Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Gress Ka Itihaas

Gupt,babu Pyare Lal · 2011/01

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तरुण-भारत-ग्रन्थावली-सं०५
ग्रीस का इतिहास
"इतिहाम निज अ अ य देशन के रच ततकाल ।
.
.
सम्पादक
लक्ष्मीधर वाजपेयी
,

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भारतीय मवयुवकों द्वारा संचालित
.
तरुण-भारत-ग्रन्थावली-सं०५
ग्रीस का इतिहास
Bikini
Troulains.
लेखक
बाबू
प्यारेलाल
गुप्त ।
-
प्रकाशक
तरुणा-भारत-ग्रन्धावली-कार्यालय
दारागज, प्रयाग।
२.
५० काशीनाथ वाजपेयी प्रब से शौंकार प्रेस, प्रयाग में छपा।

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in in निवेदन । हमारी मातृभाषा में इतिहासप्रथा को कितनी न्यूनता है, यह किसी से प्रविदित नहीं है। इतिहास का महत्व पहुत बड़ा है-यहाँ एक विषय ऐसा है कि, जिसके अध्ययन से हम राष्ट्र के उत्थान और पतन के कारणों को जानते हुए अपने राष्ट्र की रक्षा कर सकते हैं । इतिहास, फिर चाहे वह अपने देश का हो, चाहे विदेश का हो, उसका अध्ययन प्रत्येक देशहितचिन्तक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। ग्रीस का इतिहास, ससार के इतिहासों में अत्यन्त महत्व का इतिहास है। भारत के प्राचीन इतिहास से इसका बहुत कुछ मेल है । अनेक क्रान्तियों से भरे हुए इस इतिहास को पढ़ कर, आशा है, हमारे देशभाई, अपने देश के लिए बहुत कुछ सोच सकेंगे। यहां पर यह कहने की भाषश्यकता नहीं कि , यह इतिहासप्रन्थ उन्हीं लोगों के लिए तैयार किया गया है कि जो राष्ट्रीय भाषा हिन्दी के द्वारा नवयुवकों को इतिहास की शिक्षा देने-दिलाने का शुभ विचार रखते है। हमे आशा है कि, भारत की देशो सस्थाओं को,मातृभाषा में इतिहास की शिक्षा देने के लिए, इस पुस्तक का अच्छा उपयोग होगा। यह पुस्तक प्रसिद्ध महाराष्ट्र इनिहासिक श्रीयुक्त गोविन्द सखाराम सरदेसाई यी० ए० के आधार पर लिखी गई है, प्रतएव उक्त विद्वान् महाशय को हम यहाँ पर हार्दिक धन्य. वाद देते हैं । आप को कृपा से ही यह पुस्तक राष्ट्रीय भाषा में प्रस्तुत हो सकी है। प्रयाग, श्राश्विन शु०१, लक्ष्मीधर वाजपेयी। स०१६७५ . - Pr + अनुक्रमणिका + 1 अध्याय पृष्ट " विषय निवेदन अनुक्रमणिका ग्रीक इतिहास का महत्व प्रसिद्ध ग्रन्धकारों की सूची और काल . ३ भारम्भ १७ पहला दूसरा तीसरा २१ होमर के समय में ग्रीस को अवस्था एथेंस का राज्य स्पार्टी का राज्य • स० के सौ वर्ष पहले के रीति रवान मोलन से ईरानी युद्ध तक चौथा 'पाचा ठयां सातमा प्राठवा 1 । ४४ ईरानी युद्ध . पवना ६८ १०७ दसवा ग्यारहवा यारहवा तेरहवा चौदहवा पदहवा सोलहया समस्या भटारख सायमन और पेरिक्लीज़ पेरिक्लीज़ के समय के रीति रवाश पेनापोनेसियन युद्ध मालिसबियारीज एधेम की सत्ता का हास ईरानी!युद्ध । थोन्स और घाटी मासिडोनिया का फिलिप फिलिप की जीत भलेक्जेंडर दि प्रेट, पूर्वाद अनेक हर दि प्रेट, हत्त ११० -

पृष्ठ
.
...
...
भध्याय
विषय
तमीसवा मासिडोनियन राज्य के टुकड़े
वीप्तवा अशेक्जेंडर के बाद के राजा
इक्कीसवा गास लोगों का चदाई
यासर्वा स्पार्टी
। तेईसवा
स्पाटों के जुल्मी अधिकारी
। चौबीसवा रोम का भधकार
पचीसवा रोम के शासन में ग्रीस की दशा
। अग्नीसवा भाचीन इतिहास का साराश
प्राचीम नगर-राज्यों का भरत स्वरूप
१८०
२६५
.
०.-
प्रेमियों से प्रार्थना।
तरुण भारत प्रन्थावली का कार्यालय अब स्थायीरूप से
प्रयाग में ही रहेगा , और नियमित रूप से आपकी सेवा
करता रहेगा। 1) प्रवेश फीस दे कर स्थायी प्राहक बन जाने,
वाले महाशयों को प्रन्थावली की पुस्तके पौनी कीमत पर
| मिलती रहती हैं। आशा है कि आप स्वयं स्थायी प्राहक बन
कर तथा अपने मित्रों को भी धना कर हमारे इस पवित्र
साहित्यकार्य में सहायता करेंगे।
विनीत
प्रकाधक।

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ग्रोक इतिहास का महत्व ।
इतिहास का विषय इतना व्यापक, उपयुक्त और गहन है
कि उसके स्वरूप का, वर्णन, घोडे में करना एक प्रकार से
असम्भव है । सृष्टिक्रम के प्रारम्भ से आज तक मनुष्य की
जो उन्नति होती गई, उसके तात्विक विवेचा को ही इतिहास
कहना चाहिए । हम इस सृष्टिरूपी विराट शरीर के जीते
जागते घटकारयव है । यह शरीर अत्यन्त मदगति से, किन्तु
एक समान, वृद्धि का पाप्त हो रहा है। इस वृद्धि की कथा
प्रत्येक श समझ लेनी चाहिए । अर्थात् मनुष्य के अखिल
जीवनक्रम ओर उसके अद्भुत विकास का ज्ञान हमें जय
भली भाति हो जायेगा नभी हमारी इहलोक की यात्रा सुख
पूर्वक पूरी होगी। इधर कुछ दिनों से अनेक विद्वानों ने, वडे
परिश्रम के साथ, उपयुक्त विकास को स्पष्ट और सुसपद्ध
करके दिखलाया है।
सच्चा और मार्मिक इतिहास लिखने का काम पहले पहल
ग्रीको ने ही किया था। ईस्वी सन् के चार सो वर्ष पहले हिरा-
डाटस नामक एक ग्रीक इतिहासकार उत्पन्न हुआ। उसने
कानों सुनी हुई और आखों देखी हुई घटनाओं की कहानियो
का वर्णन करके अपने अप्रतिम बुद्धि कौशल का अपूर्व परि-
चय दिया है और इसी कारण वह “इतिहास का जनक"
कहा जाता है। हिराडाटस का प्रन्थ पढने ही योग्य है, फिर

। . , । चाहे वह मूल हो या अनुवाद । जैसा कि मुखपृष्ठ के अवतरण में कहा गया है, ग्रीस कुछ एक देश न था, और न उसे एक राष्ट्र ही कह सकते हैं। पश्चिम में स्पेन के तट से पूर्व की ओर यूफ्रेटिस नदी तक. और दक्षिण में आफ्रिका के उत्तर किनारे से, उत्तर में काले समुद्र तक, जो बडा भारी मैदान है, उसके अनेक प्रदेशों में और अनेक द्वीपों में, स्थान स्थान पर ग्रीकों की वस्तिया थीं। अन्य राष्ट्रो के सदश ग्रीक राष्ट्र कुछ एक ही निश्चित स्थान पर नहीं बसाया। फिर भी ग्रीक लोग जहांजहां बसेथे वहा वहां अपनी भाषा का व्यवहार करते थे, अपने स्वतत्र विचार प्रकट करते थे और अपने कला-कौशल की उन्नति करते थे । उनकी इन्हीं सब बातों को, अर्थात् प्राचीन ग्रीक लोगो के सर्व- साधारण विचारों और आन्दोलनों को, ग्रीस सज्ञा दी जाती है। यूरोप महाद्वीप के आग्नेय कोण में जो छोटा सा प्रायद्वीप है, केवल उसी को प्राचीन ग्रीस देश नहीं समझना चाहिए । उक्त प्रायद्वीप के अतर्गत जोप्रदेश है वह पहाडी और सकुचित है। वहाँ बस्ती के योग्य अधिक स्थान नहीं। आसपास के दो सौ मील में जो द्वीप हैं, वे भी ऐसे जान पड़ते हैं, मानों समुद्र से डुबकी मार कर ऊपर निकले हुए कोई पर्वत ही हैं । इन द्वीप की भी गणना ग्रीस देश में ही थी। मुख्य प्राय- द्वीप का,प्रदेश अधिक से अधिक दो सौ मील लम्बा और सौ मील चौडा होगा। उसमें भी अनेक स्थानों पर खाडियां इत्यादि हैं। श्रतएव बराघर मिला हुआ पटपर प्रदेश बहुत ही थोडा है। ऐसे प्रदेश के निवासियों के इतिहास को, इतना महत्व .. sh काल । - न पयों दिया जाता है ? यह यात तो कुछ है ही नहीं फि प्राचीन में केवल ग्रोकों ने ही मनुष्य के निर्वाह योग्य साधन हृढ निकाले हों। प्रोकों के पहले भी ऐसे अनेक राष्ट्र थे जो जमीन जोत कर खेती करना, धातुओं के हथियार बनाना, दूर देश में व्यापार करना,सुदर पोर बडो इमारतें बनाना जानते थे ऐसे सुख साधनों के विषय में हिन्दू और चीनी राष्ट्र ग्रीक लोगों से यहुत,आगे यढ़े हुए थे। तब फिर क्या कारण है कि ग्रीको के इतिहास को इतना महत्व दिया जाता है ? यान यह है कि, सासारिक व्यवहार में विवारशक्ति का स्वतत्ररूप से उप योग करनेवाले प्रथम प्रोफ ही हुए । उदाहरणार्थ, प्रोकों ने छोटे छोटे अनेक प्रजासत्ताक राज्य स्थापित किये। जव कि एक ओर पृथ्वी को पीठ पर अनेक राजा अपने सेन्यनल से बडे यडे राष्ट्रों पर कठोर शासन कर रहे थे, तब इधर ग्रीक लोगों ने भिन्न भिन्न नगरों में सब को सुखी रखनेवाली लोकसत्ताक राज्यप्रणाली प्रचलित की । प्रोक साहित्य को देखिये तोउसमें भी यही वात पाई जाती है। फघि, इतिहासकार, वक्ता और साधु, सयों ने, अपनी निज की धुद्धि लडा कर और स्वतन विचार करके अपने उद्योग की पराकाष्टा कर दी है। प्रत्येक ग्रीक मनुष्य के हृदय में यह विचार बिलकुल हद हो गया था कि, जोयाट हमारी विचारशक्ति में उचित जंचेगी वही मत्य है, और किसी विषय में भी हम दूसरों के गुलाम नहीं बनेंगे। यही कारण हे कि, प्रोक राष्ट्र और ग्रीक भाषा का अस्त हुए पहुत काल हो जाने पर भी, प्रोकों की ही विचारशक्ति के जोर पर यूरोप की इतनी उन्नति हुई है। धर्म, नीति, भौतिकशास्त्र, राजनीति, इत्यादि विषयों में जो उन्नति आज-कल यूरोप में है ३००२०० ग्रीस देश के प्रति ग्रंथकारों की सूची और उसका फाल । काल (ईसा के कवि और इतिहासकार तत्ववेत्ता और पहले) नाटककार वैज्ञानिक केलिमेकस मानीयो यूक्लिड अरेटस बेरोजस आर्किमिडिज थिश्रोक्रिटस जेनोडोटस मोस्कस अरिस्टोफेनिस वियोन स्टोइक तत्ववेत्ता २००१०० अपोलोनियस पोलिनियस अरिस्टार्कस होडियस अपोलोडोरस निफेंडर १००१ डायोनिसियस डिमोडोरस । सिफ्युलस । डायोनिसियस ईसा के पश्चात् घानियस स्टेपो एपिक्टेटस १,१०० जोजेफस प्लटार्क १००२०० प्रोप्पियन हर्मोजिनिज पोलक्स अरिस्टाइड्ज श्रोप्पियन टालेमी ल्यूसियन पाज़नियस पाथीनियस पोलिपनस मासमारेनियम (१०) पर्यन

-
ग्रीस का इतिहास।
'पहला अध्याय।
।
।
प्रारम्भ।
प्रीस देश -यूरोप के आग्नेय दिशा में है। प्राचीन समय में
उमका विस्तार वर्तमान समय की अपेक्षा यहुत अधिक था।
देश के मध्य भाग में कारिथ की खाडी है, और उससे देश के
दो भाग हो गये हैं । प्राचीन ग्रीस देश में, इन दो भागों के
सिवा, ईज्यन समुद्र, श्रायोनियन समुद्र और भूमध्य समुन्द्र
के समस्त डीप और एशिया माइनर का कुछ भाग भी शामिल
था। इन दूर दूर के प्रदेशों में प्रीको ने बहुत प्राचीन समय में
बस्तियाँ,यसाई थी।
मुख्य प्रीस देश में पहले हेलन नाम के लोग रहते थे।
इस नाम का प्रीक लोग अब भी व्यवहार करते हैं, और इसी
से वे अपने देश को हेलास भी कहते हैं । ग्रीस बडा ही सुन्दर
देश है । वहा पहाडों की अनेक श्रेणिया है, और इस कारण
स्वाभाविक ही उसके बहुत से विभाग हो गये हैं। प्रत्येक,
दिमाग में प्राचीन समय से भिन्न भिन्न जाति के लोग रहते
थे। प्रत्येक जाति के लोगों का स्वतन्त्र, राज्य और स्वतन
1

(. १२ )
-
व्यवस्था थी। इस कारण देश में, भिन्न भिन्न समय पर, अनेक
छोटे छोटे राज्य उत्पन्न हुए; और समय पाकर उनका विकास
भी हुआ।।
हेलन लोगों के पहले प्रीस में पेलास्जान्स नामक एक
जंगली जाति के लोग रहते थे। बाद को हेलन्स पूर्व की ओर
से ग्रीस देश में पाये । उन्होंने पहले थेसली प्रान्त में अपनी
वस्ती बसाई, और धीरे धीरे दक्षिण की ओर बढते गये । इस
प्रकार उन्होंने अनेक स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये।
कहते हैं कि, हेलन लोगों का मूल पुरुप हेलन नामक एक
राजा था । यह राजा ग्रीकों के देवता जुपिटर का पुत्र था ।
आगे चलकर इसी राजा का नाम इन लोगों को प्राप्त होगया।
परन्तु यह बात पेतिहासिक नहीं, काल्पनिक है, इसलिये
विश्वास करने योग्य नहीं।
प्रीस के इतिहास का पहला भाग वीर-काल कहलाता है।
इस वीर-काल में देश में अनेक वीर पुरुष उत्पन्न हुए। उनकी
अनेक कथाएं और कविताएं, जो उस समय उपलब्ध थी,
उन्हीं के आधार पर, उस समय का इतिहास लिखा गया है
ग्रीक लोग समझते थे कि, इन वीर पुरुषों -का अबतार देव
ताओं से हुआ है, और इसलिए घे उनकी पूजा देवताओं के
सदृश करते थे। बाद को ग्रीम देश में बडे बडे सरदार घराने
उत्पन्न हुए। ये सरदार उपयुक्त वीर पुरुषों में से किसी एक
को अपने अपने घराने का मूल पुरुप समझते थे । इन वीर
पुरुषों का काल लगभग २०० वर्षों का अर्थात् हेलन्स लोग
पहले पहल जय ग्रीस देश में आये तव से लगा कर ट्राय की,
चढाई तक-समझा जाता है। इसी काल में ग्रीकों के राज्य
1

स्थापित हुप, । और उनकी सस्थाएं उत्पन्न हुई । इन राज्यों और सस्थाओं के विषय में अनेक दतकथाएँ काही जाती हैं, जो निरी काल्पनिक है । उदाहरणार्थ, कहते हैं कि, सेक्राप्स नामक एक राजा था । उसने एथेन्स की स्थापना की थी, ओर इजिष्ट देश की अनेक उपयुक्त यात प्राप्त देश के पटिका प्रान्त में प्रचलित की थी। उसने कुल बारह शहर घसाये थे, उनमें एथेन्स सत्र से पटा था। एथेनो नाम की एक देवी थी। उसकी कृपा देश पर मवंदा बनी रहे- इस हेतु से उर्म शहर का नाम उसने एथेन्स ग्यता । कहते हैं- कि, यह वान सन् स्त्रिी के १५५० वर्ष पहल हुई । पर एयेन्स शहर की स्थापना के साथ ईजिप्ट देश का कुछ सम्बन्ध होना बहुत कम समय जान पडता है । एथेन्स फिनीशियन जाति के लोगों का बसाया हुआ जान पड़ता है। फिनीशियन एशिया के पश्चिमी किनारे पर रहते थे, और बडी सभ्य दशा में थे। उन्होंने भूमध्य समुद्र के किनारे पर व्यापार के अनेक स्थान नियत किये थे। उनके समय में प्रीक लोग असभ्य अपस्था में थे, और रोम का जन्म भी न हुआ था। ऐसी दशा में यह कदापि समय नहीं है कि, एथेन्स के ममान व्यापार का स्थान फिनीशियन लोगों की हष्टि में न पाया हो। एक: दतकथा ऐमी भी है कि, कड्मस नामक एक फिनोशियन सज्जन ने ग्रीस देश में पहले पहल अपनी लिपि का प्रचार- किया और थीम्स नामक शहर बसाया। इस कथा को यदि झूठ भी मान लें, तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि, ग्रीको के प्राचीन इतिहास के साथ फिनीशियन लोगों का कुछ भी सम्बन्धन था। ,

है
प्रत्येक राज्य की स्थापना के विषय में इसी तरह की एक
न एक दन्तकथा है। प्रत्येक के मूल पुरुष मिन्न भिन्न है।
और वे उनके पूज्य हैं। किन्तु, यह मानने का कुछ भी
आधार नहीं है कि, पास्तव में ऐसे कोई पुरुष थे। जो हो,
ग्रीकों का इन पर पूर्ण विश्वास था, और इन वीर पुरुषों का
ग्रीको के सम्प्रदाय, रहन सहन, राजनैतिक और धार्मिक
सस्थानो पर यडा प्रभाव पड़ा था।
प्राचीन ग्रीक मूर्तिपूजक थे। उनक देवताओं की संख्या
बहुत अधिक थी। उन देवताओं का एक राजा भी था । उस
का नाम था जुपिटर या जियस । थेसली प्रान्त में प्रालिपस
नामक एक पर्वत है। उसके शिखर पर उक्त देवता का दर.
पार लगता था । जुपिटर के नीचे अपोलो नामक देयता का
दरजा था । यह विद्या और सगीत कला का अधिष्ठाता माना
जाता था। इसके सिवा पशुओं का सरक्षण करने, पापाचरण
पर दड देने तथा देवराज जुपिटर को आज्ञाए मनुषो तक
पहुँचान का भी फाम इसी के अधिकार में था।
ग्रीक धर्म के मुख्य चौर पुरुष हक्युलीज, थीसियस,
ट्रिप्टोलिमस, एसयूलेपियस और मायनाज ( Minos ) है।
इनके नीचे श्रगमेनान, अकोलीज, नेस्टार और यूलिसीज की
गणना की जाती है। इनके सिवा ट्रोजन युद्ध में प्रसिद्धि पाये
दुए अनेक वीर पुरुषां को भी ग्रीक लोग पूजनीय समझते थे।
प्राचीन ग्रीक इतिहास में अधिक विश्वसनीय बात ट्राय
का घेरा अर्थात् ट्रोजन युद्ध है । यह युद्ध ईसा के लगभग
तेरह सौ या एक हजार वर्ष के पहले हुआ था । इस युद्ध का
वर्णन प्राचीन कविता में किया गया है। युद्ध समाप्त होने के
M
.
।

दो तीन सौ वर्ष बाद होमर नामक एक विषयात कविहुआ। उसी ने इस युद्ध का वर्णन कविता में किया, जिसकासाराश इस प्रकार है। . प्राचीनकाल में एशिया के पश्चिमी किनारे पर एक समृद्धि- शासी राज्य था। उसकी राजधानी ट्राय शहर में थी। प्रायम उसका राजा था। उसकेपेरिस नामक एक पुन था।पेरिम एक पार प्रोसदेशान्तर्गत स्पार्टी के राजामेनिलास केदरवार में गया। मेनिलास ने उसका घडा आदर मत्कार किया। पर पेरिस ने पडी कृतघ्नता दिसलाई-वह मेनिलास की स्त्री हेलन को अपने साथ ट्राय भगा ले गया। इस दुष्टता का बदला लेने के लिए मेनिलास ने समस्त ग्रीक राजाओं को एकत्र करके प्रायम के साथ युद्ध श्रारम्भ किया, और ट्राय शहर को चारों ओर से घेर लिया । शहर की किलेवदो मजबूत थी, अतएव यह घेरा दस वर्ष तक बना रहा । अन्त में ग्रीको ने युक्तिपूर्वक शहर अपने अधिकार में कर ही लिया। इस युद्ध में अनक वीरों ने नाना प्रकार के अघटित और अपूर्व शुरता के कार्य किये । ग्रीको ने अतिम युक्ति यह की कि, उन्होंने लकडी का एक बडा भारी घोडा बनाया, और उसे कोट के राहर रख दिया | घोडे के पेट के भीतर भेनिलास और अनेक अन्य योद्धागण, गुप्त रीति से, बैठे हुए थे। शेष सेना घेरा छोड कर चले जाने का यदाना फर दूर जा छिपी थी। ट्रोजन लोगों ने जब देखा कि शनु चले गये तेय घे उक्त लकडी के घोडे को खींचते हुए शहर के भीतर ले आये । रात होने पर मेनिलास,अपने योद्धाओसहित, घोडे के पेट से बाहर निकला, और किले का दरवाजा सोल कर अपनी सेना को भीतर ले प्रापा । इस तरह ट्राय शहर पर .

,
-
इजिप्ट देश में पेपिरस नामक वनस्पति यहुत होती थी।
वहां उससे एक प्रकार का कागज तैयार किया जाता था।
श्राज-कल अगरेजी में जो कागज को 'पेपर' कहते हैं, वह
इसी 'पेपिरस' पर से निकला है। ग्रीक लोग पेपिरस के
बहुत से वृक्ष अपने देश में लाये, और उनसे कागज
बनाना आरंभ किया । 'कागज का आविष्कार होने से
ग्रीस देश में सर्वत्र लेखनकला का प्रचार हो गया । इसी
समय होमर के प्रथ भी लिपिबद्ध हुए । इसके पहले वे
मुखान याद रक्से जाते थे। होमर एशिया के पश्चिमा
किनारे पर रहता था। वहां से कोईये अथ प्रीस देश में लाया;
और वर्तमान स्वरूप में उनको लिखा । इन ग्रन्थों के निर्माण
काल में ग्रीक लोगों को जो दशा थी, और उनमें जो रीति-
रवाज प्रचलित थे, उन सब के जानने का एक मात्र साधन
यही ग्रन्थ हैं।
ट्रोजन युद्ध समाप्त होने के बहुत काल पश्चात् होमर का
जन्म हुआ था। अनुमान है कि, ईसवी सन् के लगभग नौ
सौ वर्ष पहले वह उत्पन्न हुआ होगा। इसी बीच में ग्रीस
के उत्तरीय भाग के थेसली प्रान्त से डोरियन जाति के लोग
दक्षिण में आये, और सारा देश उन्होंने अपने अधिकार में
कर लिया। अर्थात् जैसे नार्मन लोगों ने इंगलेंड पर चढाई करके
सेक्सन लोगों को जीता, उसी तरह डोरियन लोगों ने चढ़ाई
करको हेलन लोगों को पराजित किया। इन डोरियन लोगों के
युद्धों का वृत्तान्त पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है। परन्तु उन्हों
ने ग्रीस में बहुत से राज्य स्थापित किये। उस समय से, फिर
प्रीक लोगों में तीन भिन्न भिन्न जातियां दिखाई पड़ने लगी।
.

चे इस प्रकार हैं-ईश्रोलियन्स, आयोनियन्स और डोरियन्स !
मद्यपि ये तीनों जातिया ग्रीक ही कहलाई, तथापि इनमें
पारस्परिक भेद सदैव बना रहा । उदाहरणार्थ, अधीनियन
लोग आयोनियन जाति के और स्मार्टन लोग डोरियन जाति-
के थे। ऐसा ही भेदभार इंगलैंड में भी सेक्सन और
नार्मन जाति में बहुत काल तक बना हुआ था, सो इंगलैंड के
इतिहास में प्रसिद्ध ही है।
दूसरा अध्याय।
.
होमर के समय में ग्रीस की अवस्था ।
1.
-
.
होमर के काव्यों से ग्रीस देश का जो हाल मालूम होता
है, उससे जाना जाता हे कि, उस समय ग्रीस के उत्तरी प्रान्त
के छ भाग 2 -उत्तर में आयोनियन किनारे पर थेसली. इटो
लिया, और आकरनेनिया, मध्यभाग में डोरिस और फोसिस,
तथा कारिश की बाडी के किनारे पर लोक्रिस । उत्तरी और
दक्षिणी भाग कारिथ की सयोगीभूमि से जुड़े हुए है, ओर
उसके धीचो,यीच पर्वत की एक श्रेणी दक्षिणोत्तर चली गई
है। दक्षिण ओर इस श्रेणी की अनेक शाखाएँ होगई हैं, अत.
“पय दक्षिणी भाग, जो पिलापोनेसस कहलाता है, उसके
अनेक विभाग होगये है। उन विभागों को 'ओकेया, प्रा.
डिया, एलिस, मेसेनिया, पाालिस और लेकोनिया कहते थे।

(२० ) । स्पार्टा शहर लेकोनिया प्रान्त में है । उपर्युक्त सब प्रान्त भित भिन्न स्वतंत्र राज्यों के रूप में थे; परन्तु उन सब की राज्य व्यवस्था प्राय एक ही ढंग की थी। मुख्य राजा की गद्दी वश परम्परा के लिए चलती रहनीथी । युद्ध के अवसर पर.समस्त अधिकार राजा के हाथ में रहते थे, पर शाति के समय, राज्यकार्य करने के लिए, राजा के नीचे एक सभा रहती थी। मुख्य न्यायाधीश का काम भी राजा के ही हाथ में था, ओर इसके लिए वह न्यायसभा में श्राया करता था । न्यायसभा, घाजार के चौक में, अथवा ओर कहीं खुली जगह में, हुश्री करती थी । न्यायाधीशों के लिए शिलासन बने हुए थे, और घे अर्धवृत्ताकार धेरै के बीच में रक्से रहते थे। होमर के , समय में ग्रीक लोग बहुत कुछ सभ्य - दशा में थे, और उन्हें उपयुक्त कलाओं का प्रान भी अच्छा हो गया था। तथापि वह शान सर्वसाधारण में नहीं फैला था, अत एव शिल्पज्ञ लोगो को कवि अथवा वैद्यों के समान ही ऊचा मान मिलता था । ऊन के वस्त्र बुनना तथा मिट्टी के भद्दे बर्तन बनाना उनको मालूम था ! उस समय ग्रीस देश में इजिप्ट से मलमल और चाथिलोन, टायर तथा सिडोन से गलीचे आते थे। अनेक धनवानों के यहां चांदी के प्याले भी रहते थे, पर शायद वे विदेश से बन कर पाते होंगे। होमर के समय में, और उसके पश्चात् भी, ग्रीक लोगों के साधारण व्यवसाय-खेती करना,,शराब बनाना ओर पशु पालना इत्यादि थे। परन्तु चूकि उस समय भिन्न भिन्न राज्यों में युद्ध दुधा ही करते थे, अतएव बीच बीच में ये व्यवसाय बन्द पड जाते थे, और चाहे किसान हो, या ग्वालो हो, उसे .

( २१)
1
A
युद्ध में जाना ही पड़ता था।
राजधानी के मध्यभाग में, अथवा उसके निकट किसी
स्थान पर, लकड़ी का एक किला बना हुआ था और तत्का.
लीन राजा लाग वहीं रहा करते थे। इस किले को आको-
पोलिम कहते थे । धनवान लोगों के महल भी लकडी के ही
होते थे और यद्यपि उनको महल कहते थे, तथापि भद्दे ढग
से बने हुए वे केवल लकडी के घर थे। पाहुनों के लिए इन
घरों में बडे बडे दालान बने होते थे। क्योंकि ग्रीस देश में
पाहुनों का बडा आदर सत्कार किया जाता था । सच्चे
हृदय से उनका मान सन्मान करना वहाँ के निवासी अपना
परम कर्तव्य समझते थे।वे पहले पहल यह नहीं देखते थे
कि श्रागत मनुष्य शत्रु है या मित्र ।
डेन्स लोग जिस प्रकार, पहले सामुद्रिक चोरियाँ करके
इगलैंड पर छापा मारा करते थे, उमी प्रकार प्राचान समय
में, अनेक ग्रीक लोगों ने सामुद्रिक चोरी करके बहुत सा धन
कमाया था। उस समय वहा के राजा तक सामुद्रिक छापा
मार कर लूट मार करना बडी शरता ओर गौरव का कार्य
समझते थे। इस तरह की लूट मार मचाने में वे जित जहाजो
का उपयोग करते थे वे श्राकार में लम्बे तथा कुछ गोल हुआ
करते थे। उनके साथ एक डोगी तथा पाल ओर वलिया भी
रहा करती थीं । उनम बहुतेरे तो इतने बड़े होते थे कि, उनमें
सो सौ मनुष्य तक समा सकते थे। तथापि उस समय दिशा
सूचक यत्र का आविष्कार न होने के कारण, ये समुद्रतट से
मोदर नौका न ले जा सकते थे।
सामुद्रिक चोरी का यह धधा उस समय यहुन मामूली

-
समझा जाता था। किलान जव अपनी खेती का काम करने
जस्ता था तव उसे लडाई का सामान साथ लेकर जाना पडता
था ; क्योंकि लुटेरे कव आकर हम्ला करेंगे, इसका कुछ ठिकाना
न था । इन अस्थाचारों से लोगों को बचाने के लिए सवराज्यों
ने मिलकर एक प्रतिनिधि सभा स्थापन की थी। इस सभा में
प्रत्येक राज्य के दो प्रतिनिधि रहते थे। यह सभा वर्ष भर में
दो घार होती थी। एक बार वर्षा ऋतु में थर्मापिली में और
दूसरी धार वसंत ऋतु में डेल्फाय में। इस सभा का नाम
पम्फिफ्टिओनिक (Amphietvonic), अर्थात् परस्पर-प्रेम
सम्वर्धक सभा था । युद्ध तथा शाति के समय में समस्त राष्ट्रा
में जिन नियमों का पालन किया जाता था, उनका निर्धारण यही
सभा करती थी। इसके सिवा, यह सभा उन लोगों का भी
विचार करती थी जो धर्म-सम्बन्धी नियमों का उल्लघन करते
थे। निर्धारित किये हुए नियमों का समुचित रीति से पालन
किया गया या नहीं, इसकी जांच भी इसी सभा की छमाही
बैठक में होती थी। इस सभा के सभासद, पांच वर्ष में एक
अपने समस्त कुटुम्ब को डेलास में एकत्र करके एक
वडा धर्मोत्सव करते थे।
ग्रीक लोगों के धर्म में त्योहारों और उत्सवों का बड़ा महत्व
था। होमर के ग्रन्थों से यद्यपि इस विपय में बहुत कम बातें
मालूम होती हैं, तथापि देश के सब लोगएकत्र होकर देवोत्सव
और यज्ञयाग किया करते थे। साथ ही भजन भी गाये जाते
ये, और तुलस भी निकलता था। ग्रीक लोगों में सार्वजनिक
भजन का यहीं से आरम्भ है । इन भजनों के गाते समय डफ
औरझांक का उपयोग किया जाता था।
चार,
.

। । , ( २३ ) होमर के समय में ग्रीक लोगों के मदिर यद्यपि छोटे ओर लकडी के ही होते थे, तथापि बडी घड़ी फुलवादियों या बगीचों के भीतर बने होते थे , और भीतर दीपक लगे होते थे। बाद को जब देश में सम्पति की वृद्धि हुई तब लकडी के स्थान पर पत्थर का उपयोग करने लगे । जिन अमराइयों के भीतर ये मदिर होते थे, उनके वृक्ष कभी काटे नजाते थे। यदि कोई अपराधी इन वगीचों में जा छिपत्ता था, तो फिर उसके पफडे जाने का डर नहीं रहता था । ग्रीक लोगों में । पुरोहितों की कोई अलग श्रेणी न थी। सार्वजनिक त्योहारों में, कोई भी योग्य पुरुष, पुरोहित का कार्य करने के लिए, चुने | लिया जाता था , और प्रत्येक कुटुम्ब का मुखिया अपने अपने घर पुरोहित का काम कर लेता था । होमर के समय में सम्पूर्ण लोगों की तीन श्रेणियों थीं। पहली श्रेणी उन लोगों की थी जिन्होंन युद्ध में पराक्रम दिन लाकर, और विजय सम्पादन करके, अन्य देशों को जीताथा, ये अपने को सरदार अथवा योद्धा समझते थे । दूसरी श्रेणी विजित लोगों की थी, और तीसरी श्रेणी गुलामों की थी। प्राचीन ग्रीकों को रहन सहन बिलकुल सादी थी। उनके घर में मेज, कुसी और बचे, इत्यादि रहा करती थी , कुछ धनवानों के घर पलॅग भी रहते थे। पलॅग पर वाघ अथवा अन्य पशुओं के चमड़े के गहे पड़े रहते थे। गरीव लोग जमीन पर मेढों का चमडा विचाकर अथवा सूरने पत्तों का बिछौना बना कर सोते थे। पुरुप लोग ऊपर से नीचे तक सारा अग डॉकने वाली धोती पहनते थे ,ओर ऊपर से एक ऊन की शाल ओढ लेते थे । स्त्रियाँ एक लम्बा सा भगापहनकर ऊपर -- , -

( २४ )
से पुरुषों के समान ही ऊन की शाल ओढ लेती थीं। यह तो
हुआ धनी लोगों के पहनावे का वर्णन । अव गरीबों का पहनावा
पया होता था, सो सुनिये । ये बेचारे चकरो या मेढों की खाल
पहना करते थे। युद्ध के अवसर पर सरदार लोग जिरह वस्तर
पहन कर रथ पर श्रारूढ होते थे। युद्ध ही उनका मुख्य कार्य
समझा जाता था, इसलिए शस्त्र, घोडे और रथ उनकी मुख्य
सम्पत्ति थी।
घर में वे किस प्रकार से रहते थे,इसका पूर्ण रूप से पता
नहीं लगता। बडे बडे भोजी के अवसरों पर लोग दालान क
चार्रा और की दीवारों से पीठ लगाकर बैठते थे, और प्रत्येक
मनुष्य
के सन्मुख छोटी सी चौक पर पात्र रक्खा जाता
था। दालान का मध्य भाग साली रहता था , और इसमें
वाजत्री लोग वाजा बजाते हुए महमानो का मनोरजन करते
रहते थे । गोमास, मेढे, बकरी और सुधार का मास, पनीर
( Cheese) और फल इत्यादि खाने के मुख्य पदार्थ थे।
शराब और पानी का मिश्रण पहले ही से एक बड़े बड़े में
तैयार कर रक्खा जाता , और वही पीने के लिए भोजन के
समय परोसा जातो था । प्रत्येक मनुष्य शराब का प्याला मुह
में लगाने के पहले थोडी सी शराय जमीन पर डालकर कहता
कि,"अपोलो, यह तुम्हें अर्पण किया, " देवी, यह तुझे अर्पण
किया इत्यादि । वर्तन और प्याले प्रायः मिट्टी ही के रहा करते
थे। परन्तु बनवानों के यहा बडे बड़े भोजो के अवसर पर,
चांदी के प्याले भी देखे जाते थे।
.

( २५ )
तीसरा अध्याय।
एयेन्स का राज्य ।
.०
पहले हम यह कह चुके हैं कि, ग्रीस देश में बहुत से छोटे
छोटे राज्य थे । इन राज्यों में एथेन्स और स्पार्टा, मुरय, और
विशेष प्ररल थे । एथेन्स को स्थापना कब हुई, यह ठीक नहीं
कहा जा सकता । पहले एटिका प्रान्त के अनेक छोटे छोटे
विभाग थे । प्रत्येक विभाग में एक एक स्वतत्र राजा था।
सच पृलिये तो ये विभाग बटुनही छोटे, अर्थात् दो दो, तीन तीन
गार मिलकर बने थे। श्रतएव इन विभागों कोराज्य कहने की
अपेक्षा रियासतें कहना ठीक होगा । इन भिन्न भिन्न रिया.
सतों में सर्वदा लडाई झगडे हुआ करते थे। कुछ काल के
पश्चात् यारह रियासतों ने एका किया, और अपना मुखिया
एथेन्स को बनाया, उस समय यह निश्चित हुआ कि, परस्पर
एक दूसरे को सहायता करके सर की रक्षा की जाय। सेंफ्राप्स
और उसके बारह शहरों के विषय में जो कथा प्रचचित है,
वह शायद इन्हीं यारह रियासतों की एकता पर से निकली
है। कुछ समय के पश्चात् उन बारहो रियासतो का एक ही
राज्य बन गया, और एथेन्स उसकी राजधानी हुई, तथा सय
राज्यकार्य वहीं से होने लगा।
एक दनकथा है कि, थीसियस नामक राजा ने उक्त बारह
रियासतों की एकता की, और एथेन्म शहर को घढाया। उसी
,
-

( २६ ) ने मदिर बनाये तथा समस्त पटिका प्रान्त के लिए कानून और कायदे तैयार किये । उक्त थीसियस राजा वास्तव में कोई मनुष्य था, या केवल काल्पनिक ही था, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। इतनी बात सच है कि, एथीनियन उसे परम पूज्य मानते थे , और देवता के सदृश उसकी पूजा करते थे । तथापि जान पडता है कि, यह काल्पनिक ही पुरुप था। क्यों कि एथेन्स के कायदे कानून किसी एक ही के बनाये नहीं है, वे भिन्न भिन्न समय में तैयार हुए है । एटिका प्रान्त के निवासियों का एक राज्य बनाने पर, सम्पूर्ण लोगों क चार भाग किये गये , और फिर प्रत्येक भाग के तीन विभाग किये गये । इन विभागों को प्रेट्रिया, कहते थे । फेट्रिया का मतलब है-एक जाति । प्रत्येक फ्रेट्रिया में कई गोत्रों के, अर्थात् अनेक मूल पुरुषों से वृद्धि पाये हुए, लोगों की गणना होती थी। एक गोत्र में कई कुटुम्ब होते थे। इन सब विभागों में जितने लोगों की गणना होती थी, उन्हीं को "एथेन्स के नगरवासी की सजा दी जाती ; उन्हें कुछ विशिष्ट हक भी दिये जाते थे। एक फ्रेट्रिया में लगभग तीन गोत्र होते थे। प्रत्येक गोत्र के विशिष्ट कुलाचार थे, और उनके मुर्दो के गाडने की जगह अलग रहती थी। प्रत्येक कुटुम्ब क धार्मिक सस्कार भिन्न भिन्न थे ,जो उन कुटुम्मों में सदैव प्रचलित रहते थे। जय किसी कुटुम्ब के निवंश हो जाने पर उमके सस्कार बद हो जाते थे नय लोग समझते थे कि बस अप सारे देशपर ईश्वर का कोप होगा, और अव बहुत जल्द कोई न कोई आपत्ति आवेगी। ईसवी सन के नौ सौ वर्ष पहले एथेन्स की राजसत्ता भग होगई , और धीरे धीरे प्रजासत्ताक राज्य स्थापन होने लगा।

( २७ )
.
सब से पहले राजा के स्थान पर "आर्कन नामक एक मुख्य
अधिकारी, अर्थात् मजिस्ट्रेट, नियुक्त हुआ उसका अधिकार
उसके सारे जीवन स्थिर रहता था। एक दन्तकथा है, जिस
से इस परिवर्तन का कारण जान पडता है। एक बार
पिलापोनेमस की सेना ने एटिका पर चढ़ाई की। उस समय
डेल्फाय के अपोलो का शकुन उठाने के लिए एथेन्स से कुछ
वकील भेजे गये। वे वकील देवी का शकुन उठाकर यह
समाचार ले आये कि, जब एथेन्स का राजा मरेगा, तभी
शत्रु पराजित होगा । यह सदेशा जय एथेन्स के राजा
कोड्स ने जुना तब वह अपने प्राण देने को तैयार हुआ।
एक दिन वह स्वय ही, किसी को न बतलाने हुए, शत्रुओं
की सेना में घुस गया, और शत्रुओं ने उसे न पहचान कर
मार डाला। पीछे जब शत्रुओं को यह बात मालूम हुई तय वे,
एथेन्स को जीतना दुर्घट समझकर स्वदेश को वापस चले
गये। इधर एथेन्स वालों ने राजा के स्थान पर पाकन की
नियुक्ति कर ली।
उपयुक्त डेल्फाय के शकुन का महत्व राज्यकार्य में बहुत
अधिक था।
राष्ट्र के राजकीय अथवा निजी व्यवहार में इतनी
छोटीसी बात पर अवलम्बित रहकर कार्य करना इतिहास में
शायद ही कहीं मिलता हो। ग्रीक लोगों की, और आगे चल
कर रोमन लोगों की भी, यही समझ थी कि, इन शकुनों के
द्वारा देवता अपनी इच्छा प्रकट करते है । प्राचीन काल में,
ग्रीस देश में ही नहीं, किन्तु उस समय के मूर्तिपूजक अन्य राष्ट्रों
में भी, अपोलो का बडा मान था। डेल्फाय की एक अमराई में
अपोलो का मंदिर था और उसकी मूर्ति सोने की थी। मंदिर
.

(२६) । घडी गुफा पुष्पहारों से सदैव सजा रहता था। वहां सदा के पुजारी रहते थे । सब लोगों के प्रश्नों के उत्तर इन्हीं पुजारियों के द्वारा मिला करते थे, अतएव इनका महत्व बहुत ही बढ़ा चढा हुना था। सब ग्रीक लोगों को यह पूर्ण विश्वास था कि, ये उत्तर स्वय अपोलो की ओर से ही मिलते हैं। परन्तु वात असल में यह थी कि, ये पुजारी राज्य के मुखिया लोग थे, इस लिए ये अपनी इच्छा के अनुसार लोगों के प्रश्नों का उत्तर दिया करते थे । पहले तो वह मन्दिर एक बडे अनघड स्थान पर बना हुआ था, और फिर उसके नीचे एक थी । उस गुफा से दुगंधयुक्त हवा ऊपर आया करती थी । गुफा का मुह सदैव बन्द रहता था, परन्तु प्रश्न पूछते समय गुफा के मुंह पर एक पिताई रस देते थे, और उस पर एक स्त्री को बैठाते थे। इस स्त्री को पायथिया कहते थे । स्त्री के तिपाई पर बैठने के बाद गुफा का मुंह खोल दिया जाता था । मुह खोलते ही दुगंधि ऊपर उठती; ओर वह स्त्री दुर्गन्धि के मारे घबडा कर हाथ पैर पटकने तथा अड बड यकने लगती थी। उसकी इस दशा को देखकर लोग समझते थे कि, अब उस पर देवता आ गया। ऐसी अवस्था में वह जो कुछ वकती थी, पुजारी लोग लिख लिया करते थे, और फिर वाद को उसको कविता बनाकर पृच्छकों को दे दिया करते थे । इन कविताओं की शब्दयोजना ऐसी कुछ गडवड और गोलमाल हुश्रा करती थी कि, जैसा जी चाहे वैसा अर्थ निकाल सकते थे। यही कारण है कि, परिणाम कुछ भी हो, भविष्य कीसत्यता पर लोगों का विश्वास कराने में कोई अडचन न पडती थी। इसलिए देवता का . . .

( २६.)
-
शकुन मिथ्या होने का कभी अवसर ही नहीं पाता था।
इस प्रकार डेल्फाय के शकुन का महत्व अत्यन्त पढा हुआ
था। पहले पहल पायथिया का काम करने के लिए नीच कुल
की कोई स्त्री रख ली जाती थी। एक बार मन्दिर में उसका
प्रवेश होजाने पर फिर मन्दिर छोडकर जाने अथवा विवाह
करने की उसे मनाई थी। एक यार एक युवती उपयुक्त
नियमों का उल्लघन करके मन्दिर से भाग गई, तब से यह
नियम बना दिया गया कि, पचास वर्ष से कम अवस्था की
स्त्री इस कार्य के लिए न रक्खी जावे । पहले पहल बहुत दिनों
जक पाथिया का काम केवल एक ही स्त्री से लिया जाता था,
पर बाद को पृच्छको फी सरया बढ़ती हुई देखकर दो त्रियां
रक्सी गई । इनके अतिरिक्त एक तीसरी स्त्री भी मन्दिर में
तेयार रक्सी जाती थी कि, जिससे किसी पायधिया के,
दुर्गन्धयुक्त वायु के कारण, वीमार होजाने पर कामवन्द न हो।
डेल्फाय के देवता की सेवा में प्रतिनिधि भेजने के लिए
एथेन्स के लोगों ने सरकारी जहाज बनाये थे। ये जहाज बड़े
पविन समझे जाते थे। अन्य धार्मिक महोत्सवों में भी इन'
जहाजों का उपयोग होता था। यह पीछे बतलाया जा चुका है
कि, डोरियन लोगों ने जव एथेन्स पर चढाई की, तब देवता-
का शकुन राजा कोड्स को बतलाया गया, उसके अनुसार जब
राजा ने अपने प्राण दे दिये, तब आगे से नवीन राजा की
नियुक्ति न करते हुए एथियन लोगों ने आर्कन नामक एक
अधिकारी के नियुक्त करने की प्रथा प्रचलित की । इस प्रकार
एर्थस का राजवश मिट गया । आर्कन की नियुक्ति भी पहले.
पहल यशपरम्परा की थी । यह चाल १६० वर्ष तक चलती.
-

. , रही। इसके बाद यह निश्चय हुआ कि, प्रत्येक दस वर्ष में नये श्रार्फन की नियुक्ति हुआ करे । इसके कुछ समय बाद अल्प- सत्ताक, अर्थात् नौ मत्रियों की राज्यव्यवस्था शुरू हुई । अर्थात् राज्य के नौ प्रमुख सरदारों के हाथ में राज्य की बागडोर दी गई । इन नौ सरदारों में एक प्रधान मत्री था, दूसरा मुख्य धर्माधिकारी और तीसरा सेनापति था। शेष छै राज्य के मुख्य न्यायाधीश थे। इस प्रकार सारी सत्ता जब राज्य के धनवान और प्रमुख सरदारों के हाथ में चली गई तब प्रजा की बडी हानि होने लगी। ये सरदार मनमाने कानून बनाते, और प्रजा को चूसते, रहते थे। इन्होंने प्रजा पर इतने अधिक कर लगाये कि, उन करों को चुकाने के लिए लोगों को अपनी जमीन गिरवी रसनी पडती, या भारी व्याज पर कर्ज लेना पड़ता था। परि- रणाम यह हुआ कि, लोग कर्ज में डूब गये। उनकी, सारी जमीन चली गई; और के गुलाम बन गये । क्योंकि उस समय यह कायदा था कि, जो मनुष्य अपना कर्ज चुकाने में असमर्थ हो उसे अपने साहूकार का गुलाम बनकर, या उसकी मजदूरी करके, अपना फर्ज अदा करना होगा। अनेक लोगों ने तो इस कर्ज के कारण अपने वाल पच्चे तक बेच डाले। कानून ने, अठारह वर्ष से कम उम्र के लडके, और अवि धाहित लडकियां या वहने बेचने की सव को स्वतत्रतादे रक्खी थी। इधर दरिद्रता के कारण लोग नाना प्रकार के अपराध करने लगे और अधिकारियों ने, ऐसे अपराधों को बंद करने के लिए, और अधिक कडे कानून बनाये । कडे कानून बनाने चालों में डेको नामक एक मुख्य आदमी था। वह स्वभाव का ।

( ३१ ) - चडा दुष्ट और निर्दयी थी । उसकी सदा यही इच्छा रहती थी कि, कठोर कानून बना कर लोगों को दवाते रहें । पथेन्स के भारम्भिक कानून डू को ही के बनाये थे। प्रायः सभी अप. राधों में चूँकि मृत्यु की ही सजा निश्चित की गई थी, अत एव उस समय यह कहावत प्रचलित होगई थी कि, डूको के कानून रक्त के द्वारा लिखे गये हे किन्तु, इसका परिणाम अच्छा न हुआ। इस से सर्व साधारण में घडा असतोप फैल गया । सायलोन नामक एक सरदार था । उसने यह मौका पाकर बलवा मचा दिया । कुछ और साथी एकत्र करके उसने एथेंस का किला अपने अधि. कार में कर लिया। पर सरकारी सेना ने किले पर चढाई करके उसे अपने हस्तगत कर लिया। किन्तु सायलोन भाग गया, और उसके साथी एथिना देवी के मदिर में जा छिपे । तय उन लोगों को यह वचन देकर कि, "तुम्हारे सारे अप राध क्षमा कर दिये जायेंगे" मन्दिर से बाहर निकाला, और विश्वासघात करके सब को मार डाला। इस विश्वासघात के कारण एथेन्स में राज्यक्रांति होगई। सब लोग घबडा गये । अव यह चिन्ता सर के सिर पर सवार हुई कि इस विश्वासघात का बदला देवी जी न जाने फिस तरह लेती है, इस लिए सच्चे अपराधियों को दण्ड देकर देवी का कोप शात करने के लिए तीन सौ नगरनिघा- सियों की एक सभा हुई। सभा ने सय अपराधियों को देश- निकाले का दण्ड दिया। इसके बाद सोलन नामक एक महा शय ने नये कानून यना कर एथेन्स का राज्यशासन नये ढंग से प्रारम किया। यह घटना सन् ई० के ५६४ वर्ष पहले की है।

(४)
वह फिजूलखर्ची तो नहीं है। इन अधिकारों के कारण
लोग एरिओपेगस अदालत से बडे भयभीत रहा करते थे।
इस अदालत के न्यायाधीशों के सामने कोई हँसता तक
कर लगाने का अधिकार भी इन्हीं को दिया
गया था, अतएव प्रत्येक मनुष्य को अपनी जमीन, सम्पत्ति
और आमदनी का सारा वृत्तान्त इस अदालत के सामने
उपस्थित करना पडता था ।
सोलन ने सब मिलाकर दस अदालतें स्थापित की थी,
और प्रत्येक अदालत के फैसले सुनने के लिए के सौ मनुप्यो
की लूरी नियन कर दी थी। उस ने विदेशी कारीगरों को बुला
कर अपने राज्य में अनेक उद्योग धधे प्रारम्भ किये। एथेन्स
के जंगी जहाज भी इसी ने तैयार कराये । इस विषय में उस
ने यह नियम कर दिया था कि, उपर्युक्त चार विभागों में से
प्रत्येक विभाग को बारह जहाज युद्ध के लिए तैयार कर देने
चाहिए । इसी प्रकार उसने यह भी नियम बनाया कि, इतनी
आमदनी वाले प्रत्येक पुरुष को जहाज का कप्तान नियत करना
चाहिए , और इसके लिए एक वर्ष का व्यय भी उसी को..
उठाना चाहिए । इन लोगों को दायराकस ( Irrorarohs )
कहते थे।
मध्यम स्थिति के लोगों की दशा सुधारने के लिए
सोलन ने और भी अनेक कायदे बनाये, और बड़े लोगों का
अत्याचार विलकुल बद कर दिया। परन्तु उसकी सभी बाते
लोगों को पसन्द नहीं आई । अतएव, देशपर्यटन और अन्य
लेखन का कार्य हाथ में लेकर यह एथेन्स को छोड वाहर चला
गया। उसके कायदे लकडी के तख्तों पर खुदे रहते थे। पहले
,

( ३५ )
चे सय लोगों में घुमाये जाते थे; वाद को प्रथम किले में:
और फिर सार्वजनिक सभागृह में रक्ने गये।
.
चौथा अध्याय ।
स्पार्टा का राज्य ।
कारिथ की खाड़ी से ग्रीस देश के दो भाग हो गये हैं
उसके दक्षिणी भाग के बिलकुल दक्षिणी सिरे को लेकोनिया
कहते हैं। इसी लेकोनिया प्रान्त में स्पोर्टी शहर है । प्राचीन
काल में डोरियन लोगों ने इसे जीत कर, इसका नाम लेसि.
डीमन रक्या । धीरे धीरे डोरियन लोगों ने आसपास के
प्रान्तों को भी जीत कर उन पर कर लगाया। डोरियन लोग
• मूल निवासियों को अपना तावेदार समझते थे और अपने को
स्पार्टन्स या लेसिडिमोनियन्स कहते थे। विजित लोगों को
लेकोनियन्स नाम दिया गया। इन दोनों जातियों में परस्पर
बेटी-व्यवहार बंद था। विजित जाति को उन्होंने अपनी घरा-
बरी के अधिकार कभी नहीं दिये, इसलिए इन दोनों में अनेक
शताब्दियोंतक भेद भाव बना रहा। विजित लोगों कोराजनैतिक
कोई भी अधिकार नहीं थे और उन्हें सरकारी नौकरी भी
कभी नहीं दी जाती थी। वे केवल व्यापार या सेती करके
अपनी जीविका चलाते थे। स्पार्टन लोग अपने को योद्धासमा
.
-

हष्टपुष्ट हाँ,
.
को एकत्र
(३),
चनाये हुए सब कायदों की नीति एक ही तरह की थी। उसके
कायदों का उद्देश्य इस प्रकार थी कि, विजित जाति स्पार्टनों
के विरुद्ध कभी सिर न उठाचे, स्पार्टन लोग युद्ध के लिए
सदा सुसज्जित रहे, वे कटसहिष्णु, दृढ और
स कट के समय विचलित न होते हुए स्वराज्य रक्षा के हेतु
चे सब प्रकार का स्वार्थत्याग कर सकें और स्त्री-पुत्रों की
भी परवा न करते हुए अपने लोगों, का राज्य बना रक्खें
लायकरगसनियमो सेस्पार्टन लोग यधपिशूर और साहसी
वनःगये, तथापि उनका स्वभाव भी कर और निर्दय हो
गया। उन्हें गृह-सुख से घृणा हो गई, और
कुटुम्च
करनेवाले सामाजिक बन्धन नष्ट हो गये।
लायकरगस ने वालकों के लिए पालन गृह स्थापित किये
थे। प्रत्येक स्पार्टन चालक सात वर्ष का होने पर अपने मां-
चाप से अलग कर लिया जाता था, और उसी पालनगृह में
रख कर, उससे सब प्रकार के व्यायाम लेते हुए, उसके सय
अग-प्रत्यंग खूब मज़बूत बनाये जाते थे। इस प्रकार वहां की
सरकार लोगों को शूरवीर और साहसी बनाती थी। उनके
शरीर पर सिर्फ एक ही छोटा सा बन रहता था, जिसे ये
शरीर से लपेटे रहते थे। कठिन जगहों में घूमना, दौडना,
कुदना, पेड पर चढना, इत्यादि वाते उन लडको को लिखाई
जाती थी। उनको अन्न भी बहुत ही मोटा मोटा दिया जाता
था। घास पिछा कर उसी पर वे सोते थे। आसपास के
सेतों में चोरी करना भी उन्हें सिखाया जाता था। यद्यपि ये
चाते अच्छी नहीं थीं, पर उनकी शिक्षा का सारा रुख इसी
भोर था कि, शत्रुओं के राज्य में अपना बचाव किस

. (10) प्रकार किया जाय । अपने राज्यकर्ताओं की प्राज्ञा का. पालन करके उन्हें सम्मान देना, फिजूल बातें न करना, जहां तक हो सके, थोडे शब्दों में अपने मन को भाव प्रगट करना, इत्यादि बातों का भी उनसे अभ्यास कराया जाता था। अग. रेजी भाषा में "लेकानिक भाषण की कहावत स्पार्टन लोगों की उपर्युक्त रीति से ही प्रचलित हुई है। अठारह वर्ष की अवस्था होने पर लडके अपने पिताओं के साथ सार्वजनिक भोजनगृहों में जाते थे। वहां मेजो के पास राडे होकर पिताओं को भोजन परोसने का काम उनको करना पडता था । बीस वर्ष की अवस्था होने पर उनको सेना में भरती करके, सीमान्त प्रदेश की रक्षा करने के लिए, भेज देते थे। वहां से दस वर्ष के बाद वापस आने पर उन्हें सरकारी नौकरी मिल जाती थी, अथवा सेना में कोई पद दे दिया जाता था। इतना जब हो जाता, तभी उन्हें सार्वजनिक भोजन गृह में जाकर भोजन करने की आशा मिलती थी, अन्यथा नहीं । सरकार ने खास तौर पर ये भोजन-गृह स्थापित किये थे कि, जिससे लोग घर में पेश श्राराम न करने पाने । यह रीति पहले कीट द्वीप में प्रचलित थी, उसकी नकल स्पार्टनों ने की। भोजन के लिए बडे बडे दीवानसाने वते रहते थे और वहां प्रत्येक किसान को जौ का आटा, शराव, अजीर, पनीर आदि भोजन की सामग्री भेजनी पडती थी । जन कभी लोग पशु यति देते थे, तब उस बलि का कुछ भाग इन भोजन- गृहों में भेजना पडता था। सरकार जगलों को रक्षित रमती थी, और वहा से शिकार पफड कर भोजनगृहों में लाया जाता था। आगे चल कर नमक मिर्च मसाला तक के लिए - । ४०.), भी लोगों पर कर बिठाये गये । प्रत्येक मनुष्य को, चाहे वह राजा हो या रक, इन सार्वजनिक भोजनगृहों में ही भोजन के लिए श्राना पड़ता था। भोजनगृह के समान शयनगृह भी सरकार की ओर से तैयार कराये जाते थे। वहां प्राफर सब स्पार्टनों को मोना पडता था। इस तरह साठ वर्ष की अवस्था होने पर सैनिक सेवा समाप्त होती थी। इस बीच में यदि युद्ध का कोई अव सरन आता, तो कवायद या शिकार में समय व्यतीत करना पड़ता था। साठ वर्ष की उम्र के बाद सरकार की अन्य कोई सहज नौकरी करनी पडती थी, अथवा बैठे बैठे छोटे बच्चों का लालन पालन करना पड़ता था । अत्यत बुढापा आने पर समान अवस्था वालों के साथ बैठ कर बात चीत करते हुए समय व्यतीत करना पड़ता था। ऐसे मिलने जुलने के घर प्रत्येक ग्रीक शहर में बनाये जाते थे। पर स्पार्टी में उनका उप- । योग वृद्ध सैनिकों के अतिरिक्तसरे लोग नहीं कर सकते थे। स्पार्टनों की स्त्रियों और लडकियों के लिए ऐसा कोई सार्वजनिक प्रबंध नही था । चे अपने अपने घरों में ही रहती थीं । तथापि उनकी शिक्षा भी पुरुषों के समान ही कठोर थी। छुटपन में ही उन्हें भी व्यायाम करना पडता था । किसी प्रकार का भी सुन उन्हें नहीं लेने देते थे। पुरुषों के समान स्त्रियाँ भी सिर्फ एक ही वस्त्र पहना करती थीं । स्पार्टन राजाओं के हाथ में अधिकार बहुत ही थोडा रहता। था। साठ वर्ष की अवस्था के २८ बड़े लोगों की एक सभा राजकाज फिया करती थी । इस सभा का अध्यन राजा,या कभी कभी धर्माध्यक्ष अथवा सेनापति भी चुना जाता था - स्पार्टा में, तथा डोरियन लोगों के अन्य संब शहरों में, ईफोर नाम के सरकारी निरीक्षक नियुक्त थे। ये लोगों की शिक्षा और उनके आचरण की देखरेख रखते थे। युद्ध के मोकों पर दोनों राजाओं को बारम्बार बाहर जाना पड़ता था, श्रतएय राज्य का सारा कारवार भी इन निरीक्षकों केही हाथ में चला गया । वृद्ध मनिसभा और सर्वसाधारण में मध्यस्थी दिन- लाने के कारण उनकी सभी सूचनाए पास होती गई, और इस प्रकार उनकी सत्ता सूर वढी। यहां तक कि, राज्य में उनके बिना एक पत्तो तक मी न हिलने लगा। इधर स्पार्श की सत्ता भी धीरे धीरे सूब घढी । आसपास के राजानों पर पार्टी की सूब धाक जम गई। ले कोनिया से मिला हुआ, नेमृत्य दिशा में मेसेनिया नामक एक प्रान्त था। उसे स्पार्टनों ने जीत कर अपने अधिकार में कर लिया। पर मेसेनियन भी कुछ कम न थे। मौका मिलते ही स्पार्टनों से लडने भिडने में कभी न चूकते। पर अन्त में स्पार्टनों ने उन्ह युद्ध में पूर्णरूप से जीत लिया। इस युद्ध के कारण अनेक शहर धूल' में मिल गये, देश विश्वम होगया, और हजारों भनुप्य काट डाले गये, किन्तु मेसेनियन लोग केवल चालीस वर्ष स्पार्टनों के अधिकार में रहे। सन् ईसवी के ६८५ वर्ष पहले आरिस्टोमिनिस नामक एक मेसेनियन शूरवीर देश- भक्त स्वतन्त्रता के लिए स्पार्टन लोगों से लड़ने को पागे वदा उसने सब मेसेनियन लोगों को धैर्घ्य देकर युद्ध के लिए तैयार किया, और बहुत पराक्रम दिखला कर स्पार्टनों को खूब छकाया । एक दिन रात को वह अकेला स्पार्टी शहर में घुस गया। शहर में कोट नहीं था। यहां सीधेमिनर्वा देवी केमदिर " N (२) , में वह चला गया, और मूर्ति के अंग में एक ढाल लगाकर वहां उसने लिख दिया कि स्पार्टन लोगों की जो सम्पत्ति मैंने लूटी उसमें से यह ढाल मैंने देवी को अर्पण की। सुबह स्पार्टन लोगों ने जब यह ढाल देसी तब वे बहुत ही घबडा गये, और यह समझा कि, अब देवी हमको छोड कर मेसेनियन लोगों पर कृपादृष्टि करने लगी। इस युद्ध की अनेक मनोरजक कहानिया लोगों में बतलाई जाती है। उनमें से एक यह है -टिर्टियस नामक एक पुरुष पटिका प्रान्त का निवासी था । वह वास्तव में अध्यापक था, परन्तु वीररस की अनेक कविताए भी लोगों को वह सुनाया करता था । डेल्फाय के शकुन से यह मालूम हुआ था कि, स्पार्टन.लोगों में जब तक कोई एथेन्स का योद्धा सम्मिलित न होगा, तब तक विजय प्राप्त नहीं होगा। इस शकुन के अनुसार स्पार्टन लोगों ने पथेन्स से प्रार्थना की कि,हमारे लिए कृपा कर के एक उत्तम योद्धा भेज दीजिये । आर्कन लचमुच स्पार्टा को सहायता नहीं देना चाहता था । तथापि इस डर से, कि कहीं अपोलो नागजन होजाय, एथेल के लोगों ने टिर्टियसाको स्पार्टा भेज दिया, परन्तु टिर्टियस लगडा था, युद्धकला का शान उसे बिलकुल ही न था, इस लिए एथेन्स के लोगों ने यह नहीं समझा कि, उसके हाथ से कोई विशेष पराक्रम होगा। एथेंस की सारी दन्तकथाए चूकि ऐसी है कि उनमें से श्राप चाहे जिसको लीजिए, डेल्फाय के अपोलो का भविष्य सच ही निकलना चाहिए , तदनुसार टिर्दियस की वीररस की कविताओं और उत्साह- वर्धक गीतों से स्पार्टन सेना को सूव जोश चढा, और उन्होंने मेसेनियन लोगों को फिर से जीत लिया। - A ।

(५३)
इसका पता नहीं कि, टिर्टियस की स्पार्टी में कैसी प्रतिष्ठा
थी, तथापि उसकी कविताए स्पार्टन लोगों को बहुत अच्छी
लगती थी, और प्रत्येक सिपाही, रात के समय, भोजन
के बाद उनको बडे प्रेम से पढता था । स्पार्टन और
मेसिनियन लोगों का यह युद्ध सनह वर्ष तक चलता रहा। अन्त
में मेलेनिया प्रान्त पार्टी के अधिकार में आगया। स्पार्टी के
अन्तर्गत प्राडिया प्रान्त के कारी नामक मुकाम में डायाना
देवी का उत्सव प्रति वर्ष हुआ करता था। इस उत्सव से एक .
पार मेसेनियन लोग कितनी ही स्पार्टिन लडकिया भगा ले
गये । पर उनके सरदार परिस्टोमिनिस ने स्पार्टन लोगों से
उचित दण्ड लेकर, वे लडकिया उन को वापस कर दी। इसी
प्रकार को अनेक आख्यायिकाएं इस युद्ध के विषय में प्रचलित
हैं। अन्त में परिस्टोमिनिस निरुपाय हो गया, और मेसेनिया
छोडकर होड्स टापू में चला गया, और अपने जीवन के अन्त
तक वहीं रहा । मेसेनियन लोग उसे बहुत पूज्य मानते थे।
उसके ऊपर उन्होंने अनेक कविताए और पाख्यान रचे है,
उनसे, तथा टिर्टियस की कविताओं से इस मेसेनियन युद्ध
का वृत्तान्त पात हुआ है।
मेसेनिया जीतने के बाद स्पार्टी में अनेक क्रान्तिकारक
घटनाए हुई । अनेक स्पार्टन लोग युद्ध में काम आये,
अतएव उनके अधिकार यात्त से लेकोनियन लोगों को
दिये गये, इसके अतिरिक्त युद्ध में मरे हुए लोगों की
विधवाओं के साथ विवाह कर लेने की भी आज्ञा उन्हें
मिल गई । अतएन कित्तने ही कुटुम्ब कुलभ्रष्ट हो गये,
और जिन्होंने दूसरी जाति के लोगों से विवाह नहीं
1

( ५० )
के खर्च भर को वस्त्र गुलामों से नवा लिया करते थे। ऊन
के, भांति भॉति के, कपडे बनाना भी वे जानते थे। जमी हुई
ऊन की टोपियाँ यात्री, चरवाहे और किसान लोग लगाया
-
करते थे।
ग्रीक लोग अपनी जमीन साल में तीन बार जोतते थे ।
उनके हल अनेक प्रकार के, किन्तु सादे, होते थे। नेत में ही,
किसी ऊची जगह बलियान बना कर, वे वहीं मड़ाई का काम
किया करते थे। यह काम कभी कभी वे यंत्र से करते और
कभी कभी पशुओं के पैरों के द्वारा करते थे। अनाजपत्थर की
श्रोखली में सूब कूट कूट कर पीस लेते थे, अथवा पत्थर की
चकियों का ही उपयोग कर लेते थे। वकी पीसने का काम
गुलाम स्त्रियों से लिया जाता था ।
पटिका प्रान्त की ज़मीन गेहू की फसल के लिए अच्छी
न थीं। व्यापार खास कर अनाज का ही होता था, और
सरकारी लगान प्राय बहुत सा उसी से वसूल होता था।
अनाज के विषय में कानून बहुत ही कठोर थे । अनाज की
विक्री का भाव सरकार निश्चित करती थी। ठहरे हुए भाव से
महँगा वेच कर यदि व्यापारी अधिक लोभ उठाते थे तो उन्हें
मृत्युदण्ड दिया जाता था । एटिका प्रान्त में जितना अनाज
पैदा होता था, यह सब एथेंस में लाकर ही वेचना पडता था।
इसके सिवाय यह 'मी कानून था कि, परदेश से लाये हुए
अनाज में से; कम से कम, दो तृतीयांश एथेस में ला कर
वेचना चाहिए । एटिका की पैदाइश में मुख्य पैदाइश तेल और
शरा की थी। अगूरों के बागों और आलिय नामक वैलफलों
के सेतो से सारा प्रान्त भरी हुआ था । अन्य फलों के बाग

उन्हें मालूम ही न थे और न सुन्दर बाग बनाने का ही उनको शान था। हां, सार्वजनिक उत्सवों में पुष्पमालाए धनाने के लिए गुलान, कमल और अन्य सुगन्धित पुष्पवृक्ष वे लगाया करते थे। एपेट्यूरिया नामक एक उत्सव प्रति वर्ष एथेन्स में हुना करता था । साल भर में जन्मे दए सब लडको को नागरि कत्व के अधिकार देने के लिए यह उत्सव किया जाता था। यह तीन दिन होता रहता था। पहले दिन सब लोग एकत्र होकर शाम, को ग्राम भोजन कराया करते थे। दूसरे दिन मन्दिर में जाकर बलि इत्यादि देते थे। तीसरे दिन सर भाई. वन्द एक जगह जमा होते, वहा बाप अपना नवीन बच्चा हाथ में लेकर अपने गोत्रजों के सामने आता, और यह प्रश्न करता कि, "इसको नागरिक की स्वतत्रता देने में कोई हर्ज तो नहीं है। इस पर यदि कोई एतराज न करता तो उस लडके का नाम नागरिकों में दर्ज किया जाता था। उसी समय कुल देवता को यफरा या मेढा घलि देते थे। इस भाति यह उत्सव तीन दिन तक घडी घूमधाम से हुआ करता था, उसमें लडकों से सुरीले गीत भी गवाये जाते थे, और जिसका गाना उत्तम होता उसे पारितोषिक दिया जाता था। इस उत्सव से यह जान पड़ता है कि, एथेंस के नगर-निवासी यनने में ग्रीक लोगों को कितना गौरव मालूम होता था। इसके अतिरिक्त ग्रीक लोगों के अन्य धार्मिक महोत्सव भी अनेक थे। उनमें सम्पूर्ण राष्ट्र के चार मुरय उत्सव थे । उन सब में प्रालिपिया का व्यायामोत्सव अत्यन्त महत्व का था। यह उत्सव चार वर्ष में एक बार एलिस के मैदान में, प्रालि -- ( ५२ । पिया में, जुपिटर को प्रसन्न करने के लिए, हुआ करता था। इसी महोत्सव से चार वो की कालगणना ग्रीक लोगों में प्रारम्भ हुई, उसका नाम है "आलिपियाड । एलिस के राजा और स्पार्टी के राजनीतिज्ञ लायकरगस ने, सन ईसवी के ७६ वर्ष पहले, श्रालिपिया के ये खेल, जो कि बीच में धन्द होगयेथे, फिर से प्रारम्भ किये । बस, उसी समय से यह वर्षगणना प्रारम्भ हुई । पहला आलिपियाड, सन् ईसवी के ७७६ वर्ष पूर्व के ग्रीष्म ऋतु से ७७२ के ग्रीष्म ऋतु तक समझा जाता है। -श्रालिंपिया कायह उत्सव तथा अन्य सवमहोत्सव, राष्ट्रीय दृष्टि से, ग्रीक लोगों को बहुत महत्व के मालूम होते थे। इन उत्सवों के लिए भिन्न भिन्न रियासतों के लोग एकत्र होते थे, इससे उनमें एक प्रकार का ऐक्यभाव बना रहता था। उत्सव के समय युद्ध भीस्थगित कर दिया जाता था, और उत्सवों का स्थान चूकि वडा पवित्र समझा जाता था, अतएवं घहा युद्ध का सम्पर्क तक न होने देते थे। जब तक उत्सव समाप्त न हो लेता, उत्सव के प्रान्त 'में युद्ध के , हेतु प्रवेश करने के लिए दोनों दलों को मनाई रहती थी। ग्रीस की भिन्न भिन्न रियासतों सेइन उत्सवों में प्रतिनिधि भेजे जाते थे। वे प्रतिनिधि, इस मौके पर, खूब चढा-ऊपरी करके, विशेष तेयारियां करते थे, और कीमती नजराने लाया करते थे। प्रालिपिया का मुरय मन्दिर एटिस नामक पवित्र अमराई में था। उत्सव में आया हुआ प्रत्येक मनुष्य, वहां के देवता के आगे, अपनी अपनी भेट समर्पित करता था। और पुजारियों को दक्षिणा देता था। एक पुजारी देवद्वार पर खडे होकर, प्रत्येक यात्री पर लारेल के पत्तों से अभिपिचन करता

रहता था। आलिपिया के खेल में पहले सिर्फ पैदल दौड़ने
की, वाजिया हुश्रा करती थीं । 'धागे चलकर फिर कुश्ती,
क्दना, जंजीर के खेल, धू से का खेल, भाला फेकना, रथों
और गाड़ियों की बालिया, इत्यादि सेल प्रारम्भ हुए । ईरानी
लोगोंने जव ग्रीस दश पर पहले पहल चढाई की, उसके पहले
यह उत्सव एक ही दिन होता था, वाद को फिर यह पांच दिन
होने लगा। आलिपिया के सेल में ऊचे दर्जे वाले लोग शामिल
होते थे। बाजी जीतने में सूर चढाऊपरी हुआ करती थी, और
जीतनेवालो को बडे बडे पुरस्कार मिला करते थे। देवता को
पवित्र अमराई के आलिव वृक्ष की शाखा तोडकर उसकी
कलॅगी, शिरोभूषण के तौर पर, उनको दी जाती थी, और
जिस प्रकार राजा के नाम का जयघोष करते हुए चोपदार
लोग आगे चलते ह, उसी प्रकार जीतनेवाले लोगों के नाम
का जयघोप भी हुआ करता था । किसी घडे राजा के समान
उनका जलूस निकाल कर उनको नगर में ले जाते थे।
श्रालिपिया की भाति पायथियन पेल भी प्रसिद्ध था
डेरफाय नामक मुकाम में प्रति तीसरे वर्ष हुआ करते थे, और,
उनका सगठन प्राय थालिपिया के सेल के समान ही हुथा
करता था। हा, आगे चलकर इस उत्सर में गायनकला की
परीक्षा भी लेकर पारितोषिक देने की चाल पड़ गई।
इनके अतिरिकनीमियन नामक एक राष्ट्रीय उत्सव प्रति
आलिपियाड के दूसरे और चोये वर्ष और इस्थमियन नामक
उत्सव आलिपिया के पहले और तीसरे वर्ष मुन्ना करता था।
नीमियन उत्सव पिलापोनिशा रियासन श्रास के नीमिया
नगर में और इस्थमियन सब कारिन्थ में हुभा 'फरता था।
४

(५४) इन स्थानों के खेलों में अनेक मडलियां जमा होती था और उनके गाने होते थे , अतएव बडा आनन्द लाता था , 'और भोज, बलि, जलूस, मंडली, इत्यादि सारे सामाजिक कार्यों से इन खेलों को बहुत महत्व प्राप्त हुआ था। सब प्रकार के उत्सवों में बडे बडे मेले हुश्रा करते थे, उनमें नरहातरह का माल विक्री के लिए प्राता था '। इसके अतिरिक्त, लोगों के मनोरजन के भी अनेक साधन वहां उपस्थित रहते थे। जैसे एक बकरे की खाल,फैला कर, उस पर तेल डाल कर, उसे रपटाऊ बनाते, और उस पर न गिरते हुए तो नाचता रहता उसी को वह साल इनाम दे दी जाती थी! इनके अतिरिक्त और छोटे छोटे उत्सव भी अनेक थे। डायोनिशिया नामक एक उत्सव सब छोटे-बडे गावों में, माल में चार बार हुआ करता था । यह 'वेकस' अर्थात् कामदेव के सन्मानार्थ हुश्रा करता था। इस मदनोत्सव में मद्यपान और दगा सूच हुआ करता था। इस प्रकार के तमा शों में अनेक गवार लोग, नाना प्रकार के सोंग लेकर, नाचते थे। कुछ लोग बनदेवताओं का रूप धरते थे, और कुछपुरुष स्त्रियों का रूप लेकर वनदेविया वनते थे । इस डायोनिशिया उत्सव की उत्पत्ति मद्य तैयार करने के कार्य से हुई। यह उत्सव अनाज की कटाई के समय होता था, अोर उममें गुलाम तथा अन्य सब लोग भी शामिल होते थे। यह उत्सव हमारे यहां के होलिकोत्सव के समान ही समझिये। ग्रीक लोगों में अनेक गुप्त मन और पूजा की विधिया जारी थी। ये सव रात के समय एकान्त में हुआ करती थी। इनमें बहुत थोडे लोगों का समावेश होता था, और उनको, इन सब । -- . ।

,
( ५५.)
विधियों का हाल गुप्त रखने की शपथ लेनी पडतो थी। एटि-
का के इल्युसिस शहर में ऐसी विधिया बहुत हुआ करतीयों ।
कहते हैं कि, जर से डारियन लोगों का प्रवेश ग्रोस देश में
हुश्रा, तभी से पूजा की ये गुप्त विधिया वहा शुरू हुई । उन
लोगों में प्राचीन समय में जो धार्मिक चाले थी, उनका बरा.
घर जारी रखने के उद्देश्य से हो ये गुप्त विधिया प्रचलित दुई।
श्रागे चल कर उन विधियों के देवता भी निश्चित हो गये,
ओर उन्हीं देवताओं की पूजाउन गुप्त विधियों से होने लगी।
परन्तु इन सब का रहस्य केवल उन्हीं लोगों को मालूम
रहता था कि जो लोग उन गुप्त मडलियों में शामिल रहते
थे। उनका सम्पूर्ण समाचार इतना गुप्त रक्खा जाता था कि,
उनके मच्चे उद्देश्य और मच्ची चाला के विषय में कुछ भी
वृत्तान उपलब्ध नहीं है।
।
छठवां अध्याय ।
सोलन से लेकर ईरानी युद्ध तक ।
( सन् ईसवी से छठवी शताब्दी पूर्व)
1
सोलन ने जय राज्यकार्य छोड़ दिया, तब उसके लिए
तीन महाशय झगडने लगे । उस झगडे में पिजिस्ट्रेटस को
'सफलता हुई, और वही राजकाज देखने लगा। यह

सोलन का मिन और अत्यन्त लोकप्रिय मनुथ था। उसने
एथेन्स का बहुत कुछ सुधार किया, और नाना प्रकार के भव्य
और सुन्दर भवन बना कर शहर को सुशोभित किया। इन
भवनों में अपोलो का मन्दिर और लायलियम नामक व्यायाम
शाला पहुन प्रसिद्ध थी। ग्रीक लोगों में व्यायाम का विशेष
माहात्म्य था, और इसकी शिक्षा सब को दी जाती थी।
लायसियम के अनेक बडे बडे भाग थे। इस व्यायामशाला
के चारों ओर झाडियां और बाग थे । वहा एथेन्स के बालक
शारीरिक खेल और व्यायाम करने के लिए आया करते थे।
भागे चल कर, कुछ शताब्दियों के बाद, लायसियम के भवन
में विद्वान तत्ववेत्ता और कवि, इत्यादि रहने लगे, इस कारण
वह विद्यापीठ बन गया।
पिजिस्ट्रटस ने एथेंस में जो नवीन सुधार किये उनके
लिए उसे लोगो पर कर लगाना पडा। यह कर जमीन की
पैदाइश का दसवां हिस्सा था, इसके कारण लोगों में बहुत
असन्तोष उत्पन्न हुआ। एक बार की बात है कि, पिजिस्ट्र
टस देहात में घूम रहा था । वही एक किसान किसी वेउप.
जाऊ भूमि में काम करता हुआ दिखाई दिया। पिजिस्ट्रटस
ने उससे, अपने किसी नौकर के द्वारा, यह पुछवाया कि, "इस
जमीन की पैदावार क्या है ?" इस पर किसान अँझला कर
चोला, "पैदावार पूछते हो? पैदावार यया है-यही मिहनत
और फप्ट है, मुझे तो पिजिस्ट्रेटस के कर की ही चिन्ता लगी
रहती है और क्या बतलाऊ ?" उसका यह उचित उत्तर सुन
कर पिज़िस्ट्रटस ने उसका कर माफ कर दिया।
प्रोक इतिहास में पिजिस्टस को एथेंस का "टायरट।
.

कहते हैं । टायरंट शन्द का अर्थ इस समय "फर और जुल्मी राज्यकर्ता है। परन्तु उस समय इसका यह अर्थ नही था'। ग्रीक भाषा में टायरट उसको कहते थे कि, जो अपने ही चातुर्य से सारी राज्यसत्ता प्राप्त करके, अपनी ही इच्छा से राज्यकार्य चलाता था । अर्थात् ग्रीक लोगों का 'टायरट' सज्जन और परोपकारी हो सकता था, और पिजिस्ट्रेटम भी उसी प्रकार का या, यह बात इतिहास से प्रकट होरही है। पिजिस्ट्रेटस ने एक यह नियम बनाया कि, युद्ध में जा लोग लॅगडेहोजाने हैं उन सर फा पालन सरकार को करना चाहिए उसने विद्या प्रचार के लिए भी बहुत से उपाय किये। ग्रीस देश का पहला पुस्तकालय उसी ने स्थापित किया। पीछे इस यात का उल्लेख होचुका है कि, होमर कवि एशिया के पश्चिमी किनारे पर पैदा हुआ, और उसको कविताए पहले पहल रही प्रचलित थी, फिर जय ग्रीक लोगवहा रहने को गये, तयव उन्हें अपने साथ स्वदेश को ले आये । इन सब कविताओं को एकन कर के, एक जगह लिरा रखने का कार्य पिजिस्ट्रेटम ने ही किया । ग्रीक लोगों ने भिन्न भिन्न समय में, एशिया के किनारे जाकर, अपनी धम्तिया यमाई थी। पशिया के इन ग्रीक उप निवेशों को अयोनिया कहते थे । आयोनिया में तेरह ग्रीक नगर- राज्यों का समावेश होता था। इमी भांतिग्रोक लोगों ने इटली के दक्षिणी किनारे पर और मिमिली टापू के किनारे पर भी चस्तिया वसाई थीं। ये सब पहले सीधे ग्रीस देश से हो बाहर निकले थे। इजिप में भी इन्होंने अपना उपनिवेश बसाया था । कहते है कि, चित्रकला और मिट्टी की मूर्तिया बनाने का कार्य पहनों पहल कारिध के लोगों ने विशेष रूप से प्रचलित . - ॥ - (५८) - . . . किया । परन्तु इसमें सन्देह नहीं, कि, कारिय के साथ साथ प्रार्गास, ईजीना, होडस और कीट नामक ग्रीक रियासतों में भी उपर्युक्त कलाओं की उन्नति हुई थी। पिजस्ट्रेटस के शासनकाल में डेल्फाय का मन्दिर जल गया। उसे फिर से तैयार कराने लिए, डेल्फाय के लोगों ने, सारी ग्रीक रियासतों में चन्दा पपत्र करने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजे, और एक चतुर्थांश सर्च अपने ऊपर लिया। सब रियासतों में बहुत सा चन्दा जमा हुआ । इजिष्ट के राजा अमासिस ने भी चन्दा भेजा। इस प्रकार डेल्फाय का मन्दिर जो, पहले सादे पत्थर का था, पर बढ़िया पत्थर का बन गया। इस मन्दिर में तीन सौ टेलंट, अर्थात पन्द्रह लाख रुपया पर्च हुअा। पिजिस्ट्रेट सन् ईसवी के ५२७ वर्ष पहले म्वर्गवासी हुश्रा। इसके बाद पिज़िस्ट्रटस के दो लडके हिपियान और हिपा- र्कल ( Hippius and Ilippaiclhus ) गजकाज देखने लगे । इन दोनों माइयां ने भी अपने पिता का ही आदर्श सामने रख कर प्रजाहित के काम क्येि, और विद्या कलाओं की उन्नति की। अनाक्रियान ( Anuoreon ) और सायमोनाइ- ड्रम (Simonides ) नामक दो कवियों को वे खास तौर पर एथेंस ले आये । दो वर्ष राजकाज करने के बाद, भारि- स्टोजिटन ( A11stogrton ) और हामौडियस नामक दो मनुष्यों ने उन दोनों भाइयों को मार डालने कापड्यन किया। इस पड्यत्र के सफल होने पर वे दोनों राजकाज अपने हाथ में लेना चाहते थे । एथेन्स में , मिनर्वा देवी के सम्मानार्थ पेनाथिनी ( Parathene ) नामक उत्सव हुआ करता था,

( 8 )
उस समय सब लोग भाले और ढाले लेकर मेला में आते थे।
इसी उत्सव में उपर्युक्त पड्यत्र पूर्ण करने का विचार किया
था। उसमें हिपार्कस मारा गया, लेकिन हिपियस बच गया
और उसने मुख्य मुख्य पड्यत्रकारियों को पकड कर जान से
मरवा डाला। इसके बाद उसने चार वर्ष और शासन किया,
अन्त में वह लोगों को नापसन्द आया, और लोगों ने उसे
पदच्युत करके कुटुम्पमहिन देश से निकाल दिया।
इसके बाद क्लाइस्थेनिस ( Cleasthunes ) राज्यकार्य
करने लगा। उसने अनेक सुधार किये, विशेष कर बड़े लोगों
का प्रभाव तोडकर मध्यम और निम्न श्रेणी के लोगों को ऊपर
उठाने का उसने प्रयत्न किया। प्राचीन काल से लोगों में चार
श्रेणिया चली थाती थी, उनको तोडकर उसने उनकी जगह
दस नवीन श्रेणिया बनाई । इन दस में से फिर प्रत्येक के दस
दस अन्तर्विभाग बनाये, और उनको 'डेमीस' नाम दिया। डेमी
में नगर अथवा गाव का समावेश होता था । प्रत्येक डेमी पर
उसने डेमा ( Demach ) नामक एक अधिकारी नियत
किया।सम्पूर्ण डेमी की सभा करके सार्वजनिक प्रश्नों का फैसला
करना, अपनी अपनी हद में बन्दोबस्त रखना, और यह जानने
के लिए कि, सब ने अपनी जमीन का लगान समय पर अदा
किया या नहीं, सातदारों का हिसाब रखना, इत्यादि काम
देमार्फ के थे।
एथेंस में सर प्रकार के करों का ठेका एकही व्यक्ति को
देन की चाल थी। एक अथवा अनेक व्यक्तियों की एक मडली'
को ठेकेदार बनाकर, तथा उससे एक निश्चित रकम लेकर,
कर वसूल करने का सारा ठेका उसको दे दिया जाता था।

- मार्गों का कर, माल की चुगी, इत्यादि सब आमदनी के चिमाग ठेके पर दे दिये जाते थे। भूमिकर का अवश्य ही- कोई ठेका न था। उपर्युक्त विभागों को छोडकर, और संघ प्रकार के आने और जाने वाले माल पर दो प्रति सैकडा चुङ्गी थी और गुलामों पर एक फी सदी कर था। दूसरे स्थानों में जो लोग एथेंस में श्राकर रहते थे, उनको भी इसके लिए कर देना पड़ता था। इसी भाति सार्वजनिक बाज़ार में माल वेचन के लिए भी कर लगाया गया था। नगर निवासी की हैसियत से ग्रीक लोगों को जो हक हासिल थे उनमें भी क्लाइस्थेनिस ने बहुन परिवर्तन किया सब स्वतत्र लोग, अनेक परदेशी, और ऊचे दर्ज के गुलाम इत्यादि सब लोगों को उसने नगरनिवासियों के अधिकार दिये । राज्यकार्य सेनेट सभा करती थी, उसमें, प्रत्येक जानि के पचास के हिसाब से, नवीन वनाई हुई दस जातियों के कुल पांच सौ सभासद रहने का प्रबन्ध किया था। वर्ष भर के कार्य का इस प्रकार नियम कर दिया था कि, उक्त पाँच स सभासदों में से, प्रत्येक पचास सभासद छत्तीस दिन काम करें और इसके बाद दूसरे पचास सभासद काम करें। ग्रीक लोगों का वर्ष चान्द्रमान को, अर्थात् ३५४ दिन का था। उसी के अनुसार वर्ष के दस भाग करके ये दिन निश्चित किये गये थे इन पचास सभासदों को प्रायटेंस कहते थे। कोश का प्रबन्ध और.परराष्ट्रीय वकीलों से बातचीत करके सन्धि इत्यादि नि श्चित करना, इन प्रायटस लोगों का मुख्य काम था। परन्तु युद्ध के प्रारम्भ अथवा बन्द करने के समान महत्वपूर्ण कार्य प्रायटेस लोग राष्ट्रीय सभा के पास भेज देते थे। राष्ट्रीय सभा के गरोष । समासदों को वेतन देने का नियम सोलन ने ही जारी किया था। 'जुल्मो और दुष्ट लोगों को देशनिकाला देने का एक विचित्र नियम इसी समय प्रचलित हुा । जहां किसी व्यक्ति' के बारे में यह सन्देह हुआ कि, यह स्वराष्ट्रद्रोही है, त्यों ही, उसकी जांच इत्यादि कुछ भी न करते हुए, अथवा उसके अपराध की सूचना भी न देते हुए, उसको देशनिकाले की सजा दे सकते थे। इसके लिए राष्ट्रीय सभा का प्रांगण कंठ- हरी लगा कर बन्द करते थे । इस कठहरे में दस जाति के लोगों को भीतर आने के लिए दस दरवाजे रस्त्रते थे । उन दरवाजो से जय सव जातियों के लोग भीतर या जाते तय, जिसको देश निकाला करना होता, उसका नाम एक एक सीप पर लिख कर प्रत्येक मनुष्य उस सीप को एक बडे बर्तन में डालता ओर सन्ध्या समय जब सर लोगों की सोपे जमा हो जाती तब उनको गिनत, और उनकी सख्या यदि हजार होजाती तो उस मनुष्य को दस वर्ष तक को, देशनिकाले की सजा दी जाती थी । कहते हैं कि, यह नियम फ्लाइस्थेनिस ने ही पहले पहल जारी किया । इस सजा का अमल भो पहले पहल फ्लाइथेनिस पर ही हुआ। क्लाइस्थेनिस के शास में ही एथेंस ओर स्पार्स का युद्ध छिडा । स्पार्टी के राजा फ्लियामेनिस ने यडी मारी सेना लेकर एथेम पर चढ़ाई की, श्रोर पहा का किला जीत- लिया। इस पर पथंस के लोग खूब जोर शोर से लडे, और तीन ही दिन में अपना किला शत्रुओं से फिर छीन लिया। •इस लिए लियोमिनिसि को वहा से लौट जाना पड़ा। इसके (३-६४ ) सनप रहता था। उसी को अगुश्रा बनाकर, एशिया के स ग्रोक लोगों ने, डरायस का शासन नष्ट कर देने के लिए गा चत शुरू की। भरिस्टागोरास स्पार्टी के राजा लियोमिनिस के पास सहायता मागने के लिए गया । डरायस के राज्यविस्तार के विषय में क्लियोमिनिस को विश्वास दिलाने के लिए भरिस्टा गोरास अपने साथ पृथ्वी का एक नकशा तैयार करके ले गया था। यह नकशा कांस धातु के पट पर भही तौर से खिंचा हुआ था और उस पर नदियों के प्रवाह तथा समुद्र का श्राकार उस समय की जानकारी के अनुसार दिखलाया हुआ था। इस नकशे का उद्देश्य केवल इतना ही था कि, डरायस के राज्य का विस्तार और उसकी शक्ति क्लियोमिनिस को भली भाति मालूम हो जावे। यूरप में बना हुआ सब से पहला नकशा यही था | अरिस्टागोरोस को क्लियोमिनिस की सहायता नहीं मिली। उसने क्लियोमिनिस को इस सहायता के लिए ढाई लाख रुपये देने कहे, तथापि कुछ लाभ नही हुया । बल्कि, इसके विरुद्ध उसे राजा ने स्पार्टी से बाहर निकलवा दिया। कहते हैं कि अरिस्टागोरास ने ज्योंही क्लियोमिनिस को द्रव्य का लोभ दिख- -लाया, त्योंही उसकी दृढ़ता डगमगाने लगी, इतने में गोगों नामक क्लियोमिनिस को श्राठ वर्ष की लड़की अपने बाप से बोली, "पिता जी, जाइये, यहा से चले जाइये, नहीं तो आपको पाप लगेगा।" ये शब्द सुनते ही क्लियोमिनिस वहां से उठ कर चला गया। अरिस्टागोराल ने एथेंस को भी अपना वकील भेजा था। . ।

.
-
इरानी राजा का यह हुक्म,
कि हिपियस कोएथेंस का शासन.
कार्य सौंप देना चाहिए, जिस समय एथेंस में आया, उसी
'समय यह धफोल भी वहां आ पहुँचा। तब एथेंस के लोगों ने
प्रायोनिया के प्रीक लोगों को सहायता देने का एकदम निश्चय
किया, और घहुत जल्द योस जगी जहाज तैयार कराये ।
'यूबिया टापू की इरिट्रिया नामक रियासत से पाच जहाज
'श्राये, इस सम्पूर्ण जलसेना ने मिलकर ईरानी राज्य पर
हमला किया , और सार्डिस शहर को जला डाला। आगे
। चलकर एक युद्ध हुआ, उसमें ईरानी लोगों को जीत हुई, और
एथीनियन लोग युद्ध छोडकर स्वदेश लौट आये ।
श्रायोनियन लोगों के साथ डरायस छे वर्ष तक लडता
रहा, अन्त में उसने ग्रीक लोगों का मुख्य शहर मायलिटस ले
लिया , और जो ग्रीक लोग जीवित उसके हाथ आये
। उनको उसने टैग्रीस नदी के मुख के पास नवीन बस्ती
घसाने के लिए भेज दिया। इसके बाद एशिया के सय
ग्रीक शहर, एक के बाद एक, ईरान के हाथ में श्रा गये । इससे
एशिया के ग्रीक लोगों को जीतने का डरायस का संकल्प पूर्ण
-
हो गया।
१
परन्तु डरायस इतना ही करके चुप नहीं हुआ। सार्डिस
शहर के जलाने पर एथिनियन और इरिट्रिन लोगों से बदला
चुकाने के लिपाउसने एथेंस पर चढाई करने की तैयारी की।
इसके बाद डरायस ने सय ग्रीक लोगों को यह सन्देशा भेजा
कि, "इस बात को जतलाने के लिए, कि तुम कोहमारी अधी.
नता स्वीकार है, तुम इस जासूस के द्वारा मिट्टी और पानी
भेज दो "थील्स और ईजीना ने यह अपमान सहन करके

('७० )
पानी में डाल कर उसको ऐसा बना दिया था कि, बिलङ्का
हिल न सके । इसके बाद उन नौकाओं पर तख्ते विकार
मिट्टी डाल दी, और दोनों ओर फठडा लगा दिया। इस
यह पुल एक उत्तम मार्ग के समान बन गया । यह काम
के लिए क्ससिस वेगारी पकड लाया था ,
और उनसे
तेने के लिए अपने विश्वासू जमादार नियत किये थे।
पुल के द्वारा सात दिन और रात क्सक्सिस फी सेना
होती रही । स्थलसेना जब कि थूस प्रान्त से पार होने
तब उस प्रान्त के प्रत्येक शहर को एक एक दिन की सामग्री
इस सेना को देनी पडी । इस अत्याचार से कुछ शहर तो
सदैव के लिए नाश हो गये , क्योंकि इतनी बड़ी सेना का
एक दिन का खर्च कुछ थोडा न था ।
इस भयकर अरिष्ट से सामना करने के लिए एथेंस
और स्पार्टी की रियासते एक होगई । अन्य कुछ रियासत
उनमें पहले ही से मिली हुई थी, परन्तु भावी परिणाम पर
दृष्टि देकर उन्होंने प्रारम्भ में ही उस गुट से अपना अङ्ग
स्त्रींच लिया । इस प्रकार का देशद्रोह करने में सब से पहली'
रियासत थेसली थी। थेसली के लोग न सिर्फ क्ससिस के
शरण में ही गये, किन्तु उसकी सेना में शामिल होकर
एथेंस से लडने को भी आये । थेसली और ग्रीस देश के अन्य
प्रान्तों के यीच में यडे पडे ऊचे पर्वत हैं । उनको पार करके
प्रीस देश में फौज उतारने के लिए एक ही तद्ग मार्ग है। उसे
थापिली कहते हैं। इसके एक ओर ईटा का पर्वत और
-दूसरी ओर समुद्र है। यहाँ पर ईरानी सेना के प्रतिबन्ध का
मतलब यही था कि रसको इस मार्ग के आगे रदने ने दिया

--
पर
।
जाय । ईरानी सेना के प्रतिवन्ध करने का कार्यस्पा के राजा
लियोनिडास ने स्वीकार किया और वह अपनी सेना के साथ
- इस तद मार्ग को घेर कर अड रहा। ईरानी लोगों ने इस
मार्ग से प्रवेश करने के लिए अनेक प्रयल दिये, वे
सफल
नहीं हुए । अन्त में एफिएल्टिस नाम का एक ग्रीक मनुष्य, जो
कि ट्राकिनिया प्रान्त का निवासी था, बागी होकर शत्रु से
मिला। उसने पर्वतों से भीतर आने का एक मार्ग क्सीस
को दिग्बलाया । उस मार्ग से थोड़ी सी ईरानी सेना लियो-
निडास के पिछली भोर भागई।
लियोनिडास यदि भग गया होता तो वह बच गया
होता । परन्तु स्पार्टा का यह नियम था कि, स्पार्टन लोगों
को रणभूमि से भगना नहीं चाहिए, इसलिए उस विकट
मौके में फंस पर भी, उसने ऐसीही दृढता दिनलाई कि जो
किसी शूर पुरुष के लिए पूर्ण रीति से शोभा देने योग्य थी।
उसने अपने पास तीन सौ स्पार्टन सात सौ थेस्पियन और
चार सौ थीवन लोगों को रस लिया, और बाकी सब लोगों
को छुट्टी देदी । यह छोटी सी सेना उसने सीम की
मारी सेना से सामना करने के लिए तैयार की । इनमें में
चार सौ थीवन स्लोग पहले ही युद्धक्षेत्र से भग. गये । शेष
योद्धा इस रढता के साथ लडे कि उनमें से एक भी मनुष्य
जीवित नहीं चचा।
इस प्रकार यह तग मार्ग अधिकार में आते ही ईरानी
सेना फोसिस प्रान्त से लूटमार करते और नगर जिलाते हुए
मागे पढ़ी। वियोशियो के लोगों ने प्रेमपूर्वक उसकाासत्कार
किया । एक ईरानी पल्टन डेल्फाय पर चद धार्ग परन्तु पहा

( ७४)
सेनापति मिल्टियाडिस पर राजद्रोहका अपराध लगाया गया,
जिसमें उसे ढाई लाख रुपये जुर्माना हुा । यह जुर्माना उसदे ।
नहीं दिया अतएव वह जेल में डाल दिया गया। वहीं उसका
मृत्यु हो गई। लेकिन एथेंस में एक यह भी कानून था कि पिता
का दण्ड लड़के को भोगना चाहिए । इसके अनुसार, मिल्टि
याडिस के लडके मायमन (Cumon) ने भी जब जुर्माना नहीं
दिया, तब यही फैद में डाल दिया गया। कुछ दिन बाद
फल्यास नामक, एम के एक साहकार ने, सायमन का
जुर्माना देकर उसे कैद से छुडाया। इसके लिए सायमन के
अपनी बहन का विवाह कल्यास से कर देने का वचन दिया।
कुछ समय बाद सायमन को अपने पुरस्त्रों को जायदाद मिल
गई, और युद्ध को बहुत सी लूट भो उसे प्राप्त हुई, इससे वह
यडा सम्पत्तिशाली बन गया ।
!
-
--
आठवा अध्याय ।
।
।
ग
.
सायमन और पेरिलीज़ ।
'यद्यप्तिः क्सक्सम का पराभव हुआ, तथापि युद्ध बन्द
नहीं आ । पूर्व प्रोर के ग्रीक प्रदेशों में दोनों पक्षों में लडाई
हो ही रही थी । थेमिस्टाल्लीस को देशद्रोह के कारण देश
निकाले की सजा मिल चुकी थी, और सायमन उसकी जगह
सेनापति नियत हुआ था । उसने जल और स्थल पर ईरानी

( ७५ ): , - जना स लडकर बहुत यार विजय प्राप्त किया। सन् ईसवी ४६६ वर्ष पहले एशियामाइनर के किनारे पर युरिमिडान में उसने ईगनी फौज को मार भगाया, ईरानी जलसेना को नष्ट कर दिया , और लूट का यदुत सा माल प्राप्त किया। इससे सायमन को कीर्ति खूब बढ़ी और उसे यह इच्छा उत्पन्न हुई कि एथेंत का राज्यकार्य हमारे हो द्वारा होना चाहिए । परन्तु पेरिलीज नामक उसका एक प्रतिस्पधी था। यह प्रजापक्ष का मुखिया था, और सायमन सरदार लोगों का मुखिया था। सायमन बडा धनवान् था। उसने अनेक प्रकार स दानधर्म करके लोगों का प्रेम सम्पादन किया । उसने अपने बाग और फलों के खेत सब लोगों के लिए खोल दिये । उसकी पक्ति में सब जातिभाइयों को भोजन मिलता था। जब वह वाहर निकलता था तब उसके नौकर गरीबों को' पैसे और कपडे वाटते हुए उसके आगे चलते थे। उसने बाग तैयार किये, धर्मशालाए यनवाई , और अन्य बहुत से सार्व. जनिक कार्य किये, जिनसे लोगों को बहुत लाभ हुश्रा । थोसि- यम के बडे मन्दिर का कुछ गिरा हुआ माग अब भी दिखाई दता है । यह मन्दिर सायमन ने बनवाया। पथेंस शहर और उसके दो यन्दरों के बीच में उसन दो बडी बडी दीवाले वन- पाई , और दोनों को जोड़ने वाला सुन्दर सुरक्षित नवीन मार्ग यनवाया। यद्यपि उसने इतने काम किये, तथापि उसका उद्देश्य सिस नहीं हुआ। येमिस्टालोस के समान उसे भी दण्ड भोगनी पड़ा। उसे जर देश त्याग करना पडो, तव स्वाभाविक ही एथेंस का सब राज्यकार्य पेरिकोज के हाथ में आ गया। , , -

.
ईरानी फौज का पराभव करने में एथेंस और स्पार्टा की
दो रियासते मुख्य थी। इसके बाद दोनों ही को ग्रीस देश में
मुखिया बनने का अवसर प्राप्त हुआ था। उसमें स्पार्टी का
प्रभाव कुछ अधिक ही था । परन्तु वहा के लोगों में सम्राटपद
धारण करने के योग्य तेजस्विता न थी। वे जलसेना नही
चाहते थे, और जलसेना के बिना दूर दूर के प्रदेश कब्जे में
रखना अमम्भव था । इसके सिवाय, स्पार्टन लोग परिस्थिति
अनुकूल अपनी व्यवस्था भी बदल नहीं सकते थे। वे
नवीन सुपार भी नहीं चाहते थे । यदि कोई घुद्धिमान पुरुष
आगे बढ कर नवीन व्यवस्था करने लगता था, तो वह उन
लोगों को अप्रिय लगता था। स्पार्टा की मुख्य नीति यह थी
कि, जितना कुछ है उतने ही से अपनी रक्षा करनी चाहिए,
व्यर्थ के लिए बाहरी झगडा में न पडना चाहिए । स्पार्टा के
व्यवहार की रीति यह थी कि, कोई भी एक प्रणाली स्थायी
रूप से स्वीकार न करनी चाहिये , किन्तु जैसा मौका भा जावे
उसी के अनुसार एकदम निश्चय करके वैसा बर्ताव करना
चाहिए । अपनी रियासतों के अतिरिक्त अन्य प्रीक रियासतों
फी उसे कुछ भी परवा न थी।
लेफिन एथेंस की नीति और ही कुछ थी।ईरानी युद्ध में
प्राप्त किये हुए विजय का उपयोग करके एथेंस ने प्राय बहुत
सी ग्रीक रियासतों का एक गुट बनाया ,
और स्वयं नेतृत्व
स्वीकार करके एक प्रकार का नवीन साम्राज्य स्थापित किया।
अर्थात् पहले प्रत्येक प्रीक रियासत स्वतत्र और अलग थी,
शन के हमले की सम्भावना से सब रियासते मिल
फर एक यन गई , और उनका मुखियापन एथेंस को प्राप्त
.
५
परन्तु अब

( ७७ ) और वहीं + - हुओ। ईरानी लोगों का यद्यपि पराभव हो गया, तथापि जगह जगह अब भी उनकी छावनियां पड़ी हुई थी। अतएच आयोनिया इत्यादि दूर दूर की रियासतों को, अपना बचाव करने के लिए, एका करने की श्रावश्यकता मालुम हुई। ईरान के जुल्म से ग्रोक रियासतों का बचाव करना और ईरानी राज्य में अधिकार जमा कर अपनी सम्पत्ति बढाना इस एका का मुरय उद्देश्य या । डेलास नामक एक टापू था, वहा म गुट की रियासतों ने अपना मुरय रमजाना ग्खा, व्यवस्थापक सभा भी होने लगी। इससे इसागुटको "डेलास' फा गुट" कहने लगे। इस गुट में समुद्र किनारे की सब ग्रीक रियामत शामिल होगई । सव ने शक्ति के अनुसार सहायता देकर एक यडी जलसेना तेयार की । कितनी ही रियासतें बिलकुल छोटी और गरीन थी। उनका पूरा पूरा जहाज देने का सुभीता नहीं था, अतएं निश्चय हुश्रा कि, घे थोडा बहुत नक्द रुपया देवें । इस प्रकार इन रियासतों को पहले दो श्रेणिया ई -- एक पूरी जहाज देनेवालों की ओर मरी नकद रुपया देन- पोला की । दूसरी श्रेणी पडो थी। ऐरिस्ट्रायडिस नामक, एथेस का एक चतुर राजनीतिज्ञ था। उसी ने उक्त गुट पनाया था। भिन्न भिन्न रियासतों की हेमियन देख कर, यह भी उसी ने निश्चित कर दिया था कि, किसको कितनी मदद करनी चाहिए। अतएव ऐरिस्ट्रायडिस को इस गुट का सस्थापक कहते है । पेरिस्टायडिस के साथ धेमिस्टाझिम भी यही काम करना था। इन्हीं दोनों ने देलास के एथेम को प्रमुखपर दिलाया । द्रव्य,और जलसेना की सारी । ( ७८ ) । . यवस्था एथस के ही हाथ में थी। अतएव, बहुत जल्द सत्र रियासतों की स्वाधीनता छीन कर, एथेंस ने उन पर अपना स्वामित्व जमाया । यह स्वामित्व स्थापित करनेवाला पुरुष' सायमन है। उपर्युक्त गुट की स्थापित का हुई बडा भारी जलमेना लेकर उसने पहले ईरानी राज्य के कुछ प्रदेशों पर अधिकार किया, और वाद को उसी जलसेना के जोर पर उन ग्रीक रियासतो को जीता, कि जो उक्त गुट में शामिल होने से इन्कार करनी थी। इससे गुट की रियासतों की सख्या दो सो के कपर होगई । इतनी शक्ति प्राप्त होते ही डेलास का खजाना एथेंस में लाया गया। बस, यहीं से एथेंस की प्रीक साम्राज्य सत्ता का प्रारम्भ गिना जाता है ( ईसवी सन् के ४५४ वर्ष पहले।) इस प्रकार पजियन समुद्र के अधि- कांश टापुओं और थूस तथा मासिडोनिया के प्रीक शहरों पर एथेंस की सत्ता फैल गई। एथेंस की यह श्रेष्ठता लगभग पचास वर्ष टिकी । इमके अधिक दिन न टिक सकने का कारण यही था कि, दर असल में प्रीक लोगों का स्वभाव ही एक दूसरे के अधिकार में रहने का न था-सभी पूर्ण स्वतंत्रता चाहते थे। परकाय शत्रु के आने पर यद्यपि सब नगरों ने एका स्वीकार कर लिया, तथापि शत्रु के जाते ही सब फिर स्वतत्र होने को तैयार होगये। एथेस का प्रभाव उनसे सहन नहीं हो सका। यहां पर यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि, स्पार्टा तथा उसके हाथ की अन्य रियासतें तो डेलास के गुट में कभी शामिल ही नहीं हुई। एथेंस की यह बढती हुई सत्ता स्पार्टा से सहन नहीं हो सकी। अतएन दोनों में युद्ध-ठन गया, परन्तु सन्धि हो जाने .

( ७६),
के कारण पाँच वर्ष तक वह रुका रहा । इसी समय मायमन
की मृत्यु हुई, जो कि सजा रद हो जाने के कारण छूटकर
मागया था। इधर सन्धि के पाच वर्ष पूर्ण होने के पहले ही
पयंस और स्पार्टी में फिर समुद्र पर युद्ध छिड गया। इसका
कारण यह हुआ कि, डेल्फाय का मन्दिर ओर उसके देवता
की सब सम्पत्ति मम्हालने का कार्य देल्फाय के लोगों के
हाथ में था। देवपूजा का कार्य भी वहां के कितने ही बडे
पडे कुटुम्यों के हाथ में यशपरम्परा से चला आता था।
रेल्फाय शदर फोसिस रियासत के अधीन था, अतएव
फोसिस के अधिकारी डेरफाय के मन्दिर के उपर्युक्त अधि
कारों के लिए सडन लगे । इस लड़ाई में पर्थेस ने-फोसिस
को सहायता दी । इधर स्पार्टा ने डेरफाय का पक्ष सिया, और
सारा मन्दिर लेकर यहा के लोगों के अधिकार में दे दिया।
स्पार्टीपी इस महायता के लिए डेरफाय के लोगों ने स्पार्दा
को एक यह अधिकार दिया कि, जिस समय बहुत सी रिया.
सतो के वकील भविश्यद्वाणी पूछने के लिए आयें उस समय
स्पार्टी का प्रश्न सब से पहले रखा जाय । डेल्फाय के लोगों ने
इस अधिकार का वृत्तान्त पत्थर के, एक सभे पर खोद
दिया। याद को जब स्पार्टी की सेना लौट गई, तर पेरिलीज
ने एथेंस की सेना ले कर देल्फाय पर चढ़ाई कर दी, और
रेल्फाय के मन्दिर पर अधिकार, करके, वहा के सय अधि.
झार फोसिस क लोगों को दे दिये। उसने पहले प्रश्न करने का
अधिकार एथेंस को दिया, और इस विषय में जिस स्खभे पर
स्पारी का अधिकार खुदा हुआ था, उसी पम्भे पर एथेंस
का अधिकार अकित कर दिया। यह एक बडा कारण एथेंस

(८०) . . . और स्पार्टा की शत्रुना फा था। इसके अतिरिक्त और भी अनेक छोटे मोटे कारण थे। अतएव दोनों में युद्ध ठन' कर वह तीन वर्ष तक जारी रहा । उसमें स्पार्टा की अन्त में जीत हुई, और अनेक शत स्वीकार करके एथेंस को सुलह करनी पडो । सन् ईसवी क ४४५ वें वर्ष पूर्व, तीस वर्ष के लिए, दोनों में मैत्री की सन्धि होगई । सन् ईसवी के पहले ४६० से ४३० तक के तीस वर्षपेरिक्लीस के शासनकाल में प्रसिद्ध है । प्रीस के इतिहास में पेरिलीज का धडा गौरव है। उस समय के सय राजनीतिज्ञो में पेरि- लोज अग्रगण्य है, और वह अपने राज्यशासन के कौशल, अपनी विद्वत्ता और प्रजाहितदक्षता के लिए बहुत प्रसिद्ध है। उसने राज्य विषयक सारे सुधार लोगों के ही धन से किये, और गरीबों के लिए भोजन तथा सर्वसाधारण के लिए मनोरजन के साधनों का भी प्रबन्ध उसी सार्वजनिक धन से ही कर दिया, जिससे सब लोग खुश रहें। उसने मार्वजनिक त्योहारों की संख्या बढाई नाटकघर प्रति दिन एबुले रसे , और जो स्त्रय पैसे देकर नाटका नहीं देख सकते ये उनको सरकारी खजाने से पैसे देने का प्रवन्ध कर दिया। इसी भाति उसने उन लोगों को, जो कि कचहरी में जूरैरे नियत किये जाते थे, काम के दिनों का वेतन देने का निश्चय किया । इनासर्व वातों के कारण वह चंडी लोकप्रिय हो गया। पेरिक्लीज में एक यह भी कानून यनाया कि अधीनस्थ 'रिया मनों के म मुकदमे अन्त में फैसले के लिए एथेंस में प्राथा फरें। इससे भी एथेंस का कार्य और महत्वं बहुत घढ गया। गुट की रियासतों से एथेंस को जो कर मिला करता था . , . - + उसे पेरिलीज ने और भी बढाया। पहले वह ४६० टेलेंट, अर्थात् २३ लाख रुपये था , परन्तु अब ६०० टेलेंट, अर्थात् । ३. लाग रुपये हो गया। इस भाति जो अधिक धन आया उस सर्च करके उसने पयंस में बडे बडे सुन्दर भवन बन 11 चाये , और अन्य कलाकौशल के काम तैयार कराये । साय मन ने जो लम्बासा कोट पनवाना शुरू किया था उसे पेरिलीज ने पूरा किया , ईरानी लोगों के गिराये हुए मन्दिर दुरुस्त करवाये , और नवीन बडे बडे मन्दिर बनवाये, जिनमें से . पार्थिवान नामक एथिनी देवी का मन्दिर विशेष प्रसिद्ध है। यह मन्दिर किले के भीतर मध्य भाग में था , और बहुत दर्शनोय बना हुआ था। उसपर फिडियास नाम का एक पुरुष मुख्य कारीगर नियत किया गया था, इसकी बनाई दुई कई । मूर्निया पर भी ब्रिटिश म्यूजियम में मौजूद हैं, जहा कि उन्हें "परिजन आरसपान कहते है । एथिनी देवी की मूर्ति लग- भग ४० फीट ऊची, हाथीदात और सोने की बनाई गई थी- न अर्थात् पहले सब मूर्ति लकडी की बना कर, और तब फिर उस पर हाथीदात की जडाई की गई थी, और वस्त्र के भाग उसमें सोने के बनाये गये थे। इसके अतिरिक्त प्रोपिली ( Propyle ) और नोडियम (odeun) नामक दो ओर भी उत्तम कलाकौशल के कार्य । पेरिकीज के हैं। किले में जाने का जो मार्ग था, उसके दोनों ओर दीराल पर खुदावदार नक्शकारी और चित्रों का काम किया हुआ था , और भीतर जाने के मुख्य मार्ग में धातु के "पाच पडे बडे दरवाजे भोर छै कीमती पत्थर के बड़े बड़े सम्भे थे। इसी मार्ग का नाम था "मोपली" | ओडियम एक सुन्दर F 1

( २ )
और भव्य नाटकघर का नाम था, जिसमें लोगों के मनोरञ्जन
के लिए सगीत के जलसे हुआ करते थे। इन सब इमारतो
के कारण शहर के बढई, लुहार, सोनार मजदूर, प्रस्तरकार
अर्थात् मूर्तिया सोदने वाले, चित्रकार इत्यादि अनेक प्रकार
के कारीगरों को ग्यून काम मिलता रहता था।
मिक्स नामक मैदान के एक भव्यभवन में लोकनियुक्तसभा
मा कार्य हुआ करता था। यह स्थान शहर के आगोरा नामक
मुख्य घोक के पास था। रोम का मुख्य चौक जेसे फारम
प्रसिद्ध है, वैसे ही एथेंस का श्रागारा समझिये । उपयुक्त
सभागृह का बनावट वृत्ताकार थी, एक बार उसी में अदा
ततें लगा करनी थी। सभा के मुख्य दीवानखाने में पाच सो
नक सभासद् बैठ सकते थ । निक्स के पीछे एक साम्बी सी
प्राकृतिक पहाडी चली गई थी, जिसके कारण उसके एक
ओर का बन्दोवस्त श्राप ही आप हो गया था। भवन के
मध्यभाग में पत्थर में खुदा हुश्रा एक ऊ चा सा व्यास पोठ
बना हुआ था , उस पर चढने क लिए सिड्डिया भी पत्थर
ही खुदी हुई थी। ममा में भापण करने वालो के लिए यह
नियम था कि वे उन सिट्टियों से । चढ कर, व्यासपीठ पर
जा , ओर-सभा में भाषण करें। इससे सार्वजनिक प्रश्नों
की चर्चा सब लोगों को मालूम होती रहती थी, और सब
लोग अपने अपने हाथ उठा कर सम्मतिया दिया करते थे।
'एथेंस और स्पार्टी की जिस सन्धि का ऊपर उल्लेख हो.
चुका है, उसकोाहुए-अभी लगभग चौदह वर्ष हुए थे, कि
इतने ही में उन दोनों में फिर झगड़ोशुरू हो गये, और युद्ध
की नौबत आई!", Pirn r.R.
.
1

( ३ )
नववां अध्याय।
पेरोक्लीज़के समयमे ग्रीक लोगों के रीतिरवाज ।
(सन् ईसवी के ४८० से ४३१ वर्ष पहले तक ।)
प्रीफ लोगों की, घर बनाने की प्रणाली ईरानी युद्ध के
याद बहुत बदल गई । निजी मकान बडे और विस्तृत तथा
मार्वजनिक भवन सुन्दर और भारी बनने लगे । मन्दिरों के
आसपास ऊचे खम्भों के ओर कमानों के, नकाशीदार धेरे
बनने लगे। लोगों के बैठने के लिए, बैंचों के समान, पत्थर
के चबूतरे बनाने की चाल चली। चारों ओर रगीन चित्रों
से स्थान को सुशोभित करने लगे। विश्रान्ति के समय सब
प्रकार के लोग ऐसे स्थानों पर एकत्र होने लगे, और विद्वान्
लोग वहा था पाकर व्यारयान भी देने लगे।
प्रीक लोग अपने घर ईट, पत्थर और लकड़ी के बनाने
थे। नाचे सर लोग रहते थे, और ऊपर के हिस्से में नोकरी
तथा गुलामों के रहने के लिए स्थान बना दिया करते थे, जिस
का जीना घर के बाहर से रहा करता था। मकान क दो भाग
होते थे, एक जियो के लिए और दूसरा पुरुषों के लिए । बडे
बड़े घरों में बाहरी मार्ग से भीतर आने के लिए, एक गली
रहा करती थी, जिसके सिर पर ही एक द्वार होता था, उससे
गली के भीतर जाने पर पुरुषों का एक खुला चौक मिलता
था। इसी, चौक में देवपूजा और अग्निपूजा हुआ करती थी। इस
।

। - चीक के भासपास पुरुषों के रहन के कमरे होते थे, जिनमें भोज देने की दालान, वाचनगृह, चित्रगृह, उठ7 वैठने और सोने इत्यादि के मर रहा करते थे। चाक के भीतर धानक द्वार के सामने, श्रागे कर, एक दूसरा द्वार होता था, इससे भीतर जाने पर लियो का चोक मिलता था। इस क आसपास त्रिया के भोजन और काम करने के कमरे हुआ करते थे। इन में किवाडे नही होत थे, सिर्फ पडदे पडे रहत थे, और मालिक के सुभीत के अनुसार ये पडदे कीमती और कसीदेदार हुआ करते थे। यह साधारणतया धनवान लोगों के घरों की बनावट हुई । इनके सिवाय, सर्वसाधारण मोर गरीब लोगों के घर भी करीब करीर इसी ढग के बने होते थे।। हा, उनमें मरे थोडे शौर उनकी बनावट.सादी होती थी।। । ग्रीक लोगों के घर म चूरहे सादे होते थे, अथवा बिला 'यती ढंग के, चिमनादार, होते थे-यह निश्चयपूर्वक नहीं । कहा जा सकता ,हा, कमरे म गर्मी आन के लिए गारों से बधकती हुई अंगीठो वे अवश्य भीतर रक्ता करते थे । एथेंस के प्राय अधिकाश बडे बड लोगों के, इवा खाने के अगले देहातों में हुआ करते थे। उन-बेंगलों के आसपास याग होते.थे, जिनमें मूर्तियां और दूसरे मनोरजन के पदार्थ सजे रहा करते थे। गले के खास स्वासा कमरों की जमीन पत्थर के छोटे छोटे टुकडे जमा कर सुशो । भित करते थे, छते पहले पहल- सफेद रंग की रहती थी, परन्तु फिर आगे चल कर टीवालों और छतों पर रंगीन चिन' फारी कराने की भी चाल पडी। . - एथेसानगर में मुसाफिरों के लिए बहुत से स्थान बने हुए , F १ --

।
,
थे, जिनमें बाहर के व्यापारी तथा अन्य कामों के लिए आते-
पाले लोग, भाडे से रहा करते थे। कचहरी तथा सार्वजनिक
जलसों के समय एथेंस में बाहर के बहुत से लोग पाया करते
थे, इससे भाडे पर घर उठानेवाले लोगों को ग्यूब लाभ हुआ
करता था, अतएव भाडे के घर बनाने में बहुत से लोग अपना
धन लगाया करते थे
एथेंस में दूसरे स्थानों के लाग भी बहुत से थे । इनमें से
अधिकांश लोग प्राय अन्य ग्रीक रियासतों क थे। इन लोगों को
पथेस शहर में घर बनाने या जमीन लेने की मनाई थी । इन
बाहरी लोगों को एथेंस निवामियों के साथ यदि कोई व्यापार
इत्यादि करना होता, तोइनका किसीन किसोएथेंस निवासी की
जमानत देनी पड़ती थी, और इसके लिए जमानतदार इन से,
इनके व्यापार के लाभ पर, कुछ सैकहा कर लिया करता था।
सरकार भी ऐसे प्रत्येक याहरी कुटुम्ब से प्रति पवारह ड्रामा
कर लिया करती थी। इसके अतिरिक्त एथल के निवासियों के
समान उनको-एथेंस की स्थलसना अथवा जलसेना में नोकरी
भी करनी पडती थी , भौर सार्वजनिक त्योहारा के दिन कुछ
पॅधे हुए काम भी उनको करने पडते थे। उपर्युक्त कार्य यदि
न करते थे तो एथंम की ओर से उनकी रक्षा न होतो थो;
ओर उस दशा में वहा को सरकार उनको गुलाम के तोर पर
बेच डालने का भी अधिकार रखती थी।
प्रोक लोग बडे शौकोन हाते थे। जिन लोगों को मुभोता
होता था वे बडे ठाट-बाट से रहो करते थे। उनके भोजन के
स्थान में मुलायम गर्दा के कोच रस्त्रे-रहते थे , और उन पर
माराम करते हुए वे भोजन किया करते थे | रोमन लोगों का
-
।

१
( ८६
रोस का भोजन भी आगे चल कर इसी प्रकार होगा लगा।
पथेंस के लोगों को मित्रमरली एकत्र करने का बहा शौक
था, और धनवान लोगों के घर में सदैव बडो'धूमधाम के साथ
भोज हुआ करते थे। वर्ष गांठ के उपलक्ष में बहुत बड़ा भाज
दने की चाल थी। ऐसे अवसरों पर महमानों के बूट निकाल
कर उनके हाथ पैर धोने इत्यादि का कार्य गुलाम लोग किया
करते थे।
ग्रीक लोगों का भोजन रोमन लोगों के समान बटिया न
होता था । तथापि ग्रीस देश में पाकशास्त्र की बहुत कुछ
उन्नति हो चुकी थी, भोज के अवसर पर लोग सीखे हुए रसा
इये लाते थे । सिमिली टापू के रसोइये बहुत प्रसिद्ध थे।
भोजन में प्राय साधारण पदार्थो के अतिरिक्त मांस, मुर्गी के
अंडे और मिठाई भी रहती थी । भोजा समाप्त होने के बाद
हाथ मुंह धेाने के लिप सब के सामने पानी लाकर दिया
जाता था । ग्रीक लोग,आज कल के यूरोपियन लोगों की भाति,
काटे-छुगे से भोजन नहीं करते थे , किन्तु हाथ से ही करते
थे, और इस लिए हाथ धोये विना उनका काम नहीं
चलता था। हाथ मुंह धो लेने के बाद उनको अतर तथा
सुगन्धित फूलों के गुच्छक और हार इत्यादि अर्पण किये
जाते थे । इनना होने के बाद फिर मद्यपान की विधि
हुआ करती थी । शराब का एक बडा लोटा भरकर पहले
आगे लाते; और उसम से कुछ भाग देवता के नैवेद्य के
लिए पृथ्वी पर डालते थे, इसके बाद वह वर्नन प्रत्येक के
नामने ले जाते और अपनी अपनी खुशी के अनुसार लोग
उससे मध, पीने लिए, ले लेते थे। इस विधि के समाप्त होने
-
,

( ७ )
.
पर पैरों की ताल पर ईश्वरप्रार्थना हुआ करती थी।
रात के भोजन के बाद मद्यपान, गाना, नाच,सेल, इत्यादि
यथेच्छ हुआ करते थे । मद्य के साथ पाथ फल फलहरी
और मेवा भी रहती थी। मद्य में सदैव पानी और यर्फ
डाल लेते थे । मद्यपान करते हुए, कुछ बातचीत करके,
एक दूसरे के आगेग्य की आकांक्षा करने की भी चाल थी।
एथेंस में शगव बहुत मस्ती थी, अतएव जो लोग यडा भोज
देने की शक्ति न रखते थे वे अपने मित्रों को, कम से कम,
मद्यपात्रोत्सव में नो अवश्य ही बुलाते थे। ऐसे उत्सवों में
लोग बदुवा यडे बडे काचा पर पड कर मद्यपान करते थे,
ओर घर का मालिक उनके गले में पुष्पहार पहनाता था। इन
थरसगै पर मनोरजन के लिए गान और नाचनेवाली स्त्रियां
भाडे पर बुलाई जातो थीं । सम्पूर्ण मनोरजन का प्रबन्ध करने
वाला एक संगीनवेत्ता होता था। जितना वह कहता उतनाही
द्यपान सर को करना पड़ता था। यह हाल था कि, "पियो,
नहीं तो चले जाओ," श्रतएव इस मद्यपान क उत्सव में थोडा-
पहुन शोर गुल हुए रिना नहीं रहता था।
उत्सव में शामिल होनेवाले लोग अनक प्रकार की क्रीडा
करते थे। जैसे किसी अविवाहित महाशय को मद्य से भरा
हुआ एक प्याला देते, और सामने एक छोटा सा वर्तन खाली
रखते थे, और इसके बाद, दूर खडे होकर, प्याले की शराब
नीचे न गिरने देते हुए, उसी वर्तन में डालने के लिए उससे
करते थे। यह शरान डालते समय, अपनी प्रेमिका का नाम
लेने को उससे कहा जाता था। इसके बाद यदि यह संयशरार
बर्तन में ठीक गिरनी, और याहर बिलकुल न गिरती, तो यह

( 6 )
1
समझा जाना कि, उन दोनों का विवाह होजायगा, और यदि
शराब नीचे गिर पडती तो यह खयाल किया जाता कि, यम
श्रय यह जोड़ी नहीं मिलेगी पहेलियां और कृट प्रश्न भी पूछे
जाते थे। जिनका उत्तर ठीक ठीक मिलता था उनको मिठाई
मिलती थी, और जिनका उत्तर गलत निलकता था
उनको शराब और नमक का पानी पिलाया जाता था।
ऐसी ऐसी बातों से वहा सूर श्रानन्द, मचा रहता था।
शतरज के समान और भी कई मल वहा प्रचलित थे।
ग्रीस देश में नवयुवक लोग सदेव वन भोजन किया करते
थे। प्रत्येक नवयुवक अपना अपना भोजन साथ ले जाता,
अथवा प्रत्येक के चन्दा दे देने पर, एक उनमें से सब प्रबन्ध
कर लेता था। इस भाति अनेक लोग घाहर जाकर वन भोजन
किया करते थे।
एथेंस के बाजार में सब कुछ मिल जाया करता था । लोग
स्वय बाजार में जाकर सामान खरीद लाते थे । बाजार में
रोटी भी मोल मिल जाती थी । धनवान लोग गेहू की रोटी
लेते थे, और गरीब लोग अन्य किसी सस्ते अनाज की रोटी
ले लिया करते थे। रोटी बेचने का काम स्त्रियां किया करती
थीं। विक्री के समय उनमें खूब कोलाहल मचता था। मांसा
हार में सुअर का मास प्राय अधिक चलता था । इसके अति
रिक्त सादी अथवा नमकीन मछली भी ग्रीक लोग अधिक
उपयोग में लाते थे। सीताफल, लौकी, कोबी, तथा अन्य अनेक
प्रकार की शाक-माजी भी उस समय वहां प्रचलित थी।
बाजार की देख रेख रखनेवाले अधिकारी नियत थे, वे सब
-
-

-
प्रकार का बन्दोवस्त रखते थे, तथापि दुकानदार लोग खोटा
व्यवहार किये बिना मानते नहीं थे।
ग्रीक लोगों में प्रतिदिन तीन धारभोजन हुआ करता था।
सुबह के भोजन में, शराय में पकाई हुई पनेथी मिला करती
थी। इसके बाद, कचहरियो की छुट्टी होने पर, दोपहर को
कुछ स्वल्पाहार होता, और शाम को सूर्यास्त कवाद फिर खूब
ठाटबाट के साथ भोजन हुआ करता था । थाली, तम्तरी,
प्याले, इत्यादि वर्तन प्राय मिट्टी के रहते थे, तथापि धनवान
लोगों के घर में चादी सोने और कासे के वर्तन भी काम में
लाये जाते थे । कुम्हारों को बहुत घडी बस्ती थी, और उनके
लिए शहर का एक अच्छा माग अलग ही कर दिया गया था।
एथेंस के मिट्टी वर्तन सारे दश में बहुत प्रसिद्ध थे । वर्तनों
का रंग लाल, सफेट और पीला होता था, और कुछ ऊचे
दर्ज के वर्तनों पर काला रोगन भी चढा होता था।
चहर, उढौने, कम्यल और अन्य अनेक प्रकार के
कपडे पथेंस में सूब तैयार होते थे। शहर में कपडे का बाजार
ही अलग था। कोष्टी प्राय गुलाम हुआ करते थे। ग्रीस के जिन
शहरों में व्यापार अधिक होनाथा यहा केसव कलाकौशल तथा
कोष्टी लोगों के काम गुलामों से ही लिये जाते थे। उन गुलामों
के मालिक बहुत बडे बडे लोग रहते थे । प्रत्येक गुलाम को,
प्रतिदिन कोई न कोई काम करके, कुछ निश्चित रकम अपने
मालिक के लिए ला देनी होती थी। इसके अतिरिक्त गुलामों
के मालिक, अन्य लोगों के अथवा सरकार के काम करने के
लिए, अपने गुलामों को भाडे पर भी दे दिया करते थे।
जगह जगह गुलाम नीलाम भी हुआ करते थे। कारीगरी
-

(६०) तलधार तैयार - का काम जाननेवाले गुलामों का मूल्य खूब मिलता था । प्रसिद्ध वक्ता डेमास्थनीज के पिताके यहां करनेवाले कारीगरी वीस और घोडागाडी तैयार करनेवाले बढई बीस थे। यह एक बडी भारी जायदाद समझी जाती थी। सरकार भी छोटे छोटे लडके मोल लेकर, उनको शिक्षा देकर मुहर्रिर, चोपदार और अन्य छोटे छोटे नौकर तैयार करती थी। ये यद्यपि आगे चलकर गुलाम ही समझे जाते थे, तथापि इनका दर्जा और अधिकार बड़ा समझ जीता था। घर के सय नौकर गुलाम ही रहते थे । प्रत्येक कुटुम्ब में कुछ गुलाम मोल लिए हुए और कुछ घर ही के जन्मे हुए होते थे। प्रत्येक गुलाम के लिए मालिक को सरकार में कुछ कर देना पड़ता था। कभी कभी ये मालिक अपने गुलामों को गुलामी से मुक्त करके स्वतत्रता भी दे दिया करते थे। हा, इस प्रकार जो गुलाम स्वतन हो जाता था उम्मको सरकार में उतना कर अवश्य देना पडता थो, जितना कि उसका मालिक उसके लिए दिया करता था। ग्रीस देश के प्रत्येक कुटुम्ब में बच्चों को सम्हालने के लिये पढालिखा गुलाम रखा जाता था । उसे पेडागोगो, अर्थात् भैयाजू कहते थे । उसका मुख्य काम यही रहता था कि, वह बच्चों के आचरण की रेख देख रफग्वे, और उनको बुरी सगति में न पडने दे। वह सदैव लडकों के साथ बाहर जाया करता था, और लडके जव पाठशाला जाते, तब भी वह उना साथ जाया करता था। पाठशाला में हडको को व्याक- रण गाना और व्यायाम सिग्नलाया जाता था । पेरिलीज के समय में प्रीस देश में अनेक ग्रन्थकार हुए, . -

-
जिनमें से सोफोनीज और एञ्चिलस नामक दो नाटककार
महुत प्रसिद्ध है। महलियां बना कर नाटक करने का प्रणाली
उस समय अधिक प्रचलित नहीं थी, किन्तु जो कवि लोग
नाटक लिखते थे व स्वय ही रगभूमि में आकर अपन नाटक
कर दिखलात थे । बडे बडे प्रसिद्ध ग्रन्थकार रगमूमि में आते
रहते थे। ऐसे नाटकों का प्रारम्भ बेकस के उत्सव से हुश्रा ।
पहले पहल एक हो मनुष्य, कुछ गानवाल लोग साथ लकर,
आता, और पुरुपा के गान में कोई आस्यान गाकर सुनाता
था। पेरिक्लोज के समय से दो तीन पात्रों के मम्भाषणपूर्ण
आरेयान प्रचलित हुए। उनमें स्त्रियो का पार्ट पुरुप ही करत
थे । इन सेलों को "दु सान्त नाटक" कहन लगे। इसके बाद
धीर धीरे हास्यरसप्रधान स्नेह और तमाशे प्रारम्भ हुए । इन
तमाशा में तत्कालीन रीति रवाजों पर हास्यकारक आलोचना
। हुश्रा करती थी। इनकी उत्पत्ति येकस के उत्सव में, मद्यपान
क समारम्भ के कारण हुई । उस समारम्भ को कोमम
( Comis) अर्थात् तमाशा करनवाली अानन्दपूर्ण युवक
मडली कहते थे। इस मडली के लोग किसी न किमी का
भोग लेकर और बुरके पहन कर गॉप गॉव फिरा करते थे,
और गान तथा नृत्य करते हुए सब लोगों को प्रसन्न किया
करत थे। शोकयुक्त नाटक की गायक मडली का कोरस ओर
आनन्दयुक्त नाटक का गायकमडली को कोमल कहत हैं।
खिया प्राय नाटकों मेंन जाया करतीयों । उनका अधिकाश
समय घर में ही व्यतीत हुआ करता था। उनको शिक्षा देकर
विद्वान् बनाने की चाल न थी। तो भी कुछ लिया बडी
विदुपी और सभ्य होती थीं। उत्सवों के अवसर में विद्वान्
.
।

(80)
का काम जाननेवाले गुलामों का मूल्य खूब मिलता था।
प्रसिद्ध वक्ता डेमास्थनीज के पिता,के यहां तलवार तैयार
करनेवाले कारीगरी वीस और घोडागाडी तैयार करनेवाले
पढई घोस थे । यह एक बडी भारी जायदाद समझी जाती थी।
सरकार भी छोटे छोटे लडके मोल लेकर, उनको शिक्षा देकर
मुहरिर, चोपदार और अन्य छोटे छोटे नौकर तैयार करती
थी। ये यद्यपि आगे चलकर गुलाम ही समझे जाते थे, तथापि
इका दर्जा और अधिकार बड़ा समझा जाता था। घर के
सब नौकर गुलाम ही रहते थे। प्रत्येक कुटुम्र में कुछ गुलाम
मोल लिए हुए ओर कुछ घर ही के जन्मे हुए होने थे। प्रत्येक
गुलाम के लिए मालिक को सरकार में कुछ कर देना पड़ता
था। कभी कभी ये मालिक अपने गुलामों को गुलामी से मुक्त
करके स्वतत्रता भी दे दिया करते थे। हा, इस प्रकार जो
गुलाम स्वतन हो जाता था उसको सरकार में उतना कर
अवश्य देना पडना था, जितना कि उसका मालिक उसके
लिए दिया करता था।
ग्रीस देश के प्रत्येक कुटुम्ब में बच्चों को सम्हासने, के
लिये पढालिखा गुलाम रखा जाता था । उसे पेडागोगो,
अर्थात् भैयाजू कहते थे । उसका मुख्य काम यही रहता था
कि, वह बच्चों के आचरण की रेख देख रपये, और उनको
वुरी सगति में न पडने दे। वह सदैव लडको के साथ राहर
जाया करता था, ओर लडके जब पाठशाग जाते, तब भी वह
उनके साथ जाया करता था। पाठशाला में लडको को व्याक
रण गाना और व्यायाम सिखलाया जाता था ।
पेरिलीज के समय में ग्रीस देश में अनेक अन्धकार हुए,
.
,
-

(३ ) । 4 . - उसने कोई न कोई पहाना निकाल करतीस वर्ष की सन्धि भग, कर दी, और डेल्फाय का शकुन उठा कर देवी से यह मारवार सन प्राप्त कर लिया कि, युद्ध का अन्तिम परिणाम उसी के । अनुकूल होगा। इसके बाद उसने निम्नलिखित कारण दिखला कर एथेंस को युद्ध के लिए ललकारा। नियोशिया की रियासत में प्लेटिया नामक एक शहर था, at यह शहर पयेंस के अधिकार में था। लेटिया के अधिकाश = लोगों को एथेंस का शासन पमन्द था । परन्तु कुछ थोडे , लोग उसके विरुद्ध थे। उन्होंने एधस की सत्ता न मान कर थीम्स के अधिकार में जाने के लिए एक गुप्त पड्यन्त्र रचा। थीम की सरकार ने इस पड्यत्र को बड़े अानन्द से सहा यता दी । श्रीन्स के दो सेनापति कुछ फौज साथ लेकर एक रात को प्लरिया शहर में पाये । शहर के दरवाजे उनके लिए । खुले रखने की पहले ही से तजवीज हो गई थी। वे मुख्य बाजार में पाये । वहा पड्यत्र वाले भी उनसे आ मिले। इसके पाद उन सब ने मिलकर बडे जोर से स्वतत्रतोदेवी का जयघोष किया। चे ममझते थे कि, ऐसा करने से बहुत से लोग हम में श्री मिलेंगे । पर ऐसा नहीं हुआ । किन्तु नगरनिवासी लोग सशस्त्र होकर गाहर निकले, ओर पहले शहर के दरवाजे बन्द करके फिर उन्होंने थीवन लोगों पर हमला किया, और अनेक लोगों का वध करके, बाकी बचे हुए लोगों को केद कर लिया। यह बात स्पार्टा को अच्छी नहीं लगी । स्पार्टा और थीम्स की यडी मित्रता थी, नतपय थीलाका उक्त अपमान स्पार्टाने अपना ही अपमान समझा। इस पर एथेस की सरकार ने प्लेठिया के अधिकारियों को .

लोगों की परीक्षा होती थी, और ' उनको पारितोषिक दिया
जाता था, ऐसे अवसरों पर खिया भी कभी कभी प्रकट होती
थी, पेरिलीज की स्त्री श्रास्पेशिया स्वय घड़ी विदुषी थी।
उस समय के बड़े घडे तत्ववेत्ता और विद्वान उसके घर में
बने ही रहते थे। सब प्रकार के बुद्धिमान और सुशिक्षित
लोग श्रास्पेशिया से मिलने का प्रयत करते थे।
पेरिक्लीन ल का जमाना और एथेंस की उन्नति-ये दोनों
समकालीन हैं। पेरिलीज के समान पुरुष बहुत थोडे होते,
हैं । उम्मका अन्तिम समय दु ख में ही व्यतीत हुश्रा । उसके
दो लडके प्लेग से मरे, यौर उस पर घूस
खाने
लगाया गया, नथा इसमें उसे बहुत फष्ट दिया गया । सन्
ईसवी के ४२६ वर्ष पूर्व उसकी मृत्यु हुई । "मेरे कार्य से
फिमी एथेंसवासी को दुस का अवसर नहीं पाया"-ये
उसके अन्तिम शब्द थे। ऐसा दावा भला कितने सत्ताधारी
पुरुष कर सकते है ?
का अभियोग
।
दसवां अध्याय ।
--
पेलापोनेसियन युद्ध ।
( ईसवी सन् के ४३९-४२१ वर्ष पूर्व तक)
एथेंस की सत्ता और सम्पत्ति के कारण उसकी जो भारी
साति, उसके कारण स्पार्टा को अत्यन्त विषारमा,

(५ ) हा, कितने ही लोगों ने अपने बैंगले गिरा दिये, उनके घेरे तक मिट्टी में मिला दिये, और खेत भी विना - जुते हुए ही छोड दिये। उन्होंने अपने जानवर निकट के टापुत्रों में मेज दिये । इस प्रकार जय बाहर के सब लोग अपना माल 'असवाव लेकर शहर में आ गये तव वहा बडी भीड होगई, लोगों को रहने के लिए स्थान ही न मिला , इस लिए कुछ । लोग मन्दिरों में और कुछ कोट के बुर्जी में रहने लग । जहा जरा सी जगह खाली देख पडी, कि वहीं लोग, जैसा वन । पडा, घर बना कर अपना गुजर करने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि, अनक धनवान् लोग भिखारी । यन गये। सभी लोगों पर सफट आया। तथापि, हिम्मत । न हारते हुए, सब ने युद्ध क लिए कमर कसी। बहुत जरद एथेस ने एक बड़ी सी जलसेना युद्ध के लिए तैयार थी। पीनियन लोगों का विशेष निर्भर जलसेना पर ही था- । स्थलसेना का उनके लिए विशेष महत्व न था । आर्किडेमप, एटिका का उपजाऊ और सुन्दर प्रदेश जलाते, लूटते और विध्वस करते हुए, एथेंस से छै मील पर श्री पहुँचा। पथैम के लोगों को यह सम्मतिथी कि, किले से एकदम बाहर निकल कर आर्किंडेमस से युद्ध किया जाय , । परन्तु पेरिलीज की सम्मति इससे भिन्न थी, अतएव उसने सिर्फ सवारो की छोटी छोटी टुकडिया भेज कर उन स्पार्टन टुकड़ियों पर हल्ला करवाने का सिलसिला जारी किया कि मुख्य फौज को छोड कर दूर दूर पर लूटमार के लिए जाया करती थी। इस भाति वरावर छोटी छोटी लडाइया होती रही , परन्तु सन्मुख मडे होकर भारी युद्ध एक भी । -- . -- -

(६४)
.
--
,
यह सन्देशा मेजा कि, यौबन कैदियों के साथ अच्छा हो बार
पिया जाय, कि जिससे स्पार्टा के मन को कष्ट न हो। परन्तु
यह सन्देशा पहुँचने के पहले ही सेटियन लोगों ने थीवन
कैदियों का शिरच्छेद कर डाला ।.यस, इसी पर,सन् ईमयी
के ४३१ वर्ष पूर्व, स्पार्टी और एथेल में युद्ध छिड गया।
स्पार्टा और एथेंस, दोनों ग्रीस देश की मुख्य रियासत
थीं, अतएव अन्य सभी रियासतें इन्ही दोनों में से, किसान
किसी के अधीन रहती थीं। अतएव उनमें अधिकाश को
इस युद्ध में शामिल होना पड़ा। स्पार्टी का भीतरी उद्देश्य
यह था कि, एथेंस को दबाकर ग्रीस में हम अपना ही प्रभाव
स्थापित कर दें। परन्तु अपना यह भीतरी उद्देश्य प्रकट न
करते उम्मने
स्वतत्रता के नाम पर पुकार को । उसने प्रकट
किया कि, हम प्रीक लोगों की स्वतन्त्रता स्थिर रखग के लिए
लड रहे है । इस कारण अवश्य ही स्पोर्टी का पक्ष अधिकांश
लोगों को पसन्द आया । इधर आर्किडेमम नामक स्पार्टी का
एक राजा वडी भारी सेनाले कर पटिका प्रान्त में घुस पड़ा।
अब पेरिक्लोज ने समझा कि, स्पार्टन लोगो से सामना
करके यदि प्रत्यक्ष युद्ध किया जायगा तो एथेंस टिक नहीं
सकेगा , अतएव उसने यह आशा निकाली कि, दहात के
सब लोग अपन लडके बच्चे और सम्पत्ति इत्यादि लेकर
शहर में चले आयें! इधर अनेक लोगों के सुन्दर भवन और
कीमती बाग बगीचे देहात में थे, सो अब उनको छोड़कर
शहर में माना लोगों को बहुत कष्टदायीप्रतीत हुभा । तिस पर
मी, बहुत जल्द मव लोग शहर में आगये, योर थाहर के
अपने सुन्दर भवन उन क्रूर शत्रुओं के लिए खुले छोड दिये !

- (६७ ) । युद्ध का तीसरा वर्ष प्रारम्भ होते ही पेरिलीज मर गया। पेरिलीज बडा बुद्धिमान और चतुर था । अतएव उसकी मृत्यु से पयेन्स की पडी हानि हुई। उसके सटश राज्यप्रवध करन. वाला दूसरा पुरुष उस समय एथे-म कोई न था । इधर युद्ध सारे प्रीस देश में फैलता ही जाता था। दोनों दलों में खूब जोश चढा हुआ था, भोर दोनों ही ने एक दूमरे के साथ क्रूरता की हद कर दी था। जो जिसके हाथ में पड जाता उसी को वह तलवार से काट डालता या गुलाम बना कर बेच देना था। स्पार्टन सेना ने जर प्लेटिया प्रान्त पर अधिकार कर किया तब उसमान्त के निवासियों के साथ उसने उपयुक्त प्रकार का ही व्यवहार किया । इस सिवा, यह सारा प्रान्त उसने थीवन लोगों को सेती करन क लिए दे -- दिया । अस्तु । यह अच्छा अवसर समझ कर एथेन्स की अनेक रिया- सतो ने बलवा मचा दिया, परन्तु वही क्रूरता माथ उनको 'दण्ड दिया गया। किमी की किलेवन्दी गिरवा दी, किसी के जहाज जप्त कर लिये और किसी की राज्यपद्धति ही मिटादी। अनेक छोटी छोटी जातियों के ग्रीक लोग तो अमाल से ही पारिज कर दिये गये। एथेन्स में इस यार सात वर्ष तक प्लेग बना रहा । अत में दोना पक्ष लड़ते लडते त्रस्त हो गये। अपर विवश होकर पचास वर्ष के लिए उन्होंने सधि कर ली (सन् ईसवी के “४२१ वर्ष पूर्व ) सन्धि की मुख्य शर्त यह थी कि दोनों पक्ष एक दूमरे के जीते हुए प्रदेश वापस कर द : भऔर एक दूसरे के कैदियों को छोड । यह सन्धि निसियास की सन्धि -

-
नहीं हुआ। इसके बाद, जाडे का मौसिम श्री जाने के कारण
स्पार्टन सेना स्वदेश लौट गई।
यह ध्यान में रखने योग्य है कि, युद्ध में मृत्यु पाये हुए
वीरों की अत्यविधि एथेन्म में बडी 'धूमधाम के साथ होती
थी । एक बडे मडप के नीचे सब मृत देह एकत्र किये जाने
थे, और वहा मृतक के सम्बन्धी, नातेदार, और मित्रगण
इकट्ठे होते थे। फिर दस जातियों के लिए दस सदुक लाये
जाते और एक एक सदूक में एक एक जाति के मृत देह रक्ने
जाते थे। इसके बाद चे मय सदूक गाडी पर लाद दिये जाते
थे, और बडे मभारभ के साथ उनको स्मशान ले जाते थे।
मृतक के नातेदार सय के धागे चलते और उनके पीछे शहर
के प्रसिद्ध पुरुषों का समूह चलता था। स्मशान में अन्त्यविधि
करते समय एक वक्ता मृतक के गुणों का वर्णन करता था।
पेरिफ्लोज ने भी ऐसा भाषण किया था। मृतक के बच्चों का
पालन पापण, उनके बालिग होने तक, मरकार करती थी।
और बालिग होने पर उन्हें एक एक जिरह-यखर पारितोषक
देकर उनका सन्मानाया जाता था।
दूसरे वर्ष स्पार्टन सेना ने फिर पटिका प्रान्त पर चढाई
की। उसी धर्प एथेन्स में लेग बड़े जोर शोर से फैला ,
बाहर भी उसका बड़ा प्रकोप रहा। इस विपत्ति में पर कर
एयोनियन सरकार ने स्पार्टा से सन्धि के लिए बातचीत
शुरू की, परन्तु उसने सन्धि करनास्वोकार न किया। श्राकि
डेमस की सेना इधर पटिका प्रान्त मेंधूम मचारही थी,
एथेंस की जहाजी सेना पेलापोनेसस प्रान्त पर प्राममण करके
उसका बदला चुका रही थी।
और
उधर

(७)
युद्ध का तीसरा वर्ष आरम्भ होते ही पेरिकोज मर गया।
पेरिकीज बडा बुद्धिमान और चतुर था। अतएव उसकी मृत्यु
से एथेन्स की बड़ी हानि हुई। उसके सदृश राज्यप्रवध करन.
वाला दूसरा पुरुष उस समय एथेन्म में कोई न था । इधर
युद्ध सारे प्रीस दश में फैलता ही जाता था। दोनों दलों में
खूब जोश चढा हुआ था , भोर दोनों ही ने एक दूसरे के
साथ क्रूरता को हद कर दी था। जो जिसके हाथ में पड
जाता उसी को वह तलवार से काट डालता या गुलाम बना
कर बेच देता था । स्पार्दन सेना ने जब प्लेटिया प्रान्त पर
अधिकार कर किया तब उस प्रान्त के निवासियों के साथ उसने
उपयुक प्रकार का हो व्यवहार किया । इन मिवा, वह
सारा प्रान्त उसने थीवन लोगों को सेती करन क लिए दे
दिया । श्रस्तु।
यह अच्छा अवमर समझ कर एथेन्म की श्रनेक रिया-
सतों ने बलवा मचा दिया, परन्तु वही क्रूरता के साथ उनको
दण्ड दिया गया । किमी की किलेचन्दी गिरवा दी, किसी के
जहाज जप्त कर लिये और किसी की राज्यपद्धति ही मिटादी।
अनेक छोटी छोटी जातियों के ग्रीक लोग तो जमान मे ही
खारिज कर दिये गये।
एथेन्स में सवार सात वर्ष तक प्लेग बना रहा। अत में
दोनों पक्ष लडते लडने प्रस्त हो गये। अतएर विवश होकर
पचास वर्ष के लिए उन्होंने सधि कर ली (सन् ईसवी के
४२१ वर्ष पूर्व ) सन्धि की मुख्य शर्त यह थी कि दोनों पक्ष
एक दूसरे के जीते हुए प्रदेश पापस कर द : और एक दूसरे
क कैदियों को छोड़ दें । यह सन्धि निसियास की सन्धि

(E)
1
-
कहलाती है। निसियाम एथेन्स का सेनापति था। उसी के
यह सधि की थी।
इस तरह स कर युद्ध का अन्त हुआ । सारा देश नष्ट
प्राय हो गया, लोग दरिद्री हो गये, न जाने किवना रकमान
टुश्रा , परन्तु लाम किमी पक्ष को कुछ भी न हुआ !
-
ग्यारहवाँ अध्याय।
माल्सिबियाडीज ।
0
इस समय श्रालिसवियाडीज नामक एक विलक्षण पुरुप पधेस
में था। वह उच्च कुन्त का, बनवान और प्रथल महत्वाकांक्षी
था । वह छुटपन म लडकों की टोलिया बना कर, भाप उनका
नायक बनता था और लडाई दगे किया करता था। वह
न्यायान्याय अथवा उचित-अनुचित की ओर बिलकुल ही ध्यान
न देता था ! उच्च कुल और अपार सम्पत्ति के कारण उसके
पाम बहुतसे मु हलगे एकत्र हो गये थे, और उसके प्रत्येक कार्य
की प्रशसा किया करते थे। इससे अपनी करतूतो की भलाई
या बुराई जानने की शक्ति उसमें नहीं रही थी। वह गडा
स्वार्थी था। उसमें नैतिक धेर्य का लेश-मात्र भी न था।
पेरिलीज के साथ उसका कुछ नाता था। निसियस की
सधि क समय उसकी अवस्था तीस वर्ष की थी, और एथेंस
में यह एक मुख्य पुरुप गिना जाता था।

.
( 8 )
साफटीस के साथ उसकी मित्रता थी । यदि वद साके
टीस के उपदेशानुसार चला होता तो पेरिलीज़ के समान वह
मो चतुर राजनीतिज्ञ पनता । अवश्य ही उसके हृदय में साक्रे.
टीस के प्रति बडी पूज्यबुद्धि थी, और वह उसके उपदेशों के
महत्व को स्वीकार भी करता था, पर उसके मुंहलगे मित्रों
के कारण उस उपदेश का कुछ असर उसके हृदय पर न होने
गता था । यहां तक कि, धीरे धीरे वह साकेटीस से विरक्त
होगया, और उससे मिलने भी न लगा !
सुन्दर वस्त्रों और पेश आराम के लिए आल्सिपियाडोज
एथेन्म में बहुत प्रसिद्ध होगया ।वहां के जूते,जो सब मे अच्छे
समझे जातेथे, उनको पारिपबियाडीज का नाम मिला था ।
पीठ की ओर जमीन पर लटकना हुआ लम्बा सा दुपट्टा
डालने की चाल उसी की चलाई हुई थी। उसने ग्रीस के एक
अत्यन्त धनवान् घराने की लडकी के साथ विवाह किया था,
निमसे उसकी सम्पत्ति और उसका प्रभाव और अधिक बढ
गया था। प्रालिपियन खेल की वाजी म उसकी तीन बार
जीत हुई, जिमस उसका बड़ा वश हुया । उस अवसर पर
उसने सब दर्शकों को एक बडा भोज भी दिया।
भोज इत्यादि में प्रारिसरियाडीज के अधिक व्यय करन
का हेतु यह न था कि, लोग उमसे प्रसन्न रहें, किन्तु वह इन
उपाया द्वारा केवल अपना बडप्पन दिखाना चाहता था।
फिर भी वह लोकप्रिय था, पर दुस्साहसी होने के कारण
उसने इस लोकप्रियता का सदुपयोग न किया । सरकारी
कानून और सामाजिक नियमों की वह बिलकुल परवा न
करता था। उसके व्यवहार से लोगों को यह जान पड़ता था
.
-
-

( १० ॥
-
हवसाये हुए
कि वह किसी को डरता नहीं, और समझता है कि, मेरे
अपराध करने पर मुम दण्ड देनेवाला कोई नहीं ।
निसियास की सन्धि पाल्मिरियाडीजाको पसन्द नाथी।
उसने सन्धि भग करने के लिए नाता प्रकार के उपाय
किये । सच पूछिये तो सधि का भग दोनो पक्षों न किया, पर
विशेप कर पर्थमवालों ने सन्धि को शतों का पालन नहीं
किया। उन्होंने स्पार्टाके मित्रशहरों पर चढ़ाई करके उन्हें अपन
अधिकार में लाने का क्रम जारी किया। अन्त में एन्स न
सिसलो द्वीप पर अधिकार करने के लिए जहाजी बेडा भेजने
की तैयारा को सिसली के प्रायः समस्त बडे बडे शहर शार्दा
। अतएव एथेंस का अधिकार वह उन पर
नहीं मान कर सकता था। निसियास इस चढाई के विरुद्ध
था। पर माल्सिवियाडीज़ के विशेष प्राग्रह के कारण सिसिली
पर चढाई करने का निश्चय होगया । और युद्ध की तैयारी
होने लगा । परम्परा के अनुसार डेल्फाय की देवी का शकुन
एथेन ने मॅगाया, पर उसे वह नहीं मिला। लेकिन एथीनियन
लोग अर उक्त देवी की वाणी पर अधिक विश्वास न रखते
थे। युद्ध के प्रारम्भ से, प्राय सभी भविष्य स्पर्श के अनुकूल
होने के कारण, वे डेल्फाय से चिढ गये थे। सच पूछिये तो
इस समय से राज्य कार्यों में देवी की भविष्यवाणी कामहत्व ही
नष्ट होने लगा। हॉ, प्रीस देश जिस समय रोमन लोगों ने
जीता उस समय तक, और इसके आगे भी, अनेक लोग निजी
तौर पर देवी का शकुन प्राप्त करने को जाते रहे, परन्तु
सार्वजनिक कार्यों में अवश्य ही अब उसका उतना महत्वात
।
.
1-

. (१०१ ) • सिसली पर चदाई करने के लिए वेडा तयार ही था, इतने में शालिसरियाडीज पर कुछ भय र अपराध लगाये गये । हर्मीज या मयुरो नामक एक दधता ग्रीक लोगों में पूजा जाता था। उसकी ऊची ऊची प्रतिमाए मन्दिरों, व्यायाम- शालामा, न्यायालयों और पाठशालानों के सामने शिलासनों पर स्त्री रहती थी। एक दिन सपेरे उठ कर लोग या देराते हैं कि, एथेन्स में उक्त देवता की जितनी प्रतिमाए थी सर चकना चूर होकर पडी है । इस घटना से सारे शहर में सनसनी फैत गई । इस दुष्ट कार्य के करनेवालो का खूब पता लगाया गया, बहुतेरे जेल गये, बहुतेरों को फासी हुई, पर अमली अपराधी का पता ग लगा। पाल्सिपियाडीज़ पर भी यह अपराध लगाया गया। इसके सिवा, एक गुलाम ने उस पर अनेक धर्मविधियाके उच्छेदन करने का भयकर अप. सुल्लमखुल्ला लगाया । इस पर नाल्सिरियाडीज ने प्रार्थना की कि, मेरा न्याय होना चाहिये । पर सिसली पर चढाई करने की सारी तैयारी इस समय हो चुकी थी, अतएव यह निश्चय हुथा कि, आरिसरियाडीज जर तक वापस न आ जाये, उसके सब मुकदमे मुलतवी रसे जायें । । जहानों का ऐसा भारी वेडी ग्रोस देश से कभी बाहर न निकला था। वेडे की विदाई के लिए सब एथेंस निवासी समुद्र-तट पर उपस्थित हुए । प्रत्येक जहाज पर सोने-चॉदी के बर्तनों में देवताओं को नेवेद्य अर्पण किया गया, और उनसे भक्तिपूर्वक प्रार्थना की गई कि वेडाविजय प्राप्त करके सुरक्षित लोट आये 1 पर पथेन्स की यह यात्रा फलप्रद न हुई । उसे. साशा थी कि, इटली और सिसली के अनेक शहर सहायता - 1 ७ । - -- -- । . (१०४ ) सिसली भेजा। वहां स्थल और जल पर अनेफ़ युद्ध हुए।' अधिकांश लडाइयों में स्पार्टनों की सहायता से सायरान्यूज की ही जीत हुई। अन्त में एथीनियन लोग पूर्ण रूप से परा जित होगये। उनके सव जहाज शनी ने छीन लिये । सैनिक समरांगण से बच गये वे शत्रुओं के हाथ पट कर कैद होगये। इनमें निसियास और डेमास्थनीज भी थे । इन दोनों को शत्रुनों ने मार डाला, और बाकी लोगा में से कुछ तो, कैदखाने में ही मर गये और कुछ गुलामों की तरह भिन्न भिन्न स्थानों पर घेच टाले गये। इस पराजय का समाचार जर एथेंस में पहुँचा तब सारे शहर में हाहाकार मच गया। एथेंव का सब महारा जाता रहा । सनाने में कुछ न रहा, तट की रक्षा करने के हेतु बटर स्थान में जहाज न रहे, एथेंस बडे संकट में पडा । फिर भी वहा के लोग निराश होकर चुप न बैठे। उन्होंने फिर से नयान जहाज बनवाने प्रारम्भ किये, श्रोर देश को फिर से पूर्ण उन्नति होने तक जलसां और तमाशों धादि मे पैसा खर्च करना बन्द कर दिया। ऐसे कठिनः प्रसरों पर सारे नगर वासियों की सभा करने की चाल थी, वह इस समय की गई, और लोगों को संब हालात्रच्छी तरह समझाया गया। इससे स्वदेशभिमीनी लोग सरकार की सहायता करने को तैयार हुए, और उन्होंने बात की बात में बहुत सा धन एकत्र कर दिया, जहाज और हथियार तैयार किये, थोर नवान जल. सेंना स्थापित करने को सब तैयारी हुई। इसी समय के लगभग स्वार्टी में प्रालिलवियाडीज से विगाड होगया। भासिवियाडीज स्पार्टी के राजा एजिस से N

।
'(१०५॥
लड़ कर एशिया मायनर के ईरानी सूबेदार टिसाफर्निस
के पास चला गया। यहा उन दोनों की यहुत जल्द अच्छी
मित्रता होगई। पारिसरियाडोज ने यहीं से ययंस फी सरकार
फो यह संदेश भेजा कि, "यदि आप मुझे फिर से हाथ में
लेंगे तो मैं एथे. वापस
प्राकर टिसाफर्नीस की
सहायता प्राप्त करा दूगा ।" इस सूचना पर एथेन्स की
कोसिल में पडा चाद-विवादामा, परन्तु अन्त में यही निश्चय
हुआ कि, माल्सिपियाडोज की सज़ा रद को जाय,
श्रोर उसे
वापस बुला लिया जाय । परन्तु इतने में ईरानी सूबेदार ने
पयन्स का सहायता देने से इन्कार किया। श्रतएव, अल्सि.
गियाडोज को और कुछ दिनों तक घाहर ही रहना पड़ा।
इसी बीच में पथैन्स म राज्यक्रन्ति होगई । प्रजासत्ताक की
जगह अब अल्पसत्ताक राज्यव्यवस्था प्रचलित हुई । उस
समय 'याल्सिपियाडीज वापस घुलाय गया। परन्तु मधीन
राज्यव्यवस्था लागों को पसन्द नाई। उन्हाने बलवा करके
फिर से मनामत्ताक मडली स्थापित की । बहुत से नये
कानून बनाये गये, और पेरिकोज के समय में जो राज्यवव्यस्था
थो, वही फिर प्रचलिन दुई। इस विप्लप में विरुद्ध पक्ष के
लोग एथेन्स छोड र स्पाटना से डिसीलिया में जा मिले।
(इसवी सन् के ४११ वर्ष पहले।।).
इसके बाद अल्सिवियाडीज फिराजलसेना का अधिकारी
नियुक्त दुश्मा और उसने स्पार्टनों से इस चीरता के साथ युद्ध
किया कि, शाम्रही पहले की भातिफिर एथेन्स का अधिकार पढ
गया। प्रथम मृत्युदण्ड से दण्डित,परन्तु अब विजयी,श्नाल्सि
चियादीज़ ने शत्रुनों को पराजित करके बड़ी धूमधाम के साथ

. 1 पयसपहर में प्रवेश किया। जबकि उसकी सवारी मार्ग में चली जा रही थी, लोगों ने उसका सूर जयजयकार किया। उसके मित्रों ने उसे यड़े समारोह के साथ सभागृह में ता बिठाया, और पहले के सव अपराधों से उसे विधिपूर्वक मुक्त किया। उसने राष्ट्र को उत्तम सेवा की, अतएव उसे 'सुवर्ष मुकुट पारितोपिक में दिया गया ; और उसकी जायदाद, जो जन्त कर ली गई थी,वापस दे दी गई। इसके सिवाय, यह समस्त जल और स्थल सेना का मुख्य सेनापति बनाया गया। आल्सिपियाडीज के हाथ में जो यह सत्ता आई, उसका पहले पहल उसने अच्छा ही उपयोग किया, अतएव लोग उस पर विशेष श्रद्धा और भक्ति रसने लगे। डिसिलिया - नामक स्थान पर पार्टनो की छावनी हो जाने के कारण एथेन्स में को एक बड़ा उत्सव वद हो गया था।पयोंकि उस उत्सव एथेन्स निवासी अपनी स्त्रियों के साथ, बड़ी धूमधाम से एधेस से इल्यूसिस जाते थे। इस उत्सव को छोड कर अन्य किसी उत्सव में स्त्रियां शामिल नहीं होती थीं। पर रास्ते में शत्रुओं की छावनी होने के कारण स्त्रियों को साथ ले जान का सुभीता न रहा था, अतएव यह उत्सव वन्द हो गया था पर आल्सिबियाडी ने अपनी सेना की सहायता से यह उत्सव एक बार फिर जारी करा दिया, अतएव सोग उसकी पहले की बातों को भूल कर उससे बहुत प्रसन्न हुए। परन्तु "बहुत जल्द फिर माल्सिपियाडीज के ऊपर से लोगों की श्रद्धा हट गई । एक के बाद एक, बराबर उसे अपजय प्राप्त होते गये। वह सेनापति के पद से व्युत कर दिया गया । श्रतएव हेले स्पार्ट के किनारे, जहां उसकी कुछ जमीदारी थी, वह कुई - -

( १०७ )
। वर्षों तक जाकर रहा । इसके बाद वह एशिया को चला गया,
जहा उसका खून हो गया। (ई० स० के ४०४ वर्ष पहले)
--
-
।
बारहवां अध्याय।
एथेन्स की सत्ता का हार ।
(ई० स० के ४०७-३८ वर्ष पहले ।)
।
.
एथेन्स और स्पार्टा में अभी युद्ध हो ही रहा था । दोनों
पक्षों ने करतो की हद कर दी थी। स्पार्टा का सहायक ईरान
का राजा सायरस था। यह राजा अतुल द्रच्यशाली था।
अतएव उसे सिपाहियों और सलासियों को वेतन देने में
कोई असुविधा न होती थी । प्राचीन काल में ग्रीक लोग
बिना वेतन लिये सरकारी नौकरी करते थे। परन्तु अब यह
हाल न था । अय चे निश्चित चेतन मिले विना नौकरी नहीं
करते थे
आल्लिबियाडीज के चले जाने पर केनन (Canon) नामक
एक पुरुष पन्स का राज्यकार्य करने के लिए नियुक्त हुआ।
यह मनुष्य उच्चवशीय और चतुर था। इसने अन्य नौ वीर
पुरुषों को अपनी सहायता के लिए सग में लेकर जहाजी युद्ध
वारा शत्रुओं को खूब ही पराजित किया। इस समय एक
बुद्र कारणवश पपेन्स सरकार ने बडी गलती का, नहीं तो
.

( १०७) . . - सदा के लिए स्पार्टा' का नाश हो जाता। ऊपर लिखी हुई लडाई एशिया.फे किनारे आर्गिन्यूजो. नामक तीन द्वीपों में हुई , और स्पार्टी का जहाजो वेडा समूल विध्वस हो गया। युद्ध अभी समाप्त नहीं हुधा था, कि एथेन्स के कुछ जहाज नष्ठ हो गये, जिससे कुछ लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। अतएव सेना के दस अधिकारियों पर यह अपराध लगाया गया कि उन्होंने अपने देशभाइयों के प्राण पत्रोने की परवा न की। उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि, युद्ध के पश्चात् बडे जोर से श्राधी भा गई, और उनकी बाजाओं का भला भॉति पालन न हुआ, इसी कारण यह दुर्घटना हुई पर लोगों को इससे सतोप न हुया। कोसिल ने निर्णय किया कि आठ सेनापतियों को मृत्यु-दण्ड दिया जाय । तदनुसार छे सेनापति तो मार डाले गये , और दो भाग निकले । इस तरह ऐन मौके पर बाठ उत्कृष्ट गरों का नाश हो गया, जिससे एथेंस की बडी हानि हुई । एथेंस में दलबन्दी थी। उसी को यह परिणाम है। एथेंस के राज्यकार्य में हमेशा से दलवदियां, वली आती थी। सायरस की सहायता से स्पार्टनों ने अपना जहाजी वेडा फिर तैयार किया, ओर, उसका मुख्य अधिकारी लिसाडर नामक एक मनुष्य नियत किया गया । उसने हेलेस्पांट जाकर लांप्लेकस नाम शहर पर एकदम बावा बोल दिया, श्रोर उसे अपने अधिकार में कर लिया। यह शहर पशिया माह- नर में था, और एथेंस से मैत्री रखता था। लिसांडर ने जहां अपने जहाजों का लंगर डाला था उसी के सामने, किले में, आल्सिबियाडोज रहता था। वह दोनों पक्षों की गतिविधि . " 1

(108)
न्यानपूर्वक अवलोकन कर रहा था। उसने यह देखकर, फि
तिसाहर एधीनियन येडे पर धाया मारने का अवसर ताके
रहा है, तद पर जाकर प्लेडे के अधिकारी से कहा कि, "तुम
पिन सिपाहियों को जहाज पर हमेशा तैयार रक्लो और उन्हें
जहाज छोड कर बाहर न जाने दो" । किन्तु, उक्त अधिकारी
जाने प्रमादयश प्राल्सिवियाडीज की इस उत्तम सम्मति पर'
ध्यान न दिया, जिसका फल उसे तुरन्त ही भोगना पडा। एक
दिन, जब कि पथोनियन घेडे के अधिकाश सिपाही थाहर
चले गए थे, लिसाडर ने मुअवसर पापर एकटम चढाई कर
(दी, भोर अनेक जहाज अपने अधिकार में कर लिये । फेनन
आठ जहाज लेकर सायप्रस सोभागगया।लगभग १७० जहाज
लिसांडर के हाथ लगे, जिससे उनका वल बहुत बढ गया ।
४००० एयीनियनों को, जिन्हें उनने कैद कर लिया था, बड़ी
* क्रूरता के साथ मग्या डाला । लिसांडर को सेना अब बहुत
। दृढ़ होगई थी। उसने एथन के अनेक प्रदेश, शहर और द्वीर
: अपने अधिकार में कर लिये । अन्त में स्वय एथेंस काही जल
भोर स्थल दोनों ओर से स्पाईनों ने घेर लिया।
एथेंस निवासी स्वप्न में भी न जानते थे कि, इस प्रकार हमें
चारों ओर से घिर जाना पडेगा । अतएव,वेयडे घबडाये शहर
में बाहर से अनाज का पाना पद होगया, जिससे खोग भूखों
मरने लगे। तय एथेन्स ने सधि के लिए सन्देशा भेजा । इस
पर पार्टी ने कहा - एथेंस फी किलेयदी गिरादी जाय, यारह
जहाज छोड कर शेष जहाज हमें दे दिये जाय देशमिकाले का
दएड पाये हुए मनुष्य फिर से वापस बुला लिये जाय, और
पर्येस हमारी तावेदारी कुबूल करे, तभी सधि होगी, अन्यथा
.

।
--
( ११० )
नहीं । ये शर्ते सुन कर पथेंस निवासी चंडे संकट में पडे, पर
फरते क्या । हार मान कर इन्हीं शता पर उन्हें संधि करनी
पड़ी। इस तरह यह युद समाप्त हुा । (सन् ईसवी के ४०?
वर्ष पूर्व ।)
सधि होते ही किसांदर एथेस की किलेपदी गिराने लगा।
निरुपयोगी जहाजों को उसने जरूवा दियो । 'देश निकाले का
दण्ड पाये हुए लोगों को वापस बुलवा भेजा । एथेंस की इस
दुर्दशा को स्पार्दन, आदि विदेशी लोग घडे कौतुक से देखते
थे। लिसाडर अपने मस्तक पर फूलों की माला वारण किये हुए
बैंड की ताल पर किलेबन्दी गिरवा रहा था। उसके इस
कार्य से एयोनियन लोगों का हृदय कितना दुखित हुआ
होगा | पर लिसांडर ने इससे भी बढ कर अनर्थ किये । उसने
पहले की राज्यपद्धति को तोड कर तीस मनुष्यों की एक
कोसिल बनाई । इस कोसिल ने एथेंस में ऐसे अत्याचार किये
कि जिन से उसे "तीस जुल्म कार्यकर्ताओं की कौसिला।
कहते हैं । इन तीस में कुछ ये लोग भी थे जो राजविद्रोह
अपराध में देशनिकाले का दण्ड पाये हुए थे, पर अब धापस
बुला लिये गये थे। उन्होंने यह अच्छा मौका देख कर अपने
पहले के शत्रुओं से मनमाना बदला लिया। लिसॉडर द्वारा
नियुक्त कौंसिल ने आठ मास तक एथेन्स का शासन किया,
पर इतनी ही अल्प अवधि में उसने प्राय. सय प्रतिष्ठित और
धनवान व्यक्तियों की दुर्दशा कर डाली। बहुतेरे मार डाले
गये, ओर बहुतेरे जेल में ठूस दिये गये। तहकीकात से कोई
मतलर न था। झूठे अपराध लगाये जाते थे, और देशनिकाले
का दण्ड देकर उनकी सारी सम्पत्ति उपरोक तीसोअधिकारी,
+
।

.
-
.
-
Trisप कर जाते थे। उन्होंने आपस में भी एक दूसरे के विरुद्ध
काररवाइया करने में कोई कसर न रक्लो । एक सभासद तो
मरो समा में पि पिला कर मार डाला गया । उसका
अपराध यह था कि, उसने सभा में दो धनवान मनुयों का
पिन लिया था।
(इन अत्याचारों से तग आकर बहुतेरे मनुष्य पयंस में
अपनी सारी जायदाद छोड कर थीम्स आदि रियासतों में भाग
गये। इससे उनकी बडी हानि हुई, पर करते क्या १ लाचारी
थी। ऐसे भागे हुए मनुष्यों में थूसिम्यूलस नामक एक पुरुष
या। यह पहले पथेंस में सेनापति था और बड़ा माहमा तथा
-शूर था। इसने अपने देशमाइयों का दुख दूर करन क इरादे
से पटिका प्रान्त की सीमा पर एक किला अपने अधिकार में
कर लिया। एथेंस से भाग फर बाये हुए लागों में से
अनेक लोग इससे ना मिले । साराश, एक अच्छी सौ सेना
- ही एकत्र होगई । इस फोज को लकर यूमिन्यूलम
ने एथेन्स पर चढाई कर दी, और जो सेना उससे लडन को
पाई उसको पराजित किया। इस समाचार के श्राते द्वीराज्य.
क्रान्ति होगई। तीस मनुष्यों की समा टूट गई, और अन्य
दस मनुष्यों की समा स्थापित हुई। भाशा थी कि, ये दसो
मनुष्य थूसिम्युलस से जा मिलेंगे, पर ऐसा न हुआ। किन्तु
इसके विरुद्ध उन्होंने स्पार्टा को दूत भेज कर वहा से सहा-
यता मागी, और स्वय पहले की, तीस मनुष्यों की, सभा के
समान ही लोगों पर अत्याचार करने लगे।
कुछ दिनों याद लिसाडर सेना लेकर एथेन्स नाया। वह
अपनी चलाई दुई पहली पद्धति के अनुसार ही फिर एथेन्स
-

- - , को राज्यव्यवस्था करना चाहता था, पर स्पार्टी के राजा पाजेनियस को यह बात पसट न आई । वह लिसांडर के पीछे तुरन्त दूसरी फौज लहर एथेन्स जा पहुँचा, और लोगा को दिलासा देकर, युद्ध के पहले पथेन्स में जो राय पद्धति प्रचलित थी, वही फिर ले जारी कर दी। । इस तरह एथेन्म में फिर शांति विराजने लगी, तथापि उसकता जो वैभव पहले था वह उसे फिर कभी प्राप्त न हुना उसके धनिकार से अनेक प्रान्तों के निकल जाने से उसर्फ श्राय नहुन कम होगई । करके रूप में जो वार्पिक श्रामदर्न होनी थी वह भी बद होगई । वहां के न्यायालयां में बाहर हजारों मनुष्य, सदा मामलों मुकदमों के लिए उपस्थित रहत थे, उनका आना-जाना भी चन्द होगया । शहर में रोनक कम होगई। श्रीयादी घट गई । पहले घर किंगये प- देकर, लोग जो अच्छी आमदनी कर लेते थे, वह भी न रही 'पाजार उजड गया । विदेशों से होनेवाला व्यापार युद्ध कारण डूब गया । विदेशों में बनवान व्यापारी, जो एथेन्स श्राफर रहे थे, इस डर से उश छोड कर चले गये, कि कई सरकार हमारी दौलत न छीन लेथे । पैसे की बड़ी तगी हो लगी । सार्वजनिक उत्सव वद होगये । बडे बडे घर, विशा इमारतं, यहा तक कि नारा नगर, मरम्मत न होने के कार बिलकुल उजड़ गया। ग्रीस देश का प्रसिद्ध साधु और तत्तन विद्वान् साकेटी इसी समय होगया है। धर्म के विरुद्ध लोगों को उपदेश दे के कारण उस मृत्यु दण्ड दियागया। यद्यपि वह बुड्ढा होगय था, तथापि दण्ड से बचने के लिए वह भाग सकता था; . T , .

. (१३) उमने पेसा नहीं किया । उसने कहा-"मुझे पर गोत्र मरना ही है, तो फिर प्यों न, यहीं रह कर मम जेल में जाकर उसके मित्रगण उमसे भेंट करते थे। जप उमे विष का न्याला पीने को दिया गया, तब उसके अनेक मित्र उसके निकट बैठे हुए थे। जेसे प्यास लगन पर कोई पानी पीता है, उसी तरह शानिपूर्वक उसने उस विप के प्याले को पी लिया, योर जब तक वह घोलने में समर्थ रहा, अपने मित्रों से बात चीत करता रहा । साकेटीस ने स्वयं कोई नथ नहीं लिखा, पर शोर जेनीफन नामक उसके दो शिष्यों ने, नपने प्रथों में उसके तर्क, वाद विवाद और स भाषण आदि लिख' . - रफा है 1 . । साकेटीस घडा तत्त्वज्ञानी था। उसने लोगों को यह सिसळा दिया कि, स्वय अपनी बुद्ध से किसी यात फा विचार किस तरह किया जाता है, और सत्य किस तरह दूढ कर निकाल लिया जाता है। उसने इसके लिए कोई पाट. शाला नहीं खोल रफ्यो थी, प्रत्युत अय कोई पुरुष उससे भेट करने अाता तब वह उससे नाना प्रकार के प्रश्न और सभा पण करके उसे सत्य और नीति की शिक्षा दे देता था। उसका क्न या कि, हम समझते है कि हमें बद्रुत सी बाते ज्ञात हैं, पर सच पूछिये तो हमें उनका यथार्थ ज्ञान लेश मान भी नहीं है। हम केवल शन्दों के श्राडम्वर में भूले रहते हैं। उदाहर- रणार्थ-राजनीतिश किसे कहते है ? उत्तर-राजनीतिज्ञ पेरि- कोज के समान पुरप को कहते है। पर पेरिक्लीज चूकि उच्च या, यता था, इसलिए क्या प्रत्येक राजनीतिको उचऔर वक्ता 'झोना ही चाहिए? नहीं। तब फिर राजनीतिश शब्द का क्या रूप में . ( ११४ ) अर्थ है ? चे कौन से गुण है जो प्रत्येक राजनीति में होने ही चाहिये ? और ऐसे गुण फोन से हैं कि जो राजनीतियों के अतिरिक्त अन्य लोगों में भी हो सकते है। बस इसी रीति से प्रश्न करके किसी भी शब्द का सच्चा अर्थ वह अपन शियों के मुख से निकलवा लेता था, और पृथकरण करके प्रश्नों के लोगों के हृदय की अज्ञानता को दूर कर दता था। इस तरह प्रचलित धर्म, अथवा प्रचलित राज्यपद्धति आदि किसी भी प्रस्तुत विषय से सम्बन्ध न रखते हुए, केवल बुद्धि के जोर से, उमने स्वतनतापूर्वक विचार करना लोगो को सिखलाया। इस प्रकार से स्वतत्र विचार करने की पद्धति पहलेपहल साकेटीस ने ही निकाली । वह निर्भय होकर प्राय लोगों को यतलाया करता कि, राज्याधिकारियों ने कोई कानून बनाये अथवा फिली धर्म का प्रचार पुरातन काल से चला पाता है- इतनेही से हम उसको अच्छा नहीं कह सकते, किन्तु प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि, अपनी खतर बुद्धि से वह सब बातों पर विचार करे, और तब वे अच्छी हैं या धुरी-यह निश्चय करे। कोई वृद्ध हो या अधिकार-सपन्न हो, उसकी वह विलकुल परवा नहीं करता था। उसका कथन था कि, वृद्धों का जो सन्मान किया जाता है वह उनकी अधिक अवस्था के कारण नहीं, किन्तु उनकी बुद्धि के कारण किया जाता है। पिता की श्राशा पुत्र को अवश्य माननी चाहिये, पर यदि पिता अशान. वश पुत्र को अनुचित प्राशा दे तो उसके पालन की विलकुल- जरूरत नहीं । साराश, साकेटीस के मत से सत्य और शान ही परम माननीय थे। - (१५) इस तरह साकटीस,ने नीतिशास्त्र का मन्थन करके यह निष्कर्ष निकाता कि, जिससे मनुष्यों की भलाई हो, बद्दी अच्छा । सद्गुण ही सुख है । सुन्य प्रत्येक के लिए आवश्यक है। मनुष्य जो दुर्युगी हो जाता है, सो अपनी अमानता के कारण, क्योंकि जान बूझ कर अपने को सुस्त्र से वचित "रखनेवाला कोई नहीं है। इसी प्रकार के स्वतन्त्र विचार उसने धर्म के विषय में भी प्रकट किये। पर वे तत्कालीन धर्म- मनों के अनुकूल न होने के कारण लोगों को पसट न आये। अधिकारियों ने उस पर अन्याय से यह अपराध लगाया कि, वह अपनी शिक्षाओं से लोगों को धर्मम्रष्ट और नीतिम्रष्ट कर रहा है। इस पर उस मृत्युदण्ड दिया गया, जिसे उसने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया । साकेटीस के पश्चात् उसका शिप प्लेटो बटा तत्ववेत्ता हुश्री । प्लेटो का शिष्य अरिस्टारल सिकदर बादशाह का गुरु था। . " - ~ तेरहवां अध्याय। . ईरानी युद्ध । म (सन् ईसवी के ३८८-३८७ वर्ष पूर्व) ईरान के बादशाह डरायस ने पथैन्स के साथ लड़ने के लिए स्पार्श को बड़ी सहायता पहुँचाई थी, पर युद्ध के प्रत ।

में उसकी मृत्यु होगई। उसके पश्चात् उसका बडा लडका
शार्टाजर्जिल मेम्नन गद्दी पर बैठा, परन्तु एशिया माइनर कर
किनारे के ईरानी राज्य के सर प्रदेश उसके मरे लड़के साय
रस का मिले।
सायरस बड़ा चतुर और तेजस्वी पुरुष था । उसको
महत्वाकाक्षा पडी प्रवल थी। उसने 'भी द्रव्य की सहायता
देकर पार्टी को एथेन्स के साथ लंदने के लिए उत्साहित
किया था। पर उसकी इस सहायता में, उसका हेतु शुद्ध न
था। यह अपने बड़े भाई को ईरान की गहोसे हटाना चाहता
था और उसे इस कार्य में पार्टी की सहायता प्रावश्यक
थी। यही कारण है कि, उसने स्पार्दा को सहायता पहुँचा
फर उससे मैत्री कायम रक्खों थी।
आर्टाजजिम गद्दी पर बैठा ही था कि, सायरस ने उत्त
पर धावा कर दिया। इस चढाई में उसे दस हजार ग्रोको
की सहायक सेना मिली थी। यायिलोन के निपट फ्यूनाक्जा
के मुकाम पर दोनों भाइये में घोर युद्ध हुआ और सायरस
मारा गया । सायरस का सारा राज्य पार्शजर्जिस को मिल
गया। पार्टाजर्जिस बडा कपटीश्चौर लहरी पुरुष था ।
ग्रीक सेना वापस लौटी । इतने में पाटनिर्जिस ने उससे
बदला लेने का विचार किया, और अपने अधिकारियों से
सलाह करके समस्त प्रोक सेनापतियां को मुलाकात के लिए
बुलवाया,
धौर विश्वासघात करके सब को कतल करा दिया।
नीक सेना निराश्रित होकर नव बडी विपत्ति में पडी। उसके'
पास रसद पानी कुछ न था । पर भाग्यवश इस सेना के साथ
सार्केटीस का शिष्य जेनोफत स्वयंसेवक के तौर पर था।
-
,
M

ह वही युक्तिपूर्वक डम सेना को स्वदेश लौटा लाया, नहीं
नो सभी के प्राए जाने में सदेह न था। नाना प्रकार के सकट
सहकर दम हजार सेना का, जेगोफन सुरक्षित रूप से स्वदेश
मोटा लाया, इमसे उसकी कीर्ति अजर अमर होगई । उसका
यह कार्य इतिहास में "दम हजार की याना" के नाम से प्रसिद्ध
। जगलियों की बस्ती से होकर भयाक सर्दी सहते हुए,
पन्न वरत्र का कष्ट उठाते हुए, हजारों मील चलकर जब ग्रीक
सेना वायजाटियम में कुशलपूर्वक जा पहुची, तर जेनोफन
उसका माथ छोर अकेला पेलापोनेसन लौट प्राया । इसके
द उस ने अपना सारा जीवन विद्या व्यासग में जिताया।
-सका घर आलिपियान के निकट मिलस में था।
पीक मेना जर इस प्रकार हाथ से निकल गई तर पार्टी
चर्जिम को वडा सताप हुश्रा । विशेषत सायरस को सहा
बता देने के कारण वह स्पार्टना पर और भी अधिक कुपित
आ। उसने टिमाफर्निस को मुख्य सेनापनि नाकर स्पाटा
। युद्ध ठान दिया। इस टिसाफर्निस ने ही अपने राजा के
बहन से, ग्रीक सेनापतियों को कपट से मरवाया था।
इस समय स्पार्टी में श्रमिलास नामक वडा पराक्रमी
परि शूर गजा राज्य करता था। राज्यशामन में भी वह सूप
नपुण था। उसके शरीर की गठन मध्यम और देखने में वह
नाधारण था। पैर से यद्यपि वह लँगडा था, परन्तु रडा कौतु
इलप्रिय और मिलनसार था। शिक्षा उसे वालपन में किसी
डाधारगा स्पार्टन लडके के समान ही मिली थी। यह बहुत
योहे में सब खर्च चलाता और ऐश श्राराम में धन बिलकुल
अर्च न करता था। कहते हैं कि यश्चों परघह यडा प्रेम रखता
८

।
( १९८ )
था। एक बार जब कि उसका कोई मित्र उससे मिलने आया,
वह काठ का घोडा लेकर बच्चों के साथ पेल रहा था। यह
देस कर उस मित्र न जब वडा पाश्चर्य प्रकट किया, तर
राजा ने कहा--"अजी साहब, जब तुम्हारे बच्चे होंगे, तव
तुम्हें इस का मजा मालूम होगा।"
लायकरगस के समय से लेकर अब तक स्पार्टाकी राज्य
व्यवस्था में अनेक रूपान्तर हुए थ । पुराने घराने कम हो चले
थे, और लेकोनियन लोगों के सम्बन्ध से नई जाति उत्पन्न
होगई थी । मत्रि सभा के सभासद चुनने का अधिकार अधिक
विस्तृत होगया था। प्रोर गुलामों को स्वतत्रता मिल जाने के
कारण सर्वसाधारण लोगों की सरया बहुत बढ गई थी।
पहले डोरियन लोगों के गर्विष्ट वशज, जिन लोगों को केवल
अपना गुलाम और तावेदार समझते थे, वे ही अब बनवान,
और प्रतिष्ठित बन गये थे। अब भी मूल स्पार्टन अपने को प्रति
ठिन और उच्च समझते थे, तथा अपने मुकाविले में दूसरों को
तुच्छ और हलका गिनते थे-यहां तक कि, ज्योज्यों इनकी
सख्या कम होती गई त्यो त्यो इनका गर्व और भी बढता ही
गया । इस समय भी गजपद, मत्रिसभा की सभासदी और
सेनापति की जगह अलली डोरियन वंशवालों को ही मिलती
थी। इसी तरह फोर नामक पांच न्यायाधीश जो प्रति वर्ष
चुने जाते थे वे भी डोरियन वश के ही चुने जाते थे। इन पांच
न्यायाधीशों को राजा से लेकर रफ तक, सब के, अपराधों की,
जॉच करके दण्ड देने का अधिकार था।
इस प्रकार स्पार्टा की राज्यव्यवस्था में यधपि अब तक
बहुत से परिवर्तन होगये थे, तथापि शिक्षा विभाग में लाय.
,

. याराम ( ११६ ) कग्गस के ही नियम प्रचलित थे।अन्य ग्रीक रियासतों की अपेक्षा स्पार्टनों को रहन महन और उनके नियमों की कठोरता अभी तक पहले समान ही प्रसिद्ध थी। फर्क इतना ही हुआ था मितियों के सम्पन्ध में जो कडे नियमथे, उन्हे अध, द्रव्य देकर, नरम करामकत थे। इससे धनवान लोगों की स्त्रियां कुछ रहा करती थी। अस्तु, पशिया में जाकर ईरानियों से टक्कर मारन के लिए म्पादनों की ओर से अजेसिलाम नियुक्त हुश्रा। उसने सार्डिस के मुकाम पर ईरानियों को हराया। पार्टाजर्जिस ने यह समाचार जर सुना तर वह बडा कुपित हुश्रा। उसने यह समझ कर कि टिसाफर्निस की लापरवाही के कारण स्पार्टनों की यह जीत हुई और दूसरा सनापात मुकरर किया। यह नया सेनापति स्पाटना स मान्य करना चाहता था, पर' आजर्जिस को यह बात पसन्द नथ । इसलिए इरारी सना. पतिन स्पाटन सेना श वापस भजन कीएक नए युक्ति लडाई । उसमे अनक ग्रीक रियासतों के पास दूत भेजकर उन्हें स्पार्टा के साथ लडन के लिए उभाड दिया थीव्स, कारिथ और श्रार्गास ने स्पार्टा पर चढाई करन की तैयारी की, इतने पर भी श्रमिलास एशिया से वापस नहीं गया। किसी निमित्त सभी ग्रीको के मन में यदि एक बार पर- स्पर लड़ने की बात आ जाती, तो फिर वे न्यायान्याय की ओर ध्यान न देने थे । लड़ने का काई क्षुद्र कारण भी चे व्यर्थ न जाने देते थे। इस ममर भी एक ऐसाही मौजा प्रागया । दो रियासतों में किसी जमीन के अपर झगडा हा रहा था। उस झगडे में थोय्स ने एक और पार्टी ने दूसरा पक्ष स्वीकार है, उने मरवा डाला, । -- .

करके . स्पादन पूर्ण ( १२० ). युद्ध ठान दिया। स्पार्टा का सेनापति लिसांडर अपनी सेना लेकर थीम पर चढ़ धाया, और इधर एथेंस थीम की सहायता के लिए तैयार हुश्रा। वियोशिया प्रान्त के हल्याटम नामक स्थान पर दोनों पक्षों में युद्ध हुआ, और रूप से पराजित हुए । लिमाइर युद्ध में माग गया। इबर अाजेसिलास एशिया में जा युद्ध कर रहा था, उसमें उसे अच्छी सफलता प्राप्त हुई। पर बीच ही में एकाएक स्पार्टा से उसे ईफोगें की प्राशा मिली कि बहुत जल्द वापस श्राकर यहां की सेना को महायता दो। तदनम्मार वह वापस आरहा था कि, कोरोनिया के मैदान में थोबन सेना के साथ उसकी मुठभेड होगई । घोर युद्ध हुत्रा, और श्राजेसिलास उसमें विजयी हुा । (सन् ईमवी के ०६४ वर्ष पूर्व। )-- ग्रीक लोगों में एक यह नियम था कि, युद्ध की लूट का कुछ भाग देश के किसी देवना को अर्पण किया जाता था। तदनु सार आजेसिलास भी डेरफाय के मन्दिर में गया, और अपनी लूट वा दसवा भाग, पाच लाख रुपये का सामान, डेल्फाय के देवता को अर्पण किया। इस प्रकार देवता का सन्मान करने के बाद उसने सेना को छुट्टी दे दी और श्राप स्पार्टी को लोट गया। इधर एथेन्स के राजनीतिश केनन को लिसाडर ने पग जित किया, और वह सायप्रस चला गया। कुछ दिन बाद फिर वह एशिया माइनर में जाकर ईराननरेश पार्टाजर्जिल से मिला; और उससे प्रार्थना की कि, आप कृपाकर हमें, एथेन्स की फिलेवन्दी फिर से तैयार कराने और उसका पूर्व- पैभव फिर स्थापित करने में सहायता दीजिये । पार्टाजर्जिस - - - ( १२१ ) ने इस आशा से, कि इससे हमें भी कुछ नाम होगा, जगी १.जवानों का एक बेडा तयार कराया, और फार्नावेजस नामक सरदार को उसका सेनापति बनाकर केनन के साथ भेज दिया । इन दोनों मरदारों ने मिलकर स्पार्टन बेडे को गरा जित किया । इसके बाद पर्थम भाकर केनन ईगन नरेश की सहायता से नगर का कोट और रिला बनवाने लगा। यह देखकर स्पर्टन डे घरडाय । उन्होंन समझा कि, । एथम श्रर फिर सय का शिगेमणि हो जावेगा। उन्होंने तत्काल हो अपना वकील आर्टाजर्जिस की सेवा में भेजा, और प्रार्थना की कि, यदि आप त्रीस देश के युद्धों को बन्द करके वहा शानि स्थापन कर देंगे ता पशिया माइनर में ग्रीको की जा यस्तिया है, वे सर की सब श्रापके अधिकार में दे दी जायेंगी। स्पार्टनों की प्रार्थना सफल न होने देने के लिए केनन भी उसी समय ईरानी दरबार में गया । बहुत वादविवाद होने पर स्पार्टन वकील की प्रार्थना आर्शजर्जिस ने स्वीकृत , की, और कैनन को पकडकर बन्दीगृह में डाल दिया । इसके बाद सन्धि हुई; जिममें एशियामाइनर के सारे ग्रीक शहर ईरान नरेश का सदा के लिए मिल गये, और ग्रीस दश से उनका कुछ सम्बन्ध न रहा । इसके सिवाय यह भी निश्चय हुआ कि प्रास देश की छाटो यही मव रियासतें बिलकुल । स्वतन्त्र समझो जाये, कोई रियासत किसी पर अपना अधि. कार न जमावे । यह मन्धि "अँटेरिमडास को मन्धि" फह- जाती है। अटेल्सिडासं स्पार्टा का चकीन था। इसी न मन्धि की थी, भतएच वह इसी के नाम से प्रसिद्ध हुई (सन् ईसवी ३७ वर्ष पहले। । -

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चौदहवां अध्याय ।
थीस ओर स्पार्टा।
( गन् ईसवी के ३८७-३६२ वर्ष पूर्व)
।
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1
'स्पार्टाने किसी तरह ईरान से सधि तो कर ली, पर'
सधि में जो सब ग्रीक रियासतों को समान स्वतत्र समझने
की शर्त थी, उसके पालन करने को इच्छा, स्पार्टा को पहले
ही से न थी । स्पार्टा को बहुत दिनो से यही इच्छा थी कि,
सब ग्रीक रियासतों का नेतृत्व उनके हाथ में रहे । यह इच्छा
उसके मन स कभी नहीं गई । अटेल्मिडास की सधि के एक
ही वर्ष वाद स्पार्टी ने प्राडिया के श्राधीनस्थ मांटिनिया
शहर को चारों ओर से घेर लिया। कारण यही था कि,
आर्केडिया स्वतत्रता चाहता था। आजेमिलास ने जब माटि-
निया शहर पर अपना अधिकार जमा लिया विहां के निवा
सी शहर छोड कर बाहर चले गये , और चार नवीन गाव
बसा कर रहन लगे। पर वहा भी प्रत्येक गाव पर एक एक
स्पार्टन अधिकारी नियत किया गया ।
श्रेस प्रान्त में प्रालियस नामक एक शहर था। उसने
थीन्स और एथेन्स से मित्रता कर ली, इससे स्पार्टी को
पडा क्रोध श्राया, और उसने कोई बहाना निकाल कर अलि
यस से युद्ध प्रारम्भ कर दिया, । आलिधस के निवासी चार
वर्ष तक वरी वीरता के साथ स्पा से लड़ते रहे। पर अन्त
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। . ( १२३ ) 1 में उन्हें पराजित होकर स्पार्टा की शरण में जाना ही पड़ा। : स्पार्सन उस शहर पर अपना अधिकार जमा लिया, और । वहा अपनी सेना की छावनी रख दी । उनका कुछ प्रदेश स्पार्टान लेकर मामिडोनिया के राजा प्रमिटास का दे दिया, क्योंकि ईरान-स्पार्टी युद्ध में राजा श्रमिटासन स्पार्दा को अच्छी सहायना पहुँचाई थी । कुछ दिन बाद थीम्स भी स्पार्टी के अधिकार में भा गया। 'इसका वृत्तान्त इस प्रकार हे कि, गीदम' में गज कमवारियों के दो दल थ । पेमी दलवदिया प्राय मभी ग्रीक राज्यों में उनी रहती थी। प्रत्येक के मुख्य नेता, प्राय दुष्ट स्वभाव के होते थे और वे अपनी निज का सत्ता स्थापित करन लिए देश वासियों के प्राणों को बलि देन अथवा देश को हानि पहुँचाने में कुछ भी पागा पीछा न सोनने थे। इसी स्वभान के एक थीयिया मनुष्य ने थानन काविला एक स्मार्ट । मैनिक सदार हवाले कर दिया । यह सरदार ५ मत के रपार्टना की सहायता लेकर पियोशिया प्रान्त से जा रहा था। अस्तु । उक्त कार्य म्पार्टन सरकार मजूर कर लिगा,और थीम में स्पार्टन मना भी रन्दोवस्त लिए रसदी। स्पार्टनों ने उस समय थपियन लोगों पर बडे बडे अत्याचार किये जिससे बहुतेरे तो अपने प्रागों से हाथ धो बैठे, और बहुतरे जान बचा कर भाग गये। अनेक लोगों की जायदाद सरकार ने जब्त कर ली, और उन्हें देश निकाला दे दिया। उसी समय बहुत से थीवयन भाग कर पथेंस शहर में मी जा बसे थे। उनमें पिलोपिडास नामक एक महाशय धन- पान और उसवशीय था । स्वदेश पर उसकी बडी श्रद्धा और . - । - ( १२४ ) भक्ति थी। उसने थीम्स को स्पार्टनों के अधिकार से छुडाने' का निश्चय किया । इपामिनोडास नामक एक और चतुर और उच्चवशीय पुरुप उसका मित्र था। माटिनिया की चढाई में इपामिनोडाम ने पिलोपिडास के प्राणों की रक्षा की- थी, तब से दोनों में बड़ी गाढी मित्रता होगई थी । इपामिना डास सदा एकात में बैठकर अध्ययन में लगा रहता था, इसी ६ारण वह थीव्स में बचा रहा । अब थीव्स से ही उसन एथे न्स के पिलोपिडास इत्यादि लोगों के साथ गुप्त रीति से पत्र व्यवहार शुरू किया, और इस प्रकार गुप्त षड्यध रन कर म्पार्टा के जुल्मी अधिकारियों के हाथ म थीव्स को छुड़ाने का पूर! पूरा निश्चय किया । एक दिन पिलोपिटाम और उसके साथी शिकारियों का भेष धर कर थी तबीर आये, और भिन्न भिन्न मार्गों से शहर में प्रवेश करके, अगली तेयारी करने के हतु से, चारण नामक एक व्यक्ति के घर डेरा डाल दिया। थीव्स का एक उच्च गजकर्मचारी भी, जिसका नाम फिलिडास था, इस पड्यत्र में शामिल था। उसने अपने साथियों की सलाह पक दिन सर बडे बडे पार्टन अधि कारियों को अपने घर भोजा के लिए बुलाया। साथ ही उसने सब को यद भा सूचना दी कि, भेड जन के पश्चात् कुछ खिया भी श्रामनिन होकर आवेगी । यह उसने इमलिए किया कि, जिससे भोजन के लिए आने में कोविनाकानी नकरे। पर एक एथेनियन व्यक्ति, जो इस पड्यन में शामिल था, उसके घर जाने से नारा भेद खुलते खुलते बच रया। चन्नने पार्टन गवर्नर को गुमनाम पत्र के द्वारा इस पड्यन्त्र की सूचना दी। स्पार्टन गवर्नर भाकियास जब कि फिलिदास " ।

( १२५ ।)
के घर भोजन कर रहा था, उसी ममय उनको यह पत्र मिला।
पर उसने शगय के नशे में कह दिया कि, अभी मैं पत्र इत्यादि
कुछ नहीं देखू गा, सरेरे सब काम होगा। इसके बाद उसने
पंछा, 'स्त्रिया जो आलेवाली थी, व भावंगी तने दी में
स्त्रियों का वेश धारण किये दुप बहुत से लोग उस कमरे में
सुम श्राये ओर कमर से बंजर निकाल कर सब स्पार्टनों को
वहीं का यहाँगाट डाला। फिलिडास के घर पर तो यह
घटा होरही थी, उधर शहर में पड्येत्रियों के अन्य साथी,
दुकानों में घुस कर विक्री के लिए पपे हुए जिरह वसनरों
को पहन, हाथ में शस्त्र ले सडकों पर घूमन लगे, और स्वदेश
की स्वतंत्रता के हेतु लोगों का अपनी ओर मिलान लगे ।
इसके बाद नवान राज्यव्यवस्था हुई, पिलोपिडास और
अन्य दो बडे मनुष्यों कहाथ में राजकारवार माया । इन को
'रियाटार्क' कहते थ। इन रियोटार्को क हाथ में सिर्फ थोन्स
का ही शासन न था, किन्तु वे सार वियोशिया प्रात पर
शासन करते थ, और इसी लिए इनका नाम 'वियोटाक' पडा
था। पर अभी तक योन्स का किला स्पाटना के ही अम्किार
में था। उसे वापस लेने के लिए एयन्स की महायता प्रागई।
शर्त यह हुई कि, किला चुपचाप छाड दन पर स्पार्टन सेना
को कुछ दुःन न पहुंचाया जाय, इस लिए किला बिना किसी
सून स्वरादो के मिल गया। पामिनाडास भी अधिकारी
बनाया गया था। वह शर था, अतण्य उसे सेनापति का पद
-
मिला था।
.
इस प्रकार जब स्पाईन लोगों ने देखा कि थीम्स से उनकी
सत्ता चली गई, तब उनको अत्यन्त खेद हुना, और वे फिर
-

- १ . (1 १२६ )। से युस करने को तैयार दुर । युद्ध पारेभ हुआ और सान वर्ष तक जारी रहा। इस युद्ध में बडे बडे म और कार्य हुए । ग्रीक लोगों की यह आदत थी कि, जहां एक वार वे हठ में पाये कि, फिर क्रूरता की हद कर देते थे। मान वर्प के पश्चात् वियोशिया प्रान्त के ल्यूमर नामक स्थान पर एक लहाई हुई, जिसमें थीव्स की बार में इपामिनोंडाम और 'स्पार्टा मी ओर से वहां का राजा क्लिओ टस मुख्य थे। थोमों की सख्या यद्यपि बहुत थोडी थी, तथापि उन्होंने स्पार्टना को पूर्ण रूप से पराजित किया । युद्ध के इस परिणाम से स्पार्टनों की नम सूच दोली होगई । पार्टी में जर इस पराभाव का समाचार आया, उस समय लोग, सदा के अनुसार, बडे श्रानपूर्वक किसी उत्स का माज सजा रहे थे । बाहर के बहुतेरे मनुष्यों की भीड उत्सव देखने को एकल हुई थी, और सब युवा स्त्री पुरुष नार गृह में एकत्र होकर नाच तमाशों में मग्न थे। पराजय का समाचार सुन कर मी 'ईफार्स' ने यही माशा दी कि,नाव तमाशे बद न किये जाय, और युद्ध में मरे हुए तोगों के लिए शोक ओर दुस कोई न करे । हां, युद्ध में जिन लोगों की मृत्यु दुई थो, उनके नाम उनके घरवालो को बता दिये गये। कहा जाता है कि, जो लडाई में मारे गये थे उनकी माताएँ, समाचार पाने के दूमरे दिन, अच्छी पोशाक पहन फर मदिर में गई , और देवता के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रका शिन की, और एक दूसरे के घर जाकर अभिनदन किया, किन्तु, जो लोग युद्ध से सही-सलामत वापस लौट आयेथे “उनकी माताए घर में बैठी हुई शोक मनाती रहीं। , , - लपर्युक्त विजय से थीयन लोगों को अत्यन्त आनन्द हुया! होने तत्काल हो दून भेज कर एथेन्स को यह विजय-वार्ता थीषियन समझते थे कि, एथेन्स को सहायता से हमें टी के पजे से छुटकारा मिला है, अतएव हमारी विजय- ना सुन कर एथीनियन बडे हर्पित होगे । पर वास्तव में नहीं हुा । थीम का उदय होते देख कर एथेन्स को बुग लगा । इसके सिवाय जब उसने यह सुना कि, योशिया प्रान्त के समस्त शहरों ने भी थीम्स की सत्ता स्वी र कर ली और फोमिम के निवामी श्राग ही श्राप उमके धिकार में चले गये, तब तो उनके सन्ताप की सीमा ही न पर घर स्पार्टा और थीम्स का युद्ध जारी ही था, अरथीव्स देखा कि, हमें एथेन्म ले सहायता 1 मिलेगी, इम्म लिए सने थेसली के राजा जेसोन के साथ मैत्री करन का विचार किया , और स्मार्टा के साथ लड़ने के लिए उसका सहायता नागने को अपना वकील उसके पास भेजा। जेसोन पडा पराक्रमो महत्वाकांक्षी और अत्यन्त धूर्त था। उसने यीस का श्रामत्रण रही प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लिया , हृदय में थीम को ही निगल जाने का उद्देश्य रक्खा । वह सेना लेकर पियोशिया प्रान्त में पाया सही, पर स्पार्टनों से सडने के लिए नहीं किन्तु उसने आकर दोनों पक्षों को संधि कर लेने की सलाह दी, और म्वय प्रयत करके सधि करा, मो दी। सधि हो जाने के याद स्पार्टन सेना स्वदेश लौट गई। जेमोन के इस व्यवहार से लोगों के हृदय में सदेह उत्पन्न होने लगे, और चे अन्न में सत्य भी निकले । योस देश में 1 ( १२८ ) पार्थियन नामफ खेल हुआ करते थे, उनमें अग्रस्थान पाने के लिए जेसोन ने बड़ा आग्रह किया। इस श्राग्रह का यही अर्थ था कि, ग्रीम देश में उससे पडा और काई न समझा जावे। उसने अपने लोगों के द्वारा उत्सव के यज्ञ में अर्पण करने लिए करे, मेढ़े, सुअर, आदि ग्यारह हजार पशु पकत्र कियों 'और बडे ठाट गट के साथ, अपनी सत्ता प्रदर्शित करते हुए उत्सव में प्राने का प्रबंध किया। किन्तु उत्त्तव आरम होने के कुछ दिन पहले ही उसका खून हो गया। इससे प्रोक रिया सता की पराधीनता कुछ दिनों के लिए टल गई । आगे चल कर मेसिडोनिया के राजा फिलिप ने, सारे ग्रीम देश को एक छत्र के नीचे लान का कार्य पर्ण किया। जेनोन की मृत्यु के बाद थोब्स और स्पार्टा में फिर युन प्रारम्भ हो गया। अजेसिलाम ने प्रार्कडिया प्रान्त पर चढाई कर के उसको विध्वस कर डाला । यह प्रान्त पेलापोनेसम का चराऊ प्रदेश था , और पान नामक पशुओं का दखता उसका अधिकारी समझा जाता था। यह पान देव गडरियों का पूज्य था । अजेसिलास के उपर्युक्त उपद्रव का बदला थोम्म पार पाडिया की सेना ने खून चुकाया सेनाए लेकोनिया प्रान्त में प्रविष्ट हुई के राज्य में लूट-मार करके ओर धनवान लोगों के वागवगीचे उजाड कर स्पार्दा में आ पहुँची। पर स्पार्टी के साथ उनका सन्मुख युद्ध न हुआ। दोनों दल एक दूसरे को, जिस प्रकार हो सका, तग करन लगे। मेसनिया प्रान्त के लोग, जो अपने देश से वचित हो गये थे, इस युद्ध में फिर अपने देश को पा गये । लगभग तीन सौं ये दानों और रास्ते में स्पार्दा , - -

1
( १२६ )
के पहले उनकाश स्पार्टा ने जीत लिया था, और व देश
निकाल दिये गय थे । उनमें से कुछ तो भाडिया प्रान्त
भार कुछ येचारे अन्य निपटवती द्वीपों में जा बसे ।
नशा शज पर तफ विद्यमान थे, जो परकीय देश में बड़ा
स तरह से रपे जाते थ, अतएव अपन पूर्वजों की भूमि
सनिया को वे सदर याद किया करत थे । इपामिनोंडास
र प्राकडिया प्रात में पाया तवये लाग यहुन जल्द उससे
मिले । इपामिनोंडास न भी, अपना असली दश फिर से
(तत करने के लिए, उन्हें सूब उत्साहित किया। फल यह हुशा
क, मेसेनियनों ने इपामिनांडास की महायता से अपना देश
पस ल लिया , और फिर वहा जा म । इपामिनोंडास ने
सान नामक एक नया नगर बसाया। उसकी क्लेिबन्दी
तनी सुदर और दृढ़ थी कि, उनको प्रशमा बहुत काल तक
होनी रही । यह किला शाथोम की टेकडी पर बनाया गया
पा । उसके कुछ भग्नावशेष अब भी दृष्टिगोचर हाते है
भर मेसेनिया मानो थीन्स को एक नवीन सहकारी मित्र
मल गया। पार्टी काधीनस्थ प्रदेश अब बहुत कम हो
बत : प्रोर थीम्स की महत्ता बढ़ने लगी । थी-स की यह
बदनी एयम से बिलकुल ही सहन न हुई। यहा तक कि उसने
पास को नीचा दिसलाने के लिए अपने पुराने शत्रु स्पार्टी
म. मित्रता तक कर ली। एथेन्स यह नहीं चाहता था कि,
पीय देश में बीस की ही सत्ता चले । हा, इपामिनोहास
और पिलोपिडाम योस को पढाना अवश्य चाहते थे।
अन्त में दोनों दलों का युर ठन गया,
और
बहाई के बाद दस वर्ष के भीतर धीम्स दोनों योद्धा रक्षक्षेत्र में
-
ल्यूष्मा की

.
( १३० )
मारे गये। पिलोपिडास थेमली प्रान्त में लडते लडते मारा
गया, और इपामिनोडास प्राडिया प्रान्त में मॉटिनिया के
युद्ध में काम आया ( सन् ईसघी के ३६२ वर्ष पहले ) । पा
मिनोंडास की मृ यु के पश्चात् शीघ्र ही पार्टी का राजा
अजेसिलास भी -४ वर्ष की अवस्था में मृत्यु को प्राप्त हुआ।
इसने ४० वर्ष तक स्पार्टा का राज्य किया। इस अवधि में
जितने
युद्ध इसने किये, उन सब में उसने विजय प्राप्त किया।
जब कि ईजिप्ट में, राजसिहासन के लिए दो पक्षों में झगडा
हो रहा था, एक पक्ष की ओर से यह वहा गया , और युद्ध,
करके अपना अभीष्ट सिद्ध किया। वहीं से लौटते समय
रास्ते में इसकी मृत्यु हो गई। अजेसिलास उस समय का
बडा पराक्रमी और शूर योद्धा था । शत्रुओं के साथ वह वडा
अच्छा व्यवहार करता था। उमके सद्गुणों की अनेक भारया
यिकाए प्रसिद्ध है। एक बार जब उसने कारिथ पर चढाई
की, चहा के कई देशद्रोहियों ने उसे सलाह दी कि, शहर पर
एकदम हम्ला करके उसे अपने अधिकार में ले लीजिए,
परन्तु उसने यह बात स्वीकार न की । उसने कहा,
"श्रावश्यकता पड़ने पर यद्यपि एक ग्रीक रियासत का दूसरी
रियासत को दण्ड देना उचित है, तथापि उसका समूल
नाश कर देना किसी प्रकार उचित नहीं।"
+
r

(. १३१ )
पद्रहवां अध्याय।
मासिडोनिया का फिलिप ।
(सन् ईसवी के ३६२-३५७ वप पहले।)
.
इगामिनोंडास की मृत्यु स श्रीस के सारे मनोरय विफल,
हो गए । परन्तु एथेंस का अपना गत वैभव फिर में प्राप्त
करने का कुछ मौका मिल गया। हा, इस समय ग्रीस की सय
रियामत लगातार युद्ध के कारण अत्यन्त दुयल हो गयी थी।
किसी में सिर उठान की ताकत न रही था। विदशी शत्रुओं
के हमलों से टक्कर मारना त उनक लिए बिलकुल असभव
था । तथापि, एक विदशी शत्र,
ने
बदुत जल्द उन पर चढाई
कर दी, वह मासिडोनिया का राजा फिलिप था।
ग्रीस के उत्तर में मासिडोनिया नाम म एक प्रदेश है। प्राचीन
काल में, इस प्रदेश में अनक छोटे छोटे सरदार थे, और वे
अपने अधीनस्थ द्वीपो पर स्वतत्रतापूर्वक राज्य करते थे
बड़ा नगर वहा केवल एक था। जिसका नाम पेला था। वहा
के राजा को ग्रीक उपनिवेशी कर दिया करते थे।
मासिडोनिया की राज्यपद्धति कुछ अधिक व्यवस्थित न
थी , और वहा के लोग भी अधिक सभ्य न थे। अधिकांश
लोग म्पनत्र थे , परन्तु मत्ता प्राय सेना के हाथ में थी।
मतलब यह कि, वहां की राज्यव्यवस्था सैनिक नीति पर
.

-
किया
( १३२ )
चलती थी। सेना का मुख्य अधिकारी ही वहां का गजा था
पर उस्स भी विशेष अवसरों को छाड कर राजचिन्ह धारण
करने का अधिकार न था । गजसिहासन के लिए सदा झगड़े
शुश्रा करते थे। द्वितीय अमिटाय (Ament as) को मृत्यु
होने पर उसका छाटा लडका फिलिप अपन अल्पवयी भतीजे
के नाम से राजकार करने लगा। उस अल्पवयो लडके का
रिता इलिरियन लोगो के साथ लडत समय मारा गया था।
फिलिप
छुटपन हीर धीटम में रह कर ग्रीक लागों की तत्का
लीन विद्याओं में निपुण हो गया था। ग्रीक लोगों को गाय
प्रवध शैली और युद्ध-काशल का उसने खूर निरीक्षण
था। उन्हों के प्राचार पर उसन अपन यहा भी नाना प्रकार
के सुधार किये । विशेषत सना के सुधार में उसने खूब
ध्यान दिया । कहा जाता है कि, सेना के चोखोनी सा खडे
करके लड़ने की युक्ति उनो की चलाई हुई है , पर अब यह
सिद्ध हो गया है कि, उसके पहले भी यह पद्धति ग्रीको को
ज्ञात थी। हा, थोब्स में पहले पहल फिलिप ने ही उस सोखा।
सन् ईसवी के ३५६ च वर्ष पूर्व अपन भतीजे को लिहासन
से उतार कर फिलिप स्वय राजा बन बैठा । उस समय लोग
अर्द्धसभ्य थे , और उन लोगों पर अपना प्रभाव जमाने के
लिप फिलिप में शारीरिक और मानषिक योग्यता पर्याप्तरूप
से थी । उसका डोलडोल सुन्दर और मुखमडल तेजस्वी
था। वुद्धि उसकी विलक्षण थी, वह बडा साहमी, उद्योगी
और उत्कृष्ट वक्ता था। स्वभाव,से वह चतुर, कौतूहलप्रिय
और चिन्तारहित था। उसका व्यवहार सब के साथ बहुत
अच्छा था, अतएव लोग उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। भतीजे
३

"
कोराज सिहासन से उतार कर उसने उसको कुछ कर नहीं
दिया, किन्तु बडे प्रेम के साथ उसको शिक्षा इत्यादि दिला
कर उसके साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया।
फिलिप के गजसिंहासन पर बैठते ही लोगों ने समझ
लिया कि, वह सारे प्रीस देश का अपने हाथ में ले लेगा। सच.
मुच उसने ऐसा ही किया। यह नहीं कि, युद्ध करके उसने
ऐसा किया हो , फिन्तु धीरे धीरे, मौका पाकर घह अपनी
मत्ता और प्रभाव बढ़ाता गया । यद्यपि यह स्मय शुर और
योद्धा था, पर युद्ध से उसे घृणा थी। वह जानता था कि,
युद्ध से गष्ट की बडी बडी हानिया होती है , भोर शाति से
हमारा हेतु भी सिद्ध होता है, तथा राष्ट्र की शक्ति भी
बदती ' है । अतएव जय तक उसका कार्य शांतिपूर्वक
निकलते गया, युद्ध को यह टालते ही गया। वह शूर होकर
भी दद्यानु भार साम्य समानशा था , अतएव विजित लोग
भी पडी प्रसशता के साथ उसके अधिकार में रहते थे। हा,
सेना के प्रबन्ध में अवश्य ही वह बडा फठोर था। लिखा है कि,
एक सिपाही ने उढे पानी से स्नान न करके गरम पानी से
स्नान किया , तथा एक दुसरे सिपाही ने मार्ग में ठहर कर
मद्य पान किया, इस पर उसने उन दोनों को अत्यन्त कठोर
दण्ड दिया।
फिलिप के राज पद धारण करते ही दो मनुष्य राज्य पर
अपना अधिकार जतलाते हुए, उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए।
एक को थूम के राजा का सहारा था, और दूसरे को एथेन्स
की मदद थी। पहले को तो फिलिप ने मीठी मीठी बातो से
समझाकर तथा कुछ रिश्वत देकर चुप कर दिया; पर दूसरे
६
-
4

। - ( १३४ ) साथ युद्ध करके उसने उसफी खूब सार ली । इस युद्ध, में यदुतेरे पीनियन उसको कैद में आये। उन कैदियों को उसन रडे सन्मान के साथ रपत्रा, और भी दडन लकर उसने उन्हें छोड दिया। एन्धेस पहुँच कर उन लोगों ने फिलिप की मडी प्रशसा की। एन्थेस की सरकार ने भी अपने वकील फिलिप के पास भेजकर उसस मित्रता कर ली। इस समय एन्थेत निवासियों की रहन-सहन में पहले। की अपेक्षा बडा तर पड़ गया था। पहले प्रत्येक पुरुष का सरकारी सेना म स्वयसेवक के तौर पर रहना ही पड़ता, या पर शव सेना में तिर्फ नौकरों की ही भरमार,यी। सैनिक चाहे जिस देश के निवासी होत थे , और केवल द्रव्य के लिए नौकरी करते थे। उनमें न प्रात्माभिमान था पोरन एथेन्स पर कोई विशेष भक्ति थी। एथेन्स में इस समय प्राय: ऐस ही लोग ये कि जो न्यायालय में अपनी सम्मातया देन के लिए जाते थे, और इस काम में उन्हें जो कुछ थोडा बहुत भत्ता मिल जाता था उसी से सतुष्ट हो बालली बन कर घर पर बैठे रहते थे। इनके अतिरिक्त जोगरीब थे उन्हसरकार से सहायता मिलती थी, प्रतएव निठल्ले रहने की उनकी भी चान पड गई थी। लाग शपने हाथ से कोई उद्योग धधा नहीं करते थे। उनके सारे काम गुलामों के द्वारा होते थे। इन कारणों से, और सेना में भाले के सिपाहियों की भरमार होने से, देश में चारों ओर दरिद्रता छा गई थी। जब युद्ध बद हो जाता था तव समुह पर तथा देश में चोरों का वडा उपद्रव हाता था सारी गोष रियासतों की सेना उस समय डाकू मार लुटेरे - .

। - ( १३५ ) 1 काम करती थी। पहले जिन पुरुषों के हाथ में राज्य की गिडोर रहा करती थी वे स्वययादा होते थे। पर अब सेनेट अधिश ऐसे हो 'मेम्बर भरतो होते थे जो युद्ध कला नाम से शू प रहत थे । साथ ही सेना के अधिकारी भी. बनट के कार्यों को न जानते थे। राज्य के प्रमुख लोगों में निका बनने की अपेक्षा बक्ता बनने की लालसा अधिक हती जाती थी। इस समय वक्तृत्व कला का महत्व बहुत बढा, ग्रा था और वह विडत्ता का प्रधान प्रग समझी जाती थी। -लसना की पद्धति भी पहले से अय बहुत विगड़ गई थी, चमग्ने यी हानि हुई। पहले जलसेना में नौकरी करना धन- ना कर्तव्य समझा जाता था। पर अब वे अपने पदते परे श्रादमी भी दे सकते थ, परन्तु जहाओ का वर्ष भर पूर्ण अय चूकि उन्हीं के मत्थे रहता था, अतएव ये, जहाँ के यन्ता, प्रलप चतन के अधिकारी जहाजों पर रखते थे। बाराश, क्या स्थलमेना; और क्या जलसेना, दोनों की बड़ी चिनीय दशा पी। सच तो यह था कि, एथेन्स में भर पहले पता ही नहीं रह गयी | लोग भोग विलास और लम्य फे दाम बन गये थे। प्रोन राज्यों की यह दशा स्वाभाविक ही फिलिप के लिए डी अनुकूल हुई । पर उम बुद्धिमान पुरुप ने उतावती नहीं जब तक उसे अपनी सफलता का निश्चय नहीं हुमा येन्म को उसने घमड में चा रहने दिया पर अपना उद्योग मन यही लूगी के साथ जाग रसा। उसके राज्य में समुद्र फिनाग बिलकुल नहीं था । अतपय उमको बडी इच्छा कि, आफिपोलिस बदर उनके अधिकार में पा जाय । यह , , ।

. , ( १३६ ) चंदर व्यापार के लिए यडे सुभीते का था । इसके सिवा वहां के जङ्गलों में जहाजों के लिए उपयोगी लकडी भी बहुत थी अतएव प्रांफिपोलिस से लड़ने के लिए उसने बहुत जल्द एफ कारण भी हूढ लिया । उसने एथेन्स सरकार से कहा कि, आफिपोलिस चन्दर पहले तुम्हारे आधीन था, पर भर नहीं है, सो यदि तुम मुझ से कहो, तो मैं उसे जीतकर फिर तुम्हें दे दू । एथेन्स सरकार उसकी बातों पर विश्वास कर, उसके चकर में आगई, और फिलिप की कार्यवाही में उसने कुछ दखल न दिया। फल यह हुआ कि, उसन आफिपालिम को जीतकर मासिडोनिया के राज्य में शामिल कर लिया और एथेन्स सरकार को टकासा जवाबदेदिया कि, इस शहर को जब मैंने जीता तय वह एथेन्स के अधिकार में न था. अतएव यदि मै अव उसे अपने अधिकार में रक्खू, समझता हू कि, उससे एथेन्स की कोई हानिनहीं है। फिलिप ने श्राफिपोलिस को अपने अधिकार में कर तो लिया, पर उसने उसकी प्रजासत्ताक राज्य पद्धति में कुछ परिवर्तन नहीं किया। आफिपोलिसके विजय के पश्चात् शीघ्रदी थेसलोवासिय ने फिलिप की सहायता चाही। थेसली की सारी राजसत्ता तीन अन्यायी अधिकारियों के हाथ में थी। वे, जैसा जी चाहता, चैसा अत्याचार प्रजा पर करते थे। फिलिप थेसली गया, और उन अन्यायी अधिकारियों को पदच्युत करके थेसली को स्वतन्त्र कर दिया। इस उपकार के बदले में थेसली- वासियों ने अपनी वसूली में से कुछ कर उसे भी देना सी फार किया और अपनी जहाजी सेना उसके उपयोग के लिए म . -

(१३७ )
दी। आगे चल कर प्रालिथियन लोगों ने भी उसका श्रोश्रय
सम्पादन किया । थेस प्रान्त के अनेक प्रदेशों को उसने जीता।
उन प्रदेशों में सुवर्ण को अनक खाने थीं । रहा उसने एक
नया नगर साया और उसका माम फिलिप रक्या । उसने
अपनी फोजीन्छावनी भी वहा रख दी।
येसली प्रान्त का प्रबन्ध करने के बाद उसने एपिरस के
राजा की पुत्री आलिपियास से अपना विवाह किया। एपिरस
रार थेसली प्रान्त की सीमा पर ही था। जब कि फिलिप
यूसमान्त में बढ रहा था तब पेला के मुकाम पर, सन्
ईसवी के ३५६ वें वर्ष पहले उसे पुत्ररत्न का लाभ हुधा । यही
पीछे पलेक्जेंडर या मिकदर के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
इस समय एथल भोर होड्स द्वीप तथा अन्य प्रान्ती में
निरर्थक युद्ध जारी था। ये प्रदेश नाम-मान को एथेन्स के
अधीन थे, परन्तु पथेंस को उन से फर मिलता था। दो वर्ष
तक यह युद्ध होता रहा और अन्त मेंएयेन्स कोहोड्स, कास,
कियास और वायजाटियम, नामक प्रदेशों के अपने सारे स्वत्व
बोड देने पडे। यह युद्ध इतिहास में "पारस्परिक युद्ध" के
जामले प्रसिद्ध है।
इस बीच में मोल देश में फिर एक बडी भारी लडाई
छिड गई, जिसमे फिलिप के मनोरथ कोमच्छो पुष्टि मिली ।
तथापि उसने वधुत समय तक अपनी तटस्थ वृत्ति नहीं छोडो।
यह युद्ध इतिहास में 'धार्मिक युद्ध' के नाम से प्रसिद्ध है।
युद्ध का मूल कारण यह था कि देल्फाय के मन्दिर की
व्यवस्था किसके आधीन रहे, थीम्स के,याफोसिस के ? घात
यह थी कि, फोमिस रियासत में 'सिहायन' नामक एक
,
.

( १३८ )
मैदान था। वह फोसियनों के अधिकार में था। उससे वे खूब
फसल पैदा करते थे, जिससे उन्हें बडा लाभ होता था ।
थीब्स के लोगों से यह न देखा गया। उन्होंने कहा कि
यह मैदान डेल्फाय के मन्दिर का है। श्रतएव इस पवित्र
प्रदेश पर निज के लिए फमल पैदा करके फोसियों
ने देवता का घार अपमान किया है। कहना नहीं हागा कि,
उनका यह कथन बिलकुल व्यर्थ था । वेश्राम कयन क मम
र्थन में किसी प्राचान इन्तकथा का प्रमाण देते थ, पर उसका
कुछ मूल्य न था । वे पूरी तरह स साधिन नहीं कर सकत थे
'कि यह जगह उक्त मन्दिर की ही है । पर राज सभा ने भाशा
दे दी कि, इस स्थान पर प्रथ फोसियन खेती न किया करे,
और अब तक उन्हाने जा किया उसके लिए वे दण्ड दें।
फासियन लोगों ने इस प्राज्ञा का पालन नहीं किया, इसमे।
युद्ध श्रारम्भ होगया। फोलिस को स्पार्टी की मदद थी,
थीन्स का महायक थेसली था। यह युद्ध ई० स० के ३५७ में
वर्ष पहले प्रारम्भ हुआ।
फिलोमिलस नामक एक धनवान महाशय फोनिम का
सेनापति था। उसने डेरफाय का मदिर अपने अधिकार में
ले लिया। इस पर थीम्स वासियो मे बड़ा कोलाहल मचाया
और सारी ग्रीक रियासतों से पुकार की कि "देखो, फोसि
पाप !" इधर फिलोमिलस ने युक्तिपूर्वक
डेरफाय के देवता से अपने अनुकूल प्रज्ञा प्राप्त करके यह
प्रकट किया कि, डेल्फाय के मदिर की रक्षा करने का अधि ।
कार केबल फोसियनों को है । इसके बाद वह दो वर्ष तक
पक्षी शरता से लड़ता रहा । अन्त में इसी लड़ाई में वह मारा :
और
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यनों का यह

--
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( १३६ )
गया उस के बाद, उसके स्थान पर, उसके भाई सोनोमार्फस
की नियुक्ति हुई।
' फिलोमिलस ने वचन दिया था कि, डेल्फाय के मंदिर
मी आयदाद पर वह हाथ नहीं लगायेगा, पर घोडा यहत
माल वहा से उसने मार ही लिया, घोर उसके भाई ने तो
उरफाय की सम्पत्ति से ही अपनी सेना का चेतन चुकाया,
और उसके सहायक एथेन्स तथा स्पार्टी के लोगों ने भी उस
पार धन के अपहरण करने में कमी नसी।
बहुत समय तक फिलिप इस युद्ध में शामिल न हुना।
घमका ध्यान दूसरा ही शोर था । वह अपनी सत्ता बढ़ाने
की धुन में लगा हुआ था। उसने एगीनियन लोगो का एक
बन्चर फिर अपने अधिकार में कर लिया और फोसिस पक्ष
क एक योद्धा को, जो थेनली प्रांत में प्रमुग्न था, पगजिन कर
सली में अपनी सत्ता बढ़ाई । तदनन्तर, सेम, इजिरिया,
और मामिडानिया मोजली गायों को अपने अधिकार
में करके उस पा राज्य का विस्तार चढाया । साथ ही
उसने बहत से नये जहाज बना कर अपनी नाविक शकि
भी रहा । मानिडोनिया प्रात में पडे बडे मरधागे के घराने
ध। उन्हें अपने वश में करने के लिए, उसने उनके होनहार
बहकों को शिक्षा के हेतु, अपने दरबार में रख लिया। उन्ह
पछ राजनेतिक, युद्ध सम्बन्धी, प्रीक साहित्य, नस्वशान आदि
'मर प्रकार की शिक्षा दिलवाता था । इस प्रकार से वह शिक्षित
ना कुलीन सरदारा को अपने पास रखता था । उसने
आयापित कर दिया था कि इस रीति से शिक्षित हुए विना
राज्य के ऊचे ऊचे पद पिसी को न मिले।

( १४०)
1
।
सोलहवां अध्याय ।
"
फिलिप की जीत ।
( ई० स० के ३५७ से २३६ वर्ष तक।)
ग्रीस देश में जब यह धार्मिक युद्ध प्रारम्भ हुना, उसी
समय के लगभग एथेन्स में डेमास्थेनिस नामक एक प्रसिद्ध
anा रहताथा। उसका पितानलवार बनाने का व्यवसाय करता
था। इस व्यवसाय में उसने यहुत धन कमाया था। वह सारा
बन मरते समय अपने पुता को देगया। पर उस समय पुत्र
की अवस्था केनल सात वर्ष की होने के कारण उसने बालक
और उसकी जायदाद की रक्षा करने के लिए तीन पालकों की
नियुक्ति कर दी । परन्तु इन पालकों ने पूरा विश्वासघात;
किया, और उसका सारा द्रव्य फूफ टाला। यहां तक कि
जव लडका पयरक हुआ तर उसे उदरपोपण के लिए कोई
न कोई व्यवसाय करने पी आवश्यकता जान पडी। उसने
वक्तृत्व कता मा ही अभ्यास किया, और आज कल जैसे
वकील वैरिस्टर काम करते हैं, वैसे ही यह भी कार्य करने
लगा। कहते है, पहले बद समानों में बोलते हुए घषडाता
था, रुक रुक कर भाषण करता था, और उसे अपने कधे वार
चार उठाने की भी बुरी प्रान्त थी, पर उसने परिश्रम करके
अपने सारे दोष दूर कर दिये, और ऐसा अच्छा वक्ता वन
गया कि, वह तत्कालीन बनायो.और राजनीतिज्ञों का शिरो.
2

- . ( १४१ ) मरि समझा जाता है। उसको कीर्ति आज भी अजर-अमर है। डेमास्धेनिस ने, वयस्क होने पर, अपने एक सरक्षक पर, उमके विश्वासघात के लिए, अभियोग चलाया, और स्थय उसकी पैरवी की। उसने अपना पक्ष ऐसे अच्छे ढंग से समर्थन किया कि, प्रतिवादी पर सरकार ने दसटेलेंट, अर्थात् लगभग पचास हजार रूपया दरह किया। इस मामले से उसका यश सूर फेल गया । इसके बाद वह राज्य प्रबन्ध. कारिणी सभा में भाषण करने लगा, और उसकी गणना पधेन्स के नेतामों में होने लगी। पथम मे उमास्टनिस ने एक बड़ा भारी काम किया। वह यह कि, उसन अपने प्रभावशाली भापण क द्वारा सब लोगों को यह जता दिया कि मालिडानिया का राजा फिलिप धीरे धीर अपनी महत्वाकाक्षा बढ़ा रहा है, और जान पडता हे, आगे चत पर वह साग ग्रीस देश व्याप्त कर लेगा । अतएव उसका प्रतीकार करने के लिए सब प्रीक रियासतों को, और विशेषत. पधेस को, कम- कस कर तैयार रहना चाहिए । इस विषय पर उसने जो व्यात्यान दिये वे फिलिपिक्स के नाम से प्रसिद्ध है, और भाज कल जा वाता पाई जाती है बमम ये उत्कृष्ट नमूने माने जात है। अस्तु । पथिनियन सर- कार के कुछ टापू फिलिप ने लूट लिये, ओर यूरिया के वन्दर से उसने एयेंग के कुछ भरे हुये जहाज भी पडे । इससे मालिथियम लागा को यह भय हुआ कि, अब फिलिप हम पर भी चढ़ाई करेगा । इस लिए उन्हाने फिलिप की सन्धि मग करके पयंस सेन्धि की, और ऐसी तेयारी कर रपी कि मौका पड़ने पर एयरा उन्हें सहायता दे । इतने में फिलिप

-
A
नै शालिथियन लोगों से युद्ध शुरू कर दिया। उनके अनेक शहरों
पर कब्जा करके अन्त में प्रालिथम को भी उसने घेर लिया।
इसके बाद आलिथिया की राज्यमनी के दो सभापदों को
घूस इत्यादि देकर उमने अपनी प्रोर मिला लिया, मोर उनके
विश्वासघात का उपयोग करके फिलिप नालिथिया शहर
पर भी अपना अधिकार कर लिया, वहां के लोगों को पकड
फर वह मासिडोनिया को ले गया, और उनको बहुत बुरी
तरह से अपमानित कराया। उन लोगों ने फिलिप से-जय
यह शिकायत की कि अधिकारी लोग हमारे म्नाथ पडा तुरा
वय करते ह नर उसने कहा, "हमारे लोग बिलकुल अशि
क्षित मोर भालेभाले है, धूतना का बर्ताव उन्हें बिलकुल'
मालूम नहीं है। जैसा होगा वेसा ही वे यर्ताव करेंगे।"
फिलिप ने पालिथस शहर को रवाद करके वहां के
लोगों को गुलाम की तरह वेच डाला । उनकी जमीन लेकर
अपने सैनिक अधिकारियों को वाट दी। इससे मासिडोनिया
पान्त और समुद्र के बीच का समग्र द्वीपकल्प उसके अधि
कार में आ गया. और उमका राज्य खूब बढ गया। थेसली की
सीमा पर डायम नामक एक शहर था। वहां उसने देवी के
नाम से यडा उत्सव किया, और उपयुक विजय के उपलक्ष
में बडे ठाट-बाट के साथ जुलूस निकाला ।
कुछ दिनों बाद पयेन्स के वकील पेला नामक मुकाम पर
फिलिप के पास गए , और एथीनियन कैदियों को छोड देने
के लिए निवेदन किया । फिलिप ने कहा, "एथेंस - झगडा
करने की हमारी रिलकुल इच्छा नहीं है, कुछ भी हो, उसके
साथ हम मित्रता ही रखेंगे।" यह कह कर उसने अपने तीन
-

-
,
T
( १४३ )
प्रतिनिधि सधि करने के लिए एथेन्स भेजे । ये प्रतिनिधि
जिस दिन एयेल पहुँचे उन दिन वहा डायोनिमिक
नामक वत्सरहा रहा था। शहर में याहरफ लोगो की बड़ी
भीड थी। लोग आमोद माह में पूरा मग्न थे । ऐने अवसर
पर चयदि कोई बागप्रतिनिधि आ जाते थ तो उनको
किसी बड़े श्रादमी के घर उहग कर उनका सत्कार किया
आ था । इसी रीति के अनुमार तीनों प्रतिनिधियों को
डेमास्धनिमअपने घर ले गया और उनका बटा आदर-माकार
किया, मोर दोनों पक्षों में सन्धि हो गई। यह सन्धि सन्
ईसयो के ३४६ वें वर्ष पूर्व हुई।
इस सन्धि के गगट बहुत जरर फिलिग ने थेस प्रांत को
जीत लिया, जिनसे हलेस्पाट ममुद्र के किनारे का महत्वपूर्ण
स्था। उसके अधिकार में श्रागया।
इधर धार्मिक युद्ध जारी हो या। फिलिप उसमें यमी नक
नहीं पडा था । यह तटस्थ रह कर मौकाटेरन रह था, जो उसे
बहुत जल्द मिल गया। वह शर्मापिली कीधारियों से अपनी सेना
रोकर फोसिस प्रदेश में उतरा याथीन्स को सेनाभी उरासे
आकर मिल गई। पर फोसियन शीघ्र ही उसकी शरण आगये।
नेताओं ने देश छोड कर बाहर जाने की प्रामा मांगी, सो उन्हें
मिल गई । शहर के शेष निवासियों ने अपने लिप कुछ भी न
रखते हुए मारा शहर उमके हवाले कर दिया और स्वयं भी
उसके अधीन होगये। फिलिप ने इस विषय पर विचार करने
के लिए कि, उनके साथ कैसाव्यवहार करना चाहिए, फिकि
योनिक नामक सभा की । उसमें यह निश्चय हुआ कि, लोग
अपने सारे मन शन और घोडे फिलिप के हवाले कर दे

-
(१४४ )
आयी को छोड कर शेष सारे नगर नष्ट कर दिये जावे, और
लोग जाकर भिन्न भिन्न गांवों में रहे, एक गांव में पचास से,
अधिक कुटुम्ब न रहें। इसके अतिरिक्त डेल्फाय की सपत्ति,
जो फोसियन लोगा ने हरण की थी, उसका मूल्य दस हजार
टेलेंट आंज्ञा गया, जिसके लिए यह तै हुआ कि जर तक पूरी
रकम न माजावे, प्रति वर्ष साठ टेलेंट दंड देते जावें । माफि
कृियोनिक सभा में उनके बैठने का स्वत्व छोने कर मेसीडो
नियन लोगों का दिया, साथ ही यह भी निश्चय किया कि,
मासिडोनियन लोग भी ग्रीक ही समझे जाय । पायथियन,
खेल में अग्रस्थान फिलिप को दिया गया, और उसन प्राफिक
लियोन सभा में स्त्रय पाकर बैठना प्रारम्भ कर दिया ।
इसके बाद उसने सारे ग्रीमदेश, विशेषतः पिलापोनेसस
प्रान्त पर अधिकार जमाने का प्रारम्भ किया। पिलापोनेसस
के लोगों को उसने यह दियलाया कि, 'मैं स्पार्टी से तुम्हारी
रक्षा करता हू' । पर इसकी यह धूर्तता एथेन्म में लोगों ने
जान ली। उन्होने पितापोनसस के लोगों का भ्रम दूर करने
के लिए टेमाथिनिम को भेजा। पर उसकी वक्तृताओं से कुछ
लाभ न हुआ । फिलिप को जो नये चन्दरे मिले थे। वह
उसने जहाज और अन शस बनाने के कारखाने खोल दिये
और थूल प्रान्त के अनर्भाग में उसने स्थायीरूप से फौज
छाधनी पायम कर दी।
इस प्रकार सर तैयारी होजाने पर फिलिप ने अपन
संशा स्वरूप प्रकट किया। ई० स० के ३३८ वर्ष पहले उस
चडी भारी सेना के साथ खुल्लम खुल्ला ग्रीस देश , पर चढ़
कर दी। नाथ में उसका लडका एलेग्जेंडर भी था। इस रा

-
( १४५
पुत्र को युद्धकला और राजनीति की उत्कृष्ट शिक्षा दो गई
थी । इसकी अवस्था उस समय १८ वर्ष की थी, और सेना
में उसे एक अधिकारी का पद मिला था।
पटिका प्रांत पर फिलिप की चढाई का समाचार सुनते
बी एथेंस में पडी सलपला मच गई। बाजार की दूकाने बन्द.
करके प्रापटेन ने सर्वसाधारण लोगों की एक सभा करने के
लिए शीघ्र ही आज्ञा दी। बहुत जल्द सब लोग जमा हो गये।
- उपयुक्त श्रापत्ति का समाचार चोवदार ने जोर से पुकार कर
सब को सुनाया , और तुरहो वजा कर कहा, "इस सम्बन्ध में
जिन्हें कुछ कहना हो वे भागे आयें, डेमास्थेनिस उठा ,
और एक प्रमावशाली व्यारयान देकर यह सम्मति दी कि,
निराश मत होमो, प्रतिनिधि भेज कर शत्रु के साथ लडने के
लिए सहायता मागो। डेमास्धेनिस की यह सम्मति लोगों
को पसद भाई थौर स्वय वही प्रतिनिधि बना कर थीव्स
भेजा गया । वहा जाकर उमने अपनी बक्तृत्वशक्ति से
ঘাষনা ক্ষা ছুব স্মনী গায় গাঙ্কনি দিলি ক লাখ
की हुई सघि तुडवा दी, और ग्रोस की स्वाधीनता की रक्षा के
लिए उनकी सहायता प्राप्त कर ली। अन्य रियासत भी भागे
- पदी । एयोनियन, कारिंथियन, प्राकेयन, यूवियन नादि सब
छोटे बड़े राज्य इस कार्य के लिए एक होगये 1 कुल तीस
सहल सेना एकन हुई । वियोगिया प्रान्त के विरोनिया
नामक स्थान पर, पहली ही लडाई में, सारा फैसला होगया।
विजयलक्ष्मी ने प्रसन्न होकर फिलिप के गले में जयमाला
डाली । और ग्रोक राष्ट्र को स्वतत्रता सदैन के लिए अस्त
होगई (सन् ईसवी के ३३८ वर्ष,पूर्व)।
-

। - इस पराजय से लोगों को जो दु ख हुम्ला, यह कलामातीन है। पथोनियन लोगों ने समझा कि बस श्रम फिलिप नाया, और हम लोगों के प्राण लिये । इस आशका स ये अपन नगर का प्रवन्ध फरने लगे। पर इमको कोई यारश्यकता न थी। फिलिप ने पथेम-निवामियो के साथ बड़ी ही सौम्यता से वर्ताव किया। कैदियों को उमन विना कुल दरड लिये ही छोड दिया ओर एवीनियन लोगों को नाम मात्न की स्वत मना देकर उनसे मित्रता कर ती। पर थीन्स से उसने ऐसा व्यवहार नहीं किया, किन्तु उसकी मारी स्वतंत्रता हरर करके उसने वहा अपनी सेना रप दी। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रोम को जीतकर भी फिलिप सतुष्ट नहीं हुआ। उसके हृदय में ईरान देश को विजय करने की बढी भारी उन्माता थी। इसके लिए उसने फारिथ में एक परी भारी सभा की । उस सभा में स्पर्टी को छोडकर अन्य सय रियासतों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। उसने सभा में यह प्रस्ताव किया कि एशिया की ग्रीक बस्तियों को ईरान के अधिकारी व्यर्थ के लिए कष्ट दते है, इसलिए सप ग्रीक रियासतों को एफन होकर ईरान की खबर लेनी चाहिये। फिलिप का यह प्रस्ताव सब रियासतों ने स्वीकार किया। इसर वाद यह निश्चय हुआ कि इग बृहद् कार्य के लिए फोन रियासत क्तिने जहाज और कितनी सेना देवे । सेना जमा हो जाने पर फिलिप सारी सेता का मुख्य सेनापति चुना गया। पहले फिलिप न पिलापोनेसस प्रान्त में प्रवेश करके स्पार्टी के प्रदेश जीत लिये, और स्पार्टा को हरा कर उसे उसने रिल कुल अपने अधीन कर लिया। स्पा का बहुत सा राज्य - - r -

(४७)
सर
लेकर उसे उमने पिलायोनेसम की अन्य रियासतों को दे
दिया। इस तरह उसन गर्दा का काम तमाम किया।
फिलिप और उसको रानो लिधियास में प्राय कभी
मेल नहीं रहा। अबकी बार फिलिप जर मासिडोनिया लौटा
उमने नालियियास का त्याग करके क्लियापैट्रा से विवाह
कर लिया। यह फिलिप के एमग्दार को भतीगी थी।
अलक्जेंडर वडा मातृना था। रिता के इस कार्य स वह
चहा नाराज एला, श्रार मा का लाय लेकर वह राज्य से चला
गया। पहल नह इलिरिया प्रान्त में गया। वहा के निवासी
मदर मासिडोनिया के विरद्ध गारत फिरा करने थे। परन्तु
फिलिप ने शीघ्र ही पुत्र को समझा बुझा कर पेला में वापस
सुनालिया। पहलीरानी काभाई एपिरस कागजाया। फिलिप
ने उसके साथ अपनी पुत्री का विवाह करके उसे अपनी ओर
। मिला लिया । मागा भाजी का विवाह ग्रीक लोगो में शार.
विमन्द्र नहीं माना जाता था ।
यह विवाह पपिरस की प्राचीन राजधानी ईज्या (Aeger)
मंचडीधूमधाम के साथ हुश्रा ! फिलिप था यश सोरभ चार्ग
शार फैल गया। उस समय उसकी जोप्रतिष्ठा थी, वसी किसी
पनि हुई होगी। पर उनका यह मौभाग्य रवि शीघ्र ही प्रस्त
हो गया। इस विवाह की धूमधाम में पाजेशिरस नामक एक
युगा ने भीड से निकल कर राजा के पेट में तलवार घुसड
दो और उसके प्राण त लिये। इस प्रकार वह अपना काम पूरा
का भागना दी चाहता था कि, रनों ने उसे पकड़ फरमार
डाला। इस प्रकार मासिडोनिया कागजा फिलिप २४ वर्ष तक
राज्य करके वर्ष की अवस्था में मृत्यु को प्राप्त मा।
-

(१४८ )
सत्रहवां अध्याय ।
अलेक्जेंडर दि ग्रेट।
( सन् ईसवी के ३३६-३३२ वर्ष पूर्व)
फिलिप के मरते ही ग्रीस देश में चारों ओर श्रानन्द का
गया। एथेन्स में उसकी मृत्यु का समाचार सब से प्रथम
डेमास्थेनिस ने सुना । उस समय वह अपनी एकलौती कन्या
की मृत्यु के शोक में था । पर उपरोक्त समाचार सुनते ही
उसने शोक की पोशाक छोड कर सफेट अंगरसा, दुपट्टा
और सिर पर फूली की माला धारण कर ली और आनन्द
पूर्वक यह समाचार लोगों को बतलाने के लिए बाहर आया ।
लोग भी इस बात को सुन कर बडे प्रसन्न हुए। उन्हाने गदिरी
में जाकर ऐसा महोत्सव किया जैसे मानो बड़ा भारी विजय
'प्राप्त किया हो। उन्होंने समझ रक्खा था कि मासिडोनिया
का भावी गजा हमें पूर्ण स्वातव्य देगा। पर उनकी यह मूल
शीघ्र ही उनकी दृष्टि में आ गई । अलेकजेंडर बड़ी भारी सेना
लेकर त्रीस में आया और थीम्स तया चन्य नगरों से कर
वसूल करते हुए एथेन्स आ पहुँचा। तब तो एथीनियन लोगों
के सारे उत्सब वद हो गए । अलेक्जेंडर के आगमन से लोग
में इतना प्रातक छा गया कि, प्रायटेन सभा ने प्रतिनिधि भे
कर अपने अनुचित व्यवहार के लिए क्षमा मागी। अलेक्जेंड
.
1
1
-

१४६ ), - । - जिनिस को सहन न उनका अपराध क्षमा करके कारिथ चला आया। वहां उसने एक सभा की, और सब रियासतों के प्रतिनिधियों को बुलाया । उस समय स्पोर्टी को छोड़ कर शेपं सर्व रियासता ने उसका,सार्वभौमत्व स्वीकार किया ! स्पार्टा ने' अवश्य ही अयं तक अपनी स्वतंत्रता का घमड कायम रखा। अलेक्जेंडर के विषय में एक घटना, जो कारिथ में हुई धो, बडी प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध तत्ववेत्ता डायोजिनिस उस समय कारिंय में रहता था। उसका आचरण अत्यन्त कठोर थी, और वह वंडी साधुवृत्ति “से रहता था ! उसका बाप एशिया माइनर के सिनीप नामक ग्रीक शहर में'व्यापार करता था। पिता के व्यापार का अनीति युक्त व्यवहार डायो; हुश्रा, और इस लिए वह घर छोड़ कर पथेस चला आया। यहा अंटिस्थेनिस नामक एक विक्षिप्त साधु का शिष्यत्व स्वीकार करके रहने लगा। अटिस्थेनिस ने सायनिक नामक एक निराला हो पर्थ स्थापित किया था। उसका सिद्धान्त यह था कि, समाज के बन्धनों और नियमों का पालन न करते हुए पोरं किसी प्रकार के विषयभोग में भी न पडते हुए सारा जीवन घोर तपस्या में व्यतीत करना चाहिए । डायोजिनिम की रयाति सुन कर हालेक्जेंडर उसके . दर्शनों के लिए गया, 'भोर बातचीत में उसन उससे पूछा, "महाराज, श्रापके लिए में या करू डायोजितल ने कहा- "मेरे सामने खडा हे इससे मेरे ऊपर धूप नहीं आने पोती, सांभर तु जरा दूर हो जा, बस और मुझे कुछ नहीं चाहिए। कहते हैं कि, अलेक्जे डा जब उसके पास गया था, तब वह उदे पानी में बैठा दुना तप कर रहा था। ५ 7 T . म - . ( १५२' ) उनकी कांसे की मूर्तियां वनवा कर उन्हें डायम में स्थापित किया। प्रानिकस की लडाई में अलेक्ज़डर को लूट में बहुत सा सामान मिला, जिसमें से तीन सा कवच उसने एथेन्स को भेजे। अपनी माता प्रालिपियांस के लिए उत्तम थालियां और तम्बुओं के अच्छे अच्छे सामान भेजे। अलक्जेंडर यहां से फिर सार्डिल गया । सार्डिस लिडिया के राजा कोसस की राजधानी थी। सार्डिन के लोगों ने नगर के द्वार खोल दिये और अलेक्जेंडर को भीता ले जा कर उसके शरणागत हुए। यहां उसने अपनी चढाई का नुस्ख" उहश पूरा किया अर्थात् ग्रीक बस्तियों को ईरान की अधी' नता से मुक्त करके उन्हें स्वतन कर दिया , और उन्हें उनके सारे स्वत्व दिला दिये । इस तरह उसने अपने विलक्षण पर कम से एक वर्ष के भीतर ही भीतर समस्त एशिया माइनर अपने अधीन कर लिया । इसके पश्चात् अलेक्जेंडर गोर्डियन गया । गोर्डियन फिजिया की प्राचीन राजधानी थी। जिया. देश सायम ने जीता था। गोर्डियन के किले में एक गाडी थी, उसकी धुरी इस युक्ति से बांधो गई थी-कि, उसे कोई खोत नहीं सकता था । रस्सी की सिय ही किसी को नहीं मिलता था। इस गाड़ी के विषय में पहले पर्फ विचित्र दन्तकथा प्रचलित धी कहते है कि, एक युद्ध के समय किसी ने यह भविष्यवाणी कही थी कि, एक गादी पर बैठ कर एक राजा इस शहर में आवेगा और वह चारों और शान्ति स्थापित करेगा। अष दिनों बाद मोडास नामक एक किसान अपनी गांडी में कैद कर गोडियन में पाया । उसे लोगों ने राज्यपद दिया। इस ॥ । || । -- | 1(:१५३) 'समय उसने अपनी वह गाडी देवता को अर्पण कर दी। बस, तभी से यह गाड़ी उस मन्दिर में रखी थी। उसकी गांठ के विषय में यह गाता नलित थी कि, जो कोई इस गांठ को खोलेगा, वही सारी एशिया का अधिपति होगा। अलेक्जेंडर ने जय यह यातां सुनी तर उसने गांठ सोल कर स्वय उस भविष्यवाणी को सत्य कर दिखलाने का निश्चय किया । वह बहुत जल्द.गाडी के गाम , गया , और अपनी तल गार से गांट को काट दिया, कोई कहते हैं, गाडी और धुरी को जोडनेवाला एक लम्या पीला था, उसे अलेक्जेंडर में पकड कर खींच दिया, जिसमे गांठ श्राप ही खुल गई। : अलेक्जेंडर योगेकने के लिए डरायस ने बडीभारी सेना एकत्र की और पूर्व श्रोर के राजाओं की चाल के अनुसार ! बहे डाट वाट के साथ अलेक्जेंडर से सामना करने के लिए । कच किया । उसको तम्बू क्या था, एक बडा वगला ही था। * इस पर सूर्य की प्रतिमा बनी हुई थी । क्योंकि ईरानी लोग : सूर्योपासक थे। वह एक बडे सुन्दर रथ पर बैठ कर चलता था। उसके रथ के मागे ज्योनिधी और पुजारी चादी की कुंडियों में जलती हुई अग्नि लेकर चलते थे। उस अग्नि के साथ एक ही जाति के ३६५ नवयुवक पुजारी रगीन चन्न • धारण किये हुए चलते थे। रथ के साथ सरक्षक सेना चलती यो । उसके पीछे राजमाता, रानी और लडके बच्चे अपने अपने परिवार सहित रथ पर बैठकर चलते थे। फिर तम्बू, में लगाने के सोने चांदी के घामूल्य सामान, जवाहिर, सुग- धित द्रव्य और अन्य मूल्यवान पदार्थो की गाडियां चलती यो । राज्य के बडे बडे सरदार, अपने अपने परिवार और १

( १५२)
उनकी कांसे की मूर्तिया वनवा कर उन्हें डायम में स्थापित
किया । प्रानिकस की लड़ाई में अलेक्जेंडर को लूट में बहुत
सासामान मिला, जिसमें से तीन सा कवच उसने एयेन्स का
भेजे। अपनी माता प्रालिपियास के लिए उत्तम थालियां
और तम्बुओं के अच्छे अच्छे गामान भेजे।
अजफजेंडर यहा से फिर सार्डिल गया । सार्डिस लिडिया
के राजा क्रीसस की राजधानी थी। सार्डिस के लोगा जे
नगर के द्वार खोल दिये और अलेक्जेंडर को भीतर लजा
कर उसके शरणागत हुए। यहां उसने अपनी चढाई का मुख्य
उद्देश पूरा किया अर्थात् ग्रीक बस्तियों को ईरान की अधी
नता से मुक्त करके उन्हें स्वतंत्र कर दिया , और उन्हें उनके
सारे स्वत्व दिला दिये। इस तरह उसने अपने विलक्षण परा,
क्रम से एक वर्ष के भीतर ही भीतर समस्त एशिया माइनर
अपने अधीन कर लिया।
इसके पश्चात् अलेक्जेंडर गोर्डियन गया। गोर्डियन
फ्रिजिया की प्राचीन राजधानी थी। फ्रिजिया देश सायरस
ने जीता था। गोर्डियन के किले में एक गाडी थी, उसीधुरी
इस युक्ति से बांधो गई थी-कि, उसे कोई खोल नहीं सकता
था । रस्सी का सिय ही किसी को नहीं मिलता था। इस
गाड़ी के विषय में पहले एक विचित्र, दन्तकथा प्रचलित थी.
कहते है कि, एक युद्ध के समय किसी ने यह भविष्यवाणी
कही थी कि, एक गाड़ी पर बैठ कर पक राजा इस शहर में
आवेगा और वह चारों और शान्ति स्थापित करेगा। कुल
दिनों बाद मोडास नामक एक किसन अपनी गांडी में बैंड
कर गोर्डियन में आया । उसे लोगों ने राजनपद दिया । उस
।

. +- . 1(.१५३) समय उसने अपनी वह गाडी देवता को अर्पण कर दी। बस, भी से यह गाडी उस मन्दिर में रखी थी। उसकी गांठ के घपय में यह पार्ता प्रचलित थी कि, जो कोई इस गांठ को खोलेगा, वही मागे एशिया का अधिपति होगा। अलेक्जेंडर ने जन यह यार्ता सुनी नय उमने गांठ खोल कर स्वयं उस भविष्यवाणी को सत्य कर दिसलाने का निश्चय किंग । वह बहुत जल्द, गाडी के पास गया , और पानी सलवार से गाठ को काट दिया, कोई कहते है, गाडी और भुरी को जोडनेवाला पर लम्बा खीला था, उसे अलेक्जेंडर ने पकड कर खींच दिया, जिससे गाठ आप ही खुल गई। अलेक्जेंडर को रोकने के लिए डरायस ने बडीमारी सेना एकत्र की और पूर्व पोर के राजाओं की चाल के अनुसार बडे ठाट-बाट के साथ अलेक्जेंडर से सामना करने के लिए कूच किया । उसको तम्बू क्या था, एक वडा वगला ही था। इस पर सूर्य की प्रतिमा यनी हुई थी । क्योंकि ईरानी लोग सूर्योपासक थे। वह एक वडे सुन्दर रथ पर बैठ कर चलता था। उसके रथ के आगे ज्योतिषी और पुजारी चादी की कुड़ियों में जलती हुई अग्नि लेकर चलते थे। उस अग्नि के साथ एक ही जाति के ३६५ नवयुवक पुजारी रगीन पेन धारण किये हुए चलते थे। रथ के साथ सरक्षक सेना चलती. - थी। उसके पीछे राजमाता, रानी और लडके बच्चे अपने अपने परिवार सहित रथ पर बैठकर चलते थे। फिर तम्बू में लगाने के सोने चांदी के घामूल्य सामान, जपादिर, उग- न्धित द्रव्य और अन्य मूल्यवान पदार्थो की गाडियां चलती यो । राज्य के बडे बडे सरदार, अपने अपने परिवार और । । -- . . - लवाजमे सहित उनके पीछे पीछे चलते थे। पर इस युद्ध के समय लब मूल्यवान पदार्थ और दूसरे कुटुम्ब, रक्षा के लिए, डमास्कस भेज दिये गये थे ; केवल राजकुटुम्र साथ में था। अस्तु । दोनों सेनाओं की मुटभेड इसस नामक मुकाम में हुई । युद्ध का फैसला होने में कुछ अधिक विलम्य न लगा। ईरानी लोग पूर्ण रूप से पराजित हुए । डरायस, थोडे से लोगों के साथ, जान बचा कर भाग गया। उसका सारा कुटुम्ब, तम्बू और जवाहिर इत्यादि अलेफजेंडर के हाथ लगे। डरायम की रानी स्टाटीरा बडी सुन्दर थी। उससे अलेकजेंडर ने कहला भेजा कि, "आप कोकनी प्रकार का कष्ट नहीं होने पावेगा। आपके गजमहल में जैमी प्रतिष्ठा आपकी थी वैसी ही यहां भी रहेगी।" इतिहासकार लियते हैं कि अलेक्जेंड अपने इन वचनों का अक्षरश पालन पिया। इस विजय के पश्चात् । डमास्कस के 'जवाहिर इत्यादि मूल्यवान् पदाथां पर अधिकार करने के लिए अलेक्जेंडर ने पार्मिनिग्रोन नामक सरदार को भेजा । डमास्कस के अधि कारी ने शहर के दरवाजे खोल कर' पार्मिनियोन को भीतर ले लिया , बस उस समय ऐसी कुछ गडबडी मी कि उसमें से बहुत सा सामान सरांच होगया । इधर अलेक्जेंडर फिनिशिया प्रान्त में गया । यह प्रान्त जन और धन दोनों से भरपूर या जहाजों , का, चूकि वहा अच्छा,सुभीता था, अतएव यह मुकाम अनेकजेंडर के लिए। विशेष महत्व का था। फिनिशिया प्रान्त के टायर और सिडोन नामक नगरों की सम्पति, व्यापार और कारखाने । M . . - -- ( १५५) मग जगह प्रसिद्ध थे। सिडोन नगर तो एकदम अलेक्जेंडर के अधिकार में आगया , पर टायर के लोग डरायस का पक्ष लेकर लड़ने लगे। टायर नगर समुद्र से कुछ दूर एक द्वीप पर बसा हुआ था। बीच में किनारे तक गहरा समुद्र था। अलेक्- अंडर के पास जहाज अधिक न थे। इसलिए उसने लेवानन के जगल से लकडी का कर वहा तक पुल बनवाया और उस पर से अपनी सेना ले जाकर नगर को चारों ओर से घर लिया। उस समय को देखते हुए अलेक्जेंडर का यह कार्य निस्सन्देह बडे पराकम का है। कारीगर लोग जब कि समुद्र का तट तैयार कर रहे थे, अलेक्जेंडर ने लकडी की मीनारें माही करा कर उनकी वहाँ रक्षा की थी । अस्तु । पुल को तोडने के लिए टायर निवासियों ने बडे प्रयत्न किये। अन्त में उन्होंने भाग के जहाज भेज कर बना बनाया पुल जला ही हाला । परन्तु अलेक्जेंडर ने होड्स, साइमेस, आदि स्थानों से जहाज मॅगा कर फिर पुल तैयार कराया, और सात महीने युद्ध जारी रख कर अन्त में टायर शहर को जीत ही लिया। टायर निवासियों को घोर दण्ड देकर अलेक्जेंडर ने अपने कष्टों का पहला चुकाया । बहुतेरे मनुष्य तो युद्ध ही में मार डाले गये, और लगभग तीस हजार, जो कैद होगये थे, गुलाम बना कर बेच दिये गये। रायस ने दो वार अलेक्जेंडर से संधि के लिए प्रार्थना की) पर उसने स्वीकार नहीं किया और अगले युद्ध के लिए तैयारी की । वह अपनी सेना को साथ लेकर इजिट गया। वहां किसी ने उसकी बाट नरोकी । इजिप्शियन लोग 1, इसकी शरण मागये । इजिप्ट के पुरातन फारो राजाओं की । - - 1

( १५६ )
राजधानी मेंफ़िस में अलेक्जेंडर ने एक बड़ा उत्सव किया।
जहा इस समय कायरो है वहीं उस समय मेंफिस शहर था।
इजिप्ट में उस समय समुद्र के किनारे पर कोई अच्छा शहर
न था। सिकन्दर ने यह सोच कर कि, ऐसा शहर बस जाने से
-यूरप और एशिया का व्यापार इजिष्ट में खूब चमकेगा, नील
नदी के मुहाने पर अलेक्जेंड्रियो नामक शहर प्रीक लोगों को
लाकर बसाया। थोडे. ही काल में यह शहर ससार के मुख्य
व्यापारिक स्थानों में अग्रगण्य होगयो । अस्तु। अन्त में मैफिस
और पेल्यूजियम नामक स्थानों पर अपनी फौजी छावनी रस
फर सिकन्दर डरायस से युद्ध करने के लिए फिर पशिया लौट
पाया।
-
V
T
अठारहवां अध्याय।
।
।
"
3
।
अलेकजेंडर दि ग्रेट ।
उत्तरार्थ ।
(ई० स० के ३३२-३३३. पूर्वः।)
TA
अलेक्जेंडर के आने पर आयला नामक मुकाम पर डरा
यंस के साथ उसका डा. भारी युद्ध हुआ। आर्येला टा
प्रस नदी के तट पर है। 'स'युद्ध में ईरानी साम्राज्य की
सा हो गया | इस प्रकार सिर्फ अट्ठाईस वर्ष की

५ १५ अवस्था में मलजेन्द्र में सम्पूर्ण सभ्य राज्यों पो हस्तगत कर लिया। 'डरायसे की सेना में मध्य एशिया, अफगानिस्तान और भारत की सीमा के शूर, पर जंगली, लोगों की विशेष भरती यो । उसके साथ हाथी और युद्धरथ थे । उसकी सेना अले. क्जेंडर को सेना से अधिक थी। दोनों दल बडी शूरता से लडे, पर ग्रीक सेना विशेष शूर और दक्ष थी, अतएव ईरान का पराभव हुआ। ओर डरायम का सारा राज्य अलेक्जेंडर के अधिकार में आगया। डरायस हार कर ऐक्वाटना' को भाग गया, और अलेक्जेंडर यायिलोन चला गया। वही सब 'बडे बडे सरदारों और लोगों ने उसकी अगवानी की, और सारा शहर खजानेसहित उसके अधिकार में दे दिया । जन- साधारण ने भी उसका बडा सत्कार किया, और यह भाय प्रकट किया कि, जो हुआ सो अच्छो ही हुआ । जिस मार्ग 'से बह निकला, लोगों ने चादी की कुडियो में सुगन्धित द्रव्य जलाये, और उस पर पुष्पवृष्टि की। इस समय यपि चावितोन प्राचीन काल के ममान उन्नतावस्था पर न था, फिर भी वह बहुत बडा और धनवान् नगर था । वहा'अपार संपत्ति का सचय या। वहा जोसोना चादी मिला, उसका थोडा बहुत अश प्रत्येक सिपाही को मिला । अलेक्जेंडर ने फ्जर्जिस के नष्ट किये हुए मन्दिरों को फिर से बनाने की प्राशा दी, जिससे वह और भी अधिक . १ बोक प्रिय होगया। इसके बाद अलेक्जेंडर डरायस की राजधानी सूज़ा में गया, और वहा का रोजमहल अपने अधिकार में कर लिया ((१६०) था। उसंपर भरिमेजिसा नामक एक किलेदार। कुछ लोगों के साथ पडे बन्दोवस्त से रहता था। आक्जियार्टिस नामक एक अन्य सरदार ने अपनी स्त्री और पुत्री को संरक्षण के लिए उसी किले में रख दिया था। किले में दी वर्ष के लिए मोजन- इत्यादि की सामग्री थी, और ऊपर जाने के लिए एक ही छोटा तग मार्ग था। अलेक्जेंडर ने किलेदार से कहला भेजा कि किला हमारे अधिकार में दो दो। इस पर अरिमेजिस ने हँस कर दूतो से कहा कि, क्या नीकों के पख है ? इस उत्तर को सुनकर अलेकजेंडर ने अपनी सेना में जाहिर किया कि जो-सिपाही पहले किले पर चढकर जायगी उसको पचास हजार रुपैया पारितोषिक दिया जायगा। इस पर अनेक सैनिकों ने ऊपर, चढने का प्रयत्न किया और मृत्यु को प्राप्त हुए । अन्त में कुछ सैनिक बर्फ में खूटे फेंककर उनमें बंधी हुई रस्सियों के द्वारा ऊपर चद'गये; और ज्यों ही ऊपर जाकर उन्होंने अपने झडे फहराये त्योही अलेक्जेंडर ने अरिमेजिंस के पास दूत भेजकर कहलां भेजा कि, "देखो ग्रीकों के पंख हैं या नहीं 12 अरिमेजिस, ग्रीक सैनिकों को किले पर देखते ही, उनकी संख्या पर ध्यान न देतेष्टुए, एकदम अलेक्जेंडर की शरण आंबाया, फिले के सब लोग कैदकर लिये गये, पर अलेक्जेंडर आफ्जियोर्टिस की पुत्री रोक्जानों का अनुपम' स्वरूप देखें- कर इतना मोहित होगया कि उसके साथ विवाह कर लिया। और इस हर्ष में उसने सब कैदियों को छोड़ दिया । लडकी का पिता भी प्रसन्न हुआ और इस तरह वह सारी राष्ट्र आनन्दपूर्वक अलेक्जेंडर के अधिकार में आ गया।।" .

-- और वह (१६१२): भाला की लड़ाई के बाद कै लडाइयों में अलेक्जेंडर ने ईरान का साग विस्तृत, राज्य जीत लिया, इससे, कास्पि- यन समुद्र से सिधु नदी तक सारा प्रदेश उसके अधिकार- मैा गया । पूर्व और उसके राज्य की सीमा मध्यपशियो में, सीर नदी तक पहुँच गई । सोर नदी के उस पार सिथियन जाति के नमणकारी लोग रहते थे। इसी धावे में उसने. कदहार और हिरात शहर बसाये। । बार बार विजय पाने के कारण सिकन्दर को वडा भारी, , अभिमान हो गया। उसका स्वभाव विगड गया, हठी तथा दुराग्रही बन गया । प्राच्य राजाओं की करता और विषय-वासना उस के हृदय में प्रादुर्भूत होगई । वह इधर के राजामों को सी केवल पोशाक, ही नहीं पहनने लगा ; किन्तु इधर के टोटबाट और रीति रवाज भी उसने स्वीकार कर लिये। वह भाति भाति के क्रूर कार्य और ,अन्याय करने लगा, जिससे उसकी उज्वल कीर्ति में सदा के लिए कालिमा लग गई। उसके अन्याय का एक उदाहरण इस प्रकार है पानियोन नामक उमका एक वृद्ध और अत्यन्त विश्वासपात्र सरदार था । यह एक प्रकार से उसका परम मित्र और मत्री' या। उसं वृद्ध महाशय ने अलेक्जेंडर के पिता को ही नहीं, किन्तु उसके आजा-तक की, बडी भक्ति से सेवा की थी। ऐसे. उत्तम पुरुष को अलेक्जेंडर ने बिना- विचारे मरवा डाला। कारण यह हुआ कि, पार्म नियोन का पुत्र. फिलोटस सवारों. का मुख्य अधिकारी था । उस पर. यह अभियोग लगाया गया कि, वह उस पडया से सम्बन्ध रखता है जो अलेक्जे: हर, को मारने लिए रचा गया था, यह अभियोग अभी -- - - " 5 , ( १६२”) , फिलोटस पर सिद्ध न हुओ , था, कि सिकन्दर ने उसे मरवा डाला । भागे चलकर वही, अभियोग पामेनि. योन पर भी आया । चाहे अलेक्जेंडर ने उसको सशा अप राधी लमझा हो; और चाहे इस बात से डरा हो कि यह कहीं अपने सबके का बदला न ले-जो कुछ हो-अलेक्जेंडर ने एकदम गुस्सr 1 कर उस बेचारे वृद्ध का शिरच्छेद फरवी डाला । ध्यान में रहे कि, अभी पानियोन को अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार नहीं मिला था, और सिकन्दर ने उसका अभियोग भी उस पर प्रगट नहीं होने दिया था। पानियोन जिस समय मारा गया उस समय वह पत्र पढ रहा था। इसके बाद शीघ्र ही अलेक्जेंडर स्वय अपने हाथ लोगों का वध करने लगा। कायटस नामक उसका एक मित्र था। उसने अनेक बार सिकन्दर के प्राण पचाये थे, और हाल ही में वेक्ट्रिया प्रान्त का शासनकर्ता नियुक्त हुआ था। एक दिन रात को भोजन के पश्चात् दोनों में किसी बात पर झगडी हो गया। पास के लोगों ने अलेकज डर को शांत करने का पड़ा प्रयत्न किया,और क्लायटस से बाहर चले जाने को कहा। इतने में अलेकजेंडर ने पास के एक सिपाही के हाथ कामाला छीन लिया , और लोग उसका हाथ पकडने न पाये थे, कि उसने कायटस का काम तमाम कर दिया। ऐसे कार्य अलेक् जे डर के समान महा पुरुष को शोभा नहीं देते, किबहुना उसने पहले जो भनेक उदारतापूर्ण सत्कार्य करके कीर्ति प्राप्त की थी, उसमें इन दुष्कार्यों से और कलंक लगा है। पूर्व मोर अलेक्जेंसर के राज्य की सीमा सिन्धु नदी तक - 1 ।

17
.
( १६३ )
थी। इसके आगे की प्रदेश यूरोपियन लोगों को उस समय
तक बिलकुल ही मालूम न था। सो उसमें प्रवेश करने का
भव अलेक्जटर ने प्रयत्न किया। पंजाब में पहले-पहल उसने
प्रवेश किया। यहां उस समय दो राज्य थे-एक सिधु से
हिराम्पिस ( अर्थात् मेलम) तक और दूसरा हिडास्पिस के
पूर्व भोर का राज्य । पहले पर तक्षिलिस* और दूसरे पर
पोरस राज्य करता था। पोरस बहा शूर और डीलडौल
में भव्य पुरुष था ।
ततिलिस और पोरस में अपन थी। अतएव पोरस
से बदला लेने के लिए तक्षिलिस ने अलेक्जेंडर से मेत्री की।
इसन अलेक्जहर की सेना को सिधु नदी से इस पार आने
के लिए लकडी का एक पुल बनवा दिया और अनादि से
सहायता पहुँचा कर यह स्वय पाच हजार सेना के साथ
उससे जा मिला। हिडास्पिस नदी के तट पर घोर संग्राम
इया, जिसमें पोरस पराजित होकर सिकन्दर का बदी
हा। इस कठिन अवसर पर पोरम ने अलेक्जेंडर के साथ
बडे धैर्य और मर्यादा का वर्ताव किया, जिससे अलेक्जेंडर
पहुत प्रसनभा और पोरस का राज्य वापस कर दिया।
इसके अतिरिक्त उसने उसे और भी अच्छी मदद दी, तथा
जनवीन राज्य भी उसको जीत दिया।
। इसके सियाय उसने ततिलिस और पोरस की मेत्री भी
* पीक तिहास में मिशिनिस राजा का माम बताया गया है। पर
यह वास्तव में तपशिखा' मामक नगर के माम का अपक्षश ज्ञात होता है।
'शिव'माम नगर भटक के पास पा।

. - - फरा-दी। तक्षिलिस अलेक्जेंडर की- मांडलिकता स्वीकार करके अपने राज्य में बना रहा। अलेक्जेंडर का विचार और आगे, गंगा नदी, तक, बढने का था, पर उसके सैनिकों को घर छोडे चूकि बहुत दिन हो चुके थे, अतएव उन्होंने आगे बढने से इन्कार किया। इस लिए आगे बढ़ने का विचार छोड़ कर वह अपनीसेना डॉगियों में भर कर हिडास्पिस नदी से सिन्धु नदी में पाया और पहा से फिर वह वैसा ही नीचे समुद्र में उतर गया। मार्ग में सिंध प्रात के लोगों से उसके, अनेक समाम हुए। एक बार,तो वह स्वय घायल हुा । उसका वृत्तान्त इस प्रकार हैं. कि, मल्लो (मुलतान ? ) नामक एक नगर था। उसे पर अधिकार करने के लिए तट पर रस्सी लगा कर सबसे आगे वह चढ रहा था । अन्त में वह ऊपर पहुँच गया,परन्तु शेप सैनिक, रस्सी टूट जाने के कारण, ऊपर न पहुँच सके। इधर शत्रुओं के वाणों की-वर्षा, वरावर, हो रही थी। इतने में एक, यास सिकन्दर के कधे पर श्राकर लगा, जिससे वह घायल हो गया, पर बहुत जल्द उसके सिपाही पहुँच गये, और उसे उठा कर तम्बू में ले आये। इसके बाद फ्रोध में श्राफर इन्होंने शत्रु, के सब सिपाहियों को काट डाला। वाद को पाराम होजाने पर अलेक्जेंडर फिर आसपास के लोगों से हाडता हुधा, वापस चला गया। भारतवर्ष पर अलेक्जेंडर ने व्यर्थ ही चढ़ाई की थी। यहां के किसी राजा-से उसका बैंर या, प्रीतिनहीं थी। ऐसी अवस्था में जा कि वह हिन्दुस्तान पर चढाई करके आया, तब तो उसकी इस चढ़ाई को लुटेरे और उच्छ, खल लोगों के . . - ( १५ ) गिरोह की ही उपमा देनी चाहिये। जो हो, उसकी चढाई से हानि के साथ साथ कुछ लाभ भी अवश्य हुए । इस चढाई के कारण यूरोपियन लोगों का भौगोलिक और सृष्टिज्ञान बढा, यूरोप और एशिया का परस्पर-व्यवहार प्रारम्भ होगया, जिस से मारे जगत् के व्यापार की यडी उन्नति हुई । सिधु नदी के मुहाने पर अलेक्जेंडर ने व्यापार क लिए एक मजबूत किला बनवाया, वहां से उसने, निपार्कस नामक सरदार के अधिकार में जहाजों का एक बेडा देकर, उसे किनारे ही किनारे जल. मार्ग का पता लगाने के लिए पहले ईरान की साडी और पीछे यूफ्रेटिस नदी के द्वारा आगे भेजा । इस यात्रा के कारण ईरान की खाड़ी से भारत का माल पाविलान, और उधर के अन्य शहरों में ले जाने का, तथा वहासे लाल समुद्र होते हुए इजिप्ट में पहुँचान का बडा सुभीता हो गया। इजिप्ट में आया हुआ माल नहरों के द्वारा नील नदी में लोकर, फिर वहा से जहाजों के द्वारा अलेक्ज ड्रिया को, और फिर वहा स सारे यूरप को । भेजने लगे। पूर्वीय व्यापार के सिकन्दर के निकाले हुए ये मार्ग पद्रहवीं सदी तक जारी रहे। इसके बाद जब यूरोपियन लोगों को अफ्रिका के दक्षिणी सिरे से घूम कर भारत महासागर में भाने का जलमार्ग मिल गया तव उपर्युक्त स्थलमार्ग बन्द हो गये। यूझटिए नदी से ऊपर आने पर मालेक्जेंडर की सेना को बडे बडे रेतीले मैदान पार करने पडे। जिससे सैनिकों को यदा कष्ट हुभा, और पानी के विना अनेक लोगों के प्राण गये। अन्त में भलेक्जेंडर अपनी मुरयासेना को लेकर ईरान की राजधानी (सूजा १) में पहुंचा। वहां उसने, कुशलतापूर्वक पहुँच जाने 4 - के हर्ष में, बडा उत्सव किया। वहीं उसने, एक स्त्री के रहते, दूसरी से विवाह करने की प्राच्य रीति को स्वीकार करके उरायस की वही लडकी स्टाटीरा से विाह किया, और अपने बडे बडे सरदारों का विवाह भी उसने कुलीन ईरानी और मीडियन स्त्रियों से करा दिया । यूरोपियन भार पशि यन लोगों में विवाह की चाल डालने का उसने बडा प्रयत्न किया। वह समझता था कि, इससे हमारा राज्य चिरस्थायी हो जायगा । इसके बाद अलेक्जेंडर बहुत जल्द याविलोन गया। उसकी इच्छा वही स्थायी रूप से निवास करने की, तथा बाक्लिोन को अपने साम्राप्य की मुख्य राजधानी बनाने की थी । तद्- नुसार उसने वहाँ अनेक नवीन कार्य प्रारम्भ किये। टाइप्रस और यूनोटिस के बीच की, जो पुरानी नहरें बन्द होगई थीं, उन्हें उसने दुरुस्त कराया । निस्सन्देह, उसके प्रयत्न यदि सिद्ध हो गये होते तो बाविलोन का प्राचीन वैभव फिर उसे प्राप्त होजाता । पर बहुत जल्द ज्वर' के कारण उसका देहान्त हो गया।'सन् ईसवी के ३७३ वें वर्ष पूर्व उसकी मृत्यु हुई । उस समय उसकी अवस्था पूरी ३३ वर्ष की भी न थी। इजिप्ट के मैफिस नामक स्थान पर उसकी अन्त्यविधि हुई, उसकी लाश यहां से लाकर अलेक्जेंड्रिया में गाडी गई । उसका सारा जीवन युद्ध और राज्यविस्तार में व्यतीत हुआ। पर हाथ की तलवार म्यान में जाते ही उसका वैभव पण भर भी नहीं टिक सका, किन्तु छाया के समान जहा का तहां ही लुप्त होगया। 1 वह .. - -

( १६७ )
उन्नीसवां अध्याय ।
-
-
मासिडोनियन राज्य के टुकड़े
(ई० स० के० ३२३-३१६ वर्ष पहले।)
1
,
अलेक्जेंडर सारे ग्रीस देश पर राज्य करता था। हा,
स्पार्टी के राजा 1 उसको अधीनता स्वीकार नहीं की। एशिया
की चढाइयों में सब ग्रीक रियासतों ने सिकन्दर को सहायता
दी , पर स्पार्टी ने नहीं दी। यही नही, किन्तु उसके हेलेस्पाट
पार होते ही स्पार्टा ने उसके विरुद्ध षड्यत्र रचना आरभ कर
दिया , और ईराननरेश से पाये हुए द्रव्य के बल से उसपर
नढाई करने की तैयारी की। इस पड्यत्र में कुछ ग्रीक रिया.
सतों ने भी सहायता पहुँचाई , पर अनेक रियासतों ने श्रले
क्जेंडर का पक्ष नहीं छोडा । एथेन्स भी तटस्थ ही रहा।
मार्केडिया के सारे शहर स्पार्टी से मिल गये । केवल मेगा.
लोपोलिस नहीं मिला। अतएय स्पार्टी के राजा तृतीय एजिस
ने उन शहर को घेर लिया। मेगालोपोलिस के निवासियों ने
मामिडोनिया के अधिकारी अँटिपेटर से सहायता मांगी,
और जब तक वहां से कोई सहायता नहीं आई, घडी शूरता
सेनानी ,रक्षा की। सहायता आ जाने पर जो लडाई हुई
उसमें एजिस मारा गया। इसके बाद स्पार्टी ने जब अपने
'पचास सरदार मासिडोनियन लोगों के अधिकार में देकर यह

( १६८ ) वचन दिया कि, अब कभी तुम्हारे साथ उपदव न करेंगे तब उन्होंने स्पार्टी को क्षमा प्रदान की। इधर एथेन्स में डेमास्थेनिस की प्रतिष्ठा पहले ही के समान थी। पर मेगालोपोलिस की लड़ाई के थोडे ही समय के पश्चात् उस पर यह अपराध लगाया गया कि, अलेक्जेंडर के विरुद्ध एथेन्स में बलवा कराने के लिए उसने घूस ली है। यद्यपि उसके इस अपराध के लिए आधार कुछ भी न था, फिर भी उस पर ढाई लास रुपया जुर्माना किया गया। डेमा स्थेनिस के पास इतना धन नहीं था, अतएव उसे एथेंस का त्याग करना पडा, और वह इजीना द्वीप में जाकर रहने - लगा। . फिलिप और अलेक्जेंडर का समय ग्रीस मै वडा महत्व- पूर्ण समझा जाता है। उस समय ग्रीस देश में अनेक प्रसिद्ध प्रथकार हो गए। उनके नाम और प्रथ अव भी आदरणीय माने जाते हैं। अलेक्जेंडर का गुरु अरिस्टाट महान् तत्ववेत्ता था। अलेक्जेंडर की शिक्षा समाप्न होने पर वह एथेन्स में प्राया। वहां की सरकार ने उसे अच्छी सहायता दी, और वहां उसने लायसियम नामक शिक्षण-सस्था कायम की । उक्त प्रसिद्ध विद्यालय के प्रागण में धने वृक्षों की छाया में घूमते हुए वह एथेंस के विद्यार्थियों को पढ़ाया करता था । राम नामक एक दूसरा विद्यालय था। वहां का अध्यापक छ तत्ववेत्ता लेटो था। इस विद्यालय का 'आकेडेमी' पटने का कारण इस प्रकार बतलाते हैं कि, स्पार्टी के मेनिस्तास को अभिस्तापा हेलन के साथ विवाह करने की थी । हेलन बडो सु दी थी। परन्तु थीसियन उसे भगा . - - ( १६९ ) कर एटिका प्रान्त में ले गया और वहीं छिपा रखा। हेलन के दो भाई थे। उन्होंने उसका यहुत पता तगाया। पर कुछ लाभ न हुा । तर आडेमास नामक एक ग्रीक योद्धा ने उसका पता उन्हें बताया , और वह मिल गई। शाकेडेमन के इस उपकार के स्मरणार्थ यह निश्चय किया गया कि, स्पार्टन यदि कभी पटिका प्रात में चढ़ाई करें, तो आकेडेमस के स्थान का कभी अपमान न करें। आगे चल कर पाकेडेमस की इल जमीन पर 'श्रालिव' नामक वृक्षों का योग लगाया गया, और प्राकेडेमिया नामक एक पाठशाला भी चहा स्थापित की गई। बस,तभी से पाठशाला के अर्थ में 'नाकेडेमी शन्द का प्रचार होने लगा। यूक्लिड नामक एक और विद्वान् पुरुष भी उसी समय हुधा । यह रडा गणिनश था । इसका निवासस्थान अलेक- जेंड्रिया था। इसके विषय में एक कथा इस प्रकार प्रचलित है कि, ईजिष्ट के राजा टालेमी ने यूक्लिड से पूछा कि, "भूमिति पया सरल नहीं की जा सकती ?" उसन उत्तर दिया कि, "विद्या का मार्ग एक है। उसमें सरल और कठिन का भेद नहीं है।" यडे बडे कवि और चित्रकार भी इस समय घास से हुप । चित्रकारों में एपिलीस बहुत प्रसिद्ध है। सफेद, लाल, पीला और काला-इन्ही चार रगों को उपयोग प्रीफचित्रकार करते थे। परन्तु इन्हीं चार रगो से घे उत्तम ऐतिहासिक और पौराणिक चित्र तैयार करते थे। ये चित्र काठ के पटो पर चित्रित किये जाते थे। युद्ध इत्यादि के समय पर शन्नु के द्वारा बहुधा ये नाश किये जाते थे।

1
।
( १७० )
अलेक्जेंडर की मृत्यु का समाचार पाते ही एथेन्स ने
स्वतत्रता प्राप्त करने की फिर कोशिश की । वहां की सरकार
ने एक चडी जलसेना तैयार करके चालीस वर्ष से कम अवस्था
के सब लोगों को युद्ध के लिए बुलाया । उसने अन्य
रियासतों के पास अपने प्रतिनिधि भेज कर निवेदन किया
कि "ग्रीक रियासतों की स्वतंत्रता फिर से प्राप्त करने के
लिए एथेन्स श्रगुधा होता है, श्राप उसकी सहायता करे ।।
इन प्रतिनिधियों के साथ डेमास्थेनिस भी गया, और अपनी
वक्तृत्वशक्ति से उसने अधिकाश को अपने पक्ष में कर लिया
उसकी इस कार्यकुशलता से प्रसन्न होकर एथेन्स सरकार ने
उसे क्षमा प्रदान की , और उले लाने के लिए इजोना को
जहाज भेजे। कुछ दिन बाद वह पिरियस में श्रा उतरा ,ओर
फिर वहाँ से बडे समारोह के साथ एथेंस आया।
इधर एशिया में इस बात को लेकर यही गडाडी मची
फि,अलेकजंडर के राज्य पर कौन चैठाया जाय।रानी रोजाना
का पुत्र और अलेक्जेंडर का सौनला भाई एरिडियस (an
datus ) ये दोनों राज्य के अधिकारी थे। इनमें पहला तो
अत्यन्त अल्यवस्यक और दूसरा मून तथा वेममम था। इस
लिए इस बात को लेकर सेना के अधिकारियों में झगडा होने
लगा कि इन दोनों में किसे राजसिहासनादिया जाय । अन्त में
यह निश्चय हुआ कि,एरिडियस राजा बनाया जाया।तदनुसार
फिलिपं नाम धारण करके वह एशिया के राज्यसिहासन पर
श्रारुढ़ प्रा । पर उसके कर्तृत्ववान न होने के कारण सारा
अधिकार सेनापति पर्डिकास ने अपने ही हाथ में रक्खा
इधर मासिडोनिया का राजकाज अँटिपेटर के अधिकार में

था, और इजिप्ट का कार्य टालेमा नामक सरदार। के हाथ
मैं था। इस भिन्न भिन्न व्यवस्था के कारण बडी गडबडी
मन्त्री । प्रत्येक अधिकारी के मन में यही, इच्छा उत्पन्न हुई
कि सब गज्य उसीको मिल जाय।इस प्रमिलापा को पूर्ण करने
कलिप सरने इतन दुष्कृत्य किये कि जिनका कुछ ठिकाना
नहीं । गुप्त अथवा प्रकट रूप से किसी का मार डालना उस
समय इतना महज हो गया कि, स्वामाविक मृत्यु से मरने
घाले उस समय बहुत थोडे दिखाई देने लगे। सम्पूर्ण राज्य में
अप्रवध और गडयडी मच गई।
पर्डिकास ने तो क्रूरता को हद कर दो। एशिया के नवीन
जीते हुए प्रदेशों में अलेक्जेंडर ने अनेक नवीन शहर और
। नवीन ग्रीक चस्तिया बसाई थी। इन स्थानों में प्राय लड़ाई
में गये हुए लोग वसाये गए थे । कुछ दिनों याद उन्होंने
स्वदेश वापस जाने की इच्छा प्रकट की, जिसे वहा के ग्रीक
अधिकारिया ने स्वीकार नहीं किया । उन्होंने बलवा मचा
दिया, जिसे शान्त करने के लिए पर्डिकास ने मेना भेजी।
बलवाई पराजित हुए, और सेना के नायक पायथोन
( Fithon ) ने उन्हें क्षमा प्रदान की। परन्तु पर्डिकास ने
गुप्त रूप से आज्ञा भेजी कि, नि शस्त्र होते ही सब
बनवाई मार डाले जायें। पायथोन ने बडा प्रयत किया
कि, इस प्रकार की कतल न होने पावे, पर सब व्यर्थ
हुआ। पर्डिकास समझता था कि, इस प्रकार की कतल से
उसका प्रभाव जम जायगा मासिडोनिया की गद्दी कमी न
कभी उसे अवश्य मिल जायगी।
रघर मासिडोनिया का अधिकारी अँटिपेटर प्रोक रिया-
है
ar

(१७२ ) . सतों से युद्ध कर रहा था। उसका सामना करने के लिए पथीनियन लोग दूसरी सेना लेकर धर्मापिली की घाटी में लिश्रोस्थेनिस की अधीनता में एकत्र हुए । उनमें जो एक- लडाई हुई उस में एथीनियन लोगों की जीत हुई, और अँटि पेटर थेसली प्रान्त के लारिया नामक शहर में भाग गया। ग्रीक लोगों ने उस शहर को घेर लिया । पर शीघ्र ही मासि. टोनिया से जब अँटिपेटर की महायता के लिए सहायक सेना श्रा पहुँची तब तो पथिनियन लोगों ने सधि के लिए प्रार्थना की। अटिपेटर ने, प्रत्येक रियासत से, अपने सुभीते के अनु- सार पृथक पृथक सधि की। एथीनियन लोगों के साथ जिन शर्ती पर सन्धि हुई उनमें एक मुख्य शर्त यह थी कि, एथेंस की प्रजासत्ताक राज्यव्यवस्था तोड दी जाये, और सभा में मत देने का अधिकार जो अनेक लोगों को प्राप्त है वह, छीन लिया जावे । अर्थात् सोलन की कानून के अनुसार, वही लोम मत दे सके कि, जिनके पास किसी निश्चितापरिमाण में सम्पत्ति हो। एथेंस के लोगों पर दाव रखने के लिए, म्यूनिचिया के बदर में, अँटिपेटर ने अपनी सेना रख दी। इसके पाद उसने एथेंस में बलवा करनेवाले लोगों के नेताओं को अपने हाथ में लेना चाहा, पर वे सब, भाग गये। इस लिए, ऑटिपेटर ने उनको पकड़ने के लिए अपने सिपाहियों को रवाना किया । डेमास्थेनिस इजीना के निकट झालारिया नामक टापू के एक मन्दिर में, छिपा हुआ था । अँटिपेटर के सिपाही वहां उसे ढूंढते हुए श्रा पहुँचे। परन्तु, उसने विष माकर भारमहत्या कर ली। (ई० स० के० ३२२ वर्ष पूर्व।) , 1 1 . --

.
। इसके बाद अंटिपेटर को शीघ्र ही ज्ञात हुआ कि, पर्डि
कास मासिडोनिया का राज्य हडप करने की अभिलाषा
रखता है। अतएव उसने इजिप्ट के राजा टालेमी की सहा.
यता से उस पर धावा कर दिया। पर्डिकास ने भी बड़ी भारी
सेना के साथ इजिप्ट पर चढाई की, पर वह अपने क्रूर फर्मो
के कारण इतना अप्रिय होगया था कि, उसी के कई सैनिक
अधिकरियों ने उसका खून किया।
पर मारा अधिकार अँटिपेटर के हाथ में आगया, परन्तु
उसका यह चैभव बहुत दिनों तक वहीं टिका ! एक वर्ष के
भीतर ही उसकी मृत्यु होगई । तब अलेक्जेंडर का एक
पुराना सेनापति पोलिप!न (Polvprachen) राज्य का
अधिकारी बनाया गया। पर अरिपेटर के पुत्र केसॅडर को यह
प्रवन्ध पसद न पाया। उसने यह सोच कर कि राज्य पर
- हमारा विकार हे, पोर्लिपर्बोन से झगडा आरम्भ किया।
सेंडर पराक्रमी और पर्डिकास के समान ही दुष्ट एवं
कर था। अपनी इच्छा पूर्ण करन के लिए वह चाहे जैसा
अधम कार्य करने को तैयार रहता था । लगभग दो वर्ष
तक उन दोनों में झगडा होता रहा, और श्रत में केसँडर ही
चिलयो हुनापोलिपर्चीन के हाथ में जो थोटे याहुत शहर
थेचे मी केलॅडर की ओर जा मिले।
इस युद्ध में चूंकि दो प्रसिद्ध स्त्रियां शामिल मी, अनपव
इतिहास में इस को विशेष महत्व प्राप्त हुआ है। उन दो
मियों में से एक सिकन्दर की मा आलिपियास और मरी
परिडियस की स्त्री यूरिटिस थी। पर्डिकास का खून होजाने
पर यूरिरिस ने प्रयन किया कि, एशिया का राज्य उसे प्राप्त
बडा
.
]

( १७४ )
होजाय। अतएव आगे यढ करउसने अपने आवेशपूर्ण भाषणद्वारा
सेना में जोश चढाया, और उसे अँटिपेटर के साथ लड़ने के
लिए प्रवृत्त किया। अलेक्जेंडर को मृत्यु के बाद उसने केसँडर
से मित्रता कर ली और घडीमारी सेना के साथ वह उसे सहा
यता देने के लिए ग्रीस कोरवाना हुई। इधर से पोलिपोन
उसका सामना करने के लिए गया। उसके साथ श्रलिपियास
थी। वह भी यूरिडिस के ही समान शूर थी, और स्वय सेना
का सचालन करती थी। इन दोनों सेनाओं में यदि लडाई
हुई होती, तो अवश्य ही ये दोनों स्त्रियां समरांगण में एक
दूसरे पर शस्त्र चलाती हुई देखी जाती, पर विचित्रता यह
हुई कि अलेक्जेंडर की मां को सामने देखते ही यूरिडिस
की सेना उस पर हथियार न चला सकी । अतएव यूरिडिम
अनायास ही अलिपियास के हाथ श्रागई । आलिपियास ने
उसे और उसके पति को अधेरी कोठरी में डाल दिया। वहाँ
आगे चल कर उन दोनों का खून हुश्रा।
अलिपियास बडी क्रूर स्त्री थी, और उसके पापों का
फल भी उसे शीघू ही मिल गया। केसेंडर मासिडोनिया
आया, और पिडना शहर को घेर लिया। प्रालिपियास
पिडना ही में थी। कुछ दिन युद्ध होने के बाद जय पिडना के
लोगों को अन्न पानी न मिलने लगा तब वे केलेंडर की शरण
पाये । शरण भाते समय यह निश्चय हुभा था कि, प्रालिपि
थास के शरीर को कुछ धक्का न पहुंचाया जाय । परन्तु केसे
डर ने उसे न्यायालय में उपस्थित करके उसके अपराधों की
नांच की, और उस पर अलेक्जेंडर, उसकी रानी, केसॅडर के
भाई और कई अन्य मनुष्यों के खून करवाने का अपराध सिद्ध
.
.

.
( १७५ )
किया । अन्त में उसे मृत्युदण्ड दिया गया। उसे मारने के
लिए कई सिपाही शस्त्र लेकर उसके पास गये, पर उनका
हाथ उस पर नहीं उठा । परन्तु उनमें कुछ ऐसे भी थे जिनके
सम्बन्धियों को श्रालिपियास ने मरवा डाला था। इस लिए
वे उसे देखते ही उस पर टूट पडे, पोर उसे काट डाला।
कहते हैं, इस अवसर पर भी प्रालिपियास ने बडा साहस
दिखलाया था। ( ई० स० के ३१६ वर्ष पूर्व) ।
, इसके बाद केसेंटर सम्पूर्ण राज्य का स्वामी बन गया।
अलेक्जेंडर की स्त्री रोक्जाना और उसके छोटे लडके को
उसने अफिपोलिस में कैद कर ग्यवा । फिर उसने अलेक्
जेंडर की मौतेली बहन थेसलोनिका से विवाह करके उसके
म्मरणार्थ थेसलोनिका नामक शहर बसाया। इसके बाद
उमने थीव्स शहर को, जिसे अलेक्जेंडर ने सत्यानाश कर
डाला था, फिर से पूर्ववत् बनवाना प्रारम्भ किया।
--
बीसवां अध्याय ।
अलेक्जेडर के बाद के राजा लोग ।
(ई० स० के ३१६ से २८० वर्ष पहले तक )
।
जव कि यूरोप में उपर्युक्त घटनाए होरहीथीं, इधर एशिया
में अटिगोनस और यूमोन्स(Antigonus and Bumenes )
'नामक सिकन्दर के दो सरदारों में राज्यप्राप्ति के लिए लड़
-

( १७६ ) होने लगा, और यूरप में जब फि प्रालिपियास का वध हुआँ उसी समय अटिगोनस को जीत हुई, और यह एशिया में प्रमुख बन बैठा । यह सब प्रतिस्पर्धियों में विशेष शक्तिमान था, अतएव इसके विरुद्ध, फेसॅडर, टालेमी, लिजिमेकस ( Lysimachus ) और सेल्युकस ने एक यडा भारी षड् , - - - - ग्रीस देश में इस समय चारों ओर चडी गडबडी मची सुई थी। जो पुरुष पराक्रमपूर्वक आगे बढ कर ग्रीस को स्व तत्रता प्राप्त करो देने की प्रतिज्ञा करता वही ग्रीक रियासतों' को सहायता पा जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि सब रियासतों में युद्ध और मत्रिसभाओं में कलह का प्रारम्भ होगया। एशिया और यूरोप दोनों जगह अनेक लडाइया हुई। कभी इस पक्ष को जय मिलता तो कभी उस पक्ष को। अन्त में युद्ध से सब प्रस्त हो गये, और ई० म० के ३१ - वर्ष पहले सब ने सन्धि कर ली, जिममें यह निश्चय हुआ कि, केसॅडर मासिडोनिया प्रान्त के रीजेंट पर्थात् प्रतिनिधि का फाम करे, लिजिमेकस के हाथ में थेस प्रांत घहुत दिनों से था । अतएव वह उसी के पास रहे, टालेमी इजिप्ट का कार वार देये, और ऑटिगोनस एशिया का राज्य सम्हाले । इस सधि में यह स्पष्ट लिखा था कि, प्रीक शहर स्वतंत्र हैं, वास्तव में केसॅडर यूरोप की प्रोक रियासतों पर अपनी सत्ता चलाने लगा, और उधर टालेमी ने इजिप्ट की ग्रीक बस्तियों को स्वतन न होने दिया। इम सन्धि के थोडे ही दिन पश्चात् केसॅडर की आशा से, मलेकजेंडर की रानी रोक्जाना का पुन, जो अब कुछ बडा पर 17 ५ - -- हो रहा था, मार डाला गया। इससे केसेंडर का पथ बहुत कुछ निष्कटक हो गया। इसके बाद कुछ ही दिनों में फिर युद्ध प्रारम्भ हो गया, जिस में शॉटिगोनिस के पुत्र डिमेट्रियस की प्रसिद्धि हुई । 'इस युद्ध में महत्त्व की घटना "होड्स का घेरा" है । इसके पहले ही डिमेट्रियस ने केसॅटर के पजे से पथैन्स को छुडा लिया, और वहा प्रजासत्ताक राज्यव्यवस्था पूर्ववत् जारी की। केसेंडर और टालेमी ने अव समस्त ग्रीक रियासतों में । अपनी अपनी सेना रख कर उनका नन्दोपस्त किया तव एथेंस । की तरह उनको भी छुडाने के लिए डिमेटियस अपनी सेना सहित एथेंस आया। चहा उसका बडासत्कार हुआ । केसँडर का कारवारी पथेन्स में था, उसे एथेन्म छोड़ कर जाना पड़ा। उस समय राज्यशाप्तग के लिए लोकसभा फिर बनाई गई, जिससे पथीनियन लोग इतने प्रसन्न हुए कि, उन्होंने अपनी - छतक्षता प्रदर्शित करने के लिए डिमेट्रियस और उसके पिता के मन्दिर बनवाये, और देवता के समान उनकी पूजा करने लगे। (ई० स० के ३०० वर्ष पहले।) इसके बाद अगले वर्ष डिमेट्रियस ने टालेमी को जलयुद्ध मै पराजित किया। इधर उसके पिता ऑटिगोनस ने राज- पद धारण किया। टालेमी, लिज़िमेफस और सेल्युफल ने भी बसी का अनुकरण किया । सेल्युकस ने पाविलोनिया का राज्य प्राप्त करके उसकी यडी उन्नति की थी। उसने अपने को "सिरिया के राजा "की उपाधि से विभूपित किया। यही सिरियन राजघराने का मूल पुरुप है। ३० स के ३०१ वर्ष पूर्व इप्लस के युद्ध में ऑटिगोनल .

L - . । । (१७) मारा गया । उसका राज्य सेल्युकस के हाथ लगा, जिससे उसकी शक्ति और बढ गई । इस तरह एशिया में अलेक्जेंडर का जितना राज्य था वह सब सेल्युकस को मिल गया । अले क्जेंडर के पश्चात् विशेष पराक्रमी और चतुर राज्यकर्ता यही पा । यह दूर नहीं था। ग्रीक सभ्यता का एशिया में प्रचार करने के लिए पने प्रल किया। उसके समय में ग्रीक लोगों में कलाकौशल की घडी उन्नति हुई। प्रत्येक प्रान्त में उसने मासिडोनिया और ग्रीस के लोगो को लाकर वसाया, जिनकी शागे चल कर वहा बड़ी उन्नति हुई । आंटिओक नामक शहर' इसी प्रकार बसाया गया था। यह सिरिया की प्रसिद्ध राज । धानी थी । ग्रीक लोगों को ईसाई धर्म का पहला उपदेश यहाँ मिला, और ईसा मसीह के भक्तों को 'ईसाई नाम पडले पहल यहीं प्राप्त हुआ। इतिहास में सेल्युकस के वंशज सेल्युसिडी कहलाते हैं। इन्होंने २४० वर्ष सिरिया का गज्य किया। इनके अन्तिम राजा को रोमन सरदार पापे ने जीता । तभी से सिरिया प्रान्त रोमन राज्य में शामिल होगया। डिमेट्रियस ने जब केसॅडर केजुल्मों से एथेन्स को छुड़ाया तब उसके पिता ने उस होड्स द्वीप को जीतने के लिए भेजा। डिमेट्रियस ने होड्स द्वीप को जा घेरा, और एक वर्ष तक युद्ध करता रहा । होडस निवासियों ने अपने बचाव के लिए खूप प्रयत्न किया 1 वहा की सरकार ने प्रकट किया कि, जो गुलाम शूरता और सच्चाई के साथ लड़ेंगे उनको स्वतन्त्र नागरिकों के अधिकार मिलेंगे। लड़ाई में काम आये हुए लोगों के कुटुम्ब का पालन पोषण सरकार करेगी । वह उनके लडकों

.
1
( १०४ )
को शिक्षा इत्यादि देगी, और लडकियों का विवाह अपने
• पास से कर देगी। लडकों के बडे होने, पर सरफार उनको
एक एक जिरह घबर पारितोषिक देगी। इसी प्रकार के अनेक
प्रलोभन देकर वहा की सरकार ने लोगों को खूपही उत्तेजित
' किया। अतएर लोग बड़ी शूरता से लडते रहे।
। इस चढाई में डिमेटिस ने यनशास्त्र विषयक शान का
खूर ही परिचय दिया। "शहरजातने वाले बडे पडे यत्न उसने
पनाये । परन्तु उनसे कुछ लाभ नहुा। होड्स के निवासियों
= को अन्न और युद्ध सामग्री इजिप्ट से मिलती गई। इसके मिया
में उन्होंने इस चीरता से युद्ध किया कि, डिमेदियस को सन्धि
करन के लिए लाचार होना पड़ा । चलते समय उसने अपने
- सब यत्र होड्म निवामियों को भेट कर दिये । उन यत्रों को
चेचने मे जो द्रव्य एकन्न हुआ, उससे होड्म वासियों ने सूर्य
की एक मूर्ति यनवाई, जो ससार कसप्ताश्चर्यों में से एक है।
होड्स से डिमेट्रियस प्रीस का वापस आगया, और फिर
क्सॅडर से युद्ध प्रारभ किया। अनेक बडी वडी रियासतों से
उसने मासिडोनियन सेना को निकाल बाहर किया, मोर उन
रियामती को स्वतत्र कर दिया । इसके बाद उसने कारिथ
में सब रियासतों को एक सभा की, और सब से सेनापति
का,पद स्वय प्राप्त कर लिया, जिसका परिणाम यह दुधा कि
उन रियासतों को दूमरे के हाथ से छुडाकर उसने स्वय
अपने हाथ में ले लिया । श्रासिर नतीजा वही रहा।
इसी समय के लगभग एपिरस का राजा पिहस अपने
वीरतापूर्ण कार्यों से खूब प्रसिद्धि प्राप्त कर रहा था। डिमे-
ट्रियस ने यह सोच कर, कि उसकी सहायता से हमें यहा
-
.

(१०)
लाभ होगा, उसकी बहिन से विवाह कर लिया। इधर पशिया
मैं सेल्यूकस और लिजिमेकस ने सलाह कर के डिमेट्रियस
के पिता ऑटिगोनस पर चढाई कर दी। इसलिए उसने अपने
चेटे को सहायता के लिए बुलाया । परन्तु इप्सस की लड़ाई में
अँटिगोनस मारा गया और उसका सारा, राज्य सल्यूकस
और लिज़िमेकस ने आपस में बांट लिया। डिमेट्रियस भाग
गया , परन्तु प्रीस में उसे आश्रय नही मिला । यहा तक कि,
एथेंस के लोग, जो कि डिमेटियस का मन्दिर बना कर अभी
उसकी
पूजा
करते थे, उन्हो न भी उसे अपने शहर में नहीं
आने दिया।
अब केसँडर की सत्ता फिर ग्रीक रियासतों में चलने
लगी। परन्तु ई० स० के २६७ चे वर्ष पूर्व उसको मृत्यु होगई,
इससे डिमेट्रियस को एक बार फिर अपनी सत्ता स्थापन
करने का अवसर मिला। अतएव बडी भारी सेना साधे
में ले कर उसने एटिका प्रान्त में प्रवेश किया और उसको
विध्वस कर के जल और स्थल दोनों ओर से एथेंस को घेर
लिया। उसके पास जलसेना बहुत थी, अतएव उसने इजिप्ट
से सामग्री का पाना बन्द कर दिया, और इस कारण एथेंस
पर अधिकार करने में उसे कुछ भी विलम्ब न लगा। डिमे
ट्रियस ने,फिर, बडे समारभ के साथ, नगर में प्रवेश किया,
परन्तु उसने किसी को कुछ कष्ट नहीं दिया। उसकी सब
घडी इच्छा यह थी कि, मासिडोनिया का सिक्षासन प्राप्त
किया जाय । यह इच्छा उसकी शोभाही पूरी हुई।
फेसडर के दो लडके मासिडोनिया के सिहासन के लिए
परस्पर लडते थे। उनमें से एक ने, जिसका नाम अलेकजेंडर
,

( ११ )
था, डिमेट्रियस और पिहस से सहायता मांगी। पिहस पहले
आया और अलेक्जेंडर को सिहासन पर विठा दिया । बाद
को डिमेट्रियम पाया और अपना विचार पूर्ण होता हुआ नहीं
देखा । अतपत्र वह मन ही मन पिहस पर बडा कुपित हुश्रा,
और फिर युवा अलेक्जेंडर का खून कर के सेना की सहा.
यता से, मासिडोनिया के सिहासन पर बैठा ।
डिमेट्रियस का शासन क्रूरता के लिए प्रलिम है । उसने
अपने सुखचैन के लिए प्रजा पर नाना प्रकार के कर सागा कर
धन वसूल किया। उसने केवल सात वर्ष तक राज्य किया,
पर इतनी ही, अवधि में वह बडा अप्रिय होगया । इसके
अतिरिक्त ग्रीक रियासतों और पिड्स के साथ उसका युद्ध
भी जारी था। पिह्रस उसका कहर शत्रु था। ई० म०
२८७ में वर्ष पूर्व सेना में एक बलवा हुा । उस समय डिमे
ट्रियस भेष बदल कर भाग गया। अतएर उसका राज्य
पिहम के हाथ लगा। इधर डिमोट्रियस भाग कर एशिया में
गया, और वहा उसने अपने पिता के राज्य का कुछ भाग
प्राप्त करने का प्रयत्न किया, परन्तु सेल्यूझम ने उसको पकड
कर सिरिया प्रात में भेन दिया, जहा उसकी मृत्यु हो गई ।
पिहस भी मासिडोनिया का राज्य बहुत दिनों तक नहीं करने
पाया। उसका राज्य लिजिमेकस ने छीन लिया । तर पिहल
एपिरस प्रान्तार्म चला गया, और वहा उसने कुछ दिन शाति
पूर्वक राज्य किया। इधर इटली के दक्षिण म टारेंटम नामक
ग्रीक शहर पर जय रोमन लोगों ने चदाई कर दी तर यहा के
लोगों ने सन् ईसवी के २० वें वर्ष पूर्ष पिहस से सहायता
मांगी। इसी कारण रोम के इतिहाम में उसका नाम प्रमिद

(१२) है। उसकी बडी इच्छा थी कि, रोम राज्य को जीत कर सिसली और कार्थेज पर अधिकार किया जाय, और फिर अन्त में सारा प्रीस अपने कब्जे में कर लिया जाय ।। m इक्कीसवां अध्याय । गाल लोगों की चढ़ाई। ( ई० स० के २०४-२५६ वर्ष पूर्व तक।) पिह्रस के इटली चले जाने पर ग्रीस देश पर एक दूसरे ही शत्रु ने चढाई कर दी। गाल नामक एक जाति के जङ्गली । लोग बडे शूर वीर थे। उन्होंने ई० स० के २७६ वें वर्ष पूर्व मासिडोनिया पर चढाई करके सारा देश नष्ट कर डाला। दूसरे वर्ष उन्होंने फिर चढाई की । उनके सरदार का नाम बेनस था। वह जब अपनी सेना लेकर थर्मापिली की घाटी तक भा गया तब उसको रोकने के लिए ग्रीक सेना भागे चढी। दोनों दलों में युद्ध हुश्रा, और गाल लोग पराजित हुए । उनके बहुत से सैनिक मारे गये , और उन्हें लौट जाना पडा। फिर भी ब्रेनस ने लडाई जारी रखी। उसने अपना एक दस इटोलिया प्रांत में भेजा, जिसने वहां के शहरों को लूटकर उनकी दुर्दशा प्रारम्भ की । इधर इटोलिया के लोग थर्मापिली की लड़ाई में फंसे हुए थे।वे अब अपने बाल- । । ( १८३ ) बच्चों की रक्षा के लिए लोट आये । ब्रेनस की चाल सफल हो गई। पहले जब ईरान ओर स्पार्टा में युद्ध हुआ था तय स्पार्टी के राजा लिश्रोनिडास को थर्मारिलो को घाटी में धोखा देखर, जिस मार्ग से ईरानी सेना ने चढाई की थी, 'यही मार्ग बेनस को भी मिल गया, और उसी के द्वारा उसने अपनी सेना आगे बढा लो। यह वात ग्रीक लोगा को पहले हो से मालूम होगई, अतएव वे एथेन्स के जहाजों पर चढकर भाग गये । श्रथ गाल लोग डेरफाय की ओर मदिर लूटने के लिए वढे । मार्ग के सव प्रदश उन्होंने भयकर करता के साय जलाकर और लूटकर सत्यानाश कर दिये। इसके बाद जब वे डेल्फाय के मदिर के पास पहुँचे तर वहा की सुन्दर मूर्तिया बडे बडे रथों और भक्तों को दी हुई अन्य सामग्रियो को धार सकेत करके ब्रेनस ने कहा, "यहा के देवता इतने धनवान हे कि, अपनी ओर से हमें इनको कुछ अर्पण करने को आवश्यकता नही, किन्तु यही हमें कुछ अर्पण करें।" इधर यह बातचीत हो रही थी कि, इतने में डेल्फाय की सेना ने पीछे की एक पहाड़ी पर से एकदम गात लोगों पर हमला करके उनको पराजित कर दिया । इस लड़ाई में ब्रेनस म्बय घायल हुया , और इस हार से लज्जित होकर उसने ली। वाद को उसके अन्य साथी भग चले पर प्रोक सेना ने उनका पीछा करके उनमें से अधिकांश को , १ आत्महत्या कर मार डाला। इधर रोम के युद्ध में पिदस को यधपि सफलता प्राप्त नहीं हुई , तथापि उसने इटली और सिसलो में ऐसा कुछ पराक्रम दिखलाया कि, वहाउस समयघह एक घडा शूरवीर।

.
( १८४)
गिना जाने लगा। एपिरस में लौट आने पर उसने मामिडो.
निया पर चढाई फी, उसमें वह विजयी हुना, तथा मामिडो
निया का राज्य उसे फिर मिला ! परन्तु साथ ही एक झगडा
फिर उसे लग गया । स्पार्टी के एक राजा की मृत्यु होगई ।
किन्तु उसके पुत्र क्लिभोमिनस को गद्दी नहीं मिली , एरियस
(Areus ) नामक उसका चचेरा भाई सिहासन पर बैठ
गया । इस लिए एरियस से राज्य प्राप्त करने के लिए जियो
मिनल ने पिहस की सहायता चाही । पिहस बडी भारी सेना
के साथ लेकोनिया प्रान्त में गया । उस समय एरियस कही
पाहर गया हुआ था, और लेफोनिया (नगर का प्रबन्ध ठीक
नहीं था। फिर भी नगर वासियो ने, एरियस के लोटन तक
बडी वीरता के साथ नगर की रक्षा की। बाद को परियस ने
लौटने पर पिहूस को मार भगाया।
मी समय के लगभग आर्गास राज्य के दो हफबारों में
, गही के लिए झगडा भारम्भ धुना। उनमें से एक ने पिहस
से सहायता मागी। पिहस सेना के साथ तुरन्त ही भार्गास
के लिए रवाना हुअा । परन्तु बीच में 'उसकी बाट रपार्टनों
ने रोक ली। श्रतएव वह उनसे लड़ कर नगर में प्रविष्ट
हुना । स्पार्टन भी उसके पीछे ही पीछे चले गये, और चारों
ओर से उसे घेर लिया। इस विपत्ति को देखकर पिहस ने
अपनी सेना को लौटने की आशा दी, पर नगर के दरवाजे में
श्रीक सेना का एक हाथी राह रोक गया,
और
दूसरा हाथी पिहस की सेना में घुसकर उसका सत्यानाश
करने लगा। इसी गडबड में एक मनुष्य पिहस पर वार
करने के लिए दौडा। पिहस उसे रोकता ही था कि, इतने

- + -- - - लिया। प्रज्ञा को यूर मताने लगे । इसने भाकिया (Achan) यह गुट ई० स० के २८० वें वर्ष पहले स्थापित हुआ। धीरे, दूसरो ने भी अपने अपने अन्यायी अधिकारियों को निकारा बाहर किया, और इस गुट में शामिल हो गये। फिर क्रमश अन्य प्रान्ता के नगरो का भी इस गुट में प्रवेश मासिहोनिया और रोम दोनो के लिए परोमा होता। समय आ गया, और यदि ऐसा हुश्रा हातोयह प्रीक राष्ट्र । ( १८५) में उक्त मनुष्य को मा ने, जो पास हा -घर के ऊपर बसा थी, एक खपडा लेकर इस खूयो के साथ पिहस के ऊपर फेंका कि, वह तुरन्त हो बोडे से नीचे गिर पड़ा। उसने गिरते ही लोगों न उसका शिरच्छेद फर डामा ! इतिहास में पिहम की मृत्यु एक महत्वपूर्ण घटना है। क्योंकि उसको मृत्यु से ग्रोक फिर अपनी स्वतनता के लिए मासिडोनियन लोगों से माडने लगे। यह झगडा गहन दिनों तक जारी रहा , पर अन्तिम निर्णय कुछ भी न हुया , और बीच ही में प्रोक और मासिडानियन दोनों को रामन लोगों ने जीत इस समय ग्रीय लोगे की बड़ी दुर्दशा थी। चारों ओर डाक नोग लूट मार कर रहे थे । ये लुटेरे कभी इस पक्षसे और कभी उस पक्ष से युद्ध में शामिल रहते थे। प्रत्येक नगर में कोई 7 फाई छोटे रड अधिकारी जुरमी पैदा हो गये, और प्रान्त क शहरा ने अपना एक गुट यनाया। उसे इतिहास म' "प्राझियन गुट" कहते हैं। पहले तो केनला चार ही नगरों का एका था। पर धार हुआ । अन्त में सम्पूर्ण प्रीक रियासते के एक हो जाने का - , । .

1 --- । -- : (१८६ ) आरेटस नामक एक बुद्धिमान और उदार नवयुवक था। इसी ने उपर्युक्त ऐयय के बढाने का भारी प्रयन किया । यह पिलापोनेसस प्रान्त के सिकियन (Cioron ) नगर के अधिकारी क्लिनियस का पुत्र था । पारेटम जर सात वर्ष का था तभी उसके पिता का खून हागया और उसकी मौसी ने वडी युक्ति से उसके प्राण बचाये । वह उसे गुप्त रीति से श्राम ले गई , वहीं वह बडे हो नक रहा । ग्रीस देश की । उतरती कला को देस उसे वडा दुख हुश्रा, अतएव उसने उक्त राष्ट्र क घचाने का उद्योग प्रारभ किया । उसने पहले अपने जन्मस्थान सिकियन को ही उसके अत्याचारी अधिकारी के हाथ से छुडाने का प्रयत्न किया । इसके लिए उसने कुछगुलाम और देशनिकाले का दण्ड पाये हुए लोगो को एकत्र किया। एक दिन रात को वह अपने साथियों को लेकर गुप्त रीति से रस्सी के द्वारा कोट की दीवाल पर चढा, और नगर के अधि कारी निकोलिस ( Nicoles ) के घर को जा घेरा । परन्तु निकोलिम छिपकर भाग गया । अब नगर में चारो ओर यह सपर फैल गई कि क्लिनियस का पेटा नगर के उद्धारार्थ श्राया है। फिर क्या था, नगरवासियों ने चारो ओर से उसका जयजयकार शुरू कर दिया। श्रारेटस ने वहां लोकसत्ताक गज्यव्यवस्था प्रारभ की, जिसमें लोगों ने उसी को मुख्य अधिकारी बनाया । इस राज्यकाति में लगभग 2 सौ देशनिकाले का दण्ड पाये हुए लोग अपने नगर में आगये। उनके घर द्वार और जायदाद, जो दूसरों को दे दीगई थी, उन्हें फिर से दिलाने में पारेटस को घडा प्रयास उठाना पड़ा । इजिप्ट का राजा . -

M
६
( १८७ )
टालेमी फिलाडेल्फस आरेटस का मित्र था। उसने सब लोगों
को सन्तुष्ट करने के लिए, श्रारेटस को गव्य की पूरी पूरी
सहायता दी। इस के बाद आरेटस के प्रयन से सिकियन
नगर का भी प्राकियन गुट में प्रवेश होगया; और आगे चल
कर बही मारे गुट का मुख्य सेनापनि वना । उसने शीघ्र ही
कारिथ नगर से.मासिडोनियन सेना को निकाल बाहर किया,
और उक्त शहर को भी भाकियन गुट में शामिल किया । (३०
स० के० २४३ वर्ष पूर्व)
बाईसवां अध्याय ।
(ई० स० के २२५-२१३ वर्ष पहले ।)
इधर स्पार्टा में श्रय बहुत परिवर्तन होगया था। प्राचीन
सस्थानों के विषय में अब किसी को कुछ भी आशा न थी।
अन्य ग्रीक लोगों की तरह स्पार्टन लोग भी अब विलासी धन
गये थे। पहले क्यो दरिद्री, क्या धनवान, सब एक ही समान
उद्योगी और परिश्रमी थे, पर अब धनवानों की एक निराली
ही श्रेणी पन गयी थी । खूब ठाट गट से रहने के कारण
सनका सर्च
खून बढा हुआ था। भोजन करते समय भी उन्हें
मुलायम गहों की प्रावश्यक्ता पडतो थी। कीमती हो
बिना उन का काम ही नहीं चलता था। सारांश, स्पार्टन

( १८८ )
लोगो की वह तेजरिवता, जो पहले कभी थी, अब विलकुल
नहीं रही थी।
जमीन के स्वामित्व के सम्बन्ध में एक नवीन फानूग बम
जाने से धनवान और गरीब लोगों में और भी अधिक भेद
यढ गया। पहले किसी मनुष्य के मर जाने पर उसको जमीन
उसके वारिस को मिलती थी, जिसे वह न किसी को दे सकता
था, और न घेच सकता था। किन्तु पर यह कानून बन गया
कि, मालिक अपनी जमीन की चाहे जैसी व्यवस्था कर
सकता है। इसका परिणाम यह हुआ कि, बहुत लोगों के अधि
कार से जमीन निकल गई, और वह एक अथवा कुछ थोडेसे
लोगों के हाथ में आगई । इस समय असली स्पार्टनों के
लगभग मात सौ कुटुम्ब थे, इनमें से केवल सौ के पान थोडी
बहुत जाग्दाद रह गई थी, शेम मप भिलारी और कर्जदार
होगए थे।
० स० के २४८ ३ वर्ष पूर्व स्पार्टा की ऐसी ही परिस्थिति,
थी। इसी वर्ष चौथा एजिस पार्टी की गही पर बैठा । यह
चतुर था , और इसकी इच्छा थी कि, पहले के समान ही
हमारे देश का वैभव बढे । उसने इस प्रकार का कानून बन
जाने के लिए बडा प्रयत्न किया कि जमीन का विभाग पहले
ही के समान हो जावे, ओर थोडी बहुत जमीन सब के पास
'रहे । यहां तक कि, वह अपनी निज की भी,बडी, भारी स्था
घर सम्पत्ति छोड़ देने के लिए तैयार हो गया, पर यडे,
वड
जमीदारों को उसका उद्देश्य पसन्द न पाया। विशेषत उसके
:ोडीदार राजा लियोनिडास को तो उसका उद्देश्य बिलकुल
ही न भाया । परिणाम यह हुधा कि वह अपने स्वदेशाभिमान
.

. TH . के कारण ही अनेक लोगों का कोपभाजन बन बैठा, और चार वर्ष भी राज्य न, कर पाया था कि, उस पर सरकारी कायदो की अवहेलना करने का दोपारोपण किया गया, और ईफोर्स ने उसके लिए प्राणदण्ड को पाशा दी । तदनुसार उमकी मां और उसको सहायक श्राजी के साथ उसका शिरच्छेद किया गया। लियोनिडास अब अपला हीराज्य करने लगा। बस तभी से पार्टी पर दो राजाओं के एक साय राज्य करने की चाल बन्द होगई। "ली समय रोमन कौर कार्थेजियन लोगों में युद्ध जारी म युद्ध को 'प्यूनिक युद्ध' कहते हैं। स्पार्टा का जाटिपास इन युद्ध में लियानिडास से तग की नौपरी छोड पार्थेज ने जा मिना रोमन तोगो को पराजित किया । गेम को सेना- था । पजिम के मारे जाने पर उसकी सी के दास ने अपने पुत्र शियामिनिस का विवाह कर सिमा कूट कूट कर भग सुत्रा हृदय में अपने विचार इस में एजिस मारा गया था, स भी तैयार होगया। नी राज्यपद्धति के तैयार न होगी, . A में पायम चाहिए निक थी। -

1
-
(१८)
लोगों की यह तेजस्विता, जो पहले भी थी, अब चितक्कल
नही रही थी।
जमीन के स्वामित्व के सम्पन्ध में एक नवीन कानूग धन
जाने से धनवान और गरीब लोगों में और भी अधिक मेद
पढ गया। पहले किसी मनुष्य के मर जाने पर उसको जमीन ,
उसके वारिस को मिलती थी, जिसे वह न किसी को दे सकता
था, और न घेच सफता था। किन्तु शर,यह कानून बन गया
कि, मालिक अपनी जमीन की चाहे जैसी व्यवस्था कर
सकता है। इसका परिणाम यह हुआ कि, बहुत लोगों के अधि
कार से जमीन निकल गई, और वह एक अथवा कुछ थोडेसे
लोगों के हाथ में आगई । इस समय असली स्पार्टनों के
लगभग सात सो कुटुम्ब थे, इनमें से केवल सौ के पाल थोडी
बहुत जायदाद रह गई थी, शेम मघ भिखारी और कर्जदार
हागए थे।
ई० स० के २४८ चे वर्ष पूर्व स्पार्टा की ऐसी ही परिस्थिति
थी । इसी वर्ष चौथा एजिस पार्टी की नहीं पर बैठा । यह
चतुर था , और इसकी इच्छा थी कि, पहले के समान ही
हमारे देश का वैभव बढे । उसने इस प्रकार का कानून वन
जाने के लिए बड़ा प्रयत्न किया कि जमीन का विभाग पहले
ही के समान हो जावें, और थोड़ी बहुत जमीन सब के पास
'रहे । यहां तक कि, वह अपनी निज की-भीबडी, भारी स्था
घर सम्पत्ति छोड़ देने के लिए तैयार हो गया, पर बडे बडे
जमीदारों-को उसका उद्देश्य पसन्द न आया। विशेषत उसके
जोडीदार राजा लियोनिडास फो तो उसका उद्देश्य बिलकुल
दी न भाया । परिणाम यह हुआ कि वह अपने स्वदेशाभिमान

.
( १६ )
। के कारण ही अनेक लोगों का कोपभाजन बन बैठा, और
चर्प भी राज्य न कर पाया था कि, उस पर सरकारी कायदों
' को अवहेलना करने का दोषारोपण किया गया, और ईफोर्स
ने उसके लिए प्राणदण्ड को याज्ञा दी । नदनुसार उसकी मा
। और उसको सहायक श्राजी के साथ उसफा शिरच्छेद किया
। गया। लियोनिडास भर अकेला ही राज्य करने लगा। वम तभी
। से पार्टी पर दो राजाओं के एक साथ राज्य करने की चाल
। यन्द होगई।
इनी ममय रोमन और कार्यजियन लोगों में युद्ध जारी
था। इस युद्ध फो ‘प्यूनिक युद्ध' कहते हैं । स्पार्टी का
सेनापति जाटिपास इस युद्ध में लियोनिडास से तग
आकर स्पार्ग को नौरी छोड कार्थेज से जा मिता
और उसने रोमन लोगो को पराजित किया। गेम का सेना-
पति रेग्युमल था। एजिस के मारे जाने पर उसकी स्त्री के
साय लियोनिडास ने 'पने पुत्र लियोमिनिस वा विवाह कर
दिया । इस रती में सदेगामिमान कूट कूट कर भरा, हुश्री
7 था । इसने अपन नवीन पति के हृदय में अपने विचार इस
तरह भर दिये फि, जिस उद्योग में एजिस मारा गया था,
उली के प्रारम करने के लिए लियोमिनिम भी तैयार होगया।,
उसे अच्छी तरह मालूम था कि, पुरानी राज्यपद्धति के
अनुसार काम करने के लिए मत्रिसभा कभी तैयार न होगी,
पर उसने सोचा फि, कम से कम सैनिक भाव लोगों में कायम
रखने के लिए तोपुरानी पद्धति का स्वीकार करना ही चाहिए,
क्योंकि इसी पद्धति के कारण आज तफ स्मार्टी में सैनिक
भार इतना बना हुआथा और राज्य की इतनी उन्नति हुई थी।
.
--

. 1 (१०) इसी लिए, अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् , राज्य की घागडोर अपने हाथ में श्राजाने पर, क्लियोमिमिस ने धाकियन गुट से युद्ध प्रारंभ कर दिया। दोनो ही पक्षों का उद्देश पिलापानेसस सहित सारी रियासत को अपने सघ में शामिल कर लेना था। अर्थात् प्राकियन गुट और उसके नेता आरेटस का इरादा स्पार्टा को अपने गुट में शामिल कर लेने का था, और स्पार्टा चाहता था कि सब रियासते केवल उसी के अधिकार में रहें । इन्हीं कारणों से प्रारटेस और क्लियोमि निस की ठन गई। पहले पहल लियोमिनिस की जीत रही, और उसने समझा कि अब हमारी शक्ति खूब बढ गई है, अतएव उसने अपने सोचे हुए सुधार भी प्रारभ कर दिये । दस वर्ष सतत परिश्रम कर के उसने अनेक परिवर्तन किये , पर साथ ही रक्तपात भी खूब हुआ। क्योकि सारी सत्ता ईफोर्स के हाथ में थी, और इन ईफोर लोगों को नीचा दिखाये विना नवीन सुधार करना असम्भव था । एक दिन रात को अपने कुछ सिपाहियों को साथ में ले लियोमिनिस ईफोर लोगो के क्लब में गया, और उनमें चार को एकदम मार डाला, और पाचवा एक मदिर में छिप कर बच गया। दूसरे दिन उसने अस्सी नगरवासियों को देश से निकाल दिया और सर्व का ण दूर कर के सारी जमीन को सव लोगों में वरावर वरा घर बांट देने का प्रबंध किया । जिन अस्सी मनुष्यों को उसने देश से निकाल दिया था उन का भी हिस्सा उसने इसमें रपया । क्योंकि सारी व्यवस्था ठीक हो जाने पर वह उन लोगों को फिर वुला लेना चाहता था । प्राचीन काल में सब , ,

-
।
अत
के एक साथ बैठ कर भोजन करने की चाल थी, और बालकों
से छुटपन ही से कष्ट सहने की आदत डलवाते थे। ये सब
वालें उसने फिर से प्रचलित की। (ई० स० के० २२५ वर्ष
पहले) । इधर उससे लड़ने के लिए आरेटल ने मासिडोनिया
के राजा शॉटिगानस की सहायता मागी। ऑटिगानस स्वय
पडा महत्वाकांक्षी था उसने समझा कि, इससे सारे ग्रीस
देश पर अधिकार जमाने का अच्छा अवसर मिलेगा,
स्व उसने भारेटस को सहायता पहुँचाई । यह युद्ध तीन वर्ष
कि फिर चला । अन्त में लेकोनिया की सीमा पर सेलासिया
क्लियोमिनिस पराजित हुआ और स्पार्टा ऑटिगोनस के
अधिकार में पाया । उसने क्लियोमिनिस के सारे सुधार रद
कर दिये, और वही पहले की दुर्व्यवस्था फिर जारी कर दी।
केयोमिनिस इजिष्ट भाग गया, जहा उसने अन्त में आत्म
त्या कर ली।
कुछ काल के याद मासिडोनिया के राजा ऑरिगोनस की
की मृत्यु होगई , और उस का भतीजा पॉचवा फिलिप गही
र वेठा । उस समय उसकी अवस्था केवल सत्रह वर्ष की
। फिर भी वह वडा शूर और बुद्धिमान था। उसने
नाकियन गुट को बड़ी सहायता दी । इन युद्धों में प्रीस की
नत्यन्त हानि हुई। ई० स० के २१७ वे वर्ष पहले इन लडाइयों
का अन्त हुआ।
इसी समय रोम और कार्थेज में द्वितीय प्यूनिक युद्ध यडे
गर-शोर से हो रहा था। कार्थेज का सेनापति हनियाल,
पनी सेना के साहत बालपस पर्वत पार कर के इटाली
। पहुँचा । कानी नामक मुकाम पर पड़ा भारी युद्ध

.
सूचना मिली।
.
(.१४२ )
हुश्रा, जिसमें रोमन पराजित हुए । तुरन्त ही फिलिप ने
वकील भेज कर हानिवाल से मैत्री के लिए प्रार्थना की। यह
प्रतिनिधि अपना कार्य समाप्त करके लौटा पा रहा था कि,
रोमन लोगों ने उसे पकड कर रोम भेज दिया। उसके पास
जो कागज पत्र प्राप्त हुए, उनसे रोमन लोगों को भावी अरिष्ट
की
फिलिप जय पहले पहल राज्य करने लगा तब यह ,
थी कि, वह बडा चतुर और योग्य राज्यकर्ता, होगा। पर बहुत
जल्ट उसके स्वभाव में परिवर्तन होगया, और वह स्थन्छन्दी
तथा अन्यायी बनने लगा । श्रारेटस ने उसे बहुनेरा समझाया
पर प्रभाव उलटा पडा, फिलिप बहुत चिढ गया। यहा।
कि कुपित होकर उसने शारेटस को विप देकर मार डाला।
श्रारेटस का शव उसकी जन्मभूमि सिकियन में ले
लोगों ने बडे समारम्भ के साथ उसकी अन्तिम क्रिया की,
और उसकी समाधि पर मन्दिर बना कर उसकी पूजा करने
लगे। उसकी पूजा के लिए एक पुजारी नियत किया गया, और
आगे कितनी ही शताब्दियों तक लोग पारेटस का जन्मदिन
मनाते रहे, तथा जिम दिन उसने जुल्मी लोगों से अपनी जन्म
भूमि सिकियन शहर फोबुद्धाया था उस-दिन भी लोग विशेष
उत्सव करते रहे।
।
तक
जाकर
.
.

1
( १६३ )
--
तेईसवा अध्याय।
स्पार्टा' के जुल्मी अधिकारी।
( ई० स० के २१३-१८३ वर्ष पूर्व तक । )
-
M
1
धारेटस की मृत्यु के पश्चात् अनेक वर्षे तक छोटे-मोटे
बहुत से युद्ध हुए। इन युद्धों में कभी कभी रामन लाग बीच
में पढते , और फिमी न किसी पक्ष को महायता देकर
फिलिप को मदा पराजित करने का प्रयत करन थे
पक पार फिलिप ने एटिका प्रान्त पर चढाई फी, पर
पथेन्स नगर में जब उसका प्रवेश न हो।सका तब उसने
कुपित होफर उक्त प्रान्त के अनेक पवित्र और सुन्दर स्थानों
का नाश कर डाला, कारें और मूर्तिया तोड डाली, और
-माकेडेमी सथा लायसियम के बाग और मदिरों को जला
दिया। इसके बाद छोटे छोटे गावों में जाकर उसने उनका
सर्वनाश कर दिया, इस प्रकार उसने अनेक अत्यन्त प्राचीन
सुदर और कीमती कामों का सत्यानाश कर दिया।
ग्रीस देश के शासन में एथोनियन लोगों की प्रधाताव
बहुत दिनों से नहीं रही थी। उनका व्यापार और सारा राज्य
नप हो चुका था। उनकी वह भारी जलसेना अप नही रहा'
यो। किन्तु अब सिर्फ तीन जहाज उनके पास थे । और उन
के निज के, कम उपजाऊ प्रदेशों के सिवा उनके पास और
कोई अच्छे प्रदेश नहीं थे । इजिप्ट और अन्य स्थाना के रामा
,

(१६४. )
लोग उन पर दया दिना कर उन्हें द्रव्य और अन्न के द्वारा
सहायता पहुँचाते थे। एथेन्स राज्य की प्रचीनता और
पूर्ववैभव पर ध्यान रख कर लोग उसे मान देते थे।
इधर स्पार्टा के लोगों ने राजा को निकाल दिया, ईफोर्स
लोगों का शासन बन्द कर दिया , और
अल्पसत्ताक राज्य
पद्धति चला । पाले अधिकारी मेवानिडासने भाडे के सिपा
हियो से सहायता लेकर कठोर शासन प्रारभ किया और
आसपास के प्रान्ता पर अपना म्यूब भातक जमा लिया ।
अन्त में भाकियन गुट के सेनापति फिलोपिमेन के साथ उस
का युद्ध हुआ, जिसमें मेवानिडास मारा गया। इसके बाद
नाविस अधिकारी हुन्ना । यह इतना क्रूर था कि, इसके सामने,
रोमन राजा लोग, जो बडे क्रूर समझे जाते थे, कुछ न थे।
उसने सैनिकों की सहायता से सब धनवान लोगों को देश
से निकाल बाहर किया , और अन्य लोगों पर मनमाना
अत्याचार करके खूब धन प्राप्त किया। उसने मदिरों को लूट
लिया , और स्पार्टी में सर प्रकार के
लोग भर दिये । गुलामों से उसने अपने दुष्ट कार्यों में सहायता
ली , और उसके बदले उन्हें गुलामी से मुक्त करके उन्हें कुछ
जमीन की आमदनी बांध दी।
फिलिप और रोमेन लोगों में युद्ध जारी ही था। ई० स०
के १६८ वर्ष पहले शानियन गुट से मैत्री करने के लिए रोम
का वकील श्राया। इस विषय पर ग्रीस देश में बड़ी चर्चा
शुरू हुई। श्रत में सधि हो गई , और आकियन रियासतों ने
फिलिप का पक्ष छोड कर रोम का पक्ष स्वीकार किया। इस
का कारण उन्होंने यह प्रगट किया कि यदि वे फिलिप का
.
और बदमाश
।

.
.
( १६५ )
जपकडे रहेंगे तोवह फिर आगे पीछे ग्रीस देशकोजीत लेगा।
अगले वर्ष रोमन लोगों ने सिनोसिफेली नामक स्थान
फिलिप पर विजय प्राप्त किया । इस समय रोमन लोगा
सेनापति फ्लामिनायनस था । युद्ध के बाद जो सन्धि हुई
समें यह निश्चय हुआ कि, मासिडोनियन लोगों के जितने
गर ग्रीस में है, वे सर रोम के अधिकार में दे दिये जायें,
र केटी बिना दण्ड लिये छोड दिये जावे , पाच जगीजहाज
बोर एक राजा का जहाज छोड कर अन्य सब जलसेना रोम
अधिकार में दे दी जावे, और एक हजार टालेंट, अर्थात्
चास लाख रुपये, फिलिप दण्ड दे। यह सधि कारिथ में
दुई। उस समय वहा सेल कूद का उत्सव होरहा था और
जय जगह के लोग एकत्र हुए थे । सब लोग उत्सुकतापूर्वक
इस रात की प्रतीक्षा कर रहे थे कि, देखें श्रर रोमन लोग
या करते हे । खेल प्रारभ होने के पहले चोपदार ने तुरही
बजा कर प्रकट किया कि, रोमन लोगों ने मासिडोनियन
लोगों को जीत कर सारे ग्रीस देश को स्वतत्र कर दिया है
और सैनिक सर्च अथवा अन्य किसी प्रकार के कर का
मार भी उन्होंने ग्रीक लोगों पर नहीं डाला ।" इस श्राघोषणा
से चारों ओर आनन्द छा गया। खेल समाप्त होने पर ग्रीस
देश के उचारक रोमन सेनापति फ्लामिनायनस पर लोगों
। खूब पुष्पवर्षा की।
यह समाचार सारे देश में शीघ्र ही फैल गया और
चारों ओर जयजयकार मच गया। उस आनन्द में ग्रीक लोगों
यह न सोचा कि जिन्होंने उनको एक फन्दे से छुडाया
बनावेंगे।
यही उन्हें गुलाम

(१८) चौवीसवां अध्याय । द - -- रोम का अधिकार । (ई० स० के १७८-१४६ वर्ष पहले ) - । ० सन् के १७६वें वर्ष पहले मासिडोनिया के राजा पांचवे फिलिप का देहान्त होगया। इसके बाद उसका लडका पर्सियस (Persey-) सिहासन पर बैठा । फिलिप के मरते समय उसका राज्य खूब उन्मतावस्था में था। प्रत्येक से टकर लगाने की उसमें शक्ति थी। परन्तु रोमन लोगों के सामने उस की नहीं चली। अन्त में उसके मरने पर रोमन लोगों ने पर्सियस से युद्ध प्रारम्भ किया। इस समय इटली,सिसली, सार्डिनिया, स्पेनाऔर एशिया माइनर का कुछ भाग रोमन लोगों के अधिकार में आ गया था । अब उन्हें मासिडोनिया सहित समस्त प्रीस देश जीतने की उत्कठा हुई। ई० स० के १७१ वें वर्ष पहले यह युद्ध पार- म्भ हुआ। के सरदार अब इस कठिनाई में पड़े कि इस समय वे रोमन लोगों में मिले अथवा उदासीन रहे। सायकोर्टास और उसके मित्रों ने उदासीन रहने की सम्मति दी, परन्तु दूसरे दल के नेता.कालिक्रेटिस ने रोमन लोगों को सहायता देने की सलाह दी। बहुत चर्चा होने के बाद लाय. कोटास के विचार सय को पसन्द पड़े, और रोमन धकीत्र भाकियन गुट , ( १६४ ) मार्शस (funclus ) को उक निश्चय की सूचना देने के लिए आकियन गुट ने अपने वकील पोलिबियस को मासिडोनिया भेजा। हां, उस वकील ने रोमन लोगों को यह भी सूचित कर दिया कि, हम सहायता देन को मी तेयार रहेंगे।" पर्सियस और रोमन लोगों का यह युद्ध चार वर्ष तक होता रहा। इस अवधि में रोम पक्ष के ग्रोक नगरों को रोमन सेना के जुल्म और लूट से बडा कष्ट हुा । बडे बडे श्राद- मियों के घर में रोमन खलासी मनमान तोर पर जाकर रहने लगे। “मान मान, मैं तेरा मेहमान" की लोकाक्ति चरितार्थ होने लगी। इसमेघहा के प्रतिष्टित कटुम्चों को बड़ी मानहानि सहनी पडी। किसी शहर के जोतन पर वहा के लोगो को यदा तक कष्ट दिया जाना था कि स्त्रियों और वृद्ध पुरुषों पर भी किसी को दया न पाता थी। ई० स० के ६८ वर्ष पूर्व पीडना की लड़ाई में इस युद्ध का फैसिला हुना । रोमन राजनीतिश एमिलियस पालस को जोत हुई । पर्सियस कुटुम्ब सहित रोमन सेनापति के अधीन हुश्रा । उसने पर्सियस के साथ बहुत अच्छा वर्ताव किया । दूसरे वर्ष पालस ग्रीक रियासतों में दौडा करते हुए सब के उलहने सुनता रहा । इसके याद यह अँफिपोलिस गया। यहां दस रोमन अधिकारी नियत करके उसने मासिडोनिया के गज्यशासन का परम्ध किया। प्रान्त के चार विभाग कर प उसने प्रत्येक विभाग पर मासिडोनियन लोगों को एक एक कोसिल नियत कर दी। ये चारों भाग एक दूसरे से सर्वथैव अलग थे। यहा तक कि, एक भाग के लोग दूसरे M - 7 साथ ( २०० ) भाग विवाह तक नहीं कर सकते थे, और न घर इत्यादि बना कर सम्पत्ति कमा सकत थे एक बार में यह नूतन राज्य व्यवस्था बहुत लाभदायक सिद्ध हुई । रोमन लोगों ने कर बधुत कम लगाया। यहा, तक कि मेसिडोनिया के गजा को जितना कर देना पड़ता था उससे श्राधा रोमन लोग लेने लगे। मैसिडोनिया को यह नवीन राज्यव्यवस्था जिस समय निश्चित हुई , उम समय ग्रीक लोगों ने बडे घडे खेल तमाशे करके अपनी प्राचीन उत्सवप्रियता व्यक्त थी। इटली वापस पाने के पहले, पालस रोमन सेनेट की श्राक्षा से, एपिरस प्रान्त में गया। वहा उसने पर्सियस के पक्ष के सत्तर नगरों को बूल में मिला दिया । रोमन सनिकों ने नगरों को लूट कर उनके कोट गिरा दिये, और वहा के लोगों को गुलाम के तौर पर बेच दिया ! एमिलियस पालस के रोम वापस आने पर लोग बड़े समारोह के साथ उसे नगर में ले गये। उसके रथ के पीछे मासिडोनिया का कैदी राजा अपने बाल बच्चों सहित पैदल चल रहा था । रोम में पहले तो वह एक अँधेरी कोठरी में बन्द कर दिया गया, पर पीछे से शीघ्र ही उसका छुटकारा हो गया, और उसे पाल्या में रहने को प्राज्ञा मिली। वहीं उसकी मृत्यु हुई। पीडना के विजय के बाद आकियन गुट के, लगभग एक हजार लोगों को कालिफोटिस ने रोम का शत्रु ठहराया, और उन्हें पकड कर रोम भेज दिया। वहां से उन्हें इटली के भिन्न भिन्न नगरों में रहने की अाशा दे कर देशनिकाले का दण्ड " -- 1 . + ( २०१ ) दिया गया। इन लोगों में पोलिवियस नामक एक इतिहास. कार भी था। पालस के पुत्र फेथियस ओर सिपियो की सिफारिश पर पोलिवियस को रोम में ही रहने को प्राश मिल गई । पोलिबियस सदैव सिपिया के साथ उसकी सर चढाइयों में उपस्थित रहता था। ई०म० के १४६ वें वर्ष पूर्व, जर सिपियो ने कार्य को जलाया, तर भी पोलिपियस उप- स्थित था। कार्थेज को पराजित करने के कुछ वर्ष पहले सिपियो ने सेन्सर ( Uruson ) केटो से प्रार्थना करके, देशनिकाले का दण्ड गये हुए ग्रीकों को स्वदेश वापस भेजने को बाधा सेनेट से प्राप्त कर ली। इससे, उन ग्रीक लोगों को, जो बेचारे अब तक जीवित थे, बहुत दिनों बाद फिर एक बार स्वदेश 'लौट जाने का अवसर मिल गया। इसके गद पोलिरियस ने फेटा से प्रार्थना की कि, इन सब को इनके पहले के अधिकार भी दे दिये जावे तो बडा अच्छा हो , परन्तु इस पर उस वृद्ध राजनीतिज्ञ ने सिर हिलाते हुए उत्तर दिया, 'भाई, इतने ही में सतोप रक्खो, नहीं तो जो कुछ मिला है, वह भी चला - . जावेगा।" . रोमन लोगा ने ग्रीस पर धीरे धीरे अपना खूब प्रभाव जमा लिया। उन्होंने अपनी प्रधानता और भी बढाने के लिए कियन गुट में फूट डाल कर कारिथ, स्पार्टा और प्रार्गास को उससे अलग कर दिया। प्राकियन लोगों को यह फट एसद न आई , और उन्होंने रोम के साथ युद्धघोषणा कर दी। परन्तु बहुत जल्द इस पर उनको पछताना पडा, क्योकि जिन बडे बडे लोगों ने युद्ध के लिए उनको उभाडा था

( २०२ )
वही नाना प्रकार के जुल्म करके लोगों से, खर्च के लिए,
वसूल करने लगे , और उनके गुलामों को जबरदस्ती सेना में
भरती करने लगे। पर उनके ये मब प्रयत्न व्यर्थ थे । रोमन ।
सेनापति मिटेलस विजयी हुश्रा , और पाकियन गुट की
सयुक्त सेना को पराजित करके उसन कारिथ नगर में प्रवेश
किया, तथा उस नगर, को लूट कर और जला कर उसनेमरिया-
मेट कर दिया (ई० स० के०१४६ वर्ष पहले।)
कारिथ के लोग गुलाम बना कर बेच दिए गए। वा के
कलाकौशल के अनेक सुदर और प्रसिद्ध स्थान रोमन लोगों
के
हाथ
में आ गए । परन्तु रोमन लोगों में अभी इतनी मभ्यता
न आई थी कि, वे उनका मूल्य समझते । अभी उनमें कला
कौशल और भाषा सम्बन्धी प्रेम उत्पन्न होने में और ढो सो
वर्ष लगे । सच पूछिए तो ग्रीस देश को जीतने ही के कारण
उनका सुधार हुश्रा , और रोमन राष्ट्र की प्रसिद्धि हुई । कारिथ
के अनेक चित्र और मूर्तियां ममियस के हाथ में पड़ गई,
जिनमें से कितने ही उत्तमोत्तम चित्न और मूर्तिया उसने
पर्गेमोस ( Pergumas ) के राजा के हाथ वेच दी ; और
बाकी चीजें जहाजा में भर कर रोम भेज दी । हा, जहाज
वालों से इतना उसने अवश्य कह दिया था कि इनमें धका न
लगने पावे । पोलिबिपस अपने इतिहास में स्पष्ट लिखता
है कि, "अनेक कीमती चित्रों पर पंट रख कर पासों से खेलते
हुए मेने स्वय रोमन लोगों को देखा है। इससे साफ जान
पडता है कि वे लोग उन चित्रों की कदर नहीं जानते थे।
ममियम प्रीस में दो घर्प रहा। उसे प्रो० कासल अर्थात्
सूबेदार का पद मिला था। सन् ईसवी के १४५, वें वर्ष पूर्व
म

( २०३ ।
ग्रीस के राज्यशासन का प्रबन्ध करने के लिए रोम से अच्छे
अच्छे चतुर मनुष्यों को कमेटियां भेजी गई । थेसली और .
एपिरस के दो प्रान्तों को छोड कर शेष सारा ग्रीस मासिहो.
निया प्रान्त में आ गया था।
'पचीसवां अध्याय ।
-
रोम के शासन मे ग्रीस की दशा।
(ई० स० के पहले १४६-१४५३ तक।)
रोमन लोगों के अधिकार में पा श्राने पर मोम देश की
प्राचीन स्वतत्रता नष्ट हो गई । फिर भी वहां के लोगों की
स्थिति बदलने में बहुत समय लगा। ऊपर ऊपर तो भिन्न
भिन्न ग्रीक रियासतों की राज्यव्यवस्था प्रजासत्ताक ही थी।
पर वास्तव में सारा प्रवन्ध रोमन अधिकारियों के इच्छानु
सार होता था ।
प्राज अनेक शताब्दियों से पथेन्स नगर, मारे ग्रीस देश में
ही नहीं, प्रत्युत सारे जगत् में विद्या का धादिस्थान माना
जाता था। रोम के धनवान् युवक अपनी विद्या पूर्ण करने के
लिप एथेंस जाया करते थे। होरेस और सिसरो ने भी अपनी
विद्या एथेंस में ही भार पूर्ण की थी। ग्रीक लोगों के धर्माः
चार रोमन लोगों ने कुछ नहीं बदले। उनके राष्ट्रीय उत्सव
-
-

-- है ( २०४'). भी पहले ही के समान जारी रहे , और रोमन भी उनमें शामिल होते रहे। रोमन लोगों की अधीनता पहले पहल ग्रीक लोगों को दुस्सह नहीं जान पड़ी । रोमन लोगों ने जो दूसरे देश जीते थे उनकी बात जुदी थी , और ग्रीस की बात सुदी अन्य । देश बिलकुल असभ्य अवस्था में थे। अतएव नूतन सुधार करने के लिए रोमन लोगों को वहां जबरदस्ती करनी पड़ी, परन्तु यहा तो विजित लोगों को सुधारने का प्रश्न ही नथा, किन्तु इसके विरुद्ध विजेता लोगों को ही उनसे बहुन कुछ सीखना था। रोमन लोगों के अधिकार में लगभग साठ वर्ष रहने के पश्चात् ग्रीकों ने स्वतत्रता प्राप्त करने के लिए फिर एक बार प्रयत्न किया । पर उनका सारा परिश्रम व्यर्थ गया। रोमन सेनापति सिला एक बड़ी भारी सेना लेकर ग्रीस में पाया , और उसने सब बलवाई नगरों को पराजित करके उन्हें अपने अधिकार में कर लिया। एथेन्स भी गेमनों के अधिकार में आ गया । एथेस के लोगों को सिला ने यह अधिकार दिया कि, वे अपने अधिकारी प्राप चुन लिया कर , और अपने लिए कायदे-कानून भी श्राप ही बना लिया करें । इसके बाद उसने पिरियस को जीतो , और उसकी किलेबन्दी गिरवा दी। कुछ दिनों के बाद ग्रीकों का स्वातन्य विषयक प्रयत्न सर्वदा के लिए बद हो गया। ( ई० स० के० ८७ वर्ष पहले ) रोमन लोगों ने चूंकि यह कठोर प्रबन्ध कर दिया था कि पीक रियासतें अपनी निज की सेना न रखें, इस लिय अब चारों ओर समुद्री डाकुओं का उपद्रव शुरू हो गया। सरकार १ 1 + । 1 - .

-
((-२०५ )
की कठोरता भी बहुत असह्य हो गई । अधिकारो लोग नियत
कर से अधिक द्रव्य घसूल करने लगे। बडे आदमी द्रव्य देकर
रोमन नागरिकत्व का हक हासिल कर सकते थे, अतपय
वे कर के बोझ से बच जाते थे। इससे मारा कर गरीबों के
ही मत्थे भाता था। इन कारणों से सर्वसाधारण लोगों को
अत्यन्त कष्ट होने लगा । इसके अतिरिक्त चू फि उपरोक
रीति से एकत्र किया हुया सारागन्य रोम भेज दियाजाताथा,
अतएव देश की दरिद्रता और भी अधिफवढने लगी। व्यापार,
संपत्ति और लोकसंख्या, सर में कमी होन लगी,
अनेक ग्रीक शहर उजड़ गये। जहां देखो वहा उजाड बस्तिया
और बिना जोती वोई जमीन का दुसद दृश्य दिगाई देने
और
स्वगा।
जूलियस सीजर न कारिथ में फौजा ढग की किलेयन्दो
यनवाई । परन्तु इसके लिए चूंकि पूरा पूरा द्रव्य न था,
अतएव देहात के लोगों ने कवरों तक के पत्थर उसके लिए
निकाल दिए । तथापि कितने ही लोग अपना पूर्ववैभव दिन
लाने का ढोंग करते थे , और उनको थोडी रहुत स्वतनता
भी थी। कम से कम, अपने अधिकारी आप नियुक्त करना,
और सटके, पाठशाला' तथा मन्दिर इत्यादि स्थानिक उपयोग
के कार्यों के लिए कर लगा कर द्रव्य एकत्र करना इत्यादि
कार्य व कर सकते थे।
अफिकृियोनिक कोसिल का कार्य पहले ही के समान हुया
करता था। डेरफाय के मदिर में जाकर ग्रीक लोग भविष्य
हाणी अभी सुना करते थे। एथेंस की परियोपेगस सस्था
और स्पार्टा की सब सस्थाए भी पहले ही के समान अपने
4

P . in . - 1 - , 1(२०६ ) अपने कार्य किया करती थी। फिर भी ग्रीको' की गरीबी घढती ही गई । रोमन साहकारों से उन्होंने कर्ज लिया, जिसे काने में उनको अपनी जायदाद घेचनी पडी। बडी चंडी जमीन विदेशियों के हाथ में चली गई, और ग्रीक लोग केल किसान बन गये। कई रोमन राजाओं ने ग्रीस देश में अनेक सत्कार्य मी किये । उदाहरणार्थ, हेड्रियन ने अनेक भव्य मदिर बनवाये, फारिथ में सार्वजनिक स्नानगृह बनवाये, और उत्तर की ओर पेलापानेसस तक गाडी का रास्ता तैयार करा दिया। मार्कस श्रारेलियस ने एथेन्स में पाठशालाए बनवाई और शिक्षकों का वेतन वढा दिया। अन्य कई राजाओं ने भी समय समय पर कुछ अच्छे काम किये । फिर भी अन्य राष्ट्रों के मुकाविले ग्रीस देश का जो ह्रास होरहा था, वह बंद नहीं हुआ। आर्केडियस और होनाग्यिम नामक राजाओं के शासन काल में गाथ लोगों ने ग्रीको पर चढाई की । इन जगली लोगों ने एथेन्स को लूटा , सारे देश को धूल में मिला दिया, 'और अन लोगों को पकड ले जाकर गुलाम की तरह वेच दिया। उसी समय से गाथ लोग सदैव ग्रीको कोसताने लगे अत में उन्होंने रोमन राज्य तक को विध्वस किया। इसी समय के लगभग ग्रीस देश में, विशेषत उसके पूर्वी भाग में, ईसाई धर्म का प्रचार आरम्भ हुश्रा । यूरोपियन ग्रीस में प्राचीन काल का धर्म लुप्त होकर राजा कान्स्टेंटाइन के में ईसाई धर्म का सब जगह प्रवेश होगया। दूसरा एक बड़ा परिर्वतन यह हुआ कि, रोमन राज्य रोम से उठकर बायजांटियम शहर में चली गई । सन् ३३१ - -- - -- समय की राजधानी

11
( २०७ )
ई० में राजा ने राजधानी का यह शहर फिर से बनवाया और
इस का नाम कान्स्टेटिनोपल रना।
उस समय से रोमन राज्य के दो टुकडे होगये, एक पूर्व
की ओर का और दूसरा पश्चिम की ओर का। पूर्वीय राज्य
में ग्रीस का ममावेश हुआ, और उसका शासन ग्रीक राजाओं
के में
रहा । इस प्रकार राज्य के विभाग होजाने पर
"गाथ लोगों के नायक अलेरिक ने ग्रीस पर चढाई की। उस
समय, बहुत दिनों की शान्ति से ग्रीस देश धनवान होगया
था। परन्तु इन जगली और लुटेरे गाथ लोगों ने देश की
ऐसी दुर्दशा की, कि फिर यह कभी उठ नहीं सका।
थीम नगर की किलेवदी वडी मजबूत नवीन बनी थी।
अतएव अलेरिक ने उम पर चढ़ाई करने का प्रयल नहीं
किया। एथेन्स से भी उसने छेडछाड नहीं की । परन्तु शेप
पदिका प्रांत को उसने धूल में मिला दिया । इल्युसिस नगर
और वहां के मदिर का नाश होगया, और सारा पेलापनेसस
भात युद्ध में जल भुन कर विध्वन्म होगया । कारिथ, अगस
और स्पार्टा के शहर मटियामेट होगये । इसके सिवा, और
मी कितने धन और जन का नाश हुआ, इसका कुछ ठिकाना
महीं । इस लड़ाई के कारण ऊचे दरजे के ग्रीक लोग तो
सर्वथा नए होगये, अनेक लोग तलवार मे काट डाले गये,
और जो बचे उनकी जायदाढ,तथा गुलाम छीन लिये गये.
अतएव ये किमान घन गये । कुछ देश छोड कर चले गये।
उधर जब कि अलेरिक और उसके गाय लोग ग्रीस देश
को सत्यानाश कर रहे थे, इधर एशिया में हुण नामक एफ
दूसरे ही जगलो लोग सिरिया देश को लूटने लगे। थ्स और
Y

1 .. ( २०८) मासिडोनिया प्रातों को भी इसी प्रकार के जगली लोगों ने नाशकर डाला। ग्रीस देश में गुलामों और निज्ञ जाति के लोगों में सर्चदा एक प्रकार का भेद बना रहता था। इस भेद को मिटाने के लिए रोमन लोगों ने समय समय पर अनेक कायदे बनाये। उन्होंने यह भी कानून बनाया कि, मालिक अपने गुलामों से खेती के काम के सिवाय दूसरे काम न ल , जो किसी जमीन को लगातार तीस वर्ष तक जोतता बोता रहा है, उससे वह जमीन न ली जावे, और उसके वशज भी, चाहे अन्य बानो में वे फितन ही स्वतत्र क्यों न हो,-उसे न छोडे । इस कानून का फल यह हुश्रा कि, निन्न जाति के लोग और गुलाम मिल • कर एक होगये और उनसे एक तीसरा नवीन वर्ग 'सर्फ ' अर्थात् नौकरों का गन गया। यपि ग्रीन देश में ईसाई धर्म का प्रचार प्रारभ होगया था, तथापि निम श्रेणी के लोग मूर्ति पूजा के उत्सव और विधि कियाही करते थे।गजा जस्टिनियन के समय तक यही हाल रहा जस्टिनियन ने मूर्तिपूजा बिलकुल वन्द कर दी, और दश में कई ईसाई,मदिर तथा मठ पनवा दिये । तथापि उसने ग्रीस देश पर' बडे बडे अत्याचार किये। उसने खतत्र नगरों की सम्पत्ति हरण कर ली, और उनके सारे स्वत्व छीन लिये । इसके बाट करों का बोझा बहुत बढ गया, जिससे लोग दरिद्र होगये, और अपने पूर्वजों की विद्या और कलाकौशल भूल कर अज्ञानी बन गये। जस्टिनियन के समय में रेशम के कीडों से रेशम तैयार करने की विद्या यूरप . -- - ( २०६ ) में पाई, और तभी से सारे ग्रीम देश में इस व्यवसाय का प्रचार होगया। ग्रीन की लोकसरपा जब कम होगई तर उत्तर की ओर से नवीन लोग देश में भागये, और पहले जो इलिरियन तथा अन्य जगली लोग श्रयेनियन नाम से देश में रहते थे, उनको उन्होंने दक्षिण की ओर भगा दिया। उस जगह प्राचीन और नवीन लोगों का मिश्रण हुप्रा । श्रतएव वर्तमान ग्रीक लोगों की उत्पत्ति इमी मिश्रण से हुई है । वे असली हेलन लोगों क वशज नहीं है । गुलामों की सरया धीरे धीरे नष्ट होगई। जर्मनी के जंगलों से हथियारबन्द लोगों की नवीन टोलियां आई जो येमली और मासिडोनिया प्रांत में बस गई। ग्रीक नगरों और ग्रीक सभ्यता के नाम या मुरय कारण यह है कि देश के चलतू मार्ग अच्छी दशा में नहीं रखे गये । रास्तों के खराब होजाने के कारण भिन्न भिन्न प्रान्तो फा पर. स्पर व्यवहार छूट गया । इसी से हेलास अथवा ग्रीस के ग्रीक लोग कास्टैटिनोपल के ग्रीक लोगों से मिलकुल भिन्न जाति के होगये। पूर्वी रोमन राज्य, अर्थात् ग्रीस देश का रोमन राज्य, अन्त में डूब गया । भरत और तुर्किस्तान के मुसलमान प्रबल होकर अनेक शताब्दियों तक उक राज्य पर चढाई करते रहे। उन्होंने इजिप्ट और सिरिया में ग्रीक मभ्यता का नाम निशान तक नहीं रक्खा | ग्रीक लोगों की प्राधादी भी प्राय' उन्होंने नष्ट कर दी। अंत में मन् १४५३ में ग्रीस का रोमन राज्य भी तुओं ने जीत लिया, और कास्टेंटिनोपल में अपना अझ जमाया, जो और तक उनके हाथ में है। ।

(, २१० )
छब्बीसवां अध्याय ।
ग्रीस के अर्वाचीन इतिहास का सारांश ।
कांस्टेटिनोपल को जीत कर तुर्को ने यूरोप में जय
अपना राज्य स्थापित किया, तब ग्रीक लोग भी उनके अधि.
कार में प्रागये तुका ने देश भर में अपनी ही जाति के अंधि
कारी नियुक्त किये, जो पाशा के नाम से प्रसिद्ध हुए । ये
अधिकारी, लोगा पर नाना प्रकार के जुल्म करते रहे । प्रत्येक
यस्ती पर जो अधिकारी नियत हुए उन्हें श्रागा कहने लगे।
वे पाशात्रों के नीचे काम करने लगे । वे तथा अन्य सवा
अधिकारी प्रजा पर खूब जुल्म करते रहे।
ग्रीक और तुर्क लोगों में धर्मभेदों के कारण कभी ऐक्य
हुधा ही नहीं। उनमें विवाह सम्बन्ध होना बिलकुल अस.
म्भव था। ग्रीक लोगों के हृदय में मुहम्मद पैगम्बर के प्रति
श्रद्धा नहीं थी, अतएव इन दोनो जातियों में सदैव के लिए
भेद पड़ गया।
तुर्की के शासन में प्रीक लोग अत्यन्त अज्ञानी और दरिद्री
होगये । उनका देश जो पहले इतना सधन, सघन और सभ्य
था, श्रय बिलकुल उजाड दिखाई देने लगा। बडी बडी भव्य
इमारतें गिर गई, और ग्रीक कलाकौशल के प्राचीन नमूने
प्राय. नष्ट होगये । पेलापोनेसस प्रान्त को तुर्क लोग मोरिया
तो
-

२११ )
कहने लगे । वहा एक भी जगह नहीं रही। कुछ थोडे थोडे
प्राचीन वेभय के चिन्ह भर दिखाई दे रहे थे।
हां, नीचे के प्रायद्वीप की अपेक्षा उत्तरी प्रीस की दशा
कुछ अच्छी थी। एथेंस में बहुत से प्रतिष्ठित कुटुम्य रहते थे,
और पटिका की अनेक यस्तिया में भी लोग सुसी थे । त्योहार
के दिन नाना प्रकार के सेल और उत्सव हुश्रा करते थे।
तथापि देश की गिरी दशा के चिन्ह जहा तहा स्पष्ट दिखाई
देते थे।
समशीतोप्ण वायु और उपजाऊ धरती के कारण देश में
अन्न खूब होता था । सरसों, चावल, कपास और तम्राक
वहा के मुरय पदार्थ है । एटिका प्रान्त में लोग पहले ही के
समान आलिय फल भोर रेशम के लिए शहतूत के वृक्ष लगाते
थ। अनेक लोग पशु पालने और मछली मारने का व्यवसाय
करते थे। शेप लोग लकडी येच कर अपना उदर निर्वाह
करते थे।
प्राचीन काल के समस्त बडे बडे नगर अम कुमामों की
दशा में आये । इनमें से अनेक गावों में ग्रीक व्यापारी और
अन्य धनवान लोग रहते थे। तथापि 'इनमें से प्राय अनेक
लोगों के घर भिमारियों की झोपडी से अच्छे न थे।
रोमन राज्य में ग्रीक लोग रोमन ढग के कपडे पहनते थे।
तुर्फी राज्य में उन्होंने तुर्की पहनाचा स्वीकार किया गिरीव
लोग सिर में टोपी और अग में एक छोटा सा कुर्ता पहनने
लगे।
सन् १७७२ में रुस के भडकाने से प्रीक लोगों ने तुर्की
सरकार के विरुद्ध बलवा किया, जिसे तुफी सरकार ने शान्त

1 , - (२१२) कर दिया। तथापि सब ग्रीक लोगों के मन में स्वतन्न होने की उत्कट इच्छा उत्पन्न होगई ! परिणाम यह हुआ कि, सन् १८१७ में उन्होंने फिर दूसग बलवा किया। उनका मुखिया प्राल्पियन सरदार अली पाशा था । उसकी सहायता से बल वाइयों ने कई वर्ष तक तुर्की सरकार से झगडा किया। श्रागिर सन् १८२२ में जो लडाई हुई उसमें अली पाशा'मारा गया। तथापि ग्रीक लोगों ने अपना उद्योग नहीं छोडा। पहले,पहल इस झगडे की ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया, पर धीरे धारे ग्रीक लोगों के विषय में यूरोपियन राष्ट्रों में, विशे पत फ्रान्स और इलैंड में, बड़ी सहानुभूति उत्पन्न हुई। इस लिये ग्रीक लोगों की सहायता करने के लिए कई राष्ट्रों के लोग स्वयं ग्रीस में गये , और कई राष्ट्रों ने चन्दे कर के उन्हें धन की सहायता भेजी। इस प्रकार छै वर्ष और न्यूनाधिक वेग से लड़ाई होती रही । तुर्क लोगों ने एथेंस को घेर कर शहर पर अधिकार कर लिया। अब ग्रीक लोगों का पक्ष गिरने लगा। ऐसे सकट के समय ग्रीक लोगों ने काउट केपो डिस्ट्रियास ( Count Capo d' Istras) नामक एक ग्रीक महाशय को, जो रुस के यहां नौकर था, वापस बुला कर अपने कार्य पर नियुक्त किया । उसने प्रेसिडेंट (राष्ट्रपति ) का पद धारण करके एक प्रकार की सुयत्रिन राज्यप्रणाली निर्मित की, 'और' जो लोग स्वतन्त्रता के लिये भिन्न भिन्न स्थानों में लड रहे थे उन सवको सगठित करके एक उत्तम सेना तैयार की। इस प्रकार केपो डिस्ट्रियाम ने ज्यों ही राज्यप्रणाली को सुयनित किया, त्यो दी प्रेटविटन, रूस और फ्रांस ने तुकों के ( २१३ ) विरुद्ध, ग्रीक लोगों का पक्ष ग्रहण किया। इन राष्ट्रों ने सुल तान को सूचित किया कि नियमित कर-भार लेकर प्रीस देश को स्वतत्रता दे दी जावे । सुलतान ने यह सूचना स्वीकार नहीं की। इस पर उपर्युक्त राष्ट्रों ने खुल्लमखुल्ला युद्ध प्रारम्भ फर दिया। सन् १८२७ में नेवेरिनो के उपसागर में एक बडी भारी लडाई हुई, जिसमें इजिप्ट और टर्क की जलसेना नष्ट होगई । इसके दो वर्ष बाद रूस ने तुर्की सेना पर विजय प्राप्त किया। प्रतपच सन् १:२६ में सुलतान को यह स्वीकार करना पड़ा कि ग्रीस देश स्वतन्त्र है। सव'राष्ट्रों ने इस नवीन ग्रीक राज्य की मर्यादा निश्चित कर दी। उसे पहले का 'हेलास' नाम दिया गया, और वे रिया के राजा का दूसरा लडका प्रोथो सन् १८३२ में गही पर बैठाया गया। परन्तु यह राज्यप्रणाली लोगों को पसन्द नहीं आई । पहले ही चर्प लोगों ने राजा को पदच्युत कर दिया। एक वर्ष बाद डेन्मार्क के राजा का द्वितीय पुत्र, पहला जार्ज, "हेलेन्स के राजा के नाम से एथेंस की गद्दी पर पाया। उसी समय से अनेक सुधार प्रारम्भ हुए । तथापि, उत्तम सृष्टिवैभव और समशीतोष्ण वायु के होते हुए भी, ग्रीस देश के अनेक भाग अब भी गिरी दशा में हैं । कारिथ की सयोगीभूमि से जलमार्ग खोदा गया है। व्यापार के नवीन नवीन उपाय प्रारम्भ हो गए हैं। श्रीक लोग राजकाज दक्षता दिसला रहे हैं, और राष्ट्रीय शिक्षा के लिए भी यत्न कर रहे है। फ्रांस, इङ्गलड, और रूस ने यूरप की प्राचीन सभ्यता के मुख्य स्थल-इस ग्रीस देश का उद्धार करके बडा पवित्र कार्य किया । तथापि यूरप में इस समय जो महा युद्ध हो रहा है, . 1

( २१४ )
उसके कारण भविष्य में यूरप के नकशे में क्या क्या परिवर्तन
होते हैं, सो अभी देखना चाहिये ।
1
,
प्राचीन नगर-राज्यों का अन्तःस्वरूप ।
n
।
मान लीजिए कि, हम एथेंस, कारिथ अथवा रोम के
समान, प्राचीन काल के, किसी नगर में उपस्थित हैं, और
तव देखिये कि, हम को क्या क्या दृश्य दिखाई देते हैं।
हमारा सर्वस्व यह शहर है। हमारा सारा देश, हमारा'
सारा राज्य, हमारे सब लोग और धर्म, सब कुछ, इसी एक
शहर में है। शहर के बाहर हमारा कुछ नहीं। सव व्यवहार
सिर्फ इसी एक शहर में है। किसी एक देवी अथवा देवता ने
प्राचीन काल में इस शहर को बसाया, उस देवता का यहां
सूप मभाव है। उसकी पूजा अर्चा यहां सदैव होतो ,रहती
है । उस देवता के सहायक अन्य अनेक देवता भी है। उन
सबकी मूर्तियाँ और मन्दिर शहर में जगह जगह हे । मन्दिर,
चांग, फुलवाडिया, गुफाएँ, पहाडियां, तलाव, झरने, इत्यादि
भिन्न भिन्न पवित्र स्थान भी भिन्न भिन्न देवताओं के निर्माण
किये हुए जहां तहा मौजूद है। एथिनी देवी ने यहा ज्योड़ी
एक भाला मारा, त्योंही भूमि से एक वृक्ष उत्पन्न हो गया,
और वही यह 'आलिया वृक्ष है। किसी और दूसरे देवता ने
पानी का यह भरना उत्पन्न कर दिया है। देखिये, इस गुफा
अमुक साधु ने बैठकर तपस्या की थी। यह एक पत्थर है,

(२१५ )
जो श्राप ही श्राप उठ पाया। इसी प्रकार के अनेक दृश्य ह ।
इन देवताओं की पूजा में मिर्फ नगर निवासी ही सम्मिलित
हो सकते हैं । गुलामों को नागरिको के हक हासिल नही
हैं । इसी प्रकार, अन्य शहरों से, किसी कारणवश जो पर
कीय लोग यहा पाते हैं, उन्हें भी यहां कोई हक हासिल नहीं
है । यहा के लोग अपना शहर छोड कर, मदेव के लिए,
रहों बाहर नहीं जा सकते; और यदि वे जाने तो माना
उनका देशनिकाला हो गया, और वे अपने अधिकारी से
वचित हुए। इसे आप एक प्रकार का सासारिक मरण सम
भिये । उसे फिर कहीं श्राश्रय नही मिल सकता । मान
लीजिए, एक मनुष्य किसी दूसरे शहर में महमान के तौर
पर गया, अब उसे उस शहर के समाज में अपना वहा के
उत्सवों में स्थान नहीं मिलेगा। उसका वहा पूग यहि कार
।
ही समझिये।
शहर में प्रति वर्ष अनेक उत्सव और समारम्भ होते है ।
उस समय चित्र, मूर्तिया, इत्यादि रस कर स्थान को साजते
ओर सुशोभित करने है । सर कठिनाइया को एक ओर रस
५ फर उत्सव में प्रत्येक को अवश्य जाना चाहिए । सर उत्सव
सुले स्थान में होते हैं। देवता की सवारी निकलती है । वाथ,
भजन, मत्रघोप, इत्यादि खूर होता है। व्यारयान होते हैं।'
इन उत्सों में निमित्त धारान शोर भक्त लोग, मन्दिर,
चौक, फापारे, नाटकगृह, इत्यादि अपने व्यय से बनवाकर
लोकोपयोग के लिए देते हैं। दीपोत्सर, नान, रग, खेल,
पाजी, नाटक, कुश्ती, मुठभेड, इत्यादि उत्मर के गा है।
,
,

.
.
(२१६ )
इनको सय लोग रूपतत्रतापूर्वक देख सकते है, किसी को
कुछ देना लेना नहीं पड़ता।
गरीबों के लिए ऐसे उत्सवों का विशेष रूप से कराना
धनवान् लोगों का कर्तव्य है। धनवानों को गरीयों का सय
प्रकार से व्यान रखना चाहिये । रोम नगर में धनवान् वकील
गरीबों के मुकदमे विना कुछ लिये ही मड देते है। गरीयो
को मदद करना; उनको मा प्रकार के सुमीते कर देना,
उनके लिए स्नानगृह इत्यादि बनवा देना, बडे पुण्य का
कार्य है । धनवान् लोग अपने बाग नगीचे गरी के लिए,
सुले रसते हैं । वे अपने घर, महल, हवेलिया, बॅगले, इत्यादि
स्थान और सारा सम्पत्ति, अपने वाद, गरीबों के लिए दे
जाते हैं । मुख्य मुख्य लोगो को सार्वजनिक उत्सवां में मुख्य
भाग लेना पडता हे । चे व्याख्यान देते हैं, जिससे लोगों का
स्वाभिमान जागृत रहता है, जो कि खास सास सकटों के
अवसर पर श्रोर भी अधिक प्रदीप्त होता है। पेरिलीज, उमा-
स्थेनिस, लिपियो, इत्यादि के उत्तमोत्तम भापण सुन
कर फिसके हृदय में स्वाभिमान की ज्योति प्रज्वलित न
होगी।
राज्यप्रवन्ध में प्रत्येक नगरनिवासी को अधिकार रहता
| आजकल की तरह उसे अपने प्रतिनिधि नहीं चुनने
पडते । सब लोग एक होकर अपने कानून बनाते है-अपने
राजनियम निर्धारित करते हैं। मानो सारा नगर आज फल
का एक कार है । शहर का विस्तार भी कुछ बहुत बड़ा नहीं
है । लास पचास हजार लोग हुए, तो बहुत है। चारों ओर
नगरकोट बता हुश्रा है। कोट के बाहर वस्ती नहीं है ।' सब
.
।

.
(, २९७ )
जगल है। शहर की सफाई ऐशो फुछ अपूर्व रहती है कि
शाजकल से भारोग्य विभाग को उस पर बहुत ही आश्चर्य
होगा। शहर, दी, तालाच सथवा अन्य किसी स्थान में यदि
कोई मतीनता अथरा दुर्गनि फेलानेगा तो उन स्थानों के
देवता उस पर अवश्याही कुपित होंगे। इस डर से सब लोग
स्वच्छता रखते हैं। अर्थात् मारे व्यवहार धार्मिक बन्धनों से
नियमित किये हुए है।। शाज लि.डे बटे शहरों में गरीव
लोगों को अत्यन्त मलीन और गन्दी दशा में रहना पड़ता है।
श्रीक लोगों का यह होता नहीं है । ग्रीक लोग कभी ऐसे गन्दे
नदी रहेंगे। उन्हें कोई नेमाज में प्राने ही नहीं देगा। इस
लिए गरी और वस्त्र धांना ' विमना, मलना, साफ फिरना,
ग्रीक लोगा का सब से बड़ा उद्योग है। स्त्री हो, चाहे पुरुष
हो, स्नान किये गिना कोई नहीं रहेगा । रोमन लोगों को तो
स्नान करने का बडा ही गोकरे, ऐसे बडे बटे अनेक स्नान
गृह शहर में मौजूद हैं कि, जिनमें पाच पांच हजार लोगस्नान
कर सकते है , ओर वही नाटक, खेल, व्याख्यान इत्यादि होते
रहते हैं।
परन्तु इतने ही से यह न समझना चाहिए कि, ग्रीक
लोगों में कोई शनिष्ट रिवाज नहीं है । युद्ध पार लडाई-झगडे
सदैव होते रहते हैं। क्षुद्र से क्षुद्र कारण इसके लिए पर्याप्त
होता है। जहा एक नगर ने दूसरे नगर को जीता, कि, यस
वह नगर धूल में मिला ही समझिये। फिर उसका चहा नाम
निशान भी नहीं रहने पाता। इसके सिवाय प्रत्येक शहर में
गुलामो को सरया भी बहुत बडी रहती है।। नये फी सदी
गुलामों की वस्ती सममिए । इन गुलामों की दशा पशनों

--
के समान ही रतही है। उन्हें कोई अधिकार नही रहते ।
एंवर ने मानो उन्हें सिर्फ इसी लिए उत्पन्न किया है कि
अपने मालिक के लिए अपना पसीना बहावें और उनकी
डांट सहें । नियों को दशा भी प्राय गुलामों के समान हो'
समझिये। घर की नोकर लिया ही है। अब यतलाइए, इन
प्राचीन नगर राज्यां को अर्वाचीन काल की 'राष्ट्र'-सका किन
प्रकार दी जा सकती है?
।

Gress Ka Itihaas

Author
Gupt,babu Pyare Lal
Title
Gress Ka Itihaas
File name
Gress Ka Itihaas
Text
OCR done
Citation
1925
Published
2011/01
Publisher
Tarun Bharat Granthawali,daraganj Prayag
Language
Sanskrit
Pages
199
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546323
Barcode
4990010024809.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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4g38l6k7HQV
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