Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Shri Madant Kritdashang - Sutram
Front matter
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * M . ** * * * * * ८ * * * * * * * * 7 लाला रतनलालजी जैन पाप नागरे के प्रतिष्टित महानुभाव है । प्राप की प्रकृति पड़ी कोमल और स्वभाव सरना है। जो भी माप से एक बार मिलता है वह प्राप सौजन्य को कभी नहीं भूलता। आप के उदार इदग की भी प्रशसा कुछ कम नहीं है। यापने अनेक संस्थाप्रा को दान दिया है और दे रहे है । जिनो- बय पुस्तक प्रकाशक समिति रतलाम के श्राप पोर पापकी मातेभरी श्रीमती अनारदेवी संरक्षक हैं। * इस वर्ष अमी आपने निर्मन्य प्रवचन के अंग्रेजी अज बाद की १००० प्रतियाँ और अन्तकृत सूत्र की १००० * प्रतियाँ निज खर्च से प्रकाशित करवा कर श्रीवार * वाचनालय लोहामन्डी आगरा को मेट की है। आपका मास्टर मिश्रीम मंत्री श्री जैनोदय पुस्तक प्रकाशक समिति, रतलाम जैन दिवाकर पं० मुनि श्री चौथमलजी महाराज श्राप की प्रशसा करना सू को दीपक दिखाना है । आपने कई राजा महाराजा * एवं साधारण जनता को उपदेश देकर जैन धर्म * को गौरवान्वित किया है। उन से अहिसा विष- * गक ढेरों बन्द पट्टे मापने जिस्वाये हैं। इसके * फलस्वरूप हजारो पशु तलवार की घाट से पत्र * कर श्राप को दुहाई दे रहे हैं। आपने साहित्य सया * द्वारा भी जनता को यथेष्ट लाभ पहुंचाया है। भग• * वन् श्राप चिरायु हो 'पौर मापके द्वारा साहित्य का काफी प्रचार हो। आपका- सौभाग्यमल महता, जावरा ५ भयक्ष श्री जैनोदय पुस्तक प्रकाशक : समिति, सलाम २० ** * * * * * लाला रतनलालजी जैन, आगरा * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
श्री मदन्तकृदशा सूत्रम्
[ पीयूपधारा टीका सहित]
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अनुवादक
श्री जैन दिवाकर प्रसिद्धवक्ता पण्डित मुनि श्री चौथमलजी महाराज के सुशिष्य गणिवयं
साहित्यप्रेमी पण्डित मुनि श्री प्यारचन्दजी महाराज
प्रसाशक:
सेठ भिकामल छोटेलाल फर्म के मालिक सेठ रतनलाल मित्तल, लोहामण्डी प्रांगंग
प्रथमावृत्ति १००० ]
मूल्य बारह आने
वीराब्द २४६३ विक्रमाव्द १६६३
. निवेदन भगवान महावीर स्वामी के मुखारविन्द से भापित अङ्ग शास्त्रों में यह आठवाँ अङ्ग अन्तकृत सूत्र भी है जिस में श्राठ वर्ग है । वर्षभर में कम से कम एक बार तो इसे श्राद्योपान्त पढ़लेना प्रत्येक जैनियों का परम कर्तव्य है। इस में उन महापुरुषों का उल्लेख है जिन्हों ने सम्पूर्ण कर्मों का अन्त कर मुक्ति प्राप्त की है। इन्हीं महापुरुषों के आदर्शों का अनु- करण करने के लिए इसे आठ दिनों में पढ़लेना परमावश्यक है । मुनि महाराज भी प्राय. इस को पर्युषण पर्व के आठ दिनों में प्रत्येक चातुर्मास में पढ़ते है । परन्तु शुद्ध मूल पाठ और उस का भावार्थ शुद्ध हिन्दी में छपा हुआ ही पर्याप्त नही था। इसी लिए प्रातःस्मरणीय पूज्यवर श्री हुक्मीचन्दजी महाराज के पाटानुपाट शास्त्र विशारद बालब्रह्मचारी पूज्यवर श्री मन्नालालजी महाराज के पट्टाधिकारी शास्त्रज्ञ धैर्यवान् पूज्य श्री खूबचन्दजी महाराज के संप्रदायानुयायी जगद्वल्लभ जैन दिवाकर प्रसिद्धवक्ता पण्डित मुनि श्री चौथमलजी महाराज के सुशिष्य साहित्य प्रेमी गणीवर्य पण्डित मुनि श्री प्यारचन्दजी महाराज ने मूल अन्त कृत सूत्र को संशोधन कर उस का सरल सुबोध गम्य हिन्दी में भावार्थ लिखा है । जिसको मैंने लोकोपयोगी समझ कर अपने निजी खर्च से प्रकाशित कराया है और श्री वीर वाचनालय लोहामण्डी आगरा को भेंट किया है। इस की आमद श्री वाचनालय की उन्नति में सहायक हो । इसे पढ़कर आप अपना अात्मिक लाभ उठावे गे, इसी में मैं अपना सौभाग्य समदूंगा। लोहामण्डी, आगरा आपका प्रथम भाद्रव पyपण पर्वाधिराज संवत् १६६३ रतनलाल जैन मित्तल
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श्रीमदन्तकृद्दशाङ्ग सूत्रम्
चित्र सिर्फ परिचय के लिये
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श्रीमान् सुधर्मस्वामीजी श्री जम्बूस्वामी को उपदेश फरमा रहे है।
. " व्यावर श्री जैनोदय पुस्तक प्रकाशक समिति, रतलाम. जन्म दाता श्रीमान् जैन दिवाकर प्रसिद्ध वक्ता पंडित मुनि श्री चौथमलजी महाराज श्रीमान् सेठ उदेचन्दजी छोटमलजी सा० मूथा उज्जन छोटेलालजी जेठमलजी सा० कनेरा श्रीमान् दानवीर राय वहादुर सेठ कुंदनमलजी । मेवाड़) मोतीलालजी सा० जैन वैद मांगरोल लालचन्दजी सा० " सूरजमलजी साहब भवानीगंज सेठ नेमीचन्दजी सरदारमलजी सा० नागपुर वकील रतनलालजी सा० सर्राफ सरूपचन्दजी भागचन्दजो सा० उदयपुर " कालूरामजी सा० कोठारी पुनमचन्दजी चुन्नीलालजी सा० न्यायडोंगरी वहादरमलजी सूरजमलजी सा० यादगिरी कुंदनमलजी सरूपचन्दजी सा० तखतमलजी सौभागमलजी सा० देवराजजी सा० सुराना नाथूलालजी छगनलालजी सा० दूगड़ मल्हारगढ़ संरक्षक ,, ताराचन्दजी डाहजी पुनमिया सादड़ी श्रेमलजी लालचन्दजी सा० गुलेदगढ़ श्री महावीर जैन नवयुवक मंडल, चितौड़गढ़ लाला रतनलालजी सा० मित्तल श्री श्वे० स्था० श्रीसंघ, बड़ी सादड़ो (मेवाड़) " कलमसरा " " " व्यावर व्यावर " जावरा च्यावर " घागरा
हाथरस
श्रीमती पिस्तावाई, लोहामन्डी
স্বাগ श्रीमान् सेठ इन्दरमलजी जैन
राजीवाई, वरोरा
सी० पी०
मेम्बर
अनारवाई, लोहामंडी
आगरा
चन्द्रपतिवाई
सब्जी मंडी, देहली श्रीमान् मन्नालालजी चाँदमलजी
श्रीमान् मोहनलालजी सा० वकील
उदयपुर
बंडूलालजी हरकचंदजी
श्रीमान् सेठ मिश्रीलालजी नाथूलालजी सा० वाफणा कोटा गणेशीलालजी चत्तर
लखमीचन्दजी संतोकचन्दजी सा० मु० मुरार
चम्पालालजी सा० अलीजार
व्यावर उम्मेदमलजी भंवरलालजी वैद
नमीचन्दजी शीकरचन्दजी सा० शिवपुरी घासीलालजी श्रीनारायनजी सा०
फूलचंदजी सा० जैन
कानपुर
सेठ रामचन्द्रजी सा० पल्लीवाल जैन
ताल
नसीरावाद
सिवनी मालवा
मॉगरोल
मॉगरोल
वेतेड़
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, सुजमलजी जैन वैद
गंगापुर सीटी
श्री मदन्तकृद्दशाडू-गा-सूचनमूह । श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग पहिला (पीयूपधारा टीका सहित) प्रथम-वर्ग 半半生半未半主羊羊羊张未未中关半主未半朱孝孝孝朱孝丰米 मूलः-तेणं कालेणं तेणं समएणं चंपा णामं नयरी होत्था, वरणो। तत्थ णं चंपाए नयरीए उत्तर पुरथिमे दिसी भाए एत्थणं पुण्णभद्दे णामं चेइए होत्था । वणसंडे वएणो। तीसेणं चंपाए नयरीए कोणिए नाम राया होत्था । महया हिमवंत वरणो। तेणं कालेणं तेणं समएणं अजसुहम्मे थेरे जाव पंचहिं अणगारसएहिं सद्धिं संपरिबुडे पुव्वाणुपुब्बिं चर- माणे गामानुगाम वइज्जमाणे सुहं सुहेणं विहरमाणे जेणेव चंपाए नयरीए जेणेव पुण्णभद्दे चेइए तेणेव समोसरिए । परिसया निग्गया जाव परिसया पडिगया । तेणं कालेणं तेणं 米米半丰半卡卡未未未未半半卡卡未未米米米米米卡辛未未未 UN श्रीमदन्त- कदशाङ्ग वर्ग पहिला सूत्रम्। 米未未半半半;法卡卡米法卡卡卡卡卡卡卡卡卡卡卡未未未米 समएणं अज्जसुहम्मस्स अंतेवासी अज्ज जंबू जाव पज्जूवासमाणे एवं वयासी जइणं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं प्राइगरेणं जाव संपत्तेणं सत्तमस्स अंगस्स उवासगदसाणं अय- मढे पण्णत्ते, अट्ठमस्स णं भन्ते !अंगस्स अंतगडदसाणं समणेणं जावं सपत्तेणं के पएणते? भावार्थः-पञ्चप आरे के प्रारम्भ में, श्री भगवान महावीर स्वामी के प्रथन पट्टाधीश, सुधर्मस्वामी के समय में, 'चम्पा' नामक एक नगरी थी, जो बड़ी सुन्दर और मनोहर थी। इसकी सुन्दरता का सविस्तर वर्णन, यदि कोई पाठक चाहें तो औपपातिक सूत्र में, अबलोकन करें । इस नगरी के उत्तर और पूर्व दिशा के मध्यस्थ ठीक इशान्य कोण में, 'पूर्णभद्र' नामक एक मनोहर उपवन, विविध प्रकार के वृक्षों से सुशोभित था । उस 'चम्पा' नगरी में, उस समय ' कोणक' नामक एक राजा राज करते थे। ये अपने समय के एक बहुत ही बड़े राजा थे । अपने राज-कार्य का सञ्चालन वे न्याय, नियम और नीति के अनुसार करते थ । उसी समय, स्थविर आर्य, श्री सुधर्म स्वामी, अपने पाँच सौ 'शिष्यों के परिवार के साथ, नियमानुसार एक ग्राम से दूसरे ग्राम में, सुख पूर्वक --'पाँच सौ शिष्यों के साथ' का अभिप्राय यह है कि उस समय उनके अधिकार मे ५०० शिष्य थे। अर्थात् ५०० शिष्य श्री सुधर्म स्वामी की आज्ञा से विचरते थे। इसका अर्थ यह नहीं है, कि ५०० शिष्य हर समय उनके साथ रहते थे। 法米兰米米性味生柴米洋洋朱浩法律法漆洋洋洋朱某未 वर्ग पहिला * श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। ***** विहार करते हुए, उसी पूर्व वर्णित ' चम्पा' नगरी के ' पूर्णभद्र ' उद्यान में पधारे । श्री सुधर्म स्वामी के पदार्पण का शुभ सन्देश पाकर, नगर-निवासी लोग स्वामीजी की अमृतमयी वाणी श्रवण करने के लिए उपस्थित होने लगे । स्वामीजी ने धर्म की खूब ही विवेचना की, जिसे सुनकर श्रोता-समाज मुग्ध हो गया । व्याख्यान के समाप्त हो जाने के पश्चात्, जनता पुनः लौट कर शहर में आई । उसी समय, आर्य-श्री सुधर्मस्वामी के शिष्य श्री जम्बू स्वामी ने अपने गुरु की सेवा में विनयपूर्वक कहा, भगवन् ! धर्म का उत्थान करनेवाले श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी ने, जो मुक्ति में पधार गये हैं, उन्होंने सातवें अङ्ग उपासकदशाङ्ग का, जो भाव फर्माया है वह तो मैंने आपके श्री-मुख से श्रवण किया, किन्तु आठवाँ अङ्ग. जो 'अन्तगढ़ दशा' है, उसका क्या तात्पर्य है ? अर्थात् उसमें किन-किन बातों का वर्णन है, वह कृपा करके फमावें । मूलः-एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अन्तगड़दसाणं अह वग्गा पण्णता । जइणं भंते समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्सअंतगड़दसाणं अट्ठ वग्गा पण्णत्ता, पढ़मस्सणं भंते! वग्गस्स अंतगड़दसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं कहइ अझ- ********************** ********* - श्रीमदन्त कद्दशाज सूत्रम्। वर्ग पहिला ४ ****** यणा परणता ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगड़दसाणं पढ़मस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णता, तं जहा-गोयम समुद्द सागर, गंभीरे चेव होइ थिमिते य । अयले कांपल्ले खलु, अक्खोभ पसेणती विण्हू ॥ १॥ भावार्थ:-हे जम्बू ! भगवान् महावीर स्वामी ने श्री अन्तगढ सूत्र के आठ वर्ग फर्माये हैं। तब जम्बू खामी ने विनय पूर्वक पूछा, कि 'हे स्वामी ! कृपा कर यह फर्माने कि प्रथम वर्ग के कितने अध्याय फर्माये हैं ? ' तब श्री सुधर्म स्वामी ने फर्माया, कि हे जम्बू ! भगवान महावीर स्वामी ने प्रथम वर्ग के दस अध्याय फर्माये हैं। उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं:- (१) गौतम (२) समुद्र (३) सागर (४) गम्भीर (५) स्थिमित (६) अचल (७) काम्पिल्य (८) अक्षोभ (6) प्रसेन और (१०) विष्णुकुमार । मूलः-जइणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगड़दसाणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्तातंजहा गोयम जाव विण्हू । पढ़मस्स णं भंते ! अज्झयणस्स अंतगड़दसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं - ********* ४ -- वर्ग श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। पहिला ५ 羊羊羊羊羊羊羊羊半未来未羊羊卡夫卡米米米米米米米米米米 समएणं वारवईणामं नयरी होत्था, दुवालस जोयणायामा णवजोयण वित्थिरणा धणवइ मइनिम्माया चामीकरपागारा नाणामाणिपंचवरणकविसीसगंपरिमंडिया सुरम्मा अलकापुरि संकासा पमुदिय पक्कीलिया पचक्खं देवलोगभूया पासादीया दरिसाणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा। भावार्थ:-हे भगवन् ! श्री महावीर स्वामी ने प्रथम वर्ग के गौतम, विष्णु आदि नामवाले, जो ये दस अध्याय फर्माये हैं, इन में से प्रथम अध्ययन में क्या भाव फर्माया ? कृपा करके कहिए । जम्बू ! चौथे आरे में, अरहा अरिष्टनेमि भगवान् के समय म, द्वारिका नामक एक सुन्दर नगरी थी, जिस की लम्बाई बारह योजन और चौड़ाई नौ योजन थी । उस नगरी की रचना कुवेर देव ने की थी। उस का ग्राम-कोट ( परकोटा ) स्वर्ण का बना हुआ था । और उसके ऊपर पञ्च प्रकार के रत्नों द्वारा जड़ित करे शोभायमान थे। वह द्वारिका नगरी कुबेर की नगरी के समान देदीप्यमान थी । देवलोक के समान दर्शकों के चित्त को आकर्पित करनेवाली तथा परम सुन्दर दर्शनीय नगरी थी । दर्शकों का प्रतिविम्ब उस नगरी में पड़ता था । और, नगरी का प्रतिविम्ब, निकटस्थ जलाशय में । इस लिए वह द्वारिका नगरी वास्तव में अपने नाम 'द्वारिका' को सोलह आना सिद्ध कर रही थी। 米米卡米米米米米米米米米米米求朱未米米米米米米米米米 ५ - श्रीमदन्त- कुदशाह वर्ग पहिला सूत्रम्। 丈米水十米米米米米米卡米米米米米米米米 मूलः-तीसेणं बारवईणयरीए बहिया उत्तर पुरच्छिमे दिसीभाए एत्थ एणं रेवयए नाम पव्वए होत्था, वगणोतित्थ एणं रेवयए प०३ ए नंदणवणे नामं उज्जाणं होत्था, वगणो, सुराप्पिए णामं जक्खायतणे होत्या, पोराणे, से णं एगेणं वणसंडेणं परिक्खित्ते, असोगवर- पायवे । तत्थणं वारवईणयरीए कण्हे णामं वासुदेवे राया परिवसइ । महया रायवाणी । से णं तत्थ सतुद्दविजयपामोखाणं दमण्हदसाराणं, बलदेवपामोक्खाणं पंचगह महावीराणं, पज्जुगणपामोक्खाणं अट्ठाणं कुमारकोडीणं, संबपामोक्खाणं सट्ठीए दुइंतसाहस्सीणं, महसेण पामोक्खाणं छप्पण्णाए बलवग्गसाहस्सीणं, वीरसेणपामोक्खाणं एगवीसाए वीर साह- स्सीणं उरगसेणं पामोक्खाणं सोलसराहं राय साहस्सीणं, सप्पिणियामोक्खाणं सोलसण्हं देवि- साहस्सीणं, अणंगसेणापामोक्खाणं अणेगाणं गणियासाहस्सणिं, अण्णेसिंच वहूणं ईसर जाव सस्थवाहाणं बारवईए नयरीए अद्ध भरहस्त य सीमंतयाय समत्थस्त अाहेवचं जाव विहरइ। 来米卡卡米长米米米主*卡辛平米卡去t*幸十米米米米未 श्रीमदन्त- कृदशाह सूत्रम्। वर्ग पाहता ७ 染染来术形 ******** भावार्थ:-उस द्वारिका नगरी के ईशान्य कोण की ओर, 'रैवत' नामक एक पर्वत था । और उस पर्वत पर 'नन्दन-वन' नामक एक उपवन । उस उपवन में, 'सुर-प्रिय' नामक एक यक्ष का बड़ा ही प्राचीन स्थान था। उस स्थान के चहुँ और एक विशाल वन-खण्ड था। जिसमें अनेक अशोक वृक्षों की अपूर्व छटा लहरा रही थी। उस समय उस द्वारिका नगरी में, श्री वासुदेव 'कृष्ण' राजा राज करते थे । वे तीन खण्ड के सम्राट् थे । वहाँ समुद्र विजय, आदि परस्पर एक दूसरे की समता रखनेवाले इस राजा और भी थे । वलदेवजी, आदि पॉच महावीर पुरुष थे। पद्युम्न, आदि साढ़े तीन करोड़ कुमार थे । महासेन,आदि छप्पन हजार साहसिक योद्धा पुरुष थे। वीरसेन, आदि इक्कीस हज़ार वीर पुरुप थे । उग्रसेन, आदि सोलह हजार माण्डलीक राजा थे । रुक्मणि, आदि सोलह हजार कृष्ण महाराज की रानियाँ थीं । नृत्य-कला में प्रवीण अनंगसेना, आदि वेश्याएँ थीं । और भी अनेक धनाज्य, सेठ, साहूकारादि लोग वहाँ निवास करते थे । ऐसी महान् समृद्धिशाली द्वारिका नगरी में, श्री कृष्ण महाराज अर्द्ध भरत में, चैताढ्य गिरि पर्यन्त, अर्थात् तीन खण्ड में राज करते थे। मूलः- तत्थणं वारवईए नयरीए अंधगवण्हीणामं राया परिवसइ महया हिमवंत, वगणो । तस्सणं अंधगवाणिहस्स रगणोधारिणी नामं देवी होत्था, वगणो। तत्तेणं सा- धारिणी देवी अण्णया कयाइं तसि तारिसगांस सयाणिज्जसि एवं जहा महब्बले। सुमिणइं- ७ वर्ग पहिला श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। . *小米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米 सण कहणा, जम्मं वालत्तणं कलाप्रो य । जोवणपाणि गाहणं, कंता पासाय भोगाय ॥१॥ णवरं गोयमो नामेणं अट्ठएहं रायवर कन्नाणं एग दिवसेणं पाणि गेण्हावाति अठ्ठो दायो। भावार्थः-उस द्वारिका नगरी में, अन्धक-विष्णु नामक एक बड़े जागीरदार राजा राज करते थे । उस राजा के धारिणी' नामक एक रानी थी । यह रानी एक दिन शयनागार में सो रही थी। पिछली रात्रि में एक शुभ स्वम उसे आया । तदनुसार, पूरे नौ मास और दस दिन बीत जाने पर, एक बालक-रत्न का जन्म उसकी कोख से हुआ बालक के जन्म, बाल्य-काल, शिक्षा-प्राप्ति आदि का वर्णन, पाठकवृन्द महाबल की तरह समझ लें । विशेष केवल इतना ही है, कि उन का नाम गौतम कुमार रक्खा गया। जब वे तरुण हुए, उनका विवाह आठ कन्याओं के साथ कर दिया गया । वधु-पक्ष की ओर से आठ करोड़ का दहेज उन्हें मिला । मूलः-तेणं कालेणं तेणं समए णं अरहा अरिट्ठनेमी प्राइगरे जाव विहरइ, चगव्वहा देवा अागया, कण्हे विणिग्गए । ततेणं तस्स गोयमस्स कुमारस्स जहा मेहे तहाणिग्गए, धम्मं सोचा णिसम्मं जं नवरं देवाणुप्पिया ! अम्मापियरोप्रा पुच्छामी देवाणुप्पियाणं अंतिए पव्वयामि, एवं जहा मेहे जाव अणगारे जाए इरियासमिए जाव इणमेव निग्गंथं पावयणं - SI श्रीमदन्त- हदशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग पहिला है पुरो कात्रो विहरइ । ततेणं से गोयमे अणगारे अण्णया कयाइ अरहो अरिहनेमिस्स तहा रूवाणं थेराणं अंतिए सामाइयमाझ्याइं एकारस्स अंगाइंअहिज्जइ, अहिज्जिता बहूहिं चउत्थ जाव अप्पाणं भावे माणे विहरइ । तएणं अरिहा अरिट्ठनेमीप्रणया कयाइ बारवईयो नयरीप्रोनंदणवणाश्रो उज्जाणाम्रो पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमइ त्ता बहिया जणवय विहारं विहरइ । भावार्थः-उस समय एक बार अरहा अरिष्टनेमि भगवान् ने गाँव-गाँव विचरण करते हुए, द्वारिका के बाग में पदार्पण किया । शहर में सूचना होते ही, वहाँ की जनता भगवान् के दर्शनार्थ वरसाती नदी की भाँति उमड़ पड़ी। भवनपति, व्यन्तर, ज्योतिषी,और वैमानिक देव भी उनके दर्शन को आए। सम्राट श्री कृष्ण महाराज भी पधारे । गौतम कुमार को सूचना मिलने पर वे भी दर्शनार्थ गये । भगवान् का प्रवचन सुन कर वहीं उन्हें वैराग्य प्राप्त हो गया। तब वे भगवान् से बोले-"प्रभो ! मैं अपने माता-पिता से पूछ कर, आप से दीक्षा ग्रहण करूँगा।" ऐसा कह कर कुमार बड़े ही हर्ष के साथ घर पर आये । माता-पिता से आज्ञा उन्होंने माँगी। माता-पिता ने कुमार को बहुत-कुछ समझाया; परन्तु उन्होंने किसी की भी एक बात न मानी, अन्त में बड़े ही समारोह से, मेघ कुमार की भाँति उनकी भी दीक्षा हो गई। अब कुमार साधु बन कर इया समिति, आदि पाँच समिति, तीन गुप्ति, एवं निग्रंथों के प्रवचनों को आगे 台书法班 श्रीमदत्त- हद्दशान सूत्रम्। वर्ग पहिना 米米米米米米米法米米米米米米米米米米 रख कर विचरने लगे। उन गौतम अणगार ने अल्प समय में ही रहा अस्टिनेमि भगान् के स्थगिर मुनियों से, सामायिक से लगा कर ग्यारह अंग पर्यंत ज्ञान सम्पाइन कर लिया । साथ ही साथ उमास से लगा कर,अनेकों भाँति की तपश्चर्या करते हुए, आत्मानन्द में लीन वे रहने लगे। भगवान् अरिष्टनेमि एक दिन उस द्वारिका के 'नन्दनान' से विहार कर, देश-विदेश के भव्य जीवा को उपदेश देते हुए मुक्ति का पथ उन्हें दिखाने के हेतु, अन्यत्र पधार गये। मूलः-ततेणं से गोयमे अणगारे अण्णया कयाइ जेणेव अरहा परिछनेमी तेणेव उवा- गच्छइ, उवागच्छित्ता अरहं अरिट्ठनेमिं तिक्खुत्तो प्रायाहिण पयाहिणं करेइ, करिता वंदा नमंसइ २ ता एवं वयासी-इच्छामि णं भंते ! तुम्भेहिं अभणुगणाए समाणे मासियंभिक्खु पडिमं उपसंपजिवाणं विहरेत्तए । एवं जहा खंदो तहा बारस भिक्खुपडिमात्रो फाइ, फासित्ता, गुण रयणं पितवो कम्मतहेब फासेइ निरवसेसं, जहा खंदो तहा चिंतेइ, तहा आपुच्छइ, तहा थेरेहिं सद्धिं सेतुजं दुरूहइ, मासियाए संलेहणाए वारस वरिसाई परिताए जाव सिद्धे। 中六中法关法牛牛津宋洋法米法米米米米米米米宗太长 १० .
श्रीमदन्त- कृद्दशाह सूत्रम्। वर्ग पहिला ११ 染米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米洋法 भावार्थः-एक दिन गौतम अणगार ने भगवान् अरिष्टनेमि के समीप आ कर, उनकी क्रमशः तीन बार प्रदक्षिणा तथा स्तुति की । और विनयपूर्वक वन्दना कर के निवेदन किया- हे प्रभो ! मेरी इच्छा है, कि "मैं ' मासिक-भिक्षु-पडिमा-तप' सीकार कर, आप की आज्ञा हो, तो विचरण करूँ।" इस पर भगवान् ने उन्हें फर्माया, कि " जिस प्रकार भी तुम्हें सुख हो, वैसा करो।" फिर गौतम अणगार ने एक पडिमा से बारह भिक्षु की पडिमा पर्यत, खन्दक मुनि की भाँति घोर तप किया। तत्पश्चात् ' गुणरत्न' नामक तपस्या भी उन्होंने की। जिस प्रकार खन्दकजी ने संथारा किया था, उसी प्रकार ये भी भगवान् से पूछ कर और स्थविर मुनिवरों को साथ ले, शत्रुञ्जय पहाड़ पर गये । और, वहाँ एक मास का संथारा कर, अन्तिम समय में, सर्व कर्मों को नष्ट करते हुए मुक्ति में वे पधार गये । मूलः-एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगड़दसाणं पढ- मवग्गस्स पढम अज्झयणस्स अयमठे पण्णत्ते । एवं जहा गोयमो तहा सेसा वरिह पिया धारिणी माता समुद्दे, सागरे, गंभीरे, थिमिए, अयले, कंपिल्ले, अक्खोभे, पसेणई विण्हुए एए एगगमा। पढ़मोवग्गो दस अज्झयणा पण्णत्ता। भावार्थः-हे जम्बू ! भगवान् महावीर स्वामी ने अन्तगढ़-सूत्र के प्रथम-वर्ग के प्रथम अध्याय में यही 米米米米米米米米米米米米米米 ११ श्रीमदन्त- कद्दशाङ्ग सूत्रम्। वर्णन किया है । इसी प्रकार उन्होंने दूसरे अध्याय में समुद्र कुमार का, तीसरे में सागर का, चौथे में गम्भीर का, पॉच में स्थिमित का, छठे में अचल का, सातवें में काम्पिल्य का, आठवें में अक्षोभ का, नवें में प्रसेन का, और दशवें में विष्णु का वर्णन किया है। इन सभी की कथा गौतम कुमार की भाँति ही वर्णन की गई है । इन नवों के पिता का नाम ' वहि' और माता का नाम 'धारिणी' था। इति प्रथमो वर्गः। वर्ग पहिला . ૨૨ 环米卡卡主卡七卡主米米米米卡米卡半未未未半未未米米未 半米中丰半土迅牢中未卒中未牛羊未半丰丰米半丰幸半半半决 MITA ૧૨ - । -- द्वितीय-वर्ग वर्ग द्वितीय श्रीमदन्त- कृद्दशाह सूत्रम् मूलः-जइणं भंते! समणेणंजाव संपत्तेणं पढमस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते । दोचस्स णं भंते ! वग्गस्स अंतगड़दसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं कइ अझयणा पण्णत्ता ?एवं खलु; जंबु ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठ अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहा-अक्खोभ, सागरे, खलु समुद्द, हिमवंत, अचल णामे या धरणेय पूरणे वि यः अभिचंदे चेव अट्ठमए॥१॥ तेणं कालेणं तणं समएणं वारवईए णयरीए वरिह पिया धारिणी माया। जहा पढमो वग्गो तहा सव्वे अट्ठ अज्झयणा गुण रयण तवो कम्मं सोलसवासाइ परियारो सेजे मासियाए संलेहणाए जाव सिद्धे । एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अमट्ठस्स अंगस्स दोचस्स वग्गस्स अयमठे पण्णत्ते । ************* १३ श्रीमदन्त- 'हद्दशाङ्ग सूत्रम् वर्ग द्वितीय 生主法张卡卡主关卡生半生半半中半生半生悲 भावार्थ:-भगवन् ! श्री अनन्तगढ़ सूत्र के प्रथम वर्ग में भगवान महावीर स्वामी ने जो वर्णन किया है, वह आनन्दपूर्वक आप के श्री मुख से मैंने श्रवण किया । लेकिन, दूसरे वर्ग में कितने अध्याय हैं और उनमें किस विषय का प्रातपादन किया गया है, सो कृपा कर के अब फर्मा । " हे जम्बू ! भगवान् ने दूसरे वर्ग में अक्षोभ, सागर, समुद्र, हिमवन्त, अचल, धरण, पूरण, और अभिचन्द, इन आठ अध्यायों का क्रम-पूर्वक वर्णन किया है । अतः ध्यान पूर्वक श्रवण करो । श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् के समय, ' द्वारिका' में, अन्धक विष्णु नामक एक राजा जागीरदार के रूप में राज करते थे । उनकी धारिणी नामक एक बड़ी ही आज्ञाकारिणी रानी थी । उनके अक्षोभ, सागर, समुद्र, हिमवन्त, अचल, धरण पूरण और अभिचंद ये आठ पुत्र-रत्न थे । इन आठों कूमारों ने भगवान् श्रीअरिष्ट नेमि के सदुपदेश से दीक्षा धारण की । और गुण-रत्न संवत्सर तप, आदि अनेक प्रकार की बड़ी ही घोर तपश्चर्या की। इस प्रकार सोलह वर्ष पर्यन्त चारित्र-पालन कर कर्मों को क्षय करते हुए वे भी मुक्ति को प्राप्त हुए । जिस प्रकार श्री गौतम कुमार का वर्णन किया है, उसी प्रकार आठ अध्यायों में इन आठों कुमारों ने भी अपने जीवन को पवित्र किया। इस प्रकार हे जम्बू ! भगवान् महावीर स्वामी ने अन्तगढ़ सूत्र के दूसरे वर्ग का वर्णन किया है । 於半半米米米米米米米米米米米米米米米米米半法半半张 १४ इति द्वितीयो वर्ग:
तृताय-वर्ग श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग वर्ग तृतीय सूत्रम्। 平半生半丰夫;;米米米米未未未未未未未未未未未米未未 मूलः-जइणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स दोच्चस्स वग्गस्स अय- मढे पण्णत्ते ! तच्चस्स णं भंते ! वग्गस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णते ? एवं खल जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स तच्चस्स वग्गस्स अंतगड़दसाणं तेरस अज्झयणा पएणत्ता तं जहा-अणीयसेण, अणंतसेणे, अजियसेण, अणिहयरिउ, देवसेणे, सत्तुसेणे, सारणे, गए, सुमुहे, दुम्मुहे, कूवए, दारुए, अणादिट्टी। जइणं भंते ! ससणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स, अंतगड़दसाणं तच्चस्स वग्गस्स तेरस अज्झयणा पण्णत्ता तं जहा अणीयसेण जाव प्रणादिट्ठी । पढ़मस्स णं भंते अज्झयणस्स अंतगड़दसाणं समणेणं जाव संपत्तेण के अट्टे पएणते। 半半丰丰丰生米卡卡米米米米米米米米米米米米米未朱未未未 १५ -- श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तृतीय 来米米米卡卡卡卡米米米米米法半米卡米米卡未牛羊卡地 'भावार्थः-हे भगवन् ! श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी ने आठवें अंग के दूसरे वर्ग के आठों अध्यायों में, जिस प्रकार आठ कुमारों की मुक्तावस्था का वर्णन किया है, उसे श्री-मुख से आनन्द पूर्वक मैंने श्रवण कर लिया अव कृपा कर के, तीसरे वर्ग का वर्णन फर्मावें । हे जम्बू ! तीसरे वर्ग में, तेरह अध्ययन हैं । उन में अणीयसेन, अनन्तसेन, अजितसेन, अनिहत रिपु, देव- सेन, शड्ड-सेन, सारण, गज-सुकुमार, सुमुख, दुर्मुख, कूपक, दारुक, और अनादृष्टि इन तेरह कुमारों का वर्णन किया गया है। भगवन् ! इन तेरह अध्यायों में से अब प्रथम अध्याय का क्या तात्पर्य है, सो कृपा कर के फर्माने । मूलः-एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं भदिलपुरे णाम णयरे होत्था, रिद्धि- थिमिय समिद्धे वएणो। तस्स णं भदिलपुरस्स नयरस्स बाहिया उत्तर पुरत्थिमे दिसीभाए सिरिवणे णामं उजाणे होत्था, वरुणो जियसत्त राया। तत्थणं भदिलपुरे णगरे नागे णामं गाहावई होत्था, अड्ढे जाव अपरिभूए । तस्सणं नागस्स गाहावइस्स सुलसा णामं भारिया होत्था, सुकुमाला जाव सुरूवा । तस्सणं नागस्स गाहावइस्स पुत्ते सुलसाए भारि- 然米米米米米水未未字未米米米米米字米半半米米米米法 १६ -- श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग वर्ग तृतीय सूत्रम्। * याए अत्तए अणीयसेणणाम कुमारे होत्था । सुकुमाले जाव सुरुवे पंच धाइ परिक्खित्ते । तं जहा-खीर धाई जहा दढ़पइन्ने जाव गिरकिंदर मल्लीणेव पगवरपायवे सुहं सुहेणं परिवड्ढइ। भावार्थःहे जम्बू ! अरहा अरिष्टनेमि भगवान् के समय,भदिलपुर नामक एक नगर अपनी अटूट सम्पति की गुण-गरिमा से सुशोभित था । नगर से कुछ ही दूर पर, ईशान्य दिशा में, अपने नाम को यथार्थ रूप से चरितार्थ करने वाला, समस्त उपवनों की जीवित श्री की भाँति ' श्रीवन' नामक एक अति ही सुन्दर और सुरम्य उद्यान था। उस समय भदिलपुर में राजा जित-शत्रु राज करते थे। उसी नगर में 'नाग' नामक एक महान् समृद्धिशाली गाथापति निवास करता था । वह भी अटूट लक्ष्मी का स्वामी था और, उसके 'सुलसा' नामक एक बड़ी ही सुकुमार परम सुन्दरी धर्मपत्नि थी । उस 'नाग' नामक गाथापति के पुत्र अणीयसेन का, पाँच प्रकार की धायों ने दृढ प्रतिज्ञ (दढपइन्ने)की भॉति. आधि व्याधियों से रक्षा करते हुए, जिस प्रकार पर्वत की उन्नत गुफाओं में चम्पक वृक्ष सुरक्षित रह कर हरा-भरा होता है, ठीक उसी प्रकार, उस पुत्र का लालन-पालन किया था। मूल:-ततेणं तं अणीयसं कुमारं साइरेग अहवासजायंअम्मापियरो कलायरिय जाव भोगसमत्थे जाए यावि होत्था।ततेणं तं अणीयसं कुमारं उम्मुक बालभावंजाणेत्ता अम्मापि- यरो सरिसियाणं सरिसव्वयाणं सरिस लावण्णरूवजोवणगुणोववेयाणं सरिसेहिं तो कुलेहिं 焼きまキキキキキキキキキキキキキキ श्रीमदन्त- छद्दशाह सूत्रम्। वर्ग तृतीय 法孝子泳漆味法未生米半求法泽法字半未来 तो आणिल्लियाणं बत्तीसाए इब्भवरकरणगाणं एगादेवसे पाणिं गेण्हावेइ । भावार्थः-उस अणीयसेन नामक कुमार को आठ वर्ष की अवस्था के पश्चात् एक कलाकोविद के द्वारा योग्य विद्याध्ययन कराया गया । कुमार बहत्तर कलाओं में निष्णात हो गया। यौवनावस्था प्राप्त होने पर माता-पिता ने उसका विवाह, एक बड़े ही श्रेष्ठ कुल के, बत्तीस अर्व-पति सेठ की, कुमार के समान अवस्था, चतुराई, रूप और गुणों में निपुण, ऐसी बत्तीस कन्याओं के साथ कर दिया। मूलः-ततेणं से नागे गाहावई अणीयस्स कुमारस्स इमं एयारूवा पीतिदाणं दलयइ तं जहा-बत्तीसं हिरण्णकोडीअो जहा महब्बलस्स जाव उप्पिं पासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुइं. गमत्स्थएहिं भोग भोगाई भुंजमाणे विहरइ । तेणं कालेणं तेणं समए णं अरहा अरिहनेमी जाव समोसढ़े सिरिवणे उज्जाणे अहापडिरूवं उग्गहंजाव विहरइ, परिस्सा णिग्गया। ततेणं तस्स अणीयसस्स कुमारस्स महया जणसहं जहा गोयमे तहा नवरंसामाइयमाझ्याइं चोदस पुवाई अहिज्जइ वीसं वासाइं परियारो सेसं तहेव जाव सेत्तुजे पव्वए मासियाए संलेहणाए जाव सिद्धे । एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगड़दसाणं तच्चस्स -法米米半朱生张孝辛辛末米未斗米半朱朱孝朱孝孝法米法求法 १८ वर्ग श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। तृतीय 半丰半丰半半法半未半未未未半未未未未半半未半米卡卡 वग्गस्स पढ़म अज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते। भावार्थः-विवाह में, प्रत्येक वधु-पक्ष की ओर से एक-एक करोड़ सोनये दहेज के रूप में प्राप्त हुए । इसका सविस्तर वर्णन महाबल के चरित से जाना जा सकता है । अणीयसेन कुमार भी विवाह के पश्चात्, अपने विशाल राज-प्रासाद में, अनेक भाँति की अठखेलियाँ करते हुए, मृदङ्ग की ध्वनि से मत्त बन, अपने जीवन को आमोद-प्रमोद में व्यतीत करने लगे। जीवन के इसी स्वच्छन्द समय में, श्री अरहा अरिष्टनेमि प्रभु उस नगरी के 'श्रीवन' नामक एक उद्यान में पधारे । जन संख्या दर्शनों के लिए उमड़ पड़ी, यह दृश्य देख कर, अणीयसेन कुमार भी महावल की तरह भगवान् के दर्शनार्थ ' श्रीवन' उद्यान में उपस्थित हुए । प्रभु के दर्शन कर, उन्होंने उपदेश श्रवण किया । और, गौतम कुमार की भाँति ही, उन्होंने भी दीक्षा धारण कर ली। स्वल्प काल में ही, सामायिक * आदि चौदह पूर्व का ज्ञान सम्पादन उन्होने किया । बीस वर्ष तक चारित्र-पाल कर. अन्तिम समय में, एक मास का सन्थारा करते हुए उन्होंने भी मोक्ष पद को प्राप्त किया । हे जम्बू ! भगवान् ने श्री अन्तगढ़ सूत्र के तीसरे वर्ग के प्रथम अध्याय में यही वर्णन किया है। मूलः-एव जहा अंणीयसे एवं सेसा वि अणंतसेणो अजियसेणो अणिहयरित्रो देव- सेणे सत्तसेणे छ अझयणा एकगमा,बत्तीसाओ दाश्रो, वीसंवासा परियारो, चोद्दस पुबाई 未未米米米米米米米米米米地 १६ श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तृतीय २० 华半米未未出北宋吉米米米米米米米米米米未未孝孝未来 अहिझति सेजे जाव सिद्धा । छट्टमज्झयणं समत्तं । जइंणं भंते ! उक्खेवनो सत्तमस्स । तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवईए णयरीए जहा पढ़मे नवरं वसुदेवे राया,धारिणी देवी सीहो सुमिणे, सारणेकुमारे,पण्णासो दानो,चोद्दस्त पुव्वा, वीसंवासा परियारो, सेसं जहा गोयमस्स जाव सेजे सिद्धे । भावार्थः- जम्बू ! जिस प्रकार अणीयसेन कुमार का वर्णन किया गया है, उसी प्रकार अनन्तसेन, अजित- । सेन, अनिहत-रिपु, देव-सेन, और शत्रुसेन, आदि पाँचों कुमारों ने भी दीक्षा धारण कर मुक्ति प्राप्त की । ये छहों ?* कुमार भदिलपुर के 'नाग' नामक गाथापति के सुपुत्र और परस्पर सहोदर भ्राता थे । इनकी भी घूम धाम से बत्तीस-बत्तीस कन्याओं के साथ शादी हुई थी और, प्रत्येक को बत्तीस-बत्तीस करोड़ का दहेज प्राप्त हुआ था। परन्तु सच्ची लगन के सामने, संसार के सभी बन्धन शिथिल पड़ जाते हैं। सब कुमारों ने दीक्षा ग्रहण की । तथा चौदह वर्ष चारित्र-पालन कर अन्त में एक मास का सन्थारा धारण उन्होंने किया । और मुक्त हो गए । यहाँ तक ये छः अध्याय पूरे हो गये। हे जम्बू ! चौथे आरे में, ' द्वारिका' नगरी थी । उस में, राजा वसुदेव अपनी रानी धारिणी सहित राज करते थे । एक दिन रानी को सिंह का शुभ स्वम दिखाई दिया । और, उस स्वम के कुछ ही काल के पश्चात् , २० श्रीमदन्त- कद्दशाङ्ग सूत्रम् । वर्ग तृतीय २१ 未未未羊羊丰丰丰朱孝丰卡米卡未未 4辛未辛未朱宗未 राजा वसुदेव के घर में,राणी धारिणी की कोख से एक पुत्रोत्पत्ति का मङ्गलमय आनन्द छा गया । कुमार का नाम सारण रखा गया । कुमार का बाल्यकाल में विद्याध्ययन, और यौवनावस्था में पचास कन्याओं के साथ विवाह कराया गया । वे भी अरहा अरिष्टनेमि भगवान् का सदुपदेश श्रवण कर दीक्षित हुए । चौदह वर्ष के अविरल परिश्रम से उन्होंने चौदह पूर्व का ज्ञानाध्ययन किया । और, बीस वर्ष का चारित्र-पालन कर अन्त में एक मास का सन्थारा ले, वे भी मुक्त हो गये । विशेष वर्णन गौतम कुमार की भाँति ही यहाँ भी समझे। मूलः-जइणं भंते ! उक्खेत्रो अट्ठमस्स । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवईए नयरीए जहा पढ़मे जाव अरहा अरिहनेमी सामी समोसढ़े। तेणं कालेणं तेणं सम- एणं अरहो अरिहनेमिस्स अंतेवासी छ अणगारा भायरो सहोदरा होत्था। सरिसया सरि- या सरिव्वया नीलुप्पलगवल गुलियप्रयसिकुसुमप्पगासा सिरिवच्छं कियवच्छा कुसुमकुंडल भद्दलया नलकुव्वरसमाणा । तएणं ते छ अणगारा जं चेव दिवसं मुंडा भवेत्ता आगारात्रो अणगारियं पव्वझ्या तं चेव दिवसं अरहं अरिट्टनेमि वंदइ णमंसई णमंसइत्ता एवं क्यासी- इच्छामोणं भंते ! तुम्भेहिं अभणुन्नाया समाणा जावज्जीवाए छठें छटेणं अणिक्खित्तेणं 牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛津津津洋洋洋千牛津津洋洋 २१ श्रीमदन्त- कृशाग सूत्रम्। वर्ग तृतीय २२ 中淋 米米米米米米米米米米米米米米米米米米米 । तवकम्म संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरित्तए। अहा सुहं देवाणप्पिया ! मा पडिबंधं करेह ! तएणं ते छः अणगारा अरहया अरिष्टनेमिणा अभणुगणाया समाणाजावज्जीवाए छडं छटेणं जाव विहरती। भावार्थ:-भगवन् ! सातवें अध्याय में भगवान् महावीर स्वामी ने, जो कथन किया है, वह आपने फर्माया और * मैंने उसे सुरुचि तथा श्रद्धा के साथ श्रवण किया। किन्तु आठवें अध्याय में जो वर्णन उन्होंने किया है, मेरा मन उसे श्रवण करने के लिए बड़ा ही लालायित है । अतः उसे श्रवण करा के मेरे कान तथा मन की पियासा को मिटाने की कृपा कीजिए। हे जम्बू ! उस समय में, ' द्वारिका' नाम की नगरी थी । जिसका वर्णन पहले कर आये हैं । उसी द्वारिका नगरी में, ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए एक दिन श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् पधारे । उस समय भगवान् के साथ छः शिष्य थे । वे छहों शिष्य परस्पर सहोदर भाई थे । उनका रंग, रूप,तथा अवस्था एक ही सी थी। उनका वर्ण निलोत्पल कमल, भैंस के सींग के अन्दर के भाग, एवं अलसी के फूल के समान सुन्दर था। उनका वक्षःस्थल श्रीवन्स साथिया से सुशोभित था । फूलों के ढेर के समान उनका शरीर कोमल और सुकुमार था। इस प्रकार वे छहों मुनि कुवेर के पुत्र की भॉति सुन्दर शरीरधारी थे । जिस दिन इन छहों सहोदर भाइयों ने दीक्षा धारण की थी, 邓****米米米米米米米米米米 २२ ※米米米米未 वर्ग तृतीय श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम् । 未济未来诛杀杀杀杀杀杀杀杀杀未未柴示於 अथात् संसार की मोह-माया को छोड़-छाड़ कर, जिस दिन ये मुनि-पद के अधिकारी बने थे, उसी दिन इन्होंने श्री अरिष्टनेमि भगवान् को वन्दना कर निवेदन किया था कि-' भगवन् ! हमारी ऐसी इच्छा है, कि यदि आप की आज्ञा हो, तो निरन्तर जीवन-पर्यन्त वेले-बेले की तपश्चर्या में अपनी आत्मा को लीन करते हुए विचरण हम करें ।' भगवान् ने फर्माया-जिस प्रकार तुम्हें सुख हो, वैसा ही तुम करो । इसमें विलम्ब तनिक भी न करो । आज्ञा होने पर छहों मुनिराज वेले-वेले की तपश्चर्या कर, आत्मानन्द में रमण करते हुए, विचरण करने लगे। मूलः-तएणं ते छ अणगाराअण्णया कयाइं छट्टक्खमण पारणंसि पढ़माए पोरिसाए सज्झायं करेइ जहा गोयम सामी जाव इच्छामोणं भंते ! छट्ठक्खमणस्स पारणाए तुब्भेहिं अभणुन्नाया समाणा तिहिं संघाडएहिं वारवइए नयरिए जाव अडित्तए । अहासुहं देवाणु- प्पिया! तएणं ते छ अणगारा अरहया अरिट्ठनमिणा अभणुएणाया समाणा अरहं अरिट्ठ- नेमि वंदइ णमंसइ णमंसइ २ चा अरहो अरिट्टनेमिस्स अंतियानो सहस्संववणाओ उज्जा- णाश्रो पडिाणिक्खमति पडिनिक्खमित्ता तिहिं संघाडएहिं अतुरियं जाव अडति । भावार्थ:-उसके पश्चात्, वे छहों अणगार, एक दिन,बेले के पारणे में प्रथम प्रहर के समय स्वाध्याय कर, गौतम 米米米米米去兴未牛牛牛牛牛牛米米米米米米米米卡米米米米 २३ श्रीमदन्त- छदशाक सूत्रम्। वर्ग तृतीय २४ 北未未半未羊水非半未羊未生未未未未注未来未未北 स्वामी की तरह, भगवान् के निकट आ कर बोले-"भगवन् ! यदि आपकी आज्ञा हो, तो बेले के पारणे के लिए हम छहों मुनि तीन सिंहाडों (तीन भागों) में बँट कर द्वारिका में गोचरी के लिए जावें ।" भगवान् ने शीघ्र ही आज्ञा प्रदान की, कि जैसा भी तुम्हें सुखकर जान पड़ता हो, करो। इस प्रकार छहों अणगारों ने भगवान् की आज्ञा प्राप्त कर, उन्हें वन्दना की । फिर सहस्राम्र वन से निकल कर तीनों विभागों ने विधि-युक्त शनैःशनैः द्वारिका की तरफ भिक्षार्थ प्रस्थान किया। मूलः-तत्थणं एगे संघाडए बारवईए एयरीए उच्चनीय मज्झमाई कुलाइंघरसमुदा- एस्स भिक्खायरियाए अडमाणे अडमाणे वसुदेवस्स रगणो देवईए देवीए गेहे अणुपवितु। तएणं सादेवई देवी ते अणगारे एजमाणे पासइत्ता हट्ट तुट्ट जाव हियया आसणाभो अब्भु- ठेइ २ ता सत्तट्ठ पयाइं अणुगच्छइ २ चा तिक्खुत्तोत्रायाहिण पयाहिणं करेइ २ ता वंदइण- मंसइ२ चा जेणेव भत्तघरे तेणेव उवागच्छइ २ त्ता, सीह केसराणं मोयगाणं थालं भरेइ २ ताते अणगारे पडिलाभेइ २ त्ता वंदइ णमंसइ २ ता पडिविसज्जेइ । भावार्थः-उन तीनों सिंहाड़ों (विभागों) में से एक सिंहाड़ा द्वारिका नगरी के धनाड्य , गरीब और साधारण 牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛朱朱朱孝孝丰十米牛未未未牛未来 २४ 环形※※ श्रीमान्त- कृहशान स्त्रम्। वर्ग तृतीय २५ स्थितिवाले घरों में, अथवा क्षत्रिय, वैश्य और कृपक कुलों में क्रमशः मिक्षार्थ भ्रमण करते-करते, राजा वसुदेव के राजमहल में, जहाँ देवकी निवास करती थीं प्रवेश किया । देवकी महागनी, अणगारों को अपने द्वार की ओर आते हुए देख कर बडी ही प्रसन्न हुई । और, अपने आसन से उट कर, अत्यन्त आदर-पूर्वक स्वागतार्थ सात- आठ काम अणगारो के सर मुख गई । तथा, तीन बार उन्हें अपने हाथों से प्रदक्षिणा करते हुए, बन्दना की। फिर जिस ओर भोजन-गृह था, उस ओर मुनियों को लाई । और, सिंह-केसरी-मोदक, जो अनेक पौष्टिक पदार्थो माई के संयोग से श्री कृष्ण महाराज के कलेवे के लिए तैयार किया हुआ था | और. जिस कृष्ण महाराज प्रतिदिन प्रातःकाल व लेवे में लिया करते थे । उसी मोदक का थाल भर कर, देवकी महारानी ने मुनिराजों को वहराया और पदर बन्द ना कर, उन्हें विदा किया। मूलः-तदाणंतरं च णं दोचे संघाडए वारवईए नयरीए उच्च जाव विसजेड्। तयाणं तरं च णं तच्चे संघाडए वारवइए नगरीए उच्चनीए जाव पडिलाभेइ२त्ता एवं वयासी-किरणं दे- वाणुप्पिया ! कणहस्स वासुदेवस्स इमीसे वारवईएनयरीए दुवालसजोयणायामे पच्चक्खं देवलोग भूयाए समणानिग्गंथा उच्चणीयमज्झमाई कुलाई घर समुदाणस्स भिखायरियाए अडमाणा भत्तपाणं णो लभंति ? जन्नं ताइंचेव कुलाई भत्तपाणाए भुज्जो भुज्जो अणुप्पवि- , *** *** श्रीमदत्त कृहसास वर्ग तृतीय सूत्रम्। **洋***洋*永荣字字宋****** सांत ? भावार्थ:-उसी के थोड़ी देर पश्चात्, दूसरा सिंहाड़ा भी ( अर्थात् दो मुनियों का समूह) उसी नगरी में, भिक्षार्थ विचरण करते हुए, देवकी के यहाँ पाया । उन्हें भी देवकी ने विधि-पूर्वक वही सिंह-केसरी-मोदक बहरा कर, आनन्द पूर्वक विदा किया । फिर थोड़ी ही देर में, तीसरा सिंहाड़ा भी घूमते-घुमाते भिक्षार्थ वहाँ आया। देवकी ने उन्हे भी अन माता-पूर्वक वही सिंह-केसरी-मोदक बहराया । फिर वे विनय पूर्वक उन से बोली-- "हे देवानुप्रिय ! जहाँ वासुदेव जैसे महा-प्रतापी राजा राज कर रहे हैं, ऐसी स्वर्ग-जैसी महान् द्वारिका नगरी में, इतने घर होते हुए भी ज्या आपको भोजन नहीं मिला ? जिससे आपको यहाँ तीन बार पधारने का कष्ट उठाना पड़ा। मूलः-तए णं ते अणगारा देवइं देवीं एवं वयासी-णो खलु देवाणुप्पिए ! कण्हस्स वासुदेवस्स इमी से वारवईए एयरीए जाव देवलोग भूयाए समणा निग्गंथा उच्चणीय जाब अङमाणा भत्तपार्ण पो लमंति,नो चेवणं ताई ताइंकुलाइंदोच्चापि तच्च पि भत्तपाणाएअ- गुपविसति । एवं खलु देवानुप्पिए ! अम्हे भदिलपुरे नपरे नागस्स गाहावइस्स पुत्ता सुलसाए भारियाए अत्तया छ भायरो सहोदरा सरिसया जाव नल कुबरसमाणा अरहो अरिट्ठ- 来崇米米米米米米米米米米米米卡米米米米米米米米未非洲。 २६ श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। वगे तृतीय नेमिस्स अंतिए धम्म सोच्चा णिसम्म संसार भगविग्गा भीया जम्मणमरणाणं मुंडा जाव पव्वइया। भावार्थः-इतना सुनते ही दोनों मुनियों ने नम्रभाव से कहना प्रारम्भ किया हे देवानुप्रिये ! कृष्ण वासुदेव की स्वर्ग-जैसी द्वारिका नगरी में श्रमण साधुओं को क्षत्रिय, वैश्य और कृपकों के घरों से भिक्षा नहीं मिली । और, इसी हेतु बार-बार मुनियों को यहाँ आना पड़ा, यह बात नहीं है । किन्तु हे देवानुप्रिये ! अदिलपुर नगर नाग नामक गाथापति के पुत्र और उनकी सुलसा नामक भार्या के अङ्गज, हम छहों सहोदर भाई हैं। और, छहों नल कुवेर के समान एकसा सुन्दर दिखाई देते हैं । हम छहों सहोदर भाइयों ने, भगवान् श्री गरिष्टनेमि का उपदेश श्रवण कर, जन्म-मरण, एवं सांसारिक दुखों से भयभीत हो, भगवान के पास दीक्षा ग्रहण की है। मूलः-तएणं अम्हे जं चेव दिवसं पव्वइया तं चेव दिवसं अरहं अरिठ्नेमि वंदामो नमंसामो इमं एयारूवं अभिग्गहं अभिगेसहामो इच्छामो णं भंते ! तुम्भेहिं अन्मणुण्णाया समाणा जाब अहासुहं देवाणुप्पिया ।तएणं अम्हे अरहनो अरिट्ठनेमिस्स अभणुगणाया समाणा जावज्जीवाए छटुंबढेणं जावविहरामो,तंअम्हे अज्जछट्टक्खमणपा- *本卡产市丰未杀生土法寺孝**孝丰孝未* 宰米半未出於孝孝米半半法法牛朱柴柴米米米米米米半米米 । २७ वर्ग तृतीय कृइशाङ्ग सूत्रम् । २८ रणयसि पढ़माए पोरिसिए जाव अडमाणातव गेहंअणुप्पविट्ठा,तंनो खलु देवाणुप्पिए! तेचेव श्रीमदन्त-।। णं,अम्हे,अम्हे णं अन्ने, देवइं देविंवदइ २ ताजामेव दिसंपाउम्भूए तामेव दिसंपडिगया। भावार्थ:-हमने जिस दिन दीक्षा धारण की थी, उसी दिन से भगवान की आज्ञा प्राप्त कर, बेले-बले की तपश्चर्या करने की प्रतीज्ञा ली है । और, उसी के अनुसार, बेले-बेले पारणा कर रहे हैं। आज हमारे छहों के वेले का पारणा है। पहले पहर में स्वाध्याय किया। दूसरे में ध्यान और तीसरे में भगवान की आज्ञा लेकर क्षत्रिय, वैश्य और कृषकों के यहाँ, भिक्षा के लिये गौतमस्वामी की भॉति भ्रमण करते हुए, तुम्हारे घर पर आये । जो पहले सिंहाड़ा आया था, उस में हम नहीं थे । अर्थात् हम छहों भाई प्रथक्-प्रथक् तीन सिंहाड़ों (विभागों) में विभक्त हो कर, द्वारिका में, गोचरी के लिए निकले थे। हम ही यहाँ बार-बार नहीं आये । यह सुन, देवकी ने उन्हें वन्दना की। तथा, मुनियों ने भी अपने स्थान की ओर प्रस्थान किया। मूलः-तए णं तीसे देवईए देवीए अय मेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पन्ने एवं खलु अहं पोलासपुरे नयरे अइमुत्तेणं कुमार समणेणं बालत्तणे वागरिया-तुमंणं देवाणुप्पिए! अह पुते पयाइस्ससि सरिसए जाव नल कुव्वर समाणे, नोचेव णं भरहे वासे अण्णो अम्मयात्रो *********** श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग वर्ग तृतीय सूत्रम् । २६ तारिसए पुरे पयाइस्संति तं एं मिच्छा इमं पच्चक्खमेव दिस्सति भरहेवासे अण्णाश्रो वि अम्मयानो खलु एरिसए जाव पुत्ते पयायाो, तं गच्छामि णं अरहं अरिष्टनेमि वंदामि नम- सामि वंदित्ता नमंसित्ता इमं च णं एयारूवं वागरणं पुच्छिस्सामी ति कद्द एवं संपेहेइ २ त्ता कोडंबिय पुरिसा सदावइ २ त्ता एवं वयासी लहु करणप्पवरं जाव उवट्ठति, जहा देवाणंदा जाव पज्जुवासइ। भावार्थः-तदनन्तर, श्री देवकी महारानी को इस प्रकार सङ्कल्य-विकल्प उत्पन्न हुए, कि पोलासपुर नगर में, बाल्यावस्था में ही अइमुत्त नामक अंणगार ने मुझे ऐसा कहा था, कि "हे देवानुप्रिये ! तू, नल कुवेर के समान आठ पुत्रों को जन्म देगी। वैसे पुत्रो को भरत क्षेत्र में अन्य कोई भी माता जन्म न दे सकेगी।" किन्तु उनका यह कहना मिथ्या हुश्रा | क्योंकि, भरत-क्षेत्र में अन्य माताओं ने भी तो ऐसे पुत्रों को जन्म दिया है। जिनको में प्रत्यक्ष देख रही हूँ। मगर साधुओं की वाणी कभी निष्फल नहीं होती, अतः मैं जाऊँ और अरिष्टनेमि भगवान को बन्दना कर, अपने असमंजस को मिटाऊँ । ऐसा विचार कर, उसने अपने सेवकों को बुलाया और उन्हें एक सुन्दर रथ सजाने की आज्ञा दी । आज्ञा पाते ही तुरन्त रथ सहित वे ा प्रस्तुत हुए । तब देवकी ने रथारूढ़ होकर भग- वान् की शरण ली। जिस प्रकार देवानन्दा भगवान् महावीर स्वामी की सेवा में उपस्थित हुई थीं, उसी प्रकार २६ पामंशाहावई परिवसइ अड्ढे , तस्स णं णागस्स गाहावइस्स सुलसा णामं भारिया होत्था , वर्ग श्रीमदन्त- हदशाङ्ग सूत्रम् । तृतीय 水冰法卡冰法寺水陆法法法式土味**朱辛未辛未未恐 देवकी भी श्री अरिष्टनेमि भगवान् की सेवा में पहुँची और उन्हें वन्दना कर उन की सेवा वह करने लगीं। मूलः-तए णं अरहा रिटनेमी देवइं देवि एवं वयासी-सेनूणं तव देवई!इमे छ अणगारे पासेत्ता अयमेयारूवं अज्झथिए, जाव समुप्पजेत्था एवं खलु पोलासपुरे नयरे अइमुत्तेणं तं चेव जाव णिग्गसि णिग्गच्छित्ता जेणेव ममं अंतियं हव्वमागया से नूणं देवई देवि ! अत्थे समढे ? हंता अस्थि । एवं खलु देवाणुप्पिए ! तेणं कालेणं तेणं समपणं भद्दिलपुरे णयरे णा सा सुलसा गाहावइणी बालत्तणे चेव निमित्तिएणं वागारिया-एस णं दारिया णिंदू भविस्सइ । तए णं सा सुलसा वालप्पभिति चेव हरिणेगमेसी देव भवयायावि होत्था, हरिणेगमेसिस्स पडिमं करेइ २ ता कल्लाकल्लिं बहाया जाव पायच्छित्ता उल्लपडसाड़या महरिहं पुष्फच्चणं करेइ २ ला जनुपाय पडिया पणामं करेइ, तो पच्छा आहारेइ वा नीहारेइ वा वरइ वा। भावार्थ:-तदनन्तर, अरहा अरिष्टनेमि भगवान् ने महारानी देवकी से कहा-हे देवकी ! इन एक सरीखे छहाँ अणगारों को देख कर, तेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ, कि मुझे पोलासपुर नगर में अइमुत्त अणगारने जो 半米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米去 ३० वर्ग तृतीय श्रीसदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। ३१ *於*n*n********** कहा था. कि " तू ऐसे आठ पुत्रों को जन्म देगी। जिनके समान सामन्त भारत में अन्य कोई भी माता पैदा न कर सकेगी। " आदि-आदि विचारो में तल्लीन होकर, तू इसी विषय का मुझ से स्पष्टीकरण करने के लिए यहाँ आई हुई है । क्या, यह बात सत्य है ? उत्तर में देवकी ने कहा--हॉ प्रभु ! जिस प्रकार आपने फर्माया है, वह सोलह आना सत्य है । मैं इन्हीं विचारों में तल्लीन हो कर आपकी सेवा में अपने असमंजस को मिटाने के लिए उपस्थित हुई हूँ । अब, कृपया, इस का स्पष्टीकरण करने का अनुग्रह करें। भगवान् ने फर्माया, हे देवानुप्रिये ! इत का विवरण ! है, तू ध्यान दे कर सुन । उत्त काल, भदिलपुर नगर में, नाग नामक एक महान् सम्पत्तिशाली गाथा-पति रहता था। उसके : सुलसा नामक एक पत्नी थी। उस सुलसा नामक गाथापत्नी को बाल्यावस्था में ही, किसी ज्योतिषी ने कहा था, कि-तू मृत-बन्ध्या होगी । तब से वह सुलसा बाल्यकाल से ही हरिणगमेती देव की भक्ति करने लगी थी । हरिणगमेसी देव की प्रतिमा बना कर, वह नित्य-प्रति स्नानादि से निवृत्त हो भींगी साड़ी से ही, उस प्रतिमा के सम्मुख पुष्पों का ढेर करती थी। और फिर वह अपने घुटनों को पृथ्वी पर टेक कर उने वन्दना करती । तत्पश्चात् भोजन कर अपने अन्य गृह-कार्या में सलग्न वह होती थी। मूलः-तए णं तीसे सुलसाए गाहावइणीए भत्ति वहुमाण सुस्सूसाए हरिणेगमेसी देवे ** वगे तृतीय दशाङ्ग नम्।* 张****************张水米米米米米米 आराहिए यावि होत्था । तए णं से हरिणेगमेसी देवे सुलसाए गाहावइणीए अणुकंपणट्टयाए श्रीमदन्त- सुलसं गाहावइणिं तुमंच णं दो वि समउउयानो करेइ,तए णं तुम्भे दो वि सममेव गभेगिण्हह, सममेव गम्भे परिवहह, सममेव दारए पयायह । तए णं सा सुलसा गाहावइणी विणिहाय मावणणे दारए पयाइति,तए णं से हरिणेगमेसी देवे सुलसाए अणुकंपणट्ठाए विणिहायमावण्णए दारए करतल संपुडेणं गेरहइ २ ता तव प्रतियं साहरइ २त्ता तं समयं च णं तुमं पि णवण्हं मासाणं सुकुमालदारए पसवसी,जे वि य णं देवाणुप्पिए ! तवपुत्ता ते वि य तब अंतियायो करयलसंपुडेणं गेरहइ २ ता सुलसाए गाहावइणीए अंतिए सारहइ तं तव चेव णं देवइ ! ए ए पुत्ता णो चेव सुलसाए गाहावइणीए। भावार्थ:-तत्पश्चात, भक्ति और बहुमान-पूर्वक सेवा सुपा करने पर, हरिणगमेसी देव, उस सुलसा गाथा- पत्नी की सेवाओं के वशीभूत हो गया । तब उस हरिणगमेसी देव ने सुलसा गाथापत्नी पर अनुकम्पा दिखला कर, उसे तथा तुझे दोनों को एक ही समय में ऋतुमति की । तुम दोनों ही एक साथ गर्भवती हुई । तुम दोनों के गों की प्रतिपालना भी साथ ही साथ हुई । इतना ही नहीं पुत्रोत्यत्ति भी दोनों के यहाँ साथ ही साथ हुई । परन्तु ***米米米米米米米米米米米米 ३२ --- वर्ग श्रीमदत्त- कृद्दशाह सूत्रम् । तृतीय ३३ सलमा ने मृतक पुत्र को जन्म दिया । उस मृतक पुत्र को हरिण गमेसी देव ने अपने हाथों में लेकर तेरे पास रख दिया । और, उसी समय, तू ने भी, नौ मास और दस दिन पूर्ण होने पर एक सुकुमार पुत्र को जन्म दिया । उस पुत्र को तेरे पास से उठा कर मुलसा के अधीन कर दिया । इसलिए हे देवकी ! ये पुत्र सचमुच में तेरे ही हैं, सुलसा के नहीं। मूलः-तए णं सा देवई देवी अरहो पारेहनेमिस्स अंतिए एयम सोच्चा निसम्म हट्ठ तुट्ठ जाव हियया अरहं अरिट्टनेमि वंदइ नमसइ वंदइत्ता नमसइत्ता जेणेव ते छ अणगारा तणेव उवागच्छइ २ ता ते छप्पि अणगारा वंदइ णमंसइ वंदइत्ता णमंसइत्ता भाग- यपण्हुया पप्फुयलोयणा कंचुय पडिक्खित्या दरिय वलय बाहा धाराहय कलंब पुष्फगं पि व समूससियरोमकूवा ते छप्पि अणगारे अणिमिसाए दिट्ठीए पेहमाणी २ सुचिरं णिरि- क्खइ २ शा वंदइ नमसइ वंदइत्ता नमसइत्ता जेणेव परिहा रिट्ठनेमी तेणेव उवागच्छइ २ ता अरहं अरिट्ठनमि तिक्खुतो आयाहिणं पयाहणं करेइ २ चा वंदइ णमंसइ वंदिता णमसित्ता तमेव धम्मियं दुरुहइ २ त जेणेव वारंवइ णयरी तेणेव उवागच्छइ २ त्ता वारवई ※未未法於未牛未未米米米米米洋洋未計本法未米半米米米米 ३३ वर्ग तृतीय श्रीमदन्त- दशाह सूत्रम्। नयरिं अणुपप्पविसइ २ वा जेणेव सए गिहे जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तणेव उवागच्छइ २ ता धम्मियानो जाणप्पवरात्रो पच्चोरुहइ २ वा जेणेव सए वासघरे जेणेवे सए सयाणज्जे तेणेव उवागच्छद च सयांस यसणिज्जास निसीयइ । भावार्थ:-तदनन्तर महारानी देवकी, श्री अर्हन् अरिष्टनेमि भगवान के मुखारविन्द से इस वृत्तान्त को सुन कर बड़ी ही प्रसन्न हुई। और इस बात को हृदय में धारण कर, आनन्द का अनुभव करती हुई, भगवान् को वन्दना की । पश्चात् जहाँ वे छहों अण गार विराजमान थे, वहाँ उनकी सेवा में वह उपस्थित हुई । वहाँ जा कर, उन्हें वन्दना की । उन को देखते ही महारानी देवकी के स्तनों से दुग्ध की धारा बह चली। आनन्द के मोरे, उसकी आखें आँसुओं से ओत-प्रोत हो गई। हर्ष से उसकी कंचुकी की कसें टूट पडीं । उसकी भुजाओं के भूपण तथा हाथकी चूड़ियाँ तङ्ग होने लग गई । जिस प्रकार वर्षा में कदम्ब के पुष्प विकसित हो उठते हैं, उसी प्रकार अपने अङ्गज छहों मुकुमार और परम सुन्दर अणगारों को अवलोकन कर महारानी देवकी का रोम-रोम पुलकित हो उठा । इस प्रकार, देवकी उन छहों अण गारों को प्रेमपूर्वक बहुत देर तक अनिमेप-दृष्टि से निरखती रही । तत्पश्चात्, उन्हें वन्दना कर फिर भगवान् के समीप वह आई । उन्हें भी विधि-पूर्वक वन्दना कर, अपने धार्मिक-रथ पर वह सवार । रथ द्वारिका नगरी में प्रवेश हुआ। राजप्रासाद की तरफ, बाहर की उपस्थान-शाला में वह पहुँचा । देवकी 米米米米米米米米米米米开米米米米法 my 30 . हुई ३ ***** तृतीय वर्ग श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। ३५ ******狀*********於********* महारानो रथ से नीचे उतर पड़ी । और अपने निवास स्थान में वह पहुँच कर, शैया पर बैठी। मूलः-तए णं तीसे देवतीए देवीए अयं अभात्थिए समुपरणे एवं खलु अहं सारसए जाव नलकुव्वरसमाणे सत्त पुत्ते पयाया, नो चेव एणं मए एगस्स वि वालत्तणए समुन्भूए,एस वि य णं कण्हे वासुदेवे छण्हं मासाणं ममं अंतियं पायदए हव्वमागच्छइ, तं धरणाश्रो णं तायो अम्मानो जासिं मण्णे णियगकुच्छिसंभूतयाइं थण दुद्ध लुद्धयाई महुरसमुल्ला वयाई मंमण पजंपियाइं थण मूल कक्खदेसभागं अभिसरमाणा तिं सुद्धयाई पुणो य कोमल कमलो- वमेहिं हत्थेहिं गिरिहऊण उच्छांग णिवेसियाई देंति समुल्लावए सुमहुरे पुणो पुणो मंजुलप्प भणिए, अहं णं अधन्ना अपुन्ना अकय पुन्ना एलो एक तरमपि न पण श्रोहय मणसंकप्पा जाव झियायइ। भावार्थः-तत्पश्चात् , उस देवकी महारानी के मन में इस प्रकार विचार उत्पन्न हुआ, कि मैंने नलकुवेर के समान सुन्दर एक सरीखे सात पुत्रों को जन्म दिया है । परन्तु उन में से मैंने एक का भी बालकपन का सुखानुभव नहीं किया । और, यह कृष्ण वासुदेव भी मेरे पास प्रणाम करने के लिए पूरे-पूरे छः छः महीने में आते हैं । ****** ********* श्रीमदन्त- रुद्दशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तृतीय ३६ 米米米米米米未未卡米卡卡朱米注味法本法法并未杀朱永热 पहले तो उन माताओं का जीवन ही सार्थक है, जिनकी कोख से पुत्र-रत्न प्रसत्र होते हैं । फिर वे माताएँ ओर भी अधिक धन्यवाद की पात्र हैं, जो अपने स्तन के दुग्ध में मुग्ध होने वाले, मधुर-भापी और तुतलाती हुई बोली को बोलने वाले लालों को, अपनी कोमल गोदी में खिलाती रहती हैं । वे माताएँ सचमुच में बड़ी ही भाग्यवती हैं, जो अपने स्तन के मूल से कुक्षि-भाग में, तथा कुति-भाग से बाहुओं में क्रीड़ा करने वाले, अपने दुध-मुहाते हुए आँखों के तारों के, बाल-क्रीडा के सुख का अनुभव करती हैं । और, वे माताएँ सचमुच में साक्षात् देवियाँ है, जिन्हें अपने नन्हें-नन्हें लालों को, अपने कोमल करों से उठा कर अपनी गोदी में विठाने, आलिङ्गन करने, और उनके मुख-चन्द्र को बार-बार देखने का सु-अवसर प्राप्त होता है । ऐसा मैं मानती हूँ । किन्तु मैं अधन्य हूँ भाग्य-हीना हूँ। मैंने पूर्व-भव में ऐसे पुण्य उपार्जन नहीं किये कि जिमसे एक भी बालक का इस प्रकार आनन्द अनुभव मैं कर सकूँ । महागनी देवकी, इस प्रकार के विचारों में तल्लीन होकर मन-मलीन तन-छीन हो गई । और आर्तध्यान ध्याती हुई चिन्ता-सागर में डुबकियाँ लगाने लगी। मूलः-इमं च णं कण्हे वासुदेवे रहाए जाव विभूसिए देवतीए देवीए पाय वंदए हव्व- मागच्छइ । तए णं से कराहे वासुदेवे देवई देवि पासइ २ ता देवतीए देवीए पायग्गहणं करेइ २ त्ता देवती देवीं एवं वयासी-अन्नयाणं अम्मो! तुम्भे ममं पासेता हट्ट जाव भवह । किरणं 中非半米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米 1 ३६ - AN श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम् वर्ग तृताय ३७ 未未宋米卡米卡米千米卡米 अम्मो ! अज तुम्भे प्रोय जाव झियायह । तए णं सा देवई देवी कण्हं वासुदेवं एवं वया- सी-एवं खलु अहं पुत्ता ! सरिसए जाव समाणे सत्तपुत्ते पयाया, नो चव णं मए एगस्स वालत्तणे अणुव्भूए, तुमं पि य णं पुत्ता ! ममं छण्हं छण्हं मासाणं ममं अंतियं पायवंदए हव्वमागच्छसि, तं धन्नात्रो णं तानो अम्मयात्री जाव झियामि । भावार्थः इतने ही मे श्री कृष्ण वासुदेव स्नानादि से निवृत्त हो, और वस्त्र तथा अलङ्कारों से अलङ्कृत बन, अपनी माता, महारानी देवकी के समीप प्रणाम करने के लिए शीघ्र ही उपस्थित हुए । परन्तु अपनी माता को उन्होंने चिन्तित देखा । प्रणाम करके वे उससे बोले-माता ! और दिन जब मैं आता हूँ, तब तो आप मुझे देखकर बड़ी प्रसन्न हो उठती हैं । परन्तु आज तो अति ही अप्रसन्न और चिन्तित जान पड़ रही हैं । इसका कारण क्या है ? इस पर महारानी देवकी ने कहा-पुत्र ! मैंने एक सरीखे नल-मुबेर के समान सात पुत्रों को जन्म दिया है। परन्तु सात पुत्रो मे से किसी एक पुत्र की भी बाल क्रीड़ा के सुख का मैंने अनुभव नहीं किया । तुम भी छः छः महीनों में, जब प्रणाम करने आते हो, अपना मुँह दिखा जाते हो । अतः वे माताएँ सचमुच में बड़ी भाग्यवती हैं, जो अपने हृदय-दुलारे बालकों की बाल-क्रीड़ा का आनन्द अनुभव करती है । मैं तो इस अानन्द के अनुभव से बिलकुल ही वञ्चित हूँ। मेरे प्यारे लाल ! बम, और कुछ नहीं मैं इसी बात की चिन्ता में रात-दिन उतराते रहती हूँ। *牛牛牛牛牛未未半半米米米卡米卡未未半半牛牛牛味 श्रीमदन्त- रुदशाह सूत्रम्। तृतीय वर्ग 必米米米米米小非******於非於末r *米米 मूल:-तए णं से कण्हे वासुदेव देवइं देवि एवं वयासीमा एंतुझे अम्मो ?ोहय जाव झियायह, अहणणं तहा वत्तिस्सामि जहाणं ममं सहोदरे कणीयसे भाउए भविस्सतीति कटु देवइं देवि ताहिं इट्टाहि कंताहिं जाव वग्गृहि समासासेइत्ता तो पडिनिक्खमइरत्ताजणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ २ ता जहा अभत्रो नवरं हरिणेगमिसस्स अट्टमभत्तं पगेण्हइ जाव अंजलिं कहु एवं वयासी-इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! सहोदरं कणीयसं भाउयंविदिण्णं। भावार्थ:-तत्पश्चात्, श्री कृष्ण वासुदेव ने माता देवकी से कहा है माता ! अब आप चिन्ता चित्त से निकाल कर दूर फेंकिये । मैं ऐसा साधन करूँगा, जिससे मेरे एक सहोदर लघु भ्राता उत्पन्न होगा। इस प्रकार माता को इच्छित मधुर वचनों से विश्वाम और धीरज बंधाते हुए वहाँ से वे चले। और जिस ओर पौषध-शाला थी, वहाँ आकर, जिस प्रकार श्री अभयकुमार ने देवाराधना की थी,उसी प्रकार देवाराधना में तत्पर हो गये। विशेषता केवल इतनी ही थी कि-इन्होंने तेले की तपश्चर्या कर के हरिणगमेमी देव से अपने उभय कर-बद्ध प्रार्थना की, कि हे देवानुप्रिय ! मेरी यह इच्छा है कि मेरे एक सहोदर लघु भ्राता का जन्म हो । अतएव मेरी इस इच्छा की पूर्ति आप करें। मूलः-तए णं से हरिणेगमेसी देवे कण्हं वासुदेवं एवं वयासी होहिति णं देवाणुप्पिया BS श्रीमदन्त- हैदशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तृतीय *******未***还本宋天圣宗洋洋法本法不法 तव देवलोयचुए सहोदरे कणीयसे भाउए, सेणं उम्मुक बाल भावे जाव जोवणगमण पत्ते अरहो अरिहनेमिस्स अंतियं मुंडे जाव पव्वइस्सइ,कण्हं वासुदेवं दोचंपि तच्चं पि एवंवदइ २ त्ता जामेव दिसं पाउभूए तामेव दिसं पडिगए। भावार्थ:-इस पर, हरिणगमेसी देव ने श्री कृष्ण वासुदेव को कहा, किन्हे देवानुप्रिय !" देवलोक से एक देव आयुप्य-पूर्ण वर तुम्हारे सहोदर लघु नाई अवश्य होगा; पर वह बाल्य अवस्था से मुक्त हो कर प्रारन्भिक यौवन वय मे श्री अर्हन्त अरिष्टनेमि प्रभु के पास दीक्षा ग्रहण करेगा। इस प्रकार वह देव श्री कृष्ण को दो-तीन बार कह कर जिस ओर से आया था, उसी ओर वापिस चला गया। मूलः-तए णं से कण्हे वासुदेवे पोसहसालानोपडिनिक्खमइत्ताजणेव देवइं देवि तेणेव उवागच्छइ २ ता देवतिए देवीए पायउगहणं करेइ २ त्ता एवं वयासी होहिइ णं अम्मो ! ममं सहोदरे कणीयसे भाउ त्ति कटु देवतीए देवीए इटाहिं जाव पासासइ २ चा जामेव दिसं पा- उठभूए तामेव दिसं परिगए । तएणं सा देवई देवी अन्नया कयाई तसि तारिसंगास जाव सीहं सुमिणे पासेत्ता पडिबुद्धा जाव ह तुहियया तं गभं सुहं सुहेणं परिवहइ । 半米半半华法兴朱孝未未未未未未米米米未杀未未才未孝未未 कृद्दशाङ्ग वर्ग तृतीय ४० * * * * * ******* * * * * * パリ**** भावार्थ:-कृष्ण वासुदेव पौषधशाला से चलकर फिर अपनी माता देवकी के निवासस्थान में आये । माता को ई सप्रेम प्रणाम उन्होंने किया । तब उनके पाँव पकड़ कर वे बोल- 'माताजी,मेरे एक सहोदर लघु भ्राता अवश्य होगा। श्रीमदन्त- इस प्रकार के मधुर वचनों से माताजी को आश्वासन देकर श्री कृष्णजी वापिस अपने भवन की ओर लौट आये। सूत्रम्। कई महारानी देवकी ने एक दिन पिछली रात्रि में शैया पर सोते हुए, अर्द्ध निद्रितावरथा में, एक स्वम देखा कि एक सिंह अकाश माग से नीचे की ओर उत्तरता हुआ, उनके हुँह मे प्रवेश कर गया है। सजग होकर, इस स्वप्न को देखने के कारण महारानी का चित्त बड़ा ही प्रसन्न हुआ। उन ने पतिदेव से इस स्वम का फल पूछा । जान पड़ा कि वह अति ही शुभ स्वप्न था। फिर स्वप्न-पल के विशेषज्ञों से भी उसका निर्णय उन ने प्राप्त किया । तब तो बड़ी ही प्रसन्न हुई। फिर उस गर्भ का सुख तथा प्रयत्नपूर्वक प्रतिपालन बह करने लगी। मूलः-तए णं सा देवई देवी नवरहं मासाणं जासुमणारत्तबंधुजीवतलक्खरससरसपा- रिजातकतरुणदिवाकर समप्पमं सव्वनयणकंतं सुकुमालं जाव सुरूवं गयतालुयसमाणं दारयं पयाया, जम्मणं जहा मेह कुमारे जाव जम्हा णं अम्हं इमे दारए गयतालुसमाणे तं होउणं अम्ह एयस्स दारस्स नाम धेजे गय सुकुमाले गयसुकमाले । तएणं तस्स दारगस्स अम्मा 法法法法 ४० श्रीद- हादशाह वर्ग तताय सूत्रम्। ४१ 5********* FREE पियरे नामं करेंइ गयसुकुमाले त्ति सेसं जहा मेहे जाव अलंभोगसमत्थे जाए यावि होत्था । तत्थणं वारवईएनयरीए सोमिले नामं माहणे परिवसइ अटे रिउव्वेय जाव सुपरिनिहिए यावि होत्था । तस्स सोमिलमाहणस्त सोमसिरी नामं माहणी होत्था सुकुमाला।तस्सणं सो- मिलस्स माहणस्स धूया सोमसिरी ए माहणीए अत्तया सोमा नाम दारिया होत्था सुकुमाला जाव सुरूवा रूवेणं जाव लावण्णणं उकिट्ठा उकिट्ठसरीरायावि होत्था । भावार्थः-तदनन्तर, उस महारानी देवकी ने, गर्भस्त्राव का समय पूर्ण होने पर जूही, विकसित पारिजात पुष्प बन्धुजीव ( वधूटी ), उदय होते हुए सूर्य की प्रभा और गज के तालुये के समान आरक्त दर्शकों के नेत्रों को मोहित करनेवाले बड़े ही कोमल और सुन्दर रूप वाले पुत्र रत्न को जन्म दिया। इनका जन्मोत्सव मेघ कुमार के सदृश किया गया । अशुचि से निवृत्त हो कर बारहवें दिन नामकरण-सस्कार उनका मनाया गया । इनका कोमल पन. हाथी के तालवे के समान होने के कारण. इनका नाम भी ' गजसुकुमार' रक्खा गया । इनकी वाल्यावस्था का अवशेष वर्णन मेघ कुमार की भाँति ही समझना चाहिए। ये 'गज-सुकुमार' नामक कुमार पड़ लिख कर शि- क्षित हुए । अम बाल्यावस्था से मुक्त हो कर प्रारम्भिक यौवन की घाटी में ये उत्तरे । उधर द्वारिका नगरी में 'सो- मिल' नामक एक ब्राह्मण रहता था। वह सम्पत्तिशाली और ऋग्वेद आदि चारों वेदों का पूर्ण ज्ञाता था । उसके 丰***卡卡卡卡卡卡****沐******本卡 ar . श्रीमदन्त- रद्दशाङ्ग सूत्रम्। **米长沙法* वर्ग तृतीय ******* ४२ 各江苏:苏中济保“牙许许亦松 सोम-श्री नाम की एक बड़ी ही सुकुमार धर्म पत्नी थी। उस सोमिल ब्राह्मण के 'सोमा' नाम की एक अति सुन्दर और रूप लावण्यवती एक बालिका थी। मूलः-तए णं सा सोमा दारिया अण्णया कयाइ राहाया जाव विभूसिया बहूहिं खुजाहिं जाव परिविरुत्ता सयाओ गिहाश्रो परिनिक्खमइ २ ताजेणेव रायमग्गे तेणेव उवागच्छइ २ चा रायमग्गसि कणग तिंदूसएणं कीलमाणीरचिट्ठति । तेणं कालेणं तेणं समए णं अरहा अरिहनेमी समोसढ़े परिसा निग्गया, तए णं से कण्हे वासुदेवे इमीसे कहाए लढे समाणे रहाए जाव विभूसिए गय सुकुमाले णं कुमारेणं सद्धिं हथिखंधवरगए सकोरंट मल्लदामेणं छत्तेणं धरेजमाणे णं सेयवर चामराहिं उधुब्बमाणीहिं बारवईएनयरीए मज्झ मज्झणं पर- हो अरिहनेमिस्स पायवंदए णिग्गच्छमाणे सोमं दारियं पासइ २ ता सोमाए दारियाए रूवेण य जोव्वणे य जाव विम्हिए। भाव र्थः-वह लड़की एक रोज स्नान मञ्जन कर यावत् वस्त्रालङ्कारों से सुसजित हो, और अनेक दास-दासियों को साथ ले अपने घर से निकली । चली-चली वह जिधर राजमार्ग था उधर आ निकली । और, राजमार्ग में अपनी 来水水水水水水米米米米米米米米 ४२ -- वर्ग तृतीय गु* **tta trittt - स्वर्ण तारों से जडित गेंद को वह उछालने लगी । उस समय, अरहा अरिष्टनेमि भगवान् वहाँ पधारे । शहर में यह खवर होते ही दर्शनों के लिए जनता दौड़-पडी । कृष्ण महाराज ने भी भगवान् के पदार्पण के सुसमाचार सुने । तब श्री प्रदन्त- तो स्नान मञ्जनादि से शीघ्र ही निवृत्त हो और वस्त्राभूपणों से सुसज्जित बन, अपने लघु भ्राता गजसुकुमार को दशाङ्ग साथ उन्होंने लिया । फिर गजारूढ़ हो, कोरंट(कनेर)नामक वृक्ष के फूलों के हारों से वेष्टित छत्र को धारण किये सूत्रम् । हुए द्वारिका नगरी के मध्य के सार्वजनिक मार्गों से भगवान् अरिष्टनेमि के चरण-वन्दन को प्रस्थान उन्होंने किया। उम समय उन दोनों भाइयों की शोभा बड़ी ही अभिराम थी । बीच-बीच में श्वेत चाँवर, जो उन पर डुलाये जा रहे थे. वे तो उनकी उस शोभा को और भी बढ़ाये देते थे । मार्ग में गेद खलती हुई वह ' सोमा' नामक कन्या उन्हें दिख पड़ी । वे उस ब्राह्मण की कन्या का अनुपम रूप-लावण्य देखकर विस्मय, अधीरता और लोक लज्जा की तरल तरङ्गायमान त्रिवेणी में उतरने लगे। मूलः-तए णं से कण्हे वासुदेवे कोडुविय पुरिसे सदावेइ २ ता एवं वयासी गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया! सोमिलं महाणंजायित्ता सोमं दारियं गेण्हह गेरिहत्ता कन्नतेउरांस पक्खि- वह, तए णं एसा गयर कुमालस्स कुमारस्स भारिया भविस्सइ । तए णं कोडंविय पुरिसा जाव पक्खियांत तएणं कोडवियपुरिसा जाव पञ्चपिणंति तएणं से कराहे वासुदेवे वारवतीए 邓***於**於***於####水*****於未 ४३ .
श्रीमदन्त- दशाङ्ग सत्रम् । वर्ग तृतीय नयरीए मझ मज्भेणं णिगच्छइ २ ता जेणेव सहस्संबवणे उज्जाणे जाव पज्जुवासइ । तए णं अरहा अरिष्टनेमी कण्हरस वासुदेवस्स गय सुकमालस्स कुमारस्स तीसे य धम्मकहाए कण्हे पडिगए। भावार्थ:- तत्पश्चात्, श्री कृष्ण वासु देव ने अपने एक अधिकार सम्पन्न सेवक से कहा-हे देवानुप्रिय ! तुम जाओ और सोमिल ब्राहाण से इस कुमारी को माँग कर, इसे अविवाहित कन्याओं के अन्तःपुर में रख दो । क्यों- कि इस कन्या के साथ कुमार ' गजयुकुमार ' का विवाह किया जायगा । वह सेवक श्री कृष्ण की आज्ञा पाते ही सोमिल ब्राह्मण के घर पहुंचा । और सोमिल से उसने कहा-त्रि-खण्ड के स्वामी, श्री कृष्ण ने अपने लघु भ्राता गजसुकुमार का विवाह तुम्हारी कन्या ' सोमा' के साथ करना निश्चय किया है । और, इसी लिए उन्होंने तुम्हारी कन्या को मॉगा है । सोमिल यह बात सुन कर बड़ा प्रसन्न हुआ और बोला-अहो मेरी कन्या और राजकुमार गज- सुकुमार के साथ उसका विवाह ? यह तो बड़े ही सौभाग्य की बात है । लीजिए, इस लड़की को लेजाइए । लड़की को ल जाकर अन्तःपुर में रख दिया गया । उधर श्री कृष्ण वासुदेव की सवारी 'सहस्राम्रवन' ********幸未未未4法法法落手法不小未术未来 ५ *. उस समय तीनो वर्णो से परस्पर कन्यायो का आदान-प्रदान हुआ करता था । परन्तु आगे चल कर, यह प्रथा महाराज विक्रमादित्य के समय में वन्द हो गई।
श्रीमदन्त- हदशाङ्ग वर्ग तृतीय सम्। ************ नमक उद्द.न में भगवान् के निकट पहुँची । वहाँ श्री कृष्ण आदि ने भगवान् को श्रद्धा सेवा ई तथा भक्ति के साथ वन्दना की । भगवान् ने श्री कृष्ण वासुदेव और गजमुकुमार को धर्मोपदेश दिया । फिर कृ ण महार.ज तो भगवान का उपदेश श्रवण कर द्वारिका की ओर लौट आये। मूलः-तए णं से गयसुकुमाले कुमारे अरहो अरिष्टनेमिस्स अंतियं धम्म सोच्चा जं नवरं अम्मा पियरं श्रापुच्छामि जहा मेहो णवरं महलियावजं जाव वडिय कुले । तए णं से कण्हे वासुदेवे इमी से कहाए लद्धठे समाणे जेणेव गयसुकुमाले कुमारे तेणेव उवागच्छइ २ ता गयसुकुमालं कुमारं प्रालिंगइ २ चा उच्छंगे निवेसेइ २त्ता एवं वयासी तुमं ममं सहोदरे कणीयसे भाया तं माणं देवाणुप्पिया!इयाणिं अरहोरिट्नेमिस्स अंतिए मुंडे जाव पव्व- याहि । अहरणे कारवतीए नयरीए महया महया रायाभिसेएणं अभिसिंचिस्सामि । तएणं से गय सुकुमाले कुमारे कण्हेणं वासुदेवेणं एवं बुत्ते समाणे तुसिणीए संचिट्ठति । भावार्थः-परन्तु उन गजसुकुमार को श्री अरहा अरिष्टनेमि प्रभु की वाणी सुन कर, वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने श्री मेघकुमार की तरह भगवान् से कहा-भगवन् ! मैं माता-पिता से पूछ कर, अर्थात् उनकी आज्ञा प्राप्त कर 生未牛羊生共朱孝未半朱孝丰半半半未未未未幸未未米米米 ४५ m श्रीमदन्त- कद्दशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तुताय ! 邓小米米*h***於*水水水水水水水米米米法 आपके पास दीक्षा धारण करूँगा । इतना कह कर वे अपने घर आये । माता-पिता से दीक्षा धारण करन की आज्ञा उन्होंने माँगी । माता-पिता ने कुमार को अनेक प्रकार के सांसारिक प्रलोभन दिये । दीक्षा न लेने की अने- को बातें कहीं । अन्त मे कुमार से उन्होंने कहा-तुम्हारा विवाह हो जाने पर, तुम यदि चाहो तो अपनी सन्तति को अपना कार्य भार सौंप कर, दीक्षित हो सकोगे । श्री कृष्ण ने भी इस संवाद को सुना। वे शीघ्र ही कुमार गज- सुकुमार के पास आये । उन्हें कण्ठ से लगा लिये । अपनी गोद में उन्हें बिठाये । तब प्रेम-पूर्वक उनसे वे यूँ बोले- गजसुकुमार ! तुम मेरे परम प्रिय लघु भ्राता हो । हे देवानुप्रिय ! तुम मेरा कहा अभी मानो। अभी-अभी भगवान् के पास दीक्षा मत लो। मैं आज ही इस द्वारिका नगरी में, बड़े ही समारोह के साथ, तुम्हारा राज्याभिषेक कर- दूंगा । कदाचित, पाठक समझते होगे, कि राज्याभिषेक की बात को सुन कर, गजसुकुमार कुमार का मन अपने निश्चय से विचलित हो गया होगा । सो नहीं । कुमार ने इस से दूसरा ही कुछ अर्थ लिया । उन्होंने समझा. अभी तो दीक्षा-धारण की केवल चर्चा ही हो रही है । इतने पर ही जब त्रि-खण्ड का एक-छत्र अधिष्ठाता में बनाया जा रहा हूँ, तब दीक्षा-धारण करने पर तो इसका अनुपात कितना बढ़ जावेगा अभी किसी भी प्रकार ऑका नहीं जा सकता । यह सोच-समझ कर, वे अपने सत्य-पथ पर, हिमालय के समान अटल और समुद्र के समान गम्भीर बने रहे । और, श्री कृष्ण के कथन के उत्तर में केवल मौनावलम्बन उन्होंने धारण कर लिया । मूलः-तए णं से गय सुकुमाले कुमारे कण्हं वासुदेवं अम्मापियरोय दोचं पितचं पि एवं 米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米牛津法半小 20 वर्ग तृतीय सूत्रम् । 未米洋洋术柔术未未4·卡米手未未未 वयासी एवं खलु देवाणुप्पिया ! माणुस्सया कामा खेलासवा जाव विप्पजहियब्वा भविस्संति, श्रीमदन्त- तं इच्छामिणं देवाणुप्पिया ! तुम्भेहिं अभणुनाये समाणे अरहो अरिट्टनेमिस्स अंतिए जाव पव्वत्तए । तए णं तं गयसुकुमालं कण्हे वासुदेवे अम्मापियरो य जाहे नो संचाएति बहुयाहिं अणुलोभाहिं जाव आघवित्तए ताहे अकामाई चेव एवं वयासी तं इच्छामो णं ते जाया ! एग दिवसमवि रजसिरिं पासित्तए, निक्खमणं जहा महावलस्त जाव तमाणाए तहा जाव संजमित्तए, से गयसुकुमाले अणगारे जाए इरियासमिए जाव गुत्त वंभयारी। भावार्थः-जब माता-पिता ने तथा श्री कृष्ण जी ने गजसुकुमार को दो तीन बार राज्याभिषेक की बात कही, * तब गजसुकुमार बोले-माताजी पिताजी, एवं देवानुप्रिय ज्येष्ठ बन्धुवर ! मानव-जीवन सम्बन्धी काम-भोग, गिरते हुए श्लेष्म के समान, अर्थात् किम्पाक फल के समान हैं । किम्पाक फल रग-रूप और स्वाद में जितना ही अच्छा होता है, उतना ही विष से परिपूर्ण भी वह होता है, अतः विषय सुख हलाहल विप के तुल्य त्याज्य हैं । मेरी तो तब यही हार्दिक इच्छा है, कि आप की आज्ञा होने पर मैं दीक्षा ग्रहण कर लूँ । इस प्रकार के सुदृढ़ निश्चय को देख कर, माता-पिता गजसुकुमार के भावों में रंच-मात्र भी परिवर्तन न कर सके । माता-पिता बन्धु-वान्धवों द्वारा 环於*************※※书长张洪永兴米米米米 श्रीमदन्त- द्दशन सूत्रम्। वर्ग तृतीय ४८ संयम की कठिनता और संसार के सुखों का दिग्दर्शन बार-मार करा देने पर भी, उनके भाव ज्यों के त्यों स्थिर रहे । वे एक इञ्च-भर भी इधर-उधर न हुए । तब माता-पिता ने कहा-पुत्र ! और नहीं तो राज्य घराने में जन्म होने के नाते ही केवल एक दिन ही तू राज्य कर ले । बस, हमारी केवल इतनी ही बात को तो तू अवश्य मान ही ले । गजसुकुमार मौनस्थ रहे । तदनन्तर-माता-पिना ने बड़े समारोह पूर्वक गजसुकुमार का राज्याभिषेक कर पुत्र से पूछ -क्या आज्ञा है । पुत्र ने कहा-मुझे दीक्षा दिलाओ । बस, फिर क्या था, माता-पिता ने बड़े समारोह से कुमार गजसुकुमार को श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् के पास दीक्षा ग्रहण करवा दी । अब गजसुकुमार अणगार बन गये । पाँच समिति तीन गुप्ति और नौ बाड़सहित ब्रह्मचर्य-व्रतधारी बन गये । 'जयं चरे जयं चिठे' आदि प्रभु के उपदेशानुसार अपनी प्रवृत्ति को उन्होंने कर लिया। और. इस नाते वे अब अपनी बपौती के त्रिखण्ड के राज्य के बदले, आत्म-साम्राज्य के अधिकारी बन गय । मूलः-तए णं से गयसुकुमाले अणगारे जं चेव दिवसं पव्वतिए तस्सेव दिवसस्स पुव्वा- वरणहकाल समयसि जेणेव अरहा अरिट्ठनेमी तेणेव उवागच्छइ २ त्ता अरहं रिट्ठनोमि तिवखुत्तो आयाहिण पयाहिणं करेइ २ चा एवं वयासी-इच्छामि णं भंते ! तुब्भेहिं अब्भणु- गणाए समाणे महाकालसि सुसाणसि एगराइयं महापडिमं उवसंपजिताणं विहरेत्तए अहा. 米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米 ४८ कृदशाङ्ग सुत्रम्। ४६ वर्ग तृतीय सुहं देवाणुप्पिया ! तए णं से गयसुकुमाले अणगारे अरहया अरिहनेमिणा अव्मणुन्नाए स- श्रीमदन्त- माणे अरहं अरिष्टनेमि वंदइ णमंसइ वंदिता णमंसित्ता अरहो अरिट्ठनेमिस्स प्रतियात्रो सहस्संववणाश्रो उज्जाणाप्रो पडिनिक्खमइ २ त्ता जेणेव महाकाले सुसाणे तेणेव उवागए उवागइत्ता थडिल्लं पडिलेहेइ २ ता उच्चारपासवण भूमि पडिलेहेइ२ त्ता ईसिं पव्भारगएणं कारणं जाव दो वि पाए साहमु एगराइं महा पडिमं उवसंपजिताणं विहरइ । भावार्थ:-तत्पश्चात् . गजसुकुमार अणगार ने, जिस दिन दीक्षा ग्रहण की उसी दिन मध्याह्न में, जहाँ अरिष्ट- नेमि भगवान् विराजमान थे, वहाँ आकर उन्हें वन्दना की और विनम्रता-पूर्वक निवेदन किया, कि भगवन् ! आप की आज्ञा होने पर, मेरी ऐसी इच्छा है, कि मैं इस द्वारिका नगरी के सब से बड़े ' महाकाल' नामक स्मशान एक रात्रि की महाप्रतिज्ञा धारण कर विचरूँ । अर्थात् एक सम्पूर्ण रात्रि-भर वहाँ ध्यानस्थ हो कर खड़ा रहूँ। भगवान् ने फर्माया- हे देवानुप्रिय ! जिस प्रकार तुम्हें सुख हो, उस प्रकार करो।' इस प्रकार भगवान् की आज्ञा पाते ही, भगवान् को वन्दना उन्होंने की। और चले-चले, सहस्राम्बवन उद्यान से निकल कर 'महाकाल' नामक स्मशान में वे आये । वहाँ आकर ध्यान धारण करने के स्थान को उन्होंने देखा। उन्होंने छानबीन की, कि वह स्थान, ****味卡本半半未未未未丰洋洋77米米米米米 ४ श्रीमदन्त- कृद्दशाम वग तृतीय सूत्रम् । 卡米那卡卡卡卡卡卡卡卡卡米米米米米半t,半张丰未未米 कहीं चीटिएँ. कीड़े, मकोड़े, आदि,जीव-जन्तुओं की विराधना होने का स्थान तो नहीं है । फिर बड़ी नीत, लघुनीन (टट्टी, पेशाब ) के स्थान को उन्होंने देखा । तत्पश्चात् , खड़े हो मस्तक को कुछ झुका कर, दोनों हाथ घुटने की तरफ लम्बे उन्होंने किये । और, नेत्रों को अनिमेष रखते हुए, एक पुद्गल पर दृष्टि स्थिर की। तब दोनों पैर पास-पास रख कर, अविचल ध्यान निमग्न ये हो गये। मूलः-इमं च णं सोमीले महाणे सानिधेयस्स अट्ठाए वारवतीनो नयरीनो बहिया पुवणिग्गए समिहा भो य दब्भे य कुसे य पत्तामोडंच गेण्हइ २ ता ततो पडिनियत्तइ २ ता महाकालस्स सुसाणस्स अदूर सामंतण वीईवयमाणे २ संज्झाकालसमयांस पविरल- मगुस्ससि गयसुकुमालं अणगारं पासइ २ ता तं वेरं सरइ २ चा आसुरुत्ते एवं वयासी एस णं भो से गयसुकुमाले कुमारे अपत्थिय जाव परिवाजए जे णं मम धूयं सोमसिरीए भारियाए अत्तयं सोमं दारियं अदिट्ठदोसपइयं कालवात्तीर्ण विप्पजहेत्ता मुंडे जाव पव्वतिए। भावार्थः- इसी समय, वह सोमिल ब्राह्मण, उसी महाकाल स्मशान के पास होकर निकला । वह गजसुकमार के दीक्षा लेने के पहले ही, द्वारिका नगरी के बाहर, दर्भ, कुश, पत्ते, मौर आदि सामग्री, यज्ञ के लिए लेने को 学生朱朱失,味牛头法法基法法法法宪法学法斗法 ५० www वर्ग तृतीय श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। गया हुआ था । लौटते समय वह वहाँ आ निकला । उस सन्ध्या काल के समय में, मनुष्यों का आवागमन उधर कुछ कम हो गया था । गजसुकुमार मुनि को देख कर, सोमिल को पूर्वकृत वैर-भाव स्मरण हो आया। वह क्रोधित हो कर, कटु सम्बोधन के शब्दों में उनसे बोला-अरे, यह गजसुकुमार कुमार तो मृत्यु को चाहने वाला और लज्जा रहित है। मेरी पत्नी सोम-श्री की अङ्गजा, सोमा नामक मेरी प्राण प्यारी पुत्री को, जो त्याज्यादि दोषों से रहित तथा अबहिष्कृत यौवनावस्था में है, अकारण ही छोड़ कर यह साधु बन गया है । मूलः-तं सेयं खलु मम गयसुकुमालस्स कुमारस्स वेरनिजायणं करेत्तए एवं संपेहेइ२त्ता दिसापडिलेहणं करेइ २ ता सरसं माट्टियं गेण्हइ २ ता जेणेव गयसुकुमाले अणगारे तेणेव उवागच्छइ २त्ता गजसुकुमालस्त अणगारस्स मत्थए मट्टियाए पालिं बंधइ २ ता जलंतीयो विययात्रो फुल्लिय किंसुय समाणे खयरंगारे कहल्लेणं गेण्हइ २ ता गयसुकुमालस्स अण- गारस्स मत्थए पक्खिवइ २ ता भीए तो खिप्पामेव अवकमइ २ ता जामेव दिसंपाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए। भावार्थ:-अतएव, आज मैं ‘गजसुकुमार' कुमार को अपने वैर का बदला पाई-पाई चुका देना ही श्रेष्ठ सम- ************************** श्रीमदन्त-- छदशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तृतीय ५२ 米米米米小米小米*於*****洋* झता हूँ। ऐसा विचार कर इधर-उधर उसने देखा और जलाशय के स्थान से गीली मिट्टी लाकर गजसुकुमार की और वह आया। उनके सिर पर उस गीली मिट्टी की एक पाल उसने बाँधी। तब जलती हुई चिता में से,ज्वाज्ज्व- ल्यमान, टेसू के पुष्प के समान लाल सुर्ख, खैर की लकड़ी के धधकते हुए अंगारों को, मिट्टी के एक फूटे बर्तन म भर कर गजसुकुमार के माथे पर उसने उँडेल दिया। तत्पश्चात् वह सोमिल, भयभीत हो कर, वहाँ से, शीघ्र ही जिधर से आया था, उधर ही को चला गया। मूलः-तए णं से गजसुकुमालस्स अणगारस्स सरीरयांसि वेयणा पाउब्भूया उजलाजाव दुरहियासा । तए णं से गयसुकुमाले अणगारे सोमिलस्स माहणस्स मणसा वि अप्पदुस्स- माणे तं उज्जलं जाव अहियासेइ । तए णं तस्स गयसुकुमालस्स अणगारस्स तं उजलं जाव अहियासेमाणस्स सुभेणं परिणामणं पसत्थज्झवसाणेणं तयावरणिजाणं कम्माणं खएणं कम्मरयविकिरणकरं अपुवकरणं अणुपविट्ठस्स अणंते अणुत्तरे जाव केवलवरनाणदसणे समुप्पण्णे तो पच्छा सिद्धे जावप्पहीणे । तत्थ णं अहा संनिहितेहिं देवेहि सम्मं धाराहितं ति कडु दिव्वे सुराभिगंधोदए वुढे दसद्धवन्ने कुसुमे निवाडिए,चेलुक्खेवे कए दिव्वे य गीयगंध- “津法半米注水法本本生未未中法法米味十米味辛辛味味求法 ५२ वर्ग तृतीय *** श्रीमदन्त- रुद्दशाङ्ग सूत्रम्। व्वनिनाए कए यावि होत्था। भावार्थः-तत्पश्चात्, उन गजसुकुमार अणगार के शरीर में महा भयङ्कर एवं असह्य वेदना हुई । पर उन्होंने सोमिल ब्राह्मण के विषय में अपने हृदय में ज़रा भी बुरे भाव न लाते हुए, उस वेदना को,हँसते-हँसते समभावों से सहन कर लिया। तब शुभ परिणाम एवं प्रशस्त अध्यवसायों से ज्ञान को रोकने वाले कर्मों का क्षय हुआ । कर्मों के क्षय हो जाने, तथा अपूर्व करण में प्रवेश होने पर अनन्त पदार्थ, जिससे जाने जायें, ऐसा प्रधान केवलज्ञान, केवल दर्शन उन्हें उत्पन्न हुआ। और वे गजसुकुमार अणगार कुछ ही समय के पश्चात, सिद्धत्व को प्राप्त हो गये। उन्हों ने अपने सम्पूर्ण शारीरिक तथा मानसिक दुखों का सदा के लिए अन्त कर डाला। और,मोक्ष में जा बिराजे। मोक्ष प्राप्त होने पर. समीपस्थ देवों द्वारा, दिव्य सुगन्धित जल की वृष्टि, पाँच वर्ण के फूल,तथा सुन्दर दिव्य वस्त्रों की वर्षा, आकाश से उन के शव पर हुई । देवगण प्रधान गीत एवं गन्धर्व-निनाद, अर्थात् मृदङ्गों के शब्दों का घोर नाद करने लगे। मूलः-तए णं से कण्हे वासुदेवे कल्लं पाउप्पभायाए जाव जलते रहाए जाव विभूसिए हत्थिखंधवरगए सकोरंट मल्लदामेणं छत्तेणं धरेजमाणेणं सेयवर चामराहिं उद्धुप्पमाणीहिं म- हया भडचडगरपहकर वंदपरिक्खित्ते वारवई णयरिं मझ मज्झणं जेणेव अरहा अरिङनेमी 朱书法法半出半牛牛牛牛牛牛牛牛去法米法生张 ५ श्रीमदन्त- दराज सूत्रम् । वर्ग तृतीय *米卡米卡半*****未宋卡***半干半张未未来 तेणेव पहारेत्थगमणाए । तए णं से कण्हे वासुदेवे वारंवईए णयरीए मझमझेणं णिगच्छ- माणे एकं पुरिसं पासइ जुगणं जरा जजरिय देहं जाव किलंतं महइमहालयाश्रो इट्टगरासी- ओ एगमेगं इट्टगं गहाय बहियारत्थापहाअो अंतो गिहं अणुप्पविसमाणं पासइ २त्ता तए णं से कण्हे वासुदेवें तस्स पुरिस्त अणुकंपणछाए हत्थिखंधवरगए चेव एग इट्टगं गेण्हइ २ ता बहिया रत्थापहाम्रो अंतोगिहं अणुप्पवेसइ तएणं करहेणं वासुदेवेणं एगाए इट्टगाए ग याए समाणीए अणेगेहिं पुरिससएहिं से महालए इट्टगस्स रासी बहिया रत्थापहारो अंतो- घरंसि अणुप्पवे सिए। भावार्थः-दूसरे दिन, प्रभात में सूर्योदय होने पर, श्री कृष्ण वासुदेव ने स्नानादि कर वस्त्रालङ्कार पहने । और फिर हाथी पर सवार वे हुए । उनके ऊपर उस समय, कोरंट नामक वृक्ष के पुष्पों से वेष्टित छत्र सुशोभित था। दाहिनी और बाई और श्वेत चंवर ढुलाये जा रहे थे । वे अनेक सुभटों सहित द्वारिका नगरी के मध्य में सार्वजनिक मार्गों से होते हुए, जिस और श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् विराज रहे थे, उधर प्रस्थान कर रहे थे। मार्ग में, प्रस्थान करते हुए, श्री कृष्ण ने एक अति ही वृद्ध, जीर्ण-शीर्ण तथा जर्जेरित तन वाले मनुष्य को 张卡米卡米卡那卡采张卡水形狀 -- श्रीमदन्त- कृदशाह सूत्रम्। वर्ग तृतीय देखा । जो उस समय एक बहुत भारी ईटों के ढेर में से, एक-एक ईंट उठा कर, बड़ा कष्ट पाता हुआ बाहर से घर के भीतर रख रहा था । यह दृश्य देख कर श्री कृष्ण के मन में विचार उत्पन्न हुआ,कि यह बेचारा वृद्ध इस प्रकार कट पाते हुए इस विशाल ईंट के ढेर को एक-एक ईंट कर के,कब तक घर में रख पायगा । ऐसा विचार उत्पन्न होते है ही उन्हें उस वृद्ध पुरुष पर दया आई और हाथी पर बैठे-बैठे ही उन्होंने उस विशाल इंटों के ढेर में से, एक ईट उठा कर उसी मकान के पिछले हिस्से में जहाँ बाड़ा था, रख दी । अपने स्वामी श्री कृष्ण को इस प्रकार करते हुए देख कर. उनके साथ के जो सैंकड़ों मनुष्य थे, उन्होंने भी उनका अनुकरण किया। सभी ने एक-एक इंट उस ढेर में से उठा कर उस बाड़े में रख दी। इस प्रकार,श्री कृष्ण के एक ईंट उठाने पर, उस बेचारे वृद्ध मनुष्य के बार-बार चक्कर काटने का सारा कष्ट बात की बात में दूर हो गया । मूल:-तए णं से कण्हे वासुदेवे वारवईए णयरीए मझमज्झे णं णिगच्छइ २ ता जे. णेव अरहा अरिहनेमी तेणेव उवागए उवागइत्ता जाव वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसित्ता गय- सुकुमालं अणगारं अपासमाणे अरहं अरिठ्ठनेमि वंदइ णमंसइ वंदित्ताणमंसित्ता एवं वयासी कहि णं भंते ! से मम सहोदरे कणीयसे भाया गयसुकुमाले अणगारे ? जगणं अहं वंदामि मसामि ! तए णं अरहा अरिट्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी साहिए णं कण्हा ! गयसु- 未未未米水米未主***李孝未未生法未未未朱孝孝未 ५५ !
* * * * श्रीमदन्त- हदशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तृतीय ***於*****n*****本·本 कुमालेणं अणगारेणं अप्पणो अट्टे । तए णं से करहे वासुदेवे अरहं अरिहनेमि एवं वयासी- कहणणं भंते ! गयसुकुमालेणं अणगारेणं साहिए अप्पणो अटे ? भावार्थः-तत्पश्चाद, श्री कृष्ण वासुदेव द्वारिका नगरी के मध्यमार्ग से होते हुए. जहाँ श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् विराज रहे थे, वहाँ आये और उन्हें वन्दना करने के पश्चात्,अपने लघुभ्राता नत्र दीक्षित गजसुकुमार मुनि को वन्दना कर ने के लिए इधर-उधर ढूँढने लगे। जब उन्हें उनका कहीं भी पता वहाँ न लगा, तब भगवान् को वन्दना कर के वे बोले-" भगवन् ! वे मेरे छोटे सहोदर भाई, नव-दीक्षित गजसुकुमार अणगार कहाँ है ? उन्हें मैं वन्दना करना चाहता हूँ।" भगवान् ने फर्माया, हे कृष्ण ! गजसुकुमार अणगार ने अाज अाना अर्थ सिद्ध कर लिया। कृष्ण ने आश्चर्यान्वित हो कर पूछा-भगवन् ! गजसुकुमार अणगार ने एक ही दिन में अपना अर्थ सिद्ध कैसे कर लिया ? मूलः-तए णं अरहा अरिठ्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी एवं खलु कण्हा ! गयसु- कुमाले णं अणगारे णं मम कल्लं पुव्वावरण्हकाल समयसि वंदइ णमंसइ वंदित्ता पमंसित्ता एवं वयासी इच्छामि णं जाव उवसंपजित्ताणं विहरइ । तए णं तं गयसुकुमालं अणगारंएगे पुरिसे पासइ २ ता आसुरुत्ते जाव सिद्धे । तं एवं खलु कण्हा ! गयसुकुमालेणं अणगारेणं ************** श्रीमदन्त- हदशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तृतीय 半米米未去未未未生羊未未未未批 साहिए अप्पणो अढे । तए णं से कराहे वासुदेवे अरहं अरिट्टनेमि एवं वयासी-केसणं भंते ! से पुरिसे अपत्थिय पत्थिए जाव परिवजिए ? जेणं ममं सहोदरं कणीयसं भायरं गयसुकुमालं अणगारं अकाले चेव जीवियाग्रो ववरोविए ? तए णं अरहा अरिट्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी मा णं कण्हा! तुम तस्स पुरिसस्त पदोसमावजाहि, एवं खलु कण्हा ! तेणं पुरिसेणं गयसुकुमालस्स अणगारस्स साहिजे दिन्ने । भावार्थः-तत्पश्चात्, श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् ने श्री कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार फर्माया, कि हे कृष्ण ! कल मध्याह्न को मुझे वन्दना कर, गजसुकुमार अणगार ने अपनी यह इच्छा प्रकट की थी, कि-"मैं भिनु की प्रतिज्ञा, अर्थात् एक रात्रि का ध्यान, स्मशान में रह कर करना चाहता हूँ। " मैंने कहा, जिससे भी तुम्हें सुख की प्राप्ति हो, करो। तब वे गजसुकुमार अणगार स्मशान में जा कर ध्यानारुह हो गये। उस समय उन्हें देख कर एक मनुष्य को बड़ा ही क्रोध उन पर आया । क्रोध के आवेश में उसने गीली मिट्टी ला कर गजसुकुमार के सिर पर चहुँ और एक पाल बॉध दी। फिर खैर की अग्नि के सदृश लाल सुर्ख धधकते हुए अङ्गारों को एक फूटे मिट्टी के बर्तन में ले कर उन के सिर पर उसने उँडेल दिया । जिसमे महा भयङ्कर वेदना उन्हें हुई । उस वेदना को हँसते-हँसते सम भावों से सहन कर के, केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष में वे चले गये । इसी लिए हे कृष्ण ! मैंने कहा, कि गज- ************** ५७ श्रीमदन्त कृद्दशाह वर्ग तृतीय सूत्रम्। सनेही पुरुष सुकुमार अणगार ने अपना कार्य सिद्ध कर लिया ।' यह सुन कृष्ण बोले--भगवन् ! मृत्यु को निमन्त्रण देकर बुलानेवाला और लज्जा-हीन ऐसा कौन-सा धृष्ट मनुष्य है, जिसने मेरे सहोदर लघु भाई को अकाल म ही इस प्रकार काल-कवलित कर दिया। भगवान ने कहा-हे कृष्ण ! उस मनुष्य के ऊपर क्रोध न कगे । उसने तो गज. सुकुमार अणगार को अपने पापों को समूल निर्मूल कर देने में, बीसों विस्वा सहायता पहुँचाई है । फिर ऐसे परम के साथ क्रोध का वर्ताव करना तो, मानो उपकारी के उपकार को धो बहाना है । मूलः-कहणणं भंते ! तेणं पुरिसेणं गयसुकुमालस्स णं साहिज्जे दिन्ने ? तए णं अर- हा अरिट्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-से नूणं कण्हा ? ममं तुमं पायवंदए हव्वमागच्छ- माणे बारवत्तीए नयरीए एगं पुरिसं पाससि जाव अणुपविसिए । जहाणं कण्हा ! तुमं तस्स पुरिसस्स साहिज्जे दिन्ने, एवमेव कण्हा ! तेणं पुरिसेणं गयसुकुमालस्स अणगारस्स अणेगभवसयसहस्स संचियं कम्मं उदीरेमाणेणं .बहुकम्माणिज्जरत्थं साहिजे दिन्ने । तए णं से कण्हा वासुदेवे अरहं रिट्ठनर्मि एवं वयासी-से णं भंते ! पुरिसे मए कहं जााण- यव्वे ! तए णं अरहा अरिट्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-जे णं कण्हा ! तुम वार- 来来来洲游****迷未必张****长*邓州山兴州 ५८ श्रीमदन्त- कृदशाह सूत्रम् । वर्ग तृतीय वईए नयरीए अणुपविसमाणं पासेत्ता ठियए चेव ठिइ भेएणं कालं करिस्सइ, तण्णं तुम जाणज्जासि एसणं से पुरिसे! भावार्थः-भगवन् ! उस मनुष्य ने गजसुकुमार को कैसे सहायता दा? उत्तर में भगवान् ने फर्माया-हे कृष्ण ! जब तुम मेरे चरणवन्दन के लिए मार्ग में आ रहे थे, तो द्वारिका नगरी में तुमने एक वृद्ध पुरुष को इटें रखते हुए देखा था । तुम ने उस पर दया ला कर एक ईट उठा दी । और उसे भीतर रख दी। जिससे तुम्हारे साथ वाले सभी पुरुषों ने एक-एक ईंट उठा कर रख दी। यों सब ईटें उसी समय शीघ्र ही अन्दर रखा गई । कृष्ण ! जिस प्रकार तुमने उस वृद्ध पुरुष को सहायता दी, ठीक उसी प्रकार,उस पुरुष ने गजसुकुमार अणगार को उनके अपने अनेक शतसहस्र अर्थात् लाखों मवों में सञ्चय किये हुए कर्मों की एकान्त उदीरणा कर सम्पूर्ण कर्मों को नाश करने में बड़ी सहायता दी है। भगवन् ! उस मनुष्य को मैं कैसे जान पाऊँगा ? भगवान् ने फर्माया हे कृष्ण ! जब तुम यहाँ से लौट कर द्वारिका में प्रवेश करोगे उस समय तुम को प्राते हुए देख कर, वह मनुष्य वहीं रुक जायगा और वहीं का वहीं भयभीत होकर मृत्यु को प्राप्त हो जायगा । बस, उसे देख कर तुम जान लेना, कि यह वही मनुष्य है, जिसने मेरे लघु भाई के प्राण हरण किये हैं। मूलः-तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्टनेमि वंदइ नमसइ वंदित्ता नमंसित्ता जेणेव 未半米未老张孝孝未半米米市半米卡卡手米半幸未未未未未 ५६ श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तृतीय । ६० *未未未米米米米未未丰洋洋本米木未4 *半法未未米米 आभिसेयं हत्थिरयणं तेणेव उवागच्छइ २ ता हत्थिं दुरुहइ २ ता जेणेव बारावई णयरी जेणेव सये गिहे तेणेव पहारेत्थ गमणाए । तए णं तस्स सोमिलमाहणस्स कल्लं जाव जलंते अयमेवा रूवे अज्झथिए ४ समुप्पन्ने एवं खलु कण्हे वासुदेवे अरहं अरिहनर्मि पायवंदए निग्गए तं नायमेयं अरहया विणायमेय अरहया सुयमेयं अरहया सिद्धमेयं अरहया भविस्सइ कण्हस्स वासुदेवस्स, तं न नजइ णं कण्हं वासुदेवे ममं केण वि कुमारेणं मारिस्तइ ति कट्ट भीए सयाओ गिहारो पडिनिक्खमइ, कण्हस्स वासुदेवस्स वारवई नयरिं अणुपविसमाणस्स पुरो सपक्खि सपडिदिसिं हव्वमागए। भावार्थः-तदनन्तर, वे कृष्ण वासुदेव अरहा अरिष्टनेमि भगवान् को वन्दना कर, अाने प्रधान गज रत 'अभी- पेकीय ' हाथी पर बैठ, जिस और द्वारिका नगरी में अपने महल थे, उधर आ रहे थे। उधर सूर्योदय होने पर सोमिल ब्राह्मण के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ, कि कृष्ण वासुदेव भगवान् के चरण-वन्दन को गये हैं। ओर, भगवान् सर्वज्ञ हैं। उनसे कोई बात छिपी हुई नहीं है । वे यह सब घटना कृष्ण वासुदेव को कह देंगे, तो मुझे कृष्ण वासुदेव न मालूप किस मौत से मारेंगे। ऐसा विचार उत्पन्न होने पर, वह सोमिल ब्राह्मण भयभीत होकर अपने घर से निकला और 卡卡米卡主卡卡米米米米卡那卡那张卡来丰米米卡 米米 ६० श्रीमदन्त- कृदशाह सूत्रम्। वर्ग तृतीय , 法於未米米米米米米米米米米米米米共计六****未未 एका-एक जिधर से कृष्ण वासुदेव आ रह थे, उनके समक्ष ही, सम्मुख दिशा से शीघ्र आ निकला। मूलः-तए णं से सोमिले माहणे कण्हं वासुदेवं सहसा पासेत्ता भीए ठिए य चेव ठिइ- भेयं कालं करेइ धराण त्तलंसि सव्वगेहिं धसत्ति संनिवाडए।तएणं से कराहे वासुदेवे सोमिलं महाणं पासइ २ ता एवं वयासी-एस णं भो देवाणुाप्पिया ! से सोमिले माहणे अपस्थिय- पत्थिए जाव परिवजिए जेण ममं सहोयरे कनीयसे भायरे गयसुकुमाले अणगारे अकाले चेव जीवियानो ववरोविए त्ति कटु सोमिलं माहणं पाणेहिं कड्ढावेत्ति कड्ढावित्ता तं भूमि पाणिएणं अभोक्खावेइ २ ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागए सयं गिहं अणुपविढे । एवं खलु जंवू ! समणेणं भगवया जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगड़दसाणं तच्चस्स वग्गस्स अट्ठमझयणस्स अयमढे पएणते । भावार्थ:-उसके बाद वह सोमिल ब्राह्मण सम्मुख आते हुए श्री कृष्ण वासुदेव को एकाएक देख कर डरा और उसके पॉव वहीं रुक गए । वह स्थितिभेद (आयुष्य-क्षय ) के कारण, वहीं का वहीं मृत्यु को प्राप्त हो गया। धड़ाम से वह भूमि पर आ गिरा । भूमि पर पड़े हुए उस सोमिल ब्राह्मण के शव को देख कर, कृष्ण वासुदेव 环********辛卡米以兴******** वर्ग तृतीय श्रीसदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। 来北非於米米米米米米米************未 । बोले, कि-यह वही मृत्यु को चाहने वाला लज्जा-रहित सोमिल ब्राह्मण है, जिसने मेरे सहोदर छोटे भाई गजसु- कुमार अणगार को अकाल में ही काल का ग्रास बना डाला है। ऐसा कह कर, उस ब्राह्मण के शव को, शहर के वाहर उन्होंने फिंकवा दिया । और जहाँ उसका शव गिरा था, वहाँ उस भूमि को जल से शुद्ध करवाया । अर्थात् , वहाँ जल का छिड़काव करवा दिया। फिर वहाँ से चल कर, अपने राज-महल में कृष्ण-वासुदेव आये और आनन्द- १ पूर्वक राज करने लगे। हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त श्री गहावीर प्रभु ने, अन्तगढ़-सूत्र के तृतीय वर्ग के आठवें अध्याय में, यही । वर्णन किया है। इस प्रकार, यह आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ। मूलः-नवमस्स उ उक्खेत्रो । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समए णं वारवतीए णयरीए जहा पढ़मए जाव विहरइ । तत्थ णं बारवईए नयरीए बलदेवे नाम राया होत्था, वण्णो । तस्सणं बलदेवस्स रण्णो धारिणी नामं देवी होत्था, वरणश्रा । तए णं सा घारिणी सीहं सुमिणे जहा गोयमे, णवरं सुमुहे णाम कुमारे, पण्णासं करणाओं, पन्नासदाश्रो, चोइस पुव्वाईं अहिजइ, वसिं वासाइं परियारो सेसं तं चेव, जाव सेतुंजे 米米米米米去米米卡米半未未至未未未未字半中半本法未求法 ६२ वर्ग तृतीय श्रामदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम् । सिद्धे, निक्खेवो । एवं दुम्मुहे वि कूवदारए वि दोरहेवि वलदेव पिता धारिणी सुया । दारुए वि एवं चेव णवरं वसुदेव पिया धारिणी सुए। एवं प्रणाधिट्टीवि वसुदेव पिया धारिणी सुए। एवं खलु जंवू! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगड़दसाणं तच्चस्सवग्गस्स तेरसमस्त अज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते ! भावार्थः-श्री जम्बू स्वामी ने श्री सुधर्मस्वामी से निवेदन किया, कि भगवन् ! आठवें अध्याय में, जो वर्णन श्री महावीर स्वामी ने किया है, उसको फर्मा कर आपने मुझ पर महत्कृपा की है। अब कृपा कर के यह फर्मा. कि नौ अध्याय में, श्री महावीर स्वामी के द्वारा क्या फर्माया गया है ? श्री-सुधर्म स्वामी ने अपने शिष्य श्री जम्बू, स्त्रमी से कहा- हे जम्बू ! सुनो, उसी काल में, एक द्वारिका नगरी थी, जिसका वर्णन पहले कर चुके हैं। उस द्वारिका नगरी में, बलदेव महाराज अपनी प्राप्त जागीरी पर सानन्द प्राधिपत्य करते हुए, निवास करते थे। उनके धारिणी नामक एक परमाज्ञाकारिणी रानी थी। एक दिन, उसी धारिणी रानी को शैया में सोते हुए. पिछली रात्रि में, सिंह का स्वप्न दृष्टिगोचर हुआ । वह सजग हुई । अपने पतिदेव से स्वम का जिक्र किया । सूर्योदय होने पर स्वप्न फल के विशेषज्ञों से, स्वम का फलाफल पुछपाया गया। यहाँ भी बालक का जन्म, वाल्यकाल आदि सब गौतम कुमार की भॉति ही समझलें। विशेषता केवल इतनी है, कि उनका नाम 'सुमुखकुमार' रक्खा गया। ६३ 張半半牛牛牛牛牛市未米米宗米米卡本半米未未半法 卡米卡那卡**未必共 ६३ श्रीमदन्त- रुद्दशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग तृतीय 1 ६४ 米米米米米主朱孝未来卡米米米米米米米未未未未未未千米 यौवनावस्था प्राप्त होने पर पचास कन्याओं के साथ उनका विवाह किया गया । वधु-पक्ष की तरफ से गृह-सम्बन्धी अन्य आवश्यक वस्तुओं के अतिरिक्त, दहेज में पचास करोड़ का नकद धन भी प्राप्त हुा । कुछ समय के पश्चात्, भगवान् अरहा अरिष्टनेमि लोक कल्याण के हेतु, ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए, वहाँ पधारे । उनका उपदेश श्रवण कर 'सुमुखकुमार' के मन में संसार के प्रति उपराम हो आया । माता-पिता की आज्ञा प्राप्त कर वे दीक्षित हुए । थोड़े ही काल में उन्होंने चौदह-पूर्व का ज्ञानाभ्यास प्राप्त कर लिया । बीस वर्ष पर्यन्त चारित्र पालन कर अन्तिम समय में, सन्थारा करके, शञ्जयपर्वत पर उन्होंने मोक्ष को प्राप्त किया । अर्थात् उन्होंने सिद्धत्व को अपने अधीन किया । इसी प्रकार बलदेव राजा के पुत्र और धारिणी के अङ्गज 'दुर्मुखकुमार' और ' कूपदारक ने भी दीक्षा धारण कर अन्तिम समय में, सन्थारा कर के, सिद्ध-पद पाया । वसुदेव के पुत्र, तथा बारिणी के अङ्गज 'दारुक कुमार' और अनाधृष्टि कुमार' इन दोनों ने भी इसी तरह दिक्षा धारण की । और, मोक्ष में पदार्पण किया। इस प्रक र हे जम्बू ! अन्तगढ़-सूत्र के तृतीय वर्ग के तेरह अध्यायों में भगवान महावीर प्रभु ने ऐसा ही वर्णन किया है, जो मैंने तुम्हें कह सुनाया है। * इति तृतीयोवर्ग: गा वर्ग चतुर्थी-वर्गः चतुर्थ . ** श्रीमदन्त- मूलः-जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगड़दसाणं तच्चस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते, चउत्थस्स णं भंते ! वग्गस्स अंतगड़दसाणं समणे णं जाव संप- तेणं के अटे पन्नत्ते ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं चउत्थस्स वग्गस्स अंतगड़- दसाणं दस अज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा-जालि, मयालि, उवयालि, पुरिससेणे य वारिसे- णेय । पज्जुन्नसंब अनिरुद्धे, सच्चनेमी य दढ़नेमी । जइणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं चउत्थस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, पढ़मस्स णं भंते !अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू तेणं कालेणं तेणं समए णं वारवई णाम णयरी होत्था । जहा पढमे कण्हे वासुदेवे आहेवच्चं जाव विहरइ । भावार्थ:-फिर जम्बू स्वामी ने श्री सुधर्म स्वामी से निवेदन किया, कि-हे भगवन् ! श्रमण भगवन्त श्री महावीर 兴山米米米決丰未未州米米米米米米米米米米米米 कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। ६५ ६५ वर्ग A श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम् । चतुर्थ 米米米米米米米米米米米***洋*字法 प्रभु, जो मुक्ति में पधारे, उन्होंने आठवें अङ्ग श्री अन्तगढ़-सूत्र के तृाय वर्ग में, जो विषय वर्णन किया है, उसे मैंने आपके श्री मुख से श्रवण कर लिया है । हे भगवन् ! अब श्री अन्तगढ़-सूत्र के चौथे वर्ग में भगवान् महावीर स्वामी के द्वारा कौनसा विषय कथन किया गया है, उसे कहने की कृपा करें । जम्बू ! लो सुनो । अन्तगढ़-सूत्र के चतुर्थ वर्ग में, भगवान् महावीर स्वामी ने दस अध्याय फर्माये हैं । वे दस अध्याय क्रमवार यों हैं:-(१) जालि. (२) मयालि, (३) उवयालि, (४) पुरुष सेन, (५) वारिसेन, (६) प्रद्युम्न, (७) शाम्ब, (८) अनिरुद्ध, (8) सत्यनेमि और (१०) दृढ- नेमि । इन दसों कुमारों के नाम से दस अध्याय हे भगवन् ! प्रथम अध्याय का क्या मतलब है ? जम्बू ! उस समय जो द्वारिका नामक एक परम सुन्दर नगरी थी और जिसका वर्णन पहले कर चुके हैं, वहाँ श्री कृष्ण वा पु- देव राज करते थे। मूलः-तत्थणं बारवतीए णयरीए वसुदेवे राया धारिणी देवी, वगणो। जहा गोय- मो णवरं जालिकुमारे पण्णासो दामो, बारसंगी सोलसवासा परियारो,सेसं जहा गोय. मस्स जाव सेत्तंजे सिद्धे । एवं मयालि उवयालि पुरिस सेणे य वारिसेणेय एवं पज्जुन्ने वित्ति, एवरं कण्हे पिया साप्पणी माता । एवं संबे वि नवरं जंबवई माता। एवं अनिरुद्धे एवरं पज्जुन्ने पिया वेदब्भी माया । एवं सच्चनेमी, नवरं समुदविजये पिया सिवा माता ।
वर्ग चतुर्थ - श्रीमदन्त- छदशाङ्ग सूत्रम्। ६७ *未*亦*二本字卡於本未至未至生杀本未未字未千奈 एवं दढ़नेमी वि सव्वे एगगमा । चउत्थस्स वग्गस्स निक्खेवप्रो । भावार्थः-उस द्वारिका नगरी में 'वसुदेव' नामक एक राजा, अपने अधीन के ग्रामों पर आधिपत्य रखते हुए निवास करते थे । उनके धारिणी नामक आज्ञाकारिणी एक रानी थी । स्वम के नौ मास व्यतीत होने पर धारिणी के एक पुत्र-रत्न पैदा हुआ । यौवनावस्था में पचास कन्याओं के साथ उनका विवाह सम्पादन हुआ। दहेज में भी, पर्याप्त धन अर्थात् पचास करोड़ सौनयों की रकम उन्हें प्राप्त हुई। किसी दिन भगवान् का उपदेश श्रवण कर वैराग्य, का वेग इनके हृदय में उमड़ पड़ा। और, उसके परिणाम स्वरूप, उन्हीं से दीक्षा भी इन्हों ने ली । बारह अङ्ग-शास्त्रों का सॉगोपॉग अध्ययन इन्हों ने किया । सोलह चर्प पर्यन्त चारित्र पालन कर, अन्तिम या समय में, गौतमकुमार की भाँति, इन्हों ने भी सन्थारा किया । तथा शत्रुञ्जय पर्वत पर निर्वाण-पद को प्राप्त किया। इसी प्रकार मयालि, उवयालि, पुरुषसेन, वारिसेन और प्रधम्न कुमारों का वणन भी समझना चाहिए । भेद केवल इतना ही है, कि इनके पिता का नाम कृष्ण और माता का नाम रुक्मिणी था । इसी तरह शाम्ब कुमार ने भी दीक्षा धारण की । इनके पिता तथा माता क्रमशः 'कृष्ण' और 'जाम्बवती' थे । 'अनिरुद्ध कुनार' ने भी इसी तरह दीक्षा धारण की थी। इनके पिता ‘पद्युम्न' और माता बेदर्भी थीं । 'सत्यनेमि' और दृढ़नेमि' इन दोनों कुमारों के दीक्षा ग्रहण का विधान इसी प्रकार का था। इनके पिता का नाम ' समुद्र-विजय' और माता का नाम शिवा- 於未改未冷光宗法未於“**杀张 ६७ देवी था । इन सभी कुमारों की शिक्षा, दीक्षा आदि का क्रम प्रायः सर्वत्र एक ही सा था । हे जम्बू ! चौथे वर्ग में, यो इन दस अध्यायों का वर्णन किया गया है, जो मैं तुझे सुना चुका हूँ। ॐ इति चतुर्थो वर्गः श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग वर्ग चतुर्थ सुत्रम्। 张於主共米***********米米米米米米米米卡卡 阳卡卡朱米去水法半半半米米未孝孝孝孝子孝洋法本未未去未 ६८ पञ्चमो-वर्गः वर्ग पाँचवाँ श्रीसदन्त- हादशाज्ञ सुत्रम्। ***FETEEEEEEE Ferte ***************** मूलः-जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं उत्थस्स वग्गस्स अयमढे परणत्ते, पंच- मस्स णं भंते ! वग्गस्स अंतगड़दसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! समणेणं नाव संपत्तेणं पंचमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा-पउमावई य गोरी, गंधारी, लक्खणा सुसीमा य । जंबवई, सचभामा, रुप्पिणि, मूलसिरी, मूलदत्ता वि ॥१॥जइ एं भंते ! समणे णं जाव संपत्ते णं पंचमस्त वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ? भावार्थः हे भगवन् ! अन्तगह-सूत्र के चौथे वर्ग में भगवान महावीर स्वामी ने जो वर्णन किया, उसे आपके पवित्र सुखारविन्द से, मैंने अपने कानों के द्वारा सुन लिया । अब कृपा कर यह बताइये, कि पाँचवें वर्ग में, भगवान् ने किस विषय का वर्णन किया है। जम्बू ! पॉवें वर्ग में दस अध्याय हैं । वे दस अध्याय इस प्रकार हैं:-(१) पद्मावती, (२) गौरी, (३) ६६ वर्ग - श्रीमदन्त- कदशाङ्ग सूत्रम्। पाँचवा ७० ******************. गान्धारी, (४) लक्ष्मणा, (५) सुसीमा, (६) जाम्बवती, (७) सत्यभामा, (८) रुक्मिणी, (६) मूल- श्री और (१०) मूलदत्ता । इन दसों रानियों के ये दस अध्याय हैं । हे भगवन् ! इन दस अध्यायों में से प्रथम अध्याय में किस विषय का वर्णन किया है, वह कृपा कर के आप मुझे समझाइये। मूलः-एवं खलु जंवू ! तेणं काले णं तेणं समएणं बारवई णामं णयरी होत्था, जहा पढ़मे जाव कण्हे वासुदेवे आहेवच्चं जाव विहरइ । तस्स णं कण्हस्स वासुदेवस्स पउमावई नामं देवी होत्था वरणश्रो । तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहा रिट्ठनमि समोसढ़े जाव विहरइ । कण्हे निग्गए जाव पज्जुवासइ । तए णं सा पउमावइ देवी इमीसे कहाए लट्ठा समाणी हट्ट तुट्ठ जहा देवई जाव पज्जुवासइ । तएणं अरहा अरिट्ठनेमी कण्हस्स वासुदेवस्त पउमावतीए देवीए जाव धम्मकहा परिसा पडिगया तए णं कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्ठ नेमि वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-इमीसे णं भंते ! बारवत्तीए णयरीए दुवा- लस्स जोयण आयामा जाव पच्चक्खं देवलोग भूयाए किंमूलाए विणासे भविस्सइ ? 平米米米米米米米未未米米“未来未未·未未未末未未未和 ७० वर्ग पाचवा कृादशाह कण्हाइ अरहं अरिट्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी एवं खलु कण्हा इमीसे वारवतीए श्रीमदन्त- णयरीए दुवालस्स जोयणंायामा नव जोयणं जाव पञ्चक्खं देवलोग भूयाए सुरग्गिदी- वायण मूलाए विणासे भविस्सइ । भावार्थः-हे जम्बू ! इस प्रकार. उस काल में, जो द्वारिका नामक एक परम सुन्दर नगरी थी, वहाँ कृष्ण वासुदेव गजा राज करते थे । इस नगरी और राज्य का विशेष वर्णन पहले हो चुका है । उन कृष्ण वासुदेव के पद्मावती नामक एक परमाज्ञाकारिणी रानी थी । उसी अवधि में किसी एक दिन, श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् भी विचरते-विचरते वहाँ पधार गये । कृष्ण, श्री अरिष्टनेमि की सेवा में उपस्थित हुए। उधर इनकी रानी श्री पद्मा- वती को भी प्रभु के आगमन का सु-सम्बाद श्रवण कर बड़ी प्रसन्नता हुई और वह भी प्रभु की सेवा में आ उप- स्थित हुई । भगवान् ने श्री कृष्ण वासुदेव, पद्मावती रानी, तथा उपस्थित जनता, आदि को अपनी पीयूष वर्षी वाणी के द्वारा उपदेश प्रदान किया । धर्म-कथा श्रवण कर जनता तो अपने-अपने घरों को लौट गई । परन्तु कृष्ण वासुदेव, भगवान् को वन्दना कर के बोले भगवन् ! नौ योजन चौड़ी, बारह योजन लम्बी, देवलोक के सदृश इस द्वारिका पुरी का विनाश, किस प्रकार और किस कारण से होगा ? उत्तर में, भगवान् श्री अरिष्टनेमि ने फर्माया, हे कृष्ण ! तुम्हारे कौटुबिक कुमारों की हरकतों से रुष्ट हो कर, द्वैपायन ऋषि अग्निकुमार देव बनेंगे । और उन्हीं ******************** सूत्रम् । ***************** ७१ ७१ 1 1 *TRA**+ श्रीमदन्त- रद्दशाह वर्ग पाँचया सूत्रम्। ७२ के द्वारा तुम्हारी इस बारह योजन लम्बी और नौ योजन चौड़ी, देवलोक के सदृश मनोहर द्वारिका नगरी का विनाश होगा। मूलः-तए णं कण्हस्स वासुदेवस्स अरहो अरिठ्ठनेमिस्स अंतिए एयमहूँ सोच्चा अयमेव रूवे अज्झथिए समुपन्ने धन्नाणं ते जालि, मयालि, उवयाल, पुरिससेण, वारिसेण, पज्जुन्न, संव, अणिरुद्ध, दढ़नेमि, सच्चनेमिप्पभियत्रो कुमारा जेणं चिच्चा हिरणणं जाव परिभाएत्ता अरहो अरिहनेमिस्स अंतियं मुंडा जाव पव्वया अहणं अधन्ने अकयपुण्णे रजे य जाव अंतेउरेय माणुस्सएसुय कामभोगेसु मुच्छिए नो संवारामि अरहयो अरिहने मिस्स अंतिए जाव पव्व इत्तए । कण्हाइ ! अरहा अरिहनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी- से नूणं कण्हा ! तव अयं अज्झथिए समुप्पन्ने-धन्नाणं ते जाली जाव पव्वइत्तए, से नूणं कराहा अयमढे समढे ? हंता अस्थि । भावार्थः-तत्पश्चात् , श्री अरहा अरिष्टनेमि प्रभु के समीप यह अर्थ सुनकर उन श्री कृष्ण वासुदेव को, इस प्रकार विचार उत्पन्न हुआ, कि-जालि, मयालि, पुरुपसेन , वारिसेन, प्रद्युम्न साम्ब, अनिरुद्ध , दृढ़नमि, ७२ ग r अ श्रीमदन्त- वर्ग पाँचवा सूत्रम्। ७३ ままにボ・ボーボ・お茶本来あきおおおや सत्यनेमि, अदि कुम रों को धन्य है, जिन्होंने अपनी देव-दुर्लभ सम्पत्ति को छोड़ कर, अरिष्टनमि प्रभु के शरण में आ दीक्षा धारण की । परन्तु मैं महान् अभागी हूँ। मैंने पूर्ण पुण्योपार्जन नहीं किये । जिससे मैं राज्य और अन्तःपुर तथा मनुष्य-सम्बन्धी काम भोगों में निमग्न हो रहा हूँ। एतदर्थ, क्या मैं समर्थ नहीं हो सकता हूँ, कि श्री अरिष्ट- कद्दशा ने म भगवान की शरण ग्रहण कर मैं भी दीक्षा धारण कर सकूँ ? इस प्रकार कृष्ण को चिन्तातुर देख, भगवान् ने उन्हें सम्बोधित कर के कहा-" हे कृष्ण वासुदेव, तुम्हें इस प्रकार का विचार उत्पन्न हुआ है, कि-जालि, आदि कुमारों को धन्य है । कृष्ण बोले-हॉ, प्रभु ! मेरे हृदय में, यह विचार अवश्य उत्पन्न हुआ है। मूलः-तं नो खलु कण्हा ! तं एवं भूयं वा भव्वं वा भविस्सइ वा जन्नं वासुदेवा चइत्ता हिरन्नं जाव पव्वइस्सति । से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ-न एवं भूयं वा जाव पव्वइस्सति ? कण्हाइ ! अरहा अरिहनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु कण्हा ! सव्वे वि य वासुदेवा पुव्वभवे नियाणकडा,से एएणटेणं कण्हा! एवं वुच्चइ न एयं भूयं जाव पव्वइस्सति। भावार्थ:-हे कृष्ण ! वासुदेव अपनी सम्पत्ति को छोड़ दीक्षा अङ्गीकार करलें, ऐसा न तो कभी हुआ ही है; न होता ही है; और न कभी होगा ही। भगवन् ! ऐसा क्यों ? भगवान् ने इसके उत्तर में कहा, कि हे कृष्ण ! सब ही वासुदेव पूर्वभव में नियाणा (निदान ) कर लेते हैं । उसी के प्रभाव से. हे कृष्ण ! वासुदेव लोग कभी भी 未丰丰未主张未牛羊卡半术未未羊羊羊羊卡未未未朱朱未未 श्रीमदन्त- पदशाङ्ग सूत्रम्। वग पाचवा ******本*本求心水主平米工法术圣卡***t*** दीक्षा अङ्गीकार नहीं करते हैं। मूलः-तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिष्टनेमि एवं वयासी-अहं णं भंते ! इनो कालपासे कालं किच्चा कहिं गमिस्सामि ? कहिं उववाजिस्सामि ? तए णं अरहा अरिष्ट- नेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु कण्हा ! तुमं बारवईए णयरीए सुरदीवायण- कुमार कोव निदड्ढ़ाए अम्मा पिइ नियग विप्पहूणे रामेण बलदेवेण साद्धिं दाहिणवेयालिं अभिमुहे जोहिटिल्लपामोक्खाणं पंचरहं पंडवाणं पंडुरायपुत्ताणं पासं पंडुमहुरं संपत्थिए कोसंबवण काणणे नग्गोह वरपायवस्स हे पुढाविसिलापट्टए पीयवस्थपच्छाइयसरीरे जर. कुमारेणं तिक्खेणं कोदंडविप्पमुकणं इसुणा बामे पाये विद्धेसमाणे कालमासे कालंकिच्चा तच्चाए वालुयप्पभाए पुढ़वीए उज्जलिए नरए नेरइयत्ताए उववाजिहिसि । भावार्थः--तत्पश्चात् , श्री कृष्ण वासुदेव ने, श्री अरहा अरिष्टनेमि प्रभु से इस प्रकार पूछा भगवन् ! मैं यहाँ से आयुष्य पूर्ण कर के कहाँ जाऊँगा ? तथा कहाँ उत्पन्न हूँगा ? उत्तर में प्रभु ने फर्माया, कि-हे कृष्ण ! एक दिन यह द्वारिका नगरी अग्निकुमार देवताओं में जन्म लिये हुए द्वैपायन ऋषि के कोप से नष्ट हो जायगी : उस 米卡米米米米米米米职来职米水形识卡米米米米米米 ७४ वग पाचवा श्रीनदन्त- दसड़ सूत्रम् रामय, माता पिता और स्वजनों से रहित हो कर, तुम अकेले बलदेवजी के साथ, दक्षिण समुद्र के किनारे पॉडु ई राजा के पुत्र, युधिष्ठिरादि पाँच पॉडयों के निवास स्थल पोडु मथुरा की ओर प्रस्थान करते हुए मार्ग में कौशाम्बी नगरी के निकटस्थ बनखण्ड में, एक विशाल वटवृक्ष के नीचे, पीताम्बर (पीले वस्त्र ) से शरीर ढंक कर, पृथ्वी के एक उपल-खण्ड पर बैठोगे । उस समय जरा कुमार के द्वारा चलाया हुआ तीक्ष्ण वाण, तुम्हारे दाहिने पॉव में लगेगा और तुम आयुष्य पूर्ण कर शिला निज धाम पहुँ बोगे। मूलः-तए णं कण्हे वासुदेवे अरहयो अरिहनेमिस्स अंतिए एयमढे सोच्चा निसम्म ओहय जाव झियाइ । कणहाइ ! अरहा अरिहनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-माणं तुम देवाणुप्पिया ! अोहण जाव झियाहिं । एवं खलु तुमं देवाणुप्पिया ! तच्चायो पुढवीश्रो उज्जलियात्रो अणतरं उबट्टित्ता इहेब जम्बू दीवे भारहे वासेागमेसाए उस्सप्पिणीए पुंडेसु जणवएसु सय दुवारे वारसमे अममे नाम अरहा भविस्लसि, तत्थ तुमं बहूई वासाई केवल परियाणं पाउणेत्ता सिभिहिंसी। भावार्थः - तदनन्तर, वे श्री कृष्ण वासुदेव, श्री अरहा अरिष्टनेमि के द्वारा यह बात सुनकर बड़े ही गम्भीर ७५ 以“客先进班开治州州达州张张光形多为十个州长 **************** ७५ - + श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग पाचवा *#*张************半折i* विचार-सागर में गोते खाने लगे। तब भगवान् , श्री कृष्ण का सम्बोधित कर के बोले-हे कृष्ण ! तुम किसी भी प्रकार का कोई भी विचार मत करो । वहाँ से लौट कर इसी जम्बू द्वीप के भरत क्षेत्र में, भविष्य के उत्सार्पणी समय में 'पुण्ड ' देश के अन्तर्गत, 'शतद्वार' नामक नगर में तुम 'अमम' नामक बारहवें तीर्थकर होगे। वहाँ तुम बहुत वर्षों तक केवलपर्यय पालन कर निज-धाम पहुँचोगे । मूलः-तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहो अरिट्टनेमिस्स अंतिए एयमहं सोचा सिसम्म हट्ट तुटुं अप्फोडेइ २ त्ता वग्गइ २ ता तिवई छिदइ २ ता सीहनायं करेइ २ ता अरहंअरि- ट्ठनेमि वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता तमेव अभिसेकं हत्थिरयणं दुरुहइ २ त्ता जेणेव वा- रवइ णयरी जेणेव सए गिहे तणेव उवागए, अभिसेय हात्थरयणाश्रो पचोरुहइ २त्ता जेणेव वाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेब सए सीहासणे तेणेव उवागच्छइ २ ता सीहासणं वरांस पु. रत्थाभिमुहे निसीयइ २ त्ता कोडबिय पुरिसे सदावेइ २ त्ता एवं वयासी- भावार्थ:-तत्पश्चात् , कृष्ण वासुदेव, श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् के मुँह से इस अर्थ को सुन कर तथा हृदयङ्गम कर के, बड़े ही प्रसन्न हुए । और, बह फटकार कर एक मल्ल की भाँति अपना पद-न्यास कर के खड़े 那米米米形洲水来半米未州米米米米米米米米米米米 ७६ +4 श्रीमदन्त- हद्दशाङ्ग वर्ग पाचवा सूत्रम् । ****米半主羊北卡未未未未生未未未未不未未孝未於 हो गये । तव सिंहनाद कर भगवान् को वन्दना करने के पश्चात् वे हाथी पर बैठे । और द्वारिका नगरी की ओर, जिधर अपने महल थे उधर आये | हाथी से उतर कर बाहर की सभा में जहाँ सिंहासन था, वहाँ वे आये और पूर्व की तरफ मुँह कर सिंहासन पर जा बैठे । फिर कौटुम्विक पुरुष को बुलाकर वे यों बोले-- मूलः-गच्छहं णं तुम्भे देवाणुप्पिया ! वारवईए णयरीए सिंघाडग जाव उवघोसे माणा एवं वयह एवं खलु देवाणुप्पिया ! बारवतीए णयरीए दुवालस्स जोयण अायामा जाव पञ्चक्खं देवलोग भूयाए सुरग्गिदीवायणमूलाए विणासे भविस्सइ, तं जो णं देवाणु- प्पिया ! इच्छइ वारवतीए णयरीए राया वा जुवराया वा ईसरे तलवरे माडंबिय कोडंबिय इन्भसेट्ठी वा देवी वा कुमारो वा कुमारी वा अरहो अारिट्ठनोमिस्स अंतिए मुंडे जाव पव्व. इत्तए तं नं कण्हे वासुदेवे विसज्जइ पच्छातुरस्त विय से अहा पवित्तं वित्तं अणुजाणइ महया इडीसकारसमुदएणय से निक्ख मणं करेइ दोचं पि तचं पि घोसणवं घोसहे घोसइत्ता ममएयं आणत्तियं पच्चप्पिणह ! तएणं ते कोडंबिय पुरिसा जाव पच्चापिणंड् । भावार्थ:-हे देवानुप्रिय ! तुम जाओ और इस द्वारिका नगरी के प्रत्येक बाजार में ड्यौंडी पीट कर यों बोलो, *************** ७७ श्रीमदन्त- शाहशाह सूत्रम्। 采於未未未米牛沫卡卡 वर्ग पाचवा कि हे देवानुप्रिय ! इस विशाल और स्वर्ग के समान, द्वारिका पुरी का विनाश असुर-कुमार में उत्पन्न हुए, द्वैपायन ऋपि के द्वारा होगा। अतएव इस द्वारिका के बड़े जागीरदार, राजा, युवराज, राजा के प्रधान, राजा के प्रिय पुरुष, छोटे जागीरदार, कोतवाल, कुटुम्ब के स्वामी, अर्बपति सेठ, राणियॉ, कुमार और कुमारिका, आदि सभी में से, जिस किसी देवानुमिय की इस द्वारिका नगरी में भगवान के पास दीक्षा धारण करने की इच्छा हो, उन्हें स्वयं श्री कृष्ण दीक्षा के लिए आज्ञा प्रदान करते हैं । उन का दीक्षा महोत्सव वे बड़े ही समारोह से करेंगे । तथा दीक्षित के पीछे रहे हुए अवशेप कुटुम्ब का प्रतिपालन भी वे सदा के लिए करते रहेंगे। इस प्रकार दो तीन बार, घोषणा कर के, पीछा मुझे सूचित करो, कि मैं आपका फर्माया हुआ कार्य कर आया हूँ। ऐसी आज्ञा पाते ही, वह कौटुम्बिक पुरुष शहर में जाकर घोपणा कर आया । मूलः तए णं सा पउमावईदेवी अरहो अरिट्ठनोमिस्स अंतिए धम्म सोच्चा निसम्म हट्ट तुट्ट जाव हियया अरहं अरिहनेमि वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी सद्दहामि णं भंते ! णिग्गंथं पवयणं से जहेयं तुम्भे वदह जं नवरं देवाणुप्पिया ! कण्हं वासुदेवं अापु- च्छामि, तए णं अहं देवाणुाप्पियाणं अंतिए मुंडा जाव पव्वयामि । अहासुहं देवाणुप्पिये ! मा पडिबंधं करोहि। 来来来来来来去去如来来来来法 千米米米米米米4中求张法宋洋迷 वग श्रीसदन्त- पाँचवाँ कृद्दशाङ्ग ********** *浜本** भावार्थ:-तत्पश्चात् , उस पनावती देवी ने श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् के मुख, से धर्म को श्रवण कर उसे है प्रसन्नतापूर्वक हृदयङ्गम किया । और आनन्दित होती हुई, भगवान् को वन्दना कर के बोली-भगवन् ! मैंने निग्रंथों के प्रवचना पर अपनी हार्दिक श्रद्धा प्रगट की है । तथा. मैं यह मानती हूँ, कि जिस प्रकार पुण्य-पाप का स्वरूप आपने फर्माया है, वह ठीक वैसा ही है । अब मैं संसार के जन्म-मृत्यु के विकराल भय से ऊब उठी हूँ। इस लिए सुत्रम्। कृष्ण वासुदव से पृछ कर आपके समीप दीक्षा धारण करना चाहती हूँ । भगवान् बोले-पद्मावती, जैसे भी तुम्हें सुख हो वैसा ही करो; परन्तु 'शुभस्यशीघ्रम् ' के नाते इस में तनिक मी विलम्ब अब न करो । मूलः-तए णं सा पउमावई देवी धम्मियं जाणप्पवरं दुरूहइ २त्ता जेणेव वारवईणयरी जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ २त्ता धम्मियात्रो जाणाम्रो पच्चोरुहइ २ ता जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छइ २ ता करयल जाव कडु कण्हं वासुदेवं एवं वयासी इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! तुम्भेहिं अभणुण्णाया समाणी अरहो अरिट्टनेमिस्स अंतिए मुंडा जाव पव्वयामि अहासुहं देवाणुप्पिए ! तए णं से कण्हे वासुदेवे कोडबिए पुरिसे सदावेइ २ ता एवं वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! पउमावईए देवीए महत्थं निक्खमणाभिसेयं उववेह 丰半半米未米卡米卡米卡米卡米水半开出 'वर्ग पाँचवाँ श्रीमदन्त- हद्दशाङ्ग सूत्रम्। 来长张******米米米米办狀惡於冰***杀h* उवट्ठवित्ताएयं प्राणत्तियं पच्चप्पिणह । तए णं ते कोडुबिया जाव पञ्चप्पिणांत । भावार्थः-उसके बाद, वह पद्मावती रानी धार्मिक रथ में बैठ कर पुनः अपने महलों की और आई । रथ से उतर कर जहाँ श्री कृष्ण वासुदेव थे, वहाँ वह गई । तथा उन से हाथ जोड़ कर बोली-हे स्वामी '! आप की आज्ञा होने पर मैं अरिष्टनेमि भगवान् के द्वारा दीक्षित होना चाहती हूँ । कृष्णजी ने कहा प्रिये ! तुम्हें मेरी आज्ञा है जिससे भी सुख तुम्हें प्राप्त हो, वैसा ही तुम करो । इस प्रकार पद्मावती रानी को आज्ञा देने के पश्चात् ,कृष्णजी ने अपने विश्वासपात्र मनुष्यो को बुलाकर कहा-कि पद्मावती रानी के योग्य बड़े समारोह के साथ, दीक्षा महोत्सव की शीघ्र तैयारी करो । आज्ञा प्राप्त होते ही, उन मनुष्यों ने कृष्णजी की इच्छानुसार, महोत्सव की तैयारी कर दी। तदनन्तर उन्होंने श्री कृष्ण को वैसी ही सूचना भी दे दी मूलः-तए णं से कण्हे वासुदेवे पउमावई देवीं पट्टयं दुरुहइ २ ता अट्ठसएणं सोवन्न- कलस जाव निक्खमणाभिसएणं अभिसिंचइ २ त्ता सव्वालंकारविभूसियं करेइ २त्ता पुरिस सहस्सवाहिणिं सिवियं दुरूहावेइ २त्ता वारवईणयरीमझमझेणं निग्गच्छइ २त्ता जेणेव रेवयए पव्वए जेणेव सहसंबवणे उज्जाणे तेणेव उवागच्छइ २त्ता सायं ठवेइ २त्ता पउमावई 米米米米米米米米米玉米米卡米卡未未未米米米米米米未未 Arr श्रीमदन्त- कृहशाक पाचवा सूत्रम् । vvv ८१ ************ देवी सीयानो पच्चोरुहइ २ ता जेणेव अरहा अरिट्ठनेमी तेणेव उवागच्छइ २ ता अरह अरिहनेमी तिक्खुत्तो आयाहिण पयाहिणं करेइ २ ता वंदति णमंसति वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी- भावार्थः-तत्पश्चात् , उन श्री कृष्ण वासुदेव ने पद्मावती देवी को पाट पर बिठाया । एक सौ आठ स्वरण कलशों से यावत् दीक्षा अभिषेक उस का किया । सर्व प्रकार के आभूषणों से विभूषितं उसे की। फिर पुरुषवाहिनी शिविका में उसे बिठत कर बड़े ही समारोह के साथ द्वारिका नगरी के मध्यस्थ सार्वजनिक मार्गों से होते हुए,रैव- तगिरि के निकटस्थ सहस्त्रामनामकं बन में उसे लाये । वहाँ शिविका से उतर कर पद्मावती देवी ने तथा कृष्ण ने भगवान् अरहा अरिष्टनेमि के चरणों में जा तिक्खुत्तो के पाठ से सप्रेम वन्दना की। बन्दना कर लेने के पश्चात्, वे कृष्ण वासुदेव भगवान् से इस प्रकार बोले- मूलः-एस णं भंते ! मम अग्गमहिसी पउमावई नामं देवी इट्टा कंता पिया मणुन्ना मणामा अभिरामा जाव किमंग पुण पासणयाए ? तन्नं अहं देवाणुप्पिया ! सिस्सिणी भिक्खं दलयामि, पडिच्छंतु णं देवाणुप्पिया सिस्सिणिभिक्खं । अहासुहं तए णं सा पउ- *********** १ + वर्ग पाँचवाँ - हदशाङ्ग सूत्रम् । 环兴长4******** **********未** हुए मावई देवी उत्तर पुरस्थिमं दिसी भागं अवकमइ २ ता सयमेव अाभरणालंकरं प्रोमुयइ २ श्रीमदन्त-३ त्ता सयमेव पंचमुट्ठियं लोयं करेइ २ ता जेणेव अरहा अरिहनेमी तेणेव उवागच्छइ २ ता अरहंअरिहनेमि वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-प्रालित्ते जाव धम्ममाइक्खितं। भावार्थः हे भगवन् ! यह पद्मावती नामक देवी मेरी पट्टरानी है । मेरा इसके साथ अत्यन्त स्नेह है । यह प्रेम को उत्पन्न करने वाली है । और मेरे मन को प्रिय है। इसकी शान्त मुद्रा को बारम्बार देखत भी मुझे कभी अरुची उत्पन्न नहीं होती । जिस प्रकार गूलर के फूलों का नाम तक सुनना भी दुर्लभ है, तो फिर उसके v फूलों का देखना तो सचमुच में बड़ा ही दुर्लभ होना चाहिए । इसी प्रकार इस रानी का नाम सुनना भी जब कठिन है,तो फिर इसे देखने की तो सामर्थ्य ही किसकी है ! परन्तु आज यह संसार के जन्म-मृत्यु के दुखों से ऊब उठी है। :स लिए दीक्षा ग्रहण करती है । हे भगवन् ! मैं, इसी लिए, आप को इसे अपनी शिष्या के रूप में भिक्षा के समान समर्पण करता हूँ। इसे आप स्वीकार करें। उत्तर में भगवान् ने फर्माया, हे कृष्ण ! जिस से भी तुम्हें सुख हो करो। तत्पश्चात् . उन पद्मावती पट्टरानी ने उत्तर-पूर्व के मध्य की दिशा, ईशान्य कोण में जाकर, स्वय अपने हाथों से अपने गहनों को उतार फेंका । और, स्वयं पंच मुष्टि लोच कर के साध्वी का वेप धारण कर लिया। फिर भगान् के पास जा कर बन्दना उन्हें की। तब वह यूँ बोली-प्रभो ! संसार दुखों का सागर है । चारों और मोह माया की आग यहाँ 半米米米米米米米卡案:未未中华卡卡卡 -- 未未未乐米米卡未 - श्रीमदन्त- एहशान सूत्रम् । वर्ग *孝长办法 1丰i手办法子许法式生活 ঘাষ धधक रही है । अतः कृपा कर के अब साध्वी-जीवन का धर्म आप मुझे फर्मायें । मूलः-तए णं अरहा अरिठ्ठनेमी पउमावई देवीं सयमेव पव्वावेइ२ त्ता सयमेव मुंडावेइ सयमेव जक्खिणीए अज्जाए सिस्सिणिं दलयइ । तए णं सा जक्खिणी अजा पउमावई- देवीं सयं पब्बावेइ जाव संजमियव्वं । तए णं सा पउमावड् जाव संजमइ। तए णं सा पउमावई अज्जा जाया ईरियासमिया जाव गुत्तवंभयारिणी । भावार्थ:-यो सुन कर, श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् ने स्वयं पद्मावती रानी को अर्जित कर दीक्षित किया । और उसे, यक्षिणी नामक एक साध्वी को शिष्या-रूप में प्रदान कर दी इस यक्षिणी आर्या ने पद्मावती साध्वी का स्वय अपने हाथों केश- लुञ्चन किया और सयम की क्रियाओं से पूर्ण-रूपेण परिचत उसे किया । वह पद्मावती साध्वी भी तब अपनी गुराणीजी की बताई हुई क्रिया के पालन करने में जुट पड़ी। अब वह पद्मावती आर्या पाँच समिनि तीन गुप्ति, अधि नव बाड़ सहित ब्रह्मचारिणी हुई । मूलः-तए णं सा पउमावई अज्जा जक्खिणीए अजाए अंतिए सामाइय माइवाइं एक्का- रमं अंगाई अहिज्जइ बहुहिं चउत्थ छट्ठम दसम दुवालसेहिं मासद्धमासखमणेहिं विविहेहिं ********** + ++ + + + ******** श्रीमदन्त- दशाङ्ग सूत्रम्। पाचवा *****洋洋洋宋宗求平洋术泳件汗淋·法治rt तवोकम्मेहिं अप्पाणं भावमाणा विहरइ । तए णं सा पउमावई अजा बहु पडि पुन्नाइं वीसं वासाइं सामन्न परियाणं पागणित्ता मासियाए संलेहणाए अप्पाणं झोसेइ २ ता सहि भत्ताई अणसणाए छेदेइ २ ता जस्सहाए कीरई नग्गभावे जाव तमटुंभाराहेइ चरिमुस्सासेहिं सिद्धा। भावार्थ:-फिर तो उन पद्मावती आर्याजी ने. अपनी गुराणी यक्षिणी आर्याजी से सामायिक से लगाकर ग्यारह अङ्ग तक ज्ञानाध्ययन किय । साथ ही साथ उपवासो में, बैला, तेला चोला पँचौला, आदि पन्द्रह-पन्द्रह महीने- महीने तक की, विविध प्रकार की तपश्चर्या करती हुई, वह अपनी आत्मा को कुन्दन के समान उज्ज्वल करती रहीं। इसी प्रकार, पूरे-पूरे बीस वर्ष तक उन्होंने दीक्षा-धर्म का पालन किया । अन्त में जब उनका शरीर ऐसी उग्र तपस्या के कारण दुर्वल हो गया और अन्तिम समय भी आ पहुँचा, तब उन दिनों, पूरे एक महीने का अनशन व्रत रख, अपने सर्व कर्मों का एकान्त क्षय उन्होंने कर डाला । तथा. अन्तिम श्वाँस के पश्चात्, वे मोक्ष पहुँची मूलः-उक्खेवो य अज्झयणस्स । तेणं कालणं तेणं समएणं वारवई एयरी रेवयए उज्जाणे नंदणवणे, तत्थणं वारवईए णयरीए कण्हे वासुदेवे राया होत्था, तस्सणं कराह- वासुदेवस्स गोरी देवी; वएणो, अरहा अरिहनेमी समोसड़े, कण्हे णिग्गए, गोरी जहा ********************** ** श्रीमदन्त- कृशाङ्ग मूत्रम्। वगे पाँचवा M पउमावई तहा णिग्गया, धम्मकहा, परिसापडिगया, कण्हे वि पडिगया। तए णं सा गोरी जहा पउमावई तहा णिक्खंता जाव सिद्धा । एवं गंधारी, लक्खणा, सुसीमा, जंववई, सच्च- भामा, रुप्पिणी, अट्ठवि पउमावई सरिसायो अट्ठ अज्झयणा । भावार्थः-श्री सुधर्म स्वानी से जम्बू स्वामी बोले-भगवन् ! अन्तगढ़-सूत्र के पाँचवें वर्ग के दूसरे अध्याय में, जिस विषय का आपने अपने श्री-मुख से वर्णन किया है, उसे भली भॉति मैंने श्रवण कर लिया । परन्तु तीसरे अध्याय में, भगवान महावीर स्वामी ने जो भाव दर्शाये हैं, उन्के सम्बन्ध मे अब कुछ कहने की कृपा करें । तत्र सुधर्म स्वामी ने फर्माया, हे जम्बू ! सुनो उस काल में भी वहीं द्वारिका नगरी थी। उसके पास रैवतगिरि नामक एक विशाल पर्वत था । और. नन्दनवन नामक अति ही भव्य एक बाग वहाँ था । उस द्वारिका में, उस समय कृष्णण वासुदेव राज कर रहे थे । इन कृष्ण बासुदेव के गौरी नामक एक पटरानी थी । श्री अरहा अरिष्टनेमि प्रभु देश-देशान्तरों में विचरते हुए, वहाँ पधारे । श्री कृष्ण वासुदेव प्रभु की सेवा में उपस्थित हुए । उनकी पटरानी गौरी भी वहाँ गई । जिस प्रकार पद्मावती देवी ने बैराग्य प्राप्त कर दीक्षा ग्रहण की, उसी प्रकार गौरी पटरानी ने भी दीक्षा धारण की । ऐसे ही गान्धारी, लक्ष्मणा, सुसीमा, जाम्बवती, सत्यभामा और रुक्मिणी, इन छहों पट- रानियों ने भी, गौरी तथा पद्मावती के सदृश दीक्षा धारण की और अन्तिम समय में सभी ने अनशन व्रत कर 米米米米米去长半半半半米米米米米米米洙米米米米米米米米 ८५ वर्ग पाचवा श्रीमदन्त-- छदशाम सूत्रम्। 洋洋洋法未染牛卡卡求求生法亲亲朱柔才洋岸未米 अपने-अपने कर्मों का क्षय किया । और समय पा कर के सब की सब वे मोक्ष में पहुँची ! इन छहों रानियों के छः अध्ययन, और गौरी एवं पद्मावती रानी इन दो के दो अध्ययन, यों ये कुल आठ अध्ययन हुए। ये सभी रानियॉ, कृष्ण वासुदेव की पटरानियाँ थीं । मूलः-उक्खेवो य नवमस्स । तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवईणयरीए रेवयए पव्वए नंदनवणे उज्जाणे कण्हे राया। तत्थणं बारवईए एयरीए कण्हस्स वासुदेवस्स पुत्तए जंववतीए देवीए अत्तए संवे नाम कुमारे होत्था, अहीण । तस्सणं संबस्स कुमारस्स मूल- सिरी नामं भारिया होत्था, वण्णो । अरहा अरिहनोमि समोसढ़े । कण्हे णिग्गए, मूल- सिरी विणिग्गया जहा पउमावइ, नवरं देवाणुप्पिया! कण्हं वासुदेवं श्रापुच्छामि, जाव सिद्धा । एवं मूलदत्तावि। भावार्थः जम्बू स्वामी ने श्री सुधर्मस्वामी से कहा, कि-हे भगवन् ! अन्तगढ़-सूत्र के पाँचवें वर्ग के आठवें अध्याय में, जो भाव आपने फर्माये, उनका विधि-पूर्वक श्रवण मैंने किया । अब नये अध्याय के जो भाव हैं, उन्हें फरमान की कृपा करें । हे जम्बू ! उस काल में द्वारिका नगरी, बैतगिरि और नन्दनवन आदि से बड़ी ही सुशाभित थी । कृष्ण वर पाचवा K 1 वासुदेव वहाँ के राजा थे। उनका पुत्र और जाम्बवती का अङ्गज साम्ब नामक कुमार था। इन साम्ब कुमार के. मूल श्री' नामक पत्नी थी। श्री अरहा अरिष्टनेमि भगवान् विचरते हुए एक दिन वहाँ पधारे। भगवान् के शुभागमन का सन्देश प्राप्त होते ही कृष्ण वासुदेव भगवान् की सेवा में पहुँचे । मूल-श्री भी वहाँ पहुँची। भगवान् ने उन्हें बैगग्यमय प्रवचन सुनाया । प्रवचन सुन, मूल श्री का मन संसार से हट गया। उसके मन में वैराग्य के भाव जागृत हो गये । उसने श्रीकृष्ण वासुदेव से आज्ञा सम्पादन कर, पद्मावती पटरानी की भाँति दीक्षा अङ्गीकार की । और, यथा-समय अन्त में वह भी मोक्ष-धाम को पहुँची । इसी प्रकार, साम्ब कुमार की द्वितीय पत्नी मूलदत्ता ने भी दीक्षा धारण कर, अन्त में निर्वाण-पद को प्राप्त किया । इति पञ्चमो वर्ग: श्रीमदन्त- है कृदशाङ्ग सूत्रम् 半未常未牛市未未未米米米米米 米米米米米米米米米米米米米米形米米米 पष्टमो-वर्ग: . 米米米米米 वर्ग छठा कहशाक सुनम्। मूलः-जहणं भंते छट्टमस्स उक्खेवभो। नवरं सोलस अझयणा पण्णत्ता तंजहा- मंकाई, किंकमे चेव मोग्गरपाणी य कासवे । खेमए पितिधरे चेव, केलासे हरिचंदणे ॥ वारत्त सुदंसण पुन्नमद सुमणभद्द सुपट्टे मेहे, अइमुत्ते अ अलक्खे अझयणाणं तु सोल- सयं ॥ जइ सोलस अज्झयणा पण्णत्ता, पढ़मस्स अज्झयणस्स के अटे पण्णत्ते । भावार्थ:-श्री सुधर्म स्वामी से जम्बूस्वामी बोले-भगवन् ! पञ्चमवर्ग के जो भाव आपने फर्माये, वह मैंने सुने । पर बड़े वर्ग में क्या बात है ? कृपया उसे फर्मावें । हे जम्बू ! सुन, पञ्चमवर्ग के सोलह अध्याय हैं । वे इस प्रकार हैं:- (१) मङ्काई, (२) किङ्कम (३) मुद्गरवाणि (४) काश्यप, (५) क्षेमक, (६) धृतिधर, (७) कैलाश, (८) हरि- चन्दन, (६) वारत्त, (१०) सुदर्शन, (११) पूर्णभद्र, (१२) सुमनभद्र, (१३) सुप्रतिष्ठ, (१४) मेघ, (१५) अतिमुक्त और (१६) अलक्ष । इन सोलहो के नाम से सोलह अध्याय हैं। भगवन् ! इन सोलह अध्यायों में से सब से प्रथम 染米光张荣张 米米米米米米米米 - वर्ग छठा 1 ****** श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। के अध्याय में क्या मतलब है ? कृपया फर्मायें । मूलः-एवं खलु जंवू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं राय गिहं पयरे, गुणसीलए चेइए, सेणिए राया,तत्थणं मंकाई णाम गाहावई परिवसइ अड्ढे जाव अपरिभूए। तेणं कालेणं तेणं समएणं समणं भगवं महावीरे आदिकरे गुणासिलए जाव विहरइ, परिसा निग्गया। तए णं से मंकाई गाहावई इमीसे कहाए लढे जहा पन्नतीए गंगदत्ते तहेव, इमोवि जे? पुत्तं कुडुवे ठेवत्ता पुरिससहस्सवाहिणीए सीयाएणिक्खंते जाव अणगारे जाए ईरियासमिए जाव गुत्तवंभयारी तए णं से मंकाई अणगारे समणस्स भगवत्रो महावीरस्स तहारूवाणं थेराणं प्रतिए सामाइय माइयाई एक्कारस्स अंगाई अहिजड्, सेसं जहा खंदगस्स गुण रयणं तवो कम्म, सोलस वासाइं परियाओ, तहेव विपुले सिद्धे। दो चस्स उक्खेवो किंकमे वि एवं चेव जाव विपुले सिद्धे । भावार्थ:-इस प्रकार हे जम्बू ! भगवान् महावीर के समय में, राजगृह नामक एक नगर था । उसके ईशान्य ८६ . 关於半卡卡未未光市丰朱朱手主朱千米半永未丰米未於 वर्ग छठा श्रीमदन्त- शादशाभ सूत्रम् । *****十字士卡米**不*** कोण की ओर गुणशील नामक एक अत्यन्त सुन्दर वाग था। उन दिनों उस नगरी में, श्रेणिक-विम्बिसार नामक राजा वहाँ शासन करता था। वहाँ मङ्काई नामक गाथापति रहता था । वह बड़ा सम्पत्तिशाली तथा निडर था । उसी समय मे धर्म के प्रचारक, श्रमण भगवान् महावीर विचरते हुए राजगृह के 'गुणशील' नामक वाग में एक दिन पधारे । प्रभु के पदार्पण का शुभ सन्देश पाते ही, उनके दर्शनार्थ जनता किसी प्रचण्ड नद के टूट जाने वाले बाँध की भाँति उमड़ पड़ी। मङ्काई गाथापति को भी यह खबर हुई । जिस प्रकार भगवती नी सूत्र में गङ्ग- दत्तजी का उल्लेख है, उसी प्रकार ये भी प्रभु के चरण-वन्दन की चाह में अपने घर से निकले । प्रभु का प्रवचन श्रवण कर उनके हृदय में वैराग्य बरसाती नदी की भाँति उमड़ आया । बड़े पुत्र को गृह-कार्य का समस्त भार सौंप कर, बड़े समारोह के साथ उन्होंने दीक्षा ग्रहण की । पाँच समिति तथा तीन गुप्ति सहित नव वाड़ युक्त ब्रह्मचारी हुए । तत्पश्चात्, उन मङ्काई मुनि ने भगवान् महावीर के अनुयायी स्थविर मुनियों से, सामायिक से ले- कर ग्यारह अङ्गों तक पूरा-पूरा ज्ञानाध्ययन किया। इनका अवशेष वर्णन खन्धक मुनि की भॉति ही समझना चाहिए। अर्थात् इन्होंने भी गुणरत्न आदि तपस्याएँ की । सोलह वर्ष पर्यन्त चारित्र-पालन कर, अन्तिम समय में, अनशन व्रत कर के वे विपुल गिरि पर, मोक्ष में पहुँचे । इसी प्रकार, राजगृह नगर के निवासी, दूसरे ' किङ्कम' नामक गाथापति ने भी दीक्षा अङ्गीकार कर मोक्ष प्राप्त किया। मूलः-तच्चस उक्खेवभो । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णयरे ***邓洪洪洪洪卡卡朱米米米米米米那块染染 ६० वर्ग छठा श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम् । गुणसिलए चेइए, सेणिए राया, चेल्लणादेवी । तत्थणं रायगीहे णयरे अज्जुणए णामं माला गारे परिवसइ, अड्ढे जाव अपरिभूए । तस्सणं अज्जुणयस्स मालायारस्स बंधुमई णाम भारिया होत्था, सूमाला । तस्स णं अज्जुणयस्स मालायारस्स रायगिहस्स नयरस्स बहिया- एत्थणं महं एगे पुप्फारामे होत्था, कण्हे जाव निकुरंव भूए दसद्धवन्नकुसुमकुसुमिए पासाई ए ४ । तस्स णं पुप्फारामस्स अदूर सामंते तत्थ णं अज्जुणयस्स मालागारस्स अजतं पजतं पिइपज्जयांगए अणेगकुल पुरिसपरंपरागए मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्खाययणे होत्था, पोराणे दिव्वे सच्चे जहा पुण्णभद्दे । तत्थणं मोग्गरपाणिस्स पडिमा एगं महं पलसहस्साण- फरणं अयोमयं मोग्गरंगहाय चिहइ । भावार्थ:-श्री सुधर्मस्वामी से जम्बूस्वामी बोले-भगवन् ! छटे वर्ग के द्वितीयाध्याय का वर्णन, जो आपने फर्नाया, उसे मैंने ध्यानपूर्वक सुन पाया। अब कृपा कर फर्मायें, कि तृतीयाध्याय का तात्पर्य क्या है ? हे जम्बू! सुनो, भगवान् महावीर स्वामी के समय में राजगृह नामक एक सुन्दर नगरी, गुणशील नामक उद्यान सहित सुशो- मित थी। उस समय, उस नगरी में, श्रेणिक राजा राज करता था । जिसके चेलणा नामक एक परम प्रिय पत्नी 半孝宗朱孝法*未孝丰;朱法式洋半法米法米米半手术未未未 ६१ में श्रीमदन्त- दिशाश वर्ग छठा . सूत्रम्। - थी। उसी राजगृह नगरी में 'अर्जुन' नामक एक माली निवास करता था । यह माली बड़ा ही सुन्दर और सुडल तथा सम्पत्तिशाली और निर्भय था। इसके बन्धुमति नामक एक महान् सुन्दर और सुकुमार धर्म पत्नी थी। राजगृह नगरी के बाहर, इस ' अर्जुन ' माली की एक सुन्दर पुष्पवाटिका थी। जिसमें पाँचो वर्ण के पुष्प विकसित हो रहे थे । इस सुन्दर और मनोहर पुष्पवाटिका की अद्वितीय छटा, दर्शकों के चित्त को हरण करनेवाली थी। फूलों के इस उपवन के अति निकट ही में · अर्जुन' के बड़े बूढ़े पिता-मह, आदि की वंश परम्परा से चला आने- वाला पूर्णभद्र की भाँति प्राचीन, प्रधान एवं सत्य एक यक्ष का ' यक्षायतन' था। उसमे ' मुद्गरपाणि' नामक एक यक्ष की मूर्ति (प्रतिमा ) अपने हाथों में एक हजार पल का, भारी एक लोहमयी मुद्गर ग्रहण किये हुए प्रति- छित थी। मूलः-तए णं से अज्जुणए मालागारे बालप्पभिई चेव मोग्गरपाणिजक्खस्स भत्ते यावि होत्था, कल्लाकल्लिं पच्छियपडिगाइं गेण्हइ २ त्ता रायगिहाम्रो नगरानो पडिनिक्ख- मइ २ त्ता जेणेव पुप्फारामे तेणेव उवागच्छइ २ ता पुप्फुच्चयं करेइ २ ता अग्गाइं वराई पुष्फाइं गहाइ, गहित्ता जेणेव मोग्गरपाणिस्स जक्खाययणे तेणेव उवागच्छइ २ ता मोग्गर- पाणिस्स जक्खस्स महरिहं पुप्फच्चयणं करेइ २ ता जनुपायपडिए पणामं करेइ २ त्ता ***44地州主张****卡山水华兴车米米水千兆 ६२ - 7 - वर्ग: श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम् 洋洋未半案未朱孝宋孝宗下半米半朱洋洲 तो पच्छा रायमग्गसि वितिं कप्पेमाणे विहरइ। भावार्थः-तदुपरान्त वह ' अर्जुन' मालाकार बाल्यावस्था से ही, उस 'मुद्गरपाणि ' यक्ष की सेवा भक्ति कर के उसका पूर्ण भक्त बना हुआ था । वह वाँस की टोकरी ले, नित्यप्रति राजगृह नगरी से निकल कर, उस पुष्प- वाटिका में आता । वहाँ वह फूलों को चुन कर एकत्रित करता । फिर उन फूलों में से अच्छे-अच्छे मनोरम फूलों को लेकर, उस ' मुद्रपाणि' यक्ष के स्थान पर आता । और वहाँ उस यक्ष के सम्मुख फूलों का ढेर कर, अपने दोनों घुटनों को भूमि पर टिका नमस्कार करता । तत्पश्चात् , राजगृह में गृह कार्यादि कर वह अपना निर्वाह करता था। मूलः-तस्थणं रायगिहे णयरे ललिया नामं गोट्ठी परिवसइ, अड्डा जाव अपरिभूया जंकयसुकया यावि होत्था । तए णं रायगिहे नगरे अण्णया कयाइ पमोए घुटे यावि होत्था। तए णं से अज्जुणए मालागारे कल्लं पभूयतराएहिं पुप्फेहिं कजमितिकडु पच्चूसकालसमयांस बंधुमतीए भारियाए सद्धिं पच्छियपिडयाइं गेण्हइ २ ता सयाओ गिहारो पडिनिक्खमइ २ त्ता रायगिहं नगरं मज्झमज्मेणं णिगच्छइ २ ता जेणेव पुप्फारामे तेणेव गवागच्छइ २ त्ता बंधुमईए भारियाए सद्धिं पुप्फुच्चयं करेइ । .
श्रीमदात- रदशाह नम्। वर्ग छठा 卡术未装水求法米法生去法米法不杀卡卡卡 भावार्थ:- उसी राजगृह में एक उद्दण्ड मित्र-मण्डली रहती थी । जो 'ललित' नाम से प्रसिद्ध थी । उन उद्दण्ड मित्र-जनों के पास सम्पत्ति भी पर्याप्त थी। और वे बिलकुल निर्भय थे । वे जो भी भला या बुरा कोई भी कार्य करते, उसको जनता अच्छा ही समझती थी। एक दिन उसी राजगृह में एक होनेवाले महोत्सव की घोषणा हुई। तब छार्जुन माली ने मोचा, कि कल उत्सव के कारण फूलों की बिक्री भी विशेष होगी। इसी उद्देश्य से प्रेरित हो, प्रातःकाल के होते ही वह, फूल रखने की टोकरियॉ आदि लेकर, अपनी स्त्री ' वन्धुमति ' के सहित राजगृह के मध्य में, सार्वजनिक मार्गों से होता हुआ, अपनी पुष्प-वाटिका की तरफ चल दिया। वहाँ आकर वे दोनो दम्पति फूलों को चुन-चुन कर एकत्रित करने लगे। मूलः-तए णं तीसे लालियाए गट्ठिोए छ गोहिल्ला पुरिसा जेणेव मोग्गरपाणिस्स जक्ख- स्स जक्खाययणे तेणेव उवागया अभिरममाणा चिटुंति । तए णं से अज्जुणए मालागारे बंधुमई ए भारियाए साद्धिं पुप्फुच्चयं करेइ २ ता अग्गाइं वराइं पुप्फाइंगहाय जेणेव मोग्गर पाणिस्त जक्खस्स जक्खायणे तेणेव उवागच्छइ । तए णं ते छ गोठिल्ला पुरिसा अज्जुणयं मालागारं वंधमईए भारियाए सद्धिं एज्जमाणं पासइ पासित्ता अन्नमन्नं एवं वयासी-एस एणं 张**对决共法米卡卡卡氏水***长作法班长张张* वर्ग छठा श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूःम्। 张丰兴***************未未 देवाणुप्पिया ! अज्जुणए मालागारे वंधुमईए भारियाए सद्धिं इहं हव्वमागच्छइ, तं सेयं खलु देवाणुप्पिया ! अम्हं अज्जुणयं मालागारं अवश्रोडयं बंधणयं करेत्ता बंधुमईए भा- रियाए सद्धिं विउलाई भोग भोगाइं भुजमाणाणं विहरित्तए त्तिकट्ठ एयमढे अन्नमन्नस्स पडिसुणेति पडिसुणित्ता कवाडंतरेसु निलुकंति निचला निप्फंदा तुसिणीया पच्छण्णा चिट्ठति । भावार्थः-तत्पश्चात्, उस 'ललित' नामक उद्दण्ड टोली के छः गोष्टिक-मित्र-जन, उस मुद्गरपाणि यक्ष स्थान की ओर आकर. क्रीड़ा करने लगे। उधर वह अर्जुन माली भी अपनी स्त्री के साथ फूलों को इकट्ठा कर और उनमे से कुछ अच्छे अच्छे फूलों को लेकर उस यक्ष के स्थान की ओर आ रहे थे । इतने ही उन छहों उद्दण्ड मित्रो ने अर्जुन माली को सपत्नीक आते हुए देखा । वे परस्पर बोले-मित्रो! यह ठीक है। देखो, वह अर्जुन माली भी अपनी स्त्री सहित यहाँ आ रहा है । हम सब उस अर्जुन माती को, औंधी मुश्कियों से बल-पूर्वक बॉध कर लुढ़का द। और फिर उसकी स्त्री बन्धुमति के साथ, खूब अच्छी तरह से भोग विलास करें । ऐसा परस्पर सलाह-मश- विरा कर, वे छहों मित्र-जन किवाड़ों के पीछे हिलना-डुलना बन्द कर चुपचाप छिप कर खड़े हो गये। ६५ ****** श्रीमदत- दशह नम्। वर्ग छठा मूलः-तए णं से अज्जुणए मालागारे बंधुमईए भारियाए सद्धि जेणेव मोग्गरपाणि- जन्खाययणे तेणेव उवागच्छइ २ ता अालोए पणामं करेइ २ त्ता महरिहं पुप्फुच्चणं करेइ २ त्ता जंनुपायपडिए पणामं करेड् । तए णं ते छ गोठिल्ला पुरिसा दवदवस्स कवाडंतरेहितो णिग्गच्छति, णिगच्छित्ता अज्जुणयं मालागारं गेण्हति गरिहत्ता अवरोडगबंधणं करोति करिता बंधुमतीए मालागारिए सद्धिं विपुलाइं भोग भोगाइं सुंजमाणा विहरति । तए णं तस्स अज्जुणयस्स मालागारस्स अयमज्झथिए ४ । समुप्पन्ने एवं खलु अहं बालप्पभि तिं चेव मोग्गरपाणिस्स भगवनो कल्लाकाल्लिं जाव वित्ति कप्पेमाणे विहरामि, तं जहणं मोग्गर- पाणिजक्खे इस संनिहित होते सेणं कि ममं एयारूवं आवई पावेजमाणं पासते ? तं नास्थि णं मोग्गरपाणिजक्खे इह संनिहिते, सुव्वत्तं तं एस कटे । भावार्थ:-तत्पश्चात् , वह अर्जुन माली अपनी स्त्री सहित मुद्गरपाणी यक्ष के स्थान पर आया । और, यक्ष की प्रतिमा को देखते ही उसने उसे नमस्कार किया । फिर उस यक्ष के सम्मुख फूलों का ढेर कर, भूमि पर घुटने टिका दोनों दम्पति ने प्रणाम किया । इतने ही में उन छहों उद्दण्ड मित्रों ने किवाड़ों के पीछे से निकल कर, एका- ***米米米长米卡米卡卡卡卡卡卡卡半半不米米米米 法学法守法生法法法法 ६६ वर्ग छठा श्री-दन्त- दशग मूत्रम्। एक अर्जुन माली को धर पकड़ा । और उसे उतरे हाथों [मुसकियाँ] दे बाँधा । फिर उसकी स्त्री बन्धुमति मा लिन के साथ उन आततायियों ने बलात्कार किया । इस घटना को अपने आखों देख, अर्जुन माजी को यह विचार उत्पन्न हुआ कि अहो ! मैं बाल्यावस्था से ही इन मुद्रपाणि यक्ष की नित्यप्रति सेवा करता आ रहा हूँ । यदि वास्तव में मुद्रपाणि यक्ष इस प्रतिमा में या इस के निकट होते, तो क्या वे मुझे इस प्रकार आपत्ति में फँसा हुआ कभी देखते रहते ? नहीं, यह कभी नहीं हो सकता, इसलिए मुद्रपाणि यक्ष यहाँ है, ऐसा मालूम नहीं होता। यह जो उनकी प्रतिमा है। अतः यह तो केवल काट-मात्र ही है। मूलः-तए णं से मोग्गरपाणि जक्खे अज्जुणयस्स मालागारस्स अगमेयारूवं अज्म- थियं जाव बियाणेत्ता अज्जुणयस्त मालागारस्स सरीरयं अणुपविसइ २ ता तडतडस्स वंधाई छिदइ,तं पलसहस्सं णिप्फरणं अयोमयं मोग्गरं गेण्हइ२ ते इथिसत्तमे पुरिसे घाएइ। तए णं से अज्जुणए मालागारे मोग्गरपाणिणाजक्खेणं अणाइडे समाणे रायगिहस्स नय- रस्स परिपेरं तेणं कल्लाकल्लिं छ इत्थिसत्तमे पुरिसे घाएमाणे विहरइ । भावार्थः- तत्पश्चात् अर्जुन माली के इन विचारों को जान कर,वह मुद्गरपाणि यक्ष अर्जुन माली के शरीर में प्रवेश हो गया। उस यक्ष की शक्ति के प्रभाव से अर्जुन ने अपने बेधे हुए बन्धनों को तडाक से । तोड़ डाला और उस हज़ार ६७ 菜米米米米米米米米米米米共 ६७ *** न श्रीमदन्त- टदशश सूत्रम्। वर्ग छठा पल के भारी लोहे के मुद्दर को उसने हाथ में उठा लिया। फिर क्या था, उठाया उसने उस मुद्गर को और लगा करने संहार उन छहों उद्दण्ड मित्रजनों एव उस स्त्री का! यो उन सातों ही को बात की बात ही में उसने सदा के लिए धरा- शायी कर दिया । तदनन्तर, वह अर्जुन माली उस यक्ष के अधीन हो, राजगृह नगरी के चहुँ और भ्रमण करता हुआ नित-नये छः मनुष्य और एक स्त्री, यो सात व्यक्तियों को, मारता फिरता । * मूलः-तए णं रायगिहे णयरे सिंघाडग जाव महापहेसु बहुजणो अण्णमण्णस्स एव नाइक्खइ ४ एवं खलु देवाणुप्पिया ! अज्जुणए मालागारे मोग्गर पाणिणा अण्णाइटे समाणे रायगिहे णयरे बहिया छ इथि सत्तमे पुरिसे घाएमाणे विहरइ । तए णं से सेणिए राया इमीसे कहाए लढे समाणे कोडंबिय पुरिसे सदावेइ २ त्ता एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया ! अज्जुणए मालागारे जाव घाएमाणे जाव विहरइ तं माणं तुब्भे केई तणस्स वा कट्ठस्सवा पाणियस्स वा पुष्फफलाणं वा अट्ठाए सइ निग्गच्छउमाणं तस्स सरीरस्स वयत्ती भविस्सइ त्ति कटु दोचपि तचंपि घोसणयं घोसेह घोसित्ता खिप्पामेव ममेयं पच्चप्पि- * यू पाँच महीने पार तेरह दिनों मे ११४१ नर-नारियो का काम उसने तमाम किया। जिस में १०७८ मनुष्य और १६३ स्त्रियाँ थी। *********** 米米米米米米水米米米米米米米米米米米未米米米米米米米米 我去半张** वर्ग छठा श्रीमदत्त सूत्रम्। 88 एह । तए णं ते कोडंवियपुरिसा जाव पच्चप्पिणंति । भावार्थः-तब तो प्रतिदिन राजगृह नगरी के समस्त छोटे बड़े मागों पर जनता इकट्ठी हो कर, परस्पर इस घटना की बड़ी जोरों से चर्चा करने लगी । वे एक दूसरे को सम्बोधित कर कहने लगे, कि नगरी के बाहर अर्जुन माली के शरीर में मुद्रपाणि यक्ष ने प्रवेश कर लिया है। जिससे एक स्त्री और छः मनुष्यों को, नित्य प्रति वह म र डालता है । यह बात राजा श्रेणिक के कानों पर भी किसी दिन पहुँची । राजा ने राजकीय विश्वास-पात्र मनुष्य को बुला कर कहा, कि-" शहर भर में जाकर यह घोषणा कर दो, कि "शहर के बाहर अर्जुन माली यक्षाधीन हो का एक स्त्री और छः मनुष्य यों सात व्यक्तियों को सदैव मार रहा है । इसलिए कोई भी मनुष्य शहर के बाहर घाम, लकड़ी, पानी, फल और फूल आदि लेने के लिए न जायाँ करें । क्योंकि, इन वस्तुओं को लेने के लिए जाते समय उस यक्ष के समीप पहुँचने पर. कहीं तुम्हारे शरीर पर कोई आपत्ति खड़ी न हो जाय । अतएव शहर के बाहर न जाने पर ही प्रजाजनो में अमन-चैन बना रहेगा। ऐसी मेरी भावना है।" इस प्रकार की घोषणा करके शघ्र ही पुनः आकर मुझे सूचित करो । तत्पश्चात्, उस राजकीय पुरुष ने राजा के आदेशानुस र शहर-भर में घोषणा कर के पापिस राजा को सूचना कर दी। मूलः-तत्थ णं रायगिहे णयरे सुदंसणे णामं सेट्ठी परिवसइ, अड्ढ़े । तए णं से सुदं- 米米米米来张丰张张卡来来来米米米米米米米米米 ed श्रीमद त- रुदशान सूत्रम्। वर्ग छठा १०० ※共卡长张卡卡卡卡卡於本求未未士生米卡未来本沐本米吉 सणे समणोवासए यावि होत्था । अभिगय जीवाजीवे जाव विहरइ । तेणं कालेणं तेणं सम- एणं समणे भगवं महावीरे जाव समोसड़े विहरइ । तए णं रायगिहे पयरे सिंघाडग जाव महापहेसु बहुजणो अन्नमन्नस्स एवमाइक्खइ जाव किमंग पुण विपुलस्स अट्ठस्स गहणयाए? तए णं तस्स सुदंसणस्स बहुजणस्स अंतिए एयमढे सोच्चा निसम्म अयं अज्झथिए जाव समुपन्ने एवं खलु समणे भगवं महावीरे जाव विहरइ, तं गच्छामि णं समणं भगवं महावीरं वंदामि नमसामि, एवं संपेहेइ २ ताजेणेव अम्मापीयरो तेणेव उवागच्छइ २ त्ता करयल परिग्गहियं जाव एवं वयासी-एवं खलु अम्मताभो ! समणे भगवं महावीरे जाव विहरइ तं गच्छामि णं समण भगवं महावीरं वंदामि नमसामि जाव पज्जुवासामि । भावार्थः- उस समय राजगृह नगरी में एक बड़े सम्पत्ति शाली 'सुदर्शन ' नामक सेठ रहते थे । ये श्रमणो- पासक श्रावक थे । इन्हें जड़ और चैतन्य का भला बोध था। ये पर्याप्त मात्रा में, धम-ध्यान करते हुए अपने जीवन को उन्नति पथ पर ले जा रहे थे । उसी समय में, श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी एक समय धर्मोपदेश करते हुए, उसो नगरी के बाहर उद्यान में आ विराजे । स्वामी के पदार्पण की खुश खबर पाते ही छोटे-बड़े सभी बाजारों में १०० श्रीमदन्त- कद्दशान सूत्रम् वर्ग छठा १०१ ※*未*於未未未未未於卡未未未主主未未未未柔沫沫法未 लोग एक दूसरे से कह रहे थे, कि जब भगवान् के दर्शन से ही अपूर्व लाभ होता है, तो फिर उनकी पीयूष-वर्षी पवित्र वाणी का रसास्वादन करने में तो अवश्य ही अवर्णनीय आनन्द होता है । सुदर्शन सेठ ने भी प्रभु-आगमन की खबर पाते ही विचार किया, कि अहो ! सद्भाग्य से भगवान् ने इस क्षेत्र को पावन किया है। मैं भी जाऊँ। उन्हें वन्दना करूँ । और यों अपने जन्मजन्मान्तरों के पाप-तापों का समूल नाश मैं करूँ। ऐसे शुभ विचार करके, माता-पिता के पास वे आये और अपने दोनों हाथों को जोड़ कर वे बोलेः-परम पूजनीय माता- पिताओ ! भगवान् महावीर यहाँ पधारे हुए हैं। अतः उन्हें मैं वन्दना करने के, तथा उनकी सेवा करने के लिए जाऊँ, ऐसी मेरी इच्छा है। मूलः-तए णं तं सुदंसणं सेटिं अम्मापियरो एवं वयासी-एवं खलु पुत्ता ! अज्जुणे मालागारे जाव घाएमाणे विहरइ, तं मा णं तुमं पुत्ता ! समणं भगवं महावीरं वंदए णिग- च्छाहि मा णं तव सरीरयस्स वावत्ती भविस्सइ, तुमणणं इह गए चेव समणं भगवं महावीर वंदाहि णमंसाहि । तए णं से सुदंसणे सेट्ठी अम्मापियरं एवं वयासी-किरणं अहं अम्म- यात्रो ! समणं भगवं महावीरे इहमागयं इह पंत इह समोसढं इह गए चेव वंदिस्सामि नमस्सामि ? तं गच्छामि णं अहं अम्मयात्रो ! तुम्भेहिं अब्भणुनाए समाणे समणं भगवं 兆丰未未於法兆杰米米米米米米米 १०१ - श्रीमदन्त- छदशाङ्ग सूत्रम् वर्ग छठा -- १०२ 关卡米卡米求辛未未注本法未染未未术冰 महावीरं वदामि जाव पज्जुवासामि । भावार्थः- तत्पश्चात्, सुदर्शन सेठ के माता-पिता ने कहा-हे पुत्र ! अर्जुन माली, सात व्यक्तियों को नित्य प्रति मार डालता है । इसलिए तुम अकेले, भगवान् को नमस्कार करने के लिए मत जाओ । न जाने, वहाँ जाने पर कहीं कोई व्यर्थ ही की दुर्घटना तुम्हारे शरीर पर घटित हो जाय । अतएव यदि तुम चाहो, तो यहीं से उन भगवान् को नमस्कार कर सकते हो। वे सर्वज्ञ हैं। यहीं से की हुई तुम्हारी भक्ति को वे अवश्यमेव स्वीकार करेंगे । ता वह सुदर्शन सेठ अपने माता-पिता से बोले-हे पूज्य माता और पिता ! जब भगवान् महावीर यहाँ पधार ग; अपनी वस्ती में जब वे आ विराजे उपदेश देने को उपस्थि जब वे हो गये, तो फिर मैं कैसे उन्हें यहीं से वन्दना कर लूँ ? क्या, ऐसा करने से मैं कृत-कार्य कभी हो सकता हूँ ? नहीं, नहीं, कभी नहीं। अतः हे माता और मेरे पूजनीय पिता ! अगर आप की आज्ञा प्राप्त हो जाये, तो मैं भी सर्वज्ञ भगवान की सेवा के लिए, उनकी चरण शरण में जाकर, अपने भक्जनित तापों का कुछ न कुछ अंश में शमन कर सकूँ । मूलः-तए णं तं सुदंसण सेटिं अम्मापियरो जाहे नो संचायति बहुहिं प्राघवणाहिं ४ जाव परूवेत्तए तए णं से अम्मापियरो ताहे अकामया चेव सुदंसणं सेट्टि एवं वयासी-अहा- सुहं देवाणुप्पिया ! तए णं से सुदंसणे अम्मापिईहिं अभणुण्णाए समाणे एहाए सुद्धप्पावे- 米张张张张张洪水来来来来米米米米米米米米班 १०२ वर्ग छठा श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्, *** साइं जाव सरीरे सयानो गिहारो पडिनिक्खमइ. २. त्ता पायविहार चारणं रायगिहं नगरं मझ मज्झणं णिगच्छइ २ ता मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्खाययणस्स अदूरसामते णं जेणेव गुणसिलए चेइए जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव पहारेथए गमणाए। तए णं से मोग्गरपाणी जक्खे सुदंसणं समणोवासयं अदूरसामंतेणं वीईवयमाणं २ पासइ २ ता पासुः रुत्ते तं पलसहस्स णिप्फन्नं अयोमयं मोग्गरं उल्लालेमाणे २ जेणेव सुदंसणे समणोवासए तेणेव पहारेथए गमणाए। भावार्थः-सुदर्शन सेठ की नाना प्रकार की दलीलों से परास्त हुए, उनके माता-पिता,उन्हें अपने सत्य सङ्कल्प से एक तिल-भर भी इधर-उधर न डिगा सके । और जब वे उन्हें रोकने में असमर्थ हो गये, तब वे अपने पुत्र से बोले-यदि हमारा कहना नहीं मानना, यही तुमने निश्चय किया हो, तो तुम्हें जिसमें भी सुख ज्ञात हो, वैसा करो ! यों, माता-पिता की आज्ञा हो जाने पर, सेठ ने स्नान किया । भौर शुद्ध वस्त्रों से सज कर चे घर से निकल पड़े । राजगृह के मध्य रास्तों में पैदल ही पैदल, मद्गरपाणि यक्ष के स्थान के निकट होते हुए गुणशील नामक बाग की तरफ से, जहाँ भगवान् महावीर स्वामी विराजते थे, उधर आ रहे थे। तब वह मद्गर- पाणि यक्ष, सुदर्शन श्रमणोपासक को कुछ समीप ही में आते देख, क्रोधित हुआ । और, अपने उस एक हजार 米米米米米米卡未半米米米米米米米米米未牛米米米米米 - १०३ ६ १०३ 米米米米米米米士未 - ****** श्रीमदन्त- छदशाश सूनम्। वग छठा २०४ 米卡米米米米米米米米米米米米米米米米米米米未 पल के भारी लोहे के मद्गर को फिराता तथा उछालता हुआ, उन सुदर्शन सेठ के निकट आ पहुँचा । मूलः-तए णं से सुदंसणे समणोवासए मोग्गरपाणिं जक्खं एजमाणं पासइ २ त्ता अभीए अतत्त्थे अणुविग्गे अक्खुभिए अचलिए असंभंते वत्थएणं भूमि पमज्जइ २ ता करयल एवं वयासी-नमोत्थुणं अरहताणं जाव संपत्ताणं, नमोत्थुणं समणस्स जाव संपाउ- कामस्स, पुट्विं च णं मए समणस्स भगवो महावीरस्स अंतिए थूलए पाणाइवाए पच्च- क्खाए जावजीवाए, थूलए मुसावाए, थूलए आदिन्नादाणे, सदारसंतोसे कए जावजीवाए, इच्छापरिमाणे कए जावजीवाए तं इयाणि पिणं तस्सेव अंतियं सव्वं पाणाइवायं पञ्चक्खामि जावजीवाए सव्वं मुसावायं सव्वं अदत्तादाणं सव्वं मेहूणं सव्वं परिग्गरं पञ्चक्खामि जाव- जीवाए सव्वं कोहं जाव मिच्छादसणसल्लं पच्चक्खामि जावज्जीवाए, सव्वं असणं पाणं खाइमं साइमं चउब्विहं पि अाहारं पञ्चक्खामि जावजीवाए, जइणं एत्तो उवसग्गाश्रो मुच्चिस्तामि तो मे कप्पेइ पारेत्तए, अहणो एत्तो उवसग्गाओ न मुच्चिस्सामि तो मे तहा पच्चक्खाए 米米米米米米米米米米米米米未形 १०४ वर्ग- छठा . श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। चेव त्ति कडु सागारं पडिमं पडिवज्जइ । ' भावार्थ:-उसके बाद भी वे सुदर्शन सेठ, अपनी ओर आते हुए उस यक्ष को देख कर, भय, त्रास, उद्वेग और क्षोभ से रहित बने रहे । तथा, उसे देख कर जग भी चलायमान् वे नहीं हुए। निर्भय होकर सुदर्शन सेठ ने म को वस्त्र से परिमार्जित की और हाथ जोड़ कर बोले-नमस्कार हो, उन अर्हन्तों को, जो मोक्ष में पधार गये हैं। एवं नमस्कार हो, उन वर्तमान अर्हन्तों को, जो मोक्ष में पधारने वाले हैं। पहले मैंने भगवान् महावीर के समीप, स्थूल प्राणातिपात जीवन पर्यन्त के लिए पचक्खा था । इसी प्रकार स्थूल मृषावाद, स्थूल अदत्तादान, और स्व-स्त्री सन्तोष का अणुव्रत धारण किया था। सम्पत्ति की भी जीवन पर्यन्त के लिए यथेष्ट मर्यादा की थी। श्रा इस समय उन्हीं प्रभु की साक्षी से सर्व प्राणातिपात का त्याग जीवन पर्यन्त के लिए करता हूँ। इसी प्रकार मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन और परिग्रह का जीवन भर के लिए सर्वथा प्रकार से त्याग करता हूँ। और, क्रोध, मान माया और लोभ आदि यावत् मिथ्यात्वदर्शनशल्य तक अठारह ही पापों को जीवन पर्यन्त के लिए त्यागता हूँ । इसके अतिरिक्त, सर्वथा प्रकार से आहार-पानी खाद्य, स्वाद, चारों ही प्रकार के आहार का भी जीवन पर्यन्त के लिए त्याग करता हूँ । यदि, इस उपसर्ग से बच जाऊँ, तो मुझे ये त्याग सर्वथा प्रकार से नहीं हैं। अर्थात् मैं भोजन वगैरह ले सकूँगा । और, यदि इस उपसर्ग से मैं मुक्त न हो सकूँ तो जिस प्रकार मैंने त्याग किये हैं। उसी तरह से मेरे त्याग हैं । इस प्रकार, सागारी अनशन वत्त को धारण कर के सेठ सुदर्शन, प्रभु-भक्ति में तल्लीन 半半未米米米米米米米米米米米米米米米米 १०५ 於水未於*********米米米米米米米米米米米非法 -१०५ श्रीमदन्त- रुदशान सत्रम्। वर्ग छठा १०६ 小冰主张本法米法式生法求求朱永洋洋崇洋地 हो गये। मूलः-तए णं से मोग्गरपाणि जक्खे तं पलसहस्साणिप्फन्नं अयोमयं मोग्गरं उल्लाले- माणे २ जेणेव सुदंसणे समणोवासए तेणेव उवागच्छइ २ ता नो चेवणं संचाएति सुदंसणं समणोवासयं तेयसा समाभिपडित्तए तएणं से मोग्गरपाणी जक्खे सुदंसणं समणोवासयं सव्वश्रो समंतानो परिघोलेमाणे २ जहे नो चेवणं संचाएइ सुदंसणं समणोवासयं तेयसा समभिपडित्तए,ताहे सुदंसणस्स समणोवासयस्स पुरो सपक्खि सपडिदिसिं ठिच्चा सुदंसणं समणोवासयं प्राणिमिसाए दट्ठीए सुचिरं निरिक्खइ २ त्ता अज्जुणयस्स मालागारस्स सरीरं विप्पजहाइ २ त्ता तं पलसहस्सनिष्फन्नं अयोमयं मोग्गरं गहाय जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए भावार्थः-तत्पश्चात्, वह मुद्गरपाणि यक्ष अपने उस एक हजार पल के भारी लोहे के मुद्गर को उछालता तथा फेंकना हुआ, उन सुदर्शन श्रावक के ऊपर अचानक टूट पड़ा । किन्तु सुदर्शन श्रावक का तेज देख कर उनको कष्ट पहुँचाने में वह समर्थ न हो पाया । तब तो वह मुद्गरपाणि यक्ष, सुदर्शन श्रावक के चहुँ और घूमा । फिर भी 派米设恐水来来来未半 米米米米米来来来来来来半 १०६ ****** वर्ग छठा श्रीमदन्त- हादसाङ्ग सनम् । १०७ 卡卡卡卡洋洋未米卡米米未宋米术中未未洪洋洋洋 उनके तेज के सामने, यक्ष का कुछ भी बल नहीं चला । तब वह यक्ष उन सुदर्शन सेठ के सम्मुख बरावर खड़ा हो कर, उनको अनिमेप दृष्टि से बहुत देर तक देखता रहा। फिर वह यक्ष अर्जुन माली के शरीर से निकल गया और उस मुद्गर को लेकर जिस दिशा से आया था, उसी ओर वह चला गया । मूलः-तए णं से अज्जुणए मालागारे मोग्गरपाणिणा जक्खेणं विप्पजहे समाणे धसत्ति धरणि तलं सि सबं गेहिं निवाडिए। तए णं से सुदंसणे समणोवासए निरुवसग्गामि तिक पडिम पारेइ । तए णं से अज्जुणए मालागारे तो मुहुत्तं तरेणं अासत्त्थे समाणे उठेइ २ ता सुदंसणं समणोवासयं एवं वयासी-तुम्भेणं देवाणुप्पिया के कहिं वा संपथिया तए णं से सुदंसणे समणोवासए अज्जुयणं मालागारं एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया ! अहं सुदंसणे णामं समणोवासए अभिगय जीवाजीवे गुणसिलए चेइए समणं भगवं महा- वारं वंदए संपत्थिए। भावार्थ:-तदनन्तर, वह ' अर्जुन माली, उस यक्ष के पजे से विमुक्त होते ही,धमाक से भूमि पर जा गिरा । उधर, उन सुदर्शन श्रावक ने अपने को उपसर्ग रहित जान कर अपनी प्रतिज्ञा को पाला । कुछ समय के पश्चात्, *********** १०७ , श्रीमदन्त- कृद्दशाह वर्ग छटा सूत्रम्। ई वह 'अर्जुन माली' स्वस्थ्य हो कर खड़ा हुआ। और, सुदर्शन से बोला-'हे देवानुप्रिय ! तुम कौन हो ? और कहॉ जाते हो ? ' सुदर्शन ने कहा- 'मैं सुदर्शन' नामक श्रमणोपासक एक व्यक्ति हूँ। मुझे जीव-अजीव का भी बोध है । गुणशील उद्यान में भगन् महावीर का शुभागमन हुआ है उन्हीं को नमस्कार करने के लिए मैं वहाँ जा रहा हूँ। मूलः-तए णं से अज्जुणए मालागारे सुदंसणं समणोवासयं एवं वयासी-तं इच्छामि एं देवाणुप्पिया! अहम वि तुमए सद्धिं समणं भगवं महावीरं वंदेत्तए जाव पज्जुवासेत्तए अहासुहं देवाणुप्पिया ! तए णं से सुदंसणे समणोवासए अज्जुणएणं मालागारेणं सद्धिं जेणेव गुणसिलए चेइए जेणेव समणे भगवं महावीरे उवागच्छइ २ त्ताअज्जुणएणं माला- गारेणं सद्धिं समणं भगवं महावीरे तिक्खुत्तो जाव पज्जुवासइ। तए णं समणं भगवं महा- वारं सुदंसणस्स समणो वासयस्स अज्जुणयस्स मालागारस्स तीसे य धम्म कहा । सुदं- सणे पडिगए भावार्थः-उसके बाद, उस 'अर्जुन' माली ने सुदर्शन सेठ को इस प्रकार कहा-' हे देवानुप्रिय ! मैं भी 生米米米米米米米米牛米米诺米米米米米米米米米米米米米 米米米米米米米米米 १०० वर्ग छठा श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। तुम्हारे साथ भगवान महावीर स्वामी को वन्दना तथा उनकी सेवा- भक्ति के लिए चलना चाहता हूँ।' उत्तर में सुदर्शन सेठ ने कहा-'ज्यों तुम्हें सुख हो, त्यों करो । ऐसा कह कर, वह सुदर्शन सेठ, ' अर्जुन' माली को साथ ले जिस ओर गुएर्शल ब.ग में भगवान महावीर विराजते थे. वहाँ आया। दोनों ने भगवान् को वन्दना की । और अपने जीवन तथा जन्म को कृत कृत्य किया । भगवान् ने भी उन दोनों को धर्म-कथा सुनाई। सुदर्शन सेठ धर्मोपदेश श्रवण करने के पश्चात् शहर में लौट आये । मूलः-तए णं से अज्जणए मालागारे समणस्स भगवत्रो महावीरस्स अंतिए धम्म सोच्ना निसम्म हट्ट तुट्ठ एवंवयासी-सदहामिणं भंते ! निग्गंथं पावयणं जाव अब्भुट्टेमि । अहासुहं देवाणुप्पिया ! तए णं से अज्जुणए माजागारे उत्तर पुरस्थिमं दिसिभागे अवक- मइ २ ता सयमेव पंच मुट्ठियं लोयं करेइ २ त्ता जाव अणगारे जाए जाव विहरइ । तए णं से अज्जुणए अणगारे जं चेव दिवसं मुंडे जाव पव्वइए तं चेव दिवसं समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ वंदित्ता णमंसित्ता इमं एयारुवं अभिग्गहं उग्गिएहइ-कप्पड़ में जाव- जीवाए छटुं छटेणं अणिविखत्तेणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावमाणस्स विहरित्तए त्ति कटु ************************ २०६ 来来光半朱朱米米米米半生米米米米米米米米 १०३ -- . श्रीमदन्त-१ वर्ग छठा सूत्रम्। ६१० 卡米米米米米米米米米米未44*冰洋洋未 अयमेयारूवं अभिग्गहं ओगेगहइ २ चा जावजीवाए जाव विहरइ । भावार्थ:-परन्तु ' अर्जुन' माली ने जो भगवान् महावीर का उपदेश सुना था, उसका बार-बार उसने मनन किया । तब बड़ा ही प्रसन्न होता हुआ यह भगवान् से बोला-भगवन् ! निर्ग्रन्थों के प्रवचन मैंने सुने । अब उन पर विश्वास ला कर उनके अनुसार व्यवहार करने को भी मैं तैयार हूँ । भगवान् ने फर्माया जैसा भी तुम्हें रुचिकर हा, करो । यह सुनते ही 'अर्जुन' माली ने ईशान्य कोण में जा कर, स्वयमेव पञ्चमुष्टि लोचन किया। और, साधु के महावत को धारण कर यह साधु बन गया । उसी दिन से, 'अर्जुन' अणगार ने, भगवान् को वन्दना कर के, जीवन पर्यन्त, अन्तर-रहित, चले-बेले पारणा करने का अभिग्रह धारण कर लिया। और, यों वे बेले बेले पारणा करते हुए विचरण करने लगे। मूलः-तए णं से अज्जुणए अणगारे छट्टक्खमण पारणयं सि पढ़म पोरिसीए सज्झायं करेइ, जहा गोयमसामी जाव अडइ । तए णं तं अज्जुणयंत्रणगारं रायगिहे णयरे उच्च जाव अडमाणं बहवे इत्थीयो य पुरिसा य डहरा य महल्लाय जुवाणाय एवं वयासी-इमे णं मे पियामारए, भाया मारए, भागणी मारए, भज्जमारए, पुत्तमारए, धूयामारए, सुण्हा- ११० वर्ग छठा श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। 张书长办法本卡卡本书中未天卡夫卡米卡米卡本未末崇未出味 मारए, इमेण मे अण्णयरे सयण संवांध परियणे मारिए ति कडु अप्पेगइया अकोसंति, अप्पे- गइया हीलंति निंदति खिसंति गरिहति तज्जति तालेति। भावार्थः तत्पश्चात् उन ' अर्जुन ' मुनि ने वेले के पारणे के दिन, प्रथम प्रहर में, स्वाध्याय किया। द्वितीय प्रहर में ध्यान किया। और तीसरे प्रहर , गौतम स्वामी की भाँति गौचरी के लिए शहर में इधर-उधर फिरते रहते। उन अर्जुन मुनि को भिक्षा के लिए ब्रमण करते हुए, किसी दिन, राजगृह में अनेकों स्त्री-पुरुपों तथा बालकों और ।। बुवानो ने देखा । उन्हें देखते ही, अनेक प्रकार का वैर-बदला चुकाने की भावना ने उन लोगों के हृदयों में जोर पकडा । उन में से कोई यों कहने लगा, कि यह वही है, जिसने मेरे पिता, माता, बहिन, स्त्री, पुत्र. बेटी और पुत्र-वधु, अादि का अकारण ही सहार कर दिया था । इतना ही नहीं, अनेकों स्वजन-सम्बन्धियों को भी इसने असमय में ही परलोक को पठा दिया है। ऐसा कह कर-- गूलः-तए णं से अज्जुणए अणगारे तेहिं वहूहिं इत्थीहिय पुरिसेहियडहरेहिय महल्ले- हिय जुवाणए हिय अाप्रोसेजमाणे जाव तालेजमाणे तेसिं मणसा वि अपउस्समाणे समं सहइ सम्म खमइ तितिक्खइ अहियासेइ, सम्म सहमाणे खममाणे तितिक्खमाणे अहियास- 米米米米米米半半米米米米米米米米米米米半米米米米米 वग छठा * सूत्रम्। १२२ माणे रायगिहे पयरे उच्चनीयमज्झिमकुलाई अडमाणे जइ भत्तं लभइ तो पाणं ण लभड्, श्रीमदन्त- जइ पाणं तो भत्तं न लभइ, तए णं से अज्जुणए अणगारे अदीणे अविमणे अकलुसे अणा- कृहशाङ्ग इले अविसाई अपरितंत जोगी अडइ २ त्ता रायगिहाश्रो नयरात्रो पडिनिक्खमइ २ ता जे- णेव गुणसिलए चेइए जेणेव समणे भगवं महावीरे जहा गोयमसामी जाव पडिदंसेइ २ त्ता समणेणं भगवया महा वीरेणं अभणुगणाए अमुच्छिए बिलामिव पण्णगभूएणं अप्पाएं तमाहारं आहारे।। भावार्थः-अनेकों ने तो वहीं का वहीं, अपने सौदे का मँहगा मूल्य चुका लेना चाहा। कई लोग, तदनुसार उन पर टूट पड़े। किसी के द्वारा उनका हीलना हुआ। तो किसी ने उनका आक्रोश किया। किसी ने केवल उनकी निन्दा और ताड़ना कर के ही अपने मन को समझा दिया । यों, प्रायः सभी ने अपना-अपना बैर-बदला, किसी-न-किसी भाँति चुका लेने की पूरी-पूरी चेष्टा, उस समय की । शरीर वहीं होने पर भी, आज उनकी भावनाओं में एक दम अन्तर था । थोड़े में, यूं कहा जा सकता है, कि यदि पहले उनका सम्बन्ध जगत् के साथ तिरसठ का रहा होगा, तो आज वही छत्तीस हो गया था। अतः जो भी कुछ परिपह उन्हें उस समय पहुंचाया गया, हँसते- 米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米 ११२ छठा - 来来来来形卡卡未出未来 -श्रीरदार- कृदशाङ्ग हसते उन ने सब कुछ सह लिया। ऐसी परिस्थिति में,आहार मिलता तो पानी नहीं,और-पानी मिलता तो आहार नहीं । इस प्रकार समय पर रूखा-सूखा जैसा भी भोजन मिल जाता, उसे ही अदीन, अविमना, अकलुप, अक्षोभित, अविषादी, तनतनाटे अदि विक्षेप भावों से निरे असङ्ग रह कर लेते हुए, राजगृह से निकल वे गुण-शील बाग़ अ.ते और, वहाँ वे लाया हुआ भोजन भगवान् महावीर को श्रद्धा समेत दिखा, उन की आज्ञा प्राप्त होने पर, गृद्धिपन से रहित जिस प्रकार साँप बिल में सीधा घुसता है ठीक उसी प्रकार राग-द्वेष रहित हो, उस भोजन का सेपन कर अपना संयम निर्वह करते । मूलः-तए णं समणे भगवं महावीरे अण्णया कयाइ रायगिहारो णयरात्रो पडि. निक्खमइ २ ता बहिं जणवयविहारं विहरइ । तए णं से अज्जुणए अणगारे तेणं श्रोरा लेणं विउलेणं पयत्ते णं एग्गाहिएणं महाणुभागेणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावे माणे वह पुण्णे छम्मासे सामरणपरियागं पाउणइ अद्धमासियाए संलहणाए अप्पाणं झूसेइ, तीस भताई अणसणाए छेदेइ २ त्ता जस्सट्टाए कीरई जाव सिद्धे । भावार्थ:-फिर, किसी समय जब श्रमण भगवान् महावीर, राजगृह से विहार कर, जनपद देश में विचरण कर धर्मोपदेश कर रहे थे, उसी अवधि में उन महानुभागी अर्जुन मुनि ने, प्रयत्न-पूर्वक ग्रहण किये हुए बेल-बेले के सूत्रम् । - *幸未牛未未未未未未未未未洋洋洋洋休未休计洋於 ११३ श्रीमदत्त- दशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग छठा ***本****本法主杀式:求求法*本法十米本协米 पारणे के उस प्रधान तप से, अपनी आत्मा को निजानन्द में रमाते हुए, पूरे-पूरे छः महीने का चारित्र पाला । तथा अपने अन्तिम समय के पूरे पन्द्रह दिनों का सन्थारा कर, इन छः महीनों ही में, अर्जुन मुनि ने अपने सम्पूर्ण घनघाती कर्मों को क्षय कर डाला और मोक्ष प्राप्त किया । अर्थात् वे सिद्ध हो गये । मूल:--उक्खेत्रो चउत्थस्स अज्झयणस्स । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समए णं रायगिहे णयरे, गुण सिलए चेइए, तत्थणं सेणिए राया, कासवे णामं गाहावई परि- वसइ जहा मंकाई, सोलस्स वासा परियारो, विपुले सिद्धे । एवं खेमए विगाहावई,णवरं कागंदी णयरी, सोलस्स, वासा परियारो, विपुले पव्वए सिद्धे । एवं, धितिहरे विगाहा- वई, कागंदीए णयरीए सोलस वासा परियाओ जाव विपुले सिद्धे । एवं केलासे विगाहावई, णवरं सागेए णयरे, वारस वासाइं परियाो, विपुले सिद्धे । एवं हरिचंदणे वि गाहावई, सागेए णयरे, बारसवासा परियारो विपुले सिद्धे। एवं वारवत्तए वि गाहावई, एवरं रायगिहे णयरे, बारसवासा परियाो विपुले सिद्धे । एवं सुदंसणेवि गाहावई, णवरं वाणीयगामे णयरे दुइपलासए चेइए, पंचवासा परियाो, विपुले सिद्धे । एवं पुरणभद्दे वि गाहावइ वाणियगामे ११४ वर्ग छठा पयरे पंचवासा परियारो विपुले सिद्धे । एवं सुमणभद्दे वि गाहावई सावत्थीए णयरीए बहु- वासा परियारो विपुले सिद्धे । एवं सुपइटे विगाहावई सावत्थीए णयरीए सत्तावीसं वासा परियानो विपुले सिद्धे। एवं मेहे विगाहावई रायगिहे णयरे बहूइंवासाइं परियायो विपुले सिद्धे। भावार्थः-जम्बू स्वामी ने श्री सुधर्म स्वामी से कहा-भगवन् छठे वर्ग के. तृतीय अध्याय में, भगवान् महावीर ने, जो फर्माया था, वह आप के श्री मुख से मैंने श्रवण किया । अब इसी छठे वर्ग के, चौथे अध्याय, में, भग- वान् ने जो भी कुछ फर्माया है । उसे हृदयङ्गम करने के लिए मेरा मन बड़ा ही छटपटा रहा है । अतः उसी का विवेचन अब कर मेरा मनोरथ पूरा कीजिए । हे जम्बू ! सुनो । उस समय जो राजगृह नगरी थी, उसके पास गुणशील नामक एक बाग सुशोभित था उस समय, वहाँ श्रेणिक नामक एक राजा राज करते थे । उन दिनों वहाँ काश्यप नामक एक गाथापति रहता था। जिस प्रकार मङ्काई नामक गाथापति ने दीक्षा धारण की, ठीक वैसे ही काश्यप गाथापति ने समय पर वैराग्य पा, दीक्षा धारण की । सोलह वर्ष का चारित्र-पालन उन्होंने किया । और, अन्तिम समय में, विपुलगिरि पर सन्थारा ले अपने सारे कर्मों को नष्ट किया । पश्चात् वे मोक्ष में पधार गये । इसी तरह पाँचवें अध्याय में उल्लेख है, कि काकन्दी नगरी के निवासी, क्षमक गाथापति ने भी दीक्षा लेकर सोलह वर्ष का चारित्र-पालन किया । तथा अन्तिम समय श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग 米米米米米米米米米米米米米米米米米 सूत्रम्। ***#*#*#米米米米米米苏拉 ****未*# १२५ वर्ग श्रीमदत्त- कृदशन सूत्रम्। छठा १६६ ********** *** में वियुल गिरि पर सन्थारा ले वे भी मुक्ति में गये । आगे छटे अध्याय में उसी काकन्दी के निवासी, धृति धर नामक गाथापति के सम्बन्ध में भी ठीक ऐपा ही कहा गया है । तब सातवें और आठवें अध्यायों में यह उल्लेख -पाया जाता है कि-साकेत नगर-निवासी कैलाश और हरिचन्दन नामक गाथापतियों ने समय पर भगवान् महा- वीर का उपदेश सुन दीक्षा को अङ्गीकार किया । बारह वर्षों तक चरित्र का पालन कर, अपने अन्तिम समय उसी विपुलगिरि पर सन्थारा ले मोक्ष-धाम को सिधार गये । आगे नौवें अध्याय में भी राजगृह के निवासी बारत्तक नामक गाथापति के सम्बन्ध में ठीक इसी प्रकार का वर्णन पाया जाता है । उसके दीक्षित होने, चारित्र- पालन करने तथा सन्थारा ले मोक्ष में जाने, आदि का वर्णन ठीक आठवें अध्याय ही के समान है । इसी प्रकार दशवें और ग्यारहवें अध्यायों में उल्लेख है, कि दुतिपलास उद्यान से सुशोभित वाणियाँ गाँव के निवासी सुदर्शन और पूर्णभद्र गाथापतियों ने भी दीक्षा ले पाँच वर्ष का चारित्र पालन किया । तथा अपने अन्तिम समय में उसी वियुल गिरि पर सन्थारा ले वे भी मोक्ष धाम को गये । आगे बारहवें तथा तेरहवें अध्यायों में वर्णन किया गया कि श्रावस्ति नगरी के निवासी क्रमशः सुमन भद्र और सुप्रतिष्ट नामक गाथापतियों ने दीक्षा धारण की । सुमन- भद्र मुनि ने अनेक वर्षों तक चारित्र पाला । और सुप्रतिष्ट मुनि ने सत्ताईस वर्ष तक चारित्र पाला । और, तब ये दोनों भी अपने अपने अन्तिम समय में, विपुलगिरि पर सन्थारा ले, मुक्ति में गये । आगे के चौदहवें अध्याय राजगृह के निवासी मेघ नामक गाथापति का उल्लेख है । उन्हों ने भी समय पाकर, दीक्षा धारण की । अनेकों वो 中中中中中出北半半未未未未未未米米米未米米未未米米米米 में वर्ग छठा । श्रीमदत्त- कृादशाह सूत्रम् । तक वे भी चारित्र का पालन करते रहे । और, अन्तिम समय में विपुलगिरि पर सन्थारा उन्हों ने लिया । तथा मुक्त-धाम को गये । यो हे जम्बू ! छठे वर्ग के चौदह अध्यायों का, थोड़े में, सार-रूप कथन यहाँ कह सुनाया। मूलः-उक्खेत्रो पन्नरमस्स अज्झयणस्स एवं वयासी-एवं खलु जंबू तेणं कालेणं तेणं समएणं पोलासपुरे नयरे, सिरीवणे उज्जाणे तत्थणं पोलासपुरेनयरे विजये नामं राया होत्था । तस्सणं विजयस्स रन्नो सिरीनामं देवी होत्था, वरणश्रो । तस्सणं विजयस्स रन्नो पुत्ते सिरीए देवीए अत्तए अइमुत्ते नाम कुमारे होत्था, सुकुमाले । तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे जाव सिरीवणे विहरइ। तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगव श्रो महावीररस जेटे अंतेवासी इंदभूई जहा पण्णत्तीए जाव पोलासपुरे नयरे उच्च जाव अडड्। भावार्थः- जम्बूस्वामी ने सुधर्मस्वामी से कहा- भगवन् ! छठे वर्ग के चौदह अध्यायो में, जो वर्णन किया गया उसका श्रवण तथा मनन मैंने किया । अव शगले अध्याय में, जो भी कुछ भगवान् ने श्रीमुख से वर्णन किया है, उसे सुनने की कृपा करें । हे जम्बू ! सुन । उसी काल में एक पोलासपुर नामक नगर था । जो श्रीवन नामक एक परम मनोहर उद्यान से सुशोभित था । उन दिनों वहाँ विजय नामक राजा राजासीन थे। उसकी रानी का **米卡米卡米卡米卡米卡宋宋未米米米中半光味千主张 ***於恐济半半米州来半夫共张张卡 ११७ श्रीमदत- वर्ग कुहश छठा सूत्रम् २१८ नाम श्री देवी था। उन विजय राजा के पुत्र और श्री देवी का अङ्गज अइयुत्त-एवन्ता-नामक कुमार था । जो बड़ा ही सुकुमार तथा सुशील था । एक दिन भगवान् महावीर भव्य प्राणियों को धर्म का बोध करते-कराते हुए, उसी पोलासपुर नगर के बाहर ' श्रीवन' नामक बाग में पधार गए । भगवान् की भव-रोग-नाशिनी आज्ञा को प्राप्त कर उनके सबसे बड़े शिष्य, इन्द्रभूति. जिस प्रकार भगवतीजी सूत्र में वर्णन है, वैसे ही यहाँ पोलासपुर में, धनी तथा निर्धनी सभी घरों में भेदा-भेद के भावों का जरा भी विचार अपने हृदय में न रखते हुए भिक्षा के लिये जाते मूलः-इमं चणं अइमुत्ते कुमारे यहाए जाव विभासिए बहूहिं दारए य दारियाहि य डिभए हि य डिभिया हि य कुमारए हि य कुमारिया हि य साद्धिं संपरिबुडे स या गिहारो पडिनिक्खमइ २ त्ता जेणेव इंदट्टाणे तेणेव उवागए, तेहिं बहूहिं दारएहि य दारियाहि य डिभएहि य डिभियाहि य कुमारएहि य कुमारियाहि य सद्धिं संपरिबुडे अभिरममाणे २ विहरइ । तए णं भगवं गोयमे पोलासपुरे नगरे उच्चनीयं जाव अडमाणे इंदट्ठाणस्स अदूर सामंते णं वीईवयइ । तए णं से अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयमं अदूर सामंतेणं वीई वयमाणं पासइ २ त्ता जेणेव भगवं गोयमे तेणेव उवागए उवागइ त्ता भगवं गोयमं एवं वयासी-के ११८ वर्ग छठा श्रीमदन्त- कृशान मूत्रम् । णं भंते ! तुम्भे ? किं वा अडह । भावार्थः एक दिन उसी समय अचानक अइत्त कुमार भी स्नान कर वस्त्रालङ्कारों से सुसज्जित वन, अनेक दारक-दारिका, डिम्भक-डिम्भिका. और कुमार एवं कुमारिकाओं के साथ, घर से निकल कर जहाँ इन्द्रस्थान अर्थात् खेलने या क्रीड़ा करने की जगह थी, उधर आ निकले। और उन सभी के साथ वे भी वहाँ खेलने लगे । भग- वान के सब से बड़े शिष्य श्री इन्द्रभूति ( गौतम स्वामी ) जो पोलासपुर नगर में सभी धनी निर्धनियों के घर में भिक्षार्थ आये हुए थे, उस दिन उस क्रीडा-भूमि के निकट हो कर प्रस्थान कर रहे थे । उन दिव्य तपोधारी एवं तेजस्वी गौतम स्वामी को, अइमुत्त कुमार ने अपने क्रीड़ा-स्थल के विल कुल समीप ही से निकलते हुए देखा। खन को परे रख, वह उनके पास आया और उनसे उनका परिचय पूछने लगा । एवं उनके, यों इधर-उधर घर-घर फिरने का कारण जानना चाहा । मूलः-तए णं भगवं गोयमे अइमुत्तं कुमारं एवं वयासी-अम्हेणं देवाणुप्पिया समणा णिग्गंथा ईरिया समिया जाव वंभयारी उच्चनीय जाव अडामो। तएणं अतिमुत्ते कुमारे भगवं गोयमे एवं वयासी-ए हणं भंते ! तुम्भे जा णं अहं तुम्भं भिक्खं दवावेमीति कटु 米********於*************朱扩张 米米米米米米米米卡米平米米米米米米米米米形出 ११९ ११६ वर्ग छठा रद्दशाह सूत्रम्। १२० ***沙牛津法法术於本許未朱汉诺未还法朱小羊漆未干性* भगवं गोयमं अंगुलीए गेण्हइ २ ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागये। तए णं सा सिरी- श्रीमदन्त- देवी भगवं गोयमं एज्जमाणं पासइ २ त्ता हट्ट तुट्ठ भासणाश्रो अमुढेइ २ ता जेणेव भगवं गोयमे तेणेव उवागया,भगवं गोयमं तिक्खुत्तोप्रायाहिणं पयाहिणं करेइ २त्ता वंदइ नमंसइ वंदित्ता नमंसित्ता विउलेणं असणपाण खादिम सादिमेणं पडिलाभेइ जाव पडिविसजेइ। भावार्थ:-इस पर गौतमस्वामी ने अइमुत्त कुमार को उत्तर में इस प्रकार कहा-हम पाँच महाव्रत, पाँच समिति अ.दि और नौ नियम-पूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले, श्रमण-निर्ग्रन्थ हैं । भिक्षार्थ इधर-उधर घरों में हम जा रहे हैं। स्वामीजी की इन बातों को श्रवण कर अइमुत्तकुमार बोला भगवन् ! आप भिक्षा के लिए फिर रहे हैं आएव चलिये आप को मैं मिक्षा दिलाता हूँ। ऐसा कह कर कुमार ने स्वामीजी की अँगुलियें पकड़ ली । और, उ हैं अपने घर लाया । कुमार की माता श्रीदेवी ने श्रीगौतम स्वामी को अपने घर अतिथि के रूप में आये हुए देख कर, बड़ी प्रसन्नता प्रकट की तथा विधि-पूर्वक बन्दना कर, उच्च भावों के साथ, अति ही निर्मल अन्तःकरण से, अपन, पान, खाद्य और स्वाइ यह चारों ही प्रकार का आहार उन्हें बहराया । 张张张张张张张来来来来来来来来来来水米米米米米米 १२० वर्ग- छठा मूलः-तए णं से अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयम एवं वयासी-कहिणं भंते ! तुम्भे परिव- सह तए णं भगवं गोयमे अइमुत्तं कुमारं एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया! मम धम्मा- यरीए धम्मोवएसए भगवं महावीरे आइगरे जाव संपाउकामे इहेव पोलासपुरस्स नयररस वहिया सिरिवणे उज्जाणे अहा पडिग्गहं उग्गहं उग्गिरिहत्ता संजमेणं जाव अप्पाणं भावे माणे विहरइ, तत्थणं अम्हे परिवसामो । तए णं से अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयम एवं. वयासी-गच्छामि णं भंते ! अहं तुम्भेहिं सद्धिं समणं भगवं मनवारं पायवंदए । अहासुहं देवाणुप्पिया ! भाव.र्थः-तत्पश्चात्, उन अइमुत्त कुमार ने गौतमत्वामी को यूँ निवेदन किया कि भगवन् ! आप कहां निवास करते हैं ? उत्तर में गौतम स्वामी ने कुमार से कहा-हे देवानुप्रिय ! धर्म का फिर से उत्थान करने वाले और मोक्षाभिलाषी, मेरे धर्माचार्य एवं धर्मोपदेशक भगवान महावीर इसी पोलासपुर नगर के वाहर स्थित श्रीवन' नामक उद्यान में, सयम और तपस्या से आराधना करते हुए आजकल विराजते हैं। वहाँ, मैं भी, उनकी सेवामें रह कर काल-यापन कर रहा हूँ। यह सुन कर कुमार बोला-भगवन् ! मैं भी आपके साथ, उन परम प्रभु के श्री दात- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। १२१ १२२ 半半半丰丰卡卡卡卡卡卡卡未字未中未未米未年洋洲 hos त श्रीमदन्तः छद्दशाङ्ग वर्ग छठा सूत्रम्। १२२ 本法未米卡米卡米卡法米法牛牛牛牛未未牛米水 दर्शनार्थ अऊँ, तो क्या हानि है ? स्वामीजी ने फर्माया-कोई हानि नहीं । जिस प्रकार तुम्हें सुख हो, निःशङ्क- भाव से तुम वैसा ही कर सकते हो। मूलः-तए णं से अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयमेणं सद्धिं जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ २ ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो प्रायाहिणं पयाहिणं करेइ २ त्ता बंदइ जाव पज्जुवासइ । तए णं भगवं गोयले जेणेव समणे भगवं महावीरं तेणेव उवागए जाव पडिदंसेइ २ ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणे विहरइ । तएणं समणे भगवं महा- वीरं अइमुत्तस्स कुमारस्स तीसेय धम्मकहा । तए णं से अइमुत्ते कुमारे समणस्त भगवरो महावीरस्स अंतिए धम्मं सोचा सिसम्म हट्टतुट्ठ जंणवरं देवाणुप्पिया ! अम्मापियरो अापुर च्छामि तए णं अहं देवाणुप्यियाणं अंतिए जाव पबयामि । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंध करेह । भावार्थः तब इन अइमुत्त कुमारने, गौतम स्वामी के साथ, भगवान् महावीर के पास, आकर उन्हें विधि- विधान के साथ वन्दना की । इतना ही कर के कुमार चुप न रहा । वह उनकी सेवा में भी संलग्न हुआ । इधर १२२ वर्ग छठा गौतम स्वामी ने भी भगवान् के पास आ उन्हें आहार दिखाया । फिर भोजन ग्रहण कर लेने पर, संयम और तपस्या में, अपनी आत्मा को संलग्न किया । उधर भगवान् महावीर अइमुत्त कुमार को धर्मोपदेश देने लगे। धर्मोपदेश श्रवण कर. कुमार का हृदय बॉसों उछल पड़ा । उसे हृदयङ्गम कर वह भगवान् से यूँ बोला-भगवन् मैं माता-पिता से पूछ कर आऊँगा और आपसे दीक्षा ग्रहण करूँगा । भगवान् ने फमाया-हे देवानुप्रिय ! जिस प्रकार तुम्हें सुख प्राप्त हो, उस प्रकार करो ! परन्तु किसी भी शुभ काम में, किसी भी प्रकार का विलम्ब करना ठीक नहीं। मूलः-तए णं से अइमुत्ते कुमारे जेणेव अम्मापियरो तेणेव उवागए जाव पबत्तित्तए अइमुत्तं कुमारं अम्मापियरो एवं क्यासी-बाले सि ताव तुमं पुत्ता !असंबुद्धे सि तुमं पुत्ता! किं नं तुम जाणासिं धम्मं ? तए णं से अइमुत्ते कुमारे अम्मापियरो एवं वयासी-एवं खलु अहं अम्मायाभो ! जं चेव जाणामि तं चेव न याणामि जं चेव न याणामि तं चेव जाणा- मि । तए णं तं अइमुत्तं कुमारं अम्मापियरो एवं वयासी-कहं नं तुमं पुत्ता ! जं चेव जाणासि जाव तं चेव जाणासि ? श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। 未 未央未来共 夫卡必丰兴未来米卡开出 १२३ १२३ バ共共共共共、英米米未共共 वर्ग श्रीमदन्त- कृदशाक सूत्रम्। । 米米米米米中式 १२५ भावार्थ:-तदनन्तर, कुमार अइमुत्त अपने माता-पिता के पास आकर बोला-पूज्य माता-पिताजी ! मैंने अाज प्रभु का साक्षात्कार किया और उन्होंने मुझे सदुपदेश दिया, जिससे मेरा हृदय संसार से विरक्त हो चुका है। कृपः- कर, अब आप मुझे आज्ञा प्रदान करें । आप की आज्ञा प्राप्त होने पर मैं दीक्षा ग्रहण करूंगा । कुमार की बत सुन कर माता-पिता बोले-पुत्र ! तुम अभी बालक हो, अतत्वज्ञ हो। धर्म के मर्म को तुम अभी क्या जानते हो ? इस पर कुमार बोला-मेरे परम पूज्य माताजी एवं पिता श्री, जिस को मैं जानता हूँ । उसी को मैं नहीं जानता। और जिसे मैं नहीं जानता हूँ, उसी को मैं जानता हूँ । कुमार की इस प्रकार की पेचीदा बातों को सुनकर माता- पिता चकित हो गये । वे सोचने लगे कि ऐसी छोटी अवस्था का कुमार, यह बोल क्या रहा है ! कुमार से माता- पिता बोले-पुत्र ! तुमने यह कौनसी बात कही ? हम तो इस में कुछ भी समझ न पाये । बेटा ! अभी ! और, ऐसी ऐसी पेचीदा बातें !!! मूलः-तए णं से अइमुत्ते कुमारे अम्मापियरो एवं वयासी-जाणामि अहं अग्म- ताओ ! जहा जाएणं अवस्समरियव्वं न जाणामि अहं अम्मताभो ! काहेवा कहिं वा कहं वा केचिरेण वा ? न जाणामि अहं अम्मताओ! केहिं कम्माययणेहिं जीवा नेरड्य तिरिक्ख जोणि मणुस्सदेवेसु उव वति, जाणामि णं अम्मताश्रो ! जहा सएहिं कम्मा- 牛牛牛牛牛牛牛牛牛 १२३ श्रीमदन्त- रूदशाह सूत्रम्। वर्ग छठा १२५ 法米法恐羊卡卡卡卡米卡未未未法兰关未羊朱未辛未孝未必兴 याणेहिं जीवा नेरइय जाव उववज्जति, एवं खलु अहं अम्मताओ! चेव जाणामि तं चेव न याणामि, जं चेव न याणामि तं चेव जाणामि, इच्छामिणं अम्मताभो ! तुम्भेहिं अभ- गुणणाए जाव पव्वइत्तए । तए णं तं अइमुत्तं कुमारं अम्मापियरो जाहे नो संचाएति वहूहिं अाधवणेहिं तं इच्छामो ते जाया! एग दिवसमवि राज सिरिंपासेत्तए तए णं से अइसुत्ते कुमारे अम्मा पिउवयणमणुयत्तमाणे तुसिणीए संचिट्ठइ, अभिसेश्रो जहा महाबलस्स निक्ख- मेणं जाव सामाइय माइयाई अहिज्जइ बहूई वासाइं सामण्णपरियागं गुणरयणं जाव विपुले सिद्धे। भावार्थः-माता-पिता के पूछने पर, कुमारने उन्हें यूँ कहा-माता-पिताओ ! मैं जानता हूँ, कि जो जन्मा है, वह एक न एक दिन अवश्य मरेगा; परन्तु यह मैं नहीं जानता, कि किस समय, कहाँ, कैसे, और कितने समय के पश्चात् वह मरेगा ! पुनः मेरे प्राण-पूज्य माता-पिताओ ! मैं यह नहीं जानता, कि किन कर्मों के द्वारा जीव नर्क, तिर्यञ्च,मनुष्य और देव-गति में जन्म धारण कहता है,पर हाँ,इतना तो मैं अवश्य ही जानता हूँ,कि जैसे भी जिस के कर्म होते हैं उसी के अनुसार, नर्कादि में जा कर उत्पन्न होते हैं। अतः अब तो आप मेरी बात को अवश्य ही समझ गये 半米米米米米米米半半半半米米米米米米米米孝米米米米米 १२५ वर्ग श्रीमदन्त- कशाङ्ग * सूत्रम्। १२६ होंगे । मैंने इसी लिए कहा था कि-जो मैं जानता हूँ, उसको मैं नहीं जानता और जिसे मैं नहीं जानता हूँ, उसे मैं जानता हूँ । पूजनीय ! अब तो बहुत हो गई । आपकी आज्ञा प्राप्त होने पर मेरी तो अब दीक्षा ग्रहण करने ही प्रपल इच्छा है । इस पर फिर भी उस के माता-पिताने उसे अनेकों प्रकार के अनुकूल तथा प्रतिकूल वचनों समझाने की भरपूर चेष्टा की । परन्तु भगवान् के क्षणभर के सत्सङ्ग मात्र से, कुमार के शुभ कर्मों का उदय आज हो आया था । अतः वह तो टस से मस भी न हुआ। अब उस का निश्चय अटल था। तब तो उसके माता-पिता ने उस से, आन्त में, यू कहा-पुत्र ! कम से कम यह बात तो मानलो, कि एक दिन का राज ही करते हुए हम तुम्हें अपनी पाखों देख ले । कुमार ने अपनी मौन के द्वारा अपने माता-पिता के प्रस्ताव का अनुमोदन और सम- र्थन किया । अपने कुमार के इन भावों को देख, उनका कण्ठ गद्गद् हो गया । और शरीर रोमाञ्चित । फिर उन्हों कुमार का विधान के साथ राज्याभिषेक किया । कुमार ने राज्य की बागडोर को अपने हाथ में ले कर, सर्व प्रथन अपने दीक्षोत्सव ही की आज्ञा दी । तब महावल की भांति कुमार ने भी दीक्षा धारण कर, सामायिक से ले कर ग्यारह अङ्गों का सम्पूर्ण मथन कर डाला । उन्हों ने गुण रत्न संवत्सर, आदि तपस्याएँ भी खूब ही की। अनेकों वर्षों तक चारित्र-पालन किया । अन्तिम समय में, विपुलगिरि पर सन्थारा ले, मोक्ष-धाम में वे जा विराजे । मूलः-उक्खेवो सोलमस्स अज्झयणस्स । एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समए ने 养生光生生毕法学法法法法出法法学法守法 来米米米米米米米米米米米米米米米 १२६ 7 - वर्ग छठा *** श्रीमदन्त- कृहशाज एं वाणारसीए णयरीए काम महावणे चेइए, तत्थणं वाणारसीइ अलक्खे णामं राया होत्था। तेणं कालेणं तेणं समए णं समणे भगवं महावीरे जाव विहरइ परिसा निग्गया तए णं अल- क्खे राया इमीसे कहाए लद्धटे समाणे हट्ट तु? जहा कूणिए जाव पज्जुवासइ, धम्मकहा। तए णं से अलक्खे राया समणस्स भगवत्रो महावीरस्स अंतिए जहा उदायणेतहाणिक्खं- ते, णवरं जेट्ठ पुत्तं रज्जे अहिसिंचइ, एकारस अंगा, बहूवासा परियारो जाव विपुले सिद्ध एवं जंबू ! समणेणं जाव छठ्ठमस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते । भावार्थः-श्री जम्बू स्वामी ने श्री सुधर्म स्वामी से कहा-भगवन् ! छटे वर्ग के पन्द्रहवें अध्याय में, जो वर्णन था, वह आपने कृपा कर के मुझे कह सुनाया। उसका ध्यान, धारणा और निधि-ध्यासन-पूर्वक मैंने मनन भी किया आगे इसी वर्ग के सोलहवें अध्याय में वर्णन है, उसे जानने की मेरी उदग्र इच्छा है । अस्तुः । उसी को फर्माने की अनुकम्पा आप अब मुझ पर दिखाइए । जम्बू ! सुनो ? भगवान् महावीर के समय में काम-महावन नामक बाग से सुशोभित एक वाणारसी नगरी थी। उस समय वहाँ 'अलक्ष' नामक एक राजा अपने राज का सञ्चालन करता था । उसी अवधि में भगवान् महावीर छोटे-बड़े सभी गावों में धर्मोपदेश देते हुए वहाँ पधारे । भगवान् की पधरा- सूत्रम्। १२७ 来来来来来来来来来来来洲张 १२७ *於************未士未 श्रीमदन्त- दशाङ्ग मूत्रम् वर्ग छठा १२८ बनी उसी बाग में हुई । सारे नगर में, बिजली की भाँति, आपके शुभागमन का सुसंवाद पहुँच गया । अवतो आप के दर्शन करने तथा व्याख्यान श्रवण करने के लिए जनता नगरी की दशों दिशाओं से सिमिट सिमिट कर आने लगी। प्रभु के पदार्पण का यह शुभ सन्देश राजा अलक्ष को भी एक दिन मिला । सन्देश के श्रवण करते ही, राजा बड़ा ही प्रसन्न हुआ । और कौणिक की तरह बड़े ठाट-पाट से, एक दिन प्रभु की सेवा में आ उपस्थित हुशा । भगवान् ने उसे भी धर्मोपदेश सुनाया । उपदेश श्रवण कर राजा अलक्ष ने भगवान् महावीर के पास उदाई राजा की तरह, दीक्षा धारण करली । अन्तर केवल यही है, कि इन्हों ने अपने बड़े पुत्र के सिर-कन्धों राज का सारा भार रक्खा । अलक्ष मुनि ने ग्यारह अङ्ग तक का ज्ञानाभ्यास किया तदनन्तर, अनेकों वर्षों तक चारित्र-पालन कर अन्तिम समय में विपुलगिरि पर सन्थारा ले, मुक्ति-धाम को वे सिधारे । जम्बू ! अन्तगढ़ के छटे वर्ग में इस प्रकार भगवान् महावीर ने वर्णन किया है। * इति षष्टमो वर्ग #半米卡米卡米卡米卡卡卡 । १२८ स सप्तमो-वर्ग: वर्ग सातवा श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। मूलः-जणं भंते ! सत्तमस्स वग्गस्स उक्खेव ओ जाव तेरस अज्झयणा पण्णत्ता। तंजहा-नंदा तह नंदवई नंदोत्तर नंदसेणिया चेव । मरुया सुमरुया महमरुया मरुद्देवा य अट्ठमा ॥ १॥ भदाय सुभदाय सुजाया सुमणातिया। भूयदिन्नाय बोद्धव्वा सेणिय भजाण नामाइं। जइणं भंते ! तेरस अज्झयणा पन्नता पदमस्त णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्वे ' एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णयरे गुण सिलए चेइए सेणिए राया,वरणश्रो । तस्सणं सेणियस्स रगणो नंदा नामं देवी होत्था वएणो । सामी समोसड़े परिसा निग्गया । तए णं सा नंदा देवी इमीसे कहाए लट्ठा समाणा जाव हट्ट तुट्ठा कोडुविय पुरिसे सदावइ २ ता जाणं जहा पउमावइ जाव एकारस्स अंगाई अहिजित्ता वीसं वासाइं परियारो जाव सिद्धा । एवं तेरस वि देवीश्रो णंदागमेण 严米米米米米米米米米米米米米米米米米 १.६ १२६ * श्रीमदत सदशाह 卡米共长张** वग सातवाँ सूत्रम्। १३० ऐयवानो णिक्खेत्री। भावार्थ:-श्री जम्बू स्वामी ने श्री सुधर्म स्वामी से कहा-भगवन् ! छठे वर्ग में, जो वर्णन था, वह मैंने सुना। आगे सातवें वर्ग में, जो वर्णन है, अब उसी को कृपा कर के फर्मावें । जम्बू ! सुनों । सातवें वर्ग में कुल तेरह अध्याय हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं:-(१) नन्दा, (२) नन्दमति, (३) नन्दोत्तरा, (४) नन्द सेना, (५) महया, (६) सुमरुत्ता, (७) महा मरुत्ता (5) मरुदेवी, (६) भद्र, १०) सुभद्रा, (११) सुजाता, (१२) सुमति, और (१३) भूत दिन्ना । यह तेरह ही, राजा श्रेणिक की रानियाँ हैं । इन तेरह रानियों में से एक-एक रानी का एक-एक अध्याय में, वर्णन है। यों. उनके नाम से ये तेरह अध्याय हैं। भगवन् ! सातवें वर्ग के, इन तेरह अध्यायों से, प्रथम के अध्याय में किस विषय का वर्णन है ? जम्बू ! सुनो ! भगवान् महावीर की मौजूदगी के समय राजगृह नामक एक जगरी, गुणशील नामक एक बारा से सुशोभित थी। उस समय वहां राजा श्रेणिक का शासन था । उस श्रेणिक राजा के नन्दा नाम की एक महारानी थी। उसी अर्से में, भगवान् महावीर धर्मापदेश करते- करते एक बार वहाँ पधारे । जनता भगवान के पदार्पण की सूचना पाते ही, दर्शनार्थ दौड़ पड़ी। राजा श्रेणिक की महारानी नन्दा को जब यह सूचना मिली, तो वह भी अति ही प्रसन्न हुई । उसने अपने किसी एक कौटाम्बक पुरुष को बुला कर रथ तैयार करवा मँगाया । तब रथ पर सवार हो वह भी भगवान् के दर्शनार्थ गई । भगवान् का सदुपदेश श्रवण कर उसे संसार के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई। और वैराग्य उसके हृदय में जोर पकड़ गया। १३० श्रीमदत्त- दशाह सूत्रम्। वर्ग सातवा बस, फिर क्या था । उसने राजा श्रेणिक की आज्ञा प्राप्त कर, पद्मावती रानी के समान दीक्षा धारण करली । मारह अङ्गों तक उसने शास्त्रों का अध्ययन किया। और, बीस वर्ष चारित्र-पालन । अन्तिम समय में सन्थारा ले, वे मुक्ति में गई । इसी प्रकार, अवशेष रानियों का वर्णन भी समझना चाहिए । सभी रानियाँ समय-समय पर दीक्षा धारण कर, अन्त में मोक्ष में पहुँची । एक-एक रानी का एक-एक अध्याय, यों पूरे तेरह अध्यायों का वर्णन पाठक-वृन्द समझे। ॐ इति सप्तमो वर्ग १३१ 米米米未来未未未未未未未以本书光半年未必 米米米半永共未来恐未来未来未必来长张卡出 १३१ अष्टमो-वर्ग वर्ग श्रीमदन्त- छद्दशाङ्ग सूत्रम्। पाठवा १३२ 来米米米米米米水味洋洋羊法生米米米米不朱泳崇本地 मूलः-जइणं मंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगड़ दसाणं सत्तमस्त वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते । अट्ठमस्स णं भंते ! वग्गस्स अंतगड़दसाणं समणेणं जाव संप- तेणं के अटे परणते ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगड़ दसाणं अट्ठमस्स वगस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा-काली सुकाली महाकाली कराहा सुकराहा महाकरहा वीरकण्हा य बोद्धव्या रामकराहा तहेव य॥ १॥ पिउसेणकराहा नवमी दसमी महासेण कराहाय । जइणं भंते ! अट्ठमस्स वग्गस दस अज्झयणा पण्णत्ता, पढ़मस्स भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अद्दे पराणते ? भावार्थः श्री जम्बूस्वामी ने सुधर्मस्वामी से कहा-भगवन् ! श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी, जो मुक्ति में पधार गये, उन पुरुषों ने आठवें अङ्ग श्री अन्तगढ़ सूत्र के सातवें वर्ग में जो वर्णन फर्माया, वह आप से मैंने सुना । परन्तु 米米米米米米米米卡米卡米未未米米米卡米卡米卡米米米米米 १३२ * वर्ग पाठवा श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। भगवन् ! अन्तगढ़ के आठवें वर्ग में भगवान् ने क्या फर्माया है, कृपा कर उसे फर्मावें । जम्बू ! सुनो। आठवें अङ्ग श्री अन्तगढ-मूत्र के आठवें वर्ग में कुल इस अध्याय । वे इस प्रकार हैं:--(१) काली, (२) सुकाली, (३) महा- काली, (४) कृष्णा, (५) सुकृष्णा, (६) महाकृष्णा, (७) परिकृष्णा, (८) राम कृष्णा, (6) पितृसेन कृष्णा. और. (१०) महासेन कृष्णा । यों दसों ही रानियों के नाम से दस अध्याय हैं । भगवन् ! इन दस अध्यायों में से प्रथम अध्याय में क्या वर्णन है ? मूलः-एवं खलु जंबू ! तेणं काले णं तेणं समएणं चंपा णामं नयरी होत्था,पुण्णभद्दे चेइए, तत्थणं चंपाए नयरीए कोणिए राया, वरणश्रो । तत्थणं चंपाए एयरीए सेणियस्स रगणो भज्जा, कोणियस्स रगणो चुल्लमाउया काली नामं देवी होत्था, वगणो । जहा नंदा जाव सामइयमाझ्याई एक्कारस्स अंगाई अहिज्जइ, बहूहिं चउत्थ छठ्ठट्ठमेहिं जाय अप्पाणं भावमाणे विहरइ । भावार्थ:-हे जम्बू! सुनो । भगवान् महावीर के विद्यमान समय में, पूर्ण-भद्र नामक, मनोहर उद्यान से सुशो- भित, 'चम्पा' नामक एक परम सुन्दर नगरी थी । वहाँ उस समय कौणिक राजा राज कर रहा था । उसी के राज-घराने में राजा श्रेणिक की तो पत्नी, और राजा कौणिक की छोटी माता 'काली' नामक एक रानी थी। १३३ १३३ 兴y 法米法米法学法米 法式法法式光 का - वर्ग आउवा श्रीमदन्त- हदशाङ्ग सूत्रम् १३४ 米米米米米米米米卡米卡米未未上千丰米辛未未洪 उन्हीं दिनों भगवान् महावीर विचरते-विचरते एक बार वहाँ पधारे । काली रानी ने भगवान् का उपदेश श्रवण कर नन्दा रानी की भाँति दीक्षा ग्रहण की । सामाइक से लेकर ग्यारह अङ्ग पर्यन्त का ज्ञानाभ्यास उन्होंने किया । तपस्या करने में भी कुछ कमी उन्होंने न रक्खी । कभी वे उपवास करती थीं तो कभी बेला और कभी तेला । यों, नाना भाँति की तपस्या से अपनी आत्मा को आराधित करने मे तत्पर हो कर, वे इधर-उधर विचरने लगीं। मूलः-तए णं सा काली अजा अण्ण्या कयाइ जेणेव अज्ज चंदणा अजा तेणेव उवागया उवागच्छित्ता एवं वयासी-इच्छामि णं अज्जायो ! तुब्भेहिं अब्भणुण्णायासमाणी रयणावलिं तवं उवसंपज्जेत्ताणं विहरेत्तए । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पाड़बंध करेह । तए एं सा काली अजा अजचंदणाए अब्भणुण्णाया समाणी रयणावलिं तवोकम्म उवसंपजित्ता णं विहरइ, तंजहा- भावार्थः-एक दिन, वे 'काली' नामक साध्वी, श्रीमती सतीजी श्री चन्दनवाला आर्याजी के पास आकर बोली-हे महाभागा ! मेरी ऐसी इच्छा है, कि आपकी आज्ञा प्राप्त होने पर, मैं रत्नावलि नामक तपस्या की आरा- धना करूं । श्रीमती चन्दनबालाजी ने कहा-हे देवानुप्रिये ! जिस प्रकार तुम्हें, सुख प्राप्त हो, वैसा ही तुम करो। तपस्या करने में तनिक भी विलम्ब न करो । इस प्रकार अपनी गुराणीजी की आज्ञा प्राप्त कर, वे 'काली' नामक 半半半平米米米米米米米米米米米卡*未****半开出 १३४ साधी उसी रत्नावलि नामक तपस्या को करने में संलग्न हो गइ । वह ' रत्नावलि-तप ' इस प्रकार है:- श्रीमदन्त- कृद्दशा सूत्रम्। Jaor w9s वर्ग श्राठवाँ * * * रत्नावलि-तप - - INNI १२।२।२। ।२।२।२।२। ।२।२।२।२।२॥ ।२।२।२।२।२।२। ।२।२।२।२॥२॥ 1२।२।२।२। ।२।२। 1m 4 w2022 - 来羊水形未未未未未米卡卡卡卡卡卡半半朱朱未未未未未於北 + | मूलः-चउत्थं करेइ २ ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ ता छटुं करेइ २ ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ ता अट्ठमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेड् २ ता अट्ट छट्ठाई करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ त्ता छ8 करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ठमं करेइ २ ता सबकामगुणियं पारेइ २ त्ता दसमं करेइ २ ता सव्वकास गुणियं पारेइ २ त्ता दुवालसमं करेइरत्ता सबकाम शुणियं VA १३५ वर्ग आठवाँ कृद्दशाह सूत्रम् । * १३६ पारेइ २ ता चोदसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता सोलसमं करेइ २त्ता सव्यकाम श्रीमदन्त-कई गुणियं पारेइ २ त्ता अट्ठारस्समं करेइ २ ता सब्वकामगुणियं पारेइ २त्ता वीसइमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता बावीसभ कोइरत्ता सव्वकामगुणियं पारेइ२ त्ता चउवीसमं करेइ२ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता छब्बीसइमं करेइ २ ता सब्बकामगुणियं पारेइ २त्ता अट्ठावीसइमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता तीसइमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइरत्ता बत्तीसइमं करेइरत्ता सव्वकामगुणियं पारेइ२त्ता चोत्तीसइमं करेइ२त्ता सबकामग णियं पारेइ २ ता चोत्तीसं छट्ठाई करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता चोत्तीसइमं करेइ२ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता बत्तीसइमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता तीसं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ२ त्ता अट्ठावीसइमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता छब्बीसइमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता चउवीसइमं करेइ२ ता सब. कामगाणय पारेइ २ ताबावीसइमं करेइ करेइ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता वीसइमं 米米米米卡未米那米米米米米飛米米米米米米米米 १३६ वर्ग आठवाँ श्रीमदन्ट- कृद्दशाह सूत्रम्। ************* करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता अट्ठारस्समं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता सोलसमं करेइ २ त्ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ त्ता चोदस्समं करेइ २ ता सव्व. कामगुणियं पारेइ २ त्ता वारसमं करेइ २त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता दसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता अट्ठमं करेइ २ त्ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ ता छटुं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ट छट्ठाई करेइ २ त्ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ ता अट्ठमं करेइ २ त्ता सब्ब काम गुणियं पारेइ २ ता छर्ट करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकाम गणियं पारेइ । एवं खलु एसा रयणावलीए तवो कम्मस्स पढ़मा परिवाड़ी एगेणं संवच्छरेणं तिहिं मासेहिं वावीसाए य अहोरत्तेहिं अहासुत्ता जाव पाराहिया भवइ । भावार्थः- उन काली नामक आर्याजी ने,रत्नावलि तपस्या करने के लिए उपवास किया । पारणा करके बेला किया । पारणा करके तेला किया। पारणा करके आठ बेले किये । पारणा करके उपवास किया । पारणा करके वेला किया । पारणा करके तेला किया ! यो अन्तर रहित चोला किया। पॉच किये। छः किये । सात,आठ,नौ,दस,ग्यारह, 牛牛米米米米米米米米米米米车外形半形不全天王手车 १३७ १३७ वर्ग अाठवा श्रीमदन्त कृशाङ्ग सूभम्। व रह,तेरह,चौदह,पन्द्रह और सोलह किये। फिर चौंतीस वेले किये। पारणा करके सोलह दिन की तपश्चर्या की। पारणा करके पन्द्रह दिन की तपस्या की । यों, चौदह, तेरह, वारह, ग्यारह, दस,नौ, आठ, सात, छः, पाँच, चार, तीन, दो और उपवास किया । पारणा कर के आठ बेले किये । पारणा करके तेला किया। पारणा करके बेला किया। पारणा करके उपचास किया। फिर पारणा किया। इस प्रकार, उन्होंने · रत्नावलि-तप' की एक परिपाटी (लड़ी) की । ऐसी तपस्या की एक बार लड़ी करने में पूरा-पूरा एक वर्ष, तीन महीने और बावीस दिन लगते हैं। जिस प्रकार सूत्र में विधि बताई है, उसी तरह इन आर्याजी ने इस की आराधना की । ऐसी एक परिपाटी करने में तीन सौ चौरासी दिन उपवास के और अध्यासी दिन पारणे के, यो सब चार सौ बहत्तर दिन होते हैं। मूलः-तयाणंतरं चणं दोच्चाए परिवाडीए चउत्थं करेइ २ ता विगइवजं पारेइ २ ता छठें केरइ २ ता विगइवज्जं पारेइ २ ता एवं जहा पढ़माए वि, णवरं सव्व पारणए विगइ- वज्जं पारेइ जाव बाराहिया भवइ । तयाणंतरं चणं तच्चाए परिवाडीए चउत्थं करेइ २ ता अलेवाडं पारेइ सेसं तहेव । एवं चउत्था परिवाडी नवरं सव्व पारणए आयंबिलं पारेइ, सेसं तंचेव । पढ़मंमि सव्वकामं, पारणयं विड्यए विगइवज्जं । ततियं मि अलेवाडं आयविल 米卡米卡米卡米米床冲冲冲冲子洋张孝亲 १३८ 米米米米米米米米米米米米米米 १३८ वर्ग पाठवा यो चउत्थं मि॥ तएणं सा काली अजा रयणावली तवो कम्मं पंचहिं संवच्छरेहिं दोहि य श्रीमदत- मासेहिं अट्ठावीसाए य दिवसे हिं अहासुत्तं जाव बाराहेत्ता जेणेव अज्ज चंदणा अजा तेणेव उवागया उवागच्छित्ता अज्ज चदणं वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसित्ता वहूहिं चउत्थं जाव अप्पाणं भावेमाणी विहरइ। भावार्थ:-तत्पश्चात् उन 'काली' नामक साध्वीजी ने इस 'रत्नावलि तपस्या' की एक परिपाटी-शृङ्खला कर ली। और उनके साथ ही, वे दूसरी परिपाटी- शृङ्खला करने को उद्यत हुई। प्रथम, उपवास किया। उपवास के पारणे में, विगय, दूध, दही, मिष्टान्न, तेल, घी, आदि का खाना एक-दम बन्द कर दिया । इस प्रकार उपवास का पारणा कर उन ने वेला किया। पारणे में वही विगय बन्द रक्खी । इसी तरह, तेला किया। पारणा करके आठ वेले किये । पारणा करके उपवास किया । वेला किया । तेला किया। यू सोलह तक किया। फिर चौतीस वेले किये । पारणा करके सोलह किये । फिर पन्द्रह, चौदह. तेरह, वारह, ग्यारह, दस, नौ, आठ, सात, छः पाँच, चार तीन, दो,और उपवास किया। पारणा करके आठ बेले किये । पारणा करके तेला किया ।बेला किया और उपवास किया। सभी पारणों में विगय बन्द रक्खी । जिस प्रकार प्रथम परिपाटी की, उसी तरह दूसरी भी की । इन में विगय तो खाई ही नहीं गई । साथ ही में, रत्नावलि की तीसरी लड़ी भी इसी तरह की । यहाँ तक, कि विगय बन्द रखने 米米半半半半水半半未丰半半孝未羊羊羊羊卡米米米米米米米 - हादशाङ्ग सूत्रम् । १३६ 来*****半法未於本法米米卡主卡本未朱平洋千米卡地 १३६ ***** वर्ग श्राठवा हद्दशाह - सूत्रम्। * के साथ ही साथ, घी से चुपड़ी हुई रोटी तक न खाई । अर्थात् लेपवाली वस्तुओं का खाना बिलकुल ही छोड़ दिया। तीसरी परिपाटी के पूर्ण होते ही, चौथी परिपाटी भी इसी तरह की । पर इसके पारणे के दिन तो, फिर भी श्रीमदन्त- अ.यम्बिल- लूखी रोटी और वह भी धोवन या ठण्ढे किये हुए गर्म जल में भिगो कर खा लेती थी। इस प्रकार चे 'काली' नामक साध्वी जी 'रत्नावलि तपस्या करते हुए पूरे-पूरे पाँच वर्प, दो महीने और अट्ठाइस दिनों में. जैसे सूत्र में विधि बतलाई गई है, उसी प्रकार इस तपस्या की आराधना कर, अपनी गुराणी श्री चन्दनबाला १४० आर्याजी के पास वे आई । और, उन्हें विधि-पूर्वक बन्दना कर फिर भी फुटकर उपवास, वेले, तेले, की तपस्या करती हुई, अपनी आत्मा को पवित्र वे करती रहीं। मूलः-तएणं सा काली अज्जा तेणं अोरालणं जाव धमणिसंतया जायायावि होत्था, से जहा इंगाल सगडी वा जाव सुहुय हुयासणे इव भासरासिपलिच्छरणा तवेणं तएणं तव- तेय सिरीए अईव उवसोभे माणी चिट्ठइ । भावार्थः-तदनन्तर, उन 'काली' नामक आर्याजी का शरीर इस प्रकार की प्रधान तपस्या करने से, प्रायः मॅस और खून से रहित हो गया । केवल अस्थि-पञ्जर का ढाँचा मात्र वे रह गई । उठते-बैठते, उनकी हड्डियाँ कड़-कड़ शब्द करने लगी । और उनके शरीर में चहुँ ओर नसों का जाल-सा दिखाई देने लगा। वे अपने अयुष्य- 米米米米米米米米4主 - १४० 米米米米米未来 वर्ग अ.ठवा १४१ ※***半*朱朱朱*本未未关未生法米米米米米米米卡 बल-जीवन ही से जीवित थीं । और चलती-फिरती थीं । वे इतनी कृश हो गई थीं, कि बोलना तो दूर रहा पर, बोलने के विचार-मात्र से ही उन्हें कष्ट प्राप्त होता था। जिस प्रकार सूखे काप्ट, सूखे पत्ते या कोयले की भरी हुई श्रीमदन्त- गाड़ी चलते समय आवाज करती है, उसी तरह उनकी हड्डियां भी उठते-बैठते, चलते-फिरते आवाज करने लगी छदशाम थीं । जो भी उन साध्वी के शरीर का मॉस एवं रूधिर प्रायः सूख गया था, तब भी तप और तेज रूपी लक्ष्मी से सूत्रम्। वे दिन-दनी और रात चौगुनी सम्पन्न हो कर शोभा को प्राप्त होती जा रही थीं। मूलः-तएणं तीसे कालीए अज्जाए अण्णया कयाइ पुव्वरत्तावरत्त काले अयं अज्झस्थिए जहा खंदयस्स चिंत्ता जहा जाव अत्थि उहाणे कम्मे वले वीरिए पुरिसकार पर- कमे सद्धाधिई संवेगे ताव ताव मे सेयं कल्लं जाय जलंते अज्ज चंदणं अजं आपुच्छित्ता अज्ज चंदणाए अज्जाए अमणुनायाए समाणीए संलहणा असणा माराहणा अत्तपाण पडियाइक्खे कालं अणवखमाणे विहरेत्तए ति कडु एवं संपेहेइ २ ता कल्लं जेणेव अज्ज. चंदणा अजा तेणेव उवागच्छइ २ ता अजचंदणं अजं वंदइ णमंसद, वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामिणं अज्जो ! तुम्भेहिं अभणुराणाया समाणी संलहेणा जाव विहरेत्तए अहा- १४१ वर्ग आठवा रद्दशाङ्ग सूत्रम्। १४२ 米米米米米洋味半洋牛宋洋深洋味小本卡米不作卡米 सुहं देवाणु प्पिया ! मा पडिबंध करेह । तो काली अजा अज्ज चंदणाए अब्भणुराणाया श्रीमदन्त- समाणी संलेहणा असिया जाव विहरइ । सा काली अजा अज्ज चंदणाए अंतिए सामाइय- माझ्याई एकारस्स अंगाई अहिजित्ता बहुपडिपुन्नाइं अट्ठ संवच्छाराइं सामगणपरियागं पाउ- णिता मासियाए सलेहणाए अप्पाणं झूसेता सहि भत्ताइं अणसणाए छेदेत्ता जस्सट्ठा कीरइ जाव चरिमुस्सासनीसासेहिं सिद्धा। भावार्थः तत्पश्चात् , उन 'काली' आर्याजी को, एक रोज, पिछली रात्रि के समय खन्दक की भाँति ऐसे विच र उत्पन्न हुए, कि मेरा शरीर तपस्या से इस प्रकार कृश हो गया,तब भी मुझ में उत्थान, बल, वीर्य, पुरुषार्थ, पराक्रम, श्रद्धा, धृति संवेग और शक्ति आदि अभी तक विद्यमान हैं । अतएव कल सूर्योदय होते ही मुझे गुराणी श्रीमती चन्दनवालाजी से पूछ कर, आहार-पानी का जीवनभर के लिए परित्याग कर लेना चाहिए । तथा सन्थारा करके, जीवन एवं मृत्यु की आशारहित होकर, विचरण करना चाहिए। ऐसा विचार कर, सूर्योदय होते ही होते, वे 'काली' नामक आर्याजी, श्रीमती चन्दनबालाजी के पास आई । और उन्हें वन्दना कर के बोली- महाभागा! मेरी इच्छा है, कि आप की आज्ञा प्राप्त होने पर, मैं सन्थारा कर के रहूँ । उत्तर में श्रीमती चन्दनवाला आर्याजी 来来来来米米米米米米米米米 ૨૨ वर्ग पाठवा **未於我* श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। ने फर्माया हे देवानुप्रिये ! जो तुम्हें सुखकर हो वैसा ही करो। इसमें विलम्ब मत करो । बस, इस प्रकार आज्ञा हो जाने पर, उन्होने सन्थारा कर लिया । इन साध्वीजी ने अपनी गुराणी श्रीमती चन्दनवालाजी के समीप सामा- इक से लेकर ग्यारह अङ्गों तक का सम्पूर्ण ज्ञानाभ्यास किया । पूरे-पूरे आठ वर्ष तक चारित्र पाला । और, एक महीने के सन्थारे में सम्पूर्ण घनघाती कर्मों का एकान्त निकाश्चन कर, अन्तिम श्वासोश्वास के पश्चात् वे सिद्धगति- मोक्ष में पहुंची। मूलः-उक्खेवो वियं अज्झयणस्स । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समए एं चंपा णाम णयरी, पुण्णभद्दे चेइए, कोणिए राया, तत्थणं सेणियस्स रगणो भज्जा कोणि- यस्त रणणो चुल्लमाउया सुकाली नाम देवी होत्था । जहा काली तहा सुकाली वि णिक्खंता जाब वहूहिं चउत्थ अप्पाणं भावे माणे विहरइ । तए णं सा सुकाली अज्जा अण्णया कयाइ जेणेव अज्जचंदणा अजा जाव इच्छामि णं अज्जो ! तुम्भेहिं अभणुण्णाया समाणी कणगावली तवोकम्म उवसंपज्जित्ताणं विहरेत्तए। एवं जहा रयणावली तहा कण- गावली वि णवरं तिसु ठाणेसु अट्ठमाई करेइ जहा रयणावलीए छट्ठाई एकाए परिवाडिए ******************朱书法 १४३ 牛牛牛牛米米半牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛牛米米 वर्ग पाठवा श्रीमदन्त- हदशाह सूत्रम्। १४८ संवैच्छरो पंच मासा अट्ठारस दिवसा, सेसं तहेव । नव वासा परियारो जाव सिद्धा। भावार्थ:-जम्बू स्वामी ने सुधर्म स्वामी से कहा-भगवन् ! मैंने आपके श्री-मुख से प्रथम अध्याय श्रवण कर लिमा । आगे दूसरे अध्याय में जो वर्णन है, कृपा कर के अब उसे फरमावें । जम्बू ! सुनो । उस काल में, वही 'चम्पा' नाम की एक नगरी थी । वहां कौणिक राजा राज करता था । श्रेणिक राजा की पत्नी और कौणिक राजा की लघु-माता, सुकाली नाम की एक रानी थी। उन दिनों, वहां एक बार भगवान् महावीर स्वामी पधारे । जिा प्रकार, पहले काली रानी ने दीक्षा धारण की, उसी प्रकार इन सुकाली महारानी ने भी दीक्षा ग्रहण की। एक दिन यही सुकाली नामक साध्वी, श्रीमती चन्दनवाला आर्याजी के पास आकर, यों बोली-हे महाभागा आर्याजी ! आपकी आज्ञा होने के पश्चात् , मेरी इच्छा है, कि 'कनकावलि' नामक तपस्या की आराधना मैं करूँ। उतर में उन्होने कहा-जो तुम्हें सुखकर प्रतीत हो, वैसा तुम करो । तदनन्तर, उन सुकाली आर्याजी ने, जिस प्रकार काली आर्याजी ने 'रत्नावलि तपस्या की थी, उसी प्रकार इन्होंने भी ' कनकग्वालि' नामक तपस्या की। पान्तु जहाँ रत्नावलि में तीन जगह बेले किये । यहाँ उस जगह तेले किये । इस ' कनकावलि' की एक परिपाटी शृड्डला करने मे पूरा-पूरा एक वर्ष, पाँच महीने और बारह दिन लगते हैं । इस में अध्यासी दिन पारणे के, और एक वर्ष दो महीने एव चौदह दिन तपस्या के होते हैं । यों, चारों ही परिपाटी करने में पूरे-पूरे पाँच वर्प, नौ महीने और अट्ठारह दिन लग जाते हैं। वह 'कनकावलि ' तपस्या इस प्रकार है:- - ***********米办法 १४४ 小米米米米米米米 - वर्ग - - 0Y पाठवा - nx . - m 1३1३1३1३1 ।३।३।३ 1३।३। 20 ।३।३।३।३।३।। 07 - . कनकावलि-तप ४ mmm - MI . - श्रीमदन्त- छदशाङ्ग सूत्रम् m २४ M immm ४ ( 2 m0 - १४५ 中共共法於半半米半牛牛牛牛牛先生牛牛牛牛牛未老牛 इस तपस्या के समाप्त होने पर, फिर भी कई तपस्याएँ उन्होने की । जिससे उन का शरीर सूख कर कॉटा बन गया । अन्तिम दिनों में सन्थारा कर नौ वर्ष का चारित्र पाल कर ये भी मोक्ष से पहुंची। मूलः-एवं महाकाली वि णवरं खुड्डागं सीह निकीलियं तवो कम्म उवसंपज्जित्ताणं विहरइ, तं जहा-चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता छटुं करेइ २ ता सव्व- कामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ट करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता छटुं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दसमं ********************* १४५ थीमदन्त- कृद्दशाह सूत्रम्। बग याटवा १४६ 共牛米洋洋洋洋洋未未未未宋洋宋朱半干半来丰宋丰光 कोइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ठमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारे । २त्ता दुवालसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता दसमं करेइ २ ता सव्वकाम- गुणियं पारेइ २ त्ता चोद्दसम्मं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता बारसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता सोलसमं करेइ २ ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ त्ता चोदसमं करेइ २ ता सव्वकाम गुणियं पारेई २ ता अट्ठारसमं करेइ २ त्ता सव्वकाम- गुणियं पारेइ२ त्ता सोलसमं करेइरत्ता सबकाम गुणियं पारेइ पारेइ त्ता बीसइमं करेइ २ त्ता सव्वकाम गुणियं पारेइरेत्ता अट्ठारसमं करेइ २त्ता सव्वकाम गुणियं पारेइ२ त्ता बीस- इमं करेइ २ त्ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ ता सोलसमं करेइरत्ता सव्वकामगुणियं पारेइ२ ताअट्ठारस्समं करेइ करेइ त्ता सव्वकाम गुणियंपारेइ २ ता चोदसमं करेइ २ ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ त्ता सोलसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ चा बारसमं करेइ २ त्ता सव्वकाममणियं पारेइ २ ता अट्ठमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चोदसमं 未未未未来米米米決未来还未来的未央未来共洲未北地 १४६ "- ܝܝܙ वर्ग, श्राठवा . ६ करेइ २ ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ ता दसमं करेइ २त्ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २त्ता वारसमं करेइ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता अट्ठमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ.२ ता दसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता छटुं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अहमं करेइ २ त्ता सव्दकाम गुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं. पारेइ २ ता छटुं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगु- णियं पारेइ २ ता तहेव चत्तारि परिवाडीअो, एक्काए परिवाडीए छम्मासा सत्तय दिवसा, चउण्हं दो वरिसा अट्ठावीसा य दिवसा जाव सिद्धा । एवं कण्हा वि णवरं महालयं सहि- णिकीलियं तवो कम्मं जहेव खुड्डागं, एवरं चोत्तीस इमं जावे णयवं तहेव ऊसारेयव्वं, एक्काए वरिसं छम्मासा अट्ठारस य दिवसा, चउण्हं छ वरिसा दो मासा वारसय अहो. रत्ता, सेसं जहा कालीए जाव सिद्धा। भावार्थ:-हे जम्बू ! इस वर्ग के तीसरे अध्याय में वर्णन है, कि चम्पा- नगरी के श्रेणिक राजा की पत्नी धीमदन्त- कृहशाह सूत्रम्। १४७ 形心形於外形恐形州长来※未 १४७ 张张张於*洛米米米米米米米米米米米。 । धीमदन्त- छदशग उनम्। वर्ग याठवा और कौणिक की छोटी माता महाकाली रानी ने भी सुकाली रानी की तरह दक्षिा धारण की । इन महा काली नामक साध्वीजी ने ' लघुसिंह निष्क्रीड़ित' नामक तप किया । वह इस प्रकार है:- सर्वप्रथम उपवास किया। पारणा करके वेला किया । पारणा कर के उपवास किया । पारणा कर के तेला किया । यो बेला, चौला, तेला, पँचोला, चौला छः पॉच. सात, छः, पाठ सात, नौ, आठ, नौ, सात, आठ सात, पाँच, छः चौला, पॅचौला, तेला, चोला बेला, तेला, उपवास. बेला, और उपवास किया । इस प्रकार ‘लघुसिंह निष्क्रीडित की एक परिपाटी की । जिसमे तैंतीस दिन तो पारणा किये और पूरे पाँच महीने एव चार दिन की तपस्या हुई । यो, चार परिपाटी इन ने की । जिसमें दो वर्ष और अट्ठाइस दिन लगे । इस तपस्या के हार का चित्र निग्न लिखित :- नामक तप ११८ 来来来来来以 २ ३ 9 U v 9 - लघुसिंहनिष्क्रीड़ित तप 来来来来来来来来来 १४८ 20 8 " | | इस प्रकार के 'लघुसिंह निष्क्रीड़ित' तप की उन महाकाली आर्याजी ने सूत्रों में बताई हुई विधि के अनुसार ७ श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग श्राठवा आराधना की । तत्पश्चात्, फिर भी उन आर्याजी ने फुटकर कई तपस्याएँ की । अन्तिम समय में सन्थारा कर के की का सम्पूर्ण नाश हो जाने पर,मोक्ष मे वे पहुँची। इसी तरह राजा श्रेणिक की पत्नी और कौणिक की छोटी माता, कृष्णा नामक रानी ने, भगवान् का उपदेश श्रवण कर श्री चन्दनवाला आर्याजी के पास दीक्षा धारण की । और, जिस प्रकार महाकाली आर्याजीने 'लघुसिंह निष्क्रीड़ित' नामक तप में, नौ तक की तपस्या की थी, ठीक उसी प्रकार इस तप की प्रथम परिपाटी-शृङ्खला इस प्रकार की:-सर्व प्रथम उपवास किया । पारणा कर के बेला किया । पारणा कर के उपवास किया । यों तेला किया। बेला, चौला, तेता, पँचौला, चौला, छः, पाँच, सात, छः, आठ, सात, नौ, आठ, दस, नौ, ग्यारह, दस, बारह, ग्यारह, तेरह, बारह, चौदह, तेरह, पन्द्रह, चौदह, सोलह, पन्द्रह, सोलह, चौदह, पन्द्रह, तेरह, चौदह, बारह, तेरह, ग्यारह, बारह. दस, ग्यारह, नौ, दस, आठ, नौ, सात, आठ, छः, सात, पाँच, छः, चौला, पॅचोला, तेला, चौला, बेला, तेला, उपवास, बेला, और फिर पारणा कर के उपवास किया । यों, एक परिपाटी की । जिसमें, इकसठ दिन उन सतीजी ने पारणा-भोजन किया और पूरे-पूरे एक वर्ष, चार महीने तथा सत्रह दिन, अर्थात् चार सौ सत्तानवें दिन तपस्या की । ऐसी एक परिपाटी कर के, साथ ही साथ, दूसरी, तीसरी और चौथी परिपाटी भी की। जिसमें पूरे-पूरे छः वर्प, दो महीने और बारह दिन लगे । इस ' महानिष्क्रीड़ित- तप' की एक परिपाटी इस प्रकार है:- **************** १४६ . 1Y| |ov| 810 Nirlwwwww 19059/WS १० है ११ १६ ०४ १२ ११ 믄 .* वर्ग आठवाँ महासिंह निष्क्रीड़ित तप श्रीमदन्त- कृदशाह सूत्रम्। કે Y0mX20 ०४ w १३ १२ १० ४ १५० Maima morror xvieomprises इस प्रकार, कृष्णा आर्याजी ने महानिष्क्रीड़ित तपस्या विधि-पूर्वक कर के, फिर भी कई फुटकर तपस्याएँ की । अन्तिम समय में, सन्थारा कर के, काली आर्याजी के समान ये भी मोक्ष में पहुंची। मूलः-एवं सुकण्हावि, णवरं सत्तसत्तामयं भिक्खुपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरई पढमे सत्तए एकेकं भोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइ एक्केक्कं पाणयस्स दोच्चे सत्तए दो दो भोयणस्स दोदो पाणयस्स पडिगाहेइ, तच्चे सत्तए तिगिण भोयणस्स तिषिण पाणयस्स, चउत्थे चउ, पंचमे पंच, छटे छ, सत्तमे सत्तए सत्त दत्तीश्रो भोयणस्स पडिग्गाहेइ सत्त पाणयस्स, एवं खलु सत्त सत्तमियं भिक्खुपडिमं एगृणपण्णाए राइदिए हिं एगेणय छन्नउएणं भिक्खासएणं १५० ...- ཀ་ श्रीमदन्त- कृद्दशाङ्ग सूत्रम्। 来0****** वर्ग आठवाँ १५१ अहासुत्ता जाव अाराहेत्ता जेणेव अज्जचंदणा अज्जा तेणेव उवागया अजचंदणं अजं वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामिणं अज्जायो ! तुम्भेहिं अभणुराणाया समाणी अडमियं भिक्खुपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरेत्तए । अहासुहं देवाणुप्पिए मा पडिबंधं करेह। भावार्थ:-इशी तरह, राजा श्रेणिक की पत्नी और कौणिक की छोटी माता , सुकृष्णा नाम की रानी ने भी भगवान महावीर का उपदेश श्रवण कर, श्रीचन्दनवाला आर्याजी के पास, दीक्षा धारण की । तत्पश्चात्, सुकृष्णा आर्याजी ने 'सप्त-सप्तमिका' नामक भिक्षु-पडिमा अङ्गीकार की । वह इस प्रकार है:-सात दिन तक नित्यम्प्रति एक बार गृहस्थों के द्वारा दिये हुए भोजन और पानी पर निर्वाह करना । अर्थात् एक वक्त में रोटी का पाव हिस्सा और एक बार की धारा में, जितना पानी दिया, तो उतना ही उस रोज खाते-पीते हैं; किन्तु दुबारा मॉग कर फिर नहीं लाते हैं । यही क्रम सात दिन तक रक्खा जाय । इसी को 'सप्त-सप्तमिका-भिनु पडिमा ' कहते हैं । इसी प्रकार, दूसरे सप्ताह में, दो बार का दिया हुआ भोजन और पानी ग्रहण किया । और, फिर इसी प्रकार क्रमशः तीसरे सप्ताह में तीन बार, चौथे सप्ताह में चार बार, पाँचवें में पॉच बार, छठे में छः बार और सातवें सप्ताह में सात बार गृहस्थों द्वारा दिये गये भोजन और पानी को ग्रहण कर, उसी पर अपने प्राणों की - 张从未张长兴光光 . श्रीमदन्त कदशाम सूत्रम्। प्रति-पालना की । यो, उनपचास दिन तक इस प्रकार की सप्त भिक्षु पडिमा, सूत्र में जिस विधि से पाली जाती सप्त-सप्तमिता अष्ट अष्टमिका २१ वर्ग पाठवा १ १ १ ग १ १ १ or १ २ २ २ २ २ २ २ १५२ २ २ २ २ २ २ ३ ३ ३ ३ للم ३ ३ ३ الله ३ ३ 求半生半半生米卡卡卡士牛半生半半半半主半半半未牛羊去 ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ । ५ ५ ५ ५ ५ ६ ६ ६] ६ ६ ६ ६ ६ ७ -~-- ७ ७ ७ ७ २५२ ७ ७ ७ 15 SI क SS ८ SI वर्ग अ.ठवाँ श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग सूत्रम्। है, उसी प्रकार 'सुकृष्णा' नामक आर्याजी ने इस तपस्या को समाप्त कर, वे श्रीमती चन्दनवालाजी आर्याजी के पास आई । और उन्हें वन्दना कर के बोली-हे देवानुप्रिये ! मेरी इछा है, कि अपकी आज्ञा होने के पश्चात, 'अष्ट-अष्टमिका भिनु पडिमा ' को अङ्गीकार कर के मही मे विचरण मैं करूँ उत्तर में श्री चन्द नवालाजी ने फर्माया, जिस प्रकार भी तुम्हें सुख हो, वैसा ही करो | उसमें विलम्ब को रत्ती भर भी स्थान न दो । मूलः-तए णं सा सुकण्हा अजा अज्जचंदणाए अभणुणायासमाणी अट्ठअहमियं भिक्खु पडिमं उवसंपज्जिताणं विहरइ, पढमे अट्ठए एक्ककं भोयणस्सदत्तिं गडिगाहेइ एकेकं पाणगस्स दत्तिं जाव अट्टमे अट्ठए अट्ठट्ठभोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइ अपाणगस्स । एवं खलु एयं अट्ठमियं भिक्खुपडिमं चउसट्टीए राइंदिएहिं दोहिय अट्ठासीएहिं भिक्खासएहिं अहासुत्तं जाव पाराहित्ता नवनवामियं भिक्खुपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । पढ़मे नवए एक्के भोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइय एक्केक्कं पाणयस्स जाव नवमे नवए नव दत्तिं भोय- णस्स पडिग्गाहेइय नवनव पाणयस्स । एवं खलु नवनवामियं भिक्खुपडिमं एका सीई राई- दिएहिं चउहि पंचोत्तरेहिं भिक्खासएहिं अहासुत्ता जाव पारााहित्ता दस दसमि १५३ 英半中半米来决決未半决法 १५३ वर्ग आठवाँ छद्दशाक सूत्रम्। ***开张 यं भिक्खुपाडेमं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । पढ़मे दसए एककं भोयणस्स दतिं पडिगाहेइय श्रीमदन्त- एकेकं पाणयस्स जाव दसमे दसए दस दस भोयणस्स दत्तिं पडिग्गाहेइ दसदस पाणयस्स एवं खलुएयं देस दसमियं भिक्ख्नुपडिमं एकेणं राइंदियसएणं अद्ध छट्टेहिं भिक्खासएहिं अहासुत्तं जाव बाराहेइ २ त्ता बहूहिं चउत्थ जाव मासद्धमास विविहतवो कम्मेहि अप्पाणं भावमाणी विहरइ । तए णं सा सुकण्हा अजा तेणं अोरालेणं जाव सिद्धा। भावार्थ:-सप्त-सप्तीमका भिक्षुपडिमा कर लेने के बाद उन 'सुकृष्णा'नामक आर्याजी ने श्रीमती चन्दन- बालाजी से, अष्टम-अष्टमिका भिक्षुपडिमा करने की आज्ञा प्राप्त की और तदनुसार तपस्या करना शुरू किया । प्रथा के अठवाड़े (आठ दिनो ) में, नित्यम्प्रति एक दात पानी की और एक दात भोजन की. अर्थात् गृहस्थियों द्वारा दिये हुए एक बार के आहार और पानी को ग्रहण कर, उसी पर निर्वाह किया । इसी प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे पाँचवें, छठे, सातवें और आठवें अठवाड़े में, नित्यम्प्रति क्रमशः दो, तीन, चार पाँच, छः, सात, और आठ बार गृहस्थियो द्वारा दिये गये आहार और पानी को ग्रहण कर उसी पर अपना जीवन धारण वे करती रहीं। यो सम्पुणे पडिमा में कुल चौंसठ दिन लगे । और दो सौ अठासी दात हुई । अर्थात् दो सौ अठासी बार आहार पानी लिया गया। इसी प्रकार नव-नवमिका भिक्षुपडिमा की । प्रथम नवमिका, अर्थात् प्रत्येक नौ-नौ दिनों में ** १५४ आठवा 18 ** श्रीमदन्त- कृशाह नित्यम्प्रति, एक-एक दात पानी की और एक-एक दात भोजन की उन्होंने ली । ऐसे ही दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं. आठवीं और नौवीं नवमिका में, नित्यम्प्रति क्रमशः दो, तीन, चार, पाँच. छः, सात, आठ और नौ बार गृहस्थियों द्वारा वहगये गये. आहार और पानी को ग्रहण कर, उसी से अपना निर्वाह किया। इस 'नव-नवमिका-भिक्षु पडिमा 'में पूरे-पूरे एक्यासी दिन लगे । और चार सौ पाँच बार का दिया हुआ आहार-पानी ग्रहण किया गया । इस ' नव-नवमिको भिक्षुपडिमा ' को समाप्त कर लेने के पश्चात्. उन्होंने ' दस-दशमिका भिनु-पडिमा' अङ्गीकार की। प्रथम द दशमिका, अर्थात् के दश दिनों में, नित्यम्प्रति एक बार को दिया हुआ भोजन और पानी ग्रहण किया । यों, दूसरी, तीसरी चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं, आठवीं नौवीं और दशवीं दशमिका में नित्यम्प्रति, क्रमशः एक से लगाकर दश बार गृहस्थियों द्वारा दिये गये आहार और पानी को ग्रहण कर, उपसर अपना जीवन निर्वाह किया । इस तपस्या को पूर्ण करने में कुल सौ दिन लगे। जिसमें भोजन और पानी की साढ़े पाँच सौ दात्त हुई । इस तपस्या को पूर्ण कर लेने के पश्चात्, उपवास, बेले, तेले, मासक्षमण, अ मास-क्षमण की भी तपश्चर्या इन्होंने की। जिस से श्री सुकृष्णा आर्याजी का शरीर बड़ा ही कृश हो गया। किन्तु फिर भी, अन्तिम समय में, सन्थारा कर के, सम्पूर्ण कर्मों का नाश करती हुई, वे मोक्ष-धाम में पहुँची। . उपरोक्न ' नव-नवमिका' और 'दश-दशामिका' भिक्षुपडिमा तप के यत्र निम्न प्रकार है:- प्रथम सूत्रम् । १५५ - नव-नवमिका १ १ १. १ १ ov १ १ २ २ २ वर्ग २ २ २ २ वर्ग श्रीमदत- कृशान सूत्रम्। २ २ २ २ २ २ २ श्राठवा กร ३ mm (C १५६ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ६. ६ द m ७ ७ ७ ७ ७ ७ ७ ७ ७ IS ८ ८ न 4 SI | है है है 8 ६ ६ है है है है 8 8 है १० -- १० १० १० १० १० १० १० १० १० ॐ दश-दशमिका श्रीमदन्त- फदशाङ्ग सूत्रम्। वर्ग पाठवा १५७ मूलः-एवं महाकण्हावि णवरं खुड्डागं सव्वोभदं पडिमं उवसंपजित्ताणं विहरइ तं जहा-वउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता छटुं करेइ२ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ चा अट्ठमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दशमं करेइ २ ता सबकामगुणियं पारेइ २ ता दुवालसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ठमं करेइ २त्ता सब- कामगुणियं पारेइ २ ता दसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दुवालसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ त्ता सबकामगुणियं पारेइ २ ता छ8 करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दुवालसमं करेइ २ त्ता सबकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता छटुं करेह २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ शाअट्ठमं करेइ २ वा सव्वकामगुणियं पारेइ २ चा दसमं करेइ २त्ता सबकामगणियं पारेइ २. त्ता छटुं करेइ२ ता सव्वकामगुणियं पारेइरेत्ता अट्टमं करेइ२त्ता सव्वकामगणियं पारेइ २ ता दसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता दुवालसमं करेइ २ ता सबकाम- ********************** १५७ .
वर्ग प्राठवा 5 श्रीमदन्त- छदशाङ्ग सूत्रम्। गुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दसमं करेइ २ चा सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दुवालसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ ता सबकामगुणियं पारेइ २ वा छठं करेइरत्ता सव्वकामगाणयं पारेइ २ त्ता अट्ठमं करेइ. २ ता सव्वकामगुणियं पारेइरत्ता । एवं खलु एवं खुड्डागसव्वश्रो भद्दस्स तवो कम्मस्स पढ़मं परिवाडिं ।तेहिं मासेहिं दसहिं दिवसेहिं अहासुत्तं जाव अाराहेत्ता दोच्चाए परिवाडीए चउत्थं करेइ २ ता विगइवजं पारेइ विगइवजं पारेत्ता जहा रयणावली ए तहा एत्थ वि चत्तारि परिवाडीअो पारणा तहेव । चउण्हं कालो सवच्छरो मासो दस य दिवसा, सेस तहेव जाव सिद्धा। भावार्थः-इसी तरह, राजा श्रेणिक की पत्नी और कौणिक की छोटी माता. महाकृष्णा रानी ने, भगवान् महा- वीर का उपदेश श्रवणकर. श्रीमती चन्नवाला आर्याजी के पास दीक्षा धारण की। तत्पश्चात्, श्रीचन्दनबालाजी की आज्ञा प्राप्त कर, ' लघुसर्वतोभद्र' नामक तपस्या की आराधना इन ने की । वह इस प्रकार है:--सर्व प्रथम, उपवास किया । पारणा कर के बेला किया। पारणा कर के तेला किया। यों, चोला, पँचोला, तेला, चौला, पँचोला, 水水水水上水平此*米卡夫卡米米卡米卡米卡卡卡那家 १५८ - . लघु सर्वतोभद्र , उपवाम. बेला , पंचोला, उपवास, बेला, तेला, चोला, बेला, तेला, चोला, पँचोला, उपवास, चोला, पँचोला, उपवास, बेला और तेला किया। इस प्रकार नामक तप की एक परिपाटी-लड़ी-उन श्री महा- लघुसर्वतोभद्र तप वर्ग पाठवा श्रीमदन्त- कृद्दशाह सूत्रम्। २ ३ ५ १५६ ४ ५ ******************* - १ २ ३ ४ ४ ५ १ (C ५ २ ३ कृष्णा आर्याजी ने पूरी की । जिसके करने में कुल पचहत्तर दिन की तपस्या और पच्चीस दिन पारणे के होते हैं । इस परिपाटी को समाप्त कर, साथ ही साथ, दूसरी परिपाटी भी इसी प्रकार की । किन्तु पारणे में दूध, दही, घी, तेल, - श्रीमदन्त- कृदशाङ्ग वर्ग आठवाँ खूनम्। १६० मिष्टान्न, खाना बिलकुल बन्द कर दिया । तीसरी परिपाटी में, पारणे के दिन, लूकी रोटी खाना प्रारम्भ किया। अर्थात्, घी, तेल के लेप-मात्र वाली सम्पूर्ण वस्तुओं का खाना ही बिलकुल बन्द कर दिया। और चौथी परिपाटी में पारणे के दिन आयम्बिल किये । जिस प्रकार 'रत्नावलि' तपस्या की चार परिपाटी शृङ्खला होती है, उसी प्रकार इस तपस्या की चारों परिपाटियों की सूत्रानुमार आराधना की । जिसमें पूरे तीन सौ दिन तपश्चर्या के और सौ दिन पारणे के होते हैं। महाकृष्णा आर्याजी ने इस लघुसर्वतोभद्र तपस्या करने के पश्चात् , फिर भी अनेकों छोटी-बड़ी फुटकर तपस्याएँ की । अन्तिम समय में सन्थारा ले अपने सर्व कर्मों को नष्ट करते हुए, उन्होंने सदा के लिए जन्म-मरण छुटकाग पाया। मूलः-एवं वीर कण्हा वि, णवरं महालयं सव्वतोभदं तवोकम्मं उवसंपजित्ताणं विह- रइ, तं जहा-चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता छटुं करेड् २ ता सव्वकाम गुणियं पारेइ २ त्ता अट्ठमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दुवालसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चउदसं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं गरेइ २ त्ता सोलसं करेइ २ ता सव्वकामगणियं पारेड् २ त्ता *** वग छदशाङ्ग सूत्रम् 多多多多多多多參考 पाठवाँ १६१ पड़मालया दसमं करेइ २त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता दुवालसमं करेइ २ त्ता सव्वकाम- श्रीमदन्त- मुणियं पारेइ २ ला चउदसं करेइ २ ता सव्वकामपाणियं पारेइ २ त्ता सोलसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता छटुं करेइ २ ता सबकामगुणियं पारेइ २ त्ता अट्ठमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता वितियालया सोलसं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकाम- गुणियं पारेइ २ ता छटुं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ठमं करेइ २ ता सव्व- कामगुणियं पारेइ २त्ता दसमं करेइ२ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता दुवालसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउदसं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता तितिया लया । अट्ठमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दुवालसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चोदसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता सोलसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता चउत्थं करेइ *********** ** श्रीमदन्त- कृद्दशाक सूत्रम्। वर्ग पाठवा २. त्ता सव्वंकागुणियं पारेइ २ ता छटुं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइरत्ता चउत्थीलया। चोदसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता सोलसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता छटुं करेइ २ त्ता सव्वकामगु- णियं पारेइ २ त्ता अट्ठमं करेइ २ ता सव्वकामगाणियं पारेइ २ त्ता दसमं करेइ २ त्ता सब्व- कामगुणियं पारेइ २ ता दुवालसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता पंचमीलया। छठं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता अट्ठमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दसमं करेइ २ ता सब्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता दुवालसमं करेइ २ ता सव्वकामगु- णिय पारेइ २ ता चोदसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता सोलसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता छठी- लया। दुवालसमं करेइ रत्ता सव्वकामगणियं पोरेइ २ त्ता चोदसमं करेइ २ ता सबका- मगुणियं पारेइ २ त्ता सोलसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगाणयं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ ****** १६२ श्रीमदन्त- कृद्दशा सूत्रम्। वर्ग प्राठया १६३ चा सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता छ8 करेइ २ ता सबकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ठमं करेइ२ त्ता सबकामगुणियं पारेइ २ त्ता दसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता सतमी लया। एकेकंलयाए अट्ठ मासा पंच य दिवसा चउण्हं दो वासा अटु मासा वीसं दिवसा । सेसं तहेव जाव सिद्धा। भावार्थः-जम्बु ! अन्तगढ-सूत्र के सातवें अध्याय में, वीरकृष्णा, जो कि श्रेणिक राजा की पत्नी और कौणिक की छोटी माता कही गई हैं, उन्होंने भगवान् का उपदेश पाकर, श्रीमती चन्दनवाला आर्याजी के पास दीक्षा धारण की । जिनका वर्णन है, कि उन वीरकृष्णा आर्याजी ने दीक्षा लेने के अनन्तर अपनी जननी ममान श्रीमती गुराणीनी की आज्ञा लेकर. ' महासर्वतोभद्र नामक तपस्या करना प्रारम्भ की। सबसे पहले उपवास किया । पारणा करके बेला किया। पारणा करके तेला किया । यों चौला, पंचौला, छः, सात, चौला, पॅचोला, छः, सात, उपवास, बेला, तेला, सात, उपवास, बेला, तेला, चौला, पँचोला, छः, तेला, चोला, पँचोला, छः, सात, उपवास, वेला, छः, सात, उपवास, बेला, तेला, चौला, पँचोला, बेला, तेला, चौला, पँचोला, छः, सात, उपवास, पंचोला, छः, सात, उपवास, बेला, तेला, और, चौला, किया । इस प्रकार इस तेप का यह एक परिपाटी हुई इसे कर के, साथ ही साथ, दूसरी परिपाटी शुरू की । परन्तु इस बार पारणे में, दध, दही, घी, आदि विगय ********** (स्निग्ध पदार्थ ) खाना बन्द कर दिया । इसी तरह तीसरी परिपाटी भी की। किन्तु इस तपस्या के पारणे के दिन घी, मिष्टान्न, आदि विगयों से लेपित मात्र वस्तुओं तक का परित्याग कर दिया । केवल लूका भोजन किया। वर्ग श्रीमदन्त- कद्दशाभ १ -- २ ३ ट ५ याठा सत्रम्। ४ ५ ७ १ २ ru २ महासर्वतोभद्र तप ३ ४ ५ द ३ ट ५ ७ or २ 未******北张洪杰米******洪水来来张邓兆 o ७ ३ - ३ ५ ६ ७ १ 米米那来来来来来来来识 . ५ ४ १६४ २३ चौथी परिपाटी की तपस्या के पारणे के दिन तो लूके भोजन को भी पानी में भिगो कर खा लेने का नियम लिया। इस तप की एक परिपाटी करने में तपस्या के दिन एक सौ छन्नवे लगते हैं। और पारणे के उनपचास दिन होते हैं।
वर्ग आठवा श्रीमदन्त- कृ.दशाह सूत्रम्। हु बहुत यो, कुल दो सौ पैतालीस दिन इसमें एक-बार लगते हैं। चारों ही परिवाटियो के करने में कुल दो वर्ष, आठ मास और वीग दिन पूरे-पूरे लगते है। उन वीर कृष्णा आर्याजी ने इस 'महासर्वतोभद्र' नामक तपस्या को करने के पश्चात् फिर भी छुटकर तपस्या की । अन्तिम समय मे सन्थारा कर के मुक्ति में पहुंची हैं । मूलः-एवं राम कहावि, णवरं भदोत्तर पाडिमं उवसंपज्जि ताणं विहरइ तं जहा- दुवालसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चोदसमं करेइ २ त्ता सव्वकाम- गुणियं पारेइ २ ता सोलसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ठारसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता बीसइयं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता सोलसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ठारसमं करेड् २ ता सव्वकामगु- णियं पारेइ २ त्ता वीसइमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ२ त्ता दुवालसमं करंइ २ ता सबकामगुणियं पारेइ २ ता चोदसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता वीस इमं करेड् २ त्ता सव्वकामगाणयं पारेइ २ त्ता दुवालसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं **** *洋************* **** ।
PAT कालो छम्मासा वर्ग भाउमा कृद्दशाह सूत्रम्। .१६६ 米米米米米米米米米********* पारेइ २ ता चोदसमं करेइ २ ता सव्व कामगुणियं पारेइ २ त्ता सोलसमं करेइ २ श्रीमदन्त- सव्वकामगणियं पारेइ २ चा अट्ठारसमं करेइ २ ता सब्बकाममणियं पारेइ २ ता चोद्द- समं करेइ २ चा सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता सोलसमं करेइ २ त्ता सयकामगुणियं पारेइ २ त्ता अट्ठारसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता वीसइमं करेइ २ ता सबकाम- गुणियं पारे २ त्ता दुवालसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ठारसमं करेइ २ ता सब्वकामगुणियं पारेइ २ ता वीसइमं करइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता दुवालसमं करेइ २ ता सव्वकामगाणियं पारेइ २ ता चोद्दसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं वीस य दिवसा,चउण्हं कालो दो वरिसा दो मासा वीस य दिवसा,सेसं तहेव जहा काली *山半米研米洲洲洲米米米冰冰冰冰冰米米米洲*3米洲法 जाव सिद्धा। १६६ भावार्थः इसी प्रकार, राजा श्रेणिक की रानी और कोणिक की छोटी माता रामकृष्णादेवी भी भगवान महा- श्रीमदन्त- कृशाम सूत्रम्। वीर का उपदेश श्रवणकर, श्री चन्दनवालाजी के द्वारा दीक्षित हुई । इन नव-दीक्षित श्री रामकृष्णा आर्याजी ने अपनी पूज्या गुराणीजी की आज्ञा प्राप्त कर, भद्रोत्तर नामक तपस्या को नीचे लिखेऽनुसार करना प्रारम्भ कियाः-सत्र से प्रथम पॅचोला किया । पारणा कर के छः किया । पारणा कर के सात किया । यो आठ, नौ, सात, वर्ग पाठवा ५ द ७ IS है २६७ द भद्रोत्तर तप है ७ 5 Ramnrwww ****ARXXXIIXXX***** 先出生生朱朱朱卡卡卡卡卡卡卡卡卡卡卡卡卡卡卡本来以本 द m 15 ५ ८ m ५ ७ NAAJanwr. आठ, नौ, पाँच, छः, नो पाँच, छः सात, आठ छः, सात, आठ, नौ, पाँच, आठ, नौ, पाँच, छः, और सात, किये । इस प्रकार एक परिपाटी पूरी हुई । यो चार पूरी-पूरी परिपाटियाँ उन्होंने की। दूसरी परिपाटी के पारणे के दिना में, समस्त विगय वस्तुओं का सेवन बिलकुल ही छोड़ दिया । तीसरी परिपाटी मे, विगय की लेपित-मात्र वस्तुआ का त्याग किया । और चौथी परिपाटी के पारणा में प्रायम्बिल किये । एक बार की परिपाटी-शृङ्खला में १६७ श्रीमदन्त- सहशाह मूत्रम्। वगे अाठवा vvv १६८ कुल एक सी पिचहत्तर दिन तपस्या और केवल पच्चीस दिन पारण के होते हैं । यों, चारों ही में कुल दो वर्ष, दो माम और बोस दिन होते हैं। रामकृष्णा आर्याजी के द्वारा, इस 'भद्रोत्तर' नामक तप को करने के पश्चात्, छुटकर और भी काफी मात्रा में कई तपश्चर्याएँ की गई । अन्तिम दिनों में सन्थारा कर के मुक्ति में वे पहुँचीं। मूल:-एवं पिउसेणकण्हा वि, णवरं मुक्तावली तवोकम्म उव संपजित्ताणं विहरइ,तंजहा- चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता। छटुं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता अट्ठमं करेइ २ त्ता सव्वकामगाणयं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता दसमं करेइ २ ता सव्वकाम- गुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता दुवालसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चोदसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता सोलसमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं 洋州卡米那山那那那并形米米米米米米米米米米米米米米 k+邓**** १६८ 4 *TH कृद्दशा सूत्रम् । वर्ग पाठवा १६६ पारेइ २ ता अट्ठारसमं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्व- श्रीमदन्त- कामगुणियं पारेइ २ ता वीसइमं करेइ २ त्ता सव्वकामहणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ ? त्ता वावीसइमं करेइ २ त्ता सव्वकामगणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेड् २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउवीसइमं करेइ २ त्ता सकामगणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेता २ त्ता छब्बीसइमं करेइ २ त्ता सबकामगुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता अट्ठावीसं करेड् २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता तीसइमं करेई २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता चउत्थं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेड् २ त्ता बत्तीसइमं करेइ २ त्ता सवेकामगुणियं पारेइ २त्ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्व- कामगुणियं पारेइ २ ता चोत्तीसइमं करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ त्ता सव्वकामगुणियं पारेइ २ ता बत्तीसइमं करेइ २ ला। एवं तहेव ओसारेइ जाव चउत्थं +rrrrrrr-*- १६६ Tr* वग आटा दशाश सूत्रम्। १७० **************** करेइ चउत्थं करेइत्ता सव्वकामांणयं पारेइ । एकाए कालो एकारस्समासापनरस य दि- श्रीमदन्त- वसा चउण्हं तिरिह वरीसा दस य मासा । सेसं तहेव जाव सिद्धा। भावार्थः--इसी प्रकार राजा श्रेणिक की रानी और कोणिक की छोटी माता, पितु सेन कृष्णा देवी ने भगवान् का उपदेश श्रवण कर श्रीमती चन्दनबालाजी आर्याजी के शरण में जाकर दीक्षा धारण की । इन पितुमेन कृष्णा आर्याजी ने, अपनी गुराणीजी की आज्ञा प्राप्त कर ' मुक्तावलि' नामक तपस्या नीचे के अनुमार कीः- सर्व प्रथम उपवास किया । पारणा कर के बेला किया । पारणा कर के उपवास किया । पारणा कर के तेला किया। यों, एक-एक उपवास बीच बीच में करती हुई, इनकी संख्या को सोलह तक इन्होंने पहुँचाया । फिर इसी प्रकार वीच-बीच में, उपवास करती हुई जिस प्रकार चढ़ी था, उसी प्रकार एक उपवास तक वे उत्तरी । इस प्रकार एक परिपाटी हुई । यू. काली रानी की तरह, चारों ही परिपाटियाँ-लड़िया-उन्होने सम्पूर्ण की । इसकी एक परिपाटी में ई पूरे-पूरे उनसाठ दिन पारणा के और अवशेप तपस्या के दिन यूं कुल मिला कर ग्यारह महीने और पन्द्रह दिन * होते हैं | चारों ही परिपाटियों के करने में बुल तीन वर्ष और दस महीने होते हैं। इस मुक्तावलि तपस्या का यन्त्र इस प्रकार है:- *上*米以张**那永米作非水平邓米米米米米米米米米 www. wi श्रीमदन्त- कृदशाह सत्रम्। "' मुक्तावलि स्थापना २७१ १६ वग رلر . CU पाठवा R n. ********** • www. . ' - मूलः-एवं महासेण कण्हा वि, पवरं प्रायविलवड्ढमाणं तवोकम्म उवसंपजित्ताणं विहरइ, तंजडा-प्रायविल करेइ २ ता चउत्थं करेइ २ त्ता वे प्रायविलाई करेड् २ ता चउत्थं करेइ २ ता तिषिण आयंबिलाई करेइ २ ता चउत्थं करेड् २ ता चत्तारि अायं- विलाई करेड् २ ता चउत्थं करेड् २ ता पंच प्रायविलाई करेइ २ त्ता चउत्थं करेइ २ ता छ आयंबिलाई करेइ २ ता चउत्थं करेइ २ ता एकोत्तरियाए वडढीए आयंबिलाई वड्ढांत चउत्थतरियाई जाव श्रायविलसयं करेइ २ ता चउस्थ करेइ । भावार्थ:-इमी तरह राजा श्रेणिक की रानी और कोशिक की छटो माता. — महासेन कृष्णा ' नामक देवी ने 来来来立米米米米米卡卡卡卡卡卡卡米米米米 १७१ 7 ग - वर्ग श्रीमदन्त- दशाभ सूत्रम् श्राठवा १७२ ***米米米米米米米米米米*** भी यथा-समय, श्री भगवान् महावीर का धर्मोपदेश सुनकर, श्रीमती चन्दनवाला आर्याजी के पास दीक्षा अङ्गीकार की उन्हों ने अपनी पूजनीया गुराणीजी की आज्ञा लेकर, 'आयम्बिल-वर्द्धमान' नामक तपस्या की । उसमें सर्वे प्रथम, एक आयम्बिल किया । दूसरे दिन उपवास किया । फिर दो आयम्बिल किये । उपवास किया । तीन आयम्बिल किये । उपवास किया । चार आयविम्ल किये। उपवास किया । पांच आयम्बिल किये । उपवास किया । छः आयम्बिल किये । उपवास किया । यों, बीच-बीच में उपवास करते हुए, पूरे-पूरे एक सौ आयम्बिल किये । और, उपवास किया । इस तपस्या का यन्त्र इस प्रकार है:- १ ।१।२।१।३।१।४।१।५।।६।१।७।१८।२।।१।१०।१।११।१।१२।१।१३।१।१४।१।१५११ १६।१।१७।२।२८।१।१६।१।२०११।२१।१।२२।१।२३।१।२४।१।२५।१।२६।१।२७।१।२८।१।२६।१।३०१२ ३१।१।३२॥१।३३।१।३४।१।३५११।३६।१।३७।१।३८।१।३६।११४०।१।४१।११४२।१।४३।१।४४।१।४५११ ४६।१।४७।१।४८।१।४६१२१५०।१।५१ । १। ५२ । १।५३ ।।। ५४।१।५५। ११५६।१। ५७।१।५८।१।५६।१।६०।१ ६१।१।१२।१।६३।१।६४।१।६५।१।६६।१।६७।२।६८।१।६६।१।७०।१।७१।१।७२।२।७३।११७४।१।७५/१ ७६।१।७७।१।७।१।७४।११८०।१।१।१।८।१।३।१।४।१।८५।१।८६।११८७।१1८८।११८६।१।६०।१ ६१११।६२ । १।६३।१।६४।१।६५।१।६६।१।६७।१।१८।१।६६।११००।१।* * * 1******* मूलः-तएणं सा महासेन कण्हा अजा आयंबिलवड्ढमाणं तवो कम्मं चोदसहिं वासेहिं तिहि य मासहिं वीसहिय अहोरत्तेहिं अहासुत्तं जांव सम्मं कारणं फासइ, जाव 来来半米米米米米米卡米米米米米米米米米米 १७२ कदशाक सूत्रम् । १७३ वर्ग पाठवा バ共済州共共共が共兵共共共未 बाराहेत्ता जेणेव अजचंदणा अज्जा तेणेव उवागच्छइ २ त्ता अज्जचंदणं अज्ज वंदइ श्रीमदन्त- णमंसइ वंदित्ता नमंसित्ता वहहिं चउत्थे हिं जाव भावमाणी विहरइ । तएणं सा महासेन कण्हा अज्जा तेणं अोरालेणं जाव उवसोभेमाणी चिट्ठइ । भावार्थः-उन महासेन कृष्णा आर्याजी ने 'आयम्बिल बर्द्धमान ' तपस्या करने में पूरे-पूरे चौंहह वर्ष, तीन मास और बीम दिन लगाये । जिस प्रकार सूत्रो मे विधि-विधान इस तपस्या के लिए बतलाया गया है, उसी प्रकार इन आर्याजी ने, सम्यक् प्रकार से इसका आराधन करके, श्री चन्दनवालाजी के पास वे आई । और उन्हें वन्दना करके, फिर भी छुटकर तपस्या में जुट पड़ी । ऐसी तपस्या करने से इन महासेन कृष्णा आर्याजी का शरीर, रुधिर और मास से प्रायः रहित, अर्थात् दुर्बल हो गया । पर तपस्या के प्रभाव से शरीर इनका तेजोमय और अनुपम कान्तिशाली बना रहा । मूल:-तएणं तीसे महासेणकण्हाए अज्जाए अण्णया कयाइं पुव्वरत्ता वरत्तकाले चिंता जहा खंदयस्स जाव अज्ज चंदणं अजं अापुच्छई जाव संलेहणा, कालं अणव कंखमाणी विहरइ । तएणं सा महासेण कण्हा अजा, अज्जचंदणाए अज्जाए अंतिए सा- १७३ वर्ग पाठवा श्रीमदन्त- घद्दशाह सतम्। १७४ माइयाई एकारस्स अंगाई अहिजित्ता बहू पडि पुन्नाइं सत्तरस वासाइं परियायं पालइत्ता मासियाए संलेहणाए अप्पाणं झूसेत्ता सहि भत्ताइं अणसणाए छेदेत्ता जस्सट्टाए कीरइजाव तमटुंभाराहेइ चरिम उस्सासणीसासेहिं सिद्धा बुद्धा । अह य वासा आदी एकोत्तरीयाए जाव सत्तरस । एसो खलु परिताप्रो सोणिय भज्जाण णायव्वो । भावार्थ:-उत्पश्चात्, उन महासेन कृष्णा आर्याजी को एक दिन पिछली रात्रि में, खन्दक की तरह विचार उत्पन्न हुआ, कि जो भी मेरा शरीर इस तपस्या से ऐसा कृश हो गया है । तथापि कुछ और शक्ति मुझ में है। अतः कल सर्योदय होते ही, श्रीमती च दनवालाजी से पूछ कर मुझे सन्थारा कर लेना चाहिए । तदनुसार प्रातः काल होते ही उन्होने अपनी धर्म-जननी गुराणीजी की आज्ञा प्राप्त कर सन्थारा ले लिया । अर्थात् ' यश के लिए में अधिक जऊँ' या 'दुख के कारण मैं शीघ्र ही मरूँ' इन सम्पूर्ण प्रकार के सङ्कल्प-विकल्पों से रहित होकर, समाधिमार्ग में प्रसन्न चित्त से वे रहने लगी। इन महासेन कृष्णा आर्याजी ने श्री चन्दनवालाजी से, सामायिक से लगा कर ग्यारहों अगों तक का सर्वाङ्ग ज्ञानाध्ययन कर लिया । लगातार के सतरह वर्षों तक चारित्र का पालन किया । अन्तिन समय में, पूरे एक मास का सन्थारा कर, अन्तिम श्वासोश्वास में अपने सम्पूर्ण घनघाती कर्मों को नष्ट कर, मुक्त मे वे पहुँची । काली आर्याजी ने आठ वर्ष चारित्र पाला | दूसरी सुकाली ने नौ वर्ष । यो क्रमशः 丞州张北半张半平 . १७४ श्रीमदन्त- कृदन मूत्रम्। वर्ग पाठवा १५ 孝丰t未未羊羊卡卡卡卡卡卡未公千卡未未未来 एक-एक वर्ष हुई महामेन कृष्णा ने पूरे-पूरे सतरह वर्षों तक चारित्र का पालन किया। ये दसों ही राजा श्रेणिक की गनियाँ थीं । और, कौणिक की छोटी माताएँ । फूलः-एवं खलु जंबु ! समणे णं भगवया महावीरेणं प्राइगरेणं जाव संपत्तेणं अट्ठ- मस्स अंगस्स अंतगड़दमाणं अयमढे पण्णत्ते तिबेमि । अंतगड़दसाणं अंगस्स एगो सुय- खंधो अट्ठवग्गा अट्ट सु चेव दिवसेसु उदिसिज्जंति,तत्थ पढ़म वितिय वग्गो दस दस उद्दे- सगा, तइयवग्गे तेरस उद्देसगा, उत्थ पंचमवग्गो दस दस उद्देसया छट्ठवग्गे सोलस उद्दे- सगा, सत्तएलग्गे तेरस उद्देसगा, अट्ठमवग्गे दस उद्देसगा। सेसं जहा नाया धम्म कहाणं । भावार्थः हे जम्बू ! धर्म के प्रकट करने वाले , श्रमण भगवान महावीर जो मोक्ष में पधार गये , उन्होंने आठवे अङ्ग अन्तग: सूत्र' का यह भाव फर्माया है । उसे मैंने ज्यों का त्यों तुम्हारे सामने वर्णन कर दिया । इस अन्तगढ़ मे एक श्रुतस्कन्ध और आठ वर्ग हैं । और, जिन्हें केवल आठ ही दिनों में भगवान् ने फर्माया है । इस के प्रथम और दूसरे वर्गों में क्रमशः दस-दस अध्याय हैं । तीसरे वर्ग में तेरह , और चौथे तथा पाँचवें वर्गों में फिर दस-दम अध्याय हैं । छठे वर्ग में सोलह अध्याय । सातवें वर्ग में तेरह और आठवें वर्ग में दस अध्याय हैं। अशिप ज्ञाताधर्म कथाङ्ग सूत्र के अनुसार जानना चाहिए । 来来来来来来未形共形 १७५ वर्ग अाठवा वर्ग १७६ - मदन्तकृद्दशांग सूत्र समाप्तम द कले 5 卡卡卡卡**米卡卡莱来水中中张**张张张* श्रीमदन्त- कुशाग सूत्रमा १७१ . पार्श्वनाथ च. ॐ धार्मिक पुस्तकें मंगाकर कर वितरण कीजिए भगवान् महावीर सजिल्द २॥) भग. महावीर का दिध्यसदेश =)॥ मराठी ३ अष्टादश पापनिषेध सार्य =) मूल )॥ ( वही साइज के ६५० पृष्ठ ) स्त. मनोहर माला ) द्वि० भाग ) भ्रम निकन्दन )|| सुपार्श्वनाथ २) आदर्श मुनि हिदी १1) गुजराती ११) आदर्श तपस्वी ) ३) गजल मय धन चरित्र || ज्ञान पंचमी -) श्रादर्श रामायण १) सजिल्द ११) मुखवत्रिका की प्रा सिद्धि a) सुप्रावक कामदेवजी ) मेघ कुमार 1-) जैन सुबोध गुटका ) त्रि मुनि ||) सीतावनवास सार्थ १) मूल ) परिचय ) काव्य विलास -) अनुपूर्वी २) सें. सनकितसार ॥) मदन चरित्र 1) थोकड़ा संग्रह भा. १-२) २-1 ३-11 ४-1) भलामरादि स्तोत्र - आदिनाथचरित्र ) निग्रंथ प्रवचन सजिल्द ॥) मूल-) ५-1, ६-) जेन मनमोहन माला -) सविधि प्रतिक्रमण -) अग्रेजी 1) पद्यानुवाद सत्योपदेश भजनमाला ॥ धर्मबुद्धि चरित्र -)|| लघु गौतम पृच्छा - उद० का श्रादर्श चातु०॥ उद्घोषणा ॥) मोड्नमाला 1-) , तृ.भाग-1) ज्ञान गीतसग्रह मोचियों की त्यागवृत्ति ) अन्तगढ़-सून 11) सुखसाधन 12) धर्मोपदेश सचित्र महावीर स्तोत्र सार्थ 1-) प्रदेशी चरित्र ! मेरी भावन। ! उदयपुर में अपूर्व उपकार जेनस्तवन बाटिका॥ जेना० योर सजिल्द ११) निलोक सुदरी - नदी सूत्र ३) पत्राकार ) इतुकाराध्ययन सचित्र 1) सद्बोध प्रदीप २) तमाख निषेध a) सृष्टि क्र्तृत्व मीमासा )। वर्गसोपानम् -) मुखवत्रिका निर्णय सचित्र " जन सुखचेन वहार भा० २ २) पचम भाग -) समस्यापूर्ति सुमनमाला =) फूलबाग )॥ महाबल मलिया चरित्र मनोरजन गुच्छा ३) दम्पक च. -) हरिश्चन्द्र चारेन -) भजनावली ॥ संधि पत्र - स्था, की प्राचीनता सिद्धि सुश्रावक अरणकनी 1) सामायिसूत्र - उज्ज्वल तारे । धन चरित्र ) पता:-श्री जैनोदय पुस्तक प्रकाशक समिति. रतलाम 12)