Bharti Bhawan Liabrary, Allahabad
Manduki Siksa Or The Phonetical Treatise
Front matter
entertaining
ar
OM.
MANDUKI SIKSA
OR
TIE PHONETICAL TREATISE
OF
TX ATHARVA VEDA
EDITED FROM ORIGINAL MSS.
WITH
År introduction, Appendices An Inder
BY
BHAGAVAD DATTA
PROFESSOR D. A. V. COLLEGE, LAHORE.
.
OCTOBER 1921.
Past Edition
Price one Rupee.
509 Copies.
Printed by LALJI DASS
MANAGER HINDI PRESS, HOSPITAL ROAD, LAHORE.
AND PUBLISHED BY
THE RESEARCH DEPARTMENT, D. 1. V. COLLEGE, LAHORE.
The publications of this series can also be had of
1. MESSRS. LUZAC & Co.,
46 Great Russell Street,
London II. C.
2. Lala Moti Lal Banarsi Dass, The Punjab
Sanskrit Book Depot, Said Mittha Bazar, Lahore.
3. Lala Mehar Chand Lacliman Dass, Sanskrit
Booksellers, Said Mittha Bazar, Lahore.
4. Pt. Wazir Chand, Proprietor Vedic Book Depot,
Mohan Lal Road, Lahore.
ओ३म् माण्डूकी शिक्षा। भूमिका। हस्तलेख वा अन्य सामग्री। । (३) प, दक्षिण कालेज पूना के हस्तलेखों के राजकीय-संग्रह की सूची ( १६१६ सन् ) में इस हस्तलेख का विवरण संख्या ४०५ (पुरानी संख्या १७८ (vii) १८८०-८१ ) के नीचे है। प्रारम्भ है इसका पत्र १ख से, और समाप्ति १४क की अन्तिम से पूर्वली पंक्ति अर्थात् शिखर से सातवीं पंक्ति पर । हस्तलेख की समाप्ति पर कोई तिथि नहीं दी गई। लेख लगभग २०० वर्ष पुराना प्रतीत होता है। यह हस्तलेख गुर्जरदेशीय किसी पंचोली ब्राह्मण-कुल का है । ये ब्राह्मण अथर्ववेदीय साहित्य की परम्परा के लिये सुप्र- सिद्ध है। यह बात यद्यपि हस्तलेख के अन्त में नहीं लिखी तथापि निम्नलिखित कारण से मैं इस परिणाम पर पहुंचाहूं.. नकल करने वाला वही सुविज्ञात अशुद्धियां करता है जो पंचोलीकुल के (अ) हस्तलेख में है जिस का वर्णन मैं पञ्चपटलिका की भूमिका पृ० १, २ पर कर चुका हूं । उदाहरणार्थ-'स्वर्गः के स्थान में (अ) 'स्वर्ग' देता है (देखो पं. पटलिका मूलपाट * देखो, अथर्ववेद के मुम्बई संस्करण के 'अालोचनात्मक विज्ञापन में पिण्डत शडकर पाण्डुरङ्गकृत अथर्ववेद के हस्तलखा का विवरण ।
SHRTAJNANE भारती क्रमांक २ विभाग माण्डूकी शिक्षा। पृ० १४ का ३. पाठभेद ) और यह (प) 'वान्ता' ( मा० शि० ११।४॥) देता है। पुनः (अ) और (प) दोनों ही अनेक स्थलों में च और व का भेद नहीं करते। [4] में तैलधारेव' के स्थान में तैलधारे च० मा०४॥ १५॥ है। हस्तलेख धा को धा लिखने के पुरातन प्रकार को सुरक्षित रखता है। धातु-धातु ५॥ ५॥ कुछ स्थलों में कोका है। अनेक स्थलों में 'ग्' के स्थान में 'क्' है। देखो मा० ४।८॥ पर पाठभेद । अनुस्वार का निरर्थक प्रयोग बहुत किया गया है। यथा 'दूतां' १॥४॥ अन्य स्थलों में ब्रह्म। हस्तलेख की विस्पष्ट अशुद्धियां नहीं दी गई । यथा ऋलवण के स्थान में ऋलिवौँ ८।८॥ प हस्तलेख इसी चिह्न से हमारी ग्रन्थमाला के दन्त्योष्ट- विधिः ग्रन्थ में वर्ता गया है। (२) द, पूर्वोक्त संग्रहस्थ है। इसका प्रारम्भ है- ओं नमो दक्षिणामूर्तये । ओं नमो ब्रह्मवेदाय । यह लगभग २५० वर्ष पुराना है। पोथी के अन्त पर कोई तिथि नहीं दी गई । (प) हस्तलेख वाली बहुत सी विशेषताएं इस में मिलती है। प्रथम पत्र से लेकर पत्र १८ के अन्त तक यह ग्रन्थ गया है । उस से आगे पत्र ३५ के अन्त अथीत् पुस्तक समाप्ति तक ब्रह्मवेदस्यांगं ज्योतिष ग्रन्थ है। अध्याय दे की समाप्ति पर 'ॐः चिह्न है। उसी लेखनी से हाशिये पर संशोधन किया गया (३) ग, यह भी पूर्वोक्त संग्रह का ग्रन्थ है। इस का प्रारम्भ है- श्री गणेशाय नमः ॥ हरि ॐ॥ कुल पत्र १३ हैं । अन्त पर यह लिखा है- nange । MAHARA ।
३ भूमिका। ॥ श्रीजयति ॥ श्रीरस्तु ॥ शके १७ शें ७२ साधारण- नाम संवत्सरे आषाढ शुक्ल अष्टम्यां सौम्यवासरे तदिने लेखन समाप्तम् ॥ छ ॥गोरे इत्युपनामक भास्करभट्टस्येदं पुस्तकं खलु ॥ अन्य संशोधित है। [१] और [२] ग्रन्थ गुर्जरदेशीय और [३] महाराष्ट्रीय है। [४]का, काशी में १८६३ में पं० युगलकिशोर व्यास ने "शिक्षा माङ्ग्रह" नामक एक ग्रन्थ छपाया था। उसके अन्त में माण्डूकी शिक्षा छपी है। इस का आधार केवल एक हस्तलेख था। उस के विषय में सम्पादक ने भूमिका पृ०२ पर लिखा है- "ततो वाराणसेय रामघट्टवास्तव्य गुर्जरदेशीय पञ्चोल्यु- पाधिधारिणोऽथववेदीय शौनकशाखीयाध्ययनाध्यापनशालिनः श्रीमज्जयदेवशर्महस्तपङ्कजान्माण्डूकी शिक्षकाऽतीवप्राचीना वर्षशतद्वयात्मिकाऽत्यन्तशुद्धोपलब्धा कालत्रितयेनाऽप्यलब्धा मुद्रणीयाच यह मुद्रित पुस्तक एक अच्छे, पुराने और पर्याप्त शुद्ध हस्तलेख का काम देता है । पर यह सन्देह बना ही रहता है कि सम्पादक ने मूलपाठों के साथ कहां तक स्वतन्त्रता वर्ती है। स्मरण रहे कि यह हस्तलेख भी पंचोली ब्राह्मण से ही प्राया है। मुद्रित पुस्तक में खण्ड वा अध्याय विभाग नहीं मिलता। श्लोक संख्या क्रमशः दी गई है। कुल संख्या १७६ है। पर क्योंकि १२८ का उत्तरार्द्ध और १२६ का पूर्वार्द्ध द्विवार आया है, अतः कुल संख्या १७८ है। इस हस्तलेख में कुछ श्लोक रह गये हैं। इन के अतिरिक्त राजेन्द्रलालमित्र सम्पादित "संस्कृत हस्त- भारती- क्रमांक विभाग माण्डूकी शिक्षा। लेखों के विज्ञापनों के प्रथम भाग में एक और हस्तलेख का वर्णन है। उसका स्थान 'कलिकातास्था एसियाटिक सोसाइटी' बताया गया है। यह हस्तलेख १३५ संख्या के नीचे दर्शाया गया है। इस की प्राप्ति के लिये मैंने उक्त सभा के मन्त्री महाशय को लिखा था। उत्तर में उन्होंने लिखा- ......As for the transcript of Manduki Siksha, the ms. is not available in the Library.dated 5.7.21. माण्डूकी शिक्षा के कुछ अन्य हस्तलेख भी संसार के और पुस्तकालयों में विद्यमान हैं, पर समयाभाव से वे नहीं देखे जा सके। । चार अध्यायों का पाठसंशोधन मने मार्च १९२१ सन् में कर लिया था। तत्पश्चात् में अस्वस्थ हो गया। पुनः जून में डल- हौज़ी पर्वत पर मैंने इन हस्तलेखों पर काम प्रारम्भ किया । यद्यपि मुझे स्मरण था कि मैं चार अध्याय तक संशोधन करके पत्रादि सुरक्षित रख आया हूं, पर लाहौर से निश्चयात्मक पत्र आने पर कि संशोधन छःअध्याय तक हो चुका है, मैंने सातवें अध्याय से काम प्रारम्भ किया। जून के अन्त में मैंने हस्तलेख लौटा दिये। इस भूल के कारण, जिस के लिये कि मैं क्षमाप्रार्थी हूं, अध्याय ५ और ६के पाठसंशोधन में द. ग हस्तलेख काम में नहीं लाये जा सके। मा०शि० के सम्पादन में मैंने याज्ञवल्क्य और नारदीय शिक्षा के निम्नलिखित मुद्रित पुस्तकों से भी सहायता ली है। (१) याज्ञवल्क्यशिक्षा। उन्वट तथा महीधरभाष्ययुक्त शुक्ल- यर्जुवद संहिता के परिशिष्टों में पृ० २-६ तक छपा है। (निर्णय- सागर संस्करण, सन् १९१२)। (२) याज्ञवल्क्यशिक्षा । शिक्षा संग्रह में यह ग्रन्थ प्रथम स्थान पर छपा है। (३) याज्ञवल्क्यशिक्षा। पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र विरचितया ५ भूमिका। भाषाटीकया समलंकृता । श्रीवङ्कटेश्वर यन्त्रालय, बंबई । सवत् (४) नारदीयशिक्षा। सत्यव्रतसामश्रमी सम्पादित । कल- कत्ता, सन् १८६01 ५) नारदीयशिक्षा (भाषाटीका समेत ) पं० दत्तात्रेय द्वारा प्रकाशित । लाहौर सन् १६०६ । (६) नारदीयशिक्षा! शिक्षासंग्रह अन्तर्गत । शोभाकरभट्ट- हम ने तुलना में ३ और ४ के ही पते दिये हैं। दोनों याज्ञ० और ना० शिक्षाओं के सारे संस्करण वहुत विभिन्न हैं। इन के युक्त सम्पादन की बड़ी आवश्यकता है। इन के अनेक पाठ सुस्पष्ट बताते हैं कि याज्ञवल्क्यादि शिक्षाएं पृथक् २ शाखाओं में विभक्त हो चुकी हैं। शिक्षा अङ्ग का सामान्य इतिहास । वेद के छः अङ्गों में से शिक्षा प्रथम अंग है। इस का वर्णन निम्नलिखित प्राचीन ग्रन्थों में अभी तक मिला है। (१) गोपथब्राह्मण १।२४॥ में कहा है- "ओंकारं पृच्छामः ।... किं स्थानानुप्रदानकरणं, शिनुकाः किमुच्चारयन्ति ।" पुनः गो० ब्रा०१।२७ ॥ में कहा है- 'किं स्थानमित्युभावोष्ठौ । द्वितीयस्पृष्टकरणस्थितिश्च ।.... पडङ्गविदस्तत्तथाधीमहे । इन दोनों स्थलों पर स्पष्ट ही शिक्षाशास्त्र और उसके विषय का उल्लेख है। इन्हीं भावों को लेकर मध्यम कालीन लेखकों ने शिक्षा का ऐसा ही लक्षण किया है। जैसे राजशेखर [वि० सं०६३७-१०७७] काव्यमीमांसा में लिखता है। " S NepariwavenasarampurTOTRIme भारत विभा माण्डूकी शिक्षा। "तत्र वर्णानां स्थानकरणप्रयत्नादिभिः निष्पत्तिनिर्णयिनी क्षा आपिशलीयादिका।" अध्याय २ [२] ऐतरेय आरण्यक ३॥५॥ ५॥ और शांखायन प्रारण्यक * ॥ में "वाच उपनिषत्" का वर्णन करते हुए 'स्पर्श, ऊष्म' 'स्वरों का कथन किया गया है। [३] क, मुण्डकोपनिषत् ११५॥ में वेद के छः अङ्गों के नाम गये हैं। वहां शिक्षा को सबसे पहले गिना है। ख, तैत्तिरीयोपनिषत् के प्रथमाध्याय कातो नाम ही शीक्षोप- वा शीक्षाध्याय है। उस का प्रथम वाक्य यह है- "शीक्षां व्याख्यास्यामः।" [४] निरुक्त १ ॥ २० ॥ में भी 'वेदाङ्गानि' कहकर शिक्षादि । का परिचय दिया है। [५] महाभाष्य के प्रारम्भ में ही 'षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेय कहा गया है। पूर्वोक्त प्रमाणों से पता लगता है कि शिक्षाशास्त्र का प्रचार प्राचीन काल से चला आता है। प्रातिशाख्य और शिक्षा। तिशाख्य और शिक्षाओं का सम्बन्ध जानने से पहले यों के काल का जान लेना निष्प्रयोजन न होगा । इस के शिक्षान्तर्गत सिद्धान्तों का इतिहास भी जाना जायगा। र से हम पहले प्रातिशाख्यों के काल पर विचार करते हैं। प्रातिशाख्य-काल। । यास्क निरुक्त १ । १७ में कहते हैं- तिः संहिता । पदप्रकृतीनि सर्वचरणानां पार्षदानि ।" ।
भूमिका।
अर्थात् पदों का मूल संहिता है। पदमूलक सारे चरणों के
पार्षद-प्रातिशाख्य हैं।
इस वाक्य से प्रतीत होता है कि यास्क के काल तक जितने
भी चरण थे, उनके प्रातिशाख्य वन चुके थे।
[२] ऋक्प्रा० १०५॥ का वचन है-"संहिता पदप्रकृतिः"
अनेक लेखकों का मत है कि यास्क ने इसीप्रातिशाख्य सूत्र
को थोड़ा सा बदल कर अपने निरुक्त में उद्धृत किया है। कारण
कि यास्क से पहले प्रातिशाख्य बन चुके थे ।
[३] ऋक्प्रा० ६६३ ॥ में एक श्लोक का यह प्रथमार्द्ध है
न दाशतय्येकपदा काचिदस्तीति व यास्कः ।
अर्थात् ऋग्वेद के दशों मण्डलों में कोई एकपदा ऋचा नहीं,
यह यास्क का मत है। [अन्य प्राचार्य असिनयां यजमानो न
होता ॥ ऋ० ४। १७ । १५ ॥ भद्रं नो अपि वातय मनः ।। ऋ०
१०।२०।१॥ इत्यादि का एक पदा मानते हैं।
परिणाम।
पूर्वोक्त तीन प्रमाणों से निम्नलिखित परिणाम निकल
सकते हैं-
[क] ऋक्प्रा० यास्क से पीछे का
ख] ऋक्मा० में कई वाक्य भिन्न २ समयों में शौनकीय
सिद्धान्त के मानने वालों ने मिलाए हैं। प्रस्तुत ६६३ वचन भी यास्क
से पीछे मिलाया गया है, यद्यपि ऋग्रा० का अधिकांश यास्क से
पूर्वला है।
[ग] अनेक यास्क हो सकते हैं । ऋक्प्रा० का यास्क कोई
वहुत पहला यास्क है।
हम इन में से अन्तिम बात पर सबसे पहले विचार करेंगे।
भार क्रमा विभ माण्डूकी शिक्षा। यास्क कितने हुए हैं ? सम्भव है पार्यों के लाखों वर्ष के इतिहास में अनेक यास्क हो चुके हों। सम्प्रति तो यास्क नाम का उल्लेख इन स्थलों में प्राता है- [१] भारद्वाजो भारद्वाजाचासुरायणाच्च यास्काच्च ।। शतपथ ब्रा० १४७२७॥ यहां वंशकथन में प्रसंगतः यास्क का नाम आया है। [२] वैशम्पायनो यास्कायैतां प्राह पैगये । यास्कस्तित्तिरये प्राह उखाय प्राह तित्तिरिः ॥ तैत्तिरीय काण्डानुक्रमाणका अ०३।२५ ॥ यहां तैत्तिरीयों की परम्परा में पैगय यास्क का नाम प्राया है। (३) महाभारत के सुप्रसिद्ध प्रमाण में निरुक्त-कर्त्ता यास्क का उल्लेख तो मिलता ही है । यही यास्क निराघटु का भी कर्ता है। (देखो निघण्टु पर मेरा लेख, ज्योति संख्या १ अङ्क १) (४) ऋक् प्रा० में यास्क का एकपदा छन्द सम्बन्धी विचार अभी ऊपर लिखा गया है। इस के अतिरिक्त पिङ्गल छन्दःसूत्र अ०३॥ में ये तीन सूत्र है- न्यकुसारिणी द्वितीयः ॥२८॥ स्कन्धोग्रीवो क्रौष्टुकः ॥२६॥ उरोवृहती यास्कस्य ॥ ३० ॥ अर्थात् न्यङ्कुसारिणी को ही यास्क उरोवृहती छन्द मानता है। पिङ्गल और ऋक्प्रा० का यास्क तो एक ही हैं, क्योंकि दोनों स्थलों पर एक ही ( छन्द सम्बन्धी) विषय का प्रतिपादन , है भूमिका। है। यह यास्क निरुक्त वाला यास्क ही है । पिङ्गल निस्सन्देह यास्क से पिछला है, अतः उस से पहले निरुक्त वाला यास्क प्रसिद्ध हो चुका था। प्रश्न हो सकता है कि यास्क के ये सिद्धान्त निरुक्त में क्यों नहीं मिलते ? उत्तर में कहा जा सकता है कि यास्क ने और भी कई ग्रन्थ बनाए हों। उन्हीं ग्रन्थों में ये सिद्धान्त हो सकते हैं। इस प्रकार तीसरे और चौथे प्रमाण में कहे गए यास्क का एक ही व्यक्ति होना बहुत सम्भव है। दूसरे प्रमाण वाला यास्क तैत्तिरीय परम्परा वाला है। वह है भी अति प्राचीनकालस्थ । उस का विशेषण पैड्गी है । अतः वह ऋग्वेदीय निरुक्तकार से भिन्न प्रतीत होता है। पहले प्रमाण वाला यास्क भी अति प्राचीन है। पर्याप्त सामग्री के अभाव में यद्यपि भिन्न २ यास्कों का पूर्ण निश्चय नहीं हो सकता, तथापि इतना स्पष्ट है कि निरुक्तकार यास्क ही ऋप्रा० में उद्धृत किया गया है। पहले दो प्रमाणों वाले यास्क उस से तो भिन्न हैं, पर वे दोनों एक ही हैं या नहीं, इस से हमें अभी विशेष प्रयोजन नहीं। मूल ऋता० यास्क से पूर्व का है, पर उस का अन्तिम संस्करण यास्क से पीछे का है। ऋग्वेद की २१ शाखाये हैं। उनमें से शाकल्यपदपाठ या शाकलशाखा बहुत प्रसिद्ध है। उसी से बहुत *सम्बन्ध रखने वाला यह प्रा० इसके अतिरिक्त और कोई ऋक्प्रा० मिलता भी नहीं। एवं सम्भव नहीं हो सकता कि शाकल्य पदपाठ पर, जो यास्क से कहीं पहले का है कोई प्रा० न बना हो। हमारी समझ में तो वह प्रा० यही शौनक प्रा० है । उस प्रा० में शौनक की परम्परा वाले ही अनेक परिवर्तन करते चले आए थे। तदनुसार यास्क का पूर्वोक्त मत भी * देखो! ऋग्वेद पर व्याख्यान पृ० १३ ।
भार * विर ? माण्डूकी शिक्षा। प्रातिशाख्यान्तर्गत ये शिक्षा शास्त्र के श्लोक किस शिक्षा के हैं ? अब तीन प्रश्न उपस्थित होते हैं । (१) क्या आधुनिक शिक्षाओं ने ये श्लोक प्रातिशाख्यों से लिये हैं ? अथवा (२) प्राति- शाख्यों ने इन शिक्षात्रों से लिये हैं ? या (३) दोनों ने किसी एक पुराने स्रोत से लिये हैं, और वह स्रोत कौनसा है ? यह सन्देहरहित है कि आधुनिक शिक्षात्रों ने अपनी बहुत- सी सामग्री किसी एक ही स्थान से ली है। कारण, कि अनेको शिक्षाओं में एक ही प्रकार के वचन पाये जाते हैं। मा० शि० की जो तुलना हम ने या० और ना० से की है, उस से यह स्पष्ट है। और इन सारी शिक्षाओं का क्रम प्रायः सदृश होने से यह भी निर्विवाद है कि ये सब सम-कालीन हैं, या इन की रचना में काल का अन्तर थोड़ा ही है। अतएव इन में कोई भी ऐसी नहीं जो सब का मूल कही जा सके। वह मूल अवश्यमेव बहुत पुराना था । हम बता चुके है कि आर्य वाङमय के इतिहास में शिक्षा शास्त्र की विद्यमानता अति प्राचीन काल से है।प्रातिशाख्य यद्यापे पुराने हैं, पर वेदाग न होने से सम्भवतः इतने पुराने नहीं, जितना शिक्षाशास्त्र।ऐसी स्थिति में (१) और (२) प्रश्न तो त्याज्य हो जाते हैं। शिक्षा-शास्त्र अधिक पुराना है, अतः उस की सामग्री प्राति- शाख्यों की अपेक्षा पुरानी है। प्रातिशाख्यों ने उसी मूल शिक्षा-शास्त्र से ये श्लोक लिये हैं। और आधुनिक शिक्षाओं ने भी उसी से ये श्लोक लिये हैं। नारद शिक्षा १॥३॥ में तो कहा भी है- "भवन्ति चात्र श्लोकाः" ऐसा कहने से पता लगता है कि आधुनिक शिक्षाओं में निस्सन्देह पुराने वाक्य सम्मिलित किये गये हैं। ये सब किसी एक मूल शिक्षा के थे। ।
भूमिका। वह मूल शिक्षा कौनसी है ? उस मूल शिक्षा का पता लगना अति कठिन है। सम्भव है अधिक खोज होने पर वह मिल जाय। हां, इतना कहा जा सकता है कि आधुनिक सब शिक्षाओं की अपेक्षा पाणिनीय शिक्षा बहुत पुरानी है और मूल शिक्षा पाणिनि श्रादि ऋषियों की शिक्षाओं से भी कहीं पुरानी थी। हमारा अभिप्राय उस पाणिनीय शिक्षा से नहीं जो ऋक् और यजुः दो शाखाओं में विभक्त सम्प्रति मिलती है । प्रत्युत हमारा निर्देश उस शिक्षा की ओर है जो ऋषि दयानन्द सरस्वती ने सम्पादित की थी। (इस पर अधिक विस्तार "अष्टाध्यायी भाष्यम्" दयानन्द सरस्वती प्रणीतम् के प्रथमाक के अन्तिम पृष्ठों पर मेरी टिप्पणी में देखो।) आधुनिक शिक्षाओं का काल । अव रहा विचार आधुनिक शिक्षाओं के काल के सम्बन्ध में। ये शिक्षा प्रातिशाख्यों से बहुत पीछे की हैं । इसीलिये एक नवीन शिक्षा में कहा है- शिक्षा च प्रातिशाख्यं च विरुध्येते परस्परम् । शिक्षव दुर्बलेत्याहुः सिंहस्यैव मृगी यथा ॥ (सर्वसम्मत शिक्षा । इण्डियन अण्टीक्वेरी मास मई सन् १८७६ के पृ० १४२ पर डा० एफ० कीलहान द्वारा उद्धृत।) प्रो० कीलहान ने पूर्वोक्त स्थान पर अगले दो प्रमाण और दिये हैं। उन से भी इन शिक्षाओं का प्रातिशाख्यों के पीछे संगृहीत होना निश्चित होता है- मध्यमां वृत्तिमालम्ब्य चैवं कालाः सुनिश्चिताः । प्रातिशाख्यादिषु ह्यत्र वृत्तिः साप्यवलम्बिता॥१॥ (व्यास शिक्षा) भाव विर EX माण्डूकी शिक्षा। लुप्ते नकारे यत्स्वार रञ्जन्ति शौनकादयः। एवं रङ्ग विजानीयानत्वा भीरिव विन्दति ॥२॥ या०२॥ ११६॥) प्रथम प्रमाण में तो स्पष्ट प्रातिशाख्यों का वर्णन है। द्वितीय प्रमाण में शौनकादि कह कर ऋक्शा० आदिकों की ओर संकेत किया है। यह भी स्मरण रखना चाहिये कि आधुनिक शिक्षाओं के मूल बहुत पुराने थे । मूल शिक्षाशास्त्र से तो पुराने नहीं, पर इन शिक्षा- ओं से पुराने थे। इसका स्पष्ट कारण तो यही है कि लगभग सभी आधुनिक शिक्षाओं में लिखा है कि अमुक प्राचार्य के मतानुसारी यह शिक्षा है। जैसे माण्डूकी शिक्षा२।३॥ में कहा है- मण्डूकस्य मतं यथा । यही व्यवस्था नारद, याज्ञवल्क्य अादि शिक्षाओं की भी है। उब्वट ऋक्शा और शुक्लयजुः प्रा० के भाग्य समय अनेक स्थलों पर याज्ञवल्क्यादि शिक्षाओं के प्रमाण उद्धृत करता है। अतः ये सब शिक्षाऐं उव्वट (लगभग १००० वि०) के काल से अवश्य । पहल की हैं। वैदिक साहित्य में माण्डकी शिक्षा के प्रवर्तक का परिचय। मण्डूक ऋषि का वैदिक साहित्य में कोई परिचय मिलता है, वा नहीं? अब इस विषय पर विचार किया जायगा । प्रस्तुत माण्डूकी शिक्षा के सिद्धान्तों का, यद्यपि उन में स्वतन्त्र सिद्धान्त तो कोई ही हों, मूलप्रवक्ता मण्डूक ऋषि था। यह इसी शिक्षा के "मण्डूकस्य मतं यथा" २॥३॥वचन से ज्ञात होता है। श्रा-वत्त ECORKalanRRERATRE भूमिका। के प्राचीन काल में एक ही प्रण्डूक था वा अनेक, इस पर अजी कुछ नहीं कहा जा सकता। हां, एक मण्डूक का पुराने साहित्य में स्पष्ट वर्णन पाया है। वही इस शिक्षा से सम्बन्ध रखता है, यह भी निश्चयरूपेण नहीं कहा जा सकता। अष्टाध्यायी का सूत्र है ढक च मण्डूकात् ४।१।११६ ।। इस सूत्र में मण्डूक किसी ऋषि विशेष का नाम है। वह पाणिनि के काल से कहीं पुराना था। उसी की सन्तान माण्डूकेय आदि हुए हैं। माण्डूकेय का वर्णन प्रस्तुत साहित्य में निम्नलिखित स्थलों में मिलता है। (१) ऐतरेय आरण्यक ३।१।५॥ में कहा है- इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डकेयः। (२) ऋक्प्रा० का वचन है- माण्डूकेयस्य सर्वेषु प्रश्लिष्टेषु तथा स्मरेत् ॥ २०० ॥ (३) अथर्वपरिशिष्ट ४३।४।४६॥ में कहा है- माण्डूकेयं तर्पयामि। (४) अथर्वप० ४६ ॥१॥६॥ में ऋग्वेदीय शाखाओं का कथन करते हुए कहा है- माण्डूकेयाश्चेति । इन प्रमाणों से निश्चित होता है कि माण्डूकेय का काल ऐतरेय आरण्यक आदि से वहुत पुराना है। अतः मण्डूक का काल तो उस से भी पुराना होगा। माण्डकी शिक्षा का विषय । में पूर्व लिख पाया हूं कि मा० शि का स्वतन्त्र सिद्धान्त वहुत थोड़ा है। अधिकांश भाग अन्य शिक्षाओं से मिलता है। अतः शिक्षाओं के सामान्य विषय पर फिर कभी लिखा जाएगा। यहां भार विम वाला है । माण्डूकी शिक्षा। केवल एक दो बातों पर प्रकाश डालना है। अन्य शिक्षाओं के समान मा०शि०१११३, १४ में भी कहा है कि अमुक स्वर अमुक वर्ण-रंग । इस का क्या अभिप्राय है? इस विषय पर दार्शनिक मत । वैदिक दर्शनों में से वैषेशिक दर्शन में कहा है कि वर्ण द्रव्य का गुण है। ऐसा ही अन्य आर्य विद्वानों का भी विचार है। पश्चिम के तत्ववेताओं ने इस सम्बन्ध में अनेक वाद चलाए हैं। वे हैं भी एक दूसरे के विरोधी । एक विचार वहां भी है कि वायु मण्डल में विभिन्न गति से ही पृथक् २ रंग उत्पन्न होते हैं । यही विचार इस शिक्षा में प्रकट किये गए हैं। अब रहा विचार कि यदि रूप-रंग गुण है, तो भिन्न २ स्वरों के भिन्न २ रूप क्यों है ? इस का उत्तर यह है कि भिन्न २ स्वरों की गति परमाणुओं पर भिन्न २ प्रभाव डालती है । रूप तो प्रमाणुओं में पहले ही है, पर गति के प्रभाव से वह प्रकाशित हो जाता है। ये प्रमाणु सदा अाकाश में उड़ते रहते हैं। उन्हीं से सम्बन्ध में आने पर स्वरे रूप उत्पन्न करती हैं। तभी कहा जाता है कि अमुक स्वर का अमुक रूप है। मा०शि० में मनुस्मृति का एक श्लोक। मा० शि०१६॥ ७ ॥ में एक श्लोक है- यथा खनन् खनित्रेण भूतले वारि विन्दति । एवं गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति । यही श्लोक मनुस्मृति २।२१८ ॥ में आया है । भेद केवल इतना ही है कि मनुस्मृति के सव टीकाकारों ने द्वितीय पाद में नरो वायधिगच्छति। पाठ दिया है। यही मनु वाला पाठ या० २।७३ ॥ में है। परन्तु नारद २।८।२७ ॥ मैं माण्डूकी शि० वाला पाठ ही है । इस से प्रतीत होता है कि मनु का पाठ लेने में । । ना० और मा० ने मनु भूमिका। की किसी अन्य शाखा का अनुकरण किया है। शिक्षाओं ने यह श्लोक मनु से ही लिया है, इस में अणुमात्र भी सन्देह नहीं। मनु का काल अत्यन्त प्राचीन है, अतः शिक्षात्रों ने यह श्लोक वहीं से लिया है। मनुस्मृति के अत्यन्त प्राचीन वा मौलिक होने पर "वार्हस्पत्यसूत्रम्" के Introductory Remarks में मेरा लेख देखो। इस संस्करण के अन्त में मने तीन परिशिष्ट जोड़े हैं। पहले में या० वा ना० से मा० की तुलना दिखाई गई है। यह तुलना यद्यपि मूलपाठों की टिप्पणी में भी दर्शाई गई है तथापि पृथक् छपनी आवश्यक थी। दूसरे परिशिष्ट में निदर्शनों के पते दिये गये हैं। और तीसरे परिशिष्ट में छान्दस प्रयोग बताये गये हैं। अन्त में माण्डूकी शिक्षान्तर्गत प्रत्येक श्लोक के प्रथमार्द्ध वा द्वितीयार्द्ध की प्रतीकसूची दी गई है। इस से शिक्षाओं के भावी सम्पादकों को याज्ञवल्क्य, नारद वा माण्डूकी शिक्षा से पाठ मिलाने में बहुत सरलता होगी। मा०शि० के तीनों हस्तलेख डा० ऐस० के० बलवेल्कर की कृपा से मुझे प्राप्त हुए थे। हस्तलेखों के देने की उदारता के लिये जिले वे सदा ही दिखा रहे हैं, मैं उन को हार्दिक धन्यवाद देता हूं। अध्यापक राजारामजी ने अनेक स्थलों पर अपनी बहुमूल्य सम्मति से मुझे कृतार्थ किया है । इस के लिये मैं उन का अनुगृहीत हूं। ज्ञानचन्द्र जी बी० ए० ने इस पुस्तक का पाठ करने की बड़ी कृपा की है। अाशा है परमकारुणिक भगवान् इन ग्रन्थों के प्रचार में मेरी सहायता करते हुए सदा मेरी रक्षा करेंगे। इत्योम् । दयानन्द महाविद्यालय, लाहौर । कार्तिक वदी ७, शनि सं० १९७८ भगवदत्त अक्तूबर २२, १६२१ वि शुद्धिपत्रम्। भूमिका पृ० पं० 10 पिण्डत पण्डित को BIRALK पुराना प्रकाशास्तु मूलपाठ १ पुरान प्रकाशस्तु प्रयुजानो १२ যুক্সাল। ६ ३ करजस्य ६ लच्येत् लक्षयेत् ११ ३१ X ६ २२. तु० ऽथनु० ऽथानु० २ तु० ना०२२॥ ना०२॥ अणो० अच्णो० निन्नि निम्नमि० प्रागच्छन् अगच्छन् पदसहस्रणं पदसहस्रण प, द, अगच्छन्वै० का, ग, आगच्छन्दै , * यह अशुद्धि आगे भी कई स्थलों पर हो गई है। विज्ञपाठक स्वयं शुद्ध कर लें।
अथर्ववेदीया माण्डूकीशिक्षा।
W
सम्पादक की अन्य पुस्तकें ।
॥
(१) ऋषि दयानन्द स्वरचित (लिखित वा कथित)
जीवन चरित।
(२) ऋग्मन्त्रव्याख्या । ऋग्वेद के कुछ मन्त्रों की व्याख्या ।
(३) ऋषि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन, दो भाग। ॥y)
(४) गुरुदत्त लेखावली । श्री पं० गुरुदत्त एम० ए० के
अगरेज़ी लेखों का आर्यभाषानुवाद । ( सहकारी
अनुवादक श्री सन्तराम बी० ए०)
श)
(५) पञ्चपटलिका, अथर्ववेद का तृतीय लक्षणग्रन्थ
(६) ऋग्वेद पर व्याख्यान प्रथम भाग।
(७) बार्हस्पत्यसूत्रम् | Dr. F. IT. Thomas के संस्करण
का देवनागरी में लिपीकरण, भूमिका सहित । २॥
(८) अष्टाध्यायी भाष्यम् । महर्षि दयानन्द सरस्वती प्रणीतम्
अङ्कों में निकलता है । १२ अङ्कों का मूल्य ४॥
१)
D
ॐ . अथ माण्डूकी शिक्षा। (अथर्ववेदीया) तिस्रो वृत्तीरनुक्रान्ता द्रुतमध्यविलम्बिताः । यथानुपूर्व प्रथमा द्रुता वृत्तिः१ प्रशस्यते ॥ १ ॥ मध्यमैकान्तरा वृत्तिय॑न्तरा हि विलम्बिता । नैनां बुधः प्रयुञ्जीत यदीच्छेद्वर्णसम्पदम् ॥ २ ॥ अभ्यासार्थे द्रुता वृत्तिरुपलब्धौ३ विलम्बिता । मध्यमा तु प्रयोगार्थे न तद्वचनमन्यथा ॥३॥४ ऐन्द्री तु मध्यमा वृत्तिः प्राजापत्या विलम्बिता । अग्निमारुतयोवृत्तिः सर्वशास्त्रे निन्दिता ॥ ४ ॥५ दोषाः प्रकाशस्तु विलम्बितायां, वर्णा द्रुतायां च न सूपलक्ष्याः६ । तस्माद्रुतां चैव विलम्बितां च, त्यक्त्वा नरो मध्यमया प्रयुज्यात् ॥ ५ ॥ १. का, पृश्निः ।२. का, सम्पदाम् । ३. का, लब्धैर्वि। ४. तुल० या० १। ५२॥तथा ना०१।६।२१॥५.तुल०या० ११५३॥ ६-६. का, न च सूपलक्षाः। प, च नः सूपलक्षाः। ग, च न सोप- लक्षाः।
भान २ तुल० ना०१।५।५॥१४.प, ०टाघा १५. तुल० ना० १।५।६॥ माण्डूकी शिक्षा। सर्वा एव तु निदोषा वृत्तयः समुदाहृताः । खधीतस्य सुवक्त्रस्य शिनुकस्य७ विशेषतः ॥६॥ सप्तस्वरास्तु गीयन्ते सामभिः सामगैर्बुधैः । चत्वार एव छन्दोभ्यस्त्रयस्तत्र विवर्जिताः ॥७॥ षड्जऋषभगान्धारो मध्यमः पञ्चमस्तथा । धैवतश्व निषादश्च स्वराः सप्तेह सामसु ॥ ८॥८ षड्जे वदति मयूरो गावो रम्भान्ति: चर्षभे१० । अजा वदति गान्धारे क्रौञ्चनादस्तु मध्यमे ॥ ६ ॥११ पुष्पसाधारणे काले कोकिलः पञ्चमे स्वरे । अश्वस्तु धैवते प्राह कुञ्जरस्तु निवादवान् ॥ १० ॥१२ कएठादुत्तिष्ठते षड्ज ऋषभः शिरसस्तथा । नासिकायास्तु गान्धार उरसो मध्यमत्तथा ॥ ११॥१३ उरः शिरोभ्यां कण्ठाच पञ्चमः स्वर उच्यते । धैवतश्च ललाटाद्वै१४ निषादः सर्वरूपवान् ॥ १२॥१५ पद्मपत्रप्रभः षड्ज ऋषभः१६ शुकपिजरः१६ । ७. का, शितकस्य । प, द, ग, तोनों हस्तलेखों में शिक्षुकस्य पाठ है। प्रतीत होता है काशी संस्करण के सम्पादक पं० युगल- किशोर ने आधुनिक लेख-शैली को देखकर स्वयं पाठ बदला है। अथर्ववेदीय गोपथब्राह्मण १।२४ में "शिनुकाः” पाठ आया है। अतएव यहां भी मूल में शिक्षुकस्य ही युक्त है। तुल० मा० १४।१०॥ ८. तुल० ना० १।२।५॥ ६. का, रम्भान्ति । १०. प, च ऋषभे । ११. तुल० ल०या०१८ तथा ना० १।५॥३॥ १२. तुल० ना० ॥५॥४॥ १३. - १६. प, ऋषभस्तु कपिञ्जरः।
२।७॥ ३ कनकाभस्तु गान्धारो मध्यमः कुन्दसप्रभः ॥१३॥१७ पञ्चमस्तु भवेत्कृष्णः पीतवर्णस्तु धैवतः। निषादः सर्ववर्णाभ इत्येते स्वरवर्णकाः ॥१४॥१८॥१॥ ( २ ) बाह्याङ्गुष्ठं तु क्रुष्टं सादगुष्ठे मध्यमः स्वरः । प्रादेशिन्यां तु गान्धारो मध्यमायां तु पञ्चमः ॥१॥१ अनामिकायां षड्जस्तु कनिष्ठायां तु धैवतः । तस्याधस्तात्त यो ऽन्यः२ स्यान्निषाद इति तं विदुः ॥२॥३ प्रथमावन्तिमौ चैव वर्तन्ते छन्दसि स्वराः । त्रयो मध्या निवर्तन्ते मण्डूकस्य मतं यथा ॥३॥ द्वितीयं स्वरितम्प्राहुः षष्ठः प्रचित उच्यते । उच्च विद्यानिषादं तु नीचं षड्जमुदाहृतम् ॥४॥ उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितः प्रचितस्तथा । चतुर्विधः४ स्वरो दृष्टः स्वरचिन्ताविशारदैः॥५॥५ स्वरे ज्ञात्वा यथास्थानं हस्तस्य स्यन्दनं स्मृतम् । निकृष्य हस्तं विन्यस्तं पाणौ दृष्टि निवेशयेत् ॥६॥ किञ्चिद्यो६ नभसः स्वाँसाहाहौ७ दृष्टि निपातयेत् । प्रसार्य चाङ्गुलीः सर्वारोपयेत्करमण्डलम् ॥ ७॥ . १७. तुल० ना० १।४।१॥ १८. तुलना०१।४।२॥ १. तुल० ना०१।७।३॥ २. का, ऽन्त्यः। ग, न्त्य । प, त्य। ३. तुल० ना० १।७।४॥४. द, प, विध । ५. तुल० ना०१ । ७। १६ ॥ ६. ग, किंचिद्गो । द, प, किंचिद्रो अथवा किंचिद्गो। ७. का, ग, बाहु ॥८. का, सर्वाश्चालयेत् ॥ - ४ वि माण्डूकी शिक्षा। न चाङ्गुलीभिरङ्गुष्ठसुपेयादोषवित्ततः ।। ऊर्द्धवमायुस्तमाकुञ्चमङ्गुष्ठं स्थापयेद्वधः ॥८॥ नाधः शिरा१०नावनता१०नागुल्यः प्रतराः११स्मृताः। उत्तानं सोन्नतं किञ्चित्सुव्यक्ताङ्गुलिरजितम्१२ ॥६॥१३ स्वरविद्धं करं कुर्यात्प्रादेशोदेशगाभिनम् । अङ्गुष्ठस्योत्तरे पर्वे यवस्योपरि यद्भवेत् ॥ १० ॥१३ प्रादेशस्य तु तदेशस्तन्मात्रं चालयेत्करम् । चलुनावा१४स्फुटी दण्डी स्वस्तिको मुष्टिरेव१५च ।११।१६ एते वै हस्तदोषाः स्युः परशुछेदस्तु सप्तमः ।१६ कूर्मोऽङ्गानीव संहृत्य चेष्टा१७दृष्टि परं१७मनः॥१२॥१८ न कम्पयेच्छिरः पादौ मुखदोषांश्च वर्जयेत् । नासिकायास्तु पूर्वेण हस्तं सञ्चालयेद्बुधः ॥ १३ ॥१८ सूक्ष्मान् वर्णान्प्रयुञ्जानो१६दक्षिणं श्रवणं प्रति । श्रुतिं वाचोऽनुगां कृत्वा वाचं कृत्वा मनोऽनुगाम् ।। दृष्टिं हस्तानुगां कृत्वा ततः पदविदारभेत्र२० ॥१४॥२१॥२ ६. तुल० ना० १।६।५॥ १०. का, शिरस्ताद्वामे ॥ ११. द, प, ग, प्रतरा । १२. द, प, रांचतं । १३. तुल० या० १।४८, ४६ ॥ १४. का, चुलुनौ वा। १५. का, मुष्टिकाकृतिः।१६. तुल० या० ११४५॥ १७-१७. का, चेष्टां हाष्टिं दृढं। १८. तुल० ना०१ । ६ । १२, १३॥ १६. का, वर्णानुञ्चरेद्वै । २०. का, पदमिवोच्चरेत् । २१. ग में अन्ति- मार्द्ध मूल में नहीं है । किसी अन्य हाथ से ऊपर के हाशिये पर लिखा गया है।
३।७॥ Ac (३) यथा बाणी तथा पाणी रिक्तं तु परिवर्जयेत् । यत्रैव तु स्थिता वाणी पाणिस्तत्रैव धार्यते ॥१॥१ स्वरश्चैव तु हस्तश्च द्वावेतौर युगपद्भवेत् । हस्ताद्धृष्टः स्वराद्धृष्टो न वेदफलमश्नुते ॥२॥३ हस्तहीनं तु योऽधीते स्वरवर्णविवर्जितम् । ऋग्यजुःसामनिर्दग्धो४ वियोनिमनुगच्छति५ ॥३॥६ ऋग्यजुःसामगादीनि हस्तहीनानि यः पठेत् । अनुचो ब्राह्मणस्तावद्यावत्स्वारं न विन्दति ॥४॥७ हस्तेनाधीयमानो यः स्वरवर्णान्प्रयोजयेत् । ऋग्यजुःसामभिः पूतो ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥५॥ स्वरात्स्वरं संक्रमते स्वरसन्धिमनुल्बणम् । अविच्छिन्नं समं कुर्यात्सूक्ष्मं आया तपोपमम्१० ॥६॥११ अक्षरज्ञो विरामज्ञः प्रत्यारम्भी तथैव च । स्वरमात्राविभागज्ञः स विनो मानमर्हति१२ ॥ ७ ॥३॥ - १. तुल० या० १॥ ४६॥२. ग, द्वावेको । ३. तुल० या० १ । २५, २६ ॥ ४. का, ग, मभिर्दग्धो । ५. का, ०मधिगच्छति । ६. तुल० या०१॥ ३६॥ ७. तुल० या १॥ ४० ॥८. तुल०या०॥४२॥ ६. द, नुल्वणं ॥१०. का, तथोपमम् । द, तमोपमं । ११. तुल० ना० १॥ ६॥ १८ ॥ १२. का, वक्नुमर्हति ।
६ माण्डूकी शिक्षा। (४) आम्रपालाशविल्यानामपामा गार्गशिरीषयोः। खादिरस्य करजस्य कदम्बस्य तथैव१ च१॥१॥४ अस्थर करवीरस्य कुटजस्य विशेषतः। वाग्यतः प्रातरुत्थाय३ भक्षयेद्दन्तधावनम् ॥ २॥४ तेनास्यकरणं सूक्ष्मं माधुर्य चोपजायते । न चास्य बदतो दोषान्दै कश्चिदप्युपलक्ष्येत् ॥ ३॥ नात्युच्चैाति वा नोचार्नेपरण:७ सदने सुखम् । प्रबयानातितीक्ष्णेन कण्ठेन मृदुनादिना ॥४॥ प्रातदेनित्यमुरम स्थितेन स्वरेण शार्दलरुतोपमेन | माध्यंदिने कण्ठगतेन चैव चक्राह्वयः कूजितसन्निभेन१०॥५ तारं तु विद्यात्सवनं तृतीयं शिरोगतं११ तच्च सदा प्रयोज्यम् । मयूरहंसादि मृदुस्वराणां तुल्येन नादेन शिरः सुखेन ॥६॥ यथा व्याघ्री हरेत्पुत्रान् दंष्ट्राभिन च पीडयेत् । भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद्वान् प्रयोजयेत् ॥ ७॥१२ एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या न१३मुक्ता१३न च पीडिताः१४ । १. का, च क्षीरणः । २. का, द, ग, अर्कस्य । ३. ग, ०रुथ्थाय। ४. तुल० या० १ । ३५, ३६॥ ना०२।८।३,४॥५. तुल० या० १॥३७॥ ना०२।८।५॥ ६. का, प, दोषात् । ग, त् कोही न बनाया गया है । ७. का, घोषणाः।ग, निषणः।प, द, निषणः । ८.प, मुर। ग, मूर। ६. प, क्षतोपमेन । १०. प, कूजितः०। ग, सन्निभेद, द के ऊपर काटने का चिन्ह है। ११. का, शिखण्डिना॥ १२. तुल . या०२।१०२॥ ना० २।८।३०॥ १३. प, नाव्युक्ला । नारद में अव्यक्ता है । माण्डूकी १२।८ में अव्यक्तान् । १४. का, पीडयेत् । , , ७ १ सम्यग्वर्णप्रयोगेन१५ ब्रह्मलोके महीयते ॥८॥१६ शनैरध्वसु वक्त्रेण न परं१७ योजनाद् व्रजेत् । न हि पार्णिहता१८वाणी प्रयोगान्वक्नुमर्हति ॥ ६ ॥१६ मान्ते मुष्टयाकृतिं कुर्यात्तकारान्ते२० विश्लेषयेत् । नखस्य दक्षिणे पार्थे नकारान्तं२१ निवेदयेत्र२२ ॥१०॥२३ कटान्तयोस्तु२४ कर्तव्यमगुल्यग्रप्रकुञ्चनम् । ङणनान्ते तथैव स्यात् ५ पान्ते२६ त्वगुलिपीडनम्॥११॥ ऊर्द्धवक्षेपापि२७ या मात्रा अधः क्षेपापि या भवेत् । एकेकामुत्सृजेद्धीरः प्रचिते तूभयं२८ तथा ॥ १२ ॥ २६ हस्वानुस्वारकरणे त्वङ्गुष्ठाग्रप्रकुञ्चनम् । दीर्धे तु सूरयः प्राहुः प्रादेशिन्याः प्रसारणम्३०॥१३॥११ पदान्तरं न कुर्वीत३२ संहितायां प्रयोगवित् । मांसे३३ मांसं३४ विजानीयात् पांसे३५पांसं विनिर्दिशेत् ।१४ १५. ग, प्रयोगेण । प, सम्यक्वर्णः प्र० । १६. तुल० ना०२। ८।३१॥ १७. ग, पठं । १८. का, द, पार्णिाहता। प, पाणिहिता। ग, पाणिर्हता। देखो इस श्लोक पर प्रो० कीलहान का लेख, इण्डियन अण्टीकरी, भाग ५, सन् १८७६, पृ० १४१ । प्रो० कीलहान की कल्पना ठीक है। १६. तुल० ना० २।८।१५, १७॥२०. ग, • रान्तं । २१. का, रान्ते । २२. का, प्रयोजयेत् । प,ग, निवेशयेत् । २३. तुल० या० १ । ५४ ॥ २४. ग, कंठात्तयोस्तु । २५. का, प, तथैवास्यात् । २६. प, प्रान्ते । २७. का, क्षेपाच्च । २८. ग, नूभयं । २६. तुल० या० १ ॥५८ ॥ ३०. का, देशिन्याःसुप्रसारणम् ।३१. तुल० या० १ । ५६ ॥ ३२. ग, कुर्वश्त । ३३. का, नैव । ३४. प, मांसे। ग, मांस । ३५. का, प, पांसेन् । ग, पासं। AHAR - १० onomy Store Hopen Demon - AN माण्डूकी शिक्षा। + नौ स्रोतसां३६ मध्ये समं गच्छति संयुता । हा धारेव वा वक्त्रं३७ तद्वद्वर्णान्प्रयोजयेत् ॥१५॥४॥ ( ५ ) 7 ताच न कर्त्तव्यमुदात्तं स्वरितं तथा । निीचतरन्नास्त्युच्चादुच्च न विद्यते ॥ १ ॥ दुच्चतरनास्ति नीचान्नीचतरं कुतः।१ = तात्स्वरितन्नास्ति कम्पिताच्चैव कम्पितम् । स उत्तमुदात्तं तद्यत्स्वरितं तत्पदे भवति नीचम् ॥३॥२ स चं नीचमेव तद्यत्प्रचयस्थं तदपि नीचम् ॥ ३॥२ स ताना३ मनहादमुदात्तानामताडनम् । दात्तमनाधिष्ठं४ शषसानामरोमशम् ॥४॥ स तुस्वरितादेशे५ उदात्तश्च५ चतुर्विधः । धश्चानुदात्तश्चैतच्छास्त्रेण चोदितम्६ ॥ ५॥ = प्रभवं७ प्रचितात्स्वरित विद्यत: उदात्तं वा। दात्तमेव तद्विद्याद्यदृतं१० च तद्विद्धि यत्प्रचितम् ॥६॥ ॥ तात्पराणि यानि स्युरनुदात्तानि ११ कानिचित् ११ इणि प्रचयं यान्ति१२ ह्युपोदात्तं न विद्यते ॥ ७॥१३ १. द, प, श्रोतसां । ३७. का, वाणी । तु० या०२।२७॥ ना०१।८।६॥ २.ना०२।३।१॥ त्त। ४. प, धिष्टं । ५. क, ०देवादा० । ६. का, त्तश्च ०चोदितम् । ७. प, इस के आगे प्रचितं देता है। ८. का, ना० १. का, नास्ति । १०. का, द्यादृतं । १.का, त्तान्युदात्तवत्। ना०तु। १३. तु. ना०२।७।८॥ AR ६.का ६. का १ ६।४॥ ह स्वरितावधृत१४ उदात्ते परस्त्रिपूर्वो विक्रमोच्युते । स्वरितावधृत१५ उदात्ते१५ पादः स्यात्स हि विक्रमः॥८॥ ननु धारयेद् धृतमुपस्पर्शमुपोदात्तम्१६ निपातयेत् । एकाक्षरे१७ पतनं१८ न१८ च धृतमुच्चारयेत्स्वरे वापि ॥६॥ न्यासमेवादितः कुर्यान्नीयतेषु बहुष्वपि । शेषमाधवदुक्त्वा तु तत्पदेषु समेषु च ॥ १० ॥ स्वर उच्चः स्वरो नीचः स्वरः स्वरित उच्यते । व्यञ्जनान्यनुवर्त्तन्ते यत्रासौ तिष्ठति स्वरः ॥ ११ ॥१६॥५॥ स्वर उच्चः स्वरो नीचः स्वरः स्वरित एव तु । स्वरप्रधान त्रैस्वयंमाहुरक्षरचिन्तकाः ॥१॥१ इयोस्तु स्वरयोः सन्धावेकीभावो यदा भवेत् ।२ उदात्तोऽथनुदात्तस्य३ वशं गच्छति सन्धिषु ।। २।। दुर्बलस्य यथा राष्ट्रं हरते बलवान्नृपः । स्वरो व्यञ्जनमासाद्य हरते नात्र संशयः ॥३॥४ आख्यातानां प्रयोगेषु पूर्वस्वरमुपस्थितम्५ । पोडशाक्षरमर्यादं यद्योगे स्वरमुद्धरेत् ॥ ४॥ १४. प, तावद्धृत। इसके आगे उद्धत अथवा उद्धृत अधिक है । १५. प, ०द्धृतोदात्ते। (६. का, वृतमु०॥ १७. प, च अधिक है ॥ १८. का, धारयेन ॥ १६. तु० या० २, २८, २६ ॥ ना० १. तु० या०२।२६ ॥ ना०२।५।२॥२. तु० या०२८॥ ३. का, ऽप्यनुदा०॥ ४. तु० या०२।२६॥ ना०२।५।३॥ ५. प, पूर्वपदमु०॥
१० माण्डूको शिक्षा। नीचं तु स्वरपूर्व तु नीचावग्रहमेव च । हन्तव्यं तद्विजानीयादुच्चावग्रहवर्जितम् ॥ ५॥ नातिहन्न्यान्न निर्हन्यान६ प्रगायेन कम्पयेत् ।७ एतौ द्वौ युगपत्साद्यावेतच्छास्त्रेण चोदितम् ॥ ६॥ अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा । जिह्वामूलं च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च ॥ ७ ॥ वर्णानां तु प्रयोगेषु करणं स्याच्चतुर्विधम् । संवृतं विवृतं चैव स्पृष्टमस्पृष्टमेव च ॥८॥ स्पर्शानां कारणं स्पृष्टमन्तस्थानामतोऽन्यथा । यमानां संवृतः प्राहुर्विवृतं च स्वरोष्मणाम्१० ॥६॥ ७ सप्तस्वरान् प्रवक्ष्यामि तेषां चैव बलाबलम् । लक्षणानि च सर्वेषां युक्तस्तानि१ निबोध मे१ ॥१॥२ अभिनिहितः प्राश्लिष्टो३ जात्यः क्षेप्रश्च पादवृत्तश्च । तैरोव्यञ्जनः षष्ठस्तिरोविरामश्च सप्तमः ॥२॥२ ए ओ आभ्यामुदात्ताभ्यामकारो रेफितश्च यः । अकारं यत्र लुम्पन्ति तमभिनिहितं विदुः ॥३॥४ इकारं५ यत्र पश्येयुरिकारेणैव संयुतम् । ६. का, नाभि० ॥ ७. तु० ना०१।६।१५॥ ८. तु० या०२।११॥ ६. का, स्वरितम् ॥ १०, का, विरो०॥ १. ग, युक्तस्थानानि बोधत ॥ २. तु० या० १ । ७१, ७२ ॥ ना०१।८।५,१०॥ ३. का, प्राश्लिष्टः ॥ ४. तु० या० १। ७३॥ ना०२।२३॥५. द, ईकारं; ग, इकारो॥ , ७॥१०॥ ११ उदात्तो ऽप्यनुदात्तस्य प्राश्लिष्टो३ ऽभीन्धतामपि ॥४॥६ सयकारं समं७ वाऽप्यक्षरं स्वरितं भवेत् । न चोदात्त पुरस्तात्स्याज्जात्यः८ स्वर्दत्य एव तु ॥ ५॥ इ१० उ१० वर्णी यदोदात्तावापद्यते यवो क्वचित् । अनुदात्तप्रत्यये११ स्याद्विद्धि प्रस्य लक्षणम् ॥ ६ ॥१२ स्वरिते स्वरितं यत्र विवृत्या१३ यत्र संहिताः१४ । तं पादवृत्तं जानीयात्ते त्वस्मिन्यवमादधुः ॥७॥१५ उदात्तपूर्वे साढे १६ तु द्वितीये अक्षरे१७ तु यः। तैरोव्यञ्जन इत्येष सारः१८ रयादधिमध्विति १६ ॥८॥२० अवग्रहात्परं यत्र स्वरितं स्यादनन्तरम् । तिरोविरामं जानीयात् प्रजापतेनिदर्शनम् ॥ ६ ॥२१ द्वयोरुदात्तयोमध्ये नीचो२२ यस्स्यादवग्रहः२२ । ताथाभाव्यो२३ भवेत्कम्पस्तनूनपानिदर्शनम् ॥ १० ॥२४ १ , , . . ६. तु० या० १। ७५ ॥ ना०२।१।६॥ ७. का, द, सवंग, संवः प, समं व्याप्यक्षरं ॥ ८. का,पुरस्तस्य जात्यः। प, पुरस्तास्या जात्य०॥ ६. तु० या० १॥७३॥ ना० २।१।१॥ १०. द, ई ऊ॥ ११. द, अनुदात्तः प्रत्ययः॥ १२. या०१।७४॥ ना०२।१।२॥ १३. का, विवृत्यां॥ १४. का,ग, संहिता॥१५. या० १ । ७८ ॥ ना०२।१।७॥ १६. प, स्वार्य । ग, सायें ॥ १७. ग, अक्षये ॥ १८. प, ग, सार ॥ १६. प, मध्वति ॥ २०. तु० या० १ । ७६ ॥ ना०२।१।४॥ २१. तु० या० १। ७७ ॥ ना०२।१।५॥२२. का, नीचोऽस्ति यदवग्रहः । प, द, ग, व्यस्यात् ॥ २३. प, ग, तथाभाव्यः॥२४. तु० या० १। ७८ ॥ , .
१२ माण्डूकी शिक्षा। (८) ताथाभाव्यस्तु १ तालव्यो न कम्पः स्वरसञ्जकः। स तालव्यो भवेत्कम्प एजातीतिर निदर्शनम् ॥ १॥ सर्वतीक्ष्णो ऽभिनिहितस्ततः प्राश्लिष्ट३ उच्यते । ततो मृदुतरौ स्वारौ४ जात्यः५ प्रश्च तावुभौ ॥२॥ ततो मृदुतरः६ स्वारस्तरोव्यञ्जन७ उच्यते । पादवृत्तो मृदुतर इति स्वारबलाबलम् ॥३॥ उपन्यासस्तु कर्त्तव्यः कण्ठे निक्षेपसञ्जकः । उपन्यासात्परं हन्याद्भूमौ शङ्कुपदं यथा ॥ ४ ॥ प्राश्लिष्ट जात्यक्षेत्राणान् १० यच्चाभिनिहितश्च यः। उदात्तोपस्थिते ११ तेषामेकदेशं प्रकम्पयेत् १२ ॥ ५॥ हलन्तादुत्तरो यस्तु पदादवग्रहेषु च । मिश्रस्तस्याद्य १३ इत्येषो१४ योऽन्यः स य इति स्मृतः ॥६॥ पादादौ च पदादौ च संयोगावग्रहेषु च । यः शब्द इति विज्ञेयो योऽन्यः स य इति स्मृतः॥७॥१५ पुनरन्तश्च सवितश्च प्रातर्या रेफिता च संहिता यत्र । १. का, प, ग, तथा० ॥ २. का, एजतीति । ग, एजातेति ॥ ३. का, प्राश्लिष्ट ॥ ४. का, चैव ॥५. प, ग, जात्य ॥६.प, द, मृदुतर॥ ७. प, तौरो० ॥८. प, संज्ञिकः ॥ ६. का, द, प्राश्लिष्ट ॥ १०. का, जात्यक्षप्राश्चयश्चाभि० ॥ ११. द, स्थितो ॥ १२. का, प्रकल्पयेत् । प, प्रकंपयेत् ॥ १३. का, यस्य स्वस्माद्य । द, ग, मिश्रस्वस्याद्य ॥ १४.द, इत्येको ॥ १५. तु० या०२ । ५६ ॥ ना०२।२।१६॥
१३ रेफवन्ति पदान्यत्र १६ रेके १७ तद्रफितं१८ पदम् ॥ ८॥ अन्तः१६ शब्दस्तु यः कश्चिदाबुदात्तो भवेद्यदि । न तत्र रेफमिच्छन्ति संहितायां पदेषु च ॥६॥ अनुस्वारं हि दोषस्तु हकारादिषु वर्जितः। अंहोमुचो वातरहा हूँहश्चेति निदर्शनम् ॥१०॥ अनुस्वारास्तु२० कर्तव्या ह्रस्वदीर्घप्लुतास्त्रयः । अयँ राजा पशोमांसं क्षत्रियाणां धनूंषि च ॥ ११ ॥ (8) विवृत्तयस्तु विज्ञेयाश्चतस्रस्त्वनुपूर्वशः । नामभिस्तु पृथग्ज्ञेयास्तासां२ वक्ष्यामि लक्षणम् ॥१॥३ पिपीलिका पाकवती तथा वत्सानुसारिणी । अनुसृतवत्सा चैव चतस्रो हि विवृत्तयः॥२॥४ वत्सानुसृता ह्रस्वा जघने वत्सानुसारिणी चाग्रे । पाकवती चोभयतः पिपीलिकमध्याप्युभयदीर्घा५ ॥३॥६ पूर्व ह्रस्वं परं दीर्घमक्षरं यत्र दृश्यते । सा वत्सानुसृता ज्ञेया व्यत्यासेत्यनुसारिणी ॥४॥ उभाभ्यामेव ह्रस्वाभ्यां यवमध्यां विनिर्दिशेत् । १६. का, पदान्यस्य ॥ १७. का, स्याद्वै । ग, रेफ ॥ १८. का, प, तद्रिफित । ग, तद्रैफितं ॥ १६. ग, अन्त ॥ २०. का, राश्च ॥ १. का, यश्च ॥ २. प, द, ग, पृथक्ज्ञेया० ॥ ३. तु० ना० २।४।१॥४. तु० या०२।६॥ ५. प, मध्याथुभय । ग, पिपी- लिकामध्या०॥ ६. तु० या० २०११ ॥ ना० २।४।२ ॥ ७.द, सेत्वनु०॥ .
माण्डूकी शिक्षा। ताम्यामेव तु दीर्घाभ्यां विज्ञेया सा पिपीलिका ॥ ५ ॥ अभ्रमध्ये यथा विद्युद्दश्यते मणिसूत्रवत् । एपच्छेदो विवृत्तीनां यथा बालेषु८ कर्तरि ॥६॥१० प्रापद्यते मकारो यरवोष्मसु११ प्रत्ययेष्वनुस्वारम् ।१२ न भवति लकारे परसवर्ण स्पर्शेषु चोत्तमापत्तिः ॥७॥ ऊष्मस्थौ यत्र दृश्येते स्वरवर्णी स्वरोदयो । ऋलवर्णी तथा ज्ञेयौ स्वरभक्तीति संस्थितौ ॥८॥ तां ह्रस्वां प्रतिजानीयाद्यथा मात्रा भवेद्यदि। सम्यगेनां विजानीयाद्१३ द्वौ दोषौ परिवर्जयेत् ।। ३ ।। सम्यगेनां यदा पश्येच्छतबलिशेति१४ निदर्शनम् । अकारं चाप्युकारं च विच्छिन्नं विवृतं तथा ॥१०॥ करिणी कर्विणी१५ चैव हरिणी हारितेति च ।१६ तथा हंसपदा नाम पंचताः स्वरभक्तयः॥ ११ ॥१७ करिणीं रहयोर्विद्यात्कर्विणी लहकारयोः। MAHAR - , है ॥ ८. प, कालेषु ॥ ६. का, ग, कत्तरी । द, मेरीिपाठ है। यहां (दीर्घ) ईकार का चिन्ह पतली मसी में पीछे से दिया गया १०. तु० या०२॥ ७॥ ना०१।६।११॥ ११. प, यरावाष्मस्तु । यह पुरानी लेखविधि के अनुसार यरवोष्मस्तु बनेगा ॥ १२. तु० ना०२।४।४॥ १३. प, द, ग, विजानीया ॥ १४. प, द, छतबल- शेति । ग, छतवल्रोति ॥ १५. प, करिणीं ॥ १६. का, करिणी कुर्विणीं चैव हारिणी लहकारयोः॥ १७. तु० या० २।१३ ॥ का, में ११वें श्लोक का उत्तरार्द्ध और १२वे का पूर्वार्द्ध नहीं है ॥
AIN १०। ७॥ १५ हरिणीं१८ रषयोर्विद्याद्धारितां१६ लशकारयोः ॥ १२ ॥२० या तु हंसपदा नाम सा तु रेफषकारयोः।२१ या तु रेफशकारी स्यात्काकिनी तां विनिर्दिशेत् ॥ १३॥६॥ (१०) ऋकारप्रत्ययो रेफः संयुक्तः शषसैः सह । आधस्तत्र क्रमो ज्ञेयो न परो बोधितो बुधैः ॥१॥ रेफोष्मणां संयोगे स्वरभक्तिरक्रमश्चैव । तत्रोदाहरणानि प्रदर्शनं वर्षबहिश्च१॥२॥ रेफ स्वरोदये विद्याकार२ व्यजनोदये। स्वरव्यजनयोर्मध्ये रेफमेव विनिर्दिशेत् ॥३॥ ओभावश्च विवृत्तिश्च शषसा रेफ एव च । जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः ॥४॥३ यद्योभाव प्रसंधानमुकारादि परं पदम् । स्वरान्तं तादृशं विद्याद्यदन्न्यव्यक्तमूष्मणः ॥५॥४ पत्वणत्वमुपाचारो दीर्घाभावस्तथैव च । यस्मिन् पदे निपद्यन्ते तत्समासाद्य लक्षणम् ॥६॥६ नकारान्ते पदे पूर्व स्वरे च पर संस्थिते७ । १८. का, हरिणी ॥१६. का ऋष० ॥२०. तु० या०२।१४॥ २१. तु० या०२।१५ ॥ १. का वर्षावर्हिश्च । प, वर्षबर्हिषश्च । ग, वावहिषश्च ॥ २. प, ग, विद्यादकारं॥ ३. तु० या० २। ५३ ॥ ना० २।५।४॥ ४. तु० या०२। ५४ ॥ ना० २।५।६॥ ५. प, ग, तत्समापाद्य ॥ ६. का में ६ठा श्लोक पहले ओर ५वां पीछे है ॥ ७. ग, पदसं०॥ .
an १६ माण्डूकी शिक्षा। रक्तं वर्ण विजानीयान्न ग्रसेत्पूर्वमक्षरम् ॥ ७ ॥ रक्तं वर्ण यदा पश्येद्विवृत्या सह संस्थितम् । व्यजनान्तं विजानीयागोमाँ इति निदर्शनम् ॥८॥ यथा सौराष्ट्रिका नारी अ(१० इत्यभिभाषते । एवं रङ्गाः प्रयोकव्या उकारपरिवर्जिताः ॥ ६ ॥११ नासादुत्पद्यते रङ्गः कांसेन१२ समनिस्वनः१३ । मृदुश्चैव१४ द्विमानं स्याद् वृष्टिमाँ इति निदर्शनम् ॥१०॥१५ संयुक्तस्य तु यत्पूर्वं तद्धस्वलघु१६ विजानीयात् । तत्संयोगोत्तरं विद्याद गुर्वन्यत्र १७ नियोगतः ॥११॥१०॥ मात्रैलघु विज्ञेयं तत्संयोगपरं गुरुम् । सपरं२ व्यजनान्तं चदीर्घस्तु प्लुत एव च ॥ १ ॥ स्पर्शानामुत्तमैः स्पर्शः संयोगाश्चेदनुक्रमात्४ । आनुपूर्व्या यमांस्तत्र५ जानीयाच्चतुरस्तथा ॥२॥ रुक्मेति प्रथमं विद्यान्नृचक्षेत्यपरं६ विदुः। तृतीयं पद्ममित्याहुः शंखध्ममिति७. चोत्तमम्७ ॥३॥ ८. तु० ना० २।४।५॥ ६. द, दोम।ग, ०द्रोमां॥१० द, ग, अ॥ ११. तु० या०२।१७॥ ना०२।४।। ॥ १२. का, कंसेन ॥ १३. ग, स्वरः ॥१४. का, मृदुं चैव ॥ १५. तु० या०२। १०१॥ ना० २।४।८॥ १६. का, तस्वं । प, तस्वं । द, ग, तध्रास्वं ॥ १७. द, ग, गुर्वन्यत्र । का, कुर्वेन्त्यत्र ॥ १. प, मात्रकं । ग, मातृकं ॥ २. का, मपरं ॥ ३. प, स्थ॥ ४. का, संयोगाच्चेद० ॥ ५. प, द, ग, यमास्तत्र ॥ ६. ग, क्षेसरमं ॥ ७. का, शधनमितिः। प, शंखद्वयमीति० ग, शंखध्मति चोदितं ॥ . , , ११। २४॥ वर्गान्ताः श ष स प्रथमाः संयुक्ता यदा स्युरभिधेयाः । लघुशास्त्रदोषतत्त्वज्ञैर्यमदोषास्तथा हि परिहार्याः ॥४॥ वर्गान्ता यत्र दृश्यन्ते शपसैः सह संयुताः । यमास्तत्र निवर्तन्ते श्मशानादिव बान्धवाः ॥ ५॥ संयोगस्य परं स्वार्य१० परं संयोगनायकम् । संयुक्तस्य तु वर्णस्य न११ स्वरं पूर्वमिष्यते ॥६॥१२ स्वरणं १३ पतनं१४ चैव १५ वोत्थानेषु१६ समेषु च । एवमेव १७ पदे दृष्टं न पूर्वाङ्गे क्वचिद्भवेत् ॥ ७ ॥ दारुसङ्घातवश्लिष्टं १८ संयोगवशवर्तिनाम् । वर्णानां युगसम्पन्नमेकं वर्णमिवोत्सृजेत् ॥८॥ वर्णा१६ विंशतिरेकश्च येषां द्विर्भाव इष्यते२० । प्रथमा मध्यमा चान्त्या यवला:२१ श ष सास्तथा॥8॥ न रेफे वा हकारे वा द्विर्भावो जायते क्वचित् । न च वर्गद्वितीयेषु न चतुर्थे कदाचन ॥ १०॥२२ चतुर्थ तु तृतीयेन द्वितीयं प्रथमेन तु । आद्यमन्त्यं तृतीयं च स्वाक्षरेणैव२३ पीडयेत् ॥ ११ ॥२४ ८. का में लुप्त ॥ ६. तु० या० २। ११४ ॥ ना०२।२।६ ॥ १०. प, सवार्य । द, हार्य । ग, कार्य। ११. ग, तत्॥ १२. तु० या० २॥ २२॥ ना०२।२।१४ ॥१३. प, ग, स्मरणं ॥ १४. ग, पवनं ॥ १५. प, द, ग, चै॥ १६. द, वोत्छातेषु । ग, वोछ्वातेषु ॥ १७. का, एकमेव ॥ १८. द, वछिलष्टं । प, धाटवच्छिलष्टं ॥ १६. ग, वर्ण ।। २०. ग, उच्यते ॥ २१. को, ग, यलवाः। प, द, यरलवाः। द में इसे काट कर हाशिये पर उसी हाथ से "यवलाः इति पाठः" लिखा है। २. तु० ना० रारा६ ॥२३. प, साक्षेरणैव ॥ २४. तु० या०२। १२२ । - ना०२२।२।७॥
१८ माण्डूकी शिक्षा। - ( १२ ) दृप्सो १ ऽप्सरायामपशब्दे२ विश्वप्स्न्या च३ विरॅशिने। काश्यपो ऽभिनिधानानामागमं४ प्रतिषेधते ॥ १॥ यत्र चोभयतः स्पर्शाः संयुक्ताः शपसैः सह । आधस्तत्र क्रमो ज्ञेयो न परो बोधितो बुधैः ॥२॥ ऋवर्णरेफसंयुक्तं स्वरितं स्यादनन्तरम् । ऋकार रेफसंयुक्तं यत्पूर्व व्यजनोदये। ॥३॥ ऋकारे लघु तद्विद्याद्रेफे तद्गुरुसंज्ञकम्६ । न क्रमते स्वरयमयोन च वर्गसवर्णयोन च विरामे ॥४॥ न च रेफानुस्वारे विसर्जनीये तु सर्वत्र अवन भ्रवौकर्णललाटनासिका, न कम्पयेदोष्ठचलुन निर्भुजेत् । मुखं न विक्लिश्य न नग्नवक्त्रजो, न चापि संदृष्टहनुन बाह्यवाक् ॥ ५॥ न रुक्षवाक्७ स्यान्न च उत्स्वरं८ वदेन, न चानिमेषो न च गर्वमाचरेत् । गजव्यवेषी बलवानतन्द्रितो, व्यपेतरोष श्रमशोकहर्षभीः ॥६॥ . . ७ १. का, दृप्सौ । ग, द्रप्सो ॥२. का, ऽप्सरायामशब्दे । प, प्सरायामशब्दे । ग, प्सराभ्यामप्शब्दे ॥ ३. का, ०त्र ॥ ४. का, ऽभिनिघाताना० ॥ ५. का, ०दयेत् ॥६. प, द, संज्ञिकम् ॥७. प, द, रूक्ष्य०॥८. ग, चंडस्वरं॥
ANALAMA १३।१॥ न चानुकूजेत्पदमादितोह अवन् , न नासिका नित्यमनुष्ठितं वदेत् । न चापदान्ते श्रमपीडितः श्वसेन , न चोच्छ्वसेदुक्तपदोऽप्यभीक्ष्णशः१० ॥७॥ नातिनिष्पीडयेद्वर्णान्न चाव्यतानुदाहरेत् । समानश्लक्ष्णानसंदिग्धान् वर्णानुच्चारयेवुधः ॥८॥ प्रथमानूष्मसम्पन्नान्द्वितीयानिव दर्शयेत् । तथतान् प्रतिजानीयाद्यथा मत्स्थान् क्षुरोऽप्सरान् ११॥६॥१२ तथैव पञ्चमानाहुरागमो यत्र १३ दृश्यते । द्वितीयानेव तान्कुर्याद यस्मिन्सीतेति निदर्शनम् ॥१०॥१४ ( १३ ) अन्णोनिमेषमात्रेण यो वर्णः समुदीर्यते । स एक मात्रो द्विस्तावान्१ दीर्घस्तु प्लुत उच्यते ॥१॥ अवग्रहे ऽर्द्धमात्रं२ स्यात्कालो मात्रा पदान्तरे । : ६. ग, चातिकुजेसदमा०॥ १०.ग,०भीक्षशः॥११. का,ग, क्षरोप्सरान् ॥ १२. तु० ना०२।५।११ ॥ १३. द, यत्र न ॥ १४. चौथे श्लोक से श्लोकों की अङ्क गणना में सब हस्तलेखों में भेद है। हमने द को अादर्श माना है। प का इस से इतना ही भेद है कि चौथा अटक "सर्वत्र" पर समाप्त होता है। ग में गणना दो दो श्रद्धों को लेकर क्रमशः चली गई है और अन्तिम अर्द्ध श्लोक को भी पहले के समान १० ही माना है। १. द, हाशिये पर द्वि के स्थान में द्वय किया गया है ॥२. प, द, अर्द्ध। ग, ऽद्ध ॥
माण्डूकी शिक्षा। द्वेचे द्वे तथा पादे त्रिमात्रं स्यादृगन्तरम् ॥ २॥३ षस्तु वदते मात्रं द्विमानं वायसो ऽब्रवीत् । खी त्रिमात्रं विज्ञेय एष मात्रा परिग्रहः ॥३॥४ चत्पादविभागेन कचिदई५ क्वचित्पदे । चदर्थे क्वचिच्छब्दे विरामः पञ्चधा स्मृतः॥४॥ इस्येते प्रयुज्यन्ते क्रमेण क्षेपसंज्ञकाः६ । रामं प्रयोक्तव्या येन वृत्तिन विद्यते७॥ ५ ॥ ज्ञाने८ भूयसो दोषान्प्रवक्ष्यामि निबोधत । स्य सन्दर्शनमनुस्वार यमावपि ॥६॥ छन्नत्वं विक्षणत्वं१० सुशीमं सोमसत्सरु११ । रेणाव१२ गृह्णीयात्प्रति शुक्लेति पञ्चमम् ॥ ७॥ नामूष्मसन्देहे अश्र्च१३ स्यान्नपुंसकम् । दुपरिष्टाद्वा सर्वे विश्वा निरूष्मकाः ॥८॥ मानि रूपाणि विश्वानि भुवनानि च । पश्चादुपरिष्टाद्वा सर्वे विश्वा निरूष्मकाः ॥६॥१४ न्ते पदे पूर्व स्वरे च परसंस्थिते । त्तः १५ प्रयोक्तव्यः शयसैः१६ प्रत्ययेषु च ॥१०॥१३ • या०१।१३, १४॥४. तु० या०१। १७, १८ ॥५. ग, द, संज्ञिकाः (१)। ग, संसकाः ॥ ७. ग, दृश्यते ॥८. ग, का, सन्दर्शनञ्च ह्यनुस्वार ॥ १० ग, विक्षिणत्वं ॥ ११ प, परु । १२. ग, इकारेण० ॥ १३. ग, ऽर्द्धर्च ॥ १४. का, १५. का, हस्खोमात्रः॥१६. का,ग, श ष सोद, श ष सः॥ , ४ .
२१ १४ ) द्वो तकारी थकारो च यमो१ नेति च पञ्चमः । श्रनार इति च संयोगमाहुरक्षरचिन्तकाः ॥१॥ ककारान्ते पदे पूर्वे कारे३ प्रत्यये परे । उकारस्यागमं कुर्याद्वाङ्म इति निदर्शनम् ॥ २॥ टकारान्ते पदे पूर्व णकारे३ प्रत्यये परे । णकारस्यागमं कुर्याद् वण महाँ४ इति निदर्शनम् ॥ ३ ॥ तकारान्ते पदे पूर्वे नकारे३ प्रत्यये परे । नकारस्यागमं कुर्याद् यन्न इति निदर्शनम् ॥ ४॥ पकारान्ते५ पदे पूर्वे मकारे प्रत्यये परे । मकारस्यागमं कुर्यात् त्रिष्टुम्म इति निदर्शनम् ॥ ५ ॥ अन्त्यं कटतपं दृष्ट्वा परं णनमं तथा । आत्मपञ्चमसंयोगमाहु रक्षरचिन्तकाः ॥६॥ आम्नायात्प्रपदो प्रपदो भवति निर्भयः । निर्भयो मधुरो भवति माधुर्यात्सिद्धिमाप्नुयात् ।। ७ ॥ आम्नायकरणं श्रेष्ठं वर्णानां चावधारणम् । अप्रमत्तश्च स्वार्येत एतदाचार्यशासनम् ॥ ८ ॥ आम्नायशास्त्रसम्पानं शास्त्रमानायसारवित् । पयः शङ्खे यथा तद्वच्छिरः छन्दसि सारथिः ॥३॥ दन्त्योष्ठकरणं६ सूक्ष्मं माधुर्य तरुणं वचः । १. ग, यमेनेति ॥२. का, कृत्स्ना । द, श्रश्ना ॥ ३. ग, मकारे॥ ६, ०महँ । ५. का, मकारान्ते ॥ ६. का, ग, दन्त्योष्टय ॥
२२ माण्डूकी शिक्षा। स्वभावं शिक्षुकस्याहुरन्यद्गुरुकृतं७ भवेत ॥ १० ॥१४॥ (१५ ) तरुणं शिचुकं १ प्राद्धमक्षरचिन्तकम् । नैयायकं परिश्रुतं बहुधा यन्ति३ याचकम् ॥ १ ॥ न करालो न लम्बोष्ठो न च सर्वानुनासिकः । गद्गदो बद्धजिह्वश्च प्रयोगान्वक्तुमर्हति ॥२॥४ प्रकृतिर्यस्य कल्याणी दन्त्योष्ठौ५ यस्य शोभनौ । अधीतं येन तत्वेन स शिक्षां६ पारयिष्यति ॥३॥ आगमैरधिकाः केचिद्विज्ञानरपरेऽधिकाः । प्रयोगसौष्ठवादन्ये७ नाहमस्मीति विस्मयः॥४॥ सुतीर्थादागतं जग्धं खाम्नातं सुव्यवस्थितम् । सुखरेण सुवक्त्रेण प्रयुक्तं ब्रह्म राजतिः॥ ५ ॥ कुतीर्थादागतं दग्धमपर्वेणैश्च भक्षितम् । न तस्य परिमोक्षो ऽस्ति पापाहेरिव किल्विषात् १० ॥ ६॥११ येषां तीर्थागता विद्या नित्यमभ्यासनिर्जिता१२। ते भवन्ति दुराधर्षाः ससिंहा१३ इव पर्वताः ॥७॥ ॥ ७. का, शिक्षकस्य॥ १. का, शिक्षकं॥२. प, वृद्धिम॥३. का, भवन्ति । प, याति ॥ ४. तु० या० १ । २६,२७॥ ना०२।८।१२ ॥ ५. का, ग, दन्तोष्ठौ ॥६. ग, विद्यां ॥ ७. द, ग, सौष्टवा० ॥८. का, राजते ॥ ६. तु० ना०२ । ८।११ ॥ १०. द, ग, किल्बिषात् ॥ ११. तु० ना० २ । ८ । १० ॥ १२. का, ०भ्यासवर्जिता ॥ १३. ग, ससिंह्वा ॥
७।१०॥
न भोजनविलम्बी स्यान्न च स्यात् स्त्रीनिबन्धनः१४ ।
स दूरमपि विद्यार्थी ब्रजेद्गरुडहंसवत्१५ ॥ ८॥१६
हयानामिव जात्यानामद्धरात्रार्द्धशायिनाम् ।
न विशेषार्थिनां निद्रा चिर नेत्रेषु तिष्ठति ॥६॥१७
अहेरिव जनाभीतः स्त्रीभ्यश्च नरकादिव ।
मिष्टाच१८ विषवद्भीतः स विद्यां पारयिष्यति ॥१०॥१६॥१५
( १६ )
सहस्रगुणिता१ विद्या शतशः परिवर्तिता२।
आगमिष्यति जिह्वाग्रे स्थलान्निम्निवोदकम् ॥ १ ॥३
शतेन गुणिता१ भवति४ सहस्रेण तु धारिता।
शतानां तु सहस्रेण प्रेत्य चेह च तिष्ठति ॥२॥५
उपांशु त्वरितं चैव योऽधीतेऽवत्रसन्निव६ ।
अपि रूपसहस्रेस्तु संशयेष्वेव वर्तते ॥३॥७
येषां च न ग्रहणशक्तिरतिप्रचण्डा,
लुब्धाश्चद येन शतशः परिवर्तयन्ति ।
निद्रां च ये प्रियसखीमिव न त्यजन्ति:,
१४. ग, स्त्रान० ॥ १५. द, गुरुडसिंहवत । ग, गरुडसिहवत् ॥
१६. तु० या०२। ७२ ॥ ना०२।८।२४ ॥ १७. तु० या०२।८० ॥
ना०२।८।२३॥ १८. ग, मिष्टान्न ॥ १६. तु० या०२।७१ ॥ ना०
२।८।२५॥
१. ग, गणिता ॥२. का, परिवर्जिता ॥ ३. तु० या०२।७५॥
ना०२।८।२२॥ ४. ग, विद्या ॥ ५. तु० या० २।७६॥ ६. प,
वृत्तसन्निव । द, वृत्र का वित्र किया गया है। ग, वित्र ॥ ७. तु०
या०२।६६ ॥ ना०२।८।१८।८. का, लुब्ध्वाच॥
.
.
माण्डूकी शिक्षा। तेह तादृशा गुरुकुलेषु जरां व्रजति ॥४॥ पश्च विद्या न गृह्णन्ति लुब्धाश्चण्डाश्च ये नराः। अलसाश्चानुरोगाथ१० येषां च विकृतं मनः ॥५॥११ ऊर्द्धवं सहस्रादाम्नातं सततं चान्ववेक्षणम् । आप्तस्तु सह सम्पाठस्त्रिविधा धारणा स्मृता१२॥६॥ यथा खनन् खनित्रेण भूतले १३ वारि विन्दति१४ । एवं गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥ ७॥१५ योजनानां सहस्रं तु शनैर्याति१६ पिपीलिका । आगच्छन्वैनतेयोऽपि१७ पदमेकं न गच्छति ॥८॥१८ पदेनैकेन१६ मेधावी पदानां विन्दते शतम् । मूर्खः पदसहस्त्रेणं पदमेकं न विन्दति ॥६॥ पदं पादं तथा च संचितव्यं२० प्रयत्नतः । अप्राज्ञः प्राज्ञतां याति सरिद्भिः सागरो यथा ॥१०॥ अनिर्वेदी श्रियो२१ मूलं लोहबद्धं२२ च२३ कुण्डलम्२३ । अहोरात्राणि दीर्वाणि कः समुद्रं न शोषयेत् ॥ ११ ॥ जलमभ्यासयोगेन शैलानां कुरुते क्षयम् । है. ग, त्यजन्त्येतादृशा ॥१०. का, ग, बालसा० ॥ ११. तु० या०२।७०॥ ना०२।८।१४ ॥ १२. प, द, स्मृताः ॥ १३. ग, भूतलं ॥ १४. का, विन्दते ॥ १५. तु० या०२।७३॥ ना०२।८।२७॥ १६. का, शतै० ॥ १७. प, द, अगच्छन्वै ॥ १८.तु० ना० २।८।१६॥ १६. प, पादेनैकेन ॥ २०. का, सेवितव्यं ॥ २१. ग, श्रिया ॥ २२. ग, मोहबद्धं ॥२३. का, कमण्डलुम्॥
६१ । १६॥ कर्कशानां मृदुस्पर्श किमभ्यासो२४ न२४ साधयेत् ।१२।२५ प्राचार्याः सममिच्छन्ति पदच्छेदन्तु पण्डिताः । स्त्रियो मधुरमिच्छन्ति विक्रष्टमितरे जनाः ॥ १३ ॥२६ प्राचार्योपासनाद्योगात्तपसा प्राज्ञसेवनात् । विगृह्यकथनात्कालापभिर्विद्या प्रपद्यते ॥ १४ ॥ आलस्यान्मूखसंयोगाद्भयाद्रोगनिपीडनात् । प्रत्याशक्याच२७ मानाच षड्भिाविद्या विनश्यति ॥१५॥ मण्डूकेन कृतां शिक्षा२८ विदुषां बुद्धिदीपिनीम् । यो हि तत्वेन जानाति ब्रह्मलोकं स गच्छतीति२६ ॥१६॥ इति शिक्षा समाप्ता मण्डूककृता।३० २४. प, भ्यासेन ॥ २५. तु० या० २। ७५॥ २६. तु० या० २।३०,३१॥ ना०१।३।३॥ २७. का, अत्यशक्त्या च ॥ २८.ग, शीतां ॥ २६. का, ब्रह्म० शब्द से अन्त तक दो बार आया है ॥ ३०. प, इति मंडूकी शिक्षा समाप्ता । का, इत्यथर्वणवेदीया माण्डूकी शिक्षा समाप्ता। ग, इत्यथर्ववेद मंडूकी शीक्षा समाप्तः ॥ , AVTALANSOWWW WY
परिशिष्ट (क)
मा० या० वा नारद शिक्षाओं की तुलनात्मक
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मा०शि० ५।२७/२॥ ङ) परिशिष्ट (ख) निदर्शनसूची। अथर्ववेद प्रजापतेः तनूनपात् पजाति अहोमुचः वातरंहाः दृ ८।११॥ अयं राजा पशोर्मासम् क्षत्रियाणां धनुषि ALAN * -- प्राप्त . २॥२७॥६॥ शतबलिशा वर्ष बर्हिः गोमान् वृाष्टमान् . " अप्राप्त प्राप्त सीता वाङ्म बरामहान् यन्न त्रिष्टुम्म * अथर्ववेद में अहंः ऽमुचम १६ । ४२ ॥ ४ ॥, वा अहंः ऽमुचे २६।४२॥३॥ पाठ है। *** अथर्ववेद में शतवल्शा ६ । ३० ॥ २॥ पाठ है। *** अथर्वपाठ वर्षम् है । अथर्ववेद में वृष्टिमान् ऽइव २०११३८॥१॥ पाठ है। ।
SHAANEEPAVAS (च) परिशिष्ट (ग) छान्दसप्रयोग। . १।१२॥ २॥२०॥ वृत्तीरनुक्रान्ताः গান্ধিলালা: रम्भान्ति उरः शिरोभ्याम् पर्वे স্থান द्वावतो भवेत् नासिकोष्टी प्रतिषेधते दन्त्योष्टी श्लोकाद्धों की प्रतीकसूची। AN अकारं च কাকাৰ অল্প १, अभ्यासाथ अभ्रमध्ये श्रयं राजा গলজ স্বা: अर्कस्य अर्द्धचें .. १३,२॥ अग्निमारुतयोः , , १३.२॥ , ६, अङ्गुष्ठस्य अजा वदति अत्याशक्याश्च अधीतं येन अनामिकायां अनिर्बंदी अनुदात्त प्रत्यये अनुदात्तम् अनुदात्तमेव अनुसतवत्सा अनुस्वारं हि अनुस्वारास्तु अनुचो : अवग्रहात्परं अवग्रहे १६, १५॥ अविच्छिन्ने अश्वस्तु अष्टौ स्थानानि १६, ११॥ अहेरिव अहोरात्राणि अंहो मुचो आख्यातानां प्रागमिष्यति आगमैरधिकाः श्राचार्याः आचार्योपासनात् प्रात्मपञ्चम् प्राधमन्त्यम् . . ८,१०॥ . अन्तः शब्दस्तु अन्त्यं कटतपं अपि रूप० प्राद्यस्तत्र অম १२,२॥ आद्यस्तत्र १६, १०॥ आनुपूर्व्या प्रापद्यते अभिनिहितः आतैस्तु आन्नायकरणम् १२.३॥ प्राम्नायशास्त्र आम्नायात् श्राम्रपालाशे ( २ ) ऋकारप्रत्ययो ऋकार रेफ ऋकारे ऋग्यजुःसामगा० ऋग्यजुः सामनि० १६, १५॥ ऋग्यजुः सामभिः ७,१२॥ ऋलवर्णी ऋवर्णरेफ० आलस्यात् इ उ वौँ ए ओ . २,४॥ ५,६॥ ६.६॥ इकारं यत्र ईकारेणैव उच्च विद्यात् उच्चादुञ्चतरं उत्तानं सोन्नतं उदात्तपूर्वे उदात्तश्च उदात्ताच्चन उदातोऽथानु उदात्तोपस्थिते उदात्तोऽप्य० एकाक्षरे एकैकाम् एषच्छेदी एते वै एतौ द्वौ एवं गुरुगतां - २,५॥ १६, ७॥ २०,६॥ एवं रङ्गाः . - एवं वर्णाः एवमेव पदे " उपन्यासस्तु ऐन्द्री तु . उपन्यासात् उपांशु उभाभ्यामेव उरः शिरोभ्यां ऊर्द्धक्षेपापि ऊर्द्धमायुः ऊ सहस्र० ऊष्मस्थौ श्रोभावश्च ककारान्ते कटान्तयोस्तु कण्ठादुत्तिष्ठते कनकाभस्तु करिणी करिणी कर्कशानां ४,१२॥ ६,८॥
१२,६॥ १२, १०॥ काश्यपो किञ्चिद्यो कुतीर्थादागतं कूर्मोऽगानीव क्वचित्पाद० क्वचिदर्थे खदिरस्य गजव्यवेषी गद्गदो उकारस्यागम ङरणनान्ते २,२॥ . , . . चतुर्थ तु ( ३ ) तथा हंसपदा নথনালু तथैव तं पादवृत्तं तरुणं १३, ४॥ | तस्माद्रुतां तस्याधस्तात्तु ताथाभाव्यो ताथाभाव्यस्तु ताभ्यामेव तां ह्रस्वां ११, ११॥ तारंतु तिरोविराम तिस्रो वृत्तीः तृतीयं ते तादृशाः तेनास्यकरणं १६, १२॥ ते भवन्ति तैरोव्यञ्जन तैरोव्यञ्जनः षष्ठः तैलधारेव बयो मध्याः दन्त्योष्ट० १०,११॥ दारुसंघात १ चतुर्विधः चलुवा -1 , . चत्वार एव , ५ . चाषस्तु छन्दस्येते जलमभ्यास० जिह्वामूलं जिह्वामूलमुपध्मा टकारान्ते णकारस्यागमं तकारान्ते तत्संयोग ततो मृदुतरौ ." दीर्घ तु ततो मृदुतरः दुर्बलस्य दृप्सो तत्रोदाहरण १०, २॥
( ४ ) दृष्टिं हस्ता० दोषाःप्रकाशास्तु द्वयोरुदात्तयोः द्वयोस्तु द्वितीयं स्वरितं द्वितीयानेव द्विविधश्च द्वौ तकारी धैवतश्च न भवति न भोजन न रेफेवा नरुक्षवाक् न विशेषार्थिनां न हि पाणि नातिनिष्पी० . २५,६॥ नाति हन्यात् नात्युच्चैः .. धैवतश्च ललाटात् नाद्यःशिरा टा १५, २॥ न कम्पयेच्छिरः न करालो नकारस्यागमं नकारान्ते पदे नामाभिस्तु नासादुत्पद्यते नासिकायास्तु न क्रमते , १३, १०॥ निद्रांच निर्भयो निषादः निष्कृप्य हस्तं ११, १०॥ नीचं तु नीचान्नीचतरं न च रेफा० नच वर्ग नैनां वुधः नचास्य न चाङ्गुली न चानुकूजेत् न चापदान्ते न चोदात्त न तत्र रेफम् नैयायिक न्यासमेवादितः पकारान्ते पञ्चमस्तु पञ्चविद्यां पदं पादं ननु धारयेत् पदान्तरं न पदेनैकेन ( ५ ) मण्डूकेन मध्यमातु मध्यमैकान्तरा मयूरहंसादि " पझपत्र " पयः शंखे मालेकं लघु , क Daman , पाकवती पादवृत्तो पादादौ च पिपीलिका पुनरन्तश्च पुरस्तात् पुष्पसाधारणे पूर्व ह्रस्वं प्रकृतिर्यस्य प्रथमानूष्म० प्रथमा मध्यमा प्रथमान्तिमौ माध्यदिने मान्ते मांसे मांस मिष्टाच मिश्रस्तस्याद्य मुखं न मूर्खः पद० मृदुश्चैव यत्र चोभयतः १२, २॥ १२,६॥ यत्वैव तु यथा खनन् यथानुपूर्व यथा नौ ." -- . 2.. . प्रव्रयात् प्रयोगसौष्ठवात् प्राश्लिष्ट प्रातर्वदेत् प्रादेशस्य तु प्रादेशिन्यां प्रसार्य चाङ्गुली बाह्याङ्गुष्ठ ब्रुवन् भ्रुवौ भीता पतन मकारस्यागम यथा वाणी यथा व्याघ्री यथा सौराष्टिका यदुदात्तम् यद्योभाव यत्रीचं यमानां re. १ यमास्तत्र यस्मिन्पदे ( ६ ) या तु रेफ० या तु हंस० येषांचन येषां तीर्थागता येषां पश्चात् योजनानां यो हि तत्वेन ४. यः शब्द रक्तं वर्ण ६,६॥ विश्वानामूष्म्० व्यञ्जनान्तं व्यञ्जनान्यनु० शतानां तु १३, ६॥ शतेन शनैरध्वसु १६, १६॥ शिखी ८,७॥ शेषमाद्यवत् १०,७॥ श्रत्स्ना इति १०,८॥ श्रुतिं वाचो षड्धातु षड्जऋषभ १०,२॥ षड्जे वदति षत्वगत्व षोडशाक्षर ११,४॥ स्वधीतस्य १४,१॥ , .. रेफं स्वरोदये रेफवन्ति रेफोष्मणां रुक्मति लक्षणानि लघुशास्त्र वत्सानुसृता वर्गान्ताः यत्र वर्गान्ताः श वर्णा वर्णानां स्वर उच्चः , वरप्रधान स्वभावं खरमात्रा वर्णानां तु १ वरणं स्वरावद्धं खरव्यञ्जनयोः १६, १४॥ स्वरश्चैव वसुधामानि वाग्यतः विगृह विच्छिन्नत्वं विवृत्तयस्तु १०,३॥ स्वरात्वरं ११, , ( ७ ) संयोगस्य संवृतं सयकारं सर्वतीक्ष्णो १ खरान्तं स्वरित्प्रभवं स्वरितात्पराणि स्वरितात्वरित स्वारतानाम् स्वरितावधृत पाद: खरिते स्वरितं सर्वा एव " ५,७॥ १३,५॥ . स्वरे ज्ञात्वा स्वरो व्यञ्जनम् . " १५, सज्ञाने स तालव्यो सदूरमपि सपरं " सर्वाणि प्रचयं सविराम सहस्रगुणिता सावत्सा० स्पर्शानां स्पर्शानामुत्तमैः सुतीर्थादागतं सुस्वरेण सूक्ष्मान् वर्णान् हन्तव्यं हयानामिव हरिणीं हलन्तादुत्तरो हस्तहीनं हस्ताभ्रष्टः हस्तनाधीय० ह्रस्वानुवार ह्रस्वोदात्तः सप्तस्वरान् सप्तखारास्तु ६,१२॥ समान सम्यगेनां ६,६॥ सम्यग्वर्ण संयुक्तस्य संयुक्तस्य तु १३.१०॥