वं मिथ्यात्वलक्षणाक्रान्तत्वात् । तथैव अत्यन्ताभावस्यापि न पारमार्थिक- स्वमिति न तमादाय द्वैतापत्तिः । अन्योन्याभावमाह- इदमिदं नेति प्रतीतिविषयोऽन्योऽन्याभावः । "इदं इदं न" इति प्रतीतिः "घटः पटोन" इत्यादिप्रतीतेः उपलक्षिका वेदितव्या । तादात्म्यसम्बन्धावचिछनप्रतियोगिताकाभावत्वं तु न वास्तविकमन्योन्या अनुपलब्धिपरिच्छेदः । २३३ भावलक्षणम् । तादात्म्यस्य वस्तुस्वरूपत्वेन सम्बन्धत्वाभावात् । सम्बन्धस्य द्विनिष्ठत्वनियमात् । नैतावदेव । इदमस्मात्पृथक्, इदमस्मात् विभक्तमित्यादेरप्युपलक्षिका इदमिदं नेत्यादिप्रतीतिरित्याह- अयमेव विभागो भेदः पृथक्त्वं चेति व्यवह्रियते । अत्र "व्यवह्रियते" इत्युक्त्या व्याहारे एव भेदः न तु व्याहार्ये इत्युक्तम् । तत्र हेतुमाह- भेदातिरिक्तपृथक्त्वादौ प्रमाणाभावात् । भेदात् अतिरिक्तं यत्पृथक्त्वादि तस्मिन् । आदिपदेन विभागपरिग्रहः । ननु इदमस्मात्पृथक् इति पञ्चमीविभक्तिश्रवणात्, "इदं इदं न" इत्यत्र तदश्रवणात् कथमेषामेकत्वम् ? इति चेन्न । पृथक्शब्दयोगे पञ्चम्यनुशासनात् तेन तथाभावात् । घटकलशभेदेऽपि वस्त्वमेदवत् व्याहारवरूप्येऽपि भेदपृथक्त्ववस्त्वभेदसम्भवात् । न च तर्हि व्याहारवरूप्येऽपि प्रतीतिवैरूप्यं मास्त्विति वाच्यम् व्याहारप्रतीत्योरेका- कारतानियमात् । सोदाहरणं विमजते- अयं चान्योन्याभावेऽधिकरणस्य सादित्वे सादिः । यथा घटे पटभेदः । अधिकरणस्यानादित्वे त्वनादिरेव यथा जीवे ब्रह्मभेदः ब्रह्मणि वा जीवभेदः। अधिकरणस्य- अन्योन्याभावाधिकरणस्य । सादित्वे -प्रागभावप्रतियोगित्वे । घटे पटभेद इति घटादौ ब्रह्मभेदस्याप्युपलक्षको वेदितव्यः । तत्रापि अधिकरणस्य सादित्वात् । अनादित्वं प्रागभावाप्रतियोगित्वम् । न च जीवस्यानादित्वे अपसिद्धान्त इति वाच्यम् । जीव ईशो विशुद्धाचित् तथा जीवेशयोभिदा । अविद्या तच्चितोर्योगः षडस्माकमजादयः ॥ इत्यभियुक्तोक्तः।
२३४ वेदान्तपरिभाषा ननु तहि द्वैतापत्ति: इत्याशङ्क, याह- द्विविधोऽपिभेदः ध्वंसप्रतियोग्येव । अविद्यानिवृत्ती तत्परतन्त्राणां निवृत्त्यवश्यम्भावात् । द्विविधोऽपि = सादिरनादिश्च । अविद्यायाः गिति: अविवानिवृत्तिः, तस्यां सत्याम् । तत्परतन्त्राणां = अविद्यानिवृत्त्यधीनानाम् । नित्यवश्यम्भावः = दुर्वारा- निवृत्तिः । यद्यपि निवृत्त्यवश्यम्भावादित्यगगतम्, अविभानिवगिरथले प्रपञ्चबाध- स्यैवाभ्युपगमात् । तथापि निवृत्तिस्थले बाधाभावेऽगि, बाघस्गले निवृत्तिरप्य- वश्यम्भाविनी इत्यभिप्रायेण तथोक्तिरिति बोध्यम् । देतापत्तिशंकापनोदायव प्रकारान्तरेणापि भेवगागं सोदाहरणमाह- पुनरपि भेदो द्विविधः । सोपाधिको निरुपाधिकश्चेति । तत्रो- पाधिसत्ताव्याप्यसत्ताकत्वं सोपाधिकत्वम् । तच्छून्यत्वं निरुपाधिकत्वम् । पुनरपि = प्रकारान्तरेणापि । तत्र = उभर्योमध्ये । उपाधिः -- परिच्छेदकस्य अस्तित्वम्, तद्व याप्या सत्ता -- अस्तिता यस्य, तत् उपाधि- सत्ताव्याप्यसत्ताकम्, तस्य भावस्तत्त्वम् । तच्छून्यत्वं सोपाधिकरवाभावः । उपाधिसत्ताव्याप्यसत्ताकत्त्वाभाव इति यावत् । घटभेदभिन्नाकाशस्थले, उपाधिः तत्सत्तायाः घटास्तित्वाभाववत्कालनिरूपितवृत्तित्वाभाववती भवति घटाकाशस्य सत्तेति भवति घटाकाशे लक्षणरामन्वयः । शुद्धाकाश तु तदभावान्निरूपाधिकत्वम् । या सत्ता- घटः व्याप्या अवच्छेदवादेन आद्यस्य दृष्टान्तमाह- यथा एकस्यैवाकाशस्य घटाद्यपाधिभेदेन भेदः । अय भावः--एकमपि महाकाशं घटादेपाः भेदेन भिन्नमिव भवतीति घटा- काशपटाकाशभेदस्य सोपाधिकत्वम् इति ।
अनुपलब्धिपरिच्छेदः । २३५ आद्यस्यैव प्रतिबिम्बवादेन दृष्टान्तमाह- यथा वा एकस्यैव सूर्यस्य जलभाजनभेदेन भेदः । यथा एकस्यैव ब्रह्मणः अन्तःकरणभेदाभेदः । अयं भाव:- यत्रानेकस्मिन् पात्रे जलं प्रपूर्य तानि पात्राणि वहिरवस्थाप्यन्ते तत्र तेपु प्रतिबिम्बपातेन विभिन्न इव सूर्यो दृश्यते । स च भेदो न निरुपाधिको भवितुमर्हति उपाधिभूततत्तत्पात्रजन्याभावे भेदादर्शनात् इति । यथा एकस्यैव ब्रह्मण इत्यादि नृतीयदृष्टान्तप्रदर्शनं अवच्छेदप्रतिबिम्बोभयवादसाधारणमवसेयम् । निरुपाधिकभेददृष्टान्तमाह- निरुपाधिकभेदो यथा घटे पटभेदः । घटपटसत्तयोरन्वयव्यतिरेकाभावेन व्याप्त्यभावात् न व्याप्तिघटितसोपाधिक- त्वस्य तद्भदे सम्भव इति भावः । - शङ्कते- ननु ब्रह्मण्यपि प्रपञ्चभेदाभ्युपगमेद्वैतविरोधः । भेदस्य प्रतियोग्याधारोभयनिरूप्यतया, प्रतियोगिनः - प्रपञ्चस्य ब्रह्मणश्चा- स्तित्वमभ्युपेयमिति द्वैतापत्तिर्दुवारेति भावः । उत्तरयति- - न । तात्विकभेदादेरनभ्युपगमेन वियदादिवदद्वताव्याघातकत्वात् । वियत् = आकाशं, तदादिवत् । अद्वैताव्याघातकत्वात् = अद्वैतनिवारकत्वा- भावात् । आकाशादिप्रपञ्च इव प्रपञ्चभेदस्यापि काल्पनिकतया न देतापत्तिः । तात्विकाभेदस्यैव वेदान्तप्रतिपाद्यत्वात् इति भावः ।
वेदान्तपरिभाषा। - सुरेश्वरोक्त्या निजोक्ति पुष्णाति- अक्षमाभवतः केयं साधकत्वप्रकल्पने । किं न पश्यसि संसारं तत्रैवाज्ञानकल्पितम् ।। इति सुरेश्वराचार्यवचनात् । साधकत्वप्रकल्पने भवतः का इयं अक्षमा। संसारं तत्रैव अज्ञानकल्पितं किं न पश्यसि इत्यन्वयः। साधकत्वं प्रामाण्यं, तस्य प्रकल्पनं स्वीकारः तस्मिन् । अक्षमा = असहिष्णुता, अस्वीकार इति यावत् । तथा च केयमक्षमा ? इत्यस्य किमर्थकल्पितः प्रमाणप्रमेयभावः कथं नाभ्युपगम्यते ? संसारस्यैव ब्रह्मणि कल्पितत्वेन द्वैतापत्तेरभावात् इति भावार्थ प्रागभावाभ्युपगन्तारमेकदेशिनं विवरणादिविरोधापत्तिप्रदर्शनेन वारयति- अत एव विवरणेऽविद्यानुमाने प्रागभावव्यतिरिक्तत्वविशेषणं, तत्त्वप्रदीपिकायां अविद्यालक्षणे भावत्वविशेषणं चं संगच्छंते । अत एव = वेदान्तिभिः प्रागभावाभ्युपगमादेव। अविद्यानुमान "प्रेमाज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वविषयावरण-स्वनिवर्त्य-स्वदेशगत-वस्त्वन्तरपूर्वकम् । अप्रका- शितार्थप्रकाशकत्वात् । अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रभावत्" इत्याकारक-अविद्यासाधकम- नुमानम्, तस्मिन् । तत्त्वदीपिका = चित्सुखीतिप्रसिद्धः चित्सुखाचार्यग्रन्थः, तत्र । अविद्यालक्षणे . - "अनादिभावरूपं यद्विज्ञानेन विलीयते । तदज्ञानमिति प्राज्ञाः लक्षणं सम्प्रक्षते ॥ इत्युक्त्वा अनादित्वे सति भावत्वे सति विज्ञाननिवय॑त्वम्" एवं प्रकारेण प्रति- पोदिते। अयं भाव:-"प्रमाजानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वविषयावरण-स्वनिवर्त्य- स्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकम्" इत्यनुमिती साध्यांशे वस्त्वन्तरपवेन परिशेषात् मशानमेव गृह्यते इति भवति तसिद्धिः । तत्रानुमाने वस्त्वन्तरे प्रक्षिप्तानां विशेषणानां मध्ये प्रागमावमावायार्थान्तरवारकं प्रागमावण्यतिरिक्तत्वविशेषणमपि अनुपलब्धिपरिच्छेदः । २३७ प्रक्षिप्तम् । तच्च प्रागभावाभ्युपगमपक्ष एव घटते । प्रागभावानभ्युपगमे तमादाय अर्थान्तरप्रसक्तिरेव गगनकुसुमायितेति, न केवलं व्यर्थमेव स्यात् प्रागमावव्यति- रिक्तत्वविशेषणम् । अपि तु दातुमशक्यमपि, प्रागभावाभावात् । अतो ज्ञायते यत् प्रागभावो वेदान्तसिद्धान्तसिद्ध इति । एव अनादित्वे सति भावत्वे सति विज्ञान- निवर्त्यत्वं अज्ञानत्वमिति अज्ञानलक्षणे भावत्वविशेषणं प्रागभावे अतिव्याप्तिवारणायव दीयते । यदि प्रागभाव एव न स्यात् तहि क्वातिव्याप्तिः ? किं वारणाय च तद्विशेषणदानं संमतं स्यात् ? अतः प्रागभावो वेदान्तसिद्धान्तं सिद्ध इति । परिच्छेदोपसंहारमाह- । एवञ्च चतुर्विधाभावानां योग्यानुपलब्ध्या प्रतीतिः । तत्रानुपलब्धि- मानान्तरम् । इति । एवं च = चतुर्विधाभावसिद्धौ च । चतुर्विधाभावानां = प्रागभावप्रध्वंसा- भावात्यन्ताभावान्योन्याभावानां। प्रतीति: = प्रमाज्ञानम् । तत्र = अभावे । तथा चानुपलब्धेः षष्ठं प्रमाणत्वदुरपलपमिति भावः ।
२३८ वेदान्तपरिभाषा। । अथ प्रामाण्यवादः प्रसङ्गात् प्रमात्वस्वतस्त्वं प्रतिपादयति- एवमुक्तानां प्रमाणानां प्रामाण्यं स्वत एव उत्पद्यते ज्ञायते च । प्रमाणाना = प्रमाणसाध्याना प्रमाणम् । प्रामाण्य प्रमात्वम् । अयं भाव:- उक्तप्रत्यक्षादिप्रमाणषट्कसाध्य-प्रमाषट्कगतं प्रमात्वं ज्ञानसामान्यसामग्रीप्रयोज्यं उताधिकसामग्रीप्रयोज्यम् ? इति दार्शनिकविप्रतिपत्तिः । तत्र न ज्ञानसामान्य- सामग्रीप्रयोज्यम्, अपि तु गुणात्मकाधिककारणघटितसामग्रीप्रयोज्यमिति न्याय- वैशेषिकमतम् । तन्न मनोरमम् । अपि तु ज्ञानसामान्यसामग्रीप्रयोज्यमेवेति । एवं प्रमागतस्य प्रमात्वस्य ज्ञानं ज्ञानग्राहकसामग्रीप्रयोज्यमेव भवति, न त्वतिरिक्त- सामग्रीप्रयोज्यमिति । एतदेव व्युत्पादयति- तथा हि स्मृत्यनुभवसाधारणं सम्वादिप्रवृत्त्यनुकूलं तद्वतितत्प्रकार- कत्वं प्रामाण्यम् । तच्च ज्ञानसामान्यसामग्रीप्रयोज्यम् ।न त्वधिक गुणमपेक्षते । प्रमामात्रेऽनुगतगुणाभावात् । स्मृत्यनुभवसाधारणं = तदुभयवृत्ति । सम्वादिनी = सफला या प्रवृत्तिः, तस्यामनुकूलम् । तद्वति = प्रकारीभूतपदार्थाधिकरणे । प्रामाण्यं प्रमात्वम् । तच्च = प्रामाण्यं तु। ज्ञानस्य या सामान्यसामग्री साधारणकारणसमवायः, तत्प्रयोज्यम् । ज्ञानसामान्यसामग्रीप्रयोज्यत्वेन सह अधिकगुणप्रयोज्यत्वं न विरुद्धम्, इत्यत: स्पष्टतयोक्तं “न त्वधिकं गुणमपेक्षते" इति । कारणतायाः अनुगतधर्मा- वच्छिन्नत्वनियमेन गुणेष्वनुगतधर्मस्याभावः गुणकारणत्वे बाधकः इत्युक्तं "प्रमामात्रे" इत्यादिना । -- ननु मास्तु प्रमासामान्य प्रति अनुगततया गुणत्वेन कारणता। विशेषतः कारणतायां तु बाघकाभावः इत्याशङ्कायामाह- - नापि प्रत्यक्षप्रमायां भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्षः रूपादिप्रत्यक्षे आत्म- प्रत्यक्षे च तदभावात् । सत्यपि तस्मिन् पीतः शंख इति प्रत्यक्षस्य भ्रमत्वाच्च।
प्रामाण्यवादपरिच्छेदः। २३९ D । प्रत्यक्षप्रमायां - प्रत्यक्षात्मिकायां प्रमायाम् । भूयान् अवयवेन्द्रियमन्निकर्षः भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्षः । तदभावात भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्षाभावात् । तस्मिन् भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्षे । अयं भाव:-अन्वयव्यतिरेकाम्यामेव कार्यकारणभावो निश्चीयते । इह तु तावन्वयव्यतिरेको विद्यते । यतो रूपस्य चाक्षुषं प्रत्यक्ष भवति, भूयोऽवयवेन्द्रियसनिकर्षस्तु नास्ति । रूपस्य गुणत्वेन निरवयवत्वात् । किञ्च आत्मनो मानसं प्रत्यक्ष भवति किन्तु भूयोऽवयवेन्द्रियसनिकों नास्ति, तत एव । इति व्यतिरेकामावः । स्थलद्वयप्रदर्शनं वाह्यमानसप्रत्यक्षभेदाभिप्रायेण बोध्यम् । "पीतः शंख." इति प्रत्यक्षस्थले शंखेन सह भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्षों विद्यते किन्तु प्रमाप्रत्यक्ष न भवति इति अन्वयाभावः । सति चैवमन्वयव्यतिरेकाभावे कथं प्रत्यक्ष प्रत्यपि भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्षात्मगुणत्वेन विशेषरूपेण कारणता अभ्युप- गन्तु शक्येति। - अनुमितिस्थलेऽपि न विशेषरूपेण कारणता, इत्याह- अत एव न सल्लिङ्गकपरामर्शादिकमपि अनुमित्यादिप्रमायां गुणः । असल्लिंगकपरामर्शादिस्थले विषयाबाधेन अनुमित्यादेः प्रमात्वात् । अत एव व्यभिचारादेव । परामर्शादिकमित्यत्रादिपदेन वक्तृवाक्यार्थ- यथार्थज्ञानपरिग्रहः । अनुमित्यादीत्यादि पदेन च शाब्दवोवपरिग्रहः । अयं भावः- अनुमितिप्रमा प्रति सल्लिंगकपरामर्शात्मकगुणः कारणम् इत्यादिविशेषरूपेणापि न शक्यते वक्तुं कार्यकारणभावः । यत्र "वह्निव्याप्यधूमवदयोगोलकम्" इति भ्रमात्मकः परामर्शः, तत्र गुणाभावेऽपि जायमानाया "वह्निमदयोगोलकम्" इत्यनुमितेः वह्निमति वह्निप्रकारकतया प्रमात्वेन व्यतिरेकव्यभिचारात् । ननु तर्हि भ्रमप्रमयो वैलक्षण्यमेव लुप्तं स्यात् । विशेषकाभावात् न चेष्टापत्तिः प्रवृत्त्यो : सम्वादित्वविसम्वादित्वाभ्यां भेदस्य सर्वानुभवसिद्धस्यापलापापत्तेः । इत्याशां निवारयति- न चैवमप्रमापि प्रमा स्यात् । ज्ञानसामान्यसामग्र्याः अविशेषा- दिति वाच्यम् । दोषाभावस्यापि हेतुत्वाङ्गीकारात् । न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । ज्ञानस्य या सामान्यसामग्री तस्याः । अवि- शेषात् = अवैलक्षण्यात् । हेतुत्वाङ्गीकारात् = कारणत्वाङ्गीकारात् । अयं भाव.- २४० वेदान्तपरिभाषा। प्रमा प्रति गुणस्य कारणत्वानभ्युपगमेऽपि दोषाभावस्यातिरिक्तकारणत्वमभ्युप- गम्यते । तस्य चाप्रमा प्रति कारणत्वाभावेन प्रमाप्रमयोः वैलक्षण्यमक्षुण्णमिति । ननु ता पसिद्धान्तापात: । दोषाभावात्मकातिरिक्तहेत्वभ्युपगमेन फलतः परतस्त्वाभ्युपगमात् इति शङ्का निराकरोति- न चैवं परतस्त्वम् । आगन्तुकभावकारणापेक्षायामेव परतस्त्वात् । एवं = दोषाभावस्य कारणत्वाभ्युपगमे । आगन्तुकं सत् भावात्मकं यत्कारणं तदपेक्षायाम् = तस्य कारणत्वकल्पनायाम् । अयं भाव:-न ज्ञानसामान्यसामग्री- भिन्नसामग्रीजन्यत्वमेव परतस्त्वम् । अपि तु ज्ञानसामान्यसामग्रीभिन्नागन्तुक- भावात्मककारणजन्यत्वम् । प्रकृते दोषाभावस्य भावत्वाभावेन तज्जन्यत्वेऽपि न परतस्त्वापत्तिः । न चागन्तुकपदव्यर्थतेति वाच्यम् । घटादिप्रमायां अविद्यात्मकदोष- जन्यत्वसत्त्वेन तत्राव्याप्त्यापत्तेः । आगन्तुकपददाने च तस्याः आगन्तुकत्वाभावेन दोषानवकाशात् । - प्रामाण्यस्य उत्पत्ती स्वतस्त्वमुक्तवा ज्ञप्तौ तमाह- ज्ञायते च प्रामाण्यं स्वतः । प्रामाण्यं स्वत: ज्ञायते च इत्यन्वयः । ज्ञप्ती स्वतस्त्वं तु ज्ञानग्राहकसामग्री- ग्राह्यत्वम् । अयं भाव:--"अयं घटः" इत्याविप्रमाजाने जाते, "इवं ज्ञानं प्रमा" इति प्रमात्वनिश्चयः परक्षण एव सर्वत्र ज्ञानग्राहकसामग्या सजायते, आहोस्वित् अतिरिक्ता सामग्रीमपेक्ष्य कालान्तरे सजायते इति विप्रतिपत्तिः। तत्र न परक्षणे एक प्रमात्वनिश्चयः, अपि तु ज्ञानजन्यप्रवृत्तिसाफल्यमवलोक्य पश्चात् "इवं ज्ञानं प्रमा" इति प्रमात्वनिश्चयो भवतीति नैयायिकवैशेषिकावीनां मतम् । तन्न युक्तम् बानमासकसामग्र्यैव प्रमोत्पत्तिपरक्षण एव हि भवत्यसौ निश्चयः । अन्यथा रजता- थिनः इवं रजतमिति निश्चयोत्तरमेव समुपलभ्यमाना तत्प्रवृत्तिरनुपपन्ना स्यात् इति । -- ननु किं नाम स्वतो ग्राह्यत्वमित्याकांक्षायामाह- स्वतो ग्राह्यत्वं च दोषाभावे सति यावत्स्वाश्रयग्राहकसामग्री- ग्राह्यत्वम् ।
प्रामाण्यवादपरिच्छेदः । २४१ स्वं = प्रमात्वम्, स्वाश्रयः = प्रमात्वनिश्चयः, तस्य ग्राहिका या यावती सामग्री तद्ग्राह्यत्वमित्यर्थः । सामग्रीपदं कारणमात्रपरम् । तेन न यावत्पदवैयर्थ्यम् । एतदेव विवृणोति- स्वाश्रयो वृत्तिज्ञानं तद्ग्राहकं साविज्ञानं तेन वृत्तिज्ञाने गृह्यमाणे तद्गतं प्रामाण्यमपि गृह्यते । तेन साक्षिज्ञानेन । वृत्तिज्ञाने प्रमाज्ञानात्मकवृत्तौ । प्रामाण्यम् प्रमात्वम् । गृह्यते = ज्ञायते । अयं भावः- रजते शुक्तिकायां वा यवा "इदं रजतम्" इति साक्षात्कारो भवति केषांचित् तदा तदप्यवहितोत्तरमेव जायमानां रजतार्थिनां प्रवृत्तिः न शक्या अपलपितुम् । न च स्वकीये "इदं रजतम्" इति ज्ञाने अगृहीतप्रामाण्यकस्य सन्दिग्धप्रामाण्यकस्य वा कस्यापि भवितुमर्हति प्रवृत्ति- स्तादृशी । ज्ञानप्रामाण्यसंशयस्य विषयसंशयपर्यवसन्नतया विषयसंशयानारत्वा । संशयस्थले च निष्कम्पप्रवृत्त्यदर्शनात् । तस्मात् भवति ज्ञानग्रहणसमकालमेव ज्ञानग्राहकसामग्र्यैव च ज्ञानप्रमात्वनिश्चय इति । नन्वनभ्यासदशापन्नज्ञानस्थले दृश्यते खलु ज्ञाने प्रामाण्यसंशयः-इदं ज्ञानं प्रमा न वेति । य: खलु पश्चात् विलोक्य प्रवृत्ति विसम्वादिनी समपसरति । ज्ञानज्ञानेन सहैव च प्रमात्वज्ञाने नासौ युज्यते कथमपि । निश्चयोत्तरं संशयानुत्पादात् इत्याशंका निषेधति- न चैवं प्रामाण्यसंशयानुपपत्तिः तत्र संशयानुरोधेन दोषस्यापि सत्त्वेन दोषाभावघटितस्वाश्रयग्राहकाभावेन तत्र प्रामाण्यस्यैवाग्रहात् । एवं = प्रामाण्यसंशयस्य स्वतस्त्वे । प्रामाण्यस्य संशयः प्रामाण्यसंशयः, तस्या- नुपपत्तिः प्रामाण्यसंशयानुपपत्तिः । तत्र = प्रामाण्यसंशयस्थले । दोषस्य यः अभावः तद्धटितो यः स्वाश्रयस्य = प्रमात्वाश्रयस्य ग्राहकः तदभावेन । अग्रहात् - ग्रहा- भावात् । अयं मावः-ज्ञानप्राहकसामग्रीतोऽषिको दोषाभावोऽपि ज्ञानगतप्रमात्वग्रहे अपेक्षितः । प्रामाण्यसंशयस्थले तु संशयात्मकस्याप्रमाज्ञानस्य जननाय दोषास्तित्व- मप्यपेक्षितम्, इति दोषामावादेव न तत्र प्रमात्वनिश्चयः । इति नानम्यासदशा- पन्नज्ञानस्थले प्रामाण्यसंशयानुपपत्तिः। दोषाभावस्याधिकस्यापेक्षणेऽपि यथा न स्वतस्त्वहानिः तथा प्रदर्शितं प्रागेव ।
२४२ वेदान्तपरिभाषा। उपायान्तरमाह- यद्वा यावत्स्वाश्रयग्राहक - ग्राह्यत्व - योग्यत्वं स्वतस्त्वम् । संशयस्थले प्रामाण्यस्योक्तयोग्यतासत्त्वेऽपि दोषवशेनाग्रहात् न संशयानुपपत्तिः यावता स्वाश्रयग्राहकेण यत् ग्राह्यत्वं तद्योग्यत्वमित्यर्थः । स्वं = प्रमात्वम् । प्रामाण्यसशयस्थले दोषस्य संशयसम्पादकतया अपेक्षितत्वेन दोषाभावाभावेन स्वाश्रयग्राहके यावत्वाभवेन योग्यताया दुर्वारत्वेऽपि न प्रामाण्यनिश्चय इति न प्रामाण्यसशयानुपपत्तिरिति । ननु तर्हि प्रमात्वाप्रमात्वयोरुभयोः ज्ञाननिष्ठत्वाविशेषात् अप्रमात्वमपि किं न स्वतः समुत्पन्नं भवेत् । ओमित्युक्तो अप्रमात्वोत्पादात् तज्ज्ञानाच्च । इत्याशङ्कां निराकर्तुमाह- अप्रामाण्यं तु न ज्ञानसामान्यसामग्रीप्रयोज्यम् प्रमायामप्यप्रामाण्या- पत्तेः । किन्तु दोषप्रयोज्यम् । अप्रामाण्यं = अप्रमात्वम् । ज्ञानस्य या सामान्या सामग्री तत्प्रयोज्यं न । अपि तु अधिकसामग्रीप्रयोज्यमित्मर्थ. । अन्यथा सर्वत्र ज्ञानस्याप्रमात्वा- पत्तिः । "किन्तु" इत्यादिना किमधिकमपेक्षितमिति शका निराकृता । केवलमुत्पत्तावेव ज्ञाने अप्रमात्वस्य परतस्त्वम्, आहोस्वित् ज्ञप्तावपीत्या- काक्षायामाह- नाप्यप्रामाण्यं यावत्स्वाश्रयग्राहक-ग्रह्यात्वम् । यावत्स्वाश्रयग्राहकग्राह्यमपि नेति सम्बन्धः । ग्राहकान्तरमप्यपेक्षितमिति भावः । कुतो न तथेति जिज्ञासायामाह- अप्रामाण्यघटकतदभावावेदे: गृहीतुमशक्यत्वात् । वृत्तिज्ञानानुपनीतत्वेन साक्षिणा प्रामाण्यवादपरिच्छेदः १४३ . अप्रामाण्यं तदभाववति तत्प्रकारकत्वं, तद्घटकः तदभावादिः, तस्य । आदिपदेन तत्प्रकारकत्वपरिग्रहः । साक्षिणा अन्तःकरणोपहितचैतन्येन । गृहीतुं विषयीकर्तुम् । अयमाशयः - यत् अन्तस्तद्धर्मप्रातिमासिकामां अन्तःकरणवृत्त्या विषयीक्रियते तदेव अन्तःकरणोपहितचंतन्यात्मकेन साक्षिणा विषयीक्रियते इति नियमः । सति चैवं अन्तःकरणवृत्त्यविषयस्य तदमाववत्त्वादेः गृहणं न साक्षिसाध्यम् । अतः तदभाववत्स्वाविघटितं अप्रमात्वमपि साक्ष्यमास्य- मेवेति न ज्ञप्तौ अपि स्वतस्त्वमप्रमावस्येति । तर्हि कथं तस्य गृहणम् इत्याकांक्षायामाह- विसम्वादिप्रवृत्त्यादिलिंगकानुमित्यादिविषयः इति परत एवाप्रामाण्यमुत्पद्यते ज्ञायते च । विसम्वादिनी या प्रवृत्तिः, तदादिलिंगिका या अनुमितिः, तदादिविषयः इत्यर्थः । “विमता प्रवृत्तिः अप्रमाजन्या विसम्वादित्वात्" इत्याद्यनुमित्या विषयीक्रियते इति भावः । परत एवेत्यादिरुपसंहारपरः ।
२४४ वेदान्तपरिभाषा । विषयपरिच्छेद-भगवती जीवब्रह्म क्यात्मकविषयनिरूपणाय, निरूपितस्य विभक्तस्य प्रमाणस्य प्रकारान्तरेण विभागमाह- एवं निरूपितानां प्रमाणानां प्रामाण्यं द्विविधं व्यावहारिक- तत्त्वावेदकत्वं पारमार्थिकतत्त्वावेदकत्वं चेति । निरूपणविषयतां प्रापिताः-निरूपिता:, तेषाम् । प्रमाणानाः प्रत्यक्षाद्यनुपलब्धिपर्यन्ताना । प्रामाण्यं =प्रमाकरणत्वम् । व्यावहारिकं यत् तत्त्वं वस्तु, तस्य वत् आवेदक = ज्ञापकं, तत् व्यावहारिकतत्त्वावेदक, तस्य भावः तत्त्वम् । व्यावहारिकत्वञ्च व्यवहाराय स्वीकृतत्वम् । एवं पारमार्थिक- तत्त्वेत्यत्रापि बोध्यम् । पारमार्थिकत्वं त्रिकालाबाध्यत्वम् । प्रामाण्यस्य द्वैविध्ये प्रमाण विध्यं कैमुतिकन्यायसिद्धम् । अयं भाव:-द्विविधः खलु पदार्थः ब्रह्मज्ञानबाध्यस्तदबाध्यश्च । तमःप्रकाशयोरिव विरुद्धयोरेतयोः ख्यापकेन प्रमाणेनापि वैलक्षण्यवताभाव्यम् इति द्विविष प्रामाण्यमभ्युपेयम् । तत्र यत्प्रमाणं जीवब्रोक्यस्य यथार्थवस्तुनः ख्यापक तत्पारमार्थिकतत्त्वावेदकम् । अतस्तत्त्वरूपं प्रामाण्यं तत्र । यच्च घटपटादिव्यवहारकल्पितपदार्थख्यापक तव्यावहारिकतत्वावेदकम् । अतस्तत्वरूपं तत्रेति । विशेपतो लक्ष्यजिज्ञासायामाह- तत्र ब्रह्मस्वरूपावगाहिप्रमाणव्यतिरिक्तानां सर्वप्रमाणानां आद्यं प्रामाण्यम् । तद्विषयाणां व्यवहारदशायां बाधाभावात् । द्वितीयं तु जीवब्रह्म क्यपराणां सदेव सौम्येदमग्र आसीदित्यादीनां तत्त्वमसीत्यन्तानाम् । तद्विषयस्य कालत्रयाबाध्यत्वात् । तत्रद्वयोः प्रामाण्ययोर्मध्ये । ब्रह्मस्वरूपं अवगाहन्तेप्रमेयत्वेन विषयीकुर्वन्ति यानि प्रमाणानि, तद्व यतिरिक्तानां = तद्भिन्नानाम् । आद्यं = व्यावहारिक- तत्त्वावेदकत्वरूपम् । तद्विषयाणां = तत्प्रमेयाणाम् = ब्रह्मभिन्नत्वेन गृह यमाणाना- मिति यावत् । द्वितीयं = पारमार्थिकतत्त्वावेदकत्वम् । जीवब्रह्मणोः यत् ऐक्यं अभेदः तत्पराणाम् = तत्ख्यापकानाम् । “सदेवे" त्युपक्रमवाक्यं “तत्त्वमसी"ति च %D विषयपरिच्छेदः । २४५ उपसंहारवाक्यम् । तद्विषयस्य निरूक्तोपक्रमोपसंहारवच्छ तिवाक्यबोध्यस्य जीव- ब्रह्मक्यस्य । कालत्रयाबाध्यत्वात् = भूतवर्तमानभविष्यत्कालेपु बाधाविषयत्वात् । अयं भावः-त्रिविधः खलु सत्पदार्थः प्रातीतिको व्यावहारिकः पारमार्थिकश्च । प्रातीतिको रज्जुसादिः, व्यावहारिको घटादिः, पारमार्थिकः जीवामिन्नं ब्रह्म। तत्र जीवाभिन्नस्य ब्रह्मणः कस्मिन्नपि काले बाधाभावेन पारमार्थिकसत्यता । तत्रव्यापिका सोपक्रमोपसंहारा श्रुतिः पारमार्थिकतत्त्वावेदकं प्रमाणम् । ब्रह्मभिन्नानां तु सर्वेषां अहं ब्रह्मास्मीति परमवृत्त्याबाधेन पारमार्थिकत्वाभावात् तत्रव्यापकं प्रत्यक्षादिप्रमाणं अपारमाथिकतत्त्वावेदकमिति । व्यावहारिक- तत्त्वावेदकत्वमित्यत्र व्यावहारिकपदं अपरमार्थिकपरं बोध्यम् । तेन प्रातीतिकस्य प्रमाणान्तरवेद्यत्वशङ्का । जीवब्रह्म क्यनिर्णयप्रयोजकीभूत तत् त्वं पदार्थशोधनाय भूमिका- मारचयति- तच्चैक्यं तत्त्वं पदार्थज्ञानाधीनम् इति प्रथमं तत्पदार्थो लक्षण- प्रमाणाभ्यां निरूप्यते । न -- तच्चक्यं जीवब्रह्म क्यम् । तत् त्वं पदयोः यौ अथौँ, तयोः यत् ज्ञानं, वदधीनमित्यर्थः । प्रथमं = पूर्वम् । तत्पदार्थः = तत्त्वमसीत्यत्र तत्पदस्यार्थः । निरूप्यते अध्येतृज्ञानानुकूलव्यापारविषयः क्रियते इत्यर्थः । अयमाशयः - मोक्षाय अविद्यानिवृत्तिरपेक्षिता । तस्य च जोवब्रह्मक्यज्ञानमपेक्षितम् । तच्च तत्त्वमसोति महावाक्यार्थबोधसापेक्षम् । सच त्वं पदार्थज्ञानसापेक्षः । तच्च ज्ञानानुकूलव्यापारसापेक्षम् इति विधीयते खल्वसौ व्यापार इति । लक्षणप्रमाणाभ्यामित्युक्तं तत्र विभागपूर्वक लक्षण-लक्षणमाह-- तंत्र लक्षणं द्विविधं स्वरूपलक्षणं तटस्थलक्षणं चेति तत्र स्वरूपमेव लक्षणं स्वरूपलक्षणम् । यथा “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म"त्यादिकं स्वरूप- लक्षणम् । तत्र = लक्षणप्रमाणयोर्मध्ये । तत्र = लक्षणयोर्मध्ये । स्वं = लक्ष्यम्, तद्प- तदात्मकं सदेव यल्लक्षणं = ज्ञापकं भवति, तत्स्वरूपलक्षणमिति भावः । मेव - २४६ वेदान्तपरिभाषा। इत्यादिकं = इति श्रुतिप्रतिपाद्य सत्यज्ञानादिकम् । स्वरूपलक्षणं ब्रह्मण इति शेषः । अयं भाव:-यत् तत्त्वतो न भिद्यते लक्ष्यात् किन्तु काल्पनिकधर्माभावापन्नं सत् लक्ष्यस्य परिचायकं भवति, तत्स्वरूपलक्षणम् । यथा ''सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" "आनन्दं ब्रह्म" इत्यत्र सत्यादिकं न ब्रह्मणो मिन्नं तन्मात्रस्यैव सत्पदार्थत्वात् । किन्तु तादात्म्येन तवादेः ब्रह्मण्येव सत्त्वं नाब्रह्मणि व्यावहारिके प्रातिमासिके वा कस्मिश्चिदिति भवति तदादिकं लक्षणं ब्रह्मणः इति । नन्वसाधारणधर्मत्वस्यैव लक्षणलक्षणतया तवृत्तित्वस्यैव तद्धमत्त्वतया स्वस्य स्वस्कन्धरारोहणमिव स्वस्य स्ववृत्तित्वमसम्भवीति कृत्वा कथमेकस्यैव लक्ष्यलक्षण- भावः ? इत्याशङ्कय निषेधति- - ननु स्वस्य स्ववृत्तित्वाभावे कथं लक्षणत्वमिति चेत् न स्वस्यैव स्वापेक्षया धर्मभिभावकल्पनया लक्षणत्वसम्भवात् । स्वस्मिन् वृत्तित्वाभावः स्ववृत्तित्वाभावः, तस्मिन् स्वस्य कथं लक्षणत्वमित्य- न्वयः। एवकारः अप्यर्थकः । धर्ममिभावी धर्मत्वं धर्मित्वं च । तत्कल्पना = तदारोपः । अयं भावः-न कोऽपि स्वकन्धमारोहतीति सत्यम् । परन्तु प्रमेयत्व- वाच्यत्वादेः केवलान्वयित्वमिच्छता प्रतिवादिनाऽपि कथंचित् कुत्रचित् स्वस्य स्ववृत्तित्वमभ्युपेयम् । अन्यथा प्रमेयत्वादेः जगदन्तःपातिप्रमेयत्वाद्यवृत्तितया समग्रजगदवृत्तित्वेन केवलान्वयत्वव्याकोपो दुर्वारः स्यात् । सति चवं सत्यस्यापि सत्यात्मकब्रह्मवृत्तित्वमुपपद्यत एव कथञ्चित् इति नानुपपद्यते स्वासाधारणधर्मत्वं स्वस्येति लक्ष्यलक्षणभावो नानुपपन्न इति । अर्थेऽस्मिन् पञ्चपादिकासम्मतिमाह- आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वं चेति सन्ति धर्माः अपृथक्त्वेऽपि चैतन्यात् पृथगिवाभासन्ते इति । चैतन्यात् अपृथक्त्वेऽपि पृथक् इव अवभासन्ते इति आनन्द: विषयानुभवः नित्यत्वं च भवन्ति धर्माः इत्यन्वयः । चैतन्यस्येति शेषः । अपृथक्त्वेऽपि विषयपरिच्छेदः २४७ % 3D भिन्ना इव । इव शब्देन धर्ममिभावस्य तत्त्वतः अभेदेऽपि । पृथक् इव काल्पिनिकत्वद्योतनम् । द्वितीयं तटस्थलक्षणमाह- तटस्थलक्षणं नाम यावल्लक्ष्यकालमनवस्थितत्वे सति यद् व्यावर्तकं तदेव । तटस्थं सत् लक्षणं तटस्थलक्षणम् । ताटस्थ्यस्यैव हि विवरण यावल्लक्ष्यकाल- मनवस्थितत्वम् । तच्च लक्ष्यतावच्छेदकाधिकरणे विद्यमानाभावप्रतियोगित्वं बोध्यम् । व्यावर्तकत्व = इतरभेदानुमापकत्वम् । उदाहरणमाह- यथा गन्धवत्त्वं पृथिवीलक्षणम् । महाप्रलये परमाणुषु, उत्पत्तिकाले घटादिषु च गन्धाभावात् । पृथिवीलक्षणं = पृथिव्यास्तटस्थलक्षणम् । महाप्रलये = महाप्रलयावच्छेदेन । उत्पत्तिकाले उत्पत्तिकालावच्छेदेन । लक्ष्यतावच्छेदकस्य पृथिवीत्वस्याधिकरणे परमाणौ उत्पत्तिकालावच्छेदेन महाप्रलयावच्छेदेन च विद्यमानः अभावः गन्धाभाव., तत्प्रतियोगित्वं गन्धवत्वे विद्यते । एव पृथिवी पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्वात् इतीतरभेदानुमितौ हेतुभूततया व्यावर्तकत्वमपि विद्यते इति लक्षणसमन्वयः । उत्पत्तिकाले घटादौ निष्क्रिय च तिष्ठतीति नियमेन नैयायिकादिभिरप्यभ्युपगम्यत एव । एतेन महाप्रलयान भ्युपगमेऽपि न क्षतिः । तत्पदार्थावगमाय तत्तटस्थलक्षणमाह- प्रकृते च जगज्जन्मादिकारणत्वम् । प्रकृते = तत्पदार्थावगमस्थले । जगत: जन्मादि जगज्जन्मादि, तस्य कारणत्वं, जगज्जन्मादिकारणत्वम् । तत्पदार्थस्य ब्रह्मणः तटस्थलक्षणमिति शेषः । आदिपदेन २४८ वेदान्तपरिभाषा। स्थितिप्रलययोः मंग्रहः । तथा च जगज्जन्मकारणत्वं, जगत्स्थितिकारणत्वम्, जयल्लयकारणत्वञ्च ब्रह्मणः तटस्थलक्षणत्रयं बोध्यम् । विशिष्टस्य लक्षणत्वे वैयर्थ्यात् । लक्ष्यतावच्छेदकाधिकरणे ब्रह्मणि तत्त्वतः जगज्जन्मादि- कारणत्वाभावेन, तत्प्रतियोगित्वस्य, जगज्जन्मादिकारणत्वे सत्त्वात् लक्षणसमन्वयः । ननु जगत्पदस्य जगमवाचितया ब्रह्मणि स्थावरकारणत्वानुपपत्तिः । तथा च तस्याकाल्पनिकत्वेन द्वैतापत्तिः, अत आह- जगत्पदेन कार्यजातं विवक्षितम् । कार्यजातं = कार्यसमुदायः । तथा च स्थावराणामपि कार्यकोटिप्रविष्टतया नोक्तदोषः । नन्वविद्याया जगत्परिणामिन्यामतिव्याप्ति: । परिणामित्वरूपस्य कारणत्वस्य तत्रापि सत्त्वात् । अत आह- कारणत्वं च कर्तृत्वं अतोऽविद्यादौ नातिव्याप्तिः । - आदिपदेन कालादृष्टपरिग्रहः । अयं भावः अविद्यादिपु परिणामित्वरूप- कारणत्वसत्त्वेऽपि जगत्कर्तृत्व तत्र नास्तीति नोक्ततटस्थलक्षणातिव्याप्तिः । ननु न परिणामित्वादन्यत् किञ्चित् कर्तृत्वम्, पुरुषस्य पुष्करपलाशनिर्लेपतया प्रधानस्यैव परिणामित्वात् कर्तृत्वाच्च । तथा चातिव्याप्तिस्तदवस्थैव । इति साङ्ख्योक्तनिरासायाह- कर्तृत्वञ्च तत्तदनुकूल - तत्तदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानचिकीर्षा- कृतिमत्त्वम् । - . चस्त्वय तत्तत्पदेन तत्तत्कार्यपरिग्रहः । उपादानगोचरः यत् अपरोक्ष- शानं, या चिकीर्षा, या च कृतिः तत्तत्वमर्थः । उपादानपदेन परिणामिकारणं प्राह्यम् । तेन नासङ्गतिः । ज्ञानेच्छाकृतीनां अजडधर्मतया प्रधानतेषाममावेन तत्र नातिब्याप्तिरिति भावः । अथवा कार्यानुकूलकृतिमत्वमवेहि कर्तृत्वम् । तत्त्वाद्दष्टद्वारा जीवस्यापि सम्भवति इति नेश्वरस्य तत्तटस्थलक्षणमिति सुवचम् ।
विषयपरिच्छेदः । २४६ - अन्त:करणावच्छिन्न तत्प्रतिबिम्बरूपे वा जीवेऽपि गतत्वात् इति नैयायिकोक्ति- निरासायव कर्तृत्वञ्चेत्यादिग्रन्थावतारः । कर्तृत्वस्य चैताद्दशनिरुक्ती नोक्तदोषः । असर्वज्ञ जीवे जगदुपादानपरमाण्वादिगोचरापरोक्षज्ञानचिकीर्षा- प्रयत्नानामभावात् । चिकीर्षा कर्तुमिच्छा। कृतिः प्रयत्नः । न च योगिजीवेऽतिव्याप्तिः । तेषां सर्वज्ञतया तथा सम्भवादिति वाच्यम् । तेषामप्य- सर्वज्ञत्वात् । न च योगागमविरोधः, तत्र सर्वज्ञपदेन ज्ञानाधिक्यमात्रस्य विवक्षितत्वात् । निरतिशयस्य सर्वज्ञस्य तैरपि परमेश्वर एवाभ्युपगमात् । ननु निरुक्त कर्तृत्वं उपादानगोचरापरोक्षज्ञानादिविनाऽनुपपन्नम् । तेषाञ्च ईश्वरेऽपि सद्भावे प्रमाणाभावः इत्याशङ्कायामाह- ईश्वरस्य तावदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानसद्भावे "यः सर्वज्ञः स सर्ववित्" "यस्य ज्ञानमयं तपः" "तस्मादेतनामरूपमन्नं च जायते" इत्यादि श्रुतिर्मानम् । तावदिति वाक्यालङ्कारे । उपादानगोचर: = परिणामिविषयकं यत् अपरोक्षज्ञानम् साक्षात्कारः, तस्य यः सद्भावः = अस्तित्वं, तस्मिन् । इत्यादि श्रुतिर्मानमिति सम्बन्धः । परमेश्वरः । सर्वज्ञः = विशेषेण सर्व- विषयकज्ञानवान् । तस्मात् नामरूपे समुत्पद्यते इति श्रुतिभावार्थः । मान= प्रमाणम् । यः नन्वास्तां तथाविधं ज्ञानम् । चिकीर्षासद्भावे तस्य किं प्रमाणम् ? इत्याकांक्षायामाह- तादृशचिकीर्षासद्भावे च "सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय” इत्यादि श्रुतिर्मानम् । तादृशचिकीर्षा = उपादानविशेष्यकचिकीर्षा । सः = आत्मा अकामयत् । तद्ब्रह्मकामनां कृतवत् । "बहुस्यां प्रजायेय" इति कामनाऽऽकारः । "बहुस्यां" इत्यस्यैव विवरणं प्रजायेय इति । प्रजारूपेण बहुभवनेच्छारूपा चिकीर्षा परमेश्वरस्यास्तीति भावः ।
२५० वेदान्तपरिभाषा । कृतिमद्भावे मानमाह- तादृशकृतौ च "तन्मनोऽकुरुत" इत्यादि वाक्यम् । तादृशकृती उपादानविशेप्यककृतौ। वाक्यमित्यनन्तर मानमित्यनुपंगः । नन्वेव सति जगदुत्पत्त्यनुकूलजगदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानचिकीर्पाकृतिमत्व, जगत्स्थित्यनुकूलतदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्व, जगद्भङ्गानुकूलजगदु- पादानगोचरापरोक्षज्ञानचिकीकृतिमत्व ब्रह्मण. तटस्थलक्षणानीति स्थितम् । तत्र केवलमुपादानगोचरापरोक्षज्ञानघटितलक्षणसम्भवे चिकीर्षाकृत्यानिवेशः कथ न व्यर्थः ? इत्याकामायामाहेप्टापत्तिम्- जानेच्छाद्यन्यतमगर्भ लक्षणत्रितयं विवक्षितम् । अन्यथा व्यर्थ- विशेषणत्वापत्तेः । अत एव जन्मस्थितिध्वंसानां अन्यतमस्यैव लक्षणे प्रवेशः । एवञ्च लक्षणानि नव सम्पद्यन्ते । आदिना कृतिसंग्रहः । ज्ञानेच्छाद्यन्यतमत्व = "ज्ञानं न" "इच्छा न" "कृतिर्न" इत्याकारकभेदकूटावच्छिन्नप्रतियोगिताकभेदवत्त्वम् । चरमभेदाकारस्तु "ज्ञानं न, इच्छा न, कृतिर्न इति भेदकुटवान्न" इति रूपो बोध्यः अन्यतमगर्भ अन्यतमघटितम् । व्यर्थविशेपणत्वापत्तेरित्यनन्तर लक्षणस्यति शेषः । तथा च नीलधूम इव व्याप्यत्वासिद्धतया इतरभेदाननुमापकत्वेन लक्षणत्वमेव न स्यात् इति भावः । अत एव - व्यर्थविशेषणत्वादेव । ध्वंसानामित्यत्र षष्ठीसप्तम्यर्था । एवञ्च = अन्यतमस्यैव लक्षणे प्रवेशे च । नव = नवत्वसंख्यावन्ति । ज्ञानेच्छा- कृतिमेन उत्पत्तिघटितानि त्रीणि, इति त्रयाणां त्रिगुणितत्वेन नवत्वम् । तथाहि- जगदुत्पत्त्यनुकूलजगदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानवत्वमित्येकम् । जगदुत्पत्त्यनुकूलजगदु- पादानगोचरचिकीर्षाश्रयत्वं द्वितीयम् । जगदुत्पत्त्यनुकूलजगदुपादानगोचरकृत्या- अयत्वं तृतीयम् । तथा जगत्स्थित्यनुकूलजगदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानवत्त्वमित्येकम् । जगत्स्थित्यनुकूलजगदुपावानगोचरचिकीर्षाश्रयत्वम् द्वितीयम् । जगत्स्थित्यनुकूल- जगदुपादानगोचरकृत्याश्रयत्वम् तृतीयम् । एवं जगङ्गानुकूलजगदुपादानगोचरा- परोक्षज्ञानाश्रयत्वं प्रथमम् । जगङ्गानुकूलजगदुपावानगोचरचिकोधियत्वं द्वितीयम् । जगबङ्गानुकूलजगदुपादानगोचरकृत्याश्रयत्वं तृतीयम् । एवं नवत्वम् । उपादानत्वं त्वत्र नाध्यासाधिष्ठानत्वं अपि तु साक्षात्परिणामित्वम् ।
विपयपरिच्छेदः । २५१ ननु ब्रह्मणो जगज्जन्मादिकारणत्वमेव निप्प्रामाणिकमिति कथं तद्धटितलक्षण- सिद्धिः ? इत्याशका निरसितुमाह- ब्रह्मणो जगज्जन्मादिकारणत्वे च "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसम्विशन्ति" इत्यादि श्रुतिर्मानम् । "तद्विजिज्ञासस्व' "तद्ब्रह्म" इति तदो: “यतो वे"ति यत्पदसम्बन्धः । इमानि प्रत्यादिविषयाणि । जायन्ते = उत्पद्यन्ते । जीवन्ति = स्थितिमन्ति भवन्ति । अभिसम्विशन्तीति प्रयन्तीत्यस्यैव व्याख्यानम् । तत्प्रयोजनं त्वारम्भवादानभिप्रेतता- सूचनमवसेयम् । तथा च वाक्यशेषानुसारेण जायन्ते इत्यस्यापि विवर्त्तन्ते इत्यर्थ एव कर्तव्य इति स्पष्टीकर्तुम् । ननु यतो वा इमानीत्यत्र पञ्चम्यर्थों हेतुत्वम्, तत्, निमित्तत्वमुपादनत्वं वा? आद्य अपसिद्धान्तः। द्वितीये असिद्धिः । परमाणोः मूलप्रकृतेर्वा जगदुपादानत्वात् इत्याकाक्षायामाह- यद्वा निखिलजगदुपादानत्वं ब्रह्मणो लक्षणम् । -- यद्वा = अथवा । निखिलस्य - अखण्डस्य, जगत: = प्रपञ्चस्य, यत् उपादानं = तत्त्वम् । परमाणुप्रकृत्यो तत्त्वनिरासाय निखिलपदम् । निखिलजगद- न्तःपात्वसम्मवेपि निखिलजगपादानत्वसम्मवेऽपि निखिलजगदुपादानत्वं तत्र तत्र नास्ति इति भावः । अथवा.............."आकाशादेव.........."जायन्ते, आकाशं प्रत्यस्त यन्तीति श्रुतिबलेन प्रसिद्धो भूताकाश एव जगदुपादानमिति कथं तत्त्वं ब्रह्मणो लक्षणमिति भ्रान्तिनिरासाय निखिलपदम् । भूताकाशस्य जगदन्तःपातिनं भूताकाशं प्रति हेतुत्वासम्भवेन तत्र निखिलजगदुपादानत्वमसम्भवि । इत्यतो ब्रह्मण एव तल्लक्षणमिति भावः । ननु जगदुपादानत्वं न तत्परिणामित्वमपसिद्धान्तापातात् । भर्तृ प्रपञ्चादिकति- पयैकदेशिमतसिद्धस्यापि तस्य भाष्यकारादिभिनिराकरणात् । न च समवायसम्बन्धा- वच्छिन्न कार्यतानिरूपिततादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नकार्यतानिरुपिततादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्न कारणत्वं तत् । समवायाद्यन म्युपगमात् । इत्याशंकायामाह- २५२ वेदान्तपरिभाषा। उपादानत्वञ्च जगदध्यासाधिष्ठानत्वम् । जगतः - नामरूपात्मकस्य प्रपञ्चस्य यः अध्यास: - आरोपज्ञानं तद- धिष्ठानत्वं तदाश्रयत्वम् । श्रौतसिद्धान्ते कुड्यादेः चित्राधारत्वमिव ब्रह्मण एव जगत्कल्पनाधारत्वमिति भवति तत्र लक्षणसमन्वयः । अम्बरान्तधारणसामर्थ्यस्य अन्यत्राभावात् । । नन्विदं लक्षणं ब्रह्मणः सर्वादिकमर्सावादिकं वा ? अन्त्ये कालविशेषमादाया- व्याप्तिः । आये च निखिलस्यैव नामरूपात्मकस्य जगत: अनादित्वाम्युपगमापत्तिः । न चेष्टा सा, "जीव ईशो विशुद्ध चित् जीवेशयोभिंदा । अविद्या तच्चितोर्योग: षडस्माकमनादयः" इत्यभियुक्तोक्तिविरोधात् । अवान्तरलयासद्भावप्रसङ्गाच्च । इत्यत आह- जगदाकारेण परिणममानमायाधिष्ठानत्वं वा । । " जगदाकारेण प्रपञ्चरूपतया, परिणममाना प्रतिक्षणपरिणामिनी या माया, तस्याः अधिष्ठानत्वं आश्रयत्वम् । "वा" विकल्पे । सिंहावलोकनेन "उपादानत्वमि"त्यनेन पूर्वेण सम्बन्धः । मायाया अनादित्वन्तु निरुक्ताभियुक्तोक्ति- सिद्धमेव । ब्रह्मणि मायाश्रयताऽपि "आश्रयत्वविषयत्वभागिनो निविभागचितिरेव केवला" इत्यभियुक्तोक्तिपरिपुष्टैव । ब्रह्मणि समाश्रिता माया तत्तन्नामरूपाकारेण क्रमेण परिणमते इति तादृश्या मायाया आश्रयत्वं ब्रह्मणि विद्यते नान्यत्रेति नाम्याप्त्यतिव्याप्त्यसम्मवानां लक्षणदोषाणामवकाशः, इति भवति तादृगुपादानत्वं लक्षणं ब्रह्मण इति भावः। उपादानत्वञ्चेत्यत्रोपादानत्वं जगदुपादानत्वं बोध्यम् तेन नासङ्गतिः । ब्रह्मणो जगदुपादानत्वे श्रौतं प्रमाणमुपन्यस्यति- एतादृशमेवोपादानत्वमभिप्रेत्य "इदं सर्व यदयमात्मा" "सच्च त्यच्चाभवत्" "बहुस्यां प्रजायेय" इत्यादि श्रुतिषु ब्रह्मप्रपञ्चयोस्ता- दात्म्यव्यपदेशः। " एतादृशं - जगदध्यासाधिष्ठानत्वं जगदाकारेण परिणममानमायाधिष्ठानत्वं वा । यत् इदं सर्व तत् अयमात्मा इत्यर्थः । इदं दृश्यमानं । सर्व = बहुधाज्ञाय- विषयपरिच्छेदः २५३ मानं प्रपञ्चवस्तु । सत् = सत्यम् । त्यत् = मिथ्या। च द्वयमप्यर्थकम् । अभवदित्यनन्तरं ब्रह्म इति शेषः । प्रजायेय उत्पन्नो भव्यम् । ब्रह्म च प्रपञ्च- श्चेति ब्रह्मप्रपञ्ची तयोः । तादात्म्यस्य = ऐक्यस्य, अभेदस्येति यावत् । व्यपदेशः व्यवहारः । अयं भावः-"इद सर्वमि"ति श्रुत्योपविश्यमानं ब्रह्मणः सर्वात्मत्वं न गच्छेत् संगतिम्, यदि न भवेब्रह्म जगदध्यासाधिष्ठानम् । तत्त्वे तु शुक्तौ इदं रजतमितिबद्भवितुमर्हति तादात्म्यव्यपदेश इति । एवं सच्च त्यच्चेति प्रतिपाद्यमानं ब्रह्मणः उभयरूपभवनमपि त्यद्भतप्रपञ्चोपादानत्वे एवं संगच्छते न भिन्नत्वे । कुविन्दः पटोऽभवदिति ध्यपदेशाभावात् । बहुस्यामिति बहुभवन- संकल्पोऽपि ऐन्द्रजालिकस्य 'व्याघ्रो भवेयम्" "गजो भवेयम्" इत्यादि संकल्पवत् ब्रह्मणो निरुक्तोपादानत्वकल्प एवावकल्पते । न तु निमितत्त्वकल्प इति । - लोककर्तृकः, श्रीतं व्यवहारं प्रमाणत्वेनोपन्यस्य लौकिकं तं तत्त्वेनाह- घट: सन् घटो भाति घट इष्ट: इत्यादि लौकिकव्यपदेशोऽपि सच्चिदानन्दरूपब्रह्म क्याध्यासात् । इत्यादिः यो लौकिकः व्यपदेशः = व्यवहारः, सोऽपि । सच्चिदानन्दरूपेण ब्रह्मणा यः ऐक्यस्य अध्यासः = आरोपः, तस्मात् । सच्चिदा- नन्दरूपेत्यत्र रूपपदस्य प्रत्येकमन्वयात् सद्रूपेण चिद्रूपेण आनन्दरूपेण चेत्यर्थः । अयं भाव:- यदि ब्रह्मणो न भवेग्निरुक्तमुपादानत्वं तदा आत्मानमास्नो- रख्यासाभावेन ब्रह्मणः सत्तामादाय "घटः सत्" इति तात्त्विकसत्त्वाभाववति घटे सत्त्वव्यवहारः, तच्चतन्यांशमादाय जडे घटे "घटो भातीति" व्यवहारः तदानन्दांशमादाय अनानन्दे तत्र "घटः इष्टः" इति आनन्दरूपेष्टताव्यवहारः, कथं स्यात् ? भवति च तथेति ध्रुवमुपगन्तव्यं निरुक्तमुपादानत्व ब्रह्मणः । चोपादानगततत्तवंशमादाय नानुपद्यते तथा व्यवहार इति । न च घटादावपि स्वीक्रियत एव सत्ताजातिः, तां तात्त्विकीमेवोपादाय भवितुमर्हति "घट: सन्' सत्त्वव्यवहारः । भातीत्यनेन च प्रोच्यते ज्ञानविपयता । सा च विद्यत एवेति तामुपादाय "घटो भाति" इत्यादि व्यवहारोऽपि सुसम्पाद एव । एवं इष्टत्वमिच्छा- विषयता, सा च आनन्दत्वाभावेऽपि आनन्दजनकत्वेन घटादावबाधितैव इति तामु- पादाय “घट: इष्टः" इत्यादि व्यपदेशोऽपि साधीयस्तयैव सम्पद्यत्ते विनाऽपि तथा २५४ वेदान्तपरिभाषा । निरुक्तोपादानत्वं ब्रह्मणः, इति वाच्यम् । “नेह नानास्ति किंचन्" इत्यादि श्रुति- विरोधात् । विषयविषयिभावस्य चाध्यासिकसम्बन्धातिरिक्तस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । तथा हि घटादिनिप्ठविषयता स्वरूपमम्बन्धविशेपः, अतिरिक्तः पदार्थों वा। आये आध्यासिकत्वम् स्वरूपस्थले सम्बन्धसम्बन्धिभावस्य काल्पनिकत्वात् । द्वितीये भानविगमकालेऽपि घटो भातीति व्यवहारापत्तिः । अतिरिक्तपदार्थरूपायाः तस्याः घटादौ सार्वदिकत्वात् । एवमेव "घट इष्टः" इत्यत्राऽपि बोध्यम् । D शङ्कते- नन्वानन्दात्मकचिदध्यासात् घटादरिप्टत्वव्यवहारे दु खस्यापि तत्राध्यासात् तस्यापि इष्टत्वादिव्यवहारापत्तिः । आनन्दात्मकं चित् ब्रह्म, तस्य यः अध्यासः, तस्मात् । तत्र ब्रह्मणि । तस्यापि = दुःखस्यापि । अयं भावः-ब्रह्ममिन्नं सर्वमेव वस्तु ब्रह्मणि अध्यस्तम् । अध्यास- मूलका एव च सर्वे व्यवहाराः इत्यम्युपगमे दुःखमपि न तात्त्विक अपि तु ब्रह्मणि अध्यस्तम् । अध्यासमूलक एव च दुःखस्यापि व्यवहारः इति वक्तव्यम् । तथा च "घट इष्ट" इति वत् "घटो दुःखम्" इत्यपि व्यवहारः सावलौकिक: स्यात् । ननु भवति तथा । तस्मानाध्यासमूलत्वं व्यवहारमात्रस्येति । निपेति- इति चेन्न । आरोपे सति निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्या- रोप इत्यभ्युपगमेन दु.खादी सच्चिदंशाध्यासेऽपि आनन्दांशाध्यासा- भावात् । आरोपे - अध्यासात्मके कायें । निमित्तस्य - आरोपकारणीभूतायाः भविद्यायाः अनुसरणं कल्पनम् । निमित्त = अध्यासात्मकं कार्यम् । सच्चि- वंशाध्यासेऽपि सदशाध्यासेऽपि चिदंशाध्यासेऽपि च । आनन्दांशस्याध्यासः आनन्दांशाध्यासः, तदभावात् । अंश इव अंशः न तत्त्वतः । ब्रह्मणो निरंशत्वात् । अयं भाव:-कार्याणाममायिकत्वपक्षे कारणेन कार्यकल्पनासम्भवेऽपि मायिकत्वपक्षेन तत्सम्मवः। मायाया दुर्गम्यतया तवसम्मवात् । अतस्तावृशस्थले कार्यदर्शनेनैव कारणकल्पनं न वन्यथा। प्रसिद्ध चतत ऐन्द्रजालिकक्रीडास्थले । सति चैवं कार्य- विषयपरिच्छेद.। २५५ मात्रम्य मायिकत्वं व्यवस्थापयतामस्माकं मते कार्यदर्शनेनैव कारणमनुमेयम् । प्रकृते च दुःखादौ इष्टत्वव्यवहारात्मकस्वकार्यस्याभावेन कारणीभूतस्यानन्दांशस्या- भावः। तदभावेन तत्कारणस्याभाव एव स्वीकर्तव्यः न तु अध्यासः तत्कार्यभूतो व्यवहारो शक्य आपादयितुम् इति । प्रसङ्गादाह- जगति नामरूपांशद्वयव्यवहारस्तु अविद्यापरिणामात्मकनामरूप- सम्बन्धात् । तदुक्तम्- अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् । आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ॥ इति । % 3D नामरूपे एव अंशद्वयं, तस्य = व्यवहार. तज् ज्ञापकशब्दप्रयोगः, तज् ज्ञानं वा । अविद्यायाः परिणामौ अविद्यापरिणामी, तावेवात्मानौ स्वरूपे ययोः नामरूपयोः, तयो सम्भवात् इत्यर्थ । तदुक्तमित्यनन्तरं अभियुक्त रिति शेष: । इति = एवं व्यपदिश्यमानम् । अंशपञ्चकम् - पञ्चत्वसख्यावन्तः अंशाः । आद्य त्रयं अस्ति-भाति-प्रियमिति । ब्रह्म रूप्यते अनेन इति ब्रह्म- रूपं ब्रह्मणः कल्पिता अशाः । जगवयं = जगत: अंशौ। ततो द्वयम् तदनन्तरवत्तिनी नामरूपे द्वे । अयं भावः-घटः अस्ति घटः भाति, घटः इष्टः, घटस्य रूपम्, घटस्य नाम, इति भवन्ति व्यवहाराः सर्वावहारिकः क्रियमाणाः । तत्र अस्तीत्यनेन ब्रह्मणः सदशः ख्याप्यते । भातीत्यनेन च तस्य चिवंशः ख्याप्यते । इष्टः इत्यनेन तस्य आनन्दांशः स्याप्यते । रूपमित्यनेनाकारः, नाम इत्यनेन च वाचकः शब्दः । तत्राद्येन त्रयेण = सच्चिदानंदांशात्मक अस्ति भाति प्रियांशः ब्रह्म रूप्यते । नामरूपाम्यां तु जगत् । तेषां तत्स्वरूप- लक्षणत्वात् इति । ब्रह्म रूप्यते = निरुप्यते अनेन इति ब्रह्मरूपम् । एवं जगद्र पमित्यपि । ननु जगज्जन्मादिकारणत्व ब्रह्मण. तटस्थलक्षणमित्युक्तम् । तत्र केन क्रमेण जगत: उत्पत्ति: ? किञ्च तत्र प्रमाणम् इत्याशङ्कायामाह- ?
२५६ वेदान्तपरिभाषा। अत्र- अत्र जगतो जन्मक्रमो निरूप्यते । तत्र सर्गाद्यकाले परमेश्वर: सृज्यमानप्रपञ्चवैचित्र्यहेतुप्राणिकर्मसहकृतः सन् नामरूपात्मक- निखिलप्रपञ्चं बुद्धावाकलय्य "इदं करिष्यामि” इति सङ्कल्पयति । "तदक्षत बहु स्यां प्रजायेय, सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय" इत्यादि- श्रुतेः । इदानीम् । जन्मनः क्रमो जन्मक्रमः । जन्मप्रक्रियेति यावत् । निरूप्यते - बोधानुकूलव्यापारविषयः क्रियते । तत्र निरूपणप्रतिज्ञायां सत्याम् । सर्गस्य = सृष्टे: आद्यः कालः सर्गाद्यकालः, तस्मिन् । परमेश्वरः इति सङ्कल्प- यतीत्यन्वयः । सृज्यमानः वर्तमानसृष्टिक्रियाविपय: य: प्रपञ्चः तस्य यत् वैचित्र्य = वैषम्यम्, तस्य हेतु: प्राणिकर्म भोगादृष्ठम्, तत्सहकृतः = तत्साहाय्यमावहन् । नाम च रूपं च नामरूपे, ते एव आत्मा = स्वरूपं, यस्य स नामरूपात्मक: । एतादृशो यो निखिलः = समग्रः प्रपञ्चः तम् । प्रथम = सृष्टिप्राक्काले । बुद्धौ = ज्ञाने । आकलय्य - विषयत्वेनादाय । 'इदं करिष्यामि" इति सङ्कल्पाकारः । इदं = नामरूपात्मकं जगत् । बहु स्यां = बहु भवेयम् । इति अकामयत = कामनां चकार । इति श्रुत्यर्थः । सङ्कल्पस्यानन्तर किं वृत्तमित्याकाक्षायामाह- ततः आकाशादीनि पञ्चभूतानि अपञ्चीकृतानि तन्मात्रपदप्रति- पाद्यानि उत्पद्यन्ते । ततः = सङ्कल्पानन्तरम् । तन्मात्रपदप्रतिपाद्यानि अपञ्चीकृतानि आकाशा- दीनि पञ्चभूतानि उत्पद्यन्ते इत्यन्वयः । तन्मात्रपदेन = तन्मात्रेति शब्देन । प्रतिपाद्यन्ते उच्यन्ते यानि, तानि तन्मात्रपदप्रतिपाद्यानि । तन्मात्रशब्द- वाच्यानीत्यर्थः । वक्ष्यमाणविशेषप्रकारेण, परस्परं मिलितानि पञ्चीकृतानि । न पञ्चीकृतानि अपञ्चीकृतानि । आकाशादीत्यत्र आदिपदेन अनिलानलसलिलभू- तलानि बोध्यानि । उत्पद्यन्ते जायन्ते । उत्पत्तिश्च घ्यावहारिको न पार- माथिकी। तेन चारम्भवावादरो वैतापत्तिर्वा ।
विषयपरिच्छेदः । २५७ ननु तानि सगुणान्युत्पद्यन्ते निर्गुणानि वा ? सगुणानि चेत् किं गुणकानि ? इत्याकांक्षायामाह- तत्राकाशस्य शब्दो विशेषगुणः। वायोस्तु शब्दस्पशी। तेजसस्तु शब्दस्पर्शरूपाणि । अपां तु शब्दस्पर्शरूपरसाः । पृथिव्याः शब्दस्पर्श- रूपरसगन्धाः । तत्र = आकाशादिषु मध्ये । गुण : विशेषगुण : ,तेन संख्यादिसामान्य- गुणाव्यावृत्तिः । एवमन्यत्रापि । " वायोस्तु " इत्यत्र "तु"कार: केवल स्पर्श- निरासार्थाकः एवमन्यत्रापि । ननु "शब्दो न स्पर्शवद्विशेषगुणः अग्निसंयोगासमवायिकारणकत्वाभावे सत्य- कारणगुणपूर्वकप्रत्यक्षत्वात्" इत्यनुमानस्य बाधकस्य सत्वेन कथं वायोः शाब्दस्पशी इत्युक्तिसंगतिः इत्याशङ्कायामाह- न तु शब्दस्य आकाशमात्रगुणत्वम् । वाय्वादीनामपि तदुपलम्भात् । न चासो भ्रमः । बाधकाभावात् । तस्मात् । असो केवलमाकाशः आकाशमात्रम् । तस्य गुणत्वं आकाशमात्रगुणत्वम् । आदिना अनिलानलसलिलभूतलानां परिग्रहः । तस्य उपलम्भः तदुपलम्भः = शब्दप्रत्यक्षम् - उपलम्भः। भ्रमः पदार्थव्यभिचारिज्ञानम् । बोधकाभावात् अवाधितज्ञानाभावात् । अयं भाव:-स्पष्टं साक्षात्कयत एव हि वेगवत्सु अनल- सलिलभूतलेषु शब्दः । व्यावहारिकेषु प्रमाणेषु प्रत्यक्षस्य श्रेष्ठयमविवादमिति तेन बाधिततया न "शब्दो न स्पर्शवद्विशेषगुणः" इत्यादेनिराभासता । साभासस्य च न कथञ्चित् साधकतेति । इदमुपलक्षणम् "नरशिरः कपालं शुचिप्राण्यङ्गत्वात् शंखवत् इत्यनुमानवत् निरुक्तानुमानस्य- - आद्याद्यस्य गुणगानवाप्नोति परः परः । यो यो यावद्गुणश्चैषां स स तावद्गुणः स्मृतः ।।
२५८ वेदान्तपरिभाषा। इति मानवेन वचनेन "शब्दादिभि गुणैव ह्मन् संयुक्तान्युत्तरोत्तरे" इति विष्णुपुराणवचनेन च आगम- बाघोऽपि बोध्यः। . ननु सङ्कल्पानन्तरमपञ्चीकृतभूतोत्पत्तिरुक्ता, परन्तु भूतानां तेषामुत्पत्तिः कुतो भवति ? ब्रह्मणश्चेत् अपसिद्धान्तापातः । ब्रह्मपरिणामवादानभ्युपगमात् । इत्या- शंकायामाह- इमानि च भूतानि त्रिगुणमायाकार्याणि त्रिगुणानि । इमानि = अपञ्चीकृतानि । त्रिगुणात्मिका या माया तस्याः कार्याणि परिणामानि भूतानि । त्रिगुणानि इति हि युक्तिप्रदर्शनम् । अयं भावः-एकमेव हि वस्तु केषाञ्चित्कृते सुखरूपं केषाञ्चित्कृते दुःखरूपम् । केषाञ्चित्तु मोहरूपम् इति सर्वजनप्रसिद्धम् । सति चैवं जगतस्त्रिगुणात्मकत्वे तत्कारणेनापि तत्सजातीये- नैव भवितव्यम् इति त्रिगुणात्मिका मायव जगदात्मकस्य परिणामस्य परिणामि- कारणम् इति । ननु के ते त्रयो गुणाः ? इत्यकांक्षायामाह- गुणाः सत्वरजस्तमांसि । सत्त्वं सुखम् । रजः-दुःखम् । तमः = मोहः । यथोक्तमीश्वरकृष्णेन- प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकाः प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्थाः । अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणाः ॥ इति ॥ ननु तहिं मन्ये सांख्योक्तजगदुत्पत्तिपद्धति रेवाथिता वेदान्तिभिरपि इति भ्रम- निरासायाह- एतैश्च सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतैः व्यस्तैः यथाक्रमं श्रोत्रत्वक्चक्षू- रसनघ्राणानि पञ्चेन्द्रियाणि जायन्ते । । एतैः अपञ्चीकृतः । सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतसत्त्वांशः। यथाक्रयं आकाशेन श्रोत्रं वायुनात्वक् इत्येवं क्रमेण जायन्ते उत्पद्यन्ते। तथा च विषयपरिच्छेदः। २५९ नास्माकं मते सांस्यसिद्धान्त इव समुत्पत्तिरिन्द्रियामणहंकारात् भवतीति न सर्वथा सांख्यासद्धान्तनुसरणम् इति भावः । ननु अन्तरिन्द्रियाणां उत्पत्तिस्तहि कुतो भवति इत्याकांक्षायामाह- एतरैव सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतमिलितैः मनोबुद्ध यहंकारचित्तानि जायन्ते । एतैः = अपञ्चीकृतः। सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतरित्यस्यार्थः पूर्ववत् । तथा च मिलितैरपञ्चीकृतैः पञ्चभूतसत्त्वांश: मनोनु यहंकारचित्ताख्यानि चत्वार्यन्त:- करणानि समुत्पद्यन्ते इत्यर्थः । अपञ्चीकृतपञ्चभूतसत्त्वांशपञ्चकान्तःपात्येकंक- सत्त्वांशेन चक्षुरादिज्ञानेन्द्रियपञ्चकघटककेन्द्रियोत्पत्तिः । अपञ्चीकृतसत्वांश- पञ्चकेन समुदितेन अन्तरिन्द्रियचतुष्टयोत्पत्तिरिति विवेकः इति भावः । ननु चेतनाधिष्ठितानामेवाचेतनानां किञ्चित्करत्वं सर्वानुभवसिद्धम् । सति चैवं किमधिष्ठितानि इन्द्रियाणि ज्ञानजननसमर्थानि ? इति जिज्ञासायामाह- श्रोत्रादीनां पञ्चानां क्रमेण दिग्वातार्कवरुणाश्विनोधिष्ठातृदेवताः । मन आदीनां क्रमेण चन्द्रचतुर्मुखशंकराच्युताः अधिष्ठातृदेवताः । दिग्वायुसूर्यवरुणाश्विनीकुमाराः यथासंख्याः श्रोत्रत्वक्चक्षुरसनघ्राणानाम- धिष्ठातारः इत्यर्थः । चतुर्मुखः = ब्रह्मा । शंकर: - शिवः । अच्युतो विष्णुः । तथा मनसः चन्द्रः, बुद्ध: ब्रह्मा; अहंकारस्य शिवः । चित्तस्य विष्णुः अधिष्ठाता । तत्तदेवाधिष्ठितानि तत्तदिन्द्रियाणि स्वस्वकार्यभूतज्ञानोत्पादनक्षमानि भवन्ति इत्यर्थः । एतद्विषये प्रमाणजिज्ञासायाम्- दिग्वातार्कप्रचेतोरिव वह्नीन्द्रोपेन्द्रमृत्युकाः । चन्द्रो विष्णुः चतुर्वक्त्रः शम्भुश्च करणाधिपः ।। इति भागवतवचनमवगन्तव्यम् ।
२६० वेदान्तपरिभाषा। कर्मेन्द्रियाणि कुतः समुत्पद्यन्ते किमधिष्ठितानि च भवन्ति ? इति जिज्ञासाया- माह- एतैरेव रजोगुणोपेतैः पञ्चभूतैः यथाक्रमं वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाणि जायन्ते। तेषां च वह्नीन्द्रोपेन्द्रमृत्युप्रजापतयोऽधिष्ठातृ- देवताः। % 3D एतैरेव = अपञ्चीकृतैरेव । रजोगुणोपेतैः पञ्चभूत पञ्चभूतरजोंशैः । यथाक्रम = यथासंख्यम् । वाक् च पाणी च पादौ च पायुश्च उपस्थं च वापाणीपादपायूपस्थानि । कर्मेन्द्रियाणि कर्मजनकानीन्द्रियाणि । वह्निश्च इन्द्रश्च उपेन्द्रश्च मृत्युश्च प्रजापतिश्च वह्नीन्द्रोपेन्द्रमृत्युप्रजापतयः । अधिष्ठातारो देवताः अधिष्ठातृदेवता: । अयं भावः-अपञ्चीकृतवियदादिभूतपञ्चकरजोंश- पञ्चकान्तःपातिना एककांशेन वागादिकर्मेन्द्रियान्तःपातिनः एककेन्द्रियस्य समुत्पत्तिर्भवति । यथा-तादृग्वियदशेन वाचः, तादृग्वाय्य्वशेन पाण्योः, सावृक्तेजोशेन पादयोः, ताकतोयांशेन पायोः, तादृथिव्यंशेन उपस्थस्य समुत्पतिर्भवति । अधिष्ठाता च वाचो वह्नि, पाण्योरिन्द्रः, पावयोरुपेन्द्रः, पायोमृत्युः। उपस्मस्य प्रजापतिः, इति । ननु यथा मिलितैः पञ्चभूतसत्त्वांशः अन्त:करणोत्पत्तिः तथा मिलित रजोशः किमपि भवति न वा ? इति जिज्ञासायामाह- रजोगुणोपेतैमिलतः पञ्चवायवः प्राणापानव्यानोदानसमानाख्याः जायन्ते। - - मिलितरजोंशपञ्चकेन प्राणादीनां वायूनां जीवनकारणानां समुत्पत्तिः । रजोंशस्य वायुपञ्चकस्य च उभयोः क्रियाशीलत्वात् । सजातीययोरेव च कार्य- कारणभावानुभवात् । प्राणादिकं विशेषत: परिचाययति- तत्र प्राग्गमनवान् वायुः प्राणः नासादिस्थानवर्ती । अग्गिमनवान् अपानः पाय्य्वादिस्थानवर्ती। विष्वग्गमनवान् व्यानः अखिलशरीर- वर्ती। ॐगमनव न् उत्क्रमणवायु: उदानः कण्ठस्थानवर्ती। एवं अशितपीतान्नादिसमीकरणकरः समानः नाभिस्थानवर्ती ।
विषयपरिच्छेदः। २६१ तत्र - प्राणादिषु पञ्चसु। प्राग्गमनवान् - अग्रदेशगमनवान् । अर्वाक् अधोदेशः। विष्वक् = सर्वदिक्षु । अशितं = भक्षितम् । पीतं पानविषयी- कृतम् यत् अन्नादिकं, तेषां यत्समीकरणं = एकरूपतापादनम् तत्करोतीति अशितपी- तान्नादिसमीकरणकरः । परिचायक इति यावत् । नाभिरेव स्थानं तद्वर्ती = तन्निष्ठः। ननु स्थूलपञ्चभूतोत्पत्तिः कुतः ? इत्याकांक्षायामाह- एवं तैरेव तमोगुणोपेतैः आचीकृतभूतैः पञ्चीकृतानि भूतानि जायन्ते। एवं = प्राणादिवत् । तैरेव = मिलितैरेव । तमोगुणोपेतैरपञ्चीकृतभूतैः अपञ्चीकृतभूततमोगुणांशैः। पञ्चीकृतानि भूतानि स्थूलभूतानि । जायन्ते उत्पद्यन्ते। पञ्चीकरणे प्रमाणमाह- "तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति"श्रुतेः । तासां = तेजोबनानां देवतानाम्, एककां त्रिवृतं त्रिवृतं करवाणीति सम्बन्धः । त्रिवृत्करणन्त्वित्थम् तेजोबनानां प्रत्येक द्विधा विधाय, तदेककांशं पुद्विधा विधाय स्वेतरार्धाशन योजयेत् । सति चैवं त्रयाणां व्यात्मकत्वं सम्पद्यते । तथा हि स्थूले तेजसि अर्द्ध तेजः, अर्द्ध चार्द्ध जलं, अर्द्ध पृथिवी; इति स्थूलस्य श्यात्मकत्वम् । एवमेवान्ययोरपि बोध्यम् । ननु प्रतिज्ञाहेत्वोविरोधः । प्रतिज्ञया पञ्चीकरणस्य, हेतुना च तद्विरुद्ध- त्रिवृत्करणस्य प्रतिपादनात्, इत्याशंकायामाह- त्रिवृत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणोपलक्षणार्थत्वात् । न विरोध इति शेषः । त्रिवृत्करणश्रुतिः = उक्ता तस्यां त्रिवृत" इत्यादि श्रुतिः, तस्याः पञ्चकरणस्य उपलक्षणं ज्ञानम्, तदर्थकत्वात् तत्प्रयोजनकत्वात् २६२ वेदान्तपरिभाषा । अयं माव:- एवञ्च तेषु भूतेषु प्रत्येकं स्वाद्विधा ततः । चतुर्षा भिन्नमेकंकमर्द्धमार्द्ध तथा स्थितम् ॥ व्योम्नोऽर्वभागाश्चत्वारो वायुतेजष्पयोमुवाम् । अर्द्धानि यानि वायोस्तु व्योमतेजष्पयोभुवाम् ।। इति पुराणादौ पञ्चीकरणस्योपलब्ध्या श्रौती त्रिवृत्करणश्रतिःपञ्चीकरणस्यापि प्रकाशनार्या इति । ननु को नाम पञ्चीकरणस्य प्रकारः ? इत्याकांक्षायामाह- पञ्चीकरणप्रकारश्चेत्थम्-आकाशमादौ द्विधा विभज्य तयोरेक भागं पुनश्चतुर्धा विभज्य, तेषां चतुर्णा वाय्य्वादिषु चतुर्षु भूतेषु संयोजनम् । तन्मात्ररूपं सूक्ष्मम् । सूक्ष्मत्वं च न निरवयवत्वम्, अपि तु उपभोगालाघवत्वम् । तेन नासङ्गतिः । विभागकर्ता तु सर्वशक्तिमान परमेश्वर इति बोध्यम् । आकाश S - आकाशोक्तप्रकारमन्यत्रातिदिशति- एवं वायुं द्वधा विभज्य, तयोरेकं भागं चतुर्धा विभज्य तेषां चतुणामंशानां आकाशादिषु सयोजनम् । एवं तेजोवाय्वादीनामपि । एवं आकाशवत् । आदिना पृथिवीपरिग्रहः । नन्वेवं सर्वेषां भूतानां सर्वभूत- साङ्कर्ये वियदादिव्यपदेशनियमः कथमुपपद्यते ? विनिगमकाभावात् इत्याशंकाया- माह- तदेवमेकैकस्य भूतस्याधं स्वांशात्मकं अर्धान्तरं चतुर्विधभूतमय- मिति पृथिव्यादौ स्वांशाधिक्यात् पृथिव्यादिव्यवहारः । तदिति अर्धस्य विशेषणम् । एवमिति प्रकारे । अयं भाव:-अशिस्य अन्य- भूतमयत्वेऽपि अाशस्यकभूतमयत्वेन प्राधान्यात तत्ततत्वन्यपदेशः । भागप्राचम्यं- मेव पिनिगमम् । अन्येषां भूतानां अष्टमांशतया एकस्य भूतस्याधिक्यात् ।
विषयपरिच्छेदः । २६३ उक्तार्थे सूत्रकृत्सम्मतिमाह- तदुक्तम्-"वैशेष्यात्तद्वादस्तद्वाद" इति । वैशेष्यं भागाधिक्यम्, तस्मातृ । तद्वादः तत्तद्भूततया वदनम् थनम् व्यपदेश इति यावत् । तद्वादपदवीप्सा पदसमाप्तिसूचिका । तथा च धिक्यादाकाशादिपदव्यवहार इति भावः । ननु शरीरस्य भस्मशेपतायां परलोकोपभोगादिः कथमुपपद्यते ? सूक्ष्मशरीरेण नगाख्येन चेत् कुतस्तदुत्पत्तिः ? कि स्वरूपता च तस्य । इति जिज्ञासायामाह- पूर्वोक्तैरपञ्चीकृतभूतैलिङ्गशरीरं परलोकयात्रानिर्वाहकं मोक्ष- र्यन्तस्थायिमनोबुद्धिभ्यामुपेतं ज्ञानेन्द्रियपञ्चककर्मेन्द्रियपञ्चक- गणादिपञ्चकसंयुक्तं जायते । लिंगमेव शरीरं लिङ्गशरीरम् । परलोकयात्रा = मरणोत्तरभावी भोगः, निर्वाहकं तत्सम्पादकम् । मोक्षपर्यन्तं तिष्ठतीति मोक्षपर्यन्तस्थायि । मनश्च द्धिश्च मनोबुद्धी, ताभ्यामुपेतं युक्तम् । सङ्कल्पव्यापारवन्मनः, निश्चय- यापारवती बुद्धिः इति तयोर्भेदः । ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं च कर्मेन्द्रियपञ्चकं च गणादिपञ्चकस्य इति ज्ञानेन्द्रियपञ्चककर्मेन्द्रियपञ्चकप्राणादिपञ्चकानि, तैः युक्तम् । इदं सर्व लिङ्गशरीरविशेषणम् । अयं भावः-प्रत्यक्षसिद्धस्थूलशरीरा- तरिक्तसूक्मशरीराभ्युपगमो निरर्थकः प्रयोजनाभावात् इति ताकिककथनमसङ्गतम् आत्मनो न पभोगत्वेन स्थूलस्य च शरीरस्य व्यभिचारित्वेन सर्वस्थूलशरीरानु- यूलिंगशरीरानुपगमे कृतहानाकृताभ्यागमप्रसंगः । न चान्त:करणमात्रानुस्यूति- दाय तद्वारणम् । अनाश्रितस्य तस्य शरीरान्तरगमनासम्भवात् । अतः सप्त- शावयवं तत्स्वीकार्यमेव । तदवयवास्तु श्रोत्राविज्ञानेन्द्रियपञ्चकं वागाविक न्द्रिय- ञ्चक, प्राणाविपञ्चकं मनो बुद्धिश्चेति । अत एव हि- ततः सत्यवतः कायात् पाशबद्ध वशङ्गतम् । अङ्ग ष्ठमात्र पुरुषं निश्चकर्ष बलाधमः ॥
२६४ वेदान्तपरिभाषा। इति पुराणवचनमपि संगच्छते । अङ्ग,ष्ठमात्रत्वं तु सूक्ष्मत्वं न तु मानवाङ्ग ष्ठ- परिमाणत्वम् पुत्तिकादिलिंगे तत्सम्भवाभावात् । अत्रार्थे शब्दप्रमाणमाह- तदुक्तं- पञ्चप्राणमनोबुद्धिदशेन्द्रियसमन्वितम् । अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्मांग भोगसाधनम् ॥ इति । - अपञ्चीकृतभूतोत्थं तथाविधभूतघटितम् । सूक्ष्मांग भोगसाधनं - = भोगस्य साधनम् । सूक्ष्मशरीरम् । लिंगशरीरं विभजते- तच्च द्विविधं परमपरं च । तत्र परं हिरण्यगर्भलिंगशरीरम् । अपरं अस्मदादिलसरन् । तत्र हिरण्यगर्भलिंगशरीरं महत्तत्वम् । अस्मदादिलिंगशरीरञ्चाहकार इत्याख्यायते । लिंगशरीरं च । तत्र - परापरयोर्मध्ये । परत्वं उत्कृष्टत्वम्, हैरण्यगर्भत्वात् । अस्मदादेः लिंगशरीरं = अस्मदादिलिंगशरीरम् । आदिपदेन पश्वादिशरीरपरिग्रहः हिरण्यगर्भलिगशरीरास्मदादिलिंगशरीरयोः । महत्त्वं आख्यायते इति व्यवहितेन सम्बन्धः । शास्त्रविद्भिरिति शेषः । नन्वपञ्चीकृतभूतात्स्थूलभूतोत्पत्तिरित्युक्तम्, तदयुक्तं कपालादिस्थूलेभ्यो घटादिस्थूलोत्पत्तः प्रात्यक्षिकत्वादित्याशङ्कायामाह- एवं तमोगुणयुक्त भ्यः पञ्चीकृतभूतेभ्यः भूम्यन्तरिक्षस्वर्महर्जन- तपस्सत्यात्मकस्योर्ध्वलोकसप्तकस्य, अतल - पाताल-वितल - सुतल- तलातल-रसातल-महातलाख्यस्याधोलोकसप्तकस्य ब्रह्माण्डस्य, जरा- युजाण्डजस्वेदजोलि जाख्यस्य, चतुर्विधशरीराणां चोत्पत्तिः । तमोगुणयुक्त भ्यः = अधिकतमो गुणकेभ्यः । भूमिः, अन्तरिक्ष, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्, एतानि आत्मा = स्वरूपं यस्य उर्ध्वलोकसप्तकस्य तत् तथा, विषयपरिच्छेदः । २६५ तस्य । भूमिः = भूर्लोकः । अतलं च, पातालं च, वितलं च, सुतलं च, तलातलं च, रसातलं च, महातलं च अतल - पाताल-वितल - सुतल - तलातल- रसातल- महातलानि । तान्येव आख्या संज्ञा यस्याघोलोकसप्तकस्य तत्तथा, तस्य । उभयं ब्रह्माण्डविशेषणम् । द्वन्द्वान्तश्रूयमाणस्य आख्या शब्दस्य प्रत्येकमन्वयात् जरायुजाख्यानि अण्डजाख्यानि स्वेदजाख्यानि उद्भिजाख्यानि च यानि चतुर्विधानि स्थूलानि शरीराणि तेषाम् । अयं भाव:- न खलु सूक्ष्मभूतेभ्यो युगपदेव समग्रा सृष्टि: भवति पाश्चात्त्या। किन्तु तेभ्यः मूलभूतसृष्टिः। ततश्च प्रथमभौतिकसृष्टि: ततश्च प्रत्यक्ष जायमाना भौतिकी सृष्टिरिति क्रमः । इति नोक्तशङ्कावकाशः । जरायुजादीनां प्रत्येक परिचाययति- तत्र जरायुजानि जरायुभ्यो जातानि, मनुष्यपश्वादिशरीराणि । अण्डजानि अण्डजेभ्यो जातानि पक्षिपन्नगादीनि शरीराणि । स्वेदजानि तु स्वेदाज्जातानि यूकमशकादिशरीराणि । उद्धिजानि तु भूमिमुद्भिद्य- जातानि वृक्षादीनि । चतुर्युमध्ये । गर्भवेष्टनचर्मपुटकं जरायुः । जातानि निर्गतानि । आदिपदं सम्भाव्यमानशरीरविशेषमाभिलक्ष्य । पन्नगः - सर्पः । मलिनकेशवत्ति- जन्तुविशेषो यूकः गगनगवाष्पजो "जोक" इत्याख्यो वा । उद्भिद्य - औन्मुख्येन भेदनं कृत्वा । . ननु कथं वृक्षादीनां शरीरता ? लौकिकतद्व्यवहाराभावात् इत्याशङ्कायामाह- वृक्षादीनामपि पापफलभोगायतनत्वेन शरीरत्वम् । पापफलं = दुःखं, तद्भोगायतनत्वेन = तद्भोगाश्रयत्वेन । अयं भाव:- - गुर हुंकृत्य तुकृत्य वित्रं निर्जित्य बावतः । श्मशाने जायते वृक्षः कंकगनोपसेवितः।। नर्मदातीरसम्भूताः सरलार्जुनपादपाः । नातीयसंस्पशात ते यान्ति परमां गतिम् ।।
वेदान्तपरिभाषा। इत्यादिवचनेन तेषामपि भवति साध्वसाधूपभोगाश्रयत्वनिश्चयात् आध्यत्मिक- वायुसम्बन्धरूपस्यानुमापकस्य च सत्त्वात् शरीरत्वनिश्चय इति । आध्यात्मिकवायुसम्बन्धश्च भग्नक्षतसंरोहणादिना समनुमेय इति । ननु जगत्स्रष्ट्रत्वं कस्य ? हिरण्यगर्भाख्यस्य ब्रह्मण इति चेत् “आत्मन: आकाशः सम्भूतः' इति श्रुतिविरोधः। ईश्वरस्य चेत्- "सर्गादौ सृष्टवान् ब्रह्मा तन्ममाचक्ष्व विस्तरात्" इत्यादि स्मृतिविरोधः इत्याशङ्कायामाह- तत्र परमेश्वरस्य पञ्चतन्मात्राद्य त्पत्तौ च साक्षात्कर्तृत्वम् । इतरनिखिल- प्रपञ्चोत्पत्तौ च हिरण्यगर्भद्वारा। तत्र - भूत भौतिकोत्पत्त्योः । चकारस्त्वर्थः । साक्षात् हिरण्यगर्भमन- पेक्ष्य । इतरस्य निखिलस्य प्रपञ्चस्य उत्पत्ति: इतरनिखिलप्रपञ्चोत्पत्तिः, तत्र । हिरण्यगर्भो ब्रह्मा, तद्द्वारा = तं द्वारीकृत्य । अयं भाव:-अपञ्चीकृतमूतोत्पत्ती परस्य साक्षात् हेतुत्वम् । भौतिकोत्पत्तौ तु हिरण्यगर्भस्य साक्षात् हेतुत्वमिति वाक्यद्यसङ्गत्या न विरोधावकाशः। व्यापारेण व्यापारिणो नान्यथा सिद्धरिति न्यायेन परमेश्वरोमयस्रष्ट्रत्वम् इति । ननु किमत्र प्रमाणं भौतिकसृष्टि: हिरण्यगर्भद्वारकेश्वरकर्तृकत्वे इति जिज्ञासा- यामाह- "हन्ताहमिमाः तिस्रो देवताः, अनेन जीवनात्मना अनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणी"ति श्रुतेः । अहं अनेन जीवनात्मना इमाः तिस्रो देवता: अनुप्रविश्येति सम्बन्धः । जीवेना- मना = जीवस्वरूपेण । तिस्रो देवताः तेजोबन्नरूपाः । इदं द्वितीयाबहुवचन- पदम् । नन्वत्र श्रुतौ हिरण्यगर्भचर्चाऽभावात् कथमितो भौतिकसृष्टेहरण्यगर्भत्व- नियमः? इत्याशङ्कायामाह- हिरण्यगर्भो नाम मूत्तित्रयादन्यः प्रथमो जीवः । स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते ।
विषयपरिच्छेदः । २६७ - आदिकर्ता स भूतानां ब्रह्माग्ने समवर्त्तत् ।। "हिरण्गर्भः समवर्तताने” इत्यादि श्रुतेः । मूर्तित्रयात् = ब्रह्माविष्णुमहेश्वराख्यात् । शरीरी = जीवः । भूतानां अपञ्चीकृतभूतानां आदिकर्ता = प्रथमकर्ता । परमेश्वर इति यावत् । अग्रे प्रथमं । ब्रह्मा हिरण्यगर्भः। समवर्तत अभवत् । अयं भावः-mware प्रथमजीवत्वेन 'जीवेनात्मना अनुप्रविश्य" इत्यनेन तस्यैव प्रतिपादनात् न भौतिक- सृष्टेहरण्यगर्मत्वे प्रमाणामावः । न च तहिं त्रिमूर्त्यन्तःपातिना ब्रह्मणः कल्पना- वयर्थ्यम् बुद्धरधिष्ठातृतया वैयमिावात् । भूतानामादिकर्तुः परमेश्वरस्यव भौतिककत्तुंचतुर्मुखमावापन्नतया वस्तुतः सर्वकर्तृत्वं परमेश्वरस्यवेति । सृस्टिनिरूपणोपसंहारपूर्वकं प्रलयनिरूपणं प्रतिजानीते- एवं भूतभौतिकसृष्टिनिरूपिता इदानीं प्रलयो निरूप्यते । - भूतं च भौतिकं च भूतभौतिके । तयोः सृष्टिः भूतभौतिकमष्टिः । निरूप्यते बोधानुकूलव्यापारविषयीक्रियते प्रलयलक्षणमाह- प्रलयो नाम त्रैलोक्यविनाशः । - त्रिलोकमेव त्रैलोक्यम् = स्वर्गमर्त्यपातालाख्यम्, तस्य विनाश: जन्याभाव- रूपा निवृत्तिः । तद्भदानाह- स चर्तु विधः । नित्यः प्राकृतो नैमितिक आत्यन्तिकश्चेति । तत्र नित्यः प्रलयः सुषुप्तिः । तस्याः सकलकार्यप्रविलयरूपत्वात् । उक्तेषु चतुर्विधेषु । नित्यत्वं चात्र प्रतिदिनं जायमानत्वरूपं बोध्यम् । "तस्याः सकलकार्येत्यादिना" सुषुप्तेः 'लयवस्थापनं विहितं वेदितव्यम् । अयं भावा-न चेदं शङ्कनीयम् यत् कथं नाम सुषप्तेः प्रलयत्वम् ? इति। कार्याणां मूलकारणे लोनत्वस्यैव प्रलयपदार्थतया, तस्य च तदानीमपि भावात् ।
२६८ वेदान्तपरिभाषा ननु तर्हि सुपुप्त्यनन्तरं पुनर्जागरणे सुखदुःखानुभवस्मरणादीनामप्यभाव- प्रसङ्गः । धर्माधर्मादीनां तत्कारणानां विलयात् इत्याशङ्कानिरासायाह- धर्माधर्मापूर्वसंस्काराणां च तदा कारणात्मना अवस्थानम् । तेन सुप्तोत्थितस्य न सुखदुःखानुपपत्तिः । न वा स्मरणानुपपत्तिः । धर्माधों एवापूर्व धर्माधर्मापूर्वम्, धर्माधर्मापूर्व च संस्काराश्च धर्माधर्मापूर्व- संस्काराः, तेषाम् । तदा- सुषुप्तौ । कारणात्मना = अविद्यात्मना। अवस्थानं = स्थितिः । अयं भावः-सुषुप्ती धर्माधर्मसंस्कारसहितस्यान्तःकरणस्य स्वस्व- रूपेण विलयेऽपि अविद्यात्मना अवस्थानेन जागरणे पुनस्ततो निर्गमनसम्भवेन न सुखदुःखाधुपभोगस्मरणाः पपत्तिरिति । पुनरन्यां शङ्का निराकरोति- न च सुषुप्तावन्तःकरणस्यापि नाशे तदधीनप्राणनादिक्रियानु- पपत्तिः । वस्तुतः श्वासाद्यभावेऽपि, तदुपलब्धेः पुरुषान्तरविभ्रम- मात्रत्वात् । सुप्तशरीरोपलम्भवत् । F- तदधीना = अन्तःकरणाधीना या प्राणादिविक्रिया - श्वासप्रश्वासात्मको विकारः तदनुपपत्तिः । अनुपपत्तिर्न चेति सम्बन्धः । वस्तुतः = तत्त्वतः । तदुपलब्धेः श्वासाधुपलब्धेः । अन्ये पुरुषाः पुरुषान्तराणि, तेषां विभ्रममात्रत्वात् प्रतीतिमात्रत्वात् । अयं भावः-सुषुप्तिकालिकश्वासप्रश्वासादयः न व्यावहारिकाः, सुषुप्तप्रातीतिका वा, किन्तु असुप्तान्यपुरुषप्रातीतिकाः। अतो न विलयोक्ति- विरोधः। परमार्थतो व्यवहारतश्च तदा तदभावात् । । ननु तर्हि मृतसुषुप्त्योरविशेषापत्तिः इत्याशंका निराकुरुते- न चैवं सुषुप्तस्य परेतादविशेषः । सुप्तस्य हि लिंगशरीरं संस्कारा- त्मना अत्रैव वर्तते । परेतस्य हि लोकान्तरे इति वैलक्षण्यात् । CHAR न चाविशेष इति सम्बन्धः । परेतात् मृतात् । संस्कारात्मना संस्काररूपेण । अत्रैव - एतत्प्रारब्धजन्यशरीरे । लोकान्तरे एतादृशशरीर- विषयपरिच्छेदः। २६९ यतिरेकेण । वैलक्षण्यात् = भेदात् । अयं भावः-अयं खलु सुषुप्तमृतयोः भेदः, यत् सुषुप्तलिंगशरीरं पुनरेतच्छरीरावच्छिन्नोपभोगाय एतच्छरीरे एव अविद्यात्मना वतन्ये तिष्ठति तदानीम् । मृतस्य तु न तथेति प्रकारान्तरेण मरणसुषुप्त्योर्भेदमाह- यद्वा अन्तःकरणस्य द्वे शक्ती । ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिश्चेति । तत्र ज्ञानशक्तिविशिष्टान्तःकरणस्य सुषुप्ती विनाशः, न तु क्रियाशक्ति- विशिष्टस्येति प्राणाद्यवस्थानमविरुद्धम् । यद्वा - अथवा । ज्ञानानुकूला शक्तिः = ज्ञानशक्तिः । एवं क्रियाशक्ति- त्यपि । इति तोः प्राणादेः = श्वासप्रश्वासादेः अवस्थान अस्तित्वम् । अयं भावः-सुषुप्ती नान्तःकरणविनाशः किन्तु तदानीं जानानुकूल- शक्तिनाशेन तत्र तवैशिष्ट्याभावेन, विशेषणामावप्रयुक्तः तद्विशिष्टान्त:करणस्या- भाव इति कारणाभावेन ज्ञानात्मककार्यस्याभावो भवति । श्वासप्रश्वासादि- क्रियानुकूलशक्तेस्तु तदानीमपि अन्त:करणे सस्वेन विशेषणविशेष्ययोरभयोरपि सत्त्वेन विशिष्टामावामावेन कारणस्यैव सत्तया श्वासप्रश्वासाधुपपत्तिरिति । यदत्यस्वरसबीजम्-अन्त:करणस्यालीनत्वे प्रमाणविगमः। - किमत्र सुषुप्तौ प्रमाणमित्याशङ्कायामाह- "यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यति । अथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति । अथैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति । सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति । स्वमपीतो भवति" इत्यादिश्रु विसुषुप्ती मानम् । D अस्मिन्निति प्राणविशेषणम् । एकघा भवति लीनो भवति । एनं - प्राणं । अप्येति गच्छति । प्राणस्त्वत्र ब्रह्म न मुख्यः। सोम्येति सम्बोधनपदम् । सता सम्पन्नो भवतीति सम्बन्धः । सता = ब्रह्मणा । सता सम्पन्नो भवतीत्यस्यैव व्याख्यानम् स्वमपीतो भवतीति । स्वं आत्मानं प्राप्तो भवतीत्यर्थः। प्राकृतं प्रलयमाह- प्राकृतप्रलयस्तु कार्यब्रह्मविनाशनिमित्तकः लकार्यावनाशः ।
२७० वेदान्तपरिभाषा। कार्यब्रह्म = हिरण्यगर्भः। तस्य विनाशः = विदेहकैवल्यम् तदेव निमित्तं = कारणं यस्य तत्तथा । सकलकार्याणा विनाशः = निवृत्तिः । . - इसमेवार्थ स्पष्टयति- यदा तु प्रागेवोत्पन्नब्रह्मसाक्षात्कारस्य कार्यब्रह्मणो ब्रह्माण्डा- धिकारलक्षणप्रारब्धकर्मसमाप्तौ विदेहकैवल्यात्मिका परा मुक्तिः, तदा तल्लोकवासिनामप्युत्पन्नब्रह्मसाक्षात्काराणां ब्रह्मणा सह विदेहकैवल्यम् । उत्पन्नो ब्रह्मसाक्षात्कार. = अहं ब्रह्मास्मीति व तिजन्यः अखण्डार्थबोधः यस्य असी उत्पन्नब्रह्मसाक्षात्कारः तस्य । इद कार्यब्रह्मविशेषणम् । कार्य ब्रह्म कार्यब्रह्म हिरण्यगर्भः, तस्य । तस्यानित्यत्वात् । ब्रह्माण्डस्याधिकार: योगक्षेमनिर्वाहकत्वम् । तल्लक्षण = तत्स्वरूप यत् प्रारब्धकर्म, तस्य या समाप्तिः, तस्या सत्याम् । विदेहकैवल्य आत्मा = स्वरूपं यस्याः परस्याः मुक्तेः, सा विदेह- कैवल्यात्मिका। परा मुक्तिरित्यनन्तर भवतीति शेषः । तम्य कार्यब्रह्मणः, लोके सत्याख्ये वसन्तीति तल्लोकवासिनः तेषाम् । सूर्यमण्डलं भित्वा दक्षिणेन यथा गतानामिति यावत् । उत्पन्नो ब्रह्मसाक्षात्कारो येथा ते उत्पन्नब्रह्मसाक्षात्काराः अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारवन्तः, तेषाम् । इदं तल्लोकवासिनामित्यस्य विशेषणम् । अयं भाव:-ये खलु लोकेऽस्मिन् सगुणोपात : सन्तः मरणानन्तरं तादृगुपासना- बलेन दक्षिणमार्गेण हिरण्यगर्भस्य सत्याल्यं लोकं गत्वा तन्निवासिनो जाताः, ते तत्रैव प्राप्तनिर्गुणब्रह्मसाक्षात्काराः सन्तः हिरण्यगर्भस्य जगधोगक्षेमनिर्वाहकत्व- कालसमाप्तौ तत्कवल्ये भवन्ति केवलिनः इति । अत्रार्थे प्रमाणमाह- ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे । परस्यन्ति कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ।। इति श्रुतेः। ब्रह्मणा - हिरण्यगर्भेण । ते - सगुणब्रह्मोपासकाः । प्रतिसञ्चरः प्रलयः। परस्य - अधिपतेहिरण्यगर्भस्य । अन्ते - मुक्तौ । कृतात्मान. - कृतात्म- साक्षात्काराः । ब्रह्मणा सह परं पदं प्रविशन्ति इति सम्बन्धः ।
विषयपरिच्छेदः। २७१ -- ननु प्रकृते ततः किमायातम् इति जिज्ञासायामाह- एवं तल्लोकवासिभिः सह कार्यब्रह्मणि मुच्यमाने तदधिष्ठितब्रह्माण्ड- तदन्तर्वतिनिखिललोकतदन्तर्गतस्थावरादीनां भौतिकानां भूतानां च प्रकृतौ मायायां लयः, न तु ब्रह्मणि । बाधरूपविनाशस्यैव ब्रह्मनिष्ठ- त्वात् । अत प्राकृत इत्युच्यते । एवं उक्तप्रकारेण । तल्लोकवासिभिः हिरण्यगर्भलोकवासिभिः। तेन शासितं यत् ब्रह्माण्डं, तदन्तर्वत्तिनो ये लोका: = भूरादयः, तदन्तर्गता ये स्थावरादयः तेषाम् । आदिपदेन जङ्गमपरिग्रहः । इदं भूताना भौति- काना इत्यस्य विशेषणम् तेन नासङ्गतिः । मायायामिति साङ्ख्योक्तप्रकृतिवारणा- योक्तम् । अयं भावः- पूर्वोक्तक्रमेण हिरण्यगर्भाभावे तदधिष्ठितस्य निखिलचरा- चरात्मकभूतभौतिकघटितस्य ब्रह्माण्डस्य मायात्मकप्रकृती निवृत्तिरूपः प्रलयः सम्पद्यते । प्रकृती लयेन अयमेव लयः प्राकृतलय इत्युच्यते । इति । D ब्रह्मणा अधिष्ठितं ज्ञातो नित्यः प्राकृतश्च प्रलयः, नैमित्तिकोऽसौ कीदृशः इत्याकाक्षायामाह- कार्यब्रह्मणो दिवसावसाननिमित्तस्त्रलोक्यमात्रप्रलयो नैमित्तिकः प्रलयः। - कार्यब्रह्मणः = हिरण्यगर्भस्य । दिवसावसानं निमित्तं यस्य स दिवसावसान- निमित्तकः । अवसानं अन्तः । कर्मणि निमित्ताधीननैमित्तिकत्ववत् प्रलयस्याप्यस्य दिवसावसाननिमित्ताधीनत्वप्रयुक्त नैमित्तिकत्वमिति भावः । ननु दिवसोऽसौ लौकिक एव अन्यो वा कश्चन ? आद्य अनुभवविरोध: । द्वितीये वचनीयता इत्यत आह- ब्रह्मदिवसः चतुर्युगसहस्रपरिमितः कालः । ब्रह्मणः हिरण्यगर्भस्य दिवसः दिन ब्रह्मदिवसः। चत्वारो युगाः चर्तु युगाः, तेषां सहस्राणि चतुर्युगसहस्राणि, तैः परिमितः चतुर्युगसहस्र- परिमितः । चत्वारो युगाः सत्यत्रेताद्वापरकल्पाख्याः। सहस्रसंख्यकचतुर्युगपरिमितः कालः हिरण्यगर्भाख्यस्य ब्रह्मणः एक दिनं भवति । तदन्ते तद्रात्रिरूप: कालः = प्रलयकालः, तद्दिनान्तनिमित्ताधीनतया च नैमित्तिकः इति भावः ।
२७२ वेदान्तपरिभाषा। - तद्दिवसस्यतावत्कालपरिमितत्वे शास्त्रं प्रमाणयति- चतुर्युगसहस्र तु ब्रह्मणो दिनमुच्यते । इत्यादिवचनात् । सहस्रसंख्यकाः चत्वारो युगाः हिरण्यगर्भाख्यब्रह्मसम्बन्धिदिनशब्दवाच्याः इति वाक्यार्थः। दिनस्य तस्यैतत्परिमित्वे सदात्रिरूपस्य किम्परिमितत्त्वमिति जिज्ञासा- यामाह- प्रलयकालोऽपि दिवसकालपरिमितः । रात्रिकालस्य दिवसकाल- तुल्यत्वात्। प्रलयकाल: - नैमित्तिकप्रलयकालः । दिवसकालेन परिमितः । दिवसकाल- परिमितः ब्रह्मरात्रिकालः चतुयुगसहस्रपरिमितः, तद्दिवसकालतुल्यत्वात् दिवसपद- वाच्यक्षणकूटसंख्यकक्षणरूपत्वात् इत्यर्थः । तुल्यत्वं चात्र अत्यधिकक्षणघटितत्व- प्रयुक्तातिवैषम्याभावः । तेन न विषमदिनरात्री समादाय दोषापत्त्यवकाशः। - प्राकृतिकनैमित्तिकास्यप्रलमप्रमाणजिज्ञासायामाह- प्राकृतिकप्रलये नैमित्तिकप्रलये च पुराणवचनानि प्रमाणानि- द्विपरार्द्ध त्वतिक्रान्ते ब्रह्मण. परमेष्ठिनः । तदा प्रकृतयः सप्त कल्पन्ते प्रलयाय हि ॥ एष प्राकृतिको राजन् प्रलयो यत्र लीयते । इति वचनं प्राकृतप्रलये मानम् । एष नैमित्तिकः प्रोक्त: प्रलयो यत्र विश्वसृक् । शेतेऽनन्तासनो नित्यमात्मसात्कृत्य चाखिलम् ॥ इति वचनं नैमित्तिकप्रलये मानम् । पञ्चाशत्वसंख्याको ब्राह्मो वर्षः पर्राद्धम् । द्वित्वविशिष्टं तदेव द्विपराद्धम् तस्मिन् । ब्रह्मणः पूर्णायुभूते शतसंख्याके वर्षे इति यावत् । अतिक्रान्ते = व्यतीते । परमेष्ठिन इति. ब्रह्मणो विशेषणम्, तेन हिरण्यगर्भतालाभः । प्रकृतयः सप्त प्रकृतिविकृतिभूताः । फलत: महदहंकारपञ्चतन्मात्राणि साङ स्यशास्त्र प्रकृति- - विषयपरिच्छेदः। २७३ विकृतिपदेनाभिधीयमानानि प्रलयाय कल्पन्ते इति सम्बन्धः । कल्पन्ते भवन्ति । यत्र लीयते इत्यनन्तरं चराचरमिति शेषः । विश्व सृजतीति विश्वसृक् विश्वसृष्टा हिरण्यगर्भः। अखिलं आत्मसात्कृत्य अनन्तासनः नित्यं शेते इति सम्बन्धः। तुरीयं प्रलयमाह- तुरीयप्रलयस्तु ब्रह्मसाक्षात्कारनिमित्तकः सर्वमोक्षः । ब्रह्मणः ज्ञेयस्य सच्चिदानन्दरूपस्य न तु पूर्वोक्तस्य यः साक्षात्कारः अहं ब्रह्मास्मीति रूपः स एव निमित्तं कारणं यस्य स तादृशनिमित्तकः । सर्वेषां मोक्षः सर्वमोक्षः = अज्ञाननिवृत्तिः । तेन नापसिद्धान्तः । आत्मरूपस्य मोक्षस्य नित्यतया साक्षात्कारनिमित्तकत्वासम्भवात् । ननु सर्वेषां जीवानां मोक्षरूपः प्रलयो भवति चेत् क्रमेणासो भवति युगपद्वा ? इति जिज्ञासानिरासाय आह- स चैकजीववादे युगपदेव । नानाजीववादे तु क्रमेण "सर्व एकी- भवन्ती" त्यादिश्रुतेः। स च मोक्षाख्य तुरीयप्रलयः । एकजीववादे जीवस्यैकत्वाभ्युपगमपक्षे । युगपदेव एकदैव = । नानाजीववादे जीवबहुत्वाम्युगमपक्ष । क्रमेण = एकैकमोक्षोत्तरम- परापरमोक्ष इति । अयं भाव:-एकजीववाद उपाधिमूताया अविद्याया अप्यक्येन सन्निवृत्तिरूपस्य मोक्षस्य क्रममाविता अनुपपन्ना । अनेकजीववादे तु उपाषिभूतानां अविद्यानां युगपनिवृत्त्यसम्भवेन एकदा तादृशमोक्षासम्भव इति । वस्तुतस्तु "सर्वमोक्ष" इति लेख एव नकजीववादे सङ्गच्छते । अनेकत्वाभावे तद् याप्य सर्वत्वासम्भवात् । अथवा कथञ्चित् संगतो क्रियमाणायां "युगपत्" इत्यस्य अक्रमेण इत्यर्थः । - मोक्षामोक्षात्मकप्रलययोः कारणभेदमाह- तत्राद्यास्त्रयो विलयाः कर्मोपरमनिमित्ताः । तुरीयस्तु ज्ञानोदय- निमित्तकः अज्ञानेन सहैवेति विशेषः ।
२७४ वेदान्तपरिभाषा। - -- चतुप प्रलयेपु मध्ये । त्रयः - नित्यप्राकृतनैमिनिकाः। कर्म अदृष्टम्, तदुपरमः = तत्स्तम्भः, कार्याननुकूलत्वमिति यावत् । तुरीयः मोक्षाख्यः । जानस्य उदयः = ज्ञानोदय. असो निमित्त यस्य स तथा । अज्ञानेन सदैव अज्ञानविलयेन सदैव । अय भावः-त्रिषु जीवाज्ञानसत्त्वात् तुरीये च तन्नि- वृत्तेः मोक्षामोक्षविलयोमेद इति । । ननु भूतभौतिकाना प्रलयो भवतीति बुद्धम्, किन्तु कस्तत्र क्रम: ? इत्या- काक्षायामाह- एव चतुर्विधः प्रलयो निरूपितः । तस्येदानी क्रमो निरूप्यते- भूतानां भौतिकानां च न कारणलयक्रमेण लयः कारणलयसमरे कार्याणांमाश्रयमन्तरेणावस्थानानुपपत्तेः। कारणाना लयः कारणलयः, तस्य क्रमः = तदव्यवहितोत्तरभावित्वम्, तेन । उपादाननाशाधीनो नोपादेयनाशः इति भावः । कार्याणां अवस्थानानुपपत्तरिति सम्बन्धः । अयमाशय:-यदि कपालनाशाधीनो घटनाशः स्वीकरणीयः, तदा कपाल- नाशक्षणे विनय कपालं घटस्यास्तित्वं स्वीकरणीयतां प्राप्नोति । न च कपालं विना घटस्यास्तित्वमनुभवसिद्धं येन तदिष्टतामुररीकुर्यात् कोऽपि इति । ननु केन क्रमेण तहि तेषां नाशः ? इत्याकांक्षायामाह- । न किन्तु सृष्टिक्रमविपरीतक्रमेण । सृष्टे: क्रमः सृष्टिक्रमः । कारणानन्तरं कार्योत्पादः । तद्विपरीतक्रमः कारणनाशस्य कार्यनाशानन्तर्यम् । तेन । ननु कारणनाशाधीनकार्यनाशानङ्गीकारे कार्यनाशस्य किञ्चिदप्रयोज्यत्वा- पत्त्या कारणनाशस्य कार्यनाशप्रयोजकत्वमभ्युपगन्तव्यम् । तथा च कारणनाशानन्तर- मेव कार्यनाश: इत्याशङ्कायामाह- तत्तत्कार्यनाशे तत्तज्जनकादृष्टनाशस्यैव प्रयोजकतया उपादान- नाशस्याप्रयोजकत्वात् ।
विषयपरिच्छेदः २९५ तानि तानि कार्याणि तत्तत्कार्याणि घटपटादीनि, तेषां नाशः तत्तत्कार्य- नाशः, तस्मिन् । तत्तज्जनकानि यानि अदृष्टानि, तन्नाशस्य । उपादानं समवायिकारणत्वेन परळवह्रियमाणं परिणामिकारणम्, तन्नाशस्य । प्रयोजकत्वात् सम्पादकत्वात् । अयं भावः-परिणामनाशं प्रति परिणामिनाशस्योक्तयुक्त्या नास्माभिः प्रयोजकत्वमभ्युपेयते अपि तु परिणामानुकूलादृष्टनाशस्य । तथा च न कार्यनाशस्य निष्प्रयोज्यत्वापत्त्या सार्वदिकत्वापत्तिरिति । - एवमनम्पुपगच्छतां नैयायिकानां शिरसि अधिक दण्डं पातयति- अन्यथा न्यायनयेऽपि महाप्रलये पृथिवीपरमाणुगतरूपरसादेर- विनाशापत्तेः । अन्यथा % 3D उपादाननाशाधीनोपादेयनाशाभ्युपगमे । पृथिवीपरमाणुगतः पृथिवीपरमाणुनिष्ठः, यो रूपरसादिः तस्य । महाप्रलये तत्काले । अविनाशापत्त: विनाशानुपपत्तः अयं भावः-परमाणुगतानां रूपरसादीनां उपादानानि परमाणवः, तेषां नित्यतया नाशासम्मवेन उपादाननाशत्वरूपप्रयोजकामावेन, कथं खलु रूपरसादीनां उपादेयानां नाशः तत्प्रयोज्यः सम्पद्यते । न च तेपि परमाणु- वनित्या एवेति शक्यते वक्तुम् । पाकजत्वात्तेषाम् । जन्यमावानां तेषां तदानीम- स्तित्वाभ्युपगमे महाप्रलयस्यैव व्याकृतिः स्याविति । क्रममेव स्पष्टयति- तथा च पृथिव्या अप्सु, अपां तेजसि, तेजसः वायो, वायोराकाशे, आकाशस्य जीवाहङ्कारे। तस्य हिरण्यगर्भाहङ्कारे तस्य चाविद्यायाम् इत्येवरूपः प्रलयः। सर्वत्र विलय इति शेषः। हिरण्यगर्भाहङ्कार. समष्टिरूपः, महत्तत्वम्, तत्र । आत्मनः आकाशः सम्भूत इत्यारभ्य अभ्यः पृथिवीत्यन्तेन श्रुतिवाक्येन पृथिव्याः चरमकार्यत्वप्रतिपादनात् कार्यभूतायाः तस्याः स्वकारणेषु अप्सु लयो भवति । एवमन्यत्रापि एवमभ्युपगमे कारणे कार्यलय इति सर्वानुभवोऽपि सुरक्षितस्तिष्ठति ।
२७६ वेदान्तपरिभाषा। एतस्मिन् लयक्रमे आगमं प्रमाणमाह- तदुक्तं विष्णुपुराणे- जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे पृथिव्यप्सु प्रलीयते । तेजस्यापः प्रलीयन्ते तेजो वायो प्रलीयते । इति । देवर्षे ? इति सम्बोधनपदम् । जगत्प्रतिष्ठा पृथिवी अप्सु प्रलीयते इति सम्बन्धः । जगतः प्रतिष्ठा = आश्रयः जगत्प्रतिष्ठा, इदं पृथिवीविशेषणम् । पृथिव्या अपि जगदन्तः पातितया स्वस्य च स्वाश्रयत्वाभावेन कथं पृथिव्याः जगत्प्रतिष्ठात्वमिति तु नाशङ्कनीयम् । जगत्पदस्य जङ्गमवाचित्वेन पृथिव्याः स्थावरत्वेन तत्सम्भवात् । प्रलयनिरूपणप्रयोजनमाह- वम्विधप्रलयकारणत्वं ब्रह्मणः तटस्थलक्षणम् । एवविधः पूर्वोक्तप्रकारः यः प्रलयः, तत्कारणत्वं = तत्कर्तृत्वम् । तटस्थं सत् लक्षणं तटस्थलक्षणम् । ताटस्थ्यं - लक्ष्यावृत्तित्वम् । लक्षणत्वं प्रकाशकत्वम् । तत्त्वतः अजातवादे सृष्टिप्रलयाधभावेन ब्रह्मणि प्रलयकर्तृत्वं नास्ति, इति तदवृत्तिसदेव तत् ब्रह्म = परिचायक भवतीत्याशयः । ननु “आत्मन आकाशः सम्भूतः" इत्यादिका श्रतिः प्रमाणं न वा ? आधे अपसिद्धान्तः द्वितीये द्वैतापत्तिः तत्प्रतिपाद्यायाः सृष्टेरभ्युपगमात् इत्याशयेन शङ्कते- ननु वेदान्तः ब्रह्मणि जगत्कारणत्वेन प्रतिपाद्यमाने सति सप्रपञ्चं ब्रह्म स्यात् । अन्यथा सृष्टिवाक्यानामप्रामाण्यापत्तेः । वेदान्तः = "आत्मन आकाश: सम्भूत" इत्यादिभिः । जगत्कारणत्वेन जगत्कत्त त्वेन । प्रपञ्चेन सहितं सप्रपञ्चं प्रपञ्चद्वितीयकमित्यर्थः । अन्यथा अप्रतिपाद्यमाने । सृष्टिवाक्यानाम् = "आत्मनः आकाशः सम्भूतः" इत्यादीनाम् । तथा चोभयतः पाशा रज्जुरिति भावः ।
विषयपरिच्छेदः । २७७ समाधत्ते- इति चेन्न । नहि सृष्टिवाक्यानां सृष्टौ तात्पर्यम् । किन्त्वद्वितीये ब्रह्मण्येव । ? नोभयतः पाशा रज्जुः । यत इत्यध्याहारः । न हि तातपर्यमिति व्यवहितेन सम्बन्धः । सृष्टिवाक्यानाम् प्रोक्तानां “आत्मन आकाशः" इत्यादी. नाम् । सृष्टौ = तात्त्विके वियदारम्भे । अद्वितीये द्वितीयरहिते । तात्पर्य त्वत्र प्रतिपादकत्वरूपं बोध्यम् । न त्विच्छात्मकं जडे वाक्ये तदसम्भवात् । पुनराशङ्कय विशदयति- तत्प्रतिपत्तौ कथं सृष्टेरुपयोग: ? इत्यं यदि सृष्टिमनुपन्यस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मणि निषेधः प्रतिपाद्येत तदा ब्रह्मणि निषिद्धस्य रूपस्येव ब्रह्मणोऽन्यत्रावस्थानशङ्कायां न निर्विचिकित्समद्वितीयत्वं प्रतिपादितं स्यात् । तत्प्रतिपत्तौ = अद्वितीयब्रह्मप्रतिपत्तौ । कथमिति प्रश्ने न त्वाक्षेपे । उपयोगः सहायकत्वम् । अनुपन्यस्य = अप्रतिपाद्य । श्रुत्या इति शेषः । ब्रह्मणः इति पञ्चमी । अवस्थानं अवस्थिति: अस्तित्वम्, तस्या या शङ्का तस्याम्। सत्त्यामिति शेषः। निविचिकित्सं - असन्दिग्धम् । इद क्रियाविशेषणम् । तथा च अद्वितीयत्वं निर्विचिकित्सं न प्रतिपादितं स्यादिति सम्बन्धः । अयं भाव:- यदि ब्रह्मणि सृष्टि- मनुपन्यस्यैव तस्मिन् प्रपञ्चनिषेधं प्रतिपादयेत् भगवती श्रुतिः, तहि "देववेत्तो गेहे नास्ति" इति निषेधेन तस्य बहिः सत्त्वकल्पनावत् ब्रह्मणि निषेषमुपगतस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मभिन्नेऽन्यत्र कुत्रापि तात्त्विकतयावस्थानकल्पनया प्रपञ्चात्मकद्वितीयसस्था- पत्या ब्रह्माद्वैतवादो न स्यानिर्णीतः श्रुत्येति । ननु श्रुत्या सृष्टिप्रतिपादने कथमद्वितीयत्वसिद्धिः ? इति जिज्ञासायामाह- ततः सृष्टिवाक्यात् ब्रह्मोपादेयत्वज्ञाने सति उपादानं विना कार्य- स्यान्यत्रसद्धावशङ्कायां निरस्तायां, नेति नेतीत्यादिना ब्रह्मण्यपि तस्या- सत्त्वोपपादने प्रपञ्चस्य तुच्छत्वावगमे निरस्तनिलितविभ्रमं अखण्ड- सच्चिदानन्दैकरसं ब्रह्मसिद्धयतीति परम्परया सृष्टिवाक्यानामद्वितीये ब्रह्मण्येव तात्पर्यम् ।
२७८ वेदान्तपरिभाषा । ततः = तस्मात् । ब्रह्मण: उपादेयं ब्रह्मोपादेयम्, तस्य भावः तत्त्वम्, तस्य ज्ञानं ब्रह्मोपादेयत्वज्ञानम् । ब्रह्मोपादानकत्वज्ञानमिति यावत्, तस्मिन् । तस्य = उत्पन्नत्वेन प्रतिपाद्यमानस्य प्रपञ्चस्य । असत्त्वोपपादने - तात्त्विकत्वाभावनिर्णये। तुच्छत्वमत्र नालीकत्वमपि तु अनिर्वाच्यत्वरूप मिथ्यात्वमवगन्तव्यम् । तस्यावगमो निर्णयः, तस्मिन् । निरस्तः निखिलस्य द्वतस्य विभ्रमो यत्र तत् तथा। द्वैत- विभ्रमः - द्वैतनिष्ठनिरूपकतानिरूपिताधिकरणत्वप्रकारज्ञानम् तद्विशेष्यत्वञ्च । अखण्ड च सत् च चित च आनन्दश्च एकरम इति अखण्डसच्चिदानन्दैकरसम् । सर्वत्र विग्रहस्थश्चकार: अप्यर्थकः । अखण्डत्वं निर्विकल्पकधीविषयत्वम् । सत्त्वं तात्विकत्वम् । चित्त्वं साक्षात्कारत्वम् । एकरसत्वं कूटस्थनिर्विकारत्वम् । अयं भावः-कार्य समवायिकारणे एवं समुत्पद्यते तिष्ठति चायुतसिद्धभावेनेति नैयायिकादिभिरपि स्वीक्रियते । सति चैवं "आत्मन आकाश" इति श्रुतिः जगतः ब्रह्मात्म मरण एव समुत्पत्तिः अस्तितः चेति प्रदर्शितवती। प्रदर्शनेन चानेन जगतः अन्यत्रावस्थानशडूव नावतरति । ब्रह्मणि तत्समुत्पत्तिः तदस्तिता च पश्चात् नेति नेति श्रुत्यैव खण्डिता। इति ब्रह्मभिन्नाधिकरणे ब्रह्मणि च द्वैतप्रपञ्चामावः स्पष्टीकृतो भवति । ब्रह्मतद्भिनाभ्यामन्यच्च तृतीय स्थानमेव नास्ति यत्र द्वतप्रपञ्चसद्धावसम्भावनाऽपि शक्नुयाद्भवितुम् । सृष्टिवाक्यात् प्रपञ्चस्य बघस्थाननयनम् । नेति नेतीति वाक्याच्च तद्वधः इति सर्वथा ब्रह्माद्वैते श्रुतितात्पर्य समधिगतं भवतीति । ननु श्रुते: अद्वै तब्रह्मपरत्वाभ्युपगमे सत्यकामत्वसत्यसङ्कल्पत्वादिगुणप्रतिपादक- वाक्याना का गतिः इति शङ्कायामाह- उपासनाप्रकरणपठितसगुणब्रह्मवाक्यानां तु उपासनाविध्यपेक्षित- गुणमात्रपरत्वम् । निर्गुणप्रकरणपठितानां सगुणवाक्यानां तु निषेधवाक्या- पेक्षितानिषेधसमर्पकत्वेन विनियोगः । इति न किञ्चदपि वाक्यम- द्वितीयब्रह्मप्रतिपादनेन विरुध्यते । .. उपासनाया: प्रकरणं उपासनाप्रकरणम् तत्र पठितानि यानि सगुणब्रह्मवाक्यानि, तेषाम् । सगुणस्य ब्रह्मणो बोधक वाक्यं सगुणब्रह्मवाक्यम् । उपासनायाः विधि: विधानम् तत्र अपेक्षितो यो गुणारोपः, तन्मात्रपरत्वं तन्मात्रबोधकत्वम् । निर्गुणस्य प्रकरणं निर्गुणप्रकरणम्, तत्र पठितानि निर्गुणप्रकरणपठितानि तेषाम् । सगुण- विषयपरिच्छेदः । २७६ वाक्यानां = सगुणब्रह्मबोधकवाक्यानाम् । निषेधवाक्यार्थ अपेक्षित निषधवाक्यापे- क्षितम्, तादृशं यत् निषेध्यं, तत्समर्पकत्वेन = तत्प्रापकत्वेन । अयं माव:-उपासना- प्रकरणपतितादि सगुणब्रह्मबोधकवाक्यानि न ब्रह्मणि तात्त्विकगुणप्रतिपादकानि । येन गुणानद्वितीयत्वेनादाय अद्वितीयत्वनिरासः स्याद् ब्रह्मणः। किन्तु उपासनार्थ आरोपितगुणे प्रतिपावकानीति न तात्त्विकाढतव्याघातः । निर्गुणस्य ब्रह्मणः प्रतिपादके तु प्रकरणे पठितानि सगुणब्रह्मवाक्यान्यपि नेति नेतीति निषेधार्थमेव निषेध्यस्य गुणस्य प्रतिपादकानि । अप्राप्तस्य निषेधासम्भवात् । तथा च तत्प्रति- पादितस्यापि गुणस्य आरोप्यत्वेन तात्त्विकत्वामावात् न तमादाय द्वैतापत्त्या अद्वितीयत्वनिरास इति सर्वथा अद्वैतब्रह्मण्येव श्रुतितात्पर्यमिति । सृष्टिलयप्रतिपादनेन तद्घटितं लक्षणमुपपाद्य लक्षणस्वरूपमाह- तदेवं स्वरूपतटस्थलक्षणलक्षितं तत्पदवाच्यमीश्वरचैतन्यं माया- प्रतिबिम्बरूपमिति केचित् । तत् तस्मात् । एवं प्रोक्तप्रकारेण स्वरूपं च तटस्थं च स्वरूपतटस्थे । ते एव लक्षणे स्वरूपतटस्थलक्षणे ताभ्या लक्षितम् । लक्षितं - तादृशलक्षणयोगि। तत्पदवाच्यम् = तत्त्वमसीति महावाक्यघटकतत्सदनिष्ठवाचकतानिरूपितवाच्य- तावत् । ईश्वरमेव चैतन्यं ईश्वरचैतन्यम् । मायाप्रतिबिम्बरूपं = मायाया तद्रूपं तदात्मकम् । केचिदित्यनन्तरं वेदान्तिन इति शेषः। यत् प्रतिबिम्ब प्रतिफल, प्रतिबिम्बमात्रस्य बिम्बसापेक्षतया, तज्जिज्ञासाया प्रक्रियां स्पष्टयति । तेषामयमाशयः-जीवपरमेश्वरसाधारणं चैतन्यमानं बिम्बम् । तस्यैव बिम्बस्याविद्यात्मिकायां मायायां प्रतिबिम्बमीश्वरचैतन्यम् । अन्तःकरणेषु प्रतिबिम्ब जीवचैतन्यम् । तेषां ईश्वरस्य माया प्रतिबिम्बतावादिनाम् । जीवपरमेश्वरसाधारणम् == तदुभयानुस्यूतम् । चैतन्यमात्रम् = शुद्ध चैतन्यम् । बिम्बं = प्रतिबिम्बता- निरूपकम् । तस्यैव = शुद्धचैतन्यस्यैव । इदं बिम्बस्येन्यस्य विशेषणम् । अविद्यात्मिकायां सत्त्वासत्त्वाभ्यामनिर्वचनीयरूपायाम् । अन्तःकरणेषु बुद्धिषु ।
२८० वेदान्तपरिभाषा। अयं भावः यथा बिम्बरूपस्य सूर्यस्य एकस्यां महानता एकं प्रतिबिम्बमवलोक्यते लोकः । अनेकेषु च सरावावच्छिन्नजलेषु तस्यैव सूर्यस्य सरावसंख्याकानि प्रति- बिम्बानि समवलोक्यन्ते, तथैव एकस्यैव चितः सूर्यस्थानीयस्य एकस्यां मायायां व्यापिकायां यत्प्रतिबिम्बमुत्पद्यते प्रातीतिकं तदीश्वरः । यच्चानेकेष्वन्तःकरणेषु सरावाच्छिन्नजलस्थानीयेषु अन्तःकरणेषु तस्यैव चितः अनेकानि प्रतिबिम्बानि समुत्पद्यन्ते प्रातीतिकानि, तान्येव जीवाः । तत्र माया प्रतिबिम्बरूपस्येश्वरस्यैव लक्षणं सृष्टिस्थितिलयकर्तृत्वाविरूपं प्रागुक्तमिति । ननु कल्पनामात्रप्रसूता इयं प्रक्रिया ? आहोस्वित् प्रामाणिकी ? इत्याशङ्काया- माह- कार्योपाधिरयं जीव: कारणोपाधिरीश्वरः । इति श्रुतेः । कार्योपाधिः अन्तःकरणप्रतिबिम्बरूपः । कारणोपाधिः मायाप्रतिबिम्बमूलः। ननु तहिं जीवेश्वरयोलक्षण्यानुपपत्तिः उभयोः चित्प्रतिबिम्बत्वात् इत्या- शङ्कायामाह- एतन्मते जलाशयगतशरावगतसूर्यप्रतिबिम्बयोरिव जीवपरयो- भैदः । । जलाशये गतिज्ञानं यस्य तत् जलाशयगतम् । एवं शरावगतमित्यपि । इदं सूर्यप्रतिबिम्बविशेषणम् । परः परमेश्वरः । जीवश्च परश्च इति जीवपरौ तयोः अयं माव:-यथा महानदीगतं प्रतिबिम्बं न शरावाच्छानिवपति- बिम्बभिन्नम्, अपि तु विलक्षणम्, तथा प्रकृतेऽपि वैलमण्यमक्षुण्णमिति । भेदकान्तरमाह- अविद्यात्मकोपाधेापकतया तदुपाधिकेश्वरस्यापि ब्यापकत्वम् । अन्तःकरणस्य सिंचातया तदुपाधिकजीवस्यापि परिच्छिन्नत्वम् । अविद्या एवं उपाधि: स्वरूपं यस्य असो अविद्यात्मकः, स एव च उपाधिः अविद्यात्मकोपाधिः तस्य । व्यापकतया = देशान्तरापरिच्छिन्नतया। परिच्छिन्नतया विषयपरिच्छेदः। २८१ - अव्यापकतया। उपाधित्वमत्रपक्षे प्रतिबिम्बाधारत्वरूपं वोध्यम् । स्वाधारयोः मायान्तःकरणयोः परिच्छिन्नत्वापरिच्छिन्नत्वकृतमपि जीवेश्वरयोर्वलक्षण्य मिति । मतेऽस्मिन् दोषोद्धावनपूर्वकं मतान्तरमाह-एतन्मते अविद्याकृत- दोषाः जीव इव परमेश्वरेऽपि स्युः । उपाधेः प्रतिबिम्बमात्रपक्षपाति- त्वात् । बिम्बात्मकमीश्वरचैतन्यमित्यपरे । एतन्मते-ईश्वरप्रतिबिम्बत्वमते । प्रतिबिम्बपक्षपातित्वात् प्रतिबिम्बे स्वगतदोषादिज्ञापकत्तवात् । अयं भावः-जलगतस्य चलनादेः प्रतिबिम्ब एव भानं भवति न बिम्बे इति सर्वजनप्रत्यक्षम् । सति चैवं उपाधिभूताविद्यागतदोषस्य भानं परमेश्वरेऽपि स्यात् । न चेदं सुसहम् ईश्वरे दोषकल्पनाया अनुचितत्वात् । ईश्वरचैतन्यं न प्रतिबिम्बभूतं अपि पु बिम्बभूतम् । तत्र चोपाधिदोषास्पर्शानोक्त- दोषावकाश इति । प्रक्रियां विशदयन् पूर्वमतप्राप्तं दोषं परिहरति- तेषामयमाशय:-एकमेव चैतन्यं बिम्बत्वाकान्तमीश्वरचैतन्यं । प्रतिबिम्बत्वाकान्तं च जीवचैतन्यम् । बिम्बप्रातबिम्बकल्पनाधिश्च एकजीववादे अविद्या । अनेकजीववादे तु अन्तःकरणान्येव । अविद्या- न्तःकरणोपाधिप्रयुक्तो जीवपरयोर्भेदः । उपाधिकृतदोषाश्च प्रतिबिम्बे जीवे एव वर्तन्ते न तु बिम्बे परमेश्वरे । उपाधेः प्रतिबिम्बपक्षपाति- त्वात्। एतन्मते गगनसूर्यस्य जलादी भासमानप्रतिबिम्बसूर्यस्य जीव- परयोर्भेदः । तेषां = ईश्वरबिम्बत्ववादिनाम् । बिम्बत्वाकान्तं बिम्बत्वयोगि । एवमन्य- त्रापि । एकजीववादे जीवकत्वे । अविद्या च अन्त:करणानि, च अविद्यान्तःकरणानि, तान्येवोपाधयः । तत्प्रयुक्तः =तन्मूलकः । जीवपरयो दः जीवपरभेदः । एकजीववादे अविद्यायाः अनेकजीवादे अन्तःकरणानां जीवोपाधितया, बिम्बभूतस्येश्वरस्य च उभय- वादे निरूपाधितया जीवस्य जीवानांच परमेश्वराद्भिन्नत्वमित्यर्थः । गगनं आकाश: तद्वतः सूर्यो गगनसूर्यस्तस्य । अयं भाव:-प्रतिबिम्बदर्शनं तत्त्वतो निन्दन।
२८२ वेदान्तपरिभाषा। जलाविपराहतनयनरश्मिभिः बिम्बस्य वर्शनात् । इति बिम्बमेव तत्त्वं नान्यत् किञ्चिदपि प्रतिबिम्बत्वेन ख्यापमानम् इति बिम्बप्रतिबिम्बयोः जीवपरयोरभेद एव तत्त्वतः एकजीववादे नानाजीववादे चेति । गते- ननु ग्रीवास्थमुखस्य दर्पणप्रवेश इव बिम्बचैतन्यस्य परमेश्वरस्य जीवप्रदेशेऽभावात् तस्य सर्वान्तर्यामित्वं न स्यात् । गलप्रदेशो ग्रीवा, तत्रस्थितं मुख ग्रीवास्थमुखम्, तस्य । दर्पणप्रदेशो दर्पणा- भ्यन्तरभागः, तत्र । तस्य - परमेश्वरस्य । सर्वान्तर्यामित्वं साक्षितया सर्वान्त- विद्यमानत्वम् । अयं भावः-प्रतिबिम्बाधारात अनव्यवहितस्य नातिसंसृष्टस्य वस्तुनो बिम्बत्वं भवतीति सर्वजनसिद्धं चन्द्रसूर्यादौ बिम्बे । प्रकृते तु स्वतो व्यापकोपाधिक- तया, परतश्च परमेश्वरस्य व्यापकत्वेन, प्रतिबिम्बत्वेनाभिमतस्य जीवस्याधार- भूतान्तःकरणेऽपि संसृष्टतया नातिसंसृष्टत्वाभावेन कयं नाम बिम्बत्वम् ? तवभावे च कथं वा जीवस्य प्रतिबिम्बत्वम् ? यदि बिम्बप्रतिबिम्बमावनिर्वाहाय स्वीक्रियते परमेश्वरस्यापि सूर्यादिवत् जीवदेशानतिसंसृष्टत्वं तवा श्रुतिसिद्धं सर्वान्तर्यामित्वं विलोपमुपयाति । साक्षितया सर्वान्तविद्यमानस्यैव तत्वात् । बिम्बत्वनिर्वाहार्य च तथाभावाभ्युपगमाविति । उत्तरयति- इति चेन्न । साभ्रनक्षत्रस्य जलादौ प्रतिबिम्बितत्वे बिम्बभूतमहा- काशस्य जलादिप्रदेशे सम्बन्धदर्शनेन परिच्छिन्नबिम्बस्य प्रतिबिम्ब- देशासम्बन्धित्वेऽपि अपरिच्छिन्नबिम्बस्य प्रतिबिम्बदेशसम्बन्धा- विरोधात् । अभ्रेण नक्षत्रेण च सहितं साभ्रनक्षत्र, तस्य । आकाशस्येति यावत् । प्रतिबिम्बितत्वे =प्रतिबिम्बत्वप्राप्ती। परिच्छिन्नं बिम्बं परिच्छन्नबिम्बं तस्य । प्रतिबिम्बदेशा- सम्बन्धित्वेऽपि = प्रतिबिम्बदेशसम्बन्धाभावेऽपि । प्रतिबिम्बदेशसम्बन्धाविरो- प्रतिबिम्बदेशसम्बन्धे विरोधाभावात् । अयं भावः-द्विविषं खलु भवति बिम्ब परिचितमपरिधिनतत्र परिच्छिन्नविम्बस्येवायं नियमो यत् प्रति- घात - विषयपरिच्छेदः। २८३ बिम्बदेशेन नातिसंसृष्टत्वम्, न त्वपरिछिन्नस्य तस्य । जलमध्यस्थस्याप्याकाशस्य व्यापकस्य जले प्रतिबिम्बवर्शनात् । तथा चेश्वरस्य जीवप्रदेशसम्पृक्तत्वेन सर्वान्तर्या- मित्वं, जीवनिष्ठप्रतिबिम्बतानिरूपकत्वेन च बिम्बत्वं चेति न किञ्चिदनुप- पन्नमिति । अन्या शंकामपाकरोति- - न च रूपहीनस्य ब्रह्मणः न प्रतिबिम्वसम्भवः, रूपवत एव तथात्वदर्शनादिति वाच्यम् । नीरूपस्यापि रूपस्य प्रतिबिम्बदर्शनात् । - न चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । रूपहीनस्य - रूपात्यन्ताभाववतः। तथात्व- दर्शनात् = = बिम्बत्वदर्शनात् । नीरूपस्य - रूपात्यन्ताभाववतः । अयमाशय:- नायं नियमो यत् रूपवत एव भवति प्रतिफलम् । गुणे गुणाभावेन रूपरहितस्य जवाकुसुमलौहित्यस्यापि स्फटिके प्रतिफलनदर्शनात् । तथा च रूप इव नीरूपस्यापि ब्रह्मणः मायाख्यायामविद्याया प्रतिफलनं सम्भवेन जीवब्रह्मणोबिम्बप्रतिबिम्वभावे बाधकाभाव इति। ननु नीरूपगुणप्रतिफलनदृष्टान्तोपलब्धावपि नीरूपस्य द्रव्यस्य प्रतिफलन- दृष्टान्ताभावेन द्रव्यस्य तथा बिधस्याविद्यायां प्रतिफलनासम्भव इत्याशकां निराकुरुते- 'नच नीरूपस्य द्रव्यस्य प्रतिबिम्बाभावनियमः । आत्मनो द्रव्यत्वा- भावस्योक्तत्वात् । प्रतिबिम्बस्याभाव:-प्रतिबिम्बाभावः, तस्य नियमः अव्यभिचारः। द्रव्य- स्येति सम्बन्धे षष्ठी। तथा च द्रव्यसम्बन्धिप्रतिबिम्बाभावनियमः, इत्यर्थः। विशेषतो निष्ठत्वार्थकत्वे तु प्रतिबिम्बाभाव इत्यस्य प्रतिबिम्बनिरूपितबिम्बत्वाभाव इत्यर्थः । अयं भावः- नीरूपस्यप्रतिफलनं न भवतीति नोच्यते, किन्तु नीरूपस्य द्रव्यस्य प्रतिफलनं न भवतीति । तथा च नीरूपद्रव्यस्येश्वरस्य कथं प्रतिबिम्बसम्मव इत्यापि न शक्यते वक्तम् । प्रोक्तनियमस्वीकारेऽपि परमेश्वरस्य द्रव्यत्वमेव नाभ्युपेयते, येन स्यादपि प्रश्नस्यावकाश इति परमेश्वरस्य बिम्बत्वं निराबाषमेवेति ।
२८४ वेदान्तपरिभाषा। - ननु ब्रह्मबिम्बत्वाभाववत् विषयित्वात् यन्नैवं तनवम् यथामुखम् इत्यनुमानस्य जागरूकतया कथमीश्वरस्य बिम्बत्वमित्याशङ्कायामाह- "एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्" यथा ह ययं ज्योतिरात्मा विवस्वान् अपोभिन्ना बहुधैकोनुगच्छन्" इत्यादि वाक्येन ब्रह्म प्रति- बिम्बाभावानुमानस्य बाधितत्वाच्च । जले चन्द्रः जलचन्द्रः प्रतिबिम्बचन्द्र इत्यर्थः तद्वत् । दृश्यते इत्यनन्तरं ब्रह्मति शेषः । ज्योतिरात्मा = ज्योतिस्वरूपः । विवस्वान सूर्यः । एक: = एकोऽपि । भिन्ना अप: अनुगच्छन् बहुधा इति सम्बन्धः । भवतीति शेषः। आगमविरुद्धस्या- नुमानस्याभासतया "नरशिरः कपालं शुचित्रायनात् अंखवत्" इत्यनुमानमिव प्रोक्तबिम्बत्वाभावानुमानस्य बाधितत्वादामासत्वम् । इति तत्तेन बिम्बत्वक्षति- रेस्पत्यात भावः । - उपसंहरन् प्रतिजानीते- तदेवं तत्पदार्थों निरूपितः । इदानीं त्वं पदार्थो निरूप्यते। . तदेवं = प्रोक्तेन प्रकारेण । तत् पदार्थः तत्त्वमसीत्येतद्धटकतत्पदस्यायः। निरूपितः बोधानुकूलव्यापारविषयीकृतः। त्वम्पदार्थः = उक्तमहावाक्य- घटकस्य त्वम्पदस्यार्थः । निरूप्यते - बोधानुकूलव्यापारविषयीक्रियते । निरूपयन्नाह-. अथ त्वेकजीववादे अविद्याप्रतिबिम्बो जीवः अनेकजीववादे अन्तः- करणप्रतिबिम्बः । स च जामस्वप्नसुप्तिरूपावस्थात्रयवान् । अविद्यायां प्रतिबिम्ब: अविद्याप्रतिबिम्बः। अन्तःकरणे प्रतिबिम्बः अन्त:- करणप्रतिबिम्बः । न स्वच्छ एव पदार्थे प्रतिबिम्बसम्भवादनयोश्चास्वच्छतया कथं प्रतिबिम्बसम्भव इति तु न शंक्यम् स्वच्छसत्त्वप्रधानत्रिगुणात्मकत्वेन तयोरपि स्वच्छत्वात् । स च = जीवश्च । चस्त्वर्थे । जागच्च स्वप्नं च सुषुप्तिश्च जागृत्स्वप्नसुषुप्तयः, तान्येव अवस्थात्रयं, तद्वान् । अवस्थात्रयसम्पन्न इत्यर्थः ।
विषयपरिच्छेदः। २८५ ननु का तत्र जाग्रदवस्था? इति जिज्ञासायामाह- - तत्र जाग्रदवस्था नाम इन्द्रियजन्यज्ञानावस्था। इन्द्रियजन्यं यत् ज्ञानं तेनावस्था = अवस्थितिः। इन्द्रियजन्यवर्तमानज्ञान- परिणामाभ्यन्तःकरणावच्छिन्नत्वमित्यर्थः । ननु ज्ञानावस्थेत्युच्यताम् किमिन्द्रयजन्यत्वनिवेशेनेत्यत आह- अवस्थान्तरे इन्द्रियायाप्तिः । अवस्थान्तरे = स्वप्नादौ । नातिव्याप्तिरितिसम्बन्धः। इन्द्रियाणामभाव: इन्द्रियाभावः तस्मात् लयेनेति शेषः । अयमाशयः--यदि धर्मशानावस्थेत्येताब च्यते तदा स्वप्नसुषप्त्योरतिव्याप्तिः। नित्यस्य स्वरूपज्ञानस्य तयोरपि सत्वात् । यदि जन्यज्ञानावस्थेत्युच्यते सदा सुषुप्तावतिव्याप्तिः । अन्तःकरणजन्यज्ञानस्य तदानीमपि सत्त्वात्, अतः इन्द्रियपदमिति । ननु ज्ञानस्य नित्यत्वेन तत्रन्द्रियजन्यत्वमेवासम्भूतमिति जिज्ञासायामाह- इन्द्रियजन्यं ज्ञानं घान्तःकरणवृत्तिः । स्वरूपज्ञानस्यानादित्वात् । चकारस्त्वर्थः। अन्तःकरणस्य वृत्तिः परिणामः । ज्ञानं द्विविधं मुख्यं गौणं च । तत्र मुख्यज्ञानस्य नित्यत्वेऽपि गौणस्यान्त:करणवृत्तिरूपस्य तस्य इन्द्रियजन्य- त्वमबाधितमेवेतिभावः। ननु गौणज्ञानरूपा अन्तःकरणवृत्तिः कथमभ्युपेया ? स्वरूपचतन्ये एव हि स्वप्रकाशे विषयाणामध्यस्तत्वेन तत्संसृष्टतया, ततो विषयप्रकाशनसम्भवात् इत्या- शंकायामाह- सा चान्तःकरणवृत्तिरावरणाभिभवार्था इत्येकं मतम् । अन्तःकरणस्य बुद्धः वृत्तिः परिणामः । आवृयते चैतन्यमनेनेत्यावरणं अज्ञानं, तस्याभिभवः तिरस्कारः, तदर्या = तत्प्रयोजना ।
२८६ वेदान्तपरिभाषा। उक्तमयं विशदयति- तथा हि अविद्योपहितचैतन्यस्य जीवत्वपक्षे घटाधिष्ठानचैतन्यस्य जीवरूपतया, जीवस्य सर्वदा घटादिभानप्रसक्तौ घटाद्यवच्छिन्नचैतन्या- वरकमज्ञानं मूलाविद्यापरतन्त्रमवस्थापदवाच्यमवश्यमभ्युपगन्तव्यम् । एवं सति घटादेर्न भानप्रसङ्गः । अनावृतसम्बन्धस्यैव भानप्रयोजकत्वात् । तस्य चावरणस्य सदातनत्वे कदाचिदपि घटभानं न स्यात् इति तद्भङ्गे वक्तव्ये तद्भङ्गजनकं न चैतन्यमात्रम् । तद्भासकस्य तदनिवर्तकत्वात । - - - अविद्यया उपहित चैतन्य अविद्योपहितचैतन्य, तस्य । उपहितत्वमवच्छिन्न- त्वम् । तथा चाविद्यावच्छिन्नचैतन्यम्य जीवतापक्ष इत्यर्थः । इदमवच्छेदवादे । प्रतिबिम्बवाद तु अविद्याया उपहित = प्रतिविम्बित चैतन्य अविद्योपहितचैतन्यम् । अविद्याप्रतिबिम्बभूतचैतन्यमित्यर्थः तस्य जीवत्वपक्षे । घटादेरधिष्ठान आरोप- स्थानम् यच्चैतन्यमुक्तरूपं तस्य। जीवस्य सर्वदा यद् घटादिभान, तत्प्रसत्तौ = तस्य सर्वदेव घटादिभासकत्वापत्ताविति तत्सरलार्थ । घटादिना अवच्छिन्न चैतन्य घटाधवच्छिन्नचैतन्यम् । तादृशचैतन्यस्यावरफ आच्छादकम् । मूलभूता अविद्या अज्ञानं मूला विद्या, तत्परतन्त्र तदवीनम् अवस्था शब्देन उच्यते इति अवस्थाशब्दवाच्यम् । अवस्थासंज्ञकमिति तदर्थः । एतत् त्रितयमज्ञानविशेषणम् । अभ्युपगन्तव्यम् - स्वीकरणीयम् । न आवृतं अनावृतं, तादृक् चैतन्यमित्यर्थः । तस्य सम्बन्धः अनावृतसम्बन्धः तस्यैव । भानं अन्तःकरणवृत्त्यात्मकज्ञानं, तस्य प्रयोजकं, भानप्रयोजकम् तस्य भावः तत्त्वम् तस्मात् । तस्य अवस्थापदवाच्य- स्याज्ञानस्य । सदातनत्वे = सार्वदिकत्वे। घटभानं = घटस्य विषयीकरणम् । तद्भङ्ग आवरणभंगे। तस्य आवरणस्याज्ञानस्य भंगो नाशः, तस्य जनक = कारण, तद्भगजनकम् । चैतन्यमानं - शुद्धचैतन्यम् । तदनिवर्तकत्वात् तन्निवर्तकत्वाभावात् । अयं भावः-जीवस्य प्रपञ्चाधिष्ठानत्वपक्षे अविद्यावच्छिन्नचंतन्यात्मके जीवे घटादेरध्यासो भवतीति मन्तव्यम् । सति चैवं प्रकाशकजीवचैतन्यप्रकाश्य- मतन्ययोरन्तराले यदि व्यवधायकं किमपि न स्यात् तहि प्रसज्येत सर्वदेव मानं घटावेरिति स्वीकर्तव्यं व्यवधायकं किञ्चित् द्वयोरन्तराले । तच्च व्यवधायकं न मूलासानं भवितुमर्हति । तस्य तस्वे मोक्षाव्यवहितपूर्वमहं ब्रह्मा- स्मीत्यनेनैव नाशेन, मध्ये त्यावरणमंगेन घटादिभावानुपपत्तिप्रसङ्गात् । अतस्त- - विषयपरिच्छेदः। २८७ स्कार्यभूतं तूलाज्ञानं आवरणत्वेनाभ्युपगन्तव्यम् । यन्नाशे आवरणाभावेन अर्हति प्रकाशयितुमविद्यावच्छिन्नं चैतन्यं घटादिकं प्रदीपादिरिवानव्यवहितं वस्तु । सति चैवं तन्नाशजनकापेक्षायां भवति खलु प्रयोजनमन्तःकरणवृत्तेः तन्नाशाय। वृत्तरपि गौणज्ञानतया तेनाज्ञाननाशस्य युक्तिसिद्धत्वात् । विरोधिनव विरोधिखण्डनस्य लोकसिद्धत्वात् । वृत्ति विनाकृत्य चैतन्यमाणोक्तज्ञाननाशः शक्यते नाभ्युपगन्तुम् । तस्याज्ञानावभासकत्वेन तन्नाशकत्वायोगात् । एवं जीवानधिष्ठानत्वपक्षे ऽपि युक्तेयं प्रक्रिया, ईश्वरादावपि कल्पितस्य घटादेः जीवकर्तृकावभासनानगीकारे घटादेर्जीवावभास्यत्वमनुभवसिद्ध न स्यात् कादाचित्कीमिति तयोर्मध्ये व्यवधायकमपि कादाचित्कं वाच्यम् । तन्निवृत्तिरपि कादाचित्की वाच्या। तनिवर्तकमपि च कादाचित्क वाच्यमिति सैवान्तःकरणस्य वृत्तिर्यया प्रोक्तं कादाचित्कत्वं सम्पद्यतेऽनुभूयमानम् । एवं हि नामावधेयम्-यत् गिरिश्रृंगादेहिमाच्छावित्वे सत्यपि सवितृप्रकाशे तावत् श्रृंगज्ञानं न भवति यावत् तपनमण्डलनिर्गतैः फिरणैर्न भवति तुषारविलयः। भवति च तथा भवत्येव तथेति सर्वानुभवसिद्धम् । तथा प्रकृतेऽपि बोध्यम् । तपनस्थानीयं चैतन्यं तन्मण्डलस्थानीया अविद्या । किरणस्थानीया वृत्तिः। तुषारस्थानीयमज्ञानम् । गिरिगस्थानीयो घटादिः । इत्यावरणभंगार्थावृत्तिः समभ्युपगता भवति । ननु वृत्तिस्वीकारेऽपि तस्य गोगज्ञानत्वेन तन्मात्रस्यैव कुत अज्ञाननाशकत्वमा- स्थीयते ? अज्ञानोपहितचैतन्यस्य तदा स्थीयतामिति जिज्ञासायामाह- नारि वृत्त्युपहितं चैतन्यम् । परोक्षस्थलेऽपि तन्निवृत्त्यापत्तः । इति परोक्षव्यावृत्तवृत्तिविशेषस्य, तदुपहितचैतन्यस्य वा आवरणभङ्ग- जनकत्वमित्यावरणाभिभवार्था वृत्तिरुच्यते । परोक्षस्थलेऽपि अनुमित्यादिपरोक्षवृत्तिस्थलेऽपि । तन्निवृत्त्यापत्तेः आवरणनिवृत्त्यापत्तेः । अयं भावः सामान्यतो वृत्त्युपहितचैतन्यस्यावरणमंगजनक- त्वमभिप्रेतम् । आहोस्वित् वृत्तिविशेषोपहितस्य ? आधे अनुमित्यादिस्थलेऽपि तदात्मकवृत्तिसमुपहितचैतन्येनावरणभंगे वह्न यावेः साध्यस्य स्पष्टावभासापत्याउपरो- भत्वापत्तिः । द्वितीयेऽपि यदि अनमित्यादेवत्तिविशेषपदेन परिग्रहः तदा संवापत्तिः। वनिपटेत परोभिवानिमिता नाaaira zRAMET- यविच वेदान्तपरिभाषा। २८८ पहितचैतन्यस्यापि भवितुमर्हत्यावरणमञ्जकत्वम् । किन्तु भञ्जकतावच्छेवक गुरु स्यादित्येतावन्मात्रमिति । वृत्तिसमुपयोगस्तूमयथा । वृत्त्युपयोगे मतान्तरमाह- सम्बन्धार्था वृत्तिरित्यपरं मतम् । तत्राविद्योपाधिकोऽपरिच्छिन्नो जीवः । स च घटादिप्रदेशे विद्यमानोऽपि घटाद्याकारापरोक्षवृत्तिविरह- दशायां न घटादिकमवभासयति । घटादिना सह सम्बन्धाभावात् । तत्तदाकारवृत्तिदशायां तु भासयति । तदा सम्बन्धसत्वात् । - सम्बन्धार्था विषयचैतन्ययोः सम्बन्धार्था । तत्र - तस्मिन् मते । घटादि- प्रदेशे इत्यनन्तरं विद्यमानोऽपीत्यतः पूर्व व्यापकत्वादिति शेषः । घटाद्याकारा= अयं घट इत्याद्याकारा या अपरोक्षा वृत्तिः तस्याः यो विरहः = अभावः, तद्दशायां तत्काले । नावभासयतीति सम्बन्धः । जीवो घटादिकं न प्रकाशयतीत्यर्थः । सम्बन्धा- भवात् = प्रकाशननियामकसम्बन्धाभावात् । तत्तदाकारा - घटाद्याकारा या वृत्तिः, तद्दशायां - तत्काले । भासयति - प्रकाशयति । घटादिकमिति शेष.। अयं भावः-अन्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्यकारणभावनिश्चयो भवतीति सर्वानुमतम् । सति चैवं वृत्तिकाले घटप्रकाशात् तद्विरहकाले च तवप्रकाशात् विद्यते वृत्तः कोऽपि समुपयोगः, इति निश्चीयते । ततो विशेष जिज्ञासायां जीवघटयोः सम्बन्धविशेष- सम्पावकतया तदुपयोग इति । निश्चीयते अन्वयव्यतिरेको व्यों स्यातामन्यथेति । कथं सम्बन्धसम्पादकत्वमिति चेत् इत्थम्-अन्त:करणस्य घटाकारधारणमेव हि तवृत्तिः । अन्तःकरणं च जीवचैतन्योपाधिभूताया अविद्याया एव परिणाम इति स्वाश्रिता विद्यापरिणामभूतान्तःकरणकारकत्वं सम्बन्धः सम्पद्यते इति । शकते- नन्वविद्योपाधिकस्यापरिच्छिन्नस्य जीवस्य स्वत एव समस्य वस्तु- सम्बरस्य वृत्तिविरहदशायां, सम्बन्धाभावाभिधानमसङ्गतम् । असङ्ग- त्वदृष्ट्या सम्बन्धाभावाभिधाने च वृत्त्यनन्तरमपि सम्बन्धो न स्यात् । अविद्या उपाधियंस्य सा अविद्योपाधिकः, तस्य । अपरिच्छिन्नस्य = व्यापकस्य । स्वत एव = वृत्तिमनादृत्याऽपि । समस्तं वस्तु समस्तवस्तु, तेन सम्बद्ध समस्त- विषयपरिच्छेदः । २८९ वस्तुसम्बद्धम्, तस्य । इदं जीवविशेषणम् । सम्बन्धस्याभाव: सम्बन्धाभावः, तस्या- भिधानं सम्बन्धाभावाभिधानम् । वृत्ति विनेति शेषः । असङ्गतं अनुचितम् । न संग: अस्यास्तीत्यसंगः । तस्याभावः असङ्गत्वम्, तस्य दृष्टिः आत्मासङ्गरहित इति बुद्धिः, तया । सम्बन्धस्याभाव: सम्बन्धाभावः, तस्याभिधानं - कथनम्, तस्मिन् । चस्त्वर्थे । वृत्त्यनन्तरमपि अन्तःकरणवृत्त्यव्यवहितोत्तरकालमपि । सम्बन्धो न स्यात् वृत्तिप्रयोजनत्वेनाभिमतस्य सम्बन्धस्याभाव आपतेत् । आत्मन: असंग- त्वस्य स्वाभाविकत्वादित्यर्थः । अयं भाव:-अविद्योपाधिकस्य जीवचैतन्यस्य व्यापकत्वेन = सर्वमूर्तसम्बन्धित्वेन वृत्त्यभावेऽपि सम्बन्धः स्वत एव स्यादिति कृतं वृत्तिकल्पनेन । यदि च आत्मन असंगतया स्यात् सम्बन्धाभावः, तदा वृत्ति- शतेनापि न शक्यते सम्पादयितुं जीवघटायोः सम्बन्ध इति तथापि कृतं वृत्तिस्वीकारेणेति। उत्तरयति- इति चेत् उच्यते । न हि वृत्तिविरहदशायां जीवस्य सम्बन्ध- सामान्यं निषेधामः । किन्तु घटादिभानप्रयोजकं सम्बन्धविशेषम् । स च सम्बन्धविशेषः विषयस्य जीवचैतन्यस्य व्यङ्गयव्यञ्जकभावलक्षण: कादाचित्कः, तत्तदाकारवृत्तिनिबन्धनः । न हि निषेधाम इति व्यवहितेन सम्बन्धः । घटादेर्भानं घटादिभानं, तस्य प्रयोजकम् । इदं सम्बन्पावशेषविशेषणम् । वृत्ति विना निषेधाम इति व्यवहितेन सम्बन्धः । व्यङ्यभावो व्यंग्यत्वं घटादिनिष्ठम्, व्यंजकभावो व्यञ्जकत्वं, जीवनिष्ठं, तत्स्वरूपः । स्वनिष्ठव्यञ्जकतानिरूपितव्यंग्यतास्वरूपसम्वन्धो जीवस्य विषये इत्यर्थः । कादाचित्क: असार्वदिकः । तत्तदाकारा = घटाद्याकारा या वृत्तिः, तन्निबन्धनः = तन्मूलकः । अयमाशयः-व्यापकस्य सर्वमूर्तः वस्तु- सम्बन्धः स्वाभाविक एव भवति न सत्र वृत्त्यपेक्षेति सत्यम् । किन्तु घटाविमान- प्रयोजको वृत्त्यधीनो जीवस्य सम्बन्धविशेषो वृत्ति विना न स्यादिति वृत्तिमवश्यम- भ्युपेयेति । वृत्त्यभ्युपगमे च तदधीनस्य जोवप्रतियोगियसअनुयागिकनिरुत- सम्बन्धसम्पत्त्या न घटादेः प्रकाशनानुपपत्तिरिति । एतदेव विशदयति- तथा हि तैजसमन्तःकरणं स्वच्छद्रव्यात् स्वत एव जीवचैतन्याभि- व्यञ्जनसमर्थम् । घटादिकं तु न तथा, अस्वच्छद्रव्यत्वात् । स्वाकार- तल्लक्षणः २९० वेदान्तपरिभाषा। वृत्तिसंयोगदशायां तु वृत्त्यभिभूतजाड्यधर्मकतया वृत्त्युत्पादितचैतन्या- भिव्यञ्जनयोग्यताश्रयतया च वृत्त्युदयानन्तरं चैतन्यमभिव्यनक्ति । . तैजसं = तेजोनिष्पन्नम् । अन्त:करणं बुद्धिः । स्वत एव वृत्ति विनैव। जीवचैतन्यस्याभिव्यञ्जनं प्रतिफलनं, तत्समर्थम् । स्वाकारा = घटाद्याकारा या वृत्तिः = अन्त:करणस्य परिणामः, तस्य यः सयोगः, तद्दशायाम् = तत्काले । वृत्त्या अभिभूतं जाड्यं धर्मो यस्य असौ वृत्त्यभिभूतजाड्यधर्मकः, तस्य भावस्तत्ता तया । वृत्त्या उत्पादिता या चैतन्याभिव्यञ्जनयोग्यता, तस्य यः आश्रमः, तस्य भावस्तत्ता तया । वृत्तेरुदयः 3 उत्पादः, तदनन्तरम् । चैतन्यं अभिव्यनक्ति स्वस्मिन् चैतन्यप्रतिबिम्बमादधाति । अयमाशयः-अहं सुखीत्याद्यन्तःकरणप्रकाशकाले नान्तःकरणवृत्त्यावश्यकता । अन्तःकरणस्य स्वतः स्वच्छतया तत्र वृत्तिमनपेक्ष्यैव चैतन्यात्मकप्रकाशप्रतिफलनात् । घटादेस्त्वतजसत्वेन तत्र स्वतः प्रतिफलनासम्भवेन, तेषां भानस्थले अन्तःकरणस्य तत्तदाकारा वृत्तिः स्वीकरणीया। तथा च स्वच्छ- स्यान्तकरणस्य स्वच्छाया: वृत्तः घटाद्याकारधारणे, घटादेः स्वत: अस्वच्छत्वेऽपि स्वच्छान्तःकरणपरिणामरूपवृत्तिलिप्ततया, स्वत: अस्वच्छाया अपि स्वच्छकाचादिज- द्विततया स्वच्छतामादधत्त्याः पाथिवभित्त: सूर्यादिप्रतिबिम्बप्राहित्वमिव भवति जीवचैतन्यप्रतिबिम्बग्राहित्वमिति न जीवचैतन्येन घटादिप्रकाशनवैधुर्यम् । वृत्त्यन- भ्युपगमे त्वस्वच्छतया घटादौ जीवचैतन्यप्रतिफलनाभावेन तेषां प्रकाशो दुर्घट एव स्यादित्यतोऽवश्यमभ्युपेयान्त:करणवृत्तिः । अत्र मते यत्र जीवस्य प्रतिफलनं तस्यैव प्रकाश्यत्वमिति नियमः । उक्तार्थ विवरणं प्रमाणयति- तदुक्तं विवरणे अन्तःकरणं हि स्वस्मिन्निव स्वसंसगिण्यपि घटादौ चैतन्याभिव्यक्तियोग्यतामापादयति इति- चैतन्यस्य अभिव्यक्यिः = प्रतिफलनं, तस्य योग्यता = सामर्थ्यम् । आपादयति = सम्पादयति । दृष्टान्तमुखेन स्पष्टयति- दृष्टं चास्वच्छस्यापि स्वच्छद्रव्यसम्बन्धदशायां प्रतिविम् प्राहि- त्वम् । यथा कुड्यदेजलसंयोगादियां मुखादिप्रतिबिम्बग्राहित्वम् ।
विषयपरिच्छेदः । २९१ न स्वच्छो अस्वच्छः तस्य । स्वच्छं द्रव्यं स्वच्छद्रव्यं, तेन सह यः संयोग:, तद्दशायां तत्काले । प्रतिविम्बग्राहित्वं प्रतिबिम्बग्रहणसामर्थ्य, प्रतिविम्बाभार- त्वमित्यर्थः। कुड्यं-भित्तिः जलसंयोगेत्यप्युपलक्षणम् कायादिसंयोगेऽपि तत्सम्भवात् । ननु प्रोक्तप्रकारेण घटादेः प्रतिबिम्बग्राहित्वेऽपि चैतन्याभिव्यञ्जकत्वं कथं सिद्धिमित्याकाक्षायामाह- घटादेरभिव्यञ्जकत्वं च तत्प्रतिबिम्बग्राहित्वम् । चैतन्यस्याभि- व्यक्तत्वञ्च तत्र प्रतिबिम्बितत्वम् । तदभिव्यञ्जकत्वं तत्प्रतिबिम्बग्राहित्वञ्चकमेव वस्तु । अभिव्यञ्जकत्वं प्रतिबिम्बतत्वमपि चैकमेव वस्तु इति चैतन्यप्रतिबिम्बग्राहित्वे घटादेः चैतन्याभि- व्यञ्जकत्वं स्वतः सिद्धमेवेति न प्रश्नावकाशः। ननु अन्तःकरणस्य बाह्यावच्छिन्नावृत्तिर्भवतीति निश्चायकाभावे कथं घटादे- वृत्तिलिप्तता ? कथं च तदभावे प्रतिबिम्बग्राहित्वमित्याकांक्षायामाह- एवं विधाभिव्यञ्जकत्वसिद्धयर्थमेव वृत्तेरपरोक्षस्थले बहिनिर्गम- नाङ्गीकारः । परोक्षस्थले तु वह्नयादेः वृत्तिसंयोगाभावेन चैतन्या- व्यञ्जकतया नापरोक्षत्वम् । . एवं विधं = प्रोक्तप्रकारं यत् अभिव्यञ्जकत्वं = अभिव्यञ्जकत्वं = चित्प्रतिबिम्बग्राहित्वं, तस्य या सिद्धिः, तदर्थम् । अपरोक्षस्थले वृत्तेर्बहिनिर्गमनाङ्गीकार इति सम्बन्धः । वृत्तिसंयोगाभावेन अन्त:करणवृत्तिसंयोगाभावेन। वह्न यादेः चैतन्याव्यञ्जकत- येति सम्बन्धः । जीवचैतन्यप्रतिबिम्बाग्राहितयेति तदर्थः । नापरोक्षत्वं न विषयगत- मपरोक्षत्वम् । अयं भाव:-भागापा भवति कारणकल्पनमिति सर्ववादिसिद्धम् । सति चैवं घटादेरनपलपनीयापरोक्षत्वानुपपत्त्या जीवचैतन्यप्रतिबिम्बग्राहित्वम्, तदनुपपत्त्या चान्तःकरणस्य बात देशावच्छिन्नत्तिभवनमभ्युपगमनीयम् । अत एव हि वह्नयाद्यनुमितिस्थले वह्नौ न विषयगतमापरोक्ष्यम् । तत्र वह्नयंवहितत्वेन अन्तःकरणस्य तदाकारधारणासम्भवेन बाह्यवृत्त्यनभ्युपगमात् । इति पारोक्या- पारोक्ष्यभेदसाधनार्थमपि स्वीकरणीया बाह्यवृत्तिरन्तःकरणस्येति ।
२९२ वेदान्तपरिभाषा। प्रसङ्गादेतन्मतसिद्धं विषयगतमापरोक्ष्य प्रतिपादयति- एतन्मते विषयाणामापरोक्ष्यं चैतन्याभिव्यञ्जकत्वमिति द्रष्टव्यम् । षष्ठ्यर्थों निष्ठत्वम् । तथा च विषयनिष्ठमापरोक्ष्यमित्यर्थः । चैतन्याभि- व्यञ्जकत्वं - जीवचैतन्यप्रतिबिम्बाधारत्वम् । दष्टव्यम् = बोध्यम् । जीवपरिच्छिन्नत्वे पक्षे वाचस्पतिमतेन वृत्त्युपयोग दर्शयितुमाह- एवं जीवस्यापरिच्छिन्नत्वपक्षेऽपि वृत्तेः सम्बन्धार्थत्वं निरूपितम् । इदानीं परिच्छिन्नत्वपक्षे वृत्तेः सम्बन्धाथत्वं प्रतिपाद्यते । एवं = कथितप्रकारेण । अपरिच्छिन्नत्वपक्षे व्यापकत्वपक्षे । अपिकारेण मतेऽस्मिन्नस्वरस इति सूचितम् । परिच्छिन्नत्वपक्ष जीवस्यान्तःकरणावच्छिन्नतया अव्यापकत्वपक्षे। प्रतिपाद्यते प्रतिपत्त्यनुकूलव्यापारविषयीक्रियते । तथा हि अन्तःकरणोपाधिको जीवः । तस्य च घटाद्यनुपादानता । घटादिदेशासम्बन्धात् । किन्तु ब्रह्मव घटाधुपादानम् । तस्य मायो- पहिततया सकलघटाद्यन्वयित्वात् । अत एव ब्रह्मणः सर्वज्ञता । अन्त:करणं उपाधिः यवच्छेदको यस्य स तथा। अन्तःकरणावच्छिन्न इत्यर्थः । तस्य = जीवस्य । घटाद्यनुपादानता = घटाद्यध्यासानधिष्ठानता । घटादिदेशा- सम्बन्धात् घटादिदेशसम्बन्धाभावात् । ब्रह्मव - न तु जीव इत्यर्थः । तस्य = ब्रह्मणः। मायया उपहितः मायोपहितः, तस्य मायोपहितम्येत्यर्थः । सकलं घटादि सकलघटादि। तदन्वयित्वं तत्सम्बद्धत्वं तदनुस्यूतत्वम् तस्मात् । अत एव सकलघटादिसम्बद्धत्वादेव । सर्वज्ञता सर्वविषयकज्ञानत्वम् । अयं भावः- देहावच्छिन्नान्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यं जीवः । तस्य यथा न देहान्तरान्तःकरणान्तर- सम्बद्धत्वं तद्वत् न सादसम्बदत्वमपोति कृत्वा न तस्य घटाध्यासाधिष्ठानत्व- रूपघटाधुपादानत्वसम्. वः, इति मतेऽस्मिन् अनेकजीवाभ्युपगमके परमेश्वरस्यैव व्यापकेन मायात्मकोपाधिना समुपहितस्य व्यापकस्य घटादिव्यावहारिकप्रपञ्चो- पावानत्वम् । - अस्त्वेवं कितत आयात प्रकृते ? इत्यत आह- विषयपरिच्छेदः । २९३ तथाच - 3- तथा च जीवस्य घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्याभेदमन्तरेण घटाद्यव- भासासम्भवे प्राप्ते सदवभासाय घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्याभेदसिद्ध्यर्थं घटाद्याकारा वृत्तिरिष्यते । जीवस्यानुपादानतया ब्रह्मण एव घटाद्य पादानत्वे च । घटाद्य- धिष्ठानं यत् ब्रह्मचैतन्यं, तेन सह यो जीवस्याभेदः, तमन्तरेण तम्विना। घटादेः अवभासः प्रकाश्यता, तस्य यः असम्भवः = सम्भवनाभावः, तस्मिन् । तदवभासाय घटाद्यवभासाय । घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्याभेदसिद्ध्यर्थ घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्येन सह प्रमातृचैतन्यस्य जीवस्याभेदसिद्ध यर्थम् । वृत्तिः अन्तःकरणवृत्तिः इष्यते स्वीक्रियते । अयं मावः-इदं तावदायातं प्रकृते यत् घटादिप्रमाता जीवः अन्तःकरणपरिच्छिन्न चैतन्यरूपः। यसमानतया घट- प्रकाशकं मायावच्छिन्नचैतन्यं, तेन सह प्रमातुर्जीवस्य नास्ति सम्बन्धः, मिन्ना- वच्छादित्वात् इति घटादिप्रमातृत्वं भवति सर्वथाऽनुपपन्नं विना स्वान्तः- करणस्य घनाकार । अतः समभ्युपगन्तव्या खल्वन्तःकरणवृत्तिरिति । शङ्कते-- ननु वृत्त्यापि कथं प्रमातृचैतन्यविषयचैतन्ययोरभेदः सम्पद्यते ? घटाद्यन्तःकरणरूपोपाधिभेदेन तदवच्छिन्नचैतन्ययोरभेदासम्भवात् । % 3D अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यं प्रमातृचैतन्य । घटाधवच्छिन्नं मायावच्छिन्न- चैतन्यं विषयचैतन्यम्, तयोः । सम्पाद्यते = क्रियते । घटादिरूपः । अन्तःकरण- रूपश्च यो उपाधी तयोः भेदेन । तदवच्छिन्नचैतन्ययो: = अन्तःकरणावच्छिन्नघटा- वच्छिन्नचैतन्ययोः । अभेदासम्भवात् अभेदसम्भवाभावात् । समभ्युपगम्य- मानायामपि वृत्तौ भेदकयोरन्तःकरणघटाद्युपाध्योः तथैव वर्तमानत्वेन कथं प्रमातृ- चैतन्यस्य घटाद्यधिष्ठानभूततदवच्छिन्नमायावच्छिन्नचैतन्याभेदः? येन प्रमातुर्घटाद्यव- गतिः स्यात् इति । उत्तरयति- इति चेन्न । वृत्तेविषयदेशनिर्गमनाङ्गीकारेण वृत्त्यन्तःकरण- विषयाणां एकदेशस्थत्वेन उपधेयभेदाभावस्योक्तत्वात् ।
२६४ वेदान्तपरिभाषा। वृत्तेः = अन्तःकरणवृत्तेः । विषयदेशो घटादिप्रदेशः, तत्र यन्निर्गमन, तस्य यः अङ्गीकारः स्वीकारः, तेन । वृत्तिश्च अन्तःकरण च विषयश्च वृत्त्यन्तःकरणविषयाः, तेषाम् । एकदेशस्थत्वेन = बाह्यघटदेशस्थत्वेन । उपधेयस्य चैतन्यस्य यो भेदाभावः = अभेदः तस्य उक्तत्वात् । प्रत्यक्षपरिच्छेदे इति शेषः । अयं भाव:- सत्यं उपाधयो भिन्नाः, तद्भदात् च चैतन्यस्यापि तत्तदुपाध्यवच्छिन्नस्य भेदः । किन्तु यत्रोपाधीनामेकदेशस्थता भवति तत्रोपाधिमेदेऽपि तदेकदेशस्थता प्रयुक्तो भवति चतन्याभेदः । सति चैवमन्तःकरणस्य बहिर्घटदेशे वृत्तिनिर्गमने अन्तःकरणा- वच्छिन्नं चैतन्यं अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यं घटादिविषयावच्छिन्नचैतन्यमेक सम्पद्यते । सति च तथा घटभासकतदवच्छिन्नमायोपाधिकचैतन्येन सहाभेदसम्पत्त्या अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यरूपं जीवचंतन्यमपि भवति घटभासकतामुपेतमिति न प्रमातुर्घटप्रमातृत्वानुपपत्तिः । घटाकारवृत्त्यभ्युपगमेन वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यरूपप्रमाण- चैतन्यस्य विषयमासनक्षमस्य प्रमात्रा अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्येन समाश्रयणात् । इति। उपसंहरति- एवमपरोक्षस्थले वृत्तेर्मतभेदेन उपयोगः उपपादितः । प्रत्यक्षस्थले । वृत्तेविनियोग उपपादित इति सम्बन्धः । विनियोगः उपयोगः प्रयोजन मिति यावत् । उपपादितः युक्त्या समर्थितः। अपरोक्षस्थले - D ननु ज्ञाता जाग्रदवस्था, का नाम स्वप्नावस्था ? इत्याकांक्षायामाह- इन्द्रियाजन्यविषयगोचरापरोक्षान्तःकरणवृत्त्यवस्था स्वप्नावस्था । इन्द्रियर्न जन्यते इतीन्द्रियाजन्या, एतादृशी या अपरोक्षा = प्रत्यक्षरूपा अन्तःकरणवृत्तिः, तदवस्था - तद्विशिष्टतया स्थितिः । " ननु विषयगोचरापरोक्षान्त:करणवृत्तिरित्येतावदेवोच्यताम् कृतमिन्द्रियजन्यत्व- निवेशेन इत्याकांक्षायामाह- जाग्रदवस्था व्यावृत्त्यर्थमिन्द्रियाजन्येति । जाग्रदेवावस्था जानदवस्था, तस्याः ब्यावृत्तिः अपरिग्रहः, तत्रातिव्याप्त्यभाव इत्यर्थः तदर्थम् । अयं भावः-अपरोक्षा अन्त करणस्य वृत्तिस्तु जाग्रदृत्तिरपीति विषयपरिच्छेदः। २९५ तत्रातिव्याप्तिः स्यात् । यदि इन्द्रियाजन्यत्लनिवेशो न स्यात् । तन्निवेशे तु जाग्रदृत्तेरिन्द्रियजन्यतया इन्द्रियाजन्यत्वाभावेन न तत्रातिव्याप्तिरिति । विषय- गोचरेति स्पष्टार्थम् । विषयरहिताया वृत्तेरेवाभावात् । विषयगोचरत्वन्तु सविषयत्वम् । ननु इन्द्रियाजन्यविषयगोचरवृत्तिरित्येतावदेवोच्यताम् कृतमन्तःकरणप्रवेशेनेति शङ्कायामाह- अविद्यावृत्तिमत्यां सुषुप्तौ अतिव्याप्तिवारणयान्तःकरणे नेति । अविद्या अज्ञानं तद्विषयिणी वृत्तिः, अविद्यावृत्तिः, सा अस्ति अस्यामिति अविद्या- वृत्तिमती, तस्याम् । इदं सुपुप्तिविशेषणम् । अतिव्याप्तिवारपाय स्वप्नलक्षणाति- व्याप्तिवारणाय । अयं भावः-वेदान्तमते सुषुप्तौ अपि न वृत्तिसामान्याभावः, तवानीमज्ञानविषयकवृत्तः स्वीकारात् । अन्यथा अनन्तरं जागरणे 'गाढमहमस्वाप्स न किञ्चिदर्वेदिषम्" इति परामर्शानुपपत्तेः । सति चैवमविद्यावृत्तिमावाय सुषुप्तावतिव्याप्तिः स्यात् यदि लक्षणेऽन्तःकरणनिवेशो न स्यात् । तनिवेशे तु सुषुप्ती अविद्यावृत्तिसद्भावेऽपि अन्तःकरणवृत्तेरभावान्नातिव्याप्तिरिति । ननु अवस् थारैविध्योक्तिरसङ्गता । मरणमूर्छयोरपि तत्त्वादिति शङ्कायामाह- अत्र केचिन्मरणमूर्छयोरवस्थान्तरतामाहुः । अपरे सुषुप्तावेव तयोरन्तर्भावमाहुः । अपरे = अन्ये । अथवा न परे इत्यपरे । अस्मदीयाः इत्यर्थः । एवकारो भिन्नक्रमः । तथा चान्तर्भावमेवाहुरिति सम्बन्धः । वस्तुतस्तु नान्तर्भावः उचितः । मूर्छाविशेषे मुखादिवैकृत्ये मरणे च वृत्त्यभावेन तयोर्वेजात्यस्यैवोचितत्वात् । विषयेऽस्मिन् विचारवमुख्यहेतुमाह- तत्र तयोरवस्थात्रयान्तर्भावबहिर्भावयोः त्वम्पदार्थनिरूपणे उपयोगाभावात् न तत्र प्रयत्यते । तत्र = अवस्थाचर्चायाम् । तयोः मरणमूर्च्छयो: । अन्तर्भावश्च बहिर्भावश्च अन्तर्भावबहिर्भावौ । अवस्थात्रये अन्तर्भावबहिर्भावौ अवस्थात्रयान्तर्भावबहिर्भावौ, वेदान्तपरिभाषा। २६६ तयोः । त्वं पदस्यार्थः त्वं पदार्थः । तस्य निरूपणं बोधानुकूलो व्यापारः, तस्मिन् उपयोगाभावात् प्रयोजनाभावात् । तत्र - तनिरूपणे । न प्रयत्यते = न प्रयत्नः क्रियते । अयं भाव:-"तत्त्वमसी"ति घटकत्वमपदार्थनिरूपणमेव प्रकृतम् । अवस्थायाः त्रैविध्यं पञ्चविधत्वं वा यद्भवतु तनिर्वचनेन न कोऽपि लाभः प्रकृते जीवनिरूपणे । इति न विचार आद्रियते इति । अवस्थात्रयवान् जीवः इति प्रसङ्गेन अवस्थाविधारी विहितो मध्ये । तदवसाने पुनर्जीवमेवाभिलक्ष्य प्रोच्यते- - तस्य मायोपाधिमपेक्ष्यैकत्वम् । अन्तःकरणोपाध्यपेक्षया च नानात्वं व्यवह्रियते । . तस्य = जीवस्य । माया एव उपाधिः तम् । अपेक्ष्य अवच्छेदकत्वेन प्रतिबिम्बाधारत्वेन वा परिग्रह्य । एकत्वं अभिन्नत्यम्, व्यवलियते इति सम्बन्धः । अन्तःकरणमेवोपाधिः, तदपेक्षया--तं अवच्छेदपादन प्रतिबिम्बाधारत्वेन वा दृष्टिविषयीकृत्य । नानात्वं = बहुत्वम् । व्यवह्रियते व्यवहारविषयीक्रियते। बहवो जीवा: इति व्यवहारः क्रियते इत्यर्थः । - ननु महत एव अन्येन केनापि परिच्छेदात् । अणुहोप आत्मा इत्यादि श्रुत्या च जीवस्याणुत्वप्रतिपादनात् । कथं मायान्तःकरणाम्यां परिच्छिन्नत्वोक्तिः संगता ? इत्याकांक्षायामाह- - एतेन जीवस्याणुत्वं प्रत्युक्तम् । एतेन = अनुपदं वक्ष्यमाणश्रुतिवाक्येन । अणुत्वं तादृशपरिमाणवत्त्वम् । प्रत्युक्तं = निरस्तम् । H एतत्पदप्रतिपाचं प्रदर्शयन्नाह-- "बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव ह्याराग्रमात्रो गवरोऽपि दृष्टः' इत्यादी जीवस्य बुनिशब्दवाच्यात:करणपरिमाणोपाधिकपरिमाण- श्रवणात् ।
विषयपरिच्छेदः । २९७ तस्य य. बुद्ध गुणेन हि आराग्रमात्रो दृष्टः आत्मगुणेन हि अवरोऽपि दृष्टः इति सम्बन्ध । जीवः इति शेषः । बुद्धः गुणः मध्यमपरिमाणत्वं, तेन । हि: निश्चये। आराग्र- मात्रः आराग्रपरिमाणवान् । मध्यमपरिमाण इत्यर्थः । आत्मनः स्वस्य गुणः व्यापकत्वं तेन । न वर: श्रेष्ठ व्यापको यस्मात् असो अवरः सर्वापेक्षया व्यापक इत्यर्थः । दृष्टः ज्ञातः । बुद्धिशब्देन उच्यते इति बुद्धिशब्दवाच्यं तदेवान्त:करणम्, परिमाण: - मध्यमपरिमाणः। नदुपाधिक: तन्मूलक: यः परिमाणः, तस्याश्रयणादित्यर्थः । अयं भावः-अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य जीवः । तत्रान्तःकरण- रूपोपाधेः परिमाणं यदि बुद्धिविषयोक्रियते तहि तदुपाधिकस्य जीवस्यापि मध्यमपरिमाणत्वाम् । सावययस्यान्त:करणस्य मध्यमपरिमाणत्वात् । यदि विशेष्य- भूतस्य चैतन्यस्य परिमाणं तया बुद्धिवषयीक्रियते तदस्यापरिच्छिन्वतया व्यापकत्वात् परममहत्त्वमेवायाति न तु कदाचिदपि दृष्ट्या तस्याणुपरिमाणकत्वसम्भव इति । उपपद्यते चैवम्, अन्यथा तस्य परमाणुकल्पस्य शरीराव्यापित्वेन शरीरव्यापिसुखाद्य- नुपलब्धिप्रसङ्गः। "जीवो नाणु." प्रत्यक्षत्वादित्यनुमानेन अणुत्वस्य तत्र बाधित- त्वाच्च । ननु तर्हि तस्यानित्यत्वापत्तिः । बुद्ध्यनित्यत्वमूलकानित्यत्वस्य स्वीकारे बाधकाभावात् । ननु तर्हि जीवो न स्वयम्प्रकाशः मध्यमपरिमाणत्वात् घटादिवत् इत्यनुमानेन तस्य स्वयम्प्रकाशत्वव्याघात: ? इत्याशङ्कायामाह- स च जीवः स्वयम्प्रकाशः। स्वप्नावस्थामधिकृत्य "अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योति" रिति श्रुतेः । स्वयं प्रकाशः = न प्रकाशस्सन् प्रकाश इत्यर्थः । अधिकृत्य - उद्दिश्य । स्वप्ने । पुरि शरीरादी शेते इति पुरुषः - आत्मा। स्वयंज्योति:= स्वयम्प्रकाशः । श्रुतेः = श्रवणात् । अयं भावः-प्रोक्तानुमानस्य एतदागमबाधि. तत्त्वेन अनुमानाभासतया न ततः स्वप्रकाशत्वनिराकरणावकाशः इति । अपरोक्षतामुपपादयति- अनुभवश्च । प्रज्ञानधन एवेति श्रुतेः । अनुभवः = साक्षात्कारः । तथा च साक्षात्काररूप इत्यर्थः । प्रज्ञानघन: - प्रज्ञानबहुल: । प्रज्ञानात्मा इत्यर्थः । प्रकृष्टज्ञानतया अपरोक्षानुभव एव हि प्रज्ञान- पदवाच्यम्। अत्र- - २९८ वेदान्तपरिभाषा। ननु अनुभवस्वरूपत्वे तस्य अनुभवामीति अनुभवाश्रयत्वविषयकानुभव. कथमुप- पद्यताम् ? इत्याकांक्षायामाह- अनुभवामीति व्यवहारस्तु वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्यमादायोपपद्यते । वृत्ती अन्तःकरणपरिणामे । प्रतिबिम्बितं = प्रकल्पितं यच्चैतन्यं तदादाय । उपपद्यते युज्यते । अयं माव:- अन्तःकरणावच्छिन्नं तत्प्रतिबिम्बितं बा चैतन्यं जीवः, न तु अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नं तत्प्रतिफलितं वा चैतन्यं जीवः । तथा च तयो देन वृत्तिप्रतिफलितचैतन्यमनुभवपदेनादाय अनुभवामीति व्यवहारोऽपि सुसम्पाद इति। तत्त्वमसीति घटक तत् स्वं पदाथों निरूप्य वाक्यार्थ प्रतिपादयितु प्रतिजानीते- - एवं त्वं पदार्थों निरूपितः अधुना तत् त्वंपदार्थयोरैक्यं महावाक्य- प्रतिपाद्यमभिधीयते। एवं = उक्तप्रकारेण । त्वं पदार्थः = जीव: । निरूपितः बोधानुकूलव्यापार- विषयीकृतः । बोधित इति यावत् । तत्पदार्थो ब्रह्मचैतन्यं, त्वं पदार्थों जीवचैतन्यं तयोः ऐक्यं अभेदः । महावाक्येन तत्त्वमसीत्यनेन प्रतिपाद्यते = बोध्यते इति महा- वाक्यप्रतिपाद्यम् । इदं ऐक्यमित्यस्य विशेषणम् । जीवब्रह्मणोरभेदज्ञानान्मुक्तिरिति श्रीतसिद्धान्तः। तच्चैक्यं तत्त्वमस्यादिवाक्यप्रतिपाद्यम् । महावाक्यार्थबोधश्च वाक्य- घटकपदार्थबोधं विना न सम्भवतीत्यतः प्रथमं तत्पदार्थ त्वं पदार्थं च विस्तारण प्रतिपाद्य इदानी साकाक्षपदसमुदायरूपस्य वाक्यस्य प्रतिपाद्योऽर्थः क इति प्रदर्श- नीयमिति तदर्थं प्रयत्यते इति भावः । भेदवादी शकते- ननु नाहमीश्वरः इत्यादिप्रत्यक्षेण किञ्चिज्ज्ञत्वसर्वज्ञत्वादि- लिङ्गेन द्वा सुपर्णोति श्रुत्या द्वाविमौ पुरुषी लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
विषयपरिच्छेदः। इत्यादि स्मृत्या च जीवपरभेदस्यावगतत्वेन तत्त्वमस्यादिवाक्यं "आदित्यो यूपः" "यजमानः प्रस्तरः" इत्यादिवाक्यवदुपचरितार्थ- मेवेति । किञ्चिज्ञत्वं अल्पजत्वम् । सर्वज्ञत्वं विशिष्यसकलपदार्थज्ञान- वत्त्वम् । आदिपदेन मायोपाधिकत्वान्तःकरणोपाधिकत्वादिपरिग्रहः । तदादयो ये विरुद्धा धर्माः, तदाश्रयत्वरुपं यल्लिंग तेन । जीव ईश्वरभिन्नः अल्पज्ञत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा घट. इत्याद्यनुमानेन इत्यर्थः । द्वा सुपर्णा इत्यादि श्रुतिः="द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानवृक्ष परिपष्वजाते । एकस्तयोः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- न्योऽनश्नन्नभिचाकशीति" इति श्रुतिः तया । सुपर्णाविव सुपणों न तु तत्त्वतः सुपणौं । सयुजी सहयोगमुपेती सखायौ सख्यभावापन्नौ । समानः एको वृक्षः, वृक्ष इव वृक्षः, न तु तत्त्वत : स्थानम् । परिपप्वजाते आश्रयं कुर्वतः । पिप्पलं फलम् । अनश्नन् - अभक्षयन् । अभिचकाशीति पश्यति । पुरुषो आत्मानौ । जीवश्च परश्च जीवपरी, तयोर्मेंदः तस्य । अवगतत्वेन = ज्ञातत्वेन । तत्त्वमस्यादिवाक्यमुपचरितार्थमेवेति सम्बन्धः। यदि जीवब्रह्मणोः स्यादेक्यम् कथं प्रतिपादयेत् भगवती श्रुतिः स्पष्टं तयोर्भवम् । कथं बोपपन्ना भवेत् भगवतः कृष्णस्य "द्वाविमो पुरुषों" इत्यात्मद्वित्वप्रतिपादिका स्मृतिः ? कथं वा भवेत् "जीवः परमेश्वरमिन्नः अल्पज्ञत्वात्" "परमेश्वरो जीवभिन्नः सर्वज्ञत्वात्" इत्याद्य- नुमानं हेत्वाभासशून्यम् ? तस्मात् द्वयोमॅद एव मन्तव्यो नामेदः । न च तर्हि तत्त्वमसीति श्रुतेः का गतिरिति वाच्यम् । तस्य यजमानः प्रस्तर इत्यादिवत् उप- चरितार्थतासम्मवात् । न खलु “यजमानः प्रस्तर" इत्यस्यापि शक्यमनुपचरितार्थत्वं वक्तम्, तयोर्मेदस्य पांशुलपादहोलिकरपि प्रत्यक्षतो ग्रहणात् । तथा च यया यजमानः प्रस्तर इत्यत्र निश्चिततया यजमानः प्रस्तर इवेति तवर्थः तथा तक्तानानना सर्वकर्मदाहे निर्दु:खत्वेन त्वमपि तत्तल्यः स्याः इत्यत्रव तस्वमसीति वाक्यस्य तात्पर्य- मिति । उत्तरयति- इति चेन्न। भेदप्रत्यक्षस्य सम्भावितकरणदोषस्यासम्भावितदोष- वेदजन्यज्ञानेन बाध्यमानत्वात् । अन्यथा चन्द्रगताधिकपरिमाण- ग्राहिज्योतिश्शास्त्रस्य चन्द्रप्रादेशिकप्रत्यक्षेण बाधापत्तेः ।
वेदान्तपरिभाषा। - भेदप्रत्यक्ष नाहं परमेश्वर इति प्रत्यक्षम्, तस्य । सम्भावितः करणदोषो यत्र असौ सम्भावितकरणदोषः, तस्य । दुष्टकरणजन्यत्वप्रकारकसन्देहविशेष्यस्येति तदर्थः । दुष्टत्वं च करणे दोषसहकृतत्वम् न सम्भावितो दोषो यत्र असो असम्भावितदोषः, एवादृशो यो वेदः, तज्जन्यं तज्ज्ञानम् तेन । अन्यथा = प्रत्यक्ष- सामान्येन प्रमाणान्तरबाधे। शास्त्रस्य बाधापत्तेरिति सम्बन्धः । अयमाशय:: प्रत्यक्षप्रमाणान्तरयोः विरुद्धार्थज्ञापकत्वस्थले प्रत्यक्षसामान्ये न प्रमाणान्तरार्थबावो भवदभिप्रेत:, अदुष्टकारणजन्यप्रत्यक्षेण वा ? आद्य प्रदेशपरिणामित्वख्यापकेन प्रत्यक्षेण ज्योतिश्शास्त्रप्रतिपादितस्य महत्परिमाणविशेषस्य बावितत्त्वं स्यात् । प्रवलेन प्रत्यक्षेण प्रादेशिकत्वस्यैव ग्रहणात् । द्वितीये नास्माकमनिष्टम् चन्द्रप्रत्यक्ष- स्थले दूरत्वस्येव प्रकृतेऽप्यज्ञानदोषस्य विद्यमानतया दोषसहकृतकरणजन्यत्वेन तस्य श्रौतनिश्चयविषयक्यबाधकत्वायोग इति । समाध्यन्तरमाह- - पाकरक्ते घटे "घटो रक्तोऽयं न श्यामः" इतिवत् "स विशेषणे हि" इति न्यायेन जीवपरभेदनाहिप्रत्यक्षस्य विशेषणीभूतधर्मभेदविषय- त्वाच्च । . विशेषणीभूतौ यो धमौं, तयोर्यो भेदः, तद्विषयत्वादित्यर्थः । अयं भावः क्वचित् धर्मयोर्भेदमादायापि सविशेषणयोधर्मिणो दो व्यवह्रियते लोके । यथा हि पूर्व श्यामरूपविशिष्टस्य घटस्य पाकेन रक्ततां गतस्य धर्मिणोऽभेदेऽपि श्यामरक्तरूपयोः गुणयोरेव भेदमादाय भवति खलु "रक्तो घटोऽयं न श्याम" इति धर्मिभूतघटभेदविषयक: प्रत्ययो लोकानाम् । तथा प्रकृतेऽपि धर्मिणः आत्मन ऐकत्वेऽपि धर्मयोः अल्पज्ञत्वसर्वज्ञत्वाद्योः भेदमादाय तन्मूलक: "नाहं परमेश्वर" इति तद्विशिष्टात्मभेदावगाही भवितुमर्हति प्रत्ययो लौकिकानाम् । न ततः किन्तु तत्त्वतः आत्मभेदसिद्धिसम्भव इति । - अनुमानप्राप्तबाघ निषेधति- अत एव च नानुमानमपि प्रमाणम् । आगमबाधात् । मेरुपाषाण- मयत्वानुमानवत् ।
विषयपरिच्छेदः । । अत एव = जीवब्रह्मणोरक्यादेव । आगमः शब्दप्रमाणं तेन बाधः आगमबाध: तस्मात् । मेरुपाषाणमयत्वानुमानवत् आगमबाधात् इति सम्बन्धः । मेरौ पाषाण- मयत्ववत् अनुमानं तद्वत् । अयं भावः-सुमेरु: पापाणमयः पर्वतत्वात् विन्ध्यवत् इत्यनुमानं यथा सुमेरौ सुवर्णत्वस्यापकशास्त्रेण बाधितत्वादप्रमाण तथा "एकमेवाद्वितीयं नेह नानास्ति किञ्चन्" इत्यादि श्रुत्या प्रदर्शितस्याल्पज्ञत्वादि- हेतुकानुमानस्यापि बाधितत्वेनानुमानाभासतया न भेदसाधकत्वमिति । नन्वेवमपि प्रोक्तश्रुतिस्मृतिविरोधः कथ परिहरणीयः? इत्याशङ्कायामाह- नाप्यागमान्तरविरोधः । तत्परातत्परवाक्ययोः तत्परवाक्यस्य बलवत्त्वेन लोक सिद्धभेदानुवादि "द्वा सुपर्णे"त्यादि वाक्यापेक्षया उप- क्रमोपसंहाराद्यवगताद्वैततात्पर्यविशिष्टस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यस्य प्रबल- त्वात् । S अन्यः आगमः आगमान्तरं, ततो विरोध: आगमान्तरविरोधः । तत्परं - तात्पर्यवत् । अतत्परं = तात्पर्याभाववत् । तादृशे वाक्ये तत्परातत्परवाक्ये, तयोः। इदं सप्तमीद्विवचनान्तपदम् । तत्परवाक्यस्य = तात्पर्यवतो वाक्यस्य । बलवत्त्वेन अर्थप्रतिपादनसामर्थ्याधिक्येन । लोकसिद्ध आपामरबुद्धिविषयं, भेदं अनुवदति पश्चात्प्रतिपादयतीति लोकसिद्धभेदानुवादि । तादृशं यत् द्वा सुपर्णेति वाक्यं तदपेक्षया तमवधीकृत्य । उपक्रमश्च उपसंहारश्च उपक्रमोप- संहारी, तौ आदिर्येषां ते उपक्रमोपसंहारादयः, तैः अवगतं ज्ञातं यत् अद्वैत- तात्पर्यम्, तद्विशिष्टस्य, तादृशतात्पर्यवतः । तात्पर्य च तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वम् । प्रथमादिपदेन अभ्यासापूर्वताफलार्थवादोपपत्तीनां ग्रहणम् । प्रबलत्वात् स्वार्थ- प्रतिपादनसामर्थ्याधिक्यात् । अयं माव:-यत्र विरार्थकवाक्यप्रतिपादकयोः वाक्ययोः प्राप्तिः तत्र उपक्रमोपसंहारादिनिर्णीततात्पर्यवत् वाक्यं भवति सबलम्, अन्यखुर्बल- मिति सिद्धान्तः । सति चैवं भेदाभेवयोः प्राप्तौ श्रुतिषु अद्वैतोपक्रमोपसंहारादि- वर्शनेन तनिर्णीततात्पर्यकतया, तत्त्वमसीति वाक्यं भवति प्रबलम् । अन्यच्च द्वा सुपर्णेति वाक्यं तादृशतात्पर्याभाववत्वेन भवति दुर्बलमिति प्रबलेन दुर्बलबाषस्य सर्वानुभवसिद्धतया, तत्त्वमसीत्यनेन जीवब्राह्मणोरक्यस्यैव सिद्धिः । न तु द्वा सुपण- त्यादिना तयोर्भवस्य । तत्त्वतस्तु अशातापकस्यैव वाक्यस्य प्रामाण्याभ्युपगमार प्रमाणान्तरगृहीतानुवादिनस्तु प्रामाण्यानम्युपगमात् लोकसिवस्येव भेवस्य ३०२ वेदान्तपरिभापा । ख्यापकतया अज्ञातज्ञापकत्वाभावेन द्वा सुपर्णेति वाक्यस्य प्रामाण्यमेव नास्ति । प्राचायाया वास्ता दूरे। सति चैवं न ततो द्वैतसिद्धिसम्भव इति । परोद्भावितां शङ्कां निरस्यति- न च जीवपरैक्ये विरुद्धधर्माश्रयत्वानुपपत्तिः । शीतस्यैव जलस्यो- पाधिकोष्ण्याश्रयत्ववत् स्वभावतो निर्गुणस्यैवान्तःकरणाधुपाधिककर्तृ- त्वाद्याश्रयत्वं प्रतिभासोपात्तेः । यदि च जलादौ औष्ण्यमागेपितं तदा प्रकृतेऽपि तुल्यम् । न चानुपपत्तिरिति सम्बन्धः । जीवश्च परश्चेति जीवपरौ जीवपरमेश्वरी तयोः ऐक्यं अभेदः तस्मिन् । विरुद्धौ धमौं सर्वज्ञत्वाल्पज्ञत्वे, तयो. यत् आश्रयत्वं तस्यानुपपत्तिः - अभावप्रसंगः । औपाधिकं - अग्न्यादिसंयोगकृत यत् औपण्या- श्रयत्वं = उष्णस्पर्शसम्बन्धित्वं, तद्ववत् । अन्तःकरणादिरेवोपाधिः, तत्कं सन्मूलकं यत् कर्तृत्वाद्याश्रयत्वं = कर्तृत्वभोक्तृत्वादिसम्बन्धित्वं, तस्य यः प्रति- अनिवर्चनीयख्यातिः, तदुपपत्तिः तत्सम्भवः, तस्मात् । औषण्यं उष्णस्पर्शः। आरोपितं तूलाविद्यापरिणामतया प्रातीतिकम् । प्रकृतेऽपि तुल्यम् एकस्मिन्ना- त्मनि सर्वज्ञत्वकिञ्चिज्ञत्वादिकमपि तथैवाविद्यक, प्रातीतिकम् । अयं भावः- यथा स्वतः शोतलेऽपि जले अन्यादतेजस्तयोगेन औष्ण्यं भवदपि न स्वामाविक भवति, तथा आत्मनः किञ्चिज्ज्ञत्वसर्वज्ञत्वादिकमपि न स्वाभाविकम्, अपितु अन्तःकरणायुपविसम्पर्काविति । इदं धर्माणां व्यावहारिकत्वममिलक्ष्य । आत्मधर्मत्वेन ज्ञायमानाः सर्वज्ञत्वकिञ्चिज्ञत्वादयो न तात्त्विका इति । पुनरन्यां शङ्कां निराकरोति- न च सिद्धान्ते कर्तृत्वस्य क्वचिदप्यभावात् आरोप्यप्रमाहित- संस्काराभावे कथमारोप इति वाच्यम् । लाघवेनारोप्यविषयसंस्कारत्वे- नैव तस्य हेतुत्वात् । म चेति वाच्यमिति परेणान्वयः । आरोप्यस्य - प्रातीतिकजातीयस्य या प्रमा पूर्ववत्ति यथार्थज्ञानम्, तदाहितः - तेनोत्पादितो यः संस्कारः भावना, तस्य यः विषयपरिच्छेदः। ३०३ अभावः तस्मिन् । लाघवेन = शरीरकृतेन लघुत्वेन । आरोप्य तज्जातीयो विषयो यस्य सस्कारस्य स आरोप्यविषयसंस्कारः, तत्त्वेन। तस्य == संस्कारस्य। हेतुत्वात् = कारकत्वात् । अयं भावः-जवायां प्रमितारुण्यस्यैव जनस्य स्फटिके आरुण्यारोपदर्शनेन आत्मनि किञ्चिज्जत्वादीनामारोपार्थ पूर्व कुत्रापि तत्त्रमा अपेक्षिता । प्रमा च वास्तविकविषयिणी भवतीति कुत्रापि तादृशस्य धर्मस्य वास्तविकत्वं स्वीकरणीयमिति तात्त्विककिञ्चिज्ञानजीवस्वीकारात् अकामेनापि जीवपरमेव अभ्युपगन्तव्य इति न वाच्यम् । यतः आरोपात् पूर्व संस्कारार्थ- मारोप्यजातीयस्य ज्ञानेन भवितव्यम् इत्येव नियमः न तु प्रमात्मकेनैव तेन भवितव्यमिति । तथा च पूर्वपूर्वारोपवासनातोऽपि परं परं तत्तद्धर्मारोपसम्मवेन ताविककर्तृ किञ्चिज्ञादिजीवाभ्युपगमप्रयोजनाभावेन द्वैतापत्त्यभावात् जीव- ब्रह्मामेदाबाधात् । शरीरकृतलाघवात् आरोप्यजातीयज्ञानजन्य-ar: आरोपहेतुः इत्येव कार्यकारणभावः । न तु आरोप्यप्रमाहितसस्कारः आरोपहेतुरिति । आरोपे प्राथम्यमारोप्य क्रियमाणां शंका निषेधति- न च प्राथमिकारोपे का गतिः । कर्तृत्वाद्यध्यासप्रवाहस्याना- दित्वात् । का गतिरिति न चेति सम्बन्धः । कर्तृत्वादेरध्यासः आरोपः, तस्य प्रवाहः = ऋमिकोत्पादसमूहः, तस्य । अनादित्वात् प्रागभावाप्रतियोगित्वात् । भविष्यत्वा- भावादिति यावत् । अयं भावः-द्वितीयारोपावेः प्रथमारोपजसंस्कारपूर्वकत्वसम्म- वेऽपि सर्वप्रथमकर्तृत्वारोपस्थले ततः पूर्व तत्सस्कारोत्पावार्थ प्रथमारोप्यकर्तृत्वादि- ज्ञानस्य यायायं दुरपलपमिति तद्विषयस्यावास्तवस्यवाभ्युपेयतया भोज्यभोक्यो- रक्यासम्मवेन कयं योरमिन्नत्वमिति नाशकुनीयम् । संसारस्यानादितया आरोपे प्रायम्यस्यैवानभ्युपगमात् । नन्वेवमपि तत्त्वमसीत्यत्र तत्पदवाच्यस्य सर्वज्ञत्वविशिष्टस्य परमेश्वरस्य त्वं पदवाच्यात् किञ्चिज्ज्ञत्वविशिष्टात् जीवात् भेदस्यावश्यकत्वेनाभेदः कथं स्यात् इत्याशंकां विस्मृतिकृतां पूर्वोक्तं स्मारय निराकरोति- तत्र त्वं पदवाच्ययोविशिष्टयोरक्यायोगेऽपि लक्ष्यस्वरूपयोरैक्य- मुपपादितमेव । अत एव तत्प्रतिपादकतत्त्वमस्यादिवाक्यानामखण्डार्थत्वं सोऽयमिति वाक्यवत् ।
३०४ वेदान्तपरिभाषा। तत्र = तत्त्वमसीति वाक्ये । विशिष्टयो सर्वज्ञत्वाल्पज्ञत्वविशिष्टयोः । ऐक्यस्य अभेदस्य। अयोगः = अभावः। तस्मिन् । लक्ष्यस्वरूपयोः । भागत्यागलक्षणा- धीनोपस्थितिविषययो. । चैतन्यमात्रयोरिति यावत् । ऐक्य = अभेदः । उपपादित- मेव = प्रतिपादितमेव। आगमपरिच्छेदे इति शेषः । अत एव चैतन्य- योरक्यप्रतिपादनादेव अखण्डार्थत्व - निर्विकल्पकधीजनकत्वम् । यथा च सोऽयं देवदत्त इत्यादेः वाक्यस्य अखण्डार्थत्वम् यथा च तादाम्यभानेऽपि नोक्तवाक्यजज्ञानस्य सविकल्पकत्वं तत्सर्व प्रपञ्चितमेव पूर्वमिति नात्र पुनः प्रयास: । ग्रन्थकृता इह तदादिक स्मारितमेवेति । नाम् । प्रामाण्यं - - लिङ लोट्तव्यप्रत्ययादिकार्यतावाचकपदविघुराद्वाक्यात् बोध एव न भवतीति कथं तत्त्वमसीति वाक्यादर्थबोध: ? इत्याशंकामपि निराकरोति न च कार्यपराणामेव प्रामाण्यं चैत्र पुत्रस्ते जातः इत्यादी सिद्धेऽपि संगतिगृहात् । न च प्रामाण्यमिति सम्बन्धः । कार्यपराणां विधिनिषेधादिपराणाम् । एव = नान्येषाम् = "नित्यं विज्ञानामानन्दं ब्रह्म" "तत्त्वमसि' इत्यादीनामतथाभूता- प्रमात्मकबोधजनकत्वम् । चैत्रेति सम्बोधनपदम् । सिद्धेऽपि विधिनिषेधादिबोधकपदाघटितेऽपि । संगतिग्रहात् शाब्दबोधात् । अयं भावः- विधिनिषेधाप्रतिपादकतया वेदान्तवाक्यानां बोधकत्वमेव न, कुत अखण्डब्रह्म- बोधकत्वरूपमखण्डार्थत्वमिति नाशनीयम् । "ववाहस्तः पुरन्दरः" "चैत्र पुत्रस्ते जातः" इत्याविवाक्यात् बोधस्य सर्वानुभवसिद्धतया, तद्वत् तत्त्वमस्यादिवाक्याना- मपि तथामावसम्भवात् । "चत्र पुत्रस्ते जातः" इत्यादावपि बोवो न भवतीति कथनं तु दुस्साहसमेव स्यात् । मुखप्रसाक्मुखमालिन्यादिजनकबोषजनकत्वेन तावृश- शब्दस्य परीक्षकग्रहणात् इति । उपसंहरति- एवं सर्वप्रमाणाविरुद्धं श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणालिपाद्यं जीव- परयोरैक्यं वेदान्तशास्त्रस्य विषय इति सिद्धम् । एवं = पूर्वोक्तप्रकारेण । सर्वप्रमाणः अविरुद्ध सर्वप्रमाणाविरुद्धम् । केनापि प्रमाणेनावाधितमित्यर्थः । श्रुतयश्च स्मृतयश्च इतिहासाश्च पुराणानि च श्रुति- विषयपरिच्छेदः। ३०५ स्मृतीतिहासपुराणानि, तेषां प्रतिपाद्य = तावज्जन्यप्रतीतिविषयम् । इदमैक्य- विशेषणम् । वेदान्तशास्त्रस्य = शारीरिकसूत्रशाङ्करभाप्यादेः। विषयः = प्रति- पाद्यम् । इदं जीवब्रह्म क्यं नैकप्रमाणगम्यम् अपि तु श्रुतिस्मृत्यादिनिखिलशब्द- प्रमाणगम्यम् । तदेव समग्रस्य वेदान्तशास्त्रस्य प्रतिपाद्यविषय इति भावः । इति विषयपरिच्छेदभगवती ।
वेदान्तपरिभाषा प्रयोजनपरिच्छेद-भगवती - समीक्षकाणां ब्रह्मावगमप्रवृत्तये प्रयोजनं वर्णयितुं प्रतिजानीते- इदानी प्रयोजनं निरूप्यते। - ब्रह्मज्ञानफलम् । निरूप्यते इदानी - विषयनिरूपणानन्तरम् । प्रयोजनं बोधानुकूलव्यापारविषयीक्रियते । - प्रयोजनलक्षणमाह- यदवगतं सत् स्ववृत्तितयेष्यते तत् प्रयोजनम् । स्वस्मिन् वृत्तिता = सम्बन्धो यस्य तत् स्ववृत्ति । तस्य भावस्तत्ता, तया - स्वीयतयेत्यर्थः । इष्यते = "इदं मम भवतु" इतीच्छाविषयीक्रियते । यद्यपि "यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्" इति पारमर्ष सूत्रम् । तथापि प्रवृत्तिप्रवेशो नातिप्रयोजनक इत्यभिप्रायः। “अवगतं सत्" इत्यपि वस्तुस्थितिज्ञापनमात्रम् । तदभावे इष्यमाणतायाः स्वत एवासम्भवेन लक्षणेतन्निवेशस्य वैयर्थ्यात् । विभजते- -- तद्विविधम् मुख्यं गौणञ्चेति । तत्र सुखदुःखाभावी मुख्यप्रयोजने । तदन्यतरसाधनं गौणप्रयोजनम् । तत् प्रयोजनम् । द्विविधम् = द्विप्रकारम् । मुख्यं = अन्येच्छानधीनेच्छा- विषयम् । तत्र - मुख्यगौणयोः। सुखं च दुःखाभावश्च सुखदुःखाभावो । मुख्य- प्रयोजने = इतरेच्छानधीनेच्छाविषयौ । तयोः अन्यतरस्य साधनं = साधक तदन्यतरसाधनम् । गौणप्रयोजनम् = इतरेच्छाधीनेच्छा विषयः। अयं भाव:- सुखदुःखाभावयोः चरमप्रयोजनस्वेन, तविच्या नान्यस्येच्छाया अधीना, अपि तु स्वतन्त्रव । अतः अन्येच्छानीनेच्यापपतया तस्य मुख्यप्रयोजनत्वम् । तदुपाय- भूतानामन्येषां यागब्रह्मज्ञानादीनां तु स्वर्गापवर्गेच्छाधीनेच्याविषयता गौण- प्रयोजनत्वम् । उपायेच्या प्रतिफलेच्छायाः अन्वयव्यतिरेकसिद्धकारणताशालित्वात् न खलु स्वर्गादिकमनिच्छन् जनः कदापीच्छति यागादिकम् । स्वर्गापवर्गों अन्यदेव प्रयोजनपरिच्छेदः। ३०७ वा किञ्चिदिच्छन्नेवेच्छतोति सर्वानुभवसिद्धम् । अतः स्वर्गादः मुख्यप्रयोजनत्वं यागादेस्तु गौणप्रयोजनत्वम् । - मुखप्रयोजनान्तःपातिनं सुखमपि विभजते प्रपञ्चति च- सुखं तु द्विविधं सातिशयं निरतिशयं चेति । तत्र सातिशयं सुखं विषयानुषङ्गजनितान्तःकरणवृत्तितारतम्यकृतानन्दलेशाविर्भावविशेषः । एतस्करन्दरमायाले भूतानि मात्रामुपजीवन्तीति श्रुतेः । सातिशयं ब्रह्मभिन्न सत् इष्यमाणम् । विषयानुषङ्गो विषयेन्द्रियसम्बन्धः तज्जनिता या अन्तःकरणवृत्तिः, तत्र यत् तारतम्यं, = अतिशयः, तत्कृतो यः आनन्दलेशस्य, = आनन्दांशस्य, आविर्भावविशेपः = प्रकाशनम् । एतस्य = आत्मरूपस्य । एवकारो भिन्नक्रमः। तथा च एतस्यानन्दस्यैवेति सम्बन्धः । मात्रां लेशम् । अयमभिप्रायः-आनुकूल्येन विषयसम्बर सति या काचनान्त:- करणवृत्तिरदेति, तया अवच्छिन्नः तत्र प्रतिबिम्बितो वा यः आनन्दरूपात्मांशः, तमेवदाय "वयं सुखिनः" इति लौकिकाः प्रतियन्ति । वृत्तिगतातिशयेन च तत्रापि "अल्पं सुखम्" "महत्सुखम्" इत्याधतिशयमान सम्पद्यते इति । निरतिशयं सुखमाह- निरतिशयं सुखं ब्रह्मव । “आनन्दो ब्रह्मेति व्यंजानात्" इति श्रुतिः। निरतिशयं = पराकाष्ठां प्राप्तम् । ब्रह्म = आत्मा। एवकारः अन्ययोग- व्यवच्छेदे । तथा च विषयो वा, अन्तःकरणवृत्तिर्वा, तदवच्छिन्न, तत्प्रतिबिम्बो वा न निरतिशयसुखमित्युक्त भवति । नन्वादौ मोक्ष एव परमपुरुषार्थ इति प्रतिपादितम्, इदानीमात्मा निरतिशय- तया परमप्रयोजनमित्युच्यते । तत्कथं संगतम् ? इत्याशंकायामाह- वेदान्तपरिभाषा। । आनन्दात्मकब्रह्मावाप्तिश्च मोक्षः। शोकनिवृत्तिश्च । "ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति" "तरति शोकमात्मवित्" इत्यादिश्रुतेः । आनन्द एवात्मा स्वरूपं यस्य तत् आनन्दात्मकम्, तादृशं यद् ब्रह्म = आत्मा, तदवाप्तिः =3 तत्प्राप्तिः। शोकः = अज्ञानं = अविद्या, तन्निवृत्तिः । तन्नाश इत्यर्थः । अत्र च द्वयेन अविद्यानिवृत्त्युपलक्षित आत्मा मोक्ष इति प्रतिपादितम् । ब्रह्म वेदेति श्रुत्या मोक्षस्य आत्मरूपता, "तरित शोकमिति श्रुत्या च शोकसन्त- रणात्मिका विद्या निवृत्तिरूपता प्रतिपादिता। अतः अविद्यानिवृत्त्युपलक्षितात्म- रूपता प्रतिपादिता भवति मोक्षस्य । तस्य केवलात्मरूपत्वे बद्धमुक्तयोरविशेषापत्तिः अतः शोकनिवृत्तिरपि वाच्या। केवलं शोकनिवृत्तिरूपत्वे अनित्यत्वापत्तिशङ्का "ब्रह्मवेदेति" श्रुतिविरोधश्चेति आत्मरूपत्वोक्तिरिति । ननु स्वर्गब्रह्मलोकाद्यवाप्तिरेव मोक्षोऽस्तु इत्याशङ्कामपाकरोति- न तु लोकान्तरावाप्तिः। तज्जन्यवैषयिकानन्दो वा मोक्षः । तस्य कृतकत्वेनानित्यत्वे मुक्तस्य पुनरावृत्त्यापत्तेः । अन्यो लोकः लोकान्तर, स्वर्गब्रह्मादिलोकः, तदवाप्तिः = तत्र गमनम् । तया लोकान्तरावाप्तया जन्यते उत्पद्यते इति तज्जन्यः । तादृशो यो वैषयिकानन्दः विषयसम्पर्कजनितान्त:करणवृत्तितारतम्यकृतानन्दलेशाविर्भावः । न तु मोक्ष इति सम्बन्धः । तस्य - लोकान्तरस्य वैषयिकानन्दस्य च । कृतकत्वेन = जन्यत्वेन । अनित्वे = विनाशित्वे । पुनरावृत्तिः = पुनस्संसारः । - शङ्कते- ननु त्वन्मतेऽपि आनन्दावापोः अनर्थनिवृत्तेश्च सादित्वे तुल्यो दोषः । अनादित्वे मोक्षमुद्दिश्य श्रवणादौ प्रवृत्त्यनुपपत्तिः । त्वन्मतेऽपि - वेदान्तिमतेऽपि । अनर्थः = अज्ञानं, तस्य निवृत्तिः, अनर्थ- निवृत्तिः, तस्याः । सादित्वे कादाचित्कत्वे । तुल्यो दोषः - समाना पुनः संसारा- पत्तिः । अनादित्वे = सार्वदिकत्वे । श्रवणादौ आत्मश्रवणमनननिदिध्यासनेषु । प्रवृत्त्यनुपपत्तिः = प्रवृत्तिवेयर्थ्यम् । अयं भावः-आनन्वावप्तिर्वा भवत अज्ञान- प्रयोजनपरिच्छेदः ३०४ निवृत्तिरेव वा भवतु मोक्षः, तस्य साध्यत्वमिष्यते वा न वा? इष्यते चेत्, सावित्वेनजन्यतया तन्नाशेनापि भवितव्यम् । एवं च तादृशमोक्षनाशानन्तरं पुनस्संसारापत्तिस्तव मतेऽपि दुर्वारा । नेष्यते चेत् साध्यत्वम्, तहि तस्य नित्यतया कारणानपगमेन "श्रोतव्यो मन्तव्य" इत्यावित्रयोदश्यमानः श्रवणादिप्रवृत्ति- भवति व्यथेति कथं त्वन्मतसाधीयस्त्वमिति । उत्तरयति- इति चेन्न । सिद्धस्यैव ब्रह्मरूपस्य मोक्षस्यासिद्धत्वभ्रमेण तत्साधने प्रवृत्त्युपपत्तेः । अनर्थनिवृत्तिरप्यधिष्ठानरूपतया सिद्धैव । सिद्धस्यैव असाध्यस्यैव । ब्रह्मस्वरूपस्य = ब्रह्मात्मकस्य । असिद्धत्वस्य साध्यत्वस्य भ्रमः, असिद्धत्वभ्रमः, तेन । तत्साधने = मोक्षसाधके श्रवणमननादौ । प्रवृत्त्युपपतेः प्रवृत्तिसम्भवात् । अनर्थनिवृत्तिः = अज्ञाननिवृत्तिरूपो मोक्षः । अधिष्ठानरूपतया। सिद्धव असाध्यैव । अयं भावः-यद्यपि आत्मनोऽपि न साध्यता, तस्य कूटस्थनित्यत्वात् । एवं अज्ञाननिवृत्तेरपि न साध्यता, कल्पित- वस्तुनाशस्य अधिष्ठानमात्ररूपतया आत्मनिष्ठाया अविद्यानिवृत्तेः असाध्यात्म- रूपत्वात् । तथापि अज्ञानां तत्र साध्यताभ्रमेण, तत्साधकत्वप्रकारकभ्रमविशेष्येषु श्रवणमननाविषु प्रवृत्तिसम्भव इति । उक्तमर्थ लौकिकेन दृष्टान्तेन स्फुटयितुमाह- लोकेऽपि प्राप्तप्राप्तिपरिहृतपरिहारयोः प्रयोजनत्वं दृष्टमेव । यथा हस्तगतविस्मृतसुवर्णः पुरुषः, तव हस्ते सुवर्णमित्याप्तोपदेशात् अप्राप्तमिव प्राप्नोति । यथा वलयितचरणायां लजि सर्पत्वभ्रमवतः नायं सर्प इत्याप्तवासात् परिहृतस्यैव सर्पस्य परिहारः । एवं प्राप्त- स्यानन्दस्य प्राप्तिः परिहृतस्याप्यनर्थस्य निवृत्तिर्मोक्षः प्रयोजनं च । प्राप्तस्य प्राप्तिः प्राप्तप्राप्तिः परिहृतस्य परिहारः परिहृतपरिहारः, तयोः । प्रयोजकत्वं फलत्वम् । दृष्टमेव ज्ञातमेव । हस्तगतमपि विस्मृतं सुवर्ण यस्यासी हस्तगतविस्मृतसुवर्णः । इति = इत्याकारको यः उपदेशः तस्मात् । अप्राप्तमिव प्राप्नोति - अप्राप्तमिव सुवर्ण प्राप्नोतीव । वलयिती = वेष्टितौ चरणी यया ३१० वेदान्तपरिभाषा । वलयितचरणा, तस्याम् । नजि मालाया । सर्पस्वस्य भ्रमः अस्यास्तीति सर्पत्व- भ्रमवान् पुरुषः, तस्य । इति इत्याकारकं यत् आप्तस्य यथार्थवक्तु: वाक्यम्, तस्मात् । परिहृतस्य = अपरिहार्यस्य । सर्पस्य प्रातिभासिकसर्पस्य। परिहार इत्यनन्तरं भवतीति शेषः । एवं तथा । प्राप्तस्य स्वरूपतया अप्राप्यस्य । परिहृतस्यानर्थस्य = मिथ्यात्वेनापरिहार्यस्याज्ञानस्य । मोक्षः प्रयोजनं चेत्यनन्तरं भवितुमर्हतीति शेषः । अयं भावः-दृश्यत एव हि शुक्तिका रजतत्वेन विजानता रजतार्थिनामरजतभूतायां शुक्तिकायां प्रवृत्तिरिति परमार्थतः साध्यसाधकमावा- भावेन मोक्षासाधकेष्वपि श्रवणमननादिषु अज्ञानां प्रवृत्तिभविष्यतीति किमत्र चित्रम् ? ज्ञानिनां न स्यादिति त्विष्टमेव । एवं माला सर्पत्वेन जानतामज्ञानां दृश्यत एव हि असर्पभूतायां मालायां निवृत्तिरिति मिथ्याभूताया अपि अविद्याया निवृत्तिः, तत्साधकत्वप्रकारकभ्रमविशेष्येषु श्रवणादिषु प्रवृत्तिश्च भविष्यतीत्यपि नाति चित्रम् । ज्ञानानन्तरं तु नास्त्यविद्या न वा तनिवृत्तिरिति सत्यमेव । ननु भवतु यत्किमपि मोक्षः । तत्कारणं कर्मैव, न ज्ञानम् । "कर्मणव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः" इत्यादि स्मृतेः । तथा च किमर्थ श्रवणमननाद्यपेक्षा ? . इत्याशंकायामाह- स च ज्ञानैकसाध्यः । "तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय" इत्यादिश्रुतेः । - प्राप्तप्राप्तव्यपरिहृतपरिहाररूपा मोक्षः। चस्त्वर्थे । ज्ञानेन एकेन केवलेन । साध्यते इति ज्ञानकसाध्यः । ज्ञानमात्रसाध्य इत्यर्थः । तमेव = आत्मानमेव । विदित्वा = ज्ञात्वा । मतिमृत्युं = मोक्षम् । एति प्राप्नोति। अयनाय = मोक्षाय । न विद्यते इति सम्बन्धः। सर्वश्रेष्ठधुतिप्रमाणेन ज्ञानस्यव मोक्षोपायता प्रतिपावनात् न कर्मणः तत्करम् भावः । न खलु श्रुतिरेव प्रमाणं युक्तिरपीत्याह- अज्ञाननिवृत्ते नैकसाध्यत्वनियमात् च । नियमोऽव्यभिचारः । अयं भावः-घटज्ञानेन घटाज्ञानस्य, पटज्ञानेन पटाज्ञानस्य निरासो भवतीति सहसूशः अव्यभिचारदर्शनेन तद्विषयकस्याज्ञानस्य बाध्यत्वम् प्रयोजनपरिच्छेदः । ३११ तद्विषयकस्य ज्ञानस्य तं प्रतिबाधकत्वमित्यास्थेयम् । सति चैवं न कर्म अज्ञान- निवृत्त्याख्यमोक्षकारणमिति स्पष्टावभासात्मकसाक्षात्काराय श्रवणमननाद्यपेक्षा युक्तैवेति । अत एव हि "ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामदित्यवज्. ज्ञानं प्रकाशयति तत्परमि"त्युक्तं चक्रपाणिना गीतायाम् । “कर्मणव हि संसिद्धिमा- स्थिता जनकादयः" इत्यत्र “संसिद्धि" पदं न मोक्षपरं अपि तु ज्ञानपरम् । कर्मणा सत्त्वशुद्धिद्वारा ज्ञानजननादिति । ननु ज्ञातं ज्ञानेन बन्धः भपणीय इति । किन्तु किं विषयकं तत् ? इत्याकांक्षायामाह- तच्च ज्ञानं ब्रह्मात्मैक्यगोचरम् । "अभयं वै जनकप्राप्तोऽसि"। "तदात्मानमेवावेत्" "अहं ब्रह्मास्मी"त्यादिश्रुतेः । तत् मोक्षोपायभूतम् । ब्रह्म च आत्मा च ब्रह्मात्मानौ = ब्रह्मजीवी, तयोः ऐक्यं अभेद. गोचरो विषयो यस्य, तत् ब्रह्मात्मक्यगोचरम् । जीवब्रह्म- क्यविषयकं इत्यर्थः । अहं ब्रह्मास्मीति आत्मानमेव अवेत्, तत् हे जनक ! अभयं प्राप्तोऽसीतिसम्बन्धः । अवेत् अवः = 'ज्ञातवानसि । अभयं = अयं भाव:-यदि तज्ज्ञानं ब्रह्मविषयक नाभिप्रेतं स्यात् कथं याज्ञवल्क्यमुखेन ब्रूयात् भगवती श्रुतिः "आत्मानमेवावेत्" इति। न तावदेष, तदनन्तरं ततः अभयाख्यं मोक्ष प्राप्तोसित्येतदपि च । तस्मान्मोक्षसाधनभूतं मानं ब्रह्मविषयक- मोक्षम । मिति न केवलं श्रुतावेव, पुराणेप्युक्तमित्याह- तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थज्ञानं मोक्षस्य साधनम् । इति नारदीय- वचनाच्च। तत्त्वमस्यादिवाक्यानामों जीवात्मनोरक्यम् तस्य ज्ञानमित्यर्थः मोक्षसाधनता प्रागुक्तदिशावसेया। ननु तज्ज्ञानं परोक्षरूपमपेक्षितमपरोक्षरूपं वा? तस्य पारोक्ष्यापारोक्ष्याभ्यां द्वैविध्यात् । इत्याशंकायाह- तच्च ज्ञानमपरोक्षरूपम् । परोक्षत्वेपरोक्षप्रमनिवर्तकत्वानुपपत्तेः ।
३१२ वेदान्तपरिभाषा। अपरोक्षरूपं महावाक्यजन्यसाक्षात्काररूपम् । अपरोक्षात्मको भ्रमः अपरोक्षभ्रमः तस्य निवर्तकं अपरोक्षश्रमनिवर्तकम्, तस्य भावः तत्त्वम् । तस्यानुपपत्तिरभावः । तस्मात् । अयं भावः-प्रमाणेषु प्रत्यक्षस्य श्रेष्ठत्वमवि- वादम् । सति चैवं भ्रमस्यापरोक्षत्वे प्रमायाश्च परोक्षत्वे, सत्यपि प्रमात्वे परोक्ष- त्वात् बाधज्ञानस्य बाधकता न स्यात् इत्यतो बाघार्थ बाधकेनापि साक्षात्कार- रूपेणव भवितव्यम् । ननु ज्ञातं "अहं ब्रह्मास्मीति" ब्रह्मापरोक्षज्ञानेनाज्ञाननिवृत्तिरिति तत्खलु केन साधनेन सम्पद्यते ? इत्याकाक्षाया विवरणानुसारिणां मतमाह- तच्चापरोक्षज्ञानं तत्त्वमस्यादिवाक्यादिति केचित् । तत् अहं ब्रह्मास्मीति । आदिपदेन अयमात्मा ब्रह्म इत्यादेः परिग्रहः । केचित् = विवरणानुसारिणः । अयं भाव:-वेदान्तश्रवणं तावत् द्विविधम्, प्राथमिकमन्त्यं च । तत्र प्राथमिकेन परोक्षतया ज्ञाते ब्रह्मणि मनननिदिध्यासन- विधानेन सत्त्वशुद्धौ, द्वितीयेन अन्त्येन सकृन्महावाक्यश्रवणेन "अहं ब्रह्मास्मी"त्य- खण्डसाक्षात्कारो जायते । इति विवरणानुगानां मतम् । अत्राचार्यवाचस्पतिमतमाह- मनननिदिध्यासनसंस्कृतान्तःकरणादेवेत्यपरे । पूतीकृतं यत् मननं च निदिध्यासनं च मनननिदिध्यासने, ताभ्यां संस्कृतं अन्तःकरणं, तस्मात् । एवकारेण श्रवणव्यवच्छेदः । अयमाशयः-अपरोक्षं तज्ञान- मिति सत्यम् । किन्तु श्रवणजन्य शाब्दं तदिति न वस्तुस्थितिः। किन्तु तन्मानस- प्रत्यक्षरूपम् । श्रोतव्यमित्यनेन केवलमेकस्य प्राथमिकस्यैव श्रवणस्योपदेशात् । अतो द्वितीयश्रवणकल्पनमौतम् । कि च प्रत्यक्षत्वं शाब्दत्वं च विरुद्धी अनुभवत्वव्याप्यजाती सर्वानुभवसिद्धौ, इति कथमेकस्मिन् अहं ब्रह्मास्मीति निश्चये स्यादुमयोः समावेश इति । मनननिदिध्यासनवाक्ये श्रवणस्यापि चर्चा श्रोतव्य इति श्रुतिप्रतिपादितं श्रवणं मनने एव साक्षादुपयोगि, अश्रुतस्य मनना- सम्भवात्, न तु मानसे अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारे इति द्योतनाय ।
प्रयोजनपरिच्छेदः। सत्येवं मतद्वैधे विवरणानुसारिणामाशयं प्रकाशयति- तत्र पूर्वाचार्याणामयमाशयः। सम्विदापरोक्ष्यं न करणविशेषो- त्पत्तिनिबन्धनं, किन्तु प्रमेयविशेषनिबन्धनमित्युपपादितम् । तथा च ब्रह्मणः प्रमातृजीवभिन्नतया, तद्गोचरं शब्दजन्यमपि ज्ञानमपरोक्ष्यम् । अत एव प्रतर्दनाधिकरणे प्रतईनं प्रति "प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मां आयुः अमृतमित्युपास्व" इतीन्द्रवाक्ये प्राणशब्दस्य ब्रह्मपरत्वे निश्चिते सति अस्मच्छब्दानुपपत्तिमाशङ्क य, तदुत्तरत्वेन प्रवृत्ते “शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्" इत्यत्र सूत्रे शात्रात् दृष्टि: शास्त्रदृष्टिः इति तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यं अहं ब्रह्मति ज्ञानं दृष्टिशब्देनोक्तमिति । तत्र = उभयोर्मध्ये । पूर्वाचार्याणाम् = पद्मपादादीनाम् । सम्विदः ज्ञानस्य । आपरोक्ष्यं प्रत्यक्षत्वम् । करणविशेषः = करणप्रभेदः = अन्त:- करणम् ततः उत्पत्तिः अन्तःकरणविशेषोत्पत्तिः, तन्निबन्धनं = तन्मूलक नेति सम्बन्धः । अथवा करणगतो विशेषः अतिविशेषः । प्रमीयते इति प्रमेयम्, तद्गतो विशेष: प्रमेयविशेषः । प्रमाता जीवः प्रमातृजीवः, ततः अभिन्नता प्रमातृ- जीवाभिन्नता, तया। तद्गोचरं प्रमातृजीवाभिन्नविषयम् । शब्दजन्यमपि = तत्त्वमस्यादिमहावाक्यजन्यमपि । अपरोक्षम् प्रत्यक्षम् । अयं भावः-ज्ञानस्य प्रामाण्यं न प्रमाणगतविषयमपेक्ष्य भवति इति बहुत्र प्रतिपादितमेव । सति चैवं शब्दजन्यतया पारोक्यविशेषरूपं शाब्दत्वं प्रसज्यते । न ततस्तद्विरुद्धस्य साक्षात्कारत्वस्य सम्भव इति न शक्यते वक्तुम् । तथा च सत्यपि शन्दयतेऽपरेलजीवामिनबह्मविषयकतया तस्यापरोक्षत्वं दुरपलपमिति भावः । अत्र पक्षे सूत्रभाष्यकृतसम्मतिमाह- अत एव प्रतर्दनाधिकरणे प्रतर्दनं प्रति “प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मां आयुः अमृतमित्युपास्वे" तीन्द्रप्रोक्तवाक्ये प्राणशब्दस्य ब्रह्मपरत्वे निश्चिते “मामुपास्वेति" अस्मच्छब्दानुपपत्तिमाशंक्य तदुत्तरत्वेन प्रवृत्ते "शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्" इत्यत्र सूत्रे शास्त्रात् दृष्टि: शास्त्रदृष्टिः इति तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यमहं ब्रह्मति ज्ञानं दृष्टि- शब्देनोक्तमिति ।
३१४ वेदान्तपरिभाषा। अत एव = शाब्दात् साक्षात्कारस्वीकारादेव । "मामुपास्व" मदुपासनां कुरु । अस्मच्छब्दानुपपत्ति = इन्द्राभिप्रायकास्मच्छब्दानुपपत्तिम् । तदुत्तरत्त्वेन प्रवृत्ते - आशंकानिवारकतया प्रोक्ते । इदं सूत्रविशेषणम् । शास्त्रादित्यत्र जन्यत्वं पञ्चम्यर्थः । तथा च शास्त्रजन्या दृष्टिः शास्त्रदृष्टि: । अयमाशयः- प्राणोस्मि प्रज्ञात्मा तं मां आयुः अमृतमित्युपास्वेति वाक्ये प्राणपद मुख्यप्राणपरं आहोस्वित् ब्रह्मपरं ? इति संशये, ब्रह्मपरमेवेति निर्णीतं वेदान्तसूत्रे । अनन्तरं कथमेवं युज्यते ? यतः प्रतईनं प्रतीन्द्रस्येदं वचनम्, अस्मच्छब्देन वक्तुरेव परामर्शन प्रकृतवाक्ये च मामुपास्वेत्यस्य मा = इन्द्र आयुः अमृतमित्येव उपास्वेति खल्वर्थ- स्यैव भवितव्यतया इन्द्र एवात्र प्राणः इत्याक्षेपे प्राप्ते "शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' इति सूत्रमुक्तं भगवता वेदव्यासेन । द्विविधा हि खलु भवति दृष्टिः लौकिकी शास्त्रीया च तत्र लौकिकदृष्ट्याश्रयणे भवितुमर्हति इन्द्रः प्राणः, लोकेऽस्मच्छब्देन वक्तुरेवाभिधानात् । किन्तु शास्त्रीयां दृष्टिमाश्रित्य प्रयोगे तत्र ब्रह्मव मच्छब्दवाच्यम् । तस्यैव तत्त्वतः आत्मत्वात् । प्रकृते तामेव तत्त्वमस्यादि- महावाक्यजां आत्मदृष्टिमाश्रित्य मामित्यस्मच्छब्देन प्राणाख्यं ब्रह्मोपास्वेति प्रतिपादयतोन्द्रो न तु वज्रहस्तमरावतारुढं स्वमिति वेदान्तवर्शनीयो विचारः । अयं खलु तवैव घटते यदि तत्वमस्यादिशास्त्रादपि साक्षात्कारो भवतीति स्वीक्रियते । अतो मन्तव्यं खल्वेतत् यत् भवति शाब्दत्वेऽपि ज्ञानस्य साक्षात्कार- तेति । वाचस्पतितदनुयायिनामभिप्रायं विशदयति- अन्येषान्त्वेवमाशयः । करणविशेषनिबन्धनमेव ज्ञानानां प्रत्यक्ष- त्वम् । न विषयविशेषनिबन्धनम् । एकस्मिन्नेव सूक्ष्मवस्तुनि पटुकरणा- पटुकरणयोः प्रत्यक्षाप्रत्यक्षव्यवहारदर्शनात् । करणगतो विशेष: करणविशेषः, तन्निबन्धनं तन्मूलकम् । षष्ठ्यर्थों निष्ठत्वम् । तथा च ज्ञानानां प्रत्यक्षत्वमित्यस्य ज्ञाननिष्ठ प्रत्यक्षत्वमित्मर्थः । सूक्ष्मवस्तुनि अपकृष्टमहत्वशालिनि । पटूनि झटिति स्पष्टज्ञानसमर्थानि करणानि यस्य असौ पटुकरणः । एवं अपटुकरण इत्यपि, तयोः । प्रत्यक्षमिदमिति व्यवहारः प्रत्यक्षव्यवहारः, अप्रत्यक्षमिदमिति व्यवहारः अप्रत्यक्षव्यवहारः, तयोः प्रत्यक्षाप्रत्यक्षव्यवहारयोः दर्शनं शानम्, तस्मात् । अयं भावः-यदि हि विषयगत- प्रयोजनपरिच्छेदः। मेव हि विशेषमाश्रित्य भवेत् खलु विषये "इदं प्रत्यक्ष वस्तु" इति व्यवहारः, तवा सूक्ष्मकेशमेकं समानभावेनैव गृह्णीयात् सर्वः । विषयक्येन तद्वतस्य विशेषस्य सर्वेषां कृते समानत्वात् । न भवति किन्तु तथा । कश्चिद्धि स्वस्थचक्षुष्को जनः सूक्ष्ममपि तं स्पष्टं गृह्णाति । न च तथा तं गृह्मात्यस्वस्थचक्षुः । अत इदं स्वी- करणीयमेव यत् करणगतेनैव विशेषेण ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वमिति । - ननु भवत्वेवम् । किमायातं ततः प्रकृते ? इत्याकांक्षायामाह- तथा च सम्वित्साक्षात्त्वे इन्द्रियजन्यत्वस्यैव प्रयोजकतया न शब्दजन्यज्ञानस्यापरोक्षत्वम् । ब्रह्मसाक्षात्कारेऽपि मनननिदिध्यासन- संस्कृतमन एव कारणम् । मनसैवानुद्रष्टव्यमित्यादि श्रुतेः । तथा च पटुकरणापटुकरणयोः प्रत्यक्षाप्रत्यक्षव्यवहारदर्शने च । सम्वित् ज्ञानं तस्य साक्षात्त्वं प्रत्यक्षत्त्वं तस्मिन् । इन्द्रियजन्यत्वं इन्द्रियनिष्ठकरणतानिरूपित- कार्यत्त्वम्, तस्यैव । शब्देन जन्यते इति शब्दजन्यम् दशमस्त्वमसीत्यादिवाक्य- जन्यम् । तादृश यज् ज्ञान तस्य । ब्रह्मसाक्षात्कारेऽपि अहं ब्रह्मास्मीति चरम- साक्षात्कारेऽपि । मननं च निदिध्यासन च मनननिदिध्यासने, ताभ्यां संस्कृतम् अहं ब्रह्मास्मीति प्रत्यक्षजननयोग्यतां प्राप्तम् । करणं = असाधारणं कारण । मनसवानुद्रष्टव्यम् = मनसेन्द्रियेणैव साभात्कर्त्तव्यम् । अयं भावः-प्रोक्तया युक्त्या ज्ञानापरोक्षत्वस्य इन्द्रियजन्यत्वप्रयुक्तत्वे निश्चिते अहं ब्रह्मास्मोति चरमस्य साक्षात्कारस्य मनोजन्यत्वप्रयुक्तमेव हि प्रत्यक्षत्त्वमङ्गीकर्तव्यम् । मनसंवानुद्रष्टव्य- मिति श्रुतिरपि हि तथैव बवति । सति चैवं साक्षात्कारो सावहं ब्रह्मास्मीति तत्त्वमस्यादिवाक्यात्मकशब्दजन्य इति प्रागुक्तं मतं न साधीय इति । - ननु तर्हि कथं श्रुत्या “यन्मनसा न मनुते यन्मनो न वेदेति प्रोक्तम्" प्रोक्तश्र ति- युक्तिभ्यां ब्रह्मणो मानसप्रत्यक्षविषयत्वावगमात् इत्याशङ्कायामाह- मनोऽगम्यत्वश्रुतिश्चासंस्कृतमनो विषया । मनसा अगम्यत्वं = अज्ञेयत्वम् मनोऽगम्यत्वम्, तस्य श्रुतिः - यन्मनसान मनुते यन्मनो न वेदेति श्रुतिवाक्यम् । चस्त्वर्थे । असंस्कृतं = मनननिदिध्यासन- प्रयुक्तब्रह्मसाक्षात्कारजननसामर्थ्याभाववत् यन्मनः, तद्विषया - तदभिप्रेत्योक्ता।
वेदान्तपरिभाषा। - अयं भावः-"मनसैवानुद्रष्टव्यम्" "यन्मनसा न मनुते" इति श्रुत्योर्न खलु विरोधः शङ्कनीयः । पूर्वत्र "मनः" पदस्य शुद्धमनःपरत्वात् । परत्र च तदभाववन्मनःपर- त्वात् । शुद्धत्वं च पूर्वप्रदर्शितसंस्कृतत्वरूपमवसेयम् इति । अन्या शङ्कामपाकरोति- न चैवं ब्रह्मणः औपनिषदत्वानुपपत्तिः। अस्मदुक्तमनसो वेदजन्य- ज्ञानानन्तरमेव प्रवृत्ततया वेदोपजीवित्वात् । औपनिषदत्वं उपनिषन्मात्रमानगम्यत्वं, तस्यानुपपत्ति: = अभावः । अस्मदुक्तं = संस्कृतं यन्मनः, तस्य । वेदजन्यज्ञानं तत्त्वमसीत्यादिवाक्यजन्यं परोक्ष- जानम्, तदनन्तरम् । प्रवृत्ततया - अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारजनकतया। वेदो- पयोगित्वात् = वेदसापेक्षत्वात् । अयं भाव:-न खलु उपनिषज्जन्यसाक्षात्कार- विषयत्वं ब्रह्मणः औपनिषदत्वं, येन "तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामी"ति श्रुति- प्रतिपादितं औपनिषवत्वं तस्य व्याकुप्येत । अपि तु वेवोपजीविप्रमाणजन्यः मा- विषयत्वम्, तवस्त्येव ब्रह्मणि । मनस्संस्कारस्य वेदाधीनत्वेन, संस्कृतस्य मनसो बंदोपजीविप्रमाणत्वेन तज्जन्यसाक्षात्कारविषयत्वस्य तत्रासत्त्वात् इति । ननु मानान्तरगम्यत्वं वेदगम्यत्वञ्च विरुद्धमिति मनोऽगम्यत्वाभ्युपगमे ब्रह्मणः, कुतो वेदगम्यत्वसम्भव: इत्याशङ्कायामाह- वेदानुपजीविमानान्तरगम्यस्यैव वेदगम्यत्वविरोधित्वात् । ? - वेदं नोपजीवतीति वेदानुपजीवि, तादृशं यन्मानान्तरं - वेदातिरिक्तं प्रमाणं तद् गम्यत्वं तज्जन्यज्ञानविषयत्वम्, तस्य । एवकारेण केवलमानान्तरगम्यत्वव्य- वच्छेदः । मनोजन्यज्ञानविषयत्वेन मानान्तरजन्यविषयत्वेऽपि वेदानुप- जीविमानान्तरगम्यत्वामावेन वेदगम्यत्वसत्वे बाधकामावेन न ब्रह्मणः औप- निषदत्वानुपपत्तिरिति भावः। ननु “शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्" इत्यत्र शास्त्रदृष्टिशब्दप्रयोगस्य तर्हि का गतिः ? इत्याकांक्षायामाह- शास्त्रदृष्टिसूत्रमपिब्रह्मविषयानर प्रत्यक्षस्य शास्त्रप्रयोज्य- त्वादुपपद्यते । - प्रयोजनपरिच्छेदः। - ब्रह्म विषयो यस्य एतादृशं यन्मानसं प्रत्यक्षं तस्य । शास्त्रप्रयोज्यत्वात् तत्त्वमसीति महावाक्यजन्यजीवाभिन्नब्रह्मज्ञानप्रयुक्तसंस्कारवन्मनोजन्यत्वात्। उपपद्यते == संगच्छते । अयं भावः-न खलु शास्त्रीया दृष्टिः शास्त्रवृष्टिः तत्त्वमसीति वाक्यजन्यसाक्षात्कार इति तवर्थः, अपि तु शास्त्रप्रयोज्या दृष्टिः शास्त्रदृष्टिः, शास्त्रोपजीविमनोजन्यस्साक्षात्कार इति तदर्थः । तथा च नानुपपत्तिः काऽपि इति । अत्र कल्पतरुकृदुक्तिमाह- तदुक्तम्- अपि संराधने सूत्रात् शास्त्रार्थध्यानजा प्रमा । शास्त्रदृष्टिर्मता तां तु वेत्ति वाचस्पतिः परम् ॥ इति । D "अपि संराधने" सूत्रात् "अपि सराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्” इति उत्तरमीमांसासूत्रात् । शास्त्रं तत्त्वमस्यादि, तस्यार्थी जीवाभिन्नमखण्डं ब्रह्म, तस्य ध्यानं - मनननिदिध्यासने, केवलं निदिध्यासनमेव वा, तत्त्वे जायते - उत्पद्यते इति शास्त्रार्थध्यानजा । प्रमा = मानसः अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारः । शास्त्र- दृष्टिर्मता = शास्त्रदृष्ट्या तूपदेश इति सूत्रे शास्त्रदृष्टिशब्देनाभिप्रेता । तु एवार्थों भिन्नक्रमश्च । तथा च परं - किन्तु तां शास्त्रदृष्टिं वाचस्पतिरेव जानाति इति परार्धार्थः । अपि = अपि च एनं अपि च एनं = निरस्ताखिलोपद्रवानन्दरूपं, संराधने भक्तिध्यानप्रणिधानानुष्ठानकाले । पश्यन्ति योगिन इति शेषः। प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रुतिस्मृतिभ्याम् इति सूत्रार्थः । तथा चायं भावः-योगिकत्त के ब्रह्मणो मानसं वर्शनं भवतीति इति श्रुतिस्मृतिशारीरिकसूत्ररक्तम् । तदेव दर्शनं "शास्त्र- दृष्ट्या तूपदेश" इत्यत्र शास्त्रदृष्टिशब्बेनाभिप्रेतम् । तथा च न काप्यनुपपत्ति- रिति । पेद्ददीक्षितसम्मतस्तु पाठो "वेत्ति वाचस्पतिः परः" इति । अस्मिन् पाठे विशिष्टबुद्धिमत्त्वरूपं परत्वं वाचस्पतेविवक्षितम् । प्रत्यक्षानुमानाभ्यामित्यत्र प्रत्यक्षशब्दवाच्या श्रुतिः "ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तुतं पश्यते निष्फलं ध्यायमानः" इति । स्मृतिस्तु "योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्" इत्यादि- रूपा बोध्या ।
वेदान्तपरिभाषा। ननु यदि ब्रह्मज्ञानान्मोक्षः तदा "यज्ञो दान तपश्चैव न त्याज्य"मिति कथना- सगति. । तस्य निष्फलत्वात् इत्याशङ्कायामाह-- तच्च ज्ञानं पापक्षयात् । स च कर्मानुष्ठानात् इति परम्परया कर्मणां विनियोगः । अत एव "तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदि- षन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेनेत्यादि श्रुतिः "कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञान प्रवर्त्तते" इत्यादिस्मृतिश्च संगच्छते । - -- तत् - शाब्दसाक्षात्काररूपं मानससाक्षात्काररूप वा । पापस्य क्षयो नाश: तस्मात् । परम्परया - पापक्षय दूरीकृत्य । विनियोगः = उपयोगः । अत एव = कर्मणः परम्परया उपयोगादेव । एतं = आत्मानम् । वेदानुवचनं वेदाध्ययनम्, तेन । ब्राह्मणाः = ब्राह्मणजन्मानः । विविदिषन्ति = ज्ञातुमिच्छन्ति । अनाशकेन - हितमितपवित्राहारेण । इत्यादिश्रुति: संगच्छते इति सम्बन्धः । कर्मभिः निष्कामयागदानादिभिः । कषाये पक्वे- नष्टे । ततः = पापनाशात् । उत्पद्यते । न खलु निष्कामकर्मणो निष्फलत्वशंका, तोधकशास्त्र- सङ्गतिशङ्का वा । तस्य पापक्षयद्वारा मानोत्पावप्रयोजकत्वात् इति भावः । प्रवत्तते ननु पापक्षयादेव ज्ञानोत्पादे "श्रोतव्यो मन्तव्य" इत्यादिश्रवणादिविधानानर्थ- क्यम् इत्याशङ्कायामाह- एवं श्रवणमनननिदिध्यासनान्यपि ज्ञानसाधनानि । मैत्रेयीब्राह्मणे "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" इति दर्शनमनूद्य, तत्साधनत्वेन "श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" इति श्रवणमनननिदिध्यासनानां विधानात् । अवणं च मननं च निदिबार च, श्रवणमनननिदिध्यासनानि । शान- साधनानि = ब्रह्मसाक्षात्कारजनकानि । श्रोतव्य इत्यत्र तव्यप्रत्ययश्रवणेऽपि साक्षात्कारस्य फलत्वेन, फलस्य च विधयत्वाभावेन न विधानसम्भवः, अपि तु भनुमासामलद्योति लिखनरहस्यम् । तत्साधनत्वेन = दर्शनसाधनत्वेन ।
प्रयोजनपरिच्छेदः । ३१६ लक्षणः श्रवणमनननिधिध्यासनानि परिचाययति- -- श्रवणं नाम वेदान्तानां तात्पर्यावधारणानुकूलमानसक्रिया । मननं नाम शब्दावधारितेऽर्थे मानान्तरविरोधाशङ्कायां तन्निरा- करणानुकूलतर्कात्मकज्ञानको मानसो व्यापारः । निदिध्यासनं नाम अनादिदुर्वासनया विषयेष्वाकृष्यमाणचित्तस्य विषयेभ्योपकृष्यात्म- विषयकत्वस्थैर्यानुकूलो मानसव्यापारः । . - तात्पर्य तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वम्, तस्यावधारणं निश्चयः । तदनुकूला मानसक्रिया मनोव्यापारः । शब्देनावधारितोऽर्थः शब्दावधारितोऽर्थः, तस्मिन् । मानान्तरं प्रमाणान्तरं, तेन विरोधः, मानान्तरविरोधः, तस्य या शङ्का, तस्याम् । जायमानायामिति शेषः । तस्याः शङ्कायाः यनिराकरण निरासः, तत्रानुकूलो यस्तर्कः स एव आत्मा स्वरूप यस्य ज्ञानस्य, तत्कः । अनादिः या दुर्वासना अधमः संस्कारः, तेन । विषयेप्वाकृप्यमाणस्य विषयाभिमुख्येन धावतः । चित्तस्य = अन्तःकरणस्य । अपकृप्य - पृथक्कृत्य। आत्मविषयकत्व- स्थैर्य = आत्ममात्रविषयकत्वम्, तत्र अनुकूल: । “वेदान्ताः अद्वैतब्रह्मप्रतिपादकाः" इति निर्णयानुकूलो मानसव्यापारः श्रवणम् । प्रत्यक्षादिप्रमाणेन यदि द्वितीयं तत्त्वं स्यात, एकविज्ञाने सर्वविज्ञानप्रतिज्ञा नेह नानास्तीत्यादिश्रुतिश्च बाधिता स्यात् इति तर्कसहकृता "प्रपञ्चो मिथ्या वृश्यत्वात्" इत्यनुमितिर्मननम् प्रकृते । अव्यवहितमावेनानारतं आत्ममात्रज्ञानं निदिध्यासनम् इति भावः। ननु ब्रह्मसाक्षात्कारे त्रयाणां श्रवणादीनां कि समानतया कारणत्वम् ? इत्याकांक्षायामाह- तत्र निदिध्यासनं ब्रह्मसाक्षात्कारे साक्षात्कारणम् । "ते ध्यान- योगानुगतां अपश्यन् देवात्मशक्ति स्वगुणैनिगूढाम् ।" ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वः ततस्तुतं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः इत्यादि श्रुतेः । तत्र - श्रवणमनननिदिध्यासनेषु । ब्रह्मसाक्षात्कारे = अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारे। साक्षात्पदं प्रयोजकसाधारणीं कारणतामाश्रित्य । ते - ज्ञानिनः । देवस्य आत्मनः, शक्तिः सर्वाध्यासाधिष्ठानता, ताम् । स्वगुणः सत्त्वरज, - ३२० वेदान्तपरिभाषा। %D D स्तमोगुणात्मिकाभिः मायाभिः । निगूढा आच्छन्नाम् । पश्यन् साक्षात्कृतवन्तः । ज्ञान निदिध्यासन, तस्य प्रसाद: - आत्मातिरिक्तविषया- संस्पृष्टत्वम्, तेन । विशुद्धं सत्त्वं अन्तःकरणं यस्य स विशुद्धसत्त्वः । भवतीति शेषः । ततः = अनन्तरम् । ध्यायमानः निष्कलं पश्यते इति सम्बन्धः । ध्यायमानः = निदिध्यासकः। निष्कल - निर्गुणं । पश्यते पश्यति । अयं भावः-सत्यपि श्रवणमनननिदिध्यासनानां ब्रह्मसाक्षात्कारप्रयोजकत्वे समाने कारणत्वं निदिध्यासनस्यैव । नियता व्यवहितपूर्ववत्तित्वात् । पूर्वत्तिनोस्तुभयोः अन्यथासिया न कारणत्वम् अपि तु अन्तश्शुद्धिविधायकतया प्रयोजकत्वमात्रमिति । ब्रह्मसाक्षात्कारे निदिध्यासनस्यैवात्मविषयकस्य हेतुत्वे, निदिध्यासनं केन कारणेन सेत्स्यति ? इति जिज्ञासायामाह- निदिध्यासने च मननं हेतु: । अकृतमननस्यार्थदादाभावेन तद्विषयनिदिध्यासनायोगात् । हेतु: - कारकः । न कृतं मननं येन असौ अकृतमननः तस्य । अर्थस्य आत्मनः दाय = दृढ़ो निश्चयः, तदभावेन । तत् विषयो यस्य तत् तद्विषयम्, तादृक यनिदिध्यासनम्, तस्यायोगः - अभाव:, तस्मात् । अयं भाव:-अन्वयव्यतिरेक- योरेव कारणतानिर्णायकत्वेन, तयोः सत्त्वेन, निदिध्यासनं प्रति मननस्य कारणत्वमवश्यं वक्तव्यम् इति । - ननु मनने कस्तहि हेतुः ? इत्याकांक्षायामाह- मनने च श्रवणं हेतुः। श्रवणाभावे तात्पर्यानिश्चयेन शाब्दज्ञाना- योगेन श्रुत्यर्थविषयकयुक्तत्वायुक्तत्वनिश्चयानुकूलमननायोगात् । श्रवणाभावे = तात्पर्यनिश्चयानुकूलमानसक्रियायाः अभावे । तात्पर्यस्य - तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वस्य, अनिश्चयो निश्चयाभावः, तेन। शाब्दनिश्चयस्य अभिन्नाविषयकशाब्दनिश्चयस्य, अयोगः अभावः, तेन । श्रुतार्थः = जीव- ब्रह्मणोरक्यम् । तद्विषयक: तद्विशेष्यको यो युक्तायुक्तत्वनिश्चयः = "जीव- ब्रह्मणोरक्यं स्वीकत्तुं मुचितम्" इत्यादिनिर्णयः, तदनुकूलस्य मननस्यायोगः D . am- प्रयोजनपरिच्छेदः। अभावः, तस्मात् । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां निदिध्यासने मननस्येव, मनने श्रवणस्य हेतुत्वमभ्युपगन्तव्यमिति । अत्र कार्यकारणभावे केषाञ्चिदाचार्याणां मतमाह- एतानि त्रीण्यपि ज्ञानोत्पत्तो कारणानीत्येतावन्मात्र केचिदाचार्या उचिरे । . एतानि = श्रवण-मनन-निदिध्यासनानि । ज्ञानं = अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारः, तस्य या उत्पत्तिः, तत्र । मात्रपदेन श्रवणमननयोः नननिध्यिासन- हेतुत्वद्वारककारणत्वात्मकप्रयोजकत्वव्युदास: । उचिरे = उक्तवन्तः। अयं भाव:- अनन्यथासिद्धनियतपूर्ववत्तित्वमेव हि कारणत्त्वम् न तत्राव्यवधाननिवेशः। तथा सति निदिध्यासनस्येव श्रवणमननयोरपि साक्षादेव चरमसाक्षात्कारं प्रति हेतुत्वमिति । - मतान्तरमाह- अपरे तु श्रवणं प्रधानम्, मनननिदिध्यासनयोस्तु श्रवणात्पराचीन- योरपि श्रवण प्रणफलब्रह्मदर्शननिर्वर्तकतया, आरादुपकारकतया राजकारल्याहुः। प्रधानं = ब्रह्मसाक्षात्कारं प्रतिजनकभूता अङ्गिक्रिया । पराचीनयो: परवत्तिनोः। श्रवणस्य फलं ब्रह्मदर्शनं, तस्य निर्वर्तकं निर्वाहक, तत् तथा । आरादुपकारकतया - दूरवलुपकारकतया । अङ्गत्वं = सहकारित्वम् । अयं भाव:-ब्रह्मसाक्षात्कार: श्रवणादेव जायते । मनननिदिध्यासने तु श्रवणस्य साहाय्यं कुरुतः । न तु ब्रह्मसाक्षात्कारमुत्पादयतः, इति तयोः श्रवणरूपायाः साक्षात्कारकत्वेन अंगिभूतायाः मुख्यायाः क्रियायाः-अंगत्वम् । दूरोपकारकस्यान्यथा सिद्धत्वेन कारकत्वाभावात् । सन्निपत्योपकारकत्वारादुपकारकत्वयोः द्विविधयोरङ्गत्वयोर्मध्ये दूरवत्तिनः सन्निपत्योपकारकत्वाभावेऽपि आरादुपकारकत्वरूपमङ्गत्वं सम्भवत्येवेति। ननु मनननिदिध्यासनयोः श्रवणाङ्गत्वे, किं स्वरूपं तत् अङ्गत्वम् ? न ताव- दवयववत्त्वरूपं तदिष्टम् । श्रवणमननयो व्यत्वाभावेन तव्याप्यस्यावयवत्वस्य तत्राभावात् । दर्शपौर्णमासादी प्रयाजादेरिव परोद्देशप्रवृत्तकृतिसाध्यत्वरूपं तदिति ३२२ वेदान्तपरिभाषा। चेत्, तत्ल्यापकानां श्रुतिलिगवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्याना अन्यतमेन तर्हि ध्रुवं भवितव्यम् । न चावलोक्यते, इति कथङ्कारमगत्वं सुसम्पादमित्याकांक्षायामाह- तदप्यङ्गत्त्वं न तार्तीयशेषत्वरूपम् । तस्य श्रुत्याद्यन्यतमप्रमाण- गम्यस्य प्रकृते श्रुत्याद्यभावेऽसम्भवात् । तदपि = ,आरादुपकारकत्वमपि । तार्तीयशेपत्वरूपं मीमासादर्शनतृतीया- ध्यायाप्रतिपाद्याङ्गत्वरूपम् । तस्य = तार्तीयशेषत्वरूपस्याङ्गत्वस्य । श्रुत्यादिना अन्यतमेन प्रमाणेन गम्यते इति श्रुत्याद्यन्यतमप्रमाणगम्यम्, तस्य । इद तत्पदप्रति- पाद्याङ्गविशेषणम् । प्रकृते मनननिदिध्यासनाङ्गत्वविपये । तस्यासम्भवादिति सम्बन्धः । अयं भावः-सत्यं मनननिदिध्यासनयोः श्रवणं प्रति न तथाङ्गत्वं यथा प्रयाजादेः वर्शपौर्णमासादिकं प्रति । यतो श्रुतिलिगवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां षण्णां मध्ये एकेन केनापि हि तादृशमङ्गत्वं भवति निर्णीतम् । प्रकृते च तदमावेन कथं शक्यते कर्तु तथा दिपाङ्गनर्णयः ? इति । श्रुत्यादीनामन्यतमाभावं विशदयितुमाह- "ब्रीहिभिर्यजेत्" "दध्ना जुहोती"त्यादाविव मनननिदिध्यासन- योरङ्गत्वे न काचित् तृतीया श्रुतिरस्ति । अङ्गत्वे = श्रवणाङ्गत्वविषये । तृतीया श्रुति: न अस्तीति सम्बन्धः । अयं भाव:-"बीहिभिर्यजेत्" इत्यत्र "बीहिभिः" इति तृतीयान्तं पदम्, तत्र श्रूयमाणा तृतीया विभक्तिः प्रमाणीभूय पुरोडाशप्रकृतिभूतस्य ब्रीहे: यागाङ्गत्वं ख्यापयति । प्रकृते "श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" इत्यत्र न मनागपि सम्भेदोऽस्ति प्रमाणभूतायाः तृतीयायाः, येन बीहेः दध्नो वा यागाङ्गत्वमिव मनन- निदिध्यासनयोः श्रवणाङ्गत्वं श्रुतिप्रमाणसिद्धं स्यात् इति । ननु श्रुत्यभावेऽपि लिंगप्रमाणबलेन मनननिदिध्यासनयोः श्रवणाङ्गत्वं कुतो न स्यात् इत्याकांक्षायामाह- नापि "बहिर्देवसदनं दामि" इत्यादिमन्त्राणां बर्हिः खण्डनप्रकाशन- सामार्थ्यवत् किंचिल्लिगमस्ति ।
प्रयोजनपरिच्छेदः। न हि किञ्चिल्लिगमप्यस्तीति सम्बन्धः । बर्हिः कुशः, तस्य खण्डनं छेदनम्, तत्प्रकाशनसामर्थ्य तदर्थप्रतिपादनस्वरूपयोग्यत्वम् । अयं भावः-बहिर्देवसदनं दामीति मन्त्राणां कुशलवनाङ्गत्वम् ? आहोस्वित् उलपाधन्यतृणलवनाङ्गत्वम् ? इति सन्देहे देवसदनवहिः खण्डनमेव हि यतो मन्त्रेण प्रतिपावते, ततस्तादृश- प्रतिपादनसामर्थ्यरूपलिङ्गप्रमाणबलेन कुशलवनाङ्गत्वमुक्तमन्त्राणामिति भवति विनिर्णयः । प्रकृतेऽपि यदि तद्वत् कुत्रापि मन्त्रादौ मनननिदिध्यासनयोः श्रवणाङ्ग- त्वख्यापनसामर्थ्य स्यात् भवेत्तद्वलेन तयोस्तदङ्गत्वम् । न स्वस्ति तथेति कयं लिगेनापि प्रमाणेन स्यात्तत्सिद्धिरिति । . ननु मा भवता श्रुतिलिगे वाक्यं भवेत् तथाविध किञ्चित्, इत्याशकायामाह- नापि देशान्तरपटितस्य प्रवर्यस्याग्निप्टोमे प्रविणक्तीति वाक्यवत् श्रवणानुवादेन मनननिदिध्यासनयोविनियोजकं किञ्चिद्वाक्यमस्ति । न वाक्यमस्तीति सम्बन्धः । वाक्यं वाक्यप्रमाणम् । विनियोजक = विधायकम् । अयं भाव:-अग्निष्टोमादन्यत्रपठिता यद्यपि प्रवर्ग्यक्रिया, तथापि अग्निष्टोमे प्रविणक्ति भवति इति प्रवर्यप्रापकवाक्यप्राप्त्या, अग्निष्टोमेऽपि भवति विधीयमाना प्रवर्ग्यक्रिया । प्रकृतेऽपि यदि तथा स्यात् किमपि वाक्य, येन श्रवण- मनूद्य स्यान्मनननिदिध्यासनयोविधानम्, तर्हि वाक्यप्रमाणबलेन तयोः स्याच्छ्रवणाङ्ग- त्वसम्भवः । श्रोतव्य इत्यनेनैव प्रवणस्यापि प्राप्ती न तदनुवाद इति शक्यते वक्तुमिति । ननु प्रकरणं कुतो न तयोः श्रवणाङ्गत्वख्यापकम् ? इत्याकांक्षायामाह- नापि दर्शपौर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेतेति वावयावगतफल- साधनताकदर्शपूर्णमासप्रकरणे प्रयाजादीनामिव फलसाधनत्वेनावगतस्य श्रवणस्य प्रकरणे मनननिदिध्यासनयोराम्नानम् । न आम्नानमस्तीति सम्बन्धः । दर्शपौर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत इति वाक्येन अवगता फलसाधनता यत्र, असौ तादृशसाधनताकः, एतादृशो यो दर्शपूर्णमासः, तस्य यत्प्रकरणं तत्र । प्रयाजादीनामिव = प्रयाजादीनामाम्नानमिव। आम्नानं = उपदेशः । अयं भाव:-प्रकरणात् मायालयातक भवति यत्र ३२४ वेदान्तपरिभाषा स्वस्य यत्किञ्चिदपि फलं न श्रुतं भवति । फलवतश्च प्रकरणे पाठो भवतीति फलवन्मुख्यप्रकरणपाठात् तस्य मुख्याङ्गत्वं भवति । यथा प्रयाजनामकस्य यागस्य स्वतः किन्चित् फलं न श्रूयते, किन्तु फलबद्दर्शपूर्णमासप्रकरणे तस्य पाठोऽस्तीति दशंपौर्णमासाङ्गत्वं तस्य भवति । प्रकृते तु नैव फलवतः श्रवणस्य प्रकरणे निष्फलतया ननूपवेशो मनननिदिध्यासनयोरस्ति । येन श्रवणाङ्गत्वं भवेत् मनन निदिध्यासनयोः प्रकरणप्रमाणात् । शकते- ननु द्रष्टव्य इति दर्शनानुवादेन श्रवणे विहिते सति फलवत्तया श्रवणं प्रधानम्, तत्सन्निधावाम्नातयोः मनननिदिध्यासनयोः प्रयाजन्या- येन प्रकरणादेवाङ्गता। प्रधानं अङ्गि । तत्सन्निधौ = प्रधानस्य श्रवणस्य सन्निधौ। आम्नातयोः उपदिष्टयोः । प्रयाजन्यायेन प्रयाजदृष्टान्तेन । प्रकरणादेव उभयाकांक्षा- रूपात् प्रकरणप्रमाणादेव । भवितुमर्हतीति शेषः । अयं भाव:-"आत्मा वारे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" इति श्रुतिः । तत्र दर्शनानन्तरं अवणस्य विधानात् तस्य फलवत्त्वं स्वीकार्यम् । सति चैवं फलवतः श्रवणस्य प्रकरण एव मनननिदिध्यासनयोरूपदेशात् तयोरपि तथैव श्रवणाङ्गता वक्तुं शक्यते, यथा फलवतोदर्शपौर्णमासयोः प्रकरणे फलरहिततया पठितस्य प्रयाजावेः, इति कयंन तयेति । उत्तरयति- - इति चेन्न । ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्ति स्वगुणनि- गूढाम्" इत्यादि श्रुत्यन्तरे ध्यानस्य दर्शनसाधनत्वे नावगतस्य अङ्गा- कांक्षायां प्रयाजन्यायेन श्रवणमननयोरेवाङ्गतापत्तेः । दर्शनसाधनत्वेन - दर्शनकारणत्वेन । अवगतस्य = ज्ञातस्य । आकांक्षायां = कथं भावयेत् इत्याकांक्षायाम् । अङ्गतापत्तेः = निदिध्यासनाङ्गतापत्तेः । अयं भावः-दर्शयाममान विचारे विधीयमाने वैपरीत्येन श्रवणमननयो- रेव निदिध्यासनाङ्गता भवति सम्पन्ना । यतो हि "ते ध्यानयोगानुगता" इति प्रयोजनपरिच्छेदः। ३२५ श्रुत्या ध्यानयोगानुगतानामेव दर्शनसम्पत्तिरिति प्रतिपादयन्त्या ध्यानयोगस्यैव साक्षात्कारणत्वमुच्यते, इति तत्र कथम्भावाकाक्षायां श्रोतव्यो मन्तव्य इति श्रुत्या तन्निवृत्त। अतो मनननिदिध्यासनयोन श्रवणाङ्गत्वमिति । ननु क्रमात् समाख्यातो वा प्रमाणात् स्याच्छ्रवणाङ्गत्वं मनननिदिध्यासनयोः इत्याशङ्कायामाह- क्रमसमाख्ये च दूरनिरस्ते । क्रमश्च समाख्या चेति क्रमसमाख्ये । दूरनिरस्ते स्फुटं मनननिदिध्यासनयो: श्रवणाङ्गत्वख्यापकत्वाभाववत्त्यौ । अयं भाव:-यत्र विकृतियागे अङ्गाना भवत्यति- देशः, तत्राङ्गाना विधानक्रमजिज्ञासाया प्रकृतियागगत: क्रमो भवति प्रमाणम् । प्रकृते तादृशी स्थितिरेव नास्ति, येन स्यादपि क्रमस्य प्रामाण्यशङ्कति । एवं समाख्याया अपि नात्र प्रामाण्यशंका । यतो हि समाख्या प्रमाणं तत्रव भवति यत्र कुत्राप्यङ्गत्वनिर्णयो नाम्ना भवति । यथा “शुन्धध्वं देव्याय कर्मणे" इति मन्त्रस्य पौरोडाशिकेति समाख्यया पुरोडाशपात्रसुन्धनाङ्गत्वम् । प्रकृते तु मनननिदिध्या- सनपदं न श्रवणस्य यौगिकं नाम भवति येन स्याद्गतिसम्भावनापि समाख्या प्रमाणस्येति । प्रकृते हेत्वन्तरमाह- किञ्च प्रयाजादावङ्गत्वविचार: सप्रयोजनः। पूर्वपक्षे विकृतिषु प्रयाजाननुष्ठानम् । सिद्धान्ते तु तत्रापि तदनुष्ठानमिति । प्रकृते तु श्रवणं न कस्यचित् प्रकृतिः । येन मनननिदिध्यासनयोः तत्राप्यनुष्ठानं अङ्गत्वविचारे फलं भवेत् । तस्मान्न तार्तीयशेषत्वं मनननिदि- ध्यासनयोः । सप्रयोजनः = सफल: । पूर्वपक्षं = पूर्वमीमांसादर्शनीयपूर्वपक्षे । विकृतिषु विकृतियागेषु । सिद्धान्ते मीमांसादर्शनसिद्धान्ते। तत्रापि विकृतियागेऽपि । तदनुष्ठानं प्रयाजानुष्ठानम् । कस्यचित् प्रकृति: = कस्यचित् अङ्गि। तत्रापि श्रवणविकृतावपि । अङ्गत्वस्य विचार: अङ्गत्वविचार, तस्य फलम् । अयं भाव:- विकृती केवाञ्चिबानामनुष्यत्वस्य प्रकृत्यङ्गत्वसापेक्षतया प्रयाबादेः वर्शपौर्ण- ३२६ वेदान्तपरिभाषा । मासानङ्गत्वे वर्शपौर्णमासविकृतियागेषु तत्प्राप्तिन स्यादिति प्रयाजादेः दर्शपौर्ण- मासाङ्गत्वस्थापनं भवति सप्रयोजनम् । यदि "श्रोतव्यो मन्तव्यः' इत्यत्रापि श्रवणं कस्याप्यङ्गि स्यात्, तच्च किञ्चित्तदङ्ग, तदा तत्रापि मनननिदिध्यासन- प्राप्त्यर्थं तयोः श्रवणाङ्गताभ्युपगमः स्यात्सफलः । न चास्ति तथेति नास्ति दृष्टान्तदाष्टान्तिकत्वाभ्यामुपगतयोः सादृश्यसम्पत्तिरिति न कथमपि प्रयाज- दृष्टान्तप्रसर इति । ननु तहि कीदृशमङ्गत्व विवक्षितमित्याकाक्षायामाह- किन्तु यथा घटादिकार्ये मृत्पिण्डादीना प्रधानकारणता । चक्रा- दीनां सहकारिकारणतेति प्राधान्याप्राधान्यव्यपदेशः, तथा श्रवणमन- ननिदिध्यासनानामपीति मन्तव्यम् । यथा घटादीति व्यपदेशाकारप्रदर्शनम् । प्राधान्यञ्चाप्राधान्यं च प्राधान्या- प्राधान्ये, तयोः व्यपदेशः = व्यवहारः। श्रनणमनन निदिध्यासनानामपि प्राधान्या- प्राधान्यव्यपदेश इति सम्बन्धः । अयं भावः-न न्यायवैशेषिकमतसिद्ध नापि पूर्वमीमांसासिद्ध अङ्गत्वमत्र विवक्षितम् अपि तु लोकसिद्धं सहायकत्वमात्रमत्राङ्गत्वं विवक्षितमिति । विषयेऽस्मिन् पक्षपादसम्मतिमाह- सूचितं चैतद्विवरणाचार्यैः । शक्तितात्पर्यविशिष्टशब्दावधारणं प्रमेयावगमं प्रत्यव्यवधानेन कारणं भवति । प्रमाणस्य प्रमेयावगमं प्रत्यव्यवधानात् । मनननिदिध्यासने तु चित्तस्य प्रत्यगात्मप्रवणता संस्कारपरिनिष्पन्नतदेकाग्रवृत्तिकार्यद्वारेण ब्रह्मानुभवहेतुतां प्रतिपद्यते इति फलप्रत्यव्यवहितकारणस्य विशिष्ट शब्दावधारणस्य व्यवहित- मनननिदिध्यासने तदङ्ग अङ्गीक्रियेते इति । शक्तिश्च तात्पर्य च शक्तितात्पर्ये । ताभ्यां विशिष्टो= विशेषितो यः शब्दः, तस्यावधारण- - श्रावणसाक्षात्कारः । प्रमेयस्य अवगमः = निश्चयात्मकं ज्ञानम् । अव्यवधानेन = 'साक्षात् । प्रत्यगात्मा जीव: तत्प्रवणतालक्षणो यः संस्कारः, तेन परिनिष्पन्ना या तदेकाना = आत्मैकाग्रवृत्तिः अन्तःकरणपरिणामः, तदेव प्रयोजनपरिच्छेद. । ३०७ कार्य, तद्वारेण । ब्रह्मानुभवः अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारः, तस्य हेतुता तन्निरूपिता कारणता, ताम् । इति शब्दो हेतो। फल प्रति = अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कार प्रति । व्यवहिते मनननिदिध्यासने 3 व्यवहितमनन निदिध्यासने । तदङ्ग = श्रवणस्याङ्गे । अव्यवहितत्वोच्छवणस्य प्राधान्यम् । तेन तत्राङ्गित्व- व्यवहारः। व्यवहित्वाच्च मनननिदिध्यासनयोरप्राधान्यम् । तेन तयोरङ्गत्व- व्यपदेश इति भावः। ननु ज्ञातमिदं यत् श्रवण अङ्गि। मनन निदिध्यासने च तदङ्गभूते इति । अथा- धिकारवानेव न कोप्यवलोदयते । “यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात्" इत्यादिना सर्वेपामग्निहोत्रादिप्वेव व्याप्तत्वात् इत्याशङ्कायामाह- श्रवणादिषु मुमुक्षूणामधिकारः । काम्ये कर्मणि फलकामस्याधि- कारित्वात् । आदिना मनननिदिध्यासनपरिग्रहः । मुमुक्षूणां = मोक्षमिच्छताम् । अभि- कारः = अनुप्ठातृत्वम् । काम्यकर्मणि यागपाकादौ । फलकामस्य स्वर्गादिलोक- प्राप्तीच्छावतः । अयं भावः-ये खतु स्वर्गादिलोकप्राप्ती सस्पृहाः सत्यं तेषां न श्रवणादिष्वधिकारः । ते हि स्वर्गादिकामुकतया तदनुकूलयावज्जीवादिश्रुति- चोदिताग्निहोत्रादिमात्राधिकारिणः । किन्तु ये चाप्तकामाः आत्मकामाः मकमाः ते भेदज्ञानसाध्याग्निहोत्राघुपरताः भवन्ति खल्वधिकारिणः श्रवणमनन- निदिध्यासनेविति। ननु विवेकवैराग्यादेस्तहि कोपयोग ? इति जिज्ञासायामाह- मुमुक्षायां च नित्यानित्यवस्तुविवेकस्य, इहामुत्रार्थफलभोगविराग- स्य शमदमोपरतितितिक्षासमाधानश्रद्धानां च विनियोगः । - मोक्षविषयिणी इच्छा मुमुक्षा, तस्यां विनियोग इति व्यवहितेन सम्बन्धः । "आत्मा नित्यः तदन्ये पदार्था अनित्या." इति विवेकेनावधारणं नित्यानित्यवस्तु- विवेकः । इह = अस्मिन् लोके, अमुत्र = परस्मिन् लोके च यः फलभोग:- सुखदुःखान्यतरसाक्षात्कारः, तत्र विरागः वैराग्यं रोगाभावः, तस्य । विनियोग: = उपयोगः । अस्य प्रत्येक सम्बन्ध । शमश्च दमश्च उपरतिश्च तितिक्षा च ३२८ वेदान्तपरिभाषा। समाधानं च श्रद्धा च शमदमोपरतितितिक्षासमाधान श्रद्धाः । तासाम् । मयं भाव:- नित्यानित्यवस्तुविवेकादीनां श्रद्धान्तानामनाश्रयणे मुमुक्षवत्तावन्नोदेति । तदभावे चन श्रवणादौ प्रवृत्तिरिति मोक्षामावः। अतो मोक्षमिच्छद्धिविवेकवैराग्यादे- राश्रयण विधेयमिति। - । शमदमादीन् प्रत्येकं परिचाययति- अन्तरिन्द्रियनिग्रहः शमः । बहिरिन्द्रियनिग्रहो दमः । विक्षेपाभाव उपरतिः । शीतोष्णादिद्वन्द्वसहनं तितिक्षा । चित्तैकाग्र्यं समाधानम् । गुरुवेदान्तवाक्येषु विश्वासः श्रद्धा । अन्तरिन्द्रियाणि मनोहङ्कारबुद्धिचित्तानि, तेषां निग्रहः = विषयवैमुख्यम् । एवं बहिरिन्द्रियेत्यत्रापि । विक्षेपः = चित्तस्याव्यवस्थितिः, तदभाव: । द्वन्द्वसहनं = कष्टसहनम् । तथा शीतोष्णादिसमुत्थपीडासहनशीलता तितिक्षेत्यर्थः । ननु कर्मत्यागात्मकस्य सन्न्यासस्य कि प्रयोजनम् ? इत्याकांक्षायामाह- अत्र उपरमशब्देन सल्यासोऽभिधीयते । तथा च सन्न्यासिनामेव श्रवणादावधिकार इति केचित् । अत्र - उक्तानां षण्णां मध्ये। अभिधीयते उच्यते । सन्न्यासिनां वैदिकेन विधानेन गार्हस्थ्यत्यागपूर्वकं पारिवाज्यं समाश्रितानाम् । एवकारोऽन्ययोगव्यवच्छेदे खल्वर्ये । तथा च न ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थानामित्यर्थः । अपरमतमाह- अपरे तूपरमशब्दस्य सन्यासवाचकत्वाभावात् । विक्षेपाभावमात्र- स्य गृहस्थेष्वपि सम्भवात्, जनकादेरपि ब्रह्मविचारस्यापि श्रूय- माणत्वात् सर्वाश्रमसाधारणं श्रवणादिविधानम् । इत्याहुः । अपरे - गृहस्थस्यापि मोक्ष मिच्छन्तः। आहुरिति व्यवहितेन सम्बन्धः। सर्वाश्रम- साधारण ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थसन्यासिनां चतुर्णामाश्रमिणां कृते । अयं भाव:- उपरमशब्दो यदि भवढावकविध्या सारेग कर्मत्यागात्मकसन्यासे प्रयोजनपरिच्छेदः ३२६ भवेबसन्न्यासिनामनधिकारः श्रवणादिषु । न चैवमस्ति । किन्तु तादृशशाक्ताह मानामावेन विक्षेपामावे एव तद्रूढिरिति सर्वेषामाधमिणां श्रवणादिषु समान अधि- कार इति । ये हि सन्न्यासिनामेव केवलमिच्छन्त्यधिकारं श्रवणादिषु, तेषां मते उपरमशब्दस्य सन्न्यास एवं रूढिरिति धेयम् । ननु अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारेणैव चेन्मोभप्राप्तिः तहि सत्यकामत्व- सत्यसङ्कल्पत्वादिगुणविशिष्टोपासनस्य किं फलम् ? इत्याकांक्षायामाह- सगुणोपासनमपि चित्तकायद्वारा निर्विशेषब्रह्मसाक्षात्कारे हेतुः । तदुक्तम्- निविशेषं परं ब्रह्मसाक्षात्कत्तुमनीश्वराः । ये मन्दास्ते नु कम्प्यन्ते सविशेषनिरूपणः॥ वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात् । तदेवाविर्भवेत्साक्षात् अपेतोपाधिकल्पनम् ॥ निविशेष अतिशयरहितम् । परं = श्रेष्ठं ज्ञेयमित्यर्थः अनीश्वरा: असमर्थाः । मन्दाः = अधमाधिकारिणः । सविशेषस्य हिरण्यगर्भस्य ब्रह्मणो निरूपणं सविशेषनिरूपणं, तैः । अनुकम्प्यन्ते = क्रियाविषयीक्रियन्ते । श्रुत्या इति शेषः । ये मन्दाः निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कत्तुं अनीश्वराः, ते सविशेषनिरूपणः अनुकम्प्यन्ते इति सम्बन्धः । एवं सगुणब्रह्मशीलनात् एषां मनसि वशीकृते, अपेतो- पाधिकल्पनं तदेव साक्षादाविर्भवेत् इति सम्बन्धः । सगुणस्य ब्रह्मणः शीलनं तद्गुणविशिष्टतया उपासनं तस्मात् । अपेता -- अपगता उपाधिकल्पना यतः, तत् अपेतोपाधिकल्पनं - उपाधिरहितम् । साक्षात् प्रत्यक्षम् । तत् ब्रह्म । सहि गतं किं तेषां मुक्त्याशयाऽपि ? इत्याशङ्कायामाह- सगुणोपासकानां चाचिरादिमार्गेण ब्रह्मलोकं गतानां तत्रैव श्रवणा- धुत्पन्नब्रह्मसाक्षात्काराणां ब्रह्मणा सह मोक्षः । अचिरादिर्यस्यासी अचिरादिः, स एव मार्गः, तेन । ब्रह्मलोकं हिरण्य- गर्भस्य सत्यलोकाख्यं Firs। तत्रैव = सत्यलोक एव। श्रवणादिभिः ३३० वेदान्तपरिभापा। उत्पन्नो ब्रह्मसाक्षात्कारो येषां ते श्रवणाधु त्पन्नब्रह्मसाक्षात्काराः, तेषाम् । ब्रह्मणा सह = हिरण्यगर्भेण सह । हिरण्यगर्भस्य कार्यकालसमाप्ती, तस्मिन् मुक्ते तेनैव साई तल्लोकं गतानामपि सगुणोपासकानां तत्रत्यरेव श्रवणमनननिदिध्यासनः निविशेषं ब्रह्मसाक्षात्कृतवतां मुक्तिरवश्यम्माविनीति नानाश्वासो मुक्ति प्रति सगुणो- पासकानामिति । ननु नित्यनैमित्तिकं कर्मानुतिष्ठतां मरणोत्तरं कीदृशी गतिः ? इत्या- काक्षायामाह- कर्मठानान्तु धूमादिमार्गेण पितृलोकं गतानां उपभोगेन कर्मक्षये सति 'पूर्वकृतसुकृतदुष्कृतानुसारेण ब्रह्मादिस्थावरान्तरेषु पुनरुत्पत्तिः । तथा च श्रुतिः-"रमणीयचरणाः रमणीयां योनिमापद्यन्ते", "कपूप- चरणाः कपूपां योनिमापद्यन्ते" इति । D कर्मठः कर्मनिरताः, तेषाम् । धूमः आदिर्यस्यासौ धूमादिर्मार्गः, तेन । उपभोगेन = सुखसाक्षात्कारेण । कर्मक्षये = पितृलोकप्रापकादृष्टनाशे । पूर्व पूर्वजन्मनि कृतानि यानि सुकृतदुष्कृतानि, तदनुसारेण तदनुरूपम् । ब्रह्मादि- स्थावरान्तेषु, हिरण्यगर्भमारभ्यस्तृणपर्यन्तेषु। पुनरुत्पत्तिः = पुनश्शरीरपरिग्रहः । चरणं = आचरणम् । रमणीयचरणाः = शास्त्रानुमोदितकर्मकारिणः । रमणीयां योनि = उत्तमजन्म। आपद्यन्ते प्राप्नुवन्ति । कपूपचरणाः = शास्त्रनिपिद्ध- कर्मकारिणः । कपूपां योनि = कुत्सितं जन्म । अथ ये शास्त्रातिनिषिद्धकर्मकारिणः, मरणोत्तरं तेषां गतिः कीदृशी ? इत्या. कांक्षायामाह- प्रतिषिद्धानुष्ठायिनां तु रौरवादिनरकविशेषेषु तत्तत्पापोचित- तीव्रदुःखमनुभूय शूकरादितिर्यग्योनिषु स्थावरादिषु चोत्पत्तिरित्यलं प्रसङ्गागतेन प्रपञ्चेन। - प्रतिषिद्ध शास्त्रातिनिषिद्धं अनुतिष्ठन्तीति प्रतिषिद्धानुष्ठायिनः, तेषाम् । रौरवादयः तत्संज्ञका ये नरकविशेषाः नरकप्रभेदाः तेषु । तत्तत्पापोचितं तत्तत्पापाचरणानुरूपं यत् तीन दुस्सहं दुःखं, तत् अनुभूय = साक्षात्कृत्य ।
प्रयोजनपरिच्छेदः । शूकरादीत्यादिपदेन कुक्कुटसारमेयादिपरिग्रहः । स्थावरादिपु = वृक्षलतागुल्मा- दिपु। उत्पत्तिः = जन्म । प्रसङ्गादागतः = प्राप्तः य. प्रपञ्चो विस्तरः - वर्णनं तेन अलमिति सम्बन्धः । लघुगुरुभवात् शास्त्रनिषिद्धान्यपि कर्माणि भवन्ति द्विविधानि । तत्र पूर्वेषां फलं केवलं निकृष्टशरीरपरिग्रहः । परेषां तु दुस्सहायाम्य- यातना अपि भवन्ति इति विशेषः इति भावः । निर्गुणब्रह्मसाक्षात्कारवतस्तु न लोकान्तरगमनम् । “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्तीति श्रुतेः । किन्तु यावत्प्रारब्धक्षयं सुखदुःखे अनुभूय पश्चादपवृज्यते । निर्गुणस्य ब्रह्मणः साक्षात्कारः अहं ब्रह्मास्मीत्याकारकः अस्ति अस्येति निर्गुण- ब्रह्मसाक्षात्कारवान् तस्य । न लोकान्तरगमनं = न शरीरान्तरपरिग्रहः। तस्य निर्गुणब्रह्मज्ञस्य । प्राणः = इन्द्रियाणि । न उत्क्रामन्ति = उत्क्रमणात्मक- क्रियावन्तो न भवन्ति । यावत्प्रारब्धक्षयं = प्रारब्धात्मकवर्तमानभोगशरीराद्य- नुकूलकर्मक्षयपर्य्यन्तम् । सुखदुःखे अनुभूय अहं सुखी अहं दुःखी इति साक्षात्कृत्य । पश्चात् सुखदुःखसाक्षात्कारानन्तरम् । अपवृज्यते प्राप्नोति । निर्गुणब्रह्मजानतः शरीरात्मकप्रतिबन्धकपातमात्रेण निर्वाणमिति मावः। - अपवर्ग शङ्कते- ननु क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे । इत्यादि श्रुत्या- ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुतेर्जुन । इत्यादि स्मृत्या च ज्ञानस्य कर्मक्षयहेतुत्वनिश्चये सति प्रारब्ध. कर्मावस्थानमनुपपन्नम् । तस्मिन् = सर्वात्मभूते। परावरे सकलश्रेष्ठे। दृष्टे साक्षात्कृते। = जीवस्य । कर्माणि पुण्यापुण्यात्मकसकलकर्माणि । क्षीयन्ते नश्यन्ति । ज्ञानमेवाग्निः ज्ञानाग्निः । सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते = भस्ममात्र- शेषं करोति । अर्जुनेति सम्बोधनपदम् । श्रुतिस्मृतिभ्यां इदमवगम्यते यत् ज्ञानेन अस्य ३३२ वेदान्तपरिभाषा। सकलपुण्यापुण्यनाशी भवतीति । सति चैवं शानिनां प्रारब्धकर्मतदनुरूपभोगादिकञ्चा- नुपपन्नमिति यावत्प्रारब्धक्षयमित्यसङ्गसमिति । उत्तरयति- इति चेन्न । "तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये" इत्यादि श्रुत्या "नाभुक्त क्षीयते कर्म" इत्यादि स्मृत्या च उत्पादित- कार्यकर्मव्यतिरिक्तानां सञ्चितकर्मणामेव विनाश्यत्वावगमात् । तस्य = ज्ञानिनः । चिरं = बहुकालम् । न विमोक्ष्ये = न विमुक्तो भवति । सम्पत्स्ये सम्पनो भवति । कर्माभुक्तं न क्षीयते इति सम्बन्धः । उत्पादितं कार्य शरीरं येन कर्मणा प्रारब्धाख्येन तत् उत्पादितकार्यकर्म। तद्वयतिरिक्तानि तद्भिन्नानि सञ्चितानि कर्माणि, तेषाम् । विनाश्यत्वं = विनाशः, तस्यावगमो निश्चयः, तस्मात् । उभयेषां श्रुतिस्मृतिवचनानां प्रामाण्याविशेषण "क्षीयन्ते चास्य कर्माणि" "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि" इत्यत्र च कर्मपदं सङ्कोचेन सञ्चित- कर्मपरमिति स्वीकर्तव्यमेव । अन्यथा श्रुत्योः स्मृत्योश्च विरोधापत्त्या उभयेषाम- प्रामाण्यं प्रसज्येत । अतः झानात् सञ्चितसर्वकर्मणां नाशो भवति इत्येव वक्तव्यम् । तथा च नोक्तश्रुत्याधसङ्गतिः । जीवन्मुक्ताभावो वेति । - ननु किं तद्भवति सञ्चितं पुण्यं पापं वेति जिज्ञासायामाह- सञ्चितं द्विविधं सुकृतं दुष्कृतं च । तथा च श्रुति:- "तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां, द्विषन्तः पापकृत्यामि"ति । - सुकृतं - पुण्यम् । दुष्कृतं अपुण्यम् । तस्य - ज्ञानिनोमृतस्य । दायं भूहिरण्यानादिकम् । सुहृदः मित्राणि । साधुकृत्यां पुण्यकर्मफलम् । द्विषन्तः शत्रवः । पापकृत्यां पापफलं दु:खमित्यर्थः । अयं भावः- सञ्चितं नकविधमेव भवति पुण्यं पापं वा । अपि तु उभयम् । तत्रशानिप्राकृतामुक्त- पुण्यफलं तन्मित्राणान्, तथाविधापुण्यफलं तच्छत्रूणां भवतीति । कारणकार्य- योर्वेयधिकरण्यं तु नाशकुनीयम् । तत्पुण्यतुल्यपुण्योत्पाबादेः मित्राविषु स्वीकारात् इति।
प्रयोजनपरिच्छेदः । उपादाननाशे उपादेयनाशस्यावश्यम्भावात् ज्ञानेनाज्ञाननाशे तदुपादानकस्य प्रारब्धस्यापि नाशः स्यादेवेति कथं ज्ञानिनः प्रारब्धकर्म तिष्ठतीति कथनं संगच्छते ? - इत्याशङ्कते- ननु ब्रह्मज्ञानान्मूलज्ञाननिवृत्ती, तत्कार्यप्रारब्धकर्मणोऽपि निवृत्तेः कथं ज्ञानिनो देहधारणमुपपद्यते ? ब्रह्मज्ञानात् = अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारात् । मूलं च तदज्ञानं मूलाज्ञानं, तस्यं निवृत्तिः मूलाज्ञाननिवृत्तिः, तस्यां सत्याम् । तस्य मूलाज्ञानस्य कार्य यत् प्रारब्धकर्म तस्यापि । निवृत्तेः = नाशात् । देहधारणं = देहापातः । उपपद्यते सङ्गच्छते। अयं भावः-कपालनाशे न तिष्ठति धटः इति सर्वप्रत्यक्षसिद्धम् । सति चैवं सकलप्रपञ्चोपादानभूतस्याजानस्यात्मज्ञानेन नाशे प्रारब्धकर्मापि न स्थातुमर्हतीति ज्ञानिना प्रारब्धकर्म तिष्ठति, तद्वलेन शरीरमपि भोगात्प्रारब्धक्षय- पर्यन्तं तिष्ठतीति कथनं न युक्तिपथमवतरतीति । समाधत्ते- इति चेन्न । अप्रतिबद्धज्ञानस्यैवाज्ञाननिवर्तकतया, प्रारब्धकर्मरूप- मोतवन्धकदपाया अज्ञाननिवृत्तेरनङ्गीकारात् । अप्रतिबद्धस्य = प्रतिबन्धकरहितं यज् ज्ञानं तस्यैव । अज्ञाननिवर्तकतया = अज्ञानस्य नाशकतया। प्रारब्धकर्मरूपं यत्प्रतिबन्धकं तस्य दशायां = तदस्तित्त्वकाले अयं भावः-सत्यं पूर्णेशाने न स्थातुमर्हति खल्बज्ञानं, तत्कार्य प्रारब्धकर्म वा। किन्तुजीवन्मुक्तानां स्थूलरूपाज्ञानस्य पुनर्मवकारणस्याभावेऽपि वासनात्मकसूक्ष्मरूपेण तावदादेहपात तिष्ठत्येव । अतस्तत्कार्यभूतस्य प्रारब्धस्य कर्मणः सत्त्वं नासमज- सम् । शानत्वब्यबहारस्तु स्यूलासाननाशेनापपाते इति । ननु आत्मन एकत्वे एकमुक्तो कथं न जगन्मुक्तिरिति शङ्कते- नन्वेवमपि तत्त्वज्ञानादेकस्य मुक्ती सर्वस्य मुक्तिः स्यात् । अविद्याया एकत्वेन तन्निवृत्ती क्वचिदपि संसारायोगात् ।
वेदान्तपरिभाषा । एवमपि उक्तप्रकारेण देहापातसमर्थनेऽपि । एकस्येत्यनन्तरं जीवस्येति शेषः । एवं सर्वस्येत्यनन्तरमपि। तन्निवृत्तौ = अविद्याया: जगत्परिणामिन्या: नाशे। क्वचिदपि =कुत्रापि जीवे । संसारायोगात् = संसारासम्भवात् । अयं भावः- सिद्धान्ते आत्माप्येकः एवं तदुपाधिभूता जगदाकारपरिणामिनी अविद्याप्येका । इति एकस्य ब्रह्मात्मैक्यज्ञानिनः शरीरपाते अविद्या नष्टेति स्वीकर्तव्यमेव, तन्मुक्त्यनुरोधात् । तथा च कोऽपि कथं स्थास्यति बद्धः ? सर्वबन्धकारणीभूताया अविद्याया उच्छेदात् । अनुच्छेवे तस्याप्यमुक्त्यापत्तिरिति । समाधत्ते- इति चेन्न । इष्टापत्तरित्येके । - । इप्टापत्ते. आपत्तेरिष्टत्वात् । इत्येके इत्यनन्तरं वदन्तीति शेषः । एकजीववादे एकमुक्तो जगन्मुक्तेरापत्तिरेव निराधारा । तत्त्वत: अनेकात्मनः एवाभावात् । यदि चाद्यावधि कस्यापि वामदेवादेर्मुक्तिर्न जातेत्यभ्युपगमापत्ति: ? तदा सा खल्विष्टव। महाप्रलय एव तत्स्वीकारात् इति । बन्धकारणीभूतायाः अविद्यायाः नानात्वेन नोक्तापत्तिरित्याशयेन समाधत्ते- अपरे त्वेतद्दोषपरिहारायैव इन्द्रो मायाभिरिति बहुवचनश्रुत्यनु- गृहीमविद्यानानात्वमङ्गीकर्तव्यमित्याहुः । अपरे =केचन वेदान्तिनः। एतद्दोषपरिहारायैव = एकमुक्ती सर्वमुक्तिदोष- परिहारायव । बहुवचनस्य श्रुतिः = श्रवणं तदनुगृहीतं तदनुकूलं । अविद्यायाः नानात्वं = अनेकत्वम् । अयं भावः-सत्यप्येकस्मिन् सूर्यबिम्बे प्रतिबिम्बाधार- भूतानां सरावजलानां नानात्वे, यस्य सरावजलस्य नाशः तत्प्रतिबिम्बस्य बिम्बा- मनवावस्थानम् अन्येषां तुप्रतिबिम्बात्मना । तथा च यस्योपाषेर्नाशः तदुपाधिकस्य जीवस्य मुक्तिः नान्योपाधिकस्येति नोक्तापतेरवकाशः । उपाधिबहुत्वे तु इन्द्रो मायामिरित्यत्र मायाभिरिति बहुवचनश्रुतिः प्रमाणमिति । अन्यथा समाधत्ते- अन्ये त्वेकवाविद्या । तस्या एवाविद्यायाः जीवभेदेन ब्रह्मस्वरूपा- वरणशक्तयो.नाना । तथा च यस्य ब्रह्मज्ञानं तस्य ब्रह्मस्वरूपावरण- शक्तिविशिष्ट विद्यानाश इत्युपगमानकमुक्ती सर्वमुक्तिः ।
प्रयोजनपरिच्छेदः । - नाशः - ब्रह्मस्वरूपं आवृणोतीति ब्रह्मस्वरूपावरगं संव शक्तिः इति ब्रह्मस्वरूपावरण- शक्तिः। तथा च = आवरणशक्तीना नानात्वे च। आवरणशक्तिविशिष्टाविद्या- तादृशशक्तिभेदभिन्न विद्यानाशः । अयं भाव:-अविधाया एकत्वेऽपि तस्याः आवरणशक्ते नात्वमभ्युपेयते । सैव चावरणशक्तिभिन्ना जीवमेवप्रयोजिका । सति चवं एकावरणशक्तिनाशेन एकमुक्तावपि अपरावरणशक्तेरक्षुण्णतया नापर- मुक्तिप्रसङ्ग इति नोक्तापत्त्यवकाश इति । अत्र शारीरिकसम्मतिमादर्शयति- अत एव "यावदधिकारमवस्थितिरधिकारिकाणाम्" इत्यस्मिन्नधि- करणे आधिकारिकपुरुषाणां उत्पन्नतत्त्वज्ञानानां इन्द्रादीनां देहधारणा- नुपपत्तिमाशंक्य अधिकारापादकप्रारब्धकर्मसमाप्त्यनन्तर विदेहकैवल्य- मिति सिद्धान्तितम् । अत एव - आवरणशक्ते नात्वात् तद्भादेव च मुक्तिभेदादेव । अन्यथा केवलमाधिकारिकपुरुषं परिगृह्य शङ्कोत्तरग्रन्थौ न स्यातां कथमपि सङ्गताविति । एतदेव वाचस्पतिसम्मतिप्रदर्शननापि द्रढयति- तदुक्तमाचार्यवाचस्पतिना- उपासनादिसंसिद्धं तोषितेश्वरचोदितम् । अधिकारं समाप्यते प्रविशन्ति परं पदम् ।। इति - उपासनादिभिः सम्यकप्रकारेण सिद्ध यतीति उपासनादिसंसिद्धम् = उपासना- दिभिरुपनतमित्यर्थः । तोषितः आराधनेन अभिमुखीकृतः यः ईश्वरः तेन चोदितं प्रदत्तम् । अधिकार लोकव्यवस्थासम्पादकत्वम् । समाप्य निश्शेपं विधाय । परं पदं प्रविशन्ति मुक्ताः भवन्ति । एते आधिकारिकाः । इन्द्रचन्द्रादयः = लोकव्यवस्थासम्भावनार्थमीश्वरेण प्रदत्तं कार्यभार सुचाररूपेण सम्पाद्य मोक्षमुपगच्छन्तीति भावः । एतेन किमायातं प्रकृते ? इति जिज्ञासायामाह- एतच्चैकमुक्तौ सर्वमुक्तिरिति पक्षे नोपपद्यते । तस्मादेका विद्या- पक्षेऽपि प्रतिजीवमावरणभेदोपगमेन व्यवस्थोपपादनीया । - वेदान्तपरिभाषा। । एतच्च-आधिकारिकाणामधिकारसमाप्तिक्रमेण मुक्तिप्रतिपादनं च । चस्त्वर्थे । एकमुक्तौ सर्वमुक्तिरिति पक्षे इष्टापतिपक्षे । नोपपद्यते = न सामञ्जस्यमेति । आवरणभेदोपगमेन एकस्या अविद्यायाः आवरणभेदस्वीकारेण । व्यवस्था - केचन बद्धाः केचन मुक्ताः इति स्थितिः । परिच्छेदार्थमुपसंहरति- तदेवं ब्रह्मज्ञानान्मोक्षः । = तस्मात् । एवं = आगन्तुकनानाशङ्कापरिहारे सति । ब्रह्मज्ञानात् = अहं ब्रह्मास्मीति साक्षात्कारात् । मोक्ष इत्यनन्तरं भवतीति सिद्धमिति शेषः । व्याख्यातमेव मोक्षपदार्थ पुनः स्मारयति- मोक्षश्चानर्थनिवृत्तिः, निरतिशयब्रह्मानन्दावाप्तिश्चेति सिद्ध प्रयोजनम् । अनर्थः अज्ञानं, तस्य निवृत्तिः नाशः । निरतिशयः निविशेषः यः ब्रह्मरूपः - आत्मरूपः आनन्दः, तदवाप्तिः तन्मात्ररूपेणावस्थानम् अज्ञान- परिणामाभावेन अविवर्तमानता । अयमेवार्थः पूर्व प्राप्तप्राप्तव्यपरिहृतपरिहारादि- प्रदर्शनेनोक्तम् । सिद्ध प्रयोजन = प्रयोजनमस्तीति सिद्धम् इत्यर्थः इति शिवार्पणमस्तु । माता भगवती यस्य पिता च बबुनन्दनः । चन्द्रशेखरशर्मा तु यस्यासीत् प्रथमो गुरुः ॥ ( २ ) द्वितीयस्तर्कवागीशः सम्राट्सम्मानभाजनम् । फणिभूषणशर्मोद्यमशः कुमुदबान्धवः ॥ स्फुरन्महामहोपाध्यायोपाधिः शिवतां गतः । पामाचरणशर्मासीत् तृतीयः शास्त्रवारिधिः ॥
प्रयोजनपरिच्छेदः ।
सीताऽऽसीत् प्रथमा पली यज्जातेयमरुन्धती ।
पद्मा भवनपद व द्वितीया यत्समिणी ॥
यतः सत्तनयावेती मृत्युञ्जयधनञ्जयो ।
वसुन्धरा तथ । सत्यम्भरा विश्वम्भरा, सुताः ।।
तेनानन्दने विदुषा विषडष्टकसम्मिते ।
शाके व्यरचि टीकेयं बोधायाल्पधियामपि ॥
विहारप्रान्तदमंगामण्डलान्तर्गते शुभे ।
सिंहवाड़ाभिधे ग्रामे सुरम्ये लब्धजन्मना ॥
(८)
अनेन सम्प्रसन्नास्तु मिथलेला मम प्रसः ।
आविबभूव यद्गर्भान्महामायाञ्च मैथिली ।
अपर्णाऽपि कृपापर्णा सगुणाप्यगुणानुगा ।
अशिवापि शिवामोदाऽजनका जनकान्विता ।
इति कवितार्किकवर्यवेदान्तवागीशाचार्यश्रीमदानन्दझाविरचिता-
-
भगवती-
-
समाप्ता
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शब्दानुक्रमणिका अ अक्षमा अखण्डचैतन्यम् अग्निष्टोमम् अजहल्लक्षणा अज्ञातार्थज्ञानजनकत्वरूपम् (प्रामाण्यम्) अज्ञानम् अतिव्याप्तिः १८२ ३२३ १७१,१७२, १७८,१७६ १०, ११, १२, १३, १६,२१,३१, ४०,४१,४२,५२,५५, ५७,५८, ६६,७०,७२,८०,८१,८२,८३, १८, ११३, ११६, ११७, ११८, १२०, १२४, १२५, १४८, १५०, १६१, २१५, २२०, २३७, २४८, २४६, २५२, २८५, २६४, २६५ २८, ३७, ३९,१५,१०६, ११३, २१५, २१६, २१. १३७, १३८, १४३,२०६, २२५, २२६, २३२, २३७ अतीन्द्रियम् अत्यन्ताभावः - अत्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यसामानाधिक- रण्यरूपा व्याप्तिः अद्वैतम् अतवादी अतिः अध्यासः १२६,१२७ २,१३ ४ २५, २६ १८,२७, २८,३५, ५५, ८६,६१, ६२, १८, १०१, १०२, १०३, १०४, २५२, २५३, २५४, २५५, ( i ) अध्यासः, तूलाज्ञानमूलक:- अध्यासः, मूलाज्ञानमूलक:- अध्वरीन्द्रः- &0 - अध्वरीन्द्रः, धर्मराज- अनाविद्या अनिर्वचनीयख्यातिः भ्रमप्रत्यक्षम् अनुपपत्तिः, अन्वय- अनुपपत्तिः, अभिधान- अनुपपत्तिः, आ अभिहित- अनुपपत्तिः, अर्थ- अनुपपत्तिः, तात्पर्य- प्रामाण्यसंशय- अनुपपत्तिः, शब्द- अनुपपत्तिः, संशय- अनुपपत्तिज्ञानम् अनुपपत्तिज्ञानम्, तात्पर्य- अनुपलब्धिः -- अनुपपत्तिः, २, ४, ५, ७, १०, १४, १६, ५२, १५०,१८५ १, ५, ६, ९ १०५ २२६ १७६ २०७ २०७, २०६ २०७ १७८, १७६ २४१, २४२ २०७ २४२ २०६,२१० २०६ २०, ३६, ६०, २१२, २१५, २१६, २१७, २१९, २१६, २२०, २२२, २२३, २२८, २३७ २१७, २१६, २२० २१४, २१६, २२५ ३२६, ३२७ ११,१४, २०,२१,२५, ३२, ३५, ३६,४१, ४२,५०, ६०, ६७, ८४, ११६, ११७, ११८, १२६, १२७, १३०, १३३, १३७, १३८, १४३, १४५, १४६, १६०, १६२, १६५, १९६, १९५, २०१, २०६, २१०, २११, २१२, २१५, २१६, २२०, २५७, २८४, २९७, २६६, ३००, अनुपलब्धिः, योग्या- अनुपलब्धिप्रमाणम् अनुभवः, ब्रह्म- अनुमानम् (iii ) २३६ ४६ अनुमानम्, अविद्या- अनुमानम्, केवलव्यतिरेकी- अनुमानम्, केवलान्वयि- अनुमानम्, परार्थ- अनुमानम्, व्यतिरेकी- अनुमानम्, स्वार्थ- अनुमानप्रमाणम् अनुमितिः १२८ १३०, १३१ २१० १३०, १३१ ४६,५६, १२३ १४, २१, ३१, ३२, ३४, ३५,३६, ४२,४६,४६, ५५, ५६, ८०,८१, ६५, ११३, ११६, ११७, १२०, १२१, १२२, १२३, १२४, १२५, १२८, १२६, १३०, १३३, १३४, १३५, १४५, १४६, १४७, १६६, २१०, २१२, २१३, २३६, २४३ - ११०, २१२ ११८, ११९ ५२, २११ अनुमितिः, स्वार्थ- अनुमितिः, व्यतिरेकी- अनुमितिकरणम् अनुमितिज्ञानम् अनुमितित्वम् अनुमितिरूपा अर्थापत्तिः अनुव्यवसाय: अन्त.करणम् ४५,४७ २११ ५, २४, २५, २६, २७, २८,२६, ३१, ३४,३५, ३६, ३७, ३८,४०, ४२, ५१, ५६, ६२,७१, ७२,७३, ७४, ७५,७६, १००, १०३, १२४, १६१, १६२, २६८, २६६, २७६, २८०, २८१, २८२, २८८, २६०, २६२, २६४, २६७, ३१२, ३१३, ३१३, ३२० ४३ अन्तःकरणधर्मत्वम् ( iv ) अन्तःकरणविशिष्टचैतन्यात्मकजीव: ७३ अन्तःकरणवृत्तिः ८, १०, १६, १७, २३, २४, ३३, ३४, ३५, ३६,३८,३६,४१,४२, ४५, ५६, ६०, ६६,८१, ८२, ८६, ६५, १६, १२४, २४३, २८५, २८७, २८६, २६०, २६१, २६३, २९४, २६५, ३०७ अन्तःकरणवृत्तिः, स्मृतिरूपा- ४० अन्तःकरणवृत्यवच्छिन्नचैतन्यम् ८५ अन्तःकरणवृत्यात्मकज्ञानम् २९६ अन्तःकरणानि, मनोबुड्यहंकारचित्ताख्यानि २५६ अन्तःकरणावयिताचतिव्यम् ५२, ५३, ५४, ५५, ६७,७०,७१, ७२,८१,६३, २२२, २६२, २९४, २९७ अन्तःकरणोपहितचैतन्यम् ७०,७३,६१,२४३ अन्तरिन्द्रियाणि मनोहङ्कारबुद्धिचित्तानि ३२८ अन्यथाख्यातिः २२७ अन्यथाख्यातिः भ्रमप्रत्यक्षम् २२६ अन्योन्याभावः २२८, २३२, २३३, २३७ अन्योन्याश्रयापत्तिः १८९ अन्वयः १४४, १२६, २१९, २२१, ३२०, ३२१ अन्वयन्ततिरेकव्याप्तिः १२७ अन्वयव्यतिरेकिलिंगम् १२६ अन्वयव्याप्तिः १२८, १२६, २१२ अन्वयव्याप्तिज्ञानम् २१० अन्वयानुपपत्तिः अपरं लिंगशरीरम् २६४ अपरोक्षज्ञानम् अपवर्ग: अपौरुषेय मागमः २०२ ( v ) ४ अप्पयदीक्षितः अबाधितार्थज्ञानजनकत्वरूपम् (प्रामाण्यम्) अभावः अभाव:, अत्यन्त- - - अभावः, अन्योन्य- अभाव:, प्रध्वंस- अभावः, प्राक- - अभावः, सन्निकर्ष- अभावज्ञानम् अभावप्रत्ययालम्बनावृत्तिः अभावाकारवृत्तिः अभिधानानुपपत्तिरूपा श्रुतार्थापत्तिः अमिधानानुपपत्तिरूपा श्रुतार्थापत्तिप्रमा अभिहितानुपपत्तिः अयुतमिद्धप्रतियोग्यनुयोगिक: सम्बन्धः अर्थवादवाक्यम् अर्थानुपपत्तिः अर्थापत्तिः २१५, २१६, २१८, २२८, २३७, २८८, ३०३, ३०४ १३७, १३८, १४३, २०६, २२८, २२९, २३२, २३७ २२८, २३२, २३३, २३७ २२८, २२९, २३७ २२८, २२९, २३०, २३२, २३६, २३७ २२१ २२०, २२१, २२२ १२ २२०,२२३ २०७, २०८ २०० २०७, २०९ ५० १०२, १८३,१८४ २०७ २०, ३६, ४१, ४२, ४७, ४६, ६०, १२९, १६०, १८३, २०३, २०५, २०६, २११, २१२ अर्थापत्तिः, अनुमितिरूपा- अर्यापत्तिः, दृष्ट- अर्थापत्तिः, प्रमाणभूता- अर्थापत्तिः, प्रमाभूता- अापत्तिः, श्रुत- अपत्तिप्रमा २०५ २०६ - २०५, २०६, २०७, २०० २०३, २०७, २१० ( vi ) २०३, २०७, २१०, २११ २१३ १०२ १७४ १७७ M ३३ २८ अर्थापत्तिप्रमाणम् अर्थापत्तिरूपा प्रमा अर्थावच्छिन्नचैतन्यम् अल्पज्ञचैतन्यम् अल्पज्ञत्वविशिष्टचैतन्यम् अवच्छेदकम् अवच्छेद्यम् अवच्छेद्यावच्छेदकभावम् अवच्छेदिका शक्तिः अवयवसंयोगः अवयवाः, उदाहरणोपनयनिगमनरूपा:- अवयवाः, प्रतिज्ञाहेतूदाहरणरूपा:- अवस्था, जाग्रद्- अवस्था, स्वप्न- अवस्था, सुषुप्ति- अविद्या १६२ १३२ २८४, २८५, २६४ २८४, २९४, २९७ २८४ १,२,३, १९, ७५, ७६, ८२,५६, १८, २९, ९०,९१, ९३, ९४, ९५, ९६, ९७, ९८, १००, १०२,१०३, १०४, १०५, १०६, १५१, २२५, २२७, २३३, २३४, २३६, २४८, २५२, २५५, २७३, २७५, २८०, २८३, २८४, २९६, २८७, २८९, २८९, २९५, ३०८, ३०९, ३१०, ३३३,३३४,३३५, ३३६ - - अविद्या, अनादि- अविद्या, तूला- अविद्या, मूल- आवद्यानुसार अविद्यावृत्तिः अविद्योपहितचैतन्यम् १०५.३०२ १०५,१०६ २३६ २५६ (vii) अव्याप्तिः १२, १३, १४, १५,१६,१७, १८, १९, २२, २३, २४, ३२, ३६,४०, ५८, ५६, ६१, ६३, ६५, ६६,८०, ८२, ११३, १२४, १२५, १२६, १५१, १६१, १६८, १७१, १६१, २४०, २५२ २५,२६ . अश्रद्धा असमवायिकारणम् अस्मदादिलिंगशरीरम् अहंकारः आ आकांक्षा २६४ २६, ६१, ६३, २५६, २७५ - १४८, १४६, १५०, ११, १५२, १५४, १५५, १५६, १८३, १८४, १८५, १९० २०, ६०, १४८, २१२, ३००, आगमः -- आगमः, अपौरुषेय- आगमः, पौरुषेय- २०२ २०२ १३७,२४६ आगमप्रमाणम् आचार्यः, चित्सुख- आचार्यः, पद्मपाद- आचार्यः, शंकर- आचार्यः, सुरेश्वर- भाचार्यवाचस्पतिः आत्मज्ञानम् आत्मा ४,५ - ३१२, ३३५ २, ६८, २४९, २५२, २५६, २६४, २७०, २८४, २९६, २९७, २९६, ३०७, ३०८,३०९, ३११, ३१८, ३१६, ३२४, ३२७ २६७ आत्यन्तिकः प्रलयः ( viii ) २ आनन्त्यम् आनन्दस्वरूपम् आनुपलब्धिकं ज्ञानम् आवरणशक्तिः आवरणशक्तिः, ब्रह्मस्वरूप- आवरणशक्तिप्रधाना अविद्या आसत्ति: २१६ ३३५ ३३४, ३३५ ७३ १४८, १४६, १५८, १९५, १८६, १९० इ इतिहासः इन्द्रियम् ३०४,३०५ ११, २८, २९, ३१, ३२, ३३, ३४, ३७,४५, ४७, ५१,६०, ६५, ९३, १८, ६६, १००, १०२, १०३, ११४, ११६, १२४, १४६, २२१, २२४, २५९, २८५, २६४, २६५, २६०,२६३ २६३ इन्द्रियम्, कर्म- इन्द्रियम्, शान- इन्द्रियजन्यं प्रत्यक्षम् इन्द्रियजन्यज्ञानत्वम् इन्द्रियविषयसन्निकर्षः इन्द्रियसन्निकर्षः ८६ १०, ११, २१, २४,४५, ५६, ६२, ७८, ९५,९६,१०१, १११, ११२, १४४, १४५, १४७, १२०, २२६, २३८,२३६ ११३ २२, २३, ८० ८४. ७१,१०६, २३३, २५२ इन्द्रियाजन्यं प्रत्यक्षम् इन्द्रियार्थसनिकर्षः इन्द्रियार्थसनिकर्षजन्यं ज्ञानम् ईशः ( ix ) chor ईश्वरः १, ३२,७३,७६,७८,८७, १२०, १६१, १७४, १८८, २४८, २४६, २६६, २८०, २८३, २८४, २९८, ईश्वरः, कारणोपाधि:- ईश्वरकृष्णः ईश्वरचैतन्यम् ईश्वरसाक्षिप्रत्यक्षम् ईश्वरीयतात्पर्यज्ञानम् २८० २५८ ७४, २७६, २८१ ७०,७८ १८८ उ ३१७ १८४ १३२ २०३, २०५ २०४ २०३, २०५ २०४ २०, ६०,१४५, १४७, १४८,२१२ उत्तरमीमांसासूत्रम् उत्पत्याश्रिता (अन्योन्याश्रयापत्तिः) उदाहरणोपनयनिगमनरूपाः अवयवाः उपनिषदः उपपादकज्ञानम् उपपादकत्वम् उपपाद्यज्ञानम् उपपाद्यत्वम् उपमानम् उपमानप्रमाणम् उपमिति: उपरतिः उपादानम् उपादानम्, परिणामि- उपादानसमसत्ताककार्यापत्तिः उपादानवषिमसत्ताकः उपादानवषिमसत्ताककार्यापत्तिः उपाधिः १४४,१४७ ३२७, ३२८ १०४, २७५,३३३ २२५ ८७ ८६ ५१,७१,७३,७४,७६, ७७, २३४ २८०, २८८, २९२, २६६ ( ४ ) ४८,५० ७८ उपाधित्वम् उपाधिमूता माया उपाध्यायः, गंगेश उपाध्यायः, रविदत्त- ५ ऋ ऋग्वेदः ए ऐक्यम्, जीवब्रह्मणो:- ऐकात्म्यज्ञानम् २ २० करणम् २१, २३, ३२, ११६, ११७,११९ १२२, १२४, १२६, १३१, १४४, १४६, २०५, २११, २१४, २२०, ३१४, ३१५ ११८,११६ १०, ११, १४ ३२७ ३३१, ३३२, ३३३, ३३५ - करणम्, अनुमिति- करणम्, प्रमा- कर्म, काम्य- कर्म, प्रारब्ध- कर्म, सञ्चित- कर्ममीमांसकः कर्ममीमांसा कर्मेन्द्रियम् मन्द्रियपञ्चकम् कामः काम्यकर्म कारणम्, असमवाय- कारणम्, परिणामि- कारणम्, समवायि- कारणोपाधिः ईश्वरः कार्यब्रह्म . १९७,१९८ १५२, १६१,१६४ २६०, २६२ ३० २५, २६,४२,४३ ३२७ २५७ २४८, २७५ १४०, १४१, २३०, २७५, २७८ २८० २६९, २७०, २७१ - (xi ) १०४ १०४ २८० १६८, १६६, १७१ १२७ १२६ ४३ कार्यविनाशः, निवृत्तिः- कार्यविनाशः, बाधः कार्योपाधिः जीवः कुम्भकोणम् केवललक्षणा केवलव्यतिरेकव्याप्तिः केवलव्यतिरेकिलिङ्गम् केवलव्यतिरेक्यनुमानम् केवलसाक्षिविषयत्वम् केवलान्वयिलिङ्गम् केवलान्वयी हेतुः केवलान्वय्यनुमानम् केवलान्वयव्याप्तिः कैमुतिकन्यायः कैवल्यम्, विदेह कौमुदी, सांख्यतत्त्व- क्रियाशक्तिः ६० १२६,१२८ १२६ १२८ १२७ ४, २३, ११३, १६१, २४४ २७०,३३५ ९ २६९ ग गङ्गशोपाध्यायः गीता गुणाः सत्वरजस्तमांसि गौडब्रह्मानन्दपादः गौणज्ञानम् गौडप्रयोजनन् ग्रन्थः, विवरण- २५८ १३ २८५ १६३ घ्राणरसनचक्षुःश्रोत्रत्वगात्मकानि इन्द्रियाणि ११३ चित्तम् चित्तवृत्तिः (xii ) २ चित्स्वरूपम् चित्सुखाचार्यः चिन्तामणिः टीका चैतन्यम् चैतन्यम्, अखण्ड- चैतन्यम्, अन्तःकरणावच्छिन्नम् - १३७, १४३,२३६ ५ २२, २३, २४, २५, २८,३३, ३५, ३७, ३८,३९, ४०,४४,४५, ५१, ५२,७६, ७३, ७६, ८०, ९०, १०१, १०५, १३९, १७४, १७६, २३१,२४६, २६९, २५१, २८६, २८७, २६०, २९१, २९२, २९४, २६८ १८२ ५२, ५३, ५४, ५५, ६७, ७०,७१, ७२, ८१, ८५, ९३, २२२, २६२, २६४, २६७ ७०, ७३, ९१, २४३ १०२ १७४ १७७ २८६ ७४, २७९,२८१ २७६, २५१, २८९, २९०, २६१, २६२, २९४, २९८ ५७,५८ ३३, ३४,४१,४५,४७, ६६, ८०, ८१,२२२ - . चैतन्यम्, अन्त:करणोपहित- चैतन्यम्, अविच्छिन्न- चैतन्यम्, अल्पज्ञ- चैतन्यम्, अल्पज्ञत्वविशिष्ट- चैतन्यम्, अविद्योपहित चैतन्यम्, ईश्वर- चैतन्यम्, जीव- - - चैतन्यम्, परिमाणावच्छिन्न- चैतन्यम्, प्रमाण- चैतन्यम्, प्रमाणावच्छिन्न- चैतन्यम्, प्रमातृ- चैतन्यम्, प्रमावच्छिन- वेतन्यम्, ब्रह्म- ३४, ३५,५२,५५, ५७, ५८,८६, ८७, १४, २९३ ८१ २९० - (xiii) - २२२ २२२ - चैतन्यम्, भूतलनिष्ठघटाभावावच्छिन्न- चैतन्यम्, भूतलावच्छिन्न- चैतन्यम्, भ्रान्त्यवच्छिन्न- चैतन्यम्, मायावच्छिन्न- चैतन्यम, मायोपहितं- चैतन्यम्, रूपावच्छिन्न- चैतन्यम्, विषय- ८१ ७७,२९३ - ५७,५८ ३३, ३४, ३५, ४१,४५,४७,५५, ६६, ८०, ८१, ८५, ८६,६१, २२२,२९३ चैतन्यम्, विषयाकारवृत्तिप्रतिबिम्बित- चैतन्यम्, विषयावच्छिन्न- चैतन्यम्, वृत्त्यवच्छिन्न- चैतन्यम्, वृत्युपहितं- चैतन्यम्, शुक्त्यवच्छिन्न- चैतन्यम्, शुद्ध- चैतन्यम्, सर्व- चैतन्यम्, साक्षि- चैतन्यम्, स्वरूप- ३६,४१, ६२,६७,११२ ५६, ८७ २८७ २३२ १०३, १७७, १७९, २५६ १७४ १०३ १५७, २८५ जगतः मिथ्यात्वम् २ जगन्मुक्तिः ३३३, ३३४ जरायुजाख्यानि अण्डजाख्यानि स्वेदजाख्यानि उद्भिजाख्यानि चतुर्विधानि स्थूलानि शरीराणि २६५ ६५, १७१, १७२, १७३, १७४, जहदजहल्लक्षणा १७५, १७७, १७० जहल्लक्षणा १७१, १७२, १७३, १७८ जाग्दवस्था २८४, २८५, २६४ पातिशक्तिज्ञानम् १६५ (xiv ) जिज्ञासासंशयशक्याप्राप्तिप्रयोजनसंशय- व्युदासाः पञ्च, प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनय- निगमानि पञ्च इति दशावयवाः जीवः ६८,७०, ७१, ७३,७४,७७, ६७, ६८, १०६, १७४, २३३, २४४, २४५, २४८, २४६, २५२, २६६, २६७, २७३, २७५, २७६, २८०, २८१, २८२, २८३, २८४, २८६, २८८, २८९, २६२, २६३, २६६, २६७, २८, २९६,३०१, ३०२, ३०३, ३०४,३०५, ३११, ३१३, ३२०, ३२६,३३१, ३३४, ३३५ - - जीव:, अन्तःकरणविशिष्टचतन्यात्मक- जीवः, कार्योपाधिः- जीवः, प्रमातृ- जीवचैतन्यम् २८० ३१३ २७६, २८१, २८६,२६०, २६१, २६२, २६४,२६८ ३३२,३३३ २ ७०,७८ जीवन्मुक्तः जीवब्रह्मणोरक्यम् जीवब्रह्म क्यबोषवाक्यत्वम् जीवासाक्षिप्रत्यक्षम् जीवात्मा ज्योतिष्टोमयागः शप्तिगतं प्रत्यक्षत्वम् सप्त्याश्रिता (अन्योन्याश्रयापत्तिः) २०६, २१० ७६ १८९ १६५ ज्ञातता ज्ञानम् ६, ७, १०, १२, १३, १५, १६, १७, १९, २०, २१, २२, २४,३१, ३२, ३३,३८,४३, ४४,४६,४७, ४०,५१,५९,६५,६७, ६८,७३, ८४, ८६, १३,१८, ६६, १०४, (xv ) १०६,१०६, ११०, १११, ११६, ११६, १२०, १२१, १३६, १४४, १४६, १४७, १४८, १६२, १६४, २६६, १७६, १८१. १८७, १९६, २००, २०६, २०८, २०६, २११, २१४, २१६, २२५, २२६, २३८, २४०, २४१, २४२, २४५, २४६, २५०, २५५, २५६, २५६, २६१, २७४, २७८, २८५, ३०३, ३१०, ३११, ३१३, ३१४, ३१५, ३१६, ३१८, ३२०, ३२१, ३२६, ३३१, ३३२,३३३ २०६,२१० ५२,२११ ३१२ २२०, २२१,२२२ - ज्ञानम्, अनुपपत्ति- ज्ञानम्, अनुमिति- ज्ञानम्, अन्तःकरणवृत्यात्मक- ज्ञानम्, अपरोक्ष- ज्ञानम्, अभाव- ज्ञानम्, आत्म- ज्ञानम्, अनुपलब्धिक ज्ञानम्, इन्द्रियार्थसनिकर्षजन्यं ज्ञानम्, उपपादक- ज्ञानम्, उपपाद्य- ज्ञानम्, ऐकात्म्य- ज्ञानम्, गौण- ज्ञानम्, तात्पर्य- ज्ञानम्, निर्विकल्पक- ज्ञानम्, पक्षधर्मता- - २०३,२०५ २०३, २०५ २० १८५ १८७, १८६, १६०, १६३, १६४ ६५ १२०, १२१, १२२, १३१, १३२, - - - ज्ञानम्, पदार्थ- ज्ञानम्, प्रत्यक्ष- शानम्, प्रमा- ५ ७६,११४ २०३, २३६,२३७ ( xvi ) ज्ञानम्, प्रमात्मक ज्ञानम्, बाप- ज्ञानम्, ब्रह्म- १८८ १०७ ज्ञानम् भ्रान्ति- - ५, ६, ६५, ८२, ८३, १२५, १२६, १४२, २३१, ३०६, ३१८, ३३३, ३३४, ३३६ ८३ २८५ ६६, २०४ ज्ञानम्, मुख्य- ज्ञानम्, यथार्थ ज्ञानम्, वृत्यात्मकम् ज्ञानम्, वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानम्, व्याप्ति- २२ ६४ ११७, ११८, ११६, १२२, १२४, १२५, १२६, १२७, १२८, १२६, १३०, १३१, १४५, १४६, २१४, २१५,२१६ ज्ञानम्, व्याप्तिपक्षधर्मता- झानम्, शक्ति- ज्ञानम्, संज्ञासंजिसम्बन्ध- ज्ञानम्, संसर्गानवगाहि- ज्ञानम्. संस्कारमात्रजन्यं- ज्ञानम्, स्वरूप- ज्ञानत्त्वम्, इन्द्रियजन्य- ज्ञानशक्तिः १६४ १४७ ६४ ६३ २२,५९ २६६ २५ ज्ञानात्मिका वृत्तिः ज्ञानेन्द्रियम् मानेन्द्रियपंचकम् जयगतं प्रत्यक्षत्वम् २६,२६३ ३० ट टीका, चिन्तामणिः टीका, तकंचूडामणिः टीका, बालव्युत्पत्तिदायिनी- टीका, ब्रह्मानन्दी ६ ( xvii ) त तटस्थलक्षणम् तत्वदीपिका ग्रन्थः) तत्वमसि २४५, २४७, २४८, २५०, २५५, २७६, २७९ २३६ ६४, ६५, ६६,६८, ६६, १५१, १५२, १५७, १७४, १७६, १७७, १७८, १८२, १३६, २४४, २४५, २७६, २८४,२६६, २९८, २६६, ३०१, ३०३, ३०४, ३१२, ३१३, ३१४, ३१५, ३१६, ३१७ तदात्मतादात्म्यम् (सन्निकर्षः) तन्मात्रसृष्टिः तर्कचूडामणिः तर्कचूडामणिः टीका तात्पर्यज्ञानम् w ५ १४८, १४६, १८६, १७, १८६, १६०, १६३,१४ १८८ १७८, १७६ २०६ तात्पर्यज्ञानम्, ईश्वरीय- तात्पर्यविषयत्वम् तात्पर्यानुपपत्तिः तात्पर्यानुपपत्तिज्ञानम् तादात्म्यम् (सन्निकर्षः) तादात्म्यसम्बन्धः तितिक्षा तुरीय: प्रलयः तूलाज्ञानम् तूलाज्ञानमूलकः अभ्यासः तूलाविद्या तृतीयलिंगपरामर्शः तृतीयलिंगपरामर्शः, व्याप्तिस्मरण- १४१,२५१ ३२७, ३२८ २७३, २७४ २८७ ६८ १०५,३०२ ११९, १२२ १२२, १२३ दण्डापूपन्यायम् ७७ ( xviii ) दण्डापूपायितम् ७३, ८९,१०३, १२६, १२६ दमः ३२७, ३२८ दर्शपूर्णमासः ३२३, ३२४, ३२५, ३२६ दशावयवाः, जिज्ञासासंशयशक्यप्राप्तिप्रयोजन- संशयव्युदासाः पंच प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनय- निगमानि पंच १३३ दीक्षितः, अप्पय- दीक्षितः, पेद्द- ५,६,७,१३,१५१,३१७ दुष्कृतं, सञ्चितम् दृष्टार्थापत्तिः २०५ दृष्टिः, लौकिकी ३१४ दृष्टिः, शास्त्रीया- देवदत्तः ४३, ६४, ६५, ६६, ६७,६८, १६१, १७३, १७४, १७५, १७७, १९८, २०७, २७७, ३०४ - द्वैतम् १०८, १०६, ११०, २०६ ४३ १, ५, ६,६ २५, २६ २५, २६ धर्मः, व्यधिकरण- धर्मत्वम्, अन्तःकरण- धर्मराजाध्बरीन्द्रः धर्मार्थकाममोक्ष: धीः धृतिः न नरसिंहाश्रमः नव्यनैयायिकः नव्यवैशेषिक: नित्यप्रलयः नित्यसपशपरमेश निदिध्यासनम् ३,४ १५,१६ ४८ २६७, २७१, २७४ १९७ ३१२, ३१५, ३१७, ३१८, ३१९, ३२०, ३२१, ३२२, ३२३, ३२४, ३२५, ३२६, ३२७, ३३० (xix) निद्रा १२, ६६, १००, १०१, १०४, १०५ १८२ निन्दार्थवादवाक्यम् निरतिशयं सुखम् निरतिशयब्रह्म निरूपाधिक: निर्गुणब्रह्म निर्वाणम् निर्विकल्पकम् ३३४,३३५ ३७९,३३१ १३, ६७, १७४, १८२, २११, २७८, ३०४ निर्विकल्पकज्ञानम् निर्विकल्पकप्रत्यक्षम् निर्विशेषब्रह्म निवृत्तिः कार्यविनाशः नैमित्तिकः प्रलयः नैयायिक: ६३, ६४,७० ३२९, ३३० १०४ २६७,२७१, २७२,२७४ ४८, ५२, ७२, ७८, ९, १०, २३०, १३५, १६३, १९७, २०१, २२१, २४७, २४६, २७५, २७८ - ७७ नैयायिकः, नव्य- न्यायम्, दण्डापूप- न्यायः न्यायः, वीचीतरंग- कैमुतिक- न्यायभाष्यम् न्यायसूत्रवृत्तिकृत् - न्यायः, ४, २३, ११३, १६१, २४४ प पक्षधर्मताज्ञानम् १२०, १२१, १२२, १३१, १३२, पंचकम्, कर्मेन्द्रिय- पंचकम्, ज्ञानेन्द्रिय- ३० (xx ) ६ २५६ २६० २५८,२५९ २६० २६२ पंचपादिका पंचपादिकाविवरणाख्यग्रन्थः पचभूतानि पंचभूतः, रजोगुणोपेतैः पचभूतैः, सत्त्वगुणोपेतैः पंचवायवःप्राणापानव्यानोदानसमानाख्या: पंचीकरणम् पंचीकृतानि भूतानि पदमात्रवृत्तिः पदार्थः, लक्ष्य- पदार्थः, शक्य- पदार्थः, सत् - पदार्थज्ञानम् पद्मपादाचार्यः परं लिंगशरीरम् परमात्मा परमेश्वरः १८० - १६७,१६८ १६८ २४५ ६१ २६४ ७७, ७८, १६८, २००, २०१, २०२,२४६, २५६, २६२, २६६, २६७, २७६, २८०, २८१, २८२, २८४, २६२, २६६, ३००, ३०२, १६७ परमेश्वरः, नित्यसर्वज्ञ- परमेश्वरोपाधिभूतमाया परम्परासम्बन्धः परामर्शः परार्थानुमानम् परिणामः परिणामाभ्युपादानम् परिणामपरिणामिभवः परिणामात्मिका वृत्तिः १६६, १७०, २०० ११८, १२०, १२२, १३०, २३६, २६५,३१४ १३०, १३१ ८७,८८, २२८ ८७,८८ २४, २५ (xxi ) परिणामि कारणम् परिमाणालिनचैतन्यम् पातंजलसूत्रम् पारमार्थिकम् २४८, २७५ ५०,५८ १०१, ११०, १२५, १३५, १४३, २२८, २३२ - १४१, १४२ २४४ ८७,८८ २६२, २६४, २७२,३०४, ३०५ २५८, २७६ २९७, २९८, २९६, ३१६ पारमार्थिक, सत्वम्- पारमार्थिकः सत्पदार्थः पारमार्थिकतत्वावेदकत्वं प्रामाण्यम् पारमाथिकसत्ता पुराणम् पुराणम्, विष्णु- पुरुषः पुरुषार्थ: पूर्वमीमांसा पूर्वमीमांसादर्शनम् पेद्ददीक्षितः पौरुषेय बागमः पौरुषेयत्वम् प्रकृतिः प्रतिशाहेतूदाहरणरूपाः अवयवाः प्रतिपातपारकभावः सम्वन्धः प्रत्यक्षम् ३२६ ३२५ ५,६,७,१३, १५१, ३१७ २०२ २०१,२०२ ७३, ७५,७६, ७८ १३२ २ ६,११,१४, १५, १६, १९, २०, २१, २२, २३, २७,३१, ३२, ३३, ३४, ३७,३८, ३६,४०,४१,४२, ४६, ५८, ६५२,४,५,९५, ९६,१०६, ११२, ११३, ११५, १२०, १२४, १३३, १३९, १४३, १४४, १४५, १४७, १५६, १९६० २००, २११, २१२, २१४, २११, २२२,२२३, २२५, २३८, २३९, २९८, ३००, ३१२, ३१३, ३१४, ३१५, ३१७, ३२६, ३३३ (xxii ) - प्रत्यक्षम्, इन्द्रियजन्यं- प्रत्यक्षम्, इन्द्रियाजन्य- प्रत्यक्षम्, ईश्वरसाक्षिः प्रत्यक्षम्, जीवसाक्षि- प्रत्यक्षम्, भ्रम- प्रत्यक्षम्, निर्विकल्पक- प्रत्यक्षम्, सविकल्पक- प्रत्यक्षत्वम् ११३ ११३ ७०,७८ ७०, ७८ २२६ ६३,७० ६३, ७० २८,४३, ४४, ४६,४७,५१,५२, ५४, ५६, ६१, ६२, १४० ७६ - ७६ प्रत्यक्षत्वम्, ज्ञप्तिगतं प्रत्यक्षत्वम्, ज्ञेयगतम्- प्रत्यक्षत्वम्, विषयगतम्- प्रत्यक्षत्वम्, विषयिगतम्- प्रत्यक्षज्ञानम् प्रत्यक्षप्रमा प्रत्यक्षप्रमाणम् प्रत्यभिज्ञा ७६, ११४ २३६ ८,४६, ११६, ११७, २२३ १९८, १६६, २०० १९, २०, २७, २८, १०, ११, १३, १४, १०७, १०८, १०६, ११०, ११२, ११५, १३६, १४०, १४१, १७६, १८७, २००, ३०० प्रत्ययः प्रत्ययः, सामानाधिकरण्य- प्रत्यासत्तिः प्रध्वंसामाव: प्रमा २२८, २२६, २३७ ११, १३, १७, २०,२१, २२, २३, ८२,१३,१७६, १६६,२०४,२०६, २२२, २२३, २२५, २३६, २४०, २४१, ३०२, ३०३, ३१२, ३१६, प्रमा. अर्धापत्ति- २०३, २०७, २१०, २१३ ( xxiii) प्रमा, प्रत्यक्ष- प्रमाकरणम्- प्रमाज्ञानम् प्रमाणम् १०, ११, १४ २०३, २३६, २३७ ६, ७, ८, ९, १०, ११, १३, १४, १७,२०, २१,२३, ३८,४४,४५, ६२, ७०, ७४, ७५, ८३.६२, १२६, १३७, १४५, १४७, १४८, १५५, १५८, १९५, २००, २०३, २०४, २०५, २१३, २१४, २२२, २२४, २२८, २३८, २४४, २४५, २४६, २५२, २५३, २५५, २५७, २५६, २६६, २६६, २७०, २७२, २७६, ३००,३१०, ३१२, ३१३, ३१६, ३२२, ३२५, ३२६, ३३४ २१४,२१६, २२५ ४६,५६, १२३ २०३, २०७,२१०, २११ २०३ १४४ ८,४६, ११६, २२३ १४८, २६४,३०१ ३३, ३४,४१,४५, ४७,६६, ८०, ८१, २२२ २८, ६७, २०६ ३४, ३५, ५२, ५५, ५७,५९, ६१, ८६,८७,६४,२६३ - प्रमाणम्, 'अनुपलब्धि- प्रमाणम्, अनुमान- प्रमाणम्, अापत्ति- प्रमाणम्, मागम- प्रमाणम्, उपमान- प्रमाणम्, प्रत्यक्ष- प्रमाणम्, शब्द- प्रमाणचैतन्यम् - प्रमाता प्रमातृचैतन्यम् प्रमातृजीवः प्रमात्मकं ज्ञानम् १८८ २०६ प्रमाणभूता अर्थापत्तिः प्रमाणावच्छिन्नचैतन्यम् ( xxiv) प्रमात्वम् १४, १५, १६, २३८ प्रमाभूता बर्षापत्तिः २०४, २०५ २२८, ३१३, ३२६ ३२४, ३२५, ३२६ ३०६, ३०६, ३३६ - प्रमावच्छिन्नचैतन्यम् प्रमितिः प्रमेयम् प्रयाजयागः प्रयोजनम् प्रयोजनम्, गौण- प्रयोजनम्, मुख्य- प्रलयः प्रलयः भात्यन्तिक: प्रलयः, तुरीयः नित्यः प्रलयः, नैमित्तिक: प्रकृतः प्रलयः, महा- प्रशंसायंवादवाक्यम् प्राकृतप्रलयः प्राकृतलयः प्रलयः, प्रलयः, २६७, २७०, २७४, २७५, २७६ २६७ २७३, २७४ २६७, २७१, २७४ २६७, २७१, २७२, २७४ २६७, २६१,२७१, २७४ २४७, २७५ १८२ २६७, २६६, २७१, २७४ २७१ २२८, २२६, २३०, २३३, २३१, २३७ प्रागभावः २६० प्राणापानव्यानोदानसमानास्याः पंचवायवः प्रातीतिकः सत्पदार्थः प्रातिभासिकम् १०, ११, १२, १४, १५, १६, १८,६९,१.०,१०१,१०२,१०४, १०५, १०६, १०७, १०८, १०६, ११०, १११, १२३, १२४, १२५, १३३, १३४, १३५, ११६, १३७, २३८, १४३, २०१, २२५, २२६, २२५, २२८,२४१, २४१ १४१, १४२ विकसिक, सनम ( xxv ) प्रातिभासिकसत्ता प्रातिमासिकसृष्टिः प्रामाण्यम् ८७,८९ १११ १४१, १९१, १९७, ११८, २००, २३८, २४१,२४४, ३०२, ३.४, ३१३, ३२५, ३३२ प्रामाण्यम्, अज्ञातार्थज्ञानजनकत्वरूपम्- प्रामाण्यम्, अबाधितार्थज्ञानजनकत्वरूपं प्रामाण्यम्, पारमार्थिकतत्वावेदकत्व- प्रामाण्यम्, व्यावहारिकतालावरत- प्रामाण्यम्, शब्दयतं- प्रामाण्यसंशयानुपपत्तिः प्रारब्धकर्म २४४ २४१,२४२ ३३१, ३३२, ३३३, ३३५ ब बाधः बाधः, कार्यविनाशः बाघप्रतीतिः बालव्युत्पत्तिदायिनी टीका बुद्धिः ६ १५, १६, १९, २६, २९, ३०,१०, ६३, २६३, २७६,२२५, २८६, २००,२७ बोषः, शान्द- २,३,५,६,७,९,१०,१८, १९, २०, २२, २५, ३३, ३९,५०,६३, ६८,७५,७७,७८,७६,७,८, बर, १८, १.४, १०५, १०६, १२४, १२, १३३, १३४, १३५, १३७, १३८, १३९, १४०, १४१, १४३, १६२, १६६, २२८, २३१, २३३, २३५, २४४, २४१, २४६, २४७, २४८, २४६, २५, २५१, ( xxvi ) २५२, २५३, २५४, २५२, २६६, २६९, २७१, २७२, २७६, २७७, २७८,२८३, २८४, २८६, २६२, २६३, ३०१, ३०३, ३०४, ३०५ ३०७, ३०८, ३०९, ३११, ३१२, ३१३, ३१४, ३१५, ३१६, ३१७, ३२०, ३२१, ३२७, ३२८, ३२६, ३३०, ३३१, ३३३ - - - २७६, ३३१ ब्रह्म, कार्य- ब्रह्म, निरतिशय- ब्रह्म, निर्गुण- ब्रह्म, निविशेष- ब्रह्म, सगुण ब्रह्मज्ञानम् २७८, २७६, ३२१ ५, ६,६५८२, ८३, १०७, १२५, १२९, १४२, २३१, २६९, ३०६, ३१८, ३३३, ३३४, ३३६ २ ब्रह्मणः तटस्थलक्षणम् ब्रह्मस्वरूपावरणशक्तिः ब्रह्मानन्दपादः, गौड ब्रह्मानन्दी टीका ब्रह्मानुभवः १३ ३२६,३२७ भगवद्गीता भगवद्वैपायनः २८, २६ ३० भागवतम् भावम्, अवच्छेद्यावच्छेदक- मावा, परिणामपरिणामि- माध्यम, साफ- २५९ २८ ८७,८८ १० २५, २६ ( xxvii) १, ३, २६७ २२२ २२२ १ भूतभौतिकसृष्टयः भूतलनिष्ठघटाभावावच्छिन्नचैतन्यम् भूतलावच्छिन्नचैतन्यम् भूतसृष्टिः भूतानि, पंच- भूतानि, पञ्चीकृतानि- भूतानि, स्थूल- भौतिकसृष्टिः भ्रमप्रत्यक्षम् भ्रमप्रत्यक्षम्, अनिर्वचनीयख्याति:- भ्रमप्रत्यक्षम्, अन्यथाख्यातिः भ्रान्तिज्ञानम् भ्रान्त्यवच्छिन्नचैतन्यम् २५६ २६१ २६१ १, २६५, २६६, २६७ २२६ २२६ ८३ ५ मधुसूदनः मधुसूदनसरस्वती मनः ४, १३ ५, २५, २६,२८, २९, ३०, ३१, ३२, ६३, ११३, ११६, २६३, ३१५, ३१६, ३१७ ३१२, ३१५, ३१७, ३१८, ३१९, ३२०, ३२१, ३२२, ३२३, ३२४, ३२५, ३२६, ३२७, ३३० मननम् मनोबुड्यहंकारवितास्यानि अन्त:करणानि मनोहंकारबुद्धिचित्तानि, अन्तरिन्द्रियाणि- महत्तत्त्वम् महाप्रलयः महाभारतम् महावाक्यम् ३२८ २६४,२७५ २४७, २७५, ३३४ २९, ३०, २०२ २१, २२, ६५, १५१, १२३, १४, १५६, २४५, २७६, २५४, २९८, ३१२, ३१३, ३१४, ३१७ ( xxviii ) २, ७३, ७४, ७५, ७६, १२९, २२७, २२८, २५२, २५४, २५८ २७१, २७९, २८०, २८१, २८३, २६२,२३६, ३२०, ३३४ - - ७७,२६३ १६,३२२ २७०,३३०,३३३, ३३६ २८५ माया, उपाधिभूता- माया, परमेश्वरोपाषिभूत- मायावच्छिन्नचैतन्यम् मायोपहितं चैतन्यम् मीमांसा मुक्तिः मुक्तिः, जगत्- मुख्यज्ञानम् मुख्यप्रयोजनम् मुमुक्षा मुमुक्षः मूलभूवसृष्टिः मूलाझानम् मूलाशानमूलकः अध्यास: मूलाविद्या मोक्षम् ३२७, ३२८ ३२७ २६५ २५६, ३३३ १०५,१.६ २, ६, ७, ८, ६, ६४, २७३, २७४, ३०७, ३०८, ३०९, ३१०, ३११, ३१८, ३२७, ३२८, ३२३, ययुर्वे १२८ ३ यतीन्द्रम् यवार्यज्ञानम् यागः, ज्यातिष्टो.- का प्रयाक १०, २०४ २०९, २१० ३२४ ( xxix) यागः, विश्वजित्- यागः, वैश्वदेव योगसूत्रम् २०८ १५२, १५३, १५४, १५५ १२ १४८, १४६, १५४, १५६, १५७, १५८, १९०, १९२ २१७, २१६, २२० योग्यता योग्यानुपलब्धिः र रजोगुणोपेतः पंचभूतैः रविदत्तोपाध्यायः रूपावच्छिन्नचैतन्यम् २६० ५ लक्षणम्, तटस्थ- - लक्षणम्, स्वरूप- लक्षणा २, २४५, २४७, २४८, २५०, २५५, २७६,२९७ २, २४५, २४६, २७६ १६७, १६८, १७१, १७३, १७६, १७७,१७९, १०, ११, १२६ १७१, १७२, १७८, १७६ - लक्षणा, अजहत् लक्षणा, केवल- लक्षणा, जहत्- लक्षणा, जहदजहत- - - लक्षणा, लक्षित- लक्षणा,वाक्य- लक्षितलक्षणा सक्यः (पदार्थः) लक्ष्यपदार्थः १७१, १२, १७३, १५८ ६५, १७१, १७२, १७२, १७४, १७५, १७७, १७८ १६०, १६६, १७०, १७१ १८०, १२, १८३ १६८, १६९, १००, १७१ १६०,१८६ १६७, १६८ २७१,२७४ २७१ - जयः, प्राकृत- लिंगम् 'लंगम्, अन्वयव्यतिरेकि- १२६ ( xxx ) लिंगम्, केवलव्यतिरेकि- लिंगम्, केवलान्वयि लिंगपरामर्शः लिगपराम, तृतीया- लिंगविपर्ययः लिंगशरीरम् लिगशरीरम्, अपरं लिंगशरीरम्, अस्मदादि- लिगशरीरम् परं लिंगशरीरम्, हिरण्यगर्भ- १२६, १२८ १०,११६ ११६, १२२ १८१ ३०, २६३, २६४, २६८, २६९ २६४ २६४ लौकिकी दृष्टिः - १५२,१५३,१५४ १५२ १८२ - - १५०, १५२, १८३ ३१२, ३३५ १८६ वाक्यम्, अर्थवाद- वाक्यम्, निन्दार्थवाद- वाक्यम्, प्रशंसार्थवाद- वाक्यम्, जीवब्रह्म क्यबोष- वाक्यलक्षणा वाचस्पतिः, आचार्य- वाच्यः (पदार्थः) वाच्यार्थः विकल्पः विपति माया विचिकित्सा विदेहकवल्यम् विपर्ययः, लिंग- विलंगुतिः विवरणकृत् विवरणअन्यः १२ २५, २६, ४२ २७०, ३३५ १८१ - ८६, ८६,९.
( xxxi ) विशुद्धसत्त्वः विष्णुपुराणम् विश्वजिद्यागः विश्वस्ष्टा विषयगतम् (प्रत्यक्षत्वम्) विषयचैतन्यम् ३२० २५८,२७६ २०८ २७३ ३३, ३४, ३५, ४१,४५,४७, ५५, ६६, ८०, ८१, ८५, ८६, ९१, २२२, २६३ १ विषयप्रयोजनसम्बन्धाधिकारिस्वरूपानु- बन्धचतुष्टय विषयाकारवृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्यम् विषयावच्छिन्नचैतन्यम् वीचीतरंगन्यायः बृत्तिः ३१, ४१, ६२, ६७, ११२ ११५ ३४, ५१, ५७, ८०, ९९, १०४, १२३, २८८, २८९, २९. वृत्तिः, अनेकविधा वृत्तिः, अन्तःकरण- ८, १०, १६, १७, २३, २४, ३३, ३५, ३६, ३८, ३६, ४१, ४२, ४५, ५८,६०,६६,८२,८६,१५,१६, १२४, २४३, २८५, २५७, २८६, २९०, २११, २९३, २६४, २५५, ३०७ १२ २२०, २२३ २९५ - वृत्तिः, अभावप्रत्ययालम्बना- वृत्तिः, बभागकारा- वृत्तिः, अविद्या- वृत्तिः एकविधा वृत्तिः, नानात्मिका वृत्तिः चतुर्विधा संशयो निश्चयो गर्वः स्मरणम् वृत्तिः, पदमात्र- वृत्तिः, परिणामात्मिका- २५ - १८० २४,२५ (xxxii) ८६,८० बृत्यवच्छिन्नचैतन्यम् वृत्यात्मकं ज्ञानम् वृत्युपहितं चतन्यम् बेङ्कटनाथः, श्रीमद्- वेदः २८७ - २६, १९४, १६५, १६६, १७, १९८, १९६, २०१, २०२ - ३,४,३०४,३०५ ३ वेदः, ऋक्- वेदः, यजुः- वेदव्यासः वेदान्तशास्त्रम् शिष्ट्या माहि ज्ञानम् वैशेषिकदर्शन: वैशिषिकः, नव्य- वैश्वदेवयागः वैयधिकरणम् व्याक्तशक्तिमानम् व्यंग्यः (पदार्थः) व्यंजना व्यतिरेकः - १५२, १५३, १५४, १५५ व्यातरेकव्यानि व्यतिरेक्यनुमानम् व्यतिरे परितः व्यषिकरणधर्मः व्याप्तिः १६५ १६०,१०६ १५६ १२०, १२१, १४,१४६, १६५, १८६, २१६, २२१, ३२०, ३२१ १२८, १२६, १३०, २१२ २१० २१०, २१२ १०५, १०, ११०, २०६ ११, २९, ३२, ३६, ११६, ११२, १३२, १३३, १३५, १९८, २२३ व्याप्तिः, अत्यन्तासाप्रतियोगिता- मानाधिकरण्यरूपा व्याप्तिः, अन्वय- व्याप्तिः, FM १२६, १२७ १२८, १२९, २१३ १२१ ( xxxiii ) - व्याप्तिः, केवलव्यतिरेक- व्याप्तिः, केवलान्वय- व्याप्तिः, व्यतिरेक- व्याप्तिज्ञानम् १२७ १२७ १२८, १२९, १३०, २१२ ११७, ११८, ११६, १२३, १२४, १२५, १२६, १२७, १२८, १२९, १३०, १३१, १४५, १४६, २१४, २१५, २१६ २१० व्याप्तिज्ञानम्, अन्वय- व्याप्तिपक्षधर्मताज्ञानम् व्याप्तिसंस्कारः व्याप्तिस्मरणतृतीयलिंगपरामर्शः व्यावहारिकम् ११८, १२०, १२१ १२२, १२३ १४,९६,१८, १०७, १०८, १०१, ११०, १११, १२४, १२५, १२६, १३३, १३४, १३५, १३६, १३५, १३८, १४३, २२६, २२८, २३२, - १४१,१४२ २४५ २४४ व्यापारिक, सत्त्वम् व्यावहारिक सत्पदाः ध्यावारिकचादकत्वं प्रामाण्यम् भयावहारिकसत्ता व्यावृत्तम्, स्मृति- व्यासः, वेद- ८७,८८ १२, १४, १६ ३१४ शक्तिः १६०, १९४, १६६, ४६७, १६८, २८०, १५१, ३१९, २२६ - शक्तिः, अवच्छेदिका- शक्तिः, बावरण- शक्तिः, क्रिया- शक्तिः, शान- शक्तिशानम् ३३५ २६९ २६९ २६४ - ( xxxiv ) १६५ १६०, १६६, १८०, १८१ १७२, १७३ शक्तिज्ञानम्, जाति- शक्तिज्ञानम्, व्यक्ति- शक्यः शक्यपदार्थः शक्यार्थः शंकराचार्य: शब्दगतं प्रामाण्यम् शब्दप्रमाणम् शब्दानुपपत्तिः शमः शरीरम्, लिंग- शरीरम्, सूक्ष्म- शरीरम्, स्थूल- शशधरः २४८, २६४, ३०१ २०७ ३२७, ३२८ ३०, २६३, २६४, २६८, २६६ २६३,२६४ २६३ ६ - -- शाब्दबोषः ४१,४३, ६५, ६७, ६८, ११५, १४६, १५०, १५६, १५७, १५८, १५६, १६३, १६४, १६५, १६६, १९७, १७२, १७७, १४, १८६, १८८, १८६, १६०, १६१, १९३, १६४, १६६, १७, २०६, २०७, २०८, २०६, २१०, २३९, ३०४ शारीरकमीमांसा शारीरकसूत्रम् शारीरकसूत्रशांकरभाष्यम् शास्त्रम्, वेदान्त- शास्त्रम्, सांख्य- - शास्त्रीया दृष्टिः शुक्त्यवच्छिनचैतन्यम् सुखचैतन्यम् ३०४, ३०५ २७२ ३१४ २३२ १०३, १०६, १७७, २७९, २९६ २५, २६, ३२० श्रदा ( xxxv ) श्रवणम् ३१८, ३१६, ३२०, ३२१, ३२२, ३२३, ३२४, ३२५, ३२६, ३२७, ३२९, ३३० ४ श्रीमद्वेङ्कटनाथः श्रुतार्थापत्तिः श्रुतार्थापत्तिः, अभिधानानुपपत्तिरूपा- श्रुतार्थापत्तिप्रमा, अभिधानानुपपत्तिरूपा श्रुतिः - २०५, २०६, २०७, २०८ २०८ २०८ ८,६, १९, २२, २५, २६, २७, ३०,७३,७४, ७५,७६, ७८,७६, १००, १३३, १७६, १९८, २४५, २४६, २४६, २५१, २५२, २५४, २५६, २६१,२६६, २६६, २७०, २७३, २७५, २७६, २७७, २७८, २८२, २६६, २१७, २६६, ३०४, ३०७, ३०८, ३१०, ३११, ३१५, ३१६, ३१७, ३१८, ३१६, ३२२, ३२४, ३२७, ३३०, ३३१, ३३२, श्रुतिलिंगमपानकस्समाय- षट्- प्रमाणानि श्वेतकेतुः ६८ संज्ञासंशिसम्बन्धज्ञानम् संयुक्ततादात्म्यम् (सन्निकर्ष :) संयुक्ततादात्मतदात्मतादात्म्यम् (सन्निकर्षः) ११४ संयोगः (सन्निकर्षः) संयोगः, अवयव- संशयानुपपत्तिः २४२ संसानवपाहि मानम ६४ ( xxxvi ) १३, १४,६६,१००, १०३,११६, ११७, ११८, १२०, १२१, १२२, १२५, १२६, १३१,२१५, २१६, ३०२, ३०३, ३१६ ११८, १२०, १२१ ६३ २७८, २७९, ३२९ २५, २६,४२, ४३ १,२,३ ३३२ ८७,८९ - ८७ - संस्कारः, व्याप्ति:- संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानम् सगुणब्रह्म संकल्प: सच्चिदानन्दविग्रहम् संचितं, दुष्कृतम् संचितम्, सुकृतम्- संचितकर्म सत्ता, पारमाथिकी- सत्ता, प्रातिभासिकी- सत्ता, व्यावहारिक- सत्पदार्थः सत्पदार्यः, पारमार्थिक: सत्पदार्थः, प्रातीतिकः सत्पदार्थः, व्यावहारिक:- सत्वं पारमार्थिकम् सत्वम्, प्रातिभासिक- सत्वम्, व्यावहारिकम् सत्वरजस्तमांसि गुणाः सत्वरजस्तमोगुणात्मिका प्रशा सत्वगुणोपेतैः पंचभूतैः सत्स्वरूपम् सनिकर्षः ८७,८८ २४५ २४५ २४५ - . . १४१, १४२ १४१, १४२ १४१, १४२ ७४, ७८, २५८ २५८, २५६ २ सनिकर्षः, इन्द्रिय- - १३, १४, १५, ११, १११, ११४, ११६, ११८, १४३, १४७, २२६ १०, ११, २१, २४, ४५, ७८, ९५, ६६, १०१, १११, ११२, १४,१४५, १४७, २२०, २२१, २३८,२३९ mp4 - - ( xxxvii) सन्निकर्षः, इन्द्रियार्थ- २३,८० सन्निकर्षः, इन्द्रियविषय- सनिकर्षः, तदात्मतादात्म्यम्- सन्निकर्षः, तादात्म्यम्- ११४ सन्निकर्षः, संसदात्मतादात्म्यम्- सनिकर्षः, संयुक्ततादात्म्यम्- ११४ सन्निकर्षः, संयोमः- सन्निकर्षाभावः २२१ समवायः १६६ समवायसम्बन्धः १५, १६,५०, १०, १४१, १६५, १७०, २५१ समवायिकारणम् २३०, २७५, २७८ समवायिकारणस्वम् १४०, १४५ समाधानम् ३२८ सम्बन्धः, अयुतसिवप्रतियोग्यनुयोगिकः सम्बन्धः, तादात्म्य- १४१, १५१ सम्बग्धः, परम्परा- १५६, १७०, २०० सम्बन्धः, प्रतिपाचप्रतिपादकभाव:- २ सम्बन्धः समवाय- १५, १६,१०,१४१, १६५, १७०, २५१ सम्बन्धः, साक्षात्- सम्बन्धः, सामानाधिकरण्य- १६, १७४ सरस्वती, मधुसूदन सर्वज्ञपैतन्यम् सविकल्पक १५७, १७४, ३०४ सविकल्पकप्रत्यक्षम् ६३, १४,७० पास्यवस्वको मुवी 8 साधास्वम् २७२ २५६ सावासम्बन्ध - - winternet ( xxxviii ) १०३ साक्षिचंतन्यम् साक्षिविषयत्वम् साक्षिविषयत्वम्, केवल- सातिशयं सुखम् साधनम् - १२४, १२५, १२८ १२४, १२५, १२७, १२८, १३७, साध्यम् सामानाधिकरण्यम् २६, ६२, ६५, ८८, १२४, १२५, १२७, १३४, १४५, २१०, २१३, २१४ . सामानाधिकरण्यप्रत्ययः सामानाधिकरण्यसम्बन्धः सिद्धान्तः, सांख्य- सुकृतं, संचितम् १६, १७४ २५९ ३०७ सुखम्, निरतिशयं- सुखम्, सातिशयं- सुरेश्वराचार्यः सुषुप्तिः सुषुप्त्यवस्था सूक्ष्मशरीरम् सूत्रम्, पातंजल- २६७, २६८, २९५, २६५ २८४ २६३, २६४ १२ - सूत्रम्, योग- १२ २ १, ३, २६७ सूत्रम्, शारीरक- सृष्टयः, भूतभौतिक- सृष्टयः, भूतानां- सृष्टयः, भौतिकाना- १ .
( xxxix ) २६५, २६७, २७४, २७७ - १ - १११ - १,२६५, २६६, २६७ - १ सृष्टि: सृष्टिः, तन्मात्र- सृष्टिः, प्रातिमासिक- सृष्टिः, भूत- सृष्टिः, भौतिक- सृष्टिः, स्थूलवियधटपटादि- सोपाधिक: स्थूलभूतानि स्थूलवियषटपटादिसृष्टिः स्थूलशरीरम् स्मरणम् स्मृतिः २३४ २६१ १ २६३ ६९,१०० १२, १३, १४, ६३, ७३, ९८, १२०, १२१, २१५, २६६, २९६, ३०४, ३०५, ३१०, ३१७, ३१८, स्मृतिरूपा अन्तःकरणवृत्तिः स्मृतिव्यावृतम् १२, १४,१६ सप्टा, विश्व- २७३ १६, १००, १०१,,१०२, १०३, १०४, १०५,१०६ २०४, २१४, २९७ स्वप्नावस्था R १ स्वरूपम्, बानन्द- स्वरूपम्, चित्- स्वरूपमा सत्- स्वरूपतिन्यम् स्वरूपक्षानम् २ १५७, २८५ २२६५९
२, २४५, २४६, २७९
३०८
स्वरूपलक्षणम्
स्वर्ग:
स्वार्थानुमानम्
स्वार्थानुमितिः
१३०, १३१
१३१
है
हिरण्यगर्भः
१, २६६, २६७, २७०, २७३,
२७५, ३२९, ३३०
२६४
हिरण्यगर्भलिंगशरीर
हेतुः, केवलान्वयी-
ह्रीः
१२६
२५,२६
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