Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Shri Maduttra Adhayayansutram Bhag-i

Gani, Laxmivallabh · 2011/01

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

S
YOOOOOOOOOOOOOD
॥ श्रीमदुत्तराध्ययनसूत्रम् ॥
॥ श्रीअईते नम ॥
१ti Gi)23
मुलगागा, मूलार्थ, श्रीलक्ष्मीवहभगणि प्रणीत अथदीपिका टीका तथा तेना गुजरातीभापानुवराद महित
4 भाग प्रथम
आ सूत्र पालणपुरनिवासी सो मणीवाइए पोताना स्वर्गस्थ पिताश्री राजकरण छगनलालनाशुभ स्मरणार्थे !
-छपावी प्रसिद्ध यु छे-
सरत् १९९०
(मूल्य वाचन तथा मनन)
सने १०३४

श्रीजैनभास्करोदय प्रिन्टिंग प्रेसमां मेनेजर बालचंद हीरालाले छाप्यु-
जामनगर.
-
-
सूचना-आ प्रथम संस्करण चातुर्मासमां बांचवा काम लागे
जेथी प्रथम भाग त्रण अध्ययने संपूर्ण करेल हे वाकीना
त्रण भागमा याकीनां ३३ अध्ययनो संपूर्ण यशे.

DINGREENDAGANBANDEY → प्रसिद्धकर्तानु रत्तात *- आ सन पालणपुरनिवासी मौ मणीयाइए पोताना स्वर्गस्थ पिताश्री महेता राजकरण छगनलालना शुभ स्मरणार्थे छपाची प्रसिद्ध करें श्री राजकरण छगनलाल महेतामा धर्मसस्कार पहेलाथोज रता तेओ श्री धरमचद फतेचद महेता जेओ सने १८३०ना अरमामा पालणपुर पोलिटीकल एजन्टना शीरस्तेदार हता तेमना पौत्र धाय जैनधर्म प्रत्ये तेमने उडो प्रेम अने अविचल श्रद्वा हती तेमणे पोतानी पुनीमा धर्ममारना नानपणधीज जाग्रत करेली, सौ मणीगाइ घार वर्षनी उमरना हतात्यारे तेमना पितानुअपमान धयेल जीपहिसा न धाय तेवा कार्योमा नाणानो सदयय करगो एपी तेमना पिताश्रीनी अतिम इच्छाने मान आपना तेमणे केटलाफ वर्षथी आयु मत्र छपारमा निश्चय अनुसार आ मत्र प्रथम भाग छपाची प्रसिद्द कर्यु के पीजा प्रण भागो छपाय के DHARSWEESLASH न सो मणीयाइ राजकरण छगनलाल

No text on this page.

श्रीमदुत्तराभ्ययनना आ सस्करण सबधी थोडु वक्रव्य श्रीजैनागम सूत्रग्रन्थोमा ययपि भगवती, मूयगडाग, आचाराग पाभृति ग्रन्थोमा ते ते विषयोनी विशिष्टता रहेली छे तथापि श्रीउत्तराध्ययनसूत्र नैनसिद्धाताना अनेक विशेपाना निरूपणथी सपूर्ण होवाथी तथा सर्वागम साधारणी अर्धमागधी भाषामय होवा छतां पण भापानी ऋजुता तथा विषयमतिपादनाचित वाक्यमणालीबद्ध होराथी मूत्र ग्रथोमा विशेष आदरपात्र थवा योग्य छे आ ग्रन्य उपर अनेक टीकाओ लखायेली छे तेमा श्रीभावविजयजी विरचित टीका तथा श्रीलक्ष्मीवल्लभगणि विरचित टीका ए वे टीकाओ परिपूर्ण उपलब्ध छे आ बेमानी श्रीभाववीजयजी रचित टीका अति विस्तृत होवाथी ते जीज्ञासु जनने पल्लवन जेवी भासे पण लक्ष्मीवल्लभमरि रचित अर्थमकाशिका टीका सरल तथा अथार्य समजगमा मदाधिकारीने पण उपकारक थाय तेवी छे ते साये-पचमहाकाव्य टीकाकार मल्लीनाथे करेली- नामूल लिरयते मिचिन्नानपेक्षित मुच्यते ' मूलग्रन्थना अश कर रहेवा दीधो नथी तेम पिनजरूरी अनपेक्षित कशु रख्यु नयी, आ प्रतिज्ञाने अनुसर- नारी होइ एन टीका आ सस्करणमा लीधेली छे मथम आनथी छ वर्ष पहेला श्रीलक्ष्मीवल्लभीटीका सहित श्रीउत्तराध्ययनमूलमल छत्रीशे अध्यन पूर्ण वे आत्ति - अमारा मुरब्बी पिताश्री सद्गत पंडित हीरालाल हंसराजे पोताना आ जैनभास्करोदय प्रेसमा छापी प्रसिद्ध करेल जेनी तमाम प्रतो थोडाज समयमां पूज्य साधुजनो तथा साध्वीओना उपयोगमा आवी गइ तेम केटलाएक जैन धार्मिक गृहस्थोए पण संगृही तेथी खलास थतां आ वखते केटलाएक महापुरुषोनी प्रवल प्रेरणाथी मूलगाथानो अर्थ प्रथम दर्शावी पछी ते नीचे संपूर्ण लक्ष्मीवल्लभी टीका तथा तेनुं गुजरातीमां भाषांतर अति सरलशैलीमां आपवामां आव्युं छे जेथी जिज्ञामु जनोने घणुंज उपकारक थशे. महात्मा साधुजनो तो यद्यपि संस्कृतनिष्णात होय तथापि तेओने पण प्रवचन प्रणालीमां सहायक थाय तेवी योजना राखी छे एटले प्रथम मूलगाथा ते पछी संक्षेपमा मूलार्थ, तदनंतर संस्कृत टीका अने ते पछी टीकातुं गुजराती भापांतर आपेलुं छे तेथी आ संस्करण सर्व प्रकारे उपयोगावह थाय तेवी गोठवण करी छे. आवा महान् जैनागम ग्रंथना आवा संस्करण आरंभवानुं साहस करता हृदयमां जैनसाधु समुदाय तथा श्रावकसंघनी धर्म भावनानु उपोद्वलन मळवानी पूर्ण आशा राखवामां दृढ विश्वास एज परम प्रेरणा समर्पक थया छीए आटलं वक्तव्य आ प्रथम भागना आरंभमां आवश्यकजाणी निवेदन करी विरमीए छीए विशेष टीकाकारना समय वगेरेनो विचार तथा उपोद्घात तरीके विवेचन वीजा भागना आरंभमां कहेवाशे. ली. वालचंद तथा जेसंगलाल हीरालाल.

॥ श्रीजिनाय नम ॥ मापातर अध्ययनर यन सूत्रम् ॥ अथ श्रीमदुत्तराध्ययनसूत्रम् ॥ ABAR (मूलगाथा अने तेनु भाषातर-टीका अने टोकार्नु भाषातर) (मूळकर्ता-श्रीसुधर्मास्वामी, टीकाकार-श्रीलक्ष्मीवल्लभसरि ) भाषातरसहित छपाची प्रसिद्ध करनार-पडित भावक हीरालाल हंसराज-(जामनगरवाळा) अर्हतो ज्ञानभाजा सुरवरमहिता सिद्विसीधस्थसिद्वा । पश्चाचारमवीणा प्रगुणगणधरा. पाठकाश्चागमानाम् ।। लोके लोकेशवद्या. सकलपतिवरा साधुधर्माभिलीना. । पश्चाप्यते सदाप्ता विद्धतु कुशल विननाश विधाय॥१॥ अथ-श्रीलक्ष्मीवल्लभमरि श्रीसुधर्मास्वामिकत उत्तरा पयनमूननी टीकाना आरममा मङ्गलाचरणरूपे नमस्कारयोग्य 'पश्चणमुकार' पठित पाचे परमेष्ठीनु यथाक्रमे स्मरण करे छे अन्तिो-झानभान =केवलज्ञानसेवी तथा मुरवरमहित देवेन्द्रा- भाषांतर । म दिके पूनित एवा अईन्ता तीर्थकरो, (१) सिद्धिसोधस्थ=मुक्तिरूपी महालय उपर स्थित यएला-सिद्धो, (२) पञ्चविध आचारमा प्रवीण प्रकृष्ट गुणवान् गणधरो आचार्यो, (३) आगमग्रन्थोना पाठक-अध्यापन करावनारा उपाध्यायो, (४) तथा लोकमां लोकेश गणाता महापुरुषोए पण वन्दन करवा योग्य, साधुओनाधर्म पालवामा तल्लीन रहेनारा, सकलयतिवर-साधुभो (५) आ सदाप्त जेमनां वचनो संशयादिदोषरहित सर्वनां श्रेयस्कर होई सर्वेयें ग्रहण करवा योग्य मनायएवा ए पांचे विघ्नोनो नाश करी सर्वेनुं कुशल करो. ॥१॥ श्रीवीरं क्षीरसिंधूदकविमलगुणं मन्मधारिप्रयातं । श्रीपार्श्व विनवल्लीवनदलनविधी विस्फुरत्कांतिधारम् ॥ सानंद पेन्द्रभूत्याऽऽहतवचनरसं दत्तहकर्णयोधं । वंदेऽहं भूरिभक्त्या त्रिभुवनमरितं वामनःकाययोगः ॥२॥ अर्थ:-क्षीरसागरना उदकजेवा विमल छे गुण जेना, कामदेवरूपी शत्रनो घात करनारा, इन्द्रभूति गौतमस्वामीए आनंद- सहित जेना वचनरसन आदरथी सेवन कर्यु छे तथा प्रणे भुवनें पूजित एवा श्रीवीर महावीरस्वामीने तथा विनवल्लीना वनदलन करवामां समकती छे देहकातिरूपी धार जेनी तथा दत्तहकर्णबोध-जेणे कर्ण=नागर्ने बोध दीपो छे एवा श्रीपार्श्वनाथने हुँ मन वचन तथा कायाना योगवडे, करी घणी भक्तिसहित वन्दन करूं ई. ॥२॥ सराध्ययनसूत्रवृत्तयः । संति यद्यपि जगत्यनेकशः ॥ मुग्धहस्सदनयोधदीपिका । दीपिकामिव तनोम्यहं पुनः ॥३॥ अर्थ:-उत्तराध्ययनमत्रनी यधपि जगतमा अनेक वृतिभो थयेली के पुना तथापि मुग्ध-मंदाधिकारि जनोना हृदयगृहोमां भाषातर अध्ययन बनसूत्रम् बोधनु दीपन करनारी आ दीपिका (मशाल तुल्य) वृत्ति हु विस्तारु छु.॥३॥ प्राप्तचारविभवो गिरा गिर । श्रीगुरोश्च विशदप्रभावत.॥वक्ति लक्ष्म्युपपदस्तुवल्लभा । सजना मयि भवतु सादरा' अर्थ. बाग्देवीना तथा श्रीगुरुना निर्मल प्रभावथी वाणीनो मुन्दर वैभव जेने माप्त थयेल छे एवो लक्ष्म्युपपद वल्लभ, अर्थात् । *लक्ष्मीवल्लभनामा व्यार यानगर कहे छे के सज्जनो मारे रिपये सादर-आदरभावयुक्त थामो ॥ ४॥ श्रेयसे स्ताद गणभृता । चतुर्दशशती सता ॥ श्रीपुडरीकमुख्याना । या विपचाशदुभरा ॥५॥ अर्थ-श्रीपुडरीक आदिफ चावन जेमा अधिक छे एवी गणधरोनी चतुर्दशशती, अथाव चउदसो वावन गणधरोनो समुदाय सतपुरुषाना श्रेय - कल्याणकारक थाओ ॥५॥ ** आत्मनाम गुरोनाम नामावतिष्टपणस्य च ॥ आयुप्कामो न गृहीयाज ज्येष्ठापत्यकलत्रयो । मायुप्यनी कामनावाळा पुरपे पोतानु, गुरुनुअतिपण होय तेनु महोटा पुशनु तथा पोतानी पत्तीनु नाम न उच्चारषु आ निषेधथी यचया प्रकारातरे बे विभाग करी प्रय पोतानु नाम निर्देश्यु छे यधपि भक्तामरकारे "त मानतुग भषशासमुपैतिलक्ष्मी अही पोतानु नाम ग्रहण कयु छे जेथी आत्मनाम ग्रहण सदोष नथी एम कोइ शका करे तथापि भक्तामर कारे पण मान-स्वाभिमानथी तुग-उन्नत पया पुरुपने लक्ष्मी पराधीन थर आधी घरे छे र अर्थ योधन करपा हाने श्लेपम यांदया पोतानु नाम प्रकट कर्य है, साक्षात् 'मार नाम मानतुग' एम उच्चायु नथी जेथी तेणे पण उपयुक्त वचनना निषेधने माय राख्यो है उत्तराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर ध्ययन ॥४॥ संजोगा विप्पमुक्कस्स । अणगारस्स भिक्खुणो ॥ विणयं पाउकरिस्सामि । आणुपुर्वि सुह मे ॥१॥ मूलगाथार्थ:-संयोग-सांसारिक पितापुत्रादि संयन्ध-धी तथा विविध विषयादि सबंधथी विशेषतया मुक्त थयेला अने अनगार-नियतनिवासस्थान रहित एवा भिक्षु-संयमीसाधुना विनय-साधुए पाळवाना आचारने हुं प्रकट करीश, ते (हे शिष्यो!) तमे आनुपूर्वी यथावत् क्रमथी श्रयण करो ॥ १ ॥ व्याख्या-श्रीसुधर्मस्वामी जम्बूस्वामिनं वक्ति, जम्बूस्वामिनमुद्दिश्य अन्यानपि शिन्यान् वदति, भोः शिष्याः ! अहम् आनुपूर्ध्या अनुक्रमेण भिक्षोभिक्षया मधुकरवृत्त्याहारं गृहीत्वा शरीरधारकस्य साधोविनयं प्रादुःकरिष्यामि, प्रकटीकरिष्यामि, मे मम विनयं प्रकटीकरिप्यतो यूयं वाक्यं शृणुत ? यतो जिनशासनस्य मूलं विनयधर्म एव, उक्तं च श्रीदशवकालिके-विणयाओ नाणं, नाणाओ दंसणमित्यादि. कधभूतस्य भिक्षोः ? संयोगात् बाह्याभ्यंतर भेदेन द्विविधाद् विप्रमुक्तस्य विशेषेण रहितस्य , तत्र पाह्यसंयोगो धनधान्यपुत्रमित्रकलत्रादि, अचित्तसचित्तादि- रूपः, अभ्यंतरसंयोगो मिथ्यात्ववेदत्रिकहास्यादिषट्कक्रोधादिचतुष्करूपः. एवंविधविविधसंयोगादिरतस्य. पुनः कीदृशस्य भिक्षोः १ अनगारस्य, न विद्यते अगारं गृहं यस्य सोऽनगारोऽगृहः, तस्य नियतवासरहितस्य. ॥१॥ अर्थ:-सुधर्मास्वामी जम्बूस्वामीने कहे छे तेम जम्यूस्वामीने उद्देशीने वीजा शिष्योने पण उपदेशे छे. हे शिष्यो ! हुं आनुपूर्वीथी अनुक्रमे भिक्षुना, भिक्षा [ मधुकरी] सिथी आहार लावीने शरीर धारण करनारा साधुना विनयनें प्रकटन करीश. .

उत्सराध्य यन सूत्रम् भाषातर अध्ययन, ॥५॥ ए विनय प्रकट करता हु जे वाक्य कहु ते तमे श्रवण करो कारणके, जिनशासननु मूळ विनयधर्मन छे. श्रीदशकालिकमा फा छ के–'विनयशकी शान, अने झानथको दर्शन ' इत्यादि हवे ए भिक्षुना विशेषणो निर्देशे छे सजोगा-बाल तथा आभ्यतर आग बेकारना सयोगथी विममुक्त-विशेषेकरी रहित बाह्यसयोग-धन धान्य पुत्र मित्र स्त्री इत्यादिरूप अचित्तसचिचादि भेदभिन्न, तथा आ-पतर सपाग-मिथ्यात्वदकि, हास्पादि षट्क तथा क्रोधादि चतुष्करूप, आम वेय प्रकारना सयोगथी विरत थएला तेमन अनगार-जेने आगार (गृह) नयी, अर्थात् एक स्थाने नियत वास न करनार; एका भिक्षुनो विनय कहेवाय छे ॥१॥ आणाणिदेसकरे । गुरूणमुक्वायकारए ॥ इगियाकारसपन्ने । से विणीय त्ति वुच्चइ ॥२॥ मूळगाथार्थ-जे विनेय, गुरुनी आमाना निर्देश प्रमाणे करनारो होय भने गुरुनी समीपेज रहेनारो तथा गुरुना रहित मुख नेत्र भृकुटी घगेरेनी चेप्टाथी तेमज आकार-उप्रतादि अवस्था उपरथी गुयना अभिप्रायने जाणीलेनार होय ते शिप्य-साधुन पिनीत-विनययान् पम कवाय छे॥ ३ ॥ याच्या-स शिन्यो विनीत इत्युच्यते, स इति क ? य शिष्य आज्ञायास्तीर्थकरप्रणीतसिद्वांतवाण्या निर्देश उत्सर्गापवादकयनं तस्य कारको भवति, अपवाज्ञाया गुरुवायस्य निर्देश प्रामाण्यमाज्ञानिर्देशस्त करोती- त्याज्ञानिर्देशकर पुार्य शिष्यो गुरूणाम् उप-समीपे पात स्थितिस्तत्कारक उपपातकारक , गुरूणा दग्गोचरे तिछनीत्यर्थ पुनर्य शिय इगिताकारसपनो भवति, गुरूगामिनित मानसिक चेष्टित जानाति, पुनर्गुरूणामाकार - * उत्तराध्य- यन सूत्रम् याह्यं शरीरचेष्टितं च जानाति, इङ्गितं निपुणमतिगम्यं, प्रवृत्तिनिवृत्तिज्ञापकं. इषद्भूशिर कंपनादिकं, आकारः स्थूलमतिगम्यश्चलनादिदिशावलोकनादिसूचकः. यदुक्तं-अवलोकनं दिशानां । विजृभणं शाटकस्य संवरणं ॥ आसनशिथिलीकरणं । प्रास्थितलिङ्गानि चैतानि ॥१॥ तस्माद्यः शिष्यो गुरोरिनिताकारौ सम्यक् प्रकर्षण जाना- तीति इङ्गिताकारसंपन्नः एतादृशः शिष्यो विनयवान् उच्यते ॥२॥ अधाविनीतस्य लक्षणमाह- भाषांतर अध्ययन ॥६॥ ॥ ६॥ अर्थः-ते शिष्य विनीत=विनयवान् कहेवाय के जे शिष्य आज्ञानिर्देशकर नीर्यकरमणीत सिद्धान्तवाणीना उत्सगे अपवादादिक जे निर्देश-कथन-तेने यथावत् करनारो होय, अथवा गुरुवाक्यतुं प्रामाण्य मानी ए आज्ञाने अनुसरनारो, वली जे शिष्य गुरुउपपातकारक अर्थात्-गुरुनी समीपें स्थिति करनारो-गुरुने दृष्टिगोचर रहेनारो होय ते साथे इङ्गिताकारसंपन्न-शुरुना मनमां होय ते जाणी जइ, तेमन गुरुना बाह्य चेष्टित उपरथी समनी लइ तदनुकूलवर्तनारो, अहीं इंगित; निपुणमति होय तेज जाणीशके-निदर्शनार्थ-गुरु भृकुटी जरा वक्र करे अथवा मस्तक धुणावे ते उपरथी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति समजी जाय, अने आकार-स्थूलबुद्धि पण समजीशके-जेमके-चालवामांडे अथवा दिशाओ तरफ जोवा लागीजाय, आवा प्रकारनां इंगित तथा आकार उपरथी गुरुनो अभिप्राय समजी तदनुकूल प्रवृत्ति वा निवृत्ति करे-कह्यं छे के–'दिशाओमणी जोवा लागे, हलचल करवा मांडे, ओढवानुं वस्त्र संकोचवामांडे, आसन शिथिल करवालागे तो जाणधुं जे ए बधां चिन्ह क्यांक बहार जवामाटे चालता थवानां छे-' माटे जे शिष्य गुरुना इंगित तथा आकार सम्यक् प्रकारे जाणी तदनुसार वर्त ते शिष्य विनयवान् कहेवाय ॥ २॥ R - उसराध्य भाषांतर अध्ययनर पन मूत्रम् हो पिनीती विपरीत अविनीतनु लक्षण कहे छे- आणाणिदेसकरे । गुरूणमणुपवायकारए । पडिणीए असबुझे । अविणीए ति वुच्चइ ॥ ३ ॥ मूळगाधार्थ-जे शिष्य गुरती आशा निर्देशने नदि फरनारो तथा गुगनीसमीपे मदि रहेगारो पळी गुरुथी प्रतिफल पणे यत्ततो होय एपो असयुध-अयुश गयिनीत यिनयही एम य हेयाय छे ॥ ३ ॥ यारया-स शिष्योऽपिनीत इत्युच्यते, य आज्ञायास्तीर्थकरवाश्यस्य गुरोर्वाक्यस्य चानिर्देशकरोऽप्रमाणकर्ता ज्ञानविराधक, पुनर्यो गुरुणामनुपपातकारको भवति, गुरुणा दृग्विपये स्थितिं न करोति, आदेशभयाद दर तिष्ठ तीत्यर्थ पुनर्प शिग्यो गुरुणा प्रस्नीको गुरूणा छला वेपी, पुनर्योऽसतुद्धस्तत्वस्यावेत्ता, एतादृशलक्षणोऽविनीतो भवति ॥३॥ अन फूलवालकस्य दृष्टात - अर्ध-ते शिष्य अविनीत यहवाप के जे-आशातीर्थकर पायो तया गुरुना पाण्यानो अनिर्देशकर=न माननारो, अर्थात् नानो विराध तथा गुरनो अनुपपातकारप-गुरनी पासे नहिं पत्तनारा, 'गुरु पर आशा फरशे' एरा भगथी हमेशा गुरुथी दरज रहेनारो, एग्लन नहि स्तुि विशेषमा गुरुनो मत्यनीय-गुरुना छिद्र जोनारो अने असयुद्ध-नचथी अनाण, आग लक्षण पाळो जे शिष्य होय ते अविनीत विनयरहित पहेवाय छे ॥३॥ आरिपयमा लगाठपनु दृष्टात- .

उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययन . यन सूत्रम् ॥८॥ ॥८॥ यथा एकस्य आचार्यस्य क्षुल्लकोऽविनीतः, तमाचार्यः शिक्षार्थ वाचा ताडयति, स क्षुल्लको रोषं वहति. अन्यदा आचार्यस्तेन क्षुल्लकेन समं सिद्धशैलं वंदितुं गतः, तत उत्तरत आचार्यस्य वधाय तेन पृष्ठस्थितेन क्षुल्लकेन शिला मुक्ता. आयांत्याचार्येण दृष्टा, स्वपादौ प्रसारितो, अन्यथा स आचार्यों मृतोऽभविष्यत्. आचार्येण शापोऽस्मै क्षुलकाय दत्तः, हे दुरात्मन् त्वं स्त्रीतो विनंक्ष्यसि, अथ स क्षुल्लक आचार्योऽयं मिथ्यावादी भवत्विति विचित्य पृथग्भूतस्तापसाश्रमे गत्वा तिष्ठति, तत्रासन्ननदीकूले आतापनां कुरुते. मार्गसमीपे सार्थ विलोकयति, यदि शुद्ध प्राप्नोति तदाहारं गृह्णाति, नो चेत्तदा तपः करोति, तस्यातापनाप्रभावेण नद्यन्यत्र व्यूढा, ततो लोकेरस्य कूलवालक इति नाम कृतं. एक आचार्य पासे क्षुल्लक अविनीत शिष्य हतो. आचार्य तेने वाणीथी शिक्षा देवामां बहु तरछोडता त्यारे ए क्षुल्लक रोपे भरातो. एक समये ए क्षुल्लकने साथे लइ आचार्य सिद्धशैल शेव्रुनानी वन्दना करवा गया त्यांथी उतरता हता तेवारें बांसेथी क्षुल्लके एक शिला गवडावी पण आचार्य चे पग मोकळा कर्या एटले वच्वेथी नीकली गइ, जो आम न कर्यु होत तो आचार्यन मरणज यात. आचार्य क्षुल्लकने शाप दीयो के-'हे दुरात्मन् ! जा तुं स्त्रीथी विनाश पामीश' आ शाप सांभलीने-आचार्यनां आवां वचन मिथ्या थाओ' आम मनमां चिंतन करतो क्षुलक आचार्ययी छुटा पड़ी एक तापसना आश्रममा जइने रह्यो, त्यां रही नदीना तीर उपर नित्य आतापना आदरी. मार्गसमीपे माणसोना साथ जता होय तेने जोतो अने जो कोइ शुद्ध आहार मले तो ग्रहण करतो. न मले तो पण तप कर्या करतो. तेनी आतापनाना प्रभावथी नदीनो प्रवाह हतो त्यांची हठीने अन्यत्र जरा छेटे वहेवा लाग्यो. आ उपरथी लोकोए तेने "कूलवालक" अर्थात्-नदीना कांठाने वाळनार=एक ठेकाणेथी बीजे लइ जनार एवं नाम आप्यु. P उत्तराध्य यन सूत्रम् इतव श्रेणिकपुन कुणिको राजा स्वपत्नीपद्मावतीप्रेरित स्वभ्रातृहरिल्लपाचे जनकणिकार्पितदिय कुडलाष्टादशसरिकहारसेचनकहस्वादिक वस्तु मार्गितवान् तौ च सर्व लात्वा मातामहचेटकमहाराजपाः भाषातर वैशालीनगर्यो गतौ कृणिकन मातामरचेटकमहाराजपार्थान् सर्ववस्तुसहितौ तौ भ्रातरौ मार्गितो, शरणागतर- अध्ययन अपजरविरुद् वरता तेन चेटकनहाराजेन न प्रेपितो, तनो झट कणिक समारावितशकचमरप्रभावेण स्वजी-06॥९॥ वित रक्षन्नमोषणेन चेटकमाराज सग्रामे निर्जिल वैशालीनगरीमध्ये क्षिप्तवान् सजितवमा च ता वैशाली नगरी स कूणिको रोधयतिम नगरीमध्यस्थितीमुनिसुव्रतखामिस्तृपप्रभावात्ता नगरी ग्रहीतु न शक्नोति, ततो बहुना कालेन देवतयैग्माकाशे भणित-- ॥९॥ एवामा श्रेणिर राजानो पुन कूणिराज पोतानी पद्मावती नामनी राणीनो मेरणाथी पोताना हल्ल अने विहल्ल नामना के भाइआ पासेथी, ते भाइओने पिता श्रेणीके आपेला दिव्य कुन्डल, अढारसरो हार तथा सेचनक हाथी पगेरे वस्तु माग्या त्यारे ते पन्ने भाइओ पानानु सर्वस साथे लइने पाताना मातामह [ नाना] महाराजा चेटकने शरणे वैशालीनगरीमा जता रह्या कूणिके ' सर्पपस्तुसहित बन्ने भाइभो मारे हाले करो, ' आम पोताना नाना चेटक पासे मागणी करी पण- शरणागत थाय तेने वनपञ्जर एटले वजना पानराजेवु रक्षण आपरानु पिरद धारण करनार ए चेटारागाए पोताना विरुदनी टेक जाळनया खातर इल्ल तमा विहल्ल बन्नेने इणिकने सोप्या नहि, आ उपरथी कृणिके इन्द्रचमरनी आराधना करी जेना उत्तराध्य- षांतर अध्ययन ॥१० ॥१०॥ प्रभावथी पोताना जीवितनुं रक्षण करी चेटफ महाराजने संग्राममां जीती वैशालीनगरीमा रूंधी मुक्यो, किंतु ए वैशालीनगरीमां श्रीमुनिसुव्रतस्वामिनो स्तूप हतो ए स्तूपना प्रभावथी वैशालीनगरी ग्रहण न करी शक्यो. केटलोक काळ वीततां आकाशवाणीर्थी देवताए कह्यु के- समणे जहकूलवालए । मागहिअं गणि रमिस्सए । राया य असोगचंदए । वेसालिं नवरी गहिस्सए ॥ १ ॥ कणिकेनेमां वाणी श्रुत्वा स कूलवालकश्रमणो विलोक्यमानस्तत्र स्थितो ज्ञातः, राजगृहादाकारिता मागधिका गणिका, तस्याः सर्व कथितं, तयापि प्रतिपन्नं तं कूलवालकत्रमणमहमत्रानेयामीति. सा कपटाविका जाता, सार्थेन तवागता, तं कूलवालकं वन्दित्वा भणनि स्थाने स्थाने चैत्वानि साधूंश्च वन्दित्वाहं भोजनं कुर्वे, यूयमत्र श्रुताः, ततो वन्दनार्थमागता, अनुग्रहं कुरुत ? प्रासुकमेषणीयं भक्तं गृहीत ? ज्यारे कूलवालकश्रमणने मागधी गणिका रमण करावशे त्यारे राजा अशोकचन्द्र वैशाली नगरी ग्रहण करशे? कुणिके आ आकाशवाणी सांभली कूलवाळकश्रमणनी गोत करावतां ज्यां ते स्थित हता त्यां पत्तो मेळवी जाण्या. रानगृहमांथी मागधी गणिकाने बोलावी बंधीवात समजावी. ते गणिकाएं वधु कयूल कर्यु के हुँ ए कूलबाळक श्रमणने अहीं आणी आपीश" पछी ने मागधी गणिका कपट श्राविका बनी सार्थ लइने कूलबाळकश्रमण पासे जइ वन्दनाकरी बोली के-ठेकठेकाणे चैत्योनी वन्दना करती आयु छु। आप जेग साधुओनुं वन्दन करीने भोजन करुं छु, आप आंही विराज्या छो एम सांभळी आपर्नु वन्दन करवा अत्रे आवी छु, हवे आप अनुग्रह करो अने पुष्कळ अभिलपित भक्त-भिक्षाम-ग्रहण करो." - उत्तराध्य भाषांतर अध्ययनर यन सूत्रम् , इति श्रुत्वा कलवालकश्रमणस्तस्या उसारके गत , तया च नेपालगोटकचूर्णसरोजितामोदका दत्ता तरक्षणानतर तस्यातीसारो जात , तया औषधप्रयोगेण निवतित प्रक्षालनोदर्तनादिभिस्तया तस्य चित्त भेदित, स कलवारकश्रम- | णस्तस्यामासक्तोऽभूत, तथापि स्ववशीभूत स साधु कूणिकसमीपमानीत , कणिकेनोक्त भो कूलवालकश्रमणीयधेय वैशालीनगरी गृह्यते तथा क्रियता? कूलवालकेनारितद्वच प्रतिपय नैमित्तिकवेषेण वैशालोनगर्यभ्यतरे गत्वा मुनि- सुक्तम्वामिस्तूपप्रभावो नगरीरक्षको ज्ञात , नैमित्तिकोऽय नगरीलोकै पृष्ट' कदा नगरीरोधोऽपगमिष्यति स प्राह पदैन स्तृप युयमानयत तदा नगरीरोधापगनो भवतीति श्रुत्वा तैलॊकस्तगत कलवालक प्रमणेन यहिर्गत्वा सजित कुणिकस्तेन तदेव स्तूपप्रभावरहिता सा नगरी भानग, एव पतित. कलवालकानगोविनीतत्वात् इति कलवारक कथा अथाविनीतस्य दोपपूर्व दृष्टातमार- आ वचन साभळी पुटवाळाश्रमण तेणीने उतारे गया ए गणिगए तेमने नेपालगना गोला मेळवीने चुरमाना लाई आप्पाजे खासगी श्रमणने अतिसार (झाडो) थयो ए गणिगए तेने औषधापचारथी अतिसार मटाड्यो ते साये मळ- प्रक्षारन तथा अग चापमा वगेरे वरदासपी ' तेनु चित्त ए ता भेदी नारयु के ए श्रमण ए गणिगमा आसक्त धनी गया ते गणिका पण पोताने वश थयेला ए साधुने कणिकराजा पासे लइ गइ कुणिके तेने का के-'हे श्रमण ! आ वैशाली नगरी ग्रहण राय नेम करी धा? मनपाठक 'वचन म्यूर परीने. पाने नैमित्तिर=नेनस्फुरणादि निमित्त उपरथी जनोने उत्तराध्य- भाषांतर মান। यन सूत्रम् ॥ १२॥ ॥१२॥ शुभ अशुभ फल कहेनार-नो वेप लइ वैशाली नगरीमा गयो. अंदर जतां तेणे जाण्यु के मुनिसुव्रतस्वामिनो स्तूप नगरी मध्ये छे तेना प्रभावथी नगरीनी रक्षा थाय छे. नगरीनां लोकोयें आ श्रमणने भविष्यवेत्ता समजीने पूछ्यु के-' आ नगरीनो घेरो क्यारे उठशे.' त्यारे श्रमणे कां के-' आ स्तूपने तमे ज्यारे नष्ट करशो त्यारे आ घेरो उठशे. ' आ वचन सांभली लोकोएं ए स्तूप खसेडी नाख्यो के कूलवालकमणे यहार जइ राना कूणिकने सज्ज थवा जणाच्युं तेज समये स्तूपना प्रभावथी रहित बनेली नगरी भांगी. आची रीते ए कुलवालकसमण अग्निीत होवाथी पतित थयो. ( कूलबालक कथा) जहा सूणी पूइकन्नी । निकसिझइ सबसो ॥ एवं दुस्सीसपहिणीए । मुहरी निकसिज्झइ ॥ ४ ॥ मूळगाथार्थ:-जेम सडेल कानवाळी शुनी-फूतरी-सर्वतः चारे कोरथी काढी भूकाय छे तेम दुशील शीलभ्रष्ट तथा प्रत्यनीक-सामा थनारो अने मुसर-व्यर्थ बहुयोलनारो शिष्य पण सर्वताज्या ज्यां जाय त्यांथी निकाली देवामां आवे छे. ॥ ४ ॥ व्याख्या---एवममुना प्रकारेणानेन दृष्टांतेन दुःशीलो दुष्टाचारः प्रखनीको गुरुगांपी, पुनर्मुग्वरो वाचाल: एतादृशः कुशिष्यो दुविनीतो निष्कास्यते गणात् संवादकात् यहिः क्रियते, अथवा मुहरी मुखम् अरिर्यस्य स मुखा- रिरसंबद्धभाषी, प्राकृतत्वात् मुहरीतिशब्दः, केन दृष्टांतेन निष्कास्यते ? यथा प्रतिकर्णी सटितकर्णी शुनी कुकुरी सर्वतः सर्वस्थानकादगृहादितः सनिष्कास्यते, अत्र शुनीनिर्देशोऽधिकनिंदामूचकः, सटितकर्णीतिविशेषणेन सा- गंकृमिकुलाकुलं सूचितं, इत्यनेन दुविनीतत्वं त्याज्यं. ॥ ४ ॥ अथ पुनस्तदेव दृढयति-

राध्य
यन सूत्रम्
-अविनीतनु दोषपूर्वक द्वष्टात कहे -
अर्थ -उक्त प्रभारना ए दृष्टांतवढे दुशील दुराचारी तथा गुरुने प्रत्यनीक-सामो थनारो (द्वपी) तेमन मुखरी बाचाल=
भाषांतर
बहुचोलो; आवो शिष्य, जेम सडेल कानवाळी भुनीतरी सरस्थानेयी निकाशित कराय छ काही मेलवामा आवे छे, तेम सर्व
গিয়ন
सघाडामाथी ए अविनीतने काही मेलवामां आवे छे अहीं 'शुनी' शब्द अधिक निंदानो सूचक छे बळी 'सडेल कानवाली' ए विशेषण-
सवागमा जेने कीडा पडया होय-एवु सूचन करे छे अने तेथी एवी फूतरीनी पेठे दुर्विनीतने दुरत परिहरणीय दर्शावे छे ॥४॥
कणकुडग चइत्ताण । विट्ठ भुजइ सुयरों ॥ एव सील चइत्ताण । दुस्सीले रमइ मिए ॥ ५॥
मूळगाथार्थ-जेम सूकर कणनु कुड तजीने विष्टा सुजे छे-खाय छ, एम दुशील शिष्ण मृग-जगलीपशुतुल्य, शील
त्यजीने दुशील दुराचारमा प्रीति करे छे ॥ ५ ॥
व्याख्या-एवममुना प्रकारेणानेन दृष्टातेन मिए इति मृगो मृर्वोऽविवेकी शील सम्यगाचार त्यक्त्वा दुशीले
दुष्टाचारे रमते, अत्र शीलशब्दो विनयाचारसूचक , केन दृष्टातेन तदाह-यथा शुकर कणकुडक तहुलभक्ष्यभृत
भाजन त्यक्त्वा विष्टा भुक्ने तथा शील त्यक्त्वा मूर्ख कुशीलमादत्ते, दु'शीलस्य विष्टोपमा, मूर्खस्य शकरोपमा
शीलस्य तलभृतभाजनोपमा ॥५॥

उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययन यन सूत्रम् ॥ १४ ॥ DO ----फरीने एज अर्थनी दृढ़ता दर्शावे .... अर्थ:-प्रकारान्तरे दृष्टांतनो उपन्यास करे छे-मृग-मूर्ख-अविवेकी, शीलसम्यक् आचारनो त्याग करी दुःगील दुष्ट आचारमा रमे छे. [ अहीं शील शब्द विनयाचारनो सूचक छे ] जेम सकर, कण-धान्य भक्ष्यथी भरेलां कुंदांने त्यजीने विष्टा भक्षण करे छे तेम मूर्ख शील सनी दुःशीलने सेवे छे. अहीं दुःशीलने विष्टानी उपमा आपी भने मूर्खने मुकरनी उपमा आपी अने शीलने भक्ष्यपूर्ण पाचनी उपमा आपी छे. ॥ ५ ॥ सुणियाऽभावं साणस्स । सूयरस्स नरस्स य ॥ विणए ठविज अप्पाणं । इच्छंतो हियमप्पणो ॥ ६ ॥ मूळगाथार्थ:-कूतरीनो तथा सूकरनो अने नर-अविनीत मनुष्यनो अशुभ भाव, अर्थात सदोष आचरण सांभळीने पोताना हितने इच्छनार पुरुपे निज आत्माने विनयमां स्थित करवो ॥ ६ ॥ व्याख्या-आत्मनो हितमिच्छन् पुरुप आत्मानं विनये स्थापयेत् , किं कृत्वा ? शुनः कुर्कुरस्य. च पुनः शूकरस्य नरस्याभावमशुभं भावं दृष्टांतं निंद्यमुपमानं, 'सुणीय' इति श्रुत्वा पूर्वगाथायां शुनी पूतिकर्णीति स्त्रीलिंगनिर्देशः कृतः, इदानीं शुन इति लिगव्यत्ययः प्राकृतत्वात्. ॥ ६॥ अर्थ:-पोताना आत्मानु हित इच्छनार पुरुचे, पूर्वगाथामां-कूतरा तथा सूकरना अशुभ भावरूपी निंद्य दृष्टांत आप्यां उत्तराध्य সাবান अध्ययन यन सूत्रम् ॥ १५ ॥ ते साभजीने पोताना आत्माने विनयमों स्थित करतो पूर्व 'शुनी' ए स्वीलींगनिर्देश पर्यो, भने आ गाथामा (शुन) एम पुलिंग निप यो एम रिंग व्यत्यय थयो ते दोष नथी कारणके माक्तमा लिंगव्यत्यय अनुज्ञात रे ॥६॥ तम्हा विणयमेसिज्जा । सील पडिलभेजए ॥ बुद्रपुत्ते नियोगही । न निकसिजइ कण्हुइ ॥ ७ ॥ मळगाथाथ -तस्मात्-ते माटे चुमपुत्र-मानवान् गुग्ना पुतुल्य तथा नियोगार्थी-हमेशा गुरुनी माशा उठावधामा तत्पर एवा साधुए विनयनी परणा-आकाक्षा परवा, जेथी शीरने प्राप्त थाय भने क्यायथी निष्कासित न कराय-एटले कोर काढी न मूके किंतु तेनो सवय आदर थाय व्याख्या--तस्मात्कारणात् बुद्धपुत्रो बुद्धानामाचार्याणा पुत्र इव पुनो बुद्धपुन , आचार्याणां शिष्य पुनर्नियोगो मोक्षस्तमर्थयतीति नियोगार्थी, पतादृश साधुर्विनयमेपयेदिनय कुयात् यतो विनयाच्छील सम्यगाचार प्रतिलभेत स पिनयवान , शीलवान कण्इ इति कस्मादपि स्थानान्न निस्कास्यते सर्वनाप्याद्रियते, अय परमार्थ -विनयवान | सर्वन सादरो भवति ॥७॥ अर्थ -ते कारणथी युद्धपुर-ज्ञानी आचार्थना शिष्य, जे नियोगार्थी-मोक्षा अर्थी-होय तेणे विनयनी एपणा=चाहना राखी, कारण के विनयवढे शील-सम्यक आचारनो पतिलाभ थायछे अने तेथी ए शियनु कोइ पण स्थानेथी निष्कासन करपामा आरतु नयी किंतु ए सन आदर पामे के ॥७॥ Infll उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययन यन सूत्रम् ॥१६॥ निसंते सियाऽमुहरी । बुद्धाणं अंतिए सया ॥ अजुत्ताणि सिक्खिज्जा । निरहाणि उ वजए ॥८॥ मूळगाथार्थ-संयमीए अत्यंत शांत थबु तथा बहु वाचाळ न थर्बु अने युद्ध-आचार्योनी समीपे सदा अर्थयुक्त-पुरुषार्थ- वाळा ( शालो ) शीखां तेमज निरर्थक एटले निष्प्रयोजन शृंगारादि ( शालो ) वर्जवां ॥ ८ ॥ व्याख्या-अथ विनयपरिपाटी दर्शयति-नितरामतिशयेन शांतो निशांतः क्रोधरहितः स्वाधुः सिया- शब्देन स्यात् भवेत्. साधुना क्षमावता भाव्यं. पुनः सुशिष्योऽमुखरी अवाचालः स्यात् , पुनर्बुद्धानामाचार्याणां शाततत्वानामंतिके समीपे अर्थयुक्तानि हेयोपादेयसूचकानि सिद्धांतवाक्यानि शिक्षेत. तु पुनर्निरर्थकानि निःप्रयो- जनानि धर्मरहितानि स्त्रीलक्षणादिसूचकानि कोकवात्स्यायनादीनि वर्जयेत्. ।। ८ ।। -विनयपरिपाटी दर्शावे छे- अर्थ:-निःशांत अत्यंत शांत ( क्रोधरहित ) यवं, अर्थात् साधुपुरुषे सर्वदा क्षमावान् रहे. ए सुशिष्य हमेशां अमुखरी व्यर्थ वाचाळ न यवु अने बुद्ध ज्ञाततत्व आचार्योनी समीपे रहि अर्थयुक्त= आ ग्रहण कराय; आ त्यजाय '-एवा अर्थनां सूचक सिद्धांत वाक्यो शीखवा; निरर्थक-प्रयोजनशून्य धर्मरहित स्त्रीलक्षणादि सूचक कोकशास्त्र जेवां वर्जवां. ॥ ८ ॥ अणुसासिओ न कुप्पिजा । खंति सेविज पंडिए ॥ खुइहिं सह संसग्गिं । हासं कीडं च वजए ॥९॥ .

भाषांतर अध्ययनर यनसूत्रमा भूळगाथार्थ'-पडित-अभिम शिष्य, गुरु भनुशासन-शिक्षा करे तो पण न कोपे किंतु भाति-भमा सेवे, क्षुद्रजनोनी साये संसर्ग, हास्य तथा क्रीडा बजे-न करे ॥९॥ व्याख्या-पुनर्विनयी साधुरनुशाशितो गुरूमि कठोरवचनस्वजितोऽपि हित मन्यमान सन्न कुप्येत् कोपं न कुर्यात्, पडितस्तत्वज्ञ क्षारत सेवेत क्षमा कुर्वीत पुन' सुसाधु क्षुद्रयर्यालः सहाथवा क्षुद्र पार्श्वस्थादिभिप्रधर्मः सह ससगै सगति वर्जयेत्, पुनहाँस्य पुन क्रीडा च वर्जपेत् ॥९॥ अर्थ -~-गुरु कठोर वचनोवडे शासन करे तो पण ए विनयी साधु पोतानु हित मानी कोपे नहिं किन्तु पंडित-तत्वज्ञ थइ | क्षोति-क्षमा सेवे; तेमज पडखे रहेनारा क्षुद्र-मनधर्म जनोनी सा ससग वने अने तेओनी साये हास्य क्रीडा आदिनु पण वर्जन करे ॥१॥ मा य चडालीय कासी । बहुय मा य आलवे ॥ कालेण य अहिजित्ता तओ झाइज एगगो ॥ १० ॥ मूळगाथा'-है शिप्य तु चर-कूषित थाने अलीक-कर मोटु मा करीश, तेम व्यथ यहु आलाप पण मा करीश किंतु काळे-नियतसमये अभ्यास करीने तदनतर क्शक एकलो बेसीने ध्यान करजे, अथात पठन करेलु विधारजे। ॥१०॥ व्यारया-भो शिष्य ! त्व चहालीक माकार्षी, घड क्रोधस्तेनालीक एव लोभायलीक कषायवशान्मिथ्या भाषण माकार्षी , पुनर्यहुक बहु ण्व बहक, आलजाल रूप स्व न आलपेर्मा अयाः, पहुभाषणाद पहयो दोषा भवति, भाषांतर अध्ययनर यन सूत्रम् ॥ १८॥ 1॥१८॥ च पुनः काले प्रथमपोम्पीसमये अधीत्याध्ययनं कृत्वा, तत एकक एकाकी सन् ध्यायेदधीतमध्यपनं मचान चिन्तयेत् एको भावतो ,व्यतंच, भावतो रागपरहितः, द्रव्यतः पशुसंडकादिरहितोऽपाश्रये स्थितः ॥१०॥ अर्थ:-है शिष्य ! तुं चंडालीक-क्रोधमां आवी लोभादिक मनोमळने लीधे मिध्याभाषणादि कई पण खोटु काम मां. करीश. वली बहु आळ जाळ जेवू कइ बोलीशनहि. कारणके बहुभाषणयी घणा दोषो संभवे छे तेम का एटले प्रथम समयमा अध्ययन करी एकला अर्थात् भावथी रागद्वेप रहित रही तथा द्रव्यथी पशु आदि रहित रही केवल अपाश्रयगां एकाकी स्थिति करी करेला अध्ययनन चिंतन कर्या करजे. ॥ १० ॥ आहच्च चंडालीयं कटु । न निन्हुविज कयाइवि ॥ कडं कडित्ति भासिंजा। अकडं तो कडिति यः ॥११॥ मूळगाथार्थ:-कदाचित् बांडालिक-क्रोधादिकने ला दुष्कर्म-करायं तो साधु, गुरु आगळ तेनो कदापि निम्हण न छुपावे नहिं; किंतु कर्यु होय ते 'कर्यु ' छे भने न कयु होय ते 'नभी कयु ' एम योली नाले. ॥११॥ व्याख्या-आहत्वं कदाचित्क्रोधार्दिकपाययशादलीकं दुकृतं कृत्वा विनीतः साधुगुरूणामप्रतो र निहवीत, कृतस्य दुःकृतस्यापलपर्न गोपनं न विधेय, कृतं कार्य कृतमेव भाषेत, अकृतं कृतं कार्य न भाषेत, अयं परमार्थ:- गुरूणां पुरतः सुशिष्येण सत्यवादिना भात्यम्. ॥ ११ ॥ , भाषांतर अध्ययन यन प्रमा अर्थ'पोइ सेमये क्रीधादिं कपायने लीधे कई चडांलीकमपुष्कृत कराइ गयु तो विनयवान साधुए गुरुनी भाग तेनों निन्हवं न रखों अर्थात् छुपाव नहि किंतु करेलु कार्य 'डो में कयु' ऐमं कही देवु अने न कराय होय ते 'कर्ष' एम कहे परमार्थ एदलोज के-गुरुनी आगळ मुशिप्ये सर्क्सवादी धवु एजे उचिताचरण के. ॥ ११ ॥ मा गलिअस्सु व कॅस । वयणमिच्छे पुणो पुणो | कसं व दंछुमाइन्ने । पावग पडिवजए ॥ १२ ॥ मूळगांधि-गति-अपळोट अश्य जेम कशा-चावुक पारपार 'मागे) तेम विनयवान् साधु पुन पुन' गुरुना पचानने न इन्छ। किंतु भाकीर्ण-वेळवायेलो अय कशाम्चावुक देखतांज जैम पर्दछ ।तेम विनीत साधु, पाप-प्रत परिछे त्यजीदेले १२ याख्या-अब चिनीनाविनीतर्ययोदयानमाह-विनीत साधुराकीर्ण इव सुविनीताश्च इव गुरोर्वचन शिक्षारूप करणयोग्यस्य कार्यस्य प्रवृत्तिसूचक करणायोग्यस्यकमणो निवृत्तिमचक च मा इच्छेत् , पुन. पुनन इच्छेत् किंतु एकवार ज्ञापित सत्सवै स्वकार्य गुरोश्चित्त च जानीते, कि कृत्वेव कंधे प्रोजनक दृष्ट्या इव यथा गल्यश्वो दुविनीततुरगोऽश्वारस्य प्राजनकमिच्छेत् तग विनीतो वचनतजन नेच्छेत्तथा सुविनीतशिप्य आघायस्पाकार- मिगित ज्ञात्वा पापानुष्ठाने वर्जयेटिवर्थ ॥१२॥ -विनीत तयाँ अविनीतना दृष्टांत उदाहरणे आपे छे- अर्थ-विनीतसाधु, करवा योग्य मार्यनी कर्तव्यतानु वोधन करतु क्या न करता पोग्य वापनु वर्णन दर्शावतु गुरुनु भाषांतर अध्ययन यनसू ॥ २० ॥ ॥ २० ॥ , वचन वारंवार न इच्छे-अर्थात् एकवार सांभळीनेज ह निश्चय करी लीए. जेम अपलोट घोडो सवारने हाथै वारंवार चाबुक खाय तेम विनीत शिष्य एकवार गुरुनु शिक्षा वचन सांभली गुरुनु चित्त जाणी जाय अने आचार्यना आकार तथा इजित बराबर लक्ष्यमां लइ पापानुष्ठान त्यजी दीए, जेथी फरीथी गुरुना मुखयी तरछोडनुं वचन सांभळवानो अवसर आववा न दीप; आ विनीततानी स्पष्ट निशानी छे. ॥१२॥ अणासवा थूलवया कुसीला । मिपि चंडं पकरंति सीसा ॥ चित्ताणुया लहु दक्खोववेया । पसायए ते हु दुरासयपि ॥ १३ ॥ मूळगाथार्थ- अनाश्रष-गुरु पचन न माननारा. वगर विचार्य योलनारा, कुत्सित आचरण बाळा शिप्यो मृदु-शांत गुरुने पण क्रोधी करी मूके के ज्यारें गुरुना चित्तने अनुसरनारा तथा दक्षतायुक्त शिष्यो दुराशय-कुपित-गुरुने पण प्रसन्न करी दीये छे. ॥ १३ ॥ व्याख्या-अथ पुनर्विनीताविनीतयोराचारमाह-पूर्वार्धेन दुर्विनीतशिष्याणामाचारं वदति, एतादृशाः शिष्या मृदुमप्याचार्य सरलमपि गुरुं चंडं कोपसहितं कुर्वति, एतादृशाः कीदृशाः ? अनाया गुरुवचनेऽस्थिताः, आश्रयो वचने स्थित इति हैमः, न आश्रवा अनाश्रवाः, पुनर्ये स्थूलवचसः स्थूलमनिपुणं वचो येषां ते स्थूलवचसोऽविचार्यभाषिणः. पुनः कुशीला.. अधोतरार्धेन विनीतस्याचारं वदति-चित्तानुगा आचापचिसानुगामिनः पुनर्लघु शीघं दास्यं AN उत्तराध्यन पन सूत्रमा मापातर अध्ययन ॥२१॥ ॥ २१ ॥ चातुर्यं तेनोपेता लघुदाक्ष्योपपेता , स्वरितं यातुर्यसहिता एतादृशाः शिष्या दुराश्रय करमपि सकोधमपि गुरु प्रसा- दयेयु प्रसार कुयु ॥ १३ ॥ अत्र घडदाचार्यकथा- अर्थ ---विनीत तथा अविनीतना आचार कहेछे तेमा प्रथम पूर्वार्दथी दुविनीतनो आचार वर्णवेछे अनाव=[ 'आश्रवो वचने स्थित ' आइमकोपना प्रमाणथी ] वचनमा स्थित पुरुष आश्रा यहेवाय अने एथी विपरीत अनाश्रम, अर्थात् वच- नमा स्थित न रहेनारा वली जे स्थूलपचन एरले वगर विचार्ग पोलनारा तथा कुशील=निंदित आचरणवाळा जे शिष्यो होय तेश्रो मृदु गुरु होय तेने पण चद-कुपित करी दीयेरे हवे उत्तरार्दगो विनीतना चार वर्णवेळे जे शिष्यो, चित्तानुगा-आरार्थना चित्तने अनुसरनारा तेमन शीघ्रता तथा दक्षताथी उपेत-पुक्त होय, अर्थात् गुरुए चौंधेलु काय वगर विल अने चतुराइयी करी शके तेवा होय तेवा शिष्यो दुरा सर-सक्रोध गुरुने पण मसन करी दीये. ॥ १३ ॥ आ विषयमाचहरुद्राचार्यनी कथा- उमन्पिया चन्डन्द्रसरि समायात , स रोपणप्रकृति' साधुभ्य पृथगेकातस्थाने आसाचक्रे, माभूत्कोपोल्प- त्तिरिति चित्ते विचारयति इतथेभ्यसुत' कोऽपि नवपरिणीत' सुत्परिवृतस्तत्रागल साधून वन्दते, कैश्विामित्रै- दोस्पेन प्रोक्तममु प्राजयत ? साधुभिर्वरमित्यभिधाय गुरुदर्शित , तेऽपि गुरुसमीपे गता तथैव तैरक्त गुरुभिभूतिमानयेति प्रोक्त तेन नवपरिणीतेन हास्यादेव स्वय भूतिरानिता, गुरुभिर्यलादेव गृहीत्वा तल्लोच कून', सुहद खिन्नास्तदा नष्टाः, तस्य तु कृतलोचस्य लघुकर्मतयाऽत पर मम प्रव्रज्यवास्त्विति परिणाम सपन्न , ततस्तेनोक्त । .

उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययनर ॥ २२ ॥ ॥ २२॥ केलिः सत्थीभूतोऽधान्यंत्र गम्यते, गुरुराह अहो शिष्य! सांप्रतं रात्रिर्जाता, अहं रात्रौं न पश्यामि तेन शिष्येण स्वस्कंधे गुरुरारोपिता, उच्चनीचप्रदेशे मागे वहता तेन गुरोः खेद उत्पादितः, खिन्नेव तेन गुरुणाऽस्यै शिरसि दंडप्रहारा दत्ताः, असौ मनस्येवं विचारयलहो महात्मीयं मयेदशीवस्था प्रापित इति सम्यग्भावयतस्तस्य केवलज्ञानमुत्पन्न, केवलज्ञानबलेन समप्रदेश एव वहन गुरुभिरेष उक्तः, मारिः सार इति कीदृशः सनो बहनसि ? तेनोक्तं युष्मत्प्र- सादान्मे समं वहनं, गुरुभिरुक्तं किं रे ज्ञानं समुत्पन्नं तच? तेनोक्तं ज्ञानमेव, गुरुभिरुक्तं प्रतिप्रात्यप्रतिपाति ? तेनो- तमप्रतिपाति गुरवस्तु हा मया केवली आशातितः, इत्युक्त्वा तच्छिरसि दन्उपहारोदभूतं मधिरप्रवाहं पश्यतः पुनः पुनस्सत् क्षामणं कुर्वतः केवलज्ञानमापुरिति विनीतशिष्यैरीही व्यं॥ १३ ॥ उज्जयिनी नगरीमां चंदरुद्रनामना साधु आव्या. पोते रोपण प्रकृति होराथी वीना साधुओथी नोखा एकांतमां स्थान गोती बैठा रहेता; अने ‘मने कोप न उद्भवे' एम चित्तमां भावना कर्या करता. एक वखतें एक नको परणेल धनिकपुत्र पोताना मित्रोने साथैलाई साधुओंने वंदन करवा आव्यो; त्यारे साथे आवेला मित्रोमांना एक जणां उपहास करता होय तेम बोल्या के-महाराज! आ शेठना पुत्रने पत्रज्या-साधुदीक्षा आपो. साधुओऐं 'बहु सारं ' आम कही पेला एकला बेठेला साधु तरफ आंगली चौंधी के ए गुरुपासे जइ दीक्षा लीओ. ए शेठना बना मित्रो ते नोखईसाधुनी पासें गया अने कसु के-मुनीजी! आ शेठना पुत्रने भाज्यों आपो. रुद्रमरिऐं कई के-'भूति लइ आवो स्पारे ते नवो परणेलो शेठनो पुत्र हसता हसता भूति लइ आव्यो, गुरु) बला- स्कारची पकडीने तेनों लोच कों; त्यारे तेना मित्रो बहु कवाणा अने भागी गया; पण पेला शेठना पुत्रने कर्मनी लघुताने लीधे . -

भाषांतर
अध्ययनर
पन सत्रमा
॥ २३ ॥
ए तो भने प्रत्रग्यान भले होय' आवो मन परिणाम थयो; त्यारे तेणे कर्यु के- आतो रमतमाथी साचो त्याग थइ गयो'
ये हु अन्य स्थाने विपरीश गुरुं कई-अहो शिष्य ! हवे रात्रि पढी मने रातन मन नहीं आ वचन सभिळी शिष्य गुरुने
पातानी पांवे उपाच्या अने उचा नीचा प्रदेशाला विपम मार्गर्मा गुरुने उपाही चालता गुरुने खेद ययो. खेद पामता गुरुमें
शिष्यनी मस्तर उपर देव्यी प्रहार क्यो. शिष्य तो मनमा विचार करेले जे 'अरे ! आ महात्मा गुरुने में आवी दुर्दशा पहों-
नाड्या' आम विचार करता तेने केवलज्ञाननी लब्धि थई
ऐ केवलज्ञानना प्रमामयी गुरुने सम प्रदेशमान वहन करवा लाग्यो त्यारे गुरुएं पूउयु के मारि-सार ! हवे केम सम वान
फरेछ । त्यारे ते शिये कधु के-' आफ्ना प्रसादयी मर्ने समवहन सापायु गुरुए पछु के-' अरे शु तने ज्ञान उत्पन्न गयु ? तेणे
उत्तर आप्यु के-' हा ज्ञान उपनुन ' गुरु पहे-'प्रतिपाति के अभतिपाति ? तेणे का- अमनिपाति' आ साभली गुरनो-'हाय!
में केरळीनी आयातना परी ' आम मनमा कचवाइ ते शिष्यना माथामा पढेल महारमाथी उभराता रुधिर प्रवाहने जोइ फरी
फरीने तेने खमावता पोत पण केवळज्ञान पाम्या विनीत शिप्ये आवा ययु जोइए ॥ १३ ।।
नापुष्टों वागरे किचि । पुटो वा नलिय वए । कोह आसब कुविज्जा । धारिजा पियमप्पिय ॥ १४ ॥
मुळगाथार्थ-गुरु न पूछे रया सुधी को चोलघु नहि तेम पूछे त्यारे अलीक-योटु न बोलवु मनमा क्रोध आवे तो तेने
असत्य परी नांखयों एटले गुरा प्रत्ये दुर्भाव न आपया देता योधन मनमाज शमाची देवो भने गुरुर कहल अप्रिय घचनर्ने पण
प्रिय-गीता हितार धारखं मानयु ॥ १४ ॥

तराध्य- भाषांतर अध्ययन ॥ २४ ॥ ॥ २४ ॥ व्याख्या-सुविनीतशिष्योऽपृष्टः सन्न किंचियाकुर्यात् व्यागृह्णीयात् , न किंचिदएष्टो वदेत्, अथवापृष्टोऽल्पं पृष्टोऽपृष्टः सन् विनीतः किमपि न व्यागृणीयात् , अपृष्टोऽल्पमपि न ब्रूयादिति भावः, अथवा पृष्टः सन्नलीकं न घदेत. पुनः क्रोधमसत्यं कुर्यात् , गुरुभिनिर्भत्सितः कदाचित्स क्रोधः स्यात्तदानि क्रोधं विफलं कुर्यात् , अप्रियमपि गुरुवचनं प्रियमिवात्मनो हितमिव खमनसि धारयेत्. ॥ १४ ॥ अर्थः-सुविनीत शिष्य अपृष्ट-अगर पूछये कोइने कंइ पण कहे नहि; तेम कोइ पूछे तो तेने अलीक-खोटुं कंइ कहे नहि. गुरु कदाच तरछोडे तो क्रोध आवे पण ते क्रोधने असत्य-निष्फळ-करे अने गुरुनुं वचन अप्रिय होय तो पण पोताना मनमां हित- कर गणी प्रिय जेवू माने. ॥ १४ ॥ अथ क्रोधस्यासत्यकरणे उदाहरणं-यथा कस्यचित्कुलपुत्रस्य भ्राता वैरिणा व्यापादितः, अन्यदा कुलपुत्रो जनन्या भणितः, हे पुत्र ! त्वद्भातृघातकं वैरिणं घातय ? ततः स वैरी तेन कुलपुत्रेण शीघं निजयलाजीवग्राहं गृहीत्वा जननीसमीपे आनीतो भणितश्वारे भ्रातृघातक ! अनेन खड्गं दृष्ट्वा भयभीतेन भणितं, किं शरणागता हन्यते ? एतबचः श्रुत्वा कुलपुत्रेण जननीमुखमवलोकितं. जनन्या च सत्वमवलंब्योत्पन्नकरुणया भणित, हे पुत्र शरणागता न हन्यते, यतः-शरणागयाण विस्सं-भियाण पणयाण वसणपत्ताणं ॥ रोग्गिय अजुंगमाणं । सप्पुरिसा नेव पहरंति ॥१॥ . .

उत्तराध्य . पन सत्रमा भाषांतर अध्ययन -क्रोधने असत्य केम कराय तेनु उदाहरण कहे थे - कोइ कुलपुत्रना भाइने वैरीये मारी नाख्यो त्यारे तेनी माताए ए कुलपुत्रने कायु के-'तारा भाइनो घात करनार वैरीने तु मारी नाख' आ वचन साभळी ए कुलपुत्र पोताना बळथी पाताना भाइने मारनार वैरीने जीरतो पाडीने पोतानी मा पासे लइ आव्यो, अने खग उगामी पधु के- हे भाल्पातक ! माराभाइने मारनारा" आ वखतें कुलपुत्रना हाथमां खा जोइ भयभीत बनेला ए पातों कई के-'भु शरणागतने मराय के ? ' आ वचन साभली कुळपु पोतानी माना मोग सामु जोयु, सत्वगुणनो आविर्भाव थवाथी जेना दिपमा करुणा उत्पन्न थइ छे एवी जननीए फयु के-' हे पुत्र ! शरणागनने हणाय नहि ' का छे के- 'शरणागव, विश्वास करनार, प्रणयवान्, गसनपात्र-दुखमा आवी पटेल, रोगी तथा आर्जवयुक्त जनोने सत्पुरुषो महार करता नयी' ॥ २५॥ तेन कुलपुत्रेण भणित कथ रोष सफलीकरोमि ? जनन्योक्त वत्स सर्वत्र न रोषा सफलीक्रियते, जननी षचनात् स तेन मुक्त , तयोश्चरणेषु पतित्वा क्षामयित्वा चापराध स गत एव क्रोधमसत्य कुर्यात् . त्यारे ते कुलपुर्ने का के-'हवे आ मारो रोप हु केम सफल करूं ?' माताए उत्तर आयु के-' हे वत्स ! रोप का सर्वत्र सफल नज कराय' आवा जननीनां वचन उपरथी ते कुलपुत्रं पोताना भाइना घातकने छोडी मूक्यो. त्यारे ए घातक कुलपुत्रना पगा पडी पोताना अपराधर्नु क्षमापन करावीने गयो आधी रीते क्रोधने असत्य-निष्फळ करको भाषांतर अध्ययन यन सूत्रम ॥ २६॥ ॥२६॥ 'धारिजा पियमपियं'-एतत्पदकथा यथा-वीतभयपत्तने एकदा महदर्शिवमुत्पन्न, तन्निशम्य प्रयो मांत्रिकास्तत्रायाताः राज्ञः पुरस्तैः कथितं वयमशिवमुपशमयिष्यामः, राज्ञा भणितं केन प्रकारेण ? तेषां मध्ये एके- नोक्तं मंत्रसिद्धं ममैकं भूतमस्ति तदत्यंतं रूपवद्गोपुररथ्यादिपु भ्रमद्यः पश्यति स म्रियते, यस्तदृष्ट्वाऽधोमुखः स्यात्स सर्वरोगैर्मुच्यते, राज्ञा भणितमलमनेनातिरोषणेन भूतेन ! अथ द्वितीयमांत्रिकेणोक्तं मम भूतं महाकायं लंबोदरं विस्तीर्णकुक्षिपंचशीर्षमेकपादं विकृतरूपमट्टहासं कुर्वदृष्ट्वा यो हसति तस्य शिरः ससधा स्फुटति, यस्तु तद्भुतं धूपपुष्पस्तुत्यादिभिः पूजयति स सर्वरोगैर्मुच्यते. -हवे 'धारिजा पियमप्पियं' आ पदनी कथा कहे छे.- वीतभय नामना पत्तन नगरमा एकसमये महोटुं अशिव अमंगल उत्पन्न ययुं ते सांभळी त्रण मांत्रिक मंत्रशास्त्रना ज्ञाता त्यां आवी चड्या, राजा पासे जइ तेओए कह्यु के-' आ अशिवनु अमे उपशमन करी दइए' राजाए कपुं-' केवी रीते ? ' त्यारे ए त्रणमांथी एक बोल्यो के-'मारे एक मंत्रसिद्ध भूत छे ते अत्यंत रुपवान् छे ते ज्या ज्यां दरजा तथा शेरीओमा फरे त्यां तेने जे देखे ते मरी जाय, पण तेने जोइने नीचुं मोढुं करी जाय ते सर्व रोगथी मुक्त थाय ' राजाए कड्यु- एका अति क्रोधी भूतन मारे काम नथी.' त्यारे वीजो मांत्रिक बोल्यो के-' मार भूत छे ते लांबा उदरवालं महोटी कायारालु तथा विस्तीर्ण पेटवाळ पांच माथां एक पग अने विकराल रुपबाळ छे. ते अट्टहास करे छे ते जोइने जे हसे तेना मस्तकना सात टुकडा थइ जाय अने जो ए भूतने धुप पुष्प स्तुति आदिकथी पूजे ते सर्व रोगथी मुक्त याय.' । --

पसराध्य
यन सूत्रम्
भाषातर
अध्ययन
॥२७॥
॥ २७॥
राज्ञोक्तमनेनापि भूतेन मृत ! अथ तृतीयेन मात्रिकेणोक्त ममाप्येवंविधभूतमस्ति, पर प्रियाप्रियकारिण
जन दर्शनादेव रोगेभ्यो मोचयति, राज्ञोक्तमेव भातु तथा कृते तन्नगराशिवमुपशात ततो नृपादिजन. स
तृतीयमात्रिक पूजित एवं साधुरपि पूजा निंदा प्रियाप्रिय सहेत उक्तं च-लाभालाभे सुखे दुखे । जीविते
मरणे तथा ॥ स्तुतिनिंदानिधाने च । साधवः समचेतस ॥१॥ स्तुतिनिंदादावनगारोऽवेषवान् साधुर्भवतीति
॥ १४ ॥ क्रोधायसत्ताकरण चात्मदमने ण्व स्यादतस्तदुपदेश तत्फल चार-
राजा कहे ए भूतमा पण अमारु कान न सयु त्यारे त्रीमो मानिस योल्यो के-'मारे पण एवुन एक भूत छे पण ते तो
पोतानु मिय करे के अप्रिय करे, गमे ते जन होय तेने पोताना दर्शनमानीं रोगनिर्मुक्त करे छे ' राजाए कधु के-जो एम होय
तो भले थाय आम करसाथी ए नगरमा अशिव उपशात थयु, तेथी राना आदिक सर्व जनोए ए नीना मानिस्नी पूजा करी
एम साधु पण पूना निंदा वगेरे प्रिय अभियने समभावथी सहन फरे का छे के-" साधु पुरुषो लाम अलाभ, सुग्व दुल, जीवित
मरण, स्तुति निंदा प्रभृति विधानमा सर्वदा समयुद्धिवाळा होय छे " ॥ १४ ॥ क्रोधादिकनी असत्यता करती ए ज्यारे
आत्मदमन होय त्यारेज बनी शके छे माटे आत्मदपननो उपदेश तथा ए आत्मदमननु फळ दर्शावे छे.
अप्पा चेव दमेयवो । अप्पा हु खलु दुइमो ॥ अप्पा दतो सुही होइ । अस्सि लोए परत्थ य ॥ १५ ॥

उत्तराध्य यन सूत्रम् मूळगाथार्थ:-आत्माज दमितव्य वश करया योग्य छे, कारण के, आत्मा निश्चयें दमन करवो दुष्करछे जेणे आत्मा दांत घश को छे ते आ लोकमां तथा परत्र-परभवमां पण सुखी थाय छे. ॥ १५ ॥ भाषांतर अध्ययन ॥ २८॥ ॥ २८ ॥ व्याख्या-आत्मा एव दमितव्यो वशीकर्तव्या, हु इति निश्चयेन खलु यस्मात्कारणादात्मा दुर्दमो वर्तते आत्मानं दमन् जीवः सुखोभवति. अस्मिन् लोके च पुनः परत्र परभवे च सुखीभवति. ॥१५ ॥ आत्मदमने दृष्टांत:- अर्थः-आत्मानेज दमवो जोइए वश करवो जोइए कारण के-आत्मान दुईम छेअर्थात् एच् दमन करवू अत्यंत दुःसाध्य छे, आत्माने दमे ते जीव आ लोकमां तथा परभवमां पण सुखी यायछे. ॥१५॥ आत्मदमनमां दृष्टांत- यथैकस्यां पल्ल्यां छौ भ्रातरौ तस्करनायको स्तः. सार्थेन सह गच्छतां साधूनां वर्षाऋतुः प्राप्ता, नच तत्र कोऽपि साधुभक्तोऽस्ति, तेन साधवस्तस्करनायकयोः समीपे गताः, तान् प्रणम्य कथयतः किं प्रयोजनं भवतां ? साधुभि- भणितमस्माकं वर्षासु विहर्तुं न कल्पते, ततो वर्षावासप्रायोग्यमुपायं प्रार्थयामः, ताभ्यां च सहर्ष साधुनामुपायो दत्तस्तत्र विश्वस्तास्तिष्टंति साधवः, चौरनायकाभ्यां भणितमस्माकं गृहेषु संपूर्ण भक्तादि गृहीतव्यं, साधुभिर्भणितं न कल्पते एकस्मिन् गृहे पिंडग्रहणं साधूनां, ततः सर्वेषूचितगृहेषु विहरिष्यामः, उपाश्रयदानेनैव भवतां महापुण्यसंबंधो जातः.

उतराध्यन भाषांतर अध्ययन पन सूत्रमा ॥२९॥ ॥ २९॥ एक गामडामा ये चोरना सरदार रहेता हता त्या साथ-साथे चालता साधुओ आची चड्या, वपा ऋतु आवी जवाथी साधुधी आगळ न वधाय तेम प गामडामा कोइ साधुभक्त न हतो तेथी ए साधुओ ए तस्कर नायक पासे आव्या तेआने प्रणाम करी तस्कर नापक वोल्पो के आपने शु प्रयाजन छे ? ' साधुभोण का के-'अमे आ पा रुतुमा विहार करी न शकीये माटे वर्षा ऋतुमा रहेगा योग्य कर उपाश्रयनी प्रार्थना 'ते व तस्कर नायको रानी थइने साधुओने उपाश्रय आप्यो त्या साधुओ नीराते रया ए चार नायकोए फयु के-अमारे घरेयी पूर्ण अनादिक लेजो साधुओ पोल्या के-साधुने एक घरेथी पिंडग्रहण न कराय तेची अमने ठीक लागशे तेगा सा गृहोथी आहार वोरी लावशु तमे अमने उपाश्रय दीयो तेथी तमने महान पुण्य सपथ थयोछे. उक्त च-जो देश उपस्सय । मुनिवराण तवनियमजोगजुत्ताण ॥ तेण दिन्ना पत्थन्न-पाणसयणासणविगप्पा ॥ १॥ तवसजमसज्झाओ । नाणज्नासो जणोक्यारो य ॥ जो साहणमवगाह-कारी सिग्झायरो तस्स ॥२॥ पारह सुरनररिद्धि-सुकुलुप्पत्ती य भोगसामिद्धि ॥ नित्थरइ भवमगारी | सिजादाणेण साहण ।' ३ ॥ इद साधु- वचः श्रुत्या तायत्यत परितुष्टी, तेपा साधूनामुपद्रव रक्षतो विश्रामणादिभक्ति च कुन्त , सुखेन साधूना वर्षा. कालोऽतिमात , गच्छनि साधुभिस्तयोश्चौरनायकयोरन्यवतग्रहणाऽसमर्थयोनिशाभोजननियमो दत्तस्तयोरेवमुपदिष्ट - फा छ के-" आ विनययुक्त मुनिवरने जे उपाश्रय दीये तेणे वस्त्र, अन्न, पान, शयन, आसन, वगेरे सब दीधु गणाय तप सपम स्वा-याय ज्ञानाभ्यास जनोपकार अने साधुने जे भागाइकारी थाय ते मिदार याय के (२) अने तेने सुरनर सिद्धि, DO उत्तराध्य- सुकुल प्राप्ति तथा भोगसमृद्धि प्राप्त थाय छे वळी साधुने शया दीये ते भवमार्गथी निस्तरे छे. (३) " आ साधुना वचन सांभळी ते तस्कर नायक बहु प्रसन्न थया अने ए साधुओनी उपद्रवथी रक्षा करता तेमज विश्रामणादिकथी साधुओनी भक्ति करता हता. आम करतां साधुभोनो वर्पाकाळ व्यतीत थयो त्यारे साधुओ जवा लाग्या ते समये ए वन्ने चोर सरदारोने साधुओए वीजां व्रतो नहिं पाळी शके एम धारी-रात्रिभोजन न करवानो नियम उपदेश्यो. भाषांतर अध्ययन यन सूत्रम् ॥ ३० ॥ ॥३०॥ DO मालिति महीयलं जा-मिणीसु रयणीअरा सनं तेण ॥ ते वित्थलति य कुडं । राइए भुंजमाणाओ ॥१॥ मेहं पवीलिआओ । हणन्ति वमणं च मत्थिया कुणइ ॥ जूआ जलायरं तह । कोलिओ कुछरोग च ॥२॥ वालो सरस्स भंग । कंटो लगइ गलमि दासं च ॥ तालुमि विंधइ अली । वंजणमझमि मुज्जतो॥३॥ जीवाण कन्धुमाइण । घायण भायणधोअणाईसु ॥ इमाइ रयणिभोअण । दोसे को साहिउँ तरइ ॥४॥ उलूककाकमार्जार- गृध्रसंवरशकराः ॥ अहिवृश्चिकगोधाश्च । जायंते रात्रिभोजनात् ॥५॥ अतोऽस्मिन् व्रते दृढप्रयत्नैर्भवितव्यमिति भणित्वा गताः साधवः, तावपि चौरनायको सपरिवारोकियन्मार्गमनुगम्य निवृतौ, मुनिसेवया कृतार्थत्वं मन्यमानौ तिष्ठतः कां छे के-" यामिनि= रात्री=मां रजनीचर-राक्षसो रात्रीभोजन करनारने महीतले आवीने छले छे. (१) मेह वरसतां पिपीलिकाओ कीडिओ=तेमज मसिकाओ वमन करावे छे जलमां जूं वगेरे अने करोळीया कुष्ठरोग करे. [२] वाळ जवाथी स्वर- उत्तराध्य पन सूत्रमा भाषातर अध्ययन ॥३१॥ भग-साद वैसी जाय, गळामा काटा लाग्या जेवु थइ आवे, व्यजनदाळ कढी वगेरेमा खाता सळी जेवु तणखलु आवी जता ताठच वींचाइ नाय [३] झीणा जीमोनो घात वासण म ये भोजन, करता थाय, आ क्या रात्रिभोजनना दोषोयी कोण वची शके तेम छे ? [2] रागीभोजन फरसायो घुबड, फागडा, बिलाडा, गीय, सार, सूपर, सर्प, वींची, गरोळी, इत्यादि योनिमा जन्म थायले [५] माटे तम ने ए नत परार सावधानीथी पाळजा " आटा कही साधुभोए विहार कर्यो ए तस्सर नायको परिवार सहित थाढे दूर मधी वळापीने पाछा गळ्या मुनिसेवाथी पोताने कृतार्थ मानी रणा अन्यदा ताभ्या घाटीगताभ्या बहुगोमहिपमानीत, अतरालमार्ग तत्परिवारपुमपै कैश्चिन्मरिपो व्यापादितस्त- भोजनाय सपरिवारौ तौ तन स्थिती, केचित्परिवारपुम्पा मद्यानयनार्थ ग्राममध्ये गता , महिपयापादकै परस्पर- मिति विमृष्ट, मासार्दै विप प्रक्षिप्य मध्ये गतेभ्यो दीयते तदा यरगोमरिप भागे आगच्छति आत्मनामिति विमृष्य तेस्तथैव कृत, भरित यतावशेन ग्राममध्ये गतैरपि तथैव सचिव मद्यार्दै विप प्रक्षिप्त, तत्रागता मिलिता कृचित्ता सर्वेऽपि, चौरनायकौ तु नि फूटौ स्त , तावता सूर्योऽस्त गत , तो भ्रातरौ इहलोके च सुखिन्ग जातो रात्रिभोजनातग्रणेन जिहेंद्रियदमनात् , इति चौरनायकदृष्टात ॥ एक समये ए पने पोर सिरदारो घीना केटलाफ धाइपाइओनी साथे धाइपापामा घणी गायो भे सो लाव्या सार्थना धाड पाडुनोए मार्गमा महिप मार्या त्या भोजन करता परिसार सहित आ पन्ने तस्कर नायको रोकाणा के लार परिवार पुरुप मध परस्पर उसराध्य- D) भाषांतर यन सूत्रम् ॥ ३२ ॥ लावा गाममां गया. अहिं महिप मारनाराओए अंदर अंदर संतलस करी के-आ मांसना अर्ध भागमा विप नाखी दइए तो आप- णने पुष्कळ मांस भोग पढे, आम धारी तेमां विप नाख्यु, गाममां गएलाओए विचार्यु के आ मधमां विप नाखी दइए तो आपणना अध्ययन भागमां मध तथा मांस पुष्कळ आवे; आम विचारी तेओए अर्ध मद्यमां विप नाख्युं आम चेय पार्टीमां परस्पर कपटभावथी विष प्रयोग करी मळी बेठा, अने जमवानी तैयारी करे छे त्यां रात्रि पडी गइ. आ वे तस्कर नायक तो निष्कपट हता पण रात्रीभोजन न ॥३२॥ करवान व्रत लोधेलं अने जिवाइंद्रियर्नु दमन करी जम्या नहि. तेथी यची गया. ( चोर नायक दृष्टांत) वरं मे अप्पादंतो । संजमेण तवेण य ॥ माहं परेहिं दम्मंता। बंधणेहिं वहेहि य ॥ १६ ॥ मूळगाथार्थ:-आत्मदमन माटें एम चि तन करयु के-संयम बडे तथा तपें करीने मारा आत्मानुं देहनु दमन कराय ए पर बहु'सारं, पण अन्य जनोयं बंधन वडे तेमज वधथी हुँ मारो देह-दमन कराय एसारं नहिं ॥ १६ ॥ व्याख्या-अथ किं चिंतयन्नात्मानं दमयेदिलाह-च पुनस्तपसा मया स्वात्मा दांतो वशीकृतो वरं भव्यः, अत्रात्माशब्देन देह आत्मन आधारभूतत्वात् , दांतोऽसंयममार्गानिषिद्वो भव्यः संयमेन ससदशविधेन, 16 तथा तपसा द्वादशविधेनात्मा पंचेंद्रियरूपः साधुमार्गे नेतव्यः, यथा दुर्विनीतोऽश्वो वृषभो योन्मार्गात् प्राजनकेन नोदनकाप्टेन मार्ग नीयते, तथायमात्मापोलयः. पुनर्मनस्येवं चिंतयेदहं परैरन्यलोकैर्यधनैः शृंखलादिभिश्च पुनर्यधैर्ल- . कुव्यंकुशचपेटाम्राजनकादिभिर्दमितो मा भवेयं यदान्ये मम ताडनातर्जनादिभिर्दमनं करिष्यंति, तदा मम श्रेयो DO Dil Do उत्तराध्य पन सूत्रमा भाषांतर अध्ययन - नास्ति, यदुक्त-सरकलेर खेददचितयन् । स्ववशता हि पुनस्तव दुर्लभा । यहुतर च मरिष्यसि जीव रे । परवशो न च तन एणोऽस्ति ते ॥ १॥ इत्यादि शिक्षयात्मा वशीकर्तय ॥ १६ ॥ हवे केवा विधारथी आत्मानु दमन करवु ते यहे - अर्थ --मारा आत्माने सयम तथा तपाढे हु दमु ए भनु अही आत्मा शन्द आत्माना आपारभूत देहनो काचक समजवानो छे मारो आत्मा असयम मार्गी रोकु ए वर श्रेष्ठ-भव्यमान सयम सतर मझारनो तथा तप चार प्रकारनु कद्देवाशे आमा पचे- न्दिपरुप साधु मारगे दोरवो. जेम दुविनीत अश्व अथवा दृशमसार उन्मार्गयी चावुक अथवा दइयी मार्गे लइ आय छ तेम आ आत्माने पण तप" सयमादि साधन बढे अमार्गेथी राळी समार्गे दोरलो मनमा एम विंतन करवू के-हु अन्य लाकोए साकळे वाधीने अथवा लाकडी अकुश पापड चाबुक वगेरेयी दम पामीने देरान न कराउ, ज्यारे अन्य जनो मार मारी अथवा तरछोडी मारु दमन करशे एम पवायी मारु श्रेय नपी धानु. कयु छ के-'हे फलेवर देह ! जरा पण मनमा न लावता खेद सहन कर केमके एम न कराय ता तारी स्ववशता दुर्लभ मानजे माटे हे जीव । लोपातरमा परवश नी पशु सहन करीश तेमा कर नारों गुण नहीं मनाप (१) आवी आवी शिखामणोपी आत्माने श फरवी जोइए ॥१६॥ अन्न सेचनकहष्टात -एकस्यामटन्या महार गजय वसति, यूथाधिपतिर्जातजात कलभक विनाशयति अन्यदा तत्रैका करिणी सर्भिणी जाता एव चिंतयति, यदा कथमपि मे गजपालको जापते तदानेन विनाश्यते, तत मा उत्सराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर ৪নং करिणी यूधादपसरति, यावता यथाधिपतिना युथमवलोक्यते तावता द्वितीये दिवसे सा यूथमध्ये गत्वा मिलति, एवं कुर्वला तयाऽन्यदा ऋप्याश्रमपदं दृष्टं, सा तत्रोलीना गुप्तस्थाने प्रस्ता, गजकलभो जातः, स गजः कुमारैः सहारामान सिंचति, ततस्तापसैस्तस्य सेचनक इति नाम कृतं, स वयस्यो जातः, भ्रमंतं यूथाधिपतिं दृष्ट्वा नवो- दितबलः स मारितवान् , स्वयं गूथाधिपतिर्जातः, तापसाश्रममपि समूलं विनाशितवान् , मन्मातेवान्यायकारिण्यत्र प्रच्छन्नं प्रतिष्टत्विति विचारितवांश. ततस्ते मष्टा ऋपयः पुष्पफलपूर्णहस्ताः श्रेणिकस्य राज्ञः पार्श्वे गताः. ॥ ३४॥ है आ विषयमां सेचनकनुं दृष्टांत कहे छे-एक अवी-जंगलमां महोटु हाथी, टोळं रहेतु, ए यूगनो अधिपति जे मदमत्त मातंग हतो ते हाथणीभी नानां यच्चा जेम जेम 'जणे तेम तेम मारी नासतो. आवामां एक हाथणी गर्भिणी यइ, तेणे विचार्य के-कदाच मने कलभ [ चाळ हस्ती ] जन्मशे तो आ मातंग विनष्ट करशे; आम विचार करती ते हाथणी गजयुथमांथी छुटी पडी जती अने ज्यारे पेलो गजयूथपति एकांतरा जोगा आवे त्यारे बीजे दिवसे यूथमध्ये आती मळे. आम करतां ते हाथणीए एक मुनिनो आश्रम दीठो तेमां गुप्त स्थानमा जइ बीयाणी अने तेणीने एक नानो कलभ गनवाला अवतो. आ कलभ मुनि- आश्रममां जरा मोटो थयो त्यारे मुनि कुमारोनी साये आराम वृक्षोनुं सेचन ( पाणी पावानु) काम करावा लाग्यो, आ उपरथी तपस्वीओए तेने सेचनक आईं नाम आप्युं, ज्यारे ते बराबर उमरमां आव्यो त्यारे एक वखते फरतां फरतां पेला यूथपति साये तेनो भेटो थयो तेमां आ सेचनके यूथपतिने मार्यो अने पोने मजयपति मन्यो. भाटलेथी न अटकता तेणे तपस्वि ननोना आध- -- पत्तराध्य पन सूत्रम्। भाषातर अध्ययन ॥ ३५॥ मोनो समूलगो नाश क्यों, ते एम पारीने के मारी मा जेवी अन्यायकारिणी आवा छाना स्थानमा आगीने रही तेथी आवां स्थान न जोइए पा उपरथी पापियो कुपित यइने हाथमा पुष्पफळ आदिक लइ राना श्रेणिक पासे गया कथित च ते सर्वलक्षणसपूर्णो इस्ती सेचनकनामा वने तिष्ठति, त श्रेणिकेन स्वय तदने गत्वा महता बलेन गृहीत्वानीय स आलानस्तभे यद , ऋपिभिस्तनागत्येति निर्भसित हे गजराज ! क ते शीडीयै गत ? प्राप्त त्ययाऽस्मदविनयफलमिति श्रुत्वा स गज पफाम मष्ट स्तभ भक्त्वा तेपा पृष्टे धावित , ते सर्वे एतप्रेहता कृता, प्राप्तोऽदया, भमा पुनरपि तेशामाश्रया, पुन श्रेणिक तद्नग्रहणाय गत , पूर्वमवसगतदेवेन गजस्योक्त, हे वत्स ! परेभ्यो दमनात्स्वय दमन परमिति तवच श्रुत्या स्वयमागवालानस्त भमाश्रित , यथा श्यस्य स्वय दम नाद्गुणो जातस्तथाऽ येपामिति ॥ अने कई के-सर्व रक्षण सपूर्ण सेचनक नामनो हाथी पनमा रही पहुं भनवाड करे हे भा उपरथी राजा श्रेणीके महोटु सैय साथे लाए उनमा जइ ए हाथीने पकडी लागी अगडमा लारी गध्यो ऋपिओए त्या आगीने ते हाथीने नरछोड्यो के-'हे गजराज ! हवे तारु सामर्थ्य क्यां गयु ? अम सायेना अविनयनु फल तने मळयु 'आ वचन साभली ते हायी अत्य न रोपे भराणो अने पन्धनस्तभ भागीने ते ऋपियोनी पाछळ दोड्यो भने तेओ सर्वने अधमुगा जेरा हणीने अटवीमा जइ तेओना आश्र- मोने भागी नाल्या फरीने पण श्रेणीक ते गनने पकडवा गया त्यारे ते हस्तीना पूर्वभवना समागमी देवे तेने का के-'हे उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययन यन सूत्रमा ॥ ३६॥ ॥३६॥ वत्स ! पारकाने हाये दमन पामवा करतां पोतेज दमन पामबु श्रेष्ठ छे.' आq ते देवनुं वचन सांभळतांनी साज ते हस्ती पोतानी मेळे अगडमां आवी आलान [ हाथी बांधवाना स्तंभ ] नो आश्रय कर्यो. जेम आ गजने स्वयं दमनधी गुण थयो, अर्थात् राजा श्रेणीकना माणसोना हाथे भालांना मार न खावा रुपी गुण थयो-तेम अन्यने पण स्वंय दमनथी गुण माप्ति थाय छे. पडिणीयं च बुद्धाणं । वाया अदुव कम्मुणा ॥ आवी वा जइवा रहस्से । नेव कूजा कयाइ वि ॥ १७ ॥ मूळगोथार्थ:-( विनीत शिष्ये ) वाणीथी अथवा कर्म वडे बुद्ध आचार्योर्नु प्रत्यनीक-एमने विरुद्ध लागे तेवू आचरण लोक देखता यदिवा अथवा एकांतमां पण कदापि नज करवू. ॥ १७ ॥ व्याख्या-अथ पुनर्विनयशिष्यमाह-च पुनर्बुद्वानामाचार्याणां प्रत्लनीकं शत्रुभावं वाचा वचनेनं कृत्वा न कुर्यात् त्वं किं जानासीत्यादिरूपेण निर्भर्त्सनां न कुर्यादथवा कर्मणा क्रियया संस्तरकोल्लंघनेन चरणादिना संघटनेना- विनय न कुर्यात्तदपि आवी इति लोकसमक्षं यदि वा रहस्येकांते कदापि सुशिष्यो गुरुभिः सह शत्रुभावं न कूर्या- दित्यर्थः, शत्रोरपि गुणा ग्राह्या । दोपा वाच्या गुरोरपि ॥ इति कुमतिनिरासार्थ कदापि नैव शब्दस्य ग्रहणं. ॥१७॥ पुनरपि शिष्यने विनय समजावे छे-बुद्ध आचार्योने प्रत्यनीक-सामा यq=शत्रुमाव, वाचा=बाणीथी; अर्थात्-'तुं शुं जाणशे' आवां वचनथी निर्भर्त्सना करवी नहिं, अथवा कर्म-क्रियाथी-नेनो संस्तर ओळंगवो अथवा पग अराडवा विगेरेथी अविनय भाषातर अध्ययन ॥ ३७॥ ।। ३७॥ करवो नहिं एम लोकोनी समक्षमा अथवा एकातमा कदापि मुशिष्य गुरुनो शत्रुभाव नन करे "शत्रुना पण गुण होय ते सराहना अने गुरना पण दोष होप ते पही देवा." आवी जे लोकोक्ति छे तेना निरासार्थ आ गायामां ' कदापि नहि ' एम भार दइने कहेवामा आव्यु छे ॥ १७ ॥ न पक्खओ न पुरओ । नेव किच्चाण पिठ्ठओ ॥ न जुजे ऊरुणा ऊरु । सयणे नो पडिस्सुणे ॥ १८ ॥ मळगाथार्थ-यिनीत शिप्ये प्रत्य-आचायोना पडसामा अथवा पुरत मागळ न बेसवु। तथा पुठ दाने पण नज बेसवु तेम गुरुना ऊसापळने पोतानो ऊर अडाडयो हिं अने गुरुना पवननु प्रत्युसर सूता सूता न देषु ॥ १८ ॥ न्या०-अधासनस्य रिधिमाह-विनीत साधु पक्षतो न निपीदेवक्तिसमावेशात् , गुरुणा सह समानत्व स्यात् तम्मादगुरोर्याहुना सह पाहु कृत्वा न तिष्टेत् पुनर्गुरूणा पुरतोऽयतोऽपि न निषीदेत , वन्दना कुर्यत' पुरुषस्य गुरुणा मुग्वालोकनं न स्यात् , कृत्यानामाचार्पाणां पृष्टतोऽनि स्थातव्य, गुरूशिययोरुभयोरपि मुखादर्शने तथाविधरसवत्त्वाभाव स्यात् , न च पुनर्गुरूणामूमणा जघया सहोरु जघा युजेत् सघट्टयेदलासगादविनय. स्यात् पुन शिप्यो गुरूणा वचन शयने शव्याया शयान समासीनो वा न प्रतिशृणुयात् , गुरुभिरुते सति शय्याया स्थितेनैव शिष्येणैव कुर्म इति न वक्तन्य, किंतु गुरूणा समीपे आगत्य वचनं श्रोतयमित्यर्थः ॥ १८ ॥ हवे आसन एटखे केवी रीते वेसवु तेनो विधि कहे छे. विनीत साधु पक्षत गुरना पडखामां न बेमे; अर्थात् गुरुना बाहुने उतराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥ ३८॥ पोतानो वाहु अडे एवी रीते न वेसे; केमके एम करवाथी गुरुनी समानता थइ जाय; तेम गुरुनी आगळ पण न बेसे कारण के कोइ वंदना करवा आवे ते गुरुनु मुख न जोइ शके तेवी रीते आडो थइ न बेसे, वळी कृती आचार्योनी पृष्ठतः पाछळ पण न वेसवु केमके गुरु तथा शिष्यने परस्पर मुख न देखावार्थी जोइए तेको रस न पडे, तेम गुरुनी जांघनी साथे पोतानी जांघ अथ- डाय एम पण न वेसवु, केमके एम अति आसंगथी अविनय थाय छे, तेम शयनमां-पयारीमां-पड्या पडया गुरुना वचननु प्रत्यु- त्तर न आपवू. अर्थात् पथारीमां पडया होदए अने गुरु कंइ कहे तो तेनो जवाव विछानामां पडयां पडयां न आपतां-बोलावे के तरत उठी गुरु पासे जइ उभवू अने जे कहे ते सांभळीने प्रत्युत्तर आपq.॥१८॥ ॥ ३८॥ नेव पल्लत्थियं कुजा । पक्खपिंडं च संजए ॥ पाए पसारिए वावि । न चिठे गुरुणंतिए ॥ १९ ॥ मूळगाथार्थ:-विनीत शिष्ये गुरुनी समीपे पलोंठी वाळी-पग उपर पग चडावीने न बेस तेम पक्षपिंड-गोठण तथा केडे वस्त्र यंधन-पण न करखु, अथवा पग प्रसारी-लांया करी न बेसबुं. ॥ १९ ॥ व्या- । -पुनरासनविधिमाह-शिष्यो गुरोः समीपे पर्यस्तिकां नैव कुर्यात् , जंघोपरि पादमोचनं न विदधीत, च पुनः पक्षपिंडं जानुजघोपरि वस्त्रवेष्टनात्मिकां योगपटाअधिकामथवा याद्रयेनैव कायबंधात्मिकां गुरूणां पार्श्व न कुर्यात् , चशब्दः पुनरर्थे, पुनर्गुरूणा मतीके सन्मुखं वा पादौ प्रसार्य न तिष्टेत. ॥ १९ उत्तराध्य यन सूत्रमा भाषातर अध्ययन . ॥ ३९॥ -फरीने पण आसन प्रकार शिष्ये केम वेसवु ते दशावे छे- अर्थ -शिष्ये गुरनी समीपे पर्यस्तिका साथळ उपर पग चढावीने न वेसघू. तेम पक्षपिंड-धु टण तथा जाप उपर पछेडी वीटी (योग पट्टा अयिका करी) न वेसवु . अथवा घे हाथवी धुरणने पीटीने काया वाधीने पण न वेसवु अथवा गुरुनी सामे पोताना पग पसारीने पणन वसवु ॥ १९॥ आयरिएहिं वाहितो । तुसिणीओ न कयाइवि ॥ पसायपेही नियोगहो । उवचिठे गुरु सया ॥ २० ॥ मुळगाथाथ-विनीत शिष्ये आचार्यों बोलावे त्यारे मुगे मोढे कदापि बेसी न रहवु, किंतु गुरुना प्रसादापेभी-गुरु केम प्रसन थाय एयो भाव रासो तथा गुरुनी आशाना अर्थी धनी गुरु पासें उभयु ॥ २० ॥ या-पुन सुशिय आचार्यगुरुभिर्याहत आहत' सन् कदाचिदपि तूष्णीको न भवेत् , अन कदापि शब्दात् ग्लानाद्यवस्थायामपि गमभिरामनित शक्तौसला मौन कृत्वा अनमश्रुत न कुर्यादिखर्थ कथभूत सुशिष्य ? प्रसादप्रेक्षी, प्रसाद गुरुणा स्नेह मेक्षितु शील यस्य स प्रसादप्रेक्षी, यत -अन्येषु शिष्येषु सत्सु गुरवो मा शब्दयति, ततो मम महद्भाग्यमिति मनसि चिंतयति, पुन कथभूत सुशिष्य ? नियागट्ठी, मोक्षार्थी विनयस्य मोक्षकारणत्वात् सुशिष्योऽनेन विधिना गुरु सदोपतिप्टे सेवेन ॥ पुनर्विनयशिक्षा वदति- उत्तराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर সায়ন ॥४०॥ ॥ ४० ॥ . , अर्थ:-आचार्यों ज्यारे वोलावे त्यारे सुशिष्य कदापि गुपचुप वेसी न रहे. अहिं 'कदापि' शब्द आप्यो छे तेनुं तात्पर्य एबुं छे के-थाक्यो होय के अस्वस्थ होय तो पण शक्ति होय त्यांसुधी गुरु हाकल मारे त्यारे सांभळ्यु न सांभळयु करी मुंगा बेसी न रहे_ किन्तु मुशिये गुरुना प्रसादापेक्षी-अर्थात्-गुरु अन्य शिष्यो छे छतां तेने नहिं वोलावतां मने वोलावे छे ए मारुं अहो भाग्य छे एम समजी शीघ्र गुरु आगळ जइ उभा रहेQ अने नियोगायी-मोक्षाथी रही हमेशां उक्त प्रकारे गुरु समीपे रही वर्तवु ॥२०॥ आलवंते लवंते वा न निसीइज कयाइवि ॥ चइऊण आसणं धीरो । जओ जूत्तं पडिस्सुणे ॥ २१ ॥ मूळगाथार्थ -गुरु कंड योले अथवा फरीने बोले त्यारे शिष्ये बेसी न रहे कींतु धीर-धैर्य पूर्वक तथा यत्नवान् थइ गुरु जे कहे ते आसन छोडीने अर्थात् उभाथइने सांभळवु-ध्यानमो लेवु ॥ २१ ॥ व्या०-धीरो बुद्धिमान् यतो यत्नवान् सन् शिष्यो यविधेयं कार्य गुरुभिरूपदिष्टं तत्कार्य प्रतिशृणुयादंगी- कुर्यात्. पूर्व गुरावालपति सतीषददति सलथवा गुरौ लपति सति वारंवारं कथयति सति सुशियो न नीषीदेत् , गुरुणा कार्ये उक्त सलासनं स्वस्थानं त्यक्त्वा धीरो धैर्यवान् यत्नेनैकाग्रचित्तेन यद् गुरुणा कार्यमुक्तं भवेस- स्कार्यमंगीकुर्यादित्यर्थः ॥ २१ ॥ अर्थः-धीर-बुद्धिमान शिष्य गुरुए चींधेलु कार्य पडिस्सुणे लक्ष्यमां लीए. प्रथम गुरु धीमेथी बोलता होय अथवा वारंवार

अध्ययन
पनमूत्रमा
॥४१॥
बोलता होय ते वारे मुशिष्य येसी नज रहे गुरुए कार्य क्यु के-तरत आसन छोरीने यत्नपूर्वक एकाग्रचित्तथी गुरुए कहेल
उपदिष्ट कार्य अंगीकार करे. ॥ २१ ॥
आसणगओ न पुच्छिज्जा । नेव सिजागओ कया ॥ आगम्मुक्कुडूओ सतो। पुच्छिज्जा पजलिउडो ॥२२॥
मूळगाथाथ -विनीतशिक्ष्य का सूत्राथ घगेरे गुरुने पूछनु होय ते पोताना आसन उपर बेटा घेठा न पुछयु तेम
शय्या उपर रहीने पण कदापि न पूछा किंतु गुरुपासें आधी उत्कुटुक भासने हाथ जोडीने पुण्खु ॥ २२ ॥
व्या-आसने स्थित ण्व सुशियो गुरुप्रति सूत्रार्थादिक न पृच्छेत्तथा पुन. शय्यां गतो रोगाणुपद्रव विना
कदापि शयान सूत्रादिक न पृच्छेत्तहि कि, कुर्यादित्याह-गुरो. समीपमागयोत्कुटुको मुक्तासन कारणत पाद-
पुछनादिस्थ सन् शातो वा प्राजलिप द्वाजलि सूनार्थादिक पृच्छेन् ॥२॥
अथ-आसनगत भासनपर बेठा घेगन मुशिष्य कदापि-गुरुने मनार्थादिक न पूरे तथा रोगादिक उपद्रव पिना शय्या
पर पडयां पढयां पण मूत्रार्थादिक न पुग्छे स्न्तुि-गुरनी समीपे आवीने उत्कुटुर-मुक्तासन कारण वशात् पादपुघ्नादिस्थ थइने
पांजलि-हाथ जोडीने स्वार्थादिक पूछे ।। २ ।।
एव विणयजुत्तस्स । सुत्त अत्थ च तदुभय ॥ पुच्छमाणस्त सोसस्स । वागरिज जहा सुय ॥ २३ ॥

प यन सूत्रम् ॥४२॥ मूळगाथार्थः-एवीरीते विनययुक्त शिष्य होय तेनें आचार्य सूत्र तथा अर्थ बेय पुछे त्यारे यथाथुत-पोते गुरुपरंपराथी जे प्रेमाणे जाणेल होय ते प्रमाणे कहेवा ॥ २३ ॥ भाषांतर अध्ययन व्या०-आचार्य एवममुनाप्रकारेण विनययुक्तस्य शिष्यस्य सूत्रमर्थं च तदुभयं सूत्रार्थ पृच्छमानस्योभयं पूर्वोक्तं सूत्रार्थ व्याकुर्यादेविनयवतः शिष्यस्याग्रे. यथाश्रुतं गुरुपरंपरातो यथा ज्ञातं सूत्रार्थ गुरुः कथयेदित्यर्थः. २३ ॥४२॥ अर्थः-आचार्य एवी रीते विनययुक्त प्रकारे सूत्र तथा अर्थ पूछता शिष्यने ए उभय-मूत्र तथा अर्थ पोते गुरुपरंपराथी जेम जाणेल होय तेम स्पष्ट करी कहेवो. ॥ २३ ॥ मुसं परिहरे भिक्ख । न य ओहारिणिं वए ॥ भासादोस परिहरे । मायं च वजए सया ॥ २४ ॥ मूळगाथार्थ:-भिक्षु-साधु मृषा-असत्यनो परिहार त्याग करे अवधारिणी- आ आमज छे' आवी साग्रह भाषा न बोले, तेम भाषाना दोप-अपशब्दादिक तथा माया-प्रपचवचन-ने पण सदा वर्जे-त्यजे. ॥ २४ ॥ व्या०-भिक्षुः साधुर्मुषां भाषां परिहरेत् , च पुनः 'ओहारिणि ' अवधारिणी निश्चयात्मिकामेवमेवेतिरूपां भाषां न ब्रवीत, भाषादोष सावधानुमोदनादिकं परिहरेत् , च पुनर्मायां वर्जयेत् , मायाया ग्रहणेनान्येषामपि : क्रोधमानलोभादिनां ग्रहणं सर्वान् कषायान् परिवर्जयेत् , कषायाणां वर्जनान्मृषाभाषागा वर्जनं स्यादेव, कारणा- भावे कार्याभावः ॥ २४॥ + भाषांतर अध्ययनर यनसूत्रमा अर्थ ---भिक्षु साधुए मृपा भाषा-असत्य भाषण परिहरवु त्सना वळी अवधारिणी-आ आमज छे एका प्रकारे निध- यात्मक भाषा पण न बोलवी. भाषाना दोप-अर्थात् कोइ सदोष वाक्य अनुमोदन कराइ जाय इत्यादिक दोषने तेमन पाया कपट वाक्यनु पण वर्जन करवू अहीं माया शब्दना गृहणथी क्रोध मान लोभ आदिकनु गृहण समजी लेवु-अर्थात् सर्व कपायनु परिवर्जन-सहन त्याग करतो कपायोनु वर्जन करवायी मृपा भापानु वर्जन पर शके छे. केमके क्रोपलोभादि छे ते मृपा भाषाना कारणो छे ते कारणनो त्याग करसाथी तेनु कार्य जे मृपा भाषा-असत्य भाषण-तेनी उत्पतिन रोकाइ जाय छे कारण जे अभावे कार्यनो अभाव थाय ॥ २४ ॥ न लविज पुठो सावज । न निरहन मम्मय ॥ अप्पणठा परछा वा । उभयस्सनरेण वा ॥ २५ ॥ मूळगाथार्थ -साधुने कोई पूछे त्यारे तेणे सावध सदोष पवन पोलयु नहि तेम का निरर्थक पण पोलवु नहिं, अनें मर्मक-कोनु मन दुखाइ जाय एवुम्बवन पण बोल नदि-आम पोताने माटे के परने मारें अथवा पन्नेने अथे कर पण प्रयोजन पिना बोलवु नहि ॥ ५ ॥ व्या०-एन साधु पृष्ट सन् सावध सपापवचन न लपेन भाषेत, निरर्थक वचन च नालपेत, न च मर्मक मर्मरूप वाक्यं साधुयात् , नियतेऽनेनेति मर्म लोकराजविरुद्वादिक, अथवा मर्मणि गच्छत्तीति मर्मग, यस्मिन् राध्य यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन१ १ ॥४४॥ कर्मणि प्रकटीभूते सति मनुष्यस्य मरणमेव स्यादपि वावयमात्मार्थ वाधवा परार्थ वायवोभयार्थमंतरेण प्रयोजन विनापि च न वदेदिलर्थः. ॥ २५ ॥ स्वगतदोपत्यागमुक्त्वोपाधिकृतदोपल्यागमाह- अर्थ:--साधु पुरुष, कोइ पूछे सारे सावधयापयुक्त वचन न लपे चोले, तेम निरर्थक वचन पण न बोले. तथा मर्मक कोइर्नु हृदय दुखाइ जाय तेवू वाम्य साधु न बोले. मर्म शब्दनो अर्थ एवो छे के जेना हणावाची प्राणी मरी जाय ते मर्म=लोक राजविरुद्धादिक-मर्मक कयां छे. आ गाथामां' मम्मयं ' ए पदनी छांया मर्मक तथा मर्मग एम वे प्रकारे थाय छे तेथी मर्मग पाठ स्वीकारीए तो-कोइना मर्मने जाग-अर्थात् ठेठ मर्म सुधी स्पर्श करे-एटले के जे कर्म प्रकट थतां मनुष्यनु मरणज थाय तेवू वाक्य पोताने माटे पारकाने माटे अथवा बन्नेने माटे प्रयोजन विना पण साधु सर्वथा न वाले. ॥ २५ ॥ समरेसु अगारेसु । संधीसु य महापहे ॥ एगो एगिस्थिए सद्धिं । नेव चिठे न संलवे ॥ २६ ॥ मुळगाथार्थ:-साधुप लुहारशाळाभोमां तथा शून्यगृहमा तेमज ये घर वच्वेनी खचाळीमां अने राजमार्गमा एकला पकली स्त्रीनी साथे उभयं नहिं तेम तेणीनी साथे आलाप पण न करवो ॥ २६ ॥ व्या---एतेषु स्थानेष्वेक एकाकी सन् साधुरेकाकिन्या स्त्रिया सार्ध न तिष्टे , न चैकाकी साधुरेकया कामिन्या सह संलपेत् . तानि कानि स्थानानि ? समरेपु गर्दभकुटीरेषु लोहकारशालासु, वा, तथाऽगारेषु, शून्यगृहेषु, तथा *- or उत्तराध्य भाषांतर अध्ययन लाभ सधिषु गृहययातरालेषु, तथा महापये राजमार्ग, अत्रैकस्यायग्रहणमस्मतदुष्टत्वप्रतिशदनार्थे ॥ २६ ॥ अथ गुरुमि. शिक्षार्थ शिक्षमाण शिष्य किं कुर्यादिसार- अर्थ -आग्ला स्थानके एक्लो साधु, कोइ एक्ली स्त्री साये न उभे ते स्थानको कहे छे समर-गर्दभकुटीर लुहारनी कोहमां, अगार-रय गृहमा, सधिस्थान= मकानना वचमा छीनरी जेवु होय त्या, महापय राजमार्गमा, एटला स्थानमा एकली सी साथे साधुए उभवु नहिं तेम तेणीनी साथे आलापात पण परवी नहि. ॥ २६ ॥ ज मे बुद्वाणुसासति । सोएण परुसेण वा ॥ मम लाभुत्तिपेहाए । पयओ त पडिस्सुणे ॥ २७ ॥ मूळगाथार्थ युभ मानी गुरु मने शीला अथपा रुप-कठोर वचनोपडे अनुशाशन-शिखामण-आपे छे ते मारा माज छ एम जाणी प्रयत्नपरायण रही ते शिखामणरूप गुरुपचन स्वीकारी लेयु ॥ २७ ॥ या०-युद्वा गुरवो य मे मम शीतेन शीतलवचनेन वाधवा परपेण कठोरवचनेनाऽनुशासति शिक्षा प्रय- च्छति तन्मम 'लभुत्ति' मम लाभायाासवस्तुप्राप्तये भवि यतीति प्रेक्षयेति पुध्ध्या प्रयत प्रयत्नवान सन शिष्यो गुरुवचन प्रतिशृणुयादगीकुर्यात् , न च गुरूणां कठोरवाक्यात् क्रोध कुर्यात् ॥ २७ ॥ --गुरु शिक्षार्थ शिखामण आपवा होय त्यारे शिष्ये | करवु ते कहे छे - अर्थ-युद्ध ज्ञानी गुरुओ जे मने शीळा तथा कठोर वचना वढे अनुशासन करे -शिक्षण आपे घेते मारा लाभनु छे,

»
उत्तराध्य.
यन सूत्रम्
भाषांतर
अध्ययनर
॥ ४६॥
अर्थात् मने जे प्राप्त नथी थयेल तेवा ज्ञानादिकनी माप्ति करावनार पशे एवी बुद्धिथी शिष्ये प्रयत्नपूर्वक गुरुनु बचन अंगीकार
करवू. गुरुना शिक्षा वचन कदाच कठोर होय तो पण शिष्ये क्रोध न करतां गुणभावे ग्रहण करनां ॥२७॥
अणुसासणमोवायं । दुक्कडस्स य चोयणं ॥ हियं तं मन्नइ पन्नो । वेस होइ असाहुणो ॥ २८ ।।
मूळगाथार्थ:-प्राश शिष्य, कोमल के कठोर जेवू होय तेयु अनुशासन गुरुनु शिक्षापाक्य तथा दुष्कृतनु कोइ प्रेरण
'भरे आ शु कर्यु? ' इत्यादि बचन पोतानु हितकर माने छे, ज्यारे असाधु-दुष्टशिश्यने तेवां गुरुनां यवन द्वेप्य-द्वपने उत्पन्न
करनारां बने छे ॥ २८ ॥
व्या०-' पन्नत्ति' प्रज्ञावान प्राज्ञः शिष्य उपाये मृदुपरुषभाषणादौ भवमुपायं गुरुशिक्षावास्यं, तथा च
पुनःकृतस्य प्रेरणं हा किमिदं दुष्ठं कर्म कृतमित्यादिरूपं तच्चनं हितमिहलोकपरलोकसुखदं मनुते, असाहुणो
असाधोः कुशिष्यस्य सद्गुरूणां परुषवाक्यं दैव्यं छेषोत्पादकं भवति. ॥ २८ ॥ इममेवाथै पुनदृढीकरोति-
अर्थ:-पन्नाश-समजु शिष्य, अनुशासन शिक्षण संबंधी गुरुवचन रुप उपाय मृदु अथवा कठोर भाषणादियुत गुरु शिक्षा
वाक्यने पोताना दुकृत पापन प्रेरणहडसेलनार मने अरे आ Vतें दुष्कर्म कर्यु ? ' इत्यादि रुप वचन हित माने अर्थात् आ
लोक तथा परलोकमां मुखदेनाएं छे एम माने ज्यारे असाधु शिष्यने तेवां गुरुवयन हे पोषोत्पादक पाय छे. ॥ २८ ॥

-- भाषांतर अध्ययन ॥१७॥ ॥४७॥ हियं विगयभया बुद्धा । फरुसपि अणुसासणं ॥ वेम त होई मूढाणं । खती सोहिकर पय ॥ २९ ॥ भूळगाथोथ -विगतभप-निर्भय बनेला पुर-तत्वा शिप्यो गुरुना परुष कठोर शिक्षावचनोने हितकर माने जे पण मूड शिष्योने तो गुरुनु अनुशासन-शिक्षापचन भले भाति तथा शुद्धि करनार होय तो पण दुप्यन्वेषहेतु बने छे ॥ २९ ॥ या-विगतभया सलभरयहिता बुद्वा ज्ञानसत्वा , एतादृशा शिष्यो आचार्यकृतमनुशासन परुषमपि कठोरमपि हित मयते, मृताना भूर्वाणा कुशियाणा शाति क्षमाकर शोधिकरमात्मशुद्विरत्पादक, पुन पदं ज्ञाना दिस्थानमेतादृश गुरूणा शिक्षावचन देष्य पहेतुक भवति ॥ २९ ॥ -एज अपने फरी हद करे के- अर्थ-विगतभय सप्तमकारनां भयथी रहित युद्ध-साततत्व-शिष्यो भले परुप कठोर लागे तेवु पण गुरुनु अनुशासन शिक्षावचन हितार माने छे अने मूढ-मूर्ख-कुशिष्योने शाति-क्षमा करे एतु तथा शोधिकर-आत्मदिनु उत्पादक होय तेवु पण गुरुर्नु शिक्षावचन द्वेप्य द्वेपनु उत्पादक थाय छे. ॥ २० ॥ आसणे उवचिद्विजा । अणुचे अक्कुए थिरे ॥ अप्पाहाई निरुठाई । निसीइजप्पकुक्कए ॥३०॥ मूळगाथार्थ-अनुच्च-अति उचु न होय तथा भकूज-भयान न करतु दोय भने स्थिर-डगमगतु न होय तेवा आसन यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययनर ॥ ४८॥ ।। ४८॥ -- उपर बेसवु ते पण भल्पोत्थायी-जरूरी निमित्त विना आसनपरथी उठवु नहिं यनतांसूधी निरुत्थायी-उठवानी देव न राखतां हस्तपादादिक यहु न हलायतां निश्चल बेसी रहेयुः ॥ ३० ॥ व्या०-सुशिष्य एतादृशे आसने उपतिष्ठेत् , कीदृशे आसने तदाह-अनुचे द्रव्येण भावेनानुचे गुरोरासनाद्धीने. पुनरकचे चीत्कारादिशब्दरहिते, नादशस्यासनस्य शृंगारांगत्वात् , पुनः स्थिरे आसने समपादे तिप्टेन्. अथ स साधुरीदृशे आसने कीदृशः सन् तिष्टेत्तदाह-अल्पोत्थायी, कार्य सत्यप्यल्पमुतिष्टतीत्येवंशीलोऽल्पोत्थायी, मुहुर्मु- हुरासनानोत्तिष्टत् , पुनः कीदृशः ? निम्त्यायी निमित्तंविना नोत्तिष्टे , स्थिरं तिप्टेदित्यर्थः. पुनः पुनमत्यानंशी- लस्य साधुत्वं न भवेत् , पुनः स साधुः कीदृशो भवेत् ? अल्पकुक्कुचो भवेत् , हस्तपादशिर प्रमुखशरीरावय- वानधुन्वानो निश्चलस्तिष्टेदिलर्थ. ॥ ३ ॥ चरणे विनयरूपामेषणामाह- -सुशिष्ये केवा आसन उपर बेमवू ते कहे छे- अर्थ:-अनुव-द्रव्यथी तथा भावथी उबुं न होय, अर्थात् गुरुना करतां नीचे होय तेवा तथा अकूज-चित्कार जेवो शब्द न करतुं होय तेवा (जेना उपर वेसतां उठतां कोई प्रकारनो नाद थतो होय तेवू आसन श्रृंगारर्नु अंग गणाय छे) नया स्थिर=समान पायावालं एटले के-हलतुं चलतुं न होय तेना आसन उपर साधुए बेस. केम बेसबुं ? अल्पोत्यायी कार्य होय त्यारे धीमेथी उठवू; वारंवार आसनयी न उठवू. निरुत्थायी वगर प्रयोजने घडी घडी उठवानी टेव न राखंत्री किंतु स्थिरताथी -- -- । - -- भाषांतर अध्ययन पन सत्रम् ॥४९॥ सयु वारसार उठनानी देव साधुए न राखवी; अने अल्पकुक्कुष-हाथ पग मस्तक आदिक शरीरना अवयवोने नहिं धूणावता निश्रलेपणे आसन उपर घेसवु ॥ ३० ॥ कालेण मिक्खमे भिक्खू । कालेण य पडिक्कमे ।। अकालं च विविजित्ता । काले कालं समायरे ॥ ३१ ॥ मूळगाथार्य-मिथु-साधुए भिधादिफने माटे नीमेले समये नोकळवु पाछु योग्य समयेज स्थानपर गावी जवु मकाले अयोग्य काळनं घर्जीने योग्य काळेज ते ते काळनी वियागो आचरवी ॥ ३१ ॥ व्या०-काले प्रस्तावे भिक्षु' साधुनि"क्रमेशिक्षार्थ, निर्गच्छेत् , च पुन• काले ण्व प्रतिफमेदाहार गृहीत्वा स्वस्था नाय पवादाग, अकालमनस्ताव विशेपेग वर्जयित्वा क्रियाया असमय तस्त्वा काले क्रियायोग्यप्रस्तावे एव काल तत्समययोग्यमियासमा समाचरेत्कुर्यात् ॥ ३१ ॥ -चरणमा पण विनयरुप एपणानु निरुपण परे छे- अर्थ-भिक्षु साधुए काले नियमित टाणेन भिक्षा नीकलयु तेम पाछु काले नियमित वेळाएज आहार लइने स्वस्थान तरफ , अाले असमयनो त्याग करी क्रियायोग्य आसरेज ते ने समये उचित कार्यनु आचरण कर. ॥३१॥ परिवाडीए न चिठिज्जा । भिक्खू दत्तेसण चरे ॥ पडिरूवेण एसित्ता । मिय कालेण भक्खए ॥ ३२ ॥ - 11 । उत्तराध्य. यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥५०॥ ॥५०॥ मुळगाथार्थः-परिपाटी-पंगत जमती होय त्यो भिक्षुके उभवू ना तेम दीधेला आदारमा दोष निरीक्षण करतु, पूर्वाचार्यानीपेठे आहारने गृहीने नियत समये मित-उदरपूर्ति जेटलो आदार करे. ॥ ३२ ॥ व्या०-भिक्षुः साधुः परिपाट्यां गृहस्थगृहे जीमनवारादौ भोजनस्थितपुरुषाणां पंक्तौ न तिष्टेत् , तत्र भिक्षो- रप्रीतिशंकादिदोषसंभवात्. पुनर्भिक्षुः साधुर्दत्ते दाने गृहस्थेन दीयमाने आहारदाने एषणां चरेदाहारदोषविलोकनं कुर्यात् , न तु जिहालोल्येन सदोषाहारं गृहीयात्. तच्छुद्धमाहारं प्रतिरूपेण सुविहितप्राचीनमुनिनां रूपेण, यथा पूर्वाचार्यस्थविरकल्पैः साधुभिः पात्रे आहार निर्दोष गृहीतं, तथा गृहीत्वा तदप्याहारं मितं स्तोकं स्वकुक्षिपूर्तिमात्रं गृहीतव्यं, अमितभोजने यहुदोषसंभवात्. एवं विधिनाहारमानीय कालेन नमस्कारपूर्वकप्रत्याख्यानपारणसमयेन सिद्धां- तोक्तविधिना भक्षयेदाहारं कुर्यादित्यर्थः ॥ ३२ ॥ पुनर्गहस्थगृहे आहारग्रहणविधिमाह- अर्थ:-भिक्षु साधु परिपाटी गृहस्थने घरे जमणवार होय त्यां जमवा वेठेला पुरुषोनी पंक्तिमां न रहे; कारण के त्यां भिक्षुने अप्रीति शंका आदिक दोपनो संभव रहे छे. वळी साधुए गृहस्थ ज्यारे आहारदान दीए त्यारे एपणा आचरे-अर्थात् आहारना पदार्थोमां दोपावलोकन करे. एटले के जीभनी लोलुपताने वश बनी सदोष आहार न स्वीकारे. प्रतिरुप पूर्वना वृदा- चार्योए पात्रमा जेवा निर्दोष आहार गृहण कराता तेवा अने ते पण स्तोक-योडो अर्थात् पोताना उदरभरणपूरतोज आहार ग्रहण करवो, कारण के अपरिमित भोजनमां घणा दोषो संभवे छे. आगी रीते आहार लावीने काले योग्यटाणे नमस्कार पूर्षक प्रत्या- ख्यान पारण समये सिद्धांतोक्त विधियी आहार भक्षण कर. ॥ ३२॥ -- ।

भाषांतर अध्ययन नाइदूरमणासन्ने । नन्नेसि पक्खुफासओ ॥ एगो चिहिज भत्ता । लघित्ता त नइक्कमे ॥ ३३ ॥ मूळगाथाथ-साधुए गृहस्थने त्या मिक्षा लेवा जवु त्यारे अतिदूर न उभ तेम अति नजदीक पण न उभयु छेकर गृहस्थना वशु-पर्यनजर आगळ उभा न रहषु किंतु एकला भत्ताध-भिक्षा माटे-स्थित थवु, भने ते प्रथम कोर साधु मावी उमो होय तोते ने ओळगीने घरा न जयु ॥ ३३ ॥ च्या०-साधुहस्थगृहे नातिदर तिष्टेत् , पूर्वसमागतापरभिभूनिर्गमननिरोधसभवात् आहारपणस्यादर्शनाच, पुनस्तथा नासन्नस्तिष्टेत, आसन्ने न तिष्टेदपरभिक्षुगामप्रीतिसभवात, पुनरन्येषा भिक्षुकापेक्षया गृहस्थानां चक्षु - स्पर्शतभाप स्पर्श न तिष्टेत् , यथाऽये भिक्षवो गृहस्थस्य चक्षु स्पर्श तिष्ठति तथा न तिष्टदित्यर्थ कथ सिष्टेत्तदाह- एकातदेशे यथा गृहस्थ एव न जानाति, अप साधुरन्यभिक्षुनिर्गमनमिच्छति, एवमेक पुराआगतभिक्षुकोपरि बेपरहितो भक्तार्थमाहारार्थ-साधु पूर्वमागत त भिक्षु लघयित्वा नातिकमेपुल्लष्य न प्रविशेदित्यर्थ ॥३३॥ पुनराहारग्रहणविधिमाह- -हवे गृहस्थने घरे केवी रीते आहार ग्रहण करवु तेनो विधि कहे छे. अर्थ:-साधुए गृहस्यने घरे आहार ग्रहण करवा जबु त्यारे प्रथम आवेला अन्य साधुने निकळवामा निरोध यवानो सभव रहे तेमन आहारनां दूषण पण वरावर न जोइ काय तेटला माटे-अतिदूर न उभवु, तेम अन्य साधुनी अप्रीतिनो सभव होवाथी - wor ६ ॥५२॥ - अति समीपे पण न उभवु, तेम बीजा साधुना करता आगळ पडी गृहस्थमा चक्षुःस्पर्श-नजरे पडे तेवी रीते न उभवू. किंतर्हि भाषांतर एकांत देशमा गृहस्थने एम न जणाय जे, आ साधु वीजा साधु नीकलवानी राह जुवे छे-एवी रीते पूर्व आवेला साधु मति द्वेष अध्ययन भाव रहित ए प्रथमागत भिक्षुर्नु उल्लंघन करी आहारार्थ प्रवेश न करे. ॥ ३३ ॥ ॥५२॥ नाइ उच्चे व णाए वा । नासन्ने नाइ दूरओ ॥ फासु परकडं पिंडं । पडिगाहिज संजए ॥ ३४ ॥ मूळगाथार्थ-न अति उचे न अति नीचे तेम दुकडे नदि भने अति दूरे पण नहि एवी रीते साधुयें परने माटे करेल प्रासुक पिंड-अनादि-प्रतिग्रह करवो ॥ ३४ ॥ व्य०-उच्चैः स्थाने मालादावाहार न गृह्णीयात् , आहारस्याहारदातुर्षा पतनसंभवात् , च पुनींचैः स्थानेऽपि भूमिगृहादावाहारं न गृह्णीयात्तत्र चैपणायासंभवात् , दायकस्य कष्टादिसंभवादा, अथवात्युच्चैः सरसाहारलब्धेरहं : लब्धिमानित्यभिमानरहितः, आहारेऽलब्धेरहं दीनोऽस्मि मा कोऽपि न ददातीति दीनबुद्धिरहित इति भावः.06 । उच्चत्वनीचत्वरहितो नासनो नातिनिकटवर्ती, नातिंदूरवर्ती, यथायोग्यस्थाने स्थितः प्रासुकं निर्दूपणं नवकोटि- विशुद्ध परकृतं गृहस्थेनात्मार्थ कृतं पिंडमाहारं संयतो जितेंद्रियः साधुः प्रतिगृह्णीयात्. ॥३४॥ अथाहारकरणस्थानमाह- -फरीने पण आहार गृहणनो विधि कहे छे.- भर्थ:-उंचा स्थाने मेडीमाळ उपर चढीने आहार न लेबो कारण के आहार अथवा देनारने पडवानो संभव रहे; तेम - - - उसराध्य यन सूत्रमा अध्ययन नीचा स्थाने भोयरा जेवामा जइ आहार ग्रहण न करवु, केमके त्या एपणानो सभव रहे तेम देनारने कष्टादिनो सभव अथवा ' उच्चै 'ए पदनो एलो पण भाव छे जे सरस आहार पामी ' आज मने बहु उत्तम सावानु मल्यु ' एवु अभिमान न करयु तया नीचे 'ए पदनो भाव-आहार न मले त्यारे 'हु दीन छु, मने कोइ आहार देतु नथी' आवी दीन बुद्धि न करवी आम पण अभिमाय वर्णी शकाय. 'न आसन्ने 'अति समिपे रहीने नहि तेम अति दूर रहीने पण नहि-अर्थात् यथायोग्य स्थाने उभा रही मासुर-निर्दोप-नाकोटि विशुद्ध, परकत-गृहस्थे पोता माटे तैयार करावेल पिंड आहार साधुए सपत-नितेंद्रिय रहीने प्रतिग्रह करवो स्वीकारा ॥ ३४ ॥ अप्पपाणप्पबीयमि । पडिच्छिन्नमि सवुडे ॥ समय सजए भुजे । जय अप्पपरिसाडिय ॥ ३५॥ मुळगाथार्थ-अल्पप्राण तथा गल्पयीन पटलें द्रींद्रीय पद्रियरहित तथा प्रतिच्छन्न-उपर छापरेल-पळी सवृत-धारे फोरथी ढाकेल पया स्थानमा घेसीने यत्नयान रही धीजा साधुओनी साथे सडसड आदिक अवाज न थना देता अपना नीचे न येराय तेची रीते भिक्षा करवी ॥ ३५॥ "या०-सयत साधुरेतादृशे स्थाने समक साधुभि सम जय यतमान सन सुरसुर वचर्वकसकसकुरडकुरडा- दिशब्दमकुर्वाण अपरिसाटित सिपथुपातनेन रहितमाहार भुजीत, कीदृशे स्थाने ? अल्पयीजे बीजग्ररणोपलक्ष- णेन मवेकेंद्रियरहिते, पुन कीदशे' प्रतिच्छन्ने संपातितजीवरक्षायै सते पाचन कटकुत्पाद्याच्छा-िते, अन्यथा कण .

मूळगाथार्थ:--आचार्य पुरुषो पंडित-विनयवान् ने शासन करतां भला घोडाने खेलावनार असवारनी पेठे रमे छेप्रीति पामे छे, अने वाल=अविनीत-शिष्यने शीखवतां गलि-अपळोट अश्वने चलावता सवारनी पेठे श्रमित था जाय छे. ॥ ३७ ॥ यन सूत्र भाषांतर अध्ययन ॥५६॥ ॥५६॥ व्या०-अत्र गुरुरिति कर्तृपदमनुक्तमपिग्रहीतव्यं, गुरुः पंडितान् विनीतशिष्यान शासयन्, शिक्षा ददन पाठयन रमते रतिमान् स्यात् प्रयत्नो भवेदिवर्थः, क इव ? वाहक इव, अश्ववारो इव, यथाश्ववारो भद्र सुशिक्षित हयं वाहयन खेलयन रमते हर्षितो भवेत् , बालं मुर्ख शिष्यं शासदाचार्यः श्राम्यति अमं प्रामोति, कमिव ? गल्यश्व 'दुर्वीनीततुरग वाहक इवाश्ववार इव, यथाश्चवारो दुविनीततुरगं वाहयन् खेदं प्रामोति, तथा कुशिष्य पाठयन् गुरुर्दुःखितो भवेदित्यर्थः ॥ ३७ ।। अर्थ:--अहिं यद्यपि कर्तृपद नथी आप्यु तथापि गुरुपद कर्ता रुपे गृहण करवानुं छे, गुरु, पंडित-धुद्धिमान् शिष्यने शासन आपवामां रमे छे. जेम सवार भद्र-भला घोडाने खेलववामां हर्ष पामेछे तेम अने वाल=मूर्ख शिष्यने शिखवता आचार्यने पडे छे, जेम गल्यश्व=अपळोट घोडाने चलावनामां सवार थाकी जायछे-खेद पामेछे तद्वत् कुशिष्यने भणावतां गुरु दुःखित थायछे.३७ खड्डुया मे चवेडा मे । अक्वोसा य वहा य मे ॥ कल्लाणमणुसासंतो। पावदिहि ति मन्नइ ॥ ३८ ॥ मूळगाथार्थ:-अविनीत शिष्य, कल्याण-हितकर अनुशासन करता गुरुने 'आ आचार्य तो पापष्टि छे. मने हाकलो मारे छे, मने थपाट मोरे छे, मने गाळो दे छे, मने प्रहार करे छे, एम माने छे. ॥ ३८ ॥ श्रम A اور الرعور - TA उत्तराध्य ॥१७॥ व्या-दुपिनीतशिष्या कन्याणमिरलोकपरलोकहितमनुशासत शिक्षयतमाचार्य पापादृष्टि रस्पेति पापरष्टि- भाषांतर रयमानार्य पापदृष्टिरस्ति, पापकारी वर्तते, मे मध चपेटा ददाति, मे मामाकोशान दुर्वचनानि श्रावपति, पुनर्मे मा সিন बधान कयादिघातान् ददाति, अपर समीहित किमपि न दृश्यते, आचार्य केरल मय टकरादीनेव ददातीति मन्यते ॥५७॥ न तु रितकारकमाचार्य मनुते ॥ ३८॥ अथ पुनर्विनीतपुर्धिनीतयोर्वर्णनमाह- अर्थ-दुनिीत शिष्य, फ्ल्याण-आ लोकनु तथा परलोपनु हितकर शिक्षण आपता आचार्यने-' आ आचार्य पापडष्टि छे, मने चपेग-धपाट मारे छे, मने आनाश-दुर्वचनो सभळावे छे मने बाधे छे तथा लाफडानी कापीथी मारेछे आमां का इच्छवा जेवु तो नयी आ ता गुरु मात्र मने टकोरा मार्या करे.-'आम माने छे, आचार्य ने हितकर नयी मानतो ॥३८॥ पुत्तो मे भाय गाइ ति । साहू कल्लाण मन्त्रइ ॥ पावदिछी उ अप्पाण । सास दासि त्ति मन्नइ ॥ ३९ ॥ भूळगाथार्य-साधु-विनीत शिप्य, भा गुरु मने पुत्र, भार अथवा सगा जेयो गणी शासन करे के पस कल्याण माते छे पण पापरहिचाने शिष्य तो 'आ गुरु तो मने दासना जेयो गणी शासन करे छ' एम. माने छे. ॥ ३९ ॥ व्या०-साधु सुशिल्प कल्लाण हितकारक गुरु गुरुवचन वा कल्याणकारक मनुते, अयमभिप्राय-यदा सुशिप्यालयाचार्यो गुफरनुशास्ति तदा सुशिष्यो मनस्येव जानाति, आचार्यों मे मम पुत्रस्येव भ्रातुरिव ज्ञाते -- ... ध्य- यन सूत्र भाषांतर अध्ययन ॥५८॥ ॥५८॥ स्वजनस्य स्वस्येवानुशास्ति, स्वकीयस्य बुध्ध्या मे मह्यं पाठयति, पापदृष्टिः कुशिष्यो गुरुणा शास्यमानमात्मानं दासमिव मनुते, अयं मां दासमिव तर्जयतीति मनसि दुःखितो भवत्याचार्य निंदतीत्यर्थः ॥ ३९ ॥ - हवे विनीत अने दुर्विनीतर्नु वर्णन आपे छे. अर्थ:-साधु-सुशिष्य, कल्याण हितकर गुरु तथा गुरुना वचनने कल्याण कारक माने छे. अभिमाय एवो छे के-ज्यारे विनयवान् शिष्य प्रति आचार्य शिखामण आपे छे त्यारे ए मुशिष्य मनमा एम जाणे छे जे-मा आचार्य मने पुत्रने जेम, भाइने जेम, ज्ञाति-स्वजनने जेम शिक्षण आपे तेम मने शिक्षण आपे छे. मने पोतानो जन गणीने भणावे छे. अने पापदृष्टि-कुशिष्य गुरु ज्यारे तेने शिक्षण आपे त्यारे पोताने दासजेयो मनमां माने अने 'आ गुरु मने पोताना दास जेवो गणी तरछोडे छे आम मनमां दुःखित थइ गुरुने निंदे छे. ॥ ३९ ।। न कोवए आयरिअं। अप्पाणं पि न कोवए । बुद्धोवघाइ न सिया । न सिया तोत्तगवेसए ॥ ४० ॥ मूळगाथाथै:--(सुशिष्ये) आचार्यने न कोपाववा तेम पोताना आत्माने पण कोष न पमाडवो अने बुखोपधाति न थवं मर्थात् गुरुनो उपधात करवा तत्पर न थत् एटले गुरुने मारवा तोत्रग वेषक न थy अर्थात्-लाकडी वगेरे गोतवा न मंडी जयं. किंतहि गुरु प्रति शांत भावे वर्गवं. ॥ ४० ॥ व्या--विनीतशिष्य आचार्य न कोपयेसथापरमपि न कोपयेत्तधात्मानमपि न कोपयेत्, पुनः शिष्यो - ta

उत्तराध्यन
पन भूत्रमा
भाषांतर
अध्यापन
॥ ५९॥
पुदोपघाल्याचार्यस्योपघातकारी न स्यात् , युगप्रधानाचार्योपघातिकुशिष्यवन्न स्यात्, पुनस्तोत्रगवेषकोऽपि न स्यात्,
यथा दुर्विनीततुरग प्राजनकगवेपको भवेत्तम सुशियो द्रव्यतो भावतश्च स्तोत्रस्य प्राजनकस्य गवेषको न भवेत्
न्यतोऽत्र चपेटादि भारतोऽन्न यशाकारिवचन ज्ञेय
अर्थ –विनीत शिष्य आचार्यने न कोणवे तेम पोताना आत्माने पण न कोपावे तेम युद्धोपयाती-युग प्रधान आचार्यना
उपघाती कुशिष्यनी पेठे गुरुनो उपघातक न थाय अने तोत्रग वेपक-अपलोट घोडो चाबुक गोतावे तेम मुशिष्य द्रव्यथी के
भावी तोरनो गवेपक न वने, अर्थात् द्रव्यथी तोत्र पपाट वगेरे अने भावधी तोरनो व्यथाकारि वचन, आ बन्ने प्रकारनां तोत्रने
गोतावनारो नन थाय ॥४०॥
अन्न घटाता-
---कोऽप्याचार्योऽष्टविधगणिसपत्समन्वितो पर्यंत प्रकृत्यापि शान क्षीणजघायल• कोपि ग्रामे
स्थित तन कुशिष्या सतत वैयावृत्यविधिविधानमग्नपरिणामैर्गुरुमारणार्थ सदोषधादिर्चिताकारकाणामपि प्राय
काणा पुर इति प्रवदति गुरवो नाशन चिकीर्षव किमप्यौपधादिक न गृह्णन्ति, इत्युक्त्वातपातमारारमानीय गुरवे
प्रयच्छति, वदति नित्यावस्थायित्वेनात्मनां गृहस्था अतिविशिष्ठ २ किचिघच्छति तत. श्राद्धैः सलेखनास्वरूप
गुरव पृष्टा, शियाणा करमप्रीनि च ज्ञात्वा कृतमेवानशन तैरित्येवमाचार्योपघाती न स्यात् ॥४०॥

Ju उत्तराध्य- Do भाषांतर अध्ययन यन सूत्रम् ॥ ६०॥ -~-अत्रे एक दृष्टांत कहे रे.- कोइ एक आचार्य, अष्टविध गणि संपत्थी समन्धित तथा बहुश्रुत अने शांत प्रकृतियाळा क्षीण जंघावन अर्थात् पगमा हरवा फरवार्नु सामर्थ्य न रहेवाथी कोइ गाममां स्थित करी रह्या. त्यां कुशिष्यो, वैयाहत्य आहारादिक आपीने गुरुनी भक्ति करवी ते वैयानृत्य, कहेवाय आ विधि विधानमां भग्न परिणाम यनीए, अर्थात् ए अशक्त आचार्यनी भक्ति करवामां निरुत्साह थइ, हमेसां ए आचार्यना औपधादिकनी चिंना करनारा श्रावको पासे जइ र कुशिष्यो कहेवा लाग्या के-गुरु कइ खावाने इच्छता नथी तेम कंइ औपधादिक पण गृहण करता नथी-आम बोली आजु बाजुमांथी कंइ आहार लावीने गुरुने आपे अने कहे के-तमे अत्रे जाथु पड्या रह्या तेथी गृहस्थो कंई आपता नथी ते उपरथी सेवकोए आवीने संलेखना-एटले शारीरिक तथा मानसिक तपथी कपाया- दिकनो नाश करवा रुप तपन्तुं स्वरुप पूछतां साधुए शिष्योनुं कपट तथा अप्रीति जाणीने अनशन व्रत चालु राख्यु. जेम आ कुशिष्योए आचार्यनो उपधात कर्यो तेवी रीते भाचार्योपघाति न थq. ॥४०॥ " आयरियं कुवियं नच्चा । पत्तिएण पसायए ॥ विज्झज्झ पंजलिउडो । वइज न पुणत्तिय ॥ ४१ ॥ भूळगाथार्थः-आचार्यने कुपित जाणीने तेमने प्रीति उत्पन्न करे या वचनो वडे प्रसन्न करवा बळी हाथ जोडी 'फरी आम नहिं करं ' एम कही विनयया-तेसनोकोप शांत करवा. ॥ ४१ ॥ व्याव-सुशिष्य आचार्य गुरुं पतिएण प्रीतिसमुत्पादकेन वचनेन प्रसादयेत्प्रसनं कुर्यात् , किं कृत्वा ? कृपितं

उत्तराध्य
भाषांतर
গান
ज्ञात्वा गुरु सक्रोध ज्ञात्या विनीतशिष्य प्रांजलिपुट सन् द्धमाचार्य विध्यापथेच्छात कुर्यात् , क्रूद्धस्य गुरोरने
सुशि येणैव वक्त य, हे स्वामिन् पुनरेव न कुर्या ममापराधोऽय क्षतव्य ॥ ४१ ।।
-सुशिये केवी रीते भाचार्य-गुरुनी परिचर्या करवी ते कहे छे
अर्थ -सुशिष्य आचाय गुरुने मीति उत्पन करे तेवां वचनो वडे प्रसन्न परे क्यारे ? ते कहे डे-गुरुने कुपित जाणीने
विनीत शिष्य हाय जोडी क्रुद्ध ययेला आचार्गने विनवे क्रुद्ध थयेला गुरु आगळ मुशिष्ये जइने फहेवु के-' हे स्वामिन् ! फरीने
हु आम नहि फरु मारो आ वरतनो अपराध क्षमा करो; आम विनय वचनथी गुरुना क्रोधनुं अपनपन करे ॥ ४१ ॥
धम्मज्झिय घ ववहार । बुझेहोयरिय सया ॥ समायरतो ववहार । गरह नाभिगच्छइ ॥ ४२ ॥
मूळगाथार्थ --धर्मथी सपादित तथा सदा युध्ध-तत्यापुरुषाए भाचरित अने विशेषत पापरजित या व्ययहारने सम्यक
प्रकारे जावरतो साधु, फ्याप गर्दा निम्ता पामतो नथी ॥ ४२ ॥
या०-साधुस्त व्यवहार साध्याचारमांचरन् गहीं नाभिगच्छति, न्यवहियते अगीक्रियते धमारिभिरिति
व्यवहारस्तमगीकुर्वन् मुनिनिदान प्राप्नोति, त क व्यवहार, यो न्यवहार सदा सर्वदा युद्वैाततत्वैराचरित',
पुनर्यश्र व्यवहारो धर्मार्जितो धर्मेण साधुधर्मेणोत्पादित , कथभूत यवहार ? व्यपहार विशेषेणापहरति पापमिति
न्यपहारस्त व्यपारमनेन प्राणातिपातायावनिवारक माध्वाचारो दर्शित ॥ ४२ ॥

उत्तराध्य-
भाषांतर
अध्ययन
यनसूत्रम्
॥६२॥
॥६२ ॥
अर्थः-साधु, ते व्यवहारर्नु आचरण करवाथी निंदा नथी पामतो के जे व्यवहार धर्मानित होय; अर्थात् साधु धर्म बढे
उत्पादित होय ते साथे सदा बुद्ध ज्ञाततत्व महात्माओए आचारित-स्वीकृत होय अने व्यपहार-पापने हरनार होय; एटले प्राणा-
तिपातादिक आश्रवनो निवारक होय एवो व्यवहार आचरवाथी मुनि निंदा पामतो नथी. ॥ ४२ ॥
मणोगयं वकगयं । जाणित्तायरियस्स उ ॥ तं परिगिज्झ वायाए। कम्मुणा उबवायए ॥ ४३ ॥
मूळगाथार्ध:-विनीत शिष्ये आचार्यना मनमा आवेलु तथा वाणीमां आवेलु कार्य जाणी लइने पोते वाचाथी परिग्रह
करी-एटले हुए काम करी आपीश' रम स्वीकारी कर्म-क्रिया वडे उपपादन करवु ॥ ४३ ॥
व्या-सुशिष्यैराचार्यस्य मनोगतं मनसि स्थितं कार्य पुनर्वाश्यगतं कार्य पूर्व ज्ञात्वा पश्चात्तत्कार्य वाचा
परिगृत्यांगीकृत्याहमेतत्कार्य करोमीत्युक्त्वा कर्मगा क्रियया तत्कार्यमुत्पादयेत् , गुरोर्मनसि स्थितं गुरूक्तं गुरुणा
क्रियमाणं कार्य सुशिष्येण त्वरितं विधेयमित्यर्थः ॥४३॥
अर्थ:--सुशिष्ये गुरुना मनमा रहेलं कार्य, वाक्यगत-वचनथी जणावेलु कार्य प्रथमयी जाणीने पश्चात् ते कार्य वाणीथी-हुँ
ए कार्य करुं छु, आम अंगीकार दर्शावी ए कार्य क्रियावडे संपादित कर. अर्थात् गुरुना मनमां उगेलं, गुरुए, वचनथी फरमावेलु
गुरुर्ने कार्य सुशिष्ये तुरत करवू. ॥ ४३ ॥

उत्तराध्य
भाषांतर
अध्ययनर
॥६३ ॥
वित्ते अचोइए निच्च । खिप्प हबइ सुचोइए । जहोवइई सुकय । किच्चाइ कुबई सया ॥ ४४ ॥
मूळगाथार्थ'गुणाल्यात शिष्ये नित्य अप्रेरितज गुरुकार्य कर अने गुरुए प्रेरित था तो शिप्र-शीघ्रकारी थवु
गुरुए चौंधेल काम जे प्रमाणे उपदिष्ट होय तेज प्रमाणे सारी रीते करवु ॥ ४४ ॥
व्या-पित्तो विनयादिगुणेन प्रसिद्धो विनीतशिष्योऽनोदितोऽप्रेरितोऽपि सर्षेषु कार्येषु नित्य प्रवर्तते, कदा-
गित्स्वय कार्य कुर्वाण आचार्येग प्रेरितवेनदा क्षिम भपति शीघ्र कार्यकृद्भवति, कार्य कुर्वन्नाचार्यप्रेरित' शिष्य
एप न यादह तु कार्य करोम्येव, कि भवद्भिपृथैव प्रलप्यते ? यथोपदिष्ट सुकृन कार्य सदा कुर्वीत, एक कार्य
वाथा कृयानि यहुनि कार्याणि कुर्वीत, गु देशेऽवालस्य न विधेय, प्रसन्नतया तदेव कार्य त्वरित विधेयमित्यर्थ
अर्थ ---वित्तीनयादि गुणोथी प्रसिद्ध पिनीत शिष्प गुरुए अमेरित छता सर कार्यमा नित्य महत याय कदाचित् पोते
कार्य करतो होय अने गुरु प्रेरणा करे तो-'हु काम तो कर छु तोय तमे मने था शामाटे घोदवो छो, आम गुरु सामु न बोले
तिहि यथोपदिष्ट-जेम गुरु चौंधे तेम मुकत कार्य सदा करे एक अथवा घणा काम होय तो पण गुरुनी आज्ञा थता आलस्य न
करता प्रसन्नताथी ते कार्य शीघ्र सपादन करे ॥ ४ ॥
नचा नमइ मेहाची । लोए कित्ती य जायए । हवइ किच्चाण सरण । भूयाण जगई जहा ॥ ४५ ॥

= उसराध्य यन सूत्रम् भाषांतर সম্মান ॥ ६४॥ ॥ ६४ ॥ BE मूळगाथार्थः-मेघावी शिष्य जाणीने समजीने नमे छेतेनी लोकमां कीर्ति थाय छे, अने ते साधु. भूत-प्राणीओने जेम जगती-पृथ्वी-तेम कृत्य-पुण्य कार्यानो आश्रय बने छे. ॥ ४५ ॥ व्या-मेधावी बुद्धिमान साधुनप्रति विनयं करोति, किं कृन्वेति विनयशिष्यां ज्ञात्वा तस्य नम्रत्यलोके कीतिर्जायते, पुनः स विनयवान् साधुः कृत्यानामुचितकार्यागां शरणं भवत्लायो भवति, केपां का ? यथा भूतानां तरूणां जगती पृथ्वी यथा आश्रय भूता तथा सर्वेपां साधुकार्याणां विनयी साधुराश्रयो भवतीलर्थः. ॥४५॥ अर्थ:-मेधावी-बुद्धिमान् साधु, विनयचर्चा जाणीने नमे छे. अने ते नम्र शिष्यनी लोकमां कीर्ति थाय छे. जेथी ते साधु, कृत्य उचित कार्य नो शरण-आश्रय थाय छे; जेम भूत-वृक्षोनो आ पृथी आश्रय छे. नेम सर्व साधु कार्यनो ए विनयी साधु आश्रय याय छे. ॥ ४५ ॥ पुजा जस्स पसीयंति । संबुद्धा पुवसंथुया ॥ पसन्ना लाभइस्संति । विउलं अठियं सुयं ॥ ४६ ॥ मूळगाथार्थ-संबुध्ध तत्त्वज्ञानी तथा पूर्वपरिचित एया पूज्य आचार्य जे शिष्यने प्रसन्न गाय छे तेने ए प्रसन्न थाने विपुल अर्थित श्रुत-मनवांछित पुष्कल शाल श्रवणनो लाभ करावेछे ॥ ४६ ॥ व्या-पूज्या आचार्या गुरवो यस्य शिष्यस्य प्रसीदति प्रसन्ना भवंति, ते गुरवः प्रसन्नाः सतस्तं शियप्रति + 7 उत्तराध्य चन सूत्रम भापातर अध्ययनर विपुलमधिन विस्तीर्ण वाछित श्रुत श्रुतज्ञान लाभयिष्यति, कथभूता' ? पूज्या सवुद्धा सम्परज्ञाततत्या पुन कथभूतो ? पूर्वसस्तुता पूर्व सम्पप्रकारेण स्तुता. पठनकालात्पूर्वमेर सस्तुता विनयेन परिचिता रजितास्तत्काल विनयम्य कृतिप्रतिक्रियारूपत्वेन तपाविधप्रसादाऽजनकत्वात् , तेन सर्वदा सस्तुता अथरा कथभत ? श्रुतमाथिक- मों मोक्ष प्रयोजनमस्येति, आर्थिकमर्थान्मोक्षोत्पादक श्रुतधर्म प्रापयिष्यति ॥ १६॥ अर्थ-पूज्य-भाचार्य गुरुओ जे शिष्यने प्रसम थाय छे, ते गुरुभो प्रसन्न धइने पिपुल-पुप्पळ अर्थित वाछित श्रुतज्ञाननी लन्धि फरावे छे ए पूज्य गुरुभो सम्पम्मकारे युद्ध-शानतत्व होइने पूर्व सम्यक स्तुत अर्थात् सारी रीते परिचित थपेला; एटले विनयरान् शिष्ये प्रथमथी चिरकाल परिचर्यारडे रजित करेला होगाथी आर्थिक श्रुत-मोक्षोणयभूत ज्ञाननी माप्ति करावे छे आमा 'प्रथमथी मारे चित्त ' कहेवानु तात्पर्य एच छे के-तात्कालिक विनय तो गर्यानु प्रतिक्रिया रुप होताथी तेवी प्रसन्नतानो उत्पादक नधी यतो एतो प्रथमनी परिचर्यान तेवी समता उत्सन फरी शकेले के जे प्रसन्नताना आवेशमा गुरु पिनयी शिष्यनो अनु- ग्रह करवा प्रेराय छे ॥४६॥ . स पुजमत्थे सुषिणीयससए । मणोरुई चिटइ कम्मसपया । तमो समायारिसमाहिसवुडे । महज्जुइ पचवयाणि पालिया ॥ १७ ॥ 2.

उत्तराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥६६ मूळगाथार्थ:-ते पूज्य-प्रशस्त-शास्त्र अध्ययन संपन्न तथा सम्यक्प्रकारे गुरुए विनीत-टाळेल छे संशघ जेना, अने गुरु ना मनने गमतो ए शिष्य कर्मसंपदवडे संयुक्त रहे छे. तपर्नु समाचरण तथा समाधिवडे संवृत-युक्त बनी पंच महायतोतु पालन करी महाद्युतिवाळो थाय छे. ॥ ४७ ॥ व्या०–स सुशिष्य आचार्येभ्यो लब्धश्रुतधर्मे मनोरुचिस्तिष्टति, मनसो रुचिर्नेमल्यं यस्य स मनोरुचिनि- मलचित्तः, अथवा मनसो गुरोश्चित्तस्य रुचिर्यस्य स मनोरुचिः, गुरुचित्तस्थ बुद्धियुक्त इत्यर्थः. पुनः कीदृशः ? सुशिष्यः कर्मसंपदा दशधा समाचारी करणसंपदोपलक्षितः, पुनः कीदृशः? पूज्यशास्त्रः, पूज्यं सर्वजनश्लाघ्य शास्त्रं यस्य स पुज्यशास्त्र:. गुरुमुखाद्धीतं शास्त्रं विनयपुर्वकमधीतं च पुज्यशास्त्रं भवत्येव, यदुक्तं-न हि भवति निर्विगोपक-मनुपासितगुरुकुलस्य विज्ञानं ॥ प्रकटितपश्चिमभागं । पश्यत नृत्यं मयूरस्थ ॥१॥ पुनः कीदृशः ? सुशिष्याः सुविनीतसंशयः सुतरामतिशयेन विनीतो दुरीकृतः संशयो यस्य स सुविनीतसंशयोऽपगतसंशयो लब्धरहस्य इत्यर्थः. पुनः कीदृशः ? स सुशिष्यस्तपःसमाचारी समाधिसंवृतस्तपसः समाचारीतपासमाचरणं समाधिश्चित्तस्य स्वास्थ्य, तपः समाचारी च समाधीश्च तपासमाचारीसमाधी, ताभ्यां संहतो निरुद्धाश्रवः, पुनः कीदृशः सुशिष्यः? महाशुतिर्महती थुतिर्यस्य स महाद्युतिः महातपास्तेजोलेश्यापुलाकलभ्यादिसहितो भवति, तादृशः सन् पंचमहाबतानी पालयित्वा कीदृशो भवति ? ॥४७॥ तदाह- अर्थः-ते मृशिष्य आचार्यों पासेथी लब्ध जे श्रुतधर्म नेमां जेनी मनोरुचि छे एवो थइ, अथवा मनोरुचि-निर्मलचित्तवाळो भाषांतर সায়ন पत्तराध्य थइ अथवा गुरु चित्तस्य चुद्धियुक्त थइ वथा कर्मसपदा-इशविध साधुसमाचारी करण संपनी उपलक्षित अने पूज्यशास्त्र-गुरु पन सूत्रम् मूखथी अधीत ते साणे विनयपूर्व अध्ययन करेलु शास्त्र पूज्यशास्त्र कहेवाय तेवा शास्त्राध्ययनवान् पुरुष पण पूज्पशास्त्री कडेवाय, पाछे के- जेणे गुरुकुम्लनु उपासन नधी कर्यु तेवा नियनु विज्ञान अनिंदित नथी होत; नृत्य करता मयूरोनो पाउलो भाग ।। ६७ ॥ जोइ लीओ' अर्थात् गुरु रुपा लन्ध विज्ञानवान् मुशिष्य मुविनीत सशय-सर्वसशयो जेना दर थया छे एवो बनी तप समाचारी- तप समाचरणशील तथा समाधिसत-चित्तनी स्वस्थता र सहत, अर्थात् निरुद्ध छे आश्रय जेणे एको ए मुशिष्य, महाति-महा तेजस्वी महातपा -अर्थात् तेजोलेश्या पुलाफलन्ध्यादि सहित होइ पच महानतोने पाले छे ॥ ४७ ॥ स देवगधवमणुस्सपूइए । चइन देह मलपकपुच्चय ॥ सिझे वा हवइ सासए । देवे वा अप्परए महद्विप ति बेमि ॥ ८ ॥ मूळगाथार्थ -देव गघर्ष तथा मनुष्योए पूजित ते विनयवान् शिष्य, मळपकपूर्वक शुशोणित सभूत-देइने त्यजीने शाश्वत सिद्ध थाय छे अथया अरपरत थोडा कमवाळो तथा मदपि-महोटी समृद्धिधाळा देष धापछे एम (हु) का छु । ४८ ॥ व्यास पूर्वोक्तलक्षणसहितो मुनिर्विनयी शिम्यो देवैर्वादशकल्पवासिभिगैधयर्देनगायनैताग मनुष्यै पूजितो माति, ततश्रायु क्षये देह सात्वा सिद्धो भरनि, कथभूत मिद ' शाश्वनो जन्ममरणरहित.. कथभूत उत्तराध्य- पापा यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥ ६८॥ ॥ ६८॥ देहं ? मलपंकपूर्वकं मनुष्यशरीरं हि औदारिक शुक्ररक्तजनितं भवति, तादृशं त्यक्त्वा सिद्धिभाक् स्यात्, अथवा देवो भवति, देवः कीदृशः ? अल्परतोऽल्पमविद्यमानं रत क्रीडितं मोहनीयजनितं कर्म यस्य सोऽल्परता, अथवाऽल्प- रजा रजोरहितः, पुनः कथंभूतो देवः ? महद्धिको महति ऋद्धिर्यस्य स महद्धिकः, ऋद्धिर्विकुर्वाणा तया सहित इति परिसमाप्तौ. एवममुना प्रकारेण वा एतद्विनयश्रुताध्ययनं ब्रवीमि गणधरापादेशेन, न तु स्वबुध्ध्या ब्रवीमि. ॥४८॥ अर्थः-पूर्वोक्त लक्षण संपन्न सुशिष्य मुनि, देव-द्वादशकल्पवासी गंधर्व-देव गायन तथा मनुष्य; ए सर्वनो पूजित थायछे अने अंते आयुःक्षय थये देहत्याग करी सिद्ध बने छे. केवो सिद्ध थाय छे. तेनां विशेषणो कहे छे. आ मलपंकपूर्ण मनुष्य शरीर औदारिक एटले शुक्रशोणित जन्य छे तेवा शरीरने छोडी शाश्वत जन्म मरण रहित सिद्ध थाय अथवा देव ते पण अल्परत, अर्थात् जेनुं मोहनीय जनित कर्मरत अल्प अविद्यमान जेवू छे, अथवा अल्परजा एटले रजो रहित तथा महर्धिक-महोटी ऋद्धि- युक्त; देवभावने पामे छे. इति=एवी रीते आ उत्तराध्ययननुं विनयश्रुत अभिधानवाळू प्रथमाध्ययन हुं कहुं छं. ते कंइ मारी पोतानी बुद्धिथी कल्पित नथी कहेतो किंतु गणधरादिकना उपदेशानुसार का छे. ॥ ४८ ॥ छे १ ॥ इति प्रथमाध्ययनं विनयश्रुतं नाम. ॥

भाषांतर अध्ययन२ पन सत्रमा ॥ अथ द्वितीय परीपहाध्ययन प्रारभ्यते ॥ अप च विनया परिपहजेतृभि साधुभि' कर्तव्यस्तस्मात् सुधर्मास्वामी जम्बूखामिन प्रत्याह- पूर्व अध्ययनमा निरुपण करेलो निय परिपहनयी साधु पुरुषोए सानो छे तेथी सुधर्मास्वामी जयूस्वामी मत्ये कहे छे- सुअ मे आउस तेण भगवया एवमक्खाय, इह खल्ल वावीस परिसहा समजेण भगवया महावीरेण कासवेण पवेइआ, जे भिक्खु सुच्चा नवा जिच्चा अभिभूय भिवायरियाए परिवयतो पुठो नो निहन्निजा ॥ इत्यायालापक ॥ मूळगाथार्थ- आयुप्मन् । ( अचू! ) में सामळ्युं छे के ते भगवान-शानीसद्गुरुए एम आख्यान का छे, (जे) मा (जिनशासन )मा निधये थमण-तपस्थी काश्यपगोत्री भगवान्-परमानस्वामीए यावीश परीषदो प्रवेदित-स्पष्ट रीते स्वयक्षात छे जे (परीपक्षोने) मिनु-साधु-सामळो, जाणी तथा जीतीने तेमज ते परीपहोनो धैयवढे अभिमरम्परामय करीने मिक्षाचयामा पर्यटन करतो कोर काळे ए परीपदो पदे स्पृष्ट थाप तो पण पोते न हणाय अर्थात् ए साधुना सपमरूप शरीरनो उपधात न थाय अस्यार्थ -'आउस ' इति शियस्यामत्रण, हे आयुस्मन् ! हे शिष्य ! मे मया श्रुत, 'तेण' इति तेन सागुमणा प्रसिद्धेन भगवता ज्ञानवतेयमारपातमेव ममतात् कथित इहाम्मिन् जिनशासने हे शिष्य ' हे जम्बू !

उत्तराध्य. भाषांतर अध्ययनर यन सूत्रम् ॥ ७० ॥ ॥ ७० ॥ स्वय श्रमणेन भगवता महावीरेण काश्यपगोत्रेण खलु निश्चयेन द्वाविंशतिपरीपहाः प्रवेदिताः प्रकर्पण स्वयं साक्षादज्ञाताः, तीर्थंकराणां स्वयं संबुद्धत्वादात्मागमः. गणधराणामनंतरागमः, तीर्थकरेभ्यो यादृशमर्थ गणधराः शृण्वंति. तादृश- मनंतरं धारयति, तस्माद्गणधराणमनंतरागमो गणधरशिष्याणां हि परंपरागमः, तस्मात् श्रीमहावीरस्वामिना स्वयमेव ज्ञाता अर्थ:-शिष्यने संबोधन करे छे. हे ( आउसं) आयुप्मन् ! हे शिष्य ! ते प्रसिद्ध ज्ञानवान् भगवान् सद्गुरुए एम जे कां ते में सांभळ्यु-आ जिनशासनमां श्रमण भगवान महावीर काश्यपगोत्रीए वावीश परीपद प्रवेदित करेला छे--स्फुट रीते साक्षात् जाणेला छे कारण के तीर्थकरो स्वयं संबुद्ध होवाथी आत्मागम कहेवाय अने गणधरो अनंतरागम होय कारण के तीर्थ- करोथी जेवो अर्थ गणधरो सांभळे तेवो अर्थ अनंतर धारण करे छे तेथी गणधरोना अनंतरागम कठेवाय छ; अने गणधर शिष्योने गणधर पासेथी मले एटले तेओनो परंपरागम कहेवाय; एरले महावीरस्वामी स्वयमेन ज्ञात होइ स्वयं संबुद्ध कहेवाग. परि समंतात् सत्यंते साधुभिरिति परीपहा द्वाविंशतिर्यान् बाविंशतिपरीपहान् भिक्षुः साधुः श्रुत्वा गुरुमुखात् कर्णे धृत्वा ज्ञात्वा यथाखरूपेणावबुध्य यान् परीपहान् जित्वा पुनः पुनरभ्यासेन परिचितान् कृत्वा, पुनर्यान् परीपहानभिभूय धैर्येण तिरस्कृत्य भिक्षाचर्यायां परिव्रजन साधुस्तैाविंशतिपरीषहैः स्पृष्ट आश्लिष्टः सन विहन्येत संयमरूपशरीरपातेन न म्रियेत इति सुधर्मखामिना प्रोक्ते सति जम्बूस्वामी गुरुप्रति पृच्छति- उत्तराध्या पन सूत्रम् अपयन२ ॥७१ ॥ ॥ ७१ ॥ ए महावीरस्वामीए यावीश परीपह-[परित सद्यन्ते ] समतात् लागु थता जे साधु पुरुषोए सहन कराय-ते परीषद जे गागीय परीपहने भिक्षु-साधु गुरुमुखथी साभळीने-श्राणमा धारण करी, यथार्थ सरूपे जाणी-समनी, वारवार अभ्यासद्वारा परिचित करीने, फरी ते परीपहोनो धैर्यधारणपूर्वक अभिभव-तिरस्कार करी, भिक्षाचर्यामा परिनजन-विहरतो ए साधु, ए वावीश परीपहथी स्पृष्ट-घेराइ विहत न थाय अर्थात्-सयमरूप शरीर पाते करी मृत न याय आम सुधर्मास्वामिए का त्यारे नबू- स्वामी गुरुने पूरे कयरे खलु वावीस परोसहा स मणेण भगवया महावीरेण कासवेण पवेइया" जे भिक्खु सुच्चा नच्चा जिच्चा अभिभूय भिक्खायरिंयाए परिवयंतो पुठो नो विहन्निजा ॥ मूळगाथार्थ -( उपरनु भालापक-गद्य सामळीने जदूरनामीए सुधर्मास्वामीने पूछयु के ) कतरे-क्या ते वावीश परी पहो' जे अमण भगयार फाप्यप महावीरे प्रशापित करेला छे? के जेने भिभु-साभळी जाणी जीती गने ते मोनो अभिभर-तिर स्कार-करी मिधाचर्यामा पर्यटन करतो-कदाच स्पृष्ट धर जाय-तोरण विहत यतो नथी व्या०-हे स्वामिन् ! कतरे के ते कि नामान , खलु निश्चयेन. ग्वलु शन्दो चाफ्यालकारे, चा दाविंशतिप रीषा पान श्रुत्वा ज्ञात्या जित्वाऽभिभूय भिक्षाचर्याया परिव्रजन साधुर्यविंशतिपरीपहै स्पृष्ट सन विरन्येत सदा श्रीसुधर्मास्वामी जम्मूस्वामिनप्रति वदति- उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययन यन सूत्रम् 3 ॥७२॥ ॥ ७२ ॥ १ L . L अर्थ:-हे स्वामिन् ! ते वावीश परीपह क्या ? क्या क्या नामवाळा छे ? ( अहीं खलु आ पद निश्चयार्थी वाक्यालंकाररुप छे) जे परीपहोने सांभळीने, जाणीने, जीतीने अभिभूत करीने, भिक्षाचर्यामां विहरतो साधु, ए बावीश परीषठोबडे स्पृष्ट-घेरा- येलो विहत-संयम शरीरपातद्वारा-मृत न थाय ? इमे खलु ते बावीसं परीसहा समणेणं भगवया महावीरेणं कासवेणं पवेइवा, जे भिक्खू सुच्चा नच्चा जिच्चा अभिभूय भिक्खायरियाए परिच्चयंतो पुठो नो विहन्निजा ॥ मूळगाथार्थ हे जंवू! आ ( तरतज जेतुं निरूपण कराशे तेवा ) निश्चगे ते वावीश परीग्दो धमण भगवान् महावीर काष्यपे प्रशापित करेला, जेने सांभळी, जाणी, जीती, तरछोडी, भिक्षाचर्यामां परिभ्रमण करता भिक्षु कदाच ए परीपहथी स्पृष्ट थाय तोय विहत न थाय. व्या-हे जम्बु ! इमे वक्ष्यमाणा हृदि वर्तमानत्वात् प्रत्यक्षा ये त्वया सोढास्ते द्वाविंशतिषरीपहाः श्रमणेन भगवता महावीरेण काश्यपेन प्रवेदिता, यान् परीवहान श्रुत्वा ज्ञात्वा जित्वाभिभूय भिक्षाचर्यायां परिव्रजन साधुः परीपहै। स्पृष्टः सन्न विहन्येत, -आवो प्रश्न सांभळी सुधर्मास्वामी जंबूस्वामीने कई ले- अर्थ:-हे जंबू ! आ-तरतज कहेवाशे एवा ए चावीशे परीपहो ( हृदयमां विधमान होवाथी प्रत्यक्षवत् 'आ' ए पदयी भाषांतर সম্মান पनचत्रमा ॥ ७३ ।। निश कर्यो) जे तमे सहन कर्या ने श्रमण भगवान् काश्यपगोत्र महावीर स्वामीए मवेदित-जणावेला छे जे परीपहोने साभळी, जाणी भीती, भिक्षाचर्यामा विहरतो साधु परीपहो वडे स्पृष्ट-घेरायेल होरा छतां पण विहत-सयम शरीर पाते करी मृत यतो नयी त जहा-(तेषां परीपहाणां नामान्युच्यते,) दिगछापरीसहे १ पिवासाप० २ सीयप० ३ उसणप० ४ दसमसयप० ५ अचेलप० ६ अरतिप० ७ इत्थीप० ८ परियाप० ९ निसीहियाप० १० सिजाप० ११ अकोमप० १२ वहप० १३ जायणाप० १४ अलाभप० १५ रोग१० १६ तणफासप० १७ अल्लप० १८ सकारप० १९ पन्नाप० २० अन्नाणप० २१ दसणप० २२ मूळगाथार्थ -ते परीरहोना नाम कहे छे) ते जेया के-दिगछा १० इत्यादिक नामो सुगम छे देशी भाषामा 'दिगिच्छा' शन क्षुधानो पावक छे ( सस्थत 'जियत्सा' शब्दको अपभ्रश छे ) ते भुधा बडेज पटकायमदनात्मक असंयमना भयें करी माहार पाकादिक यथावत् न थाय तेम शुद्ध आहार न मळपाथी मन मारयु पडे। मम परि-चारे कोरधी-सहन करया पडे ते उपाधी ते परोपह कहेयाया तेमा प्रथम क्षुधा गणी तेथी ते दिगिछा परीपह कहो एम अयनी पण व्युत्पत्ति समजी लेयी या-नामानि सुगमान्पेव नवर दिगच्छाशन्देन देशीभाषया क्षुधोच्यते, सा क्षुधैव षट्कायमदनपातक- भयेनारारपाकादि निवर्तते, न शुद्धाहारालाभेन वा, परि समतात् सह्यते इति परीषहो दिगछापरीषद , एवम परेष्वपि व्युत्पत्ति कार्या परीपराणां नामान्युक्त्वा स्वरूपेण वक्तुकाम. सयधार्थमार- P-4-4 उत्तराध्य- त भाषांतर अध्ययन२ -ते परीपहोना नाम कही देखाडे छे.- अर्थ:--प्रथम दिगंछा परीपह-देशी भाषामां दिगंछा क्षुधाने कहे छे एटले क्षुधान पदकायमदनपातक भयने लइ आहार पाकादि नित थाय छे, शुद्ध आहारना अलाभे करी नहि ए क्षुधा परि-सर्व रीते सहन कराय एने दिगंछा परीपह कहेवाय के एज प्रमाणे वीजा परीपहोना नामनी व्युत्पत्ति करी लेवी. परीसहाणं पविभत्ती । कासवेणं पवेड्या ॥ तं भे उदाहरिस्सामि । आणुपुर्वि सुणेह मे ॥ १ ॥ मूळगाथार्थ:-[ हे शिप्यो! ] परीपदोनी प्रविभक्ति-विभागकल्पना काश्यपें प्रवेदित स्पष्ट जणावेली हुं तमने कही देखा. डीश ते आनुपूर्वीथी अनुक्रमे तमें सांभळो १ व्या०-हे शिष्याः परीपहाणां प्रविभक्तिः प्रकर्षण विभजनं प्रविभक्तिः, पृथक्पृथग्विभागः प्रविभक्तिः, काश्यपेन काश्यपगोत्रीयेण श्रीमहावीरदेवेन प्रवेदिता विद् ज्ञाने प्रकर्षेण ज्ञाता इत्यर्थः. ता परीषहाणां प्रविभक्ति- महमानुपामनुक्रमेण मे भवतामुदाहरिष्यामि, मे मम कथयिष्यतस्ता परीषहमविभक्ति यूयं शृणुत? ॥१॥ -परीपहोनां नामो कहीने हवे तेओनां स्वरुप कहेवानी इच्छाथी संबंध दविधा उपक्रम करे छे..-- अर्थ:-हे शिष्यो ! परीपहोनी प्रविभक्ति-पृथक्पृथक् विभाग काश्यपगोत्रीय श्री महावीर देवे जेवी रीते प्रकर्षे करी जाणीने जणावी छे ते ९ तमोने अनुक्रमे कही देखाडीभ ए परीपह पविभाग हूं कहुं हुं ते तमे श्रवण करो. १ तराज- भाषांतर স अत्र सए परीपहेषु पूर्व क्षुधाया निर्देश, मर्वेणु परीपहेषु क्षुधाया दुस्सहत्वात् , गहुक्त- बंगणा नरिय'ति भए वाम्या गाथाभ्यां क्षुधापरीपहजय वदति- भप्रे षा परीपोमांची प्रथम भुधानो निर्देश कर्यो पारण के-सर्व परीपहोमा सुधा अति दु सह छे-मा छे के-खहासमा यणा गयि' 'शुभासमा वेदना नास्ति' भूख जेसी बीनी वेदना नधी-एरले पे गाया र क्षुषा परीपहनो जग कहे छे दिगछापरिगए देहे । तबस्सी भिक्खु थामव ॥ न लिंदे न छिंदावए । न पए न पयावए ॥ २ ।। कालीपनगसकासे । किसे धमणिसतए ॥ मायने असणपाणस्स । अदीणमणसो घरे ॥ ३ ॥ मुगापा-तपस्सी मिन, पोतानो देह दिगिंडा परिगत-पाथी घेराा जाय तो पण भामपान-मननी एटता धारी पोने का पद महिम छेवाये पण नहिं तथा पोते पचेराधे नवितेम अन्य पासे रचावे पण नदि मले पोतानो देव बागानी अधाना पर्ष जेपो थाप, अर्थात् फागनी टाग पचमा जाडो तथा छेडे पातळी होय छे नेपा हायपगयाटो तया कृष-मति दूषलो रोमन धमती संतत-पटले परित-रगोडा घडे प्याप्त यने तोरण अशन-स्यायु तथा पान-पीए तेनी मात्राप्रमाणने नाणनारो ( साधु ) जे मन जराप दी। न होय तेयो रहीने पिचरे-पतेः भर्थात् शुधापी दीन न पनु र दिगा परीपद ३ गा-तपस्यो माधुदिगंशा शुधा, तया परिगते याप्ते देहे मति न छियात् , तरूणा फलादिकं स्वय न २ उत्तराध्या भाषांतर अध्ययन प्रोटयेत्, न चापरेण छेदयेत्, न च स्वयमन्नादिकं शाकादिकं च पचेत्, न च परेण पाचयेत्, नवकोटिशु- द्वियाधां न कुर्यात्. अर्थः-तपस्वी साधु दिगंछा-क्षुधाथी देह व्याप्त थाय तो पण न छेदे; अर्थात् साडमांथी फलादिक कंइ पण पोते तोडे नहि. तेम बीजा पासे तोडावे पण नहि, तथा पोते कंइ अन्न अथवा शाकादिक रांधे नहिं तेम वीजा पासे पोता माटे रंधावे पण नहिं. अर्थात् आहारनी नवकोटि शुद्रिने वाघ आवे तेवू कंइ पण न करे. कथंभूतस्तपस्वी स्थामवान् मनोयलयुक्तः, पुनः कीदृशः ? कालीपर्वागसंकाशः, काली काकजघा, तस्याः पर्वाणि मध्ये तनूनि भवंति, अंत्ये स्थूलानि भवंति, तदाकाराणि याहुजंघायंगानि भवंति यस्य तपस्विनो जानु- कूर्परादयोऽवयवाः काकजंघासदृशा दृश्यते इखर्थः. कालीपर्वसंकाशांग इति पाठो युज्यते कालीपर्वागसंकाशा, इति पाठस्त्वार्यत्वात् , प्राकृतस्यात् संकाशशब्दस्य परनिपातः, अंगशन्दस्य पूर्वनिपातः, पुनः कर्णभूतस्तपस्वी ? कृशा, पुनः कथंभूतस्तपस्वी ? धमनीसं ततः धमनीभिर्नाडीभिः संततो व्याप्तोयस्य शरीरं नसाभिर्व्याप्तं दृश्यते इत्यर्थः. पुनः कीदृशस्तपस्वी ? अशनपानस्य मायन्नत्ति मात्रज्ञो मात्रमनपानेन स्वस्योदरपूर्तिमप्रमाणं जानाति यावताजहारेण स्वकीयोदरपूर्तिः स्यात्तावत्प्रमाणमेवाहारं गृतीयात् , ननु यस्तपस्वी रसादिलोल्यादधिकं गृहा- तीत्यर्थः, इति मात्रज्ञः पुनर्यस्तपस्वी अदीनमनाः, अदीनं मनो यस्य सोऽदीनमनाः, तपसः पारणादाबाहारस्या- भापातर अध्ययनर यन सुत्रमा ॥ ७७॥ ॥ ७७॥ प्राप्तावप्पदीननिराः सन् चरेत् , सयममार्ग प्रवर्तेत, अल धे तपसो द्विर्लधे देहधारणा इति बुद्धि घिने दधान स्तिष्टेदित्यर्थः ॥ ३ ॥ तत्र दृष्टातो या- हवे तपस्सीना विशेषण कहे छे-स्थामवान् मनोरलयुक्त तथा कागडानी टाग जेवा जेना अग छे, अर्थात् कारजया जेम वचमां पातळी तथा छेडे गाडी होय छे तेषां गोठण कोणी वगेरे जेना अग छे, केमके तपस्वीना घुरण कोणी वगेरे अगोए कार- नया जे थइ गयां होय छे अहीं कालीपर्वा ग समाश ' एने पदले ‘फालीपर्व समाशाग 'एरो पाठ योग्य हतो पण छदो दोष आये थी अग शब्दनो पूर्वनिपात आप कर्यो पळी ते तपस्वी यश दूगलो तथा धमनी सतत=शरीरमां नाडी-रगोडायी व्यास अर्थात् आखु शरीर जेनु नसोधी व्याप्त देग्याय तेरो, भशनपान खाना पीपानी मानाने जाणीने पोताना पेट पूरती अन्नमाना ग्रहण परे रसमा लोट-वृष्णारालो-पनी साधु अनादिकनी अधिक माना गृहण न करे ए मागश कहेगाय पळी ए साधु अदी- नमना एरले मनमा दीनता न राखे-अर्थान् तपना पारणा नगरे मसगे कदाच आहार न मळे तो पण दीनचित्त न भाय भने सपम मार्गमा मत रहे. अशात् जो आहार नहिं मळे तो मारु तप दि पाम भने जो आहार गळी जशे तो देहनु धारण यशे एम माने छे हट सिनधी सदा ते ॥३॥ आ विपयमा दृष्टात कहे छे उन्नयिन्या रस्तिमित्रभेष्टी वर्तते, तस्य रस्तिभूतनाम यालकोऽस्ति, अन्यदा हस्तिमित्रष्टिन, प्रिया मृता, नगर्ने वैराग्येण हस्तिमित्रश्रेष्टी हस्तिभूतदारकेण सम प्रबजिन , अन्पदा दुर्भिक्षे साधुभिः सम विहर सौ उत्तराध्य- यन सूत्रम् भापांतर সমগন ॥८० ॥ || ८० ॥ त्यारे 'भले त्यां जाउं छु' आम वोलीने ए वाळके त्यां जइने 'धर्मलाभ' आम उच्चार कर्यो. त्यारे देव थयेला तेना पिताए नरनारीरूप धारण करीने लांचा हाथ पसारी दिव्यशक्ति पडे ते ने अनानादि देवा मांडयु एम करतां दुष्काळ उतरतां भोजकट नगरथी पाछा वळेला साधुओ एज मार्गे त्यां भाव्या. जुने शव जोइ दिव्य प्रयोग जाणीने पाछा ए बालकने लइ विहार कर्यो. जेम ए पिता तथा पुत्र बन्नेए क्षुधा परीपह सहन कर्यो तेवीज रीते सांपतकालना मुनिओए पण सहन करवो जोइए. तओ पुछो पिवासाए । दुर्गच्छी लज्जसंजए ॥ सीओदर्ग न सेविजा । वियडस्से सणं चरे ॥ ४ ॥ छिन्नावाएसु पंथेसु । आउरे सुपिवासिए ॥ परिसुकमुहे दीणे । तं तितिक्खे परीसहं ॥ ५ ॥ मूळगाथार्थ -तत =क्षुधा परीपहने अनंतर-पिपासा-तृपावडे स्पृष्ट-पीडित तथा दुगंछी-अनाचारथी व्हीता अने लजा संयत-शरमना मंकोचवाळा साधुप शीत उदक न सेवबु, किंतर्हि विकृत-अग्नि आदिकथी शुद्ध थगेला जळनी एपणा करवी ॥४॥ मूळगाथार्थ:-छिन्नापात-लोकोनी आव जा वगरना मार्गमां पूर्वोक्त साधु आतुर-आकुल तथा अत्यंत पिपासा-तृपाथी पीडातो होय वळी अत्यंत मुस सूकातुं होय तो पण जराय दीन न थत। ते पिपासा परीपहने तेणे तितिक्षापूर्वक सहन करवो. ॥५॥ व्या०-ग्रामनगरादौ भिक्षार्थ भ्रमन् दुगंछी अनाचारागीतः, एतादृशो लज्जसंयतो लज्जायां सं सम्यक यतते यत्नं कुरुते इति लजसंयतो लज्जावान् साधुन हि निर्लजो धर्मादः, तस्माल्लज्जसंयतस्तपखी, ततः क्षुधापरीपहानंतर एव पिपासया तृपया स्पृष्टः सन् शीतोदकमप्रासुकजलं न सेवेत न पिवेदिल्यर्थः, 'वियडस्स' प्रासुकजलस्य पनपत्रम अध्ययन२ - ॥८१॥ ॥८१॥ ४ शत्रपरिणीतस्य रसानर वर्णीतर म प्राप्तस्य वहयादिना शुद्धस्यैषगाय ग्रहणाय भरेत्, प्रासुकपानीयग्ररणाय गृहस्थगृह बजेदित्यर्थ. ॥ ४॥ हवे भिक्षार्थ अटन करतां पानो उदय थाय त्यारे ते परीरह पण सहन करवो-ए अर्थ वे गायाभोथी कई छे - अथ गामनगरादिमा भिक्षा अर्थे फरता दुगंछी-अनाचारथी डरतो तथा लज्जावडे शरमाइने सम्याप्रकारे यत्न करतो- अर्थात् शरमाळ समारवाळो-केमके निर्लज साधु धर्मयोग्य न मनाय माटे साधुए लज्जासयत रहेवु-आगो तपस्वी साधु क्षुधा- परीपह पठी तरतन पिपासा पाढे बाधित थयो तो शीतोदक-अमासुक जल न सेवे-न पिये, किंतु- पियडस्स ] मालक-वस्त्र मरिणीत, रसातर तथा वीतरने पामेला, अर्थात् अग्नि आदिक्यी शुद्ध जलनी एपणा गादे फरे-एटले मानक पाणी मेळवका माटे गृहस्य ने घरे जाय अथ प्रामनगरादिभ्यो यहिवनार यादिमागै व्रजन साधुश्चेतृपया पीडित स्यात्तदापि तृपापरीपह सहेन तु तत्र साधुनैव ज्ञातव्यमन कोऽपि गृहस्थो दाता न दृश्यतेऽह म्ययमेव जल गृहीत्वा पियामि तदेव मार्गवैपम्पमाह- 'छिनेति एतादृशेपु परिपु मार्गेषु पूर्वोतस्तपस्वी पिपासापरीपह तितिक्षेत सहेत, कीदृशेषु ? पथिपु छिन्नो गत आपातो लोकाना गमनागमन येभ्यस्त छिन्नापातास्तेपु, कीदृश.? स्थय तपस्न्यातुरस्तृपाया आकुलतनु , पुन' कीदृश सुपिपासित, सुतरामतिशपेन पिपासितोऽत्यत तृपित , पुन कीदृश परिशुकमुसो गतनिष्टीवनत्वेन शुष्कतालजिहोष्ट . पुन. कीदृश ? एतादृशोऽप्यदीन ॥०॥ - उत्तराध्य. पन सूत्रम् ॥८२॥ भाषांतर अध्ययन२ ॥८२ ॥ गाम नगर वगेरेथी भिन्न वन अटवि आदिक मार्गमां जतो साधु कदाच तपाथी पीडाय त्यारे पण तेणे छमा परीपद सहन करतो पण त्यां साधुए एम मनमां न मानयु के.-' अहीं कोइ देनार गृहस्थ नथी माटे हुं मारी मेळेज जळ लइने पी लडं ' आती मार्ग विपमता समये शुं करवू ते कहे छे. 'छिन्न'-गवा मार्गमा पूर्वोक्त तपस्वी साधुए पिपासा परीपह सहन करतो-अर्थात् तितिक्षा धारण करी तृपा बाधा सहन करवी केवा मार्गमा ए साधुये तितिक्षा सेवी ते मार्गर्नु वर्णन करी देखाडे छे छिनापात जेमां कोइ पण लोकोनी आव नाव न होय ते साये पोते तपस्वी पण गावडे आतुर अति पीडितो एटले सुधीके परिशुष्कमुख मोढामांधी अभी जतुं रहेबाथी जेनां तालवू जीभ तथा होठ सुकाता होय, आटल छतां पण जराय पण मनमा दीन-दुःखितभानना- वाळो न यतां तृपा परीपह सहन करे. अत्र धनमित्रकथा-उन्नयिन्यां धनमित्रो वणिक, धनशमनाना स्वसुतेन समं प्रनजितः. अन्यदा मार्ग क्षुल्ल- कस्तृट्पीडितो नदी दृष्ट्या पित्रावादि वत्स ! पिय जलं पवादालोचनया दोषशुद्धि विनी, इत्युक्ते क्षुल्लो नेति, तता पिता साधुः स्वशंकानिरासार्थ शीघ्र नदीमुत्तीर्याने गता. -आ विषयमा धनमित्रनी कथा- उज्जयिनी नगरीमा धनमित्र नामनो एक वणिक रहेतो इतो तेने धनभर्मा नामनो पुत्र हतो आ पिता तथा पुत्र बनेए साये मव्रज्या लीधी. एक समये ए बने मार्गे चालतां क्षुल्लक बाळक तरसथी पीदाता लाग्यो एटलापां नदी भारी ते जोइने पिताए अध्ययनर अपने म के-हे वत्स ! जल पीले पछी आलोचनापी दोपशुद्धिकरी सेवाशे -आ ममाणे पिताये कयु तथापि पुत्र जळ पीधु नहिं त्यारे पिताए माण्यु के मारी हामरीमा पीना अनकाय छे तेरी पिता शीश-उतावळो आगळ चाली नदी उतरी गयो. शुष्टो नया प्रविष्टो जलांजलिमुक्षिप्य चिंतितवान् का जल पियामि ? यत-गमि उदगपिबुमि । जे जीपा जिणवरेहि पन्नता ॥ पारेरयमिता । जंबूदी न मायति ॥१॥ जयजल तत्व वण । जय वण तत्थ निधिओ अग्गी ॥ तेउवाउसहगया। न सा य पचावया चेव ॥२॥ पेलो वाळक तो नदीमा पेठो त्यारे खोगमा पीपा माटे जळ भरी विचार करे - भाजल केम पीनाय ? एक जळ विंदुमा जिनवरोये जेटला नीयो मझात छे ते अपार भीको आ जयूद्वीपमा माप नहिं १ ज्या जळ त्यां वन ओ ज्यां वन त्या निश्चये भग्नि, ए तेउ तथा वायुना सहगामी (जीवों) मत्यक्ष यता नधी २ हतूण परप्पाणे । अप्पाण जे कुणति सप्पाण ॥ अप्पाण दिवसाण ! कए य नासेर अपाण ।। ३ ॥ इति मगेन जलमालितः पचायलेन मुक्त, ततस्तृपया मृत्वा स देयो जात , अवधिज्ञानावगतपूर्वभववृत्तातेन तेन साधुनामनुकपया पथि गोकुल तं, तर तफ्रादि शुद्धमिति गृहीत्वा साधव सुखिनो जाताः, अग्रे चलिता पारका प्राणने दणीने पोनाने समाण परे छे वेभो केरलाक (योडाक) दिवसोपा आत्मानो नाश करे ऐ=अधोगतिए पहों- उत्तराध्य. यन सूत्रम् चाडे छे, ३ आवा संवेगथी हाथनी अंजलिमां लीवेलुं जळ यत्नथी पार्छ नदीमां नाखी दीधुं. त्यारे पोते तृपा पीडित थइ मरी गयो अने देव थयो. अवधिज्ञाननी लब्धि थवाथी पूर्व भवनों सघळो वृत्तांत ज्ञात थयों त्यारे तेणे साधुओना अनुग्रहार्थे ए स्थानके मार्गमां गोकुल (गागो, टोळ ) राख्यु जेथी ते मार्गे जता आवता साधुओ छाश वगेरे शुद्ध पदार्थों ग्रहण करी सुखी थइ भाषांतर अध्ययन२ ॥ ८४ ॥ ॥८४ ।। आगळ चालता थता. तेन देवेन खवरूपज्ञापनार्थमेकस्य साधोविटिका गोकुले स्थापिता. विंटिग्रहणार्य पश्चादद्यावृत्तमुनिवचसा सर्वरपि साधुभिातगोकुलाभावैस्तत्र दिव्यमाया ज्ञाता, तत्पिडभोजनविषयं मिथ्यादुःकृतं दत्तं. ततस्तत्रायातेन देवेन पितरं मुक्त्वा सर्वे साधवो वंदिताः, पित्राऽवंदनकारणं पृष्टः सर्व स्ववृत्तांतं पितुर्जलपानानुमतिं च प्रोच्य गतो देवः स्वस्थानं, एवं क्षुल्लककृत्तपरीषहः सोढव्यः. ॥ २ ॥ ते देवे पोतार्नु स्वरूप जणाववा माटे एक साधुनी विटिका [ ] गोकुलमा राखी ए विटिका लेवाने पाछा वळी ते स्थाने आवेला मुनिये जोयु तो त्यां गोकुल के कशुं दीर्छ नहिं, आ वृत्तांत ए साधुए वीजा साधुओने जणान्यो ते उपरथी सर्वेए जाण्यु के-एतो कोइ दिव्यमाया हती. एम जाणी तेना पिंडभोजन विषयक 'मिथ्या दुष्कृत' दीधुं त्यारे ते देवे त्यां आवीने पोताना पूर्वभवना पिताने छोडीने वीजा साधुओने वंदन कयु, पिताए वंदन न करवानु कारण पूछयु त्यारे-पोतानो सकलवृत्तांत तथा पिताये जलपान करवा जे अनुमति आपेली ते बधुं कहीने देव पोताने स्थाने गया, आवी रीते ए क्षुल्लके [बालके करेला तृपा परीपहनी पेठे साधुए पण तपा परिपह सहन करचो. २ .

भाषातर अध्यपन२ अध क्षुधापिपासापीडितस्य शस्य शीतमपि शरीरे लंगति, तदापि सोदय, तदपि गाधावयेनाह भुधा तथा उपायी पीडित होह कश [दुर्वज गागाळाने शीत पण लागे ते पण सहन फरे एम ये गायाधी कहे के परतं विरय लह। सोय फुसइ एगया ॥ नाइवेल मुणी गच्छे । सुच्चा ण जिणसासण ॥ ६ ॥ न मे निवारण अस्थि । छवित्ताण न वियसे ॥ अह तु अग्गि सेवामि । इइ भिक्खू न चिंतए ॥७॥ मूलगायार्थ -कोर टाणे प्रामातरे विचरता विरत अग्निसधुक्षणादि कायधी निवृत्त धयेला तथा रक्ष अगयाळा साधुने शीत स्पर्श फो, अर्थात् टाट पाय तथापि मुनियें जिनशासन साभळीने अतिवेळ टाढनी व्हीफथी स्याध्यापादिकने टाणे फ्याय जवु नहि ॥६॥ मूळगाचार्य-मारे फा (टादनु ) निवारण फरे तेवु ( छापरा जेयु ) नथी म छयित्राण-टाल्थी चामडीनु रपण फरे तेतु कपलादिफ पण नधी तो पछी हु पग्नि सेयु-तापु एम मिथुए मनमा कदापि चितन विचार सरयु पण करखु नहि ॥७॥ या-एकदा महाशीतकालादो प्रतिमावरनादौ कायोत्सर्ग स्थित तपस्विन शीत स्पृशेच्छरीरे लगेत्तदास मुनिस्तपस्यतिवेल स्वाध्यायकरणप्रस्तारमतिफम्य शीतभीत सन् स्थानातरन गच्छेत् , किं कृत्वा जिनशासनं श्रुत्वा जिनशासने हि जीवोऽन्यो देहशान्य , कीदृश मुनि ? ग्रामानुग्राम विहरत चरत, अथवा मुक्तिनगरानुकले साधुमार्ग विचरत; पुन कीदृशी लरक्ष लिग्धभोजनतैलाभ्यगादित्यागोरक्षाग, पुन कीदृश घिरतमग्निप्रज्ज्वालनाघिरत, तदा ?

भाषांतर ময় ॥८६॥ ॥८६॥ पुनः शीतपीडितो भिक्षुरिति न चिंतयेदिति न विचारयेत् , इतीति किं ? मे मम 'छवित्ताणं' देहचर्माच्छादनं शीतनिवारणं किमपि न विद्यते नास्ति, तेनाहमग्निं सेवामीति चिंतितमपि न कुर्यात् , तदाग्निसेवनं दूरमेव त्यक्तं. अर्थः-कोइ समये महाशीतकालमा प्रतिमावहनादिक कायोत्सर्ग स्थित तपस्वीने शीत दाह शरीरे लागे त्यारे ते मुनिए वेळानो अतिक्रम करीने अर्थात् स्वाध्याय करवाना प्रस्तावने छोडी टाढयी व्हीने, जिनशासन सांभळीने स्थानांतरे जतुं न रहे- केमके जिनशासनमां जीव अन्य अने देह अन्य एम कहेलुं छे. तेथी ए मुनि एक गामथी बीजे गाम विहार करतां, अथवा मुक्ति नगरने अनुकूळ मार्गमां विचरना, स्निग्ध भोजन तैलनो अभ्यंग वगेरेना अभावने लइ सकल देह जेनो लुखो लागे एवो, तेमज तापवा माटे अग्नि सलगाववा वगेरे क्रियाथी विराम पामी, आ मारा देहने दांकवा कंइ ओढवानु नथी तथा टाढनु निवारण करवा वीजें कंइ साधन नथी तेथी हुँ आ अग्नि तापुं छु-आम मनमां चिंतन पण करे नहि. तो पछी अग्नि सेवननी तो वातन क्यां रही. ७ अत्र भद्रयाहुशिष्याणां कथा-राजगृहे चत्वारो वयस्था वणिजः श्रीभद्रयाहुगुर्वतिके प्रव्रज्य श्रुतं चाधीत्यैका- किप्रतिमया विहरंतस्तत्रावेयुः, तदा हेमंत आसीत् , ते च भिक्षाभोजनमादाय तृतीयपौरुष्यां न्यवर्तत, रात्रौ पृथक् पृथगवसन् , तेषामेकस्य चरमपौमपी वैभाराद्रिगुहादारेऽवगाढा, तत्रैव सोऽस्थात्, द्वितीयः पुरोधाने तृतीयस्तधानसमीपे, चतुर्थस्तु पुराभ्यणे.

भाषातर अध्ययनर पनसुनमा ॥८७॥ उद्याना- . --आ विषयमा भद्रबाहुना शिष्योनी कथा कहे .-- रामगृहमा चार सरखी उम्मरना वैश्यो प्रज्या लइ शास्त्राप्ययन फरी नोखनोखा विहार करता श्रीभद्रबाहुगुरु पासे भावी घड्या ते समये हेमत ऋतु चाली रयो इतो ए चारे जणा भिक्षा भोजन लइने श्रीजी पौरुषी (पहोर)मा पाडा परता अने रात्रे सर्वे पृथक्पृथक् निवास करता तेमाना एकने छेली पौरुपी वैभार पर्वतनी गुफाना द्वारमा पड़ी तेथी ते तो त्यांन स्थित थयोबीजो नगरोधानमा त्रीनो ए उद्याननी समीपे अने चोथो तो पुरनी समीपमान रही गयो तत्र यो वैभाराद्रिग्रहासन स महाशीतव्यथितो रजन्याधयामे मृत , उद्यानस्थो वित्तीययामे मृत सनस्तृतीये यामे मृत पुरासनस्तु पुरोग्मणात्पशीतत्वेन चतुर्थे प्रहरे मृता, सर्वेऽप्येते साधवो दिव जग्मु , एव शीतपरीपर मोढव्य ॥७॥ शीतकालानंतर ग्रीष्मकालस्यागमन स्यात् , तत्परीपहोऽपि सोढन्य हवे आ चारमाथी जे वैभारादिनी गुफा पासे हतो तेती टाढनी अतिव्यथाथी रातिना पहेलान पहोरमा मरण पाम्यो, बीनो उधानमा हतो ते पीना पहोरमां मृत थयो, उचाननी नजीकमा हतो ते जीना पहोरमा मृत ययो अने नगरनी नजीकमा हतो तेने नगरनी जरा हुफ मली तेथी तेने पहेला पणना करता ओछी टाढ लागवाथी चोथा पहोरमा मरण पाम्यो; अने ते चारे साधुओ सर्गे गया एती रीने साधु जनोए हमेशा गीत परीपह सहन फरको जोइए. ७ शीत फाळ पछी उष्ण काळ आवे ते परीपह पण सहन करवो ॥८८॥ भाषांतर अध्ययन ॥८८॥ उसिणप्परियावेणं । परिदाहेण तजिए ॥ प्रिंसु वा परितावेणं । सायं नो परिदेवए ॥ ८ ॥ उण्हाहितत्तो मेहावी । सिणाणं नो वि पत्थए ॥ गायं नो परिसिंचिजा । न वीइज्जा य अप्पयं ॥९॥ मूळगाथार्थ-ग्रीष्मऋतुमां-'या' शब्द छे तेथी शरद् ऋतुमा पण उष्ण परितापें करी तथा परिदाघ-सर्वांग घामवाडे अने परिताप-सूर्यना सख्त तापवडे तर्जित-अकळावेला साधुए सात-सुखनी परिदेवना' हाय! आ ताप क्यारे शांत थाय! एयो प्रलाप न करवो. ॥ ८ ॥ मूळगाथार्थः-मेधावी-वस्तुधर्म जाणनार साधु, उणाभितात-गरमीथी तपे तथापि स्नाननी प्रार्थना न करे तेम पोतानां गात्रने (जलवती) सींचे नहि अने पोताने (पंखा यगेरे थी) वीजे ननि, अर्थात् वायु ढोळे नहि ॥ ९ ॥ व्या०-~-मेधावी स्थिरबुद्धिमान साधुग्रीष्मे उष्णकाले वा शब्दाच्छरदि ऋतावपि सातं सुखहेतुं न परिदेवेत, कदा मम शरीरे शीतलत्वं स्यादिति न प्रलापं कुर्वीत. कीदृशः साधुः ? उष्णपरितापेन यः परिदाघस्तेन तर्जितः ग्रीष्मकाले सूर्यस्यातपेन भूमिशिलादयः परितप्ताः संति, तत्र साधुरातापनां कुर्वस्तप्तभूमेः, शिलातो लोहकारशा- लासमीपत्याचा परिदाधेन यहिः प्रस्वेदमलाभ्यां बहिना वा, अंतश्च तृष्णारूपेण तजितोऽतिपीडितः. पुनरप्युक्त- मर्थमेव दृढयति-मेधावी साधुष्णाभितप्तः स्लान नैव प्रार्धयेत् नाभिलेखेत् , पुनर्गानं शरीरं नो परिसिंचेत्, न च प्रस्वेदादिसद्भावे आत्मानं स्वदेहं वीजयेत् : वीजनेन शरीरस्य न वात प्रक्षेपं कर्यादिलः. - उत्तराध्य पर मूत्रमा भाषांतर अध्ययन ॥८९॥ ॥८९॥ , - अर्थ-मेधावी स्थिरतुद्धिमान-साधुए ग्रीष्म-उष्णकाळमा वा-शरद् ऋतुमा उष्ण परिताप वडे थता परिदाप-अर्थात् ग्रीष्मकालमा सूर्यना तडकारे लीधे पृथ्वी शिग इत्यादिक पर्धा परितप्त होय छे ते समये साधु आतापना एटले तपेल भूमिथी अथवा तपेली शिगयी तेमन लुहार वगेरेनी कोड पासे होवाथी जे परिदाय पाप बहार तो परसेवो मेल तथा सताप थाय अने अतरमा तृष्णारूपी, एम रेप प्रभारना परिदापथी तर्मित पाहातो होप सो पण सात-मुख हेतु सपादनार्थ 'मारे शरीरे क्यारे शीतलता थाय आम परिदेवन-लाप करे नहिं ८ पुनरपि कहेला अर्थने दृढ करे छे -मेधावी साधु तहकाची तपे तो पण स्नाननी अभ्यधना न करे, तेम पोतानु गार-शरीरने सींचे पण नहिं अथात् जलथी मोक्षण जेषु पण करे नहिं अने परसेवायी गमे तेयो अफलातो होय तो पण पानणावती शरीरने पवन नाखे नहि अनारहनकाथा यथा-नगरानगर्यामहन्मित्राचार्यपाधै दत्तनामा वगिम्भप्राभार्यारह नकपुत्रेण मम प्राजितः विना सर्ववैयावृत्त्यकरणेनेतस्तत परिभ्रम्प भव्यभिक्षाभोजनसपादनेन स पालोत्यत सुग्वी कृत , उपविष्ट एवं भुक्त, कदापि भिक्षायै न भ्रमति, तशिक्षार्थ स्वभिक्षा च पितुरेव भ्रमणात् अन्यदा पितरि मृते माधुभि प्रेरिता स यालो ग्रीष्मे मासे भिक्षार्थ गत ~मा विषयमा एक अरहनकनी क्या कहे थे- तगरा नगरीमा अहमिन आचार्यनी पासे दत्त नामना वणिके भद्रा भार्या तथा रहना पुन सहित मत्रज्या गृहण करी, पिना राध्य. भाषांतर अध्ययन ॥९॥ हमेशां पोतेज फरी भटकीने सारं भिक्षा भोजन मेळवी कावी ए बाळकने अत्यंत सुखी राखतो. ए छोकरो क्यांय भिक्षा मागवा न जाय, तेने माटे तथा पोताने माटे पिताज भ्रमण करी आवे; छोकरो तो बेठां बेठां लावी आपे ते खाय, एम करतां बाप मरी गयो त्यारे ए छोकराने साधुओ कहेवा लाग्यो के-'भिक्षा मागवा जाओ' एटले ते छोकरो भिक्षा मागवा जवा लाग्यो. तापाभिभूतः प्रोत्गगृहच्छायायामुपविशति, पुर्नस्तत उलिष्टति. शनैः शनैर्याति. एवं कुर्वतमतिसुकुमारं तमरहन्नकुमारं रूपेण कंदर्पावतारं दृष्ट्वा काचित्प्रोषितवणिग्भार्याकार्य गृहे स्थापितवती: तयासह स विषयासक्तोऽभूत्. एक वख्ते भिक्षा मागतां वपोरना तडकाथी गभराइने एक उंचा घरनी छायामां बेठो, वळी त्यांथी उठीने धीमे धीमे चालेछे तेटलामां ते अति सुकुमार अने रुपमा कामदेव समान ए रहन्नक कुमारने जोइ, एक वणिक्नी स्त्री के जेनो पति परदेश गयेलो होवाथी घरमा पोते एकलीज हती तेणे आ रहन्नकने बोलावी पोताना घरमा राख्या, तेणीमां आ रहनक विषयासक्त थयो. अथ तन्माता साध्वी पुत्रमोहेन अथिलीभूयारे अरहन्नक ! अरे अरहन्नक ! इति निर्घोषयंती चतुष्पथादिषु भ्रमति. एकदागवाक्षस्थेनारहनकेन तादृशावस्था माता दृष्टा, संजातात्यंतसंवेगः स गवाक्षापुत्तीर्य पादयोः पतित्वा मातरमेवाह हे मातः ! सोऽहमरहमकः, इति तबचाश्रवणात्स्वस्थचित्ता माता तमेवमाह वत्स ! भव्यकुलजातस्य तव केयमवस्था?

माषांतर
अध्ययन
घन मूत्रम्
एक समये ए रहनक कुमारनी माता साध्वी पुत्रमोहथी विहल थइ 'अरे आहनक ! हे अरहमा ! आम बूमो पारती
चकला चातरामा फरती हती तेलामा गोखमा बेठेला रहनक कुमारे पोतानी माताने भावी दुरवस्थामा जोइ के तेन क्षणे अत्यत
सवेग उत्पन्न वाधी सट गोखमाथा नीचे उतरीने माताना पगमा पडीने माने कहे छे के-हे माता ! • ते हु आ अरहमक,
माता आ वचन साभळी सस्थचित्त थइने कहेवा लागी के-' हे वत्स ! उत्तम कुळमा जन्मीने तारी आ अवस्था केम थइ ?'
स माह मातश्चारित्र पालयितुमह न शक्नोमि, मा प्राह तीनशनं कुरू ? मातृवचसा स तप्तशिलाया सुप्त्वा
पादपोपगमन चकार सम्यगुणपरीपह विमस्य ममाधिमाग्देवत्व प्राप्नवान् एवमन्यैरपि साधुभिमप्णपरीषर'
सोढव्य ।'४॥
ते घोल्यो-'हे माता ! हु चारित्र्य पाळी शानो नथी.' त्यारे माताए का के-'त्यारे अनशन करा' ते मातानु वचन साभळी
तप्त शिला उपर लइने तेणे पादपोपगमन फयु अने सम्पप्रकारे उष्ण परीपह सहीने समाधी सेवी देवभावने मास थयो आवीन
रीते अन्य साधुओए पण उष्ण परीपद सहन करवो जोइए १
ततो ग्रीमकालादनतर वर्षाकाल समागच्छति, वर्षाकाले दशमशकादय उत्पयते तेच पीडितेन सना तत्प-
रीपर मोदय ॥८॥९॥

उत्तराध्य. यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन२ ॥ ९२ ॥ ॥९२ ॥ ग्रीष्मकाळ पछी वर्षाकाळ आवे छे. वर्षाकाळमां डांस मच्छर वगेरे उत्पन्न याय छे ए दंशमशकादिकथी पीडित थता साधुए ए वर्षापरीपह पण सहन करवो जोइए.- पुठ्ठो य दसमसएहिं । समरेव महागुणी ॥ नागो सैगामसीसे वा। सूरो अभिहणे परं ॥ १० ॥ न संतसे न वारिजा। मणंपि न पओसए । उवेहतहणे पाणे । भुंजते मंससोणियं ॥ ११ ॥ मुळगाथार्थ:-समभावी महामुनि देशमशकादिवडे स्पृष्ट-डंख लागतां पीडित थाय=तो पण, संग्रामने मोखरे रहेला हाथी अथ्वा शूरवीर जेम पर-शत्रु-ने हणे तेम पर-आंतर शत्रु क्रोधादिकने हणे, ॥ १० ॥ मूळगाथार्थः-ए डांस मच्छर मसला जुं वगेरेथी त्रास न पामे तेम तेने वारे पण नहि, एटलुंज नहिं किंतु पोताना मनने पण प्रदूषित न करे, किंतु उपेक्षा करे. पोताना मांस तथा शोणित-रुधिरने खाता एवा ए प्राणीओने हणे नहिं ॥११॥ व्या०-महामुनिर्महातपस्वी दशमशकैतुभिः स्पृष्टो भक्षितः सन्न संत्रसेत् , त्रासं न प्राप्नुयात् , पुनस्तान दंशादीन् न निवारयेत्. तेषां वारणे याहारांतरायः स्यात् , मनोऽपि न प्रदुषयेत् , मनोऽपि कलुषं न कुर्यात् , निवारणं तु दूरे एव व्यक्त, तेषु मनस्यपि क्रोधं न कुर्यात, किंतु तेवु दंशमशकादिवु दुटजीवेषु मांसशोणितं पललरुधिर भुजाने पूपेक्षेत. उदासीनभावे वर्तेत, रागदेषरहितो भवेत् , प्राणांस्तान् देशमशकादीन् मांसरुधिरं मुंजानान्न हन्यात्. ।

भाषांतर अध्यपन२ पासूत्रमा अर्थ-महानि महातपस्वी डांस मसला वगेरे जतुओ आवीने स्पर्श करे; अर्थात् करडे तो पण जराप त्रास न पामे, तेम एस मसला आदिकने निवारे पण नहिं, अर्थात् भापट मारीने उडाडे पण नहिं केमके एओने उडास्वाथी तेना गुजारामां अरचण नाखवा रूप ' आहारातराय ' नामक दोष लागे छे. तेम ए प्राणियो निवारण करवान तो दूर रघु पण मनने पण दूषित करवु नहिं अर्थात् मनमा पण जराय कचरा नहिं, तेना उपर क्रोपलेश पण करवो नहिं, किंतु ते दुष्ट जतुओ ज्यारे मांस तथा रुधिर भक्षण करे त्यारे उपेक्षा करवी-रागद्वेष रहित उदासीन भावे रहे ए मास रुधिर खाता डांस मसला आदिक पाणीने इणवा नहि. अत्र अमणभद्र कथा पधा-चपापां जितशत्रुटपस्य पुत्र श्रमणभद्रो युवराजा श्रीधर्मघोषाते प्रव्रज्यकाकि- त्वविहारेण विहरन्यदा शरदि तावटव्या प्रतिमास्थितो देशमशकै. पीड्यमानोऽपि निश्चल, स्वयमनतशो भुक्त नरकवेदनाम्वरूप चितयन् समाधिना मृन्या दिव गता. एव दशमशकपरीपह सोढव्य ॥५॥ -~आ विषयमा श्रमणभद्रनी एक एवी कथा छ के- चंपानगरीमा नितशत्रु राजानो पुत्र श्रमणभद्र नामे युवराज हतो तेणे धर्मघोषणा साभळीने अते प्रवज्या लइ एकाकी विहार करतो एक समये शरद् ऋतुमा अटवी जगलमां भटकतो एक स्थळे पेठो त्या दशमशकादिक जतुओ करडवा लाग्या तथापि पोते G उत्तराध्य- पन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन२ ॥९४॥ RRORLD निश्चळ रखो. केमके पोते अनंतवार नरकवेदनाओ भोगवेली तेनो विचार राखी अडग रहीने समाधि दशा पामी मृत थयो अने स्वर्गे गयो. आवीन रीते दंशमशकपरीपह अथवा नामांतरे वर्षा परीपह पण साधुओए सहन करतो जोइये. ११ अथ च दंशमशकादिभिः पीड्यमानो वस्त्राशास्याकारो न स्यादतोऽचेलपरीषहमाह- ए दशमशकादिकथी पीडातो साधु वखनी आशा सूचक आकारवान् न थाय तेने माटे अचेल परीपह कहे छे.- परिजुन्नेहिं वत्थेहिं । होक्खामित्ति अचेलए ॥ अदुवा सचेलए होक्खं । इइ भिक्खू न चिंतए ॥१२॥ एगया अचेलए होइ । सचेलए अवि एगया ॥ एयं धम्मं हियं नच्चा । नाणो नो परिदेवए ॥१३॥ मूळगाथार्थ:-अति जीर्ण वस्खथी 'हवे हुँ यस वगरनो थइ जश' अथवा 'आ जुनां वस्त्र जोइ मने कोई वस्त्र आपे तेथी हुं वल सहित थाश' एवी रीते भिक्षु कदापि चितवे नहि ॥ १२ ॥ मूळगागार्थ:-एकदा-कोर अवस्थामा अचेलक-वन यिनाना अथवा जीर्ण पत्रवाळा होय तेम एकदा अवस्थांतरे सथे. लक-वन सहित पण होय, आ बन्नेने धर्महित-धर्ममां उपकारक मानो शानी साधु कदापि परिदेवना-खेद न करे. ॥ १३ ॥ व्या-भिक्षुः साधुर्वनेषु परिजीर्णेष्विति न चिंतयेत् , मनसि न विचारयेत्. इतीति किं ? अहं वस्त्राभा- 4.

भाषांतर
अध्ययन
।०५॥
चेलको निर्वस्त्रो भविष्यामि, न विद्यते चेल वस्त्र यस्य सोऽचेलक इति दैन्यं न कुर्यात् अथ वैताश जीर्ण
स्फुटितवनमा दृष्ट्वा कधिर्मात्मा दाता मध वस्त्र दास्यति तदाह सचेलको वनसहितो भविष्यामीति प्रमोद
भागमपि न स्यात् , एतावता वस्त्रस्याप्राप्तौ वस्त्रस्यप्राप्ती वा विषादो वा हाँ वा साधुना न विधेय , प्राप्याप्राप्यो
सहशेन भाव्यमित्यर्थः ॥१०॥
अथ -भिक्षु-साधु, भले वस्त्र परिजीर्ण-अत्यत जुना घर गयेल होय ता पण ते वावत मनमा "अरेरे आ वस्त्र जुना थइ
फारी मा आयो छे" एम भाना न करे अर्थात्-हवे आ वस्त्र नष्ट घशे अने हु अचेलफ-सटीन थइ जइश एवी दीनता
मनमा न लावे. अथवा ' भावु आ फाटल तुटल वस्त्र जोइ कोइ धर्मात्मा मने वस्त्र देशे सारे हु सचेलय वखवान् यइश ' आम
मनमा धारी प्रमोद-दर्प पण न पामे आ उपरथी साधुए वखनी मासि तथा अप्राप्ति प्रमगे हर्ष अथवा खेद न करतो किंतु वस्त्र
प्राप्त थाय के न थाप वग्ने प्रसगे समान भावे रहेवु १२
पुन साधुरेव चिंतयेत्-एकदा जिनकल्पावस्थाया साधुरचेलकस्यात् , इयमपि साधुरेवावस्था, स्थविर-
कम्पेऽपि दुर्लभवस्नत्वेन पूर्ववस्त्रस्य जीर्णत्वान्नाशे जाते सत्वपरवस्त्रमाप्यभावेन निमित्त विनापि निर्वस्त्र स्यात् ,
तदा मनसि साधुनेति चिंतनीय इदानीमह जिनकल्पावस्था भजामि, जिनकल्पीमुनिरयेलक एव तिष्ठति पुन-
रेकदा स्थविरकल्पावस्थाचितनेनोमय धर्म शास्वा ज्ञानी साधुनों परिदेवेत, नो विलाप कुरीत, कीदृश धर्म? हित
हितकारक ॥१३॥

उतराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन पुनः साधु एम चिंतन करे के -एक समये साधु जिनकल्प-जिनसदृश अवस्थामां अचेलक अवस्व बने; आ पण साधुनीज अवस्था होय, वृद्धावस्थामां पण वस्त्र दुर्लभ होय त्यारे अथवा पूर्वनां वस्त्र जीर्ण थइ फाटी तुटी नाश पामे अने अन्य वखनी प्राप्ति न थाय त्यारे निमित्त विना पण निर्वस्त्र दशा आवे त्यारे साधुये मनमा एम चिंतन करवु के-' हवे हुँ जिनकल्प अवस्था भगँछु' कारण के जिनकल्पी मुनि अचेलक-निर्वस्त्र-ज रहेछे. कोइ समये स्थवीरकल्पवृद्धजेवी अवस्था चिंतन करी उभयधर्मने जाणीने ज्ञानी साधु परिदेवन-विलाप न करे केमके ए धर्मने ज्ञानी साधु पोतानो हितकर मानी ले. १३ ॥९६ ॥ सागर अत्र दृष्टांतो यथा-दशपुरे नगरे सोमदेवो हिजोऽस्ति, तस्य भार्या रुद्रसोमा नाम्नी वर्तते, तयोः पुत्रावार्य- रक्षितफल्गुरक्षितौ स्तः, आर्यरक्षितेन पितुर्विद्या पूर्णा गृहीता, पश्चत श्चत्पाटलिपुत्रे नगरेऽधिकविद्यापठनाय कस्यधि- दुपाध्यायपाधैं गतः, तत्र तेन सांगोपांगाश्चत्वारो वेदाः पठिताश्चतुर्दश विद्यास्थानानि गृहीतानि. Gauri रा --आ विषयमां एक दृष्टांत कहे छे- दशपुर नगरमां एक सोमदेव नामनो ब्राह्मण रहेतो हतो. तेनी भार्या रुद्रसोमा नामनी हती, तेने आर्यरक्षित तथा फल्गुरक्षित एवा नामना बे पुत्र हता, तेमांना आर्यरक्षिते पोताना पिता पासेथी पूर्ण विद्या भणीने अधिक विद्या संपादन करवा पाटलिपुत्र नगरमां कोइ उपाध्यायनी आगळ जइने ते अंग उपांग सहित चारे वेद भण्यो, अने चउदे विद्यास्थान गुरु पासेथी पाम्यो.

भाषांतर अध्ययन२ पनसूत्रमा ॥ ९७॥ ॥ २७॥ ततो दशपुर नगर प्राप्ता, नृपादिसकललोकै प्रवेशोत्सव कृत्वा पूजितच खगृहे गत्वा पितरौ प्रणत. पिता- तीवहर्षवान जाता, माता तु नैय हर्ष मनारदर्शयति आर्यरक्षित प्राह हे मातस्व मध्ययनेन किं न हटा ? सा प्राह किमनेन जीवघातादिनिमित्तेन यहुशास्त्राध्यपनेन ! किं त्वया दृष्टिवादोऽधीत ? येन मम हर्ष स्यात् ततस्तेन पृष्ट दृष्टिषाद. क्वास्ति ? मात्रोक्त ईक्षुवाटके स्थिताना तोसलिपुत्राचार्याणां समीपेऽस्ति भणी गणीने ज्यारे पाछो दशपुर नगरमा आग्यो त्यारे राजा भादिक सफल लोकोए गाजते वाजते तेने गाममा प्रवेश फरावी पूजा करी पोताने घरे जइ मा पापने पगे लाग्यो त्यारे पिता सोमदेव अत्यत हर्ष पाम्या पण माता रुद्रसोमाए लेश पण हर्प दर्शाव्यो नहिं त्यारे आ आर्यरसित पुत्र बोल्यो-' हे मात ! हु भण्यो तेथी तमे जराय हर्ष केम नधी पामता ? त्यारे माता बोल्या के-आगरा जीवघात वगेरेना निमिचभूत बहुशाखना अध्ययनथी शु वळ्यु ' शु तु दृष्टिवाद भण्यो ? के जेयी मने हर्ष थाप त्यारे पुत्र फरी पूछयु 'ए दृष्टिवाद क्या छ ? ' माताए उत्तर प्यु के 'शेरडीना गाडमा रहेता तोसलिपुत्र आचार्य समीपेछे ततस्तेन भणित हे माता! कल्ये तत्र यास्यामि दृष्टिवादभणनाथै, रात्रौ सुप्त समेव चितयति दृष्टीनां वादो दृष्टिवाद इति नामाप्यस्य शास्त्रस्य सुदरमिति प्रभाते तगणनार्ध तत्र चलित , मार्ग प्रथमत एव दशपुरनगरप्रत्या- सनग्रामवासी पितृमित्र साधनवेक्षपष्टिहस्तो ब्राह्मणो मिलित, कथित च तेनाह तव मिलनार्थमागतोस्मि, तत' खागतं परस्पर पृष्ट, पृश्नादार्यरक्षितेनोक्तमह क्वचित्कार्याय गच्छन्नस्मि, इद साधनवेक्षुपष्टिमाभृत मातुर्हस्तेऽपणीय, कथनीय चाह पूर्वमार्यरक्षिताय मिरित ~ । उत्तराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन२ ॥ ९८॥ ॥२८॥ सामा त्यारे पुत्र बोल्यो-'हे मातः! काले हुँ, दृष्टिवाद भणवामाटे त्यां जइश. रात्रिमा मूता सूतांएम विचार करवा लाग्यो के-'दृष्टिनां वादो दृष्टिवादः' अर्थात् दीठेलु कहेवु आ दृष्टिवाद नाम के सुंदर छे. सवारमा उठीने ते भणवा माटे चाल्यो, मार्गमा पहेलांज दशपुर नगरनी समीपना गामडांनो रहेवासी तेना पितानो मित्र एक ब्राह्मण शेरडीना साडानव सांठा हायमां लइने तेने सामो मल्यो अने बोल्यो के तमनेज मळवा आ. छं. एक वीजा परस्पर स्वागत करी कुशलता पूछी त्यारे आर्यरक्षिते का-हुँ तो कंड कार्य अर्थ जाउछु; आ साडानव शेरडीना सागंनु उपायन(भेट)मारां माताना हाथमां आपजो, अने कहे के हुं आर्यरक्षितने मल्यो. अथ तेन तथैव कृतं. ततो माता तुष्टा सती चिंतयति मम पुत्रेण सुदरं मंगलं दृष्टं, साधनवपूर्वाण्यध्येष्यति पुत्रः, आर्यरक्षितोऽपि शुभं शाकुनं चिंतयन् गत ईक्षुवाटके. तत्रैकस्मिन् पार्चे स्थित्वा ढगुरश्राद्धवंदनविधि दृष्ट्वोपाश्रयमध्ये प्रविष्टः, वंदिता स्तोसलिपुत्राचार्याः, तैः पृष्टं खरूपं प्रयोजनं च सर्वमप्युक्वा मम दृष्टिवादम- ध्यापयंत्विति वदंतं तं सूरयः प्रोचुर्यद्यस्मदंतिके प्रव्रज्या गृह्णासि तदा तमध्यापयामः, तेनोक्तमेवमप्यस्तु. ए ब्राह्मणे ते प्रमाणे कर्यु, ते सांभळी माता-' मारा पुत्र सुंदर मंगल दीर्छ' एम जाणी राजी थइ, अने मारो पुत्र साडानव पूर्व भणशे एम पारी मनमां संतोष पामी. आर्यरसित पण पोताने शुभ शकुन मल्यु एम विचारतो इावाटके ( शेरडीने वाडे ) पहोंच्यो, त्यां एक पडखे उभो रहीने ढवर श्रादचंदन विधि जोइने उपाश्रय मध्ये प्रवेश कर्यो अने तोसलिपुत्र आचार्यने वंदन कडं त्यारे आचार्य 'तुं कोण छ ? अने ' केम आव्यो छु ?' पूछयु तेना उत्तर धी हकीकत कहीने 'आप मने दृष्टिवाद भणावों' , মাশন भगमन ॥९॥ एम पारे मोत्या त्यारे मरिप यु के-'जो तमे अमारी पासे प्रमग्या-दीक्षा ग्रहण करो तो अमे रविाद भणारीए 'स्यारे तेणे मले पम हो ततम प्रयजित. कथयति भगवन्नात्र सफल लोकयाक्षितस्य मम विद्याग्रहण स्वल्पमेव भावि, तेन क्वाप्प- पत्र गम्पते, गुरुमिस्तथा कृतं भाणितोऽसौ सोपागा कादशांगानि. अब पूर्वपठना तोसलिपुत्राचार्यरमाषा- परक्षित श्रीवस्थाम्यतिके प्रेपित , पधि गच्छनघत्यो श्रीभगुप्तसूरीणा निर्यापना कृतवान् तेल्यिसमये प्रोक्त पठता त्यया पलस्वामिमडल्यान स्थेय, यतस्तनमहली स्थितो तेनेव सह म्रियते आम उत्तर भाप्य पटछे तेने प्राग्या ग्रहण परारी त्यारे तेणे गरिने यधु फे-'हे भगान् ! अहीं पधा लोक सर्व जन्य विक्षपोलीधे मने पल पण पिणग्रहण या दुप्पर छे तेपी पाफ अय स्थळे जइए तो ठीक, गुरुए तेम फ्र्यु भने तेने उपांग सहित एकादश अंग भणाय्या हवे आगळ भणमा मारे तोसामिपुराचाथै ए आयातितने श्री राजस्थागीनी पासे मोपल्यो माग पालना देणे भवनिमा श्री भद्रगुप्तमरिनी निफापना भत्यक्रिया=करी त्यारे ते भद्रगुप्ते तेने अतसमये कयु के-'जस्सामी पासे भणां नारे तेनी महलोमा रहेर नहि कारण के वेनी महळीमा रहेनारो तेनीन साथे परे गर्ष नक्षिा गुला तो गत श्रीवनस्वामिपार्थे, तेच रात्री क्षीरभृतं पाप्रमागतुकेन शिष्येण किंचिदन पाखरतगदाप शान मन्दिर, जयपुर उत्तराध्य- यनसू भाषांतर अध्ययन२ ॥१०॥ ॥१०॥ DE पीतमिति स्वमो दृष्टः. ततस्तेन पृथग्मंडली कृत्वाऽधीतानि श्रीवज्रस्वामिपाधै नव पूर्वाणि. वजस्वामी तु पृधामंड- लीकारणं ज्ञात्वा न किंचित्तस्योक्तवान्. दशमपूर्वाधिकाराः केचन यावत्तेन पठितास्तावद्दशपुराश्चिरकालविरहार्दि- तमातृपितृप्रमुखकुटुंबप्रेरितः फल्गुरक्षितो भ्राता तस्याकारणाय समायातः, आयरक्षितेन तत्रैव प्रतियोध्य प्रवाजितः. आवो तेनी शिखामण सांभळी ते यन्त्रस्वामी पासे गयो. तेज रात्रिमा वनस्वामीए कंइक अगुं दुधयी भरेलु पात्र कोइ आगंतुक शिष्ये पीई एवं स्वप्न दीढ़-तेथी तेणे नोखी मंडली करीने वनस्वामी पासे नव पूर्वनुं अध्ययन कर्यु. वनस्वामीए तो जुदी मंडली- कारण जाणीने तेने कंइ पण का नहि. ज्यारे आर्यरक्षित दशम पूर्वना केटलाक अधिकार भणतो हतो तेवामां घणा समयना वियोगथी पीडातां तेनां मा बाप वगेरे कुटुम्बीजनोए मोकलेलो तेनो नानो भाइ फल्गुरक्षित तेने बोलाववाने आव्यो. आर्यरक्षिते पोताना नानाभाइ फल्गुरक्षितने केटलोक बोध दइ मनजीत दीक्षित कर्यो. एकदा आयरक्षितः श्रीवास्वामिन पृच्छति भंगवन्नताऽपरं पूर्वपाठः कियानवशिष्टोऽस्ति ? वैजस्वाम्याह वत स्वया बिंदुमात्रं पठित, समुद्रोपमं दशम पूर्वमस्ति, ततोऽसौ धकपरिणामः प्राह नाहमतःपरं पूर्वपाठं कर्तुं शक्नोमि, गुरवस्तु दशमपूर्वार्धस्य स्वस्मिन्नेव व्युच्छेदं ज्ञास्था मौनेन स्थिताः. असौ गुरूननुज्ञाप्य स्वसंसारिकवंदापनार्थ दशपुरनगरे प्राप्तः. एक समये आ वज्रस्वामीने आर्यरक्षिते पूच्यु के-'भगवन् ! हवे आथी आगळ पूर्वपाठ केटलोक भणयो बाकी अवशेष रह्यो? AKAM ঘন মুহম; ॥१०॥ वनस्लामी बोल्पा के -' हे वत्स ! हनी तो तु एक बिंदुमात्र भण्यो छु, हनी समुद्र तुल्य दशम पूर्व तो बाकी छे.' आ सभिली पाकी गयेला जेगो यइने ते बोल्यों के आधी आगळ हवे हु पूर्व पाठ कराने शक्तिमान् नयी आ वचन साभळी गुरु (अध्ययनर तो दशम पूर्वार्द्धनो पोतामान व्युच्छेद जाणी मौन धारण फरी स्थित थपा. मा आरक्षित गुरुनी अनुशा लई पोताना सासारिक Hei१०१॥ सम्बन्धिभाने वन्दन करावा दशपुर नगर भणी चारण गच्छतस्तस्य गुरूणा सूरिपद दत्त अवार्यरक्षितहरिस्तत्र स्वमातभगिणीप्रमुखसर्वसासारिकवर्गों दीक्षा ग्राहिता, पिता तु प्रतियोधितोऽपि साधुलिंग न गृहाति, स्वजातीयजनाना लजा च वहति आचार्या दीक्षाग्रहणाय तस्य पहु कथयति जता जता गुरुए तेने मूरिपद आप्यु, आर्यरक्षित मरिए दशपुर नगर नइ पोताना माता वेन बगेरे सम्बन्धि वर्गने दीक्षा लेव- रापी; पण पिताने पणो बोध को छत्ता तेणे साधुचि ह धारण नन कर्या पोताना प्राति जनोमा घणु शरमावा लाग्या नेम आचार्य पण दीक्षा लेगा तेने येणु का तत. स कथयति पृथुरवस्त्रयुगल १ यज्ञोपवीत २ कमडलु ३ छधिका ४ उपानति सम चेदीक्षा ददासि तदा लामि ततो राम दृष्ट्वा तादृशमेव त गृह प्रवाजितवान् , ग्राहितधरणकरणस्वाध्याय. अन्पदा चैत्यवदनार्थं गता आचार्या, तर साधुशिक्षिता गृत्स्थडिभका पदति गन छत्रिण मुस्त्वा सर्वान साधून वदामहे R उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययन२ ॥१.२॥ , ॥१०२॥ त्यारे छेवट एम बोल्या के-'बे महोटां बस, यज्ञोपवीत, . कमंडलु, छत्री तथा पगरखां, आटला चानां साथे राखीने दीक्षा दीओ तो लां' त्यारे गुरुए एम करवामां पण लाभ जोइ तेने ए छ वस्तु साथे प्रवज्या आपी आचरण तथा स्वाध्याय ग्रहण कराव्यां, एक समये आचार्य चैत्यवंदनार्थ चाल्या त्यां साधुओए शीखवी मूकेला गृहस्थ बालको बोल्या के-'आ एक छत्रवाळाने छोडी बाकीना साधुओर्नु वंदन करीए छइए. ततः स वृद्धो वक्ति मम पुत्रा नाप्नादय एते वंदिताः, अहं कस्मान्न वंदितः ? किं मया दीक्षा न गृहीता ? ते आहुः किं दीक्षितस्य छत्रकमंडल्वादीनि स्युः ? ततो गुरुष्वागतेषु स वृद्धो वक्ति पुत्र ? मम डिभका अपि हसंति. ततो न कार्य छत्रेण. एवं प्रयोगेण क्रमता धौतिकवस्त्रं मुक्त्वा सर्व त्याजितः, बहुशस्तथा प्रयोगकरणेऽपि धौतिकं २ मुंचति. त्यारे पेला वृद्धे को के-मारा पुत्र तथा पौत्र आदिकनु वंदन कर्यु अने मारु वंदन केम न कयु ? शुं में दीक्षा ग्रहण नथी करी ? आ सांभळीने ते बाळको बोल्या के-'शुं वळी दीक्षितने छत्र कमन्डलु वगेरे होता हशे ? ज्यारे गुरुओ आल्या त्यारे ते वृद्ध बोल्यो के-हे पुत्र ! मने आ बाळको हसे छे माटे मारे आ छत्रनुं काम नथी एम कही छत्रनो त्याग कर्यो अने एम करतां आगन जतां तेणे एक धोती सिवाय तमात वस्तुनो त्याग कर्यो; तथापि अनेक प्रयोगो कर्या छतां धोतीनो त्याग करतो न होतो. अन्यदैकः साधुर्गृहीतानशनः स्वर्ग गतः तत आचार्यवृद्वस्य धौतिकल्याजनाय साधून प्रत्येवमुक्तं य एनं वृद्ध- .

भाषांतर अध्यपनर यमनमा ॥१०॥ -- . . साधु व्युत्मृष्ट स्कंधेन वहति तस्य महत्पुण्य तत स स्थविरो वक्ति पुत्रात किं बहु निर्जरा ? आचार्या आदि तत सवालह वहामि, आचार्या बदल्योपसर्गा जायते, चेटकरूपाणि लग्यते, यदि शक्यतेधिसोढुं तदा पर, यदि क्षोभो भविष्यति तदाशुभमस्माकं भविष्यति एक समये एक साधु अनशन प्रत लइ स्वर्गे गयो त्यारे आ वृदने धोती मूकाक्वानो आचार्योए एक लाग गोठन्यो. तेओए कप के आ साधुने काधे उपाहवानु महोटु अण्प छे त्यारे ते वृद्ध पूज्यु के पुनो । आ करवामा शु बहु निर्जरा थाय ? आचा- योए मधु के-'निश्चये थाय' त्यारे वृद्ध का 'हु उपाडु ' आचार्योए फयु के-एमा अनेक उपद्रवो यशे, केटलाफ चेटक लागशे जो वधु सहन करी शको तो उपाइचु ठीक छे जो क्षोभ पामशो तो आपणा बघायनु अशुभ यशे' एष स्थिरीकृत्य स तत्र नियुजित , साधुसाध्वीसमुदाय पृष्टौ स्थित , यावत्तेन माधुशय स्कधे समारोप्य वोढुमारन्ध तावत्तस्य धौतिक गुरुशिक्षितभिराकर्पित, स लबयां यावत्तासाधुशय स्कघान्मुश्चति तावदन्यैरुरत मा मुच' मा मुत्र ? एकेन घोलपको दवरकेण कृत्वा फटौ यद्ध , म तु लज्जया तत्साधुशय धारभूमियावह्य तन युत्मृज्य पश्चादागतो यक्ति हे पुत्राय महानुपसर्गो जात , आहुराचार्या आनीयता धौतिक परिधाप्यता? तत स परखचाल घोतिकेन, यद् दृष्टय दृष्टमेव, अथ चोलपष्ट एवास्तु, पूर्व तेनाचेलपरीषहो न सोढ , पक्षात्सोढ ॥६॥ आम पहु हद्धता फरारीने ए शव उपाडवाना काममा तेने जोट्यो तेणे शव उपायु, साधु साध्वीनो समुदाय पाछळ चाल्या . उत्तराध्य यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन२ ॥१०४॥ ॥१०४॥ आम ज्यां साधुनुं शव कांधे उगवीने चालवा मांडे छे के-गुरुए शीखवी राखेला वालकोए तेनी धोती खेची लीधी. शरमाइने ज्यां ते साधुनुं शव कांधेथी हेडं मुकवा जाय छे त्यां वीजा वाळको 'मुकशोमां, मुकशोमां' एम बोलि उट्या. तेटली वारमा एक वाळके वस्त्रखंड लावी तेनी केडे लपेटवा मांड्यो त्यारे ते दृद्ध पेला शवने द्वारदेश सुधी उपाडी त्यां मुकीने पाछो आवी कहेवा लाग्यो के ' हे पुत्रो आ तो महान् उपद्रव थयो. आचार्योए-धोतीयु लावीने आने पहेरावो' आम कडं त्यारे ते वृद्ध बोल्यो के-' हवे वस्त्रनुं शुं काम छे ? जे देखावानुं हतु ते तो देखाइ रधु ' ' हवे तो ए वस्त्र खंड भले रह्यो. ' आवी रीते तेणे अचेलपरीपह प्रथम सहन न कर्यों पण पाछळथी सहन को. ६ अथाचेलकस्य शीतादिभिररतिः स्यात्, अतस्तत्परीषहमाह- ---हवे अचेलक निर्वस्त्र=ने शीत आदिकथी उद्वेग थाय माटे ते अरतिना परीपहनुं निरूपण करे छे.- गामाणुगामं रीअंतं । अणगारं अकिंचणं ॥ अरई अणुप्पविसे । तं तितिक्खे परीसहं ॥ १४ ॥ अरई पिठ्ठओ किचा। विरए आयरक्खिए ॥ धम्मारामे निरारंभे । उवसंते मुणीचरे ॥ १५ ॥ मूळगाथार्थः-गामे गाम विहरता, अनगार-नियतस्थान रहित तथा आकंचन-परिग्रह वर्जित मुनिने अरति-संयम पाळ वामां अणगमो प्रवेशे-मनमां आवे तो ते परीपहनी पण तितिक्षा करवी, अर्थात् कंटाळो न लावतां सहन करवा टेवा ॥ १४ ॥ मूळगाथार्थः-अरतिने पृष्ठतः करीने अर्थात् मनथी वेगळी करीने विरत-उपराम पामेला तथा आत्मरक्षणमा सावधान तेमज निरारंभ-उपाइने कोइपण कार्य ने नहिं आरंभनारा अने उपशांत-क्रोधादिक जेना शमी गया छे एवा मुनिये धर्माराम-धर्मरूप आराम-मनोविनोदन स्थानमां-विचरः ॥ १५ ।। .

इतराध्य শাখা अध्ययन - घ्या-अरति. सपमेऽधैर्य यदाऽनगारमनुप्रविशेदरतिपरीपहो मुनि स्पृशेचदा साधुस्त परीपह तितिक्षत सहेत. किं कुर्वतमनगार' प्रामानुमाम रीयत, ग्राम ग्राममन्वित्यनुग्राम, एक ग्राम बजतो मुनेरतराले आगत ग्राम- मनुग्राम, तत्र विचरत, कीदृश ? अकिचनं न विद्यते किंचन पस्य सोऽकिंचनस्तं, परिग्रहरहित, अर्थ-अरति एटले सयममा अधैर्य-अथात् सपमने वरावर पाळवाना मनोदृढतारूप (पनो अभाव-आ पण ज्यारे अनगार- निवास स्थान रहित, एक गार्मथी बीजे गामे विचरता, वळी अकिंचन=सर्वपरिग्रहवर्जित, साधुने अरनि परीपह प्रवेश करे-अर्थात् एवा मुनिने नडे त्यारे ते पण तेणे सहन क्लो जोइए एटले के एवे मसगे धैर्य धारी दृढ मन रहे जोइए १४ पुनरुक्तमयं दृढयति-मुनिररतिपरीपहे उत्पन्ने सत्वरतिं पृष्टत कृत्वा'दूरे गत्वा धर्माराम सन् सयममार्गे घरे- विचरेत् धर्मे आरमते रति करोतीति धर्माराम', पुन. कीदृश साधु ? विरत आप्रवाहित', पुन कीदृश ? निरारभ आरमरहित , पुन कोश. ? उपशातो नि कपाय पूर्वोक्त अर्थने दृढ करे छे-मुनि अरति उपस्थित थाय त्यारे ते अरतिने पृष्ठत. पूढे करीने-अर्थात् ते तरफ दृष्टि न करता एटले अरति दूर करीने धर्ममा भीतिमान-धर्माराम पनीने तथा निरारभ-करपण तजवीज न आरभता विरत-आश्रय रहित रही उपनात-निफपाय रहे ॥१५॥ MEIN उत्तराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥१०६॥ ॥१०६॥ -अत्र पुरोहितपुत्रराजपुप्रयोः कथा यथा- अवलपुरे जितशत्रुपपुत्रोऽपराजितनामा रोहाचार्यपाधै दीक्षितः, अन्यदा विहरंस्तगरा नगरी गतः, ताव- तोजयिन्या आर्यरोहाचार्यास्तत्रागतार, पृष्ठं साधुना तेनोजयिन्याः स्वरूप, तैरुक्तं सर्व तत्र वरं, परं नृपपुत्रामाल- पुत्रौ साधूनुद्रेजयतः. ततो गुरूनाएछय स्वभ्रातृव्यबोधार्थ शीघ्रमुज्जयिन्यां गतः. -आविषयमां पुरोहितपुत्र तथा राजपुत्रनी कथा दृष्टांत कहे छे.- अचलपुरमा जितशत्रु राजानो पुत्र अपराजित नामनो रोहाचार्य पासे आवी दीक्षित थयो. एक समये विहार करतो करतो तगरा नगरीमा आवी चड्यो, एटलामां उज्जयिनीथी आर्य रोहाचार्य त्यां आवी पहोंच्या तेमने साधुए उज्जयिनी, स्वरूप पूज्यु त्यारे तेओए कह्यु के-चीजें तो वधुं सारं छे पण राजानो पुत्र तथा अमात्यनो पुत्र ए बे मळीने साधुने उद्वेग आपे छे. आ सांभळी गुरुनी अनुज्ञा लइ पोताना भ्रातृव्य (भाइ भत्रीजा )ने बोध देवा माटे तरतन उज्जयिनी भणी चाली नीकळ्या. तत्र भिक्षावेलायां लोकैर्वार्यमाणोऽपि याढस्वरेण धर्मलाभ इति पठन् राजकुले प्रविष्टः, राजपुत्रामात्यपुत्राभ्यां सोपहासमाकारितोऽत्रागच्छत ? वंद्यते, ततः स तत्र गतः, ताभ्यामुक्तं वेत्सि नर्तितुं ? तेनोक्तं बाद, परं युवां वादयतां ? तो तादृशं वादयितुं न जानीतः, ततस्तेन तथा तो कुहितो पृथक्कृतहस्तपादादिसंधियंधिगै यथात्यंत- मारार्टि कुरुतः, तो तादृशावेव मुक्त्वा साधुरुपाश्रये समायातः. .

भाषांतर সশনঃ पन सत्रमा ॥१०७॥ ॥२०७॥ सो भइने भिक्षाटाणे लोकोए वार्या तो पण दृढस्वरवडे 'धर्मलाभ 'आवं उधारण करता करता राजकुलमा पेग त्या उभेला रामपुत्र तथा अमात्यपुत्र बनेए उपहासयुक्त वचनवी बोलाव्या- भहीं आवो, दन करीए छोइए ' आ उपरथी ते साधु त्यां गया पासे आवेला साधुने ए रानपुर तथा अमात्य पुर्ने पूछयु के-नाची जाणो छो ? नृत्य करता आवडे छे' साधुए का नृत्य करता तो आवरे छे पण तमे वाघ वगाडशो ? आ वने तेवु वाधवादन कर जाणता न होता एटले साधुए ते वनेने एवा कूया के हाथ पगना साधाभो खेदवी नारया जेपी तेओ राई पाडा माड्या, ए मनेने एवीज हालतमा पडता मुकीने साधु उपाश्रये आव्या ततो राजा सर्ववलेन तत्रायानस्तमुपलक्ष्य प्रसादनाय तस्य पाइयो पति, उवाच च स्वामिन् ! सापराधाव पीमी सम्लीकार्यो, अत परमपराध न करिष्यत , साधुनोस यदिमा प्रव्रजतस्तदा मुश्चामि, राज्ञोक्तमेवमप्यस्तु त्यानो राना सपळी सेना सापे लइने उपाश्रयमा ज्या साधु ठेगछे त्यां आव्या. साधुभोने जोइने क्रोध न करता ते साधुने प्रसन्न करता तेना परणमा पडीने पोल्या के-'हे स्वामिन् ! आ वने अपराधी छे तो पण आपे तेमने साना करवा, हरे पछी ते आपनो अपराध फरशे नहि' साधुए क्यु के-'जो ए वन्ने मव्रज्या(दीक्षा)लीये तो मुक्त करु-'राजाए फछु फरो ततस्ती प्रथमं लोच कृत्या भवाजिती, तर राजपुरो नि शकितो धर्म करोति, इतरस्त्वम वरति, अर यलेन पराजित इत्युवेग घेतसि परति,पर पालयती वावपि चारित्रं शुद्ध मृत्वा तो दिव गती तदनतर ते वनेने प्रथम तोच परीने प्रवज्या दीधी. हवे आ बेमांना राजपुन तो नि शक धर्माचरण परवा लाग्यो पण जो के-भले एम उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययन२ यन सूत्रम् ॥१०८॥ ॥१०८॥ अमात्यपुत्र तो उलटो तेनी अदेखाइ करवा लाग्यो, 'आणे वलथी मने हरायो एम मनमा राखीने उद्वेग करतो हतो पण बने शुद्ध चारित्र पालता हता तेथी मरीने स्वर्ग गया. अस्मिन्नवसरे कौशांब्यां तापसश्रेष्टी मृत्वा स्वगृहे शुकरो जातस्तत्र जातिस्मरणं प्राप्तवान , सर्व स्वप्लुतादिकुटुंयं प्रत्यभिजानाति, परंवक्तुंन किंचिच्छक्कोति.अन्यदा सुतैरेषशूकरोमारितः स्वगहे एव सो जातः, तत्रापिजातिस्मरण- वांस्तैरेव मारितः पुत्रपुत्रो जातः तत्रापि जातिस्मरणमाप, स एवं चिंतयति कथमेतां पूर्वभववधू मातरमहमुल्लपामि ? आ अवसरे कौशांबी नगरीमां एक तापस शेठीयो मरीने पोतानेज घरे मुकर थयो पण पूर्वभवना तपःसामर्थने लइ जाति- स्मरण-पूर्वभवना स्मरणवाळो-थयो तेथी पूर्वभवना पोताना पुत्र आदिक सर्व कुटुवने ओळखे पण कंइ वोली न शके. एक समये पुत्रोए आ सूकरने मारी नाख्यो त्यारे ते सर्प थइ जन्म्यो. सर्प जन्ममां पण जातिस्मरणवाको हतो. घरमां सर्प जाणी पुत्रोए मारी नाख्यो त्यारे पोताना पुत्रनो पुत्र थइ अवतो. ते समये पण पूर्वभवर्नु स्मरण रहेबाथी मनमां चिंतवन करे जे आ मारा पूर्वभवनी बहुने हुँ मा कही केम बोलावू. कथं घेमा पूर्वभवपुत्रं पितरमहमुलंपामीति विचार्य मौनमाश्रितः, भूकव्रतभाग्जातः. अन्यदा केनचिच्चतुर्ता- निना तद्बोधं ज्ञात्वा स्वशिष्ययोर्मुखे गाया प्रेषिता, यथा-तांयस किमिणा मूअ-व्वएण पडिवज जाणि धम्मं ॥ मरिउण सूअरोरग । जाओ पुसस्स पुसत्ति ॥ १॥ ।

भाषांतर अध्ययन२ ॥१०९॥ ॥१०९॥ वळी आ मारा पूर्वभवना पुत्रने बाप कही केम बोलावु ? आम विवारीने मौननो आश्रय लीयो अर्थात् मुंगावत धारण करी रमो-एक सपर्य कोइ चतुर्बानी आवी नीपम्पो तेणे आ मुगानो घोष जाणी पोताना एक शिष्यने मुखे गाया पाटवी-पथा- (तावस०) हे तापस ! मरीने मुकर ययो उरग-सर्प-थयो अने पुप्रनो पुत्र थयो हवे मुंगो को रहेछे जाणेल धर्मने प्रतिपम था पतां गाथा श्रुत्वा प्रतिवद्वो गुरूणा सुश्रावकोऽभूत् तस्मिअवसरे सोऽमात्यपुत्रजीवदेवो महाविदेहे तीर्थकर- समीपे पृच्छति किमह सुलभयोधिदुर्लभयोधिर्वा ? इति प्रश्ने प्रोक्त तीर्थकरेण स्व दुभयोधि कौशाम्या मूकनाता भावीति लन्धोत्तर स सुरो गतो मूकपार्थे, तस्य बहु द्रव्य दत्वा प्रोक्तवान् यदार त्वन्मातुरुदरे उत्पत्स्ये तदा तस्या आनदोहदो भविष्यति, स दोरद साप्रत महर्शितसदाफलाम्रफलैस्वपा तदानीं तस्या पूर्णीकार्य', पुनस्त्वया तथा विधेप यथा तदानीं मम धर्मप्राप्ति स्यात् आ गाथा साभळीने प्रतियुद्ध थयो अने गुरनो सारो श्रावक बन्यो एवामा पेलो अमात्यपुननो जीव देव थइ महाविदेहमा तीर्धकर समीपे रही पूछे छे शुलभवोधि यवानो के दुर्लभवोधि ? त्यारे तीर्थकरथी तेने उत्तर मळ्यु के तु दुर्लभवोधि छो भने फौशांबीनगरीमा मुगानो भाइ थइने अवतरीश. आम उत्तर मळता ते फौशावीनगरीमा मुगा पासे गयो अने तेने पणु द्रव्य आपी कधु के-ज्यारे हुतारी माताना उदरमा उत्पन्न यश त्यारे तेणीने आम्रफळ खावानो दोहद हेळधशे ते समये तारे में देखाडेला वारेमास जेमा फळ आवे छे एवा आवाना झाडमाथी आम्रफल लावीने तेणीनो मनोरथ पूर्ण करतो. अने पछी तारे एवी रीते कर के जेथी मने धर्मनी माप्ति थाय .

उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययन ॥११०॥ ॥११०॥ एवमुक्त्वा गतो देवः, अन्यदा देवलोकाच्च्युत्वा स देवस्तया गर्ने समुत्पनस्तस्याश्वानदोहदः समुत्पन्ना, मूकेन पूर्वोत्तरील्या परितः, पुत्रो जातः, भूकस्तु तं यालं लघुमपि करे कृत्वा देवान साधून यंदापपति, परंस दुर्लभयोधित्वेन तान दृष्ट्वा रदति. एवमायालकालादपि भृशं प्रतियोधितोऽपि स न बुध्यति. ततो मूकः प्रव जिता, गतः स्वर्ग. आटलं कहीने ते देव त्यांची चाल्यो गयो. थोडा समय राद देवलोफयी भ्रष्ट यइ ते देन नंगलीमाना गर्भवासमा प्रविष्ट थयो त्यारे तेणीने आम्रफळ खावानो मनोरथ थयो. पेला मंगाये पूर्वोक्त प्रकारे तेणीनो ते मनोरथ पूर्ण कर्यो. तदनंतर तेणीने पुत्र अवतो. मूगो ए नाना पाळकने पण हापे झालीने देव तथा साधुओर्नु वंदन करावे हे तथापि ते दुर्लभत्रोधि होवायी ते साधु तथा देवोने जोइ रडवा पांडे के आम चाळपणधीन मतिरोध करवा छतां पण तेने बोधनी लन्धि यती नवी. तेटलामां मूगो प्रयज्या लइने स्वर्ग गयो. अथ देवीभूतेन मूकजीवेन स पुर्लभयोधिलः प्रतियोधकृतं जलोदरव्यथावान् कृतः, वैद्यरूपं कृत्वा देवेनोक्त- महं सर्वरोगोपशमं करोमि, जलोदरीवक्तिमम जलोदरोपशांति का ? वैगेनोक्तं तवासाध्योऽयं रोगः, तथा यह प्रति- कारं करोमि यदि मम पृष्टावौषधकोत्पलकं समुत्पान्य मरीव सहागमिष्यसि. तेनोक्तमेवं भवतु. हो देवरूप ययेला मूंगाना जीये ते दुर्लभबोधि वाळकने प्रतिबोध भापना माटे लेने जलोदर व्याधियी प्रस्त कर्यो; पोते .

भाषांतर ॥११॥ ॥१११॥ मेषरूप धारण करी देवरूप थ्येला मूगाना जीवे क-के 'हु सर्व रोग मदाडु छु. ' जलोदरी बोल्यो-' पारे आ मारा जलोदर व्याधिनी शांति करो 'वैधे का के-'आ तारो रोग असाध्य छे 'तो पण हु मतिकार करु, जो तु मारी पाछळ औषधकोथळो उपाढीने मारी सापेज आवशे तो ते रोगीए फयूल फ्र्यु के-'भले हु औषधकोपको उपाडीने तमारी पाछळ आतीश ' ततो पेयेन स जलोदरी सजीकृत समाधिभागजातः, तस्योत्पाटनायोषधकोत्थलकस्तेन दत्ता, स तत्पृष्टी भ्रमस्त कोत्थलकमुत्पाटपति, देवमायया स कोत्थलकोऽतीयभारवान् जात , तमतिभार वहन् स विधति, पर तमुत्मज्य पश्चादगतु न शक्नोति माभूत्पश्चाद्तस्य मे पुनर्जगोदरव्यथेति विमर्श कुर्वन् वैद्यस्यैव पृष्टी कोत्पलक यान् भ्रमति स्यारे ए वैधे ए जलोदरीने साजो पर्यो, व्याधि मटीने सारो थयो. वैये तेने उपाडवाने औषधकोषको दीपो, ते पण औषध- फोपळो उपाढीने ते वैधनी पाछळ फरतो इतो त्या दैवमायाने लीधे ते कोथलामा भार अत्यत वधतो गयो, ए भार उठावता ते थाकी नाप पण तेने छोडीने पाठो जा सके नहिं तेणे विचाऍ के -जो पाछो जाउ ने पने वळी जलोदर थइ आवे तो! आम धारी वैधनी पाछळ कोपळो उपाही फर्या करतो. एकदैकदेशे स्वाध्याय कुर्वन. साधवो दृष्टास्तर तो गती. वैयेनोक्त स्व दीक्षा गृही यसि यथा त्वां मुश्शामि, स भारभनो वक्ति गृहीष्याम्पेव, ततो वैशेनाप्यस्य दीक्षा दापिता, देवे च स्वस्थान गते तेन दीक्षा परित्यक्ता, , भाषांतर अध्ययन यन सूत्रम् ॥११२॥ ॥११२॥ देवेन पुनरपि तथैव जलोदरं कृत्या वैद्यरूपधरेण पुनरसौ दीक्षां ग्राहितः, पुनर्गते च देवे तेन दीक्षा त्यक्ता, तृतीयवारं दीक्षां दापयित्वा,वैद्यरूपो देवः सार्धं तिष्टति स्थिरीकरणाय. एक समये एक प्रदेशमा साधुओने भणता जोइ वैद्ये पेलाने कयु के-दीक्षा ग्रहण करीश ? तो तने मुक्त करुं. तेणे भार उपा- डीने कंटाळेल तेथी का के-' हा दीक्षा ग्रहण करीश. त्यारे वैये तेने साधु पासे दीक्षा देवरावी,पण ए देव स्वस्थाने गया एटले आणे दीक्षा छोडी दीधी. देवे पार्छ तेने जलोदर करी मूक्यु. फरी पण ए देवे वैद्यरुप लइ दीक्षा लेवरावी. वळी पण देव गया के आणे दीक्षा त्यजी दीधी एटले त्रीजीवार देवे वैद्यरुपे आवी दीक्षा लेवरावी दृढ राखवा पोते देव साथे रहेवा लाग्या. एकदा तृणभारं गृहीत्वा स देवः प्रज्ज्वलद्ग्रामे प्रविशति. ततस्तेन साधुनोक्तं ज्वलति ग्रामे कथं प्रविशसि ? देवेनोक्तं स्वमपि क्रोधमानमायालोभैः प्रज्ज्वलिते गृहवासे वारंवारं वार्यमाणोऽपि पुनः कथं प्रविशसि? वैद्यरूपेण देवेनैवमुक्तोऽपि स न धुध्यते. एक समये ते देव खडनो भारो लइ वळता गाममा पेठा त्यारे ए साधुए कह्यु के-' वळता गाममां केम पेसो छो ? ' देवे कर्जा-तुंपण-क्रोध मान माया लोभ वगेरेथी बळता घर वासमां वारंवार वार्या छतां हम पेसतो जाय छे ? ' वैधरुपी देवे आम कथु तथापि ते समज्यो नहि. -

परसुत्रमा
भाषांतर
अध्ययनर
॥११३॥
॥११३॥
अन्यदा ताक्ट या गती, देव कटकाकुले मार्गे चरति, स प्राह करमान्मार्गेण यासि ? देवेनोक्त त्वमपि विशुद्ध
सयममार्ग परिलन्याधिन्याधिरूपे कटकाकीणे ससारमार्गे कस्मायासि ? एवं देवेनोऽपि स न बुध्यते पुनरेक
स्मिन देवकुले तो गतो, तत्र यक्ष ईप्सितपूजापूज्यमानोऽपि पुन पुनरधोमुख पतति, स कथयत्यहो यक्षस्थाधमत्वं ।
यत्पूज्यमानोऽप्ययमधोमुग्व पतति, देवेनोक्त त्वमप्येतादृशोऽधम , यद्यमान पूज्यमानोऽपि स्व पुन पुनः पतसि
वळी एक टाणे येय जणा अटवी जगलमा गया त्या देवे काटावाला मार्गे चालवा माझ्यु ते जोइने मा साधु बोल्यो के
आप अपळे मार्ग केम चालो छो ? त्यारे देवे कधु के-तु पण विशुद्ध सयम मार्गनो परित्याग करी आधिव्याधिरूप अनेक कंट-
कवी व्याप्त एवा ससार मार्गमा केम जाय छे? आो उपदेश करता पण ज्यारे ते साधु समज्यो नहिं त्यारे बळी एक वखते एधेय
जणा एक देवकुळमा पेठग. त्यां तो एक यक्ष तेने मनमानती पूनाथी पूनाता छतां वारवार उधेमुखे पडतो दीठो. त्यारे साधु बोल्यो
के-'अहो ! आ पक्षनी अधमता तो जुओ, आवी रीते पूजाय हे तो पण उधेमोटे पडेछ' देवे का-'तु पण एना जेवोन अधम
छो जे वन्दन कराता पूजा पामता पण फरी फरीने पालो पडेछे ।
तत स साधुर्वक्ति कस्त्व ? देवेन मूकरूप दर्शितं, पूर्वभवसयधश्च कथित , स वक्वत्र क प्रत्यय.
वैतात्ये चैत्यवदापनार्ग देवेनासौ प्रापित तत्रैकस्मिन् सिद्धायतनकोणे दुर्लभयोधदेवेन स्वयोधाय मूकविदित
स्यकुडलयुगल स्थापितमभूत् , ततदानों दर्शित, ततस्तस्य जातिस्मरण जातं, तेनाम्य चारित्रदृढताभूत् । अस्य
पूर्वमरति, पश्चादति ॥७॥

IJF II " उत्सराध्य- पन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥११४॥ BE ॥११४॥ आ वचन सांभळी साधु गोल्यो के-'तमे कोण छो ?' त्यारे देवे पोतानुं प्रथमर्नु मुंगा तरीकेतुं रूप देखाइयुः अने पूर्व- भवनों संबंध पण कयो. ते साधु बोल्यो-तमे कायं तेनी खात्री शी? ' त्यारे देव तेने वैताव्यस्थाने चैत्यदनार्थ लइ. गगा त्यां एक सिद्धायतनना खूणामां दुर्लभवोधि देवे पोतानी नाण माटे पेला मंगानो नाणेल ये कुंदळ राखेला हता ते तेने देसायां ते जोतांन तेने जातिस्मरण थयु अने तेथी तेर्नुचारित्र दृढ थयु. आवी रीते प्रथम तेने अरति हती अने पाछळयी रति यइ. ७ अथ संयमेऽरतिसदावे सति स्त्रीप्वीहा स्यात् , स च परीपहोऽपि सोढव्या. अतस्तत्परीपहमाह- संयममां ज्यारे अरति थाय त्यारे स्त्रीओमां ईहा-अभिलापा-याय ते पण परीपह सहन करतो जोइए-ते परोपह कहे छे.- संगो एस मणुस्साणं । जाओ लोगमि इत्थीओ ॥ जस्त एआ परिणाया । सुकडं तस्स सामन्नं ॥१६॥ एयमादाय मेहावी । पंकभूया उ इत्थीओ || न ताहि विहन्निजा । चरेजत्तग्गवसए ॥ १७ ॥ मूळगाथार्थ---आ लोकमां मनुष्योने खीओ के र संग ययेलो छ; अर्थात् यंधनका संगापादक स्त्रीमो के. साधुप र सीमोने सर्वाशे जाणी, अर्थात् अनर्थकारिणी तरीके ओळलीमे त्यजी ले ते साधुनु धामण्य-साधुग्णु सुकृत-सफळ थयु. १६ मूळगाथार्थ:-मेघायी साधु, सीमो पंकभूता-कादवरूप छे, अर्थात् मलिनता मारनारी से एम मनमा प्रहण करीने ते स्त्रीमो पडे पोते विहत न थाय अर्थात् पोताना संयमने जोखममान नासे किंतु आत्मगदेष-भात्माना उदारनो उपाय शोधतो-विहरे. ॥१७॥ व्या०-लोकेऽस्मिन् संसारे मनुष्याणामेताः नियः संगो जातोऽस्ति, नराणां त्रियो बंधनं वर्तते. यथा भाषांतर अध्ययन पन सत्रमा ॥११५॥ मृगाणा बंधन वागुरादि विधते, सगन्थति वशीभवतीति जीयो यस्मात्स सगो बधनमित्यर्थ , अत्र मनुष्यग्रहण तेषामेव मैथुनसशाया आधिक्यात, यथा मक्षिकाणा श्लेष्मसगो बधन, तथा पुरुषाणा स्त्रियो वधन- मित्यर्थ , यस्य साधोरेता. त्रिय परि समताद परिज्ञया ज्ञाताः प्रलाख्यानपरिज्ञया प्रत्यारपाता परित्यक्ता अनर्थहेतुरूपा ज्ञाता , अत्र प्राकृतत्वासृतीयास्थाने षष्ठी, येन साधुना स्त्रिय एतादृशो ज्ञातास्तस्य साधो श्रामण्य सुकृत साध्वाचार सफल ॥१६॥ अर्थ – लोका-आ ससारमा-मनुष्याने स्वीओ एक सगरूप धयेल छे अर्थात् नरने स्त्रीभो बधनरूप छे जेम मृगलाओने जोल बधनरूप छे अर्थात् मृगला जेम वागुरा-जालमा फसाय छे तेम मनुष्यो स्त्रीओमा वश यइ जायछे जीवने क्याय पण सग 'थाप ते पधनज छे अहीं मनुष्य पद रारयु मनुप्यमा ससारधर्मनी अधिक्ता दर्शाववा माटे छे जेम माखीने लाळठीट वगे- रेनो सगधवावी तेमा चोटी रहेता धन याय छे तेम पुरुषोने स्त्रीओ वयन छे जे साधुए ए स्त्रीओ परिज्ञात करी-अर्थात् सर्म प्रकारे प्रत्याग्व्यात परित्यक्त करी, एटले के ए खीयोने अनर्थरूप जाणीने परहरी ते साधुनु श्रामण्य-साधुपणु-मुकृत थयु. ए साधुनो आचार सफळ थयो । १६ ।। मेधावी धर्ममर्यादापास्ताभि. स्त्रीमिर्न विहन्यात् , सयमजीवितघातेनात्मानन विनाशयेत् , कित्वात्मगवेषक सन् मरेत , आत्मान गवेषयतीत्यात्मगवेषक , किं कृत्वा ? एवमादाय भात्वा, एतदिति कि? स्त्रिय, पकभूता', छे ते उत्तराध्य. भाषांतर अध्ययन२ ॥११६॥ ॥११६॥ man- मुक्तिमार्ग कर्दमभूताः, मुक्तिपथप्रवृत्तानां यंधकत्वेन मालिन्यकारणं स्त्रियः संतीति ज्ञात्वा, तस्माम् स्त्रीणां संगं विहाय मया संसारादात्मा निस्तारणीयः, इति बुद्धिमान, मेधावी-धर्ममर्यादावान् ते स्त्रीओवडे विहत थतो नथी-अर्थात् संयम जीवितनो घात करी आत्मानो विनाश करतो नथी. किंतु आत्मगवेपक थइने, अर्थात् आत्मस्वरूपनी शोधमा तत्पर रही, स्त्रियो पंकभूत छे एटले के मुक्ति मार्गमां कादवरूप छे.- केम के मुक्तिमार्गे पळेलाने बंधक तथा मलिनता कारणभूत छे तेथी ए स्त्रीओनो संग त्याग करीने मारे संसारथी आत्मानो निस्तार लाववानो छे एवी बुद्धि धारण करे छे. अत्र स्थूलिभद्र कथा यथा-पाटलिपुत्रनगरे नवमो नंदराजा, तस्य राज्यचिताकारकः शकडालनामा मंत्री वर्तते, तेन स्ववृद्धपुत्रः स्थूलभद्रनामा लीलाविलासार्थ तन्नगराधिवासिन्याः कोशावेश्याया गृहे मुक्तस्तत्र तस्या मागितं सुवर्णादि यथेष्टं प्रेषयति, वित्तीयपुत्रः श्रीयकनामा राजांगपार्श्ववर्ती विहितः अस्मिअवसरे तनगरवास्तव्यो वरमचिनामा भट्टो नवीनकृतैरष्टोत्तरशतकाव्यैर्नदभूपालं प्रत्यहं स्तौति, राजा च तस्मै द्रव्यदित्सुः कहालमंत्रि- मुग्वं विलोकते, शकहालमंत्री तु मिथ्यात्ववृद्रिभीन्न तत्काव्यानि स्तौति. आ विषयमा स्थूलिभद्रनी कथा दृष्टांतरूपे कहे छे.- पाटलिपुत्र नगरमां नवमो नंदराना राज्य करतो हतो त्यारे तेनो राज्यचिताकार भकडाल (शकटार ) नामे मंत्री हतो. तेणे 1 . ..

उत्तराध्य भाषातर अध्ययन अवसरमा ॥११७॥ ॥११७॥ पोतानो महोगे पुत्र स्थूलभद्र नामनो हतो तेने ते नगरमा रहेनारी कोशा नामनी वेश्याने त्या लोलाविलासार्थ राख्यो ते जे का पोतानी इच्छा प्रमाणे मुवर्णादि मागे ते मोकलारतो बीजो श्रीयक नामनो पुन हतो तेने राजा पासे अगत जण तरीके रारयो. आ ते नगरमा वसनार एक वररुरि नामना भट्ट रोज एक्सोआठ नवा काव्य नदराजानी स्तुतिना रचीने राजाने सभळावतां त्यारे राजा तेने द्रव्य देवानी इच्छायी शरडाल मत्रीना मुख सामु जुए पण शाडाल मत्री तो जगत्मा मिथ्यावनी द्धि याय एपी वीस्थी ते वररुविना काव्यना वखाण परता नहि मविप्रशसा विना राजा तस्मै न किचिदत्ते, वररुचिना तु मन्त्रीभार्या स्वरचनामृतेन तोपिता स्वभार शकडालमत्रीणं प्रत्यार वररुचे कान्यानि त्वया नृपपर्पदि व्याख्येयानि, यथास्थितवस्तुमरूपणे सम्यक्त्वस्य भूषण न तु दपणमियादि स्ववनितापचोयुक्त्या तत्कायप्रशसन प्रतिपन्न. अने मत्री प्रशसा न करे त्या मुधी राजा ए कविने कइपण दइ शाता न होता-पररुचिए मत्री शकडालनी भार्याने पोताना वचनामृतथी सतुष्ट करी त्यारे तेणीए पोताना पति शक्डाल मत्रीने क्यु के-आ वररुचिना काव्योनी राजसभामा आपे प्रशसा फरसी केमके वस्तुनु यथार्थ प्ररूपण फरवु ए सम्यस्खनु भूपण छे का दूपण न कहेवाय, आवां पोतानी स्वीना युक्तियुक्त वचनोथी ते वररुपिना काव्योनी प्रशसा करवानु कबूल कर्यु प्रभाते पर्षदि भूपते पुरो वररुचिप्रोक्तानि का यानि मनिगा प्रशसितानि, तत्पश मानतरमेव राज्ञा + पन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥११८॥ DE ॥११८॥ वररुचिभदाय दीनाराणामष्टोत्तरशत दत्त, ततः प्रतिदिनं विप्रो भूपत्तेः पुरोऽष्टोत्तरशतकाव्यानि नवीनानि वक्ति, स्तुतिमांते भूपप्रदत्त दिनाराष्टशतं गृह्णाति, ततो वृद्धिमान वररुचिनामा भहः शतसहस्त्र वित्तव्ययेन यागहोमादि करोति. सवारमा राजानी सभामां गया. त्यां वररुचिए काव्य संभळाव्यां तेनी मंत्रीए प्रशंसा करी ते मंत्रीकृत प्रशंसा सांभळी तरतन राजाए कवि वररुचिने एकसो आठ दीनार आप्यां. आम प्रतिदिन एकसो आठ काव्य रचीने सभामां आवी संभळावे अने राजा ए वररुचि कविने रोज एकसो आठ दीनार आपे एम करतां वररुचि भट्ट तो समृद्धिमान् थया अने सेंकडो तथा हजारोगमे द्रव्य वावरीने यागहोमादिक करवा लाग्या. मन्त्री तु तथा वर्धमानं मिथ्यात्वं दृष्ट्वा तहाननिषेधार्य राज्ञः पुर एवमुवाच हे राजन्नस्य ब्राह्मणस्यैतावद्धनं दवा कथं कोशक्षयो विधीयते ? अयं तु परकाव्यहरणात्कवितस्करोऽस्ति, राज्ञोक्तं किमसौ पुरातनकवितानि काव्यानि मत्पुरो वक्ति ? मन्त्रीगोतमेतदुक्तानि काव्यानि ससापि मत्पुत्र्यः पठति, राजोक्त प्रातरेतदुक्तानि काव्यानि तव सतपुत्रीपाचे पाठनीयानि. मंत्रीए तो आम वधतुं जतुं मिथ्यात्व जोइ ते दाननो निषेध करवा राजा आगळ कडु-हे राजन्! आ ब्रामणने आटलं बधुं धन दइने | खजानानो क्षय करतो धार्यो छे ? आ ब्रापण तो पारका काव्य हरीने कविचोर छे. राजाएं भाषांतर अभ्ययनर ताच क्रमात्प्रथमा ॥११९॥ ॥११९॥ कर्म्यु- ते कवि कोकनां करेला पुराणा काव्य मारी पासे बोले छे ? मत्रीए कछु के-जे काव्यो ए बोले ते मारी सात दीकरीओ पोली देखाडे तो आपने सात्री थायने? राजाए क्यु-त्यारे सवारे ए काव्य बोले ते तमारी साते पुत्रीभो पासे वोलाववा. ततो मन्त्रिणा सर्व शिक्षयित्वा सप्तापि पुन्य प्रभाते भूपपर्षदि यवन्यतरिता स्थापिता पुश्पेकवार श्रुतसर्वग्रन्धधारिका, द्वितीया तु दिरितसर्वप्रथधारिका, एच सर्वा अपियावत्सप्तमी पुत्री सप्तवारश्रुत अन्धधारिका एतादृशधारणान्विता सति मत्री घरे जइ पोतानी सात पुत्रीओने शिखवीने सवारे राजसभामा चक नाखीने बेसाडी आमानी पहेली पुत्री एक वार साभळेल सर्व प्रय धारण करनारी हती वीजी वे वार साभळी धारण करनारी, एम क्रमयी सातमी पुत्री सातकार साभळेलु धारण करनारी हती अथ तत्र समायातो वररुचि खकृतकाव्यानि नृपते पुरो वस्तुमारेभे, स्तुत्यते भूपतिनोक्तमो भद्वैतानि काव्यानि त्वरकृतानि परकृतानि वा ? सोऽवग्मत्कृतान्येव राज्ञोक्तमेतानि काव्यानि मन्त्रिण सप्तपुत्रीणा मुखे समायाति, स वक्ति यदि ता यक्ष्यति तदाहमसल, व तेनोक्ते यवन्यतराद्यक्षानाम्नी प्रथमापुत्री भूपतेपुर' समागर सर्वाणि तानि कान्यानि पपाठ सभामा वररुचि आव्यां अने खकृत काव्य रामानी आगळ बोलवा मांड्या त्यारे स्तुतिने अते रानाए क्यु के-अहो । भट्ट !

उसराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन२ ॥१२०॥ ॥१२०॥ आ काव्य जे बोल्या ते तमारां रचेलां छे के परकृत छे ? वररुचि बोल्या के-मेंज रचेलां छे:' राजाए कह्यु के ए काव्यो मंत्रीनी साते पुत्रीओने मुखपाठ आवडे छे' भट्ट वोल्या के-'जो ते पुत्रीओ बोली देखाडे तो हुँ खोटो' आम ए कवि वोल्या ते वख्ते चकमां उभेली मंत्रींनी यक्षा नामनी पहेली पुत्रीए राजानी आगळ आवी ते सर्वे काव्य भणी देखाड्या. एवं क्रमात्सर्वा अपि तानि काव्यानि पेठः, तथा प्रज्ञासद्भावात्तनो निष्कासितो राजकुलाइररुचिभूपेन, सभा- जनेन च तिरस्कृतः सर्वत्रापमानं प्राप्तः. अथ तेनेत्थं कपट प्रारब्धं, संव्यायां गंगाजलांतर्यत्रं कृत्वा दीनारपंच- शती मुक्त्वा प्रभाते तत्र गत्वा गंगां स्तौति, स्तुत्यंते लोकसमक्षं जलयंत्रग्रन्थिपार्दनाक्रम्म हस्ते गृहीत्वा जनेभ्यो दर्शयति मत्स्तुतिरंजिता गंगा मह्यमेवं दत्ते. एज क्रमे साते पुत्रीओ काव्य वोली रही त्यारे राजकुलमांथी वररुचिने निकाली मूक्या तेम सभाजनोए पण तिरस्कार को एटले कवि सर्वत्र अपमान पामी खिन्न थया. हवे आ कविए एक कपट आरंभ्यु-सन्ध्याटाणे जइ गङ्गाजळनी अन्दर पांचसो दीनारनी पोटली यन्त्र ( कमान ) थी दवावी मूकी आवे अने सवारे त्यां जइ नाहीने गगाजीनी स्तुति आदरे ते स्तुति थइ रहे त्यारे जळनी अन्दर यन्त्रनी जे गांठ होय तेने पगवती दवावे के पेली पांचसो दीनारनी पोटली उपर हाथमां आवे ते लोकोने देखाडे ने कहे के-'मारी स्तुतिथी प्रसन्न थइ गंगा मने आ दीनार आपे ले. राज्ञा तु कार्पण्यान्ममासत्कलंकमारोप्या तिरस्कारः कृत इति च वदति, तद्वार्ताश्रवणाल्लज्जितो राजा तवृत्तांत भाषांतर সাল? , ॥१२॥ ॥१२॥ शकहालमत्रिणोऽने कथयामास, मत्रिणा तत्र चरप्रेषणेन तबालमंत्र ज्ञात्वा दीनारपञ्चशतग्रन्थिमानाप्य खकरे घृत, प्रभाते तत्र भूपति स नगरलोकस्तत्रायात, वररुचिरपि गगा स्तौति, स्तुत्पते पादाक्रमेण हस्ताभ्या च जलमालोडगन्नपि न प्रथिमामोति, विखिन्नो वररुचि , मन्त्रिणेवमुक्त भो वररुचे ! तव कल्पे किं अधिक्षेपो विस्मृत.? किंवा क्षिप्तोऽपि दीनारग्रथिरन्येनापहृतः ? यया नदराज्ये परद्रव्यापारी कोऽपि नास्तित्युक्त्वा स अधि. सर्व- जनाना भूपतेर्वररुच दर्शिता, चरणप्रेषणवृत्तातच प्रकटिता राजाए तो पणतानेलीधे मारा उपर खोटु कल क आरोपी तिरस्कार कर्यो, आम बोले ते वात राजाए सांभळी त्यारे शरमाइने ए वात राजाए शकडाल मत्री आगळ कही. मत्रीए छुपा दूत मोकलीने ए जाळ य प्रनी हकीकत जाणी लइ पाचसो दीनारनी पोटली गङ्गामाथी कढावीने पोताना हाथमा लीधी सवारमा नगरना लोको सहित राजा गहाजी उपर जोवाने आव्या वररुचिए गङ्गानी स्तुति करवा मांडी. स्तुतिने अते पगे दवावी हाथी जल डोळवा मांडयु पण पोटली न जडी सारे वररुचि खिन्न थयो. मत्रीए कधु के वररुचि काले गाउडी नाखवानु भूली गया छो के नाखेली दीनारनी गाडी कोर उपाठी गर्यु छ? यदा आनदराजाना यमा परद्रव्यनु अपहरण कोइ करेज नहिं ? आम कहीने ते गांठडी सर्वजनोने तथा राजाने देखाही अने छुपो दूत मोकल्या वारतनो वृत्तात पण जाहेर कर्यो. ततो लोकधिकृत विन्नो वररुचिर्मुग्वमाच्छाघ मत्रिदत्त च प्रथि लात्वा स्वगृहे गत , तत पर मत्रीरिछद्राणि उत्तराध्य- घनसू भाषांतर अध्ययन२ ॥१२२॥ ॥१२२॥ विलोक्यते, परं न पश्यति, ततो मन्त्रिगृहदास्या सह स स्नेहं चकार, तद्गृहवाती च पृच्छति, सापि तत्स्नेहलुब्धा सर्व कथयति. अन्यदा तस्याग्रे तया प्रोक्तमधुना श्रीयकविवाहः- समायातोऽस्ति. राजानं गृहे आकारयिष्यति, तत्सत्काराय नवोनच्छत्रचामरसिंहासनशस्त्रादिसामग्री जायमानास्ति. आथी सर्वलोकोए धिक्कार करवाथी वररुचि अत्यंत खिन्न थइ मोडं ढांकीने मंत्रीए आपेली पोटली लइने पोताने घेर गयो. आ बनाव पछी वररुचिए मंत्री शकडालनां छिद्र गोतवा मांड्यां पण क्यांय जोवामां आवे नहिं त्यारे तेणे मंत्रीना घरनी दासी साथे स्नेह वांध्यो अने ए दासी द्वारा मंत्रीना घरनी सर्व वात पूछवा लाग्यो. ते दासी पण वररुचिना स्नेहमां, लोभाइ वधु तेने कहेवा लागी, एक वखते ते दासीए वररुचि पासे आवीने का के-' हमणां श्रीयक ( शकडालनो नानो पुत्र ) नो विवाह आवे छे ते मंत्री पोनाने घरे राजाने जरुर बोलावशे ते वारे राजानो सत्कार करवा माटे हालमां नवीन छत्र चामर सिंहासन शस्त्र आदिक सामग्री बनाववानी तैयारी चाली रही छे. ततो वररुचिश्छिद्रं मनसि कृत्वा नागरिकडिंभान मोदकदानेनेदं पाठयति-नंदराय नवि जाणई । जं करेसि ॥ नंदराय मारी उ करी । सिरिय उ राज ठवेसि ॥ १॥ पठति ते तथैव मार्गे मार्ग, तद्राजवाटिका गच्छता राज्ञा श्रुतं, मन्त्रिगृहे चराः प्रेषिताः, तैस्तत्र छत्रादिसामग्री जायमाना दृष्टा, राज्ञोऽग्रे कथिता, राजा रुष्टः, प्रभाते प्रणामार्थ गतेन मंत्रिणा क्रोधवहिज्वालामालाकुलो दृष्टः, ज्ञातं च खकीयसकलकुटुंबक्षयकारिराजकोपस्वरूपं. सगडाल M भाषांतर अध्ययनर यमनमा ॥१२३॥ ॥१२३॥ आ टाकणे वरचिए छिद्र कल्पना परी नगरना बालकोने मोदक आपीने एक गाथा बोलाववानु चालु कयु, गाथानो अर्थ एको छ के-नदराय नथी जाणतो जे शकडाल करशे रायने मारीने श्रीयकने रान उपर यापशे.'आ गाथा बाळको मार्ग मार्गे बोलतां फरतां हता ते राजवाडीए जता राजाए साभब्यु. तरत मत्रीने घरे छुपा दूतो मोक्ल्या त्यां तेओए छत्रादि सामग्री तैयार यती दीठी अने राजा आगळ आवी हकीकत कही राजा रोषे भराणो सवारमा मत्री ज्या सलामे जाय त्यो तो क्रोधामिनी ज्वालामओयी राजाने आकुळ जोया, मनमा समजी गयो के आ टाणे राजाना कोपनु स्वरूप मारा सकल कुटु पनो क्षय करीनाखे एबु जणाप छे त्वरितमेव पश्चात्स्यगृहे गत , श्रीयकस्याग्रे राजकोपस्वरूपमुवाच, पवन सचिवेन तस्य शिक्षा दक्षा हे वत्स। कन्ये यदाह नृपस्य प्रणाम करोमि तदा त्वया खगेन मन्दिरछेद कार्य , अन्यथा सर्व कुटुयक्षयमसौ फरिष्यति मुवक्षिपताल पुरविषस्य मम शिरश्छेदे तव न कोऽपि दोष इति पैत्रवचस्तेन महता कष्टेन प्रतिपन्न आम जाणीने तरतन पोताने घरे गयो अने श्रीयकनी आगळ राजाना कोपनु स्वरूप वर्णवी देखाइयु अने शकडाल म त्रीए पोताना पुत्र श्रीयफने का के तु तो वहेगे रामा पासे रोज जाय छे हु ज्यारे त्या आधी रानाने जेवो प्रणाम करता नीचो नमु के तारे खड्गवती मारु मस्तक छेदी नाखवु, जो तु आम नहिं कर तो राजा आपणा तमाम कुळनो नाश करावी नाखशे अने हु तो मुखमां हरताळर्नु विष नाखीने भावीश एटले मारु माथु कापवानो नने दोप नहिं लागे. आ पितानु वचन घणीन रगझगने अते ते पुत्रे काल क् उत्तराध्य- पन सूत्रम् भाषांतर সাগৰ ॥१२४॥ ॥१२४॥ प्रभाते राज्ञोऽने तीच कृतं, राजपर्षदि हाहाकारो जानः, राज्ञोक्तं हे श्रीयक ! किमिदं त्वया कृतं ? श्रीयक प्राह हे राजन् ! मम पित्रा न प्रयोजनं किंतु तवाज्ञायां प्रयोजनं यसवानिष्टं तन्ममाप्यनिष्ठमेवेत्यसौ मया हतः, तुष्टो भूपति। श्रीयकस्य कथयति त्वं मन्त्रिमुद्रां गृहाण ? तेनोक्तं मम वृद्धभ्राता स्थूलभद्रः कोशागृहे तिष्ठति. ततः स्थूलभद्रो नृपेणाकारितस्तत्रायातः, नृपेणोक्तं मन्त्रिमुद्रां गृहाण ? तेनोक्तमालोच्य गृहीये. अने सवारे रागानी पासे तेज प्रमाणे कयु. राजसभामा हाहाकार पर्ती रखो. रानाएं कहा के- अरे श्रीयक! आ ते शृं कर्यु ? त्यारे श्रीयके उत्तर आप्यु के-'हे रामन् ! मारे बापर्नु कंइ प्रयोजन नवी रितु आपथीनी आशानुं प्रयोजन छे. तमाएं जे अनिष्ट ते मारु पण अनिष्टन मार्ने छ तेथी में आ पिताने मार्यो छे. आ सांभळी राजा तुष्ट यइ श्रीयफने कथु के-'मन्त्रिनी महोर तुं ग्रहणकर ' तेणे कयु के-'पारो भाइ स्यूलिभद्र कोशानामनी वेश्याने घरे रहे छे, राजाए ए स्थूलिभद्रने बोलाव्यो एटले ते रामा पासे आव्यो राजाए कयु मंत्रिमुद्रा विकारो-अनि मंत्रिनु सील-महोर लइ मारा मंत्री बनो' ते स्धूलिभद्रे कधु के-विचारीने ग्रहण करीश. ततोऽशोकवाटिकायां गत्वालोययति संसारस्थानित्यता, पितृविनाशकारिण्या मुद्रायाः शाकिन्या इव त्यागा- हतामालोच्य लोगोऽनेन कृतः, गृहीता खयं तपस्था राजसभायां समायातस्यास्य नृपेणोक्तं भोः स्थूलमालोमित ? स्थूलभद्र प्रात, लोगित शिरो मयेत्युक्त्या गतः स्थलभाः कमिग्नगरे संसूतिविजयपरेः शिष्यो जातः. . - 44 , . - उत्तराध्य भाषांतर अध्ययन ॥१२॥ ते पछी आशोपालवनी वाडीमा जाने विचार करता लाग्या रिचारने अते संसारनी अनित्यता तथा पितविनाश करनारी शाकीनी जेवी मत्रिमुद्रानो त्याग योग्यता विचारीने तेणे त्याज लोच को अने तपस्या वय कइ लीधी राजसभामा स्थूलिभद्र आव्या सारे रानाए का के 'केम स्धूलिभद्र ! विचार करी लीयो ?' स्थलिभद्रे जवार आप्यो के हा लोचित शिर' आलोचित =अर्थात् मस्तानो लोच को एटले त्याग करीने मे तो दीक्षा ग्रहण करी लीधी आटल वोलीने स्थूनिभद्र चालता थया. अने कोइ नगरमा जइ सभूतिविजयना शिष्य थया अब भ्रातृमोहेन श्रीयक. कोशागृहे आलापनाय गच्छति वदति च हे कोशे! त्वत्पतिर्मभ्राता स्थूलभद्रो यतिर्जातः, त्वत्पतिपिता शकडालब क्षय गतस्तत्कारणमसौ वररुचिर्भो ज्ञेय , स च त्वगिन्यामुपकोशायो रक्तोऽस्ति, ययममु मद्यपानरत करोति तमा विधीयतामित्युक्त्वा श्रीयक स्वगृहे गत पेलो श्रीयफ भाइना मोहथी कोशाने घेर भाइने बोलाववाने जइने कहे छे के-'हे कोशे ! तारो पति मारो भाइ स्थूलिभद्र पति थयो, तारापतिनो पिता शकडाल पण क्षय पाम्यो ए वधानु कारण आ वररुचि भट्ट जाणवो, अने ते तो तारी पेन उप- कोशामा आसक्त छे मारे ए उपक्रोशा आ वररुचि मधपान करवामां परापण याय एम करे तेवु कंइक भवु जोइए' आट कहीने श्रीयक पण होताने घरे गयो. अथ कोशावचनादुपकोशा त वरचि मद्यपानरत चकार शाततवृत्ताता च कोशा मद्यपानमसौ कुर्वनस्तीति -- उराराध्या भाषांतर अध्ययन यन सूत्रम् ॥१२६॥ ॥१२६॥ श्रीयकायाचख्यौ. अन्यदा राज्ञा शकडाल सारितोऽहो गुणवान शतको भक्तो महामंत्री ममाभूत् , ईदृशोऽसौ यदित्थं मृतस्तन्मे मनसि दूयते, इति राज्ञोक्तमाकर्ण्य श्रीयकः प्राह यन्मे पितेत्यं मृतस्तत्र मद्यपानकार्ययं परमचिरेव कारण, श्लोकशिक्षण डिभानां तेनैव कृतमित्यादि वार्ता चकार. कोशाना वचनथी उपकोशाए वररुचिने मद्यपानने व्यसने चडाव्यो. आ वृत्तांत कोशाए जाण्यो त्यारे श्रीयकने तेणीए का के वररुचि हवे खूब मद्यपान करतो थयो छे. एक बख्ने राजाने पोताना शकडालमंत्रितुं स्मरण गयुं अने कईवा लाग्या के-' गुणवान् , शक्तिमान् , भक्त; मारो ए महामंत्री एवी रीते मृत थयो तेभी मारं मन घणुं दूभायछे. ' आवां राजानां वचन सांभळी श्रीयक वोल्यो ' मारा पिता जे एवी रीते मराणा तेनुं कारण आ मधपीनार वररुचिज छे. छोकराओने श्लोक शीख- वीने तेणेज बोलाव्या हता. राजा पप्रच्छ वररुचिः किं मद्यपानं करोति ? श्रीयकः माह श्वो दर्शयिष्यांमीत्युक्त्वा स्वगृहे श्रीयकः गतः. अध प्रभाते नृपपर्पशुपविष्टानां सर्वेषां नराणां करेपु संकेतितपुरुपेग कमलानि श्रीयको दापितवान् , मदनफल- चूर्णमिश्रितं कमलं च वररुचये दापितवान्. तद्गंधमाप्रावररुबिना पीत मद्य तत्रैव वांत, राज्ञा तस्य धिकारपूर्व नागरिकविप्रवृन्दवचसा तप्तत्रपुपान कारित, स मृतः. आ वार्ता सांभली राजाए पूछ्यु के-'शुंगररुचि कवि मद्यपान करे छे? ' श्रीयके कयु के-'हुँ आपने काले देखाडीश' .

भाषातर अध्ययन२ ॥१२७॥ ॥१२७॥ - आलु कहीने श्रीयक पोताने घर गयो. वीजे दिवसे सारे राजसभामां वैठेला सर्व पुरुषोना हाथमा प्रथमयी सकेत आपी राखेला पुरपने हाये श्रीयके कमलना पुष्प देवराया अने मीढलना चूर्णवाल कमळ वररुविने अपान्यु तेना गधमात्रथी वररुचिए पीधेला मधनु त्या वमन की. राजाए तेने धिकारपूर्वक नगरना ब्रामण समुदायना वचनयी तपावेलु जसत पीय राव्यु तेथी ते मरीगयो अप क्रमाविहरत. स्थूलिभद्रादिशिष्यसहिता. श्रीस भूतिविजयाचार्या पाटलिपुरे पतुर्मासकस्थित्यै समा- याता.. तक शिष्य कृतचतुर्मासकोपवास सिंहगुराया गुज्ञिया स्थित. एका दृष्टिविपसर्पविले स्थित , एक पुनः कृपदारणि तथैव स्थित स्थूलभद्रस्तु निवारारकारि कोशावेश्यागृहे गुर्वाज्ञया स्थित . कोशया त्वस्य पुर- स्तादृशा हावभावा विहिता यथा परमयोगीश्वरोऽपि यति परमेतस्य मनोन मनागपि क्षुभित, प्रत्युत सा सुशिला श्राविका विहिता, शेप चरित्र तु प्रसिद्वमेव एवं यथा स्थूलिभद्रेण स्त्रीपरिपह सोदस्तथापरैरपि साधुभि सोढन्य तेवामा क्रमथी विहार फरता धूलिभद्रादि शिष्यो सहित श्रीसभूतिविजयाचा चातुर्मास स्थित करता पाटलिपुत्रनगरमां आव्या तेमना शिष्योमाधी एक शिष्ये चारमासना उपवास करवा गुरनी आशाथी सिंहगुफामां स्थिति करी रह्यो, एक बीजो शिष्य जेने जोवायी और चढे एवा दृष्टिविप सर्पना दरमा स्थित थयो, एक शिष्ये वळी कुवाना काष्ठ उपर स्थिति करी अने उत्तराध्य. पन सूत्रम् ॥१२८॥ स्थूलिभद्र तो नित्य आहार करनारा कोशावेश्याने घरे गुरुनी आज्ञा लड्ने रसा. कोशावेश्याए तो एवा हावभार आदर्या के भाषांतर जेथी परमयोगिश्वर होय ते पण द्रविभूत थइ नाय. पण आ स्थूलिभद्र मुनिनु मन जराय क्षोभ पाभ्यु नहि. उलटानी ते कोशा- ৪ নং वेश्या सुशीला श्राविका बनी गइ. बाकीचें चरित्र प्रसिद्धन छे. आम जेवीरीते स्थूलिभद्रे सीपरीपड सद्यो तेम अन्य साधु पुरुषोए पण सहन करवो जोइए. ॥१२८॥ अथैकत्र स्थितस्य मुनेः स्त्रीप्रसंगः स्यात् , अतवर्या कार्यति हेतोपर्यापरीपहः सोडव्या, अनस्तमाद- एकज स्थानमां स्थिति करी रहेनारा मुनिने स्वीपसंग थाय माटे तेणे चयां भ्रमण करता रहेवू जोइए ए हेतुथी नर्या- परीपह सहन करवानु निरुपण करे छे. एग एवं घरे लाढे । अभिभूय परीसहे ॥ गामे वा नगरे वावि । निगमे राय हाणिए ॥ १८ ॥ असमाणो चरे भिक्खु । नेय कुजा परिग्गहं ॥ असंतत्तो गिहत्थेहिं । अणिकेउ परिव्वए ॥ १९ ॥ मूळगाथा:-ला-संयमी साधु-क्षुधादिक परिषदोबडे अमित-पीडित उतां तेने सहन करीने गाममां नगरमां अथवा वणिक्नी वस्तीवाळा प्रदेशमा अथवा गजधानीमां पण एफलोज पिचरे ॥ १८॥ मूळगाथार्थः-भिक्षुः असमान-कोहनी साये समानना न धारतो पिचरे अने प्रामादिकमा फ्याय परिग्रह-ममतादिक नज करे तेम गृहस्थो साथे सर्वदा असंसक्त-लेशपण भामक्ति वगरनो, अनिकेत-गृहादिरहित चारेकोर विचार करे. ॥ १९ ॥ . -- are

भाषांतर
अध्ययन
पासूत्रमा
॥१२९॥
॥१२९॥
व्या-लाह साधुरेक एवं चरेत् , लाढयति यापयति आत्मानमेषणीयाहारेण निर्वाहयतीति लाद', कुन कुत्र
विचरेत् ? ग्रामे वाथवा नगरेऽपि, अथवा राजधान्यामपि द्रव्येण भावेन चैकाक्येव विचरेत् , तत्र ग्राम. कटकादि-
वेष्टित , नगर प्राकारादियुक्त, निगमो वणिग्जनस्थान, राजधानी राजस्थानमेतेषु विहार कुर्यात्, पर कीदृश. सन्
भिक्षुविचरेत् ? असमान सन न विद्यते समानो यस्य सोऽसमान , गृहस्थोऽयतिथिलोकेभ्योऽधिक सर्वोत्कृष्ट ,
पुनः कीदृशा ? गृहस्थैरससको परस्थै सहास मिलित , पुन कीदृशः ? अनिकेत., न विद्यते निकेतो गृह यस्य
सोऽनिकेतोऽनगार', एतादृश सन् परिव्रजेत् सर्वतो विररेत् ॥ १९ ॥
अर्थ ---एपणीय आहारवडे आत्मानु लाग्न-यापन करे छे तेथी लाढए साधुवाचक छ अर्थात् लाद एटछे साधु, परीपहने
सहीने एकलोज सर्वदा विचरे, क्याक्या विचरे ? ते दर्शावें छे. गाममा अथवा नगरमां तथा निगममा अने राजधानिमां पण
भावथी तथा द्रव्यथी एकाकीज विचरे. काटानीवाडवाना गाम कडेवाय, किल्ला गढवाळा स्थान नगर कहेवाय,वेपारीओनां
स्थान निगम अने राजाओ जेमा रहेता होय ते राजधानी गणाय; एवा सर्वस्थानोमा भिक्षुए, असमान-अन्य पृहस्य के
तीथिलोक पोताना तुल्य अथवा अधिक-सर्वोत्कृष्ट कोइ साथे न होय तेवी रीते अने गृहस्पथी अससक्त अर्थात् कोइ गृहस्थ
सापे मळीने नहिं, बळी पंह परिग्रह न करता तेमज अनिकेत कोइपण ठेकाणे पोतानी स्थान कल्पना नहिं करतां अनगार
रहीने विचरवु ॥ १९ ॥

ve उत्तराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययनर ॥१३॥ ॥१३०॥ अत्र संगमस्थविरदृष्टांत:-कोल्लागपुरे संगमस्थविरा यहुश्रुता यथास्थितोपसर्गापवादनिपुणा दुर्भिक्षे गणं देशांतरे प्रेष्य स्वयं नगरं नवभागीकृत्य व्यवस्थिताः, नगरदेवता च तेषां गुणे रंजिता. अन्यदा तत्र गुरुवंदनार्थ दत्तनामा शिष्यः समायातः, तद्भवलर्थ गुरवः सपात्रं तं सार्ध लात्वा भिक्षायां गताः, एकस्येभ्यस्य भद्रकप्रकृतेहे बालो व्यंतरेण गृहीतः सदा रोदिति. अर्हि संगमस्थविरनु दृष्टांत कहें छे-कोल्लागपुरमा पूर्वे जेणे घणु शास्त्र श्रवण करेलु छे एवा अने ज्यारे कोइ उपद्रव आवी नडे तेनो मतीकारमा निपुण एवा संगमस्थविर साये मळी रहेनारावृद्धजनो-दुष्काळना समयमां जनसमुदायोने देशांतर मोकली पोते नगरना' नव भाग करी व्यवस्था बांधी रहेता हता. नगरदेवता पण तेओना गुणोथी राजी रहेता. एक समये त्यां गुरुवंदन करवा दत्तनामनो शिष्य आव्यो तेनी भक्ति जोइ गुरु ते शिष्यने पात्र सहित साथे लइने भिक्षा लेवा गया. एक धनाढ्य भलाखभाववाला गृहस्थने घरे वाळकने व्यंतरे गृहीत करेलो तेथी हमेशां रोया करतो. उपायशतसहस्रकरणेऽपि व्यतरदोषोपशांतिर्न जाता गुरवस्तद्गृहे गताः, चप्पुटिकाकरणपूर्व मा रुद् वालेत्युक्तं, आचार्यतपस्तेजसा व्यंतरो नष्टः, तुष्टास्तन्मातृपितृप्रभृतिस्वजनास्तेभ्यो मोदकादिकमाहारं गाढाग्रहेण दत्तवतः, ते मोदकास्तस्यैव शिष्यस्य गुरुभिर्दत्ता, स्वयं त्वंतप्रांतमाहारं विहत्व भुक्तवंता. सेंकडो हजारो उपायो करतां पण ए व्यं तरनी उपशांति न थइ त्यारे गुरुओ तेने घरे गया. चपटीयो वगाडीने 'हे भाषांतर अध्ययनर ॥१३॥ पाळ! रोमां' आम कहेतानी सारे आचार्यना तपासामर्थ्यवरे बंतर नादो जने सासक रोती रही गयो तेवी ते बाळकनां माता- उत्तराध्य पिता आदिक स्वजन् संतोप पामी घणा आग्रहथी आचार्यने मोदकादिक आहार आप्यो. भा मोदकादिक जे मग ते गुरुए शिग्यने पन सूत्रमा आपी दइ पोते अतमामाभी वहोरी आवीने भोजन करें। ॥१३॥ प्रतिफमणावसरे तस्प शिप्यस्प पिंडदीपमालोचयेति गुरुभिरुक्त, शिप्यभिंतपत्यसो धात्रिपिंड सदा भुक्त, ममत्वेवं कथयतीति चिंतनसमय एव तापनार्थ देवतयाधकार विकुक्ति, स भृश विभेति, गुरु प्रति च वक्ति अहमत्र दरस्थो विभेमि, गुरव माहुरेहि मासमीपे ? स वक्त्यस्मिन् घोराधकारे नाहमागतु शक्रोमि, गुरुभिस्थू- | स्कृतकृतलिसा स्वागुली दर्शिता, तदुद्योतेन सोऽत्रायात , पर चिंतयति गुरयो दीपक रक्षयति अतिक्रमण आसरे ते शिप्यने । आहारदोपनी आलोचना करा' आम गुरुए की त्यारे शिप्य मनमा चिंतन करवा लाग्यो के-'गुरु पोते तो धामिति (धाव्यनी पेठे चाळकने रमाडीने-पोलावीने जे मिक्षा लेवी ते धानीपिंड नामक भिक्षानो एक दोप गणाय छे सदाय लीये छे अने मने आम टाके छे, आम ज्या एशिय मनमा तिन करे छे त्यां तेने वीरडायमा देनताए अंधकार फरी दीपो त्यारे ते शिप्य अत्य त व्हीनो अने गुरुने कहेगा लाग्यो के-हु भो दूर रह्यो पीहु छु गुरए कानु के 'मारी समीपे आव ' त्यारे शिष्ये या के-'आ घोर अधारमा हु आवी शस्तो नथी' त्यारे गुमए पोलानी एक आगली धुंकवाली करीने देखाडी तेना उनालायी ए शिग्य गुरु पासे आव्यो पण मनमा एम धार्यु जे गुरु पोता पासे दीत्रा राखेछे . ,

ue
उत्तराध्य.
भाषांतर
अध्ययन२
॥१३२॥
॥१३२॥
एवं चिंतयन्नेवासो देवतया चपेटाभिस्तर्जिता, ज्ञातस्वरूपैर्गुरुभिस्तस्य नवभागीकरणादिकं स्वरूपं प्रकाशितं,
यथा संगमस्थाविरैविहारक्रमापरपर्यायवश्चर्यापरीषहोऽध्यासितस्तथा ग्लानत्वावस्थायामपि क्षेत्रनवभागीकरणेनापि
चर्यापरीषहोऽन्यैरध्यासितव्यः.
आवो विचार ए शिष्ये कर्यों के अदृश्य देवताए तेने एक थपाट मारी झाटक्यो. जणायु छे स्वरूप जेनुं एवा, गुरुए तेने नव-
भागीकरुणादिक स्वरूप प्रकाशित कयु, जेम संगम स्थविरोए विहारक्रम अपरनामवाळो चर्यापरीपह वेठ्यो तेवी रीते ग्लानतादिक
अवस्थामा पण क्षेत्र नवभागीकरण वडे पण चर्यापरीपह अन्य साधुननोए पाळवो.
अथ यथा ग्रामदिष्वप्रतियद्धेन चर्या सह्यते, तथा शरीरादिष्वप्यप्रतिबद्धन नैषेधकीपरीषहोऽपि सहनीयः,
अतस्तं परीषहमाह-
जेम ग्रामादिकमां वगर प्रतिबंधे चर्या सहन कराय छे तेमन शरीरादिकने विपये पण अप्रतिवद्ध नैषेधकी परीपह सहन करवो
ए समजाववा माटे नैषेधकी परीषह कहे छे.
सुसाणे सुन्नगारे वा । रुक्खमुले व एगओ ॥ अकुक्कुओ निप्तीइजा । न य वित्तासए परं ॥ २० ॥
तत्थ से अस्थमाणस्स । उक्सग्गाभिधारए ॥ संकाभीओ न गच्छिज्जा । उद्वित्ता अन्नमासणं ॥ २१ ॥

उत्तराध्य
धन सुत्रमा
| भाषांतर
अध्ययन२
॥१३॥
॥१३३॥
मूळगाधार्थ -स्मशानमा अथवा शम्यागारमा-जेमां कोर रहेतुं न होय तेवा घरमा अधया वृक्षमूले (साधुर) फलाज
भकूमाजव्यर्थ लयारो न करतां-बेसी रहेवु कोइपर अन्य जमने त्रास न मापयो ॥ २० ॥
भूळगाथार्थ:-तत्र-मशानादिक स्थाने स्थित थयेला ते साधुने उपसर्ग-उपद्रयो थाय त्यारे ते उपसगनु साधुए
मभिधारण-दवित्तथी सहन करषु भने शकाधी भयपामी स्थानेथी उठीने अन्य आसने जता न रहेषु ॥ २१ ॥
व्या०-साधुरेका एकाकी सन् श्मशानेऽथवा शुन्यागारे शन्यगृहेऽथवा वृक्षमले निपीदेदुपविशेत् , परतत्र कीदृशः
सन्' अकौकुच्य , नास्ति कौकुच्य यस्य सोऽकौकुच्य., कौकुच्य हि भडविट्थेष्टोच्यते, तया रहित' सम्पक साधुमुद्रा-
युक्त इलार्थ पुन साधुस्लत्रनिषण्ण सत्परम य जीव न विनासयेत् , तत्रस्थ जीव स्थानभ्रष्ट न कुर्यादित्यर्थ ॥२०॥
अर्थ -साधुए स्मशानमां शूयागारमा अथवा क्षमूळे एरला वेठा रहे अने ते भाड तथा विटना जेवी चेष्टा कर्या विना,
अर्थात् शाविधी साधुमुद्रा धारण करी रहे अने त्यां सीने पर-अन्य कोइ जीवने त्रास आपको नहिं अर्थात् त्या स्थिति करी
रहेला जीवने स्थानभ्रष्ट करता नहिं २०
पुनस्तदेव दृढयति तत्थेति' पुनस्तर श्मशानादावास्थीयमानस्य भिक्षोयदोपसर्गा भवेयुस्तदा तानुपसर्गान्
साधुरभिधारयेत् किमेते उपसर्गा वराका मम करिष्यति ? स्वयमेवोपशाम्य यास्यतीति मति कर्तव्येत्यर्थः पर
शकाभीत. सन् तत आसनादातापनास्थानादुरधायान्यदासन न गच्छेत् , आस्यते उपविश्यतेऽस्मिन्नित्यासन,
आतापनास्थानमुच्यते ॥२१॥

उत्तराध्य- पन सूत्रम भाषांतर अध्ययनर ॥१३४॥ ॥१३४॥ एज अर्थने दृढ करे छे. त्यां-स्मशानादिकमां स्थित यएला भिक्षुने ज्यारे कइ उपद्रव थाय त्यारे ते उपसर्गोने ए साधुए अभिधारण करवा, एटले 'आ उपसर्गो विचारा मने | करी शकवाना छे ? ए उपद्रवो एनी मेळेज उपशांत थइ जशे' आवी मति राखवी पण शंकाभीत-एटले मनमां भयनी आशंका लावीने ते आसनथी अर्थात् ए आ तापना स्थानथी उठीने अन्य आसने जतुं न रहे, ॥ २१ ॥ अत्र कुरुदत्तसाधुकथा--हस्तिनागपुरे इभ्यपुत्रः कुरुदत्तनामा प्रबजितो विहरन क्रमात्साकेतपुरदरप्रदेशे प्रतिमायां स्थितः, तत्र चरमपौरुष्यां गोधनापहारिणश्चौराः समायाताः, तत्पृष्टौ त्वरितं गताः, पश्चाद्गोखामिनः .समायातास्तैश्चौरमार्गखरूपे पृष्टे स यतिनं किंचिद यूते. ततः संजातकोपैस्तैः शिरसि मृत्पालिं कृत्वांगाराः क्षिप्ताः, स यतिर्मनानापमृतः, तां वेदनामधिसहमानः सिद्धिं गतः, एवं नैषेधिकीपरीषहः सोढव्या. -आ विषयमा कुरुदत्त साधुनी कथा दृष्टांत रूपे कहे छे- हस्तिनागपुरमा एक धनादयनो पुत्र कुरुदत्त नामनो हतो ते प्रव्रज्या दीक्षा लइ विहार करतो करतो क्रमे करी साकेत अयो- ध्यापुरीथी थोडे दूर प्रदेशमा प्रतिमा काउसग्ग-एटले शरीरव्यापारनो परित्याग करी स्थिति करी रह्यो हतो त्यांकणे चरमपौरुषी रात्रीना पाछला पहोरे गायोनां धणने अपहरण करनारा चोर आव्या ते गायोने वाली तेने पुंठे चालता यया तदनंतर गायोना खामी-मालिक-आव्या तेओए 'ए चोर कये रस्ते गया एम पेला मुनिने पूछयु पण तेणे पोताना नियमने आधीन रही कंडपण Kri মাখনৰ अध्ययन२ ॥१०॥ उत्तर न आप्यु त्यारे ते गायोना प्रमीए आ साधुना मस्तक उपर माटीनी पाळ बांधी तेमा अगारा नाल्या तथापि ते यति जरा पण खस्यो के डग्यो नहि. किंतु ते वेदना सहन करतो सिदि पाम्यो एम नैषेधक परोपह सहन करवा अथ नैपेचिश्यामातापनादिस्थाने खाध्यायादिक कृत्वा शय्यायामुपाये आगच्छेत् , अतस्तस्परीपहमाह- अथ नषेधकीमा आतापनादिस्थाने स्वाभ्यायादिक करीने साधु शग्यामा उपाश्रये आवे एतदर्थ शग्या परीपह कहे छे.- उच्चावयाहि सिजाहिं । तवस्सो भिक्खु थामव ॥ नाइवेल विहन्नेजा । पावदिवो विहन्नइ ॥ २२ ॥ पड़रिक्कृवस्तय लधु । कल्लाण अदुव पावग ॥ किमेगराइ करिस्सई । एव तत्थ हियासए ॥ २३ ॥ मूदगापार्थ-स्थामपान टाढ तडका सहन करवा सामर्थ्यवान् तपस्थिभिक्षुए उव्यावन-उच्चा-मनुकूळ तथा अवय- मतिकूल शय्या जेमा सघाय तेयु उपाधय स्थान मळे तेथी अतिवेळ-वेळा घही जाय तेयो रीते स्वाध्यायादिकने इणवा नहिं कारणके पापडठि-' मा साह नयी आतो म्बराय छे, पपी बुद्धियाळोषिहत थाय छे आचाराच्युत बने छे ॥ २२ ॥ मळगाथार्थ-कल्याण-उत्तम अधया पापक खराब होया छता प्रतिरिक्त-खी पनु पगेरे विनानो खाली उपाश्रय मेलवी साधुप 'आ एक रात्रीचा उपयोगथी मने गु सुखदुस करशे ? आम दयमा लेषु २३ ध्या-तपस्वी भिक्षुमधावाभि शय्याभिपाश्रयै कृत्या स्थामवान् भवेत् , धैर्ययुक्तो भवेत् , कीडशीभिः शम्याभि.? उवाच अवमान उच्चावयास्तामिम्बावचाभि, उच्चा शीतादिरक्षणगुणैर्युता, अवचास्तविपरीता, है । उत्तराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययनर ॥१३८॥ ॥१३८॥ तेना माता पिता एक समये उज्जयिनीमां गया त्यां विहार करता आ वे पुत्र पण जइ चयाः अहीं तेना देशनी रीत प्रमाणे विविध प्रकारना औषधो नाखीने तेने घरे सुरा नामनु विकट-ऊनु पाणी करातुं हतुं ते खजनोए आ येने आप्यु. तौ तत्स्वरूपमजानती जलविशेषवुध्या पीतवतो, परिणते च तस्मिन् ज्ञातमद्यस्वरूपौ तौ कृतपश्चात्तापौ तद्वै- राग्यादेवानशनं पादपोपगमनामकं नदीतटस्थकाष्टोपरि प्रपन्नौ. ततोऽकालवृष्ट्या नदीपूरेण प्लावितो समुद्रातः प्रविष्टौ, तत्र जलचरोपसर्ग विपत्यदिवं गतो. इमो हि नीरपूरागमेऽपि शय्यातो न पृथग्भूतो. एवं शय्यापरीपहः. अने तेओए स्वरूप जाण्या विना आ कोइ विशेष प्रकारचें जल छे एनी बुद्धियी पीधुं पण ज्यारे परिणामे मद जणाणो त्यारे ए जळमां कंइ मद्य आदृश्य हतु एवु भान यतां पश्चाताप करी वैराग्य उत्पन्न थवाथी बनेये अनशन-निराहार पादपोपगमन-(कोइ वृक्षतळे जq ) नामर्नु व्रत लइ एक नदीतटे पडेला काष्ठ उपर जइ वेठा, आ वख्ते अकाळ वृष्टि थवाथी नदीना पूरमां काष्ठ साये बन्ने जणा तणाणा अने समुद्रमा जइ पज्या त्यां जळचर जंतुओना उपद्रव सहन करी स्वर्गे गया. आ वे जणा पाणीनुं पूर आव्यु तो पण आसनथी शय्याथी पृथक् न थया अने शय्या परीपह सहन करी सिद्धि पाम्या. अथ शय्यास्थितस्य तत्रोपद्रवे जाते सति रागद्वेषरहितस्य साधोदा कधिचयातरो वा शय्यातरादन्यो वा वचनैराकोशेदिति हेतोराक्रोशपरीपहोऽपि सोडव्यः, अतस्तत्परीपहमाह- उत्तराध्य - भाषांतर अध्ययन ॥१३॥ हवे शग्या स्थित साधुने शय्यामा उपद्रव आवे सारे रागद्वेष रहित साधुने कोइ शग्यातर अथवा तेथी अन्य कोई वचनोवडे तिरस्कारे अवाच्य शब्दो कहे त्यारे ते आक्रोश परीगह पण सहन करवो एतदर्थ आक्रोश परीपहनु निरूपण करे छे - अकोसिज परो भिक्खु । न तेर्सि पडिसजले ॥ सरिसो होइ वालाण । तम्हा भिक्खू न सजले ॥२४॥ सुच्चाण परुसा भामा । दारुणा गामकटया ॥ तुसीणीओ उवेहिजा । न ताओ मणसी करे ॥२५॥ मूळगाथार्थ -पर-अय कोर मिक्षु-साथुने आक्रोशे अर्थात् निन्दादि पचनोनडे तिरस्कार करे तेना प्रति पण पोते जवले कोपे नदि कारणके एम कोप परवाथी साधु बालसहश-मूर्ख बनें छे ते कारण माटे भिभु-साधुए ज्यलघु नहिं सामा पळी न उठवु ॥ ९४ ॥ मूळगाथाथ-साधुए दारुणा-सयमनु धैर्य नाश करे एवी परुप-कठोर तथा श्रवणादि इद्रियोने षटफतुल्य वेदना करे एवी भाषा सामळीने पण तूष्णीक-चुपचाप मीनभावधारी-उपेक्षा करवी ते भाषाने मनमा पण न लायवी ॥ २५ ॥ या-परोऽय कश्चिद्यदि भिक्षु साधुमामोशेत दुर्वचनस्तर्जयेत् तदा तस्मै न प्रतिसज्वलेन् , तस्योपरि क्रोध न कुर्यादित्यर्थ , यदि तस्योपरि साधुरपि क्रोध कुर्यात्तदा सोऽपि यालाना मूर्खाणा सदृशो भवेत् , तस्माद्भिक्षुर्न सज्वलेगाली श्रुत्वा प्रतिगाली न यात् अर्थ –पर अय कोइ ज्यारे साधुने आक्रोशे एटले दुर्वचन (गालो) वडे तरछोडे सारे ते गाळो देनार प्रत्ये ते भिक्षु प्रति उतराध्य- पन सूत्रम् भाषांतर সন ॥१४०॥ ॥१४०॥ संज्वलन-एटले सामो बळी न उठे, तेना उपर क्रोध न करे. जो साधु पण तेना उपर क्रोध करे तो ते वाळक मूर्खना जेवोन मनाय, माटे भिक्षुए गाळ सांभळीने सामी गाल देवी नहि. २४ तदा किं कुर्यादित्याह ' सुच्चा ' साधुस्तूष्णीको मौनी सन्तुपेक्षेत, औदासीन्येन तिष्टेत् , रागद्वेषरहितो भवेत् , ता भाषा मनसि न कुर्यात्, किं कृत्वा ? परुपाः कठोरा भाषाः श्रुत्वा, कीदृशीः भाषाः ? दारुणाः, दारयंति संयमधैर्य विदारयंतीति दारुणाः, पुनः कीदृशीः ? ग्रामकंटकाः, ग्राम इंद्रियगणस्तस्य कंटका इव कंटका ग्रामकंटका दुःखोत्पादकाः. यदुक्तं- त्यारे शुं करवु ते कहे छे. परुप कठोर, तथा दारुण संयम धैर्यतुं विदारण करी नाखे तेवी अने ग्रामकंटक-एटले इंद्रिय- गणने कांगनी पेठे दुःख आपनारी भाषा श्रवण करीने साधु तूष्णीक मौनी यइने स्थिर रहे. रागद्वेष रहित बनी एवी भाषा मनमां न लेतां उपेक्षा करे. कयुं छे के- चांडालः किमयं द्विजातिरथवा शद्रोऽधवा तापसः । किं वा तत्वनिवेशपेशलमतियोगीश्वरः कोऽपि वा ॥ इत्यस्वल्पविकल्पजल्पमुखरैः संभाष्यमाणा जनैनो मष्टो न चैव हष्टहृदयो योगीश्वरो गच्छति ॥१॥ पुनर्गालीं श्रुस्वेति चिंतयेत् ददतु ददतु गालीगर्गालिमंतो भवतो । वयमपि तदभावाद्गालिदानेऽप्यशक्ताः । जगति विदितमेतदीयते विद्यमानं । ददतु शशविषाणं ये महात्यागिनोऽपि ॥ १॥ इतिविचार्य शमत्वेन तिष्टेत. 1 1 भाषांतर अध्ययन पासप्रमा ॥१४१॥ (चाण्डाल . )-'आ ते कोइ चाडाल छे ? के सु आ बामण छ ? प्रथा कोइ शूद्र छ ? के तापस-तपस्वी छे ? किंवा तस्वमानमा मवेश करी शके एवी निपुण मतिवालो आ ते कोइ योगीवर छ? आम अनेक विकल्पना मलापथी वाचाळ लोको गमे तेम भाषण करे तो पण यागीश्वर हर्ष हृदये धरतो नथी तेम रोपे पण भरातो नथी किंतु निर्विक्रिय चाल्यो जाय छे वळी ते जन मुखेथी गाली साभळीने मनमा एम विचार करे-(ददतु०) तमे गाळो देतारहो, केमके तमे गाळोवाळा छो अम पासे गाळो नथी एटले अमे गाळ देवा अशक्त छइए आ जगत्मा मसिद्ध वात छे के-जेनी पासे जे होय ते पोता पासेनी वस्तु दह शके छे न होय ते पण जो काइ दह शक्ता हात तो महोटा त्यागी-दानी पुरुष शशलाद शींगडु पण दा शपत ए तो जेनी पासे जे होय ते से दीये आम विचार शमनो आश्रय फरी रहे ॥२५॥ अप्रार्जुनमालाकारर्षिकथा यथा--अथ राजगृहे नगरेऽर्जुननामा मालिकोऽस्ति, तस्य प्रिया स्कदश्रीनानी वर्तते, स स्ववाटिकामार्गस्थ पुराहहिर्मुन्द्रपाणियक्ष निरतर स्वगोत्रदेवत्वेनाति अन्यदा बाटिकागतस्यार्जुनमालिकस्य समीपे सा भोज्य गृहीत्वा वाटिकाया याति पक्षभवनस्थै पट्पुरुष्टा, भोगार्थ यक्षभवनात प्रवेशिता तदानीमेव तत्र यक्षपूजार्थ मालिक समायात, सवध्वा पडपि पुरुषास्तस्या भोगे प्रवृत्सा.. -आ विषयमा अर्जुनमालाकार अने पापिनी कथा कहे छे. राजगृह नगरमा अर्जुन नामनो माली इतो तेनी मिया स्त्री स्वदश्री नामनी इती ते पोतानी वाडीए जवाना मार्गमां नगरनी .

M पन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥१४शा ॥१४२॥ बहार मुद्रपाणि नामक यसवें स्थान आवे. ते स्थाने ए मुद्गरपाणि पक्षने आ माली पोताना गोमदेवरूपे पूजतो. एक समये वाडीए अर्जुन माली हतो. नेने माटे तेनी स्त्री स्कंदश्री सावान (भात) लइ वाडीए जती हती त्यां ए यक्षभवनमा उभेला छ पुरुषोए दीठी एटले ए छ ए पुरुषोए ए स्त्रीने भोगाथै यक्षभवनमा लइ गया. एज टाणे यक्षनी पूजा करवा पेलो माली आवी चड्यो तेने आ छ जणाए वांधीने तेनी वी साये छएजणा भोगमां आसक्त यया. स पश्यत्येवं च चिंतयति मयैप यक्षो मुधैवाचित, यदेतस्य पुर इत्यं पराभूयते. ततो यक्षस्तच्छरीरमनुप्रविश्य तान पापि पुरुपान स्त्रीसतमान् मारयतिस्म. एवं प्रत्यह मारयति. ततो लोकोऽपि तस्मिन् मार्गे राजगृहपुरासावन निर्गति यावत्सत मारिता न स्युः अन्यदा श्रीवीरस्तत्र समवमृतः, न कोऽपि तयेन वंदनार्य गच्छति. से जोइने मालीना मनमां थयु के आ यक्षनु पूजन तद्दन व्यर्थ छे. जेना आगल आम तीनो पराभव थाय. आ वचन सांभळी पक्षने चीड चडी तेथी यक्षे मालीना शरीरमा प्रवेश करी ए छए जणाने तथा सीने मारी नाख्या. यक्षने छंद लाग्यो तेथी रोज सात माणस मारवा मांड्यां आ उपरथी लोकमां पास पेठो ते ज्यां मुभी सात न मराय त्यांसुधी राजगृह नगरमांथी ते मार्गे कोई न नीकलतुं. एक समये श्रीवीरे त्यां समवसरण कर्य, पेला यक्षना भययी कोइ पण वंदन करवा न आवे. सुदर्शनभेटी यति तवतु, मया त्ववयं श्रीवीरस्तत्र गत्वा वंदनीय गवेति विचित्य तन्मार्गे पलितः, भाषांतर अध्ययन ॥१४३॥ ॥१४३॥ तरा मालिकशरीरमविष्टो मुद्रपाणिर्यक्षो धावित. सात सुदर्शन श्रेष्टिनार्हत्सिद्धसाधुशुद्धधर्मशरण प्रपत्रं, सागारिकमनशनमपि गृहीत, कायोत्सर्गेण स्थित, नतो धर्मप्रभावात्स यक्षस्तमाक्रमितुं न शक्रोति एक सुदर्शन नामना शेठ 'जे यवानु इशे ते पशे मारे तो त्यां जइने श्रीवीरने वदन करवुज आम विचारीने ते मार्गे चाल्यो तेने जोताज पेला मालीना शरीरमा पविष्ट पालो यक्ष तेनी पाछळ दोड्यो. आ टाणे सुदर्शन शेठीयाए आंद सिद्ध साधुनु शुद्ध शरण लइ सागारिक अनशन ग्रहण करी कायोत्सर्ग धारी स्थित थयो ते वसते धर्मना प्रभावथी ते यक्ष ए सुदर्शन शेठनु आक्रमण करी शक्या नहि पश्चायक्षो मालिकशरीर मुक्त्वा गता, स्वस्थीभूतो मालिक. श्रेष्टिमुखातीरागमन श्रुत्वा प्रेष्ठिना सह वदनार्थ गत', वीरवमसा प्रतिद्वोऽसौ दीक्षा गृहीतवान् , राजगृहनगरमध्य एय गृहे गृहे भिक्षार्थ भ्रमति, लोकास्तु स्वजनमारकोऽयमित्याक्रोशान् दति, स मनोवचनकायशुध्ध्या तानाक्रोशान विषयोत्पन्न केवलज्ञान' शिवमगात् एवमन्यैरप्याक्रोशपरीषह सोढन्य ॥ अथ कश्चिदाकोशको दुर्वचनवादी साधोधमपि कुर्यात् , तदा तमपि सहेत अतस्तत्परीपहमाह- एटले ए यक्ष मालीनु शरीर मूत्री दइ चालतो थयो पेलो माली पण यक्ष वेश निवृत थवाथी स्वस्थ थयो त्यारे शेठना मुखथी श्रीवीरनु आगमन सामली शेठनी साथेन वेंदन करता गयो. त्यां श्रीवीरना वचनी प्रतिबुद्ध थइ दीक्षा ग्रहण करी अने -

उत्तराध्य-
पन सूत्रम्
भाषांतर
গশন
.
॥१४४॥
॥१४४॥
राजगृह नगरमांज घरे घरे मिक्षार्थ भ्रमण करे छे. लोको तो 'आ पोताना स्वजनने मारी नाखनारो छे' एम तेनी निंदा करे
अने तेने गाळो देवा मंड्या तथापि ते साधु थएलो माली मन वचन तथा कायाथी शुद्ध रही ते गाळो ने सहन करता केवळज्ञान
उत्पन्न थवाथी कल्याण पाम्यो. एम अन्य साधु पुरुषोए पण आक्रोशपरीपह सहन करवो.
कदाच कोइ आक्रोशक-दुर्वचनवादी-साधुनो वध पण करे तो ते पण सहे एतदर्थ वधपरीपह दर्शावे छे.
हओ न संजले भिक्खू । मणं पि न पओसए ॥ तितिक्खं परमं नच्चा । भिक्खू धम्मं विचिंतए ॥२६॥
समणं संजयं दंतं । हणिज्जा कोइ कत्थई ॥ नस्थि जीवस्स नसोत्ति । एयं पेहिज संजए ॥ २७ ॥
मुळगाथार्थ -भिक्षु कोइए हत-हणाय तो पण कोप करी जळे नहि तेम मनने पण प्रद्वेष युक्त न करे किंतु तितिक्षा
परम धर्मसाधन छे एम जाणीने भिक्षुधर्म-क्षमा आदिक साधुना धर्मोनु चितवन करे ॥ २६ ॥ कोइ मनुष्य क्यांय संयत-संयमी
तथा दांत-इन्द्रियोनु दमन करनार श्रमणने हणे ते वम्बते'ए साधु विचरे के-' जीवनो नाश धवानो नधी आम ए संयत
साधु जुर-मनमां माने ॥ २७ ॥
व्या-भिक्षुः साधुईतो यष्ट्यादिभिस्ताडितो न संज्ज्वलेन क्रोधाध्मातः स्यात् , मनोऽपि न प्रदेषयेत्, विसं
सदेष न कुर्यादिलर्थः. किं कृत्वा ? तितिक्षां क्षमां परमामुत्कृष्टां ज्ञात्वा दशविधसाधुधर्म शांतिमुत्कृष्टां विचार्य
भिर्धर्म विचिंतयेत्. मम धर्म एव रक्षणीय इति विचिंतयेदित्यर्थः. ॥ २६ ॥

पुत्तराध्य भाषांतर अध्ययन२ ॥१४॥ ॥१४॥ . अर्थ-मिथु-साधु, लाकडी वगेरेयी ताडित थाय तो पण न जळे अर्थात् कोइ तेने हणे-मारे-तो पण तेने सामे क्रोधाक्रांत न थाय; तेम मनने पण सद्वेप न करे, स्तुि तितिक्षा-सहन शीलताने परम उत्कृष्ट जाणीने अथात् दशविध साधु धर्ममा क्षातिने सर्वोत्कृष्ट विचारीने धर्मनु चिंतन करे, एटले-'मारे तो धर्मनी रक्षा करवानी छे' एम विचारे २६ कश्चिद दुष्ट कुनचिदनार्यदेशे श्रमण साधु हन्यात् , प्राणापहारमपि कुर्यात्तदा सयत साधुरेच सप्रेक्षेत विचा- रयेत् , एवमिनि कि ? जीवस्य नाशो नास्ति शरीरस्य नाशो विद्यते, न च शरीरनाशे जीवनाश , कीडश साधु ? सयत निद्रिय, पुन कीदृश' दात फ्रोधादिरहित, साधुना मनस्येव चिंतनीय कदाचिदहमस्मिन शरीरना शावसरे मोघ करि यामि तदा मम धर्मरूपजीवित यनाशो भविष्यति, न चास्मिन्ननिवदेहे नष्टे ममात्मनो धर्मस्य च नाशो भाषीति फाइ दुष्ट कोइ अनार्य देशमा श्रमण साधुन हणे, अथात् माणापहार पण यदि करे त्यारे सययमवान् साधु पम विचारे के - 'जीरनो नाश यतो नथी अने शरीरनो नाश तो थवानोज छे अने कह शरीर नाशथी जो नाश थशे नहिं आम धारीने सयत- जितेंद्रिय तथा दात काधादि रहित साधु मनमा पण एम भावन करे के-फदाच हुआ शरीरना नाश अबसरे क्रोध करीश तो मारा धर्मरूप जोषितव्यना नाश थशे भने आ अनित्य देह नष्ट थवाथी मारा आत्माना के धर्मनो कइ नाश थवानो नथी यदुक्त-दोपो मेऽस्तीति युक्त शपति शपति वा त विनाज्ञ परोक्षे ।ळ्या साक्षान्न साक्षादिनि शपनि न पन सूत्रम भाषांतर अध्ययन ॥१४६॥ ॥१४६॥ मां ताडयेत्ताडयेगा ।। नासून मुष्णाति तान् वा हरति सुगतिदं नैष धर्म ममाहो । इत्थं यः कोऽपि हेतौ सति विश- दयति स्याद्धि तस्येष्ठसिद्विः ॥१॥ कर छे के-(दोपो०) मारामां फंदोप हशे त्यारे मने ते गाल दीयेछे. अथवा दोष विना पण ते अक्ष परोक्षे निंदा करे. नजर सामे नथी करतो. कदाच साक्षात् आवीने अवाच्य शब्दो कहे तो पण मने मारतो नथी. कदी आवीने ताहन-मार मारे तो पण कंइ मारा प्राण हरतो नथी अने कदी प्राण पण हरे तथापि मने सद्गति देनारा धर्मने नथी हरतो आवी रीते जे साधु हेतुनी स्पष्टता विचारे तेनी इष्टसिदि थाय छे. अत्र स्कंदकशिष्याणां कथा यथा-श्रावस्त्यां जितशत्रुनृपः, धारिणी प्रिया, तयोः पुत्रः स्कंदकः, पुरंदरयशा पुत्री कुंभकारकटके पुरे दंडकिनृपस्य दत्ता. तस्य पुरोहितः पालको मिश्यादृक्. अन्यदा श्रावस्त्यां मुनिसुव्रतस्वामी समवसृतः, तस्या देशना श्रुत्वा स्कंदकः श्रावको जातः. एकदा पालकपुरोहितो दूतत्वेन श्रावस्त्यां प्राप्तः, राजसभायां जैनसाधुनामवर्णवाद बदन स्कंदकेन निरुत्तरीकृत्य निर्धाटितः स स्कंदककुमारस्प छिद्राणि पश्यति. -आ विषयमा स्कंदक शिष्योनी कथा कहे छे.- श्रावस्ती नगरीमा जितशत्रु राजा इतो तेनी धारिणी नामे पिया स्त्री इती. तेओने एक संदक नामे पुत्र तमा एक पुरंदरयशा भाषांतर अध्ययनर ॥१४७॥ ॥१४७॥ नामे पुत्री रती, आ पुत्री कुभकारक्टक नामना शेहेरमा दरकि नामना राजाने आपी इती तेनो पुरोहित पालक मिथ्यारष्टि इतो. एक समये श्रावस्तीमां मुनिमग्रतस्वामीए समवसरण कयु त्यारे तेनी देशना सांभळी स्कदक श्रावक थयो एक बहते पालक पुरोहित श्रावस्तीमा दूत बनीने आन्यो राजसभामा जैन साधुओने माटे अवाच्य वातो बोलतो हतो. तेने सदके निरूतर करी काही मूक्यो त्यारथी ते स्वदक कुमारना छिद्र जोवा लाग्यो अयन्दा स्कदककुमार श्रीमुनिसुव्रतस्वाभिपाधै पञ्चशतकुमारै सह प्रबजितो गीतार्थो जात , स्वामिना ते कुमारशियास्तस्यैव दत्ता अन्यदा स स्वामिन पृच्छति भगवन् ! भगिनीं वदापनार्थ गच्छामि ? स्वामिना भणितं तत्र मरणातिकोपसोऽस्ति, स्कदकेनोस भगवन् ! वयमाराधका विराधका वा ? स्वाभिना भणित स्वां मुक्त्वा सर्वेऽप्याराधका , स्वानिनवमुक्तेऽसि भवितव्यतावशेन पञ्चशतशिप्यपरिवृत. स कुमकारकटकपुरे गत एक समये स्वदा कुमार श्रीमुनीसुव्रतस्वामी पासे पाचसो कुमाराने साये लइ जइ अने मत्रज्या ग्रहण करी कृतार्थ थयो त्यारे स्वामीए ए पाचसो कुमार शिप्यो तेने आप्या एक वख्ते सदके स्वामीने पूछयु के-हे भगवन् ! मारी पूनी बहेनने बदन करावया हु जाउँ ? त्यारे स्वामीए का के-जाभो भछे पण त्या मरणातिक उपद्रवनी का छे. त्यारे सदफ बोल्यो के-भगवन् ! अमे आराधफ छइए के विराधक ? स्वामीए पधु के एक तने छोडीने सर्वे पण आराधक छे स्वामीए आम कया छतां भवितव्य- ताने वश थर पांचसो शिष्यथी युक्त ते स्कंदक कुभकारपटक पुरमा गया.

JI उत्तराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन२ ॥१४८॥ ॥१४८॥ पालकेन तथागच्छंतं श्रुत्वा पूर्ववैरं स्मरता साधुस्थितियोग्योद्याने षट्त्रिंशदायुधानि भूमौ स्थापितानि, स्कं- दकाचार्यस्तु तत्रैव समवसृतः. ततः पालकेन नृपस्याग्रे कथितं महाराजायं स्कंदकः पञ्चशतसाधवोऽपि च सहस्र- योधिनः परीषहभग्नास्तव राज्यं गृहीतुकामाः समायातास्त्वां हनिष्यंति, राज्यं च गृहीव्यंति, यदि न प्रत्ययस्तदोद्यानं विलोकय ? एभिरायुधानि भूमौ गोपितानि संति. पालके ते प्रमाणे स्कदकने आवतो सांभळी पूर्व वैरने याद करी साधुओने स्थिति करवा योग्य उद्यानमा छत्रीस आयुधो भूमीमां दाटी राख्यां. स्कंदकाचार्य तो त्यांज आवीने गणुं कर्युः त्यारे पालके जइने राजाने वातमी आपी के-हे महाराज ! आ स्कंदक, पांचसो शिष्य भूतसहस्रयोधी साधुओने साथे लइ परीपह भग्न थएला तमारं राज्य लइ लेवानी कामनाथी अहों आवेल छे तेओ तमने हणशे अने तमारुं राज्य पण लइ लेशे. जो मारी वातमा विश्वास न यतो होय तो उधानमां आवीने जुओ. एओए आयुधो पृथ्वीमां संताड्या छे. नृपेणोद्यानं विलोकितं. आयुधानि दृष्टानि क्रोधात्तेन ते साधवस्तस्यैव दत्ताः, तेन सर्वेऽपि ते यत्रेण पीलिताः वधपरीषहस्य सम्यगधिसहनादुत्पन्नकेवलज्ञानास्ते सिद्धाः, स्कंदकाचार्यस्तु सर्वेषां शिष्याणां तथाविधमरणं दृष्ट्वो- त्पन्नक्रोधः सर्वस्याप्यस्य दाहकोऽहं स्यामिति कृतनिदानोऽग्निकुमारेपूत्पन्नः. अथाचार्यस्य रजोहरणं रुधिरलिप्तं गृधैः पुरुषहस्तं ज्ञात्वा चंचुपुटेनोत्पाट्य पुरंदयशापुरः पातितं, सापि महत्तीमधृतिं चकार, साधवो गवेषिताः, किंतु भाषांतर মানব पन सूत्रमा ॥१४९॥ ॥१४९॥ न दृष्टा, प्रत्यभिज्ञातानि कालाधुपकरणानि, ज्ञात न तया साधवो मारिता इति आ उपस्थी राजाए त्या आतीने जोयु, आयुधो पण दोग तेथी क्रोधे भराइ तेणे ते साधुभो पालक्ने हवाले कर्या अने तेणे सने यत्रमा पालीने पील्या. आ वध परीपहनु साधुओए सम्यक्प्रकारे सहन फ्र्यु तेथी तेआने केवलज्ञाननी लब्धि यह ने बधा सिद्ध यया. पण पेला स्कदकाचार्य तो सर्वे शिष्योनु तेवु दुर्मरण जोइ क्रोधाविष्ट थइ गया अने मनमा 'आ वायनो हवाळ- नार थाउ' आउ भावन परवावी अमिकुमारोमा उत्पन्न भयो ए स्कदकाचार्यनु रजोहरण रुधिरथी तरसोळ थयेलु इतु ते गीध- पक्षीए पुरुषनो हाथ जाणी चाचवढे उपाडी तेनी व्हेन पुरदरयशानी आगल नाख्यु तेणीए धैर्यरहित थइ साधुओनी गोतकरी पण क्याय पतो मन्यो नहिं पण ते साधुभोना क्वल आदिक उपकरण ओळखीरदयां अने साधुभो मार्या गया एम जाण्यु ततो घिस्कृतस्तया नृपतिः, अह तप मुग्व न पश्याभि, प्राजिप्याम्येवेति वदती ता स्कदकभगिनीं देवा. श्रीमुनिसुव्रतस्वामिसमीपे मुक्तवत., स्वामिना सा दीक्षिता ततोऽग्निकुमारदेवेन तेन से नगरो देशो दग्ध ततो दडकारण्य जात, अद्यापि तथैव तजनैर्भण्पते पमि साधुभिर्वधपरीषहः सोढस्तथापरैरपि सोदय न तु स्कदका चार्यवत्कर्तव्य अथ परैरभिरतस्यौपधादिकयाञ्चा स्यात्तस्माद्याश्चापरीपहोऽपि सोढ य, अतस्तत्परीषदमाह- सारे तेणीए रागाने धिकार आप्यो अने का के-'हु तारु मोहु जोइश नहि किंतु मत्रज्या ग्रहण करीश' आवी रीते बोलती ए सदकनी व्हेन पुरदरयशाने देनोए मुनिसुव्रतखामीनी समीपे लावीने मूकी तेवारे स्वामीए तेणीने दीक्षा आपी - उत्तराध्य. यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन२ ॥१५०॥ ॥१५॥ अमिकुमारदेव थयेला स्कंदके ए नगर सहित प्रदेश वाळ्यो तेथी ते प्रदेश आजे पण दंडकारण्यना नामयी लोकोवळे कहेवाय छे. ए साधुओए वधपरीपह सह्यो तेम अन्य साधुओए पण सहेवो जोइए. स्कंदकाचार्यनी पेठे न कर, जोइए। कोइपर आवीने मारे त्यारे व्रणविरोपणादिकने अर्थ औपच याचना करवी पडे तेने माटे यांचना परीपह पण सहन कर वानो छे एटला माटे याचा परीपह कहे छे. दुकरं खल्लु भो निच्चं । अणगारस्स भिखुणो ॥ सवं से जोइये होइ । नस्थि किवि अजाइयं ॥ २८ ॥ गोयरम्गापविठस्स । पाणी नो सुप्पसारए । सेओ अगारवासुत्ति । इइ भिक्खु न चिंतए ॥ २९ ॥ मूळगाथार्थ:-निश्चये भो! अनगार-गृह विनाना भिक्षुने नित्य-जीवतां सुधी दुष्कर-करमयज छे. कारण के तेने सर्व वस्तु याचितज होय छे, अयाचित कंड पण होतुं नदी ॥ २८ ॥ गोचरामप्रविष-पटले भिक्षार्थे गृहस्थना घरमा पेसतां साधुने पाणि-पोतानो हाथ पसारवो सेहेलो नधी; याचना करवी अति दुष्कर छे. भगारवास-गृहस्थाश्रम श्रेयः उत्कृष्प के रम भिक्षुए चिंतन न करतु ॥ २९ ॥ व्या०-खस्विति निश्चयेन भोः स्वामिनगारस्य भिक्षोनित्यं कष्टं. अपरस्य च कदाचित्कष्टमुत्पयते. भिक्षोस्तु नित्यमेव कष्टं, यदुक्तं-गात्रभंगः स्वरे दैन्यं । प्रस्वेदो वेपथुस्तथा ॥ मरणे यानि बिहानि । तानि मिहानि याचने १ अर्थ:-खलु-निश्चये हे स्वामिन् ! अनगार-गृहरहित भिक्षुने नित्य दुष्कर-कटन छे. इतर जनने कोकटाणे कष्ट होय भाषांतर पनमूत्रम पण साधुने तो नित्ये सर्वदा बटन छे मा छ के-परवा पडेलाने जेवा गाप्रभ ग, स्वरमा दीनता, परसेवो, भने शरीरमा धुमारो र चिन्हो पाय छे तेनान ए चारे चिन्हो याचना करती वखते याचकने पाप छे. इत्युक्तत्वानिक्षोनिस्य महत्कष्ट, तस्कि कष्टमित्याह-से इति तस्य भिक्षो. सर्व वस्तु याषित सरवति, अयाचितं गृहस्थानमागितं किंचिदपि नास्ति, तस्माद्विकष्ट भिक्षुजीवितमिति अर्थात याचना ए मरणना जेवी कष्टदायक होवाथी याचक साधुने सदाय फष्टन के केमके ते भिक्षुने सर्व पदार्थ याचितम होय छे अयानित का होतुं नधी तेथी भिक्षु जीवित कष्ट छे. ॥ २९ ॥ पुनस्तदेव दृढयति- गोयरेति' गोचरामप्रविष्टस्य भिक्षार्थ प्रविष्टस्य साधो पाणिहस्तः पिंडग्रहणाथै न सुपसार्पः, गोरिष चरति यस्मिन् स गोचरः, गोयरेऽग्न प्रधानपिंडग्रहण गोचराग्न तन्निमिस प्रविष्टस्प गृहस्थगृहे प्रस्थितस्य भिक्षापां करप्रसारण दु कर मिक्षामार्गण दुष्कर, को नित्य सम्पग्वपुष्मानरः भिक्षा मार्गयति ? तस्मादागारवासो गृहवास श्रेपानिति भियुर्मनसि न चितयेत् यथारण्ये याचापरीपहो दुस्सहो न तथा श्रीमद्गृ- हाकीणे पुरे अत श्रीणां निजरूपकृतमनर्थ दृष्ट्वा पलदेवर्षि पुरप्रवेश निषेध्य यत एव यात्रापरीषद सोढवान् तत्कया यथा- पन सत्रम भाषांतर মযান -- ॥१५२॥ ॥१५२॥ ए विषयने दृढकरे छे-गोचरागप्रविष्ट एटले गायनी पेठे भटकतां-भिक्षा लेवाने गृहस्थने घरे जतां भिक्षार्थ हाथ पसा- रवो दुष्कर बने अर्थात् सानो सारो मनुष्य भिक्षा कोण मागे ? ' तेटला माटे घरकरी तेमां वास करवो सारो' आयु भिक्षुए मनमा चितवन पण करवू नहिं. जेम अरण्यमां याचापरीसह दुस्सह थाय ले तेम श्रीमान् गृहस्थोनां घरोवाला शहेरमा नयी थतो; एतदर्थ-स्त्रीओने, पोताना रूपथी यता अनर्थ जोइने कलदेवऋपिए पुरभवेशनो निषेध करी जेम याञ्चापरीपह सद्यो तेनी कथा. द्वारिकानगर्यामेकदा श्रीनेमिः समवसृतः, कृष्णेन द्वारिकाक्षयखमरणकारणं पृष्टं, नेमिना मद्यपानविकली- भूतत्वत्कुमारोपसर्गसमुदभूतक्रोधाददीपायनाद बारिकाक्षयस्त्वन्मरणं च त्वद्भातृव्यजराकुमारादेवेति प्रोक्तं. श्रीनेमिए एक समये द्वारिका नगरीमां समवसरण कर्यु त्यारे श्रीकृष्णे द्वारिका, क्षय तथा पोताना मरणY. कारण पूछ्यु: त्यारे श्रीनेमिए-" मधपानथी विकल वनेला तमारा कुमारोए करेला उपद्रवी क्रोघे द्वारिकानो क्षय अने तमारा भतीजा जरा कुमारना दोपयोज तमारु मरण सर्जायलं छे" एम कां. वासुदेवेन द्वारिकायां निषिद्धमपि मद्यपानं भवितव्यतावशेन कृष्णपुत्रैः कृतं, विकलीभूतैश्च तैः कीडार्थ नगरबहिर्गतैस्तत्रातापनां कुर्वन् दीपायनपिष्टः, अरे ! त्वं द्वारिकाक्षयकारी भविष्यसीत्युक्त्वा यष्टिमुष्टयादिभि- रुपसर्गितः कोपाद द्वारिकाक्षयनिदानं चकार, स तन्मारणेनैव मृतोऽग्निकुमारेपूत्पन्नः, तेन च द्वारिकाक्षयः कृतः, - mar- भाषांतर अध्ययन कृष्णवलदेवानेव निर्गती, अटव्या तृषाक्रांतेन वासुदेवेनोक्त नाहमत पर चलितुं शक्रोमि, पानीयमानीय मे देहि ? ततो बलदेवेन पानीयार्थ पूरे गते पादोपरि पादं कृत्वा कृष्ण सुप्त वासुदेवे द्वारिकामा मधपाननी सरत मनाइ कया छता ए निषेधनो भग करी भवितव्यताने आधीन पनेला कृष्णना भाइ गोए मद्यपान कर्यु मद्यपानथी छाकटा बनेला ए यादवोए क्रीडा करता नगरनी बहार नीकली आतापना करता द्वीपायन अपि दीठा. अरे! तु द्वारिकानो क्षयकारी थाश ? आम बोलता बोलता ते ऋषिने लाकडीओ तथा मुठीओ वती मारवा मच्या एकापिनो कोष द्वारिका क्षयनु निदान-कारण-बन्यो अने एओना मारथी मरणपामी ए ऋषि अमिकुमारोमा उत्पन थया तेणे द्वारिका क्षय कर्यो तेमा मात्र कृष्ण तथा पलदेव रे नीकळी गया अरण्यमा जतां कृष्ण ठपातुर यया त्यारे धनदेवने कथु हवे हु अहीथी एक पगलु पण आगळ चाली शकू तेम नथी माटे मने पाणी लारी आपा? त्यारे पाणी लेवाने बलदेव दर गया अने कृष्ण पग उपर पग चहावी मूता अब प्रागेव श्रीनेमिनायवधनश्रवणसजातभयेन जराकुमारेण वनवास प्रपन्नेन सदानीमितस्ततो भ्रमता तत्रै- पापातेन मृगमात्या मुक्तपाणेन विद्वपाद कृष्ण पञ्चत्वमाप तत्रापि तत्रायातेन यलदेवेन न मे भ्राता मृत, किंतु महिलंबागमनोत्थरोषादेष मौनमानितोऽस्तीति सुन्ध्या तरच खस्कधे समुत्पादित, पूर्वसंगतिकदेवेन प्रतियोधे कृते पलदेवेन दीक्षा गृहीता ॥१५४॥ भाषांतर अध्ययनर - ॥१५४॥ - + पहेलां श्रीनेमिनायनां वचन सांभळीने भय उत्पन्न ययेल एवा जराकुमारे वनवास करेलो त्यां नाम लेग भटकतां ज्या कृष्ण मूता छे त्यां आत्री नीकळेला जराहमारे मृगनी भ्रांतीची वांग छोड्यु ते वाणथी कृष्णनो पग वींचानां कृप्यनो देहांत थयो त्यां पाणी गोतवा गयेला बळदेव पाला भाच्या तेणे करणने मृत ययेला न जाण्या किंतु ' मने बहु विलंब यगायी रोपे भरा बोलता नथी' आम धारी कृष्णना शबने कांधे उपाठी चाल्या त्यां बळदेव ने पूर्वसंगतिक देने प्रतिबोध भाप्यो तेथी बळदेये दीक्षा गृहण करी. एकदा कस्मिंश्चिद् ग्रामे भिक्षार्थनायातस्य बलदेवस्य रूपं ध्दा व्यामोहगतया कुपकंठस्थया कयानिमार्या घट- भ्रांत्यां स्ववालकंठ एव पाशितस्ततो बलदेवमुनिना प्रतियोधिता सा बालगलात्पाशं दरीचकार. नतो भिक्षार्थ ग्रामप्रवेशनियमो गृहीतः, वन एव तृणकाटहारकेभ्यो भिक्षां गृहाति, यदि तेभ्यो न प्रामोति तदा तप एवं करो- तीति. यथा यलदेवेन तुगलोकेभ्योऽपि भिक्षा मागिता, ततो यात्रापरीषहः सोटस्तथापरैरपि मोदव्या, एवं यात्रा- परीपहे बलदेवकथा. ॥ २९ ॥ अय यात्रायां न लभेत तदाऽलाभपरीपहमाह- एक समये काइ गाममा भिक्षा अर्थ भावेला बलदेवनुरूप जोइ व्यामोहपामेली एक बीए वा उपर पाणी भरतां रांदवानो गाठो घटाना कांठगां नारखवाने बदले पासे उभेला पोताना वाळकना गळामा नाम्यो अने ज्यां सदाको पीरना नापछे त्यो वनदेनमुनिए चेतावी एटले झट गळकना गलामांधी रांडवाना गाळानो फांसो दूर को. ते पूर्ण रसदेरे मिक्षा - -~-

भाषांतर
সান
॥१५५।।
अर्थे गाममां न जानो नियम ग्रहण कर्यो. अने वनमान घास तथा काष्ठनाभारा उपाइनाराओथी जे मळे ते भिक्षा लेवामांगी.
ग्यारे ए वणकाष्ठवाहक जनो पाथी भिक्षा न मळे त्यारे तपोभावनाथी उपवास करता. जेम बलदेवे तुच्छलोकोथी भिक्षा मागी
याबापरीपड सहन कर्यो तेवीरीते अन्य साधुओए पण सहन करतो
आ ममाणे याचापरीपद विषयमा बलदेवमनिनी कथा कही, हवे याचन करता न मले त्यारे अलाभपरीपह कहे छे
परेसु गास ए मेमिजा । भोयणे परिनिहिए ॥ लकेवि पिंडे अलके वा। नाणुतप्पिज पडिए ॥३०॥
अजेवाह न लाभामि । अवि लाभो सुएसिया ॥ जो एव पडिसचिक्खे । अलाभो त न तजए ॥३१॥
मूळगापार्ट -पर-गृहस्थने त्यां भोजन परिनिष्ठित-तैयार-थर जाय त्यारे साधु घास-मिसा पिडनी गवेषणा करे,
पछी ति लग्ध थाप अथया न लग्ध थाय तोसयत-साधु अनुताप न करे ॥ ३० ॥ आजेज हु मिक्षा न पाम्यो परतु श्व%3D
काले मिसानो राम थशे? जे साधु मा प्रमाणे प्रतिसमिक्षा करे-विचारे तेने अलाभ परीषह तर्जे नहि पराभव करे महि
(जे मायो पिसारन करी शके तेने तो भलाम भत्यत सतापजनक थाय छे ) ॥ १ ॥
व्या०-साधुः परेषु गृहस्थेषु प्रास कवलमेषपेत् , तत्र च भोजने ओदनादौ परिनिष्टिते सपूर्णे सिद्धे वा
लम्धे प्राप्ते सति वायवालन्धेऽल्पे लन्धेऽनिष्ट लन्धे वा परितो मुनि नुतृप्येत् , लब्धिमानह यतो मया सपूर्ण
मिष्टे वाहार लन्ध, अनिष्टेऽल्पे ल तथा न येतेत्यनुक्तोऽप्यों गृह्यते ॥ ३ ॥

1 भाषांतर अध्यपन२ ॥१५६॥ ॥१५६।। अर्थः-पर-गृहस्थोमा ग्रास भोजननी साधु एषणा करे पण परिनिष्ठित-तृप्तिजनक पूर्ण=भोजन लब्ध थाय अथवा अलब्ध- न मले तो पण 'आजतो मने सारु अन्न खूब मल्यु' एम मनपां लावी अनुतृप्त न थाय तेम मले अथवा अणगमतु मले तो पण जराय मनमां दूभाय नहिं. ॥ ३० ॥ तदा किं कुर्यादित्याह-अयैवाहमाहारं न लभामि, अपि संभावनायां संभावयामि, अद्यैवाहारं न प्राप्तं, परं 'सुए' इति श्वः प्रभाते आगामिदिने लाभः स्यादाहारस्य प्राप्तिर्भवेत्. उपलक्षणत्वादन्येारन्यतरेयुर्वा मा वाभूत्, यः साधुरेव प्रतिसमीक्षते इति चिंतयति, तं साधुमलाभपरीषहो न तर्जयेत् , नाभिभवेत् ॥ ३१ ।। त्यारे केम करे ते कही देखाडे छे.-' आजेज मने आहार लब्ध न थयो पण आवती काले लन्ध थशे-सवारे आहार जरुर मळशे एम परमदिने, चोदिने, ते पछीने दिवसे आहारलब्धि थशे' आम जे साधु प्रतिसमिक्षा करे अर्थात् उद्वेग न करतां काळयापन करे ते साधुने अलाभपरीषह तर्जन-अभिमव-सर्वथा करी शकतो नथी. अत्र ढंढणकुमारकथा-कमिंश्चिद ग्रामे कोऽपि कृशशरीरी कुटुंबी वसति, अन्येऽपि बहवस्तत्र कुटुंबिनो वसंति, वारकेण ते राज वेटिं कुर्वति, राजसत्कपंचशतवाहनानि वाहयंति. एकदा तस्य कृशशरीरिणः पंचशतहलवाहन- वारका समायातः, तेन च वाहिता वृषभाः. भक्तपानवेलायामप्पेकोऽधिकमाषो दापितस्तदातरायं कर्म बद्धं. ततो भाषांतर अध्ययन पन मूत्रम ॥१५७॥ ॥१५७॥ सतो मृत्वासी बरकालमितस्तत ससारे परिभ्रम्य कस्मिंश्चिद्वे कृतसुकृतवशेन वारिकाया कृष्णवासुदेवस्य पुत्र रवेन ममुत्पन्न ढढणेति तस्य नाम प्रतिष्ठित आ विषयमा एक रडणकुमारनी क्या कहे छे - पोइ एक गाममा दुबळा शरीरसाको एक युद्धपी उसतो हतो तेम धीना कुटुपीओ पण रहेता हता अने वाराफरती तेओ राजानी चेठ करता हता अने राजफाममा पाचसा वाहन चलावता एकवार पेला दुळ शरीरवागानो पारसो हल पहन करवानो वारा आव्या त्यारे तेणे रलदो जोख्या भने भातपाणी लेग टाणे पण एक चाप अधिक देवराव्या तेधी तेनु अतराय कर्म वाणु के उपरपी ते मरीने आमतेम घणाकाळ सुधी फरीफरी काइ एष भवमा परेला सुकृतने योगे द्वारिकामा श्रीकृष्ण वासुदेवनो पुन थइने भरतों अने नेनु वरण एवु नाम रावपामा आन्यु स बढणकुमार श्रीनेमिपावेऽयदा प्रबजित , लाभातरायवशामरसामगि दारिफाया हिंदमानो न किचिद- नादि लभते, यदि कदाचिल्लभते तदा सर्वथासारमेव ततस्तेन स्वामी पृष्ट , स्वामिना तु सकल. पूर्वभववृत्तात- स्तस्य कथित , तेन घायमभिग्रहो गृहीत' परलाभो मया न ग्राह्य , अन्यदा पासुदेवेन स्वामिन पृष्ट भगव ने तावत्सु अमणसहस्रेषु को दुग्करकारक ? स्वामिना ढाणपिरेव दुकर कारक इत्युक्त, भा तरणकुमारे एक समये पीनेमि पासे जइ प्राज्या-दीक्षा ग्रहण करी लाभना कोइ अतरायने लीधे महोटी द्वारिकामा उत्तराध्य- यन सूत्रम् .. ॥१५८॥ भाषांतर अध्ययन ॥१५८॥ होंडतां हीडतां पण कंइ अन्नादि मलतुं नहिं अने कदाच कंइ मळे तो पण निःसार मळे, तेथी तेणे स्वामीने पूछयु त्यारे स्वामीए तेना पूर्वभवनो सघळो वृत्तांत तेने कही देखाड्यो. आ सांभळी ए ढंढणकुमारे एवो अभिग्रह लीधो के 'मारे परलाभ ग्रहण न करतो' एक समये वासुदेवे स्वामीने पूछ्यु के-हे भगवन् आ वधा हजारो श्रमण छे तेओमां दुष्कर करनारो कोण छे ? त्यारे स्वामीए ढंढणपी छे तेज दुष्करकारक छे' आम उत्तर आप्यु. कृष्णेनोक्तं स इदानीं कास्ति? स्वामी प्राह त्वं नगरं प्रविशंस्तं द्रक्ष्यसि, ततः कृष्णः श्रोनेमिजिनं प्रणम्यो- स्थितः, पुरबारे प्रविशन साधु दृष्टवान् , हस्तिस्कंधादुत्तीर्य कृष्णस्तं ववंदे, तेन वंद्यमानोऽयं साधुरेकेनेभ्येन दृष्टः, चिंतितं च तेनाहो एष महात्मा कृष्णेन वंधते. एवं चिंतयत एव तस्य गृहे ढंढणर्षिः प्रविष्टस्तेन मोदकैः प्रतिला- भिता. ततः स स्वामिसमीपे गन्या पृच्छति मम लाभांतरायः क्षीणः किं ? स्वामिनोक्तमेष वासुदेवलाभा, मम परलाभो न कल्पते इत्युक्त्वा नगराद्वहिर्गत्वोचितस्पंडिले मोदकान विधिना परिठापयन शुभध्यानारोहण केवली जातः. एवमन्यैरपि परीपहः सोढन्या. त्यारे कृष्णे कयु के 'ते इमणां क्यां छे?' स्वामीए कयु के 'तमे नगरमा प्रवेश करतांज तेने देखशो' त्यारे श्रीकृष्ण श्रीनेमि- जिनने प्रणाम करी उठ्या. ज्यां पुरद्वारमा प्रवेश करे छे त्यां सामेज साधुने दीठा आ टाणे हाथीना स्कंध उपरथी उतरीने कृष्णे तेने वंदन कयुः आ समये एक धनाढ्य शेठे ए साधुने वंदन करता कृष्णने जोया. त्यारे तेना मनमां आव्युं के 'अहो !

अध्ययनर ॥१५९॥ आ महात्माने कृष्णे बदन कर्य आम ज्या ते शेतीयो मनमा चितान करे छे तेटलामा तो ए देवगऋषि ते शेठना घरमाज पेठा परले तो शेठे प्रसम थइ तेने मोदकपतिलाभ कराव्यो, अर्थात् मधुर मोदक तेने वोराव्या तदनतर ए साधुए स्वामी पासे जाने पूछ्यु के- मने लाभातराप हतो ते क्षीण पयो? त्यारे स्वामीए कषु के-'ए लाभ वासुदेवनो लाभ छे. ' आ उत्तर सांभली साधुए मारे परलाभ न जाइए' आम कहीने नगरनी बहार नीकली उचित स्थडिल [स्थान ] मां मोदक विधियी परि दर पाते शुभध्यानपरायण घनी केवली थया एम अन्य साधुओए पण अलाभपरीषद सहन करवो जोइए अलाभादनिष्टाहारलाभादल्याहारमान्याहारभोजनाच्छरीरे रोगा उत्पद्यते, अतो रोगपरीषहोऽपि सोदव्य ततो रोगपरीपहमार- आहार लाभ न थाप अपना अनिष्ट आहारनो लाभ याय वळी अत्याहार तथा प्रात्याहारनु भोजन करवायी रोगो उत्तम थाय एटला माटे रागपरीपह पण साधुए सदन करवानो छे तेथी रोगपरीषह निरूपण करे में नमा उप्पड्य दुक्ख । वेयणाए दुहट्टिए ॥ अदीणो ठावए पन्न । पुट्ठो तत्थ हियाप्तए ॥ ३२ ॥ तेगिच्छ नाभिनदिज्जा । सचिक्खत्त गवेसए ॥ एय खु तस्स सामन्न । ज न कुजा न कारए ॥३३॥ मूळगाधार्थ-दूख उत्पन थयु आणीने वेदनावडे दुसादित-पीडातो होय तथापि मदीन-मनमा जराय दीनता न लगषता प्रहा-बुद्धिने स्थापित करे भने पृ-रोगप्रस्त-छता तेथी थतु दुख सहन करे ॥ ३२ ॥ मळगाथार्थः-साधु चिकित्साने न अभिनदेनरोगोपचार करवा हा न पाडे, फितु आमगषेपक-आत्मानो शोधक बनी सम्यक स्थिति को देमके तेनु भ्रमणपणु एज डे के पोते ( औषधोपचार ) करे नहिं तेम बीजा पासे करावे पण नहि ३३ उत्तराध्य- भाषांतर अध्ययनर यन सूत्रम् ॥१६०॥ ॥१६०॥ व्या०-वेदनया दुःखातितो मुनिरदीनः सत् प्रज्ञां स्थापयेत् , बुद्धि स्थिरां कुर्यात् , किं कृत्वा ? दुःखमु: त्पतितमुद्भूतं ज्ञात्वा, तत्र वेदनायां दुःखे वा रोगपरीपहमध्यासेत सहेत कीडशो मूनिः ? पुठो स्पृष्टो रोगैाप्तः, दुःखयतीति दुःखं रोगस्तेनातः पीडितः क्रियते इति दुःखातितः, तादृशोऽपि प्रज्ञां स्थापयेत् , रोगातस्य हि प्रज्ञा चंचला स्यात् , साधुस्तु रोगसद्भावेऽपि प्रज्ञा स्थिरामेव विधीतेत्यर्थः. अर्थः-उपजेला दुःखने जाणीने वेदनाथी दुःखार्दित-दुःखपीडित थतो होय तो पण मुनि, अदीन रहीने प्रज्ञा स्थापित करे. अर्थात् बुद्धिने चलित न थवा देतां स्थिर राखे; रोगपरीपह सहन करे. त्यारे रोगार्त साधुए शुं करवू ते कहे छे-रोगात साधुए रोगप्रतीकाररूप चिकित्साने अभिनंदन न दे, अर्थात् औषधादिनी अनुमति न आपवी. तदा रोगातः किं कुर्यादिलाह--' नेगत्यमिति' साधुः रोगार्तश्चिकित्सा रोगप्रतीकारं रोगं नाभिनिदेत् , नानुमन्येत, तदा चिकित्सयाः कारणं करणं दूरत एव त्वतं. यदा मनस्यपि चिकित्सा चिंतनं साधुन कुर्यात् , कीदृशः साधुः ? आत्मगवेषकः, आत्मानं संयमजीवं गवेषयतीत्वात्मगवेषकः, एतादृशः सत् 'संचिक्खे' समाधिना तिप्टेत् पीडया पीडितो न क्रदेदित्यर्थः खु यस्मात्कारणाच्छ्रामण्यं साधुत्वं, 'एयं' एतदेव, 'जं इति णाद्रोगे समुत्पन्ने स्वयं चिकित्सां न कुर्यात् , अन्येनापि न कारयेत् , जिनकल्पिकापेक्षयायमाचारः, स्थविर- कल्पिकाः पुनः कारयंत्वपीति वृद्धसंप्रदायः. ज्यारे साधुए मनमां पण चिकित्सार्नु चिंतन न करवू तो पछी औषधस्वीकारवा, तो दूर रघु. साधुए आत्मगवेषक आत्म- यस्मात्कार- भाषांतर अध्ययनर ॥१६॥ तस्वनी शोधमा तत्पर रही समाधिदशामा स्थित थषु पीडाथी पीडातो होय तो पण 'हाय वोप' वगेरे बुमराण सर्वथा न करवी 'खु%3D | खलु-निश्चये साधुनु श्रामण्य=खरेखर श्रमणपणु 'एग नएतदेव एज छे कारण के रोग उत्पम थाय त्यारे पोते चिकित्सा न करवी तेम अय पासे करावी पण नहि ॥ ३३ ॥ निनकल्पिानी अपेक्षाए आ आचार कयो छे स्थविरफल्पिको ता यद्यपि पाते नथी करता पण चीजो करे तो ते स्वीकारे छे एलो वृद्धसमदाय छे अत्र कालवैशिककथा यथा-मथुराया जितशनृपोऽतिसुरूपा कालाख्या वेश्यामत.पुरेऽक्षिपत् , तस्गा पुत्र. कालवैश्यकस्तस्य भगिनी मुद्गशैलनगरस्वामिना परिणीता अन्यदा स कुमार शृगालशब्द श्रुत्वा स्यभृत्यानपच्छ तकस्याय स्वर ? तैरूचे फेमस्वरोऽय, कुमारेणोक्त फेरकोऽत्रानीयता ? तैरानीत शृगाल फुमारेण हन्यमान ग्वीग्वीति कृत्वा मृत , अामनिर्जरया यतरो जात अहीं कालवैशिक कथा कहे छे-मथुरामा जितशत्रु राजा हतो तेणे अतिमुरूपवती काला नामनी वेश्याने पोताना अत पुर= जनाना=मां घेसाडी तेणीने काल्वैश्यक नामे पुत्र थयो तेनी बहेन मुद्गशैलनामना नगरना स्वामीने परणी इती एक समये ए राजकुमार शियाळनो शन्द साभळी पोताना नोरोने पुच्यु के-आ अवान केनो? ते नोक्रोए का के-'फेरुक्नो स्वर छे' कुमारे फयु के 'ए फेरस्ने अहीं लइ आवो' ते उपरथी नोकरो ए फेरकने उपाठी लाल्या. कुमारे ए शियाळने हणवा मांड्यो त्यारे ते शियाळ ' ग्वी खी' एका शब्द करतो मरण पाभ्यो बामनिर्जरा-एटले-निर्जरानी इच्छा विना पराधीनपणे उत्तराध्य- यन सूत्रम् 2.DCPrGPRG भाषांतर अध्ययन ॥१६२॥ ॥१६२॥ भूख तरस वगेरे सहन करवा ते अकामनिर्जरा कहेवाय आ शियाळ अकामनिर्जराने लीधे व्यं तर थयो. अन्यदा कुमारः स्थविरांतिके प्रत्रजिता, गीतार्थो जातः, एकाकिविहारप्रतिमा प्रतिपन्नः तस्यार्थी रोगो बभूव, न चिकित्सां कारयति, नाप्यौपधं करोति तथाविप्रत्याख्यानात्, अन्यदा विहरन्नसौ मुद्गशैलपुरे गतः, तत्र तन्नगर- स्वामिपरिणीतया तद्भगिन्याझेनौषधमिश्रा भिक्षा दत्ता, तेन चाजानता नौषधिमिश्र आहारो गृहीतः, औष- धप्रयोगे च ज्ञाते भग्नं मे प्रत्याख्यानमित्यधिकरणदोपशंकया भक्तं प्रत्याख्यातं पुराबहिः, तत्र च तेन शृगालजीवेन व्यंतरीभूतेनोपयोगदानेनासावुपलक्षितः, समुत्पन्नवैरेण च नवप्रसूतशिवारूपेण खीखीकुर्वता खापमानः शिवो- पसर्गमर्शोरोगं च सोढवान्. एक समये कुमार कोइ स्थिरबुद्धि समीपे जइ प्रत्रजित थइ गीतार्थबहुमूत्री थयो. एकाकी विहार प्रतिमा अभिग्रहविशेषथी एकलान विहार करवानो नियम लइ बेठो. एमां तेने अझै रोग (हरसनो व्याधि) थयो. पोते कोइ पासे उपाय न करावे तेम कंइ औषध पण खाय नहिं एवं प्रत्याख्यान लीधुं एक समये विहार करता करता ए कुमार मुद्गशैलपुरमा आवी चड्यो त्यां तेनी बेन जे त्यांना राजाने परणेली हती तेणे अझरोगने मटाडे एवं औषध भिक्षाममां भेळवी बोराव्यु कुमारे आ वात न जाणतां ए अर्शीन औषधमिश्र आहार गृहण कर्यो. पाछळथी तेणे औषधप्रयोगनी बात जाणी त्यारे 'मारुं पचक्खाण भन ययु' आवा अधिकरण दोपनी शंकाथी नगरनी बहार जइ भक्त-अमलेवानुं प्रत्याख्यान लीधुं. त्यां पेला व्यंतर थपेला - m उत्तराध्य पन सूत्रमा भाषांतर মান ॥१६॥ ॥१६॥ । - शियाळे उपयोगबातचित उपरथी ओळखी उदयमो र उभरावाथी एक नवी प्रमता थयेली शियायळीरूपे । 'खीखी करतां साता माग्यो सारे तेणे ए शिवा [शियायही ] नो उपद्रव तथा अशेरोगनी पीडा सहन कर्यो एम अन्य साधुए पण रोग सहन करवा. एवमयैरपि रोग' सोढव्य अथ रोगादियुक्तस्य शयनादौ दुस्सरहणस्पर्शः स्यात् , अतस्तस्परीषामाह- रोगादियुक्त होय तेने शग्या आदिका तृणस्पर्श पण दु.सह थाय ते पण सहन करवो ते तुणस्पर्शपरीपह कहेवाय ते पण साधुए सहन करवो एम कहे छे अचेलगस्स लुहस्स । सजयस्स तवस्सिणो ॥ तणेसु सुयमाणस्स । हुजा गायविराहणा ॥ ३४ ॥ आयवस्स निवारण । अउला हवइ वेयणा एव नच्चा न सेवति ततुज तणतजिया ॥३५॥ मूळगाथार्य -धन विनानो तथा कक्ष शरीरवाळो सयत-सयमी तपस्थीने तृणधर्म आदिकनी सादडी जेवा-उपर सूता मात्र विराधना-शरीरने पीडा होय-धाय ॥ ३४ ॥ आतप तडकाना पडयाधी अतुल-घणी वेदना थाय छे, मम जाणीने र हणम्घास घडे तर्जना-पीडा पामी साधुओ ततुज-कपलादिकने सेयता नधी ॥ ५ ॥ न्या०-तपस्विन सयतस्य तृणेषु शयमानस्य, तृणैत्रिविराधना भवेत् , कीरशस्य? सपतस्य ? अचेलकस्य वसा JS भाषांतर अध्ययनर यनस ॥१६४॥ ॥१६४॥ रहितस्य, पुनः कीदृशस्य ? रुक्षस्य तैलाभ्यंगादिरहितस्य, यदा शरीरे तृणैः कृत्वा पीडा स्यात्सदा किं कुर्यादित्याह- 'आयवस्सेति' तृणजितास्तुणस्पर्शपीडिताःसाधवः, तंतुजं वस्त्रं सूत्रवस्त्रं कंबलादिवत्रं वा न सेवंति ना चरंति, किं कृत्वा ? एवं ज्ञात्वा, एवमिति किं? आतपस्य निपातेन धर्मस्य संयोगेनातुला वेदना भवति. तापशीतवर्षावातादिपी डास्माभिः सोढुं न शक्यते. अथवा तप्यते पीड्यते शरीरमनेनेत्यातपः, तृणपाषाणादिरप्युच्यते, तस्य संगेनास्मच्छ- रीरे महती वेदना भवति, यदि वस्त्रादीनां प्रस्तरणं स्यातदारमच्छरीरे तृणादिभिः पीडा न स्यादिति विचित्य वस्त्रकंबलादिकं न परिगृहंति, इति जिनकल्पापेक्षयेदमुक्त वर्तते. अर्थः-तपस्वी संयमवान् तृणमां सुवे त्यारे तेने गात्रविराधना=अंगपीडा थाय-छे ते वली आतपाइको पडतो होय त्यारे अतुल वेदना थाय अने ते साधु पोते अचेलकवखरहित तथा रूक्ष एटले तैलअभ्यंगादि विहीन होय त्यारे शरीरे तृणस्पर्शथी पीडा थाय. अर्थात् ' ताप शीत वर्षा वगेरेथी यती पीडा अमारायी सहन थती नथी तेथी जो वस्त्रादिकर्नु विछार्नु मळे तो अमारे शरीरे पीडा न थाय' आवी चिंताथी वस्त्रकंबलादि परिग्रह न करे. आ जिनकल्प-उत्कृष्ट आचार पाळनार साधु-नी अपेक्षाए कहेल छे. अत्र भद्रर्षिकथा यथा-श्रावस्त्यां जितशत्रुपुत्रो भद्रः प्रव्रजितः, विरुद्धराज्ये विहरन् हेरकोऽयमिति भ्रांत्या नृपनरैधृतः, पृष्टोऽप्यनुवन कुबैस्तैः क्षुरेण तक्षितो दभै वेष्टपित्या मुक्तः. ततः स तबेदनामधिसेहे. एवं तृण- - 1 ६ '

उतराच्या
पन सत्रमा
भाषांतर
अध्ययन
॥१६॥
॥१६५॥
स्पर्शपरीपह, साधुभिरप्यधिसय. अथ तृणादिस्पर्शाच्छरीरे प्रस्वेदावज स्पोन्मलोपचय स्यात् , तदा मलपरी
पहोऽपि सोढव्या, अतस्तमार-
अहीं भद्रर्पिनी कथा कहे छे..-श्रावस्तीनगरीमा जीतशत्रु राजानो पुत्र भद्र, प्रत्रजित साधु-थयो. ते विरोधी राजाना
राज्यमा विहार करतो हतो त्या तेने शत्रुराजानो हेरफ-छुपो दूत छे एवी प्रातिथी विरोधी राजाना माणसोए पकड्यो, पूछता
कइ पण जवाब न आप्यो तेयो क्रुद्ध थयेला राजपुरुषोए सजागाथी छोली दर्भाडे वींगळीने मूकी दीयो, त्यारे तेणे ए वेदना
सहन करी एम बीना साधुओए पण तृणस्पर्शपरीपह सहन करवो
शरीरे तृणादिस्पर्शथी परसेको वळे तेमा रज स्पर्श थवाथी मेलनो उपचरा थाग ते मल परीपद पण सहन करवो
किलिन्नगाये मेहावी । पकेण य रयेण वा ॥घिसु वा परियावेण। साय नो परिदेवए ॥ ३६ ।।
वेइन निजरापेही। आरिय धम्ममणुत्तर ॥ जाव शरीरभेउत्ति । जल्ल कारण धारए ।। ३७ ।।
मूळगाधार्थ-मेधावी-शानवान् साधु प्रीमतुमा तथा 'या' शव भाप्यो छे तेथी अन्य अतुमा पण पकषी
अथवा रजथी फ्लिन्नगात्र-मलिन शरीरवाळो होया छता पण सात-सुख एटले ए मलिनता न करे ॥ ३६ ॥ र साधु, निर्जरा
पेक्षी-पोताना कमना क्षयने इच्छतो तथा मार्य-शुभाचार युक अनुसर-सोए धर्मने प्राप्त थयेलो ज्या सुधी शरीरमेद-शरीर
पात-थाय त्या सुधी पाय-शरीरपडे जल्ल-मळने धारण करे-उठेग न घरे ॥ ३७ ॥

उत्तराध्य. यन भाषांतर সমান ॥१६६॥ ॥१६६॥ درود रासस व्या०-मेधावी साधुधिंसु ग्रीष्मकाले वा शब्दाच्छरद्यपि परितापेन गाढोष्मणा पंकेन प्रस्वेदादाद्रीभूतमलेन अथवा रजसादमलेन परिशुन्य काठिन्य प्राप्तेन धूल्या वा क्लिन्नगात्रः सत् बाधितशरीरः सन सातं सुखं न परि- देवेत, मलापहारात्सुखं न वांछेत् , सातार्थ विलाप न कुर्यादित्यर्थः. ॥३६॥ अर्थः-मेधावी बुद्धिमान-साधु ग्रीष्मकालमां अथवा शरत्समयमां परिताप-धामथी तेमज परसेवाथी भीजायेल रजथी थतां पंकमलबडे अर्थात् पसीनामां मळेल रज सुकाइ कठिन बने ते मेलथी क्लिन्नगात्र=अंग गरमरवाथी वाधित यइ सात-सुखने माटे विलाप न करे. 'आ मल मटीने मुख थाग' एवी वांछना पण न करे. तदा किं कुर्यादित्याह-'वेयजेत्ति' निर्जरापेक्षी कर्मक्षयमीप्सुः साधुस्तावत्कायेन जल्लं धारयेत् , देहेन मलं धारयेत् , पुनर्वेइज्ज मलपरीषहं वेदयेत सहेत, तावत्कथं ? यावच्छरीरस्य भेदः शरीरस्य पातः स्यात् , साधुः कीदृशः सन् ? आर्य श्रुतचारित्ररूपं धर्म प्रपन्नः सन्नित्यध्याहारः, कीदृशं धर्म अनुत्तरं सर्वोत्कृष्टं. ॥ ३७ ॥ किं तर्हि निर्जरापेक्षी कर्मक्षयनी उग्रआकांक्षा राखनारो साधु कायें करी मलने धारण करे अने मलपरीपहने सहे; ते ज्यां सुधी शरीरनो भेद-पात-थाय तावत् पर्यंत आर्ग श्रुत शास्त्राध्यागन तथा चारित्र-उत्तमाचार आ उभयरूप अनुत्तर=सर्वोत्कृष्ट धर्मने प्रपन्न चुस्तपणे वळगी रही मलपरीपहने सहन करे. ॥ ३७॥ श्राद्धसुनंदहढे भेषजार्थी साधुस्तत्कथा यथा-चंपायां सुनंदो वणिग्दानवान्. अन्यदा मलाविलसाधुं दृष्ट्वा उत्तराध्य भाषांतर अध्ययनर ॥१६७॥ ॥१६७॥ मलधारिण शेष मर्वसाधूना भव्यमिति जुगुप्सां कृतवान, मृत्वासौ कौशाच्यामिभ्यपुत्रोऽभूत, स प्रस्तावे दीक्षा गृहीतवान् तदानी तत्कर्मोदयेन देहे दुर्गधोऽभूत्, स यतिर्यत्र यत्र प्रयाति तत्र तत्रोडाहो भवति श्राद सुन ने हाटे औपधार्थी साधुनी क्या कहे छे- चपा नरीमा सुनदनामे पणिक दानवान् इतो, एक खते मलादिग्ध साधुने जोइ ' साधुओने मरधारीवेश भु भन्ग गणाग' आम मुगयी वोल्गो आ साधुनी जुगुप्सा करायी ते मुवा पडी पोशाची नगरीमा एक धनान्यशेठने या पुत्र थइ अवतों भने मसगे दीक्षा लइ साधु थगो पण पूर्वभवया साधुना मलनी जुगुप्सा करेल तेथी तेना ए फर्मोदगने लीने देहमां दुर्गध यह ए. पति ज्या जाय त्या उड्डाह-अवलेहना-तिरस्कार पामवा लाग्यो ततो गुरुभिस्तस्य भ्रमण निपित, तेन रात्रौ जिनदेवताराधनार्थ कायोत्सर्ग कृत., तुष्टदेवतया सुगधीकृत , तथाप्युवाहभने पुनरप्याराधितथा देवतया सर्वसमानगध कृत अनेन हि साधुना जलपरीपो देवताराधनेन न सोढ एवम यै साधुभिर्न कार्य सारे गुरुए तेने भ्रमण ससानो निपेप क्यों आधी खिन्न थइ तेणे रात्रीमा जिनदेवताराधनार्थ कायोत्सर्ग पर्यो, देवता तुष्ट भइ अने तेने मुगधी को तोपण तरोडाया लाग्यो फुरी देवतानु आराधन कप त्यारे देवताए समानगधी क्यों आ साधुए जल्लपरीपह-पलपरीपद-देवताराधन करीने सहन न यो एम वीजाए नन करयु ॥ ३७॥ अथ समल साधु शुचीन मनियमाणान् दृष्ट्वा सत्कारादिन स्पृश्येत् , अतस्तत्परीपरमाह- उत्तराध्य- पन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥१६८॥ ॥१६८॥ मलयुक्त साधु शुचि-निर्मलम्जनोने सत्कार पामता जोइ पोते सत्कारादिकनी स्पृहा न करे माटे ते परीपह कहे छे- अभिवायणमप्भुटाणं । सामी कुज्जा निमंतणं ।। जे ताइं पडिसेवंति । न ते संपेहए मुणी ॥ ३८ ॥ अणुकसाई अपिच्छे । अन्नाएसो अलोल्लए रसेसु नाणुगिझिजा । नाणुतपिज्ज पपणवं ॥ ३९ ॥ मुळगाथार्थ:-स्वामी-राजा वगेरे अभिवादन-च दन करे, तथा अभ्युत्थान-उभा थइने सामा आववानु मान आपे, निमत्रण आजे अमारे त्यांथी भिक्षा लेजो' एम निमंत्रण करे ( नोतरु दीये ) तेने अभिवादनादिकने-जे प्रतिसेवे-स्वीकारे तेओनी मुनि स्पृहा न करे ॥ ३८ ॥ अनुत्कषायी-सत्कारादिकथी हर्ष न पामनारो. अल्प इच्छावान तथा अज्ञातैपी पटले पोताना न जाणेला गृहस्थने त्यां भिक्षार्थ जवा चाहनार तेम थलोलुप-सरस माहारमा तृष्णारहित, एवो साधु, रसोने विषये अभिकांक्षा न करे तथा प्रज्ञावान-तत्वयुधिसंपन्न रही बीजानो सत्कार जोइ अनुताप पण न करे ॥ ३९ ॥ व्या०-मुनिस्ते इतितेभ्योन स्पृहयेत् , यत पते धन्या इति न चिंतयेदित्यर्थः, तेभ्यः केभ्यः ? ये तानि प्रति- सेवन्ते तानि कानि ? स्वामी राजादिः, अभिवादनं नमस्कारमस्मभ्यं कुर्यात् , अथवा खाम्यभ्युत्थानमस्मभ्यं कुर्यादशनादिसन्मानं कुर्यात् , पुनरस्माकं निमंत्रणं कुर्यात् . एतावता राज्ञा निमंत्रितानाहारादिभ्यः प्रार्थितान् द्रव्यलिंगिनः साधून न कीर्तयेदिलः, पुनः साधुः कीदृशो भवेत्तदाह- अर्थ:- स्वामी राजादिक अमने अभिवादन करे, अमने अभ्युत्थान आपे, अने अमने निमंत्रण करे; आम जेओ प्रतिसेवन करता होय तेवाभोनी मुनि स्पृहा न करे-अर्थात् राजाए निमत्रण करी प्रार्थना पूर्वक आहारादिकथी सत्काराता जनोनी वातो पण न करे तेम 'एओ धन्य छे' एम मनमा पण कोइ काळे चितवन न करे त्यारे साधुए केवा यवु जोहर ते कहे छे শাখা अध्ययन पन सत्रमा ॥१६९॥ ॥१६९॥ अनुस्कशायी सत्कारादिना हर्षरहितस्तादृशो भवेत् , नोकोऽनुत्क शेते इत्येवशीलोऽनुस्कशायीति शब्दार्थ, यत्र कविदासनदानाभ्युत्थाननिमत्रणादिक करोति तत्र गमनायोत्को न भवति, उत्कठितो न भवति अथवाणु- कषायी, सत्कारादिक यो न करोति तस्मै क्रोधमकुर्वाणोऽक्रोध पुनः कीदश ? अस्पेच्छो धर्मोपकरणमात्रधारी, अनेन निर्लोभत्वमुक्त पुन' कीदृश १ 'अमाएसी' अज्ञातैषी जातिकुलसम्पनिद्रव्यादिनाऽपरीक्षितोऽज्ञातस्ता- दृश गृहस्थमाहारापर्थमेषपतीत्येवंशीलमज्ञातेपी. पुन, कीरशो भवेत् ? अलोलुप* सरसाहारे लापट्यरहित, पुन साधुरन्यान् सरसाहारभक्षणासक्तान् वीक्ष्य रसेपु नानुगृध्येत् ? सरसाहारभिक्षा नाभिकाक्षेदित्यर्थ पुन 'पनव इति प्रज्ञावान् साधुनानुतप्येत, अन्येषां सत्कार या 'हा मम कोऽपि सत्कार न करोति किमर्थमह प्रवजित' इति चिंतापरो न भवेत् ॥ ३९ ॥ अनुत्कशायी अर्थात् सत्कारपामी इपरहित रहेवाताळा, एटले ज्यां जवाथी आसन दान अभ्युत्थान निमत्रण आदिक यतु होप त्यां जवामा उत्कठित न थाय. तेम जे सत्कारादिक न करे तेना पर क्रोध न करे अल्पेच्छ-धर्मोपकरणमात्र धारण- करनारा=अर्थात्-निर्लोभ, अज्ञानेपी जाति कुल अद्र यता सद्रव्यता आदिक जेना जाणता न होइए तेना गृहस्थनी आहारादि- Gr उत्तराध्य- Ksmal यन भाषांतर अध्ययनर ॥१७॥ ॥१७०॥ कने अर्थे एपणाचाहना करनार, अलोलुप सरस आहारनी आकांक्षा रहित अलंपट, वीजा सरस आहार भक्षणमां आसक्त होय तेने जोइ पोते जरा पण अभिकांक्षा न करे एवो प्रज्ञावान् साधु सर्वथा न अनुतापकरे. एटले बीजाना सत्कार सन्मान आदिक जोइ ' अरे हुं शा सारं साधु थयो ? साधु न थयो होततो हुँ पण आम सत्कारादि पामत' आम मनमां संताप नज करे. ॥३९॥ अत्र श्राद्धश्रमणयोः कथा यथा-मथुरायामिंद्रदत्तः पुरोहितोऽस्ति, स जिनशासनप्रत्लनीकः स्वगवाक्षस्थः सन्नधो निर्गतो जैनयतेमस्तकोपरि निजचरणं विततं करोति एवं निरंतरं कुर्वाणं तं दृष्ट्वा साधुन कोऽपि कुप्यति, परमेकः पावकः कुपितस्तत्पादच्छेदप्रतिज्ञामकरोत् , अन्यानि तच्छिद्राण्यलभमानेन तेन श्रावकेण तत्स्वरूपं गुरोः पुरः कथितं, गुरुणोक्तं सह्यते सत्कारपुरस्सरस्कारपरीपहः साधुनेति. तेन स्वप्रतिज्ञा कथिता, गुरुभिरुक्तमस्य गृहे किं जायमानमस्ति ? तेनोक्तं नवीनप्रासादे राजा निमंत्र्यमाणोऽस्ति पुरोहितेन गुरुभिरुक्तं तर्हि त्वं तस्मिन् प्रासादे प्रविशंत राजानं करे धृत्वा प्रासादोऽयं पतिष्यतीति कथयेः, अहं च प्रासादं विद्यया पातयिष्यामि. आ विपयमां श्राद्ध तथा श्रमणनी कथा कहे छे. मथुरामां इंद्रदत्तपुरोहित हतो ते जिनशासननो विरोधी हतो ते पोताना गोखमां बेसीने जैन यतिओना मस्तक उपर पोताना पग लांबा करे. एम निरंतर करतो तेना उपर कोइ साधु तो कोप न करता पण एक श्रावकने ए जोइने क्रोध चड्यो तेथी तेणे ए पुरो- हितना बेय पग छेदी नाखवा प्रतिज्ञा करी आ श्रावकने ते पुरोहितनां अन्य छिद्रतो जड्यां नहिं त्यारे तेणे गुरुपासे जइ तेनु स्वरूप कही देखाडयुं त्यारे गुरुए तो कधु के-साधु पुरुषो तो सत्कारपरीपह सहन करी लीए छे. त्यारे ते श्रावके पोते करेली ते पुरोहितना .." - भाषांतर अध्ययनर पनमनमा ॥१७॥ ॥१७॥ पाद छेदननी प्रतिज्ञा कही सभळावी आ साभळी गुरुए कधु के एने घरे इमणा शु चाले छे ? त्यारे धारके का के-हमणां तेणे नको मासाद-महेल-धनाव्यो छे तेमा ए पुगेहित राजाने निमत्रण दइ पधराक्वानु करे छे गुरुए कधु के तेना मासामा ज्गरे रामा प्रवेशता होय त्यारे राजानो हार झाली आ मासाद हमणा धसी पडशे' आम तु कहेजे ए टाणे हु मारी विद्याथी ए मासादने पाही नाखीश ततस्तेन तथा कृते मासाद पतित राज्ञोक्त किमिद जात ? श्रेष्टिनोक्त हे महाराजानेन तव मारणाय कपट मडितमभूत् ततो सप्टेन राज्ञा स पुरोहितस्तस्य श्रेष्टिनोऽपित , तेन श्रेष्टिनेंद्रकीलके तस्य पाद क्षिप्या प्रतिज्ञा- पूरणार्थ च पिष्टमय पाद कृत्वा छिन्नवानुक्तवाश्च सर्व तत्स्वरूप, पुरोहितेनोक्तमत पर नैवेश करिष्यामीति. जातानुकपेन श्रावकेण स मुक्त. अन सत्कारपुरस्कारपरीपर सोढ य. साधुभि , पावकेण तु न सोढ य इति पेला श्रायके ते प्रमाणे कर्यु अने तेज क्षणे महेर पड्यो राजाए कधु-' आ शु थयु श्रावक बोल्यो 'हे महाराज ! आ पुराहिने आपने मारवानु कपट माइयु हतु आ साभळी ऋद्ध थयेला राजाए पुरोहितने ए श्रावकने हवाले करी दीयो शेठीए इंद्रकीलक हेडमा तेना पग नाखी अने ते पुराहितने तमाम हकीकत समजावी अने पोतानी पतिशा पूरी करवा लोटना पग वनापरी यंत्रयी छेदी नाख्या, पुरोहिते ' हवेथी कोइ दिवस ए प्रमाणे करीश नहिं एम का ते उपरथी भावाने दया आवी तेयों तेने छोडी मेल्यो आमा माधुए सत्कारपरीपह सहेवो, श्रावके तो न सहेवो एवो सार दर्शाव्यो छे .

यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥१७॥ ॥१७२॥ अथ सत्कारे सति प्रज्ञाप्रकर्षापकर्पविदलत्वं न विधेयं, अतः प्रज्ञापरीपहोऽपि सोढव्या. हवे क्यांय सत्कार थाय त्यारे बुद्धिना प्रकर्ष अप्रकर्ष प्रयुक्त विह्वलता न धरती नेने माटे प्रज्ञापरीपह पण सहेवो एम कहे छे. से नूणं मए पुर्वि । कम्माऽनाणफला कडा ॥ जेणाहं नाभिजाणामि । पुठ्ठो केण य कहई ॥ ४० ॥ अह पत्था उइजति । कम्मानाणफला कडा ॥ एवमस्सासि अप्पाणं । नच्चा कम्मविवागयं ॥४१॥ मूळगाथार्थः-मे निश्चये पूर्व अन्नान जेनु फळ होय तेयां कर्म कर्या जेथी क्यांय कोइ मने पूछे तो 'हु जाणतो नथी' एम जवाब देवो पडे छे ॥ ४० ॥ पण हवे पाछळथी शानफळवाळां कर्म उदय पामशे; आम कर्मविपाक जाणीने आत्माने आश्वासन आप ॥४१ ॥ व्या०-प्रज्ञापरीपहोऽपि विधा सोढव्यः, प्रज्ञाप्रकर्षे सत्येवं चिंतनीयं. येन कारणेन केनापि पुरुषेण कुत्रचित्प्रभे पृष्ठः सन्नाहं पुरुषप्रश्नोतरं जानामि, तत्पश्नस्योत्तरं ददामि. अथेदानी ज्ञानफलानि कर्माणि कृतानि पश्चादुदेष्यंति पश्चादुदयं प्राप्स्यति, कर्मणां विपाकं ज्ञात्वैवमात्मानं त्वमाश्वासय ? भो शिष्य ! न तु प्रज्ञा- प्रकर्षे गर्व कुर्या इत्यर्थः, प्रज्ञाप्रकर्षेऽयमर्थः कार्य:. अर्थ:-प्रज्ञापरीपह बे प्रकारनो सहेचानो छे. जो मनापकर्ष-युद्धिविकास होय तो एम मनमां चिंतन करवु के-कोइ पुरुष भाषांतर अध्यापन पनसनम ॥१७॥ ॥१७॥ क्यांय कइमन पूछे त्यारे-हुआ पुरुषे करेला प्रश्न उत्तर जाणु छु आपुए प्रभनु उत्तरछु' हमणा मान जेनु फळ के एलार्म में कोंछे ते पश्चात् हवे पछी उदय पामशे आम कर्मविपाक जाणीने मनने आश्वासन देणे हे शिष्य ! महाप्रकर्ष प्रसगे सर्वथा गर्व परीक्षा. भय प्रज्ञाप्रकर्षपक्षे प्रज्ञाहीनत्वेऽर्थं वदति, येन केनचित्पुरुषेण कस्मिमित्सुगमेऽपि जीवादिप्रो पृष्ट. समाई। नाभिजानामि तन्नन मया पूर्व पूर्वभवेऽज्ञानफलानि धर्माचार्यगुरुश्रुतनिंदारूपाणि कृतानि, ततोऽह प्रशाहीन. सजा तोऽस्मि अयाज्ञानफलानि कृतानि कर्माण्यपि पश्चादग्रेतनजमानि 'उजति ' उदेष्यत्युदय प्राप्स्यप्तीति कर्म- विपाक ज्ञात्वैवमात्मानमाश्वासष ? उदयप्राप्तानां जानावरणकर्मणा विघाताय यस कार्य इत्यात्मानमनुशासये- त्यर्थ अतो हि प्रज्ञोदये हो न विधेयः, प्रज्ञाभावे विषादे कृते यार्तध्यानपरत्व स्यात् मज्ञाना अभकर्षमसगे-एटले बुद्धिहीनताने अवसरे-कोइ पण पुरषे कोइ मुगम जीवआदिक प्रश्न पूछयो त्यारे-' विषय घरावर जाणतो नथी तो निश्चये में पूर्व-पूर्वभवमा अज्ञान छे फळ जेनु एवा कर्म जेवां के-धर्म, आचार्य गुरु, शास्त्र विगे- रेनी निदारूप कर्म करेला छे तेथी आ भवमा हु प्रज्ञाहीन थयोछु अज्ञान जेनां फळ छे एवां कर्मो जे में कर्या तेपण पाछळयी आगळ उपरना जममा उदय पामशे एम कर्मविपाक जाणीने आत्माने आश्वासन आपदु उदय पामेलां ज्ञानावरणीय कर्मनो विधात करवा माटे यन करवा आम आत्माने आश्वान देवु एटले प्रधानो उदय पाय त्यारे हर्ष न करतो तेम मझाना अभाव प्रसगे विषाद-खेद न करवो जो खेद करे तो आतंभ्यानपरता याग प्रज्ञाप्रकर्षापरि कालिकानार्यसागरचद्रयो कथा यथा-उजयिनीत कालिकाचार्या. प्रमादिन स्वशिष्यान । उत्तराध्य. यन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन ॥१७४॥ ॥१७४॥ मुक्त्या सुवर्णकुले स्वशिव्यसागरचंद्रस्य समीपें प्राप्ताः. सागरचंद्रस्तु तानेकाकिनः समायातान् नोपलक्षयति, कालिकाचार्या अपि न किंचित्स्वस्वरूपोपलक्षणं दर्शयंति. अन्यदा सागरचंद्रेण पर्षदि सिद्धांतन्याख्यानं प्रारब्धं, चमत्कृता लोकाः सिद्धांतव्याख्यानं प्रशंसंति, कालिकाचार्याणां सागरचंद्रेण पृष्टं मव्याख्यानं कीदृशं? तैमक्तं भव्यं, तेन चाचार्यः समं तर्कवादः प्रारब्धः, परं तुल्यतया वक्तुं न शक्नोति, भृशं स चमत्कृतः. प्रज्ञाप्रकर्ष उपर कालिकाचार्य तथा सागरचंद्रनी कथा कहे छे. उज्जयिनीथी कालिकाचार्य, पोताना ममादी शिष्योनो त्याग करी मुवर्णकुलमां पोताना शिष्य सागरचंद्र पासे आतीने रया. सागरचंद्रे तो ते एकला आवी चड्या तेना तरफ कंइ लक्ष्य आप्यु नहिं, तेम कालिकाचार्ये पण कंइ पोताना स्वरूपढें उपलक्षण दर्शाव्यु नहिं, एक समये सागरचंद्रे सभामा सिद्धांतनु व्याख्यान आरंभ्यु. लोको चमत्कार पामी सिद्धांत व्याख्याननी प्रशंसा करवा लाग्या. आ वखते कालिकाचार्यने सागरचंद्रे पूज्यु के-'मारं आ व्याख्यान के, छे ?' तेणे कयु के-' भव्य थे' त्यारे तेणे आचार्य नी सापे तर्कवाद मांड्यो, पण तुल्य उतर्या एटले कइ बोली न शक्यो, तथापि मनमा अत्यंत चमत्कार पाम्यो. अब शिष्यास्ततः शय्यातरेण तिरस्कृतापां प्राप्ताः स्वगुरुं गवेषपंतचलिताः, कालिकाचार्याः समायांतीति प्रसिद्धिं कुर्वाणाः सुवर्णभूमौ प्राप्ताः, सागरचंद्रः कालिकाचार्याः समायांतीति वृद्धस्य पुरः प्रोक्तवान् , वृद्धः प्राह मयापि श्रुतमस्ति, सागरचंद्रस्तेषां सन्मुखमायातः, तस्य तः पृष्टं किमत्र कालिकाचार्याः समायाताः मंतिन पा? तेनोक्तमेको वृद्धः समायातोऽस्ति, नापरः कोऽपीति.

, भाषांतर अध्ययन पनमूत्रमा ।।१७५॥ एक हद्ध आवेल ॥१७५॥ अहीं उजयिनीमा कालिकाचार्यना प्रमादी शिष्यो त्यांना शग्यातर स्थानवासिजनोनो तिरस्कार पामी शरमनामार्या पोताना गुरु कालीकाचार्य ने गोतरा चाल्या 'कालकाचार्य आन्या छे ? जाहेर करता करता सुवर्णभूमिमा आवी पहोंच्या अहीं सागरचद्र पण 'कालिकाचार्य पधारे छे' एम वृदनी पासे कहेवा लाग्या वृद्ध का के-'मे पण साभव्यु छे' सागरचंद्र सो सामा भाज्या सारे पेला शिष्योए पूज्यु के-'शु अत्रे कालिकाचार्य आवेला छे? सागरचद्रे का छे' पीजो तो काइ नथी. तेऽप्युपायात समायाता , उपलक्षिता कालिकाचार्या, प्रणतास्त , सागरचद्रेण पश्चादुपलक्ष्य तेषा मिथ्या- दुकृत दरा, हा मया श्रुतलवगर्वा नातेन श्रुतनिधयो यूयमाशातिना इति च करित कालिकार्यिकक्त हे वत्स ! श्रुतगर्यो न कार्य यथा सागरबद्रेण श्रुतमद कृतस्तथापरैर्न श्रुतमद, कार्य, अथ प्रज्ञाप्रकर्षे गर्व, ॥ प्रज्ञामाचे दैन्यनितन, इत्युभय राऽज्ञान अतस्त-परीपरोऽपि सोढव्य', इति कारणादशानपरीषहमाह- ते शिप्यो पण उपाश्रयनी अदर आल्या. त्या तो सामे पालिकाचार्यने जोइ ओळख्या अने ते वा शिष्योए मणाम कर्या सागरनद्रे पण पाउळधी तेने ओळखीने तेओने 'मिथ्यादुष्कृत' माग्यु अरे मे शास्त्रज्ञानना लेशना गर्नमा फुलाइने श्रुतहा- नना भडाररूप आपनी आसातना करी एम कही खेद दर्शाव्यो सारे कालिकाचार्ये कधु के-हे वत्स श्रुतझाननो गर्न न करतो. सारांश ए के जेम सागरचरे श्रुतमद पर्यो एम बीजाए श्रुतमद न करवो. प्रमाना अभावे दैन्यचिंतन करतु ए पण उभयथा अज्ञानन होवाथी ए परीपह पण सहेको एटला माटे अज्ञान परीषद कहे हे उत्तराध्य. भाषांतर अध्यापन यन सूत्रम् ॥९७६॥ ॥१७६॥ निरहगंमि विरओ । मेहुणाओ सुसंबुडो ॥ जो सक्खं नाभिजाणामि । धम्म कल्लाणपावगं ॥ १२ ॥ तवोवहाणमादाय । पडिम पडिवजओ ॥ एवंपि निहरओ मे । छउमं न निअट्टई ।। ४३ ॥ मुळगाथार्थ:-हु मैथुनथी निरर्थकज निवृत्त थयो, तेम जे हुं सुसंवृत्त-इद्रियादिकना संवरवान् धयो ते पण निरर्थकज छे, जे कारणथी हुँ कल्याण यस्तुना शुभ धर्मने अथवा पापक-अशुभधर्मने साक्षात् जाणतो नधी जेनुं कह साक्षात् फळ न देखाय तेबु का वेठवु व्यर्थ छे ॥ ४२ ॥ बळी हुँ तप-भद्रादि तथा उपधान-सिद्धांत पठनना उपचाररूप आयाम्ल आदिक अंगीकार करीने, तेमज प्रतिमा-साधुना यार प्रकारना अभिग्रह विशेपने पाळीने विचार छु, सम छतां पण मा छम-शाना- वरणीयादि कर्म निवृत्त थ नथी ॥ ४३ ॥ व्या०-अहं निरर्थकेऽर्थाभावे सति मैथुनास्कामसुखाविरतो निवृत्तः, मैथुनग्रहणं कुस्त्यजत्वात्, यतोऽहं 'दुःकर कार्य कृतवान्, योऽहं सुसंहतो जितेंद्रियोऽपि साक्षात्स्फुटं धर्म वस्तुस्वभावं कल्याणं शुभं पापकमशुभ- मभिजानामि, यदि मैथुनानिवृत्तौ जितेंद्रियत्वेऽपि काचिदर्थसिद्विआनसिद्धिर्भवेत्तदा मम ज्ञानमुत्पयेत, मम तु ज्ञानं नोत्पन्नं तदा वृथाहं मैथुनमत्यज, वृधैव चेंद्रियजयमकरवं, पुनरित्थमपि न चिंतयेत्. अर्थ:-हुँ निर्थक अर्थना अभावे मैथुन काममुखथी विरत-निवृत्त छु. अत्रे मैथुन शन्दन ग्रहण तेनु दुस्त्यमपणुं देखारे छे-एटले में दुष्कर कार्य कयु, एम जणावे छे जे हुं मुसंवृत=नितेंद्रिय होइ साक्षात् धर्म-वस्तुस्वभावभूत कल्याण शुभ, पापक भाषांतर মাগন पनमममा ॥१७७॥ ॥१७७॥ अशुभ मधुप नाणु छु जो मैथुनथी नितिमा जिते द्रियल छता कोइ पण प्रकारनी अर्थ सिदि अथवा बानसिद्धि थाय तो मने मान उत्पम थाय. मने तो शान थयु नहि तो में मैथुन घ्या त्यज्यु, अने इद्रियजय पण वृथान कर्यो ' आम चिंतन न कर. तपो भरमहाभद्रसर्वतोभद्राघुपधान सिद्वातपठनोपचाररूप, एकभुक्तनिर्विकल्याचाम्लोपवासादिकमादायाँ- गीकृत्य पुन प्रतिमा भिक्षोरभिग्रहविशेषफ्रिया द्वादशविधा प्रतिपद्यमानस्य ममैव विरत. साधुमार्गे विहार कुर्वतोऽपि छमस्थज्ञानावरणादिकर्म न निवर्तते, आतप करोम्युपधान वहामि प्रतिमा च धरामि साधुमार्गे विहरामि तथापि केवली न भवामीति न विचारणीय, अयमज्ञानपरीपर. तपो भद्र महाभद्र सर्वतोभद्र आदिक उपधान व्रत ग्रहण, सिद्धान्तपठनोपचाररूप एक मुक्त निर्विकृति आचाम्ल उपवा- सादिक अगीकार करीने पुनः भिक्षुने अभिग्रहविशेषक्रियात्मक द्वादशविध प्रतिमा प्रतिपत्ति पूर्वक साधुमार्गे विहार करता मने छमस्थ ज्ञानावर्णादि कर्म नयी निवृत्त थतु, अर्थात् 'हु तप करु छु, उपधान वहन करुछु, प्रतिमा पारछु , साधुमार्गे विहरुडूं तथापि केवली न थयो' एम विचार न लावदो ए अज्ञानपरीपह अत्राज्ञानपरीषहे कथा-गातीरे दो भ्रातरौ वैराग्यादीक्षा गृहीतवतो, तत्रैको विद्वान् जात , द्वितीयस्तु मूर्च, यो विद्वान् सोऽनेकशियाध्यापनादिना खिन्न एव चितयत्यो धन्योऽय मे भ्राता य. सुखेन तिष्ठति, निद्रादिक- मवसरे कुर्वन्नस्ति, अह तु शिष्याध्यापनादिकष्टे पतितोऽस्मीति चितयन् का यमिद भकार- भाषांतर अध्ययन पन सूत्रम् ॥१७८॥ ॥१७८॥ आ अक्षानपरीपह विषयमां कथा कहे छे-गंगातीरे ये भाइओए दीक्षा ग्रहण करी तेमां एक विद्वान् थयो अने बीजो मूर्ख रह्यो. जे विद्वान् थयो ते अनेक शिष्योने भणाववा वगेरेथी खिन्न थइ एम चितवन करतो के-' अहो आ मारो भाइ धन्य छे के जे सुखे रहे छे, अवसरे निद्रादिक करे छे अने हुँ तो आ शिष्यो भणावताना कष्टमां पज्यो छु आवा विचार करतां तेणे एक काव्य कयु के- मूर्खत्वं हि सखे ममापि रुचितं यस्मिन् यदष्टौ गुणा । निश्चितो यहुभोजनोऽत्रपमना नक्तं दिवा शायकः ।। कार्याकार्यविचारणांधयधिरोमानापमाने सनः । प्रायेगामयवर्जितो दृढवपुर्मखः सुखं जीवति ॥१॥परं नैवं चिंतयति- अर्थ:-हे मित्र! मूर्खत्वतो मने पण रुचे छे के जेमां आठ गुणो छ-मुर्ख जन हमेशां निभिंत बेफिकर रहे. पुष्कळ भोजन करे मनमां जराय शरमाय नहि, रात्रदिवस उघ्याज करे, आ कराय के आ न कराय ए विचारमा आंधळा बहेरा जेवो, मान तथा अपमानने न गणकारतो, घणे भागे रोग रहित, अने अलमस्त शरीरचालो मूख सुखे जीवे छे. ॥१॥ परंतु आमतो कदापि ते चिंत्वन करतो नथी के- नानाशास्त्रसुभाषितामृतरसैः श्रोत्रोत्सवं कुर्वतां । येषां यांति दिनानि पंडितजनव्यायामखिनात्मना । तेषां जन्म च जीवितं च सफलं तैरेव भूभूषिता । शेषैः किं पशुपरिवेकरहितै भारभूतैनरैः ॥२॥ अर्थः-नाना मकारनां शाखसंबंधी मुभाषितरूपी अमृत रसवडे श्रवणेंद्रियना उत्सर अनुभवनारा जे पुरुषांना दिवसो A भाषांतर भयपनर ॥१७॥ ॥१७९॥ . पडितजन साना व्यासगान वीते छे तेओना जन्म तथा जीवित सफळ छे अने एवा पुरुषोथीन आ भूमि भूपित छे वाकीना पर जेवा विवेक रहित पृथ्वीना भारभूतोनरोयी शी प्रयोजनसिदि यह शकवानी हती ॥ २ ॥ एव पहितगुणानचितयन मूर्वगुणाश्चासतोऽपि चिंतयत् ज्ञानावरणीय कर्म पध्ध्वा दिव गत , ततश्च्युतो भरतक्षेत्रे आभीरपुत्रो जात क्रमेण परिणीत , तस्य पुत्रिका जाता, सा रूपवती आवा पडितोना गुणोनो रयाल न करतो केवळ मूर्खनान गुणानु चिंतन करतो एवो ए साधु भानावरणीयकर्म बांधीने देवलोक गयो त्यांची चविने भरतक्षेत्रमा एक आभीर ( आहीर) ने त्या पुत्र थर अवतो. मोटो थतां परण्यो तेने एक पुत्री थइ ते अति रूपवती हती अन्यदाने काभीरा घृतभृतशका किचिन्नगरप्रति गच्छति, असावपि तत्साथै घृतभृत शकट गृहीत्वा चलित मार्गे सा पुत्री शकटखेटन करोति ततस्तद्रुप पामोहितैराभीरपुत्रैरपथे खेटितानि शकटानि, तानि सर्वाणि भन्नानि, तादृश ससारस्वरूप दृष्ट्वासजातवैराग्य स आभीरस्ता पुत्रीमुदाय दीक्षा जनार, उसराध्ययनयोगोबर रावसरेऽसख्या ध्ययनोदेशे कृते तस्याभोरभिक्षोानावरणोदयो जात न तध्ययनमायाति आचाम्लान्येव करोति, सबै स्वरेण तदध्ययननिर्घोष करोति एव च कुर्वतस्तस्य द्वादशवर्षप्रातेऽज्ञानपरीषह सम्यगधिसहमानस्य केवलज्ञान समुत्पन्न एक समये केटला आहीर घीना गाडा भरीने कोइ नगरभणी चाल्या ते साथे आ आभीर पण गाडामा घीना धारदान " भाषांतर থিং ॥१८०॥ भरीने चाल्यो. मार्गे तेनी रूपवती पुत्री गाई हांकती हत्ती. तेना रूपमा व्यामोह पामेला' आहीर जुवानीयाओएं गाडां अवळे मार्गे हांस्या. एम खेडतां वधाय गाड भाग्यां. आई संसार स्वरूप जोइने आ आहीरने वैराग्य उत्पन्न यतां ते पुत्रीने एक पन सत्रम DE आहीर साधे परणावीने पोते दीक्षा ग्रहण करी. उत्तराध्ययन योग धारणावसरे असंख्य अध्ययननो उदेश करता ते आहीर- ॥१८॥ मिथुना मानावरणीयनो उदय भयो. ते अध्ययन आवडे नहिं भने आचाम्लन करना मांड्या उंचे स्वरे ते अध्ययन गोखतां गोखतां तेने वार वर्षने अंते अज्ञानपरीमह सम्यक् सहन करता करतां तेने केवळझान उत्पन्न थयु. एयमज्ञानपरीषहे आभीरसाधुकथा, यस्य च ज्ञानाजीर्णस्यात्तेनापि ज्ञानपरीपहो न सोइस्तत्रार्थ स्थूलभद्रकथा यथा. एवीरीते अज्ञानपरीपद विपये आ आहीरकसाधु कथा कही. जेने ज्ञानाजीर्ण थाय तेणे पण ज्ञानपरीपह सहन करतो पडे छे ते वावतमा स्थूलभद्रनी कथा कहे छे. स्थूलभद्रस्वामी विहरन यालमित्रदिजगृहे गतः, तत्र तमदृष्टा तगार्या पृष्टवान् क ते पतिगेतः ? सा प्राह परदेशे धनार्जनार्थ गतोऽस्ति. ततः स्वामी तद्गृहस्तंभमुलस्थितं निधिं पश्यन स्तंभाभिमुख हस्तं कृत्वा 'इदमीशं सच तादृशः' इति भणित्या गतः ततः कालांतरे गृहागतस्य विप्रस्य तगार्यया स्थूलभद्रस्वामिवचो ज्ञापितं, तेन पंडितेन ज्ञातमात्रावश्यं किंचिदस्ति. ततः वानितः रतभा, लभो निधिः. एवं स्थूलभद्रेण ज्ञानपरीपहो न सोटा, शेषसाधुभिरपीट न कार्य. -- - , - + भाषांतर अध्यापन ॥१८॥ ॥१८॥ स्यूलभस्मामी विहार करता करता वालमिन ब्रामगने घरे गया त्या तेने न दीठो त्यारे तेनी भार्याने पूछ्यु के- तारा पति क्यों गया छ ? ' ते चोली के परदेश धन कमावा गया छे' त्यारे स्वामी तेना घरना स्तभना मूलमा रहेलो निधि नाइ थाभला सामी आगळी चीधीने 'आ आम छे अने ते तेवो छे' आर बोलीने चालता थया कालांतरे परदेशथी पति परे भाव्या त्यारे तेनी भार्याए स्थूलभद्र सामीए कहेला वचन जगाव्या, ते पडिते जाण्यु के 'अहि करक होवू जोडप ' आनो विचार आवता स्तभना यडमां खोदता निधि-भडारनो लाम धयो सूलभद्रमुनिए ज्ञानपरीपह सदन न क्यों पीना मुीिओए एम न पर अगज्ञानदर्शनेऽपि कश्चित्सशय स्यादतस्तत्परीपर कायते- एमज अशानदर्शनमा पण कोइ सशय थाय माटे अज्ञानपरीपह कहे छे नस्थि नुण परे लोए । इद्वी वावि तवस्सिणो ॥ अहवा वमिओ मिति । इइ भिक्खू न चिंतए ॥४॥ अभू जिणा अस्थि जिणा । अदुवावि भविस्सई मुसते एवमाहसु । इइ भिक्खू न चिंतए ॥ ४५ ॥ मळगाथाथ नागीश्वयें परोक नथी अथया तपस्वी-साधुने ऋखि पण नभी हु पचित-कोरए ठगायेलो छु। आम साधुए चिंतन परखु नहि ॥ ४४ ॥ केपली कहे के के-जिन ( भूतकाळमा ) या गया तेम पर्तमानमा पण जिन ( विरेट क्षेत्रादिकमा ) छे अथरा (आगळ उपर पण) जिन होगे ए पधु मृषा-अमरय छे एयी रीतेभिक्षुए चिंतन न पर ४५ 유 उत्सराध्य- भापांतर अध्ययन२ यन सूत्रम् ॥१८२॥ ॥१८२॥ BE व्या०-नृनमिति संभावनायां परलोकोनास्ति, परलोके गतः कोऽपि नात्रागल वदति, तस्मात्प्रत्यक्षस्याभावनास्ति परलोका. वाऽथवा तपस्विनोऽपि साधोरपि काचिद्, ऋद्विरामीपधिवपुपौपधिखेलौपधिप्रमुखा काचिन्नास्ति न दृश्यते, अथवा किं यहुना ? अहं वंचितोऽस्मि, ऋपिभिष्ठगितोऽस्मीति भिक्षुर्न चिंतयेन विचारयेत्. ते जिनाः केवलिन एवमाहुः कथयतिस्म तन्मृषा तदसत्यं, नवं तत् किं ? जनास्तीर्थकराः केवलिनो वाऽभूवन , पुनर्जिनाः संति, सांप्रतं वर्तमानकाले महाविदेहक्षेत्रादौ संति, अथवाऽग्रे भविन्यंतीति यदृचुस्तदतत्यं. प्रत्यक्षमदृश्यमानत्वात्. इति विचारे क्रियमाणेऽसम्यक्त्वसगः स्यात्, तस्मादिति न विचारणीयं, सम्यक्त्वपरीपहः सोढव्या. अर्थः-'नूनं ' आ पद संभावना अर्थमां छे खरेखर परलोकमां कंइ नथी. अर्थात् परलोक गयेला कोड आवीने कहेता नथी; एटले प्रत्यक्ष न देखावाथी परलोक छेज नहिं, तपस्विनी पण कंड ऋद्धि-आमर्पोपधि वपुपौपधि खेलोपधि इत्यादिरूपा नथी-देखाती नथी. अथवा वीजुं शृं? हुंज वंचित . ऋपिओए मने ठग्यो -आम भिक्षु न विचारे. जिन-तीर्थकरो केवली थइ गया, तेम वर्तमानमां पण जिन तीर्थकरी महाविदेहक्षेत्रादिकने विषये विद्यमान छे अने आगळ उपर पण जिन- तीर्थ करो थवाना छे-एम ते केवली जिनो कही गया छे ते असत्य छे, कारण के प्रत्यक्ष देखाता नथी-आवा विचार करवाथी मनमां असम्यक्त्वसंग-संशयादि थाय माटे भिक्षुए एवा विचार के चिंतन न करवू. सम्यक्ल परीपह सहन करतो अत्रार्यापाढसूरिकथा-वत्साभूम्यामाषाढभूतिसरयस्तत्र गच्छे यो यः कालं करोति तं तं निर्जरयामामुः, भाषातर अपनर , ॥१८३॥ ॥१८॥ अत्यसमये तेषामेव कथयति युप्माभि. स्वर्गे सुरीभ्य मम दर्शन देणे, ते च स्वर्गे गच्छति, परमामार्याणा दर्शन न ददति सा च सूरीणा परलोकशका जायते एकदको विनेय प्रकाम स्वभक्त समाधिमरणसमये सरिभि- रेवमुक्तस्त्वया स्वर्गे देवीभूयावश्य मम दर्शन देग, न प्रमाग, सोऽपि मृत्वा देगे जात पर विनियरचना नाटयादिदर्शनेन न्यग्रत्वान्नात्रायाता. -~आ विषयमा आर्य आपामूरिनी कथा कहे - वत्साभूमिमा आपा भूतिमूरि हता ते गच्छमा जे जे काल करे नेने निर्जरा करावे अने अंतसमये तेने कहे के-तमारे स्वर्गमा मूरि थाने मने दर्शन देवु. ए मरनारा स्वर्ग जाय परतु आपार्यने दर्शन देवा न आवे ते उपरथी आपाभूतिना मनमा परलोक का थइ एक समये ए मरिनो एक विनेय शिष्य अत्यत भक्त मरवा पडयो. समाधिमरण समये तेने मरिए का के-तार सर्गे जइ देव धया पछी मने अवश्य दर्शन देव, नेमा प्रमाद न करतो पेला शिप्ये ययूर पर्यु ते मरीने देव थया पण पिचिनरचनावाला नाट्यादि जावामा व्यग्र यता मरिने दर्शन देगन आव्यो तावता सूरिभिरेव चिंतित नास्त्येव परलोकस्तत कोऽपि नात्रागच्छति, गदि परलोक स्यात्तदा मच्छिाया कृतप्रतिज्ञा अपि कथ न दर्शन दा. १ ततो मयाद्यगवद् व्रतानि, पालितानि, तपासि तप्तानि, कष्टानि कृतानि, सर्वापराप्यनुष्ठानानि मुधा जातानि, मुधा मया मोगास्सता. वचितोऽमिति मिथ्यात्व प्रतिपन्ना , गन्छ मुक्त्व काकिन एव लिंगमात्रधरा निर्गता उत्तराध्य- यन सूत्रम् ॥९८४॥ . Ja त्यारे मूरिना मनमां एम विचार आव्यो के-परलोक जेवू का छेज नहिं तेथीन कोइ अत्रे पाछो आवतो नथी. जो परलोक भाषांतर होयतो मारा शिव्य मतिज्ञा करीने जाय ते पण मने पाछा दर्शन केम न दीये ? में आज दिवस सुधि घणाय व्रत पाल्यां, अनेक अध्यपन२ तप तप्यां, बहु कष्ट वेठयां, वधां अनुष्ठान को ए तमाम व्यर्थ थयां. में सफल भोगनो त्याग पण व्यर्थ कर्यो; नाहक हुं वंचित रह्यो; आम मिथ्यात्व प्रतिपत्तिवाळा बनी गया. गच्छनो त्याग करी एकला मात्र साधु-लिंगधारी घर निकली गया. ॥१८४॥ अवांतरे तेन भक्तशिव्येण देवोभूतेन कियदिनानि यावन्नाट्यादि विलोक्म गुरुप्रेम्णाऽवायतं मिथ्यात्व गता गुरवो दृष्टाः, तत्प्रतियोधार्थ कस्यचिद्ग्रामस्य सीन्नि नाटयं विचक्रे, तत्राचार्गाः पण्मासान यावनाटधं पश्यतः क्षुधादिकं नानूभूतवंतः, नाटयं देवेन विसृष्टं, आचार्या अग्रतश्चलिताः. ततस्तेनैव सुरेण तेपामाचार्याणां संयम- परीक्षार्थ पट्कायनामानः षट् दारकाः सर्वालझार विभूषितांगा विकुचिताः. एटलामां ए आपाठभूति मूरिनो जे शिष्य पाछां दर्शन देवानी प्रतिज्ञा करी देव थयो हतो ते देवभावमां केटलाक दिवस नाट्यादि जोया पछी गुरुना प्रतिप्रेमर्नु रगरण यतां अहीं आव्यो त्यां गुरुने मिथ्यात्व पामेला दीठा. ते गुरुने प्रतिवोध देवा माटे कोइ गामनी सीममां तेणे नाट्य प्रयोग करवा मांड्या. आचार्य छ महीना मूवी नारय जोता रवा तेमां भूखतरस वगेरेनुं पण भान न रां. देव धयेला शिष्ये ज्यारे नाटय बंध कर्यु त्यारे आचार्य आगल चाल्या त्यारे ते देव ययेला शिष्ये ने आचार्यना सयमनी परीक्षा करवा पट्काय नामना छ छोकरा सर्व अलंकारथी शणगारेला उत्पन्न कर्या.

उतराध्य শব अध्यपन२ , ॥१८॥ ॥१८॥ प्रथम 'वीकायिक कुमारस्तेपामाचार्याणा हटो पतित , आचार्या आहुः, मो माल ! भूषणानि ममाय ? स नारयति तदनु सारिभिरसो गले गृहीत. ततश्च भगभ्रांतो याल प्राह प्रमोश पृथिवीकायिक कुमार , अस्या मद्राट या त्या शरण श्रित , मवादशानामेव कर्तुं न युक्त, हे स्वामिन् मदुक्तैका कथा श्रूयता, तथाहि- पहेलवेलो पृश्चिकायिक कुमार ते आचार्पनी दृष्टिये पड्यो. आचार्य बोल्पा के-भरे बालक! तारा भूगण मने आपीदे ते वाळके ज्यारे भूपण न आप्यां त्यारे मूरिए ते बाळकने गळे पान्यो तेथी भयभ्रांत थइने ते बाळक बोत्यो के-' हे प्रभो! 'हु पृथ्नीकायिक कुमार छ, आ सेंद्र अटवीमा तमारा शरणने आश्रये छु तो आप जेनाने माम फरवु योग्य नथी हे स्वामिन् हु एक फया कहु ते साभलो- एक कुलाल सानो मृदं पनन् मृदाकात एव भगति-जेग मिच बलि देमि । जेग पोसेमि जाओ। सा मे मही अम्मद । जाय सरगो भय ॥१॥ एतन्यायेन शरणागतस्य पि कथमेव पराभव करोषि ? सूरि- भिमतमतिपडितोऽसि बालेत्युक्त्वा तदगाभरणानि गृहीतानि, पाक्षिप्त नि, गत पृथिवीकायिक. स्तोकांतरे गच्छदिरानाटितीयोऽप्कायिकनामा यालको दृष्ट, सोऽपि तथैवोवाच, तत्कविता का चेय- एक कु भार मारी खाणमां मारी ग्योदता खोदता भड धसी पडता माटीमा दशाणो त्यारे बोल्यो-(जेण०) जेणे मिक्षा-बलि अर्थात् आन पर्यंत गुजारो दीयो, जेणे मने जन्मथी पोप्यो तेज माली मने आक्रमे छे-दाटे हे आतो शरणमागी भय जन्म्यु भा रीते तमारा शरणागतरूप मने केम आम पराभव सरो छो मूरिए का-'तु अपंडित=पूर्व-छो हे बाल" एटलु कहीने तेनां आभरण लइ लीयां - - D DO उत्तराध्य- पन सूत्रम् भाषांतर अध्ययनर ॥१८६॥ ॥१८॥ DO अने पोताना पात्रामा नाख्यां. पृथ्वीकायिक गयो ते पछी थोडीवारमा आचार्यने आगळ चालतां चीजो 'अकायिक' नामनो वालक दृष्टिए पड्यो. तेणे पण मथमना बालकनी पेठेज वचन कमां अने कथा कही. एकः पाटलनामा तालचरः प्रकामं वाग्मी, सोऽन्यदा गंगाश्रोतसि प्रविष्टः, तेन च हियमाणोऽसौ तटस्थज- नेनाभापि हे पाटल ! प्राज्ञ ! किंचित्पूक्तं पठ ? सोऽवादीत्-जेण रोहति बीआणि । जेण जीवंति कासवा ।। तस्स मज्झे मरिस्सामि । जायं सरणओ भयं ॥ १ ॥ एवमप्कायिककुमारेण कथोक्ता, तथापि तस्याभरणानि तेनाचार्येणातिपंडितोऽसि हे कुमारत्युक्त्वा गृहीतानि, सोऽपि तथैव गतः अग्रेऽग्निकायिकः कुमारस्तस्यापि तथैवो- क्तिप्रत्युक्ती, तत्कथिता कथा चैपा- एक पाटल नामनो तालचर अत्यंत वाचाळ हतो ते एक समये गंगाना प्रवाहमा पेठो ते प्रवाहमा तणाणो त्यारे तीरे उभेला जणे कयु के-' हे पाटल ! प्रान्त ? कंइक मूक्तनो पाठ करो. त्यारे ते बोल्यो (जेण०) जेनाथी बधां वीन उगे छे अने जेना वडे वधा प्राणिो जीवे छे तेना मध्यमां मरीग. एतो शरणमांथी भय उत्पन्न ययुं कहेवाय. आम ए अकायिक कुमारे कथा कही तो पण आचार्ये 'तु तो अति पंडित छो, कुमार ! एम कहीने बधां आमरण उतारी लइ पात्रांमां नाख्या. ते अकुमार चालतो थयो, त्यां आव्यो अग्निकुमार पाळक तेणे पण वचन प्रतिवचन थया पछी कथा कही के- एकस्य तापस्याग्निनोटजो दग्धः, स यक्ति-जमहं दिवा य राओ य । तप्पेमि मएसपिणा ॥ तेण मे ।

भाषांतर अगमन ॥१८७॥ ॥१८७॥ उडओ दवो । जाम सरणओ भय ॥ १॥ अमिन्नेवाले बितीया कथा-कश्चित्पथिक पथि व्याघ्रभीत्यानिशरण श्रित , तेनैव तस्याग दग्ध, स प्राह--मए बग्घस्स भीएण । पावओ सरणीकओ ॥ तेण दह मम अग । जाय सरणओ भय ॥२॥ एव करावय कथयतस्तस्य कुमारभ्य तेनाचार्यण तथैवोस्वाभरणानि गृहीतानि, अग्रेवायुकुमारो मिलितस्तस्य तयोक्तिः, तत्कथिता कथा चेय- एक उपस्थीनी शुपडी अग्निये साली त्यारे तेणे फा के-जेने मे रात्रे तथा दिरसे मध तथा घीवढे तप्तयों तेज भमिए मारु उज- पड वाळयु. आतो शरणमाथी भय उत्पन्न थयु. कळी आ विपयमा पीनी पण कथा कही के-मोइ एक पवितबारेमा पनी हीरथी भगिनो भडयो करी तेने शरणे वेठो त्या ते अमिएन तेनु अग दझाडयु, त्यारे ते पोल्यो के-गाय पी ही गे पाको शरण कर्यो तेणेन मारु अग पान्यु ए शरणमाथी भय उत्पा यु. आग ने क्या कही ते सभिजता छता पण मागे गेने पहेबांनी पेठे मूर्ख वगेरे यतो सभळारी तेनां तमाम आभरणो उतारी लइ पात्रामा पाख्या. भाग परत आयुकुमार मल्यो तेणे पण पूर्वना कुमारना जेवान रचनो सभळावी कथा फही के- को घननिचितशरीरो घायुजाति , स चायदा वायुभग्नागो दुइधारी मार्गे गच्छन् केनाप्युक्तो हहा दृढाग! स्व कथमीदग्जात ? म आह-जिट्टासादेसु मासेसु । जो सुहो होइ मामओ ॥ तेण मे मजए अग ) जाय सरणओ भय ॥१॥ एव कथा कवयतोऽपि तस्य कुमारस्या भरणानि तेनानार्येण गृहीतानि उत्तराध्य- पन सूत्रम् भाषांतर अध्ययन२ ॥१८८॥ ॥१८८॥ कोइ एक दृढपुष्ट अंगवाळो वायु जाति हतो ते एक समये वायुथी जेनुं अंग भन्न धयु छे तेवो हाथमां लाकडी झाली मार्गमा मतो हतो तेने कोइए कयु-के मजबूत अंगवाला! तुं आम केम थइ गयो ? ते बोल्यो-ज्येष्ठ आषाढ मासमां जे वायु सुखकर होय छे तेणे मारु अंग भांगी नाख्यु, ने जेनुं शरण ली, तेनाथीज भय उत्पन्न थयुः ॥ १ ॥ अग्रे च वनस्पतिकायिकः कुमारः, सोऽपि तथैवाख्यत् , तदुक्ता कथा चेयं-एकस्मिन् वृक्षे केषांचित्पक्षिणा- मावासोऽस्ति, तत्र यहनि तेपामपत्यानि जातानि. अन्यदा वृक्षमुलादुत्थिता वल्ली सतावेष्टयंती वृक्षशिखरमारूढा. एकदा तामारुहासर्पस्तत्सीमां प्राप्तो नीडस्थान्यपत्यानि भक्षितवान् , मातृपितृपक्षिभिरुक्तं- आगळ चालतां वनस्पतिकायिक कुमार मळ्यो. तेणे पण पूर्वना कुमार जेवांज वचनो संभळावी कथा कही के-एक वक्षमा केटलांक पतिओनां रहेठांण हतां तेमां घणाय पक्षीओनां वच्चा जन्म्यां हतां. ए झाडनामूळमांथी एक वेल उठी ते झाइने चारे कोस्थी चींटलाती चाली ते छेक ए झाडनी टोचे पहोची. एक समये ए वेल उपर चडीने एक सर्प टोचे पहोंची पक्षीओना माळाओमां पडेलां बच्चानुं भक्षण कयुं त्यारे ते वच्चांभोनां मावतर पक्षियोए कह्यु के- जाव वुच्छं सुहं बुच्छं । पायवे निस्वदवे ॥ मूलाओ उठीआ वल्ली । जायं सरणओ भयं ॥१॥ एवमुक्तेऽपि वनस्पतिकायिकस्याभरणानि तेनाचार्येण गृहीतानि. अथ प्रसकायिकः कुमारः कथामाह- ज्गरे आ वृक्ष पाम्यां त्यारे आ सुखरूप तथा उपद्रवरहित वृक्ष हतो. मूळमाथी वेल उठी अने शरणमांथी भय जाग्युं.

भाषांतर अध्ययन ॥१८९।। ।।१८९॥ . ।। फहवा छतां पण ए आचार्ये वनस्पतिकायिस्कमारनां सपला आभरण उतारी लइने गोताना पात्रामा नाग्व्या. त्या वळी प्रसकापिककुमार मळ्यो तेणे पण वीजाओनी पेठे युक्ति प्रयुक्ति क्या पछी कथा कही के- एकस्मिन्नगरे परमकागमे पुर प्रविशतवाडालानशौचभीत्या जननिष्कास्यमानान दृष्ट्वा मध्यस्थजना केचिदाहु- अभितरिआ भीआ। रिलती बाहिरे जणे ॥ दिस भयरमायगा। जाय सरणो मय ॥१॥ त्रसकायिको वित्तीया कथामार-एकस्मिन्नगरे राजा स्वय चौर , पुरोहितो माडीवह , तयोरन्याय दृष्ट्वा लोका परस्पर वदति-जस्थ राया सय चोरो । मडिओ य पुरोहिओ ।। दिस भयर मागरगा । जाय सरणओ भय ॥१॥ अथाऽसौ तृतीया कथामार-- एक नगरमा पर पक्रनो इल्लो थयो अर्थात् पासेना रानाए चडाइ करी त्यारे पुरमा प्रवेश करतां चांडालोने भाभडछेग्नी व्हीक्थी जनोए बहार काढवा माख्या ते जोइने मध्यस्थ केटलाक जनो कहेवा लाग्या के-(अपर्भित०) आ-तर-अदरना जनो व्हीने पहारना जणने पीडे छे दिशाओ भयव्याप्त गत आतो शरणमाथी भय उत्पन्न थयु. वळी ए प्रसायिके चीनी क्या कही के-एक नगरमा राना स्वय चोर हतो पुरोहित भांडीवह-एटले भाडा करनारो ते यनो अयाय जोइ लोको कहेता के-[ जत्थ.] ज्यां राजा स्वर चोर अने भाडीयो पुरोहिन होय त्या नागरिक लोकोने भय दीसे तो शरणमांथी भय जान्यु एम यहेवाय कळी नेणे एक त्रीजी कथा पण कही है

भाषांतर
মান?
पन सूत्रम्
॥१९०॥
॥१९॥
एकस्मिन् ग्रामे एकस्य ब्राह्मणस्य पुत्री यौवनस्थातीवदर्शनीयास्ति, तस्या पितुर्भोगेच्छाभूत् , परं लज्जातः
कस्याप्यग्रे न कथयति, दुर्बलो जातः, पल्या दुर्बलत्वकारणं पृष्टं, स स्वसुताभोगेच्छां प्राह, तया प्रोक्तं मा वीषीद
तवेन्छामहं पूरयिष्यामीत्युक्त्वा मातैकांते. पुत्री प्राह हे वत्सेऽस्माकं पूर्व पुत्रीं यक्षा भुंजंति, पश्चादरस्य दीयते.
ततो यक्षः कृष्णचतुर्दश्यां त्वदावासे समायास्थति, त्वया तस्यापमानं न कार्य, रात्रौ त्वयोद्योतो न कार्यः.
एक गाममां एक भ्रष्ट ब्राह्मणनी सुरूपा पुत्री हती तेमां ब्राह्मणनी वृत्ति मलिन थता मनमां शोपातो ते जोइने तेनी
पत्नीए पूज्यु त्यारे मनोगत कह्यु. तेणीए धणीने धारण दइ एकांतमां पुत्रीने कह्यु के-पुत्रीने प्रथम यक्ष उपयोजे छे पछी
वरने देवाय छे. तारे आवासे चउदश दिने यक्ष आवशे तारे तेनुं अपमान न करवू अने दीवो न राखवो.
*एवं मात्रोक्त सा पुत्री रात्रिप्रस्तावे स्वगृहे सुप्ता, यक्षं साक्षात्पश्यामीती कौतुकेन दीपकः कृतः, परं शराव-
संपुटे रक्षितस्तेन तद्गृहांतरुयोतो न दृश्यते, रात्रौ तत्र पिता यक्षरूपः प्रविष्टः, तेनेयं भुक्ता. रतक्लांतश्च तत्रैव
सुप्तो निद्राणश्व, अनया च कौतुकेन शरावसंपुटं दूरीकृत्य दीपोद्योते दृष्टो जनकः, ज्ञातं मातृकपट, तया चिंतितं
यद्वति तद्भवतु, मयानेनैव सह विला
विलासः कार्यः, इति चिंतयित्वा जागरितेन तेन समं पुनीगान् भुक्त्वा सा
सुसा सोऽपि सुप्तः बावपि निद्राणी, प्रभातेऽपिनजाग्रता, प्रातामणी तत्रागत्य तौ तथा सुप्तौ दृष्ट्वेमां मागधिकां पठति-
*अइग्गएवि सरिए । बेइए अंधूभगएवि वायसे ॥ भित्तीइगपवि आयवे सहि । सुहिए हु जणे न धुमइ ॥१॥

भाषांतर भगमन अस्या व्याया-अचिरोदतकेऽपि च सूर्य कोऽर्थ ? प्रथमोदिते रवी चैत्यस्तृपगते च वायसे अनेनोचविवस्वती त्याह, मिनिगते घातपे, अनेनोचतर इत्यर्थ हे सम्खि! सुखिनो हुर्वाक्यारकारे, जनो न बुगते, न निद्रा जहाति, अनेनात्मनो दुखित्व प्राप्यति, सा हि भर्तृविर ग्विका न रात्री निद्रा लन्धवतीति मागधिकार्थः जननीप्रोक्तामिमा मागधिका श्रुत्वा पुत्री विनिद्रा प्रार- *तुमेवर अय मालवे । म है विमाणे य जाखमागय ॥ जावो अन हु पर तायए । अन्न माप गवेस तातय १ अस्या व्यारया-त्वमेवार मात ! इन्यामत्रणे अलाप्युक्तवती शिक्षासमये, य गधा 'माति' मैव ' विमा णगति' यक्षमागत पिमुग्व मा कृया' 'जस्खोयति' अय अपक्ष, न त्वय तातक रिता, हे मातरन्य तात गवेषपेत मागधिकार्य ॥१॥ पुनर्माता मणति-वर मासा कुछि धारिया । जस्सासपरसपुरीसमदिय ॥ धुगा तामिगेरिओ । हरिओ सरणासरणय ॥१॥ अस्या गाण्या-नवमासान् यावत्कुक्षौ धारिता, यस्या प्रश्रवण पुरीप च मर्दित, 'धुयाए तपसि' तया दुहित्रा 'मेत्ति' मम गोरिको भर्ता हतधौरितस्ततो हेतो शरणमशरण मम जातमिति गम्गे रित कुर्वत्या ममारित जातमिति मागधिकार्थ.. ॥१॥ यथा तस्या पुत्र्या मातृपित्राभ्या विनाश कृतस्तथा मातृपिततुल्वेन भवता मदिनाश नियमाणोऽस्ति एव सकायिकेनोक्तेऽपि म आचार्यों न निवर्तते अरबमकायिकश्चतुर्थी कथामाह- मा फ्धामा वेटयेक भाग स्स उखानु अस्थाने जणावाथी मक्षेपमा सर्व अर्थ आपवामा भावेल के उत्तराध्य- यन सूत्रम् भाषांतर যান। ॥१९२॥ ॥१९२॥ *आम कही योग साधी आप्यो. पेलो भ्रष्ट त्यांज मूइ रह्यो. पुत्रीए शरावयी ढांकेल दीवो उघाडी ओळख्यो अने मार्नु कपट जाण्यु. सवारे माए आवीजोइने कहां के-(अइरुग्ग०) मूर्य उग्यो कागडा बोल्या तडका भी चड्या तोय मुखिया न उठे त्यारे पुत्रीए को के-(तुमे०) हे अंब! तुंज वोली हती के यक्षनु अपमान मा करजे तो हवे आ यक्ष थयो माटे मारो वाप अन्य खोली ले. त्यारे माए कयु-( नव०), नव मास उदरमा धारण करी बळी जेनां मूत्र मळ चोळ्यां तेणेन घरनो भर्ता हर्या. आतो शरणज अशरण थयु. आ मातापिताए पुत्रीनो विनाश कर्यो तेम तमे पण मायाप समान थइने जगत्नो विनाश करो छो. आम ए त्रसफायिके कया छतां पण ज्यारे ते आचार्य निवृत्त न थया त्यारे तेणे चोथी कथा कही- एकस्मिन् ग्रामे एकेन ब्राह्मणेन यज्ञार्थ सरोऽकारि, सर:समीपे वनमपि च कारितं, तत्राने कान् पशून जुहन् हिजो मृतस्तत्रैव ग्रामेऽजोऽजनि, सचरणार्थ पहिर्याति, सरोवनं च पश्यति, ततो जातिस्मरणवान जातः. अन्यदा तत्सुतेन यज्ञः कर्तुमारेभे, तदर्थमसावेवाजस्तेन सुतेन तत्रैव नीयमानो गाढस्वरेण पूत्कारं कुर्वन् केनचि- नमुनिमा सातिशयज्ञानेन दृष्टो भणितश्च-वियड खणावी तइं छगल । तइआरोविअरुख ॥ जन्नपवत्तण तई कीयओ। काई बूबू मुरक्ख ॥ १॥ एक गाममां एक ब्राह्मणे यज्ञार्थ तलाव गळाव्यु. तळावने समीपे वन पण वाराव्युं, त्यां अनेक पशुओ राखी यज्ञ कर- नारो ए ब्राह्मण मृत थयो. वासनावले तेन गाममां अन थइने अवतो. ते चरताने बहार जाय त्यारे पोते करावेलां सरोवर -- .

उत्तराध्य भाषांतर সিগনং ॥१९३॥ ॥१९३॥ तथा बनने जोता जातिस्मरण थयु एक वखते तेना पूर्वभवना पुत्रे यज्ञ करवा आरभ कर्यो त्यारे एन अन ते पुढे ज्यारे लइ जवा माड्यो त्यारे मोटे अवाजे पूत्कार शब्द करतो कोइ अतिशय ज्ञानवान् मुनिए दीठो मुनिए कयु के- 'वियडमि' देशीवचनस्ताकिकेत्यर्थ यतिप्रणीतामिमा मागधिका श्रुत्वाऽजो जातिस्मरणधरो मौनवान जात , तत्पुत्रेण साधु पृष्टः कथसौ मौनी जात' साधु प्राहाय तव पिताजयागकरणादज व जात , तत्पुत्रेणोक्त- मत्राऽभिजान कि ? साधु पार तव गृगगभूनिहितनिधिमसी पादाग्रेग दर्शयिष्यति ततस्तथैव तेनाजेन कृत, पुत्रस्थाजस्य च धर्मप्राप्सिईयोरपि देवलोकगतिर्जाता [विभड०] वीयडी-तळावडी खणावी स्पारे हे छगर! त्या रक्ष रोपाव्यां अने यज्ञप्रवर्तन तेंन कराव्या हवे हे मूर्ख यूबू शु करे छ ? यतिए रनी सभळादेवी आ मागधिका साभळीने अजने पोताना पूर्वभवनु स्मरण थतां मौनवान् बनी गयो. तेना पुत्रे साधुने पुच्यु के आअन बराडा पाडतो हतो ते एकदम मौनी केम थयो? साधु पोल्या के-आ तारो पूर्वभवनो पिता छे तेणे अनयाग करवाथी पोते अन थइने जन्म्यो छे पुने पूज्यु के-तमे साचु कहो छो तेनी खात्री शी ? साधुए कहा के-तारा आगणामां आ नारा पिताए दाटेलो निधि छे आ अन पोताना पाना अग्रभागधी तने देखाइशे, ए अजे एन ममाणे यु पुत्रने तथा भजने वेयने धर्मपाप्ति यवायी गन्नेने देवलोकगति प्राप्त थइ JE भाषांतर अध्ययन२ यन सूत्रम् ॥१९४॥ ॥१९४॥ एवं तेन ब्राह्मणेन शरणं मे भविष्यतीति कृत्वा तटाकसमीपे यज्ञारामो विहितः, स एवास्य वधस्थानतया भवनेन शरणाद्भयमुत्थितमिति शब्दपदं जातं. एवं भवंतोऽपि शरणागतानामस्माकमनर्थकारिणो जाता.. एव- मुक्तोऽपि त्रसकायिककुमारस्याभरणानि गृहीतानि. एवं षण्णामपि कुमारकाणां पंडितवादिनो यूयमित्युक्त्वा- भरणान्यादायाने चलितः सूरिः. पुनस्तेन देवेन सम्यक्त्वपरीक्षार्थ हारकंकणाद्यलंकृता साध्व्येका दर्शिता. एम ए ब्राह्मणे मने शरणरूप थशे एटला माटे तळाव समीपे यज्ञाराम कर्यो एज तेना वधस्थानरूपे थयो, त्यारे कह्यु आतो शरणमांथी भय उत्पन्न थयु. आवीजरीते आप पण शरणागत बनेला अमोने अनर्थकारी थया. आटलं कहेतां छतां पण ए त्रसकायिककुमारनां सघळां आमरणो ए आचार्ये उतारी लइ पात्रांमां नाख्या. एम छए कुमारोने 'तमे वधा पंडितवादि छो' एम कहीने आभरण लइने आगळ चाल्या त्यां एज देवे पुनः सम्यक्त्व परीक्षार्थ एक साध्वी स्त्री हारकंकण वगेरे अलंकारवाळी आगळ देखाडी. तां दृष्ट्वा सूरिरेवमाख्यत् , हे प्रवचनोड्डाहकारिके ! दूरतो व्रज ? मुख मा दर्शय ? रुष्टया तयोक्तं-राइसरि- सवमित्ताई । परच्छिद्दाई पाससि ॥ अप्पणो बिल्लमित्ताइं । अपि छिहाई न पाससि ॥ १॥ तव पतद्गृहे किम- स्तीति तया प्रत्युतोपालब्धस्तथाप्यसौ न प्रतिषुद्धः. अग्रे चलता तेनाचार्येण स्कंधवारगतो राजा दृष्टः, तेन राज्ञा- चार्यों वंदितः, प्रोक्तं च हे प्रभो! पात्रकं धर ? प्रासुकमोदकान् गृहाण ? ततः स पात्रक्षिप्ताभरणदर्शनभीत्यावद- 23 E भाषांतर মান ॥१९॥ ॥१९५॥ दहमधारार न करिष्ये, राज्ञा च रठाझोलिकात-पात्र कर्षित, आभरणानि दृष्टानि तेने जोइने मूरि बोल्या के हे प्रवचनोड्डाह कारिके! अर्थात् भवचनमा अडचण करनारी!दर चालीमा अही मुख मा देखाइ आ सा भळी रष्ट थयेली तेखीए कबु के राजिसर्पपमानाणि परच्छिद्राणि पश्यसि आत्मनो विल्लमानाणि छिद्राणि न हि पश्यसि-राइ तथा सरसव जेवडा पण पारका छिद्र देखो छो अने पोताना दिल्य पीला जेाडां छिद्र पण नयी देखता? तारा आपडु पडु थइ रहेला घरमा शु छे? आवी रीते ते साध्वी सीए समजाव्यो तथा उपालभ ठपको दीपो तो पण ज्यारे न समज्यो अने आगळ चाल्यो त्या ते आचार्य एक सेना सनिवेशमा आवेलो राजा दीठो ते राजाए आचार्यनु वदन कर्यु भने ना के-' हे प्रभो पात्र धरो अने उत्तम मोदक गृहण करा ते भासरे पात्रामा पोते आभरण भयो छे ते देखाइ जाय एपी व्हीस्थी का के-आज मारे आहार नयी करवो पण राजाए इठवी तेनी झोळीमाधी पानु खेच्यु त्यातो वधा आभरण दीग राज्ञोत हे अनार्य ! कि त्वया मत्पुत्रा व्यापादिता ? इत्यादिवचनैस्तजित स सरिर्भयभ्रातो न किचिद्धक्ति, पश्चामायाजाल साहत्य स शिष्यदेव प्रकटीभूत , स्ववृत्तात चाकथयत्, एव चोपदिष्टयान हे प्रभो। यथा नाट्य पश्यता पण्मासान् यारक्षुत्तृषा न जाता, एव देगा अपि दियनाट्य पश्यतो न किचित्म्मरति, नाप्यत्रागमनो- त्साह कुर्वति, यत सिद्वातेऽप्युक्त रानाए गद्य के-हे अनार्य ! भू ते मारा पुत्रोने मारी नाख्या ? आवां भावा वचनोथी तरछोड्यो त्यारे ते मूरि भयभ्रात उत्तराध्य पनस थइने कंह बोली न शक्यो. पछी पोते पायरेली मायाजाळ संकेली पेलो देव थयेलो शिप्य प्रकट थयो अने पोतार्नु तमाम वृत्तांत कएँ, ने उपदेश कर्यो के-दे प्रभो ! जेम नाटक जोतां छ मासमुधी भूखतरसनी खबर न पडी एम देवपण दिव्य नाटको जोतां कंइ पण संभारता नथी तेम तेओ अत्रे आश्वानो उत्साह पण राखता नबी. सिद्धांतमां पण कहां छे के- भाषांतर अध्ययन२ ॥१९६॥ ॥१९६॥ संकेतदिव्यपेमा । विसयपसत्ता सम्मत्तकत्तया ॥ अगहीणमणुअकजा । नरभवमसुहं न इंति सुरा ॥१॥ DE इत्यादि शिष्यदेववाक्यैः स प्रतिबुद्धः, सिद्धांतवचनास्थां कृत्वा पुनः संयमे लीनः, पूर्व तेन दर्शनपरीपहो न सोढः, पश्चात् सोढः अब कस्य कर्मग उदये कः परीपहोदयः स्यादिलाह-दर्शनमोहनीयोदयाईर्शनपरीपदः स्यात्. ज्ञानावरणी- योदये प्रज्ञापरीपहः स्यात् , तस्यैवोदयेऽज्ञानपरीपहोऽपि स्यात् , अंतरायकर्मोदयेऽलाभपरीपहः स्यात् , चारित्रमो- हनीयकोदो आक्रोश १ अरति २ स्त्री ३ नैपेधिकी ४ अचेल ५ याचना ६ सत्करीः ७ गते सप्तपरीपहा उत्पयंते, शेषा एकादश वेदनीयकर्मोदये उत्पधते. ॥ ४५ ॥ अथ सर्वोपसंहारगाथामाह- [संकंत० ] दिव्यप्रेममा सक्त रहेनारा मुरा-देवो विषयामसक्त अने समाप्तकर्त्तव्य होइ मनुष्य कार्योने नापसंद करता असुखरूप नरभवमां नथी आवतां. इत्यादि ए शिष्य देवनां वचनो वडे ते मूरि प्रतिबुद्ध थइ-बोधलाभ पामी सिद्धांत वचनोमां पूर्ण आस्था करी पुनः संयममां लीन यया. पूर्वे तेणे दर्शनपरीपह नहो तो सयो पण पाउलधी सहन कर्यो.

उत्तराध्य
भाषांतर
अध्यपन२
॥१९७||
॥१९७॥
-हवे क्या कर्मनो उदय था क्यो परीपह थाय ते कहे -
दर्शनमोहनीय कर्मनो उदय थां दर्शनपरीपह उद्भवे छे ज्ञानावरणीयनो उदय थाता प्रज्ञापरीपह थाय छे अने तेनान
उदयमा अज्ञानपरीपह पण थाय के अतराय कर्मनो उदय यतों अलाभपरीपह थाय र चारितमोहनीय कर्मना उदयावसरे
आक्रोश, अरति, खी, नैपेधी, अचेल, याचना अने सत्कार; ए साते परीपह उद्भवे छे पाकीना अगीआर परीपहो वेदनी-
यकर्मोदय यता उत्पन्न पाय छे,
एए परीसहा सव्वे । कासवेण पवेईया ॥ जे भिक्खू न विहन्निज्जा । पुट्टो केणइ कहु तिबेमि ॥ ४६
मूळगाथार्थ -आ सर्वे यापीश परीपदो काप्यप श्रीमहावीरे प्रवेदित-प्रज्ञापित परेला छे जेने जाणीने भिक्षु-साधु कोर
पण परीपहे स्पृए-सपद्धस्थता क्याय पण यिहत न थाय अर्थात्-कोर पण काळे फ्याय पण सयमथी भ्रष्ट न
आ कमप्रवाद नामक अप्टम पूषनु सप्तदश सत्सरमु प्राभूत के तेना उद्धारलेश आ उत्तराध्ययननु चीजु परीपदाध्ययन छे
'यारया-ते दाविंशति. सर्वे परीपरा' काश्यपेन श्रीमहावीरेण प्रवेदिता, प्रकर्षेण ज्ञाता', यान् ज्ञात्वा
भिक्षु साधु केनापि परीपहेण स्पष्ट सन कुत्रचित्कस्मिंश्चित्प्रदेशे कस्मिंश्चित्काले था न विहन्येत सय
मान पात्येत ॥ ४६॥
थाय ॥ ४६॥

. --- उत्तराध्य- यनसूत्रम् D D भाषांतर अध्ययनर ॥१९८॥ مجلس وحدتج ॥१९८॥ अर्थ:-आ सर्वे परीपह काश्यपभगवाने पे श्रीमहावीरे प्रवेदित जाणिने ज्ञापित कर्या छे. जेने जाणीने मिशु साधु कोइ पण परीपहथी स्पृष्ट थइ क्यांय-कोइ पण प्रदेशमा कोइ पण काळे विहत यतो नथी. संयमथी पतित थतो नथी. इदं हि कर्मप्रवादनामाष्टमो हि पूर्वस्तस्य सप्तदशं प्राभृतं, तस्योद्वारलेशं दितीयमध्ययनमुत्सराध्ययनस्य. आ कर्मपवाद नामना अष्टम पूर्वनु सप्तदश-सत्तरमा प्राभूतना उद्वारलेश उत्तराध्ययन- द्वितीय अध्ययन कहेवाय छे. इति श्रीमदत्तराध्ययनस्वार्थदीपिकायामुपाध्यायश्रीलक्ष्मीकीर्तिगणिशिस्यश्रीलक्ष्मीवल्लभगणिविरचितायां द्वितीयमध्ययनं संपूर्णम्. ।। आ प्रमाणे उत्तराध्ययननी उपाध्याय लक्ष्मीकीर्तिगणि शिप्य श्रीलक्ष्मीवल्लभगणिए विरचित मूत्रार्थदीपिका नामनी टीकामां चीजु परीपहाध्ययन पूर्ण थयु.

Shri Maduttra Adhayayansutram Bhag-i

Author
Gani, Laxmivallabh
Title
Shri Maduttra Adhayayansutram Bhag-i
File name
Shri Maduttra Adhayayansutram Bhag-i
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2011/01
Publisher
Jamnagar., Jain Bhaskaroday Press
Language
Sanskrit
Pages
199
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
446032
Barcode
99999990027882.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
4orgHfUdhVW
Download PDF

Shri Maduttra Adhayayansutram Bhag-i