Hindi Sahataya Samalayan
Mahaswarsudhakar
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9099999909090099999000000 ॥श्रीः ॥ महेश्वरसुधाकर । श्रीस्यामास्यामसुन्दर प्रेमियों के प्रतक्षार्थ रामपुरेन्द्ररैकवारशावतंशश्री गुमान सिंहात्मज श्री महाराजा महेश्वर- बक्ससिंह जू देव की आज्ञानुसार (जिला) फतेपुर असनीनगर निवासी कबीन्द्र पण्डित मिश्र मन्नालालात्मज श्री श्यामसु- न्दर (श्याम) कबि ने नव रससंयुक्त निर्मित किया। काशी। भारतजीवन प्रेस में मुद्रित हुआ। सन् १८८८ ई.। 53687688888888888888862 शुद्धाशुद्ध पत्र। पृष्टि पंक्ति अशुद्ध १ वे नय ४ १५ सन सज्जन १८ सज्जन १८ अनुमान गुमराव शुन my १२ अनुमानि अमराव गुनि गुन पहाड़ मुदित सों २ Ah १८ २३ 4E ११ २३ २६ मोयो वेस्यो ११ २७ ४ १२ पहार उदित सो करि भोयौ चोखो बूंघुट ज्यौं तीय नभोढ़ा আন छनजोति नवत पवित्र कै बिलास तिया प्रौढ़ा ६ Am AM ABAD ३८ 2 छबिजोति नावत विचित्र के ३८ e Yoc0 हेतु ( २ ) पृष्टि पंक्ति ४५ १ ५ স্বমছ मौ मे चुनरी चूनरो कहीं कहो मुकुत मुकुट हसित इसत छतियां कहुं आन पान तिया के तिया के लगे। लगे छतियाँ हरि उतत অনন चातक चाविक इताई इतमाई तनमाहि १५ ५२ १३ तुम माहि १९ खडित खंडिता मृग युक्ति जति ६१ ११ १८ ३ कर बैठी रनै t करि बैठि रेन फुरै धिप छवि तस्य उत्प्रेक्षा पा कहंत तंत ६८ धीप छाये तस्या उत्प्रीक्षा है पर्सा १. ११ १२ जहँ प्रस्तुत प्रास्तुत घोर नन १४ घेरि तैन भ १४ मै कारन कारज ( ३ ) पृष्टि पंक्ति ८४ .. खानि ८५ ४ हानि फैली है तनायो ८५ फैम्ति है तिनायो वेगैर १८ २ वगैर Aur ३ २१ १ २१ चोट मिहे पिया भाव प्रवीन गई ताको कुशुम बिरोधा चोट मिले प्रिया भाय प्राचीन मई तोको કે ૨ ६२ 22 ८३ ६५ ४ ६५ विरोधी पैर पर भादू भाय 29 १३ पाय स्वतंत्र ट ५ नेत्र वरनन १०४ १०४ २० १०४ पाइ सुतंत्र नेत्र को बरनन सहस अनियारी प्यारो कमल को नायक रुचि हरसन हरकोर की नायक का मेमुद्रिका सामान्या है १०४ १०५ ३ सादृश अनियारी प्यारी कमलकी नायक को रुचि दरसन सरकोरकी नायक का भै मुद्रिका सामान्य निबंधना के कई ने ५ १६ ११७ कैकई न ( ४ ) पृष्टि पंक्ति अशुद्ध ११८ शत्रुन को शत्रुन के ३ उमग उमंग है है • १२० १६ आर १२१ ३ १२१ १२२ १२३ 2 परमत सिरताई धरि वोसव दास दूनी १२ १२४ युक्ति से IS AU १.२६ १२८ और परगत सोरताई धारि केशवदा दुनी युक्ति सो तेरे राजामहेश्वर श्रोणित को तोयौंकहत विकट मुंडन केगन भांग निहोरि रूप सोकित तोहिन ११४ २२ १३० मेरे राजाहारचंद श्रोणित सो तो कहत विकन मंडन कोगन भंग निहारि भूप सोकत सोनहि १० १३१ १२ १३२ २० १२३ १३४ बन १३३ २ पावत जिते ही प्रिय पागत जिते हो पिय ४ १४५ १६ इति।
श्रीगणेशाय नमः। महेश्वरसुधाकर। अथ बन्दना गणेशजी की, हरिगीतिका छन्द । सिन्दूर सोभित सीस पै गिरिशृङ्ग पै रवि राजहीं । कलिकाल काल कराल तम सम पाप- पुज्ज पराजहीं ॥१॥ शुभदण्ड दन्त अनन्त छबि कवि कौन कहि उपमा लहै। करुनानिधान सुजान श्री गनपाल सो गनपाल है ॥२॥ उ- पमा जो आन न है सो आनन श्रीगजाननराज की । जेहि देवबन्द अनन्त ध्यावत होत सिद्धि सुकाज की ॥३॥ सुत गौरि के उर गौर करि बर देव जो जन जाँचहीं । निरबिन काज स- माज संयुत सुजन आंनद राचहीं ॥४॥ द्विज श्याम कहि बसु याम में छन नाम नेक पुकारि है । भवसिन्धु-गोपद सरिस ते तरि तुरत जन्म सुधारिहै ॥ ५॥ शुभ दृष्टि सों अवलोकि कै पद पद्म जे उर धारहीं। श्रीकृष्णचरित पवित्र पावन प्रेमजुत अनुसारहीं ॥६॥ छल छन्द २ महेश्वरसुधाकर । तजि छहछन्द जे छन येक जे नर गाइहैं । त्रै- ताप ताप नसाय ते शुभ परम मंगल पाइहैं । दोहा। श्रीगणपति गिरिजासुवन एकरदन सुखदाय । प्रणत स्यामसिधिकामहित चरणकमल मनलाय॥ अष्टक श्रीगणराज को कहत सुनत जन जोय। जस प्रताप ताको बिमल महिमण्डल में होय॥९॥ अपरंच कवित्त सवैया । सिद्धि औ रिद्धि अहैं नवनिधि रहैं जिनके हग-कोर निहारे । ज्ञाननिधान सरूप अनूप बखानत सेस महेस पियारे ॥ सुण्ड उदण्ड सु- दन्त लसै सुखदायक स्याम सुवेद बिचारे । रा- खत हैं न कलेस को लेस बसैं मन माहिँ ग- णेस हमारे ॥ १०॥ पुनः कवित्त घनाक्षरी। सोभित सिन्दूर लाल भाल में बिसाल मंजु बाल अंसुमान कलिकाल तम-खण्डी के । बास कयलास सुआस पास सिद्धि सिद्धि दास- आसपोषक सुखम्भ धर्ममण्डी के ॥ से जासु देव बासुदेव स्याम धेवें सदाँ शङ्कर शिवा के पै ३ महेश्वरसुधाकर। राजै अङ्क बरवण्डी के । झुण्ड झुण्ड दम्भ दोष दन्त सों दवाय धरें शुण्डादण्डमण्डल उदय अग्रचण्डी के ॥ ११ ॥ अथ सरस्वती जी की बन्दना सवैया । जानत वेद पुरान न नेक नहीं गुन गौरव ज्ञान निहारो। प्रेम नहीं पदपङ्कज में मन को तन को तनको न सिहारो ॥ औगुन औ अघ- खानि महा अवलम्ब चहै द्विज स्याम बिचारो। भीर मैं पीर हरौ हिय की हमै भारती भूरि भ- रोस तिहारो ॥ १२॥ कासों कहीं यह कौन सुनै नहिं है मन की कोउ जाननहारो । हारि रह्यौ हिय में द्विज स्याम न पेखि परयौ दुखदारनवारो ॥ और कहूँ अवलम्बन है जिय जानि चटौ शरनै शिर धारो । भीर मैं पीर हरौ हिय की हमै भारती भूरि भरोस तिहारो ॥ १३ ॥ दोहा । बानी महरानी महा सुखदानी गुनखानि । बरदानी बानी बिमल करह सदाँ जन जानि॥१४॥ श्रीगुरुवन्दना कवित्त घनाक्षरी। जाहिर जहान मध्य तपोबल प्रेम नेम ऋद्धि ।
महेश्वरसुधाकर । सिद्धि जाके पास करत गुलामी हैं । ज्ञानमान गुनमान सोहमिति ध्यानमान ऑनद के का- नन में रमत अकामी हैं ॥ परम पवित्र चारु चरित बिचित्र सब कहत सदाही श्रुति पथ अनुगामी हैं । अङ्ग मैं बिराजै भासकरा के स- मान भास आसकरा स्याम भासकरानन्द स्वामी हैं ॥ १५॥ श्री मन्त्रगुरु की बन्दना दोहा । सुथल बिन्ध्यगिरिमें बसत सकल शास्त्र को ज्ञान। बदत सदाँ येहि भाँति सों जन विरच्यौ नहिं आन॥ भास्यांत वैयाकरन मन्त्रशास्त्र परिपूर। सिद्धि प्रयोगहि को करत बिहजन मन सूर॥१७॥ देत सुबिद्या दान को निसिबासर हित मानि श्री ओझा महराज हैं नाम वओरन जानि ॥१८॥ पण्डित सज्जन शीलनिधि ऋजु तपसी सरबज्ञ । छमा दया दाता बिमल भाषत सजन सुज्ञ ॥१९॥ सो कृपाल अति सरल चित मन्त्र गुरू हैं मोरि । तिनके चरन सरोज युग बन्दत हौं कर जोरि॥२०॥ श्री गुरुसेवक राम को धन्य बदत द्विज श्याम । जिन की कृपा कटाक्ष सों लह्यौ काव्य अभिराम ॥
५
महेश्वरसुधाकर ।
अथ खलबन्दना चौपाई।
अब बन्दत में खल जन नामी।
जे परदूषन भूषन कामी ॥
परतिय परधन पर प्रपंच रत ।
परनिन्दा अघ पर प्रसन्न मत॥२२॥
तिन सों विनै करौं कर जोरी।
करिहिं अनुग्रह मो पर थोरी ॥१३॥
दोहा।
मैं उन को अनुचर अहौं अघ औगुन की खानि ।
सोमो पर करि हैं कृपा प्रीत पुरातन मानि ॥२४॥
सिद्धि श्रीमन्महाराजाधिराज राजेन्द्र मुकुटमणि रामपुराधिप रैक
वारकुल कमल दिवाकर श्रोगुमानसिंहात्मज श्री महेश्वरवकशसिंह ब-
हादुर जू देव की आज्ञानुसार श्री पण्डित मिश्र मन्नालाल तस्यात्मज
मिश्च स्यामसुन्दर असनीनगरनिवासी महेश्वर सुधाकरग्रन्यविरचिते
प्रथमस्तरङ्गः ॥ १ ॥
अथ कविबंस बर्नन दोहा ।
मैं बर्नन नहिं बहु कियो ग्रन्थ बढ़न भय मानि।
स्वल्पहि में सब जानि हैं कबि कोबिद गुनखानि ॥
कानकुन हिजबरन में मिसिर बदरका केर ।
बसत अश्वनीनगर में गुजरी पुस्ति घनेर ॥२॥
येहि कुल में उपजे सुमति सुजसी शीलनिधान ।
तेजवान तपसी बली विद्या गुन धनवान ॥ ३ ॥
मह वरसुधाकर ।
श्री रामेश्वरमिश्र भे तिन के चारि कुमार ।
मिश्र मदारीलाल यक बिय शिगुलाम उदार॥४॥
श्रीकाशीपरसाद अरु मिश्र सु मैकूलाल ।
मिश्र मदारीलाल के लाला रामविशाल ॥५॥
श्री काशपिरसाद के भये निहाल पवित्र ।
गुनगौरव सुचि सील निधिजिनके चरितबिचित्र॥
शिउगुलाम के तनै श्री रामनरायन नाम ।
सुजस पताको अजहुँ लों जिनको फहरत आमा
लाला रामसुमिश्र के जग जाहिर प्रनपाल ।
तनय भये तिनके सुखद नाम शिवचरनलाल ८॥
शिवचरनन मैं मगन मन पूजन करत त्रिकाल ।
तिनके सुत भे बिमलमति मिश्र समन्नालाल ॥९॥
है सुत मन्नालाल के जेठी में मतिमन्द।
नाम स्यामसुन्दर अहै लघु विश्वेश्वर चन्द ॥१०॥
बैदराज मम पितु अजहुँ रहत राज दरबार ।
नृपति महेश्वरबक्स के निकट सहित सतकार॥११॥
सहर फतेपुर मैं मोहूँ करत सुबैद्यक आम ।
बसत बहुत गत अब्द भे होत सिद्धि शुभ काम ॥
हितू मित्र हैं बरन जुग सज्जन सील उदार ।
परम कृपा सब की अहै मो पर प्रेम अपार ॥१३॥
७ महेश्वरसुधाकर। नाम लिखत सब सुजन को होत महा बिस्तार। ताते लिख्यौ न मैं इतै सम सबही को प्यार॥१४॥ मम कबिता पर प्रेम अति सुनत कहत मन लाय। तिनके चित्त प्रसन्न हित दीन्हो कबित बनाय।१५। काव्य भेद जानौं नहीं नहिं बिद्या गुन मोर । सन्त सुजन सुर गुर कृपा समुझत हों निज ओर॥ सजन कबि कोबिदन को बिनवत हौं कर जोरि । बिगरो कहत सुधारिये जानि मोरि मति थोराि१७॥ कबित्त घनाक्षरी। जाहिर जिला है फतेपुर हँसवा को जौन वाके दिशि उत्तर सुपाँच कोस न्यारे हैं । ग्राम असनी है धाम गङ्गा जी समीप जहाँ कानकुब्ज बिप्र वृन्द बसत अपारे हैं ॥ मिश्र मन्नालाल को तनै हौं श्यामसुन्दर मैं सेवक गुरू ते काव्य कछुक बिचारे हैं । तालुके अवध रामपुर के म- हीप श्रीमहेश्वरबकससिंह रक्षक हमारे हैं॥१८॥ दोहा । नृपति महेश्वरबकस सो श्रीयुत सुख आसीन । है प्रसन्न मो पै कह्यौ सुनिए स्याम प्रबीन ॥१९॥ सरस सुखद नवरस सहित बिरचहुँ ग्रन्थ नबीन। बैन सुनत उर चैन लहि सुघर सुधाकर कीन।२०।
महेश्वरसुधाकर ।
मिश्र स्यामसुन्दर सुखद सुनत हुकुम मुद छाय ।
नृपति महेश्वरबकस को आसिषि देत बनाय।२१।
बाजपेय कुल बिमलमति श्रीसिवनन्दनलाल ।
करत कृपा मो पर अमित सोध्यौ ग्रन्थ रसाल।२२।
असनी बासी सुकबि श्रीकृष्ण महा मतिखानि ।
सजन श्रीकबि लाल जी कियो तिलक मुदमानि॥
अलङ्कार अरु नायिका कह्यौ सुमति अनुमानि ।
सुहित सहित इक ढिग बसत रहत प्रसन्न महान॥
सम्बत युग्मरु बाण निधि ससि सुपक्ष ससि बार।
माघ मास तिथि पञ्चमी भयो ग्रन्थ तइयार॥२५॥
सोरठा।
सहित सुधाकर नाम धरयौ महेश्वरग्रन्थ कर ।
रुचिर कथा अभिराम रसिकचित्त-आनन्दकर ॥
सिद्धि श्रीमन्ममहाराजाधिराजराजेन्द्रमुकुटमणि रासपुराधिप रैक
वारकुलकमलदिवाकर श्रीगुमानसिंहात्मज श्री महेश्वरबकससिंह ब.
हादुर जू देव को आज्ञानुसार श्री पण्डित मिश्र मन्त्रालाल तस्यात्मज
मित्र स्यामसुन्दर असनीनगरनिवासी महेश्वसुधाकरग्रन्थ बिरचिते दि-
तौयस्तरङ्गः ॥२॥
अथ राजबंस बनन दोहा ।
परब्रह्म परमात्मा सतचित आनदकन्द ।
सृष्टि हेतु सो प्रगट भो नारायण स्वच्छन्द॥१॥
तासु नाभि तें कमल भो कमलासन तेहि माहि ।
उपजे जग करतार इमि बद्यौ वेद जिन कॉहि॥२॥
है महेश्वरसुधाकर । तिनके तनै मरीच भे मुददायक गुनखानि । सुत कस्यपजिनके बिमल सुजस जासु सुखदानि॥ चौपाई। कस्यप बिवस्वान उपजाये । श्राद्धदेव तेहि सुवन कहाये ॥ सो इक्ष्वाकु नाम श्रुति गाये । परम धरम महि माहिं चलाये ॥ भयो पुरंजय तासु कुमारा। अनन्याश्व तेहि तनय निहारा॥ तिनके पृथु नृप परम सुजाना। नीतिनिपुन जग बिदित महाना ॥ विश्वरंध्रि तिनते सुखकारी। नृपति चन्द भे अति हितधारी ॥ तनय तासु युवनास्व सुहायौ। साम्ववस्तु तिनके सुत गायौ।। रहदस्व तेहि सुवन उदारा । सुत जेहि कुबल- याश्व सुचि प्यारा ॥ भये दृढ़ास्व तासु गुनआ- गर । तेहि के भेहरयस्व उजागर ॥ तासु तनय भे भूप निकुम्भा। जासु सुवन बरणास्व अदम्भा।। दोहा। ताके भये कृसास्व नृप तनयसेन जित जासु । जिनके सुत युवनाश्व पुनि मान्धाता मे तासु ॥ चौपाई। जिनके सुत कुरु कुत्स कहाये। तनय तृहस्यु तिनहुँ उपजाये ॥ तेहिके भे अनरण्य भुवाला।
१०
महेश्वरसुधाकर ।
जासु सुवन हर्यश्व बिसाला ॥ अरुन तनय ति-
नके सुखधामा।भो निबन्ध सुत तासु ललामा॥
सुवन सत्यत नृप नय-नागर। हरिश्चन्द तेहि
पुत्र उजागर ॥
दोहा।
रोहितास्व तिनके तनय ताके हरित भुवाल ।
चम्प भए सुत जासु के तासु सुदेव कृपाल ॥
विजय भूप पुनि प्रगट भे ताके भरुक सुजान।
ताके रक रक के भये बाहुक नाम महान ॥
तासुत सगर नृपाल भो असमंजस पुनि तासु ।
अंसुमान तेहि के भये तिमि दिलीप सुत जासु॥
नृपति भगीरथ तनय तेहि प्रगटे परम प्रबीन।
सुरसरि आन्यौ अवनि तल सुजस तिहूँ पुरकीन॥
छन्द पझ्झटिका।
अब बरनत मैं तिनको सुबंस । श्रुति संग्रम
जेहि सुत देव अंस ॥ तेहि तनय नाभवर भूप
जानु । जेहि सिन्धु दीप सुत हैं महान ॥ तिन
प्रगट कियो ऋतुपर्ण भूप । सुत सर्बकाम जि-
नके अनूप ॥ पुनि सुवन भये जिनके सुदास ।
तेहि तनय नाम अस्मक प्रकास ॥ नारीकवच्च
जेहि नाम जान। तेहि सूनु भयो जसरत महान॥
महेश्वरसुधाकर । अब नाम ऐंड बिड़बल निधान । खट्वाङ्ग तनय तेहि को सुजान ॥ सुत दीर्घबाहु जग सुजस चंद । तिनके प्रगटे रघु भूप संद ॥ रघुबंश बदत तब ते सुजान । कल कीरति है जग जेहि प्रमान ॥ ८॥ दोहा। श्रीरघु के सुत एथुश्रवा तिनके अज सिरताज। अज के तनै सु बिमलमति श्रीदशरथ महराज ॥ श्रीदशरथ महराज हैं रघुकुल कमलदिनेस । बसत अवध सरजू निकट दिवि में यथा सुरेस ॥ चारु चारि तिनके तनै प्रगटे परम सुजान । रामचंद लछिमन भरत रिपुहन शीलनिधान ॥ सुजस सुखद त्रयताप-हर बदत वेद बसु याम। निरगुन निरुपम नयनि पुन धरा धर्मधुर राम ॥ चारिह भ्रातन के तनै है है बली महान । नाम सुनत जिनको समर तजि अरि करत पयान॥ भरतपुत्र पुष्कल प्रगट प्रबल प्रताप प्राण्ड । असुर दर्प दाहत सदा सन्तन सुखद लखण्ड। तौन बंश में भे बिमल दौलत राय प्रधान । तिनके सुत गिरवर भये सुवन दलेल सु कीन ॥
१२ महेश्वरसुधाकर । नाम जुरावर तासु के बखतावर महिपाल । भुजगराज ताके तनय दलथंभन छबि माल ॥ दलथंभन सुत सुभग सुचि मतवारो जिहि नाम। मंगल भूभरतार भो तनय तासु मतिधाम ॥ ता सुत भयो पहार नृप मोती जासु सजान । मोती के अरजुन सुवन दानराय परधान राजराव जिनके प्रगट पुत्र पुरंजय जासु तिनके सुत भे केशरी बुधिबर बिद्या तासु ॥ छन्द पझ्झटिका। तेहि तनय भयो भोरी भुवाल । दलजीत तासु शिवशामलाल ॥ पुनि शामल के सुत मानदत्त । जिनके अनूप तेहि राजमत्त॥ तिमि केहरि के सुत नवल भूप । इमि बुद्धिराय प्र- गटे अनूप ॥ सुत छत्रसेन के सुख-प्रसून । पुनि आलिम भो जस को प्रसून ॥ प्रगटे तेहि भैरव भूमिपाल । अरु ऊगा के सुत चैनलाल ॥ उपजे जेहि अच्छे राउ राज । तेहि फतेसिंह भो फतेकाज ॥ अब सुन्दर सुन्दर रूपवान । सुत जदन तासु अमराव जान ॥ ग्रमराव सुवन भू- पति महान। है शंकर तासु मुसाहिबान ॥
महेश्वरसुधाकर। १३ दोहा। तिनके हिम्मति भूप भो तेहि गुरबकस नरेस । ताके भे गजराज सुत रामदीन गुनबेस ॥ सुर्यन ताके तनय भे डम्बर धरम महान । सुवन तासु दिगपाल तेहि काली परम सुजान॥ सत्यराव ताके प्रगट दलगंजन जेहि नाम । भए भवानी तासु के रुस्तम त्यौं गुनधाम ॥ जब्वर नृप तिनके सुवन तासु जोरावर जान। ताके राव-जहाँन भे गङ्गराव सुखदान ॥ छन्द पझ्झटिका। तब प्रगट कालिका जेहि कुमार । तेहि त- नय लालता परम प्यार ॥ तिमि अचलमल्ल अतिसै अनूप । सुत मचल नाम ताके सुभूप ॥ भो मेहरबान गुनिगननिधान । गजराउ सुवन ताको प्रमान ॥ सनमान तनुज ताको बिसाल। सुत तासु भयो खुसहाल हाल ॥ उपजे महौल प्रहलाद जातु । बलगरहु महा वसुभीष्म तासु ॥ अब अजा भूप भगवन्त पुत्र। किय बास सुरैका नगर उत्र ॥ भो रैकवार तिनको सुनाम । तेहि बंस प्रगट घनस्याम स्याम ॥ जेहि भये सुवन बलवन्त बीर । उपजे उदोत तेहि गुन गंभीर ॥
महेश्वरसुधाकर ।
दोहा ।
ता सुत बाजीराव भो जासु दिलीप कुमार ।
पुनि ताके रैपाल नृप तेहि रघुनाथ उदार ॥
तौन बंस में भे बिमल नागर नवल सुभूप ।
रैकदेव सुचि सीलनिधि सुन्दर सुजस अनूप ॥
रैका नगर बसाय तिन कियो सुरुचि सतकार।
रैकवार तबते भयो बस बिदित संसार ॥
बिक्रम नृप तिनके तनय प्रगट भभूती तासु।
गजरथ ताके सुवन भे धर्मराव नृप जासु ॥
चौपाई।
करनभूप तेहि परम सुजाना।ता सुत ईसे
बीर बखाना ॥ गङ्गा नृपति नाम तिन जायो।
दरसन सुवन तासु जग गायो॥ त्यौं गजराज
सिंह रनधीरा । ताके कमल तनय बर बीरा ॥
तासु सुवन सिरमान कहाये। तेहि उमराव सु-
जस महि छाये॥तिमि प्रगटे परसाद भुवाला।
नन्दन नन्दन तासु कृपाला॥ताके सुवन मुला-
यम नामा । गयादीन सुत तासु ललामा॥ति-
नके ढालराय नय-नागर। तासु खुमान बीर बर
आगर ॥ भयो नरायन तेहि सुत राजा। केसव
भूप सुवन सुख साजा ॥
महेश्वरसुधाकर ।
दोहा।
तिनके थम्भन प्रगट भे मऊ सुगुनगुनखानि।
जिनके हिम्मतिराउ पुनि नृप परसाद सुदानि ॥
ता सुत बिदित मकुन्द जग चेतन नृप तिमितासु।
तासु तनय सिरदार तेहि बेनी कुन्दन जासु ॥
जिनके दुल्लह देव भे सुवन सुखद श्रुतिपाल ।
तिनके प्रगटे सुमति श्री भैरव देव भुवाल ॥
सुखद सुजन जन के सदाँ भैरवदेव भुवाल ।
बीर विदित जग में महा अरिगन पैजिमि काल॥
सुखद सुमति तिनके तनय द्वै अति रूप अनूप
सालदेव मतिवान बर बालदेव सुर रूप ॥
निधिससिबिधुमहि अब्दमें समै सुखद जिय जानि
बन्धु सुहृद सेना सहित अवध गये मुद मानि ।।
सालदेव महराज सुचि अवनि अरिन बिन कीन।
सुथल संभु ढिग गुनि बसे रामनगर सुख लीन॥
बालदेव महि सुभग लखि किय बौंड़ी बिच बास ।
सिव पूजन नितहीं करत प्रेम नेम स हुलास ॥
सालदेव नृप के भये सुवन सुखद सुचि तीन ।
परम प्रतापी बीरबर बैरिन बिन महि कीन ॥
इक पहाड़सिंह भूप बर दूजे श्री जसवन्त ।
तीजे कीरतिसिंह नृप विद्या बुधि बलवन्त ।
महेश्वरसुधाकर।
रामनगर में बसत मे श्री पहाड़सिँह भूप ।
बसे रामपुर बिमल रचि श्री जसवन्त अनूप॥
श्री कीरतिसिंह नृप रहे देवथानी सुभ जानि ।
कल कीरति जिनकी बिमल भई जगत सुखदानि॥
श्री जसवन्त महीप को सुजस चन्द चहुँओर।
सुजन चकोरन को सदाँ सुखदायक बरजोर ॥
अचलसिंह तिनके तनय सुधरम अचल समान।
दया दान द्विजवरन पर गुन गंभीर महान ॥
अचलसिंह महराज के हृदयराम अभिराम ।
हृदय राम जिनके बसत होत सिद्धि शभ काम॥
चारिहु बरन बसाय करि हृदयराम अभिराम ।
नाम रामपुर सुखद हरि अमरावति सम धाम ॥
आये तुलसीदास जहँ साधुसमाज समेति ।
रामायन निज कृत लिखित दीन्ह्यौ नृप हित हेत॥
भीष्मसिंह तिनके भये भीष्महि के सम ज्ञान।
धीर बीर बर विदित जग जस जिनको सितभान॥
भीष्मसिंह रणधीर के सुत कल्यान भुवपाल ।
अपर सुसज्जनसिंह नृप पूजन करत त्रिकाल ॥
सुवन महीसिंह प्रगट भे तिनके परम सुजान ।
बखतावरसिँह तेहि तनय सुन्दर बीर महान ।।
फतेसिंह तिनके भये नृपगन में सिरताज ।
महेश्वरसुधाकर।
दान मान किरवान में जिनकी फते दराज ॥
फतेसिंह महराज के द्वै सुत अति अभिराम ।
विजयसिंह गुन ग्राम नृप दलगंजन मतिधाम ।।
विजय नृपति महराज सुत सिंह सहित अहलाद।
जिन कीन्हे खल दल दलन हितुवन हिय अहलादा
जुगुल तनय तिनके भये हिम्मतिसिंह अभिराम ।
जिनकी हिम्मति सेर सम बुधि विद्या बलधाम ।।
अनुज सुकीरतिसिंह नृप कल कीरति जग जासु ।
दया दान सनमान करि द्विजगन तोपत आसु ।।
हिम्मतिसिंह नरेन्द्र के श्री सिववकस नरेस ।
परम धरम जुत इमि लसत जिमि सुर मध्य सुरेस।
जग-जाहिर तिनके तनय माधवसिंह भुवाल ।
बिबिधिदानकरिकियो द्विजन प्रजन प्रतिपाल
बीर बिदित तिनके सुवन श्री सिवसिंह सुजान।
सुजस दान किरदान में जिनकर नाम पहात् ।।
नृपन मौलि भनि-मंजु मे तिनके सुत गुनधामा
श्रीगुमानसिंह भूप बर बिदित जगत जस आम !!
कवित्त घनाक्षरी
जाकी सलमान के समान है न आन भूप
परम सुजान गुन गौरव बखान है। राज काज
महेश्वरसुधाकर । निपुन रिपुन को न राख्यौ नेक करत अनेक दान करन समान है ॥ स्याम हिज मानद हमेस चित्त आनद सुधर्म के निमित्त वित्त धनद न आन है । महाराज राज सिरताज श्री गुमान- सिंह सुजस महान तप तेज को निधान है। पुनर्यथा। बास करै नन्दन बिपिनि में हमेस बेस सु- मन सुरेस लेत सुख सरसावै ना । जाँचक के जाँचत सुऋद्धि सिद्धि देत आसु सुजस पसारै जग सुरति भुलावै ना॥रावरी अपार दान-धारा की धुकार सुने हारि हिये मानि अवनीतल में आवै ना। राज-सिरताज श्री गुमानसिंह म- हाराज तेरी कर समता कलपतरु पावै ना॥ कीरति लता को कै सुमन चन्द आला स्वच्छ उन्नत रसाला की कमाला धर्मधुर मैं । सुजस मसाला प्रेम नेम प्रतिपाला की सुमेर मेरवाला कै अनन्द स्याम उर मैं ॥ जागै जोति जाला मंजु मूरति कृपाला हेरि हरत कसाला बर बिप्र धेनु सुर में । श्रीयुत महीप श्री गुमानसिंह महाराज बिरच्यौ बिसाला है सिवाला रामपुर मैं ।
१६ महेश्वरसुधाकर । दोहा । सुमति सजीले जुगुल सुत तिनके परम अनूप । जेठे रुद्रप्रतापसिंह नृपनय-निपुन सुभूप यथा कबित्त घनाक्षरी। जाहिर जहान ज्ञान गुन को गंभीर धीर दान बर बीर औ कृपान मै सुथाप है। सूर सम तपत सुरन मै उदित होत तोम तम सत्रुन को रहत न दाप है ॥ नाम सुने भाजत उलूक सों लुकात तन ज्वाला सों जरत अरि जोर जनु साप है। महाराज राज श्री प्रतापरुद्रसिंह राज जा- गत महान जग प्रबल प्रताप है। सुजस वर्णन। अमल अखण्ड वसुधा में वसु यामै रहै मु- दित मुदित स्याम सुमन चकोर को। कैरव क- लपतरु केवरा कपूर कंबु कास कमनीय कंज कामद सजोर को ॥ क्षीरसिंधु सारद सरद घन पारद परम शुचि नारद प्रभा रद अथोर को। महाराज राज श्रीप्रतापरुद्रसिंह जगरावरो सु- जस है सु चंद चहुँओर को ॥ दोहा। अवनि अनेकन धरम करिगवन कीन शिवपास।
।
॥
महेश्वरसुधाकर ।
जस प्रताप जिनको कियो दिग अंतनलों बास ॥
बंधु तासु गुनशील निधि सुजस बली अभिराम।
नृपति महेश्वर बकस शिर शोभित छत्र ललाम ॥
राज सिंहासन पर लसत बखतबली महराज ।
मनहुँ नरन हित अवनि पै राजत है सुरराज ॥
संत सुहृद कबि कोबिदन हितकर करन समान ।
कलकीरति बिधुबिमल जग सम महिपाल न आन।।
ज्ञानवान गुनवान नृप नीतिवान मतिवान
शीलवान विद्वान वर भूप महेश्वर जान
संस्कृत भाषा फारसी प्राकृतादि में तज्ञ
घट शास्त्रन के भेद तिमि राज काज सर्वज्ञ ॥
छवि बनान।
सादी औ मसंद तकियों को तके काम मंजु
कंचन मनीन पुंज मोतिन सुसाज है । रतन
सिंहासन पै महाराज राज श्री महेश्वरबकस
सिंह राज सिरताज है। स्याम द्विज देखि दुति
चख चकाचौंध होत नाच रंग राग सुर संजुत
अबाज है। सूर चंद किरन अरखण्ड महिमंडल
में मानो संग सुरन समाज सुरराज है ।।
पुनर्यथा ।
बसन बिभूषन विभूषित कनकजुत जटित
महेश्वरसुधाकर। जवाहिर सु मोतिन की माल है । पन्ना पोख- राज स्याम मनिन सिंहासन पे महाराज राजत महेश्वर विशाल है ॥ नृत्य राग रंग में उमङ्ग की तरंगन सों डारत अबीर रङ्ग गरद गुलाल है । आयो सुरराज आज मानो महिमण्डल में सुरन समेत सुचि सीखत सु चाल है ॥ सुजस वर्गान। चन्दन सों चामर सों चाँदनी चमेलिन सों चन्द सों दुचंद चारु स्याम कवि गायो है। हीरा सों हिमालै सम हरिहर-चन्दन सों हंस सों हमेस बेस हिय हुलसायो है ॥ कुंद सों म. कुन्द सों है पारद सु नारद सों कम्बु कास सा- रद समानता न पायो है । चक्कवै महेश्वरब- कस महाराज राज रावरो सुजस महिमण्डल में छायो है। अथ प्रताप वर्णन कवित्त । बैरीबन्द भाजे फिर रन बन साजे सैन पा- वत न चैन तेज ताप सों जरत है। ग्रीषम तरनि सम गरबी गनीमन को जेर करि जोर ज्वाल जाहिर परत है। करत दिगन्तन प्रकास हिज स्याम कहै हेतिन के सीस छत्र छाया है ढरत २२ महेश्वरसुधाकर । है । बीरबर विदित महेश्वरबकस भूप रावरो प्रताप कल कौतुक करत है। अथ तेग बर्णन कवित्त । कानन में नगर नगर करै कानन को ग- ब्बर गनीमन के प्रान हरतारी है । रङ्ग रन भूमै महाकाली सङ्ग घूमै खल श्रोनित चमू मै चा- खिवे को सरतारी है। पन्नगी प्रचण्ड सम सत्रुन के काटिबे को पालिबे प्रजा के हेत धर्म धर- तारी है । जङ्ग जैतवार श्री महेश्वरबकस भूप कर मै कृपान करै काम करतारी है । अथ दुनामी बन । जाके जोर सोर में प्रलै के घनघोर कहा कठिन अरिन ओर बढ़ति उताली है। गोली की धमक पाय धसक धरा पै होत डोलत धराधर सों ढाहति गजाली है ॥ धीर न धरत हिय ह- हरि हहरि करि घूमि घूमि गिरत परति नहि खाली है । बीर बर बिदित महेश्वरबकससिंह प्रबल प्रचण्ड यह रावरी दुनाली है ।। अथ दान बनन सवैया । जाँचक जाँचत जे ढिग जाय के पावत ते मन मौज लुने हैं। है गज साजि सु कञ्चन की २३ महेश्वरसुधाकर । निधि देत सु ऑनद प्रेम सुने हैं ॥ कीरति चा- दनी सी जग मैं द्विज स्याम हित बलि भोज चुने हैं। श्री महराज महेश्वर के कर कल्पलता से करोरि गुने हैं । जाँचक लिलार लिपि बिरच्यौ बिरंचि जन होय यह रङ्क सों असत्य नहिं कीन्ह्यौ है। दान सनमान के कुबेर औ सुमेर सम सम्पति सं- वारि सुख स्याम मुख चीन्ह्यौ है ॥ कलपलता को जनु अलप पताको करि सुजस पताको जग आप कर लीन्ह्यौ है । चक्कवै महेश्वरबकस महा- राजजू ने दारिद को दारिद सु वाके कर दीन्ह्यौहै।। इस कबित्त में कबि की उक्ति है राजा की प्रसंशा है अत्युक्ति अल- कार है । लक्षन । अलङ्कार अत्युक्ति सो बरनन अतिसै रूप। जाँचक तेरे हार ते भये कल्पतरु भूप ॥ अथ रस निरूपणम् दोहा। भाव बिभावनभाव अरु संचारिन जुन जौन । थाई कारज हेतु सों परिपूरन रस तौन ॥१॥ भये ब्रह्म में मगन मन जो जीवहिं सुख होत। सो रस है सुख रूप नव बरनत सुजन सुगोत ॥ सोरठा। जीव सहस रस मामि, यथा व्यङ्गि सब्दार्थ नहिं। तथा मुख्य सुखखानि, रस के बोधक भाव हैं॥३॥ -- महविरतुवाकर । बार्ता। . म जैसे व्यंगि सब्दार्थ नहीं है तैमे रसह सव्दार्थ नहीं है। अथ रस बोधक भावादीनां यथोत्पत्ति लक्ष नबर्न नम् तत्र भाव लक्षाम् दोहा । होत चित्त में प्रगट जो रस अनुकूलहिँ आय। ताहि बखानत भाव कबि मिटैन किये उपाय॥४॥ अथ भाव भेद वर्ननं दोहा। भाव द्विबिधि सो जानिये अन्तर उपर सरीर अन्तर हू में बहुरि बिय थाई व्यभिचर बीर ॥५॥ थाई लक्षगा दोहा। थाई थिर है आठ बिधि रति आदिक रस मूल। व्यभिचारी व्यचरन्त हैं सहकर तैंतिस तूल ॥६॥ अथ सागैरकानुभाव लक्षनम् दोहा । सारीरक सुसरीर ते बसु सात्विक स्वेदादि । थाई अनुभव करन ते हैं अनुभाव प्रमादि ॥७॥ अथ बिभाव लक्षन । जे अतिसै भावत मनै ते थिर होत विभाव । आलम्बन उद्दीपनहुँ हिबिधि कहत कबिराव ॥८॥ अथ आलंबन बिभाव लक्षणाम् । आलम्बन अबलादि तैं रस आलम्बित होत । उद्दीपन दीपन करै पुहुप चन्द उद्दोत ॥ ९ ॥ अथ अालम्बन भेद बननंम् । आलम्बन है भाँति को विषयालम्बन एक । द्वितिय आश्रयालम्बनहुँ कहत सुकवि सविवेक ॥
२५ महेश्वरसुधाकर । अथ बिषयालम्बन लक्ष गाम् । बिषयालम्बन है सोई जेहिं लखि रति हिय होय । आश्रय आलम्बन कहूँ प्रगटत आश्रय जोय॥ अथ आश्रयालम्बन लक्षनम् अथ रस भेद बननम् । प्रथमहिँ आठ प्रकार को पुनि नव किय कबिराज। श्यामादिक रँग देवता श्यामादिक रसराज॥१२॥ अथ रस नाम बननम् दोहा । रस सिंगार कहि हाँस्य पुनि करुण रौद्र अरु बीर । बीभत्सरुभय अद्भुतहु सांत कहत मति धीर॥१३॥ नवरस के रँग नव कहे नवहि देवता मानि । थाई नव हैं प्रथक ये क्रम सों लीजै जानि ॥१४॥ अथ रसरंग बर्गनम् दोहा । रङ्ग स्याम अरु स्वेत कहि बहुरि कपोत सुरक्त । कुन्दन कैला नील बर पीत शुक्ल निधि व्यक्त ॥ अथ रंग देवता बननं दोहा। कृष्ण बायु बर बरुन सिव सक्र और यमराज । महाकाल विधि ब्रह्मरस देव कयौ कबिराज॥१६॥ अथ थाई वर्णनम् चौपाई। रति हाँसी अरु सोक बखानौ । क्रोध हर्ष भय भेदहि जानौ ॥ घिन आश्चर्य कह्यौ निर- वेदा । क्रमते थाई नवरस भेदा ॥ १७॥ ॥
महश्वरसुधाकर। अथ अनुभाव लक्षनम् दोहा । जिनते रति थिर होत चित ते सिंगार अनुभाव। सो हैबिधि इक क्रियनते यकतन खुद कविगाव।। अथ सारीरकानुभाव लक्षनं दोहा । अनुभव सो जो लखात यक कहत कबिन के द्वंद। सो तन ते कविवर कहत लखि रस ग्रंथ अमंद। अंग विकाश रति भाव को जाते प्रगटति संद। भाव कटाक्षादिक कहत सात्विक धृत आनंद॥ संग सखीन के राधिका की छबि ज्यों यमुना तहँ नेसक हेरयो। न्हाय सु भूषन औ पट साजि चहूं कित कौतुक सों हग फेरयो॥स्याम लख्यो तित ठाढ़े कई अंग अंग अनंग छटा झकझेरयो। दोऊ दुहूँन के प्रेमपगे हँसि प्यारी उतै सो चितै चित घेरयो ॥२१॥ टो • । इस कवित्त में सखी की उक्ति सखी प्रति है और प्रेमा लंकार है स्वभावाक्ति भी है ॥ लक्षण । स्वभावोक्ति यह जानिये बनन जाति स्वभाव हसि हँसि फिरि देखति झुकति मुख मोरति इतराव॥ प्रेमा को नामही लक्षण है ॥ २१ ॥ अथ सात्विक भाव बर्गन दोहा । स्तंभ स्वेद रोमांच कहि बिवरन अरु स्वर भंग आँसू कंप प्रलाप बसु सात्विक निधि जृम्भंग॥ - Ama महेश्वरसुधाकर। तत्रस्तंभ अनुभाव लक्षणम् दोहा । लज्जा भय हरखादि तें अंग अडोल जब होय। ताहि कहत अस्तंभ कबि रस ग्रंथन मत जोय॥ तस्य उदाहरण सवैया। चंदमुखी साजि भूषन अंग चली रसरंग भरी छबि छावै । घूघुट खोलि चितै मुसक्याय सु नैनन सों मन मैन जगावै॥ स्याम बिलोकतहीं बर बाल रही जकि ज्यों पलकै नलगावै। दोउन को तन को तन को न रही सुधि देखतहीं बनि आवै ॥२४॥ टोका। इस कवित्त में परकीया नायिका है उक्ति सखौ की सखी प्रति यमकालंकार है । लक्षण । जमक शब्द को फिरि श्रवन अर्थ जुदो सो जानि । सौतल चंदन बंदनहि अधिक आगि ते मानि ॥४॥ अथ खेद लक्षगा दोहा । हरष लाज श्रम रोष भय अंग जाहिर जल होय । स्वेद बखानत ताहि सब सुकाबन की मति जोय॥ तस्य उदाहरमा कवित्त घनाक्षरी। सीस पै किरीट श्रुति कुण्डल सवारे कटि पीतपट धारे गुंज हार हिय भायो है । काछनी सुकाछे आछे गैयन के पाछे मंजु मुरली बजाय काम कोटिन लजायो है ॥ नटवर भेष मन मो- हत अनेकन को प्रेम सरसाय इहि मारग सि- महश्वरसुधाकर। धायो है। ऐसो है अनूप स्यामसुन्दर सरूप सखी जाको देखि राधिका के स्वेद तन छायो है ॥२६॥ टीक । इस कबित में लक्षिता नायिका है सखी की शक्ति सखी प्रति प्रथम सम अलंकार ओ तोसरा प्रतीप है। लक्षन । अलङ्कार सम तोनि विधि यथायोग्य को सङ्ग , कारज में सब पाइये कारन ही की अङ्ग ॥ ॥ १५ ॥ प्रतोपलक्षन। अनादर उपमेय ते जब पावै उपमान । तीक्षन नैन कटाक्ष ते मन्द काम के बान । २५ ॥ अथ रोमांच लक्षन दोहा । हरष भीति कामादि ते उठत रोम तन माहिं। कहत ताहि रोमांच कबि लखि रस ग्रन्थन काँहि ॥ तस्य उदाहरगाम् सवैया। सीत की भीत के प्रीति कळू तनको तन को नहिं जात संभारे। आनद धौं उर छाय रह्यो सु कुतूहल जानि परै जनु न्यारे । काम कला की कला है बला यह है है कहा मन सोच ह- मारे । तै न उठी मनमोहन को लखि रोम उठे अंगही के तिहारे ॥ २८॥ टोका। इस कबित्त में लक्षिता नायका है सखो को उक्ति नायका प्रति पिहितालङ्कार है। लक्षन । पिहित छिपी पर वस्तु को आनि दे. खावै भाय । प्रातहि आये सेज प्रिय हँसि दाबति तिय पाय ॥ २८ ॥ अथ बैबन्यं लक्षन दोहा । सोक भयादिक क्रोध तें के हरषहँ ते आनि । बरण और विधि होय जब सो वैवयं बखानि ॥
२६ के महेश्वरसुधाकर । तस्य उदाहरण सवैया । मनिमन्दिर मैं सजि प्यारी गई सखियान सङ्ग सुखेलन को। तहँ औचक आय गये पिय स्याम चौ गहि अङ्क में मेलन को॥स- कुची सिकुरी तन पीरी परी मुख ताकि रही उर झेलन को । अंगराग मलीन परे सिगरे हरि कीन्हो जबै रस रेलन को ॥ ३०॥ टीका । इस कवि स्त्र में नवोढ़ा नायिका है सखी को उक्ति सखी अति अनतरंगिनी कुट्टमित हाब है, तोय असंगति अलंकार है। लक्ष न ! और काज अरंजिये और करिये दौर । कोयल मदमाती भई झूमत अंबा बोर ॥ तेरे अरि की अंमना तिलक लगायो पानि । मोह जिटायो नाहि प्रभु मोह गायौ आनि ॥ ३ ॥ अथ बरसंग लाल होहा । হিন্দ্র ঠত্ব ও হরি ল শ ক ভাতৃ সঙ্গ होय और विधिवचन जन कहत ताहि स्वरभङ्ग॥ तखोदाहरण कबिल घनाक्षरी। आई केलमन्दिर में मादन-सदीली बाल औचकहीं आयो स्थान पायो मन साधा सों। महत उरोज झकझोरि झझकोरि जकी चौंकि चाकि उहाकि परी यो गुन नाधा सो ॥ एज अजू ऐतो कहा करत अनोखे नेक नैनन न- चाय हँसि दीन्हो प्रेम पाधा सोलाय परजङ्क ॥ Featmethermout ३० महेश्वरसुधाकर । पिय अङ्क भरि लीन्ही फेरि हेरि मुख बचन न आयो बोलि राधा सों ॥ ३२॥ टीका । इसमें मध्या नायिका है सखी की उति सखी प्रति है, खभावोक्ति औ सम टतीय है लक्षन पूर्वोत है । ३२ ॥ खभावीति यह जानिए बरनन जातिवभाव । इत्यादि। पुनर्यथा। बैठी मनिमन्दिर मै प्यारी रति-रूपवारी तैसे मनभावन को आवन जनायो है । हेरि तिरछौंहे फेरि मंजु मुसक्यानी नेक नैनन नचाय सकुचाय सुख पायो है । स्याम उर लाय रस रीति सरसाय. मन मदन जगाय कल कौतुक मचायो है। बाँही गहि अङ्कभार पारयौ परजङ्क पै जो नाहीं कह्यौ चाहति सो नाहीं कहि आयो है। टोका। इसमें नायिका मध्या है सखी की शक्ति सखी प्रति है प्रथम प्रहर्षनालङ्कार है ॥ ३३ ॥ लक्षन । तीनि प्रहर्षन जतन बिन बां. छित फल जो होय। बांछित फल ते अधिक फल श्रम बिन लहिये सोय॥ अथ अश्रु लक्षण दोहा। आनँद अरु दुख रोस भय शोकादिक ते होय। नैन-नीर प्रगटत जबै अश्रु कहत कवि सोय॥ तस्य उदाहरण कवित्त घनाक्षरी। आजु हौं गई ती मग कुंजन अनोखी भई दरद दईने दई रूपरस बारे की। स्याम अभि-
महेश्वरसुधाकर ।
राम छबि छकित भुलानी सुधि बुधि बिलखानी
रहै नेक न सम्हारे की ॥ आह करि भावत न
धीर उर आवत सु पार सरसावत मनोज-बज
मारे की। नैन-जलजात से प्रवाह-जल जात
बीर मन ते न जात तसबीर प्रानप्यारे की॥
टोका। इसमें परकीया प्रौढा है नायिका की उक्ति सखी प्रति है
संसृष्टि अखशार है धर्मलुप्ता सुमिरन जमक छठी विभावना है ।
अथ कम्प लक्षण दोहा।
हरख कोप भय काम ते थरथरात जब अङ्ग।
कम्प बखानत ताहि सब जे प्रबीन रस-रङ्ग ।
तस्य उदाहरण कवित्त घनाक्षरी।
आवत सखी री स्याम सुन्दर सलोनो गात
मृदु मुसक्यात बात मोसन बतान्यो है। मग
मै मिलै को चह्यौ अङ्क भरिवे को जो मै सङ्क
मन आन्यौ त्यौँ निसङ्क सकुचान्यो है ॥ लै
लियो चोराय चित्त जाय उतै ठाढ़ो रह्यो भेदहू
न जान्यौ पुनि प्रेम सरसान्यो है । तरनितनूजा
तीर तकत तिरीछे ताकि ता छिन ते मेरो तन
थकि थहरान्यौ है ॥ ३६॥
टोका। इसमें उढ़ा नायिका है उक्ति नायका की सखी प्रति उला
सालझार चतुर्थ भेद है ॥ लक्षण । गुन औगुन जब येकते और धरै
उल्लास । न्हाय संत पावन करै गंग धरै येहि पास ॥३६॥
महेश्वरसुधाकर ।
.
अथ प्रलय सात्विक भाव लक्षन दोहा।
हरख शोक भय काम ते तन सुधि रहै न नेक।
प्रलय वखानत ताहि कविजिनके बिमल बिवेक।
तस्योदाहरमा कबित्त सवैया।
आय कढ़े मग में मनमोहन अङ्ग अनङ्ग ल.
जावन हारे। राधिका स्याम बिलोकत ही सुलेग
हग दोउन के अनियारे॥कोऊ सके न संभारि
मनै तन को तनको तब चैन न धारे। बेधिगये
हिय सैनन के शर मैन मरोरि मनौ मलि डारे ।
टीका। इसमें परकीया नायिका है जयपति नायक है, उक्ति सखी
की सखौ पति । संसृषि अलंकार प्रतीप सहोति दूसरी विभावना, हेतू
प्रेक्षा । लक्षण पूर्वोक्त है।
भाव लक्षन दोहा।
श्रमालल अरु मोहबस जहँ मुखकमलविकास।
ताहि बखानत सुजन जन जुभा सुरति हुलास ॥
तय नया हरदम इसवित्त सवैया ।
नवला निति केलि कै प्रात खरी अलसानि
भरी छवि रिलियो अगिराय जम्हाय लजाय
कछू मुलझाय न नैनन् फेरि लियो । लखि
स्यामा मनोज हिये सरस्यौ सुखसिंधु तरङ्गन
गरि लियो । कर सोंछिटकाय दियो सिर सों
कच आय दोऊ कुच घेरि लियो ॥ ३९ ॥
महेश्वरसुधाकर ।
इति सत्विक भावः अथ संचारी भाव वर्णन कवित्त ।
निन्दा सों निखद मन सोई निरवेद होत
रति बल हानि ग्लानि संक कहवायो है। और
को सहै न सुख सो तो है असूया प्रेम रूप मद
छाक श्रम आलस बतायो है । मोह विकलाई
भय औरऊ वितर्क चिंता सुस्मृति धयान दुख
दीनता दिखायो है । ब्रीड़ा हर्ष जड़ता विषाद
गर्व उत्सुक त्यों निद्रा कम्प मूरछा सुनाम भेद
गायौ है ॥ ४०॥
पुनर्य था।
अमरख अपस्मार स्वपन सुजागिबो जो
सोई है बिबोध स्याम सुकबि गनायो है। त्रास
अवहिथ्थ आवेग उग्रता है व्याधि छीन तन
मरन सुवेदन बनायो है । और है सुधृति मति
ज्ञान लहि होति सति त्योंही उनमाद औ च-
पलता सनायो है । भेद संचारिन के तेतिसौ
बखान्यौ जौन तौन तिन नामही में लक्षन ज-
नायो है ॥४१॥
सिद्धौधौमहाराजाधिराज राजेन्द्रमुकुटमणि रामपुराधिप रैकवार
कुल कमालदिवाकर श्री गुमानसिंहात्मजश्रीमहेश्वरबक्ससिहबहादुर जूदेव
को आज्ञानुसार स्यामसुन्दरबिरचित महेश्वरसुधाकर अन्य भावसंचारो
आदिबर्णनचतुर्थस्तरंगः ॥ ४ ॥
महेश्वरसुधाकर। अथ शृङ्गाररस बर्णन दोहा । रस सिँगार सो कहत हैं जेहि रति थाई भाव । अरु विभाव अनुभाव जुत संचारी सु गनाव ॥ रतिलक्षन। सो बरनत रति चित चुभी प्रीति और पर होय। सुकवि कहैं शृङ्गार के भाव सु थाई सोय ॥२॥ रति परिपूरन भाव थिर सो रस है शृंगार । सुजन रसिक प्यारी महा सुकबिन कह्यो विचार॥ तिया पुरुष शृङ्गार के आलम्बन जिय जानु । बन अराम सिखि पुहुप ससि उद्दीपन उर आनु ॥ अग विकाश मृदुहँसनि पुनि हाव भाव जुत और। कहि अनुभाव सिंगार के बरनत कबि सिरमौर॥ सो संचारी भाव हैं उन्मादिक संचार । देव स्याम अरु स्याम रंग रस सिँगार है प्यार !! है विधि है श्रृंगार रस तिय पिय सँग संजोग। बिछुरन दोउन को सोई बरनत सुकबि बियोग। तत्र संजोगशृङ्गार लक्षन दाहा। तिय की केलिकलानि में जहँ प्रसन्न मन होय । कहत संजोग सिंगार रस परिपूरन रति जोय॥ अन्तरीय रति सात हैं वहि रति सात सुजानि। रति विपरीति सुमुदित तिय पियसंजोग बखानि॥
महेश्वरसुधाकर । ३५ तस्योदाहरण कबित्त । आज रति रङ्ग के उमङ्ग स्याम पी के सङ्ग मदन मजेजन अमेजन अरी रहै । करि बिप- रीति रीति बिबिधि बिनोद मोद मो तन सरोज ओज मोजन भरी रहै ॥ जुरि जरि अङ्क फेरि मुरि मुरि जाती कहा सुमन समेति रन रङ्ग मैं खरी रहै। लाल के ललकि लपिटात लचि जात लङ्क व्यालिनि सी बेनी बीर पीछे क्यों परी रहै॥१०॥ टोका। यह कबित्त में प्रौढा नायिका है औ विपरीति सों संयोग शृङ्गार है, उति नायका को बेनी प्रति है पूर्णोपमालङ्कार है। लक्षन दोहा। बाचक है अरु धर्म जह उपमेयो उपमान । तहँ पूर्णो उपमा कहत उपमा सादृश जान ॥ १० ॥ पुनर्यथा सवैया कवित्त। सेज सजी सजनी सुचि सों रजनी कै मिलै के धरे लै मसाला। स्याम के सङ्ग अनंग भरी डगरी मनिमन्दिर ओर उताला ॥ कै बिपरीत रमै रति में पति में मन के करै काम कमाला । बाला झुकै उझकै न रुक येहि कारन कान न हालत बाला ॥ ११॥ टीका। इस कवित्तमं प्रौढ़ा नायिका है सुबिपरीति रति सी उति अनतरङ्गिणी सखी की है काव्य लिङ्ग अलङ्कार है । लक्षन दोहा । का.
महश्वरसुधाकर। । में ॥ व्य लिङ्ग जब जुगुति सो अर्थ समर्थ न होय । मैं तोको जीत्वौं मदन मौ हिय मै शिव सोय ॥ ११ ॥ पुनर्यथा। स्याम के सङ्ग करै रति रङ्ग भरी रसरङ्गन में झुकि झूमत । छाके सु जोबन के मद में जनु थाके परे परजङ्क में दूमत ॥ प्यारी मि- लाय दियो मुख सों मुख सो सुखमा अखियान घुमत । आवति मो मन में उपमा यह चंद मनौ अरविन्द को चूमत ॥ टोका । इस कवित्त में नायिका प्रौढ़ा स्वकीया है उक्ति सखी को सखी सों, औ उत्प्रेक्षा अन्लङ्कार । पुनर्यथा। सजि केलि के मन्दिर बैठि तिया छबि आ- नन इन्दु समान लसी । अति भूषन भूषित अङ्गलसैं यह को कही की नहिं कोक बसी। तेहि औसर आइ कै नन्दकिशोर गयो गर त्यों बरजी विहँसी । लर टूटी कहूं कवि स्याम कहै येहि कारन मोती की माल खसी ॥ १२॥ टीका। इस कवित्त में मशावासक मज्या नायका है सखी सखी की उक्ति है कबि निवद स्वतः सम्भवो है पूर्णोपमा अलङ्कार है लक्षन पुर्बोल है मुख उपमेय चन्द्रमा उपमान छवि धर्स सो बाचक इति में अपरजमाया। सेज सजी सखियां सुचि सौ रस रजत-
१
महेश्वरसुधाकर ।
रङ्ग उमङ्ग हरे मै । स्याम सुबास सुबासित के
छबि छाय रही रति रङ्ग घरे मै॥ लाई लिवाय
लजीली सुबाल न जानै हवाल सुभाय भरे मै ।
चाँकि चकी सुचितै करी आह परी जब नाह
की बाँह गरे मैं ॥१३॥
टीका। इस कबित्त में प्रौढ़ा नायिका है, सखी सखी प्रति उक्ति
है औ समुच्चय अलङ्कार है प्रथम भेद १३ । लक्षन दोहा। उपजत ए.
कहि संगही जहँ कछु भाव अनेक । प्रथम समुच्चय कहत हैं जे कवि
कहत बिवेक ॥ १३ ॥
पुनर्यथा कबित्त घनाक्षरी ।
कीधों सुधासिंधु में मयङ्क की विभा है स्वच्छ
कीधों दिव्य दुति है सोहाति सुरगुर की। कीधों
कल कमल विकास मंजुता है कैधौं छबि छनदा
है छिति छाई सुरपुर की॥ कैचों दीप दीपन की
दीपति दिपति कैधों सुखमा सोहाई हेम पाई
है मधुर की । देखे अभिराम आसु मोहै मन
स्थाम राधे आनन प्रभा है कीधों आभा है मु-
कर की॥१४॥
टोका। इस कबित्त में रूप मात्र को बर्णन है नायिका मात्र जा.
निये उक्ति सखी की या नायक की है और सन्देहालङ्कार है। लक्षन ।
जहाँ एकही बस्तु को करत बहुत सन्देह । के कौधौं पद दै जहाँ स-
न्देहा सुख गैह ॥ १३ ॥
३८ महेश्वरसुधाकर । पुनर्यथा। राजै रङ्गरावटी में मंजुल मयङ्कमुखी सु- खमा विभूषन विभूषित सु अङ्ग वाल । हीरा लाल हार मध्य मोतिन विशाल माल उपमा र- साल तन जोति छबि जोति जाल॥चमक च- हूँघा चारु चन्द्रक चुनीन आब अधर प्रवाल सङ्ग स्याम के निहाल हाल। पट जरवाफी प्र- भा जागति जलूसदार मानौ तारापति धौं सि- तारा की मदनमाल ॥ १५॥ टोका। उक्ति सखी सखी प्रति है उत्प्रेक्षा अलङ्कार है रूपमात्र को बर्णन सो नायिका मात्र जानौ ॥ अथ हाव बर्णन तत्र हाव लक्षन दोहा । करैबिबिधिबिधिभावतिय पियहियसुखसरसाय। रमै रमन मन लखि जिन्हें हाव कहत कबिराय ।। प्रथमहिं लीला जानिये भाषत द्वितिय विलास । पुनिविच्छितविभ्रमअपर किलकिंचितललितास॥ विहित बिवोकरु कुट्टमित मोहाइतह सुजानि । बोधक हेला तपन पुनि मुग्ध कहत रसखानि ॥ तत्रादी लोला हाव लक्षन दोहा । करै पुरुष तिय रूप को तीय पुरुष को लीला हाव बखानहीं सुकवि बिलोकि सुसङ्ग ॥
महेश्वरसुधाकर । तस्यौदाहरण सवैया। राधिका मोहन रूप रच्यो सिरमोर पखा बन माल बनायो । काछनी काछि सु बाँसुरी लै कर मैन के मंत्रन फँकि बजायो॥स्याम सु राधिका त्यों बनि कै सुनि बिरहानल सों तन तायो। धाय मिले पुनि आय दोऊ कलकौतुक देखत ही बनि आयो ॥ १९॥ टोका। इस में प्रोढ़ा नायका है उक्ति सखी की सखी प्रति अन्य उन्यालङ्कार असंगति बिचित्र लक्षन अन्य उन्यालङ्कार सो अन्य उच्य उ. पकार शसि सो निसि नीको लगै निसिही मै शसिसार बिचित्र लक्षन नावत उच्चता को लहत ज है पुरुष बिचित्र । इच्छा फल बिपरीति को कौजे जतन बिचित्र ॥ १४ ॥ अथ बिलाश हाव लक्षन दोहा । भावबिबिधिविधिकरततिय पियमनहरिवेकाज । सोई हाव विलास है कहत सुकवि सिरताज ॥ तस्य उदाहरण सवैया । पिय पास मैं प्यारी प्रवीन तिया करि भाव अनेकन सोहती है । चित चौकि चकै झझकै उझकै कुच तुंग तरङ्गन सोहती है॥अंग अंग अनंग के रङ्गन के गुन गौहर से उर पोहती है । मुख मोरि सुनै न नचाय चितै हँसि मो- हन को मनमोहती है ॥ २१ ॥ ।
महश्वरसुधाकर। टीका • इस में नायका पौढ़ा है स्वकीया वलासहाव है समुच्चय लझार है। उक्ति सखो की सखी प्रति है। लक्षन । दोय समुच्चय भाव बहु कहु एक उपजै संग । इक काज चाहै कस्यो है अनेक इक अंग ॥ अथ वितिहाव लक्षन । अलप विभूषन बसनसातिय छबिअति सरसाय। बिच्छित हाव बखानहीं सुकविन के समुदाय ॥ तस्सोदाहरगान कवित्त घ। आनन अनूप चंद चाँदनी चटक चारु छाई बसुधा में बसु यामें मोदकारी है। उदित बि- लोकि स्याम नैन व्है चकोर सदा रहत सकाम अभिराम मनवारी है। उरज रसाल पै विसाल माल मोतिन की गङ्गधार मानौ मंजु शंभु सीस धारी है । हारी रूपवारी रति रम्भा मैनकारी रंग प्यारी अङ्ग सारी प्रभा पुंजन पसारी है । टीका। इसमें खाधीन पतिका नायका है उक्ति नायक की सखी प्रति शंकर अलङ्कार प्रतीप रूपक उत्प्रेक्षा लक्षन पुर्वोत है ॥ २३ ॥ अथ विचमहाव लक्षन दोहा। अति आतुर है होत जहँ काज और को और। विभ्रमहाव बखानहीं ताहि सुकवि करि गौर ॥ तस्य उदाहरगा सवैया। साजि सिंगार रही अंग अंगन बागरिया धुनि औचक आई । चौकि चकी स चित चिन कै चलि आतुर आप गई नियराई॥हार किये महेश्वरसुधाकर । उर किङ्किनि को कटि मै कसि माल महा छवि छाई। स्याम लखै बर बाल खरी मनमौज भरी सुमनौ निधि पाई ॥ २५॥ टीका । इस कबित्त में नायिका मुदिता है सखी को उति सखी प्रति दूसरी असंगति अलंकार है लक्षन पुर्बोता ही है, । तौनि असंगति काज अरु कारण न्यारे ठाम। गौर ठौरही कौजिये और ठोर को काम ॥ २५ ॥ दोहा। विराचि सुभाल विशाल में बाजूबंद बर-बाल । बेंदा बँदिया अजनबिच विहसि लखति नँदलाल। अथ किलकिंचित हास लक्षागा दोहा। प्रगट होय इक साथही जहँ रिस र भय हाँस। ताहि सुकिलकिंचित कहत हाव सुजन सहुलास तहसउदा हरन कवित्त घनाली। रूप रस छाके मद जोबन प्रभा के रंग रण में मजा के कसि दोऊ लंक लीन्हो है। चुम्बन करत मुख मोरि मोरि जोरि जोरि कुच के छुये ते तिरछौहैं नैन कीन्हो है।लहि परजक में निसंक गहि लीन्हो अङ्क व्है करि ससङ्कनिज अङ्क गसि चीन्हो है। त्रासरि सरोस संग करति अ- नंगरंग स्याम पिय अंग हेरि फेरि हँसि दीन्हो है॥ २८॥ टोका। इस कबिल से प्रौढा नायका है उक्ति सखी को सखी प्रति प्रथम समुच्चय अलङ्कार है लक्षन पुर्वोक्त है । AADura IMEDIU ६ महेश्वरसुधाकर। अथ ललितहाव लक्षन दोहा। चलनि चितौनि सुअङ्ग छबि बरनत सौरभ सङ्ग। ललित हाव तासों कहत जे प्रबीन रसरंग ॥२९॥ तस्य उदाहरन कवित्त घनाक्षरी। मंजुल महल मध्य राजै परजङ्क पर जाकी मुख सुखमा मयङ्क कोटि बारी है । अङ्ग अङ्ग भूषित सुभूषन जराऊ रङ्ग पट जरवाफी प्रभा पुंजन पसारी ॥ पाँघुरी पुहप जुत महि पै प- रत पग फैलति ललाई ज्यों मजीठ माठ ढारी है। चलनि चितौनि होति मन सो न न्यारी स्याम प्यारी सुकुमारी वृषभान की कुमारी है। टी। इस कबित्त में अभिसारिका नायिका है उत्ती सखी की प्रति नायिका के हैं। प्रतीप अलङ्कार है पञ्चम भेट उपमालक्षार भी है, ल. पूर्वोता ही है ॥३०॥ प्रतीप लच्छन । व्यर्थ होय उपमान जब बरननीय लखि सार । हम आगे सम कछु म ए पंच प्रतीप प्रकार ॥ जाको उप मा दौजिले सो कहिये हपमान ॥ ३० ॥ अश्य मोडादूत हाव लक्षन दोहा। सुनत स्याम पिय की कथा हिय उपजत रसभाव। ताहि सुजन जन सब कहत मोहाइत कवि राव ॥ तस्य उदाहरन सवैया । सोभित मोरपखा श्रुति कुण्डल माल बि- साल हिये बिलसी है। स्याम सरोज बिनिन्दक नैन सुआनन की समता न ससी है ॥ बैन सुधा .
४३ टी० महेश्वरसुधाकर । मुसकानि अनी सम देख अरी उर आनि गसी है । मूरति माधुरी मोहन की सुनते सजनी मन माँहि बसी है ॥३२॥ ० । इस कबित्त प्रौढ़ा नायिका नायकिा की उक्ति है सखी प्रति प्रतीप अलङ्कार तीसरा भेद ॥३॥ ल. अन आदर उपमेय ते जब पावै उपमान । तौछन नैन कटाक्ष ते मन्द काम के बाम ॥२॥ अथ बिब्बोकहाव लक्षन दोहा । गहि गरूर गुन बिभव को करै निरादर तीय। हाव कहत बिब्बोक तेहिं जेहि अति मतिकमनीय। तस्य उदाहरन सवैया । जुरि आई सची सँग मैं सिगरी सुविराजि रहीं रुचि रासन मैं । धनि स्याम कहाँ बनि आये इतै ललचौहैं लखौहै कहा मन में ॥ प- हिचानि समै अब जैये चले तुझै लाजन ला- गति या छन मैं । कमरी है लसी तुझरे तन मै हमरी है हँसी अमरीगन मैं ॥ ३४ ॥ टो। इस कश्चिन्त प्रौड़ा स्वाधीनपरिका भाबिका है कि नायिका को नायक प्रति है, पाखपति अखकार ॥३४ . और ठौर हो को . जिये और ठौर को काम ॥१४॥ अथ बिताब लछम दोहा। लाज बिबस तिय पिय मिले नेकहु बोलि सकेन। बिहृतहाव बरनत सकल सुकबि ताहि करि चैन ।
महेश्वरसुधाकर।
तस्योटाहरन सवैया।
कन्त यकन्त मिले घनस्याम अनङ्ग भरी
वे तौलि तकी ना। अङ्ग अनूपम जोहि रही
राग सों घूघट खोलि छकी ना॥ अञ्चल ऐं-
। चंचल के हग जोरि सुने कहुँ डोलि थकी
। लाज भरी वृषभानसुता ब्रजचन्द सों मंद
बोलि सकी ना ॥३६॥
टीका। इस कबित्त में सध्या नायका है सखी की उक्ति है सखी
बिशेषोनि अलङ्कार है ल. विशेषोक्ति जो हेत सों कारज उपजत
इ। नेह घटत हिय में तऊ काम दीप चित चाहि ॥३६॥
अथ कुट्टमित हाव लक्षन दोहा ।
य पिय सो रति रङ्ग मैं अङ्ग छुवत अनखाय।
व कुट्टमित है सोई जिय में सुख सरसाय ॥३७॥
तस्योदाहरन कबित्त घजाचरी ।
प्यारी प्राणप्यारे सङ्ग बैठी रङ्गावटी में
बान्न करत मुख भोरलि रिसाई है। धरत सु.
ही गले लाही को कति कर कुच पै परत
ल कौतुक मचाई है। अङ्क में भरत स्याम झ-
कि इंकोरि देति राते करै नैन बैन सैन में
वाई है। रचि निपुनाई रस रङ्ग सरसाई करै
लि छल छाई मन मोहित कन्हाई है ॥३८॥
का। इस कबित्त से प्रौढ़ा नायिका है उति सखी को है सखो प्रति
ज्ञाअलङ्कार है लक्षन ॥ होत अनुज्ञा दोष को जब लीजै गुनमानि
हु बिपति जा पै सदा हिये चढ़त हरि आनि ॥ ३८ ॥
महेश्वरसुधाकर । अथ बोधकहाव लचम दोहा । समुझे संज्ञहि सों जहाँ तीय पुरुष रति रङ्ग । ताहि सुजन जन कहत है बोधकहाव प्रसङ्ग । कविता सङ्ग मैं सखीन के बिराजति नबेली बाल आयो स्याम सखन समेति सो निहारी है। लो- चन ललकि लखिबे को ललचाने महा बोलत लजाने दोऊ जाने भीर भारी है ॥ छन सुख- साने पै कहा धौं मन आने कछू भेद मै न जाने कियो कौतुक खेलारी है । कमलकली लै उर लायो है मुरारी तब प्यारी नील सारी मुखचंद पै सुधारी है ॥ ३९॥ • । इस कबित्त मे क्रियाविदग्धा नायिका है बोधकहाव है सू मालङ्कार है ल इङ्गित ते आकार ते जाने जी की बात, इत्यादि ३. अथ हेलाहाब लक्षन दोहा । पिय सँग भै जहँ कति है विधिधि ढिठाई बाल। ताहि सहेलाहाव भारि बरनत बुद्धि बिसाल ॥४०॥ तखोदाहरणा सबैया। स्याम पिया गहि प्यारी प्रवीन सुकलि के मन्दिर मौ चलि आई । अङ्गन भूषन सूषित कै चुनि चुनरी चारु चुरी पहिराई ॥ कंचुकी टी.
६ महेश्वरसुधाकर । दी बिरी कजरा हँसि सेंदुर माँग भरी मन ई । नारि को रूप बनाय मुरारि को आरसी करि कै दरसाई ॥४१॥ का। इस कवित्त में प्रौढ़ा नायिका है और हेलाहाव है और का- लङ्ग अलङ्कार है ल. कायलिङ्ग जब युक्ति सों अर्थ समर्थन होय । कों मै जोत्यो मदन मो हिय में शिव सोय ॥ ४१ . अथ तपनहाव लक्षन दोहा। न सरसै जहं ताप अति मान बियोग सँयोग। वि तपन सो कहत सब बिबिधि बिलासिक लोग। तस्योदाहरन सवैया स्याम सों मान कियो सजनी जिय आनि योग विथा दरसी है। भूली भ्रमी बिलखानी नौ अँग अङ्ग अनङ्ग तरङ्ग रसी है ॥ प्रान- या बिन चाँदनी चन्द बिलोकत बाल हिये रसी है । बेसुधि जैसी परी सी परी यह ताप हा तन मैं सरसी है ॥४३ ॥ टोका । इस कबित्त में नायिका मध्याप्रोषितपतिका है मानिनी है के सखो को सखो प्रति है और बिभावना और उपमा अलंकार है च वा भेद ल• काहू कारन ते अबै कारण होय विरुव ॥ करत हि सन्ताप यह सखी सोत कर सुख ॥४३॥ लडपमा । जेहि बिधि [व समता मिले उपमा सोई जानि, इत्यादि अथ मुग्ध हाव लक्षन दोहा। चन कहै तिय ज्ञान बिन सुनत लगै जहँ नीक। ग्वहाव तासों कहत सुजन सुकबि करि ठीक ॥
महेश्वरसुधाकर।
तस्योदाहरगाम् सवैया।
कारन कौन कहीं सजनी उकले उर आमय
के अनुसारे । रूप बिलोकि न जानि परै कछु
है है कहा मन सोच हमारे ॥ स्याम हकीम हैं
जो समुझै तौ करौ उपचार न होंहि दुखारे ।
हो बलि जाँव धरौ जिय धीर सुपीर सहेंगे बि-
लोकनवारे ॥४५॥
।
टीका। इस कबित्त में नायिका अज्ञातयोबना है। उक्ति नायका को
सखी प्रति या अन्य प्रति औ मुग्धहाव है। औ असंगति अलङ्कार है। रोग
और के, पौर देखनेवाले के इससे असंगतिहै इस हो को सुसिद्धा भी क-
हते हैं । लक्षन एकही है असंगति लक्षन दोहा । तौनि असंगति काज
अरु कारज और ठाम । और ठोरहो कीजिये और ठौर को काम ॥४५॥
सिद्धि श्री मन्महाराजाधिराज राजराजेन्द्र मुकुतमणि रामपुराधिप
रैकवार कुलकमलदिवाकर श्री गुमानसिंहात्मज श्रोमहेश्वरबकश सिंह
बहादुर जूदेव को आज्ञानुसार श्री पण्डि न स्याम सुन्दर अखनो नगरनि.
वासो महेखरसुधाकर ग्रन्य बिरचिते शृङ्गाररस बर्ननो नाम पंचमोस्त
अथ वियोग शृङ्गार लक्षन दोहा ।
होत दुखित अतिसै जहाँ बिरह विवस पिय तीय।
सो बियोग शृङ्गार कहि बरनत कवि कमनीय॥१॥
है बियोग सो पाँच विधि कबिन कियो निरमान ।
इक पूरुव अनुराग है दूजो मान बखान ॥२॥
विप्रलंभ शृङ्गार सो तीजो कहत सुजान ।
निरस जानि है भेद जे सुकबिन कियो प्रमान ॥३॥
महेश्वरसुधाकर। कुन्ती भाद्री पाँडु में सा परु मरन प्रसिद्ध । ताते बर्नन नहिं कियो मरन निरसगुनि बुद्धि ॥४॥ विरह मरण रति अन्त में करुणा रस मैं मानि। या रस शृङ्गार में भै नहिं करयो बखानि ॥५॥ सच वियोग द्वारस्योदाहरमा सवैया गज बाजि रसाल अनार घने द्रुम पै दल मैन नढ़ाई करी । कर बाल गहे चहुँ आस प- लास गुलावन गोली गढ़ाई करी ॥ वरछी ले समीर हरौ लपिकी पपिहा है नकीब बढ़ाई करी। दल साजि सखी दृजराज बिना ऋतुराज ने आज चढ़ाई करी ॥ ६॥ सुसिद्धा ल. साधि साधि औरै मरै भोर भोगवे ओग । इत्यादि टोका। इम कबित में प्रौढ़ा प्रोषितपतिका नायिका है । नायका को उक्ति सखो प्रति है रूपकालंकार है । दृप्सरो भेद तद्रूप है। रूपक लक्षन दोहा । है रूपक हे भांति को मिलि तद्रूप अभेद । अधिक न्यून सम दुहुन के तोनि तोनि ये भेद ॥ ६ ॥ पुनर्यथा सवैश। बनबाग विलोकि मनौ हिय मे अति काम कला सरसाई करी । धुनि चात्रिक कोयल की सुनि के कुललाज अकाज महाई करी ॥ करि कोप महा विरहीन पै हाय अधीर समीर स- । महेश्वरसुधाकर। ४६ वाई करी। वृजराज बिना लै समाज सखी ऋ. तुराज ने आजु चढ़ाई करी ॥७॥ टौका । इस कबित्त में भी वही प्रौढ़ा प्रोषितपतिका नायिका है। वियोगशृङ्गार है। नायिका की उक्ति है। सखी प्रति बिरह निबे दन है,उत्प्रेक्षा अलंकार है ल. उत्प्रेक्षा संभावना बस्तु हेतु फल लेखि॥ अथ पूर्बानुराग लक्षन दोहा । प्रथममिलेबिन होत जहँ लखिसुनि प्रीति अभङ्ग। सो पूरुब अनुराग है बिरह विकल अंग अङ्ग ॥८॥ तस्य उदाहरन सवैया कालिदी तीर कदम्ब तरे हरि हेरि इतै हसि नेक दियो है। ता छिन ते तन ताप तपै ततबीर न बीर सिरात हियो है। नेह नबीन स्याम मिले कलपाय हमै कल पाय लियो है। चंचल चारु चितौनि चुभी अब चाहत प्रान पयान कियो है ॥९॥ टीका। इस कबित्त में परकौया प्रोषितपतिका नायिका है। नायिका की उक्ति है सखी प्रति । बियोग शृङ्गार बिरह निबेदन है। बाचक उपमान लुप्तालंकार है। लक्षन ॥ बाचक धर्मर बर्ननिय है चौथो उप- मान । इक बिन है बिन तौनि बिन लुप्तोपमा प्रमान ॥६॥ पुन: दोहा। नई नारि सों नेह करि दई न देय बियोग । जान जाय तो जाय भल जीवन में बह रोग॥१०॥ टोका । या दोहा मे प्रोषित नायक है, उति नायक की है सखा
महेश्वरसुधाकर ।
अथ मानबिरह लक्षन दोहा ।
निरखि नाह को दोष जहँ नारि करै उर मान।
पिय कौतूहल हेत जो मान बिरह सो जान ॥११॥
मान त्रिविधि सो जानिये लघु मध्यम गुरु तौन ।
बरनत लक्षन लक्षि सब रस ग्रन्थन में जौन॥१२॥
तत्रादौ लघु मान लक्षन दोहा ।
लखत लखै तिय पीय को और नारि की ओर।
करैरोसमनमानलघु हँसितहि रहतनथोर॥१३॥
तस्य उदाहरन सवैया।
पिय हेरत चन्द्रकला तन स्याम सुरोस
जग्यो मन कामिनी के । सिर नाय मनौ सकु-
चाय गई मुखचन्द भयो बिन जामिनी के ॥
भरि बारि सुबारिज नैननि मैं बलिहारि निहारि
कलामिनी के । हँसिकै उर लाय लियो करि प्यार
न मान रह्यौ पुनि भामिनी के ॥ १४ ॥
टीका। या कवित्त मैं धीरा नायिका है, कबि को उक्ति है लघु.
मान है। तीसरा समालङ्कार है और उत्प्रेक्षा भी है लक्षण उत्प्रेक्षा पू.
बर्बोक्त है। लक्षण समालङ्कार । अलङ्कार सम तौनि बिधि जथा जोग को
सङ्ग । नीच सङ्ग अधिरज नहीं लक्ष्मो जलजा आहि । जस हो को उ-
यम कियो नौके पायो ताहि ॥ १४ ॥
अथ मध्यम मान लक्षन दोहा ।
पिय के मुख तेतिय जबै सुनै आन तिय नाम ।
करै मान मध्यम सोई मिटै सपथ सों आम ॥१५॥
. महेश्वरसुधाकर। तस्य उदाहरन सवैया । राजि रही सँग सेज पै राधिका नाम लियो पिय आन तिया को । सो सुनिकै सरस्यौ मन मान मनाये न मानत रोस जिया को ॥ स्याम सुआनन फेरि लियो उर ज्वाल जग्यौ जनु जोर दिया को । लाय लियो लपटाय सुअङ्ग अनङ्ग- भरी तजि मान पिया को ॥ १६ ॥ टीका । या कवित्त मैं मानवती नायिका है। कबि की उक्ति है। यन्दा कलहंतरिता भी है। मानौ नायक भी है। मध्यम मान है। उ प्रेक्षा लंकार है, लक्षण पूर्वोत है ॥ २६ ॥ अथ गुरुमान लक्षन दोहा । पिय को औरी नारि सों सुरति रीति सुनि जानि । होत सोई गुरु मान है सौंह सुपापरि हानि ॥१७॥ तस्य उदाहरन सवैया। छतिया कहुँ आन तिया के लगे हरि सो सुनि मान जग्यौ सखि याके । आए मनावत मान्यौ न नेक अनेकन सोहन को करि थाके॥ स्याम सुपायन में परि कै कर जोरि निहोरिरहे छबि-छाके । सानभरी नहिं मान तजै तब मेल्यौ सुहार हिये मुकता के ॥ १८॥ टोका। या कबित्त मैं गनिका मानवती नायिका है । कबि को उक्ति है । या सखौ सखौ प्रति है दूसरा पूर्वरूप अलंकार है ॥१८॥ है ५२ महेश्वरसुधाकर । अथ प्रवास बिरह लक्षन दोहा । लहि बिदेस को बास जहँ बिरह बिकल नर नारि। सो प्रबास में भेद द्वै सुकबिन कह्यौ बिचारि॥१९॥ है भविष्य यक भूत बिय पिय तिय दुखद निदान। भाबिक बिछुरन हार है भूत बिकल बिछुरान॥२०॥ अथ भविष्य प्रवास बिरह यथा सवैया प्रानपिया परदेस के हेत मनाय गनेस ल- गाय दही को । आय सुप्रेम सों लाय लियो उर माँगि बिदा सुगह्यो कर ती को ॥ चम्यौ सो चन्दमुखी अधरान धरा तेहिं औसर धीरजही को । नैन सों नीर प्रवाह बहै असुवान सों भीजै लिलार को टीको ॥ २१ ॥ टीका । इस कबित्त में नायिका प्रबस्यत् प्रेयसी मध्या है। उति सखी ससखी सो है। और विरोधाभास अलंकार है। ल• भासै जहां बिरोध है वहै बिरोधा भास । उतत हो उतरत नहीं मनते प्रान नि. वास ॥ २१ ॥ पुन: घनाक्षरी। बैहरि बसन्त की बहेगी जब सीरी वह पीरी परि पाती तौ परैगी तरु तर पै.। किंसुक अंगार से गुलाब आववारे देखि ताब क्यों रहेगी ताप पै ॥ बौर भौंर भीर सों न धीर बाढ़ेगी सुधर महेश्वरसुधाकर । ५३ बीर रहै फेरि स्याम को बचाई वा बियोगिनि को घर पै। कैसे कै रहेंगे प्राण कान्ह कामिनी के बान कसिकै हनैगो काम पुष्प कलेवर पै॥२२॥ टोका। इस कबित्त में नायिका प्रवस्यत् प्रेयसी मुग्धा है । उक्ति सखी को नायक प्रति है। भविष्य बिरह है। आप अलंकार है । र तौय भेद परदेस को गमन रोकने सों तातपर्य है। लक्षन । जहां ब. चन बिधि व्यक्त के करै निषेध छपाय । सोई व्यक्त अछेप है कहत सुकवि समुदाय ॥ इस कबित्त में प्रौढ़ा प्रोषितपतिका सुकौया ना यिका है ल. पूर्वोत है ॥ २२ ॥ अथ भूतप्रवास विरह यथा कबित्त । सीरो समीर सुगंध सनो घनी कारी छटा दरसावत आवत । कोकिल कूक पपीहा पिया कहि मोर चकोर हियो तरसावत ॥ दामिन पानि ऋपान लिये गर कामिनि के गहि काम गहावत। स्याम कुमार बिना सजनी अब ये बदरा बद- राह बतावत ॥ २३ ॥ पुनर्यथा सवैया। भावत भौन न मेरी भटू बिरहानल तावन सों तन हावत । गावत दादुर चातक मोर बि- योग विथा अतिसै सरसावत ॥ धावत हैं बग पाँति जमाति सों मो मन मौज मनोज जगावत ।
५४ महेश्वरसुधाकर। आवत स्याम कमार नहीं अब ये बदरा बदराह बतावत ॥ २४॥ टीका । इस कबित्त में मच्या प्रोषितपतिका नायिका है। उक्ति नायिका को है सखो प्रति । औ बिनोति अलकार है । लक्षन दोहा । है बिनोक्ति है भाति को प्रस्तुति कछु विन छोन । अरु सोभा अधि को लहै प्रस्तुत कछु यक होन ॥ २४ ॥ पुनर्यथा। ऊधव जोग लै आये इहाँ है अजोग महा तनको न समाई। कवरी के ढिग मै उनकी म- तिमन्द भई जो हमै अजमाई ॥ मोहनि मूरति मोहन की स रमै इन नैनन मे इत आई। स्याम बसे बसु जाम हिये कहु काके वियोग बिभूति । रमाई ॥२५॥ टोका। इस कविक्त में प्रौढ़ा प्रोषित पतिका नायिका है उक्ति नायिका की सखी प्रति । औ बिसेषोक्ति अलंकार है । तथा विरोधा भास भी है । लक्षन दोहा । बिसेषोक्ति जो हेतु सों कारज उपज नाहिं । नहु घटत हिय नहिं जऊ काम दीप चित माहिं ॥ बिरोधा भास ल. भासै जहां बिरोध सो बहै बिरोधाभास ॥ ५ ॥ पुनर्यया। अंजन जे इन नैनन के सो निरंजन ब्रह्म बने उत जाई । रास बिलास रच्यौ बज मै अब जोग हमै करि हेत पठाई ॥ ऊधव सों सखि का कहिये जिनके अनरूप न रूप लखाई । स्याम
५५
महेश्वरसुधाकर ।
बसे बसु जाम हिये कहु काके बियोग बिभूति
रमाई ॥२६॥
टोका । इस कबित्त में प्रौढ़ा प्रोषित पतिका परकीया नायिका
उक्ति नायिका की है। सखी प्रति । अथवा उधव प्रति है। बिसेषोक्ति
अलकार है। तथा बिरोधाभास अलंकार है। लक्षन दोहा । बिसेषो.
ति जो हेतु सों कारज उपजै नाहिँ । नेह घटत हिय में तऊ कामदीप
चित चाहि । बिरोधाभास लक्षन । भासै जहां बिरोध सों वहै बि
रोधाभास ॥ २६॥
अथ नये प्रवास को उदाहरण-सवया ।
कूबरी के हरि रंग रंगे हमतौ अब हैं मरजी
मरजी की। आपने भागि की भूल भटू कहनूति
सही करजी करजी की ॥ प्रीति कियो हम तौ
उन स्याम सों जानती ना हरजी हरजी की।
बेगरजी गरजी न लखे गति जानत है गरजी
गरजी की ॥२७॥
टोका। इस कबित्त में पर कौया प्रोषिता नायिका है। उति ना
यिका को है सखौ प्रति । अस्तुति निन्दा अलंकार है दोपकाति भी
है। लक्षन यथा दोहा । व्याज निन्द अस्तुति बिषे निन्दा औरी होय
साधु साधु सखि मो लिये सहे दन्त नख दोय ॥ २७ ॥
पुनर्यथा ।
चोट जगी बिरहानल की तुमको तो परी
हरदी हरदी की । स्याम ज प्राणपियारे बिना
तुम माँहि चढ़ी जरदी जरदी की ॥ काम तिया
उर जाहि लगी उनके नलगे सरदी सरदी की
बेदरदी दरदी न लखै गति जानत है दरदी
दरदी की ॥ २८॥
५६
महेश्वरसुधाकर।
--
टोका । इस कबित्त में परकीया प्रोषित पतिका नायिका है
उति नायिका को है सखीप्रति । और दीपका अति अलंकार है ल.
क्षम दीपक अति तौनि विधि अति पद को होय । पुनि अति है
अर्थ की दूजी कहियत सोय ॥ २८ ॥
पुनर्यथा।
हमको अपनाय सुनाय सुबैन न स्याम उतै
सुर-काज करी । सँग कूबरी के करि कामकला
रजबालन की सुधि आजु करी ॥ लिखि भेज्यौ
अजोगन योग इतै को बियोग मैं जोग समाज
करी । अब ऊधो कहा कहिये तिनको जिन बाँह
गह्यौ किन लाज करी ॥२९॥
टीका । इस कवित्त में परकीया प्रोषित पतिका नायिका है। उक्ति
गोपियों की है जधव प्रति । अस्तुति निन्दा अलंकार है। ल. दोहा ।
व्याज निन्द प्रस्तुति बिषे औरै निन्दा होय । साधु साधु सखि मो लिये
सेद दन्त नख दोय ॥ २८ ॥
पुनर्यथा।
तबतौ नहिं लेकहु बार लगी जब ग्राह गहे
गज ध्यान धरी। पुनि द्रोपदी दौरि को मुनि दुतै
दुरजोधन को धन धाम हरी ॥ अरु पारथ को प्रन
पूर कियो पुरषारथ क्यों अब जेर परी । वृज-
लालन बालन बेर अहा फिरि बाँह गयौ किन
लाज करी ॥ ३०॥
टीका। इस कवित्त में भी परकीया प्रोषित पतिका नायिका है।
नायिका को उक्ति है सखी प्रति । व्याजस्तुति निन्दा अलंकार है। ल.
क्षन पूर्वोक्त हो है । इस कबित्त में नायिका अलंकार पूर्वोत है ॥३०॥
५७ महेश्वरसुधाकर। पुनर्यथा। अति सील सुजाति सखावत साहिबी संचित कै धन धाम धरी । अरु त्यौं सुख साज समाज सबै सुखमा केहि स्याम समान करी ॥ श्रुति पन्थन सन्तन सेय सदाँ सिखि ऊधव काम कला सिगरी । जग में जनम्यौ हरि है केहि काज जो बाँह गह्यौ किन लाज करी ॥३१॥ टीका । इस कबित्त में भी नायिका अलङ्कार पूर्वोक्तही है परकीया प्रौषित पतिका नायिका व्याजस्तुति निंदा अलङ्कार, नायका को उ० । पुनयथा । बर नारिन की नहिं नेक सुनै व्यभिचारिन ही की ओ ना तकही। अरु साधुन को सुख देत नहीं गनिका गुन मै अति रीझ रही॥ कलि के किल कौतुक स्याम सुने गुर लोगन की नहिं गैल गही । मसले असलै अब होत कहीं खर रोवत खोट बिकात सही ॥ ३२ ॥ टोका: इस कवित्त में प्रोढ़ा खडित नायिका है नायका को उक्ति नायक सौ है लोकोक्ति अलङ्कार औ तुचयोगिता भी है लक्षन बन्ध अवयं के समान्य धर्म ते तुल्य यागितालोकोक्ति लक्षन। लोकोतो कछु बचन में लोजें लोक प्रबाद । नैन यूँ दि षटमास लौ सहिहौं बिरह बिषाद ॥ ३२॥ -- परि प्रेम के जाल सबै बिलखात सुजात पू८ महेश्वरसुधाकर । नहीं कछु बात कही। धरि धीरज गोपसुता कवि स्याम कही कब लौं करि छाम रही ॥ हरि जोग जो ऊधो बियोग में देत तौ कूबरी भोग अ- जोग नहीं। करिकै कर आनन पैयौं कही खर रोवत खोट विकात सही ॥ ३३ ॥ टोका। इस कवित्त में परकीया पौषितपतिका मायका है नायका की उक्ति है ऊधब प्रति, लोकोक्ति अलङ्कार है और तुल्यायोगिता भी है तुल्ययोगिता लक्षन दोहा । धम्म एक बरयो जहाँ बबध को होय। तुल्ययोगिता प्रथम तहँ कहत सयाने लोय ॥ ३३ ॥ अथ बियोग शृङ्गार दसा बनन दोहा। है बियोग शृङ्गार की दसा सु नवहि प्रकार। अभिलाषा गुन कथन अरु चिन्ता चित्त बिचार ।। सुस्मृति कहत प्रलाप पुनि उद्वेगहु उन्माद। जड़ता व्याधि बखान हीं सुजन सुमति-मरयाद ।। अथ अभिलाष दशा लक्षन दोहा। तीय पुरुष मन में करें मिलिवे की बहु चाह । तेहिँ अभिलाख बखानहीं जे प्रबीन कबिनाह ।। अथ असि लाख दसा को उदाहरन यथा कवित्त । पायहें जीवन जीवन के ब्रजजीवन जी- वन को गहि लायहैं । लाय हैं गोल कपोल गुलाल सुबीर अबीर के रङ्ग रँगाय हैं ॥ गाय हैं राग धमारिन मै कुल लाज समाज सबै वि- महेश्वरसुधाकर। ५४ सराय हैं । राय हैं मेरी सुनौ सजनी मिलै स्याम पिया मो हिये सुख पायहँ ॥ ३७॥ टीका । इस कवित्त में अभिलाष दसा है। श्री अढ़ा नायिका है। ो नायिका को उक्ति है सखी प्रति । एकावली अरु यमकालंकार है । लक्षन दोहा । ग्रहित मुक्त पद रौति जहँ एकावलि सोमानि । दृग श्रुति लौं श्रुति बाहु लौं बाहु जंघ लो जानि ॥ पुनर्यथा। साजे सुअङ्ग अनङ्गभरी चख चंचल चारु चितौनि ललामै। गोल कपोल मनौ मुखचन्द सुमन्द करै सुर चन्दकला मै ॥ बोल सुबोल अमोल महा रति मै रति को करि लेति छला मै । भावे नहीं सुरलोक भला नवला जो मिलै असि केलि कला मै ॥ ३८॥ टोका। इस कवित्त में अभिलाष दसा है । नायक को उति है। सखा प्रति । उपपति प्रोषित नायक है, सुमिरन अलंकार है। लक्षम दोहा । सुमिरन श्रम सन्देह ये लक्षन नाम प्रकास ॥ इत्यादि ॥ पुनर्यथा। मिलिहैं कब प्राणपिया सजनी निज ताप हिये की बुझाइही में । सुचि सुन्दर स्याम सु- अङ्ग अनूप बिलोकि महा मुद छाइहौ मैं ॥ मु- सकानि भरी मनमोहन की वह मूरति नैन ब- साइहौ मैं। कबधौं ब्रजजीवन के सँग मै निज जीवन को फल पाइहौ मैं ॥ ३९॥ .
६०
महेश्वरसुधाकर।
टोका। इस कबित्त में भो अभिलाष दसा है। प्रौढ़ा प्रोषित पतिका
नायिका है। नायिका की उक्ति है सखी प्रति । सुमिरन अलंकार है।
लक्षन दोहा । सुमिरन जो सुमिरन करै दम्पति लहि तन ताप। तासो
सुमिरन कहत हैं जिन को कबिता थाप ॥
अथ गुन कथन लक्षन दोहा ।
बिरह विवस तिय पिय जहाँ गुनगन कथें अनेक।
ताहि बखानत गुन कथन जिनके बिमल बिबेक ॥
तस्य उदाहर न सवैया।
सिरमोर-पखा मुख बाँसुरिया बनमाल हिये
लसै मोज ही की । मुसक्यानि बिलोकनि त्यों
तिरछी लखि होत सँजोग के ओज ही की ॥
गति मन्द गयन्द की क्यों कहि जाय सुभाय
सुसीलता चोज ही की। कवि स्याम जू स्याम
लख्यौ वहि रोज हिनोज है मौज मनोज ही की ॥
टोका । इस कबित्त में नायिका अढ़ा है । नायिका की उक्ति सखी
प्रति और गुन कथन दसा है । पंचम प्रतीप अलंकार है औ सुमिरन
अलंकार भी है। प्रतीप लक्षन । वृथा होय उपमान जब बननौय लखि
सार । दृग आगे कछु मगन ये पच प्रतीय प्रकार ॥ सुमिरन ल पूर्वोक्त है
अथ चिन्ता दशा लक्षन दोहा ।
मन में बढ़े बिकल्प अति मतिथिर होय न नेक।
चिंता तासों कहत हैं जे कबि बिमल बिवेक ॥
तस्य उदाहरन घमाक्षी।
सजी चतुरङ्ग चारु चारयो ओर घोर अति
नभ में सुजोर धुरवान की मढ़ाई है। वैसई छटा
महेश्वरसुधाकर। ६१ के चहुंओर मोर सोर करै वैसई दुसहदाव दा- मिनी बढ़ाई है ॥ कोयल की बानी स्याम कौन पै बखानी जाय तापै नेकमानी मेरु मेढुक प- दाई है। आये ना कन्हाई घर पातिह न पाई अब मोहि को बचाई बरसात की चढ़ाई है। टोका। इस कवित्त में प्रौढ़ा प्रोषितपतिकानायिका है नायिका को युक्ति सखो प्रति है कबिनिबद्ध बक्ता को अबिवक्षित ध्वनि करिकै बरषा और चतुरङ्ग फौज को रूपक सों समाभेद रूपक अलङ्कार भयो रूपक लक्षन दोहा। है रूपक है भांति को मिलि तद्रूप अभेद । अ- धिक न्यून सम दुहुन के तौनि तोनि ये भेद॥ यहा समभेद रूपक है । अथ स्मृति लक्षन दाहा। जेहिलखिसुनिसुधिहोति हिय प्रीतिपाछिलीकेर । अस्मृति ताहि वखानहीं रसिक ग्रन्थ मत हेरि॥ अथ स्मृति को उदाहरज सबैया । खजन की छबि छीनि सदा सखि अंजन हूं में नहीं छलि जात हैं । त्यों मदगंजन कंज न- वीनन मीनन की उपमा दलि जात हैं। क्यों समुझाइये को समुझे बर वारि लो बारि भरे झलि जात हैं । जैसई स्याम लखें जेहि ओर सो वैसई नैन अजों चलि जात हैं ॥४५॥ इस कबित्त में नायिकापरकीयाप्रोषितपतिका है ना यका को उक्ति है सखी प्रति सुमिरन अलङ्कार है और भाविक अलं कार भी है लक्षन । सहस बस्तु सुनि देखिकै सुमिरन कौन्हो होय । अलङ्कारअस्मृति तहाँ बरन्यो सुख नि समोय॥ भाविक लक्षन । भाविक टीका ।
महेश्वरसुधाकर । भूत भविष्य जो परतछ होय वनाय । वृन्दावन में आज वह लोला देखी जाय ॥ ४३ ॥ अथ प्रजाप लक्षन दोहा । बचन अनर्थक कहत जहँ बिरही जन कछु पेखि। सो प्रलाप कविवर कहत जिनकी बुद्धि विशेषि ॥ तस्य उदाहरन घनाक्षरी स्याम बिन सखिन समेति बन कुंज पेखि बिरह बिचैन बैन बोलति बिहाल है । कहुं क- चनार कान्ह कारे को निहारे कहूं नारि केर बेर क्यों न बोलत उताल है। पनस पलास आस देत तो निरास जानि नाम है अशोक शोकदा- यक कमाल है। साल औ रसालन तें बूझति रसालन को भुजन पसारि बाल भेंटति तमाल है ॥ ४६॥ टोका । इस कबित्त में प्रौढ़ा प्रोषितपतिका नायिका है। कबि की उक्ति है। यहा सखी की उक्ति है। प्रलाप दसा है। मालंकार है। बिरोधाभास भी है। ल• पूर्वोक्ता है। अथ उद्वेग लक्षन दोहा । व्याकुलता अति होय उर बिरह बिबस सुख जाय। कछु सोहाय नहिं मन लगै सो उद्वेग गनाय॥ तस्योदाहरन सवैया। बैठी बिसरति मूरति सी हिय पूरति सूरीत नन्दलला की। आँखिन ते बरसै असुआ सरस - महेश्वरसुधाकर । तन ज्वाल महा बिरहा की ॥ ता छिन ते कछु बोलै न डोलै सुनै श्रुति सों न कहै को कहा की। थाकी मनोज बिथा की अहा यह छैल की जा छिन ते छबि छाकी ॥४७॥ टीका । इस कबित्त में प्रौढ़ा प्रोषितपतिका नायिका है। कवि की उति है। अथवा सखी को उक्ति है। सखी सो बिकलता उहग दशा है। उपमेय लुप्तालंकार है। अथ उन्माद लक्षन दोहा । करै अचार बिचार बिन वृथा बकै बहु बैन कहत ताहि उन्माद सब हँसि रोवै दिन रैन ॥ उन्माद यथा घनाक्षरी। बिरह बिथा सों बाल बैठी ती निकुंजन में बिहँसै बिलोके बकै विकल विचारी है । आप ही सो आपै छिन रोवै पुनि गावै चकी मद मै छकी सी मनी मैन मतवारी है। थकी सी जकी सी बिकी बेसुधि सी दीसी स्थान बाम बिधि व्है गो छाम छबि में निहारी है । प्यारी प्रेम पूरति विसूरति विहारी मन मूरति तिहारी तन सूरति बिसारी है ॥४७॥ टीका । इस कबित्त में प्रौढ़ा प्रोषितपतिका नायिका है। सखी की उक्ति है नायक प्रति, बिरहनिवेदन उन्माद दसा है। समुच्चय अलंकार है। और परजाय भी है। दोय समुच्चय भाव बहु कहं उपजै इक संग। एक काज चाहै कयौ के अनेक इक अंग ॥
महेश्वरसुधाकर। तस्य उदाहरन र अथ जड़ता लक्षन दोहा । बिरह विथा ते होत जहँ तन मन अचल समान। जड़ता ताहि बखानहीं कोबिद कबि मतिमान॥ सवैया खोलति नैन न बोलति बैन न डोलत अङ्ग अनङ्ग अतंक मै । सोवति रैन न चैन लहै सु दहै विरहागि महान मयंक मै ॥ स्यान पिया बिन हाय दसा यह याकी बिलोकत होति स- संक मैं। धीरी परी जनु साँस सखी तन परीि परी सी परी परजक मै ॥५१ ॥ टीका । इस कवित्त में भी वहो प्रोषित पतिका गायिका है। उक्ति सखो को है सखी प्रति बिरह निवेदन है । जड़ता दसा है । उपमेय लुप्ता है । लक्षन पूर्वोक्त है अथ व्याधि टसा लक्ष न दोहा । बिरह बिवस अति छीनतनतियापियको जहँ होय। व्याधि बखानत ताहि कवि अन्यन को नत जोय।। तस्य उदाहरन घनाक्षरी। कुंजन मैं काल्हि कहूँ बातन बिलोक्यो लाल तबते विहाल बाल बोलति बिचैन है। खोलति न नैन सुधि नेक तन पै न लग्यौ प्यारी उर अन पै सुमैन सर पैन है ॥ आह की अवाज मुख आवति दराज आज ताप सरसाय दुख
महेश्वरसुधाकर।
६५
भाषत बनै न है । व्याधि विरहागि जागि
जोवति तिहारी बाट रोवति बिहारी छिन सोवति
न रनै है ॥५३॥
टोका। इस कबित्त में परकीया प्रोषितपतिका नायिका है। उ-
त्तमा दूतो को उक्ति है नायक प्रति बिरहनिबेदन है। व्याधि दसा है
बियोग शृङ्गार है ओरहनो है नायक सों । समासोक्ति अलङ्कार है ।
समासोक्ति प्रस्तुत फुरे ऽप्रस्तुति बरनन माझ । कुमुदिनि हूं प्रफुलित
भई देखि सुधानिधि साँझ ॥ ५३ ॥
सिद्धि श्री मन्ममहाराजाधिराज राजराजेन्द्र मुकुटमणि रामपुराधीप
रैकवार कुलकमलदिवाकर श्रीगुमानसिंहात्मज श्रीमहेश्वरबकशसिंह
बहादुर जूदेव को आज्ञानुसार श्री पण्डित स्यामसुन्दर अश्वनौनगर
निवासी महेश्वरसुधाकरग्रन्थबिरचिते नाम षष्टमस्तरङ्गः ॥ ६ ॥
अथ दूत बनन तत्र दूती लक्षन दोहा ।
मन प्रबीन छल सों करै कारज रसिकन केर ।
सो दूती जिय जानिये बचन चतुरता हेर ॥५४॥
टूती भेद ।
सो है तीनि प्रकार की उत्तम मध्यम जानि ।
अधमा हूँ है मानिये कहत सुमति अनुमानि॥५५॥
अथ उत्तमा दूतौ लक्षन दोहा।
मीठे बचन सुनाय कै साधै काज महान ।
सो उत्तम दूती अहै भाषत सकल सुजान ॥५६॥
६६ महेश्वरसुधाकर । तस्या उदाहरन सवैया। आयसु रावरे को धरि सीस मैं काज सु- धारिहों नन्ददुलारे । नेक रहौ दिन है चुपचाप सो आप चली मिलि सङ्ग तिहारे ॥ जाय स- मीप में ऐसो करौं सोई होयगो जो चित चोप तिहारे । स्याम सुप्रीति लगाय भली विधि रा- धिकै ल्याय मिलायहीं प्यारे ॥ ५७ ॥ टीका । या कबित्त में उत्तमा दूतौ है । सरल बचन कहि धोरज देती है। प्रहर्षन अलङ्कार को तीस भेद है लक्षन यथा दोहा। ज तन सोध तै सिद्धि को बस्तु जहां मिलि जाय । तहां प्रहर्षण तौसरो कहत सुकवि समुदाय ॥ ५७॥ पुनर्यथा पनिहारिनी दूतौ । आजु गई यमुनाजल को बिधि के बस मोहिं बिलोकि बिहारी । आय मिले मग रोकि कह्यौ तुम हौ केहि के ढिग की बलिहारी ॥ स्याम सु- नाम तिहारो कयौं सुनि है गये बावरे से मति हारी । ज्योंही चलौं बिनवै तबहीं सुनिले सु- निले सुनिले पनिहारी ॥ ५८ ॥ टीका । इस कबिन में पनिहारिनि दूती है। श्री कृष्ण चन्द जी को प्रेम श्री राधिका जी सों दरसाय परस्पर प्रीति सरसाय रुचि उप- जाती है । व्याज सौ कार्य साधती है ताते पर्यायोक्ति अलङ्कार दूसरा भेद है लक्षन दोहा । पर्यायोक्ति प्रकार के कछु रचना सों बात । मिसु करि कारज साधिये जोहै चितै सोहात ॥ ५८ ॥ । -
महेश्वरसुधाकर ।
यथा कबित्त।
तारागन सखिनसमाज नभमण्डल तै उ-
दित अखण्ड छाये पुंज सरस्यौ परै । है रह्यो
चकोर मन मोर वहि ओर स्याम घन बरजोर
जनु बारि बरस्यौ परै ॥ रतन अथोर अङ्ग ब-
सन अजोर रतिरङ्ग के उमङ्ग मैन रैन सरस्यौ
पर। आज बजराज राज राधे सुख मुख साज दे-
खिये दराज द्विजराज दरस्यौ परै ॥ ५९ ॥
टीका । नायिका को रूप बरनन करती है नायक सों, उत्तमा दूती
है। रूपक अलङ्कार सम भेद है ॥ ५ ॥
पुनर्यथा कबित्त ।
अमल कमल समलोचन सजीले चारु अजब
रसीले मेनकान के कहौं किमी । मृदुल म-
धूक से कपोल गोल गोल लसैं बोलनि अमोल
अधरान में सुधा तिमी ॥ मन्द मुसकानि बानि
परम सुजानि जानि प्यारी तुमैं आनिहीं म-
नोज मौज है जिमी । रस बरसाय स्याम हँसि
उर लाय लीन्ह्यो चन्द छबि आनन सुदन्त
दुति दाडिमी ॥ ६०॥
टोका इस कबित्त में उत्तमा दूती है। श्रीकृष्णचन्द जी को रुचि
उपजाती है । लुप्तोपमा अलङ्कार है । औ प्रथम भेद प्रहर्षण भी है ।
यथा दोहा । धर्मरु बाचक है बहुरि उपमानो उपमेय । यक है
बिन है तहां लुप्तोपमा सुगेय ॥ प्रथम प्रहर्षण यथा दोहा । मन बांछिता
फल सिद्धि जहँ जतन बिना ही होय। सोई प्रहर्षन प्रथम यह कहत
सयाने लोय ॥ ६ ॥
६८ महेश्वरसुधाकर। । पुनर्यथा सवैया । आनन अम्बुज सों अनुमानि मलिन्द रहैं झुकि झूमि थलीन मै । जागै छटा छनजोति की अङ्ग उमङ्ग लगै घनस्याम गलीन मै॥ताब न नेक रही महताब मै आब कहा है गुलाब कलीन मै । रूप रसीली लसै वह लाल बिसाल बनी बर बाल अलीन मै ॥६१ ॥ पुनः। राधिका को सखि साजि सिँगार दियो नख तें सिष लौँ रुचि बारे । भूषन भूषित अङ्गन जनु दामिनी सी दरसै पिय प्यारे ॥ स्याम सुकेसन मोतिन माँग लसैं पट त्यौँ अतिहीं छबि धारे । देखत ही मनमोहन मोहत मानौ मिले तम तोम मैं तारे ॥ ६२ ॥ टोका । इस कबित्त में दूतो उत्तमा है रूप सौन्दर्य को बरनन करि नायिका को नायक को रुचि उपजाती है। बस्तु उत्प्रेक्षालङ्कार है॥६॥ मै पुनः । जाके अनूपम अङ्ग लसैं सुअनङ्ग छटा की महा छबि छाजै । पीन पयोधर त्यौँ कटि छीन विभूषन अम्बर मै रुचि राजै ॥ बोल अमोल सुधा अधरान प्रभान के पुंजन कुंजन साजै ।
महेश्वरसुधाकर। लाल लखौ चलि हाल उतै है मसाल मनौ बर बाल बिराजै ॥ ६३ ॥ टोका। इस कबित में दूतौ की उक्ति नायक प्रति है। उत्तमा दूती है नायक को रुचि उपजाती है। उत्प्रेक्षा अलंकार है । लक्षन यथा दोहा । तिय आनन पै अलक इक छूटि रही छबि छाय । मनौ सुधा. धर मै सुधा पौवत अहि सिसु आय ॥ ६३ ॥ अथ मध्यमा टूती लक्षन दोहा। कछु मीठे कछु कटुवचन कहै अगम दरसाय । सो दूती मध्यम अहै भेद कह्यौ कबिराय ॥६४॥ तस्या उदाहरन सवैया । नैनन की है रही यह बानि मनौ घन सा- वन के झरते हैं। ऊरध स्वास उठै उर ते गर ते फिरि फेरि उरै धरते हैं ॥ सैनन ही समुझाय कह सुनि बैन नहीं श्रुति लौँ परते हैं । राधिके तेरे बियोग सों स्याम समाधि को काम कियो करते हैं ॥६५॥ टीका। इस कबि त में मध्यमा दूती है। उति दूतो को है। नायिका प्रति, नायक को बिरहनिवेदन करती है । नायिका सो नायक बिरह है। हेतु गम्य उत्प्रोक्षा अलंकार है । लक्षन दोहा । मृदुल मनोहर ब. रन बर निरखि रही हौं दंग । चप्यौ चरन चूरन मनी ताते राते रंग ॥ पुनः बजाजिनि दूतो घनाक्षरी। मंजु मखमल सी अमोल गुल्बदनवारी रति लखि हारी हिये साँची के पतीजिये । करे बात । महेश्वरसुधाकर । ही में जी में आवति उसास स्याम तास बादले मे क्यों नजर-कसी कीजिये ॥ फुलवर सेज पै परी सी परी पीरी तन सारी निसि रोवत न सोवत सुनीजिये । लीजिये सुजस बजराज म- हाराज अब मार कीन छीन वाहि नैन-सुख दी- जिये ॥६६॥ टोका । इस कबित्त में बजाजिनि दूती है । दूतो की उक्ति है। श्री कृषा चन्द प्रति । नायिका को बिहरनिवेदन करती है। श्लेषालंकार है दूसरा भेद है । लक्षन दोहा । श्लेष अलंकृत अर्थ बहु एक सब्द में होत । होय न पूरन नेह बिन दीपक बदन उदोत ॥ सिर्फ एक पद ते मानी नायक है ॥ ६६ ॥ पुनर्यथा। मल मल कर तन जेव जिय जेर भई डो- रिया सुप्रेम की वनाय बस कीजिये । बात ना बनात कहि जात ना जनात स्याम जाली बा- फंदा की कम खाब मै सुनीजिये ॥ गोरी गुल- बदन स जरदा परी सी परी सोक मीच बीच ते उबारि जस लीजिये । येहो ब्रजराज राज राजन के महाराज मारकीन छीन वाहि नैन सुख दीजिये ॥ ६७॥ टीका । इस कबित्त में भी वही बजाजिनि दूती है । मध्यमा दूती की उक्ति है। श्रीकृष्ण चन्द प्रति बिरहनिवेदन करती है । श्लेष अलं. कार है । लक्षन । अश्लेष अलंकृत अर्थ बहु एक सब्द में होत । इत्यादि मानी नायक है ॥ ७ ॥ marne-means महेश्वरसुधाकर । अथ अधमा टूतौ लक्षन दोहा। बचन कटुक ही जो कहै तिय पिय के ढिग माँहि । सो अधमा दूती कहत मनमै भै कछु नाहिं ॥६८॥ तद्यथा घनाक्षरी। मेवन की पाँती लखे अति अनखाती हिये अंतर सुगन्ध रङ्ग अङ्गन लगाती हैं । धरत सुपग पुहमी मै अकुलाती मनौ हार बार-भारन सों लङ्क लचि जाती हैं। स्याम सुकमार ती सो धारती सुजोग तन मन को सँभारती न सुख सरसाती हैं। तन पियराती पातीरावरी न पाती जे न खाती नासपाती ते बनासपाती खाती हैं । टोका। इस कबि त में अधमा दूनो है । नायक से नायकान को बि रहनिबेदन करती है। और दक्षिन नायक है । यथा । बहु नारिन सो प्रौति सम ताको दक्षिन जानि । इत्यादि। और पर्यायोक्ति अलंकार है। लक्षन । है पर्यायोति प्रकार ई कछु रचना सों बात । मिसु करि का. रज साधिये जोहै चितै सोहात ॥ ६ ॥ पुनर्यथा। अङ्ग अङ्ग सुखद अनङ्ग रङ्गवारी घनी स्याम रङ्ग सुखमा समेति पुरवाई है। अम्बर विचित्र चारु चमक तड़ित रङ्ग सुछबि निहारे बिन व्याधि अधिकाई है ॥ हारे हैं उपाय के हकीम अनेक भाँति घटति न कैसहूँ कै बाढति स-- ७२ । महेश्वरसुधाकर । वाई है। येहो दृजराज राज दीजिये दरस आय आप की अवाई बिरहागि की दवाई है ॥७॥ टोका । इस कबित्त में भी मध्यमा दूती है । और पत्र द्वारा या दूती हारा करि कै बिरहनिवेदन है । तातपर्य यह कि बोलाने का सूचित करती है । दवाई अवाई के रूपक से श्लषालंकार है, लक्षन । श्लेष अलंकृत अर्थ बहु एक सब्द मे होत । इत्यादि ॥ ७० ॥ इति मध्यमा दूतौ अथ अधमा दूतौ लक्षन दोहा । बचन कटुक ही जो कहै तिय पिय के ढिग माँहि । सो अधमा दूती कहत मनमै भय कछु नाहिं।।७१॥ तस्या उदाहरन सवैया। कुंजन ते कढ़ि आवत स्याम सुराधिका आजु लख्यौ कहि प्यारे । भौंह कमान चढ़ाय चितै मुसकाय सुनैनन के सर मारे ॥ देह मे नेक संभार रह्यो नहिं जात कहे यह बात पुकारे । जागिहै जीहै तो जीहैं सबै न तो पीहैं विषै वृषभान के द्वारे ॥ ७२ ॥ टोका । इस कबित्त मे अधमा द्रूती है। नायक श्रीकणचन्द की दसा देखि बिरहनिवेदन करे है । और चेटक सखा भी हो सता है। और संभावनालंकार है । लक्षन। जो यों होतो यों कहत संभावना बिचार । बक्ता होतो सेस सो लहतो तो गुन पार ॥ ७२ ॥ पुनर्यथा। हारे उपाय अनेकन कै हम आजु उराहनो देन सिधारे । नैनन के सर स्याम हने पुनि तें मृगनैनिन नेक निहारे ॥ घायल से वै परे तब
महे हेश्वरसुधाकर ।
ते सब ते येहि औंसर जात पुकारे । जागि,
जीहैं तौ जी हैं सबै न तो पीहैं विषै वृषभान
के द्वारे ॥ ७३
टोका। इस कबित्त में भी वही पूर्वोता है। अधमा दूतो है उराहनो
बिरहनिवेदन है। और घायल पद से पूर्णोमालंकार है। लक्षन दोहा ।
बाचक है अरु धर्म जहँ उपमेया उपमान । तहं पूरण उपमा कहत उ.
पमा साहस जान ॥ ७३ ॥
सिद्धि श्री मन्ममहाराजाधिराजराजराजेन्द्र मुकुटमणि रामपुराधीप
रैकवारकुलकमल दिवाकर चौगुमानसिंहात्मज श्रीमहेश्वरबकशसिंह
बहादुर जू देव की आज्ञानुसार श्री पण्डित स्यामसुन्दर अखनौनगर
निवासी महेश्वरसुधाकरग्रन्थ बिरचिते बियोगशृङ्गारबर्ननो नाम स
प्तमस्तरङ्गः ॥७॥
अथ षटऋतु बननम् तत्रादौ बसन्तऋतु बर्नन दोहा ।
सुमनसुगन्धसमीर मधु अलि किसलयतरु झार।
नृत्य राग पिकरवसु बन मृदु मंजरी बिहार ॥१॥
यथा सवैया।
पात नये उलहे तरु माँहि बिलोकत प्रान
पयान करन्त है। तैसे पलास की डारें अंगार
सी मानौ करें बिरहीन को अन्त है ॥ कोकिल
कूक उठे हिय हूक सी स्याम जू आयो नहीं घर
कन्त है । देखु सखी ऋतुराज कहाइ कै आजु
भयो यह बैरी बसन्त है ॥२॥
महेश्वरसुधाकर । टोका। इस कवित्त में मध्या प्रोषितपतिका नायिका है नायिका की उक्ति है सखी प्रति श्री लुप्तोपमालंकार है। बाचक और धर्म- लुप्ता है। लक्षन । बाचक धर्मरु बननी है चौथो उपमान । इक बिन है बिन तीन बिन लुप्तोपमा प्रमान ॥ २ ॥ पुनर्यथा घनाक्षरी। लागै हिय हुक सी लखे ये द्रुम पात नये जागै है मनोज व्याधि लाज अवराधि कै । बौर भौर भीर सों न धीर बीर होत नेक बोलै काक- पाली या कुचाली धुनि नाधि कै ॥ तेई सुखदाई तब जाई बन माँझ साँझ ओई दुखदाई भे प- लास फूल आधि कै । स्याम सों कहत कोई कीजै कौन ततहाय अन्त कीन चाहत बसन्त बैर साधि कै॥३॥ टोका। इस कवित्त में प्रौढ़ा प्रोषितपतिका नायिका है। नायिका को उक्ति है सखी प्रति, ऋतुराज व कै बैरौ भयो । ताते पंचम विभा वना अलङ्कार है । लक्षन यथा दोहा । कारन ते प्रगटै जहाँ कारज महा बिरुष । तह पाँचई बिभावना कहत भरत मतशुद्ध ॥ ३ ॥ अपरंच सवैया बौरे रसाल बिसाल बने सुअलीगन की अ- बली बिलसन्ती । लाल नये दल फूल पलास लखे मन काके न काम कसन्ती ॥ स्याम सु- कोकिल की धुनि को सुनि माननी मान की महेश्वरसुधाकर । होति हसन्ती । प्यारे की ओर निहारिये बेगि बिचारिये आई बहार बसन्ती ॥४॥ टीका । इस कवित्त में माननी नायिका है। सखी की उक्ति है ना. यिका प्रति, उद्दीपन कराय मान छोड़ावती है । उद्दीपन बस्तुन को बर्नन करि बसन्त के मिसु भय दर्शाय मिसु सो कारज साधन करती है। यात पर्यायोक्ति अलङ्कार है। लक्षन । पयायोक्ति प्रकार है कछु र चना सो बात । मिस करि कारज साधिये जोहै हिये सोहात ॥४॥ पुनर्यथा। सीतल मन्द सुगन्ध समीर सरीर मैं काम कला सरसन्ती । कुंजन में लतिका लपटाय बियोगिन के हियरे तरसन्ती ॥ स्यों कचनार अनार पलास की डारन मैं चिनगी दरसन्ती। स्याम पियारे तिहारेई सङ्ग मैं नीकी लगी ये बहार बसन्ती ॥५॥ टोका। इस कवित्त में नायिका प्रौढ़ा प्रबास्यतपतिका है । ना यिका की उक्ति है नायक प्रतिगमन बरायो चाहती है । आक्षेपा अ लङ्कार को तौसरो भेट है । लक्षन यथा दोहा। दुरै निषेध जो बिधि बचन लक्षन तोन्यौ लेखि ॥ हौं नहिं दूतो अगिनि ते तिय तन ताप विशषि ॥ ५॥ अथ ग्रीषमतु लक्षन दोहा । सुथल पवन पानी गरम तृप्ना मृग रवि-ताप। सुखद सीत ग्रीषम सबहि सारंग राग अलाप॥६॥ तथा घनाक्षरी चन्द की छटा की छटा मन्दिर बनो है चारु । .
महेश्वरसुधाकर । संचित गुलाब आब केवरे धरे रहैं । खासे ख- सखाने तर तर तरखाने भले बिजन बिचित्र पौन गौन को करे रहैं ॥ और है कपूर चूर अंतर सुगन्ध अङ्ग स्यामा स्याम रङ्ग में अमेज है हरे रहैं । ग्रीषम झरफ जोर जङ्गल सोहात नहीं संदल लगाये लोग अन्दर परे रहैं ॥ ७॥ टीका। इस कबित्त में कबि निबद्ध खतःसंभबी ग्रीष्म सम्पति चरित बनन करि ग्रीष्मऋतु है। श्री उद्दात अलंकार भयो । लक्षन यथा । उपलक्षनु दै सोधिये अधिकारी सो उदात । तुम जाके बसि होत हो सुने तनक सी बात ॥७॥ पुनर्वथा। ग्रीषम की भीषम तपनि सों तपत अङ्ग सीना है पसीना जोर सोर को करे रहैं । सीरे उपचारे जो करौं तौ जन छार होत व्यजन ब- यारि मै न स्याम जी हरे रहैं ॥ अमल सुबास आस पास ना सोहात हाय बाला बिन सकल मसाला ये धरे रहें । बरफ उसीर घनसार सो न मङ्गल है संदल लगाये तऊ अन्दर परे रहें॥८॥ टीका। इस कबित्त में प्रोषित नायक है उक्ति नायक की है सखा प्रति ग्रीषमऋतु में बिरही व्याकुलता से कहत है कि बरफ उसीर खस घनसार कपूर अन्य सुगन्ध बस्तु ते आनन्द नही है नसन्दल ( चन्दन ) से न अन्दर (भौलर) रहने में और बिनोक्ति अलंकार को प्रथम भेद भयो ७७ महेश्वरसुधाकर। लक्षन यथा दोहा। है बिनोक्ति के भौति को प्रस्तुत कछु इक छीन । अरु सोभा अधिको लहै प्रस्तुत कछु यक हौन ॥ ८ ॥ अथ बर्षाऋतु लक्ष न दोहा । चक मराल बारिज बिना दामिनि जल घनघोर । चात्रिक दादुर मोर बक जीगन झींगुर सोर ॥९॥ भूमि हरित बन हरि बधू अगम पन्थ तम ताल। सरिता लता तमाल तरु राग मराल बिसाल॥१०॥ यथा सवैया। मोर करें चहुँओर ते सोर त्यौं घोर घटा घन घेरि गरा। छाजें छटा छनजोति की स्याम पपीहा पिया कहि को कहि साजै ॥ दा- दुर झिल्लिन की झनकार अपार मनौज जगा- वन काजें। सावन में मनभावन के बिन भा- मिनी भौन के भीतर भाजै ॥११॥ टोका । इस कवित्त में नायिका मुग्धा प्रोषितपतिका है । उक्ति सखौ को है नायिका प्रति नायिका बाहेर निकरी । तब उसने यह कहा की बिना मनभावन के सावन में भामिनो भोतर को भाजती हैं इस तू भी बाहेर को मति निकल, तातपर्य बाहेर निकरने से बर्षा दे खने से कामोद्दीपन होगा याते मना किया, कहना उसी नायिका को था, सो सब स्त्रीयों को कहा, यात सामान्य निवन्धना अलंकार है । अप्रस्तुत प्रसंसा के भेद में है ॥ लक्षन यथा दोहा। अलंकार है भांति को प्रास्तुत प्रसंस । यक वरनन प्रस्तुत फुरै दूजे प्रस्तुत अंस ॥ ११ ॥ पुनर्यथा सवैया। स्याम घटा घन घोर चहूँ दिसि पौन सु- -
in and
महेश्वरसुधाकर ।
गन्धित डोलन लागे । त्यौं चमकै चपला नभ
मैं अबला मन मैं न कलोलन लागे ॥ कोकिल
कूक पपीहा पिया धुनि बोल अमोलन बोलन
लागे। पाय हरी हरियानी मही हरि आये नहीं
हरि बोलन लागे ॥ १२॥
टोका । इस कवित्त में नायिका प्रौढ़ा प्रोषितपतिका है। नायिका
को उक्ति है सखी प्रति । औ दोपिकाबत्ति अलंकार है। प्रथम भेद
भयो। यथा ल. दोहा । दीपक प्राकृति तौनि विधि प्राकृति पद की
होय । पुनि प्राति है अर्थ को दूतो कहियत सोय ॥ पद प्रो अर्थ
इन को तोजी पाति लेखि। धन बरसे हैं रौ सखो निसि बरसैं
देखि ॥ १२॥
पुनर्यथा घनाक्षरी।
कोकिला पुकारे राग दादुर उचारे बैन चा-
त्रिक पियारे मन हारे सुरवान के । मारुत बि-
हारे जोति जिगना पसारे मनौ मैन बान मारे
ज्ञान गारे गुरवान के ॥ झिल्ली झनकारे बग
पातिन सँवारे जिमि तड़प तड़ितारे तिमि सोर
मुरवान के । बिना स्यामप्यारे बीर धीर ना ह-
मारे अब बाजे हैं नगारे नभकारे धुरवान को॥१३॥
टीका। इस कबित में पौढ़ा प्रोषितपतिका है । नायिका को
उक्ति है सखौ प्रति । संभवना अलंकार है। ल• दोहा । जो यों होतो
यों कहत संभावना बिचार । वक्ता होतो शेस सों तौ गुन लहतो
पार॥ १३॥
महेश्वरसुधाकर। पुनर्यथा सिंहावलोकन सवैथा। आइहैं कारी घटा चहुँओर ते मोर चकोरहु सोर मचाइहैं । चाइहैं चञ्चला चावभरी पुनि पीउ कहाँ कहि चात्रिक गाइहैं ॥ गाइहैं दा- दुर राग भले बिरहागि हमारे हिये उपजाइहैं । जाइहँ प्रान सही करि मान जो सावन में सखि स्याम न आइहैं ॥ १४ ॥ टोका । इस कबित्त में प्रौढ़ा प्रोषितपतिका नायिका है। नायिका की उक्ति है सखी प्रति । एकावली अलंकार है। लक्षन यथा दोहा । अहित मुक्ता पद रौति जहं एकावलि तव मानु । दृग श्रुति लौं श्रुति बाहु लो बाहु जंघ ली जानु पुन: घनाक्षरी। आवे घन घुमड़ि घुमड़ि चहुँओरन ते कारे कारे धावे लखे मैन सरसत है । दादुर मचावें सोर मोर त्यों चकोर चारु चञ्चला चमंकि चित चैन झरसत है ॥ झिल्ली झनकार स्याम को- किला पुकार रैन चातक अमोल बोल बोलि ग- रसत है । ऐसे मैन काहू के न मान को ठिकान प्यारी देख इन्द्र आजु बारिधारा बरसत है॥१५॥ टीका इस कवित्त में मानिनी नायका है । सखी की उक्ति है नायका प्रति । वर्षा को भय दरसाय, सिक्षा करि, मिसु से कारज साधन, मान छुड़ावने का तोतपर्य, याते पर्यायोक्ति अलंकार है। ल क्षन पूर्वोक्त है । मिसु करि कारज कौजिये जो है चितै सोहात ॥१५॥ जानु ॥ १४ ॥ है महेश्वरसुधाकर। पुनर्यधा मवैया । मुरवान के सोर सुने सजनी तन काम कला सरसान लगे । दिवि दामिनी की दुति दौरत हीं दिल कामिनि के झरसान लगे ॥ बगपाँति सुदादुर माधुर बोल सुचात्रिक के सरसान लगे। घर आये न स्यामपिया अवहीं घन घेरि घने बरसान लगे ॥ १६॥ टी। इस कवित्त में बचनविदग्धा नायिका है। नायिका को उक्ति है सखी प्रति । या मित्र को सुनावती है । तातपर्य यह की बरसात में किसी को अनायोग्य नहीं है, व्यंग से सूचित करती है बाते गृढ़ीक्ति अलंकार है। ल. दोहा । गूढोकति मिमु और के कोजे पर उपदेश । कालि सखी हौं जाउंगी पूजन गौरि महेश ॥ १६ ॥ पुनर्यथा घनाक्षरौ। घटा घहराती घरै घेरि घेरि आती मन्द मारुत सोहाती न अथोर ताप ताती में । मैन मदमाती जोति जुगनू जमाती बगपाँती दर- साती तौ न तैसे तरसाती मैं ॥ तन पियराती मिले स्याम पियराती नहिं छाती सिय राती प- पिहा के बोल घाती मैं । लता लहराती झकि झूमि झहराती कहाँ कैसे कल पाती जोन पाती हरी पाती मैं ॥ १७॥ टीका । इस कबित्त में प्रौढ़ा आगमितपतिका हे। नायिका को महेश्वरसुधाकर । ८१ उक्ति है सखो प्रति। याने पाती जो पत्री है सो ना पाती तो कैसे या वर्षा के उत्पात में कल पाती, अर्थात् आराम ना पाती। अतएव पाती पाने से मन को धौर्य आयो । इस्से यह जानि परा कि पाती में अ- वाती लिखौ है, ताते जी को सन्तोष भया, यात शब्दावति अलंकार है, औ संभावना भी है ॥ १७ ॥ पुनर्यथा। अङ्गन पीन पयोधर साजि सुदामिनि की छबि छोरि धरी है । भूषन भौंह मनौ धनु हैं बगपाँति सुमोतिन माल लरी है । केकिन चा- तिक बोल अमोलन स्याम सुजान को चित्त हरी है । बालम को बिलमायो बिदेस मै सौ- तिया पावस बैर परी है ॥ १८॥ टोका। इस कवित्त में बचनविदग्धा नायिका है। मित्र को ज- मावतो है कि बालम को वर्षा ऋतु ने और या सौति ने बिलमाया है, वर्षा में आय नहीं सकते, और इहां कोई है नहौं । मिलने का मौका है अन्य सन्निधि की व्यंगि है। समाभेद रूपक अलकार है, और गू ढोक्ति है, लक्षन पूर्वोत है। रूपक ल०॥ है रूपक है भाँति को मिलि तद्रूप अभेद । अधिक न्यून सा दुहुन के तौनि तौनि ये भेद ॥ मोहन मन मृगबधन को भौंह कमान चढ़ाय । नैन फेरि ताको तरुनि मैन सैन सरसाय ॥१८॥ पुनर्यथा । पापी पपीहा स्टै दिन रैन सुचैन परै नहीं एक घरी है । मोर चकोर को सोर सुने बिरहा- नल ज्वाल मै देहँ जरी है ॥ तापै घटा घन ८२ महेश्वरसुधाकर । घोर करै घनस्याम बिना भय भौर भरी है । पीर हमारी न जानत बीर है सौतिया पावस बैर परी है ॥ १९॥ टीका । इस कवित्त में बचनविदग्धा नायिका है, और सब बातें पूर्वोकहो है । नायिका को उक्ति है, सखो प्रति, मित्र को सुनावती है और परिकर अलंकार है ॥ ल• यथा दोहा । है परिकर आसय लिये अहां विशेषन होय । मसिबदनी यह नायिका ताप हरति है जोय ॥ अथ सरदऋतु वर्नन दोहा । कुन्द काश कुवलय कमल पानिप चन्द प्रकास। स्वच्छ सुघन दीपक सुमग सरद सुरास बिलास ॥ तद्यथा घनाक्षरी। कन्त विन आली वा हिमन्त अन्तकारी भयो सिसिर की सासति सों काँपति महाई मैं । आयो तो बसन्त बौर देखिकै सतायो काम स्याम ऋतु कैसहूँ के ग्रीषम बिताई में ॥ आई ऋतु पावस सुछाई करि आई घन मोरन के सोर सों अथोर ताप ताई में । छाई बिमलाई चाँदनी की चारुताई लखे दरद सवाई मई स- रद अवाई में ॥ २१ ॥ टीका। इस कबित्त में स्वकीया प्रौढ़ा प्रोषितपतिका नायिका है। नायिका को उक्ति है सखो प्रति और सरदऋतु वर्नन है ! और भूत बर्तमानकाल है। और चपलातिशयोक्ति अलङ्कार है। तद्यथा लक्षन । + महेश्वरसुधाकर ८३ चपलात्युति जु हेतु के होत नामही काज । कश्न ही मैं मुद्रिका पि. यागमन सुनि आजु ॥ २१ ॥ पुनर्यथा । कीन्हो है प्रकास कास वैसई अकास स्वच्छ कौल की सुबास स्याम भौंर की गवाई मैं । फूले पारिजात त्यौं नछत्र अस्र मारिजात धारिजात धीर ना समीर पुरवाई मैं ॥ चन्द चाँदनी के लखे लागे कामिनी के तीर हटत न बीर केहूँ कैसिहूँ दवाई में। जरद जनाई जनु हरद ल- गाई तन दरद सवाई भई सरद अवाई मैं ॥२२॥ टोका। इस कवित्त में स्वकीया मध्या प्रोषितपतिका नायिका है। सखौ को उति है सखी प्रति चपलातिसयोक्ति अलङ्कार है । लक्षन पू. र्बोत है। बस्तु उत्प्रेक्षा भी है। जनु पद से, यथा लक्षन। चपलात्युक्ति जु हेत सों होत नामही काजु । कन्नि हो मैं मुद्रिका पियागमन सुनि प्राजु । उत्प्रेक्षा लक्षन । उत्प्रेक्षा संभावना वस्तु हेतु फुल लेखि । नेम मनौ अरबिन्द हैं सरस बिलास बिशेखि ॥ २२ ॥ अथ हेमन्तऋतु वर्नन दोहा । दिवस छोट रजनी महत पल तिल तेल तमूल। तुल तरणि तरुणी अनल ऋतु हेमन्त अनुकूल ॥ तद्यथा सवैया। पामरी तेल तमूल दुकूल अतूल है तूल फूल लसन्त है। पौन प्रवेस न पावै तहाँ अरु दीपति दीपन जोति अनन्त है ॥ स्याम सु धूम के 18 मेहश्वरसुधाकर । की धूम महा मणिमाल बिसाल दुसाल दसन्त है। तन्त कहौ सखी कीजिये कौन सुकन्त बिना यह हंत हिमन्त है ॥ २४ ॥ टीका । इस कबित्त में स्व कोया प्रौढ़ा प्रोषितपतिका नायिका है। नायिका की उक्ति है सखी प्रति और विशेषोक्ति अलङ्कार है। औ ती. सरी बिभावना का शङ्कर है। बिशेषोक्ति लक्षन । बिशेषोक्ति जब हेत सों कारज उपजत नाहिं । नेह घटत नहि है तऊ काम दीप तन मांहि ॥ तीसरो विभावना लक्षन । प्रतिबन्धक के होत ही कारन पू. रन मानि । निसिदिन श्रुति सगति तऊ नैन राग को खानि ॥ २४ ॥ पुनर्यथा घनाक्षरी। सौति सनमान दिनमान सों लखान लघु सुछबि निसा सी है महान प्रेम पागी है । झाड़ औ फनूस जलुस मनिमन्दिर मै अगिनि अ- धूम धूम अगर सुजागी है ॥ तेल औ तमूल तूल अतुल दुकूल चारु ऊनी मखतूल के ग- लीचे रागी है। करत सुमार मार नैनन नि- हार या हिमन्त की बहार बाल कंत उर लागी है। टीका। इस कवित्त में नायिका मुग्धा खकोया है। सखी को उक्ति है नायक को अनुराग दर्शाय मिलाया चाहती है । और सखी की उक्ति नायिका प्रति याते मुग्धा स्वकीया भई। पर्यायोक्ति अलङ्कार है लक्षन पूर्वोक्त है ॥ २५ ॥ अथ शिसिरऋतु वर्नन दोहा। सरस सङ्क हिम सीत की जतन गरम फगुवादि। नृत्य राग निरवात थल बर्नन सिसिर प्रमादि। के ।
८५ महेश्वरसुधाकर। यथा घनाक्षरी। दरन परे हैं चारु परदे बनातन के पौन को न गौन जोति दीपमणिमाला की । अनल अँ- गीठी मृगमद की सुधूम महा फैलि है सुगन्ध स्याम सुखद रसाला की ॥ गिलिम गलीचे बिछे फरसी फनूस मंजु ओढ़बे दुसाला है मनोज ओज आला की । ससकि ससकि भरि अङ्क लपटात उर दोऊ परजङ्क पर सङ्क मानि पाला की ॥ २७॥ टोका। इस कबित्त में मध्या स्वकीया नायिका है। सखी की उक्ति है सखौ प्रति और विभावना अलङ्कार है । और बिशेषोक्ति भी है ल. क्षन पूर्वोक्त है ॥ २७॥ पुनर्यथा । मंजु मणिमन्दिर मैं मष्मली गलीचे बिछे फूल फूल तूल के सुगिरदे बनायो है । फरसी फनूस के जलूस जगें चारचौ ओर जोर बन्ही हूँ पै मनौ जलधार नायो है ॥ झर झर झाँपै परी थर थर काँपै अङ्ग सीत सों दिवाकर हूँ अगिनिति नायो है । बिबिधि बिसाला हैं म- साला औ दुसाला तऊ बाला बिन पाला जोर जाहिर जनायो है ॥ २८॥ टीका। इस कबित्त में प्रोषित नायक है उक्ति स्वयं नायक की है।
महेश्वरसुधाकर ।
कि यद्यपि ए मसाला मौजूद हैं सब तिसपर भी पाला ने अपना जोर
जाहिर कियो, बेगैर स्त्रो के तिस्से बिरही पुरुष है। औ नायिका को
उक्ति कहौ तौ नहीं हो सकती है बाले संबोधन में होता है । हे बाल
सब्द नहीं होता अतएव बिनोक्ति अलंकार है । अत्युक्ति भी है। लक्षन
यथा । है बिनोक्ति है भाति को प्रस्तुत कछु बिन छीन । अरु शोभा
अधिको ल है प्रस्तुत कछु यक होन॥ अत्युक्ति लक्षन । अलंकार अत्युक्ति
सो बर्नन अतिसै रूप । जाचक तेरे हार ते भये कल्पतरु भूप ॥ २८ ॥
सिद्धि श्रीमन्ममहाराजाधिराजाराजराजेन्द्रमुकुटमणि रामपुराधी.
पति रैकवारकुल कमलदिवाकर श्रोगुमानसिंहात्मज योमहेखरबक्स सिंह
बहादुर जू देव की आज्ञानुसार श्री पण्डित स्यामसुन्दर अश्वनीनगर
निवासीमहेवरसुधाकरग्रन्यविरचिते षटऋतुबर्ननो नामअष्टमस्तरङ्गः ॥
अथ फागु बन्न दोहा।
रङ्ग अबीर गुलालजुत धूम धमारि सुसङ्ग ।
मैन चैन हँसि खेलिबो नाच राग परसङ्ग॥२९॥
तद्यथा कवित्त ।
श्रीयुत महेश्वरबकस महाराज राज आजु खुलि
खेले फागु रङ्ग सरसत है । नाचें बार अङ्गना
सभा मैं हाव भाव करि गावैं तान ताल सों सु-
अङ्ग दरसत है ॥ कुम्कुमे की चोट स्याम कुच
पै परत हँसि कर की करत ओट प्रेम सरसत
है। भूमि झुकि झझकि अनङ्ग की उमङ्ग सङ्ग
रूप की तरङ्ग में अबीर बरसत है॥ ३० ॥
महेश्वरसुधाकर । यथा घनाक्षरी। इतै बजचन्द उतै सुन्दरि नबेली बाल बन्द मैं बिराजै छनजोति उपमान की। बाजत मृ- दङ्ग मुरचङ्ग नाच रङ्ग सङ्ग गावत धमारि मंजु ताल सुरतान की ॥ धुंधुर अबीर बीर मदन उमङ्ग अङ्ग केसरि सुरङ्ग पिचकारी हनै सान की।गोरी लै गुलाल लाल आनन मलो री आज होरी खुलि खेलति किशोरी वृषभान की ॥३१॥ टीका । इस कबित्त में फागु बनन है केवल कबि को उति है। यहा सखी की उक्ति है सखी प्रति । उत्साह राग रंग को बर्नन है । यथा सवैया। स्याम सखान के सङ्ग इतै उतै राधिका रा- जति मंजु अलीन मैं । चोट लगैं पिचकीन की त्यौं करि चंचल नैन चितै रसलीन मैं ॥ बीर अबीर की धुंधर मैं धसिकै हँसि रङ्ग भएँ अ- बलीन मैं । लाल गुपाल बने दरसैं बरसैं ब- जबाल गुलाल गलीन मैं ॥ ३२ ॥ टोका । इस कवित्त में नायिका अलङ्कार पूर्वोक्त है, लुप्ता औ उदात अलंकार है। अथ शृङ्गार से स्फुट कवित्त समस्यादिकों पर सवैया । अति रूप अनूप छटा उमही तन मैन की बायु झकोरै लगी। रस रङ्ग तरङ्ग हिये सरसी महेश्वरसुधाकर । - दृग कोरन में हित जोरै लगी। कबि स्याम जू श्याम बिलोकिवे को अलि सों मृदुबैन निहोरै लगी। रतिचोजहु की छबि छोरै लगी दिन है ते पियूष निचोरै लगी ॥ ३३ ॥ टीका । इस कवित्त में नायिका मुग्धा प्रादुर्भूतमनोभवा है । उति सखी की है सखी प्रति या नायक प्रति स्वभावोक्ति अलंकार है। ल क्षन यथा दोहा । स्वभावोक्ति यह जानिये बनन जाति सुभाय । इसि हँसि फिरि देखति झुकति मुख मोरति इतराय ॥ ३३ ॥ पुनर्यथा। आय गली है कड्यौ सजि कै बजि कै दृग मेरे सुरङ्ग मैं पागे । प्रेम निवाहनो है अब स्याम सों कोऊ कितेक कहौ मम आगे ॥ सासु जि- ठानी रिसानी फिरौ सब लोग चवाव करौ अ- नुरागे । जो कछु होनी हुती सो भई अव होत सुगन्ध कलङ्क के लागे ॥ ३४ ॥ टोका । इस कवित्त में, नायिका ऊढ़ा है, उक्ति नायिका की है सखी प्रति, प्रेमवती है याते जाहिर किया, और अलंकार संसृष्टि है, अनुज्ञा ॥१॥ पूर्व रूप ॥२॥ विभावना ॥३॥ विशेषोक्ति ॥४॥ ये चारिअलं कार हैं ताते संसृष्टि, अनुग्या ल । होत अनुज्ञा दोष को जो लोज गुन मानि ॥ पूर्व रूप लक्षन । पूर्व रूप लै संग गुनि तजि पुनि अपनो लेतु ॥ दुजे गुन जब नामिहे किये मिन्तन के हेतु ॥ प्रति बंधक लक्षन । प्रति बंधक के होतहूं कारज पूरन मानि। निशि दिन श्रुति संगति तज नैन राग को खानि ॥ तीसरी बिभावना । विशेषोक्ति जो हेत सों कारज उपजै नाहिं। नेह घटत है नहिं जऊ प्रेम दीप चित माहि ॥
। । महेश्वरसुधाकर। पुनर्यथा। मौर भई प्रथमै जबते तबते मनमौज म- नोज मैं पागे । पातन मैं दुरि के कछु रोज सु- बातन सों प्रगटे रस जागे ॥ भे परिपूरन तू- रन जोग संजोग सों स्याम सुकोकिल दागे । देखिये बाल रसालन को कस होत सुगन्ध क- लङ्क के लागे ॥ ३५॥ टोका। इस कवित्त में नायिका मानिनी है। दूतौ को उक्ति है नायिका प्रति. मान छुड़ाय मिलाया चाहती है। औ रसाल आम औ रसाल नायक दूनो का रूपक है, श्लेष अलंकार है । लक्षण पूर्वोत कहा है। ३५॥ पुनर्यथा। रूप अनूप की रोशनी है बलि मेरी कही सुनि चित्त धरा करौ । उन्नत पीन उरोज स- रोज से दैपिय स्याम हिये को हरा करौ ॥ कं- चन सों तन पाय पिया परस्वारथ के पथ पै निसरा करौ। चाहत है धनी को सबही पै ग- रीबन हूँ पै निगाह जरा करौ ॥ ३६ ॥ टोका । इस कवित्त में, गणिका नायिका है। नायक को उक्ति नायिका प्रति, या सखौ को उक्ति है नायिका प्रति, सिक्षा संयुक्त सि- पारस है । और पर्यायोति अलंकार है। यथा ल । पर्यायोति प्रकार कछु रचना सों बात । मिसु करि कारज साधिये जो है चिते सो- हात ॥ इति भाषाभूषने ॥ ३६ ॥ - महेश्वरसुधाकर । पुनर्यथा। कुन्दन ते अति सुन्दर अंग सुरंग सुगन्ध की चाह करा करौ।लाल लसैं अधरादिक चारु सुमोतिन हाँस सुमाह करा करौ॥ स्याम पियारे तिहारे अधीन प्रबीन हौ प्रेम निबाह करा करौ। चाहत है धनी को सबही पै गरीबन हूँ पै नि- गाह जरा करौ ॥ ३७॥ टीका । इस कवित्त में गणिका नायिका है, सखी को उक्ति है नायिका प्रति, यहा नायक की उतिी है नायिका प्रति, सम प्रतोप अलंकार है। औ सम भेद रूपक अलंकार है। लखन । है रूपक है भांति को मिलि तद्रूप अभेद । अधिक न्यून सम दुहुन के तीनि तोनि सो भेद ॥ ७ ॥ समस्या -गरजीगरीबन पै गजबगुजार है। घनाक्षरी। अङ्ग-सुघराई लखि दामिनी दमक जाति नैन मृग कंज खंज बन्दन बिचारै है । आनन अमोल मन मोल लेत लाखन के चन्द छबि मंद समता न उर धारै है ॥ मदन उमङ्गन सों ग- हत गयन्द-गति स्याम रस रङ्गन के कौतुक पसारै है । अजब सीली गुन गन गरवीली बाल गरजी गरीबन पै गजब गुजारै है ॥३८॥ टीका । इस कवित्त में गणिका नायिका है। मध्या है नायक को उक्ति है। उपपति वैशिक नायक है। पञ्चम प्रतोप अलङ्कार है लक्षण । कहा कछु न पद दै जहां विषई व्यर्थ बखानि । विषै आदि रित को जिये पञ्च प्रतीपा मानि ॥ ३८ ॥ +mona महेश्वरसुधाकर । पुनर्यथा । मन्द मन्द चलति मनोज मदमाती महा मंजुल मरालन की गति मति हारे है । अङ्गन अभूषन अनूपम सँवारि स्याम बसन सुधारि मंजु आनन उघारै है। झुकि झुकि भूमि झूमि करति अनेक रङ्ग सखिन के सङ्ग छबि पुंजन पसारै है। नैनन नचाय कुचकोर दरसाय मुख- मोरि मुसकाय हाय गजब गुजारै है ॥ ३९ ॥ टोका। इस कवित्त में कुलटा नायिका है। नायक की उक्ति है। और समुच्चय अलङ्कार है। लक्षण । दोय समुच्चय भाव बहु कहुं एक उपजै सङ्ग । एक काज चाहै कखो के अनेक इक अङ्ग॥३६॥ पुनः समस्या-ले त लोभाने सवैया। श्रीषभानकुमारि कही कहँ आजु मिले पिय स्याम सुजाने । मौन भई. कस बोलत बैन न नैन तिरीछे करौ केहि लाने॥मानौं न मानौ सो जान्यो सबै अब होत कहा कहिये रिसि- याने । माल की छाप बिसाल हिये सो हरे हरे मो मन लेत लोभाने ॥४०॥ टीका। इस कवित्त में नायिका लक्षिता है । सखी की उक्ति नायिका प्रति पिहित अलंकार है । लक्षण । पिहित लिपो पर बस्तु को आनि देखावै भाव । प्रातहि आये सेज. पिय हँसि दाबति तिय पाय॥8. arendrara महेश्वरसुधाकर । अथ प्रबीन समस्या पर “आगुरिया जनिलाउ अंगारन"" सवैया। बंसी बजी जब स्याम सुजान की राधिका के जगे मोद अपारन । वाही संकेत गई सखि सङ्गन पायो हने सर मैन हजारन ॥ ठाढ़ी भई गहि किंमुक-डार विलोकि सखी सुलगी यौं पु- कारन । च्चै चलि हैं चुरियाँ चलि आउरी आँ- गुरिया जनि लाउ अंगारन ॥ ४१ ॥ टीका । इस कबिन में मध्या बिप्रलब्धा नायिका है । सखी की उक्ति है। नायिका प्रति, बिशेषोक्ति अलंकार है । लक्षण । बिशेषोति जो हेत सो कारज उपजत नाहिं । नेह घटत नहि है तज कामदीप चित माहि ॥ ४ ॥ पुनयंथा। बाल बिलोकन को गई बाग भरी अनुराग सोहाग सहेली।बेला गुलाब जुही गुल सोसनी सेवती सोनजुही बरबेली ॥ त्यों कचनार अ- नार अपार अनंग तरंग गई करिकली राधि- का यौँ मुसक्याय कही केहि कारन फूली फली न चमेली ॥४२॥ टीका। इस कबित्त में नायिका मध्या बिप्रलया है। नायिका को उति है मखी प्रति व्याजोक्ति अलंकार है। लक्षण । व्याज उक्ति कछु और बिधि कहै दुरै आकार। सखि सुक की हे कम ये मानिक जानि w-more---- महेश्वरसुधाकर। ६३ पुनर्यथा। बोली सखी सुख को सरसाय सुनौ सजनी यह बात पहेली। पै अपनी मति की अनुमान कहाँ जिय आवत जो वर हेली ॥ देति वियो- गिनि को दुख है पिय स्याम बिना किय काम कसेली। कोप सों श्राप दियो तेहि को यहि कारन फूली फली न चमेली ॥ ४३ ॥ टोका। इस कबित्त में नायिका मध्या प्रोषितपतिका है। सखी को उक्ति है नायिका प्रति काव्यलिंग अलंकार है। तयथा लक्षण दोहा । काव्यलिंग जब युक्ति सों अर्थ समर्थन होय । ता को मैं जोयो मदन मो हिय में शिव सोय ॥ ४३ ॥ पुनर्यथा। कुंजन ओरहिं जात हुती चलि आई इतै अ- तिसै सुख जानो । व्यालिनिबेनी बिलोकत मोर चकोरन हूँ मुखचन्दहि मानो । व्याकुल चोचन मारि कियो जो दियो दुख सो किमि जात ब- खानो। नन्दलला नहिं जो मिलतो मिलतो न सखी कहँ मोर ठिकानो ॥४४॥ टोका। इस कबित्त में नायिका रूपगर्वितान्तरगत गुप्ता है बर्तमान नायिका को उक्ति है दूसरो नायिका सों । जिसने देखा है उसी से । संसृष्टि अलंकार है। छेकापन्हुति ॥ ॥ व्याजोक्ति ॥२॥ श्रम ॥३॥ ल. छेकापन्हुति जुक्ति करि पर सो बस्तु दुराइ । । व्याजोक्ति कछु और विधि क है दुरै आकार । सदृश रूप कछु देषि के भ्रम सों समुझ और । भ्रांति क्रिया सों क हति है सकल सुक बि सिरमौर । । - व्या. ल .
महेश्वरसुधाकर । पुनर्यथा । बेनी लसै यह स्याम न पन्नगी मोर महा भ्रम सों झहरावै । हैं अधरारुन बिम्ब न ए शुक क्यों श्रम आनि इतो छहरावै ॥ लोचन कों अलि अम्बुज जानि सुभूलै इतै न चितै थह- रावै । आनन है न सुधाकर-बिम्ब चकोर तू चोंच कहा ढहरावै ॥ ४५ ॥ टोका । इम कबित्त में रूप गबिता नायिका उति नायिका को। मोर सुक चकोर प्रति है ओ भ्रमालंकार है औ परजायोति है ॥४५॥ पुनर्यथा। प्रेमपगे मनिहार निहारि सुजानि अंगार लगे लहरावै। पानिप ओठन को है पियूष न घेरि हमारो हियो हहरावै ॥ स्याम जू क्यों मद जोबन जोर भए बरजोर छके छहरावै । आनन है न सुधाकर-बिम्ब चकोर तूं चोंच कहा ढ- हरावै ॥४६॥ टोका । इस क बिन म सबै लक्षण पूर्वोक्त है सिर्फ उक्ति केवल च. कोर प्रति है ॥ ४६ ॥ यथा घनाक्षरी। अङ्गन में अङ्गराग रंजित कर मो महा मोद सरसावै सो न लावै नेक कर पै । सारी जर- तारी ऑगी मोतिन सँवारी प्यारी सखी पास
६५
महेश्वरसुधाकर ।
वारी कामदारिन को अर पै ॥ अजब अनोखी
बाल कंचन लतासी खासी हाँसी खुसी ख्याल
सों दुरावै देह दर पै। तेवर भई है कहा नेवर
निहारि अरी जेवर न जेब अहै कुसुम कले-
वर पै॥४७॥
।
टोका। इस कवित्त में रूप गबिता नायिका है। सखौ की उक्ति
है सखी प्रति और व्याघात सरा अलंकार है । लक्षण । व्याघात जु
कछु और ते कोज कारज और । बहुरि बिरोधा तेज वै काज ल्याइये
ठौर ॥ ४०॥
पुनर्यथा मवैया ।
साँझ समै सब घेरि लियो है चहूँ कितते
सखियाँ समुदाई । मध्य मे राजै मयङ्कमुखी
सुखमा मुख एक सकै किमि गाई ॥ स्याम समै
सजि मालिनिया बहु रङ्ग सुरङ्ग प्रसून लिआई।
राधे सुजान लई हँसिकै पै गुलाब-कली लखि
के रिस छाई ॥४८॥
टोका । इस कबित्त में स्वकीया प्रौढ़ा रतिप्रीता नायिका है । ना
यिका को उक्ति मालिनी प्रति कोप में व्यंग है, याने गुलाब की कली
प्रात काल जनावैगी। प्रात, काल गुलाब की कली चटकती हैं कली
खिलैगी अतएव कोप किया। जुक्ति अलंकार है । लक्षण । अहै जुक्ति
कौन्हें क्रिया कार्य छिपायो जाय । पौय चलत आँसू चले पोंछति नैन
।
जाय ॥४८॥
महेश्वरसुधाकर ।
पुनर्यथा ।
मो घर आये प्रभात पिया अलसात है गात
करौ जनि ओटैं। रैन जगीले रँगीले सुनैन धेरै
मन मैन कलङ्क की मोटें ॥ भाल महाउर अं-
जन स्याम मनोहर मोतिन की उर जोटें। लाल
बने हौ बिसाल महा मति मारिये मोहिं नई
नई चोटें ॥४९॥
टोका। इस कवित्त में खण्डिता नायिका पिहित अलंकार है ल.
क्षन पूर्वोत है ॥ ४८॥
पुनर्यथा घमाचरी।
आइये रँगीले बने मोहन छबीले भले ढीले
क्यौं लखात नेक पाग तौ सिधाइये। जागिहै
हमारी भागि यामे ना तुह्मारी लागि सौति सङ्ग
रौनि जागि आगि ना जगाइये ॥ छाप दई ठौर
ठौर आप के सुअङ्ग अङ्ग नीके हौ सलोने लाल
लोचन लोभाइये । जाइये पियारे स्याम प्यारी
इन्तजारी करी बात मै लगाय ताहि गात में
लगाइये ॥ ५० ॥
टोका। इस कवित्त म नायिका मध्या धोरा है । नायिका की
उति है नायक प्रति जो कहौ को खण्डिता क्यों नहीं ! सो खण्डिता
में दुःख प्रधान है। सी इसमे दुखी नही है। व्यंग ! व्यंग से कोप मात्र
जनावती है। अतएव मध्या धीरा है पिहित अलंकार है लक्षण । पू.
बौता कहि आये हैं ॥ ५० ॥
। महेश्वरसुधाकर। पुनर्यथा। जोहत रसीले नैन सोहत लजीले लाल ढीले पाग पेंच पाय काके परि आये हौ। अंजन अ- धर भाल जावक बिसाल पर परत उताल अङ्ग अङ्ग छवि छाये हौ ॥ जागे रैन रङ्ग मै अमोल मोल कहै कौन प्रात दै दरस स्याम मो मन लोभाये हौ । मोतिन की माल बिन गुन की रसाल पैन्हि आये नंदलाल न दलाल सङ्ग लाये हौ ॥५१॥ टीका । इस कबित में नायिका प्रौढ़ा धीरा है । उक्ति ना. यिका कौ नायक सों हैं। और पिहित अलंकार है। लक्षण । पिहित छिपी पर बस्तु को आनि दिखावै भाइ । प्रातहि आये सेज पिय इसि दावति तिय पाइ ॥ ५१ ॥ पुनर्यथा । बसि के रजनी सजनी सँग मैं पिय प्रातहि आनि जोहारा हमै । मणिमाल लसै उर बेगुन की निरखे दुख देति अपारा हमै ॥ बरसैं अँ. सुवा इन नैनन ते गुन स्याम न ऐसे गवारा हमै । हित के मिलिये नित सौतिन सों दिल दीजिये प्यारे हमारा हमै ॥ ५२ ।। टोका। इस कबित में प्रौढ़ा खण्डिता नायिका है । नायिका को उक्ति नायक प्रति है। और अक्षेपा अलंकार दूसरा भेद है । लक्षण । ।
RE महेश्वरसुधाकर । तौनि भांति अक्षेप है एक निषेधाभास । पहिले कहिये आप कछु बहुरि फेरिये तासु । जुरै निषेध जु बिधि बचन लक्षन तीन्यौ लेषि । हौ नहि दूतो अगिनि ते तिय तन ताप विशेषि ॥ ५२ ॥ पुनर्यथा। मुख पेखन हेत सुतन्त्र रहैं सुबसीकर मंत्र पढ़ावत से । सखियान में नेक लजात नहीं ब- तियाँन मे प्रेम बढ़ावत से ॥ दिन रैन हूँ स्याम सुचैन लहै छबि मैन रती को चढ़ावत से । ज- बते बलि गौनो लिआये लला तबते रहैं सोनो गढ़ावत से ॥ ५३॥ टोका। इस कबित में नायिका स्वाधीनपतिका है । सखी की क्ति है सलो प्रति । गुन ते गुन नायिका के गुन ते पति को गुन - मान मनकार है। लक्षन । गुन औगुन जब एक ते और धरै उ मास । हाय संत पावन करें गंग धरै एहि आस ॥ ५३ ॥ पुनर्यथा। बज के धन कुंजन पुंजन मै येहि जीवन जीवन देवो करौ । दुखदाई चवाइनै बैर परी तिन की विष डीठि बचैबो करौ ॥ बिन देखे तुझै नहिं चैन परै घनस्याम छटा दरसैबो करौ। मुसकैबो करौ न चितैबो करौ न गलीन है मो- हन अबो करौ ॥ ५४॥ टोका। इस कवि त में परकीया स्वाधीनपतिका है। उक्ति नायिका को है मित्र प्रति । आक्षेप अलङ्कार है। लक्षन । तौनि भांति अक्षेप है महेश्वरसुधाकर । एक निषधाभासु । पहिले कहिये आप कछु बहुरि फेरिये तासु ॥ जुरै निषेध जु बिधि बचन लक्षन तोन्यौ लेषि । हौं नहि दूतो अगिनि ते तिय तन ताप बिशेषि ॥५४ ॥ पुनर्यथा । यह प्रेम लगो तुम मै दिनरैन सुचैन नि- बाहनो दैबो करौ। कुलकानि की आनि अनैसी दई दई स्याम सुधीर धेरैबो करौ ॥ सब गाँव चवाव के नाँव धरै तेहि ते रसरीति छि- पैबो करौ । कहिए किहि भाँति न जाति कही न गलीन है मोहन अबो करौ ॥ ५५ ॥ टोका। इस कबिन में परकौया स्वाधीनपतिका नायिका है। नायिका को उक्ति है मित्र प्रति । आक्षेप अलङ्कार है । स्वक्षन । तोनि मांति आक्षेप हैं एक निषेधाभास। पहिले कहिये आप कछु बहुरि फेरिये तासु ॥ जुरै निषेध जु बिधिबचन लक्षन तीन्यौ लेषि । इत्यादि ॥५५॥ पुनर्यथा। पिय पाय के रूप अनूप महा मति मान मतो दरसैबो करौ। तन बारिद प्रेम पयोनिधि ते बर वैन सुधा बरसैवो करौ ॥ जिय जानि अधीन है स्याम पिया रस रीति सदा सरसैबो करौ । मुसकाय चितै अपनाय हमै हित के न इतो तरसैबो करौ॥ ५६ ॥ टीका । इस कबित्त में माननी नायिका है। उक्ति सखी की नायिका सों शिक्षा करे है। यहा नायिका को उक्ति है नायक प्रति पर्यायोक्ति १०० महेश्वरसुधाकर। अलङ्कार है तथा समभेद रूपक है। लक्षन पूर्वोक्त है । पर्यायोक्ति प्र कार है कछु रचना सों बात। मिस करि कारज साधिये जो है चित पुनर्यथा । मुख कोमल कौंलन की छवितै फविरौं नहिं बोलत लाल को हौ । धनस्याम सरूप अनूप बनो अरु बानो बनाये दयाल को हौ ॥ रस दीन अधीनन मीनन के मनमोहन मोहन जाल को हो । बनितानि के मारत नैन के बान ब- हानी बतावत काल को हौ ॥ ५७ ॥ टीका । इस कबित्त में सखी की उक्ति है नायक प्रति, उपालंभ है। उराहनो है। दूसरौ बिभावना अलङ्कार है। लक्षन । होड छ भांति बिभावना कारन बिनहीं काजु । बिन जावक दीन्हे चरन अरुन लषे हौं आजु ॥ हेतु अपूरन ते जबै कारज पूरन होइ । कुसुम बान कर गहि मदन सब जग जीत्यी सोय ॥ ५७ ॥ पुनर्यथा। हँसि हेरि इतै अपनाय मनै हित के कत रोस बढ़ावती हौ । कुच तुङ्गन पै कसि कंचुकी को मनु केलिकलानि पढ़ावती हौ ।तन पानिप प्यासे प्रबीनन को गुन बाँधि करेजो कढ़ावती हो । सर बेधि सुनैनन के उर मै पुनि भौंह कमान चढ़ावती हौ ॥ ५८ ॥ सैका। इस कबित में मानिनौ नायिका है। नायक की उक्ति है महेश्वरसुधाकर। नायिका प्रति कमान रूपी भौंह को चढ़ाय बान सम नैन मेरे हिये में बेधि दियो । अब पुनः भौंह क्यों कमान रूपो तानती हौ। एक बार के मारे को फेरि मारिबे को इरादा मत करौ । प्रमान । मुये बधे नहि कछुक भलाई । सम भेद रूपक अलंकार है, लक्षन । पूर्वोक्त ही जानिये ॥ ५८॥ पुनर्यथा। मधुरी बतियान मै मोहि लियो मन मौज म. नोज जगावती हौ । छतियान छुवै छिन देती हमै कलपाय कहा कल पावती हो। मिलिये नित स्याम सुजानहि सों रस रङ्ग सु अङ्गन भावती हो । सर बेधि सु नैनन कै उर मे पुनि हाय हिये नहि लावती हौ ॥ ५९॥ टोका। इस कबित्त में भी वही मानिनी नायिका है। नायक को उक्ति है, नायिका प्रति और वही बात सब है अलंकार व्याघात है । लक्षन । ध्याधात जु कछु और ते कोजै कारज और । बहुरि विरोधी ते जबै काज ल्याइये ठौर ॥ सम भेद रूपक भी है। लक्षन पूर्बोला ॥५॥ पुनर्यथा। अंग अङ्ग अनङ्ग तरङ्गन सों सुखमा सर- साय मनौज करी । गुन गौहर माल बिसाल महा दुति नैनन लै नकसे मै धरी ॥ कुच तुङ्ग लखे द्विज स्याम कहै थिर चित्त रहै नहिं एक घरी । हँसि हेरि जकै उझकै न रँकै झुकि झू- मती प्रेम नसे सों भरी ॥६०॥ --- महेश्वरसुधाकर। टीका इस कबित्त में नायक की उक्ति है उपपति नायक है । प्रौढ़ा नायिका है ॥ ६ ॥ पुनर्यथा । धनु भौंह सुनैनन के सर सों हनि सैनन कीन सहारा हमै । मुसकानि बसीकर सी द- रसी सरसी छबि मैन संवारा हमै॥करि प्रीति करौ अनरीति कहा दुख देत मनै न बिचारा हमै। मिलि लीजिये अङ्क लगाय न तो दिल दीजिये प्यारी हमारा हमै ॥ ६ ॥ टोका। इस कबित्त में उपपति प्रोषित नायक है । अथवा नायक की उक्ति है । प्रत्यक्षहो नायक को कहत है । मानिनी नायिका है। उपालंभ भी है। बिभावना अलंकार । लक्षन पूर्वोत है। होइ छ मांति बिभावना कारन बिनहीं काज। बिन जावक दीन्हे चरन अरुन लखो हो पाजु ॥ ६ ॥ पुनः कुण्डलिया। राधे तुह्मरे दरस बिन आधो रह्यौ शरीर । कौन सनै कासों कहाँ को जानै यह पीर । को जानै यह पीर वीर कोऊ नहिं वारै । कासों कहीं पुकारि जौन मम सोच निवारै ।। बरनै स्याम सुजान प्रान राखौं केहि साधे । होत महा परिताप आप के बिन अवराधे॥ टोका। इस कुण्डन्निया में प्रोषित बिरही नायक है । उक्ति स्वयं नायक को है पत्र द्वारा करिक। बिरह की विह्वलता जनावै है । वि. ।
महेश्वरसुधाकर।
नोक्ति अलंकार है । लक्षन । है बिनोक्ति है भांति को प्रस्तुति कछु
इक छोन । अरु शोभा अधिको लहै प्रस्तुत कछु इक हौन ॥ ६२ ॥
पुनर्यथा नेत्र बन्न कबित्त घनाक्षरी।
अजब रसीले अरसीले त्यौं लजीले चारु
कमल सजीले सम है न अजरानी के। चंचल
नुकीले चटकीले दरसीले चैन सैन सरसीले
मौज मैनराज-रानी के ॥सेत रतनारे अनि-
यारे कजरारे बड़े प्यारे मतवारे मीन मृग नज-
रानी के । कहत बनै न मैनका के सने मैन असे
स्याम सुखजैन हैं सुनेन बजरानी के ॥६३॥
टोका। इस कबिन में नेत्र को बर्नन है। उति नायक की है।
नायिका के नवन को अबलोकन करिकै बनन करै है । और सखौ
को भी उक्ति है। पञ्चम प्रतीप अलंकार है, लक्षन । व्यर्थ होय उपमान
जब बननीय लखि सार । दृग आगे कछु मृग न ये पञ्च प्रतीप प्रकार ॥
पुनर्यथा घनाक्षरी ।
आबदार अजब रसीले अरसीले बड़े चंचल
सजीले मृग मीन की न चेरे हैं। प्रेम दरसीले
स्याम रङ्ग मै रँगीले लाल गुन गरबीले रति
रम्भा के न हेरे हैं ॥ खंजन लजीले से पराने
मरजीले बन बारिज रजीले लिए बारि मै बसेरे
हैं। गजब गसीले मैन सैन सरसीले झुकि झूमत
नुकीले ए नसीले नैन तेरे हैं ॥ ६४ ॥
महेश्वरसुधाकर । दोहा। चञ्चल नैन नचाय कै मो मन लियो चुराय । चन्दमुखी मुसकाय घर चली बात बहलाय ॥ टीका । इस दोहे में उपपति नायक है। और उपमा अलङ्कार है। लक्षन उपमा सट्टस जान, स्वभावोक्ति भी है ॥ ६४ ॥ दोहा । हरिन हेरि हारे हिये दिये मीन जल ऐन । कंज खंज बारिज किये अजब रसीले नैन । टीका । इस दोहे में मुग्धा नायिका है। सखी को युक्ति है। पंचम प्रतीप अलङ्कार है । ६५ ॥ दोहा। देत दुसह दुख देखतै अमल कमल सम नैन अनियारे बेधत हिये परत नेक नहि चैन । टीका। इस इस दोहे में उपपति नायक है उपमा अलङ्कार है। दोहा। चितये उर में चाह अति बिन चितये उर दाह। चितए तेंचित करिरहे चिन्ता चित्त अथाह ॥ टोका । इस दोहे में भी उपपति नायक दीपकात्ति अलङ्कार दोहा। अनियारो प्यारो महा कहा कमल को आब । शीलभरी शोभाभरी जादूभरी जनाब ॥ टोका । इस दोहे में नेत्रन को वर्णन है।दूती को उक्ति है नायक रुचि उपजाती है पंचम प्रति अलङ्कार है लक्षन । व्यर्थ होइ उपमान जब बननीय लखि सार। दृग आगे जछु मृग न ये पञ्च प्रतीप प्रकार ॥ ।
महेश्वरसुधाकर । दोहा। तुमको बिन देखे हमै नेक परत नहि चैन । बनती सुनिये करि दया दीजै हरसन बैन ॥ टोका। इस दोहे में प्रेमासक्त है। उक्ति नायिका को है । नायक सो क है है। यहा नायक को उति है। नायिका प्रति स्वाधीन है। नायिका सों कहै है ॥ चितचाहत हमतुमहि को तुमचितवत इत नाहिँ। चित कठोर करिकै कहा कल पावत मन माहि । टोका। इस दोहा में भी वही भाव है। नायिकालझार है ॥ पी आगम सुनि बाल के सरस्यौ प्रेम अपार । भीतर व्है देखन लगी खले अधखुले द्वार ॥७॥ टोका। इस दोहा में आगतपतिका नायिका है। सध्या प्रथम भेद प्रहर्पण अलङ्कार है। जो अपने जी की कहैं है न नजीकी कोय । याते मनही में समुझि रहें यादि करि रोय ॥ टोका। इस दोहा में बचनविदग्धा नायिका है । गूढोक्ति अलङ्कार है नींद छुधा तन में नहीं नहीं नेक मन धीर । प्यारी तुम्हरे बिरह में निमुदिन हटत न पीर ।। टोका। इस दोहा में उपपति, नायक प्रोषित है बिरह कथन सों सुमिरन अलङ्कार है। आह रहै निसिद्योश हूँ दाह झरे अति देह । कौन सुनै कासों कहीं को जाने यह नेह ॥७३॥ टोका । इस दोहा में परकीया खलिता नायिका है दुख से पि- हित अलङ्कार है। -- महेश्वरसुधाकर । पहिलेही करिबो रह्यो नहीं प्रेम सों चाह । करिकै पुनि प्यारी तुम्है करिबो है निरबाह ॥ टोका। इस दोहा में उपपति नायक प्रोषित है बिरह कथन मो सुमिरन अलङ्कार है। दुरै न अंचल ओटहूं चख चंचल कुच कोर । अनिआरे बेधत हिये लखत लगे हूँ थोर ॥७५॥ टीका। इस दोहा में उपपति नायक कुलटा नायिका है। धुनर्यथा सवैया । अब चाव चवायनै चाहै करै रस चाखिबो है मुखकंदन को । कुल कानि की संक न नेक करें अखियाँ लखि कै जगबंदन को ॥ बदनाम चहै टजगाँव करै हम छाडि दियो भ्रम फंदन को । हिय में रमे स्याम सुजान सखी मन तौ व्है चुक्यौ नँदनंदन को ॥ ७६ ॥ टीका। इस कवित्त में अढ़ा नायिका है । नायिका की उक्ति है सखी प्रति, तोसरी बिभावना अलंकार है। लक्षन । प्रतिबन्धक के होत हो कारज पूरन मानि। निसि दिन श्रुतिसंगति तज नैन राग को खानि ॥ पुनर्यथा घनाक्षरी। आज सखि भोर लखि नंद को किशोर स्याम तामरस छाम छबि खंजन चकोर की। कुटी मरोर चल्यौ कुंजन की खोर मोर चलत महेश्वरसुधाकर । न जोर हन्यौ सैन उर छोर की ॥ध्यान ओहि ओर ज्ञान गहत न थोर कुलकानि झकझोर कै बँधी हौं प्रेम डोर की। मैन की मरोर कैसी बढ़ति अथोर थोर ऐसी नैन कोर बरजोर चित- चोर की॥ ७७॥ टीका । इस कवित्त में अढ़ा नायिका है। नायक को उक्ति है सखौ प्रति तामरस जो कमल है ताकी शोभा छाम । खञ्जन चकोर की शोभा छाम है, याने कम है। इस पद से पञ्चम प्रतीफ अलंकार भयो लक्षन । व्यर्थ होय उपमान जब बननीय लखि सार। दृग आग कछु मृग न ये पञ्च प्रतीप प्रकार । पुनर्यथा । खान औ पान करै न कछू सखियान की सीख सुने अनखाति है। स्याम बिलोकि निकुंजन मैं भई बावरी सी यों दसा दरसाति है ॥ बेसुधि बीर बिकानी मनौ मनमौज मनोज विथा न स- माति है। भामरी देत फिरै बिन काम री कामरी वारे पैका मरी जाति है ॥ ७८॥ टोका । इस कवित्त सखी को उति है।नायिका प्रति शिक्षा क रती है। नायिका नायक के रूप पै पासत है। जमकालंकार है। पुनर्यथा । जनक सुबाटिका में बिहरै सुमन लेत सम्म छबि हेरी है अनङ्ग रङ्ग रितवनि । अरबिन्द अ- M १०८ महेश्वरसुधाकर । मल मुखारबिन्द नीको महा जैन मृग खंजन सु- मीन कीन रितवनि ॥ परम अन्य स्यामसुन्दर सरूप मोहिं पन सर सैन मारि लीन्यो चैन जितवनि । जी मै बनी जो वाली अंजुल मरोर- वारी धन्य वह कोशल-किसोरवारी चितवनि ॥ टोका । म कजिन में उति सखो को सखो प्रति है। पुनर्थथा। रतनरिहासन विराजे छवि अना राम बोले मंजु बैना विसरै ना हेरि हितवनि । करिकै क- लेऊ पान खात मन्द मुगकात मोहै सखी सङ्ग सिद्धि सुखमा अमितवनि ॥ विविधि बिलास हास होत रसरास स्याम नैन बान लागे बाम चित्त की न थितवनि । ऑनद अरोरवारी म- दन मरोरवारी धन्य वह कोशल-किसोरवारी चितवनि ॥ ८० ॥ पुनर्य था। जोबन रूपवती जवती रज मैं एक तू सी तुही दरसाति है। प्रेम पतिव्रत पालिवे को द्विज स्याम सुबेद बद्यौ बहु भांति है। सोजिय जानि अपानि महा मति हानि करै कुल कानि अराति है। बामरी काम री कीन्हें कहा अरी कामरीवारे पै का मरी जाति है ।। ८१ ॥
महेश्वरसुधाकर। १०६ । टीका । इम कबित में भी वही बात है। सखी को उक्ति है नायिका प्रति नायिका नायक के रूप पै आसक्ता है सो सखी सिक्षा करती है। प्राकृति अलंकार है। लक्षन । आहति पद की होय। इत्यादि पनर्यथा। तब तो पल चेन परै न उन्हें लखिवे को हमै पिय प्यारे फिरें । करिकै मिसु गोरस के रस को सु गली भली स्याम निहारे फिर ॥ पटपीत सु मोरपखा श्रुति कुंडल काछनी चारु सँवारे फिरें । अब कूधरी साति व्है कै लटू तेहि ते कर कुबरी धारे फिरें ॥ ८२॥ टोका। इस कबिल में नायिका परकीया प्रोषितपतिका है । ना. यिका को उति है सखो प्रति बा अन्य प्रति । श्री कृष्णचन्द जी कूबरौ सौति पर लटू याने प्रसन्न याते हाथ कूबरौ छरौ लिये फिरते हैं। औ कूबरी कंस को दासी नाम याते उपादान लक्षना है। और कायलिंग अलंकार है। लक्षन । काव्यलिंग नब जुक्ति सो अर्थ समर्थन होय । मैं तोको जोत्यो मदन मो हिय में शिव सोय । पुनर्यथा। बौरे रसाल घने बिलसैं अलि उंद अनंद भरे उर आली ।माती सुकोयल बोलि रही पुनि पेखि पलास गुलाब बहाली॥ डारन पत्र नये उलहे सु- लहे मन मौज मनोज बहाली। भावै सखी सुखमा मन को बन बागन कैसी बसन्त मैं लाली। टोका। इस कबित्त में मानिनी है सखी अभिसार करायो चाहती है परजायोक्ति अन्न कार है। लक्षन पूर्वोक्त है। - महेश्वरसुधाकर। पुनर्यथा । मंद सुगंध समीर लगै सु जगै अँग अँग अनंग बहाल । आब गुलाबन की दरसै सरसै पुनि पेखि पलास खुसाली॥ भौर पिकीरव स्थाम सुने बनि बौरे रसाल बिराजत आली। मो मन के अनुरागन को बन बागन कैसी बसंत में लाली॥ टोका। इस कबिन बचनबिग्धा नायिका है। पर्यायोक्ति वा गू. ढोक्ति अलंकार है। समस्या--हल्यो जात मदन मतङ्ग मानसर में घनाक्षी। प्रेम परिपूरी परी पगन सुआँदू महा रुकत न नेक तऊ तेरे मग भर मैं । झूमत झुकत चाल आवत चलो है इतै तोरत द्रुमन घनस्याम अङ्ग पर मैं ॥ करि अनुराग रङ्ग बाल तें बि- लोकै अब कहत न मोसों बनै हाल येहि थर मैं । गल्यो जात ज्ञान गुन अंकुश न मानै अरी हल्यो जात मदन मतङ्ग मानसर में ॥ ८५॥ टोका। इस कवित्त में मानिनी नायिका है सखौ को उक्ति है। नायिका प्रति शिक्षा है। या उपालंभ है। और काम का औ मतंग का रूपक है। नायिका को मान रूपी सर तामै नायक का काम मा. तंग रूपी हिला जाता है। अर्थात मान छड़ाये देत है। सखी कहती है को तेरा काम मातंग रूपो है । सो देखु तेरे मान रूपी सर तालाव में हिला जाता है। अतएव मान तेरो नही रहेगी। भय दरसाय मि महेश्वरसुधाकर । लाया चाहती है। छल सों कार्य साधती है। ताने पर्यायोक्ति भी है। औ समाभेद रूपक है। लक्षन “पर्यायोति प्रकार के कछु रचना सों बात । मिस करि कारज साधिये जोहै चितै सोहात ॥ है रूपक है भांति को मिलि तद्रूप अभेद । न्यून अधिक सम दुहुन के तोनि तौनि ये भेद ॥ पुनर्यथा। छल्यो जात छल सों छपाये कुच कुम्भन को दल्यो जात द्रुमन लताली अङ्ग भर मैं। पल्यो जात परम प्रबीन प्रन तेरो इतै जल्यो जात सौति सनमान गण्ड थर मैं ॥ मल्यौ जात सु- मन सरोज ओजवारो स्याम झल्यो जात बारि बर नैन बारि तर मैं । चल्यौ जात हूलत महा- उत सुअंकुश त्यों हल्यौ जात मदन मतङ्ग मा- नसर मैं ॥ ८६॥ टोका। इस कबित्त में भी येही नायिका अलंकार है। यात फेरि नहीं लिख्यो। पुनर्यथा। आदर सों ससुरारि मै स्याम सुचन्दमुखी सन प्रीति बढ़ाई । चाहत हैं चलिबे को जब सुघरी सुनि सोचत लोग लोगाई ॥ प्यारी सु- जानि महा छबिखानि सों मागत हैं सुबिदा उर लाई । नैनन सों सरिता उमहै मिलि दो- उन की बहि जात बिदाई ॥ ८७ ॥ .
महेश्वरसुधाकर । टोका। इस कबित्त में नायिका प्रौढ़ा प्रबस्यतप्रेयसी है। कबि की उक्ति है। वा सखो को, व्याघात अलंकार है। लक्षन । व्याघात जु कछु और ते कोजे कारज और । बहुरि बिरोधी ते जबै काज ल्याइये ठौर ॥ और चपलातिसयोक्ति भी है। लक्षन । चपलात्युक्ति जु हेतु के होत नामही काजु । कंकन ही में मुद्रिका पोय गमन सुनि आशु ॥ पुनर्यथा। जाकी मुख मंजुतामयङ्क सकलङ्ककियो नैन अरबिन्दन दियो है बास पानी को। भृकुटी अ- नङ्ग चाप नासिका सुबोल सुक कोकिल लजाय बन जाय कहै बानी को ॥ जोति जोतिवंतन को जग प्रगटायो महा मोहनी सुदासी सुरसुन्दरी कहानी को। बानी के ननन हैं न नैनन के बानी कही कैसे के बखानी रूप राधा महरानी को । टोका। इस कबिल में रूप मात्र को बर्नन है। सो नायिका मात्र जानौ । और उक्ति सखौ को होय तौ उपालंभ है। औ नायिका दूसरी को उति होय तौ या कवि की उक्ति से। तौ पञ्चम प्रतीप औ संभा. वना अलंकार है। लक्षन। व्यर्थ होय उपमान जब बर्ननीय लखि सार। दृग आगे कछु सग न ये पञ्च प्रतोप प्रकार ॥ संभावना लक्षन । जो यों हो तो यों कहत संभावना बिचार । बता होतो शेश जो तो गुन लहतो पार॥ पुर्नयथा । सुखमा महानी जग जाहिर बखानी वेद गुन गन गानी सो न जानी मति मानी को । उमा रमा रानी जेहि अति हित जानी सची से- - महेश्वरसुधाकर। वत सहानी सदाँ स्याम सुखदानी को ॥ उपमा जो आनी तिहुँ लोक में न जानी लखे बानी स- कुचानी मन मुदित महानी को । बानी के न नैन हैं न नैनन के बानी कहाँ कैसे कै बखानी रूप राधा महारानी को ॥ ८९॥ टोका । इस कवित्त में पूर्वोक्त सब बात है। पुनर्यथा। वै उनके गुन सों अनुरागत वै उनको मन मोल लयोरी।वै उनके अंगराग स तन वै उनकी छवि में छकि गोरी ॥ स्याम सुराधिका की सुखमा उपमा कहिवे की नहीं मति थोरी। मो मन मन्दिर मै थिर है चिरजीवै सदैव म- नोहर जोरी ॥ ९० ॥ टोका। इस कवित्त में कबि को उक्ति है अन्योन्यालंकार है ल क्षण । अन्योन्यालंकार सों अन्य उन्य उपकार । और रूपक भी है, ल. क्षण । है रूपक है भांति को। पुनर्यथा सबैया। काम करोरिन की सुखमा उपमा लखि स्याम की है मति भोरी । त्यौं रति की सत कोटि छटा कृषभानसुता छबि की सम थोरी । मोहन रा- धिका की समता कहिये केहि आनन कान सु- १५ महेश्वरसुधाकर । नोरी । मो मनमन्दिर में थिर है चिरजीवै स- दैव मनोहर जोरी ॥ ९१ ॥ टोका। इस कवित्त में कवि की उक्ति है यहा सखी की उक्ति या दास कौ; पञ्चम प्रतीपालंकार है । लक्षण । वृथा होय उपमान जब वर्णनीय लखि सार । दृग आगे कछु मृग न ये पंच प्रतीप प्रकार ॥ है रूपक है भांति को.॥ सिद्धि श्रीमन्महाराजाधिराजराजराजेन्द्रमुकुटमणि रामपुराधिपति रैकवारकुलकमलदिवाकर श्रीगुमानसिंहात्मज श्रीमहेश्वरबक्ससिंह ब. हादुर जू देव को आज्ञानुसार श्री पण्डित स्यामसुन्दर अश्वनीनगर नि- वासो महखरसुधाकरग्रन्थविरचिते बननो नाम नवमस्तरङ्गः ॥ ८ ॥ इति शृङ्गाररस । अथ हास्यरस लक्षन दोहा । सुरस हाँस्य रस श्वेत कहि बायु देवता मानि। थाई हाँस कुरूप कछु कूद बिभाव सुजानि ॥१॥ उत्तम मध्यम अधम सो त्रिबिधि अहै अनुभाव । खुसी चपलता अपर है संचारी तहँ भाव ॥२॥ भेद द्विबिधि कबिबर कहत है स्वनिष्ट परनिष्ट । सुस्मित अरु उपहँसित पुनि ऊँचे स्वरन बरिष्ट ॥ तस्योदाहरण घनाक्षरी। फागुन में कोऊ गोप मद मै सुछाको महा स्वाँग बनि आयो मुख कारिख लगाय कै। पोल ढोल सिर पै अजूबा स्याम सोहै बेष लीन्हे कर मूसल कपाल छबि छाय कै ॥ कूदत समाज महेश्वरसुधाकर । मध्य जीरन बसन अङ्ग बोलै रङ्ग सङ्ग मन मोद सरसाय के। नृत्य करि गावत चलावत सुनैन सैन हेरि हँसें गोपी गोपही मै सुख पाय कै ॥४॥ टोका। इस कबित्त में कबि कौ. उक्ति है यहा सखी की उति है सखी प्रति और पर्याय अलङ्कार है और विदूषक सखा है । पर्याय ल. हे परजाय अनेक को क्रम सों आश्रय एक। फिर क्रम ते जब एक वह पाय धरै अनेक ॥ इत्यादि ॥४॥ पुनर्यथा । बूढो बैल बाहन विभूषन बिभूति ब्याल उर मै कपाल माल नैन ज्वाल जरतो। भाँम औ धतूरा कालकूट संखिया को खात दोख के दिगम्बर न दम्भर ठहरतो ॥भूत औ पिशाच संग रहत मसानबास ऐसो सुनि कौन जौन त्रास मे न परतो। सुनिये पुरारि हँसि गिरिजा- कुमारि कहै हम जो न बरती तुम्हें और तौ न बरतौ ॥५॥ टोका। इस कवित्त में कवि को उति है और पारबती जी को उक्ति है महादेव प्रति, और विषम अलङ्कार है और ब्याज जिंदा स्तुति अलङ्कार है और रसवत भी है। लक्षण । विषम अलङ्कत तीन बिधि अनमिलते को संम । कारण को रंग और कछु कारज और रंग ॥ ५ ॥ पुनः यथोत्तर । लाले नैन श्रोणित से मद मै सु माते महा महेश्वरसुधाकर । रूप बिकराल देखि धीर कौन धरतो । सिंह की सवारी करबाल मुण्डमाल कर खप्पर त्रि- शूल चक्र चक्रित है डरतो॥ रंग रंग जोगिनी उमङ्ग सङ्ग बैन सुनि ब्याह को उछाह भलि मन मे न करतो। हँसिकै पुरारि कहें गिरिजा- कुमारि सुनौ हम जो न बरते तुमै और तौन बरतो ॥६॥ टोक । इस कवित्त में भी वही सब वात है कवि की उक्ति महादेव जी का उतर है पारवती प्रति । ब्याज निंदास्तुति अलङ्कार है बिषमा लङ्कार भी है। लक्षण । व्याजस्तुति निंदा विषे जहां बड़ाई होहि । स्वर्ग चढ़ाये पतित लै गंग कहा कहुँ तोहि ॥ ६ ॥ अथ करुणारस लक्षन दोहा । निधन सुजन प्रिय को जहाँ आलम्बन सोइ गाव। उद्दीपन दाहादि है रोदनादि अनुभाव ॥७॥ निरवेदादिक हैं तहाँ संचारी जिय जान । भाखत हैं कबिजन सकल जे बर बुद्धिनिधान॥८॥ बरन कपोत सुचित्र है बरुन देव सिरताज । थाई जाको शोक है सो करुणारस साज ॥९॥ तस्य उदाहरण सवैया। धुनि माथ सुहाँथन मीजि कहैं अभिमन्यु गयो सुरलोक सही । अँसुवान की धार बही सरिता सरिता मिलि सोक समुद्र रही ॥ लहरें महेश्वरसुधाकर । ११७ कहरै पुर सोर मनौ मन धीरज संग समीर लही। सुनि पारथ को बिललाप महा करुना करके क- रुना उमही ॥१०॥ टोका। इस कविता में कबि कोक्ति है और संजय को वाक्य है धृतराष्ट्र प्रति और अत्युक्ति अलङ्कार है और चौथा उल्लास भी है और रूपक भी है एकावली भी है यातें संसृष्टि है । लक्षण । एक दोय बय मिलत जह जामै जो परधान ॥ १० ॥ अन्यच। शुभ काम कियो चहै जो कछु तो मन माहिं मनोरथ पीवन है । घर बाहर देस नरेशहु के ढिग आदर होत नशीब न है ॥ जिनके सिर पै कमला-कर है सोइ स्याम महाबल धीवन है । तप तीरथ संजमहूँ न सधै धनहीन बथा जग जीवन है ॥ ११॥ टोका। इस कबित्त में कवि को उति है, निदर्शना अलंकार है, टतोय भेद अप्रस्तुत प्रशंसा भी है, सामान्या है, निबन्धना है । यात संसृष्टि है जो नायका को उक्ति है तौ गनिका नायिका है। संसृष्टि ल. पूर्वोत हो ॥निः॥ कहिए त्रिविधि निदर्शना वाका अर्थ सम दोय । एक किए पनि और गुन और वस्तु में हाय । अप्रस्तुत ल. ॥ अलंकार है भांति को अप्रस्तुत प्रसंस । इक बर्नन प्रस्तुत फुरै दूजे प्रस्तुत अंस ॥ पुनर्यथा घनाक्षरी। कीन्ह्यौ कैकई न जैसी 3 कई न जात कछू लै कई अजस पतिहूँ सों हाथ धोती हैं। मान्यौ ११८ महेश्वरसुधाकर । न मनाये राम बन को सिधाये सङ्ग अनुज सु- जान जानकी जू चलि होती हैं ॥ पथ मैं बि- लोकि जड़ चेतन अचेत होत लता मुरझानी नहीं मानो दुख गोती हैं । कहै कवि स्याम सियाराम के वियोग पाय हैं न ओस मोती ए बनाशपती रोती हैं ॥ १२॥ टीका। इस कवित्त में कबि को उति है वा सखौ सखौ प्रति है वा मार्गबधून को उति है निन्दा है और उत्प्रे च्छालंकार है शुद्धापन्दुति भी है उपक्षा संभावना · वस्तु हेत फल लेखि" इत्यादि ॥ १२ ॥ अथ रौद्र रस लक्षन दोहा । क्रोध महा थाई जहाँ आलम्बन अरि मानि। उद्दीपन अरि घेरिवो सोई रौद्र रस जानि ॥१३॥ कुटिल भौंह आनन अरुन अधरादिक अनुभाव । दर्प सुचंचलता अपर कहि संचारी भाव ॥१४॥ लाल बरन अरु देव शिव सुरस रौद्र रस तौन। उदाहरन कछु कहत हौं सुकविन को मत जौन ॥ तस्य उदाहरन घनाक्षरी । चण्डमुण्ड माग्यौ रक्तबीज को सँहारयौ धू- म्रलोचन को जारचौ शुभ दुष्ट उर-घालिका । सिंह पै सवार लै हथ्यार करबाल शूल तोमर मुसल पास पट्टिस करालिका ॥ परिघ प्रचण्ड
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महेश्वरसुधाकर । ११६
रुण्ड मुण्ड उर माल लसै अष्टभुजा धारे सदाँ
स्याम पै कृपालिका। जोगिनी जमाति साथ
सत्रुन को घालिबे को जन प्रतिपालिबे को
तैहीं अंब कालिका ॥ १६ ॥
टो. • । इस क० में कवि को उक्ति है वा किसी शाम को है कालो
प्रति और पर्यायालंकार है दूसरा उदान भी है। ल० । सो उदात सं.
पंति चरित श्लाघ्य और को अंग । इत्यादि ॥ १६ ॥
पुनर्यथा।
पांडव की सैन बायु बान सों उड़ावों मन
मोद सरसावों कल कौतुक लखावों में । पीठि ना
दिखावों पैर पीछे न हटावों जस जग मै बढ़ावों
नाम भीष्म तो कहावों मैं ॥पारथ को आजु रन
भूमि न सुतावों छत्रीधर्म तो नसावों कपिध्वज
न ढहावों मैं । बिक्रम दिखावों कर्म सारथी छु-
टावों चक्र स्याम ना गहावों गङ्गासून ना क-
हाँवों मैं ॥ १७॥
टोका । इस कबित्त में कवि को उक्ति है और भोषम पितामह को
प्रतिज्ञा है दुर्योधन प्रति भाव सबलतालंकार है छेकानुप्रास है। ल.
आवृति बरन अनेक को दूइ दूइ जब होय । है छेकानुप्रास सो समता
बिनहू सोय ॥ १७॥
अथ बीररस लक्षण दोहा ।
थाई है उत्साह जेहि अहै बीर रस सोय ।
युद्ध बीर इक भेद है दया बीर बिधि दोय ॥१८॥
१२० महेश्वरसुधाकर । धर्म बी रतीजो कहत दान बीर बिधि चारि । युद्ध बीर आलंबनहुँ शत्रु जोर निरधारि ॥१९॥ सैन सोर उद्दीपनहुँ अंग उमग हग लाल । सो अनुभाव बखानिए निरखि ग्रन्थ रस माल ॥ दर्प असूया उग्रता संचारी शुभ जानि । देव सक्र रस बीर के कुन्दन बरन बखानि ॥२१॥ अथ युद्धबौर को उदाहरन घनाक्षरी । पाऊँ जोर जाय जोर जाय खाय आवों फल सुभट अपार स्याम नेक नाहिं हारेंगे। वाटिका उजारि डरै डार सिन्धु माहिं डारें अक्ष को स- होर सैन बेसुमार मारेंगे ॥ लङ्क हलकंप कै स- शङ्क के दशानन को अवनि अकंप अतिकाय काय फारेंगे। नाक दम रहै तौलौ नाक दम रहै जॉली नाकदम रहै तौलौं ना कदम टारेंगे॥२२॥ टीका । इस कबित्त में कवि को उक्ति है और हनूमान जी को वाय है सोताजो प्रति ओर यमकालंकार है छेकानुप्रास है ॥ - लक्षण पूर्वोत है ॥ २२॥ अपरंच परसत युद्ध बौर । लक्षन सुजानकी सुजानकी जतन कीन्ह्यो जानकी के जान की सुदीन्ह्यौ धीरताई है । ल- पति प्रान की परम दुख दान की सुदानव म- महेश्वरसुधाकर। १२१ हान की न राख्यौ कीरताई है ॥ स्याम मन- मान की श्रीराम गुन गान की सुन्यौ न कान आन की सु जैसी सिरताई है । महाबीरताई महाबीरन सों पाई वह महाबीरताई कहाँ महा बीर ताई है ॥ २३ ॥ टीका । इस कवित्त में कवि की उक्ति है या कोई दास को है श्रीहनुमानजी प्रति और जमकालंकार है छेकानुप्रास है। लक्षण पू. वक्त ही है ॥ २३ ॥ पुनः युद्ध बौर सवैया । आये सबै कपि सागर के तट ठीक न होत मतो कछु सोऊ । त्यो सुनि के यमवन्त के बैन सुचैन लह्यौ फरके भुज दोऊ ॥ दै कर ताल चल्यौ नभ है दिगपाल के आसन डोलि प- रोऊ । स्याम सुवेद कहै जग में और बली नहिं कोऊ ॥ २४ ॥ टोका। इस कवित्त में कबि को उक्ति यहा कोई दास की है अन्य प्रति । और अत्युति अलङ्कार है, लक्षन । अलझार अत्युक्ति यह बरनन अतिसै रूप । जाँचक तेरे हार ते भये कल्पतरु भूप ॥ २४ ॥ पुनः हर्ष युद्ध कांक्षां सवैया । हो हनुमान महामतिमान जुआनि सजीवनि प्रान बचायो । राम सुप्रेम पगे कहि यों तब स्याम सुखेन सुबैन सुनायो ॥ आनद-अंबुधि सों बर हनुमान सों १२२ महेश्वरसुधाकर । बारि सुबारिज नैनन सों बरसायो । बैठत ही लखि के लखनै उठि कै हँसि कै निज अङ्क लगायो ॥ २५॥ टोका। इस कवित्त में कवि की उक्ति है या रामचन्द्र जी को वाक्य है, हनुमान जी प्रति, और प्रहर्षन अलङ्कार है और रूपक भौ है सम लक्षन । तोनि प्रहर्षन जतन बिन बांछित फल जो होय। बांकित फल ते अधिक फल श्रम बिन लहिये सोय ॥ २५॥ अपरंच घनाक्षरी। माथ नाय राम को सुहाथ धनु वान धरि साथ अङ्गदादि महाबीर बलवारे हैं। स्याम रन रङ्ग मैं उमङ्ग जङ्ग जैतिवारे देखि घननाद बीर बैन ललकारे हैं ॥ लक्षन है मेरो नाम अक्षन निहारै नेक रक्षन करैया कौन हेरे तन धारे हैं। सैन-जुत शङ्कर सहाय जो करेंगे आय तऊ तेरे प्रान यमराज के दुवारे हैं ॥ २६ ॥ टोका। इस कबित्त में कवि को उक्ति है। और लक्षमन जी को वाक्य है मेघनाद प्रति, प्रतिज्ञा है, औरसंबन्धातिसयोक्ति अलङ्कार है ।लक्षन । अतिसयोक्ति दूजी वहै जोग अजोग बखान । तो कर आगे कल्पतरु क्यों पाये सनमान ॥ २६ ॥ अथ दयावीर वर्नन दोहा । दीनन को दुख भाखिवो दयाबीर सुबिभाव । हरिवो दुख वदि वचन मृदु आदि कहैं अनुभाव।
महेश्वरसुधाकर। १२३ हैं संचारी भाव तहँ सुधृति चपलता और । सुकबि ताहि को कहत हैं दया बीर करि गौर ॥ तस्य उदाहरन सवैया। हे प्रियवन्धु सुलक्षनलाल मिले तुम मोहिं सुधीरज आयो । स्याम सबै दुख छूटे महा मम जीवन जीवन आस जनायो ॥ बानर ऋक्ष सु- चैन लह्यौ पुनि पारस रङ्क परो जनु पायो प्रेमपगे प्रभु पङ्कजलोचन राम सु यो कहि अङ्क लगायो ॥ २९॥ टीका। इस कबित्त में कबि को उक्ति है और श्री रामचन्द्र जू को बाक्य है लक्ष्मन प्रति अमकालङ्कार लुप्ता और प्रेमा भी है, लक्षम नि पट कपट मिटि जाय जहँ उपजे पूरन छेम । वो सब दास बखानहीं ताको पूरन प्रेम । जमका पूर्वोक्त ही है ॥ २६ ॥ पुनः दोहा। द्रुपदसुता की टेर सुनि बिनहिं बेर जदुराय । पाय पियादेहिं दौरि करि लीन्ह्यौ बसन बचाय ॥ अथ दान बीर नक्षन दोहा । जैबो तीरथ जाँचकन दीवो दान बिचार । ए बिभाव बरनत सुकवि दान बीर करि प्यार ॥ सु धन तुच्छ करि मानिबो सो कहिये अनुभाव। हरख आदि ब्रीड़ा कह्यौ संचारी करि चाव ॥
१२४
महेश्वरसुधाकर ।
तस्योदाहरनम् घनाक्षरौं ।
आप तो दिगम्बर न एको अङ्ग अम्बर पै
दीनन को देत है पटम्बर सुरेश के। विरच्यौ बि-
रंचि जिन्है रङ्क अङ्क डारि तिन्है टारि कै निसङ्क
सम कीन्ह्यौ है धनेश के ॥ पूजे बर्ग बेल स्याम
कनक तनक ताहि चाहि अपवर्ग फल देत है ह-
मेश के।हेत जन जानी देत मागे मनमानी मौज
सानी है न देव दानी दूसरो महेश के ॥३३॥
टीका । इस कवित्त में कबि की उक्ति है वा किसो शैव को वाक्य
है अन्य पै बिशेषोक्ति अलङ्कार है काबिप्रिया मत माधन है व्याज नि
न्दास्तुति है पञ्च पप्रतीप भी है असङ्गति है याते मंसृष्टि है लक्षन । पू.
ऊत है ॥ ३३ ॥
पुनर्वथा।
महाराज-राज श्री महेश्वरबकससिंह जाँचे
बिन धनद समान धन भरि देत । दीनन को
देखि कै दया को सरसाय सिन्धु प्रेम की ल-
हरि मे महान दुःख हरि देत ॥ दानी नहीं ऐसो
कहूँ दूसरो दूनी में स्यामकलपलताको जो प-
ताको दूरि धरि देत । सत करै बुद्धि औ सहस्र
मन जाको करै लाख करै जीभ तौ करोरि कर
करि देत ॥ ३४॥
१२५ महेश्वरसुधाकर। टीका । इस कबित्त में कबि की उक्ति है राजा को प्रसंसा है, अ त्युक्ति अलङ्कार है, लक्षन । पूर्वोक्त ही है ॥ ३४ ॥ पुन: । अलङ्कार अ. त्युक्ति से बरनन अतिसै रूप । जाचक मेरे द्वार ते भये कल्पतरु भूप पुनर्यथा । बिरचि बिरंचिजन जाँचक लिलार लिपि होय ए दरिद्री सो असत्य नहिं कीन्ह्यौ है। दान सनमान के कुबेर औ सुमेर सम स्याम सुख- सम्पति सजाय मुख चीन्ह्यौ है ॥ कलपलता को जनु अलपपताको करि सुजस पताको ताको आप कर लीन्ह्यौ है । चक्कच मही पै श्री महे- श्वरबकश जू ने दारिदै को दारिद सुवाको करि दीन्ह्यौ है ॥ ३५॥ अथ धर्मबीर लनन दोहा । कबि कोबिद बरनत सदाँ धर्मबीर सुबिभाव । सुनियोसबिधिपुरानपुनिश्रुति अस्मृतिपरचाव। बचन कर्म तन वेद बिद इत्यादिक अनुभाव । संचारी तहँ जानिये सुधृति आदि सुगनाव॥३०॥ तस्यो दाहरणम् घनाक्षरी । सबिधि पुरान सुनि बिबिधि बिधान दान दीन्हे जो बखान स्याम वेद सुखकन्द भो । बित्त बनितानि तन तुच्छ मनमानि कर कीरति दुचन्द निसि चन्द मतिमन्द भो ॥ कर सम-
१२६
महेश्वरसुधाकर।
तान कर कलपलतान नित परम सुजान हित
गो द्विज पसन्द भो । सत्य शील भारी फल
सुकृति सुधारी धरा धर्म धुरधारी श्री महेश्वर-
सुचन्द भो ॥ ३८॥
टोका। इस कबित्त में कबि को उति है. राजा हरिचन्द को जस
बर्नन है और इस में भी वही अत्युक्ति अलङ्कार है अत्युक्ति लक्षन । पू.
बोता है ॥ ३६॥
अथ बिभत्स रम नक्षन दोहा।
है बिभत्स जाको अहै थाई भाव गलानि ।
अरु बिभाव मज्जा छतज गन्धि पीव में दानि॥
सो अनुभाव रोमांच तन कम्प नासिका मूदि ।
संचारी मुरछादि कहि मोह असूया सूदि ।
महा काल है देवता नील वरन सोइ जानि ।
रस बिभत्स ताको कहत उदाहरन सुख मानि ॥
तस्य उदाहरन सवैया ।
दाम छदाम लौं धाम रहै नहिं नाम कुनाम
रहै तेहिं सगा । धावें चहूँ दिसि देसन में कहुँ
पावै न आदर अङ्गन अङ्गा ॥ दीन अधीन म-
लीन रहैं निसि बासर होय मनोरथ भङ्गा ।जे
किये स्याम सों बैर विचार तिन्है करतार करौ
भिखमणा ॥४२॥
महेश्वरसुधाकर ।
१२७
टोका। इस कवित्त में कबि को उति है, करतार ब्रह्मा जी सो
और व्याज निन्दा है अलङ्कार लक्षन । व्याजनिन्दा निन्दा बिषे औरी
निन्दा होय ॥
सोरठा।
समर मध्य जगदम्ब, असुर अनेक संहार किय।
छतज पियतनबिलम्ब,खाहिंगीधपलप्रेत सब॥
पुनर्यथा घनाक्षरौ।
मारे इन्द्रजीतै बीर बाँकुरे लषनलाल लोहू
की नदी सी लेत लहरै सुजङ्ग मैं । झुण्ड झुण्ड
जोगिनी सुजोगिनी न जाती पेखि नाचती पि-
शाँची धुनि माँची रन रङ्ग मैं ॥ धारै उर मालैं
अचि अन्तरी सुरारिन की भूत प्रेत पीढ़े मेद
श्रोणित सुसङ्ग मैं । मेले मुख आमिष लै झेलै
खेल खेलें घने बोलें बैन चैनभरे मैन अंग अङ्गमैं॥
टोका। इस कवित्त में कबि को उक्ति या कोई बानर या दास
है, अन्य प्रति औ जमकालङ्कार औ छेकानुप्रास है, लक्षन । पूर्वोत है।
अथ भयानक रस लक्षन दोहा ।
भाव सुथाई भय जहाँ सुरस भयानक आय ।
ये बिभाव जिय जानिये जेहिं लखि भय सरसाय॥
बेपथु बिवरण आदि दै तह अनुभाव सुजानि।
देव काल कैला बरन रस सु भयानक मानि ॥
की
१२८ महश्वरसुधाकर । अथ भयानक रस स्यौटाहरण घनाक्षरी । छाई जग बिदित बड़ाई वेद गाई स्याम सोई सुनि पाई तुव शरण सिधाई है । बिपति म- हाई अति प्रबल जनाई नहीं हटति हटाई कियो कोटिन उपाई है ॥ लखि बिकलाई बेगि की- जिये सहाई अब जन सुखदाई जिमि लच्छन जिआई है । महा बीरताई तवै बीरन सों पाई वह महावीरताई कहाँ महावीर ताई है ॥४७॥ टोका। इस कवित्त में कबि को उक्ति है यहा कोई दास की म- हाबीर प्रति ओर जमकालङ्कार के कानुप्रास है । लक्षने । पूर्वोत है । अपरज। प्रबल परे हैं सब सत्रु ये महान मैया मेरी बिनती को सुनि लीजिये कृपालिका । धारि के त्रिशूल हूलि दीजिये हिये के बीच श्रोणित सो कीच मार कीजै चक्र चालिका ॥ जैसे रक्त- बीज औ निशुभ चण्ड मुण्ड हूँ को झुण्ड झुण्ड योगिनी सुकीन्ह्यो प्रान घालिका । तैसे धारि चोप चित ऑनद समेत नित बैरीचन्द बेगि ही विदारौ अम्ब कालिका ॥१८॥ टोका। इस कबिन में कवि की उक्ति है यहा कोई जन की है जौन सत्रुन से पोडित श्री भगवतोप्रार्थना है और प्रथम भेद तुल्य जोगितालङ्कार है, देवी सों प्रार्थना है। तुल्य जोगिता तोनि बिधि ल क्षन कहत सुजान । होय अब के सी को महेश्वरसुधाकर । १२६ भयरस अंगौ दास अंग घनाक्षरी । पावें नहीं रोजी रहैं रोगी दुखभोगी सदाँ सम्पतिबियोगी सोच पावै बिकरालिका । देश देश घूमैं धनहीन तन छीन दीन बसनविहीन नारि अन्न बिन बालिका ॥ रोवे गाँव गैल मैं कुनाव के कुपत धूत कायर कुरूप महा सूदन मै आलिका । धारै पाप पुंज को बिसार धर्म कर्म इमि बैरी बन्द वेगि ही बिदारौ अम्ब का- लिका ॥४९॥ टीका। इस कबित्त में कबि को उक्ति है वा कोई दास की है काली जी सों; जमकालङ्कार के कानुप्रास है। जमक शब्द को फिरि श्रवन अर्थ जुदो सो जानि ॥ ४ ॥ पुनर्यथा । लीन्हो है सुधाय धाय बल अजमाय निज एकहू उपाय आय चित्त मै अरै नहीं। देश देश जाय चह्यो सुख सरसाय माय आपके सिवाय दुख दूसरो हरै नहीं ॥ मोद सरसाय लघु लो- गन रिझाय स्याम अति सकुचाय काज कैसहूँ सरै नहीं। अम्ब अब रावरी कृपा की कोर हेरे बिन हिम्मति हमारी नेक धीरज धरै नहीं ॥५०॥ टोका। दूस कबित्त में कबि को उक्ति है देवो जो सो वा कोई दास । को है और संभावनालङ्कार है। लक्षन । जो यों होतो तो कहत संभाव ना बिचार । बता होतो शेस सो तो गुन लहतो पार ॥ ५० ॥ १ महेश्वरसुधाकर । अथ शुद्ध भयानक रस को घनाक्षरी। कालिका कराल रूप कोपि के कृपान धारि सिंह पै सवार दानवान पै सिधाई है। कलित कपाल माल नैन मदमाते लाल रसना निकासे बेष बिकन महाई है ॥ भृकुटी कुटिल कर तो- मर त्रिशूल चक्र दुष्टदलदलन सुचोप सरसाई है। भभरि भगाने अङ्ग अङ्ग थहराने कहैं भय सों बिलोकि हाय मीचु सम आई ॥५१॥ टीका । इस कवित्त में कबि को उक्ति है कोई सत्रु या कोइ दैत्य राक्षस भय संयुक्ता कहै है उपमालङ्कार है । लक्षन । पूर्वोक्त है ॥ ५१ ॥ अथ अद्भुत रम बननम् दाहा। थाई अचरज जासु को अद्भुत रस है सोय। अरु विभाव लखिबो चरित असंभवित जो होय॥ कंप बचन चलि बोलिबो रोम हर्ष अनुभाव । शंक वितर्क सुमोह जहँ संचारी सुगनाव ॥५३॥ चतुरानन जेहि देवता पीत बरन शुभ जानि। ताहि कहत अद्भुत सुरस जे प्रबीन गुनरवानि॥ तस्योटाहरन घनाक्षरी। कालीदह माहि कान्ह कूदि के पताल जाय काली नाग सोवत ते औचक जगायो है। कोपि के कियो है विष झार फूतकार महा नेसुक न हान्यौ स्याम मन मुसकायो है ॥ नाथि ताहि महेश्वरसुधाकर। शिर पैसवार व्है अवार बिन कमल लदाय आय दरस दिषायो है। राज के सुबासी चित्त चक्रित बिलोकि भये नंद यसुदा के मन मोद सरसायो टोका। इस कबित्त में कबि को उक्ति है यहां कोई गोपी गोप को उक्ति है। बिचित्र हेतु अलङ्कार है लक्षन । इच्छा फल बिपरीत को कौजे जतन बिचित्र । नवत उच्चता लहन को ज हैं पुरुष पवित्र । ५५॥ पुनयं या सवैया । राजै जटान मैं गंग तरंग त्यौं चंद छटान भली छबि छाजै। छाजै स मंडन की उर माल त्यौँ भूत पिशाचन को गन साजै ॥साजै बिभूति विभखन व्याल कृपाल व्है साधत स्याम के काजै । काजै रह्यौ न कछू यम को जहां कासी विश्वेश्वरनाथ बिराजै ॥ ५६ ॥ टीका । इस कवित्त में कवि कौ उक्त है का शैवमत की उक्ति है या कोई गोपी गोप को है. सिंहावलोकन कवित्त है। एकावली अ. लङ्कार है, लक्षन । ररहित मुक्ता पद रीति जहं एकावलि तह मानु । दृग श्रुति पर श्रुति बाहु पर बाहु जंघ पर जानु ॥ ५६ ॥ मुनयं वा। सोहैं दिगम्बर अंबर चारु बघम्बर त्यो अहि पुंजनि घेरो। शैल सुता अरधंग बिभूति त्रिशूल हरै भव शूल करेरो॥ चाखत भंग धतूरहु को यह भाषत स्याम दया जुत हेरो। क्या नर बापुरो कोई रिसाय सदैव शिवा शिव रक्षक मेरो।५७॥
१३२ महेश्वरसुधाकर । टीका। इस कबित्त में कबि को उक्ति है शिव जी को बर्नन है। बिधेषालङ्कार है लक्षन । पूर्वोक्त हौ है ॥ ५० ॥ पुनः घनाक्षरी। चारु मणिमंदिर में झालरै सुमोतिन की तास बादले के परे पावड़े अमोल बर। चंद सों चदोवा तनो गिरदे गुलाबन के पांखरी सुमल्लि- का बिछाई है प्रमोद कर ॥ द्वार पै दरस हेत स्याम देव राखें आस भारती सुआरती उता- रती उजास पर। राजै परजंक पर आदि जोति रानी तहाँ रहति निहारि जोरि कमला कमल कर ॥ ५८ ॥ टोका। इस कवित्त में भो कबि को उक्ति है या कोई शात को । भगवती का रूप ऐवर्य बनन है, उदात्त अन्लङ्कार है लक्षन । उपलक्षन दै सोधिये अधिकारी सो उदात ॥ ५८॥ पुनर्यथा सवैया। आदिन मध्यन अन्त अनन्त हौ सन्तत स्याम सुन्यौ श्रुति गावै । अम्बुज आनन आनन है सु गजानन अम्ब अहौ जग ध्यावै ॥ शैलसुता सुखदानि सुजान की जान की जान की बात ज- नावै । भूप अनूपम मोहिं दियो बर देव दया करि जो मन भावै ॥ ५९॥ टोका । इस कवित्त में भो कबि की उक्ति है दाम की प्रार्थना है वाचक धर्म लुना है ॥ ५ ॥ -- महेश्वरसुधाकर । १३३ पुनर्यथा सवैया । घननाद महा घननाद कियो सर बन्दन को बरसाय मुदै । अहिपास मे बाँधि सबै दल को रन मोहित लक्ष्मन राम खदै ॥ मन मोदमई इमि बैन कही इनही मोहिं श्राप दै कीन जुदै । जब रामहिं सोकतई चितई चकई तब चाहति चन्द उदै ॥६०॥ टीका। हम कबित्त में भी कबि की उति है समस्या है और जम कान्लङ्कार है, प्रथम प्रहर्षन भी है लक्षन पूर्वोत हो है ॥ ६ ॥ पनर्यथा। जब चाहति केलिकला नवला जब के किन की धुनि व्याल मुदै । जब कोकिल स्याम स- चान चहें अरु कामकलान को क्लीव खदै ॥ रवि को कुमुदी जब पेखि खिलै तिमि मालती सों अलि जाय जुदै । जब कौल बियोगिन को हितई चकई तब चाहति चन्द उदै ॥६१ ॥ टोका। इस कबिन में भो कबि को उक्ति है समस्या को प्रतिउ. तर है, और मिथ्याध्यवसित अलङ्कार है, लक्षन । मिथ्याध्यवसित क. हत हैं अलङ्कार एहि रोति । कर में पारद जो रहै करै नवोढ़ा प्रीति अथ शान्तरस लक्षन दाहा। थाई है निरबेद जेहिं सुरस सान्त सोइ होय । सुगुरु सुजन सँगतपबिपिनि समबिभाव है सोय॥
१३४
महेश्वरसुधाकर।
रोम हर्ष आदिक जहाँ सुकबि कहत अनुभाव।
सुमति खुसी धृति आदि है शुचि संचारी भाव ॥
ब्रह्म देवता शुक्ल रँग बरनत सुजन समाज ।
उदाहरन सुनि जासु को उर उपजै सुखसाज ॥
अथ शान्तरसस्योदाहरगाम् यथा सिंहावलोकन कबित्त ।
ध्यावत है धनवन्तन को भगवंत के नेक
नहीं गुन गावत । गावत गीत सँगीत सबै पर
ब्रह्म की भावना सो नहिं भावत ॥ भावत है
परपञ्च बिषै मृगनैनी बिलोकि महा सुख पा-
वत । पावत है न अराम रे स्याम सदैव शिवा-
शिव क्यों नहीं ध्यावत ॥६५॥
टोका। इस कबित्त में भी कबि की उक्ति है सिंहावलोकन कवित्त
है, एकावली अलंकार है लक्षन । ग्रहित मुक्त पद रीति जहँ एकावलि
तब मान । दृग श्रुति पर ग्रुति बहुा पर बाहु जंध लौं जान ॥ ६५ ॥
पुनर्यथा।
बनितानि सुता सुत के रंग में रँगि के मन
मोद भरेई रहैं। रसरीति न छोरि सके कबहूं अ-
नुमान गुमान करेई रहैं । उपचार अपार विषै
के सिखै निसि बासर स्याम खरेई रहैं । छन
ध्यान करैं न शिवा शिव को बहु धंध के फंद
परेई रहें ॥६६॥
महेश्वरसुधाकर। १३५ टोका। इस कबित्त में भी कबि को उक्ति है शिक्षा है अन्योकि अलङ्कार है॥६६॥ पुनर्यथा। द्वारिक जान कह्यौ ढिग स्याम के है मन मेरो न मो मन माया। चंचलता तजिये चित की अरु आतुर व्है रचिये न उपाया ॥ भामिनि मानिये सीख सही करि जो श्रुति आदि पुरान मैं गाया । आपुहि पांय परैगी परापति व्हेहै जबै रघुनाथ की छाया ॥६७॥ टोका इस कबित्त में भी कबि को उक्ति है सुदामा जी को बाक्य अपनी स्त्री प्रति बर्नन है लोकोकि अलङ्कार है लक्षन । लोकोकति कछु बचन सो लीजै लोक पवाद । नैन मूदि षटमास लौ सहिहौं बि रह बिषाद ॥ ६७॥ पुनर्यथा । जानि महान महेश्वर स्याम दियो नर को तन सो न बिचारी । भूलि गये इत आय बि- शै बस है मद जोबन को भ्रम भारी॥ कौन जबाब करोगे उहाँ जग में परिपङ्कज प्रेम बि- सारी । पाय प्रमोद रहौ मन मै सब पेषि लई करतूति तिहारी ॥ ६॥ टोका । पूर्वोक्त है अन्योक्ति अलङ्गार है, शांतरम है ॥ पुनर्यथा ! मानसरोवर मे रमि के चुनि के मुकतान कहूँ तुलि जाइ है । रूप अनूपम पाय महा यह चाल
महेश्वरसुधाकर ।
चले अनते दुलि जाइ है । यौ मद मोह महा
नद मै परि पैरत पाँव अरे डुलि जाइ है। आय
बने तुम डोलत हो बक हंसन मै कलई खुलि
जाइ है ॥ ६९॥
टोका ! इस कबि स में शांतरस है अन्योक्ति अलङ्कार है ॥ ६८ ॥
पुन यथा ।
स्याम सुजान को पंथ लखै ममता मद के
बस में कस आया । मोह के पास बध्यौ मन
बावरे लोभ लगो बन कोसन धाया ॥ है मृग
तृष्णा सबै कलि की कल होन न देत कहूं छल
माया । आपु ही पाय परैगी परापति हुँहै जब
रघुनाथ की छाया ॥ ७० ॥
टोका । इस कवित्त में अलङ्कार पूर्वोक्त है ॥ ७० ॥
पुनर्यथा सिंहावलोकन सवैया ।
गाइबो गीत सँगीतन को सुरतालन लै कर
बीन बजाइबो । जाइबो जोग यथारथ मै प-
रमारथ के पथ मै मन लाइबो ॥ लाइबो इंदिन
को बस मै तप के तन कंचन ताप तपाइबो ।
पाइबो यार अपार महा जग सार है रामहि को
गुन गाइबो ॥ ७१॥
टीका। इस कबित्त में भी कबि को उक्ति है सिक्ष्या है सिंहावलो.
कन कबित्त है और एकावली अलङ्कार है लक्षन । रहित मुक्त पद
रोति जई एकावलि तब मानु। दृगश्रुति परशुति बाहु पर बाहु अंध
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लौ जान ॥ ७९ ॥
महेश्वरसुधाकर । १३७ अथ दास्यरस बनन तस्योदहरणम् घनाक्षरी। सीस पै किरीट सो मुनीस मन मोहै महा स्वच्छ रजनीश कोटि शोभा भई मन्द की । कु- ण्डल कपोल गोल लोल जुग मीन मनौ भृकुटी कमान नैन बान मैन सन्द की ॥ अङ्ग अङ्ग भू- षन बिभूषित रतनवारे पीतपट धरे घन दामिनी सुछन्द की । स्याम सुखमा की मति कौन क- बिता की कहै चारु उपमा की लखे झाँकी रा- मचन्द की ॥ ७२॥ टोका। इस कबित्त में भी कबि को उति है रामचन्द्र को भाको का बर्नन है सङ्गर अलङ्कार है सम लुवा रूपक संसृष्टि लक्षन पूर्वोक्ता पुनर्यथा सवैया। गनिका अरु गीध गयन्दहु की गति को गुनि के अनुरागत हौं । द्विज स्याम कहै कुबरी उबरी सेवरी को सुने सुख पावत हौँ ॥ पुनि गोकुल गोप सुगोपसुता मुनि गौतमनारि सु जागत हौं । इमि बाँकेबिहारी तिहारी कृपा नित मोपै रहै बर मागत हौँ ॥ ७३ ॥ टोका। इस कवित्त में भी कवि की उक्ति है परमेश्वर की प्रशंसा है तुल्ययोगिता अलंकार है। ल• पूर्वोक्ता है ॥ १३ ॥ १९ S १३८ महेश्वरसुधाकर। पुनः दोहा। जे पापी पातक किये निसुदिन परम महान । तिनहिं पार भवसिन्धु ते कीन्हो कृपानिधान ॥ पुन: सवैया। आमिष-भोगी अजामिल व्याध बिराध क- बन्धहुँ लौँ लटि जैहै । दृषन मे खरदूषन से त्रिशिरा की शरा न जरा हटि जैहै ॥ स्याम पुरातन पापी महा तुम पातकी पावन सो पटि जैहै। मेरे उधारिबेही मे कृपाल कहा प्रभु की प्रभुता घटि जैहै ॥ ७५॥ टीका । इस कवित्त में भी कवि को उक्ति है व्याज स्तुति अलंकार है ल• पूर्वोक्त है ॥ ७ ॥ पुनः दोहा। जो न स्याम सुनि पावतो अधमउधारन नाम। तौ न भूलि परतो कहूँ पाप पन्थ मै राम ॥७६॥ टोज । इस दोहा में कवि की उक्ति है संभावना अलंकार है ॥७६॥ दीन जानि कीजै दया दीनदयाल खरारि । पानि जोरि बिनती करै स्याम राम उर धारि॥ टोका । इस दोहा में कवि को उक्ति है, काव्यलिंग अलंकार है ॥७॥ काव्य लिंग जो युति सो अर्थ समर्थन होय । तोको मैं जीत्यौ मदन मो हिय में शिव सोय ॥ पुनर्यथा सवैया । बाटिका जाय उजारि दियो निरसंक है लंक महेश्वरसुधाकर। १३४ दह्यौ श्रम थोरे । रावन औ महिरावन से बर बीर जितै तिनके मद तोरे ॥ श्रीरघुनाथ के पास सदा पदपंकज सेवत साथ निहोरे। सो हनुमान बली सों विनै यह सुन्दरस्याम करै कर जोरे ॥ ७८ टीका । इस कबित्त में कवि की उक्ति है ग्रन्थकर्ता को बिनै है कि कोई दास की है, उदात्त अलंकार है। ल० पूर्वोत है ॥ ७८ ॥ पुनः दोहा। बज-अङ्ग पिङ्गल-नयन कनकबरन रणधीर स्यामसहायक अतुलबल महावीर बरबीर पुनर्यथा घनक्षरी। मरजी तिहारी पाय जन्म जग लीन्यों आय मन बच काय कहीं नेसुक सुनीजिये। रावरो सु- जश अब गावत हमेश रही पावत प्रमोद सो कृपाल बर दीजिये ॥ दीनहितकारी भारी बि- रद तिहारी सदा स्याम सुखकारी बैन मानि उर लीजिये। अरजी यही है नेक हर जी हमारी सुनौ नर जी वनाय नाथ करजी न कीजियो॥८॥ टीका। इस कवित्त में ग्रन्थ कर्ता कवि को उक्ति है प्रार्थना है या कोई दास को बिने है शिवप्रतिः और छेकानुप्रास. अलंकार है ।।८०॥ पुनर्यथा घनाक्षरी। दानी और दूसरो दुनी मै सुन्यौँ स्याम नहीं महेश्वरसुधाकर। दीन के दयाल शंभु साँची के पतीजिये। जाके सुख सम्पति बिरांचे बिरच्यौ न रंच ऐसे रंक कोटि कियो धनद सुनीजिये ॥ अब कलिकाल हाल हेरि हिय हारयौ कहा करिकै कृपा की कोर येतो जसु लीजिये । गरजी गरीबन की गौर कर अर्जी सुनि नरजी बनाय नाथ करजी न कीजिये ॥ ८१॥ टीका । इए. कविता में भी कवि को उक्ति है श्री दाम को शंभुजी सों प्रार्थना है इसमें भी कानुप्रास अलंकार है पूर्वोक्त है ॥ ८१ ॥ पुन यथा सवैया । जो मधुकैटभ को बधि के महिषासुर सैन समेत सँहारयौ । आयो बली पुनि लोचन धृय कियो सो हुँकार मे भूति पहारचौ॥ स्याम सुरेस औ देवन की बिनती सुनि शुम्भ निशुम्भ बि- दारयौ। श्रीजगदम्ब विलम्ब कहा भई मेरिही बेर न बेगि उबारयौ ॥ ८२॥ टोका। इस कवित्त में कवि की उक्ति है यहा दास की प्रार्थना है श्री भगवतो जो सों; तुल्य जोगिता अलंकार है ल• पूर्वोक्त है ॥८९॥ पुनर्यथा घनाक्षरी। इन्द्र आदि देव सब गावत हमेश रहैं पावत न भेद वेद आदि मै बखानी है। जाकी महिमा महेश्वरसुधाकर । है महा जानी नहीं जाति कछू थाकी सहसानन की बुद्धि सकुचानी है ॥ शुम्भ औ निशुम्भ रक्तबीज के अजीज और तिन्है मीजि मीजि अति ही मै हुलसानी है। लोक लोकपाली जेहि धारे मुण्डमाली सोई स्याम कामपाली महा- काली महारानी है ॥ ८३ ॥ टीका। इस कवित्त में भी कवि की उक्ति है या दास की प्रार्थना है और परिकर अलंकार है ल• । सो परिकर प्रासै लिय जहां विशेष न होय । शसिबदनी यह नायिका होय हरति है जोय ॥ ८३ ॥ पुनर्यथा। असि चक्र धारौ चाप परिघ सुधारो दुख दुसह विदारो शंख शूल मुण्डमालिका । तैसई भुशुण्डी गदा नैन हैं विशाल तीनि अङ्ग सब साजि मधुकैटभ की घालिका ॥ विष्णु औ वि- रश्चि देव पायौ है अनन्त सुख नीलमणि छबि मुख पद दिगपालिका । स्याम-काम कीजै लोक लोक जस लीजै सब सत्रुन को बेगि दण्ड दीजै अम्ब कालिका ॥८४॥ टीका। इस कवित्त में कवि की उक्ति है वा कोई दास की है श्री भगवती प्रति; छेकानुप्रास अलंकार है। पुनर्यथा । लोचन बिसाल लाल श्रोणित समान लसैं * १४२ महेश्वरसुधाकर। गदा पद्म परशु सुधारि कै कृपालिका । दण्ड औ कुलिश चाप शक्ति कुण्डिका है चारु चर्म औ जलज त्यों त्रिशूल पाश मालिका ॥ घण्टा सुरा भाजन सुदर्शन कृपाणहूँ लै साज नये साजि खल सैरिभ की घालिका। कमल की पा- लिका पैकर ज्यों प्रबालिका सौं शत्रुन को दण्ड . बेगि दीजै अम्ब कालिका ॥ ८५॥ टोका। इस कवित्त में कवि को उक्ति है ध्यान है देवी जी का, और उपमा अलंकार है। जहि बिधि सब समता मिले उपमा सोई जानि॥ इत्यादि। पुनर्यथा । ब्रह्मा मुण्ड शम्भु अस्थि रसना बिराजै विष्णु तामबूल ऐसे रक्त अधर बिशालिका । स्यामघन अङ्ग छबि बैठी प्रेत आसन पै कर मै त्रिशूल चक्र पद्मपाश जालिका ॥ अंकुश कुलिश असि मूशल बिराजै शंख अहि जुग धारे लाल अम्बर सुचालिका।दास सुख कीजै मेटि लोजै या बिपत्ति सब शत्रुन को दण्ड बेगि दीजै अम्ब कालिका ॥८६॥ टोका । इस क वत्त में कवि की उक्ति है विराटरूप देवी जी को ध्यान है या कोई दास को, और इसमें भी उपमा अलंकार है, पूर्वोक्त ही है ॥ ८६ ॥ लक्षन - - महेश्वरसुधाकर। १४३ पुनर्यथा । करत महान उतपात निशिबासर हैं जैसे मधुकैटभ नै कीनो है कुचालिका । विष्णु देव स्याम सदा तेरेही भरोसे रहैं कीजिये सहाय आय दीनन की पालिका ॥ धारि कै त्रिशूल चक्र दुष्टन के वक्र तोरि फोरि फोरि खोपरीन खाय लै करालिका। चण्ड मुण्ड मालिका बिराजै चन्द्र भालिका सो शत्रुन को दण्ड बेगि दीजै अम्ब कालिका॥ ८७॥ टोका। इस कबित्त में कवि की उक्ति है या दास की श्रीभगवती से; छेकानुप्रास अलंकार है ॥८७ ॥ पुनर्यथा। करत निकाम काम पावत अराम आम र- हत सकाम बाम सङ्ग सुख सानि के । औगुन अमाप पाप जोरत हमेस बेस नाम को न नेक जाप जानत भवानिकै॥ असो मै अयान स्याम गुन गरबीलो महा मद सों मदीलो अरसीलो अनुमानि के। करुना कदम्बा जगजन अवलम्बा सदाँ अम्बा मोहिं पालती निकम्बा पूत जानिकै॥ टोका। इस कवित्त में कवि को उक्ति है यहा कोई दास की प्रा. र्थना है देवी जी सों; और छेकानुप्रास अलंकार है ल० पूर्वोत है ॥८॥ .
महेश्वरसुधाकर।
पुनर्यथा।
माल छनजोति ते कमाल छटा अङ्गन की
सिंह की सवारी भारी रूप की करालिका । खड़
खेट कन्या सङ्ग धन्या ही महीतल मे धारे चक्र
चाप बान गुनगन मालिका ॥ लोचन कमल
छबि मोचन हैं दास दुख दीरघ रसीले स्याम
सोहित बिसालिका । दुर्ग दैत्य घालिका सुरेस
सेस पालिका सो शत्रुन को दण्ड बेगि दीजै
अम्ब कालिका ॥९॥
टोका । इस कवित्त में कवि को उक्ति या कोई दास की है, श्री
देवी जी से प्रार्थचा करै है, औ लुप्ता अलंकार है ॥ ८ ॥
पुनर्यथा !
मजन के सखियान समेत सरोवर पैसुमहा
छबि छावै। सारी सजी सिया प्यारी चली गति
बाल मराल कहा सरि पावै ॥ गौरि को पूजि
सुगौर करी कर जोरि यही बिनती को सुनावै ।
रूप अनूपम मोहिं दियो बर देव दया करि जो
मन भावै ॥८९॥
टोका। इस कवित्त में सखी की उक्ति है सखी प्रति। श्री सौता
जो गौरि पूजने आई बरदान मागतो हे गौरि सों; पञ्चम प्रतीप अल-
द्वार है । लक्षन पूर्वोक्त है॥ १० ॥
महेश्वरसुधाकर । पुनर्यथा। दैत्यन के दल को दलि के कियो देवन के दुख दूरि महावै । सन्तन को सुख दीन्हो सदाँ अब दीन हौं देखि दया उर आवै ॥ गौरि कहीं कर जोरि निहोरि हे सम्भुप्रिया प्रण पूरो क- रावै। रूप अनुपम मोहिं दियो बर देव दया करि जो मन भावै ॥ ९१ ।। टीका । इस कबित्त में श्री सीता जी की स्तुति है पारबती जी सों बरदान मागे है, और परिकरांकुर अलक्षार है ॥१॥ पुनर्यथा । श्री जगदम्ब तुहीं अबलम्ब न कीजै बिलम्ब मया सरसावै । कीजिये पर पिताप्रणको तनको मन को अति ऑनद आवै ॥ अन्तर की सब जाननिहारि हौ जाहिर क्यों करि तोहि जनावै। रूप अनूपम मोहिं दिये बर देव दया करि जो मन भावै ॥ ९२॥ टीका । इस कबित्त में श्री जानकी जी की प्रार्थनास्तुति है पावती जी सों परिकरांकुर अलङ्कार है। साभिप्राय विशेष जब परिकरअंकुर नाम । सूधे हू प्रिय के कहे नेक न मानति बाम ॥ ४२ ॥ पुनर्यथा । तैहीं स्वधा अरु स्वाहा तुहीं सुन्यौ तैहीं त्रि- देवन को सुख छावै । तैहीं करै जग को लय महेश्वरसुधाकर। पालन स्याम तुहीं जग को उपजावै ॥ तैहीं चेतन है जड़ को पुनि तैहीं सुजोगिन जोग जगावै । रूप अनूपम मोहि दियौ बर देव दया करि जो मन भावै ॥ ९३ ॥ टोका। इस कबित्त में भी श्री जानकी जी की स्तुति बिनय प्रार्थना है, और उन्लेष अलङ्कार है, लक्षन । सो उल्लेष जो एक को बहु समुझे रोति । अरथिन सुरतर तिय मदन अरि को काल प्रतीत ॥ वि शेष अलङ्कार भी है ॥ ३ ॥ पुनर्यथा घनाक्षरी। कोऊ करि हेत क्रेज चन्द को बसन देत कोऊ रमानाथ हित उन्दा दल माल को । कोऊ विश्वनाथ माथ नाय बिल्वपत्र देत कोऊ कहै बानी बिधि बानी सों दयाल को॥कोऊ सुर इन्द्र आदि बन्दत सकल सुर कोऊ है अनन्द लह्यो फन्द जगजाल को । राधिका-रवन सुख सा- गर जवन स्याम ध्यावत तवन करुनाकर कृ. पाल को ॥ ९४॥ टीका। इस कबित्त में कबि को उक्ति है या किसी दास की अ. नन्य भक्ति है, दृढ़ता करि कहै है, इष्ट देव सौ और परसंख्या सम अल- कार है, परसंख्या इक थल बरजि दूजे बल ठहराय । नेह हानि हिय में नहीं मई दीप में लाय ॥ ४ ॥ पुनर्यथा। आये घने भूमि भूप सोहत अनूप रूप बाजी महेश्वरसुधाकर। १४४ गज स्यन्दन सवारी सजी सान की । मही। महल पै सुमंच छत छजन पै मेच कुरसीन में बिराजत प्रमान की ॥ पैदल अनेक नर न. गर डगर माहिं स्याम छबि देखत सुनैन तँ न आन की । देव गुन-गान की सुमन बरखान की सुशोभा को बखानै राम भरत मिलान की । टोका। इस कबित में भी कबि को उति है श्री रामचन्द्र जौ जब लङ्का से आये हैं तब श्री भरथ जी को मिलाप बनन है, और छकानु प्रास अलङ्कार है, लक्षन पूर्वांत है ॥ ६५ पुनर्यथा। जानि जगपावन को आवन परम रम्य औध यौँ सोहावनि सनेह दरसान की । तोरन पताका मंजु मनि में सुमग चौक स्याम जू बजार त्यौं अपार गुन गान की ॥ बसन बिभूषन विभूषित सुनारी नर निरर्षे अंटारी चढ़े चारुता बिमान की । नेम के निधान की सुप्रेम सरसान की कही न जाय शोभा राम भरत मिलान की ॥१६॥ टोका। इस कबित्त में सर पूर्वोक्त है ॥ ६ ॥ अथ वात्सल्य रस घनाक्षी। कसकन कीन्ही कंस कैद मै करायो बेगि बेरी लै भरायो नेक मान्यौ न सगैया को । ब- सुदेव देवकी को देखि दुख दीनबन्धु मन में महेश्वरसुधाकर । बचारयौ स्याम देवन सहैया को । भाद्र कृश्न भाछै बुध रोहिनी नछत्र चारु प्रगट्यौ सरूप बराधर्म के धरैया को । जग को रचैया भयो बज को बसैया बजी आँनद-बधैया जब जन्म भो कन्हैया को ॥ ९७॥ टीका। इस कबित्त में कबि की उक्ति है या दास की। श्री कृष्ण जन्मोत्सव बर्नन है, प्रहर्षन अलङ्कार है, लक्षन । पूर्वोक्त है ॥ ८ ॥ पुनर्यथा मवैया । पार न पावत जाको पुरान परे सब सों बद्यौ बेद सलोने । शश सुरेश महेश गनेश गनै गुन के गन जाहिर होने ॥ शंभु स्वयम्भु सराहत स्याम भयो नर भूप सो नन्द के भोने । पूरन ब्रह्म अनन्त अनूप सो ? शिशु सोहत सूप के कोने ॥ ९८॥ टोका। इस कवित्त में कवि की उक्ति है यहा कोई स्त्री की उक्ति है वा कोई ब्रह्म उपासक को है, परमेखर को अवतार लैन मानषी की अहचर्य और प्रहर्षन अलङ्कार है, और अधिक अलङ्कार भी है, पूर्वोक्त है। पुनर्यथा मवैया । ध्यान धरै जप जोग करें मुनि प्रेम सों जा- नत है जगपालक । शेश गणेश सुरेश महेश हमेश रहें जिनके सब तालक ॥ स्याम सो दे. वन को दुख देखि सुभूप मये श्रुति आयसु चा.
महेश्वरसुधाकर। लक । मोद किये जननी मुख चमति गोद। यह सुन्दर बालक ॥ ९९ ॥ टोका। इस कबित्त में वही कबि को उक्ति है परमेश्वर को करा, वतार लेन बर्नन है, छेकानुप्रास अलङ्कार है, लक्षन पूर्वोक्त ही है ॥८५, पुनर्यथा । पङ्कज से पग नूपुर चारु लसैं कटि भूखन दूखन घालक । नाभि गभीर भली त्रिवली उर केहरि कंध सुबाहु बिसालक ॥ स्याम सुआनन की छबि आनन हैं दतिया दुति दामिनि झा- लक । नैन सुमन्द किये मृग कंज सु गोद लिये यह सुन्दर बालक ॥ १०० ॥ टोका । इस कवित्त में भी कवि की उक्ति है परमेश्वर को मानुषी अवतार लेन बर्नन श्री राम को या श्री कथ को श्री प्रतीप और उप- मालङ्कार है ॥ १०॥ पुनर्यथा। परम सुजान नृप कीन्ह्यौ सनमान मान ध- रम प्रमान श्रुति सम्मत सुकाम को । भूषन बसन बर बाजि गजराज साजि सम्पति सरस महि सदन अराम को ॥ सुजस पताको जग जाको फहरात मंजु ताको के प्रकास देस देस में मुदाम को । महाराज राज श्री महेश्वरबक- ससिंह अतिसै प्रसन्न है दियो है द्विज स्याम को ॥
५० महेश्वरसुधाकर । पुनर्यथा। सुजस सुचन्द जग चन्द सों दुचन्द चारु पा समेति सुख सम्पति सने रहौ । हिम्मति दारता हमेस बेस ही मे बसै बसुधाधिराजन पै सासन भने रहौ ॥ स्याम कबि कोबिद को करन समान दान देत सनमान ज्ञान गौरव गने रही। श्रीयुत महेश्वरबकसमहाराज राज तखत- नसीन परमानंद बने रहौ ॥ १०२॥ सिद्धि श्रीमन्महाराजाधिराजराजराजेन्द्रमुकुटमणि रामपुराधिपति रैकवारकुल कमलदिवाकर श्रीगुमानसिंहात्मज श्रीमहेश्वरबक्ससिंह ब हादुर जू देव को आज्ञानुसार श्री पण्डित स्यामसुन्दर अखनौनगर नि- वासी महेश्वरसुधाकर ग्रन्थविरचिते नवरस बननो नाम दसमस्तरङ्गः ॥ दोहा । सुरस लसत द्वैसे अधिक दोहा कवितललाम। रच्यौ महा सुखधाम यह श्री कवि सुन्दर स्याम ॥ ग्रन्थ महेश्वरसुधाकर सुरस भरो अभिराम । पाठ अर्थ सब सोधि के लिख्यौ स बेनीराम ॥ बन्हि बाण निधि चन्द त्यों है सम्बत सुखधाम । भाद्र असित गुरु पञ्चमी भो समाप्त जुग जाम॥ बन्दीजन कुल कमल रवि बसत सरेनी ग्राम। मिश्र स्यामसुन्दर रचित लिख्यौ सो बेनीराम ॥ इति ।