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The Chhandogya Upnishad

Pandit,rajaram · 2012/08

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J ... ... छान्दोग्य उपनिषद् का विषर छान्दोग्य उपनिषद् का सामवेद से सम्बंध, उसके प्रपाठक आदि का निर्णय और उसका विषय... भूमिका-१ पहला प्रपाठक। प्रवाक पृष्ठ ओम् की उपासना और ध्यारया का आरम्भ ओम् फी भिन्न २ महिमा और उस २ महिमा फालश्य में रखकर उपासना करने के भिन्न २ फल यशकर्म के लिये ओम की महिमा जानने की आवश्यकता देवासुरमंग्रामकी गाण्यायिका और अध्यात्म में प्राणरहि मे ओम् की उपासना अधिदेवत में सूर्य दृष्टिम ओमफी उपासना और सूर्य और प्राण में समान धोका वर्णन व्यानहाट म आंम् की उपासना उद्गीय [ उद+गी+] के अक्षरों की उपासना और उसका फल प्रार्थना के फलने फूलने पा उपाय ओम की उपासना में अमृनत्य की प्रामि... ओम् का ग्यदायशापामों में प्रणय और सामयदीय शांगाओं में उद्गीथ रूप मे वर्णन साम रचा माधन है मधियत में सूर्य के अन्तयांमी रूप में परमात्मा भी उपासना सायात्म में प्राण के अन्तर्यामीरूप में परमात्माशी उपासना .... उदगीप (भाम् । रहस्प भयं के जानन में शिलफादायमार अर्याल या मंयादार पिये जानने काफल (सम में उपजीयन पा साम) ... .. ... ... ... .. ... ... ... ... ... ...

(२) ... ... ... भवाक-पृष्ठ बुर्भिक्षकाल में उपस्ति का देशान्तरजाना और महावत का जूठाखान आदि प्रस्ताव के अनन्तर उपस्ति का राजा के यज्ञ में जाना और प्रत्वजों से संवाद ...१०-४६ राजा और उपस्ति का संघाद और ऋत्वजों का उपस्ति से प्रस्ताव, उद्गीथ और प्रतिहार के देवना का ज्ञान लाभकरना शीय उद्गीथ (अन्नकी कामनावाले के लिये) ..१२-५५ स्तोनाक्षरों (हाउ, होइ, ओहोहाइ, इत्यादि) का रहस्यार्थ दूसरा प्रपाठक साधुदृष्टि से समस्तसाम की उपासना लोकदृष्टि से पञ्चविध साम (हिङ्कार, प्रस्ताघ, उद्गीथ, प्रतिहार, निधन) की उपासना २-६२ घृष्टिदृष्टि से पचविध साम की उपामना ३-६४ जलष्टि से पञ्चविधसाम की उपासना ४-६४ मतुदृष्टि से पञ्चविधसाम की उपासना पशुदृष्टि से पञ्चविधसाम की उपासना प्राणदृष्टि से पञ्चविधसाम की उपासना याणी की दृष्टि से सप्तविघसाम (हिङ्कार, प्रस्ताव, आदि, उदीय, प्रतिहार, उपद्ध, निधन) की उपासना आदित्यदृष्टि से सप्तबिधसाम की उपासना ९-६८ आदित्यजय और आदित्य से परे की जय पाले भाग्मम्मित मतिमृत्यु सप्तविध साम की उपासना ...१०-७१, प्राणों में गाय साम की उपासना ....११-७३ अग्नि में रथन्तर साम की उपासना ....१२-७४ मिथुन में यादन्यसाम फी उपासना भादित्य में गृहत माम की उपासना पजन्य (मेघ) में पेरुप माम फी उपामना अतुओं में पैराज माम फी उपासना ... ... ... ...

(३) प्रवाक-पृष्ठ ..१४-५ ...२१-८२ ...२२-८३ ....२२-८५ शकरीसामफा लोकों से सम्बन्ध और उसके ज्ञान का फल रेवतीसाम का पशुओं से सम्बन्ध और उसके ज्ञान का फल यझायशिय सास का अंगों से सम्बन्ध और उसके ज्ञान का फल राजन साम का देवताओं से सम्बन्ध और उसके ज्ञान का फल प्रयाविद्याआदि की दृष्टि से साम की उपासना और उसका फल साम में कौन स्वर ग्रहण के योग्य और कौन त्याग के योग्य है साम गाते समय मन में क्या संकल्प होनचाहिये वर्णों उच्चारण की शिक्षा आदि धर्म के तीन बड़ेस्कन्धों का वर्णन और अमृतत्व के लिये ओंकार की उपासना साम यहों में तीनों सवनों द्वारा यजमान को तीनों लोक के देवताओं से फल की प्राप्ति तीसरा प्रपाठक उपासनाविशिष्ट कर्मों का भिन्नर फल गौर इसरहस्य के जानने का फल गायत्री से ब्रह्म की उपासना पांच द्वारपालों के पूर्वक हृदयस्थ ब्रह्म की उपासना और फल 'सर्व खल्विदंब्रह्म' से आरम्भकरके, शाण्डिल्य का यह प्रसिद्ध उपदेश जो मनुष्य के अपने दृढ़ विश्वास को ब्रह्म प्राप्ति का पूरा साधन बताता है धीर और दीघायु पुत्र की प्राप्ति के साधन- विराट्कोश का विज्ञान ...२३-७ .२४-८८ ....१३-११० ...१४-११४ ...१५-११६ प्रवाक-पृष्ठ अपनी दीर्घ आयु की प्राप्ति का साधन- पुरुप यज्ञ का विज्ञान अध्यात्म और अधिदेवत में मनो ब्रह्म ओर आदित्य ब्रह्म की उपासना और उसका फल ...१८-१२८ आदित्य ब्रह्म की उपासना और उसका फल, और प्रसग से सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन "...१९-११ चौथा प्रपाठक बड़े दानी राजा ज्ञानश्रुति का रैक से विधा ग्रहण ...१,२-१३२ सवर्ग विद्या और उसके ज्ञान का फल अशातगोत्र सत्यकाम जावाल का ब्रह्मचर्य के अर्थ हारिद्रुमत गौतम की शरणलेना, उसकी गाओं को चराना. और यलीवर्द, अग्नि, हस, मद्गु स ग्रहा की शिक्षा लेना सत्यकाम का आचार्यकुल में वापिसआना और आचार्य से उसी विद्या को दुहराना अय उपकोसल सत्यकाम का ब्रह्मचारी यनता है, और गाहपत्य दक्षिणाग्नि तथा आहवनीय अग्नि से उसे ब्रह्म विद्या का प्रकाश मिलता है ....१०, ११, १२, १३-१५३ उपकोसल फिर भाचार्य से महाविद्या सीपता है शुहगति (देयपथ या ब्रह्मपथ) का वर्णन यम में ब्रह्मा का कर्तव्य और त्रुटि होनेपर प्रायश्चित्त होम १६, १७,-१६३ पांचयां प्रपाठक माण और इन्द्रियों के धर्म और कर्म का वर्णन, और परस्पर के विवाद पूर्वक प्राणों की श्रेष्ठता का निर्धारण ...

(५१) ... ... भवाक-पृष्ठ प्रार्थों के अन्न और वस्त्र का वर्णन और प्राणों की उपासना का फल महत्व की प्राप्ति के लिये मन्य- कर्म का विधान पंचालों की सभा में श्वेतकेतु और राजा प्रवाहण' का संवाद, श्वेतकेतु का पांचों प्रश्नों में निरुत्तर होकर अपने पिता के पास आना और उसके पिता का उनके उत्तर पूछने के लिये फिर प्रवाहण के पास जाना पंचाग्निविद्या का उपदेश ...४,५,६,७,८,९,१८४. शुक्लगति (वा उत्तरमार्ग वा देवयान) कावर्णन कृष्णगति (वा दक्षिणमार्ग वा पितृयान) १०-१९ चन्द्रलोक से फिर वापिस आने का मार्ग और जन्मग्रहण करने का प्रकार १०-९२. शास्त्र से विमुख लोगों की गति और पापों का वर्णन वैश्वानर आत्मा के जानने के लिये छः ऋपियों का राजा अश्वपति के पास जाना और राजा स वैश्वानर आत्मा की विद्या को सीखना ११-१४-१९८. वैश्वानर के उपासक के लिये प्राणाग्नि होत्र और उसके फल का वर्णन १९-२४-२०८ छाटा प्रपाठक श्वेतकेतु को अपने पिता का उपदेश (विषय-- एक के विज्ञान से सबका विज्ञान) खाए हुए अन्न जल और तेज से मन, माण भौर पाणी फी उत्पात ५-७-२२२ का वर्णन ...

प्रवाक-पृष्ठ ८-२२७ ... ८-२३० १-२४४ २-२४६ ३-२४८ सुपुनि फा वर्णन भूग और प्यास के वर्णन का भरम्म फर परादेवता का वर्णन यहां से 'तत्वमसि' घाफ्य मारम्भ होता है जो इस उपनिषद् में नापार दुहरायागया है सातवां प्रपाठक नारद फो र नखुमार के उपदेश का भारम्भ-नाम की महिमा पापी पी महिमा मन पी महिमा संपल्प पी महिमा चित्त की महिमा म्यान पी महिमा यिनपी मदिमा पल पी महिमा भरणी महिमा जल पी महिमा तेजपी मदिमा पापारापी महिमा स्मृति पी महिमा मातापीमदिमा पापपीदिमा सप ये जानने या उपदेश पिसानप जानना उपदेश भतिजानने पा उपदेश मना सनने पाउपदेश निहाफ जानने या टपदेश दिमानने पापा सुगमनने पापा मूमा जानने पास ५-२५३ ६-२५४ ७-२५६ ८-२५८ ... ... १०-२६१ ११-२६१ १२-२६३ १३-२६४ १४-२६६ २५-२६७ ... ... ... १७-२७० ... . १९-२७१ १-७२ १६-२७२ (७) भवाक-पृष्ठ २४, २५, २७३ ... २५, २६, २७४ . - ܕܝ . १,२-२७. ... ३-२८४ ४-२८७ भूमा का स्वरूप भूमा के स्वरूप ज्ञान का फल और न जानन में हानि आठयां प्रपाठक हृदय कमल में ब्रह्म की उपासना (दहरोपासना) ब्रह्म का स्वरूप और उपासना का फल सच्ची फामनाओं के प्राप्तफरने में रुकावट और उनकी प्राप्ति का उपाय आत्मा का स्वरूप और उसकी प्राप्ति का फल ब्रह्मचर्य की महिमा और प्रक्षलोक का वर्णन हृदय की नाड़ियों और सूर्य की रश्मियों का सम्यन्ध आत्मा के जानने के लिये इन्द्र और विरोचन का प्रजापति के पास जाना और प्रजापति का उन दोनों को उपदेश (जामत् अवस्था में आत्मा का उपदेश) विरोचन की भ्रान्ति (देहको आत्मा समझना)... इन्द्र पर फिर वापिस आना स्वमायस्था में आत्मा के स्वरूप का वर्णन सुपुप्ति अवस्था में आत्मा का वर्णन तीनों भयस्थाओं से भिन्न आत्मा के स्वरूप फा मार पन्ध तथा मोक्ष का वर्णन जीयमुना की शतार्यता पा पर्णन इम प्रभाविद्यापी परम्परापा, उसकी ५-२८८ ... ... ७-२९४ ८-२९७ ... १०-३०२ ११-३०४ .. ... सुरक्षा रणने या और उस पलया पर्णन प्रयाफों या मादिरी ...

शुद्धि पत्र. २७१ पृष्ठ पर उन्नीसवें खण्ड का यह संस्कृत पाठ पढ़ना चाहिये- यदा वैश्रद्दधात्यथमनुते, नाश्रद्दधन्मनुते, श्रद्दधदेवमनु ते श्रद्धात्वेव विजिज्ञासितव्येति । श्रद्धां भगवो विजि- ज्ञास इति ॥१॥ २३ पृष्ट पर मंस्कृत के नीचे जो पाठ है, वह नोट का पाठ है।' पृष्ट १७७ के आगे १८० और १७९ के आगे १५८ हैं। यह दो अंक अशुद्ध छपे हैं । पाठ ठीक है . १८० की जगह १७८ और १५८ की जगह १८० ठीक करलेवें। ३१२ के पीछे सूचीपत्र के आठ अंक भी अशुद्ध छपे ' हैं. वहां ३.१ अदि की जगह ३१३ अदिं जानना चाहिये ।' . . .

छान्दोग्य उपनिषद् । छान्दोग्य उपनिषद् सामवेद से सम्बन्ध रखता है । यह ७५- निषद् छान्दोग्य ब्राह्मण का एक बहुत बड़ा भाग है, जिसके दो अन्याय और है, जो गृह्यविधि के सम्बन्ध में है । यह ब्राह्मण या तो इसी साधारण नाम से बोला जाता है, कि छन्दोगो का अर्थात् सामवेदियों का ब्राह्मण, या इसमें बहुत वडा भाग उपषिद् का है, इस लिये उपनिपद ब्राह्मण कहते है । इस उपनिपद के आठ प्रपाठक [का अध्याय ] और १५:४ खण्ड है । मसेक खण्ड के फिर छोटे २ अनेक खण्ड किये गए है, उनको भवाक, कहते है । ओर वह प्रत्येक खण्ड में १, २, इत्यादि अंक लगाकर प्रगट किये गए है । वृहदारण्यक की नाई छान्दोग्य में भी उपनिषद् के सारे रि- षय बड़े विस्तार के साथ पाए जाते है । इस उपनिपद में इस वि- पय को बडे जोर के साथ बतलाया गया है, कि मनुष्य के सकल्प में कितना बल है । एक दृढसंकल्प पुरुष क्या कुछ अद्भुत काम कर सक्ता है, यह इस में जगह २ प्रगट किया गया है । हमें यह [३॥ १६ में ] सिखलाया गया है, कि यदि तुम्हारे संकल्प इस तरह [जिस तरह वहा शिक्षा दी है ] पवित्र और दृद रहेंगे, तो कोई भी रोग तुम्हें नहीं दवा सकेगा और तुम सारे रोगों को जीतकर २१५वर्ष का आयु लाभ करोगे । इसी तरह और बहुत सी उपयोगी [ २ ] मपाठक १.खण्ड। .और अद्भुत शिक्षाएं इसमें दीगई हैं । सार यह है, कि मनुष्य इस ब्रह्माण्ड में एक दुर्वल वस्तु नहीं, वह एक बड़ी प्रवल और अटुन शक्ति है । उसको अपने ऊपर भरोसा नहीं, यही एक कारण है, कि वह दुर्बल बना हुआ है । जब उसे अपने ऊपर भरोसा होजाता है, तो फिर उसके लिये कोई रुकावट नहीं रहती । जैसा उसके अपने अन्दर पलटा आजाता है, वैसा ही वह अपने बाहर पलटा दे सक्ता है। पुरुष को ऐमा दृढ़ निश्चय इस उपनिषद से सिखलाया गया है। और यह बहुत कुछ यज्ञों के रहस्यार्थ खोलने में प्रगट किया गया है। । । इस उपनिपद में, और ऐसा ही दूसरी उपनिपदों में भी, कई एक ऐसी उपासनाएं पाई जाती है, जिनकी साधना करने वालों का सम्प्रदाय अब नही रहा है, जिन में यह परम्परा से चली आती थीं। इसी लिये ऐसी जगह पर सिवाय अक्षरार्थ कह देने के और कुछ नहीं बन पड़ता । हां यह पूरी आशा है, 'कि ज्यों २ माचीन शास्त्रों में खोज की जाएगी, धीरे २ सब कुछ खुल जाएगा। जो कुछ अब हम समझते है, वह भी इतना पर्याप्त है, कि हम उसी से अपने जीवन को सर्वाङ्ग परिपूर्ण बना सक्ते हैं । T पहला प्रपाठक-पहलाखण्ड 'ओमित्येतदक्षर मुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गा- यति । तस्योपव्याख्यानम् । १ । (पुरुष को) चाहिये कि ओम् * इस अक्षर की उपासना * ओम के वर्णन में देखो-कठ उप०२।१५-२७, प्रश्न उप. प्रश्न ५ मुण्ड० उप० २१ २ ३-६तैति०११४१४.१ । ८. ms उप०११११५॥

. छान्दोग्य उपनिषद् । करे, जो उद्गीथ कहलाता है। क्योंकि उदीय ओम् से आरम्भ होता है उस (ओम्) का पूर्ण व्याख्यान यह है--। १ । उद्गीथ सामवेद का एक भाग है, जो ओम् से आरम्भ होता है। उद्गाता इसको सोमयज्ञों में गाता है । सोमयज्ञ सात हैं-अग्निष्टोम, अखमिष्टोम, उक्थ, पोडशी, वाजपेय, अतिरात्र, अप्तोर्याम । यही सात सोमयान्न की सप्त संस्था कहलाती हैं। - इन यज्ञों में सोलह २ ऋत्वि होते हैं, जिनमें चार सामवेदी होते हैं। उनमें उद्गाता मुख्य है; ओर दूसरे तीन (मस्तोता, प्रति हती और सुब्रह्मण्य) उसके सहायक हैं। उद्गाता इन यज्ञों में साम के उिदीय भाग को गाता है । यह उद्गीथ ओम् से आरम्भ होता है, जिस को उद्गाता पहले एक लम्बे और ऊंचे स्वर में गान करता है, और फिर शेष उद्गीय को गाता है । यह उद्गीथ के आरम्भ का अक्षर सामवेदियों का परम आदरणीय अक्षर है । मानो, यह उद्गीय के सारे उपदेश का निचोड़ है । अतएव सामवेदियों में केवल ओम् अक्षर भी उद्गीथ ही कहाजाता है, इस का अधिक प्रयुक्त नाम प्रणव है । इस तरह सारे सामवेद का सार ओम् है । यह सामवेदीय उपनिषद इसी ओम पर ध्यान करने का उपदेश देती हुई आरम्भ होती है। उपनिषद् का उद्देश्य ओम् के बहुत से अर्थ बतलाने में है, जो उपासक के हृदय में जमजाने चाहिये, और अन्ततः उपासक को ओम् के . सब से ऊंचे. अर्थ अर्थात् ब्रह्म जो इस सारे विश्वका आधार है, उस पर पहुंचा देना है । वस्तुतः ओम् सारे वेदों का सार है, जैसा कि इसी प्रकरण में * अक्षय-क्योंकि ओम यह कह कर उद्गान करता है (उद्गीय गाता है | [ ४ ] मपाठक १. खण्ड १ आगे प्रगट होगा । इसी लिये हरएक वेद ओर वैदिक कर्म इसी से आरम्भ होता है । और स्वाध्याय के आदि और अन्त में इस मयोग किया जाता है, इस अभिमाय से कि इन सब पुण्यको का परमलक्ष्य ओम् * है । उपासक को चाहिये, कि जब वह ओम का उच्चारण करे, तो ओम की यह माहमा उसके ज्ञान में हो, जो यहां सविस्तर वर्णन की जाएगी। फिर वह अपने लिये वा उद्गावा वनकर यजमान के लिये जो मांगेगा, निःसन्देह पाएगा ॥ एपां भूतानां पृथिवी रसः, पृथिव्या आपो रसः, अ- पामोषधयोरस,ओपधीनां पुरुषो रसः, पुरुपस्यवाग्रसो,वा च ऋग्रस, ऋचः साम रसः, सानउद्गीथोरसः।। स एष रसाना र रसतमः परमः परायोऽष्टमो यदुद्गीथः । ३॥ इन सारे भूतों का रस + पृथिवी है, पृथिवी का रस जैल है, - , * तस्मादोमित्युदाहृत्य यशदानतप क्रिया । प्रवर्तन्ते विधा- नोक्ता सतत ब्रह्मवादिनाम् (गीता० १७॥ २४) इसलिये घेदिक लोग पहले ओम् का उच्चारण फरके तव यश दान और तप इत्यादि वेदोक्त फमा को बारम्म करते है॥ + रस यहां भिन्न २ अभिप्राय को घोधन करता है,आश्रय, कारण भौर सार । रस जिससे पोदे बढते है, यह उनका आश्रय है, उनकी कान्ति और जीवन का हेतु है । इस अभिप्राय को लेकर रस शम्द माश्रय या कारण के अर्थ में प्रयोग किया जाता है। रम जब पोदों से निचोड लिया जाता है, तो वह उनका सार कहलाता है, इस आशय से रस शब्द सार ये अर्थ में प्रयोग किया जाता है। यहां यह शब्द दोनों अभिप्रायों में प्रयोग किया गया है। पृथिवी सब भूतों का आश्रय है, पानी पृथिवी पर फैल हुए हैं, जो इमकी कान्ति और श्रीमन हेतु हैं। पोदे पानियों से उत्पन्न होते है । मनुष्य पोदों के .

. छान्दोग्य उपीनपद्। जल का रस ओषधिये है, ओषधियों का रस मनुष्य है, मनुष्य का रस वाणी है, वाणी का रम मचा (ऋग्वेद) है, अचा का रस साम (वेद) है, साम का रस उदीय है (जो ओम है)।२। सो यह जो (रसों के सिलसिले में) आठवां (रस) उद्गीय (ओम) है, यह सारे रसों में सबसे उत्तम, सबसे ऊंचा, सबसे ऊंचे स्थान (दर्जे) के योग्य है । ३। कतमा कतम, कतमत् कतमत् साम, कतमः कतम उद्गीथ, इति विमृष्टं भवति । । वागेवर्ष, प्राणः साम,ओमित्येतदक्षरमुद्गीथः । तदा एतन्मिथुनं यद् वाक्च प्राणश्च च साम च । ५। तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे स ५ सृज्यते । यदा वै विथुनौ समागच्छतः, आपयतो वैतावन्योऽन्य- स्य कामम् । ६॥ आपयिता हवै कामानां भवति, य एतदेवं विद्वा- नक्षरमुद्गीथमुपास्ते । ७। आश्रय जीता है । याणी मनुष्य का सार (सब से उत्तम भाग) है। ऋग्वेद घाणी को सार है । सामवेद ऋचाओं से पींचा हुआ रस है। उद्गीथ (ओम् अक्षर)साम का रस है । यह साम के मधुर स्वरसे गाया जाता है और मारे वेदों का परम लक्ष्य जो परब्रह्म है, उसका प्यारा माम है। सारी याह सृष्टि का निचोड मनुष्य है । उसका निचोड बाणी और उसका परम रस ओम है।

. प्रपाउँकखण्ड * तब ऋचा क्या है? साम क्या है.? उद्गीथ क्या है ?-र विचार है (प्रश्न है)। ४। ऋचा वाणी ही है, माम माण है, उद्गीय ओम् अक्षर है । अब यह जो वाणी और प्राण है, या ऋचा और साम है, यह एक जोड़ा (मिथुन) है।५। और यह जोड़ा ओम् इस अक्षर में मेल रखता है दो मेली इकट्ठे मिलते हैं, वह एक दूसरे की कामना को पूरा करते हैं। ६। इस प्रकार वह जो यह जानता हुआ, उदीय (ओम्) अक्षर को उपागता है (ओम् पर ध्यान धरता है), वह (जहाता, यज- मान की) कामनाओं का पूरा करने वाला बन जाता है। तदाएतदनुज्ञाक्षरं, यद्धि किश्चानुजानाति,ओमित्येव तदाह । एपो एव समृद्धिः,यदनुज्ञा । समयिता हवै का- मानां भवति, य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते । N - * उद्गीथ इस सृष्टि में रसों का रस है, इस बात के बतलाने के लिये जो पूर्व रस गिनाए हैं, उनमें जी'ऋचा, साम और उद्गीथ है, यह क्या हैं, इस बात का अब यहां विचार करते हैं। यहां कतमा इत्यादि दो २ थार आदर के लिये कहा गया है। याणी ऋचाओं का चश्मा है और प्राण साम का, क्योंकि बाणी ही ऋचा का रूप धारण करती है, और प्राण साम (स्वर) का, इस लिये ऋचा अपने असली रूप में वाणी हो है और साम प्राण है। + ओम में वाणी और प्राण का जोड़ा इस तरह मिला हुआ है. कि आम स्वय एक वाणी है और सारी बाणो का सार है। वाणी की उत्पत्ति का मुख में सब से पहला स्थान फण्ठ है और सर से अन्तिम होंठ । ओम, अ+उ+म, है । इनमें से अकण्ठ में उबारना । " ।

। *- छान्दोग्य उपनिषद्। यह [अक्षर] एक अनुज्ञा का अक्षर है, क्योंकि जिस किसी [वस्तु] की [पुरुष] अनुज्ञा देता है, वह यही कहता है ओम् * हां। अब यह जो अनुज्ञा है यह एक समृद्धि । है।वह जो इस प्रकार T . होता है, और मुह के खुला रखने से उच्चारण होता है, उ सारे मुख को वायु से पूर्ण करता हुआ और होंठों को सकुचित करता हुआ उचरित होता है, उसके पीछे म् उच्चरित होते समय होंठों को वि- कुल बद कर देता है । अर्थात् ओम् वाणी के सार स्थानों को व्याप- कर उच्चरित होता है, अतएव यह वाणी के सारे स्थानों में व्यापने वाला अव्यय सर्वव्यापक अव्यय परमात्मा का नाम होने के अधिक योग्य है । और जब यह ऊचे स्वर से उच्चारण किया जाता है, तो प्राण और वाणी दोनों का इस में मेल होजाता है, क्योंकि स्वर प्राण का रूप है । घस प्राण और वाणी ही मनुष्य का उत्तम जीवन हैं और उसकी सारी कामनाओं के साधक हैं। जब यह जोड़ा ओम् में मि- लता है, तो अपनी इस शक्ति को ओम् में स्थापन करता है। यह उद्गाता जो उद्गीथ के आरम्भ में ओम् की इस शक्ति पर ध्यान करता हुआ ओम् का उच्चारण करता है, वह यजमान की सारी कामनाओं को पूरा करता है 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति' देखो, पह० आर० उप० ३।९।१, ६।२।१ FETसमृद्धि, भाषा में हमें कोई ऐसाशब्द नहीं मिला, जो इसके विशाल अर्थों को प्रगट कर सके, इस लिये हमने यही शन्द रहने दिया है। समृद्धि, फलना फूलना, सरसब्ज़ होना,बदना, पडी यहुतायत से होना।समृद्धि, वृद्धि और सपत्ति इन तीनों शब्दों का मुकाविले में अर्थ समझने से समृद्धि का अर्थ पूरा २ समझ में आजाएगा। जय कोई देश धन में, घाणिज्य में, विद्या में, पल में, प्रभुता में, धर्म में, इतना.अमीर है.कि वह इन सारी बातों में अपना निर्भर किमी दूसंदेश पर नहीं रखता, तो यह देश सम्पन्न, है और यह उसकी सम्पत्ति है। और यदि यह इतना बढा हुआ है, कि यह अपनी सारी जरूरतों को पूराफरके दूसरों की जरूरतों को भी पूरा कर सक्ता,है।

[१०] प्रपाठकखण्ड १ 'य के पारिभाषिक [इस्तलाही, Technical j शब्द है या अध्वर्यु आनीध्र को 'ओम् आश्रवर्य' यह कहकर अस्तु अपिट्' कहने के लिये प्रेरणा करता है, यह 'आश्रवयति से अभिप्राय है। होता जो स्तुति के शस्त्र [ ऋचाओं का समुदाय ] पढ़ता है, यह सात से आभमाय है, और उदाता जो साममन्त्र गाता है, यह “उद्गायति से अभिप्राय है। सोमयज्ञ में ये तीनों ऋत्विज् [अध्वर्यु, होता, उदाता.] मायः काम में लगे रहते हैं । इन में से हर एक ऋत्विज् यज्ञ में अपना काम ओम् से आरम्भ करता है । अतएव सारा यह ओम पर सहारा रखता है, और इस तरह पर यज्ञ से ओम की पूजा की जाती है, जो परमात्मा का नाम है । यह इस बात का निशान है, कि सारे यज्ञों का अन्तिम फल परमात्मा का जानना है ! तेनोभी कुरुतो, यश्चेतदेवं वेद, यश्च न वेद । ना- नातु विद्या चाविद्याच । यदेव विद्यया करोति श्रद्धयो पनिपदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्येवाक्षरस्यो पव्याख्यानं भवति ॥ १०॥१॥ उमसे [ओम अक्षर मे, या तो] दोनों करते हैं, वह जो यह [ ओम् के इम मचे अर्थ को] जानता है, और वह जो नहीं जानता है। पर जानने और न जानने में बड़ा भेदनी। वह यज्ञ] निमको पुरुष विद्या में श्रद्धा मे और उपनिषद मे पूरा करता है, वहीं अधिकशक्तिवाला होता है। यह [ ओम् ] अक्षर का पूरा व्याख्यान है। १०॥ पाले आठ प्रराकों में ओम् की उपामना समलाकर ना में या का मारा निर्भर ओम् पर , इस बात को दिनगर - छान्दोग्य उपनिषद्। [१] और ऋत्विजों के लिये ओम् के रहस्य अर्थ का जानना आवश्यक दिखलाया है । इस पर यह प्रश्न उत्पन्न होता है। कि वह जो ओम् अक्षर का केवल शुद्ध उच्चारण कर सक्ता है, और वह जो इसके गुख अर्थको जानता है, दोनों ही उसी यज्ञ को पूरा कर सक्त है, तो. क्या आवश्यकता है, कि ऋत्विज् इस के रहस्यार्थ को जानें । और हमारा अपना अनुभव भी तो इसी बात को सिद्ध करता है, कि एकतो वहहै, जो हरीतकी [हरड] के गुणों को जानता है, और दूसरा वहहै जोनहीं जानता है,पर दोनों को उसके सेवन से एक जैसा विरेचन होता है। इसी तरह बादामरोगन के निकालने वाले बादामों को-फूटकर- उन पर पानी छिडकते है। उन में से बहुत से ऐसे है, जो इस मोटे नियम [अमूल] को भी नहीं जानते, कि क्यो पानी छिड़कने से बादामरोगन वाहर आता है । उनसे पूछो । पानी क्यों डालते हो? वह सीधे शब्दों में इसका उत्तर देंगे, इसके बिना निकलता नही । पानी, डालने से क्यो निकलता है ? परमेश्वर की मर्जी, हमारी तुह्मारी मी तो नही चलती । बस इसके सिवाय वह कुछ उत्तर, नहीं देंगे। इतने भोले भाले तो निकालने वाले पर बादामरोगन वैसाही निकलता है, जैसा एक पूर्ण वैज्ञानिक [साइन्सवेत्ता] के हाथ से निकलेंसक्ता है । क्योंकि 'नहि द्रव्यशक्तिर्ज्ञानमपेक्षते' द्रव्य की निज शक्ति किसी के ज्ञान की परवाह नहीं करती । इमी तरह यज्ञ का अनुष्ठान और ओम् का उच्चारण भी अपना फल देगा, वह किसी. के मान की परवाह नहीं करता । इस प्रश्न का उचर यह दिया है, किन जानने की अपेक्षा जानना अत्युत्तम है। वेशक हीरा हीरा ही है, पर उसका जो मूल्य एक गवार लाभ करता है, जोहरी उससे कई गुना अधिक लाभ करता है। ओम् के गुणों को जौहरी की तरह परलो और श्रद्धा से भरे हुए हृदय से उसका उधारण करो, उस' ཙེ༔ .

[८] मपाठक १. खण्ड जानता हुआ इस उद्गीय [ओम् ] अक्षर को उपासता है, वह (गज- मान की ] कामनाओं का समृद्ध करने वाला होता है। ८ ।' पहले ओम को सारी सृष्टि का निचोड़ बतलाया है। फिर सारी कामनाओं का पूरा करने वाला बतलाया है। अब यहा तीसरी महिमा उसकी यह बतलाते है, कि ओम् में समृद्धि का गुण पाया जाता है। और इसका यह गुण इस बात से प्रतीत होता है, कि यह ओम् एक अनुज्ञा का असर है । अर्थात् संस्कृत में अनुज्ञा देते ममय ओम् कहा जाता है । अनुज्ञा अनुमति [इजाज़त,Permission] अब इस बात को देखना है, कि अनुज्ञा देने का अधिकार किसको है ? जो धर्म में, धन में, प्रभुता में, वा विद्या में दूसरों से बढ़ा हुआ नहीं, उससे कोई अनुज्ञा नहीं मागता, न वह किसी को देता है। हो उसको आप दूसरों से अनुज्ञा मागने की अवश्य आवश्यक्ता पड़ती है। पर अनुज्ञा उसी से मागी जाती है, और उसी को देने का अधिकार भी है । जो धर्म में, विद्या में, प्रभुता में, वा धन में, दूसरों से आगे बढ़ा हुआ है। इससे क्पा सिद्ध होता है, यह कि अनुशा मनुष्य की समृद्धि है, जो समृद्ध है, उसी को अनुशा देने का अधिकार है, असमद को नही । तब यह ओम जो अनुमा देने मयांत जिसका पाणिज्य,धन,विद्या प्रमुताआदिइतने बढेर है,कि यह अपने आप में ममा नहीं मनः । तो यह देश समृद्ध है और यह उस की ममृदिहै। और यदि यह देशइतना पीछे है, कि वह बाणिज्य विद्या प्रमुता भादि में मे मिसी मश में मी दूसरे देश पर निमररखता है, तो यह देश है, और यह युदंशाउमको स्मृति है। यहाँ मारी काम- भागोको समृद करता है, इसमें यहअभिप्राय है, कि वह यजमानकी कामनामों को इतना बदारपूरा करता है, कि अपनी मारी जबरने भोपा करके दूमरों की जकरतो कोमी उस से पूरा कर सका।

छान्दोग्य उपनिषद। [९] में बोला जाता है, बोलने वाले की समृद्धि को प्रगट करता है। यह ओम् की महिमा है । वह उद्गाता जो इस महिमा पर ध्यान घरता हुआ ओम का उच्चारण करता है, वह यजमान की कामनाओं को फलता फूलता वना देता है। तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते, ओमित्याश्रावयति, ओ मिति श सति,ओमित्युद्गायति,एतस्यैवाक्षरस्यापचिस महिना रसेन ।९। उस [ओम् अक्षर ] से यह त्रयी विद्या [ ऋचा, यजु और साम की विद्या प्रवृत्त होती है,ओम् यह कहकर [ अध्वर्यु] आश्रा- वण कराता है । ओम् यह कहकर [ होता] स्तुति करता है। ओम् यह कहकर [उद्गाता] गाता है। इसी अक्षर की पूजा के लिये। [इसी की महिमा से [ इसी के ) रस से * । ९ । पहले तीन गुणों के साथ तो ओम् की उपासना वतलाई है। अब यहा केवल स्तुति है। यहां आश्रावयति, शसति, उद्गायति' यह * 'महिम्ना रसेन' महिमा से रस से। इसका अभिप्राय स्पष्ट नहीं है। स्वामी शकराचार्य ने इसका अभिप्राय यह वर्णन किया है। कि यश इसी अक्षर की पूजा के लिये किया जाता है। इसी अक्षर की महिमा से किया जाता है और इसी के रस से किया जाता है। इस अक्षर की महिमा से अर्थात् ऋत्विज, यजमान और पत्नी के ... प्राणों से, और इसी के रस से अर्थात् चायल और जौ आदि के रस से बनी हुई हवि से। प्राण और अन्न का ओम् अक्षर के साथ यह सम्बन्ध है, कि याग होम आदि ओम अक्षर से किया जाता है. यह सूर्य को पहुंचता है। सूर्य वृष्टि को भेजता है। पृष्ठि से भन्न होता है । और जीवन और माणका हेतु है। और प्राण और अन्न से मल किया जाता है, इस लिये कहा है कि या अक्षर की महिमा से और अक्षर के रस में किया जाता है। - [१०] प्रपाठक' खण्ड 'यज्ञ के पारिभाषिक [इस्तलाही, Techneilj शद गाय अध्वर्यु आग्रीध को 'ओम् आश्रवय यह कहकर 'अस्तु औपट्' कहने के लिये प्रेरणा करता है, यह 'आवयति से अभिप्राय है। होता जो स्तुति के शस्त्र [ ऋचाओं का समुदाय] पडता है, यह 'शंसति' से आभप्राय है, और उदाता जो साममन्त्र गाता है, वह उद्गायति से अभिमाय है। सोमयज्ञ मे ये तीनों ऋत्विज् [अवयु, होता, उद्गाय] माय' काम में लगे रहते है । इन में से हर एक ऋतिन् यज्ञ में अपना काम ओम् से आरम्भ करता है । अतएव सारा यज्ञ ओम् पर सहारा रखता है, और इस तरह पर यज्ञ से ओम् की पूजा की जाती है, जो परमात्मा का नाम है । यह इस बात का निशान है, कि सारे यज्ञों का आन्तम फल परमात्मा का जानना है । तेनोभो कुरुतो, यश्चैतदेवं वेद, यश्च न वेद । ना- नातु विद्या चा विद्याच । यदेव विद्यया करोति,श्रद्धयो पनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्यो पव्याख्यान भवति ।। १०॥१॥ उमसे [ ओम् अक्षर से, यन्न तो ] दोनों करते हैं, वह जो यह [ओम के इस सच्चे अर्थ को जानता है, और वह जो नहीं जानता है । पर जानने और न जानने में वडा भेद है । वह गड़] जिमको पुरुष विद्या से श्रद्धा से और उपनिषद् से पूरा करता है, वही अधिकशक्तिवाला होता है। यह [ ओम् ] अक्षर का पूरा व्याख्यान है। १०॥ पहले आठ प्रवाकों में ओम् की उपासना बतलाकर नमें में यन्न का सारा निर्भर ओम् पर है, इस बात को दिखलाया है।

छान्दोग्य उपनिषद्। [ ११ और ऋत्विजों के लिये ओम् के रहस्य अर्थ का जानना आवश्यक दिखलाया है । इस. पर यह प्रश्न उत्पन्न होता है। कि वह जो ओम् अक्षर का केवल शुद्ध उच्चारण कर सक्ता है, और वह जो इसके गुप अर्थ को जानता है, दोनों ही उसी यज्ञ को पूरा कर सक्ते हैं, तो. क्या आवश्यकता है, कि ऋलिज् इस के रहस्यार्थ को जानें । और- हमारा अपना अनुभव भी तो इसी वात को सिद्ध करता है, कि एकतो. वहहै, जो हरीतकी [हरड] के गुणों को जानता है,और दूसरा वहहै जो नहीं जानता है,पर दोनों को उसके सेवन से एक जैसा विरेचन होता है। इसी तरह वादामरोगन के निकालने वाले वादामों को-कूटकर: उन पर पानी छिड़कते हैं । उन में से बहुत से ऐसे हैं, जो इस मोटें नियम [अमूल] को भी नहीं जानते, कि क्यों पानी छिड़कनें से बादाम गर्ने बाहर आता है। उनसे पूछो। पानी क्यों डालते हो?? वह सीधे शब्दों में इसका उत्तर देंगे, इसके बिना निकलता नहीं। पानी डालने से क्यों निकलता है- परमेश्वर की मर्जी, हमारी तुह्मारी मर्जी तो नहीं चलती । वस इसके सिवाय वह कुछ उत्तर नहीं देंगे । इतने भोले भाले तो निकालने वाले पर बादामरोगन वैसाही निकलता है, जैसा एक पूर्ण वैज्ञानिक [साइन्सवेत्ता] के हाथ सेनिकलसंक्ता है। क्योंकि नहि द्रव्यशक्तिनिमपेक्षते द्रव्य की निज शक्ति किसी के ज्ञान की परवाह नहीं करनी । इसी तरह यज्ञ का अनुष्ठान और ओम का ारण भी अपना फल देगा, वह किसी- के,झान की परवाह नहीं करता । इस मश्न का उत्तर यह दिया है, किन जानने की अपेक्षा जानना अत्युत्तम है। बेशक हीरा हीरा ही है, पर उसका जो मूल्य एक गंवार लाभ करता है, जौहरी उससे कई गुना अधिक लाभ करता है । ओम् के.गुणों को, जौहरी की तरह परखो और श्रद्धा से भरे हुए हृदय से उसका, उधारण करो, उसा inा .

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भपाठक. खण्ड २
के रहस्यार्य पर ध्यान धरो । तो तुमारा फल कई गुना बढजाएगा।
यह विद्या, श्रद्धा और उपनिषद यद्यपि यहां ओम के सम्बन्ध
में कही हैं, पर यह हर एक धर्मकार्य के अंग हैं । धर्मकार्यों में जो
स्वभावसिद्ध शक्ति है, वह इन अंगों के मेल से अधिक बलवाली
बनजाती है । क्योंकि ये अन्तःकरण को और भी अधिक शुद्ध
बनाते हैं और संकल्प को और भी अधिक दृढ बनाते हैं।
दूसरा खण्ड
देवासुरा हवे यत्र संयेतिरे। उभये प्राजापत्याः, तद्ध
देवा उद्गीथ माजगुः, अनेनैनानभिभविष्याम इति ।।
तेह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाश्चक्रिरे।तहासुराः,
पाप्मना विविधुः, तस्मात् तेनोभयं जिघ्रति-सुरभिाच
दुर्गन्धि च, पाप्मना ह्येप विद्धः।२।
अथ ह वाच मुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे । ता ५ हासुराः'
पाप्मना विविधुः, तस्मात् तेनोभयं वदति-सत्यं चानृतं
च, पाप्मना ह्येपा विद्धा । ३ ।
अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे।तद्धासुराः पाप्मना
विविधुः, तस्मात् तेनोभयं पश्यति-दर्शनीयं चादर्शनीयं
च, पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ।।
'* देवता और असुर जो दोनों प्रजापति की सन्तान हैं, यह
* यह आख्यायिका इसी तरह पर यह आर० उप०.११३ में
भी आई है, तथापि इन दोनों का उद्देश्य परस्पर विभिन्न है। यहां
उपास्पप्राण उद्गीथावयव ओम् है और यहां उद्गाता है। देखोवेदान्त
मनुष्य की धार्मिक वृत्तियां देवता हैं, और पापकी पत्तियां
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छान्दोग्य उपनिपद् । • [१३] जब आपस में जुटे [ एक दूसरे को जीतने के प्रयत्न मे लगे] तत्र देवताओं ने उद्गीथ [ओम्] को ग्रहण किया, कि इससे हम इन को [असुरों] को दवालेंगे ॥ १ ॥ उन्होंने [ देवताओं ने ] नासिका में होने वाले माण [प्राण] की दृष्टि से उद्गीथ [ओम् ] की उपासना की, * उस [घाण ]. avan असुर । और प्रजापति मनुष्य है, जिस की ये दोनो सन्तान है । धर्म की वृत्तियां पाप की वृत्तियों को दवाना चाहती है, और पाप की वृत्तियां धर्म की वृत्तियों को । यही देवासुरसंग्राम है (सविस्तर व्यापया के लिये देखो वृहदारण्यक पृष्ठ ३३ से ४१) ॥ * यश में उद्गाता ऐसा होना चाहिये जो उद्गीथ (ओम्) का उपासक है, वही यजमान की कामनाओं को पूरा कर सक्ता है और उसी से किया हुआ कर्म वीर्यवत्तर होता है, यह पूर्व कह चुके हैं। अव यह बतलाते हैं, कि उसे ओम् की उपासना करते समय किस स्वरूप पर ध्यान धरना चाहिये। उद्गाता ने अपने उद्गीथ के गाने में दूसरों की (यजमान आदि की) भलाई मांगनी है। उसकी प्रवृत्ति यहां स्वार्थ नहीं, किन्तु परार्थ है । इसलिये उसको ऐसे स्वरूप पर ध्यान धरना चाहिये, कि जिसकी प्रवृत्तिस्त्रार्थन हो, किन्तु परार्थ हो। जिस पर दूसरों का सहारा हो, न कि अपना सहारा दूसरों पर रखे। ऐसे स्वरूप पर ध्यान धरने से उद्गाताकामन उसी रंग में रंग जाता है 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति' तय यह सचमुच इस योग्य पनजाता है, कि यह दूसरों के लिये वर मांग ओर उसकी प्रार्थना पूरी हो । ऐसा स्वरूप शरीर में प्राण है और वाह्य में सूर्य । प्राण से इन्द्रियों की रक्षा होती है और सूर्य स सारी प्रजाओं की । इस लिये यहां सारे इन्द्रिों की परीक्षा करके सब में स्वार्थ दिखलाकर अन्त में प्राण को केवल परार्थी दिखलाया हे । सी शरीर में प्राण और बाहा में सूर्य द्वारा ब्रह्म की जो महिमा (दूसरों का महारा होना) प्रकाशित होती है, उस महिमा के साथ ब्रह्म इन व्यष्टिरूपों में उद्गी.' थोपासना का ध्येय है । (शेषनोट आगे देसी) [ १४ ] प्रपाठक १. खण्ड २॥ को असुरों ने पाप से वींध दिया। इस लिये उस [प्राण] से मनुष्य दोनों को संघता है-जो मुगन्ध वाली वस्तु है और जो दुर्गन्ध वाली है, क्योंकि यह प्राण ] पाप मे वींधा हुआ है *१२। तब उन्हों ने वाणी की दृष्टि से उदीय [ओम् की उपासना की, पर असुरोने उसको भी पाप से वींध दिया। इस लिये मनुष्य उससे दोनो वात बोलता है-सच और झूट; क्योंकि वाणी पाप से वाँधी हुई है ।। ३॥ तब उन्होंने आंख की दृष्टि से उदीय की उपासना की,पर असुरों ने उसको भी पाप से वध दिया,इसलिये मनुष्य उससे दोनों बातें देखता है-देखने योग्य और न देखने योग्य; क्योंकि आंख पाप से वांधी हुई है ॥ ४॥ अथ ह श्रोत्रमुद्गीथ मुपासाञ्चक्रिरे । तद्धासुराः पा- प्मना विविधुः, तस्मात् तेनोभयशृणोति-श्रवणीयं चा श्रवणीयं च, पाप्मना ह्येतद् विद्धम् । ५। अथ हमन उद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुः, तस्मात् तेनोभय ५ संकल्पयते-संकल्पनीयं चा संकल्पनीयञ्च, पाप्मना ह्येतद् विद्धम् । ६ । अक्षरार्थ 'नासिका म हाने वाले प्राण को उद्गीथ उपामा' अर्थात् यह प्राण जो नासिका में चलता है, यह उद्गीथ है, ऐसाजान कर उद्गीथ की उपासना की। * पाप का फल फेल दुर्गन्ध है । प्राण यादे पाप से न वाधा- जाता, तो यह काल सुगन्ध हो मूघता, अव पाप से वाँधा हुआ है, इस लिये दुर्गन्ध भी सूचता है। सुगन्ध में प्राणकी अपनी आसक्ति (लालच) हे, यही इसमें पाप है। अर्थात् यद्यपि सुगन्ध सूधन का फल सारे इन्द्रियों को मिलता है, तथापि घ्राण का काम स्वार्थ से शून्य नहीं, जैसा कि प्राण का है।

छान्दोग्य उपनिषद् । [१५] अथ ह य एवायं मुख्य प्राणः, तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे। त हासुरा ऋत्वा विदव ५ सुर्यथाऽश्मानमाखनमृत्वा विव ५ सेत । ७॥ एवं यथाऽश्मानमाखनमृत्वा विध्व ५सेत, एव हैव .स विध्व ५सते, य एवं विदि पापं कामयते यश्चैनमभि- दासति, स एपोऽश्माऽऽखणः । ८ । 'नैवैतेनसुरभि नदुर्गन्धिविजानाति,अपहतपाप्मा ह्येपः, तेन यदनाति यत् पिबति तेनेतरान्माणानवति। एतमु एवान्ततो ऽवित्त्वोकामति व्याददात्येवान्तत इति ।९। तब उन्हों ने श्रोत्र की दृष्टि से उदीय की उपासना की, पर अनुरों ने उसको भी पाप से धीध दिया, इसलिये मनुप्य उससे दोनों बातें सुनता है-सुनने योग्य और न सुनने योग्य; क्योकि श्रोत्र पाप से वींचा हुआ है ॥५॥ तब उन्हों ने मन की दृष्टि से उदीय [ओम] की उपासना की,पर असुगें ने उसकोभीपापसे वीध दिया,इस लिये मनुष्य उस से दोनों बातें सोचता है, वह जो सोचने योग्य है और वह जो नहीं सोचने योग्य है क्योंकि मन पाप से वीधा हुआ है ॥ ६ ॥ अब यह जो मुख्य * [मुख में होनेवाला माण है इस की दृष्टि से उन्हों ने उद्गीथ की उपासना की, जब असुर उस (मुख्य माण) * मुख्य प्राण से दो अभिप्राय होसक्त है, मुखिया या मुख में होनेवाला माण । प्राण सारे इन्द्रियों में मुपिया है श्रेष्ठ है [ देखो [छान्दा उप०५।१] और प्राण मुख में होने वाला है भयास्य है दिखो छान्दो०१।२।१३ ॥

[ १६ ] प्रपाठक१. खण्ड २॥ के पास पहुंचे, तो वह इस तरह * तित्तर वित्तर हुए, (मट्टी का ढेला) किसी सख्त पत्थर पर लग कर चूर हो जाता है ॥७॥ जमे [मट्टी का देला] सस्त पत्थर पर लग कर चूर २ हो जाता है, इसी तरह वह पुरुष विनष्ट [तबाह] होता है, जो किसी ऐसे पुरुष के लिये पाप चिन्तन करता है, वा इमे सताता है; जो इस (रहस्य) का जाननेवाला है (अर्थात् प्राण की दृष्टि से उद्गीथ का उपासक है)। क्योकि वह .(उपामक) एक सख्त पत्थर है ॥८॥ (यह जो मुस में प्राण है) इस से मनुष्य न तो सुगन्धवाली वस्तु को जानता है और न ही दुर्गन्ध वाली को,क्योंकि यह(पाण) पाप से बचा हुआ है, इम मे मनुप्य जो कुछ खाता है और जो पीता है, उस मे दूसरे प्राणों (इन्द्रियों) की रक्षा होती है । 'जब अन्त (मरण ) समय होता है, तो इमी (प्राण, जिस के द्वारा हम साते पीते और जीते हैं) के न मिलने से यह + (मनुप्य) चल देता है । वह अन्त ममय में (मुंह को) अवश्यही खोल देता है ।। (मानो चाहता है, कि प्राण उममें वापिम आमाए)॥९॥ *'इस तरह'यह एवम् का अर्थ है, जो आटव प्रचाक के आदि में है। ऐमाही १०,११,१२, प्रयाय में यादि का तेन, पूर्व प्रयाक सम्बद्ध है । यह-त्राण धादि इन्द्रियों का समुदाय । घ्राण आदि इन्द्रिय उम ममय इस शरीर में चलदत है,जय प्राण जो उनमय का पालन करने वाला (मम्मरि) है, यह अब पापीफर उन की रक्षा नहीं भरमना (कराचार्य) प्राप पं. निकलते समय जो मनुष्य का मुंह खुलजाता है, यह इमपात का चिन्ह है, फि भय भी प्राण कुछ गाना चाहता है, जिम मे यह भय भी इन्द्रियों का महायता दमः ॥ (राचार्य) , छान्दोग्य उपनिपद्। [ १७ ] तहाङ्गिरा उद्गीथ मुपासाञ्चक्रे, एतमु एवाङ्गि- रसं मन्यन्ते, अङ्गानां यद्रसः । १० । तेन । त ५ ह बृहस्पति रुद्गीथ मुपासाञ्चक्रे, एतमु एव बृहस्पति मन्यन्ते, वाग्घि वृहती तस्या एप पतिः। ११ । तेन । त५हायास्य उद्गीथमुपासाञ्चके । एतमु एवायास्यं मन्यन्त, आस्याद यदयते । १२ । तेन । त ५ हवको दाल्भ्यो विदाञ्चकार, सहनैमिपीयानामुद्गाताबभूव । स हस्मैभ्यः कामानागायति । १३ । आगाता हवे कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते । इत्यध्यात्मम् । १४ । ॥ २॥ अङ्गिरस ने प्राण की दृष्टि से उदीय [ ओम् ] की उपासना की, और लोग इसी को [प्राण को ] ही अङ्गिरस मानते हैं, इस लिये कि माण अङ्गो का रस है [शरीर के अंग इसी से हरे भरे रहते हैं । अग+रस अगिरम् ] । १० । बृहस्पति ने माण की दृष्टि से उदीय [ओम् ] की उपामना की, और लोग इसी को बृहस्पति मानते हैं. इस लिये, कि वाणी बृहती है और यह [माण] उसका पति है [ बृहती+पति बृहस्पति ] 1१२॥ अयास्य ने माण की दृष्टि मे ओम् की उपासना की, लोग इसी कोअयास्य मानते हैं, इसलिये कि वह मुंह से आता है [स्याद अयते । आस्य+अयः-अयास्यः]।१२ उसको [माण को] दाल्भ्य [दल्भ्य के पुत्र ] चकने जाना [ उद्गीथ के तौर पर उपासना किया] वह नैमिपीयों [नमिप यन और -- 1 १८ ] प्रपाठक १ खण्ड ३१ के याज्ञिकों ] का उदाता वना, और उसने गाकर इनकी कामनाओं को पूरा किया* । १३॥ वह जो इस [ रहस्य ] को इस प्रकार जानताहुआउद्गीय [ओम्] अक्षर की उपासना करता है, वह [उद्गीथ ] गाकर कामनाओं का पूरा करने वाला बन जाता है । यह अध्यात्म है ।। १४ । तीसरा सण्ड अथाऽधिदैवतम् । य एवासी तपति, तमुद्गीथमु- पासीत । उद्यन् वा एप प्रजाभ्य उद्गायति, उद्य' ५ * शंकराचार्य से पहले वृत्तिकार ने १० से १३ इन तीन प्रवा. कों का एक साथ अन्वय करके यह अर्थ किया है। वक दालभ्य ने प्राण को अगिरस (अंगो का रस), वृहस्पति (वाणी का पति) और 'अयास्य (मुख से आने वाला) इन गुणों वाला मानकर उसकी उपासना फी । पर यह अर्थ तब ठीक होसका है, जो 'अङ्गिराः' पृहस्पतिः, अयास्यः, इनके आगे एक 'इति' हो। अथवा ये द्विती- यान्त हों। जो पाट पाया जाता है, उसके अनुसार यही अर्थ ठीक है, कि अगिरा. वृहस्पति और अयास्य सपियों ने प्राण की उपासना की। शंकराचार्य ने भी यही अर्थ लेफर कृत्तिकार के अर्थ का मण्डम किया है। और यह दिसलाया है, कि यद्यपि थहां माथ ही साथ अङ्गिरस, वृहस्पति और अयास्य ये नाम व्युत्पनि द्वारा प्राण के भी दिपलाए है, तथापि ये नाम ऋपियों के भी है, इस में कोई रुका- घट नहीं, जैसाफि एत. आर० में विशिष्ठ आदि नाम ऋपियों के भी हैं और प्राण के भी हैं। | अध्यात्म, जो शरीर के माय मम्यन्ध रखता है। अथात् उगीय (भोम् ) के यह अर्थ यतला दिये हैं, जो शरीर वा शरीर के भाभिन इन्द्रियों के सम्बन्ध में हैं। भय उसके अधिदयत अर्थात् जो देवताओं के सम्बन्ध में अर्थ है, पद बतलाएंगे।

N छान्दोग्य उपनिषद ।। [१९] स्तमो भय मपहन्ति । अपहन्ता हवै भयस्य तमसो भवति, य एवं वेद ॥ १॥ समान उ एवायञ्चासौ च । उष्णोध्य मुष्णोऽसौ, स्वर इतीममाचक्षते; स्वर इति, प्रत्यास्वर इत्यमुं। तस्मादा एतमिमममुं.चोद्गीथ मुपासीत ॥ २॥ अब अधिदैवत है-(अर्थाव देवताओं के विषय में उद्गीथ की उपासना वतलाते हैं)। वह (आकाश में सूर्य) जो तपरहा है, उसकी दृष्टि से उदीय (ओम् ) की उपासना करे।जव यह (सूर्य) उदय होता है, तो (उद्गाता के तौरपर) सारी प्रजाओं के लिये गाता है * और जब उदय होता है, तो अन्धेरे के भय को मार हटाता है । वह जो इस मकार जानता है (सूर्य की दृष्टि से ओम को उपासता है), वह अन्धेरे (अविद्या) के भय को मार हटाने के योग्य वनजाता है ॥२॥ + यह (माण जो मुख मे है) और वह (सूर्य जो आकाश में है ) समानही हैं । गर्म यह (प्राण ) है, और गर्म वह (सूर्य.) * स्वर इस को कहते हैं, और स्वर और प्रसास्वर उस (सूर्य) * जैसे उद्गाता उद्गीथ गाकर यजमान की कामनाओं को पूरा करता है। इसीप्रकारसूर्य अपने उदय से लोगों की कामानों को पूरा करता है । क्योंकि अनाज का पकना और जीवन सूर्य से मिलते हैं। | अध्यात्म प्राण और अधिदैवत सूर्य में समता दिखलाते हैं। प्राण देह को गर्म रखता है और सूर्य सारे जगत को गर्मी पहुंचाता है । यह उन दोनों की गुण से समता है। अगली नम से है अर्थात दोनों को स्पर कहते हैं। स्वर-जाने वाला प्रत्यास्वर-घापिस आनेवाला । मरने के समय प्राण केवल जाताही है, उसी देह में फिर वापस नहीं आता। ।

म , [ २० ] मपाठक १.खण्ड ३॥ को कहते है । इसलिये चाहिये कि इम (माण) और उस (सूर्य) की दृष्टि से उदीय (ओम् ) को उपासे ॥२॥ अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत । यदै प्राणिति, स प्राणः। यदपानिति, सोऽपानः। अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः, स व्यानः । यो व्यानः सा वाक् । तस्माद प्राणन्ननपानवाचमभिव्याहरति ॥३॥ या वाक् सर्वं, तस्मादप्राणन्ननपानन्नृच मभि- व्याहरति । य तत्साम, तस्मादप्राणन्ननपानन साम गायति । यत्साम स उद्गीथः, तस्मादप्राणन्ननपान न्नुद्गायति ॥ ४॥ अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि-यथाऽग्ने- मन्थन माजेःसरणं दृढस्य धनुप आयमनम्, अप्राण- ननपान ५ स्तानि करोति । एतस्य हेतो ानमेवो- द्गीथ मुपासीत ॥ ५॥ अव (दूसरे प्रकार से उदीय की उपासना कहते हैं) चाहिये कि व्यान निःसंदेह उदीय है इस दृष्टि से उड़ीय (ओम् ) को उपासे। जो वाहर मास निकालना है यह प्राण है, और जो अन्दर खींचना है, यह अपान है । अव जो माण और अपान की सन्धि है (जोड है, सास का अन्दर ही थमना है) वह व्यान है । जो इसलिय प्राण को स्वरही कहते है, प्रत्यास्वर नहीं कहते । और सूर्य मस्त होकर फिरभी दिन २ वापिस आता है, इसलिये वह स्वरभी है भौर प्रत्यास्थर भी है (शकराचार्य)

छान्दोग्य उपनिपद् । [२१]
'व्यान है यह वाणी है । इसलिये जब हम वाणी बोलते हैं, तो न
बाहर सांस लेते हैं, न अन्दर खींचते हैं । ३ ।
अब यह जो वाणी है, यह ऋचा है, इस लिये जब हम ऋचा
बोलते हैं, तो न वाहर सांस लेते हैं, न अन्दर खींचते हैं। यह जो
ऋचा है. यह साम है । इस लिये जब हम साम गाते हैं, तो न वा-
हर सांस लेते हैं, न अन्दर खीचते है ।
यह जो साम है, यह उद्गीथ है । इस लिये जब हम उदीय
-गाते हैं, तो न वाहर सांस लेते हैं, न अन्दर खींचते हैं * । ४ ।
- इसके सिवाय और भी जो काम ऐसे हैं, जिन में वल की
आवश्यकता है, जैसाकि रगड़कर आग निकालना, दौड़ दौड़ना,
किसी दृढ़ धनुप का खींचना (चिल्ला चढ़ाना), उन [ सव कमों ]
* अध्यात्म और अधिदेवत एक २ ,उपासना कहकर अब
फिर अध्यात्म उपासना घतलाते हैं । यहां पहले व्यान की दृष्टि से
ओम की उपासना कहकर व्यान और ओम् में अभेद यह दिखलाया
है। कि व्यान सांस के थमने का नाम है। और जब हम पाणी योलते
है, तो हमारा सास थम जाता है, और तव वह शम्द
रूप में प्रगट
होता है। और जय हम लगातार बोलते हैं, तो वीच २ में सांस को
भी अवसर मिलता रहता है, और यह सांस थम २ कर शब्द के
रूप में भी बदलता रहता है। इस प्रकार व्यान धाणी है । और पाणी
का रस ऋचा, ऋचा का रस साम और साम फारम उद्गीथ
(ओम) है । इस प्रकार व्यान और उद्गीथ अभिन्न होने से व्यान की
रष्टि से उद्गीथ की उपासना करे।
+पहले व्यान की उद्गीथ के साथ एकता दिखलाई है। अब
ग्यान की महिमा दिखलाने के लिये यह सिद्ध करते हैं, कि शरीर
में सारे यल साध्य काम इसी की शक्ति से है।

[२२] प्रपाठक .खण्ड३॥ को बाहर और अन्दर सास लिये विना पूरा करता है। इस लिये चाहिये, कि व्यान की दृष्टि मे ही उद्गीय (ओम् ) की, उपासना करे।५। अथ खलूद्गीथातराण्युपासीत, उद्-गी-थ इति । प्राण एवोत्, प्राणेन ह्युत्तिष्ठति । वाग् गीर वाचो ह गिर इत्याचक्षते । अन्नं थम्, अन्ने हीद ५ सर्व स्थितम् । ६। द्यौरवोद् , अन्तरिक्षं गीः, पृथिवी थम् । आदित्य- एवोद्, वायुगीर,अमिस्थम् , सामवेद एवोद् यजुवेंदो- गीग्वेदस्थम् । दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं, यो वाचो दोहो नवानन्नादो भवति, य एतान्येवं विद्धानुद्गीथाक्षरा- पयुपास्ते, उद-गी-थ इति । ७ मनुष्य को चाहिये कि उद्गीथ के अक्षरों पर ध्यान धरे अर्थात् जद, गी, थ (पर ध्यान धरे)। उत् माण है, क्योंकि प्राण के द्वारा मनुष्य ऊपर उठता ह । गी वाणी है, क्योंकि वाणियों को गिरः' कहते है। य अन्न है, क्योंकि अन्न के द्वारा यह सब कुछ स्थित है *1६ उत् धौ है, गी अन्तरिस है, य पृथिवी है । उत् सूर्य है, गी वायु है, य अग्नि है।उत् सामवेद है, गी यजुर्वेद है, थ ऋग्वेद है ।। * उतिष्ठति से उत, गिर से गी, और स्थित से थ लेकर उदगीय बना है। स्वामी शकराचार्य ने इन सारे नामों के भी निर्वचन दि. बलाए हैं। घी उत् है क्योंकि वह ऊचा है, अन्तरिक्ष गी है, क्योंकि पह सारे लोकों को निगल लेता है (गिरणात्) पृथिवी य है, क्योंकि छान्दोग्य उपनिषद् । [२३] वह जो, इस प्रकार जानता हुआ उद्गीथ के उद्,गी, य इनतीन अक्षरों पर ध्यान धरता है, उस के लिये वाणी स्वयं दूध बहादेती. है, जो वाणी का अपना दूध है * । और वह प्रभूत अन्नवाला और अन्न के खाने के योग्य (नीरोग) होता है ॥ ७ ॥ अथ खल्वाशीःसमृद्धिः । उपसरणानीत्युपासीत । येन साम्ना स्तोष्यन् स्यात् , तत् सामोपधावेत् ॥६॥ यस्यामृचि तामृचं; यदायं तमृषि;यां देवता मभि- योष्यन् स्यात्, तां देवतामुपधावेतः ॥ ९ ॥ येन छन्दसा स्तोष्यन् स्यात्, तच्छंन्द उपधावेत, येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात, त ५ स्तोममुप धावेत् ॥ १०॥ यांदिशमभिष्टोष्यन स्यात्, तां दिशमुपधावेत ११।। आत्मान मन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन सारे प्राणधारियों के रहने का स्थान है। सूर्य उत् है, क्योंकि यह ऊपर है, वायु गी है, क्योंकि यह अग्नि आदिकों को निगल लेता है, अग्नि'थ है, क्योंकि यह यक्ष का स्थान है । साम वेद उत् है, क्योंकि स्वर्ग के तौर पर इसकी स्तुति की गई है, यजुर्वेद गी है, क्योंकि यजु से दी हुई हवि को देवता निगलते है, ऋग्वेद य है, क्योंकि यह साम के मन्त्रों का स्थान है। यह उद्गीथ के अक्षरों का विभाग गृह आर० उप० १।३। २३ में दिखलाया है। यहां उतन्माण और गीथा-वाणी ये दो विभाग किये हैं। * याणी का दूध, घेदों के ज्ञान का फल । अथवा इसकी यह आं कर सके हैं. पाणी इसके लिये दूध देती है.. जो वाणी का दोहने वाला है।

] २४ ] प्रपाठक, खण्ड ३ प्रमत्तः अभ्याशोह यदस्मै स कामः समृद्भयेत, यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥ अप (उद्गाता की) प्रार्थनाओं की समृद्धि (फलन फूलना; जिस तरह होसके यह बतलाते है)। चाहिये कि उपसरणों पर इस तरह ध्यान लगाए। (उदाता को) चाहिये, कि जिस साम से स्तुति करनी हो, उस साम को चिन्तन करे;॥८॥ जिस ऋचा में (वह साम) है, उस ऋचा का चिन्तन करेः जो उस (साम) का मपि है, उत्त कपि का चिन्तन करे जिस देवता को लक्ष्य में रख कर स्तुति करनी है, उस देवता का चिन्तन करे; ॥९॥ निस छन्द से स्तुति करनी है, उस छन्द का चिन्तन करे जिस स्तोम से उसने अपने लिये । स्तुति करनी है, उस स्तोम का का चिन्तन करे ॥१०॥ जिप्स दिशा को लक्ष्य में रख करे स्तुति करनी है, उस दिशा का चिन्तन करे ॥११॥ । * उपसरण, उपधायन दौड़कर पासजाना। यहां अभिप्राय मन को जल्दी उधर रगाने से है । अर्थात् उद्गाता जय स्तुति गाना चाहता है, तो पहले उस का मन इन बातों पर दौडना चाहिये, अर्थात् वह इन को जल्दी से ध्यान में लाए जिन का आगे२चिन्तन, करना लिखा है। इन का जल्दीर चिन्तन करनाही उपसरण और उप धावन कहलाता है। + 'स्तोप्यमाण ' आत्मनेपद इसलिये है, कि स्तोम का फल उदाता को होता है, इस यात के जिताने के लिये 'अपने लिये, यह मर्थ बढ़ा दिया गया है । - पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, जिधर वह चाहता है, कि उसकी यह कामना पूरा हो।

. छान्दोग्य उपनिषद् । [२५] अन्त में अपने आपका (उद्गाता अपने नाम गोत्र आदि का) चन्तन करके अपनी कामना का ध्यान करता हुआ अप्रमत्त होकर (सावधान होकर, अर्थात न उच्चारण में कोई अशुद्धि करता हुआ, न मन को इधर उधर जाने देता हुआ) स्तुति करे(स्तोम गाए)। तब जल्दी ही उसके लिये वह कामना फले फूलेगी, जिस कामना वाला होकर वह स्तुति करेगा, हा वह जिस कामना वाला होकर स्तुति करेगा ॥ १२॥ चौथा सण्ड ओमित्येतदक्षर मुद्गीथमुपासीत. ओमिति झुगायति । तस्योपव्याख्यानम् ॥ १॥ देवा वै मृत्योविभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशन् । ते छन्दोभिरच्छादयन् । यदेभिरच्छादय ५ स् , तच्छन्दसा छन्दस्त्वम् ॥ २॥ तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेव पर्यपश्यद-ऋचि साम्नि यजुपि। तेनु वित्त्वोर्वा ऋचः साम्नो यजुपः, स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३॥ यदा वा ऋचमामोत्योमित्येवातिस्वरति, ' एव ५ सामैवंयजुः, एप उ स्वरो, यदेतदक्षर मेतदमृतमभयं, तत् प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥ ४॥ स य एतदेवंविदानक्षरं प्रणौति, एतदेवाक्षर ५ स्वरममृतमभयं प्रविशति, तत् प्रविश्य यदमृता देवास् , तदमृतो भवति ॥ ५॥ , प्रपाठक १. खण्ड। मनुष्य को चाहिये, किउदीय के तौरपर ओम अक्षर की उपा- सना करे, क्योंकि (उदाता) ओम् से आरम्भ करके (उदीय को) गाता है। और यह (आर्ग) उस (आम्) का पूरा न्यारत्यान है। देवता मृत्यु के भय से, त्रयी विद्या (वेदविया) में प्रविष्ट हुए । (प्रयी विद्या में प्रविष्ट होकर) उन्हों ने छन्दों से (पद्यात्मक मन्नों से ) अपने आप को दाप लिया। और जिम लिये उन्हों ने (देवताओं ने ) छन्दों से अपने आप को दांपा, इसलिये इनको छन्द*कहते है ॥ २ ॥ तर जैसा कि एक मछली पकड़नेगाला पानी के अन्दर मछली को ताड़ लेगे, इस मकार उन देवताओं को वहा मचा यजु और साम के अन्दर मृत्यु ने ताड़ लिया। और देवता यह जान कर (कि यहां हम मृत्यु से छिपे नहीं रहे ) सचा, यजु और साम से ऊपर चढ़ कर, स्वर (ओम् ) में भविष्ट हुए (ओम की उपासना की) ॥३॥ जन कोई पुरप ऋचा (अग्नेद) को पा लेता है, (अपने- अधीन करलेता है, पूरा र जान लेता है) तो वह ओम इस प्रकार (आदर के साथ ) लम्या उच्चारण करता है, इसी प्रकार जब वह साम को पा लेता है, और जब यजु को पा लेता है (तो ओ३म उच्चारण करता है ) । यह ही स्वर है, जो यह अक्षर (अविनाशि है, अमृत है, अभय है। उसमें भवेश करके देवता अमृत और अभय हो गए ॥४॥ सो जो यह इस प्रकार जानकर अक्षर (और) को ऊंचे उच्चारण करता है, वह इसी अक्षर (अविनाशि) स्वर अमृत * छन्दम्, घद (दापना) से है। y - , छान्दोग्य उपनिपद् । [२७] अभय में प्रवेश करता है, और इसमें प्रवेश करके जिस अमृत वाले देवता हैं, उसी अमृतवाला होता है (देवताओं के सदृश अमृत होता है)॥५॥ पांचवां खण्ड अथ खलु य उद्गीथः, स प्रणवः, यः प्रणवः स उद्गीथ इति । असौ वा आदित्य उद्गीथः, एप प्रणवः, ओमिति ह्येप स्वरन्नेति । १। 'एतमु एवाहमभ्यगासिपं, तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौपीतकिः पुत्रमुवाच । 'रश्मी ५ स्त्वं पर्यावर्तयाद्, बहवो वै ते भविष्यन्ति' इत्यधिदैवतम् । २ । अथाऽध्यात्मम् । य एवायं मुख्यःप्राणः, तमुद्गीथ मुपासीत । ओमिति ह्येप स्वरनेति । ३ । "एतमु एवाहमभ्यगासिपं,तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति' हकौषीतकिः पुत्रमुवाच 'प्राण ५स्त्वं भूमानमभिगाय- तादू, बहवो वै मे भविष्यन्तीति'।४। अथ खलु य उद्गीथः, स प्रणवः, यः प्रणवः, स उ- द्गीथ, इति होतृपदनाद्वैवापि दुरुद्गीत मनुसमाहर- तीत्यनुसमाहरतीति । ५। जो उहीय है, वह प्रणव है, जो प्रणा है, वह उद्गीथ है। वह (आकाश में) सूर्य उगीय * है, यह प्रणव है, क्योंकि यह (सूर्य) ओम उचारता हुआ जाता है। १ । * देखो छान्दो उप०१३।१ , , [२८] प्रपाठक १ खण्ड ५। कौपीतकि ने अपने पुत्र को कहा, कि 'इसी को मैने (ओम से गाया, इस लिये तू मेरे अकेला (पुत्र) है। अब तू किरणों को घुमा, (वार २ ध्यान लगा) तब तेरे बहुत (पुत्र) होंगे। यह अधिदैवत है (देवताओं के सम्बन्ध में है)।२। अव शरीर के सम्बन्ध में कहते हैं । चाहिये कि यह जो मुख में प्राण है, उसको उदीय के तौर पर उपासे, क्योंकि यह ओम् उचारता हुआ चलता * है।। कौपीतकि ने अपने पुत्र को कहा, कि 'इसी (माण) को मैने (ओम से ) गाया, इस लिये तू मेरे अकेला पुत्र है, अब तू यदि चाहता है, कि मेरे बहुत पुत्र हों, तो प्राण को भूमा (बहुत गुना) जानकर (ओम् से) गा । ४। जो यह जानता है कि जो उद्गीथ है, वह प्रणव है, जो प्रणव है, वह उद्गीय है, वह होतृपदन [ होता के बैठने की जगह ] से ही गाने की अशुद्धि को ठीक कर देता है, हां ठीक कर देता है । ५ । ऋग्वेदी प्रायः प्रणव बोलते है, और सामवेदी उद्गीथ । यह दोनों नाम ओम् की जगह वोले जाते हैं । इस खण्ड में इन दोनों की एकता दिखलाकर अन्त में यह सिद्ध किया है, कि प्रणव और उद्गीथ एक ही है, इस लिये यदि उदाता से उद्गीथ के गाने में कोई घाटे होजाए, तो होता प्रणा के उच्चारण में उस त्रुटि को पूरा कर - " . * जो मुख में प्राण है, वह ओम् कहता हुआ चलता है, इस का यह अभिप्राय है कि पांचों इन्द्रियों को काम करने की अनुक्षा देता हुआ चलता है, इसी तरह 'सूर्य' भोम् कहता हुआ, यह अभिप्राय है, कि सब प्राणधारियों को चलने फिरने की अनुमा देता हुभा (मोम-अनुवा-देखो पूर्व ११८) , ... छटा सण्ड * . छान्दोग्य उपनिषद । [२९] देता है, क्योंकि जो उद्गीय है, वही प्रणव है और जो प्रणव है वही उद्गीय है। कौपीतक के उपदेश से भी उद्गीय और प्रणन की एकता दिखलाई है। कौपीतकि ऋग्वेद का आचार्य है, उसने प्रणव से अधिदैवत में मूर्य और अध्यात्म में माण को गाया है और इन्हीं दोनों को सामवेदी उद्गीय से गाते हैं । इसलिये प्रणव और उद्गीथ एक ही है। इयमेवर्गमिः साम । तदेतस्यामृच्यध्यूढ ५ साम । तस्मादृच्यध्यूढ ५साम गीयते । इयमेवसा,ऽमिरमस्त- साम। १॥ अन्तरिक्षमेवर्वायुः साम । तदेतस्या मृच्यध्यूढ'५ साम । तस्माच्यध्यूढ रसाम गीयते । अन्तरिक्षमेव सा वायु रमस्तत्साम । २ । धोरेवर्गादित्यः साम । तदेतस्यामृच्यध्यूढ साम। तस्माच्यध्यूढ ५साम गीयते । घोरेव साऽऽदित्यो मस्तत्साम । ३ । नक्षत्राण्येव चन्द्रमाः साम । तदेतस्यामृच्यध्यूढ ५साम । तस्मादृच्यध्यूढ ५साम गीयते । नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम। ४ । अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सेवर्गय यन्नीलं . *६,७इन दोराण्डों का विषय एफ है। दोनों कोकादको मोर मन्त की व्याख्या पर पूरा ध्यान दो।

- -- [३] मपाठक १. खण्ड ६। परः कृष्णं तत्साम । तदेतस्यामच्यध्यूढ ५साम । तस्मा दृच्यध्यूढ ५साम गीयते । ५। अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्भाःसैव साऽथ यनील परः कृष्णं तदमस्तत्साम । अथ य एपोऽन्तरादिसे हिरण्मयः पुरुषो-दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आपणखात् सर्व एव सुवर्णः ।। तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी । तस्यो दितिनाम । स एप सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः। उदेति हवै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो, य एवं वेद । ७। तस्य च सामच गेष्णो, तस्माद्वीथः। तस्मात्त्वे वोद्गातैतस्य हि गाता । स एप ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तेपां चेष्टे देवकामानां च । इत्यधिदैवतम् । ८। * ऋचा पृथिवी है, माम अग्नि है । यह साम [अग्नि] इस ऋचा [पृथिवी ] के सहारे है, [निर्भर रखता है | इस लिये साम ऋचा के सहारे गाया जाता है । सा पृथिवी है, अम अग्नि है, यह साम है [यह दोनों सा+अम्=साम है] ।१ मचा अन्तरिक्ष हे. साम वायु है। यह साम [वायु] ऋचा [अन्तरिक्ष के सहारे है। इस लिये साम ऋचा के सहारे गाया जाता है। सा अन्तरिक्ष है और अम वायु है। यह साम है ॥२॥ कचा द्यौ है, साम मूर्य है। यह साम [सूर्य] इस ऋचा [चौ] के सहारे है । इस लिये साम ऋचा के सहारे गाया जाता है। सा द्यौ है, अम मूर्य है, यह साम है । ३ । - -

है
छान्दोग्य उपनिपद् ।
ऋचा नक्षत्र हैं, साम चन्द्रमा है । यह साम चन्द्रमा] इस
ऋचा [नक्षत्रों के सहारे है । इस लिये साम ऋचा के सहारे गाया
'जाता है । सा नक्षत्र हैं, अम चन्द्रमा है । यह साम है । ४ ।
अब यह जो सूर्य की श्वेत दीप्ति [चमक] है, यह ऋचा है,
और जो [ मूर्य में] नीला-अत्यन्त कालापन *
यह साम
है। यह साम [ कालापन] ऋचा [वेतचमक] के सहारे है।
इसलिये ऋचा के सहारे साम गाया जाता है । ५।
सा मूर्य की श्वेतदीप्ति है, अम नीला-असन्त कालापन है ।
यह साम है।
अब यह मुनहरी [मुवर्ण की तरह चमकता हुआ] पुरुष जो
सूर्य के अन्दर दीराता है, जिसकी सुनहरी दाढ़ी और मनहरी
याल हैं, नखों के अग्र तक जो सारा ही मुवर्णमय है । ६ ।
उसकी आंखें कप्पाप्त । कमल की नाई है, उसका नाम उत्
है । क्योंकि यह मारे पापों से ऊपर चढा हुआ है। यह जो यह
जानता है, सारे पापों से ऊपर चढ़ जाता है । ७ ।
ऋचा और साम उसके जोड़ है, इस लिये [उद्गीथ ] उद्गीय
* यह अत्यन्त फालापन उनको दीपता है, जो सूर्यफे अन्दर
इष्टि जमा मत है।
+ फप्यासयपि+भाम, पन्दर की घटनं थी जगह, मयांत
यन्दर का पुच्छ भाग जसं यड़ा लाल होता है, उसी तरह जो लाल
फमल है, येमे लाल उमफे मंत्र है, ताज़ह सिल हुए लाल पमल फे
तुल्य उसके मेन है, अर्थात् यह तेजस्वी (शंकराचार्य)पर यह मर्य
पनाया हुभा प्रतीत होता है। यह शम्द अन्यत्र पददिपा नहीं गया,त्म
लिये अर्थ का निधारण करना पटिन ६
उदितः में उत् निमसरा है।
६ उद्गणी-उद फेजोद, मउगीय मना है।
-

[३२] मपाठक १.खण्ड ७ है। और इसी लिये [उद्गाता] उद्गाता * है, क्योंकि वह इस [पुरुष] का गाने वाला है। सूर्य के अन्दर जो पुरुप है, जिमका नाम उत् है] उन सारे लोकों का मालिक है, जो उस [सूर्य] से परे हैं, और देवताओं की सारी कामनाओं का मालिक है । यह अषि- दैवत है [देवताओं के सम्बन्ध में है] + 10। सातवां सण्ड अथाध्यात्मम् । वागेव, प्राणः साम । तदेत- स्यामृच्यध्यूढ ५ साम । तस्मादृच्यभ्यूद ५साम गीयते । बागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ॥१॥ चक्षुरेवर्गात्मा साम । तदेतस्यामृच्यध्यूढ ५ साम । * उद्+गाता-उद्गाता उद् का गानेवाला। +साममन्त्रसाम के अपने नियत स्वर से गाए जाते हैं, इतने से ही वह साम कहलाते हैं, वस्तुतः वह सब ऋचा ही हैं। यह ऋचाएं लग भग सारी ऋग्वेद में पाईजाती है, और जो ऋग्वेद में नहीं पाई जाती। यह भी ऋचाही है. क्योंकि उनमें ऋचा का लक्षण पाया जाता है । इसीलिये साम का वह भाग आर्चिक कहलाता है, जिसमें इन ऋचाओं का संग्रह है। इसलिये यहां वारर कहा है, किमामऋचा के सहारे है। अव यहां आरम्भ मे उद्गीथ का वर्णन है और उद्गीय साम का भाग है और साम ऋचा के सहारे है। इसलिये यहां पहले ऋचा और साम के भिन्नर अर्थ दिसलाकर अन्त में यह दिखलाया है कि आदित्य में उपास्य पुरुष का नाम उद् है। और यह ऋचा औरसाम उसके 'गेष्ण' जोड़ हैं । इसलिये वह उद्गीथ है अर्थात उदकोण से उद्गीथ घना है। उदगीथ जो साम का भाग है, उसके जोड़ भी ऋचाऔर साम है। और उद्गीथ जो आदित्यस्थ पुरप है, उसके जोड़ पृथिवी आदि (ऋचा) और अग्नि आदि (साम) है। और उद्गाता को उद्गाता इसलिये कहते हैं. कि वह उद् का गाने वाला है अर्थात उद्+गाता-उद्गाताई।

छान्दोग्य उपनिपद्। [३३] तस्मादृच्यध्यूढ ५ साम गीयते । चक्षुरेव सा ऽऽत्माऽम स्तत्साम ॥ २॥ श्रोत्रमेवई, मनः साम तदेतस्यामृच्यभ्यूढ५ साम । तस्माच्यध्यूढ साम गीयते। श्रोत्रमेव सा मनोऽम स्तत्साम ॥ ३ ॥ अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्ग, अथ यन्नीलं पर कृष्णं तत्साम । तदेतस्यामृच्यध्यूढ ५ साम । तस्मादृच्यध्यूढ : साम गीयते । अथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्साम ॥४॥ अथ य एपोऽन्तरक्षिणि पुरुपो दृश्यते, सेवर्क, तत्साम, तदुक्थं, यद्यजुः, तद्ब्रह्म । तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं, यावमुष्य गेष्णी तो गेष्णी, यन्नाम तन्नाम ॥ ५॥ स एप ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे,मनुष्य कामानाञ्चेति । तद् य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति, तस्मात ते धनसनयः॥ ६॥ अथ य एतदेवं विद्वान् साम गायति, उभौ स गायति, सोऽमुनेव, स एप ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्ता ५श्चोमाति देवकामा ५श्च ।। ७ ।। अथानेनैव, ये चैतदस्मादर्वाञ्चो लोकास्ता ५ . - [३४] मपाठक १. खण्ड ७॥ श्वाप्नोति, मनुष्यकामा ५ श् । तस्मादुहैवंविदुद्गाता घूयात् ॥॥ कं ते काममागायानीति, एष ह्येव काम गानस्येप्टे, य एतदेवं विद्वान् साम · गायति, साम गायति ।। ९॥ अब अध्यात्म (शरीर के सम्बन्ध में ] कहते हैं। ऋचा वाणी है, साम माण* है । यह माम [ वाणी ] इसत्राचा [प्राण] के सहारे है । इसलिये साम ऋचा के सहारे गाया जाता है। सा घाणी है, अम माण है. यह साम है, [ दोनों मिल कर साम बनाते हैं, सा+अमम्माम] ॥१॥ ऋचा आंख है, साम आत्मा (छायामा) है । यह साम [छाया:] इस ऋचा [आंग्व] के महारे है । इमलिये साम ऋचा के सहारे गाया जाता है। सा आंख है, अम आत्मा है । यह माम है ॥२॥ ऋचा श्रोत्र है, माम मन हे । यह माम [ मन ] इम ऋचा [श्रोत्र] के मदारे है । इसलिये साम ऋचा के सहारे गाया जाता है, मा श्रोत्र है, अम मन है, यह माम है ।। ३ ।। अब यह जो आंग्य की श्वेत दीप्ति [ चमक ] है, यह ऋचा है, और जो यह नीला-अत्यन्त कालापन है यह माम है, यह साम [कालापन] इमऋचा शेतना] के महार है । इसलिये माम मचाके महारे गाया जाता है। मा आँप की खेत चमक है, अम नीला- अत्यन्त कालापन है, यह माम है ॥ ४ ॥ * , जो नामिका में प्राण है थात् प्राण (तफराचार्य)।

छान्दोग्य उपनिषद् । [३५] अब यह जो आंख के अन्दर पुरुष दीखता है, वह मचा है, वह साम है, वह उक्थ है, वह यजु है, वह ब्रह्म है * । [ यह जो आंख में पुरुप है ] इसका वही रूप है, जो उस [आदित्यस्थ पुरुप] का रूप में है, जो [ ऋक् और साम][आदित्यस्थ पुरुप] के जोड़ हैं, वह इसके जाड़ हैं, जो उसका नाम [ उत् ] है, वह इस का नाम है ॥५॥ यह [ जो आंख में पुरुप है ] उन लोकों का मालिक है, जो इस से नीचे हैं, और, मनुष्य की सारी कामनाओं का मालिक है । सो ये जो वीणा में गाते हैं, इसी को गाते है, और इसलिये वह धन लाभ करते हैं ॥६॥ वह जो इस ( रहस्य ] को इस प्रकार जानता हुआ साम गाता है, वह दोनो को ( अधिदैवत और अध्यात्म आत्मा को,जो आदित्य मे पुरुप है,और जो अक्षि में पुरुप है, वस्तुतः जो दोनों एक है ] गाता है । वह उस [आदित्यस्य॑ पुरुष) के द्वारा उस [ सूर्य ] से परले लोको को और देवताओं की कामनाओं को पा लेता है ॥ ७॥ और वह इस [अक्षिस्थपुरुष ] के द्वारा, जो इस से निचले लोक हैं, उनको, और मनुष्य की कामनाओं को पालता है ॥८॥ इसलिये वह उद्गाता जो इस प्रकार जानता है [उपासता है। वह [ यजमान को ] कह सक्ता है ॥८॥ । * अचाका समुदाय शस्त्र, और साममन्त्रीका समदाय स्तोत्र है। उफ्थ एक शस्त्र विशेष है। देखो छान्दो उप०१।६।६।

. - [३६] प्रपाठक १. खण्ड ७॥ क्या कामना तेरे लिये गाउं [गाकर पूरी कर्फ ] क्योंकि वह जो चाहे गाकर उसके पूरा करने के समर्थ होता है, जो यह इसमकार जानता हुआ साम गाता है, साम गाता है ॥ ९ ॥ यहां यह विचार उत्पन्न होता है, कि यह जो आदित्य और अक्षि में उपास्य पुरुष है, यह कौन है ? उत्तर यह है,कि वह नित्य- सिद्ध परमेश्वर है । उसी की उपासना यहां भी और अन्यत्र भी सर्वत्र दिखलाई है। (प्रश्न) यहां उपासना ईश्वर की नहीं, किसी और देवता की होसक्ती है, और उसके हेतु यह है- (२) यहां उपास्य दो हैं, एक वह पुरुष जो आदित्य के अन्दर है, और दूसरा वह जो आख के अन्दर है सो यहां दो उपास्य हैं, और ईश्वर दो नहीं है ॥ (२) दोनों का एलये मर्यादा(हद्द)वाला है, 'यह (आदि त्यस्य पुरुष) उन लोकों का मालिक है, जो सूर्य से परे हैं, और देवता- ऑकी सारी कामनाओं का मालिक है। यह आदित्य में स्थित पुरुष के ऐश्वर्य की मर्यादा है । और 'यह उन लोकों का मालिक है, जो इस से नीचे हैं और मनुष्य की सारी कामनाओं का मालिक है' यह आंख में स्थित पुरुष के ऐश्वर्य की मर्यादा है, पर परमेश्वर के ऐश्वर्य की कोई हद्द नहीं वह सबका ईश्वर है (देखो बृह०आर० उप ४।४ । ३२] (३) यहां जो यह सूर्य के अन्दर पुरुप है, और जो यह आरके अन्दर पुरुप है, रन, वचनों रे. दोनोकर भरण, २ भापार बतलाया है। पर निराधार सर्वव्यापी परमेश्वर का कोई आधार नहीं बन सक्ता (देसो छान्दो० उप०७।२।४।१)॥

छान्दोग्य उपनिपद् । " [ ३७] (४) यहां दोनों का रूप दिखलाया है, 'मुनहरी दाढ़ीवाला' इस्यादि आदित्यस्थ पुरुष का रूप है, और अक्षिस्थ पुरुष का भी यही रूप कहा है, ' इसका वही रूप है, जो उमका रूप है। इस वचन । पर परमेश्वर का कोई रूप नहीं । इसलिये यहां मूर्य और आँखके अन्दर जो उपास्य पुरुष यतलाया है, वह परमेश्वर नहीं है ।। (उत्तर) यह वर्णन केवल एक परमेश्वर का है, क्योंकि यहां जो धर्म वतलाए हैं, वह केवल उसी में घट सक्ते हैं, किसी दूसरेमें नहीं। [१] आदित्यस्थ पुरुप का नाम उत् कह कर उसका निर्वचन यह किया है क्योंकि यह सारे पापों से ऊपर चढ़ा हुआ है। ' और यही नाम फिर अशिस्थ पुरुप का बतलाया है, कि 'जो उसका नाम है, वही इसका नाम है' अव सारे पापों की पहुंच से परे होना यह केवल परमात्मा मे ही बन सकता है । [२] असिस्थ पुरुष के विषय में यह कहा है, कि 'वह ऋचा है, वह साम है, वह उक्थ है, वह यजु है, वह ब्रह्म है' [७।५।] यह बात केवल परमेश्वर में ही घट सक्ती है, क्योंकि सारे घेद उसीको बतलाते हैं ' सर्वे वेदायत् पदमामनन्ति [कठ० उप०२।१०] और 'इसीको ही ऋग्वेदी बड़े उक्थ में विचारते हैं,इसीको यजुर्वेदी आग्न में उपासते हैं, इसीको सामवेदी महावत में उपासते हैं । [ ऐते आ० ३।२।२ । १२] । (मन] यह तुह्मारा हेतु तत्र वन सक्ता, यदि यह कहा होता, कि ऋचा उसको बतलाती हैं, साम उसको बतलाते हैं, इत्यादि । पर पहां तो यह कहा है, कि वह ऋचा है, यह साम है, इत्यादि । [ उत्तर ] ऋचा, साम, उक्य आदि उसकी माप्ति के पूरे २ साधन है, और असंदिग्ध साधन हैं, इसलिये यहां ऋचा उसीको बोपन करती है, यह न कह कर वह ऋचा है' ऐसा कहा है। - * - - " [३८] मपाठक १.खण्ड 1 जिस साधन पर पूरा भरोसा हो, उसको साधन के तौर पर न ' कह कर साध्य के साथ एक बना देते हैं । जैसा वरुण ने भृगुको कहा है 'तपसे ब्रह्मके जाननेकी इच्छा कर, तप ब्रह्म है' इसी तरह यह और वचन है, [अन्नं वै प्राणिनांमाणाः] अन्नं प्राण धारियों के. माण हैं। सो यहां भी ऋचा आदि उसके सच्चे और पूरे साधन हैं, इसलिये कहा है कि वह ऋचा है, वह साम है, इत्यादि । इसलिये यह हेतु ठीक है॥ [३] यहां अधिदैवत में यह पांच ऋचा कही है। प्रथिवी अन्तरिक्ष, धौ, नक्षत्र, औ मूर्यकी सेत दीप्ति । और यह पाच साम कहे हैं, अग्नि, वायु. मूर्य, चन्द्र और 'मूर्यका अतिकृष्णा रूप । यह कह कर बतलाया है, कि ऋचा और साम उसके जोड़ा अर्थात् पृथिवी आदि पांच जो ऋचा हैं, और अग्नि आदि पांच जो साम हैं, यह उसके जोड़ हैं । इसीतरह अध्यात्म में ये चार ऋचा कही है, वाणी, नेत्र, श्रोत्र, और आंखकी श्वेतदीप्ति और ये चार साम कहे हैं, प्राण, छायात्मा, मन और आंखका अतिकृष्ण रूप । यह कह कर बतलाया है, कि जो उनके जोड़ हैं, वह इसके जोड़ है, अर्थात् वाणी आदि चार ऋचा और माण आदि चार साम ये इसके जोड़ हैं । सो ऐसा पुरुप जो सारे परिपूर्ण है, का अन्तरात्मा है, सब कुछ जिसका शरीर है, वह परमेश्वर ही सक्ता है, दूसरा नही ॥ [४] सारे लोकों काऔर कामनाओं का मालिक होना भी ठीक २ रूप में परमेश्वर में ही बन सकता है, इत्यादि हेतुओं मे यह वर्णन परमेश्वर का ही बन सक्ता है, किसी दूसरे क नहीं। और जो विरुद्ध हेतु तुमने दिखलाए हैं, उनका उत्तर यह कि यहां व्यष्टिरूप में ब्रह्म की उपासना है, ब्रह्म की यह महिमा --

छान्दोग्य उपनिषद् । [३९]
सूर्य द्वारा प्रगट होती है, उस महिमा को दिखलाते हुए सूर्य में
उसकी उपासना वतलाई है, और जो महिमा आख द्वारा प्रगट
होती है, उस माहेमा को दिखलाते हुए आख में उसकी उपासना
बतलाई है । इस लिये-
(१) यहा दो उपास्य नही, किन्तु एक ही उपास्य दो भिन्नर
दिव्य शक्तियों के अन्दर उपास्य बतलाया है ।
(0) ऐश्वर्य की मर्यादा भी उपासना के लिये उसके व्यष्टि-
कप को लेकर वतलाई गई है।
(३) व्यष्टिरूप में उपासने के लिये ही दो भिन्न • आधार
बतलाए है, यह उसके स्वरूप के आधार नहीं, किन्तु उपासना के
है, वह स्वरूप से निराधार ही है ।
(४) यह पुरुप सूर्य का अन्तरात्मा ह, ओर मूर्य उसका
परीर है, सूर्य सारा तेजोमय है, इस लिये उस पुरुष के सारे अग
हुनहरी [ सोने की नाई चमकते हुए तेजोमय] वर्णन किये है।
भोर यह उस सूर्य का अधिष्ठाता मानकर पुरुष विशेप के रूप से
र्णन किया है । ऐसा वर्णन कविता का एक गुण है, इससे उसका
स्तुतः कोई रूप सिद्ध नहीं होता ।
इस लिये स्थानभेद से यहा एक ही परमेश्वर की उपासना
भिमेत है, स्थानभेद से उपास्य के भेद की शका, दोनों का एक
ही रूप और एक ही नाम बतलाने से पूरी तरह मिटा दी है।
* यहा हमने सक्षेप से लिखा है। व्यष्टि और समष्टि का वि
थप वेदोपदेश में सविस्तर लिखा है। यहा वेदोपदेश, कठ की
भूमिका, और तैत्तिरीय के पहले अनुचाक की प्यारया को पूरी
तरह एक बार ध्यान दकर पढगे। तब इस विषय पर यदुत अधिक
फाश पडेगा और आगे भी यह बहुत उपयागी हागा। यहा पटि
उपासना यहुत है, उनका रहस्य तभी समझ में आएगा।
।

और वह [४०] भपाठक १. खण्ड८॥ उद्गाता जव उद्गीय गाता है, तो वह यजमान के लिये पर मांगता है। पर वर मांगना कोई खेल की वात नहीं, दूसरे के लिये। खाली कह देने से कुछ नहीं बनता, पहले अपने आप को इस योग्य बनाओ, कि तुम जो कुछ चाहते हो, उसका पूरा होना अटल हो। यह सामर्थ्य तुम्हारे अन्दर तुम्हारे उस प्रेमभाव से आएगा, कि जोसारी कामनाओं कामालिक है, यदि उसके साथ एक होजाओगे। लिये यह उपनिपद् बतलाती है, कि उदाता को पहले उपासक बनना चाहिये उस अधिपति का, जो देवलोकों का और देवताओं की कामनाओं का मालिक है। और उसका, जो मनुष्यलोकों का और मनुष्यों की कामनाओं का मालिक है। जो उदाता इस ओपपति के प्रेम में रत है, और उद्गीथ गाते समय इसी को गाता है, वह उद्गाता यजमान को कहने के योग्य होता है, कहो तेरे लिये क्या कामना गाउं । क्योंकि वह जिस परमात्माके गीत गाता है, वह उसकी यातको सुनता है। आठवां खण्ड त्रयो होद्गीथे कुशला वभूवुः, शिलकः शालावत्य- कितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जेवलि रिति । ते होचुः 'उद्गीथे वे कुशलाःस्मो, हन्तोद्गीथे कयां वदाम' इति । तथेति ह समुपविविशुः । स ह प्रवाहणो जैवलिर- वाच 'भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रो. प्यामीति'। २॥ *इन दोनों गण्डों का उद्देश्य भी एक ही है। यहां एक दूसरे प्रकार मे उद्गीप (प्रोम) की उपासना बतला, जिमका फल वलोष भार उच्च म उच्च जीवन लाम करना है।

छान्दोग्य उपनिषद् [१] सह शिलकः शालावत्यश्चेकितायनं दाल्भ्यसु- वाच 'हन्त वा पृच्छानीति' 'पृच्छेति' होवाच । ३ । 'का साम्नो गति रिति' 'स्वर' इति होवाच । 'स्व- रस्य कागतिरिति' 'प्राण' इति होवाच । 'प्राणस्य कागतिरिति' 'आप' इति होवाच । । 'अपां का गतिरिति' 'असौ लोक' इति होवाच। "अमुष्य लोकस्य का गतिरिति । 'न वर्गलोकमति नयेदिति होवाच । 'स्वर्ग वयं लोक ५ सामाभिस ५ स्थापयामः, स्वर्गस ५स्ताव हि सामेति'।५। त ५ ह शिलकःशालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमु- वाच 'अप्रतिष्ठितं वे किल ते दाल्भ्य साम, यस्त्वेतर्हि- बयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति, मृर्धा ते विपतेदिति'१६॥ 'हन्ताहमेतद् भगवत्तो वेदानीति' 'विद्धीति' हो वाच । 'अमुष्य लोकस्य का गतिरिति' 'न प्रतिष्ठा लोकमतिनयेदिति' होवाच 'प्रतिष्ठां वयं लोकं सामा- मिस ५स्थापयामः, प्रतिष्ठास ५स्तावं हि सामेति'। त ५ह प्रवाहणोजैवलिरुवाच 'अन्तदे किल ते शालावत्य साम, यस्त्वेतहियान्मूर्धाते विपतिष्यतीति, पूर्धाते विपतेदिति''हन्ताहमेतद्भगवत्तो वेदानीति' विद्धीति' होवाच । ८॥

प्रपाठ १ खण्ड . यदि [४२] एक वार तीन पुरुप जो उद्गीथ * में निपुण थे, शिलक शालावत्य (शलावत् का पुत्र), चैकितायन, दाल्भ्य और प्रवाहण जवलि (जीवल का पुत्र ) उन्हों ने कहा, 'हम उदीय में निपुण हैं, आओ हम उदीय के विषय में विचार करें, ॥१॥ 'बहुत अच्छा' यह कह कर वह इकठे वैठ गए । नव प्रवाहण जैवाल बोले, 'हे भगवन्तो ! आप दोनों पहले विचार करें, आप दोनों ब्राह्मणों के विचार में मैं आपकी वाणी मुनाना चाहता हूं, का। तब शिलक शालावत्य ने चैकितायन दाल्भ्य से कहा, 'अनुज्ञा हो तो पर्छ । उसने कहा 'हां पृछो' ॥३॥ 'माम का आश्रय कौन है ? उसने उत्तर दिया 'स्वर' । 'स्वर का आश्रय कौन है ? उसने उत्तर दिया 'प्राण'। माण का आश्रय कौन है ? उसने उत्तर दिया 'अन्न' 'अन्न का आश्रय कौन है ? उसने उत्तर दिया 'जल' ॥४॥ जलका आश्रय कौन है ? उसने उत्तरदिया वह(धौ)लोक ॥' 'उम लोक का आश्रय कौन है ? उमने उत्तरदिया (मामको)स्वर्गलोकसे आगे नहीं लेजानाचाहिये * उद्गीथ (ओम्) के रहस्यार्थ जानने में। । चिकितायन का पुत्र और दलस्य गोत्री। * प्रपाहण जैवलि क्षत्रिय राजा ह (देखो डान्दो उप ।।२) और यह ब्रह्मविद्या में एक यडा प्रगल्भ विद्वान् है, जो वाहाणांसे आगे बढ़ा हुआ है। यहां भी उसने अपनी पारी में उद्गीथ (ओम) का जो असली . अर्थ है यह प्रगट किया है, अर्थात् परब्रह्म । यहां साम से अभिप्राय उद्गीय है, क्योंकि उगीयका प्रकरण है और आगे भी (९।२ में) कहा है कि 'उद्गीयमुपासस्ते(शंकराचार्य ॥ ऋचाही स्वर विशेष आश्रय साम कहलाती है. स्वर प्रा मेयनताह,प्राण अन्नस,अन्न जल मे उत्पन्न होताह जलधास आता । ।

छान्दोग्य उपनिषद् । हम स्वर्गलोक को साम ठहराते हैं, क्योंकि साम स्वर्ग के तौर पर स्तुति किया गया है *१५ । तब शिलाशालावत्य ने चकितायन दाल्भ्य मे कहा, 'हे दाम्य ! तेरा साम प्रतिष्ठा (दृढ़ स्थिति) वाला नहीं है । और यदि कोई (साम की प्रतिप्पा का जाननेगाला) इस समय (जव तुम भ्रालि मे मिना दस्थिति के सामको ठहरा रहे हो) कहे कि तेग मिर गिर जाएगा, तो तेरा मिर अपश्य गिर जाए' । 'अच्छा (दालय ने कहा ) तर, हे भगान् अनुज्ञा हो, मैं आप मे ममा लूं'। उसने (शिलकशालारत्य ने ) कहा, 'हां समझो ॥ (उमने पूछा ) उस (स्वर्ग) लोकका आश्रय कोन है ? उसने उत्तर दिया 'यह लोक ( पृथिवी) और इम लोकका आश्रय कौन है ? उसने उत्तर दिया [मामफो] मतिष्ठालोक [पृथिवीलोक] से आगे नहीं लेजाना चाहिये । हम सामको प्रतिष्ठालोकमें ठहराते हैं, क्योंकि सामकी प्रतिष्ठा के तौर पर स्तुति की गई है ॥७॥ तय भवाहण जैपलि ने इस [शिलकशालावत्य ] से कहा, हे शालावत्य ! तेरा साम [पृथिरी] अन्तवाला है । और यदि *क्योंकि 'स्वर्गावैलरीफो सामवेद, सामवेद स्वर्गलोक है, इस श्रुति में सामर्यद फी स्वर्गलोक के रूप में स्तुति की है, (शकराचार्य) सय भूनॉकी प्रतिष्ठा पृथिवी है और स्वर्गलोकी भी प्रतिष्ठ है। अग्नि में किये यहा होमादि धौलोक को पुष्टि देते है । + 'इयर्य रयन्तरम्' यहां रथन्तर सामफी पृथिवीफे रूप में स्तुति की गई है (शंकराचार्य) स्वर्गलोफकी प्रतिष्ठा पृथिवीलोक पर है, इसलिये शालावत्य ने दालय को कहा कि तेरा साम प्रतिष्ठावाला नहीं। यह कह कर उसने पृथिवीलोक को साम ठहराया। अब जैवलि शालावत्य को - [ ४४ ] मपाठक १.खण्ड ९ कोई इम ममय कहे कि तेरा सिर गिर जाएगा, तो तेरा सिर अवश्य गिरजाए॥ [शिलकशालावत्य ने कहा 'अच्छा,तब हे भगवन् अनुज्ञा हो, मैं आपसे समझ लूं ॥ उसने कहा 'हां समझो॥८॥ नवां खण्ड 'अस्य लोकस्य कागतिरिति' 'आकाश' इति होवाच । 'सर्वाणि हवा इमानि भूतान्याकाशादेव स- मुत्पद्यन्ते, आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति । आकाशोह्येवैभ्यो ज्यायान्, आकाशः परायणम्' । १। स एप परोवरीयानुद्गीथः स एपोऽनन्तः। परोवरीयो हास्य भवति ? परोवरीयसो ह लोकान जयति यएतदेवं विदान् परोवरीया ५ समुद्गीथमुपास्ते । २ । त हैतमतिधन्वा शोनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वो- वाच 'यावत् त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते, परो- वरीयो हेभ्यस्तावदस्मिल्लोके जीवनं भविप्यति । ३। तथाऽमुष्मिल्लोकेलोक इति' स य एतमेवं विद्वानु- पास्ते, परोवरीय एव हास्मिल्लोके जलनं भवति तथा ऽमुष्मिलोके लोक इति लोकेलोक इति । ४ । कहते हैं. कि तुम जिसको माम ठहरांत हो, यह यपपि प्रतिष्ठा है, तयापि अन्तघाला है, इसलिये यह भी मामका असली भयं नहीं।

" छान्दोग्य उपनिषद् [शालावत्स ने पूछा] 'इस [पृथिवी] लोक का आश्रय कौन है? उसने कहा 'आकाश' पयोंकि ये सारे भूत आकाश से उत्पन्न होते हैं, और आकाश में लीन होते हैं। क्योंकि आकाश इन सबसे बड़ा है, आकाश [इन सबका] परम आश्रय है।। यह बड़े से बड़ा उदीय [ओम्ब्राम] है, यह विना अन्त के है । वह जो इस प्रकार जानकर इस बड़े से बड़े उद्गीय को उपासता है, वह उसको पालेता है, जो बड़े से बड़ा है, और उन लोकों को जीत लेता है जो बड़े से बड़े हैं । २ । अतिधन्वा शौनक [ शुनक के पुत्र ] ने [ अपने शिष्य ] उदरशाण्डिल्य को यह उद्गीथ वतलाकर कहा था, कि 'जब तक तेरे पंश में इम उद्गीय को जानेंगे, तब तक उनका इस लोक में बड़े से बड़ा जीवन होगा' । ३ । 'और उस [स्वर्ग] लोक में लोक होगा' यह जो इस मकार उद्गीथ को जानता है, और उसको उपा- सता है, उसका इस लोक में जीवन निःसंदेह बड़े से बड़ा होता है, और उस लोक मे लोक होना है, हा[उस]लोक में लोक होता है ।। दाल्भ्य, और शालाक्स, ब्राह्मण और जैवलि, राजा ये तीनों जो उद्गीथविद्या में कुशल थे, इन्होंने विचार किया, कि उद्गीथ का परम आश्रय कौन है ? उन में से दालभ्य का पक्ष यह था कि स्वर्ग लोक से आए हुए जलों से प्राण को जीवन मिलता है, और माण से उगीय गाया जाता है, इस लिये उद्गीथ का परमभाश्रय स्वर्गलोक है। इस पक्ष में अप्रतिष्ठा का दोष दिखलाकर शालावस ने यह सिद्ध किया, कि यह लोक कर्म द्वारा स्वर्ग का भी हेतु है इस लिये माम का परम आश्रय यह प्रतिष्ठालोक है। जवाल ने इसमें अन्तवाला होने का दौप दिखलाकर आकाश को साम का परम [४६ ] मपाठक १ खण्ड १० 1 आश्रय बतलाया है । आकाश यहां परमब्रह्म का नाम है, अथवा भूताकाश के अन्तर्यामी के तौर पर उसे आकाश कहा है (देखो वेदान्त० ११ १२२) । यहां साम के मूल का पता खोजते हुए आगे बढ़कर पर- वाम तक पहुंचते है, इस लिये यह उद्गीय परोवरीयस्-बड़े से बड़ा, कहलाता है। और इस गुण के सदृश ही इमकी उपासना का फल है। दसवां खण्ड मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिह चारायण इभ्यग्रामे प्रदाणक उवास । १ । सहेभ्यं कुल्मापान खादन्त विभिक्षे ।त होवाच । नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता' इति ।। 'एतेषां मे देहीति' होवाच । तानस्मै प्रददौ । 'हन्तानु- पानमिति' 'उच्छिष्टं वै मे पीतस्यादिति होवाच ।३। 'नस्विदेतेऽप्युन्छिष्टा' इति । 'न वा अजीविष्य- मिमानखादनिति होवाच । 'कामो मे उदपानमिति।। स ह खादित्वाऽतिशेपान जायाया आजहार । साग्र एव सुभिक्षा वभूव, तान् प्रतिगृह्य निदधौ । ५। सह प्रातः सञ्जिहान उवाच । 'यदवताऽन्नस्य ल- भेमहि, लभेमहि धनमात्रां, राजाऽसौ यक्ष्यते, स मा सर्वराविज्ये वृणीतति, । ३। तं जायोवाच 'हन्त पते ! इम एव कुल्माषा' इति। तान् खादित्वाऽमुं यज्ञं विततमेयाय । ७।

' छान्दोग्य उपनिपद। [४७]
तत्रोद्गातॄनास्ताव स्तोष्यमाणानुपोपविवेश ।सह
प्रस्तोतारमुवाच । ।
'प्रस्तोतर् ! या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता, तां चेद
विदान प्रस्तोष्यसि, मुर्धा ते विपतिष्यतीति'। ९ ।
एवमेवोद्गातारमुवाच 'उद्गातर् ! या देवतो-
द्गीथ मन्वायत्ता, तां चेदविद्धानुद्गास्यसि, मूर्धा ते
विपतिष्यतीति' ।१०।
एवमेव प्रतिहारमुवाच 'प्रतिहर्तर ! या देवता
'प्रतिहारमन्वायत्ता, ताश्चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि, मूर्धा ते
विपतिष्यतीति' ते हसमारतास्तूष्णीमासाश्चकिरे ।
* जब ओलों [के पड़ने] से कुरदेश [कुरदशों की सेतियें]
मारे गए, तब उपस्ति चाक्रायण [चक्र का पुन] घड़ा तंगदस्त
हुआ, अपनी कंवारी स्त्री के साथ इभ्य + ग्राम में रहा ।।।
* साम का जो भाग उद्गाता गाता है, उसे उदीय पहते ,
जो प्रस्तोता के गाने का है, उस प्रस्ताव भोर जो प्रतिहतों के गाने
का है, उसे प्रतिहार कहते हैं। यहां तक कयल उद्गीय के देवता वा
विचार हुभा है । अय उसके साथ मस्तार और प्रतिहार के देयता
का भी विचार परत है।
t
'माटिपी' यह उपम्नि पी स्त्री का नाम नहीं है। इमपा
अर्थ है, जो खुला घूमने के योग्य है। अभी छोटी मयस्था महै।
एक युपति के लिये तंगी की दालन में येघर होना मनुचित है।
विही भाशय दर्शकराचार्य और दूमर ग्याल्याकारोंपाद
याम, महायतों या प्राम, मयया पनयानों कासिमराचार्य)

. - [४८] प्रपाकठ १ खण्ड १० । -. उसने एक इभ्य को कुल्माप *खाते देखकर उससे भीख मांगी । इभ्य ने कहा 'मेरे पास और नहीं हैं, सिवाय इनके जो यह मेरे आगे धरे हुए हैं।।२॥ 'उपस्ति ने कहा 'इन्हीं में से मुझे खाने को] दो उसने उसे दे दिये [और कहा] 'लो यह पानी पीने को है' उपस्ति ने कहा [यदि मैं इसमें से पिई, तो] मैं उसे पिउंगा जो उच्छिष्ट [दूसरे का वचा हुआ है, झूठा ] है। ३ । ने कहा 'क्या ये [कुल्माप] झूठे [अच्छिष्ट] नहीं ? उसने उत्तर दिया [नहीं, क्योंकि मैं जीता न रहता, यदि मैं इनको न खाता, पर पानी पीने को मेरे लिये बहुतेरा है।।४। वह [उपस्ति] आप खाकर वाकी बचे हुए [कुल्माष ] स्त्री के लिये लाया । पर उसे पहले ही अच्छी भिक्षा मिल चुकी थी, उनको लेकर उसने रख दिया। ५। दूसरे दिन प्रातःकाल उठते ही उपस्ति ने कहा 'शोक ! यदि हमें कुछ थोड़ा सा अन्न मिल जाए, तो हमें कुछ थोड़ा सा धन मिल जाए [जिससे हमारा जीवन होसके] राजा वह एक या करने लगा है, वह मुझे सारे ऋत्विक् के कामों के लिये चुन लेगा। उसकी स्त्री ने उसे कहा 'लीजिये, हे पति ! यही [तुम्हारे) कुल्माप हैं । उनको खाकर वह उस फैलाए हुए यज्ञ में आया। वहां वह, आस्ताव । में जो स्तुति करने को बैठे हुए थे, उन उद्गाताओं के पास बैठ गया । और उसने प्रस्तोता से कहा था *कुल्माप, ओ का कोटा दले हुए जॉकी खिचड़ी अथवा एकभनाज +आस्ताव जिस स्थान में बैठे हुए उद्गाता प्रस्तोता और प्रति. हती अपना २ साम भाग गाते हैं। + यद्यपि सामवेदी चार ऋत्विजों में से उदाता एक विज् है। पर यहां 'उद्गातृन्' उद्गाताओं, यह बहु वचन सारे सामवेदी । .

" छान्दोग्य उपनिषद्। [४९ ] हे मस्तोतः! जो देवता मस्ताव से सम्बन्ध रखता है, उसको यदि तुम न जानते हुए प्रस्ताव गाओगे, तो तुम्हारा सिर गिर जाएगा, *।९। ऐसे ही उसने उद्गाता को कहा 'हे उद्गातः ! जो देवता उद्गीथ से सम्बन्ध रखता है, उसको यदि तुम न जानते हुए उद्गीथ गाओगे, तो तुम्हारा सिर गिर जाएगा । १० । ऐसे ही उसने प्रतिहर्ता को कहा 'प्रतिहतः ! जो देवता मतिहार से सम्बन्ध रखता है, उसको यदि तुम न जानते हुए भतिहार गाओगे, तो तुम्हारा सिर गिर जाएगा ।। तब वह बन्द होगए और चुप चाप बैठ गए । ११ । ऋत्विजों के अभिप्राय से है। मोम यस में सोम भक्षण के प्रसंग में भी 'प्रोद्गातृणाम्' उद्गातृ शम्द का यहुवचन है । और उससे सारे सामवेदी लिये जाते हैं, यह मीमांसा ॥२३-२६ में निर्णय किया है। * खाने को पास भन्न नहीं, जूठा और यासी साते फिरते हो, और यहां आफर इतने पड़े विद्वानों को तुमने हैरान कर दिया है। हे पिजन! तुम्हारी महिमा तुम ही जानते हो, हमारी समझ में नहीं माता, कि क्यों इतने बड़े विद्वान् ने यदुत मा धन इफटा न फर लिया, उस समय तो राज्य मी संस्कृत का ही था। पर तुम सचमुष हमें निरुत्तर कर देते हो,अब यह कददेते हो, फि हम विधा को पंचते महीं थे, सयको मुफ्त देते थे, तभी तो इमदेशफे राजा रफ सप के सब विद्यावान होते थे। + यदि प्रस्ताय के देयता को ग जानता हुभा तू मस्ताय गाएगा, तो तेरा सिर गिर जाएगा, इमसे यह नहीं जानना चाहिये, फि पिना रहस्यायं आने किमी फो फरियन नहीं बनना चाहिये, किन्नु पिशान के सामने भपिदान को कराने का माधिकार महीं, इसी लिये मागे उपस्ति मेकदा (पदिर देवना को गिना जाने कम कराता, तो तेरा सिर गिर जाता) जफि मने पंमा मह दिया था' हां पिशानी मगुलामे अपिवान भी करा सामाकिया [५] प्रपाठक १..खण्ड ११ ग्यारहवां खण्ड। ॥ अथ हैनं यजमान उवाच 'भगवन्तं,वा अहं विवि- दिपाणीति' 'उपस्तिरस्मि चाक्रायण' इतिहोवाच-११॥ स होवाच 'भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरालिंज्यैः पर्यशिर्ष, भगवतो वा अहमवित्त्या ऽन्यानवृषि' १२॥ भगवांस्त्वेव मे सर्वैरालिंज्यैरिति' 'तथेति' 'अथ- तर्खेत एव समतिसृष्टाः स्तुवताम् । यावत्त्वेभ्यो धनं द- द्यास ,तावन्ममदद्या'इति। तथेति'हयजमानउवाच॥३॥ अथ हेनं प्रस्तोतोपससाद । 'प्रस्तोतर् ! या देवता प्रस्तावमन्वायचा, तां चेदविदान प्रस्तोष्यसि, मुर्धा ते . विपतिप्यतीति ' मा भगवानवोचत् । 'कतमा सा देवतेति' ॥४॥ 'प्राण' इति होवाच । 'सर्वाणि हवा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति, माणमभ्युजिहते । सेपा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता । तां चेदविद्धान प्रास्तोष्यो, मूर्धाते व्यपतिष्यत् , तथोक्तस्य मयेति' ॥५॥ भी मागे उपस्ति ने उनको पमं फरान की अनुमा दे दी थी। रह- स्मार्य आनने वालों में कराया हुआ धर्म पढकर पलयाला होता है, उसकी अपेक्षा से, जो मर्म के न जानने वालों से कराया गया है। (देम्मो 131१०) पर फर्म पर्ममान, जानने याल से भी पूरा किया जासत्ता। भोरन्हीं के लिये दक्षिणमार्ग बतलाया है। भीर दो साप रहस्यायं भी जानते हैं, उनके लिये उत्तरमार्ग है (शंकराचा).

"T छान्दोग्य उपनिषद् । [५.] अथ हैनमुदगातोपससाद 'उद्गातर् ! या देवतो- दीथमन्वायत्ता,तांचेदविद्धानुद्गास्यसि मूर्धातेविपति ष्यतीति'मा भगवानवोचत । 'कतमासा देवतेति ॥६॥ 'आदित्य' इति होवाच । 'सर्वाणि हवा इमानि भूतान्यादित्यमुञ्चैः सन्तं गायन्ति, सेपा देवतोद्गीथ म- न्वायत्ता' तां वेदविदानुदगास्यो, मूर्धाते व्यपतिप्यत्, तथोक्तस्य मयेति' ॥७॥ अथ हैन प्रतिहतोंपससाद 'पतिहर्तर ! या देवता प्रतिहार मन्वायत्ता, तां चेदविदान प्रतिहरिष्यति, मूर्या ते विपतिष्यतीति' मा भगवानवोचत, 'कतमा सा देवतेति' ॥ 'अन्नामिति' होवाच । 'सर्वाणि हवा इमानि भूता: न्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति, सेपा देवता प्रति- हारमन्वायत्ता, तां चेदविद्वान् प्रत्यहरिप्यो, मूर्धा ते व्यपतिष्यत्, तथोक्तस्य मयेति ॥९॥ ताउमेयजमान ने कहा भगान में आपको जानना चाहता (आपकौन है) उमने उत्तर दिया. 'मैं उपस्ति चामायण'॥१॥ उसने कहा 'भगवन् ! मैंने ऋविजों के इन मारे कामों [पर दृष्टि रचने के लिये ] के लिये आपको यहुत हंगा, पर आप के न मिलने से मने दूसरों को गुना' ॥२॥ * मिरते यहां मे, पोई ठिकाना था। यह मुम्हारा गमाग्य है. पिरात या यचा बचाया पीपर अपने माप माप ।

. भपाठक १ खण्ड ११ 'तथापि हे भगवन् ! अब आप सारे ऋत्विज के कर्मों को अपने हाथलें। उपस्ति ने कहा 'बहुत अच्छा; तो अब यही मेरी अनुझा से स्तुति गाएं, पर जितना धन इनको दो, उतना मुझे दो * । यजमान ने कहा 'बहुत अच्छा ॥३॥ तव मस्तोता (शिप्य के तौर पर ) उसके पास आया, (और कहा) 'भगवन् ! आपने मुझे कहा है " हे प्रस्तोतः ! जो देवता मस्ताव से सम्बन्ध रखता है, उसको यदि तुम न जानते हुए प्रस्ताव गाओगे, तो तुम्हारा सिर गिरजाएगा"सो वह देवता कौनसा है ॥४॥ उसने कहा 'माण क्योंकि ये सारे भूत प्राण में लीन होते है, आर प्राण से निकलते हैं + यह देवता प्रस्ताव से सम्बन्ध रखता है, यदि तुम इस देवता को न जानते हुए प्रस्ताव पड़ते, तो तुलारा सिर गिरजाता, जब कि मैने ऐसा कह दियाथा ॥५॥ तव उद्गाता उसके पास आया (और कहा)'भगवन् ! आप ने मुझे कहा है " हे उद्गातः ! जो देवता उद्गीथ से सम्बन्ध रखता है, उसको यदि तुम न जानते हुए उगीय गाओगे, तो तुम्हारा सिर गिरजाएगा" सो वह कौनसा देवता है। ॥६॥ उसने कहा 'आदित्य (सूर्य) क्योंकि ये सारे भूत सूर्य को गाते हैं, जब वह ऊंचा होता है (उदय होता है)। यह देवता उद्गीय * सपेरे ही अभी जो कुछ पाकर आए है, यह ताजह २ याद है, पहले ही ठेका कर लिया है। । यहां प्राण में अभिप्राय परमात्मा है, क्योंकि उसी से सारे भूत उत्पन्न होते और उसी में लीन होते हैं । देखो, वेदान्तः देवता से प्रायः व्यष्टिरूप में ब्रह्म का वर्णन होता है। .

छान्दोग्य उपनिषद् । [५३ ] सेसम्बन्ध रखता है। यदि, इस देवता को बिना जाने तुम उदीय गाते, तो तुम्हारा सिर गिरजाता, जब कि मैंने ऐसा कह दिया था' ||७|| तव प्रतिहर्ता उसके पास आया (और कहा) 'भगवन् ! आपने मुझे कहा है "हे प्रतिहतः ! जो देवता प्रतिहार से सम्बन्ध रखता है, उसको, यदि तुम न जानते हुए प्रतिहार गाओगे, तो तुम्हारा सिर गिरजाएगा" सो वह कोनसा देवता है ॥८॥ उसने कहा 'अन्न । क्योंकि ये सारे भूत अन्न को ही ग्रहण करते हुए[प्रतिहरमाणानि] जीते हैं । यह देवता प्रतिहार से सम्बन्ध रखता है यदि, इस देवता को विनाजाने तुम प्रतिहार गाते, तो तुम्हारा सिर गिर जाता, जब कि मैने ऐसा कहदिया था' ॥९॥ उपस्ति का इतिहास बतलाता है, कि पुराने समय में छूतछात का वखेड़ा न था, केवल उन्छिष्ट को दोष मानागया था । जब महावत ने उपस्ति को पानी दिया, तो उसने न पीने का हेतु केवल यही कहा है, कि यह उच्छिष्ट है । यह नहीं कहा कि यह महावतके घर का है। दूसरा-वह धर्मशास्त्रों की आज्ञाओं के मर्म जानते थे, उच्छिष्ठ इसलिये दोप है, कि कुछ तो उसमें स्वाभवातः ही घृणा होती है, और भोजन वही पूरी पुष्टि देता है, जिसको देख कर चित्त मसन्न होजाए। घृणा से तो प्रत्युत उलटे फल की भी संभावना है। और दसरा उच्छिष्ट से रोगों का सञ्चार भी होता है । और क्या यह मनस्विता के विपरीत भीनहीं है ? कि हम दूसरे का वचा हुआ खाएं। इसलिये उच्छिष्ट को अभोज्य कहा है । अव उपस्ति के सामने भूखे मरकर प्राण देने का और इन दोपों की संभावना का मुकाविला है। उसने मृत्यु से अपने आपको बचाया । ऐसे समय में पहला T । [४] प्रपाठक १. खण्ड ११ ॥ .. और तीमरा दोष तो प्रायः उत्पन्न ही नहीं होता। रहा रोग का, [वह भी संभावित है । और उसका प्रतीकार (इलाज) है, मृत्यु : का प्रतीकार. नहीं । इसलिये उपस्ति ने उच्छिष्टनिषेध के असली तात्पर्य को लिया, न कि शब्दों को । ऐसाही आचरण और भी ऋषियों ने किया है (देखो मनु० १० । १० ५-१० ८) इसी आशा को निवृत्त करने के लिये वेदव्यास ने लिखा है:- सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् (वेदान्त० ३ । ४। १२८) प्राणों की आशंका (खतरे) में हरएक अन्न के लिये अनु मिति है, क्योंकि ऐसा देखागया है। यहां देखागया है' से इशारा उपस्ति के जूठे और बासी भोज- न की ओर है। :- तीसरा-जटा भोजन खाने पर भी जुटा पानी नहीं पिया। यह अपने आप को संभालना है । उपस्ति विपनि का मुकाबिला 'कररहा है । जिमका हृदय गिरजाता है, वह यह.कह कर अपने आपको मन्तोप देलेता है, कि चलो अब क्या है, जब जूठा अन्नही खालिया, तो अब पानी वाकी रहगया। पर नहीं उपस्ति कहता है, पानी नहीं पिउंगा, क्योंकि यह जठा है । ऐसे पुरुष की प्रकृति पर दोप अपना अधिकार नहीं जमामक्त। उपस्ति के मामने अब कोई दोप आकर यह नहीं कह सक्ता, कि चलो अव तो तुम गिरगए, मुझे भी थोड़ी मी जगह दे दो । पर हां जो यह कह कर मन्तोपदे सेना है, कि अब क्या रहा ' वह धीरे २ सारे दोपों का शिकार बननाना है । मनुष्य को चाहिये कि जब वह विपत्ति में हो, तो उसको काटे, अपने आपको कभी न गिराए । और यदि विपत्ति में , छान्दोग्य उपनिपद् [५५) :वा किसी दूसरे समय में उससे कोई त्रुटि होनाए, तो उसके साथ दूसरी ध्रुटियों को ज़रा जगह नदे। श्रुटि को शुटि समझे, और साव- 'धान होकर दृढ़ खड़ा हो, कि फिर कोई ध्रुटि उसके सम्मुख न आए । ऐसा निराश होकर गिर न पड़े, जैसा कि आज कल इस जाति के लोग विपत्ति में वा भूल में भी विजाति के हाय का खाकर ऐसा हाय पाओं छोड़ कर गिरते हैं, कि अब वह और उन की सन्तानपरम्परा सदा के लिये उसी विजाति की जायदाद बन गई । उपस्ति को देखो, वह यहावत का जूग और वह भी वासी खाकर गया है और यज्ञ का अधिष्ठाता जा बना है, उसके बाह्म- -णत्व में कोई भेद नहीं आया।क्योकि वह आप कायर नहीं बना। जिस तरह शत्रु का घार खाकर भी मुकाविला कियाजाता है । इस तरह दोप की चोट खाकर भी मुकाविला जारी रयो । दोप शत्रु 'है, उसके सामने कभी न झुको। चोट खाओ, तौभी उसको मार हटाओ, यही वीरता है। पारयो खण्ड अथातःशीव उद्गीथः तद्धवको दाल्भ्यो ग्लायो -वा मैत्रेयः स्वाध्याय मुवनाज।१। तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव, तमन्ये श्वान उपसमेत्यो चुः 'अन्नं नो भगवानागायत्वशनायामवा' इति ।। तान होवाच 'इहेब मा प्रातरुपसमीयातेति' तद्ध वको दाल्भ्यो ग्लायो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाशकार।३। ते ह यथैवेदं वहिप्पवमानेन स्तोप्यमाणाःस ख्वाःसर्पन्तीत्येवमासस्पुः। तेहसमुपविश्य हिवः। । 41.

प्रपाठक १ खण्ड १२ [५६ ] ॐ३ मदा३ मोशपिवा ३ मा ३ दैवो वरुणःप्रजापतिः सविताऽन्नमिहा२ऽहरदऽनपते ३ ऽनमिहारहरा २55 हरोइमिति । ५। * अब शीव उदीय कहते हैं । वक दालभ्य याग्लाव मैत्रेयन स्वाध्याय के लिये वाहर (निर्जन स्थान में) गया ॥१॥ , * अन्न के न मिलने से उपस्ति को इतना कष्ट हुआ कि उच्छिष्ट और यासो अन्न खाने तक की दशा आई। यह अन्न का कष्ट न हो, इस प्रयोजन के लिये अन्न का साधन यह शीव उद्गीथ आरम्भ करते है। शिंकराचार्य यहां धक दालभ्य और ग्लाव मैत्रेय एक ही व्यक्ति का नाम लेते हैं। यक प्रसिद्ध नाम है और दालभ्य (दलय फी सन्तान) यह गोत्र नाम है। और उसीका दूसरा नाम ग्लाव है और मैत्रेय मित्रा का पुत्र । मित्रा उसकी माता का नाम है । एक के दो नाम और दो गोत्र होना स्मृतियों में बतलाया है। और लोक में भी यह चाल है फि एफ फा अमली पुत्र है और दूसरा उसे अपना धर्म पुत्र यना लेता है । यह दिसलाकर फिर शंकराचार्य ने लिखा है अथवा यह दोनों नाम दी ऋषियों के है। क्योंकि पहले अर्थ में था,या' का अर्थ ठीक नहीं बन सक्ता था। और यही यात यथार्थ प्रतीत होती है, इस में चा का अर्थ मी ठीक लग जाता है। मोरशरा १३में जहां एकदालभ्य का पहल नाम आया है, उसके माथ'ग्लायो वा मैत्रेयः' नहीं आया। और यहां यह इतना आवश्यफममझा है, कि दुबारा नाम देने ममय मी 'ग्लायो या मंत्रयः' भुलाया नहीं । वस्तुतः यह बात उपनिषद् का संग्रह करने वाले को ठीक स्मरण नहीं रही, कि इन तनों में में बौन एक था, उमे जमा मंदेद ६, धैसा स्पए लिख दिया है, कि यह बरदारश्य था, या ग्लाय मंत्रय था।

छान्दोग्य उपनिषद् । उसके लिये श्वा श्वेत प्रगट हुआ, और दूसरे या उसके गिर्द इकडे हुए, और कहने लगे 'भगवन् ! हमारे लिये अन्न गाएं (गाकर -लाभ करें) हम भूखे हैं। ॥२॥ श्वेत ने उनको कहा 'यहां ही कल सवेरे मेरे पास आओ। वक दालभ्य या ग्लाय मैत्रेय ने इस बात को पूरे ध्यान से देखा ॥३॥ अव जैसे वहिप्पवमानस्तोत्र *से स्तुति करने लगते हैं, तो [सारे ऋत्विज्] एक दूसरे को पकड़े हुए [ आगे पीछे ] चलते हैं, ठीक इसी तरह वह [ एक दूसरे के पीछे होकर ] चले । फिर वह मिल कर बैठगए, और हिन किया। ४ । 'ओम्' हम खाएं। ओम, हम पियें ! ओम, देव वरुण, मजापति, सावता हमारे लिये अन्न लाए ! हे अन्न के मालिक अन्न लाओ, लाओ, ओम् । ५। यह श्वेतचा और दूसरे या कौन हैं इस पर शंकराचार्य लिखते हैं, कि वा अर्थात् कुत्ता। और यह लिखते हैं, कि पक- दाल्भ्य वा ग्लाय मैत्रेय अन्न की कामना मे स्वाध्याय किया करता था। उसके स्वाध्याय से प्रसन्न होकर देवता या ऋपि श्वत कुत्ते का रूप धारण करके : और दूसरे देवता वा प्रापयों दुसरे * साम उ० के १११ मे१।१।३ तप,यह तीन मून (जो तीन २ मुचा के है) मिलकर पदिप्पयमान स्नोत्र पाहलाता सामवेदी स्तोत्र विशेष पा भारम्म परते ममय जो तीन पार हिहिहिं फहते हैं। यह हिंफार गर्यातहि फरना पडता है। सयिता-उत्पन्न परने याला ( मप पा) मयांत सूर्य । घरण भार प्रजापति भी उसी यो पहायणम्यपारने पाला प्रजापतिन्मजा का रक्षफ। मीर याद गमपनि म रिपकि मन्त्रको उत्पन्न करता है और पकाना है (शंपराग)। .

1५८] मपाकठ १ खण्ड १२॥ कुत्तों का रूप धारण करके-आनन्दगिरि)उसकी भलाई के लिये प्रगट हुए । और इस तरह पर उन्होंने दिखला दिया, कि अन्नप्राप्ति के लिये वैदिक विधि यह है । इसके पीछे शंकराचार्य ने फिर एक और पक्ष दिखलाया है, कि ऋपि के स्वाध्याय मे प्रसन्न होकर मुख्य प्राण ने और बाणीआदि इन्द्रियों ने [जो प्राण के सहारे अन्न खाती हैं] कुत्तों का रूप धारण करके उस पर अनुग्रह किया। और इस दूसरे पक्ष की समाप्ति कावचन यह कहा है, 'युक्तमवं प्रतिमत्तुम्' अर्थात् ऐसा जानना युक्त है । इसमे प्रतीत होता है, कि यह दूसरा पक्ष स्वामी शंकरा- चार्य का निज सम्मत है। और ऐसाही आनन्दगिरि ने लिखा है। संभव है, कि पहली कल्पना शंकराचार्य से पहले किसी व्याख्या- कार की हो, और दूसरी उनकी अपनी । अस्तु दोनो कल्प; नाओं में कुत्ते असली रूप में माने गए है। और इसी लिये जब उनके जलूस ( Procession ) का वर्णन आया, तो यह आशङ्का उठी, कि उन का जलूम ठीक वहिप्पवमान के जलस की तरह कैसे वन सक्ता है, क्योंकि उसमें ऋत्विज़ एक दूसरे का वस्त्र पकड़कर चलते है. तो इमको इस तरह ठीक किया गया है, कि कुसे एक दूसरे की पूंछ को अपने मुंह में पकड़कर चले । आश्चर्य है कि यह कल्पनाएं कितनी दूर तक पहुंच गई है, पर निकी तह में केवल एक दो शब्द के सिवाय कुछ नहीं । यह विधि जन लोगों ने की, उनकी नाति श्वा है न कि वह कुत्ते थे । रामचन्द्र सहायक वानर थे, और जनमेजय के विरुद्ध लड़नेपाले नाग । र दोनों जातियों के नाम को लेकर भी अनेक कल्पना हुई हैं, : इतिहास ने मिद्ध कर दिया है, कि ये दोनों मानुपी जातियां । और ऐसा ही माना जा सक्ता है । अव भी बहुत सी जातियां I, अनाज, पट और पक्षियों के नाम पर है । और यह नाम .

। छान्दोग्य उपनिषद् [५९ उनके अपने चुने हुए ही नहीं होते, किन्तु दूसरे लोग उनके लिये किसी न किसी हेतु से चुन लेते है । इस लिये यह आक्षेप नहीं रहता, कि ऐसा नाम ही क्यों पसन्द किया गया * । वा शम्द के सिवाय दूसरी वात शंकराचार्य ने यह लिसी है, कि यह एक दूसरे की पूंछ को मुंह में पकड़कर चले । पर इनके लिये एक भी शब्द उपनिषद् के अक्षरों में नहीं है। केवल यही लिसा है, कि वहिप्पवमान के सदृश जन्लूम निकाला और फिर इकई बैठकर अपनी कामना का मन्न गाया । यह मन्त्र सामसंहिता के अन्दर नहीं । और यह विधि भी स्वतन्त्र है, इस लिये यहां इसका पूरा इतिहास देना उचित समझा गया है । इसको शॉव उद्गीय इसी लिये कहते हैं, कि इसके द्रष्टा या हैं (वभिः दृष्टः शारः)। दो शब्द और हैं, जिनका आशय ग्योलना आवश्यक है 'तस्म, प्रादुर्वभू ' उसके लिये, प्रगट हुआ । यदि यह था मनुप्प विशेष होते, तो उसके पास आया कहना चाहिये या, न कि उसके लिये मगट हुआ । मगट होना, छिपे हुए का होता है पर यहां कोई कठिनाता की पात नहीं. यह शम्द नाना का प्रकाश करते हैं। ऋषि स्वाध्याय के लिये उमस्थान में गपापा, जहाँ मनुप्पों का पाम न था। यहां उसे भगानक एक पि का दृष्टि पड़ना और फिर उसमे एक भार रिया का विना या माम होना जो उसके लिये पड़ी उपपोगी थी । पही उमसे लिपे उसका मगट होना है। हम भी नग्न होकर ऐगा ही सा कर। - -- • मुऐ पुण् उन संग में परिभय है, जिनको पहले भीर पद रण भी भपनं मापांनी

भपाठक १. खण्ड १३॥
तेरहवां खण्ड *
अयं वाव लोको हाउकारो, वायुर्हाइकारश्, चन्द्रमा
अथकार, आत्मेहकारो, मिरीकारः। १ ।
आदित्य ऊकारो,निवह एकारो, विश्वेदेवा औहो-
इकारः, प्रजापतिहिङ्कारः, प्राणः स्वरो, उन्नं या, वाग
विराट् । २॥
अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोमः सञ्चरो हुंकारः।३।
दुग्धेऽस्मै वागदोहं, योवाचो दोहः। अन्नवानन्नादो
भवति, य एतामेव ५ साम्नामुपनिपदं वेदोपनिषदं
वेद इति ।।
हाउन यह [पृथिवी] लोक है, 'हाइ : वायु है। 'अथ'
चन्द्रमा है, 'इह' आत्मा है, 'ई' अग्नि है। १ ।
*साम मन्त्रों के गाने में गाने को पूरा रखने के लिये चीवर में जो
अक्षरगाए जाते हैं, जो ऋचा के अन्दर नहीं होते, जैसे-हाउ, हाइ,ौ
होहार, इत्यादि । इन अक्षरों को स्तोभाक्षर कहते हैं। यहां पूर्व उद्गीय
प्रस्ताव आदि का विषय समाप्त करके अय, उनके गाने में जो स्तो-
भाक्षर आते हैं, यहां प्रपाठक की समाप्ति में उनका रहस्य यतलाकर
इस विषय को समाप्त करते है ।
+ हाउ, स्तोम रयन्तर साम में आता है, और रथन्तर साम
को पृथियी कहा है 'यंवरयन्तरः' यह सम्बन्ध हाउ का पृथिवी से
है (शंकराचार्य)
दाइ, स्तोम घामदेव्य साम में आता है।
जो साम भग्नि सम्बन्धी ६, ''उनके निधन के तौर पर
भाता है।
.

प्रपाठक २. खण्ड १ 'अ' सूर्य है, 'ए' बुलावा [आवाहन] है, 'औहोइ' * वि- देव हैं, 'हि' प्रजापति है, स्वर माण है, 'या' अन्न है, वाग् ।' विराद है । २। तेरहवां फैलाहुआ स्तोम 'हु' अनिरुक्त [जिसका निर्वचन ही होसक्ता] अर्थात् परब्रह्म है । ३ । वाणी स्वयं उसके लिये दृध झरती है, जो वाणी का दूध है, और वह अन्न वाला [धनी] और अन्न खाने के योग्य (हल) बनता है, जो इस प्रकार साममन्त्रों की इस उपनिषद् को जानता है, हां उपनिषद् को जानता है । ४ । दूसरा प्रपाठक पहला पण्ड। . समस्तस्य खलु साम्न उपासन साधु, यत् खल साधु तत्सामेत्याचक्षते; यदसाधु तदसामेति । १। तदुताप्याहुः 'साम्नेनमुपागादिति' साधुनैन मु. .पागादित्येव तदाहुः । 'असाम्नेन मुपागादिति' अ- साधुनैन मुपागादित्येव तदाहुः । २ । अथोताप्याहुः 'साम नो वतेति' यत्साधु भवति, साधुवतेत्येवतदाहुः 'असाम नो वतेति' यदसाधु भ- वति, असाधु वतेत्येव तदाहुः। ३ । * मोहोर, स्तोभ घेण्यदेम्य साम में माता है। देिखो 'सान्दो उप०१।४।४ याग्स्तोम पैराज साम में भाता है। विराट मे पिपद पा मा अभिमेत है (कराचार्य) [२] छान्दोग्य उपनिषद् । स य एतदेवं विद्वान् साधुसामेत्युपास्ते, ऽभ्याशो ह यदेन ५ साधवो धर्मा आचगेच्छयुरुपचनमेयुः। ४ । * सारे साम की उपासनावितलाते हैं वह साधु है [ अर्थात् समस्त साम को साधुदृष्टि से | उपासना चाहिये] 1 [क्योंकि लोक में] जो वस्तु अच्छी होती है, उसे साम कहते हैं, और जो अन्छी नहीं होती, उसे असाम कहते हैं । १ । और लोक में ] ऐसा भी कहते हैं 'साम से उसने इसे गाकर मुनाया' अर्थात् बड़ी मुन्दरता से इसे गाकर मुनाया । और 'असाम से उसने इसके पास गाया' अर्थात् अमुन्दरता से इसके पास गया, यही इन वचनों का अभिमाय है । २ । और जब उनके लिये कोई वात भली होती है, तो वह कहते है, कि 'वास्तव में यह हमारे लिये साम है' अर्थात् हमारे लिये भला है। और जब भली नहीं होती, तो कहते है, कि यह हमारे लिये साम नहीं है, अर्थात् भला नहीं है, । ३ । जो इसे इस प्रकार जानता हुआ साम को साधु के तौर पर उपासता है, जल्दी ही साधु धर्म [अच्छे गुण कर्म] उसके पास आएंगे, और उसके लिये झुक जाएंगे ॥ ४॥ दूसरा सण्ड। लोकेषु पञ्चविध सामोपासीत । पृथिवी हिङ्कारोऽमिः * पहले प्रपाठक में साम के विशेपभागों की उपासना और उनके रहस्यार्थ वर्णन किये है । अव वही सयकुछ सारे साम के विषय में बतलाते हैं। अर्यात सारे साम को साधु ध्यान करना चाहिये । साधु, भन्छा, नेक, नेकी, मला, मलाई।

प्रपाठक२. खण्ड २॥ [६३ ] प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौनिधनम् । इत्यूर्वेषु । १। - अथावृत्तेपु-यो हिवार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्ष- मुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् । २ । कल्पन्ते हास्मे लोका ऊर्वाश्चात्ताश्च, य एतदेवं विद्वाल्लोकेषु पञ्चविध सामोपास्ते । ३ । लोकों के विषय में पाच प्रकार * के साम को उपासे ।। पृथिवी हिङ्कार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उदीय है, मूर्य मतिहार है, यो निधन है। यह ऊपर को चढ़ते हुए लोकों के विषय में [साम की उपासना है] ।। अप नीचे उतरते हुए लोकों के विषय में [माम की उपासना वतलाते है ] धो हिड्डार है, मूर्य प्रतार है, अन्तरिक्ष उदीय है, अग्नि प्रतिहार है, पृथिवी निधन है ।। वह जो यह ठीक जानकर लोगों के विषय में पांच मकार * माम ये पांच प्रकार जी या में प्रयोग किये जाते है, यह ६, दिवार, प्रनाय, उदीय, प्रतिहार भीर निधन । इन पांचों को साम की पांच मनियें (हिम्मे) पहन है। और माम इनमें पांब. भक्तिष पहलाता है। भय यहां इन विषय में उपासना भीर उनके अलग २ फल पतराते है। इन पांचों भनियों या भलग कप में उपासते हुए समस्त माम पो माशु रष्टि में उपासना नाहिये । न यहां माम पं जा पांच भागई, उनपा पम में परि. अतु, पशु और प्राणी पी एष्टि में उपासना चाहिये, भय द्विार को पाथरी पी ष्टि में दंगे, न पि पिगे या हिवारी दि पयोपि यसपा भगदिद्वार भादि (गया) [६४ ] छान्दोग्य उपनिषद । के साम को उपासता है, उसके लिये ऊपर को चढ़ने हुए और नीचे को उतरते हुए लोक [उपभोग देने के ] समर्थ होते हैं *।३। तीसरा खंड। वृष्टौ पञ्चविध ५ सामोपासीत । पुरोवातो हिङ्कारः, मेघो जायते स प्रस्तावः, वति स उदीयः, विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः॥ १॥ उद्गृह्णाति तन्निधनम् । वपति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्धान वृष्टौ पञ्चविध ५ सामोपास्ते ॥२॥ दृष्टि के विषय में पांच प्रकार के साय को 'उपासे । पूर्वी वायु (जो वादलों को लाता है ) हिङ्कार है, वादल का बनना प्रस्ताव है, यरसना उद्गीथ है, चमकना और गर्जना मातेहार है ।। बन्द होना निधन है। वह, जो यह ठीक २ जान कर दृष्टि के विषय में पंचविध साम को उपासता है, उसके लिये( अपने आप) बरसता है और वह दूसरों के लिये वरसाता है ॥ ३ ॥ सर्वास्वप्सु पञ्चविध सामोपासीत । मेघो यत् सम्प्लवते स हिङ्कारः, यद्धपति स प्रस्तावः, याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथः,याःप्रतीच्यः स प्रतिहारः, समुद्रो- निधनम् ॥१॥ न हाप्सुप्रैति, अप्सुमान् भवति, य एतदेवं विद्वान सर्वास्वप्सु पञ्चविध ५ सामोपास्ते ॥२॥ चौथा सण्ड। * इसलोक से धोको जति समय ऊपर २ के लोक औरची से नीचे को आते समय नीचे २ के लोक उसके लिये भोगदेते हैं (शंकराचार्य) मपाठक २ खण्ड [६५] सारे पानियाँके विषय में पञ्चविध साम को उपासे । मेघ की घटा का उठना हिङ्कार है, वरसना प्रस्ताव है, जो पूर्व को बहती हैं, यह उगीय है, जो पश्चिम को बहती हैं, * यह प्रतिहार है। समुद्र निधन है ॥ १॥ वह जो यह ठीक २ जान कर पञ्चविध सामको सारे जलों के विषय में उपासता है, वह पानियों में नहीं मरता है, और पानियों में अमीर होता हैं ॥२॥ , पांचयां गण्ड। - ऋतुषु पञ्चविध ५ सामोपासीत । वसन्तोहिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १॥ कल्पन्ते हास्मै ऋतव ऋतुमान भवति, य एतदेवं विद्धान्तुपु पञ्चविध ५ सामोपास्ते ॥ २॥ ऋतुओं के विषय में पञ्चविध साम को उपासे । मान्न हिकार है, गर्मी मस्तार ई,परमात उदीय हंशरद (असून,कातिक) मनिहार है, हेमन्त निधन ई ॥१॥ वह जो इसे ठीक २ जानता हुभा प्रतुओं के विषय में परिय सामको उपासता है, उसके लिये मार्ग प्रतुओं समर्थ रोती हैं, (भोग देने के), और यह ऋतुभों में अपीर (तुगोरे अगो फमों से युक्त होताई ॥२॥ .पूर्व पो गगा मादिमाद पहनी भार पश्चिममा माती माधि(भानन्दगिरि) छान्दोग्य उपनिषद् । छटा खण्ड पशुषु पञ्चविध सामोपासीत । अजा हिकारो, ऽवयः प्रस्तावो,गावउदीथो,ऽश्वाःप्रतिहारः,पुरुषो निधानम् ॥५॥ ... भवन्तिहास्य पशवःपशुमानभवति, यएतदेवं विद्धान पंशुषु पञ्चविध ५ सामोपास्ते ।। पशुओं के विषय में पञ्चविध सामको उपामे विकरियें हिकार हैं, भेड़े प्रस्ताव हैं, गोएं उद्गीथ हैं । घोड़े प्रतिहार हैं, पुरुष निधन : वह, जो यह ठीक ? जानता हुआ पशुओं के विषय में पञ्च विध साम को उपासता है, उसके पशु होते हैं, और वह पशुओं में बड़ा अमीर होता है ।२। सातवां सण्ड 'प्राणेषु पञ्चविध परोवरीयः सामोपासीत । 'प्राणो हिंकारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनम् । परोवरीया ५ सिवा एतानि ।। परोवरीयोहास्यभवति,परोवरीयसोह लोकाञ्जयति, य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविध ५ सामोपास्ते । इति. तु पञ्चविधस्य । प्राणों (इन्द्रियों) केविषय पञ्चविध साम को उपासे, जो (साम) बड़े से बड़ा है। प्राण *हिङ्कार है, वाणीप्रस्ताव है, आंख उद्गीथ है।। श्रोत्र प्रतिहार है, मन निधन है। ये हैं एक दूसरे की अपेक्षा से बड़े। *माण से यहां नासिक्य प्राण अर्थात् प्राण अभिप्रेत है, मुख्य प्राण नहीं क्योंकि यहांफ्रमशः एक दूसरे से बड़े इन्द्रिय बतलाएं हैं।

प्रपाठक २ खण्ड [६] जो यह ठीकर जानता हुआ प्राणों (इन्द्रियो) में पञ्चविध सामको उपासता है, वह उसका स्वामी होता है, जो कुछ बड़े से बड़ा है, और वह बड़े से बड़े लोकों को जीतता है। यह है पञ्चविध साम की (उपामनाएं) ॥२॥ आठवां गण्ड अथ सप्तविवस्य-चाचि सप्तविध ५ सामोपासीत । यत् किञ्च बाचो हुं इति सहिङ्कारः, यत्प्रेति स प्रस्तावः, यदेति स आदिः ।। १ ।। यदुदिति स उद्गीथः, यत्प्रतीति स प्रतिहारः, यदुपति स उपद्रवः, यन्नीति तन्निधनम् ॥ २॥ दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं, योवाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भ- वति, य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविध सामोपास्ते ।। अब सप्तविध * (सात प्रकार के सामफी उपासनाएं कहते हैं) वाणी में सप्तविध सामको उपास । वाणी में जहा कही न 'ई' आता है, यह हिङ्कार है, जो '' है, यह मस्ताव है, जो 'आ' है, वह आदि है (प्रथम है, ओम है)॥१॥ जो 'रन' है, यह उहीय ई, जो 'मति' है, वह मतिहार है, जो 'उप' है, वह उपद्रव है, जो 'नि', वह निधन ॥॥ * पूर्व जो प्रत्येक सामगान के पांच भाग यतलाए हैं, उनके साथ दो भाग और मिलाने मे सान होते हैं, यह तो यह है, मादि और उपद्रव । आदि मय से पहना अर्थात भाम होइन सातों भागों से साम साप्ततिर यहता है । पाचमनिय माम की उपासना के साय भए यह साममनिक माम पी उपासना पाते है। + अधांत सारे याद्दमय में ला ''६, यह हिद्वार है, जो यह प्रस्ताय है, इत्यादि।

[ ६८ ]
छान्दोग्य उपनिषद्।
वाणी उसके लिये स्वयं द्घ झरती है, जो वाणी का दूध है,
और वह अन्न में बड़ा अमीर और अमखाने के योग्य होता है ।
नवां खण्ड
अथ खल्वमुमादित्य ५ सप्तविध ५ सामोपासीत ।
सर्वदा समस्तेन सामः मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण सम-
स्तेन साम ॥ १ ॥
तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति वि.
द्यात, तस्य यत् पुरोदयात् स हिङ्कारः। तदस्य पश
वोऽन्वायत्ताः । तस्मात् ते हिकुर्वन्ति, हिङ्कारभा-
जिनो ह्येतस्य साम्नः॥२॥
अथ यत् प्रथमोदिते स प्रस्तावः । तदस्य मनुष्या
अन्वायत्ताः । तस्मात् ते प्रस्तुतिकामाः प्रश५ सा-
कामाः, प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः॥३॥
अथ यत् सङ्गबवेलाया ५ स आदिः । तदस्य
वया ५ स्यन्वायत्तानि । तस्मात् तान्यन्तरिक्षेऽनारम्ब-
णान्यादायात्मानं परिपतन्ति, आदिभाजीनि ह्येतस्य
साम्नः ॥ ४ ॥
अथ यत् सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथः । तदस्य
देवा अन्वायत्ताः । तस्मात् ते सत्तमाः प्राजापत्या-
नाम्, उद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥५॥
+ पूर्व देखो १।३।७, १ । १३॥४॥

प्रपाठक २. खण्ड ९। [६९] अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दितात् प्रागपराहणात् , स प्रति- हारः। तदस्य गर्भा अन्वायत्ताः । तस्मात् ते प्रति- हृता नावपद्यन्ते, प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः॥६॥ अथ यदूर्ध्वमपराह्णात् परागस्तमयात् स उपद्रवः, तदस्यारण्या अन्वायत्ताः, तस्मात् ते पुरुपं दृष्ट्वा कक्ष ५ श्वभ्रमित्युयद्रवन्ति । उपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः॥७॥ अथ यत् प्रथमास्तिमिते तन्निधनं, तदस्य पि- तरोऽन्वायत्ताः, तस्मात् तन्निदधति, निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्नः । एवं खल्वमुमादित्य ५ सप्तविध ५ सामोपास्ते ॥ ८॥ वह (धौलोक में ) जो सूर्य है, उसकी दृष्टि से मप्तविध साम को उपासे । क्योंकि यह सर्वदा मम रहता है और कि, प्रत्येक पुरुष समझता है, कि वह मेरे लिये है, वह मेरे लिये है, इस मकार यह सब के साथ सम है । इसलिये यह माम * ॥ यह जानना चाहिये, कि ये मारे माणघारी उमी पर निर्भर रखते हैं । उमका जो रूप उदय मे पहले है, वह हिवार इस पर पत्र निर्भर रखते हैं । इसलिये वद (प) ( सूर्योदय से पहले) ft करते हैं, क्योंकि यह इम माम (म्यं) के हिसार के भागी (हिस्मेदार) ॥२॥ * मात्र मूर्य मपंदा मम . या मप पि मम लिये उसे माम पदनामम ममाम गांए प्रायः प्रमात पेमीही न पाती। " [७] छान्दोग्य उपनिषद् । और पहले पहल उदय होतेही जो उमका रूप है. वह मस्ताव है। उनके इमरूप पर मनुष्य निर्भर रपने हैं । इसलिये मनुष्य बड़ी स्तुति (प्रस्तुति, प्रस्ताव ) और प्रशंसा को चाहते हैं, क्योंकि वह इस साम (सूर्य) के प्रस्ताव के भागी हैं॥॥ अब जो इसका रूप मगय के ममय पर है, वह आदि (प्रथम, ओम) है, उसके इस रूप पर पक्षी निर्भर रसते हैं। इसलिये पक्षी आकाश में बिना किमी महारे के अपने आपको थाम कर (आदाय) उड़ते फिरते हैं, क्योंकि वह इम साम,(सूर्य)के आदि (ओम् ) के भागी है ॥ ४ ॥ अब जो उसका रूप ठोक दुपहर के ममय है,वह उद्गीय है। उसके इस रूप पर देवना निर्भर रसते हैं (क्योंकि यह चमकनेवाले हैं), इसलिये वद्द प्रजापति की सन्तान में से मत्र मे क्योंकि वह उम साम के उदीय के भागी हैं ॥५॥ अब जो इसका रूप दुपहर से पीछे और पिछले पहर से पहले है, यह प्रतिहार है । उसके इम रूप पर गर्भ निर्भर रखते हैं । इम लिये वह गर्भ में स्थित हुए (प्रतिहताः) गिर नहीं पडते, क्योंकि वह इम साम के प्रतिहार के भागी है॥४॥ अब जो इमका रूप पिछले पहर से पीछे और अस्त होने से पहले है, वह उपद्रव है । उसके इस रूप पर जंगली पशु निर्भर रखते हैं । इसलिये जर वह किसी पुरुपको देसते हैं, तो वह जंगल - उत्तम है - J * सङ्गय, जय सूर्य रश्मियों को ग्रहण करता है। और जव गोएं बछड़ों से मिलती हैं। दूध दुह कर जव यछड़ों को दूध पीने के लिए खोल दिया जाता है।

प्रपाठक २. खण्ड १० ॥ [१] को अपनी सुरक्षन छिपने की जगह मान कर भाग जाते हैं (उप- वन्ति), क्योंकि यह इस मामके उपद्रव के भागी है ॥ ७ ॥ अब जो इसका रूप पहले पहले अस्त होने के समय है, वह निधन है । उमके इस रूप पर पितर निर्भर रहते हैं । इमलिये उन को नीचे रखते हैं * (निदति) क्योंकि वह इस सामके निधन के भागी हैं । इस प्रकार पुरुष इस सूर्य की दृष्टि से सप्तविध शाम को उपासता है ॥ ८॥ दसवां गण्ड अथ खल्यात्मसम्मित मतिमृत्यु सप्तविध ५ सामोपासीत । हिंकार इति त्र्यक्षरम् , प्रस्ताव इति व्यक्षरं, तत् समम् ॥१॥ आदिरिति व्यक्षरं, प्रतिहार इति चतुरक्षरं । तत इहेकं, तत्समम् ॥ २॥ उद्गीथ इति त्र्यक्षरम्, 'उपद्रव इति चतुरक्षरम् । विभि स्त्रिभिः समं भवत्यक्षर मतिशिप्यते व्यतरं तत् समम् ॥ ३॥ निधनमिति व्यतरं तत्सममेव भवति। तानि हवा एतानि दापि ५ शतिरक्षराणि ॥४॥ एकवि र शत्याऽऽदित्यमाति, एकविंशो या इतोऽसावादित्यः । दावि *शेन परमादित्याज्जयति, तनाकं तदिशोकम् ॥ ५॥ कदापि माने पविता में full उनकरिपाटि (Tra) [७२] छान्दोग्य उपनिषद् । आमोतीहादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजया ज्जयो भवति, य एतदेवं विद्धानात्मसम्मितमति- मृत्यु सप्तविध ५ सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ उस सप्तविध सामको उपासे जो अपने आप में वरावर * हैं और जो मृत्यु से पार ले जाने वाला है ।। हिङ्कार शब्द तीन अक्षरवाला है, प्रस्ताव शब्द तीन अक्षर वाला है, वह सम (वराबर ) है । ॥ १ ॥ आदि शब्द दो अक्षरवाला है, प्रतिहार शब्द चार अक्षर वाला है, उस से एक ( अक्षर जो तीनसे अधिक है ) यहां (आदि- डाला, तर) वह सम है ॥२॥ उद्गीथ तीन अक्षरवाला है, उपद्रव चार अक्षरवाला है, तीन तीन से सम होता है, एक अक्षर बच रहता है, इस तरह यह तीन अक्षरवाला है, वह सम है ॥ ६॥ निधन तीन अक्षरवाला है, वह सम ही है । सो यह बाईस अक्षर हैं ॥४॥ इक्कीस अक्षरों से वह ( उपासक ) सूर्य (मृत्यु) को पहुंचता है, क्योंकि वह सूर्य यहीं से इक्कीसवां है, और वाईसवें अक्षर से में । * आपस में एक दूसरे के बराबर अर्थात् भिन्न २ साम माक्तयों की अक्षरों की संख्या आपस में एक दूसरे के बराबर (सम) है, इसलिये यह साम है। क्योंकि वह सम है। आत्म सम्मितम, आपस में एक दूसरे के सम, अथवा पर- महा के सम है, क्योंकि मृत्यु की जय का हेतु है, (शंकराचार्य) तीन अक्षर हि-का-र ये है, और तीनही प्र-स्ता-च यह हैं। इस तरह से आपस में सम हैं। -- । [७३ ] r । प्रपाठक राखण्ड ११॥ वह उसको जीतता है जो सूर्य से परे है, और वह दुःख से रहित (स्थान) है, वह शोक से रहित है * ॥ ५ ॥ वह सूर्य ( मृत्यु ) पर विजय पालता है, और सूर्यकै विजय से परे जो विजय है, वह भी उसका होता है, जो, इसे.ठीक २ जानता हुआ, आपस में बराबर और मृत्यु 1 से पार ले जानेवाले सप्तविध साम को उपासता है, हा सामको उपासता है ॥ ६ ॥ ग्यारहवा खण्ड मनोहिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः प्रतिहारः। प्राणो निधनम् । एतद्, गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ॥ १॥ स य एवमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद, प्राणी भवति, सर्वमायुति, ज्योग्जीवति, महान् प्रजया । * यह जो अक्षर यच रहता है, यही याईसयां है और सारे सात वार तीन २ अक्षर मिल के इक्कीस बनते है । यारह महीने पांच 'ऋतु (यहां हेमन्त और शिशिर को एक करके पांच कहे है ) तीनलोफ और यह सूर्य कीसयां है, यह श्रुति है (शकराचार्य) * सूर्य मृत्यु है, क्योंकि दिन रात आदि काल के द्वारा 'जगत का मारनेवाला है। इसके तैर, जाने के लिये यह सामोपासन उपदेश किया है। * यज्ञ सम्बधी समस्त साम के रहस्यार्थ फह दिये है, जो केवल ध्यान से सम्बन्ध रसते है, अय आगे मिग्न २ साम के असली नाम लेकर उनके रहस्यार्थ प्रगट करते है। ये नाम भी उसी क्रम से यहां करे गए है, जिस क्रम से यह यज्ञ में प्रयोग होते है। गायत्र रयन्तर, पामदेव्य, पदव,वैरूप, येराज, शकरी, रेवती, यज्ञायशिय राजन ।

[ ७१ ] छान्दोग्य उपनिषद्। पशुभिर्भवति, महान् कीर्त्या । महामनाः स्यात् तद व्रतम् ॥२॥ मन हिडार है। याणी प्रस्ताव है. आख उदीय है, और प्रतिहार है, माण निधन है । यह गायत्र साम (पांच) प्राणों * में मोया हुआ है ॥१॥ वह जो इस मकार इस गापत्र साम को प्राणों में मोया हुआ जानता है वह अविकल इन्द्रियोंवाला होता है,सम्पूर्ण आयु को पहुंचता है, और उचल जीना जीता है, महान होता है प्रजा (सन्तान ) मे और पशुओं से और महान कीति से (गायत्र साम के उपासक का) प्रत यह है, कि वह बड़े मनवाला हो (क्षुद्रहदय न हो) धारहवां वण्ड अभि मन्थति, साहिङ्कारः; धूमोजायते, स प्रस्तावः, ज्वलति, स उदीयः, अङ्गारा भवन्ति स प्रतिहारः, उपशाम्यति, तन्निधनम्, स ५ शाम्यति,तनिधनम् । एतद् रथन्तरमग्नो मोतं ॥१॥ स य एवमेतद रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद, ब्रह्मवर्च स्यन्नादो भवति, सर्वमायुरेति, ज्योग्जीवति, महान् पूजया पशुभिर्भवति, महान् कीर्त्यान प्रत्याग्नि माचामेन्ननिष्ठीवेद तद्बतम् ॥ ३॥ * मिलामो आन्दोर उप० १२१७११। जहा प्राण दूसरेशान गिय प्राणों का नाम है (देसी बहाउपा) गायत्री प्राणों का की सस्य करने वाली प्रपाठक २ खण्ड १३॥ [ ७५] । जो (अरणि को) रगड़ना है, यह हिड्कार है,जोधुआं उठता है। यह प्रस्ताव है, जो जलना है, यह उदीय है; जो अङ्गारे घनने हैं, वह प्रतिहार है; जो बुझने लगना है, यह निधन है; जो बुन जाना है, यह (भी) निधन है। यह स्थन्तर साम अग्नि में मोया हुआ है ॥ १ ॥ वह जो इस प्रकार इस स्थन्तर साम को आग्न में मोया हुआ जानता है, वह ब्रह्मवर्चसापाला और अन्नका सानेवाला (चमकती हुई भूखवाला, स्वस्य, नीरोग ) होता है, सारी आयु को पहुंचता है। उज्वल जीता है, महान होता है प्रजा से और पशुओं से और महान् कीर्ति से (इस उपासना का यह ) नत है, कि वह आग्न के अभिमुख न आचमन करे, न थूके ॥ २॥ तेरहवां गण्ड उपमन्त्रयते, स हिंकारः; ज्ञपयते स प्रस्तावः; स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः, प्रतिस्त्री सहशेते,स प्रति हारः, कालं गच्छति तन्निधनम् , पारं गन्यति तनि- धनम् । एतद् वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥१॥ स य एवमेतद् वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद, मिथुनी भवति, मिथुनान्मिथुनात् प्रजायते, सर्व मायुरेति, ज्योग्जीवति, महान् प्रजया पशुभिर्भवाते महान् कीर्त्या, न काञ्चन परिहरेत तद् व्रतम् ॥ २ ॥ . त्यन्तर माम अग्मि मन्थन करने में प्रयोगपिपा जाता। + प्रशापर्वम, जो तप और म्याध्याय में घर पर मंत्र धमपता थिळाड़ियों के मोर पर निकरना या प्रतीत होता है।

. [ ७६ ] छान्दोग्य उपनिषद् । * । वामदेव्य साम मिथुन (जोड़े) में मोया हुआ हे ॥१॥ - वह जो इस प्रकार इम वामदेव्य को मिथुन में प्रोया हुभा जानता है, वह मिथुनी । होता है ( जोड़ेवाला होता है, विरह के दुःखका भागी नही होता) मिथुन मे प्रजावाला होता है ( अमोध वीर्य होता है ) सारी आयु को पहुंचता है, उज्ज्वल जीना जीता है, महान होता है मजा से और पशुओ से । और महान् कीर्ति से। इस उपासना का यह प्रत है । किसी को न त्यागे ॥२॥ चौदहवां खण्ड उद्यन हिंकार, उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उदीयो, ऽपराहणः प्रतिहारोऽस्तं यनिधनम् । एतबृहदादित्ये प्रोतम् । १। स य एवमेतद्वृहदादित्ये प्रोतं वेद, तेजस्व्यन्नादो भवति, सर्वमायुरेति, ज्योग्जीवति, महान् प्रजया-प- शुभिर्भवति,महान कीा।तपन्तंननिन्देत् तदव्रतम् २१. , “यह गर्भाधान कर्म सम्बन्धी वचन है इनकी व्याख्या सरल संस्कृत में करदेते हैं। उपमन्नयते, सकेतं करोति, सहिद्वार., शपयते तोपयति स प्रस्ताव.। स्त्रिया सह शयन, एकपर्य गमनम, उद्गीथा, फालं गच्छति मैथुनेन, पारं ममाप्तिं गच्छति, तन्निधनम् ॥ वायु जल के जोड़े के सम्बन्ध से वामदेव्य साम की उत्पत्ति कही गई है (शकरावार्य), #फिमी (स्त्री) को नहीं त्यागे-अपनी स्त्रियों में से किसी का त्यागर्ने करे (आनन्द तीर्य)। पर यह अधिक सम्भव है, कि जो उसे पहले वरना चाहे, उसमें सौन्दर्य आदि किसी बात की त्रुटि देखकर उसका त्याग न करें। यह स्त्री जाति को सम्मानना का प्रत है। . ।

-
मपाठक २. खण्ड १५॥ [७]
* उदय होता हुआ [ सूर्य] हिङ्कार है, उदय होचुका हुआ
प्रस्ताव है, दुपहर के समय वह उद्गीय है, पिछले पहर वह मतिहार है,
अस्त होता हुआ निधन है । यह बृहत् साममूर्य में प्रोयाहुआ है १॥
वह जो इस प्रकार इस बृहत् को सूर्य में प्रोया हुआ जानता
है, वह.तेजस्वी में होता है, अन्न खाने के योग्य हद होता है,
- सारी आयु को पहुंचता है, उज्वल जीता है, महान होता है प्रजा
से और पशुओं से, महान् कीर्ति से। इसका यह व्रत है । 'तपते हुए
[ गर्मी पहुंचाते हुए सूर्य] की कभी निन्दा न करे' । २ ।
पन्द्रहां खण्ड।
-अभ्राणि-सम्प्लवन्ते, स हिकार; मेघो जायते, स
प्रस्तावः; वर्पति स उद्गीथः; विद्योतते स्तनयति स
प्रतिहारः; उदगृह्णाति, तन्निधनम् । एतदरूपं पर्जन्ये
प्रोतम् ।।
स य एवमेतदैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद, विरूपा ५ श्च
सुरूपा ५ श्च पशूनवरुन्धे, सर्वमायुरेति, ज्योग्जीवति,
-महान् प्रजया पशुभिर्भवति, महान् कीर्त्या । वर्पन्तं न
निन्देत, तव्रतम् । २
जो धुंध इकही होती है, यह हिङ्कार है। मेय यनता है. यह
प्रस्ताव है; वरसता है, यह उट्ठीय है, चमकता है गर्नता है, यह
.
*मिलामो अथव ९५४में
पहन का देयता सूर्य है (शंकराचार्य)
+ जिसकी भोर आय उठामर न देससकें।
मिलामो मध ११५।६-७ मे।

. [७८ ] । छान्दोग्य उपनिषदः । प्रतिहार है बन्द होता है, यह निधन है; यह वैरूपसाम पर्जन्य [ मेघ ] में प्रोया हुआ है।। बह जो इस प्रकार इस वैरूप साम को पर्जन्य में प्रोया हुआ । जानता है, वह सब प्रकार के [विरूप, मुरूप] पशुओं को प्राप्त होता है, सारी आयु को पहुंचता है, उज्वल जीता है, महान् होता है प्रजा से, और पशुओं मे, और महान् कीति से । इसका व्रत यह है 'बरसते हुए की कभी निन्दा न करे।। सोलहषां खण्ड वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् । एतद् वैराजमृतुषु प्रोतम् ॥ १॥ स य एव मेतद् वैराजमृतुषु प्रोतं वेद, विराजति प्रजया पशुभिब्रह्मवर्चसेन, सर्वमायुरेति, ज्योग जीवति, महान् प्रजया पशुभिर्भवति, महान की] । ऋतून न 'निन्देत, तद् व्रतम् ॥२॥ वसन्त हिङ्कार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, घरसात उदीय है, शरद प्रतिहार है, हेमन्त निधन है । यह वैराज साम ऋतुओं में मोया वह जो इस प्रकार इस वैराज साम को ऋतुओं म मोया हुआ जानता है, वह प्रजा से, पशुओं से और ब्रह्मवर्चस से चमकता है (विराजति)*पूर्ण आयु को पहुंचता है, उज्वल जीता है, महान होता - - 4 हुआ है ॥१॥ * जैसे ऋतु अपने र धमों से चमकते हैं। विराजतिस फल के सम्बन्ध से वैराजनाम है। .

मपाठक २. खण्ड १७! [७९] है मनासे और पशुओं से और महान् कीर्ति से । इसका यह व्रत है 'ऋतुओं की कभी निन्दा न करे ॥२॥ सत्तरहयां खण्ड पृथिवी हिड्वकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनम् । एताः शकयों लोकेषु प्रोताः॥१॥ स य एवमेताः शकयों लोकेषु प्रोता वेद, लोकी भवति, सर्वमायुरेति, ज्योग् जीवति, महान पूजया पशुभिर्भवति, महान् कीर्त्या । लोकान् न निन्देत्, तब्रतम् ॥२॥ पृथिवी हिङ्कार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, धौ उदीय है, दिशाए मतिहार है, समुद्र निधन है । यह शरुरी * साम लोकों में प्रोए वह जो इस प्रकार इन शहरियों को लोगों में मोया हुमा जानता है, वह लोकों का मालिक होता है, पूर्ण आयु से पहुचता "है, महान होता है, मना से और पशुओं मे,और महान् कीर्ति मे। और इस का मत यह है ' लोगों की कमी निन्दा न करे। * 'शाय' यह एक ही साम फा नाम है। पर यह नित्या पचन रहता है, ऐसही मागे 'रयत्य' यह पायाचन भी है। +शरी माम महानाम्नी श्यामों में गाए जाते हैं। और उन वाभों का सम्माघ'जल महामानी है'म मेरो माय बतलाया है । मौर र जगेमहार:' पद धुनि दाम सम्बाध से शारी माम लोगों में प्रतिष्ठित है (मानन गिरि) 1 ।

प्रतिहार । , . ॥ [८० ], छान्दोग्य उपनिषद् । अठारहवां वण्ड अजाहिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उदगीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषोनिधनम् । एतारेवत्यः पशुपुपोताः॥१॥ स य एवमेता रेवत्यः पशुपु प्रोता वेद, पशुमान भवति, सर्वमायुरेति, ज्योग जीवति, महान् पूजया पशुभिर्भवति, महान् कीर्त्या । पशून् न निन्देत, तद् ब्रितम् ॥ २॥ 1. बकरिये हिङ्कार है, भेड़ें प्रस्ताव है, : गाएं उद्गीय है,, घोड़े वह जो इस प्रकार इन रेवतियों को पशुओं में प्रोया हुआ जानता है, वह पशुओं में अमीर * होता है, पूर्ण आयु को पहुंचता है, उज्वल जीता है, महान होता है. प्रजा से और पशुओं से और महान् कीर्ति से । इसका व्रत यह है, कि पशुओं की कभी निन्दा न करे। ॥२॥ उन्नीसयां खण्ड लोम हिंकार स्त्वक् पूस्तावो मा ५ स मुद्गीथो- ऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनम् । एतद् यज्ञायज्ञिय मङ्गेषु प्रोतम् ॥ १॥ सं य एवमेतद् यज्ञायज्ञिय मङ्गेषु प्रोतं वेद, अङ्गी भवति, नाङ्गेन विहूति, सर्वमायुरेति, ज्योगजीवाते, *रेप.न.- अर्थ धनवान हैं। पशु रेवती है,यह श्रुति है (भानन्दगिरि) .

मपाठक २. खण्ड २०॥ [८]
महान पूजया पशुभिर्भवति, महान् कीर्त्या । संवत्सर
मजोनाश्नीयात, तद्वतम्, मजोनाश्नीयादिति वा॥२
लोम हिड्तार है, त्वचा (चमड़ा) प्रस्ताव है, मांस उद्गीय है,
अस्थि (हड्डी) प्रतिहार है, मजा (चर्स) निधन है । यह यज्ञाय-
झिय साम अंगों में प्रोया हुआ है ॥ १ ॥
वह जो इस प्रकार यज्ञायज्ञिय साम को अंगों में प्रोया हुभा
जानता है, वह दृढ अगों वाला होता है, किसी अंग से हीन वा
टेदा नहीं होता, पूर्ण आयु को पहुचता है, उज्जल जीता है, महान्
होता है प्रजा से पशुओं से । और महान् कीर्ति मे। इस का धन
यह है 'बरस भर मजा नखाए , या (मर्यदा) मन्नानखाए ॥२॥
यीसवां खण्ड
अग्नि हिड्कारो वायुः पूस्ताव आदित्य उद्गीथो
नक्षेत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनम् । एतद् राजनं दे-
वतासु प्रोतम् ॥ १॥
स य एव मेतद् राजनं देवतासु पोतं वेद, एता
सामेव देवताना ५ सार्टिता सायुज्यं गन्छति, सर्व
मायुरेति, ज्योग जीवति, महान् पूजया पशुभिर्भवति,
महान् कीर्त्या । ब्राह्मणान् न निन्देत् तद्वतम् ।।२।।
अग्नि हिंकार है. वायु प्रस्ताव है, सूर्य उगीय है, नार
प्रतिहार है, चन्द्रमा निधन है । यह राजन माम देवताओं में प्रोया
हुआ है ॥१॥

। , [२] छान्दोग्य उपनिफ्द् । वह जो इस राजन सामको देवताओं में प्रोया हुआ जामती, वह इन्हीं देवताओं की सलोकता, साहिता और सायुज्यको मात होता है, पूर्ण आयु को पहुंचता है, उज्वल जीता है, महान होता है मजा से और पशुओं से । और महान् कीर्ति मे। इसका व्रत यह है , 'ब्राह्मणों की निन्दा न करे ॥२॥ इक्कीसवां खण्ड त्रयी विद्या हिङ्कारः, त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावः, अग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथः, नक्षत्राणि वया ५ सि- मरीचयः स प्रतिहारः, सर्पगन्धर्वाः पितरस्तनिधनम् । एतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतम् ॥ १॥ स य एवमेतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतं वेद, सर्व ५ ह भवति । २॥ तदेषश्लोकः-'यानि पञ्चधा त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । ३। यस्तदेद स वेद सर्व सर्वा दिशो वलि मस्मै हरन्ति। सर्वमस्मीत्युपासीत, तद्वतं तद्वतम् । ४ । यी विद्या [ ऋचा, यजु और साम की विद्या ] हिकार है, तीनों लोक [पृथिवी, अन्तरिक्ष और घौ] प्रस्ताव है, अग्नेि वायु और सूर्य [तीन देवता] उहीय है, नक्षत्र, पक्षी और किरणें * समान लोक में होना.समान शक्तिवाला होना और एकता । अर्थात् उसफा लोक दुख और अविद्या से रहित, शक्ति अप्रतिहत (जिसके लिये कोई रोक नहीं) और स्वभाव परोपकारपरायण होजाता है।

पंपाठक २, खण्ड २२ [३]
प्रतिहार है, सर्प गन्धर्व और पितर निधन हैं। यह साम* हर
एक वस्तु में प्रोया हुआ है ।
वह
जो इस साम को हर एक वस्तु में मोया हुआ जानता है,
बह सब कुछ होता है।।
इस पर यह श्लोक है । जो पाच मकार के तीन + है, उनसे
बड़कर और कुछ नहीं है । ३ ।
जो उसको जानता है, वह सब कुछ जानता है। सारी दिशाएं
उस [उपासक] के लिये चलि लाती है । वह ऐसा ध्यान करे 'मै
सब कुछ है' यह उसको प्रत है यह उसका व्रत है ।। ४ ।
पाईसयां लण्ड।
विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यमेरुद् गीथः, अनि
रुक्तः प्रजापतेः, निरुक्तः सोमस्य, मृदु श्लक्ष्णं घायोः,
लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य, क्रौञ्चं बृहस्पतेः, अपवान्तं
वरुणस्य । तान् सर्वानेवोपसेवेत, वारुणं वेव वर्जयेत् ।
साम का [साण्डकी गर्न की तरह] गम्भीर स्वर से गाना
पशुओं के लिये भला है, मै उसे पसन्द करता । ऐसा उगीय
* यहां कोई गायत्रआदि नाम विशेष नहीं रिया, इस लिये साम
शम्द साममात्र का योधक है। अर्थात् हिङ्कार भादि साम मत्तिपोका
प्रयायिधा आदि की दृष्टि मे उपासना चाहिये । भोर पिछली सामी-
पासनाओं में भी जिन २ में जोर साम मोया हुगा पठलाया है, उसर
साम को उनकी इटि से उपासना चाहिये । (शंकराचार्य)
सम्र का माटिक होता है। (शकराचार्य)
प्रयी विद्या सीन लोफ हत्यादि जो तीन र हिकार मादिकंडप
यहां साम की उपासनामों की समाप्ति है।
में मतलाप गए है।

'[४
८४ ] छान्दोग्य उपनिषद् ।
[साम का गान] अग्नि का है, * अनिरुक्त | प्रजापति का है,
निरुक्त सोम का है, नर्म और साफ [चिकना ] वायु का है, साफ
और वल वाला इन्द्र का है, कुंज के सदृश वृहस्पति का है । फूटा
हुआ [ फूटे हुए भाडे के सदृश, या घां] वरुण का है । इन सब
पर अभ्यास करे केवल वरुण मम्बन्धी को छोड देवे ।।
अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् । स्वधां
पितृभ्यः, आशां मनुष्येभ्यः । तृणोदकं पशुभ्यः, स्वर्ग
लोकं यजमानाय ।अन्नमात्मने, आगायानीति एतानि
मनसाध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत । २।
$ (उद्गाता को) इस बुद्धि से गाना चाहिये II,' कि 'मैं
अमृत देवताओं के लिये गाउं (अपने गाने मे सम्पादन कर)
स्वधा पितरों के लिये । आशा मनुष्यों के लिये । तृण
। (चारह) औरपानी पशुओं के लिये। स्वर्गलोक यजमान के लिये,
th
* उसफा देयता अग्नि है।
है जो निखरकर अर्थात दूसरों से अलग करके अपने निजरूप
मे यतलाया जासक्ता है, यह निरुक्क, जो इस तरह निखरा नहीं जा
सका, यह अनिरुक्त है।
यहां यह मिन२ स्वर गिनाए है, जो साममन्त्रों के गाने में
प्रयुक्त होते हैं । उनके नाम यह है । विनाद, अनिरक्त, निरुक्त,
दरहण, इलश्ण घरवत्, प्राञ्च, अपभ्यान्त ।
गाने के समय ध्यान करने योग्य विषय को कहते है।
॥ इत्यागायत्' इस धुरि से गाना चाहिये' यह पाठ शंकरा.
चाय की घ्याल्या में नहीं लिया गया, और इसके छोड देने में कोई
टिभी नहीं है।

मपाठक २. खण्ड २२। [ ८५ ] और अन्न अपने लिये गाउं । इस प्रकार वह (उदाता) इनको मन से ध्यान करता हुआ अप्रमत्त होकर (उच्चारण आदि में कोई अशुद्धि न करता हुआ ) स्तुति करे ।। सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मानः, सर्व ऊष्माणः प्रजापतेरा- मानः,सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानः।तं यदि खरेपूपालभेत, 'इन्द्र शरणं प्रपन्नोऽभूवं, स त्वा प्रतिवक्ष्यती' त्येनं- यात् । ३। अथ यद्येन मृप्मसूपालभेत, 'प्रजापति ५ शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिपक्ष्यती' त्येनं ब्रूयाद् । अथ यद्येन ५ स्पर्श पालभेत मृत्यु ५ शरणं प्रपन्नोऽभूवं, स वा प्रतिधक्ष्यती' त्येनं घूयात् ॥४॥ सर्वे स्वरा घोवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रेवलं ददानीति । सर्व ऊप्माणोऽयस्ता निरस्ता विवृता वक्तव्याः। प्रजापतेरात्मानं परिददानीति । सर्व स्पर्शा लेशेनानभिनिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परि हराणीति ॥ ५॥ * सारे स्वर इन्द्र का शरीर हैं, मारे ऊपम मजापति का शरीर हैं, सारे स्पर्श मृत्यु का शरीर हैं। सो यदि कोई पुरुष उमे * साम की भिन्न २ ध्यनियों के देवता पह फर अय अक्ष के देवतो कहते है ! स्थर-अ भा र उ ल ए ऐ मी भी। ऊम-दापसहास्पर्श-फरा ग घ च छ ज झ ट ठ १८ ६धनपफयभामा [८६] छान्दोग्य उपनिषद्। स्वरों में उलहना दे * तो वह उसे कहे ' मैं इन्द्र की शरण पड़ा था (स्वरों का उच्चारण करता हुआ) वही (तुझे) उलटा कहेगा ॥३॥ और यदि कोई इसे ऊपमों में उलहना दे, तो वह उसे को 'मैं मनापति की शरण पड़ा था, (ऊप्म का उच्चारण करता हुआ) वह तुझे उलटा पीसेगा' और यदि कोई इसे स्पशों में उलहना दे, तो वह उसे कहे 'मैं मृत्यु की शरण पड़ा था, (स्पर्शों का उच्चारण करता हुआ) वह तुझे उलटा भस्म करेगा॥४॥ + सारे स्वर भरी हुई ध्वनि से और वल से उचारने चाहिये, इस तरह उद्गाता इन्द्र में वल दे देता है , सारे ऊष्म न असे हुए न फैंके हुए किन्तु सुले हुए उचारने चाहिये, इस तरह उदाता प्रजापति को अपना आप समर्पण करता है। सारे स्पर्श धीरे २ एक दूसरे में न मिलाए हुए उचारने चाहिए, इस तरह उद्गाता ( सन्तुष्ट हुए ) मृत्यु से अपने आपको बचा लेता है ॥५॥ * कि तू ने अमुक स्वर ठीक नहीं उचारा है। | अर्थात् में स्वरों का प्रयोगकरता हुआ,स्वरों के अधिष्ठाता इन्द्र की शरण में पहुंचा हुआ था, तुम मेरे ऊपर आक्षेप करते हो, तुम्हारे ऊपर उस देयता से आक्षेप होगा। अभिप्राय यह है जो अपने इष्टदेव की मक्ति में उसके साथ एक हो रहा है, ईर्षा के यश हो कर उसका अनिष्ट चाहना उलटा अपने ऊपर पड़ता है । इसलिये यहां तीनों जगह प्रति शब्द का प्रयोग है। प्रति वक्ष्यति, उलटा कहेगा या उत्तर देगा, प्रति पेश्यति, उलटा पीसेगा, प्रतिधक्ष्यति, उलटा जलाएगा। यह उनको नाड़ना दी गई है, जिनका सारा घमण्ड उच्चारणपर है, और परमात्मा मेको मति नहीं॥ + अक्षरों का उच्चारण भी ठीक होना चाहिये, इसके लिये शिक्षा देते हैं। इअक्षराध-स बुद्धि से, कि मै इन्द्र में बल।

प्रपाठक २ खण्ड २३ [८७] तईसयांखण्ड त्रयो धर्मस्कन्धाः। यज्ञोऽध्ययनंदानामितिप्रथमः ।। तपएव द्वितीयः, ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयो ऽत्यन्त मात्मानमाचार्यकुले वसादयन् । सर्व एते पुण्य- लोका भवन्ति, ब्रह्म स ५ स्थोऽमृतत्वमेति । २ । प्रजापतिलोकानभ्यतपत् । तेभ्योऽभितप्तभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् । तामभ्यतपत, अस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्पासवन्त भूर्भुवः स्वरिति ।। ३ ।। तान्यभ्यतपत, तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओंकारः सम्पा- स्रवत् । तद्यथा शंकुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृष्णानि, एव मोंकारण सर्वावाक् सन्तृष्णा । ओंकारए वेद ५ सर्वम्, ओंकार एवंदे १ सर्वम् । ४ । धर्म के तीन स्कन्ध (बड़े डाल) हैं। या करना, पढ़ना ( स्वाध्याय ), और दान देना यह पहला (स्कन्य)* है॥॥ तप ही दमरा है, ब्रह्मचारी बन कर अपने आप को मदा तपस्पा से क्षीण करते हुए आचार्य के घर रहना तीमरा है। यह * पहला, तीनों में से एक। क्योंकि धर्म गृहम्प ६. मार गृहस्थ प्राधमों में भरा है, न कि पहला ॥ सप, धानप्रस्थ का धर्म है, मदा गुरु को घर में रहते हुए से अपने भाप को क्षीण करना यह नैष्ठिका प्राचार्गपा धर्म मचारी दो प्रकार के हैं। उपकुर्याणक भार मैटिकाउपर्याणरा मय पर ब्रह्मचर्य को ममाम पर गुग्दाक्षिणापर गृहस्य में पेश करते है और मैटिक जो सारी भायु प्रमचर्य में शिनात - [८८] छान्दोग्य उपनिषद् । सारे (धर्मी)पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं; हां ब्रह्म संस्थ * ( ब्रह्म में दृढ निष्ठा वाला ) अमृत को प्राप्त होता है ॥२॥ प्रजापति ने लोकों को तपाया । जब वह तपे तो उन मे त्रयी विद्या चूकर वही । उमने फिर उम (त्रयी विद्या):को तपाया, तो उस से तीन अक्षर चूकर बहे, भूः, भुवः, स्वः ॥३॥ उमने फिर उनको तपाया, जब वह तपे, तो उन मे ओंकार चूकर वहा । जैसाकि नाल से सारे पत्तै छिद्रे हुए हैं (नाल मारे पत्तों के अन्दर से हो कर गई है ), इसी प्रकार ओंकार से मारीवाणी छिदी हुई है।ओंकार ही यह सब कुछ है, हां ओंकार ही यह सब कुछ है॥४॥ चौबीसवां खण्ड ब्रह्मवादिनो वदन्ति यवसूनां प्रातः सवनं ५ रुद्राणां माध्यन्दिन ५ सवनम्, आदित्यानां च विश्वे- पाञ्च देवानां तृतीय ५ सवनम् ॥१॥ -- * ब्रह्मसंस्थ से यहां चतुर्थाथमी संन्यासी अभिप्रेत है। ब्रम- संस्थ, ब्रह्म में रद निष्ठा वाला । ब्रह्म से यहां ओंकार अभिप्रेत है, जैसा कि उसी को आगे सब की निचोड यतलाया है। पहले तीनों आश्रमी जिन वैदिक कमों में रत हैं, जिनका कि फल पुण्यलोक हैं, संन्यासी उन फमा से ऊपर हो कर मारे वेदों के मार ऑकार में निष्ठा वाला हो कर अमृतत्त्व को पा लेता है। है यहां तपाने में दो अभिप्रायह, एफ तो उसे किमी द्रव्य को तपाने में उस में से मार च पड़ता है, इस तरह इन लोकों में से या विद्या मार है, उसका सार भूभुवःस्य. और इनका मार ओम ६। दूसरा, जय कोई पस्नु तपती है, तो वह चमक उठती है, प्रदीप हो जाती है। इस प्रकार प्रजापति के लिये तीनों लोक प्रदीम हुए. इन लोकों में कोई यात उसके लिये छिपी नहीं रही, उमने इनको मर्षांश में देना, और ममें मप्रयोविद्यापीमार केतार पर निकाला। - ३ , मपाकट खण्ड २४ । [८९] क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति । स यस्तं न विद्यात्, कथं कुर्यात्, अथ विद्वान् कुर्यात् ॥ २ ॥ पुरापातरनुवाकस्योपाकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्यो दङ्मुख उपविश्य स वासव १ समाभि गायति ॥ *लो ३ क द्वारमवापाणु ३३ पश्येम वा वयं ५ रा ३३३६ हुं ३ आ ३३ ज्या३ यो ३ आ ३२१४ 'इति ॥४॥ अथ जुहोति 'नमोऽनये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्देप वे यजमानस्य लोक एतास्मि ॥५॥ अत्र यजमानः परस्तादायुपः स्वाहा । अपजहि परिघम, इत्युक्त्वोत्तिष्ठति । तस्य वसवः प्रातःसवन ५संप्रयच्छन्ति ॥ ६॥ ब्रामवादी (वेद के उपदेष्टा ) कहते है, कि मातःसवन तो सुओ का है, माध्यन्दिनमवन न्द्रों का है और तृतीयमवन गादित्यों का और विश्वेदेवों का है । ॥॥ * मन्त्र के अक्षर यह है 'लोपद्वारमपाणु, पश्येम त्या ययं राज्याय' ये प्रवाफ में राज्याय' १३ये प्रयाक में 'स्वाराज्याय,भीर, साम्राज्याय' इन अन्त पदों के सिवाय सार मन्त्र यही है। । तीन यार सामकारम निचोडा जाता है, और उसकी आइति दीजाती है, प्रात., मध्यन्दिन(दुपहर)और रायपाल । इन तीनों को क्रमशः प्रातःमवन, माध्यन्दिनमयन और तृतीयमयन पहते है। पीनों सपनों के देवता यमु, रुद्र और मादित्य है. भार एन्द-गापत्री, प्रष्टुप मा जगती है। P4 .

[९.] छान्दोग्य उपनिपद् । तो अब यजमान का लोक कहां * है ! वह जो उस (लोक) को नहीं जानता, वह (यज्ञ को) कैसे कर सक्ता है ? हां यदि वह जानता है, तो करसक्ता है ॥२॥ मातरनुवाका के प्रारम्भ से पहले यजमान गार्हपत्य अनि के पीछे उत्तराभिमुख बैठ कर वसुओं का सामगाता है, लोक (पृथिवी) - के द्वार को खोलदे, हम तुझे (पृथिवी पर ) राज्य करने के लिये देखें ॥४॥ तब यजमान होम करता है [यह कहते हुए] नमस्कारहो अनि को. जो पृथिवी में रहता है, जो लोक में रहता है, [इस ] लोक को मुझ यजमान के लिये लाभ कर यह यजमान का लोक है।५। मैं जो यजमान हूं, यहां आने वाला हूं, जूही यह आयु ममाप्त होती है। स्वाहा ! [ कहता हुआ आहुति देता है । को परे हटा दे, । यह कहकर वह उठ खड़ा होता ह । उस [यजमान] के लिये यमु मातःसवनदे देते हैं।१। - अगल . * प्रान सपन के मालिक जो चमु है, पृथिवीलोक उनके वश मेंह, अन्तरिक्ष रुद्रों के भार पी भादित्यों और विश्वेदेषों के । अब यजमान के लिये कोई लोक रहा नहीं, जिसको वह यह से जीत भार लोकाय य यजते यो यजते' लोक के विजय के लिये यह यह घरता है,जो कार यज्ञ करताहै,यह श्रुति है।इसलिये यह मान होना चाहिये कि इस उपाय मे यजमान इन लोगों को जीतता है (शंकराचार्य) अचानों का ममुदाय जो गाया नहीं जाता, उसे शस्त्र पहन है, जो शस्त्र प्रात. काल पढ़ा जाता है, उसे प्रातरनुवाक कहत है। लोक के द्वार का अगंल । अर्गल-अरल, होड़ा, पटकनी । यह लकड़ी जो भार को खुलने नहीं देती । यहाँ लोक मे पृथिवीलोक अभिप्रेत है । और माध्यन्दिनसयन में लोक मे अन्तरिक्ष लोक भोर- हनीय मयन में लोक मेपालीक मभिप्रेत है। 1

प्रपाठक २ खण्ड २४
[११]
पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाजघनेनामी
धीयस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्र ५सामाभिगायति
लो३ क द्वारमपावा ३" ३३ पश्येम त्वा वयं वैरा
३३३३३ हुं ३ आ ३ ३ ज्या३यो ३ आ ३२११ इतिचा
अथजुहोति-नमो वायवे ऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते
लोकं मे यजमानाय विन्देपवैयजमानस्यलोक एतास्मि।
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहा 'अपजहि
परिघम्' इत्युक्त्वोत्तिष्ठति । तस्मै रुदा माध्यन्दिन ५
सवन सम्प्रयच्छन्ति । १० ।
माध्यन्दिन सवन के प्रारम्भ से पहले यजमान आमीधीय
अग्नि के पीछे बैठकर रुद्रों के साम को गाता है । ७ ।
लोक [अन्तरिक्ष ] के द्वार को खोल दे. हम (अन्तरिक्ष में)
फैले हुए राज्य को पाने के लिये तुझे देखें । ८ ।
तब वह होम करता है (यह कहते हुए) नमस्कार हो वायु
को, जो अन्तारक्ष में रहता है, जो लोक में रहता है, इस लोक
(अन्तरिक्ष) को मुझ यजमान के लिये लाम कर। यह यजमान
का लोक ।।
मै जो यनमान है, यहां आने वाला, ही यह आयु ममाप्त
होती है । स्वाहा । अर्गल को परे हटा दे। उसके लिपट माध्य.
न्दिन सबन दे देते हैं।।
पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाजघनेनाहवनीयस्यो

[ ९२ ] छान्दोग्य उपनिपद्। दङ्मुख उपविश्य स आदित्य ५ सवैश्वदेव ५सामाभि- गायति । ११ । लोश्क द्वार मपावाणू ३३ पश्येमत्वा वय ५ स्वारा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३ यो : आ ३ २१११ ॥ १२ ॥ आदित्यम् । अथ वैश्वदेवम् । लो ३क द्वारमपावा ३' ३३ पश्येम त्वा वय ५ साम्रा ३३३३३ हुँ ३३ ज्या ३यो ३ आ ३ २१११ इति । १३ । अथजुहोति-नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवे- भ्यो दिविक्षिद्धयो लोकक्षिद्धयो लोकं मे यजमानाय विन्दत । १४ । एप वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः पर- स्तादायुपः स्वाहा ऽपहत परिघम्' इत्युक्त्वोत्तिष्ठति १५॥ तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवा स्तृतीय सवन ५ सम्प्रयच्छन्ति । एप हवे यज्ञस्य मात्रां वेद, य एवं वेद य एवं वेद । १६ । तृतीयसवन के मारम्भ मे पहले यजमान आहवनीय अग्नि के पीछे उत्तराभिमुख बैठकर आदियों का और विश्वेदेवों का साम गाता है ।। लोक (घी) के द्वार को खोलदे । हम तुझे स्वाराज्य (सबसे ऊंचे राज्य स्वर्ग के राज्य) के लिये देखें। यह आदिसों का (साम) है । १२- - --

प्रपाठक ३ खण्ड १ [९३ ]
अगला विश्वेदेवों का है 'लोक (यौ) के द्वार को खोलदे,
हम तुझे साम्राज्य के लिये देखें।।
तब वह होम करता है (यह कहते हुए) नमस्कार हो आदिसों
को और विश्वेदेवों को, जो द्यौ में रहते हैं, लोक में रहते हैं। इस
लोक (यौ) को मुझ यजमान के लिये लाभ करो । १४ ।
यह यजमान का लोक है । मैं जो यजमान हूं यहां आने वाला
हूं, मुंही कि यह आयु समाप्त होती है। स्वाहा । अर्गन को परे
हटा दो। वह कहकर वह उठ खड़ा होता है । १० ।
उसको आदिस और विधेदेय तृतीयमान दे देते हैं. यह है
जो यज्ञ के परिमाण ( यथार्थता) को जानता है, जो इस रहस्य
को समझता है. हां जो इस रहस्य को मममता है । १६ ।
30302030200
तीसरा प्रपाठक *
पहला गण्ड
ॐ असो वाआदित्यो देवमधु । तस्य द्योरेख तिरची
नव ५ शो ऽन्तरिक्ष मतपो मरीचयः पुत्राः ।। तस्य ये
प्राचो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्योमधुनाइयः । अत्र एवं
'मधुकृतः । ऋग्वेद एव पुप्पम् । ता अमृता आपः।
ता वा एता कचः ॥ २॥ एतमृग्वेद मभ्यतप ५
स्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्य मन्नाद्य र
*पमा (यतों) के भगा (उहोश भादि)मे मम्गार रने
पाने विज्ञान को ममान परपं. मार पमा पा पाल मा भाविप
उमपी स्वतन्त्र उपासना पलिय गया प्रपादय माम्भ पलं।

[ ९४ ] छान्दोग्य उपनिषद् "स्सोऽजायत ॥३॥ तद्व्यक्षरत् तदादित्य मभितोऽ- श्रयत् । तदा एतद् यदेतदादित्यस्य रोहित ५ रूपम् ।। वह (यो में स्थित ) सूर्य देवताओं का मधु (शहद) है। छौ उस (मधु ) का तिरछा वास है, अन्तरिक्ष छत्ता है, किरणे (कि- रणों में स्थित पानी, पानी की माप) (मरिखयों के) बच्चे हैं । उस (सूर्य) की जो पूर्व की किरणें हैं, वही इसकी पूर्व की मधु की नालियां हैं। ऋचा ही मक्खियां हैं। ऋग्वेद (से विहित कर्म) फल है। पानी (मोम, आज्य और दूध की जो आहुति दी जाती है, वर पानी) (फल का) अमृत है । उन ऋचाओं ने (जो मविषयां है) ॥२॥ इस ऋग्वेद (विहित कर्म को जो फल है ) तपाया. जब वह तपा, तो उससे यश, तेज, इन्द्रिय वीर्य, और अन्नाय * (स्वास्थ्य), यह रस उत्पन्न हुए ॥ 3 ॥ वह (रस) वाहर झरने लगा, और उमने सूर्य का जा आश्रप लिया। और वह यह है, जो यह सूर्य का (उदय के समय) लाल पहै।४। केवल की अपने फल भोग के लिये चन्द्र लोक को प्राप्त होते हैं, औरजोसायही उपामक भी हैं, वह सूर्य लोक को।यही देवयान है जो इम गोत को प्राप्त हुए हैं, वह सब देवता है । मूर्य उन मक्के लिये मधु है आनन्द का हेतु है, क्योंकि वह सारे यहाँ का परमफल है । यो वह यांस है, जिस के साथ यह आइद का गना स्टक रहा है अन्तरिक्ष छत्ता है और उममें जो मुस्म पानी भरा हुआ है, यह मक्खियों के अंडे है । र्य की 1 मारा, माने की शनि, स्वास्थ्य दिनो३।११ प्रपाठक सण्ड। [4] किरणें उन अंडों के लिये घर हैं, ऋचाएं यह के पूरा करने में जो एक अंग है, वही यहां मधु मक्खियां हैं। वह फूल जिस में से यह मक्खियां अमृत चूसती हैं, वह यज्ञ (ऋग्वेद विहित होता का कर्म) है, और उस यज्ञ में जो कुछ होमा जाता है, वह इस फल का अमृत है, जिसको वह चूसती हैं। फूल जय मक्सियों से चूसा गया, तो उसमें से रसझरा । वह रस जो सारे मझों से सम्बन्ध रखता है, वह उस लोक वा मूर्य लोक में भोगा जाता है, इसलिये कहा गया है, कि उस रस ने सूर्य का जा आश्रय लिया। दूसराखण्ड अथ ये ऽस्यदक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाडयः। यजू ५ प्येव मधुकृतः। यजुर्वेद एवपुष्पं । ता अमृता आपः ॥१॥ तानि वा एतानि यजू ५ प्येतं यजुर्वेदमभ्यतप ५ स्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्य ५ रसोऽजायत ॥ २॥ तव्यस- रत, तदादित्यमभितोऽश्रयत् । तदा एतद् यदेतदा- दित्यस्य शुक्ल ५ रूपम् ॥ ३॥ और जो इमकी दक्षिण की किरणें है, वही इसकी दक्षिण की मधु की नालियां हैं। यजुर्मन्त्र ही मारेखयां । यजुर्वेद (विहित कर्म) ही पुष्प है। पानी (सोम रस आदि)ी (फल का) अमृत है॥१॥ उन यजुर्मन्त्रों [मविषपों ने इस यजुर्वेद चिहिन कर्म के फूल] को तपाया। जब वह सपा, वो उममे यश, हेन, इन्दिर, गीर्य और अमाप यह एम उत्तम हुआ।२।

-- [९६ ] छान्दोग्य उपनिषदू ।। वह (रस) वाहर झरने लगा, और उसने सूर्य का जा आश्रय लिया । वह यह है, जो यह सूर्य का शुक्ल [श्वेत) रूप है ।। ३ । तीसरा खण्ड अथयेऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ताएवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः। सामान्येव मधुकृतः । सामवेद एव पुष्पं । ता अमृता आपः ॥ १॥ तानि वा एतानि सामान्येत ५ सामवेदमभ्यतपन् । तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्य ५ रसोऽजायत ॥२॥ तंदू व्यक्षरत्, तदादित्य मभितोऽश्रयत् । तदा एतदू यदेतदादित्यस्य कृष्ण ५ रूपम् ॥ ३॥ और जो इसकी पाश्चमी किरणें है, वहीं इसकी पश्चिमी मधु की नालियां है । सामवेद (विहित कर्म) ही पुष्प है।। ( सोम- आदि ) जल ही इसका अमृत है ॥ १॥ इन साममन्त्रों (मक्खियों) ने इस यजुर्वेद (विहित कर्म ) को तपाया जब वह तपा, तो उम मे यश, तेज, इन्द्रिय, और अन्नाय रस उत्पन्न हुआ॥२॥ वह शरने लगा, और उसने मूर्य का ना आश्रय लिया । वह यह है, जो यह मूर्य का कालारूप है ॥ ३ ॥ " चाया राण्ड -- अथ येऽस्योदञ्चो रश्ममस्ता एवास्योदच्यो मधुनाड्यः । अथर्वाङ्गिरस एव मधुकृतः। इतिहास पुराणं पुप्पं । ता अमृता आपः ॥ १॥ ते वा एतेऽथ , प्रपाठक.खण्ड ५। [९] वाङ्गिरस एतदितिहासपुराण मभ्यतपन् । तस्याभि तप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्य मन्नाद्य ५ रसोऽजायत ॥ २॥ तद् व्यक्षरत, तदादित्यमभितोऽनयत् । तदा एतद, यदेतदादित्यस्य परः कृष्ण ५ रूपम् ॥३॥ और जो इसकी उत्तरी किरणें है, वह इसकी उत्तरी मधु की नालियां हैं । अथर्वाङ्गिरम् मन्त्र ही मक्खियां है । इतिहास पुराण* फूल हैं । (सोम आदि ) जल अमृत है ॥१॥ उन अथर्वाङ्गिरम् मन्त्रों ( मक्खियों) ने इम इतिहास पुराण को तपाया। जब वह तपा, तो उस से यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्य रस उत्पन्न हुआ ॥ वह झरने लगा, और उसने मूर्य का जा आश्रय लिया । वह यह है, जो सूर्य का अत्यन्त काला रूप है ॥ ३ ॥ पांचवां सण्ड अथ येऽस्योईवा रश्मयस्ता एवास्योद्ध्यामधुनाड्यः। गुह्या एवादेशा मधुकृतः । ब्रह्मैव पुष्पं । ता अमृता आपः॥१॥ ते वा एते गुह्या आदेशा एतद् ब्रह्माभ्यतपन्, तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्य मन्नाद्य ५ रसोऽजायत ॥ २॥ •* अपमेध में पारिप्लय रात्रियों में इतिहासपुरापया मुनना लिया है। यही यहां फल।

[१८] छान्दोग्य उपनिषद् । तद् व्यक्षरत्; तदादित्यमभितोऽश्रयत् । तदा एतद, यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥३॥ . ते वा एते रसाना रसाः,वेदा हि रसास्तेषा मेते रसाः। तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि, वेदाह्यमृता स्तेषा मेतान्यमृतानि । ४ । और जो इसकी ऊपर की किरणें हैं, वहीं इसकी ऊपर की मधु की नालियां है । गुह्य आदेश [गुप्त विधिय-लोक द्वारमपाणु, इत्यादि] ही मक्खियां हैं । ब्रह्म [ओम् ] ही पुष्प है। [सोम आदि ] जल ही अमृत है । । उन गुह्य आदेशों ने इस ब्रह्म (ओम) को तपाया । जब वह तपा, तो उससे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य, अन्नाद्य, यह रम उत्पन्न हुआ। २। वह झरने लगा, और उसने मूर्य का जा आश्रय लिया। वह गह है, जो यह सूर्य के मध्य में हि थरथराता सा दीखता है । ३।। यह [ सूर्य के रोहित आदि रूप] रसो के रस हैं। क्योंकि 'वेद रस हैं [ लोक में सार भूत वस्तु हैं ] और यह [ रोहित आदि कप] उनके (वेद विहित कर्मों के) रस हैं । और यह अमृतों के अमृत हैं । क्योंकि वेद अमृत है, और यह उनके अमृत हैं ॥ ४ ॥ . छटा खण्ड। तद् यत् प्रथमममृतं, तवसव उपजीवन्त्यमिना- मुखेन । न वे देवा अनन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति । १।

प्रपाठक ३. खण्ड ६॥ [ ९९ ]
त एतदेव रूपमभिसं विशन्त्येतस्माद्पादुद्यन्ति।२।
स य एतदेवामृतं वेद, वसूनामेवेको भूत्वाऽमिनैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति । स एतदेवरूपमभिसं
विशत्येतस्माद रूपादुदेति । ३ ।
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता, पश्चादस्तमेता, वसू
नामेव तावदाधिपत्य स्वाराज्यं पर्येता ।।
जो यह पहला अमृत है [ रोहितरूप] उमको वसु [प्रातः
सवन के अधिपति ] उपभोग करते हैं, जिन [चमुओं ] में अमि
प्रधान है। देवता न खाते हैं, न पीने हैं, किन्तु इम अमृत को
देखकर ही तृप्त होते हैं।
वह इमी रूप [रोहित रूप] में ही प्रवेश करते हैं, और हम
रूप से उदय होते हैं * [ फिर बाहर निकलते हैं ] ।2
वह जो इसी अमृन को जानता है, यह वसुओं में से ही एक
बनकर, अग्नि की प्रधानता से [में ही इमी अमृत को देवार
नृप्त होता है, वह इसी रूप में प्रवेश करता है, और इस कप मे फिर
उदय होता है।३।
जितनी देर मूर्य पूर्व में उदय होता है. और पश्चिम में अस्त
होता है, उतनी देर तक वह वसुओं के स्वतन्त्र राज्य को लाभ
करता है ।
* जय तक उनके भोग का अवसर नहीं आता, नयनका पद उम
कप में लीन रहते हैं, और जब उनके भोग का अयमरभाता है, सायद
इसरूप में उदय होते हैं अर्थात् उस्माह यादे होते हैं (शंकराचार्य)
* भक्षरार्थ-आधिपत्य स्याराज्य फी घेरता है। अर्थात् उमप्रभुना
.को अपने वश में करता है, जिमपर अपना स्वतन्त्र राज्य है।

म
[१०] छान्दोग्य उपनिषद् ।
सातवां खण्ड ।
अथ यद् द्वितीयममृतं, तद् रुदा उदजीवन्तीन्द्रेण
मुखेन । न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं
दृष्ट्वा तृप्यन्ति । १।
तएतदेव रूपमभिसंविशंन्त्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति।।
स य एतदेवममृतं वेद, रुदाणामेवैकोभूत्वेन्द्रेणैव
मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति । स एतदेवरूपमभि
संविशत्येतस्माद्पादुदेति । ३ ।
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता,
दिस्तावद् दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता, रुद्राणामेव
तावदाधिपत्य स्वाराज्यं पयेंता। ४ ।
अव जो दुमरा अमृत है, उसको रुद्र उपभोग करते हैं, जिन
में इन्द्र प्रधान है । देवता न खाते हैं, न पीते है, किन्तु इस अमृत
को देखकर ही तृप्त होते है ।।
वह इमी रूपमें मवेश करते है, और इमरूपमे उदय होते हैं ।
वह जो इस मकार इम अमृत को जानता है, वह रुद्रों में से
ही एक होकर इन्द्र की प्रधानता मे ही इमी अमृत को देखकर तृप्त
होता है, वह इमी रूप में प्रवेश करता है, और इम रूप मे उदय
होता है।३।
जितनी देर तक मूर्य पूर्व मे उदय होकर पश्चिम में अस्त
होता है, उसमे दुगना काल दक्षिण से उदय होता है और उत्तर में
अम्त होता है, उतनी देर तर वह न्द्रों के स्वतन्त्र राज्य को लाभ
.

भपाठक ३. खपहा [१०१ ] आठवां सण्ड। . अथ यत् तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरु- णेन मुखेन । न वै देवा अनन्ति न पिवन्त्येत देवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति । १।। त एतदेवरूपमभिसंविशन्येतस्माद रूपादुद्यन्ति । २ । स य एतदेवममृतं वेद, आदित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनेतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति । स एतदेव रूपमभिसंविशयेतस्माद् रूपादुदेति । ३ । स यावदादित्यो दक्षिणंत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता, दि. स्तावत् पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता, ऽदित्यानामेव ता- वदाधिपत्य ५ स्वाराज्यं पाता । ४ । और जो तीसरा अमृत है, उमे आदिस उपभोग करते हैं, जिन में वरुण प्रधान है । देवता न साते हैं, न पीने हैं, किन्तु इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं। १। वह इसी रूपमें प्रवेश करतेहैं और इसम्पमे उदय होते है॥२॥ यह जो इस प्रकार इम अमृत को जानता है, यह आदित्यों में से एक हो कर वरुण की ही प्रधानता से इमी अमृत को देस कर तृप्त होता है। वह इमी रूप में प्रवेश करता है, और इस रूप से उदय होता है ॥ ३॥ सो जितनी देर तक मूर्य दक्षिण से उदय होता है और उत्तर में अस्त होता है। उसमे दुगना काल पश्चिम में और पूर्व में अस्त होता है, उतनी देर तक वह राग्य को लाम करता है॥४॥ . 4 -- 1 [१०२] "छान्दोग्य उपनिषद् । नावां खण्ड अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मस्त उपजीवन्ति सो- 'मेन मुखेन । न वै देवा अनान्ति न पिबन्त्येतदेवा- मृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १॥ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादु द्यन्ति ॥ २॥ स य एतदेवममृतं वेद, मरुतामेवैकोभृत्वा सोमेनेव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति । स एत- देव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥ स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता, द्विस्ताव दुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुता मेव तावदा- धिपत्य ५ स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ और जो चौथा अमृत है, उसे मरुत् उपभोग करते हैं, जिन में सोम मधान है । देवता न पाते हैं, न पीते हैं, किन्तु इस अमृत को देख कर ही तृप्त होते हैं।॥१॥ वह इसी रूप में प्रवेश करते हैं, और इस रूप से उदय होते हैं ॥२॥ वह जो इस प्रकार इस अमृत को जानता है, वह मरुतों में से ही एक पनकर सोम की ही प्रधानता से इसी अमृत को देख कर इस होता है । वह इसी रूप में प्रवेश करता है, और इम रूप मे उदय होता है ॥3॥ .

प्रपाठक ३ खण्ड १० [ १०३] सो जितनी देर तक सूर्य पश्चिम से उदय होता है, और पूर्व में अस्त होता है, उस से दुगना काल उत्तर से उदय होता है और दक्षिण में अस्त होता है, उतनी देर तक वह मरुतों के स्वतन्त्र राज्य को लाभ करता है।॥ ४ ॥ दसयां खण्ड अथ यत् पञ्चमममृतं, तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन। न वै देवा अनवन्ति न पिवन्त्येतदेवा मृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥ त एतदेवरूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ।।२।। स य एतदेवममृतं वेद, साध्यानामेवेको भूत्वा "ब्रह्मणेव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति । स एतदेवरूप मभि संविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥ स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्त मेता, दिस्तावदूर्य उदेता गस्तमेता, साध्यानामेव तावदाधिपत्य ५ स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ और जो पाचवां अमृत है, उसे साध्य उपभोग करते हैं जिन में ब्रह्मा मधान है । देवता न साते हैं, न पीते हैं. किन्तु इम अमृत को देख कर ही रप्त होते हैं ॥१॥ यह इसी रूप में प्रवेश करते हैं, और इस रूप मे उदय होते हैं ॥२॥ इस प्रकार इम अमृत को जानता है. यह मान्यों में में ही एक बनकर ब्रह्मा की है। प्रधानना मे इमी अमत को देख कर यह को

लिपे एक बार ही दिन हो जाता है * (हमेशह का दिन वह
है. उमके लिये न कभी उदय होता है, न अस्त होता है, उसके
[ १०४ ] छान्दोग्य उपनिषद्।
तृप्त होता है । वह इसी रूप में प्रवेश करता है, और इस रूप से
उदय होता है ॥ ३॥
सो जितनी देर तक मूर्य उत्तर से उदय होता है, और
दक्षिण में अस्त होता है, उस से दुगना काल ऊपर उदय होता है
और नीचे अस्त होता है, उतनी देर तक वह साध्यों के स्वतन्त्र
राज्य को लाभ करना है ॥४॥
ग्यारहया सण्ड
अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नेवोदेता नास्तमेतैकल
एव मध्ये स्थाता । तदेष श्लोकः ॥ १॥
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन ।
देवास्तेनाह ५ सत्येन माविराधिपि ब्रह्मणेति ॥२॥
न हवा अस्मा उदेति, न निम्लोचति सकृद्दिवा
हैवास्मे भवति, य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥
ना उम मे ऊपर उदय होकर वह फिर न कभी उदय होगा
न अस्त होगा। वह अकेला ही मध्य (केन्द्र) में खड़ा रहेगा।
इम पर यह श्लोक है ॥१॥
वहां न कभी उदय है न अस्त है । हे देवो ! मैं उस सत्य
(पकरम) वाम कभी परे न होउं ॥२॥
जो इम ब्रह्मोपनिषद् (वेद के रहस्यार्थ) को ठीक २ जानता
T-
जाता)॥३॥
* दमो सानो 3.८४॥२॥

प्रपाकठ ३ खण्ड ११ [ १०५ ] तदैतद् ब्रह्मा प्रजापतय उवाच, प्रजापतिर्मनवे, मनुः प्रजाभ्यः । तद्वैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४॥ इदं वाव तज्ज्येष्ठाय - पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्राणाय्याय वाऽन्तेवासिने ॥ ५॥ नान्यस्मैकस्मैचन,यद्यप्यस्मा इमामद्भिःपरिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्याद्, एतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥६॥ यह (रहस्य, मधुविज्ञान) ब्रह्मा ने प्रजापनि को बतलाया, मजापति ने मनु को, मनु ने अपनी सन्तान (इक्ष्वाकु आदि) को । अपने सबसे बड़े पुत्र उद्दालक आमणि को उसके पिता (अरुण) ने यह ब्रह्म ( का रहस्य) बतलाया।४। इसलिये यह ब्रह्म ( का रहस्य) पिता अपने मयमे बड़े पुत्र को बतलाए, वा योग्य शिप्य को ५ । और किसी को नहीं चाहे इमे वह पानियों में घिरी हुई यह (समुद्र पर्यन्त पृथिवी) धन की भरी हुई देवे, यही (रहस्य) उममे बढ़ कर है, हां. यही उमसे बढ़ कर है * ।। * इन ग्यारह मण्डों का रहस्यार्थ हमार्गपहुंच मे पर है। और मचमुच यह इतना महंगा रहस्यार्थ हमारी पहुंच मे पर ही मनाया हिये था। नहीं तो हम इमे यहुन थोड़े में पंच डालने। यहां हमें घोल कर बतला दिया है, कि इमफे पाच यही है, जो मार्यभाम राज्य को इसके सामने नुच्छ समझते है। इसलिये हमें कोई शोया नहीं, पर हम इसके पूरे रहस्य पर नहीं पहुंच म । तथापि जोर यात ममन .

[ १०६ ] छान्दोग्य उपनिषद् । यारहवां खण्ड गायत्री वा इद ५ सर्व भूतं, यदिदं किञ्च । वाग्वै गायत्री, वाग्वा इद ५ सर्व गायति च त्रायते च ॥१॥ में आती है, उमको विवृत करते हैं । हम मनुष्य हैं, हमारे लिये यह लोक है, इम लोक में जो हमारे पास मार वस्तु है, वह घेद है, वैदिक जीवन द्वारा हम इस लोक में यश, तेज, इन्द्रिय, चीर्य और स्वास्थ्य फो भोगने है । फिर इस जीवन का मार एक और जीवन है, जिसे हम मूर्यलोक में भागते हैं। यहां वेदों का दिशाओं का मूर्य के रंगो का देवताओं का और उनमें एक प्रधान देवता का इनका कोई नियत सम्बन्ध है-जैसे (१) ऋचा, अग्वंद. पूर्व,लालरूप, पनु, अग्नि। (२) यजु, यजुर्वेद. रूप, रुद्र इन्द्र । (३) माम, मामवंद, पश्चिम, काला, आदित्य दक्षिण, घरुण ()अधाङ्गिरमाइतिहास पुगण.उत्तरपड़ाफाला,मगत मोम (५) गुह्य आदेश, ओम, ऊपर, मध्य, (केन्द्र) माध्य, ब्रह्मा । पसु, गद्र,आदित्य,मग्तू और माध्य देवतागण हैं। यदिककर्मों का करने वाला और इन रहम्यों का ( जो यहां पूर्व फहे हैं) जाननेवाला देवता यनगर उन्हीं में जा मम्मिलित होता है। और वह इनके साथ उमी अमृत फी भोगता है, जिमको यह देवता भोग रहे हैं । इनमें मं मन्येक उपासना का फलं एक दुमरे मे बढ़कर है । पहले का जो भोगकाल है. दूसरे का उसमे दुगुना और नीमरे का दूसर मे. दुगुना है इत्यादि।सूर्य के अन्दर जोर परिवर्तन होता है, उस २को पद उपभोग करने ६,यह पांचो शयल ग्रह के उपामक शबलग्रम का उपमांग करते हैं । इसके ऊपर (उममे परे) गफ और मूर्य है (येन सूर्यम्नपति नेजमेरः ) जिममे यह सूर्य तप रहा है। वह परवाना गुरमा है। मशालय में ऊपर चढ़ कर जब यह इम शुद्ध के दर्शन करता है। मय उदय भान होना एक दम मिट जाता है और एक बार दी मदा के लिये दिन नद जाता है। 1 प्रपाठक ३. खण्ड १२ [१०७] या वैसा गायत्री, इयं वाव सा येयं पृथिवी, अस्या •५हीद ५ सर्व भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते ॥२॥ या वे सा पृथिवी, इयं वाव सा, यदिदमस्मिन् पुरुपे शरीरम, अस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥३॥ यदेतत् पुरुपे शरीरम्, इदं वाव तद; यदिदमस्मि- नन्तः पुरुपे हृदयम्, अस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्टिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥४॥ सपा चतुष्पदापइविधागायत्री। तदेतदृचाभ्यनूक्तम्।५। तावानस्य महिमा ततो ज्याया ५श्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भृतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥६॥ यदे तद्ब्रह्मेति, इदं वाव तद्,योऽयं बहिर्दा पुरुषा दाकाशः । यो वेस वहिर्दा पुरुपादाकाशः ॥७॥ अयं वाव सः, योऽयमन्तः पुरुप आकाशः यो वे सोऽन्तः पुरुप आकाशः ॥८॥ अयं वाव सः,योऽयमन्तर्हदयआकाशः, तदेतत् पूर्ण मप्रवति। पूर्णमप्रवर्तिनी ५ श्रियं लभते य एवं वेद ।।९॥ गापत्री * सचमुच यह मारी हनी है, जो कुछ पा । *गायत्री पदिक छन्दों में से एप एन्दा प्राप. बड़ी शनि घाला वर्णन किया.इसकेमारा प्रम में चित्त मगापातासाम लिये यहां मां गायत्री के रूप में वर्णन किया दान १।१।२९॥

[१०] छान्दोग्य उपनिषद्। गायत्री वाणी है, क्योंकि वाणी इस सब को गाती है (गायति) और रक्षा करती है (मायते) * ॥१॥ वह गायत्री यह वृथिवी है, क्यों कि इस में यह हर एक हस्ती सहारा लिये हुए है और इसे कभी नहीं उलांघती है ॥२॥ वह थियो यह है, जो यह पुरुप में शरीर है; क्योंकि इस में यह सारे माण । (जो वास्तव में हर एक हस्ती हैं) सहारा लिये हुए हैं और इसे कभी नही उलांघते हैं ॥३॥ अब यह जो पुरप में शरीर है, वह यह पुरुप के अन्दर हदय है, क्योंकि इस में यह मारे माण (जो वास्तव में हर एक हस्ती हैं) सहारा लिये हुए हैं और इस को कभी नहीं उलांघते हैं ॥४॥ सो यह छाप्रकार की गायत्री चारपाद वाली है। और यह सचा मे भी कहा गया है (ऋग्वेद १.० १ १० । ३) ५॥ मै और मा इन दोना धातुओ से गायत्री बना है। गायत्री वाणी इसलिये है, कि याणी मय को गाती है, वर्णन करती है, और "भय में बचाती है। f प्राण यहा पांच इन्द्रियों में अभिप्राय होसक्ता है, जैसा कि छान्दो ११२१ १.२१७११ में वर्णन किया है। या पांच भीतरी घायुओं से अभिप्राय होसक्ता है, जैसा कि ३ । १३।१ में वर्ण करेंगे। + गायत्री और पृथिवी में यह समता है, गायत्री प्राणों की रक्षा करने वाली है, और पृथिवी सय प्राणियों का आश्रय है। इसी तरह पृथिवी शरीर है, और शरीर हृदय है। इस तरह अन्त में गायत्री मो हृदय के माथ एक किया गया है। और हृदयाफाश ग्रह है। छ प्रकार की अर्थात् पाणी; भूत, पृथिवी, शरीर, प्राण और हृदय रूप । चार पाद छ छ अक्षरों के, क्योंकिगायत्री चौबीस अक्षर का छन्द है (शकराचार्य) प्रपाठक ३ खण्ड १२ [१०९] इतनी इस [ ब्रह्म जो गायत्री से सम्बद्ध है ] की महिमा [विभूति ] है, पुरुष [ पूर्णब्रह्म ] उससे बड़ा है । सारे भूत इसका एक पाद हैं । और तीन पादवाला इसका अमर स्वरूप द्यौ अर्थात् [ अपने स्वरूप ] में है * ॥ ६ ॥ यह जो ब्रह्म है [ जो अपने स्वरूप में तीन पाद से अमर वर्णन किया है, और गायत्री के रूप में वर्णन किया है. ] यह वही है, जो पुरुष के बाहर आकाश है । और यह आकाश जो पुरुप के बाहर है-॥ ७॥ गायत्री-गायत्री छन्दों में से एक छन्द है, जो प्राय-वडी शक्ति बाला वर्णन किया गया है, इसके द्वारा ब्रह्म में चित्त लगाया जाता है, इस लिये यहां ब्रह्म को गायत्री के रूप में वर्णन किया है देखो वेदान्त ११११२५ गाऔर त्राइन दोनों धातुओं से गायत्री यना है ।याणी गायत्री इसलिये है, कि पाणी सय गाती है, वर्णन करती है और भय से यचाती है। प्राण -प्राण यहां पांच इन्द्रियों से अभिप्राय होसक्ता है, जैसा कि छान्दोग्य उ०१।२।१२।७।१ में वर्णन किया है। वापांच भीतरी वायुओं से अभिप्राय होसक्ता है, जैसा कि ३ ॥१३ । १ में वर्णन करेंगे। गायत्री और पृथिवी में यह समता है, गायत्री प्राणों की रक्षा करने वाली है और पृथिवी सब प्राणियों का आश्रय है । इसी तरह पृथिवी शरीर है, और शरीर हृद्य है। इस तरह अन्त में गायनी को हृदय से एक किया गया है । और हृदयाकाश ब्रहा है । छः प्रकार की अर्थात् याणी, भूत, पृथिवी, शरीर, और प्राण हदयरूप; चार पाद छः छ अक्षरों के, क्योंकि गायत्री 'चौबीस अक्षर का छन्द है (शंकराचार्य) *पुरुष सूक्त में यह मन्त्र स्पष्ट ब्रह्म के वर्णन में है। और यहां भी दयाकाश से प्रझ का वर्णन है।

। उस हृदय के पांच छिद्र [ द्वार] हैं, जो देवों [इन्द्रियों से सम्बन्ध रखते हैं। जो इस का पूर्व द्वार है, वह प्राण है, वहासि [११० ] छान्दोग्य उपनिपद्। वह यही है, जो यह पुरुप के अन्दर आकाश है। और यह आकाश जो पुरुष के अन्दर है, वह यही है, जो यह हृदय में आकाश [ब्रह्म ] है, जो सारे परिपूर्ण है और कभी बदलने वाला नहीं है । जो इसे जानलेता है, वह पूर्ण और न वदलने वाली भी [खुशी] को लाभ करता है ॥ ८ ॥ तरहया सण्ड * तस्य हवा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुक्यः । स योऽस्यप्राङ्सुपिः स प्राणः, तच्चक्षुः स आदित्यः । तदेतत् तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत। तेजस्व्यन्नादो भवति, य एवं वेद ॥१॥ है, वह आदित्य [ सूर्य ] है । । इस को इस दृष्टि से उपासे कि यह तेज है और अन्नाद्य[ स्वास्थ्य, आरोग्य ] है। जो इस रहस्यको जानता है, वह तेजस्वी होता है और स्वस्थ [नीरोग] होता है ॥३॥ अथ योऽस्य दक्षिणः सुपिः स व्यानः, तच्छ्रोत्र' स चन्द्रमाः। तदेतच्छ्रीश्च यशश्चत्युपासीत । श्रीमान यशस्वी भवति, य एवं वेद ॥२॥ * गायत्री द्वारा हृदयस्य ब्रह्म की उपासना बतलाकर संबो उस हृदय के द्वारपाल है, उनका ध्यान और फल वतलाते हैं। यहां जो प्राण,चक्षु और आदित्य आदि का सम्बन्ध दिखलाया है, ठीक ऐसाही सम्बन्ध पांचवें प्रपाठक की समाप्ति में भी है।

मपाठक ३ खण्ड १३ [१] जो इसका दक्षिणी द्वारा है वह व्यान है, वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है । उसको इस दृष्टि से उपासे कि यह श्री है और यश है । जो इस रहस्य को जानता है, वह श्रीवाला और यशवाला होता है ॥२॥ 1 अथायोऽस्य प्रत्यङ् सुषिः सोऽपानः सावाक् सो- ऽमितत् ब्रह्मवर्चस मन्नाद्य मित्युपासीत । ब्रह्मवर्चस्य नादो भवति य एवं वेद । ३! जो इसका पश्चिमी द्वार है, वह अपान है। वह पाणी है, वह अग्नि है । सो इसे इस दृष्टि से उपास, कि यह ब्रह्मवर्चस और अन्नाद्य आरोग्य] है । जो इस रहस्य को जानना है, यह ब्रह्मासी और 'अन्नाद(अरोग) होता है ।। ३ ।। अथयोऽस्योदङ सुपिःस समानः तन्मनः,सपर्जन्यः। तदेतत् कीर्तिश्च व्युष्ठिश्चेत्युपासीत । कीर्तिमान् व्युष्टि- मान भवति य एवं वेद ॥ ४॥ जो इसका उजरी द्वार है, वह समान है, वह मन है, वह पर्जन्य मे] है। इसे, इस दृष्टि से उपासे कि यह कीर्ति है और कान्ति [सौन्दर्य] हे जो इस रहस्य को जानता है, वह कीर्तिमान और कान्तिमान । सौन्दर्यवान् ] होता है ॥ ४ ॥ अथ योऽस्योवः सुपिःस उदानः सवायुः स आकाशः। तदेतदोजश्च महश्वेत्युपासीत । ओजस्वी महस्वान् भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥ x r [ ११२] छान्दोग्य उपनिपदू। जो इसका ऊपर का द्वार है, वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है । इसे इस दृष्टि से उपासे कि यह ओजम् [बल, दृढ़ता), है और माहिमा है । जो इस रहस्य को जानता है, वह ओजस्वी और महिमा वाला होता है ।।५॥ ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुपा स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः। सय एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुपान स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान वेद, अस्य कुले वीरोजायते; प्रतिपद्यते स्वर्गलोकं, य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान वेद ॥६॥ यह पांच (हृदयस्थ)ब्रह्म के पुरुप हैं, जो स्वर्गलोक (हार्दलोक) के द्वार पाल है ।जो इन पांच ब्रह्मपुरुषों को स्वर्गलोक के द्वारपाल जानता है, उसके कुल में वीर पुरुष उत्पन्न होता है और स्वयं वह स्वर्ग लोक को प्राप्त होता है, जो इस प्रकार इन पांच ब्रमपुरुषों को स्वर्गलोक के द्वारपाल जानता है ॥ ६ ॥ अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेप्वनुत्तमेपूत्तपुलोकेषु, इदं वाव तद, यदि दमास्मिन्नन्तः पुरुपे ज्योतिः । तस्येपा दृष्टिः ॥७॥ यत्रेतदस्मिञ्छरीरे स ५ स्पर्शनोष्णिमान विजा- नाति । तस्येपा श्रुतिः-पत्रेतत् कर्णावपिगृह्य निनद नदथुरिवाग्नेखि ज्वलत उपशृणोति । तदेतद् अब वह ज्योत जा इस याक अपर चमकती है, सारे विश्व से ऊपर और हर एक से ऊपर, सबसे ऊंचे लोकों में, और जिन से परे कोई ऊंचा नहीं है उन लोकों में (जो ब्रह्म ज्योति चमकती है ), यही है, वह, जो यह यहां पुरुष के अन्दर ज्योति है । उस का यह दर्शन (प्रत्यक्षचिन्ह) है अर्थात् जो छूने से इस शरीर में मनुष्य गर्मी प्रतीत करता है । और उस (ज्योति) की यह श्रुति (आवाज़ ) है, जो दोनों कान ढांपकर के [रयकी ] ध्वनि की तरह, वा [ चैल की ] गर्न की तरह, वा अग्नि के जलने की तरह [ अपने कानों में ध्वनि ] सुनता है सो इस शवलब्रह्म] को इसमकार उपासे, कि वह दृष्ट देखागया ] है और श्रुत [ मुनागया ] है। यह दर्शनीय होता है और विख्यात होता है, जो इस मकार जानता है [उपासता है ] हां जोइस मकार जानता है * ॥८॥ * सौर जगत् में सूर्य इस सारे जंगम और स्थायर का जीयन है, पर वस्तुत सूर्य भी अपने अन्दर एफ और सूर्य रखता है, जिस से उस का जीवन है और जिसकी ज्योति से यह चमफरहा है, यही त्योति सारे विर्य से ऊचा है और सारे विश्व को घर हुए है, यो. सारे विश्व का असली जीवन है। हां जीवन रूप में यह सर्वत्र प्रतीत होता है 'प्राणो होप य सर्वभूतर्विभाति' यह जिसकी महिमा इस सारे विश्व पर चमफरही है, हमारा जीवन भी उसी महिमा से भरा हुआ है. हम बाहर ही क्यों देखें, हमारे जीवन में क्या उसकी थोडी महिमा है।यदि सूर्य में उस महती सत्ता के विन्द विद्यमान है, .

[११२] छान्दोग्य उपनिषद् । जो इसका ऊपर का द्वार है, वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है । इसे इस दृष्टि से उपासे कि यह ओजम् [बल, दृढ़ता] है और महिमा है । जो इस रहस्य को जानता है, वह ओजस्वी और महिमा वाला होता है ॥ ८ ॥ ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुपा स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः । सय एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुपान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान • वेद, अस्य कुले वीरोजायते प्रतिपद्यते स्वर्गलोकं, य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुपान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान वेद ॥६॥ यह पाच (हृदयस्थ)बल के पुरुष है, जो स्वर्गलोक (हार्दलोक) के द्वार पाल है । जो इन पाच ब्रह्मपुरुषों को स्वर्गलोक के द्वारपाल जानता है, उसके कुल में वीर पुरुप उत्पन्न होता है और स्वयं वह स्वर्ग लोक को प्राप्त होता है, जो इस प्रकार इन पांच ब्रह्मपुरुषों को स्वर्गलोक के द्वारपाल जानता है ॥ ६ ॥ अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेप्वनुत्तमेपूनपुलोकेषु, इदं वाव तद, यदि दमास्मिन्नन्तः पुरुपे ज्योतिः। तस्येपा दृष्टिः ॥ ७॥ यत्रेतदस्मिञ्छरीरे स ५स्पर्शनोष्णिमान विजा- नाति । तस्येपा श्रुतिः-यत्रेतत् कर्णावपिगृह्य निनद मिव नदथुखिाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति । तदेतद् .

'अब वह ज्योति जाइम कि ऊपर चमकनी है, सारे विध से ऊपर और हर एक से ऊपर, सबमे ऊंचे लोगों में, भार जिन से परे कोई ऊंचा नहीं है उन लोकों में (जो ब्रह्म ज्योति चमकती है), यही है, वह, जो यह यहा पुरुष के अन्दर ज्योति है । उस का यह दर्शन (प्रत्यक्षचिन्ह) है अर्याद जो छूने से इस शरीर में मनुप्प गर्मी प्रतीत करता है। और उस (ज्योति ) की यह श्रुति (आवाज) है, जो दोनों कान ढांपकर के [स्थकी धनि की तरह, वा [वैल की ] गर्न की तरह, वा अग्नि के जलने की तरह [ अपने कानों में धनि ] मुनना है । सो इस शिवलब्रह्म] को इमप्रकार उपामे,कि यह दृष्ट [देगागया ] . और श्रुत [मुनागया ] है । वह दर्शनीय होता है और विरपात होता है, जो इस मकार जानता है [उपासता है ] हां नोइस प्रकार जानता है *॥८॥ * सौर जगत् में सूर्य इस मार जगम भोर स्थायर या जीपन है, पर यस्तुत सूर्य भी अपने भादर एक भार पूर्ण रगता, हिर से उसका जीवन है और जिमरी ज्यान पद पमपरदा , पही ज्योति मारे विश्व में अगर मार मार विश्य पा पर हुए है, य.. सार विश्य पा ममली जीयन है। जीयनरूप में पद मयंत्र प्रतीत होता है 'प्राणो र य मयंभूनाथमाति' पद जिमपी महिमा इम सारे यिश्य पर यमपरदी है, हमाग जीयन भी उमपी महिमा में भरा हुमा ई. हम पाहर ही क्यों देंगे, हमार सायन में क्या उमर्या पारी महिमा यदि गपं में उममदनी महापंचिदपिपमान, . [ ११६ ] छान्दोग्य उपनिपद। सलिये उसे यह इच्छा और विश्वास करना चाहिये कि-॥१॥ वह * मनोमयं [विज्ञानमय) है, जिस का शरीर प्राण है, जिप्स रूप प्रकाश है, जिसके संकल्प सच्चे हैं, जिस का स्वरूप आकाश की नाई [च्यापक और अदृश्य] है, अथवाआकांश जिसका शरीर है ] सारे रस जिसके हैं, वह इस सब को घेरे हुए है, वह कभी -बोलता नहीं है, वह वे परवाह है ॥ २ ॥ यह मेरा आत्मा है हृदय के अन्दर धाई से छोटा है, जो से 'छोटा है, सरसों से छोटा है, सिमाक ( सवांक) से छोए है, सिमाक के चावल से भी छोटा है यह मेरा आत्मा है, हृदय के अन्दर, प्रथिवी से बड़ा है, अन्तरिक्ष से बड़ा है, यो से बड़ा है, इन सब लोकों से बड़ा है।३। • सारे कर्म, सारी कामनाएं, सारे मुगन्ध और सारे रस उसके F- हैं, वह इस सवको घेरे हुए है, वह कभी बोलता नहीं; वह बेपरवाह । यह मेरा आत्मा है हृदय के अन्दर, यह ब्रह्म है, इस को मैं यहां से मर कर भाप्त हूंगा ऐसा जिसका प्राविश्वास है, और कोई संदेह - नहीं (वह उसे पालेता हैं) यह शाण्डिल्य + ने कहा है शाण्डिल्य ने कहा है ।।। पन्द्रहवां गण्ड (कोशविज्ञान) अन्तरिक्षोदरः कोशोभूमिबुघ्नो न जीर्यति । . , -- -- 1 * देखो शन० प्रा० १०।६।३। और यह उप०५।६।१ *इस सण्ड के विज्ञान को शाण्डिल्य विद्या कहते हैं-देखो-वेदान्त ३1३।१९ की व्याख्याएं। वाम गण्ड (कोशविज्ञान)का आशय इस यान को प्रगट करना है, कि पूर्व ३।१३.६ में जो प्रतिक्षा की ६, 'किइसके कुल में वीर पुरुष जग्म लेता है" कोश विज्ञान उसके पूरा करने का साधन है।' .

मपाठक ३. खण्ड १५॥ [ ११७ ] दिशो ह्यस्य सक्तयो द्यौरस्योत्तरं विलम् । स एप कोशो वसुधानस्तस्मिन् विश्व मिदं श्रितम् ॥१॥ तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम, सहमाना नाम दक्षिणा, राज्ञी नाम प्रतीची, सुभृता नामोदीची,तासां वायुर्वत्सः। स य एतमेवं वायुं दिशांवत्सं वेद, नपुनरोद रोदिति। सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद,मा पुत्ररोदरुदम्।। अरिष्टं कोश प्रपद्येऽमुनाऽमुना मुना, प्राणं प्रपद्ये ऽमुनाऽमुनाऽमुना, भूः प्रपद्येऽमुनाऽसुनाऽमुना,भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, स यदवोचम् 'प्राणं प्रपद्ये' इति । प्राणो वा इद ५सर्व भूतं यदिदं किञ्च,तमेव यत्नापत्सि'१४। अथ यदवोत्रम् 'भूः प्रपद्ये' इति । पृथिवी प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम्।५।अथ यदवोचम् 'भुवःप्रपद्ये'. इति । अमिं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् । ६। अथयदवोचं 'स्वःप्रपद्ये' इति । मग्वेदं पपद्य, यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्ये इत्येव तदवोचं तदवोचम् । ७॥ [* एक सन्दुक है ] जिसका पेट अन्तरिम है और पृथिवी * यह त्रिलोकी एक सन्दुक है, जिसका निचला तर पृथियी ऊपर या दफना धो है, और पट अन्तरिक्ष है । और मनुष्यों में प साधन और फलों का राजाना इम में भरा हुआ है।

[ १२० ] छान्दोग्य उपनिषद्। तत्प्रातः सवनं । चतुर्वि ५ शत्यक्षरा गायत्री, गायत्रं, प्रातः सवनं । तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः । प्राणावाव वसवः, एते हीद ५ सर्वं वासयन्ति ॥१॥ तश्चेदेतस्मिन् वयसि किश्चिदुपतपेत्, सब्रूयात, प्राणा बसवः ! इदं मे प्रातः सवनं माध्यान्दिन ५ सक्न मनु सन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सी येति । उद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥ पुरुप यज्ञ है। उसके जो [ पहले ] चौवीस बरस है, वह प्रातः संचन है। गायत्री छन्द चौवीस अक्षर का होता है, और मातः सवन गायत्र है [ गायत्री छन्दों से पूरा किया जाता है ] इस [यह] के उस [भाग, प्रातः सबन] से वसु सम्बन्ध रखते हैं।माण [इन्द्रिय] [ यहां पुरुप यज्ञ में ] वसु हैं, क्योंकि यह ही इस सवमाणिमात्र] को बसाते है [ वासयन्ति । [देह में प्राणों के वसते हुए ही सब जीव जीवित है] ॥१॥ यदि कोई [ रोगादि ] इस [ पहिली ] आयु में उसे तपाए [ तंग करे ], तो वह कहे हे माणो-वसुओ ! मेरे इस भातः सवन कोमाध्यान्दन सवन तक फैलाओ,जिससे कि तुम जोमाण होवसु हो, तुम्हारे मध्य में, मै जो यज्ञ हूं, मत लुप्त होजाऊं।इस प्रकार वह निःसंदेह उससे [रोगसे] ऊपर चढ़जाता है और नीरोग होता है ।।२।। - -- जीवन को यक्षरूप घनाउगा, और इस पुरुष यक्षको तीनों सवनों में पूर्ण करूगा । यह पुरप जिस प्रकार सोम यज्ञ के ठीक सदृश है, पह सब कुछ यहां दिसलाया गया है ॥ , + 1 मपाकठ ३ खण्ड १६ [ १२१ 1 अथ यानि चतुश्चत्वारि ५शद् वर्षाणि, तन्मा- न्दिन ५५ सवनं । चतुश्चत्वारि ५ शदक्षरा त्रिष्टुप्- दुभं माध्यन्दिन ५ सवनं । तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः । •णा वाव रुद्रा एते हीदं ५ सर्व५ रोदयन्ति ॥३॥ तञ्चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत्, सब्रूयात- प्राणाः रुद्राः । इदं मे माध्यान्दिन ५ सवनं तृतीय- वन मनुसन्तनुतेति । माऽहं प्राणाना ५ रुद्राणां मध्ये ज्ञो विलोप्सीयेति । उद्धैव तत एत्यगदो हभवति ॥णी अव [उस से आगे] जो चवालीस वरम हैं, वह माध्यन्दिन विन है । त्रिष्टुप छन्द चवालीस अक्षर का है, और माध्यन्दिन विन त्रैष्टुभ [ भिष्टुप् छन्दों से कियाजाता है ] । इस [य] के उस [ भाग-मध्यन्दिन सवन ] से रुद्र सम्बन्ध रखते है । माणही" इन्द्रिय ] ही [ यहां पुरुषयज्ञ में] रुद्र हैं, क्योंकि यह इस सव को रुलाते हैं * [ रोदयन्ति) ॥३॥ यदि कोई [ रोग आदि ] इस [दूसरी] आयु में उसे तपाए, तो वह कहे- 'हे प्राणो रुद्रो ! मेरे इस माध्यन्दिन सवन को मृतीय सवन तक फैलाओं, ताकि तुम जो माणहो रुट हो, तुम्हारे मध्य में मै जो यज्ञ हूं, मत लुप्त होजाउं'। इस प्रकार वह निसंदेह ऊपर चढ़जाता है (आराम पाता है) और नीरोग होजाता है ॥४॥ अंथ यान्यष्टचत्वारि ५ शदर्पाणि, तत् तृतीय- सवनं । अष्टचत्वारि ५ शदक्षरा जगती, जागतं *मभ्य की आयु में प्राण फूर होते हैं, इसलिये रद है।(शंकराचार्य) [१२२] छान्दोग्य उपनिषद् । तृतीय सवनं । तदस्यादित्या अन्वायत्ताः । प्राणा वावादित्या एते हीद ५ सर्व माददते ॥ ५॥ तञ्चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत्, स ब्रूयात् 'प्राणा आदित्याः ! इदं मे तृतीय सवन मायुरनु सन्तनुतेति । माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेति । उद्धैव तत एत्यगदोह भवति ॥ ६ ॥ अव [ उससे आगे] जो अड़तालीस बरस हैं, वह तृतीय [तीसरा] सवन है । जगती छन्द अड़तालीस अक्षर का है, और सृतीय सवन जागत है [जगती छन्द छन्दों से कियाजाता है। इस (यज्ञ) के उस [भाग, तृतीयसवन ] से आदित्य सम्बन्ध रखते हैं। प्राण [इन्द्रिय] ही [यहां पुरुपयज्ञ में] आदित्य हैं, क्योंकि यह इस सब को ग्रहण करते हैं * ॥५॥ यदि कोई [रोगआदि] इस [ तीसरी ] आयु मे उसे तपाए, तो वह कहे । हे माणो आदित्यो ! इस मेरे तीसरे सवन को आयु तक [११६ घरस तक ] फैलाओ [यज्ञकोसमात करो] जिससे कि तुम जो माण हो आदित्य हो, तुम्हारे मध्य में मैं जो यज्ञ हूं,मत लुप्त होजाउं, इस प्रकार वह निःसंदेह उस [रोग] से ऊपर चढ़ता है, और नीरोग होजाता है ॥६॥ • एतद्धस्म वै तद्विद्धानाह महीदास ऐतरेयः । 'स कि म एतदुपतपसि, योऽहमनेन न प्रेष्यामीति' स ह * शन्दादि विषय को ग्रहण करते हैं, (शंकराचार्य) अथवा इस सप को संभाले हुए हैं।

मपाठक ३ खण्ड १६ [ १२३ ] षोडशं वर्षशतमजीवत् । प्रहपोड़शं वर्षशतं जीवति, य एवं वेद ॥ ७॥ 1 महीदास ऐतरेय (इतरा का पुत्र) जो इस (रहस्य) का जानने वाला था, उसने कहा (रोग को सम्बोधन करके)'तूक्या यह मुझे तपाता है, मैं इससे नही मरूंगा ! वह एक सौ सोलह वरस (अर्थात् ०४+४४+४८) जीता रहा । (और भी) जो (कोई ) ऐसा जानता है (ऐसे निश्चय वाला है) वह एक सौ सोलह बरस जीता है * ॥ ७॥ इस खण्ड का अभिमाय यह है, कि दीर्घजीवी होने के लिये मनुष्य का दृढ़ निश्चय होना चाहिये, और साथ ही उसे अपने जीवन को एक परोपकार की लड़ी में परो देना चाहिये, यही अपने आपको यज्ञरूप बनाना है । यही इसके आरम्भ में कहा है 'पुरुषो वाव यज्ञः'। सोमयज्ञ के तीन सवन होते हैं, प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन, और तृतीयसवन ऐसे ही पुरुष को भी अपने जीवित. काल के तीन सवन मानने चाहियें। विधियज्ञ में पहला मातासवन है, उस में गायत्री छन्द का प्रयोग होता है, गायत्री छन्द चौवीस अक्षर का है । सो पुरुप को अपनी आयु के पहले चौबीस वर्ष प्रातःसवनमाननाचाहिये । विधियज्ञ में मातामवन के मालेकवर हैं, सो पुरुपयज्ञ में प्राण [इन्द्रिय ] व कहलाते है । यदि इसमाता- * यशके तीन सपन और उनके देवता आदि के विषय में देखो, छान्दोग्य २२२४.११ छन्दों के सम्बन्ध में देयो, शत० मा०॥२॥२०॥ + पुरुष यज्ञ में रुद्र और आदित्य भी प्राण ही है, जो माध्यन्दिन सवन और तृतीयसपन के मालिक है।

[ १२४ छान्दोग्य उपनिषद सबन [२४वर्ष ] में कोई रोग उसे तपाए [अनि यग में विघ्न होता दीखे] तो वह दनिश्चय से माणों को कहे, हे मानो तुम इस या में वा हो, भातः सवन के मालिक हो, इसकी रक्षा करना तुम्हारा काम है । तुम अपने सबन के रक्षक घनो, चिन्न को दूर हटाओ, और इस सवन को दूसरे सदन के साथ मिलादो ऐसा हद विश्वास उसके लिये अवश्य कल्याणकारी होता है, क्योंकि 'ऋतुमयः पुरुषः' पुरुष ऋतुमय है (आन्दो० ॥१४11) अप विधियज्ञ में मातासवन के पीछे दूसरा माध्यदिनसवन आरम्भ होता है, इसमें त्रिष्टुप् छन्द का मयोग होता है । विष्टुपू छन्द चवालीस अक्षर का है । सो पुरप को भी अपने पहले चौबीस परस मातः सवन के भोगकर उसके आगे चवालीस वरस अर्थात् अड़सठ वरस की आयुतक अपना माध्यन्दिनसवन मानना चाहिये। इसी प्रकार अड़सठ के आगे और अड़तालीम बरस अर्थात् एक सौ सोलह बरस तक अपनातृतीयसवन मानना चाहिये । इस तीसरेसवन को पूर्ण करके यज्ञ परिपूर्ण होता है, जो अपने जीवन को यन्नमय धनाकर पढ़ विश्वास रखना है, कि अब उसके लिये कोई अपमृत्यु नहीं है, वह मृत्यु को दवाकर इस यज्ञ को अवश्य पूर्ण करेगा, सो यह विश्वास महीदास ऐतरेय ने अपने जीवन में सस कर दि. खलाया है । यह मार्ग अब भी सबके लिये सुला है, जो चाहता है, घह चले, और उत्तका अमृतफल लाम करे । सत्तरहवां खण्ड स यदशिशिपति, यतपिपासति, यन्न रमते, ता *इस खण्ड का विषय पूर्व सण्ड के साथ एक है। यहां भी पुरप भोर पक्ष की तुल्यता दिखाई है ।।

प्रपाठक ३. वण्ड १७ [ १२५ ] अस्य दीक्षाः॥ १ ॥ अथ यदनाति, यतपिवति, यद् -रमते, तदुपसदेरोति ॥२॥ अथ यद्धसति, यंजक्षति, यन्मेथुनं चरति, स्तुतशप्रेरेव तदेति ॥ ३॥ अथ यत् तपोदान मार्जवमहि ५ सा सत्यवचनमिति, ता अस्य दक्षिणाः॥ ४॥ तस्मादाहुः सोष्यत्यसोप्टेति पुनरुत्पा- दनमेवास्य तन्, मरणमेवास्यावभृथः ॥ ५॥ तदै तद् घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्लोवांचा पि- पास एव सबभूव । सोऽन्तवलायामेतत त्रयं प्रपद्यत । अक्षितमस्यच्युतमसि प्राण स ५ शितमसीति । तत्रे- ते दे ऋचो भवतः॥६॥ 'आदित् प्रवनस्य रेतसः"उदयं तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तर ५ स्वः पश्यन्त उत्तरम् । देवं देवत्रा सूर्य मगन्म ज्योतिरुत्तमम् ज्योतिरुत्तममिति॥७॥ वह [ जो अपने आपको यह जानता है जो भाषा होता है, जो पाता होता है, और जो रमण नहीं करता है ( मुशियों से अलग रहता है, वह इमकी दीक्षा ई* ॥१॥ और नो ग्वाता है, पीता है, और रमण करता है । सुशिय भोगता है ] यह उसका उपमटों के बराबर है। ॥२॥ भूरा प्यास सहना, पिसी ममीर की प्रानि में जोमाता होनी, इत्यादि प्रकार के सो हरा उठाने ६, पह उस लिये पह भी दीक्षा के मास उपसद के दिनों में यजमान का दूध पीन पी मामा , मरिये सान पाने भादि फै. मुग पो उपमदा में उपमा दी।

. + [ १२६ ] छान्दोग्य उपनिषद् । और जो वह हंसता है, खाता है, और मैथुन करता है, यह स्तुत मास्त्रों के बराबर है * ॥३॥ और जो तप, दान, सरलता, अहिंसा [दयाभाव ] और सस वचन है, यह उसकी दक्षिणाएं हैं। ॥ ४ ॥ इसलिये जब कहते हैं, 'सोप्यति और 'असोष्ट' यह इसका नया जन्म है, + मरनाही अवमृय है ॥५॥ घोर आङ्गिरस [ अगिरमगोत्री] ने यह [यज्ञ का रहस्य ] [अपने शिष्य ] देवकी के पुत्र कृष्ण को उपदेश करके कहा- * स्तुत जो मचाएं गाई जाती हैं, शस्त्र जो ऋग्वेदियों से पड़ी जाती हैं। + यहां तक दीक्षा, उपसद्, स्तुत-शस्त्र और दक्षिणा ये यह के अंग पुरुष में दिखलाए हैं। # यहां शब्दमें तुल्यता दिखलाई है 'सोष्यति' अर्थात् (सोमको) निचोडेगा। और जय निकालचुकता है, तो कहा जाता है ' असोष्ट' अर्थात् (रस) निचोड़ा गया है। सोम यज्ञ में इन दोनों के यह वास्तव अर्थ हैं । पर'सू-धातु ' के रस निचोडना अर्थ भी हैं, और जन्म देना अर्थ भी हैं,इसलिये जब पुरुष का जन्म होना होता है,तब भी कहते हैं 'सोप्यति' (यह माता पुत्रको ) जनेगी । और जन्म होने के पीछे कहते हैं 'असोष्ट' (उसने पुत्र) जन्मा है । यह दोनों शब्द जो यज्ञ में सोम की उत्पत्ति में घोले जाते हैं.वही पुरुष की उत्पत्ति में योले जाते हैं, इस लिये पुरप का जन्म सोमरस के घहने के सदृश है ॥ 5 अभृय, यश की समाप्ति का स्नान, यहां ११६ वर्ष की आयु से पुरुपयक्ष को समाप्त करके जो उसका मरना है, वही अवभृथ है ॥ का यहां देवकी का पुत्र कृष्ण" इतना मात्र देखकर यह नहीं कह सक्त, कि यह यही वसुदेव के पुत्र अर्जुन के सखा कृष्ण है। पिता प्रपाठक ३. खण्ड १७1 [ १२७ ] जिसके कि मुनने से उसे फिर कोई प्यास कुछ और जानने की इच्छा) नहींरही-कि जब उसका अपने आपको पज्ञ जाननेवाले का] अन्त का समय हो, तो वह इन [ तीन यनुओं ] की शरण ले इन तीन मन्त्रों का जपकरे "तू अविनाशि है""तू न बदलने वाला है। 'तू प्राण का तीक्ष्ण किया हुआ [ सूक्ष्म तत्व ] है" इस [विषय] पर यह दो ऋचा हैं ॥७॥ *तववह [जगतके पुराने वीज [सस, आदिसस्य ब्रह्म] की ज्योति पुत्र धा माता पुत्र या दोनों भाइयों के एफसे नामों का मेल का जगह पाया जाता है । और किसी टीकाकारने भी यहां धार आशिरस का शिष्य लिपन के मिवाय और इसके विषय में कुछ नहीं लिया। और न ही इन प्राचीन उपनिपदों में यासुदेव कृष्ण या कहीं नाम है। शाण्डिल्प सूत्रकार जिसे कृष्ण के विषय में भुति प्रमाण देने की घड़ी रवि है, यह भी इस प्रमाण फी उमृत नहीं परता, चिन्तु नारायण उपनिषद और अथर्व शिरम् इन नवीन उपनिषदों के प्रमाणों पर ही ठहर जाता है । सो यह घोर भागिरम पाशिष्य कृष्ण यासुदेव कृष्ण से प्राचीन प्रतीत होता है, यद्यपि इमपी मातापा नाम भी देवी ही है। * इसमें पहले मन्त्र पी प्रतीक दीपही है।मारा मन्त्र पाही- अदित्प्रनस्पतिसो ज्योतिः पश्यन्ति घामरम् । परो परिपतेविपि' इसका अर्थ पूरा ऊपर देदिपा है। दूसरी ऋचा का पाठ कायद १।१०।१० में 'ज्योतिः पश्यन्त उत्तरम्' की जगह पद २०२१ में 'स्वपश्यन्त उत्तरम है, और भयर्ष पर 11 में इसी जगह 'रोहन्तो माप मुत्तमम् ' पद पार दातारपाश तीनों में एक है। इसीलिये यहां ज्योतिः पश्यत उत्तरम्'। मागे 'स्पात . । .

[१२८] छान्दोग्य उपनिषद् । को देखते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है, सब से ऊंची है, जो घी में चमकर ही है' [कर ८ । ६ १ ३०] 'जो [अविद्याके] अन्धेरे से ऊपर है, ऊंची से ऊंची ज्योति है, 'जो ऊंचे से ऊंचा स्वर्ग है। देवों के मध्य में जो देव है, उस मूर्य को हम पहुंचे है, जो सब से ऊंची ज्योति है, हां सब से ऊंची ज्योति है [ऋग् । । ५०। १० । ७। अठारहवांसपढ मनो ब्रह्मेत्युपासीते त्यध्यात्मम् । अथाधिदैवतम्, आकाशोब्रह्मेति, उभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधि- दैवतं च ॥ १॥ तदेतच्चतुष्पाद् ब्रह्म । वाक् पादः प्राणः पादः, चक्षुः पादः, श्रोत्रं पादः। इत्यध्यात्मम् । अथाधिदैवतम्-अमिः पादो, वायुः पादः, आदित्यः पादो, दिशः पाद इति । उभयमेवादिष्टं भवत्यध्या- मं चेवाधिदैवतं च ॥ २॥ वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः, सोऽमिना ज्योतिपा भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥३॥ प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थःपादः,स वायुनाज्योतिपा भातिच उत्तरम् ' उसका अर्थ दिखलाया प्रतीत होता है । यहां आदित्यस्य शबलब्रह्म ( सत्य) का वर्णन है । शफराचार्य की व्याख्या. 'स्व' के के स्थान 'स्म' पाठ को लेकर है, कि वहीज्योति हमारे हृदय में हैं।

प्रपाठक ३. खण्ड १८॥ [ १२९ ] तपतिचाभातिचतपति च कीर्त्या सशसाब्रह्मवर्चसेनय एवं वेद।। चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः, स आदित्ये- न ज्योतिपा भाति च तपति च। भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद । श्रोत्र मेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः, स दिग्भि ज्योतिषा भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्च- सेन य एवं वेद ॥ ६॥ मन *ब्रह्म है, यह उपामना करे, यह अध्यात्म (देह के सम्बन्ध में) है । और आपदैवत (देवताओं के सम्बन्ध में) यह है किआकाश ब्रह्म है (यह उपासन करे)। सो यह दोनों (उपासनाएं) उपदेश की गई है-अध्यात्म और अधिदैवत ॥ १ ॥ * पूर्व ।। १४ । २ में जो पात्मा के विषय में 'मनोमय.' पोर पाकाशात्मा' कहा है। जिमका पभिप्राय यह है कि मन धमकी महिमा को प्रकागित करता है पीर पाकाग उमको महिमा दिष. साता है। यहां गरीर के अन्दर उमके महत्व को प्रकागित करने पानी में मे मन को लिया है, पौकि मन देश में एक बड़ी दिय गति है. पीर बाध जगत् में पाकाग ही मव मे बहा है। यहां यह पामा के महाव में पीर का विपी के अन्दर यह भी दो (मनोमयः पीर भाकायामा) विशेषता यहां गवनरूप में इनकी पतष उपाममा पमनाई है. एक तो गरीर के पन्दर पीर मरी बार।

[१३०] छान्दोग्य उपनिषद् । यह ब्रह्म ( मन वा आकाश) चार पाद वाला है । वाणी एक पाद है, माण (प्राण) एक पाद है, नेत्र एक पाद है, श्रोत्र एक पाद है-यह अध्यात्म है । अब अधिदैवत (कहते हैं ) आग्नेि एक पाद है, वायु एक पाद है, मूर्य एक पाद है, दिशाएं एक पाद हैं * सो यह दोनों (उपासनाएं) उपदेश की गई है- अध्यात्म और अधिदेवत ॥२॥ वाणी ही ब्रह्म का चौथा पाद है । वह (पाद) अमिरूप ज्योति से चमकता है, और तपता है । वह जो इस मकार जानता है (पासता है ) वह कौति से, यश से, ब्रह्मवर्चस से वमकता है और तपता है ॥३॥ माण ही ब्रह्म का चौया पाद है। वह वायुम्प ज्योति से चमकता है और तपता है ॥ ४ ॥ श्रोत्र ही ब्रह्म का चौथा पाद है, वह दिशाम्पी ज्योति से चमकता है और तपता है । वह जो इस प्रकार जानता है, वह कौति से, यश से और ब्रह्मवर्चम में यमकता है और तपता है।।६।। * मन, धाण नेव और थोत्र द्वारा वाद्य विषयों में पहुंचता है, और वाणी हारा अपने अन्दर के भावों को बाहर (दूमरों तक) पहुंचाता है, इमलिये यह चार उसके पाद हैं, और अग्नि, वायु, पादित्य और दिशाएं यह चारी शाकाग के उदर से पाद की तरह लगे हुए हैं। समष्टि में जी अग्नि, वायु, श्रादित्य और दिशाएं हैं, वही व्यष्टि में बापी, माप, नेत्र पीर थोत्र हैं, उन्ही दिव्य शक्तियों से यह व्यरि गालियां चमकती है, और उन्ही से गर्म रहती है (थपने काम में उत्साहवती रहती है।

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प्रपाठक ३. खण्ड १९ [१३]
उन्नीसवां पण्ड।
आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः, तस्योपव्याख्यानम् । अ
सदेवेदमग्र आसीत् । तत्सदासीत् तदाण्डं निवर्तत ।
तत् संवत्सरस्य मात्रामशयत । तन्निरभिद्यत । ते आ
ण्डकपाले रजतं च सुवर्णचाभवताम् । १ ।
तद् यद् रजत से यं पृथिवी, यत् सुवर्ण साद्यौः,
यज्जरायुते पर्वताः, यदुलंस मेघो नीहारः, या धमन
यस्ता नयः, यद् वास्तेयमुदक ५स समुद्रः ; २ ।
अथयत्तदजयत् सोऽसावादित्यः । तं जायमानं
घोपा उल्लयोऽनूदतिष्ठन्त, सर्वाणि च भूतानि, सर्वे-
च कामाः तस्मात तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोपा
उल्लवोऽनुतिष्टन्ति सर्वाणिचभूतानि सर्वे चेव कामाः३
स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्ते, अभ्या-
सो ह यदेन ५साधवो घोपा आचगच्छेयुरुप च नित्रे
डन् निमेडन् । ४।
मूर्य ब्रह्म है यह आदेश है और उमका यह पूरा प्याग्यान है,
आरम्भ में यह असत् ही या वह सव (व्यक्त) हुआ, वह कहा हो
*मूर्य पदलभाषाराम्रा का एफपाद के तौर परपदा है. मय यहां
यह शयलमा के रूप में स्वतन्त्र उपासना पी जगह टहराया
प्रमत् में प्रभाव अभिमत नहीं, किन्तु पश्यत नामरुप अभि-
प्रेतापमत में मत् का रोना मी उपनिषद ( ।।२।१) में जोर

" [ १३२ ] छान्दोग्य उपनिषद् । गया (जम गया) वह एक अंडा* बन गया। वह (अंडा) एक वरस परिमाण लेटा रहा । (तव) वह फट गया (जैसे पक्षियों का अंडा फटता है) (अब) वह अंडे के दो कपाल (आधे टुकडे) हुए एक रुपहरी और दूसरा मुनहरी।। १ । वह जो रुपहरी था, वह यहपृथिवी है, औरजो सुनहरी था, वह धौ है,जो जेर,[मोटी झिल्ली] थी, वह पर्वत हैं जो नीचे पतली झिल्ली थी, वह मेघ और कुहर है, जो छोटी नाहिये थी वह नदियां हैं, जो वस्ति [ मूत्राशय ] का पानी था, वह समुद्र है ॥२॥ और वह जो उत्पन्न हुआ, [ अण्डे में से निकला ] वह सूर्य है। जब वह उत्पन्न हुआ, तो उलूलवः के घोप [नअरे ] उठे, और सारे भूत [प्राणधारी, उठे ] और सारी कामनाएं (प्राणियों की जरूरतें उठीं-उतान्न हुई)इसलिये सूर्य के उदय के लिये, वापिस आने से खण्डन किया है। इसलिये जहा कही प्रमत् से सत् का होना कहा है, वहां असत् से तात्पर्य अव्यक्त है, यहां यह सूर्य की प्रशंमा के लिये कहा है। जगत् के नाम रुप का प्रगट होना मूर्य के अधीन है, उसके बिना धुप अन्धेरे में सब कुछ अविज्ञात रहता है। * अण्ड शब्द को जगह आण्ड शब्द भी उपनिंपदी के समय व्यवहत था, दो बार यहां हो प्रयुक्त हुआ है, और ६ । ३ । १ में भी है मिलाश्री-मनु १ । १३ और वह और उप० ११२ ॥ ४ ॥ * उलूलय = उरुरव, ठीक वही शब्द है, जो इङ्गलिश में दुर्रा (Hurrah) है। प्रानन्दगिरि लिखता है गदविशेषे मसिद्धः' उलूलव या .विशेष में प्रसिद्ध है। - .

F प्रपाठक ४. खण्ड। [१३३ ] के लिये*उललब के घोप उठते है और सारेप्राणधारी और कामनाएं उठती हैं ॥३॥ वह जो.इस (मूर्य) को इस प्रकार उपामता है, जल्दी ही उसके पास साधु ध्वनिये (नेक ध्वनियें) आएंगी और उसे मुख देंगी हां मुख देंगी ॥४॥ चौथा प्रपाठक (पहला राण्ड) ॐजानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस । स ह सर्वतः आवसथान् मापयाञ्चक्रे, सर्वत एव मेऽस्यन्तीति ॥ १॥ अथ ह ह ५ सा निशायामतिपेतुः, तदैव ५ ह ५ सोहं ५ समभ्युवाद-हो हो यि भल्लाक्ष ! भल्लाक्ष! जान श्रुतेःपौत्रायणस्य समं दिवा ज्योति राततं । तन्मा प्रसा- क्षी, तन्मा प्रधाक्षीरिति ॥ २॥ । तमुह परः प्रत्युवाच 'कम्बर एनमेतत्सन्त ५स- युग्वानमिव रेकमात्थेति' । 'यो नु कथ ५ सयुग्वारक इति' ॥३॥ *व्याख्याकारों ने इसका प्रर्य अस्त होने पर भी निखाई, पर उस अर्थ में 'प्रत्ययन' शब्द होना चाहिये । 'प्रत्यायग' का पर्व फिर वापिस पाना ही समुचित है, जो यहां उदय को पट करता । और यही उत्सव का काल है। पूर्व वायु और प्राण ब्रश के पाद के तौर पर प्राए , यह सासरूप में उनकी स्वतन्स उपासना म . [१३४ ] छान्दोग्य उपनिषद् । यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येव मेन ५ सर्व तदभि समेति, यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति । यस्तदेद यत्सवेद । समयैतदुक्त इति' ॥ ४ ॥ तदुह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव, सह सञ्जिहान एव क्षत्तार मुवाच 'अङ्गारे ह सयुग्वानमिव रेवमात्थेति' 'योनु कथ ५ स युग्वारेक इति ॥५॥ - यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेन-५ सर्व तदभि समेति, यत् किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति । स यस्तद्धेद यत्स वेद । स मयैतदुक्त इति ॥ ६॥ । स ह क्षत्ता ऽन्विष्य 'नाविद मिति' प्रत्येयाय । त होवाच-'यत्रारेब्राह्मणस्यान्वेपणातदेनमच्छति'७ सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कपमाणमुपोपवि वेश। त पहाभ्युवाद 'वं नु भगवः सयुग्वारेक इति' 'अह ५ ारा ३इति' ह प्रतिजज्ञे । स ह क्षत्ता, 'अविद- मिति' प्रत्येयाय ॥ ८॥ जान श्रुति पौत्रायण* श्रद्धा से देने वाला, बड़ा उदार हुआ है, जिमका पर अतिथियों के लिये सदा सुला था। उसने हर एक जगह रहने के घर (टिकाने, धर्मशालाएं) वनपाए, इसलिये कि हर एक जगह (यात्री) मेरा अन्न खाएंगे ॥ १ ॥. जानयुतिः जन युत को सन्तान, पोचायण = पोते का पुत्र अर्थात् जनयुत का प्रपोता॥

, . प्रपाठक ४.खण्ड [१३५ ] एक वार रात्रि को कुछ इंस * (उसके घर के ऊपर मे, उड़ते हुए गए, और तब एक हंस ने दूसरे हम को इस प्रकार कहा 'होहो ! भल्लाक्ष भल्लास ! (मन्ददृष्टि !) जानश्रुति पौत्रायण की ज्योति (धर्म का तेज) द्यौ की तरह फैला दुआ है। उम (ज्योति) के ऊपर से मत उलांघो, न हो कि वह तुझे जला दे ॥२॥ दूसरे ने उसे उत्तर दिया 'अरे माना यह एक योग्य राजा है, पर कौन है यह बेचारा, जिसको तुम सयुगा रैक की तरह बोलते हो । ( पहले ने पूछा) 'कैमा है वह सयुमा गफ, जिसके विषय में तुम कहते हो ॥३॥ (दसरे ने उत्तर दिया) 'जेमे (जुए के रोल में) कृन अय: से जीतने पर निचले सारे अय उसी में आ जाते हैं. इसी प्रकार यह उसमें (रेक की नेकी में) आ जाती है, जो कुछ लोग नेकी करते है * इमका तत्त्व (धमनीयत) हमारे लिये अभी चिन्तनीय है। कराचार्य लिखते है कि राजा के पमदान प्रादि गुणों में समय होकर देवता वा ऋपि ईम का रूप धार कर उसके दर्गन गोचार पिर्थात् जो वचन मयुग्वारक के विषय में कहना चाहिये. यह तुम इसके विषय में दोनते हो । मयुग्वा = गाड़ी का मानिक जिममें बन वा घोडे जुने हुए हैं। निर्द जिन पर फूल बने हुए होते हैं, उन्हें पय करते हैं, या पन प्रलगर एक,दो,तीन, पीर घार रहते है। इनको क्रम में कनि, दापर, चता पर फ़त कहते हैं। इत में मपको जीत लिया जाता योकि दूमरे मम उमके नीचे हैं उमर्क पन्तर्गत । मी प्रकार क में जो नेकी है, उममे टूमर मारी मेको त्रीती जाती है। + . [१३६ ] छान्दोग्य उपनिषद्। (या उसकी नेकीमें) जो उसको जानता है, जिसको कि वह (क) जानता है । वह मैने यह (इस आदर से ) कहा है' ॥ ४॥ जान श्रुति पौत्रायण ने यह (बात चीत ) मुनी, और उसने (मातः ) उठते ही क्षत्ता (द्वारपाल) को कहा 'प्यारे ! त् (मुझे) सयुम्वा रैक की तरह कहता है*( सयुपारेककी प्रशंसा व मुझे देता है) (उसने कहा ) 'कैसा है वह सपुग्या रेक ॥ ५ ॥ (राजा ने कहा ) जैसे (जुए के खेलने में) कृत अय से जीतने पर निचले मारे अय उमी में आ जाते है, इसी प्रकार वर्ड' सब उसकी नेकी मे आ जाती है, जो कुछ लोग नेकी करते हैं, (या इसकी नेकी में) जो उसको जानता है, जिसको कि वह जानता है। वह मैने यह कहा है ॥६॥ क्षत्ता उसे ढूंहने के लिये गया, और यह कहते हुए वापिस आया कि 'मैंने उसे नहीं पाया तब उसे (राजा ने ) कहा 'अरे जहां किसी ब्राह्मण की दृढ होनी चाहिये (एकान्त स्थान में) वहां उसे ढूंढ ॥ ७॥ अब वह (सत्ता) (एक पुरुष के पास पहुंचा जो) एक छकड़े के नीचे अपनी दाद को खजिया रहा था, वह उसके पास बैठ गया और उसे कहा 'भगवन् ! क्या आप मयुगारक है। उसने कहा 'हां मै हूँ तयक्षता वापिस आया और कहा मैने उसेपालिया है। चत्ता ने जो उमकी स्तुति की, तो उसने वही रात वाली बात उमे कही । थोर सत्ता ने राजा का अभिप्राय जान कर रक की टूट पाया, जिममे कि राजा उमे जान जाए. जो कुछ कि रक जानता है।

प्रपाठक ४ खण्ड २ [१३७] इसरायण्ड तदुह जानश्रुतिः पौत्रायणः पद्शतानि गवां नि- कमश्वतरीरथं तदादायप्रतिचक्रमे। तर हाभ्युवाद॥१॥ रेवेमानि 'पट्शतानि गवामयंनिष्कोऽयमश्वतरीरथो, ऽनु म एतां भगवो ! देवतां शाधि यां देवतामुपास्स इति' ॥२॥ तमुह परः प्रत्युवाच 'अह हारेत्वा शृद्ध ! तवैव सहगोभिरास्त्विाति 'तिदुह पुनरेव जानश्रुतिःपौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रति चक्रमे ॥ ३॥ तहाभ्युवाद- केद ५ सहस्रं गवामयं निष्को ऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयंग्रामो यस्मिन्नास्से, ऽन्वेव मां भगवः! शाधीति' ॥ ४॥ तस्याह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाच-' आजहारेमाः शूद्र ! अनेनेवमुखेनालापयिष्यथा इति' । ते हेते रेक- पर्णानाममहावृपेषु यत्रास्मा उवास। तस्मेहोवाच ॥५॥ "रैक यह छः सौगाए है, यह मोहरों का हार और यह सगरों समेत रथ है, है भगवन् ! मुझे उम देवता का अनुगामन कीजिये, जिसे आप उपासते है" ॥२॥ उसे दूसरे ने उत्तर दिपा 'अह ! यह हार और गाडी गाओं के सहित हे गृह ! तेराही रहे। .

- [१८] छान्दोग्य उपनिषद तर जानश्रुतिपौत्रायप ने फिर एक हज़ार गाएं एक मोहरों का हार, एक खच्चरों ममेत रथ और एक निज कन्या इनको लिया और उसके पास पहुंचा ॥ ३॥ बार उसे कहा कि यह हजार गौएं है, यह मोहरों का हार है, यह सचरो समेत रय है, और यह पत्री है, और यह ग्राम है, जिगम त रहता है । हे भगान ! मुझे उपदेश दो ॥ ४ ॥ उमने उस ( कन्या) के मुरा को ऊंचे उठाकर कहा 'तुम यह ( गौए और दूसरे उपहार ) ले आए हो हे शूट ! पर केवल इस मुप्त मे तुम मुझे बुलवाते हों। सो यह रैरूपर्ण ग्राम महारों में है, जहा (0) उसके लिये ( उसके आधीन ) में रहा । उसने उसे ( राजा को कहा-11८॥ तीसरा खण्ड (सवर्गविद्या) वायुर्वाव संवर्गः। यदावाअनिरुद्धायति, वायुमेवा- प्येति ॥१॥ यदाप उच्छुप्यन्ति वायुमेवापियन्ति, वायुहोवैतान सर्वान् संवृक्ते । इत्यधिदेवतम् ॥ २॥ अथान्यात्मम्-माणो वाव संसर्गः। स यदास्वपिति * इनमें से कोई वस्तु मुझे उपदेश देने के लिये बाधित नहीं कर सती, केवल यह एक स्त्रीरत्न है, जिसका अनादर नहीं होसक्ता। 1 महावृष देश, अर्थ महापुण्य । शक्राचार्य ने 'अस्म के साथ 'अदात 'अध्याहारकरके यह अर्थ क्यिा है 'राजा ने यह ग्राम उस देदिये' . - मपाकठ४ खण्ड ३ [ १३९ ] प्राणमेववागप्येति प्राणंचसुः प्राण ५ श्रोत्रं प्राणं मनः, प्राणो ह्येवतान् सर्वान संवृक्ते इति ॥ ३ ॥ तौ वा एतौ दौ संवर्गों,वायुरेव देवेषु, माणःप्राणेषु।। वायु निःसदेह संवर्ग । है । जब अमि बुझती है, तोवायु में लीन होती है।जा मूर्य अस्त होता है, वायु में लीन होता है (वायु मण्डल में छिपता है) जब चन्द्रमा अस्त होता है, वायुमें लीन होता है। जब पानी सूखता है, वायु में लीन होता है । वायु ही निःसंदेह इन सव को चूसता है (खाजाता है, ज़जब करलेता है) यह, देवता ओं के सम्बन्ध में है ।२। अव शरीर के सम्बन्ध में (कहते है) माण निःसदेह सवर्ग है। जब कोई मनुष्य सोता है, तो माण में ही उसकी वाणी लीन होती है, माण में नेत्र, प्राण में श्रोत्र, और माण में मन (लीन होता है) माण ही इन सत्र को चूमता है ॥३॥ सो या दो संवर्ग है, देवतओं में वायु और माणों [इदियों . में माण ॥४॥ अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं व काक्षसे नि परिविष्यमाणो ब्रह्मचारी विभिने । तस्मा उ ह न ददतुः॥५॥ *ग या उपदंश भारम्भ होता है, रंग ने मधिदया में पायु की और भायात्म में प्राण भी यादी शयल उपामना पता मियगं, मारेगेधारा, भपन मन्दर मिरा नेपालय, पर रेनवाला।

[१४० ] छान्दोग्य उपनिषद् । . सहोवाच 'महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपाः ।त.कापेय नाभिपश्यन्ति मा अभि प्रतारिन् बहुधा वसन्तम् । यस्मा वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥६॥ तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येया- याह 'आत्मा देवानां जनिता प्रजाना हिरण्यद र ष्ट्र बभसोऽनसूरिः । महान्तमस्यमहिमान माहु.रन द्यमानो यदनन्नमत्तीति वै ब्रह्मचारिनेदमुपास्महे, दत्ता- स्मै भिक्षामिति ॥ ७॥ तस्मा उ ह ददतुः। ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्त स्तत्कृतं,तस्मात् सर्वासु दिवन्नमेव दश कृतं,सैपा विराडनादी, तयेद ५ सर्व दृष्टम् । सर्वमस्येदं दृष्टं भव- त्यन्नादो भवति, य एवं वेद, यएवं वेद ॥ ८॥ *एक बार शौनक कापेय (शुनक की सन्तान, कपि गोत्री) और अभिप्रतारी काक्षसेनि [ कक्षसेन की सन्तान ]' को जब भोजन परोसा जारहा था, उस समय उनके पास आकर एक ब्रह्म- चारी ने भिक्षा मांगी। उन्होंने उसे कुछ नहीं दिया ॥५॥ . * इस विषय में इम विद्या की स्तुति के लिये प्राख्यायिका - दिखलाते है॥

प्रपाठक ४.खण्ड ३ [१४१ ] तब उसने कहा 'एक देवता-वह कौन है ?-जो चार महान आत्माओं को खाजाता है * और जो सारे भुवन का रक्षक है । उसको हे कापेय ! लोग नहीं जानते हैं, हे अभिमतारिन् ! यद्याप वह बहुत जगह रहता है। जिसके लिये यह अन्न है, उसी को यह नहीं दिया गया ॥६॥ तष शौनक कापेय उसकी बात को समझ कर उसके पास आया और कहा 'वह सारे देवताओं का आत्मा है, सव प्रजाओं का जन्म देने वाला है, वह सुनहरी दान्तावाला बडा खाने. वाला है, वह अचेतन नहीं है । उसकी महिमा निःसंदेह बड़ी बतलाते है, क्योंकि वह स्वयं न खाया जाता हुआ उसको भी खा लेता है जो अन्न नहीं है। इस प्रकार हे ब्रह्मचारिन ! हम उसकी. उपासना करते है है । (और फिर परोसने वालों को कहा ) इसे भिक्षादो ॥ ७ ॥ *यह वायु और प्राण को ओर दशारा है,जिन में चारर का लोन होना बताया है । देखो पूर्व ४।३।२ और ४।३।३, शकराचार्य ने 'क' शब्द का प्रजापति अर्थ लिया है। मजापति ब्रह्म के अभिमाय में है, जिसको यहां वायु और माण शबलरूप में प्रगट करते हैं। 1 मुझे अब देने से जो तुमने इनकार किया है, यह वस्तुत प्राण ब्रह्म को अन्न देने से इनकार किया है। भोनक ने ब्रह्मचारी पर प्रगट किया है, कि यद्यपि लोग उसे नही देखते, पर मै उसे देखता इ. और उपामता हू । अर्थात् वह देवता वाय है, जो अग्नि प्रादि देवताओं को (जो प्रश्न नहीं है) खाजाता है, और फिर उनको जन्म देता है । या वह देवता प्राण ई, जो बाणी पादि (जो अन्न नहीं हैं) को खाजाता है और जाग्रत में उनको फिर जन्म देता है।

६ १४२ ] छान्दोग्य उपनिपद् । उन्होंने उसे अन्नदिया । सो एक पांच और दूसरे पांच दस बनते हैं, और वह कृत अय है * इसलिये सारी दिशाओं में यह दस अन्न है और कृत है । और यह विराट है, जो अन्न को खाने वाली है । । उस (विराट्) के द्वारा यह सब देखा हुआ होजाता है सब कुछ इस का देखा हुआ होजाता है, और वह अन्न का खाने वाला (स्वस्थ, नीरोग) होजाता है, जो इस प्रकार (इस रहस्य को ) जानता है, हां, जो इस प्रकार जानता है । ॥ ८ ॥ । । * पहने पाच पधिदैवत में-द्वानेवाला वायु एक और चार उसके पब-अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और जन । दूमरे पांच अध्यात्म में-बानेवाला माण और चार उसके अन्व-बाणी, नेत्र, थोत्र और मन । यह मिल कर दम होते हैं और जुए की चार नद-(प्रय) दस फूल बनाती हैं। लत-४, चेता-३, दापर-२, कलि-१ । और सत नर्द टूमरों को पन्तर्गस करलेती है, इमलिये वह दम गिनी गई है। + विराट, छन्द दम पचर का है, और यह पद का नाम भी है। टम को मंग्या मे पत्र और प्रव का खानेवाला घन्तर्गत है, जैमा कि ऊपर कहा है, इमनिये दम की संख्या क्लत रूप में अन्द्र और अनादीई । इस प्रयाफ के तात्पर्याश में यड़ी उलझन सी है । यहां उस उपमा को ठीक किया गया है जो पूर्व रेक फेलिये दीगई थी, जैसे कृत भय में निचले अय अन्तर्गत होते है ।मो यहां संवर्ग विद्या की दस संख्या मोरजुए के अयों की दससंख्या द्वारासमता दिसलाई है। और रतन दमरों कोभन्तर्गत घरलती है.जैसे कि मवर्गविद्या के जानने पाले में भरे सारे पुण्य अन्तर्गत होजाते है । पर इसकी उलमन परापर बनी है। शरमाम्य में भी यह सलमती नहीं। ।

मपाठक ४. खण्ड ४॥ [१४३ ] चौथा खण्ड* सत्यकामो ह जाबालो जवालां मातस्मामन्त्रया- ञ्चके 'बह्मचर्य भवति ! विवत्स्यामि, किंगोत्रो ऽहम स्मीति' ॥१॥ सा हैनमुवाच 'नाहमेतद् वेद तात! यद्गोत्रस्त्वमसि । बव्हहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वा- मलभे। साहमेतन्नवेद यद्गोत्रस्त्वमसि ।जबलातु नामा हमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि । स सत्यकाम : एव जाबालो ब्रवीथा इति ॥२॥ सत्यकाम जाबाल [जवाला के पुत्र ]" ने अपनी माता जवाला से पूछा 'मातः ! मैं ब्रह्मचर्य वास करना चाहता हूं, 'मैं किस गोत्र का हूं ॥१॥ 'वेटा ! मै यह नही जानती, तू किस गोत्रका है। परिचारिणी [ आए गए की सेवा करने वाली] के तौर पर बहुत घूमती हुई मैने अपनी जवानी में तुझे पाया है । सो मैं नहीं जानती, व किस गोत्र का है । हां मेरा नाम नबाला है, और तेरा नाम *पूर्व ३॥ १८ ॥ १-में आकाशग्रह के जो चार पाद यतलाए हैं यह उसका विस्तार है, उनमें से प्रत्येक पाद चार २ कलाओं वाला दिखलाया है, इसप्रकार यह सोलह कला घाले की उपासना पोडश कलावाली विद्या कहलाती है । +पति के घर में में सेवा के स्वभाव वाली रहकर अतिथि अभ्या- गतों की सेवा में दत्तचित्त रही, गोत्रादि के स्मरण में मेरा मन नहीं गया, उन्हीं दिनों जवानी में मैंने तुझे पाया और तभी तेरा पिता भर गया, और मैं उसी समय से अनाथा है, सो मैं नहीं जानती तू किस गोत्र का है (शंकराचार्य) पर यहां 'यम्हहं चरन्ती, परिचारिणी,यौवने' यह शब्द उसी अर्थ को स्पष्ट करते हैं, जिसकी आगे (४) में गौतम प्रशंसा की है 'नतदाह्मणी विवक्तुमर्हति ' न सत्यादगा', उसने कहा - --- [१४४] छान्दोग्य उपनिषद् । सत्यकाम है । सो तू यही कहो, कि मै जवाला का पुत्र सत्य काम हूं ॥२॥ सह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच 'ब्रह्मचर्य भग- वति ! वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति' ॥ ३ ॥ त ५ होवाच 'किं गोत्रो नु सोम्यासीति' स हो वाच 'नाहमेतद वेद भो यद्गोत्रोहमस्मि । अपृच्छं मातरं ५ सा मा प्रत्यब्रवीद्" बव्हहं चरन्ती परिचा- रिणी, यौवने त्वामलभे । साहमेतन्न वेद, यद्गोत्र- स्त्वमास । जबाला तु नामाहमस्मि, सत्यकामो नाम त्वमसीति " सोऽह र सत्य कामो जाबालोस्मि भो इति' ॥ ४॥ त ५ होवाच 'नैतदब्राह्मणो विव- तुमर्हति ' समिधं सोम्याहरोपत्वा नेष्ये न सत्यादगा इति' । तमुपनीय कृशानामवलानां चतुः शता गा निराकृत्योवाच 'इमाः सोन्यानुस बजेति' । ता अभि प्रस्थापयन्नुवाच 'नासहस्रेणावर्तेयोत । स ह वर्षगणं पोवास, ता यदा सहस्र र सम्पेदुः ॥ ४॥ यह हारिद्रुमत (हरिद्रुमान के पुत्र ) गौतम गोत्री) के पास आपा और कहा 'भगवन् ! में आपके पाम ब्रह्मचर्य वास करूंगा भगान् ! आपके पास आई ॥३॥ - प्रपाठक ४ खण्ड ५ [ १४५ ] उसने उसे कहा 'सोम्य! तू किम गोत्र का है ?' उसने उत्तर दिया 'भगवन् ! मैं नहीं जानता, मैं किस गोत्र का हूं । मैंने अपनी माता से पूछा था, उसने मुझे यह उत्तर दिया है, "दासी के तौर पर बहुत घूमती हुई मैंने अपनी जवानी मे तुझे पाया है. सो मैं नहीं जानती, तू किस गोत्र का है ? हां मेरा नाम जवाला है और तेरा नाम सत्यकाम है। 'सो हे भगवन् ! मैं जवाला का पुत्र सत्यकाम हूँ' ॥ ४ ॥ उसने उसे कहा 'यह वात सिवाय ब्राह्मण के कोई साफ नहीं कह सक्ता। ना सोम्य समिधा ले आ, मैं तेरा उपनयन करूंगा । तू सचाई से नहीं गया है (इधर, उधर नहीं गया है)* तब उसका उपनयन करके, उसने पतलीदुवली चार सौ गौए अलग करके उसे कहा 'हे सोम्य ! इनके पीछे जाओ। उसने उनको हांक लिया ( और मन में) कहा 'मैं वापिस नहीं आऊंगा. जय तक यह हज़ार न होनाएं। यह बहुत बरम (जंगल में ) रहा । जब वह (गौएं ) हज़ार होगई ॥५॥ पांचयां गण्ड अथ हैन मृपभोऽभ्युवाद 'सत्यकाम३ गते' 'भगव इति' ह प्रतिशुश्राव । 'प्राप्ताः सोम्य ! सहस्र ५ स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १॥ ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति' । 'नवीतु मे भगवा- निति'। तस्मै होवाच 'प्राची दिक् कला, प्रतीचीदिक कला दक्षिणा दिकलादीची दिक् कला । एपवे सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥ * इस पर देयो घेदान्त०२।३।३६-३७ ॥

[ १४६ ] छान्दोग्य उपनिपद् । स य एतमेवं विदा ५ श्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते, प्रकाशवानस्मिँलोके भवति, प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति, य एतमेवं विद्धा श्व तुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥३॥ तय उसे बैल ने कहा 'सत्यकाम!! 1 उसने उत्तर दिया 'भगवन् ! बैल ने कहा ] मोम्य ! हम हजार होगए हैं, हमें आचार्य के घर ले चलो' ॥१॥ 'और मैं तुझे ब्रह्म का एक पाद बतलाऊंगा'। [ उसने कहा ] 'भगवन् ! मुझे यतलाइये ॥ उसको उसने कहा ' पूर्व दिशा एककला है, पश्चिम दिशा एक कला है, दक्षिण दिशा एक कला है, उत्तर दिशा एक कला है । हे सोम्प ! यह ब्रह्म फा चार कलाओं पाला पाद प्रकाशवान (मकाश वाला] कहलाता है ॥२॥ वह जो इस मकार जानता हुआ ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले पाद को प्रकाशवान नाम से उपासता है, वह इस लोक में - * घर की महिमा सर्वत्र विस्तृत है, उसकी महिमा और उपा. सना का सरि के अन्यपदार्थ भी उसी तरह उपदंश देरह है, जैसे माचार्य शिष्य को उपदेश देते है। सत्य सामने सो विद्यायल आदि से मीगी, उसका उनके संवाद हारा भरद्वार से वर्णन किया है। 'माय शाम पी घसा और तप से वायु देवता ने प्रसन्न होकर चल में प्रा गरके उममे मयाद क्रिया (शकराचार्य) . प्रपाकठ ४ खण्ड ६ [१४७ ] प्रकाशवाला होता है, और प्रकाश वाले लोकों को जीतता है *। जो इस प्रकार जानता हुआ ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले पाद को प्रकाशवान नाम से उपासता है ॥ ३ ॥ छटा खण्ड अमिष्टे पादं वक्तेति'। सह श्वोभते गा अभिप्रस्था पयाञ्चकार। ता यत्राभिसायं बभूवुः, तत्राग्नि मुपस- माधाय, गा उपरुभ्य, समिधमाधाय, पश्चादमे पाडु पोपविवेश ॥१॥ तमनिरभ्युवाद 'सत्यकाम ३ इति 'भगव इति' प्रतिशुश्राव ॥ २॥ 'ब्रह्मणःसोम्य ते पादं ब्रवाणीति 'ब्रवीतु मेभग- वानिति । तस्मेहोवाच 'पृथिवी कलाऽन्तरिक्ष कला योः कला समुद्रः कला, एप वे सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३॥ स य एतमेवं विद्धा ५श्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽन- नन्तवानित्युपास्ते,अनन्त वानस्मॅिल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जयात, यएतमेवं विदाश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ऽनन्तवानित्युपास्ते ॥४॥ * प्रकाश चाला होना इस लाक का फल है, और प्रकाश वाले लोकों को जीतना अहए फर है। इसी प्रकार आगे भी दो २ फर इसी अभिप्राय से है।

, [ १४८] छान्दोग्य उपनिषद् । 'अग्नि तुझे बहा का एक पाद कहेगा ।। (यह कहकर बैलचुप होगया) उसने दूसरे दिन गौओ को हांक लिया (आचार्य के घर की ओर)। और जहां उन्हें सायंकाल हुआ, वहां उसने अग्नि जलाई, गौओं को रोक दिया, अग्नि में ममियाधान किया * और अग्नि के पीछे पूर्वाभिमुख धैठगया ॥१॥ अग्नि ने कहा 'सत्यकाम' उसने उत्तर दिया 'भगवन् ' अग्नि ने कहा 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्म का एक पाद बतलाऊंगा' उसने उत्तर दिया 'भगवन् ! मुझे बतलाइये' उसने उसे कहा पृथियी एक कला है, अन्तरिक्ष एक कला है, धौ एक कला है, समुद्र एक कला है । यह ब्रह्म का चार कलावाला पाद अनन्तवान् [अन्तरहित ] नाम है ॥३॥ वह जो इस प्रकार जानता हुआ ब्रह्म के इस बार कला वाले पाद को अनन्तवान् नाम से उपासता है, वह इसलोक में 'अन्तरहित [सन्तान की परम्परा से ] होना है। वह अन्तराहेत लोकों को जी- तता है, जो इस प्रकार जानता हुआ बल के इस चार कला वाले पाद को अनन्तवान नाम से उपासता है ॥४॥ मातयां राण्ड ह ५ सस्ते पादं वक्तेति' । सह थोभूते गा अ- भिप्रस्थापयाचकार । ता यत्राभिसायं बभूयुः, तत्राग्नि मुपसमाधाय गाउपरुध्य समिधमाधाय,पश्चदग्ने प्राङ पोपविवेश ॥ १॥ ** अग्नये समिधमाशप'.. मन्त्र से अग्नि में समिधा डालना विद्यार्थी का नित्यकर्तव्य है। .

प्रपाठक.४. सण्ड [ १४९ ] तहस उपनिपत्याभ्युवाद 'सत्यकाम३ इति'। भगव! इति' ह प्रतिशुभाव ।। २॥ 'ब्रह्मणःसोम्य !ते पादंबूवाणीत"यूषीतु मे भगवा निति' तस्मै होवाच 'अग्निः कला, सूर्यः कला,चन्द्रः कला, विद्युत् कला । एप सोम्य चतुप्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिप्मानाम ॥३॥ स य एतमेवं विदा ५श्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्यो- तेष्मानित्युपास्ते, ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति, ज्यो- तेष्मतो हलोकाञ्जयति, य एतमेवं विद्धाश्चतुष्कलं द ब्रह्मणो ज्योतिप्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ हंम * तुझे ब्रह्म का एक ओर पाद कहेगा' ( यह कहकर वह चुप होगया) उसने दमरे दिन गौओं को हांक लिया. और जहां सायंकाल हुआ, वहां उसने अग्नि जलाई,गौओं को रोकदिया, अग्नि में समिधा- धान किया और अग्नि के पीछे पूर्वाभिमुख बैठगया ॥१॥ तब हम उड़कर उसके पास आया और कहा 'सत्यकाम। उसने उत्तर दिया 'भगवन् ॥॥ (हंस ने कहा) 'सोम्य में तुझेब्रह्म का एक और पाद बतलाऊंगा' *हंस, सूर्य से अभिप्राय है-क्योंकि भ्वत है,आकाश में उड़तासा प्रतीत होता है, और आगे उमने ज्योति के विषय में ही सत्यकाम को उपदेश भी दिया है (शंकराचार्य)

[ १५० ] छान्दोग्य उपनिपद ।
( उसने उत्तर दिया ) भगवन् ! मुझे क्तलाइये। उसने कहा
अगि
एक कला है, सूर्य एक कला है, चन्द्रमा एक कला है
विजली एक कला है। हे सोम्प ! यह चार कलाओं वाला ब्रह्म का
पाद ज्योतिप्मान (ज्योति से पूर्ण ) नाम है ॥३॥
वह जो इस प्रकार जानता हुआ ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले
पाद को ज्योतिष्मान नाम से उपासता है, वह इस लोक में ज्योति से
पूर्ण लोकों को जीतता है, जो इस प्रकार जानता हुआ ब्रह्म के इस )
चार कलाओं वाले पाद को ज्योतिप्मान नाम से उपासता है ॥४॥
• थाठवांगण्ड
मद्गुष्टे पादं वक्तेति । सहयोभूते गा अभिप्रस्थाय
याञ्चकारातायनाभि सायंबभूवुः तत्रामि मुपसमाधाय,
गाउ परुभ्य, समिधमाधाय,पश्चादमे पाकुपोपविवेश ।।
तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद 'सत्यकाम ३ इति''
'भगवव ! इति' ह प्रतिशुश्राव ॥२॥
'ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति' ब्रवीतु मे भगवा-
तिति' तस्मैहोवाच 'प्राणः कला, चक्षुः कला, श्रोत्रं
कला,मनः कला ।एप वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण
आयतनवान्नाम ॥३॥
स य एतमेवं विदा ५ श्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आय-
तनवानित्युपास्ते, आयतनवानस्मॅिल्लोके भवत्याय-
तनवतो हलोकाञ्जयति, य एतमेवं विद्रा ५श्चतुष्कलं
पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ॥४॥

मपाठक ४. खण्ड [२५१ 'मद्गु* तुझे ब्रह्म का एक और पाद कहेगा' (यह कह कर हंस चुए हो गया) उसने दूसरे दिन गौओं को हांक लिया, और जहां उन्हें सायंकाल हुआ, वहां उसने अग्नि जलाई, गौओं को रोक दिया, अग्नि में समिधाधान किया और अग्नि केपीछे पूर्वाभिमुख बैठगया।१॥ वव एक मद्गु उड़कर उसके पास आया, और कहा 'सत्यकाम' उसने उत्तर दिया 'भगवन्' ॥२॥ (मद्गुने कहा) सोम्यमै तुझे ब्रह्म काएक और पाद बतलाउंगा' (उसने उत्तर दिया) 'भगवन् ! मुझे वतलाइये ॥ उसने उसे कहा 'प्राण एक कला है, नेत्र एक कला है, श्रोत्र एक कला है, मन एक कला है । हे सोम्य ! यह चार कलाओं वाला ब्रह्म का पाद आयतनवान् (घर वाला) नाम है ॥ ३ ॥ वह जो इस प्रकार जानता हुआ ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले पाद को आयतनवान नाम से उपासता है, वह इस लोक में घरों का मालिक होता है, और उन लोकों को जीतता है जहा उसे घर (आश्रय) मिलते हैं, जो इस प्रकार जानता हुआ ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले पाद को आपतनवान नाम से उपासता है॥४॥ नयां खण्ड प्राप हाचार्यकुलं । तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम३ इति । 'भगव इति' ह प्रति शुश्राव ॥१॥ * मद्गु, पानी में डुयकी लगाने वाला पक्षी विशेष, यहां अमि- प्राय प्राण से है क्योंकि उसफा जलों से सम्बन्ध है (शंकराचार्य) . 1.१५२ ] छान्दोग्य उपनिषद। ब्रह्मविदिव वै सोम्य ! भासि, को नु त्वाऽनुशशा- सेति' 'अन्ये मनुष्येभ्य इति' ह प्रतिजज्ञे । 'भगवाँ स्त्वेव मे कामे चूयात् ॥२॥ श्रुत ५ ह्येव मे भगवदृशेभ्य आचार्याद्वैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयतीति' तस्मै हैतदेवोवाच, अत्र ह न किञ्चन वीयायेति वीयायेति ॥ ३ ॥ इस तरह वह आचार्य के घर पहुंचा। उमे आचार्य ने बुलाया 'सत्य काम' । उसने उत्तर दिया 'भगवन् ॥१॥ (आचार्य ने कहा) सोम्य तुम ब्रह्मवेत्ता की तरह चमक रहे हो* | किसने तुझे शिक्षा दी है । उसने उत्तर दिया 'मनुष्योंने नहीं पर हे भगवन् मै चाहता हूं, केवल आप ही मुझे उपदेश दें ॥२॥ क्योंकि हे भगवन् ! मैने आप जैसे महा पुरुषों से सुना हुआ है, कि विद्या जो आचार्य से ही जानी गई है, वही असली भलाई तक पहुंचाती है । । तब उसने उसे यही (विद्या जो बैल आदि ने उपदेश दी थी) सिखलाई, इम मे कुछ छोड़ा नहीं गया (यह विद्या पूर्ण है) हा, कुछ छोडा नही गया ॥३॥ + इन्द्रिय प्रसन्न, मुस सिला हुआ, निश्चन्त और कृतार्थ हुए प्रतीत होते हो। यह बहुन अनुचित होगा, यदि मत्य फाम ने अपने स्वीकार "किये हुए आचार्य के मिवाय किमी दुसरे मनुष्य से जाफर ब्रह्मविद्या ग्रहण भी हो + अक्षरार्थ-मनुष्यों में मिन्नों ने (शिक्षा दी है) ६ मे काम' अक्षरार्थ-मेरी इच्छा पर ॥

मपाटक४ खण्ड १० दसवांखण्ड ।' उपकोसलो हवे कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्य मुवास । तस्य ह द्वादश वर्पाण्यग्नीन परिच- चार । स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयन्, त ५ हस्मैव न समावर्तयति ॥१॥ तं जायोवाच 'तप्तो ब्रह्मचारी,कुशलमग्नीन् परि- चचारीमा वाऽग्नयः परिभवोचन्, प्रबृह्यस्मा इति' तस्मै हापोच्यैव प्रवासाचक्रे ॥ २ ॥ सह व्याधिना निशितुं दधे। तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिनशान, किं नु नाश्नासीति' । सहोवाच 'बहव इमे पुरुष कामा नानात्यया व्याधिभिः प्रति- पूर्णो ऽस्मि, नाशिष्यामीति' ॥३॥ अथ हाग्नयः समुदिरे 'ततो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीत् , हन्तास्मे प्रबवामेति' तस्मे होचुः ॥ ४ ॥ 'प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति' । स होवाच 'विजा नाम्यहं, यत्लाणो ब्रह्म, कञ्च तु खञ्च न विजानामांति'। *भिवरणबल उपामना कहकर अब उपकोमल विद्या मे शुद्ध (दस्थ ब्रह्म) और शबन्न (प्राण,आदित्य पुरुष प्रादि) को एक मात्र उपासनाए बतलाई है। और इमलिये यह अात्मविद्या पोर अग्निविद्या कहलाती है। उपासना का फल मरने के पीके शुक्लगति वतलाई है और पाग्यायिका द्वारा पूर्ववत् अदा और तप को ब्रह्मविद्या का माधन बतलाया है। 13 [ १५४ ] छान्दोग्य उपनिपद। ते होचुः यदेव कं तदेव खं,यदेवखंतदेव कमिति। प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः॥५॥ उपकोसल कामलायन (कमल की सन्तान) ने सत्यकाम जावाल के पास ब्रह्मचर्य वास किया। उसने बारह बरस उसकी अग्नियों [ गाईपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय) की सेवा की । आचार्य ने यद्यपि दूसरे शिष्यों का समावर्तन कर दिया [वेदाध्ययन कराकर अपने घर वापिस लौटा दिया पर केवल उपकोसल का समावर्तन नहीं किया ॥२॥ तव उसे पत्री ने कहा 'यह ब्रह्मचारी बहुत तप चुका है [तप करते २ थक गया है ] बड़ी सावधानी से इसने आग्नियों की सेवा की है। ऐसा न हो कि अग्निये तुझे दोप दें, सो आप इसे उपदेश देवें । पर आचार्य उसे विना उपदेश दिये ही यात्रापर चलेगए॥२॥ अब उस [ब्रह्मचारी] को शोक से खाना खाने की रुचि नहीं हुई। तब उसे आचार्य की पत्नी ने कहा 'ब्रह्मचारिन् ! खाओ क्यों तुम नहीं खाते हो' ? उसने कहा 'इस पुरूप में बहुत सी काम- नाएं हैं, जो उसे इधर उधर डुलाती हैं, मैं शोकों से भर रहा हूं, मैं खाना नहीं खाउंगा' ॥३॥ तब अग्नियों ने आपस में कहा 'यह ब्रह्मचारी तप से थक गया है, बड़ी सावधानी से इसने हमारी सेवा की है । अच्छा हम इसे उपदेश दें। तब उन्होंने उसे कहा * ॥ ४ ॥ 'माण ब्रह्म है, क [मुख] ब्रह्म है, ख [आकाश] ब्रह्म है। * अग्नियों द्वारा जो उस पर परब्रह्म की महिमा का प्रकाग हुधा, उसे इसमें पाख्यायिका की भान्ति वर्णन किया है।

क प्रपाठक '४. खण्ड ११ उसने कहा 'मैने समझ लिया है, कि माण ब्रह्म है, पर मै और ख नही समझा। उन्होंने कहा 'जो क है, वही ख है, जो ख है, वही क है।। सो उन्होंने इस प्रकार उसे प्राण का [ब्रह्म के तौर पर] और उसके आकाश [हृदयाकाश] का उपदेश दिया ॥५॥ ग्यारहवांसण्ड अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास' पृथिव्यग्निरनमा- दित्य इति । यएप आदित्ये पुरुषो दृश्यते, सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति' ॥१॥ सयएतमेवं विद्धानुपास्ते, अपहते पापकृत्यांलोकी भवति, सर्वमायुरेति, ज्योगजीवति, नास्यावरपुरुषाः * नही समझा, इसका अभिप्राय है, कि क सुख को कहते है, पर वह नाशवान् है और ख आकाश का नाम है, वह चेतन नहीं, यह कैसे ब्रह्म हो सकते है। कि के अर्थ मुख और ख के अर्थ आकाश है, जब यह दोनों एक दूसरे के विशेषण कर दिये गए, तो अब यह हृदयस्थब्रह्म को बोधन करते है । अब क विषय मुख को नही कह सका, किन्तु ऐसे मुख का नाम है, जो प्राकाश मे सम्बन्ध रखता है। वह शुदयाकाशस्थ ब्रम . है। और ख अब भौतिक आकाश का नाम नहीं रहा,किन्तु उस चेतन अाकाश से अर्थात् उस व्यापक चेतन से अभिप्राय हो गया है जो मुख स्वरूप है। और इस प्रकार क और ख दोनों मिलकर हृदयस्य शबछ को कहते हैं। और प्राण हृदय से सम्बन्ध रखने से गबल बन है। # 'तदाकाग उसका प्राकाश, आकाश जो दृदय में है, जिस में . माण का सम्बन्ध है।

२५६ - छान्दोग्य उपनिषद् क्षीयन्ते । उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिँश्चलोकेऽमुष्मि ५श्व, य एतमेवं विदानुपास्ते ॥ २॥ अव * इसको गार्हपत्य अग्नि ने शिक्षा दी 'पृथिवी, अग्नि, अन्न और सूर्य । यह मेरे शरीर हैं, (वा ब्रह्म के शरीर हैं)। वह पुरुष जो यह सूर्य में दीखता है, यह मै हूं, वहीं मैं हूं। वह जो इसको इस प्रकार जानता हुआ उपासता है, वह पाप कर्म को दह करदेता है, [गार्हपत्य अग्नि के ] लोक का मालिक वनता है, पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, उज्वल जीता है, उसके निचले पुरुष (सतन्ति) क्षीण नहीं होते। हम [ अग्नयें ] उसकी रक्षा करती हैं, इसलोक में और उस लोक में, जो कोई इसको इस प्रकार जानता हुआ उपासता है... वारहवां राण्ड अथ हैनमन्वाहार्यपचनो ऽनुशशास 'आपो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति । य एष चन्द्रमसि पुरुपो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति' ॥१॥ *पूर्व अग्नियों ने मिलकर उसे प्राण और क,ख, ब्रह्म की शिक्षादी है। अब यह अलग २ अपने २ विषय की विद्या उसे बतलाती है इन चारों में परस्पर क्या सम्बन्ध शंकराचार्य कहते है, अग्नि और सूर्यसमानधर्मवाल है, अर्थात खाने वाले, पकानेवाले और प्रकाश देनेवाले है,इसलिय यह एकही तत्त्व है,और पृथिवी और अन्न इनका भोज्य है।प्रधान अंश यहां यहहै कि इन सब में एक ब्रह्मका प्रकाश है ।। सा स्पर शवल ब्रह्म का स्वस्प दिरालाया है, जो सूर्य में बेतन है, वही गार्हपत्य में है। गाहपन्य में उसी की उपासना जसे सूर्य प्रदीप्त होता है। सन .

प्रपाठक ४. खण्ड १३ [ १५७ ] 'स-य एतमेवं विद्धानुपास्ते, अपहते पापकृत्यां, लोकी भवति-सर्वमायुरेति, ज्योग् जीवति, नास्यावर- पुरुषाः क्षीयन्ते । उप वयं तं भुञ्जामो स्मि ५ श्लोके {ऽमुष्मि ५श्य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ अब इसको दक्षिणानि ने शिक्षा दी 'जल, दिशाएं, नक्षत्र और चन्द्रमा [यह मेरे शरीर है ] वह पुरुष जो चन्द्रमा में दीखता है, वह मैं हूं, वहीं मैं हूँ ॥१॥ वह जो इसको [दक्षिणानि को] इस प्रकार जानता हुआ • उपासता है, वह पाप कर्म को दूर कर देता है, [दक्षिणामि के] लोक का मालिक बनता है, पूर्ण आयु को माप्त होता है, उज्वल जीता है, उसकी सन्तति क्षीण नहीं होती । हम उसकी रक्षा करती है, इस लोक में और उस लोक में, जो इसको इस मकार जानता वा उपासता है ॥२॥ तेरहवां खण्ड • अथ हैनमाहवनीयो ऽनुशशास 'प्राण आकाशो 'चौर्विद्युदिति । यएप विद्युति पुरुषोदृश्यते,सोऽहमस्मि, स एवाहमस्मीति ॥१॥ सय एतमेवं विद्धानुपास्ते,अपहतेपापकृत्या,लोकी भवति, सर्व मायुरेति, ज्योग् जविति, नास्पावरपुरुषाः दपिलग्नि और चन्द्रमा ज्योति वाले होने से एक है नन और अपर मन में नशा भी चन्द्रमा के भोग्य माने गए है (कराचार्य) , [१५८ ] छान्दोग्य उपनिषद श्रीयन्ते । उप वयं तं भुजामो ऽस्मि ५W लोके मु. मि ५, य एतमेवं विद्धानुपास्ते ॥ २॥ अब इसको आहवनीय ने शिक्षा दी 'माण, आकाश, बौ और विजली [यह मेरे शरीर हैं] 1 वह पुरुष जोविजली में दीanा) है, वह मै हूँ, वही मै ह' ॥ १॥ वह जो इसको [आहवनीय को] इस प्रकार जानता हुआ उपासता है, वह पाप कर्म को दूर कर देता है,, [ आहवनीय के] लोक कामालिकवनता है, पूर्ण आयु को पास होता है, उज्वल जीता है, और उसकी सन्तति क्षीण नहीं होती । हम उसकी रक्षा करती है इस लोक में और उस लोक में, जो इसको इस प्रकार जानता हुआ उपासता है ॥२॥ चौदहवां खण्ड ते होचुः उपकोसलैपा सौम्य! तेऽस्मदविद्यात्म विद्या च, आचार्यस्तु ते गति वक्तेति आजगाम हास्या चार्यः। तमाचार्योऽभ्युवाद उपकोसल ३ इति ॥१॥ - 'सभगव इति' ह प्रतिशुधाव 'ब्रह्मविद इव सोम्य ! ते मुखंभाति,कोनुत्वाऽनुशशासेति'। कोनुमाऽनुशिष्या ट्रो इति' हापेव निन्हुते 'इमे नूनमीदृशा अन्याह- 'शाइति' हामीनभ्यूदे ' किंतु सोम्य किल तेऽअवोच निति ॥२॥ 'इदमिति' ह प्रतिजज्ञे लोकान वाव किल सो- म्य ते ऽवोचनहं तु ते तवक्ष्यामि, यथा पुष्करपलाश मपाठक ४ खण्ड १४ [ १५९ ] आपो न श्लिष्यन्ते, एवमेवंविदि पापं कर्म न लिप्य ते इति' 'ब्रवीतु मे भगवानिति ' तस्मै होवाच ॥३॥ । तब उन्होंने [फिर मिलकर] कहा 'उपकोसल सोम्य ! यह तुझे हमारी विद्या [ अनिविद्या ] है और आत्मविद्या [ पूर्वोक्त- माणोब्रह्म क ब्रह्म ख ब्रह्म' यह ] है । पर आचार्य तुझे गति [परलोक का मार्ग ] कहेगा' [समय पाकर ] उसका आचार्य आगया। आचार्य ने उसे कहा 'उपकोसल ' उसने उत्तर दिया 'भगवन् । [आचार्य ने कहा ] 'सोम्यं ! तेरामुख उस पुरुष की तरह चमक रहा है जिसने ब्रह्म को जान लिया है । किसने तुझे अनुशासन किया है।" [उसने कहा ] 'भगवन् ! कौन मुझे अनुशासन करसक्ताया। इस प्रकार उसने इन्कार सा किया । और आग्नियों की ओर ध्यान करके कहा 'यह अग्नियें जो इस प्रकार की है तब औरही प्रकार की थी' [आचार्य ने कहा ] हे सोम्य ! तुझे इन अग्नियों ने क्या उपदेश किया है। उसने उत्तर दिया 'यह (अर्थात जो अमियों का उपदेश था वह कह सुनाया) [आचार्य ने कहा ] 'हे सोम्य ! तुझे उन्होंने लोक [पृथिवी आदि ] ही बतलाए है *, पर मै तुझे वह बतलाउगा, कि निम तरह कमल के पत्ते पर जल नहीं चिमटते, इस प्रकार इस विद्या के नानने वाले को पापकर्म नही चिमटता है। "उसने कहा 'भगवन् मुझे बतलाए। उमको उमने कहा ॥३॥ . * न कि ब्रह्म पूरे तौर पर (शकराचार्य) [१६] छान्दोग्य उपनिषद्। पन्द्रयां सड . 'य एषोऽक्षणि पुरुषो दृश्यते, एष आत्मेति' होवाच 'एतदमृतमभय मेतद् ब्रह्मेति' तयद्यप्यस्मिन् सर्पि- वोंदकं वा सिञ्चन्ति, वर्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥ एत संयदाम इत्याचक्षते, एत हि सर्वाणि वा- मान्यभिसंयन्ति । सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति, य एवं वेद ॥२॥ एष उएव वामनीः, एष हि सर्वाणिवामानि नयति। सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ॥ ३॥ एष उ एव भामनी, एप हि सर्वेषु लोकेषु भाति । सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४॥ उसने कहा 'जो यह आंख में (दृष्टि का द्रष्टा) पुरुष दीखता है, यह आत्मा है । यह अमृत है, यह ब्रह्म है* । सो चारे इस (आंख) में घी वा पानी को डालते हैं, वह दोनों किनारों को ही चला जाता है (आंख निर्लेप ही रहती है, जैसे कमल का पर्चा पानी से)* ॥॥ 'इसको संपदाम कहते है, क्योंकि सारे सौन्दर्य (चाम) इसको मात होते हैं, सारे सौन्दर्य इस को माप्त होते है, जो इस मकार जानता है (उपासता है)॥२॥ *21018 में यह प्रजापति का उपदश भी है। 1 भान मपने अन्दर आई हुई पस्तुमों से निलेप है, इसी प्रकार यह सब में रह कर भी निलेप है-मिलामो-आन्दो०४।१४॥३ * सयज्ञाम म्याम-पर्मफल, संयन्ति उत्पन्न होते हैं (लके . मपाठक ४. खण्ड १५ [१६१ वह वामनी भी है, क्योंकि यह सारे सौन्दयों (बाम) को सास कराता है (नयति)। वह सारे सौन्दयों को प्राप्त कराता है, जो इस प्रकार जानता है ॥३॥ यह मामनी भी है, क्योंकि यह सारे लोकों में चमकता है । बह सारे लोकों में चमकता है, जो इस प्रकार जानता है* ॥ ४ ॥ अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि चन,अर्विष मेवाभि सम्भवन्त्यर्चिपोऽहरन्ह आसूर्यमाणपक्षमापूर्य माणपक्षाद या पडदड्डेति मासा ५ स्तान,मासेभ्यः संवत्सर५ संवत्सरादादित्यमादित्याचन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं, तत्पुरुषो ऽमानवः ॥ ५ ॥ ., स एतान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथः । एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्त नावर्तन्ते ॥६॥ अब चाहे वह (ऋविज्) उनके लिये शवकर्म (अन्त्येष्टि संस्कार) करते हैं, चाहे नहीं, सर्वथा वह (उपासक) किरण (आ) को प्स होते है, आँच से दिन को, दिन से शुक्ल पक्ष को, शुक्लपक्ष रा)अथांतकम फलों के उदय का हेतु है। धामनो-धाम। कर्मफल, माप्त कराने वाला । अर्थात् कर्म फलों का दाता भी यही है । गमनी सब का प्रकाशक (गोविन्दानन्द) *यह अक्षिपुरप पर ब्रह्म है, इसी को पूर्व क, ख, और यहां यामादि कहा है । देखो येदान्त ९।२।१३-१७॥ यह प्रमविद् ( उपासक) की गति यतलाई है. गृहस्थ को पने मारलौकिक कर्म करने के लिये अग्न्याधान कर उन अग्नियों में - [ १६२] छान्दोग्य उपनिषद् । से उन छ: महीनों को जिन में सूर्य उत्तर को जाता है, महीनों से वरम को, वरस से सूर्य को, सूर्य से चन्द्रमा को, चन्द्रमा से विजली को । वहां एक अमानव (जो मानुषी सृष्टि का नहीं) पुरुष है ॥४॥ वह इन को (सत्यलोकस्थ) ब्रह्म को पहुंचाता है । यह देव पथ (देवताओं का मार्ग) है,ब्रह्मपथ है( वह मार्गजो ब्रह्म को पहुंचाता है)। वह जो इस मार्ग से जाते हैं, इस | मानवचक्र (मानुपी जीवन) को वापिप्त नहीं आते हैं, हां, वापिस नहीं आते ॥६॥ दर्शपूर्णमासादि इष्टियों और सोमादि यशों का फरना आवश्यक है। और जब वह मरता है तो उसके स्विज उन्हीं अग्नियोंको ले जाकर यशपात्रों समेत उसका विधिपूर्वक दाहसंस्कार करते हैं । यह संस्कार उस पुरुष का, जो पूर्वोक्त अग्निविद्या और आत्मविद्या की जानता है, हो, चाहे न हो, इस से उसका कुछ बढ़ता घटता नहीं, यह सर्वथा शुक्लगति को ही प्राप्त होता है। इस कथन से यह बात अर्थ सिद्ध होती है, कि जो इस उपासनावाले नहीं, उनका ययाविधि अन्त्येष्टि संस्कार न होना उनको उत्तरमार्ग वा तत्क्षण उत्तरमार्ग की प्राप्ति का वा फर्मफल के बारम्भ का प्रतियन्धक है । और यह कदाचित इसलिये सम्भय हो, कि उसके लिङ्गदेह के सम्बन्धको इस शरीर से तोड़ने में दाहसंस्कार सहायक हो। विना दाह के उस का लिङ्गन्देह देर तक वहीं प्रतिवद्ध रहता हो । तथापि निर्धारण के लिये किसी प्रमाण की अपेक्षा है।यहां उपासक के लिये दाहसंस्कार में अनादर दिसलाने से विद्या की स्तुति की गई है, यह अभिप्राय नहीं फि उसका दाहसंस्कार नहीं करना चाहिये । * मिलाओ, खान्दो० उप०५११०११, यह आर० उप०६.२०१५ और गीता ॥२॥शंकराचार्य यहां अर्चि,दिन आदिसे उनके अभिमानी देयता लेते हैं। 'रस'इस विशेषण देने से यह सूचित किया है, कि इस कल्प में उनकी आवृत्ति नहीं होती, किन्तु कल्पान्तर में होती है (आनन्दगिरि) 1 मपाठक ४ खण्ड १६ [ १६३] सोलहवां खण्ड * - एष हवै यज्ञो योऽयं पवते। एप हयन्निद ५ सर्व पुना ति । यदेष यान्निद सर्वेपुनाति, तस्मादेषएव यज्ञः। तस्य वाचमनश्च वर्तनी।।। तयोरन्यतरां मनसा स ५स्करोतिब्रह्मा, होताऽध्वर्यु लगातान्यतरां। स यत्रोपाकृते प्रातरवाके.पुरा परिधा नीयाया ब्रह्मा व्यववदति । २। अन्यतरमेव वर्तनि ५सर स्करोति हीयतेऽन्यतरा। स यथैकपाद् ब्रजनं रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यांत एवमस्य यज्ञो रिष्यति,यज्ञ रिष्यन्त यजमानोऽनुरिष्य- ति, स इष्ट्वा पापीयान भवति । २। अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाकेन पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदति, उभे एव वर्तनी स५ स्कुर्वन्ति, न हीयते ऽन्यतरा । ४। सयथोभयपाद् व्रजन रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्त मानः प्रतितिष्ठति,एवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति, स इष्टवा श्रेयान् भवति । ५। अग्निविद्या के प्रसंग से यज्ञ में घु.टि होने पर उसके प्रायवित्त के लिये व्यातियो का विधान और ब्रह्मा के लिये मौन का विधान करते हैं। यह विधि भरण्य (जंगल) में उपदेश किया जाता है, इसलिये "उपनिषद में कहा है। इन दोनों खण्डों का विषय ऐतरेय ५११।३२- ३४ और मोषध के तीसरे प्रपाठक में भी पाया। ।

" छान्दोग्य उपनिषद् निःसंदेह यह यज्ञ है, जो यह शुद्ध करता है [अर्थात वायु]*। मह विायु] चलता हुआ हरएक वस्तु को शुद्ध करता है । और निसलिये यह चलता हुआ [यन् ] हर एक वस्तु को शुद्ध करता है, इसलिये यह यज्ञ है। उस [यज्ञ] के दो मार्ग हैं जिनसे या फैलता है] एक मन और दूसरा वाणी ॥१॥ उनमें से एक [मार्ग] को ब्रह्म [ऋत्विज्] मन से सजाता है, और दूसरे [मार्ग ] को होता, अध्वर्यु और उदाता [वाणी से सजाते है] । जव मातरनुवाक के प्रारम्भ होजाने पर परिधानी या [ऋचा] से पहले ब्रह्मा [ऋतिज् ] [अपना मौन साम-देवा है और] बोल पडता है ॥ २॥ तो वह केवल एकही [वाणी के ] मार्ग को सजाता है, और दूसरे [मार्ग] को हानि पहुंचती है । सो जैसे कोई पुरुष एक पाओं से चलता हुआ, या रय एक पहिये से घूमता हुआ हानि उठाता है, इस प्रकार इसका यह हानि उठाता है, जब यज्ञ को हानि पहुंचती है,तो.वह (यजमान) यज्ञ करके अधिक पापी बन जाता है ॥३॥ * ममिष्ट यजु “स्वाहा वाते धा” में यन की स्थिति वायुम कही है और वायु गुद्धि का हेतु है, इमलिये वायु को यत्र कहा ॥ जिब दूसरे ऋत्विज् यज्ञ में अपने २ मत्री को पटते रे, प्रमा त्विज चुप चाप रहता है, या के कर्म को मन से देखता है, और यह ध्यान रखता है, कि कोई त्रुटि न हो। और यदि कोई धुटि हो जाए, तो वह उसका प्राययित्त करता है । यह ब्रमा का काम यन्न मे उपासना के मदृश है । इमलिये उसके काम का उपनिषद में वर्णन +पारनीकिक कर्म या भावना में और यथावधिनी-बोना पाहिये यासापर्य है। - T

भपाठक ४. खण्ड १७
[ १६५
: पर जर्षे वह ब्रह्मा मातरनुवाक के पारम्भ होजाने पर
परिवानीया से पहले २ नहीं बोलता है [ अपना मौन नहीं त्यागताः
है) तब वह [ऋत्विज्] दोनों मार्गों को पूरा २ सजा देते है, उन
में से किसी [मार्ग] को हानि नहीं पहुंचती ॥ ४॥
सो जैसे कोई पुरुष दो पाओं से चलता हुआ, या रथ दोनों
पाइयों से घूमता हुआ प्रतिष्ठित होता है [गिर नहीं जाता, किन्तु
चला चलता है, इस प्रकार इसका [यजमान का ] यज्ञ [मन-
और वाणी के दोनों मागों से चलता हुआ] मतिष्ठित होता है, जब
पा प्रतिष्ठित होता है तो उसके साथ यजमान प्रतिष्ठित होता है;
और वह यज्ञ करके अधिक श्रेष्ठ बन जाता है ॥५॥
सत्तरहवां खण्ड
प्रजापतिलोकानभ्यतपत्, तेषां तप्यमानानासार
प्राबृहदग्नि पृथिव्या वायु मन्तरिक्षादादित्यं दिवः।।१।।
स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्, तासां तप्यमाः
नाना रसान प्राबृहदग्नेचो वायोर्यज़ पिसामा-
न्यादित्यात् ॥ २॥
स एतां त्रयों विद्यामभ्यतपत् तस्यास्तप्यमानाया
रसान पाबृहद, भूरितिभ्यो, भुव इति यजुर्यः
स्वरिति सामभ्यः ॥ ३॥
तद्यवृत्तो रिष्येद, भः स्याहोत गार्हपत्ये जुहुयाद्,
ऋचामेवतद्रसेन वीर्येणर्चा यज्ञस्य विरिष्ट ५ सन्द-
धाति ॥ ४॥

म - 1 [१६६ ] छान्दोग्य उपनिषद। अथ यदि यजुष्टो रिष्येद् ,भुवः स्वाहोत दक्षिणा- ग्नौ जुहुयाद्, यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषों यज्ञस्य विरिष्ट ५ संदधाति ॥५॥ अथ यदि सामतो रिष्येत्, स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात्, साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्ट ५ संदधाति ॥ ६ ॥ तद्यथा लवणेन सुवर्ण ५ सदध्यात सुवर्णेन रजत' ५ रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसर सीसेन लोहं लोहेन दारु चर्मणा ॥७॥ एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या वि- द्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्ट ५ संदधाति । भेषजकृतो हवा एष यज्ञो यत्रैवविद् ब्रह्मा भवति ॥ ८॥ एप हवा उदभवणो यज्ञो, यत्रैवविद् ब्रह्मा भवति । एवंविद ५ हवा एषा ब्रह्माणमनुगाथा 'यतो यत आवर्तते, तत्तद्गच्छति ॥ ९ ॥ मानवो' । ब्रह्मेवेककात्विक 'कुरूनश्वाभिरक्षति' एवं-- विद्धवे ब्रह्मा यज्ञ यजमान ५ सर्वा ५ चर्विजोभि रक्षात । तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानवविदम् ॥१०॥ 4 अपाठक ४ खण्ड १७॥ [१६७ भै जापावे ने लोकों (पृथिवी,अन्तरिक्ष और घौ ) को तपाया "और जब चॅह तपे, तो उसने उनके रस निचोड़े, अग्नि पृथिवी से, वायु अन्तरिक्ष से, सूर्य घाँसे ॥ १ ॥ तब उसने इन तीन देवनाओं को तपापा, और 'जब वह तपे, तो उसने उन के रसों को निचोड़ा, ऋचाएं अग्नि से, यजु वायु से, साम आदित्य (सूर्य) से ॥२॥ तब उसने इस त्रयी विद्या (ऋचा, यजु और सामकी) विद्या को तपाया, और जब तप तपी, वो उस ने इस केरस निचोड़े, भू यह (व्याहृति) ऋचाओं से, भुवः यह (व्याहति ) यजुओं से, स्वः यह (व्याहाते) सामों से ।।३ सो यदि ऋचाओं की ओर से ( पन को) मति पचे (अर्थात होता के कर्म ये कोई त्रुटि वा ममाद हो), तब उसे 'भूर स्वाहा' कहते हुए गाईपत्य में आहुति देनी चाहिये । इस प्रकार बह पाओं के ही रससे और नचाओं के ही वीर्य (पाक्ति) से यह वे उसमत (घाव) को मेल देता है जो ऋचा सम्बन्धी है *rn और पदि यजु की ओर से क्षति पहुंचे (अध्वर्यु के काम में कोई धुटि वा प्रमाद हो) तब उसे 'भुवःस्वाहा' कहते हुए दक्षिणामि में आहुति देनी चाहिये । इस प्रकार वह यजुओं के ही रस से पनु ओं के ही वीर्य(शक्ति) से यह के उस सत को मेलदेवा है जो यतु सम्बपी है ॥५॥ *पयांत चापों के वा ऋचा सम्बधिकर्म न होने का न्यथा होने से यमका जो भाग उस पाई, इसको पहम पाति में मर देता है। मे भरीर का इस शिविरसा से भरजाता, मी प्रकार .

. । १६८] छान्दोग्य उपनिषद् । और यदि सामों की ओर से क्षति पहुंच [उदाता के कर्म में धुटि वा प्रमाद हो] तो उसे 'स्वः स्वाहा' कहते हुए आहबनीष में आहुति देनी चाहिये । इस प्रकार वह सामों के ही रस से और सामों के ही वीर्य [शक्ति] से यज्ञ के उस क्षत को मेल देता है, जो सामसम्बन्धी है * ॥६॥ सो जैसे कोई लवणा के द्वारा सोने को मोने से मेल देवे, चांदी को चांदी से, कलई को कलई से, सिक्के को सिक्के से, लोहे को लोहे से, और चमड़े के द्वारा लकडी को (मेल देवे, बांध देवे) इस प्रकार वह (ब्रह्मा) इन लोकों के, इन देवताओं के, इस त्रयी 'विधा के वीर्य (शक्ति) से (अर्याद व्याहृतियों से ) या के क्षत को मेल देता है । निःसंदेह इस यज्ञ का औषध किया गया है जहा ऐसा जानने वाला ब्रह्मा होता है।॥ ८॥ यह यन्न उत्तर की ओर झुकने वाला होता है, * जहां ऐसा गजानने वाला ब्रह्मा होता है । और ऐसे ब्रह्मा के विषय में यह 'गाथा है 'जहा २ से वापिस आता है, वहा २ मानव (मनुष्य मनु की सन्तान ) पहुंचता है '॥९॥ । *और ममा के काम में जति हो, तो तीनों अग्नियों में तीनी महाष्यासियों से होम की, कोकि ब्रह्मा भयो विद्या बनता है (जंकराचार्य) सवण, बार, टेका, शिस से मोना चादी मनाते हैं। तर की भोर भलता एमा,दक्षिण की ओर से अचा, तापर्धात् उत्तर मार्ग (गुतगति) के प्रति हेतु होता. या मिल्प (मकराचार्य) मानन्दनिरिहता,कि गाथा गायत्री प्रादि शनि मिर तवापि या गावा (वा, संजराचार्य के अनुसार गावा) 4 प्रपाठक ५. खण्ड । [अर्थात् ] अकेला ब्रह्मा ऋत्विज ही 'वह कुरुओं की रक्षा करता है जैसे घोड़ी (रक्षा करती है)। (अर्थात् ) ऐसा जानने वाला ब्रह्मा यज्ञ की यजमान की और सारे ऋत्विजों की रक्षा करता है। इसलिये उसी को ब्रह्मा बनाना चाहिये, जो यह (१६,१७ खण्ड की विद्या को) जानता है, उसको नहीं, जो यह नहीं जानता, हां, उसको नहीं, जो यह नही जानता ॥ १० ॥ पांचवां प्रपाठक * (पहला खण्ड) यो हवै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद,ज्येष्ठश्च हवै श्रेष्ठश्च भवति । प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १॥ , प्राय गायत्री छन्द में है। इसका अमली पाठ यह है 'यतो यत पावर्तते, । तत्तद् गच्छतिमानव', कुरूनावाभिरक्षतिमोर यह किमो पुरानी ऐति- हामिक घटना से लोहुई प्रतीत होती है । इम में करमों में से किसी एक बडे शूरवीर की और उमको घोडी की महिमा गाई गई है-अर्थ यह है 'जहा २ से (सेना) पीछे लोटतो हे, वहा२ वह मानव (मनु की सन्तान) पहुचता है । घोडी कुश्त्रों की रक्षाकरती है (अथात् घोडी बडे वैग से कुरुओं की सहायता के लिये उसे वहा पहुचाती है, जहा उसकी सेना के पाश्री उखड गए है)। यह गाथा यहा यस को सफल बनाते हुए ब्रह्मा के विषय में लगाई गई है, कि महा कही वह या में क्षति देखता है, वहीं पहुंचता है, और कुरुयों की अर्थात् यह के करने वालों को रक्षा करता है। * इस प्रपाठक का उद्देश्य उन भिन्न २ मार्गा का प्रकट करना है,. जिनपर लोग मरने के पीछे चलते हैं। इन भागों में में एक देवपथ है जोशानियों का मार्ग है। जो ब्रा को प्राप्त करता है, जहां से पुनरा- इति नहीं होती। जैमा कि पूर्व ४१११ में वर्णन किया है । दूसरा कर्मियों का है। और तीसरा उनका है जो उमय भ्रष्ट है, जिनका वर्णन यहीं होगा।

[१०] छान्दोग्य उपनिपद यो हबै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति । वाग्वाव वसिष्ठः ॥२॥ यो हवै प्रतिष्ठां वेद, प्रति ह तिष्ठत्यास्म ५ श्रलोके ऽमुष्मि ५श्च । चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ यो हदै सम्पदं वेद, स ५ हास्मै कामाः पद्यन्ते' देवाश्च मानुपाश्च । श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥ यो ह वा आयतनं वेदायतन ५ ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५॥ * जो सबसे बड़े और सबसे अच्छे को जानता है, वह सत्र से बड़ा और सबसे अच्छा बन जाता है. प्राण निःसंदेह सबसे वड़ा और सबसे अच्छा है * ॥१॥ r * पिछले प्रन्थ में अध्यात्मोपासना में प्राय. प्राण का ग्रहण किया गया है, इसका हेतु यह है, कि इस औचित पुरुष में प्राणही मबसे श्रेष्ठ है। यह यहां दिसलाते हैं । यह सारा विषय, वृहदारण्यक ६।१ में भी उससे मिलामो॥ नातं यथा यथोपासते तदेव भयति ।मय से यड़ा होने में यह अभिप्राय है, कि यह याहुत यड़ी गायुफो भोगता है ॥ प्राण मषसे यहाइस लिये है कि यह गर्म में दूसरे इन्द्रियों के मगर होने में पहले अपना पाम आरम्म करना है। दूसरे न्द्रिय अपनर स्थानों में बनाने पर पीछे अपना नाम भारम्भ परत है। माण की श्रेष्ठता यहांदी निर्धारण करेंगे।

- प्रपाठक ५. खण्ड १॥ [१७१ ] जो सबसे बढ़कर अमीर को जानता है, वह अपनों में सबसे बढ़कर अमीर होता है ।वाणी निःसंदेह सब से बढ़ कर अमीर है॥२॥ 'जो दृढ़ स्थिति को जानता है, वह इस लोक और उस लोक में दृढ़ स्थित होता है । नेत्र निःसंदेह दृढ़ स्थिति है ॥ ३ ॥ जो सम्पदा को जानता है, उसकी दैवी और मानुषी दोनों मकार की कामनाएं सम्पन्न ( सफल ) होती है, श्रोत्र निःसंदेह सम्पदा है ॥४॥ . जो घर ( आश्रय) को जानता है, वह अपनो का घर बनता है । मन निःसदेह घर है* ॥५॥ अथ ह प्राणा अह ५ श्रेयसि व्यूदिरे, 'अह ५ श्रेयानस्म्यह श्रेयानस्मीति । तेह प्राणाः प्रजापति पितरमेत्योचुः ‘भगवन् ! को नः श्रेष्ठ इति' । तान् होवाच 'यस्मिन् व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत, सवः श्रेष्ठ इति' ॥७॥ साह वायुच्चक्राम, सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच । कथमशकतर्ते मजीवितुमिति' । 'यथा कला अवद- * वाणी मय से बढकर अमीर है, क्योंकि अच्छा योलने वाले दूसरों को दबारेते हैं । नेत्र दृढस्थिति है, क्योंकि नेत्र से देखता हुभा पुरष सम और विषम दोनों जगह दृढ सड़ा होसक्ता है। श्रीर मम्ण्दा है, क्योंकि श्रोन से घेद सुना जाता है, और तदनुसार धर्म करने से सम्पदा मिलती है । मन घर है, क्योंकि इन्द्रिय जो अपने २ विपयों के ज्ञान की भेंट आत्मा को देना चाहते हैं, यह मन में रख दंते है (शकराचार्य)

[ १७२ ] छान्दोग्य उपनिषद् ।
न्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुपा शृण्वन्तः श्रोत्रेण
ध्यायन्तो मनसेवमिति' प्रविवेश ह वाक् ॥ ८॥
चक्षुर्दोच्चकाम । तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच
'कथमशकततें मजीवितुमिति' । 'यथाऽन्धा अपश्य-
न्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण
ध्यायन्तो मनसैवमिति' । प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥
श्रोत्र ५ होचक्राम । तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्यो-
वाच 'कथमशकततें मजीवितुमिति' । 'यथा बधिरा
अभृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्च
क्षुपा ध्यायन्तो मनसैवमिति' प्राविवेश हश्रोत्रम्॥१०॥
मनो होचकाम । तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच
'कथमशकततें मजीवितुमिति' । 'यथा बाला अम-
नसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा
शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति' । प्रविवेश हमनः ॥११॥
अथ ह प्राण उच्चिक्रमिष्यन्त्सयथा सुहयः पद्वीश-
शङ्कन संखिदेदेवमितरान् प्राणान् समखिदत् । त ५
हाभिसमेत्योचुः ‘भगवन्नेधि, वन्नः श्रेष्ठोऽसि, मोल-
4
मीरिति ॥ १२ ॥

+ प्रपाठक ५. खण्ड। [ १७३ ] अथ हैनं वायवाच 'यदहं वसिष्ठाऽस्मि त्वं तद् वसिष्ठोऽसीति । अथ हैनं चक्षुरुवाच 'यदहं प्रति छास्मि, वं तत्प्रतिष्ठासीति' ॥ १३ ॥ अथहैन ५ श्रोत्रमुवाच 'यदह ५ सम्पदास्म त्वं- तत्सम्पदसति । अथ हेनं मन उवाच 'यदहमाय- तनमस्मि त्वं तदायतनमसीति' ॥ ११ ॥ न वै वाचो न चक्षू ५ पि न श्रोत्राणि न मना सीत्याचक्षते' प्राणा इत्येवाचक्षते, प्राणोोवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ 'मैं श्रेष्ठ हूं। इस विषय में प्राणों (मुख्य माण और इन्द्रियों) का झगड़ा हुआ * (हर एक कहता था) 'मैं श्रेष्ठ हूं, मै श्रेष्ठ हूँ॥६॥ तर वह माण अपने पिता प्रजापति के पास गए और कहा भगवन् ! कौन हम में से श्रेष्ठ है। उसने उत्तर दिया 'तुम में से जिस के निकल जाने पर यह शरीर बहुत बुरा सा दीखे, वह तुम में श्रेष्ठ है। ॥ ७॥ तबघाणीवाहरचली गई,ओर वह वरसभर वाहर रह कर वापिस आई और कहा 'कसे तुम मेरे बिना जीसके ?' उन्हों ने उत्तर दिया 'जैसे गूंगे न बोलते हुए, पर माण मे सांस लेते हुए, नेत्र से * यह भाख्यायिका (प्राण सवाद, या प्राण विचा) वृद० आर० उप०६।१।१-१४; माध्यन्दिन रातपय १४ ॥ १९ ॥२: पेत. भा० कौपी. उप० ३।३ और मदन उप० २।३ में भी है। . 4 . [१७४ ] छान्दोग्य उपनिषद् । देखते हुए, श्रोत्र से सुनते हुए, और मन मे ध्यान (ख्याल) करते हुए (जीते हैं ) वैसे (हमजिये) । तव वाणी (अपनी जगह) प्रविष्ट होगई ॥ ८॥ अव नेत्र चलागया और वह वरसभर बाहर रह कर वापिस आया और कहा 'कैसे तुम मेरे विना जिसके ?' उन्हों ने उत्तर दिया 'जैसे अन्धे न देखते हुए, पर प्राण से सांस लेते हुए, वाणी से बोलते हुए,श्रोत्र से सुनते हुए.मन से चिन्तन करते हुए (जीते हैं) वैसे (हमजिये) । नेत्र भी प्रविष्ट होगया ॥ ९ ॥ अव श्रोत्र चलागया और वह वरस भर बाहर रह कर वा पिन आया और कहा 'कैसे तुम मेरे बिना जीसके' ? उन्हों ने उत्तर दिया 'जैसे वहरे न सुनते हुए भी, प्राण से सांस लेते हुए वाणी से बोलते हुए और मन से चिन्तन करते हुए जीते हैं, वैसे (हमजिये) तव श्रोत्र भी प्रविष्ट होगया ॥ १० ॥ अब मन चलागया, और वह वरस भर वाहर रहकर वापिस आया और कहा 'कैसे तुम मेरे विना जी सके ? ' (उन्हों ने उत्तर दिया) 'जैसे बाल जो अभी बिना मन के हैं (जो देखते तो हैं, पर अभी उनमें संकल्प विकल्प नहीं उठते) प्राण से सांस लेते हुए, वाणी से बोलते हुए, नेत्र से देखते हुए और श्रोत्र से मुनते हुए (जीते हैं) वैसे (इमजिये) तव श्रोत्र (भी अपनी जगह) प्रविष्ट होगया ॥ ११॥ अव माण जब निकलने को तय्यार हुआ, तो उसने दूसरे माणों (इन्द्रियों) को इस तरह उखाड़ दिया, कि जैसे एक उत्तम घोड़ा अगाड़ी पिछाड़ी के कीलों को उखाड़ देता है (जब वह चलने को होता है)। तब (इन्द्रिय) उसके पास .

" मपाठक ५ खण्ड। [१७५] आए और कहा 'भगवन् ! तुम हो (हमारे स्वामी), तुम हम में से श्रेष्ठ हो, वाहर मत निकलो' ॥ १२ ॥ तब उसे वाणी ने कहा 'जो मे सब से बढ कर अमीर हूं, वह तुम सब से वहकर अमीर हो [ मेरी अमीरी सारी तेरे अधीन है, इसलिये वह तेरी ही है ] ' । नेत्र ने कहा 'जो मै दृढस्थिति हू, वह तू दृढस्थिति है। ॥१३॥ श्रोत्र ने कहा 'जो मै सम्पदा हु, वह तू सम्पदा है। मन ने कहा 'जो मै घर हू, वह तू घर है। ॥१४॥ सो लोग (उन सारे इन्द्रियों को ] न वाणी कहते है, न नेत्र, न श्रोत्र, न मन (कहते हे ) किन्तु माण यही कहते है, क्योंकि माणही यह सारे है * ॥ १५॥ दूसरा खण्ड सहोवाच 'कि मेऽन्नं भविष्यतीति' 'यत्किञ्चिददमा- श्वभ्य आशकुनिभ्य इति' होचुः। तदाएतदनस्यानं । अनो हवै नाम प्रत्यक्षम्।न ह वा एवं विदि किञ्चनाननं भवति ॥१॥ सहोवाच 'किं मे वासो भविष्यतीति' 'आप इति' * यदि पाणी, नन्न, श्रोत्र या मन इन में से कोई सय से बढकर श्रेष्ठ इन सय का आश्रय, सब का मारिफ होता, तोसारे उसी के नाम से पुकारे जाते । प्राण सब से श्रेष्ठ है, दूसरे इन्द्रियों की स्थिति भी प्राण के ही अधीन है. इसलियेप्राण यही नाम सारे इन्द्रियों काह।

. [ १७६] छान्दोग्य उपनिषद् । होचुः, तस्मादा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताचोपरिष्टाचाद्भिः परिदधति लम्भुको हवासो भवत्यनग्नो ह भवति||२|| ' तद्वैतत् सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्या योक्त्वोवाच 'यद्यप्येनच्छुष्काय स्थाणचे व्याजायरन्ने- वास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति' ॥३॥ उम (पाण) ने कहा मेरा अन्न क्या होगा ?' उन्होंने उत्तर दिया 'जो कुछ यह है कुत्तॊ तक और पक्षियों तक *। इसलिये यह अन का अन्न है । अन यह नाम साफ है । जो यह जानता है इसके लिये कोई वस्तु अनन्न नहीं होती है भ ॥ १ ॥ उसने कहा 'मेरा वस्त्र क्या होगा। उन्होंने उत्तर दिया 'जल'इमलिये जब खाना खाने लगते हैं, तो पहले और पीछे जलों मे दांप देते हैं । वह सदा वस्त्र लाभकरता है और कभी नंगा नहीं होता है (जो यह जानता है) ॥२॥ 1 * अभिप्राय यह ई, फि हर एक प्रकार का अन्न चाहे वह कुत्तों से साया जाता है, या पक्षियों से, प्राण की ही खुराक है । सारे मामीफा अन यह नाम असली है, म+अनम्याण अप+ सन-पान आदि उमफेविशेषकायों के हेतु उसयो विशेष नाम हैं । यह अभिप्राय नहीं, कि ऐसा जानने वाले के लिये भक्ष्यामध्य फा भेद नहीं रहता, किन्तु ऐसा जानने वाले ने माणों की रक्षा के उद्देश्य जो पुरभी पाया है, यह उसे पापी नहीं ठहराता (देखो पूर्व १०९में उपस्ति चामायण का इतिहास) अपांत् गान में पहले और पीछे जो भाचमन किया जाता है यह प्राण पस्त्र पहनाना (दांपना) है। .

प्रपाठक ५. खण्ड २ [१७७ यह रहस्य ससकाम जावाल ने गोश्रुति वैयाघ्रपद्य (व्याघ्रपाद् की सन्तान) को उपदेश करके कहा कि यदि कोई इसे मुखी छड़ी को भी उपदेश करे, तो उसमें भी शाखाएं उत्पन्न होजाएं, और पत्ते फूट निकलें ॥३॥ अथ यदि महजिगमिपेदमावास्ययां दीक्षिला पौर्ण मास्या रात्रौ सर्वोपधस्य मन्यं दधिमधुनो रुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय खाहे त्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पा तमवनयेत् ॥ ४ ॥ 'वसिष्ठाय स्वाहे त्यमावाज्यस्य हुत्वा मन्ये सम्पात मवनयेत् । 'प्रतिष्ठायस्वाहे'त्यमावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत्। 'सम्पदे स्वाहें त्यनावाज्यस्य हुत्वा मन्ये सम्पातमवनयेत। आयतनाय स्वाहेत्यमा वाज्यस्यहुत्वा मन्धे सम्पातमवनयेत् ॥ ५॥ अथ प्रतिसृप्याञ्जली मन्य माधायजपति अमोना मास्यमाते सर्व मिद ५स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाऽधिपतिः ज्येष्ठ्य ५ श्रेष्ठय राज्यमाधिपत्यं गमयत्वहमेवेद ५ सर्व मसानीति' ॥ ६ ॥ अथखल्वेतया पच्छः आवामति 'तत्मविणीमहे' इसाचामति । वयं देवस्य भोजनम इत्याचाप्रति [ १८० ] छान्दोग्य उपनिषद्। सर्वधातमम्' इत्याचामति । 'तुरं भगस्य धीमहि' इति सर्व पिवति ॥७॥ निर्णिज्य क ५ संचमसं वा पश्चादनेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः । स याद स्त्रियं पश्येत्, समृद्ध कर्मेति विद्यात् ।। ८॥ तदेष श्लोकः 'यदा कर्मसु काम्येपु स्त्रिय५ स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात तस्मिन् स्वप्ननिर्दशने तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने' ॥९॥ * अव यदि वह महिमा [बड़ाई] को पहुंचना चाहता है, उमे चाहिये,कि वह पहिले अमावास्या के दिन दीक्षा लेकर फिर पौर्णमासी की रात्री को हर एक प्रकार की ओपधियों के चूर्ण को [किमीपात्र में] दही और शहद में विलोकर रखदे, और 'सबसे बड़े के लिये और सबसे श्रेष्ठ के लिये स्वाहा' यह कहते हुए (आव सथ्य आने में) पीकी आहुती देकर [सुबमे लगेहुए] मेस्रव [चूते हुए घी] को मन्य में डाले ॥१॥ तो * अप महत्त्व की प्राप्ति के लिये मन्यकर्म यनलाते है, मका भधिकारी पूर्वोक्त प्राणविधा मा जानने घाला है। मिलाभो यह भार.उप०५३ + यहां अमली दीक्षा (जो ममियों के आरम्म फी विधि है) मे तात्पर्य नहीं, बिन्तु तप, सरय यचन, ब्रह्मचर्य आदि दीक्षा के धर्म पालन संतारपया मपाठक ५.खण्ड २॥ [ १७९ ] [इसी प्रकार सबसे वडे अमीरके लिये स्वाहा' यह कह कर घी की आहुति देकर संस्रव को मन्थ में डाले। स्थिति के लिये स्वाहा' यह कह कर अग्नि में घी की आहाते देकर संस्रव को मन्थ में डाले। 'सम्पदा के लिये स्वाहा' यह कहकर आग्नि में घी की आहुति देकर संसत्र को मन्थ में डालें । 'घरके लिये स्वाहा' यह कह कर आने में घी की आहुति देकर संसा को मन्थ में डाले* ॥ ५ ॥ तब (अग्नि से ) थोड़ा पीछे हट कर मन्थ को अमाल में रख कर जप करे 'तू हे माण अम नाम वाला है, क्योंकि यह सब (सारा जगत) तेरे साथ है (अमा) (तेरे साथही सन माणधारियों की सत्ता (हस्ती है) वह (माण) सब से बड़ा है, सब से श्रेष्ठ है, राजा है, अधिपति (स्वतन्त्र मालिक) है। वह मुझे सब से बड़ा, सब से श्रेष्ट राजा और आधिपाते बनाए । मैंही यह सब कुछ हो जाऊ॥६॥ तब वह इस ऋचा के एक पाद से (उप्त मन्य में से) आचमन करे ' तत्सवितुर्टणीमहे ' यह कह कर आचमन को 'वयं देवस्य भोजनम' यह कह कर आचमन करे 'श्रेष्ठ सायातमम् । यह कह कर आचमन करे 'तुरं भगस्य धीमहि ।' यह कह कर सारा पी लेता है ॥७॥ *जो२ गुण पूर्व (४।१।१-४ में) प्राण, वाणी, मंत्र, धोत्र और मन में पतलाप है, उन्ही नामों में यहां माहुतियां दी। मिरामा०प० मा उप०१।१।३।२२ मार मन्त्र का अर्थ यह है, 'हम मपिता देव (मास) उम अन्न को पसन्द परत है, जो सय स मच्छा भार मय मेंबर सय पाधारण परनपाला है। हम मग (मपिता, प्राम)कगी चिन्तन करते है, यहा मपिता भार प्राणी एपना र यह . ऋचा दिसलाई गई। M 1 ~ [१५८] छान्दोग्य उपनिषद् । कंसे वा चमसे को धोकर (रखदेता है और ) वह आने के के पीछे चमड़े (मृगाजिन) पर वा नंगी भूमि पर बैठजाता है, न बोलता हुआ, न कोई और साहम करता हुआ । अब याद वह स्वप्न मे स्त्री को देखे, तो यह जाने, कि उस का कर्म सफल होगया है ॥ ८ ॥ इस पर यह श्लोक है 'जब यह काम्य कर्मों में स्वप्न के अन्दर स्त्री को देखता है, तो वह उस (कर्म) में सफलता जाने, ऐसे स्वप्न के देखने पर, हां, ऐसे स्वप्न के देखने पर ॥ ९ ॥ तीसरा सण्ड * श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालाना ५ समितिमयाय । त ५ हप्रवाहणो जैवलिरुवाच ‘कुमारानुत्वाऽशिपत् पितेति' में भगव इति' ॥१॥ 'वेत्थ यदितोऽधिप्रजाप्रयन्तीति "न भगव इति' 'वेत्य यथा पुनरावर्तन्ता ३ इति' 'न भगव इति' 'वेत्य पयोदेवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति' 'न भगव इति' ॥२॥ 'येत्य यथाऽसोलोको न सम्पूर्यता ३ इति' 'न भगव इति' 'वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुष- वचसो भवन्तीति' 'नैव भगव इति' ॥ ३ ॥ . . * यह कया गृहदारण्यफ ६.२ और शतपय १४ 1८1१६ में पूरे विस्तार से कही गई है।

मपाठक ५. खण्ड। , [ १८१ ] अथ नु किमनुशिष्टोऽवोचथाः ? यो हीमानिन ति,कथ५ सोऽनुशिष्टो ब्रुवीतेति।सहायस्तःपितुरर्द्ध यात ५ होवाच 'अननुशिष्य वाव किल मा नववीदनु त्वाऽशिपमिति ॥२॥ पञ्च मा राजन्यवन्धुः प्रश्नानपाक्षीत् , तेपां नैकंञ्च किं विवक्तमिति' सहोवाच 'यथा मातदैतानवदो, ऽहमेषां नैकञ्चन वेद, यद्यहमिमानवेदिप्यं, कथं वक्ष्यमिति' ॥५॥ सह गौतमो राज्ञोऽद्रमेयाय । तस्मै ह प्राप्तायाच्चि सह प्रातःसभागउदेयाय।त होवाच 'मानुषस्य विन् ! गौतम'! वित्तस्य वरं वृणीयाइति' सहोवाच वैव राजन् मानुपं वित्तं, यामेव कुमारस्यान्ते वाचम पथास्तामेव मे बहीति' ॥६॥ सह कृच्छ्री वभूव, त ५ ह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्च- परत होवाच 'यथा मा वं गौतमावदो, यथेयं न (क् त्वत्तः पुरा विद्या ब्रह्मणान् गच्छति, तस्मादु सर्वेषु केषुक्षत्रस्य प्रशासनमभूदिति' तस्मेहोवाच ॥७॥ * श्वेतकेतु आरुणेय (अरुण का पोता)पक्षालों की सभा में *यह कथा पृहदारण्यफ ६१२ और शतपय १४।८।१६ में पूरे विस्तार से कही गई है। - - . [१५८ ] छान्दोग्य उपनिषद् । कसे वा चमसे को धोकर (रखदेता है और) वह आने के के पीछे चमडे (मृगाजिन) पर वा नगी भूमि पर बैठजाता है, न बोलता हुआ, न कोई और साहस करता हुआ । अव याद वह स्वप्न में स्त्री को देखे, तो यह जाने, कि उस का कर्म सफल होगया हे ॥८॥ इस पर यह श्लोक ह 'जा यह काम्य कर्मों में स्वप्न के अन्दर स्त्री को देखता है, तो वह उस (कर्म) में सफलता जाने, ऐसे स्वप्न के देखने पर, हा, ऐमे स्वप्न के दखने पर ॥ ९ ॥ तीसरा यण्ड * श्वेतकेतुर्हारुणेयः : पञ्चालाना ५ समितिमयाय । त ५ हमवाहणो, जैवलिरुवाच 'कुमारानुत्वाऽशिपत पितेति' नभगव इति' ॥१॥ वेत्थ यदितोऽधिप्रजाःप्रयन्तीति "न भगव इति' २ 'वेत्थ यथा पुनरावर्तन्ता ३ इति' 'न भगव इति' 'वेत्य पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति' 'न भगव इति' ॥२॥ 'वेत्थ यथाऽसौलोको न सम्पूर्यता ३ इति' 'न ५ भगव इति' 'वेत्य यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुष- वचसो भवन्तीति' 'नैव भगव इति' ॥३॥ 3 , * यह क्या वृहदारण्यक ६२ और शतपथ १६ ।। १६ में पूरे विस्तार से कही गई है।

[ १८१] . मंपाठक ५. खण्ड ३। अथ नु किमनुशिष्टोऽवोचथाः? यो हीमानिन विद्यात्,कथ५ सोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति।सहायस्तःपितुरर्द्ध मेयायात ५ होवाच 'अननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनुत्वाऽशिपमिति ॥४॥ - पञ्च मा राजन्यवन्धुः प्रश्नानपाक्षीत् , तेपा नच नाशकं विवक्तमिति' सहोवाच 'यथा मातदैतानवदो, यथाऽहमेषां नैकञ्चन वेद, यद्यहमिमानवेदिप्यं, कथं ते नावक्ष्यमिति ॥५॥ सह गौतमो राज्ञोऽर्द्धमेयाय । तस्मै ह प्राप्तायाचि कार। सह प्रातःसभाग उदेयाय।त होवाच 'मानुपस्य भगवन् ! गौतम ! वित्तस्य वरं वृणीथाइति' सहोवाच 'तवैव राजन् मानुपं वित्तं, यामेव कुमारस्यान्ते वाचम भाषथास्तामेव मे बहीति' ॥६॥ सह कृच्छी बभूव, त ह चिरं वसेत्याज्ञापयाच- कारत होवाच 'यथा मा त्वं गौतमावदो, यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्रह्मणान् गच्छति, तस्मादु सर्वेषु लोकेपुक्षत्रस्य प्रशासनमभूदिति तस्मैहोवाच ॥७॥ * श्वेतकेतु आरुणेय (अरुण का पोता)पचालों की सभा में * यह कथा वृहदारण्यक ६१२ और शतपय १४।८ । १६ में पूरे विस्तार से कही गई है।

. [१८२] छान्दोग्य उपनिषद् आया । प्रवाहण जैवलि * (जीवल की सन्तान) ने उसे, कहा कुमार ! क्या तुम पिता से शिक्षा पा चुके हो ? (उसने उत्तर दिया) 'हां भगवन् । ॥ १॥ (मवाहण ने पूछा) क्या तुम जानते हो, यह मनुष्य (मरकर) यहां में कहां जाते हैं। (उसने उत्तर दिया) 'नहीं हे भगवन् । 'तो क्या तुम जानते हो, जैसे वह फिर लौटते हैं। 'नहीं हे भगवन 'तो क्या तुम जानते हो, कहां देवों का और पितरों का मार्ग अलग २ होते हैं। 'नहीं हे भगवन् !' ॥२॥ 'तो क्या तुम जानते हो, कि ( यहां से लगातार जाते हुए लोगों से) वह लोक । क्यों भर नहीं जाता?' 'नहीं हे भगवन् !' 'तो क्या तुम जानते हो, कि किस तरह पांचवी आहुति में जल पुरुप कहलाते हैं । 'नहीं हे भगवन् !' ॥३॥ 'तव तूने कैसे कह दिया, कि मैं शिक्षा पाचुका हूं, ?, जो पुरुष इन बातों को नहीं जानता, वह कैसे कह सक्ता है, कि मै शिक्षा पाचुका है ? तय यह शोकातुर हुआ अपने पिता के स्थान को वापिस आया, और कहा 'भगवन् ! पूरी शिक्षा दिये बिना ही आप ने मुझे कहा, कि तुझे शिक्षा दे दी है ।। ४॥ पांच प्रश्न मुझे उस क्षत्रिययन्धु ने पृछे हैं, उनमें से मैं एक . 2 * यह पही क्षत्रिय ऋषि है, जिसने पूर्व (१।८1१) उद्गीथ- यिया में दो ग्राह्मणों को जाता है। . if यह लोफ-पितरों का लोफ (शंकराचार्य) + क्षप्रिययन्धु, यह, जिसके यन्धु क्षत्रिय हैं।जी क्षत्रियों में रहा महाभार पला ६, उसमें विद्या के विषय में एक ब्राह्मण के पराजित धोने में पहत यही त्रुटि तानकर श्वेतपतु ने यह प्रयोग किया है। .

> " प्रपाठक ५ खण्ड ३॥ [ १८३ ] का भी उत्तर नहीं देसका, 'पिता ने कहा 'जैसा तूने मुझे उसके यह प्रश्न वतलाए है,*इन में से तो मै भी एक भी नहीं जानता, यदि मै इनको जानता, तो कैसे तुझे न कह देता' १॥५॥ तब गौतम (श्वेतकेतु का पिता) राजा के स्थान को गया, और जब वह वहा पहुचा, तो राजा ने उसका आदर किया। मातःकाल जब राजा सभा में गया, तो गौतम उसके पास पहुचा राजा ने उसे कहा 'भगवन् ! गौतम! ऐसा वर कोई एक माग लो, जो मानुप धन से सम्बन्ध रखता हो (अर्थात् कुछ रुपया वा ग्राम आदि ) उसने उत्तर दिया 'हे राजन् ! मानुप धन तेरा ही रहे । मुझे तो वही वात बनलाओ, जो कुमार ( मेरे पुत्र ) के पाम तुमने कही है॥६॥ राजा वडा तग (दिक) हुआ, और उसे आज्ञा दी, 'कुछ समय मेरे पास ठहरो' ओर उसे कहा 'जमा हे गौतम ! तुमने मुझे कहा है (कि मुझे वही वात बतलाओ, जो कुमार के पास के तुमने कही हे ) सो यह विद्या तुझमे पहले किसी ब्राह्मण को नहीं मिली, और इसीलिये यह शासन (इस विद्या से शिष्यों को शिक्षा देना) सारे लोको में वेचल क्षत्रिय वर्ण काही रहा है' तर राजा ने उसे यह बतलाया ॥७॥ * अक्षरार्थ- जैसा तूने तव अर्थात् आते ही मुझे उमफे यह (प्रश्न) घतलाए है । पर इस वाक्य फी यनावट माफ नहीं युछ टूटा हुआ पाठ प्रतीत होता है । वृहदारण्यक का वचन माफ है 'हे बेटा तुम मुझे ऐसा जानो, कि जो कुछ मैं जानता था, यह मय तुझे पतला दिया है।

[२४] छान्दोग्य उपनिपद। चौथा खपड* असौ वाच लोको गौतमामि स्तस्यादित्यएव समिद् श्मयोधूमोऽहरर्चिश्चन्दमाअङ्गारानक्षत्राणिविस्फुलिङ्गा तस्मिन्नेतस्मिन्ननौ देवाः श्रद्धां जुव्हति, तस्या आहुतेः सोमो राजा सम्भवति ॥ २ ॥ वह [यौ] लोक हे गोतम!अग्नि है, सूर्य ही उसकी समिधा है, N * पांचवें प्रश्न (किम तरह जन पांचवीं पाहुति में पुरुष कहलात हैं) का उत्तर पहले प्रारम्भ करते है, कोकि द्रुमरे प्रश्नों का निर्णय इम प्रश्न के निर्णय के अधीन है॥ + शतपथवाझप में यह वर्णन है, कि अग्निहोत्र के विषय में जनक ने यामवत्कय मेल: प्रश्र पूछे थे(१) कि यह दोनों (अर्थात मार्य प्रातः को) पाहुतिये, किम तरह हम नोक मे ऊपर उठती है ! (२) किम तरह आगे जाती है । (३) कहां ठहरती है ? (४) क्या यहां फल देती हैं। (५) किस तरह फिर इम लोक की ओर लीटती (६) पौर इम लोक में आकर फिर कमे उठती है ? इन प्रयों में अग्निहोत्र का यह माधारगा माल नहीं पूछा गया, जो रमोलोक और इसी जीवन मे मिन्नजाता है, अर्थात् जो होमाहुपा दृष्य पग्नि मे छिद्र भिन्न होकर ऊपर उठना है, और वह पाकाश में भाग जाता पुत्रा, जंचा जाठहरता है,वहां वह वायु और उममें स्थित जन को पद और पुष्ट करता है, मध के रूप में नीचे उतरतार और प्रीपधि पाटि के रुप में फिर इम् लोक में उठता है। कि अग्निहोत्र का यहां वह धमाधारण फन पा गया है, ओ यत्र- भान को परलोक में और पर जन्म में मिलता है। होम की हुई मा - मपाठक ५. खण्ड ४ [१८५] रश्मियधुआं है,दिन लाट है,चन्द्रमाअंगारे है और नक्षत्रींचगाडियां हैं ? तियें जिस तरह एक सूक्ष्मरूप धारण करके आकाश में प्रवेश करती है उसी तरह एक दूमरा अत्यन्त सूक्ष्मरूप धारकर आहुति देने वाले के अन्तःकरण में प्रवेश करती है। यह रूप वह है, जो यहा से यया विधि पाहुति देते ममय एक आस्तिक पुरुष के चित्त पर उस कर्म के शुभ मस्कार पडते है। इन्हीं संस्कारों को वामना, अपूर्व और प्रष्ट भी कहतेहै। यही वह धर्महे,जो मरनेके पोछे मनुष्य के माथ जाता है। अब पाहुतियों के दो रूप बनगए,एक जो सूत्मरुपसे आकाश में प्रवेश करता है और दूसरा जो सस्कार रूपमे अन्तःकरण में । इनमेंमे प्रकाश सवका मांझाहै, इसलिये आकाश में प्रविष्ट पाहुतिये मयके लिये साझा फल उत्पन्न करती है अर्थात् बष्टि । पर ग्रन्त.करण अपना र अलग है, सो उसमें प्रविष्ट हुई भाडुतिये (मस्कार) उमौके परनोक और परजन्म को संवारती हैं, जो उन का देने वाला है। यह प्रालिये किम तरह उमके परलोक और पर जन्म को मंवारती है, उम के लिये यह प्रय है। अर्थात् दोहुई थाहतियें जो संस्कार रूप मे यजमान के पित्त में स्थित है, वह मरने के पीछे किस तरह ऊपर उठती है इत्याटि। यहां जो उत्तर दिये ई, उनका मारांग यह है । यह मूक्ष्मरूप (वामनारूप) आहुतिये (मूहम गरीर में) यजमान को लपेटे हुए उसके माथ उठती हैं, जब वह इमलोक मे ऊपर उठता है। फिर वक्ष यजमान पतरित में प्रवेश करता है, तो वह उमर्क माय अन्तरित में प्रवेश करती है। (यह अग्निहोत्र को पाहुतिय है, इमलिये इन का फन प्रगट करने के लिये भी मत्र जगह अग्निहोत्र की हो कम्पना की गईई । अमे) जय वह अन्तरिक्ष में प्रवेश करती है, तो अन्तरिक्ष को पाइपनीय धनालेती है, वायु को मभिधा इत्यादि । यहाँ पर पारिश में रहकर यजमान को वन करती है। फिर जब यन्मान प्राप्ति में ऊपर धोलोक में जाता है, सो यह उम के माय योनीक में जाता है। - - [ १८६ ] छान्दोग्य उपनिषद् । इस अग्नि में देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं, उस आहुति से राजा सोम [चन्द्र] । उत्पन्न होता है ॥२॥ पांचवां गण्ड पर्जन्यो वावगौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदद॑धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विस्फुलिङ्गाः ॥१॥ तस्मिन्नेतस्मिन्ननौ देवाः सोम राजानं जुह्वति, तस्या आहुतेर्वर्प ५ सम्भवति ॥ २ ॥ वहां वह धोलोक को पाहवनीय बनाती है ( इत्यादि) और फल दे कर यजमान को टप्त करती है । फिर जब फल भोगकर यजमान पृथिवी की ओर लोटता है, तो वह उमर्क साथ लोटती है। इस प्रकार गतपथ में रन के मविस्तर उत्तर दियेगए है। और यहां छान्दोग्य के एम प्रकरण में वह यजमान धोलोक से जिम प्रकार लोटता है, और जो२ एप बनता चला आता ई, उमका वर्णन है। यहां भी तहत् अग्निहोत्र को ही कल्पना की गई है, जैसा कि 'वह लोक अग्नि है' इत्यादि । यहा द्योलोक मे उतरने से प्रारम्भ करके मनुष्य जन्म लेने तक पाचग्नियोको कल्पनाकी गईह।यही पञ्चाग्निविद्याकहलाती है। * यहा यहा मे अभिप्राय वह पाहुतिये है, जो यजमानने पहले अग्नि मे होमी हुई है, और अब वामनारूप में यजमान के माथ ई। यह आइनिये होम के ममय द्रवमय (घी, दूध प्रादि ) वा ट्व- प्रधान होती है, उमनिये इन को जन्न मानकर यह प्रश्न किया है, कि 'फिम तरह जन पांचवी पाहुति मे पाय कहलाते है' यह वही होम के अन्न (द्रय) अब यहारप ई (क्योंकि यहा के बन्न मे ऽम रूप में पाए) जो यहां पहनोमाहुति की यम है। यहा मे जन अभि- प्रेम, इम पर देषो येदान्त 1१1५॥ + या यहा पर निम रुप में परिणन होती है, वह मोम की प्रति वाला मोम कहलाता है।

प्रपाठक ५. खण्ड६ [१८७] मेघ हे गौतम ! अग्नि है, वायुही उसकी समिधा है, धुंधधुआं है, बिजली लाट है,वज्र अंगारे हैं,विजली की कडकें चिंगाड़ियां हैं॥१॥ इस अग्नि में देवता सोमराजा की आहुति देते हैं, उस आ- हुाते से वर्षा उत्पन्न होती है ( अर्थात् वही श्रद्धा नामी जल जो पहले परिणाम में सोमरूप हुए थे, अब दूसरे परिवर्तन में पर्ज- न्याग्नि को पास होकर दृष्टिरूप से परिणत होते हैं) ॥२॥ छटा खण्ड पृथिवी वाव गौतमाग्नि स्तस्याः संवत्सर एव समिदा काशो धूमो रात्रि चिर्दिशोऽङ्गारा अवन्तिरदिशो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्ष जुव्हति, तस्या आहुते रन ५ सम्भवति ॥ २॥ पृथिवी हे गौतम ! अग्नि है, सम्वत्सर ही उसकी समिधा है आकाश धुआं है, रात्रि लाद है, दिशाएं अङ्गारे हैं, अवान्तर दिशाएं, कोणे] चिंगाड़ियां हैं ॥१॥ इस अग्नि में देवता वर्षा की आहुति देते हैं, उम आहुति से अनाज उत्पन्न होता है ॥२॥ पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेवसमित् प्राणो धूमो जिहार्विश्चक्षुरङ्गारा श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः॥१॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नी देवा अन्नं जुन्हति, तस्या आहुतेः रेतः सम्भवति ॥ २॥ सातयां सण्ड [१८८] छान्दोग्य उपनिषद् । पुरुष हे गौतम ! अग्नि, वाणी ही उसकी ममिधा है, सांम धुआं है, निहा लाट है, नेत्र अंगारे है, श्रीव चिंगाड़ियां है ॥१॥ इस अग्नि में देवता* अन्न को होगते हैं, उस आहुति से वीर्य उत्पन्न होता है [भव वहीं पहली आहुति इस क्रम से वीर्य के रूप में परिणत होती है] ॥2॥ गाठवां सण्ड योपा वाच गौतमाग्नि स्तस्या उपस्थ एव समिद यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः॥१॥ तस्मिन्नेतस्मिन्ननौ देवा रेतो जुल्हति,तस्या आहुते गर्भः सम्भवति ॥ २॥ स्त्री हे गौतम भग्नि है इस अग्नि में देवता [मण] बीज की आहुति देते हैं, उस आहुति से गर्भ उत्पन्न होता है ॥ २॥ इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसोभवन्तीति । स उल्वावृतो गर्भो दश वा मासानन्तः शयित्वा या बदाऽय जायते ॥१॥ सजातो यावदायुपं जीवति, तं प्रेतं दिष्टमितोऽनय एवाहरन्ति यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २॥ * यहाँ देचता प्राण [इन्द्रिय है. जो अधिदैवत में इन्द्रादि देवत है, यही अध्यात्म मैं प्राण आदि हैं। *शेष अर्घ मुल से देखो। .."* ||१|| . . नयां पण्ड है प्रपाठक ५. खण्ड १० [ १८९ ] इस प्रकार पांचवीं आहुति में जल पुरुष कहलाते हैं । अय वह गर्भ चमडे से लपेटा हुआ दस महीने अथवा जितना चिर (न्यून अधिक) अन्दर रह कर तब उत्पन्न होता है ॥ १॥ वह जन्म लेकर जब तक उसका आयु है जीता है। जब वह मरता है, और अब जिसे कर्मों ने अगला रस्ता बतला दिया है। तो उसे अग्नि (चिता की अग्नि) के लिये ही ले जाते हैं, जहां से ( श्रद्धा आदि की आहुति के क्रम से वह आया है, जहां से वह उत्पन्न हुभा है । ॥२॥ दसवां यण्ड - तद्य इत्थं विदुर्यचेमे ऽरण्ये श्रद्धातप इत्युपासते, ते २५.५ अर्चिपमभि सम्भवन्त्यर्चिपो ऽहरन्ह आर्यमाणपक्षमा-- पूर्यमाण पक्षाद याच पडुदडेति मासा ५ स्तान् ॥१॥ मासेभ्यः संवत्सर ५ संवत्सरादादित्यमादित्या only चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो ऽमानवः। स एनान् नाम ब्रह्म गमयत्येप देवयानः पन्था इति ॥ २॥ *यह पांचवें प्रश्न का उत्तर दिया गया, कि आहुनि के जल जो घो में श्रद्धारूप से वर्तमान थे, उनी आहुति होफर मोम, साम की माहुति होकर पृष्टि, वृष्टि की आहुति होकर अन्न, अन पी आहुनि होकर वीर्य और वीर्य की आहुति होकर पुरुष के रूप में फिर यापिस आ गए । अब इसके आगे पहले प्रश्न [क्या त जानता है, कि मे यह प्रजाएं यहां से जाती है] का उत्तर आरम्भ करते हैं। जिहां से-पांच अग्नियों में।तरह याररजन्मता और मरता हुआ लोक परलोक में घूमता है ।। mat माना [१९] छान्दोग्य उपनिषद् । वह जो इस प्रकार (इस पञ्चानि विद्या को और पांच अग्नियों द्वारा अपने जन्म को) जानते है (वह चाहे गृहस्य भी हों) और वह जो जंगल में श्रद्धा और तप में तत्पर है,वह आच (लाट) को माप्त होते है '' आँच से दिन को, दिन से शुक्ल पक्ष के उन छः महीनों को, जिन में मूर्य उत्तर को जाता है [उत्तरायण ॥2॥ महीनों से घरस को, बरस से मूर्य को, सूर्य से चन्द्रमा को, चन्द्रमा से बिजली के स्थानों को, यहां एक पुरुष है, जो अमानव है [मानुपी साष्टि का नहीं] वह इनकोबा शिवल ब्रह्म हिरण्यगर्भ] को पहुंचा देता है । यह देवयान मार्ग है ॥२॥ अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते, ते धूम मभिसम्भवति, धूमावात्रि रात्रेरपरपक्ष मपरपक्षाद् थान पड् दक्षिणैति मासा ५ स्तान, नेते संवत्सर मभि प्रप्नुवन्ति ॥३॥ मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाश माकाशा चन्द्रमसम् । एप सोमोराजा । तद् देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४॥ पर वह जो ग्राम में इष्ट और पूर्व [यज्ञ और दूसरे सर्वोप योगी काम अर्थाद विद्यालय स्थापन करना आदि) और दान देने *वानप्रस्थ और वह सन्यासी जिन्होंने अभी तक शुभ ब्रह्म का साक्षात् नहीं किया है। मिलामो छान्दोग्य ४११५1५॥

प्रपाठक ५. खण्ड १०॥ [१९..] में तत्पर रहते हैं, वह धूम को माप्त होते हैं, धूम से रात्रि को, रात्रि से कृष्णपक्षको, कृष्णपक्ष से उन छः महीनों को, जिनमें सूर्य दक्षिण को जाता है दिक्षिणायन को] यह संवत्सर को नहीं प्राप्त होते ॥३॥ महीनों से पितृलोक को, पितृलोक से आकाश को, आकाश से चन्द्रमा को यह सोम राजा है, वह देवताओं का प्यारा है, उस को देवता प्यार करते हैं* ॥ ४ ॥ , * प्रक्षरार्थ-वह देवतामों का प्रवाहै, उसे देवता भक्षण करते है' पर उपनिषदों में भन केवल खाने पीर पत्र कवन भनाज के भर्य में ही प्रयुक्त नहीं हुमा, फिन्त भद, भोगने या म्यार करने के पर्य में और अब, प्यारी, चाही हुई, मुख देने वाली, पारमा करने पाली हर एक वस्तु के अर्थ में भी प्रयुक्त हुपा है । इमग्निये हमने ऊपर मन्त्र का पर्य प्यारा पीर भक्षयन्ति का पर्थ प्यार करते है, किया है। शंकराचार्य भी इमी पागय को प्रगट करते हुए मिलते है कि यदि कर्मी जन चन्द्रमोक में पहुंच कर देवताओं का पथ बन जाते है, और उन्हें देवता भक्षण करते हैं, तो उनके गभ कमाँ का उनको क्या फल मिला ? इसलिए वह वस्तुत' पाए नहीं जाने । पब के पचं है,जिमसे रचा होती है, वा जिममे मुग्न मिलता है, सो रमशा या तात्पर्य महीं, कि वह देवताओं में पाए जाते है, किन्तु या फिर सानों के पानन्द का ईत बनते हैं । यह मोतरमा किया जाता है, प्रभा जी पार पगु गजापों का पद र पर्यात् उनसे भीग या मुष का माधन है। पौर यह मुष परम्पर एक दूरी को सता नाकर मालिश के मुण भोग का माधन है और मानिक नाका के मुख भोग का माधन है । पुरुष प्णी को प्यार करता, पार उमम बार किया जाता है। यह परम्पर एक दूभरे को प्यार करते है। एस धर्मा मुए कारेशमी प्रशासमो प्रदेशमा पार [ १९२ ] छान्दोग्य उपनिषद् । १८को तस्मिन्,यावत्संपात मुपित्वाऽयैतमेवाध्यानं पुनर्नि- वर्तन्ते यथेतमाकाशा माकाशा दायु । वायुर्भूला धूमो भवति । धूमो भूत्वा उभं भवति ॥५॥ अभ्रं भूत्वा मेघो भवति । मेघो भृत्वा प्रवर्पति । त इह बीहियवा ओपधि वनस्पतयस्तिलमापा इति जायन्ते । अतोवै खलु दुर्निप्पपतरम् । यो योह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति, तभूय एव भवति ॥ ६॥ तद्य इह रमणीय चरणाअभ्याशोह यत्ते रमणीयांयोनि मापद्येरन् ब्राह्मणयोनि वा क्षत्रिययोनि वा वैश्ययोनि वा । अथ य इह कप्यचरणा अभ्याशो ह यत्चे ‘कप्यां योनिमापोरन् श्वयोनि वा शूकरयोनि वा चण्डालयोनि वा ।। ७॥ वह वहा [ चन्द्रमण्डल में ] उतनी देर रहते है, जब तक उनके कर्म क्षीण नहीं होते तय यह उसी मार्ग को फिर लौटते है, जैसे , जाते है, अर्थात् वह दवताश्री के माथ मुख और आनन्द भोगते है, उनका गरीर उस पानन्द के भोगने के योग्य बन जाता है । जोजल ची में अहारूप था, वह पाहुति होकर यहा मोम राजा है (छादो० ॥४॥ ५-२) केवल कर्मी जब मरता है और जलाया जाताई (छादो०५८२) तो उसका मूत्म देह उनके कमी के सस्कारों को लेकर धूम के साथ ऊपर उठता है, और वह मस्कार उसे सोम को ले जाते हैं, जहा वह अपने काम का फल भोगता है, जब उमके कर्म समाप्त जाते हैं, सो मा निर वाप्रिम पाता है और नया जन्म यह करताई। . - .

प्रपाठक ६. खण्ड १० [१९३] गयेथे *। पहले आकाश को, आकाश से वायु को! वायु बनकर वह (यजमान) धूम वनता है, धूम वनकर धुंध बनता है ॥ ५॥ धुंध वन कर मेघ वनता है । मेघ वनकर बरसता है। तब वह धान, जौ, ओषधियें, वनस्पतियें, तिल और माप के रूप में यहां (पृथिवी में) जन्म लेता है। यहां से उसे निकलना घड़ा कठिन है। * (प्रश्न) जाने में तो महीनों से पितृलोक को, पितृलोक से आकाश को, आफाश से चन्द्रमा को गये थे (छान्दो १०।४) भोर भाने में आकाश से घायु और घायु से धुएं को आए हैं। तय 'उसी मार्ग को फिर लौटते हैं। यह कैसे कद्दा (उत्तर) अभिप्राय यह है, कि पृथिवी से चन्द्र को गए थे, अय चन्द्र से फिर पृथिवी को लीटते हैं । जाते समय भाफाश से चन्द्र में पहुंचे थे, भार भातेसमय भी धैसे चन्द्र से आकाश में आप है । सो मार्ग में यपपि भेद , पर पहला स्थान (मनज़ल) एक है, और जहां पहुंचना यह एक है। चन्द्रमण्डल में जो उनका शरीर या, यह भय विलीन होकर आकाश में आकार की तरह अतिसूक्ष्म रूप में उतरता है,इसी प्रकार नीचे २ उतरता हुआ घायु और घूमआदि में तद्रूप यनता आता है। इस पर कराचार्य लिखते हैं कि जब वह मेघ दारा नोचे उतरते है और पोषधि वनस्पतिय, धान जी, सिन माप पादि में मे पार होकर जन्म ग्रहण करते हैं, इम पसर में उनके लिये बात कठिनाया है। मब से पहली यह है, कि मेघ के सामने के मामों स्थान है, यदि यह पर्वत की चोटी पर वरम, पीर यहां में भी टम कर नदी में बहने हुए ममुद्र में जा पहुंचे। यह किमी महसी वा समुद्रिय जन्त ने पी लिये। फिर उसको किमी दूमर जना ने सानिया और वह वहां ही नब उस अन्तु के माय ममुद्र में विलीन हुए, तब समुद्र के मली के माम पाकाय मे पीपे गए, फिर मा को भारत के साथ मह भूमि (रंगसान) मेवा पयरों पर पड़े हैं। यहाग [ १९४ ] छान्दोग्य उपनिपद् । क्योंकि जो कोई (उस) अन्न को खाता है, और वीर्य सेचन करता है, वह पूरा तद्रूप (उसकी शकल) ही होजाता है ॥ ६ ॥ कदाचित् व्याल और हिरण प्रादि में पिये गए, उनको किमी दूमरे अन्तु ने खालिया, और उसको फिर किमी दूमरे ने । इस प्रकार वह एक लम्बे चक्र में पड़ जाते है । अव जब वह ओषधि बनम्पतियों में आते हैं, तो उस पहिली कठिनाइयों में निकल पाते है, और अब नई कठिनाइयों में पड़ते है । कदाचित् उन स्थावरों में पाए, जो किमी नही खाए और सूख गए । कदाचित् उन स्थावरी में भी पाए, जो खाए गए है, तथापि यदि वह बों से वा बूढो मे खाए गए, वा उन से खाए गए जो गृहस्थ नही, वा उन से जो नए सक हैं, तो इम तरह वह यह अवसर भी अपने नये जन्म का खो देते है। यदि किसी युवक ग्टहस्थ से खाये गये पर वह बन्ध्यवीर्य है, वा सी बन्ध्या है, तो फिर उनका जन्म लेने का यह अवसरभी चूक जाता है। फिर जब कभी जाकर वह ममर्थ पुरुप से खाये जाते हैं, और समर्थ माता की कुधि में जाते हैं, तब वह नया जन्म ग्रहण करते है। वैसा जन्म, जैसे पिता के शरीर मे गये है। और यह उनका जाना कर्मानुसार होता है, इममे कुछ उलट पलट नही होता।। यह कठिनाइया उन्ही के लिये है, जी चन्द्रमण्इल से उतरे हैं, और म्यावर जन्मो में नहीं जाएगे। जो पापकर्मी स्थावर जन्मों के योग्य है, वह शीघ्र अपने कर्मानुसार स्थावर जन्मों में चले जाते है। यह लो चन्द्रमाहट से उतर कर स्थावरी मेहोकर पाए हैं । स्थावरे में जाना उनके किसी कर्म का फन्न नही, किन्तु ब्राह्मणादि जन्म पाने के लिये यह उनका मार्ग है, और इमलिये वह इन स्थावरी भाकर कोई सुख दुःख नहीं भोगते । स्थावर उनका शरीर नई - प्रपाठक ५. खण्ड १०॥ [ १९५] अव वह जिनका कि वर्ताव यहां रमणीय(मुहावना,शुद्धो रहा है, वह जल्दी उत्तम जन्म को प्राप्त होंगे, ब्राह्मण के जन्म को, वा क्षत्रिय के जन्म कोवा वैश्य के जन्म को। पर वह जो यहां नीच वताववाले रहे हैं, वह जल्दी ही नीच योनि को प्राप्त होंगे, कुत्ते की योनि को वा मूभर की योनि को, वा चण्डाल की योनि को । अर्थतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदा वर्तीनि भृतानि भवन्ति, जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृती य ५ स्थानम् । तेनासौ लोको न सम्पूर्यते । तस्माज्जुगु प्सेत । तदेप श्लोकः॥ ८॥ स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिव ५श्चयरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा च । एते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चावर ५ स्तो- रिति ॥९॥ अथ हय एतानेवं पञ्चामीन वेद, न सहेतेरप्याचरन् होता, किन्तु वह जमे पहले पाकाग, धुण, धुन्ध पीर मंघ में मिन गए थे, ऐमे ही पय स्थावरी में मिन नात हैं। पीर मी लिये उन पनाजों के कूटने पीमन से या उनमे निफन मही जात, भय कि यार जीव उस ममय उनमे निकल जाते हैं, जिनका कि वह स्पायर देश पीर यह भी जानना चाहिये कि चन्द्रमण्डन में उनकी जान होता है, पीर जब पर मोचे उतरत है. मी वर पान में गन्य (वैपयर) रही है यमक कि उनकी फिर मानुयं जन्म देर मन को पहुंचने के योग्य बना दिया जाता है।

[ १९६ ] छान्दोग्य उपनिषद् पाप्मना लिप्यते । शुद्धः पूतः पुण्यलोको भवति । य एवं वेद ॥ १०॥ और जो इन दोंनो मार्गों में से किसी से नहीं चले, वह यह छोटे जन्तु [मक्खी मच्छर आदि] बार२ जन्म लेनेवाले बनते हैं, जोजन्मते हैं और मरते हैं। यह तीसरा स्थान है [जहां मरकरजाते हैं]॥ इसलिये वह] चन्द्र] लोक भर नहीं जाता* [मिलाओ५॥२]। * यहां तक पांचों प्रशो के उत्तर दे दिये गए है । -माला किस रह पाचवीं पाहुति में जल पुरुष कहलात है। इसका उत्तर पांच पम्मियों द्वारा पुरुष उत्पत्ति बतलाते हुए दिया है। दूसरा भरने के पीछे मनुष्य कहां जाते है, इसका उत्तर-कुछ देवयान से ब्रह्मलोक को प्रात होते है, कुछ पिळयाण से चन्द्रलोक को प्राप्त होते हैं, कुछ यहीं वार २ जम्मते मरते है। तीसरा-कैमे फिर वापिम प्रतिहै, इसका उत्तर-कुछ ब्रह्मा को पहुंच जाते है, दूमरे श्राकाशादि मार्ग में पृथिवी को वापिस पाते हैं। चौधा-कहां देवताओं का और पितरों का मार्ग अलग २ होते है । दमका उत्तर-वह जो देवयान से जाते हैं, जब भयन (प्राधे बरम) से बरस को जाते है, पिट्याए वाले प्रयन से पिटनोक को जाते हैं । पाचवां-कैसे वह नोक भर नही जाता। उत्तर-कोकि वह अपना फल भोग कर फिर इस लोक को वापिम पाते हैं। इस विषय पर बहुत से विचार प्रगट किये गए है । पहला, वह कौन लोग हैं, जो देवयान मे जाते है। उत्तर-पहले वह ग्राहस्थ जी पक्षाग्नि विद्या और उसके द्वारा अपने जन्म को जानते है,जिमका यहां वर्णनहुपा है। जबकिदूमौ ग्रहम्य नोकि माधारणतया यज्ञों को पूरातो करते हैं, पर उनके पमनी रहस्य को नहीं जानते, वा वह जो दूमर नक काम करते हैं, वह पियाण में जाते है। दूसरे, वह जो गृहम - मपाठक ५ खण्ड१०। [ १९७ ] इसलिये अपने आपको बचाना चाहिये* [पाप में गिरने से ]। इस पर यह श्लोक है-॥८॥ 'सोने का चुराने वाला,मुरा शराब का पीने वाला, गुरुतल्प से बन को चले गए है, और वहां श्रद्धा और तप में रत है, अर्थात् वानप्रस्थ और परिव्राजक जो अभी शुद्द ब्रह्म को माक्षात् नही किये है। फिर प्रश्न उत्पन्न होता है, कि क्या ब्रह्मचारी भी देवमार्ग को जाते हैं। इसका उत्तर शकराचार्य यह देते हैं, कि स्मृति और पुराणों में नैष्ठिक ब्रह्मचारियों के लिये देवयान बतलाया है, और उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी प्रायमान्तरों में प्रवेश की योग्यता लाभ करने के लिये इस पाश्रम को धारण किये है. उनका यह प्राथम अगले पायमों को संवार देता है, कोई स्वतन्त्र पारलौकिक फल नही रखता । पर हम यहा उपनिषद में भी ब्रह्मचारी के लिये देवयान का कोई निषेध नहीं पाते। और प्रश्वर । १६ में यह पचन सब प्राथमियों के लिये देखते हैं- 'उनके लिये वह धूलि रहित ब्रह्मलोक है, जिनमें कोई कुटिलता नहीं, कोई झूठ नहीं, और कोई छल नहीं' । वस्तुत सब के लिये देवयान है, जो शबल ब्रह्म के उपासक हैं। हा वह जो गुह को माक्षात् किये हैं, उनके लिये देवयान नही, वह साचात् ब्रह्म को पालेते हैं। फिर यह विचार किया गया है, कि अब चन्द्रलोक में एक पुरुष अपने मारे कर्म भोग लेता है, तो वह फिर कैसे जन्म ले सत्ता है। जन्म पिछले कर्मी का विपाक (फल) है । जब पिछले मारे कर्स समाप्त होगए, तो फिर नया जन्म कैसे हो मता है। उत्तर इसका यह है, कि वह यन्त्र कर्म जिनका फल चन्द्र लोक में भोगा गया है, उनके सिवाय और कर्म भी है, जो उमका यहां लोगों के माय याब रहा। वह अभी भोगने वाले है, और उनके अनुसार वह यहां नया जन्म लेता है। *पक्षरार्थ-उमसे घृणा करनी चाहिये।

[ १९८ ] छान्दोग्य उपनिषद् । [स्त्री] गामी, और ब्राह्मण का मारनेवाला, यह चारों पतित होजाते हैं, और पांचवां जो उनके साथ आहार व्यवहार रखता है ॥९॥ हां, वह जो इन पांच अग्नियों को ठीक२ जानता है, वह उन के साथ आचरण करता हुआ भी पाप से लिप्त नहीं होता । शुद्ध पवित्र होकर पुण्य लोकों को प्राप्त होता है, जो इस रहस्य को जानता है, हां, जो इस रहस्य को जानता है ॥ १० ॥ ग्यारहयां पण्ड प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुपिरिन्द्र द्युम्नोभालवेयोजनःशार्कराक्ष्योबुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमा ५ साञ्चक्रुः को न आत्मा कि ब्रह्मेति ॥१॥ ते ह सम्पादयाञ्चक्रुः । उद्दालको वै भगवन्तोऽयमा रुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति । त ५ हन्ता भ्यागच्छामेति । त५हाभ्याजग्मुः ॥२॥ सह सम्पादयाञ्चकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो नसर्वमिव प्रतिपत्स्ये । हन्ताह मन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३॥ तान होवाच अश्वपति भगवन्तो कैकेयः सम्प्रती ममात्मानं वैश्वानरमध्येति। त५हन्ताभ्यगच्छामेति । तर हाभ्याजग्मुः॥४॥ तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयाञ्चकार । सह प्रातः सञ्जिहान उवाच 'नमस्तेनो जनपदे नकदों प्रपाठक ५. खण्ड ११ [ १९९ ] न मद्यपः । नानाहितानि विद्वान् न स्वैरी स्वेरिणी कुतः। यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि, यावदेकैकस्मा ऋत्वजे धनंदास्यामि,तावद्भगवयोदास्यामिावसन्तु भगवन्त इति ॥ ५॥ ते होचुः येन हैवार्थेन पुरुपश्चरेत्, त ५हैववदेदात्मा न मेवेमं वैश्वानर सम्प्रत्यध्यपि, तमेव नोबहीति॥६॥ तान होवाच 'प्रातःप्रतिवक्तास्मीति। तेह समित्पा- णयःपूर्वाणे प्रतिक्रिमिरे।तान् हानुपनीयतदुवावा। *माचीनशालण औपमन्यव (उपमन्यु की सन्तान ) सत्ययक्ष- पौलुपि [पुलुप की सन्तान], इन्द्रद्युम्न-मालवेय [भालमिरापोता], जन-शार्कराक्ष्य शर्कराक्ष्य की सन्तान], युहिल आखतराधि [अश्वतरासकी सन्तान], यह पांचों पडे गृहस्थ और बडे श्रोत्रिय [वेदवेत्ता] एक बार इकट्ठे हुए, और यह विचार चलाया, कि हमारा आत्मा क्या है, ग्रह्म यया है। ॥१॥ उन्होंने निश्चय किया 'भगवन्तः ! यह जो उद्दालक आणि [अरुणकी सन्तान] है, यह इम वैवानर आत्मा को ठीक र मानता है आओ उस के पाम चलें तर वह उम के पास गए ॥ २॥ उसने सोचा यह पड़े गृहम्य और पहे श्रमिप नो कुछ मुनगे परेंगे, मैं उन की मारी बातों को नहीं कह महंगा; मा, और (शिक्षक) इन्हें बतला॥॥ • यह पया रातपय प्रावण १०।६।१।१में भी है। ग्रिम जो सय भन्तरामा (मस्तपांमी)।

[२०० ] छान्दोग्य उपनिषद्। तब उसने उन्हें कहा 'हे भगवन्तः ! अश्वपति कैकेय केकय देशका राजा] इस वैश्वानर आत्मा को ठीक २ जानता है । आओ उसके पास चलें। तब वह उसके पास गए ॥ ४ ॥ जब वह पहुंचे तो राजा ने उन में से हर एक को अलग२ भेंट देने की आज्ञा दी और दूसरे दिन मातःकाल उठते ही उसने कहा 'मेरे देश में कोई चोर नहीं, कंजूस नहीं, शराब पीनेवाला नहीं, अग्न्याधान प्रतिदिन होम के लिये घर में अग्नि की स्थापना] से शून्य नहीं, विद्या से हीन नहीं, व्यभिचारी नहीं, व्यभिचारिणी कहां * । हे भगवन्तः ! मैं यज्ञ करनेवाला हूं, जितना धन एकर ऋत्विज को दंगा, उतना आप में से हर एक को दूंगा। आप यहां वास करें ॥ ५ ॥ उन्होंने उत्तर दिया 'जिस भयोजन के लिये पुरुप घूमरहा हो, [आया हो], उसे वही बात कहनी चाहिये । आप इस वैश्वा- नर आत्मा को जानते हैं, वह हमें बतलाएं' ॥ ६ ॥ उसने कहा 'मैं कल प्रातःकाल तुम्हें उत्तर दूंगा'। वह दूसरे दिन प्रातःकाल [विद्यार्थियों की तरह] हाय में समिधा लिये हुए उसके पास पहुंचे । उसने उपनयन किये बिना ही । उनको यह कहा ॥७॥ ' * राजा को इस पावके कहने की आवश्यकता कदाचित यह है कि ब्राहाण उस राजा से कुछ नहीं ग्रहण करते थे, जो अपने फर्न- व्यों का पालन नहीं कर रहा, जो उसके अपनी प्रजा की ओर है शिष्य जय विद्या पढ़ने के लिये गुरु के पास जाता है, तो पहले उसका उपनयन होकर फिर विद्या सिखाई जाती है । शिघ्य जय पहले फिसी आचार्य से शिक्षा पाचुका है,तो भी जबवह किसी दूसरे आचार्य के पास कुछ सीखने को जाता है,तो वहां फिर उपनयनपूरा ॥ वि प्रपाठक ५. खण्ड १२ बारहवां खण्ड 'औपमन्यव कं समात्मानमुपास्स इति? । 'दिव मेव भमवो राजनिति होवाच । 'एवै सुतेजा आत्मा वैश्वनरोयं त्वमात्मानमुपास्से,तस्मात्तव सुतं प्रसुतमा- सुतं कुले दृश्यते ॥१॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम् । अत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले, य एतमेव मात्मानं वैश्वानर मुपास्ते । मूर्धा त्वेषआत्मन इति' होवाच । 'मूर्धा ते व्यपतिष्यद् यन्मा नागमिष्य इति' ||२|| 'औपमन्यव । तुम किस को आत्मा के तौर पर उपासते हो' * उसने उत्तर दिया 'केवल द्यौ को, हे भगवन राजन् !' उसने कहा 'यह आत्मा सुतेजा [घडे तेजवाला, वैश्वानर है, जिप्त . , किया जाता है। यहां भी यह ब्राह्मण इसी नियत से समिधा हाथ में ले कर राजा केपास भाप थे। पर राजा उनके इस विनय से ही सन्तुष्ट है, कि यह प्राह्मण होपर शिष्य के तौर पर मेरे पास आप है, जोकि ब्राह्मण नहीं हु॥ * जहां तक यह मान में पहले पहुन धुके हैं, उस से आगे ले जाने के लिये उन के पहले शान को पूछ लिया है ॥ +चौ में जो आत्मा है, यह वही पैश्वानर है, जो इस मार विश्व का नेता है, तथापि द्यो उसको एफ छोटी सी महिमा का प्रकाशक है । जैसे आंख जीवात्मा की एफही महिमा दिपने की] पा का प्रकाशक है, द्यौ में उसकी महिमा का दर्शन सारे विश्व में फैली हुई महिमा में से बहुत थोड़ी सी महिमा का दर्शन है।

[ २०२] छान्दोग्य उपनिषद् । आत्मा को तुम उपासते हो । इस लिये [मुतेजा वैश्वानर आत्मा की उपासना से ] तुम्हारे कुल में मुत अमृत और आमत । दीखता है ॥ १ ॥ तुम अन्न खाते हो [स्वस्थ और वलिष्ठ हो] मिय [पुत्र पात्र आदि] देसते हो। जो कोई इस [द्यौ ] वैश्वानर आत्मा को इस प्रकार उपासता है वह अन्नखाता है, मिय देखता है, और इम के 'कुल में ब्रह्मवर्चस [स्वाध्याय और धर्म का तेज] होता है,। पर यह) आत्मा का केवल सिर है न किम मम्पूर्ण वैश्वानर] और इस लिये तेरा सिर गिर जाता, यदि तू मेरे पास न आता ॥२॥ तेरहवां गण्ड अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपिम् ‘प्राचीनयोग्य! कं त्वमात्मानमुपास्स इति' 'आदित्यमेव भगवो राज- निति' होवाच । 'एप वै विश्वरूप आत्मा वैश्वावरो यं- त्वमात्मानमुपास्से, तस्मात् तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १॥ प्रवृत्तो ऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्न पश्यसि प्रिय- म् । अत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले,य एत- मेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते, चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाच 'अन्धोऽभविष्पद् , यन्मांनागमिष्य इति' ।। तय उसने सत्ययज्ञ-पौलुपि को कहा 'हे प्राचीनयोग्य तुम किमको आत्मा के तौर पर उपासते हो उसने उत्तरदिया 'हे भगवन * सोम को एकाह आदि अहर्गण में सुत, अहीन में प्रसुत, और सत्र में आसुत कहते है ।

. मपाठक खण्ड १४। [२०३] राजन् ! केवल मूर्य को' । उसने कहा 'यह आत्मा विश्वरूप (सारे रूपों वाला) वैश्वानर है, जिस आत्मा को तुम उपासते हो, इसलिये तेरे कुल में बहुत और सब प्रकार का धन दीखता है ॥२॥ खच्चरों वाला स्थ है, दासियें है. मुहरें है । तुम अन्न खाते हो, ओर पिय देखते हो । जो कोई इस वैश्वानर आत्मा को इस मकार - जपासता है वह अन्न खाता है, मिय देखता है और इसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है, पर यह आत्मा का केवल नेत्र है, और तुम अन्धे होजाते, यदि तुम मेरे पास न आते ॥ २॥ चौदहवा खण्ड अथ होवाचेन्द्रद्युम्नंभाल्लवेयं 'वैयाघ्रपद्यकत्वमात्मान मुपास्स इति' 'वायुमेव भगवो राजनिति' होवाच 'एपवै पृथग्वमात्मा वैश्वानरो यंत्वमात्मान मुपास्से, तस्मात् त्वां पृथग् वलयः आयन्ति, पृथग स्थश्रेणयो ऽनुयन्ति ॥ १॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम् । अत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्स्य ब्रह्मवर्चस कुले, य एतमेवात्मानं वैश्वानरमुपास्ते । प्राणस्त्वेप आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्य यन्मां नागमिष्य इति' ॥ २॥ तब उसने इन्द्रद्युम्न भालवेय को कहा 'वैयाघ्रपद्य! तुम किस को आत्मा के तौर पर उपासते हो' उसने उत्तर दिया 'हे भगवन् राजन् ! केवल वायुको उसने कहा यह आत्मा पृयवात्मा (अलग मार्गों से बहन के स्वभाववाला वैश्वानर है,जिसकोतुम आत्माके तौर पर उपासते हो, इसलिये (सब दिशाओं से) तुझे अलग २ उपहार . [२०४] छान्दोग्य उपनिषद् । (भेंट) आते हैं, और अलग २ रथों की पंक्तियें तेरे पीछे चलती हैं। तुम अन्न खाते हो और मिय देखते हो । जो कोई इस बैशानर आत्मा को इस प्रकार उपासता है वह अन्न खाता है, प्रिय देखता है, और इसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है। पर यह आत्मा का प्राण है, तेरा माण निकलजाता, यदि तू मेरे पास न आता ॥ २॥ पन्द्रहवां सण्ड अथ होवाच जन ५ 'शार्कराक्ष्यकत्वमात्मानमुपास्स इति' 'आकाशमेव भगवो राजनिति' होवाच 'एष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से, तस्मात् त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम्।अत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्य- स्य ब्रह्मवर्चसं कुले, य एतमेवमात्मानं वैश्वानर मुपास्ते सन्देहस्त्वेप आत्मन इति होवाच । 'सन्देहस्ते व्य- शीर्यद् , यन्मांनागमिष्य इति ॥२॥":.. तब उसने जन को कहा ' हे शार्कराक्ष्य, तुम किसको आत्मा के तौर पर उपासते हो ? उसने उत्तर दिया 'हे भगवन राजन् ! केवल आकाश को उसने कहा 'यह आत्मा बहुल विड़ा परिपूर्ण] वैश्वानर है, जिसको तुम आत्मा के तौर पर उपासते हो, इसलिये तुम प्रजा से और धन से भरे हुए हो ॥१॥ अन्न खाते हो और मिय देखते हो । जो कोई इस वैश्वानर आत्मा को इस प्रकार उपासता है, वह अन्न खाता है, प्रिय देखता है, और इसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है । पर यह आत्मा का धड़ है, और तेरा धड़ टूट जाता, यदि व मेरे पासन आता ॥२॥ 4 .

पा०५ खण्ड १६ [ २०५] सोलहया खण्ड अथ होवाच बुडिल माश्वतराश्चिम् 'वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति' 'अप एव भगवो राजनिति' होवाच । ' एप वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मान मुपास्से, तस्मात व १ रयिमान पुष्टिमानसि ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम् । अत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले, य एतमेवमात्मानं वैश्वानर मुपास्ते, बस्तिस्त्वेप आत्मन इति' होवाच । 'वस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्, यन्मां नागमिप्य इति' ॥२॥ तब उसने बुडिल आश्वतराधि को कहा 'वैयामपय! तुम किसको आत्मा के तौर पर उपासते हो उसने उचर दिया 'हे भगवन राजन् ! केवल जलों को'। उसने कहा 'यह आत्मा रयि (धन) वैश्वानर है, जिसको तुम आत्मा के तौर पर उपासते हो, इसलिये तुम धन वाले हो और पुष्टि वाले (फलते फूलते) हो ॥ १ ॥ अन्न खाते हो और प्रिय देखते हो। जो कोई इस वैधानर आत्मा को इस प्रकार उपासता है, वह भन्न खाता है प्रिय देखता है, और इसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है । पर यह आत्मा का बस्ति (मूत्राशय )है,तेरा मूत्राशय फट जाता, यदि त मेरे पास न आता सत्तरहयां पण्ड अथ होवाचौद्दालक मारुणिम् ‘गौतम! के लमा- स्मान मुपास्स इति' । 'पृथिवीमेव भगवोराजनिति' होवाच 'ए'वै प्रतिष्ठाऽऽत्मा वैश्वानरो यं स्वमात्मान मुपास्से,तस्मात् त्वं प्रतिष्टितोऽसि प्रजया चपथभिश्चा।

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[२०६] छान्दोग्य उपनिषद् ।
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम् । अत्त्यन्नं पश्यति प्रियं
भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले, य एतमेवमात्मानं वैश्वानर
मुपास्ते, पादौ त्वतावात्मन इति' होवाच 'पादौ ते
व्यम्लास्येतां, यन्मां नागमिष्य इति' ॥२॥
तब उसने औदालक आरुणि को कहा 'हे गौतम !तुम किस
को आत्मा के तौर पर उपासते हो उसने उत्तर दिया 'हेभगवन
राजन् ! केवल पृथिवी को उसने कहा 'यह आत्मा प्रतिष्ठा (दृढ़
स्थितिधर्मवाला)वैश्वानर है,जिप्सको तुम आत्मा के तौरपर उपासते हो,
इमलिये तुम प्रजा से और पशुओं से प्रतिष्ठावाले (दृढ़ खहे) हो॥२॥
अनखातेहो और मिय देखते हो।जो कोई इस वैश्वानरआत्मा
को इस प्रकार उपासता है, वह अन्न खाता है, मिय देखता है और
इसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है । पर यह आत्मा के पाद हैं। और
तुम्हारे पाद कुमला (सूख) जाते, यदि तुम मेरे पास न आते॥२॥
अठारहवां खण्ड
तान होवाच एते वै खल यूयं पृथिगिवेम मात्मानं
वैश्वानरं विदा ५ सोऽन्नमत्थ । यस्त्वेतमेवं प्रादेशमा-
त्रमभिविमान मात्मानं वेश्वानरमुपास्ते, स सर्वेषुलोकेषु
सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥१॥
तस्य हवा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मुंधैव सुतेजा-
श्वक्षुर्विश्वरूपःप्राणःपृथग्वाल्मा संदेहोबहुलोवस्तिरेव
रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिलोमानि वर्हिर्हदयं
गाईपत्योमनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥२॥

मपाठक ५. खण्ड१८॥ [२०७] तब उसने उन सब को कहा 'तुम इस वैश्वानर * आत्मा को मानो अलग २ जानते हुए अन्न खाते हो । पर जो वैश्वानर - अयखानर भौतिक अर्थ में जाठराग्नि का नाम है । पर्यात् कर अग्नि जो हर एक माणधारी के अंदर है, जिसके द्वारा उमका प्रय पच कर उनका जीवन बनता है । यही पग्नि जीवन का चिन्ह है मरते ममय मनुथ के जिम २ भंग से यह पग्नि गान्त होता जाता है, वही मुर्दा होता जाता है । अन्ततः छातो पर हाथ धर कर देखते यह मबसे पीछे ठण्डी होती है, इसके ठण्डा होने के माय ही नीयन की समाप्ति है। यह पग्नि जो प्राणधारियों में लोवन का हेतु यही पृथिव्यादि लोकों के भो जीवन का हेतु है। पर्यात् यह हर एक स्थावर जंगम में रहकर उसको जीवित रखने वाली है । यह शि. व्यापी वैवानर पग्नि जिस अन्तरात्मा के पधोन, पोर जिमकी गति से अपना काम करती है, उम अन्तरामा को गमलरूप में पेम्बानर पात्मा कहा है- वया इदमे अनयस्ते अन्पेले विधे अमृता मादयन्ते । ये वानर नाभिरसिक्षितीनां स्यूणेच जनाँ उपमिद्यपन्य (म० १ । ५९।।) विमानर पग्ने ! दुमरी पग्निये तेरी गापाएं हैं, मार देयता तुझमें पानन्द मनाते हैं। तू मम मनुयों का नामि . ( केन्द्र), हद खम्भे की तरह तू मोगों को महार हुए हैं। मी मम्बन्ध को मेकर पागे वैवानर के उपामक के लिये अपने पन्दर ही वैदि पाटि की कम्पना (५।१८।२) पोर इमर्श भोजन में होम की कल्पना पीर उममे मार विग की प्ति दिपमा । १८-२१) पीर पकान को उपिर देने में भी पग्निोर की सुन्यता दिपमा है । पीर देपो शग १।१५१८. पार उप.12गतपय 1.11दात ११२।२४-११ ।

[२०८] छान्दोग्य उपनिषद् । आत्मा को इस प्रकार उपासता है, कि वह प्रादेशमात्र है और आभावेमानी है, वह सब लोकों में सब माणधारियों में और संब आत्माओं में अन्न खाता है ॥१॥ इस वैश्वानर आत्मा का मुतेजा ( अच्छे तेन वाला धौ) केवल सिर है, विश्वरूप ( सारे रूपों वाला सूर्य) नेत्र है, पृथग्वा- स्मा (भिन्न २ मागों वालावायु)माण है, वहुल (व्यापक आकाश) घड़ है, रयि (जेल) यस्ति है, पृथिवी पाओं है। छातीं वेदि है (वेदि की नाई है) (छाती के लोम) कुशा है । (वैदि में बिछी हुई कुशा की न्याई है) हृदय गार्हपत्य अग्नि है, मन दक्षिणामि है, मुख आइवनीय है ॥२॥ उन्नीसवां सण्ड तद् यद्भक्तं प्रथममागच्छन् , तद्धोमीयम् । स यां प्रथमामाहुतिं जुट्ठयात् , तां जुहुयात् 'प्राणाय स्वाहेति' प्राणस्तृप्यति ॥ १॥ प्रादेगमात्र, और अभिविमान, यह दोनों शब्द यहां स्पष्टार्थ नहीं पचरार्थ-बालिस्त भर, और सामने होकर मापने वाला। गतपय मायण में मूर्धा से लेकर ठोडी तक अगों में धी प्रादि का स्वरूप दिखलाया है. देखो शतपथ १.१६१और वेदान्त ॥२॥३१॥ उन दोनोगों का अर्थ योगंकराचार्य यह लिखते हैं-'ची मूर्धा 'मे नेकर 'पृथियो पापों है। यहा तक जो प्रादेश हैं उनमे वह पध्यान में मापा जाता है, इसलिये प्रादेशभाष है, अथवा सुख शादि भपयों में या माचीप मे मापा जाता है। प्रयवा द्युलोक मे पृथिवी पर्यन्त (प्रदेग) के परिमाण पाना। अयया शास्त्र में जो बतलाए गए रे, (पाशित) दो भादि, उनके परिमाण याना ई । और प्रत्यगामा के तौर पर जाना जाता है, इसलिये पर अभिविमान ।

मपाठक ५. खण्ड २01 [२०९] प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुपि तृप्यत्सादित्य- स्तृप्यत्यादिसे तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां य- तिञ्च द्योश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानुतृप्ति तृप्यति प्रजयापशुभिरनायेन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति।। *सो अव जो अन्न पेहल पहल (वैश्वानर के उपासक के पास आए, वह होम की वस्तु है । अब यह जो पहली आहुति हामे (पहलाग्रास मुख में डाले,मुख जोआहवनीय अग्नि है) तोवह 'प्राणाय स्वाहा' यह कहकर उसे होमे । तब माण तृप्त होजाता है ॥ १ ॥ पाण क तृप्त होने पर नेत्र तृप्त हाजाता है, नेत्र के तृप्त होने पर सूर्य तृप्त होता है, सूर्य के तृप्त होने पर द्यौ तृप्त होता है, द्यौ के तृप्त होने पर घो और सूर्य के अधिकार में जो कुछ है, वह सब तृप्त होजाता है। उसकी तृप्ति के पीछे वह (खाने वाला वैश्वानर का उपासक, यजमान) स्वयं प्रजा से पशुओं से, स्वास्थ्य से, तेज से और ब्रह्मवर्चस से तृप्त होता हे ॥२॥ बीसवां खण्ड अथ या द्वितीयां जुहुयात् , तां जुहुयाद 'व्याना- यस्वाहेति' । व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृष्यति श्रोत्रेतृप्यति चन्द्रमास्तृ- प्यति चन्द्रमसि तृप्यतिदिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीपु * पूर्व वैश्वानर के उपासक के अगें में अग्निहोत्र के अंगों की कल्पना दिखलाई है । अब उसका फल यह दिखलाते हैं, कि श्वानर का उपासक जो अन्न खाता है, यही सच्चा अग्निहोत्र है इससे समष्टि विराट की लत होकर मारुफ मेनिय धर्म और अर्थ क्षेनों की सिद्धि होती है।

. [ २१० ] छान्दोग्य उपनिषद् । -यत्किञ्च दिशश्चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति, तस्यानु- तृप्ति तृप्याति प्रजया पशुभिरनायेन तेजसा ब्रह्मवर्च- सेनेति ॥२॥ अव जो दूसरी [ आहुति ] होमे, तो वह उसे 'व्यानाय स्वाहा' कहकरहोमे। तव च्यान तृप्त होता है, च्यान केतृप्त होने पर श्रोत्र तृप्त होता है श्रोत्र के तृप्त होने पर चन्द्रमा तृप्त होता है,चन्द्रमा के तृप्त होने पर दिशाएं तृप्त होती हैं दिशाओं के तृप्त होने पर जो कुछ दिशाओं और चन्द्रमा के अधिकार में है वह सब तम होता है। उसकी प्ति के पीछे वह [उपासक] स्वयं प्रजा से पशुओं से स्वास्थ्य से तेज मे ओर ब्रह्मवर्चस से तृप्त होता है ॥२॥ इक्कीसवां खण्ड अथ यां तृतीयां जुहुयात्, तां जुहुयादपानाय स्वाहे त्यपानस्तृप्यति ॥ १॥ अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति वाचि तृप्यन्याममि स्तृप्यत्समो तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यतिच पृथिवी चामिश्चाधिष्ठतस्तत् तृप्यति, तस्यानु तृप्ति तृप्यति प्रजया पशुभि रनायेन तेजसा ब्रह्मवर्च सेनेति ॥ २॥ अवजो तीसरी [आहुति होमे, तो उसे अपानाय स्वहा' कहकर होम । तब अपान तृप्त होता है। अपान के तृप्त होने पर वाणी तृप्त होती है, वाणी के तृप्ति होने पर अनि तृप्त होती है, अपि के तृप्त होने पर यित्री तृप्त होती है, पृथिवी मपाठकर खण्ड २३॥ [२११] के कृप्त होने पर जो कुछ पृथिवी और आम के अधिकार में है, वह सब तृप्त होता है, उसको सप्ति के पीछे वह स्वयं प्रजा से पशुओं से स्वास्थ्य से तेज से और ब्रह्मवर्चस से तृप्त होता है ॥२॥ याईसका खण्ड अथ यां चतुर्थी जुहुयात् तां जुहुयाद् समानाय स्वहेति समान स्तृप्यति ॥१॥ समानेतृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्य स्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत् तृप्यति विद्युति तृप्यन्यां यत्किञ्च विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठत स्तत् तृप्यति, तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभि स्नाद्येन तेजसाब्रह्म- वर्चसेनेति ॥२॥ अब जो चौथी [आहुति] होमे, तो उसे 'समानय स्वाहा' कह कर होमे । तब समान तृप्त होता है ॥ १॥ समान के तृप्त होने पर मन तृप्त होता है, मन के तृप्त होने पर मेघ तृप्त होता है, मेघ के तृप्त होने पर विद्युत् [विजली] तृप्त होती है, विद्युत् के तृप्त होनेपर जो कुछ विद्युत् और मेय के अधिकार में है, वह सब हप्त होता है। उसकी तृप्ति के पीछे यह स्वयं प्रजासे पशुओं से स्वास्थ्य से तेज से और ब्रह्मवर्चस से तृप्त होता है ॥२॥ तेईसा खण्ड अथ यां पञ्चमी जुहुयात्,तांजुहुयादुदानाय स्वाहे. त्युदानस्तृप्यति ॥१॥ उदाने तृप्यति वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृ

[ २१२ ] छान्दोग्य उपनिषद् ।
प्यत्याकाशेतृप्यति यत्किञ्चवायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठ
तस्तत् तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरनाये
न तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २॥
अब जो पांचवी (आहुति) होमे,तो उसे उदानायस्वाहा' कहकर
होमे । तब उदान तृप्त होता है ॥१॥
उदान के तृप्त होने पर वायु तृप्त होता है, वायु के तृप्त होने
पर आकाश तृप्त होता है । आकाश के तृप्त होने पर जो
कुछ वायु और आकाश के अधिकार में है, वह सब तृप्त होता
है । उसकी दृप्ति के पीछे वह स्वयं प्रजासे पशुओं से स्वास्थ्य से
तेनमे और ब्रह्मवर्चस से तृप्त होता है ॥२॥
चवीसवांखण्ड
स य इदमविदानमिहोत्रं जुहोति, यथाङ्गारानपोह्य
भस्मनि जुहुयात् तादृक्तत्स्यात्॥१॥
अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रंजुहोति तस्य सर्वेषु
लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेप्वात्मसु हुतं भवति ॥२॥
तद्यथेपीकातूल मग्नोप्रोतं प्रदूयेतेव हास्यसर्वे पापमानः
प्रदूयन्ते, य एतदेवंविधानमिहोत्रं जुहोति ॥३॥
तस्मादु हैवंविद् यद्यपि चाण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छे
दात्मनि हेवास्य तदेश्वानरे हुत * स्यादिति । तदेष
श्लोकः ॥ ४॥

प्रपाठक ६. खण्ड १ [२१३] यथेहक्षुधितावाला मातरं पर्युपासते। एव ५ सर्वाणि भूतान्यामहोत्र मुपासते, इत्यग्निहोत्रमुपासत इाते ।५। अगर कोई इस विद्या को जाने विना आंग्नहोत्र करता है तो वह होम ऐप्ता हे जमे कोई अगारों को हटाकरराख मे होम करे॥॥ हां वह ना इसके संच तात्पर्य का जानकर आग्नहोत्र करता है, तो इसका वह होम | कथात अन्न खाना* मारे लोकों में सारे मणधारेयों में और मारे आत्माओं में होजाता है ॥२॥ और जसे सरकण्डेकी ऊपर को रुई आग्न में डालो हुई जलनाती है, इस तरह उसके सारे पापनल जाते हैं, जो आग्नहोत्र के इस सच्चे तात्पर्य को जानताहुआ होम करता है [ वा अन्न खाता है ] ॥३॥ इमालये याद [ अमिहोत्र के इस ] सब तात्पर्य को जानने वाला अपना बचा हुआ अन्न {उच्छिष्ट] चाण्डाल को भी देदेवे, तो वह उसके [ चण्डाल के देह में स्थित ] वैश्वानर आत्मा में ही होम होगा। इस पर यह श्लोक है ॥ ४ ॥ जैसे भूखे पचे [ भोजन की आशा से ] माता के आस पास बैठ जाते हैं, इस प्रकार सारे माणधारी लोग]आग्निहोत्र को उपासते* १, हां, अग्निहोत्र को उपासत हैं ॥५॥ . छदा प्रपाठक (पहलाखण्ड). ओ३म् । श्वेतकेतुहारुणेय आस, त ५ ह पितोवाच * मिलाओ ५।१८।१ + इस विद्या के जानने याले फे भोजन को ध्यान करते हैं, फि कय यह खाएगा ! क्योंकि विद्वान के मोजन से सारा जगत सप्त होता है (शंकराचार्य) [ २१४ ] छान्दोग्य उपनिषद् श्वेतकेतो! वस ब्रह्मचर्य, न वैसोम्यास्मत्कुलीनोऽननू च्य ब्रह्मवन्धुरिख भवतीति'॥१॥ स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्वि ५ शतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानीस्तब्धएयाय ॥२॥ त ५ ह पितोवाच 'श्वेतकेतो! यन्नु सौम्येदं महाम नाअनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यो,येना श्रुतं ५ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति ॥३॥ 'कथंनु भगवः ! स आदेशो भवतीति' ! यथासो- म्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्व मृण्मयं विज्ञातं स्याद्, वाचार- म्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४॥यथा. सोम्येकेन लोहमणिना सर्व लोहमयं विज्ञात स्याद, वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम्।। ५॥ यथा सोम्येकेन नखनिकृन्तनेन सर्व कार्णायसं वि- ज्ञात ५ स्यादाचारम्भणं विकारोनाम धेयं कृष्णायस मित्येव सत्यम् । एव सोम्यसआदेशोभवतीति ॥६॥ न वेनूनं भगवन्तस्तएतदवेदिपुर्यद्धयेतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति , भगवाँस्त्वेव मे तब्रवीत्विति' तथा सोम्येति होवाच ।। ७॥

प्रपाठक ६. खण्ड १ [२१५ ] श्वेतकेतु-आरुणेय [ अरुण का पोता ] था, उसको उसके पिता [ अरुण के पुत्र-उद्दालक ] ने कहा 'श्वेतकेतो ! जाओ, ब्रह्मचर्य वास करो; क्योंकि वेटा ! हमारे कुल में ऐसा पुरुष नहीं होता, कि जो वेद को न पढ़कर ब्रह्मवन्धु * सा वनजाए ॥१॥ वह बारह बरस की | आयु में [ आचार्य के ] पास गया और चौबीस वरस की आयु में सारे वेदों को पढकर वापिस आया, बड़े मन वाला, अपने आपको पूरा विद्वान समझता हुआ, और बड़ी अकड़ वाला [वन कर वापिस आया ॥२॥ उसे पिता ने कहा 'श्वेतकेतो ! बेटा ! तुम जो इतने बढे मन वाले, अपने आपको पूरा विद्वान समझते हो और अकड वाले हो, क्या तुमने वह आदेश[उपदेश] भी कभी पूछा है, कि जिससे न सुना हुआ सुना हुआ हो जाता है, न समझा हुआ समझा हुआ हो जाता है, और न जाना हुआ जाना हुआहोजाता है यही ॥३॥ [उसने पूछा] 'वह आदेश हे भगवन् ! किस प्रकार का है। [पिता ने उत्तर दिया] 'जैसे हे सोम्य ! एक मट्टी के गोले [के जानने] से मट्टी की हर एक वस्तु विज्ञात [जानी गई हो जाय, क्योंकि विकार केवल नाम मात्र अलग है, जो वाणी का * ग्रहयन्धु, यह जो ग्राह्मणों को अपने यन्धु यतलाता है, पर स्वयं ब्राह्मण के 'गुण फर्म से भूपित नहीं 1 जब कि ब्राह्मण का पुत्र सातवे यरस उपनीत होसता है, तो एक योग्य विधान का पुष इतनी देर अनुपनीत रहा हो, इसकी अपेक्षा यह अधिक सम्भव है, फि वह इससे पहले अपने विद्वान पिता से पढता रहा हो। भादेश, यह उपदेश जो केवल शास्त्रगम्य पा गुरुगम्य ही हो।

[२१६ ] छान्दोग्य उपनिपद् । सहारा है [ अलग शब्द से वोला जाता है ] पर वह मट्टी है यही सत्य है * ॥ ४॥ और जैसे हे सोम्य ! एक सोने के देले से सोने की हर एक वस्तु जानी जाती है, विकार केवल नाम मात्र अलग है, जो.बाणी का सहारा है, पर वह सोना है, यही सत्य है ॥५॥ और जैसे हे सोम्य एक नख काटने वाले से लोहे की हर एक वस्तु जानी जाती है, विकार केवल नाम मात्र है, जो वाणी का सहारा है, पर वह लोहा ही है यही सत्य है। इस प्रकार हे सोम्य! वह आदेश होता है।॥ ६॥ [पुत्र ने कहा ] 'निःसंदेह वह भगवान् [मेरे आचार्य ] इसे नहीं जानते होंगे। क्योंकि यदि वह जानते होते, तो मुझे कैसे न बतलाते । इसलिये आप ही मुझे यह बतलाएं'। उसने कहा 'ऐसा ही हो हे सोम्प ! ॥७॥ दूसरा सण्ड । सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीय; तस्माद सतः सजायेत ।। १॥ कुतस्तु खलुसोम्यैव ५ स्यादिति होवाच । 'कथम सतःसजायतेति । सत्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवा द्वितीयम् ॥ २॥ * विकार, पनी हुई पस्तु । जय काई यस्तु नई धनती है तो उस में नाम रूप का भेद होता है, मट्टी के बर्तन माम में औररूप[आकार में भिन्न २ दोजाते हैं, पर यह मट्टी से फोई अलग परतु नहीं मिलाभो ॥३॥ tमिताभो तेति० उप०२१६॥

[२१७ ] मपाठकद खण्ड। तदेतत बहु स्यां प्रजायेयेति।तरोनोऽसृजताततेज ऐक्षत वहु स्वां प्रजायेयेति । तदपोऽसृजत । तस्माद् यत्र कच शोचति स्वेदते वा पुरुपस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥ ताआप ऐक्षन्तवन्तः स्याम प्रजाये महीति।ताअन्नमसृजन्त,तस्मादयत्रकच वर्पतितदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यन्ध एव तदध्यन्नायं जायते ॥२॥ हे सोम्य फले यह केवल सत् था एक ही विना दूसरे के, इस विषय में कई ऐसा कहते हैं, कि पहले यह केवल असव (अभाव) था एक ही विना दूसरे के ऐमा मानने में अमत् से सत् की उत्पत्ति माननी होगी ॥१॥ पर उसने कहा हे सोम्य यह कैसे होसक्ता है ? असद से सत् की उत्पत्ति कैमे होसक्ती है ? किन्तु सब ही हे सोम्य ! यह पहले था, एक ही विना दूसरे के ॥२॥ उसने देखा * ( अर्थात् ख्याल किया ) मैं बहुन होजाऊं, मैं प्रजावाला होउं । उसने तेज को रचा । उस * यह क्रिया प्रगट करती है, कि यह सचेतन है, न कि अचंतन। यहां प्रकृति का अन्तर्यामी मान कर उसे शयलरूप में प्रगट किया है। ऐसे ही आगे 'तेजः' और 'आप' है। है यहां व्याख्याकारों ने तेज से अग्नि और अन (४)से पृथिवीली है। और यह बतलाया है, कि तेज की उत्पत्ति आफाश और वायु मे पीछे जाननी चाहिये, जैसा कि तैत्तिरी (२१) में है। पर यहां जैसा कि तेज, जल, और अन्न का भागे वर्णन है, उससे, तेज से वह [२१८ ] छान्दोग्य उपनिषद् । तेज*ने देखा, मैं बहुत होउं, प्रजावाला होउं, उमने जल को रचा। इसलिये जहां कहीं कोई पुरुप गर्म होता है, और उसे पमीना आता है, वहां तेज मे ही जल उत्पन्न होता है ॥ ३॥ उस जल नेि देखा, मैं बहुत होउं, मैं प्रजा वाला होउं । उसने अन्न : [ पृथिवी ] को रचा । इसलिये जहां कहीं वरसता है, वहीं बहुत अन्न होता है ॥ ४॥ तीसरा सण्ड तेषां खल्वेपां भूतानांत्रीण्येव वीजानिभवन्त्याण्डजं जीवजमुद्भिजमिति ॥ १॥ सेयं देवतेक्षत, हन्ताह मिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २॥ तासां निवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति । सेयं देवते मास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नाम- रूपे व्याकरोत् ।। ३॥ गर्मी जो उत्पत्ति का धीज है,जल से दवावस्था और अन्न से घनावस्था अभिप्रेत है। यह अग्नि इन तीनों मे त्रिकत है (६४।१) न कि तेजोरूप ह.तेजका उसमें लाल रंग प्रगट कियागया है। * वही सत्, जो अब तेज के अन्दर शवलरूप में है। तेज से वह सव अभिप्रेत है,जाजलता है, पकाता है, चमकता है और जो लाल है। जिल से अभिप्राय है, जो द्रव है और शुक्लवर्ण है। मन मे वह यस्तु अभिप्रेत है, सो धन (ठोस)भारी है, स्थिर आकार घाली है, और काले रंगकी है। - प्रपाठक ६. खण्ड ३॥ [२१९ ] तासां त्रिवृत त्रिवृतमेकैकामकरोदः । यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवत् त्रिदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ४॥ * इन मारे प्राणधारियों के तीन ही वीज । हैं-अण्डे से उत्पन्न होनेवाले [अण्डज पक्षीआदि], जीव [अर्थात् जीवित जन्तु] से उत्पन्न होनेवाले [जरायुज-मनुष्य, पशु आदि], और उद्भित से उत्पन्न होनेवाले [उद्भिज-क्ष आदि] ॥ १॥ इस देवताने [जिसने तेज, जल, और अन्न को उत्पन्न कियाथा] सोचा , अच्छा अब मैं इन तीनों देवताओं [तेज, जल और अन्न] में इस जीते आत्मा [ जीवात्मा ] के साथ भवेश करके नाम और रूप को अलग २ करूं ॥३॥ और इनमें से हरएक को तीन २ गुना बनाउं । तर उम देवता [सद] ने इन तीनों देवताओं में इस जीते आत्मा [जीवात्मा] के साथ प्रवेश किया और नाम और रूप को अलग २ किया ॥ ३ ॥ * अय तेज आदि की उत्पत्ति दिपला कर उसके पीछ जीवित सृष्टि का उत्पन्न होना और उसके द्वारा अलग २ नामरूप का व्ययहार होना दिखलाते है॥ ऐत० उप० में चार योज दिखलाए है, अण्डज, जो यहां अण्डज है, जारज (अर्थात् जरायुज)जो यहां जीवज है, उद्जि,जो यहां उद्भिज है, स्वेदज, जो पसीने (गर्मी) मे उत्पन्न होते हैं, यह वहां अधिक है । (यहां यह इन्हीं के अन्तर्गत किया गया है) मिलाभो अर्थव १।१२।१॥ + यद्यपि तेज, जल, और अन्न को उत्पन्न करदिया है, पर अभी भी बहुत होने का प्रयोजन पूरा नहीं हुआ, इस लिये उमने फिर सोचा (शक्राचार्य) [ २२० ] छान्दोग्य उपनिषद् । इनमें से हरएक को तीन २ गुना*बनाया; और निसतरह पर हे सोम्य ! इन देवताओं में से हरएक तीन २ गुना है, अब यह मुझ से जान ॥४॥ चौथा सण्ड यदग्नेरोहित ५ रूपं तेजसस्तद्रूपं, यच्छुक्तं तदपां, यत्कृष्णं, तदन्नस्य । अपागादग्नेरमित्वं वाचारम्भणं विकारोनामधेयं । त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १॥ यदादित्यस्य रोहित श्रूपं तेजसस्तद्रूपं, यच्छुक्लंतदपां, यत्कृष्णं तदन्नस्याअपागादादित्यादादित्यत्वं वाचारम्भ- णं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥२॥ यच्चन्द्रमसो रोहित५ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां, यत्कृष्णं तदन्नस्य । अपागाचन्द्राचन्दत्वं वाचारम्भण विकारो नामधेयं त्रीणिरूपाणीत्येव सत्सम् ॥३॥ यद्विगुतो रोहितररूपं तेजसस्तद्रूपंयच्छुक्तं तदपां, यत्कृष्णंतदन्नस्य।अपागादिद्युतो विद्युत्त्वंवाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीसेव सत्यम् ॥ ४॥ एतद्धस्मवैतद्विदा ५ सआहुः पूर्व महाशाला महाश्रो- त्रियाः, ननोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्य- * तेज, जल और पृथिवी, इनमें से एक का अधिक भाग लेकर दूसरे उसके साथ मिलादिये। और यह रश्यमान अग्नि, जल, तेज इसतरह पर मिश्रितरूप हैं।

प्रपाठक ६.खण्ड ४ [२२१ ] तीतिह्येभ्यो विदाञ्चक्रुः॥ ५॥ यदुरोहितमिवाभूदिति- तेजसस्तद्रूपमिति तदिदाञ्चक्रुः,यदुशुकमिवाभूदित्यपा ५ रूपमिति तदविदाञ्चक्रुः । यदु कृष्णमिवाभूदिय- न्नस्य तद्रपामिति विदाञ्चक्रुः ॥६॥ यदविज्ञातमिवा- भूदियेतासामेव देवताना समास इति तडिदाञ्चक्रुः। यथानु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवता पुरुषं प्राप्य त्रिवृत त्रिदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७॥ (जलती हुई ) अग्रि का जो लालरंग है. वह तेज का रंग है, जो श्वेत रंग है, वह जलों का है। और जो काला रंग है, वह पाथवी का है । अब अग्नि का अग्निपन चलागया,* विकार नाममात्र (अलग) है जो वाणी का सहारा है । जो कुछ मस है,वह तीन रूपही है ॥१॥ जो सूर्य का लाल रंग है, वह तेज का रंग है, जो श्वत है, वह जलों का है, और जो काला है, वह पथिवी का है, अब सूर्य का सूर्य पन चलागया, विकार नाममात्र ( अलग) है, जो वाणी का सहारा है । जो कुछ सत्य है, वह तीन रूपही हैं ॥२॥ जो चन्द्रका लाल रंग है, यह अग्नि का है, जो धेन है, यह जलों का है, जो काला है, वह पृथिवी का है । अव चन्द्र का चन्द्रपन चला गया, विकार नाममात्र [ अलग ] जो वाणी का सहारा है, जो कुछ सत्य है, यह तीन रूपही है ॥३॥ मग्नि का अग्निपन को अपना स्वतन्त्र नहीं, क्योंकि मान तीन रूपों का विकार विशेष है, इसके सिवाय मौरपुछ नहीं ।

। जो [ २२२ ] छान्दोग्य उपनिषद् । जो बिजली का लाल रंग है, वह तेन का रंग है, जो घेत है, वह जलों का है, जो काला है, वह पृथिवी का है, अब विजली का विजलीपन चला गया, विकार नाममात्र ( अलग ) है, जो वाणी का सहारा है । जो कुछ सत्य है, वह तीन रूपही हैं ॥ ४॥ पुराने समय के बड़े गृहस्थ और बड़े वेदवेत्ता जिन्हों नेइस घात को जान लिया था, उन्हों ने कहा, 'अव हमें कोई ऐसी वस्तु नहीं बतलाएगा, जो हमारी न मुनी हुई, न समझी हुई और न जानी हुई हो, क्योंकि इन [ तीन रूपों के जानने] से उन्होंने सब कुछ जान लिया था ॥५॥ जो कुछ लाल सा था, वह उन्हों ने तेज का रूप जाना, श्वेत सा था, वह उन्होंने जलों का रूप जाना, जो काला सा था, वह उन्हों ने पृथिवी का रूप जाना ॥६॥ और जो कुल बेमालूम सा था, वह उन्हों ने कि इन तीनों देवताओं का मेल है। अब हे सोम्य ! मुझसे यह सीख, यह तीनों देवता जब पुरुप को प्राप्त होते है, किस तरह इनमें से हरएक तीन २ गुना होजाता है ॥७॥ पांचयां सण्ड अन्नमशितं त्रेधा विधीयते, तस्य यःस्थविष्ठो धातुस्तत् पुरीपं भवति, योमध्यम स्तन्मा५सं योऽणिष्ठस्तन्मः।। आपः पीता स्वेधा विधीयन्ते; तासांयः स्थविष्ठो धातु स्तन्मूत्रभवति, योमभ्यमस्तलोहितं, योऽणिष्ठःस प्राणः ॥२॥ तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते,तस्य यःस्थविष्टोधातु जाना, प्रपाठक ६.खण्ड ६॥ [३] स्तदस्थि भवति, योमध्यमः, समज्जा, योणिष्ठः सावाक् ॥शाअन्नमय हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजो मयी वागिति । भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति हो उवाच ॥ ४ ॥ जव पृथ्वी [ अन्न] खाया जाता है, तो वह तीन प्रकार का वनजाता है उसका सबसे स्यूल भाग मल बन जाता है, जो मध्यम है वह मांस, ओर जो सब से सूक्ष्म है, वह मन वन जाता है ॥ १ ॥ जर जल पिया जाता है, वह तीन प्रकार का बन जाता है, उसका जो सत्र से स्थूल भाग है वह मूर बन जाता है, जो मध्यम है वह रुधिर, और जो सब से सूक्ष्म है, वह माण बन जाता है ॥२॥ जब तेज [अर्थात् जो तेल घी आदि में है,वा जो अन्न में धातें है] खाया जाता है, तो वह तीन मकार का बन जाता है, उसका जो स्यूल भाग है, वह हड्डी बन जाता है, जो मध्यम है, वह मजा [मिज ] जो सब से मूक्ष्म है, वह वाणी बन जाता है * ॥ ३ ॥ क्योंकि हे सोम्य ! मन अन्न मय [ अन्न का बना हुआ है, प्राण जलमय है, वाणी तेजो मयी है। पुत्रने कहा । भगवन् ! अभी मुझे फिर [अधिक स्पष्ट करके ] बतलाएं । पिता ने कहा। तथा स्तु हे सोम्य, ॥ दनः सोम्य मध्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्वः समुदीपति तत्सर्पिर्भवति ॥१॥ * हर एक यस्तु अन्न जल और तेज तीनोंकी यनी हुई, इसलिये जो कोई घस्तु जिस फिसी प्राणधारी से साई जाती है, उसमें इन तीनों का भाग पाया जाता है, चाहे उनका न्यूनाधिक मागकुछ ही हो। छटापण्ड

[ २२४ ] छान्दोग्य उपनिषद्।
एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणि-
मा स ऊर्ध्वः समुदीपति तन्मनो भवति ॥ २॥
अपा ५ सोम्य ! पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः
समुदीपति स प्राणो भवति ॥३॥ तेजसः सोम्या
श्यमानस्य योऽणिमा सऊर्ध्वः समुदीपति सा वाग्भवति
॥४॥अन्नमयहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्ते
जोमयी वागिति । भूय एव मा भगवान् विज्ञापयविति
तथा सोम्येति होवाच ॥ ५॥
हे सोम्य ! जब दही मया जाता है, तो उसका सबसे सूक्ष्मभाग
ऊपर उठआता है, और वह मक्खन घनता है॥१॥ .
ठीक इसी तरह हे सोम्य ! अन्न जव खाया जाता है तो उसका
सबसे सूक्ष्म भाग ऊपर उठ आता है वह मन बनता है ॥ २॥
और हे सोम्य ! जब जल पिया जाता है, तो उसका सबसे
मूक्ष्मभाग ऊपर उठ आता है वह माण बनता है ॥ ३ ॥
और जब तेज खाया जाता है तो उसका सबसे मूक्ष्मभाग
ऊपर उठ आता है, वह वाणी बनती है ॥४॥
क्योंकि हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है, वाणी
तेजोमयी है।
पुबने कहा भगवन् ! अभी मुझे फिर [अधिक स्पष्ट करके]
निवलाएं।
पिताने कहा तया ऽस्तु हे सोम्य ॥ १ ॥

मपाठक ६. खण्ड
[ २२५ ]
सातवांखण्ड
षोडशकलः सोम्य ! पुरुषः पञ्च दशाहानि माशी,
काममपः पिब,आपोमयःप्राणोन पिवतो विच्छेत्स्यत
इति॥शास ह पञ्चदशाहानिनाश । अथ हैनमुपससाद
किं ब्रवीमि भो इति । ऋचः सोम्य यजू ५ पि सामा-
नीति'सहोवाच। 'नवैमांप्रति भान्ति भो इति'॥२॥
त ५ होवाच 'यथा सोम्य ! महतो ऽभ्याहितस्यैको
Sङ्गारःखद्योतमात्र परिशिष्टःस्यात, तेन ततोऽपि नबहु
दहे ५ सोम्य ! ते पोड़शानां कलानामेका कलाऽति
शिष्टास्यात् तयैतर्हि वेदान्ना नुभवस्यशान ॥ ३ ॥
अथ मे विज्ञास्यसीति' । सहाश । अर्थ हैनमुप-
ससाद । त ५ ह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्व ५ ह प्रतिपेदे।
त ५ होवाच ॥४॥ यथा सोम्य ! महतो ऽभ्याहितस्यै
कमगारं खद्योत मात्रं परिशिष्टं तं तृणै रुपसमाधाय
प्राज्वलयेत् । तेन ततोऽपि वहु दहेत् ॥ ५॥
एव ५ सोम्य! ते पोड़शानां कलानामेका कलाति
शिष्टाभूत् साऽन्नेनोपसमाहिता प्राज्वलीत, तयेतर्हि
वेदाननुभवस्यन्नमय ५ हि सोम्य मन अपोमयः प्राण
स्तेजोमयी वागिति । तद्धास्य विजज्ञाविति, विजज्ञा
विति ॥ ६॥

। कहा सोम्य . - . [२२६ ] छान्दोग्य उपनिषद् । हे सोम्य ! पुरष सोलह कलावाला है। तुम पन्द्रह दिन कुछ नहीं खाओ, जल जितना इच्छा हो पीते रहो, प्राण जो जलमय है, वह तुम्हारा कटनहीं जाएगा, जब तुम पानी पीते रहोगे ॥१॥ उसने पन्द्रह दिन तक नही खाया। तब वह पिता के पाम आया [ और कहा ] भगवन् ! क्या मुनाउं? पिता ने ऋचा, यजु और साम मन्त्र [ सुनाओ,] । उसने उत्तर दिया भगवन् ! यह मुझे नही फुरते है। ॥ २ ॥ पिताने उसे उत्तर दिया 'जैसे हे सोम्य ! जलती हुई ऑमि का एक अंगारा जो जुगुन जितना है वचरहे, तो उस [ अंगारे ] से पुरुप उससे बहुत [ जितनी उसकी छोटी शक्ति है,उमसे तनिक भी अधिक ] नहीं जला सक्ता, इस तरह हे सोम्या तेरी सोलह कला ओं में से एक कला वाकी वच रही है, और इस लिये उम एक कला से तू हेसोम्य ! अब वेदों को नही स्मरण करता है । अच्छा जाओ और खाओ ॥३॥ तब व मुझ से इसे समझेगा, । श्वेतकेतुने जाकर भोजन किया और फिर इस के पास आया । अब जो कुच्छ पिता ने उस से पूछा, वह सब उसने जान लिया। तर उमे पिता ने कहा ॥ ४ ॥ जैसे हेसोम्य [ जलतीहुई ] अमि का एक अगारा जो जुगुनू जितना वच रहा है, उस को यदि पास से मुलगा कर फिर चमकादे, तब वह उससे भी बहुत [ अधिक ] जला सक्ता है । इम प्रकार हेमोम्प ! तेरी सोलह कलाओं में से एक वाकी बच रही * खाए हुए अन्न का जो सूक्ष्मभाग मन में शक्ति डालता है, यह सानि जी बन्न से पढती है, उसपे सोलह विभाग फर सोरह कला यतामनकी उस पूर्णशचि से यह पुरुषसोलहवरावारराषहा है। .

मपाठक ६.खण्ड८ [ २२७ ] थी, वह अन्न से मुलगाई हुई फिर चमक उठी है, और उससे अव तुम वेदों को स्मरण करते हो । सो हेसोम्य ! मन अन्नमय है,माण जलमय है, और पाणी तेजोमयी है, । अव उसने पिता की बात को जान लिया, हां, उसने जान लिया * ॥ ६ ॥ आठवां खण्ड उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच 'स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति । यत्रतत् पुरुषः स्वपिति नाम, सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति,स्वमपीतोभवति तस्मा देन ५ स्वपितीत्याचक्षते स्व ५ ह्यपीतो भवति ॥१॥ स यथा शकुनिः सूने प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वा ऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयते, एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशंपतित्वा ऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्रणमेवोपश्रयते, प्राणबन्धन हि सोम्य मनइति ॥२॥ उद्दालक आणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को कहा 'बेटा! मुझसे तुम स्वप्न । के तत्त्व को सीखो । जब यह पुरुप सोजाती , * यहां अन्तिम शब्द का दुहुराना इस यात के प्रगट करने के लिये है कि त्रिवृत्करण (अर्थात् हरएक वस्तु तेज जल और अन्न के स्वभाव वाली है,) का प्रकरण समाप्त हुआ। +मन वाणी और प्राण का असली स्वरूप दिसला कर भात्मा का स्वरूप दिखलाने के लिये नया उपदेश आरम्भ करते है। स्वम से यहां अभिप्राय सुषुप्ति है, सुषुप्ति तकान से होती है, इसमें मन पाणी और दूसरे इन्द्रिय आराम करते हैं, औरमाण जागता है,जीयात्मा उतने काल के लिये परब्रह्म के आश्रय रहता है, उसे कोई विशेष शान नहीं रहता 4. [ २२८ ] छान्दोग्य उपनिषद् है, तब हे सोम्य ! सत् (ब्रह्म) के साथ मिलजाता है,वह अपने आप में लीनहोता है । इमलिये उसे स्वपिति कहते हैं, क्योंकि वह अपने आप (स्त्र) में लीन (अपीत) होता है * ॥१॥ जैसे (शिकारीके) तागे से दृढ़वन्धा हुआ कोई पक्षी (वाज आदि) दिशा २ में उड़ कर (फड़ फड़ाकर) और कहीं आश्रय न पाकर उसी जगह का आश्रय लेता है, जहां वह बन्धा हुआ है, ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! यह मन + दिशा २ में घूमकर और कहीं आश्रय न पाकर प्राण + का ही सहारा लेता है, क्योंकि यह मन हे सोम्य माण से बन्धा हुआ है (माण के आश्रप है.) अशनापिपासे मे सोम्य! विजाहीनीति । यत्रतत्पु रुपो ऽशिशिपति नाम,आप एव तदशितंनयन्ते। तद् यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुपनायइति, एवं तदपआच- चक्षते ऽशनायेति । तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतित ५सोम्य ! विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥३॥ तस्य कमूलं स्यादन्यत्रा न्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुड़ेनापो मूलमन्विच्छ, अद्भिः सोम्य ! शुङ्गेन तेजो मूल मन्विच्छ । तेजसा सोम्य ! शुङ्गेन सन्मूलमन्वि * स्वपिति, यह सोता है यह सन्द 'स्व' (अपने आपमें) और 'भपात (लीनहोता है) मे निकला, क्योकि आत्मा उस समय अपने स्वरूप में होता है, न कि बाहरकी दुनिया में । मन से मन में स्थित जीय, और प्राण में परम से मभिप्राय जैसा कि मोर जगह भी उसे प्राण का प्राण और प्राण शरीर इत्यादि कहा है (शकराचार्य) से हड़ी, हट्टियों से मजा, मजा से वीर्य। दूसरी ओर-स्त्री से खाया दुमा अन्त रस आदि के क्रम से रज बनताई।रज और वीर्य जो प्रपाठक ६ खण्ड ७ [२९] न्छ । सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः।। सत्प्रतिष्ठाः॥४॥ अब हे सोम्य ! तुम मुझसे भूस और प्यास के तत्व को सीखो। जब कोई पुरुप, कहा जाता है, कि भूखा है, तो (इसके यह अर्थ है कि) जल उस के खाये हुए को लेजारहे है । सो जैसे यह गोनाय अपनाय और पुरुपनाय है, इसी प्रकार जल ( जो अन्न को जीर्ण करता है और भूख का हेतु है) को कहते है अशनाया। इस मकार [अन्न के जीर्ण होने आदि से ] यह जो अङ्कुर निकला है [शरीर उत्पन्न हुआ हे ] विश्वास रखो, कि विना मूल [कारण] के नहीं हुआ होगा क्योंकि कार्य विना सत कारण के नहीं होता ] उसकामूल सिवायअन्न के और कहा [क्या] होसकता है ? इसीप्रकार * गोनाय-गौओं का नेता, गवाला । अश्वनायघोडों का नेता, साईस । पुरुपनाया-पुरुषों का नेता, सेनापति, राजा वा लीडर। इसी प्रकार अशनाया अर्थात अन्न का ले जाने वाला,जल | अन्न जो साया जाता है उसको तेजाव जीर्ण करके रस रुधिर आदि रूप में यदल कर सारे शरीर में फैला देता है, इस तरह पर साए हुए अन्न का जीर्ण हो कर शरीर में फैलना भूय का हेतु है, जो अशनाया (भूख) शम्द से प्रकट किया गया है। | अन्न शरीर का मूल इस तरहसे है। अन्न जय साया जाता है, तो उसको तेजाय जीर्ण कर देते है और यह जाठराग्नि से पर कर रस बनता है,रस से राधर, रुधिर से मास, मास से चर्चा, चों - अन्न का कार्य है,इन दोनों के मेलस नया शरीर बनता है और प्रति दिन के आहार से पढता है ।

। - [२३० ] छान्दोग्य उपनिषद् । हे सोम्य! अन्न भी एक अङ्गुर है, उस के भी मूल को ढूंद और वह तेज है। इसी प्रकार हे सोम्य ! तेज भी एक अंकुर है, उस के भी मूल को ईद, और वह हे सोम्य ! सब [ ब्रह्म ] है । वस हे सोम्य! इन सारी मजाचे का [ असली ] मूल सत् है अव भी स्थिति काल में यह सत् के आसरै है और अन्त को सत में लीन होती हैं । आठवां सण्ड अथ यत्रततपुरुपःपिपासति नाम, तेज एव तत्पीतं नयते । तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुपनाय इति, एवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति । तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतित सोम्य ! विजानीहि, नेदममूलं भविष्यतीति । तस्य क मूल ५ स्यादन्यत्राद्भय आद्भिः सोम्य! शुङ्गेनसन्मुल मन्विच्छ । सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदाय- तनाःसत्प्रतिष्ठाः। यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रोदेवताः पुरुषं प्राप्य निवृतनिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ् मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम्। स * यहां निचरा चित्र सब जगह ध्यान में रपना चाहिये, क्योंकि इसी क्रम से पूर्व उत्पत्ति दिग्पलाई है और यही उलटने से लय माम है। मत् (परादेयता) जम्याणी जलन्माण 'भग्नम्मन M 1 मपाठक ६, खण्ड ८ [२३१] य एपोऽणिमा ॥६॥ ऐतदात्म्य मिद सर्वतत्सत्यश्स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ! इति 'भूय एव मा भगवान विज्ञापयत्त्विति' 'तया सोम्येति होवाच।।। ( अब प्यास का तत्व बतलाते है ) और जर कोई पुरुप,कहा जाता है, कि वह प्यासा है तो ( इमके यह अर्थ है कि तेज उस को ले जा रहा है [माणादि रूप में बदल रहा है ] जो कुछ उम ने पिया है। सो जैसे यह गोनाय,अश्वनाय,पुरपनाय है । इसी प्रकार उस तेज को कहते है उदन्या * इस मकार [पानी के जीर्ण होने आदि से ] हे सोम्य ! यह जो अंकुर [ शारीर ] उत्पन्न हुआ है विश्वात सखो यह रिना मूल के नही होगा ॥५॥ उस का मूल सिवाय जल के और कहां होगा, इसी प्रकार हे सोम्य ! जल भी अंकुर है उस से तू उस के मूल को बंद, यह तेन है और तेज भी एक अंकुर है उम के भी मूल को हंद और वह सत् है । यस मोम्य ! इन मारी मनाओंका मूल मत् है यह सत् के आश्रय है और सत् मेगन होती है । हे सोम्प ? जिम तरह पर यह तीन देवता [ अन्न जल और तेन ] पुरुप को प्राप्त हो कर इन में से हर एक तीन २ गुणा हो नाता है, वह पहिले [६।४७ ] कह दिया है । हे मोम्य ! जर कोई पुरुप यहा मे चलना [ मरना ] है तो उसकी पाणी मन लीन होती है, मन माणों में,माण तेन में तेन पग देवता [ मत् ] में * उदन्या-याम, पचराय जनका नेजाने याना पर्थात् जन यो जीर्ष करता हुआ तेज प्याम का हेतु ॥

नवां खण्ड [२३२ ] छान्दोग्य उपनिषद्। में * सो जो यह सूक्ष्मता [ सद, जो जगत का मूल ] है ॥६॥ यह सब कुच्छ इसी से आत्मा वाला है वह सत्य है वह आत्मा है वह तू है हे + श्वेतकेतो! [पुत्र ने कहा ] हे भगवन् मुझे फिर बतलाएं ॥ पिता ने उत्तर दिया तथास्तु हे सोम्य । ॥ ७॥ यथा सोम्य ! मधु मधुकृतोनिस्तिष्ठन्ति नानात्या यानां वृक्षाणा र रसान् समावहारमेकता ५ रसं गमय न्ति ॥ १ ॥ ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यऽमुष्याहं वृक्षस्य रसो ऽस्मीयेवमेव खलु सोम्येमा! सर्वाः प्रजाः सति संपद्यन विदुः सति * जब पुरुष मरता है तो पहिले उसको बाणी बद होती है, वह दोन्नता नहीं है,पर समझता है। फिर उसका मन लीन होता है वह कुछ नहीं ममझता पर उमको छाती गरम होती है फिर तेज लोन होता है और वह ठडा होजाता है। +"तत्त्वममि' यह वेदात का बडा प्रसिद्ध वाक्य उन चार महा वाक्यों में से एक है जो प्रतवाद का स्तम्भ माने गये है। यह याका यहा नो बार दुहराया गया है इम पर हैत यदियों और प्रत पादियों क बहुत कुछ विचार है। पतिवाद का जोर मीधे अर्थ पर है और इतवाद का बल और पाक्यों के महार पर इमका टूमरा तात्पर्य मानने में है। देखो सत्यार्थ प्रकाग माम ममुठाम * जव मारी प्रजाए प्रति दिन मुपुप्ति में मत् में लीन होती है, तो वह फिर क्यों नहीं जानती धम मत् में नौन हुई में यह मुझे फिर पगट करें।

. . प्रपाठक ६. खण्डा [ २३३ ] संपद्यामह इति ॥२॥ त इह व्याघ्रो वासि ५ हो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा द ५शो वा मशको वा यद यद भवन्ति तदाभवन्ति ॥ ३॥ स य एपोऽणिमैतदात्म्य मिद ५ सर्व तत्सस्य ५ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ! इति ! भूयएव मा भगवान् विज्ञापयलिति । तथा सोम्येति होवाच ॥४॥ जैसे हे सोम्य ! मधुमक्खिये शहद बनाती हैं भिन्नर जगह के क्षों के रसों को इकट्ठा करके और उनको एकरूपमें एकरस बना देती हैं। वह जैसे वहां यह विवेक नहीं पासक्ते,कि मैं उस वृक्षका रमहूं, मैं उस वृक्षका रस हूं। इसी प्रकार हे मोम्य ! जर [मुपप्ति में और मर ने के पीछे] सारे जीव सत् में लीन होजाते हैं,तो वह नहीं जानते कि हमसदमें लीन हुए हैं ॥२॥ वह यहां जो जो कुछ ये चीते वा शेर भाड़ये वा मुअर वा कीट पतंग वा डांम और मच्छर, वही फिर २ होते हैं ॥३॥ सो जो यह सूक्ष्मता [सर का मूल] है। यह मय कुछ इसीसे आत्मावालाहै । यह सत्यहै । वह आत्मा है!वह है धनकेतो! [पुत्र ने कहा] हे भगवन् मुझे फिर बतलाएं * पिता ने उतर दिया 'तथास्तु हे मोम्य' ! ॥४॥ दमयां गण्ड इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यःस्यन्दन्ते,पश्चात् प्रती * जर पोई पुरुष अपने घर में सोता मार मपर उठार मिमी दूसरे गांव में जाता है। यह जानना है कि में अपने घर मे माया है। तब क्या कारण है कि यह प्रक्षाएं सत् से भागर नहीं जानताकि हम सत् से माई है यह मुसे फिर यताएं।

'[ २३४ ]' छान्दोग्य उपनिषद् । 'च्यः। ताःसमुद्रात समुद्रमेवापियन्ति समुद्र एवभवन्ति ता यथा तत्र न विदु रियमहमस्मीयमहमस्मीति॥१॥ एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाःप्रजाःसत आगम्य न विदुः 'सत आगच्छामह इति । तइह व्याघ्रोवा सि ५ होवा 'वृको वा वराहो वा कीटो वा पतंगोवाद ५ शोवा मश को वा यद् यद् भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥ स य एपोऽणिमैतदात्म्यमिद ५ सर्व तत्सत्य ५ स आत्मा तत्त्वमास श्वेतकेतो ! इति । भृयएच मा भगवान विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ हे सोम्य ! यह नदियें पूर्वी [गंगा आदि] पूर्वकी तरफ वहती है और पश्चिमी पश्चिम की तरफ बहती है। वह समुद्र में समुद्र में लीन होती है [ अर्थात् मेघों से पानी समुद्र में से अन्तरिक्ष में खीचा जाता है और फिर बरस कर वहता हुआ समुद्र में जामिलता है ] ममुद्र ही हो जाती है । वह (नदिय) जैसे वहां नहीं जानती कि मै यह नदी हूं या वह नदी हूं ॥१॥ इसी प्रकार हे सोम्य ! यह सारी प्रजाएं सत से आकर नहीं जानतीं,कि हम सत से आई हैं । वह यहा जो कुच्छ थे चीते पा शेर भेड़िये वा मूअर वा कीट पतंग वा डांस और मच्छर।वही फिर फिर होते है ॥ २॥ जो यह मूक्ष्मता सप का मूल है, यह सब कुच्छ इसी से आत्मा वाला है। यह सत्य है। वह आत्मा है। वह तु है है श्वतकेतो! (पुत्र ने कहा) हे भगान् मुझे फिर बतलाएं * ॥ * तरंग झाग मौरबुवुदे जो पानी में उठते हैं फिर पानी में लीन हुए नए हो जाते है, पर यह प्रजाएं सत् से भाकर, सुभुप्ति, मरने . प्रपाठक ६. खण्ड ११ [२३५ पिता ने उत्तर दिया 'तथास्तु हे सोन्य ! ॥ ३ ॥ ग्यारहया सण्ड अस्य सोम्य ! महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्या जीवन स्रवेद, यो मध्येऽभ्याहन्याजीवन स्रवेद्योऽग्रे ऽभ्याहन्याजीवन् सवेत्।स एप जीवनात्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ॥ १॥ अस्य यदेकां शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति, दितीयां जहाति अथसा शुप्यति । तृतीयां जहात्यथ साशुष्यति । सर्व जहाति सर्वःशुप्यत्येवमेव खल सोम्य ! विद्धीति हो वाच ॥ २ ॥ जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो नियत इति । स य एषोऽणिमेतदात्म्यमिद ५सर्व तत्स सश्स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ! इति । भूय एव मा भगवान् विज्ञापयविति । तथा सोम्येति हो वाच ॥ ३ ॥ हे सोम्य ! यदि कोई इम [मामने स्थित ] परे एस पी नर पर चोटदे,तो वह जीताहुआ ही यहे गा [ अर्याद उममें गे रस पड़ेगा और यह सूप नहीं जाए गा जीना रहेगा ] और यदि कोई इसके मध्य पर चोटदे,तो वह जीता हुभा यहेगा। और यदि कोई पोटी पर चोटदे तो जीता हुआ घहे गा। यह [एस ] जीते हुए आत्माम प्यास मार प्रलय में सत में लीन होती हुईमार पयों नहीं होगाती. यामम फिर पतलाएं।

[ २३६ ] छान्दोग्य उपनिपद् । हुआ [ और पुष्टि कारक रसों को ] पूरी तरह पीता हुआ हरा भरा हो कर खड़ा रहता है ॥१॥ पर जब इसकी एक शाखा को जीव छोड़ देता है, तब वह मुख जाती है, दूसरी को छोड़ देता है, वह सूख जाती है, तीसरी को छोड़ देता है, वह सूख जाती है, सारे वृक्ष को छोड़ देता है, सारा. वृक्ष मूखजाता है । इसी प्रकार हे सोम्य ! तुम जानो ॥२॥ कि जीव से पृथक् हुआ यह [ शरीर ] मरता है, जीव नहीं मरता है, सो जो यह मूक्ष्मता सबका मूल है, यह सव कुच्छ इसी से आत्मा वाला है वह सस हैं । वह आत्मा है । वह तू है हे श्वेतकेतो ! [पुत्र ने कहा ] हे भगवन् ! मुझे फिर वतलाएं * ॥ पिता ने उत्तर दिया 'तथास्तु हे सोम्य' ! 1॥ ३ ॥ यारहवां खण्ड न्यग्रोधफलमतआहरेति ” “इदं भगवइति" "भिन्धीति" "भिन्न भगवइति" "किमत्रपश्यसीति" अण्व्य इवेमा धाना भगव इति ” “ आसामङ्गका मिन्धीति” “ भिन्ना भगवइति" "किमत्रं पश्यसि" "किश्चन न भगव इति" त ५ होवाच ॥१॥ "यं सोम्येतमणिमानं ननिभालयस एतस्य सोम्यैषो ऽणिम्न एवं महान्यग्रोधस्तिष्ठति ॥ २॥ श्रद्धत्स्व सोम्ये ति सय एपोऽणिमेतदात्म्यमिद ५सर्व तत्सत्य ५ स , " । * यह पृथिव्यादि नाम मप जगत् यत्यंत सूक्ष्म उम सदरूप से कस उरपर होता है जो स्थर्य नाम रुप से रहित है।

. -- प्रपाठक ६. खण्ड १३ [२३७ ] आत्मा तत्त्वमास श्वेतकेतो ! इति । भूयएव मा गवान विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच ॥३॥ इस [वड के क्ष] से बड़का फल लाओ। यह है हे भगवन् !" इसे तोड़ो॥ तोड दिया है हे भगवन् !॥ इसमें क्या देखते हो?॥ बड़े सूक्ष्म से दाने हे भगवन् ॥ प्यारे इन दानों ] मे से एक को तोड़ो ॥ तोड़ दिया है हे भगवन् !॥ स में क्या देखते हो ॥ कुच्छ नही हे मघवन् ! ॥१॥ उस को उसने कहा हे सोम्य ! तू अब जिस सूक्ष्मता को नही देखता है इसी सूक्ष्मता से हे सोम्य ! यह इतना बडा पड़ का वृक्ष खडा होजाता हे ॥२॥ विश्वास कगे हे सोम्य !कि जो यह सूक्ष्मता सर का मूल है यह सब कुच्छ इती से आत्मा वाला है वह सस है वह आत्मा है वह तू है हे श्वेतकेतो! [पुत्र ने कह.] हे भगवन् ! मुझे फिर बतलाएं * ॥ पिताने उत्तर दिना तथास्तु हे सोम्य ! ॥३॥ तेरहवा खण्ड लवण तदुदके ऽवधायाथ मा प्रातरूपसीदथा इति। । यदि यह सत जगन का मूल है तो फिर अनुभव क्यों नहीं होता।

" [२३८] छान्दोग्य उपनिषद् । सह तथा चकार । त होवाच यद्दोषा लवण मुदके ऽवोधाअङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य नविवेद यथाविली- नमेवाङ्ग ॥१॥"अस्यान्तादाचामेति"1"कथमिति" लवण मिति" " मध्यादाचामेति ” कथमिति " लवण मिति" अन्तादाचामेति” “कथमिति" "लवण मिति " अभिप्रास्येनदथ मोपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । तच्छश्वत् संवर्तते । त होवाच अत्र वाव किल तत्सोम्य ! ननिमालयसि । अत्रैव किलेति ।। २॥ स य एपोऽणिमैतदात्म्यामद ५ सर्व तत्सत्य ५ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ! इति भूय एव मा भगवान् विज्ञपयात्विति । तथा सोम्येति होवाच ॥ ३॥ इस लवण को पानी में डाल कर फिर सबेरे मेरे पास आओ उम ने बसा ही किया। पिता ने उसे कहा । वेटा जो लवण तुमं रानको पानी में टाला या उसे लेआभो । पुत्र ने उसे दंदा । नहीं पाया क्यों कि वह उस में धुल गयाथा ॥१॥ पिता ने कहा इसके ऊपर आचमन करो । कैसा है? सटूना [खारी] है मध्य से आचमन करो कैसा है। सलूना है। अच्चा अब इसको छोड़कर मेरे पास आयो । उमने वैसा ही वि [भौर कहा] वह लवण] मारे विद्यमान है।

. प्रपाठक ६.खण्ड १४॥ [२३] । उसको पिता ने कहा इसी प्रकार यहां [ शरीर में ] ही है वह इन हे सोम्य ! तुम नहीं देखते हो निःसंदेह वह यहां ही है ॥२॥ । विश्वास करी हे सोम्य कि जो यह सूक्ष्मता सब का मूल है पह सब कुच्छ इसीसे आत्मा वाला है। वह सत्य है । वह आत्मा है वह तू है हे श्वेतकेतो ! [पुत्रने कहा] हे भगवन् ! मुझे फिर वतलाएं* पिताने उत्तर दिया 'तथास्तु हे सोम्य' !॥ ३ ॥ चौदह खण्ड - यथा सोम्य ! पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्ष मानीय तं ततो ऽतिजने विसृजेत् । स यथां तत्र प्राङ्योदङ् वाधराङ्वा प्रत्यङ् वा प्रध्मायीताभिनद्राक्ष आनीतो ऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः॥ १॥ तस्य यथाऽभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयाद “ एतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति सग्रामादग्रामं पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोप संपद्येत , एवमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद । तस्य तावदे व चिरं यावन्नविमोक्ष्ये अथ संपत्स्य इति ॥२॥ सय एषोऽणिमेतदात्म्य मिद * सर्वं तत्सत्य ५स आत्मा तत्त्वमास श्वेतकतो ! इति भूयएव मा भगवान विज्ञपयत्विति । तथा सोम्येति होवाच ॥३॥ *यदि ऐसे है तो लवण की तरह जगत् का मूल भी यह सत् किसी उपाय से उपलब्ध होना चाहिये यद्यपि यह इन्द्रियों से उपलब्ध नहीं होता। उसकी उपलब्धि का क्या उपप है। .

[२४०] छान्दोग्य उपनिषद् । जैसे हे साम्य ! कोई पुरुष किसी पुरुष को कन्धार से आंखें बांध कर लेआए और उसको निर्जन जंगल में छोड़दे । जैसे वह वहां पूर्व पश्चिम और उत्तर दक्षिण की तरफ घूमता हुआ पुकार करे, कि मुझे आंखें वांधकर लाया गया है और बांधी हुई आंखें से छोड़ दिया गया है* ॥१॥ इस पर जैसे कोई पुरुष उसकी पट्टी सोलकार वतलाए, कि इस दिशा की तरफ़ कंधार है तुम इस दिशा को चलेजाओ। वह यदि विद्वान् और समझवाला है, तो एक गांव से दूसरे गांव का रस्ता पूछता हुआ निस्संदेह कंधार पहुंचजाएगा । ठीक इसी तरह यहा भी वह पुरुष जिसको आचार्य मिलगया है, वह उस [सत] को जानलेता है।उसके लिये उतनीदेर ही देर है,जबतक वह [देह से] नहीं छुटेगा,तब वह सबको प्राप्त होगा। सो जो यह सूक्ष्मता सबका मूल है,यह सबकुच्छ इसी से आत्मावाला है। वह सत्य है। वह आत्मा है । वह तू है हे श्वतकेतो! [पुत्रने कहा] हे भगवन् मुझे फिर बतलाएं। पिताने उत्तर दिया तथास्तु हे सोम्प ! ॥ ३ ॥ * ठीक ऐसे ही मनुष्य यंद आंखों के साथ लोक में आया है और घंधी हुई मांखों से ही छोड़ादिया गया है । यह कंधारी से चढ़कर बंद आंखों से लाया गया है क्योंकिइसे यह भी पता नहीं कि मैं कहां ने आया है। पर जैसे कंधारी को उपदा मिलजाने से अपने देश को पहुंचजाता है। ऐसे ही यह भी उस देश के जाननेवाले आचार्य के मिलजाने ले असल देश को पालेता है। आचायवाला पुरुष जिस क्रम से सत को HIT होता है यह कम मुझे रवान्तवारा बतलाएँ।। 1 , प्रपाठक ६ खण्ड १५। [२४५ ] पन्द्रहवां सण्ड पुरुष " सोम्योपतापिनंज्ञातयः पर्युपासते 'जानासि मां जानासि मामिति ' । तस्य यावन्न वाङ् मनसि संपद्यते, मनःप्राणे,प्राणस्तेजसि,तेजःपरस्यां देवतायां, तावजानाति ॥१॥ अथ यदा ऽस्य वाङ् मनसि संप- द्यते, मनःप्राणे, प्राणस्तेजसि,तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २॥ स य एपो ऽणिमेतदात्म्यमिद ५ सर्व तत्सत्य ५ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ! इति'। 'भूय एव माभगवान् विज्ञापयत्विति' । 'तथा सोम्येति गोवाच ॥३॥ हे सोम्य ! जब कोई पुरुष वीमार होता है, तो उसके सबन्धी बाधव प के आस पास बैठ जाते है [ यह कहतेहुए ] " क्या तुम मुझे निते हो, क्या तुम मुझे जानते हो "'जब तक उस की वाणी मन लीन नहीं होती, मन माण में, प्राण तेज में, और तेज परा देवता सत् ] में [ लीन नहीं होता] तब तक वह जानता है ॥ १ ॥ पर जा उसकी वाणी मनमें लीन होजाती है, मनमाण मे और माण परादेवता में [ लीन हो जाता है ], तब वह उन को नहीं 'जानता है * ॥२॥ * मरने का क्रम जो अज्ञानी के लिये है यहीशानी के लिये है। अज्ञानी सत् को प्राप्त हो कर नहीं जानते, कि हम उस को प्राप्त हुए हैं, और वापिस आकर नहीं जानते कि हम सत् से वापिस आए है । पर शानी 'को पाकर अज्ञानी नहीं होता।

[२४२ ] छान्दोग्य उपनिपद् । सो जो यह सूक्ष्मता (सबका मूल है) यह सब कुछ इसी से आत्मा वाला है । वह सत्य है । वह अत्मा है। वह तू है, हे श्वेतकेतो!'[ पुत्र ने कहा ] हे भगवन् मुझे फिर बतलाएं * 1 पिता ने उत्तर दिया 'तथास्तु हेसोम्य !' ॥ सोलहयां पण्ड पुरुप ५ सोम्योत हस्तगृहीत मानयन्ति “ अपहा, पीत् स्तेयमकापीत् परशुमस्मै तपतेति” । स यदि तस्य कर्ता भवति, तत एवानृतमात्मानं कुरुते । सोऽनृता भिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धायपरशुंतप्तंप्रतिगृह्णाति। स दह्यतेऽथ हन्यते ॥१॥ अथ यदि तस्याकर्ता, भवति, तत एव सत्यमात्मानं कुरुते । स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मान मन्तर्धाय परशुं तप्त प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २॥ स यथा तत्र नादाह्येते तदात्म्य मिद ५ सर्व तत्सत्य ५ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ! इति'। तद्धास्य विजिज्ञाविति विजज्ञा- विति ॥३॥ हे सोम्य जैसे किसी पुरुष को हाथ से पकड़कर लाते है कि " इसने कोई चीज़ उठाली है इसने चोरी की है" (यदि वह *यह जो सत् को नहीं जानता है और वह जो जानता है, मरकर जब दोनों ही सत् को प्राप्त होते हैं, तो जानने वाला उसको पालेता है, न जानने घाला नए जन्म के लिये फिर पापिस आता है, इसमें आकारण है वह मुझे फिर रष्टान्त द्वारा यतलाएं। और मपाठक ६ खण्ड १६॥ [२४३ ] इनकार करता है, तो वे कहते हैं) "इसके लिये कुल्हाड़ा [लोहा] तपाओ"* अब यदि वह उसका (चोरीका)करने वाला होता है, तब वह निःसंदेह अपने आप को झूठा वनारहा है, वहझूठे अभिप्राय वाला झूठ से अपने आप को ढांप कर तपे हुए लोहे को पकड़ता है, तो दग्ध होता है और (राजपुरुषो से) मारा जाता है ॥ १॥ और यदि वह उसका (चोरीका)करने वाला नहीं होता है, तब वह अपने आपको सच्चा धनारहा है, वह सच्चे अभिप्राय घाला सच्चाई से अपने आप को ढांप कर तपे हुए लोहे को पकड़ता है, वह दग्ध नहीं होता, और वह छूट जाता है ॥२॥ जैसे वह [ सच्चा ] पुरुष वहां दग्ध नहीं होता । इस प्रकार यह सब इससे आत्मा वाला है । वह सत्य है । वह आत्मा है। वह तू है हे श्वेतकेतो !। तब उसने उसकी बात को जानलिया हां, उसने उसको जानलिया ॥३॥ * जहां किसी लौकिक उपाय से सच्चे झूठे का पता न लगसके, वहां सच्चे झूठे की परीक्षा के लिये यह दिव्य उपाय स्मृतियों में बतलाया गया है। तपे हुए लोहे को सच्चा और झूठा दोनों पकड़ते हैं। एक के हाथ को सच्चाई लपेटे हुए है और वह अग्नि के दाह मे यचजाता है। दूसरा आग के और हाथ के मध्य में झूठका परदा डालता है, इस लिये उसके असर से नहीं बचता । इसी प्रकार मरने के पीछे यद्यपि दोनों ही सत् को प्राप्त होते है, यह भी जो उमको जानता है और यह भी जो नहीं जानता है, तथापि फल दोनों के लिये भिन्न २ होजाते हैं। -एक ब्रह्मानन्द को पहुंचता है और दूसरा नए जन्म के लिये पापिस आता है।

[ २४४ ] छान्दोग्य उपनिषद् । । सातवां प्रपाठक *-पहला सण अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदः। त ५ होवाच “ यदेस्य तेनमोपसीद,ततस्त ऊर्च वक्ष्या मीति || स होवाच 'ऋग्वेदं भगवोऽध्यमि युजवेंद ५ सामवेद माथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पंचमं वेदानां वेदं पित्र्य ५ राशिं देवं निधि वाकोवाक्य मेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्र विद्या ५ सर्पदवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि ॥ २॥ सोहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मवित् । श्रुत ५ ह्येव मे भगवदूहशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति । सोऽहंभगवः शोचामि,तमा भगवाञ्चोकस्य पारं तारयलिति । त होवाच यद्रीकञ्चैतदध्यगीष्ठा नामेवैतत् ॥३॥ नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चचतुर्थ इतिहास पुराणः पञ्चमोवेदानां वेदः पित्र्योराशियो निधिर्वाको- वास्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या । नामेवेतन्नामोपास्खे- ति ॥ ॥ स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नोगतं तत्राम्य यथाकाचारो भवति, यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते । * उदै प्रगटफ में जगत् में मूल परा देयता का उपदेश दिया है, उमम निचले तत्वों की महिमा नहीं दिलाई। अयम मातवें प्रपाठक में मार पर भूक्ष्म, मृरमतर पिपय योजितलाते हुए अन्त में मपादक ७. खण्ड १ [ २४५ ] अस्तिभगवो नानो भूय इति"? 'नाम्नो वाव भूयो ऽस्तीति'। 'तन्मे भगवान ब्रवीत्विति ॥ ५॥ नारद सनत्कुमार के पास आया और कहा 'हे भगवन् मुझे शिक्षा दो' सिनत्कुमार ने उसे कहा जो कुच्छ तुम जानतेहो, वह मुझे बतलाओ, तब मैं उसके आगे तुम्हें बतलाऊंगा' ॥१॥ नारद ने कहा 'हे भगवन् मैं ऋग्नेद पढ़ा हूं, तथा यजुर्वेद सामवेद और चौथा आर्षण पांचवां इतिहास पुराण. वेदों का वेद, पित्र्य, राशि, दैव, निधि,वाकोवाक्य, एकायन, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्प और देवजनकीविद्या, यह सब हे भगवन् मैं पढ़ा हूं ॥१॥ * उसी परा देवता का निर्देश किया है अर्थात् गाम आदि जो एक दूसरे से उत्तम हैं उन सब से बढ़कर भूमा नामी तत्य है उसकी प्राप्ति के लिये नाम आदियों की क्रम से महिमा यतलाई है। मानों यह एक सीढ़ीर भूमा तक पहुंचान का उपाय है। * यहां हमें यहुनसी विद्याओं का पतालगता है जो उपनिषदों के समय आर्यावर्त में आम तौर पर पढ़ी पढ़ाई जाती थीं। परन्तु इन विद्याओं से क्या कुच्छ अभिप्रेत है इसका निर्णय प्राचीन प्रमाणों पर निर्भर रखता है जिसके लिये हम अन्येषण कर रहे है। शंकराचार्य मे इस विषय में यह लिखा है ऋग्नद । यजुर्वेद । सामवेद । अथर्ववेद । इतिहास पुराण (भारत) पांचवां वायदों का चंदध्याकरणपिन्य - श्राद्धकल्पाराशि-गणितशास्त्रादेव-उत्पातशानशास्त्रानिधि महा कालादिनिधिशास्त्रापाकोवास्य तर्कशास्त्रापफायन गीतिशास्त्रा देवविद्या-निरुक्त । ब्रह्मविद्या शिक्षाकल्प और छन्दाभूतविद्याभूत तंन्त्राक्षनविद्या धनुर्वेद। नक्षघिद्या -ज्योतिपामपंविधा=गागड़। देवजनविद्यानन्ध की योजना, नृत्य, गीत, यजाना और शिल्प आदि का विज्ञान ॥ मिलामो १११।१२।२०१॥ ७१ [२४६ ] छान्दोग्य उपनिषद् । नो हे भगवन् ! मैं केवल मन्त्रों को जानता हूं, आत्मा को नहीं जानता। मैं ने आप जैसे पुरुषों से सुना है कि जो आत्मा को जान लेता है यह शोक से परे होजाता है । सो मैं हे भगवन ! शोक में हूं आप मुझे शोक से पार करें। सनत्कुमार ने उत्तर दिया। 'जो कुच्छ तुमने यह पढ़ा है यह केवल नाम है ॥३॥ नागही ऋग्वेद है, यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आथर्वण पांचवां इतिहागपुराण, चेदों का वेद, पित्र्य, राशि, देव, निधि, चाकोवाक्य, एकायन, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्प और देवनन की विद्या, यह सब नाम ही है । नाम को ही तुम उपासी ॥४॥ यह जो नाम को ब्रह्म के तौर पर उपासता है। जहां तक नाम की पहुंच है, वहां तक इसकी इच्छानुसार होती है, (कोई रोक नहीं होती है-मालिक होता है जो नाम को ब्रह्म के तौर पर उपामता है । (नारद ) "क्या हे भगवन् नाम से बुढ़ कर कोई वस्तु है" ॥ (सनत्कुमार ) "हां नाम से बढ़कर है".॥ (नारद ) 'भगवन् ! मुझे वह वताएं ॥५॥ दूसरा खण्ड वाग्वाव वानोभृयसी । वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेद ५सामवेद माथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चम वेदानांवेदं पित्र्य५ राशिं देवं निर्षि वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भृतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्यां दिवस पृथिवीच वायुं चाकाशं चा *'यस्नानपद फिमृचा परिष्यति' जो उसे नहीं जानता, वह ऋचा सेपमा फरगा (१११६४।३९.)! .

मपाठक ७. खण्ड २। [२४७ ] पश्चतेजश्च देवा ५श्च मनुष्या ५श्व पशु ५श्व व्या ५ सिच तृणवनस्पतीच्छ्वापदान्या कीटपतङ्गपिपीलकं धर्मश्चाधर्मञ्च सत्यञ्चानृतं च साधु चासाधु च हृदय- ज्ञञ्चा हृदयज्ञञ्च । यदै वाङनाभविष्यन्न धर्मो ना- धर्मों व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु नहृदयज्ञो नाहृदयज्ञः । वागेवेतत्सर्व विज्ञापपति, वाच मुपास्स्वेति ॥१॥ स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते,यावयाची गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति, यो वाचं ब्रह्मेत्यु पास्ते'। 'अस्ति भगवो वाचो भूय इति' । 'वाचो वाव भूयोऽस्तीतिः 'तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति'।२। याणी नाम से बढ़कर है। यह वाणी है, जो इनसब को पूरा २ जितलाती है-ऋग्वेद.यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आथर्वणपांचवां इतिहास पुराण, वेदों का वेद, पित्र्य, राशि, दैव, निषि, वाको- वाक्य, एकायन, देवविद्या,ब्रह्मविद्या, भूतविद्या,त्रविद्या, नक्षत्रावद्या सर्प और देवजन की विद्या; धौ, और पृथिवी; वायु और आकाश; जाल और तेज; देवता और मनुष्य; पशु और पक्षी; तृण और वनस्पति सब सिजन्तु कीट, पतंग और चीटीतका धर्म और अधर्म; मत्य और झूठ; भला और बुरा; प्रिय और अप्रिय । यदि वाणी न होनी, तो न धर्म जानाजाता, न अधर्म; न सच न झा न भला न बुरा " * हृदयश-अक्षरार्थ, हृदय का प्याय ॥

.. [२४८ ] छान्दोग्य उपनिषद्। नमय न ऑप्रिय । वाणी ही यह सबकुछ हमें समझाती है। वाणी को उपासो॥१॥ वह जो वाणी को ब्रह्म के तौरपर उपासता है, उसके लिये जहांतक वाणी की पहुंच है, वहां तक कोई रोक नहीं रहती-जो वाणी को ब्रह्म के तौरपर उपासता है ।। 'क्या हे भगवन् ! वाणी से बढ़कर कोई वस्तु है । ? 'हां, वाणी से बढ़कर है॥ 'भगवन् ! वह मुझे बतलाएं ॥२ तीमरा खण्ड मनोवाव वाचो भूयः। यथावे देवाआमलके द्वे वा कोले दावा सौ मुष्टि रनुभवत्येवाचंचनामचमनोऽनु भवति।सयदामनसामनस्यतिमन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते, कर्माणि कुर्वीयेत्यथकुरुते, पुत्रा पशू ५ श्वेच्छेये त्यथे च्छते, इमञ्चलोक ममुञ्चेच्छेयेत्यथेच्छते । मनोह्यात्मा मनोहि लोको मनोहि ब्रह्म मन उपास्खेति ॥ १॥ स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते, यावन्मसो गतं तत्रास्य यथा- कामचारो भवति, यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते । 'अस्ती भगवो मनसो भयइति' ? 'मनसो वाव भूयोऽस्तीति'। 'तन्मे भागवान् वीविति' ॥ २ ॥ मन वाणी मे घड़कर ई, क्योंकि निम प्रकार एक वंदमुट्टी दो आंचलों वा दोवेरों या दोरहेड़ों को अनुभव करती है (अप प्रपाकठ ७ खण्ड [२४९ ] ने अन्दर रखती है ) इस प्रकार मन नाम और वाणी इन दोनों को अनुभव करता है। जब कोई पुरुष मन से ख्यालकरता है, कि मैं मन्त्रों को पर्दू , तब वह पढ़ता है, (जब ख्याल करता है) मैं कर्म करूं, तब वह कर्म करता है । (जब ख्याल करता है ) मैं पुत्र और पशुओं को चाहूं, तब वह उनको चाहता है; (जय ख्याल करता है) इसलोक और उसलोक को चाहू, तब वह उनको चाहता है । मन निःसंदेह आत्मा है, मन लोक है, मन ब्रह्म है , मन को उपासो ॥१॥ वह जो मन को ब्रह्म के नौरपर उपासता है, जहां तक मनकी रहुंच है, वहां तक इसे कोई रोक नहीं रहती, जो मन को ब्रह्मके र पर उपासता है। 'क्या हे भगवन् ! मन से बढ़कर कोई वस्तु है ? 'हां, मन से बढ़कर है॥ 'भगवन् ! वह मुझे बतलाएं। ॥३॥ * मन में जय ख्याल आता है, तब यह वाणी को वक्तव्य विषय में प्रेरता है, इस प्रकार याणी मन के अन्तर्गत है। और नाम याणी के अन्तर्गत है। | पुत्र पशु और लोक परलोक की प्राप्ति के उपायों का अनुष्ठान करके उनको प्राप्त होता है ।। + क्योंकि मारमा मन के साधन से काम करता है, और भोग भोगता है॥ मनही लोक की प्राप्ति का साधन है और ब्रह्म की प्राप्ति का साधन है।

[२५० ] छान्दोग्य उपनिषद। चौथा सण्ड संकल्पो वाव मनसो भूयान् । यदा वै संकल्पयते ऽथमनस्यत्यथ वाचमीरयति, तामु नानीरयति । नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति, मन्त्रेषु कर्माणीति ॥१॥ तानि ह वैतानि संकल्पैकायनानि संकल्पात्मकानि संकल्पे प्रतिष्ठितानि । समक्लप्तां द्यावापृथिवी, समक ल्पेतां वायुश्चाकाशञ्च, समकल्पतामापश्च तेजश्च, ते पा ५ संक्लप्त्यै वर्ष ५ संकल्पते, वर्पस्य संक्लुप्त्ये अन्न ५ संकल्पते,ऽन्नस्य संक्लुप्त्यै प्राणाःसंकल्पन्ते, प्राणाना ५ संक्लुप्त्ये मन्त्राः संकल्पन्ते, मन्त्राणा ५ संक्लप्ये कर्माणि संकल्पन्ते, कर्मणा सक्लुप्त्ये लोकः संकल्पते, लोकस्य संक्लप्यै सर्व ५ संकल्पते, स एप संकल्पः, संकल्प मुपास्स्वेति ॥ २॥ मंकल्प * मन से बढ़कर है. क्योंकि जब पुरुप संकल्प करता है, तब वह रयाल करता है, तब याणी को प्रेरता है, और वह उसको (याणी को) नाम (शब्द) में मेरता है । नाम में एक होते है, और मन्त्रों में कर्म ॥१॥ मन्त्र * मेयरप-दादा, मनुष्य का संकल्प होता है, धर्म उमक पाल पनते है इमलिय मफल्प यपाल में पढ़कर है॥ मित्र जो कि दम्प है, पह नाम में एक होजाते है, अर्थात् नाम भन्नात है। क्योंफि विशेष मामान्य के अतर्गत होता है।

भपाठक ७ खण्ड ४ [२५१ ] सो इन सब (मनसे लेकर कर्मपर्यन्त) का संकल्प एक आश्रय (केन्द्र) है, (संकल्प की ओर खिचे जारहे हैं) यह संकल्पस्वरूप ( संकल्प के बने हुए) हैं और मंकल्प में रहते हैं। द्यौ और पृथिवी (मानोंएक) संकल्पवाले हैं, वायु औरआकाश (मानों एक)संकल्प वाले हैं,जल और तेज (मानों एक ) संकल्पवाले हैं *। उनके (टो, पृथिवी मन्त्रों में कर्म एक होते है । मन्त्रों से प्रकाशित किये हुए ही कर्म किये जाते हैं, कोई कर्तव्य ऐसा नहीं, जो मन्त्रों में न यतलाया हो। जो कर्म मन्त्र से प्रकाश पाकर (प्रगट होफर) आत्मलाभ करचुका है, ब्राह्मण उसके विषय में यह विधान करता है, कि यह कर्म इस फल के लिये करना चाहिये इत्यादि । और जो ब्राह्मणों में कर्मों की उत्पत्ति देखीजाती है (अर्थात् नया कर्म घतला हुआ प्रतीत होता है) वह भी मन्त्रों में जो फर्म सत्ता पाचुके है, (जो मन्त्रों में संक्षेप से आचुके हैं) ऐसे कर्मी को स्पष्ट किया गया है । ऐसा कोई कर्म नहीं, जिस की उत्पत्ति केवल ब्राह्मण हो, और मन्त्रों ने उसका प्रकाशन किया हो। लोक में भी यह प्रसिद्धि है, कि कर्म यी से विधान किया गया है, और प्रयी शब्द ऋग्, यजु, साम इन तीनप्रकार के मन्त्रों का नाम है । मुण्डक उपनिषद में भी लिखा है, कि 'मन्त्रों में ऋपियों ने जिन कर्मों को देखा' इसलिये यह ठीक है, कि मन्त्रों में कर्म एक होते हैं ' (शंकराचार्य)॥ * यहां 'समल्कृप्ताम, समकल्पेताम, समकल्पताम्' इन भिन्न प्रकार के शब्दों के प्रयोग में क्या अभिप्राय का भेद है, यह यात स्पष्ट नहीं हुई, न किसी पूर्व स्यारयाकार ने ही की है। धौ और पृथिवी संकल्पवाले है, इत्यादि का यह अभिप्राय है, कि यह एक संकल्प (ईश्वर संकल्प) के अधीन काम करते है, और इसीलिये यह सारे इस तरह काम करते है, जिससे एफदूसरे के काम में सहायता मिलती है, मानों यह सारे एफ अभिप्राय को रसफर काम . में लगे हुए हैं।

[ २५२ ] . छान्दोग्य उपनिषद् । आदि के ) संकल्प से वर्षा संकल्पवाली होती है; वर्षा के संकल्प मे अन्न संकल्पवाला होता है; अन्न के संकल्प से माण संकल्पवाले। होते हैं, प्राणों के संकल्प से मन्त्र संकल्पयाले होते हैं, मन्त्रों के संकल्प से कर्म संकल्पवाले होते हैं, कमों के संकल्प से लोक संकल्प वाला होता है, लोक के संकल्प से हर एक वस्तु संकलपवाली होती है * यह है ( इतने सामर्थ्य वाला ) संकल्प, सो तुम संकल्प को उपातो ॥२॥ वह जो संकल्प को ब्रह्म के तौरपर उपासता है, वह स्वयं अकम्प्य (निश्चल) प्रतिष्ठावाला और दुःख से रहित हुआ उन लोकों को प्राप्त होता है, जो संकल्प वाले हैं, ध्रुव हैं, मतिष्ठा वाले है और दुःख से रहित हैं। जहां तक संकल्प की पहुंच है, यहां तक इसे कोई रोक नहीं रहती, जो संकल्प को ब्रह्म के तौरपर उपासता हे। 'क्या हे भगवन ! संकल्प से बढ़कर कोई वस्तु है ।। 'दो संकल्प से बढ़कर है। 'भगवन् ! वह मुझे बतलाएं ॥ ३ ॥ * अभिमाय यह है, फिया और पृथिवी आदि ने जिस अभिप्राय स पाम भारम्भ किया है, उस अभिप्राय फो पूरा करने के लिये वर पननी है, भागे उR अभिप्राय को पूरा करने के लिये अन्न होता है, म से प्राण (जीवन की उत्पत्ति और उसफा धारण) जीवन का रस्ता दिलाने के लिये मात्र, मन्त्र फर्म द्वारा सफल होते हैं, कर्म एमार भविष्यको सुधारता है, भविष्यत् के सुधरने में दुनिया की दर एक यस्तु हमार रिपे मुखदायी अनजाती है। मानो एक संकल्प इन सब के भादर पदरमाई, जिससे यह सारा जगत् हमारी सेवा में सगरमाद, भार यह वर का पविन गौर सरय संकल्प है।

भपाठक ७. खण्ड ५॥ 1.२५३ ] पांचयां खण्ड चत्तवाव संकल्पद भूयः। यदावे चेतयतेऽथसंकल्पयते थमनस्यत्यथ वाचमीरयति,तामु नाम्नीरयति, नाम्नि न्त्रिा एकं भवन्ति, मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १॥ तानि 'वा एतानि चित्तेकायनानि चित्तात्मानि चित्ते प्रति- इतानि । तस्माद् यद्यपि वहुविदचित्तो भवति नाय स्तीत्येवेनमाहुः।यदयं वेद यदाऽयं विद्वान्नेत्थमचित्तः पादिति। अथ यद्यल्पविचित्तवान् भवति, तस्माएवोत श्रूपन्ते । चित्त ५ोवपामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं तिष्ठा चित्तमुपास्वेति।।२॥स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते,चि- न्वैसलोकान ध्रुवान्ध्रुवःप्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽन्य मानानव्यथमानोऽभिसिद्धयति।यावञ्चित्तस्यगतंतत्रा तयथाकामचारो भवति, यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते। अस्ति गवश्चित्ताद् भूय इति' 'चित्ता वाव भूयोऽस्तीत' न्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥ चित्त * संकल्प से बढ़कर है । क्योंकि जब कोई पुरप सो ना है, तब वह [उसकाम को करने या त्यगने, अथवा उसमस्तु लेने वा छोड़नेका] संकल्प करता है, और तब वाणी को मेरता चित्तन्योध, सोच,समह, गौर, फ़िफर अर्थात् मय पाषरना चा- य, मागे इसका क्या फल होगा, और पीछे पमी भयस्था में पेमें मों का क्या पर्यणाम निकासविषय में मुसि पूर्णरसदमके। + [२५४ ] छान्दोग्य उपनिषद् । है, और वह उसको [पाणी को] नाम में प्रेरता है, नाम में मा एक होते हैं, और मन्त्रों में कर्म ॥ ॥ सो इन सब सिंकल्प से लेकर कर्मपर्यन्त] का चित्त एकगा [केन्द्र] है, यह चित्तस्वरूप हैं, और चित्त में रहते हैं। इसलिये यदि को पुरुप सोच से शून्य [अचित्त] हो, तो चाहे वह बहुत कुछ में जानता हो, तौभी लोग उसके विषय में कहते है, कि यह कुछ नह है [नहोने के वरावर है] जो यह जानता है । यदि यह विद्वान होता, तो ऐसा वेसोच [समझ-अचित्त] न होता । पर यदि को पुरुप सोचवाला होता है, तो चाहे वह थोड़ा भी जानता हो. लोर उसकी बात को सुशी से सुनना चाहते हैं । क्योंकि चित्त इन सबक आश्रय [केन्द्र] है, यह चित्तस्वरूपहैं, चित्त में रहते हैं।सो तुम चित्त को उपासो ॥२॥ वह जो चित्त को ब्रह्म के तौर पर उपासता है, वह स्वयं , ध्रुव, प्रतिष्ठापाला और दुःख से रहित हुआ उनलोकों को प्राप्त होता है, जो सोच से पूर्ण, अटल, प्रतिष्ठावाले और दुःख से रहित है । जहां तक चित्त की पहुंच है, वहां तक इसके लिये कोई रोक नहीं होती, जो चित्त को ब्रह्म के तौर पर उपासता है ।। क्या हेभगवन् ! चित्त से बढ़कर कोई वस्तु है' 'हा चित्त से बढकर है। 'हे भगवन् मुझे वह बतलाएं। छटासण्ड ध्यानं वाव चित्ताद्भूयः । ध्यायतीवपृथिवी ध्यायतीव वान्तरितध्यायतीवद्योयिन्तीवापोध्यायन्तीव पर्वता ब प्रपाठक ७. खण्ड ६ [ २५५ ] ध्यायन्तीव देवमनुष्याः । तस्माद् य इह मनुष्याणां महत्तां प्राप्नुवन्ति ध्यानापादाशा इवैव ते भवन्ति । अथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्ते । अथ ये प्रभवो ध्यानापादा शा. इवेव ते भवन्ति, ध्यान मुपास्स्वेति ॥ १॥ स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते, यावद ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति, यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते । ' अस्ति भगवो ध्यानाद् भूय इति'। 'ध्यानाद् वाव भूयो ऽस्तीति' 'तन्मे भवगन् ब्रवीविति' ॥२॥ ध्यान * चित्त से बढ़कर है । यह पृथिवी मानों ध्यान में लगी हुई है और इसी प्रकार अन्तरिक्ष, घौ, जल, और पर्वत ध्यान में लगे हुए हैं, देवता और मनुष्यो ध्यान में लगेहुए हैं। इस लिये वह लोग जो यहां मनुष्यों में से [ धन, विधा, या गुणोंद्वारा ] महत्त [ घड़ाई ] को प्राप्त होते हैं, तो वह निःसंदेह ध्यान के फल का कुछ हिस्सा लिये हुए प्रतीत होते हैं [ क्योंकि वह गम्भीर और शान्त प्रतीत होत हैं ] । जो छोटे दर्जे के मनुष्य हैं, वह लड़ाई * ध्यन-एफमता, चित्त को एक जगह पर टिफादना । जप कोई पुरुष फिसी गम्भीर विषय पर ध्यान लगाता है, तो पद शान्त भार निश्चल होता है । पृथियी और अन्तरिक्ष मादि इसी तरद मे शान और अपनी मर्यादा में निधन है, मानों पद ध्यान में लगे ए है। मिथया देय मनुष्य, मनुष्यों में जोशान्तिमादि देपी संपदा घाले हैं (शंकराचार्य) " . + [२५६] छान्दोग्य उपनिषद् । झगड़े वाले, चुगलियां करने वाले और निन्दा करने वाले होते हैं । पर जो प्रभुता वाले [ऊंचे दर्जे के ] मनुष्य हैं, वह ध्यान के फल का कुछ हिस्सा लिये हुए प्रतीत होते हैं। सो तुमध्यान को उपासो ॥१॥ वह जो ध्यान को ब्रह्म के तौर पर उपासता है, जहां तक ध्यान की पहुंच है, वहां तक उसे कोई रोक नहीं होती, जो ध्यान को ब्रह्म के तौर पर उपासता है ।। क्या हे भगवन् ! ध्यान से बढ़कर कोई वस्तु है ॥ हां, ध्यान से बढ़कर है॥ भगवन् मुझे वह बतलाएं ॥ सातवां सण्ड विज्ञान वाव ध्यानाद् भयः। विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेद सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहास- पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्य राशि दैवं निधि वाको वाक्य मेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्या 'नक्षत्रविद्या ५सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायु चाकाशंचापश्चतेजश्चदेवाश्चमनुष्या५श्चपशवश्रवया ५ सिच तृणवनस्पतीच्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिक धर्मश्चाधर्मञ्च सत्यञ्चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञ चाहृदयज्ञं चानं च रसं चेमं च लोकममुंच विज्ञानेनैव विजानाति, विज्ञानमुपास्स्वेति ॥ १॥ स यो विज्ञान ब्रह्मेत्युपास्ते, विज्ञानवतो वेस लोकान् ज्ञानवतोऽभिसि द्धयति, यावदिज्ञानस्य गतंतत्रास्य यथाकामचारो भ- मपाकट ७ खण्ड ७ ["२५७ ] वति, यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते । 'अस्ति भगवो विज्ञा नाद् भूय इति' । 'विज्ञानाद वाव भूयोऽस्तीति' 'तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २॥ विज्ञान ध्यान से बढ़कर है * | विज्ञानद्वारा मनुष्य ऋग्वेद को जानता है, यजुर्वेद, सामवेद, चौथे आर्थवण, पांचवें इतिहास- पुराण, वेदों के वेद, पित्र्य, राशि,दैव, निधि,वाकोवाक्य,एकायन, देव- विद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या,क्षनविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्प और देवजन, की विद्या, द्यौ और पृथिवी, वायु ओर आकाश, जल और तेज, देवता और मनुष्य,पशु और पक्षी; वृण और वनस्पति; सारे हिंस्र जन्तु कीड़े पतंगे और चीटी तक; धर्म और अधर्म; सत्य और झूठ; भलाई और बुराई मिय और अमिय, अन्न और रस; यह लोक और वह लोक, इन सब को विज्ञान द्वारा ही पुरुप जानता है । सो तुम विज्ञान को उपासो ॥१॥ वह जो विज्ञान को ब्रह्म के तौर पर उपासता है, वह विज्ञान वाले और ज्ञानवाले । [लोगों से युक्त] लोकों को प्राप्त होता है; जहा तक विज्ञान की पहुंच है, वहां तक इसे कोई रोक नही होती, जो विज्ञान को ब्रह्म के तौर पर उपासता है। 'क्या हे भगवन् ! विज्ञान से पढ़कर कोई वस्तु है। * विज्ञान, शास्त्र के विषय का ज्ञान, विज्ञान पारण है और ध्यान उसका कार्य है, क्योंकि पहले वस्तु जानी जाती है, तय उमपर ध्यान जमायाजाता है, इसलिये शान ध्यान से पढफर है। विहान, शास्त्र के विषय पा शान, और भान, दूसरे रीफिक विषयों में निपुणता (शंकराचार्य) - 1 २५८३ छान्दोग्य उपनिषद् । 'हां विज्ञान से बढ़कर है।॥ 'भगवन ! मुझे वह बतलाएं। ॥२॥ आठवां खण्ड वलं वाव विज्ञानाद् भूयः। अपि ह शतं विज्ञानवता मेको वलवानाकम्पयते । स यदा वली भवत्यथो त्याता भवत्युत्तिष्ठन् परिचरिता भवति, परिचरन्नु- पसत्ता भवत्युपसीदन् दृष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति, वोद्धा भवति, कर्ता भवति, विज्ञाता भवति । बलेन वै पृथिवी तिष्ठति, बलेनान्तरिक्ष बलेन द्यौर्बलेन पर्वता वलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च वया ५ सिच तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्ग पिपीलिकं बलेन लोकस्तिष्ठति, बलमुपास्स्वेति ॥ १॥ स यो वलं ब्रह्मेत्युपास्ते, यावद् वलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचरो भवति, यो वलं ब्रह्मेत्युपास्ते । 'अस्ति भगवो वलाद् भूयः इति ' । 'वलाद् वाव भूयो ऽस्तीति' 'तन्मे भगवान् ब्रवीविति' ॥२॥ वल विज्ञान से बढ़कर है *।वलबाला एक पुरुष विज्ञान वाले सौ पुरषों को कम्पा देता है । जब कोई पुरुष वलवाला होता , * पुष्टि फारफ मय के उपयोग से जो शरीर में यल उत्पन्न होता है, पही शरीर को स्वस्थ रखकर मनुष्य की प्रतिमा [नया २ फुरना [ २५९ . , प्रपाठक ७ खण्ड ९ है, तो वह उद्योगी [ उद्यमी ] बन जाता है। और जब वह उद्योगी होता है, तो वह [ आचापों ] का सेवन करने वाला बनता है, और जब वह उनकी सेवा करता है, तो वह उन का निकटवर्ती [ अन्तरङ्ग, विधादान का पान ] बनता है, और नय वह निकटवर्ती धनता है, तो वह देखने वाला. सुनने वाला, मनन करने वाला, जानने वाला, करने वाला, और समझने वाला यन जाता है। उस के सारे इन्द्रियों के योधसुल जाते है यल से पायरी [ अपनी मर्यादा में ] सही है, घल से अन्तरिक्ष, पल से यो, पल से पर्वत, बल मे देवता और मनुष्य, घल से पशु और पक्षी, हण और वनस्पति, सपर्हिस जन्तु कीट पतग और चीटीतक; बल से लोक [दुनिया ] खग है ।गोतुम यल को उपासो॥१॥ यह जो बलको ब्रह्म के तौर पर उपासता है, जहा तर पल की पहुच है, वहा तक इमे कोई रोक नहीं होती, नो बल को माह के तौर उपामता है। क्या हे भगवन् बल से घटकर कोई वस्तु है। हा बल से पढकर है॥ भगवन् मुझे वह बताए । . नपांगड अन्नं वाव वलाद् भूयः । तस्माद यद्यपि दा रात्री नाश्नीयाद् , या हे जीवेदथवा द्वयाऽश्रोता पहाता है और उद्योगी तथा त्यस्यन्दिप मना पर सरप गए विज्ञान में मार पर दंता दे, मलि पल विज्ञान मे पर। मार भी २ तोसीधे तौर पर भी पर मित्रान में यह जाता है, जबकि विज्ञान यारोपा वास्ना निमी पट पारे सापालाta [२६० ] छान्दोग्य उपनिषद् । ऽमन्ता बोद्धाऽकर्ता ऽविज्ञाता भवत्यथानस्याये द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति, कर्ता भवति, विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्स्वेति ॥१॥ स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्ते ऽन्नवतो वै स लोकान् पान- वतो ऽभिसिद्धयति, यावदन्नस्य गतं तत्रास्य यथा- कामचरोभवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्ते । अस्ति भगवो ऽन्नाद् भय इति ' । अन्नाद् वाव भूयोऽस्तीति' ।' तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २॥ अन्न वल से बढ़कर है [ क्योंकि वल का कारण है 1 । इसलिये यदि कोई पुरुष दसदिन कुछ न खाए। तो वह [ बलकी हानि होने से मरजाता है, और ] यदि जीता भी रहे, तो वह देखने, सुनने, मानने, जानने, काम करने, और समझने के अयोग्य होता है । पर जब उसे अन्न प्राप्त होता है, तो वह देखने, मुनने, मानने, जानने,काम करने, और ममझने वाला बन जाता है । सो तुम अन्न को उपासो ॥१॥ वह जो अन्न को ब्रह्म के तौर पर उपासता है, वह प्रभूत अन्न और प्रभृन पान वाल लोकों को माप्त होता है, जहां तक अन्न की पहुंच है, वहां तक उसे कोई रोक नहीं होती-जो अन्न को ब्रह्म के नार पर उपामता है॥ पा भगान ! भन्न मे चढ़कर कोई वस्तु है' 'हो भन्न मे पढ़कर है। मान् ! मुझे वह बताएं ॥२॥ " .

प्रपाठक ७ खण्ड १० [२६१ ] दसवां खण्ड आपो वाअन्नाद्भूयस्यः । तस्माद् यदा सुवृष्टिर्न भवति, व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीति। अथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीति । आप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्त- रिक्षं यद द्यौर्यत्पर्वता यद्देवमनुष्या यत्पशवश्च वया । सि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलकं मापएवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १॥ स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्ते, आमोति सर्वान् कामा५ स्तृप्तिमान् भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति, यो ऽपो ब्रह्मेत्युपास्ते । 'अस्ति भगवोऽयो भूय इति । 'अन्यो वाव भूयोऽस्तीति' । 'तन्मे भगवान् ब्रवीविति' ।।२।। जल अन्न से बढकर है । इमलिये जा अच्छी टोष्ट नहीं होती, तो माण दुःखी होते है, कि अन्न [इमापं ] थोडा होगा । पर यदि अच्छी यष्टि होती है, तो प्राण आनन्द मनाते है, [] अन्न बहुत होगा। जल ही यह भिन्न २ मातये * धारण रिय है, जो यह पृथिवी है, जो अन्तरिक्ष है, जो या है, जो पर्वत है. जो देव और मनुप्य है, जो पशु और पक्षी है, तृण और घनम्पति है, और जो हिंस्र जन्तु है, कीट पनग और चोटी तक जल ही यह भिन्न मूर्तियें धारण किये है ।मो तुम जल को उपामो ॥१॥ * यह सय पुछ तो मूर्त (टोम) है, यह पावस्था में इम अवस्था में आया है।

. [ २६२] छान्दोग्य उपनिषद्। वह जो जल को ब्रह्म के तौर पर उपासता है, वह सारी काम- नाओं को प्राप्त होता है, तिवाला होता है, जहां तक जलों की पहुंच है, वहां तक इसे कोई रोक नहीं होती-जो जलों को ब्रह्म के तौर पर उपासता है। 'क्या हे भगवन् ! जल मे बढ़कर कोई वस्तु है' 'हां जल से बढ़कर है। 'भगवन् ! मुझे यह बताएं। ॥ २॥ ग्यारहवां राण्ड तेजो वा अद्भयोभ्यः । तदा एतदायुमुपगृह्या काशमभितपति तदाहुनिशोचति नितपति वर्पिप्यात वा इति । तेज एव तत्पूर्व दर्शयित्वाऽथापः सृजते । तदेतदू भिश्चतिरश्चीभिश्च विद्युद्भिराहादाश्चरन्ति । तस्मादाइविद्योतते स्तनयति वर्षियति वा इति । तेज एव तत्पूर्व दर्शयित्वा ऽथापः सृजते । तेज उपास्खेति ॥१॥ स यस्तेजोब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वे स तेजस्तो लोकान् भासतोऽपहततमस्कानभिसिद्धयति, यावत्ते- जसोगतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्यु पास्ते । 'अस्तिभगवस्तेजसोभ्य इति'1'तेजसो वाव भूयोऽस्तीति' । 'तन्मेभगवान् ब्रवीस्थिति' ।। २।। नेन नन में पढ़कर है । क्योंकि नेग वायु के मामिलकर आकाश गौ पाता है। नव लोग करते है, गर्म होरहा है, तपारहा - प्रपाठक ७.खण्ड १२ [२६३ ] वरसेगा । सो तेज ही यह [अपने आप को पहले दिखलाकर तव जलों को रचता है । तब फिर उपर और चारों तर्फ चमकती दुई विजिलियों के साथ मेघकी गर्जनाएं प्रगट होती हैं, तब लोग कहते हैं 'चमकता है, गर्जता है. वरसे गा' सो यहां भी तेन ही [विजली के रूप में] पहले अपने आप को दिखलाकर जलों को रचता है, सो तुम तेज को उपासो ॥१॥ वह जो तेज को ब्रह्म के तौर पर उपासता है, वह स्वयं तेजस्वी वनकर उनलोकों को प्राप्त होता है, जो तेजवाले हैं, मकाश से पूर्ण हैं, और [वाहर अन्दर के] अन्धेरे से रहित हैं। जहांतक तेनकी पहुंच है, वहां तक इसे कोई रोक नहीं होती, जो तेज को ब्रह्म के तौर पर उपासता है॥ 'क्या हे भगवन् ! तेजसे बढ़कर कोई वस्तु है। 'हां, वेनमे बढ़कर है॥ भगवन् ! वह मुझे बताएं। यारहयां सण्ड आकाशो वे तेजसो भृयान् । आकाशे वे सूर्या चन्द्रमसावुभी विद्युन्नक्षत्राएयमिः । आकाशेनाह्वय- त्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायते आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥१॥ स य आकाशं ब्रह्मेत्युपा स्ते,आकाशवतो वे स लोकान् प्रकाशवतोऽसम्वाधानु रुगायवतोऽभिसिद्धयति । यावदाकाशस्यगतं तत्रास्य .

[ २६४ ] छान्दोग्य उपनिषद् यथाकामचारो भवति, य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्ते । 'अस्ति भगवआकाशाद भूय इति'। 'आकाशाद् वाव भूयोऽस्तीति' । 'तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति' ॥२॥ आकाश तेज से पढ़कर है । क्योंकि सूर्य और चन्द्र बिजली और नक्षन और अग्नि आकाश में स्थित हैं । आकाश के द्वारा मनुष्य युलाता है, आकाश के द्वारा सुनता है, आकाश के द्वारा प्रतिवचन देता है। आकाश में आनन्द भोगता है, [जब कोई किसी से मिलता है ] और आकाश में आनन्द नही भोगता [जब वियुक्त होता है ] | आकाश में [अंकुर आदि]उत्पन्न होता है, और आकाश की ओर [ अंकुर आदि ] उत्पन्न होता है [ न कि नीचे की ओर] सो तुम आकाश को उपासो ॥१॥ वह जो आकाश को ब्रह्म के तौरपर उपासता है, वह आकाश और मकाशवाले लोकों प्राप्त होता है, जहां कोई दवाव और पीडा वहीं है, और जो खुले चौड़े है। जहां तक आकाश की पहुंच है, वहां तक इसे कोई रोक नहीं होती, जो आकाश को ब्रह्म के तौर पर उपामता है। क्या हे भगवन् ! आकाश से पढ़कर कोई वस्तु है ॥ हां, आकाश से बढ़कर है॥ भगवन् ! मुझे वह बताएं॥ तेरहवां पण्ड समगे वा आकाशाद् भूयः । तस्माद् यद्यपि वस्व आमीरनस्मग्न्तो नच ते कञ्चन भृश्युन मन्वीरन् न विजानीरन् । यदा वाव तेस्मरेयुरथ अणुयुस्थ मन्वीरन्न . ।

- प्रपाठक७. खण्ड १३। [ २६५] । विजानीरन् । स्मरेण वै पुत्रान विजानाति स्मरेण शुन्। स्मरमुपास्स्वेति॥१॥ स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते, वत् स्मरस्य गतं. तत्राऽस्य यथाकामचारो भवति, स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते । 'अस्ति भगवः स्मराभूय ति' । 'स्मराटू वाव भूयोऽस्तीति'। तन्मे भगवान् वीविति' ॥२॥ मृतिआकाश से बढ़कर है इसलिये यदि किसी जगह बहुत से जन को वैठ जाएं, पर वह [एक दूसरे की बात को स्मरण न रखें, तो ह कुछ नही सुनसक्ते, कुछ नहीं मान सक्तै, कुछ नहीं जानसक्ते । जब वह स्मरण करसक्ते है, तब ही वह सुनसक्ने है, मान सक्ते है । और जान सक्ते हैं । स्मृति के द्वारा ही पुगों को जानता हे, स्मृति के द्वारा पशुओं को [यह मेरे पुन है, यह मेरे पशु है, यह पहचानता 1] । सो तुम स्मृति को उपासो ॥१॥ वह जो स्मृति को ब्रह्म के तौरपर उपासता है, जहा तक मृति की पहुंच है, वहां तक उसके लिये कोई रोक नहीं होती, जो मृति को ब्रह्म के तौरपर उपासता है ॥ क्या हे भगवन् ! स्मृति से बढ़कर कोई वस्तु हे। 'हां स्मृति से बढ़कर है। भगवन् ! मुझे वह बताएं। ॥२॥ * मनुष्य के सारे व्यवहार शब्द के ऊपर निर्भर रखते हैं, शब्द आकाश फाधर्म है, सो आकाश के अधीन हमारे सारे व्यवहार चलरहे हैं,परशन्द सारे स्मृति के अधीन ही षाम देते है, इस अभिप्राय से स्मृति आकाश से बढकर फही है । बिना स्मृति के हर एफ यस्तु न होने के बरायर होती है, क्योंकि उनसे भोग स्मृति फेहारा होता है, और स्मृति केविना तो आकाशादि का होना भी नहीं जाना जासका [शंकराचार्य] [२६६ ] छान्दोग्य उपनिषद्। चौदहवां सण्ड आशा वाव स्मराद भूयसी । आशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते,कर्माणि कुरुते, पुत्रा५श्वपशु ५श्चेच्छते, इमञ्च लोक ममुञ्चेच्छते, आशामुपास्स्वेति ।। १ ।। स य आशां ब्रह्मेत्युपास्ते, आशयाऽस्य सर्वे कामाः स्मृध्यन्त्यमोघा हाऽस्याऽऽशिपो भवन्ति, यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति, य आशां ब्रह्मे त्युपास्ते । 'अस्ति भगव आशाया भृय इति'। 'आशाया वाच भूयोऽस्तीति' । 'तन्मे भगवान ब्रवीत्विति' ॥२॥ आशास्मृति से बढकर है * आशा से चमकी दुई स्मृति मन्त्रों को पढ़ती है, कर्म [यज्ञआदि] करती है, पुत्र और पशुओं की इच्छा करती है [ उपाय के अनुष्ठान से इनको प्राप्त करना चाहती है ] इमलोक और उसलोक को चाहती है ।सो तुम आशाको उपामो । वह जो आशा को ब्रह्म के तौर पर उपासता है, आशा के द्वारा उसकी सारी कामनाएं समृद्ध [परिपूर्ण और घटकर] होती हैउसकी प्रार्थनाए खाली नही जाती है; जहा तक आशा की पहुंच है, वहातक इसकेलिये कोई रोक नहीं होती, जो आशा को ब्रह्मके तौरपर उपासता है ॥ . * पागा हम प्रर्तव्य का भरण कराती है, जिमको पाया है, उमको पोर उमकी प्राप्ति के माधनों को हम वार २ समरण करते हैं, मनिये भाया परनका हेत।

• प्रपाठक७.खण्ड १५ [ २६७ ]
'क्या हे भगवन् ! आशा से बढ़कर कोई वस्तु है।॥
'हां आशा से बढ़कर है॥
'भगवन् ! मुझे वह वताएं ॥२॥
पन्द्रहवां खण्ड
प्राणो वा आशाया भूयात् । यथा वा अरा नाभौ
समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्व ५ समर्पित। प्राण प्राणेन
याति प्राणःप्राणंददाति प्राणाय ददाति। प्राणोहपिता
प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः खसा प्राण आचार्यः
प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥ स यदि पितरं वा मातरं वा
भ्रातरं वा स्वसारं वा ऽऽचार्य वा ब्राह्मणं वा किञ्चद्
भृशमिव प्रत्याह । धिक्त्वाऽस्त्वित्येवैनमाहुः । पितृहावे
त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसहा वे
त्वमस्याचार्यहा वेत्वमसि ब्राह्मणहा वैत्वमसि॥अथ
यद्यप्येनानुकान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिसंदेहन्नै-
वैनंबूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भातृहासीति
न स्वसहासीतिनाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥३॥
प्राणोोवैतानि सर्वाणि भवति । स वा एप एवं पश्यन्ने
वं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति । तच्चेद् ब्यु
रतिवाद्यसीति अतिवायसीति बयानापन्हवीत ॥४॥

- [२६८] छान्दोग्य उपपिनद्। पाण* आशा से बढ़कर है । जैसे [रय की] नाभि में अरे मोए हुए होते हैं, इसमकार यह सब [नाम से लेकर आशापर्यन्त] इम प्राण में प्रोया हुआ है । प्राण प्राण से चलता है प्राण माण को देता है और माण के लिये देता है । प्राण है पिता, प्राण है माता, प्राण है भ्राता, माण है यहिन, प्राण है आचार्य, प्राण है नाह्मण ॥१॥ क्योंकि यदि कोई पुरुष पिता, माता, भाई, बहिन वा आचार्य को कुछ अनुचित मा कह देवे, तो लोग उसे कहते है, धिक्कार है तुझे ! तूने पिता की हत्या की है, तूने माता की हत्या की है. तूने भाई की हत्या की है, तूने भगिनी की हत्या की है, तूने आचार्य की हत्या की है, तूने ब्राह्मण की हत्या की है ॥२॥ पर जब उनके माण निकलगए हैं, तव चाहे कोई उनको इकठा करके शूल मे टुकडे२ करके भी जलादे, तब उसे कोई नहीं कहेमा, कि तूने पिता की हत्या की है, तूने माता की हत्या की है, तूने भाई *प्राण से यहां अभिप्राय सांस नहीं, किन्तु समष्टिलिजन्देश, हिरण्यगर्म, प्रमात्मा से अभिप्राय है, इसी सूत्र में सब चर अचर प्रोया हुआ है। यही मुख्य प्राण है। जैसे अरों में पहिये की धारा लगी होती है, और अरे नाभि में लगे होते हैं, इस प्रकार यह भूनमात्रा ( शब्दादि और पृथिवी आदि विषय) प्रक्षामात्रामों (शब्दादि के ज्ञान और शानके हेतु इन्द्रियों) में लगी हुई हैं, और प्रक्षमात्राए प्राण में लगी हुई हैं (शकराचार्य)। और सब कुछ इस प्राण के द्वारा चष्टावाला होता है, पर प्राण सय अपनी ही शक्ति से चटा यारा है। प्राण के अधीन सय चराचर को स्थिति है, इसलिये देनेवालाप्राण है जिसकलिये देता है, यह प्राण है और जो कुछदिया जाता है, यहप्राण है।। ।

मपाकठ ७. खण्ड १६ "[२६९] की हत्या की है, तूने वहिन की इसा की है, तूने आचार्य की हसा की है, तूने ब्राह्मण की हत्या की है ॥ ३ ॥ [इसलिये] प्राण ही यह सब [पिता माताआदि, और सारा जगम स्थावर] है *। जो इसप्रकार [पूर्वोक्तरीति से प्राण ही सबकुछ है] देखता है, इसमकार मानता है. इसमकार समझता है, वह अतिवादी बिनता है । उसे यदि लोग कहें, कि तू अतिवादी है, तो वह वेशक कहे, हां मै अतिवादी हूं, वह इससे इन्कार नही करे ॥ ४॥ सोलहयां खण्ड एप तु अंतिवंदात, यः सत्येनातिवदति । सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानीति । सत्यं त्वेव विजिज्ञास तव्यमिति । सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ + पर वस्तुतः अतिवादी वह है, जो सत्य [ब्रह्म] को सब से बढ़कर कहता है। * पिता माता वही हैं,जबकि उनको अनुचित वचन कहने में पितृहत्या और मातृहत्यालगती है, जयतक कि उनमें प्राण है, और फिर वही पिता माता है, जब वह प्राण से वियुक्त हैं, तो उनको उलट पटल जलाने में भी मनुष्य हत्यारा नहीं होता, इसलिये वस्तुतः प्राण ही पिता माता है। + अतिवादी, वह पुरुष जो किसी ऐसी वस्तु को प्रगट करे, जो उन सबसे परे फी हो, जिनका वर्णन पहले आँचुका हो । यहाँ प्राण . को ग्रह कहने वाला उन सब से आगे यदकर बहता है, जो नाम है'इससे आरम्भ करके 'भाशाग्रह है,'तक पहुंचे हैं। मुण्डक। ११४ में अतिवादी परब्रह्म के जाननेवाले के मुकायिले में आया है ।। नारद ने आगे नहीं पूछा, कि फोई वस्तुप्राणसे यदकर है। यह प्राण को ब्रह्म कहने वाला अतिवादी (यदफर कहने याला)है,सुनफरसन्तुष्ट होगया ब्रह्म [ २७० ] डान्दोग्य उपनिषद् । 'हे भगवन् ! मैं सत्य से अतिवादी वनूं' आपकी [कृपा से मैं सस को जानकर वास्तव में अतिवादी बनना चाहता हूँ]॥ [सनत्कुमार] 'तब तुझे सब को जानने की इच्छा होनी चाहिये' [नारद] 'हां हे भगवन् ! मैं सस को जानना चाहता हूं'। सत्तरहवा खण्ड यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति, नाविजानन सत्यं वदति, विजाननेव सत्यं वदति । विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । विज्ञानं भगवो विजिज्ञासइति।। जब कोई पुरुष [सस को] समझता है, तब वह मस को कह ता है, जो सस को समझता नहीं है, वह सस को नहीं बतलाता *। केवल वही, जो सस को जानता है, सस को बतलाता है । सो हमें विज्ञान की जिज्ञासा करनी चाहिये । 'हे भगवन् मै इस विज्ञान को जानना चाहता हूं। ॥१॥ अठारहयां पण्ड यदावे मनुतेऽथ विजानाति । नामत्ता विजानाति । मत्वैव विजानाति । मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । 'मति भगवो विजिज्ञास' इति ॥१॥ है, कि माण ही सब से बढ़कर (परब्रह्म) है । पर सनत्कुमार इस योग्य शिष्य को सचा अतिवादी बनानाचहते हुए और आगे (सत्य ब्रह्मपर) लेजाते हैं । इसलिये यह १६ से २६ खण्ड तक का उपदेश हे ॥ * क्योंकि अग्नि जिसकों वह सत्य ममझता है, वह अग्नि केवल तीन तत्वोंका मेल है (देखो १४) नोकेवल विकाररूप नाममात्र इसीतरह वह तीनतत्व भी विकार नाममात्र से भिन्न अन्त हैं, जो उमसे परे जानता है, वह असली सत्य को जानता है ।

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मपाठक खण्ड २१ [ २७१ ]
जब कोई पुरुष मनन करता है, तब वह समझता है । वह जो
मनन नहीं करता, नहीं समझता । केवल वही समझता है, जो मनन
करता है । सो हमें मनन करने की जिज्ञासा करनी चाहिये ।।
'भगवन् मै मनन को जानना चाहता हू' ॥१॥
उन्नीसका पण्ड
जब कोई पुरुष श्रद्धा रखता है, तब वह उसका मनन करता है
वह जो श्रद्धा नहीं रखता, मनन नहीं करता। कंवल वही, जो श्रद्धा
रखता है, मनन करता है । सो हमें श्रद्धाकी जिज्ञासा करनी चाहिये।
भगवन् मै श्रद्धा को जानना चाहत हू ॥१॥
वीसाखण्ड
यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति । नानिस्ति
सञ्छ्रदधाति । निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजि-
ज्ञासितव्येति । 'निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥
जब कोई पुरुप निष्ठावाला [ गुरुसेवापरायण ] होता है
तब वह श्रद्धा वाला बनता है । वह जो निष्ठा वाला नहीं है, श्रद्धा
वाला नहीं होता है, केवल वही जो श्रद्धा वाला है, निष्ठा वाला
होता है । सो हमें निष्ठा की जिज्ञासा करनी चाहिये ।
भगवन् मै निष्ठा को जानना चाहता है । ॥ १ ॥
इक्कीसवा पण्ड
यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति । नाकृत्वा नि-
स्तिष्ठति । कृत्वैव निस्तिष्ठति । ऋतिस्त्वेव विजिज्ञा-
सितव्येति । 'कृति भगवो विजिज्ञास इति' ॥ १॥

[२७२ ] छान्दोग्य उपनिषद्। जब कोई पुरुप ( अपने कर्तव्य * को) पूरा करता है, तब वह निष्ठावाला बनता है । वह जो अपने कर्तव्य को पूरा नहीं करता, निष्ठावाला नहीं बनता । केवल वही, जो अपने कर्तव्य को पूरा करता है, निष्ठावाला बनता है । सो हमें कर्तव्य की जिज्ञासा करनी चाहिये ॥ 'हे भगवन् ! मैं कर्तव्य को जानना चाहता हूं ॥ १ ॥ याईसवां खण्ड यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति । नासुखं लब्ध्वा करोति । सुखमेव लब्ध्वा करोति । सुखं त्वेव विजि- ज्ञासितव्यमिति । 'सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ जब कोई पुरुष [ अपने आपमें ] सुख लाभ करता है, तो वह अपने कर्तव्य को पूरा करता है । वह जो [ उससे ] मुख लाभ नहीं करता, अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता । केवल वही, जो [ उससे ] मुख लाभ करता है, कर्तव्य को पूरा करता है . सो हमें मुख की ही जिज्ञामा करनी चाहिये । 'हे भगवन में सुख को जानना चाहताहूं' ॥ १॥ तेईसवां सण्ड 'यो वे भूमा तत्सुखं । नापे सुखमस्ति । भूमैव सुखम्। भूमा त्वेवं विजिज्ञासितव्य इति। भूमानं भगवो विजिज्ञास इति' ॥१॥ * विद्यार्थी के धर्म-न्द्रियसंयम और चित्त की एकप्ता आदि .

प्रपाठक ७.खण्ड२४॥ [२७३ ] जो भूमा [ निरातिशय, वेहद्द ] है, हव मुख है; अल्प [ हद्द- वाले ] में मुख नहीं है। केवल भूमा { वेहह ] ही सुख है तो हमें भूमा की ही जिज्ञासा करनी चाहिये ।। 'हे भगवन् मैं भूमा को जानना चाहता हूं' चौवीसवांखण्ड यत्र नान्यत पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यदविजानाति सभूमा । अथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणासन्यद विजा- नाति तदल्यम् यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मय॑म् । 'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठत इति । स्खे महिनि, यदि वा न महिनीति' ॥ १॥ गोअश्वमिहमाहिमेत्यावक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्य क्षेत्राण्यायतनानीति । नाहमेवं वामि,बवामीति होचाचान्योह्यन्यस्मिन प्रतिष्ठतइति।। . * भूमा, बडा, अभिप्राय निरतिशय [ येहह ] से है । अल्प | छोटा, अभिप्राय सातिशय [ हदयाल ] से है। जो वस्तु अल्प है, वह असली सुख का इंतु नहीं, क्योंकि अप वस्तु अधिक की तृष्णाका हेतु यनती है, और तृष्णा बुस का पीज है। इसी लिये विषयसुख हष्णा को बढ़ाकर उसका हेतु बनता है, और तृष्णा दुःसका पीज है। सो यह विषयसुस आपाततः [बाहय ] सुस प्रतीत होता है. परवस्तुत. दु सफा यीज होने से दुःखरूप ही है । हाँ यह भूमा ही है, जो फेवल सुपरूप है, यहां तृष्णा का यनारहना असम्भव है, क्योंकि हि निरतिशय सुख है।

[२७४ ] छान्दोग्य उपनिषद् जहां पुरुष न कुछ और देखता है, न कुछ और सुनता है, न कुछ और जानता है, वह है भूमा । और जहां पुरुष कुछ और देखता है, और सुनता है, और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वह अमृत है, और जो अल्प है, वह मर्त्य [ मरने वाला है ॥ 'हे भगवन् ! भूमा किसमें प्रतिष्ठित [किस के आश्रय] है ॥२॥ अपनी महिमा में-या [या यूं कहो] किसी भी महिमा में नहीं ॥१॥ संमार में लोग गौ और घोड़े, हाथी और सोना, दाम और स्त्री, क्षेत्र और घर इन को माहेमा कहा करते हैं । मैं [ भूमा को ] ऐसा नहीं कहता, क्योंकि [ ऐमा कहने में ] दुसरा [ मालिक ] दूसरे [ अपनी मलकीयत में ] प्रतिष्ठित होता है, [ पर भूमा अपने आप से भिन्न किसी वस्तु में प्रतिष्ठित नहीं है ] । किन्तु उसने कहा, मैं कहताहूं कि--॥२॥ पच्ची सयां खण्ड स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात स दक्षिणतःस उत्तरतः सएवेद ५ सर्वमिति । अथा- तोऽहङ्कारादेश एव अहमेवाधस्तादह मुपरिष्टादह पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेद ५ सर्वमिति ॥ १॥ अथात आत्मादेशएव-आत्मैवा धस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवद ५ सर्वमिति । स वा एप एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरा-

[ २७५ ]
प्रपाठक ७. खण्ड २५
त्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः। स स्वराड् भव-
ति । तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति । अथ
येऽन्यथाऽतो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति
तेपा ५ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ।। २ ॥
वही [ भूमा ही ] नीचे है, ऊपर है, पीछे है, सामने है, दाएं
है और वाएं है-वही यह सब कुछ है ।
अब उस [ भूमाका ] अहङ्कारादेवा (मै हूं के तौर पर उपदेश)
है-मै ही नीचे हूं मै ऊपर हूं, मै पीछे हूं मै सामने हूं, मै दाएं हूं, मै
धाएं हूं, मै ही यह सब कुछ हूं ॥१॥
निचला [ उस भूमाका ] आत्मा देश [ आत्मा के तौर पर
उपदेश ] है-आत्माही नीचे है, आत्मा ऊपर है, आत्मा पीछे है,
आत्मा सामने है, आत्मा दाएं है, आत्मा वाएं है, आत्मा ही यह
सब कुछ है॥
.
वह जो इस प्रकार देखता हुआ, मनन करता हुआ और
जानता हुआ आत्मा में मेमरखता है, आत्मा में खेलता है,
आत्मा के साथ जोड़ा होता है, आत्मा में अनन्द भोगता है, वह
स्वराट् [ स्वतन्त्र अधिपति ] बन जाता है, उस का सर लोकों
में यथेच्छाचार होता है [ अर्थाद वह सारे लोकों का मालिक
होता है ॥
पर यह जो इससे भिन्न प्रकार से जानते है, वह क्षय होने
वाले लोकों में रहते है, और वहा उनपर दूसरे राज्य करते है,
उनका सव लोकों में अकामचार होता है [ स्वतन्त्रता नहीं होती ] ॥२॥

[२७६ ] छान्दोग्य उपनिषद्। छन्त्री सवां सण्ड तस्य हवा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्येवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मतः आशाऽऽत्मतः स्मर आत्मत आकाशआत्मतस्तेज अत्मतआप आत्मत आविर्भाव- तिरोभावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतःसंकल्पःआत्मतोमन आत्मत कर्माण्यात्मत एवेद ५ सर्वमिति ॥ १ ॥ तदेष श्लोकोन पश्यो मृत्यु पश्यति नरोगंनोत दुःखताम् ।सर्व रह पश्य पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वशइति । स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा, सप्तधानवधा चैव पुनश्चै कादश स्मृतः।शातञ्चदशचैकश्च सहस्रणिच विश तिः।आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवास्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः । तस्मै मृदितक पायाय तमसः पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारः, त ५ स्कन्द इसाचक्षते त ५ स्कन्द इत्याचक्षते ॥२॥ जो इस प्रकार देखता है, मानता है, समझता है, उस के लिये आत्मा से प्राण उत्पन्न होता है, आत्मा * से आशा, आत्मा से स्मृति * वह जो स्वाराज्य को प्राप्त है, उसके लिये सदात्म विज्ञान से पहले, प्राण से ले कर नाम तक [जिनपर ध्यान धरना बताया है] की उत्पत्ति और प्ररय अत्मा से भिन्न सतसेये अव धह सदात्म विज्ञान होने पर स्वात्मा से ही होग है, वैसे ही और भी सारा व्यवहार विद्वान के लिये आत्मा से ही होजाता है। शंकराचार्य ] . . मपाठक ७. एण्ड६ {२७७] स्मा से आकाश, आत्मा से तेज, आत्मा मे जल, आत्मा गे विर्भार और तिगेमार * [ प्रगट होना भार कम होना त्मा मे अन्न, आत्मा मे क्ल, आत्मा से विज्ञान, आत्मा मे ध्यान, स्मा से चित्त, आत्मा मे सकल्प, आत्मा में मन, भात्मा से गी, आत्मा मे नाम, आरमा से मन्त्र, आत्मा मे गर्म [ यज्ञ -हा यह मर कुछ आत्मा मे ही उत्सन हुआ ह ॥ १॥ इस पर यह श्लोक है, 'वह जो यह देसता कि यह सब आत्मा से ही है ] वह न मृत्युको देवता है, न ही रोगयो, न दुःस को देखता है। वह नौ यह देखना है, पर इरएर वस्तु को पता है, और हरएक प्रकार मे हरएक वस्तु को प्राप्त होता है ।। वह एक प्रकार से है [टि से पूर्व वह तीन माार में होता [ तेज, जल, और अन्न-पृथिवी ] यह पाच प्रकार से होता है, । गात प्रकार से होता है, वह नौ मार मे होता है, और फिर ग्यारह प्रकार का बनायागया , और मार दम, नार क और बीस हजार हानामनुप्प का नाधार होनाना ,तो पिछले सण्डों में प्राण आदि पे मध्य में आरिभाय र तिमाय का वर्णन नहीं आया है। यहां उमा बागा प्रगायरता,पि या तो नमें से सपा वर्णन मागया है, या यहा शायरएका समसार दो दियागया है। यह सष्टि के प्रभेद में पहले एक प्रकार से ही होताद, भार पर 'यार काही दुआरष्टियार में तीन भादिभेदों में पान मदों याग जाता है, और फिर महारपार में अपनी समय पर प्रसारण को प्राप्त होता है। शराचार्य ] मिगमो। मेघा उप०५॥२॥ इन्द्रियों का माहार, शाद मादिसियों का मांग, यह अपराग पमोहरूप दोषों से गुम होता है। - [२७८] छान्दोग्य उपनिपद उसका अन्तःकरण शुद्ध होजाता है । और जब अन्तःकरण शुद्ध होजाता है, तो स्मृति अटल होजाती है। और जब [ भृमा आत्मा की ] स्मृति पक्की हो जाती है, तब सारी गांठे खुल जाती हैं। सो इस प्रकार भगवान् सनत्कुमार ने नारद को अन्धकार का परला किनारा दिखला दिया, जब इस के [ राग, द्वेष आदि ] मैल पहले मलदिये गए । उसको ( सनत्कुमार को) लोग स्कन्द कहते हैं, हां उसको स्कन्द कहते हैं * ॥ २॥ ओम् आठवां प्रपाठक पहला खण्ड ', अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म, दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः, तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तदाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥१॥तञ्चेदयुः 'यदि- दमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहर पुण्डरीकं वेश्म, दहरो ऽस्मिन्न न्तराकाशः,कितन्त्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यदाव विजिज्ञा, सितव्यमिति ॥२॥ सत्रूयाद् ‘यावान् वा अयमाकाश, स्तावानेपोऽन्तर्हदयं आकाश उभे अस्मिन् द्यावा- * दो बार पाठ प्रपाठक की समाप्तिके लिये है ।। प्रिझएक अद्वितीयहै और दिशा और फालकी सीमा सेपरे है, यह छुटे और सातवें प्रपाठक में वर्णन किया है। अब इस आठवे प्रपाठक में, उसकी प्राप्ति का स्थान-हृदय, उसकी प्राप्ति का उपाय-ब्रह्मचर्य मादि, उपासना का फल, और आत्मा परमार्थ स्वरूप का वर्णन

.
मपाठक८.खण्ड १
[२७९
पृथिवी अन्तरेव समाहिते। उभावनिश्च वायुश्च सूर्या
चन्द्रमसावुभौ । विद्युत्नक्षत्राणिं यचास्येहास्ति यन्त्र
नास्ति सर्वतदस्मिन् समाहितमिति'शातञ्चेद् ब्रूयुः
अस्मि ५ श्वेदिदं ब्रह्मपुरे सर्व ५ समाहित ५ सर्वाणि
च भूतानि सर्वे च कामा यदैनजरावामोति प्रध्व ५
सतेवा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥सबेयान् 'ना
ऽस्यजरयेतजीयति नवधेनास्यहन्यते, एतत्सत्यं ब्रह्मपुर
मस्मिन् कामाः मसाहिताः । एष आत्माऽपहतपाप्मा
विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्य-
कामः सत्यसङ्कल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्याविशन्ति
यथाऽनुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जन-
पदं यं क्षेत्रभागं तंतमेवोपजीवन्ति ॥ ५॥ तद्यथेह
कमीजतो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः
क्षीयते । तद्य इहात्मानमनमुविद्य वजन्त्येता ५श्व
सत्यान् कामा ५ स्तेपा ५ सर्वेषु लोकेप्वकामचारो
भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येता ५श्वसत्यान
कामा ५ स्तेपा ५ सर्वेपुलोकेषु कामचारो भवति॥६॥
यह जो ब्रह्मपुर [ग्रम का पुरशरीर ] है, इस में
छोटा सा [हृदय ] कमल का मन्दिर ई.इम [ मन्दिर] के अन्दर
एक छोटा म आकाश [ ग्राम ] है । अब उम[छोटे आकाश ]
के अन्दर जो कुछ है, उमा भन्नेषण करना चाहिये, उमरी
जिज्ञासा करनी चाहिये ॥ १॥

[ २८० ] छान्दोग्य उपनिषद् । और यदि उसे कहें ' यह जो ब्रह्म का पुर है, छोटा सा इस में कमलका मन्दिर, आर छोटा सा उस [ हृदय कमल ] के अन्दर आकाश, भव इस के अन्दर वह क्या है. जिसका अन्वेषण करना चाहये, जिम की जिज्ञासा करनी चाहिये * ॥२॥ सब यह को जितना बड़ा यह [वाहरका ] आकाश है, उतना बड़ा यह हृदय के अन्दर [ का] आकाश है । दोनों इस में अन्दर ही मौ और पृथिती ममाए हुए है; अग्नि और वायु दोनों; सूर्य आर चन्द्र दोनो; विजिलिये और नक्षत्र और जो कुछ इस [ आत्मा ] का इस लोक में है, और जो नहीं है [ अर्थात जो कुछ हो चुका है वा होगा] वे मयइस में समाया हुआ है । ॥ ३ ॥ और यदि उत्ते करें इस ब्रह्मपुर में यदि यह सब कुछ समाया हुआ दै, सारे भूत और सारी कामनाएं [ काम्यवस्तुएं,समाई हुई हैं ] छोटा माता उदय, उसके अन्दर फिर और भी छोटा सा भाफाश, अब उस छोटे म के अन्दर भला क्या होगा, जिसको ढूंढना चाहिय, श्रीर यदि कुछ पेरमाण यहां दृढने से मिलभीगया, तो उमम ढूंढने वाला का क्या या जाएगा, जिसके लिये इतने गौरव पं. माय उपदेश दिया जारहा है, उस के अन्दर जाकुछ ई, उम्मे हृदो, उसकी जिशामा फरे। हिदय के ग्रन्टर के पाकाग मे ग्राम अभिप्राय है, इमलिये उदय के पदर कोटामा पाकाम करने में यह अभिप्राय नहीं, कि बम वह पदव के पन्दा नारा समाया मारे, प्रत्युसन टीवल इदय, अपितु परमास AII उनके अन्दर ममाया दुपा। जो या प्रदय में त्रा मग या छोटा गा नहीं, किन्तु इतना बडा है, जितना मात्र पात्रामा.वियहम दिनान ज्योनियरूपमे हृदय में उतना माप मामात् हानामनिये छोटा मा कहा है। यहां बाटा पाकाग । टपमा मामा यमलान में र, पम्तुतः पाकाग भी उम; अन्दर ।

प्रपाटक८. खण्ड १॥ [ २८१ ] तो जा इमे बुढ़ापा आघेरता है, ना यह हुकडे • होजाना दे, तर फिर क्या [ इसका ] पीछे क्य रहता है । ॥ ४ ॥ तर वह कहे 'इम [ शरीर ] के बुढ़ापे मे वह [ आकाश , हृदया काशम्थब्रह्म ] बूदा नही होता, और न इस दो गुन्युमे यर मरता है, यह [ब्रह्म ] है सच्चा ब्रह्मपुर [नकि शरीर] 1 इसमें मारी काम- नाएं समाई हुई हैं। यह आत्मा है जो सारे पापों से अलग ६, जरा और मृत्यु से परे हे शोक मे परे है भूख और प्याम गे परे है, वह सधी कामनाओ वाला और सच्चे गंकल्पों वाला है। जंग "- यहां मनाएं जिन पर दूसरा स्वामी है, उस स्वामी के शामन (हुक्म) के अनुमार चलती हैं, और जिम मागगे उनका प्यार (1) हो. पाहे वह कोई देश हो, या क्षेत्र का टुकड़ा, यह काही उपभोग करती है ॥५॥ और जसे यहां कर्म रोनी आदि का रोना आदि गाल जीता गया है [फल प्राश हुआ है ] यह शीण हो नालाही परलोक में भी वह फल क्षीण होगा, जो यहां ध्यानी के पूरा करने से जीता गया है। नप या पुरण जो इस नामाको और इन सभी कामनाओं को इंटे बिना ही इसकी चल देते है, उन के लिये सारे लाकों में कोई मान्यता नी 19 रनों उस आत्मा को और इन गली कामनाओं को पारगम चोक से चलते हैं, उनके लिये मर लोकों में बनाना l 4. *झोपाप की ग्राम पाने , उन १६ मामाका जानना पायग्नश है, वर्गशिपन सर्मा - कोटा होने वाला है, पोर उम में भी उन मिल जान का फन सागम्य रे, मसम्बनाई, पदमा मदि।

[२८२ ] छान्दोग्य उपपिनद्। दूसरा सण्ड स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरःसमुत्तिष्ठन्ति,तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीयते।१। अथ यदि मातृलोककामो भवति, संकल्पादवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति,तेनमातृलोकेन सम्पन्नो महीयते।२ अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति, संकल्पादेवास्य भ्रातरःसमुत्तिष्ठन्ति, तेनभ्रातृलोकेन सम्पन्नोमहीयते।३। अथ यदि खसृलोककामो भवति, संकल्पादेवास्य खसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥४॥अथ यदि सखिलोककामो भवति, संकल्पा- देवास्य सखायः समुत्तिष्टान्ति तेन सखिलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥५॥ अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतः, तेनगन्धमाल्य लोकेन सम्पन्नो महीयते ॥६॥ अथ यद्यन्नपानलोक- कामो भवति संकल्पादेवास्यानपाने समुत्तिष्ठतः तेनान्नपानलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥७॥अथ यदि गीतवादित्रलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गीत- वादित्रे समुत्तिष्ठतः तेन गीतवादित्रलोकेन सम्पन्नो महीयते॥॥ अथ यदि स्त्रीलोककामोभवति संकल्पा- 'देवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन सम्पन्नो - प्रपाठक८.खण्ड २ [२८३] महीयते ।। ९॥ यं यमन्तमभिकामो भवति यं काम- यते सो ऽस्य संकल्पादेव संमुत्तिष्ठति, तेन सम्पन्नो महीयते ॥ १०॥ * वह यदि पितृलोक 1 की कामना वाला होता है, तो इम के संकल्पमात्र से पितर उसके मामने प्रगट होते हैं, और वह पितृलोक से सम्पन्न हुआ [ पितृलोक की सम्पत्ति लाभ करके ) आनन्द भोगता है ॥१॥ और यदि वह मातृलोक की कामना वाला होता है, तो इसके संकल्पमात्र मे माताएं उसके मामने प्रगट होती , और वह मातृलोक से सम्पन्न होकर आनन्द भोगता है। और यदि वह भ्रातृलोक की कामना वाला होता है, तो इस के संकल्पमात्र से भाई मगट होते हैं, और वह भ्रातृलोक मे मम्पन्न हुभा आनन्द भोगना ॥३॥ और यदि वह भगिनीलोक की कामना वाला होता है, तो इसके संकल्पमात्र से बाहनें इसके मामने प्रगट होती है, और यह भगिनीलोक से सम्पन्न होकर अनन्द भोगता है ॥४॥ और यदि यह मिरलोक की कामना वाला होता है, तो इसके संकल्पमात्र से मिन प्रगट होते हैं, और वह मिरलोक मे सम्पन्न होकर आनन्द भोगता है ॥५॥ *फिस तरह सप लोगों में उमपी स्वतन्त्रा होती है, पर पर्णन परते है। । लोफ यह है, जिसमें रहकर, पाजिन माधनों के माप, म अपनी कमाई का फल मोगते हैं। यहां गिलोकतारपरं पितर मनाप मार उनपं, माप मानन्द भोगन मा महीयते = मदिमापाला होता. मपनी महिमा को मनुनप करता है. भानन्द मोगता है।

[२८८ छान्दोग्य उपनिप। विन्दन्ति तेपामेवैपब्रह्मलोकस्तेषा ५ सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥३॥ यह आत्मा है यह एक सेतु * ( पुल ) है, एक हद्द है, जिससे कि यह लोक गड़बड़ा न जाएं दिन और रात इम मेतु को नहीं मुलांघने, न जरा; न मृत्यु, म शोक, नपुण्य न माप॥१॥ मारे पाप इस से वापिस लौटते हैं क्योंकि यह ब्रह्मलोकपापसे पृथक् (वरी) है । इस लिये वह जो इस सेतु से पार होता है वह यदि अन्धा है, तो अनन्य होजाता है, पीपाहुआ ( ज़रूमी ) है, तो अविद्ध (नजरूपी ) होजाता है, रोगी है, तो अरोगी हो जाता है । इम लिय जर पुरुष इस सेतु से पार होता है, तो. रात भी दिनही घन जाती है ( अन्धेरा सारा दूर हो जाता है ) क्योंकि यह ब्रह्मलोक एकवारही (सदा के लिये ) चमका हुआ है ॥२॥ यह प्रत्मलोक केवल उन्ही लोगों का है, जो. इस ब्रह्मलोक को ब्रह्मचार्य मे ढूंढते है, उन्ही की मब लोकों में स्वतन्त्रता पांचया राड अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद, ब्रह्मच- यण येव यो ज्ञाता तं विन्दते । अब यदिष्टमित्याचक्षते मनु का भये पुल दै। पुल पानी या फीचर पर में पार होने मामार्ग होता है। यह मही फे पन्ध मिन्न २ लोगों पता पीप पा पाभी ने मिलायो ममा उप०७।७। पटप०३। मुण्ठ उप०२१२१५ मिीकी माशा में यह सारा जगहू अपनी र मर्यादा में काम प्रपाठक ८ खण्ड५। ૨૮૬ ब्रह्मचर्य मेवतद,ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्रवाऽऽत्मानमनुविन्दते।? अथ यत् सत्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् , ब्रह्मच- येण ह्येव सत आत्मानस्त्राणं विन्दते । अथ यन्मौन मित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् , ब्रह्मचर्येण ह्येवात्मान मनुविद्य मनुते ॥२॥ अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्य मेव तद, एप ह्यात्मान नश्यति, यं ब्रह्मचर्येणा- नुविन्दते । अथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्य मेव तद्, अरश्च हवै ण्यश्चार्णवौ व्रह्मलोके तृतीय स्यामितो दिवि तदैरंमदीयं सरस्तदश्वत्यः सोमसवन- तदपराजिता पूर्बह्मणः प्रभुविमित हिरण्मयम् ॥३॥ तद्यएवैतावरंचण्यं चाणवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्द न्ति,तेपामेवैप ब्रह्मलोकस्तेपार सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति । ४। निसको (धार्मिकलोग) यज्ञ कहते है, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही, वह जो जानने वाला है, उसको (ब्रह्म लोकको) पालेता है। और जिसको इष्ट कहते है, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही वह दृढ करके (इष्टवा) आत्मा को पालेता है।।२।। और जिसको लोग सत्रायण कहते है, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही वह सत् (सत्यनम) से आत्मा की रक्षा (घाण) को पाता है।

कामार्ग होता है। यह मट्टी के बन्ध भिन्न २ लोगों के प्रतों की हद का कामभी देते है। मिलाओ० मंत्रान्डप०७।७1 कठप०३। इसी की महा मे यह सारा जगत् थपनी २मयांदा में काम [ २८८ ] छान्दोग्य उपनिपद। विन्दन्ति तेपामेवैपब्रह्मलोकस्तेपा ५ सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥३॥ यह आत्मा है यह एक सेतु * ('पुल ) है, एक हद्द है, जिससे कि यह लोक गड़वड़ा न जाएं । दिन और रात इम मेतु को नहीं संलांघते, न जरा; न मृत्यु, न शोक, न पुण्य न पाप ॥२॥ सारे पाप इस से वापिस लौटते हैं क्योंकि यह ब्रह्मलोक पापसे पृथक् (वरी) है । इस लिये वह जो इस सेतु से पार होता है वह यदि अन्धा है, तो अनन्ध होजाता है, वधाहुआ (ज़ख्मी ) है, तो अविद्ध (नज़ख्मी ) होजाता है, रोगी है, तो अरोगी होजाता है । इस लिये जव पुरुप इस सेतु से पार होता है, तो. रात भी दिनही वन जाती है ( अन्धेरा सारा दूर हो जाता है ) क्योंकि यह ब्रह्मलोक एकवारहीं ( सदा के लिये ) चमका हुआ है ॥२॥ यह ब्रह्मलोक केवल उन्ही लोगों का है, जो इस ब्रह्मलोक को ब्रह्मचार्य से ढूंढते है; उन्ही की सब लोकों में स्वतन्त्रता होती है ॥ ३ ॥ पांचयां सण्ड अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद, ब्रह्मच- येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दते । अथ यदिष्टमित्याचक्षते * सेतु का अर्थ पुल है । पुल पानी या फीचड़ पर से पार होने . २;मुण्ड०उप०२।२१५ मपाठक८ खण्ड५। ૨૮૭ ब्रह्मचर्य मेवतद,ब्रह्मचर्येण वेष्ट्रवाऽऽत्मान मनुविन्दते।? अथ यत् सत्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् , ब्रह्मच- येण ह्येव सत आत्मानस्त्राणं विन्दते । अथ यन्मौन मित्याचक्षते व्रह्मचर्यमेव तद् , ब्रह्मचर्येण ह्येवात्मान मनुविद्य मनुते ॥२॥ अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्य मेव तद, एपह्यात्मान नश्यति, यं ब्रह्मचर्येणा- नुविन्दते । अथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्य मेव तद्, अरश्च हवै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीय स्यामितोदिवि तदैरंमदीयं सरस्तदश्वत्यः सोमसवन- स्तदपराजिता पूर्बह्मणः प्रभुविमित५ हिरण्मयम् ॥३॥ तद्यएवैतावरंचण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्द न्ति,तेपामेवैप ब्रह्मलोकस्तेपार सर्वेषु लोकेपु कामचारो भवति । ४। निसको (धार्मिकलोग) यज्ञ कहते है, यह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही, वह जो जानने वाला है, उसको (ब्रह्म लोकको) पालेता है । और जिसको इष्ट कहते हैं, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही वह दृढ करके (इष्ट्रवा) आत्मा को पालेता है॥२॥ और जिसको लोग सत्रायण कहते है, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही वह सब ( सत्यनह्म) से आत्मा की रक्षा (प्राण) को पाता है।

[२८४ ] छान्दोग्य उपनिषद् । और यदि वह गन्धमाल्य (गन्ध और माला के)लोककी कामना वाला होता है, तो इसके संकल्पमात्र से गन्ध और माला प्रगट होती है, और वह गन्यमाल्यलोक से सम्पन्न होकर आनन्द भोगता है ॥६॥ और यदि यह अन्नपान ( अन्न और पान के ) लोक की कामना वाला होता है, तो इसके संकल्पमात्र से अन्न आर पान प्रगट होता है, और वह अन्नपानलोक से सम्पन्न हुआ आनन्द भोगता है ॥ ७॥ और यदि यह गीतबादिन [ गीत और वाजे के ; लोक की कामना वाला होता है, तो इसके संकल्पमात्र से गीत और पाजे प्रगट होते हैं, और यह गीतबादित्रलोक से सम्पन्न होकर आनन्द भोगता है ॥ ८॥ और यदि वह स्त्रीलोक की कामना वाला होता है, तो इस के संकल्पमात्र से स्त्रिये प्रगट होती है और वह सोलोक से सम्पन्न होकर आनन्द भोगता है ॥९॥ निदान जिस २ विषय को यह प्यार करता है, जिस को चाहना ६, वह इम के संकल्पमात्र से प्रगट होता है, और वह उस में सम्पन्न हो कर आनन्द भागता है ॥ १० ॥ तीसरा पण्ड त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानाः तेपा ५ मत्याना ५ सतामनृतमपिधानम् । यो यो ह्यस्येतः प्रति न तमिह दर्शनाय लभते ॥१॥ अथ ये चास्येह- जीवा ये चप्रेता यनान्यदिन्छन्न लभते, मयं तदनगत्त्वा - प्रपाकठ ८ खण्ड ३. [ २८५. विन्दते । अत्र ह्यस्यैते सत्याः कामाअमृतापिधानाः। . तद् यथापि हिरण्यनिधि निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न चिन्देयुः, एवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरगच्छ न्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनुतेन हि मत्यूढाः।२। स वा एप आत्मा हादि, तस्येतदेवनिरुक्त हृद्ययमिति, सस्मादृदयम्, अहरहर्वा एवंचित् स्वर्गमलोकमति।। अथ य एप सम्प्रसादो ऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणामिनिप्पद्यत एप आ- स्मेति होवाच, एतदेवामृतमभयमतेद्ब्रह्मेति । तस्य . ह्वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति । ४ । तानि हवा एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमिति । तद्यत् सत् तदमृतमथ यदति तन्मय॑मथ या तेनोभे यच्छति, यदनोनेमे यच्छति तस्माद यम्।अहरह; एवंचित स्वर्ग लोकमेति ॥ ५॥ मो यह सभी कामनाएं घट में की हुई मार पाप यह कामनाएं माप , परन पर गह एक दाना नागर । जो २ कोई इन( पुरष साप गेनरमा, उप दिया (इन आंगो में देखने के दिप पानी पामना । पर नोडम के यहां नीति है, जो मर गुरभीर जो भीर भी है जिसको वह चाहता है, पर पानी मका, उम गरमी पा (हदगन्य मन में ) पहुंच कर पाता है, (पांट या अपने दस - [२८६ ] छान्दोग्य उपनिषद्। में उतरे, जहां हृदयाकाश में ब्रह्म रहता है । क्योंकि यहां (हृदय- स्थ ब्रह्म में ) इसकी सची कामनाएं हैं, जो झूठ मे ढकी हुई हैं * जैसाकि दवे हुए सोने के निधि ( खजाने ) के ऊपर २ घूमते हुए भी वह लोग जो क्षेत्रज्ञ (क्षेत्रविद्या के वेत्ता) नहीं है; वह उसे नहीं पासक्ते, इसी प्रकार यह सारी प्रजाएं (जन्तु) दिन प्रति दिन ब्रह्मलोक में जाती हैं (सुपात में हृदयस्थब्रह्म में लीन होती हैं ) तथापि वह उसे नहीं ढूंढपाती; क्योंकि वह झूठ से चलाई जा रही हैं, [ अर्थात् यूठ ने उनको अपने स्वरूप से हटाकर बाहर के विषयों में फेंका हुआ है ] ॥२॥ यह आत्मा हृदय में है, इसका यही निर्वचन है ' हृदि+अयम्' . अर्थात् हृदय में यह ( आत्मा) है, इस लिये यह हृदय कहा जाता है । वह जो इस प्रकार (हृदय में आत्मा है, इम लिये यह हृदय कहलाता है ) जानता है, वह प्रतिदिन ( मुषुप्तिमें ) स्वर्ग लोक हृदयस्थ ब्रह्म ) में जाता है ॥ ३ ॥ - * सची कामनाएं, जिनका पहले और दूसर खण्ड में वर्णन है, यह हर एक के हृदय के अन्दर सदा विद्यमान हैं, उन कामनाओं को हरपक पुरुप इस लिये नहीं पासना, कि उनके ऊपर एक परदा पड़ा हुआ है, और वह परदा झूठका है अर्थात् धाहर के विषयों में तृष्णा और उसके परवश होकर स्वेच्छाचारी होना (नकि शास्त्र की मर्यादा में रहना ] यह कामनापं मिथ्याज्ञान मे होती हैं, इसलिये झूठी हैं। जय यह झूठका पग्दा उठ जाता है, तो वह सची कामनाएं प्रकाशित होती है। हद् अर्थात् दृदय और 'अयम् ' अर्थात् यह अर्थात् आत्मा। सो ह+अयम्-हदयम् ' है। इसमें आत्मा रहता है, इस लिये इसे हृदय कहते है। .

, . भपाठक८.खण्ड ४॥ [२८७ ] अब यह पूरा निर्मल हुआ * ( आत्मा ) इस ( भौतिक) शरीर से उठकर ( शरीर में आत्मभावना को त्यागकर ) और परम ज्योति को प्राप्त होकर अपने असली रूप से प्रगट होता है, यह आत्मा है, यह उसने कहा ( जब उसे शिष्यों ने पूछा) । यह अमृत है, यह अभय है यह ब्रह्म है । इस ब्रह्म का नाम है सत्य । ४ । इस नाम ( सत्य) के तीन अक्षर है सत-ति-य जो 'सत् है यह अमृत है, और जो 'त् । है यह मरी है , और जो 'य' है, इस से वह दोनों को नियम में रखता है । जिस लिये इस से यह दोनों को नियम में रखता है ( यच्छति ) इसलिये उसे 'य कहते हैं। वह जो इस प्रकार जानता है, वह दिन प्रतिदिन स्वर्ग लोक (ब्रह्म ) को प्राप्त होता है ।। ५ ॥ अथ य आत्मा स सेतुर्विधतिरेषां लोकानाम सम्भेदाय । नैत ५ सेतुमहोराने तरतो नजरा न मृत्यु- नशोकोन सुकृतं न दुष्कृतम् ॥ १॥ सर्वेपामानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येपब्रह्मलोकः । तस्मादा एत ५ सेतुं तीर्खाऽन्धः सन्ननन्धो भवति विद्धःसन्नविद्धोभव त्युपतापी सन्ननुपतापी भवति । तस्मादा एत ५ सेतुं तीवाऽपि नक्तमहरेखाभिनिष्पद्यते । सदिभातो हवेप ब्रह्मलोकः ॥ २ ॥ तद्य एवेतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानु *मिलामो आन्दो०८ ॥१३॥ महिमामुपद से समसामिलामा पृ०५1५1१ पता चौथा खण्ड --- है । [ २८८ ] छान्दोग्य उपनिषद् विन्दन्ति तेपामेवेपब्रह्मलोकस्तेपा ५ सर्वेषु लोकेपु कामचारो भवति ॥ ३॥ यह आत्मा है यह एक सेतु * (पुल ) है, एक हद्द है, जिससे कि यह लोक गड़वड़ा न जाएं । दिन और रात इम मेतु को नहीं उलांघते. न जरा; न मृत्यु, न शोक, न पुण्य न पाप॥१॥ सारे पाप इम से वापिस लौटते हैं क्योंकि यह ब्रह्मलोकपापसे पृथक (वरी) इम लिये वह जो इस सेतु से पार होता है वह यदि अन्धा है, तो अनन्ध होजाता है, वींधाहुआ (ज़ल्मी ) है, तो अविद्ध (नज़ख्मी ) होजाता है, रोगी है, तो अरोगी होजाता है । इम लिये जब पुरुष इस सेतु से पार होता है, तो.रात भी दिनही वन जाती है ( अन्धेरा सारा दूर हो जाता है ) क्योंकि यह ब्रह्मलोक एकवारही ( सदा के लिये ) चमका हुआ है ॥ २॥ यह ब्रह्मलोक केवल उन्ही लोगों का है, जो इस ब्रह्मलोक को ब्रह्मचार्य से ढूंढते है। उन्हीं की मा लोकों में स्वतन्त्रता होती है ॥ ॥ पांचवां सण्ड अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तेंदु, ब्रह्मच- येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दते । अथ यदिष्टमित्याचक्षते । मेतु का अर्थ पुल है । पुल पानी वा कीचड़ पर से पार होने पामार्ग होता है । यह मट्टी के बन्च भिन्न २ लोगों के पत्तों की हद्द का कामभी देते है । मिलाओ० मैना उप०७१७ कठप० ३ । २: मुण्ड उप०२।२।५ इसी फी अझा में यह सारा जगत् - अपनी मर्यादा में काम फररहा है।

२८६ . . - प्रपाठक८.खण्ड ५। ब्रह्मचर्य मेवतद,ब्रह्मचर्येण वेष्ट्रवाऽऽत्मानमनुविन्दतो? अथ यत् सत्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् , ब्रह्मच- र्येण ह्येव सत आत्मानस्त्राणं विन्दते । अथ यन्मौन मित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्, ब्रह्मचर्येण ह्येवात्मान मनुविद्य मनुते ॥२॥ अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्य मेव तद, एप ह्यात्मान नश्यति, यं ब्रह्मचर्येणा- नुविन्दते । अथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्य मेव तद्, अरश्च हवै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीय 'स्यामितो दिवि तदैरंमदीयं सरस्तदश्वत्थः सोमसवन- स्तदपराजिता पूर्बह्मणः प्रभुविमित हिरण्मयम् ॥३॥ तद्यएवैतावरंचण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्द 'न्ति, तेषामेवैप ब्रह्मलोकरतेपासर्वे लोकेषु कामचारो भवति ।।४। जिसको (धार्मिकलोग) यज्ञ कहते है, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही, वह जो जानने वाला है, उसको (ब्रह्म लोकको) पालेता है। और निसको इष्ट कहते है, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही वह ढूंढ करके (इष्टवा) आत्मा को पालेता है। और जिसको लोग सत्रायण कहते हैं, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य , क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही वह सद (सत्यब्रह्म) से आत्मा की क्षा (प्राण) को पाता है।

. छान्दाग्यउपनिपद् और जिसको लोग मौन कहते हैं, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही पुरुष आत्मा को ढूंढ करके उस पर ध्यान जमाता है [ मनुते ] ॥२॥ और जिसको लोग अनाशकायन कहते है, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि यह आत्मा (अपना आप) नष्ट नही होता (न नश्यति) जिसको पुरुष ब्रह्मचर्य केद्वारा दृढपाता हे ॥ और जिमको लोग अरण्यायन ( जंगल में चलेजाना, वानप्रस्थ ) कहते है, वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि अर और ण्य यह दो समुद्र (सरोवर ) ब्रह्मलोक में है अर्थात् यहा से तीसरे द्यो में, और एक ऐरंमदीय सर है, और एक अश्वत्य वृक्ष है, जिससे सोम वहता है, और (हिरण्यगर्भ ) का अपराजिता एक पुर है और एक मुनहरी प्रभुविमित (प्रभु अर्थात् ब्रह्मा से बनाया हुआ मण्डप) है ॥ ३ ॥ अब वह लोग जो ब्रह्मचर्य के द्वारा ब्रह्मलोक में वर्तमान अर और ण्य इन दो समुद्रों को ढूढपाते हैं, यह ब्रह्मलोक उन्हीं लोगों का है, उन के लिये सब लोकों में स्वतन्त्रता हे* ॥४॥ - * चौथे खण्ड में ब्रह्मलोक की प्राप्ति का साधन ब्रह्मचर्य वर्णन किया है, इस पाचवें खण्ड में उसकी महिमा दिखलाई है। यह दर्शाया गया है, कि वैदिक कर्म जो मनुष्य के अन्त कारण को पवित्र बनाते हैं, और जिनका परम फल ब्रह्मलोक है, ब्रह्मचर्य उन सब की जगह पकता पूरी कर देता है । यच ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्यवाला फल को ब्रह्मचर्य के द्वारा लाभ कर लेता है, जिसको पुरुष या धारा लाभ करता है। यज का परम फल वझलोक है, और यह फल ब्रह्मचर्य से प्राप्त हो जाता है इसलिये यन भी ब्रह्मचर्य हो ? इसी प्रकार पर और सत्रायण आदि के विषय में भी जानना चाहिये ।

प्रपाठक८.खण्ड६॥ ( २९) छटा खण्ड अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणि म्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येति । असौ वा आदित्यः पिङ्गल एप शुक्ल एप नील एप पीत एप लोहितः ।। १ ॥ तद्यथा महापथ आतत उभौग्रामी, गच्छतीमंचामुंच, एवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ? पर जहां वस्तुत' ब्रह्मचर्य, फल के द्वारा यन्न आदि के बराबर है, वहां दूसरी ओर यहां शब्दों को बनावट से भी ब्रह्मचर्य को उन के बराबर दर्शाया है। जैसे यन्न ब्रह्मचर्य है, क्योंकि 'यो ज्ञाताजी जानने वाला है' से यज्ञ बना है। जो जानने वाला है, वह ब्रह्मचर्य के द्वारा ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है, इम लिये ब्रह्मचर्य यज है। इसी प्रकार 'इष्ट दृष्ट्वा =ढूंढकरके' से; सत्रायण; सत+चाणम् = सत् सेअपनी रक्षा, मे; 'मौन मनुते = ध्यान जमाता है'से, 'अनाशकायन' न नश्यतिम्नष्ट नही होता है से, और अरण्यायन, 'अर+एय+अयनम् = अर और ण्य को प्राप्त होना'से है । इष्ट, यज्ञ विशेष है, सत्रायण,वह यज्ञ, जिनमें बहुत यजमान होते है । मौन, बाणी का रोकना । अरण्यायन, बनम जाना, बानप्रस्थका जीवन । इन सब का फल ब्रह्मचर्य से मिलजाता है, इमलिये ब्रह्मचर्य का पूर्णतया पालन करना चाहिये। 'पूर्बदूमरे खण्ड में जो पितामाता यादि कहे हैं, और यहा पांचवें खण्ड में जो ब्रह्मलोक में अर,स्य दो समुद्र ऐरमदीय (ऐरं-अव से पूर्ण और मदीय = हर्प देनेवाला) सर, अश्वस्य (पीपल ) का दृक्ष, जिममें सोमरस वा अमृत बहता है, अपराजिता (जिस को वह लोग नहीं जीतमक्ते,जिनके पाम ब्रह्मचर्यका माधन नही)पुरी,और सुनहरीमण्डप। यह सब ब्रह्मलोक में मानमरूप से प्रतीत होते हैं. न कि स्थूल रूप से । पौर शुद्ध हुए अन्त करण के मंकल्प मे प्रगट होते हैं, इसलिये निरति- शय सुख कारक होते हैं, (शंकराचार्य) 7 (२९२) छान्दोग्यउपनिषद् लोकौ गच्छतीमं चामुंचाअमुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते ता आसु नाडीपु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते ते ऽमुष्मिन्नादिये सृप्ताः ॥ २॥ तद् यत्रतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वमन विजानात्यासुतदा नाडीषु सृप्तोभवति, तं नकश्चन पाप्मास्पृशति, तेजसाहि तदा सम्पन्नोभव ति॥३॥अथयत्रैतदबलिमाननीतोभवति, तमभितआ सीना आहुः 'जानासि मां, जनासि मामिति । सया वदस्माच्छरीरादनुकान्तो भवति तावजानाति ॥४॥ अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुनामत्यथैतैरेव रश्मभिरूलमा क्रमते।स ओमिति वाहोदामीयते । स यावक्षिप्यन्म- नस्तावदादित्संगच्छति । एतदै खलु लोकदारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुपाम् ॥ ५॥ तदेपश्लोकः 'शतश्चै- का च हृदस्य नाडयस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वकन्या उत्तमणेभवन्त्यु लमणे भवन्ति ॥ ६॥ * अब यह जो हृदय की नाडियें हैं, भुरे मूक्ष्म [रस] की भरी * याद्य विषयों की तृष्णा को त्यागकर और ब्रह्मचर्य से सम्पन्न होकर जो पुरुष हृदय काल में स्थित ब्रह्म की उपासना करता है - अन्त समय में ओम पर ध्यान धरता हुआ मूर्धा की नाड़ी से . प्रबलोफ को जाता है, यह इसमें दिखलाते हैं।

( २९३) मपाठकखण्ड ६॥ हुई हैं, तया वेत, नीले, पीले और लाल की [भरीहुई है ] और ऐसे ही वह सूर्य भूरा है, श्वेत है, नीला है, पीला है और लाल है॥१॥ जैसे एक लम्बी चौडी सडक दोगाओं को जाती है, इधर इस [गाओं ] को और उधर उस [ गाओं ] को, इसी प्रकार यह सूर्य की किरणें दोनों लोकों को जाती है, इधर इस लोक [लोक-शरीर] को ओर उधर उस [लोक-सूर्य ] को । वह उस सूर्य से चलती हैं और इन नाडियों में आकर प्रवेश करती है। इन नाडियों से चलती है और सूर्य में जाकर प्रवेश करती है ॥ २ ॥ और जव कोई पुरुष सोया हुआ आराम करता हुआ [ वाह्यवि. पयों के ग्रहण से निवृत्त हुआ] और पूरानिर्मल हुआ [अपने स्वरूप से जो कुछ बाहर है, उससे वेखवर हुआ] स्वप्न को नहीं देखता है [मुपिप्ति में होता है ], तब वह इन नाडियों में प्रविष्टहुआ होता है। तब उसे कोई बुराई नही सक्ती, क्योंकि वह उससमय [सूर्य के तेज से [जो नाडियों में है] व्याप्त होता है। ॥ और जब कोई पुरुष पूरीनिर्बलता में [मरने के निकट] पहुंच जाता है, तब उसके इधर उधर बैठेहुए ( वन्धु वान्यव) उसे कहते हैं 'क्या तुम मुझे जानतेहो, क्या तुम मुझे जानते हो ? ' वह जब तक इस शरीर से निकल नहीं जाता है, तबतक उनको जानता है ॥४॥ पर जब यह इस शरीर से निकल जाता है, तब वह इन्हीं रश्मि- यों के द्वारा [जो मूर्य से नाडियों तकफैलीहुई है ] ऊपर चढता है [उनफलों को भोगने के लिये, जो उसने कर्मद्वारा सम्पादन किये हैं, न कि ज्ञान द्वारा] । अथवा ओम पर ध्यान जमाताहुआ जाता है, [जब उसने ब्रह्मलोक को जाना होता है, जो उसने ज्ञानद्वारा जीता तुः ॥ २॥ तौ हद्वात्रि शतं वणि ब्रह्मचर्यमुपतुस्तौ * देसी कट०उप०६।६और मिलाओ प्रश्न उप०३।६-७॥ (२९४) छान्दोग्यउपनिपद् है । वह जितनी देर में मन फैंकाजाता है, उतनी देर में सूर्य में पहुंचजाता है। क्योंकि यह [सूर्य] [ब्रह्म] लोक का द्वार है, शानियों के लिये यह खुला है, और अज्ञानियों के लिये बंद है ॥५॥ इस पर यह श्लोक है 'एकसौ एक हृदय की नाड़िये है, उनमें से एक मूर्धा की ओर निकली है, उस नाड़ी से ऊपर चढ़ता हुआ [ज्ञानी] अमृतत्व को प्राप्त होता है। दूसरी [ नाड़िये ] निकलने में भिन्न गति [ देने ] वाली होती है *, हां, निकलने में [ भिम २ गति देनेवाली ] होती है ॥ ६॥ सातवां सण्ड 'य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजि घत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकलल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः । स सर्वा ५ श्लोकानामोति सर्वा ५श्चकामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति' ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥ तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधि- । ते होचुः 'हन्ततमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानम विष्य सर्वा५श्चलोकानामोति सर्वा ५श्चकामानिति इन्द्रो हैव देवानामभिप्रवव्राज, विरोचनोऽसुराणां। तो हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्म- प्रपाठक८.खण्ड ७ [ २९५ ] ह प्रजापतिरुवाच 'किमिच्छन्ताववास्तमिति'। तो हो चतुः ‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजिरो विमृत्युर्विशोको ऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वे टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वा ५ श्लोकानामोति सर्वाश्च कामान्यस्तमात्मान मनुविद्य विजानातीति' भगवतो वचोवेदयन्ते, तमिच्छन्ताववास्तमिति' ॥३॥ तौह प्रजापति रुवाच य एपो ऽक्षिणि पुरुपो दृश्यत एप आत्मेति होवाच । 'एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मोत' । अथ 'योऽयं भगवो ऽसु परिख्यायते, यश्चायमादर्श कतम एप इति"एप उ एवैषु सर्वेपुष्वेतेषु परियायत इति होवाच । ४ । *प्रजापति ने कहा 'आत्मा जो कि पापसे अलग है; नरा और मृत्यु से परे है, शोक से परे है; भूख और प्यास से अलग है, सची कामनाओं वाला है और सच्चे संकल्पों वाला है। उसका अन्वेषण करना चाहिये,उसकी जिज्ञासा करनी चाहिये । वह जो इस आत्मा को ढूंढ कर जान लेता है, वह सारेलोकोंको और सारी कामनाओं को पालेता है। देवता और दैत्य दोनोंने यह शब्द मुने, और उन्होंने कहा अहो । हमें उस आत्मा का अन्वेषण ( तलाश) करनाचाहिये, *स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से अलग मामा का खस्वरूप (श स्वरूप) दिखलाने के लिये प्रजापति का उपदेय पार करते है - - ( २९६) छान्दोग्य उपनिपद् जिस आत्मा को ढूंढकर पुरुष सारे लोकोंको और सारी कामनाओं को पालेता है' यह कहकर इन्द्र देवताओं में से और विरोचन अमरों में से गया । वह दोनों विना एक दूसरे से सलाह किये ( शिप्य के तौर पर ) समिधा हाथ मेंलिये प्रजापति के पास आए।२। वह वहां वत्तीस वरस ब्रह्मचारी वनकर रहे । तब प्रजापति ने उन्हें कहा'तुम दोनों किस प्रयोजनसे यहां रहेहो' उन दोनोंने उत्तरदिया 'आपके इस वचन का दुनिया में ढंढोरा फिर रहा है, 'कि आत्मा जो कि पाप से अलग है,जरा और मृत्यु से परे है, शोक से परे है भूख और प्यास से अलग है, सची कामनाओं वाला है और सच्चे संकल्पों वाला है, उसका अन्वेपण करना चाहिये, उसकी जिज्ञासा करनी चाहिये । वह जो इस आत्मा को ढूंढकर जानलेता है, वह सारे लोकों को और सारी कामनाओं को पालेता है । सो हम दोनों उस (आत्मा) को चाहते हुए आपके पास रहे है ॥ ३ ॥ मजापति ने उन दोनों को कहा यह जो आंख में पुरुष दीखती है,*यह वह आत्मा है, यह है जो मैने कहा था, यह अमृत है, यह अभयहै, यह ब्रह्म है। *यह जो आंख में पुरुष दीखता है, इस से प्रजापति का अभिप्राय यह है, कि आप अपने देखने के काम से जिस की हस्तीकी तर्फ इशारा करती है, यह आत्मा है। क्योंकि देखने वाली असल में आंखें नहीं, आंख एक साधन है और यह देखने वाली शक्ति इससे अलग इसके अन्दर है, जो इस झरोफे में बैठकर बाहर के दृश्य देखती है। उसफे शिष्य इस अभिप्राय को नहीं पहुंचे हैं, यह आंख के अन्दर बैठकर उस देखने वाले को आत्मा नहीं समझे, किन्तु जो आंख के मन्दर पुरुष का आकार [छाया दीखता है, उसी को मात्मा समझे है, और इस लिये भागे पूछते हैं, कि जो जल में और शीशे में दीखता है वह कौन है॥

भपाठक ८ खण्ड ८१, { २९७] (उन्होंने पूछा ) हे भगवन् ! यह जो जलों में दीखता है, : यह जो शशि में दीखता है. यह कौनसा है उसने उत्तरदिया, यह ही इन में दीखता है, * ॥ ४॥ साठयां खण्ड 'उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानी तन्मेप्रबूतमिति' तो होदशरावेऽक्षाचनाते।तो जापतिरुवाच 'किंपश्यथ इति' । तौहोचतुः 'सर्व दभावां भगव आत्मानं पश्याव आलोमभ्य आनखे- । प्रतिरूपमिति ॥ १॥ तौ हप्रजापतिरुवाच 'सा लड़कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामि 'तोहसावलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदश ऽवेक्षाचनाते। तैह प्रजापतिरुवाच 'किंपश्यय इति' २॥तौ होचतुः 'यथैवेदमावां भगवः साध्वलकृतौ सनौ परिष्कृतौरव एवमेवेमौभगवः साध्वलकृती सनौपरिष्कृताविति । एपआत्मेति होवाचेतदमृत । प्रात्मा सब के अन्दर है, इस उच्च अभिमाय से प्रजापति ने उत्तर है। पर यहजानकर कि उमझे शिष्यों ने पुरुष मे शरीर की मम 1, उनकाअज्ञानदिपलाने के लिये प्रगन्ना उपदेश भारम्भ किया। इले पहल प्रात्मा को इसी को आंख में दिग्वनाने में प्रजापनि हभिप्राय है, कि वह अपने शिष्यों को पहले पहल जापत में की अलग हस्ती का नियय कराए।

( २९६) छान्दोग्यउपनिषद् जिस आत्मा को ढूंढकर पुरुष सारे लोकोंको और सारी कामनाओं को पालेता है' यह कहकर इन्द्र देवताओं में से और विरोचन अमरों में से गया । वह दोनों विना एक दमरे से मलाइ किये (शिप्य के तौर पर) समिधा हाथ मेंलिये प्रजापति के पास आए।। वह वहां बत्तीस बरस ब्रह्मचारी वनकर रहे । तब मजापति नेउन्हें कहा'तुम दोनों किस प्रयोजनमे यहां रहेहो' उन दोनों ने उत्तरदिया 'आपके इस वचन का दुनिया में ढंढोरा फिर रहा है, 'कि आत्मा जो कि पाप से अलग है,जरा और मृत्यु से परे है, शोक से परे है भूख और प्यास से अलग है, सच्ची कामनाओं वाला है और सच्चे संकल्पों वाला है, उसका अन्वेपण करना चाहिये, उसकी जिज्ञासा करनी चाहिये । वह जो इस आत्मा को ढूंढकर जानलेता है, वह सारे लोकों को और सारी कामनाओं को पालेता है । सो हम दोनों उस (आत्मा) को चाहते हुए आपके पास रहे है ।। ३ ।। मजापति ने उन दोनों को कहा यह जो आंख में पुरुष दीखता है,यह वह आत्मा है, यह है जो मैंने कहा था, यह अमृत है, यह अभयहै, यह ब्रह्म है। *यह जो आंख में पुरुप दीखता है; इस से प्रजापति का अभिप्राय यह है, कि आप अपने देखने के काम से जिप्स फी हस्तीकी तर्फ इशारा करती है, यह आत्मा है। क्योंकि देखने वाली असल में आँस नहीं, मांख एक साधन है और यह देखने वाली शक्ति इससे अलग इसके अन्दर है, जो इस झरोके में बैठकर बाहर के दृश्य देखती है। उसके शिष्य इस अभिप्राय को नहीं पहुंचे है, वह आंख के अन्दर धैठकर उस देखने वाले को आत्मा नहीं समझे, किन्तु जो मांख के अन्दर पुरष का आकार[छाया दीखता है, उसी को आत्मा समझे है, और इस लिये आगे पूछते हैं, फिजो जल में और शीशे में दीखता है वह कौन है? ।

मपाठकस खण्ड८१ [ २९७ ] । (उन्होंने पृछा) हे भगवन् ! यह जो जलों में दीखता है, और यह जो शाश में दीखता है. यह कौनसा है उसने उत्तरदिया, यह ही इन में दीखता है, * ॥ ४ ॥ आठयां खण्ड 'उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानी थस्तन्मेप्रबतमिति' तो होदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते।तो हप्रजापतिरुवाच 'किंपश्यथ इति' । तौहोचतुः 'सर्व मेवेदमायां भगव आत्मानं पश्याव आलोमभ्य आनखे- म्यः प्रतिरूपमिति'॥१॥ तो हमजापतिरुवाच 'सा बलकृती सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामि ते' तौहसावलङ्कृतो सुक्सनौ परिष्कृतौ भूत्वोदश वेऽवेक्षाचनाते । तेह प्रजापतिरुवाच 'किंपश्यथ इति' । २॥तौ होचतुः यथैवेदमावां भगवः साध्वलकृती वसनौ परिष्कृतीस्व एवमेवेमोभगवः साध्वलड्कृती वसनौपरिष्कृताविति । एपआत्मेति होवाचैतदमृत *पामा सब के अन्दर है, इस उच्च अभिप्राय से प्रजापति ने उत्तर ईया है। पर यहजानकर कि उसके शियों ने पुरुप से शरीर ही सम ना है, उनकाअज्ञान दिखलाने के लिये भगला उपदेश प्रारम्भ किया। पहले पहल प्रात्मा की हस्ती को पात्र में दिखलाने में प्रजापति यह अभिमाय है, कि वह अपने शिष्यों को पहले पहल जाग्रत में तस्मा की अलग हस्ती का निश्चय कराए।

[२९८ ] छान्दोग्य उपनिषद् मभयमेतद्ब्रह्मेति । तौहशान्तहृदयौप्रवव्रजतुः ॥३॥ तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाच 'अनुपलभ्यात्मानमननु विद्य बजतो यतरएतदुपनिपदोभविष्यन्ति देवावाऽसुरा वा ते पराभविष्यन्तीति'। सहशान्तहृदयएव विरोचनो ऽसुरान् जगाम । तेभ्यो हैतामुपनिपदं प्रोवाचात्मेवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महयन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकापवामोतीमश्चामुश्चेति ॥ ४॥ तस्मा दप्योहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बते ति'। असुराणा ५ हपोपनिपत् प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालङ्कारेणेति स ५ स्कुर्वन्त्येतेन ह्यमुं लोकं जे- प्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५॥ पानी के प्याले में तुम दोनों आत्मा [अपने आप] को देखो, और जोकुछ तुम आत्मा [अपने आप] का नहीं समझे हो, वह मुझे बताओ'। उन्हों ने पानी के प्याले में देखा । तर प्रजापति ने उन्हें कहा 'तुम क्या देखते हो? उन्हों ने कहा हेभगवन् ! हम यह पूराआत्मा को देखरहे है रोमों तक और नखोतक-अपनी पूरी छाया ॥१॥ प्रजापति ने उन्हें कहा अच्छे२ भूषण और वस्त्र धारकर और अपने आप को साफ सुथरा करके [वाल और नख कटवाकर] फिर पानी के प्याले में देखो। उन दोनों ने अच्छे भूपण और . भपाठक८.खण्ड ८ [२९९ ] वस्त्र धारकर और अपने आप को साफ सुथरा बनाकर देखा । प्रजापति ने कहा 'क्या देखते हो ?॥२॥ उन्हों ने उत्तरदिया 'हेभगवन् ! जैसे हम यह अच्छे भूषण और ववधारणकिये हुए और साफ सुथरे हुए हुए है, इसीप्रकार हेभगवन् ! यह दोनों (हमारे आत्मा, अर्थात् प्रतिवम्ब) अच्छेभूपण और वस्त्रधारणकिये हुए और साफ सुथरे हैं * । प्रजापति ने कहा 'यह आत्मा है, यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म है । तब वह दोनों प्रसन्नचित्त होकर चले गए ॥ ३ ॥ उनको देखकर प्रजापतिने कहा ' यह दोनों आत्मा को जाने और ढूंढे विना [ ढूंढकर साक्षात किये विना ] जाते हैं, इन दोनों में से जो कोई देवता या असुर इस उपनिपद् [ देह आत्मा है, इस सिद्धान्त ) का अनुसरण करेंगे, वह नष्ट होजाएंगे। अब विरोचन तो वैताही प्रसन्नचित्त हुआ असुरों के पास पहुंचा और उनको यह उपनिपद् उपदेशकी, कि आत्मा (देह ) केवल यहां पूजा के योग्य है, और आत्मा (देह ) सेवा के योग्य है। और वह जो यहां आत्मा (देह) को पूजता है और आत्मा । * वह दोनों छायाऽत्मा को आत्मा समझे थे,प्रजापति ने उनकीभ्रान्ति दूरकरने के लिये छायाऽत्मा की स्थिति देह के आश्रित दिखलाई, तथापि उनकीभ्रान्ति दूरन हुई,इसलिये प्रजापति ने फिर अपने अभि- प्रेत आत्मा को मन में रखकर 'यह आत्मा है' इत्यादि उसफा स्वरूप कह दिया, जिससे छाया वा देह का आत्मा न होना उनको प्रतीत हो जाए, तप भी यह नहीं समझे, और सन्तुष्ट होकर चलदिये ।

[ ३०.] छान्दोग्य उपनिषद्। (देह) की सेवा करता है, वह दोनों लोकों को लाभकरता है, इस (लोक) को ओर उस (लोक) को ॥ ४ ॥ इसलिये अब भी जो यहां न दानदेता है, न श्रद्धारखता है, न यज्ञ करता है, उसे लोग कहते है, कि यह अमुर है । क्योंकि यह अमुरों की उपनिषद् (आत्मविषयकसिद्धान्त) है । वह मृतक के शारीर को गन्धमाला आदि से, वस्त्रों से और भूपणों से सजाते हैं, और वह ख्याल करते हैं, कि इस प्रकार हम उसलोक को जीतेंगे ।। नयां खण्ड अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श । यथैव खल्व यमस्मिञ्छरीरे साध्वलकृते साध्वलङ्कृतो भवति सुव सने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृतः, एवमेवायमस्मिन्नन्धे उन्धोभवति सामे सामः परिवृणे परिवृणोऽस्यैव शरी रस्य नाशमन्वेपनश्यतिनाहमत्रभोग्यपश्यामीति ॥१॥ स समित्पाणिःपुनरेयाय। त५ प्रजापतिरुवाच 'मधव- न यच्छान्तहृदयःप्रात्राजीःसार्द्ध विरोचनेन, किमिच्छ- न पुनरागम इति' । सहोवाच 'यथैवखल्वयं भगवो ऽस्मिञ्छरीरे साध्वलकृते साध्वलकृतोभवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृतः, एवमेवायमास्मिन्नन्धे ऽन्योभवति सामेलामः परिवृणे परिवणो ऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेप नश्यति नाहमत्रभोग्यपश्यामी ति॥२॥ एवमेवैपमघवन्निति होवाचैतंत्लेव तेभ्योतु , मपाठक८.खण्ड ९ व्याख्यास्यामि, वसापराणि दात्रि ५ शतं वर्षाणीति'। सहापराणि द्वात्रि शतंवर्पाण्युवास । तस्मैहोवाच ।। पर इन्द्र ने देवताओं के पास पहुचने से पहले ही यह भय (दिक्कत) देखा, कि जैसे यह (छाया जो पानी में है *) अच्छे भूषणों वाला होजाता है, जब शरीर अच्छे भूषणों वाला होता है, अच्छे वस्त्रोवाला होजाता है, जब शरीर अच्छे वस्त्रोंवाला होता है, अच्छा साफ सुथरा होता है, जब शरीर अच्छा साफ सुथा होता है, इसीप्रकार शरीरके अन्धाहोने से यह अन्धाहोजाता है, से काना होता है, लूलालंगड़ा होने से लूला लगड़ा होता है । सो में इस (सिद्धन्त) में कोई भलाई (भोग्य, अच्छाफल) नहीं देखता ॥४॥ (यह जान शिष्य के तौरपर ) वह समिधा हाथ में लेकर फिर प्रजापति के पास आया। प्रजापति ने उसे कहा 'मघवन् (इ) तुम बान्तहृदय होकर विरोचन के साथ चलेगए थे, किसी जन के लिये तुम फिर वापिस आए हो?॥ उसने कहा 'हेभगवन् ! जिसतरह पर यह (छाया) अच्छे भूषणोंवाला होजाता है, जब शरीर अच्छे भूषणों वाला होता है अच्छे पत्रोंवाला होजाता है, जव शरीर अच्छे वस्त्रों वाला होता है । और अच्छा साफ सुथरा होता है, जब शरीर अच्छा साफ सुथरा होता है । पर इसीमकार इस शरीर के अन्धा होनेपर यह (छाया) काना होने ' , १ , * यद्यपि प्रजापति का असली अभिप्राय समझने में भ्रान्ति दोनों तो हुई है । पर विरोचन ने यह समझा, किप्रजापति ने शरीर को आ मा बतलाया है, और इन्द्रने यह समझा कि शरीर की छाया को Tरमा बतलाया है (शकराचार्य)॥

(३०२) छान्दोग्यउपनिषद् अन्धा होता है, काना होनेपर काना होता है, लूला लंगडा होने पर लूला लंगड़ा होता है । और इस शरीर के नाश होने पर यह नाश होजाता है। सो मै इस (सिद्धान्त) में कोई भलाई नहीं देखता' ॥२॥ उसने उत्तर दिया 'निःसंदेह यह ऐसेही है हे मघवन् ! (तूने टीक समझा है, क्योंकि छाया आत्मा नहीं है), पर मै तुझे उसी (असली आत्मा) काफिर व्याख्यान करूंगा (जिसका व्याख्यान पहले करचुका हूं, तुम जो उसे नहीं समझे, सो तुम्हारे अन्तः करण पर अभी कोई मैल है, पहले उसके दूरकरने के लिये) और बत्तीस सरस मेरे पास (ब्रह्मचर्य) वास करो ॥ 'उसने और वत्तीस बरस उसके पाप्त वास किया, तब उसे अगपति ने कहा ॥३॥ दसवां सण्ड 'य एप स्वप्ने महीयमानश्वरत्येष आत्मेति' होवाच एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति' । सह शान्तहृदयः अक्काज । सहाप्राप्यैव देवानेतद भयं ददर्श । तद् । यद्यपीद शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति । यदि साममलामो, नैवेपोऽस्यदोषेण दुष्यति ॥१॥न वधे- तास्य हन्यते नास्य साम्येणखामः। मन्ति त्वेवैनं वि- च्याययन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपिरोदितीव । नाऽहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २॥स समित्पाणिः पुनरेयाय । तरह प्रजापतिरुवाच । मघवन् यच्छान्तहृदयःमात्रा जी, किमिच्छन् पुनरागमइति' । सहोवाच । 'तद - प्रपाठक खण्ड १०॥ 1100 यद्यपीद शरीरमन्धं भगवत्यनन्धः से भवति, यदिपा ममस्रामो नैवेपोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ ३॥ ने धेना स्यहन्यते नास्य साम्येण सामः। प्रन्ति त्वेवैनं विश्य- यन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव । नाहमत्रायं पश्यामीति' । एवमेवेप मघवनिति' होवावे । एवं तेभ्योऽनुव्यख्यास्यामि । वसापराणि द्वात्रिशी णीति' । सहापराणि दात्रि५ शतं वर्पाण्युवास । होवाच ॥४॥ यह जो स्वप्न में महिमा अनुभव करता हुआ विचरता है, आत्मा है, यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म है। तव इन्द्र शान्तहृदय होकर चलागया । पर देवताओं के पहुंचने से पहले ही उसने यह भय देखा । कि यद्यपि यह ठीक. कि यह शरीर यदि अन्धा भी होजाए, तो वह (स्वप्न द्रष्टा आत्मा, अन्या नहीं होता, यदि यह काना हो, तो वह काना नहीं, होता। न इसके दोप से वह इपित होता है, ॥१॥ न इसके वध से वह मरता है, न इसके काना होने से यह काना होता है । तथापि इसको मानो मारते है, औरभगाते है (इमका पीछा करते है) यह मानों अमिय देखना है और रोता है । इसलिये मैं इम (सिद्धान्त ) में कोई अच्छा फल नहीं देखता ॥२॥ *यद्यपि न पोई उसे मारता है, न भगाता है, न यह मनिय देखता और मरोता है, तथापि स्वार समय में ऐसा ही पर देखता है, इसलिय यम्मा' कहा है प्रजापतिनै स्वम ये इशा को मारमा पतलाने से बंधारमा, पी भ्रान्ति को दूर पर दिया है ।

छान्दोग्यउपनिषद् को वह समिधा हाथ में लेकरफिर वापिसआया, उसे प्रभापतिने कहा 'मवन् ! तुम शान्तहृदय होकर चले गएथे, किस प्रयोजनके लिये रि वापिस आए हो? सने कहा 'भगवन् यद्यपि यह ठीक है, कि यह शरीर अन्धा हो, तो वह अन्धा नहीं होता, यदि यह काना हो जाए, तो वह का नहीं होता । न यह इसके दोप से दृपित होता है ॥ ३ ॥ न इसके वधसे मरता है । न इसके काना होने से काना होता तयापिमानों इसको मारते हैं और भगाते हैं । और यह मानों *य देखता है और रोता है । सो मैं इसमें कोई अच्छा फल दिखता ॥ प्रजापति ने कहा निःसंदेह यह ऐसेही है हेमघवन्!पर मै इसीको से फिरव्याख्यान कम्गा, अभी औरवत्तीस बरस मेरे पास ब्रह्मचर्य भासकरो। उसने और बत्तीस वरस वास किया। तब उसके लिये मजापति ने उपदेश दिया ॥४॥ ग्यारहवां खण्ड 'तद् यत्रतत् सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वमं न विजानात्येप आत्मेति' हो वाच एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति' । सह शान्तहृदयः प्रवबाज । स हाप्राप्येव देवानेतद् भयं ददर्श । नाहखल्वयमेव ५ सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति, नो एवेमानि भूतानि, विनाश मेवापीतो भवति । नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ १॥ सममित्पाणिःपुनरेयाय ।तरहपूजापतिरुवाच मघव- न ! यच्चान्तहृदयःप्राबाजीः किमिच्छन्पुनरागमइति' मपाठक ८. खण्ड११। सहोवाच नाहखल्वयं भगव!एव५ सम्प्रत्यात्मानं जैन त्ययमहमस्मीतिनोएवेमानिभूतानि,विनाशमेवार भवति।नाहमत्रभोग्यं पश्यामीति ॥२॥ 'एव मेवैश- वन्निति होवाच एतं तेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्या एवान्यत्रैतस्माद, वसापराणि पञ्च वणीत'। वर्षाण्युवास। तान्येकशत ५ संपेदुरेतत् तद्यदाहुरे । ५ हवै वर्षाणि मघवान प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवार तस्मै होवाच ॥३॥ जब यह सोया हुआ, आराम करना हुआ सम्ममन्न । चल से रहित, पूरे आराम में ] हुआ. स्वम को नहीं देखत यह आत्मा है, यह अमृत है, अभय है, ब्रह्म है * ॥ तर इन्द्र शान्तहृदय होकर चलागया। पर देवताओं के पा पहुंचने से पहिले ही उमने यह भय देखा । कि यह [ सुपुतारस्य का आत्मा ] अपने आप को भी इस मकार ठीक २ न जानता है, कि यह मैहूं । और न ही इन भूतों को [ नानता है जैसा कि जानव और स्वप्न में जानता है ] मानो विनाश में ही लीन हुआ [ विनष्ट हुआ सा ] होता है । मैंइम (मिति) में कोई अच्छा फल नहीं देखना ॥१॥ तब वह समिधा हायमें रेकर फिर वापिस आया, उमको ममा. पति ने कहा मधवन तुम मान्नहृदय होकरचर गए, किम प्रयो- मन के लिये फिर वापिम आए हो! *देखो उान्दो उप०८।६।३ . .... छान्दोग्य उपनिषद। हसने कहा 'हे भगवत् ! यह उस समय अपने आप को भी इस का ठीकर नहीं जानता है, कि यह मैं हूं, और न ही इन भूतों जानता है, मानों विनष्ट हुआ सा होता है। मैं में कोई 'छा फल नही देखता हूं ॥२॥ मनापति ने उत्तर दिया" निसंदेह हेमघवन् ! यह ऐसे ही है। इसी का तुझे फिर व्याख्यान करंगा, इससे भिन्न वह नहीं है। और पांच वरस यहां वास करो। उसने और पांच बरस वास किया। सो यह एक सौ एक [ ३२+३२+३२+५=१०१] वरस हुए । जो, यह कहा करते हैं, कि इन्द्र ने प्रजापति के पास एक सौ एक चरस ब्रह्मचर्यवास | किया । तब मजापति ने उसको उपदेश दिया ॥ ३ ॥ धारहवां सण्ड मघवन् मय वा इद ५ शरीरमा मृत्युना । तदस्यामृतस्याशरीरस्यत्मनोऽधिष्ठानम् । आत्तो वै स शरीरः प्रियाप्रियाभ्याम् । न हवेसशरीरस्य सतः प्रि- याप्रियोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न मियाप्रिये स्पृशतः ॥ १॥अशरीरो वायुर_विद्युत् स्तनयित्नु- रशरीराण्येतानि तद्यथेतान्यमुष्मादाकाशात्समुत्याय परं ज्योतिरुपसम्पद्य खनरूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥२॥ जिम भाभा या पदले जापन में उपदेश दिया है, उसीका फिर रथम में, फिर मुशी में। और अय. रमी आत्मा का तीनों अवस्थामा में मसग हुए.पा स्वाधरुप पर्णन करेंगे।

पाठक८.खण्ड १२॥ (३०७] एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात समुत्थाय परं ज्यो- तिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते सउत्तमः पुरुषः। स तत्र पर्येति जक्षत् क्रीडन रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजन ५ स्मरन्निद ५ शरीर ५ स यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्चरीरे प्राणो- युक्तः ॥३॥ अथ यत्रैतदाकाशमविषण्णं चक्षुः स चाक्षुपः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथयो वेदेदं जि-. घ्राणीति स आत्मा गन्धाय माणमथयो वेदेदमभिव्या- हराणीति स आत्माऽभिव्याहारायवागथ यो वेदेद ५ शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥ अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य देवं चक्षुः । स वा एप एतेन देवेन चक्षुषा मनसेतान कामान् पश्यन् रमते ॥ ५॥ य एते ब्रह्मलोके । तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते, तस्मात् तेपा ५ सर्वे च लोका आत्ताः सर्वे च कामाः। स सर्वा ५ श्व लोकानाप्नोति सर्वा ५ श्व कामान, यस्तमात्मानम- नुविद्य विजानातीतिह प्रजापतिम्वाच मजापति- हवाच ॥६॥ * मघवन् ! यह शरीर मर्स [ मरने वाला है, जो मृत्यु मे * जामन स्वम और सुषुप्तिइन तीनों भस्याओं में मारमा बोस शरीर दिखलाफर अय मपने निजरूप में भारमा का स्वरूप दिसला । ३०८] छान्दोग्य उपनिषद् पकड़ा [ असा ] हुआ है। यह इस अमर और अशरीर आत्मा का अधिष्ठान [रहने की जगह ] है।जबतक यह सशरीर है [शरीर के साथ एक होरहा है, शरीर में आत्माऽभिमान रखता है ] यह मिय और अप्रिय [हर्ष भोक ] से पकड़ा [ असा ] हुआ जवतक यह सशरीर है, तब तक प्रिय और ऑपय का विनाश नहीं होता है । पर जब यह अशरीर होता है [ शरीर से अपने आप को अलग समझता है ] तब इसको प्रिय और अमिय नहीं छूते हैं * ॥१॥ अशरीर है वायु, मेघ, विजली और गर्जना, यह विना शरीर के [विना हाथ पाओं आदिके ] हैं, जैसे यह उम आकाश से उठकर परमज्योति को प्राप्त होकर अपने अमली रूप से प्रगट होते है ॥२॥ इसी प्रकार यह सम्प्रसाद [निर्मलडुआ आत्मा ] इस शरीर से उठ कर परमज्योति को प्राप्त होकर अपने असली रूप से मगट होता है । यह [ इस अवस्था में ] उत्तम पुरुप है । वह हैं, और प्रसंग से यह दिसलाते हैं, कि सुख दुःख और विनाश आदि फे सारे भय सशरीरता में हैं, अशरीर आत्मा इनसे ऊपर है । * दुनिया के हर्ष शोक उसफो नहीं छूते, फिन्तु ब्रह्मानन्द को तो पद उपभोग फरता ही है। यहां परमज्योति से एक जगह सूर्य की गमी अगिप्रेत है, और दूसरी जगह परब्रह्म । घायु जय चल नहींग्हा, तो यह माकाश में माफाश के साथ इसतरह पफ होरहा है, जैसे शरीर में शरीर के माय मारमा । इसी प्रकार यादल, बिजली और गर्ज भी आकाश में लीन हुए हुए है। सूर्य की गर्मी पाफर यायु अपने अमली रूप को धारणकर यहनेलगता है, पादल प्रगट होते हैं, विजली चमकती है भोर गर्जना प्रगट होती है। रमीमकार यह आत्मा जो स्थूल सूक्ष्म भोर कारण शरीर में छिपा हुमा है, यह परग्रह का पाफर अपने अमलीप में प्रगट होता है। भारमा के पक्ष में परमज्योति का अर्थ बाप्पाण्यातामों में ब्रह्मविद्याभी लिया है।

+ प्रपाठक८.खण्ड १२ [३०९] इस शरीरको जिसमें वह जन्माथा स्मरणन करता हुआ, वहां स्त्रियों के यानोंकेवा ज्ञातियों के साथ हंसता (वा खाता) खेलता और आनन्द भोगता हुआ विचरता है। जैसे घोडा रथमें जुड़ाहुआहोता है, इसी प्रकार इस शरीर में यह माण [ प्रज्ञात्मा ] जुड़ा हुआ है॥३॥ जहां यह आकाश [ आंख के छेद ] में नेत्र जड़ा हुआ है, वहां वह चाक्षुष [ नेत्र का ] पुरुष है, नेत्र उसके देखने के लिये है, [ देखने का साधन है ] और जो यह जानता है, कि मैं इसे सुंधूं, वह आत्मा है, और प्राण गन्धग्रहण करने का साधन है, और जो यह जानता है, कि मैं यह वोलू, वह आत्मा है और वाणी बोलने का साधन है। और जो यह जानता है, कि मैं यह सुनूं, वह आत्मा है, श्रोत्र सुनने का साधन है ॥ ४ ॥ जो यह जानता है, कि मैं इसे ख्याल करूं , वह आत्मा है, मन उसका देवनेत्र [ दिव्यदृष्टि ] है । वह इस देवनेत्र-मन से इन कामनाओं को देखता हुआ आनन्द भोगता है ॥ ५ ॥ जो यह ब्रह्मलोक में है । देवता इस आत्मा को उपासते हैं, इस लिये सारे लोक और सारी कामनाएं उनके वश में हैं वह जो इस आत्मा को ढूंढ कर जानलेता है, वह सारे लोकों और गरी कामनाओं को माप्त होता है, यह मनापतिने कहा, हां, मजा. तिने कहा ॥६॥ * यह मान्द उसे ब्रह्मलोक में होते है जो मानस है। + जिसतरह रथका चलानेवाला घोड़ा रथ से अलग है, इसी कार इस शरीर का चलानेयाला प्रशारमा इससे अलग है। + मन दिव्य दृष्टि इसलिये है, कि इससे आत्मा केयल वर्तमान धूल और व्यवधान राहत को ही नहीं देखता, किन्तु भूत भावभ्यत, |म, दूरस्थित और ओट में स्थित को भी देखलेता है।

[३१० ] छान्दोग्य उपनिषद् । तेरहवां खण्ड श्यामाच्छवलं प्रपद्ये शवलाच्छेयामं प्रपद्येऽश्वइव रोमाणि विधूय पापं चन्द्रइवराहोर्मुखात्प्रमुच्य भूत्वा शरीरम कृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसंभवामीत्यभि सं- भवामीति ॥१॥ मै श्याम (हृदयस्थ ब्रह्म] से शवल [ब्रह्म लोक] को प्राप्त होता है । शरल से श्याम को प्राप्त होता हूं * । घोडा जैसे रोमों को शाहता हैं इस प्रकार पापों को झाडकर, चन्द्र जैसे राहु के मुष में विटता है] इसतरह छटकर, शरीर को झाडकर (देहाभि मान छोडकर] कृतार्यहुआ अप मैं अकृत ( अकार्य ) ब्रह्मलोके को माप्त होता हू, हा, माप्तहोता हूँ॥ चौदहवां सण्ड आकाशोनाम नामरूपयोनिहिता, ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतरस आत्मा । प्रजापतेः सभांवेश्म प्रप- ये, यशोऽहं भवामि ब्रह्मणानां यशोराज्ञा यशोविशाम् । यशोहमनु प्रापत्सि सहाहं यशसां यशः । श्येतमदक मदत्त ५ श्येतं लिन्दुमाभिगां लिन्दु माभिगाम् ||१|| घोर अपर ग्रहयो श्याम और शयल नाम से वर्णन किया याम, पालर और शरचितकारा । ब्रह्मा गुर स्वरूप मन पाणी से परे हैं, यह अनय है, उस पर अन्धेरा है, इसलिये यह श्याम । भौर सबल के धर्म सापेक्ष है (पाहर पंपदायों दी अपेशाम) सालिप उसका यह स्वरूप दोरगा रहा है * मपाठक८.खण्ड १५ [ ३११] आकाश * है जो सारे नाम और रूप का निर्वाह करनेवाला छ । वह दोनों (नाम और रूप) जिसके मध्य में है, वह ब्रह्म है, वह अमृत है, वह आत्मा है। मैं मजापति की सभा को, घरको, माप्त होवा हूं; मै ब्राह्मणों में से यशरूप होता हूं, क्षत्रियों में से यारूप, वैश्यों में से यशरूप होता हूं। मैंने उस यश को पालिया है, मैं यशों का यश हूँ।मै उस श्वेत को, जिसको कोई दान्न नहीं तथापि खानेवाला है, ऐसे श्वेत घर को प्राप्त न होउ, हा (इस) घर को माम नहोउं ॥ पन्द्रहवां सण्ड तद्धैतद ब्रह्मा प्रजापतय उवाच, प्रजापतिमनवे मनुः प्रजाभ्यः। आचार्यकुलाद वेदमधीत्य यथाविधा- नं गुरोः कर्मातिशेपेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुवो देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान विदधदात्मान सन्द्रि- याणि संप्रतिष्ठाप्याहि ५ सन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः। स खल्वेवं वर्तयन यावदायुपं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते । न च पुनरावर्तते नच पुनरावर्तते ॥१॥ यह (आत्मज्ञान) ब्रह्मा ने मनापति को बतलाया, मनापति ने मनुको, मनुने मजाओं को (इम प्रकार मम्मदाय की परम्परा प्राकार यहां ब्रह्म को माहा, क्योंकि यह पाफागको नाई अगरीर है पीर परमसुरमई। प्रिजापति को ममा, प्रभुपिमित हरिएमय (देखो पूर्वा५३) येत स्वर्णत पप बदाममं रोहितम् । तया दकन्दारक्षित मपिपदक = भयायिय =गी व्यवन ( योमि अदितं प्रजननेन्द्रियमि त्य तत्मविनां तेपो बनगोर्य विज्ञानधर्मावामपन्य - दिनाणा यिक्त्येितत् । यदेवं मतम् इयत निन्दु-पिशल,समाभिगा गये प्रजापति पयपा मार मनु, काश्यप का पुष (रामाय) म।(यकराचार्य) [ ३१२] छान्दोग्य उपनिपद् । से आया हुआ यह उपनिपदविज्ञान तक मुक्षित है) । चाहिये कि आचार्यकुल में जाकर, गुरु की ओर जो उस का कर्तव्य है उसको पूरा करता हुआ वाकी बचे हुए समय में यथाविधि वेद को पहे। फिर समावर्तन होने के पीछे कुटुम्ब में स्थिर हो कर शुद्ध देश में स्वाध्याय पढता हुआ और (पुत्र तया शिष्यों को) धार्मिक बनाता हुआ अपने सारे इन्द्रियों को आत्मा ( हार्दब्रह्म) में लीन करके सिवाय तीर्थों के *किसी भी माणी को पीडान देवे। वह जो आपुभर ऐसा वर्तता है, वह ब्रह्मलोक को माप्त होता है, और फिर वापिस नहीं आता है, हा, फिर वापिम नहीं आता है।॥१॥ छान्दोग्य उपिनिषद का शान्ति पाठ-यो आप्यायन्तु ममाङ्गानि पाक प्राणश्च श्रोत्रमयो यलमिन्द्रियाणिचसीणि सर्व प्रझोपनिषद माह ब्रह्म निराकुयों भामाब्रह्मनिराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरण मेऽस्तु । तदात्मनि निरते ये उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयिमन्तु॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः!! शान्तिः!!!! 11 समासेयं छान्दोग्योपनिपत् । || ओतत्सत् ॥ * मिक्षा के निमित्त घूमने वादिसे गी प्राणिया को पाडा होस- सी है, इसरिये पहा है सिवाय तीर्थों के । तीर्थ अर्थात जिस विषय में शास्त्र अनुशादेता है, उस के सिवाय (शकराचार्य) अिांत शरीरग्रहण करने के लिये फिर वापिस नहीं आता। (चन्द्र लोफ से जैसे पुनरावृत्ति होती है, उसकी नाई) प्रारोफ से भी प्राप्त हुई जोपुनरावृत्ति है, उसकायह निषेध है। अर्थात अधिरादि मार्गसे बायझरोष को प्राप्त होकर जबतक नहालोक की स्थिति है तबतक वहीं रहता है, उससे पहले (अर्थात महामरय से पहले) वापिस नही आता है, यह अभिभाय है (शकराचार्य) ।

छान्दोग्य उपनिषद के प्रवाकों की वर्णानुक्रमणिका। .... .... .... .... खंडविभागाद्यपदानि. अध्यायादीनि खंडविभागाद्यपदानि. अध्यायादीनि अमिहिकारो वायुः, २.२०.१/ अथ खलु य उद्गीय.... अग्निष्टे पादं वक्तति ४. ६.१ इत्यसौवा आदित्यः....१.५.१ अजा हिंकारोऽवपः.... २.१८.१ अथ खलु व्यानं अतोयान्यन्यानि १. ३.५ अपखलूद्गीयाक्षराणि १.३.६ अत्रयजमान:- अथखल्वमुमादित्यं तस्मैरुद्राः ....२.२४.१०/ अथखल्वात्मसमितं ...२.१०.१ अत्रयजमान:.... अथखल्वाशी:० तस्मैवसवः २.२४.६ अय खल्वेतपर्चा अत्स्यन्नं पश्यासिप्रियं... अथ जुहोति नम वैश्वानर आदित्याय ..२.२४.१४ मुपास्ते पादौ ५.१७.२ अथ जुहोति नमोऽग्नये...२.२४.५ अत्स्यन्नं पश्यसि अय जुहोति नमोवायवे २.२४. ९ वैश्वानर मुपास्ते ..३.११.१ माणस्वेपः ५.१४.२ अय प्रतिस्मृत्याअली अत्स्यन्नं पश्यसि अयय आत्माससः वैश्वानरमुपास्ते अय य इमे ग्राम बस्तिस्त्वेपः ....५.१६.२ अप य एतदेवं- अत्स्यन्नं....मूर्षालेपा....५.१२.२ विद्वानग्निहोनं अत्स्यनं.वैश्वानर मु अययएतदेवंविद्वान्साम १.७.७ पास्ते संदेहस्त्वेपः ५.१५.२ अथयएपोऽन्तरराणि.... १. ७.६ अथ खलु य उद्दीयः स अयय एप संमसादः प्रणवो....स उदीय अय यच्चतुर्थममृतं इतिहोतृपदनाद १.५.५/ अय यत्तदजायत .... अय तत ऊर्चः .... .... AN .... .... .

.... लोककामः .... .... .... .... ............ खविभागाद्यपदानि, अध्यायादोनि खडविभागाद्यपदानि अध्यायादीनि अथ यत्तपोदानं ३.१७.४ अथ यदि गन्धमाल्य- अथ यत्तृतीयममृतं अथ यत्पञ्चमं ३.१०.१ अथ यदि गीतवादित्र. अथ यत्प्रथमास्तमिते.... २. ९.८ लोककामः.... अथ यत्प्रथमोदिते २. ९.३ अथ यदि तस्याकर्ता ....६.१६.२ अथ पचैतत्पुरुपो ६.८.५ अथ यदिदमस्मिन् अथ यत्रैतद्वलिमानं.... ८. ६.४ ब्रह्मपुरे अथ पचैतदस्माच्छरी अथ यदि भ्रातृलोक- रात कामः अथ यत्रैतदाकाशमनु अथयदि महजिगमित्....५.२.४ विपणं ८.१०.४ अथयदिमातृलोककामः....८.२.२ अथ यत्रोपाकृत ४.१६.४ अथ यदि यजुष्टः अथ यत्ममीतमध्यंदिने २.९.५ अथ यदि सखिलोककामः८.२.५ अथ यत्मत्रायणमित्या अथ यदि सामतः चक्षते अथ यदि स्त्रीलोककामः ८.२.९ अथ यदतःपरो ३.१३.७/अथ यदि स्वस- अथ यदनाशकायन लोककामः ८.२.४ मिसाचक्षते ८.५.३ अथ यदु चैवास्मिन् अपपदवोत्रभुवः अथ यदूलभपराह्लाद . प्रपद्ये ...३.१५.८ अथ ययमध्यदिनात्... २.१.६ अथ यढवोचं भाप्रपद्ये ....३.१५.५ अब यदेतदक्ष्णः.... अथ यदवोस्वामपद्ये ....३.१५.७ अथ यदेतदादित्यस्य ....२.६.५ अथ यदनाति ....३.१७. अथ यदेवैतदादिसस्य ....१.३.६ अधयदाऽस्पबामनांसि ६.१५.२ अथ यद्यन्नपानलोककामः ८२.७ .... .... ....४.१८.५ .... ....

.... .... .... .... ........ .... .... खडविभागाद्यपदानि. अध्यायादीनि खडविभागाद्य पदानि, अध्यायादोनि अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्त अथ योऽस्योदछ ३१३१४ भाणान् ........७.१५३) अथयोऽस्यो सुपि.....३।१३१० अथ यद्यज्ञ इसाचक्षते ८... अथ सप्तविधस्य २२८१ अथ यद्येनमूममूपालभेत २.२२.४ अथ संगवलाया १९४ अथ यद्वितीयममृतं ३.७१ अथ ह चक्षुः भार अथ पद्धसति ३.१७.३ अथ हमाणउचि- अथ या एता हृदयस्य क्रामपन् ५१० नाड्यः ८.६.१ अथाह प्राणा अथ यानिचतुश्चत्वा. अंह श्रेयसि दाग रिशद्राणि .३.१६.३ अथ ह मनः.... शह अथ यानि अष्टाचत्वारि- अथह य एताने ५ शद्रपाणि ३.१६.५/ अथ ह य एवाय १७ अथ यां चतुर्थी जुहुयात् ५.२२.१ अथ ह वाचं શારે अग यां तृतीयांजुहुयात् ५-२१-१ अथ ह शौनकं च कापेयं ४३१० अथ यां द्वितीयांजुहुयात ५-२०-१ अथ ह श्रोत्रं श अथ यां पंचमी ...५।२३११/ अथह है २ सा ४ागा अथ ये चास्य जीवाः ३१२/ अथ हाग्नयः ४॥१०॥ अथयेऽस्य दक्षिणा शाग१ अथ हेन्द्रोऽमाप्यैव ८१९१ अथयेऽस्य प्रत्यञ्चः ३३१ अथ हैम्मन्वाहार्य ४॥१.२ अथ येऽस्योदश्चः श४ा अथ हैनमाहवनीयः ४१ अथ ये ऽस्यो ः ३२५१ अथ हैनमुद्गाता ११११११ अथ योवेदेदं मन्वानीति ८११२२ अथ हैनमृपभः ४ान अथ योऽस्य दक्षिणः.... १३२ अथ हनंगाईपत्यः ४१११ अथ योऽस्य प्रसइ ११३३ अथ हैनं प्रतिदर्ता १।११८ ....५170120 .... .... ... .... .... .... .... .... .... ....

+A. भय हैन १। हर ... .... .... .... .... .... .... .... .... (३०४) खंडविभागाद्यपदानि. अध्यायादीनि खंडविभागाद्यपदानि, अध्यायादीनि अन्तरिक्षमेव प्रस्तोतोपससाद १२११४ अन्तरिक्षोदकोशः ३२१५१ अथ हैन यजमानः ११२१.१ अन्नमय हि अथ हैन वागुवाच ५।१११३ सोम्य मनः ....६१ ५४ अपन श्रोत्रमुवाच २०१४ अन्नमशितं त्रेधा अथ होवाच जनं ५/१५/१ विधीयते दा ५.१ अब होवाच बुडिलं ५।१६।१ अन्नामति होवाच २११९ अथ होवाच सत्यय... ५१५.३१ अन्नवाव बलाद्भूयः ७ ९।१ अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं ८११४११ अन्यतरामेव वर्तन ४।१६३ अथ होवाचोदालक ५।१७।१ अपाने तृप्यति दा२१२ अथात आत्मादेश एव....१२५२ अपां का गाति:....: २३८५ अथातः शौवः १११२११/ अपां सोम्य पीय- अयाधिदैवतं ॥श मानानां ६॥ ६॥३ अयाध्यात्मप्राणोवाव ४॥३ अभिमन्यति सहिकारः....२।१२।१ अथाध्यात्म य एवायं ११५३ अभ्राणिसंप्लवन्ते २११५१ अथाध्यात्म वागेव १११ अभ्रंमूत्वा मेघोभवति..... ५.२०१६ अयनु किमनुशिष्टः दा४ अमृतत्वं देवेभ्यः ચાર રાત્ર अथाननव ११७१८ अपंवार लोको अथाऽऽवृत्तेपु घोहिकारः २१२२२ हाउकार:.... ३१ अयेतयोःपयोः .....१२.०८ अयं वाव सपोऽयमन्त:- २११०३ २१२१८ अधीहिमगर इति होए- अयं वाद स योऽयम- मसाद ७१ न्तहृदय आकाशः.... ३१०१२ अनिरुक्तरूपोदशः आरटं कोश प्रपद्य ३१० .... .... .... .... .... .... .... .... ... अयोताप्याहुः .... पुरुष आकाश .... .... ....

... इ ... .... . .... . .... खऽविभागाद्यपदानि अध्यायादीनी खडविभागाद्यपदानि अध्यायादीनि अशनापिपासेमेसोम्य .६१८३ प्राप्नोति हाऽऽदित्यस्य २१०.६ अशरीरो वायुरभ्रं ८१२२२ आशा वाव स्मराद्भूय. ७१४१ असो वा आदित्यः असौवाच लोको इतितु पञ्चम्या गौतमामिः ५। ४१ इदमिति ह मतिजो अस्य यदेका शाखां ६११२/ इदं वाव तज्ज्येष्ठाय अस्यलोकस्य का इमाःसोम्य नघः गतिः १॥ ९।१ इयमेवर्गग्निः साम अस्य सोम्य महतः ६३१ आ उदशरावआत्मानमवेक्ष्य ८.८.१ उदानेतृप्यति आकाशो वाव तेजसः १२।। ५.२३.२ आकाशो वै नाम उद्गीय इति ध्यक्षर १४॥ आगाता हवे १।२।१४/ उद्गृह्णाति तन्निधन आत्मानमन्तः २३।१२ उद्दालको हाऽऽरुणिः उद्यन्किार उदितः आपयिता १॥ १७ २.१४.१ आदित्मवस्यरेतसः ३११७१७ / उपकोसलो हवे आदित्य इति होवाच.... १११११७/ उपमन्त्रयते स आदित्य ऊकारः .... ११२ ऋ आदित्यमय वैश्वदेव.... २०२४।१३ ऋग्वेदं भगवोऽध्यमि.... ७.१.२ आदित्यो ब्रह्म ३१९ ऋतुषु पञ्चविध आदिरिति ब्याक्षर १०१२ आपः पीतावेधा वापार एक विंशत्याऽऽदित्यं आपः वावाऽन्नाद्भूय....७ १०.१ एतदस्म वै तद्विद्वानहि ३.१६७ .... .... .... . TI ता प्र का .... .... या मधु 4 .... .... .... .... .... . .... .... (३०) खडविभागाद्यपदानि अध्यायादीनि खडविभागाद्यपदानि. अध्यायादीनि एतद्धस्म वैवाद्विदाम 6. ४.५ एप उएव वामनीरेप.... ४. १५.३ एतमु एवाह....पुत्रमुवाच एप तुचा अतिवदत्तियः....७.१६.१ माणा स्वं १.१.४) एप म आत्मा ३.१४.३ एतमु एवाह ....पुनमुवाच एप यजमानस्य २०२४११५ रश्मी ५ स्वं १. ५.२ एप ह वा उदभवणः ४/१७९ एतमगेदमभ्यनपर ३. १.३ एप ह वैयज्ञोयोऽयं ४११६.१ एतेपां में देहीति एपां भूतानां १।११२ एत मंयद्वाम ओ एवमेव खलु सोम्यान्नस्य ६. ६.२ एवमेव खलु सोम्येमाः १.१०.२ ओमित्येतदक्षरमुद्रीथमुपा एवमेव मातहतो १.१०.११॥ सीत एवमैवैपमघवन्निति....भूयो ओमित्यदक्ष २। ४५ नुव्याख्यास्यामि ओ३मदाश्मों३ २१२१५ नो एवान्यत्रतस्मा २१ १११ द्वमपराणि औ भूयोऽनु . औपमन्यव को.... ५।१२। व्याख्यास्यामिवसा- पराणि क. एवमेवपमंप्रमादः ८.१२.३, कतमा कतमई.... ११ १४ परमेरोदातारं १.१०.१०१ कल्पन्ते हास्मारनवः.... २०१२ परमेपां लोकानां ४.१७.८ कल्पन्ते हास्मै लोका.....२ परं यमाऽमान.... १. २.८ कामानो गतिरिति ११ ८४ एवं मोम्पने.... 6.98 कुनस्तु पल मोम्या....।।२ एप उपाभापनीरेप १.१५.४ ते काममागायानीति । ७१९ ऑममस्तस्य खल .... .... एवमैप मध०.... .... ... .. .... क..

लोक इति ........ सर्व भूतं .... पौत्रायणः.... .... .... ... .... ( ३०७) खुडविभागाद्यपदानि. अध्वायादोनि खंडविभागाद्यपदानि अध्यायादौनि कतर्हियजमानस्य तथाऽमुग्रिलोके.... १॥ ९।४ २।२४१२ तथेति हसमुपविविशुः ११ १२ ग गायत्री वा इद ५ तदुताप्याहुः २। श२ ३।१२।१ तदु ह जानश्रुतिः गोअश्वमिह महिमा.... ७/२४/२ ४॥ शद तदु ह पद्शतानि ४॥ २१ च तदु ह शौनकः कापेयः ४॥ १७ चक्षुरेव ब्रह्मणः.... ३१८५ तदेतचतुप्पाब्रह्म.... ...३१८२ चक्षुरेवर्गात्सा.... १॥ ७२ तदेतन्मिथुनम् ........... १॥ ११६ चक्षुर्दोच्चक्राम ....५। १२९ तदेप श्लोकः । शतं चै- चित्तं वावसंकल्पाद्भूयः....१ ५।१ का च हृदयस्य.... ८। दाद ज तदेप श्लोको न पश्यो ७२६२ जानश्रुतिई पौत्रायणः ४॥ १।१ तदेप श्लोको यदा जीवापेत वार किलेदं १३ तदेप श्लोको यानि २।२३ ६। २।३ त. तदेतत्ससकामो.... ५। २।३ त इमे ससाकामा ८ ३१ ८।१५।१ त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा ६। ९३ तद्वैतद्ब्रह्मामजापतय .... त एतदेव रूपमभि०.... ३। ६२ ३१११४ श१७६ ३। ८१२ तद्धो भयेदेवासुरा .... ८ ७२ ३। ११२ तय इत्यं विदुः.... ५.१०१ ३३१०१२ तय इह रमणीयचरणाः ५१०७ तत्रोद्गातॄन. १२१०८ तद्य एवैतं ब्रह्म........ ८४३ ....द। २८ तदैवत वहुस्या .... .... " स्तदैत " ३। १२ तद्वैतदोर. ........ .... ...........

.... .... . ....८८.५ .... टेति........... ............ .... (१०८) खंडविभागाद्यपदानि, अध्यायादोनो खंडविभागाद्यपदानि. अध्यायादीनी तद्य एवैतावरं च ण्यं.... ८ ५।४ तयोरन्यतरां मनसा ४॥२६॥२ तद् यदप्रथमममृतं ३६१ तस्मा आदित्याश्च २।२४।१६ तयत्रैतद मुप्तः समस्त..... तस्मा उ ह ददुस्ते ४॥ ३८ विजानात्यामु ८।६।३ तस्माद प्योहाददान तयत्रतत्सप्तः समस्तः तस्मादाहुः.सोप्यत्यतो विजानात्येप सार११ तद्यया महापथ आततः....८. ६२ तस्मादु हैवविद्यद्यपि.... ५.२४.४ तद्यथा लवणेन.... ४।१७७ तस्माद्वा एतं सेतुं तीखा ८. ४.२ तघयेपीका ५।२४।३ | तस्मिन्निमानि..........:. २. ९.२ तद्ययेइ कजितो तस्मिन्नेतस्मिन्नमो लोकः................८ ११६ देवाअन............ ५. ७.२ तघद्भक्तं प्रथम रेतो.... ५. ८.२ तघवृक्तो रिप्ये ३२१९।२ वपै......... तद्वा एतदनुज्ञाक्षर २॥ १८ तयारत्तदादिसमभितो.... त०....श्रर्दा. ३२ ३३ ..सोम.... ५. ५.२ तया०....परं कृष्णं.... ३॥ ४॥३तस्मिन्यावत्मंपातमुपित्वा ५.१०.५ तम्या.....मध्ये सोभत ३॥ ५३ | तस्मै श्वा श्वेता........ १.१२.२ रोहितं ॥ २४ तस्य कमूलं स्यादन्यत्रा- ३। २।३ नादेवमेव. तममिरभ्युवाद ४॥ ६२ तस्य योद्भिः मुह परम्मत्युपाचकम्बर- ४११॥३| तस्य माचीदिग्जुहूर्नाम ३,१५,२ ....४० २।३ तस्य यया कप्पासं .... ५।१९।१ तस्मि.. ४।१७१४] तस्मिन्नेतस्मिन्नमो देवा ........ तघरजतं.... ... कृष्णं........... . त............. .... "हारला in ... .... ( १ ) खडविभागाद्यपदानि अध्यायादीनि खडविभागाद्यपदानि प्रयावादीनि तस्य यथाभिनहन प्रमुच्य ६,१४,२ त ५ हावाचनतदब्राह्म० ....४।४।५ तस्प ये माञ्चोरश्मयस्ता ३, १.२ त होवाच यथा सोम्य.... तस्यर्च साम च स्यक ६१७९ तस्य इवाएतस्य हृदयस्य ३,१३,११ त ५ होवाच यथा तस्य हवाएतस्याऽऽत्मनो५५१८२ सोम्य....स्यैको पण तस्य ह वा एतस्यैव १२६ त होवाच यवैसोम्पैत० ६।१२।२ तस्याहमुख मुपोद्गृह्णन्तु०४।२६ ता आपऐलन्त ६.२४ तं चेदेतस्मिवन्यसि तानि वा एतानि माणा आदित्या.... ३२१६६ यत 'प्येतं ... तं.....माणा रुद्राः ३३१६१४ तानि ...सामान्पेत .... शश २०....माणा वसका ३१वा२) तानि हवा एतानि- तचेव्युरस्मिश्चेदिदं....॥ १४ त्रीण्यक्षराणि । १३५ तं चेदयुर्यदिदमस्मिन् ॥ २२ तानि०...चित्तकायनानि ७५ार तंजायोवाच.... १११०१७ तानि०, सकल्प कायनानि ७४ार तंमद्गुरुरुपनिपत्या १४३ भ्युवाद..... ४ तान्यभ्यतपत्तेभ्यो ....२२२३३३ કાર नह समुपानिपत्या०-४१ तान्होवाच मानः .५११२७ तरह चिरं वसेत्या०....५। ३१७ तान्होवाचावपति- ....१.११॥४ त ५ ह मवाइणो........ 1 ८1८ तान्होबाचेहैव ,२०१२ त हाभ्युवादरफेर्दै १२।४ तान्होबांचते .६।११ भीमतावानस्य महिमा ARI/ तासांत्रित ६.३४ ११९६३ तेजसः सोम्पाश्पमानस्प. १५होवाच कि गोत्रोनु ४४ तेजोशवायोभूयः ...७११ .... - तानु तामृत्युर्यथा .... ... . .... 1. ... तरह शिलका तर हागिरा त५ हैतमविधवा le .... .... .... तेनेयं त्रयी तेनोभी कुरुतः .... ... .... .... .... .... (३२२) खडविभागाद्यपदानि अध्यायादीनि खडविभागाद्यपदानि. प्रध्यायादीनि तेजो आशतं त्रेधा ६।५।३ | तो ह प्रजापतिरुवाच तेन तरह वको .१२।१३ साध्वलंकृती દ્વાર तेन तरह बृह. .१२१११ तौहान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचा तेन तरहा ऽयास्य श२।१२ | तोहोचतुर्यथैवेद २११९ मावाम् भगवः ८८३ ...१२१३१० प्रयीविया हिंकारस्त्रै०....२१२॥१ तेभ्यो ह प्राप्तभ्यः ..५।११।५ वयो धर्मस्कन्धाः २।२३११ ते यथा यत्रन विवेक ६।९।२] त्रयो होगीथे १२८१ तेवा एते गुह्याआदेशा ३।५।२ ते वा एतेऽर्वाङ्गिरसः.... श४२ | दनः सोम्यमध्यमानस्य... ६०६१ ते वा एते ब्रह्मपुरुषाः ...२१३।६ | दुग्धेऽस्मैवाग्दोई.... तेवाएते रसाना भवति य एतदेवं શકાર रसा वेदा २१४ दुग्धेऽस्मै....भवति तेषां खल्वेपां ६.३३१ य एता मेवर ..१।१२४ तेह नासिक्यं तेह माणा मजापतिम् .... १४ार ते ह यथैवेदं १।२।२ तेह संपादयाच- शक्षा रुदालक: १२७ ..५११०२ ते होचुरपकोसलैपा ध ११४।१] ध्यानं वावचित्ताद्भूयो.... ७६१ ते होचुर्यन .५।११४६ न १६४ ... । .... .... २२२२२ देवा वै मृत्यो ५।२७ देवामुरा ह .१।१२।४ धौरवर्गादित्यः चौरेखोदन्त .... . .... .... .... वीवा एती द्वौ संवर्गा :... १४ न नक्षत्राण्येव तीददात्रि शतवाणि....८७३) न वधेनास्य....भोग्य सौद मनापतिरुवाच य एषोदावार पश्यामीति .... ...८१०२ .... ५/७१ ... 4... न वा अस्मै न हाप्सु मैत्यम्मु० .... .... .... नाम वा ऋग्वेदो ... (२३) खंडविभागाद्यपदानि. अध्यायादीनि खंडविभागाद्यपदानि. अध्यायादीनी नवपेनास्य...भोग्यं पश्या पुरुष सोम्योतोपतापिनं १ मीत्येव मेवेष ...१२०१४ पुरुषोवाव गौतमामि नवै तत्र न निम्लोच २१२/ पुरुषोवाव यज्ञः .२१६१ नवैनूनभगवन्तः ६॥ २७/ पृथिवीवाव गौतमानिः....५, ११ नवैवाचोन चक्षू पि या १११५ पृथिवी हिकारोऽन्तरिक्षं २०७१ नास्तिदेतेऽप्युच्छिष्टा .... १२११४ प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्रे २२३३२ प्रजापतिलॊकानभ्यतपत्ते ४११७११ ३२१२३ महत्तोऽश्वतरीरथो ५/१३२ २॥ ४२) प्रस्तोतर्या ११०९ नान्यस्मै कस्मै चन ३११११६ माचीनशाल औपमन्यवः दाशर ७ ११४ नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति.का ९।२ माणइति होवाच शरशय निधनमिति यक्षरं २।१०४माण एव ब्रह्मणः .... ३१टार नवे तेन सुरभि माणे तृप्यति १। २।९ ६।१९।२ न्यग्रोधफलमतआहरेतदि.६।१२।१/ प्राणेषुःपञ्चविधं माणो ब्रह्म के ब्रह्म ४३१५ माणोवावआशायाभूया०७।१५।५ पञ्च माराजन्यवन्धुः.... ५। ३६५/ माणो |वैतानि सर्वाणि १६४ परोवरीयो हास्य .. २१ २ प्रापहाऽऽचार्यकुलं ... ४॥ ९॥ पर्जन्यो वनातैमागवंगः....६।९।१ ब पशुपु पञ्चविषं २॥ ६।२ वलंबावविज्ञानाद्भूपो पुरा तृतीयसवनस्य ....२।२४।११ ब्रह्मणश्चते पादं पुरामातरनुवाकस्य २२४३ ब्रह्मणा सोम्यतेपार्द... पुरामाध्यदिनस्य २।२४७ व्र०....तस्मै होवाच पृथिवी रुपसोम्योत हस्तगृहीत..६.१६१ .... .... .... ११ .... .... ७. ८ ४॥ ५२ ।

-- .... .... (१२५) खंडविभागाद्यपदानि अध्यायादीनि रहंडविभागाद्यपदानि. अध्यायादीनि ब्रह्मणः सोम्यते पादं.... य व०....तस्मै होवाच.. यआत्माऽपहतपाप्मा.... ८1७. प्राण कला .... ४॥ ८१३ | य एते ब्रह्मलोके ८१२२६ ब्रह्मणः सोम्य ते....तस्मै यएपस्वप्ने महीयमान..... ८१०१ होवाचाग्निः ४॥ ७३ य एपोऽक्षिणि पुरुपो.... ४.१५.१ ब्रह्मवादिनो वदन्ति.... २२२४।२ | यचन्द्रममोरोहितं ब्रह्मविदिववै सोम्य ... ४॥ ९।२ यवनान्यत्पश्यति ७२४॥ यथा कृताय ४१ १६ भ | यथाकृतायावजिताय.... ४. १२४ भगवति प्रतिशुश्राव....४।१२ यथा विलीनमेवाङ्गा- भवन्तिहास्य पशवः २१ ६२ स्यान्तात ६।१३।२ भगवा रस्त्वेव ११११३ यथासोम्य पुरुष ६/१४३१ म यथासोम्यमधुमधुकृती....६९२. मघवन्मयैवाइदंशरीर.... ८११२१ यथा सोम्यकेन नख ....। श६ मंटचीहतेषु ११०१ यथासौम्यकेनमृत्पिण्डेन....६॥२॥४ मंगुष्टे पादं ४॥ ८११ यथा सौम्यकेन लोहमणिना।।५ मनो ब्रह्मेत्युपातीत ३।१८।१ यथेहक्षुधिता वाला ५।२४ाद मनोमयामाणशरीरो.... ३११४२ यदग्ने रोहितं रूपं ७ ३१ यदादित्यस्यरोहितंरूपं....६. ४.२ दा॥१॥ यदापउच्छुप्यन्ति ११ यदावा ऋचः १. ४.४ मानवा ब्रह्मवेकः .४॥१७॥१० यदा चै करोत्यय- १।१०।४ यदावनिस्तिष्ठत्यय ७.२०.१ ५।१०।२ यदा वै मनुतेऽथ ७.१८.१ .... .... .... .... मनो वाववाचोभूयो. मनो होच्चक्राम मनोदिकारो .... .... .... .... मासेभ्यःपितृलोकं मासेभ्यःसंवत्मर ...

करोति.... .... .... रैमानि षट्शतानि (३२५) खंडविभागाद्यपदानि, अध्यायादीनि खडविभागाद्यपदानि अध्यायादीनि यदा वै विजानात्यथ.... ७.१७.१/ यो ह वै प्रतिष्ठां .१५.१३ यदा वै श्रद्दधात्यय ७.१९.१/ यो ह वै वसिष्ठं यदा वै मुखं लभतेऽथ यो ह वै संपदं वेद ५शि४ ७.२२. र. यदिति स उद्गीथः २. ८२ पदुरोहितभिवाभूदिति .... ६.४.६ ४.२.२ ल. पद्रविज्ञातमिवाभूदित्ये तासामेव.... लवणमेतदके ....६.१३.१. पद्विद्युतो रोहितं रूपं.... ६. ४.४ लोकेषु पञ्चविध साम.... २.२.१ गदै तत्पुरुष शरीरं लो ३कद्वारम....त्वा ३.१२.४ पदै तड्रामेतीदं वयरा ३.१२.७ ...२.२४.४ लोकदारम.. यस्तद्वेद स वेद २.२१.४ यस्यामूचितामचं लोकद्वारमपावा ....त्वा यं यमन्तमभिकामो ८.२.१० वय र स्वरा० ....२.२४.१२ यावाक्सक्तस्माद लोम हिकारस्त्वमस्तावः.२.१९.१ यावान्वाअयमाकाशा ८.१.३ व. या वैसा गायत्रीयं ...३.१२.२ वमन्तो हिंकारः .२.१६.१ या वे सापृथ्वीयं वमिष्ठयि स्वाहा यां दिशमभिष्टोप्यन् वागेव ब्रह्मणः येन च्छन्दसा वागेवमाणः येनाश्रुत र श्रुतं यो भूमा तत्सुखं ..७.२२.१ | वाग्वाव नान्नोभूयसी.... ७.... योपा वाव गौतमाग्निः.... ५.८.१ वायुवि संवर्गः यो हवा आयतनं रोह वै ज्येष्ठंच .... ११ विज्ञानंबावध्यानाद्भूयः.... ७.७.१ ....त्वा षय वैरा० ....२.२४.८ .... .... M .... ... .... .... ५.१.५/विनाद सान्नः वेत्थ यदितः .... .... श. .... .... ... ५.२२.२ ७.१२.२ ७.१४.२ ५.२४.३ श्रोत्रमेव ब्रह्मणः स य आशा .... .... (३२०) खंडविभागाधपदानि, अध्यायादीनि खंडविभागाद्यपदानि, अध्यायादौनि वृष्टौ पञ्चविध सामोपासीत २.३.१ स जातो यावदायुपं .... ५.९.२ वेत्य यथाऽसौलोकोन.... ५.३.३ ससकामो ह जावाला.... ४.४... .... ५.३.२ सदेव सोम्पदमने व्याने तृप्याते ...५.२०.२ स ब्यान्नास्य ८.१.५ समान उ एवायं १.३.२ समाने तृप्यति श्यामाच्छवलं प्रपद्ये ....८.१३.१ म य आकाशं श्रुतं होव मे भगव० .... ४.९.३ ....३.१८.६ श्रोत्रमेव मनः स य इदमविद्वान् श्रोत्रं होच्चक्राम स य एतदेवममृतं ..२.१.१० वेत केतुहऽऽकणेपास ६.१.१ वेद मरुतां स य एतदेवममृतं वेद श्वेतकेतुर्हाऽऽरुणेयः रुद्राणां स य एतदेवममृतं प. वेद वमूनां ३.६.९ पोडशकला सोम्प ६.७.१ स य एतदेवममृतं स. वेद साध्यानां.... स एतांत्री विद्या स य एतदेवममृतं ४.१७.३ वेदाऽऽदिसानां....thit .३८.३ स एवाधस्तात्सः स य एतदेवं विद्वानक्षरं स एप परोवरीयान् स य एतदेवं विद्वान्साधु २.१.. स एप ये चैतस्माद स य एतमेवं विद्वार श्चतुकलं पादं स एप रमाना ब्रह्मणः ........ .... .... .... .... स एतास्तिस्रो देवताः....४.१७.२ .... ४,८४ ...

"" NA .... .... ... .... .... "" .... .... .... (३२७) खविभागाद्यपदानि, अध्यायादीनि खडविभागाद्यपदानि, अभ्यायादोनि स य एतमेव विद्वा ५ श्चतुष्कलं स य एषोऽणिमा દાઢ૭ पादं ब्रह्मणः प्रकाशवान ४.५३ ६।९।४ स य एतमेव विद्वा २ श्चतुष्कलं ६१४१३ पादं ब्रह्मणो ज्योतिप्मानु४,७.४ ....३।१०१४ जय एतमेवं विद्वा र श्चतुष्कलं स प एषोऽणिमैत- पादं ब्रह्मणः ४।६।४, दात्म्य ६।१२।२ स य एतमेवं विद्वा ६.१३३ नादिस ।१९।४। ६१५/३ स य एतमेवं विद्वानुपास्ते४।११।२ स यथा.तत्र ४।१।२ सयथा शकुनिः.... દાર ४।१३।२/ स यथोभयपाद.... "स य एवमेतत्साम २२२ स यदवोत्रंमाणं.... .... २१५१४ स य एवमेतद्वायत्रं २।११।२/ स य यदशिशिपति २१७११ स य एवमेतदृहदादिसं २१४।२/ स यदि पितरं ... ७.१५/२ स य एवमेतद्यज्ञा २।१९।२ स यदि पितृलोक- स य एवमेतद्रय २।१२।२ कामो भवति था। स य एवमेतद्राननं २२२०१२/ स यश्चित्तं ७५/३ स य एवमेतद्वैराजमृतुपु २।१६।२ स यस्तेजो ११२ शार सह खादित्वाऽतिशेषान्. .१।१०१५ ५०६ २।१३।२/ स ह द्वादशवर्ष उपेस વાર स य एवमेता रेवसः .... २१२८१२, सह पञ्चदशाहान १७)२ सह प्रातः संजिहाना ....१।१०/६ २।१७२ सहच्याधिनाऽनधित....४१२०१३ "" .... .... .... ... ........ .... ".. .... स य एवमेतद्ररूपं सय एवमेतद्वा- मदेव्यं सह गौतमो .00 स य एवमेताः भाकयों , सह शिलका .... स हाऽऽशाध हेनं... .... .... .... .... .... (३२८) खडविभागाद्यपदानि. अध्यायादोनि खुडविभागाद्यपदानि, १८३ स यावदादियउत्तरतः । स ह संपादयांचकार ....५।२११३ स यावदादिसः पश्चात स ह हारिद्रुमतं ४४३ स यावदादिसः ફાશ૪ पुरस्ताव द्विस्तावत्.... ३- स हेभ्यं कुल्मापान ....८।१०।२] वमूनां । स होवाच कि मेऽनं दा२।२ स यावदादिसो दक्षिणतः ३१ त होवाच किं मे वासः કરાર स यो ध्यानं स होवाच भगवन्तं, ....८१२२ स यो नाम स होवाच महात्मनः ४॥३॥ स योऽन्न संकल्पो वाव मनसः ७१४१८/स योऽपो ....७१ सा हैनमुवाच ४।४।२स यो वलं ७८ सेयं देवतक्षत ६२/ स यो मनो .३२१०१४ स यो वाचं ७२। सोऽयस्ताडकटस्य ४३१२८ स यो विज्ञान ७ सोऽहं भगवो मन्त्रावदे- सर्वकर्मा सर्वकामः ३११४॥ यास्मि ૭૧૨. । सर्वास्वप्मु २४॥ सेनो हिरण्यस्य मुरां ....५/२०१९ स्मरो यावाऽऽकासाद....११३३१ मर्वेवरा इन्द्रस्याऽऽत्मानः॥२२॥ मर्वे स्वरा घोपवन्तो ह. स वा एप आत्मा रन्तरमेतद्भगवतो ८८10/सममित्पाणिः १२ सस्ते पादं वक्तेति ....४१७१८ पुनरेयाय स पामरल्प ७८३ म पाप्म १२ स ह क्षत्ताऽन्विप्य .... ७श .... .... सैपा चतुप्पदा .... .... सर्वं खल्विदं ब्रह्म.... .... .... .... .... .... .... ....८1001 ...८/11 .... .... ... ....

The Chhandogya Upnishad

Author
Pandit,rajaram
Title
The Chhandogya Upnishad
File name
The Chhandogya Upnishad
Text
OCR done
Citation
1907
Published
2012/08
Publisher
Lahore.,the Punjabi Press
Language
Sanskrit
Pages
344
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311960
Barcode
99999990320796.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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The Chhandogya Upnishad