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Sandhi Chandrika
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|| श्रोः ।
हरिदास संस्कृत ग्रन्थमाला
२२२
॥ श्रीः ।।
सन्धिचन्द्रिका
कारक-समास-तिङन्त-कुदन्तादिपरिशिष्टसहित
पण्डित श्री रामचन्द्र झा व्याकरणाचार्य
सम्पादनः
चौरखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस.वाराणसी
१९७७
प्रकाशक : चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी
मुद्रक
चौखम्बा प्रेस, वाराणसी
संस्करण : द्वितीय, वि० सं० २०३४
..
मूल्य
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अपरं च प्राप्तिस्थानम्
चौखम्बा अमर भा र ती प्रकाशन
के० ३७/११८, गोपाल मन्दिर लेन
पो० वा नं. १३८, वाराणसी-२२१००१ ( भारत )
प्राकथन संस्कृत भाषा विश्वकी प्राचीनतम भाषाओं में अन्यतम है। भारतीय पुरातत्वके विषयनें पूर्ण और यथार्थ ज्ञान के लिए संस्कृत ही एकमात्र अनन्य साधारण साधन है। बहुत ही संतोष और प्रमोदका विषय है कि संस्कृत शिक्षा- पद्धतिके सुधारको ओर भी स्वतन्त्र भारतकी सरकारका ध्यान आकृष्ट हुआ है और अनुदिन हो रहा है। आवश्यकता आविष्कारकी जननी होती है। अतः राष्ट्रभाषा हिन्दी स्वीकृत होनेके पश्चात् जब संस्कृत अनिवार्य रूपसे पड़नेकी सावश्यकता हो गयी है तब विद्वानोंने भी विविध इति कर्त्ततामय स्वल्प श्रममें अधिक लाभप्रद ग्रन्थोंके प्रणयनमें यथेष्ट ध्यान दिया है। प्रस्तुत पुस्तिका भी उसीका हेतुभूत है। अगर अल्प वयस्क बालकों को इससे कुछ भी लाभ पहुँचा तो मैं अपने श्रमको सफल समझूगा । इस पुस्तकके प्रणयनमें मित्रवर श्री पं० शोभित मिश्र जी न्यायव्याकरणा- चार्यने विशेष नहायता प्रदान की है तदर्थ मैं उनका बहुत ही कृतज्ञ हूँ। नाथ । ही साथ जिन ग्रंथों से मुझे प्रांशिक सहायता मिली है मैं उन ग्रन्थकारोंका भी विशेष आभारी हूँ। अन्तमें इस पुस्तकके प्रकाशक 'चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय' के अध्यक्ष श्रेष्ठिवर स्व० बाबू हरिदासजी गुप्त के सुपुत्र बाबू जयकृष्णदासजी गुप्तका आभार प्रदर्शित करना भी मेरा पुनीत कर्तव्य है । अंग्रेजके शासनकाल में जब संस्कृत मृत भाषा कही जा रही थी, उस समय भी आपका उत्साह कम नहीं था। संस्कृतके उत्थानके लिये ६२ वर्षोंसे निरन्तर आप भगिरथ प्रयत्न कर रहे हैं। अपने ही हाथों से एक सहस्रसे अधिक प्राचीनसे प्राचीन संस्कृत ग्रन्थोंको प्रकाशित कर आपने भगवती सुरभारतीकी जो सेवा की है वह सराह- नीय है और इसके लिए स्वतंत्र भारत आपका कृतज्ञ - श्रावणी झूला विनीत श्री रामचन्द्र झा वि० सं० २००६ विषय-सूची ... संज्ञाप्रकरण or है ... ... १० सन्धिप्रकरण वर-मन्धि व्यञ्जन-सन्धि विमी-सन्धि ... ३० ... कारक-विचार ३ ... ममान विचार ... तिङन्त-विचार कृदल विचार ... संन्यानोंका गणनारन गुप्ताशुद्धिद्रदर्शन उपमविचार अनुवादोपयोगिया-वर्थ व्याकरणादिलक्षण ... ६७ ... 8 ७३ ... विद्यार्थी-शिक्षासूत्र
सन्धि-चन्द्रिका
संज्ञाप्रकरण
ओङ्कारं मुरलीधरं प्रभुवरं वृन्दावनाधीश्वरम्
भक्ताभीष्टफलप्रदं सुरवरैरासेव्यपादाम्बुजम् ।
वन्दे रासविहारिणं निजजनानन्दप्रदं माधवं
श्रीराधादिसमस्तगोपवनितासंसेव्यमानं प्रभुम् ।।
अइउण् १ । ऋला २। एमोड ३। ऐऔच ४ ।
हयवर ५। लण् ६ । आमजनम् । झभज ८।
घढघष्ाजबगडदश् १० । खफछठथचटतव् ११॥ कपय १२ ।
शषसर १३ । हल १४।
इन्हीं चतुर्दश (१४) सूत्रों के आधार पर महपि पाणिनिने समस्त व्याकरणकी
सभी बातें सरलरूपेण संक्षेप में कही हैं। ये चतुर्दश माहेश्वर सूत्र अण , अक् ,
अच् इत्यादि संज्ञा (प्रत्याहार ) सिद्धिके लिए हैं। आचार्य पाणिनिने भगवान्
शंकरके अतिशय प्रिय डमरूके शब्दोंसे इन सूत्रीको उपलब्ध किया था । )
नोट:-आचार्य पाणिनि और कात्यायन दोनों पाटलिपुत्र (पटना) के महा-
प्राज्ञ श्री १० उपवर्षाचार्यजोक शिष्य थे। सतीर्थ्य होने के कारण दोनीन परस्पर
शाश्वतिक विरोध रहता था। एकदा कात्यायनसे परास्त होकर पाणिनि दीर्थराज
प्रयागर्ने अजयनटके नीचे हां नकादि ऋषि गण तन कर रहे थे नहीं जाकर
घोर तपस्या करने लगे । अनन्तर उपस्त्रियाको विकट पश्चात प्रसन्न होकर
आसुतोष भगवान् शङ्करने ताण्डव नृत्य करते हुए उन लोगोंको दर्शन दिया और
१४ बार अपना डमरू बनाकर तपस्वियोंका अभीष्ट सिद्ध किया। जैसा कि
नन्दिकेश्वर विरचित 'काशिका' में लिखा है:-
।
२ सन्धिचन्द्रिका na । 'नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नव-पञ्चवारम् । उद्धतुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्श शिवसूत्रजालम्॥ (विस्तृत समीक्षा 'इन्दुमती' टीका सहित 'लघुकौमुदी' की प्रस्तावना में देखो) इन चतुर्दश सूत्रोंके अन्तिम वर्ण (ण, कु, आदि) इत्संज्ञावाले हैं 'हलन्त्यम्' सूत्रसे इनकी इत्संज्ञा हो जाती है। हकारादि वर्गों में संमिलित जो अकार हैं वे केवल वर्णोच्चारण करनेके लिये हैं--इत्संज्ञाके लिये नहीं। 'लण्' सूत्रके मध्यमें (लकारोत्तरवर्ती) जो अकार है वह इत्संज्ञक है-उच्चारण मात्रके लिये नहीं। क्योंकि उससे 'र' प्रत्याहारकी सिद्धि होती है। (१) हलन्त्यम् - उपदेश अवस्थामें जो अन्त्य हल (व्यञ्जन वर्ण) उनकी इत्संज्ञा होती है। नोट: -आद्य (प्रथम) उच्चारणको 'उपदेश' कहते हैं। व्याकरण शास्त्र के प्रवर्तक पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि मुनिका जो आद्यो- चारण है उसीका नाम 'उपदेश' है। कहा भी है- धातु-सूत्र-गणोणादि-वाक्य-लिङ्गानुशासनम् । आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीतिताः ।। (२ तस्य लोप :- जिसकी इत्संज्ञा होता है उसका लोप हो जाता है। नोट :-प्रसक्त ( शास्त्रतः वा अर्थतः विद्यमान-प्राप्तोच्चारण ) का जो अदर्शन (श्रवणाभाव वह लोपसनक होता है-उस अभावको लोप कहते हैं । (३ ) आदिरन्त्येन सहेता- अन्य इ.संज्ञक वर्णके साय उच्चारित आदि वर्ण अपने तथा मध्यवर्ती वर्णोंका में बोधक के। नोट:-'अ इ उ ' सूत्रपटक 'अण्' प्रत्याहारमें अन्त्य इत्संज्ञक 'ण' के सहित उच्चारित आदिवर्ण हुआ 'अ-'। वह 'अण्' अपने बीच में इ, उ, का तथा अपना अर्थात् 'अ' का भी संज्ञक हुआ (एवम् अन्यत्रापि)। यथा 'अण्' प्रत्याहार अ, इ, उ वर्णोकः संज्ञा (बोधक) है, तथा अच् , हल् आदि प्रत्याहारों को भी जानना चाहिये । प्रत्याहार निम्न होते हैं । ima - शिवसूत्र-प्रत्याहार स्यादेको अणवटेः, षेण द्वौ, त्रय इह कणमैश्च । चत्वारश्च चयाभ्यां, पञ्च रेफेण, शलाभ्यां षट् ॥ ए-ए ओ। क . , १ . . . , , अक्-अ, इ, उ, ऋ,लू । अच् अ, इ, उ, ऋ, ल, ए,ओ,ऐ,औ एच् -- ए, ओ, ऐ, औ । अत्र -अ, इ, उ, ऋ, ल, ए, ओ, ऐ, ऐच-ऐ औ। औ, ह, य, व, र, ल, ञ, म,ङ, खय्-ख, फ, छ, ०, थ, च, ट, त, ण, न, झ, भा अट - अ, इ, उ, ऋ,ल, ए, ओ, ऐ, खर-ख, फ, छ, 5, थ,च, ट, त,व, औ, ह, य, व, र। प, श, ष,स। अण्-अ, इ, उ, ऋ, ल, ए, ओ, ऐ, उम्--ङ, ण, न । औ, ह, व, र, ल। चय-च, ८, त, क. प । अम्-अ, इ, उ, ऋ, ल, ए, ओ, ऐ, चर-च, ट, त, क, प, श, प, स! औ,ह,य,व,र, ल, म,ङ, ण,न छन्-छ,०, थ, च,८,त। अल-अ, इ, उ, ऋ, ल, ए, ओ, ऐ, जश-ज, ब, ग, ड, द। औ, ह, य, व, र, ल, ञ, म,5, ण, न, झ, भ, घ, ङ, ध, ज,ब, झय-क, भ, घ, ढ, ध, ज,ब, ग.ड, ग, ड, द,ख,फ,छ,,थच, द, खफ, छ,०, थ,च,ट,त,काप ट, ताक,प, श, ष,सह। झर-कान,ब ,,ध, ज, ब, ग, अर-अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ, ड,द.स.क.छ.०, थ,च,, औ, ह, य, व, र, ल, ज, न,ङ, मा, न, झ, भ, घ, ङ, ध, न झल-क, भ, घ, तु, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख,फ, छ, ठ, थ,च,ट, इक् - इ, उ, ऋ,ल। त, क, पशबस,है। इच् इ, उ, ऋ, ल, ए, ओ, ऐ, औ। झर-क,भ,घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड,द इण्-इ, उ, ऋ, लु, ए. ओ, ऐ, औ, झष्-- झ, भ, ८, ड, ध। ह, य, व, र, ल। बराब, ग, ड,द। उक-उ, ऋ,लू। भप--भ, घ, ङ, ध। ५ , , ' 20 . . , , सन्धिचन्द्रिका . , , , , मय-~म, ङ, ण, न, झ, भ,घ, ढ,ध, फ, छ, ठ, थ, च,ट, त,क, प, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ,छ,ठ, श, ष, स,हा थ, च,ट,त,क.६। वल--व, र, ल, ञ, म, ङ, ण,न,झ, यन-य, व, र, ल, ञ, म, ङ,ण,न, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड,द, ख, फ. छ, ठ, थ, च,ट, तक, यण--य, व, र, ल। प, श, ष, स,हा यम्---य, व, र, ल, ञ, म, ङ,ण,न । वस--व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न,झ, यय--य, व, र, ल, ञ, म, ङ,ण, न, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द क, भ,,ड,धान,बम.ड,द, सर-श, ष, स। ल. फ. छ, ३, थ,त्र,,तक, शल --श, ष, स, ह। यर--य, व, र, ल, ञ, म, 3, ण, न, हल- है, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, भ, भ,क,ड,ध, ज, व, गड, न, क, भ, घ, ढ, ध, ज,ब, ग, द,ख, फ,छ,क, थ,च,,त, ड, द, ख,फ,छ, ठ,थ, च,ट, त, क,प, श, ष, स,है। रल- र, ल, ञ, म, ङ, ण, न,झ, भ, हर--है, य, व, र, ल, म, म, ङ, ण, घ.द, ध, , ब, ग, इ, द, ख, नक, भ, घ, द, ध, ज, ब, ग, द । . , , . २० . , . . . . , , mume- " (४) ऊक लोऽज्नदीप्लुतः- उकाल, कलउकाल कम वक, विनावि, बिमात्रक) के समान उच्चारत काल होलिका का 'म'कार कमले लट,, प्लुत संज्ञावाला हो। नोटः---- कान है : नरक कम-स-३' ने एक दो, - कमर महान, मन : उमार है। दृष्टान्तरूप में दिगम हुमाने का - एक नवे बनी । उच्यते । . gade महानुन का ... ...' उदास, अनुदात्त, स्वरित १. अनुदे के जर्व नाग उमारिनो 'अच्' ह उदात्त' संज्ञाप्रकरण २. तालु आदि स्थानों के अधोभागने उच्चारित जो 'अच्' वह 'अनुदात्त' कहलाता है। ३. उदात्त और अनुदान मिस स्वर में संमिदिन ही उसे 'स्वरित' कहते हैं। वह (उदात्त, अनुद- स्वरित देनी न प्रकारका ह्रस्व, बोध, प्लुत संज्ञक 'अच्' पुनः अनुनासिक और अननुनासिक भेदने का दो प्रकारका होता है। ( ४ ) मुखनासिका चनोऽखिक:--- मुख और नालिका । उनय , से जिस वर्णका उच्चारण हो वह अनुनासिक संज्ञक वर्ण कहलाता है। नोट:- -इस प्रकारले 'अ, इ, उ, ऋ' इन दोन प्रत्येकके १८ भेद होते हैं । दीर्थ न होने के कारण 'लु वर्णके ( १८ भेद न होकर ) १२ भेद होते हैं। एवं (ह्रस्व न होनेके कारण) 'एच' वर्णोके प्रत्येकका भी ( अगरह-अठारह भेद न होकर ) १२ भेद होते हैं। स्वाका अष्टादश भेदज्ञापक चक्र- , अइउऋल अ इ उ ऋ ए ऐ औ अ इ उ ऋ ल ए ओ ऐ औ हस्वभेद -- दीर्घभेद प्लुत भेद १ ह्रस्व उदात्तानुनासिक ७ दीर्घ उदात्तानुनासिक १३ प्लुत उदात्तानुनासिक २,, उदात्ताननुनासिक उदात्ताननुनासिक १४ ,, उदात्ताननुनासिक ३ ,, अनुदासानुनासिक ९,, अनुदानानुनासिक १५ ., अनुदात्तानुनासिक ४ ,, अनुदात्ताननुनासिक १० अनुदानाननुनासिक १६ ,, अनुदात्ताननुनासिक ५ ,, स्वरतानुनासिक १ . स्वरिटानुनातिक १७ ,, स्वरिनानुनासिक ६ , स्वरितामनुनानिक १२ ,, स्वराननुनासिक .१८ ,, स्वरिताननुनासिक - वर्णम् जिस वर्ण का जिस वर्ण के साथ कालु आदि स्थान आभ्यन्तर प्रयत्न एक हो वह परस्पर सवर्ण संज्ञावाला होता है। नोट:-ऋ-ल वर्णकी भिन्न स्थान होनेपर भी) परस्पर सवर्णसंज्ञा होती है। प ६ सन्धिचन्द्रिका स्थानविचार- १. अ-अकार, कु-क्रवर्ग, ह-और विसर्ग का उच्चारणस्थान कंठ है-अत: इनको कण्ठ्य वर्ण कहते हैं। २ इ-इकार, चु-चवर्ग, 'य' और 'श' का उच्चार- णस्थान 'तालु' है-अ-: इनको तालव्य वर्ग कहते हैं ! ३. ऋ-ऋकार, दु-टवर्ग, 'र' और 'प' का उच्चारणस्थान 'मूर्धा है-अतः इनको मूर्धन्य वर्ण कहते हैं । ४. लु-लकार, तु-तवर्ग, 'ल' और 'सु' का उच्चारणस्थान 'दन्त' है-अतः इनको दन्त्य वर्ण कहते हैं । ५. 3-उकार, पु-नबर्ग और उपध्मानीय (प-फ) का उच्चारण स्मात 'ओड-अत: इनको अंञ्च वर्ण कहते हैं । ६. अ-म-ङ-ण- न' का उच्चारणस्थान नातिका' तथा 'कठ-तालु-मूर्धा-दन्त-ओष्ठ' भी हैं- अतः इनको नासिक नया कण्य, तालब्ध, मूर्धन्य, दन्त्य और ओप्ठ्य वर्ण भी कहते हैं ! 3. एकार-ऐकारका उच्चारणयान के और तालु है-अतः इनको कंस्य, तालव्य दोनों कहते हैं। ८. ओकार-औकारका उच्चारणस्थान कंठ और ओष्ठ है-अतः इनको 'कंव्योष्ठय' वर्ण कहते हैं। ९ वकार का उच्चारणस्थान दन्त तथा 3-अतः इसको दन्त्योच' वर्ण कहते हैं । १०. क ख का उच्चारणस्थान जोनका मूल जड़ भाग) है-अतः इनको जिह्वामूलीय कहते हैं । ११. अनुस्वार का उच्चारणस्थान नासिका है। वर्णोद्भवस्थान ज्ञापक चक्र- कंट वालु । मू दन्त ओड नानिक के. ता.कं. ओ .ओ. जि.म.नासिका ओ औ क ऐ FFROHom १) (भ Isole Fly et le fe fps 11911 अनुस्वार प DAANAarma यत्लो द्विधा-यत्न (प्रयत्न) दो प्रकार का होता है-आभ्यन्तर और बाह्य । नोट:--"प्रकृष्टो यत्नः प्रयत्नः" अर्थात् वर्णोच्चारणके पूर्व हृदयमें जो यत्न संज्ञाप्रकरण ५ करना पड़ता है, उसी प्रयत्नको 'आभ्यन्तरप्रयत्न' कहते हैं । इसका अनुभव उच्चारण करने वालेको ही होता है। दूसरा प्रयत्न मुखसे वर्ण निकलते समय होता है । इसका अनुभव सुनने वालेको भी होता है, अतः वह 'बाह्यप्रयत्न' कहा जाता है। इसका उपयोग सवर्णसंज्ञामें नहीं होता, किन्तु आन्तरतम्य- परीक्षा अर्थात् कई वर्षों में परस्पर अत्यन्त समानताका अन्वेषण करनेके समय इसकी आवश्यकता पड़ती है। पहला-'आभ्यन्तर' प्रयत्न, पांच प्रकारका है १. स्पृष्ट, २. ईषत्स्पृष्ट, ३. ईषद्विवृत, ४. विवृत और ५. संवृत। इन पांचोंमें स्पृष्ट प्रयत्न ( स्पर्शका) 'क' से 'म' पर्यन्त वर्णोंका है । ईष- स्पृष्ट-प्रयत्न (अन्तःस्थोंका) य व र ल वर्णोका है । ईषद्विवृत-प्रयत्न (ऊष्मा- का) शल् वर्णोका है। विवृत-प्रयत्न ( स्वरका ) अच्का है , संवृत-प्रयत्त ह्रस्व अकारका प्रयोगावस्थामें-परिनिष्ठित सिद्ध रूपमें, होता है। किन्तु प्रक्रिया- दशा साधनिकावस्था ) में विवृत ही रहता है। दूसरा बाह्यप्रयत्न' ग्यारह प्रकारके होते हैं-१. विवार, २. संवार, ३. श्वास, ४. नाद, ५. घोष, ६ अघोष, ७. अल्पप्राण, ८. महाप्राण, ९. उदात्त, १०. अनुदात्त और ११. स्वरित। नोट:-जिन वर्णोका उच्चारण करते समय कंठका विकाश हो उनको 'विवार' तदतिरिक्तको 'संवार' एवं जिन वर्णोंका उच्चारण करते समय श्वास चलता हो उनको 'श्वास' जिनका उच्चारण नादसे हो उनको 'नाद' तथा जिन वर्णोंका उच्चारण करनेपर गूंज होता हो उनको 'घोष' तदतिरिक्तको 'अघोष' एवं जिनके उच्चारण करनेमें प्राणवायुका अल्प उपयोग हो उन्हें 'अल्पप्राण' और अधिक उपयोग हो उन्हें महाप्राण कहते हैं। १ खर्-प्रत्याहारका विवार, श्वास और अघोष प्रयत्न है। १ हश- प्रत्याहारका संवार, नाद और घोष प्रयत्न है । ३. वर्गोके प्रथम (क च ट त प) तृतीय (ग ज ड द ब), पंचम (ङ अ ण न म) तथा यण ( य व र ल) का अल्पप्राण प्रयत्न है। एवं वर्गोके द्वितीय (ख छ ठ थ फ), चतुर्थ (घक ढ ध भ) तथा 'शल्' ( श ष स ह ) का महाप्राण प्रयत्न है। ४. 'क' से 'म' पर्यन्त ( कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग) वर्ण स्पर्श कहलाते हैं। नोट: -जीभके अग्र (चोटी) उपान ( अग्रके समीपस्थ प्रदेश), मध्य सन्धिचन्द्रिका (बीच ) और मूल ( आदि ) भागद्वारा कण्ठ, तालु प्रभृति स्थानोंका स्पर्श करके कवर्गादि वर्णोका उच्चारण होता है अतः इनका नाम स्पर्श वर्ण है। ५ यण-(व व र ल ) अन्तःस्य कहलाते हैं । नोट:-अन्तःस्य का मतलब है बोचवाला । 'य व र ल' स्वर और व्यंजन के बीच के हैं। ६. शल- श ष स ह ऊष्मा कहलाते हैं-जिन वर्णोके उच्चारणमें गर्म वायु का प्राधान्य हो उसे अम वर्ण कहते हैं । ७. अच-( अ इ उ ऋ ल ए ओ ऐ औ) स्वर कहलाते हैं। कख -यहाँ ककार, खकारसे पूर्व विसर्गार्ध के समान जो ध्वनि है वह जिह्वा- मूलोय है। पक-यहाँ पर पकार, फकारसे पूर्व विसधिके समान जो ध्वनि है वह उपध्मानीय है । अं अः-यहाँ पर अकारसे पर जो ध्वनि है वह यथाक्रमने अनुस्वार, विसगं वाचक है। नोट:-'न' और 'म्' के स्थानमें अनुस्वार तथा 'रेफ' के स्थानमें विसर्ग होता है अतः अनुस्वार-विसर्ग पृथक् वर्गोमें नहीं गिने जाते । आभ्यन्तर और बाह्यप्रयत्न ज्ञापक चक्र- . - Daktille प्रयत्न स्पृष्ट ईषत्स्पष्ट ईषद्विवृत विवृत संवृत संज्ञा स्पर्श उदात्त, दात्त, स्वर अनु- स्वरित 144 अन्तःस्थ hi व्यञ्जन, स्वर 44 प्रयोग में हस्व अ. है उदात्त, अनु- ठ त थ अ.प्राम.प्रा. अल्प.प्रा.म.प्रा. अल्प.म.प्रा.म.प्रा. अल्पप्राण विवार संवार संवार संवार विवार) सं. संवार श्वास नाद नाद श्वास नाद अघोष घोष घोष , घोष अघोष घो. घोष दात, स्वरित । अल्प. संवार Thirt घोष स्वरसन्धि (६) अणु दित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः जो विधान किया जाय वह प्रत्यय और तद्भिन्न अप्रत्यय कहलाता है । एवं च सूत्रार्थ यह हुआ कि - जिसका विधान न किया गया हो ऐसा अण् (प्रत्याहार) और उदित् ( कुत्रु दु तु पू) अपने सवर्णके बोधक हों। फल यह हुआ कि 'अस्य बौ' ह्रस्व अकारसे दीर्घ आकारका भी ग्रहण हुआ और उससे 'गाङ्गी' भवतिमें 'गङ्गा' के आकारका ईत्वविधान सफल हुआ नोट:-केवल इसी ( अणुदित् ) सूत्रमें 'अण्' प्रत्याहार पर ( 'लण् सूत्रस्थ ) णकारसे समझना चाहिये । तथा च हरिकारिका- परेणैवेण्ग्रहाः सर्वे पूर्वेणेवाणग्रहा मताः । ऋतेऽणुदित्सवर्णस्वेत्येतदेकं परेण तु॥ maar - समिप्रकरण दो वर्ण परस्पर अत्यन्त निकटवर्ती होनेसे जो मिल जाते हैं, उस मिलनको 'सन्धि' कहते हैं। सन्धि ३ प्रकारकी होती है। १. स्वर-सन्धि, २ व्यञ्जन-सन्धि और ३.विसर्ग-सन्धि। सन्धिकी व्यवस्था- 'सन्धिरेक पदे नित्या, नित्या धातूपसर्गयोः । नित्या समासे, वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ।। एक पदमें, धातु और उपसर्गक तथा समासमें नित्य (निश्चितरूपेण) सन्धि होती है, किन्तु वाक्यने विवक्षाकी अपेक्षा रखती हैं अर्थात् वाक्यमें वक्ताकी इच्छा पर सन्धि होती है। * १. 'पद' अप्तिङन्तं पदम्' 'सुप्' अथवा तिङ् प्रत्यय जिसके अन्तमें हो वह पद कहलाता है ! : भ्याम् आदि हलादि विभक्तिके पूर्व जो हो वह भी 'पद' कहा जाता है। २ धातु' भूवादगो वातवः' जिन 'भू' प्रभृति शब्दोंने क्रियाका ज्ञान हो हो उन्हें धातु कहते हैं। ३ 'समास' उपसर्गाः क्रियायोगे'-क्रियाके साथ योग होनेपर-प्र.परा अप सम् अनु-अवनिस्-निर्-स्-दुर्-वि-आङ नि-अधि अपि-अतिनु-उत्-अभि-प्रति-परि- उ शब्दोंको उपसर्ग कहते है। ४. 'समास'दो अथवा उससे अधिक शब्दोंके मेलका नाम समास' है।
१. सन्धिचन्द्रिका - - - उदाहरण- १. एक पदमें-ने-अयनम् = नयनम् । भो+अति= भवति २. धातु और उनसर्ग में-अधि+ आगच्छति = अध्यागच्छति । ३. समासने-राज्ञः+अश्वः=राजाश्वः । ४. वाक्यनें-द्वाविशे एव वर्षे इन्दुमती अधिजगाम नाकम् । स्बर सन्धि स्वर वर्णक स्वर वर्ण के साथ जो सन्धि होती है उसे 'स्वर-सन्धि' कहते हैं ? (१) अकः सवर्णे दीर्घः 'अक्' प्रत्याहार घटक वर्णसे अव्यवहित परमें कोई भी सवर्ण (सजातीय) 'अच् प्रत्याहार टक वर्ग हो तो दोनो मिलकर दीर्घ हो जाता है* (यह सूत्र गुण और यण का बाधक है। उदाहरण- १. अ + अ = आ-दत्य अरि:=देत्यारिः । आ-आ = आ- विद्या+आलयः विद्यालयः । अ+आ आ कमल+आकरः कमला- करः। आ+=आ-श्रद्धा+अस्ति-श्रद्धास्ति। २.६+इ-ई-फणि+इन्द्रः-फरगोन्द्रः । ई+६=ई-श्रो+ ईश:-श्राशः ! ई+इ = ई-महती+इच्छा = महतोच्छा। इ+ई=ई- कवि+ईश्वर:=कवीश्वरः। ३. उ+3-ऊ-भानु+उदयः= भानूदयः । ऊ+ऊऊ-भू+ ऊर्ध्वम् =भूर्ध्वम् । ऊ+3=-वधू+उत्सवः वधूत्सवः। उ+ऊ= ऊ-लघु + मिः = लघूमिः । ४. ऋ+ऋ= तृ-होत+ऋकार:=होस कारः । ऋ+ल=ऋ-होतृ+ लकार:=होह कारः। 2 'शकन्वादिषु पररूपं वाच्यम्'--रानन्धु आदिके विषय में जिस प्रकार उनकी सिद्धि हो पैसा पररूर करना चाहिये इसलिये-शक+अन्धुः=शकन्धुः, कर्क+ अन्यु:-कन्युः । इन स्थानों में दोई नहीं होता। शकन्वादि 'आकृतिगण' है - 'आकृत्या=स्वरूपेण, कार्यदर्शनेन, गण्यते- परिचीयते' इति 'आकृतिगणः' । अत एव -मृत+अण्ड:=मृतण्डः सम+अर्थः =समर्थ इत्यादिकी भी सिद्धि होती है।
स्वरसन्धि D । (२) आदगुणः अवर्णसे पर 'अच्' (इ-उ-ऋ-लु वर्ण) हो तो पूर्व-परके स्थानमें गुण एक आदेश होता है। उदाहरण- १.अ+इ=ए-उप+इन्द्रः = उपेन्द्रः। अ+ई-ए-देव+ ईशः= देवेशः। आ+इ=ए-महा + इन्द्र = महेन्द्रः । आ+ई = ए-रमा+ईश: रमेशः। २. अ+उ =ओ-सूर्य + उदयः = सूर्योदयः । अऊ-ओ-प्रा- साद + ऊर्ध्वम् = प्रासादोर्ध्वम् । आ+उ=ओ-गङ्गा+उदकम् = गङ्गोदकम् आ+ऊ=ओ-दया+ऊनः= -दयोनः ३. अ+ ऋ=अर्-देव + ऋषिः = देवर्षिः। अ+ ऋ=अर--- उप+ ऋकारीयति-उपकारोयति । श्रा+ऋ= अर्-ब्रह्मा+ऋषि = ब्रह्मर्षिः । मा+ऋ=अर्-देवता+ऋकारः = देवतरिः । ४. अ+= अल्-प्लुत+लकार:प्लुतलकारः । आ+ल = अल् आ+लकार:=अलकारः। नोट:-विशेष रूपसे कहे गये कार्योंके प्रति सामान्य रूपसे कहे गये कार्य बाधित हो जाते हैं। यथा-( गुण बाधक वार्तिक )- (क) अक्षाहिन्यामुपसंख्यानम् – 'अक्ष' शब्दसे पर 'ऊहिनी' शब्द हो तो पूर्व परके स्थानमें (अ+ऊ मिलकर ) वृद्धि एकादेश ( औ ) होता है। यथा-अक्ष+ऊहिनी-अक्षौहिणी (परिणाम विशेष विशिष्ट सेना ) (ख ) स्वादोरेरिणो:-स्व शब्दसे पर 'ईर' वा 'इरिन्' शब्द रहे तो अ ई मिलकर वृद्धि ऐ होता है। यथा-स्व+ईर:=स्वरः स्वाधीनता) स्व+ईरिन् - स्वैरी(स्वच्छन्दचारी) (ग) 'प्रादूहोढोढयेषेष्येषु-प्र उपसर्गके बाद ऊह, ऊन, ऊडि और एष * हल+ईषा-हलीषा, लाङ्गल+ ईषा = लागलीपा, इन जगहों में गुण न होकर "शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्" से पररूप हो जाता है। * जिस सेनामें २१८७०हाथो हों और इतने ही रथ हों तथा ६५६१० घोड़े हों, १०९३५०पैदल चलनेवाले हों उन विशिष्टसेनाओंका नाम अक्षौहिणी' है प्रमाणअक्षौ- हिण्या:प्रमाणंतुखाङ्गाष्टकद्विकैर्गजारौरेतैर्हौस्त्रिध्नैःपञ्चभ्रंश्चपदातिभिःमहाभारत.
सन्धिचन्द्रिका maste प्र+ऊहः proland ) । एष्य शब्द रहे तो अ+ऊ मिलकर 'औ' तथा अ+ए मिलकर वृद्धि 'ऐ' होता है। यथा- प्रौहः (उत्तम तर्क)। प्र+ऊड:-प्रौढः (विचारवान, निपुण ) प्र+ऊढिः = प्रौढिः ( प्रौढता )+ एषः=प्रेषः=(प्ररणा प्र+एण्यः = प्रेष्यः ( नौकर ) । (घ ) 'ऋते च तृतीयासमासे' -अवर्ण से पर ऋत शब्द हो तो(तृतीया समासमें ) अवर्ण और ऋवर्णके स्थान में वृद्धि 'आर्' होता है । यथा-(सुखेन ऋतः ) सुख+ऋतः सुखातः । ङ) प्रवत्सतरकम्बलवसनाणदशानामृणे'-प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन ऋ और दश शब्दोंसे पर यदि 'ऋण'शब्द हो तो पूर्व-पर (अ+ऋ.) मिलकर वृद्धि 'आर् होता है। यथा-प्र+ऋणम् =प्रार्णम् । वत्सतर+ऋगम् = वत्सतराणम् । कम्बल+ ऋणम् =कम्बलार्णम् । वसन + ऋणम् = वसनार्णम् । ऋण+ऋणम् =ऋणा णम् ऋण चुकानेके लिए लिया हुआ दूसरा ऋण) । दश+ऋण: दशार्णः ( दश ऋणानि = दुर्गभूमयः यस्मिन् प्रदेशे सः । इस प्रयोगमें ऋण शब्द का दुर्ग- भूमि अर्थ है । विन्ध्यप्रदेशका नाम 'दशाण' प्रसिद्ध है।) ( ३ ) वृद्धि रेचि-- अवर्णसे पर 'एच' हो तो पूर्व-परके स्थान में वृद्धि एकादेश हो * । नोट:--'वृद्धिरादेच' इस सूत्रने आ और ऐचकी वृद्धिसंज्ञा होती है। एवं च आ-ऐ-औ इन वृद्धिसंज्ञक वर्णोने अतिशय सादृश्यात् अकार-एकारके स्थानमें पूर्व पर मिलकर 'ऐ' और अकार-ओकारके स्थान में पूर्व-पर मिलकर 'औं' होताहै। उदाहरण- १. अ + ए=ऐ -कृष्ण+एकत्वम् =कृष्णैत्वम् । अ+ऐ-ऐ- पा+एप्यः न एङि पररूपम् सूत्र ६ से पररूप प्राप्त था। "निरवाशी विधिरपवाद:"-जिस विधिका अवकाश कहीं नहीं हो उसे अपवा-- द' कहते है। 'वृद्धिरेत्रि की जहाँ प्राप्ति होती है, वहाँ आद्गुणः' अवश्य प्राप्त होता है। अतः 'वृष्टिरेचि' अपवाद हुआ और अपवाद विधि बलवान होती है इसलिये जहाँ वद्धिकी प्राप्ति होगी वहाँ आदगण नहीं लगेगा। । m- स्वरसन्धि MAMAND देव+ऐश्वर्यम् = देवैश्वर्यम् । अ+ओ=औ-दिव+ओकसः = दिवौकसः । अ+औ=औ-कृष्ण+औत्कण्ठ्यम् = कृष्णोत्कराठ्यम् । २. आ+ ए =ऐ-सदा+एव = सदेव। आ+ऐ-ऐ-महा-ऐरा- वतः = महेरावतः। आ+ओ = औ-गङ्गा+ओघः= गोषः। आ+ औ=औ-महा+औचित्यम् =महौचित्यम् ( ४ ) उत्येषत्यूठ- अवर्णसे पर एजादि इण् धातु एति), और एथ् धातु (एधते) तथा जळ रहे तो अ+ए मिलकर 'ऐ' और अ+ऊ मिलकर वृद्धि 'औ' होता है। यह सूत्र पररूप और गुण का बाधक है। उदाहरण- १. उप+एति = उपैति । २. उप+ एधते-उपैधते। ३. प्रष्ठ+ ऊहः=प्रष्ठौहः (यहां 'वाह' को "वाह ऊ" सूत्रसे 'ऊ' आदेश होनेसे 'जहः' बनता है)। (५) उपसर्गादृति धातौ-- अवन्ति उपसर्गसे पर ऋकारादि धातु हो तो पूर्व-परके स्थान में वृद्धि 'आर होता है । ( यह सूत्र गुणका बाधक है) उदाहरण- १. प्र+ऋच्छति =प्रार्छति । उप+ऋच्छति = प्रार्छति । उप+ऋच्छति = उपार्छति । प्र+ऋ- णोति=प्रार्णोति । प्र ऋच्छन् = प्राच्र्छन् । उप+ऋच्छन् = उपार्छन् । (६) एडि पररूपम्- अवर्णान्त उपसर्गसे पर अदि बातु हो तो पूर्व-परके स्थानने पररून एका देश हो अर्थात् पूर्व वर्ण (अ) का दर्शनाभाव हो जाय । (यह सूत्र वृद्धिका बाधक उदाहरण- १. प्र-+एजते-प्रेजते। २. उप + ओषति= उपोषति।
m सन्धिचन्द्रिका - (७) ओमाङोश्च- अवर्णसे पर 'ओम्' अथवा 'आङ' हो तो पूर्व-परके स्थानमें पररूप एकादेश हो । ( यह सूत्र वृद्धि का बाधक है ) उदाहरण- शिवाय+ओं नमः = शिवायों नमः । (आ+इहि = एहि ) शिव+एहि = शिवेहि । (८) इको यणचि-- इक् प्रत्याहारके बाद यदि अच् प्रत्याहार हो तो इक् प्रत्याहारके स्थान में यण् प्रत्याहार होता है। नोट :-( क ) इवर्णके बाद इवर्णभिन्न स्वरवर्ण रहनेपर इवर्णके स्थानमें 'य्' होता है। ख) उवर्ण के बाद उवर्णभिन्न स्वरवर्ण परे रहने पर उवर्णके स्थान में '' होता है। (ग ) ऋवर्णके बाद ऋ-लभिन्न स्वरवर्ण रहनेपर ऋवर्णके स्थान में '' होता है और र् पूर्व वर्णसे युक्त हो जाता है। (घ) लवर्णके बाद लु-ऋभिन्न स्वरवर्ण रहनेपर लुके स्थानमें 'ल' होता है और ल पूर्व वर्णसे युक्त हो जाता है। उदाहरण- १. इ+अ-य-अति+अन्नम् = अत्यन्तम् । इ+आय-दधि+ आन्य = दध्यानय । ई+आय--देव+अर्चा = देव्यर्चा। ई+आ देवी+आगच्छति = देव्यागच्छति। इ+उ-य-प्रति+उपकारः प्रत्यु- पकारः: इ+ऊ= य-अति ऊचुः = अत्यूचुः ई+उ=य-सुधी+उपास्यः = सुध्युगस्यः। ई+ऊ=य-सखो+जरुः = सख्यूरुः । इ+ऋ=य-अभि+ ऋकार:=अभ्यकारः। ई+ऋ=य-देवी + ऋषभः=देव्यूषभः। ई+ऋ = य-देव+ऋकारोयति = देव्यकारीयतिाइ+=य अति+लकारः अत्यल वार:इ-एय-प्रति+एकम् = प्रत्येक म्। इ+ऐ = य-मति+ऐक्यम् = * ऋकार और लकारघटित प्रयोगोंका प्रचुर व्यवहार लोक में नहीं होता। पा० महाभाष्य आदि ग्रन्थोंमें ऐसे अधिक प्रयोग देखे जाते हैं । य- स्वरसन्धि १५ - - मत्येक्यम्। ई+ए-य-गौरी+ एवम् = गौर्येवम् । ई+ऐ= य-लक्ष्मी + ऐश्वर्यम = लक्ष्म्यैश्वर्यम्। इ+ओ-य-दधि+ओदनः = दध्योदनः । इ+औ = य-अति+औदास्यम् = अत्यौदास्यम् । ई+ओ-य-देवी+ ओजः=देव्योजः। ई+ौ-य- सखी + औपम्यम् = सख्यौपम्यम् २ उ+अव-वस्तु+अत्र = वस्त्वत्र । उ+आ-व- लघु+ आचारः = लघ्वाचारः। ऊ+अ = = वधू - अन्वेषणम् = वध्वन्वेषणम् । ऊ+आ-व-वधू+आगमनम् =वध्यागमनम्। उ+६-~~ लघु +इन्दुः लध्विन्दुः। उ+ईव्-मधु+ईशः= मध्वीशः। ऊ+३=-तनू + इन्द्रः तन्विन्द्रः । ऊ+ई-वधू+ईक्षणाम् = वध्वीक्षणाम्। उ+ऋ =व-लघु+ऋणम् -लघ्वृणम्। उ+ऋ=-सु+ऋकारः%स्वकारः। उ+लुव-मधु+तृतः=मध्व्लुतः । उ-ए-अनु+एषणम् = अन्वेषणम् । उ+ऐ = व्-साधु+ऐक्यम् = साध्वक्यम् । ऊ+ए - व्-वधू - एका-वध्वेका । ऊ+ऐ= व-तन+ऐश्वर्यन्=तन्वैश्वयंम् । उ+ओ= व्= साधु+ओकः = साध्वोको । उ+औ=-लघु+औदार्यम् = लघ्वौ- दार्यम् । ऊ+ओ =-इन्भू+ओषधिः = इन्भ्वोषधिः । ऊ+औ=- करभू+औडलोमिः केरभ्वौडलोमिः । ३. ऋ+अ=-पितृ+अर्थम् =पित्रर्थम् । ऋ+आर- मात्राकृतिः । ऋ+अर्कृ+अर्थम् = ऋर्थम् । ऋ+आ = र् - कृ+आकृति:=क्राकृतिः। ऋ+इ-र-मातृ+इच्छा- मात्रिच्छा : ऋ+ई=र्-पितृ+इहितम् =पित्रीहितम् । ऋ+उर्- पितृ+उदकम् = रित्रुदकम् । ऋ-ऊ-र-भात+जनः भ्रात्रुनः । ऋ+ए-र-धातृ+एवम् =धात्रेवम् । ऋ+ऐ= २-मा+ऐश्वर्यम् = भ्रात्रैश्वर्यम् । ऋ+ओ = र्-जामातृ+ओक:=नामात्रोकः ऋ- औ= र्-पितृ+औदार्यम् =वित्रौदायम्। ४. लु+अल-लु+अर्थम् = लर्थम् । ल+आल+ आकृतिःलाकृतिः। (६) एकोऽयबायाव:- 'एच' प्रत्याहारके बाद 'अच्' प्रत्याहार रहे तो एच-(ए ओए औ स्थानमें, क्रमसे अय, अव, आय, आव आदेश हों। मातृ+आकृतिः - सधिचन्द्रिका pma- । आः % उदाहरण- १. ए+अ% अय्-ने+अनम् =नयनम् । ए+आअय्-रमे+ रमया। ए+इ = अय् शे+इतः शयितः। ए+ई = अय्-शे+ ईत =शयोत : ए+उ=अय्-मृगे+उ: मृगयुः। ए+ऊ-अय्-मे+ ऊरः= मयूरः । ए+ऋ=अय्---गृहे+ऋत्विक् =गृहयात्वक् । ए+0= अय्-वने + लुतकः-वनयल तक: । ए+ ए = अय्-हरे+ए हरये। ए+ऐ=अय्-शे+ऐ=शेये । ए+ओ=अय्--बने+ओ: वनयो।। ए+औ= असे+औसयौ। २. ऐ+अ-आय-नै+अकः-नायकः । ऐ+आआय- रै+आन्=रायाम् । ऐ+इ-आय-- + इत: शायितः। ऐ+ई= आय--+ ईशः=रायाशः। ऐ+उ आय-ऐ+उ:=आयुः । ऐ+ ए = आय-रै+ए = राये। ऐ+ओ=आय-रै+ओः= रायोः। ऐ+ और आय मुखै+औ=सखायौ ३. ओ+अ = अद्-भो+अनम् = भवनम् । गो+आन् = गवाम् ! ओ+ इ = अव - गो+३=गवि। ओ+ई अव्- औणों+इत्-और्णवोद । ओ+उ = अव-- अजुहो+उ = अजुवुः। ओ+ ए - अव - गो+ए=गवे । ओ+ओ=अव-गो+ओ:=गवोः। ओ-अ= आव-न-अक:=पावकः । = आव- ग्लो+आ = ग्लावा। औ+३ = आव-अभी+३= अभावि : औ+उ= आव्-अदादौ+उच्यन्ताम् = अदादावुच्यन्ताम्। +ऊआव-भ्वादौ+ ऊचुः = भ्वाद वुचुः औ-ए-व-पन्दौ - ए = ग्लावे ! औ+ओ=आव- नौ+ओ:-नावा: ओ ओ भा -गौ+औ=गावो। - । ओ+आ=अवmalod ! प्रो+आ = D Kumar HAR अवर्णक बदाम यकार-ककारका लोप हो, विकल्प अश के परे : यहां लोप होने पर सन्धि नहीं होती है :) १. हरे-हरह-घर यह २. विज+इ =विष्णा इह-विष्ण विह।
स्वरसन्धि १७ Rsax ३. देव्यै + अर्पय = देव्या अर्पय देव्यायर्पय। ४. री + अस्तङ्गते = रवा अस्तङ्गते रवावस्तङ्गते । (११) एङ: पदान्तादति-- उदरे अन्त में स्थित 'ए' के बाद 'अत्' (ह्रस्व अकार) रहे दो अकारका पूर्वरूप होता है अर्थात् श्रवणाभाव हो जाता है । उदाहरण १. हरे + अव = हरेव । मुने - अत्र = मुनेत्र । २. विष्णो + अव = विष्णोव । गुरो + अव+गुरोव । (१२) अवङ् स्फोटायनस्य- अच् परे रहने पर पदान्त विषयमें एङन्त गोशब्दको अवड् आदेश हो, विकल्पसे । (१३) सर्वत्र विभाषा गो:-- अत् ( ह्रस्व अकार ) परे रहने पर पदान्त एङन्त गोशब्द ( गोशब्दाक्यव ओकार) को विकल्पसे प्रकृतिभाव हो अर्थात् सन्धि नहीं हो। नोट: -अच् परे रहने पर पदान्त में स्थित गोशब्दके ओकारको १२ वाँ सूत्रसे 'अवङ आदेश होकर १ ला सूत्रसे सवर्ण दीर्घ हो जाता है अथवा १३वाँ सूत्रसे प्रकृतिभाव होता है । ज्यों का त्यों रह जाता है ) अथवा ११ वां सूत्रसे अकारका पूर्वरूप होजाता है। उदाहरण- गो + अग्रम् = गवानम्-गो अग्रम्-गोग्रम् । (१४) इन्द्र शब्द परे रहने पर गो शब्दके ओकारको नित्य ही, 'अव होता है ( अवादेश होने पर अ-इ मिलकर गुण ए होजाता है । ) उदाहरण- गो+इन्द्रः = गवेन्द्रः। २ स० च० इन्द्रे च- - ( स्वरसन्धि-निषेधप्रकरण ) (१) दूराद्धृते च- दूरले सम्बोधन (नामोच्चारणकर पुकारने में प्रयुक्त वाक्यको टि को विकल्प से हो (अर्थात् कोई भी सन्धि नहीं हो केवल प्लुतका चिन्ह (३) रह जाय) उदाहरण आगच्छ कुष्म ३ अत्र गौश्वरति । भो मित्र (३) इन्दुमती त्वां नमस्करोति । (२) ईदूदेद्विवचनं प्रगृह्यम्-- स्वर वर्ण परे रहनेपर द्विवचन में निष्पन्न--ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त पदकी सन्धि नहीं होती। उदाहरण- १. हरी एतौ-हरी एतौ ! कत्रो + आगच्छतः = कवो आगच्छतः। २. विष्णू + इमो = विष्णु इमौ । ऋतू + अतीतो = ऋतू अतीतौ। गङ्ग + अमू = गङ्गे अमू । बालिके+उच्चलतःबालिके उच्चलतः। ( ३ ) अदसो मात्-- स्वरवर्ण परमें रहने पर अदस् शब्द निष्पन्न 'अमी' और 'अमू' पदकी सन्धि नहीं होती। उदाहरण- १. अमो+ ईशाः = अमो ईशाः । अमी+ अश्नन्ति = अनो अश्नन्ति । २. रामकृष्णावमू + आसाते = रामकृष्णावमू आसाते। अमू + अत्तः= -- - अम् अत्तः। (४) ओत्-- स्वरवर्ण परे रहनेपर ओकारान्त निभात। (अव्यय) को पन्धि नहीं होता। उदाहरण- अहो + ईशाः = अहो ईशाः । अहो + आश्चर्यम् = अहो आश्चर्यम् । ( ५ ) निपात एकाजनाङ्- एक स्वर मात्र निपात (अव्यय) की सन्धि नहीं होती। R- स्वरसन्धि उदाहरण- अ: अच्युतः = अ अच्युतः। 7 मिलन -आ एवं किल तन् । इx इन्द्रः = इ इन्द्रः। उx उमेश:-उनेगः। नोट:--ईश्त् ( अल्ल ) अर्थ समझने ले एवं क्रिया के साथ योग होनेसे व्या नर्यादा और प्रविधि अर्थ में एक स्वर मात्र निमत होते हुए भी आङ् ( आ की सन्धि होती है । इसी लिए उपर्युक्त सूत्र में अनाई आवजित) कहा गया है । - उदाहरण- १. ईषत् अर्थमें--आ णम् = ओष्णम, ( थोड़ा गर्म ) २. क्रिया के योगमें--आX इहि = एहि । ( आओ) ३. मर्यादा (सीना' अर्थ में- अन्वुधेः = आम्बुधः ( समुद्रतक ४. अभिविधि ( मर्यादाका प्रभेद व्याप्ति' अर्थमें--आ X एकदेशात् = ऐ ऐक- देशात् ( एकदेश ब्यापकर) सन्धि करो- १. त्रिपुर X अरिः। महा + आलयः । अभि + इष्टम् । प्रति + ईक्षणम् । भानु + उदयः । तनू+उर्ध्वम् ! पितृ + ऋणम् । २. देव + इन्द्रः । गण+ईशः ! यथा + इति । उमा+ईशः। हित-उप- देशः । एक + ऊनविंशतिः । गङ्गा उत्तरम् । महा+अरुः । शुभ्र+ ऋषिः । ह्रस्व + लुकारः । ३. जन + एकता । महा + ऐश्वर्यम् । जल+ओषः। सुखस्य + औपयिकम् । ४. अव+एति प्र+ एधते : विश्व + अहः । ५. प्रऋणोति । उप+ ऋच्छन् । ६. अव+ एजते । उप + एजते । प्र+ओषति । ७. का + ओम् । या+ओम् । अद्य + ओढा । कदा+ओढा । अब एहि । अद्य + अर्यात् । ८. दधि अत्र । वस्तु+इदम् । वधू + आननम् । सुधी+ऊहितम् । मातृ + अर्थम् । गम्ल+अर्थम् । ९. चे+अनम् । लो+ अनम् । चै+ अकः। स्तो+अकः । मुने +ए।
२० सन्धि चन्द्रिका am . गुरो+ए । के + एते । अचै+इ। अलौ+ इ ! गुरौ+उत्कः । हरौ + औत्सुक्यम् । व्ये + एते। १०.के + आसते । अस्मै+ उद्धर । श्रियै + उद्यतः। द्वौ+ अत्र । असो+ आदित्यः । हरे + इह । विष्णो + इह । ११. वायो अत्र । कवे+अव । विभो + अब । हरे + अत्र । १२. गो + अजिनम् । गो + ईशः। गो+ उष्ट्रम् ! गो+ ओदनम् । गो + अक्षः गो + अञ्ची । गो+ अभु । गो + अग् । १३. गो + अश्वम् । गो + अजिनन् । गो + अञ्चा। गो + अक्षु । विच्छेद करो १. शशाङ्कः । रत्नाकरः । लतान्तः । दधीव । लक्ष्मीशः । महीन्द्रः । क्षितीशः। विष्णूदयः । भूर्वम् । ऊरूद्भवः। गुरुहः : २. महेन्द्रः । देवेशः । यथेति । महेश्वरः। व्याघ्रोत्पातः । इतोर्ध्वम् । महोष्णम् । विद्योनः । हिमतुः । देवतः । महरिः । तवल्कारः । अल्कारः। ३. पञ्चैते । शुद्धरावती । मैवम् । विद्यैश्वर्यम् । तवौदनः । चित्तौदास्यम् । महौचित्यम् । ४. अपैति । अवैधते । विश्वौहः । ५. प्रार्छन् उपार्णोति। ६.प्रेषयति । अवोषति । ७. अवेहि । रामहि । ८. अत्यव्यक्तः । हर्यागमनम् ! नद्यम्बु । लक्ष्म्यागमनम् । मुन्युचितम् । इत्यू- ज़म् । सख्युपदेशः । नधुष्णा । अत्यजुः । देभ्यणम् । नह्येवम्। अध्यरावती। लक्ष्म्येकता। पप्यैषमः । अध्योङ्कारः । अत्यौदरिकः भूखसे व्याकुल)। नद्योधः। देव्यौदार्यम् । तत्वङ्गो स्वागतम् । वध्वाचारः । चञ्च्वाधातः साध्विदम् । धेन्वीरितः । सुभ्र वीशः। वध्वक्यम् । धेन्बोकः । जामात्रयम् । भ्रात्रागमनम् । कत्रिदम् । दुहित्रीहितम् । श्रात्रुपकारः ! प्रशास्त्रूर्ध्वम् । भ्राकान्तः। पित्र- श्वर्यम् । पित्रोदनम् । कौत्सुक्यम् । लर्थम् । लानय । ९. जयति । शयिष्यते । गृहबुदकम् । भूमतये । अनयोः । रायो। ग्लायति । मुनयागच्छ । सर्वस्मायिदम् । मायः (पित्त ) ग्लायेः। स्तवनम् । हविः । ।
व्यञ्जन-संधि २१ । । गवुत्सवः । गवैश्वर्यम् । स्मृतावौं । स्तावकः । स्मृतावा । श्रावयिष्यति । भावुकः । गवे । जनावौ। १०. ययिह । श्रियायुद्यतः । विधावुदिते । ११. केपि । देवोपि । पण्डितोसौ। १२. गवायनम् । गवोद्धः । १३. गवेन्द्रः । १४. एहि मित्र ३ अत्र पठेव ! आगच्छ राम ३ इह मैथिली पुष्पं सचिनोति १५. कवी इमौ । शम्भू आगच्छतः । बालिके अधीयाते । १६. अभी अश्नन्ति । अमू आस्ताम् । १७. अथो अपि । अहो आगतः । १८. आ एवंन मन्यसे । उ उमेशः । शुद्ध करो-- १ रामात्र एहि, विष्णूभी, कवीमो, मृताण्डः, दिगेशः, स्वेरः, उपरोक्तम्, दिवो- कसः, अक्षोहिणी, प्रोडः, सुखतः, प्रैजते, केशवोर्ध्वम्, तवैदम्, प्रेषयति, रामैहि, उपैतः, प्रैषः, अवैहि, मालार्छति, प्रार्छकः, देवोजः, बालोपति मालेजते, रामेति, वेघसायोंनमः, विष्णवायॉनमः, वस्त्वुदकम्, दध्यिदम् , पित्रणम्, रवीशः, गविन्द्रः, भवुकः, देव अतति । इरौऽव, विष्णोऽव, चेऽनम् । सबै, चित्रगवानम्, गो उष्ट्रम्, गो ईशः, सो उद्धः । व्यञ्जन-सन्धि व्यञ्जन वर्ण के साथ व्यञ्जन ग्यास्वर वर्णके मेलेको 'व्यञ्जन-सन्धि' कहते हैं । यश-तत् टी = तट्टीका । तस्मिन् “ इति = तस्मिन्निति ! () स्तोमचुनः चुः- सकार और तवर्ग के स्थान शकार और चवर्गके योग होनेन : आगे या पीछे रहनेपर ) दन्त्य सकारकै लान, तालव्य शकार और तवर्गके स्थानमें चवर्ग* होता है। *शात्' सू० । शकारसे पर तवर्गको चवर्ग नहीं होता। यथा--विश्नः, प्रश्नः ।
२० सधिचन्दिका wear उदाहरण- गमम् + शेते = रामोते ! रामस् + चिन्गेति x गमश्चिनोति । तत् -निवः तच्छिवः । सत् + चित् = सच्चित् । तत् + छविः - तच्छविः । एतद् + जलम् एतज्जलम् । शाङ्गिन् + जय = शाङ्गिञ्जय ! तत् +झनकारः = तज्झ- नत्कारः । याच् + ना = याज्ञा । यज्+नः = यज्ञः । (२) टुनाष्टः पकार या टवगंके योगमें ( आगे या पीछे रहनेपर ) दन्त्य सकारके स्थान में मूर्धन्ध पकार और तवर्गके स्थानमें यथाक्रमेण टवर्गक होता है । उदाहरण- रामस्+पष्टः = रामष्पष्ट । रामस् + टीकते = रामष्टीकते । तत्+टोका = तट्टोका ! अग्निचित् + ठकारः = अग्निचिट्ठकारः। सोम- सुत् + डोनः = सोमसुड्डोनः ! अद् + इति = अड्डति । चक्रिन् + ढौकसे = चक्रिण्डौकसे ! पेप् + ता = पेष्टा ! अधिः । याता = अधिष्टाता। ( ३ ) झलां जशोन्त- पदान्तमें स्थित 'झल' प्रत्याहारके स्थानम 'जग्' प्रत्याहार होता है। उदाहरण- वाक् ४ इशः = वागोशः ! अच् + अन्तः =अजन्तः। षट्+विद्वांसः = पविद्वांमः : जगत् + ईश: जगदोश: । तत् + धनम् = तद्धनम् । बुध + भ्याम् = युभ्याम् । अ + भाण्डः = अभाण्डः । ( ४ ) झमे होऽन्यतरस्याम्-- 'झ' प्रत्याहारके बाद याने इ--- -म्-को छोड़कर वर्गके किसी *'न पदान्ताबोरनाम्, 'अनाम-नका गरीणामिति वाच्यम्' वा० । पदान वर्गने पर नाम नबीर के सभार और तवर्ग के तृत्व नहीं हारा था-- पद सन्तः पट् ? झला जश मानकर यदि दान में ल वी पर 'झम बा हो तो 'झन् के समान में 'जर (वर्गका तीसरा ) होचावा है । 'न उपास्यः' ऐसी स्थिति में 'ब' को 'द' होकर सुद्धय उपास्यः' ऐसा बनता है। - Japanesaway - व्यञ्जन-सन्धि २३ - भी वर्णके आगे ‘ह रहे तो उस वर्ग के स्थानमें उसी वर्गका तृतीय वर्ण ( ग- ज्-ड्-द्-६ ) और 'ह' के स्थान में क्रमसे उसी वर्गका चतुर्थ वर्ण (ध्-झ्-द- घ्-) विकल्पसे होता है। उदाहरण- वाक् - हरिः = वाग्धरि-यागहरिः । तत् + हितम् - तद्धितम्-तद् हितम् । तत् + हननम् = तद्धननम्-तद्हननम् । वित् + हेतुः = विपद्धेतुः-विपद् हेतुः । अच् + ह्रस्वः = अज्झस्वः-अज् ह्रस्वः । षट् + हलानि - षड्ढलानि षड्हलानि ! अप् + हरणम् = अब्भरणम्-अब् हरणम् । ( ५ ) खरि च-- 'स्वर' परमें हो तो 'झल् के स्थानमें 'च' ( क्-च-ट्-त्-८) होता है । उदाहरण- १. द + थानम् = उत्थानम् । २. उद्+तम्भनम् - उत्तम्भनम् । ३. उद् + थापकः % उत्थापकः। दिग+पालः । सम्पद् + कामः = सम्प- कामः ! विराड्-पुरुषः = विराट्पुरुषः । ( ६ ) तोलि:-- तवर्गन 'त्-द्-न' अभरके बाद 'ल' रहे तो त्-द् के स्थानमें 'ल और 'न्' के स्थानमें सानुनासिक 'ल" होता है। उदाहरण तत्-व्यः = तल्लयः । तद् + लीनः = तल्लीनः । विद्वान् + लिखति = विद्वाल लिखति। (७ ) यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा-- पदान्त वर्' से पर अनुनासिष्ट वर्ण हो तो 'पर' के स्थान विकल्पसे अपने वर्गका अनुनासिक वर्ण होजाता है ? नोट-वर्गका ‘ञ्चम : अ-म-पान-म् । वर्ण परमें रहने में दफे अन्न में विद्यमान का प्रथम वर्थ (कच उत-प) के स्थल में उसी वर्गका पञ्चम वर्ण और तदभाव तृतीय वर्ष होता है। परन्तु प्रत्यय परमें रहने वा ('प्रत्यये भाषायां नित्यम्' वा० से ) सिर्फ पांचवा वर्ग हा होता है।
२४ सन्धिचन्द्रिका -- उदाहरण- दिक् + नागः = दिङ नागः-दिग्नागः । षट्+मला:-षण्मासाः--षड्- मासाः। एतत् + मुरारिः = एतन्मुरारि:--एतद्भुरारिः । अप- मग्नः = अम्मग्न: अबमग्नः । प्रत्ययपरे रहने पर-तत् + मात्रम् = तन्मात्रम् ( मात्रच प्रत्ययान्त) चित्+मयम् = चिन्मयम् ( मयटप्रत्ययान्त ।) (८) मोऽनुस्वारः-- व्यञ्जन वर्ण परमें रहनेपर पदके अन्तमें स्थित 'म्' के स्थानमें अनुस्वार होता है । उदाहरण- हरिम् + वन्दे = हरि वन्दे । पुष्पम् - सिञ्चति = पुष्पंसिञ्चति । गृहम् + गच्छति = ! गृहं गच्छति । ईश्वरं + भजति = ईश्वरं भजति। (९) नश्चाऽयदान्तस्य झलि~- 'झल' परे रहनेपर अपदान्त में स्थित 'न्' और 'म्' के स्थान में अनुस्वार हो जाता है। उदाहरण- आक्रम् + स्यते - आक्रस्यते ! रम् + स्यते । यते। यशान्+सि = यशांसि । दन् + शनम् = दंगलम् । *अपवाद-(क) 'मो राजि समः क्वौ क्विप् प्रत्ययान्त राज्धात परे होनेपर 'सम्' के मकारके सनमें मकार ही आदेश होता है अर्थात् अनुस्वार नहीं होता। यथा-सम् + राट् सम्राट । (ख हे मपरे वा । मकार परक हकार परमें होतो मकारके स्थान में विकल्प से अनुस्वार होता है। यथा---किम् + ह्मल्यात = कि मलयति--किम् झालयति । ग) “यवलपरे यवला वा वा० । यकार , वकार और लकार परक हकारके पुर्व पदान्त मकार के स्थान में शिकत रमे ऋमिक लानुन क -व-ल हो जाता है। व्या- किम् +हः = किया:-किहः । किम् --- हुलयति = किव हलयति-- किंह्वलयति । किम् - ह्लादयति = किललादयनि-किंजदयनि । (घ) 'नपरे न:'-नकार परक हकार परे हो तो पदान्त मकार के स्थान में विकल्पसे नकार हो जाता है । यथा-किम् + हृते = किन्ह्यते--किंह्वते ।
व्यज्जन-सन्धि २५ am- ( १ ) अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः-- पदके मध्यमें स्थित अनुस्वार के बाद जिस वर्गका वर्ण रहता है अनुस्वारके स्थानमें उसी वर्गका पंचम वर्ण होजाता है। उदाहरण- आशं + कते = आशङ्कते । वां + छति = वाञ्छति । उत्कं + ठते = उत्क- ण्ठते । शां + तः = शान्तः । पं+ फुल्यते = पम्फुल्यते । (११) वा पदान्तस्य- पदान्तमें स्थित अनुस्वारसे पर 'यम्' प्रत्याहारका कोई भी वर्ण हो तो अनु- स्वारके स्थानमें परसवर्ण अर्थात् परवर्णके वर्गका पांचवां अक्षर और परमें य् - ल् - व् हो तो क्रमिक अनुनासिक विशिष्ट य--ल - विकल्पसे होता है। उदाहरण- १. त्वं x करोषि = त्वङ्करोषि-त्वं करोषि । पुष्पं x चिनोति + पुष्पञ्चि- नोति-पुष्पं चिनोति । ऊवं x डीयते = ऊर्ध्वण्डीयते-उवं डीयते । धनंx ददाति = धनन्ददाति-धनं ददाति । पुस्तकं ४ पठति = पुस्तकम्पति-पुस्त- कं पठति ! २. संxयन्ता = सयन्ता-संयन्ता। यं लोकम् = यल् लोकम् यंलो- कम् । वशं x वदः = वश वदः-वशं वदः । सम् ४ वत्सरः = सवत्सरः- संवत्सरः। (१२) नश्छव्यप्रशान्- 'अम्' परक छन्' प्रत्याहार परे रहने पर प्रशान् भिन्न नान्त पदके स्थानमें रु * आदेश होता है। नोट-प्रशान्' शब्दको छोड़कर अन्यत्र यदि पदान्त में 'न्' रहे और उसके बाद च-छ्ट-ठ-त-थ् रहे नो 'न्' को रुत्व होकर च-छ्--ट्ठ-त्-थ के स्थान में क्रमसे इच-३-ट्-ष्ठ-स्त्-स्थ् तथा उसके पूर्व अनुनासिक अथवा अनुस्वार हो जाता है। * 'ह' होनेके पश्चात्--'अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा" इससे अनुनासिक हो जाता है अथवा "अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः" से पूर्ण वर्ण को अनुस्वार का आगम होता है और "खरवसानयोविसर्जनीयः" से रेफको विसर्ग होजाता है। विसर्गके सन्धिचन्द्रिका महान्+छेदः = Hàng उदाहरण- गच्छन् --कोरः = गच्छश्चोरः-गच्छंश्चकोर । महाश्छेदः-महाश्छेदः । महान्-टीकाकार: महाँष्टीकाकार:-महांष्टीका कार : नहान् --उक्कुरः = नहाँष्ठक्कुर:-महांष्ठक्कुरः। चक्रिन्+त्रायस्व = चक्रिस्नालस्व-स्त्रिायस्त्र क्षिपद्न् + थुत्कारः = क्षिपंस्थूत्कार:- क्षिपंस्थत्कारः (१३ ) नश्च-- सान्त पदो पर दन्त सकारसे विकल्पसे धकार आजाता है और घकारको बर्व कार हो जाता है। उदाहरन- सन् सः सनल्सः सन्तः । मतिमान् - सन्तरति == मतिमान्त्सन्त- रति- मानमान् सन्तरति! (१४) शि तुक-- पदन्त नकारसे पर तालव्य शकार हो तो नकारके आगे विकल्पसे तकार आ जाना है। नोट-तकारका आगम होनेपर प्रथम सूबते 'न्' को च और 'न्' को श्चुत्व 'अ'हा है और नदुपरान्त २० वां तुने शकारको विकल्प छकार होना है और छकार होनेपर प्रकारका विकल्पसे लोप * हं जाता है। उदाहरण सन्+शम्भुः = सञ्छन्भुः सञ्च्छम्भुः सञ्चशम्भुः-सञ्ज्ञम्भुः। बाद-विसर्जनीयस्य सः" से विसर्गके स्थानले 'स' होता है जदनन्तर-सन्भावना रहने पर ही त्रुत्व और कहीं टुत्व होता है। इस कार्यको अपर 'लेट' करके बनलाया है। याद रहे कि जहाँ कहो किसी वर्ष होगा बह सक्त विना, सत्त्व और अनुनामिका अपात्र स्वार अवश्य होगा। नोट:- . प्रमार पर है : अ अ या नी में 'ससजुबो रु.' और दूसरा अष्टन अध्याय के तृका गड भारम्भमा तुको रुः सम्बुद्धौ छन्दः" ". नात्रेड इयरपके सूत्रो हा विहित ह' से पूर्व वर्गको अनुनासिक या अनुस्वार हता। ऐसा समझना चाहिये। *लोप विधायक सूत्र -.."झरा झारे सवहैल स पर झर्ग लोप हो सवर्ण झर के परे विकल्पते।
, - व्यञ्जन-सन्धि २७ ( १५ ) नन् पे- यदि प्रकार परे हो तो नन् के नकारको विकलसे रु (र) होता है । १६ ) कुप्वोः क पौ च * कवर्ग या पवर्ग ( क, ख, प, फ) परे हो तो विसर्ग के स्थानमें विकल्पसे अर्घ विसर्ग होता है। नोट-रुत्व होनेपर १२ वा सूत्रोक्त (नोट, रीत्या अनुनासिक या अनुस्वार होनेके पश्चात् रेफको विसर्ग हो जाता है और विसर्ग होनेपर १६वां सूत्रकी प्राप्ति होती है। उदाहरण- १. नून् + पाहि = न पाहि-न पाहि-न-न पाहि-नन्याहि ! २. ( कवर्गपरकका उदाहरण विसर्गसन्धिमै देखो) ( १७ ) समः सुटि- 'सुद् ( सुट् के सकार) परमें होनेपर 'सम्' के मकारको रु (र) होता है। नोट-रु ( २ ) होनेपर उससे पूर्व अकारको अनुनासिक वा अनुस्वार और रेफको विसर्ग होकर स् । हो जाता है । उदाहरण- सम् + स्कर्ता = संस्स्कता-संस्स्कर्ता। सम् + स्कारः = संस्कार:- संस्स्कारः। ( १८) पुमः खय्यम्परे- 'अन्' परक 'खय् परमें होनेपर पुम्के मकारके स्थान में रु (र) होता है । नोट-रु होनेके बाद अन्य कार्य सम् -- स्कर्ता के समान होते हैं परन्तु सम्भावना रहनेपर कहीं श्चुत्व और कहीं ष्टुत्व भी हो जाता है। उदाहरण- पुम् + कोकिल: = पुस्कोकिल:-स्कोकिल: । पुम् + खनित्रम् - पुस्खनि त्रम्-पुस्खनित्रम् । पुम् + चारेत्रम् = पुश्चरित्रन-मुश्चरित्रम् ! पुन् - टेका = पुष्टीका पुष्टीका। * इस सूत्रको विसर्ग संधिप्रकारणमें भी देखो।' सिकार विधायक वार्तिक-संपुकानां सो वक्तव्यः । - -- २८ सन्धिचन्द्रिका IC NEW anta ( १९ ) ङमो ह्रस्वादति ङमुण् नित्यम्- स्वर वर्ण परमें रहनेसे ह्रस्व स्वरके बाद पदान्त ङ्ण-न् के स्थानमें द्वित्व (दो) -ण्ण-न्न हो जाता है। उदाहरण- प्रत्यङ्X आत्मा = प्रत्यङ्डात्मा । सुगण + ईशः = सुगण्णीशः। सन्+अच्युतः = सन्नच्युतः। (२०) शश्छोऽटि- पदके अन्त में स्थित झय् प्रत्याहारके बाद तालब्य शकार हो तो शकारके स्थान में विकल्पसे छकार होता है, अटके परे । नोट :-शकारके पूर्व तवर्ग रहने से तवर्ग को श्चुत्व होकर चवर्ग हो जाता है। उदाहरण- तद्-शिवः = तच्छिवः-तशिवः । वाक् +शूरः = वाक्छूरः-वाक्शूरः। ( २१ ) छे च-- ह्रस्वसे पर तुक् । त्), हो, छकार के परे । ( २२ ) दोर्धात्-- दीर्घसे पर तुक् (त् ) हो, छकारके परे । नोट--तक होने के बाद 'त्' को श्चुत्व होकर च् होता है अर्थात्-स्वर वर्ण के बाद छ' रहने के स्थान में 'च्छ हो जाता है। उदाहरण- २१. शिव+ छाया-शिवच्छाया ! २२. आ+छादयति-आच्छादयति । सन्धि करो १. कृष्णस् + शेते ! सत् + चनोति सूर्यस् + उन्नः । सत् + चित्रम् । तद् + विः विपद् -- बालन् । श्रीमन् ---जन! बृहद् + झटिका । राज + ना। जज-नारे । २. म + पदाद':: नेत्र--टीरते! एतत् + उक्कुरः। महान् रुः : जगद्-ढक्का इतः । षष् +थः । ३. दिक् + अम्बरः । षट् + दर्जनम् । तत् + भवनम् । क्षुध् + भ्याम् । अप+ अब्जम् । . मत् + टीका। . ।
व्यञ्जन-सन्धि - । । ४. दिक+हस्ती। अच् + हली। रत्नमुट् + हरति । ईषत् +हसितम् । सम्रद् + हर्षः। ५. उद् + स्थापयति । भेद्+तुम् ! लभ + स्यते । दिक् + रक्षकः । ६. महत् + लावण्यम् । एतद् + लीला । महान् + लामः: ७. दिक् + मुखः । पट् + मुखोऽवतरति ! सत् + मित्रम् । अप् + नायकः । ८. पुस्तकम् + पठति । देवम् + भजति ! दिव्यम् + सरः । ९. पयान् + सि । संगम् +स्यते ! जिवान + सति ! वृन् + हितम् । १०. अ+ कितः ! अं+ चितम् । लुं+ ठितः । गं+तव्यम् । गुं+ फितः। ११. कार्य + करोति । इदं + चित्रम् । अयं + डमरुः । नदी + तरति । इदं + पुष्पम् । सं+पतति । ग्राम+याति । धनं + लभते । हरि + बन्दे । १२. कस्मिन् + चित् । केशान् + छिनत्ति। महान्+टकारः। धीमान् + ठकुरः महान् + तडागः । महान् + थुत्कारः। १३. बनवान् + स्वपिति । बुद्धिमान् + सहते । १४. मतिमान् + शोभते । अप्रज्ञावान् + शत्रुः । १५. नृन् + पालय । नून् + प्रतिगच्छ । १६. सन्स्कृतम् । १७. पुम् + कार्यः । पुम् + छविः । १८. प्रत्यङ्+आस्ते । सुगण + अस्ति । हसन् + आगतः। १९. मनाक + शूरः । जगत् + शान्तिः । त्वत् + श्वशुरः । अच् + शेषम् । २०. तरु+ छाया । चे+छिद्यते । आ + छायम् । विच्छेद करो- १. पयशीतम् । देवश्चिनोति । महच्चक्रम् । शरच्छटा । जगज्जीवनम् ! राजञ्जय। बृहज्झरः । राज्ञी। जज्ञे। २. देवष्षष्टः । वृक्षष्टीकते । अग्निचिट्टोकते ! उड्डयनम् । एतड्ढक्का । महाण्ड- महः । राजण्डौकसे । हृष्टः । पुष्टः । ३. वाग्दानम् । दिगीशः । अजन्तः । वषडिन्द्राय । अब्भाजनम् । वसिग्घसति ।उद्धरणम् । ददद्धसति । तद्धेयम् । ५. उत्तम्भते । छेत्तुम् । विराट्राजा । दिक्पालः ।
३० सन्धिचन्द्रिका । ६. एतल्जय जगल्लीयते । ग्रन्थाल लाति । ३५. धिङ्मूर्ख ? | षण्णाम् जगन्निस्तारः । ककुम्नायकः । ८. ग्राम शास्ति । राम हासयति । तं हन्ति । ९. सरांसि । आक्रस्यते । ध्वंस्थते । भ्रस्यते । १०. अक्तिः । सञ्चितम् । कुण्ठितः । क्षन्तव्यम् । शम्भुः । ११. मधुरङ्गायति । आनञ्चिनोति । कथण्डीयते । शङ्खन्धमति । रामम्भजति । देवयजति । दिव्यल लोकम् । सवत्सरः । १२. भास्वश्चिन्द्रः। महाँक्छेदः । उद्यष्टड्कारः । भवाष्ठक्कुरः। महाँस्तरः । महास्थतारः। १३. विद्वान्त्सहते । जलवान्प्सरोवरः। १४. दिञ्छोभते ! शिशूञ्चायति १५. न प्रासषेधति । न प्रति करोति । १६. संस्करोति। १७. गुस्वर्तव्यः । पुश्चमत्कारः । गुष्टिट्टिभः । १८. धावन्नपतत् । एकस्मिन्नहनि । हसन्तागतः । १९. यावच्छक्यम् । विश्वमृ?ते । मच्छरीरम् । षट्छ्यामाः। २०. वृक्षच्छाया । स्वच्छात्रः । । शुद्ध करो- कृष्णम्शेते । नत्छविः । अधिस्थाता। ददत्वसति । महान्नात्मा । विषया- न्नाह ! जगत्नावकः । संचितः । गंगाजलम् । यमलोकम् । गच्छंचकोरः १ मतिमा- नच्छन्तः । पुखनित्रम् ! वाच्छूरः । वाकमात्रेण ! वटस्छाया। HOMEMORIA X Samition विसर्ग-सन्धि (१) खरवसानयोक्सिजनीयः- अवसान * में रेफ हो अथवा पदान्त रेफ के बाद वर्गोके प्रथम, द्वितीय क ख च छ, ठ, त थ, पक) और श ष स, का कोई वर्ण हो तो रेफके स्थान में विसर्ग होता है। विरामोऽवसानम् ।।सू०॥ जिस वर्णके उच्चारणोत्तर वर्णान्तरका उच्चारण नहीं किया गया हो उस वर्णको अवसान कहते हैं ।
विसर्ग-सन्धि यथा- विसर्ग दो प्रकार के होते हैं सजात और रजात । (क) (१) शब्द (२) विभक्ति * ( सुप् - तिङ, ) अथश (३. प्रत्यक्ष सन्न्धी सकार के स्थानों में '' होकर जो विसर्ग होता है, उसे 'सजत' विसर्ग कहते हैं। उदाहरण- १. निस् =निः। दुस् = दुः। शनैस् शतैः। उच्चस् रच्दै नीचैम् = नीचैः । हविम् = हविः पयस = पयः ! २. देवस् - देवः । पठावस् = पठावः । ३. एकशस् = एकशः । बहुशस् = बहुशः । नोट -- कहां मूर्धन्य '' के स्थानों भी 'र' होकर विसर्ग होता है । यथा-सजुष - सजूः।। (ख) (१) स्वाभाविक अथवा (२) ऋकारस्थानिक 'र' के स्थानों में जो विसर्ग होता है उसे रजात विसर्ग कहते हैं। १. स्वर् स्वः । अन्तर् = अन्तः । प्रातर् प्रातः । पुनर्पुनः । निर = निः । दुर्%दुः। धूर-धूः २. गोर = गोः पूर = पूः। मातर् = मात: पितर् = पितः भातर भ्रातः। दुहितर = दहितः । जामातर् = जामतः ज्ञातर = ज्ञातः । नोट-कहीं 'न्' के स्थानों में भी 'र' होकर विसर्ग होता है। यथा-अहन = अहः । (२) कुप्वोः क पौ च-- क ख, और प फ परे रहनेसे विस के स्थानोमें अर्धविसर्ग (7) होता है अथवा विसर्गका ही रहजाता है। उदाहरण.--- कः+करोति = कः करोति, कः करोति । कः + खनति = के खानति, कः खनति । कः + पचति = क पचति, कः पचति । कः + फलति = के लति-कः फलति *विभक्तिश्च ॥ सू० ।। सुप् (सु-औ- जस् , अम्, - ओट - शस् , टा-भ्याम् - मिस , डे-भ्याम् - भ्यस् , उसि - भ्याम् - भ्यस् , इस - ओस्- आम्, ङि - ओस् -सुप् ) और तिङ् (तिप्-तत् -शि, सि - थस् -थ, भिप- वस्-मस् । त-आताम् – झ-थास-आथाम्-ध्वम्-इट-वहि-महिक) को विभक्ति संशा होती है।
३२ सन्धिचन्द्रिका , A नोट-स्नि समास स्थल में क ख, प फ के परे विसर्गके स्थानमें दन्त्य 'स' होता है, अधः-पदम् = अधस्पदम् । शिरः + पदम् = शिरस्पदम् । भाः+करः - भास्करः । भाः+ पतिः - भास्पतिः । वाचः पतिवाच- स्पतिः। ( ३ ) अत:कृ-ऋमि--स-कुम्भ-पात्र-कुश-की-वनव्ययस्य समासमें-'कृ' और 'कम्' धातु निष्पन्न पद ( कार, कर, काम, कान्त ) और कंस, कुम्भ, पात्र कुशा तथा ऋणो शब्द परमें रहनेसे, अकार से पर अव्यय सम्बन्धिभिन्न विसर्ग स्थानमें दन्त्य 'स्' होता। उदाहरण- अयः+कारः = अयस्कारः। श्रेयः+करः = श्रेयस्कारः । अयः + कामा = अयस्कामः। अयः+कान्तः = अयस्कान्तः । अयः + कंस = अयस्कंसः। पयः+कुम्भः = पयस्कुम्भः। पयः+पात्रम् = पयस्पात्रम् । अयः + कुशा = अयस्कुशा । अयः कर्णी = अयस्कर्णी। ( ४ ) नमस्पुरसोर्गत्यो:- क ख, प फ के परे गतिसंज्ञक* 'नमस्' और 'पुरस्' शब्द सम्बन्धी विसर्ग के स्थान में दन्त्य 'स्' होता है। उदाहरण- नमः + कारः = नमस्कारः । नमः+करोति = नमस्करोति । पुरः + कारः = पुरस्कारः । पुरः + करोति = पुरस्करोति । ( ५ ) तिरसोऽन्यतरस्याम्--- क ख, प फ के परे तिरस्' शब्द सम्बन्धी विसर्गके समानमें विकल्पसे दन्त्य 'स' होता है। उदाहरण तिरः + करोति = तिरस्कोति-तिरः करोति । (६) सोऽपदादौ---- पाश, कल्प, क और काम्य प्रत्ययके परे विसर्गके स्थानसे दन्त्य 'स्' होता है। * "साक्षात्प्रभृतीनि च" इस सूत्रसे नमस् शब्द और पुरस् शब्दको गतिसंज्ञा होती है। ( साक्षात् प्रभृति गण आकृतिगण है)।
विसर्गसन्धि ३३ R - उदाहरण-- पयः + पाशम् = पयस्पाशम् । यशः + कल्नम् = यशस्कल्पम् यशः+कम् = यशस्कम् । यशः+काम्यति = यशस्काम्यति । नोट--अव्यय सम्बन्धी विसर्ग के स्थान में 'स्' नहीं होता। यथा--प्रातः कल्पम् । 'काम्य' प्रत्यय के परे रजात विसर्ग के स्थान में 'स्' नहीं होता है यथा--गो: काम्यति । (७) इण: ष:- पाशादि प्रत्ययके परे इग्से परमें स्थित विसर्गके स्थानमें मूर्धन्य 'ए' होता है । उदाहरण- सर्पिः + पाशम् = सर्पिष्पाशम् । सर्पिः + अल्पम् = सर्पिष्कल्पम् । सपिः + कम् = सर्पिष्कम । सपिः+ काम्यति = सर्पिष्काम्यति । (८) इदुदुपधस्य चाऽप्रत्ययस्य- क ख, प फ के परे इकार और उकारोपध* अप्रत्यय सम्बन्धी विसर्ग के स्थान में मूर्धन्य 'ए' होता है। उदाहरण- निः + कृटम् = निष्कृतम् । दुः+ कृतम् = दुष्कृतम् । बहिः + कृतम् = ब- हिष्कृतम् । आविः + कृतम् = आनिष्कृतम । चतुः+ कोणः = चतुष्कोणः। निः + फलः = निष्फलः । निः + प्रत्यूहम् = निष्प्रत्यूहम । ( ९) इसुसोः सामर्थ्य- क ख, प फ के परे इस् और उस् भागान्त शब्दके विसर्गके स्थानमें विकल्पसे मूर्धन्य '' होता है। उदाहरण- सपिः + करोति = सर्पिष्करोति-सपिःकरोति । धनुः + करोति = धनुष्क- रोति-धनुःकरोति । (१०) नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य- समासमें क-ख अथवा प-फ के परे अनुत्तरपदस्थ 'इस्' और उस् भागान्त शब्दके विसर्गके स्थान में मूर्धन्य 'ए' होता है। *अलोन्त्यात्पूर्व उपधा ।।सू०॥ अन्त्य 'अल्से पूर्व वर्णकी उपधासंज्ञा होती है। ३ सं० च० सन्धिचन्द्रिका उदाहरण २. सर्पिः + कुण्डिका = सर्पिष्कुण्डिका । हविः + कुण्डम् = हविष्कुण्डम् । २. धनुः + खण्डम् = धनुष्खण्डम् । धनुः + पाणिः = धनुष्पाणिः । (११) विसर्जनीयस्य सः- खर् के परे विमुर्गके स्थानमें सकार आदेश होता है ! नोट-:) च अथवा छ के परे विसर्गके स्थानमें दन्त्य सकार होता है और उसको भी श्चुत्व हाकर बालव्य शकार हो जाता है। (२)ट अथवा ठ परे रहने विसर्गके स्यानमें दन्त्यसकार होता है और उसको भी ष्टुत्व होकर मूर्धन्य षकार हो जाता है । ३) त अथवा थ के परे विसर्ग के स्थानमें केवल दन्त्य सकार मात्र होता है। उदाहरण- १. बाला+चलति = बालश्चलति । तरोः+छाया = तरोश्छाया । २. धनुः+टङ्कारः =धनुष्टङ्कारः । चतुरः ठक्कुरः = चतुरष्ठक्कुरः। ३. विष्णुः त्राता = विष्णुस्त्राता। क्षिप्तः थुत्कारः =क्षिप्तस्थुत्कारः। ( १२ ) वा शरि- शर् के परे विसर्गके स्थानमें विकल्पसे 'स्' होता है । नोट-१) वालव्य शकार के परे विसर्गके स्थानमें विकल्पसे दन्त्य सकार होता है और तदुपरान्त श्चुत्व होनेसे वह तालव्य शकार हो जाता है। (२) मूर्धन्य षकार के परे विसर्गके स्थानमें विकल्पसे दन्त्य सकार होता है और तदुपरान्त ष्टुत्व होने से वह मूर्धन्य पकार होजाता है। (३ दन्त्य सकार के परे विसर्गके स्थान में विकलसे दन्त्य सकार मात्र होता है। उदाहरण-- १. हरिः- शेते = हरिश्शेते, हरिः शेते। शिशुः+शेते = शिशुश्शेते, शिशुः शेते। २. देवाः-षट् -- देवाषट्--देवाः पट् । चतुरः षट्पदः = चतुरष्ष- ट्पद:-चतुरः पट्पदः ! ३. मनः+सुखम् = मनस्सुखम् -मनः सुखम् । प्रथमः सर्गः = प्रथम- स्सर्गः-प्रथमः सर्गः। - विसर्गसन्धि ३५ ३ Home- ( १४ ) ससजुषो रु:- पदान्त सकार तथा सजुष् शब्दके षकारके स्थानमें रु (२) होता है। ( १४ ) अतोरोरप्लुतादप्लुते- अप्लुत अत् के परे अप्लुन अत्से पर रु (र) के स्थान में उकार होता है। नोट-उ होने पर अX उ मिलकर गुण ओ होता है और पुनःओके अग्रवर्ती जो 'अ' रहता है उसे पूर्वरूप हो जाता है। उदाहरण- शिवस + अर्य: शिवोऽर्यः। यशस् + अभिलाषी = यशोऽभिलाषी। देवस् + अयम् = देवोऽयम् । वेदस् + अधीतः = वेदोऽधीतः । (१५) हशि च-- हर, (वर्ग का तृतीय, चतुर्थ अथवा पञ्चम वर्ण अथवा य, र, ल, व, अथवा ह) के परे रहने पर भी अप्लुत अकार से प्रर र सम्बन्धी र को उ होता है । नोट-यहाँ उ होने के पश्चात् गुण मात्र ही होता है । उदाहरण- १. रामस् + गच्छति = रामो गच्छति। पूर्णस् + घट: = पूर्णो घटः । अद्भुतस् + ङ्कारः = अद्भुतो ङकारः । २. कृष्णस् X जयति कृष्णो जयति। मधुरस +झङ्कारः = मधुरो झङ्कारः। ठस्येकस्+अश्च = ठेस्येको भश्च । ३. सुन्दरस् + डमरुः = सुन्दरो डमरुः । बालस् + ढोकते = बालो डौकते। कसन्तेभ्यस् + णः = असन्तेभ्यो णः। ४. निर्वाणस् + दीपः = निर्वाणो दीपः । मृगस् + धावति = मृगो धावति । सुन्दरस् + नरः = सुन्दरो नरः । ५. रामस् + ब्रवीति = रामो ब्रवोति। मनस् + भावः = मनो भावः । देवदत्तम् + मन्यते = देवदत्तो मन्यते । ६. (य-र-ल--व-ह) नरस्+यात = नरो याति ! मनस् + रथः- मनोरथः । यशस् + लभते = यशो लभते । शिवस्+वन्धः = शिवो वन्द्यः । बालस् + हसति = बालो हसति । नोट-- :--सजात 'र' से अतिरिक्त स्थलों में '' के बादमें वर्गका तृतीय, चतुर्थ ३ सन्धिचद्रिका । - या पंचम वर्ण रहे अथवा य, ल, व, या ह रहे तो र् अग्रिमवर्ण की चोटी पर चला जाता है। उदाहरण- १. प्रात+ गमनम् = प्रातर्गमनम् । पुन+धर्मः = पुनर्धर्मः । २. निर+जलम् = निर्जलम् । दुर् + झनकारः = दुसनत्कारः । ३. पुनर्+डीयते = पुनर्डीयते । अन्तर् + ढक्का = अन्तढक्का । ४. दुर्+दिनम् = दुर्दिनम् । अन्तर+पत्ते = अन्तर्धत्ते । पुनर् + नमनम् =पुनर्नमनम् । ५. भ्रातर् + याहि = भ्रातर्याहि ! पुनर् + लब्धः = पुनर्लब्धः । जामातर् + वद = जामातर्वद । प्रातर् + हसति = प्रातहसति । ( १६ ) भो-भगो-अघो-अपूर्वस्य योऽशि- अञ् के परे 'भो' पूर्वक, 'भगो' पूर्वक, अघोपूर्वक और अवर्ण पूर्वक रु र के स्थान में यकार आदेश होता है। (१७) हलि सर्वेषाम् 'हल' के परे भो, भगो, अधो और अवर्ण पूर्वक य का लोप होता है । उदाहरण-- १. भोस् + देवाः = भो र् + देवाः = भो य् + देवाः = भो देवाः । भगोस् + नमस्ते - भगोर्+नमस्ते = भगोय+नमस्ते = भगो नमस्ते अघोस्+ याहि = अघोर्+याहि-अघोय + याहि = अघोयाहि । २. देवास् + हसन्ति = देवार् - हसन्ति = देवाय् + हसन्ति = देवा हसन्ति । भत्तास्+भजन्ति = भक्तार् + भसन्ति = भक्ताय + भजन्ति - भक्ता भजन्ति । नोट-१७ सूत्रमें 'सर्वेपाम्' हा गया है। इससे सिद्ध होता है कि हल के परे सभी के मत से यकार का नित्य लोप हो। किन्तु 'अन्' के परे अवर्ण पूर्वक पदान्त यकार का "लोपः शाकल्यस्य (स्वरसन्धि-प्रकरण सू० ८) से विकल्पसे लोप हो । उदाहरण- देवास् + इह = देवार + इह = देव यइह = देवा इह--देवायिह । ब्राह्म- णास्-आगताः = ब्राह्मणा र् + आगताः= ब्राह्मणा य् आगता=ब्राह्मणा आगताः ब्राह्मणायागताः । देवास् + ऊचुः = देवा र + ऊचुः = देवा य् + ऊचुः - देवा ऊचुः-देवायूचुः। रामस् + = राम र् + एति = राम य एति राम एति रामयेति । एवं-देव इच्छति-देवयिच्छति इत्यादि । -- - विसर्गसन्धि -- - ( १८ ) रो रि--- रेफ के परे रेफ का लोप होता है। ( १९ ) ठूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण: ढकार * और रेफ लोपके निमित्त ढकार और रेफके परे पूर्व अण्के स्थानमें दीर्घ आदेश होता है। उदाहरण- पुनर्+रमते = पुन+रमते = पुना रमते । हरिर+रम्यः = हरि + रम्यः हरी रम्यः । शम्भु+राजते = शम्भु+राजते = शम्भू राजते । अन्तर् + राष्ट्रीयः = अन्त - राष्ट्रीयः = अन्ताराष्ट्रीयः। हरिर् + रक्षति = हरि + रक्षति = हरी रक्षति । ( २० ) एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि- नञ् समास को छोड़कर-हल के परे ककार ! रहित एतद् और तद् शब्द सम्बन्धी सु ( स् ) का लोप होता है। उदाहरण- एसस्+विष्णुः- एष विष्णुः। सस्+शम्भुः = स शम्भुः । एषस्+ चलति = एष चलति । एषस् + हसति = एष हसति । ( २१ ) सोऽचि लोपेचेत्पादपूरणाम्- लोप होने से ही यदि पाश्की पूत्ति होनी हो तो अच् के परे स ( तत्- शब्द ) सम्बन्धी सु स् ) का लोप होता है। * ढकार लोपका उदाहरण तिङन्तमै देखो ?-लिट् + ढलि-दुः- लीढः । अलिट् + 6 = अलि-ढ = अलोढ । नसमासमें सकाराकोर नहीं होता। ययःननः असः, असस्+ शिवः = अनःनिवः । एतद् शब्दसे "अन्यय सर्वनामनामश्च् प्राक् इस सूत्रसे अकच् होकर 'एषकः' रूप बनता है। वहां के परे सकारका लोप नहीं होता इसी लिये ककार रहिम कह गया है। उदाहरण यथा-एषकस् + रुद्रः = एषको रुद्रः ! यहां लोप नहीं होकर रुत्व-उत्व-गुम हो जाता है। ६ अत एव "सोऽहमाजन्मशुद्धाताम्" यहाँ लोप नहीं हुआ। क्योंकि लोप नहीं होने पर भी सकारको रुत्व, उत्व, गुण तथा पूर्वरूप होनेसे भी (प्रयोग सिद्ध होता है और) पादको पूत्ति हो जाती है। स- - सन्धिचन्द्रिका उदाहरण- सस् + इमामविड्ढि प्रभृतिम् = स + इमामविड्ढि प्रभृतिम् = सेमामविड्ढि प्रभृतिम् * ( लोप होने पर गुण हो जाता है ) । सस्+ एष दाशरथी रामः = स+एष दाशदथी रामः = सैष दाशरथी रामः + ( लोप होने पर वृद्धि हो जाती है) सन्धि करो- पुनर् + करोति । रामः + क्रुध्यति ! यशः+ करः । नमः+ कारः । पू:+ काम्यति । हविः + काम्यति । निः + फलम् । धनुः + खण्डितम् । धनुः खण्डम् । गोपाल:+शेते । रामः + अयम् ! चन्द्रशेखरः + हसति । पुनः + हसति । भोः+ नमस्ते । अन्तर् + रामः । - शुद्ध करो-- । मनो रामो क्रुध्यति । श्रेयष्करः । अधिस्थाता, अहर्स । हविर्कुण्डम् । सो रामः । बालो चलति । मनो सुखम् । एषो बालः । सूर्यो शोभते । हतो शत्रुः । कल्पना । अज्ञो इन्द्रः । यशाललभते । प्रातो गमनम् । देवाः हसन्ति । अहोगतः । अन्तर्राष्ट्रीयः भ्रातः रमय । एषो विष्णुस्शिवो वा । इति सन्धि-प्रकरण समाप्त । । * 'सेमामविढि प्रभृति य ईशिपे"वह वैदिक छन्द 'जगति" का एक पाद है। १२ अक्षर होने पर इस पादकीपूर्ति होती है। यदि यहाँ लोप नहीं होगा तो १३ अक्षर हो जायगे और उससे छन्दोभङ्ग हो जायगा । संपूर्ण श्लोक इउ प्रकार का है "सैष दाशरथी रामः, सैष राजा:धिष्ठिरः । सैष ! महात्यारी, मैटभीमो महाबलः ॥” इति । यह अनुष्टुप् छन्द है । इसके प्रति सदमें ८ अक्षर होते है यहाँ सु का लोप नहीं होनेसे सकारको रुत्व, यत्व तथा "लोप शाकल्यत्व से यकारका लो हो जायगा और यलोपके असिद्ध होने से फिर वृद्धि नहीं हो सकेगी। एवं च प्रत्येक पादमें ९ अक्षर हो जायेंगे जिउसे पाद की पूत्ति न हो सकेगी। T- LEMONIONLaurel PM - परिशिष्टम् (१) कारक-विचार- करोनि क्रियां जनयतीति कारकम् । क्रिया के उत्पादक को कारक कहते हैं । संस्कृत व्याकरण में सम्बोधन और सम्बन्ध को छोड़कर छः कारक कहे गये है- कर्ता कर्म च करणञ्च सम्प्रदानं तथैव च । अपादानाधिकरणञ्च इत्याहुः कारकाणि षट्' । 'स्वतन्त्रः कर्ता-किसी भी काम को करने में जो पूर्ण स्वतन्त्र हो ( दूसरों के अधीन न हो। उसे कर्ता कहते हैं । 'रामो गृहं गच्छति' यहाँ पर घर जाने में राम स्वतन्त्र है, इसलिये उक्त वाक्य में राम ही कर्ता है । 'सम्बोधने च'-'सम्बोधनं स्वाभिमुखीकरणम् ।' प्रयोजनवश आह्वान द्वारा जिसको अपनी ओर किया जावे उसे सम्बोधन कहते हैं और सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति होती है जैसे हे राम ! यहाँ पर पुकार कर राम को वक्ता अपनी ओर करता है, इसलिये 'राम' सम्बोवन हुआ और उसमें प्रथमा हुई । प्रायः करके चेतन पदार्थों में हो सम्बोधन किया जाता है। नोट--भवेद्विभक्तिः प्रथमा कर्तृवाच्यस्य कर्तरि । सम्बुद्धौ नाममात्रे च कर्मवाच्यस्य कर्मणि ।। कचिदव्यययोगे च प्रथमा कथ्यते बुधैः ।। 'कर्तुरीप्सिततमं कर्म'-कर्ता अपनो क्रिया ( व्यापार) द्वारा जिसको प्राप्त करना चाहता है उसे कर्म कहते हैं । और अनुक्त कर्म में द्वितीया होती है । "कृष्णो * संस्कृत साहित्यमें कर्तृवाचा, कर्मवाच्य और भाववाच्यमें प्रयोग किये जाते हैं । कर्तृवाच्य में कर्ता के अनुसार क्रिया में वचन पुरुपाद की व्यवस्था होती है। काके एकत्व, द्वित्व, और बहुत्वके अनुसार क्रिया में एकवचन द्विवचन और वहुवचन होते हैं और युष्मद्कर्ता की प्रधानता होने पर क्रियामें मध्यम पुरुष, अस्मद्कर्ताकी प्रधानता होने पर उत्तम पुरुष और इन दोनोंके अप्राधान्य में या अभावमें प्रथम पुरुर होता है जैसे क्रममे त्वं पश्यसि' 'अहं पश्यामि' मोहनः पश्यति' इत्यादि । इसी तरह 'युवां पश्यथः, 'यूय पश्यथ' 'आवां पश्यावः 'वयं पश्यामः' "चैत्रमैत्री पश्यतः" 'गुरवः पश्यन्ति', इन सभी वाक्योंमें क-कि प्राधान्य होनेसे उसीके अनुसार क्रिया हुई हैं, इसलिए इसे कर्तृवाच्य कहते हैं । कर्तृवाच्यमें कर्ता- से प्रथमा विभक्ति होती है । (३) तिङन्तविचार' देखो) सन्धिचन्द्रिका ग्रामं गच्छति" इस वाक्य में ग्राम कर्म है क्योंकि कृष्ण गमन क्रिया द्वारा ग्राम को प्राप्त करता है इसलिये ग्राम कर्म हुआ। इस कर्म के तीन भेद है- 'निर्वत्यं' "विकार्य और प्राप्य' । 'घटं करोति' 'तण्डुलं पचति' 'ग्रामं गच्छति' ये क्रमशः तीनों के उदाहरण हैं। 'तथायुक्तं चानीप्सितम्' उक्तकर्म के और भी दो भेद हैं-'उपेक्ष्य' ( उदासीन ) और द्वेष्य' । इच्छा के नहीं रहने पर भी कर्ता अपने व्यापार द्वारा जिसको आनुषङ्गिकरूप ( अनायास ) से प्राप्त कर लेता है उसे ही 'अनीप्सित' ( उपेक्ष्य और द्वेष्य ) कर्म कहते हैं। जैसे 'ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति' 'ओदनं भुञ्जानो विषं भुंक्ते' यहाँ पर ग्राम जाना ही कर्ता का अभिलषित है तृण का छूना तो यों ही हो जाता है। इशी तरह भात खाना ही कर्ता का इष्ट है, जहर खाना उसका इष्ट नहीं फिर भी धोखेसे चावलके साथ जहर भी खा जाता है इसलिये उक्त स्थलों में क्रमशः 'उपेक्ष्य' और 'द्वेष्य' कर्म के उदाहरण सम- झने चाहिये। 'अकथितञ्च'- अपादान वगैरह कारकों की अविवक्षासे कर्मत्व रूप में ही वक्ता की विवक्षा होने पर अपादानादि भी कम हो जाते हैं। इसे 'अकथित' कर्म कहते हैं । जैसे 'गां दोग्धि पयः' बलि भिक्षते वसुधाम्' 'सुत्रां क्षीरनिर्षि मनाति' 'अजां ग्रामं नयति' 'गर्गान् शतं दण्डयति' 'माणवक धर्म शास्ति' इत्यादि । नोट--कर्मलक्षण यथा-"कर्तवत्तिव्यापारप्रयोज्यफलवत्वप्रकारकेच्छा- निरूपितविषयताश्रयत्वम्" * कर्मवाच्यमें कर्मकी प्रधानता होती है, और कर्म के अनुसार क्रिया में वचन पुरुषादिकी व्यवस्था होती है, जैसे 'रामेण घटौ क्रियते' यहाँ पर दो घटरूप कर्मके प्राधान्य होने से क्रिया भी द्विवचन एवं प्रथम व हुआ। परन्तु कर्मभाधान्य- स्थलमें कर्मके रक्त होनेसे कर्ममें प्रथमा विदा हो जाती है, और कीमें तृतीया विभक्ति हो जाती है क्योंकि उनवाक्यमें कर्ता अनुक्त है इसलिये "कर्तृकरणयो- स्तृतोया' इससे अनुक्त कर्नामें तृतीया हुई । किन्तु कताके उक्न होने से प्रथमा और कर्मके अनुक्त होने पर द्वितीया होती है जैसे देव ओदनं पचति । कर्मवाच्यमें धातुसे सामने पक्ष ही आता है और मध्यमें यक् प्रत्यय लग जाता है । भाववाच्य में क्रिकी प्रधानता होती है और अकमक धातुसे ही भावमें लकार होते हैं । इस- लिये कर्ताक अनुक्त होनेसे तृतीया हो जाती है। और किवाने एकवचन और प्रथम पुरुषही होते हैं जैसे त्वया, मया चैत्रेण वा भूयते' इत्यादि । ( (३) 'तिङ्डन्तविचार' देखो) कारक-विचार "साधकतमं करणम्'-जिसके ब्यापार के अव्यवहित तुरत) उत्तरकाल में क्रिया को निष्पत्ति होती है उसे करण कहते हैं और अनुक्त करण में तृतीया होती है । जैसे-"रामेण बाणेन हतो वाली" यहाँ पर बाण के ब्याप र होने के अव्यवहित उत्तर काल में ही वाली का हनन हो जाता है इसलिए वाण करण है और उक्तस्थल में कर्म में क्त प्रत्यय होने से करण अनुक्त रहा इसलिए अनुक्त करण में “कर्तृ करणयोस्तृतीया" इससे तृतीया हुई । उक्तस्थल में राम कर्ता को करण नहीं कह सकते क्योंकि राम के व्यापार के अव्यवहित उत्तर क्षण में हनन क्रिया नहीं हो पाती है इसलिए कर्ता करण नहीं हो सकता । परन्तु यह करण- त्वादि वक्ता के विवक्षाधीन माना गया है अर्थात् कर्तादि कारकों को भी जब वक्ता करणत्वेन विवक्षित कर देता है तब कादि भी करण हो सकता है परन्तु ये सारी बातें वक्ता की विपक्षा के ऊपर निर्भर रहती हैं। भर्तृहरिने भी इस बात को पुष्ट किया है -'कियायाः प िनिष्पत्तिर्यद्व्यापारादनन्तरम् । विवक्ष्यते यदा यत्र करणं तत् यदा स्मृतम् ।' 'वस्तुतस्तदनिर्देश्य नहि वस्तु व्यवस्थितम् । स्थाल्या पच्यते ह्येषा विवक्षा दृश्यते यतः।' इत्यादि । 'हेतौ'-हेतु में भी तृतीया होती है ! जैसे 'दण्डेन घटः' पुण्येन दृष्टो हरिः' यहाँ पर घटकार्य के प्रनि दण्ड हेतु है एवं हरि दर्शन के प्रति उच्य (धर्म) हेतु है । हेतु को करण नहीं कह सकते क्योंकि क्रिया मात्र का जनक एवं व्यापा- रवान् करण होता है, किन्तु द्रव्य गुणक्रियाओं का जनक व्यापारवान् और कहीं पर व्यापाराभाववान् भी हेतु होता है जैसे 'दण्डेन घटः' यहाँ पर दण्ड व्यापारवान् एवं घटरूपद्रच्छ का जन्म है, इसी तरह "पुण्येन दृष्टो हरिः"यहाँ पर पुण्य दर्शन- क्रिया का जनक होते हुए भी यासार शुन्य है इसलिए इन दोनों को करप नहीं कह सकते ! "कुठारेण काष्ठं छिनत" यहाँ पर कुल्हाई भरण है क्योकि यह छेदनक्रिया मात्र का जनक और जापारवान भी है। इसी इन्द्र जिस अङ्ग के विकार से शरी* से वैज व्यवहः होना भी उससे ना सना होनी है जैसे "अक्षणा काण:" "पदेन खजः" इत्यादि । नोट-हेत, और करण के लक्षणों में विभिन्नता--१. द्रव्य--गुग--क्रिया- स्मककार्यत्रयनिरूपित- निर्यापार--सव्यापार-- वृत्ति च यत्तद्धेत त्वम् । २. "क्रियाजनकमात्रवृत्तिव्यापारवद्वृत्तिच यत्तत् करणत्नम्"।
४२ सन्धिचन्द्रिका तृतीया कहां २ होती है इसके लिए निम्न कारिका स्मरण रखने योग्य है- 'तृतीया करणे चैव कर्मवाच्यस्य कर्तरि । सहाथैश्च तथा हेती प्रकृत्यादिभ्य एव च ।। ऊनार्थं नरिणाथैश्च सदृशार्थस्तथैव च । अङ्गिनो विकृतिर्येन तृतीया स्यात्तदङ्गतः ॥ 'कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम्'- दान क्रिया के कमं के साथ जिसका सम्बन्ध स्थापित किया जाय उसे सम्प्रदान कहते हैं। जैसे 'विप्राय गां ददाति' यहां पर दान क्रिया के कर्म गो के साथ ब्राह्मण का स्वत्व ( अधिकार ) सम्बन्ध स्थापित किया गया है इसलिए ब्राह्मण सम्प्रदान-हुमा । और अनुक्त सम्प्रदान में चतुर्थी हो जाती है । 'रजकाय वस्त्र ददाति' ऐसा वाक्य नहीं होता किन्तु 'रजकस्य वस्त्रं ददाति' ऐसा वाक्य ही बुद्ध माना गया है, क्योंकि जिस वस्तु से जब बिलकुल ही अपना अधिकार हट जाय और दूसरा ही व्यक्ति उसका मालिक हो जाय तभी चतुर्थी मानी जाती है। सम्प्रदान शब्द का अर्थ भी यही होता है कि सर्वथा अपना अधिकार हटाकर दूसरे का अधिकार स्थापित हो जाय, क्योंकि स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वक -परस्वत्वोत्पत्तिजनकव्यापार' ही दा पातु का अर्थ माना गया है । कोई विद्वान् तो 'परस्वत्वोत्पत्तिजनकब्यागार' को ही दा धात्वर्थ मानते हैं ! उनकी विचार धारा से त्याग वाक्य में 'हरये नमः' इत्यादि स्थल में 'इदं न मम' ऐसा जोड़ना जरूरी हो जाता हैं । लेकिन उक्त सिद्धान्त पक्ष में इस को जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। "नमः स्वास्तिस्वाहास्वाऽलं वषट्योगाच्च"-नमः प्रभृति शब्दों के योग में भी उती होती है। जैसे 'हरये नमः' 'प्रजाभ्यः स्वस्ति' 'अग्नयेस्वाहा' इत्यादि। *क्रिया यममिति सोऽपि सम्प्रदानम्-जिसके उद्देश्य से कुछ क्रिया की जाती है उसे भी सम्प्रदान करते हैं। जैसे 'पत्ये शेते' इस वाक्य में पति के उद्देश्य से शयन किया का विधान किया गया है इसलिए पति की सम्प्रदान संज्ञा और चतुर्थी हुई ! नोट -चतुर्थी के लिए निम्न कारिका स्मरण करने योग्य है- सम्प्रदाने चतथी स्यात् याद च क्रियायुते । रुच्यर्थानां प्रियमाणे नमो योगे च ना भवेत् ।।' 'भ्रमपायेऽनादानम्'--जिससे किसी भी वस्तु का विश्लेष ( अलगाव ) । . य कारक-विचार होता है उसे अपादान (ध्रुव) कहते हैं, 'वृक्षात्पर्ण पतति' इस वाक्य में वृक्ष से पत्ते का त्रियोग होता है इसलिये वृक्ष अपादान हुआ । अर्थात् प्रस्तुत धात्वर्थव्यापार का जो आश्रय नहीं हो किन्तु विछुड़ाव में अवधि होता हो उसे ही ध्रुव या अपादान कहा गया है । और अनुक्त अपादान में पञ्चमी विभक्ति होती है । जिस से नियमानुसार विद्यादि ग्रहण किया जाता है उससे भी पञ्चमी, होती है जैसे 'गुरोरघोते' गुरु से नियमपूर्वक विद्या पड़ता है जिससे डरना या लुकना एवं त्राण चाहता हो उसमे भी पञ्चमी होती है जैसे 'चौराद् विभेति' 'मातुनिलीयते' 'सिंहात् त्रायते' इत्यादि । जहां से जिसकी उत्पत्ति एवं अभिव्यक्ति होती है उससे भी पञ्चमो मानी गई है जैसे 'ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते' 'हिमवत' गङ्गा प्रभवति' इत्यादि। नोट-अपादाने ल्यबथें च योगे पूर्वादिभिस्तथा । उत्कर्षे पञ्चमी ज्ञेया हेत्वर्थे तु विभाषया ।। ऋते विनादिभिर्योगे पञ्चमो च स्मृता बुधैः।। 'षष्ठी शेषे'-उक्त अर्थो से भिन्न स्वस्वामिभावादि सम्बन्ध सामान्य में षष्ठी होती है। जैसे राज्ञः पुरुषः' 'चैत्रस्य पुत्रः' इत्यादि । सम्बन्ध षष्ठी को कारक नहीं माना गया है क्योंकि सम्बन्ध में क्रिया जनकत्व रूप कारकत्व नहीं हो सकता। जैसे 'मागवकस्य पितरं पन्थानं पृच्छति' इस वाक्य में पिता से ही प्रश्नादि क्रिया को उपपत्ति हो जाने के कारण उसके प्रति माणवक अन्यथा सिद्ध हो जाता है। घट कार्य के प्रात दण्डादि का कारणत्व सर्वमत सिद्ध होने पर भो रासभ को कारण नहीं माना गया है, इसलिये कारणत्व के लक्षण में "अन्यथा- सिद्धिशून्यत्वे सति नियतपूर्ववृत्तित्वरूप” निवेश करना जरूरी हो जाता है ऐसी स्थिति में रातभ अन्य या सिद्ध होने से कारण नहीं हो सकता, इसी तरह प्रकृत में माणवक भा अन्यथा सिद्ध होने से क्रियाजनक नहीं हो सका। अतः कारकत्व भी सम्बन्ध षष्ठी को नहीं माना गया । नोट-पष्ठो भवति सम्बन्धे कृदन्ते कर्तृकर्मगोः । तृतीया स्यात् तथा पाठ करताना इतृकारक ! तुल्यायोगे पष्ठी स्यात् तृतीया च विभाषया !! 'आधारोऽधिकरणम्'-कर्ता और कर्म के द्वारा तवृत्ति क्रिया का जो बाधार होता है उसे अधिकरण कहते हैं। जैसे 'कटे आस्ते' 'स्थाल्यो पचति' यहाँ सन्धिचन्द्रिका पर चटाई और बटलोती, देवदत्तादिकता एवं तण्डुल कर्म के द्वारा उपवेशन एवं विक्लेदन क्रिया का आधार होती हैं इसलिये इन्हें अधिकरण संज्ञा हुई और अनुक्त अधिकरण में सप्तमी विभक्नि हुई । अधिकरण के तीन भेद है--'औपश्लेषिक' 'वैषयिक' और 'अभिव्यापक' । क्रमशः तीनों के उदाहरण निम्न प्रकार समझने चाहिये 'कटे आस्ते' 'मोक्षे इच्छास्ति' तिलेषु तैलम्' इत्यादि । नोट-आधारे च तथा भावे विभक्तिः सप्तमी भवेत् अनादरे च निर्धारे षष्ठी स्यात् सप्तमी तथा । छः कारकों के उदाहरण एक ही साथ निम्न श्लोक में देखो :-- रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे। रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।। रामान्नारित परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् । रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मामुद्धर । २ ) समास-विचार 'मममनं समासः'--संक्षेप को समास कहते हैं । अर्थात् बड़े वाक्य को छोटा करना ही समास का मुख्य उद्देश्य होता है। और विस्तार को व्यास कहते हैं। व्याकरण में विस्तृत वाक्य ही व्यास पद से लिया जाता है। लाघव के लिए किसी पदसमूह को छोटा करना हो तो वहाँ र तमास कर दिया जाता है जिससे वह पदममुदाय छोटा हो जाता है, समास करने का यही प्रयोजन है। कृदन्त-तद्धिनान्त-समार-मशेष और सामदि द्वादश प्रत्ययान्तधातुरूप, ये पांच वृत्तियां मारी गयीं हैं। जैसे पाचक, औपगव, राजपुरुष, पितरों पुत्रीयति इन्यादि, इन वृतियों में विशिष्ट (समुदाय में ही अर्थबोध जनकशक्ति मानी गयी है, यह शकिन दो तार की है- एकार्थीमाद' और 'व्यपेक्षा । तत्र 'पृथगर्थानां पदानां समुदाय विनिष्ठर्थोपस्थितिजनकत्वम्, एकार्थीभावत्वम्, पृथक् २ अर्थले पदों में सनदाय शक्ति से पानी में मिली हुई धूलि की तरह मिले जुले अर्थों का ज्ञान कराने वाली वृत्ति को कार्थीभाव कहते हैं, 'अनेकार्थों हि एकार्थी भवति अनेनेति एकार्थीभावः' अनेकार्थ जिससे मिलकर एकार्थ हो जाय उसे ही वास्तव में एकार्थीभाव कहते हैं। जिसके बदौलत उक्तस्थलों में जैसे 'पितरौं' , समास-विचार DAR कहने से माता और पिता इन दोनों का ही बोध होता है, प्रत्येक का अलग २ बोध नहीं होता यही बात उक्त पांचों वृत्तियों में मानी गयी है, इसके दो भेद हैं-'जहत्स्वार्थी' और 'अजहत्त्वार्थी' जहाँ पर प्रत्येक रद अपने २ अर्थों को छोड़कर विशिष्टार्थों को ही बतलाता है उसे जहत्स्वार्थावृत्ति कहते हैं । जैसे 'प्रतिष्ठा' 'निष्ठा' 'कृष्णसर्पः' इत्यादि स्थलों में अवयवों का कुछ भी अर्थ न होकर एक विलक्षण अर्थ ही ज्ञात होता है। जहां पर प्रत्येकपद अपने २ अर्थों के साय २ समुदाय के अर्थ को प्रधान रूप से बतलाता है उसे 'अजहत्स्वार्थी वृत्ति कहते हैं । जैसे 'पङ्कज' कहने से कोचड़ से पैदा होने वाला कमल समझा जाता है इसलिये यहां पर अवयवार्थों के साथ ही विशिष्टार्थ कमल का बोध होने से अजत्स्वार्थी वृत्ति हुई । इसे ही योगरूढिशक्ति कहते हैं। यही वृत्ति प्रायः अधिक स्थलो में ली जाती है क्योंकि इसमें अवयवार्थों का भी ज्ञान होने से अधिक लाभ होता है। जहत्स्वार्या तो वहीं पर मानी जाती है, जहाँ पर अक्यवार्थों का संग्रह नहीं हो सकता हो । कहा भी है 'जहत्सर्था तु तत्रैव यत्र रुढिविरोधिनी' इत्यादि । जहत्स्वार्था को ही रुढिशक्ति कहते हैं । जैसे-'प्रतिष्टा' कहने से इज्जत या महत्ता का बोध होता है-प्रत्येकपद का अर्थ कुछ भी नहीं संगत होता। 'स्वार्थपर्यवसायिनां पदानामाकांक्षादिनमात् यः परस्परं सम्बन्धः सा व्यपेक्षा अपने २ अर्थों को बतलानेवाले पदों का जो अपेक्षावश आपस में अन्वय होता है उसे व्यपेक्षा कहते हैं । इस में अलग २ हो पदार्थों की अस्थिति होती है । एकार्थीभाव की तरह मिले जुले दोनों पदार्थों की उपस्थिति नहीं होती, केवल आकांक्षावश एकपदार्थ का दूसरे के साथ सम्बन्ध मात्र हो जाता है। यह शक्ति वाक्य में मानी गयी है। उक्त समास के पांच भेद बतलाये गये हैं-'केवल समास अव्ययीभाव' 'तत्पुरुष' 'बहुव्रीहि' और 'द्वन्द्व' । नुत्युरुष के दो भेद हैं-'कर्मधारय' और 'द्धिगु। १. "विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवलसमासः प्रथमः'-जिसकी कोई विशेष संज्ञा न हो उसे केवल समास कहते हैं। यह समास कहीं पर सुबन्त को सुबन्त के साथ किया जाता है जैसे 'पूर्व भूत': भूतपूर्वः।' और कहीं पर तिङन्त के साथ भी किया जाता है जैसे 'अनुव्यचलत्' 'पर्यभूषत्' यह सारा कार्य 'सह सुपा' के सहारे पूरा किया जाता है । 'इवेन समासो विभक्तयलोपञ्च' इव के साथ भी यह समास होता है लेकिन इसमें समासमध्यवर्ती विभक्ति का लोप नहीं होता है, सन्धिचन्द्रिका ama ' . जैसे 'वागर्थाविव' 'जीमूतस्येव' 'हरीतकी भुक्ष्व राजन् 'मातेव' हितकारिणीमित्यादि। २. 'पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावः' । जिसमें प्रायः करके पूर्वपदार्थ की प्रधानता हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। इस समास के पूर्वपद प्रायः अव्यय ही होते हैं । जैसे-उपकृष्णम्' : कृष्ण के पास) ।इसमें उप पूर्वपद अव्यय है और उनी का सामीप्य रूप अर्य मुख्य रूप से प्रतीत होता है ! यह नित्य समास होता है 'अविग्रह स्वपदविग्रहो वा नित्यसमासः' जिसमें विग्रह वाक्य नहीं बनता हो या बना भी हो तो समास जिसके साथ होता है उससे भिन्न के साथ दिपहजता हो यही नित्य समाज का चिह्न हैं जैसे- कृष्णा मीयम्' "कृष्णम् ! यहां हर समय वह के साथ विग्रह किया गया है और उसके माय नमार होना है। यह समान अययों के अधिकरण आदि विभाघर सम प्य. समृद्धि, विगतऋद्धि, या काय अत्याध्वंस, सम्प्रति(अभी) शब्दानुभाव, पश्चात, यथार्थ, योग्यता. बोप्सा, पार्थानतिवृत्ति, सादृश्य ) आनुपूव्य, योगपद्य, सादृश्य, सम्पत्ति, साकल्य, सन्त इत्यादि अनेकों अर्थों में समस्त होने से अत्यन्त ही व्युत्पत्ति वर्द्धक और चमत्कारजनक होता है जैसे- 'अविहरि' हरि में उपकुम्भम्' घट के पास 'सुमद्रम्' मद्रों की समृद्धि 'दुर्यवनम्' यवनों की बदहालत 'निमभिम' मक्षिकाओं का अभाव 'अतिहिमम्' पालाओं का नाश 'अतिनिद्रम्' असमय में सोना अच्छा नहीं 'इतिहरि' हरि शब्द का प्रकाश अनुविष्णु' विष्णु के पीछे अनुरूपम्' स्वरूप के योग्य 'प्रत्यर्थम्' अर्थ अर्थ के प्रति 'यथाशक्ति' शक्ति के अनुसार –'सहरि हरि का सादृश्य 'अनुज्ये- 'ष्टम्' बड़ों के अनुक्रम से 'सचक्रम् चक्र के एक साथ 'ससखि' मित्र के तुल्य 'सक्षत्रम्' क्षत्रियों की सम्पत्ति, 'सतृणम्' तिनकों के साथ ही 'साग्नि' अग्नि ग्रन्थ- पर्यन्त इत्यादि विलक्षण हो उक्त प्रयोगों के अर्थ हो जाते हैं । 'अनुगङ्गवाराणसी' गङ्गा के फैलाव के अनुसार काशी का फैलाव है । 'अभ्यग्नि शलभाः पतन्ति' माग की ओर पतंगें गिर रहे हैं । 'पारेगङ्ग गङ्गा के पार 'मध्येयमुनम्' यमुना के मध्य इत्यादि अनेक अर्थों में यह समास होता है। अव्ययीभाव को अव्यय संज्ञा हो जाती है और नपुंसकत्व भी हो जाता है इसलिये प्रायः करके अधिक प्रयोगों में अकारान्त को छोड़कर सभी जगह विभक्ति का श्रवण नहीं होता है। जैसे 'अधिहरि' 'यथाशक्ति' इत्यादि अकारान्त में पञ्चमी को छोड़कर सभी विभक्तियों का अम् आदेश हो जाता है और पञ्चमी अलुक हो जाता है।
समास-विचार ४७ -- परन्तु तृतीया सप्तमी में विकल्प में यह कार्य होता है। जैस 'उपकृष्णम्' 'उपकुष्णात्' उपकृष्णेन दा 'उपकृष्णे' वा । कहो पर पूर्व पदार्थ की प्रधानता नहीं ना होती है जैसे--'उन्मत्तराङ्गम्' लाहितगङ्गम्' इत्यादि । ३. 'उत्तरपदार्थप्रधानस्तत्वुल्पः'-जिसमें उत्तर पदार्थ की प्रधानता रहती है उसे तत्पुरुष समान कहते हैं । जैसे-'राजगुरुपः' राजा का पलट निगही वगैरह , यहाँ पर पुरुष अर्थ मुख्यरूप से भासित होता है अतः इमे उन्युरुष कहते हैं। इसमें द्वितीया से लेकर नमी विरक्त्यन्त कंपो के साथ हर है। जैसे 'कृष्णं श्रितः' 'कुष्णश्रितः सङ्घलया खण्डः' 'सङ्कलाखः' मा दारु' 'यूददार' 'चौराद्भयम्' 'चोरभवम्' 'राजो धनन्' 'राजधनम्' क्षेषु शौण्ड: अक्षशीण्डः इत्यादि। इनमें पद समास गनिसमास प्रादिसमा 'मध्यमपद- लोपो समास' 'उसमित नमान उपमान समास' और 'नन् समाना जाता है। जैसे-'कुम्भकारः' च्यात्री' 'अतिभाल:' नकोशान्तिः शाकपार्थिवः"देवना- झणः' 'पुरुषव्यानः"घनश्यामः' अनश्वः' इत्यादि । 'तत्पुरुषविशेष क्रमधल्यः' तत्पुरुषविशेष को कर्मधारय समास कहते हैं : तत्पुरुषः समानाधिकरणः क्रम- धारयः' विशेषण विशेष्यभाव से एकार्थप्रतिपादक समास को कर्मधारय कहते हैं। जैसे-'नीलोत्पलम्' 'महानवमी' 'मयूरव्यंसक' इत्यादि । कर्मधारय विशेष को द्विगु समास कहते हैं। 'संख्यापूर्वो द्विगु:'-द्विगु समासमें संख्यावाचक शब्द पूर्व पद से होता है। जैसे त्रिलोकी' 'पञ्चगवधनः' 'पाण्मातुरः' 'द्वैमातुरः' 'सप्तर्पयः' 'पञ्चगवम्' इत्यादि । कहीं पर उत्तर पद की प्रधानता नही भी होती है जैसे-'अर्ध- पिप्पली' रित्तली का आधा हिस्सा । यहां पर पूर्व पद 'अर्ध का अर्थ ही प्रधान रूप से भासित होता है । अकारान्त उत्तर पदक द्विगु स्त्रीलिङ्ग हो जाता है। जैसे 'पञ्चमूली' 'दशमूली' इत्यादि । 'परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः'-द्वन्द्व और तत्पुरुष समास में उत्तर पद की तरह लिङ्गव्यवस्था होती है । जैसे 'मयूरीकुक्कुटो इमो' कुक्कुटमयूर्यो इमे' 'राज- कुमारो' इयम् । 'ब्राह्मणीपुत्रोऽयम् । किन्तु--रात्रि, अह्न और अन् शब्दान्त द्वन्द्व और तत्पुरुष पुल्लिङ्ग हो जाता है जैसे 'अहोरात्र: 'पूर्वाहणः' 'व्यहः' इत्यादि । परन्तु संख्यावाचक शब्द पूर्व पद में रहने से रात्रि शब्दान्त उक्त समासनपुंसक होता है । जैसे-'द्विरात्रम्' त्रिरात्रम्' । अर्गादिगणपठित शब्द पुंल्लिङ्ग एवं नपुंसक भी होते हैं। जैसे-'अर्द्धर्चः"अर्द्धर्चम्' । सेना सुरा छाया शाला mons ४८ सन्धिचन्द्रिका -- और निशा शब्दान्त तत्पुरुष नपुंसक और स्त्रीलिङ्ग हो जाता है । जैसे-ब्राह्मण- सेनम्' 'ब्राह्मणसेना' इत्यादि । अमनुष्य पूर्वक राजादि और सभा शब्दान्त तत्पुरुष नपुंसक हो जाता है । जैसे-'ईश्वरसमम्' 'इनसभम्' इत्यादि । ४. 'अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः'--जिसमें समासान्तर्वर्ती से कोई अन्य पदार्थ ही मुख्य रूप से जाना जाता है उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। द्वितीया विभक्ति से लेकर सप्तमी विभक्तिपर्यन्त के अर्थ अन्य पदार्थ में लिए जाते हैं, किन्तु प्रथमान्तपदों का ही समास होता है । जैसे-प्राप्तमुदकं यं स 'प्राप्तोद- को ग्रामः' ऊढो रथो येन स 'ऊढरथोऽनड्वान्' 'उपहृतपशूरुद्रः' 'उद्धृतौदना- स्थाली' 'पीताम्बरो हरिः' 'वीरपुरुषको नामः' इत्यादि । इसे समानाधिकरण बहुव्रीहि कहते हैं। कहीं पर सप्तम्यन्तादि और प्रथमान्तपदों का भी यह समास प्रयोजनक्श माना जाता है । इसे ब्यधिकरण बहुव्रीहि समास कहते हैं । जैसे-- कण्ठे कालो यस्य स 'कण्ठेकालः' पद्मनाभौ यस्य स 'पद्मनाभः' दण्डः पाणी यस्य स 'दण्डपाणिः" इत्यादि । तद्गुणसं विज्ञान और अतद्गुणसंविज्ञान के भेद से यह समास दो प्रकार का होता है । जहाँ पर आनयनादि क्रिया में अन्य पदार्थ के साथ २ समास मध्यवती पदार्थों का भी विशेषणरूम से बोध होता है वहाँ उसे तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि कहते हैं । जैसे-'लम्बकर्णपुरुषमानय' यहाँ पर आनयन क्रिया में पुरुष के साथ २ लम्बे कर्णो का भी अन्वय होता है इसलिए यह तद्गुणसं विज्ञान बहुव्रीहि कहलाता है और जहां क्रिया में अन्य पदार्थों के साथ २ समास के मध्यवर्ती पदार्थो का अन्वय नहीं जाना जाता हो वहां उसे अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि कहते हैं। जैसे- 'दृष्टसागर-पुरुषमानय' । यहाँ पर आनयन क्रिया में पुरुष के साथ २ समुद्र का अन्वय नहीं होता है वहां यह अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि कहलाता है । इस समास में सप्तम्यन्त और विशेषण वाचक शब्दों का पूर्वप्रयोग ही होता, जो ऊपर के उदाहरणों ने स्पष्ट प्रतीत होता है । इसमें अन्य पदार्थों के लिङ्गों के अनुसार ही समास के मध्यवर्ती पदों का लिङ्ग हो जाता है, यह बात भी ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट ही प्रतीत हो रही है । इस समास में कहीं पर अन्य पदार्थ की प्रधानता नहीं भी रहती, जैसे 'द्वित्राः' पञ्चषा' त्रिचतुराः' ( दो या तीन, पांच या छै, तीन या चार ) इन स्थलों में समास के मध्यवर्ती पदार्थों की ही प्रधानता देखी जाती है। , समास-विचार ४९ - ५. 'उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः'-'सर्वपदार्थप्रधानो वा द्वन्द्वः' जिसमें समासमध्यवर्ती सभी पदार्थ मुख्यरूप से जाने जाते हैं उसे द्वन्द्व समान कहते हैं । जैसे 'घटपटौ' घड़ा और कपड़ा दोनों ही मुख्य रूप से प्रतीत होते हैं । 'हरिहरगुरव (विष्णु,महादेव और गुरु) ये तीनों ही मुख्यरूप से जाने जाते हैं। चार्थ में यह समास होता है । चकार के निम्न चार अर्थ माने गये हैं-- (१, समुच्चय, (२) अन्वाचय, (३) इतरेतरयोग और (४) समाहार । १. परस्परनिरपेक्षत्यानेकस्यैकस्मिन्नन्वयः समुच्चय--जह पर एक क्रियापद की आवृत्ति करके उसने पहिले असमस्यमान एक पदार्थ का अन्वय होता है, बाद में दूसरे का अच्वय होता है उसी को समुच्चय कहते हैं जैसे- 'ईश्वरं गुरुच भजस्व' यहां पर गुरु का च शब्द के साथ सम्बन्ध होने ने ईश्वर सापेक्षत्व है किन्तु ईश्वरका गुरुमापेक्षाव नहीं है क्योंकि ईश्वर के साथ च पान्द का सम्बन्ध नहीं होता, इसलिये यहां एक हीच शब्द का प्रयोग किया गया है । ऐसी दशा में 'ईश्वरं भव' गुरुच भजस्व इस प्रकार से दो वाक्य बन जाते हैं । इसलिये यहाँ पर उत्तरीति से ईश्वर गुरु को परस्पर निरपेक्ष होकर ही भजन क्रिया में क्रमसे कर्मस्नेग अन्वय होने के कारण परस्पर अन्वय नहीं होने से सामथ्र्य नहीं रहा, अतः समास भी नहीं हो सका क्योंकि समर्थः पदविधिः इसके अनुसार परस्पर सामर्थ्य रहने पर ही समान होता है । २. 'अन्यतस्मानुपाङ्गत्वेन्वाच्यः'--जहाँ पर एक त्रिया में एक पदार्थ का अप्रधानरूपसे अन्वय होता है और दूसरी क्रिया में दूसरे का मुख्यरूप से अन्वय होता है से अन्याय कहते हैं जैसे --भिज्ञ नट गां चानय' यहाँ पर भिक्षाप्रत करना जरूरी है किन्तु रोका साना कोई जरूरी नहीं माल्न पड़ता, हाँ इनका अवश्य जो कहीं मिल जाय तो गौ को भी लेते आना, यही वक्ता का अभिप्राय है न कि उसके लिये कोई विशेष प्रयत्न करना जरूरी है, इसलिये यहां पर एक की प्रधानता और दूसरे की प्रधानता होने से परस्पर अन्वय नहीं हो सकने के कारण सामर्थ्याभाव से समास नहीं होता है। ३. 'मिलितानामन्वये इतरेतरयोगः' - जहाँ पर परस्पर अपेक्षित समुदित का एक हिया में अन्य होता है उसे इतरेतर योग कहते हैं । जैसे घवश्च खादिरश्चेति धवलदिरौ' छिन्धि, यहां पर समुदत घव और खदिर का ही एक ४ सं० च० सन्धिचन्द्रिका साथ छेदन क्रिया में अन्वय होने से परस्पर साहित्य हो जाने के कारण सामर्थ्य रहने से समास हो जाता है और दोनों की प्रधानता होने से द्विवचन होता है ४. समूहः समाहार:'--समुदाय ही समाहार कहते हैं। जैसे- 'पाण्योः पादयोश्च समाहारः पाणिपादम्' यहाँ पर समुदाय में दो हाथ और दो पाद का एक साथ ही अन्वय होने से परस्पर साहित्य हो जाने से सामर्थ्य की क्षति नहीं हुई इसलिये समास हो गया । किन्तु इसमें समुदाय की प्रधानता और एकत्व होने से नपुंसकत्व और एक वचन ही आता है। जैसे--'संज्ञापरिभाषम्' 'माईगिक यिम्' 'रथिकाचारोहम' इत्यादि उदाहरणों से स्पा प्रतीत होता है। इसमें अल्प स्वरवाले पदों का पूर्व प्रयोग होता है । जैसे-शिवकेशवो' इत्यादि । पूज्यवान कमब्दों का भी पूर्व प्रयाग हो जाता है जैसे--'तापसपर्वतो' इत्यादि । इकारान्त और उकारान्त घिसंज्ञकका भी पूर्व प्रयोग हो जाता है । जैसे- 'हरिहरौ' इत्यादि । ब्राह्मणादिवों में क्रमने हो पूर्व प्रयोग होता है। जैसे-'ब्राह्मण क्षत्रियविटशनाः' इत्यादि । लघु अक्षर का भी पूर्व प्रयोग होता है। जैसे-'कुश- काशम्' इत्यादि । मातृवाचक शब्दों में बड़ों का ही पूर्व प्रयोग होता है। जैसे- 'युधिष्टिरार्जुनौ,इत्यादि । समान अक्षरवाले ऋतु और नक्षत्र वाचक शब्दोंमें क्रम से ही पूर्व प्रयोग होता है। जैसे--'हेमन्तगिशिरवसन्ताः' कृतिकारोहिण्यो' इयादि । अाणिवाचक जाति शब्दों का समाहार द्वन्द्व ही होता है। जैसे 'धाना शकुलि' इत्यादि। ।
-- (३) तिङन्त-विचार-- प्रयोग कालमें धातुके उतर जो 'तिङ्' विभक्ति होती है, उस तिङ् विभक्तिके योगसे जो पद निष्पन्न होता है वह 'तिङ्डन्त' कहलाता है। लट लिट् लुट् लूट लेट लाट तुङलिङ लुङ् लुङ्- कालका ज्ञान एवं विधि आदिकः अर्थतान कराने के लिए धातु के बाद लडादि तिङ् विभक्तियां दश उकार को होतो हैं । इसमें 'लेट का प्रयोग त्रेदमें होता है। १-वर्तमाने लट्- वर्तमान क्रियावृत्ति धातु से लट् लकार होता है। नोट-जिसमें क्रिया का प्रारम्भ हो उसे 'वर्तमान कहते हैं। वर्तमान सामीप्य रहने पर भूत और भविष्यत् कालमें भी 'लट्' होता है । यथा-'इदानी- मेव आगच्छामि' (अभी आया हूँ ) । 'अपमहं गच्छनि' (मैं अभी जाउंगा)। स्म' के योग भूत कालने भो लट का प्रयोग होता है । यया- 'स पठतिस्म' ( उसने पड़ा ) । यावत्' के योगले भविष्यत् काल में भो 'लट्का प्रयोग होता है । यया-'स यावत् नागच्छति' (वह जब तक नहीं आयगा)। लकारके स्थान में तिबादि विभक्तियां होतो हैं (पृ०३० को टि देखो) विभ- क्तियों में ३ पुरुष होते हैं-प्रथम, मध्यम और उत्तम । क्रियाके साथ युष्मद् या अस्मद् शब्दसे भिन्न शब्दोंके प्रयोग रहने पर प्रथम पुरुष, युष्मद् शब्दके प्रयोग रहने पर मध्यम पुरुष और अस्मद शब्द प्रयोग रहने पर उतम पुरुष होता है, तथा कर्ता का जो बचन रहे वही क्रिया का भी बबन होता है। यथा- १. बालकः पठति । बालको पठनः । बालका: पठन्ति । २. त्वं पठसि । युवां पठयः । यूयं पठय । ३. अहं ठामि । आव पावः । वयं पठामः । ३–परोक्षे लिट् -- भूत अनद्यतन और परोक्षार्थ वृत्ति जो धातु उससे 'लिट् लकार होता है । नोट- अनद्यतन कालके दो भेद हैं --भूत और भविष्यत् । पूर्व दिन की आधी रात (१२ बजे) तक जो क्रिया हुई हो वह भून अनद्यतन ओर आगामी (आज) रातके बारह बजे के बाद जो क्रिया होने वाली हो वह भविष्यत् अनयतन (लुट) को क्रिया कही जातो है । लक्षण यया-'अतीताया रात्रे. पश्चाधन आगामिन्याः पूर्वार्धन च सहितो दिवसोऽद्यतनः, तद्भिनोऽनद्यतनः ।'
५२ सन्धिचन्द्रिका -- -- 'परोक्ष' उसको कहते हैं जिसमें वक्ताका प्रत्यक्ष नहीं हो । एवं च सिद्ध यह हुना कि 'परोक्ष' और 'अनद्यतन' भूत कालमें 'लिट्' का प्रयोग हो। यथा-- 'रामो बालिनं जघान । स्मरण रहे कि चेत्तविक्षेपमें तथा किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करने पर प्रत्यक्ष ( उत्तम पुरुष) में भी 'लिट् का प्रयोग होता है । यथा-१. 'सुप्तोऽहं किल विललाप' २. 'नाऽहं कलिङ्गां जगामा ३-अनद्यतने लुट्-- भविष्यत् अनद्यतन अर्थ में धातुसे लुट् लकार होता है। ४--लट् शेपे च-- भविष्यत् अर्थमें धातुसे'लुट् लकार होता है; द्रियार्थकविया रहे या न रहे। नोट--एक क्रिया यदि दूसरी क्रियाके लिये हो रही हो तो उस क्रियाको 'क्रियार्थक क्रिया' कहते हैं । यथा--पठितुं गच्छति' इति-'पठिष्यति'। ५--लोट् च-- विध्यादि अर्थों में धातुसे लोट् लकार होता है। ६--आशिषि लिङ्लोटौ-- आशीर्वाद अर्थ में घातुसे लिङ् और लोट्लकार होता है। ७--अनद्यतने लड-- अनद्यतन भूतार्थवृत्ति धातुसे 'लङ् लकार होता है । ८--विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्ट सम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्- विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अघीष्ट, संप्रश्न और प्रार्थना अर्थोमें धातृते 'लिङ् लकार होता है। नोट-विध्यादि अर्थोंमें लोट्का भी विधान हो चुका है । अब यहाँ दोनों का स्पष्टीकरण इस प्रकार है--विधि:=प्रेरणम्'; भृत्यादेनिकृष्ठस्य प्रवर्तनम् । जैसे--'भवान् वस्त्रं भालयतु, क्षालयेद्वा। निमन्त्रणं नियोगकरणम्,आव- श्यके श्राद्धभोजनादौ दौहित्रादेः प्रवर्तनम् । जैसे-'इह मातामहस्राद्ध दौहित्रा- दयो भवन्तः भुञ्जताम् वा भुञ्जीरन् । आमन्त्रणं कामचारानुज्ञा । जैसे- मत्पुत्रोत्सवे भवान् आगच्छतु, आगच्छेद्वा । अधीष्टः सत्कारपूर्वको व्यापारः । जैसे-मदात्मजं चन्द्रशेखरं गोपालं वा भवान् अध्यापयतु अध्या- पयेद्वा । सम्प्रश्नः-सम्प्रधारणम् । जैसे-किं भोः व्याकरणंभवान् अधीयीत, उत तर्कम् ? प्रार्थनं - याच्या। यथा-भवान् मे फलं ददातु दद्याद्वा । e- ?
तिङन्त-विचार 8-माडि लुङ्- 'माङ् उपपद रहने पर धातुसे लुङ् लकार होता है। १०--लिङ् निमित्त लुङ क्रियातिपतौ भविष्यत् अर्थ में विद्यमान धातु हेतुड़े तुमद्भावादि ( कार्यकारणभावादि } 'अर्थ में 'लङ' लकार होता है. क्रियाको अनिष्पत्ति यदि गम्यमान रहे। ११--लः कर्मणि च भावे चाऽकर्म केभ्यः --सकर्मक धातुसे कर्म और कर्ता तथा अकर्नक धातुसे भाव ओर कमि लकार होता है। नोट--१ कर्तृवाच्य में कर्ता प्रथमान और कर्म द्वितीयान्त तथा क्रिया के पुरुष-वचन कर्ता के अनुसार प्रयुक्त होते हैं । यया-'इन्दुमती पुष्पं चिनोति' । एवं कर्म वाच्यमें कर्ता तृतीयान्त और कर्म प्रयमान्न तथा क्रिया के पुरुष-वचन कर्मके अनुसार होने हैं । यथा - 'गोपालेन वेदाः पश्यन्ते । एवं भाव वाच्यमें कत्ता कर्न वाच्यवत् तृतीयान्त होता है पर कर्म नहीं होता तथा क्रिया सदैव प्रथम पुरुष का एक ववनात ही होती है । यथा -- 'अस्माभिः स्थीयते । तथाहि- 'प्रयोगे कर्तृवाच्यस्य कर्तरि प्रथमा भवेत् । द्वितीया कर्मणि तथा क्रिया कतृ पदान्विता ।। प्रयोगे कर्नवाच्यस्य तृतीया त्यात कर्तरि । कर्मणि प्रथमः चैव क्रिया मानुनारिणी ।। काभावः सदा भावे तृतीया चैव कर्तरि । प्रथमः पुरुषश्चैकवचनं च क्रियापदे ।' १२--भावकर्मणोः साववाच्य और कर्मवाच्य में लकारके स्थानमें आत्मनेपद होता है। १३--सार्वधातुके यक्- भाववाची और कर्मवाची सार्वधातुकके परे धातुसे 'यक् प्रत्यय होता है । नोट-भाव क्रियाको कहते हैं। वह भावार्थक लकारसे अनूदित होता है । भावमें प्रत्यय करनेपर 'तिङ' के साथ युष्मद् अस्मद् शब्द एकार्थवाचक नहीं होते, अतः धातुसे प्रथम पुरुष ही होता है । : कर्नामें प्रत्यय करनेपर तिड़ और युष्मद्- यस्मद् शब्द कारूप एकार्थके वाचक होते हैं, अतः पातुसे मध्यम-उत्तम पुरुष होते हैं) तिर्थ क्रियाके द्रव्यरूप न होनेसे द्वित्व, बहुत्व संख्याकी प्रतीति नहीं होती । इसलिये द्विवचन बहुवचन नहीं होते,किन्तु स्वाभाविक एकवचन ही होता । +-- .
सन्धिचन्द्रिका - यथा- - है । भाव में प्रत्यय होनेपर का कि अनुक्त होनेसे क्से तृतीया विभक्ति होती है। जैसे-'त्वं भवसि' इस अर्थमे 'त्वया भूयते' इत्यादि । फल और व्यापार घाट के अर्थ होते हैं-'फलव्यापारयोर्धातुः' व्यापारका आश्रय कर्ता और फलका आश्रय कर्म होता है। जिसका फल और व्यापार भिन्न २ अश्रयमें हो उसे सकर्मक करते है:-- फलव्यधिकरणव्यापारवाच- कत्वं सकर्मक्त्वम्' । यथा--'देवदत्तः तण्डुलं पचति यहां विजित्ति रूप फल चण्डल में और पावरूप व्यापार देवदत्तमे है, अतः पच् धातुको सकर्मक समझना चाहिए। जिसका फल और व्यापार एक ही आश्रयमें हो उसे अकर्मक कहते हैं-- फलसमानाधिकरणब्यापारवाचकत्वमकर्मक्त्वम् । 'गोपाल: शेते' यहां विधाम रूप फल और चक्षुनिमीलनादि रूप व्यापार भी गोपाल में हैं, अतः 'शीङ् धातु अकर्मक है। सामान्य नियम:--साकांक्षित क्रिया 'सकर्मक', यथा--पठति, खादति आदि २। क्या पढ़ता है ? क्या खाता है ? एवं निराकांक्षित क्रिया अकर्मक, यथा-जागता है हंसता है। यहां क्या जागता है, क्या हंसता है,इत्यादि आकांक्षा ही नहीं उठती। विशेष चियम- 'धातोरर्थान्तरे वृत्तेर्धात्वर्थेनोपसंग्रहात् । प्रसिद्धरविवक्षातः कर्मणोऽक्रमिका क्रिया' !! यहां पर प्र येक वाक्यका अर्थ इस प्रकार है-- १. सकर्मक धातु यदि अन्तिर (कर्मक क्रियारूप अर्थान्तर) को कहने लगे तो' वह अकर्मक हो जाती है । यथा 'भारं वहति प्रापयति' यहां प्रापणार्थक 'वह' धातु सकर्मक है, परन्तु यही अर्थान्तर (स्यन्दतेरूप अर्थ ) में प्रवृत होकर कहीं अकर्मक होती है । यथा 'नदी वहति स्यन्दते-प्रस्रवति'। २. यदि कर्मका धात्वर्थ से उपग्रह हो जाय तो धातु अकर्मक हो जाती है । यथा 'जीवति' नृत्यति यहां 'जीव' का प्राणधारण करना और 'नृत' का अङ्गविक्षेप करना इर्थ है। परन्तु दोनों जगह प्राण और अङ्ग रूप कर्मका धात्वर्थ में ही अन्तर्भाव हो जाता है अतः ये दोनों धातु सकर्मक नहीं होते। ३. कहीं प्रसिद्ध कर्म रहने पर भी धातु अकर्मक हे जाती। है यथा 'मेघो' New तिङन्त-विचार वर्षति' अर्थात् मेघो जलं वर्षति । यहां पर जलरूप कर्म प्रसिद्ध है, क्योंकि मेघ जल ही वर्षाता है आग वगैरह नहीं । इसलिये धातु अकर्मक कही जाती है । ४. कर्मकी अविवक्षा करने पर भी धातु अकर्मक हो जाती है, यथा- 'हितान्न यः संवृणुते स किं प्रभुः' (हितात् हितपुरुषात् यः न संशृणु। स्वहितं न मन्यते, स किं प्रभुः, कुत्सित इत्यर्थः ) यहां पर स्वहितरूप कर्मको अविवक्षा करने पर धातु अकर्मक हो जाती है । 'अकर्मकोप्युपसर्गवशासकर्नकः' --अकर्मक धातु भी उपसर्गवशात् सक- मक हो जाती है । यथा-'अनुभूयते अानन्दश्चैत्रेण इयादि। यहां अनुपूर्वक भूधातु अनुभवार्थक होनेसे सकर्मक हो गया और उसने कर्मम भी प्रत्यय सिद्ध हुआ : कर्म उक्त होनेपर कमसे प्रथमा और कर्म अनुक्त होनेपर कति तृतीया विभक्ति होती हैं । एवं कर्म के एकवचन रहने पर किया प्रम पुरुषके एकवचन, द्विवचन रहनेपर द्विवचन और बहुववन रहनेपर बहुवचन होती है । वल युप्मद् कर्म रहनेपर मध्यम पुरुषकी और अस्मद् कर्न रहनेपर उत्तम पुरषकी क्रिया होती है । यथा---गापालेन प्रानन्दः अनुभूयते,गोपालेन आनन्दौ अनुभूयेते गोपालेन आनन्दाः अनुभूयन्ते ! एवं गोपालेन त्वम् अनुभूबसे, गोपा- लेन युवाम् अनुभूयेथे, गोपालेन बूयम् अनुभूपध्वे । गोपालेन अहम् अनु- भूये. गोपालेन आवम् अनुभूयावहे, गोमालेन वयम् अनुभुयामहे । ( इसीप्रकार अन्यत्र भी समझना)। नोट-अकर्मक धातु ण्यन्त होनेपर भी सकर्मक हो जाता है और सकर्मक होनेपर उससे कम में भी प्रत्यय होने लगता है तथा कर्मानुसार क्रिया होती है । यथा कमि-गोपालः भवति चन्द्रशेखरः तं प्रेरयति, इति चन्द्रशेखर: गोपालं भावति । कर्म में-चन्द्रशेखरेण गोपालः भाव्यते, गोपालौ भाव्येते गोपाला: भाव्यन्ते । एवं--चन्द्रशेखरेण त्वं भाव्यसे, युवां भाव्यथे, यूयं भाव्यध्वे । अहं भाव्ये, आवाम् भाव्यावहे, वयम् भाव्यामहे । द्विकर्मक धातुओंके किन कर्म में लकार होगा इसकी व्यवस्था निम्न है:- 'गौणे कर्मणि दुह्यादेः प्रधाने नीहृकृष्वहाम्। बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया ।। प्रयोज्यकर्मण्यन्येषां ण्यन्तानां लादयोः मताः ॥ , - सन्धिचन्द्रिका , अर्थात् दुह, याच, पच्, दण्ड, रुधि, प्रच्छि, चि, ब्र, शासु. जि, मन्थ, मुष् इन धातुओं के ( अकथितञ्चेति सूत्रविहित ) गौणकर्म में लकार होता है । ( इसलिये गौण कर्मसे ही प्रथमा विभक्ति होती है,यथा 'गौदुह्यते पयः' । नी, हृ, कृष्, तथा वह धातुओंके ( 'अकथितञ्च' से भिन्न सूत्रविहित ) प्रधान कर्ममें लकार होता है, ( इस लिये प्रधान कमसे प्रथमा विभक्ति होती है) यया 'अजा ग्रामं नीयते' । बुद्ध्यर्थक, भक्षार्थक, और शन्दकर्मक धातुओंके ( 'गतिबुद्धि' सूत्रविहित गौण या तदतिरिक्त सूत्रविहित प्रधान ) दोनों कर्मों में स्वेच्छासे लकार होता हैं । इसलिये प्रवानाऽप्रधान उभय कमोसे प्रयमा विक्ति होती है ) यथा- 'बोध्यते माणवकं धर्मः, माणवको धर्मम्' इति वा । अन्येषां--पूर्वोक्तोंसे अन्य अर्थात् प्यन्त जो गत्यर्थक, अकर्मक तथा 'हृनोरन्यतरस्याम्' इस सूत्रोपात्त हृन और कृत्र, धातुओंके प्रयोज्य कर्ममें लकार होता है ( अतः प्रयोज्य कर्मसे प्रथमा विभक्ति होती है । यथा--मासमास्यते माणवकः, हार्यते कार्यते वा मृत्यः कटगोपालेन। १४--कर्मवत्कर्मणा तुल्यक्रियः- कर्मस्था ( कर्म में वर्तमान ) जो क्रिया उसके समान ही क्रिया है जिसकी ऐसा जो कर्ता, वह कर्मवत् हो, इससे यगादि होते हैं । ( जहां कर्म में क्रियाकृत विलक्षणता दिखाई पड़े वहां कर्मस्था क्रिया होती है । जैसे पके ओदनमें।) नोट-कर्म ही यदि कर्ता हो अर्थात् क्रियाका कर्तृव यदि कर्नमें आरो- पित हो तो 'कर्म की हो जाता है और प्रायः सकर्मक सभी घातु अकर्नक हो जाते हैं, इसलिये भाव और कर्ता में लकार होता है । भाव वाच्य में कर्म बर्ता से तृतीया हो जाती है। जैसे-भिद्यते काप्टेन' इत्यादि और कर्तृवाच्य में कर्म- कर्तासे प्रथमा विभक्ति होती है. अन्य कर्म पद नहीं रहता तथा क्रियाका रूप कर्मवाच्यकी क्रियाके तुल्य होता है। यथा - 'काष्ट भिद्यते स्वयमेव' । कार्य करनेके समय जो 'कर्म शारक' कर्ताक सुखकर निजगुणों स्वयं ही सिद्ध होता है, उसे 'कर्म कर्ता' कहते है । कहा भी है:- क्रियमाणं तु यत् कर्म स्वयमेव प्रसिध्यति । सुकरैः स्वर्गुणैः कर्तुः 'कर्मकर्ते'ति तद्विदः ॥'
(४) कृदन्त-विचार- 'कृत्' प्रत्यय धातुके अन्तमें प्रयुक्त होते हैं और उनके योगसे बने शब्द 'कृदन्त' कहलाते हैं । कर्तृवाच्च कृदन्त की क्रिया कर्वाका विशेषण और कम वाच्यमें कर्मका विशेषण होती है तथा भाववाच्यमें नपुंसकलिंगका एक बचानान्त होती है । यथा- कर्तृवाच्य-स अस्मान् उक्तवान् । कर्मवाच्य-तेन वयमुक्ताः । भावाच्य-तेन उक्तम् । कृदन्तके निम्न मुख्य पांच प्रन्ययों पर ध्यान दो-- १. तव्य-अनीयर्-इनके प्रयोग कर्ता तृतीया अथवा षष्ठी विक्ति होती है । सकर्मक धातुसे ये प्रत्यय होनेपर तीनों लिङ्ग और तीनों वचन होते हैं, और अकर्मक धातुसे होनेपर केवल नपुंसक लिंग और एक वचन ही प्रयुक्त होते हैं । यथा---'तेन (तस्य वा ! पाठः पठितव्यः' । त्वयेदं कर्तब्धम्, करणीयं वा' 'तेन आसितव्यम्' : प्रायः विधि' अर्थमें ही इसका प्रयोग होता है । २. क्त - 'क्त' प्रत्यय भूतकाल में होता है और 'क्त' प्रत्ययान्त क्रिया के कति तृतीया और कर्नसे प्रयना विनक्ति होती है तथा कर्म के लिंग के अनुसार ही तप्रन्ययान्त पदका हिंग होता है। जैसे--तेन माला निमिता। मया फलं भक्षितम् । अकर्मक धातु से भाव में 'क्त' प्रत्यय प्रायः नसक विगमें होता है । जैसे--मया हसितम् । कुछ धातु ऐसी भी हैं जिनसे 'क्त' प्रत्यय कर्ता में भी होता है । जैसे - गन्यर्थक अकर्मक, शिनष, शोङ, स्या, आस, व, जन, रुह और ज, धातु । उदाहरण यया--'वनं गतो रामः' । इत्यादि । २. क्तवतु-- क्तवतु' प्रत्यय भी भूतकालनें होता है, परन्तु यह कर्नामें ही होता है और कर्तृवाच्यके अनुसार कर्ता और कर्नसे विभक्ति मो होती हैं । जैसे--'अहं पुस्तकं पठितवान् । तौ पुस्तकं पठितवन्तौ' । ४. क्त्वा --जव एक क्रियाके बाद दूसरी क्रिया को जाती है तब प्रथम कालिक क्रियासे 'क्वा' प्रत्यय किया जाता है और क्या प्रयपात क्रिया अन्यय सन्धिचन्द्रिका ma- रूपसे प्रयुक्त होती है तथा कर्म आदि मुख्य (द्वितीय)क्रियाके अनुसार ही होते हैं। पथा-'शत्रून् जित्वा निवर्तते रामः' । 'क्त्वा' प्रत्ययान्त क्रियाके पूर्व यदि कोई उपसर्ग रखा जाय तो 'क्वा' के स्थान पर 'य' हो जाता है। जैसे- विजित्य, निहत्य, भादि । ५. तुमुन्-जब एक क्रिया करनेके लिये दूसरी क्रिया की जाती है, तब प्रथम क्रियासे 'तुमुन् प्रत्यय होना है और तुमुन्प्रत्यान्त अव्यय हो जाता है। 'तुमुन्' प्रत्ययान्त क्रियाके कर्मादि प्रथम प्रियाके साथ संबद्ध होते हैं। परन्तु कर्ताका संबन्ध मुख्य क्रियासे ही होता है । जैसे-'इन्द्रियाणि जेतुमुपक्रमते' ।। ४ १ ३ (५) संख्याओंका गणनाक्रम--- 3 १-एकम् 8 =नव -अष्टादश १० --दश ऊनविंशतिः ३ =त्रीणि ११ एकादश एकोनविंशतिः ४ =चत्वारि १२ -द्वादश १६ । एकान्त्रविशतिः एकाविंशतिः ६ = पद -त्रयादश २१ =विशतिः १४ =चतुर्दश २१ =एकविंशतिः पच्चदश अष्टी २२ -द्वाविंशतिः १६ =षोडश १७ मतदश २३ त्रयोविंशतिः (१,३) द्वयष्टनःसंख्याया-बहुव्रीहशोत्योः' =द्विशब्दस्य अप्टन् शब्दस्यच संख्या वाचके उत्तर पदे परे आत्स्यात्,न तु बहुवोही,अशीतिपरे चेत्यर्थः । बहुव्रीहौनिषेधात् द्वौ वा त्यो वेति विग्रहे संख्याव्ययेनि बहुव्रीहो द्वित्राः' इत्यत्र आत्वं न भवति । अशीतिपरे त्वन्नेत्यस्योदाहरणन्तु अनुपदमेव 'द्वयशीति इतिशक्ष्यामः।(४)एकेन न विंशतिःइति विग्रहः। 'एकादिश्चैकस्य चादुक'इतिनत्रःप्रकृतिभावे अदुमागमेच दोर्पा अनुनासिको विकल्पः । (२.५) स्त्रयः' =प्राक्शतात् संख्याशब्दे उत्तरपदे परतः त्रि शब्दस्य त्रयस्बादेशःस्यात् नतुबहुव्रीही,अशीतिपरे चेत्यर्थः। एवञ्च त्रयसादेशे रुत्वे ८ %D 3 ४८ বিশ্রামার संख्याओं का गणता क्रम। ५६ २४= चतुविशतिः ४७=सप्तचत्वारिंशत् ६७ = सप्तषष्टिः २५ पञ्चविंशतिः अष्टाचत्वारिंशत् । ६८ (अष्टाषष्टिः २६=षड्विंशतिः अष्टषष्टिः अष्टचत्वारिंशत् ऊनसप्ततिः २७ सप्तविंशतिः ऊनपञ्चाशत् ४३ एकोनसप्ततिः २८=अट्टाविंशतिः एकोनपञ्चाशत् ७० सप्ततिः (ऊनत्रिशत् पञ्चाशत् २६ एकोनत्रिंशत् ७१ =एकसप्ततिः ५१ एकरञ्चाश्त ३० = त्रिंशत् (द्विपञ्चाशत् (द्विसप्तति; ७२ ५२ । द्वासप्ततिः ३१ = एकविशत् द्वापञ्चाशत् त्रयःसप्ततिः ३२- द्वात्रिशत् त्रयःपञ्चाशत् ७३ त्रिसप्ततिः ३३=त्रयस्त्रिशत् ७४ = चतुःसततिः ३४-चतुस्त्रिशत् ५४-चतुःपक्षाशत् ७५ - पञ्चस्ततिः ५५ = पञ्चपञापत् ३५=पञ्चत्रिंशत् ७६=पट्सततिः ३६ = षट्त्रिंशत् ५६=पटपञ्चाशन ७७-सप्ततिः ५७-सप्तपञ्चाशत् ३७=कत्रिंशत् अासततिः ३८=आत्रिंशत् सवारचाशत् अस्प्ततिः अपञ्चाशत् जनत्रत्वारिंशत् अनाशीतिः ७६ एकोनचत्वारि० निषष्टिः एकोनाशीतिः एकोनषष्टिः चत्वारिंशत् अशीतिः ६९ =षष्टिः ४१=एकचत्वारिंशत् ६१ =एकषष्टिः ८१-एकाशीतिः द्वाचत्वारिंशत ४२ द्विचत्वारिंशत् द्विषष्टिः ८२ -द्वयशीतिः ६२ द्वाषष्टिः ८३=त्र्यशीतिः वियश्चत्वारिंशत् त्रियषष्टः ६३ त्रिचत्वारिंशत् त्रिषष्टिः ८४=चतुरशीतिः ४४ = चतुश्चत्वारिंशत् ६४ = चतुःषष्टिः ८५ पञ्चाशीतिः ४५ पञ्चचत्वारिंशत् ६५ पञ्चषष्टिः ८६= षड्शीतिः ४६= षट्चत्वारिंशत् ६६=षट्षष्टिः ८७=सप्ताशीतिः ६ ८८-अष्टाशीतिः उत्वे च गुणः । (१-३) "विभाषा चत्वारिंशत्प्रभृतौ सर्वेषाम् द्वि-अष्टनः-त्रेच ६० सन्धिचन्द्रिका अष्टानवतिः भागुक्तम् (द्वि-अष्टनोरात्वं, त्रिशब्दस्य त्रय सादेशच) वा स्यात् वत्वारिंशदादा परे इत्यर्थः। (४-६) 'दयनः संख्यायाम बहुव्रोही, इति सूत्रे,त्रेस्त्रयः' इति सूत्रे त्र न तु ऊननवतिः १४ चतुर्गवतिः नवनवतिः एकोननवतिः 88 ऊनशतम् ६० नवतिः २५ पञ्चनवतिः एकोनशतम् ६१-एकनवतिः १६ष्णवतिः १००-शतम् द्वानवतिः ३२ ६७ सप्तनवतिः १०१-एकशतम् द्विनवतिः त्रयोनवतिः १०२=द्विशतम् २३ त्रिनवतिः अनवतिः १०३ = त्रिशतम्, इत्यादि। अथ संख्यायाः कुत्र "एक दश शतञ्चव सहस्रमयुतं तथा । लक्षच नियुतश्च व कोटिचुदमेव च ।। वृन्द खो निखर्वत्र शङ्खः पद्मश्च सागरः । अन्त्यं मध्यं परार्द्धश्च दशवृद्धचा ययाक्रमम् ॥" अशीता वियुक्तस्वात् द्वयान् शब्दयोरावं, त्रिशन्दस्य त्रयसादेशश्वाऽत्र न भवन इत्यवधेयम् । ( १ ) एकच शतञ्चति समाहारद्वन्द्वः । (२-३) द्वच शतञ्च, त्रीणि च शतं च इति समाहारद्वन्द्वः द्वयनः इति सूत्रे 'स्त्रयः' इति सूत्रे च प्राक् शतादिति वक्तव्यम्' इत्युक्तत्वात् शतशब्दे परे द्विशब्दस्य आत्वं, त्रिशब्दस्य त्रयसादेशो न भवतीति । कर्नधारये तु 'द्विशतम्' इत्यस्य २००, 'त्रिशतम्' इत्यस्य ३०० इत्यर्थो भवतीति दिक् । (४) एतत् संख्याक्रमो नेदानी व्यवहारे दृश्यते । विश्राम इत्याहm संख्याओंका गणना। १ एकम् = एकाई श=दहाई शतम् =सैकड़ा १० .... .... १०० सहनम्-हजार १००० 16. दशसहस्त्रम् -दश हजार १०००० लक्षम्=लाख १००००० १०००००० दशलक्षम्य दस लाख कोटि:=कड़ोर दशकोटि:=दश करोड़ अर्बुदम=अरब दशाबुदम् =दश अरब १००००००० १०००००००० १००० ००० 80000000000 खर्व: खरब १००००००००००० १०००:०००००००० दशखर्व = दश खरब नीलम् = नील दशनीलम् = दश नील १००००००००००००० १००० पद्य-पदुम १००० . १०००००००००००००००० दशप-दश पदुम शंख शंख: 800000000000000000 .... महाशंख =दश शंख .... १०००००००००००००००००० ५सखेरह (६) गुप्ताऽशुद्धिप्रदर्शनम् १ पतिना रक्षिता सर्वा दारा भवति शोभना' सर्वा विधिगृहानां सा करोति मतिना मुदा ।।१।। ते १ गृहः कुत्र १3 मित्रा३स्ति दक्षिष्यामि ४१५ १. पत्या। पति शब्द को समास में ही घिसंज्ञा होने से ताभाव नहीं होता। २. रक्षिताः । दारशब्द के 'दाराः पुसि च भूम्ति एवं' इस नियम से पुल्लिङ्ग और नियत बहुवचनान्त होनेसे उसके विशेषण रक्षित शब्द भी वैसा होगा। ३.सर्वे । दारशब्दका विशेषण होनेसे सर्वशब्द भी पुलिला बहुव बनान्त होगा। ४. भवन्ति । दाररूम कर्ता के अनुसार भवनक्रिया से बहुवचन होगा। ५. शोभनाः। पूर्वोक्तनियमानुसार दारविशेषण शोभन से भी बहुवचन होगा। ६. सर्वम् । 'क्यन्तो धुः' इसलिङ्गानुशासन क्रम से किप्रत्ययान्त विवि शब्द के पुल्लिङ्ग होने से उसका विशेषण सर्व शब्द भी पुल्लिङ्ग होगा। ७. गृहाणाम् । 'अकु-वाङ्' से णत्व हो जायगा। ८. ते । तत् शब्द प्रस्तुत बुद्रिविषर के ग्राहक होने के कारण उपस्थित दारा अर्थ का बोधक होने से पुल्लिङ्ग बहुवचनान्त होगा। ६. कुर्वन्ति । कर्तृवाच्य में कर्ता के अनुसार क्रिया में ववन और पुरुष की व्यवस्था होने से यहाँ बहुवचनान्त होगा। १०. माया । स्त्रीलिङ्ग में नाभाव का निषेध है अतः ना आदेश नहीं होगा। ११. तव । 'अनुदात्त सर्वमपादादौ' ऐसा सूत्र है अतः यहाँ पादके आदमें रहनेसे तव को ते आदेश नहीं होगा। १२. गृहम् । “गृहाः पुसि च भूमन्येव" इस नियम से एकत्व संख्या अर्थ में गृह शब्द से नपुंसक में एकवचन होना ही समुचित है। १३. मित्र ३ ! अस्ति । सम्बोधन में प्लुत होनेसे प्रकृतिभाव होगा। १४. द्रक्ष्यामि । दृश्धातुको अनिट् होनेसे लट् में स्य प्रत्ययको इट् नहीं होगा। १५. सख्युः । सखि शध्द को घिसंज्ञाका निषेध होनेसे "डिति" से गुण न होकर यण और 'ख्यत्यत्पिरस्य" इस सूत्र से उत्व हो जायगा । १६. अहम् । हल के परे न होनेसे "मोऽनुस्वारः नहीं होगा।
.. गुमाशुद्धिप्रदर्शनम् । ६३ विहित्वा' सर्वकार्यानि-वित्र दद्यां वहुं धनम् ॥२॥ प्रभुक्त्वा" वं गृहेगाद्य आगत सखिना सह । ९भ्रातर्वदोयमित्रोऽत्र नागत'' केन हेतुना ॥ ३ ॥ तव'? माकं ग मध्ये हा नोचे नस्य १४ बन्यने ५ : मरिष्ये ६ नात्र संदेहस्त्रजिष्यामि'' अनु निजम् ॥४॥ १. विधाय । 'ममा गन्नपूर्वे क्वो स्म से कवा का ल्या हो जानेपर तकरादिक परमें नहीं रहने से 'दवानेहि' से हि आदेश नहीं होगा। २. कार्याणि । रेफ के उत्तर नकार को 'अकुप्वाङ से गकार हो जायगा । ३. विप्राय । दाधातु के योग में सम्प्रदान संज्ञा होकर चतुर्थी हो जायगा । ४. बदु । धन शब्द विशेषण होने से बहुसे भी नपंसकत्व होगा। ५ प्रभुज्य । समासेना पूर्वे से ल्यप हो जायगा। ६ गृहात् । अप"य अर्थ नासित होनेपर ध्रुव से अपादानमें पञ्चमी हो जाती है। ७. आगतः । ‘वा परि' इस नत्रने शर् परे रहने पर विकल्प से विसर्गको विसर्ग हो जाता है। पनावरमें विसर्गको सकार हो जायगा । ८. सख्या । मखिरब्द को धिन नहीं होती अतः टाको ना नहीं होगा। ६. भ्रातत्त्वदीयम् । विसर्ज ीयस्य सः” विसर्ग को सकार हो गया। १०. मित्रम् । अखिवाचक मित्र शब्द नपुंसक ही माना गया है । ११. नागतम् । नपुंसक मित्र का विशेषण होने से नपुंसक ही होगा। १२. त्वया । सार्थवाचक शब्द के योगमें 'महयुक्त प्रधाने' से तृतीया होगी। १३. गमिष्यामि । गम्धातु परस्मैपदी है अतः तङ् नहीं होगा। १४. प्रेम्ण प्रेमन् शब्द नकारान्त है इस लिये अदन्तत्व के अभाव होने से 'टाङ सङसामिनात्स्याः' इस सूत्र से उस को स्य आदेश नहीं होगा । १५. बन्धनात् । हेतु अर्थ में 'हेतौ' इस सूत्र से पञ्चमी हो जाती है। १६. मरिप्यामि । मृधातु को लुङ् लिङ् और शित्प्रत्यय में 'नियतेलुङलि. ङोश्च' इस सूत्र से आत्मने पद होने से लट् में परस्मैपद ही होगा। १७. त्यक्ष्यामि । त्यज् धातुको अनिट् होने से इडागम नहीं हुआ। १८. असून् । असु शब्द बहुवचनान्त है। (पुंसि भूम्रयसवः प्राणा:' १६. निजान् । बहुवचनान्त असु के विशेषण होने से बहुवचनान्त होगा।
६४ सन्धिचन्द्रिका - वमनानेन' गच्छन्तः कर्म कुर्वन्ति ये नरः । नमस्कृत्वा प्रभु यान्ति मरित्वा५ ते न संशयः ॥ ५ ॥ गुरुणा श्रुतिमधीते नाधीती शब्दानुशासनम् । न्यायशास्त्रमधीयन्तो नो बिभ्यन्ति केनचित्र ॥ ६ ॥ ये नो ददन्ति ११ नो भुङ्क्ते१२ पुनर्रमन्ति 13 योषित:१४ १. वमना । वर्मन् शब्द नान्त है अतः टाको इन आदेश नहीं हुआ। २. कर्म । कर्मन् शब्द नकारान्त नपुंसक है इसलिए "स्वमोर्नपुंसकात्" से उम् विभक्ति का लुक् होकर नकार का भी लोर हो जायगा। ३. नराः। नर शब्द को अदन्त होने से जस् विभक्ति में प्रथमयोः' से दीर्घ हो जाता है। ऋकारान्त नृ शब्द के ग्रहण पक्ष में नरः' का प्रयोग ठीक ही है। ४. नमस्कृत्य । गति संज्ञक नमः शब्द के साथ "कृत्वा" को "कुगति- प्रादयः" से समास होने पर "समासेऽनन पूर्वे' से क्त्वा को ल्यप् हो जायगा। ५. मृवा । मृधातु अन्ट् िहै इसलिये इडागम नहीं होगा और कित् होने से "क्ङिति च" से गुण का निषेध भी हो जायगा। ६. गुरोः । “आख्यातोपयोगे च" से नियम पूर्वक जिससे विद्या ग्रहण करें उससे अपादान संज्ञा द्वारा पञ्चमी हो जाती है। ७. शब्दानुशासने । "क्तस्येन्विषस्य कर्मण्युपसंख्यानम्" से सप्तमी होगी। ८. अधीयानः । इङ धातु आत्मनेपदी है इसलिये शानच् प्रत्यय होगा। ६. बिभ्यति । भीधातु अभ्यस्त संज्ञक है इसलिये 'अदभ्यस्तात्" । से झि प्रत्यय का अत् आदेश हो जायगा । १०. कस्माच्चित् । भयार्थक धातु के योग में "भीत्रार्थानां भयहेतुः" से भय के हेतु वाचक शब्द के अपादान संज्ञा द्वारा पञ्चमी हो जाती है ११. ददति । दाधातु भी अभ्यस्त संज्ञक है अतः अदादेश होगा। १२. भुञ्जते । कर्ता के बहुत्व होने से बहुवचनकी क्रिया होगी। १३. पुनारमन्ते । रम् धातु आत्मनेपदी है इसलिये झप्रत्यय का अन्त आदेश होकर "सेरि" इस से रेफ का लोप होने पर दीर्घ हो जायगा। १४. योषिद्भिः । योषित् शब्द तकारान्त है अतः ऐसा देश नहीं होगा।
। गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम् ६५ जहित्वा सर्व ते जान्ति जगतेऽस्मिन् विनिन्दितः ॥७॥ सन्धिस्त्वया न कर्तव्या' महतो५ रिपुणा सह । प्राप्त विपत्तौ धीरत्वं नो जहन्ति महज्जना: ॥८॥ फले इमे तिमधुरे बाला जक्षम्ति हषिताः'' क्रीडन्ते १२ च अहोरात्र १३ रोदन्ति ४ न कदाचन:१५॥९॥ १. हात्वा । क्त वा प्रत्यय आर्ध धातुक है इसलिये श्लु प्रत्यय नहीं होने से द्वित्व नहीं होगा। २. यान्ति । या धातु यकारादि है इसलिये जकारादी अशुद्ध है। ३. जगति । जगत् शब्द तान्त है अतः ङिविभक्ति में गुण नहीं होगा। ४. कर्तव्यः । सन्धि शब्द पुल्लिङ्ग है अतः उसका विशेषण पुंल्लिङ्ग ही होगा ६. प्राप्तायाम् । विपत्तिशब्द 'क्तिनन्तं स्त्रियाम्' इस नियमसे स्त्रीलिङ्ग है। अतः उसका विशेषण होनेसे यह भी स्त्रीलिङ्ग हो जायगा । ७. जहति । 'अदम्यस्तात्' से झिप्रत्ययको अत् आदेश होगा। ८. महाजनाः । महत् शब्दको 'आत्महतः से आत्व होगा। ९. इमे अतिमधुरे । 'ईदेद्विवचनम्' से प्रगृह्य होकर प्रकृतिभाव होगा। १०. जक्षति । 'जक्षित्यादयः षट्' से झिप्रत्ययका अत् आदेश होगा । ११. हृष्टाः । हप्धातु अनिट् है अतः क्तप्रत्ययको इडागम और कित् होनेसे गुण नहीं हुआ। १२. क्रीडन्ति । कोडवातु परस्मैपदी है अतः आत्मनेपद नहीं होगा। १३. चाहोरा । श्लोकपादके मध्यमें रहनेसे सन्धि और "रात्राहनाहः पृसि" से पुंस्त्व हो जायगा। १४. रुदन्ति । झिप्रत्ययको 'सार्वधातुकमपित्' से ङित् होनेसे गुण नहीं होगा। १५. कदाचन । तद्धितश्चासर्वविभक्तिः से अव्यय होते विभक्ति नहीं होगी। ५ सं० च० । । ।
सन्धिन्द्रिका नोचाऽपि' ये नमस्यन्ति विष्णवे कुप्यन्ति नो नवा । प्राप्त्वा महत्वमाप्तास्ते वञ्चयन्ति न सज्जनान् ॥ १० ॥ . (७) उपसर्ग-विचार- उपसर्गको गति तीन प्रकारकी होती है। कोई उपसर्ग धातुके मुख्याको बाधकर नवीन अर्थका बोध कराता है, कोई धात्वर्थका ही अनुवर्तन करता है और कोई विशेषण होकर उसी धात्वर्थको और भी स्फुटित कर देता है । तदुक्तम्- धात्वर्थ बाधते कश्चित्कश्चित्तमनुवत्तते। विशिनष्टि तमेवाऽर्थमुपसर्गगतिविधा ॥ अन्यञ्च- - उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते। प्रहाराहार-संहार-विहार-परिहारवत् ॥ विविध उपसर्गके बलसे धात्वर्थ भी विविध अर्थमें परिवर्तित होता है। (निम्न परिशिष्ठ नं० ८ देखो।। १. नीचा अपि । यलोप की असिद्धता होनेसे दीर्घ नहीं होगा। २. विष्णुम् । कर्मत्व होनेसे कर्म में द्वितीया होगी। ३. प्राप्य । 'समासेऽनन पूर्वे' से क्त्वा प्रत्ययका ल्यप् आदेश होगा। ४. वञ्चयन्ते । 'गृधिवञ्च्योः' से आत्मनेपद होजायगा। MEAPANES अय गतो. - (८) अनुवादोपयोगिधात्वर्थ- अञ्च -- गतिपूजनयो:- असु क्षेपणे- १ अञ्चति-जाता या पूजता है । १ अस्यति-फेंकता है, २ प्राञ्चति-- उन्नत होता है। २ अपास्यति-दूर करता है, ३ पराश्चति-लौटता है। ३ अध्यस्यति-आरोप करता है, ४ न्यञ्चति-नीचे जाता है। ४ वन्यस्यति-स्थापित करता है, ५ प्रत्यञ्चति-अवनति प्राप्त करता है। ५ न्यस्यति सौंपता है, ६ उदञ्चति-ऊपर जाता है । ६ अभ्यस्यति- कण्ठस्थ करता है, ७ सहाञ्चति-साथ जाता है। ७ निरस्यति--हटाता है, ८ अवाञ्चति-अधोमुख होता है। 4 व्युदस्यति-निकालता है, ६ पर्युदञ्चति-पैंचा लेता है। ६ परास्यति-परास्त करता है, १०समञ्चति-अच्छीतरह जाता या पूजताहै। १० व्यत्यस्यति--उलटपलट करता है, ११ तिरोन्नति-टेढा जाता है। ११ विपयस्यति-विपर्यास करता है, १२ समस्यति-संक्षिप्त करता है, १ अयते-जाता है, २प्लायते - भागता है, १ प्राप्नोति-प्राप्त करता है, ३ पलायते- व्याप्त करता है, ४ उदयते--उदय लेता है, -खर्च करता है, समाप्त करता है, ३ समाप्नोति-1 समाप्त होता है, ६ निरयते--निकलता है, ४ अवाप्नोति-प्राप्त करता है, ७ दुरयते--दुःखी होता है, पर्याप्त करता है, निलयते-विलीन होता है, ६ दुलयते - कांपता है, आस उपवेशने- अर्थ उपयाञ्चायाम्-- १ आस्ते-बैठता है, २ उदास्ते-उदासीन होता है, १ अर्थयते-मांगता है, ३ उपास्ते - ध्यान करता है, २ समर्थयते--अनुमोदन करता है, ४ अध्यास्ते-रहता है, ३ अभ्यर्थयते--अनुमोदन करता है, ५ अन्वास्ते-पाछे बैठता है, ४प्रार्थयते--प्रार्थना करता है, इण गतो- ५ व्यर्थयते-विफल करता है, १ एति--जाता है, ६ अन्वर्थयते-अर्थानुकूल करता है, २-प्रत्येति-विश्वास करता है, आप्ल व्याप्ती- २ व्याप्नोति-{कलता है, ५ व्ययते- done ५ पर्याप्णोति-पर्याप्त होता है, सम्धि चन्द्रिका ६ अत्येति-नट होता है। ४ समूहते-शोधित करता है। ४ अन्वेति--पीछे मिलता है। ५ प्रत्यूहते - विघ्न डालता है ५ विपयति-उलटा समझता है । ६ व्यूहते - संगठित करता है। ६ उपेति-पास जाता या आता है। ७ दुल्हते-कठिनाई से जानता है। ७ अभ्येति--सामने आता है। (ड) कृञ् करणे. व्यत्येति-उलट पलट करता है। १ करोति करता है। या जीतता है। २ अनुकरोति--- नकल करता है। है व्यति-उर्च करता है। ३ अपकरोति - हानि करता है। १० अवैति--मानता है। ४ विकुरुते--उच्चारण करता है। ११ अपैति--दूर होता है। ५ विकुर्वते - विकार प्राप्त करता है। १२ सनवेति -- सम्बद्ध होता है। १३ समन्वेत--समन्वय करता है। ६ उपकुरुते--सेवन करता है। ७ अधिकुरुते-क्षमा या पराभव करताहै। १४ अभिप्रेति--इट करता है। ८तिरस्करोति-तिरष्कार करता है। ६५ उदेति - उदित होता है। ईह चेष्टायाम- ६ निराकरोति-हटाता है। १०परिष्करोति-परिष्कृत करता है। १ ईहते- वेट करता है। ११ आविष्करोति-प्रकट करता है। २ समोहते-चाहता है। -संस्कार करता है। ३ निरीहते-निःस्पृह होता है । १३ उत्कुरुते-चुगली करता है। ईक्षदर्शने-- १४ उदाकुरते-झपटता है। १ ईक्षाते-देखता है। १५ प्रकुरुत जबर्दस्ती करता है। २ अपेक्षते--इच्छा करता है। १६ उपकुरुते - दूसरे का गुण ग्रहण ३ उपेक्षते- लापरवाही करता है । करता है। ५ वीक्षते-देखता है। १७ अलंकरोति - भूषण पहनता है। ५ प्रतीक्षते-प्रतीक्षा करता है। १८ उपकरोति-भलाई करता है। ६परीक्षते-परीक्षा करता है। १६ प्रतिकरोति- प्रतिकार करता है। ७निरीक्षते-निगरानी करता है। २० अपाकरोति-खण्डन करता है। समीक्षते--विमर्श करता है। २१ प्रत्युपकरोति-प्रत्युपकार करताहै ९ उत्प्रेक्षते- सम्भावना करता है । कमुपाद विक्षेपे- १ कामति चलता है। १० अन्वीक्षते-चिन्तन या मनन करताहै। २ क्रमते-. उत्साह करता है। ३ उपक्रमते--आरम्भ करता है । १ कहते--विचार करता है। ४ प्रक्रमते २ अपोहते - छोड़ता है। ५ विक्रमते-आगे बढ़ता है। ३ उपोहते-सूक्ष्मविचार करता है। ६ पराक्रमते-अप्रतिहत होता है। १२ संस्करोति- -- ऊह वितके-- अनुवादोपयोगिधात्वर्थ। ६९ 5 - गम्लु गतो- - ७ आक्रमते-उदय लेता है। २ उच्चरते-उल्लंघन करता है। अतिक्रामति-उल्लंघन करता है। ३ उच्चति-ऊपर जाता है ! ४ विचरति ---- विचरण करता है। ९ परिक्रमांत-प्रदक्षिण करता है ३ आचरति-आचरण करता है: १० निष्कामति - निकलता है। ११ अपक्राति-हटता है। ६परिचरति . सेवा करता है। १२ संक्राति - संक्रान्त होता है। ७उपचरति-उपचार करता है। १३ अनुनामति-अनुक्रम करता है। ८ अनुवति-अनुसरण करता। १४ आक्रमति ऊपर जाता है। ९ संचरते --ब्रमण करता है। १० दुराचरति-कुरा आचरण करता है ! १ अतिचरति-जादा गमन कर है १ गच्छत-जाता है। १२ व्यभिवरति-व्यभिचार करता है। २ आगच्छति-आता है। १३ अपचरति-विपरीत करता है ! ३ संगच्छते---संगत होता है। चित्र चयने- ४निर्गच्छति-निकलता है। ५ अनुगच्छति - पीछे जाता है। १ चिनोति-चुनता है। ६ अवनच्छति-जानता है। २ परिचिनोति-पहचानता है। ७ अधिगच्छति-प्राप्त करता है। ३ निचिनोति- इकट्टा करता है ! ८ अभ्यागच्छति-सामने आता है। ४ उपचिनोति-बढ़ाता है। ६ प्रतिगच्छति- लौटता है। ५ अपचिनोति-घटाता है । १० अभ्युपगच्छति-स्वीकार करता है ११ उद्गच्छति-ऊपर जाता है । ६ संचिनोति-जमा करता है । १२ अपगच्छति-दूर हटता है। ७निश्चिनोति-निश्चय करतः । ८ समुच्चिनाति-अधिक करता है। ग्रह-उपादाने- अन्वाचिनोति -आनुषङ्गिककरताहै १ गृहाति-लेता है। १० अवचिनोति-इक्ट्ठा करता है। २ आगृह्णाति-आग्रह करता है। ज्ञा अवबोधने- ३ अनुगृह्णाति--कृपा करता है। १ जानाति-जानता है। ४ दुरागृति-हठ करता है। ५ प्रतिग्रह ति-दान लेता है। : जानीते-प्रवृत्त होता है। ३ अपजानीते-छिपाता है। ६ विगृह्णाति-लड़ाई करता है। ४ प्रतिजानीते-प्रतिज्ञा करता है ७ निगृह्णाति-कैद करता है। ५ अनुजानाति - अनुमति देता है ८ संगृह्णाति-- इकट्ठा करता है ! ६अभ्यनुजानाति-स्वःकार करता ९ परिगृह्णाति-आसक्ति करता है। ७ त्यभिजानाति-प्रत्यक्ष का स्मर चर गतिभक्षणयो:- करता है। १ चरति-घूमता या खाता है । अभिजानाति-पहचानता है सन्धिचन्द्रिका णीत्र प्रापणे- १ उपजानाति-आरम्भ करता है । १० अपदिशति-वहाना करता है। १. संजानीते-देता है। ११प्रतिनिद्दिशति-विधेयकोबतलाताहै ११ अवजानाति-अपमान करता है (डु) धान -धारणपोषणयोः- १२ विजानाति-निन्दा करता है। । दधाति-धारण करता है। २ विदधाति करता है। १ नयति - लेजाता है। ३ अनुसंदधाति-अनुसंधान (खोज) २विनयति-विनय करता है। करता है। ३ विनयते-गिनता या खर्च करता है। ४ अन्तर्धत्ते-छिपता है। ४ अनुनयति- मनाता है। ५ तिरोषत्ते ५ परिणयति-विवाह करता है। ६ अभिधत्त-बोलता है। ६ निर्णयति निर्णय करता है। ७ अववत्ते-ध्यान देता है। ७ अभिनयति-अभिनय करता है। पिधत्त-ढांकता है। ८ उपनयति--पासमें लाता है। ६ अपिधत्ते- ९ अपनयति हटाता है। १० आनयति-लाता है। १० संधत्ते-मेलकरता है। ११ प्रणयति-प्रेम करता है। ११ परिधत्ते-पहनता है। १२ उन्नयते - ऊपरले जाता है। १२ आधत्ते-स्थापित करता है। १३ निधत्त-रखता है। तृप्लवनतरणयोः १ तरति-तैरता है। १४ प्रणिधत्ते- ध्यानकरता है। अवतरति-उतरता है। १५ प्रतिनिधत्त-प्रतिनिधिकरता है। ३ वितरति देता है। ४ उत्तरति-जबाव देता है। १ पतति-गिरता है। -ऊपर तैरता है। २ प्रणिपतति-प्रणाम करता है। दिश अतिसर्जने ३ निपतति-गिरता है। १दिशति-देता है। ४उत्पतति-उड़ता है। • आदिशति-आशा देता है। ३ निद्दिशति-बतलाता है। ५ प्रपतति--गिरता है। ४ उद्दिशति-उद्देश करता है। पद गतौ- ५ उपदिशति-उपदेश करता है। जाता है। ६ निदिशति--अनुमति देता है। २ उत्पद्यते--पैदा होता है। संदिशति-संदेश कहता है। ३ विपद्यते-मरता है। ८व्यपदिशति-मुख्यव्यवहारकरता है ४ संपद्यते--सुखी होता है। ९ अतिदिशति-काल्पनिक व्यवहार ५उपपद्यते--युक्त होता है। करता है। ६ आपद्यते--षोद लगता है। पत्लु पतने- ५ संतरति- १ पद्यते- d- अनुवादोपयोगिधात्वर्थ। NA . ७ प्रपद्यत-शरण में जाता है। निष्पद्यते -- निष्पन्न होता है। ९ प्रतिपद्यते-आज्ञा मांगता है। १० व्युत्पद्यते-व्युत्पन्न होता है। वन्ध बन्धने १ बध्नाति-बांधता है। २ प्रबध्नाति-प्रबन्ध करता है। ३ निबध्नाति-रचता है। ४ प्रतिबध्नाति-रोक लगाता है। २ सम्बध्नाति -जोड़ता है। ६ उद्बध्नाति-फांसी लगाता है । ७ निर्बध्नाति-प्रेम करता है। भू सत्तायाम - १ भवति --होता है। २ अनुभवति .. अनुभव करता है । ३ अभिभवति-दबाता है। ४ पराभवति-पराभव करता ५ परिभवति-तिरस्कार करता है। ६ उद्भवति-उत्पन्न होता है। ७ आविर्भवति - प्रकट होता है । ८ प्रादुर्भवति-, ९ सम्भवति हो सकता है। १० तिरोभवति-छिपता है ११ अन्तर्भवति- १२ प्रभवति-समर्थ या पैदा होता है मनु-अवबोधने- मत्यते. -मानता है। २ अवमन्यते-तिरस्कार करता है। ३ अनुमन्यते-सलाह देता है। ४संमन्यते-सन्मान करता है। ५ विमन्यते-उपेक्षा करता है । ६ अभिमन्यते-घमण्ड करता है । युजिर योगे १ युनक्ति-जोड़ता है। २ अभियनक्ति-अभियोगकरता है। ३ उद्युनक्ति-उद्योग करता है। ४ संयुनक्ति-संयुक्त करता है। ५ प्रतियनक्ति स्पर्धा करता है । ६ अनुयुनक्ति-पूछता है। ७ पर्यनुयुनक्ति-प्रत्युत्तर देता है । ८ उपयनक्ति-उपयोग करता हैं । वियनक्ति-वियुक्त करता है। १० नियनक्ति-नियुक्त करता है रुह बीजजन्मनि- १ रोहति - जमता है। २ प्ररोहति - उत्पन्न होता है। ३ अधिरोहति - चढ़ता है। ४ अवरोहति-उतरता है। ५ आरोहति-चढ़ता है। ६ संरोहति - मिलता है। लप लपने- १ लपति-बोलता है। २ विलपति-विलाप करता है। ३ प्रलपति - वकवास करता है । - आलपति-बोलता है। ५ संलपति-बार्तालाप करता है। ६ अपलपति-छिपाता है। वद व्यक्तायां वाचि- १ वदति-बोलता है। २ अपवदते-छोड़ता है। ३ अपवदति-दुपित करता है । ४ अनुवति-अनुवाद करता है। ५ उपवदते-प्रार्थना करता है। ६ विवदते-झगडता है। संप्रवदन्ते -मिलकर बोलता है ८ अनुवदते-तुल्य बोलता है। ९विप्रवदन्ते-विरुद्ध बोलता है। १ सन्धिचन्द्रिका वृतु वर्तने -- १० प्रतिवदति-जबाब देता है। ६ अपसरति-हटता है। ११ संवदति-बात करता है। ७ परिसरति- [-घूमता है। ८ संसरति सम्बद्ध होता है। १ वर्तते-है। ९ उत्सरति-अलग होता है। २ प्रवर्तते-प्रवृत्त होता है। २. उपसरति पास जाता है। इनिवर्तते-~लौटता है। हृञ हरणे--- ४ परिवर्तते--मता । १ हर्रात ले जाता है। ५ अनुवर्तते-पीछे चलता है। २ अपहरति--चुराता है। ६ निवर्तते. शान्त होता है ३ अनुहरति -- नकल करता है। ७ दुर्वर्तते-बुरा आचरण करता है। ४ परिहरति छोड़ता है। ८ विवर्तते- बदलता है। ५ आहरति-लाता है। ९ आवर्तते ---दुहराता है। ६ व्याहरति-बोलता है। षद् विशरणगत्यवसादनेषु ७ व्यवहरति-व्यवहार करता है। १ सीदति-व्हरता या दुःखी होता है। ८ अभ्यवहरति-खाता है। २ प्रस'दति-खुश होता है। ९ प्रहरति - मारता है। ३ विषीदति-खन्न होता है। १० संहरति-नाश करता है। ४ निषोदति-बैठता है। ११ उपसंहति-उपसंहार करता है। ५ अवसीदति-थकता है। १२ विहरति बिहार करता है। ६ पर्यवमीदति-समाप्त होता है। १३ समाहरति - इकट्ठा करता है। ७ उपसीदति-पास में बैठता है। १४ उद्धरति--निकालता है। टा गतिनिवृत्ती.. १५ उपहरति-उपहारता है। १ तिष्ठति-ठहरता है। १६ उपाहरति-लाता है। २ प्रतिष्ठते-प्रस्थान करता है । १७ उदाहरति --उदाहरण देता है। ३ उपतिष्टते- उपस्थान करता है। १८ प्रत्युदाहरीत-दूसराउदाहरणदेताहै। ४ उत्तिष्ठति-उठता है। क्षिपप्ररणे ५ अनुतिष्ठति- करता है। १ क्षिपति-फेकता है। ६ संतिष्टते - मरता है। निक्षिपति-नोचेफेकताहै। सौंपत्ताहै। ७ अवतिष्ठते-स्थिर होता है। ३ प्रक्षिपति-प्रक्षेप करता है। ४ आक्षिपति दोष लगाता है। १ सरति जाता है। ५ अधिक्षिपति-दोष लगाता है। २ अनुसरति-अनुसरण करता है। ६ संक्षिति-छोटा करता है। ३ प्रसरति-फलता है। ७ उत्क्षिपति ऊपर फेकता है। ४ अभिसरति-निकलता है ! ८ अधः क्षिपति-नीचे फेकता है। ५ निःसरति-निकलता है। ९ विक्षिपति-विक्षित होता है। सगतौ- - (8) व्याकरणादिलक्षणम् यथा- १-व्याकरणम् व्याक्रियन्ते = व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति-शब्दज्ञानजनकं माक- रणम, तच्च सूत्रम् । जिससे सात्रु शब्दका ज्ञान हो उसी का नाम व्याकरण है। (व्याकरणका इतवृत्त मेरी इन्दुमती' टीकायुत 'लधु नदी की प्रस्तावनामें पड़िये २--सूत्रलक्षणम् अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् । अस्तोभमनवा च सूत्र सूत्रविदो विदुः ।। सूत्रोंके मेद-सञ्ज्ञा च परिभाषा च विधिनियम एव च । अतिदेशोऽधिकारश्च षडविधं सूत्रलक्षणम्॥ १. संज्ञानूत्रं क्या-वृद्धिरादैच, अदेङ्गणः, इत्यादि। २. परिभाषासूत्रम्-( कुव्यवस्थायां सुव्यवस्थासम्पादकं सूत्रम् ) -आदेः परस्य, तस्मिन्निति निर्दिष्ट पूर्वस्य, इत्यादि ) ३. विधिमूत्रं यथा--इकोणचि, एचोऽयवायावः इत्यादि । ४. नियमसूत्र यथा-कृत्तद्धितसमासाश्च, रात्सस्य, इत्यादि । ५. अतिदेशसूत्रं यया—'स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ, तृन्वत्कोटः, झ्यादि ! ६. अधिकारसूत्र यथा-अचाप्रतिपदिकात्, आर्धधातुके, इत्यादि। ३-वार्तिकलक्षणम् उक्ताऽनुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्तते। तं ग्रन्थं वातिकं प्राहुर्वातिकज्ञा मनीषिणः ।। ४-माष्यलक्षणम् सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र वणः सूत्रानुसारिभिः । स्वपदानि च वय॑न्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ।। ५-व्याख्यानलक्षणम् । पदच्छेदः पदार्थोक्तिविग्रहो वाक्ययोजना। आक्षेपश्च समाधानं व्याख्यानं षड् विध मतम् ॥ 4
(१०) विद्याथी-शिक्षासूत्रम्
छात्राणामुपकाराय हितमुपदिशाम्यहम् ।
येन जीवनमेतेषामुन्नतिप्रवर्ण भवेत् ॥ १॥
छात्रों के उपकारार्थ मैं कुक्त हित बात बतलाता हूँ। जिससे उनका जीवन
उन्ततिशील हो ॥ १॥
इन्द्रियाणि वशीकृत्य समाधाय मनस्तथा।
प्रत्यहं प्रातरुत्याय प्रभुं वन्देदतन्द्रितः ।। २ ।।
सबसे पहले इन्द्रियोंको अपने वशमें कर और मनको एकाग्र बनाकर प्रति-
रोज सवेरे उठकर आलस्य छोड़कर ईश्वर की वन्दना करे ॥२॥
शौचस्नानादिकं
कृत्वा सन्ध्याहवनमाचरेत् ।
पूर्वं पठितपाठानामावृत्ति निव्यशश्चरेत् ॥ ३ ॥
शौच दन्तधावन स्नान आदि शारीरिक पवित्रता सम्पादन कर सन्ध्या
(परमात्मचिन्तन) और हवन
करें
तदुपरान्त पड़े हुए पाठों का आवर्तन करें।
ततो गुरुमुखाद्ग्रन्यमाद्योपान्तं पठेन्मुदा।
गुरुशुश्रूषणं कृत्वा सततं पाठमभ्यसेत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर गुरु मुखसे अपने२ पाठौं को पढ़े। बादमें गुरुकी यथोचित सेवाकर
हमेशा पाठ का अभ्यास करें ॥ ४ ॥
परीक्षोत्तीर्णतार्थाऽपि योग्यता परमौचिती।
अर्जनीया सदा शिप्यैर्वा व्युप्पत्तिरन्ततः॥ ५॥
परीक्षामें सफलता प्राप्त्यर्थ उचित योग्यता हासिल करते हुये आन्तरिक
व्युत्पत्ति बढ़ाने की भी चेष्टा करें ॥५॥
व्युत्पत्तिमन्तरा नैव प्रतिपत्स्यात् कथंचन ।
अतो व्युत्पत्सुभिर्भाव्यं छात्र जिज्ञासुभिस्तथा ॥ ६॥
व्युत्पत्तिके विना कुछ भी पदार्थोका वास्तविक ज्ञान नहीं हो सकता इसलिये
विद्यार्थियों को व्युत्पत्ति की जिज्ञासा अवश्य रखनी चाहिये ॥६॥
विद्यार्थि-शिक्षासूत्र
!
समयस्य महामूल्यमज्ञात्वा य उपेक्षते।
जीवनं यस्य व्यत्येति व्यर्थमेव न संशयः ॥७॥
जो विद्यार्थी समय की कीमत को नहीं जानकर (पढ़ने में) लापरवाही करता
उसका जीवन निःसन्देह व्यर्थ ( कंटकाकीर्ण) हो जाता है ॥ ७ ॥
परीक्षां दातुकामो वै लेखशक्ति विवर्धयेत् ।
अल्पेनापि सुलेखेन परीक्षोत्तीर्यते ध्रुवम् ॥ ८ ॥
परीक्षा देनेवालोंको चाहिये कि लिखने की शक्तिको अच्छी तरह बढ़ावें
क्योंकि थोड़े भी सुन्दर लेखोंसे निश्चितरूपेण परीक्षामें सफलता मिलती है ।।८।।
लेखशक्तिविहोनेन बहुश्रमयुताऽपि वा।
परीक्षामुत्तरोत हा ! पायंते न कथंचन ।। ६ ।।
उत्तम लेख करने में कमजोर छात्र अधिकसे अधिक मेहनत करने पर भी
परीक्षा ने सतलता प्राप्त नहीं करते ॥ ९ ॥
परीक्षा भवनं गत्वा मनश्वाञ्चल्यमुत्सृजेत् ।
निर्भीकतां समासाद्य शान्तचित्त भवेज्जनः ।।१०।।
परोक्षानबनने जाकर मनकी चञ्चलता का दूर कर हृदयसे भयको विलकुल
हटाकर प्रसन्नचित्त हो जाना चाहिये ॥ १० ॥
प्रश्नपत्रं गृहीत्वादौ प्रश्नान् सर्वान् निभाल्य च !
उत्तरं विदितं सम्यगादौ लेख्यं सविस्तरम् ॥ ११ ॥
पहले प्रश्नपत्र लेकर सब प्रश्नोंको अच्छी तरह हृदयङ्गम करके सबसे पहिले
जिस प्रश्न का उत्तर खूब उत्तम रूपले आता हो उसीको लिखें ।। ११ ॥
कालानुपातमाश्रित्य तारगर्भण सत्वरम्
संक्षेपेणेव लेखेन प्रश्नानामुत्तरं लिखेत् ।। १२ ।।
परीक्षा समयके औसत को ध्यानमें रख कर संक्षेपमें ही सारगर्भित लेखसे
अनिवार्य प्रश्नोंका उत्तर लिखना चाहिये ॥१२॥