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Suryaprakash Granth
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विषय परिचय ८७ पृष्ठ १. श्रेणिक महाराजका वर्णन व पंचमकालको धर्माधर्म प्रवृत्ति कैसी होगी ऐसा महावीर स्वामीसे प्रश्न १ से १४ २. उत्तरमें-अनेक अधर्माचरणोंका वर्णन तथा कुन्दकुन्द स्वामीकी कथा, विदेह गमन १५ से ८६ (पृष्ठ ५० से वैष्णव धर्मकी उत्पत्ति, पृष्ठ ६३ से गिरनारीपर श्वेताम्बरोंसे कुन्दकुन्द स्वामीका वाद) ३. अष्ट द्रव्यके पूजनको और अभिषेककी, स्तवनकी, जपकी, प्रतिष्ठाकी महिमा ४. लुक मतकी उत्पत्ति, स्वरूप तथा मूर्तिपूजा समर्थन १४० ५. व्रत प्रकरण (श्रावकके दानादि कर्त्तव्य तथा सम्यक्त्वका स्वरूप व महिमा) १६३ ६. श्रीसम्मेदशिखरि वर्णन २०४ ७. कर्म आस्रव तथा कर्मफलके और विधवा होना आदि दुःखोंके सम्बन्धमे कुछ प्रश्न तथा उत्तर २२६ ८. गिरनारी पर्वतका वर्णन तथा वहॉपर श्रीधरसेन मुनिका वर्णन तथा श्रुतावतार कथा ३०४ ९. ग्रन्थ प्रशस्ति ३१६ ran विद्वद्वरनेमिचन्द्रविरचितः सूर्यप्रकाशग्रन्थ: प्रारभ्यते 11 मंगलाचरण श्रीमन्त सर्वयोगीन्द्रवद्याहि सन्मतिं जिनम् । वदे प्रारब्धसिद्धयर्थं सिद्ध सिद्धिकर वरम् ।। १ ।। अर्थ-अतरंग अनंतचतुष्टयादि लक्ष्मी और बहिरंग समवसरणादि लक्ष्मी से सुशोभित, सर्व योगीश्वरों से पूजित, चार घातिया फर्मोका नाश करने से सिद्ध अवस्था ( भाविनयको अपेक्षा ) को प्राप्त हुए, समस्त प्रकारको सिद्धियों को प्रदान करनेवाले, श्रेष्ठ ऐसे वीर प्रभुको मैं, प्रबलतर मोहनीयादि कर्मो के नाशकी सिद्धिके लिये नमस्कार करता हूँ ॥१॥ भावार्थ-श्रीवीरप्रभुके गुणो को अचिंत्य महिमाको प्रकट करनेके लिये ग्रंथकर्ताने श्रीमंत आदि विशेषणों से यह बतलाया है कि जगत् में आभ्यंतर और बहिरंग लक्ष्मीसे प्रभु वीर भगवान् अतिशय प्रभावित हैं। महान ऋद्धियोके धारक योगीश्वरों से भी पूजित हैं। और समस्त प्रकार रागादि भावों का नाश कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं । ऐसे वीर भगवान्को नमस्कार करने से मेरे कार्य की सिद्धि हो । शमंद शर्मभोक्तार नेमिचंद्र जिनेश्वरम् । वक्ष्ये सूर्यप्रकाशाख्यं ग्रथमानददायकम् ॥ २ ॥ अर्थ-अनंतसुखके स्वामी, अतएव जगत्के जीवों को अनंत सुखके प्रदान करनेवाले ऐसे श्री नेमिचंद्र जिनेंद्र भगवान्को नमस्कार कर परमानंद देनेवाले इस सूर्यप्रकाश नामक ग्रंथका वर्णन करता हूँ ॥२॥ भावार्थ-जिस प्रकार सूर्यके उद्योत से अंधकार नष्ट होकर आनंदको प्राप्ति होती है उसी प्रकार इस सूर्यप्रकाश ग्रन्य से भव्य जीवो का चिरकालका घोर मिथ्यांधकार नष्ट होकर उनको परम आनंद अवश्य हो प्राप्त होगा। याकामीमायालयमायालयात रायमा SHE weSHI [ २ ] वृपभादिजिनान् सर्वान् पंचकल्याणभूपितान् । ज्ञानाब्धिपारगान् शुद्धान् वदे भवविहानये ॥३॥ सर्वान् सिद्धानह वदे शर्ममग्नान् सदा खलु । लोकाग्रशिखरारूडान् तेपा सद्गुणसिद्धये ॥ ४ ॥ सूरीन् सर्वानह वदे पत्रिंशद्गुणभूपितान् । भुक्तिमुक्तिप्रदान् नित्य नानद्धिगुणमडितान् ।। ५ ॥ पाठकान् बुद्धिवृद्धयर्थं वदे देवेन्द्रवदितान् । स्वव पठति सर्वाङ्ग शिष्यान् सपाठयत्यहो ॥ ६ ॥ सर्वान् साधूनह वदे त्रिकाले ध्यानकारकान् । योगसरोधने दक्षान् ध्यानज्ञानादिसिद्धये ।। ७ ।। जिनाननात्समुत्पन्ना भारती मतिवृद्धये । वदे भवतु मे देवि | बोधलाभो भवे भवे ।। ८ ।। अर्थ-गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण ऐसे पंचकल्याणकों के द्वारा महान् अतिशय को प्राप्त हुए, समस्त प्रकारके दोषों से रहित, परम विशुद्धताको प्राप्त और ज्ञानरूपी समुद्रके पारंगत ऐसे वृषभादि चतुर्विशति परम तीर्थंकर परमदेवको मै संसार नाश करनेके लिये नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ अर्थ-लोकके शिखरके अग्रभागमें विराजमान और अनंत सुख मे निमग्न ऐसे समस्त सिद्ध परमा- त्माओंको उनके गुणो की प्राप्तिके लिये मै नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥ अर्थ-पंचाचारादि छत्तीस गुणो से सुशोभित, अनेक प्रकारको ऋद्धियो से विभूषित, और स्वर्ग मोक्षके प्रदान करने वाले ऐसे आचार्य परमेष्ठीको मै नमस्कार करता हूँ ॥५॥ अर्थ-जो ग्यारह अंग चौदह पूर्वको स्वयं पढ़ते है और शिष्योको पढ़ाते हैं तथा देवेन्द्र नरेन्द्र आदि से पूजनीक हैं ऐसे उपाध्याय परमेष्ठीको बुद्धिकी वृद्धि के लिये मै नमस्कार करता हूँ॥ ६ ॥ अर्थ-तीन कालमें ध्यानको धारण करने वाले, मन-वचन-कायका संरोधन करने वाले, इन्द्रियों को वश करने वाले, समस्त प्रकार के परिग्रह और आरंभ से विरक्त ऐसे साधु परमेष्ठीको ज्ञान-ध्यान की सिद्धिके लिये मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥ अर्थ-श्री सर्वज्ञ-वीतराग-अरहंत प्रभुके मुखकमल से प्रकट हुई अनादिनिधन सरस्वती देवी को बुद्धिके विकासके लिये नमस्कार हो । हे त्रिलोक को जानने वाली सरस्वती देवी ! आपके प्रसाद से मुझे भव-भवमें सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति हो ॥८॥ men utelusaHEINANG
Meteमा
[ ३ ]
वदे वृषभसेनादीन् ह्यग्निपचगुणान्वितान् । नानद्धिमडिनान् शुद्धान् गणाधीशान सुरार्चितात् ॥ ९॥
मुनीन्द्रान जिनसेनादीन् वदे धर्मप्रकाशकान् । दिशावासोधरान् वीरान् ज्ञानध्यानात्तमानसान् ॥ १० ॥
जिनेन्द्र शर्मदातारं सीमंधरमह मुदा। दत्त सुदर्शन पूर्व कुदकुदतपोनिधेः ॥ ११ ॥
पूर्वाल्ये सुदरे क्षेत्रे विदेहे भव्यसंभृते । वदेह मुक्तिभर्तारं तत्पदाप्ताय केवलम् ।। १२ ॥
कलकनाशने वीरमकलक दयापतिम् । वदे वौद्धमत्तेभाना नाशने सिंहसदृश ( पाटवं ) ॥ १३ ॥
अर्थ-वेपन गुणों से सुशोभित महान् अतिशयोंको प्रकट करनेवाली बड़ी-बड़ी ऋद्धियों से सम्पन्न,
परम विशुद्ध, देवेन्द्रो कर वंदनीक ऐसे वृषभसेन आदि गणधर देवोंको मै नमस्कार करता हूँ ॥ ९॥
भावार्थ-२८ मूल गुण और २५ उपाध्यायके गुण इस प्रकार दोनो गुण मिलाकर गणधर देवमें ५३
गुण होते हैं। गणधर देवोंके मनःपर्ययज्ञान होता है और भी अनेक सातिशय ऋद्धियाँ होती हैं । वे समस्त
मुनीश्वरोके स्वामी होते हैं। तया देव, मनुष्य और अमिद्रोकर पूज्य होते है । आदि तीर्थंकर ऋषभदेवके
मुख्य गणवर श्री वृपभसेन थे। इसी प्रकार अन्य तेईस तीर्थकरोके गणधर जानने। महावीर स्वामीके मुख्य
गणधर गोतम स्वामी थे। ग्रन्थकार इन समस्त गणधर देवोंको बुद्धि की अतिशयता प्राप्त होनेके लिये
नमस्कार करते है
अर्थ-परम धर्मके प्रकाशक, दिशारूपी वस्त्रको धारण करनेवाले ( भगवती दंगबरी दीक्षाके धारक)
ज्ञान-ध्यान में लबलीन ऐसे जिनसेनाचार्यादि मुनीश्वरोको मैं नमस्कार करता हूँ॥ १० ॥
अर्थ-स्वर्ग मोक्षके सुखो को प्रदान करनेवाले, तपोनिधि आचार्यवर्य श्रीकुदकुद स्वामी को अपना
दर्शन देकर कृतकृत्य करनेवाले, भव्यजीवोसे परिपूर्ण ऐसे पूर्व विदेह क्षेत्रको अपने अवतार से पवित्र करनेवाले,
मुक्ति रमणीके स्वामी, ऐसे श्री सीमंधर स्वामी को मै आनंदके साथ उनके गुणोकी प्राप्तिके लिये सदा
नमस्कार करता हूँ ॥११-१२॥
अर्थ-~समस्त प्रकारके फलंको को नाश करने में साहसिक वोरोत्तम, दयाके अधिपति और बौद्धमतरूपी
उद्धत गजराजके नाश करनेके लिये प्रबल सिंह ऐसे भगवान् अकलंक देव को नमस्कार करता हूँ॥ १३ ॥
जन- MES SWEE नदे गाल कोयाख्य मुनीन्द्र पावन मुदा । नतुरशीतिगथाना करि तत्पदाप्तये ॥ १४ ॥ मगलार्थ नमस्कृत्य एतेपा चरणाव्जयो । वच्म्यह च शृणुध्व वै यथोचेम बुवोत्तमाः ॥ १५ ॥ जन्द्वीपोऽ7 विख्यातस्तन्मध्ये राजते महान् । क्षेत्रोहि भारतो नाम्ना रिपुखडविमडित ॥ १६ ॥ तस्मिंश्न गोभते ह्यार्यखडो वे आर्यमर्त्ययुक् । देशे च मगधे ख्याते सर्वेषु चोत्तमे खल ।। १७ ॥ भावार्थ-यदि बोद्ध राजाके नगरमें जैन मतका रथ सबसे प्रथम उसके ही नगरमें नही निकलता तो जैनधर्म के लिये यह एक बड़ी भारी कालिमा थी। उस कालिमाका नाश करने वाले और ज्वालामालिनी देवीके सहारेसे, बौद्धोंसे स्थापित तारा देवी की अदम्य शक्तिको नाश करने वाले और शास्त्रार्थ द्वारा जगत् में जैनधर्म को प्रभावना स्थापन करने वाले अकलंक भगवान्के लिये मै नमस्कार करता हूँ। अर्थ-शुद्ध चारित्रके धारक, परमपवित्र और चौरासी ग्रंथोंके निर्माणकर्ता यतीश्वर सकलकीर्ति आचार्यके लिये मै उनके गुणप्राप्त्यर्थ नमस्कार करता हूँ॥१४॥ भावार्थ-सकलकीर्ति आचार्यने चौरासी ग्रंथ बनाये है । यद्यपि इस समय समस्त ग्रन्थ देखने में नहीं आते है तो भी उनमें बहुत कुछ मिलते है । अर्थ----उपर्युक्त अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्व साधु और सीमंधरादि मंगलोत्तम परमेष्ठियोंके चरण कमलोंकी मंगल कामना के लिये नमस्कार कर यह सूर्यप्रकाश नामका ग्रन्थ कहता हूँ। हे भव्योत्तम हो ! आप लोग आत्मकल्याणके लिये इसको सावधानतापूर्वक श्रवण करें ॥ १५ ॥ अर्थ-इस प्रसिद्ध जंबूद्वीपमें भारतवर्ष नामका सुन्दर क्षेत्र है । जो छह खण्डोंसे सुशोभित है ॥ १६ ॥ अर्थ--उस भरतक्षेत्रमें एक आर्य खण्ड है और पाँच म्लेच्छ खण्ड हैं। आर्य खण्डमें उत्पन्न हुए मनुष्योंको क्षेत्रज आर्य कहते है। उस आर्य खण्डमें एक मगध नामका सुन्दर देश है। जो समस्त देशों से उत्तम है ॥ १७॥ १. क्षेत्रज आर्य एक समान नही होते हैं। उनमे भी जाति आर्य, कर्म आर्य, चारित्र आर्य आदि अनेक भेद है वैसे ही भगी, चमार, कोली आदि क्षेत्रज आर्य होने पर भी अस्पर्श है, क्षेत्रज आर्यों मे जिनको नीचगोत्र का उदय प्राप्त हुआ हे ऐसे जीव अपने शरीर की स्थिति पर्यंत नीच ही रहते है उनके साथ जाति आर्यों का खान-पान सबंध व कन्याविवाहादि सवध नही होता है। ऐसे सलमा ल्यापट मायालयाला मारामा पुगे वे भाति देवाना नदद सज्जनैयुतः । नाम्ना राजगृहश्चैव सभृतो धनधान्यत ॥ १८ ॥ क्षमी दमी कृती पूज्यो निर्जरैर्वा नृभिनूपैः । शुद्धक्षायिकसम्यक्त्वराजितस्तेजस्वी गुणो ॥ १९ ।। श्रीवीरजिनगजन्य सेवार्पितमना. सदा । भोक्ता वधुजनै साधं शूरवीराग्रणी खलु ॥ २० ॥ त्रिवर्गपालने दक्ष. प्रतापजितपूपणः । भुजैश्च खडिताराती रूपेण मन्मथोपम ॥ २१ ।। पुनवल्यप्रजाना च पालको वुद्धिमान् शुचिः । दुष्टाना नाशकर्ता च न्यायवान् पुरुपोत्तम ॥ २२ ।। इत्याद्यन्यगुणैक्तो नाम्ना श्रीश्रेणिको नृप । तस्मिन्नासीद्गुणैः पूर्णः ईदृशेरुज्वल परैः ॥ २३ ॥ mereemesmewwe-LREADS अर्थ---मगध देशमें देवताओको भी आनन्द देनेवाला, ऐसा राजगृह नामका एक भव्य नगर था। जिसमें सज्जन जन निवास करते थे । और जो धन-धान्यादि सुख सामग्नीसे परिपूर्ण था ॥ १८ ॥ अर्थ--राजगृह नगरका अधिपति क्षमावान् दयालु कृतकृत्य कामादि शत्रुओका दमन करनेवाला, नीतिके समस्त कर्तव्योको जाननेवाला, देवताओसे पूज्य अथवा मनुष्य और राजाओसे पूजित, शुद्ध क्षायिक सम्यग्दर्शन को धारण करनेवाला,प्रतापवान्, तेजस्वी, महामना, गुणवान्, श्री वीर भगवान के चरणकमलोंकी सेवा करने- वाला, जैनधर्मका परमभक्त, कुटुम्ब परिवारोको बहुसंख्याके साथ राज्यका उपभोग करनेवाला, शूर-वीरशिरो- मणि, धर्म, अर्थ, काम पुरुषार्थोके पालन करने में समर्थ, अपने प्रताप कर सूर्यको भी तुच्छ करनेवाला, बलवान्, कामदेव के समान रूपवान्, प्रजाको पुत्रके समान पालन करनेवाला, बुद्धिमान्, पवित्र, दुष्ट और दुर्जनोंका निग्रहकर्ता ( दण्ड देनेवाला), नीतिपर चलनेवाला इत्यादि अनेक उत्तमोत्तम और पवित्र गुणोंसे विभूषित ऐसा श्रेणि नामका राजा या ॥ १९-२३ ।। Greन्य गनुलो को मनिवत धारण करने की योग्यता नहीं होती है । कितने ही कर्मज अनार्य होते है। जिनका चारित्र आचाराग शास्त्र तो आशात विद्व होता है। जो मसीका पुन मस्कार (विधवा विवाह) करते है, जो विजातीय विवाह करते हैं, जो अपने कुल व शातित योग चारिख के वित्त माम भक्षणादि करने लग जाते है वे भी अनार्य ही है। दोनों की अपेदा जाति आर्य अधिक पूज्य है । वे मोक्ष मागके अधिकारी है। विशुद्ध कुल ओर विशुद्ध वशमे “ो अन गोरगे उमा ने उत्तम (नारित्र धारण करने योग्य) जातिमे उत्पन्न हुए हो उनको जाति आर्य कहते है । जाति आर्य मे गाव 7 तमं और निग्या कम आदि के कारण बहुत मे भेद हैं । जाति कुल अनादि निधन है। और उनका सबंध नीच-ऊँच गौर में है। ऐगा नहीं है कि जिमका रोजगार (धधा) ॐना हो वह ऊंच और जिसका धंधा नीचा हो वह नीच हो । RANG FreeHenesirememesneSRIES [ ६ ] तस्यासीत् भूपते राज्ञी चेलना शातदायका । नाम्ना शुभगुणयुक्ता दभभावविवर्जिता ।। २४ ।। शुद्धशीलव्रतैर्युक्ता रूपेण निजिताप्सरा । भ ज्ञापालका नम्रा धर्ममार्गविचक्षणा ।। २५ ।। मृगशावसमानेत्रा शुभा क्षायिकदर्शना । ज्ञानविज्ञानसपन्ना गत्या च करिणी जिता ॥ २६ ॥ मनोवाकहरा भतु हेदवारविमडिता । वामासु खलु सर्वासु मुख्या ह्यष्टमदापहा ।। २७ ।। गुर्वाज्ञाधारका मन्युवर्जिता सत्कियान्विता । जिनार्चनरता भक्त्या वासर प्रति शर्मणे ।। २८ ।। स्वमतस्थेपु वात्सल्यकरा न्यायादिभि खलु । मुनोशिना गृहस्थाना वेददानप्रदायका ।। २९ ।। यात्राभिश्चैव धर्मस्य वर्द्धका स्यदनस्य वै । स्वपुरे भ्रामणेनैव सिद्धभूमौ निरालसा ॥ ३० ॥ अर्थ-श्रेणिक महाराजके चेलना नामकी अत्यंत सुन्दर गुणवती रानी थी जो कि सब रानियोमें मुख्य थी। यद्यपि चेलनामे अनेकानेक उत्तमसे उत्तम और पवित्रसे पवित्र गुण थे जिनकी गणना होनी अशक्य है । तो भी उनमेंसे मुख्य मुख्य गुणोंका दिग्दर्शन इस प्रकार है। शुद्ध शील और शुद्ध व्रतोंको धारण करने वाली, दंभवृत्ति से रहित, रूपसे अप्सराओंको जीतनेवाली, अपने स्वामीको आज्ञाका पालन करनेवाली, नम्र, धर्म- मार्गके जाननेमे अतिशय निपुण, मृगके बालकके समान सुन्दर नेत्रवाली, शुद्ध क्षायिक सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाली, ज्ञान और विज्ञान गुणोंसे विभूषित, गतिसे हथिनीकी गतिका भी तिरस्कार करनेवाली, मनको हरण करनेवाली, स्वामीको आनन्द देनेवाली, गुणवती, समस्त स्त्रियोमें मुख्य, आठ प्रकारके मदोसे रहित, धर्मगुरुओंको आज्ञाको अखंड रीतिसे पालनेवाली, क्रोध रहित, श्रेष्ठ क्रियाएँ जो श्रीजिनेन्द्र देवने आगममें कहीं है उनको पालन करनेवाली, आगमके अनुसार अपनी जीवनचर्याको पालन करने वाली, श्री जिनेन्द्र देव की पूजा-भक्ति और सेवा आदिमें नित्यप्रति तत्पर रहनेवाली, अपने धर्मके अनुयायी गृहस्थों को भोजन-पान आदि देकर वात्सल्य अंगको प्रकट करने वाली, व्रती पुरुषो की भक्तिपूर्वक वैयावृत्त्य आदि सेवा करने वाली, मुनी- श्वरोंको आहारदान, औषधदान, शास्त्रदान और वसतिका दानको भक्तिपूर्वक देनेवाली, जैनधर्मपरायण गृहस्थों की सेवा सुश्रुषा करनेवाली, जैनधर्मको उत्कृष्ट प्रभावना के लिये सदैव रथोत्सव मेला आदि महोत्सव करने- वाली, और सिद्धभूमियो की यात्रा प्रतिष्ठादि के द्वारा अपने जीवनको कृतकृत्य माननेवाली, प्रमाद रहित, धार्मिक कार्यों में तत्पर रहनेवाली थी। इनको आदि लेकर और भी बहुत से गुण चेलनारानीमें थे ।।२४-३०॥ मलमासमालामारायच्यमान्यायालयाजार न्यायासाच्या यालय [ ७ ] प्रतिपदर्शनी भूयो तामाप्य शर्मदायकाम् । तथा साक च सरेभे पूर्वसुकृतसंचयात् ॥ ३१ ॥ शर्ममग्नी गत काल न जानती च तस्यतु । अविराध्य जिनेन्द्रोक्तं धर्म कामार्थदायकम् ।। ३२ ।। एवं राज्य प्रकुर्वाण सावद्यादिविवर्जितम् । यावदास्ते सुखेनैव उदत शृणुथापरम् ॥ ३३ ॥ अर्थकदा सभामध्ये आनदरसनिर्भरः। वनपाल समागत्य भूपं नत्त्वा व्यजिज्ञपत् ।। ३४ ।। गजेन्द्र शृणु मे वात्र विपुलाद्रो जिनाविराट् । महावीरो गुणैर्युक्त समायात शुभोदयात् ।। ३५ ॥ नम्प प्रभावत सर्वे सिंहा नागा दुराशया । मातगा मृगधेन्वाद्या. सजाता भद्रमानसा ।। ३६ ॥ ಸೋಜ ಗಣಜ अर्थ-प्रतिपदाके चन्द्रमाके समान आल्हाद करनेवाली और सुखोंको प्रदान करनेवाली ऐसी अपूर्व स्त्री- को पाकर श्रेणिक महाराज पूर्व भव के सातिशय पुण्यके योग से उसके साथ मनोहर भोगोंका सेवन करता था।॥ ३१ ॥ अर्थ-चेलना महारानो ओर श्रेणिक महाराजने पूर्व पुण्यके उदयसे सुखमें निमग्न होकर अपना व्यतीत होता हुआ काल भी नही जाना । परन्तु समस्त प्रकार की कामनाओ को पूर्ण करनेवाला श्रीजिनेन्द्र भगवान्के धर्मका यथावत् पालन करने में यत्किचिन्मात्र भी प्रमाद नही रक्खा ।। ३२ ॥ अर्थ--इस प्रकार श्रेणिक महाराज सावद्य प्रवृत्ति से रहित, सुखपूर्वक राज्य शासनको नीतिपूर्वक पालन कर रहे थे। उस समय एक नवीन बात हुई वह श्रवण करना चाहिये ॥ ३३ ॥ अर्थ--अयानंतर-एक दिवस श्रेणिक महाराज सभामें विराजे हुए थे कि वहॉपर आनंदसे हर्षित एक वनमालो आया और महाराजको नमस्कार कर प्रार्थना करने लगा ॥ ३४ ॥ अर्थ- हे राजेंद्र ! मेरे वचनोको कृपा कर श्रवण कोजिये । आपके पुण्यके उदयसे विपुलाचल पर्वतपर अनंत गुणोके विकाससे परमोत्कृष्ट पदको प्राप्त ऐसे देवाधिदेव श्री महावीर प्रभु पधारे हैं ॥ ३५ ॥ अर्थ-उनके प्रभावसे दुष्ट अभिप्रायवाले ऐसे सिंह, हाथी, मृग, गाय आदि क्रूर प्राणी अपना-अपना स्वाभाविक वैर भाव तजकर भद्रपरिणामी हो गये हैं ॥ ३६ ।।
[ ८ ] ApneHASHASPARSH चमततु पिना मर्वे नगा पुष्पफलोत्करे । भृपितास्तृप्तिकर्तार आसन्नेत्रमनोहरा. ॥ ३७ ।। इत्याग्राश्नापरा शोभा या जाता वर्णिता मया । सा खलु मगधाधीश महदानददायका ॥ ३८ ॥ वनाविप इति घृत्वा तस्थी चोपायन पुर । तस्यैव कथयित्वा च मोदवृ देन स तदा ॥ ३९ ।। मगधेशोऽपि तम्मै च दत्वा वै पारितोपिकम् । स्वागे स्थित पुन स्थानादुत्थायासौ मुदा कृतो॥ ४० ।। यदिशि आगतो वोर तदिशि नम अभ्यधात् । परीक्षा हि नतिर्लोके मत सदर्शनोपमम् ॥ ४१ ।। पश्चात्स्वनगरे भेरीमानदरसपूरिताम् । दापयित्वा वरेर्लोक स्वस्ववाहनभूपित्तै. ॥ ४२ ॥ अर्थ--हे राजेंद्र ! और भी बहुतसे चमत्कार हो रहे है। वसंत ऋतुके बिना ही समस्त वनावलि फल-फूलोंसे पल्लवित हो गई है। तृप्तिको करनेवाली और नेत्रोंको प्रिय ऐसी वनराजको अपूर्व शोभा हो गई है ॥ ३७॥ अर्थ--हे मगधाधीश ! इस प्रकार आनंदके देनेवाली अनेक प्रकारकी शोभा जो मैने वर्णन की है वह वनमे हो रही है ॥ ३८॥ अर्थ-श्री भगवान् महावीर स्वामीका विपुलाचल पर्वतपर पधारनेका शुभ समाचार निवेदन कर और उनके प्रभाव से बिना ऋतुके फले-फूले हुए फलफूलकी भेट रखकर खड़ा हो गया ॥ ३९ ॥ अर्थ--वह मगधेश्वर श्रेणिक महाराज उस वनपालको अपने शरीर पर के समस्त वस्त्राभूषणोंको प्रदान कर अत्यंत आनंदके साथ अपने सिंहासनसे उठा ॥ ४० ॥ अर्थ--जिस दिशाको तरफ महावीर स्वामी पधारे हुए थे उस दिशाको तरफ मुख करके श्रेणिक महाराजने वीर प्रभुको नमस्कार किया। सो ठीक ही है क्योंकि परोक्ष नमस्कार भी लोकमें सम्यग्दर्शनके समान माना गया है ॥ ४१ ॥ भावार्थ--परोक्ष नमस्कार करनेसे विशेष श्रद्धा प्रतीत होती है। बिना विशेष श्रद्धाके परोक्ष नमस्कार नहीं सकता । इसीलिये वीर प्रभुको परोक्ष नमस्कार करना विशेष सम्यग्दर्शनके समान बतलाया है । अर्थ-फिर श्रेणिक महाराजने परम आनंदकी देनेवाली ऐसी घोषणा अपने नगरमें दिलवाई और समस्त नगरनिवासियोंको वीर प्रभुकी वंदनाके लिये चलनेको कहा। नगरनिवासी अपने २ वाहनों पर चढ़कर यायामालामालसाजरालयासमा राज्याच्याजन्यमान्य प्रयातो बीग्यात्रा म पियो भवभावयुक् । पुष्पदौपादिद्रव्योघे सपन्नो नागवाहन || ४३ ॥ आतोये नकला काठा र जयन् पजनोद्यते । चाल नगरात्स्वम्य मसैन्य इव देवराट् ॥ ४४ ।। आगत् वीरजिनद्रस्य मरण ममत्रादिकम् । दृष्ट्वा गजान्समुत्तीर्य राज्याक च निराकरोत् ॥ ४५ ।। पझ्या गालभव्योत्र माद्धं तन्मस्तकोपरि । गत्वा श्रीजिनस्थानस्य दत्त्वा प्रादक्षिणा मुदा ।। ४६ ।। पश्चाद्धि द्वारमार्गेण प्रवेशमकरोन्स च । भूत्यावलोकन चक्रे बोरराजस्य राजराट् ।। ४ ।। तथा वस्त्राभूषणोसे सब प्रकार अलकृत होकर महाराज श्रेणिक के साथ वीर प्रभुको वंदना करनेको चले ॥ ४२ ॥ अर्थ--श्रेष्ठ भावोंसे हर्षित महाराज श्रेणिक वीर प्रभुको पूजाके लिये रत्नोंके थालोंमें पुष्प-दीप आदि मनोहर सामग्री लेकर और हाथी पर बैठकर चला ॥ ४३ ॥ अर्थ--अपने प्रभावसे समस्त दिशाओंमें प्रकाश करता हुआ वह श्रेणिक महाराज सेना सहित और पूजनकी मामग्री सहित गमन करता हुआ देवेन्द्रके समान शोभाको प्राप्त हुआ ॥ ४४ ॥ अर्थ---श्री बोर भगवान्के समवशरण को समीप आया देखकर श्रेणिक महाराज अपने हाथीसे नीचे उतरा और उसने समस्त राज्यचिन्हो का परित्याग किया ॥ ४५ ॥ अर्थ-महाराज श्रेणिक संपूर्ण भव्यों के साथ-साथ अपने मस्तकको विनय से नवाकर समवशरण में पैदल हो गये । ओर बड़े हर्पसे श्रीजिनेन्द्र भगवान् के स्थान की प्रदक्षिणा दी ॥ ४६ ॥ अर्थ-~-महाराज श्रेणिक ने फिर द्वारमार्गसे समवशरण में प्रवेश किया ओर वहाँपर समवशरण की महान् विन्य विभूतिको आश्चर्य के साथ देखा ॥ ४७ ॥ १ ममान निनिके न्यामी मउलोक गजा श्रेणिकने वीर प्रभुके ममवगरणकी विभूतिको बडे आश्चर्यसे देखा। वीतराग माकोपी भगनानो बायोकन को छोडकर विभूतिको देखने का कारण क्या ? इस प्रश्नका समाधान यह है कि एक तो वीर पी विनिकितनी जो गजा, महाराजा और नकवीके भी नहीं हो सकती है। इतनी महाविभूतिके धारक मवश्य महान् पुरा कार का मान श्रेणिक महाराज को उत्पन्न हुआ। जो बात मनुष्योमे असाधारण है वह वात धोवीर प्रभुमे है इसी- गि पोर पर नाके पन है। दुसरे नावारण जनता विभूति आदि के देखने मे स्वाभाविक रूपमे उत्सुक रहती है। कितने भव्य २ AGeenायालयाच्या MEHTAस्या तारक [ १० ] मानस्तभादिस्तूपाना विभोर्भूति व्यलोकयन् । ततः सोपि ददर्शाग्रे चेलनाचित्तरजधीः ॥ ४८ ।। गभाद्वादशमध्यस्था गधकुटी मनोहराम् । पश्चात्तस्योपरि दृष्ट्वा त जिनं भवनाशकम् ।। ४९ ।। सिहविष्टरमध्यस्य तप्तकाचनभास्वरम् । तुर्यास्यभूपित शुद्धं सार्व नेत्रमनोहरम् ॥ ५० ॥ वर्द्धमान महादेव मानमायादिवर्जितम् । वागात्मभाग्यातिशयसपन्न च निरजनम् ।। ५१ ॥ कोट्यादित्याधिकतेज कामद मोहभजकम् । सर्वदेवाधिदेव वै शकर शरणार्थिनाम् ।। ५२ ॥ इन्द्रोरगनरेन्द्राद्य सेव्यानि तामसापहम् । प्रातिहार्यादिभूत्योपलक्षित वरम् ॥ ५३॥ अर्थ--चेलना महारानीके चित्तको रंजन करनेवाले श्रेणिक महाराजने समवशरणमें सबसे प्रथम मानस्तंभ और स्तूपादिकों को दिव्य विभूतिको देखा और फिर, ॥ ४८ ॥ अर्थ--बारह सभाके मध्य मनोहर गंधकुटी पर विराजमान और जन्ममरणरूप संसारको नाश करने- वाले ऐसे श्री वीर भगवान्को देखा ॥ ४९ ।। अर्थ-सिंहासनपर विराजे हुए तपाये हुए सुवर्णके समान दिव्य कांतिके धारक, महान् देवोके भी अधिदेव, चतुर्मुख श्रीवर्धमान भगवान् देखे । जिनके मान-मायादि एक भी विकार नहीं था, जो दिव्यध्वनि, शुद्ध आत्मा और अपूर्व पुण्योदयसे अत्यंत सुशोभित थे। जो समस्त प्रकारके दोषोसे रहित परमविशुद्ध तथा समस्त जीवोंके हितकारक थे। जिनके चार मुख थे। नेत्रोको तृप्तिकारक अतिशय मनोहर थे। जो करोड़ो सूर्योसे भी अधिक तेजस्वी समस्त प्रकारको कामनाको प्रदान करनेवाले, मोहका नाश करनेवाले, शरणार्थी जनोको सर्व प्रकारके सुखोंको प्रदान करनेवाले, इन्द्र, धरणेन्द्र, नरेंद्र आदि महान् पुरुषोसे पूजित, मोहरूपी गाढ़ अन्धकारको सहसा नाश करनेवाले, प्रातिहार्यादि दिव्य विभूतिसे सुशोभित, संसारसे तारक ओर जगत्के मालमसमयमयाजच्या जयमालाच्या जमरामायमरच्याच्य परिणामी भगवान्की विभूतिको देखकर तथा उससे भगवान्को लोकोत्तर महिमाको जानकर सम्यग्दृष्टी हुए है और फिर भगवान्के गुणोमे आसक्त हुए है। मदिरोमे आज चमर, छत्र, भामंडल आदि महान् शोभा की जाती है उसका भी एक यही अभिप्राय हे कि ससारी जीव दिव्य सपदाको देखते हुए श्रोजिनेन्द्र भगवान्का स्वरूप भी देखते है और उससे आत्मकल्याण करते है। जो लोग कहते है कि मदिरो मे छत्र, चमरादि विभूतिकी क्या जरूरत है। वीतराग प्रभुको वह क्यो चाहिये ? उनको जिनधर्मकी महिमाको प्रगट करनेका तरीका मालूम नही है और भगवान्का समवशरण कैसा था सो भी मालूम नही है । Awesya [ ११ ] ईदृग लोकपालेग भूमिपालो हृदि म्फुट । प्रापानद प्रदत्वाहि विप्रमा च प्रदक्षिणाम् ।। ५४ ॥ वग्यविधिना त च नत्वा इज्या च तस्य वे । कृत्वाष्टशुभद्रव्योवैः पापालिं नाशित स च ।। ५५ ॥ गमारेभे पुनस्तस्य स्तवन कर्तुमादरात् । पूर्वाहौष कृत यत्तन्नाशार्थ चाग्रहानये ।। ५६ ।। T-च नम सकललोकहितकगय, तुभ्य नम मकलकर्मविनाशकाय । तुभ्य नम. सकलभूतमुतारकाय, तुभ्य नमो जिनवरेद्र सुखातिकाय । तुम नम नालदोरविजिताय, तुभ्य नम. सकलमर्मप्रदर्शकाय । तुभ्य नम. परमसेवकतारकाय, तुभ्य नमो तिपतेर्मदनाशकाय ।।५८ तुभ्य नमाविकणारविजिताय, तुभ्य नमोऽखिलभवोदधिशोपणाय । तुभ्य नमः परमकेवलज्ञानदाय, तुभ्यं नम. परमदेवजिनेश्वराय । ಇವತು रासायद . ईश थे। ऐसे श्री वीर प्रभुको देखकर श्रेणिक महाराज अपने मनमें अतिशय प्रसन्न हुआ और भगवान्की तीन प्रदक्षिणा दी ।। ५०-५४ ।। अर्थ-श्रेणिक महाराजने श्री वीर प्रभुको अष्टांग नमस्कार किया। और पापोके नाशके लिए उत्तम ओर पवित्र अष्टद्रव्यमे भगवानको पूजा की ॥ ५५ ॥ अर्थ-महाराज श्रेणिकने पूर्वके पापोका प्रक्षालन करनेके लिए और आगामी होनेवाले पापोको शांति- के लिए श्री वीरप्रभुका स्तवन करना प्रारंभ किया ॥ ५६ ॥ अर्थ-हे वीर प्रभो ! समस्त जीवोके आप हितकारक हो इसलिए आपको नमस्कार है । समस्त कर्म- मल के नाश करनेवाले हो एतदर्थ नमस्कार है। समस्त प्राणियोके संसार समुद्रसे तारक हो इसलिए नमस्कार है। और चन्द्रमाके समान सुखको प्रदान करनेवाले हे जिनचन्द्र, आपको नमस्कार है ॥ ५७ ॥ अर्थ-हे वीर प्रभो, आप समस्त प्रकारके दोपोसे अर्वथा विनिर्मुक्त हैं एतदर्थ आपको नमस्कार है । हे वीर, आप समस्त पदार्थोंमें सारभूत (समस्त पदार्थोका मर्म) आत्माके प्रकाशक हो इसलिये नमस्कार है। भगवन् ! आप अनन्य भक्त सेवको के शीत्रही संसारसे तारक हो एतदर्थ नमस्कार है। और कामदेवके मदको नाश करनेवाले हो इसलिये आपको नमस्कार है॥ ५८ ॥ अर्थ-हे भगवन , आपने चारों प्रकार के (क्रोध, मान, माया, लोभ) कपायोको नाश किया है एतदर्थ नमस्कार है । चार प्रकार नरफ, तियंच, मनुष्य, देवगति रूप संसारसमुद्र को शोषण कारक होनेसे नमस्कार यस्ता Ger - । अचमन्यायव्यायालयाच्या जयराज [ १२ ] तुभ्य नम सकलदशनधारकाय, तुभ्य नम सकलज्ञानप्रकाशकाय । तुभ्य नमः सकलवीर्यसुधारकाय, तुभ्य नम सकलशर्मधराधिकाय ॥ तुभ्य नमः सकलसत्त्वहितकराय, तुभ्य नमो दशसुधर्मविवद्धंकाय । तुभ्य नमः सकलपापविनाशकाय, तुभ्य नम सकलतत्त्वप्रकाशकाय ।। तुभ्य नमः सकलव्यतिविनाशकाय, तुभ्य नम सकलभूपणभूपकाय । तुभ्य नम सकललोकविभासकाय, तुभ्य नम. परमपूज्यनिरजनाय ।। तुभ्य नमो हतप्रमादजिनानिमाय, तुभ्य नम परमदेवमुनोश्वराय । तुभ्यं नम परमशातपदस्थिताय, तुभ्य नमो वसुगुणाकितशर्मदाय ।। इत्याद्यनेकगुणव्यूहयुक्त त्वा वीरवीरेशमह नमामि । सुरेन्द्रभूतिगणनायकोऽपि क्षमो हि नो वक्तुमहो गुणान् ते ।। ६४ ॥ है। परम केवलज्ञानके प्रदान करनेवाले हो इसलिये नमस्कार है । हे जिनेश्वर, हे परम देव, आपको नमस्कार है ॥ ५९॥ अर्थ हे जिनेश ! आप अनंत दर्शनके धारक हो इसलिये आपको नमस्कार है। अनन्त ज्ञान के प्रकाशक हो इसलिये नमस्कार है। अनंत वीर्यके धारक हो इसलिये नमस्कार है। और हे जिनराज ! अनंत सुखके स्वामी होनेसे आपको नमस्कार है ॥ ६०॥ अर्थ-हे प्रभो ! आप सकल जीवोके हित करनेवाले, दश प्रकार उत्तमक्षमादि धर्मके बढ़ानेवाले हैं, समस्त प्रकारके पापसमूहों के नाश करनेवाले हैं । सकल तत्त्वोंके प्रकाश करनेवाले हैं। इसलिए आपको नम- स्कार है ॥ ६१ ॥ अर्थ--समस्त प्रकारको पीड़ाके नाशक, समस्त प्रकारके भूषणोसे विभूषित, समस्त लोकके प्रकाशक, समस्त दोषोसे रहित परमपूज्य हे वीर प्रभो ! आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ६२ ॥ अर्थ--समस्त प्रकारके प्रमादोके निरवशेष नाशक होनेसे जिनवर पदको प्राप्त, केवलज्ञान प्राप्त होने- से मुनीश्वर पदके धारक, वीतराग होनेसे परम शांत अवस्थाको प्राप्त और आठ प्रकारके गुणोसे युक्त होनेसे समस्त प्रकारके सुखोके प्रदाता परम देवाधिदेव हे वीर ! आपको नमस्कार है ।। ६३ ।। अर्थ--इत्यादि अनन्त गुणोके समूहसे सुशोभित हे वीर प्रभो! आपको मै नमस्कार करता हूँ। हे वीर ! आपके समस्त गुणो का वर्णन करना मुझसे अशक्य है क्योकि समस्तविद्याके पारगामी इन्द्र गणधर देव भी आपके समस्त गुणोको कहने के लिए असमर्थ है ॥ ६४ ॥ معطلیعصععععيمتلتلتصره
[ १३ ]
har
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-SA-PRICE-IMSHI-
SAMASHASCIERepress
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गुणान् जिनायोग-क्य हि मद , शक्नोमि ते वस्तुमहो सुग: । शरण्ययोग्य मयि नाथ दीने, दया कुरुत्तारक तारय त्वम् ॥६५॥
जनार्दनो वा गल ब्रह गो वा, शिवरतथा केवल नामयवताः । वार बहु दृष्ट दयोज्झितो वै, त्वं नो कदाचिदपि वीक्षितोऽपि ।। ६६ ।।
वरं न याचे मविधे तवापि, त्रिलोकराजस्य जिनेंद्रदेव । किंतु हृदि स्वद्गुणसततिर्हि, मेस्तु सदा चिन्मय आशिपा ते ।। ६७ ॥
पूत्कारमेव शृणु वीरनाथ, करोमि देव सदयो भव त्वम् । अन्योहि देवो भवनेषु नास्ति, त्वत्सदृशो दोपविकारहोनः ।। ६८ ।।
अतो जिनाधीग क्षय कुरु मे, पापस्य, मोक्षस्य पद प्रदेहि । सतारिता पापक्लकमग्ना, ये चाजनाद्याश्च नराः त्वया च ॥ ६९ ।।
उस्य म बेलनाकातः स्तुत्वा वीर गणाधिप । गौतमादीन् मुनीन्नत्वा नृकोष्टेषु ह्यपाविशत् ॥ ७० ॥
अर्थ--हे जिनाधीश ! आपके गुणोका गान करनेमें मै मंदबुद्धि सर्वथा असमर्थ हूँ। भला जिन गुणो-
फा गान इंद्र भी नहीं कर सकता उनका मैं कैसे करूँ ? मात्र एक यही प्रार्थना है कि हे नाथ ! मुझ दीन-
अनाथको शरण योग्य बनाइए और हे तारक ! मुझे संसारसमुद्रसे पार करिये ।। ६५ ॥
अर्थ-- हे भगवन् ! जगत्में विष्णु-ब्रह्मा-शिव-शंकर आदि जितने देव हैं वे केवल नाम मात्र से ही
विष्णु-ब्रह्मा-शिव कहलाते हैं उनमें ब्रह्मा विष्णुके गुण नहीं है। दयारहित मैंने उनको अनेक बार देखा परंतु
कुछ भी लाभ नहीं । परतु हे भगवन् ! आप कभी देखे नही ॥६६॥
अर्थ--हे स्वामिन्, जिनेंद्रदेव, त्रिलोकके नाथ, आपके समीप मै कुछ वर नही माँगता हूँ। किंतु हे
चिदानन्द, मेरे हृदयमें आपके आशीर्वाद से आपके समस्त गुण विराजमान रहे ॥ ६७ ॥
अर्थ---हे स्वामिन् वीर प्रभो ! अत में अपने भव-भवके दारुण दुखसे अत्यन्त क्लेशित होकर दीनताके
सार पुकार करता हूँ। हे प्रभो ! अब तो मेरी प्रार्थना को सुनिये । और मुझपर दया कीजिये। क्योकि संसार-
में आपके समान दोष और विकारसे रहित अन्य कोई देव नही है ।। ६८ ॥
अर्ग-हे जिनाधीश ! इसलिये मेरे पापोका क्षय करिये और अनंत सुखोका स्थान ऐसा मोक्ष पद
प्रदान कीजिये। क्योकि आपने अंजन आदि अनेक पापोजन संसार समुद्र से पार कर दिये ॥ ६९ ॥
अर्थ----इसप्रकार चलना महारानीका स्वामी महाराज श्रेणिक गणोके अधिपति श्रीवीर भगवान्का
स्तवन फर और गोतम गणधर देव एवं अन्यान्य मुनीश्वरोंको नमस्कार कर मनुष्यके कोठेमें बैठा ॥ ७० ॥
[ १४ ॥ मरमर पोतगगमुसोद्गीता वाणी समारतापहाम् । ममाप परम माद श्रुत्वा श्रेणिकभूमिगट् ॥ ७ ।। पुन प्रश्नमिति चक्र सर्वभूतहिताप्तये । स्वात्मनोऽज्ञाननाशाय तत्वाना च प्रकाशकम् ॥ ७२ ।। तीर्थाविप महावीर सशयो मे प्रवर्तते । तस्य त्व नागकर्ता स्या किंचित्पृच्छामि मे वद ।। ७३ ।। पचमे कोदृशा भुना का चेष्टा कोदृशो क्रिया । भविष्यति कथ तहि सज्ञस्यति नवाच ते ।। ७४ ।। इति मे सशयो वोर हृदि हि यततेतराम् । नाशेऽस्य त्वदृते स्वामिन्नन्यो देवो क्षमो नहि ।। ७५ ।। वदतावर वीरेश तारक कल्मपापह । सशयस्य तिरस्कार कुरु तीर्थाधिराट् प्रभो ।। ७६ ॥ अर्थ--श्रेणिक महाराज ससारके समस्त पापसमूहको नाश करनेवालो ऐसी श्री वीतराग देवके मुख- कमलसे प्रकट हुई जिनवाणीको सुनकर परम आनंदको प्राप्त हुआ ॥ ७१ ।। अर्थ-फिर श्रेणिक महाराजने समस्त जीवोंके हितके लिये तथा अपने अज्ञानको नाश करनेके लिये और समस्त तत्त्वोंको जाननेके लिये नीचे लिखा प्रश्न किया ॥७२॥ जयजयाजाजचा रामदयार जाजरा रामजच्यापच्या अर्थ--हे तीर्थाधिप ! हे महावीर प्रभो ! मेरे हृदयमें कुछ सदेह हो रहा है आपही उसके नाश करने- वाले हो इसलिये उस संदेहको दूर करनेके लिये मै कुछ पूछना चाहता हूँ। दयाकर मुझसे कहिये ॥ ७३ ॥ अर्थ--हे वीर प्रभो ! पंचमकालमे जीव कैसे होंगे। उनकी कैसी चेष्टा होगी। उनकी कैसी क्रियाएँ होगी। उनके आचरण कैसे होंगे । उनके विचार कैसे रहेंगे। उनको सुबोध प्राप्त होगा या नही ? सो सर्व खुलासा कहिये ॥ ७४ ॥ अर्थ--हे वीर प्रभो ! मेरे हृदयमे यही सदेह जम रहा है । हे प्रभो ! आपके बिना अन्य किसोसे उसका नाश नहीं हो सकता। क्योंकि आपके समान त्रिलोकका ज्ञाता सर्वशक्तिशाली अन्य कोई देव नहीं है ॥ ७५ ॥ अर्थ--हे वदतांवर ! हे वीरेश, हे संसार तारक, हे पाप नाशक, हे तीर्थाधिराट्, हे सर्वज्ञ, मेरे उक्त संशयको दूर करिये ॥ ७६ ॥ मान्य [ १५ ] उति प्रग्ने तदा वोगे दिव्येन ध्वनिना जनान् । मोदयन् सकलान् ववतु वीरराट् स प्रचक्रमे ॥ ७७ ॥ शृणु देव भावितोर्थेश वर्णन पच मस्य वै । समासख्या तथा चेष्टामायुःकाये क्रिया नृणाम् ॥ ७८ ।। पचमाभिध कालस्य अब्दसख्या नराधिराट् । दुखदा त्वं च जानीहि सहस्रभूकरप्रमाम् ॥ ७९ ॥ तावत्प्रमाच पष्ठस्य पुन. पष्ठस्य तत्प्रमाम् । पचमस्यापि भो भूप | बुद्धस्व खलु तत्प्रमाम् ॥ ८० ॥ मनुहस्तप्रमा काया हायन प्रतिहानिकाः । नो भविष्यति यस्मिन् वै केवलाढ्या मुनीश्वराः ॥ ८१ ।। अर्थ--श्रेणिक महाराजके इस प्रकार प्रश्नोको सुनकर श्री वीर भगवान् समस्त द्वादश सभाको हर्षित फरते हुए दिव्य-ध्वनिके द्वारा उत्तर कहने लगे ॥ ७७ ॥ अर्थ--हे मगधेश श्रेणिक महाराज, हे भावि तीर्थेश ! पंचमकालमें उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंकी चेष्टा धर्माचरण, विचार, आयु, काय और उनकी क्रियायें तथा वर्ष प्रमाण कहता हूँ उसको सावधान होकर श्रवण ಹಾಗೂ ಮಾಜmbKEZam कर ।। ७८ ॥ अर्थ--हे राजन् ! पंचम काल २१ हजार वर्षका है । वह अतिशय दुःखकर है । इस श्लोकमें अब्द मस्या का अर्थ वर्षोंको सख्या और सहस्रभूकरप्रमां का अर्थ २१ हजार है ॥ ७९ ॥ अर्थ-हे राजन् ! इक्कोस हजार वर्षका हो फिर छट्ठा काल होगा। अवसर्पिणोके छठे कालके बाद फिर भी इकतीस हजार का छठा काल उत्पपिणो का आवेगा। उसके बाद उत्सर्पिणीका पंचम काल भी २१ हजार वर्षका आवेगा । इस प्रकार ये चारो ही काल इक्कीस-इक्कीस हजार वर्षके के होगे ॥ ८०॥ अयं---हे राजन् ! पंचम कालमें मनुष्योका शरीर ७ हाथ का ऊँचा होगा । वह भी प्रति वर्ष घटता हो जायगा । और उस पंचम कालमें केवलज्ञानके धारक मुनीश्वर उत्पन्न नही होगे। भावार्थ-पंचमकालमें उत्पन्न हुए मनुष्योको केवलज्ञान नही होगा। हाँ चतुर्थ कालमें जन्म लेकर पंचम कालमें केवलज्ञान उत्पन्न कर सकता है ॥ ८१॥ का पृथ्यो है जा है, कर हागोको कहते है जो दो होते है। नया अफाना वामतो गति.। सख्या बाई ओरमे fri I है । उन हिगावने नकर का अर्थ २१ होता है । तया महन मायमे होनेसे फईम हजार अर्थ होता है ।
[[१६ ] PAHERemeSHI यस्मिन् काले भविष्यति भूता ये पापमडिता.। 'चलचित्ता. क्रियाभ्रष्टा मिथ्यामार्गस्य पोपका ।। ८२ ।। अन्नकोटा कुरूपाढया वीर्यहीना मदोद्धता । मिथ्यामार्गरता. क्रूरा देवगुर्वादिनिदका. ।। ८३ ।। याच्यमन्चमाया जमारानियाजायल्यामर अर्थ--जिस पंचम कालमें उत्पन्न हुए मनुष्य बड़े पापी होगे। जिनका मन बडा चपल होगा। उनके आचरण बड़े भ्रष्ट होंगे। उनके विचार और उनकी बुद्धि मिथ्यामार्गको हो पुष्ट करने वाली होगी ।। ८२ ॥ भावार्थ--पंचम कालके मनुष्योको पापाचरणको नीति प्यारी लगेगी। और पापाचरणको सदाचार बतलायेंगे। ऐसी राजनीतिके कानून बनाये जायेगे जिनसे पापोंकी वृद्धि हो। मनुष्य अपने पापोंको पोषण करनेके लिये ऐसे ग्रन्थो की रचना करेंगे जिनमे भगवान्की पवित्र आज्ञाके विरुद्ध अनेक प्रकारकी मलिन बातों- का संग्रह किया जायगा । जिनसे वे स्वय भ्रष्ट होंगे और धर्मात्मा भाइयोंको भ्रष्ट करेंगे तथा मिथ्यामार्गको पुष्टि करेंगे। अर्थ--पंचमकालके मनुष्य अन्नके कीड़े होंगे, कुरूपी होंगे, वीर्यहीन होंगे, तो भी मदोन्मत्त होगे। मिथ्या मार्गमे रत होंगे। क्रूर परिणामी और देवगुरु आदि पूज्य पुरुषोंके निंदक होगे ॥ ८३ ॥ १ मर्कटस्य सुरापान तस्य वृश्चिकदशकम् । तस्यापि भूतसचारो यद्वा तद्वा भविष्यति ।। भावार्थ-मर्कट-बदरका मन बडा चपल होता है । यदि बदरको शराब ( मदिरा ) पिला दी जावे तो फिर क्या कहना। बदर का चपल मन सौगुण अधिक चपल हो जायगा। और फिर मदिरापान किये हुए बदरको बिच्छुओसे कटवा दिया जाय तो फिर उसके मनको चपलताका क्या ठिकाना ? फिर उस पर एक भूत लगा दिया जाय तो चपल बदर जो न कुछ करे वही गनीमत है । ठीक इसी प्रकार कुशिक्षासे चचलचित्त मनुष्योंको नेता पदवी मिल जाय तो वे स्वय तो क्रिया भ्रष्ट होते ही है और सारी समाजको क्रियाभ्रष्ट पापी बना डालनेका प्रयास करते है। ऐसे दभी चंचलचित्त नेता कदाचित् धर्मका भेप धारण कर लेवें तो फिर उसका कुछ भी ठिकाना नहीं रहता । समस्त धर्मशास्त्रकी पवित्र आज्ञापर पानी फेर कर अपनी मनमानी कल्पनाको धर्मशास्त्र बनाकर दुनियाको ठगते है । लोगोको भ्रष्ट करते है। खोटे उपदेश द्वारा मिथ्यामार्ग बढाते है और अपने धर्मकी, अपने धर्म- शास्त्रकी, अपने गुरुओकी निन्दा ( अवर्णवाद ) कर खुश होते हैं । २. पचम कालके मनुष्यो के उत्तम सहनन और श्रेष्ठ सस्कारोका अभाव होनेसे मन और शरीर की कमजोरी इतनी अधिक होगी कि उनसे तपचयदि उत्तम आचरण (उपवासादिक) नही हो सकेंगे। इतना ही नहीं, बल्कि उपवासादि पवित्र कर्मोका निषेध करेगे । स्वय अन्नके कीडे होगे। शक्तिहोन होनेपर भी बडे मदोद्धत होगे। धर्मकार्यों मे स्वतन्त्र विचार फैलायेंगे और मममrer EMPSUSIC:-SMIC [ १७ ] MAHAMARPES ज्यादा THE THANESS शिव विष्णुपरा ब्रह्मसेवाभक्तिपरायणाः। सर्वोत्कृष्टमत स्वस्य त्यक्त्वा चान्यमते रताः ॥ ८४ ।। ममारार्णवसमग्ना मोहमग्ना दुराशयाः। निर्दया वैरसयुक्ताः स्वस्यैव पक्षनाशकाः ॥ ८५ ।। आतरौद्रे सदा लोना निर्विचारा क्रियोज्झिताः । नि शीला निस्त्रपा दुष्टा दिवानिशिपभक्षकाः ।। ८६ ।। अर्थ-पंचमकालके मनुष्य अपने सर्वोत्कृष्ट और पवित्र जैनधर्म को छोड़कर अन्यामतके शिव, विष्णु, ब्रह्मा और कुगुरुओंकी सेवामें लग जायेंगे ॥ ८४ ॥ भावार्थ---पंचम कालके मनुष्य सत्य और असत्यको परीक्षा रहित होंगे। जिससे उनको हिताहितका विचार नहीं होगा। वे सत्य जैनधर्मको छोड़ देंगे और मिथ्या धर्मको ग्रहण करेंगे। अर्थ--पंचमकालके मनुष्य संसार रूपी समुद्र में ही निमग्न होगे, मोहमे निमग्न होगे और दुष्ट अभि- प्रायको अपने हृदयमें धारण करेंगे। निर्दय होगे। वैरको धारण करनेवाले होंगे। तथा अपने धर्मका अपने आप नाश करनेवाले होगे ।। ८५ ॥ भावार्थ----पंचमकालके मनुष्य संसारके बढ़ाने में ही अपना धर्म समझेगे । और संसारको उन्नति मानेगे। हृदयमें बड़े भयंकर दुष्ट अभिप्राय रखेंगे। तथा जैनी भाई ही अपने जैनधर्मका नाश स्वतः करेंगे। अर्थ-पंचमकालके मनुष्य आर्त-रौद्र ध्यानमें ही लवलीन रहेगे। विचार रहित होगे। क्रिया रहित होंगे । शोल रहित होगे । लज्जा रहित होगे । दुष्ट होगे। और रात्रि दिवस भक्षण करनेवाले होंगे ॥ ८६ ॥ भावार्थ-पचमफालके मनुष्योमें सदाचार संस्कार-धर्म दान पूजादि शुभ क्रिया और भोजनपानादि उत्तम अपने अभिमान ने गिव्यामार्गको बढायेंगे तथा देवशास्त्रगुरुको निंदा करेंगे--कोई देवको सर्वज्ञ नही मानेगा। कोई अष्टद्रव्य ने पूजाका निपेश करेगा, कोई जिनदेवको मूर्तिको अस्पृश्य शूद्रोसे पूजा प्रक्षालन करनेका उपदेश देगा। कोई शास्त्रोको समालो- नना अपने स्वना विचारोसे युति और आगमविरुद्ध करेगे । और इस बहाने से अपना मतलब बनायेंगे। अपनी निज वुद्धिको गायों को बुद्धिगे उत्तम मानेंगे। मुनियोके मत्यस्वल्पकी निंदा करेंगे। उनमे मिथ्या अवर्णवाद लगायेंगे ओर धर्मके स्वरूपमे भी मोपकार मिया अपर्णवाद लगायेंगे । धर्मको पवित्रता नष्ट करेंगे । विवाहादिक धार्मिक क्रियाओको व्यवहार कार्य बतला कर पशीलताको गहिमाको नष्ट करेंगे। विधवाविवाह करेंगे, करायेंगे । जाति पांतिका लोप करेंगे । सदाचारकी क्रियाएँ नष्ट कर शूद्रोके गायनानपान गयेंगे । उन पकार पनाकालमे अनेक प्रकार देवशास्त्रगुरुओकी निंदा कर मिथ्या मार्ग बढायेंगे। जयराम । - HOTOS ३ चाच्याच [ १८ ] कदमूलाशनाः चर्मआज्यभक्षणतत्पराः। जतुनिकायभूताना घातकाः कर्मवजिताः ।। ८७॥ द्वाविंशतेरभक्षाणा भक्षका 'ज्ञानवर्जिताः। आत्मशसे कृताभ्यासाः परनिंदनचातुरा. ।। ८८ ॥ किंचिद् द्रव्य च सप्राप्य मानाद्रिमस्तके स्थिताः। विभूतिहानिमालोक्य सदा शोके रता. खलु ॥ ८९ ॥ GETरायाजालमा आचरणोंका विचार नहीं रहेगा। धर्मका भेष धारण कर अधर्मको बढ़ानेवाले होंगे। जो निर्लज्ज होकर विधवाविवाहादि अधर्म फैलायेंगे । और जैनधर्मको धारण कर जैनधर्मके विषयमे ही दुष्ट अभिप्राय रखेगे। अर्थ-पंचमकालके मनुष्य कंदमूल आदि अभक्ष्यभक्षण करनेवाले होंगे। चर्ममें रखे हुए घृत आदि अपवित्र पदार्थके सेवन करने वाले होंगे। छह प्रकारके जीवोंके घातक होंगे। तथा धर्मकर्म और चारित्रसे रहित होंगे ॥ ८७॥ अर्थ--हे राजन् ! पंचमकालके मनुष्य वाईस अभक्षके सेवन करने वाले होंगे। धार्मिक श्रेष्ठ ज्ञानसे रहित होंगे । जिनको अपनी आत्माके प्रशंसन का ही लक्ष्य बना रहेगा, और धर्मात्मा बनकर दूसरों की मिथ्या निंदा करनेमे बड़े चतुर होंगे ॥ ८८ ॥ अर्थ--पंचमकालके मनुष्योंके पुण्य कर्मके उदयसे कुछ धन प्राप्त हो जावे तो वे फिर मानके पहाड़ पर बैठकर सच्चे धर्मात्माओकी निंदा करायेंगे और पापकर्मके उदयसे कदाचित् धनकी हानि हो गई तो सदैव शोकमे आर्तरौद्र ध्यान करेंगे । ८९ ॥ जास्याए जयजयाज-मजायजा १ दर्शन मोहनीय कर्मके तीव्र उदयसे जोवोको श्रेष्ठ ज्ञान नही होता है। यद्यपि उनको ज्ञानावरणी कमके क्षयोपशम से मिथ्याज्ञान अधिक होता है। भव्यसेन मुनि ग्यारह अगका पाठी या तो भी उसको दर्शन मोहनोय कर्मका उदय होनेसे उसको विवेक नही था। हिंसक व्यापार करनेमे उसको जरा भी ग्लानि नहीं हुई। इसो पकार वर्तमान समयमे लोगो को कुज्ञान अधिक होता है । परतु सत्यज्ञान नही होता । जिससे वे अपने कुज्ञानके मदमे मदमाते होकर मदिरापान करते है, मास भदाण करते हैं। होटलो मे अभक्ष पदार्थोका भक्षण करते है। वाजार को अपवित्र वस्तुओका सेवन करते हैं, नीच और मलेच्छ लोगोके माथ गाते हैं। ऐसे लोग जूता पहनकर खाते है। जिनका अपनो आत्माका स्वत विश्वास (श्रद्धान) नही परंतु ढोगो धर्मात्मा बनार सच्चे धर्मात्मा गृहस्थ और विद्वानोकी निंदा करते हैं, मुनि, आर्यिका और श्रावक, श्राविका आदि चतुर्विध सघको निंदा करने मे बडे चतुर होते है। IASISATELy-waseeness [ १९ ] जिनवाय" वहीनागा स्ववाक्यपोपणे स्ववाक्यपोपणे रताः। मभिमतसलीनाः पाखडमतधारका ॥ १० ॥ माधा गुणविहीनागा मानधारका । पूजका कुपरस्थाना कुस्वना न्यायनिता ॥ ९१ ।। मतिहीना : "वहीना दाने ज्याव्रतविच्युता. । सातहोना गुणींना दभयुक्ताऽक्षपोपका ।। ५२ ।। पेजन्या माच्याNE T अर्थ-~-हे श्रेणिका महाराज ! पंचम कालके मनुष्य श्रीजिनेन्द्र भगवान्के सत्य और प्रामाणिक वचनों की आज्ञाको पालनेवाले नहीं होगे। उनका श्रद्धान श्रीजिनेन्द्र भगवान्के वचनोमें नहीं होगा। परंतु अपने असत्य और कल्पित वचनोको जनतामें सत्य बतलायेगे। तथा अभिमानसे अपने ही वचनोकी पुष्टि करेंगे। अयवा कल्पित वचन गढकर नवीन मतका प्रचार करेगे। और अनेक प्रकारके ढोंग फैलाकर अंतमे मिथ्या- मार्गको पुष्टि करेगे ॥ ९० ॥ अर्थ-हे राजन् ! पंचमकालमें ऐसे साधु और भेषधारी ब्रह्मचारी होंगे जिनमें अपने पदके योग्य गुणोका अभाव होगा। वे लोग अपने स्वार्थके लिये चुगली करेगे। अभिमानको धारण कर धर्मका नाश करेंगे । तथा मिथ्यादृष्टि नीच आदिको वे लोग पूजा करेंगे। न्याय मार्गका परित्याग करेंगे। और बहुत बकवाद कर दंभ फेलायेंगे ।। ९१ ।। अर्थ-पचमकालके मनुष्य बुद्धिहीन, द्रव्यहीन, दान-पूजा, व्रत आदि रहित, सुख रहित, गुण रहित, १ पनम काल के कितने ही ऐसे भी मनुष्य होगे जिनका जिनवाणीमे अतरग श्रद्वान सर्वथा नहीं होगा तो भी वे अपनेको बडे ननुर नौर मानिता कहकर अपने मिथ्या वचनोको सिद्ध करेंगे। जिससे उनका स्वार्थ सिद्ध हो। तथा मनगढत जैनमतके समान नवीन मत स्थापित करेंगे। जिससे उनका मतलव सिद्ध होता हो वही उनका धर्मशास्त्र होगा। वे लोग अपने स्वार्थ और विपय नपायी निद्धि के लिये श्रीजिनेन्द्रभगवान्के वचनोका अर्थ भी उलटा ही करेंगे तथा सत्य और यथार्थ अर्थको छिपाकर सदा अनीति चोर अगदानार हीगलावेंगे। २ वर्तमान जेन गमालमे कितने ही दभी श्रावक ऐसे भी है कि जो किसी न किसी बहानेसे जिनेन्द्र भगवान की पूजा को ही उाना नाहते हैं। उनका इतना ही दुष्ट अभिप्राय नहीं किंतु भगवान्की मूर्ति तक को माननेको तैयार नही है उनमे कितनेही गो दान देना नहीं नाहते। और स्वतः दान न देकर दूसरोकी दानकी परिपाटी मेढते मुनिनिंदा, धर्मनिंदा शास्त्रनिदा आदि निदाजी के द्वारा पूज्य पुरखोके महत्त्वको गिराकर मिथ्या मार्ग अथवा अपात्रमे दान दिलाकर वाहवाही लूटना चाहते हैं । ३ पर्तमान समयमे यह हो रहा है। कितने हो मनुष्य धर्मका भेप धारण कर लेते है परतु उनमे अपने पदके योग्य गुण नही समस्यालयमा [ २० ] तेल धान्य तथा हिंगुसामुद्रजाद्यनेकधा। वस्तुविपयरालीना दयावतविजिता. ।। ९३ ।। बह्वारभधराश्चैव परवचनचातुरा.। राज्ञ. सेवाकरा. कृष्यारभधारणतत्परा ॥ ९४ ।। परेपा द पदा नीचाः क्रियाधीशवजिता । क्षत्रियाश्च द्विजा वेश्या. स्वस्वधर्मविवजिता ॥ २५ ॥ SARI दांभिक और केवल इन्द्रियोंके पुष्ट करनेवाले होंगे ।। ९२ ॥ भावार्थ-पंचमकालके ऐसे भी श्रावक बहुत होंगे जिनसे भगवान्की पूजा करना, दान देना और व्रत पालन करना आदि एक भी पुण्य कर्म नहीं होगा। दांभिकरूपसे वे अपना जीवन विषमय कषायों की पुष्टिमें ही व्यतीत करेंगे। अर्थ-पंचमकालके मनुष्य अतिशय लोभके कारण जीवोंकी हिंसाका विचार नहीं कर तैल, हीग, मछली, चर्वी, हाड़ आदि कुत्सित पदार्थोंका व्यापार करेंगे, जिनको दयाका जरा भी विचार नहीं होगा॥१३॥ अर्थ-हे राजन् ! पंचमकालके मनुष्योंके बहुत-सा आरंभ होगा। ये लोग अपनी चालाकीसे भोले लोगोंके ठगनेमें बड़े निपुण होंगे। कितने ही तो राजाकी सेवा करेंगे और कितने ही खेती आदि हिंसक आरंभके करने में ही तत्पर होंगे ॥ ९४ ॥ अर्थ-हे राजन् ! पंचमकालके मनुष्य दूसरोंको दुःख देनेवाले बड़े नीच होंगे । उनके आचरण धर्मके अंशरहित होंगे। पंचमकालके क्षत्रिय अपने क्षात्रवलको खो बैठेंगे । ब्राह्मण अपने पवित्र कर्म और श्रेष्ठ आचार GHयालHC H सामन्यास ಸಾವು होते है । गुणोका रहना दूर रहा किंतु उनके जैनधर्मका पूर्ण श्रद्धान भी नही होता है। तो भी वे लोग अपने स्वार्थकी सिद्धि और विपय कपायका पोपण करनेके लिये अनेक प्रकार धर्मके ढोग फैलाते हुए देखे जाते है । पररपर चुगली कर धर्मकी निंदा कराते है और अपने मिथ्याभिमानको पुष्ट करनेके लिये अधर्म और अनीतिको वृद्धि कारते हैं। ऐसे दगी और मायानागे लोग भोले लोगोको अपने चुगलमे फँसा कर अधर्म कराते है । मिथ्या मार्गको बढाते है । समाजमे आज अधर्म और अनीतिकी वृद्धि ऐरो ही ढोगी पाखी और विपग कगाय सेनन करनेवाले लोगोरो हो रही है । धर्मका नाश करनेमे ही उनको शाति मालूम होती है । यह राव पचमकालकी बलिहारी है ।
[ २१ ] MAMATA त्याचगणगपन्ना मनुजा वा स्त्रियोऽपि च । अनुक्रमेण सर्वे ते मगधेश्वर निश्चयात् ॥ ९६ ।। नीना हि गज्यभोरतारः कुलजाः सत्त्ववर्जिताः । कृपणास्तेपि तस्मिश्च भविष्यति न सशयः ।। ९७ ।। गिनवमस्य' हानिहि समये समये घना । भविष्यति च उद्योतो खद्योतवत् रेश्वर ॥ ९८ ।। विचारको भूल जायेंगे । वैश्य नीतिका त्यागकर अनीति पथसे धन संचय करेंगे। उच्च वर्णोमे धर्मकी मर्यादा नष्ट हो जायगी ।। ९५ ।। अर्थ--हे मगधेश्वर ! श्रेणिक महाराज पंचमकालके मनुष्योमें तथा स्त्रियोंमें इत्यादि अनेक प्रकारके दुर्गुण क्रमसे बढते जायेंगे ॥ ९६ ॥ अर्थ-हे राजन् ! पंचमकालमें नीच मनुष्य, जिनके धार्मिक संस्कार व विचार नहीं है और जो लदाचार की पवित्र नीतिको मान्य नहीं करते हैं, राज्य करेंगे जिससे प्रजामे सदाचार और नीतिका लोप हो जायगा। उच्च कुलीन क्षत्रियोंमें बल ( क्षात्र धर्म ) नहीं रहेगा। अथवा वे कृपण और लोभी हो जायेंगे जिससे वे प्रजाको लूट-लूट कर अन्याय और अधर्म फैलायेंगे ॥ ९७ ॥ अर्थ---हे राजन् ! पंचमकालमें जैनधर्मको हानि समय-समय पर बहुत होगी। परन्तु फिर भी कभी- कभी सद्योतके समान जैनधर्मका उद्योत होता रहेगा ॥ ९८ ॥ यस्यास्रालयमा HCE १ पनमकालमे यद्यपि अन्यमतावलवियोमे और मिथ्यामार्गी जैन भाइयोसे भी जैनधर्मको समय समय पर बहुत-सी हानि होगी। गेन राजाओके अभाव हो जानेसे लोग निरंकुश बनेंगे, अपने आप ही अपने धर्मको हानि करेंगे और खुश होगे। परन्तु फिर भी कभी-कभी मुनियोके प्रतापसे और भव्य विद्वानोके प्रभावसे जैनधर्म खूब प्रभाव प्रकट करेगा और वह पंचमकालके अंतपर्यंत नियमगे रहेगा। जो लोग यह कहते है कि यदि जैनधर्मको रक्षा करना है तो विधवाविवाह, जातिपांति लोप और विजातीय शिवाह नाल कर देना चाहिये अन्यथा पचास वर्षमे जैनधर्मका सर्वथा अभाव हो जायगा। ऐसी मिथ्या भीति बतलाते है वे लोग अपने विषय गायकी पुष्टिगे लिये धोका देते है और समाजको भ्रममे डालते हैं। परंतु विचारशील मनुष्योको यह दृढ़ श्रद्धान है शिजेलपमं पनमकालो अन पर्यंत नियममे रहेगा। और मुनि और विद्वानोके द्वारा खूब उन्नति भी करेगा। कितने ही मनुष्य ह कहते हैं कि शुद्ध वश और शुद्ध रजवोसे उत्पन्न हुए मनुष्योका शीघ्र ही अभाव हो जायगा, उनको भी इन जेन वचनोका इम अवान करना चाहिये । शुद्धवश, शुद्ध जाति और शुद्ध वर्णका अभाव कभी किसी कालमे सर्वथा नहीं होता है। रामला Sölusam जसमाजशाजाच्याच ! E [ २२ ] कुकुला द्रव्यभोक्तारो न्यायहीनाश्च भूमिपा । एधिष्यत्येव म्लेच्छानामुद्योत. प्रति वासरम् ॥ ९९ ।। शीलहीना भविष्यति वामास्तस्मिन्मदोद्धताः । त्यक्त्वा च स्वपति दास भोक्ष्यति कालदोपतः ।। १०० ॥ लक्षकोटिपु शीलाढ्या नारी ह्येका नराधिराट् । शुद्धशीलधरा नापि भविष्यति न सशय ॥ १०१ ॥ पचमाभिधकालस्य स्त्रियोऽपि मगधेश्वर । भविष्यति रता नून भडगानेपु निस्त्रपाः ।। १०२ ।। प्रभूणा गानविद्यापु लज्जाधारणचातुरा । विवाहे चान्यघस्रे वा त्यक्त्वा लज्जा च स्वेच्छया ।। १०३ ।। भडगान च पितरौ सान्निध्येच नृणा तथा । विगोष्यति कुतस्तेपा शीलरत्न च दुर्लभम् ।। १०४ ।। अर्थ- हे राजन् ! पंचमकालमे नीच पुरुषोके घर पर लक्ष्मी बढ़ेगी। राजा लोग न्यायरहित हो जायेंगे और म्लेच्छ लोगोका साम्राज्य जन, धन, कनक आदि संपत्ति प्रतिदिन बढ़ती रहेगी ॥ ९९ ॥ अर्थ-हे राजन् ! पंचमकालको स्त्रियाँ भी शीलभ्रष्ट होगी। धन, कुशिक्षा और जवानी से मदमाती बनेंगी तथा काल दोषसे अपने सुन्दर पतिको छोड़कर नौकर लोगोंके साथ कुकर्म करेंगी ॥ १०० ॥ अर्थ-हे राजन् ! पंचमकालकी लाखों करोड़ो स्त्रियोंमे एक स्त्री शीलवती होगी। और शुद्ध शीलका पालन करनेवाली तो होंगी ही नहीं ॥ १०१ ।। भावार्थ--ब्रह्मचर्य ( शीलवत ) नवकोटिसे पालन किया जाता है। नवकोटिसे शील पालन करने- वाली स्त्रियाँ कम होगी जिनकी सीताके समान अग्निमे शीलको परीक्षा हो सके । परन्तु कायसे शीलको पालन करनेवाली स्त्रियाँ बहुत होंगी । यह नहीं है कि शीलको धारण करने वाली स्त्रियोका पंचमकालके अंत तक अभाव हो जावे । शीलका सर्वथा अभाव किसी कालमें भी नहीं होता है । हाँ, कुशिक्षा और अज्ञानतासे उनका अधिकांश भाग भ्रष्ट हो जायगा । weswer न्याच्या अर्थ--हेमगधेश्वर ! पंचमकालकी स्त्रियाँ लाज रहित होकर भंड गीत गानेमें तत्पर हो जायेंगी॥१०२॥ अर्थ--हे राजन् ! पंचम कालकी स्त्रियोंको श्रीजिनेन्द्रदेव ( भगवान् ) के गुण गाने में लाज आवेगी । और विवाहादिक दिवसोंमें कुत्सित गान स्वेच्छापूर्वक करेंगी उस समय लाज सब जाती रहेगी ॥ १०३ ॥ अर्थ--पंचमकालकी स्त्रियाँ अपने माता-पिताके सामने भी कुत्सित गान गायेंगी । और जन समूह Dirl में [ २३ ] नयति भडगगेण व्रतदानक्रियाफलम् । तीर्थयात्राफल सर्व जाप्यादिकं च भो स्त्रियः ।। १०५ ॥ भउरागेण ना वामा पडत्व लभते तथा । विधवा यौवने स्याद्धि नानादुःखपभोगका ॥ १०६ ।। ये वे दुपाश्च जायंते स्त्रोणा दीर्भाग्यकादयः । ते ते सर्वेच भो भव्य भडरागस्य कारणम् ।। १०७ ॥ अनो भो ललना यूय भडरागस्य सर्वदा । त्यागमेव कुरुष्व वै केवलानर्थहानये ।। १०८॥ कुलोत्तम च सप्राप्य भडरागस्य या वधू । गान करोति वैवाहे सा मता चडकामिनी ।। १०९ ।। यदोच्छा रागगानस्य तद्धि गायंतु नंदये । मगलाद्या. शुभा गोता प्रभोर्गुणभवास्तथा ॥ ११० ।। RATE भी गायेंगी इसलिये उनका दुर्लभ शीलरत्न किस प्रकार रह सकता है ॥ १०४ ॥ भावार्थ-प्रायः कुत्सित गानेवाली स्त्रियाँ अपने बड़ोंके सामने ही भ्रष्ट हो जायेंगी। अर्थ-आचार्य महाराज उपदेश देते हैं कि हे राजन् ! इस कुत्सित गानके फलसे इन स्त्रियों का व्रत, वान आदि पवित्र आचरण सब नष्ट हो जायगा। तथा तीर्थयात्रा, जप, तप आदि सर्व व्यर्थ जायगा ॥ १०५ ॥ अर्थ-इस भउरागसे स्त्री और पुरुष दोनों ही नपुंसक हो जायेंगे और स्त्रियाँ यौवन अवस्थामें ही नाना दुःसोको प्रदान करनेवाले वैधव्यको प्राप्त हो जाया करेंगी ॥ १०६ ॥ अर्थ-हे भव्य ! दुर्भाग्यके प्रदान करनेवाले जो-जो दुःख स्त्रियोंको प्राप्त होते हैं वे सब भंडरागके गानके फलसे ही होते हैं ।। १०७ ॥ अर्थ-इसलिये हे स्त्रियो ! तुम केवल अपने अनर्थोंको दूर करनेके लिये इस भंडरागके गानेका सर्वथा परित्याग करो ॥ १०८ ॥ अर्य-उत्तम कुलको प्राप्त कर जो स्त्री विवाह आदि शुभ मांगलिक कार्यों में भंडरागका गान करती है, वह स्त्री चंद्रगामिनीके समान है ॥ १०९ ॥ अर्थ-हे स्त्रियो ! जो तुम्हारो इच्छा गान करनेको ही तो श्रीजिनेंद्र भगवान्के मंगलगान और शुभ गोतोको सुशोसे गाओ। जिससे पुण्यको प्राप्ति हो और पाप कर्मका नाश हो ॥ ११० ॥ मान्य [ २४ ] MIRE HPSIVASHEE नेमिनायस्य वा चान्ये आदिवीरस्य वा गुणा. । विवाहस्यैव तपा हि विवाहमगलाप्तये ॥ १११ ।। गूढच्छद तथा गद्य वरा प्रहेलिका पुन । पठथ कुरुथ चोच्चैः प्रश्नोत्तरमहो स्त्रियः ।। ११२ ।। भउगगे कुतो धर्मो धर्मादृते कुतः सुखम् । अतस्त्यक्त्वा मद यूय गायथ जिनसद्गुणान् ।। ११३ ।। प्रभोर्गुणानुवादाच्च जायते मानसे मुद । पापहानिर्यशो लोके पुण्यस्य सततिः खलु ।। ११४ ।। प्रभोर्गुणानुवादेन सम पुण्य न भूतले । चापर स्वर्गराजोहि सदा गायति तद्गुण ।। ११५ ।। भडरागस्य या नार्यो त्याग कुर्वति ता. पुनः। दिवि सोख्य च संप्राप्य लभते चाक्षय पदम् ॥ ११६ ।। भडरागप्रभावेन हत्वा शील पुनश्च ता. । श्वभ्रे दुखमनेक हिं प्राप्नुवति न सशय ॥ ११७ ।। Meemen समाजमा ? अर्थ-इसलिये स्त्रियोंको विवाहादि शुभ मंगलिक अवसर पर श्री देवाधिदेव आदिनाथ भगवान् या नेमिनाथ भगवान् आदि पुण्य पुरुषोंके विवाह आदिके शुभ और मंगलीक गीतोको गाना चाहिये ॥ १११ ॥ अर्थ-गूढ छद, गद्य, पद्य, प्रहेलिका आदि शुभ और पवित्र धार्मिक गीतोंको पढ़ो। और धार्मिक प्रश्नोत्तरोंको आत्मकल्याणके लिये खूब करो ॥ ११२ ॥ अर्थ--इसलिये भंडरागोंके गाने में धर्म कहाँ है और धर्मके बिना सुख कहाँ ? अतएव सुखकी प्राप्तिके लिये श्रीजिनेन्द्र भगवान्के सद्गुणोंका गान करना चाहिये । और कुत्सित गानका नाद छोड़ देना चाहिये ॥११३॥ अर्थ--भगवान्के परमोत्कृष्ट और पवित्र गुणानुवादके गान करनेसे मनमें अतिशय हर्ष होता है । जिससे पापकी हानि, यशकी प्राप्ति और पुण्यकी वृद्धि होती है ॥ ११४ ॥ अर्थ--प्रभुके गुणानुवादके समान अन्य किसीमें पुण्य नहीं है । स्वर्गके देवगण भी पुण्यकी प्राप्तिके लिए प्रभुके गुणोंका गान करते हैं ॥ ११५ ॥ अर्थ--भंडरागका जो स्त्रियाँ परित्याग करती है वे स्वर्गमें अपूर्व सुखको प्राप्त होती हैं। और क्रमसे अक्षय पदको प्राप्त होती है ॥ ११६ ॥ अर्थ--भडराग से कितनी ही स्त्रियाँ अपने पवित्र शोलरत्नका नाश करती है और फिर उससे नरकके दुःखोको प्राप्त होती हैं ॥ ११७ ॥ च्यायची न्यायालयाच्या [ २५ ] SHRESHE द्वयोहिं रागयोभव्याः फल ज्ञात्वा मुखाप्तये । मा शृणुध्वमहो तं च भंडराग कुदु.खदम् ।। ११८ ॥ यस्मिन् काले नराधीश नरा नार्यो धनाः खलाः । भद्रा हि स्वल्पसंख्याश्च क्रियाव्रतधरा वराः ।। ११९ ।। शिथिलाचाराश्च केचित् केचिदाचारवर्जिताः। केवलाभिधसंपन्ना यस्मिन् वै श्रावकाः खलु ॥ १२० ।। आचारधारका. केचित् तेपा निंदा भविष्यति । कालाते जिनधर्मोय यत्र कुत्रैव स्थास्यति ।। १२१ ॥ EUREVालयमालामाल AweswweSResmes अर्थ-धार्मिक पवित्र गीत और कुत्सित भंडराग दोनो प्रकारके गीतोंके शुभाशुभ फलको जानकर सुखकी प्राप्ति के लिये धार्मिक गीतोंका गान करना चाहिये और भंडराग को दुःखकारी समझकर नही गाना चाहिये । तथा श्रवण भी नहीं करना चाहिए ॥ ११८ ॥ अर्थ--हे राजन् ! जिस पंचमकालमें प्रायः बहुतसे स्त्री पुरुष दुष्ट अभिप्रायवाले और धर्मसे बहिर्भूत होंगे । उत्तम व्रत तथा उत्तम पवित्र श्रावकको क्रियाओंको पालन करनेवाले भद्र परिणामी ( सरल परिणामी ) विशुद्ध हृदयवाले स्वल्प संख्यामें होंगे ॥ ११९ ॥ अर्थ--हे राजन् ! उस पंचमकालमें कितनेही मनुष्य शिथिलचारी होगे तथा आचार रहित होंगे। उस पंचमकालमें श्रावकजन केवल नामधारी जैनी होगे। इन दोनो श्लोकोंका अभिप्राय यह है कि कुशिक्षा और व्यामोह से मनुष्यों में मायाचारी और पापिष्ठता बढ़ जायगी। जिससे उनके परिणाम सदैव दुष्ट रहेगे। इस अज्ञान और दुष्टता से वे अपने स्वार्थ ओर विषय कषायोंको सिद्ध करने के लिये सदाचार पर पानी फेरेंगे। धामिक मर्यादाका नाश करेंगे। पवित्र आचरणोंमें शिथिलता करेंगे और उपदेशोके द्वारा करावेंगे जिससे शोलवत संयमचारित्रमें लोग शिथिल होते जायेंगे। परिणामोसे सरलता नष्ट हो जायगी। और कदाचार बढ़ता जायगा । सदाचार और धर्मको मर्यादाकी पुष्टि करने वाले सच्चे धर्मात्मा भद्र परिणामी मनुष्य बहुत हो स्वल्प संरयामें रह जायेंगे। श्रावकगण केवल नाममात्रके जैनी रह जायेंगे ॥ १२० ॥ अर्थ--हे राजन् ! पचमकालमें श्रीजिनदेवके आगमानुसार आचारका पालन करनेवाले सच्चे धर्मात्मा भाइयों की कुशिसित लोग निदा करेंगे । तथा हे राजन् ! पंचमकालके अंतमें यह जिनधर्म कही-कही पर ही स्थिर रहेगा ।। १२१ ॥ Synon HDमा SHED [ २६ ] द्रव्ययुक्ता नरा केचित्स्वात्मनि हर्षपूरिताः । भविष्यत्यन्यगानुष्य गणिष्यति तृणोपमम् ।। १२२ ।। धनाचास्ते गृहे स्वस्य दासीदासान् कुलोज्झितान् । रक्षयिष्यति पानार्थ न्यादार्थं च खलाशयाः ।। १२३ ॥ शूद्रलोकस्य ये धाम्नि रक्षति ते कथ मताः । खानपानादि कर्मार्थ श्रावकास्तत्समाः खलु ॥ १२४ ।। अर्थ--हे राजन् ! पंचमकालमें धनिक लोगोंमें अभिमान बढ़ जायगा जिससे वे अपने धनके हर्ष में गहले बन जायँगे । और अन्य मनुष्योंको तृणके समान समझेंगे ॥ १२२ ॥ अर्थ--हे राजन् ! पंचमकालमें वे धनिक लोग अपने धनके मदमें अन्धे होकर विचार रहित हो जायेंगे। जिससे वे अपने गृहमें नीच और अकुलीन नौकर चाकरोंको रखेंगे। और उनके हाथसे भोजनपान करेंगे। जिस समय कुसंगति या कुशिक्षासे धनवान लोगोंकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है उस समय उनका विचार भी गंदा हो जाता है । उन्हें हिताहितका विवेक नहीं रहता जिससे वे धर्म और सदाचारको पवित्र मर्यादाका विचार नहीं कर अपने घरमे नोच मनुष्योंको (दासदासी) रखकर उनके हाथका भोजन करने लग जाते है।।१२३॥ नीच मनुष्योंके हाथका भोजनपान करना धर्मशास्त्रको पवित्र आज्ञासे विरुद्ध हे और सदाचारका लोप करने वाला है । जो लोग नीच मनुष्योंके हाथका भोजनपान करते है वे जैन नहीं हैं । उनके धर्मकी श्रद्धा नहीं है । अतएव वे नाममात्रके ही जैन हैं। भावार्थ--जो लोग अपवित्र साधनोंके साथ समुद्रयात्रा कर नीच लोगोंके हाथका अपवित्र और अभक्ष्य भोजन कर अपनेको सम्यग्दृष्टी बतलाते हैं वे जिनेन्द्र भगवान्के आगमके श्रद्धानी नहीं हैं। तथा जो लोग ऐसे नीच पुरुषोंके हाथका अभक्ष्य भोजन कर अपनेको पंच अणुव्रतधारी बतलाते हे वे बनावटी जेनी है । अर्थ----जो धनिक लोग अपने गृह पर शूद्रलोगोंसे खान-पान आदि धार्मिक क्रियायें कराते हे वे श्रावक शूद्रके समान ही है ॥ १२४ ॥ भावार्थ--भोजन पान आदि केवल व्यवहार मार्ग नहीं है कि जिस-तिस प्रकार शुद्ध-अशुद्धका विचार नहीं कर नीच लोगोंका भोजन पान कर लिया जाय । परंतु भोजन पानकी क्रियाको धार्मिक सदाचार ( चारित्र ) की पवित्र ओर उत्कृष्ट क्रिया माना है । मुनीश्वर भोजन पानकी क्रियाके समय भी विशुद्ध भावोसे SERIमारामालयामासान्जयममmama DSHAHG लालार IHERS [ २७ ] Free anायम -- गद्राणा न बिवेकोस्ति मरणे जन्मनि रजो । मद्यमामादिखाये च गेमचर्मे बुधा खलु ॥ १२५ ।। सातवें गुणस्थानको प्राप्त होते हैं। और इसीलिए हो वे शुद्ध और विधिपूर्वक भोजन करते हैं । श्रावक लोगोके भोजन पानको क्रियाकी विधि जिनागममें बतलाई है । अतएव यह विधि जिनाज्ञा रूप होनेसे धार्मिक ही मानी गई है। जो मनुष्य धार्मिक भोजन पान विधिको जिनागमको आजाके विरुद्ध बतलाते हैं और शूद्रोके हाथका भोजन पान करते हैं वे जैन नर्मकी आज्ञा न मानने के कारण जैनधर्मसे रहित समझने चाहिए। जो लोग मुसलमान, भंगी, चमार, म्लेच्छ आदि नीच मनुष्यो को नाम मात्रका जैन बनाकर उनके हाथका भोजन करना चाहते है और उनसे कन्या का विवाह कराना चाहते है वे जैन मतको पवित्र आज्ञा से पराङ्मुख है । क्योकि जिनागममें बतलाया है कि शूद्र, भंगी, चमार आदि नीच गोत्रकर्मके उदयसे उत्पन्न हुये मनुष्य चाहे जनमतको अपने आत्मकल्याणके लिये भले हो पालन करे परंतु उनके हाथका भोजन पान व कन्या दानादान आदि व्यवहार "मुनिधर्म" और "सज्जाति" का लोप करनेवाला है। जेनधर्मको तिर्यंच घोड़ा, गधा आदि सभी पशु पाल सकते हैं परंतु उनके साथ मनुष्य घास नही खाने लगते । धर्मका पालन करना आत्म- फल्याणके लिये है। परंतु भोजनपान और कन्याव्यवहार यह सज्जातीयता की रक्षा करनेके लिये है । यदि सज्जातिको रक्षा न की जाय तो मुनि धर्म और श्रावक धर्म दोनो में से एक भी स्थिर नही रह सकेगा। अर्थ-शूद्र लोगोके जन्म, मरण और ऋतुधर्मपालनका तथा सूतक-पातकका विवेक नही होता। तथा मय, मास आदि अभक्ष्यका भक्षण करनेमें विवेक नहीं होता है तथा रोम (कंबल पर भोजन पान करना) चाम आदि मलिन पदार्थ पर भोजन करनेमें विवेक नही होता है । इसलिए शूद्रके हाथका भोजन पान करना आगम- विगत है ॥ १२५ ॥ भावार्थ--सोलह संस्कार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीन वर्णमें ही होते हैं। जिन जीवोमें सोलह सस्कार नही, उनके मोक्ष मार्ग भी नहीं है। भोगभूमिके जीव कितने उत्तम होते हैं परंतु उनमें सोलह संस्कार नहीं होते अतएव वे मोक्षके अधिकारी नहीं होते हैं। सौधर्म इन्द्र ग्यारह अंगको धारण करनेवाला और सम्यक्त्वी है तथापि सोलह सरकार नहीं होनेसे मोक्षका अधिकारी नही है। इसी प्रकार शूद्रलोगोमें सोलह संस्कारोंका अभाव यात्रा [ २८ ] A " EPERH जाज का नास्ति किषायति क्रियालेशोऽपि नास्ति च । अतो धर्मस्य रक्षार्थ पालयध्व वरा क्रियाम् ।। १२६ ।। ते गर्न पानपूर्णादि कार्य स्वस्येव नेव च । हस्तेन निविवेका हि करिष्यति मदोद्वता ।। १२७ ॥ गागागायम्य भेदोहि नेत्र तपा मतो निशि । धनाचा हि क्रियाहीना निद्रव्याश्च क्रियारता ॥ १२८॥ भविष्यति गृहे तेपा स्त्रियोऽपि मदमडिता । क्रियाकर्मोज्झिता मूढा परासूयरताः सदा ।। १२९ ।। होता है तो फिर वे शूद्र लोग जिनधर्मको पालन कर लेनेपर भी मोक्षके अधिकारी किस प्रकार हो सकते हैं ? त्रिवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) में ही संस्कार होते है इसीलिए त्रिवर्णमें ही मोक्षमार्गका अधिकार है। यदि शूद्रों (जिनके संस्कार नहीं है) के हाथका भोजन पान त्रिवर्णमें कराया जाय और कन्यादान आदि व्यवहार धर्म चालू कर दिया जाय तो त्रिवर्णके संस्कारोंका लोप हो जायगा । और संस्कारके लोप होनेसे मोक्षमार्गका लोप हो जायगा । इसलिए शूद्र जैनधर्मको धारण कर लेवे तो उसके साथ रोटी बेटी-व्यवहार नहीं करना चाहिए। अर्थ--जिन पुरुषोंके ( शूद्र लोगोके ) क्रियाकी शुद्धि नही है तथा जिनके संस्करादि धार्मिक क्रियाएँ नही है उनके साथ खान पान आदि व्यवहार नहीं करना चाहिए । अतः धर्मकी रक्षाके लिए हे भव्यजीवों ! आगमोक्त उत्तम और पवित्र क्रियाओंका पालन करो अर्थात् भोजन पान आदि पवित्र क्रियाएँ शूद्रके हाथसे मत कराओ । अन्यथा शुद्ध क्रियाओका पालन होना अशक्य है ॥ १२६ ॥ अर्थ--उस पंचमकालमे विवेक रहित और मदोन्मत्त पुरुष ही खानेपीने, पीसने, पानी भरने आदि घरके कामोंको अपने हाथसे नही करेंगे। अर्थात् ऐसे लोग शूद्रोसे ही सब काम करावेगे ॥ १२७ ॥ अर्थ--जो धनिक लोग शूद्रके हाथका भोजन पान करते हैं उनके खाद्य और अखाद्यका विचार सर्वथा नही होता है । वे लोग रात्रि भोजन करते है। इसलिये कितने ही धनांध ( कुशिक्षित और कुसंगतिमे लगे हुए ) क्रियाहीन होते है । और निद्रव्य ( गरीब ) लोग क्रियावान् होते है ॥ १२८ ॥ अर्थ--क्रियाहीन धनिक लोगोंकी स्त्रियाँ भी मतवाली बनकर खान पानकी विशुद्ध क्रियाओंसे रहित होंगी। मूखिणी होंगी तथा दूसरोंसे ईर्षा-द्वेष करनेवाली होंगी ॥ १२९ ॥ SASURE च्याय [ २९ ] यह पचाक्षपोपणे लीना धर्ममार्गविवर्जिताः। स्वात्मशंसे कृताभ्यासा मिथ्यात्वपथसेविका.।। १३० ॥ स्वस्य हस्तेन किंचिच्च गृहकार्य क्रियोद्भव । न करिष्यति ता. भूप मदमात्सर्यसभृताः ॥ १३१ ।। शूद्रहस्तेन तत्सर्व भाद्रमासे व्रतेपु च । नून कारापयिष्यति अन्नपानादिजां क्रिया ।। १३२ ॥ निद्यं स्यात् सर्वमासेपु न्यादपानादिकं खलु । शूद्रकरेण संस्पृश्य सदाचारविनाशकम् ॥ १३३ ।। मद्यमासमधूना यदशनाद्दोपो जायते । वै स्यात्तद्धस्तसपर्कवस्तुभक्षणतो बुधाः ॥ १३४ ॥ ये पुन शूद्रहस्तस्य भाद्रमासे व्रतेषु च । चूर्णोदकाज्यं खादंति ते नरास्तत्समा मताः ॥ १३५ ।। अर्थ--धनवानोकी कुशिक्षिता स्त्रियाँ पाँचों इंद्रियोके विषयोंको पुष्ट करनेमें रात्रि दिवस मग्न रहेंगी। धर्ममार्गसे रहित होगी । जिनको अपनी आत्माका भी विश्वास नहीं होगा । केवल मिथ्यात्व मार्गका ही सदैव सेवन करेंगी ।। १३० ।। अर्थ---मद और ई-द्वेषसे भरी हुई धनवानोकी कुशिक्षिता स्त्रियाँ अपने गृहके खानपान और आचार विचारफी धार्मिक क्रियाओको अपने हाथसे बिलकुल नहीं करेंगी ।। १३१ ॥ अर्थ--हे राजन् । धनवानाकी कुशिक्षिता स्त्रियाँ भाद्रपद मास (पर्युषण पर्व) और व्रतोंके दिवसोंमें भी भोजनपान शूद्र के हाथसे करायेंगी। उनको पवित्र व्रतोकी मर्यादा और पवित्र विधिका भी विचार नहीं रहेगा॥१३२॥ अर्थ--भोजनपानकी क्रिया और विशुद्ध खानपानकी सामग्री शूद्रके हाथसे कराना सदा ही निंद्य योकि उससे सदाचार समूल नष्ट हो जाता है ।। १३३ ॥ अर्थ---हे विद्वानो, जो दोप मद्य, मास और मधुके सेवन करनेसे उत्पन्न होता है वही दोष शद्रके हापसे सम्बन्ध पिये हुए पदार्थोके भक्षण करनेसे होता है ॥ १३४ ।। भावार्थ---शूद लोग मद्य, मास और मधुका सेवन करते है । उनके हाथोंमें उन मलिन और अस्पृश्य पदार्गाका सरकार बना रहता है । यदि उस शूद्रके हाथसे स्पर्श किये हुए भोजनपानका सेवन किया जाय तो उरा नम्तुके सेवन करने में मद्य, मांस भक्षण करनेका दोप अवश्य ही लगेगा। क्योकि शूद्रके हाथोका असर अपने गोजनपानमें अवश्य हो आयेगा । अर्थ-जो पर्युषण पर्व और व्रतादि पुण्य दिवसोमें भी शूद्रके हाथका आटा, पानी और घी आदि [ ३० ] 4500-we-eeHIPSweareshe शूद्रश्रावकभेदो हि दृश्यते व्रतपालनात् । शूद्रोऽपि श्रावको शेयो निर्वत सोपि तत्सम. ॥ १३६ ॥ सानो जिनधर्मण कथित श्रावकोतम । भूपपुरोऽपि सप्रोक्तो त विना श्वपचसमः ।। १३७ ।। यसको व्रतयोगेन देवत्वे जायते खलु । देवो ह्यधर्मदोषेण श्वयोनी भो बुधोत्तमा. ।। १३८ ॥ वर्चस्वे भूमिपालोनि कीटत्व लभते खलु । कीटोपि प्रततेशेन भजते गतिमुत्तमाम् ॥ १३९ ।। अनो भो सज्जना यूय मा कुरुध्च कदाचन । मानप्रमादमात्सर्य यदीच्छा शर्मसतते ।। १४० ॥ मानेन बहवो नष्टा रावणाद्या नरोत्तमा । सप्राप्य परम दुःख गतास्ते नरकावनी ।। १४१ ।। भोजन पान सामग्रीका सेवन करते हैं वे शूद्रोके समान ही माने गये है ॥ १३५ ।। अर्थ-शूद्र और श्रावकमें यदि भेद है तो मात्र इतना ही है कि शूद्रके सोलह संस्कारके अभावसे व्रतों- का पालन-भोजन पान आदि धार्मिक क्रियाओंका पालन नहीं होता है और श्रावकमें होता है। जो श्रावक अपने भोजन पान आदि धार्मिक व्रत क्रियाओंको भूल जावे-नहीं करे तो वह शूद्रके समान ही है ॥ १३६ ॥ अर्थ-यदि चांडाल जिनधर्मकी आज्ञाके अनुसार जैनधर्मको धारण करता है तो वह श्रावकोत्तम माना जाता है । और जो राजपुत्र होकर भी जिनधर्मकी आज्ञाके अनुसार नहीं चलता तो वह चांडालके समान माना जाता है ।। १३७ ॥ अर्थ- हे उत्तम बुद्धिमानो, देखो सम्यग्दर्शनादि व्रतों के धारण करने से कुत्ता भी देव हो जाता है और पाप कर्म करनेसे देव भी कुत्ता हो जाता है। इसलिये हे बुद्धिमानों ! जिन क्रियाओंसे सम्यग्दर्शन स्थिर रहे ऐसी व्रतादि धार्मिक क्रियाओंका पालन करो ॥ १३८ ॥ अर्थ--पापसे राजा भी कोड़ा (कीटक) हो जाता है। और धर्मसे कीट भी देव बन जाता है ॥१३९॥ अर्थ---हे भव्य जीवों ! जो सुखको प्राप्त करनेकी इच्छा है तो जिन धार्मिक आचरणोंके पालन करनेसे सम्यग्दर्शन की स्थिरता होती है ऐसे पवित्र आचरणोंके पालन करने में मान या आलस मत रखो और मात्सर्य मत करो ॥ १४०॥ अर्थ---धार्मिक चारित्रका यदि सत्ता और धनके अभिमानसे लोप किया जाय तो रावण आदि महान् पुरुषोंके समान नरकादिकोंके भयानक दुःख भोगने पड़ेंगे ॥ १४१ ।। REEसास्यास्यामा पलान्यायालय Desweepstempestes [ ३१ ] मान दुर्गतिकारण बुवजनैर्हय च निंद्य खलु, मानाद्धि खचरेश्वरो दशमुखो रामेण वै नाशित । स्वन्येवाखिलदुःसशोकनिचय मप्राप्य वै निद्यतां, ह्याप श्वभ्रनिकेतन बुधजनास्त हि जहीध्व ह्यतः ॥ १४२ ॥ अन्नादिशोधने पानगालने न्यादपाचने । प्रमार्जने महद्यत्नं कर्तव्यमजसा खलु ॥ १४३ ॥ ह्यगोध्य गाकपुष्प च विद्धानं नवनीतकं । दधितक्रद्विदलान्न त्याज्य व्रताप्तये सदा ॥ १४४ ।। भावार्थ--हम बड़े हैं, हम राजा हैं, हम धनवान हैं, इस प्रकार अभिमान में आकर यदि हम धार्मिक पवित्र आचरणो का पालन नहीं करेंगे तो हमारी अवश्य ही दुर्गात होगी। रावणने अपने राजसत्ता और बलके अभिमानसे ही शील जैसे पवित्र धार्मिक आचरणको नष्ट करना चाहा इसलिये ही वह दुःख को प्राप्त हुआ। अतएव धार्मिक क्रियाओको कभी नहीं छोड़ना चाहिये । अर्थ--मान दुर्गतिका कारण है, विद्वानोंको छोड़ने योग्य है और निंद्य है । मानसे ही विद्याधरोंका ईश रावण राम लक्ष्मणके द्वारा नाशको प्राप्त हुआ अथवा अपने आप ही दुःखोंको प्राप्त होकर नाशको प्राप्त हुआ और अंतमें नरकादिक दुखोंका पात्र हुआ । इसलिए भव्य जीवोंको मान करना छोड़ देना चाहिए ॥१४२॥ अर्थ--अन्नादिक पदार्थोके शोधन करनेमें प्रमाद नही करना चाहिए। पानो छानना ओर भोजनपान आदि चोकेको क्रियामें महान् सावधानी और यत्न रखना चाहिए। भोजन बनाना, पानी छानना, सड़े हुए घान्यको बोन छानकर आटा बनाना, शरीर और वस्त्रको शुद्धकर रसोई घर ( चौका ) में जाना, चौकाको शूद्रावि लोगोंसे स्पर्श न कराकर स्वतः उसको साफ करना आदि बातोमें प्रमाद नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह सब सोलह संस्कारका फलरूप धार्मिक चारित्र है। जो मनुष्य इस विषयमें प्रमाद कर अन्यथा करता है या दूसरे शूद्रादि लोगोसे यह कार्य कराता है वह धर्ममार्गसे भ्रष्ट समझा जाता है ॥ १४३ ॥ अर्थ-विना शोधे पदार्थ पुष्पादि खानेके पदार्थ, सड़ा घुना हुआ अन्न, लोनी ( मक्खन ) और दही, लाछके साथ चना, मूंग आदि द्विदलको व्रतको शुद्धताके लिए ग्रहण नहीं करे ॥ १४४ ॥ १. इन तीन लोकोका मतलब यह है कि मम्यग्दर्शनके प्रभावमे कुत्ता कीटकऔर चाडाल आदि नोच पर्यायको धारण करने- वाले पागो भो पारि शुभ गति को पाप्त होते हैं । जो जीव सम्यग्दर्शन सहित चाडाल हो तो भी मरकर देवपर्यायको प्राप्त होते है गा और नम्वरगंना माहात्म्य हो ऐसा है । सायन्सच्च [ ३२ ] । हनूर्णाजयहिंगु च चर्मतल दयाप्तये । न ग्राह्य सर्वदा भव्येः कदमूलोत्कर खलु ।। १४५ ।। यत्नेन जायते धर्मो विना यत्नेन नो खलु । अत सर्वत्र कार्येषु दयाभावो विधीयते ।। १४६ ।। वम्नाणा धोवन चापि गालितेन जलेन च । कर्तव्य व्रतरक्षार्थ दया सर्वेषु पत्तमा ॥ १४७ ।। यच्चित्ते हि दया नास्ति म पुमान् राक्षममम । अतो भव्याः सदा कार्या सर्वभूपेषु सत्कृपा ।। १४८ ।। दयानमो न धर्मोस्ति क्षमातुल्य तपश्च न । दानसम न भूपास्ति त्रयस्ते मोक्षदायका. ॥ १४९ ।। कुलजा बुद्धिहीनाश्च सभविष्यति कुकुलाः । भूपते बुद्धिवेत्तार. स्वस्वधर्मपरान्मुखा. ।। १५० ।। जैनादिपड्मता. ख्यातास्तपा मध्ये नरेश्वर । भविष्यति घना भेदा. स्वस्वमतिविकल्पतः ॥ १५१ ।। जारामाच्याच्यामा चाच्याच reSPामा अर्थ--अपने चारित्रको शुद्ध रखनेके लिये व दयाधर्म पालन करनेके लिये बाजारका आटा, अशुद्ध बाजारका घी, हींग, चाममे रखा हुआ तैल और कंदमूल आदि पदार्थ सर्वथा ग्रहण नही करना चाहिये ॥१४५॥ अर्थ--अपने संयम और पवित्र चारित्रकी रक्षाके लिये भोजनपानको यत्नाचारसे शोध कर सेवन करो। अशोधित अन्नपानका सेवन मत करो। क्योंकि यत्नपूर्वक शोधनेसे ही उत्तम प्रकारसे धर्मका पालन होता है, बिना यत्नके नहीं । इसलिये समस्त कार्यो में दया रखनी चाहिये ॥ १४६ ॥ अर्थ-व्रती पुरुषोंको अपने वस्त्र भी छने हुए पानीसे धोना चाहिये क्योंकि उसके बिना दयाधर्मका पालन होना अशक्य है। जिनके यत्नाचार पूर्वक आचार विचार है उनके ही दयाधर्मका पालन होता है ॥१४७॥ अर्थ--जिन मनुष्योंके मनमे दया नहीं है वे राक्षसके तुल्य हैं । इसलिये हे भव्य जीवों ! सब जीवोंपर दया करनी चाहिये ॥ १४८ ॥ अर्थ--दयाके समान अन्य धर्म नहीं है । क्षमाके समान अन्य तप नहीं है। दानके समान अन्य कोई भूषण नहीं है । संसारमे दया, क्षमा और दान ये तीनों मोक्षके प्रदान करनेवाले रत्नत्रय हैं ॥ १४९ ॥ अर्थ--इस पंचमकालमें कुलोन पुरुष बुद्धिहीन होंगे । और कुकुलीन राजाओंके मन भावते होंगे। तथा धर्म से रहित होंगे ॥ १५० ॥ अर्थ--हे राजन् ! पंचमकालमें षट मतके धारक मनुष्य होंगे। तथा जैन मतमें भी विपरीत मत ज्याला स्मरन्च्यायालय [ ३३ ] जयजयाज LATED धार्मिकाणा भविष्यति हानिस्तु समय प्रति । गुरोनिदा करिष्यन्ति श्रावका व्रतवर्जिताः ॥ १५२ ॥ महस्रार्द्धपु वर्षेषु नाशो धर्मस्य वा पुन । भविष्यति पुनर्धर्ममार्गजैनप्रभावकाः ॥ १५३ ।। अपनी-अपनी मन की कल्पनासे गढ़कर श्वेतांबरादिक बहुत भेद होंगे। जो अपनेको जैन मतके धारक बतलायेंगे परंतु उनका मत मिथ्याके समान तीव्र मिथ्यात्वसे परिपूर्ण होगा ॥ १५१ ॥ अर्थ-उस समय धर्मात्मा पुरुषोकी हानि होगी। और व्रत रहित । ( असदाचारी ) श्रावक गण ही अपने धर्मगुरुओंको निन्दा करेंगे। मिथ्या अवर्णवाद लगायेंगे ॥ १५२ ॥ अर्थ-हे राजन् ! इस पंचमकालमें ५०० पाँचसौ वर्ष व्यतीत होनेपर क्रमसे धर्मकी हानि होती जायेगी। ओर ५०० पाँचसौ वर्षोंमें जैनधर्मका माहात्म्य अतिशय प्रभावनाके साथ बढ़ेगा ॥ १५३ ॥ भावार्थ--हजार वर्षके आधे भाग क्रमसे जैनधर्म घटता चला जायगा। और उत्तरार्द्व भागमें जैन- धर्म क्रमसे बढता जायगा। किसीको यह नहीं समझना चाहिये कि अब जैनधर्म बढ़ेगा ही नहीं। यह बात त्रिलोकप्रज्ञप्तिसे मालूम होती हे कि हजार वर्ष व्यतीत होनेपर एक कलंकी होगा जो धर्मका नाशक होगा। १. मिशित और अगदानारी लोगोसे सच्चे धर्मात्मा पुरुपोकी बडो भारी हानि होगी । वे लोग अपने विपय कपाय को पुष्टिके लिए और अपने कुशिक्षाके मिथ्याभिमानमे धर्मात्माओको सब प्रकारके कष्ट देंगे। निर्दयतासे कार्य करेंगे। वात्सल्य और वन्धुत्व भावना को भगकर अपने धर्मका मत्यानाश करनेके लिए सच्चे धर्मात्माओको गत्रु मानेगे। तथा वीतराग सर्वथा निरपेक्ष-परम पवित्र मां पर दोपगे विरहित और सब प्रकारको आशाको छोडकर ज्ञान-ध्यानमे लीन रहनेवाले धर्मगुरु ( मुनि-आचार्य-ऐल्लक माविका) को ये वन और नारिनविहीन श्रावक निन्दा करेगे । तथा निर्लज्जताके साथ निन्दा करते है। ये लोग स्वय पापी, सदा- नार रहित, कुमिक्षाने विषयोका पोषण करनेवाले और क्रियाहोन पापिष्ठ होगे, सच्चे धर्मात्मा और धर्मगुरुका चारित्र-विचार एवं माती भापना जतान्त पवित और उत्तम होगी। उसको भी ये लोग महन नहीं कर सकेगे, उनकी इच्छा रहेगी कि यदि सच्चे गर्माया गति और धर्मगु हमारे मत के अनुकूल हो जावें तो हम समस्त समाजमे अपने विषय कपायोकी प्रवृत्ति करा सकते हैं। निता करेगा रुगकर गहज रीतिमे कुमार्गका प्रचार कर सकते है । तभी समाजमे विपय कपायोकी सिद्धि होगी। ऐसी त्मिा गारणाने हो ये लोग मन्ने गुरु गोर सच्चे धर्मात्माओसे पापको प्रवृत्ति कराना चाहेगे। परन्तु अपने जीवनकी परवाह नहीं सारे पगग और गन्ने धर्मान्मा ऐने धमविरुद्ध पापोको प्रवृत्ति कभी नही करेगे । बस, ऐसे ही कारणोसे ये धर्मात्माओकी हानि और गुरु की तो निश कगे। राजमाया HEAPSARI [ ३४ ] HERSHIPSHISHESHereSee स्मशाल रामिलामा भद्रबाहुस्तथा भूप जिनसेनऋषीश्वरः । समतभद्रयोगीन्द्रो बौद्धमातगसिंहभ ॥ १५४ ।। इत्याद्या वरयोगोन्द्रा वर्तयिष्यन्ति निश्चयात् । दिशावासधराः पूज्या देवमानववृन्दतः॥ १५५ ।। पश्चाद'भ्रमुनिजायाप्रमाब्दे मगधेश्वर । कुदकुदाभिधो मौनी भविष्यति सुरार्चितः ॥ १५६ ।। मुनेस्तस्य शृणुध्वच वृत्त मानददायकम् । एकाग्रमनसा भूप कर्मेन्धनहुताशनम् ।। १५७ ।। और आगेके पॉचसौ वर्ष व्यतीत होनेपर एक उपकलंकी मुनि होगा जो धर्मका स्थापन करनेवाला होगा । बस इनके योगसे धर्मकी हानि और वृद्धि होगी। अर्थ-हे राजन् ! परम दिगम्बर ( निग्रंथ )-देव-मानवोंसे पूज्य, बौद्धादि मतरूपी हाथियोंको सिंहके समान नाश करनेवाले, पूर्ण योगो ऐसे भद्रबाहु, जिनसेन, समंतभद्र आदि अनेक मुनीश्वर जैनधर्मके स्थापक होंगे ॥ १५४-१५५॥ अर्थ--हे मगधेश्वर ! हमारे (श्रीवीरनिर्वाण संवत्से) चारसी सत्तर वर्षके बाद देवोंसे पूजित कुंदकुंद स्वामी नामके यतीश्वर होंगे ॥ १५६ ॥ अर्थ--हे राजन् ! उन कुंदकुद स्वामीका आनन्द प्रदान करनेवाला वृत्तांत एकाग्र मनसे श्रवण करो जिस पवित्र वृत्तांतके श्रवण करनेसे कर्मरूपी ईंधन भस्मीभूत हो जाता है ॥ १५७॥ १ अभ्रका अर्थ आकाश है और आकाशसे सख्यामे शून्य लिया जाता है तथा मुनिशब्दसे सात सख्या ली जाती है । और जाया शब्दसे चार सख्या ली जाती है । 'अकाना वामतो गतिः' इकाई दहाई बॉई ओर लिखी जाती है । इस न्यायसे ४७० वर्ष होते है। २ हमारे पास (ऐल्लक पन्नालाल दिगबर जैन सरस्वती भवन, मुम्बईमे ) एक गुटका हे जिसमे श्री कुदकुद भगवान्का जीवन हिंदी भाषामे लिखा है । वह यहॉपर उपयोगी होनेसे अविकल रूपसे अक्षरश रखते है । स० ( वीर सवत् ) ४७० की सालमे वारा नगरमे श्री कुन्दकुन्द मुनिराज थे । तिनका व्याख्यान करिये है। सेठ कुन्द ओर कुन्दलता सेठानीके पाँचवाँ स्वर्गका देव चयकर गर्भ- मे आये तिस दिनसे सेठका नाम प्रख्यात भया । नव महोने पश्चात् पुत्र जन्म भया । तिस समय श्वेताम्बर आम्नाय विशेष होय रही थी। दिगम्बर आम्नायमे कुछेक विक्षेप पड गया था । एक जिनेन्द्रचद्र मुनिराज रामगिरी पर्वतपर रहे। ताके दर्शन सेठजी करवो करे सो याके पुत्र आठ वर्षका हुआ और श्रीजिनेन्द्रचद्र मुनिका आयुकर्म नजीक आया। कुमार कुन्दकुन्द नित्य मुनिके दर्शनार्थ आया करता था। सो पूर्व सस्कारसे कुन्दकुन्द कुमार दीक्षा लेता भया । आचार्य तो देवलोक सिधारे और कुन्दकुन्द मुनिने आचार्यो- का मार्ग विशेष जाण्या नाही सो अपने गुरु स्थापनाके निकट ही ध्यान करते भये । इनके ध्यानके प्रभावसे सिंह व्याघ्रादिक शांत- ASIASHPatpesaweeyeSHO [ ३५ ] Swes यस्याल भावको प्राप्त भये । श्रीस्वामीके ऐसा धान प्रकट भया । तोन ज्ञानके अगोचर श्री सीमधर स्वामी पूर्वले विदेहक्षेत्रके तीर्थंकर निना ध्यान म्वामीने शुरू किया । आदिमे समवशरणकी रचना विधिपूर्वक चित्तरूपी महलमे बनाई। ताके बोच गन्धकुटी रची। और बारह नभा सहित रचना बनाय, सिंहासन ऊपर चार अगुल अन्तरीक्ष श्रीसीमन्धर स्वामीको विराजमान देखकर श्री कु दकुद मुनि नमाकार करना भया । वे हो समयने श्री सोमधर भगवान्ने मुनिराजको धमवृद्धि दीनी। तदि चक्रवर्ती आदि महन्तपुरुपोके बडो विस्मय उत्पन्न भयो। अभी कोई इन्द्रदेव या मनुष्य कोई भी आया नहीं। और स्वामीने धर्मवृद्धि दीनी ताका कारण कहा । नदि महापम नम्वर्ती आदि सब ही राजा उठकर स्वामीको नमस्कार कर पूछते भये । भो सर्वज्ञ देव या धर्मवृद्धि आप कौनको दोनो । ये वनन सुनकर स्वामीने दिव्यध्वनिसे व्याख्यान किया कि हे महापद्म । भरतक्षेत्रके आर्यखडमे रामगिरी पर्वतपर श्री कुद- कुद मुनि तिप्ले हैं उनने अभी मन, वचन, कायकी शुद्धता कर मुझे नमस्कार किया तदि धर्मवृद्धि दीनी । ऐसा वचन स्वामीका गुनकर सब लो कोके अनरज हुओ। भो भगवान् आपकी दिव्यध्वनि पहले हमने सुनी थी कि भरतक्षेत्रादिकके दशक्षेत्रमे धर्मका मार्ग नही । पाखण्डी है । जैनधर्मको नाममात्र जानता नही । विपरीत मार्ग चालेगा। पाखण्डी लोगोकी मान्यता ज्यादा होगी। गुरुद्रोही लोग हो जायेंगे । ग्याल्पित ग्रन्थ वाचेंगे । अनेक पाखण्ड चलेंगे। जिनराजका मार्ग आगिया समान कही-कही दिखेगा। पाखण्डीके मठ जागर-जगह (जागा-जागा) पायेगा । व्यन्तरादि देवनिका चमत्कार प्रतिभामेगा। स्व स्व धर्मको छोड करि सर्व ही लोग उन्मत्त मागंग धर्मगे। अब ऐसा ऋद्विधारी मुनिराजका नाम सुन्या सो हमारे वडो आश्चर्य है । तदि केवली वर्णन करते भये-ऐसे मुनि- गज शिरले होते हैं । आगियाका चमत्कारवत् होते रहेगे | आर्यखण्डमे वे स्वर्गवासी देवका जीव है। या सभामे रविप्रभ नामका देव है ना वह अगले भवका भाई है । ऐसा शब्द होते ही दोय देव श्रीभगवान्के निकट आये। नमस्कार कर सकल व्याख्यान पुरले भगे। और मुनिगज का दर्शन करने वास्ते रामगिरी पर्वतपर आवते भये । ता समय रात्रि थो। तदि मुनिराजको नमस्कार तर नेठ गये। मनिगज बोले नहि । मुनिके शिप्य वहाँपर बिना ध्यान तिष्ठते थे तिनका दर्शन भया उनमे ही वार्तालाप हुआ। वा हो यो गोगधर स्वामी इनको धर्मवृद्धि दीनी । तदि हम यहाँ आये । और स्वामी बोलते नही सो हम भगवान्के समोशरणमे पी., । [गते है] या कहकर देव भगवान के समोगरणमे गये। और प्रभातका समय भया । तदि प्रभातका समय भया Timनो नमस्कार किया। भीर गरिफा सर्व सम्बन्ध श्री सीमधर स्वामी सम्बन्धी सर्व विधिपूर्वक मालूम किया। गोरी, दो देव आपके दर्शन करने को दाया। आपके दर्शन कर पीछे ही समोगरण सभामे गया। ये समाचार सुनिकर यो मनि विशेष शानदकू पाप्त गया । और चोडेमे ऐमा शब्द प्रकाशते भये कि अब श्रीसीमवर स्वामीका दर्शन साक्षात् नामार आदि लेयेंगे। गाहार स्वामी फिर मोन धारण करी । ध्यानमे मग्न भये। ऐमा ध्यान आवे जदी वैसा काम फिर दो नार दिनमे चित्त की स्थिरता से ऐसा ही ध्यान प्रकट भया । अर समोगरण बनाया । और साक्षात् श्रीसोमधर पानी तो नागार करता भगा। ये हो समय फिर धर्मवृद्धि भगवान् की हुई और प्रश्न भया। भगवान् कही जो देव गया छा (1) गो गाघा नाया। अब उगको निगम हुआ कि दर्शन बिना सर्व त्याग है। तदि देवा कही भो स्वामी वे आये नहीं। तब । मree । ३६ ] न्यायालयाला राजा ईलाजन्य राज्याच्या भगवान् आज्ञा करी तुम बे समय गए । देव पूछते भये वे समय कौन सा ? तब भगवान् कही । यहा रात्रि होय हे वहा दिन होय हे वहा रात्रि हे यहा पर दिन हे । सूर्यका गमन ऐसा हे । सो तुम वहा दिवममे जाओ तो उनका आगमन होवेगा। ऐसा वचन सुनकर वे दोनो मध्याह्न समय आये । मुनिराजका दर्शन हुआ । परस्पर वचनालाप हुआ । देव हाथ जोड नमस्कार कर विनती करी । आप विमानमे विराजो । सीमधर स्वामी का दर्शन करो। या वात सुनकर प्रसन्न हुए। आप विमानमे विराजे । आकाश मार्ग जायता स्वामीके सामायिकका समय आगया तो सामायिक करते वखत पीछी हाथसे गिर पडी अर पवनका वेग अत्यत लागा। तब स्वामी कही हमारा गमन नही । क्योकि मुनिराजका वाना विना मुनिराज पिछाणा नही जाय । तव देव पीछी ढूढनेका वडा यत्न किया । पीछी पाई नही। तब गिद्ध पक्षीके पख वहाँ पर पडे हुए देवोने देखे । उनको अति कोमल देख पीछी बनाय श्री मुनिराज को सोपी। तदि आप कोमल जान अर धर्मकार्य करने निमित्त अगीकार करी। फिर आगे गमन किया। इस हेतुसे गृद्धपिच्छाचाय नाम पड़ गया। विदेह क्षेत्रमे जाय पहुँचे । श्रीसीमधर स्वामीका समोगरण मानम्तभकी विभूतिको देखकर प्रसन्न हुए। आप अतरग की शुद्धता धार विमान से उतर भगवान् के समोशरणमे प्रवेश किया। श्री सीमधर रवामी की तीन प्रदक्षिणा करी। नमस्कार किया स्तुति करी । अहो तुम्हारी महिमा अगम है । अगोचर है। आप सकलवस्तु मदेव देसो हो। आप जगत् गुरु हो । परमेश्वर हो । आपके नामसे अनेक जन्मके पाप बिलय हो गए है। आप केवलज्ञानी सर्व प्रतिगामी हो । आप पूज्य हो । आप ब्रह्म हो । महेश हो । परब्रह्म रूप हो । चतुर्मुख हो । गणधरादिक देव तुम्हारे गुनगान करते थक गए, हमारी कहाँ सामर्थ्य । आज हमारा शरीर मफल भया । आज हमारी मोक्ष भई माने है । इत्यादि स्तुति कर पश्चात् देव इनको भगवान् की गध कुटीकी कटनीपर चढावते भये । वहाँके मनुष्योका शरीर ५०० मनुष्यका और ये सात ( छह ? ) हायके । इस कारणसे उस समय नक्रवर्ती आयो । गधफुटीपर नजर गई। तब कुन्दकुन्द मुनिको अपनी हथेलीमे उठाय विचार करता भया । यह कौन-मा आकार है। छह खउमे गह आकार हो देखा नहीं ऐसा आकार कहाँसे आगया । ऐमा आकार कीन-का है। तब चक्रधर भगवान् को पूछता भा हे जिनेन्द्र । यह मनुष्पके आकारका कौन-सा जीव है । तब भगवान्की दिव्यध्वनि हुई। ये भरतके मुनिगज है। तुम पहले धर्मवृद्धिका कारण पूछा या सो यह अब दर्शन निमित्त आये है। ऐसा शब्द सुनकर चक्रधर प्रसन्न होय मुनिराजको स्टनीपर विराजमान तिये । नमस्कार करता भया । और मुनिराजका नाम एलाचार्य प्रगट किया। और भगवान की आज्ञा भई उनको माल सदेह का निवारणेवाग मिद्धात सिखलाओ और ग्रथ लिखावो । अव कुन्दकुन्द मुनिके जा मदेह था मो भगवान् के पागमे सब निवारण किया । निम्मदेह भये । एक दिन चक्रधर विनती करी । आप आहार करने निमित्त उनगे। तन आप कहा जोग्यता नाही । काहेते ? यहाँ जन दिन हे तब हमारे क्षेत्रमे रात्रि है। हम वहांके उपजे गहाँ आहार कैसे अगीकार करें। सात दिवस तक मुनिगज वहाँपर ( विदेह क्षेत्र ) निराहार रहे । भगवान्की दिव्यध्वनि सुनकर तृप्त रहे । क्षुधा बाधा न देतो गई। चार शाम लिसाये । गयो के नाम ये है.- मतातर निर्णय ८४०००, सर्वशास्त्र ८२०००, कर्म प्रकाश ७२०००, न्याय प्रकारा ६२००० ऐगे चार गय लेकर भगवान्मू आज्ञा मागी। देव विमानमे बैठालकर रामगिरी पर्वतगर आये। देव अपने स्थानको गय । अव गव हो आज्ञा मानते भये। अगणित MPLAIMER THeAHESHeSweHHIGHeenesses [ ३७ ] भारतेस्मिन् पुरे वारे स्वाते भव्यनृभिर्मते । कुदाह्वो भव्यभावाढ्य श्रेष्ठी श्रेष्टगुणान्वित ॥ १५८ ।। कु दा गीलमुभूपाट्या भविष्यति प्रिया । तस्य धर्मरतस्यैव नाम्ना स्त्री तिलकोपमा ॥ १५९ ।। शुभा तम्य कुक्षी मुरे पूजन क दकुंदाभिध. सुत । भविष्यत्यग्रवमय॑ वर्द्धनकदिवामणिः ॥ १६० ।। निधनाने य कीमारे पूर्वमस्काग्योगतः । जिनचंद्रमुनेः पावें जातरूपं ग्रहिष्यति ।। १६१ ॥ नमालकारकावादीन् गन्निधे स्वगुरो स च । तथा हि मुनिमार्ग च ज्ञात्वा वै नूतनऋपि ॥ १३२ ।। बरणोभषणाद्री न ध्यान स्वमक्षिकारणम् । परिष्यति महाभीमे स्वाधघाताय ह्यात्मवित् ।। १६३ ।। अर्थ---हे राजन् । इस भरत क्षेत्रमें भव्य नीतिमान राजासे शासित और प्रसिद्ध वारा नगरमे भव्यात्मा, अनेक श्रेष्ठ गुणोसे विभूषित कुन्द नामका एक प्रसिद्ध सेठ होगा ॥ १५८ ॥ अर्थ--हे राजन् ! उस सेठ को स्त्री का नाम कुन्दलता होगा । जो शीलवती-अतिशय मनोहर अपने पतिको प्रिय और तिल के समान हृदयहारिणी होगी ।। १५९ ॥ अर्थ-हे राजन् ! उस कुन्द नामके प्रसिद्ध धर्मात्मा सेठको महाशीलवती स्त्री कुन्दलताके कूखसे मुख्य दिगम्बर जैनधर्मको बढानेके लिए सूर्यके समान, देवोसे पूजित और दिव्यशक्तिके धारक श्री कुन्दकुन्द नामके पुत्र रल उत्पन्न होगे ॥ १६०॥ अर्थ--हे राजन् ! वह कुन्दकुन्द आठ वर्षीय बालक पूर्वभवके पुण्योदयसे ( रामगिरि पर्वतपर ) श्री- जिनचन्द्रमुनीश्वरके पास नग्न दिगंबर भगवती जिनदीक्षाको धारण करेंगे ॥ १६१ ॥ अर्थ--हे राजन् । वे कुन्दकुन्द नामके बालयती अपने गुरुके समीप शन्दशास्त्र (व्याकरण) काव्य- शास्त्र और अलंकार शास्त्र आदि शास्त्रोंका अभ्यास करेंगे। इस प्रकार मुनिमार्ग ( यत्याचार ) को भी जान लेंगे ॥ १६२ ॥ अर्थ- हे राजन् ! इसलिये अब उनका विद्याभ्यासका होना बन्द हो जायगा और आत्माके ज्ञाता वे प्रति गममागोगा। लामो प्राणियोने श्वेतावर धर्म छुडाय दिगबर किये। धर्ममार्ग प्रवर्तीया। हजारो व्रती भये । गातो गनि हुन्य हुन्द म्यागोका नमलारने मसारसे वैगग्य हुआ और दीक्षा धारण की। कितने ही राजाओने जैनधर्म स्वीकार सामोरे जा पाने । कुन्दकुन्द स्वामी के राघमे ५९४ मुनियोकी सख्या हो गई। A ।
[ ३८ ] हृत्पकजे यति सोपि ध्यानज्ञ स्मरसोवशी । श्रीसीमधरदेवस्य प्राचिदिग्नायकरय वै ॥ १६४ ।। यथाविधि नराधीश सद्मनस्तस्य मोदभूत् । कृत्वा न रचना पश्चात् गाधकुटया मनोहराम् ।। १६५ ॥ सस्थाग्य परया भक्तचा तदोपरि मनोहरम् । हरिविष्टर महोत्तुग नानाशोभासमन्वितम् ।। १६६ ।। तदोपरि जिनाधीश सोमधरमघापहम् । महाकाय मनोज्ञ च निस्सही निस्सही पुनः ।। १६७ ।। जय त्रीणि इति प्रोच्य विप्रभा वै प्रदक्षिणा । साष्टागविधिना पश्चात् नमस्कार करिष्यति ।। १६८ ॥ तदा हि धर्मवृद्वि च दास्यति तत्र भूमिगट् । चक्रवदियो भूपा. श्रुत्वा ता हर्पदायकाम् ।। १६९ ।। प्रापूर्व विरमय पश्चाच्चक्री चानस्य त जिनम् । कोपि नात्र समायातो दत्ता कस्मे त्वया प्रभो ॥ १७० ।। इत्युत्तर तदा तस्मै सोमधरजिनाधिराट् । दास्यति मगधाधीश तस्य सदेहहानये ॥ १७१ ।। अपना समय महाभयानक-धरणीभूषण ( रामगिरि ) नामक पर्वतपर अपने पापोंको नाश करनेके लिए स्वर्ग मोक्षका कारणभूत ऐसा उत्कृष्ट ध्यान लगायेंगे ॥ १६३ ॥ अर्थ-कामदेवको वश करनेवाले और ध्यानकी खूबीको जाननेवाले वे यति श्री कुन्दकुन्द स्वामी अपने हृदय कमलमें यथाविधि समवशरणको रचना कर उसमें एक मनोहर गधकुटीकी रचना करेंगे । उस गंधकुटीपर अनेक प्रकारको शोभासे युक्त महोन्नत और सर्वाग सुन्दर ऐसा दिव्य सिंहासन स्थापन करेंगे । उस सिंहासन- पर समस्त प्रकारके पाप पंकको दूर करनेवाले त्रिलोकके ज्ञाता सर्वज्ञ महा मनोज्ञ अनंतगुणोंके स्वामी श्री जिनेंद्र भगवान् पूर्वविदेहके नायक श्रीसीमंधर स्वामीको बड़ी भक्तिसे स्थापन करेंगे। फिर तीन बार निस्सही निस्सही निस्सही ऐसा शब्दका उच्चारण करेगे ॥ १६४-१६७ ॥ अर्थ----फिर वे कुन्दकुन्द मुनि तीन बार जय-जय शब्दोका उच्चारण कर तीन प्रदक्षिणा देंगे। फिर विधिपूर्वक अष्टांग नमस्कार करेंगे और उधर विदेह क्षेत्रमें सीमन्धर स्वामीकी दिव्यध्वनिमें धर्मवृद्धि होगी। उस धर्मवृद्धिको श्रवण कर चक्रवर्ती आदि अनेक राजा और सभाके देव, मनुष्य आश्चर्यको प्राप्त होंगे। उसी समय चक्रवर्ती प्रभु श्री सीमंधर स्वामीको नमस्कार कर प्रश्न करेगा कि हे स्वामिन् ! इस समय समवशरणको द्वादश सभामें कोई भी देव, मनुष्य नहीं आया है। आपको दिव्यवनिमें धर्मवृद्धि फिसके लिए खिरी? ॥१६८-१७०॥ अर्थ-उस समय प्रभु सीमंधर स्वामीने चक्रवर्ती आदि महान् पुरुषोंके सन्देहको दूर करनेके लिये कहा ॥ १७१ ॥ Searinारस्यमय anememe-TeamesesearnSHIP स्या [ ३९ ] TOTRAMESHEEMBERDSm तस्याश्च कारण सर्व धर्मप्रभावक शुभम् । एकाग्रमनसा त्वच सार्वभोमाधिराट् शृणु ॥ १७२ ।। अस्मिन् सार्द्धद्वयद्वीपे क्षेत्राः सति मनोहरा । खमुनसोमसख्याड्या भव्याभव्यनृभिर्भूताः ॥ १७३ ॥ ग्वऋतुचद्रक्षेत्रेषु समयः शाश्वतो मत. । वृद्धिह्रास कदा नास्ति शाश्वतः पुरुपोत्तम ।। १७४ ॥ धर्मो हि शाश्वतो ह्यत्र नो कुदेवः कुलिंगिनः । नास्त्यत्र मतमन्यद्धि वीतरागमतात्परम् ॥ १७५ ।। समय. पक्तिक्षेत्रेषु वृद्विह्रासयुत सदा । वर्तते ऋतुभेदेन स स्वामी ह्याह तान् प्रति ।। १७६ ।। मोगभूमिगते तत्र वृपभादिजिनेश्वरा । अतीता मादृशा सर्वे त्वत्तुल्या. पुरुपोत्तमाः ।। १७७ ॥ अधुना पचम कालस्तत्रैव वर्त्तते खलु । मत्यादिज्ञानहीनागा माः कुज्ञानमडिताः ।। १७८ ।। Sercan be uselulele MEMEMLA अर्थ--भगवान् श्री सीमंधर स्वामीने कहा कि धर्मका शुभ प्रभावका उत्पादक उस धर्मवृद्धिका कारण हे सार्वभौम चक्रेश्वर | सावधान मनसे श्रवण कर ॥ १७२ ।। अर्थ--ढाई द्वीप क्षेत्रमें कर्मभूमिके १७० एकसौ सत्तर मनोहर क्षेत्र है जिनमें भव्य-अभव्य बहुतसे मनुष्य रहते हैं ॥ १७३ ॥ अर्थ---उनमें १६० एकसौ साठ तो ऐसे क्षेत्र हैं जो सदा सर्वदा शाश्वते रहते हैं, जिनमें कालचक्रके द्वारा परिवर्तन (घटती-बढतो) नही होता है । जिन क्षेत्रोमें सदा तीर्थङ्कर परमदेव शाश्वते विराजमान रहते है ॥१७४॥ जिस विदेह क्षेत्र (एक सौ साठ क्षेत्र) में कुदेवोका प्रकाश सर्वथा नही है, न कुलिंगी गुरु ही किसी भी फालमें होते हैं । वहाँपर सदेव एक जिनधर्म ही शाश्वता धर्म रहता है । अन्य धर्म नही रहता ॥ १७५ ॥ अर्थ--श्री सीमंधर स्वामीने चक्रवर्ती आदि भव्यजीवोंको कहा कि भरत और ऐरावतमें छह समयके कारण वृद्धि और लास होता है ।। १७६ ॥ अर्ग-भरत ओर ऐरावतमे भोगभूमिका चक्र नष्ट होनेपर वृषादि चतुर्विशति तीर्थकर मेरे समान पुरु- पोत्तम सो गये । और तेरे (चक्रवर्तीके) समान चक्रवर्ती भी हो गये ।। १७७ ।। अर्थ-रे चक्रिन् ! इस समय भरतक्षेत्रमें पंचमकाल प्रकट हो रहा है। जिससे वहाँके जीव बुद्धिहीन गौर रजानो हो रहे है ॥ १७८ ॥ । ।
[ ४० ] ह्यधुना जिनधर्मस्य जमरामारामायण जयजयाजमायलायमसरामा eHe- Resesumeete श्रावकाश्च क्रियाहीना यत्याचारपरान्मुखाः । मुनीश्वरा नराधीश यत्रत्या यत्र निश्चयात् ॥ १७९ ।। यत्र भूपा हि धर्मस्य नाशका वा द्विजा खला । वर्तते भो धराधीश कालदोषप्रभावत ॥ १८० ॥ धारक स्वर्गजो मुनि । कुन्दकुन्दसमाख्यातो ध्यानमात्रपरिग्रह ॥ १८१ ।। धरणीभूपणाद्री हि ध्यानलीनो हि मा स च । भक्तिपूर्वं कृतो भूप नमस्कारस्ततो मया ।। १८२ ।। धर्मवृद्धि. प्रदत्ता हि तस्मै शुद्धात्मने वरा । इति श्रुत्वा समालोकाश्चक्रवादयो घना ॥ १८३ ।। महद्धर्ष च संप्रापु कृत्वा च विस्मय हृदि । ह्यधुना भारते क्षेत्रे ऋषि स्याच्चेदृशो महान् ॥ १८४ ॥ देवेंद्रा निर्जरा. सर्वे भूमिपाश्च यतीश्वरा. । स्वकरौ कुड्मलीकृत्य तस्मै कुर्नति तदा ।। १८५ ।। प्रभो केनाप्युपायेन तस्य चागमन भवेत् । तदा श्रीमज्जिनाधीश. कारण ध्वनिनावदत् ।। १८६ ।। अर्थ---हे चक्रधर ! पंचमकालमें वहाँके श्रावक क्रियाहीन होगे तथा वहाँके यतियोंमें यत्याचारका परि- ज्ञान नहीं होगा ॥ १७९ ॥ अर्थ हे राजन् ! पंचमकालमे भरतक्षेत्रके राजा गण ही धर्मके नाशक होंगे । और ब्राह्मण लोग जैन- धर्मका द्वेष करनेवाले क्रूर स्वभाव वाले होंगे ॥ १८० ॥ अर्थ--चक्रधर, इस पंचम कालके भरत क्षेत्रमे अब भी स्वर्गसे अवतार लेनेवाले, जिनधर्मके धारक ध्यान मात्र परिग्रहको धारण करनेवाले महा प्रभावशाली कुन्दकुन्द नामके मुनिने धरणीभूषण नामके पर्वतपर ध्यानमे संलीन होकर मेरा (सोमंधर स्वामीका) एकाग्र मनसे चितवन किया है और भक्तिपूर्वक मुझे (सीमंधर भगवान्को) नमस्कार किया है । अतएव मेरी दिव्यध्वनिमें स्वभावरूपसे उस शुद्धात्मा कुन्दकुन्द 'मुनिराजको धर्मवृद्धि प्रकट हुई है । श्रीसीमंधर स्वामीसे इस बातको सुनकर द्वादश सभामें स्थित सपूर्ण भव्यजीव आश्चर्य- को प्राप्त हुए। और विचार किया कि अब भी भरत क्षेत्रमे ऐसी दिव्य विशाल शक्तिके धारक महान् तपस्वी मुनि है ? तत्काल ही समस्त इन्द्र, देव, मनुष्य और चक्रवर्ती आदि राजाओंने कुन्दकुन्द मुनिराजको अपने दोनों हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक नमस्कार किया ॥ १८१-१८५ ॥ अर्थ--सीमंधर स्वामीको उसी समय किसीने पूछा कि हे प्रभो ! उन मुनिराजका आगमन यहाँपर किसी प्रकार हो सकता है । तब सोमंधर स्वामीने दिव्यध्वनिके द्वारा कहा ॥ १८६ ।। ? सच्चयायालयाच्या [ ४१ ] जाजराजमान्यास रविकेतुस्तथा चद्रकेतुर्की निर्जरौ वरौ । पूर्वमित्रे मुनीन्द्रस्य प्रेषणीयौ तदा भवेत् ॥ १८७ ।। चामगै पूर्वसवधं श्रुत्वा नत्वा जिनेश्वरम् । आगमिष्यतो राजेन्द्र तदानयनसिद्धये ।। १८८ ॥ आयास्यतश्च तौ रात्री दृष्ट्वा मौनीश्वर वरम् । ध्यानमग्न महाशात नन्वा तत्पादपकजम् ।। १८९ ।। युर्वं नैव रात्रौ च ध्यानस्था हि यतीश्वरा. । स्थित्वा कियत्प्रम काल पश्चात्तव यास्यतः ॥ १० ॥ प्रभाते तस्त्र शिष्या हि कथयिष्यति रात्रिजम् । निर्जरौ द्वौ समायातो स्वामिन् ते दर्शनाय वै ।। १९१ ।। अस्यावा पूर्वजो मित्रे कथयित्वा चतौ गतौ । सीमधरसभास्थानादागतौ वै तदाप्तये ।। १९२ ॥ - Messiesmesimama mwege अर्थ--हे राजन् ! इस सभामें बैठे हुए रविकेतु और चन्द्रकेतु नामक दो देव श्रीकुन्दकुन्द मुनिराजके पूर्व भवके मित्र हैं। (अर्थात् कुन्दकुन्द मुनिराजका जीव स्वर्गसे चयकर आया है सो स्वर्गके दो देव जो सीमंधर स्वामीको सभामें बैठे हुए हैं वे दोनो ही उनके मित्र हैं ।) ये दोनों उनको यहॉपर ला सकते हैं ॥ १८७ ॥ अर्थ-वे दोनो देव अपना संबंध श्रवण कर तत्काल ही श्रीसीमंधर स्वामीको नमस्कार करेंगे और वे धरणीभूषण पर्वतपर उनको (कुन्दकुन्द स्वामीको) लेनेके लिए आवेगे ॥ १८८ ॥ अर्थ--वे दोनो देव रात्रिमें वहॉपर (कुन्दकुन्द मुनिराजके पास) आवेंगे।उस समय यहाँ शात मुनिराज मौनमें स्थित ध्यानमें संलग्न होगे । वे देव उन मौनी मुनीश्वरके चरणकमलको नमस्कार कर कुछ कालपर्यंत बैठेगे ॥ १८९ ।। अर्थ--मुनीश्वरोके रात्रिमें नियमसे मौन व्रत होता है । अतएव कुन्दकुन्द स्वामीके भी मौन व्रत होगा । और वे मौन व्रत सहित ध्यानमें लवलीन होगे । इसलिये देवोको यह मालूम होगा कि मुनीश्वर बोलते ही नहीं । अव यहाँपर बैठे-बैठे क्या करेंगे; चलोपीछे चलेंगे, ऐसा विचार कर वे दोनो ही देव वहाँसे पीछे चले आएंगे॥१९०॥ अर्थ--हे राजन् ! प्रातःकाल श्री कुदकुद स्वामीके शिष्य, स्वामीसे रात्रिके समयमें देवोके आनेफा जो गनात हुआ 'गा उसे कहेगे। और यह भी कहेगे कि वे देव श्रीसीमंधर स्वामीकी द्वादश सभामसे आये थे। आपके पूर्व भार मिल थे। और आपके दर्शनके लिए आये थे। परतु आपको मौनी देखकर पीछे चले गये॥१९१-१९२॥
जयमालायच्या रामजाजराज्याच्या [ ४२ ] तदास्मात्सर्ववृत्तात श्रुत्वा योगीश्वरोऽपि स. । करिष्यत्येव तत्रोच्चैर्दुर्घटं नियम तदा ॥११९३ ।। यावन्मे दर्शनप्राप्तिः न भवेत्तस्य निश्चयात् । वेदप्रमस्य न्यादस्य त्यागः स्यान्नात्र सशयः ॥१९४।। निर्जरौ ती समागत्य तत्रापृच्छय जिनेश्वरम् । ज्ञात्वा तत्कारण भूप चायास्यत पुनश्च तौ ॥ १९५ ।। अत्र रात्रिदिवा तत्र रवभ्रमणतः खलु । विपर्यय च जानीहि सदा नैवात्र संशयः ॥ १९६ ।। वामरे तौ समागत्य नत्वा तत्पादपकजम् । प्रकथ्य सर्ववृत्तात तदने तौ च स्थास्यतः ।। १९७ ।। तदविमाने समासह्य यास्यति स मुनीश्वर. । केवल धर्मकार्यार्थ पूर्वपुण्येन प्रेरित ।। १९८ ॥ अर्थ--अपने शिष्योंसे उपर्युक्त वृत्तांतको सुनकर श्री कुंदकुंद स्वामी तत्काल 'जबतक मुझे श्रीसीमंधर स्वामीका प्रत्यक्ष दर्शन न होगा तबतक मेरे चारों ही प्रकारके भोजनका सर्वथा त्याग है।' इस प्रकारका बड़ा भारी दुर्घट नियम करेगे ॥ १९३-१९४ ।। अर्थ--हे राजन् ! उधर देव पीछे लौटकर सीमंधर भगवान्के समवशरणमे जायेंगे और वहॉपर श्री सीमंधर स्वामीको नमस्कार कर पूछेगे कि हे स्वामिन् ! वे मुनिराज यहॉपर क्यों नहीं आये ? स्वामीजी अपनी दिव्यध्वनि द्वारा कहेंगे कि-॥ १९५ ॥ अर्थ-हे देवगण ! कुन्दकुन्द स्वामी मौनस्थ क्यों रहे और तुम्हारे साथ क्यों नहीं आये। इसका कारण यह है कि जब यहॉपर दिवस होता है तब वहॉपर [भरतक्षेत्रमें रात्रि होती है । क्योंकि सूर्यके भ्रमणसे काल- का परिवर्तन होता है। इसलिए रात्रिमें मुनि बोले नहीं और तुम्हारे साथ आये भी नहीं। समयकी विपरीतता ही इसका मूल कारण है ॥ १९६॥ अर्थ--फिर वे देव दिवसमे (भारतमें जब दिवस था) आयेगे और मुनिराजको नमस्कार कर और सर्व वृत्तांत कहकर स्वामीके सामने बैठ जॉयगे ॥ १९७ ॥ अर्थ--वे कुन्दकुन्द स्वामी उन देवोके विमानमें बैठकर विदेह क्षेत्र जायँगे। वे मुनिराज पूर्व पुण्यसे प्रेरित होकर केवल धर्म कार्यकी सिद्धिके लिए ही विदेह क्षेत्रको विहार करेगे ॥ १९८ ॥ आगे ग्रन्थकार उस कथनके अनुसार स्वयं वर्णन करते हैं । च्यामि माजयमायाजालमा मोर समस्या [ ४३ ] तस्य चकार मलयालमत्त RAMPAHIPATHIDAmpAmasmeerammam तारक भृर्धेरान जिनसमाढ्यान् नानाश्चर्यान् मुनिश्च सः। चकार गमन चाने पश्यन् हि सकला महोम् ॥१९९।। विभोरास्थानमाराच्च दृष्ट्वा यानाश्च तै. सह । उत्तीर्यानंदसयुक्तो विवेश शर्मदायकम् ।। २०० ।। मदने नददे सुरनिर्मिते । यातायातनृभिर्युक्तेऽच्युतोपमविराजिते ॥ २०१ ।। निस्सही त्रीणि त्व नाथ जय त्रीणि दयापते । इत्यादिशुभशब्दौघान् कुर्वन् वै यतिराट् वरान् ।। २०२ ।। तप्तहाटकसादृश्य सभाद्वादशमडितम् । महाकाय महातेजः शाम्यरूपमनौपमम् ।। २०३ ।। जातरूपधर धीरमनिमेप निरामयम् । दात सावं मनोहार निराभरणभास्वरम् ॥ २०४ ।। प्रातिहार्यादिभूत्योपलक्षित रागवर्जितम् । वसुचद्रमहादोपवर्जिताग निरोपमम् ।। २०५ ॥ पद्मासनसमासीन शतेन्द्रपूजित वरम् । वेदाग्न्यतिशययुक्त कोटिमातंडयुत्प्रभम् ।। २०६ ॥ हारक शुद्ध सीमधर जिनेश्वरम् । ईदृश सर्ववेत्तार हरिविष्टरसस्थितम् ।। २०७ ॥ अर्थ-कुन्दकुन्द स्वामीने विमानमेंसे हिमालयादि पर्वतोपर विचित्र शोभायुक्त कृत्रिम जिन मदिरोंको देखते हुए और सम्पूर्ण पृथ्वीको विचित्र शोभाको देखते हुए आकाशमें विहार किया ॥ १९९ ॥ अर्थ--श्रीसीमधर तीर्थकरका समोशरण समीप आया हुआ देखकर श्री मुनि कुन्दकुन्द उन दोनों देवों- के साथ विमानसे नीचे उतरे और उन्होंने सुख देनेवाले समोशरणमें प्रवेश किया ॥ २०० ॥ अर्थ-वह सीमन्धर स्वामीका समोशरण अतिशय आनन्दका प्रदाता देवो कर निर्माण किया हुआ और मनुष्योंके आवागमनसे खचाखच भरा हुआ स्वर्गके समान शोभा दे रहा था । २०१ ।। अर्थ--मुनि कुन्दकुन्द स्वामीने समोशरणमें निस्सही निस्सही निस्सही इस प्रकार तीन बार शब्दोंको उच्चारण कर जय जय जय शब्दोको बोलकर प्रवेश किया ।। २०२॥ अर्थ--तपाये हुए सुवर्णके समान देदीप्यमान शरीरको धारण करनेवाले, द्वादश सभासे विभूपित, विशाल कायसे मण्डित, महातेजस्वी, साम्यरूप, अनुपम, जातरूप (दिगम्बर) धीर वीर, नेत्रोके टिमकार रहित, रागरहित, दांत, गर्व जीवोके हितकारक, मनोहर, बिना ही आभूषणोके सुशोभित, सूर्यसे भी अधिक प्रभा- वारे, प्रातिमार्यादि विभूतिसे मस्ति, रागरहित, अठारह दोषरहित, निरुपम, पद्मासन विराजे हुए सो इन्द्रोसे पूजित, ती अतिशय युक्त, मसारके तारक, महा मनोज्ञ, परमविशुद्ध, सर्व तत्त्वोंको जाननेवाले, सर्वज्ञ, CAMER तन [ ४४ ] आवालब्रह्मचर्यरथ शकर शरणार्थिनाम् । मुक्तिकातावर सिद्ध भव्याना सिद्धिकारकम् ।। २०८ ।। सगाद्वादशगर्भस्थ सकलनददम् । साग्निकरदेहाच्या वेदाननावभूपितम् ।। २०९ ॥ चतुर गुलगस्पृश्य भ्राजमान महोज्वलम् । स मुनि कुन्दकुन्दाख्यो ददर्श त मुदान्वत. ।। २१० ।। अधोमध्योदभ्रगणोद्भीनचित्तो मुनीश्वर । श्रीश्च प्रदक्षिणा भावात् ददी स्वस्याघहानये ।। २११ ।। कृतार्थ गन्यमान स्व धन्योद्य प्रभुदर्शनात् । जातोऽस्मि कर्मनिमुक्त स मुनिदिनिर्भरः ॥ २१२ ।। साल्टागेन महानदात् नत्वा तत्पादप जम् । स पुन. कर्तुगारेमे स्तव तस्य तदाप्तये ॥ २१३ ।। भव्याभोजरवे त्व हि जय नद जिनाधिराट् । दयाधीश नमस्तुभ्य याहि मा शरणागतम् ॥ २१४ ।। सर्वदर्शी, अनन्त चतुष्टय मंडित, सिंहासनपर विराजे हुए, शरणार्थी पुरुषोंको सुखके करनेवाले, मुक्ति कांताके पति, भव्योंको सिद्धि प्रदान करनेवाले, बारह प्रकारकी सभाके मध्य विराजे हुए, सम्पूर्ण जीवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले, अपने हाथसे साढे तीन हाथ के शरीरकी ऊँचाईको धारण करनेवाले, चार मुखवाले, सिंहासन पर चार अंगुल अन्तरीक्ष विराजमान, महाउज्ज्वल, परमशांत, निविकार, ऐसे श्रीसीमंधर स्वामीको कुन्दकुन्द भगवान्ने देखा ।। २०३-२१० ।। अर्थ----मुनिराज श्री कुंदकुंद स्वामीका शरीर ७ हाथका था और विदेह क्षेत्रमें पाँचसो धनुपका शरीर होनेसे मुनिराजको विचार हुआ कि मै इतने उच्च विशाल कायके मनुष्योंके मध्य किस प्रकार प्रदक्षिणा दूँ कदाचित् किसीके नीचे दब गया तो? इस विचारसे मुनिराज ऊर्ध्व, अधः (नीचे) और मध्य क्षेत्रको देखा फिर उन्होंने भावोंसे पापके नाश करनेके लिए तीन प्रदक्षिणा ची ॥ २११ ॥ अर्थ-प्रभु श्रीसीमंधर स्वामीके दर्शनसे अपनेको कृतकृत्य मानते हुए मुनिराज कुन्दकुन्दने अपनेको धन्य माना और हर्पसे प्रफुल्लित होकर अपनेको कर्म रहित समझ लिया ॥ २१२ ॥ अर्थ--भगवान् श्रीसीमन्धर स्वामीके चरण-कमलोंको महान् हर्पसे साष्टांग नमस्कार कर भगवान के गुणोंकी प्राप्तिके लिए भक्तिसे प्रभुका स्तवन प्रारम्भ किया ॥ २१३ ॥ अर्थ-हे भक्ककमलोंको प्रकाश करनेके लिये सूर्य ! जयवत हो, नंद, चिरंनंद, हे जिनाविराट, हे दयाधीश आपको नमस्कार है । हे प्रभो मुश शरणागतकी रक्षा करो ॥ २१४ ।। LCSHASHISHCHCSweS .
[ ४५ ] वीतराग महादेव नमस्तुभ्ध चिदात्मने । निर्विकार जिनाधीश पूज्यपाद नमोस्तु ते ।। २१५ ।। भवसिधोमहाबोर तारय तारक प्रभो । त्वदृते का समर्थोस्ति भवदु खविघातने ।। २१६ ।। द्रव्याढ्योऽपि च निर्द्रव्य करोति स्वात्मसदृश । त्वत्तुल्य मा जिनादित्य कि न करोपि दीनराट् ॥ २१७ ॥ मिथ्याधतमसो नाग कुरु कर्मारिणा विभो । शुद्धरत्नत्रयप्राप्तिर्भवत् नव दर्शनात् ।। २१८ ।। यदहोपार्जितोनत क्षयमस्तु तदप्यहो । शिवदा निर्जरा मेस्तु सर्वेपा कर्मणा प्रभो ॥ २१९ ॥ अनतानतसमये भ्रमितोऽपि जिनेश्वर । नालोकितो हि त्व देव मया मोहितचेतसा ।। २२० । किंचित् मोहप्रघातेन मया त्व केवलेक्षण । ईक्षितोपि दयाधीश अद्य सुमतिधारक ॥ २२१ ।। त्राहि तोर्थग भो म्वामिन् चाद्य मोह च मे हन । स्मरारे भो सरोजाक्ष कर्मसताननाशक ।। २२२ ॥ अर्थ-हे वीतराग ! हे महादेव ! हे चिदात्मा सीमधर स्वामी, आपको नमस्कार है । हे निर्विकार, हे जिनाधीश, हे पूज्यपाद आपको नमस्कार है ॥ २१५ ॥ अर्थ---हे महावीर सीमधर देव ! हे तारक प्रभो ! मुझे संसारसमुद्रसे पार करो। आपको छोड़कर अब कोई भी ससारके दुःखाका नाश करनेके लिये समर्थ नहीं है ॥ २१६ ॥ अर्थ--लोकमें ऐसा देखा जाता है कि धनाढ्य लोग अपनी भक्ति करनेवालेको अपने समान धनवान् बना लेते हैं । तो हे प्रभो, हे दीनानाथ | आप मुझ दीनको अपने समान क्यो नही बनाते ? ॥ २१७ ।। अर्थ- हे विभो । मिथ्यात्व अंधकारका नाश करो। और कर्मरूपी शत्रुओका भी नाश करो। हे प्रभो आपके पवित्र दर्शनसे शुद्ध रत्नत्रयकी प्राप्ति हो ॥ २१८ ॥ अर्थ-हे भगवन् । जो मैंने अनादिकालसे अनंत पाप उपार्जन किये है उनका नाश हो । और मोक्षको प्रदान करनेवाली समस्त कर्माको निर्जरा हो ।। २१९ ॥ अर्थ-हे प्रभो । मे अनन्तानन्त संसारमें चिरकालसे भ्रमण करता फिरा परन्तु मुझ मोहीको आज तक आपके पचिन दर्शन नहीं हुए ॥ २२० ॥ अ-हे प्रभो । आज मेरे मोहका उदय किंचित् प्रघात हुआ है इसलिए मुझको आज आपके पवित्र वान प्राप्त हुए हैं। विलज्ञानिन् । हे जिनराज ! सुमतिको धारण करनेवाले हे तीर्थेश ! हे स्वामिन् ! हे राममंतानना ! हे.स्मरारे ! आज मेरा मोहफम नाश कीजिए और मेरी रक्षा कीजिए ॥ २२१-२२२ ॥ न्यायालयाच्यामाराहायसन्यायालय . 1 [ ४६ ] गुणानां नैव पारोरिन ते प्रभो रत्नराशिनत् । अन्धो यथा निगलन देहि गा त्वत्पदं वरम् ।। २२३ ।। सीमंधर जिनाभीश शरणागतवाल । महापूजा गहाभाग पाहि मा गलत खलु ॥ २२४ ।। चित्तदेहनाश मे कुरु वे वित्तभाववित् । लवृत्ते नेन हानि स्यात् राशगस्य दयापते ।। २२५ ।। इत्यादिशुभनामीघेः रतुत्वा तीर्थाधिपं रान । गुहुमुहु प्रणागोच्चेविनम्रो भक्तिगडितः ॥ २२६ ।। पश्चात्सर्वमुनीन्द्रीघान् नत्वा नानगिनित्तान् । तैर्दत्तमाशिप लब्ध्वा गराि चिंतयेदिति ॥ २२७ ।। या सर्व नरा अभ्रखगनचापकायगा. । मे तनुमुनिमामो हि क्व तिष्ठामि सभावनी ।। २२८ ।। वव इमे भूधराकारा' वव तनुर्मे लघुरियम् । अतो हि रवागिपीठाधोभागे वाधाविवजिते ।। २२९ ॥ अर्थ-जिसप्रकार समुद्र में रत्नराशिका पार नहीं है उसी प्रकार हे प्रभो ! आपके अचित्य गुणोंका पार नहीं है । और जिस प्रकार समुद्र में निरालंबता है उसीप्रकार संसार समुद्र में आपके सिवाय सर्वत्र निरा- लंबता है । इसलिए हे नाथ आप अपना उत्तम पद मुझे वीजिए ॥ २२३ ।। अर्थ--हे सीमंधर प्रभो, हे जिनाधीश, हे शरणागतवत्सल, हे महापूज्य ! हे महाभाग इस संसारसे मेरी रक्षा करो ॥ २२४ ।। अर्थ-हे मेरे चित्तके अभिप्रायोंको जाननेवाले मेरे मनके संवेहको दूर करो। हे दयानिधे आपके सिवाय अन्य किसीसे यह कार्य हो नहीं सकता है ॥ २२५ ॥ अर्थ-~-इस प्रकार तीर्थकर सीमंधर प्रभुफी मनोहर स्तोत्रों द्वारा स्तुति कर और भक्ति से प्रभुको बारंबार नमस्कार कर वे मुनिराज बहुत ही नम्र हुए ॥ २२६ ॥ अर्थ---फिर सभामें विराजे हुए अनेक ऋद्धियोसे मंडित समस्त मुनीश्वरोको नमस्कार फर ओर उनके दिये हुए शुभाशीर्वादको प्राप्त कर मुनिराज कुन्दकुन्द स्वामी अपने मनमें यह विचार करेंगे ॥ २२७ ॥ अर्थ----कुन्दकुन्द रवामीने विचार किया कि इस सभामें विराजे हुए समस्त मनुष्योका शरीर पांच सो धनुष ऊँचा है । और मेरा शरीर मात्र ७ हाथका ही है इसलिये मनुष्यके कोठे में कहां बेट ? ।। २२८ ।। अर्थ-यहाँके मनुष्य तो पर्वतके समान विशालफाप हैं। और मेरा शरीर एकदम लघु है। यदि मैं इन मनुष्यों के मध्य बैठा तो अवश्य ही बन जाऊँगा इसलिये मनुष्योंके कोठे में बैठना उचित नहीं। ऐसा NexyressNE-ACTeamese माजामामाकमान्य [ ४७ ] तिष्ठामि चेति सकल्पाच्चातिष्ठत् तत्र योगिराट् । तस्मिन्नेव वरे काले चक्री आयातवान् खलु ॥ २३० ॥ वदनावसरे चक्री दृष्ट्वा त च करे मुदा । गृहीत्वाऽचिंतयच्चित्ते कोयं कोयमहो खलु ।। २३१ ।। नग्नो व कु डिकाकेकोपिच्छेन मंडित वरम् । एतादृशो मया क्वापि न दृष्ट. सकलावनौ ।। २३२ ॥ पुरुषाकारसयुक्त तुच्छकायोऽपि सुन्दर. । सन्निधे वीतरागस्य ह्यत्र किं कारण महत् ।। २३३ ॥ मनसि चेति सध्यात्वा भूमिराट् स जिनेश्वर । नत्वा स्तुत्वा पुनः प्राख्यत् चित्तद्वापरहानये ।। २३४ ।। त्रिकालज दयाधीश कोयं भो भूतभाविवित् । चेदृशोहि मया भूतो नैव दृष्ट क्वचिदपि ।। २३५ ।। तदेत्यमाह भो चक्रिन् मेघगभीरया गिरा । शृणु पूर्वं हि यत्प्रोक्तं सोस्ति भारतजो मुनिः ॥ २३६ ॥ विचार कर समस्त प्रकारकी बाधासे रहित भगवान्को वेदीके नीचे, बैठनेका विचार कर वे श्री कुन्दकुन्द स्वामी भगवान्को वेदोके नीचे बैठ गये। इतने में ही वहाँ पर चक्रवर्ती भी भगवान्के दर्शन करनेको आया ॥ २२९-२३० ।। अर्थ--श्री सीमंधर स्वामीकी वंदना करते समय स्वामीकी वेदीके नीचे बैठे हुए कुन्दकुन्द मुनिको देख कर और कौतुकसे अपने हाथपर रखकर यह कौन है? यह कौन है? इस प्रकार हर्षसे विचार करने लगा॥२३१॥ अर्थ--मुनिराज कुन्दकुन्द स्वामीको अपने हाथमें रखकर चक्रवर्तीने विचार किया कि यह नग्न है और फमंडलु तथा मयूर पीछी लिए हुए है। ऐसा जीव तो मैने सारे संसारमें नही देखा ! यह देखो यह पुम्पाकार है परन्तु अत्यंत तुच्छ काय है तो भो देखने में परमसुन्दर है । यह श्री भगवानके समवशरणमें कहाँसे आया ? और यहाँपर आनेका कारण क्या है ? चक्रवर्तीने ऐसा अपने मनमें विचार कर और श्रीजिनेन्द्रदेव श्रोसोमंधर भगवान् को नमस्कार कर अपने संदेहको दूर करनेके लिए पूछा ॥ २३२-२३४ ॥ अयं-हे त्रिकालज ! हे दयाधीश । हे भूतभाविवित् । यह मेरे हाथपर रखा हुआ कोन-सा प्राणी है । ऐगा प्राणी तो मेने फभी कहीपर देखा नही है ।। २३५ ॥ यता स्वामी सीमधरने मेघ समान गंभीर वाणीसे कहा कि हे चक्रधर सुन । प्रथम जिसको मैने विन्यायनि द्वारा धर्मवृति वो यो बहो या भरतक्षेत्रका मुनिराज है ॥ २३६ ॥ PAIPSNEP-STHE ।
जच्या PSEPSHIRemese [ ४८ ] विभोर्वाचमिति श्रुत्वा भूमोशीऽपि तदा मुदा । भक्तया तत्पादपद्माग्न नत्वा तुष्टो बभूव स. ।। २३७ ।। मुहुनिरोक्षण कृत्वा पश्चात्त स्वामिन. पुर. । मोदेन स्थापयामाम तुच्छकायभयात्स च ।। २३८ ।। वीतरागमुखोद्गीतामनेकान्तमयी वराम् । सिद्धातभिता शुद्धा भेदाभेद करा धनाम् ।। २३९ ।। नयभेदप्रयुक्ता च सर्वभापामयी तथा । त्रिकालकथका चैव पुरुषार्थप्रपादकाम् ।। २४० ।। इत्याद्यनेकभेदाच्या दिव्यवाणी च स मुनि । श्रुत्वा हृदि धनानदमाप तत्समये वरे ॥ २४१ ।। पुन प्रश्नमिति चक्रे स्वामिन् तीर्थाधिराट् प्रभो । मिथ्यान्धतमोनाशकदिवामणि. कृपाधिराट् ।। २४२ ।। अर्थ--भगवान् श्री सीमंधर स्वामोके वचनोंको सुनकर चक्रधर अतिशय प्रसन्न हुआ। और कुन्दकुन्द मुनिके चरणकमलोको बारंबार नमस्कार कर परम हर्षको प्राप्त हुआ। मुनिराजको पुनः-पुनः (बारंबार) निरी- क्षण कर और ये अत्यन्त लघु काय है, गिर पड़े तो दब जायँगे ऐसे भयसे उसने स्वामीकी वेदोके नीचे रख दिया ॥ २३७-२३८ ॥ हर्षसे रामजी अर्थ-श्रीवीतराग-परमदेव श्रीसीमंधर स्वामीके मुखसे प्रकट हुई, अनेकांतमयी, परमोत्कृष्ट, परम सिद्धांतके रहस्यको प्रकट करनेवाली, परम विशुद्ध, अनेक भेद-प्रभेदोसे विभूषित, नयप्रमाणसे युक्त, समस्तभाषा- मयी, त्रिकालवर्ती पदार्थोके स्वरूपको एक साथ प्रत्यक्ष प्रतिभास करनेवाली, परमपुरुषार्थके स्वरूपको यथावत् प्रकाशित करनेवाली, समस्त प्रकारके दोषोसे रहित और परम आनंदको प्रदान करनेवाली ऐसी (दिव्यध्वनि रूपी) जिनवाणीको सुनकर वे कुन्दकुन्द मुनीश्वर अपने मनमें अत्यंत हर्षको प्राप्त हुए ॥ २३९-२४१ ॥ अर्थ-कुन्दकुन्द मुनिराजने फिर नीचे लिखे हुए प्रश्न श्री सीमंधर स्वामीसे किये-- हे स्वामिन् ! हे तीर्थाधिराट्, हे प्रभो, हे त्रिकालज्ञ, हे मिथ्यात्वांधकारनाशक, हे ज्ञानके सूर्य, हे कृपालो ! हे नाथ ! भरतक्षेत्र में समस्त मनुष्य मिथ्यात्वके पोषक क्यों हैं ? नाम मात्रसे (गुणोंसे रहित) हरि ब्रह्मा विष्णु महादेव आदि कुदेवोंकी इतनी बड़ी मान्यता क्यों हुई ? ऐसे मिथ्यात्वी और असत्य देवोंकी मूर्ति कैसे स्थापित हुई ? इसका कारण क्या ? हे प्रभो ! भारतमें सर्वत्र जिनालय क्यों नहीं है । हे नाथ ! भारत- वर्षमें परमपूज्य सत्य यथाजात (नग्न दिगंबर) स्वरूपको धारण करनेवाले मुनीश्वर स्वल्प संख्यामें क्यों हैं ? हे देव पाखंड स्वरूपके धारक कुगुरुओंकी बढ़वारी क्यों है ? हे सर्वज्ञ ! अनेक मत मतांतर वहॉपर क्यों हैं ? माजमान्यता [ ४९ ] राज्यालय भारते नाथ सर्वे हि लोका मिथ्यात्वपोषकाः । हरिब्रह्मादिदेवाना युक्ताना केवलाख्यया ॥ २४३ ।। दृश्यते दोपमग्नाना मूर्तयोऽपि च भो प्रभो । किमस्ति कारण तत्र सर्वत्र नो जिनालया ॥ २४४ ॥ तुच्छा मुनीश्वरा देव पाखडमतधारका । पुरुषा. सधना. सति नानाभेदमतातराः ॥ २४५ ॥ श्वेतवासधरा स्वामिन् स्वमतस्थापने रता. मिथ्यात्वपोपका मानमायामात्सर्पसभृता ॥ २४६ ।। स्वकल्पोक्तप्रयोगेन परवचनचातुरा । स्वेच्छाचाररता क्रूरा मुनिद्वैपा क्रियोज्झिताः ।। २४७ ॥ जैनग्रथा न दृश्यते यत्र मिथ्यात्वनाशका । तीर्थाधिप त्रिकालज्ञ तस्यैव कारण च किम् ।। २४८ ॥ मिथ्यात्वका जिनाधीश रामभारतकादयः । ग्रथा हि बहवः सति केवलानर्थसभता. ॥ २४९ ।। इत्यादिप्रश्नं स योगी कृत्वा सदेहहानये । मौन कृत्वा पुरस्तस्याऽतिष्ठत् श्रोतु प्रभोर्ध्वनिम् ।। २५० ।। तदा सीमधरस्वामी वारिवाहसमागिरा । त प्रत्याह शृणु भव्य एकाग्रमनसा खलु ॥ २५१ ।। आद्य देगवर ख्यात सर्वत्रैव महोन्नतम् । मोमासाद्या मता पच ततो जाता ह्यनर्थका. ॥ २५२ ।। वृषभनाथदीक्षायाः कालात् वीरातिमे खलु । जैनमार्गवहिभूताः खाद्याखाद्यविवर्जिता ।। २५३ ।। न्यायालयात RECE ? हे प्रभो । अपने मतके स्थापन करने में प्रवीण, मिथ्यात्वका उपासक-मान, माया और मात्सर्यसे परिपूर्ण अपने कल्पित मीठे वचनोंके द्वारा जगत्को ठगनेवाला परन्तु हृदयमें अतिशय क्रूर, स्वेच्छाचारी, सत्य दिगंबर जैन मुनियोसे अन्तरगमें द्वेष रखनेवाला और श्रेष्ठ क्रियासे रहित ऐसा श्वेतांबरी मत कब उत्पन्न हुआ ? हे भगवन् ससारमें सत्य स्वरूपको प्रकट करनेवाले जैनशास्त्र देखनेमें नही आते और मिथ्याशास्त्र बहुलतासे देखे जाते है सो क्यो ? हे त्रिकालज्ञ इन सबका कारण कहो । उपर्युक्त प्रश्नावलीको कहकर मुनि कुन्दकुन्द मौनस्थ होकर प्रभु- के सामने वही भारी नम्रतासे बैठ गये और अपने प्रश्नोके उत्तरोको सुननेके लिए अतिशय उत्सुक हुए ॥२४२-२५०॥ अर्थ--तब भगवान् श्री सर्वज्ञ प्रभु श्री सीमंधर स्वामी मेघके समान गंभीर वाणीसे बोले कि हे भव्य ! एकाग मनने सुनो ।। २५१ ॥ अर्थ----हे भव्यवर ! सबसे प्रथम ( अनादि निधन ) दिगवर जैनमत ही प्रसिद्ध है। पीछेसे मीमासा जानि मन भी अनर्थ करनेवाले उत्पन्न हुए ॥ २५२ ॥ 4--श्रीभगवान् वृषभदेवको दीक्षाके बाद और अतिम महावीर स्वामी पर्यंत जैनधर्मसे बहिर्भूत गौर नाम भक्षण विचाररहित मिथ्या मत प्रचलित हुए ।। २५३ ।। AMERICSWAMOSHG - .
V . 4 -- m भू-मा. पवार वा सा गंजामता. ॥ २५४ ।। मा ." HEIR II मा कारमाना द्वाप गम्तिनमाम् ।। २९५ ।। 11 सिता. । “पुरमा मा पनगम नाशका || २९६ ।। { { METATEEL मामिलामा। लिपान-मंग करितगति विनाशनम् ॥ २५७।। का 17 सातुर्मासान मागजन्मना ग । बलभद्रेण जगातमुत गल शृणु ।। २५८ ।। शिरोही न करोति धमनाशाम् । गाहेन नहानाटा. गत्ययुक्ता हि मानवा. ॥ २५१ ।। भातु विनिमय गति क्षिती प्रवनना । यता च तेन लोकस्य प्रतारणार्थमेव हि ॥ २६० ॥ अर्थ---उन मिथ्यामतोमें अनेक मनोनीत कल्पनाके द्वारा असत्य पदार्थोको सत्य रूप प्रगट करनेवाले पादप धारफ अनेक मत होगे । जो कि अपने ही धर्मके नाशक १६ भेद रूप है ।। २५४ ।। अर्थ--भद्रबाहु स्वामीके पीछे श्वेतांबरमत प्रचलित हुआ। ये श्वेतांबर बड़े कपटी है और अपने हृदय में सदा सशय रखनेवाले हैं ।। २५५ ।। अर्थ---हे भव्य षमतों में भी अपने-अपने मतकी कल्पना से प्रत्येकमें साठ साठ भेद हो जायेंगे। वे अपने-अपने मूल मतके नाशक होंगे ।। २५६ ।। अर्थ---कितने ही तो पाखडी हो गये। और कितने पाखंड मतको भविष्यमें फैलायेंगे। और ब्राह्मण लोग जैनधर्मका नाश करनेवाले होंगे ॥ २५७ ॥ अर्थ-हे भव्य अपने छोटे भाईके मोह से कृष्णके बड़े भाई बलदेव के जीव ने जो घोर मिथ्यात्वको उत्पत्ति को उस बात को श्रवण कर ॥ १५८ ॥ अर्थ-मोही मनुष्य धर्मके नाश करनेवाले कितने अनर्थोंको नही करता है। अरे ! मोहके प्रभावसे बड़ी-बड़ी शक्तिके धारक और महान ज्ञानसंपन्न मनुष्य भी नष्ट हो जाते हैं । २५९ ॥ अर्थ---उस वलदेवके मोही जीव ने अपने छोटे भाई कृष्णको प्रसिद्धिके लिये जो प्रपंच रच कर संसारको घोखा दिया वह विचारणीय है ॥ २६० ॥ THERE जन्ताजन्य REAMERA [ ५१ ] किं कृत व्योमयानस्थो भृत्वा कृष्णसम खलु । सुरूप सागनायुक्त दफ़े नेत्रमनोहरम् ।। २६१ ॥ स्वस्य रूप च लोकानामग्रे हि मायया युतम् । दर्शयित्वा पुन सर्वानित्याह सुमतिच्युतान् ॥ २६२ ॥ सर्वशोभासमायुक्त मोहवान् स खलु सुरः । दर्शयन्नतिशयान् लोके स्वस्य प्रत्यक्षमजसा ।। २६३ ।। शृणुध्व सकला लोका मद्वाक्य शांतदायकम् । एकाग्रचेतसा शुद्धं श्रवणाच्छिवदायकम् ॥ २६४ ॥ अद्य प्रभृतितो मर्त्यः प्रत्यक्षत्वेन सस्थितः । अस्मिन् लोके पुनश्चाह शृणुध्व यन्मयोदितम् ॥ २६५ ॥ कलियुगस्य दोपेण कलौ चास्मिन् प्रत्यक्षतः । मानवा मे स्थिति नैव अप्रत्यक्षेण निश्चयात् ॥ २६६ ।। अतो यूय मा नित्य जपध्व सकलार्थदम् । पूज्यनाथ जगत्पूज्य पूजयध्व च सर्वथा ।। २६७ ।। भवितरागादिगानौधैः यात्रा कुरुथ मे सदा । महते किमपि नास्ति मा कुरुध्वं परा क्रियाम् ॥ २६८ ॥ अर्थ--हे भव्य ! बलदेवके जीव ने अपने भाईकी प्रसिद्धिके लिये स्वर्ग में से आकर और विमानमे बैठकर अपना स्वरूप देवने माया ( विक्रियासे ) से कृष्णके समान बनाया और वह सुन्दर स्वल्प स्त्रीसहित और नेत्रोको प्यारा महा मनोहर बनाया ॥ २६१ ॥ अर्थ-उस बलदेवके जीवने कृष्णके स्वरूपमे (जो मायासे अपना कृष्णका रूप बनाया था) लोगोंके सामने मायापूर्ण दिखलाफर मतिभ्रष्ट जीवोसे कहा। इसके प्रथम सम्पूर्ण शोभायुक्त मोही उस बलदेवके जीव- ने (देवने) समस्त लोगोको बडे चमत्कार बतलाये जिससे लोग उन चमत्कारो (जो देवने विक्रियासे झूठे किये ये)फो सत्य समझकर फंस जाय । और प्रत्यक्ष भी अपना स्वरूप दिखलाकर लोगोको फंसानेका प्रपञ्च किया। इन मव बातोसे विचारे भोले-भाले जीवोफो मिथ्यात्वमें अनन्त संसार बध कराया और सत्य मार्गसे धोखा दिया । उस बलदेवके जीवने मायामयो कृष्णके रूपसे लोगोको कहा कि हे जीवलोकों ! मेरे वचन सुनो जिससे मोदकी प्राप्ति आप लोगोफो होगी। हे लोगो आज तक तो मैंने अपना प्रत्यक्ष रूप दिखलाकर सत्यधर्म (जो मोहसे विक्रिया द्वारा कल्पित् और महान् अनर्थका करनेवाला) प्रक्ट किया परन्तु अबसे मैं प्रत्यक्ष प्रकट नही होऊँगा । पालके दोपसे ऐसा होना स्वाभाविक है परन्तु आप लोग मुझमें विश्वास कर परोक्ष रूपसे मान्यता परें । इसलिए आप मेरा ध्यान करें, जप करें और मुझे ईश्वर समझ कर पूजन करें । मेरी पूजा करनेसे संपूर्ण सिदि प्राप्त होगी। भक्ति से मेरा गान करें। मेरी यात्रा फरें । मुसको छोड़कर आप लोग अन्य किसीफो नहीं मानें । तो Tr, करना हो सो-सो सब मेरे कहे अनुसार करें ।। २६२.२६६ ।। यायाम -- -- ।
[ ५२ ] BHASHASHRCHI कर्तास्मि पूर्णब्रह्माह शकरोऽस्मि जनार्दन । तारकोऽस्मि नराणा च पालकोऽस्मि धरातले ।। २६९ ।। गगाया मृतकस्योच्चै अस्थीनि भो नरोत्तमा । गतिकर्तास्मि सर्वस्य क्षेपणीयानि निश्चयात् ।। २७० ।। मत्तीर्थे मृतकस्यैव पिंडादिकवरा क्रियाम् । करिष्यति न च तेपा भविष्यत्यसुख कदा ।। २७१ ।। स्नान मांश्च मतीर्थे तर्पण पूजन जप । करिष्यति भजिष्यति मल्लोक ते न सशय ।। २७२ ।। पुन स्वमायया तेन गगाद्यास्तीर्था स्थापिता.। दर्शितातिशयास्तत्र मोहनीयोदयाच्च वै ॥ २७३ ।। स मोही भ्रातुर्नामाकसयुक्ता सकला महोम् । कृत्वा जगाम स्वस्थान तद्वेतु विद्धि निश्चयात् ॥ २७४ ।। Eekeमाराम रामाययास अर्थ--इस धरातलमें मै ही सर्व जगत्का कर्ता हूँ। मैं ही पूर्ण ब्रह्म हूँ। मै ही शङ्कर हूँ। मैं ही जनार्दन हूँ। मै ही तारक हूँ और मै ही मनुष्योका पालक हूँ ॥ २६९ ॥ अर्थ- मृतक पुरुषोंकी अस्थियाँ (हाड़) गंगानदीमें बहानी चाहिये। यों जो ऐसा करेंगे तो मै उनकी सद्गति करूंगा ॥ २७० ॥ अर्थ-जो पुरुष मेरे तीर्थमें मृतकोंका पिंडदान आदि क्रिया करेगा उसको कभी भी दुःख नही होगा॥२७१॥ अर्थ-जो मनुष्य मेरे तीर्थमें स्नान करेगा, तर्पण करेगा, पूजन करेगा, जप करेगा, मेरा भजन करेगा मै उसको निःसन्देह वैकुण्ठवास करा दूंगा ॥ २७२ ॥ अर्थ---फिर उस बलदेवके जीवने अपनी विक्रिया ऋद्धिसे मायामयी गंगादि तीर्थोका स्वरूप दिखला- कर उनको स्थापित किया और अतिशय दिखलाकर लोगोको उसकी सत्यता प्रकट की। सच है कि मोहनीय कर्मके उदयसे जीव कितने मायाचार नहीं करता है ? और कितनी प्रवचना नहीं बनाता है ॥ २७३ ॥ अर्थ--उस महा मोही और पापी बलदेवके जीवने अपने भाईके मोहसे भाईका नाम समस्त पृथ्वीपर प्रकट किया और फिर वह देव ( बलदेवका जीव ) अपने स्थान पर गया। हे भव्य (कुन्दकुन्द मुनि), भारत- में मिथ्यात्व तबसे ही प्रकट हुआ। तभीसे असत्य एवं कल्पित मत ( जिसमें जीव हिसादि पापोंका विचार नहीं है ) प्रचलित हुआ ॥ २७४ ।। सामान्यायम RELATESTHADKAPS तान्तमातमारातारा SHeSeweSHEHOSAwes [ ५३ । तत. प्रभृतितः सर्वे मूढलोकोत्कराः खलु । मिथ्यामागं च स्वीचक्रु प्रत्यक्षफलदर्शनात् ।। २७५ ।। पतत्येव यथा गर्ते ह्येकोऽपि नर्णको ऊनु । तदनुसारत. सर्वे उर्णकास्तत्र निश्चयात् ॥ २७६ ।। तथा मिथ्यात्वगर्ते हि पतिता. प्रतिवर्जिताः। एकस्यैव प्रयोगेन मूर्खाणा लक्षण परम् ॥ २७७ ।। पक्तिक्षेत्रेषु सर्वेषु कालदोपप्रभावतः। भवति चेदृशा मार्गा मिथ्यात्वरससभृता ॥ २७८ ।। जिनधर्मरता भव्य । भवति स्वल्पसख्यया । मानवाश्चेतरा कर मिथ्यात्वपालका घना. ।। २७९ ।। जिनागमस्य शास्त्राणि चाब्धी सक्षेपितानि वै। दुष्टलोक ह्यतो नैव दृश्यते जैनवाक्यजाः ।। २८० ।। धरमेनयतीन्द्रेण रचिता धवलादय । विद्यते तेधुना तत्र जेनाभिधपुरे वरे ।। २८१ ॥ अर्थ--हे भव्य तबसे ही मूढ अज्ञानी लोगोने प्रत्यक्ष चमत्कार ( देवकी मायामयी विक्रिया ) देखकर मिथ्यामार्ग स्वीकार किया ।। २७५ ।। अर्थ--हे भव्य जैसे एक भेड गड्ढे में गिर पड़े तो बहुत-सी भेड़ें बिना विचारे ही उस गड्ढे में गिर पड़ती है। उसी प्रकार प्रथम किसी भोले बेसमझ मनुष्यको बलदेवके जीवने अपनी विक्रियासे चमत्कार बतलाया उसपर विचार न कर उसको सत्य समझकर उस मिथ्याकल्पित बातको उसने सत्य माना और उसके देखा-देखी अन्य मनुष्योने विचार न कर उसी बातको स्वीकार किया। इससे समझना चाहिए कि अज्ञानी जीव गतानु- गतिक होते है। सच बात तो यह है कि मूर्ख जीवोका यही लक्षण है कि जो बिना विचारे एकके सहारे गमन करें ।। २७६-२७७ ॥ अर्थ--भरतक्षेत्रमें काल दोपसे ऐसे ही कुमार्ग उत्पन्न होगे। जो मिथ्यात्वको बढ़ाएंगे और जिनमें मत्यता नहीं होगी ।। २७८ ।। अर्थ-भरतक्षेत्रादि क्षेत्रोमें पचम कालके प्रभावसे जैनधर्मके धारक स्वल्प संख्यामें होगे। परंतु मियात्य के पालन करनेवाले क्रूर बहुसख्य मनुष्य होगे ॥ २७९ ॥ अर्थ---जिनागमके शास्त्रोको दुष्ट लोग द्वेषके कारण समुद्र में प्रक्षेपण कर देंगे। इसलिये जैनशास्त्र बात हो हम मायाम देखने में आयेंगे ॥ २८० ॥ i---श्री आनायवयं श्रीधरसेन मुनीन्द्रके बनाये हुए धवल-जयधवल-महाधवलादि महान् ग्रंथ अब भी तैनपुर ( मूवितो ) में विराजमान हैं ॥ २८१ ॥ WweSM [ ५४ ] Meyewere मिथ्यात्वपोपका भूपा विप्राणा पूजकास्तदा । सर्वलोका तदाधीना अत स्वल्पा जिनालया.॥२८२।। वेदकाले नृपा जैनास्तदा प्रजापि तत्समा । तदाहि जैनधर्मोय चाद्भुतत्वेन दृश्यते ।। २८३ ।। प्रतिघस्र च म्लेक्षानामुदयस्तत्र हानि । भविष्यति च धर्मस्य प्रकाश. कुत्रचिदपि ।। २८४ ।। ह्यतीतानागतात् वर्तमानजात्मर्ववस्तुत । निस्सदेह मुनेश्चित्त चकार स जिनेश्वर ।। २८५ ।। पश्चाद्धि चाभवदेव प्रभोर्ध्वनिमनोहर । सिद्धाताना रहस्य चागार्यनगारजा. क्रिया. ॥ २८६ ।। अद्याप्येनहि योगीन्द्र सर्वसिद्धातसूचकान् । ग्रन्थाश्च लेखयित्वा वै प्रेपणीय तत परम् ।। २८७ ।। जयरच्यालयमस्मायामागच्या अर्थ--महामिथ्यात्वके पोषक ऐसे ब्राह्मणलोगोके पूजक राजा लोग हो गये। राजाके आधीन इतर प्रजा होती है सो प्रजा भी राजाके समान ही मिथ्यात्वी ब्राह्मणोंकी उपासक बन गई। इसलिए जैन मंदिर स्वल्पसंख्यामें होते चले गये ॥ २८२ ॥ अर्थ--चौथे कालमे राजा भी जैनी थे और इसीलिए प्रजा भी सब जैनधर्मको धारण करनेवाली थी। इसी कारण उस समय यह धर्म बड़ी अद्भुत उन्नति करता हुआ दिखलाई पड़ता था ॥ २८३ ॥ अर्थ--हे भव्य ! भरतक्षेत्रमें पंचमकालमे म्लेच्छोंका उदय प्रति दिवस बढ़ेगा। इसलिए धर्मकी हानि नियमसे होगी। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्मका लोप हो जायगा। कही-कही पर धर्मका महान् उज्ज्वल प्रकाश पंचम कालके अंत पर्यंत नियमसे रहेगा। मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका रूप चतुःसंघ रहेगा ॥२८४॥ अर्थ-इस प्रकार त्रिलोकज्ञ श्रीसीमंधर स्वामीने अपनी दिव्यध्वनिके द्वारा भगवान् कुन्दकुन्द मुनिके भूत, भविष्य और वर्तमान वस्तुओंसे उत्पन्न हुए सर्व संदेहको निवारण किया ॥ २८५ ॥ अर्थ--फिर प्रभु श्रीसीमंधर स्वामीकी दिव्यध्वनि सिद्धांतोका रहस्य प्रकट करनेवाली और गृहस्थ, मुनियोंके चारित्रका स्वरूप प्रकट करनेवाली हुई ॥ २८६ ।। अर्थ--समस्त सिद्धांतके रहस्यको प्रकट करनेवाले सिद्धात ग्रन्थ लिखाकर योगीश्वर कुन्दकुन्द स्वामी के साथ भेजना चाहिए ॥ २८७ ॥ HeHeी ARESMSHRSam [ ५५ ] PreereameseNNEDAzmesmameans इत्यास्यं जिनेन्द्रोऽपि घोपमाप दयाधीः। प्रभोर्ध्वनिमिति श्रुत्वा सर्वे चानदनिर्भराः ।। २८८ ।। समाप्य परमं मोद सोपि योगोश्वरस्तदा । तस्थौ तत्र सभास्थाने पठनार्थ समग्रधीः ॥ २८९ ।। एकदा भूमिराट् चक्रे आहारार्थ मुनि प्रति । पुरे वै प्रार्थना स्वामिन् विहारं कुरु पावनम् ॥ २९० ।। मोप्याहत्व न किं विद्धि अत्रहि योग्यता न मे। न्यादस्य भो नराधीश । श्रुत्वेत्याह पुनश्च सः ।। २९१ ।। मुने मे कारण ब्रूहि तस्य द्वापरहानये । तदावदत् मुनिरेव शृणु त्वं दानवत्सल ॥ २९२ ।। मत्क्षेत्रे ह्यधुना रात्रि त्वत्क्षेत्रे ह्यधुना दिवा । भारतजोप्यहं न्याद कथ कुर्वेऽत्र दोषदम् । २९३ ।। इत्युत्तर मुनीन्द्रो हि ददौ तस्मै सहासधोः । सोपि चक्री मुनीन्द्रस्य धैर्य दृष्ट्वा मुद गत ।। २९४ ।। अर्थ-इस प्रकार श्रीजिनेन्द्र भगवान् की घोषणा दिव्यध्वनिके द्वारा श्रवण कर समस्त भव्य जीव आनन्दको प्राप्त हुए ॥ २८८ ॥ अर्थ--भगवान् श्रीसोमंधरकी दिव्यध्वनिको सुनकर मुनि कुन्दकुन्द भी अतिशय आनन्दको प्राप्त हुए। और ग्रंथ पढनेकी इच्छासे गणधरोके समीप सभास्थानमें बैठे ॥ २८९॥ अर्थ-एक समय विदेहके चक्रवर्तीने मुनि कुन्दकुन्दसे आहारके लिए नगरमें पवित्र विहार करनेकी प्रार्थना को ।। २९० ।। अर्थ---मुनि कुन्दकुन्दने कहा कि हे राजन् ! आप क्या नहीं जानते हैं कि यहाँ पर मेरी भोजन-पान (आहार ग्रहण करनेको) योग्यता हो नहीं है ॥ २९१ ॥ अर्थ-हे मुनीश्वर ! मेरे सदेहको दूर करनेके लिए आप दया कर कहिये कि यहाँ पर आपकी आहार- को योग्यता क्यों नहीं है ? मुनिने कहा कि हे दानवत्सल राजन् ! इसका कारण सुन ॥ २९२ ॥ अर्थ--हे राजन् मेरी जन्मभूमि भारत हे वहाँपर ही यह जिनदीक्षा मैंने ग्रहण की है। वहॉपर इस ममय राति है । यद्यपि इस समय यहाँपर दिवस है परन्तु मेरे हिसाबसे रात्रि है। इसप्रकार मै रात्रिमें भोजन कर नहीं मरुता । योफि मुनिचर्याम यह सबसे भारो दूषण है ॥ २९३ ॥ अर्ग--इसप्रकार मुनि कुन्दकुन्दने उस चक्रीको आहार पहण नहीं करनेका कारण कहा जिसको सुन- र गौर गुनी नको घेर्यताको देखकर चको परम हर्पको प्राप्त हुआ ॥ २९४ ।। यसरमासमस्यामन्याचार ? TAGGETARI मामाच्याच मायालयात मल प्रशस्य वचनोस्त नत्वा स्वस्याकमाप्तवान् । सस्मरन् तद्गुणग्राम शुद्धसम्यक्त्वधारक. ।। २९५ ॥ कुदकुदगतीद्रोपि प्रभोः पादाजपट्पद । सद्बती शुद्धधी वाड्मी स्मरवारणसिंहभः ।। २९६ ।। पपाठ सर्वसिद्धातसूचकान् सन्निधे गुरोः । ग्रथान् बद्धयनुमारेण जैनमार्गप्रवृद्धये ॥ २९७ ।। सप्ताहानि प्रमाणानि भो भव्या धर्मधी क्षमी । वशी दमी तपस्वी च जिनागमप्रकाशक ॥ २९८ ।। मोदभाक् शुद्धवाक् तत्र निराहारेण स मुनि । तस्थौ हि धर्मवृद्धयर्थं पूर्वपुण्योदयात्खलु ।। २९९ ।। पूर्वपुण्येन जीवाना कार्यसिद्धिश्च सर्वदा । भवेदहो शिवाप्त्यर्थं कुरुष्व पुण्यकारणम् ।। ३०० ।। पुण्य श्रीमज्जिनेन्द्राणामभिषेकपुरस्सरा । पूजा न पात्रदान च तीर्थयात्रादय. तपः ।। ३०१ ।। इत्याद्यनेकभेदा हि पुण्याना सति निश्चयात् । यदिच्छा शिवस्थानस्य कुरुध्व पुण्यसततिम् ।। ३०२ ।। अर्थ---फिर सम्यक्त्वके धारक उस चक्रवर्तीने मुनि कुन्दकुन्द स्वामीको अपने अंक (गोदी)में रखकर उत्तम वचनोंके द्वारा स्तवन किया और उनके गुणोंका स्मरण कर नमस्कार किया ॥ २९५ ॥ अर्थ--प्रभुके चरण कमलोंमें भ्रमरके समान श्रेष्ठ व्रतके धारक शुद्ध बुद्धिके धारक वाङ्मी और काम- देवरूपी हाथीको वश करनेके लिए सिंह समान-- ॥ २९६ ॥ अर्थ-ऐसे उन कुन्दकुन्द मुनिने गुरु गणधरके समीप सिद्धांत ग्रंथोका अध्ययन अपनी बुद्धिके अनुसार जैनमार्गकी वृद्धिके लिये किया ॥ २९७ ॥ अर्थ- हे भव्य धर्मबुद्धिवाले, इन्द्रियोंको वश करनेवाले, महा तपस्वी, शांत जितेन्द्रिय-जिनागमके प्रका- शक, परम आनंदी, विशुद्ध वचनोंके कहनेवाले ऐसे कुन्दकुन्द मुनि वहाँपर (विदेह क्षेत्रमे) सात दिवस पर्यंत निहा- हार रहे । इसमें एकमात्र पुण्य ही प्रधान कारण है ॥ ॥ २९८-२९९ ॥ अर्थ- हे भव्यजीवो ! पूर्वभवके पुण्य से ही जीवोंको समस्त प्रकारके कार्य अनायास ही सिद्ध हो जाते हैं । इसलिये मोक्षको प्राप्तिके लिये पुण्य कारणोको संपादन करो ॥ ३०० ॥ अर्थ- हे भव्यजीवो ! श्रीमज्जिनदेवको पंचामृताभिषेक पूर्वक पूजा फरना, पात्रमें दान देना, तीर्थयात्रा करना, गुरुसेवा करना, जैनधर्मको रक्षाके लिए जैनधर्मके अन्तरग शत्रुओका नाश करना आदि अनेक कारण पुण्य प्राप्तिके हैं । जो मोक्ष जानेकी इच्छा है तो पुण्य कार्योको करो ॥ ३०१-३०२ ।। समस्या मान्य [ ५७ ] भरतस्याचला BREAKजार जयमालासमयमा mam:... विदेहक्षेत्रभूमि. क्व क्व हि । पुण्योदयेन सर्वांच करस्था इव दृश्यते ।। ३०३।। दुर्घटं च प्रदूर च दुःप्राप्य वस्तु यत् खलु । तत् सर्वं पुण्यभाजाच स्वयमेवोपजायते ॥ ३०४ ।। नागा. चाश्वा बुद्धेोगो रम्या पुत्रा द्रव्य धान्यम् । कौशल्य की नित्यं गर्म जायते वे कर्मोद्रेकात् ।। ३०५ ।। हिरण्यवारप्राप्तिता तथैव म्वात्मशुद्धता । गुरुप्रसन्नवाक्यता विधेर्भवेच्च मान्यता ।। ३० ॥ विदुपो मैत्री मुम्वरता विधुसमभा धर्मप्राप्तिः । मुन्दग्देहश्चास्मिन् लोके सुपुण्य विना नैवाप्ता म्यु. ।। ३०७ ॥ ज्ञात्वेत्य भो बुधा नित्य सर्वशर्मप्रदायकम् । दानपूजाभिपेकाद्यै कुरुष्व धर्मसततिम् ।। ३०८ ।। म मुनिः कुन्दकुन्दाह्वो यत्याचारस्य सूचकम् । ग्रथस्य शिवप्राप्त्यर्थं मिथ्यापथविहानये ॥ ३०९ ।। गुरूपदिष्टमार्गेण कृत्वा स्वहृदि धारणाम । अथागमनसिद्ध्यर्थ गति चक्रेच शुद्धधीः ।। ३१० ।। अर्थ- हे भव्य ! कहाँ तो विदेह क्षेत्र? और कहाँ यह भारत क्षेत्रका धरणीभूषण पर्वत? कहाँ श्रीसीमंधर तीर्थकर ओर कहाँ पंचमकालीन कुन्दकुन्द मुनि परंतु पूर्व पुण्योदयसे सब कुछ होता है। जो बात अत्यंत दुर्भभ है वह भी + अपने हाथ पर रखी हुई के समान दोखती है। दुर्घट, दुष्प्राप्य और असमजस वस्तु भी पूर्व पुण्योदयसे सिद्ध होती है ।। ३०३-३०४ ॥ अर्थ--हाथी-घोडे, उत्तमवुद्धि, आज्ञाकारी पुत्र, द्रव्य, धन-धान्य, कुशलता ओर सुख पूर्वपुण्योदयसे सर्व- प्राप्त होता है ॥ ३०५ ॥ अर्थ-सुवर्णकी प्राप्ति, आत्माको विशुद्धता, गुरुको प्रसन्नता और लोकमें मान्यता यह सब बात पूर्व- पुण्योदयसे होती है ।। ३०६ ॥ अर्थ-विद्वानोसे मित्रता, सुस्वरता, चंद्रसमान काति, सुन्दर देह और धर्मकी प्राप्ति बिना पुण्यके नहीं होतो हे ॥ ३०७ ॥ अर्थ--इस प्रकार जानकर हे विज्ञ पुरुषो । सदैव सुखका प्रदान करनेवाली और पुण्यको उत्पादिका ऐगी जिनेन्द्र भगवान की पूजा, अभिषेकपूर्वक करनी चाहिए । यह सबसे महान् पुण्य का कारण हे ॥ ३०८ ॥ --मि-या मार्गका नाश करनेके लिए और गुरुके बतलाये हुए मार्गको वृद्धि के लिए यत्याचार के बनेपाको मोती प्राप्ति के लिए गुरुसे हृदय में धारण कर कुन्दकुन्द मुनिने वहांसे अपने देशमें आनेका घि पा॥ ३०१-३१० ।। SNCEHCHCWCSMIC .
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[ ५८ ]
मा
बफरी कुइमली कृत्य निप्रमा वे प्रदक्षिणा । सीमधरजिनेन्द्रस्य दत्वा ससारहानये ॥ ३११ ।।
कन्वर्जन पुन त्या नोत्याय प्रार्थना
वराम् । चके विभोहि सान्निध्ये महदानदसभृत ॥ ३१२ ।।
निनादित्य जिनाधीश धर्मनकाधिराट् प्रभो । निर्विकार निरातक ते पदाव्ज नमाम्यह ।। ३१३ ।।
कर्मदानाग्निमेघाय
पापाद्रिभजने पवे । भवादुद्धारय
वीर
दीन शरणागतम् ॥ ३४ ॥
ला विना क क्षमो देव दातु मोक्षपद वरम् । तूर्णं च देहि वस्तोस्मि भवदु खात् कृपापर ।। ३१५ ।।
रागद्वेपादिपु मग्ना ह्येते सर्वे दयोज्झिता.। कापट्यपूरिता देवा. सावरा सागना. खलाः ।। ३१६॥
तम्रा धर्मरत्नस्य चानतभवदायका । भवाविधतारका न स्यु. तेहि मग्ना परान् कथम् ॥ ३१७ ।।
तारकस्त्व हि लोकेस्मिन् नान्यो देवश्च नास्ति वै । वीतरागादृते जीवा नो तति क्वचिदपि ॥ ३१८ ॥
यात्राri... -
मलालालारामारीयमान्यायालयाच्या
जनाच्या
अर्थ- उस समय कुन्दकुन्द मुनिने अपने दोनों हाथोंको कुड्मलाकार (कमलाकार) बनाकर अपने भाल
पर रखा और भक्तिसे सीमंधर प्रभुको तीन प्रदक्षिणा दी । अष्टांग नमस्कार कर और प्रभुके सामने खड़े होकर
महान् आनन्दके साथ प्रार्थना को ॥ ३११-३१२ ॥
अर्थ-हे जिनसूर्य ! हे जिनाधीश ! हे धर्मचक्राधिराट्, हे निर्विकार, हे निरांतक, हे पापाद्रिभंजक
पापरूपी पर्वतको नाश करनेके लिए वज्रके समान, हे वीर, आपके चरणकमलको नमस्कार है। मुझ दीन
शरणागतका संसारसमुद्रसे उद्धार करो ॥ ३१३-३१४ ॥
क
अर्थ-हे जिनेन्द्र ! आपके बिना मोक्षपद देनेको कौन समर्थ है। इसलिए हे कृपापर भवके दुःखोंसे+
मुझे छुड़ाओ ॥ ३१५ ॥
अर्थ--ये मिथ्यात्वी पाखंडी देव, रागद्वेषसे पूर्ण, दयासे रहित, धर्मरत्नके चोर, अनंतभवके वर्द्धक,
महान् पापाचारी, स्त्री परिग्रह और पापारंभसहित और भी अनेक दूषण सहित, संसारसमुद्रसे कैसे तार सकते
हैं । जो स्वयं संसारसमुद्रमें डूब रहे है वे दूसरोंको क्या तार सकते हैं ॥ ३१६-३१७ ।।
अर्थ--हे सीमंधरस्वामिन् ! आप हो संसारके तारक हो। आपके सिवाय अन्य किसी भी देव में यह
शक्ति नहीं है । वीतराग अरहंत भगवान् को छोड़कर अन्य देवों मे संसारसमुद्र से तारने की कभी भी शक्ति
नहीं है ॥ ३१८॥
[ ५९ ] diver, आशिवं ते सदा भक्तिरस्तु मे चेतसि सदा। शुद्धदृग्ज्ञानव्रतस्य प्राप्ति. पुरुपार्थदा वरा ॥ ३१९ ।। आगधनाविधानेन मरण कर्मनाशदम् । चित्तशुद्धि जिनाधीश जिनचद्र भवापहा ।। ३२० ।। भट्टारक गुणाधीश चानतगुणसागर । पूज्य पूज्येश तीर्थेश नमोस्तु तवाघ्रियो (?) ।। ३२१ ।। सर्वज्ञ सर्वदर्शी त्व सार्व. शात शमी दमी। करस्थामलवल्लोक भवान् पश्यन्नपि प्रभो ।। ३२२ ।। तथापि न श्रमस्य चाल्पमात्रापि दृश्यते । भवानतः खलु लोके सर्वदर्शी च कथ्यते ।। ३२३ ।। ते नमोस्तु विदोपाय चिन्मयाय नमोस्तु ते । गुणभूषाय ते वीर मे नमोस्तु सदात्मने ।। ३२४ ।। ते तमोस्तु विमानाय विरागाय नमोस्तु ते । भक्तिवत्सलभूताना तारकाय नमोस्तु ते ।। ३२५ ।। मात्मर्यमदमुक्ताय शूरवीराय ते नमः। आबालब्रह्मरूपाय शिवरूपाय ते नमः ।। ३२६ ।। अर्थ--हे प्रभो आपका मुझे यही शुभ आशीर्वाद हो कि मेरे चित्तमें आपकी भक्तिभावना निरंतर बनी रहे । परमपुरुषार्थको प्रदान करने वाली, शुद्ध दर्शन, शुद्धज्ञान ओर शुद्ध चारित्रकी प्राप्ति भी सदैव बनी रहे ॥ ३१९ ॥ अर्थ-हे जिनाधीश आराधनाको विधिसे कर्मोका नाश करनेवाला मेरा उत्तम मरण हो, मेरा मन सदेव पवित्र और सरल बना रहे जिससे मै ससारका नाश कर सकूँ ॥ ३२० ॥ अर्थ हे भट्टारक! हे गुणाधीश ! हे अनंतगुणसागर ! हे त्रिलोकपूज्य ! हे तीर्थेश ! आपके चरण- कमलको नमस्कार है। प्रभो आप सबके जाननेवाले सर्वज्ञ हो, सबके देखनेवाले सर्वदर्शी हो, सबके हित फरनेवाले हो, परम शात हो, जितेन्द्रिय हो, मनको वश करने वाले हो। आप समस्त जगत्के त्रिकालवर्ती पदायीको और उनकी अनतानंत पर्यायोको एक साथ हो हाथके आवलेके समान प्रत्यक्ष अवलोकन करते हो तो भी आपको २ चमात्र भी श्रम नहीं होता है। इस प्रकारकी अद्भुत शक्तिसे ही आपको सर्वदर्शी करते हैं ।। ३२१-३२३ ॥ अ-से भगवन आप दोपरहित हैं इसलिए नमस्कार है। चिद्रूप स्वम्प भगवन् आपको नमस्कार है। गगो भाषण आपको नमस्कार है । हे वीर शुद्वात्मन आपको नमस्कार है । हे प्रभो मानरहित, परम बीतराग के लिए नमस्कार है। हे प्रभो आप भारतमान जीवोको संसारसमुद्रसे तारनेवाले हो इसलिए आपको सरयतामा Tara [ ६० ] सामन्याच्याजमजमान्य भूयु ते गुणा सर्वे चात्मनि मोहकर्मणः । नाशो वे स्मरभूपस्य नैरोग्य मर्वदा तनौ ।। ३२७ ॥ स्वर्गराज्यस्य वाछा न मे हृदि सर्वदा प्रभो । त्व तिष्ठ नास्ति किंतु वै सर्वपापाग्नितोयद ॥ ३२८ ।। पुनभू यात् प्रभो स्वामिन् दर्शन ते मनोहरम् । त्वदाधीन कुरु मेहि ते नमोस्तु जिनेश्वर ॥ ३२९ ॥ स पुनर्जिनपादाब्ज मुहुर्नत्वा गणाधिपान् । सर्वयोगोश्वरान् भवत्या लेभे तदाशिपो मुनिः ।। ३३० ।। गृहोत्वा ते प्रदत्तानि पुस्तकानि यतीश्वर. । धर्मार्थं न च शर्मार्थ सिद्धातसूचकानि वै ।। ३३१ ।। प्रयत्नेन विमाने हि धृत्वा चारुह्य तौ सह । तस्माद्धि चाभ्रमार्गेण चचालामदमोदभृत् ।। ३३२ ।। क्षणेन तौ मुनीद्र त तत्स्थाने चित्तनददम् । स्थापयित्वा प्रणम्योच्चैलब्ध्वा तदाशिघ मुदा ।। ३३३ ।। नमस्कार है । हे प्रभो आपमें मात्सर्य नहीं है। अभिमान नहीं है। क्रोध नहीं है। विकार नही है इसलिये नमस्कार है। हे प्रभो आप शूर है, परम वीर है, आबाल ब्रह्मरूप है। शिवस्वरूप है, योगीश्वर है इसलिये नमस्कार है ॥ ३२४-३२६ ॥ अर्थ-हे प्रभो । उपर्युक्त आपके समस्त गुण मेरी आत्माको प्राप्त हो। तथा इस कामके राजा दुष्ट मोह- नीय कर्मका नाश हो। मेरे शरीरकी निरोगता हो । जिससे मै तपश्चरण कर रत्नत्रयकी प्राप्ति करूँ ॥३२७॥ अर्थ-हे प्रभो ! स्वर्गके राज्यकी प्राप्ति हो मेरे मनमे ऐसी इच्छा नही है। किंतु हे प्रभो! आप सदैव मेरे मनमे वास करें एक यही मेरी इच्छा है । जिससे मै अपने पापोका नाश कर सकूँ॥ ३२८ ॥ अर्थ-हे प्रभो ! अब एक यह प्रार्थना है कि आपका परम पवित्र दर्शन पुनः-पुनः हो। और मुझको अब अपने आधीन रखिये। हे जिनराज ! आपको नमस्कार है ॥ ३२९ ॥ अर्थ-इस प्रकार मुनि कुन्दकुन्दने बड़ी भक्तिसे बार-बार श्री सीमधर स्वामोके चरणकमलोको नम- स्कार कर और गणधर देव तथा अपर समस्त मुनीश्वरोको नमस्कार कर उनको शुभ आशिषको तथा यतो- श्वरोंके द्वारा प्रदान किये हुए सिद्धांतके ग्रन्थोंको ग्रहण कर ओर प्रयत्नसे विमानमें बैठकर उन देवोंके साथ आकाश मार्गसे अत्यत हर्षपूर्वक विहार किया ॥ ३३०-३३२ ॥ अर्थ-उन दोनों देवोंने मुनीश्वर कुन्दकुन्दको, चित्तको आनंदप्रद ऐसे उनके स्थानमें पहुँचाकर उनको बड़ी भक्तिसे नमस्कार किया तब मुनीश्वरने उनको धर्मवृद्धि रूप आशीर्वाद दिया उसको ग्रहण कर और PRESEMIEShre-se-weSwee-MOHIDTHeaweTHESTERYTPARAN OSH weswesweswesome memes [ ६१ ] प्राप्याजा पुनः स्वस्थाने गती तद्गुणचिंतकौ । सम्यग्दृग्धारको मित्रे परोपकारकारकौ ॥ ३३४ ।। पश्चाच्छोकुन्दकुन्दाख्यो धराया सकलार्थवित् । लेखवारप्रपूज्यत्वात् विख्यातत्व च जातवान् ॥ ३३५ ॥ सर्वमिथ्यात्वदावाग्नेर्जनसिद्धातवारिणा। शम चकार सर्वत्र स भव्य शुभबोधकः ।। ३३६ ॥ तदोपदेगमासाद्य तदा भव्या मुखाप्तये। दान वा पूजन यात्रामभिपेकादिसत्क्रियाम् ॥ ३३७ ।। जिनदेवम्य बिंबाना प्रतिष्ठाच मनोहराम् । श्रीमज्जिनालयस्यापि जीर्णस्योद्धारण तथा ।। ३३८ ॥ चक्र इत्यादि ते सर्वे महदानदनिर्भराः। तदा जैनेन्द्रवर्मस्योद्योतश्च ह्यभवन् महान् ।। ३३९ ।। धर्मस्योद्धारण तेन कृत चास्मिन् कलो खलु । जयत्यसो मुनीन्द्रो वे मोहमातगकेशरी ।। ३४० ।। तदातिगयमावीक्ष्य बुधा. केचिच्च तत्क्षणे । त्यक्त्वा संसारज सौख्य जगृहुमुनिसयम ।। ३४१ ।। मुनीश्वरोके गुणोका स्मरण करते हुए सम्यग्दर्शनके धारक परोपकार करनेवाले वे दोनो देव अपने स्थानको गये ॥ ३३३-३३४ ॥ अर्थ--उसके बाद श्री कुन्दकुन्द स्वामी इस पृथ्वीतलमें समस्त पदार्थो के जानने वाले देवोंसे पूजित सर्वत्र प्रसिद्ध हो गये ।। ३३५ ॥ अर्थ----उसके बाद प्रचड ज्ञानके धारक श्री कुन्द-कुन्द मुनीश्वरने सर्व प्रकार की मिथ्यात्व रूपी अग्नि- का जेनमिद्वातत्पी जलसे नाश किया ॥ ३३६ ॥ अर्थ-भगवान् कुन्दकुन्द मुनीश्वरके उपदेशके प्रभावसे कितने ही भव्यजीव सुखको प्राप्तिके लिये मुनि, आयिका आदि सत् पात्रोमें दान करने लगे। श्री अरहन्त भगवानकी पूजा करने लगे। और विवाहादि श्रेष्ठ क्रियाओतो यथागम पालने लगे। अपरिमित धनादिकके व्ययके द्वारा श्रीमज्जिनेन्द्रके विम्बोकी प्रतिष्ठा और महान उलय कगने लगे। प्राचीन जिनमन्दिरोका जीर्णोद्धार करने लगे। और रथोत्सव आदि विविध प्रकार के उलय करन लगे। त तपादिकोके द्वारा जिनधर्मकी प्रभावना बढाने लगे। इस प्रकार श्री कुन्दकुन्द मुनीश्वर के प्रमाणे नानकी महिमा अतिशय प्रकट हुई। यो कहना चाहिए कि उस समय का ही उद्धार मुनीश्वरने गरि मे दिव्य महिमाले धारा स्वामी कुन्दकुन्द मुनि जगत् में सदैव जयवन्त रहो ॥ ३३७-३४० ॥ अ-उन समय जितने ही भव्यजीवोने उनके सदुपदेशसे ससारको विचित्र दशाका विचार कर मुनि पीक्षा पार हो ॥ ३४१ ।। न .. -- THANESS BHCHCENE TREESH HCHASHRSING [ ६२ ] नंद्याद्यास्तस्य संजाता शिष्या बुद्धयब्धिपारगा । सबोधार्थ चतुर्दिक्षु भव्याना तानसी मुनिः ॥ ३४२ ॥ प्राहिणोत्तेपि चानस्य गुरो पादी जगन्नुतौ । प्रकट जिनधर्मं हि चक्रुः सर्वे मुनीश्वराः ।। ३४३ ।। तदाहि प्रकटो वासीत् जिनधर्म क्षिती खलु । सिद्धानान् प्रकट चक्रे पुन. सोपि यतीश्वर. ॥ ३४४ ।। अते समयसार च नाटक च शिवार्थदम् । पचास्तिकायनामाह्य वीरवाचोपसहिता ॥ ३४५ ।। आद्य प्रवचन चैव अत्यस्थ सारसज्ञकम् । सबोधार्थं च भव्याना चक्रे सत्यपदार्थदम् ।। ३४६ ।। यत्याचाराभिध ग्रथ श्रावकाचारमजसा । ध्यानग्रथ क्रियापाठ प्रत्याख्यानादिसद्विधीन् ।। ३४७ ।। प्रतिघस्राहानाशार्थ प्रतिक्रमणसयुत । मुनीनाच गृहस्थाना चक्र सामायिक तदा ॥ ३४८ ।। जिनेन्द्रस्नानपाठं च स्नपनार्थ जिनस्य वै। यस्याकरणमात्रेण प्राप्नुवति सुरे प्लवम् ।। ३४९ ।। प्रभूणा पूजन चापि तेपा गुणविभूपितम् । स्तवन चित्तरोधार्थ रचयामास स मुनि ।। ३५० ।। पूजाविधिस्तथा स्नानविधिविस्तारत. खलु । ग्रथेषु निर्मितस्तेन सर्वभूतहिताप्तये ।। ३५१ ।। अर्थ-श्री कुन्दकुन्द मुनीश्वरके मुख्य नंद्यादि शिष्य हुए जो बुद्धिमें बड़े पारगामी थे। उनको मुनीश्वरने भव्यजीवोके सम्बोधन करनेके लिए पृथ्वीतलमें भ्रमण कराया और सर्वत्र जैनधर्म की स्थापना कराई ॥ ३४२ ॥ अर्थ-शिष्योने अपने गुरुके पवित्र चरणकमलोको नमस्कार कर सर्वत्र जिनधर्मका प्रचार किया ॥३४३॥ अर्थ---उस समय समस्त संसारमें जिनधर्म प्रकट हुआ और उन्होने जिनसिद्धान्त ग्रन्थोको प्रकट किया ॥ ३४४ ॥ अर्थ-श्रीकुन्दकुन्द मुनीश्वरने मुक्तिको देनेवाला समयसार ग्रन्थ अंतमें बनाया । चौरासी पाहुड ग्रंथों की रचना की । वीर प्रभुकी वाणीसे सग्रहीत पंचास्तिकाय नामसे युक्त और जिसके आदिमे प्रवचन और अंतमें सार है ऐसा प्रवचनसार सबसे प्रथम बनाया। जिससे भव्योको आत्माका सत्य-सत्य ज्ञान होता है । एक श्राव- काचार भी ग्रन्थ बनाया । भगवान् कुन्दकुन्द स्वामीने विदेहम यत्याचार और सर्व सिद्धांत गन्योका अध्ययन किया था, तदनुसार उस यत्याचारकी तथा गृहस्थोके आचारको प्ररूपणा करनेवाले श्रावकाचारकी रचना की। प्रतिक्रमण और क्रियापाठ ग्रन्थ निर्माण किया। मुनि और श्रावकोके पापोंको शातिके लिए वह प्रतिक्रमण और सामायिक पाठ बनाया। अभिषेक पाठ बनाया। जिससे प्रभुका अभिषेक करनेसे महापुण्यको प्राप्ति हो। यमन्याच्याsraetic- WHeawee [ ६३ ] इत्यादिमकलान् ग्रन्थान् चेलकातसुधर्मभाक् । करिष्यति प्रभावार्थ जिनधर्मस्य धर्मधीः ॥ ३५२ ।। म यतीन्द्र स्वसिद्धयर्थ विहार च करिष्यति । तदावनौ नराधीश भव्यबोधार्थमजसा ।। ३५३ ।। भयान् सबोधयन् धर्म बर्दयन् वचनोत्करैः । मिथ्याधतमस सैव हनिष्यति भवाब्धिदम् ॥ ३५४ ॥ गिग्नाग्भिव वृत्त तम्य बक्ष्ये वुवोत्तमाः । शृणुथ धर्मामार्गस्य वर्द्धक धर्मिणो मुदा ॥ ३५५ ।। श्रीमन्नेमिजिनेन्द्रस्य यात्रार्थं स मुनीश्वर । एकदा धर्मवृद्धयर्थं चकार गमनं सुधीः॥ ३५६ ॥ HeamPSPIMPARASIYPramod विस्तारसे अरहन्त भगवान्की पूजा करनेको विधिका ग्रन्थ बनाया। स्तोत्रोकी रचना की। जिनमें प्रभुके अनेक गद्य-पद्य सुरस स्तवन थे। जिनसे मनका निरोध हो ऐसे ध्यानके ग्रन्थ बनाये ॥ ३४५-३५१ ॥ अर्थ--इत्यादि बहुतसे ग्रन्थ बनाये । मुनिधर्मके प्रकाश करनेवाले ग्रन्थ भी बनाये । जिससे श्रीजिनेंद्र के धर्मको अपूर्व महिमा प्रकट हुई। जैनधर्मको प्रभावना हुई तथा विद्वानोमें जैनधर्मका चमत्कार हुआ। और जगत्में जैनधर्मको मान्यता बढी ॥ ३५२ ॥ अर्थ--हे नराधोश ! कुन्दकुन्द मुनोश्वर धर्मको सिद्धिके लिये समस्त पृथ्वीमें विहार करेंगे॥ ३५३ ॥ अर्थ-श्रीकुन्दकुन्द स्वामी अपने वचन किरणोंके द्वारा जीवोंमें धर्मका प्रचार करते हुए मिथ्यांध- फारका समूल नाश करेंगे और जैनधर्मके द्वारा जगत्के जीवोको संसारसे पार करेंगे ॥ ३५४ ॥ अयं--कुन्दकुन्द स्वामीने श्रीगिरनारि पर्वतपर जो चमत्कार बतलाया था और धर्ममार्गको वृद्धिको यो उसका वृत्तांत हे राजन् श्रेणिक श्रवण कर ॥ ३५५ ।। अर्थ--एक दिवस श्री कुदकुद स्वामी एक महान सघका निर्माण कर श्रीगिरनारी पर्वतपर श्री नेमिनाथ भगगनको निर्वाण भूमिको यात्रा करनेको पधारे ॥ ३५६ ।। SAIRAGITATERIA - पिन विप न प अनेक गयोमे पमाण मिलते हैं । यहाँपर दो नोन प्रमाण जो मोलहवी शताब्दीमे Timi PRT Tो नारनोने देने है। यह गुट का दर के प्रसिद्ध भारमे श्रोगभवनायके चैत्यालयम बिग TET T20)।
[ ६४ ] . • ॥५॥ mareATHERese-STHETHERSTHIER-SHEELSHIERSHEETHEHICEwe (विध वियेश्वर नर्कमहेश्वर सिद्वातप्रकाशक श्री मुनि कुन्दकुन्द (पद्मनदी) का शुक्लाचार्य श्वेतावर साधूके साथ वाद हुआ उसकी गुजराती भाषामे कविता ) दोली सिंहामन ईश मूलसघो मुनिराजे । परम पुनीत अजीत पद्मनदी मुनि गाजे । सघ चतुर्विध सहित गिरनारी आये । ध्वजा ढोल नीशान बाजते भविमन भाये ॥१॥ ताही समय वहु वैभव साथे साथे । स्वेताबर सघ त्या आवो शुक्लाचार्ये साथे । मिथ्याभिमानमा माते थइने । पहुच्या गिरिवरपर चउसघे लइने ।। २ ॥ मूलसंघी मुनि कहे प्रथम अमो पूजा करसु । तब स्वेताबर कहे अमो बलि पहला करसु । यह विधि हुवो विवाद तदा सो एम बोले । आदि दिगबर धर्म एहने नहि को लोले ॥ ३ ॥ तव स्वेताबर कहे अमो बडा पहला उपज्या । वली दिगबर ... पाछेथी निपज्या। तब विद्यासागर कहे अथ सभालो आपणा । " .॥४॥ यह विधि बहु विवाद हुओ पण कोई न हारे । पद्मनदी मुनिराय तदा पण ऐम विचारे । शास्त्रवाद नहि यहाँ तो मंत्रवाद सुखकारे । नेमि जिनेश्वरतरणी यक्षिणी गोमुखराणी । ते कहे सो निरधार करो जो निर्मलवाणी। आदि अनादि सघकरी पहेला तमो मानवा । श्रीविद्यासागर कहे और उपाधि जाणवा ॥ ६ ॥ यह विधि विचार निरधार करी यति सूरी सघे । मनमा धरी आनद पूजवा जिनवर मनरगे। अमारी अबिका भुवन वेगे पहोचो जई तबे । प्रबल प्रताप पद्मनदि मुनिवर कहे ते हवे ॥ ७ ॥ भो स्वेताबर साभलो जग अंबा पूछो जई। विद्यासागर गुरु कहे फिर मनमे बहु दुरसई ॥ ८॥ आदि दिगबर धर्म अवर कही उपाधि । जो कहो तो बोलावो देवी आराधी ।। तव मुनिवर धीर वीर थई मंदिरमा पेठा । पद्मवदन मुनि पद्मनदि पद्मासन बैठा ॥९॥ तजी आना ध्यान धीर धरि चित्ते मुनिवर तदा । श्रीविद्यासागर कहे अबा प्रकटी हवे तदा ॥१०॥ सुन्दर सुन्दर रूप धरी शृगार वनावी । पद्मनंदी मुनिराय शील महातपथी अखी। सकलसंघसुं कहे अबिका अविचल एवु। आदि अनादि धर्म दिगंबर छे एवु कहेवु ॥११॥ यह त्रिक वचने कहुँ अविका अति उजलु । श्रीविद्यासागर कहे सर्व सघे तवे साभल्यु ॥१२॥ लज्जित थईने तवे स्वेताबर त्याथी नाठो। सर्व सभा माहि वलि तेने खाधो चाटो। तव मुनिवर धरि धीर नेमि जिनभुवने आव्या । मुनिवरना गीत तदा सौ मगल बहु गाव्या ॥१३॥ wwwamu umbrelubu selu SaSheetohet TAR अजरामर [ ६५ ] माकं तस्य (तेन) घना भव्या प्रचेलु सागनाः खलु । मुन्यायिकाञ्च यात्राथं भवभ्रमणहानये ।। ३५७ ।। तस्मिन्' चतुर्विध सधे दिगवरधरा वरा.। सप्तशतप्रमा ज्ञेया मुनयो वुधसत्तमे ।। ३५८ ॥ अर्थ--मुनि कुन्दकुन्द स्वामीके साथ बहुत से भव्य श्रावकगण, अनेक श्राविकाएं, मुनि और आर्यिकाएं यात्राके लिये चले ।। ३५७ ॥ अर्थ-उस कुन्दकुन्द स्वामीके चतुर्विध संघमे ७०० सातसौ निग्रंथ दिगंबर जैन मुद्राके धारक मुनि थे। सघ तवे अतिप्रचुर वाजिंत्र बहु हर्प वाजे। नादे गडगडें धरोया गिरि अवर गाजे । विरद भाट वोले भला जय जय मुर उच्चरे । मूलसघ तिह समे अतिप्रमोद मनमा धरे ।।१४।। आदि दिगबर धर्म सत्य स्वेतावरे जाण्यो । पाछलथी भयो श्वेतावर एवु सह मान्यो । सफल सघ मणगार सारस्वत गच्छ भुलावो । बलात्कारगण सार अपार महिमा सौ गायो ।।१५।। एवु भला सह जण कहो बहुप्रकारे स्तुति करी। श्रीविद्यासागर गुरु कहे दिगवर कीर्ति विस्तरी ॥१६॥ धन्य धन्य दिगवर धर्म धन्य गिरिवर गिरनारी। यदुवंशो जगपति धन्य श्रीनेमिकुमार ॥ यक्षिणी जग अबा धन्य अनुपम देवी । पद्मनदि मुनि धन्य वाणी अमृतसम छे जेवी ।।१७।। ममकित शीलवती देवी जिनवरतणो प्रकट करी । विद्यासागर कहे कीर्ति दिगवर तणी अति विस्तरी ।। गंवत् मौलसोगोस अधिक वेदेकर जाण्यो । कार्तिक मासतणो शुभ्र शुभ पक्ष वखाणो ।।१८।। उत्तम तिथी पयोदशी वार रविवार विराजे । कारजा वर नगर दिगंवर मिहनु गाजे ॥ नद्रप्रभ भवने रही समयनद्र मुनिवरे। श्रीविद्यासागर कहे रासासा वच उच्चरे ॥१९॥ न्यमान्मारामाज्याचा Theme KAR १-या का एक गुटकामे ( जो ऐला पन्नालाल दि० जेन स० भवन मुम्बई मे है । ) लिखी है उसकी नकल यहां पर दो । AT गहित श्री गिरनारजीको यात्रावास्ते नाले, और चेतावरियोका संघ भो याया गिरनारजीको गया। दावर मी गणना-नोगमो गयो जती १२ हजार, ओमवालादि श्रावत दो लाल बावन हजार और चाकर, पियादा माजमार भी गिरनारगो नोने अपने-अपने मन में मुकाम करते भये । तदि श्री कुन्दन्द आचार्यजीका सघ ऊपर नटने "गा ! पर गोगों माग गानो गमन नहीं करने दिया और कही पहली गाना हमारी होवेगी । पीछे तुम्हारी [ ६६ ] हिंगणा आधिकारागार हा कसाटोपरिगहा.। तपसा कृशमांगा शेया' तत्वविदावरैः ।। ३५९ ॥ ammar एक साठी मात्र परिग्रहको धारण करनेवाली, तपके द्वारा शरीरकी क्षीणता को प्रकट करनेवालो, और तत्त्वोंको PERARE. माजचपरामराम -- होगी । यह गमानार मुनकर सब हो पाछा आय गया और आचार्यसो विनती करो। हे नाथ | ये श्वेतावरी बहुत ओर अपना गर पोडा सो या केगे होयगी ? तदि आचार्य आज्ञा करो, तुम उनसे कहो-तुमारे हमारे कुछ देर तो नहीं। और जो तुम पने मत का आइवर राख्या चाहो तो अरूवरू आवो । जो जीतेगा पहलो यात्रा करेगा । अव यात्रा तुम भी नही करोगे । ऐसा वनन होता थका दोनो सघका वाद ठहर गया। जो जीते सो यात्रा पहली करणी। दिगबरियोके स्वामी कुन्दकुन्दाचार्य ओर श्वेतावरियो के मालिक शुक्लाचार्यजी। सो इनके कितने ही दिन तक वादविवाद हुआ। एक दिन शुक्लाचार्यजीने मत्र प्रयोगसे कुन्दकुन्द न्यामोका कमालुमै मच्छो कर दोनी । और समस्यासू कोईके ताई कही- ये मुनि है परतु इनका आचरण धीवरकासा हे । ऐसी बात सुणके कोई श्रावक कही स्वामी कमडलुमे काई छ । स्वामी कही कमडलुमे कमलके फूल है । स्वामी दिखावो सो कमडलु औधो कन्यो सो कमलके डेर हो गये । और स्वामीका चौथा नाम पद्मनदी ( कमल-गद्म के आनदो) प्रकट हुआ । कुन्दकुन्दाचार्यने शुक्लाचार्यके वस्त्र सब उड़ा दिये ओर जती लोगोके बेठना और वस्त्र उडा दिये । राबको नग्न कर दिया । चादर नीचे ओर पीछी ऊपर । इस तरह चादर चादरपर पीच्छिका हो गई। चादरके ताई पोछी कूटने लगी । और यती लोग रोने लगे । ऐसा चमत्कार स्वामी बतलाया। तब श्वेताबर बोले कि ऐसी धूर्तविद्यासे वाद नही होता है । अब हम कहते है कि ये पाषाणमयी सरस्वती की प्रतिमा है। यह अपने मुंहसे कहे सोई प्रथम यात्रा करे । तब शुक्लाचार्यने अनेक प्रयत्न किये, प्रतिमा नही बोली । तब स्वामी आय कमण्डलु पिच्छिका हाथमे लेकर श्रोसीमधर स्वामीको नमस्कार करके पीच्छिका सरस्वतीके शिर पर धरी । आप प्रकट कहते भये कि हे देवि | अब तुम सत्य वचन का प्रकाश करो। तब देवी गर्जना रूप तीन बोल प्रकट बोलो “आदि दिगबर | आदि दिगवर ।। आदि दिगबर III गर्भका वालकवत हे चिह्न जाके ।" तदि दिगबर सप्रदाय सत्यरूप प्रतीति भई । श्वेताबर फिर उस प्रतिमा को बुलवाना शुरू किया । तदि देवी कही तुम बारह वर्ष तक भी झगडा करो। हमने एक सत्य था सो ही कह्या । तब श्वेताबरोमेके सैकडों शिष्य भये । ओर प्रथम यात्रा श्रीकुन्दकुन्दाचार्यका सघ करता भया । ओर श्रीगिरनारी पर्वतपर जिन मदिरकी प्रतिष्ठा सबसे प्रथम हुई । तदि मूलसघ, बलात्कार गण, श्रीकुन्दकुन्दाम्नाय (वश) प्रकट हुआ। बडे शिष्य नन्दी मुनिराजके ताई आचार्य पद दिया। सो उनको आम्नाय आज तक प्रसिद्ध है । आचार्य कुन्दकुन्द स्वामीने अनादिकालसे प्रचलित सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप यज्ञोपवीत विधान सर्वत्र प्रकाशित किया और जैनधर्मकी प्रभावना प्रकट की। अन्तमे आप वारा नगरमे आये और एकमास प्रथम ही निमित्त ज्ञानसे अपना मरण का निश्चय कर न्यास धारण किया ओर पांचवे स्वर्गमे देव हुए। राज्याच्या यसयमलामात्र 5 अा. TIIT TT T. . UTTrn "-:मया" । अन्तररहय Frrrr-पर-कार-rrr mर ----4 --- [ ६७ ] WIPAHIEFERESTRAMESHINDE मालासहनसस्याड्या श्राद्धाश्च व्रतपालका. । द्विगुणाः श्राविका ज्ञेयास्तस्मिन् वै वुद्धसत्तमै ॥ ३६० ॥ एव चतुर्विधे मधे कुन्दकुन्दो यतीश्वरः। सयुक्तः क्रमत. प्राप्त. उर्जयतवने वरे ॥ ३६१ ।। स्वस्वस्थाने स्थिति चक्रः तेहि तदर्शनोत्सुका. । मार्गस्य श्रमनाशार्थं शृणुध्वमपरा कथाम् ।। ३६२ ।। नत्रैव नेमियात्रार्थ सघो वै श्वेतवाससाम् । महान् डिभेन सपन्नः आगतश्च नवोदयः ॥ ३६३ ॥ तस्मिन् सधे वुधे“या दडपात्रविमडिता । शुक्लागुकधरा वृद्धा यतयो नामतो मता ॥ ३६४ ।। यक्षव्यतरदेवोना साधने एव चचवः । खवेदकरसख्याव्या. पोपकाः स्वतनो रसैः॥ ३६५ ।। तदाज्ञापालका ज्ञेया द्विलक्षप्रममानवा. । धनोत्करधरा. तस्मिन वुधैस्तत्त्वार्थवेदिभिः ।। ३६६ ।। जाननेवाली चौदहसौ १४०० आर्यिका थी। व्रतोको पालन करनेवाले जिनागमके दृढ़ श्रद्धानी ऐसे पैतीस हजार ३५००० श्रावक, और ७०००० सत्तर हजार श्राविकायें थी। उन सबके साथ अपने-अपने नौकर, चाकर, सिपाही, पयादे तथा सब प्रकारके साधन गाड़ी, घोड़े आदि थे । इस प्रकार चतुर्विध संघ सहित कुन्दकुन्दाचार्य श्रेष्ठ गिरनार पर्वतके वनमें पहुंचे ।। ३५८-३६१ ॥ अर्थ-समस्त संघके अपने-अपने डेरा लगाकर गिरनार पर्वतकी तलहटीमे मार्गश्रमको दूर करनेके लिये निवास किया । इतनेमें वहॉपर एक दूसरी कथा हुई वह श्रवण करना चाहिए ॥ ३६२ ॥ अर्थ--वहांपर ( श्री गिरनारी पर्वतकी तलहटीमें ) श्री नेमिनाथ भगवान्की यात्राके लिए श्वेतांबरियों- का एक नवीन मघ बडे आउंबरके साय आया ।। ३६३ ।। अ-नेतावर संघमें दउ ओर पात्रोसे सुसज्जित और सफेद वस्त्र धारण करनेवाले बहुतसे यती थे परंतु उनमें वतियोता एक भी गुण नहीं था । नाम मानके वे यतो थे ॥ ३६४ ॥ जरं-- श्वेतांबर यतो केवल यक्ष-यक्षिणियो के आराधक, अपने शरीरके पोषण करने में ही दत्तचित्त ऐसे पोको नाम ।। ३६५ ॥ --मरताचर संघ उन यतियोकी आज्ञा पालन करनेवाले दो लाख श्रावक ये जो धनके मारो मारो॥३६६ ॥ nonvenienारानी है [ ६८ ] न्याच्या SHESHA DIGETHE नानातिशयसपन्ना यतयस्ते मदोद्धता. । ख्यापयन्तो मद स्वस्य दशयत् विभव महान् (?) ॥ ३६७ ।। एव सकलसपेन गिरनारिवने शुभे । वास चक्रुश्च तत्रोच्चैर्मानाद्रिशिरसि स्थिता. ॥ ३६८ ॥ पूर्वागतश्च यः सघ पूजयित्वा जिनेश्वरान् । कुदकुदयतीन्द्र त ह्यग्रे कृत्वा चचाल स ।। ३६९ ॥ गानवाद्यादिसद्घोषान् कुर्वन् नृत्यादिसत्कला । सघलोकाश्च ते चेलुः सघस्याग्रे मुदान्विता. ॥ ३७० ।। न्यषेधि समये तस्मिन् स्वेतवासधरैः खलैः । पूर्वं यात्रा करिष्यामः वयमस्य च सोह्यतः ॥ ३७१ ।। अस्माक सर्वतः पूर्वो सतः सकलविश्रुत । अतः सर्वेषु वृद्धाश्च वय नान्ये धरातले ॥ ३७२ ।। इत्युद्धतमया वाच श्रुन्वा च श्रावकास्तदा । नत्वा गणपति तेषा तूर्णमागत्य तत्र वै ॥ ३७३ ।। या श्रुत्वा कथिता वार्ता तन्मुखात् सा मुनीशिन.। ता च श्रुत्वा मुनीन्द्रोपि सविचार्य स्वचेतसि ॥ ३७४ ।। वसुपालाभिध श्राद्धमेकमाहूय तत्क्षणे । शिक्षा दत्त्वा शुभालापैः प्रेपितस्तान् प्रति तदा ।। ३७५ ॥ अर्थ--श्वेतांबर साधु अनेक अतिशयो (चमत्कार) से सम्पन्न और अपने मन्त्रतन्त्रके मदसे मदोद्धत थे । जो अपने मतकी प्रसिद्धि श्रावकोंका वैभव दिखलाकर करते थे। इस प्रकार श्वेतांबर संघ गिरनारीके शुभ वनमें आकर वास करने लगा। उन लोगोको अपना बड़ा घमंड था ॥ ३६७-३६८ ॥ अर्थ-सबसे प्रथम आया हुआ श्रीकुंदकुंद भगवान्का संघ, नगर (जूनागढ़) के मन्दिरोंकी पूजा कर और पर्वत (श्रीगिरनार) पर श्री कुन्दकुन्द स्वामीको अग्रेसर बनाकर वदना करनेके लिये चला । संघमें तीर्थ- यात्राकी उमंगसे गान-वाद्य आदि विविध प्रकारके महोत्सव हो रहे थे ॥ ३६९-३७० ॥ अर्थ-उसी समय उन श्वेतांबर लोगोने उस दिगंवर संघको तीर्थयात्रा करनेसे रोका और कहा कि सबसे प्रथम हमलोग यात्रा करेंगे। क्योकि हमारा मत सबसे पूर्वका है, प्राचीन है। हमारे मतकी सर्वत्र प्रसिद्धि । इसलिये सबसे प्रथम यात्रा करनेका हमारा हक है । इस प्रकार उद्धत और अनीतिके वचनोको सुनकर कितने ही श्रावकगण शांतिसे (किसी प्रकारकी कलह अपनी तरफसे किये बिना ही) मौन सहित-गणपति कुन्द- कुन्द स्वामीके समीप आ गये ।। ३७१-३७३ ।। अर्थ-श्वेतांबर लोगोसे तीर्थयात्रा रोकनेके विषयमें जो वार्तालाप हुई थी वह ज्योकी त्यों श्रावक गणोंने आचार्य श्री कुन्दकुन्द मुनिको आकर कह दी । उसको सुनकर स्वामीजीने अपने मनमें विचार किया और CHHATTIAHIHOSParmer ator SAHESH रामनारा [ ६९ ] MAHESTIPS सोपि तत्रैव गत्वा च तानाह शृणुय महो। समाधिना वचासि मे भो श्वेतवसनाकिताः ।। ३७६ ।। सत्याख्या सर्वलोकेषु मान्या स्यात नात्र संशय । वाणी यूयमपि सत्या वदथ इतरा च मा ।। ३७७ ।। विश्रुत चास्ति सर्वत्र दैगवरमतो ह्यय । प्रत्यक्षं जिनविवेपु यूय पश्यथ निश्चयात् ।। ३७८ ॥ नग्न इत्यभिधेय च पूज्यः स्यात्सकलेश्वर. । नग्नत्वात् सिद्धस्थानस्य प्राप्ति स्यान्नान्यत कदा ।। ३७९ ।। वृपभादिजिनेन्द्राश्च गृहाश्रमे गता न किमु । मोक्षे तेपि यदा जाता तदा नग्ना सुरेः स्तुता. ॥ ३८० ।। वचनाडबरेणाल मर्वमत शिरोमणिम् । दैगबरमत यय जानोथ निश्चयाच्च भी ।। ३८१ ।। गक्ति म्याद् यदि युष्माक विशेपा वादकर्मणि । तर्हि आगच्छथ यूय तन्निकटे शीघ्रमेवाहि ॥ ३८२ ।। अम्माक चैव युष्माक वादोस्तु तत्र ये खलु । तत्रैव दर्शन तस्य करिष्यति प्रनिश्चयात् ।। ३८३ ।। शांतिसे यात्रा पूर्ण हो इस इरादेसे आचार्य महाराजने सेठ वसुपालको सब प्रकारको शिक्षा देकर श्वेतांबर संघ- के पास भेजा ॥ ३७४-३७५ ॥ Ganामान्य सRAMGERY अर्थ-उस चसुपाल सेठने श्वेताबर सघके मुखिया लोगोसे जाकर कहा कि हे श्वेतांबर भाइयो आप मेरे गमाधिके (परस्पर एकताके) वचन सुनिये ? संसारमें सत्य बात मान्य होता है और सत्यका ही सर्वविजय होता है। इसमें कुछ भी सदेह नहीं है। इसलिए आप भी सत्य-सत्य कहिये मिथ्या कहने में कुछ भी लाभ नहीं है । क्या आप नहीं जानते हैं कि दिगंबर मत सबसे प्राचीन है । संसारमें सर्वत्र दिगम्बर मतकी प्राचीनता प्राट है। यह बात आप लोग जिनबिंबोंको देखकर प्रत्यक्ष निश्चय कर सकते हैं । ओर समस्त राजागण नग्न दिगम्बर को ही पूजा करते है । नग्न होने से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है अन्य भेष से कभी नही । यदि नग्न विगघर के भेद से मोक्ष नही होतो तो वृषभादि चतुविशति तीर्थकर गृहका परित्याग कर नग्न होकर दीक्षा 3 Tया करने ? यस्मादि परिग्रह सहित घरमें ही मोक्षको प्राप्त हो जाते ? परंतु जब उन्होंने परिग्रहको स्वागा ना होने पजिन हा ओर मोक्षके अधिकारी बने। अधिक कहने से क्या प्रयोजन है। संसारमें नाममा मनो जिरोमणि दिनार जैनमत है ऐमा तुम निश्चयसे जानो। लोगोको अपने मतका अभिमान को AT मत प्रानो771 17 उत्कृष्टता मिद करने के लिये हमारे पूज्य आचार्य कुन्दकुन्द स्वामीसे बाद Trfirmरोगिये। यदि आप लोगोमें पारित है तो अवश्य वादके लिये तैयार हो जाओ। इस बावमें [ ७० ] माया मजEDS जेष्यति तेहि तीर्थस्य पूर्व वै वादकर्मणि | सज्जा भवथ तस्यार्थमत श्वेताशुधारकाः ॥ ३८४ ।। इत्युक्त्वा वसुपालाख्यो क्षोभयित्वाच्च तान् खलान् । आगत्य सर्ववृत्तात गुरवे समचीकथत् ।। ३८५ ।। सर्वसधेन सयुक्तः कुन्दकुन्दमुनीश्वर. । ऊर्जयतसमीपेहि गत्वाऽस्थाच्च प्रदीप्तवान् ।। ३८६ ।। तेपि तत्रैव ह्यागत्य तस्थुः वादार्थ मे वच । जल्पयत्येव ते मूर्खा परस्परमहो तदा ।। ३८७ ।। कियन्मात्रा इमे नग्ना सर्वातिशयवर्जिताः । अहमेको हि भो स्वामिन जेतु हि सकलान् क्षमा ।। ३८८ ॥ एव सर्वे मदोन्मत्ताः तस्मिन्नवसरे खलु । ब्रु वेत्येव मनः कल्पात् स्व स्व प्रति गुरू खला ॥ ३८९ ।। तदा सनम वादार्थ प्रयोगैः मत्रतत्रभि । अन्यैरतिगयैस्ते च आजग्मुर्मुनि सन्निध ।। ३९० ।। जो जीतेगा वही प्रथम यात्रा करेगा और तीर्थकी बंदना करेगा। इसलिये अब आप लोगोको अपनी शक्ति गुरु कुन्दकुन्द स्वामीके निकट शीघ्र चलकर प्रकट करनी चाहिये । इस प्रकार निर्णय कर और समस्त श्वेतांबरियों को क्षोभ कर वह वसुपाल अपने संघमे आया और समस्त वृत्तांत आचार्य कुन्दकुन्द स्वामीसे ज्योंका त्यो कह दिया ॥ ३७६-३८५ ॥ अर्थ-तदनंतर मुनि कुन्दकुन्द स्वामी समस्त संघसहित ऊर्जयंत गिरिनार पर्वतके समीप जाकर वाद- के लिये स्थित हुए ॥ ३८६ ॥ अर्थ--उसी समय श्वेतांबर संघके मुख्य लोग अपने आचार्य और यतियोंके साथ परस्पर अपने आप ही अपनी महिमाको गाते हुए वाद करनेके लिये वहाँ पर जहाँ श्री दिगम्बर जैन संघ कुन्दकुन्द स्वामीके पास बैठा था आये ॥ ३८७ ॥ अर्थ---उसमें से कितने ही यति लोग मिथ्याभिमान मे चूर होकर कहने लगे कि हे स्वामिन् समस्त प्रकार के अतिशय रहित ये नग्न दिगम्बर कितने है ? मै अकेला ही इन सबको जीतने में समर्थ हूँ ॥३८८॥ अर्थ--इस प्रकार अपने अभिमान में मदोन्मत्त वे श्वेतांवरी यति लोग अपना-अपना अभिमत अपने- अपने गुरुओंको बतलाते हुए वहाँ पर आये ।। ३८९ ॥ अर्थ--उस समय वादके लिये सुसज्जित होकर तथा मंत्रतत्र एवं अन्य चमत्कारके घमंडको प्रकट voowbrodu sammen sehen FIजयमाच्या सन्तता [ ७१ ] दिशाबरधराणा च यतिराट् हरिसदृशः । शुशुभे सघमध्ये च परमतेम्रघातने ॥ ३९१ ॥ शुभ्रवासोधराणा च मध्ये वै वारणोपम | शुक्लाचार्येतिनाम्ना भात् केवलेनैव नो गुणैः ।। ३९२ ।। द्वयोस्तत्रैव सजातो वादो वादार्थवेदयो । चमत्कारकरो लोके सिंहमातगतुल्ययो. ॥ ३९३ ॥ या या प्रश्नावलिस्तन कृता च स्वामिन प्रति । क्षणेन छेदिता सर्वा मुनिना तेन तत्क्षण ।। ३९४ ।। यथा वार्द्धन्दुवाणेन अन्यद्वाणोत्कराः खलु । क्षणेन क्षयता याति निष्ठुरा देह भेदकाः ।। ३९५ ।। तथा हि मुनिवाक्येन तस्य वचनसततिः। क्षयमगात् क्षणेनैव शक्तिमतस्य (?) वै तदा ।। ३९६ ।। स तदा निजितस्तेन स्याद्वादमतवादिना । चुकोप सावरोयुक्त तस्योपरि सिताशुकः ॥ ३९७ ।। करते हुये वे मुनिराज कुन्दकुन्द स्वामीके समीप आये ॥ ३९० ॥ अर्थ--उस समय दिगम्बर जैन यतिराट् कुन्दकुन्द स्वामी सकल संघके मध्य परमतरूपी हाथियोंको नाश करनेके लिये सिंहके समान शोभाको प्राप्त हो रहे थे ॥ ३९१ ॥ अर्थ--श्वेताम्बर मतके आचार्य हाथोके समान बलके धारक शुक्लाचार्य नामके यति वाद करनेके लिये तैयार शुक्लाचार्य नाममात्रके शुक्लाचार्य थे। परंतु गुण शुक्लाचार्य में नही थे ॥ ३९२ ॥ अर्थ----शुक्लाचार्य और कुन्दकुन्द स्वामीका प्रत्येक शास्त्रमें चमत्कार करनेवाला सिंह और हाथीके समान वाद हुआ ॥ ३९३ ॥ अर्थ-शुक्लाचायंने जो प्रश्न आचार्य श्री कुन्दकुन्द स्वामीसे किये उनका समाधान स्यात् सप्तभंगीके बारा नकाल हो एक क्षणमात्रमें किया ।। ३९४ ॥ यमजयन्यायालयामारयामासाना अर्थ--जिस प्रकार चंद्रवाणसे समस्त बाण समूह एक क्षणमात्रमें नष्ट हो जाते है उसी प्रकार आनायं कुरफन्य स्वामीको सप्तभग म्यादाद वाणीसे शुक्लाचार्यके समस्त प्रश्न उसी समय क्षणमात्रमें नष्ट हो जाने ।। गन है शक्तिशाली जीवोकी महिमा हो विलक्षण होती है। प्रभु कुंदकुंद स्वामी श्वेताम्बर मानानायके प्रनो का समाधान न काल ही क्षणमात्रमें कर देते थे ।। ३९५-३९६ ।। - प्रकार गमन शानो बादविवावमें श्वेताम्बर शुरलाचार्य स्याद्वाद विद्यापति श्री कुन्द- [ ७२ ] GIRल्यालयमा समस्यामरामाय- मजले तेन मायया स्वस्थ तत्क्षणे । मोनानुजाः कृताश्चेव मुनेस्तस्य दबापते. ।। २९८ ।। गनिमेषत स्वस्य सेवकाना सलेन वे। दर्शित स तथा तेपि मुदमापु खलात्मका. ।। ३९९ ।। मुनि प्रन्याह कश्चिन्ना किमस्ति भो मुने तव । कमडलाविति श्रुत्वा स प्रवाह मुनीश्वर ।। ४०० ।। पुन्छ स्वस्वगुरू त्व च स चादिमतधारक । मुनेर्वाचमिति श्रुत्वा गुरू पृष्ठञ्च तेन वै ।। ४०१ ।। आनरण्यत् मानयोगेन प्रत्यक्षमेव स कुधी । पश्यथ भी नरा यूयमय जीवस्य भक्षकः ।। ४०२ ।। निर्दयस्य रव श्रुत्वा इत्थ स यतिराट् तदा । नत्वा सीमधर देव करे धृत्वा कमडलुम् ।। ४०३ ।। अधोमुख चकार त सर्वेषा सन्निधे खलु । तस्य मानविनाशार्थं जिनधर्म प्रवृद्धये ॥ ४०४ ।। कुन्दस्वामीसे हार गया। तब शास्त्रोके ज्ञानमे अपनी गति न देखकर सांवरी मंत्रकी शक्तिके बलसे स्वामीके प्रति क्रोध किया और मंत्रके चमत्कारके द्वारा स्वामीको परास्त करना चाहा ॥ ३९७ ॥ अर्थ--मंत्रकी प्रबल शक्तिसे शुक्लाचार्यने परम दयालु-अहिंसा महाव्रतके प्रतिपालक स्वामिके कमंडलुमें मछलियाँ उत्पन्न कर दी ॥ ३९८ ॥ अर्थ---शुक्लाचार्यने अपने इस चमत्कारको (मछली कमण्लुडमें कर दो) अपने शिष्योको नेत्रके इशारेसे बतलाया जिससे वे दुष्ट बड़े प्रसन्न हुए ॥३९९ ॥ अर्थ-शुक्लाचार्यने उन शिष्योंमेंसे एक मनुष्यको भेजकर स्वामीजीको पूछा कि हे मुने आपके कमंडलु में क्या है ? इस प्रश्नके उत्तरमे स्वामोने कहा कि तुम अपने गुरुसे पूछो। क्योंकि वह आदि मतका धारक सर्वदर्शी है । मुनिके वचनोंको सुनकर उसने अपने गुरु शुक्लाचार्यसे पूछा ।। ४००-४०१ ।। अर्थ--शुक्लाचार्य अपने मंत्रके बलसे कमंडलुमें मछलियाँ उत्पन्न समझकर बड़े अभिमानके साथ कहने लगा । अरे मनुष्यों ? देखो-देखो यह मुनिका वेष धारण करनेवाला जीव भक्षक है । (क्योंकि इसके कमंडलुमें मछली है) ॥ ४०२ ॥ अर्थ-निर्दयी श्वेतांबर शुक्लाचार्यके ऐसे दुष्ट वचनोंको सुनकर स्वामी कुन्दकुन्द मुनिने सबसे प्रथम श्री सीमंधर स्वामीको नमस्कार किया और अपना हाथ अपने कमंडलुमें रक्खा । तत्काल ही श्वेतांबर और दिगंबर संघके समस्त मानव समाजके समक्ष शुक्लाचार्यका मान मर्दन करनेके लिये और जैनधर्मकी सत्य प्रभावना मस्यालयमा [ ७३ । AnHeamerparmaeaimes पद्मपुष्पोत्कराः तस्मात् पेतुः तस्मिन् क्षणे शुभाः । तेपामामोदतस्तत्र भ्रमराश्चागताः खलुः ।। ४०५ ।। तदातिशयमावीक्ष्य कुदकु दतपोनिधे । संघलोकाश्च ते सर्व मुदमापुश्च्युतोपमम् ।। ४०६ ।। पद्मनद्यभिधानेन मुनेस्तस्य तदा नरा. । इति चक्रुस्तुतिं सर्वे अय हि सार्थनामधृत ।। ४०७ ।। तस्मिन् काले मुनीद्रस्य प्रख्यातिशयदर्शनात् । म्लानवक्तास्तदा जाता श्वेतवासोधराश्चते ॥ ४०८।। पद्मनदोति सन्नाम्ना स मुनि समये तदा । आसोद्विख्यातता तत्र दिगवरविभूपित. ।। ४०० ।। पुनस्तत्र नयोरासीत् वाद. सकलसाक्षितः । शुक्लेन मत्रयोगेन मुनेः पिच्छि· धृता च खे ।। ४१० ।। मुनिना तस्य शुल्कस्य गात्रादुत्तार्य तेन वै । वस्त्र तस्य समीपे हि स्थापित चैव तत्क्षणे ।। ४११ ॥ प्रकट करनेके लिये कुन्दकुन्द स्वामीने वह कमंडलु ओंधा कर दिया। जिससे उस कमंडलुके मुख मेंसे पद्म (कमल) के फूलोंका ढेर नीचे गिर पड़ा । जिसको मनोहर और दिव्य सुगंधोसे भौरे आ गये। यह अद्भुत चमत्कार देसफर समस्त मानव अति हर्प को प्राप्त हुए। और स्वामी कुन्दकुन्द मुनिके अतिशयसे अत्यंत आश्चर्यको प्राप्त हुए। समस्त सघमें आनन्द हुआ। उसी समय स्वामीको पद्मनन्दी नामसे प्रसिद्ध किया (क्योकि स्वामीके चम- कारसे कमडल में पम हो गये। अतः पद्मनन्दी नाम रखा) ओर सार्थक इस नामसे ही प्रभुका स्तवन समस्त मंघने किया ।। ४०३-४०७ ॥ अर्थ---उम समय मुनि कुन्दकुन्दका यह लोकोत्तर चमत्कार देखकर समस्त श्वेतांवर लोगोका काला मह हो गया ।। ४०८ ॥ अर्थ-उस समय कुन्दकुन्द स्वामी पानंदीके नामसे समस्त संसारमें प्रसिद्ध हो गये। और उनका दिर अनिमय भी मवंत्र प्रकट हो गया । ४०९॥ ----फिर मा म्यामो और यालाचार्य में मात्रिक वाद हुआ । शुक्लाचार्यने अपने मत्र बलसे स्वामी- पोकर पाताराम रागदो।। ४१० ॥ -~कार यामीने शालानाय श्वेतावर यतियोले वस्त्र उनके शरीरसे उठाकर आताशमें HTTE Imऔर मोनान सिम्पर उसो क्षणमें बना डाला ।। ४११ ॥ म्यागाजियालयाच्या 1 .
उमलली यजन HARSaiयोन्या- न्याय-RSEHOLDERIAGar [ ७४ 1 एव तत्र महान् वाद वाद सजातश्च द्वयो. खलु । सागता स्वामिसान्निध्ये तत्रैव स स्थिताश्च वै॥४१२।। पुनर्धर्म प्रकाशार्थ त प्रत्याह यतीश्वर । भो यदि चादिधर्मोस्ति ते तर्हि वचन शृणु ॥ ४१३ ॥ पापाणनिर्मिता मूर्ति इमा च भारती खलु । प्रकटी करू त्व तूर्णं विलब मा भजस्व वै ।। ४१४ ।। कथयिष्यति यस्योच्चरियमाद्यमत खलु । पूर्वा तस्यैव यात्राच भूयात् वै नात्र सशयः ॥ ४१५ ।। मुनेक्यिमिति श्रुत्वा स शुक्लश्चाह त प्रति । एवमस्तु हृदि ध्यात्वा प्रयोगमत्रतत्पर ।। ४१६ ।। तदेव भारती नत्वा शुक्लपाषाणनिर्मिता। गिरिस्था मोमरूपादया तस्थैवावदन्निति ।। ४१७ ।। अर्थ-~और कुन्दकुन्द स्वामीकी (जो शुक्लाचार्यने आकाशमें उड़ाई थी) उनके पास आ गई। परन्तु उन दोनोंमें परस्पर मांत्रिक वादविवाद अति चमत्कारी हुआ। ओर श्वेतांबर यतियोके वस्त्र आकाश में उड़ा वेनेसे उनको बड़ा हो नीचा देखना पड़ा ॥ ४१२ ॥ अर्थ---फिर भी यतीश्वर कुन्दकुन्द भगवान्ने अपने दिगंबर मतकी अतिशय प्रभावना प्रकट करनेके लिए श्वेतांबर यति शुक्लाचार्यसे कहा कि जो तुम्हारा धर्म आदि कहो तो हमारे वचनोको श्रवण करो ॥४१३॥ अर्थ-हे श्वेताम्बर शुक्लाचार्य जो तेरेमें शक्ति है और जो तू अपने धर्मको आदि धर्म मानता है तो यह सामने पर्वत पर ( गिरनारी पर्वत पर ) पाषाणकी सरस्वती देवीको मूर्ति है उसको प्रकट कर उससे ही कहला दे कि कौन-सा आदिधर्म है । जो पत्थरकी सरस्वतीको मूर्ति अपने मुंहसे कह देगी वही धर्म आदि धर्म समझा जायगा। इसलिए शीघ्र ही इस पत्थरकी मूर्तिसे कहलाओ, देरी न करिये ॥ ४१४ ॥ अर्थ--जो तुमने शुक्लाचार्य, इस पत्थरकी देवीके मुखसे कहला दिया तो आप सबसे प्रथम यात्रा करे ॥३१५॥ अर्थ---इस प्रकार श्री आचार्य कुंदकुन्द स्वामीके वचनोंको श्रवण कर शुक्लाचार्य अपने मनमें बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसने कहा कि एवमस्तु, ऐसा ही हो, ऐसा कहकर वह शुक्लाचार्य अपने मन्त्रके आराधना करनेमें तत्पर हुआ ॥ ४१६ ॥ अर्थ----उसी समय वह शुक्लाचार्य सफेद पत्थरको मूर्तिको श्वेतांबर मत प्राचीन है ऐसा कहलानेके लिए देवीके सामने मंत्राराधन करनेके लिए बैठा ॥ ४१७ ॥ न्याय [ ७५ ] WALATHIPEnese सत्यवाणी महादेवि वद त्व कस्य स्यात् खलु । सुराय॑मत्रयोगेन मताद्यः शुक्लचेल भूत् ।। ४१८ ॥ इत्थं श्रुत्वापि सा देवी नाह सकलदर्शकान् । तदा शुक्लस्य वक्राव्ज श्यामत्वमगमत् खलु ॥ ४१९ ।। स मुनिः कुन्दकुन्दाख्यस्तस्मिन्नवसरे खलु । करे धृत्वा वरां पिच्छि नत्वा सीमधर जिनम् ॥ ४२० ।। तस्माद्धि भारतीमाह इत्य तुर्णेन मोदभृत् । कथय कथय क्षिप्र सत्यवाणी जिनास्यजे ।। ४२१ ।। इति श्रवणमात्रेण 'अश्मजा सा च भारती । मेघवत् गर्जनारूपा वाणीमचीकथच्च सा ।। ४२२ ॥ ऊर्जावोमध्यलोकेपु ह्यय दंगवरो मतः । विख्यातो नात्र सदेहचान वै शिवदायकः ॥ ४२३ ।। अस्मादन्ये मता ये हि स्वस्वमतिविकल्पजाः। ते हि ससारदा ज्ञेया शिवदा न कदाप्यहो॥ ४२४ ।। अर्थ-हे महादेवी सरस्वती तू सत्यवाणी द्वारा प्रकट कर कि श्वेताम्बर मत आदि का है। इस प्रकार देवोसे कहलानेके लिये उस यतीने सुराज़े मंत्रके द्वारा सरस्वती देवीको आराधना की ॥ ४१८ ॥ अर्थ--इस प्रकार शुक्लाचार्यके मत्रके प्रयोग द्वारा वचनोको सुनकर वह देवी समस्त दर्शकोके समक्ष कुछ भी नहीं बोली तब तो शुक्लाचार्यका मुंह एकदम काला पड़ गया ।। ४१९ ॥ अर्थ--जब शुक्लाचार्य से पापाणकी देवी नही बुलाई गई तब मुनि कुन्दकुन्द स्वामी अपने हाथमे श्रेष्ठ मयूर पोछी लेकर और सीमंधर स्वामीको भाव-भक्तिसे नमस्कार उस पाषाणनिर्मित सरस्वतीकी मूर्ति के समक्ष उपरियत होकर बोले। हे देवि ! तू सत्य सत्य प्रकाशन कर कि आदि मत दिगंबर है या श्वेतावर ? मुनि कचकन्द स्वामी के इस प्रकार वचनोको सुनकर उस पत्थरकी मूतिने मेघकी गर्जनाके समान गभीर वाणीसे कहा ।। ४२०-४२२ ।। अग-अधोलोक, अर्चलोक, मव्यलोक इन तीनो लोकोमे यह एक दिगवर मत ही प्रसिद्ध है। और उग मतगे ही मोक्षको प्राप्ति होती है इसलिये इसमें सन्देह नहीं कि आदि मत दिगवर ही है। इस मतके मिवाय अन्य जितने मत है वे अपनी-अपनी बुद्धिसे कल्पित आधुनिक हैं, सर्वज्ञप्रणीत नही हैं। और उनके .... नीलगिरिगो । गोगपत्तापिता राही पापाणपटिना कली।।-गावपुराणे । iii गाली। पापागपटिता येन वारिता श्रीनरम्नती ।। मालफोति । गिशिपापानिमिता देवी वारिता पदकर्मणि ॥-मिनद्रगुरुः । GIRitree-IASIAreliter - - + [ ७६ ] गाना 17 गवरमत म्या। गिवार चैव गो शवल इति प्रोता च सा तदा ।। ४२५ ॥ it निजंगवान माननोरो मुनीश्वरै. । सातद. सर्वजीवाना दोपोत्करविवर्जित ॥ ४२६ ।। नारक पूजा विपु लोकेपु नोत्तम । सकल्प त्यजय यूय मोनमाप सरस्वती ॥ ४२७ ।। नियुताना पतीना सवदेवता. । पलायिताश्च तस्माद्धि तत्प्रभावाच्च श्वानवत् ।। ४२८ ।। निगरम्य पक्षेहि जयमासीञ्च तत्क्षणे । विपक्षात् सर्वदा स्याद्धि जयोस्य सर्वभूतले ॥ ४२९ ।। माSweNSHESI -- 2:"ASWASTEResy सेवनसे संसारकी वृद्धि ही होती है । मोक्षकी प्राप्ति कदापि नहीं होती। इसलिए आदि मत दिगंबर मत ही है । आदि दिगंबर ! आदि दिगबर !! आदि दिगंबर !!! इस प्रकार तीन बार देवीने उच्चारण किया । हे शुक्ला- चार्य सुन, इस प्रकार देवीकी गर्जना होते ही श्वेतांबरके समस्त यति और सघके समस्त मनुष्य तथा शुक्ला- चार्य एकदम लज्जित हो गये । और सर्व प्रकार अपनी हार मानते भये ॥ ४२३-४२४ ।। अर्थ-हे शुक्लाचार्य दिगंबर जैनमत ही देव, इन्द्र, आदि महान् पुरुषोंसे वंदनीक है। मुनीश्वरोंसे माननीय है । समस्त जीवोको सुखका प्रदान करनेवाला है । समस्त प्रकारके दोषोसे रहित है । कल्याण करने- वाला है । ससारसे तारक है । परम पूज्य है । तीन लोकमे उत्तम है । इसलिए सब प्रकारके संकल्पोंको छोड़- कर एक दिगंबर जैनमतका आराधन करना चाहिए । वही सर्वश्रेष्ठ आदि मत है । इतना कहकर वह पत्थर- की सरस्वतीको मूर्ति चुप (मौन) हो गई ॥ ४२५-४२७ ॥ अर्थ--श्वेताबर यतियोंके आराधन किये हुए समस्त देवतागण सरस्वतीके प्रभावसे कुत्तेकी तरह पलायन हो गये ॥ ४२८ ॥ चारne अर्थ-उसी समय शुक्लाचार्य आदि श्वेतांबर यतीगण सर्व प्रकार मुनि कुन्दकुन्द स्वामीसे हार कर समस्त संघसे तिरस्कारित हुए । दिगम्बर मतका विजय हुआ। सो ठीक ही है । विपक्षके नाश होनेपर विजय ही होता है ॥ ४२९ ॥ १ पलनदियतीन्द्रेण चोर्जयतगिरौ किल । सशयिमतसवादे वादिता येन चाश्मजा। सघसहित श्री कुन्दकुन्द मुनि, वदन हेत गये गिरनार । वाद पयो तहा सशयिमतसो साक्षो वदी अबिकाकार ।। सत्यपथ निर्ग्रन्थ दिगम्बर कही सुरी तह प्रगट पुकार । सो गुरुदेव बसो उर मेरे विघनहरन मंगल करतार । सस्यमय ? यजमान्या DAIReatment 14 [ ७७ ] समीपे केशरी सिंहे ? किं कतुच क्षमा गजा. । तत्शव्दाद्धि पलायंते प्रत्यक्षेण न सशय. ॥ ४३० ॥ तस्मिन्नवमरे तत्र एवमामीत् भयोत्करः । तपा विपक्षहस्तिना स्वस्य मदविनाशनात् ।। ४३१ ॥ तदा म यतिराट् साक चतुर्विधगणैर्वरैः । श्रीमन्नेमिजिनेन्द्रस्य चकार दशन मुदा ॥ ४३२ ॥ तव स्थापयामास स मुनि धर्मवर्द्धक । सरस्वत्यभिध गच्छ सार्थनामयुत खलु ।। ४३३ ।। बलात्कारगण शुद्ध तत्रैव म मुनीश्वर । स्थापयामास सर्वस्य साक्षितो धर्मवृद्वये ॥ ४३४ ।। म्वस्य नामकृतो बग शिष्याश्च स्वस्य ये खलु । आम्नाय कृतवान् तेपा नद्याद्यानदकारक ॥ ४३५ ।। गवंमधेषु मुख्योय श्रोमूलमघनायक । अद्यप्रभृतितो यूय भजध्व च ह्यत इम ॥ ४३६ ।। उमे मर्वन लोकेषु जाता विख्यातता खलु । जिनधर्मे परा प्रोति नरा भेजुश्च ते तदा ।। ४३७ ।। अर्थ-केशरी सिंहके सामने गज कितनी देर पर्यन्त ठहर सकते है ? केशरीको गर्जना मात्रसे ही भय- भीत होकर प्रत्यक्ष भाग जाते हैं इसमें कोई सदेह नही । इसी प्रकार केशरी मुनि कुन्दकुन्द स्वामीसे भय खाकर श्वेतांवर गज भाग गये ।। ४३० ।। अर्थ--उम समय श्वेतावर यतियोका यही हाल हुआ। कुन्दकुन्द मुनि रूपी केशरीसे अपने-अपने मद- को ठोकर सब भाग गये ॥ ४३१ ।। अर्थ-उस समय सबसे प्रथम दिगम्बर जैन संघ अपने समस्त चतुर्विध सघ सहित श्री गिरनारी पर्वत पर श्रीमान् नेमि जिनेश्वरको वदना करनेको गया। और अतिशय हर्पके साथ प्रभु श्री नेमिनाथ जिनराजके पन लिए ।। ४३२ ।। अयं.-महापर हो कुन्दकुन्द स्वामीने सरस्वती नामका गच्छ स्थापन किया। क्योकि सरस्वती नामको पारशी मूतिगे आदि दिगवर मत बुलवाया था। यह सार्थक नाम या । और वहाँपर बलात्कार गण स्थापित frमम्न गएको गाक्षीमे यह कार्य धर्मको वृद्धिके लिए किया। इसी प्रकार अपने नामसे अपने शिष्योकी ताको। ओर उम आम्नाय को नादि महर्षियोने स्वीकार किया। ममस्त सघमें यह मुल सघ म : । गिरनामे इस मामले मन्य मान्यता है (श्री मूल नघे सरस्वतीगच्छे बलात्कारगणे कुन्दकुन्दा- पार पाडाभो पाय: तिनो हो प्रतिमाओपर लेपोमें मिलता है)। यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध हो गई। और मीका ना मात्र प्राद नआ । जैनधर्ममें सबको उत्कृष्ट भावना हुई ।। ४३३-४३७ ।। - [ ७८ ] www ceworlule tu sem Kresm स मुनिः सिद्धभूमेश्च तैः साक दर्शन मुद्रा । कृत्वा स्वस्थानमागत्य चकार तप सग्रहम् ।। ४३८ ।। एकदा ध्यानकालेहि तस्यायात् वक्रता मुने । नोवा तत्रैव स्वचित्ते विचार कृतवान् स च ।। ४३९ ।। केन वै कारणेनैव इयमासीच्च वक्रता । तदाभवत् पुरस्तस्य ब्राम्ह्या वाणी मनोहरा ।। ४४० ।। अकाले जैनसिद्धाता नो योग्या पठने खलु । युष्माक तद्विदोपेण इय जाता च वक्रता ।। ४४१ ।। भारत्या वचन श्रुत्वा इत्थ मुनीश्वरस्तदा । स्वात्मनो निंदा परमा चकार स्वात्मसिद्धये ॥ ४४२ ॥ पुनस्तद्दोपनाशार्थं नत्वा सीमधर जिनम् । तस्यैव ह्यकरोत्स्तोत्र तदा तस्या. प्रमोदये (2) ॥ ४४३ ।। अवक्रता तदा ता च आप सापि गता तदा । स्वस्थाने वक्रग्रोवाख्यामस्य कृत्वा मुदान्विता ।। ४४४ ।। अनेन कारणेनैव तृतीयाभिधजातवान् । तस्य सर्वमुनीन्द्रपु तस्मिन्नवसरे बुधाः ॥ ४४५ ॥ तदाप्रभृतित. स्वामी वाणी सिद्धातमण्डिताम् । कालेहि प्रतिघस्र च पपाठ नैव तद्विना ॥ ४४६ ।। अर्थ-श्री कुन्दकुन्द स्वामी श्री गिरनारो पर्वतकी (सिद्धभूमि) वंदना कर अपने तपस्थान धरणीभूषण पर्वतपर वापिस आये ॥ ४३८ ॥ अर्थ-एक समय ध्यान कालमे मुनि कुन्दकुन्द स्वामी धरणीभूषण पर्वतपर विराजे हुए थे कि इतने में उनको ग्रीवा (नार) स्वयमेव वक्र (टेढ़ी) हो गई । स्वामीने उस वक्रताका कारण अपने मनमें विचारा परन्तु रोगादि कोई भी ऐसा कारण मालूम नहीं हुआ कि जिससे मान लिया जाय कि अमुक कारणसे ग्रीवा वक्र हुई । मुनि इस बातके विचारमें ही थे कि उनके सामने एक मनोहर ब्राह्मी (सरस्वती) की वाणी हुई। उस वाणी से प्रगट हुआ कि हे मुने ! आपने अकालमें जैन सिद्धांतोंका अध्ययन किया है उस पातकके फलसे वन ग्रीवा हो गई है। ऐसे वचनोंको सुनकर अपनी आत्माको सिद्धिके लिये कुन्दकुन्द स्वामीने अपनी आत्माकी निंदा की ॥ ४३९-४४२॥ अर्थ--भगवान् कुन्दकुन्द स्वामीने ग्रीवाकी वक्रता के दोषको दूर करने के लिये श्री जिनेन्द्र सीमन्धर स्वामीको नमस्कार कर और उनकी ही स्तुति बड़ी भक्तिसे प्रेम सहित की जिससे तत्काल ही वह ग्रीवा जैसी को तैसी अपने स्थानमें आकर सरलरूप हो गई। वक्रता मिट गई। इस कारणसे स्वामीका तीसरा नाम वक्र- ग्रीव समस्त मुनि संघमें प्रसिद्ध हो गया ॥ ४४३-४४५ ॥ अर्थ-उस समयसे श्री कुन्दकुन्द स्वामी जैनसिद्धांतरूपी जिनवाणीको कालमें ही पढ़ने लगे। फिर कभी न्यायालयाच्याजयम मायामामाच्य [ ७९ ] ELENTREPSIResmaram अकाले ये पठिष्यति मोक्षशास्त्रादिकान् खलु । तियंचयोनिपु तेहि यास्यन्ति नात्र सशय. ॥ ४४७ ।। गिवनदियतीन्द्रक. सिद्धाताकालपाठनात् । हृदेऽभूच्च महामत्स्यः तपसालकृतोऽपि च ॥ ४४८ ।। कालाकालस्य मर्यादा ज्ञेया वे मूलग्रन्थतः । बुधै. विस्तारतस्तत्र वर्णना च कृता खलु ॥ ४४९ ।। एलाचार्यो ह्यय नामो विदेहक्षेत्रतो बुधैः । ज्ञेतस्तस्य वै विख्यात आसीच्च सकलावनौ ।। ४५० ।। पिच्छिका पतिता यानात् तस्य ध्यानयुतस्य वै । गृद्धस्य पिच्छिका दत्ता देवैर्वा तत्क्षणे शुभा ॥ ४५१ ॥ गतत्कारणतम्तम्य नामासीत्सकलक्षिती । वुधोत्तमाश्च गृद्धादिपिच्छाचार्यातविश्रुत ।। ४५२ ॥ एव पचाभिधानेन स मुनि. सकलार्थवित् । आसीत् विख्यातता पूज्यः विपक्षविजयात्सुरैः ।। ४५३ ।। अश्मजा वादिता येन भगमाप्ताः खलाशया । श्वेतवासोधराः क्रूराः तस्मै श्रीमुनये नमः ॥ ४५४ ।। भी उनने अकालमें अध्ययन नहीं किया ॥ ४४६ ॥ अर्थ-अकालमें जैनसिद्धांत (मोक्षशास्त्र) का पाठ करते हैं वे लोक तिथंच योनिमें उत्पन्न होते है । इममें सन्देह नहीं है ॥ ४४७ ॥ अर्थ-बडे भारी तपस्वी शिवनन्दी नामके एक मुनोश्वर अकालमें जैनसिद्धांतका पाठ करनेसे तियंच योनिमें बडे मच्छ उत्पन्न हुए ॥ ४४८ ॥ अर्थ----काल ओर अफालका स्वरूप जैनागमसे जानना चाहिये । ग्रन्थ बढ़ जानेके कारण यहॉपर नहीं निगा ॥ ४४॥ अर्थ-विवेह क्षेत्रमें सीमंधर स्वामीके समोशरणमें चक्रवर्तीने एलाचार्य (लघु शरीरको एला कहते हैं ) नाम मा । विदेहको यात्राके ममय विमानमें व्यानमें बैठे हुए स्वामीको पीछी विमानमेंसे गिर जानेसे याने गातो पो बनाकर दो इसलिये गृपिच्छाचार्य नाम प्रसिद्ध हुआ ॥ ४५०-४५२ ॥ ii-ग प्रकार अनजानसे ममस्त पदार्थों को जाननेवाले कुन्दकुन्द स्वामी पांच नामोसे प्रसिद्ध हुए fatको जीतनेगे देयोने पूज्य दा थे ॥ ४५३ ॥ -Tो पन्धर तो देवी को बचाया और दुष्ट आगयवाले कर ऐसे श्वेतांबरियोसे वादविवादमें FRIET Tो गे मायामी को नमस्कार ।। ४५४ ॥ यालयलयमायमचमात्यायालय M चायत मारामारामा [ ८० ] मामधरजिनेन्द्रस्य येनाप्त दर्शन शुभम् । प्राचीनपुण्ययुक्तेन तस्य पादो नमाम्यहम् ।। ४५५ ।। अस्मिन् कलौ मुनीन्द्रेण तेनैव रचना कृता। शास्त्रादीनामहो भव्या. तस्मै नमोस्तु सर्वदा ।। ४५६ ॥ कुन्दकुन्दसमश्चास्मिन् काले मिथ्यात्वसभृते । नाभून्नैव पुनश्चात्र भविष्यति सुनिश्चयात् ।। ४५७ ।। धन्या सा जननी लोके यस्याः कुक्षौ सुरै स्तुत. । अभूद्वै ईदृशः पुत्रो मिथ्याधतम पूपण. ।। ४५८ ॥ कुन्दकुन्दमुनीन्द्रस्य तस्यैवाह करोमि वै। स्तवन चित्तरोधार्थ नित्याहसो विनाशकम् ।। ४५९ ।। कुन्दकुन्दमहमाद्यमाव जन्मसमुद्भवम् । वदे कुदसम देह तत्पदाप्ताय केवलम् ।। ४६० ।। द्वितीय पद्मनद्याख्य पद्मातिशयदर्शकम् । वदे पद्मसम नेत्र विपक्षाद्रौ पविसमम् ।। ४६१ ।। तृतीय वक्रग्रीवाख्य ध्यानमग्नसुरैः स्तुतम् । वदेह ध्यानसिद्धयर्थ दिशाबरधर वरम् ॥ ४६२ ॥ अर्थ-जिन कुन्दकुन्द स्वामीने पूर्व पुण्योदयसे विदेह क्षेत्रमे सीमंधर स्वामीके शुभ दर्शनोंका लाभ लिया उनके चरणकमलको नमस्कार है ॥ ४५५ ॥ अर्थ-जिन कुन्दकुन्द स्वामीने ८४ पाहुड आदि ग्रंथोंका निर्माण कर जगत्में महान् उपकार किया उनको सर्वदा नमस्कार है ॥ ४५६ ।। अर्थ-कुन्दकुन्द स्वामोके समान महापराक्रमशाली जैनधर्मके उद्योतक इस कलिकालमें न हुए और न भविष्यमें होंगे ॥ ४५७ ॥ अर्थ--देवोंसे पूजित और जगत मान्य कुन्दकुन्द स्वामी जिस माताकी कूखसे उत्पन्न हुए वह माता धन्य है । जिसके प्रभावसे मिथ्यात्व रूपी घोर निबिड़ अंधकार नष्ट हुआ ॥ ४५८ ॥ अर्थ--मै अपने चित्तको वश करनेके लिये और नित्यके पापोंकी शांतिके लिये कुन्दकुन्द स्वामीका स्तवन करता हूँ॥ ४५९ ॥ अर्थ-कुन्दकुन्द स्वामीके पाँच नाम प्रसिद्ध थे उनमें कुन्दकुन्द यह उनका प्रथम जन्म नाम था । उनका शरीर कुन्दके समान था। मै उन समान पदकी प्राप्तिके लिये उनकी वन्दना करता हूँ। दूसरा पद्मनंदी यह नाम कमण्डलुमेंसे पद्मके फूलोंके ढेरोका अतिशय प्रकट करनेसे प्रकट हुआ, कमलसमान नेत्र हैं जिनके तथा जो विपक्षी रूपी पर्वतोंके लिये चातक सम उन पद्मनंदी आचार्यको मै वन्दना करता हूँ। तीसरा वक्रगीव यह ....ventunsensanाजमाजाच्याजयमालयाच्या eHere [ ८१ ] CHERPARIASISEpawreams एलाचार्याभिध तुयं सीमवरस्य दर्शकम् । तद्धि साहससिद्धयर्थं वदेह सर्वदा मुदा ।। ४६३ ।। पचमाभिवसयुक्त गृद्धपिच्छेन भूषितम् । पिच्छाचायं च गृद्धान्त वदेमृतभुजैस्तुत ।। ४६४ ।। वसुधराया मुनिसत्तमोऽय पचैव(?)नाम्ना कलितः सुवुद्धि । जातोहि वदे तमह त्रिशुद्धया विख्यातता भो वुद्धसत्तमा वै ।।४६५।। इमानि वरनामानि कुन्दकुन्दमुनेश्च ये। प्रातश्चोत्थाय नित्य वै पठिष्यन्ति नराः कलौ ।। ४६६ ।। अस्मिन् भक्त्या प्रयास्यति दिवि शर्माब्धिसभृते । ते शिवे क्रमतो भव्याः सदा शर्मविभूपिते ।। ४६७ ।। अस्य प्रभावत. सर्वे विपमादिज्वरास्तथा । व्यतरा राक्षसा. क्रूराः सर्वे यात्येव नाशताम् ।। ४६८ ।। नाम-अकालमें जैन सिद्धांतोका पाठ करनेके दुष्परिणामसे उनको ग्रीवा स्वयमेव वक्रताको प्राप्त हो जानेसे चक्रगीव नाम प्रसिद्ध हुआ। ध्यानमें मग्न वे वनगीवाचार्य देवोके द्वारा स्तुतिको प्राप्त हुए, दिशा ही जिनका श्रेष्ठ वस्त्र है ऐसे उन आचार्यको मैं ध्यानको सिद्धि के लिये नमस्कार करता हूँ। चौथा एलाचार्य यह नाम विदेह क्षेत्रमें सीमन्धर स्वामीके समवशरणमे चक्रवर्तीने इन्हे एला (इलायची) के समान लघुकाय होकर भो साहस और शक्तिकी विशेषता देखकर प्रकट किया था। उस साहस सिद्धिके लिये मै हमेशा प्रमुदित चित्त हो उन्हे नमस्कार करता हूँ। ४६०-४६३ ॥ अर्थ-पाँचवाँ नाम गृद्धपिच्छ यह विदेहकी यात्राके समय विमानमें बैठे हुए ध्यानमें मग्न थे उस समय विमानने पिच्छो ( मयूर पिच्छी ) नीचे गिर पड़ी। जब इनका ध्यान पूर्ण हुआ तब पीछी गिर जाने के समानार देवोमे रहे और यह भी कहा कि बिना पीछोके गमन नही होगा। तब देवोने पीछी तलाश की। परन्तु वह मगर पोलो नहो मिलो। तब गृद्धके कोमल पख पड़े हुए देखकर देवोने उनको पीछी बनाकर दी गोर ग पोतो पर मे उनका नाम गद्धपिच्छाचार्य सिद्ध हुआ ॥ ४६४ ।। -उन पकार पांच नाम कुदकुद स्वामोके समस्त जगत्में प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार समस्त प्रकार- है निगयोमे गुसम्पन्न, महान् प्रभावशाली, समस्त विद्याओके पारगामो ऐसे कुन्दकुन्द भगवान्को नम- कार. मन प्रात.काल इन नामोका स्तोत्र पाठ करता है सो उत्तम गतिको प्राप्त होता है।।१६५-४६६।। 1- राम सामोके स्तोत्र को जो मनुष्य भाव भरितसे पढ़ते हैं उनको समस्त सुखोका निधान TAIT । और मने मोक्ष भी होता है। इस स्तोत्र के प्रभावमे विषमज्वर आवि-व्याधि - [ ८२ ] काकोदरा महाराः सद्यः प्राणहरा हि ये । नहि चास्य प्रभावेन करिष्यति भय नृणाम् ।। ४६९ ।। धनाप्तिर्जायते पुसा पुत्राप्तिर्नात्र संशयः । स्तोत्रस्य पठनात् भव्या सर्वसिद्धि. सुखास्पदा ।। ४७० ।। इत्थ स प्रकटं कृत्वा धर्ममार्ग जगन्नुत । पश्चात् स्वपुरबाह्यस्थवने वै नदनोपमे ॥ ४७१ ।। स्वायुप हि तदा ज्ञात्वा मासमात्र च स मुनि । समाध्यत्ययसिद्धयर्थमाजगाम सुबोधवान् ।। ४७२ ।। प्राशुके तत्र भूमौ स स्थित्वा ह्यनुक्रमात् मुनि. । जेमन चोदक क्षीर तत्याज चित्तशुद्धये ।। ४७३ ।। पश्चाद्धि सर्वमाहार त्यक्त्वा साहसधारक । नत्वा सीमधर देव तस्थौ स कर्महानये ।। ४७४ ।। परिचर्चा तदा चक तच्छिष्या स्वगुरो पुर। तथासमाधिसिद्धयर्थं पाठ सिद्धातसूचकम् ।। ४७५ ॥ चतुराराधनापाठ हस्तपादादिमर्दनम् । मत्रराजस्य सर्वपापाद्रिभजकम् ।। ४७६ ।। श्रवण च्यायालयाच्या और समस्त प्रकारकी उपाधि स्वयमेव शांत हो जाती है । व्यन्तर-राक्षस और क्रूर पिशाचादिकोंकी बाधा नष्ट हो जाती है । काकोदर, जलोदर आदि भयङ्कर रोग भी स्वयमेव शमन हो जाते है । धनके चाहनेवालेको धन मिलता है और पुत्रार्थीको पुत्रको प्राप्ति होती है । इस स्तोत्रसे समस्त सिद्धि, वृद्धि और नित नये मंगलोंकी प्राप्ति होती है ॥ ४६७-४७०॥ अर्थ-इस प्रकार कुन्दकुन्द स्वामी जैनधर्मको समस्त पृथ्वीतलमे विस्तार कर फिर अपने वारा नगर के उद्यानमे (धरणीभूषण पर्वतके उद्यानमे) वापिस आये ॥ ४७१ ॥ अर्थ- वहॉपर कुन्दकुन्द स्वामीने जब अपनी आयु एक महिनाको अवशेष रह गई थी ऐसा अपने निमित्त ज्ञानसे जान लिया तब चतुर वे मुनि समाधिमरणके लिए तैयारी करने लगे ॥ ४७२ ॥ अर्थ-वहॉपर धरणीभूषण पर्वतपर एक प्रासुक स्थानमें बैठकर और चित्तकी शुद्धिके लिए क्रमसे चार प्रकारके आहारोका परित्याग किया ।। ४७३ ॥ अर्थ-फिर चार प्रकारके आहारको सर्वथा छोडकर कर्मके नाश करनेके लिए अपने मनमें सोमंधर स्वामीको नमस्कार किया ॥ ४७४ ।। अर्थ--कुन्दकुन्द स्वामीके नंद्याचार्यने अन्य शिष्य वर्गोंको प्रभुको परिचर्या करनेकी प्रधान आज्ञा दी। कितने ही शिष्य सिद्धांत शास्त्रोका पाठ करते थे। कितने चार आराधनाका स्वरूप निरूपण करते थे। कितने HERITA- मायरामाययायमच्या मार sRESEPSITED mae-मस्या ATMEL:- [ ८३ ] यच्छ्रवणादलर्काद्या दिवमापुः सुखाकितम् । तियंचोप्यजनाद्याश्च पाटच्चरक्रियोद्यता. ॥ ४७७ ॥ तरिता. तरति ये भव्यास्तरिष्यतिहि केवलम् । अनेन मत्रराजेन नान्योपायोहि प्राणिनाम् ।। ४७८ ।। शयने चासने मार्गे विपिने चाद्रिमस्तके । सख्ये शाते तथा दुखे ह्येन जपतु भो वुधाः॥ ४७९ ॥ नैव विस्मरणीय च मंत्रराज कदाप्यहो। दातु हि शिवशर्मणः क्षमो नेवापरो वुधा ।। ४८० ॥ महिमा मत्रगजस्य इत्थ ज्ञात्वा शिवाप्तये । जपतु सर्वदा भव्या इम सकलशर्मदम् ।। ४८१ ॥ कुन्दकुन्दमुनोन्द्रश्च विमोह. तत्वघो. शमी। विभो. पादारविदेहि धृत्वा स्वचित्तमजसा || ४८२ ।। निर्विकल्पो नि कपाय चायुरते वशी दमी। एकाग्रमनसा तस्थौ स्मरन् पचपदावलिम् ।। ४८३ ॥ ही णमोकार महामत्र श्रवण कराते थे। कितने उनके मलमूत्रका प्रक्षेपण करते थे। कितने पदमर्दन आदि वैयावृत्य करते थे। णमोकार महामत्रका श्रवण करनेसे समस्त पापोका नाश होता है। श्वान आदि तियंच जोवोको भी मंत्रके श्रवण मात्रसे स्वर्गको प्राप्ति हुई है। अंजन चोर आदि पापी जीव भी सदगतिको प्राप्त हुए हैं ॥ ४७५-४७७ ॥ अर्थ---जो भव्य जीव ससार समुद्रसे तिर गये, तिरते हैं अथवा तिरेंगे वे सब एक-एक णमोकार मं के प्रभावसे ही पार हुए हैं। संसारसे पार होनेका इससे अन्य कोई दूसरा उपाय नहीं है ॥ ४७८ ।। अयं-सोनेमें, बैठनेमें, मार्गमें, संकटम, पर्वतपर, सुख दुःख आदि सर्वत्र इस णमोकार मत्रका जाप फरना चाहिये ।। ४७९ ॥ L~~इस महामत्रको कभी भी भूलना नहीं चाहिये। क्योकि इसके सिवाय अन्य कोई भी मोक्षके गुतोको प्रदान करने के लिये ममर्थ नहीं है ॥ ४८० ॥ --ग महामत्ररानको इस प्रकार अद्भुत महिमा जान कर मोक्षकी प्राप्तिके लिये भव्यजीवोको गरना नारिष । तिमने मर्व मुमोको प्राप्ति हो ॥ ४८१ ॥ --भागगन गन्दन्द स्वामी समाधिमरण के समय मोह रहित हो गये। समस्त तत्त्वोके वेत्ता, मांग, नि.मा, प्रियोका विजय फरने वाले, परममाहसी, मनको चपलताको वश करनेवाले और निविकल्प सोपानकोपर यो मोमपर स्वामोके वरणफमलोंको हृदयमें धारण कर केवल पंच णमोकार मंत्रका f [ ८४ ] Errच्या मच्याच्यालयाच्या शाकपातोपि स गोगी धोग्वीराग्रणी खलु । नाभजत् मनमि कोश स किंचिदपि शिवाप्तये ॥ ४८४ ।। ततोहि मन्निये कारे चागते म यतीश्वर ! पद्मासन गृहीत्वा हि सतस्यौ शुद्वमानसः ।। ४८६ ।। अर्हद्भ्यः सर्वगिद्धेभ्य अ चार्येभ्यो नमोस्तुवै । पाठकेभ्यस्तथा योगीश्वरेभ्य सर्वदा हि मे ॥ ४८६ ।। विग या देवदेवेश मीमधरमघापहम् । पुन पुन ननाम च तत्पदाप्तये केवलम् ।। ४८७ ।। नमोस्तु चेति अर्हद्भ्य ध्यानमग्नस्तदा मुनि । त्यक्त्वा समाधिना प्राणान् दिवमाप सुखास्पद ।। ४८८ ।। नाद्विमडिता तत्र भुक्त्वा वै शर्मसततिम् । स मुनिस्नुर्यकाले च यास्यति मोक्षधामनि ॥ ४८९ ।। कुन्द कुन्दनमुज्वल सुविमठो ध्यादादिभि शुद्वधो., पत्तपसा कृशता गनोपि न भजेत् दुर्मानस स कदा । भव्याभोजदिवाकर मुग्नुतः पड्जीवरक्षाकर , बुद्धया गी पतिसदृशो हि यतिराट् स पातु नो व सदा ।।४९०।। स्मरण करते हुए ध्यानमे स्थिर हुए ॥ ४८२-४८३ ॥ अर्थ--भगवान् कुन्दकुन्द स्वामीका शरीर ध्यान और तपके प्रभावसे शुष्क हो गया था तो भी धीर- वीर परम साहसी अपने मनमे जरा भी संकोचको नही प्राप्त हुए। और परम शांतिसे आत्मज्ञानमें लवलीन हो गये ॥ ४८४ ॥ अर्थ--भगवान् कुन्दकुन्द स्वामीका जब मरण काल अतिशय समीप आ गया तब प्रभु अपना पद्मासन लगाकर मन, वचन, कायकी शुद्धि कर, निःशल्य होकर ध्यानमे निमग्न हुए। प्रभुने 'नमो अर्हद्भ्यः, नमः सिद्धेभ्यः । नमः आचार्येभ्यः, नमः पाठकेभ्यः, नमः सर्वसाधुभ्यः' इस प्रकार मंत्रोके द्वारा अपनी आत्मामे पंच परमेष्ठी की स्थापना कर तोन प्रकार को शुद्धिसे जगद्गुरु देवाधिदेव सोमंधर स्वामीको उनके पदको प्राप्तिके लिये बारंबार नमस्कार किया और प्राणांत समय नमोऽर्हद्भ्यः ऐसा कहकर एकाग्रमनसे ध्यानमें मग्न हो गये । इस प्रकार अपने स्वरूपमे लीन होकर शातिसे प्रागोका परित्याग किया और स्वर्गमें देव पर्यायको प्राप्त हुए ॥ ४८५-४८८ ॥ अर्थ-वहॉपर (स्वर्गमें) अनेक प्रकारको ऋद्धियोंसे संपन्न समस्त प्रकारके सुखोंको भोगकर भगवान् कुन्दकुन्द स्वामीका जीव आगामी चतुर्थ कालमें नियमसे मोक्षको प्राप्त होगा ॥ ४८९ ॥ अर्थ--कुन्दकुन्द स्वामी सदैव निर्मल भावके धारक थे, बड़े ही पवित्र थे और समस्त प्रकारके दोषोसे रायलमा MPSCADHE [ ८५ ] AmAzm-m प्राप्त येन जिनेश्वरस्य मुखदं पुण्योदयात्पुण्यदम्, पूर्वाख्ये बरसुन्दरे सुविमले सोमधरस्याजसा। मर्वाशर्मविनागक शिवकर सदर्शन मोदद, क्षेत्रे गर्मनिकेतने वरवुवा पुण्याच्च कि दुष्करम् ।। ४९१ ॥ पुण्य पापविनागक भवहर पुण्य पर मगलम्, पुण्य श्रीजिनस्नानपूजनभव पुण्य च रागोज्झनम् । पुष सिद्धिप्रदायक मुनिनुत पुण्याय नित्य नम ज्ञात्वेत्थ वुवसत्तमा ह्यनुदिन पुण्य कुरुध्व खलु ।।४९।। कालेऽस्मिन् मुनिवृदजितपद श्रीकुदकुदाभिधः, जातो धर्मप्रकाशको वरमतिः मिथ्याद्रिनाशे पदि. । कोनारे हि घृता महासुखकग जैनेंद्रदीक्षा मुदा । धीरः शूरतमो महानुग्वकरो न पातु समारत. १४९३।। , रहित थे । ध्यान आदि उत्तम कार्योसे जिनका ज्ञान परम पवित्र हो गया था। तपसे जिनका शरीर कृष था तो भी अत्यंत कठिन तप धारण करनेपर भी जिनके परिणामोमें कभी संक्लेश नही होता था। भव्य जीवरूपी क.मलोके लिये सूर्य, छह प्रकारके जीवोंकी दया पालनेवाले, बुद्धिमें वृहस्पति से भी अतिशय गरिष्ट ऐसे कुन्दकन्द स्वामी सदा हमारी रक्षा करो ॥ ४९० ॥ sawesomeneweseave . अर्थ--कुन्द-कुन्द स्वामीने अतिशय पवित्र और सर्वोत्तम ऐसे पूर्व विदेहक्षेत्रमें पूर्व पुण्योदयसे महान् पुण्यका प्रदान करनेवाला, समस्त पापोंका नाश करनेवाला, समस्त सुखोको देनेवाला, अपार आनंदका कारण ऐगा मोमार भगवान्का पवित्र दर्शन किया । ठीक है पुण्यसे सब बातें साध्य हो जाती है ॥ ४९१ ॥ अर्थ-पुण्य हो पापका नाश करनेवाला है । संसारका उच्छेद करनेवाला हे। पुण्य ही परम मगल है। पुण्य समस्त सिद्वियोका देनेवाला है, मुनियोसे भो पूज्य है। अरहत परमात्माका पचामृत मान, पजन, प, गग, रमरण और भक्तिसे महान् दिव्य पुण्यको प्राप्ति होती है। अथवा सामायिक, 17, TI, पानले नारा गगारिक दुष्टभावो का परित्याग करनेसे भी पुण्य प्राप्त होता है। ऐसा पुण्य निमागोमा नप करते रहना चाहिये। इस कालमें मुनियोसे पूजित, श्रेष्ठ धर्म के प्रकाशक, उग्र 31. पारो पर भेवरू और चोर, बोर, परम नाहमो, मुगके प्रदान करनेवाले और Toil Tat सिर पठिन निंद्र दीक्षातो धारण करनेवाले ऐसे तुन्दकुन्द मुनि हमारी इस समारसे १.२.११३ ॥ - , [ ८६ ] पुण्यस्येव फल जिनागमविदा ज्ञात्वा महाशर्मणे, त्यक्त्वा पापक्रिया महादु खकरा ससारवीजाकुराम ससारातपनाशक सुविमलै ध्यानादि कर्मभि , त पुण्य ह्यघनाशक मुनिनुत चागीकुरुध्व सदा ||४९४ । पुण्यात् सिद्धपदे व्रजत्यनुदिनं योगीश्वरा. पावने, ह्यतातीतसुशर्मवृन्दनिचिते क्षोभादिकर्मोज्झिते । पुण्यात्सुमुतप्राप्तिता वरगुणैयुक्ता मनोनदका, मत्वेत्थ नरसत्तमाः सुविमल पुण्य कुरुष्व मदा ॥४९५।। भूप सर्वगदित वृत्त मया तेऽखिलम्, पापौघस्य विनाशक सुविमल श्रीकुन्दकुन्दस्य वै । चित्ते त्व कुरु धारण च मनस शुद्ध कर नदद । अग्रे धर्मविवर्द्धक वरसुरै. पूज्य च पूज्योदयम् ।।४९६।। इत्थ श्रेणिक amortualul metsastu राज्याच्याजन्याचा याच्या अर्थ-इसलिये जिनवाणीसे पुण्यको ही समस्त वस्तुओसे दुर्लभ और सर्वोत्कृष्ट समझ कर संसारको बीजभूत समस्त दुःखोंको प्रदान करने वाली ऐसी पापक्रिया का परित्याग करो । तथा ध्यान, संयम, सदाचार, चारित्र आदि उत्तम पुण्यक्रियाओंका पालन करो। जिससे संसारका गश हो। यह ऐसा पुण्य मुनियोसे भी पूज्य है इसलिये ऐसा पुण्य सदा करते रहना चाहिये ॥ ४९४ ॥ अर्थ---पुण्यसे ही मोक्षपदकी प्राप्ति होती है। योगीश्वर भी पुण्यकी प्राप्तिके लिये जप, तप करते है। पुण्यसे अनन्तसुख निर्विघ्नतापूर्वक होता है। पुण्यसे पुत्र, राज्य, धन-धान्य आदि विभूति होती है, अनेक गुणों- की प्राप्ति होती है और मनको आनंद होता है । इसलिये हे भव्यजीवों, पुण्यको नित्य ही संपादन करो॥४९५॥ अर्थ-हे श्रेणिक महाराज ! अत्यन्त पवित्र, समस्त पापोंका नाश करनेवाला, धर्मको बढ़ानेवाला, देवोंसे पूज्य, पूज्य पुरुषोंके उदयको प्रगट करनेवाला और आनन्दका प्रदाता ऐसा कुन्दकुन्द स्वामीका संक्षिप्त जीवन चरित्र कहा है । उसको भावभक्तिसे श्रवण कर आत्मकल्याण करना चाहिये ।। ४९६ ॥ न्यायालयाच्या [ ८७ ] RISALARIA अथापर धाव काणा मता नदाद्या ये करिष्यति जिनधर्मप्रभावनाम् । ततो भूप सुयोगीद्रा धर्मस्योद्धारणे क्षमा ॥ ४९७ ।। पचमसमयस्य वै। वृत्तातं भाविक वक्ष्ये सर्वचिंतासमाधिना ॥ ४९८ ॥ शृणु भूप भूप जिनसेवासुशर्मदाः । पक्रिया नित्यपापस्य घातार्थमघरोधकाः ।। ४९९ ।। पूर्व श्रीमज्जिनेन्द्रस्य कर्तव्य कल्मपापहम् । अभिपेक वरैः शुद्धः पचामृतरसैघनैः ।। ५०० ।। पयेक्षुरससपिभिदुग्धविरसोत्कर । स्वर्णरचितकुम्भस्थैः नेत्रानन्दकरे. वरैः ।। ५०१ ॥ एभीग्मैजिनेन्द्रस्य स्नान कुर्वति ये नरा. । प्राप्नुवन्ति खलु ते च स्वर्णाद्रौ निर्जरोत्करः ।। ५०२ ॥ पञ्चादेलागलगवमारक कोलकुङ्कुमैः । कपूरादिवरे. द्रव्ये आमोदापूरितावरेः ।। ५०३ ॥ अर्थ--हे राजन् ! इसके बाद जैनधर्मको प्रभावना धर्मका उद्धार करनेमें समर्थ ऐसे नन्दाचार्य आदि महर्षिगण करेंगे ॥ ४९७ ॥ अर्थ-हे राजन् । अब मै पंचमकालमें होनेवाले वृत्तांतको कहता हूँ। एकाग्र मनसे श्रवण कर । ऐसा महावीर स्वामीने राजा श्रेणिकसे कहा ॥ ४९८ ।। अर्थ-हे राजन् । आवको की षक्रियाएँ परमावश्यक होती है। इसलिये उनका स्वरूप जानना परमा- वश्यक है ॥ ४९९ ॥ मर्थ--यावकोंको ममस्त क्रियाओमेंसे मुख्य क्रिया जिनेन्द्रपूजन है । इस क्रियासे समस्त प्रकारके पाप एस. मारमें नाश हो जाते हैं। और सर्व प्रकारके सुख अनायास ही स्वयं प्राप्त हो जाते है । अभिषेकपूर्वक हो पूजन होती है। क्योकि पूजनका प्रारम्भ अभिषेक पाठसे ही होता है। पूजनके पच अंगोमेंसे तीन अंग तो भिषा प्रारम्भमें को करने पड़ते हैं । इसलिये पूजनका अर्थ अभिपेकपूर्वक पूजा है । अभिषेक पंचामृत रमो- मेगा: ।। '५०० ।। -गवने प्रयास जलका अभिषेक जिन प्रभुका किया जाता है। फिर क्रमसे इक्षुरस, घृत, दुग्ध, दधि गरिमादि रगोन वर्ण लगोगे करना चाहिए । जो मनुष्य इस पञ्चामृतसे श्रोजिनदेवका अभिषेक करता in f. रिया TTI }फिर एला (इलायची-अगर, गंधसार, चंदन) कोल (शीत चीनी) 7, TTE It मुगियो गित करना चाहिए । सबने पीछे कलशाभिषेक करना चाहिए । गवलेपन, मामलामन्याममा # [ ८८ । नारास EASTHANSIRSIMPANIESH जयमाल 21 नाराजनावधि पश्चात् चाज्ञानहानये प्रभो । पुरो मत्तारणोय च सर्वसपत्तिकारकम् ॥ ५०४ ।। गृहम्यानामहो भूप सर्वासु च क्रियासु वै। कथितो वोतरागस्य चाभिपेक्रविधिर्महान् ॥ ५०५ ।। दिविहि निर्जरा. पूर्वं कृत्वा स्नान प्रभोर्मुदा। पश्चात्सकलमपत्तिमगोकुर्वति ते खलु ॥ ५०६ ।। दुग्धाद्येव॒धसत्तमा जिनपतेविस्य धस्र प्रति । शुद्धे नेत्रमनोहरै सरसके पापालिनागाप्तये ।। स्नान येन कृत सदा वररसैस्तेनाप्तमक्षालय । तस्मात् शर्मप्रदायक भवहर स्नान कुरुध्व बुधा ॥ ५०७ ॥ कली वै मानवा मूढाः चाभिषेकक्रियामिमा। नूनमुत्थापयिष्यति स्वस्वमतिविपर्ययात् ।। ५०८ ।। पुष्पवृष्टि आदि कर नीराजन आरती करना चाहिए। यदि इस क्रमसे पूजाको जाय तो सर्व सपत्ति प्राप्त होती है । हे राजन् ! यह अभिषेकको मुख्य क्रिया श्रीजिनागममे प्रतिपादन को है। इसलिए यह आगमोक्त क्रिया सब क्रियाओंमें श्रेष्ठ है ।। ५०१-५०५ ।। अर्थ--देवलोक स्वर्गमें उत्पन्न होते ही सबसे पहले भगवान्का अभिषेक करते है और फिर स्वर्गको संपदाको स्वीकार करते है ॥ ५०६ ॥ अर्थ--हे भव्य जीवों जो आप सुखकी प्राप्ति चाहते हो तो श्रीजिनेन्द्र भगवान्की प्रतिबिंबका नित्य- प्रति दुग्ध, दहि आदि मनोहर और पवित्र द्रव्योंसे अभिषेक करना चाहिये। पापोंका नाश इस पंचामृत अभिषेकसे एक क्षणमात्रमे होता है । और संसारका समूल नाश होकर मोक्षसुखकी प्राप्ति होती है ॥ ५०७ ॥ अर्थ--कलिकालमें मूर्ख मनुष्य अभिषेकको पवित्र क्रियाको उठा देंगे। और अपनी बुद्धिसे अनेक प्रकारको मिथ्या कल्पना कर जिनागमका लोप करेंगे । ५०८ ॥ अर्थ--कुशिक्षित और मलिन ज्ञानसे सुधरे हुए मूर्ख पुरुष शास्त्रोंके वचनोंका लोप करेंगे और अपनी कीतिके लिये नवीन-नवीन मार्ग निकालेंगे ।। ५०९ ॥ अर्थ-कुशिक्षा और मलिन ज्ञानके संस्कारसे सर्वत्र प्रभुके द्वारा प्रतिपादित आगम ग्रन्थोमे भी दोषको लगायेगे । और अपनी तुच्छ बुद्धिको सर्वज्ञके अतीन्द्रिय ज्ञानसे अधिक महत्वशाली मानेगे। ऐसे लोग संस्कृत और प्राकृत भाषाके मूलग्रंथोकी वाचना भी छोड़ देंगे। अभिप्राय यह है कि मूलग्रंथोना अभिप्राय तो उनकी ras-राया समाजमा IATEDSHIPSINDHeacesareemaes [ ८९ ] शास्त्राणा वचन मूर्खा लोपयिष्यति निश्चयात् । नूतन नूतन मार्ग करिष्यति स्वकोर्तये ॥ ५०९ ॥ दास्यन्ति सर्वग्रन्याना दोप स्वमतिसम्बलात् । सस्कृत प्राकृत ग्रन्थं वाचयिष्यन्ति नैव च ॥ ५१० ।। म्व स्व कल्पितवाक्य च मानयिष्यति ते नराः। जैनागमविनिर्मुक्ता आचार्यागमनिंदकाः ।। ५११ ।। म्वस्वमतस्य पक्षस्य पालका गुरुनिंदका । कृतघ्ना ते भविष्यति जैनेन्द्रमतघातका ॥ ५१२ ।। द्वितीया च क्रिया प्रोक्ता गृहस्थाना जिनेश्वरैः । पूजनाख्या त्रिकाले हि कृता ससारदुःखहा ॥ ५१३ ।। विभोः पादारविंदाने स्वर्णभ्रगारनालकात् । दातव्य त्रियमा धारा जन्ममृत्युजरापहाम् ।। ५१४ ॥ समझमें आवेगा नहीं । केवल उधर-इधरकी सुन सुनाकर अपनी विपरीत बुद्धिके अनुसार लोगोंको बहकावेगे । ऐसे लोग शास्त्रोको झूठा दोष लगावेंगे और मनमानी कल्पना कर मिथ्या मार्गका या नरक निगोद देनेवाले नीच मार्गका प्रचार करेंगे ॥ ५१० ॥ अर्थ--अपनी-अपनी कपोल कल्पनासे विषय कषायको पुष्ट करनेवाले अथवा मनोनीत, आगमविरुद्ध वाश्यको रचकर मान्य करेंगे और सर्वज्ञप्रणीत परम पवित्र यथार्थ आगमको नहीं मानेंगे तथा आचार्य और शास्त्रोको मिथ्या निदा करेंगे ।। ५११ ॥ अर्थ--कुशिक्षा और मिथ्यात्वके सस्कारसे ये लोग अपने पक्षको बनाकर देव-शास्त्र-गुरुओको निंदा गगे। मिथ्या अवर्णवाद लगायेंगे। दोप भी लगायेंगे। सर्वज्ञ प्रभुको पवित्र आज्ञाको अपवित्र बनानेका प्रयत्न नो गारेंगे। पवित्र गुरुओको निर्दोष चर्याम दूपण लगावेंगे और उनके गुणोको नहीं देख सकेंगे। सब प्रकारसे नमतका घात कर अपने को समुन्नत मानेंगे । जैनधर्मका समूल नाश करेंगे और उसीको उन्नति बतलायेंगे। ऐगेर पनिकाम अवतार लेंगे ।। ५१२ ॥ - गान् । आवक की दूसरी क्रिया श्रीजिन देवने भगवान् अरहन्त देवकी पूजन करना बत- । भगवान को पारितान करनी चाहिये। जिससे संसारके दुःखोका नाश होता हे ॥ ५१३ ॥ -भीम जिनदेव पावा नरणकमलो के आगे स्वर्ण या अन्य धातुको मारी को नालि कामे तीन HTTE I पर मर भरितसे को जाय तो जन्म-मृत्यु-जराका नाश तत्काल कर देती है।।५१४॥ SuruwE-SHIPeHeawewesesiyewesome Here AH - - wo -- [ ९० ] कु कुमागरुकर्पूरं सुघृष्य जिनपादयोः । लेपनीय भवातापघातार्थ शुद्धभावतः ।। ५१५ ॥ अखण्डाक्षतसदोहे शुभे. नेत्रमनोहरैः । चाक्षयपदसिद्धयर्थमर्चनीयो जिनेश्वर ।। ५१६ ॥ कुन्दाब्जजातिवकुलैरन्य. पुष्पोत्करैः वरैः । पूजनीयौ विभोः पादौ मकरध्वजनाशये ।। ५१७ ।। शाल्योदनैस्तथा सर्वपक्वान्नव्यञ्जनोत्करै । क्षुधातकविनाशार्थं पूजनीयो जगत्पति. ॥ ५१८ ॥ गतसहस्रप्रदीपैराज्यमिश्रितवतिजै । उद्योतो जिनपादाने कर्तव्यो मोहहानये ।। ५१९ ।। पक्त्यादिद्रव्यतोत्पन्नधूपग्येव जिनपादाने कर्तव्य कर्महानये ।। ५२० ।। केला म्रगोस्तनीराजादनफलकदवकैः । ढौकनीयौ प्रभोः पादौ शिवशर्मफलाप्नये ।। ५२१ ।। मान्यालयमा धनञ्जये । दहन च्यायल्यानट incrust अर्थ--जो भव्यजीव विशुद्ध भावोंसे कुंकुम, अगर, तगर, कर्पूर आदि सुगधित पदार्थोको उत्तम प्रकार घिसकर प्रभुके पवित्र चरणकमलोपर लेप करता है उसके संसारके समस्त पापोंका नाश होता है ॥ ५१५ ॥ अर्थ---जो भव्यजीव अखंड अक्षतो के मनोहर शुभ्र पुञ्जोंसे भगवानको पूजा करता है उसको अक्षय पदकी प्राप्ति होती है ॥ ५१६ ॥ अर्थ-जो भव्यजीव मोगरा, वकुल, जुई, जाही आदि सुगंधित पुष्पोसे भगवान्के पवित्र चरणकमलों- की पूजा करता है वह कामदेवके मदका नाश करता है ।। ५१७ ॥ अर्थ-जो भव्यजीव नैवेद्य, घी, शक्करमें पकाये हुए नाना प्रकारके व्यञ्जनोसे श्रीजिनराजको पूजा करता है वह क्षुधा रोगका नाश करता ॥ ५१८ ।। अर्थ--जो भव्यजीव हजारो लाखों घोके महान् दिव्य दीपक से भगवान के पवित्र चरण-कमलोपर प्रकाश करता है वह मोहनीय कर्मका नाश करता है ।। ५१९ ॥ अर्थ--जो भव्यजीव अगर, तगर आदि सुगंधित द्रव्योसे बनाई हुई धूपसे श्रीजिनेन्द्र भगवानके पवित्र चरण-कमलोंकी पूजा करता है वह कर्मोका नाश करता है ॥ ५२० ।। अर्थ--जो भव्यजीव केला, आम्र, द्राक्ष, विजोरा, नीबू आदि फलोंके द्वारा भगवान्के पवित्र चरण- कमलों की पूजा करते हैं वे मोक्षके सर्व सुखको प्राप्त होते है ॥ ५२१ ॥ समालामालयाच्या
[ ९१ ]
च्यायालय
अष्टभेदैर्वरद्रव्य दिर्भश्च सर्पपैः। अधं कृत्वा पुनः पादौ पूजनीयौ विभोमुदा ॥ ५२२ ॥
जय नद दयाधीश तारय तारक प्रभो । इत्यादिशब्दनिकरं चानय॑पद सिद्धये ॥ ५२३ ।।
एकैकद्रव्यतो भूप सुखमाप्ता घना जनाः। तेपां नामानि वक्तु कः क्षमोस्ति मादृश विना ।। ५२४ ।।
तथापि शृणु चाष्टाना नामानि सुखदानि च । वच्मि सक्षेपतो भूप फल चापि फलाप्तये ॥ ५२५ ॥
भारते गुजरे देगे तस्मिन् स्तभपुरे वरे। सोमिलोऽभूच्च भूदेवस्तस्य सोमाभिधा प्रिया ।। ५२६ ।।
तयोगमीत्सुनो नाम्ना याज्ञवल्कश्च वल्लभः। सोमश्रीरबला तस्य स्वनाथाशक्तमानसा ।। ५२७ ।।
कियत्यपि गते काले सोमिलश्च मृतो द्विजः । बधुवगैस्तदा तस्य सस्कार प्रापिता तनुः ।। ५२८ ।।
अर्थ----जो भव्यजीव अष्टद्रव्य और दूर्वा, दर्भ, सरसों आदि मंगलोक द्रव्योंसे भगवान्के चरण कमलों
का अर्घ उतारता है वह कर्म नाश करता है ।। ५२२ ॥
अर्थ--हे प्रभो ! जय जय जय ! नंद नंद नंद, तारय तारय तारय, हे तारक ! हे दयाधीश ! इत्यादि
मगलीक शब्दोके द्वारा गणगान करें, जिससे मोक्षपदकी प्राप्ति हो ॥ ५२३ ॥
अर्थ-हे श्रेणिक महाराज, जिन भव्य जीवोने भाव भक्तिसे प्रभुको पूजा एक भी द्रव्यसे की है वे परम
सुनको प्राप्त हुए है। उनके नाम कहनेको मेरे बिना (महावीर प्रभुके समान) अन्य कोई भी समर्थ नहीं है ॥५२४।।
अर्ग--हे राजन् ! तो भी उनमेंसे कितने ही भव्योके सुखद नामोको कहता हूँ। जिससे पूजाके फलमें
विशेष रुचि हो ।। ५२५ ॥
अमरतोत्र आर्य संउम गुर्जर देशमें एक खभात (स्तंभपुर) नामका नगर प्रसिद्ध था। जिसमें
गोपनार्मा नामता एक क्रियाकांउमें निपुण ओर समस्त वेदोका पारगामी ब्राह्मण था। उसकी स्त्रीका नाम
गोमा । दोनो ती वेदधर्ममें वो कट्टर थे ॥ ५२६ ॥
-~-3माहाणके वाजवल्क नामका पुत्र या ओर उसको स्त्रीका नाम सोमश्री था। सोमश्री भद्र
परिणामोनी और सपने म्यामीको मेगामें प्रवीण यो ॥ ५२७ ।।
ri-3 दिनोफे बाद यह सोमशर्मा ( सोमिल ) मर गया। उसके कुटुंबियोने मिलकर उसके
मागेरका मंसार जिता ॥ ५२८ ॥
[ ९२ ] ret- TEST- SearesiweSTHPASHIOSes convestionान्च्यालयमा द्वादशे वासरे सर्वे सुतमात्रादय खलु । मृतक्रिया च विप्रम्य चक्रुरानदतश्च ते ॥ ५२९ ।। सोमा स्नुगमिति प्राह सोमश्री सह भीरुभि । व्रज नदी प्रति कुभान आनय स्वक्रियाप्तये ।। ५३० ।। सापि श्रुत्वा इति ता वै आदाय अगमन्नदीम् । तस्मिन्नवसरे तत्र वैश्यसुतापि चागता ।। ५३१ ।। सोमश्रीश्च तयाऽभाणि सखे श्रीमज्जिनालये। मयारब्ध शिवाप्त्यर्थ अभिपेको जिनस्य वै ।। ५३२ ।। इति श्रुत्वाह सा मोदात् किमस्य चालि हे फलम् । साप्याह सखि भो भद्रे फलयस्य शृणु शुभम् ।। ५३३ ।। ये गृहस्था जिनेन्द्रस्य पचामृतरसैवरै । अभिषेक प्रकुर्वति ते भज्यतेत्र निर्जरै ॥ ५३४ ।। विवुधा सकलास्तस्य सेवा कुर्वति भावतः । कथयाम्यपरा शोभामतस्ते चाभिपेकजाम् ॥ ५३५ ।। जिनागारे हि त्वमपि कुभमेक जलभृत । मु च तवापि पुण्याप्ति भविष्यत्येव मत्समा ॥ ५३६ ॥ अर्थ--उस सोमशर्माके मरनेके बाद पुत्र माता आदि कुटुंब परिवारके लोग बारहवे दिवसके संस्कार करने लगे ॥ ५२९ ॥ अर्थ-सोमा ब्राह्मणीने अपनी पुत्रवधूसे कहा कि तेरे स्वसुरका आज वारहवे दिवसका संस्कार है । इसलिये अन्य ब्राह्मणीको साथ ले जाकर नदीसे घड़ों में पानी भर ला जिससे संस्कार क्रिया की जावे ॥५३०॥ अर्थ-यह सुनकर सोमश्री अन्य ब्राह्मणियोंके साथ नदीपर पानी भरनेको गई। और वहाँ पर एक सेठकी पुत्री भी पानी भरनेको आई ॥ ५३१ ॥ अर्थ--उस सेठकी पुत्रीने सोमश्री ( ब्राह्मणीकी बहूसे कहा कि सखि आज मैने श्रीमज्जिनालयमे परमपूज्य जिनेन्द्र भगवान्का अभिषेक महोत्सव प्रारंभ किया है ॥ ५३२ ॥ अर्थ-ऐसा सुनकर सोमश्रीने हर्षसे कहा कि हे सखि इस अभिषेकका क्या फल है ? सेठकी पुत्रीने कहा कि सखि हे भद्रे अभिषेकका महान् दिव्य फल होता है मै उसको संक्षेपसे कहती हूँ सो सुन । जो गृहस्थ श्रीमान् जिनेन्द्र प्रभुका भाव भक्तिसे पंचामृतसे अभिषेक करते है वे देवोके द्वारा पूजा किये जाते है। इसकी विशेष शोभा मै फिर कहूँगी ॥ ५३३-५३५ ॥ अर्थ--हे सखि, तू भी एक पवित्र प्रासुक जलसे घड़ा भर कर श्रीजिनेन्द्र भगवान्के अभिषेकके लिये श्रीजिन मंदिरमें जाकर चढ़ा । तुझे भी मेरे समान पुण्यकी प्राप्ति होगी। ५३६ ॥ जन्यमान्य च्यायल्यालयमा [ ९३ ] mameemaSiemaa तम्या वचनमाकर्य ह्येक कुभ सुमोदत.। आधाय श्रीजिनेन्द्रस्य चागात् स्वस्थानमजसा || ५३७ ।। घृत्वा सा मदिरे पूज्ये लेखवृदैश्च खेचरैः। श्रीजिनस्याभिपेकाय शिवस्थाने शिवाप्तये ।। ५३८ ।। सापि मृत्वा सुपुण्येन श्रीधराभिषभूपतेः । श्रीदेव्याया सुता जाता कुभश्रीरप्सरोपमा ।। ५३९ ।। तत्रैव सापि मोदेन चकार स्नपन प्रभोः । प्रतिघस्र च दुग्धाद्यैः पूजन वसुद्रव्यतः ॥ ५४० ।। अते समाधिना मृत्वा परमेष्ठिमत्रतत्परा । सा गता तेन स्वर्गेहि अग्रे यास्यति निवृति ।। ५४१ ।। भो भव्या पश्यथ यूय सत्फल स्नपनस्य वै । प्रत्यक्ष शर्मकार कुरुध्व स्नपन प्रभोः ।। ५४२ ।। नार्या मयंन येनेव कृत जिनपदाब्जयोः। लेपन च तयो वक्ष्ये सवध चदनादिभिः ।। ५४३ ।। समस्यायालयमा 1 अर्थ--सेठकी पुत्रीके वचनोको श्रवण कर सोमश्री ब्राह्मणी भी विशुद्ध भावोसे एक घड़ा प्रासुक पानीका नदीमेंसे बड़े हर्पके साथ भर श्रीजिनेन्द्र भगवानके मंदिरमें जाकर श्रीवीतराग अरहत प्रभु पर चढ़ा आई । और फिर अपने घर पर गई ॥ ५३७ ।। अर्थ---उम ब्राह्मणी सोमश्रोने देव ओर विद्याधरोसे पूजित मोक्षका स्थान-महामनोहर ऐसे श्रीजिन- मंदिरमे श्री जिनदेवका अभिषेक किया और वह अतिशय हर्पको प्राप्त हुई ॥ ५३८ ॥ अर्थ--सोमश्री श्री जिनेन्द्र भगवान्का एक कुंभके जलसे अभिषेक करनेके फलसे मरकर श्रीधर राजाको गनो के कुभश्री नामकी पुत्री उत्पन्न हुई। और उसने वहाँ भी भगवान्का अभिषेक किया। पचामृत अभिषेक प्रति दिन किया। आठो द्रव्योसे पूजन की। अंतमें ममाधिमरण धारण कर पच नमस्कार मंत्रका यान तो शरीर जोर स्वर्गमे देव हुई । और वहाँसे चय कर मोक्ष जायगी ।।५३९-५४१॥ -- नयनीयो ! आपने श्रीभगवानका पंचामृतसे अभिषेक करनेका फल प्रत्यक्ष ही देखा । मोमीको गा राम नग प्राप्त हुआ। इमलिये मवं सुपकी प्राप्ति के लिये नित्य हो जिनेंद्र प्रभुका स्नपन ना नायि ।। ५२२ ।। Thो स्त्री पुरा भी जिननरण कमजोपर मगधित चंदनादि द्रव्योसे लेप करता है उसके लिये TIT ॥१४३ ।। :-
[ ९४ ]
रामान्यजयजयमच्याच
अर्थ-
अस्मिन् खगाचले शुभ्र ग्वगवारविभूपिते । औदीच्याया च श्रेण्याच तस्मिन् रत्नादिसचये ।। ५४४ ।।
पुरे आसीत् धराधीशो मणिशेखरनामभाक् । तस्य वामाऽभवत् साध्वी नाम्ना शुभमती सुधीः ।। ५४५ ।।
सम्यक्त्वरत्नभूपाढ्या गुर्वाज्ञापालका शुभा । पत्युभक्तिकरा
नम्रा प्रभो. पूजनतत्परा ।। ५४६ ।।
तस्योदरे
सुर. कश्चित् सम्यग्दृष्टि जिनार्चकः । ह्यवातरच्च दीप्त्याढ्य. पूवपुण्योत्करोदयात् ।। ५४७ ।।
तत्प्रभावाच्च तस्या हो दोहलोजनि सुन्दरः । अष्टापदगिरीन्द्रस्य यात्रा करोमोति हृदि ॥ ५४८ ॥
पचामृतरसैस्तत्र करोमि स्नपन प्रभोः। तथा काश्मीरकर्पूरगधसारादिभिः खलु ।। ५४९ ।।
जिनपादाब्जयो लेप सदा सौरभयुक्तयोः । पूज्ययो. सुरवृन्दाद्येस्ततः पूजा जलादिभिः ।। ५५० ।।
ध्यात्वेति सह भूपेन सा गत्वा तत्र भूधरे । व्योमयानसमारूढा नत्वा तत्र जिनाधिपान् ॥ ५५१ ।।
पुनः सस्नाप्य सद्भक्त्या दुग्धदध्यादिसद्रसै । विलेपन चकार सा सुगन्धैः कु कुमादिभिः ।। ५५२ ।।
पश्चादिज्या च गान च स्तवन तद्गुणोद्भवम् । कृत्वा पुनः चचालासौ तस्माच्च स्वपुर प्रति ।। ५५३ ।।
अर्थ--इस विजया पर्वतपर उत्तर दिशामें एक रत्नसंचयपुर नामका नगर है ॥ ५४४ ॥
-इस रत्नसचयपुर नगरका राजा मणिशेखर नामका विद्याधर था। और उसकी रानी शुभमती
थी। यह रानी सम्यग्दृष्टि थी । गुरुकी आज्ञा पालनेवाली थी। पतिसेवामें तत्पर और जिनेन्द्र भगवान्की सेवा
में लवलीन थी। पूर्वपुण्योदयसे उसके गर्भ में भगवान्की पूजा करनेवाले सम्यग्दृष्टि एक पुण्यात्मा देवने अवतार
लिया ॥ ५४५-५४७ ॥
अर्थ--उस पुण्यात्मा देवके प्रभावसे शुभमती सतीको दोहल हुआ कि कैलाश पर्वतकी यात्रा करूं।
और कैलाशपर जाकर श्रीजिनेन्द्र देवका पञ्चामृत अभिषेक करूँ तथा सुगन्धित द्रव्यसे परम पवित्र प्रभुके चरण
कमलोंका लेप करूँ। फिर अण्टद्रव्यसे पूजा करूँ। ऐसा विचारकर वे दम्पत्ति विमानमें बैठकर कैलाशको गये
और वहॉपर प्रभुकी दिव्य प्रतिमाओंका पंचामृत रससे अभिषेक किया और कुकुमादि सुगन्धित द्रव्योंसे प्रभुके
चरणकमलोंपर विलेपन किया ॥ ५४८-५५२ ॥
मान्यजीच्या
अर्थ--फिर उस विद्याधरने श्रीजिनेन्द्र भगवान्की अष्ट द्रव्यसे भक्तिपूर्वक पूजा की, भगवान्का गान
किया, स्तवन किया और प्रभुके गुणोंका स्मरण किया। फिर वहांसे (कैलाशसे) अपने नगरको आनेका विचार
किया ॥ ५५३ ॥
[ ९५ ] earPAHEPSmemenacearnea तावत्तद्गह्वरस्थानात् नि सृतो गधदुस्सहः । जनैः सोदुमशक्योपि दुष्टैर्जातजुगुप्सकैः॥ ५५४ ।। आनाय त च दुगंध तया पृष्ट. पतिस्तदा । अस्मिन्नामोदसयुक्ते वने हि नन्दनोपमे ।। ५५५ ।। दुर्गन्धः कुत्रत. स्वामिन् आयातो देहदु खदः । कथय सत्वरं भूप कारण मम शातदं ॥ ५५६ ॥ श्रुत्वा इत्याह ता भूप. शृणु त्व प्राणवल्लभे । कश्चिद्योगीश्वरो ह्यत्र दृश्यते ध्यानतत्पर ॥ ५५७ ।। मलाविलो महाधीरस्तस्य देहस्य योगतः। आगतश्च प्रिये चाय दुर्गन्धो नात्र संशय ।। ५५८ ॥ पते. वाचमिति श्रुत्वा सा गत्वा तस्य सन्निधे । ददर्श तत्तनु दीप्त तपसा कृपता गतम् ॥ ५५९ ।। याताग स्वेदमल्लौघे ध्यानमग्न निरवर । कायोत्सर्ग स्थित सौम्य चिदात्मरससभृतम् ।। ५६० ॥ ईदृशस्य मुनीन्द्रस्य किंचिच्चकार सा हृदि । तस्मिन् काले जुगुप्सा च दृष्ट्वा सर्वार्थनाशकम् ।। ५६१ ।। अर्थ--उसी समय पर्वतको एक गुफामेंसे अत्यन्त दुस्सह दुर्गन्ध ऐसा निकला कि जिसको निर्विचि- कित्सा अगके पालनसे रहित (सम्यग्दर्शन विहीन) जीव सहन करनेको सर्वथा असमर्थ हो ॥ ५५४ ॥ अर्थ--उस दुर्गन्धको सूंघते ही शुभमतिने अपने पति विद्याधरसे पूछा कि हे स्वामिन् ! इस परम सुग- चित नन्दन वनके समान महान् उत्कृष्ट वनमें शरीरको दुःख देनेवाली यह दुर्गन्ध कहाँसे आई ? हे प्रभो ! मुझे मुख देनेवाला इसका कारण कहिये ।। ५५५-५५६ ।। अर्थ-अपनी धर्मपत्नी शुभमती रानीके ऐसे वचनोको सुनकर विद्याधरने कहा कि यहॉपर कोई योगी- पर अतिशय तपस्वी महान् मलसे पूर्ण हो रहा है और यह दुस्सह दुर्गन्ध उसीके शरीरसे आ रही है इसमें गन्येत नती है ।। ५५७-५५८ ।। अ-अपने स्वामी के ऐसे बननो को सुनकर वह शुभमती रानो शोन ही मुनि समीप गई। और परम सोचमा तपगे कृषित शरोन ऐसे दिव्य मुनिको देखा। जिनके शरीरमें स्वेद (पसेव) के कारण मल बहुत गया था। नोभी पानमालीन ये 1 बायोत्सर्ग स्थिर थे। शात ये और अपने चैतन्य परमानन्द रस हरपित५५१-५६० ।। रामरामायsatram + come -- परमाणानो और दागेर ने मर्नया मोह रहित मुनीश्वर को देखकर प्रयम तो उस । ९६ ] -- मत्ता पश्चात्प्रासुकनीरेण प्रक्षाल्य तत्तनु च सा। चकार लेपन तस्य कृष्णागुर्वादिजै. रसै ॥ ५६२ ।। मुनि नत्वा तयो पश्चात् स्तुत्वा स्वपुरमागतौ । शृणु व चान्यवृत्तात यज्जात तत्र लेपज ॥ ५६३ ॥ लेपजातसुगधेन तदा मधुव्रता । लग्नाश्चागत्य देहस्य मुनेः सहस्रश प्रमा ॥ ५६४ ॥ चैतन्यजडरूपे च पश्यन् भिन्नत्वमजसा । आत्मन्येव तदा तस्थौ स मुनिः धोरभावयुक् ।। ५६५ ।। नात्यजत् आत्मनो ध्यान तदा घोरोपसर्गके । वायुना कि नगाधीश. प्रचलत्येव निश्चयात् ।। ५६६ ।। तदोपसर्गे सजाते स यतिरात्मवेदक. । स्थिरोऽभवत् शिवाकाक्षी आत्मनि मेरुवत् क्षयी ॥ ५६७ ।। मुने देहात् पल सर्वमश्नति शोणित तका । तथाप्येष मुनिश्चित्ते न चचाल स्वध्यानतः ।। ५६८ ।। Tauszusszustelua रानीने अपने मनमें समस्त प्रकारके अनर्थोंको करनेवाली किंचित् जुगुप्सा ( ग्लानि ) की। फिर तत्काल ही प्रासुक और पवित्र जलसे मुनीश्वरके शरीरको प्रक्षाल कर अगर, तगर आदि सुगन्धित द्रव्योंका सुगन्धित लेप किया ॥ ५६१-५६२॥ अर्थ-मुनीश्वरको नमस्कार कर और स्तुति कर वे दम्पत्ति (विद्याधर व रानी) अपने नगरमें आये। इसके बाद वहॉपर दूसरी कथा बनी, वह सुनो। उस सुगन्धित लेपकी सुगन्धसे मुनीश्वरके शरीरपर हजारों भ्रमर आकर लिपट गये ॥ ५६३-५६४ ॥ अर्थ-वे धीर, वीर मुनीश्वर आत्मा और शरीरको सर्वथा भिन्न-भिन्न विचार करते हुए अपने आत्म विचारमे लवलीन हो गये ॥ ५६५ ॥ अर्थ-यह घोर उपसर्ग आनेपर भी मुनिराजने अपना ध्यान नहीं छोड़ा। सच है कि मेरुपर्वत कहीं वायुसे कम्पित होता है ? ॥ ५६६ ॥ अर्थ--इस प्रकार भ्रमरोंका घोर उपसर्ग आनेपर भी वे मुनीश्वर अपने आत्मीक ध्यानसे रंच मात्र भी चलायमान नहीं हुए। मेरुके समान अडोल रहे ॥ ५६७ ॥ अर्थ-मुनीश्वरके शरीरका सर्व मांस और रक्त भ्रमर (भौरा) भक्षण करने लगे परंतु मुनिराज अपने ध्यानसे रंचमात्र चलचित्त नहीं हुए ॥ ५६८ ॥ ? मायालयाचा [ ९७ ] TESTERamesTRATE एव पक्षप्रमे घने याते म भार्ययान्वितः । पूर्वोक्तश्चाययौ तत्र यात्रार्थ खचरेश्वर. ॥ ५६९ ।। नो दृष्टः स यतिश्चान सा चाह स्वपति प्रति । क गतः स मुनिः स्वामिन् अस्माभिः पूजितश्च यः ।।५७०।। सर्वत्रालोकना चक्रे श्रुत्वा राज्युदित वचः । स लगो भ्रमरैयुक्त ददृशाने मुनीश्वरम् ।। ५७१ ॥ प्रियामाह खगाधीशः पश्य पश्य दयोज्यिते । त्वया भक्त्या कृतो लेपः ह्यत्रानिष्टस्तु जात्तवान् ।। ५७२ ॥ सापि श्रुत्वा पते वाच दृष्ट्वा योगीश्वर तदा । आत्मनः परमा निंदा चकार खचरप्रिया ।। ५७३ ।। निर्घाटितास्ततः सर्वे तया पट्पदसचयाः । तदा ध्यानप्रभावेन स लेभे केवलोदयम् ।। ५७४ ।। समाययु सुरेन्द्राश्च तस्य पूजार्थमजसा । कृत्वा पूजा जिनेन्द्रस्य तस्थुः तत्रैव भावतः ।। ५७५ ॥ राज्याच्या अर्थ---इस प्रकार यह घोर उपसर्ग पंद्रह दिवसपर्यन्त रहा। पंद्रह दिवस बाद वही विद्याधर और शुभमती रानी कैलाशगिरिको वंदनाके लिए पुनः वहॉपर आये ॥ ५६९ ॥ अर्थ---शुभमती रानोने अपने स्वामी विद्याधरसे पूछा कि जिन मुनीश्वरको हमने प्रथम पूजा की थी, लेप किया या सो वे यहाँपर दीखते नही हैं कहॉपर गये ॥ ५७० ॥ अर्थ--शुभमतो रानोके कहनेसे विद्याधरने मुनीश्वरको सर्वत्र देखा, तब भ्रमरोसे आच्छादित उसी स्थानपर मुनीश्वर को देखा ॥ ५७१ ॥ अर्थ--हे बल्लभे ! हे निष्ठुरे । देख-देख तेने मुनीश्वरको भक्तिसे सुगन्धित पदार्थोका लेप किया परंतु विना विचारे हुए कार्यका केमा अनिष्ट परिणाम हुआ है ।। ५७२ ॥ शुभमती रानीने अपने म्बामीके ऐसे वचनोको सुनकर और मुनीश्वरका घोर उपसर्ग देखकर मोगोर निवा को ।। ५७३ ।। ई-ममतो गनीने उन ममस्त भ्रमरोको दूर किया। उपसर्गके निवारण होते ही ध्यानके प्रभावसे पार जामिया होता नारा तथा ओर मुनीश्वर को केवलज्ञान प्रगट हुआ ॥ ५७४ ।। मो समय निगा केवलज्ञानको पूजा करने के लिए देवगण आये और भगवान की पूजा कर मा १६7 हरनेके लिए ठहरे ॥ ५७५ ।।
[ ९८ ] नीच्यायच्यeeEARS च्या जयजयजयाज्याच्या सप्रियः सोपि त नत्वा स्तुत्वा तद्गुणजैः गुणे. । स्वस्य पापविनाशार्थ तदने चाहतुश्च तौ ॥ ५७६ ॥ भो जिनेन्द्र दयाधीश सर्वपापविभजक । ते नमोस्तु महावीर हतस्व नश्च दुःकृतम् ।। ५७७ ॥ अस्माभिर्भक्तिबुद्धया च विलेपन दयापते । यत्कृत भवना जातमुपसर्गकर च तत् ।। ५७८ ।। सन्निधेरात्मनस्तस्य दपती तौ पुन पुनः । कृत्वा निंदा गतौ स्वस्य पुरे तद्गुणचिंतकौ ।। ५७९ ।। पुण्योदयाच्च सा लेभे सुत कल्याणसज्ञ कम । पश्चाद्दोक्षा गृहात्वा च भ; साक गता दिवि ।। ५८० ।। तस्माच्च्युत्वा सुरो सापि ह्यस्मिन् रजतपर्वते । वैजयतपुरे जातः पुष्पदताभिधो नृप. ॥ ५८१ ।। सुभद्रा भामिनी तस्य सजाता भद्ररूपभा । तस्या कुक्षो समुत्पन्ना सुता च मदनावली ।। ५८२ ।। क्रमत सापि सजाता यौवनाढ्या प्रियवदा । सिंहध्वजेन भूपेन परिणीता स्वयवरे ।। ५८३ ।। । अर्थ--उस विद्याधरने भी अपनी रानी शुभमतीके साथ केवली भगवान्को नमस्कार कर अपने पापों- के नाशके लिए भगवान्से पूछा ॥ ५७६ ॥ अर्थ-हे जिनेन्द्र ! हे पापमर्दक ! हे दयालु, हे केवलज्ञान साम्राज्य नायक ! प्रभो! आपको बार-बार नमस्कार है । हे प्रभो । हमारे अपराधोका नाश कीजिए। हमने आपके शरीरमें गंधका लेप भक्तिभावनासे लगाया था। परतु वही लेप आपको उपसर्गका कारण हो गया। अज्ञानी जीवोमें विचार नही रहता । हे प्रभो ! यह अपराध नाश करिये । इस प्रकार अपनी निदा कर वे दम्पति (विद्याधर और शुभमतो रानी) अपने नगर- को गये ॥ ५७७-५७९ ॥ अर्थ--भगवान्की चंदनको पूजाके पुण्यप्रभावसे शुभमती रानीके कल्याणकुंवर नामका अब पुत्र उत्पन्न हुआ। इस प्रकार पुत्र राज्य आदिके उत्तम सुखोको भोग कर और अन्तमें श्रीभगवतो जिनदीक्षाको अपने पति- के साथ स्वीकार कर स्वर्गमें वह रानी देवी हुई ॥ ५८० ॥ अर्थ--आयुष्य क्षय होनेपर शुभमती रानीका जीव देवी पर्यायको छोड़कर विजयाद्वं पर्वतपर वैजयन्त नगरके राजा पुष्पदंतको सुन्दरी रानी सुभद्राके मदनावली नामकी पुत्री उत्पन्न हुई ।। ५८१-५८२ ॥ अर्थ--वह मदनावली क्रमसे यौवन अवस्थाको प्राप्त हुई और स्वयम्बरमें उसका सिंहध्वज राजाके साथ पाणिग्रहण हो गया॥५८३ ।। मयाजालमsnानामिना माया तत [ ९९ ] ततश्च ती गत काल न जानती वृपोदयात् । शर्ममग्नौ च सर्वे ते जायते शर्मसचया ॥ ५८४ ।। मुनिनिंदोत्यपापेन तस्या देहे महानभूत् । दु खसदायकः क्रूगे दुगंधो दुस्सहो अहो ।। ५८५ ।। तम्या दुर्गधनागार्थ कृतानेकाश्च भेपजाः । चिकित्सकैस्तथाप्येव नैति वै शातता च सा ॥ ५८६ ।। ततः मापि पुरेवाह्यमद्मनि दुखरिता । वास चकार तत्रापि रुदती चेत्यचिंतयत् ॥ ५८७ ।। पापिन्या. किं कृत पाप मया हि पूर्वजन्मनि । इत्येवाचिनयत् चित्ते यावदास्ते शुचान्विता ॥ ५८८ ।। तावदवधिनेत्रेण पूर्वोक्त. खचरेश्वर । तस्याः पतिः गत स्वर्गे ज्ञात्वा तस्या सुदुःखक ।। ५८९ ॥ आजगाम मुग्म्तत्र तस्याग्ने मकल स्वक । वृत्तात पूर्वज निंद्य कथयामास मोदतः ।। ५९० ।। पुन उत्याह न्व भावात् सप्ताहानि प्रमाणि च । पचामृतरसैः शुद्ध जिनाना स्नपन कुरु ॥ ५९१ ।। काश्मीरकर्पूरगन्यमारजससे । जिनाना शुद्धभावेन पादयो लेपन कुरु ।। ५९२ ।। अर्थ--मदनावलीने पूर्व पुण्योदयसे अपने स्वामीके साथ संपूर्ण सुखको भोगते हुए कितना समय व्यतीत हो गया यह नहीं जाना । सो ठोक ही है, पुण्योदयसे सब कुछ होता है ॥ ५८४ ॥ अर्थ---मदनावलोके जीवने प्रथम शुभमती रानोको पर्यायमे मुनिके शरीरको दुर्गन्धोको देखकर यत्- किंचित् निन्दा की थी, उस पापके उदयसे उसके शरीरमें दुस्सह दुर्गन्ध उत्पन्न हो गई जिसको नगर निवासी मनाय सहन नहीं कर सके । राजाने इसलिए उस अतिशय प्यारी मदनावलीको नगरके बाह्य एक राजमदिरमें गी। और उसका वहाँपर नव प्रकारसे दुर्गन्ध दूर करनेका प्रयत्न किया। परतु वेद्योसे वह दुर्गन्ध दूर नही गई । तर मदनावली दुरासे इस प्रकार विचार करने लगी ।। ५८५-५८८ ।। अपं-हाय हाय ! पापिनी मैने पूर्वभवमें ऐसा कौन-सा भयङ्कर पाप किया होगा कि जिसके फलसे काममा प्राप्त हुआ। ऐमा विचार मदनावली अपने मनमें कर रही थी कि उसी समय पूर्वभवके पामो र गोर ( जो विद्याधरको पर्यायमे स्वर्ग में देव हुआ था) स्वर्गसे मदनावलोके पास आया । मनाली पीने पूर्वभवमें मनि निन्दा फो यो और उसके फलमे ही यह रोग हो गया है, ऐमा मुनि निन्दा पा ममताभरका वृत्तांत उम देवने बतलाया ॥ ५८१-५९० ।। --उम ने फिर कहा कि हे मदनावलि ! तू सात दिवस पर्यन्त भावोसे श्रीजिनदेवका पंचामृत मने भिक पर और पति गुगन्धित केदार, कपूर, चंदन आदि पदार्योंके रसमे श्रीजिनदेवके पवित्र चरण- [ १०० ] mesesereyewearees अनेनैव प्रयोगेण त्वत्तनौ शातता खलु । भविष्यति प्रिये नात्र सदेहमाकुरुष्व भो ॥ ५९३ ।। इत्याख्याय सुरो दक्ष स्वस्थाने च गतस्तत । तच्छ्रुत्वा सापि तत्सर्वं चकार स्वस्य शातये ॥ ५९४ ।। त्रिकाले सा जिनेन्द्राणामभिपेक विधानत. । चक्रे च पादयोर्लेप नित्य सुगन्धजै रसै ।। ५९५ ॥ एव च क्रियमाणे हि तस्या देहोऽभवन्महान् । सुगन्धाढ्यश्च सर्वेषा प्रिय. स्नानप्रभावतः ।। ५९६ ।। प्रतिघस्न तत सापि चकार घनमोदतः। अभिषेक जिनेन्द्राणा पादयोः लेपन तथा ॥ ५९७ ॥ काललब्ध्या ततः सापि लात्वा दीक्षा जगन्नुताम् । दुर्धर च तपस्तेपे कर्मवृन्दारिहानये ।। ५९८ ।। अन्ते सन्यासमादाय विशुद्धमनसा तप । प्रभावात् सा निहत्याशु स्त्रीलिंग निंदित बुधै. ।। ५९९ ।। समाप पचमे नाके देवत्व शर्मसभृते । धर्मत शिवसप्राप्तिः का कथा नाकसद्मनः ।। ६०० ।। सोमरो दिव्यसौख्यानि प्रभुज्यति स सर्वदा। पूर्वधर्मप्रभावेन धर्मतो दुर्घट च किम् ।। ६०१ ।। तस्माच्च्युत्वा स्वकाला नरजन्म शुभे कुले । सप्राप्य सयम धृत्वा सोमरः शिवसिद्धये ।। ६०२ ।। न्याय Samme कमलोंका लेप कर तो ऐसा करनेसे तेरी यह दुस्सह व्याधि शीघ्र ही शमन हो जायगी। इसमे जरा भी सदेह नही। ऐसा कहकर वह देव अपने स्थानको गया और मदनावलीने वह सब विधि समस्त सांगोपांग को॥५९१-५९४॥ अर्थ-मदनावलीने अपने रोगकी शांतिके लिए तीनो काल पंचामृतसे श्रीजिनदेवका अभिषेक किया और सुगन्धित पदार्थोके रससे प्रभुके पवित्र और सुगधित चरणोपर लेप किया। इस प्रकार करनेसे उसकी देह अत्यन्त सुगंधित तथा सुन्दर हो गई ॥ ५९५-५९६ ॥ अर्थ--तदनन्तर वह मदनावली हर्षके साथ प्रति दिवस श्रीजिनदेवका पंचामृताभिषेक करने लगी। और सुगंधित द्रव्योसे जिनेंद्र चरणोका लेप करने लगी। काललब्धि प्राप्त कर वह मदनावलो श्रीभगवती जिनेन्द्र- दीक्षाको धारण कर दुर्धर तपश्चरण करने लगी। अतमें विशुद्ध भावोसे संन्यास धारण कर स्त्रीलिंगको छेद पाँचवें स्वर्गमें देव हुई। सच है धर्मसे सब कुछ होता है। जब मोक्षकी प्राप्ति धर्मसे होती है तो स्वर्गकी प्राप्ति में क्या आश्चर्य ? ॥ ५९७-६०० ॥ अर्थ--यह देव स्वर्गके दिव्य सुखोको प्राप्त हुआ। सो ठीक ही है क्योंकि धर्मके प्रभावसे कोई भी कार्य दुर्घट नहीं रहता ॥ ६०१ ॥ अर्थ--वह देव स्वर्गसे चयकर मनुष्य पर्यायको प्राप्त कर और जिनेन्द्र भगवान्की पवित्र दीक्षाको चमचमान्य -- पूष्योघे . कुदपद्मोघे विभो पूजा कृता ह्यतः । लीलावत्यमिधा श्रेष्ठश्रेठिन्या प्रतिवासरम् ।। ६०८॥ धनलाल सेठी -क- [ १०१ ] ८111H परिग्रहण ... याम्यति कमनिर्णाशात् सिद्धस्थानेच्युतोपमे । मुनिः भो मगधाधीश तत्रापि सर्वपूजितम् ॥ ६०३ ।। भो भव्या. श्रीजिनेन्द्रस्य पादयोश्च प्रलेपनात् । सुखमाप्ता च सा राज्ञी प्रत्यक्ष खलु पश्यथ ।। ६०४ ।। चदनस्य प्रलेपेन मुखमाप्ता घना जना. । लेपनीयौ जिनपादौ यतश्चदनककुमै ॥ ६०५ ।। शक कोगे जिनेन्द्रस्य पादाने धृतमजसा । शालिकण पुनः तौहि गतौ स्वर्गे मनोहरे ।। ६०६ ।। याम्यत. क्रमतो मोक्षे वधा नित्य जिनोत्तमम् । पूजयध्व वरैः शुद्ध रक्षतैरक्षताप्तये ॥ ६०७ ॥ दिवि मा न गता ह्यग्रे मोक्ष यारयति निश्चयात् । अतो भव्या जिनेन्द्राश्च पूजयध्व सुपुष्पत ।। ६०९।। हालिकाभिधवेश्यो यन्युपदेशात् कृतीति वै । नियम एकग्रामेन पूजयिष्यामि वै जिनम् ।। ६१० ।। मोमि नगानितो जान तत्फलेन पुनश्च म । दीक्षा जैनेश्वरी धृत्वा दिवि देवोऽभवत्खलु ॥ ६११ ।। 41639 धारण कर मोक्षको प्राप्त होगा। हे श्रेणिक महाराज ! यह सब महिमा भगवान् पर चंदन चढानेके पुण्यके फल को है । भगवान्के चरणकमलोकी चदनसे पूजा करनेका महान् फल है ॥ ६०२-६०३ ॥ अर्थ---हे भन्यजीवो । श्रीजिनेन्द्र देवके पवित्र चरणकमलोपर चंदनका लेप करनेके फलसे मदनावली- ने प्रत्यक्ष फल प्राप्त किया । भगवान्के चरण-कमलपर चदनका प्रलेप करनेसे बहुतसे जीव सुखको प्राप्त हुए हैं, इसलिए चदनसे पूजा नित्य ही करनी चाहिये ।। ६०४-६०५ ।। जयं--- तोता दम्पति ( तोताके जोडा) ने श्रीजिनेन्द्र भगवान्के पवित्र चरण-कमलोकी अक्षतके जगामे की भारतपूर्वक पूजा त । उसके फलसे वे दोनो स्वर्गको प्राप्त हुए । और क्रमसे मोक्षको प्राप्त होगे। मायजोगो का शत असतासे श्रो जिनेन्द्र देवको पूजा नित्य ही करनी चाहिये ।। ६०६-६०७ ।। योजित: भगवान के पवित्र चरणकमलोकी कुद, पय, चमेलो, गुलाब आदिके फूलोसे पूजा कर ""11 IMEठानीने गं गव पाप्त किया और क्रमले मोक्षको जायगी । इसलिये भव्यजीवोको भगवान् inो फलाने का नित्य करना चाहिये ।। ६०८-६०९ ॥ - मुगारो भोगदेशमे हालिक नामके एक अतिशय दरिद्र वैश्यने थोजिनेन्द्र भगवान्के frr पास मार चटाने का नियम लिया था। उम पुण्यके प्रभावसे उसका उसो a- । ८ -) [ १०२ ] SWER-SHRESTHE neHREADSHIPSORPHASHA सोऽमर स्वर्गतश्च्युत्वा लप्स्यति मोक्षमक्षयम् । कुर्वतु सर्वदा भव्या नैवेद्यै पूजन प्रभो ॥ ६१२ ॥ जिनपादारविंदाग्रे नाशार्थ मोहकर्मण । यत् खलु शुद्धभावेन दीपस्योद्योतन कृतम् ।। ६१३ ।। धूपश्रीकन्यका जाता दिवि देवागनापि सा । चाग्रे यास्यति मोक्ष हि अनुक्रमाच्च सा मुरी ।। ६१४ ।। विनयधरो नाम्नेति श्रेष्ठिपुत्रश्च शुद्धधी । धूपपूजाप्रभावेन तुर्यकल्पेऽमरोभवत् ।। ६१५ ।।। सोपि यास्यति भो भव्या ह्यनुक्रमात् शिवास्पद । पूजयध्व जिनेंद्र वै धूपव्यूहै शिवाप्तये ॥ ६१६ ।। रूपिणी नामत ख्याता दरिद्रवणिजात्मजा । केलाम्रादि फलौघ च सा जिनाग्ने फलाप्तये ॥ ६१७ ॥ धृत्वा इत्याह भो स्वामिन् देहि मोक्षफल च मे । कृत्वा प्रतिदिन चैव मृत्वा समाधिना ततः ॥ ६१८ ।। आद्ये स्वर्गेमरो जातश्च ग्रे मोक्ष गमिष्यति । फलेज्याफलतो भव्याः किं न स्यात् शर्मसततिः ॥ ६१९ ।। पर्यायमे समस्त दरिद्रताका दुःख दूर हो गया और राजासे पूजित हुआ । अन्तमें मरकर वह स्वर्गमें देव हुआ। और आगे वह मोक्षको नियमसे प्राप्त होगा। इसलिये भव्य जोवोको भगवान् जिनेन्द्र देवको पूजा नैवेद्यसे प्रति- दिन करनी चाहिये ॥ ६१०-६१२ ॥ अर्थ--मोहनीय कर्मका नाश करनेके लिये श्रीजिनदेवके समक्ष शुद्ध भावोसे दीपकोका उद्योत अवश्य ही करना चाहिये । धूपश्री नामकी कन्याने दीपकी पूजाके फलसे स्वर्गमे देवांगनाको पर्याय प्राप्त की। और क्रमसे मोक्षको भी प्राप्त करेगी ॥ ६१३-६१४ ।। अर्थ-विनयंधर नामके एक सेठके पुत्रने शुद्ध भावोसे श्रीजिनेन्द्र भगवान्की धूपसे पूजा की। उसके फलसे वह चोथे स्वर्ग में देव हुआ। और वहाँसे चयकर क्रमसे मोक्षको जायगा । इसलिये हे भव्यजीवो धूपसे भगवानको पूजा महान फल देनेवाली है । इसे प्रतिदिन करो ।। ६१५-६१६ ॥ cumswarupeमयमच्यालयाच्या Irrari शयमालमत्स्यमत अर्थ--मोक्षफलको इच्छासे रूपिणी नामकी एक दरिद्र वणिकपुत्रीने केला, आम, नारंगी, नीबू आदि उत्तम फलोंसे श्री जिनेन्द्र भगवान्की पूजा की उसके फलसे वह मरकर स्वर्गमें देव हुई। और फिर वहाँसे चयकर मनुष्य पर्यायको प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त होगी। फलोंकी पूजासे भव्यजीवोको समस्त प्रकारके सुख प्राप्त होते हैं ॥ ६१७-६१९ ॥
[ १०३ ] ना Marattime. 4:-- एकैकद्रव्ययोगेन पूजयित्वा जिनाधिपम् । सप्राप्ताः शर्मनिकर नराश्च बहवो भुवि ॥ ६२० ॥ विष्णुभट्टो द्विजश्चैको वमुद्रव्यजिन मुदा । पूजयित्वा दिवि चाद्ये सजातो देवराट् खलु ।। ६२१ ।। मेकाद्या नद्धभावेन जिनपूजात्तमानमा. । तेपि स्वगं गता भव्या अतः कुर्वन्तु ता सदा ।। ६२२ ।। नग्मत्तमा सुविधिना कुर्वन्ति ते निश्चयात्, इन्द्रस्यैव खगेन्द्रपन्नगपते. भूतिं समाप्याशु वै। याम्यत्येव शिवाम्पद मुनिनुत नागादिकर्मोज्झित, मत्वेत्येव वुधोत्तमा जिनपतेः इज्या कुरुध्व च भो ।। ६२३ ।। अनेन विधिना भूप कली मूढाञ्च ये नरा. । करिष्यति जिनेन्द्रागा पूजा नैव मदोद्धताः ।। ६.४॥ नम्मिन् तदुद्भवा. रा. मुबोधलवजिताः । वचनोत्यापका स्वस्यागमस्यैव प्रतिश्चयात् ।। ६२५ ॥ अगपूर्वा नगधीग म्याम्यति मत्पर खलु । पक्षत्तुसोमवाते प्रत्याष्टहीनतश्च ये ॥ ६२६ ।। अर्थ--एक एक द्रव्यसे ही भावभक्ति पूर्वक श्रीजिनेन्द्र देवकी पूजा करनेवाले बहुतसे भव्य जीव उत्तम मुपको प्राप्त हुए हैं ॥ ६२० ॥ अर्थ-विष्णुभट्ट नामक एक ब्राह्मणने श्रीजिनेन्द्र देवको आठ द्रव्योंसे पूजा की थी उसके फलसे वह इन्द्रपदको प्राप्त हुआ ।। ६२१ ॥ अर्थ-मेंढक आदि क्षुद्र पर्यायके धारक जीवोने भावोंकी विशुद्धिसे श्रीजिनदेवको पूजा की और स्वर्गा- दिक उत्तम पद को प्राप्ति की । इमलिए भगवान् जिनेन्द्र देवको पूजा मदा करते रहना चाहिये ॥ ६२२ ॥ यं-जो भव्य जोब भन्न भावोमे विधिपूर्वक श्रीजिनेन्द्र भगवान्की पूजा करते है वे निश्चयसे इन्द्र, पगोत्र आदि को महान् दिव्य विभूतिको प्राप्त होते हैं। वे भव्य जीव मुनियोसे पूज्य ओर समस्त प्रकारके पनि रहित सो माको पाप्त होते है। इसलिए भव्यजीवोको भगवान्को नित्य पूजन करनी चाहिए ॥६२३॥ । जात्रोको उपयोत विधिसे जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान्को पूजा नहीं करते हैं वे vi77 मीनार और उठनाती बन जाते हैं उनका सम्यग्ज्ञान नष्ट हो जाता है। जो आगमके वचनो- HTTEIR ही होता ।। ६२४-६२५ ।। | ----योगारामोने राजा श्रेणिरसे कहा कि हे राजन् ! मेरे निर्वाण होने के बाद परयो , Ti7 गांजा तान पण पो रहेगा ।। ६२६ ।। SAMASHTAeyesyEOSHDSurewes - [ १०४ ] राज्याच्याजाच्य यसमाजालन्याच्य - चाने धर्मप्रकाशार्थ करिष्यन्ति मुनीश्वराः । ग्रन्थाना सकलाना च पर्णेपु रचना खलु ॥६२७ ।। हायन प्रति तस्मिन् वै मुनिमार्गस्य हानिता। भविष्यति शरीरस्य होनसहननाश्च वै ॥ ६२८ ।। जिनधर्मात् भविष्यति भूदेवा भूमिपास्तदा। सुबोधवर्जिताश्चास्य निंदकाश्च परान्मुखाः ।। ६२९ ।। ह्यतो मुनिपदस्यैव धारका पुरुपाः कलौ । तुच्छाजानीहि त्व भूप यथा भूपास्तथा प्रजाः ।। ६३० ।। अर्थ---इसके बाद मुनीश्वरगण निःस्वार्थ और पवित्र वृत्तिसे धर्म प्रकाशनके लिये श्री जिनदेवकी ही वाणीको ताड़-पत्रपर लिखकर ग्रन्थोकी रचना करेंगे ।। ६२७ ॥ अर्थ-इसके बाद क्रमसे प्रतिवर्ष मुनिमार्गको हानि होती जायेगी। पंचमकालमें हीन । संहनन होनेसे सिंह वृत्तिके चारित्रको धारण करनेवाले विरले ही होंगे ॥ ६२८ ।। अर्थ--हे राजन् ! पंचमकालमें राजा और ब्राह्मण जिनधर्मसे परान्मुख हो जायेंगे। उनमें सम्यग्ज्ञान- का अभाव हो जायेगा जिससे वे उलटे जैनधर्मके निन्दक बन जायेंगे ॥ ६२९ ॥ अर्थ-हे श्रेणिक उपर्युक्त कारणोसे मुनिपदके धारक वीर पुरुषोंकी संख्या स्वल्प होगी। सो ठीक है जैसा राजा वैसी प्रजा होती है ।। ६३० ।। १ धर्मकी स्थिति और वृद्धिके कारण राजा धर्मगुरु और निर्ग्रन्थ ऋपिगण माने है। राजा यदि नीतिवान् सदाचारी ओर सत्य धर्ममे तत्पर है तो प्रजा भी राजाके समान नीतिमान सदाचारी और धर्ममे तत्पर होगी । यथा राजा तथा प्रजा। वर्तमान समयमे राजाओमे धर्मवासना, नोति और सदाचारका अभाव हो गया तो प्रजा भी वैसी हो गई। ऐसे कायदे कानून बन गये जिनसे अधर्म फैलाया जा सके, हिंसा की जा सके, व्यभिचारमे धर्म कायदा कानूनसे होने लग गया। इसी प्रकार धर्मगुरु ब्राह्मण गृहस्थाचार्योके अभाव होनेसे ( ब्राह्मण लोगोने जैनधर्म छोड देनेसे ) सोलह सस्कार और उत्तम आचरणोका अभाव हो गया । नीति प्रतिदिन उठने लग गई । ब्राह्मणोकी देखा-देखी अन्य प्रजा भी धर्मसे परान्मुख हो गई। निर्गन्य ऋपियोका अभाव होनेमे धमका मूल हो नष्ट हो गया । लोगोने धर्ममे मनमानी कल्पना कर ली और ऋषिगणोके अभावके कारण उपदेश न होनेसे जैनसंख्याका अभाव हुआ। नवीन जैन बनते नही, जो हैं सो अन्य धर्म स्वीकार करने लगे २. धर्मकी वृद्धि और पवित्रताको स्थिरता रखनेवालोमे मुख्य मुनिराज हो होते है । वे एक साथ हजारो जीवोसे अधर्म छुड़ाकर सवको धर्म मार्गमे लगा सकते है । ऐसो मामर्थ्य गृहस्थमे नही होतो है, परन्तु कालके दोपसे अपने धर्मभाई हो मुनियो की निंदा कर मुनिधर्म को उठानेका प्रयत्न करेंगे। मुनियोमे मिथ्या अवर्णवाद लगावेगे । इन कठिनाइयोसे मुनि धर्मका अभाव होगा । और मुनि धर्मके अभाव होनेसे जैनधर्म को भी अत्यन्त हानि होगी। AMASTERemamisarsawaseeMPSTEPSEEasyPAerm weHEHEAPE [ १०५ ] Heaseems? Beste यथा आदिवीरस्य पुत्रेण रचिता ब्राह्मणाश्च ये। जिनधर्मप्रकाशार्थ पूज्याः सर्वेषु चोत्तमाः ।। ६३१ ।। जिनधर्मविनाशाय ते च जाता बुधोत्तमाः । दुष्टकालप्रदोषेण न दोपः कस्यचिद् भुवि ।। ६३२ ।। तुर्यकाले समाः सर्वे वैश्याश्च क्षत्रिया द्विजाः । खलु चैकेव चेष्टाढ्या जिनधर्मप्रसेवका: ।। ६३३ ।। अस्मिन् भूपा द्विजा सर्वे प्राप्ताश्चैकत्वता खल । केवलं च स्थिता वैश्याश्चैकाश्चास्य प्रपालकाः ॥ ६३४ ॥ अतो हि थोजिनेन्द्रोक्तो धर्मोय दृश्यते च व । अल्पवत्तस्य दृष्टात शृणुथ यन्मयोदितम् ॥ ६३५ ॥ कठोरखो मत्तवारणारसक्षयम् । क्षणेनैकेन सकुर्यात् एकश्च नात्र संशय ।। ६३६ ।। म च आम्रतमप्याना फलानामदनेषु च । नो क्षम कारण किं तु विपक्षत्वात् बुधा खलु ।। ६३७ ।। अर्थ-हे श्रेणिक ! श्री आदिप्रभु भगवान् ऋषभदेवके पुत्र भरत चक्रवर्तीने जिन ब्राह्मणोंकी स्थापना, धर्मको वृद्धि और धर्मको पवित्रता स्थिर रखनेके लिये की थी इसलिये जिन ब्राह्मणोको पूज्य माना था और सर्व वर्णीमें श्रेष्ठता प्राप्त हुई थी वे ही ब्राह्मण जैनधर्मके नाशक, निन्दक और द्वेष करनेवाले हो जायेंगे। यह सब कालता हो दोष है। इसमें किसीका अपराध नही ॥ ६३१-६३२ ॥ अर्थ-नीथे कालमें समस्त वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणोको एक समान क्रिया, आचरण और धार्मिक प्रवृत्ति यो । उलिये सब एक ही जिनधर्मके सेवन करनेवाले धार्मिक थे ॥ ६३३ ॥ -- गजन् । पचम कालमें तो समस्त ब्राह्मण एवं राजा गण विधर्मी, क्रिया भ्रष्ट और सदाचार तिन तो गये । एक केरल वैश्य हो जिनधर्मके प्रतिपालक रह गये ॥ ६३४ ॥ १-- गजन् । इमोलिये यह सर्वोत्कृष्ट जैनधर्म इस पचमकालमें अल्प सख्याधारक जीवोमें ही देखा पानाममा दटात बतलाते है ।। ६३५ ।। -- गान् । महाधिक्रमशाला सिंह अकेला हो ममरत गजोको मारकर शीघ्र ही भगा देता है "मारी को नहीं है । मिसो मारिन नर्वोपरि और सर्वोत्कृष्ट है । तो भी वह पर्वतपरके आनो फलोको नगम नही है। उसका लाया है ? इसका कारण यही है कि उसके पक्ष (पस ) नहीं है। यद्यपि 111111 र निजीन है । तथापि वह पक्ष वा परोको धारण करनेवाला हे । इलिए अर्थात् नेवल T: HTTो को ना उन पांत नाम के फोको गानेमें समर्थ हो जाता है। अभिप्राय यह हे 9 ? में [ १०६ ] RSSHESHA योजनामा ध्वाक्षश्च शक्तिहीनाढ्यः तथापि पक्षभाक् खलु। स्याददनेषु तेषां च जातिहीनोपि स क्षमः ॥ ६३८ ॥ ह्यस्त्यनतश्च ससारे पक्षः स्यात् यस्य दृश्यते। महत्वत्व च तस्यैव तदृते अमहत्वता ॥ ६३९ ॥ कि फल एक सर्वोत्तम पदार्थ है । उसको पक्षधारी पक्षी ही खा सकते हैं। पक्ष रहित होनेसे सबसे अधिक बलवान सिंह भी उनको नहीं खा सकता। इसी प्रकार मोक्ष भी एक सर्वोत्तम पदार्थ है । उसको वही पा सकता है जिसके भगवान् अरहन्त देवका पक्ष है । जिसके अरहन्त भगवान्का पक्ष नहीं है, उनके वचनोमें जिसका श्रद्धान नहीं है उसे कभी मोक्ष प्राप्त नही हो सकता। इसलिये मोक्ष प्राप्त करनेके लिये भगवान् अरहन्त देवके वचनोंका पक्ष अवश्य रखना चाहिये । भगवान् अरहंत देवके वचनोंका श्रद्धान करना ही मोक्षका मूल कारण है। अथवा समुदाय शक्तिसे जातिहीन मनुष्य अपने ऐसे कार्य निकाल लेते है । जो समुदाय शक्ति रहित उत्तम जाति वालोसे भी नहीं हो सकें । परंतु इसमें बड़प्पन नही है। बड़े-बड़े शक्तिशालियोंको नीचा दिखा देते है ॥ ६३६-६३८॥ अर्थ--हे राजन् ! कलिकालमें इस संसारमें जिसके पक्षमें बहुत-सी संख्या है वह अपना बल प्रकट करेगा, उसका महत्त्व प्रकट होगा । और जिनके पक्षमें संख्या स्वल्प है वे सर्वाग शक्तिशाली होनेपर भी अपना महत्त्व प्रकट नही कर सकेंगे । अपना जैनधर्म यद्यपि संसारमें सर्वोत्कृष्ट है, सर्वोत्तम है, पवित्र है, सदाचारसे परिपूर्ण है परंतु राजाओंका पक्ष न रहनेसे कमजोर हो गया है। इसी प्रकार मुनिवर्गका पक्ष जबसे कम होने लगा तबसे उसका महत्त्व छुपता जाता है । इसलिए जो लोग धर्मका महत्त्व प्रकट करना चाहते हैं उनको धर्म- गुरुओंको आज्ञा शिरोधार्य कर धर्मके रहस्य जाननेवाले सच्चे विद्वान् त्यागियोंकी पक्षमें रहकर अपने धर्मकी रक्षा और वृद्धि करनी चाहिये। जो सुधारक मुनिगण और विद्वानोके सत्य और आगमोचित पक्षको छोड़कर धर्मके बहाने अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं और धर्मकी पवित्रता विधवाविवाह, जाति-पांति लोप और विजातीय विवाह आदि धर्मविरुद्ध कारणोंसे नष्ट करना चाहते हैं उनको विचार करना चाहिए कि इस प्रकार पक्षभेद कर देनेसे धर्मका सत्यानाश ही होगा । समुन्नति नही ॥ ६३९ ॥ Agastrasam-THE-THEPHEPHESHe यस्मर [ १०७ ] । । मित्रकाले च अस्यैव पालका धारका नृपा. । प्रजाः सर्वा द्विजा. सर्वे अतः सर्वपु भो बुधाः ॥ ६४० ॥ उत्तमता च ह्यस्येव अन्यस्य न्यूनता खलु । तदृते ननु विज्ञेय विपरीतस्य कारणम् ।। ६४१ ।। कलौ धर्मप्रकागार्य सर्वलोकस्य साक्षित । नूतना स्थापना लोका. करिष्यति च मायिनः ।। ६४२ ।। केनिच्च द्वेपका मा केचिच्च सेवकाः खलु । एव तस्मिन् भविष्यति कलौ च मगधाधिप ।। ६४३ ।। जैनागमसुाक्येपु ह्यमीपा मगधेश्वर । निश्चयो न भविष्यति सशयाधीनचेतसाम् ।। ६४४ ।। अर्थ- चतुर्थकालमें इस जैनधर्मके प्रतिपालक राजा और ब्राह्मण आदि सभी प्राणी थे। इसलिए इसका उका सर्वत्र अविच्छिन्न रूपसे वजता था ॥ ६४० ॥ अर्थ-यह धर्म सर्वोत्कृष्ट है । त्रिलोक पूजित है । और सर्वमान्य है । और धर्म इस धर्म (जैनधर्म)से मव बातोमे अधम हे। परतु जैनधर्मका पक्ष मुनियोके सदुपदेशके विना समस्त जीवोको मिलना कठिन है। इस- लिए उम जैनधर्म के पालन करनेवालोको संख्या कम हो गई है। इसलिए मुनिधर्म और सच्चे आगमके जानकार विद्वानोको पक्षको एकदम मजबूत बना देना चाहिए जिससे धर्मकी विपरीतता नष्ट हो जाय ॥ ६४१ ॥ अर्थ-रे मगधाविप कलिकालमें मायावी मनुष्य धर्म प्रकाशनके लिये समस्त लोगोको साक्षीसे नूतन स्थापना करेंगे। कितने ही मनुष्य उनके द्वषो हो जायेंगे। और कितने ही सेवक बन जायेंगे ॥ ६४२-६४३॥ अर्थ--हे श्रेणिक महाराज ! सशयमे मन और बुद्धि जिनको भ्रमित हो गई है ऐसे उपर्युक्त मनुष्य भी जिनागमो सत्य-सत्य वचनोका भी निश्चय (श्रद्धान) नही करेंगे ।। ६४४ ॥ 1.मा भोवर ग प्रकार धर्म को स्थापना मायावी लोगोगे कितनी बार हुई है। परंतु दिगम्बर जैन महगियोने REETITउनका हितार ही किया है। जेन गत्या बहाने लोभम उनको अट शिथियानारो गमवाय नकली गीनी मिना । नाहने नगर नव श्वेतावर गध उसान हुआ तब भी दिगम्बर जैन महर्जािगोने उनको FREETरामा । माताती लोगोने लोगो को मंका बहाना बनाकर नवीन चम-अपने म्याको मिद किया। '. ii... मनुको गुEITI और जो गन्ने गर्मानमा ये उन तो गो माना। नी प्रकार बार- HARTI : : मानी गोटि मा गयोगी मागता है। उनके जिनागमकामांचा 4. र गोरो कर भी रेन। पनु उनके का आगमका inाव गरा-निगार भवाना। रायच्या । . -- A + । .
- [ १०८ । -- गथाना पूजका केचित् जिनविबस्य' निंदका । कलो भेदा ह्यनेके च ज्ञातव्या श्रेणिक त्वया ।। ६४५ ।। वसुभूपालवत् स्वस्य मतस्य ते नराः खला । दृढ पक्ष करिष्यति सप्तघावनिदु खदम् ॥ ६४६ ॥ जिनात्तपुरुपाणा च केचिच्छाद्धानिका नरा । खला निदा करिष्यति जिनागमप्रघातका. ॥ ६४७ ।। SEASESSENIHDSUHIE अर्थ-हे श्रेणिक ! कितने ही तो केवल ग्रंथोंके पूजन बन जायँगे। कितने ही जिन बिबोकी पूजा करनेका निषेध करेगे। हे राजन् ! कलिकालमे जैनधर्ममेसे बहुतसे पथ अपने-अपने मनसे असत्य कल्पना कर अनेक प्रकारसे जैनधर्मका रूप बिगाड़गे ॥ ६४५ ॥ अर्थ--हे श्रेणिक महाराज वसु भूपालके समान अपने-अपने मिथ्या मनका हठनाही पक्ष कर सातवें नरक जाने लायक पाप संचय करेंगे ।। ६४६ ॥ भावार्थ-सत्यधर्म (जो अरहंत भगवान्ने कहा है) को दूषण लगाकर ये लोग जैनधर्ममेंसे नवीन धर्म अपने मनकल्पनासे गढ़कर अरहंत भगवान्का कहा हुआ है ऐसी मिथ्या घोषणा करेंगे । और अपने मिथ्यामतके पक्षको दृढ़ करेगे । श्वेतांबर, टूढिया और भी अनेक पंथवालोने इसी प्रकार अपने-अपने मत दिगंबर जैनमत- मेसे निकाल कर बनाये । और कितने ही दुष्ट मनुष्य अब भी ऐसा ही पाप कर रहे है। अर्थ-हे राजन् ! कितने दुष्ट श्रावक अंतरंगसे श्रीजिनागमका घात कर मूलोच्छेद करेंगे परंतु फिर भी अपनेको श्रावक कहला कर जिनात्त पुरुषोकी (मुनियोंकी) अथवा साधर्मी सज्जनोंको निन्दा करेगे ॥ ६४७ ॥ भावार्थ---कितने दुष्ट हृदयके श्रावक मनकी दुष्टता और मिथ्यात्वके तीनोदयसे जिनागमका तो नाश करेंगे हो परंतु जिनागमके अनुसार चलनेवाले मुनिगण तथा भव्य धर्मात्मा श्रावकोको निन्दा भी करेंगे । इस- प्रकार अपने धर्मका मूलोच्छेदन वे स्वयं कर पापके भागी बनेंगे। SHEE Surenाजच्या समयमा SHARESHES १ श्वेताबरो मे से दूढिया जिनविबोकी पूजाका निषेध करते है । दिगवरमे तारण पंथी भी जिनमदिरमे पूजन नही करते । परन्तु दिगम्बर जैनधर्ममे या उसके आगममे अवर्णवाद नही लगाते । जो लोग दिगम्बर जैन भी जैनबिम्बोको पूजन करनेका निषेध करते है इसका कारण उनको आगमके श्रद्धानका अभाव [ १०९ ] पूर्वाचार्यकृता ममिभिषेकादिका क्रियाम् । तस्मिन्नुत्थापयिष्यति ते मूढा पचमोद्भवाः ।।६४८ ॥ नूतना नूतना सर्वां करिष्यति जडाशयाः। ते नराश्च क्रिया भूप स्वस्वमतिविकल्पत. ॥ ६४९ ।। वय श्रद्धानिका य्य मिथ्यात्वपथसेवका । मानयिष्यति ते चित्ते क्रियालेशोज्झिता खलु ।। ६५० ॥ म्वधीकल्पितग्रथान् वै स्वाध्याये पूजनादिके । कार्ये प्रवर्तयिष्यति नो तद्धिते खलाशयाः ॥ ६५१ ।। इत्य जैनेन्द्रधर्मम्य मध्ये भेदोत्करा खलु । तस्मिन्नेव भविष्यति स्वस्वमतविनाशका. ।। ६५२ ।। भवत्येव कलो भेदा प्राक् चतुर्थाच्च निश्चयात् । चेलनाकात वुद्धस्व शमलेशविवजिते ॥ ६५३ ।। अर्थ-हे राजन् पचम कालके श्रावकगण पूर्वाचार्यप्रणीत और तीर्थकर द्वारा प्रतिपादित अभिषेकादि पवित्र आगमोक्त क्रियाका उच्छेद करेंगे ॥ ६४८ ।। अर्थ---हे राजन् । पचम कालके श्रावकगण नवीन-नवीन क्रियायें अपने मनसे गढ़कर करेंगे। और धम मत्य मार्गका लोप करेंगे ।। ६४९ ।। अर्थ-हे राजन् । श्री जिनदेव प्रतिपादित प्राचीन क्रियाओका लोप करनेवाले श्रावकगण अपनेको सम्यग्दप्टो प्रसिद्ध करेंगे । और जो श्री जिनदेवके मार्गपर आगमानुकूल चल रहे हो उनको मिथ्यात्वी बत- लायो । पवित्र क्रियाओका परित्याग करेंगे ।। ६५० ।। जर्म--राजन् । अपने मनको कल्पनासे अपने मतलबके ग्रथ बनाफर उनका ही स्वाध्याय करेंगे, प्रनार करेगा और उन ग्रथोमे हो पूजन आदि धर्मक्रियाओकी प्रवृत्ति करायेंगे। ऐसे लोग आत्महितके लिए कुछ नारी करेंगे ।। ६५१ ॥ ----न प्रकार इस जैनधर्म में अनेक भेद होगे और वे अपने अपने धर्मका नाश करनेवाले हो SANSAREECHE-SmareweHaieve । + THोपित निगमें कल्याणमार्गका सर्वपा अभाव है ऐसे इस कलिकालमें आगामी चौये काल- पाप नवहतने भेर हो जायेंगे ॥ ६९३ ।। भाriग मन में नाम में भी बहुतसे भेद हो जायेंगे जो आत्मकल्याणसे सर्वथा रहित mesamexxyeseseayees cument ? [ ११० ] हुडासपिणि काले हि भवति नो कदाचन । जिनधर्मस्य हानिश्चान्यत्र भो मगधेश्वर ॥ ६५४ ।। चेदृग्विभो । दयाधीश कियत्काले गते सति । आयात्येव तदा चाह त प्रति दिव्यभापया ॥ ६५५ ।। वसुवेदेन्दुसख्याना चतुर्विशतीना गते । हुडको जायते ह्येको तत्त्रयाणा मतश्च स ॥ ६५६ ।। अस्मिन्नेव भवत्येव ह्यनर्था चेलनापते । तीर्थंकरस्य पुत्र्यौ चक्रेश्वरस्यापमानता ।। ६५७ ।। प्रभोर्गाबादप्यधिको दोर्बलेरुच्चता तनो । जेमनार्थं च भ्रमता धराया वृषभस्य वै ।। ६५८ ॥ पदवीधारकाणा च ह्रासोपसर्गमेव च । धार्मिकाणा कलकाश्च सतीनामपमानता ॥ ६५९ ।। स्थापना सिद्धक्षेत्राणा चातिदूराः शिवार्थदा. । जिनशासनयक्षाणा तुच्छाश्चातिशयाः खलु ॥ ६६० ।। मिथ्याशासनदेवाना प्रचार. सघनो ननु । श्रीजिनाधिपबिंबानामपमानः कुमानुजै ॥ ६६१ ।। साधर्मिपुरुपाणा च निंदा ते श्रावका खलाः । करिष्यति कलौ भूय निंदायाः कि फल भवेत् ॥ ६६२ ।। अर्थ-हे राजन् ! यह इतना धर्मका भेदभावका विप्लव हुंडावसर्पिणी कालमें ही होता है। अन्य कालोमे नहीं । इसीलिए इस कालमे जैनधर्मको हानि विशेष होगी ॥ ६५४ ॥ अर्थ-महाराज श्रेणिकने हुंडावसर्पिणी कालको ऐसा दुष्ट सुनकर भगवान्से पूछा कि हे स्वामिन् ! हे वीर प्रभो ! कितने कालके बाद हुन्डावसर्पिणी काल आता है ? तब दिव्य ध्वनिसे भगवान्ने कहा कि १४८ एकसौ अड़तालीस चौवीसी व्यतीत होनेपर एक हुन्डक काल आता है ॥ ६५५ ॥ अर्थ-हे श्रेणिक ! हुन्डक कालके प्रभावसे बड़ी-बड़ी विपरीत बातें इस भरतक्षेत्रमें होगी। महान् अनर्थ होंगे- १. तीर्थंकरोंके पुत्रीका जन्म होना । २. चक्रधरका अपमान होना। ३. प्रभु तीर्थकरके शरीरसे अधिक ऊँचा शरीर बाहुबलि का होना । ४. श्रीवृषभदेवका आहारके लिए षट्मास पर्यंत परिभ्रमण होना । ४. पदवी धारक त्रैषष्ठि शलाका पुरुषोका ह्रास होना। ६. तीर्थकर देवको छद्मस्थ अवस्थामें उपसर्ग होना। ७. धर्मात्मा पुण्यपुरुषोंको कलंकका लगना । ८. सतियोंका अपमान होना । ९. सिद्ध क्षेत्रोंकी अतिशय दूर स्थापना होना। १०. जिनशासन यक्षगणोका अतिशय कम होना । ११. मिथ्या शासन देवोंकी महिमा का बढ़ना । १२. पाखं- डयोकी बढ़वारी होना । १३. श्री जिनबिम्बोंका कुमनुष्योके द्वारा अपमान होना । १४. और श्रावकोके द्वारा ही सत्यमार्गपर जिनागमके अनुकूल चलनेवाले साधर्मी पुरुषोकी निन्दाका होना। १५. जैनधर्ममें भेदभावका होना। - मान्च्याच्या अन्यायमा यमचलता [ १११ ] HIDASTIRement भवति परनिंदाया जाताधा परजन्मनि । मूकाः सदातकमग्नाः कुब्जा दुष्टाश्च कुस्वनाः ॥ ६६३ ।। वविग विकलागाश्च पडा दारिद्रधारकाः । कुरुपा दुःखभोक्तारः पुत्रपौत्रादिवर्जिताः ॥ ६६४ ।। मदा गोकधरा क्रूरा. निर्भाग्या मतिनिदिताः । नराश्चेदृग्विधाः भूप ज्ञानलेशविवर्जिताः ॥ ६६५ ॥ मुन्यादिवर्जिता धर्ममार्गपरान्मुखाः खलाः । गुणमानविहीनागाः परसमनि सेवकाः ।। ६६६ ।। प्रतिपद्दर्शनीवाते म्रियते मगधाधिप । अष्टमैकादशे चैव हायने द्वादशे तथा ॥ ६६७ ।। पोडशे योवने काले अत्रामुत्र धवाश्च ये । जानीहि परनिंदाया. तच्च भो कारण खलु ।। ६६८ ।। समाग्भयभीतैश्च महादु खप्रदायका । यतोहि परिनिंदा च नो कर्तव्या कदाचन ।। ६६९ ।। परदोप न दातव्य मा वक्तव्यमसत्यवाक् । प्रमाद नैव कर्तव्य देवपूजादिकर्ममु ।। ६७० ॥ इत्यादि बहुतसे अनर्थ कालके प्रभावसे इस भरतक्षेत्रमें होंगे। उपयुक्त दिव्यध्वनिके द्वारा सुनकर श्रेणिक महाराजने पूछा कि हे प्रभो श्रावकगण सच्चे धर्मात्माओं को निन्दा करेंगे उसका क्या फल है ? ॥ ६५७-६६२ ।। अर्थ-हे श्रेणिक महाराज जिनागमके अनुकूल चलनेवाले भव्य जीवोकी निन्दा करनेसे पर जन्ममें अंधे, गंगे, बहिर, रोगी, कुबड़े, विकलांग, नपुसक, दरिद्र, कुरूपी, दुःखी, कुटुम्ब परिवार रहित, भाग्यहीन, शोकातुर और ज्ञान रहित होते हैं। वे बड़े भयंकर दुःखोको प्रत्यक्ष प्राप्त करते हैं । उनसे मुनियोंका धर्मपालन नहीं होता। इतनाही नही बल्कि वे धर्ममार्गमे परान्मुख, गुणविहीन, दूसरोके गुलाम होते है ॥६६३-६६६॥ अर्थ-हे श्रेणिक | धर्मात्मा भव्यजीवोको निन्दा करनेवाले प्रतिपद चन्द्रमाके समान शीघ्र ही मरणको प्राप्त होते हैं । अथवा आठ, दश, ग्यारह, बारह और सोलहवें वर्ष जवानी अवस्थामें मरण कर जाते हैं। इम जोक तथा परलोकमें विधर अयना विधवा हो जाते हैं ॥ ६६७-६६८ ।। -उमरिये ममारके बुःगोमे भयभीत पुरुषोको चाहिये कि महान् दुःराको देनेवाली दूसरोकी निन्दा 7 करें। तिलो गरिमा मि-या दाग लगावें । न ठ बनन बोलकर गणोका निलव करें । तथा देवपूजादि माला पमान गरें । मना रर्मात्मा नही है जो निन्दाके भयमे मन्य धर्मका त्याग नहीं करता है। IDEA भी गा मंगे मगन नही होता, वही धर्मात्मा है ।। ६६९-६७० ॥ these । ।
[ ११२ ] 10 । सामाजिक मुना मोगतो परा । रूपयौवनमगन्ना किनिलिदा यते कता।। ६७१ ॥ का पापेत तौर तम्या गारेगाकर । उदबरमहा कुष्ट समुतान्नोतिदुस्सह. ।। ६७२ ।। गाभिना तेग मतप्ता गहाद रोन गा मृता । शुनी न गर्दभा पश्चात्सूकरीत्यादियोनिपु ॥ ६७३ ।। अमितता न गा तन प्राप्याति खराततिम् । जनगमसुता पश्चाज्जाता च दुखभोजका ।। ६७४ ।। म.चेति भो स्थिय मा च नरा गर्मविनाशका । कदापि नैव कर्तव्या सर्वेपा स्वात्मशुद्धये ।। ६७ ॥ कार्यात स्वम्ग निदा भो स्वस्यैव पापघातका । उच्चगोत्र करा नानाशर्मसहतिदायका ।। ६७६ ॥ परनिदासमो लोके धन्यत् पापहि प्राणिना । नास्त्येव तन्न कर्तव्य यदीच्छा शर्मसततेः ।। ६७७ ।। सकलक समापैव सीता शीलगुणान्विता । तद्धि निंदाप्रभावेण मा कुर्वन्तु परस्थ वे ।। ६७८ ।। गलाना सज्जनाना च छत्र भेद प्रदृश्यते । खलेच्छा चेत्तदा कार्या परनिदा ह्यनर्थदा ।। ६७९ ॥ अर्थ--हे श्रेणिक ! सोमशर्मा नामक एक ब्राह्मणको लक्ष्मीमती नामकी पुत्रीने मुनियोकी किंचित् निन्दा फी थी। उस निन्दाके फलसे उसको उसी भवमें भयंकर कुष्टरोग हो गया था। जिससे उसको महान् दुःख प्राप्त हुआ ओर परकोकमें, वह मरकर कुत्ती, गधी, सकरी आदि कुत्सित योनिमें भ्रमण कर महान् दुःखोंको प्राप्त हुई। तथा पीछे वह अनेक दुःखोको भोगनेवाली चांडालकी पुत्री हुई। और किंचित् मुनि निन्दाका इतना महान् कष्ट सहन फरना पडा । इसलिए भव्यजीवों तथा स्त्रियों अपने आत्माको शुद्ध रखनेके लिए धर्म, धर्मायतन, साधर्मी भाई और मुनि आदिको निन्दा कभी भी नहीं करनी चाहिये ॥ ६७१-६७५ ॥ अर्थ--जो अपनेसे पापकर्म अज्ञान या प्रमादसे हो जावे तो उसको दूर करनेके लिए अपनी आत्माकी निन्दा करनी चाहिये। जिससे मोक्ष सुखका प्रदान करनेवाला ऊँच गोत्रका बंध हो ॥ ६७६ ॥ अर्थ-परनिन्दाके समान अन्य कोई पाप नहीं है। इसलिए अपने आत्मकल्याणके लिए या स्वभाव रूपसे भी किसीकी निन्दा नहीं करनी चाहिए ॥ ६७७ ॥ अर्थ-सती शिरोमणी सीताको कलङ्कका योग प्राप्त हुआ इसका मूल कारण पूर्वभवमें गुरु, देव और साधर्मोकी निन्दा है ॥ ६७८ ॥ अर्थ-सज्जन और दुर्जनमें मात्र यही एक भेद है कि सज्जन जन किसीको निन्दा नहीं करते है । और दुर्जन करते हैं । जो सज्जन बनना हो तो निन्दा करना छोड़ देना चाहिए ॥ ६७९ ॥ MPSIHe-one-MESSES weSHOSHeaweSHARE [ ११३ ] nouTETरामाय ये ये दुखाश्च जायंते प्राणिना दु.खदायकाः । ते ते ज्ञेयाः शरीरेषु परनिंदाया भो फलम् ।। ६८० ।। दुर्जनाना स्वभावोय परनिंदनतत्पराः । स्वात्मदोष न जानति ह्यनर्थधारकाश्च ते ।। ६८१ ॥ प्रत्यक्ष येत्र मूढा वै निंदा कुर्वन्ति सर्वदा । ज्ञेयाः श्वपचसा तुल्याः स्वमतस्य क्षयङ्कराः । ६८२ ।। ह्येव सर्वे भविष्यति कलौ भूप न सशयः । स्वचित्ते मानयिष्यति वय श्राद्धानिकाः खलु ॥ ६८३ ।। ग्रन्थलोपज' पापेन ते च श्राद्धानिका खलु । नरकावनौ च यास्यति सर्वहि मगधेश्वर ॥ ६८४ ।। यसरीलाल अर्थ-~-जो-जो दुःख शरीरमें प्राप्त होते हैं वे प्रायः परनिन्दाके फलसे उत्पन्न होते है ॥ ६८० ॥ अर्थ---दुर्जनोका स्वभाव हो निन्दा करनेका होता है। परंतु वे अपने दोषोको नहीं जानते हैं। वे केवल अनर्थ धारण करनेवाले होते हैं ॥ ६८१ ॥ अर्थ--जो मनुष्य सर्वदा साधर्मी भाइयोको निन्दा ही करते रहते हैं, एक प्रकारसे वे प्रत्यक्ष ही चांडालके समान हैं और अपने धर्मका नाश करनेवाले हैं ॥ ६८२ ॥ अर्थ--हे श्रेणिक कलियुगमें ऐसे निन्दक मनुष्य बहुत उत्पन्न होंगे । जो जैनधर्मके धारकोको व जैन- गर्मको निन्दा करेंगे । ओर अपनेको अपने आप ही श्रावक मानेंगे ।। ६८३ ॥ अर्थ--हे मगधेश्वर ! ग्रन्योका लोप करनेके पापसे श्रावकगण अवश्य ही नरक वा निगोदमें नागों ।। ६८४ ॥ समस्या -- १ + - 1 । -- '. it ना मानो बन्यो का ठाT करना है। इसके ममान समारमे अन्य पाप नहीं है। आगमको मत्यता व i. HE TITTI मन पर बोतराग है, विकालो उनकी प्रामाणिकता स्वत.मिद्ध है। जो मनुष्य iiiमिका बना गाना प्रकट कर प्रामाणिना नष्ट करे तो वह आगमला या गन्य का लोपी है। 1. •iri Teो। ऐमा वामे यह मानो इन्द्रिय जनित बुद्धि का हो मुस्मित न और अनु- ... Er. III मिया ममा गोता र पापका भागी बगता है। लिने हा डोगा, जिनमको दागे नमो को मित्रता नमाना नेह, गम जालोग जागवाद नगा र मन : .... नाना नाका जान नीले, आगमता अमान नही है। माने जाप मा .. ""TI:। २ 4 . . 4.* -- T-.- - ३ -- ।
[ ११४ ] यद्वत् वै 'ब्रह्मदत्ताख्य चक्री धर्मस्य लोपनात् । गतो हि सप्तमे श्वभ्रे नानादुःखभयाकिते ॥ ६८५ ॥ न्यायोय लोकमान्य स्यात् यदुक्तं वचनं वरम् । सर्वज्ञाज्ञऽविरुद्ध यन्महता पुरुपेण वै ।। ६८६ ॥ यदुक्तं वीतरागेण प्रोक्त गणधरादिभि । मर्यादायाश्च ग्रथेषु तदेव सधृता खलु ॥ ६८७ ।। यत्याचारक्रियाः सर्वाः श्रावकाणा क्रियास्तथा। पूजास्नानक्रियाश्चैव नानाशर्मप्रदायका ॥ ६८८ ।। भद्रबाहुर्माघनदी पूर्वाशधारको यमी । महापुराणकर्ता च जिनसेन ऋपीश्वर || ६८९ ।। सुरायॊ गुणभद्रो वै तत्पट्टाब्जदिवाकर । सकलागमवेत्ता च मारवारणकेसरी ।। ६९० ।। सीमधरजिनेन्द्रस्य दर्शकः सयताग्रणी । नाम्ना श्रीकुदकु दो वै जिनधर्मप्रकाशकः ।। ६९१ ॥ वसुनंदी तथा धीर. सकलकोतिर्धर्मभाक् । शुभचद्रो गुणैः पूर्णो मिथ्यामार्गविघातक || ६९२ ॥ इत्याद्यैर्वरयोगीन्द्र दिशावासोधरै. वरैः । पूज्यैश्च लेखसंदोहे फलादिगुणधारक. ।। ६९३ ।। जयरामराम रासरन्यायालयाच्या PATAमरमर अर्थ-जैसे ब्रह्मदत्त नामके चक्रवर्तीने जिनागमको असत्य ठहराकर जिनागमका लोप किया था तो वह पापके फलसे मरकर अनेक दुखोसे परिपूर्ण ऐसे सातवें नरकमें प्राप्त हुआ ॥ ६८५ ॥ अर्थ-यह एक साधारण न्याय है कि संसारमे लोगोको वे ही वचन माननीय होते हैं जो किसी महापुरुषके द्वारा सर्वज्ञदेवकी आज्ञाके अविरुद्ध कहे जाते । सर्वज्ञदेवकी आज्ञाके विरुद्ध वचन कभी मान्य नहीं होते ॥ ६८६॥ अर्थ--जो सर्वज्ञ वीतराग अरहंत भगवान्ने कहा हो और गणधरादि देवोंने प्रतिपादित किया हो तदनुकूल हो आचार्य परंपरासे उन सर्वज्ञदेवकी मर्यादाको कायम रखनेवाले ही ग्रथ भव्य जीवोको मान्य करना चाहिये। ऐसे आचार्य भद्रबाहु, माघनंदी, महापुरागके कर्ता जिनसेन, कुंदकुंद, सकलकीति आदि अनेकों हुए हैं । ये सर्व धर्मके प्रकाश करनेमें अत्यंत उद्यमी थे, इन्होने मुनियोके आचरण निरूपण करनेवाले अनेक मन्मालामालयाच्या १. धर्मरहस्य सुलोचना आदि ग्रन्थ, आगम ग्रन्थोका लोप करनेके अभिप्रायसे बनाये जा रहे है । धर्म रहस्यके कर्ता तो मिथ्या- दर्शनके प्रभावसे जैनधर्मसे बहिभूत हैं । उनको ज्ञानमे रजस्वला स्त्रो जिनमदिर जा सकती हैं। डेढ और भगोके साथ खाना पीना आदि तथा विधवाविवाह (व्यभिचार) आदि धर्मविरुद्ध आचरणोको धर्मरूप कहलवानेके लिए महावीर स्वामी तथा गौतम गणधर- का संबंध जोड़ा गया है । यह भी आगममे अवर्णवाद लगाकर आगमका लोप करना है।
[ ११५ ] जिनधर्मप्रकाशार्थ मानमायाविवर्जितैः । भो बुधा जिनधर्मस्य वर्द्धनककृतोद्यमैः ।। ६९४ ॥ तक्रियोत्थापका. किन्न यास्यति ये च सप्तसु । श्वभ्रेषु दुःखपूर्णेपु नराः कापट्यपूरिताः ॥ ६९५ ।। सम्यग्दृष्टेरिद लक्ष्म यदुक्त ग्रथकारकैः । वाक्यं तदेव मान्य स्यात् ग्रंथवाक्यं न लघयेत् ॥ ६९६ ।। अतः श्राद्धानिका यूय स्वकल्पोक्तमधकरम् । त्यक्त्वा ग्रथेषु यत्प्रोक्त कुर्वीध्व शिवप्राप्तये ॥ ६९७ ।। ये मूढा जैनवाक्य हि त्यक्त्वा स्वमतिकल्पतः। चलंति तेहि धर्मना धर्मबाह्या मता बुधैः ॥ ६९७ ।। प्रभोर्वाक्यप्रलोपेन ते मूढा मानसयुता. । यास्यति वै निकोतेपु नानादु.खाकरेषु च ।। ६९९ ।। ग्रन्य बनाये हैं । तथा श्रावकोके आचरणोका निरूपण करनेवाले तथा कल्याण करनेवाले पूजा, अभिषेक आदि को क्रियाएँ बतलाई हैं । क्रियाओको जो कपटी मनुष्य उठा देना चाहते हैं, उन क्रियाओंका लोप करना चाहते हैं वे अवश्य ही दुःखोसे भरे हुए नरकोमें प्राप्त होगे ॥ ६८७-६९५ ॥ अर्थ--सम्यग्दृष्टीका यही एक लक्षण है कि जिसको श्री जिनेन्द्र देवके आगमका श्रद्धान है । आगमके एक अक्षर को भी जो अपनी बुद्धिसे मिथ्या नही ठहराता, न मनमें भी ऐसी भावना रखता है और न मलिन तर्फ व हठाग्रहसे जिनागमविरुद्ध पदार्थोके स्वरूपको सत्य मानता है वही सम्यग्दृष्टी है। जिसके ऐसा आगम- का दुइ श्रद्धान नहीं है उसके सर्वज्ञ प्रभुका भी यथार्थ श्रद्धान नही है इसलिये ग्रन्थोके वचनोको अमान्यता मिथ्यात्महे ।। ६९६ ॥ अयं--इसलिये भव्य श्रावकोको चाहिये कि आगम ग्रन्योको हो मान्य कर श्रद्धान करें । और कपोल गत वचनोपर अदाभाव न रखें। यही सम्यग्दृप्टोका लक्षण है । उससे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है । अन्यथा बन गंगार है।। ६९७ ।। --जो मापं अपनी बुद्धि को कल्पना मात्रते भगवान् जिनेन्द्र देवके कहे हुए वचनोका उल्लंघन करने के निमार कियाऐं नहीं करते वे धर्मको नाश करने वाले धर्मसे बहिप्कृत समझे जाते हैं ऐसा fami। विप्राय यह कि जेन यमके वचनोका उल्लंघन करना धर्मका नाश ही करना है । इस- ! ITI ननोका जान कभी नहीं करना चाहिये ॥ ६९८ ।। -~-मोमिना भगवान्के वचनोका लोग फरनेसे जीव निगोद राशिमे प्राप्त होकर महान् दुगको SHESAESTHE-HEIHIDIHEIHeaHEREME-- । - । [ ११६ ] न्या ज्यालयमा जनरामाययययन जापरं शृणु भूप पठनीय विभो पुर । स्तवन तद्गुणप्राप्त्ये तद्गुणेमंडित वरम् ।। ७०० ।। प्रमो स्तवनगाठेन मर्वाहा दुखदायका । तत्क्षणात् प्रलय या त नागा. खगेश्वरेक्षणात् ।। ७०१ ।। निभा गुणानुवादाढ्य नानाशर्मप्रदायकम् । पठतु सर्वदा भव्या स्तवन ह्यवरोधकम् ॥ ७०२ ।। कर्तव्या गानविद्या च मनोमोदाप्तये खलु। प्रभो. पुरो वर्धनित्य दुखदावाग्निवारिदा ॥ ७०३ ।। नृत्य गान जिनम्यागे ये कुर्वति नरोत्तमा । तेपा पुरो दिवि लेखा करिष्यति सदा मुदा ।। ७०४ ।। गानविद्याप्रभावेण चित्तरोधश्च जायते । चित्तरोधात् शुभ ध्यान ध्यानाद्धि परम पदम् ।। ७०५ ।। मत्त्वैव जिननायागे भो बुधा स्वात्मशुद्धये । स्तवन तद्गुणैर्युक्त प्रपठन्तु त्रिशुद्धितः ॥ ७०६ ।। अर्थ--हे राजन् ! अब भगवान्के समक्ष प्रभुके गुणानुवाद नामकी क्रियाको कहता हूँ। जो मनुष्य भगवान्के समक्ष प्रभुके गुणोंका स्तवनो द्वारा गुणगान करता है वह प्रभुके गुणोको प्राप्त होता है ॥ ७०० ॥ अर्थ--प्रभुके गुणोके स्तवन, पठन-पाठन आदि करनेसे दुखदायक समस्त पापोंका नाश होता है । तथा देव, विद्याधर आदि सब दुष्ट क्षणभरमें नष्ट हो जाते है ॥ ७०१ ।। अर्थ-प्रभुके गुणानुवाद करनेसे अनेक सुख प्राप्त होते हे इसलिये भव्य जीवोंको भगवान्का स्तवन अवश्य ही करना चाहिये ।। ७०२ ।। अर्थ---दुखःरूपी दावानलको बुझानेके लिये बादलोंके समान प्रभुके गुणोंका गान संगीत और वाद्यघोष आदि सब नित्य ही करना चाहिये जिससे मनको प्रसन्नता हो ॥ ७०३ ॥ अर्थ--जो भव्य जीव भगवान के सामने नृत्य गान और संगीत आदि भाव भक्तिसे करते है उनका गान देवोंसे होता है ॥ ७०४ ॥ अर्थ---गान विद्यासे भगवान के गुणोंमें चित्त संलग्न होता है। गुणोंमें चित्त संलग्न होनेसे शुभ ध्यान होता है और,शुभ ध्यानसे परम पद प्राप्त होता है ॥ ७०५ ॥ अर्थ--इसलिए भव्यजीवोको अपनी स्वात्माकी विशुद्धिके लिए प्रभुके गुणोंका गान अनेक प्रकारके स्तोत्रो द्वारा मन, वचन, कायकी शुद्धिपूर्वक करना चाहिये ॥ ७०६ ॥ याच्या [ ११७ ] RELATEKजय गावाह पाठकाना क्षयमपि स्तवनस्यैव तस्य सुभक्त्या । दुःखाना दानदक्ष सकलसुखहर श्रीजिनेशैः प्रहेयम् ॥७०७।। पापाना घातनाथं नरखचरपते श्रीजिनस्य प्रधीरा । यात्येवातः सदा वै शिवसुखसदनप्राप्तये तत् पठतु ||७०८।। जपाभिधा क्रिया वच्मि शिवशर्मकरा वराम् । अतस्थिताघवृन्दाना नाशका त्व शृणु मुदा ।। ७०९ ।। ॐ नम अहंदुद्भ्यो नमः ॐ सिद्धेभ्यो नमोस्तु वै । आचार्येभ्य पाठकेभ्यः साधुभ्य. सर्वदा नमः ।। ७१० ।। ह्री श्री क्ली भगवति सरस्वतिदेव्यै नमः। श्रीजैनधर्माय सदा नमोस्तु स । सदा मे हृदि तिष्ठतु ।। ॐ ह्री श्रीवृपभादिवर्धमानाततीर्थंकरेभ्यो नमोस्तु चित्तकल्मपहानये । ॐ ह्री श्री सप्तद्धिमडितगात्रा. तुर्यज्ञानालकृताः प्रभूणा सन्निधौ यौवराज्यपदस्था वृषभसेनादिगौतमातगणधराः अयानमार अर्थ-~जो पुरुष भक्तिपूर्वक श्री अरहंत भगवान्के स्तोत्रोका पाठ करते हैं उनके दुःख देनेमें चतुर समस्त सुखोको नाश करनेवाले और श्रीजिनेन्द्र देव द्वारा सर्वथा त्याज्य ऐसे शरीरसंबंधी समस्त पाप दूर हो जाते हैं । इसलिये भव्यजीवोको अपने समस्त पाप दूर करनेके लिये देव विद्याधरोके स्वामी भगवान जिनेन्द्र देवका मोक्ष मुस देनेवाला स्तात्र सदा पढते रहना चाहिये ॥ ७०७-७०८ ॥ अर्य---अब आगे जप क्रियाको कहता हूँ। जिससे भव्यजीवोको सुख प्राप्त होता है और समस्त पापोका नाश होता है। उसकी हे राजन, । श्रवण कर ॥ ७०९ ।। मयं--ॐ नमः अहंद्भ्यः । ॐ नमः सिद्धेभ्यः । ॐ नमः आचार्येभ्यः । ॐ नमः पाठकेभ्यः । ॐ नम. गमायुभ्यः । ये पन परमेष्ठोके वाचक मंत्र हैं ॥ ७१० ॥ --ॐ ली श्री ली भगवति सरस्वतिदेव्यै नमः । श्रीजैनधर्माय सदा नमोस्तु सः । सदा मे हुदि नियन । र नानी मार है। -- गोपाभाविवमानांततीर्थगरेभ्यो नमोस्तु चित्ताल्मपहानये । श्रीवृषभादि महावीरपर्यंत कोयोग गनिमगार हो। --गेर मान लियोने मुशोभिन है, जो नार ज्ञानके धारक है, भगवान, अरहत देवके सा मा ITEM गतमान है, जो समस्त पापोको नाश करनेवाले हैं, वीतराग अवस्थाको -- [ ११८ ] सकलाहोनाशकाः श्रीवीतरागप्रकाशका स्वात्मतेजगा जितदिवाकरा महासारयुक्ता. स्मरमातगकठीरवसदृशा प्रचण्डमोहनगपवि- तुल्याः इत्यादि अनेकगुणधारकेभ्यो नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु । जिनधर्मधारकेभ्यो हतकर्मकलकरजोभ्य. सदा नमोस्तु । श्री जैनधर्मो जयतु । ॐ सम्यग्दर्शनाय नम । ॐ सम्यग्ज्ञानाय नम । ॐ सम्यक्चारित्राय नमः । वय एते मे हृदि तिष्ठन्तु । ओ ह्री आदिधर्मप्रकाश काय श्रीवृपभनाथाय जिनेन्द्राय नमोस्तु । श्रीवीतरागाय नम । समस्तकमरहिताय श्रीमते महावीरजिनेश्वराय सदा नम. । ओ ह्री पचपरमेष्ठिभ्यो नम । wambaziu mallu SaSheets THHTHG मस्या प्रकाशित करनेवाले है, अपने आत्माके तेजसे सूर्यको भी जीतने वाले है, संसारमें सारभूत वीतरागता सहित है, कामदेवरूपी हाथीके लिए जो केशरी सिंहके समान है, प्रचंड मोहनीय कर्मरूपी पर्वतके लिये जो वज्रके समान हैं इत्यादि और भी अनेक गुणोंसे सुशोभित ऐसे वृषभसेनसे आदि लेकर गौतम पर्यंत गणधर देवोंके लिये मै तीन बार नमस्कार करता हूँ। अर्थ--भगवान् अरहंत देवके कहे हुए धर्मके धारण करनेवाले और कर्मरूपी कलङ्कको नाश करनेवाले श्री अरहन्त भगवानमें लीन ऐसे गणधर देवोको मै सदा नमस्कार करता अर्थ--श्री जैनधर्मकी जय । ॐ सम्यग्दर्शनको नमस्कार हो, ॐ सम्यग्ज्ञानको नमस्कार हो, ॐ सम्यक्- चारित्रको नमस्कार हो । ये तीनों मेरे हृदयमें सदा विराजमान रहें। अर्थ--इस अवसर्पिणी कालके प्रारंभमें सबसे पहले धर्मका स्वरूप प्रकाशित करनेवाले श्रीवृषभनाथ जिनेन्द्र देवको बार-बार नमस्कार हो । अर्थ--श्रीवीतरागाय नम:-श्री वीतराग परम देवको नमस्कार हो । अर्थ-समस्त कर्मोंसे रहित अंतरंग बहिरग लक्ष्मीसे सुशोभित ऐसे जिनेन्द्र श्री महावीर स्वामीको नमस्कार हो। अर्थ-ॐ ह्रीं पंच परमेष्ठियोंको नमस्कार हो । BAHI-H- ना ओ ही सर्वसिद्धान्तेभ्यो नमः । ओ श्रीसीमधरप्रत्यक्षदर्शनप्राप्ताय भव्यान्जमातंडसदृगाय मारवारणकेशरितुल्याय नरामरपूज्यपादाब्जाय मिथ्यात्वतमोविव- स्वत्तुल्याय श्रीकुन्दकुन्दयतोश्वराय दिगाम्बरधारकाय सदा नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु । हा-AMRESSweeurmers अर्थ---ओ ही समस्त सिद्धान्तोंको मै नमस्कार करता हूँ। अर्थ--जिन्होने श्री सीमंधर स्वामोका प्रत्यक्ष दर्शन किया है, जो भव्यरूपी कमलोंके लिए सूर्यके समान है, कामदेवरूपी हाथीको वश करनेके लिए केशरी सिंहके समान है। देव, विद्याधर, मनुष्य आदि सब जिनके चरणकमलोकी पूजा करते हैं, जो मिथ्यात्वरूपी अधकारको नाश करनेके लिए सूर्यके समान हैं और जो केवल दिशाम्पो वस्त्रोको धारण करनेवाले अर्थात् दिगम्बर हे ऐसे श्री मुनिराज कुन्दकुन्द स्वामीको मैं बार- बार नमस्कार करता हूँ। HIR-यमस्मता मन गुलवामन पनि ये मनगज नरोत्तमाः । भजति ते चतुर्थ च ह्यष्टोतरशतप्रमम् ॥ १ ।। तामा महाकाले दुग्गे २म वर । परमेष्ठिमत्रराज जपतु शुद्धभावतः ।। २ ।। वा करनेताल महागानने क्षमम् । मनगजगम न म्याद्वि मकलावती ।।३।। एता पी गिराये कालाला खुशोत्तमे । पमादे नेव नेतव्या मराजादृते खल ।। ।। iii. जपमान सिनोमव । महलसमन्याव्य नानादु खविनायकम् ॥ ५ ॥ 1 उग पोर मागी जगन्नम् । पगुनमा मनास्ते हि विन्छगतिवजिता ॥६॥ r--- मयतोत्र मोकार मतको ३ वाममें जपता है तथा इमो प्रकार एकमो आठ बार जपता "T: ताट मोर को प्राप्त होता है। णमो अरहताण, गमो सिद्धाण-~-यह प्रथम श्वासोच्छ्वाममें, नमो नाri, Tो पालापाग-ह दिनीय शानोन्यागमे, मो लोए सबमाहूग-यह तृतीय श्वासो- नायो ! ग पनपरमेठी पाच मराजा ना दु:7 सुप सब समय में मानो रो। गो गमन प्रकार के पाप नलगामें पिजीन हो जाते हैं और गवं प्रकारको ' + [ १२० ] - कुरुध्व मोक्षप्राप्त्यर्थं जाप मत्रस्य भो बुधाः। शक्त्यनुसारत शुद्धया मत्वेति शिवदायक ॥ ७ ॥ मत्र दुर्गतिनाशक ह्यघहर जैनेन्द्रवक्रोद्भवम्, दु खातकविनाशक मुनिनुत स्वर्गापवर्गप्रदम् । मसारातपघातने पयसम नानद्धिसपादकम्, त्यवत्वान्य बुधसत्तमा ह्यनुदिन चेम जपध्व खलु ॥ ८ ॥ ध्यानकी विधि ध्यानाख्या वच्मि हे भव्य क्रिया सकलदुखापहम् । यत्सम नापर धर्म गृहस्थाना जिनागमे ।। ९ ।। पद्मासनेन सस्थित्वा त्यक्त्वा सर्वविकल्पकम् । एकाते शुद्धभूमौ च सन्निधौ वा प्रभो मुदा ॥ १० ॥ per murampampamegkemewasheguamegmegmegmegmegmegnese सिद्धि स्वयमेव प्राप्त हो जाती है। इसके बिना अपने जीवनकी एक घड़ी भी व्यर्थ कभी मत खोओ। इस मंत्रके समान संसारभरमें अन्य कोई मंत्र नहीं है ॥ १-७॥ metuma अर्थ-जप क्रियाको बतलाकर अब ध्यान क्रियाका स्वरूप बतलाते है। ध्यानके समान समस्त प्रकार सुखोंको प्राप्त करनेवाला और दुःखोंका नाश करनेवाला अन्य कोई धर्म नहीं है ॥ ८ ॥ अर्थ--इसलिये हे भव्य जीवों भगवान् जिनेन्द्र देवके कहे हुए तथा समस्त दुःखोंको दूर करनेवाले ऐसे मंत्रोंको हजारोंको संख्यामे जप करो। जो मनुष्य समस्त संसार द्वारा पूज्य ऐसे मंत्रराजका (नमस्कार मंत्रका) जप नहीं करते हैं वे बुद्धिहीन तथा पूछ रहित पशुओंके समान हैं । हे विद्वानों यह नमस्कार मंत्रका जप मोक्ष देनेवाला है इसलिये मोक्षकी प्राप्तिके लिये अपनी शक्तिके अनुसार शुद्ध भावोसे इसका जप अवश्य करो। यह भगवान् जिनेन्द्र देवका कहा हुआ नमस्कार मंत्र समस्त दुर्गतियोंको दूर करनेवाला है, पापोंका नाश करनेवाला है, रोग और दुःखोंको दूर करनेवाला है, मुनिराज भी इसको नमस्कार करते हैं, यह स्वर्गमोक्षके सुख देनेवाला है, संसाररूपी अग्निको शांत करनेके लिये मेघके समान है, और अनेक ऋद्धियोंको देनेवाला है, इसलिये हे विद्वानों ! अन्य सब मंत्रोंको छोड़कर प्रतिदिन इस मंत्रका जप करो ॥ ९ ॥ अर्थ--सर्वांग शुद्ध होकर मन, वचन, कायकी सर्व प्रकारको शल्य मिटाकर, स्वस्थचित्त होकर, समस्त THel समयमsanil [ १२१ ] मानस्तभादिस्तूपाता सभाद्वादशमडिताम् । सर्वा समवसरणस्य रचना देवजा खलु ।। ११ ।। चिंतनीय विधा शुद्धया चित्तकल्मपहानये । ततः शास्त्रानुसारेण पश्चात् सिद्धपदाप्तये ।। १२ ॥ गधकुटयुपरिसस्थे तप्तहाटकनिर्मिते । सिंहासने निरौपम्ये सुराचलसमुन्नते ।। १३ ॥ तस्योपरि निरीपम्य सर्ववाधाविवर्जित । सर्वदेवाधिदेव च वृपभादिजिनेश्वरम् ।। १४ ।। तुयाँगुलमूर्ध्वस्थ तस्मादपि प्रभावत' । निर्जरेन्द्रोरगेन्द्रायं वेदर्तुचामरैर्युतम् ।। १५ ।। वमु वै प्रातिहाकि तुर्यास्यभूपित वरम् । मेघवद् गर्जनायुक्त सप्ततत्वप्रकाशकम् ॥ १६ ।। अनतमहिमोपेत च यतीश्वरनमस्कृतम् । मदचद्रमहादोपवर्जिताग विवोधकम् ॥ १७ ॥ मौम्यरूप दयारूप वासाभरणजितम् । विभय निर्विकार च मानमाया विवर्जितम् ॥ १८ ॥ विमोह सर्वलोकेश पूज्यपाद निरजन । तारक सर्वजीवाना सर्वजीवाभयकरम् ॥ १९ ॥ समस्यमय प्रकारको चिन्ताओको छोड़कर और संकल्प-विकल्पोका सर्वथा त्याग कर, निराकुल होकर, निराबाध स्थानमें पवित्रताके साथ पवित्र भावोसे पद्मासनपूर्वक ध्यान करनेके लिये स्थिर चित्तसे बैठना चाहिए । अथवा अरहंत प्रभुके ममक्ष ध्यान करना चाहिये ॥ १० ॥ अर्थ--सबसे पहले मानस्तभसे लेकर स्तूपपर्यंत समवशरणको देव रचित सब शोभाका चिन्तवन करे, फिर सिद्धपद प्राप्त करने और मब पापोंको दूर करनेके लिये शास्त्रानुसार श्रीमंडपका चिन्तवन करे । मध्यमें एक गफुटी उसपर मेरु पर्वतके समान उपमारहित सुवर्णमय सिंहासन है । उसपर चार अंगुल ऊपर अवर सब उपमानोगे रहित तथा बाधाओसे रहित भगवान् वृषभदेव विराजमान है । देव, विद्याधर, इन्द्र, नागेंद्र सब उनको पता कर रहे हैं। नौसठ नमर उनपर दुल रहे हैं। आठ प्रातिहार्य शोभायमान हैं। चारो ओर चार मुख शोभाय- गाई। मेषको गांना गमान जिनको दिव्यध्वनि सिर रही है । जो सातो तत्त्वोको प्रकाशित कर रहे हैं। ना महिमा गंयुक्त विराजमान हैं, मय मुनिराज जिनको नमस्कार करते हैं, जो अठारह दोपोसे रहित हैं, Ti IIT, गोमय है, यामय हैं, वस्त्राभरण रहित हैं, निर्भय हैं, निर्विकार है, मान-मायासे रहित हैं, मो. नी कोको व्यामो है, पगपाद है, घातिया कमोमे रहित है, मव जोवो को पार कर देनेवाले, at in firin नेगी, ममन्न 'कमंम्पो अग्नि को शांत करने के लिये मेघ के समान, शुद्ध और मोक्षमार्गको १ [ १२२ ] PareSHRESTHEASw कुरुथ HCOM मात्य रायरल ईदृश ह्यात्मनि भव्याः सर्वकर्माग्निमेघदम् । शिवमार्गकर शुद्धं चिंतयतु दिन प्रति ॥ २० ॥ अनेन ध्यानयोगेन सर्वांहो दुःखदायकम् । तत्क्षणात् प्रलय याति ध्यानिना वज्रतो नगाः ।। २१ ॥ सकलभव्या भावतश्चात्मशुद्धय, परमरसयुताना ध्यानमानदरूपम् । शिवयुवतिविलासादायक धीरध्येय, सकलकलुपवन्हेः मेघपुष्पोपम वे ।। २२ ।। षष्ठी च क्रिया वक्ष्येह महदानददायकाम् । यत्प्रसादात्तरंत्येव सर्वे जीवा भवात् खलु ॥ २३ ।। वीतरागमुखोद्गीतान् ग्रथितान् मुनिनायके. । ख्यातपूजाव्यतिकातचित्तैर्मायाविवर्जितैः ।। २४ ।। त्यक्तलोभैदिशावासोधरैर्मार्गप्रभावकः। ग्रथान् भव्याः गुरोरास्यात् शृणुध्वमीदृशान् वरान ।। २५ ।। त्रिपष्टिपुरुषाणा च पुराण वा चरित्रकम् । चान्येपा मनुजाना वै श्रोतव्य वासर प्रति ।। २६ ।। प्रगट करनेवाले भगवान् विराजमान है-ऐसा ध्यान प्रतिदिन करना चाहिये। इस प्रकार ध्यान करनेसे जिस प्रकार वज्रसे पर्वत चूर-चूर हो जाते है उसी प्रकार दुःख देनेवाले सब पाप क्षणभरमें नष्ट हो जाते है। यह ध्यान मोक्ष देनेवाला है। समस्त पापरूपी वह्निके लिये मेघके समान है, धीर वीर पुरुष ही इसका चितवन कर सकते है और आत्मरसास्वादियोंके लिये यह आनंद देनेवाला है। ऐसे ध्यानको भी भव्य जीवों शुद्ध भावोंसे प्रतिदिन करो ॥ ११-२२ ॥ अर्थ-गृहस्थोंकी षष्ठी क्रिया स्वाध्याय है। स्वाध्याय सब क्रियाओसे अधिक आनंद प्रदाता है। जिस स्वाध्यायसे प्रसादसे भव्य जीव संसार समुद्रसे पार होते है ।। २३ ॥ स्वाध्यायके ग्रन्थ कैसे होने चाहिये ? अर्थ--जो ग्रन्थ श्रीवीतराग सर्वज्ञ अरहंत भगवान्की दिव्य ध्वनिके हो प्रतिरूप हों और जिनकी रचना मुनीश्वरोने की हो और वह राग-द्वेषके वश या अपनी पूजा प्रतिष्ठा बढानेके लिये नहीं की हो अथवा जो ग्रन्थ स्वार्थ या किसी मतलबके कारण स्वकल्पित बातोंसे न बनाये गये हो जिनमें मात्र एक श्री जिनेन्द्र भगवानकी वाणीको ही रचना हो, मायाचार या लोभसे जिन ग्रन्थोमें दिव्यध्वनिसे विपरीतता न हो, जो जैनधर्मके सत्य स्वरूपको प्रतिपादन करने वाले हो ऐसे ग्रन्थोंका स्वाध्याय गुरुमुखसे ही श्रवण करना चाहिये ॥ २४-२५ ॥ अर्थ-जिन ग्रन्थोंमें त्रिषष्टि शलाका पुरुषोका पवित्र जीवन चरित्र हो । अथवा पुण्यपुरुषोंका आदर्श [ १२३ । reademasR श्रावकाचारग्रथ वे सर्वाचारप्ररूपकम् । गृहस्थैः कर्मनाशार्थ नित्य पापविनाशकं ॥ २७ ।। शास्त्राणा श्रवणात्सर्वा. क्रियाः स्वर्मोक्षसाधिका । जानात्येव ह्यय प्राण्यभिपेकाद्यास्तथा वुधाः ॥ २८ ॥ पात्रापात्रम्य भेद च हेयोपादेयक तथा । मुखामुखस्य भेद वै मार्गामार्गस्य लक्षणम् ॥ २९ ॥ चतुर्वादानभेद च मुनिमागं च तक्रियाम् । सल्लेखनाविधिं सर्वं नाकमोक्षस्य लक्षणम् ।। ३० ॥ सम्यग्दृग्ज्ञानव्रतस्य स्वरूप शिवदायकम् । पुण्यापुण्यस्य भेद हि देवादेवस्य लक्षणम् ॥ ३१ ।। गीलस्वरूप गानमडनम् । परलोकस्वरूप च गुणस्थानादिवर्णनम् ।। ३२ ।। पट्दाजीवनिकायाना लक्षण जीवरक्षण | भक्ष्याभक्ष्यप्रमेद च ह्यात्मरूप सदास्थिरम् ॥ ३३ ॥ H-SHIPewwwes- गयागय तया चरित्र हो। श्रावकाचार और यत्याचारके द्वारा जिनमें गृहस्थोके समस्त आचरणोको आज्ञा प्रतिपादित की हो ॥ २६-२७ ॥ न माया अर्थ--शास्त्रोका स्वाध्याय करनेसे गृहस्थोको पवित्र क्रियाओंका ज्ञान होता है, जिससे विवाह विधि, गानपानका आचरण और अपने समस्त कर्तव्योको धार्मिक समझ कर भव्यजीव उनको आगमके अनुकूल ही रणनेमें अपनी पवित्रता मानते हैं। पट् आवश्यक कर्मोंका परिज्ञान शास्त्र श्रवणसे ही होता है जिससे जिनेन्द्र भगवान के पवित्र अभिषेक विधि, पूजन विधि, जिनयज्ञ विधियोंका स्वरूप सत्य-सत्य जाना जाता है। पार अपान, दान कुदान, पुण्यपाप, हित अहित, कर्तव्य अकर्तव्य, सदाचार दुराचार, मार्ग कुमार्ग, नीति- नीति, मत्य असत्य आदि बातोका सम्यक् परिज्ञान शास्त्र स्वाध्यायसे ही होता है। मुनियोका मार्ग, सल्लेखना विगि क्रिया का ज्ञान भी स्वाध्यायसे ही होता है। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्रका स्वरूप स्वाध्यायसे, जाना ता: ॥ २८-३० ।। --कानयंका पाप भी स्वाध्यायले मालूम होता है और उसके विरुद्ध विधवा विवाह जैसा निधारा पोर भी प्रकारको मलिनता स्वाध्यायने जानी जाती है । TET गुम्नान, जीजम्पया लह काय जीवोफा समूह, जीवोको दया, भक्षाभक्षविचार REY IT मायने सानो जाती हैं।
[ १२४ ] . CAMICE ज्ञानाज्ञानप्रलक्षण । सप्ततत्वस्य च قليله ग्रथ रामesyres विवेकमविवेकत्व भेद कर्मप्रकृतिलक्षणम् ॥ ३४ ॥ बधाबधस्वरूप च चर्चाचर्चादि लक्षणम् । इत्याद्यन्यत्स्वरूप च भव्याभव्यस्य लक्षणम् ।। ३५ ।। पश्यत भो बुधा ह्येतत् प्रभावमागमस्य वै। करस्थरेखावत्सर्वं नथाना श्रवणात् भवेत् ।। ३६ ।। शृणुध्व प्रतिघस्न वै भो भव्या. कल्मपापह । श्रीजिनेन्द्रमुखोत्पन्न ग्रथ वैराग्यदायकम् ॥ ३७ ।। ग्रथान् श्रीजिनवक्रजानघहरान् ससारविध्वसकान्, धर्माचारप्ररूपकान् मुनिनुतान् वद्यान सुरेन्द्रादिभिः । मिथ्यामार्गविघातकान् नरवरै. सेव्यान् शुभान् भो बुधा , ससारातपहानये ह्यनुदिन यूय शृणुध्व खलु ।। ३८ ॥ कौतूहलभृत ब्रह्मचर्यविनाशकम् । वीररसभृताशुद्ध कुकथावातमडितम् ॥ ३९ ।। विवेक और अविवेकका स्वरूप ज्ञान, अज्ञानका स्वरूप सात तत्त्वके भेद और कर्मकी प्रकृतियोके लक्षण बंध अबंधका स्वरूप, भव्य अभव्यका लक्षण आदि अन्य भी वस्तु स्वरूप स्वाध्यायसे जाना जाता है स्वाध्यायसे ही कुशिक्षा और आत्मज्ञान रहित शिक्षाको ज्ञान स्वरूप नहीं जानता और न उसको हितरूप समझता है। ये सब बातें शास्त्रोंके स्वाध्यायसे सत्य-सत्य जानी जाती है । इसलिये श्रीजिनेन्द्र देवके परम पवित्र आगमका ही स्वाध्याय पठन करना चाहिये जिससे पुण्यकी प्राप्ति हो और पाप क्रियाओका परित्याग हो । ग्रंथोंके स्वाध्याय करनेका एक यही अभिप्राय है कि स्वाध्यायके पवित्र ज्ञानसे पापक्रिया और आगम- विरुद्ध विचारोका परित्याग कर आत्माकी वास्तविक उन्नतिका मार्ग शोधन कर आत्मकल्याण करें। न कि संसारको बढ़ाने वाली क्रियायोंका विचार कर अपनेको मोक्षमार्गसे गिरावें। वही ज्ञानी है उसीने शास्त्र स्वाध्यायका लाभ लिया है कि जिसने शास्त्रके स्वाध्यायसे अपने मलिन विचारोको छोड़ दिया है ॥३१-३७॥ अर्थ-अरहंत भगवान्के मुख कमलसे प्रतिपादित ग्रन्थ संसारका नाश करनेवाले हैं, मिथ्यामार्गका नाश करनेवाले हैं, मुनियोंके द्वारा वंद्य है, इन्द्रादिकोके द्वारा पूज्य हैं, सबका कल्याण करनेवाले हैं और सबके द्वारा पूज्य हैं इसलिए भव्य जीवोंको संसारके समस्त दुःख दूर करनेके लिए ऐसे ग्रन्थोका स्वाध्याय प्रतिदिन करना चाहिये ।। ३८ ॥ अर्थ--जिनमें केवल तमाशे भरे हैं, जो ब्रह्मचर्यका नाश करने वाले हैं, वीररससे भरे हैं, अशुद्ध हैं, यहाशमयमाRS SHagmamparegresnegu [ १२५ ] आद्योपातविहीन वे रागमोहविवर्धकम् । निर्दयादिकथावृदकथकं बुद्धिनाशदम् ॥ ४० ॥ कुदानकयक हेयोपादेयवस्तुजितम् । मत्तवत्कथक चैव ससारभ्रमकारणम् ।। ४१ ॥ क्रियाकर्मविहीन च मानक्रोधादिकारणम् । सद्धर्मरसहोन च कुधर्मपथपोपकम् ।। ३२ ॥ दुर्गतेयक हेय बुधैस्तत्वविदाम्बरै । स्वस्वकल्पोक्तितस्तैश्च प्रणीत लोभधारकैः ।। ४३ ।। मो बुधा चेदृश नित्य शिवमार्गकपाटद । कुमार्गवर्द्धक त्याज्य मा शृणुथ कदाप्यहो ।। ४४ ।। धर्मघ्न पापबीज मकलबुधजनेः मन्वहीन विनिंद्य । पापाना बधत सकलसुखहर सर्वदोपै प्रयुक्तम् ॥ ४५ ।। घूर्तर्व यन्च प्रोक्त करणमुखरतैनात्मविद्याविहीनः । निद्य वा मा पठध्व वुधजननिकराश्चेदृश वै कदापि ॥ ४६ ।। प्रतिघन गहम्याना मुकर्तव्या पट्टा क्रिया । जिनागमेहि कथिता शुद्धा पापप्रणाशिका || ४७ ।। पटना दुपातनागार्थ पक्रिया भो बुधोत्तमा । कुर्वीध्व पूर्व कालेहि शिवशर्मकरा वराम् ॥ ४८ ।। TRADIT यमनमायालयाच्या 14 . । कुकथाओमे भरे है, जिनका आदि अंत कुछ नही है, जो राग मोहको बढानेवाले हैं, जिनमें दयारहित जोवोकी कया। भगे हो जो वृद्धिको नाश करने वाले हो, जो कुदानका निरूपण करते हो, जो हेयोपादेय पदार्थोके ज्ञान मे रित हो, जिनमें उन्मत्तपुरपके बचनोके समान सबंधरहित कथन हो, जो ससारको बढाने वाले हो, क्रिया फार्म उपवेशमे रहित हो, क्रोन मानादिके बढाने वाले हो, धर्मके स्वरूपसे रहित हो, अधर्मको पुष्टि करने चाल हो, दुर्गति के देनेवाले रो, तत्त्वज्ञानी विद्वानोके द्वारा त्याज्य हो, जो मोक्षमार्गको रोकनेवाले हो, लोभी पुरगोने अपनी पिनासे बनाये हो ओर मार्गको बढानेवाले हो ऐसे ग्रथ विद्वानोको कभी नही सुनने चाहिये । जो मानामा करने वाले है, पाप कारण हैं, समस्त विद्वानों के द्वारा निद हैं, सत्य रहित हैं, पापबंध करनेवाले ", मा गुणोतो नारा परने बाले है, सब बोगीसे भरपूर है, जो निहा है और आत्मज्ञानसे रहित, इन्द्रिय सुखोम मीन को लोगो के मनाये गए है ऐमे गन्य विद्वानोको कभी नहीं पढना चाहिये ।। ३९-४५ ।। -- लिग गारो करने योग्य ये एक्रियायें जिनागमम कही है, ये पापको नाश करने- क - +- Fi---. और पनदाना पापी प्रकार के पाप नित्य प्रति लगते ह । उनको निवृत्ति- TREETTE Kग पान कराने को गानश्यक पक्रिया अवश्य ही करनी चाहिये ।।४७-४८।।
[ १२६ ] जमरामारामजन्यमान्याच्यामान्य ..~ wwwच्याच्या पापकार्य प्रकुर्वति ये नरा तेऽधमा मताः। सर्वदुःखप्रद हेय धर्मस्य खलु न क्रिया ।। ४९ ।। पट्कार्येण भवेत् पाप तथा धर्मोपि भो बुधा । समत्वता गृहस्थाना भवेता द्वौ यदा खलु ॥ ५० ।। यदहो धर्मकार्योहि वर्द्धत्येव तदा भवेत् । नाकलोकस्य संप्राप्तिः पारपर्यात् शिवस्य वै ॥ ५१ ।। यदहो वद्धता याति तदा प्राप्ति भवेत् खलु । अधोगतेरहो भव्या निकोतस्य ह्यनुक्रमात् ।। ५२ ।। अतो द्वयो फल ज्ञात्वा प्रात काले बुधोत्तमा.। प्रतिघस्राहोनाशाय कुरुध्व पक्रिया वराम् ।। ५३ ।। पकिया ये प्रकुर्वति मतास्ते गृहनायका. । आगमे जिननायेन ते च धर्मप्रभावकाः ।। ५४ ।। अहो श्राद्धानिका यूय कुरुथ षक्रिया वरा । भवता यदि श्रद्धा स्यात् ग्रथाना वै दृगाप्तये ।। ५५ ।। अर्थ---जो मनुष्य पाप कार्यके करनेमे रत हैं, वे अधम है। यह पापकर्म सब तरहके दुःख देनेवाला है इसलिये त्याज्य है । परंतु धर्मकी क्रिया कोई भी त्याज्य नहीं है ॥ ४९ ॥ अर्थ--कृष्यादि षट्कार्यसे पाप ही होता है। धर्म कार्यसे धर्म होता है। तथा गृहस्थोसे दोनो हो सकते हैं इसलिये गृहस्थोंको पापोको दूर करने के लिये धर्मकार्य अवश्य ही करना चाहिये ॥ ५० ॥ अर्थ -जब धर्मक्रियाएं बढ़ती है तब ही स्वर्ग सुख प्राप्त होते हैं और परंपरासे मोक्षकी प्राप्ति होती है ॥ ५१॥ अर्थ-- --जब पापकर्म बढ़ जाते है तब यह जीव अधोगतिको प्राप्त होता है। और अनुक्रमसे निगोद पर्यायको प्राप्त होता है ॥ ५२ ॥ अर्थ--पाप कर्मोंका फल दुःखको प्राप्ति और धर्मक्रियाका फल सुखोंकी प्राप्ति है। इसलिये पाप क्रियाओंका परित्याग कर नित्य ही षट् आवश्यक क्रियाओंको भावपूर्वक करना चाहिये ॥ ५३ ॥ अर्थ--जो भव्य जीव षट् आवश्यक क्रियाओंका पालन भावभक्तिसे नित्य प्रति करते हैं वे सद्गृहस्थ माने गये हैं। जिनेन्द्र भगवान्ने उनको भव्य माना है। और उनसे ही धर्मको प्रभावना होगी ॥ ५४ ।। अर्थ--हे भव्य श्रावक हो ! इसलिये आप षट् आवश्यक क्रियाओंका पालन नित्य ही अपनी शक्तिको न छुपाकर भावभक्तिसे करो जिससे जिनागममें श्रद्धा हो तथा सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हो ॥ ५५ ॥ H STRES म प्रत्यक्ष TowerPSSAIDAmmammer [ १२७ ] पश्यथ यूय सर्वप्रथेषु निश्चयात् । महापुराणचरितश्रावकाचारमुख्येषु ॥ ५६ ।। सर्वत्र वर्णिता श्रीमज्जिनसेनादियोगिभिः। दिशाबरधरैः धीरैः मिथ्यामार्गविघातकैः ॥ ५७ ॥ सर्वत्र वर्णिता. शुद्धा गृहस्थाना क्रिया वराः। पालनार्थ प्रतिदिन ह्यागमे शिवदायका. ॥ ५८ ।। म्नानाद्या कथिता. शुद्धा गृहस्थाना क्रिया वराः । पालनार्थं प्रतिदिन ह्यागमे शिवदायकाः॥ ५९ ।। भवद्भि. केन ग्रन्थेन वक्तव्य खलु लोपिताः । षक्रिया जिननाथेन इमाः प्रोक्ताश्च गेहिना ।। ६० ॥ म्यात् यदि दृढश्रद्धा वै भवतामागमस्य च । कुरुध्वं जिननाथस्य पक्रिया वासरं प्रति ॥ ६१ ।। स्यजध्व हृदयोक्ति च वसुभूपालवत् खलु । ग्रन्थाना लोपनं मूढा मा कुरुध्व मतापहम् ॥ ६२ ।। अर्थ-हे भव्य जीवो ! यह बात सबको प्रत्यक्ष है और ग्रन्थोंसे भी सबको निश्चय है। महापुराण और श्रावकाचार आदि मुख्य ग्रन्योंमें ये क्रियाएँ स्पष्ट बतलाई है ॥ ५६ ॥ अर्थ-ये क्रियायें आगममें सर्वत्र कही हैं। और मिथ्यामार्गको नाश करनेवाले श्रीमज्जिनसेनाचार्य आदि दिगम्बराचार्योने कही हैं ।। ५७ ।। अर्थ-गृहस्थोके लिये आगममें प्रति दिवस करनेके लिये आवश्यक षट् क्रियाएँ प्रतिपादन की हैं। उनमे इस लोकमे सुस ओर परलोकमें सद्गति प्राप्त होती हे और क्रमसे मोक्ष भी होती है ।। ५८ ॥ अर्थ---श्रीमजिनेन्द्र भगवान्को पंचामृत रसोसे अभिषेक पूजा आदि उत्तम क्रियाएँ गृहस्थोको नित्य हो करनी चाहिये निमसे मोक्षके सुसको प्राप्ति हो ॥ ५९ ।। अ-~-जो लोग स्नानादि क्रियाओका निषेध करते हैं उनसे पूछना है कि आपने किन ग्रन्थों में नाना किया का निरोप देना न ? आगममें तो किसी भी ग्रन्यमें निषेध नहीं है। बल्कि समस्त ग्रन्योमें उनका मानता है। जब समस्त गयोमें विधान हे तो फिर लोप क्यों करते हो । भगवान् जिनदेवने का निवाला तोप करना ठीक नहीं है ।। ६० ॥ स्याको नेन आगममे दर अशान है तो जिनवर देव प्रतिपादित पक्रियाओको नित्य प्रति नागिने नानारिणे ॥ ६१ ।। TITTTT पिको हो मत्य मानकर जिनागमका लोग करना वमु राजाके समान दुःसको मलयालमस्या [ १२८ SHESHPAweswPRESHeST योजन्याच्या मतिश्रुतावधिनेत्रधारकाणा च योगिनाम् । गृहस्थधर्मव्याख्यान कुर्वता च विमानिनाम् ।। ६३ ।। तेपा नैव ह्यहो मुर्खा दोषो दृष्ट किमप्यहो। अभिषेकादिसर्वासु क्रियामु विदितेपु वे ॥ ६४ ।। भवता नैव मो मूढा मतिज्ञानादि मद्गुणाः । चाल्पमात्रापि दृश्यते सर्वद्वापरनाशकाः ।। ६५ ।। वक्तव्य केन ज्ञानेन भवद्भि मतिवजिते । किं दृष्टश्न प्रदोपो वै अभिपेकादिपु खलु ।। ६६ ।। दोपः किं स्यात् प्रभो पादलेपने चदनादिभि । दीपस्योद्योतने किं च जिनाकयक्षपूजने ।। ६७ ।। धूपोत्करस्य दहने निशायाः पूजने तथा । जिनात्तपुरुपाणा च वात्सल्ये मार्गवर्द्धके ॥ ६८।। पुष्पोत्करै जिनेन्द्रस्य पादाब्जपूजने खलु । केलाम्रगोस्तनी चान्यत्फलोकरैः प्रपूजने ।। ६९ ।। इत्याद्या या क्रिया सर्वा जिननाथेन वर्णिता । आगमे तत् भवद्भिश्च त्यक्ता भो मूढवुद्धित ॥ ७० ।। प्रदान करने वाला है । इसलिये भव्य जीवोको ग्रन्थका लोप नहीं करना चाहिये ॥ ६२ ॥ अर्थ--मति, श्रुत और अवधिज्ञानके धारक मुनीश्वरोंने गृहस्थधर्मका व्याख्यान करने समय षट्- क्रियाओंका वर्णन किया है । इन षक्रियाओमें उन्हे कोई दोष दिखाई नहीं दिया । इसलिये जो भव्यजीव इन क्रियाओंको नहीं करते है, श्रीजिनेन्द्र भगवान्का अभिषेक नही करते वे मूर्ख हैं ॥ ६३ ॥ अर्थ-हे भोले जीवो आप लोगोमें समस्त संदेहोंको दूर करनेवाले मतिज्ञान आदि सद्गुण थोड़ी मात्रामें भी नहीं हैं फिर आप किस आधार पर अभिषेक आदि क्रियाओका निषेध करते हैं ॥ ६४-६५ ।। अर्थ-आप लोग शास्त्रके ज्ञानसे रहित है फिर आप किस ज्ञानसे अभिषेकादि क्रियाओंका निषेध करते है । क्या किसी शास्त्रमें इन क्रिया संबंधी दूषण आपने देखा है ? जो निषेध करते है ॥ ६६ ॥ अर्थ-प्रभुके चरण कमलोंपर चंदनका लेप करना, दोपको चढ़ाना और जिनशासन देवोंको पूजा करना ये सब धार्मिक क्रियायें हैं जिनेन्द्र भगवान्ने कही हैं, निर्दोष हैं ॥ ६७ ॥ अर्थ-रात्रिमें धूपका चढाना, पूजन करना और जिन मुद्राधारक पुरुषोंका मोक्षमार्ग बढ़ानेवाला वात्सल्य करना यह सब क्रिया उत्तम है, निर्दोष है और शास्त्रविहित है ॥ ६८ ॥ अर्थ-इसी प्रकार पुष्पोसे भगवान्के चरणकमलोंको पूजा करनी चाहिये। केला, आम, द्राक्ष आदि उत्तम फलोंसे पूजा करनी चाहिये। इत्यादि समस्त विधि जिनदेवने बतलाई है उसका लोप करना भगवान्- सामान्यायालयाच्या यमर x 2. [ १२९ ] अतो युय जिनेन्द्रस्य आज्ञाध्नाश्च कुमार्गगा । न श्रद्धा नि फला जाता जिनाज्ञालोपतः खलु ॥ ७१ ।। यत्राज्ञान च तत्रापि धर्मलेशोपि नास्ति वै। अतो य्यं कुश्रद्धायाः पालकाश्च न सशयः ॥ ७२ ।। यदि स्यात् दृढश्रद्धा वे भवता तत् वचनस्य च । तदा ह्यगोकुरुध्वं भो स्नपनादिकसत्क्रिया ।। ७३ ।। आख्यापयथ मूढाः कस्याज्ञाया स्नपनादिकाः । यूय त्यक्ताः क्रिया मुख्या ग्रन्थपक्ष प्रदीत ।। ७४ ।। ग्रथानुसारत त्यक्ताः वदध्व च क्रियाः खलाः। इमे यूय तथा किं च स्वमतेः सारतः खलु ।। ७५ ।। जिनाननसमुत्पन्नग्रन्याज्ञा भुवने त्रये। देवेन्द्रा वा नरेन्द्राश्च नागेन्द्राः खचरेश्वराः ।। ७६ ।। मवं ते मानयत्येव निशका निखिलार्थदाम् । मतिश्रुतावधिश्लिष्टशुद्धदृग्धारकाः खलु ।। ७७ ।। क्वचिदपि जिनेन्द्रस्य चाज्ञा ऋते सुरेश्वराः । न कुवंत्यपर कार्य नानाभवप्रदायकम् ।। ७८ ॥ की आजाका लोप करना है। जो मनुष्य भगवान्की आज्ञाका लोप करता है उसके सम्यग्दर्शन नहीं रहता है ।। ७०-७१ ॥ अर्थ-जहांपर अज्ञान है वहाँ धर्मका लेश मात्र भी पालन नहीं है। इसलिये जो लोग इन क्रियाओं- को छोड़ देते हैं वे मिय्या श्रद्धानके पालन करनेवाले समझे जाते हैं ॥ ७२ ॥ अर्थ-जो आपको आगमकी श्रद्धा है तो अभिषेक आदि षट् क्रियाओको स्वीकार करो ॥ ७३ ।। अर्थ-~यह तो बतलाइये कि स्नपन आदि क्रियायें फिसको आज्ञासे आपने छोड़ रखी है ? ऐसा कोई पय है कि निसमें उनका निषेध हो, यदि है तो वह ग्रंय दिखलाइये ॥ ७४ ॥ अयंजो आपने किमी ग्रयके आधारसे समस्त क्रियाओंका परित्याग किया है या अपने ही मनसे ? मनो वान तो ठोक नहीं है और आगम ग्रन्थमें कहींपर निषेध नहीं है । ७५ ॥ ri-गोजिनेन्द्र भगवान के मुखकमलसे प्रकाशित आगम ग्रन्योकी आज्ञा मब तरहकी शंकाओसे रहित 2 और समन तोता वोग करनेवाली है इसलिये तीनो लोकोके देवेन्द्र, नरेन्द्र, विनायर और विद्वान् सभी में नाकामविज्ञान, प्राजान, पिज्ञानको धारण करनेवाले सम्यग्दृष्टो जीव भी इसे स्वीकार भान हाने ।। ७६-७७ ।। -~-inो को मुशार भी उत्लापन नहीं करते हैं ये भी जिनदेव की आजानुमार अपनी GETHEATREAmra , R यजमान्यायालयाच [ १३० ] यूय वदथ भो मा. पारंपत्सिमागताः। भवद्भिरभिषेकाद्याः कथमुत्थापिताः खलु ॥ ७९ ॥ सुरेन्द्राणामवि नैव सामर्थ्य स्यात्कदाचन । जिनाज्ञालोपने मूढाः भवद्भि लोपिताः कथ ॥ ८० ॥ यूय तदधिकाः किं वै अत उत्थापित प्रभोः । वाक्यं सर्वेन्द्रपूज्य च सर्वत्रापि निरकुशम् ॥ ८१ ।। वदध्व पुनः भो मूर्खा ह्यसत्याः स्युरिमाः क्रियाः। सर्वे ग्रथा असत्याः स्यु. सर्वसदेहनाशकाः ।। ८२ ।। युष्माक यदि श्रद्धा स्यात् दृढा जिनागमस्य वै । तदा किं न कुरुध्व भो तत् वाक्यं शिवदायकम् ।। ८३ ।। पक्षपात त्यजध्व च ग्रथपक्ष जगन्नुतम् । यूय श्रद्धानिका नित्य कुरुध्व धर्मसिद्धये ।। ८४ ।। ह्यधुना पचमे काले नो सति भो बुधोत्तमाः। तीर्थंकराः सुरै पूज्याः केवलज्ञानमडिता ।। ८५ ।। puuseumslusens सयराजमारला समस्त क्रिया करते है । परंतु आप लोग परंपरासे प्राप्त और जिनेन्द्र देव द्वारा प्रतिपादित क्रियाओंका लोप क्यों करते है ? जो जिनेन्द्रकी आज्ञाको लोप करनेकी शक्ति देवोंमें नहीं है। मालूम पड़ता है कि आपका ज्ञान देवेन्द्रोंसे भी अधिक है ! इसीलिये देवेन्द्रोंसे पूज्य जिनागमके लोप करनेमें आपकी बुद्धि हो रही है । इस प्रकार की निरंकुश बुद्धि विवेकको नष्ट कर मिथ्यात्वको प्रकाशित करेगी ॥ ७८-८१ ॥ अर्थ -क्या शास्त्रोमे बतलाई हुई क्रियाएँ असत्य है। जो असत्य हैं तो समस्त शास्त्र भी असत्य ठहरेंगे। जिन शास्त्रोंके पढ़नेसे सर्व संदेह नाश होता है और सर्वज्ञ प्रभुकी आज्ञा निरावाध प्राप्त होती है उनको असत्य किस प्रकार माना जाय ॥ ८२ ॥ अर्थ-जो आपकी जिनागममें श्रद्धा है तो उन अभिषेकादि समस्त क्रियाओको स्वीकार करना चाहिये जिससे शिवसुख हो ।। ८३ ।। अर्थ--इसलिये पूजा और अभिषेक आदि क्रियाओंके करनेमें पक्षपातका परित्याग कर देना चाहिये । जगत्मान्य ग्रन्थोका पक्ष करना चाहिये। यदि आप आगमके अनुकूल चलना चाहते हैं तो धर्मकी सिद्धि के लिये क्रियाओंको पालन करो ॥ ८४ ॥ अर्थ-इस पंचम कालमें इस समय देवोंसे पूज्य केवलज्ञान मडित, समोशरण मंडित देवोसे पूज्य चौतीस अतिशय युक्त , अष्टादश दोष रहित, परम वीतराग, ऐसे तीर्थकर प्रभु तो साक्षात् विद्यमान नही हैं । जयपजच pm-SAWASTHe- [ १३१ ] समवसरणशोभामडिता भव्यबोधका. । मित्राग्न्यतिशयैर्युक्ताः पुष्पदतप्रभाधिकाः ॥ ८६ ॥ तेपि सर्वे शिवम्याने गताः शर्माधिभोजकाः। प्रत्यक्ष नैव दृश्यते जिनाश्च केवलेक्षणाः ।। ८७ ॥ नितनार्थ न तेपा वै स्थापना पत्रमे बुधा | धातुपापाणद्रव्येषु मुनिभि. स्थापिताः शुभाः ॥ ८८ ॥ गिलाग्फोटमुहग्नेन घटिता तत्समाश्च वै। पश्चाद्धि तत्प्रतिष्ठा च सभवेद्धि यथाविधि ।। ८९ ।। पानदा पूजया योग्या तन्मूर्ति सकलावनौ। सर्वे भव्या प्रतिघस्र तद्विवस्य तदाप्तये ।। ९० ।। उदकेनुघृतदुग्नेदविसर्वपियादिभि. अभिषेक प्रकुर्वति शुद्धे रवकनदकै. ॥ ९१ ॥ ततचे। सुवागेन तत्तनोजलजान् कणान् । दूरीकृत्य प्रयत्नेन स्थापयित्वा वरासने ।। ९२ ।। तदयहि निवारा च पातयति नगश्च ये | जन्ममृत्युजरानाश कुर्वन्ति ते हि निश्चयात् ॥ ९३ ।। कारमोगगुन्नद्र न यन्यद्गंधोत्कर शुभम् । सघृष्य जिनपादाब्जी लेपनीयौ मनोहरौ । ९४ ।। स्यालयमा - 4 । ये तो चतुर्थकालमें ही मोक्षमें जा विराजे हैं । इसलिये तीर्थकर प्रभुको प्रत्यक्ष पूजा इस समय नही होती है । किन्तु उनके गणोको प्राप्ति के लिये परोक्ष पूजा इस समयकी जाती है । भगवान्का स्वरूप चितवन करनेके लिये तदाकार घातु, पापाण आदिको सुन्दर, शुभ हाथोसे घड़ाई गई मूर्ति निर्माण कर और आगमको विधिसे उमो प्रतिष्ठा करा कर पूजा की जाती हे ॥ ८५-८९ ॥ -भगवान की मूर्तिको परोक्ष पूजा प्रत्यक्ष पूजासे भिन्न होती है । इसलिये परोक्षपूजा उस मूर्तिको जन्य सरग, घी, दूध, दही, सर्वांषधि आदि उत्तम और पवित्र द्रव्योमे की जाती है। यह सनातन विधि प्रोमिने प्रदेशने प्रतिपादन की है और इन्द्रादिक देव इमी विधिसे नंदीश्वरादि द्वीपमें अकृत्रिम जिनविबोका गित करते ॥ १०.११ ।। Hi-फिर भगवान् को उम दिव्य मूर्तिको एक उत्तम सिंहासन पर विराजमान कर मूर्तिके जलकणों- को भागी।। १२ ।। -मार अग्रत सभी नमक्ष भूगार नाली तीन भागको छोडते है ये जन्म, जग और मरण itri ।। १३ ।। ---र, TET, अगर, नगर आदि गुगंगित बन्योतो उत्तम प्रकारने घिसफर श्रीजिनदेयके पवित्र स्न्यिान्न
[ १३२ ]
यमजसारा
भवातापविनाशार्थ
केवलज्ञानधारिभिः । कथित बिंबपूजाया चदनस्य प्रलेपनम् ।। ९५ ।।
जिनपादारविंदाने कर्तव्या भो बधोत्तमाः । पुजाश्चाक्षतवारस्य चाक्षयपुरप्राप्तये ॥ ९६ ॥
कुदाब्जमालतीपुष्पव्रजाश्च मारहानये । जिनपादोपरि भव्या धर्तव्या. कोटवर्जिताः ॥ ९७ ।।
शाल्यन्न मोदक भक्ष्य सर्वं च व्यजनोत्कर । क्षुधातकविनाशार्थ स्थापनीय प्रभोः पुर ।। ९८ ।।
आरातिका प्रकर्तव्या
जिनेन्द्रपदपमयोः । मोहभूपविघातार्थ दीपव्यू हैघृतोद्भवैः ।। ९९ ॥
पावके धूपवृन्दस्य कर्तव्यो दहनो बुधैः । जिनपादाब्जभूम्यग्ने कर्मेन्धनविनाशक ।। १०० ॥
नारिंगाम्र कपित्थाद्यै पूजनोयो जिनेश्वरः । मोक्षफलस्य प्राप्त्यर्थं शर्मसततिदायकम् ।। १०१ ।।
चरण कमलोंका प्रलेपन करना चाहिये। जिससे संसार तापका नाश हो। यह जिनबिम्बपूजाकी विधि संसार
ताप विनाश करनेके लिये केवलज्ञान धारक श्री जिनदेवने बतलाई है ।। ९४-९५ ॥
अर्थ-अरहन्तप्रभुके समक्ष उत्तम अक्षतोके मनोहर पुंज बनाकर चढ़ाना चाहिये। जिससे अक्षयपुर
(मोक्ष स्थान) की प्राप्ति हो ॥ ९६ ॥
अर्थ--मोगरा, कमल, मालती आदि उत्तम और सुवासित शुद्ध निर्जीव फूलोंको प्रभुके चरण कमलोंपर
चढ़ाना चाहिए ।। ९७॥
अर्थ--क्षुधारूपी रोगके विनाशके लिए अरहन्तप्रभुके समक्ष भात, लाडू आदि व्यञ्जन बड़ी भक्तिसे
शुद्धतापूर्वक चढ़ाना चाहिये ॥ ९८ ॥
अर्थ-अरहन्तप्रभुके चरणकमलोंके सामने शुद्ध सुगंधित घोके सुन्दर दीपक जलाकर आरती करनी
चाहिये ॥ ९९ ॥
अर्थ-प्रभु के सामने उत्तम सुगधित धूप अष्टकर्मोके नाश करनेके लिये अग्निमें प्रक्षेपण करना
चाहिये ।। १०० ॥
wauawa utettu reuses
HIG
राजमान्यायमच्यामत
MAHESHI-SHAHMEASHISHI
अर्थ-प्रभुके चरणकमलोको पूजा नारंगी, आम, कपित्य आदि उत्तम फलोसे विधिपूर्वक करनी चाहिये
जिससे मोक्षसुखकी प्राप्ति हो ॥१०१॥
[ १३३ ] mememes भो भव्या विवपूजाया विधिरेव प्रकीर्तितः । जिनागमे यतीन्द्रौघै. यूयं सर्वत्र पश्यथ ॥ १०२ ।। प्रत्यक्ष केवली नास्ति अतस्तत्स्थापना मता | स्थापनाया मता सर्वा. क्रिया:वै स्नपनादिकाः ।। १०३ ।। पश्यय सर्वग्रथेषु बिम्बपूजाविधि पृथक् । केवलज्ञानपूजाया मुरेन्द्राद्यैश्च निर्मित ।। १०४॥ व्यवहारनयापेक्षो गृहस्थाना जिनेश्वरे । विम्बपूजाविधिश्चैव कथित. केवलक्षणे ।। १०५ ।। निश्चयनयतो भव्या चिद्रूपाणा मता खलु । इज्या च सारसिद्धाते प्रोक्ता सकलदर्शिभिः ।। १०६ ॥ मत माक्षात् जिना पूज्याः मुगधीशैश्च तारका । नो सति सत्सभायुक्ता कि विदध्मो वदथ वै ।। १०७ ।। अम्मन् काले महाभीमे तदृते कथिता क्रिया । मुनीश्वरेश्च विवेषु स्नानाद्या भो बुधोत्तमाः ॥ १०८ ॥ दिव्य वनिमयी वाणी वीतगगमुखोद्भवा । साप्यस्मिन् नास्ति भो भव्या सर्वद्वापरखण्डका ॥ १०९ ।। रायायायालयाला :- अर्थ-हे भव्य अरहंत भगवान्के जिनप्रतिमाको परोक्ष पूजाकी विधि संक्षेपसे ऊपर कही हे वह जिना- गममें सर्व ग्रन्यो में मुनीश्वरोने वतलाई है ॥ १०२ ॥ अर्थ-इम पचमकालमें साक्षात् केवली भगवान् विराजमान नही हैं किन्तु केवली भगवान् तीर्थङ्कर प्रभुको प्रतिकृति (स्थापनाबद्ध जिनमूर्तिको ही साक्षात् जिनेन्द्र भगवान् मानकर) में ही समस्त क्रियायें की जाती हैं। । पर स्नपनादि विधि समस्त ग्रथोमें कही है। परोक्ष पूजाको विधि यही परमागममें मानी है। देवेन्द्रोने तिमूर्तिको पूजा विधि इसी प्रकार की है । यह विधि व्यवहार नयको अपेक्षासे आचार्योंने बतलाई है। और जिलेयर देवने प्रतिपादित की है । निश्चयनयसे एक चिद्रूपमें ही लवलीन हो जाना यही पूजा विधि है । ऐसा हो अभिप्राय मागिद्धात नामो ग्रन्यमें कहा है। इसलिए जिन भव्यजीवोने जिनप्रतिमाको पूजाको उनने साक्षात् गिन्न भगवानको पूजा को । देवगणो शक्ति होनेते वे साक्षात् पूजा करते हैं और संसारसमुद्रसे पार होते हैं ऐगो को वितरित अरहन्त भगवान्में है । यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है। परन्तु इस समय साक्षात् अरहन्त नाही है। फिर मनोग मियाय उनको परोक्ष पूजाके और क्या कर सकते हैं ।। १०३.१०७ ।। पग पनमा गाक्षात् अरहन्त केवलोका अभाव होनेसे जिनविवमें हो स्नानादि विधि फर पर triनी नागि। गा आनायांने कहा है ॥ १८ ॥ मासा नोकरालोका अभाव होनेमे नाशात् दिव्ययनिका भी अभाव है जिससे सर्व मदेह - । Ememesese-SeaweTHI राजमा: [ १३४ ] पणेषु जिनसेनाद्यैर्योगीन्द्र सधृता खलु । पारपर्यात्समायाता सा च सर्वत्र विश्रुता ।। ११० ॥ तदा सर्वे गृहस्थाश्न क्रियाकर्मरता परम् । शास्त्राद्धि सर्वप्रत्यक्ष पश्यति सकला. क्रिया ॥ १११ ।। अहो श्राद्धानिका यूय कुरुष्व सकला क्रियाः । साधुमिर्वरयोगीन्द्र. ग्रन्थेषु स्थापिता नतु ॥ ११२ ॥ कालेम्मिचलचित्तकरे मिथ्यात्वपूरिते । नैव दृश्यते योगीन्द्रा महाव्रतधरा वरा. ।। ११३ ।। मतिज्ञानयुता केचित् श्रुतबोधविमण्डिताः। अवधिज्ञानान्विताहि तुर्यबोधान्विता खलु ।। ११४ ।। सत्यस्मिन् नैव ते धीरा मुनय. सूरपूजिताः । ईदृशा ज्ञाननेत्राच्या दिशावासोधरा वरा ॥ ११५ ।। दूर होता था। परंतु पंचमकालमे जिनागम ग्रन्थोमें वह दिव्य-ध्वनि आचार्योकी परंपरासे ग्रथित की है। जिना- गम ग्रंथोमें केवली भगवान्की दिव्य-ध्वनिके सिवाय एक अक्षर मात्र भी स्वकल्पित नही है। न रागद्वेष या प्रतिष्ठा कोत्ति आदिके गौरवसे वीतराग योगियोंने उस दिव्य-ध्वनिमें व्यतिक्रम किया है। इसलिये परमागमके शास्त्र सब दिव्य-ध्वनि रूप ही है । जो प्रामाणिकता, सत्यता और निर्दोषता दिव्यध्वनि की है वही प्रामाणि- कता, सत्यता, निर्दोषता और अबाधता ग्रंथों की है ॥ १०९ ॥ अर्थ-वही दिव्यध्वनि जिनसेनादि आचार्योके द्वारा सम्यक् प्रकारेण धारण कर ग्रन्थ रूप लिखी है तथा सर्वत्र वही सुनी जाती है ॥ ११० ॥ अर्थ-इसलिये सद्गृहस्थोंको चाहिये कि शास्त्रोक्त स्तवन आदि क्रियाओको करें। क्योंकि वे सब बातें शास्त्रमे प्रत्यक्ष है ॥ १११ ॥ अर्थ-हे भव्यजीवो ! साधुओं और श्रेष्ठ योगिन्द्रोंके द्वारा ग्रन्थोंमे लिखित समस्त क्रियाओंका तुम श्रद्धान करो ।। ११२ ॥ अर्थ-इस पंचमकालमें मनुष्योंके मन स्वभावसे ही चपल हो रहे है। मिथ्यात्वसे पूरित हो रहे है। ऐसे समयमे महावतके धारण करनेवाले विरले ही मिलते है । कोई मतिज्ञान श्रुतज्ञान धारक है। अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान है ऐसे महामना मुनीश्वरोंका तो प्रायः अभाव है जिनसे संसारका कल्याण होता था। वे मुनीश्वर कुमार्गपर चलनेवालोंको सुमार्गपर लाते थे। जिनराजकी आज्ञाभंग करनेवालोंको सन्मार्गपर लाते थे और मनमानी करनेवालोको योग्य व्यवस्था कर सन्मार्गपर लाते थे। संघमें बिना दण्डके कभी भी व्यवस्था स्यमयमा [ १३५ ] न्व! 'फालेम्मिन् किं करिष्याम गुरूणा तदृते नराः। लोप वदथ ग्रथेषु कथित यदि क्वापि च ॥ ११६ ।। ईदृश न श्रुत क्वापि गुरुलोप त्र पचमे। कुरुष्व मानयध्व च द्वयो. श्रीजिनशास्त्रयोः॥ ११७ ॥ त्रिकालसर्ववस्तूना वर्णना च कृता जिनैः । भो मा न श्रुत चैव गुरुलोपं च तत्र वे ।। ११८ ॥ SECREमस्या नहीं होती है। राजदण्डसे जैसे अन्याय रुक जाता है इसी प्रकार पंचायतो दण्डसे धर्मविरुद्ध चलनेवालोंको अनीति मिट जाती है ॥ ११३-११५ ॥ अर्थ-यह हुंडक पंचमकाल है। इसमें श्रेष्ठ गुरुओंको नहीं मानने वाले मनुष्य तथा जैन कहलाने बाले न जाने कैसे-कैसे पापी भी उत्पन्न होगे जो स्वयं धर्मवहिभूत होगे और समस्त प्रजाको ग्रन्थोका लोप कर धर्मगहिर्भूत बनायेंगे । कुमार्ग, अन्याय और अत्याचार बढ़ायेंगे। यद्यपि ग्रन्थोमें सदाचारका विधान होगा तो भी ये पापो उसको नहीं मानेंगे और लोगोंमें मिथ्या प्रसिद्धि कर सन्मार्गका लोप करेंगे। ऐसे मनुष्योसे सन्मार्ग प्रकाशक ग्रन्योकी रचना नहीं होगी किंतु व्यभिचार, अन्याय फैलाने वाले ग्रन्थोकी रचना होगी। इसके सिवाय जोग गमोका भी लोग करेंगे, गुरुओको भी नहीं मानेंगे ।। ११६ ॥ -- - पनम कालमे मुनिधर्मका लोप होगा ऐसा किसी भी शास्त्रमें नही है फिर भी ऐसा कहने पाने मागायो । स्योंकि पनम कालके अंततक शुद्ध मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका रहेगे ऐसा जिनागम पाटगे नत जाता है। इसलिये शास्त्र और गुरु दोनोका श्रद्धान करना चाहिये, दोनोको मानना नामि॥ १२७॥ --मानो मजा भगवान ने समस्त पदार्थों का वर्णन किया है उसमें यह भी बतलाया है कि "TR, "77 नगर निवार रहेगा, परतु ऐमा कही भी नहीं सुना, न जिनागममें कहा है कि पंचम- 71 पासो ली गनीदाना 'भार तोगा। परतु मतलयो जितने हो पापी मनुष्य गमओंका लोप inो नियमामाको भो नहीं मानते ११ ॥ . . । । 17715ो Ti, Tोर।
[ १३६ ] MPSCSTHANI श्रद्धास्माकमपि चैषा जानीध्व हृदि भो नरा.। निश्चयस्य नयस्यैव लक्षण तच्च निश्चयात् ।। ११९ ।। अर्हतो नापरो देवो निग्रंथान्नापरो गुरुः। दयातो नापरो धर्मो ह्येतच्छ्रद्धानलक्षणम् ।। १२० ॥ भो मूढा भवता नेव शुद्धसम्यक्त्वकारका । दुर्लभा सापि विज्ञेया कर्मवान् विभजका || १२१ ॥ निश्चयव्यवहारस्य नयस्य यस्य स्यात् खलु । श्रद्धा तस्यैव चोत्पत्ति' सम्यवत्वस्य न सशयः ।। १२२ ।। स्याद्यदि भवता श्रद्धा निश्चयस्यैव निश्चयात् । तहि नमथ पर्णस्थान् किमर्थं वचनापहा ॥ १२३ ।। -runnाजच्या SOSURE जन्मजयाच्याजमा अर्थ--जो सर्वज्ञ कथित आगम और निग्रंथ गुरुका प्रलोप कर केवल मनोक्त कल्पनासे शुद्ध सम्यग्दृष्टी बनते है उनके लिये विचार किया जाता है कि देव, शास्त्र, गुरुके श्रद्धान बिना केवल स्वानुभवसे सम्यग्दर्शन होता है या नहीं ? व्यवहार नयको अतिक्रम कर जो मनुष्य निश्चयनयका अवलंबन लेता है और व्यवहार नयको सर्वथा मानता ही नहीं है उसके निश्चय सम्यग्दर्शन नहीं है किंतु तीव्र मिथ्यात्व है, क्योकि अरहंतके सिवाय अन्य कोई देव नहीं । निग्रंथ दिगम्बर गुरु सिवाय अन्य कोई गुरु नहीं, और अहिंसाधर्म सिवाय अन्य कोई धर्म नहीं है, ऐसे दृढ़ श्रद्धानको सम्यग्दर्शनका लक्षण परमागममें बतलाया है। जिसके इस प्रकार श्रद्धान नहीं है वह सम्यग्दृष्टी नहीं है, मिथ्यादृष्टी है । क्योकि यह परमागमका सुदृढ नियम है कि जिसके देव, शास्त्र, गुरुका दृढ़ श्रद्धान होता है उसीके निश्चय सम्यग्दर्शन होता है। व्यवहार सम्यग्दर्शनके बिना निश्चय सम्यग्दर्शन नहीं होता है। जो मनुष्य देव, शास्त्र, गुरुको श्रद्धा करे नहीं, आगमको सर्वांग माने नहीं, आगमोक्त आचरण और क्रियाओंको स्वीकार करे नहीं, आगमप्रतिपादित धार्मिक विवाहादि क्रियाओको धर्मक्रिया नहीं माने और धर्ममें सशंक वृत्ति रक्खे वह अपनेको भले ही निश्चय सम्यग्दृष्टी कहे परंतु वह घोर पापी और अनंतसंसारी मिथ्यादृष्टी है ॥ ११९-१२२ ॥ अर्थ---जो तुम्हारे एक आत्माका हो निश्चय श्रद्वान है और उसीका पूर्ण निश्चय है तो फिर मुनि दीक्षा लेकर वनमें रहो । व्यर्थ ही भगवान् अरहन्त देवके कहे हुए वचनोंका लोप क्यो करते हो । तथा फिर ग्रन्थोको नमस्कार, पूजन और भक्ति करते हो ? जो ग्रन्थोंकी उपासना है तो फिर एक निश्चय सम्यग्दर्शन फहाँ रहा? और एक आत्मीय श्रद्धान कहाँ रहा ? जब ग्रन्थोकी उपासना है तब ग्रन्थों में प्रतिपादित मूर्तिपूजा, स्नपन, ANASHISHES [ १३७ ] पूजयथ किमयं च मूर्ति पापाणनिर्मिताम् । निश्चयपालका यूयं व्यवहारपरान्मुखाः ॥ १२४ ॥ सिद्धाते जिननायेन भापित चैव लक्षणम् । निश्चयव्यवहारस्य केवलज्ञानिना खलु ।। १२५ ।। नयेन व्यवहारेण कार्यसिद्धिर्भवेदहो । मुनीना च गृहस्थाना यूयं सर्वत्र पश्यथ ॥ १२६ ।। यवहारनयेनेव मानुजा भो इमे मता. । गुरव. शृणुथ यूव वक्ष्यमाण मया खलु ॥ १२७॥ होकवर्णप्रदातापि लोकदाता पदस्य वा । ग्रन्थस्य मन्त्रदाता च ज्ञानोपदेशकश्च वा ।। १२८॥ रासरन्याच्या अष्टद्रव्यसे पूजन आदि विधान भी मानना पड़ेगा। अन्यथा ग्रन्थोकी उपासना भी नहीं बनेगी । और जो एक आत्मा का ही निश्चय श्रद्धान सारभूत है । व्यवहार क्रियाओसे क्या प्रयोजन ? इस विचारसे व्यवहारनयका उत्यापन करते हो तो फिर पापाण निर्मित अरहंत भगवान्की मूर्तिका क्यो पूजन करते हो ? मूर्तिको पूजन फरनेसे आत्माको पूजन नहीं होती है । निश्चय अनुभवको माननेवालोको मूर्ति पूजनकी जरूरत क्या ? परंतु मतिपूजा परमागममें सर्वत्र बतलाई है। बिना मूर्ति पूजाके आत्मस्वरूपको प्राप्ति नही होती है। इसलिए केवल आत्माके श्रदानको मान कर देव, शास्त्र, गुरुका श्रद्धान नही करना सो मिथ्यात्व है ॥ १२३-१२४ ॥ अर्थ--जिनेन्द्र देवने सिद्धात ग्रन्थोमें सम्यग्दृष्टिका उपर्युक्त लक्षण कहा है। व्यवहारनयके बिना निदनयनग भी कार्यकारी नहीं है । शास्त्रकारोने यही बतलाया है कि व्यवहारनयसे हो कार्यसिद्धि होती है । गम्ममम और मनिधर्मका स्वरप इसी नयसे प्रकट होता है । व्यवहारनयसे मनुष्य गुरु होते हैं और गुणस्थानो का जागरण कर मोदाको प्राप्त होते हैं ॥ १२५-१२७ ।। Ti---1ो एक अक्षर, एक श्लोक, एक पद ओर एक ग्रन्थका पढानेवाला है वह भी गुरु होता है। '; . । .ii मे पिच गोत गातर महार मानणको पुद्गल का धर्म मान कर परित्याग कर देते .:: :: : हो आगना करने में मारतो माना है। उनके प, नाग, गुरुका अान PRE EFFER मागरम भोगगुण होने । पपने को न रह कर भी नमार्गानु- #.11 :PERो १ नमार होता'। र, नाग, गरको श्रमा के बिना भी E: :: f7TTERोगा? ऐगे को परमागममे मिलायो - ANEEM - H M - [ १३८ ] CHEmayeSixynew यज्ञोपवीतदाता च इत्याद्याः श्रीजिनागमे। इमे सर्वे मताः शास्त्रे गुरवो गुणदानतः ।। १२९ ।। येऽधमा नेव मन्यते गुरु ज्ञानस्य दायकम् । ते यास्यति न सदेह सप्तमे श्वभ्रकूपके ।। १३० ।। यथा वै जिनराजस्य यथा दिव्यध्वने बुधाः। स्थापना दृश्यने लोके गुरुणा च तथा मता ॥ १३१ ।। जैनात्तपुरुषा ह्येते जिनधर्मप्रभावका. । धर्मोपदेशनादौ च पश्यथ च तदोपमा. ॥ १३२ ।। अहो मूढा च प्रत्यक्ष कुलोन्नतविराजिता । वुद्धयादिगुणसपन्ना मिथ्यात्वपथनाशकाः ॥ १३३ ।। कलो च जैनधर्मस्योद्धारणेऽतोव चातुरा.। अस्माद्धि जैनमार्गोय प्रत्यक्ष दृश्यते खलु ॥ १३४ ।। raruwauntiGHEE मन्त्रका प्रदान करनेवाला भी गुरु हैं । ज्ञान (देशना) का उपदेश देनेवाला गुरु माना है। यज्ञोपवीत विधि, विवाह विधि, प्रतिष्ठाविधि, आदि विधि और संस्कारोंको करानेवाला गुरु होता है । जिनयज्ञ, जिनपूजन आदि विधियोको करानेवाला गुरु है। जैन परमागममे गुरुसंज्ञा गुणोका प्रदान करनेसे अनेक प्रकारसे मानी है।।१२८-१२९॥ अर्थ--जो अधम मनुष्य गुरुको ज्ञानदायक नहीं मानते है वे निःसदेह नरकके पात्र हैं। गुरु बिना ज्ञान नही होता है यह कहावत भी सर्वत्र प्रसिद्ध है ॥ १३० ॥ अर्थ--जैसे जिनराजकी स्थापना मूर्तिमे होती है। जैसे दिव्यध्वनिकी स्थापना ग्रन्थोंमे होती है । वैसे ही पूर्वकालके निर्ग्रन्थ मुनीश्वरोकी स्थापना भी वर्तमान कालके मुनियोमें होती है ॥ १३१ ॥ अर्थ--ये वर्तमानकालके मुनि भी जैनधर्मके प्रभावक होते है। और इनके द्वारा धर्मोपदेश प्रत्यक्ष सबको मिलता है ॥ १३२ ॥ अर्थ---इन वर्तमानकालके गुरुओंसे ही जैनधर्मको रक्षा कितने ही बार हुई है। बुद्धि, तप, शक्ति आदि गुणोमें प्रवीण मिथ्या मार्गके खण्डन करनेवाले और जैनधर्मका उद्धार करनेवाले ये गुरु होते है। इन लोगोके कारण ही अब भी धर्मको स्थिति प्रत्यक्ष दीख रही है ।। १३३-१३४ ॥ FEnारच्या माजमारजन्यमालामा १ धर्मगुरु, विद्यागुरु, मातापितागुरु, राजगुरु, सस्कारकर्ता गुरु आदि भेदसे गुरुओके अनेक भेद माने है । धर्मगुरु सर्वथा निर्ग्रन्थ और परम दिगम्बर ही होते है । ससार समुद्रमे तारक और आत्महितके करनेवाले धर्मगुरु है। बाकी व्यवहार आचरणोके द्वारा क्रम से आत्महित करनेवाले है।
[ १३९ ] Suprep मुरनुना विद्यादिस SHEEMESANE एपा वे नैव मामथ्यंमस्माक कालदोपत. । एतेषामपि सा न स्यात् प्रत्यक्ष पश्यथ खलु ॥ १३५ ।। जिनात्तपुरुपा ह्येते जिनधर्मोपदेशकाः । अत सर्वे प्रमान्याः स्युः जिनात्त कोन मानयेत् ॥ १३६ ।। यथा पापाणविम्वाना योग्यो वै पूजनादिक । कार्य तथैव भो मा एतेपा नमनादिकम् ॥ १३७ ।। गा कुरुध्य गुरुघ्ना वे एतेषु विनय खलु । यूय स्यु धर्ममार्गम्य घातकाः नात्र संशयः ॥ १३८ ।। ह्येतत् सिद्धानवाक्य स्यात् य. कुधीः मार्गघातकः । लोपयति जिनात्त वे स च धर्मात्परान्मुख ।। १३९ ।। युष्मा मिति भद्राय र पदेश प्रजल्पित । अस्माभिः ग्रन्यवान अहकारमदान च ॥ १४० ।। नागेंद्राय गुरेश्वरा त्रिपु बलु मन्मानयन्ति सदा । योगोन्द्रा खचरेश्वग गुणप्रभज्ञानेन सशोभिता ।।१४१।। वेदज्ञानविमण्डिता पाता । कुर्वत्येव प्रलोपन नरवरा नैव भवतापह ॥ १४२ ।। अर्थ--फदाचित् यह कहो कि कालदोपसे हम लोगोमें शक्ति कम हो गई है। तो यह भी मानना चाहिये कि उनम भी शक्ति कम हो गई है तथापि उनमें शक्ति प्रत्यक्ष दिखाई देती है ॥ १३५ ।। अर्ग--ये वर्तमानकालके धर्मगुरु जैनधर्मके उपदेशक हैं इसलिए सवको ही मान्य हैं। जिनने जिनेन्द्र कारण ग्रहण को है उनको फोन नहीं मानेगा ? सब ही मानेगे ॥ १३६ ॥ अर्थ-जिस प्रकार अरहन्त भगवान्को मूर्तिको पूजा करते है वैसे ही इनका भी सन्मान नमस्कार जादि करना चाहिये ।। १३७ ।। नगरप्नता प्रकट करना ठीक नहीं है । इसलिए उनका भी विनय करना चाहिये। जो मनुष्य मा पात करता है यह धर्ममे परान्मुप है । यह बात हमने ग्रन्यो में लिखी है । न कि किसी दूसरे अभिप्राय- म ।। १३८.१२९॥ -माग्में सबसे भय कर पाप ग्रन्योका प्रलोपन करनेका है। जो मनुष्य ग्रन्योकी आजाफा भग TRA सामं (परमागममें) बतलाये हए मार्गको स्वीकार नहीं करता है, परमागमका अनुयायी अपनेको TE TRोगको नहीं मानता या पूर्ण वा नहीं पता अथवा कुछ भागको मानता है और कुछ aami राग गयेट करता है वह गमका प्रलोपन करता है । अथवा उत्तम सदाचार के अन्यो- मा.करम गन्धोको हो पागम ममता है वह भी अन्य का प्रतोपन है ।
[ १४० ] जीजामाच्याजमाराजाजताच्या SHEESHPSSHESESHI वचनाडम्बरै किं च अतो भोः सज्जनाः खलु । यदुक्त जिनग्रथेषु तत् लोप मा विधीयता ॥ १४३ ॥ ये कुर्वति प्रलोपन च मधमा ग्रथस्य भो. सद्बुधाः। ते यास्यति निकोतिषु सुवचनोपाच्च ससारदं ।। १४४ ।। याता याति तथा च दु खनिकर सप्तावनिषु सदा । यास्यत्येव कदापि भो बुधजना लोप कुरुध्व च मा ॥१४५।। अथ ढूढक मतोत्पत्ति र अथापर शृणुध्व भो श्वेतवासोमते खलु । लुकाभिधः कुधोरासीत् सर्वधर्मविनाशक ।। १४६ ।। रिपुरग्नीन्दुसंयुक्तसमेऽभूत्श्वेतवाससाम् । द्वापरेषु प्रमग्नाना यतो हि कालदोषत ॥ १४७ ॥ मुनिहस्ते तथा पचसोमयुक्त ह्यभूत्समे । गते लका क्रियाहीनो नाम्नाहि सर्वलोपकृत् ।। १४८ ॥ इसप्रका'जो ग्रन्थोका प्रलोपन करेगा वह अवश्य नरककुण्डमे गिरेगा। और अनंत संसारको प्राप्त होगा। अथवा निगोद आदि कुयोनियोमे अनंत दुःखको प्राप्त होगा। इसलिये ग्रन्थोंका प्रलोप नही करना चाहिये। इंद्र, नागेंद्र, मुनि, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, विद्वान् आवि किसीने भी आगमोंका लोप नहीं + किया है इसलिये तुम भी ग्रन्थोका लोप कभी मत करो। जिन ग्रन्थों में जो क्रियाएँ कहीं हैं उनका लोप कभी मत करो । जो पुरुष ग्रन्थोंमे कहे कुछ वचनोंका लोप करता है वह अवश्य हो नरक निगोदमें पड़ता है इसलिये हे बुद्धिमानों ग्रन्थोंका लोप कभी नहीं करो ॥ १४०-१४५ ॥ अर्थ--श्वेतांबरोंमेसे लुका नामक मत धर्मका नाश करनेवाला प्रकट हुआ है अब आगे उसकी उत्पत्ति आदिका खुलासा बतलाते है वह श्रवण करना चाहिये ॥ १४६ ।। अर्थ--संशय मिथ्यात्वको धारण करनेवाले ( इंदोविय ससइयो ऐसा गोमटसारमें श्वेतांबर मतको संशय मिथ्यात्वी जैनाभास माना है ) श्वेतांबर ( भगवान् भद्रबाहुके समयमें ) सं० १३६ में उत्पन्न हुए। ये सब संदेह मे निमग्न रहनेवाले तीव्र मिथ्यात्वी हैं। इस प्रकार मिथ्यात्वको धारण करनेवाले और अपनेको जैन माननेवाले जैनाभास भी कालदोषसे पंचमकालमें उत्पन्न होते हैं ॥ १४७ ॥ अर्थ-हे राजन् ! लुक मत सं० १५२७ में उत्पन्न हुआ। यह मत समस्त पवित्र आचरणों का लोप करनेवाला प्रसिद्ध हुआ ॥ १४८ ॥ MESSTRICHEREAwesex-CHISHES मा PMESHSHOBHA [ १४१ ] तन्मते च घना जाता भेदा. स्वपथपोपकाः। निर्विचाराः क्रियाहीना धर्मलोपकरा खला ॥ १४९ ।। जिनेज्यानिंदका केचित् जिनविवपरान्मुखाः । निंदका तीर्थयात्राणा म्लेच्छाचारप्रपालकाः ॥ १५० ।। जनमदिग्प्रतिष्ठाबारका. कुकुलान्विताः। इत्याद्या जिनमार्गस्य वभूवु शकाः खलु ॥ १५१ ।। नाम्ना ढ्याश्च विख्याताः क्रियाकर्मविजिता । सर्वत्र विसृताः ते च ह्यधुना भो बुधोत्तमाः ॥ १५२ ।। स्यापि नेव दोपोस्ति कालदोपप्रभावत.। सर्वे मतातरा ह्यस्मिन् भवति नात्र सशय. ।। १५३ ।। युष्माक गर्वगयेषु भो लुकमतधारका.। किं न स्यात् कथन मूढा पूजायाः श्रीप्रभोः खलु ।। १५४ ॥ ग्रयमाक्षमह वन्मि शृणुत मतिवजिता । यदि ग्रथाः प्रमत्याः स्यु युष्माक शर्मप्राप्तये ।। १५५ ॥ अर्थ--उस लुक मतमेसे भी अनेक मत प्रकट हुए। जो उसी मार्गको पुष्टि करनेवाले थे। जिनमें विचार नहीं था, जिनके आचरण पवित्र नही थे और जो पवित्र धर्मका लोप करनेवाले थे ।। १४९ ॥ अर्ग---ये लुक मतके अनुयायो जैनाभास अरहत भगवान्की मूर्तिसे परान्मुख रहेगे, श्रीजिनेन्द्र भगवान्को मूर्तिको निन्दा करेंगे। तीर्थ यात्रा आदि धार्मिक आचरणो को रोकेंगे। प्रतिष्ठा, जैनमदिर आदि प्रवृत्ति को रोकेंगे। म्लेच्छाचारको फेलायेंगे और नीच कुलके मनष्योको साधु बनाकर सबको भ्रष्ट करन।। १५०-१५१ ।। अर्थ-लक मत को दलिया कहते है। ओर वे ढियाके नामसे प्रसिद्ध हैं । इन लोगोमें सदाचारको एक भी उन क्रिया नहीं है ( नको स्थानकवासी भी कहते है ) ॥ १५२ ॥ --उसमे क्मिीका कुछ भी दोष नहीं है क्योकि कालदोषसे ये सब बातें स्वयमेव बन जाती हैं। का समय मतातगेकी युति होगी यह निःसदेह है ।। १५३ ।। - मतवालो श्रीजिनदेवको पूजा का विधान तुम्हारे मतके ग्रन्थोमे क्या नहीं है सो तो - ri--आगाए गहारा 7 कहते हैं कि तुम्हारे मत के मुग्य-मुत्य ग्रन्यो ( जो सर्वमान्य हैं ) में जिनेन्द्र- मांगे। यदि तुम्हारे मतके गन्य मय हैं प्रामाणीक आप मानते हो तो जिनेन्द्र पूजाका दिला गे। बोक्ति गन्नो विगान सपाट र पसे है। जो ग्रन्य अमान्य हैं तो फिर तुम्हारा " TITL ॥ १.१.११॥ ।
[ १४२ ] سیستمه बहु ? PAHEADSHI SHASHE पतालोसामिधे ग्रन्थे प्रतिमाया विस्तारत पूजनस्य वर्णना कृता वा किं न कृता । भो लु कमतधारका तस्मिन् प्रत्यक्ष पश्यतु भवन्त । प्रभोः पूजन कथमुत्थापित । यदि युष्माक ग्रन्थोय सत्य स्यात् तहि ता जिनपूजा किं न कुयुः। यदि भवतामेष पूजाविधिः नेव रोचते तदा ग्रन्थस्य लोपन कुरुध्व । अत कारणात् यूयमपि स्वमतघ्नाः च आगमना स्युः नात्र सदेह । भो लु कमतपालका. पुन शृणुध्व जीवाभिगमग्रन्थे पूजाया विधिः बहुविस्तारत वर्णितः। ब्रवीध्व, तत्मत्य किमसत्य स्यात् ? भो लु का. 1 ज्ञाताभिधकथाया सतीनामध्ये शिरोमण्या द्रोपद्या जिनेन्द्रस्य इज्या कृता पुन. उपासकदशाभिधग्रथे यूय पश्यत । जिनेन्द्रसिद्धयात्राकरण जिनबिम्बस्य पूजाकरण बहुविस्तारेण अनयोः द्वयो कथन कृत । पुनः सूत्रकृतागमे श्रेणिक भूपस्य अभय- अर्थ--हे लुकमत धारको तुम्हारे पैतालीसा नामके मुख्य आगम ग्रन्थोमे अतिशय विस्तार पूर्वक भी जिनेन्द्रदेवकी पूजाका विधान बतलाया है या नही ? एकबार तुमने अपने आगम ग्रन्थोको खोलकर देखा है या नहीं ? प्रथम तो अपने ग्रन्थोको देखकर निषेध करना चाहिये । उन ग्रन्थोंमे जब खुलासा वर्णन है तब तुम्हारा निषेध मनोक्त कल्पनासे पक्षपात पूर्ण ही समझा जायगा। कदाचित् तुमको पूजन करना अच्छा नहीं मालूम होता तो तुम सबसे प्रथम अपने आगम ग्रन्थोको मत मानो। जो ऐसा करोगे तो आगमलोपी कहलाओगे। इसमें कुछ भी सदेह नही। अर्थ-हे ढूंढियो ! जरा तो सुनो। जीवाभिगम नामक ग्रन्थमें भगवान्की मूर्तिको पूजाका वर्णन खूब विस्तारसे किया है । अब बतलाइये कि उस ग्रन्थका लिखना सत्य है या असत्य ? यदि ग्रन्थका लिखना सत्य है तो पूजा करना तुम्हारे मतमे सबको मान्य है फिर तुम लोग अपना घर ( ग्रंथ ) देखे बिना ही किस सबूत (प्रमाण ) पर निषेध करते हो। यदि उस ग्रन्थका लिखना असत्य है तो जीवाभिगम ग्रंथको मानना छोड़ देना चाहिये । क्यो मानते हो ? ज्ञाताभिध नामक सूत्रमें सती शिरोमणो द्रोपदी आदि बहुत-सी सतिओके द्वारा श्री जिनेन्द्र भगवानको मूर्तिकी पूजा करना बतलाया है। सो सत्य है या असत्य ? उपासकाध्ययन नामक ग्रंथमें देखो---जिनेन्द्र भगवानको मूर्तिकी पूजा, सिद्ध भगवान्की पूजा यात्रा करनेकी आज्ञा है और जिनबिंबकी पूजा बहुत ही विस्तारसे स्पष्ट बतलाई है । वह सत्य है तो स्वीकार करना चाहिये और असत्य है तो उस ग्रंथमें क्यों लिखा है ? इससे तो वह ग्रंथ ही मान्य नहीं समझें ? ELHI [ १४३ ] FRital कुमाराभिवकुमारेण जिनबिंबस्य बहुभक्त्या च वसुद्रव्यविधिना पूजा कृता। तदैव पूजाप्रभावात् सोपि सम्यग्ज्ञानमाप्तवान् । पुनः मन भगवत्यभिचे ग्रन्ये जिनविवस्य च तन्मदिरस्य तत्पूजाविधेः बहुविस्तारतो वर्णना कृता। नो चेतहि भवदागमस्य लोप कुरुष्व । त्याद्याः ये ये ग्रथा भवता सति सर्वपा तेषा मध्ये यूय पश्यत युष्माक केषु ग्रन्थेषु जिनमदिरस्य जिनविवस्य जिनपूजायाः जिनक्षेत्र- ममे इत्यादि कायस्य यदि निपेवन न स्यात् तहि कुर्मध्व । कुपक्ष त्यजत । एतदेव निकोत् कारण तत दुःखान्निर्भया मा भवत बालापन्या मा बोध्य । हृदि विवेक भजध्व । समस्यामा ' सूत्रकृतांग नामक ग्रंथमें श्रेणिक महाराजके पुत्र राजकुंवर अभयकुमारने श्रीजिनेन्द्र भगवान्को मूर्ति फो अण्टद्रव्यसे पूजा की और उससे सम्यग्ज्ञानको प्राप्ति हुई ऐसा लिखा है सो यह लिखना असत्य है ? तुम लोग सूनकृताग ग्रन्थकी मानते हो या नहीं ? जो मानते हो तो मूर्तिपूजा करना स्वीकार करना चाहिये । जो नहीं मानते तो ग्रन्थ अप्रमाण ठहरा । भगवती मूत्र में---जिनविम्ब और जिनमदिरकी पूजा करना लिखा है। वह भी अतिशय विस्तारके गाय बतलाया हे मो क्या मान्य है या नहीं ? यदि मान्य नही है तो भगवती सूत्र अप्रमाण ठहरेगा ? या तो उनको अमान्य तगे या मूर्ति पूजा करना स्वीकार करो। तुम्हारे मत के आगमग्रन्थो में सर्वत्र जिन विम्ब पूजा करनेका विधान लिखा है । सो तुमको करना गरियो ग्रन्या को देकर निषेध करना चाहिये। आपकीनगीन गयोमे जिनविम्न और जिनमदिर तीर्थयात्रा आदिका निषेव हे ? या मन कल्पना गे पनि रोहो । पिनारमागते निपे करना अज्ञान है । इसलिये पक्षपातको छोडो और HTAR for RT RE 237 रना मां लोगो का कार्य है ? इनिए कुरको छोड़ देना in- गति IIT मिथ्या होगा। मनको कल्पनाने देव, शिवमदिर आदि- - .:::.11 12 कोर ITI मरमाने सोना । मो यह ठीक न है । है - .
[ १४४ ] PATRA मरचयापच्या भो लु कमतधारका जिनपूजादानमम गृहस्थानामपरो धर्मः त्रिकालेपि नास्ति । ये जिनबिम्बस्य निंदका. ते जिनघ्नाः जिनागमध्ना जिनवाक्यजिनमत्रराजघ्नाः बहुभापणेनाल ते सर्वघ्ना. स्यु. । भो ढूढ्याः नामस्थापनाद्रव्यभावतश्चतुर्धा जिनेन्द्रस्य स्मरण च पूजन स्यात् यूय महामूढा. सर्वत्र पश्यत । पुनः यूयमपि नामद्रव्यभावेन जिनेन्द्रचिद्रूप सदा हृदि स्मरथ किं न भो मतिहोना. स्यु । प्रभो. स्थापना कथमुत्थापिता भवद्भि. तत्कारण कथयत कस्य ग्रथानुसारत.। अर्थ--अरे ! टूढिया हो ! गृहस्थोका धर्म जिनपूजन, दानके सिवाय अन्य दूसरा त्रिकालमें भी श्रेष्ठ नहीं है । मुख्य धर्म तो जिनपूजन और दान देना ही है। इसपर भी आप जिनबिम्बकी पूजा करनेका निषेध कर जो सत्य धर्मका निन्हव करते हो वह जिनबिम्बका निन्हव नहीं है किंतु श्रीजिनेन्द्र देवका ही निन्हव है इसलिए आप अवश्य जिनघ्न हो। और अपने आगमको नही माननेसे आगमन हो, जब आपके आगममे जिनबिम्बपूजन, जिनमदिरपूजन, सिद्धयात्रागमन आदि विधान खुले रूपमे लिखा है तब उसको नही मानना यही आगमध्नता है । और जिनवाक्य तथा मंत्रराज ( णमोकार ) को भी नहीं माननेवाले हो । अधिक क्या ? आप सब शास्त्रोंको सत्यताका लोप करनेवाले मिथ्या कदाग्रही हो । TH रियाज मायालयमा अर्थ--अरे ढूंढिया हो! नाम, स्थापना, द्रव्य, भावसे जिनेन्द्रदेवका आराधन पूजन, स्मरण आदि चार प्रकार किया जाता है। प्रत्येक वस्तुमें यह चारों निक्षेप नियमसे होते हैं। परंतु आप लोगोंने तीन निक्षेप (नाम, द्रव्य, भाव) तो स्वीकार किये और बीचमें स्थापना छोड़ दिया सो क्यों ? स्थापना निक्षेप प्रत्यक्ष रूपसे प्रत्येकको मानना ही पड़ता है। प्रतिनिधि बिना एक क्षण निर्वाह होना अशक्य है । सेठ मुनीमको अपना प्रतिनिधि (स्थापना) बनाता है। वकील बेरिष्टर भी सब कोई अपना प्रतिनिधि बनाता है। वाईसरायको राजाने अपना प्रतिनिधि बना हो रखा है। फिर प्रतिनिधिरूप स्थापनाका निषेध किस प्रकार किया जा सकता है। स्थापनाके माने बिना अन्य तीन निक्षेपसे वस्तुस्थितिका कार्य सर्वथा नहीं हो सकेगा। इसलिये स्थापना की उत्थापना करना बहुत भारी अज्ञान है। फिर भी हे ढूंढिया हो, आपने यह स्थापना उत्थापन की सो किस ग्रन्यसे ? और चार निक्षेपको न मानकर तीन निक्षेप माने सो किस ग्रन्थसे ? जिस स्थापना निक्षेपके बिना याच्या Ramesmeer, याच्या [ १४५ ] भो लुकाः पुनः शृणुथ कृत्रिमाकृत्रिमप्रभेदेन द्वेधा श्रीजिनेन्द्रस्य सर्वत्र क्षेत्रेषु सर्वत्र भूधरेपु स्थापना स्यात् कृत्रिम जैनेन्द्र- बिम्ब मनुजा. पूजयति । अकृत्रिमजिनेश्वरविम्ब सुरेश्वरा अभ्यर्चयति तत्पदप्राप्त्यर्थं । जिनविम्बस्य पूजनात् सहस्रकवलिना सादृश्य पुण्यमुत्पद्यते अतः मर्वागमेपु जिनविम्बपूजा कथिता । ढूंच्या इत्युत्तर श्रुत्वापि स्वपक्षपालनार्थमित्यूचुः । भो मज्जना भवद्भि यत्कथितं तत्सत्यमपि तथापि अस्माक वाक् यता । वय निगरभाः म्यु अत' अम्माभिः आरभदोपेण प्रतिमायाः पूजन उत्यापितं । आरभात् सक्लजपतप सयमज्ञानादिसद्गुणा नश्यति । ययारभ तत्र मिपि धर्मोत्पत्तिस्त्येिव । निगरभेण शिवस्थानप्राप्तिरजसा भवति । आरभेण अनतश जोवराशयो म्रियते । तत्पापात् श्वभ्रान्धी अय प्राणो दु.बीघ भुजति वा निगोदादिपु वचनागोचर ह्यनतकालपर्यंत दु ख भुजत्येव । इत्येव कल्पोक्त यत्वा ल कमनेभवानने केगरितुत्य जैनागम मार्गवर्धनेक दिवाकर असत्यपक्ष विभजक भव्याव्जमातंडोपम श्रीवीतरागप्रतिपालका गिदातादि गयवानने मामधारकः पूर्वाचाय वाक्य प्रतिपालक तन्मतोत्थापनार्थमित्याह भो लु काः-आरभनिराकरण यूय शृणुथ भगवान्का स्मरण मत्रराजका जप और स्वरूप चितवन भी नहीं हो सकेगा। इसलिए सत्य बातको नही मानना अजान है। अयं-अरे ढूढिया हो तुम्हारे शास्त्रोमें कृत्रिम और अकृत्रिम प्रतिमा भेद बतलाया है । पर्वत, नदी- तोर, गिलक्षेत्र और जिनालयमें कृत्रिम जिनविम्बोको पूजा मनुष्य करते हैं । जिनपूजा करनेसे सहस्रकवलव्रतके गमान महान फल प्राप्त होता है इसलिए जिनपूजन समस्त आगमोमें बतलाई है। अमेदिया मतके समस्त शास्त्रोमें जिनबिम्बको पूजाका पूर्ण विधान सप्रमाण होनेसे यह तो कहने- में नया अगमय हो गये कि हमारे (लक) मतमें पूजा विधान नहीं है । जो शास्त्रों में पूजा विधान लिखा है गाणे, नो गन्ध अप्रमाग ठहरते हैं। इसलिए सब प्रकारसे लाचार होकर ढूंढिया लोग बोले-यद्यपि माम जिनान विधान लिया हे वे सब ग्रंथ भी मान्य हैं परंतु पूजा करने में बहुत-सा आरभ होता कि शनि आरंभ करने का भारी वोप होता है । आरम्भमे अनन्त जीवराशि मर जाती है । जिमसे rasifa पार होता । आरम्भमे जप, तप, गयम, ज्ञान आदि उत्तम सद्गुण नष्ट हो जाते है । .rf.fifr पूल पारमा चोरके भयसे निषेध करते हैं। ऐमा अवग कर लंकमतम्पी गजोको मिसमान, आम माग हो तिगत करने के लिए एक ही दिव्य मूर्य ममान, ओवोतगग AT HTET, fixinोता, ना मार्ग का अनुसरण करनेवाने दिगम्बगवायंने कहा कि - है स 1 जजच्या जयमालयमा जाज [ १४६ ] चित्तसमाधिना करोम्यह । जिनेन्द्रगर्भसमये प्राक् वृद्धश्रवाज्ञया कुवेर पुष्पवृष्टयादिभि पचाश्चर्यमकरोत् । दिक्कुमार्यः तस्य मातुः गर्भशोधनामकुर्वन् । दीपज्वालनादि अनेकधा परिचर्यां च । पुनः गर्भस्थाने आगते सति तदैव समये चतुर्निकायदेवनिकराः आगत्य तत्पितरौ हरिविष्टरे सस्थाप्य क्षीरोदकेन सस्नाप्य गर्भगत प्रभु नत्वा त्रि.प्रदक्षिणा दत्वा वस्त्राभरणमालीघे. तौ प्रपूज्य तत्पुरो जयनदादिशब्दोत्करान् घोषयित्वा पश्चात्स्वस्वस्थान ययु. तथाहि गर्भजातवालकजिन स्वावधिनेत्रेण ज्ञात्वा सर्वे सुरेश्वराः मह- ताडबरेण सह तत्पुर आगत्य जिन नीत्वा स्वर्णाचले गत्वा सिंहविष्टरे स्थापयित्त्वा सहस्रकलगै. दुग्वसमुद्रादागतैः वा असख्यैः प्रभोरभिषेक कृत्वा पश्चात्तत्पुरे जिन स्थापयित्वा महदानदेन स्वस्थान जम्मुः पुन. तप.कल्याणेऽपि ते सुरेन्द्रा. आगत्य तपःकल्याणं कृत्वा वव्रजुः । तद्वदेव केवलज्ञानोत्पत्तिसमयेऽपि समवशरणरचनाकुर्वन्नेव । तद्वदेव निर्वाणकल्याणसमये ते निर्जरेन्द्राः आगत्य प्रभोः हे ढूंढिया हो पूजा करनेमें आरम्भका दोष बतलाते हो सो सुनो। यह दोष तुम्हारे ग्रन्थोमें श्री जिनेन्द्र देवके पञ्चकल्याणके अवसर लिखा है सो सत्य है या असत्य । जो सत्य है तो फिर आरम्भका दोष देना सर्वथा अनु- चित है। तथाहि जिनेन्द्र भगवान्के गर्भकल्याण समय इन्द्रकी आज्ञासे कुबेरने बड़े समूह और उत्साहसे पुष्प वृष्टि आदि पञ्चाश्चर्य वृष्टि की। दिककुमारी देवियोंने भगवान्की माताकी गर्भशोधना की। अगणित दीप जलाये । अनेक प्रकारको परिचर्या की । और गर्भ समय देवेन्द्रोने श्रीजिनेन्द्रदेवके मातापिताओको सुवर्ण सिंहा- सनपर विराजमान करके क्षीरोदधिके कलशोसे अभिषेक कराया। फिर नमस्कार किया और प्रदक्षिणा दो, वस्त्राभरण माला पहनाये और पूजा की। पश्चात् नृत्य किया, जय नन्द आदि शब्दोको घोषणा की। फिर अपने स्थान गये। जन्म कल्याणमें-श्रीजिनेन्द्रभगवानका जन्म अवधिज्ञानसे जानकर देवेन्द्रोने बड़े ही ठाठबाट के साथ और अपार सभारंभके साथ तत्काल बालकको ऐरावत हाथी पर विराजमान कर मेरु पर्वतपर एक हजार आठ क्षीर समुद्रके दुग्धसे भरे हुए कलशोसे अभिषेक किया। पूजाको, गीत, नृत्य, वादिव आदिके द्वारा महान् महो- त्सव किया और भगवान्को नगरमें लाकर माता पिताको मोपकर आनन्द माना । तप कल्याणमे-देवगणोने भगवान्का अभिषेक कराकर शिविका प्रभुको विराजमान कर वनमें दीक्षा कल्या 7 महान् उत्सव अपूर्व सभारंभसे किया । ज्ञान कल्याणमें--समवशरणको रचना कर जगत में महान् सभारभका ठाठ सबको आश्चर्यकारो बल- लाया और भगवान्को पूजा आठ द्रव्यसे की। यायचजन्यमान्यमान्य HindiMaarHIND-Aye [ १४७ ] -unt जन्माच्या गगेरदहनक्रिया काश्मीरागुरुक'रंग वसारादिभिः द्रव्योधं कृत्वा स्वस्यौक उखुः। भो लुका वदध्व हयेतत्सत्यं किमसत्यं स्यात् ? पचम्बपि कल्याणेपु महदारंभोत्पत्तिः ? उनि युवापि गुन लक्रमनधारका टू व्या इत्याहु भो बुधोत्तमाः सुरेन्द्राणामारभे पापोत्पत्ति त्स्येव । पापारभोत्पत्तिः पुण कार्य भवेन् नात्र मगध । इति कल्पोक्त श्रुत्वा जिनागमार्थज्ञायक आह भो लु का. अम्योत्तरं यूय शृणथ भरतेश्वर' सदा नया नह भग पदादिनायवदनायंमानवान् तत्कारण किं स्यात् । प्रत्यक्ष प्रभो दर्शनात् तम्य देशावधे प्राप्तिरासीत् । भो लु काः आरएफ प्रक्ष पचय अग्माभिः नासत्य कथितम् ।। पुतगामफर शृणुय--श्रीपर्द्धमानवदनायं श्रेणि काभिवो भूपेन्द्र. सकलमेनया सह क्मिगमत् ? वा एक एवागमत् नत्कथ- निर्वाण कल्याणमें-देवोने भगवान्के दिव्य शरीरको दहन किया जिसमें काश्मीर, अगर, तगर, चदन, मर आदि मुर्गा रत पदार्थोके द्वारा अपूर्व ठाठबाटसे उत्सव मनाया। हे न लिया हो यह आरंभ (महदारभ) भगवानको पूजा और पंचकल्याणक निमित्त किया जो तुम्हारे गन्याम लिली है व सन्य हे या मिथ्या ? सो कहो। जो सत्य है तो पूजा करनेमें आरंभका दोष बतलाना व्ययं , । यो जिनेन्द्र पचकल्याणोमे देवोने पूजा की है । --उपयंत पचल्याणो में देवोके द्वारा महान् मभारभ भगवान्की पूजाका श्रवण कर दूँढियाने Pा कि भगवान के पनाल्याणो देवाने आरंभ किया है । वह विक्रियाजन्य होनेसे हिंसारूप नहीं है । मनुष्योके HTTER ही पापहात्ति होती है । देवोके आरम्भमें पापोत्पत्ति नहीं है। इसलिये मनुप्योको पूजा करनेका faat गारो है । यह सुनकर जिनागमके ज्ञाता आचार्य महाराजने कहा कि हे ढढिया हो ! भरत महा- गनार भगवान्को यात्रा और पूजा समन्य, मकुटुम्ब, सपरिवार महा विभूतिके साथ की ओर म मेरमान को प्राप्ति हुई । आपके शास्त्रोमें ऐसा लिगा है मो सत्य है या असत्य ? जो मत्य + at farmi reपूनाका नित नहीं होता है बल्कि उत्तम गणोको प्राप्ति होती है। जैसे कि मग 71 hanो प्रानिई । इसलिगे आरम्भ के दोपमे पूजाका निषेध करना केवल सोल. 7 HD Mनो नि नआ। मो यह केवल प्रज्ञान वागह हो है। ti-HTET-को शामें पारमा योग नहीं होता है, फिर भी ऐसा बनाते हैं-देगो अंगिक महा- AA [ १४८ ] यत भो मतिवजिता.। प्रभो दर्शनात् नमस्कारकरणात्तद्गुणोत्करकथनादेव तेन श्रेणिकभूपालेन पूर्वोपार्जित सकलाह. तदेव नाश- यित्वा भाविकाले महापद्माभिधतीर्थंकरस्य गोत्र बबधे । ह्येतत् आरम्भफल पश्यथ । पुनरपि ह्यनेकवार बह्वारम्भेण सह श्रेणिको भूपालो महावीरप्रभो दर्शनार्थ पूजनाथं गत ।। rezunveiमाययोग भो लुका प्रभो पूजने सिद्धक्षेत्रयात्राकरणे जिनमन्दिरनिर्मापणे जैनमन्दिरस्य जीर्णोद्धरणे जिनस्य स्नपने इत्याद्यन्यशुभे कार्ये हि महदारम्भस्योत्पत्तिः स्यात् तथापि तदारम्भ कृतोपि सख्यातगुणपुण्योत्पत्तिकृद्भवति । गृहस्थाना पुण्यारम्भे महत्पुण्यो- त्पत्ति कथिता जिनागमे जिनेश्वरै सर्वत्रैव युष्माक ग्रन्थेषु यूय पश्यथ । गृहमेधिना पुण्यारम्भे धर्मोत्पत्तिः मुनीश्वराणा निरारम्भेण धर्मोत्पत्ति । नात्र सदेह । किं च श्रूयताम् ॥ ASHODHPERHI राजने ससैन्य, सपरिवार महान् आरम्भ और पूर्ण वैभवके साथ वर्द्धमान भगवानकी पूजा की और उससे समस्त पापकर्मों का नाश कर तीर्थङ्कर गोत्रका बंध किया । अर्थात्--महापद्म नामके भविष्य तीर्थंकरका गोत्रबंध किया। यह सब आरम्भसहित पूजा करनेका ही महान् फल है । फिर भी श्रेणिक महाराजने राजगृहीसे ससैन्य विपुलाचल पर्वतपर वीर प्रभुके दर्शन बार-बार किये । सो यह लिखना सत्य है कि मिथ्या ? महाराज श्रेणिकने महान् आरम्भसे भगवान्की पूजा की और तीर्थंकर गोत्र बाँधा तो अन्य मनुष्य भावभक्तिसे महान् उत्सवके साथ पूजा करें तो क्यों नही अनन्त पुण्यको सम्पादन करेंगे, अवश्य हो करेंगे । इसलिए हे ढूंढिया हो, भगवान्की पूजा करनेमें आरम्भका दोष प्राप्त होता है, ऐसा कहना व्यर्थ और स्वकपोल कल्पित है । न्यमा अर्थ---हे ढूंढिया हो! श्रीजिनेन्द्र भगवान्को पूजा, सिद्धक्षेत्रको यात्रा, जिनमंदिरका जीर्णोद्धार करना, जिनस्नपन करना आदि कार्योंमे महान् पुण्यकी उत्पत्ति होती है । यद्यपि इन कार्योमे महान् आरम्भ है तो आरम्भ की अपेक्षा महान् पुण्य असंख्यात गुण उत्पन्न होता है । गृहस्थोंको पुण्यकी उत्पत्ति आरंभके बिना नहीं होती है, इसीलिए गृहस्थोंका धर्म आरम्भ सहित ही होता है। और मुनीश्वरोंका धर्म निरारम्भ है। ऐसा जिनागममें जिनदेवने बतलाया है । इसमें कोई सदेह नही। माPsyrewHE-HESH [ १४२ ] पूजाकार्ये ह्यहो मूढा जिनस्नाने जिनगृहे । निर्मापणे महत्पुण्य कीर्तितं च जिनेश्वरैः॥ १ ॥ किच श्रयताम्- जन्मजयमाया TRE मन्निधे भवता मर्वे लोकाश्च याः स्त्रियोऽपि च । आयात्येव प्रतिघस्र पादत्राणेन सयता. ।। २ ॥ यस्मान्मार्गे मृतानन्ता जोवा भो मूढमानसाः । तत्पाप भवता लग्न किं न वदथ मेति च (?) ।। ३ ।। प्रात मध्याह्नकालेवा चातुर्मासे दिवात्यये । सदा आयात्यहो लोका तत्वाप भवता भवेत् ।। ४ ।। ह्यहो मूर्याश्च प्राप्ति स्यात् भवता दर्शने खलु । पुण्यस्य जिनबिबस्य तन्नास्त्येव विजातिना ।। ५ ।। बबीध्व पूजनारभे पुण्य किं पापसभव | पुण्य स्याद्यदि यूय हि कुर्वीध्व जिनपूजनम् ॥ ॥ पाप म्यायदि युष्माक ग्रथाना भो मदोद्धता । कुरुध्व लोपन यूय कथयिष्याम किं पुन. ।। ७ ।। अर्थ--हे मू: । पूजा कार्यमें, जिनाभिषेकमें, जिनमन्दिर -निर्माणमें जिनेन्द्र द्वारा महान् पुण्य कहा गया ॥ १ ॥ अर्थ--हे ढूंढिया हो । तुम्हारे ( साधु लोगोके ) दर्शन और पूजन करनेके लिए बहुतसे मनुष्य और स्त्रियां नित्य जूता पहन कर आती हैं सो उनसे मार्गमें जूताके आरम्भसे अनन्त जीव मर जाते है, उसका पाप भी तुमको लगेगा । ओर दर्शनार्थ आये हुए पुरुप स्त्रियोको आरम्भ जनित दोष लगेगा । सो तुम ऐसा आरम्भ मी हगते हो। और लोगोका क्यो उपदेश देते हो ? क्या तुमको पापका कुछ भी भय नहीं है ? या आरम्भ ने पाप नाही || २-३ ।। 14-- प्रात.कान, मध्याहकाल, चातुर्मास, रात्रि और अन्धेरेमें बहुतसे मनुष्य तुम्हारे (साधुलोगोके) 27 ना पाकर आते है और उनको पुरको उत्पत्ति होती है ऐसा तुम लोग बतलाते हो तो जिनपूजनके of गे को लत्ति यो नही होगी ? तुम्हारे दर्शनमें पापारम्भ करनेपर भी पुण्यलाभ और भग 1ो पनि भारभने पुण्य लाभ न हो यह कमी बात ? अपने मतलबके लिये तो पापारंभमें पुण्य TET TET || ॥ नपान को पूरा करनेमे पुण्य होता है या पाप ? जो पुण्य उत्पन्न होता है तो TR ... | ram : भगवान की पूजा करनेमे पाप होता है तो तुम्हारे ग्रंथों में पूजन करने 21 titi - गगो । तिमी तुम्हारे पाप हो गठे हैं ऐमा मानना पड़ेगा ।। ६.७ ।। J + [ १५० ] पुनर्वच्मि शृणुध्व भो युष्माक च मते खलु । आरभाज्जायते पाप एतस्य कथन ननु ।। ८ ।। भवद्भिश्च गृहस्थाना पूजाया श्रीजिनस्य वै । त्याग च कारिता किंवा अन्यारभमपि खला ।।९।। गृहस्था. प्रतिघसहि कामसेवा गृहोद्भव । कुर्वत्येवापर कार्य धानस्य विक्रय तथा ।। १० ।। वैवाह प्रतिवर्षे वा ह्यनेककपटक्रियाम् । अगालितजले स्वस्य वस्त्राणा धोवन सदा ।। ११ ।। भो मूर्खा सर्वकार्येषु आर भो जायते खलु । भवता सेवकाना च तदारभस्य किं कृतम् ॥ १२ ॥ कारयध्व च तक्त्याग भो ढूढ्या तूर्णमेव हि । वय नै जानयिष्याम निरारभा इमे तदा ।। १३ ।। यद्यारभस्य त्याग स्यात् त्यजध्व सर्वमेव हि । आरभः सर्वकार्येषु क्रयविक्रयकेषु च ।। १४ ।। REPSAHIMeme अर्थ--हे ढूंढिया हो ! तुम्हारे मतसे गृहस्थोंको आरंभ करने में पाप लगता है ऐसा मानते हो और इसीलिये (आरंभके भयसे) भगवानकी पूजा करनेका निषेध करते हो तो यह बतलाओ कि आरभके पापके भयसे भगवानकी पूजाका आरभका त्याग करना चाहिये या गृहस्थोंकी अनेक पाप प्रवृत्तिके द्वारा होनेवाला अशुभ आरभ उसका भी त्याग करना चाहिये ? फिर भी तुम्हारे मतके प्रतिपालक गृहस्थ प्रतिदिवस कामसेवन करते है। धरके महान कार्य करते है । धान्य खरीदते और बेचते है, विवाह करते है, अनेक कपट क्रिया और मलिनाचार का आरंभ करते है। बिना छाने (अगालित) पानीमे अपने कपड़े धोते है। अपना मकान बनवाते है। और तुम्हारे (साधुलोगोंके रहनेकेलिये) रहनेके पोसारा उपाश्रय (धर्मशाला या मन्दिर) बनवाते है। आदि अनेक प्रकारका महान आरंभ करते है । हे दूढिया हो ! गृहस्थोंको प्रत्येक कार्यमे आरंभ तो होगा ही। बिना आरभके गृहस्थ अपना जीवन एक क्षण मात्र भी स्थिर नहीं रख सके तो तुम्हारे सेवकोंको उपर्युक्त पापजन्य क्रियाओंके महान् आरंभ का पाप लगता है या नहीं। जो पाप लगता है तो सबसे प्रथम अपने सेवकोंसे गृहस्थसंबंधी आरंभका त्याग कराना चाहिये । जो तुम गृहस्थोंके समस्त प्रकारका प्रारंभका त्याग करा सको तो अवश्य ही यह माना जा सकता है कि आरंभसे पाप होता है । परतु वह आरंभ तो गृहस्थोंसे छुड़ाया जा नहीं सकता। और न गृहस्थ अपने गृहस्थसंबंधी आरंभको त्यागही कर सकता है। तो फिर भगवानको पूजामें होनेवाला स्वल्पारंभ जो महान् पुण्यका प्रदान करनेवाला है उसका त्याग करना या आरंभभयसे भगवान्की पूजाका निषेध करना कितने अन्याय और पक्षपात की अज्ञान भरी हुई बात है ? जो आरंभ ही छोड़ना है तो सर्व SHEPHESH भन्या ।
[ १५१ ] मयमच्याच्यायालय पूजने जिनविम्बस्य दर्शने मन्दिरस्य वै । करणे च गृहस्थानां महत्पुण्यफलं भवेत् ॥ १५ ॥ सिद्धक्षेत्रस्य यात्राया जिनविम्बस्य पूजने। जिनमन्दिरसत्कार्य प्रतिष्ठाया च ये बुधाः ।। १६ ।। पापारम्भम्य उत्पत्ति ब्रुवते तेऽधमा मता । तदघात्ते निकोतेपु यास्यति नात्र संशय. ।। १७ ।। ते ढ्या पुन इत्याहु यो दोपा वुधोत्तमा. | जिनविम्वे ह्यतो नैव स्यादस्माकं रुचिः खलु ॥ १८॥ आद्यमचेतनत्व च द्वितोयत्व च कृत्रिमम् । तृतीयमेकेन्द्रियत्वं एभिर्दोपैश्च वर्जिता ।। १९ ॥ श्रीमजिजनेन्द्रबिम्बे हि भो ल कमतचारका.। अचेतनत्वाभिध दोपं भवद्भि गदित खल ॥ २० ।। नहोगस्य निगकरण ग्रयबोधेन भो सला । करोम्यह समासेन यूय शृणुथ निश्चयात् ।। २१ ।। मील का श्रीजिनेन्द्रस्य प्रत्यक्ष द्वापरापहा । वाण्यपि पुद्गलाकारा अचेतना च विशृता ॥ २२ ।। प्रकारका आरम्भ छोड देना चाहिए-यह नहीं कि गृहस्थ अपने गृहसंबंधी समस्त प्रकारका पापारंभ तो करें और पुग्योत्पादक भगवानको पूजाका आरम्भका परित्याग करें ॥ ८-१४ ॥ अर्थ--हे दुढिया हो । जिनेन्द्र भगवान्को पूजन करने में, जिनमन्दिर बनवानेमें गृहस्थोको महान् पुण्य काम होता है। इसी प्रकार मिद्धक्षेत्रको यात्रा करनेमें, जिनेन्द्र भगवानको प्रतिष्ठा करने में, रथोत्सव निक- थाने में मसान् पुष है । जो इन पुण्यकर्म में पापका आरम्भ बतलाते है वे नीच है । वे अवश्य ही निगोद आदि सुगनिमें जायगे गमे गन्देह नहीं है ।। १५-१७ ॥ - मुनार नियोने कहा कि भगवान् को पूजन करने में हमें तीन दोष मालूम देते है। इसलिए 'म । प्रथम नो प्रतिमा अनैता है । दूसरे जिन प्रतिमा कृत्रिम है। तीसरे जिन प्रतिमा एके- for IT नीन कारण हो निरोध है ।। १८-१९ ।। -- या हो। तुमने भगवान की पूजा करने में जो अचेतनत्व नामका दूषण बतलाया, श्री 18. भा. fanा निकन . नंतन की पूजा यो कम्ना, उसमे क्या लाभ होता है इस दोषका 17 गोदाग, तुम निरनयने गुनो । २०-२१ ।। • . 31नि नारी नाम मातोरता हआ दीवता है। फिर भी निषेध करना I tr: गुम (या) : जम्ने हो, हा नागी भी गुदामयी है, अचेतन 7 प । AR - [ १५२ ] यत्रा मत्रा जच्या मात्रामा दृश्यथ नास्ति चैतन्य तस्या यूय न स्शय । स्यादहो सर्वपापस्य नाशका सर्वदर्शिका ।। २३ ।। मानयथ क्थ मूढाः वाणीमचेतना च ता । पुनर्वै मत्रराज च किमर्थं जपथ सदा।। २४ ।। आख्यापयथ भो लु का अचेतनस्य मान्यता । भवता तर्हि नास्ति चेत् मानयथ कथ च ता ॥ २५ ॥ भेषजा सकलास्तथा । चिंतामण्यादिरत्नानि सर्वे ते लोकविश्रुताः ।। २६ ।। चेतनाकर्महीनाः स्युः पश्यथ मतिवजिता । सर्वकार्यस्य कर्तार तम्किच कारण खलु ॥ २७ ।। मत्रोऽय परमेष्ठिना चेतनाकर्मवजित । कथं ददाति सर्वेषा शिवसौख्य सदास्थिरम् ॥ २८ ।। स्वस्यातिशययोगेन ददति शर्मण खलु । सर्वे ते मत्ररत्नाद्या यय पश्यथ निश्चयात् ।। २९ ।। तद्वदेव जिनेन्द्रस्य प्रतिमादर्शनात् खलु । तदर्शकाना भो मूढा. प्राप्ति. स्यात्पुण्यसंततेः ।। ३० ।। सौम्याकार विकारेण वर्जिताग सुशोभनम् । पाासनेन सपन्न नासाग्रन्यस्तलोचनम् ।। ३१ ।। भास्वर वास निर्मुक्त तदप्यावकनंददम् । तदाकारस्य सादृश्य पूज्य च निर्जराधिपः ।। ३२ ।। ज्यालायामरामान्य che ? unseenायजयमालच प्रत्यक्ष लाभ हो रहा है तो फिर अचेतनसे लाभ नहीं होता, ऐसा मिथ्या क्यो कहते हो। तुम अचेतन वाणीको नहीं मानते क्या? और अचेतन मंत्रराज (णमोकार मंत्र) नहीं जपते हो ? या उस मंत्रराजको पूजा नही करते हो ? हे ढूंढिया हो ! जो तुम अचेतन भगवान्को मूर्तिसे लाभ नहीं समझते तो अचेतन वाणीसे लाभ क्यों समझते हो ? और अचेतन, मंत्र, तंत्र, यंत्र, औषधि आदिका सेवन क्यों करते हो । तथा चिंतामणि रत्न आदि अचेतन पदार्थों में क्यों अचित्य शक्ति मानते हो । चेतना रहित चिंतामणि रत्न आदि प्रत्यक्ष फलप्रद दीख रहे हैं और आप लोग मानते ही हो तो फिर भगवान्की पूजा करनेमें अचेतनत्व दूषण कैसे देते हो?॥२२-२७॥ अर्थ--हे ढूंढिया हो ! पञ्च परमेष्ठीका णमोकार मंत्र भी अचेतन है परंतु सर्व प्रकारके सुखोंको करने- वाला है । यह अतिशय णमोकार मंत्रमें स्वभाव रूपसे है। इसी प्रकार कामधेनु चितामणि रत्न आदि में सर्व प्रकारके सुख देनेकी शक्ति स्वभावरूप है । ठीक इसीप्रकार श्रीजिनेंद्र भगवान्की प्रतिमा भी स्वभाव रूपसे वह अचित्य शक्ति है कि प्रतिमाका दर्शन करने मात्रसे ही समस्त प्रकारके पुण्यका लाभ स्वयमेव हो जाता है।।२८-३०॥ अर्थ-श्रीजिनदेवकी प्रति मा सौम्य, निर्विकार, शुभ, परमसुन्दर, पद्मासन, विराजमान, नासाग्रदृष्टि- रूप परमशांत, देदीप्यमान, दिगंबर समस्त प्रकारके दूषणोंसे रहित, देवोसे पूजित और महिमा सहित होती है। ।
Tran nा में गई र प्रतिमा भी स्वभाव मरस भकाय गुपया लाभ स्वयवन्य हो ..२८-२० [ १५३ । cine-TE ईदृग जिनविंव य पश्यति निजभावत.। स एवाप्नोति निर्वाणमन्यत्सौख्यस्य का कथा ।। ३३ ॥ दर्शनाज्जिनबिंबस्य जायते तस्य चिंतनं । प्राणिना नात्र सदेह सर्वाहसो विनाशकम् ॥ ३४ ॥ श्रवणादि यया वाण्याः ज्ञानोत्पत्तिश्च जायते । तथाहि जिनबिवस्य दर्शनात् वजनक्षय. ।। ३५ ।। पश्यति नैव ये मढाः जिनविंब जगन्नुतम् । कदापि तन्मुखो नैव दर्शनीयो वुधोत्तमैः ।। ३६ ।। येऽधमा जिनविवस्य निंदा कुर्वति ते खलु । निकोतेपु प्रयास्यति जिनघ्नाः नैव सशय. ।। ३७ ।। कृतिमस्य निगकरण भो लुका शृणुथ खलु । करोमि शास्त्रबोधेन ह्यहकारवशान्न च ।। ३८ ।। जिनेन्द्रप्रतिमायाश्च भवद्भि. मूढमानमैः। दत्तो हि कृत्रिमो दोप. सर्वपापस्य कारकः ।। ३९ ।। म्तवन बदन गानविद्या सामयिक तथा । पठथ भो किमर्थं च पूत्काररवत सदा ।। ४० ॥ यथा तेषा हि पठनात् उत्पत्तिः जायते सदा । शुद्वभावस्य भो लु का. तथा हि तस्य दर्शनात् ।। ४१ ।। कृषिमा स्तवनाद्याग्न प्रत्यक्ष नेव सगय । इमे यथा हि मान्याः स्यु. तथा तेपि वुधर्मताः ।। ४२ ॥ कृतिमन साहो मर्या जिनबिंबस्य मेवनात् । जीवोय लभते सौख्यं शिवपुरमकृत्रिमम् ।। ४३ ॥ जो भव्य जीव अपने भावोको विशुद्धिसे भक्तिपूर्वक भगवान्की प्रतिमाकी पूजा करता है वह मोक्ष सुखको प्राप्त करता है । तो अन्य सुप प्राप्त होनेमें क्या आश्चर्य है ? भगवान्की प्रतिमा समस्त प्रकारके पापोका नाश करतो है यह प्रत्यक्ष मवको अनुभव है ॥ ३१-३४ ॥ अर्थ-2 दिया हो ! जैसे वाणी सुननेसे ज्ञानोत्पत्ति होती है वैसे प्रतिमाके पूजनसे भी पापोका नारा होता है। जो मनुष्य भगवान्को प्रतिमाका दर्शन नहीं करते हैं उनका मुंह भी कभी ज्ञानियोके लिये दर्श- गोग नहीं हो पाता है । जो मनुष्य भगवान्को मूर्तिको निंदा करते हैं वे निगोद आदि दुर्गतिके पात्र हैं।।३५-३७।। - दिया हो ! भगवान को प्रतिमा कृत्रिम है इमलिये नहीं पूजना चाहिये । ऐसा कृत्रिमपने- हो पा र देना ठीक नहीं है। क्योक्ति जिस प्रकार स्तवन, वदन, पाठ, सामायिक, गान- 12-1 पर पाठ गरि जिलने गये हैं ये भी मय किसी न किमी मनुष्य के बनाये हप होनेसे कृत्रिम ही Trianाटोको परोही उमगे तुमको लाभ होता है या नहीं ? कृत्रिम पाठादिको पउनेमे HTETimire TT TITनाने काम नहीं मानना कागद है। मनोनावित प्रत्यक्ष ही कृषिम है। 11. मान, माने इपने जाते हैं। नर पिम सोनोरे पउनेमें लाभ है तो कृत्रिम राजमान्यायालयात , 3 - [ १५४ ] TSeHESHEE मन्यमान्याच्या इत्थं ज्ञात्वा बुधा ये हि जिनविवस्य दर्शनम् । कुर्वति तेहि तत्तुल्यं लभते शाश्वतं पदम् ॥ ४४।। भो लुकाः कृत्रिम पाठ किमर्थं पठथ खलु । त्यजध्व तदपि मूर्खा दोषस्तत्रैव स्याच्च किम् ।। ४५।। गच्छध्व दुर्गतिं या च जिनबिम्बस्य निन्दनात् । अस्माक मानयध्वं च वाक्य यूय हितार्थदम् ॥ ४६ ।। इति कृत्रिम दोष निराकरणं। एकेन्द्रियाभिधो दोषो भवद्भिः स्थापितः प्रभो । बिम्बे तस्य निराकरण शृणुध्वं भो करोम्यह ॥ ४७ ॥ भो ढू व्याः काष्टलेखन्या वनस्पतिसमुद्भवे । पत्रे च मसिनाऽशुद्धे रदितान् वै विभो खला ।। ४८ ॥ जिनाज्ञा विमुखाशुद्धा सुबोधलववर्जिता. । नमथ तान् कथ ग्रन्थान् खलु एकेन्द्रियोपमान् ।। ४९ ।। वदथ सकलाश्चेमे ग्रथा एकेन्द्रिया' स्फुट। किं स्युः पचेन्द्रिया मूढा यूय मे तूर्णतो ननु ।। ५० ॥ जिन प्रतिमा भी भव्य जीवोंको अकृत्रिम मोक्षसुख प्रदान करे तो क्या आश्चर्य ? इसलिये जो भव्य जिन प्रतिमा दर्शन करते हैं वे अवश्य ही शाश्वत सुख प्राप्त करते है ॥ ३८-४४ ।। अर्थ--हे ढूढिया हो ! जो तुम कृत्रिम पाठोंका पढ़नेका त्याग करो तो जिनबिंबके पूजन और उपा- सनाका त्याग करो। अन्यथा मिथ्या दूषण लगाकर अज्ञानी क्यो बनते हो और दुर्गतिके पात्र बनते हो। इसलिये कदाग्रहका परित्याग करो और सद्बुद्धि धारण कर जिनपूजन करो, जिससे लाभ हो ॥ ४५-४६ ॥ अर्थ---हे टूढिया हो ! जिनेन्द्र भगवानको प्रतिमा एकेन्द्रिय है क्योकि पत्थर एकेन्द्रिय होता है और उस पत्थरकी प्रतिमा बनाई जाती है सो प्रतिमा भी एकेन्द्रिय कहलायी। एकेन्द्रियकी पूजा करना अयोग्य है । इस प्रकार जो एकेन्द्रियदूषण जिनप्रतिमा पूजन करने में दिया जाता है वह मिथ्या है । ठीक नहीं है। क्योकि जिस प्रकार जिन प्रतिमा पत्थर आदि को होनेसे एकेन्द्रिय है, उसी प्रकार शास्त्र भी एकेन्द्रिय हैं। शास्त्रके लिखनेकी कलम वनस्पतिसे बनती है इसलिये एकेन्द्रिय है । कागज या ताडपत्र भी एकेन्द्रिय है। वनस्पतिको कूट कर कागज बनाये जाते है इसलिये एकेन्द्रिय है । और ताड़पत्र तो प्रत्यक्ष ही एकेन्द्रिय हे । उसपर सर्व लेख अशुद्ध स्याहीसे लिखे हुए हैं । फिर उन ग्रंथोको क्यो माना जाता है, पूजा की जाती है, नमस्कार किया जाता है । हे ढूढिया हो ! तुम तो पंचेन्द्रिय हो और एकेन्द्रिय शास्त्रको क्यो पूजते हो । शास्त्रसे तो तुम्हारेमें इन्द्रियाँ अधिक हैं। यदि तुम शास्त्रोंको एकेन्द्रिय नही मानते हो तो श्रीजिनप्रतिमाको एकेन्द्रिय किस प्रकार "PuneriSLच्चमाजमजयजयमच्यासमा HE [ १५५ ] निश्चयाद्यदि युष्माक नास्त्येव भो कुमार्गगा. । एकेन्द्रियाणा मान्यत्व पत्रे च रदितान् खलु ॥ ५१ ।। मर्वानपि त्यजव्व च ग्रन्थान् यूय सनातनान् । वय हि जानयिष्यामः इमे सत्या न सशयः ॥ ५२ ।। एकेन्द्रिय च प्रत्यक्ष शारत्र भो मूढमानसा । युय नमथ भावेन जिनविम्ब कथ नहि ।। ५३ ॥ अवीव भवता गन्ये जिनविम्बनिधनम् । कम्मिन् कृते ह्यहो मूर्खा तच्च मा भो खला. स्फुट ।। ५४ ।। गन्येग वाहि मर्वपु जिनविम्बस्य पूजनात् । सप्राप्ता. वह्वो भूता शर्मसततिमजसा ।। ५५ ।। नात्र मदेहो भो लुकमतचारका. । स्याद्यदि कथन यत्र कुर्वीध्व जिनपूजाम् ॥ ५६ ।। यामा क गर्वग्रन्याना भवद्भि खलु लोपनम् । कुरुष्व यद्यसत्या. स्यु कुरुध्व न विलम्बनम् ।। ५७ ।। ति युवाह ते का गये व लिसित ननु । अतोस्माक च मान्यत्व गथाना नात्र सशय ।। ५८ ।। जिनविम्नति मर्या. नहि घटति मु दर । यदर्शनात् क्षय याति पापभूद्रा. कुदु खदाः ।। ५९ । पश्य HARELHI-SHAHainew मानते हो । त्योति शास्त्रोमें एकेन्द्रियपना ताड़पत्रपर कलमसे लिखे होनेसे प्रत्यक्ष दीख रहा है। जो एकेंद्रिय गोपी गम शास्त्रोको मान्यताको छोड देते हो तो हम समझेंगे कि आप बरावर एकेन्द्रियको जानते हो और | जो एकेन्द्रिय शास्त्रोको छोड़ नहीं सकते तो समझना चाहिये कि तुम एकेन्द्रियको पूजा करते हो ।। ४७.५२ ।। *-जास्त एलेन्द्रिय प्रत्यक्ष हैं । जो तुम एकेन्द्रिय शास्त्रको पूजते हो तो जिनप्रतिमाको क्यो नही पा को मारे कौन-फोनमे शास्त्रमें प्रतिमाको पूजाका निषेध किया है। तुम्हारे बहुतसे ग्रंयोमें जिन पतिमा जाना है। जिनपूजन करनेमे बहुतमे लोगोने अपना आत्मकल्याण किया है। फिर भी तुम frinो। यह यो ? यदि गयोमें जिन पूजन करना लिया हो और तुम उम गन्यको मान्य करते हो गोरिन भी माना लगे अन्यमा सव पन्यता लोप करो ॥ ५३-५७ ।। 14--- मनगर कपा(डिया) ने कहा कि हमें गन्य मान्य है जो गंयोमें लिखा है सो भी मान्य ... 23 म -- • गा ! जिन प्रतिमा बपि सुनाता नहीं देती है तो भी जिनेन्द्र भगवान्फो मतिमें वह २ -- frगों के मार, पाप निमारमे नाकाहो पनापमान हो जाते हैं ।। ५२ ।।
[ १५६ ] LEASHISHORESweiveNEAPSARASHI इत्याहु पुन. ग्रथ च पठति बोधधारक । जायते पठनात्तच्च सुबोधश्च ततः शिवः ।। ६० ।। जिनबिंबस्य भो लु का यो व्रती शुद्धधीवंशी । करोत्येव प्रपूजा स लभते परमं पदम् ।। ६१ ।। भो लु का जिनबिंबस्य पूजनात् वदनात् खलु । आर्तरौद्रकुध्यानस्य नाशो यात्येव तस्य वै ।। ६२ ॥ रक्ताक्षा क्रोधपूर्णागा यथा काकोदरोत्कराः । चातिरतदूर याति वैनतेयस्य दर्शनात् ॥ ६३ ।। तद्वदेव जिनेन्द्रस्य दर्शनात्पापपन्नगा । नराणा च प्रयात्येव ह्यनुक्रमाद्भवेत् शिवः ।। ६४ ।। भवद्भि जिनबिंबस्य कृता च यदि भो खला । निंदा किमर्थ त चैव मानयथ जिनेश्वरम् ।। ६५ ॥ जपथ त हि भो लु का. प्रतिघन जगत्पतिम् । तमेव निंदयथोच्चै. अस्योत्तर वदथ मे ।। ६६ ।। एवं वदथ मा मूढाः मेऽबा वध्यापि स्यात् खलु । मदोन्मता ब्रुवत्येव सुधियो नो क्वचिदपि ॥ ६७ ।। अधोलोके च सर्वत्र कृत्रिमाकृत्रिमा अपि । जिनबिंबाः सुरै. पूज्या सति वै शिवदायका. ॥ ६८ ।। ऊर्ध्वलोके च सर्वत्र विमानेपु पृथक् पृथक् । जिनबिंबाः विभातिस्म निलिपाधिप वदिताः ।। ६९ ।। अर्थ----टूढ़ियाने यह सुनकर कहा कि देखो ग्रन्थोंके पढ़नेसे तत्काल ही बोध होता है और उससे मोक्ष होती है तो उसी प्रकार हे ढूंढिया हो! जिनेन्द्र भगवानको पूजासे सम्यग्दर्शनको प्राप्ति और ज्ञानकी विशुद्धि होती है । जिससे मोक्षकी प्राप्ति होती है ॥ ६०-६१ ॥ अर्थ-हे दूढिया ! जिनेन्द्र भगवान्की परमशांत दिव्य मूर्तिको देखनेसे आर्त-रोद्र ध्यान नष्ट हो जाते हैं। और परम शांतता प्राप्त होती है । जिनके नेत्र लाल हैं क्रोधसे शरीर कंपित हो रहा है ऐसी अवस्था शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। जैसे गरुड़को देखकर सर्प भाग जाते हैं । उसी प्रकार जिन भगवान्के दर्शन करनेसे पाप रूपी नाग भी तत्काल विलीन हो जाते हैं । और क्रमसे मोक्षको प्राप्ति होती हे ।। ६२-६४ ॥ अर्थ-हे दूढिया हो ! आप जिनेश्वर देवकी मूर्तिकी तो निन्दा करते हो फिर भी जिनेश्वर देवको ही पूजते हो, मान्य करते हो, स्तवन पढ़ते हो। यह आश्चर्य है । ऐसा क्यो? मुझे इसका उत्तर दो। यह बात तो अपनी माताको वॉझ बतलानेके समान है। इस प्रकारको क्रियाएँ मूर्ख तथा उन्मत्त पुरुष ही करते हैं.६५-६७॥ अर्थ-अधोलोको कृत्रिम और अकृत्रिम जिन प्रतिमा देवोंसे पूजित मोक्षको प्रदान करनेवाली शाश्वती विराजमान है। इसी प्रकार ऊर्ध्व लोकमें भी अकृत्रिम जिन प्रतिमायें सदा विराजमान है । और रवाMitoredentiareeurariteroetreenawarent HEMEEN TASHESHI ।
[ १५७ ] पृच्छामि भवता क्स्य ग्रथानुसारत कृता । उत्थापना हि बिम्बस्य यूय वदथ तच्च मे ।। ७० ।। कुपक्ष च त्यजध्व भो मे वाच शिवकारणं । कुर्वीध्व शिववाछा चेत् मा स्युश्च जैनघातका ॥ ७१ ।। भो ढूढ़या पुन एव च वय हि साधवो भुवि । बूथ वे मुढलोकानामग्रे यूय खलाः स्फुट || ७२ ।। साधूनामेकलक्ष्मापि भवता नैव दृश्यते । साधुजनस्य चिन्ह वै शृणुध्व कथयाम्यह ।। ७३ ।। वाद्याभ्यतरद्वद्वेन वर्जित. गीलभूपित. | सकलश्रुतवेत्ता च जिनमार्गप्रकाशकः ।। ७४ ॥ पनिंदातिगो धीरो देहे निर्ममता वगी । ऋतुनिकायजोवाना रक्षको मन्युवजितः ॥ ७५ ।। गुद्धाचारग्न सद्गी मायामानविखडक । मुनिश्रावकधर्मस्य देशक सयमी दमी ।। ७६॥ जान्गजो लोभनिर्मुक्त. सर्वजनप्रिय शुचि. । सस्कृतप्राकृतवेत्ता मनोक्तिपथवर्जित ।। ७७ ।। उनको विमानवामी देवगण पूजते है। फिर आपने जिन प्रतिमाको पूजन नही करना ऐसा कौनसे ग्रन्थसे निषेध किया है। जब कोई भी ग्रन्थ जिन प्रतिमाको पूजन करनेके निषेधका नही मिलता है तब फिर पक्षपात क्यो फरना चाहिये। यदि मोक्षको इच्छा है तो कुपक्ष छोडकर भगवान की पूजन करो व जैनधर्म घातक मत वो ॥६८.७१ ।। परस्त्यमारल्या ग प्रकार सर्व दोष निराकरण किया । अब दूंडकोके दोप- - लिगा हो । एक बात तुपमे पूछते हैं। वह यह कि तुम अपनेको मूद लोगोमें साधुके नाम पर करते हो। तुम्हारा ऐमा करना ठीक नहीं है । साधुजनस्य चिन्ह में कहता हूँ, सुनो ॥७२-७३।। ५-'डिया हो। तुममें गारपनेहा एक भो लक्षण नहीं है । न कोई ऐसा चिह्न तुम्हारेमे वोग्यता 2माना गाय कि तुम गाथ हो । माधुका लक्षण-जियो बाह्य और आभ्यतर परिग्रहका READI 177 शास्त्रोके पारगन, जिनमार्ग प्रकाशक, परनिंदामे रहित, बोर, वीर, inोमिंग, मानोर इन्मियो विजय करनेवाले, शात, पद कायके जीवों को क्या पालने. 14. TRI.: नोना, मान, मापा, लोम और कामादि विकार रहित, मनि व पावक, .... जागा नानने, परम पवित, मत प्रारुन जाता, मनके अनुमार मार्ग । १५८ । PSI-SHIRSHIP शुद्धदृग्ज्ञानवत्तस्य धारको निर्मदो गुणी । कृती पूज्यो बुधीधैश्च मिथ्यात्वपथभजक ।। ७८ ।। अनेकातनयैर्युक्त ध्यानी मौनी सुवीर्यवान् । पचाक्षवारमातगनाशने हरिसदृश. ।। ७९ ॥ जिनाज्ञापालक सोम्यो भयसप्तविवर्जित । अष्टाविंशतिमूलादिगुणाना पालने क्षम. ।। ८० ॥ इत्याद्यन्यमनोज्ञेश्च गुणैर्युक्तो भवेत्खलु । य कश्चित्कथ्यते सहि साधु. माधुजनैश्च भो ।। ८१ ॥ गुणाना चैव एतेपा मध्ये ह्येकोपि नास्ति वै । भवता मूढचित्ताना यूय पश्यथ निश्चयात् ।। ८२ ।। हसा हसा. हि भो मूर्खा बका बकाश्च सुदरा । यय च बकनुल्यापि नो सति ध्यानमानसा ॥ ८३ ।। क्रियालेशोऽपि नास्त्येव भवता च खलात्मनाम् । यत्र नास्ति क्रियाशुद्धिः धर्मोऽपि तत्र नास्ति वै ।। ८४ ।। यासमा Seey AyesmanyaNESSHESHWASHIMeil न्मजाजच्याच से रहित, समस्त तत्वके वेत्ता, शुद्ध ज्ञान-दर्शन और चारित्रको धारण करनेवाले, निर्मद, गुणी, मिथ्यामार्गका नाश करनेवाले, परम ध्यानी, तपस्वी, समस्त प्रकारके भयोसे रहित, परम सोम्य, जिनाज्ञा प्रतिपालक और अट्ठाबीस मूल गुणको पालनेमे समर्थ गुणी पुरुषको साधु कहते है । इत्यादि अन्य भी सुन्दर गुणोसे युक्त जो कोई है वे साधुजनोके द्वारा साधु कहे गये है ॥ ७४-८१ ॥ अर्थ--हे ढूढिया हो ! तुम्हारेमें उपर्युक्त गुणोंमेंसे एक भी गुण नही है । अतएव तुम किसी प्रकार भी प्रकार साधु कहलाने योग्य नहीं हो । जो गुण सहित होता है वहां साधु है । जिसमें गुण नही हैं वह साधू भी नहीं है ।। ८२ ॥ अर्थ-ढूंढिया हो ! हंस हंस ही होते है। बगुला बगुला ही है । यद्यपि वगुला भी देखनेमें सुन्दर है तथापि बगुला हंस नहीं हो सकते। और तुममें तो बगुलाके समान भी ध्यान नहीं है ॥ ८३ ॥ अर्थ-हे टूढिया हो ! तुम्हारे चारित्रका लवलेश मात्र भी पालन नहीं है, न तुम्हारेमें पवित्र क्रियायें है । जहॉपर क्रियाशुद्धि नहीं है वहॉपर धर्म कैसे रह सकता है ? अर्थात् क्रिया शुद्धि जहाँ नही वहाँ धर्म भी नहीं ॥ ८४ ॥ भावार्थ-क्रियाकी शुद्धि पालन करनेपर ही धर्मका पालन करना समझा जाता है। जो क्रियाओंका पालन नहीं करता है धर्मकर्म विहीन है।
[ १५९ ] प्रत्यक्ष भवता मूढाः म्लेच्छाचारो हि दृश्यते । अतः स्यु तत्समा यूय भ्रष्टाचारस्य पालनात् ॥ ८५ ॥ जिह्वाम्वादेन युष्पाभि सर्वाचारः सुशोभनः । त्यक्त्वात सर्वधर्मोपि मुनिगृहस्थगोचरः ।। ८६ ॥ प्रामुक प्रामुक कृत्वा सर्ववस्तुकदम्बक । भवद्भिश्च क्रियाहीनै सर्वं ह्यगोकृतं ननु ।। ८७ ।। भक्ष्याभदयविवेकोपि युज्माक नास्ति किंचन। दृश्यते श्वपचो यद्वत् तद्वद् यूय न संशय. ।। ८८॥ जातिहोना कियाहीना, जिनविम्बस्य निंदका । यूय च सर्वहीना स्युर्यथा म्लेच्छाः तथा खलु ।। ८९ ॥ गाद्यामाग्रस्य भेदो न म्लेच्छाना च खलात्मना । यथा स्याकिचनो लुका युष्माकमपि सो नहि ।। ९० ॥ म्बम्वधर्म रता सर्वे स्वम्वदेवम्य पूजकाः। यूय हि जिनधर्मस्य नागका. स्युः न संशयः ॥ ९१ ।। पुन पन्छामि युष्माकं किमर्थ मुखवधन । अकुरुतेति सश्रुत्वा आहुश्च मावरीयुताः ॥ ९२ ।। मानना जोवरक्षायं बासमा वकवधन । कृत च सर्वजीवस्य पालकारच वय खल ।। ९३ ।। अर्थ-हे दूढिया हो ! तुम लोग प्रत्यक्षमें ही गन्दे हो, म्लेक्षाचार सम्पन्न हो । तुम्हारे आचरण एक- बम गन्दे ओर मलोन र इलिये म्लेक्षोके समान ही भ्रष्टाचारी हो ॥ ८५ ॥ अर्थ-- दू दिया हो । तुमने जिहाके स्वादसे समस्त उत्तम आचरणको छोड़ दिया । ओर जो शुद्धा- शामिला मन तो प्राशक है, प्राश है ऐसा कह कर सेवन किया। क्रियाहीन होनेके कारण तुम लोगोने मनि मेन करने में मी विचार नहीं किया, इसलिये तुम प्रत्यक्ष हो म्लेक्षके समान हो ॥ ८६-८७ ॥ --- नरिया हो । तम्बारेमे भक्षाभक्ष सानेका जरा भी विवेक नहीं है। जैसे चाडालके आचरण नमाने है। तम्हारी न जाति है, न क्रिया है। जिनप्रतिमाको निंदा करनेसे तुम ओर भी पापी हो रहे ATI IRRITI विचार नहीं रहनेगे तुमतो या कहे सो ममसमे नही आता है।।१८.८९॥ r:-.' inो । 'I-II मन जिम यमको पालन करता है वह अपने देव की पूजन अवश्य । पाने को सपने शर्मका नाश करते हो ।। ११ ।। - मार पायो ते हो। उनर-तो के लिये मुगपर पाटी | Pram.2 नीमको रक्षा के कारनेगा। नगगे जीव नहीं मरे उनिमा ":irat T? दागे मागे ताग निभाजी हिंगा होती है तो तुम अपने राजच्यामध्यमारामारामारामा । 1 t , 1. है [ १६० ] Prese तनो हि नवहारा' स्यु भो लुका. तान् कथ खला । बधयथ सुचेलेन जीवाना रक्षणाय नो ॥ ९४ ॥ बधयथ नवद्वारान् लु का त्यजथ भो खला । बक्रस्य बधन नून यूयं सत्या यदि खलु ।। ९५ ।। वासोयोगात्समीरस्य कोलालस्य च निश्चयात् । जीवोत्कराश्च आस्ये वै उत्पद्यंते खलाशया ।। ९६ ।। तत्रैव ते च म्रियये सदा कालेत्र संशय । नो यूय पश्यथ लुका ग्रथेपु सकलेपु च ।। २७ ।। अतो यूयं च प्रत्यक्ष निशाचरसमा खला । जीवाना भक्षणात् स्यु हि ते हि जीवस्य भक्षका ॥ ९८ ॥ रक्षथ नैव रात्री च प्रासुक चोदक खलु । यदि स्यान्मलमूत्रादेरुत्पत्तिः मा खला. स्फुट ॥ ९९ ।। वदथ कुरुथ किं च तत्र तत्शुद्धये तदा । किं न कुरुथ भो लु का यदि श्वपचसोपमाः ॥१०॥ कथ जपथ नोकार सामायिक पठथ च । अशुद्धे सर्व व्यर्थ रयात् शुचि' सर्वत्र समता ।। १०१ ।। नव द्वारोंको क्यों नहीं बाँधते हो ? सच्चे जीवरक्षक तब ही तो हो सकते हो जबकि तुम अपने शरीरके नव द्वारोंको बाँधकर सब प्रकारको वायुओंका संरोध करो। अन्यथा एक मुखपर पाटी बाँधकर विशेष म्लेक्षाचार क्यों फैलाते हो और जेनधर्मको घृणापूर्ण बनाकर निन्दाके पात्र होते हो ॥ ९२-९५ ॥ अर्थ-हे ढूंढिया हो ! मुखपर पाटी बाँधनेसे पाटीमें थूकके संयोगसे और वायुके वेगसे अगणित जीव निरंतर मुखमें उत्पन्न होते है तथा पाटीमें उत्पन्न होते है । वे वहाँपर ही मरते है। यह बात प्रत्यक्ष दीखती । मुखपर पाटी रात्रि दिवस निरंतर बँधी रहनेसे रात्रिमें भी जीवभक्षणका पाप उत्पन्न होता है। दूसरे जीवोंका भक्षण करनेसे तुमको निशाचर क्यों नहीं कहा जाय ? ।। ९६-९८ ॥ अर्थ-हे टूढिया हो ! रात्रिमें जिस समय तुमको मल-मूत्र होता है तब क्या करते हो ? क्योंकि तुम लोग रात्रिमें प्राशुफ (गर्म) पानी भी अपने पास नहीं रखते हो। और बिना पानीके मलमूत्रको शुद्धि किस प्रकार करते हो ? ॥ ९९ ॥ अर्थ---रात्रिमें मलमूत्रकी शुद्धि करते हो या नहीं ? जो करते हो तो पानी बिना फिससे ? ( क्या मूत्रसे मलविष्टाको शुद्धि करते हो ?) यदि मलमूत्रकी शुद्धि करते हो तो अशुद्ध मल-मूत्रसहित शरीरसे सामा- यिक किस प्रकार करते हो ? जप किस प्रकार करते हो ? अशुद्ध शरीरसे जप, तप, सामायिक आदि क्रियायें को जॉय तो सब व्यर्थ हैं । अरे ! चांडाल भी तो अपने मूत्रसे अपनी शरीरको शुद्धि (मल त्यागको शुद्धि) नहीं राजार [ १६१ ] ईदृश्य निंद्यकर्म च नो कुर्वति खलाः स्फुट । मातंगापि क्रियाहीना व्रतकर्मविवर्जिता ॥ १०२ ।। जनगमोपमा य्यं किं स्यु. भो जिननिंदकाः । नो सति तत्समाप्येव तद्वीनान्नात्र सशय ॥ १०३ ।। भो म्लेच्छा उदृश किं स्यात् माधुजनस्य लक्षण । वय हि साधवो लोके इत्यसत्यं वदथ मा ॥ १०४ ।। अतो भो कुक्रिया त्यक्त्वा क्रिया शुद्धा सुखास्पदा । पालयत प्रयत्नेन जिनवक्रसमुद्भवाम् ॥ १०५ ।। यायाथ कुगति मूढा ययमाचारवर्जनात् । मा भजथा विवेक च धर्ममार्गस्य नाशकाः ।। १०६ ।। जिनवित्र जिनागार जिनसिद्धातपुस्तकम् । जिनमतस्थ दयाभाव जिनयात्रा जिनोत्सव ।। १९७ ।। जिन प्रम प्रभोर्वाचं धर्माधिमोमसदृशम् । इत्याद्यान् येच लोकाश्च निंदयत्येव ते मताः ।। १०८ ।। रेच्छाच जिनधर्मभ्य नाशकाश्च जिनागमे । इति ज्ञात्वा कर्तव्या निंदा विवस्य भो खलाः ॥१०९।। उन्युपदेशमम्माभियंदत्तो भवता खलु । अहकारमदान्नैव तद्धि भद्रार्थमेव च ।। ११० ॥ तिकोने यदि वाला चेत् युष्माक स्यात् ग्वलाः स्फुट । तदा कुरुय विवस्य निंदा धर्मस्य नाशिनी ।। १११ ।। Mistradamentet e करता है तो फिर तुम किस प्रकार करते हो? यह तो प्रत्यक्षमें चांडालकर्मसे भी निंद्य कर्म है । ऐसे कर्मको फरनेपालको माधु किस प्रकार मानना ? भला यही साधुके लक्षण है ? सत्य-सत्य कहना। इसलिये कुत्सित आमरणाको बोकर मत्य और पवित्र आचरणोंका पालन करना सीखो ॥ १००-१०५ ॥ -- डिया हो ! मायाचार पायसे दुर्गतिके पात्र क्यो बन रहे हो ? विवेकका परित्याग कर जन्मापो नमान धर्ममार्गका लोप कर अपने जीवनको पतित क्यों बनाते हो ? ॥ १०६ ॥ -- पिया हो ! जिनबिंब (जिनप्रतिमा) जिनमदिर, जिनवाणी, जिनधर्म, जिनयात्रा, जिनमहो- मर, FTTTT महोगा, दिनप्रतिष्ठा इत्यादि श्री जिनयमके अग उपागोंफो जो निन्दा करते हैं वे नीच हैं । frAITRA TET शितिन रमले नाशक म्ने होगे । परतु तुम लोग तो म्लेच्छजन्मा नहीं होकर भी * .miri , उनि जो तुमको अपनी भलाई करने को इन्छा है तो निन्दा करना छोड़ देना It 1 Pri. rifनयता न करना नाहिये । यह उपदेश आपके हित के लिये लिया है। 18. Trtritiयिा। यदि आपको गिोद गर्वायमें नहीं जाना है, तो निनयमको निंदा IT ॥ १७.११? ।। -- - [ १६२ ] बीजामाच्याजव्यमय चालय जयमालामाल मारभार अर्थ- । जिनबिंब नरा येहि दृष्ट्वा कुर्वति भोजनम् । ते मता ह्यागमे मा पशुतुल्याश्च तदृते ॥ ११२ ॥ दर्शन जिनबिंबस्य सर्वांहस्यैव नाशदम् । दर्शनाज्जायते मोक्षो तदृते सर्व नि फलम् ।। ११३ ।। सर्वातकविनाशो वै जानते जिनदर्शनात् । सर्वे शोका प्रयात्येव नाशता च तदीक्षणात् ।। ११४ ।। जिनेक्षणसम धर्म लोके नात्स्येव चापर । अत. पूर्व कुरुध्व वै जिनबिंबस्य दर्शनम् ।। ११५ ।। लोकेऽस्मिन् जिनदर्शनोपमफल नैवावर सज्जना., जीवा ये तरिता. तरचित तथा वाहि तरिष्यति भो। ते सर्वे जिनदर्शनेन सुखद सर्वातिसहारिणा, ज्ञात्वेत्थ मनुजोत्तमा प्रतिदिन त हि कुरुध्व मुदा ।। ११६ ।। प्राप्नोत्येव बुधोत्तमाः जिनपते सदर्शनात् मानवो, मोक्ष शर्मनिकेतन मुनिवरैवंद्य सदास्थ वरम् । भव्योऽय शुभध्यानधर्मनिरतः पापालिसन्नाशनात्, कुर्वीध्वं प्रतिवासर सुखकर तद्दर्शन भो ह्यतः ॥११७।। अर्थ हे भव्यजीवो ! जो मनुष्य श्रीजिनदेवके दर्शन क्रिया कर भोजन करते है वे आगमानुसार मनुष्य है । तथा जो बिना दर्शन भोजन करते हैं वे पशुके समान है ॥ ११२ ॥ -श्रीजिनराजके पवित्र दर्शन करनेसे समस्त पापोका नाश हो जाता है। और क्रमसे मोक्षसुखकी प्राप्ति होती है। भगवान्के दर्शनके बिना समस्त व्रतपालन जप-तप व्यर्थ है ॥ ११३ ।। अर्थ--श्रीजिनेन्द्र भगवान्के दर्शन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट हो जाते है। समस्त प्रकारके शोक नष्ट हो जाते है । प्रभुके दर्शन सिवाय अन्य कोई धर्म ही नहीं है । इसलिये नित्य प्रति भगवानका दर्शन कर अपने जन्मको पवित्र और पुण्यरूप बनाओ ॥ ११४-११५ ॥ अर्थ संसारमें श्रीजिनेन्द्र भगवान्के पवित्र दर्शनके सिवाय अन्य कोई भी वस्तु उत्तम नहीं है, दुर्लभ नहीं है सुखद नहीं है, हितकर नहीं है । इसलिये जिनेन्द्र भगवान्के दर्शनसे भव्य जीव संसार समुद्रसे पार होते है, हो गये हैं और होगे। भगवान के दर्शन सिवाय संसारसे पार होनेका दूसरा मार्ग ही नहीं है । समस्त प्रकार को पीडाको नाश करनेवाला यह प्रभुका दर्शन समस्त जीवोंको सुखकारी है ऐसा जानकर हे भव्यजीवो ! नित्य प्रति भगवानका दर्शन-पूजन-व्यान और अभिषेकादि विधान करो ॥ ११६ ॥ अर्थ--जो भव्य जीव भगवान्के दर्शन करते है उनको मोक्षके सुख शीघ्र ही प्राप्त होते है। वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर मुनियोसे वंदनीय होता है । इसलिये भगवान्का दर्शन नित्य प्रतिदिन करना चाहिये ॥११७ EMPERAMSARASHISeare- [ १६३ ] स्मानामा ये कुर्वत्यवमाः सुराविपगणै पूजस्य बिवस्य वे, याता याति निकोतिपु खलु सदा यास्यति भो सज्जनाः। निंदा दुखप्रदायिका मुनिवरैया न कुमानजैः, कुर्वीध्व च ह्यतः सदा सुखकर भक्ति च सद्वीक्षणं ॥११८।। इत्यं वे परपक्षस्य भव्या. किंचित् धिया मया । निराकरण कृत चैव जिनागमानुसारतः ।। ११९ ॥ यत्प्रोक्ता वीरनाथेन श्रेणिक प्रति भो वुधाः । भाविकालभवा वार्ता तथैव पश्यथाशुभा ।। १२० ।। ईदृशा धर्ममार्गग्य नागकाञ्च खलाशयाः । ज्ञानलेशोज्झिता क्रूरा भविष्यति न सगय ॥ १२ ।। भव्यभावयुता. स्वल्पसख्याच्या मगधेश्वर । विसंख्याढ्या नरा' तस्मिन् भविष्यत्येव नेतराः ॥ १२२ ।। 11 अथ व्रतप्रकरणम् पुनगह शृणु भूप तेपा भाविसुखाप्तये। दर्शयामि शुभं मागं शिवो यस्माद्विजायते ।। १२३ ।। अष्टाह्नि काविधि चैव संपत्ति जिननामजाम् । शिवदा मेघमालाख्या सव्रत पल्यसज्ञकम् ।। १२४ ।। शातद पाखनाथाकमादित्याख्य च मह्तम् । सर्वपापेभसिंहाभ सर्वांतकविनाशकम् ॥ १२५ ।। जोनिवरनामान दशलक्षणसज्ञाम् । पोडशकारणाख्य च जिनगोत्रप्रदायकम् ॥ १२६ ।। मेक्ति कियातत नर्वतोभद्रसज्ञकम् । विमानपक्तिसन्नाम शातकुम्भ द्विकावली ॥ १२७ ।। अर्थ-देवोसे पूजित ऐसी जिनराजको प्रतिमाको निन्दा करनेसे जीव निगोदमें जाते हैं, जायंगे और जा रहे हैं। इसलिये निन्दाको छोकर भगवान्को भक्ति करो जिससे सर्व सुखको प्राप्ति हो । ११८ ॥ आग प्रकार टूडिया मतका निराकरण जिनागमके अनुसार किया ।। ११९ ।। गर्ग--1ोर भगवान्ने श्रेणिक महारानसे कहा कि पचमकालमें धर्मको नष्ट करनेवाले बहुतसे मनुष्य नरोगे । पर मय भागोको नारण करनेवाले कम होगे। यह कालका माहात्म्य है ।। १२०-१२२ ॥ 'जोवो हित के लिये शुभ मार्ग बतलाते है। जिससे शिवमुतको प्राप्ति 11 TTTTT नाम या नाते है जिनके पालन करनेसे भा जीपोतो स्वगं ओर मोक्षको प्राप्ति -- TIP FITUTमनिषा २ मेघमालावत ३ पयविधानमन ४ रविवारवा ५ जेठतिनवर- TE21 मारा = मेवपंक्ति २ पिपनाशत् क्रिपात १० सर्वतोभा मत ११ विमान, ।
[ १६४ ] EareAesyresenreweHereSROSHO सिंहादिविक्रम वृत्त त्रय ससारनाशकम् । नक्षत्रमालावृत्त च रत्नावली सुशातदाम् ।। १२८ ।। वृत्त कनकावलो चैव मोक्षपदस्य दायकम् । उल्लीनोल्लीनसबत जिनैक प्रतिप्रोपधम् ।। १२९ ।। पचकल्याणवृत्त च कर्मदावाग्निवारिद । शिवकुमारवृत्त च पुष्पाजलिव्रतोत्तमम् ॥ १३० ।। रत्नत्रयाभिध वृत्त सर्वकर्मारिनाशकम् । यस्यैव पालनाद्राजा मल्लिनाथोभवज्जिन || १३१ ।। इत्याद्या बहव सति जिनागमे जिनेश्वरै । प्रोक्ताश्च चेलनाकात ह्येतच्च शिवदायका. ।। १३२ ।। शास्त्रोक्तविधिना भूप ये करिष्यति मानवाः। द्वित्रिभवे हि यास्यति शिवेत्ययादिवजिते ।। १३३ ।। एषा मध्येस्ति राजेन्द्र कर्मादिदहनाभिध । ब्रत्तो हि सर्वकर्माग्नेः दाहने पावकोपम ॥ १३४ ॥ तत्कथ चास्य सर्वं हि विधिमाह जिनश्च सः । समाधिना शृणु त्व च सर्वभव्यहिताप्तये ॥ १३५ ।। कर्माण्यष्टौ महादु खदायकानि खलानि च । अष्टाधिचद्रसंख्याढ्य ज्ञेया प्रकृतयः खलु ।। १३६ ॥ सर्वे पिंडीकृता ह्येते सर्वशर्मप्रदायकाः। ऋतुपचेदुसख्याध्याः सजाता मगधेश्वर ।। १३७ ।। एषा कर्मप्रकृतोनामेकैकोपरिप्रोपधाः । शतैकपचपट्सख्याप्रमाः कार्या. शिवाप्तये ॥ १३८ ।। एते सर्वे मयाख्याताः प्रोपधा कर्मनाशकाः। एकातरेण कर्तव्या मनोमलविभजका. ॥ १३९ ।। Puuurrenामाच्याच मामा पंक्तिवत १२ शातकुम्भवत १३ द्विकावलीवत १४ सिंहविक्रमक्रीडनबत १५ रत्नत्रयव्रत १६ कनकावली १७ नक्षत्रमालावत १८ रत्नावली १९ बृहतकनकावली २० उल्लीनोल्लीनव्रत २१ जिनप्रोषधवत । पंचकल्याणव्रत २२ पुष्पांजलिव्रत २३ और सर्वकर्मोंका नाशक रत्नत्रयव्रत है। जिस व्रतको करनेसे राजाका जीव तीर्थकर मल्लिनाथ हुआ । इत्यादि अन्य भी बहुतसे उत्तमोत्तम व्रत श्री जिनदेवने भव्य जीवोंके कल्याणके लिये बतलाये है, इन व्रतोसे कितने ही ऐसे उत्कृष्ट व्रत है कि जिनका सेवन करनेसे दो तीन भवमें हो मोक्षका सुख प्राप्त होता है ॥ १२४-१३३ ॥ अर्थ--उपर्युक्त व्रतोमें एक कर्मदहन नामका सर्वोत्तम व्रत है। जो भव्य जीवोंको सर्व प्रकारको संपत्तिका प्रदान करनेवाला और मोक्षके सुखको देनेवाला है। कर्मदहन व्रत कर्मोंका समूल नाश करनेवाला होनेसे शीघ्र ही सिद्धपदको प्रदान करता है। मनोमलका नाशक यह व्रत भव्यजनोको एकान्तर से करना चाहिये। कर्मोको समस्त उत्तर प्रकृति १४८ है। उनमें आठ कर्मको मूलप्रकृति मिला देनेसे कुल १५६ रामजन्यात । [ १६५ ] प्रोषधाना विधिं वक्ष्ये त्व शृणु शर्मदायक ! विधिना क्रियमाणोय शिवशर्मप्रदायकः ।। १४० ॥ पूर्वस्मिञ्च दिने सेव व्रती चोत्याय शुद्धधीः । तल्पात् सामायिकं कृत्वा मंत्र जप्त्वा जगन्तुतम् ।। १४१ ॥ पश्चाच्छुद्वोदकेनैव स्नात्वा यत्नेन सिद्धये । वौतवस्त्रानि शुक्लानि सधार्य जिनमदिरे ।। १४२ ।। गत्वा दवा जिनेन्द्रस्य विप्रमाहि प्रदक्षिणा। नत्वा चाष्टागविधिना तत्पादाब्जौ महुमुहुः ॥ १४३ ॥ नतो जिनेन्द्रबिंब च स्थापयित्वा वरासने । छत्रचामरसच्छोभा कर्तव्या तत्पुरो मुदा ॥ १४४ ।। शुद्धोदकेक्षुमदाज्यदुग्धदधिरसोत्करै. । स्तपनीयं च त पश्चात्सर्वोपधिरसैर्वरैः ।। १४५ ॥ एकसौ छप्पन भेद हो जाते हैं। बस जितने भेद कर्मोके होते है उतने ही भेद इस कर्मदहन व्रतके होते हैं ॥ १३४-१३९ ॥ भावार्य--१५६ प्रोषधोपवास इस व्रतमें किये जाते है। एक-एक कर्मप्रकृतिके नाश करनेके लिये एक- एक प्रोपयोपवास करना चाहिये । १५६ प्रोषधोपवास इस व्रतमे किये जाते हैं। और इसीलिये इस व्रतका सार्थक नाम कर्मदहन व्रत है। ये प्रोषधोपवाग एकातर ( धारणा-पारणा ) से करना चाहिये । प्रोषधोपवासको विधि तुमको कहता हूँ उमे मनी । विभिने किया गया यह व्रत अनत सुखको देनेवाला है । --तमंदरनतकी विधिवत धारणाके दिवससे ही मनको सब प्रकारको शल्यको निकालकर गुरुके गोगा पराकने । धारणा दिस एकाशन करे । परिणामोको शात रखकर यथासाव्य विषय कपायो हा । सानां पारण करे । शुद्ध आहार निरतगय ग्रहण करे ।। १४० ॥ -- दिवस प्रात काम 376र मामायिक करे । पश्चात् शौन क्रियासे निवृत्त होकर शुद्ध ... TER: R !! रामफेर स्त्रोको कारण करे । और अपने घरमें उत्तमोत्तम भगवान्के पूजनat it ... Amit (अम, प, दरी, चन, ग्यानि, शग, फाल, फूल, केशर, कपूर, ... माना हवाली पूना भाराने कर पश्चात् भी जिनगम 7. 1717 ATो। पचान तो 7 पर प्रमका गानुपात्र र नमस्कार ::::। शामलको याममान विगतमान गरे । पश्नान गंगटोपर - - ~~ . A + . S [ १६६ ] RRC जसलग्नान कणान् सर्वान् दूरीकृता प्रयत्नत । स्निग्धेन शुभ्रवस्त्रेण प्रभोर्गात्रस्य वा तत ॥ १४६ ।। जन्मात्ययजराणा च नाशार्थ श्रीगते पुर। दातव्याश्न त्रयो धारा. स्वर्णभृगारनालकात् ॥ १४७ ।। ससारातपघातार्थ काश्मीरागुरुजै रसै । लेपनीय जिनेन्द्रस्य पादयोर्लेखपूज्ययोः ।। १४८ ।। जिनपादारविंदागे करणीया मनोहग. । पुजाश्चाक्षतसदोहेरखडस्थानलब्धये ।। १४९ ।। पद्ममदारसत्कुन्दबकुलाद्याश्च सुन्दरा । पुष्पोत्करा जिनेन्द्रस्य पादोपरि सुमोदका ॥ १५० ।। सवरारिविनाशाय धर्तव्या जीववजिता । अस्पृश्य श्च कुमयैश्च निश्छिद्रा पतिता न की ॥ १५१ ।। व्यजनैर्मोदकै खज्जै रसैर्नानाविधेरै । ज्ञाल्यन्नैजिनपादाब्ज ढोकनीय सुखाप्तये ॥ १५२ ।। दीपै पै फलोधैश्च पूजनीगो जिनेश्वर । महाLण ततस्त च अनर्घ्यपदप्राप्तये ।। १५३ ।। कृत्वैवं जिनसत्पूजा पश्चात्पुष्पाजलिमुदा । दातव्या शातिपाठ च करणीय प्रभोः पुर. ॥ १५४ ।। wawithalasan भगवान्को विराजमान कर चमर-छत्र आदिसे दिव्य शोभा करे। पश्चात् इक्षुरस, घृत, दूध, दही, सर्वौषधि रससे मंत्रपूर्वक अभिषेक करे । पश्चात् पूर्ण कलश (कुम्भकलशों से) अभिषेक करे । प्रलेपन कर पुष्पवृष्टि करें। भगवानकी आरती करें। फिर गंधोदकसे शांतिधारा समर्पण करे ॥ १४१-१४५ ॥ अर्थ--अभिषेक हो जानेके पश्चात् उत्तम वस्त्रसे प्रभुके शरीरको पोंछ लेने। फिर मंत्रपूर्वक आठ द्रव्योंसे पूजन करे। पूजनमे भी आह्वानादि विधिको भूल न जावे ॥ १४६ ॥ अर्थ---जलपूजा-जन्म-मृत्यु-जराके नाशके लिये भगवान्के आगे भंगारको नालीसे तीन धारा चढानेसे ही होती है । चंदनपूजा--अनामिका अंगुलीके द्वारा सुगंधित केशर प्रभुके चरण कमलके अंगुष्ठोंपर चढ़ानेसे होती है । अक्षतपूजा-अक्षय स्थानको प्राप्त्यर्थ पुज चढ़ानेसे होती है। पुष्पपूजा-सुगंधित पुष्प प्रभुके चरणकम लों पर चढ़ानेसे होती है । नैवेद्य पूजा-सुन्दर नैवेद्य भात, पूडी, पकवान थालमे चढ़ाकर उतारनेसे होती है। दीपपूजा-दीपकको जलाकर आरती रूप करनेसे होती है। धूपपूजा-धूपको अग्निमें खेनेसे होती है । फलपूजा- केला, बदाम आदि फलोंकी भेंट प्रभुके समक्ष चढ़ानेसे होती है। जल-फलादि, अष्ट द्रव्य, स्वस्तिक, सरसों आदि मंगलीक द्रव्योंके साथ अर्घको उतारना चाहिये। फिर पुष्पांजलि चढ़ाकर शांति धारा करनी चाहिये। यह पूजाविधिका क्रम है ॥ १४७-१५४॥ याज्यमाच्या प्रार --- NamMSERDAmateur- [ १६७ ] मक्त्यनुसारत पश्चात् जिनेन्द्राग्रे मुमोदत. | कायोत्सर्ग च अतेहि कर्तव्यं मोक्षप्राप्तये ।। १५५ ।। पञ्चात्स्तोत्र जिनेन्द्रस्य पठनीय तत. खलु । कर्तव्य मन्त्रराजस्य जाप्य ध्यानं च सिद्धये ॥ १५६ ।। कर्तव्य शाम्बस्वाध्याय मनोरोधाय केवल । स्वाध्यायसमं धर्म हि न पर गृहमेधिनाम् ।। १५७ ।। इत्यादिशुभकर्माणि कर्तव्यानि जिनास्पदे । नदन्नातोद्यसयुक्त भव्यनरालिसभृते ॥ १५८ ॥ गृहे गत्वा च पश्चाद्धि मध्याह्न समये वरे । कर्तव्य भोजन शुद्ध त्रिशुद्धया दोपवर्जितम् ।। १५९ ।। गृद्रग्पृश्य जल चूर्ण घृत ग्राह्य व्रताप्तये । नैव गृहणति ये मूस्तित्समास्ते बुधैर्मताः ॥ १६० ।। कृत्वेव जोभन न्यादमतरायविजितम् । एकवार च तत्रेव स्थाने मोक्षपदाप्तये ।। १६१ ।। प्रत्यायानग विधिना वेदाहारम्य तत्र हि । प्रत्याख्यान च कर्तव्य कर्मसतानहानये ।। १६२ ॥ अर्थ-~-फिर शक्तिके अनुसार प्रमोद भाव सहित हो, जिनेन्द्रदेवके आगे कायोत्सर्ग करना चाहिये योंकि कायोत्सर्ग ही आत्माके ध्यानका और मोक्षका साधन है ।। १५५ ।। अर्थ-फिर सिद्धपद प्राप्निके लिये श्रीजिनेन्द्र भगवान्के गुणोंका स्तोत्रपाठ करना चाहिये और मत्र- गजको नाप व व्यान करना चाहिये ।। १५६ ।। अर्य--पीले पूजा करने के बाद शास्त्रोका स्वाध्याय मनको निरोध करनेके लिये व आत्मकल्याणके लिये 'सग्ना नाहिये । ग्बा गाय मे मतका निरोध होता है, इसलिये स्वाध्याय के समान अन्य कोई उत्तम धर्म नहीं हैं। ? ।। -त्यादि शुभ क्रियाओं को जिनमदिरजीमें भव्य मनुष्योको पश्तियुक्त हो, बाजे-गाजेके साथ मयारीलालयाच्या । . riकर घर पर IIT पानो भोजन करा र मध्याह्न समयमे शुद्ध भोजन एकवार ही ( ठाम • it. , दिनेला नाहिये ।। १५१ ।। ---:- TETो हो। सानादि पवित्र निधिसे गमन्त प्रयोको शुद्रतामे TE • it ' . I fifa 17 पसंती मर्यादा मागम विपिने को हो । शूद्र के हारका जल "...। Fil: नाममा र क्रिया विमोन होनेने उमटाया जहारिक 1772 कर; 7 रोजाना समाना नाहिये। या कह स्वा दशमो नमान + MAHESHIBEESHI [ १६८ ] निरारम्भ प्रकर्तव्य प्रोपध मदर्जितम् । एवं च क्रियमाणेहि प्रोपध' कर्मनाशकः ।। १६३ ।। अनेन विधिना कार्या प्रोपधा कर्मघातना.। एवं सर्वेषु कर्तव्य पूजनादिविधि खलु ॥ १६४ ।। सर्वे च प्रोपधा भूप शतैकपचपटप्रभा । अस्य स्युः कर्मनाशार्थ कर्तव्या. शुद्धितस्त्रिधा ।। १६५ ।। प्रोपर्धेक प्रति जाप्य तत्कर्मव नामत खलु । करणीय तद्विनाशायं चाष्टोत्तरशतप्रमम् ।। १६६ ॥ दत्वा ह्येकाय पात्राय न्याद च धर्मिणे शुभम् । पूर्व पश्चाद्धि कर्तव्य सर्वेष्वेव विधिः खलु ।। १६७ ।। विकथा च गृहारभ वामात्याग स्वमडनम् । तल्पे च शयन शोक वृथाटन मदाष्टकम् ॥ १६८ ।। पैशून्य परनिंदां च परवामेक्षण तथा । रागोद्रेकाच्च हास्य वा रतिं चैवारति तथा ॥ १६९ ।। कुभाव चैव दुर्ध्यान भोगाभिलापमेव च । पत्र शाकमशुद्ध च दधिदुग्ध च वा घृतम् ।। १७० ।। व्रतिभिर्मोचनोयाश्च व्रते चास्मिन् व्रताप्तये । इत्याद्या दोषनिकरा ससारदु खदायका. ।। १७१ ।। ही है। भोजन अन्तराय रहित करना चाहिये । भोजन होनेके पश्चात् चार प्रकारके आहारका परित्याग करे । इस प्रकार भोजनका प्रत्याख्यान कर्मोका नाश करनेवाला है ॥ १६०-१६२ ॥ अर्थ--प्रोषधके दिवस आरंभ नहीं करना चाहिये । आठ प्रकारके अभिमानोका त्याग करना चाहिये। इस प्रकारकी विधि जो भव्यजीव प्रत्येक प्रोषधोपवासमें करता है, उसके कर्मोंका नाश होता है । प्रत्येक प्रोष- घोपवासके दिवस ( जिस कर्म प्रकृतिका प्रोषधोपवास हो, उस प्रकृतिके नाशके लिये ) प्रकृति के अनुसार जाप जैसे देवे ॐ ह्रीं मतिज्ञानावरण कर्मनाशाय नमः, ॐ ह्रीं श्रुतज्ञानावरण कर्मनाशाय नमः इत्यादि प्रकारसे जाप देवे । एक पात्रको आहार देकर फिर आप आहार करे। विकथा और आरंभका परित्याग करे । स्त्रीसेवन- का परित्याग करे, शरीर संस्कारका परित्याग करे, खाटपर शयनका परित्याग करे, शोक, अभिमान और व्यर्थका पर्यटनका परित्याग करे । दूसरोंको निन्दा करना, हँसना, दूसरोंकी स्त्रीके मनोहर अंगोंको देखना, दुर्भाव, मात्सर्य, द्वेष आदि दुःपरिणामोंका त्याग करना । अशुद्ध दूध, दही, घृत आदि पदार्थका त्याग करना । इत्यादि उत्तम आचरणोंके साथ इस व्रतका पालन करे ।। १६३-१७० ॥ अर्थ-व्रती पुरुषोंको व्रतकी शुद्धि के लिये संसारके दुखोंको करनेवाले इन दोषोंका परित्याग करना चाहिये ॥ १७१ ॥ TAMASHISHESHESwearespressesHDSexyesOnews Lunसयमजयमर RASHIRPATREAmarmer [ १६९ ] केगरिभयतो यद्वत् गजवृन्दा महोन्नताः । पलायत्येव तद्वद्धि कर्मभा व्रतसिंहतः ।। १७२ ।। कर्मदहनवतो भो मत मालव्रतेपु मुख्योयं । जिनसिद्धाते ह्यत स्यात् सार्थनामत ॥ १७३ ।। पूर्वधनस्य मध्यान्हे कर्तव्य भोजनं सदा । द्वितीये वासरे चैवानशनं करणीयकम् ।। १७४ ।। तृतीयस्य दिनस्यैव मध्यान्हसमये वरे । पारण करणीय च कर्मसतानहानये ।। १७५ ।। मन्कृिष्टविविश्चाय मर्वकर्मारिघातकः । कथितश्चागमे शुद्धे भूप नैवात्र संशयः ॥ १७६ ।। सर्वोत्कृष्टफल, वक्ष्ये भाविज चेलनाप्रिय । करिष्यति व्रत शुद्ध प्रापयिष्यति स शिव ।। १७७ ।। कर्मदहनवतस्य फल शृणु ममाधिना । श्रवणाच्च यत्माहा. प्रलय याति देहिनाम् ।। १७८ ।। अनेन विधिना कृत्वा य. कश्चिदिह जन्मनि । ममाधिना पुन. स्वस्य मरण गल्यवजितम् ।। १७९ ।। प्रारम्पति का गति मैव तत्म कययाम्यह । द्वादगाना गणाना तु दृढश्रद्धाय केवलम् ॥ १८० ।। पि'हे शाश्वते क्षेत्रे तूर्य फालेन भूपिते । ह्रासवृद्विविनिमुक्ते ईतिभीत्यादिवजिते ।। १८१ ।। चंदेशा मुनयो गन भवत्यनेरुशोनिगं । रत्नत्रयतपोव्याने. म मार्थनाममृत् ह्यतः ।। १८२ ॥ अयं--जिम प्रकार मिहको देखते गज पलायमान हो जाते हैं वैसे ही इस व्रतसे कर्मरूपी गज पलाय- मान हो जाते हैं । यह बात समस्त व्रतो मुख्य है । जिन सिद्वातमें इसको मुख्य व्रत बतलाया है। इसीलिये का नाम भी गायंक है ।। १७२-१७३ ॥ Rit-- धारणा पारणाके दिवम एकवार भोजन करे। वह भो मध्याह्न समयमें ही करे। यह Timirefरियालाई। मध्यम और जघन्यविधिमे भी यह व्रत किया जाता है । हे श्रेणिक ! इस व्रतका LifT- फ; मोटो पाप्ति है। जो मनुष्य इम ब्रतको विधिपूर्वक पालन कर समाधिमरण पूर्वक देहका न करे तो उनम मुगलो पाप्त होता है। इस प्रतता ऐगा हो माहात्म्य है। जो विधिपूर्वक व्रतका पालन 1 : ममारि नि.गन्य मरा करना है । इम ब्रतको पालन करके कोन किस गति को प्राप्त में मनामे प्रोता र अदानो बिगाहता हूँ ॥ १७४-१८०॥ 1--1 R ITI भागोगे ग्ने ति क्षेम उन्न लाते हैं । विवेत दोनम मदेव .! ...नना होगा। विमति-नीति त्यादि तिमी प्रकारका उपद्रव '-11 .fATrain निरनर न होता है। तोयंकर प्रभ गोश अगवार लेने हैं TAGE मस्या- -- [ १७० ] measureme जिनेन्द्रा जितमातंडा चक्राका. पुरुषोत्तमाः । पट्खडपालने दक्षा. कामरूपधरा वराः ।। १८३ ।। विष्णवो बलदेवाद्याः तद्विप शर्ममडिताः । इत्याद्या यत्र भातिस्म सदा सर्वत्र विश्रुता. ॥ १८४ ।। प्रवर्तते सदा यत्र धर्मो जैनेति नामत.। त्रयो वर्णाश्व विद्यते मिथ्यामार्गपराडमुखाः ।। १८५ ।। सदा यात्येव मोक्षेहि तस्माद्भव्या नरेश्वरा । रत्नत्रयतपोयोगात् शर्मवृंदाकितेऽक्षये ।। १८६ ॥ पाखडा. तत्र नो सति कुदेवा दोषमडिताः । तन्मदिरा हि नो सति तेषा च सेवकास्तथा ॥ १८७ ।। नो सति द्रव्यतस्तत्र मिथ्यादृग्धारका नृप । भावत' केचन सति नरा तद्धारकाः खलु ॥ १८८ ॥ यत्रा नराश्च शोभते रवितेजःसमाः शुभा.। शीलरत्नधरा वृद्धा कलाकलापमडिताः ॥ १८९ ।। चद्रकोटिप्रमायुष्काः चापपचशतोन्नता., पुत्रपौत्रादिसपन्ना धनवृदभरा · वरा. ॥ १९० ।। मा न्याय व शाश्वत बने रहते है । चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण आदि पुण्य पुरुष भी सदैव होते रहते हैं।।१८१-१८४॥ अर्थ-विदेहमें जैनधर्म सिवाय अन्य धर्म सर्वथा नहीं है । जैन मत सिवाय अन्य कोई भी मत किसी कालमें कभी भी वहॉपर उदय नहीं होता है । न अन्यमतके धारक मनुष्य ही वहॉपर उत्पन्न होते है। और वहाँ तीन ही वर्ण होते हैं, मिथ्यामार्गसे विमुख होते हैं । वहॉपर सबको व्यवहार रत्नत्रयकी प्राप्ति स्वभावरूप से होती है। इसीलिये सर्वत्र जिनायतन, जिनचैत्य, जिन चैत्यालय और जिनरूप धारक गुरु सर्वत्र सर्वदा मिलते है। यहाँसे भव्यजीव सदा ही मोक्ष जाते रहते हैं ॥ १८५-१८६ ॥ अर्थ-वहॉपर मिथ्यामतके मन्दिर, चैत्य और पाखंडी गुरु भी नहीं हैं, न कुशास्त्रोका सद्भाव वहाँ पर है । कोई भी मनुष्य कुदेव, कुगुरु, कुशास्त्र और कुधर्मको नही जानता है। न षट् अनायतन वहाँपर हैं। उसी प्रकार मिथ्यामार्गरूप गंगादि नदी प्रवाहमें स्नान कर लोग धर्म नही मानते हैं। तथा अग्निमें जलकर सती वहॉपर नहीं होती हैं। वहाँ पर कुतीर्थ नहीं हैं । वहाँ पर द्रव्य मिथ्यात्वका सर्वथा अभाव है। इसीलिए वहाँ पर ब्राह्मण नहीं होते है । हाँ भाव मिथ्यात्वके धारक कितने ही जीव उत्पन्न होते है । जहाँ सूर्यके समान तेजके धारक शुभ क्रियाकलापसे मंडित शोलरत्नके धारी वृद्ध श्रेष्ठ मनुष्य शोभाको प्राप्त होते हैं ॥१८७-१८९॥ अर्थ--वहाँ पर मनुष्योंकी एक पूर्व कोटि आयु और पांच सौ धनुषका शरीर होता है। सभी जीव er wrambalustrasjonents at new हिन्याच्या [ १७१ ] HAPATRE Seawewww पचामृतरसे आमृत्यु शर्ममग्नाश्च दुखशोकविजिताः। दानपूजादिकार्येषु सदा तत्परमानसाः ।। १९१ ॥ ईदशा यत्र राजते नार्योपि मगधेश्वर । शीलव्रतधराः शुभ्रा जिनेज्यारतमानसाः ।। १९२ ।। देगे देशे पुरे ग्रामे भूद्रे द्रोणे च कर्वटे । पत्तने विपिने खेटे नद्याः कूले मनोहरे ।। १९३ ।। इत्याद्यन्यगुभे स्थाने सति सर्वत्र सुन्दरा.। जिनालया ह्यनेकाश्च यत्र नेत्रमनोहराः ।। १९४ ।। उमगानाद्रिगुहाया च दिशावामोविमडिता । मुनीन्द्रा यत्र कुर्वति स्वात्मध्यान शिवाप्तये ॥ १९५ ।। यत्र ये श्रावकाः नार्यः स्वस्वगृहेषु भावतः । जिनविवस्य नित्य हि सर्वपापप्रशातये ॥ १९६ ।। शुद्धरभिपेक तत. परम् । कुर्वति पूजन द्रव्यैर्वसुभेदैर्मनोहरैः ।। १९७ ।। नृत्य गान जिनाने च राम्रो जागरण तथा । वाद्यघोप प्रकुर्वन्ति तत्रत्या मगधेश्वर ।। १९८ ।। मध्याह्नसमये नित्यं द्वारस्थानेषु च पुन. । तिष्ठन्ति पात्रदानार्थ स्वव्रतपालने रताः ।। १९९ ।। मनीन्द्रापि तदागत्य तेपा सद्मनि भोजन । कृत्वा सुविधिना पश्चात्तपोवने प्रयान्ति च ।। २०० ॥ तन्प्रभावात्पकुर्वन्ति तेपा गेहे सुराधिपा । पचाश्चयं सुदानस्य प्रभावात् किन्न जायते ।। २०१ ॥ पुत्र-पोत्र आदिसे सम्पन्न, धनसे सम्पन्न हैं। सभी जीव जोवन पर्यन्त सुखमें मग्न व दुःख और शोकसे रहित हैं। दान पूजा आदि शुभ कार्यों में उनका मन सदा तत्पर रहता है ।। १९०-१९१ ॥ अयं--हे राजन् ! वहां परस्त्रियां भी शोलमडित, भगवान्को पूजामें लवलीन होती हैं । जहॉपर देश-देश, ग्राम-गाम, पन-पर्वत, नदी तोर, सेट, द्रोण, शहर, जंगल आदि सभी प्रदेशो सुन्दर जिनालय होते हैं ॥१९२-१९४॥ अर्ग--जिम क्षेत्रमें दिगंबर जैन ऋषि-गुहा, कंदर, श्मशान भूमि ओर सर्वत्र अपने ध्यानमें लवलीन गित होते हैं ।। १९५ ॥ Ti- मगमेश्वर ! विवेहोरमें सर्व स्त्री पुरुष (श्राव-श्राविका) अपने-अपने घरमें (गृह चैत्यालयमें) frrrrrr .या पोमे गय पापोको शाति के लिए भावभक्तिने श्रीजिनेन्द्र भगवान्के मनोहर विवफा शुद्ध पंचा- मा मगे fair करते हैं। फिर अट-प्रत्यने पूजन करते हैं, नृत्य, गान, बागघोप आदि उत्तमोत्तम भक्ति- ...: गरिमाग कार पमं गम उत्पन्न करते हैं । १९६-१९८ ।। --- मे न ऐने पापा माया ममममें प्रतिदिन दाराप्रेक्षण करते हैं। मुनीतान भी Trinfor IIर र पानान तपोनको जाते हैं। उग पान के प्रभारमे देव लोग गहस्यो- 1 [ १७२ ] शाreHPSTHIS आहारदानतो जीवा' भोगभूमौ वजत्यहो । द्वित्रिचन्द्रपल्याते भुजत्येव वर सुखम् ।। २०२ ।। यस्माद्यात्येवईभो 'भूप तिथंचोपि सुखास्पदे । दानानुमोदनाद् भद्रा मनुष्याणा च का कथा ॥ २०३ ॥ अपर दानसदृश , नो पुण्य गृहमेधिना । अत. पात्राय दातव्यो गृहस्थैर्जेमन खलु ॥२०४ ।। पात्रदान न कुर्वन्ति ये गृहस्था मताश्च ते । विपुच्छपशुना तुल्या. स्वोदरभरणे रता ॥ २०५ ।। पात्रार्थं न च पूजार्थ दानार्थं नार्पित खलु । स्वापतेयो गृहस्थाना तेपा तन्नि फल मतम् ॥ २०६ ।। प्रातजिनेन्द्रदेवस्य पचभिश्चोत्तमै रसै. । कृत्वाभिपेक पश्चाद्धि करणीय च पूजन || २०७ ।। प्रात: जिनेन्द्रपूजा च पात्राय भोजन तथा । न करोति ददात्येव गृहस्थ. रान् स्वय पुनः ।। २०८ ।। भुञ्जत्येव मुनिश्वभ्रे सदा दुख न सशय. । अतो द्वौ सर्वदा कार्यों इज्यादानौ सुखाप्तये ।। २०९ ।। eneSTHESHe- के घरमे पञ्चाश्चर्य वृष्टि करते है । सत्य है सुदानके प्रभावसे क्या-क्या प्राप्त नही होता है ॥ १९९-२०१।। अर्थ-इस दानके फलसे जीव भोगभूमिमें उत्पन्न होते है । जहॉपर एक-दो-तीन पत्यके उत्तम सुखको प्राप्त करते है। यदि तिर्यंच भी पात्र दानकी अनुमोदना करे तो भोगभूमिके उत्तम सुखको प्राप्त होता है फिर मनुष्यको क्या बात है ? वह तो प्राप्त होगा ही। गृहस्थोंको पात्रदानके समान अन्य पुण्य नही होता है । इस- लिये पात्रमें आहार दान अवश्य ही देना चाहिये। जो गृहस्थ पात्रदान नही करते वे अपने पेट भरने में मस्त बिना पूछके पशु है । २०२-२०५ ॥ अर्थ-श्रावक-श्राविका भी जघन्य पात्र हैं उनको भी आहार देना चाहिये । जो शक्तिशाली होकर पात्रमे आहार दान नहीं देते हैं वे मनुष्य जन्मको व्यर्थ खो देते हैं। जिन मनुष्योका धन पात्रदानमें, भगवान्को पूजामे और जिनायतनोको रक्षा करने में व्यय नही होता है, उस धनका प्राप्त करना निःफल हे ॥२०६॥ अर्थ--प्रातःकाल पञ्चामृत रसोसे श्रीजिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमाका अभिषेक और पश्चात् अष्ट-द्रव्यसे पूजन करना चाहिये । मध्याह्न समयमें पात्रको आहार दान करना चाहिये । जो इस प्रकार पूजा ओर दान नहीं करता है, वह अधोगतिको जानेवाला है। पूजा और दान ये दोनो कर्म सुखकी प्राप्तिके लिये गृहस्थोंके मुख्य कर्म हैं ॥ २०७-२०९ ॥ LEART- याच्यIFEISEASURUITARIrriarTESTIMORE HESHCHER-- [ १७३ । यत्र वर्षे गृहस्थास्ते नित्य कुर्वन्ति पक्रिया। नित्याहस्य शात्यर्थ पुण्यवृन्दस्य प्राप्तये ।। २१० ॥ मूलधर्मो गृहस्थाना पूजादानौ जिनागमे । कथितौ वीतरागेण सर्वसम्पत्तिकारकौ ॥ २११ ।। ईदृश शोभन क्षेत्र नानद्धिमण्डित च त । स व्रती व्रतपुण्येन लभत्येव नरेश्वर ॥ २१२ ।। तोर्थनाथकुले तत्र चक्रनाथकुले तथा । विष्णो नद्धिसयुक्ते सुरवृन्दनिविते ॥ २१३ ॥ तेपा मद्रपशोभाढ्य स्त्रीरत्ते च गुणोज्ज्वले । सम्यक्त्वेज्याव्रतोपेते स्वर्णोद्भवच्युतोपमे ॥ २१४ ।। ईदृशे भून तद्गर्भे अस्मान्मृत्वा च सो व्रती स्थास्यत्येव शुभे घस्रे सुमहूर्ते शुभोदयात् ॥ २१५ ।। मा बामा त च गर्भस्थ परिण्यत्यपि पुण्यभा । नो भजिष्यति तत् दु ख गर्भस्यैव प्रभावतः ॥ २१६ ।। दानाभिषेकपूजा न जीवानामभय तथा । इत्यादि शुभकर्म च तदान्हो वै करिष्यति ।। २१७ ।। मुनि रत्रमामाते सुतरन्न मनोहरम् । जनिष्यत्येव सा नारो शुभयोगे शुभे दिने ।। २१८॥ नदेव जन्मकाल न नम्य तान प्रमोदत । करिष्यत्येव आतोद्य जन्मोत्सव च मगलै. ॥ २१९ ।। निभा नम्वर्ण च वस्त्राभपणमेव च । दास्यति चाभय दान कागगारस्थदेहिनाम् ।। २२० । मिनेन्द्राणा निशाने पनामृतरमेवरे । अभिषेक जिनाना च करिष्यति वाचना ।। २२१ ।। अर्थ-जिस विदेह क्षेत्रमें गृहस्थ नित्य ही आवश्यक षक्रियाओका पालन करते हैं। जिससे पापोकी शांति होनी मोर पुण्यको वृद्धि होती है । गृहस्थोके दो धर्म मुख्य हैं । क्योकि इनमें हो अभ्यन्तर पट्कर्मोका समापन हो जाता है । दान-पूना हो ये दो मुख्य हे। अरहंत भगवान्ने इन दोनोको हो धर्मका मूल बतलाया ।ग प्रसार समम्न क्रियाओको पालनेवाले गृहस्य विदेह क्षेत्र में उत्पन्न होते हैं। जहाँपर अनेक ऋद्धियाँ पालो ।। २१०-२११।। --क्षित क्षेत्रमे तो पुरुष तोयंकर कुलमें, चक्रयतों कलमें उत्पन्न होते है । नारायण होते है। मालपन मोते हैं। ये पुण्यपूण उत्तम स्त्रियोंके गर्भ में शुभ मुहूर्तमें उत्पन्न होते हैं । र पानी होती है । गर्भ में भी ये सुगने रहते हैं ।। २१२.२१५ ॥ - प्रावने समय माना जोजोको अभयदान करावेगी । नवमाम गुरमे व्यतीत होनेपर 1:21 पर लगो। पके मकामे पिता ग्रानक, बीन र दुलो मनायोती धन, वस्त्र, 74 nी मागे । सागगहने वक्तिनको कर नीयोको गतोग देंगे। और पुप्रजन्म- में पनामागे अभिषेक पाठ मे पुन नित्य महोत्सनो गाय कग- HTARलयमास्यास्यमयाजीरासस WE Tera यार [ १७४ ] पश्चात्पुनमुखाज च दृष्ट्वा म मोदमाप्स्यति । सोपि घस्र प्रति वालो वद्धिष्यत्येव सुन्दर ॥ २२२ ।। कौमारकालमुल्लघ्य पय पाने. सुभोजने । क्रमेण यौवन रूप लप्स्यते च सुशोभनम् ।। २२३ ।। दीत्प्या तजितमातंड कात्या निजितदीधितिः । गभीरेण महत्वेन निर्जितः सरितापति ।। २२४ ॥ सिक्थेन निर्जितः श्रीद सारेण निर्जितो हरि. । रूपेण शवरारिश्च पुण्यनाम्ना विभूपित. ॥ २२५ ।। इत्यादिगुणवार च नेष्यत्येव शुभोदयात् । यौवने मनदोद्दोप्ते विद्धि व्रतफल इदम् ।। २२६ ।। तत्पिता यौवनाढ्य च दृष्ट्वा सूनु गुणोज्ज्वल । गुणेन स्वात्मतुल्य वा मुदपाप्स्यति भूमिराट् ।। २२७ ।। तदात्मजविवाहाथ याचयित्वा नृपागजाः । महत्कुलोद्भवाः शुद्धा रूपात्तजितअप्सराः।। २२८ ॥ ईदृशा. सुदराकारा. सुस्वनाश प्रदापते । सूनवे यौवनाढयाय नेत्रानदकराय वै ।। २२९ ।। नेष्यति वाद्यघोषोघान् दानोत्करसुमगलान् । कुर्वन् वे मगलाप्त्यर्थं सज्जनानददायकान् ।। १३० ॥ भोक्ष्यति सोपि पश्चाद्धि शर्मणा सततिं सदा । धर्मकार्य पुरस्कृत्य व्रतफलेन भो नृप ।। २३१ ।। तत्पिता स्वस्य पट्टे हि त पुत्र विधिपूर्वक । स्थापयिष्यति स्वप्रजापालनार्थ सुरोपम ।। २३२ ।। येंगे । पश्चात् बालक (पुण्यात्मा-क्योकि उस जीवके कर्मदहन व्रत किया है।) के पुण्य मुखका दर्शन कर पिता हर्षित होगा। बालक क्रमसे कुमार अवस्थाको प्राप्त होगा । समस्त प्रकारके सुखोंको प्राप्त होकर अपने तेजसे सूर्यको, क्रांतिसे चंद्रको, गंभीरतासे समुद्रको, लक्ष्मीसे कुबेरको, शक्तिसे सिंहको, रूपसे कामदेवको जीतनेवाला अनेक उत्तम गुणोंसे भूषित वह पुण्यात्मा बालक होगा। यह सब कर्मदहन व्रतका ही माहात्म्य है ॥२१६-२२६॥ अर्थ-उसका पिता बालकको यौवन अवस्थामें देखकर अपनी जातिकी उत्तम गुणवाली अपने समान ऋद्धिकी धारक राजाओकी कन्याओंकी याचना कर विधिपूर्वक विवाह ( वाग्दान ) स्वीकार करेगा। पश्चात् कुलाम्नाय और धर्मशास्त्रकी विधिसे विवाह करेगा। वह बालक समिणीको प्राप्त कर पूर्व व्रतका पुण्यफल भोगेगा। पिता-पुत्रको गृहका समस्त भार समर्पण कर भगवतो दीक्षा धारण कर केवलज्ञानको प्राप्त कर मोक्षमें अव्यय सुखको प्राप्त करेगा। वह राजकुमार राजा होकर प्रजाका न्यायमार्गसे पालन करेगा। वह शुद्ध १ इस प्रकरणमे विवाह विधि विदेहक्षेत्रमे भी आगमको मर्यादासे बतलाई । यह नहीं है कि कन्या स्वय वरण करे या बालक अपने आप ही अपनी इच्छानुसार जिस-तिस (जाति कुजाति, योग्य-अयोग्य, नीच-ऊँच आदि सबको) को स्वीकार कर लेवें। ऐसा करना मर्यादाके बाहर है। विवाह धर्मका अग हे उसकी पूर्ति गुरुजन ही योग्य रोतिसे सम्पादन करते है। इसमे बालक-बालिकाओको स्वतत्रता नहीं है न्यायालयाच्या रामायमराराम [ १७५ ] एमालस्य पुगे बाह्यवने गत्वा तत. सोपि शिवाप्तये । गृहीत्वा सयम शुद्ध गुरोः पार्वे मुनेर्मतम् ॥ २३३ ।। हत्वा मकलकर्मारीन् ध्यानाशुगेन सः मुनिः । सप्राप्य केवलज्ञान तदेवेज्या सुरैः कृता ।। २३४ ।। पश्चात् सबोध्य भन्योघान् यास्यति चात्यये पदे । सुखासुखविनिःक्राते वृपातिक दुर्लभ नृणा ।। २३५ ।। मोपि नानपदे स्थित्वा न्यायमार्गेण धर्मधो । पालयन् स्वप्रजा सर्वा स्थास्यत्येव निरंकुशः ।। २३६ ॥ शुददग्वारको वाग्मी दाता भोक्ता च सवतः । त्रिवर्गपालक: सैव पूर्ववतफलोदयात् ।। २३७ ।। कगियति जिनेन्द्रम्य स्नानेज्या शुद्धभावत: । पात्राय विधिना दान दास्यति वासर प्रति ।। २३८॥ नित्यपापविघाताय निर्णयाय चिदात्मन: । सिद्धाताना भिवाप्त्यर्थं श्रवण मुनिवक्रत' ।। २३९ ।। पर्मकाय नम: मोपि पूर्व कृत्वावहानये । अन्यत् कायं गृहोत्पन्न पश्चादेव करिष्यति ।। २४० ।। मियनेगु जिन वर्म च वात्सल्य धर्मसिद्धये । करिष्यत्येव भूपेन्द्रो नृपु न्यादादिभिः सदा ।। २४१ ।। जिनवरियतेग वे यो नानैव प्रकुर्वते । 'वात्मल्य म मतः शास्त जिनधर्मपरान्मुख. ॥ २४२ ।। गम्यग्दर्शनको धारण करनेवाला त्रिवर्गको परस्पर अविरोधपूर्वक पालन करता हुआ, व्रतके पुण्य फलसे सर्वो- तम गुतोको, शाति ओर निराकुलताके साथ निर्विघ्न भोगेगा ॥२२७-२३२ ।। अर्थ-वह पुण्यात्मा भव्यजीव विदेहमें भगवान की पूजा, भक्ति, स्तवन, गुणस्मरण आदिके द्वारा धर्म के माहाम्गका बहायेगा । अपने कर्तव्यको राजा होकर भी परम भक्तिभावनासे करेगा। नित्य सुपात्रमें दान गा, Freोका पठन-पाठन करेगा और गरके मुमसे शास्त्रोका श्रवण करेगा। शास्त्र गुरुके मुखसे ही श्रवण करना चाहिये। गा सबसे प्रथम विद्यमसम्बन्धी अपने धार्मिक कृत्योको कर लेगा। पीछेसे राज्यकार्य पौर मा पारगा। यो पर्म की महिमा है । या - । 1 " + IFT गपि अोगी और परमागरम जगका ......fiiiili hit Fi, if कर पोतिनो ना. गार्गी, भाती मेला "-".", "TTPानगरमा मामी भागमभोगना। म .00 ADITI मीना नागना HIL:"titiना। 15 HE 'Timi - . ग । - - . . . में . -- . .
[ १७६ ] भो बुधा सर्वदा श्रीमज्जिनवर्मस्थितेषु वै । कुधिं सर्वजीवेपु वात्सल्य जेमनादिभि ।। २४३ ।। वात्सत्यात् बधयत्येव तीर्थङ्करस्य कायवान् । गोत्र शिवप्रद नून सर्वाधिपनमस्कृतम् ॥ २४४ ।। मभामध्ये वरे सिंहपीठे स्थित्वा च स नृप । स्वस्याज्ञापालकान् भूपान् दास्यत्येव मदा खलु ।। २४ ।। धर्मोपदेश भो भूपा. शृणध्व कथयाम्यह । यस्येव श्रवणात्सर्वे यात्येव नाशता खलु ॥ २४६ ।। धर्म, अर्थ और काम इन तीनो पुरुषार्थोमेसे सबसे प्रथम धर्म पुरुषार्थको निराकुल भावोसे निर्विघ्न करना चाहिये । पीछेसे काम और अर्थ पुरुषार्थको साध्य करना चाहिये। तो ही नोतिपूर्वक कर्तव्य पूर्ण होते है । जो मनुष्य अर्थ और काम पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये धर्म पुरुषार्थको छोड़ देते हैं वे नीतिका परित्याग कर देते हैं। वह राजा साधर्मी भाइयोंको भोजन पानके द्वारा वात्सल्य अंगकी वृद्धि कर जिनधर्मके प्रतिपालक साधर्मों भाइयोंका भोजन-पान आदिके द्वारा सत्कार करेगा। जो भाई अपनी शक्तिको छिपाकर साधर्मी भाइयोंका आदर, सत्कार नहीं करता है, वह जिनधर्मके तत्वोंकी जानकारीसे बहिभूत है। जिनधर्मका एक मुख्य अंग यह भी है कि साधर्मी भाइयोंका भोजन पान आदि सब प्रकारसे आदर सत्कार करें । जो इस प्रकारका विशुद्ध वात्सल्य अंगका पालन करता है, वह निश्चयसे तीर्थङ्कर गोत्रका बंध करता है, सर्व राजाओंसे नमस्कृत होता है। उसके पुण्यकी महिमा अनन्त है ।। २३३-२४४ ॥ अर्थ-वह राजा सभामें दिव्य सिंहासनपर विराजमान होकर अपनी आज्ञाके प्रतिपालक राजाओंको धर्मोपदेश करेगा । हे राजन् ! गृहस्थोका कर्तव्य और धर्माचरणका स्वरूप मै जिनागमसे कहता हूँ सो उसको सावधान मनसे सुनिये। भगवान् केवलज्ञानी सकल चराचरको प्रत्यक्ष जाननेवाले अरहंत प्रभुने बतलाया है, जो बतलाया उसे मै कहता हूँ तुम सुनो, जिसके सुननेसे सर्व पाप नाश हो जाते है ॥२४५-२४६॥ अचमायालयाच्या मायाम-mmm सुधारक ही जघन्य पात्रदानकी महिमाको नही जानते है। परन्तु आचार्योने मेला प्रतिष्ठादिमे आहारदान देनेसे तीर्थकर गोत्रका पुण्य बतलाया है। जाजचमान्य AM ~~ -~- [ १७७ ] Reemresses गृहस्थाना 7 सिद्धाते जिनेन्द्र. केवलेक्षणै । प्रथम शुद्धसम्यक्त्वो मतो हि नात्र संशयः ॥ २४७ ।। मर्वदोपविनिष्क्रिातो देवो जिनेव निश्चयात् । सर्वद्वद्वविहीनो यः गुरु सैव जिनागमे ।। २४८ ।। जिनाननसमुद्भता वाणी ससारतापहा । सा स्यात् गणेन्द्रलेखौधेः सदा वद्या च तारका ।। २४९ ।। एतेपा यत्र श्रद्धान भवेत्तत्रैव भूमिपा । सम्यक्त्वस्यैव शुद्धस्य प्राप्तिस्त्यित्र सशयः ।। २५० ॥ आत्मनो गुणव्यूहम्य निश्चयो यत्र सभवे । तत्रेवोत्पत्ति: भूपाला जायते तस्य निश्चयात् ।। २५१ ।। हृदि यस्येव सर्वेषु भूतेषु स्वात्मतुल्यता । तस्य सजायते भूपा. शुद्धः स कर्मनाशदः ।। २५२ ।। अर्थ-उनको कहा कि गृहस्थोको सबसे प्रथम सम्यग्दर्शनको विशुद्धि करनी चाहिये। निर्मल सम्य- पदर्शनके पालन करनेसे गृहस्थोका धर्माचरण सांगोपांग पालन होता है । समस्त प्रकारके दोष रहित परमवीत- राग सर्वज्ञ अरहंत प्रभुको देव मानना, समस्त प्रकार परिग्रहसे रहित परम दिगम्बर और रागद्वेषसे विनिर्मुक्त गुनओको गुरु मानना, तथा श्री सर्वज्ञ अरहंत भगवान्के मुखकमलसे प्रकाशित जिनवाणीको तत्त्वका उपदेश करनेवाली, संमार ममुद्रसे तारनेवाली च सदा वंदनीय मानना । इस प्रकार देव, गुरु और जिनवाणीका अवि- चल श्रदान करना । किसी प्रकार भय, आशा ओर लोभके वशसे भी अन्यथा नही मानना, सो सम्यग्दर्शन है ॥ २४७-२४१ ।। -जिन गठस्योको ऐसा सम्यग्दर्शन प्राप्त हो जाता है उनको ही सम्यग्दर्शनरूप शुद्ध धर्मको प्राप्ति हो जाती है । अन्य के नहीं । सम्यग्दर्शनको प्राप्ति के बिना धर्मरत्नकी प्राप्ति नही होती हे ॥ २५०॥ 4- राजन् । अथवा आत्माले समस्त गुणोका जिस भव्य जीवको दृढ निश्चय हो जाता है वहॉपर होमन प्रगट होता है ॥ २५१ ।। xi--- गन् । जिम भगजोको निष्कपट भावोसे स्वार्थ, इच्छा और किसी प्रयोजनके बिना स्वाभा- frr. परिणामी पिदिने गगम्न जीनामें अपनो आत्माले समान जीवात्माओका श्रदान होता है उसके 77 है। समाजोपोम गमता भारको आत्मिक परिणाम द्वारा प्रकट करता है। 4. "मरर का नित्य परिणामन आदिका प्रदान कर अपने म्बम्पके समान rer..? --- गोरी पायी पौर पगात्मा जोजों को मानता है उसके मम्यग्दर्शन प्रकट यजमान्यायालयाच्या .. ARH r [ १७८ ] BSITESTMer SHRESTHE-SURESHe- सम्यक्त्वस्य हि चोत्पत्तिर्दशधा कथिता जिनः । सिद्धाते दोषनिमुक्ते सर्वपापविवर्जिते । २५३ ।। इत्याद्या कथिता भेदा ये ते हि कर्मभजकाः । व्यवहारनयस्यैव लक्षणा नो जिनागमे ॥ २५४ ।। ज्ञेया ह्येते भेदा, भो निश्चयस्यैव चागमात् । वच्म्यहं लक्षणान् तस्य व्यवहारनयस्य वै ।। २५५ ।। अष्टौ मदा भया. सप्तप्रमा नानार्थनाशकाः । शल्यानि व्यसनान्येव दोपाष्टी मासजा सदा ।। २५६ ।। अर्थ-सम्यग्दर्शनके आज्ञा मार्गसमुद्भवादि दश भेद समस्त प्रकारके दोष रहित जिनागममें बतलाये हैं । सम्यग्दर्शनके मुख्य दो भेद है। निश्चय सम्यग्दर्शन और व्यवहार सम्यग्दर्शन। आज्ञादिक दश भेद भी सम्यग्दर्शनके बतलाये है ॥ २५३ ॥ अर्थ--उपर्युक्त भेद-प्रभेद सब निश्चय सम्यग्दर्शनके है और वे निश्चयनयके अवलंबनसे बतलाये है। अब व्यवहारनयसे सम्यग्दर्शनके लक्षण बतलाते हैं। यद्यपि जीवोंको निश्चय सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हो जाना ही मोक्षमार्गमे कार्यकारी है। जिन जीवोंके निश्चय सम्यग्दर्शन है उसके व्यवहार सम्यग्दर्शन है ही। परंतु व्यवहार सम्यग्दर्शनकी प्रतीति बिना बाह्यमे वात्सल्य, उपगृहन, स्थितिकरण आदि अंगोंका पालन नहीं हो सकता। इसलिये जिसके देव, शास्त्र, गुरुका दृढ़ श्रद्धान है और जिसके बाह्य आचरण जिनागमको मर्यादाके अनुकूल है जिसके विचार जिनागमसे विरुद्ध नहीं है और जो जिनागमके अनुकूल तर्कको रखकर पदार्थोका स्वरूप जानता है उसी भव्य जीवके निश्चय और व्यवहार सम्यग्दर्शन होता है । ऐसे भव्य जीव जिनागमविरुद्ध एक अक्षर भी सुननेको राजी नहीं होते है । और न जिनागमके विरुद्ध अपने ज्ञानवैभवका उपयोग करते है । भव्यको जिनागममे न शंका है न जिनागमकी परीक्षा अपने मनोनीत भावोंसे कुत्सित तर्कके द्वारा वह करता है किन्तु पदार्थोका निर्णय आगमको सत्य और प्रामाणिक समझ कर शुद्ध बुद्धिसे करता है ॥२५४-२५५॥ अर्थ-आठ मद ( ज्ञानमैद, पूज्यपनेका मद, कुलका मद, जातिको मद, बलका मैद, ऐश्वर्यको मद, तपका और शरीरको सुन्दरताका मद ) का त्याग करना । अनेक प्रयोजनोंके नाशक सात भयोंका परित्याग सरच्याच्या राजच्या या करना।
[ १७९ ] सर्वदोपप्रदा हेया दोपहीनाष्ट नामतः । मूलभूता गृहस्थाना यतो मूलगुणा मनाः ।। २५७ ।। सवेगाद्या गुणा ह्यष्टी अतीचाराश्च पच वें । त्रयो मूढाः सदा हेयाः कपाया वेदना मताः ॥ २५८ ।। पचदश प्रमादाश्चानर्थदडाश्च पच चै । द्वादशाश्चाविरतय भवसततिदायकाः ।। २५९ ।। रागद्वेषादिमोहाश्न तथा निंदा परस्य च । मिथ्यात्वरक्तसेवा च तद्धनस्यैव भक्षणः ॥ २५९ ।। भयेन स्नेहयोगेन विमार्गस्थाय सन्तति. । आशया वा तथा तेपा सगम दोपवर्द्धकः ।। २६१ ॥ इमे दोषा गदा त्याज्याः सम्यग्दृग्वारिभिः खलु । व्यवहारनयस्यैव पालकैः तद्धिः प्राप्तये ।। २६२ ।। तीन प्रकारको शल्य-(मायो, मिथ्या, निदान) का परित्याग करना । सात व्यसनोका परित्याग करना (जुमा रोलना, मामका भक्षण, मदिरापान, वेश्यागमन करना, शिकार खेलना, चोरी करना और परस्त्रीसेवन करना ये मात व्यसन हैं। इनका सेवन करनेसे सम्यग्दर्शन नष्ट होता है। ) और आठवा मांसके दोषोका त्याग करना ।। २५६ ॥ अर्थ-उान ममस्त दोपोको छोड देनेसे सम्यग्दर्शनका निर्मल प्रकारसे पालन होता हे । सम्यग्दर्शन- को मिनि लिये पन्चोग बोपोका परित्याग करना चाहिये । क्योकि ये मूलगुण गृहस्थोके भूलभूत है । मा, माम, मधु जोर पांच उदवर फलो का परित्याग करना सो श्रावकके आठ मूल गुण हैं। इन मागी पग्लिान नहीं करनेने गम्यत्यमे घात होता है ॥ २५७ ।। गोगादिगा, निकितादि आठ गण उपादेय हैं और सभ्यस्त्वके शकादि पांच अतीचार तीन THERE ने योग है। गोग, अन् तपा, प्रशम आदि गगोका पालन करनेसे भी सम्यग्दर्शनको व्यस्तता titi in , पर लापतान, लगाय, वेश्ना, पमाद, अनयंदा, अविरति, रागद्वेषमोहका परित्याग २t If मागे finा करना ना ना नाहिये । मिथ्यात्वमार्ग तया मित्रात्यके सेवन - .* ? : मानाग करना भी उतिा है। इस प्रकार दोषोता परित्याग र देनेते अतिशय Ansar १ W - + XT MA 1 ? माझा पन नहीं करना चाहिये। तमामा ने वन करनेालो तो भी ... Triमिनार में न पानेगे मालाका दोगा ऐला नही मानना नाहिये ।
[ १८० ] HEATED राजाचा आगमे जिननाथेन स मतो व्यवहारतः । एतेषा सद्गुणाना च पालको यो न सशयः ।। २६३ ।। अस्यापि भो नृप भेदा. कथिताश्च जिनेश्वरै । शृणुथ ह्येकचित्तेन तान् भेदान् कथयाम्यह ॥ २६४ ।। उक्तदोषान् न्यजेत् योवै स लभेत् व्यवहारतः। सम्यक्तोत्कृष्टसपत्ति तूर्यजन्मनि वै शिवम् ।। २६५ ।। अस्यैव पालको मर्त्यः चाप्नोति निश्चयाश्च स. । भवे च दशमे चापि द्वादशे वा त्रयोदशे ॥ २६६ ।। सप्तैव व्यसनान्येव मदाष्टौ वा गुणा वराः । एतेषा त्यजनेनैव मध्यम. सोत्र कथ्यते ॥ २६७ ।। अष्टो मूलगुणान् शुद्धान् पालयति तदाप्तये । मु चति व्यसनान्येव सप्तैव यो नरोत्तमः ।। २६८ ।। लभते सैव भो भव्याः कर्मसंताननाशकम् । जघन्याख्य च सम्यक्त्व ह्यनुक्रमात् शिवास्पदं ॥ २६९ ।। जच्या HeHCARE wamechulfreusetus मिथ्यामार्ग गामी पुरुषोको प्रणाम, विनय नहीं करना चाहिये। व्यवहार सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले भव्य प्राणी उपयुक्त विधिसे अपने कर्तव्योंकी पूर्ति करते हैं जिनेन्द्र भगवान्के परमागममें इसको व्यवहार सम्यग्दर्शन माना है ॥ २५८-२६३ ॥ अर्थ-हे राजन् ! व्यवहार सम्यग्दर्शनके भेदोंका और भी विशेष खुलासा कहता हूँ सो सुनो ॥२६४॥ अर्थ--जो भव्य उपर्युक्त दोषोका परित्याग करता है उसके व्यवहार नयसे सम्यग्दर्शनको प्राप्ति होती है। परन्तु उस व्यवहार सम्यग्दर्शनसे चौथे ही भवमे मोक्ष सुखको प्राप्त होता है। अथवा जैसे-जैसे व्यवहार सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि होती जाती है और जैसे-जैसे उपर्युक्त दोषोंका परित्याग बढ़ता जाता है वैसे ही भवावलिका अन्त होता जाता है । अधिक से अधिक दश बारह तेरहवें भवमें वह जीव मोक्षपदको प्राप्त कर लेता है ॥२६५-२६६ ॥ अर्थ-सम्यग्दर्शनको विशुद्धि उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य भेदसे मानी है। उत्कृष्ट विशुद्धिका स्वरूप ऊपर बतला दिया है। मध्यम सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि-जो भव्यजीव पच्चीस दोष रहित, आठ मूलगुण सहित, सप्त व्यसनोंका त्याग कर सम्यग्दर्शनका पालन करता है उसके मध्यम सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि होती है । जघन्य सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि-जो भव्य जीव आठ मूल गुणोके साथ सप्त व्यसनोका परित्याग कर सम्यग्दर्शनका पालन करता है उसके जघन्य विशुद्धि होती है । इस प्रकार जो भव्य जीव सम्यग्दर्शनका पालन यीच्या - [ १८१ ] . जयमामाच्यमान्याच्या सम्यक्त्वेन विना सर्वे दानेज्यावतसत्क्रिया. । नि फलाः जिननाथेन कथिताः ह्यागमे बुधा ।। २७० ।। सम्यक्त्वेन सम वालो श्वभ्रेऽपि भो वुधोत्तमाः । वरं मतं बुधैः किंच वक्ष्येह तस्य कारणं ।। २७१ ।। गद्वदृग्वारका तेहि अत्रागन्येव तत्रत अत्रागन्यैव तत्रत । तीर्थंकरा. भवत्येव कल्याणैः पंचभिर्युता ॥ २७२ ।। निरिपाधिपनमेव्या. ह्यनतसारमडिता. । त्रिज्ञानान्वितसद्गात्रा अनोपमविगजिता. ॥ २७३ ॥ तदने नो वर ना रुवायोपि मपदायुतः । अनेकमहिमोपेतः सदा शर्मेण सभत. ॥ २७४ ।। तेऽमग नदीना नम्मात् स्थावगदिकुचोनिषु । च्युत्वा भ्रमत्यहो नाकात् कालानतप्रभ खलु ।। २७५ ।। निगेगमा कापि गयेव चित्तशुदिना । जायते तस्य प्राप्तिश्च तत्रैव मभवेत् बुवा ॥ २७६ ॥ करता है उसको पोक्षपद शीघ्र ही प्राप्त होता है । परतु उत्कृष्ट सम्यग्दर्शनकी विशुद्धिसे तद्भवमे ही मोक्षसुखकी प्राप्ति होती ॥ २६७-२६१ ।। ---सम्मान बिना दान, पूजा आदि समस्त क्रियाएँ व्यर्थ हे । योग्य फलको प्रदान नहीं कर नाली । गामिमं परम भटार अग्हत देवने कहा हे ।। २७० ॥ अर्थ-वरांनो गहित नर में रहना भी अच्छा हे परनु सम्यग्दर्शनके बिना स्वर्गमें वास भी अति- iii: मारण यह है सो मुनिये ॥ २७१ 14-~~T नि. मम् पठी जीव पच पल्याणको महिमाको धारण करनेवाले तीर्थकर 1ोताना गिना मम्बादर्शन के नहीं होता हे ॥ २७२ ।। गगनोगे पूरित नित गणोने विभूषित और जन्ममे तीन ज्ञानकर मंजित :: : ' | नका ही माहात्म्य है ।। २७३ ॥ रिपोमे गुमगन, सने महिमा महित और सर्व प्रकार से मुलो । योनि मायके पूर्ण होने पर यह जीव मिव्याय काम TTER: यरवन, विना जीनतो ज . - -- + 1 . + . * . 1 न . रे indiaTRI7 मिनोगे fatो रे नी उनी - . F [ १८२ ] तस्य धारकः ॥ २७८।। N जयमालयासमाजाला SHIOSWE मतिहीनाश्च ये मा शुद्धश्रद्धाप्रपालका । तेप्याशु प्राप्य सबोध गताश्च परम पदं ॥ २७७ ॥ तियंचयोनिपु चैव कुदेवेषु कुभूमिपु । कुमर्येषु तथा नैवोत्पद्यते अधो भवति नो कुज. क्लीबो दारिद्रमडित । विपुत्र. शोकसयुक्तो भोगोपभोगवर्जितः ॥ २७९ ॥ परसेवाकर करो निर्दय. शीलवर्जित. । दानेज्यावतसहीन परवचनचातुर ॥ २८० ।। जानीथ भूमिपा भो वै सम्यक्त्वस्यैव शर्मदा । महिमा च इमा वंद्या गृहस्थैर्वा मुनीश्वरैः ।। २८१ ॥ कुर्वीध्व धारण चित्ते आदी सद्बतसिद्धये । सम्यक्त्वस्यैव शुद्धस्य विधिदावाग्नितोयद ।। २८२ ।। नित्याहस्यैव नाशार्थ षक्रिया वासरं प्रति । कुरुध्व शिवशर्माय अभिषेकादिनामतः ।। २८३ ।। अर्थ--सम्यग्दृष्टि जीव यदि कुछ भी पढ़ा लिखा न होवे तो भी वह देव, शास्त्र और गुरुकी दृढ़ श्रद्धा- से शीघ्र ही बोधको प्राप्त होकर परमपदको प्राप्त होता है ॥ २७७ ॥ भावार्थ--पढ़े लिखे मनुष्योंको ही सम्यग्दर्शनको प्राप्ति होती हो ऐसा नहीं है। किन्तु जिन भव्य जीवोंके आचरण शुद्ध है, चित्तवृत्ति विशुद्ध है, जिनके परिणाम विशुद्ध है उनको ही सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होती है। अर्थ-सम्यग्दृष्टी जीव तियंच योनिमें, कुदेव कुभूमिमें, कुत्सित मनुष्य पर्यायमे उत्पन्न नहीं होते है । तथा सम्यग्दृष्टी जीव अंधे, कुब्जे, नपुंसक, दरिद्री, पुत्रविहीन, शोकसहित, भोगोपभोग रहित, दूसरोंको सेवा करनेवाले, क्रूर, निर्दय, शीलरहित, दान, पूजा, व्रतविहीन, दूसरे जीवोंको ठगनेमे चतुर और निंद्य नहीं होते है । हे राजन् ! यह सब कुछ महिमा सम्यग्दर्शनकी है । जगत्में जितने सुखके साधन है वे सब सम्यग्दृष्टी जीवको स्वयमेव प्राप्त हो जाते है । यह सम्यक्त्व मुनियों व गृहस्थोंके द्वारा वन्दनीय है, इसकी अपार महिमा है ॥ २७८-२८१ ॥ अर्थ-हे भव्यजीवों! उत्तम व्रतकी सिद्धिके लिये सम्यग्दर्शनको सबसे प्रथम अपने चित्तमें धारण करिये। क्योंकि उससे ही उत्तम व्रतोंकी सिद्धि प्राप्त होगी। शुद्ध सम्यग्दर्शन कर्मरूपी दावाग्निको नाश करनेके लिये मेघके समान है ॥ २८२ ।। अर्थ-दैनिक होनेवाले समस्त पापोंको निवृत्तिके लिये षट् क्रियाओको नित-प्रतिदिन करना चाहिये। अभिषेक, पूजन आदि क्रियाओंसे मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥ SeeMammmmmm जयजयारामरामला - [ १८३ ] पतिमा नैव कुर्वति ये गृहस्था मता न ते । पशुतुल्या बुधैः भूपाश्चागमे पापकार्यतः ।। २८४ ॥ सतो मा भूमिपा पूर्वं कृत्वा वे धर्मसाधन । अन्यत् पश्चाद्धि कुर्वीध्व गृहकार्य सुखाप्तये ।। २८५ ।। यापते रम्य भो भपा. क्षेत्रेषु सप्तसु सदा । व्यय कुरुत शर्माप्त्यै माऽन्यत्कार्य कदाप्यहो । २८६ ।। गृहग्या धर्मकार्येषु व्यय कुर्वति नो हि ये । स्वस्य द्रव्यस्य ते नून देवतो वचिता खला ॥ २८७ ।। चर्ममयं च काम च त्रिवर्ग य पुमान् खलु । साधयत्येव स याति क्रमात् शिवपुरे वरे ।। २८८ ॥ अयं--हे राजन् । जो गृहस्थ अपने पट आवश्यक कर्मोको ( देव पूजा, गुरुको उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान ) नित्य नहीं करते हैं वे अपने कर्तव्यसे रहित हैं। मनुष्य वही है जिसने अपने कर्तव्योकी मिलि तो है कर्तव्योको मिद्धि के बिना मनुष्य पशुके समान है । पट आवश्यक कर्मोसे पापोका नाश होता है। और जिनके केवल पापको हो निवृत्त हे वे पशु ही हैं ।। २८४ ॥ अय-उमलिा हे नृपतिगण ! सबसे प्रथम अपने धर्म साधनोंको नियम पूर्वक साधन करना चाहिये। पोले पानीविकादि मवयो आरभ करना चाहिये । जो अपनी षट् आवश्यक क्रियाओको पालन कर अन्य कार्य कला के पी गिंका गान गपादन करता है ॥ २८५ ॥ - गगग हो ! अपना वन मात क्षेत्रों में लगाओ। क्योकि पापकार्यसे उत्पन्न हुआ धन यदि में गाया तो बन पुण्योदय का कारण है । अन्य कार्य में व्यय करनेसे केवल पापका ही कारण । माता, गिनागम, निनराध, गिननेत्य, जिनचेत्यालय, जिनक्षेत्र, जिन आयतन ॥ २८६ ।। गर धर्म कायम अपना धन नही पर्च करते ह वे भविष्यके लिये ठगाये जाते हैं। उनको Trini ni ! मानो।पोरन नका महान् परमंपादन करने का अवसर ही प्राप्त होता है।।२८७॥ ~ म , जोर काम परपाको पार निगद भावसे संपादन करता है यही " min 11 गाय का काम पुकारते गिर गनेने मनुष्यो पतंग 17. पिन परमप। यात काम और अगं पुरणार्थ 7; · । के प्रति दी हो। नती कर ..' . . . . . . . .111 २८८ ॥ मायाराम-ENIEF - -- M +in- - . L + . " . प - [ १८४ ] अविराध्य धर्मकार्य करव्या गृहमेधिभिः । सर्वे कार्या सदाकाले शर्मसततिदायकम् ।। २८९ ।। दानेन दृश्यते पुण्य. दयाभावेन सत्तप । आत्मध्यानेन मोक्षस्य स्वरूपो नात्र सशयः ॥ २९० ।। मुनये विधिना भूपा मध्यान्हे समये वरे । दत्वा न्याद रसाढ्य च करणीयं ततश्च त ।। २९१ ।। रोगगस्ताय सदेया भेपजा नित्यमेव हि । तस्यातकविनाशार्थ दयावतविशुद्धये ॥ २९२ ॥ भयकपितजीवाय दातव्यमभयाभिध । दान सम्यक्त्वशुद्धयर्थं सदैव भो नरेश्वराः ।। २९३ ॥ पाठकाय सुग्रथस्य कर्तव्य बहुमोदत । दान सत्ज्ञानप्राप्त्यर्थ अज्ञानध्वातसद्रवि ।। २९४ ।। Reमरा HIRSHIPS HOS HERE मय क्योंकि, अर्थ----गृहस्थोंको अपने समस्त कार्य धर्मकी रक्षा करते हुए ही करने चाहिये । धर्मकी हानि कर नहीं करने चाहिये । जो मनुष्य धार्मिक क्रियाओको भूलकर अन्य कार्य करता है वह सुखको प्राप्त नहीं होता है । सुखकी प्राप्ति धर्मक्रियाओंके करनेसे ही होती है ॥ २८९ ॥ अर्थ--दान देनेसे ही पुण्यकी महिमा प्रकट होती है । दयाका कार्य करनेसे ही श्रेष्ठ तपका फल प्राप्त होता है । आत्मध्यानसे ही मोक्षका स्वरूप प्रकट होता है ॥ २९० ॥ अर्थ--मुनिगण, आर्यिका आदि पात्रोंको मध्याह्न समय आहारदान देना चाहिये। अपनी शक्ति और भक्तिके अनुसार विधिपूर्वक प्राशुक आहार देना चाहिये । सरस, मनोहर और शुद्ध आहार देवे ॥ २९१ ॥ अर्थ---चतुःसंघमे जो रोगसे पीड़ित हो उसको उत्तम प्राशुक शुद्ध औषधिका दान करे। और साधा- रण जीवोंको भी औषधिका दान देवे । जिससे रोगका नाश हो और दया व्रतको विशुद्धि हो ॥ २९२ ॥ अर्थ-हे राजन् ! भययुक्त जीवोको अभयदान देना चाहिये । जीवोंको मरते हुए बचाना चाहिये। प्राणोंकी रक्षा कर अभयदान देना चाहिये। अन्य शास्त्रों में अभयदानका अर्थ यह बतलाया है कि पात्र मुनि, आर्यिकादि उत्तम पात्रको वसतिकादिक देना अभयदान है, अभयदानसे सम्यदर्शनको विशुद्धि होती है ॥२९३॥ अर्थ---मुनि, आचार्य, उपाध्याय आदि पात्रको जैनागमके शास्त्रोंका दान करना चाहिये । चतुःसंघको जैन ग्रन्थोंका दान देना चाहिये । जिससे सम्यक् ज्ञानकी वृद्धि होती है और अज्ञानका नाश होता है । जैनागम- के ग्रंथोंका ही दान ज्ञानदान कहलाता है । अन्य मतके ग्रन्थोंका दान मिथ्यात्व है ॥ २९४ ।। Sementara [ १८५ ] आयिकाये सुवस्त्राणि सदेयानि मुनीशिने । गोचकर्मार्थमेवाहो सदेयौ पिच्छिकुडिको ।। २९५ ।। श्रावकाय प्रदेयाश्च वस्त्राभरणसचया. । श्राविकायै महीपाला देयास्ते च मनोहरा. ।। २९६ ॥ दयाभावेन मम्मै अन्नपानादि वस्तु च । दातव्य सर्वकालेहि दयाभावप्रसिद्धये ।। २९७ ॥ इत्याद्या या क्रिया प्रोक्ता जिननाथेन ह्यागमे । व्यवहारजाश्च ता. सर्वा ज्ञेया. सम्यक्त्वधारिभिः ॥ २९८ ।। न्यायमार्गेण सर्वाश्च प्रजाः मर्थिदायिकाः । पालनीया सदाकाले भवद्भिन्यायवेदिभिः ।। २९९ ।। यमराजाच्यमान्य अर्थ-इसी प्रकार आयिकाके लिये साड़ी आदि वस्त्रोका दान देना चाहिये । मुनिगणोके लिये शौचकी शुदि के अर्थ एवं जीवरक्षाके लिये पीछो, कमंडल देना चाहिये ॥ २९५ ॥ अ-हे राजगग ! श्रावकोको भोजन पान और वस्त्राभरण देना चाहिये। उनको आजीविकाका मापन नगा देना चाहिये । और श्राविकाओके लिये भी वस्त्राभरण, अन्नपानादिक देना चाहिये ॥ २९६ ॥ - यामावगे अपात्र कुपात्र और सर्वसाधारण दुःसो, रोगी, अनाथ, पंगु, दरिद्रो, पापी, नीच, पानातिनमान नोवाको यथायोग्य अन्नपानादिक वस्तुओका दान सदेव देना चाहिये। जिससे दयाभावको प्रनिति ।। २२० ।। अरोमेन्द्र भगवान्ने परमागममें दान, पूजा, विवाह, उपनय संस्कार आदि जितनी क्रियाएँ 17: पोर l गाहार प बोल रही हैं परन्तु उनको वल व्यवहार नहीं समझना चाहिये । वे मामि frani संतो गमत है। गानयत 'कतंय हे । व्यवहारमें जितने गानपान कर्तव्य है til 31 पर मंतो नया काममि ननलाई है। परन्तु सम्यग्दृष्टो जोतोको नित्य हो 7. Trirnऐगा सर ना गन्यादायी गोलोको इनने उपेक्षा नहीं करनी In Iiit A TET EPIRATT पेसा करता है यह नि पादयो । ॥ २२८ ॥ नावामागे गरि पान करना चाहिये । साग पौर गा. • . 11: HTTTTTTAIT ॥ २१ ॥ pada . 4 7 1 , Pain r [ १८६ ] इति स्वस्वामिना प्रोक्त धर्माधर्मफल शुभ | सभातस्थाश्च ते भूमा मृदुभावान्विता व्यधु ।। ३०० ।। श्रुत्वा ससारतो भीत्वा मत्वेति स्वहृदि तदा । जिनधर्मसम नैवापर वै भुवनत्रये ।। १ ।। केचिच्न शुद्धसम्यक्त्व व्यवहारनयान्वित। दयावत च केचिद्धि केचिदणुव्रतान् वरान् ॥ २ ॥ दान दत्वा सुपात्राय करिष्यामि सुभोजन । कृत्वाभिपेकसत्पूजा जिनबिंबस्य निश्चयात् ।। ३ ।। जिनपादो सुगधौघे. काश्मीरागुरसयुतै । प्रात सलेपयित्वा वै पश्चाल्लेपो ममास्तु भो ।। ४ ।। अरविंदोत्करान् धृत्वा जिनपादाब्जयो. उपरि । जग्घि पश्चात् करिष्यामि सदैव मारहानये ॥ ५ ॥ पादाग जिनबिंबस्य सद्याज्यवतिजै शुभैः । ईदृशे दीपसदोहे. सख्या मिः सहस्रश. सदा ॥ ६ ॥ मोदक चैव शाल्यन्नमलिसयुत । इत्यादिनिवसधृत्वा जिनेन्द्रपदमन्निधे ।। ७ ॥ जेमन शोभन पश्चात् स्वर्णभाजनस स्थित । पश्चादेव करिष्यामि वासर वासर प्रति ॥ ८॥ समाभ्यर्च्य करिष्यामि लेप पश्चात् सुखाप्तये । धूप दत्वा सुगधाढ्य शिवसुखप्रदायक ॥ ९ ॥ व्यजन छालाजन्मजयमलयालयमजसमाजमान्य बाजाराच्या rawneewtrochu Sandshree अर्थ--वह धर्मात्मा राजा अपने अधीन राजाओंको इस प्रकार धर्म-क्रिया नीति और पुण्य पापका फल निरूपण करेगा जिसको सुन कर सभामें विराजे हुए राजा अपने परिणामोंमे अतिशय मृदुता धारण करेंगे । परिणामोंकी सरलतासे उनके पापमय मलिन विचार उनके हृदयसे सर्वथा दूर होगे। कितने ही राजा तो संसारसे भयभीत होंगे। कितने पापकर्मोंसे भयभीत होंगे। समस्त सभाके सभासद निश्चय करेंगे कि जैन- धर्मके समान सुखकारी तीन लोकमें अन्य कोई भी पदार्थ नहीं है । इसलिये व्यवहार सम्यग्दर्शनके साथ शुद्ध सम्यग्दर्शनको बहुतसे राजा धारण करेंगे। कितने ही राजा अहिंसा व्रत धारण करेगे। कितने ही राजा पाँच अणुव्रत ग्रहण करेंगे ॥ ३००-१-२ ॥ अर्थ--कितने ही भव्यजीव यह प्रतिज्ञा करेंगे कि हम नित्य प्रति पात्रोंको दान देकर ही भोजन करेंगे। कितने ही भव्य भगवान्का प्रति दिवस अभिषेक कर भोजन ग्रहण करनेको प्रतिज्ञा लेगे, पूजा करनेकी प्रतिज्ञा लेंगे। कितने भव्यात्मा पुरुष भगवान्के पवित्र चरणकमलो पर सुगंधित पदार्थों का लेप करने और अवशेष सुगंधित द्रव्यका मस्तकमें तिलक लगाने, उत्तम सुगंधित और शुद्ध पुष्पोको भगवान्के पवित्र चरणों पर कामदेवको नाश करनेके लिये चढ़ाने, भगवान्की पूजाके समय सुगंधित घीके मनोहर दीप जलाकर जन्यमान्च्याच्याजच्यालयाच्या [ १८७ ] समान्य त्रिपुटा चद्रवाला च क्षीरकाया मनोहरा । पटोलिका सुशोभाव्या नाम्ना वै मातुलिंगकः ॥ १० ॥ कपित्य कटकीफलः कामागो नेत्रनददः । दाडिमश्चैव हिंतालोलागलीनिबूकस्तथा ।। ११ ॥ रभाद्या ये फला. सति मनोवकहरा वराः । प्रभो पादाब्जक्षोण्यने धृत्वैतान् मेस्तु स पुन ॥ १२ ॥ अष्टम्या वा चतुर्दश्या पालयिष्यामि सबत । ब्रह्मचर्याभिधं शुद्ध शिवशर्मप्रदायकम् ॥ १३ ॥ इत्यादीन् मगवाधीश तत्समीपे व्रतोत्करान् । भूमिपाला. सुभावाट्या गृहिण्यत्येव निश्चयात् ॥ १४ ।। भूपो हि यत्र धर्मस्य पालको नात्र संशय । तदाज्ञावर्तिनः सर्वे भूपा किं न भवत्यहो ।। १५ ।। गजः धर्मभ्यः मार्गो हि चलत्येवावनी नृप । तदृते धर्मलेशोपि जायते नो कदाचन ॥ १६ ।। मोहनीय तमका नाश होनेके लिये आरती करने, भगवान्के पवित्र चरणोंके अग्रभागमे उत्तम नैवेद्य चढ़ाने, स्वर्णके गालोन उत्तम नैवेद्य रखकर क्षुधावेदनीयको नाश करनेके लिये चढ़ाने, भगवान्के चरणकमलके समक्ष गुगधित धूपको अग्निमें प्रक्षेपण करने, इलायची, दाडिम, खिन्नी, जामुन, विजोरा, पटोलिका, कपित्थ, फणस, नोयू, केला, श्रीफल आदि सुन्दर फल चढाकर अपनेको धन्य मानने, अर्घ चढाकर कृतकृत्य मानने आदिको प्रतिमा लगे ।। ३-१२।। ri--अष्टमी और चतुर्दशीके दिवस श्रेष्ठ व्रतो (प्रोषधोपवास) पालन करूँगा। ओर उस दिवस पराको वारण करेंगा । जिससे शिवमुराको प्राप्ति हो । हे राजन् श्रेणिक! इस प्रकार अनेक योतम महारा ममोपतोको ग्रहण करेंगे ॥ १३-१४ ॥ गि देशमे बडे-बो माउलो राजा जेनत्रम पालन करनेवाले हो तो उनको आज्ञामें timयो नहीं जैन समता पालन करेंगे ? अवश्य ही करेंगे। राजा यदि धर्म का प्रतिपाला • THE : 11 गाजरगा तो पायगो । पजा गनाता अनुकरण करती है। इतना ही नही १ -पान करनेता हे ॥ १५ ॥ ---- Foni गान मारे जग नामो निना भो उमो पता प्रतिपात हो जाती :::"::::मना गीतो करो। गोपिना धर्मका प्रतिपादन ":: "रोमा:, गो नेगो नायि । नापीकानयर प्रनामें जाता ..', :ना ||१६॥ -- ne . -- . । 7 . ३ [ १८८ ] तत्र क्षेत्र प्रजा. सर्वा पालयत्येव विप्रमा' । जिनधर्म जिनेन्द्रोक्तं दयाजलधिसभृतम् ॥ १७ ॥ व्रतपाकात् समापन्वान् भोगोपभोगसत्सुखान् । भोक्ष्यत्येव सदा सोपि तत्र पचेन्द्रियोद्भवान् ॥ १८ ॥ अस्मारिक दुर्लभ लोके राजसौख्य नराधिप । सुलभा धर्मिणा सर्वा इन्द्रभूत्यादिसपदाः ॥ १९ ॥ सप्राप्य पुत्रपौत्रादीन् स महीप शुभोदयात् । स्थास्यति भावितीर्थेश स्वराज्ये भूपवदिते ।। २० ।। स्वपुरे पत्तने द्रोणे महीधे वाहने तथा । द्वीपवत्यास्तटे चैव याद.पतेश्च सत्तटे ॥ २१ ।। आरामे विपिने चापि ग्रामे खेटे मटवके । वृक्षादिवाटिकाया च कर्वटे कदरे तथा ॥ २२ ॥ इत्यादिशोभने स्थाने कारयिष्यति स नरेट । उदवसितानि सौम्यानि रत्नहाटकजानि च ।। २३ ।। तन्मध्ये स्थापयिष्यति विवानि श्रीजिनेशिना । प्रतिष्ठापाठमर्यादात् चतुर्विधगणे सह ।। २४ ॥ किमिच्छका भिधदान सदा दास्यति स नृप. । निद्रव्याय शात्यर्थ दरिद्राभिधकर्मणः ॥ २५ ॥ अर्थ-वहाँको प्रजा (क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) श्री जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा प्रकाशित दयारूपी समुद्रसे युक्त जिनधर्मका ही पालन करती है ॥ १७ ॥ अर्थ---उस राजाने व्रतके शुभ फलसे अनेक भोगोपभोग संपदाको प्राप्त किया और मनोहर सुख भोगने लगा ॥ १८ ॥ राजन् ! इस कर्मदहनवतके फलसे राज्यके सुख प्राप्त होते हैं और इन्द्रकी विभूति प्राप्त होती है ॥ १९ ॥ अर्थ---इस प्रकार वह महाराजा व्रतके पुण्यसे पुत्र-पौत्रादिको को शुभ शोभाको प्राप्त होगा। हे भावि तीर्थेश श्रोणिक ! वह महाराजा व्रतके पुण्यसे राज्यसंपदाको चिरकाल पर्यंत निर्विघ्न पालन करेगा ॥ २० ॥ अर्थ--वह राजा अपने नगरमें श्रीजिनेन्द्र भगवान्के रत्नोंके दिव्य मंदिरोका निर्वाण करेगा। इसी प्रकार अन्य शहरों में ग्राम, पर्वत, नदीतट, बगीचा, वन, द्रोण, कंदरा, पर्वतको शिखर आदि स्थानोंमें भी जिनालय निर्माण करावेगा । जो बड़े ही भव्य ओर सुन्दर होगे । जिनमें मनोहर जिन प्रतिमायें प्रतिष्ठा करा- कर विराजमान करेगा। प्रतिष्ठाके समय चतुर्विध संघका आमंत्रण करेगा और सबको भोजन-पान आदि सामग्रीके द्वारा संतोप करेगा । सबको उनकी इच्छानुसार दान देगा। सतके मनोरथ पूर्ण करेगा। सवको भावनाको सफल करेगा। जिससे दरिद्रताका समूल नाश हो जायगा ।। २१-२५ ।। CLASMIREENHEADLINEusiness उपन्यास [ १८२ ] मममग्नो गत काल नैव जाति सदा । धर्मकाय पुरः कृत्वा नोक्ष्यत्येव स्वसंपनम् ।। २६ ।। एक न मुजनानहि मर्मना संतति नृप । कालमा प्रगगेग बैंगन्यं प्रापयिष्यति ।। २७ ।। चिनान्मतारं ३ रायगर्न रजोपमम् । व पापप्रदं वीरैः नून ज्ञानाधिपारगैः॥ २८ ॥ इन्द्रियोदतार्मेषु गर्मोन्यनत्र किंवन । नास्त्येव बहवो नष्टा नृगाचाः पशवो यतः ।। २९ ।। स्टोनम्मपनोइनन महातंकप्रदानका. । अतृप्तिजनका मुसादेवा इने मृताः॥३०॥ उनादेना नत्येषु पानि नो किन्यहो । न वै नेवि तस्माद्धि पत्तंन्येव यने ननः ।। ३१ ॥ नादात्र अन्न है कि सन्नात्र सन्जु । येन लुचेन निवान. स्त्र वेन्मनि स्यात् ।। ३२ ।। "55:25.II-SERIMENSTRUMEHTAS अर्थ-वह राना सब प्रकारके सुबोका सेवन करता हुआ अपने समयको नहीं जानेगा और धर्म कार्य- निर भी मयने प्रथम र अरनो पुयोदयले प्राप्त संपत्तिको भोगेगा ॥ २६ ॥ -~-57 प्रवाह राजा बनरे फलने समस्त प्रकारके सुखोको भोगेगा। काललबिसे वैराग्यको पायोगा। al + -- . - गणारी मारतो वह जानेगा। राज्य को कर छली के ननान मानेगा । नारकी अनारताको 7 - दयारामु पर है। उनमें कुछ भी मुब व नार नहीं है। इन्द्रियोकी आयीनता- गरे । गेर जानरा घर है वह मान गा ओर पनिका घर है। इनमें ..! मुगले नल इलिये मोहने योध। दिनद इन अतृप्ति- :: मानन जानो पुरानो आयोन नही होने है। इस प्रकार वह " - -- • रन मन का 7 -- :::::: म: गुल -Ecuadinाजमारामार SereAHESHESHeerwes लगापि नह सुज्ञानिन् मभुक्ता गर्ममतति । तथापि ते च तृप्तिश्च ह्यल्पमात्रापि नो भवेत् ।। ३३ ।। विस्तरेण विचारेण ह्यलमात्मन् शिवाप्तये । अतृप्तिजनकान् शर्मान् त्यजस्व चाधुनाहदान् ।। ३४ ।। वृथा ह्येतत्प्रमा वर्षा मे कुबद्धे गता वरा । विना श्रीवीतरागस्य संयमेन शुभेन च ॥ ३५ ॥ अयैव राज्यभार च ह्यारोप्य सुतमूर्द्धनि । करिष्याम्यनघ घोर तप शिवप्रदायकम् ॥ ३६ ।। इति ध्यात्वा हृति पुत्रमाहूय हरिविष्टरे । स्थापयित्वा प्रजाना च पालनार्थ स्वकीयके ॥ ३७ ।। अन्यान् पुत्रान् तथा वधून सतोष्य वृत्तिजनै सह । पृथक् पृथक् नराधीश स नृपो नृपसेवितः ॥ ३८ ॥ नि स्वेभ्य. रत्नभर्मादीन् दत्वा आनंदचेतसा । कृत्वा जिनेन्द्रसत्पूजा चाभिपेकपुरस्सरा ॥ ३९ ॥ सर्वेषु स्वकुटुबेषु सकार्य ह्यात्मभाववित् । क्षमा च खलु सर्वेषु वस्तुपु निर्ममत्वता ॥ ४० ।। अर्थ--हे आत्मन् ! संसारमें उत्तमसे उत्तम सुख तूने भोगे तब भी तेरी जरा भी तृप्ति नहीं हुई। अनंतकाल सुख भोगते हुए तुझे अल्प मात्र भी तृप्ति नही हुई ॥ ३३ ॥ अर्थ--अधिक क्या कहें ? और हे आत्मन् ! अधिक क्या समझाया जाय । यदि मोक्षसुखके प्राप्त करनेकी तेरी इच्छा है तो संसार और इन्द्रियोके तुच्छ सुखोंका परित्याग कर । और इस समय दुःखप्रदायक तुच्छ सांसारिक सुखोको छोड़। आज तक मेरा इतना समय इन तुच्छ भोगोके सुखोकी लालसामें व्यर्थ ही गया । और अपना यह अमूल्य जोवन सयमके बिना व्यर्थ ही चला गया। इसलिये आज ही मै अपने ज्येष्ठ पुत्रके शिरपर यह राज्यभार समर्पण कर सोक्षका अनुपम सुख प्रदान करनेवाला यह मुनिसंयम ग्रहण करूँगा। इस प्रकार भनमें विचार कर ओर अपने ज्येष्ठ पुत्रको बुलाकर स्वर्णसिंहासनपर विराजमान कर अपनी प्रजाको पालन करनेके लिये पट्टाभिषेक करेगा । और छोटे पुत्रोंको यथाशक्ति संपत्तिका भाग कर प्रदान करेगा। अन्य बंधु जनोको उनकी योग्यता प्रमाण आदर सत्कार करेगा । अन्य परिवार कुटुम्ब तथा भृत्यवर्गको यथायोग्य संतोषित करेगा । अपने आधीन राजाओंको पुत्रके आधीन कर राज्यभार पुत्रको समर्पण कर देगा ॥३४-३८॥ अर्थ-गरीब और अनाथ जनोको धन-रत्न आदि द्रव्य देकर संतोषित कर अपने भावोंको सफल करनेके लिये आनंद भावोंसे श्रीजिनेन्द्र भगवान्की अभिषेकपूर्वक पूजा करेगा। अपने कुटुम्बी जनोंसे क्षमा करा- कर और स्वयं सबसे क्षमाकर समस्त वस्तुओंसे निर्ममत्व भावको धारण कर समस्त प्रकारसे निःशल्य होगा। RSHerm [ १९१ ] म्वय भूत्वा निःशल्यो वै स्वस्मिन् चाज्ञाय मिद्धये । स्वात्मन. शातभावाढयः शिविका च मनोहरा ।। ४१ ।। समाका तूर्णमेव स्वात्तनृपगणे सह । पुरवायबने चैव यास्यत्येव सुशोभने ।। ४२ ।। गोमवरादितीर्याना सन्निवे वा गणेशिना । अवतीर्य स्वय यानात् शातभावात्तमानसः ।। ४३ ।। नत्वा तत्पादपद्माज (?) तारक निरैर्नुतम् । स्वकरी कुड्मलीकृत्य याचिष्यत्येव सयमम् ।। ४४ ॥ निम्बर दयाधीश गरणागतवत्सल । वीराधिप मुने स्वामिन् भव्यभूतप्रतारक ॥ ४५ ॥ आपगणविचाग्ज्ञ मा देहि शरणागत । दीक्षा जैनेश्वरी पूज्या इन्द्रनागेन्द्रभूमिपै ॥ ४६ ।। नदा गुन्पदेगेन त्यत्वा भूपणमहतोन् । वस्यादीन् शोभनान् चैव महामोहप्रदायिकान् ।। ४७ ।। गिगवान गकलान् केशान् गुल्मान् वा मोहभूपतेः । लुचयित्वा तदाकाले पचमुष्टेः महासुधी ॥ ४८ ॥ बाययान् निगिलान द्वद्वान् अत स्थान पि दुस्त्यजान् । मढेश्च तत्ममीपेहि त्यक्त्वा भूत्वा मुने सम.॥ ४९ ।। गृरीत्या गोक्षपाप्त्ययं अष्टाविंशतिगख्य कान् । मूलभतान् मुने. सर्वान् मूलगुणान् दयाप्तये ।। ५० ।। अपने मन को रातिको धारण कर राजा भगवतो जिनदीक्षाको धारण करनेके लिये विषय और कपायोको जीतने- गि अपने भाषाको शान्त करेगा, सर्वोत्तम शिविका (पालखी) में बैठकर अनेक राजाओंके साथ बाह्य उद्यान- में आप || ३९.४२ ।। यमच्यालयाच्या -~-गजा मीमवर स्वामी निफट वा गणधर स्वामीके समीप शात भावोमे पालसोसे उतर फर 717गा ॥ १३ ॥ गोगे तमगार ममुरमे तारक ऐसे गुरुले पवित्र चरण कमलोको नमस्कार कर ओर Fint TREATR TET (1) भगातो जिनदोसाकी याचना करेगा ॥ ४४ ।। 1.--: मायामोश है शरणागत नमन ! हे गने । हे भायजीवो तारक ! • PRETTIो गाती निनदोक्षा प्रदान कीजिये ।। ४५-१६ ।। माग 1,717 न। मामाको पाने वाले ऐने ममाग वारण अपने मैं: पान 33 फायेगा, तो अपने मम्मा, - " " 17,' रोगात यार नाना परिणाको .. " 14 4 [ १९२ ]] तुरमोतिलक्षान् ने उत्तरादिवरान् गुणान् । सर्वशुद्धिप्रदान वद्यान् मुने. देवाधिपं. सदा ।। ५१ ।। अष्टादरामहस्राणि शीलभेदानि भूपते । धृत्वा वै ब्रह्मचर्यम्य शुद्ध कानि यते खलु ।। ५२ ।। त्य शुचा गृहीत्वा वे सयम स मुनिवरम् । करिष्यति वने भीमे दुर्धर तपसग्रह ।। ५३ ॥ तदाधीना नरेन्द्राश्च दृष्ट्वा स्वस्वामिनो मुदा । साहस भो नराधीश भव्यभावाः सहस्रशः ॥ ५४॥ ता दीक्षा तेपि साकं च स्वमहिलाभिगदरात् । गृहिण्यन्ति परित्यज्य सपदा स्वर्गसन्निभा ॥ ५५ ।। आयिका आर्यिकासघे करिष्यत्यनघ तप । मुनयस्तेपि साक च तेनैव मुनिना वरा. ।। ५६ ।। अतीचारविनिमुक्तान् मूलोत्तरगुणान् मुनि । मोक्षार्थ धीरभावाढ्य पालयिष्यति स खलु ।। ५७ ।। महासाहमधैर्येण स यति कर्मपर्वतान् । तपोवज्रेण भो भूप खडयिष्यति दुर्जयान् ।। ५८ ॥ श्मशाने भूधरे भीमे विजने दुर्गमे वने । कदरे निर्भयो धीरो महोरुहस्य कोटरे ॥ ५९ ॥ श्रवत्याश्च तटे शालमूले वा रविसन्निधे । ध्यान व्युत्सर्गसज्ञ च करिष्यत्येव सिद्धये ।। ६० ।। यायल THE राम छोड़कर अपने गुरुसे अष्टाविंशति मूलगुणोंको धारण करेगे । नवीन दीक्षित मुनिराज चौरासी लाख उत्तरगुण और अठारह हजार शीलव्रतको धारण करेगे । इस प्रकार शुद्ध संयमको धारण कर वह राजा भयानक अरण्यमे घोर तपको धारण करेगा॥४७-५३॥ अर्थ--उस समय अपने स्वामी राजाका इस प्रकारका महान् अद्भुत साहस देखकर हजारों आधी- नस्थ राजगण भव्यभावोंसे भगवती जिन दीक्षाकी याचना करेंगे ॥ ५४ ॥ अर्थ-वे राजगण भी अपनी-अपनी रानियोके साथ सर्व सम्पदाका त्याग करके स्वर्ग मोक्षको देने- वाली भगवती जिन दीक्षाको ग्रहण करेंगे। आर्यिकायें आर्यिकाओंके संघमे रहेंगी व निर्दोष तप करेंगी और मुनिगण मुनिसंघमें रहेंगे, रहकर घोर तपश्चरण करेंगे ॥ ५५-५६ ॥ अर्थ--सर्व प्रकारके अतीचारोंसे रहित मूलगुणोंका वह मुनिराज पालन करेगा। धीर, गंभीर भावोंसे और परम साहसके साथ वह मुनिराज तपके द्वारा कर्मरूपी पर्वतोंको खंड कर समूल नाश करेगा । वन, निर्जन स्थान, श्मशान, कदरा, नदीतट आदि उपद्रव रहित एकांत स्थानमें वह घोर तपश्चरण करेगा ॥ ५७-५९।। अर्थ-और एकांतमे ध्यान धारण करेगा। एक दिवस, दो दिवस, पन्द्रह दिवस, महीना, दो महिना, सामान्य शाजयमान्य [ १९३ ] PRENTurmers मामपानं द्विमामात रसमासातमेव च । मध्मोत्कृष्टसुभेदेन हायनात च्युतोपम ।। ६१ ॥ पंचतुपक्षघनाते वा मासे वा रसाभिधे । सर्वदोपविनिष्क्रात निवसहिभजिष्यति ।। ६२ ।। उदन्याश्च समुत्पन्ना ता बाधा दुर्धग नृप । सोक्ष्यते स यतीन्द्रो हि कर्मनाशाय केवलम् ।। ६३ ।। ध्यान वाध्ययन नित्य मनोरोधाय सयमी । पालयिष्यति भो भूप कर्मसताननाशम् ।। ६४ ।। आचार्यान् दशसख्याढ्यान् जिनधर्मप्रकाशकान् । तपद्धर्यादिपु ऋद्धयाढ्यान् महासारसमन्वितान् ॥ ६५ ।। तिनाजापालकान् वुद्वान् नानातप करान् वरान् । निलिंपाधिपसदोहेवंद्यान् सुजीवतारकान् ।। ६६ ।। वदयन् मगवाधीग गृहिण्यत्येव स मुनि । एकाविहारजा वृत्ति धीरवीरे प्रपूजिता ।। ६७ ।। तत मोपि मुनीन्द्रो वे सिंहवन्निर्भयोवली । गिरिकदरदुर्गेपु सवसन् ध्यानसिद्धये ।। ६८ ॥ परिप्यत्येव भो भग द्वादशाभिघसत्तप । अतीचारविनिष्क्रात कर्मदावाग्निवर्मुचम् ।। ६२ ।। व न दुर्वर फुत्वा निशुदया ह्यनघ तप. | पष्टम च गुणस्थानमुल्लष्य ध्यानयोगतः ।। ७० ॥ चार महीना, छह महीना, बारह महीना (वर्ष) आदि समयको मर्यादासे वह मुनि घोर तपश्चरण कर अपनी जात्मामे समस्त दोपोका निराकरण करेगा ॥ ६०-६२ ॥ अर्ग--7ह मुनि तुपा परोषहको महन करेगा। अन्य परोपहोको भी सहन करता हुआ वह मुनि भामा कट करेगा । कर्मफा नाश करनेवाला ऐसा ध्यान, शास्त्रोका अध्ययन मन और इन्द्रियोका निरोध "॥१२.६१ ।। अमा, उपाध्याय, तगम्यो, शेश्य आदि दशभेद धारक आचार्य परमेष्ठी, जिनसूत्रके उपवेशक, पीक नियोगे विभूपित मान परमेष्ठीको योर जिनेन्द्रदेवकी आज्ञाको पालनेवाले अनेक TREND fuT-Tोको तार ऐसे सामान्य मुनीश्वरोको वदना करने के लिये, एव तीर्थ यात्रा n: मोकार एका मागे तोर निर्मल चारितको निर्भयताके माय पालन करेगा माम न मा ।। ६५.६८ ॥ -~~ • Titiगाह प्रसारमा नप नितिगार गारण देगा । इस प्रकार द्वार ITTER HIो प्रशासनमानी 3या तर मात गगन्या में HumesHPSHealKSHEPHARASHPAPERemenews . L . है -- .. - है [ १९४ ] MPSMETHEASTHeareweSear खाभ्रपनादिरागै प्रमितान् खलु दुर्जयान् । प्रमादान् तत्र समुक्त्वा चारुह्य सप्तमे पुनः ॥ ७१ ।। रघ्रं च दशमे पश्चात् क्षपकश्रेणिमडितः । द्वादशमे गुणस्थाने हत्वावरणपच वै ।। ७२ ॥ प्रयोदशम सप्राप्य गुणस्थान च्युतोपम । कैवल्य लप्स्यति बोध पचम मगधाधिप ।। ७३ ।। तत्प्रभावात्सुरा सर्वे ह्यागत्य नाथसयुताः । गधकुट्या दिसत्शोभा करिष्यति मनोहरा ।। ७४ ।। स्वद्भिवे शुभैर्द्रव्यै पूजयित्वा च त जिन । नत्वा पादारविंद तत् स्थास्यति तस्य सन्निधे ।। ७५ ।। स्थित्वा सिंहासने सोपि धर्मामृतरसोत्करैः । तप्स्यति चैव भव्यौघान् मिथ्याधतमस हनन् ।। ७६ ।। शिवद मुनिमार्ग च गृहिणा नाकदायक । प्रख्यापयन् जनान् सर्वान् बोधयन् बोधनोद्यत. ।। ७७ ।। जच्याच्या राज्यात अर्थ-वे मुनिराज दुर्जय ऐसे पन्द्रह प्रकारके प्रमादोका त्याग कर सातवे अप्रमत्तगुणस्थान में जा विराजमान होगे ॥ ७१ ॥ अर्थ--सातवें गुणस्थानसे फिर वे क्षपकश्रेणी मॉडकर क्रमसे आठवें, नौवे, दशवे, बारहवे गुणस्थानमे जा विराजमान होंगे । अन्तमे मोहनीय कर्मका नाश कर तथा बारहवें गुणस्थानमें ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय कर्मोका समूल नाश कर तेरहवें गुणस्थानमें जा विराजमान होंगे ॥ ७२ ॥ अर्थ--हे मगधेश्वर वह मुनीश्वर तेरहवाँ गुणस्थानको प्राप्त कर केवलज्ञानको प्राप्त करेगा ॥७३॥ अर्थ-केवलज्ञानके प्रभावसे समस्त देवगण अपने-अपने परिवार व स्वामियोंके सहित वहॉपर आयेंगे। और मनोहर गधकुटीको रचनाको करेंगे ॥ ७४ ॥ अर्थ-हे मगधेश्वर ! देवगण स्वर्गोसे उत्पन्न हुई परम पवित्र दिव्य अष्टविध सामग्रीसे प्रभुकी पूजा करेगे और प्रभुके पवित्र चरणकमलोंको नमस्कार कर प्रभुके समीप ही बैठेंगे ॥ ७५ ॥ अर्थ--वे प्रभु स्वर्णके दिव्य देवोपनीत सिंहासन पर विराजमान होकर धर्मामृतसे भव्यजीवोको तृप्त करेंगे । और उनका चिरकाल सम्बन्धी मिथ्यान्धकारका नाश करेगे ॥ ७६ ॥ अर्थ--वे प्रभु मोक्षको प्रदान करनेवाले मुनिमार्ग तथा स्वर्गको प्रदान करनेवाला श्रावक धर्मका निरू- पण करेगे ॥ ७७॥ यो POSweSHP-LesHEPSYNOPS [ १९५ ] यालय एव सबोध्य भयोधान् दिव्येन ध्वनिना स च । मते योगनिरोध च कृत्वा मोक्षाप्तये नृप ॥ ७८ ॥ हत्वा ह्यघातिकारीन् गुणस्थाने क्रियोज्झिते । अत्ये शुक्लासिना तत्र यास्यति चाव्यये पदे ॥ ७९ ।। अव्ययम्य पदम्येव किं स्वरूपं कियत्प्रमम् । इति प्रश्नस्य व्याख्यान शृणुथ भव्यसत्तमा ।। ८० ॥ नत्वा सिद्धवजान् महामुखप्रदान् ससारविच्छेदकान् । सम्यक्त्वादिगुणालयान् मुनिनुतान् लोकाग्रमूनि स्थितान् ।।८।। काया कमविनितान् मुरनुतान् ससारपारगतान् । किंचित् बुद्धिलवेन भव्यवचसा तेपा च कुर्वे स्तव ।। ८२ ॥ पृथ्व्याद्या नाराणा न द्वितीया भवनेशिना । माना तृतीया प्रोक्ता चतुर्थी ज्योतिपा च सा ॥ ८३ ।। पनगी नाकदेवाना ग्रेवेयकी च पष्ठमी । नाम्ना सर्वार्थसिद्विश्च सप्तमी भूमिका वरा ।। ८४ ।। अगोपरि पुनर्गत्या योजन द्वादशप्रम । तिष्ठते ह्यष्टमी पृथ्वी सिद्धवारविमडिता ।। ८५ ।। उमे र भोपा अस्मिन् लोकाकाशेष्टनामतः । संत्येव सुदराकारा. स्थिरा नानार्थसभृता ॥ ८६ ।। निगोनर्गदमागे रज्जुगप्तप्रमा मता । पूर्वे च पश्निमे व्यासश्चैकरज्जुप्रभो बुधैः ।। ८७ ।। मार गिराया दिया मोक्षाभिधा गिला । तन्मध्ये कानिनदीप्ता म्या द्वीनकर्गवजिता ॥ ८८ । नमाना गिदग्निा । नरक्षेपमा काग छत्राकाग विभान्यहो ।। ८९ ।। 14--प्रकार भव्य जोबो को दिव्यध्वनिके द्वारा सत्रोधन कर वे प्रभु अन्तमें योगनिरोधकी क्रिया गो ॥ ७८ ॥ - नानाः चौदह गणमानमें अघातिया कर्मोका नाश अन्तिम गुगलल्यानके द्वारा गो.. मग तो नाममा (अध्यय) स्थान है जिसमें किसी भी कारणो पुनः दुग उतन्न होने की ... .....: मान हिमको करते हैं ? इस प्रणता उत्तर यह है मो मुनिये ।। ७९-८० ॥ .--::ो प्रदान नेता, समानता नारा करनेवा, मायाति आठ गगोसे भूपित, का गितमान, शोरगति. मरिन नमागे पारगन ऐसे मित भगवान् । परिजोन कानिलग भवनमामिलो, गोगरी मनुष्य को कती, ritili, चलो, मान पानी और के ऊपर जाकर it inा है जो नि: न गुमानित ।। ८१-८' ।। . आमा र । किनके भागमा होने 1. ' ! : -finोरन तिा मान प्रमाा पिनार । पूर्व और -4 । . .. . ८ - m . - [ १९६ ] PRASHISHIPPSCHESHe-SHI स्थूला सा जिननाथेन सप्रोक्ता सर्ववेदिना । योजनैरष्टभि. ख्याता दुर्लभा चान्यलिगिना ।। ९० ॥ मध्येष्टयोजनैः स्थूला कृशाते क्रमहानित' । इति सिद्धशिलायाश्च वर्णना कीर्तिता जिनैः ॥ ९१ ।। तस्या मध्ये च तिष्ठति नित्याष्टगुणभूषिताः । निकुरुवाश्च सिद्धाना तनुवातातमस्तका. ॥ ९२ ॥ केचिदू सनाकारा केचित् पद्मासना वरा. । केचिच्च विविधाकारा ह्यमूर्ता नाशवजिता. ।। ९३ ।। विभात्येव हि केषाचित् पचेषुपचचापत. | शरीराणा इय सख्या उत्कृष्टेन हि समता ।। ९४ ।। लघुसख्याच केषाचित् राद्धाते कथिता जिनै । अग्न्यैव हस्ततश्चेय केवलाबकधारिभिः ।। ९५ ।। बहवः संति सभेदा मध्यसख्याभिरागमे । केषाचिद्दोषनिमुक्ते सर्वदोषविवर्जिताः ॥ ९६ ।। किंचिदूनाश्च ते सिद्धा. प्राक् शरीरादघापहाः । अनतसुखसलोना द्वेषरागादिवर्जिताः ॥ ९७ ।। पश्चिममें एक रज्जु प्रमाण है । स्वर्णकी दिव्यरूप मोक्षशिला है जो अपनी दीप्तिसे अतिशय चमत्कारिक है। मोक्षशिला अर्ध चद्रमाके समान है । समस्त सिद्ध उसमे एक समान निवास करते है । मनुष्यके क्षेत्रके समान जिसका विस्तार है। छत्राकार है। इस प्रकार महान् विशाल शिला है। आठ योजनकी ऊँची है । जैन लिंगको धारण करनेवालोंको ही वह प्राप्त होती है । अन्य लिगको धारण करनेवालोंको सर्वथा प्राप्त नहीं होती है । इस प्रकार यह शिला श्री जिनेन्द्र देवने बतलाई है ॥ ८६-९१ ॥ अर्थ-उस सिद्धशिलापर आठ गुणोंसे विभूषित, सिद्ध गणोके समूह तनुवात वलयके अन्तमें विराज- मान है । वहॉपर कितने ही सिद्ध प्रभु ऊर्ध्वासन विराजमान है, कितने पद्मासन विराजमान है, कितने ही अन्य आसनोंसे भी विराजमान है । सिद्ध भगवान् शरीर रहित अमूर्तीक है । द्रव्य कर्म, नो कर्म, भाव कर्मसे सर्वथा रहित है । इसलिये सिद्धोंका न तो कोई रूप हो है और न कोई आकार है । अतएव सिद्धोंको नित्य निरंजन निराकार कहते है । सिद्ध अजर है, अमर है, सिद्धोंकी उत्कृष्ट अवगाहना सवा पाँच सौ धनुषकी है और जघन्य अवगाहना ३॥ हाथकी है । मध्यम अवगाहनाके अनेक भेद है। सिद्ध भगवान् चरम शरीरसे किंचित् न्यून अनंत सुखमे निमग्न राग-द्वेष आदि रहित है ॥ ९२-९७ ॥ समस्त मंगलोंको प्रदान करनेवाले, सर्वोत्कृष्ट, लोकोत्तम, शरणभूत, परमशुद्ध, तेजरूप, चिन्मय सिद्ध भगवान् है। Here जन्मजयराज SHESHASHe-HASHASHIRW [ १९७ ] रासायासमरामाच्याच । निरजना निराकाग मदाकालेषु संस्थिता. । विश्वमागल्यकर्तार. सर्वोत्कृष्टा निरालमा. ।। ९८ ।। लोकोतमा गण्याश्च शुद्वाः मिद्धा निरामया । अनतकालमात्माप्ताः तिष्ठत्यगातिगा सदा ।। ९९ ।। निकल का निराधारा धामरूपाश्च चिन्मया. । निर्भया गतनिद्राश्च निरावाधाश्च्युतोपमाः ॥ १०० ।। नायहीनाश्च निर्माना पचवर्णविराजिताः । हावभावविनिमुक्ता ललनाभाववजिता ॥ १ ॥ कामहीनाश्च निगधा निर्विकल्पा निरागमा । निर्विहाराश्च निभा निष्पापा मदजिताः ॥ २ ॥ पिताणा निधिकागरच नि स्वना. सकलार्थदा: । निविचित्या मदावाग कृतार्था कृत्य वजिता ॥ ३ ॥ लेगापिहीनागा शानभावेन मडिता । मवेंपामीश्वगणा च ईश्वरा. सर्वदर्गका. ।। ।।। कमपतिगहीना भवदेहिना । जन्मात्ययजरात कर्वाजता निर्मला सदा ॥ ५ ॥ गगन निकायमगंगामा भुजति शम गुभमात्मभूत । अतातिगा' म्बात्मनि मस्थितास्ते निर्वाधरूपा मनसाविचित्या. ॥ ६ ॥ अर्थ-मिनु भगवान्-निर्भय, निष्फलक, निरावाध, निरामय, निर्मद, निराधार, स्त्रीरहित, हाव- भावनामादि रहित, कामविकार चेप्टा रहित, चिता रहित, विकल्प रहित, गंध रहित, कुचेष्टा रहित, उमा हिल, गेग रहित, उपद्रव रहित, विहार रहित, छल कपट भाव रहित, क्रोधादि विकार रहित, मान, मागादि, पाप रहित, नष्णा रहित, मोह-प ओर राग रहित परम शांत विराजमान हैं ॥९८-१००-१॥ F-गिलोद नही है । शगेर नहीं है । लेश्या नहीं है । कर्म नहीं है । जन्म-जरा, आधि-व्यावि ।। . निद भगवान ईश्वरोके ईश्वर है, तोग जगतके स्वामी हैं । समस्त पदार्थोके | RR Hiगार ममुरगे पार करनेवाले हैं। समस्त पदार्थको जाननेवाले अनत सुगमें मलीन तारका . . ::--Trant पर ममा तमं मारतो मग नार करने मे गिः परमात्मा अपनी प : ३ नि मामा मा का जन्म मत्य, गायन, मातर आरि ' ..miमामा विमान रहते है। उनका मनने विमानना प है . . . प '. . . . . ! ! मेन पारने मुल शो पाता T TE है। 1. TRE it.:, भोगनांगरे त्तम SHESHeres व्यायाम मारास [ १९८ ] चक्रपादिराजेन्द्रखगाधिपाना, कल्पेन्द्र ऊर्बेन्द्रसमुद्भवाना । भोगादिभूम्यसभवार्थकाना, तथान्यलोकत्रयसभवाना ।। ७ ।। जत्यये यत् क्रियते सुखैकं, त्रिकालज हि विपयोत्यसौख्य । तस्मात्सुखादक्षसमुद्भवाच्च, क्षणे हि एकैव विकारहीनं ॥ ८॥ भुजति मौख्य हतकर्मजाला , सारमत्यक्षमतुलविहीन (?) । अन्येन द्रव्येण विवर्जित हि, ह्रासेन वृद्धेन तथा विमुक्तम् ।। ९ ॥ हत्वा कर्मरिपून् पूर्व महाध्यानसुवन्हिना । येऽनंतसुखसंयुक्त त्रैलोक्यशिखर ययु ॥ १० ॥ ते मया सस्तुताः सर्वे चिन्मया कायवर्जिताः । मे समाधि सुबोधिं च यच्छतु नो परा इह ।। ११ ।। सिद्धवारा इमे नित्य धीरवीरैर्मुनीश्वरै । वद्या ममापि सभूयात् सिद्धवृदाय वंदना ॥ १२ ।। ईदृशे मगधाधीश मोक्षस्थाने मनोहरे । गत्वा निरामय शर्म शाश्वत चाक्षवर्जित ।। १३ ॥ कर्मकायविनिमुक्तमात्मज नाशवजित । निर्लेप वृद्धिहोन च सर्वेषा हि सम वर ।। १४ ॥ स व्रती व्रतपुण्येन ह्यतातीत सदा खलु । भोक्ष्यत्येव विचारज्ञ गतागमनजितं ॥ १५ ॥ जगत्में भोग कर रहे हैं वह इन्द्रियोका सुख तीनों कालोका एकत्रित किया जाय तो भी वह सुख सिद्धोंके एक क्षण मात्र सुखके समान नहीं हो सकता है । सिद्ध परमात्मा आत्मीय, अतीन्द्रिय, न्यूनाधिकरहित, विकार रहित, अविनाशीक, अचित्य, नित्य, अनन्त सुखको भोगते है ॥ ६-९ ॥ अर्थ--जो सिद्ध परमात्मा अपनी संसार पर्यायमे समस्त प्रकारके कर्मरूपी शत्रुओंको ध्यानरूपी अग्निसे भस्म कर अनन्त सुख सहित तीन लोकको शिखरपर विराजे हैं ॥ १० ॥ अर्थ-शरीर रहित चैतन्य स्वरूप परम विशुद्ध ऐसे सिद्ध परमात्मा जिनकी मैने संस्तुति की है, मुझे समाधि और रत्नत्रयकी प्राप्ति प्रदान करे ॥ ११ ॥ अर्थ-वे सिद्ध परमात्मा धीर वीर मुनीश्वरोंसे सदैव पूजित है, वंदनीक हैं, उनको मैं भी भाव भक्तिसे वंदना करता हूँ॥ १२ ॥ अर्थ-हे राजन् ! इस प्रकार सर्वोत्कृष्ट महा मनोहर-मोक्षस्थानमें जाकर निरामय, शाश्वत, अती- न्द्रिय, कर्म और शरीरको पराधीनतासे रहित, आत्मीय, अविनाशीक, निर्मल अनन्त सुखको वे सिद्ध परमात्मा प्राप्त होते है ॥ १३-१४ ॥ अर्थ-हे राजन् ! वह कर्मदहन व्रतको धारण करनेवाला भव्य जीव व्रतके पुण्यके प्रभावसे सांसारिक समस्त सुखोंको भोगकर क्रमसे आदि, मध्य और अन्त रहित, जन्ममरणादि विकार रहित मोक्षके सुखको भोगता है ।। १५ ॥ पालील यायालयात जयजय - [ १९९ ] रामजायच्याराजाराम अनेन विधिना ये हि करिष्यति कलौ नरा. । यास्यति शाश्वते स्थाने विदेहात् नात्र संशयः ॥ १६ ।। कर्मदहनमगत सोऽय कर्मविनाशक । सार्थनामयुत सम्यक् वद्यो भव्योत्करै सदा ।। १७ ।। गर्वोत्कृष्ट विधिश्चाय कथितश्च नरेश्वर । बुद्धत्व त्व हृदि शुद्ध मया त्वत्प्रश्नतः खलु ।। १८ ॥ भाजन्म पापमग्ना हि नग याम्यति निश्चयात् । अस्यैव कारणात् भूप | शिवास्पदे च शाश्वते ।। १९ ॥ अन्य शृण पुनः त्वच अपरमपि ये नरा. । करिष्यति विधिश्चाय तरिष्यति भवाच्च ते ॥ २०॥ रानम्र विधि मेत्र भोजनम्यापि स विधिः । कर्तव्यश्च व्रते चास्मिन् व्रतिभिः शिवप्राप्तये ॥ २१ ॥ गायनमारतो गामे करणीया सुभावत । प्रोपधा पच वा पक्तिप्रमा एव सदैव वै ।। २२ ।। अर्थ-इस प्रकार विधिपूर्वक इस कर्मवहन व्रतको पंचमकालमें जो भव्य जीव पालन करेंगे वे अवश्य को अविनाशी मोक्षगुणको प्राप्त होगे, इसमें कुछ भी सदेह नही है ॥ १६ ॥ अ- यह कर्मवरन व्रत सायंक नामवाला है ।जो कोई भव्यजीव इस व्रतको विधिपूर्वक धारण करता है. उसके समान माँ का दहन ( भन्मीभाव ) हो जाता है इसीलिये यह व्रत सर्वोत्कृष्ट है । भव्यजीवोसे सदैव पर ।। १७ ॥ - ममगार । फर्मबहनत को जो विधि बतलाई है वह सर्वोत्कृष्ट विधि है । जघन्य और मामfinोगो ॥ १८ ॥ मन प्रगारमे मानन्म पापी नीय भी समस्त कर्मों का नाश कर मोक्ष सुपको प्राप्त होगे ऐसा गमत।। १२ ।। ri ! म सानो गन्य मिति भो बहत हैं। जिनके पालन करनेसे भव्य जीव En: 11 २१ ।। :--- •r fit गिर र मतो पो प्रथम नाई हगो को T: Hinो ITE ITभी तो करनी चाहिये। 7 मारने न र ::; माता मागमें प्रो. A- -- 4 .. -- : . -- -- .. . . - . ។ . - . . है " -- PRIL Enामान्याच्या [ २०० ] वा मास प्रति चत्वारः प्रोपधा. शुद्धित विधा । कर्तव्याः कर्मनाशार्थ सजाप्या. सक्रियान्विताः ॥ २३ ॥ प्रोपधस्य प्रभावेण देहेस्मिन् कर्मसभृते । भवत्यघाश्च तूर्णेन शिथिली हि दुराशयाः।। २४ ॥ खगेश्वरेक्षणेनैव यथा क्र राश्च पन्नगाः । शिथिलता प्रयात्येव तथैव व्रततो ह्यघा ॥ २५ ।। ये ये मया नराधीश आख्याता. शिवदायका । व्रताना निकराः सर्वे ते ते स्युः नात्र संशय ॥ २६ ॥ पचमाख्येशुभे काले मा. या स्त्रियोपि च । मयोक्तविधिना भूप भव्यराशिसमुद्भवाः ।। २७ ।। करिष्यति शिवस्थाने जरात्ययविवजिते । ह्यनुक्रमेण यास्यति द्वापरो नात्र चाक्षये ।। २८ ।। श्रुत्वेत्थ मगधाधीशः स ध्वनि च प्रभोमुदा। त प्रत्याह तदा स्वामिन् वीर वीरेश पावन ।। २९ ।। भवद्भि. कथिता मा निस्वा हि पचमोद्भवाः । करिष्यति कथ व्रत्त तदृते नास्ति तत्फल ।। ३० ॥ गृहे यदि दरिद्र स्यात् पूर्वपापोदयात् नृप । कायेन द्विगुण कार्य व्रत प्रोपधसयुत ॥ ३१ ॥ पवास करने चाहिए । अथवा एक मासमे चार प्रोषधोपवासके करना चाहिए । प्रोषधोपवास के दिवस कर्मोका नाश करनेके लिये जाप्य अवश्य देना चाहिये और पूर्वोक्त बतलाई हुई समस्त क्रियाये करना चाहिए ॥२१-२३॥ अर्थ-इस कर्मदहन व्रतके प्रभावसे कर्मोका चूर्ण अवश्य ही होगा ॥ २४ ॥ अर्थ-जैसे गरुड़के दर्शनमात्रसे सर्प भाग जाते है वैसे व्रतके प्रभावसे समस्त पाप नष्ट हो जाते है ॥२५ अर्थ-हे राजन् ! जो-जो व्रत इस ग्रन्थमें भव्य जीवोंके उपकारार्थ बतलाये हैं वे सब मोक्षके प्रदान करनेवाले है। इसमें कोई संशय नहीं ॥ २६ ।। अर्थ-हे राजन् ! इस पंचम कालमें जो स्त्री या पुरुष भव्य जीव इस कर्मदहन व्रतको पालन करेंगे वे परम्परासे नियमसे जरा, जन्म, मरण रहित मोक्ष सुखको प्राप्त होगे ॥ २७-२८ ॥ अर्थ--इस प्रकार कर्मदहन व्रतका महान् माहात्म्य श्रीवीर प्रभुकी दिव्यध्वनि द्वारा श्रवण कर श्रेणिक राजा हर्षको प्राप्त हुआ। फिर भी राजा श्रेणिकने वीर प्रभुसे पुनः प्रश्न किया ॥ २९ ॥ अर्थ-हे प्रभो! पंचम कालके मनुष्य दरिद्री होंगे । और दरिद्री मनुष्य इस व्रतको किस प्रकार संपादन कर सकेंगे । क्योकि धनके बिना धर्म किस प्रकार हो सकता है ॥ ३० ॥ अर्थ--हे राजन् ! यदि पूर्व पाप कर्म के उदय से घर मे दरिद्रता हो तथा उस दरिद्रता के कारण व्रतका उद्यापन करने की शक्ति न हो तो शरीरसे द्विगुणा व्रत प्रोषध सहित करें तो भी वही फल प्राप्त होगा ॥ ३१ ॥ जच्या THISHESHes wearSiwwewe [ २०१ ] द्रव्यहीना नरा. तस्मिन् करिष्यति व्रतोत्करान् । द्रव्याख्याश्च करिष्यति उत्थापना व्रतस्य वै ।। ३२ ।। मुतापुत्रविवाहेगु द्रव्योत्करस्य ते नराः। करिष्यति व्यय भूप मृतकादिक्रियासु वै ॥ ३३ ॥ पनमाभिधकालस्य मानवा. पापमडिताः । धर्ममार्गवहिर्भूता धर्मकार्यपरान्मुखाः ।। ३४ ॥ हलिागेन ते मूढा. पापकार्येषु नित्यग. । द्रव्योघस्य व्यय भूप करिष्यति न संशयः ।। ३५ ॥ कृष्णा द्रव्यभोक्तारो निकृपणा तजिता.। कली एव भविष्यति मिथ्यामार्गरताः खला. ॥ ३६ ।। एकमपि व्रत शुद्ध यः करिष्यति म शिवे । यास्यति नात्र मदेह. कायात् द्विगुण च ना ॥ ३७ ।। गनम्नानसमा शेया विधिहीना व्रता इमे । स्वर्गमीयकरा. चव (नैव ) शिवशर्मकरा. खलु ॥ ३८ ॥ । अर्थ-द्रव्यहीन दरिद्री मनुष्य इस व्रतको बड़े विशुद्ध भावोसे और भक्तिसे करेंगे। परन्तु श्रीमंत (पनिक) लोग इम व्रतको उत्थापना करेंगे। अर्थात् धनके लोभसे वे व्रतके पालन करनेमें अपनी असमर्थता प्रस्ट कसे रहेगे। यह उन का लोभ परिणाम धर्मभावनाको कमजोरी प्रकट करेगा ॥ ३२ ॥ अर्थ- निरु अपनी पुनपुत्रो आदिले विवाहमें कभी-कभी अपनी मान बढ़ाईके लिये शक्तिसे अधिक धनका तरेंगे। या माकादि पुरुषों की क्रियाम शक्तिके उपरात धन व्यय करेंगे । परन्तु धर्मकार्यमें उनकी ती ।। ३३ ।। 1- गान । पनमा का माहात्म्य ही अद्भुत है उममें प्रायः धर्म मार्गसे विपरीत हो कार्य होगे। 1- गाय प्राय पापोमे लिया नोगे। धर्म मार्ग बहि त, धर्मकार्यमे परान्मुग होगे । पचम- : 3 लामो मार पापता नित्य हो करेंगे। ऐने हायों में हो अपना धन का उपयोग कर 12 HTTAR धामो नंगे जोर मार मनुष्यों के पास धन का अभाव होगा । इस : - ITSrinामी पति नमो ॥ ३४.३६ ॥ ... . . . . " और जामो कालो मनायत भी नताक 1181 गानारित किन पोल mangesHeDAHISHER-IPATHREnemy . * . । । 4 , - . -- + . A :::::: माता मानान -- [ २०२ ] सा कायाच्च भी ना. कुर्वी व दिगुण व्रत । इमं नैव गृहे द्रव्यो यद्यस्ति शिवशर्मणे ।। ३९ ॥ भा वु जिन कार्येषु ज्यापात्रादिपु सदा । कृपणत्व भजन मा ह्यनेकदु खदायकम् ।। ४० ॥ कुमार्ग गर्वदा यूय कृपणत्वं बुधोत्तमाः । भजध्व धर्मकार्येषु मा कदापि सुखाप्तये ।। ४१ ॥ नागराया बतेदन कारापण सुशर्मद । अस्माद्धि सकला भव्याः शिवे यास्यति निश्चयात् ।। ४२ ॥ कमदहनवतस्य विधिश्च कथितो मया । करिष्यति सुभावेन इद यास्यति सोव्यये ॥ ४३ ।। समान निष्फल है। अतएव जो कोई भी व्रत किया जाय विधिपूर्वक ही करना चाहिये । बिना विधिके व्रत स्वर्ग मोक्षका साधक नही है। जिनके पास द्रव्य नहीं है उनको शरीरसे ही व्रत करनेमे श्रम अधिक करना चाहिये। दुगुना व्रत करना चाहिये ॥ ३८-३९ ॥ भावार्थ--व्रतकी विधि, उद्यापन आदि करनेकी परमागममे सर्वत्र बतलाई है सो धनवान और पुण्यवान पुरुषोको तो व्रतकी उद्यापन आदि समस्त विधि करनी हो चाहिये । यदि धनवान और पुण्यवान ही ऐसी विधि न करें तो उनने अपनी शक्तिको छिपाकर भावना कम की। परिणामोकी विशुद्धि पूर्ण रूपसे नही की, इस- लिए उनको धर्मका फल स्वर्ग मोक्ष किस प्रकार प्राप्त हो सकता है। इसी प्रकार निर्धन यदि व्रतको दूना द्विगुणित न करे तो आगमकी आज्ञानुसार सर्व क्रिया न करनेसे परिणामोंकी विशुद्धि किस प्रकार रह सकती है । इसलिये प्रत्येक प्राणीको अपनी-अपनी शक्तिको नहीं छुपाकर व्रत विशुद्ध परिणामोसे करना चाहिये । अर्थ-हे विचारशील बुद्धिमान् भव्यजीवों जिनधर्म सम्बन्धी पुण्यकार्यमे, पूजा और पात्रदानमे कभी भी कृपणता मत करो। क्योकि पूजा और दानमे कृपणता करना महान् दुःखोंको प्रदान करनेवाला है । हाँ, यदि कृपणता ही करनी है तो कुमार्गमे व्यर्थ धनको व्यय मत करो। कुमार्गमे कृपणता धारण करो । परन्तु सुखकी इच्छा करनेवालोंको धर्मकार्यमे कृपणता महान् हानि पहुँचानेवाली है ॥ ४०-४१॥ अर्थ-शहरके विचारशील मनुष्योंको तो यह व्रत अवश्य ही करना चाहिये। इस व्रतके माहात्म्यसे भव्यजीव नियमसे मोक्षके पात्र होंगे ॥ ४२ ॥ अर्थ--कर्मदहन व्रतकी विधि जो यहॉपर बतलाई है तदनुसार जो कोई भव्य जीव अपने विशुद्ध भावों- करेंगे वे अवश्य ही मोक्ष सुखको प्राप्त होंगे ॥ ४३ ॥ Wholella stes message Managemeegegnesc TAच्या [ २०३ ] Sumeमाडायरी पूर्णे याते हि व्रतम्य प्रतिष्ठा श्रीजिनेशिना । करणीया सुमोदेन व्रतस्य फलसिद्धये ।। ४४ ॥ चतुविधाय मवाय यथायोग्यानि मोदतः । सदेयानि शिवाप्त्यर्थं दानानि प्रतिभिः खलु ॥ ४५ ॥ पुरेग नगरेषु वै स्थापनीया मनोहरा | छत्राश्च चामगः घटाः ध्वजाद्याः जिनसद्मसु ॥ ४६ ।। उत्कृष्टोर निधि प ! गिवगर्मप्रदायफः । व्रतस्योद्यापनस्यास्य स्यात्खलु आगमे मतः ।। ४७ ॥ गया गागा करणीयो व्रतम्योद्यापनो नृप । एतादृश्यपि नास्त्येव शक्तिर्दारिद्रयोगत. ॥ ४८॥ तो हि कालो गव्या. कुरुच द्विगुणमिदं । तत्सम हि फलाप्तिश्च भवतामपि सभवेत् ।। ४९ ।। अनेन बनेर तगियति नगेत्कग | भजिष्यति शिवशमं नाहरयेव नाशनात् ।। ५० ॥ अगमगुणनिधान गर्ववतेपु मुख्य, जिनवरमुखजात कर्ममतापहार । मदहननाम चित्तमातगमिह, परममतिप्रयुाता भो भजन विशुद्वया ॥ ५१ ।। अर्थ- पूर्ण नत होने पर नतको फल की सिद्धि के लिये भव्य जीवोको व्रतका उद्यापन अवश्य ही करना पारिगे। तो मापनको विधि-व्रती पापोको शुभ भावोंसे श्रीजिनेन्द्र भगवानके उत्तमोत्तम जिनबिम्ब fruit कमर प्रनिाठा करानी नारिये । चार प्रकारके सघको अपनी शक्ति के अनुसार दान भी देना चाहिये। मागन पान मारा गंतोपित करना चाहिये। नगरमें अथवा ग्राममें उत्तम जिनालय बनवाकर उसमें 11, नमर, पा, आदि उपना अपनी शक्ति के अनुसार प्रदान करना चाहिये। यह उत्कृष्ट विधि Him नी हो जा। जनप्रकार विधिपूर्वक व्रत करनेसे अभ्युदय की मिद्रि होती हे ।। ४४-४७ ।। --- गावरानि ता पारन करना ही नाहिये। बतोको मिति उमापन किये बिना riniti IIManार करने को रित नहीं हो तो ततो विगणित करना चाहिये। इसप्रकार font EATीपी मानना है ।। ४८.१९ ।। ....... | मोकामासाने मी मरायो नानगेनमारगमनने तिरकर ... ... ...। वो मान पाता नाम।। ।। . 1 ATTRITI मिनेन्द्र गानो माग- - SEI. 777. निगे पान । - -- * 1. 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[ २०४ ] भो भव्या व्रतमुत्तम शिवप्रद येहि करिष्यत्यहो, भवत्या चेव कली सुनिर्जरघनवंद्यच पापापह । याग्यत्येव शिनास्पदे मुनिनुते ह्रामादिकर्मोज्झिते, ज्ञात्वैव बुधसत्तमा सुविधिना कुर्वीध्वमेव व्रत ।। ५२ ।। बुधा नामानेद कुरुन विविना मोक्षसुखद, तनो सर्वे चाहा प्रलयमनिश अस्य करणात् । इमा ज्ञात्वा याति अमलमतिद वा हि महिमा, भजते हिचेम मुनिवरगणास्तेपि ह्यमला ॥ ५३॥ Mansame-SEPSITENDSHema चामल श्रीसम्मेदाचल प्रकरण पचमाभिधकालस्य भव्याना शिवदायकम् । अन्यवृत्त शृणु भूप श्रवणात्कल्मपापहं ॥ १ ॥ श्रीमदिन्द्रदिशाया च विख्यातः सकलावनौ । नाम्ना सम्मेदशिखरो विद्यते च नगोत्तमः ।। २॥ सिद्धाना निकुरु वेण मूपितोऽनतशर्मदः । सदैव पूजितो देवै. सच्छोभाभिरलकृत. ॥ ३॥ अर्थ-हे भव्यजीव ! यह व्रत सर्वोत्कृष्ट और मुख्य व्रत है। इसको पालन करनेसे मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है । देवगण भी इसकी वंदना करते है। समस्त पापोका नाश करनेवाला यह व्रत है। इसलिये भव्यजीवोंको विधिपूर्वक अवश्य ही करना चाहिये ॥ ५२ ॥ अर्थ-जो कोई स्त्री या पुरुष मोक्षको प्रदान करनेवाले इस पवित्र व्रतको विधिपूर्वक करेंगे उनके समस्त पाप नाश हो जायेंगे । इस व्रतको यही महिमा है । जिनने भाव भक्तिसे इसकी भावना भी की है वे सुखको प्राप्त हुए है । मुनिगण भी इस व्रतको धारण करते है ॥ ५३ ॥ न्यायालय अर्थ-हे मगधेश्वर ! पंचमकालवर्ती भव्यजीवोंके उपकारार्थ मोक्षको प्रदान करनेवाली एक कथाका वर्णन करता हूँ जिसके श्रवणमात्रसे पापोका नाश होता है ॥ १ ॥ अर्थ-हे राजन् ! श्री पूर्व दिशामे समस्त भारतवर्षमे तीर्थराजोंमें श्रेष्ठ, जगत्वंद्य ऐसा सम्मेद- शिखर नामका एक पर्वत है ॥ २ ॥ जिस पर्वतसे असंख्य सिद्ध हुए है जो अनन्त सुखको प्रदान करनेको शक्तिसे ही प्रसिद्ध हैं। अतएव देव उसकी निरन्तर पूजा करते हैं ॥ ३ ॥ माजच्याची 4. मरि . [ २०५ ] LIArea-Sewa 1- ग श्रीमदजितनाथाच्च मदते मगधेश्वर । असख्या. तत्रतो मोक्षे मुनीन्द्राश्च गता वराः॥ ४॥ श्रीमदजितपाश्वीता. तोर्थनाथाः सुरैस्तुताः । तस्माद्धि मुक्तिमापन्ना केवलज्ञानमडिताः ॥ ५ ॥ तत्र तेगा जिनेन्द्राणा पृथक् पृथक् मनोहग । कूटाः सति तदा पूज्या सुरेन्द्रखेचरेश्वरै. ॥ ६ ॥ द्विदशप्रमतीयंशा गता. तम्मात् शिवालये । अन्ये तीर्थंकराः तूर्याः कस्मात् गता शिवास्पदे ।। ७ ।। तत्वं शृणु भगाल कारण कथयाम्यह । समाविना शिवकर पापाद्रिभजने पविम् ।। ८ ।। तुमनपिणि कालस्य दोपादेव भवति च । अतराः सिद्वक्षेत्राणा नान्यत्काले नराधिप ।॥ ९ ॥ गम्मेवारकन गर्व भरतरमा जिनेश्वरा ।याता यात्येव याम्यति ह्यमख्यमुनिसयुताः ॥ १० ॥ गानाले नगवीन मोक्षस्थाने न मुदरे । हत्वा कमरिपून् सर्वान् अत्यशुक्लामिना खलु ॥ ११ ॥ अ-हे मगधेश्वर | श्रीभगवान् अजितनाथ तीर्थकरसे श्री पार्श्वनाथ तीर्थकर पर्यंत इस पर्वतसे मोक्ष- हामको पनारे । ओर असन्य मुनि गणोने यहाँसे निर्वाणपद प्राप्त किया है । इसलिये यह निर्वाणक्षेत्र प्रसिद्ध । चीन तो ने मोदी इस पर्वतराजसे हो प्राप्त किया है ।। ३-५ ॥ ---ाम्मे निार पर्वतपर श्रीजिनेन्द्र भगवान्के मोक्षस्थान प्राप्त करनेके बीस तीर्थकरोके पृथक्- पमा देव, विद्याधर आदि समस्त भव्य जीव करते है ॥ ६ ॥ -- गान गार २० नो र अमाय मुनियोो माथ श्रीसम्मेदशिसरपरसे वर्तमान चतुर्थ RE: : । प 37 गानादिकालने जनन्त काल पर्यत अनन्त मुनीश्वर मोक्षगामी की। it मोगे २० नीम तीतो र यो मोदी गये ? चार तीर्थर अन्य frm मग प्रश्न महागीर मामीने कहा कि श्रेणिक :::ो "मागे 3गार भिन्नता । अनाया गत ::: : साने गमा श्रीगणेशाको ती गोसको जायेंगे। : 1:ोनिन किन गमन जीता गोसम्मान TO THE गाभार नोहर मोमोजपोरगे * ..." ! .११ ।। १ . 3 , . . । । . . , A . 40 . . - . . 4 . . ।
[ २०६ ] SHReseayews मजयमायाम PAPER रचयतिस्म भो भूप पुनरुत्पत्तिं च सुराः । सर्वप्रलय याते हि सदैव समये खलु ।। १२ ।। आदी जातजिनेन्द्रस्य स्थित्यर्थं सकला शुभाम् । पचकल्याणयुक्तस्य महत्पुण्योदयाच्च ते ॥ १३ ।। अयोध्यायास्तले चास्ति कमलाको ह्यतो नृप । तत्रैव रचना तस्या ते कुर्वतिस्म निर्जरा ॥ १४ ॥ स्वस्तिकाका नराधीश अब्धिपक्षप्रमा. शुभाः। सम्मेदाद्रितले सति कूटाः तेषा च मस्तके ।। १५ ।। सोपि अनादिकालाद्धि सम्मेदाभिधभूधर । उत्पद्यते च तत्रैव मगधाधिप निश्चयात् ॥ १६ ।। मुनीद्रा वा जिनेन्द्राश्च सर्वे ह्यनादिकालत । असख्याव्याश्च तस्माद्धि शिवधाम' व्रजंत्यहो ॥ १७ ॥ अर्थ--हे राजन् प्रलय कालमें जब समस्त पदार्थ नष्ट हो जाते है तब देवगण इस पवित्र तीर्थकी रचना बार-बार प्रत्येक समयमे करते है ॥ १२ ॥ अर्थ--हे राजन् ! युगकी आदिमे जब पंचकल्याण विभूषित श्री देवाधिदेव श्री ऋषभदेवके अवतारका समय हुआ तो महान् पुण्योदयसे उस अयोध्या नगरीमे उनकी स्थितिके लिये शुभ रचना की जो अयोध्या नगरी अनादिकालसे तीर्थकर प्रभुके जन्मसे पवित्र मानी है । अयोध्या नगरका प्रलयके द्वारा विध्वंस होनेपर देवगण उसी समय उस स्थान पर कमलका चिह्न स्थापित करते है। और युगके प्रारम्भमे जब तीर्थंकरोंका जन्मावतार होता है तब उसी स्थान पर अयोध्या नगरीकी रचना की जाती है । इसलिये अयोध्या नगर कभी किसी कालमे नष्ट नहीं होता है । अनादि है और उसीमे समस्त तीर्थंकरोका जन्म होता है ॥ १३-१४ ।। अर्थ--हे राजन् ! इसी प्रकार श्रीसम्मेदशिखरके नीचे चित्रा पृथ्वी पर २४ श्रीतीर्थकर देवोंकी निर्वाण कूटोंके चौबीस स्वस्तिक चिह्न है । प्रलयकालके बाद उन चिह्नोके ऊपर ही कूट सहित सम्मेदशिखर भी अनादि तीर्थस्थान है वह किसी भी कालमें नाश नहीं होगा और अनादिकालसे वहाँसे ही समस्त तीर्थकर मोक्ष पदको प्राप्त होंगे और हुए है ॥ १५ ॥ अर्थ--हे राजन् ! यह सम्मेदशिखर तीर्थराज अनादिनिधन है, सदैव शाश्वत है। कभी किसी भी कालमें इस तीर्थराजपरसे तीर्थकर मोक्षधामको प्राप्त हो गये और होगे । अनन्त मुनीश्वर भी इस पवित्र तीर्थ- राजसे मोक्षको प्राप्त हो गये और होंगे॥१६-१७॥ SHESH मन्यायालयासraman SHES +1: [ २०७ ] नद्रपक्षमरतस्य विस्तागे लघुयोजन. । त्वया ज्ञेयो नराधीश सिद्धवारयुतस्य वै ॥ १८ ॥ स्वालागमातापि सिद्धादृतेम्ति न सा धरा । सर्वत्रैव गता' वानयोगीन्द्राश्च शिवास्पदे ।। १९ ।। अग्मिन् काले प्रयात्येव तम्माद्धि कालदोपतः । द्विदशप्रमतीर्थेशा द्विदगकूटतो नृप ।। २० ।। निग्यानेन भन्याना तारमा निर्मलाशया । दिव्यदेहवराः पूज्या सुरेन्द्र वाः मुनीश्वरै ।। २१ ।। नामानि किन कुटाना अम्मिन् काले कियत्प्रमा । मुक्तिं गता मुनीन्द्राश्च तस्माद्वे सिद्धभूवरात् ।। २२ ॥ येव मुकुटर दगंनात् फिर भवेत् । कदा मुक्तिश्न तत्सर्वं कथयस्व दयापते ।। २३ ।। नग्नुमाग्ना ना भन्याना गिवमिद्वये । गाम्यान तम्य कुर्वेह मर्वमसारतापह ॥ २४ ॥ अ---ग सम्मेदशियर का १२ योजन प्रमाणका विस्तार हे इसको परमागममें सिद्धभूमि मानी है। मिलान भोमी को करते हैं ।।२८।। -- गनन् । म पतपर ऐसा कोई वाल (फेश) बरावर क्षेत्र नहीं है कि जहाँसे कोई न कोई मुना प्रारमनमा प्रारमन आ हो । बाल-बालपर मिद्ध हुए हैं। इस पर्वत राजके कंकर-कंकर परसे सिद्ध हुए नमा पन तो निभूमि ॥ ११ ॥ --- गान् । वर्तमान गगने कालके बोपने तो बील तीर्थकर बोस कूटसे मोक्ष पधारे मोर Pीमा गये। नौवीन नही ।। २० । ग िारत देयोगे पूजित मुनीश्वगेमे बदनीय नगनुको तारन करनेवाले कर पाम मोपामको पारने है ॥ २१ ॥ ने र प्रनने नोयार को गम्मेदशिरोका जान रहस्य iiii 111 किमान गम उन गटोने ::। --":: या ना ? पाना 14. Tी नागो का 1 और नगर मोहर wiदनामयाच्या 1 ar -- . परम + 1 - V . . - . । . 1 A . Area . + . . K XOSSHere: राजमान [ २०८ ] नत्वा श्रीजिननायकान् गणधरान् देवेन्द्रवृदाचितान्, मौनीन्द्रान् सकलान् तथा च सुखदा जैनेन्द्रवक्रोद्भवाम् । वाणी पापप्रणाशका मुनिनुता सत्बुद्धिदा पावनी, सम्मेदाभिधपर्वतस्य शिवद स्तोत्र करोमि शुभम् ।। २५ ।। कूटस्य सख्या सकलाहहान्यै, नामानि तेपा फलमद्भुत च । संख्या मुनीना बुधसत्तमास्ते, शृण्वतु ह्येकाग्रहृदाच वच्मि ॥ २६ ॥ यन्मस्तके सति सुराधिपाळ पापाद्रिनाशे वरवज्रतुल्याः । कूटा मनोज्ञा वरसिद्धयुक्ता. शून्यद्विसख्या. कथिता जिनेन्द्र. ॥ २७ ।। अर्कप्रमा पूर्वदिशिहि कूटा, वसुप्रमा पश्चिममदिशित । एव च ज्ञेया. शिवदाः सुराा., तत्त्वार्थयुक्तै बुधसत्तमैश्च ।। २८ ॥ वेदेन्द्रिलक्षाश्च ननूत्तराश्च, ह्यशीति कोट्य प्रमितायुदेके. । मुनीश्वरा श्रीअजितस्य काले, मुक्तिगता. सिद्धवराच्च कूटात् ॥ २९ ॥ कुर्याच्च यस्यैव सुभावशुद्वया, यो भव्यामवं. शृणुथ फल तत् । सद्दर्शन सैव लभेत्फल च, पक्षाग्निकोटिप्रमप्रोपधानाम् ।। ३० ।। एतान् मुनीन्द्रान् वरभावतो वै, काले त्रिके तत्पदसिद्धयेऽह । नमामि ससारपयोधिनस्ते, उद्धतु मीशाः सुरनाथवंद्याः ॥ ३१ ।। अर्थ-श्री जिनेन्द्र भगवान् अरहंत परमात्मा तथा समस्त गणधर देवोंको नमस्कार कर पापको नाश करनेवाली, सुबुद्धिको प्रदान करनेवाली भगवती जिनवाणी माताको नमस्कार कर श्री सम्मेदशिखर (सिद्धाचल) का परम सुखदायी स्तोत्र कहता हूँ ॥ २५ ॥ अर्थ-हे राजन् ! मगधाधीश ! समस्त प्रकारके पापोका संहार करनेवाले ऐसे कूटोंको संख्या, उनके नाम, उनके दर्शन करनेका फल और उन कूटोंसे मोक्षपदको प्राप्त हुए मुनीश्वरोंकी संख्या आदि अद्भुत वृत्तांत कहता हूँ। सो एकाग्न मनसे सावधान होकर श्रवण कर ॥ २६ ॥ अर्थ--हे राजन् ! (इस वर्तमान युगमें सिद्धाचल श्री सम्मेदशिखर पर देवोंसे पूजित पापोंको नाश करनेवाले अतिशय मनोज्ञ और तीर्थकर प्रभुके निर्वाण स्थानभूत ऐसे बीस कूट श्रीजिनेन्द्र देवने बतलाये है । जिनमेसे बारह कूट तो पूर्व दिशामें विराजमान है और आठ कूट पश्चिम दिशामे सुशोभित है । इसप्रकार शुभ कूट बीस है ॥ २७ ॥ अर्थ---हे मगधाधिप ! श्रीसम्मेदशिखर पर्वत पर सिद्धवर नामक कूटसे श्री अजितनाथ भगवान् चौरासी अरब, चौरासी करोड़, चौअन लाख मुनीश्वर सहित मोक्ष पदको प्राप्त हुए । जो भव्य जीव इस कूट- का दर्शन मन, वचन, कायकी शुद्धिसे और विशुद्ध परिणामोसे करता है उसको बत्तीस कोटि उपवासका फल प्राप्त होता है । जो इस कूटसे मुझे दिगंबर मुनीश्वर कर्मोंका नाशकर निर्वाण पदको प्राप्त हुए हैं उनको मैं भावभक्तिसे नमस्कार करता हूँ। वे प्रभु इस नग्न संसारसे पार करें ॥ २८-३१ ॥ उच्चमाजमालयासमास्यजयजयमच्य यजमान्यामारामाच्या eHASHA AL [ २०९ ] नेत्राविपचेव गतानि यम्मात् जाया महम्त्राणि मुनीद्रवद्या. । द्विसप्ततिलक्षप्रमाञ्च कोटिकोटयो नव सर्वमुनीश्वराश्च ॥ ३२ ॥ धवलादिदत्तात् शुभनामकूटात् गताहताशात् वरमिद्धता च । ससारदावानलमेघपुष्पा: स्वदेहभाजित गुजादताः ।। ३३ ।। यम्पेटणाद मानणा च पाप्ति कगविलक्षप्रमप्रोपवाना । भवेच्च नो सगयः चात्र भव्या ह्यनुक्रमात् मोक्षपदस्य प्राप्तिः ।। ३४ ॥ आनाकटान गता मुनीन्द्रा , पचप्रमा. ह्यष्टशतानि चेव । मित्रेक्षमहरॆवसप्ततिर्हि, लक्षास्तथा सप्ततिकोटयो वै ।। ३५ ।। गगान काट्यन पुनश्न कोटि , एते च यम्मात् मकलाहनागात् । यद्वदनात् भव्यनगे लभेत् वै, द्वयष्टप्रमलक्षमुप्रोपध च ।। ३६ ।। कागोनिमनगतानि नेत्रादिप्रमलक्षा यम्मात् । चतुरशोतिकोटिस्ततो वे अर्बुदैको ह्यविचलक्टात् ।। ३७ ।। पुरेक्षाये नयमपालनाद्धि मनोग्यग केवलज्ञानयुक्ता । गता. सुरेन्द्रादिगणे. प्रपूज्या कर्मादिमातगविघातसिंहा ॥ ३८ ॥ पर लोटप्रमपोप पाना फल च प्राप्नोति करोति यम्य । मद्वदना य शुभभावशुद्वया स वै वाविल बेन तथा शिव च ।। ३९ ।। गप्नागिता गिनिया न गप्त, शतप्रमा मोहनकूटतो वे । यस्मात्पुनः पक्षमुवधुयुक्ताः, धोराः सहस्रासुरनाथवंद्याः ॥ ४० ॥ अमे-यवलायत्त शुभनाम कूटसे नो कोडाफोडि वहत्तर लाख दो हजार पाँच सौ व्यालीस मुनि श्री भगवान परत समय में पापोका नाश कर मोक्षपदको प्राप्त हुए हैं । जो भव्य जीव इस कूट का दर्शन भाव- तिमे करे वह बालोन लाग्य उपवास फल प्राप्त करता है । इसमें सदेह नहीं है ॥ ३२-३३ ॥ Ti-गानन्द टने अभिनन्दन तीर्थ तथा तिहत्तर कोडाकोडि सत्तरकोहि सत्तरलाख चौवन हजार पा, मो पनि पनि नात पाको नाश हर मोस पद प्राप्त हुए । इस कटो दर्शनका फल सोलह लारा उप- समता मामा नकातीने चतुति म र महित याना को । यह सब सबसे भारी निकाला गया था। सोमवोर्ग में सोतो यो ।। ३४-३६ ॥ ज्यमजस्याच्याच्या - +- - 1 म . -~ -frसुनितार भगवान् गौर एत अरव नोरामो 'करो यामठ लाग मात मो ":"f ITR! Iो पाए। तो भाय ग रुटका दर्शन भातर्भातगे शिदि- 1: तमाम कर का प्रा . | मन का सघनहित यात्रा प्रो "...! १४ 11, 11 जागाना। नर्मात भगवानले समयान - ... TETTER TITTो ।। 32-28॥ '... "TLE:ोगनी रानीगार गाामो माग :- - +- Enाला [ २१० ] लक्षाध्यशीति. पुनर्धर्मतीर्था., शतकमध्ये खलु एकहीन । कोटयो गताः मोक्षपुरे मनोज्ञे, अनंतशर्मार्णवमग्नदेहाः॥ ४१ ॥ यद्वदनाद् भापुमान् लभेद्वै, कोट्ये फसत्प्रोपधज फल च । अह् नमामि शिरसा त्रिशुद्धया, ते तीर्थराज शिवदायक च ॥ ४२ ॥ प्रभासकटात् करमित्रसख्या सप्तशतानि च सहस्रसप्त। द्विसप्ततिलक्षप्रमा यतीन्द्रा कोटयशीतिः चतुरुत्तरा च ।। ४३ ।। रध्रवबधुप्रमकोटिकोट्य गताश्च मोक्षे सुरराजपूज्या । यदर्शनात्प्राप्तिर्भवेच्च भव्या द्वित्र्येवकोटिप्रमप्रोपधाना ॥ ४४ ॥ घटाच्च अते ललितपकूटात् द्विपचपचैव शतानि यस्मात् । पुनरेव मित्राष्ट सहस्रयुक्ता अशीतिलक्षा हि यतीश्वराश्च ।। ४५ ।। द्विसप्ततिकोटिसुकोटिकोट्य. वेदोत्तराशोतिगता शिव च । यद्वदनात् पोडशलक्षकाना स प्रोपधना च फल लभेत् वै ।। ४६ ॥ अशीति वा वेदशतानि यस्मात् पुनः सहस्रन्दुनमैवलक्षा । मुनोश्वरा. सुप्रभनामकूटात् एकोनमध्ये शतकोटयश्च ।। ४७ ।। यद्वदनात् भव्य जन सुभक्त्या फल च कोटिप्रमप्रोषधाना । आप्नोति नो सशय भो बुधौघाः मोक्षाप्तये त च सदा प्रवदे ॥ ४८ ।। मुनि मोक्षको प्राप्त हुए । पद्मप्रभ भगवान्के समयमें एक हजार मुनि मोक्षको गये। बाकी मुनिगण उनके शासन समयमें मोक्षको गए। इस कूटके दर्शन भाव भक्तिसे त्रिशुद्धिपूर्वक करता है वह एक करोड़ उपवासका फल प्राप्त करता है । इसकी यात्रा चतुर्विध संघसहित सुप्रभ राजाने को ॥ ४०-४२ ॥ अर्थ---प्रभासकूटसे सुपार्श्वनाथ भगवान् और नवासी कोड़ाकोड़ि चौरासी करोड़ बहत्तर लाख सात हजार सात सौ ब्यालीस मुनिगण मोक्षको पधारे । इसके दर्शनका फल बत्तीस करोड़ उपवासका है । इसकी यात्रा उद्योत नामके राजाने एक बड़े भारी चतुःसंघके साथकी थी जिसमें मुनिगणोकी हजारोसे भी अधिक संख्या थी। इस कूटकी रज लगानेसे कुष्ट रोग दूर होता है। विशेष एक बात यह भी है कि बीस कूटोंकी यात्राके समान इसका फल है ॥ ४३-४४ ॥ अर्थ---ललितघट कूटसे श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्र और चौरासी कोडाकोड़ि बहत्तर करोड़ अस्सी लाख चौरासो हजार पाँच सौ बावन मुनिगण मोक्ष पधारे । इस कूटके दर्शन व संघसहित यात्रा ललितदत्त राजाने की । सोलह लाख उपवासका फल इसके दर्शनसे होता है ॥ ४५-४६ ॥ अर्थ--सुप्रभकूट से सम्भवनाथ भगवान् तथा निन्यानवे करोड निन्यानवे लाख छासठ हजार चारसौ अस्सी मुनिगण मोक्षको पधारे। जिसकी भाव विशुद्धिसे वन्दना करनेका फल एक करोड़ उपवासका होता है। इसकी वन्दना उस समय सोमप्रभ राजाने चतुर्विध संघ सहित की थी ॥ ४७-४८ ॥ जिन्यायाल ENarroram . k [ २११ ] पनेरु पनैव यतीश्वरायच यस्मात्सहता. करसिंघुसख्याः । कराग्निलक्षाः पुन पक्षवेद अष्टादशैव खलु कोटिकोट्यः ।। ४९ ।। विचारात्मोनपुरे मुनीन्द्रा गताश्च कूटात् मकलाघनाशात् । यदनात् पोडशलक्षकाना चतुर्थकाना च फलं भवेद्धि ॥ ५ ॥ दिवयाताग शतानि पन द्विरध्रलक्षाश्च सहस्रकाश्च । ऋतुनन्दकोटिप्रभवैमुनीन्द्राः यस्माच्च कूटात् वरसकुलाच्च ॥ ५१ ॥ पादि अन्ने ततोटिकोट्यः मयका मोक्षगरे गताश्च । प्राप्तिर्भवेद्यभ्य सुवंदनाच्च फल च कोट्येकसुप्रोपधाना ॥ ५२ ॥ निपातान शतानि यात महतागि पट्पण्टिसूरतलक्षा । अभ्रारिकोट्योहि गताश्च यस्मात् मुनीश्वरा मोक्षपुरे सुखाके ॥५३॥ जोग अन्ले गगन कुलान्च यो भव्यजोव. कुरुते च यस्य । मद्दर्शन सैव लभेत् फल च कोट्येकसख्यायुतप्रोपवाना ।। ५४ ॥ मागत् गिनने च गतानि सप्तेव यतोश्वराश्च । सुरेन्द्रवद्या पुनः सप्ततिहि लक्षा सहस्राश्च तथैव ज्ञेयाः ॥ ५५ ॥ गापा माननि कोटामन गो वन्दयत्येव सुभावतो वे । प्राप्नोति सैव खलु प्रोपधाना कोट्येक भव्योत्तम सत्फल च ॥ ५६ ।। पनाता नामा गनीन्द्रा गतानि पचैव तया नवैव । लक्षाः सहनाणि नवैव ज्ञेया एकोनविंगत्यून कोटयश्च ॥ ५७ ॥ अर्थ-वियूदर नामक कूटसे श्री शीतलनाथ भगवान् तथा अठारह कोडाकोड़ि व्यालीस करोड़ बत्तीस का कमालोग हजार पांचमी मुनिगण मोक्षको पधारे । इस कूटके दर्शनका फल सोलह लाख उपवासका है। पिना नाम गणाने मंघ नहित यात्रा को ।। ४९-५० ॥ -मलटने श्री श्रेयासनाय भगवान् तथा छ्यानबे कोडाकोडि छयानवे करोड़ छ्यानबे लाख सनर पोचमो दयालोग मुनिगण मोटा पधारे । गोयनका फल एक कोटी उपवासका है। इसको याना आनन्दसेन राजाने चतुर्विध संघ ..?.५२ ।। --गुर के दो शिमगाय भगवान् तथा गत्तर कोटि माठ लाप छह हजार सातमी rria का मन करनेने एका अपागका फल प्राप्त होता है। उसकी ': गाने ।। '५३.५९ ।। :-.-MITोर मनर 7 मनर 7 मतातार मातमी '} .:. THE TIME | गला गंन नारमेन गाने Pायमान्यजन्या- + - + . . . . + T. RETITIEW 7 } f गोम रोः 0 । [ २१२ ] कोट्युक्तकोट्यश्च गताश्च यस्मात् एकोनविंशतिसख्यकाठ्याः । मोक्षे पुरे शर्मनिकेतने च सुदत्त आदिवर अन्त कूटात् ॥ ५८ ॥ यस्यैव कूटस्य सुवन्दनाच्च कोटिप्रमप्रोपधज फल च । भव्यो लभेत् सशय नोत्र भव्या वन्दे च त शर्मप्रद सदा हि ॥ ५९ ॥ प्रभासकूटात् सुरनाथवद्या सद्ध्यानधर्मेण विधूतपापा । शतमध्य एकोन शतानि रन सहस्राणि नन्दैवतैवलशा.॥६० ॥ नवैव कोट्युक्त पुनश्च कोटिरेते शिवे धर्मधरा गताश्च । श्रीशातिनाथस्य सूकालमध्ये ससारसिंधो. मथका मुनीन्द्राः ॥ ६१ ।। कुर्याच्च यस्यैव सुभावशुद्धया यो दर्शन सैव लभेत् फल च । एकस्य कोटिप्रमप्रोषधस्य क्रमाद्धि मोक्ष सकलाहनाशनात् ।। ६२ ।। द्विवेदयुक्ताश्च शतानि सप्त यस्मान्मुनीन्द्राः शिवप्राप्तिरेव । सहस्रोपमाः षट् पुनः नन्दकाश्च कराग्निलक्षा हतकर्मवृदाः ।।६३।। ऋतुस्तथारध्रप्रमाश्च कोट्यो रसाख्यनन्दोपमकोटिकोट्य. । गताः मन पापविभञ्जकाश्च श्रीज्ञान आदिधरकूटतो वै ।। ६४ ।। अस्यैव कूटस्य च दर्शनाच्च कोट्योपमप्रोषधज फल च । लभेच्च भव्यो बुधसत्तमाश्च नमामि त चैव सदा त्रिकाले ॥ ६५ ॥ नवतिनवसहस्रा वा च लक्षास्तथैव, नवतिनवसुकोट्यो नाटिकाद्यतकूटात् । सकलविधिविनाशात्सत्पुरे मोक्षसज्ञे, अमलगुणनिधाना सगता लेखपूज्याः ।। ६६ ॥ प्राप्तिर्भवेत्तस्य चतुः हि भव्या, षट् रध्र कोटि प्रमप्रोषधाना । यस्येक्षणान्मुक्तिपदस्य सिद्धि, ह्यनुक्रमान्नात्र संशयश्च ।। ६७॥ सार हि नवलाख नवहजार पाँचसौ पिचानबे मुनिगण मोक्ष पधारे । इस कूटका दर्शन करनेका फल एक करोड़ उप- वासका है । इस कूटकी यात्रा विभीवसेन राजाने चतुर्विध संघ सहित की ॥ ५७-५९ ॥ अर्थ--प्रभात कूटसे श्री शांतिनाथ भगवान् तथा एक कोड़ाकोड़ि नव करोड़ नवलाख नवहजार नौसौ निन्यानबे मुनिगण मोक्ष पधारे । इस कूटके दर्शनका फल एक करोड़ उपवासका है। इसको यात्रा सुदर्शन राजाने चतुर्विध संघ सहित की थी ॥ ६०-६२ ॥ अर्थ--श्रीज्ञानधर कूटसे कुथुनाथ भगवान् तथा छ्यानबे करोड़ बत्तीस लाख छयानबे हजार सातसौ ब्यालीस मुनिगण सिद्ध पदको प्राप्त हुए। इस कूटके दर्शनका फल एक करोड़ उपवासका है। इसकी चतुर्विध संघ सहित यात्रा सोमधर राजाने की थी ॥ ६३-६५ ॥ अर्थ--नाटक नामक कूटसे श्री भगवान् अरहनाथ स्वामी तथा ब्यानवे लाख व्यानबे हजार मुनिगण सिद्धपदको प्राप्त हुए । इस कूटके दर्शनका फल छयानवे करोड़ उपवासका है। इसकी चतुर्विध संघ सहित यात्रा सुप्रभ राजाने को ॥ ६६-६७ ।। याचाच TEACHEMICATE-SHIPPALI AN. जगन्नाण जन्य SHA [ २१३ ] पटनन्दकोटयोवग्मय सान्च कूटान्मुनीन्द्रा गिवसन्पुरे च । गताश्च स्वकर्मविघातनाच्च श्रीपल्लिनायस्य सुकालमध्ये ।। ६८ ।। पदयाटिपमपोपवाना फरम्य प्राप्नि. ग्बलु सम्भवेच्च । तद्दर्शनादनुक्रमत शिवस्य गिव प्राप्त मदाप्रवदे ।। ६९ ॥ नोपयुवा बरनगन्न एकोनगतयुपतगतानि कूटात् । लक्षा नवेव सुग्वारपूज्या वन्यूनशतकोट्यतीश्वराश्च ।। ७० ।। पानमनोटिनयेर होटि गता गिवे पापविघातनाच्च । यद्दर्शनात्कोटिसुप्रोपचाना फल भवेत् भो बुधसत्तमस्य ।। ७१ ।। धादिस्य गान तानिरगगमित्र आदिसुनामफूटात् । मुनीश्वरा सप्तसहत्रयुक्ता. पत्राधियुक्ता. सकलतिदूरा ।। ७२ ।। पता: TAIT नाना तोट्यात कोट्यो नवमन्प्रयुक्ता । गताश्च माक्षे शुभभावशुद्धा. सच्छमयुक्ने खलु निय॑ये च ।। ७३ ।। सोटयानरपान फल लभेद्य मते मुभावात् । यम्येक्षण भव्यनरोत्तमो वै वन्दे मदा शर्मप्रद शिवाय ।। ७४ ।। समान बटोरे मा. ह्यगोति चतुल्तगश्न । मोक्ष गता सर्वमुनीश्वराश्च सर्वाहनाशात्सुरनाथवद्याः ।। ७५ ।। गा कटरा गुनेन भयो लाये। फल वर न । मित्राण्टलक्षप्रमप्रोपवानामोडे मदा त गिवदायक च ।। ७६ ।। पकतना गुस्मनन गया कर मुगिनादे गताग्च । मप्राप्य शर्म परम ततोवे जगदिदु कमविजिताश्च ॥ ७७ ।। रवलनाम कूटमे श्रीमल्लिनाथ भगवान् तथा उनके सुकालमें छयानवे करोड मुनिगण सिद्धपद at प्रा। इस कूटके दशनमे क्यानवे करोड़ उपवास का फल प्राप्त होता है। इस कूट की वन्दना, चतु- Frt मा गनि गत्यगन गजाने को यो । इम मंघमें मुनिगणोको संस्था वद्दत थी ॥ ६८-६९ ।। -~-17र नाम लूटमे मनिमुवत भगवान् तथा निन्यानवे फोडाफोडि सतानवे करोड नव लाख मानिग गिरो प्राप्त हए । इन फूट के दर्शन का फल एक करोड उपवास का फल है । इस {"TIT7 गत और अतिशय विभूतिले साय ओरामचन्द्र नाम के बलभद्रने की ॥७०-७१॥ 1.... म पूरी प्रोन मिनाय भगवान् तथा एक अन्य नर रोड पैतालोग तारा सात • मो fuTREET को प्राता। इन टके कान का हन एक करोड उपनामला है । इस 11. R TEEnाने ाि ा || ७२.७४ ।। -----.:- Tinान या गोरगतो निगा मोगा प्राप्त हए । ... ... ... r : TITTERTAनशिगंध गरिन या मुभारमेन न । - ६ T . -- प ܫ ܫܝܢ ++1 ..." रोमानित
[ २१४ ]
SHRSHIPe-SHIRSHISHISHASHISHESHI
यः सर्वकूटस्य सुभावशुद्धया करोति तस्यैव सुदर्शन च । वक्त फलं तस्य क्षमो न कोपि विना जिनेन्द्रर्हतकर्मव्यूहै ।। ७८ ॥
चम्पापुरबहिगिमन्दराभिधभूधरात् । वासुपूज्यजिनाधीश शिवस्याने गतो नृप ।। ७२ ॥
अन्येपि बहवस्तस्मात्सपाल्य परम तप. | मोक्षगु मुनयो धीराः अत. सोपि नगोत्तम. ॥ ८० ।।
ईशानस्य सुकोणस्थकैलासाद्रे वृषाधिप. । गतश्च शाश्वते स्थाने आदिनाथो दयापतिः ।। ८१ ॥
यस्मादप्येव सप्राप्ता मुनीन्द्रा शर्म मत्पदे । उत्पाद्य परम बोध भूपा. सहस्रश. खलु ।। ८२ ।।
अयोध्याया द्विलक्षाश्च पादोनाः क्रोशकास्तथा । तस्यातरोहि जानीहि एतावत्प्रमितो नृप ।। ८३ ।।
सोरठाख्यसुदेशस्य ऊर्जयन्तनगाच्छुभात् । नेमिनाथजिनेन्द्रोहि
गतोव्ययपुरे वरे ॥ ८४ ॥
भव्यजीवोंने जन्म, जरा आदि क्लेशोंका नाशकर परम सुख प्राप्त किया है, तो जो कोई भव्य अपने भावोकी
विशुद्धिसे मन, वचन, कायकी शुद्धतापूर्वक समस्त कूटोंका दर्शन करे, उसको महिमाका वर्णन क्या कहा जा
सकता है । उसकी महिमा श्री अरहन्त भगवान् ही कहनेमें समर्थ है ॥ ७७-७८ ॥
अर्थ--हे राजन् ! हे श्रेणिक ! चम्पापुर नगरके बहिर्भागमे एक मन्दराद्रि नामके पर्वतसे श्रीवासुपूज्य
भगवान् मोक्षधामको पधारे । मन्दराचल पर्वत श्रीवासुपूज्य स्वामीको निर्वाणभूमि है। इसलिये यह भी तीर्थ-
रूप है ॥ ७९ ॥
Aniruraच्यालयाच्यमय-माता-DATE
जयजयमार
अर्थ--इस मन्दराभिध पर्वतसे श्रीवासुपूज्य भगवान्के सिवाय और भी अनेक मुनिगण संयमका पालन-
कर मोक्षको प्राप्त हुए है । इसलिए यह पर्वत तीर्थभूमियोमें अतिशय उत्तम है ॥ ८० ॥
अर्थ-हे राजन् ! हे श्रेणिक ! ईशान दिशामे कैलाश नामके पर्वतराजसे श्रीवृषभनाथ आदि तीर्थङ्कर
युगकी आदिमे मोक्षधामको पधारे । और भी बहुतसे मुनिगण परमबोधको प्राप्त कर उसी पर्वतसे मोक्षपदको
प्राप्त हुए । इसलिये कैलाश पर्वत भी निर्वाण भूमि और परमपवित्र तीर्थ है । कैलाश पर्वत अयोध्यानगरसे पौने
दो लाख कोश ईशान दिशामे है ॥ ८१-८३ ।।
अर्थ--सोरठ (सौराष्ट्र) देशमें स्थित ऐसे गिरनार ( ऊर्जयन्त गिरी ) पर्वतसे श्री नेमिनाथ भगवान्
निर्वाण पदको प्राप्त हुए ॥ ८४ ॥
[ २१५ ] me न्यायाEिTAH - व दादया मरतेवगेपि नपते पूर्वेव भव्योत्तम , प्रादात्तस्य सुगचितोवरद्वदा सघृत्य चित्ते इद । अगायायनि गन्पदे जिनपति श्रीनेमिनाथाभिधः, अग्न्येवाघविनाशका मुनिनुत प्रादक्षिणा सम्प्रदा ।।८५।। उन्या मानमहो मनोग्य रगणा गमारपार गताः, यस्मात् भो सुग्नाथपूजितपदा कर्मारिविध्यमकाः । भयाना भव पता नवरा उद्धत मोगाश्च ते, कायाकर्मविवर्जिता मुनिनुता पापाद्रिवज्रोपमा ।। ८६ ।। मे गानि गगवावीश पावापुग्मरोवरात् । मुक्ति त्व निश्चयाद्विद्धि चतु कर्मविना नात् ।। ८७ ।। सम्मेनिगम्येव करिष्यन्नि मुभावत । दर्शन विधिना मा ये वे भव्यसुकायजाः ।। ८८ ॥ गि गान्यन्ति ने मप ग विवि कथय प्रभो। येनैव विधिना बोर करोमि तस्य दर्शनम् ।। ८९ ।। अर्थ-जिम ऊर्जयन्त पर्वतको (गिरनार पर्वतको) देखकर भरत चक्रवर्तीने प्रथम ही यह एक बार अपने दरगमें निश्चय किया कि इस पर्वतराज श्रीगिरनारसे भगवान् नेमिनाथ दुष्ट कर्मोंका सहार कर मोक्ष- परको प्राप्त लोगे। गलिये देवगणमे पूजित और मुनिगणोंसे बन्दनीय उस पर्वतराजकी तीन प्रदक्षिणायें नों ।। ८५ ॥ नार---गिरनार पानको भावो तो समझ फर प्रदक्षिणा दी और पूजा की। --गि पवंतपर मनीपरगण उत्तम ध्यान को धरकर संसारसे पार हो गये, जिसकी देवगण पूजा मो, गोगांतर मुनियोने अपने कमोक्ता नाश किया है। जो भव्यजीवोको ममाररूपी कूपसे For RTR गुमे गिनार मारण करता है और जो पापर पो पर्वतके लिए वज्रो समान है ऐमे तीर्थ- 1: illne | ८६ ।। -~-ilm RTI परी माने तोयंग असन्त मान (महावीर प्रभ) स्वामीने वाला फि मानने या विना मगर । अनि महावीर प्रभने .. - :पुर मग मा प्राप्त होगा ।। ८७ ।। 11. नाद feeir करेंगे * + 1 " 13 :..".:" मा । यो : महागने मेर : • : REET infr. 'मी ! iii गोममेर- " 1: 1.1 - - ६ - . - .. x . । ६ [ २१६ ] Rames भव्यजीवाहि तस्यैव चार्हा नान्ये कदाचन । तेषा मध्येपि भेदोस्ति तच्छृणु कथयाम्यह ।। ९० ॥ नरकायुर्वन्धजीवाना तिर्यगायुर्युतात्मना। त्रिकाले नास्ति तेषाहि तदाप्तिर्नात्र सशयः ॥ ९१ ।। ते तस्य नैव प्राप्तिश्च मा कुरु त्व मलीमष । शुद्धदृष्ट नराधीश भाविकाले जिनस्य ते ।। ९२ ।। नरकायु तव बन्धोभूत् मुने. मारणपापतः । अतस्त्व नास्ति योग्यो हि तस्य भो भावितीर्थराट् ।। ९३ ।। त्रयत्रिंशत्समुद्रायु. पूर्वबन्चे बबन्ध च । सप्तमस्यैव श्वभ्रस्य त्वया तत्र सुपापिना ।। ९४ ।। राज्ञीसयोगतो ते हि प्रलय स गतो नृप । वेदाष्टसहस्रमानो सोमश्वभ्रायुः तेस्ति वै ।। ९५ ॥ स्थितिबधस्य हानिर्हि गतिबधस्य नो भवेत् । अतो भो मगधाधीश त्व नद् भोक्ष्यसि तत्र हि ॥ ९६ ।। नरकगत्यानुयुक्ताना तदाप्तिर्नास्ति निश्चयात् । मा दुःख कुरु तस्यैव त्व भावितीर्थनायक ॥ ९७ ।। शिखरका दर्शन किस विधिसे करना चाहिये ? आप दर्शन करनेकी जो विधि बतलायेंगे, उसी विधिसे हे वीरेश ! मेरी भावना दर्शन करने की है ॥ ८८-८९ ॥ अर्थ--हे श्रेणिक! श्रीतीर्थराज श्रीसम्मेदशिखरकी यात्रा भव्यजीवोंको ही होती है । अभव्योंको सर्वथा नहीं होती है । भव्यजीवों से भी जिन जीवोंके नरक तथा तिर्यंच आयुका बंध नहीं हुआ है उनको ही यात्रा होगी । हे श्रेणिक महाराज! तुझको उस पवित्र तीर्थराजके दर्शन होने दुर्लभ हैं क्योंकि तू इसके योग्य नहीं है। तूने मुनीश्वरको मारनेके भावोंसे नरककी आयुका बंध किया है । यद्यपि तू भावी तीर्थेश है तो भी नरकायुका बंध होनेसे तुझको दर्शन होना दुर्लभ है । इसलिये मनमें इसका खेदभाव न कर ॥ ९०-९२ ॥ अर्थ--हे श्रेणिक महाराज ! मुनिके मारणके समय तेरे ऐसे अशुभभाव उत्पन्न हुए कि जिससे तेरी नरककी गति और उसमें तैतीस सागरको आयुका बंध हुआ। परन्तु चेलना रानीके संयोगसे फिर भी मुनिके दर्शन कर पुण्य सम्पादन करनेके भाव तेरे हुए। और तूने जो पाप किया था, उसको निन्दा, गर्हा आदि हो जाने से तने अपनी नरकको स्थिति बंधको कम कर दिया, अर्थात् तँसीस सागरसे घटा कर ८४००० हजारको स्वल्पायु हो गई। परन्तु नरक आयुका बध नहीं छूटा । आयुवन्ध नहीं छूटता है परन्तु स्थितिबन्ध कम हो जाता है । इसलिये हे श्रेणिक तुझको श्रीतीर्थराजका दर्शन होना दुर्लभ है । परन्तु हे भावी तीर्थराट् ! इसका तू अब विचार मत कर । इसका एक उदाहरण मै बतलाता हूँ उसको श्रवण कर जिससे संतोष होगा ॥९३-९७॥ wwwrousalu Kasselbe Seiten शाच्या हिन्याच्याजयजयी TecINTEASI [ २१७ ] - गर्वविद्याचिपो भूप दयाननसमाह्वय. | भूचरे खेचरवंद्य: विखण्डावनिपालक ॥ ९८ ।। दिगोपि गतो यत्र बने मिढाचलस्त्र वै । दर्शनं नोऽभजत् तूर्णमाजगाम स्वमास्पद ।। ९९ ।। अनेकाञ्च महीपाला नो प्नापु तम्य दर्गन । मध्यभागात् समाजग्मु स्वालय मगधाधिप ।। १०० ।। नगगे गया चक्रो मनत्कुमारसज्ञकः । आनन्दायभूपेन्द्रो प्रभाश्रेणिकनाममाक् ॥ १०१ ॥ योनाभिराजेन्द्रो ललितदत्तगज्ञक । कुन्दप्रभसमाख्यातो नाम्नाहि शुभश्रेणिक. ॥ १०२ ।। वरदत्तो पनिम्न गोमप्रभो नृपोत्तम. । पुनरविचलभूपाल आनन्दश्रेणिको नृपः ।। १०३ ॥ मुप्रभा नृपतिश्चैव चारुणिकसज्ञक. । भावदत्तकभूपाल: सुन्दरो नरनायक ॥ १०४ ।। गमनन्द्राभियो भूगस्तया अमरगिक । गुवमन्तो महीपाल पुण्यवान् तेजोवान् गुणी ॥ १०५ ।। क MAN अर्थ-गर्व विद्या का स्वामी भूचर और विद्याधर राजाओसे पूजित महासत्ताधारी तीन खण्डका स्वामी ऐगा रावण कार्य प्रगगमे सम्मेदशिवरके बन ममीप जानेपर भी उसको तीर्थराजका दर्शन नहीं हुआ। क्योकि गाने गके प्रथम नरकायका गन्ध किया था। इसलिए इस उदाहरणसे हे श्रोणिक महाराज ! नरक आयुका नेता जोवोत श्री तोगजका दर्शन नहीं होता है। ऐसे अनेक राजगणोंको इसी कारणसे इस तीर्थ- गाननाए । तोयंगजो जाने के पहले-पहले हो उनको जबरन पीछे वापिस आना पड़ा । इसलिए हे roin नीला परता मत कर ।। २८-१०० ।। - NT माग7 निम्ननिमित राजाओने श्री सम्मेदशियर को चतुर्विन सब माहित और frint Tir अपने-अपने तीर्थ करके ममगमे उनने मत्र (मनि, आर्यिका, श्रावक, rift ) II Tोगा। को, गोपरि ठाणे गई, लूटगे अमर तोफर मोक्ष को पधारे हैं, TAirf मांग की। उन गजानन नाम- IT नाम , प्रभागेत '५ ६ कितन्यप्रा ८ HT ? REET7 ?? मग १ - नारोग १५ मारा ? " .. ! . . : . . . . BECE"। '. । . मनी TTI7, पीनामा - - +T - । A १४ । . - - [ २१८ ] Hat इमे विरयातता जाता भव्याः सघाधिपा नृपा । यात्रायाः करणात्तस्य त्वया ज्ञेया न सशयः ॥ १०६ ।। गिद्धवगदिकूटाना प्रतिष्ठाकारका इमे । अन्येपा नोहि सख्या च ज्ञेया भो चेलनापते ।। १०७ ।। इमे सर्वे नराधीशा मुवितमीयुः नरेश्वर । केवल दर्शनेनैव सभुक्त्वा राज्यसपदा ॥ १०८॥ श्रीसम्मेदशिखरयात्राया विधिः (श्रीसम्मेदशिखरयात्रायाः विधि प्रवक्ष्ये चित्तसमाधिना यूय शृणुथ ) अथादी चतुर्दिशासु भव्यान् प्रति यात्रासूचकानि पत्राणि प्रेषणीयानि । पश्चात् स्वनगरस्थ जिनालयमध्ये भव्यजनैः सह पशकल्याणकाभिधमण्डलस्य विधिः करणीयः। पुन. जिनाग्रे इति जाप्यं कर्तव्य-ॐ अनन्तानन्तप्रमसिद्धकरेभ्यो नमोस्तु-श्रीसम्मेद अर्थ-उपरोक्त राजगण संघाधिप (संघपति) के पदसे प्रसिद्ध हुए। समस्त प्रजाने इन राजगणोंको श्रीसम्मेदशिखरकी चतुर्विध संघ सहित और प्रतिष्ठा करनेके लिए ही संघपति पद प्रदान किया॥ १०६ ॥ अर्थ-हे मगधाधिप ! उपरोक्त सघपति राजाओंने विधिपूर्वक संघ सहित और सिद्धवर कूट आदि फूटको प्रतिष्ठादि करा कर यात्रा की, इसलिये वे सब मुक्तिको प्राप्त हुए। इनके सिवाय असंख्य राजा श्री सम्मेदशिखरकी यात्राको गये और उत्तम सुख प्राप्त किया। इसलिये श्रीसम्मेदशिखरकी महिमा अपरम्पार है। उसके दर्शन करनेसे भव्यजीवोंको सब प्रकारका सुख प्राप्त होता है ॥ १०७-१०८ ॥ जापान श्री सम्मेदशिखर यात्रा करने की विधि अर्थ-हे श्रेणिक महाराज ! अब श्रीसम्मेदशिखरकी यात्रा किस प्रकार करनी चाहिये, उसकी विधि बतलाते है । तुम उसे एकाग्रचित्तसे सुनो। श्रीसम्मेदशिखरकी यात्रा करनेवाले भव्योत्तमको सबसे प्रथम चतुर्विध संघसहित यात्रा करनेके अपने भावोको सूचित करनेवाली कुकम पत्रिका प्रत्येक ग्रामोंमें आदरके साथ भेजनी चाहिये। फिर अपने नगरमें समस्त भव्यजनोंके साथ जिनालयमें अतिशय ठाठ-बाट और भावभक्तिसे जाकर पंचकल्याणक विधानका मण्डल बनाकर पूजा करनी चाहिये । भव्यजीवोंको भोजन पान आदिके द्वारा आदर-सत्कार करना चाहिए । पूजा पूर्ण जामन्चमान्च्याच्याजमान्य [ २१९ ] निपानामह करिष्ये । जातीपुप्पेश्चाष्टोत्तरशतप्रम । पश्चात् सिद्ध मन्त्रभि सिद्धज्या कृत्वा । पश्चात् जिनेश्वरस्य विव रथस्थहर- बिष्टरमध्ये ग्थापयित्वा तदुपरि छरचन्द्रोपकनामरादिमच्छोभा करणीया । चतुर्विधवादियाणा अग्रे शब्दोत्करा कर्तव्याः। यदि द्वन्ततिविमा ग्यात्तहि-मुनि-आर्थिकौघेश्च श्रावकथाविकोवैः साक गमन कर्तव्य । 'नमोग्नु गगिद्धेभ्य" इति मार्गे जाप्य जपनीय चतु पञ्चक्रोशप्रमाणमेव गमन करणीय । सर्वजीवशमप्राप्त्यर्थ । स्वः ममाणिो -शुराताम्नगणि मघार्य शालामेव माला करे गृहीत्वा विना वाहनमेव मुनीशिना साद गमन कर्तव्य भोजनमप्येक- पारिणी । प्रदानयं पालनीय । गर्वेपा चतुर्विध सघरथ भव्यमाना चेयावृत्य करणीय । केपामपि न्यादपानादिपु दुःस न THA हो जाने वार " अनन्तानन्तप्रमसिद्धफरेभ्यो नमोस्तु श्रीसम्मेदशिखर यात्रामहं करिष्ये" इस मन्त्रके द्वारा पतमो गाट (१०८) पुईके फूलोमे जाप देनी चाहिये। फिर सिद्धमन्त्रोके द्वारा सिद्ध भगवान्की पूजा भाव- गति और उनके गणांके नितवन द्वारा करनी चाहिये । फिर श्रीजिनेन्द्र भगवान्को प्रतिमाको रथमें विराज- माना चाहिये । रयका शृगार करना चाहिये। रथको सुन्दर सिंहासन, छत्र, चमर, चन्दोवा, घण्टा, , गा, टिका, अप्टमंगल द्रव्य आदि मगलद्रव्योसे सुशोभित करना चाहिये। चार प्रकार वादिनो रे गा मान उगवत भगवानके रथको आगे कर गमन करना चाहिए। जो द्रव्यको शक्ति हो तो Kr, गिता, आप, भाविका गमह र चनिध मघके साथ गमन करना चाहिये । सबके योग्य वाहन आदिको मार गुपूर्वक गमन करना चाहिये। जिससे समस्त भव्यगणोको सन्तोष हो और विशुन - -- - माग मानगिया" जगमको जाण देनी चाहिये । जाप्य स्फटिक मणिको सफेव हो। : oratसमा पारिमपतिको नफेर गम्मती धारण करना चाहिये । समस्त जीवोके पार पोसा करना शारि। मंगति को वाहनो चिना पेवल मुनिगणोरे : :"I - 271 रो मायरो का नाशी पोट यम्मा कर देनी कोर IT नाम मेरा पान करना चाहिए। गंगम सनकी .::... minो पा.T1ATी पूर्ण माना ८ - 4 .
[ २२० ] SHASHIOSSETHISWESHPSHIPSME देय नित्यश सर्वेषा न्यादपानादिना सन्तोपणीय । पंचामृतरसैजिनेन्द्रस्य मार्गे वासर प्रति स्नान करणीय | पश्चात् वसुविध द्रव्यो- स्करैः पूजा कर्तव्या । दीन जनाय मार्गे दान सदा देय । वस्त्र भोजन पानादिक । इत्यादि शुभविधिना सो वन्दितः सन् द्वितीयेहि भवे त पुरुष मोक्षसुख दातु क्षमः । नात्र संशयः । यदि गृहे द्रव्यस्य होनता स्यात् तहि सम्मेदाचलस्य एव यात्रा करणीया-मन्त्र जाप्य सैव सिद्धेज्या सैव कर्तव्या । न्याद- मप्येकबार सहब्रह्मचर्य च । वाहन विना गमन कार्य । गवाश्व वा क्रमेलकमगालितमुदक नो पानीय । तेपा खानपानेषु महद्यत्न रक्ष- णीय वालवृद्धाना दुख नो दातव्य निःशल्यः सन् पथि सदा गमन कर्तव्य-स्नानपूजादानकार्यादीन् कुर्वन् सन् । चाहिये। किसी भी जीवको अन्न, पान आदि का जरा भी कष्ट न हो ऐसी व्यवस्था करना चाहिये। सबको सुन्दर भोजन पानके द्वारा नित्य ही सन्तोष कराना चाहिये। मार्गमें श्रीजिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमाका पंचामृतके द्वारा अभिषेक करना चाहिये। और फिर आठ द्रव्यके समूहसे उत्सबके साथ पूजा प्रभावना करना चाहिये। दीन, अनाथ, दुःखी जीवोंको करुणा दान भोजन वस्त्रादिक देना चाहिये। उपरोक्त विधिसे जो भव्यजीव श्रीसम्मेदशिखरकी यात्रा चतुर्विध संघ निकाल कर करता है। वह दूसरे ही भवमे मोक्ष सुखको प्राप्त होता है। इसमें सन्देह नही। अर्थ-हे मगधेश्वर ! यदि द्रव्यके अभावके कारण संघ चलानेकी (शक्ति न हो तो) सम्मेदाचलकी यात्रा इस प्रकार करनी चाहिये- पूर्व प्रकरणमें जो जाप्य बतलाई है वह तो नित्य देनी ही चाहिये। सिद्ध भगवान्की पूजा जो प्रथम बतलाई वह भी उसी प्रकार करनी चाहिये। भोजन भी एकबार करना चाहिये और ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए। वाहन बिना ही पैदल यात्रा करना चाहिये । गाय, बलद या गाड़ी, घोड़ा आदि जो वाहन अपने साथमें हो तो उनको पानी छानकर पिलाना चाहिये, खान-पानमे किसी प्रकारका दुःख न हो ऐसी सुन्दर व्यवस्था रखनी चाहिये। अपने संघमें बालक, स्त्री, वृद्ध, पुरुष होवे, उनकी सेवा सुश्रुषा उत्तम प्रकारसे करनी चाहिये। किसीको किसी प्रकारका कष्ट न हो । मार्गमे दान, पूजा आदि करता हुआ निःशल्य गमन करे । किसी प्रकारको सकल्प भावना न करे । और Dwels assisted PATTERESTHEAST PRACHAR समस्यामा तत्प्रभावतः॥६॥ ने [ २२१ ] मो मगधाधिप य कलौभब्ध पुमान् एव तस्य सम्मेदाचलस्य यात्रा करिष्यति स पचमे वा दशमे भवे शिवाभिधे पुरे यास्यति । यदि एतादृश्यपि शक्ति स्तिचेत् तदपि गक्त्यनुसारत. तस्य पर्वतस्य यात्रा कर्तव्या। अवश्यमेव यूय मोक्षे यास्यथ ।। भो भव्या गात्या लोपन मा कुरुष्व । अस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापालयः प्रलय यान्त्येव नात्र सन्देहः ।। ये नग मगवावीग ह्यनेन विधिना कलौ। यात्रा सम्मेदशैलस्य करिष्यन्ति शिवास्पदं ॥ १ ॥ यागन्ति हमत कर्ममन्तते नाशनात् बलु । प्राप्य समारज शमं देवमानुष्ययोनिपु ॥ २ ।। गवाहनेन भो भूप करिष्यन्ति नराश्च ये । याना तग्य भविष्यति कदा मोक्ष च तच्छृणु ॥ ३ ॥ चोकमा भात्या शिवम्यान च ते ननु । तदने नैव स्थास्यन्ति ससारे दु खसभृते ।। ४ ।। गिनि जिव येहि वाहनेन विना नृप । यात्रा मम्मेदशेलस्य यास्यन्ति ते कदा शृणु ।। ५ ।। गिमापनेपनवज गर्मवारिधिम् । भुक्त्वा नरेन्द्रदेवादियोनिपु पात् पाम्यन्ति मोक्षामनन्तशर्मदायक । सर्वपापविनिर्मुक्तमभव्यजनदुर्लभम् ॥ ७ ॥ को मापने माय यात्रा करने के लिए आये हो उनकी यथेष्ट सहायता करें। इस प्रकार यात्रा करनेसे पाँचवें गोमाय मोक्ष मुणकी प्राप्ति होती है। -- मगरेर । यदि पूर्वोक्न प्रकारको शक्ति न हो तो शक्तिके अनुसार यात्रा करनी चाहिये। १२. If, Inानि पतिको नही लिपाना नाहिये। जो भव्य जीव नि शल्य भावोसे शक्तिको नहीं IITHiT मम्मे पाया मरेगा, वह नियम मोदाको प्राप्त होगा। :: समरस पाप नागलो प्राप्त हो जाते हैं। उनमे मत्वेह नहीं है । 1 . मानो गलिमे गोमम्मशिगती याना तरेगा, बह Mait को 1731ो प्राप्त मेगा ।। १-२ ॥ ' : init-नाने कराया (रेगा, उमा गोली का • राम:नगा ।। 2.1 in m. मो: नो ":: : : : : ME मोगानो M 1 7 क है " , ३ की . A है . प्र . ।
[ २२२ ] TEACHESH चामराम AHIPAKARSHIPHPाम- तनो वै यदि सामर्थ्य नास्त्येव मार्गचालने । तदाहि वाहनेनैव कर्तव्य तस्य दर्शनम् ।। ८ ।। सामर्थ्य विद्यते मूढा तस्य यात्रा च ये नरा । करिष्यत्येव वे मोक्षो अश्वयानादिवाहने ॥९॥ अत्यैव दूरो तेपा च सामर्थ्यलोपपापत । मा कुरुध्वमहो भव्या सामर्थ्यलोपन ह्यत ।। १० ।। कलो भूप तप कार्ये सर्वेपा नृणा खलु । नो भविष्यति सामर्थ्य तदृते शर्मसति ॥ ११ ॥ अत. सकलसौख्याप्त्यै सा काया वाहनादृते । तदाहि सफला शोघ्र भविष्यत्येव निश्चयात् ।। १२ ।। कोटिपूर्वकृत ध्यान श्मशानाद्रिगुहादिपु । तदधिक भवत्येव फल तदर्शनात् नृणा ।। १३ ।। नेय सिद्धि तपस्योच्चैः ध्यानस्यैव कदाचन । तस्मिन् काले ह्यतो भूप सा यात्रा सर्वसिद्धिका ॥ १४ ।। तस्य यात्रासम नास्ति ह्यपर पुण्यकारण । अतो भव्याः शिवाप्त्यर्थं कुर्वीध्व ता मुदा सदा ।। १५ ।। सब पापोसे रहित ऐसे मोक्षमें वे भव्य जीव बारहवें भव पर्यन्त जायेंगे, मोक्षको नियमसे प्राप्त करेगे । अभव्य- . जीवोंको यह यात्रा होना दुर्लभ है ॥ ५-७ ॥ अर्थ-हे मगधेश्वर ! जो शरीरमें शक्ति नही हो तो सवारी (वाहन) से ही सम्मेदशिखरकी यात्रा करनी चाहिये। उससे भी वही मोक्ष फल प्राप्त होगा । परन्तु सामथ्यंके होते सन्ते, घोड़ा, यान, डोली आदि पर बैठकर यात्रा नही करनी चाहिये। यदि करेगा तो सामर्थ्य लोप करनेसे भावोमे कुटिलता प्राप्त होती है, जिससे भावोंमें विशुद्धि नहीं होती है । इसलिये सामर्थ्यका लोप नही करना चाहिये ८-१० ॥ अर्थ--हे मगधेश्वर ! पंचमकालमें उत्कृष्ट तपश्चरण करनेकी शक्ति मनुष्योंमें नहीं होनेसे मोक्ष सुख प्राप्त होने में कठिनता प्रतीत होती है। परन्तु जो भव्यजीव वाहनके बिना भावभक्तिसे पैदल श्रीसम्मेदशिखर की यात्रा करते है, उनको समस्त प्रकारके सुख स्वयमेव प्राप्त होते है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ११-१२ ।। अर्थ-है मगधेश्वर ! जो पर्वत श्मसान आदि भूमिमें करोड़ पूर्व वर्ष पर्यन्त ध्यान किया जाय उससे उतने कर्मोंकी निर्जरा नहीं होती है, जितनी कि सम्मेदशिखरके दर्शन भावपूर्वक करनेसे होती है ॥ १३ ॥ अर्थ-इस पंचमकालमें न तो तप है, न ध्यान है । केवल सम्मेदशिखरकी यात्रा ही समस्त प्रकारके सुखोंको प्रदान करनेवाली है ॥ १४ ॥ अर्थ--श्रीसम्मेदशिखरकी यात्राके समान अन्य दूसरा कोई भी पुण्यका कारण नहीं है। इसलिये मोक्ष पEST- SC-SHISHESHASHISHwHIP [ २२३ ] फवारमपि त च वदयिष्यन्ति ये नरा । अनुक्रमाच्च यास्यन्ति शिवेव्यये धराधिप ॥ १६ ॥ मा कुन्ध्व तपोवृन्दं भो भव्याः ध्यानसहति । समं प्रत्येकवार च आमृत्यु तस्य दर्शनम् ।। १७ ॥ भजध्व नेन पुण्येन केवलेन शिवास्पदे । यास्यथ नात्र सदेहो द्वितीये हि भवेऽव्यये ॥ १८॥ तग्य विंशतितमस्येव कूटाना दर्शनात् नृप । कोटिश प्रोपधाना च फलोत्पत्तिश्च जायते ।। १९ ।। नत्फलात् कर्मवृन्दाश्च नाश यान्त्येव तत्क्षणे । अग्ने अव्ययगोत्रस्य वंधोत्पत्तिः प्रजायते ॥ २० ॥ विना वाहनतो य च तस्य दर्शनत शिवे । द्वितीयेहि भवे भूप इतरा यास्यति क्रमात् ।। २१ ।। अम्य दगनमा नेण कुण्टाद्या. नागता गता । रोगिणा सकलातकाः ऋद्वयाप्तिः ऋद्धिकाक्षिणा ।। २२ ।। पुमालावता नेव जाताहि नेलनाप्रिय | पुत्रोत्पत्तिर्धनोत्पत्तिः राज्योत्पत्तिः शिवस्य च ।। २३ ।। TAGEमस्या को प्राप्तिके लिये भव्यजीवोको यात्रा करनी चाहिये। जो कोई एकबार भी उस पर्वतराजकी वन्दना भाव- भक्ति करता है वह अवश्य ही अनुक्रमसे मोक्ष सुग्वको प्राप्त होता है ॥ १५-१६ ॥ अचं-हे भन्यनीज जो तप और ध्यान करनेको तुझमें शक्ति नही तो मत कर, परंतु अपनी पर्यायमें बार-बार सम्मेवगिरको यात्रा कर । जिसने अवश्य सुसको प्राप्त होगा। और जो चतुर्विध संघ सहित विधि- Tir माग गरेगा तो दन हो भरमें मोदामुरा को प्राप्त होगा ॥ १७-१८ ॥ T-- गगमेयर ! तो कोई भन्यजीव बीस फूट के दर्शन करता है, उमफो करोडो उपवासका फल Timनो मतका नास होता है। और मोक्षपदके योग्य उत्तम गोत्रका बंध होता है।।१९-२०।। riगा ! तो भगीर के रिला श्रीगम्मेवशिगरको याना न दर्शन करे तो वह दूसरे REET | गोर पाटन महिना गा करनेवालोको अनुगमने मोक्ष प्राप्त होतो . . ३ - 4 मेरे . + ..!: आपसीने उगले गावि भयानक रोग iiii नास्तिो । पानीको PIT;" TRमा | ARTH: "न . . - . . + 8 । जयमाला यजमान्याया- रामात [ २२४ ] अस्मात्किमपि नो सति दुर्लभा दुर्घटा सुखाः। शिवशर्मस्य संप्राप्तिर्जायते ह्यपरेण किम् ॥ २४ ॥ भो भव्या. शिवप्राप्त्यर्थ कुरुष्व तस्य दर्शनं । चतुर्विधेन सघन तथा शक्त्यनुसारत ॥ २५ ॥ अस्मिन् काले नराणा च मतो भो मगधाधिप । श्रीमच्छिखरसम्मेदान्नान्योपायः शिवस्य वै ॥ २६ ॥ पद्भ्यामेव च कर्तव्या सम्मेदभूभृत. खलु । सकलकर्मनाशार्थ तूर्णमेव शिवाप्तये ।। २७ ॥ यवत्या सकला जीवा सिंहसदिका नराः। भव्या. स्यु इतरेपा च उत्पत्ति व तत्र वै ॥२८ ।। केचिदासन्नभव्यास्ते केचित् दूरतरा खलु । शिवयोग्याश्च सर्वे स्युः नायोग्या मगधेश्वर ।। २९ ।। सदातिशयसयुक्त. खगामरादिवदित । फलपुष्पोत्करैः सोद्रिः सदा भात्येव सुन्दरः ।। ३० ।। अर्थ----इस पर्वतराजको वन्दना और दर्शनके पुण्यसे संसारमें कोई भी वस्तु दुर्घट नहीं है । सब प्रकार के दुर्लभ सुख स्वयमेव प्राप्त हो जाते है । जब इसकी वन्दनाका फल मोक्षके सुखोकी प्राप्ति है, तब अन्य साधारण सुखोकी प्राप्तिमें आश्चर्य ही क्या ? इसलिये हे भव्य मोक्ष सुखकी प्राप्तिके लिए तीर्थराज श्रीसम्मे- दाचलके दर्शन चतुर्विध संघ निकाल कर अतिशय भावभक्तिसे कर । ऐसी शक्ति न हो तो स्वशक्तिके अनुसार ही दर्शन (वन्दन) कर ॥ २४-२५ ॥ अर्थ-हे मगधेश्वर ! पंचमकालमें मोक्षको प्राप्तिका सरल उपाय है तो एकमात्र श्रीसम्मेदशिखरकी यात्रा पैदल ( बिना सवारी ) ही करना चाहिये, जिससे समस्त कर्मोंका नाश होकर मोक्ष सुखकी प्राप्ति हो ॥ २६-२७ ॥ अर्थ-हे राजन् ! जिस सम्मेदशिखर पर समस्त जीव मात्र भव्य हैं । सिंह, सर्प आदि क्षुद्र जीव भी भव्य ही है वहाँ पर अभव्य उत्पन्न नहीं होते हैं । इसका यह भाव है कि वृक्षादिक एकेन्द्रिय जीव भी वहाँ पर भव्य ही है ।। २८ ॥ अर्थ-हे राजन् ! सम्मेदाचल पर कितने ही तो आसन्न भव्यजीव हैं। कितने ही दूर भव्य है । परंतु वे सब मोक्ष जानेके योग्य ही है। जिनको कभी मोक्ष होनेवाली नही है ऐसे जीव वहाँ पर उत्पन्न ही नही होते हैं ॥ २९ ॥ अर्थ-हे राजन् ! वह तीर्थराज अतिशय चमत्कार सहित है । देव, विद्याधरादिसे सदैव पूजित है। aurauster SHESHPASHESNEPew [ २२५ ] FreATRE बगहरिमादिजीवात् यत्र भयो न च । तद्यात्राकारिणा भूप तत्रत्याः मृदुमानसाः ।। ३१ ।। यम्माद् ध्यानादितो मोक्षे अनतानतशो जिना । गताश्च तस्य किं भूप महिमा च करोम्यहम् ।। ३२।। कलो तदर्शनेनैव तरिष्यन्ति घना जनाः । भव्यराशिसमुत्पन्ना नोऽभव्याः तम्य दर्शकाः ।। ३३ ।। देवायुर्वन्धजीवाना मनुष्यायुर्युतात्मनाम् । तस्याप्तिः सम्भवेन्नून इतरेपा च नो भवेत् ॥ ३४ ।। कुरुष्व त्व हृदि स्वस्थ स्मरण भावशुद्धित । तस्य सम्मेदशैलस्य तद्धि तदर्शनोपमम् ।। ३५ ।। प्रान मध्याह्नगायाह्न भो भव्या त हृदि सदा । चितयथाष्टकारे. घातार्थ घातनक्षमम् ।। ३६ ।। शादिमहिमा म्वामी त प्रनि भव्यबोधक. । मम्मेदाद्रेश्च आचख्यत् स सर्वेपा सुखाप्तये ॥ ३७॥ विभो अनिमिति श्रुत्वा पुनपिरहानये । इमा प्रश्नावलिं चक्रे म्वात स्था भव्यबोधदाम् ॥ ३८ ।। फा-फूल आदि लताओसे रमणीय है। यहाँ पर सर्प, सिंह, सूअर आदि क्रूर प्राणी यात्रीगणोंको बाधा नही देते हैं। यह एक विनिन अतिशय है क्योकि ये क्रूर प्राणी होकर भी सदैव भद्रपरिणामी हो वहाँ पर रहते ।। ३०.३२ ॥ 2 1-गि मिनाचत तोयंन्प श्रीमम्मेदशिखरसे ध्यानको धारण कर अनन्त तीर्थकर मोक्षधामको पगारे, पो रिपाका या वर्णन किया जाय ? कनिकालमें उस तीर्थराजके दर्शन मात्रसे हो बहुतसे प्राणी गंगारगमगे पार होंगे। मजीवो को ही उगता दर्शन होता है अभन्यको नहीं । भव्योममे भी जिन जोवोको पाप गायका गरे उनको ती तीर्थराज का दर्शन होगा । अन्यको नया नहीं होगा ॥ ३३-३४ ॥ 1iमादा अपने में भागनिमे उस तीर्थरात श्रीमम्मेदशिर का स्मरण कर। वह REE नमान का प्रयास करना है। नो भयो प्रातःकार, मल्यात काल At : ' मारनामाका नाश करता। मप्रतार निगा गतिमा - Tin 37 मोसार प्रने कहा ||३५.३'३।। * IN THE TIf 17 if iam प्रमन्ना .:: ॥ - - || - assesHDarseme [ २२६ ] चौराधिप महावीर अस्य नु केन कर्मणा । निकोते. बन्धनप्राप्तिर्जायते परमेश्वर ।। ३९ ॥ भो जिनेन्द्र दयाधीश कर्मणा केन गच्छति । जीवोसौ नरके घोरदु खसहतिसभृते ।। ४० ॥ नाके व्रजति भो नाथ केन वै शुभकर्मणा । तियचाख्य च दुर्योनि लभते केन कर्मणा ।। ४१ ।। मर्ययोनि च द्विभेदा केन प्राप्नोति कर्मणा । स्त्रिया ना भो जिनाधीश नु वामा केन कर्मणा ।। ४२ ।। क्लीवकाभिधदु कर्म भो स्वामिन् अस्य नुश्च वै। भवति कर्मणा केन अल्पायुनमिभाक् च वै ॥ ४३ ॥ दीर्घायुर्मो जिनादित्य भवेदस्यैव केन वै। कर्मणा सार्वतीर्थेश कथ भोगी ह्यय भवेत् ।। ४४ ॥ विधिना केन वीरेश चाभोगी वा सुखी दुखी । भवेदय महावीर सुबुद्धिमान् कुबुद्धिमान् ॥ ४५ ।। विद्वत्व चैत्र मूर्खत्व धैर्यत्व केन कर्मणा । लभते चैत्र भीरुत्वमयं देही जिनेश्वर ॥ ४६ ।। देहिनः सकलार्थज्ञ विद्या भवति नि फला । विधिना केन अस्यैव भवत्यर्थस्य हानिता ॥ ४७ ।। कर्मणा केन प्राप्नोति द्रव्योघ वा स्थिरत्वता । कर्मणा केन जीवन्ति पुत्रपौत्रोत्कराश्च नो॥ ४८॥ भवन्ति बहवः पुत्रा विधिना केन कर्मणा । भवत्यय दरिद्री च बहुवित्तपतिस्तथा ।। ४९ ॥ आतड्डी वा निरातड्नी भवति केन कर्मणा । जात्यधः अधकश्चैव अय जीवो दयापते ॥ ५० ॥ Dीजलसमाज माSESHesIPEHRS प्र०-हे वीर ! सर्वज्ञ ! हे दयापते ! यह जीव निगोदमें कौन पापके करनेसे जाता है ? नरकमे कौन पापके फलसे प्राप्त होता है ? तियंच कौन-कौन कार्यसे होता है। मनुष्य गतिको कौन-कौनसे कारणोसे प्राप्त करता है । स्त्रीपर्याय कौन-कौनसे कारणोंसे प्राप्त होती है। नपुंसक कौन-कौनसे कारणोसे प्राप्त होता है । इस जीवको स्वल्पायु किस कारणसे होती है और दीर्घायु किस कारणसे होती है । समस्त पदार्थोंका भोगने- वाला किस कारणसे यह जीव होता है। और अभोगी कब होता है । सुखी और दुःखी किन-किन कारणोंसे होता है । बुद्धिमान्, कुबुद्धिमान्, विद्वान्, मूर्ख, धैर्यशालो, अधैर्यवान्, भीरु, निर्भय आदि किन-किन कारणोंसे होता है ॥ ३९-४६ ॥ अर्थ---धनी, दरिद्री, पुत्रवान्, अपुत्र, दुखी, सुखो, रोगी, निरोगी, अंधक, नेत्रवान्, भाग्यशाली, भाग्यहीन, भोजनादि सामग्रीसे परिपूर्ण और शून्य गृही किन-किन कारणोंसे होता है। अर्थ--कोढ़ी, खजा, मानहीन, हीनांग, विकल, टूटा, पंगु, मूक, बधिर, कुरूपी, रूपवान् आदि किन- किन कारणोंसे यह जीव होता है । विधवा और शीलवान् किन-किन कारणोंसे जीव होता है । माहात पर --- विन्द्र --- .*र [ २२७ ] Pामान म न्यादो नो जीर्यते वीर अस्य नु. केन कर्मणा । कुष्टित्व चैव दासत्व खजत्व मानहीनता ।। ५१ ।। होनागो भवति केन विधिना टुटकस्तथा । पगुमूक. कुरूपो हि रूपसम्पत्तिभाक् तथा ॥ ५२ ॥ शरीरवेदयुक्तो वा भवति केन कर्मणा । तद्धीनो भो जिनसिंह अय देही च्युतोपम ।। ५३ ।। केन दु कर्मणा स्वामिन् अय पचेन्द्रिय. पुमान् । भवत्येकेन्द्रियो नून सर्वतत्वप्रकाशक ॥ ५४ ।। स्थिरो भवति अम्यैव मसारोय कुकर्मणा। केन तुच्छैव ससारः सार्व भो परमेश्वर ।। ५५ ॥ विधिना केन अम्येव अष्टाना कर्मणा प्रभो । ग्रन्थी सजायते वीर ग्रथितश्चैव नाशता ।। ५६ ।। केन केन प्रयोगेण बचो भवति अस्य वै । कर्म गामष्टसख्याना भो भव्यजनभाववित् ।। ५७ ।। विधिना केन वामाश्च भवन्ति विधवा. प्रभो । शीलवतप्रयुक्ताश्च नि शोला. व्रतविच्युता ॥ ५८ ॥ व भो नाप दयापते जितरिपो व सर्वदर्शी सदा । त्व सर्वज्ञ महामुनिः जितभयः त्व सवदेवाधिपः ।। ५९ ॥ मे गन्देहविनागने त्वमसि भो नान्यः क्षमो भूतले । तस्मात्त्व वद उत्तर शिवप्रद प्रश्नावले सन्मते ॥६०।। मानलिंबुमा कुना न श्रेणिकेन ने । इत्याह त प्रति वोरो भव्य त्व उत्तरान् शृणु ।। ६१ ।। मात कर्माणि पोच मगधाधिप । वध्यते तत्फल नैव एकैव भुज्यते खलु ॥ ६२ ।। । दुटामदाटी इन्द्रियान्तया । विरुवा मामाच्या गोत्र व्यसनावहा ।। ६३ ।। If I मियात्व पायाभा । पशिदेभि: गल्याभिरग जोवो नगपि ।। ६४ ।। Forमिनी मंभि | पलाया गन्देलो नाग्नि पापान हि भवेत् ।। ६५ ।। गंगार का नाम करने वाला और बीर्घ समारो किन-किन कारणोमे होता है । या नहमने प्रश्नाको गित महाराजने वीर प्रभुसे किये और कहा कि हे सर्वज्ञ ! हे Fair trifi मेगनर नही होगा, उमनिये नमन जीपी उपहारा समाधान तोजिये । - Fam| पने प्रश्नोता तर गावरान होकर भरण कर ||४७-६१।। ५' र ! गाम पनि नमते कारण। पर आने गमागम भागने MITTी गानोगता ॥ १२॥ : ::, .:.: .., 11 मानार EMIT, ... ! 17 TH :::R, IT. THE र रगगे -:: :: :: : १९३.६॥ 1 a- . - ' . ५ । - M । AN १ [ २२८ ] LAMA पशून् हन्ति च यो मयों मास भक्षति वाधम. | अलीक च वदत्येव मधु मद्य पिवत्यहा ।। ६६ ॥ अक्लामपरमर्त्यस्य चचत्येव सुसुन्दरा । दृष्ट्वा प्रयोगमन्त्राद्यैरन्योपायोत्करैस्तथा ।। ६७ ।। जिनधर्म च सिद्धात सद्गुरु गुणमण्डित । सघ चतुर्विध चैव जिनधर्मोपदेशकम् ॥ ६८ ।। हरत्येव परस्व च कौटिल्यादिकुकर्मभि. । आशक्तीत्येव ग्रथस्य वर्द्धने भवति सदा ॥ ६९ ।। यज्ञादौ नैव पापोस्ति जीवाना मारणस्य वै । एव ब्रुवति रात्रौ च भोजनस्यैव भक्षणे ॥ ७० ॥ इत्यादीनि कुकर्माणि करोति सैव निश्चयात् । एकादिसप्तश्वभ्रेपु बजत्येव नरेश्वर ।। ७१ ।। घोर घोर च दुखीघ तत्र सुचेलनाप्रिय । भुक्त्येव सैव एकाकी घोरपापोदयात्खलु ।। ७२ ।। कियत्प्रमा जिनाधीश तत्र दु.खोत्करा प्रभो । शृणु तेषा च भो सख्या सक्षेपात् वच्म्यह नृप ।। ७३ ॥ अथवा मिथ्यात्वकी तीव्रतासे सात व्यसनोका सेवन करना परिणामोमे तीन कषायका रखना सो भी निगोदके आस्रवका कारण है । अर्थ-हे राजन् ! नरक गतिके आस्रवोंको सुनो। पशुओंका वध करना, मांस भक्षण करना, झूठ बोलना, मधुका सेवन करना, मदिरापान करना, दूसरोंको सुन्दर स्त्रियोको मन्त्रादि अथवा किसी भी प्रयोगके द्वारा ठगना, जिनधर्म, जिनसिद्धांत, जिनगुरु, चतुर्विध संघ और जिनधर्मोपदेशोंकी निन्दा करना, अवर्णवाद लगाना उनके विषयमें मलिन चितवन करना आदि सब नरक आयु बन्धके कारण है ॥ ६६-६८ ॥ अर्थ--दूसरोंका धन हरण करना, कुटिल परिणाम रखना, परिग्रहका तीव्रतर ममत्व परिणाम रखना, यज्ञमें जीवोंका हवन करना अथवा ऐसा मिथ्या प्रचार कर जनताको पापके मार्गमे लगाना, जीवोंके वधमे पाप नहीं बतलाना, जीवहिंसामें धर्म मानना, रात्रिमे भोजन करना इत्यादिक कुकर्मोंसे जीव एक से लेकर सात नरकोंमे जाता है । योनियों में जाता है । जिनधर्म, जिनायतन, जिनगुरु, जिनसंघमें मिथ्या अवर्णवाद लगानेसे और मिथ्यात्वकी तीव्रतासे जीव नरकमें जाता है ॥ ६९-७१॥ अर्थ--हे राजन् ! जीव पापके कारण नरकमें घोर-घोर दुःखोंको अकेला ही भोगता है ।। ७२ ॥ अर्थ--वहाँ कितने प्रकारके दुःख है ? इस प्रकारका प्रश्न सुनकर वीरप्रभुने कहा कि हे श्रेणिक ! नरकमें इस जीवको पाँच करोड़ अड़सठ लाख पाँचसौ चौरासी प्रकारका दुःख प्राप्त होता है। यह एक सामान्य HermaneHISHESHA Leeswegsmagumagalawegmeumpampament नट म For ना [ २२९ ] TATARAJASTHAN वेदाण्टी च शतानि पञ्च भवति अङ्कसहस्राणि वे । अष्टतु प्रमलक्षकाश्च नृपते पचैव कोटयस्तथा ।।७४|| त्वं जानीहि नगप्रमेषु सकलश्वभ्रेपु दु खोत्कराः । नानाशर्मविधायका भयप्रदा एतावता निश्चयात् ।।७५।। श्रीजिनाधिपविवाना पञ्चामृतरसोत्करे. । स्नानकर्ता तथवेज्याकर्ता च मृदुभावयुक् ।। ७६॥ दयाभावेन सयुक्तो द्वादगवतपालक. चतुर्धादानकर्ता गुरुसेवापरायणः ।। ७७ ॥ मन्दकपायसपत्त परदोपपरान्मुख । स्ववामारक्तवृद्धिश्च पररामाविरक्तधीः ।। ७८ ।। इन्यादिशुभभावाढ्यो यः पुमान् सैव निश्चयात् । नाकलोक लभत्येव सदा शर्मविभूपितं ।। ७९ ।। कार्यार्थ मेवते मित्र कृत्वा कार्य पुनश्च तं । त्यजत्येव नराधीश जिनधर्मपराड्मुख. ।। ८० ।। विश्रुनो दुनञ्चेव परनिन्दनचातुरः । दुर्मतेः पोषक क्रूरः रात्री भक्षी च निर्दयी ॥ ८१ ।। एन. पुनपो मृत्वा जायते दुष्टभावयुक् । तियंचयोनिपु नून सदाशर्माकरेषु च ।। ८२ ॥ राम को को न निर्लोभी मार्दवार्जवभावयुक् । स्वल्पनिद्राश्न निर्दम्भी स्वात्मनिन्दापरायणः ।। ८३ ।। प्रकारमे दुलोका कयन हे वास्तविकमें सभी नरकोमें पर्वत प्रमाण नाना दुःख हैं जो निरन्तर भय उत्पन्न करने ऐमा निरनयने जानो ।। ७३-७५ ।। ti- राजन् ! जो भव्यजीव श्रीजिनेन्द्र भगवान के प्रतिविबोका पञ्चामृतरससे भक्तिपूर्वक स्नान "रना पकार पूता अन्दरपसे करता है, मृदुभावोको धारण करता है, दयाभावका पालन, बारह TE Tinा परिपार ग, नार प्रकारले बानीका प्रदान करना, गुरुसेवा करना, स्वदार सन्तोष व्रत का पालन रा, पोता; मग या इत्यादिक अनेक गभ कारणोने स्वर्ग मुगोलो प्राप्ति होती है । वहां सदा सुरा नारे॥१.१२ ।। ::--Trai नामानार के परिणामाने होता है। तो अनुष मतता लिये . .. और ती नेर गाल दो। तो गा मामाचार भागोमे १. प्रा. रो रो, को, म मा सो, गा r । प है , + y है" ':: ::TiTam [ २३० ] भण्डरागस्य He-SHESHPAwes मयों हि चेदृशो भूप मृत्वा मत्यैव शुद्वधीः । भवति नात्र सन्देह परजन्मनि निश्चयात् ॥ ८४ ।। सदा सन्तोपसयुक्ता स्वपते. भक्तितत्वरा । सुशीला क्रोधसहीना विमाना दम्भवजिता ।। ८५ ॥ साहसधारका नम्रा शुचित्वगुणसयुता । जिनभक्तिकरा नित्य दानेज्यावततत्परा ॥ ८६ ॥ नि कपटा निरालस्या आर्जवामृतपानका । स्थिरचित्ता च सत्यैव भाषिणी परपोपणी । ८७ ।। स्वल्पाहारकरा स्वल्पनिद्रा सयमपालका । कामदेवस्य क्रीडासु स्वल्पचित्तस्य धारका ।। ८८ ।। इत्यादिगुणसपन्ना भवेन्नार्यत्र भूपते । ईदृशायाः सुवामाया. पुरुषो भवति निश्चयात् ।। ८९ ।। मायाकपटमपन्नः अतिचञ्चलभावयुक् । कामसेवासुस रक्तः अत्यन्तरधी. ह्यधीः ।। ९० ।। गायने अत्यन्तचञ्चलस्तथा । नेत्रविकारसपन्नः तथैव कामभावयुक् ।। ९१ ।। महामानी सदालस्यो बह्वारभस्य धारक. । बहुनिद्रारतोशुद्धः निन्दापैशून्यतत्पर ।। ९२ ॥ को लेनेवाला, निर्दम्भी, अपने पापकर्मोकी निन्दा करनेवाला, पापोसे डरनेवाला, जिनधर्मका सेवन करनेवाला ऐसा शुद्ध बुद्धिवाला जीव परभवमें मनुष्य बंधको प्राप्त होता है । इसमें सन्देह नही ।। ८३-८४ ॥ अर्थ-हे राजन् ! स्त्री पर्यायको छोड़कर पुरुष पर्याय ( स्त्रीलिंगका छेदन ) कौन-कौनसे पुण्यकर्मसे प्राप्त होती है सो बतलाते है। अर्थ-जो स्त्री सन्तोषसे रहती है अपने ही स्वामीकी भक्ति पूजामे अपना धर्म समझती है । शीलवत को ही मुख्य धर्म समझ कर पालन करती है। क्रोध, मान, माया आदि विकारोंकी भावना नहीं करती है । नम्र-पवित्रताको धारण करनेवाली जिनभक्तिमें तत्पर, जिनधर्म परायण दान पूजादि पुण्यकार्यो में सावधान, सरल परिणामोंको रखनेवाली, मायाचार रहित शुद्ध चित्तसे कार्य करनेवाली, स्वल्प आहार करनेवाली, व्रत संयम आदिको भावभक्तिसे पालन करनेवाली, विषयोंसे विशेष गृद्धता नहीं रखनेवाली इत्यादि सुन्दर कृत्योंको करनेवाली गुणवान स्त्री अपने स्त्रीलिंगको छेदन कर पुरुष लिंगको प्राप्त होती है ॥ ८५-८९ ॥ हे राजन् ! पुरुष पर्यायसे निंद्य स्त्री पर्याय किस प्रकार होती है सो सुनो। अर्थ-जो पुरुष मायाचारी है, अतिशय चपल है, सदैव कामक्रीडामे मग्न रहता है, अत्यन्त क्रूर है, पापोंका ही सदैव संचय करनेवाला है, भण्डरागोंको गानेवाला है, अत्यन्त चञ्चल है, दूसरोंके शील भ्रष्ट करने मे ही अपनेको धन्य समझता है, जो इसीलिये अभिमानी बनता है, सदा आलसी है, बहुत आरम्भका करने- न्याच्या सायर Her er मायायामरा more » कसाब आनियाई खास्यास < --- जमरण .. 4 - [ २३१ ] कियाकर्मविहीनश्च निर्दयी निस्त्रपी तथा। वह्वालापी तथा हीनो विनयेन नरेश्वर ।। ९३ ॥ कन्यापि नैव विश्वास करोति साधुनिंदक: । वंचकः स्वजनाना च साधूना परदोपदः ।। ९४ ।। त्यादिगुणमपन्नो मृत्वा मोपि निश्चयात् । परजन्मनि निंद्या च स्त्र्येव भवति सद्बुधै ॥ ९५ ।। वृपाश्च महिप छाग माहेयी चक्रमेलक । मातगं च खर श्वान स्त्रिय मत्यं च वालकम् ।। ९६ ।। लोहगाम्यं च मवृत्वा पावकेभ्यो नगधम् । इत्यादीना च जीवाना अङ्कयते च निर्दय ॥९७ ।। छेदानि तया नेपा कणं ना नामिता खल । वधं वा वचन चैत्र अन्नपानादिरोधन ||१००|| कगति मेव प्राप्नोति नपुसकत्व दुग्वद । कर्मोय भूप सर्वेषु निन्दनीय च कर्मम् ॥ १ ॥ अलन् न पो गौघान् तित्तगन् च हरीन् मृगान् । काकोदरान् तथाकोशान् नीलकण्ठान् खगेश्वरान् ॥२।। गतान् हगान् व काठचे व ध्रियन यो नृा कुधो.। इत्यादीन् जीवमन्दोहान् काष्टादिपजरेपु च ॥ ३ ।। पाला, बहन नोने वाला है, निन्दा और चुगली करनेवाला, भण्ड वचनोंका बोलनेवाला, विनय रहित है, जिया तमंगे कामोन्मादक गान को करनेवाला, नेत्र विकार और शरीरसे कुचेष्टा करनेवाला, दूसरोसे द्रोहको करने- चला, रोठ आचरणीको लोन देनेवाला, नोच आचरणोका पालन करनेवाला, निर्लज्ज, निर्दयी, निंदक, साधु परतीमें गनियाना, गलागेको भी निंदा करनेवाला, सत्यका लोप करनेवाला, किसीका भी विश्वास गों को और पापमार्ग को प्रकट करने वाला मनुष्य मर कर परजन्ममें स्त्री पर्याय (स्त्रीलिंग) को प्राप्त राजाराम साच्या Aak ए T .. - - - . म + ---- माल ! 17 जी नगर कौन-कोन कारणोगे होता है । मुनो जो मनुष्य कामको ": "Timiri , डा, भंग, नाग, हायरी, गहा, ता, स्लो, बालक, वृद्ध, r:.in - यार सम्मो नारा काटे । या लिग आदि गा ' नामें दुर्गा की पोरन करने जागर र ररे, गा, नमो निमं करे मोर भो ::FIT :: 'ग' । ' : . . - . , 1 . न 8 । .
मनसा राज्यमन्त्रालय [ २३२ ] आजन्माऽत्ययपर्यंत सा खलु वदिदुःगृहे । स्थितिं करोति दु खौघ भुजन् वाचामगोचर ।। ४ ।। निर्दयेनोच्चैः अदयापरिणामयुक् । मारयत्येव जीवान् वै छागपारावतादिकान् ।। ५ ॥ निर्दय तु च दृष्ट्वा वै कोप्येव ब्रुवते पुमान् । दयालकृतसद्गात्रः त प्रति जीवरक्षक.।। ६ ।। नत्वेव ते च कतु वै युक्त जीवस्य घातक । मा गच्छ दुर्गति मूढ श्रुत्वेत्थमाह दुष्टधी. ।। ७ ॥ जीवाना मारणे नैव पापोत्पत्ति. पुमान् खलु । न्यादाथं च कृताः सर्वे स्वयभुवा इमेस्य नु. ॥ ८ ॥ परलोकश्च नास्त्येव नैव धर्म. तथा ह्यघ. । एव धृत्वा हृदि स्वस्य यो मर्यो दुष्टभावयुक् ॥ ९ ॥ सक्लिष्टैनिर्दयैश्चैव सार्द्ध कुपुरुष सदा । करोति चैव व्यापार कुकर्मणश्च दुःखद ॥ १० ॥ सोल्पायुर्भवत्येव इत्थ कुकर्मणोदयात् । सदा कालेन सन्देहो नास्त्येव चेलनाप्रिय ॥ ११ ॥ स्वय नैव कदाप्येव मारयत्येव प्राणिन । मार्यमाण च सदृष्ट्वा केनचित् पुरुषेण वै ॥ १२ ॥ मोचापयति त नून दयाभावेन मण्डित. । सनुष्टोभयदानेषु परघातनिवारक. ॥ १३ ॥ अर्थ--जो मनुष्य कबूतर, तीतर, हरिण, मृग, काकोदर, कोश (पक्षी) नीलकण्ठ, गरुड़, सूआ, हंस, बगला आदि पशु-पक्षियोंको पकड़ कर काठके पिंजरोमे बंद करता है, आजन्म उनकी स्वतंत्रताका हरण करता, उनको इच्छाका व्याघात करता है । जो मनमें सदैव निर्दयभाव रखता है, दयाभावोको जानता ही नही ( जो किसी भी प्राणीको सुखी नही देखना चाहता) है । जो सदैव बकरादि जीवोका वध करता है, जो कबूतर आदि जीवोंको पकड़नेमे मारनेमे दत्तचित्त रहता है । जिसके परिणामोंमे निर्दयपनेको सदैव वासना बनी रहती हो। जिसको दयाका उपदेश कटुक मालूम होता हो और जीवहिंसा करनेके समय धर्मात्माके रोकने पर जिसके परिणामोंमें क्रूरता प्रकट होती है । जो जोवोंके बधमें पापोत्पत्ति नही मानता हो। जो जीवं जीवस्य भक्षणं कहकर जोवोंके भक्षण करने में धर्म मानता हो । जिसे परलोकका भय नही हो और जो परलोकको मानता भी हो । जिसके परिणाम सदैव दुष्ट रहते हो । जो सदैव संक्लेश परिणामोसे रहता हो। और ऐसे ही दुष्ट पुरुषोंको सगतिमें रहता हो । जो सदैव कुकर्मका व्यापार करता हो । इत्यादि कुत्सित कर्म करनेवाले जीवोंकी स्वल्पायु होती है । निगोद आदि पर्यायमें स्वल्पायुकी पूर्ति वे जीव करते है ॥ २-११ ॥ अर्थ--हे राजन् ! जो किसी भी जीवको स्वतः नहीं मारता है न दूसरोसे मारनेके लिये वचनसे कहता है और न ऐसी अनुमोदना ही करता है । जो दयालु, दूसरो द्वारा जीवोंके वधको देखकर दयाभावसे उस जीव- -aunाच्या न SyeesHERE स्या 1.-. ... घाटा -~-रे सा 1 सो शिर ी तीx nnn: जीत्र करते हैं । २-२२ ? मर- र सन् AND- . कि ज्या HETAKजयराम [ २३३ ] परगर्मपु सन्तुष्टः पग्दु खेषु दुखभाक् । जीवम्य रक्षणे चैव सदा काले च सन्मति ॥ १४ ॥ ईदगम्य नरम्यैव भो भवत्येव निश्चयात् । दीर्घायु. सर्वकाले च मृदुभावोदयाच्छुभ ॥ १५ ॥ आप्येव वित्तमन्दोह म पुनर्न ददात्यहो । आहाराख्य च सद्दानं पात्राय योहि मानवः ।। १६ ।। कदापि लोकलज्जाया वगादेव ददात्यहो । दान पात्राय तहिचेत् दत्ते हि स्वस्य मानसे ।। १७ ।। पश्चात्ताप कगेत्येव वृथा दत्तो हि हा मया । अस्मै दान च मे स्वस्य व्ययो जातोऽद्य किं कृत ।। १८ ॥ दोयमाने महादाने अन्येपा वर्जयत्यहो । किमर्थ कुरुय लोका: व्ययो द्रव्योत्करस्य च ।। १९ ।। पभिः कुकर्मभिर्मृत्वा मेर भो मगधेश्वर । भवति जितो भोगे सदा दुखेकभाजन ॥ २० ॥ गवना मुनीन्द्राणा 'फर तृणादिकैः शुभे । शयनोपकरणेरे भ वैयावृत्यमुपालक ॥ २१ ॥ को मारनेसे बचाता है। जो सदेव दयाभावसे अपने अतःकरणको आर्द्र रखता है, जो जीवोके अभयदानमे संतोष मानता है, तो दूसरे जीयोके घातको रोकता है, जो दूसरोको सुखी देखकर प्रसन्न होता है, जो दूसरोको दुःखी पर नगी होता है, जो जीयोको रक्षा करने में सदैव प्रयत्नशील बना रहता है ऐसे दयालु भव्यात्माको बायको प्राप्ति होती है। जो मदु भावोसे दया करता है वह भी दीर्घायुको प्राप्त करता है ॥ १२-१५ ।। --नागर्गहन कोन कोनसे पापोमे होता है सो बताते हैं। -गानी मनुष्य कन्यको यथेष्ट शक्ति रणनेपर भी लोभ परिणामोमे मुनिगणादि चतुर्विध Finm} रानी पार करता है । न पामें दान प्रदान करने को कमि करता है । कदाचित् लोक लाज 't frTET मोर IT निकाय ना भो परे तो पामे पश्चात्तापतो पाप्त होकर विचार करता है . Rो गिनने मेग तनाय “यय हो गया। यह गां व्यर्थ हो गया । इम ':.TINETRI | गुम लोग पकायो नटाने को, रातो पिचार कगे । इस प्रकार मन- ... t 1 inा गेलो नाति पुगोला मेमन नही करता है। ;"TTERTTIT; || १६.२० ॥ न - T , . + -. - [ २३४ ] सदा जमान्यायमचायranaari वैवावृतर करोत्येव तथा पादम्य धोवन । तेपा सद्गुणसयुक्त स्तवन पापनागक ॥ २२ ॥ पिच्छिका सर्वभूताना रक्षका गुणमण्डिता। यो ददात्येव कुण्डी च शौचकार्याय शोभन ॥ २३ ॥ आपिकाये तथा वस्त्र शुभ्र च ब्रह्मचारिणा । गृहस्थाय तथा तेपा वामाये भूपण तथा ।। २४ ।। जाहागदिचतुर्दान शर्मप्रदायक । अतिहर्पण । अतिहण सयुक्तो मृदुभावविमण्डितः ।। २५ ।। सेव भो मगवाधीश नानाशर्मोत्कर सदा । परजन्मनि तत्पुण्यात् भुनक्ति नात्र संशय. ।। २६ ।। त्रयाणा देवसिद्धातगुरूणा कटुकाक्षर | कदापि नो वदत्येव तथा विनयवान् महान् ।। २७ ।। गातचित्तेन सयुक्त. सदा काले हि धर्मवान् । बालकादिकवृद्धेपु यथाविनयकारक.॥ २८॥ प्रश्न-~-नाना प्रकारके सुखोंको प्रदान करने वाले भोग कौन-कौनसे कारणोंसे प्राप्त होते है ? अर्थ-हे राजन् ! जो भव्य जीव लकड़ेका फलक तृणादिकोंके विविध आसन आदि वस्तुओंको मुनि- गणोंके शयनार्थ रखता है और उसके द्वारा भाव-भक्तिसे मुनिगणोंकी वैयावृत्य करता है। इसी प्रकार उनके निवासार्थ वसतिका, गुहा, मठ आदि बनाकर वैयावृत्यका लाभ लेता है । तथा जो मुनिगणोंके पादकमलोंका धोना, सेवा सुश्रूषाका करना, स्तोत्रादिके द्वारा उनके गुणोंमें मुग्ध होना आदि विशुद्ध भावोंसे करता है। जीवोंकी रक्षाके लिये पीछी देता है, शौच रक्षाके लिये कमंडलु देता है, आर्यिकाओंको वस्त्र देता है, ब्रह्मचा- रियोके लिये वस्त्रादि देता है, गृहस्थोंके लिये भी वस्त्रादि भूषण प्रदान कर वात्सल्य अंगको प्रकट करता है, इस प्रकार चारो प्रकारका दान चार संघको अत्यंत हर्षभावसे देता है और अपने परिणामोंको सदैव कोमल रखता है वह अनन्त भोगोको भोगनेवाला होता है ॥ २१-२५ ॥ अर्थ-इस प्रकार चार संघको चार प्रकारका दान प्रदान करनेवाले भव्य जीवोके सातिशय पुण्यकी प्राप्ति होती है और वह पुण्यके प्रभावसे पर जन्ममे अनुपम सुखोंको प्राप्त होता है । इसमे संशय नहीं ॥२६॥ प्रश्न--यह जीव सुखसम्पन्न कौन-कौनसे कारणोंसे होता है ? अर्थ--हे राजन् ! जो भव्य जीव देव, शास्त्र, गुरुओकी अंतःकरणके भावोसे श्रद्धा रखकर सदैव उनको पूज्य और हित प्रदाता मानता, अतएव उनके प्रति एक भी कटुक अक्षर नहीं बोलता, महान् विनय और नन भावोसे रहता है, सदैव शांतचित्त रहता और वृद्ध-बालक मुनिगणोंकी भी विनय भाव रूपसे पूर्ण SA SCHE Segmenampun जEL याला मान्सर, . अापर जन सि एक भानाम बा - रत बनाना --- [ २३५ ] ईदृशो मानवो मृत्वा महाशर्मी भवत्यहो । परभवे नराधीश परशर्मस्य कारणात् ॥ २९ ॥ तपस्विना मुनीन्द्राणा धर्मस्थाना करोति यः। निन्दा वा पिशुन चैव प्रत्यक्षाद्वा परोक्षतः॥ ३० ।। निर्गुणो चैव गविष्टो मायावी अतिक्रूरधीः । जिनसिद्धातवाक्यानामुत्थापकश्च पापधी. ॥ ३१ ॥ महदभी च भो भूप इत्यादिगुणसभृतः । य. पुमान् सैव मृत्वा च महादु खी भवत्यहो ॥ ३२ ॥ परमदु बमयोगात् कृत्वा पापस्य सचय । पुनर्यात्येव दुखावधौ अहस्य चेदृश फलम् ॥ ३३ ॥ प्रातःकाले ममुत्याय तल्पात् यो हि नरेश्वर । कृत्वा सामायिक चैव जाप्य वा परमेष्ठिनः ॥ ३४ ॥ जयमालमस्या सेवा करता । ऐसे शुभ कार्योंसे जीव मरकर अगले भवमें परमसुखी होता है । सर्व प्रकारके सुखोंसे सम्पन्न होता है ॥ २७-२९॥ प्रश्न---अतिशय दुःरा किन-किन कारणोसे उत्पन्न होते हैं । अथवा अत्यन्त दुखिया कौनसे कारणसे होते हैं। -- गान् । तपाबी, मुनि आदि धर्मस्थापकोकी निदा करना, उनमे मिथ्या दोपोका लगाना, जनतामें Tihar जो गिगने पयल करना, उनके विषय में जूठो-झूठी पिशुनता कर बड़े-बडे श्रीमानोको धर्म भावना- मे गिना। प्रपदापोर परोदा नपरो अवहेलना करना, स्वय निर्गुण होकर भी अपना मिथ्या गर्वका साहस HTTना, गायनाराट असना मतलब बनाना, अत्यन्त कुर और कुटिल परिणाम राना। जैन for: मानना, न गिलात रलोको विपनगेन जयंकर धर्मको पवित्रताका नाश करना। ना र महान भी नगर, जेन फेलार, अपना नामानित स्वार्थ निःकरना न्यावि 1TB मर गयो गोता: ।। ३०.३२ ॥ --"" . . . . तो सार या बात है। और उन : : मेरी . । निरमा नमार गो- A FF क ३ 11 - + . T --- प । . F है om है १ . । . . -:" - ... ' ! पोरा।
[ २३६ ] पश्चादादाय स्वर्णादिभाजने बहुमोदतः । वसुद्रव्योत्कर शुद्धमभिपेकविधि तथा ॥ ३५ ॥ जिनवेश्मनि सगत्य तत्र श्रीमज्जिनेश्वरान् । सपूज्य परया भक्त्या सदसि आगमस्य च ॥ ३६ ।। आगत्य गुरुवक्त्राद्धि शास्त्र सिद्धातसूचक । शृणोति वा पठत्येव चिंतयत्येव स्वहृदि ॥ ३७॥ पाठयत्येव अन्येपा ददात्येवानिश मुदा । सद्धर्मोपदेश च गात्रस्थाहविनाशक ।। ३८॥ एव कृत्वा पुनाद करोत्येव सदा नरः । मो मृत्वा च भवत्येव सुमेधावी न संशयः ॥ ३९ ॥ तपोज्ञानादिमभेद नैव जानाति यः पुमान् । वा त्रयाणा करोत्येवाविनयं नैव मन्यते ।। ४० ।। यस्य हृदि विचारोहि नास्त्येव किमपि नृप । त्रिपंचाशत्क्रियाणा च मुनिधर्मस्य वा खलु ॥ ४१ ।। ईदृशोहि मनुष्यश्च मृत्वा भवति निश्चयात् । परजन्मनि निर्धर्मात् बुद्धिहीनो हि सैव भो॥ ४२ ॥ तत्रापि अविवेकत्वात् करोत्येव सदा ह्यघ । नदहादपि यात्येव दुर्गतौ च सदा नृप ॥ ४३ ॥ ज्याला फिर सोने, चाँदी आदिके पात्रमें अभिषेक और पूजनकी सामग्रीसे श्रीजिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाका अत्यन्त हर्षसे अभिषेक करता है, पूजा करता है । सभामें शास्त्रपूजा कर गुरुके मुखकमलसे शास्त्रोंका श्रवण करता है। पठन करता है, चितवन और उपदेश करता है और रात्रि दिवस जिनागमकी प्रभावनामें ही अपना जीवन पूर्ण करता है वह मनुष्य मरकर बहुज्ञानी होता है इसमें संशय नहीं ॥ ३४-३९ ॥ प्रश्न--मनुष्य बुद्धिहीन कौन-कौनसे कारणोसे होता है ? अर्थ--हे राजन् ! जिसको तप, ज्ञान, चारित्र आदिका भेद विज्ञान बिलकुल नहीं है अथवा तप, ज्ञान, चारित्र आदि महान् गुणोंको धारण करनेवालोंकी श्रद्धा नहीं है। इसीलिये ज्ञान, तप, चारित्र व उनके धारकोंका विनय नहीं करता और विनय करनेके भाव नही रखता अथवा मनमे मलिन विचारोंको रखता है। त्रेपन क्रियाओंका या मुनि धर्मका विचार नहीं करता है, जैन सिद्धांतोंका विपरीत अर्थ करता है, काल दोषा- दिकसे अध्ययन करता है वह धर्मसे रहित होनेसे परभवमें बुद्धिहीन होता है ॥ ४०-४२ ॥ प्रश्न--दुर्गति कौनसे पापोसे होती है ? अर्थ--हे राजन् ! वह अविवेकी होनेसे सदा पाप करता है और पापके फलसे सदा जीव दुर्गतिमें गमन करता है ॥ ४३ ॥ LING HESHe masalalam te [ २३७ ] न्याचा गम्णा भावित करनेत्र गो जानाति सदा हृदि । जिनेन्द्रोक्त न सद्धर्म सदा शर्मप्रद शुभम् ।। ४४ ।। है। त्वजनि बन्योचमुपादेय च मोक्षदम् । स्वीकरोत्येव पापाना नाशक धर्मवकम् ।। ४५ ।। ग ना तद्भवे भावा गर्मपक्ति मुग्नप्रदाम् । ततो मृत्वा भवत्येव महान् विद्वान् गुगाकर ॥ ४६ ।। राग कि महावीर विदुपो द्वादशागबित् । श्रेणिक त्व हि भो विद्धि एतत्तस्यैव लक्षणम् ।। ४७ ।। कोण जीवोवान् निर्दयी मारयत्यहो । मारयित्वा पुनम्तेपा पल भक्षति योऽधम || ४८।। गेनि पान न अधर्मपोषण तया । फि तम्य शास्त्रपाठेन प्रयोजनमघाकरम् ।। ४२ ।। FA में न असमय नगधिप । मोवर्मोहि भवत्येव चाडाल परजन्मनि ॥ ५० ॥ प्रदन-महान विद्वान् कोन-कोनसे कारणोसे होता है ? अर्थ- गजन । अपने हृदय में पवित्र भावोसे गुरुभक्तिको धारण करता है, शुभ सदा सुखदायक मोनियमको मन, वचन, कायकी विशदिसे धारण करता है, त्याग करने योग्य वस्तुओको अनात्मस्वरूप माना और उपादेय बस्तुओ को आत्मस्वरूप मानकर ग्रहण करता है, पापक्रियाओका परित्याग THIोर पालिका पनि जानरणों का पालन करता है इत्यादि शुभ कार्योसे यह जीव मरकर महान् विद्वान् MEET 77|| ११.१६ ॥ .::----HTTTTTTT है ? .--..गन । नतो जानना है तदनुसार भाव श्रुतको धारण करता है वह विद्वान् - . - , 4 mart । . 41.1:: 71"नो रोने ताना? ITE :- nोमाग को मारता। और मार उनका मांग 11 गोTTPTE समानाराम मोर पभिचारा प: TET ! गर्म नारगन में । है . . . . । . . - . 4 . , - २ ::miriiTETTET "; .:. :: .. ri II amiPो य - . 4 ।
[ २३८ ] SHRSHIPAHESH रापमा तित्तर कुकट श्वान शूकर च मृगाधिपम् । व्याघ्र वा मर्कट नाग मृग कोक परिमतम् ।। ५१ ।। शुकादिजीवजातीना दृढपासेन योऽधम । गृहीत्वा च गृहे स्वस्य आदाय तान् पुनः नृप ।। ॥ ५२ ॥ दृढैव रज्जुना तत्र वधयित्वा च दुष्टधी खलु । रक्षति सैव मृत्वा च भीरुको भवति सदा ॥ ५३ ।। मनमा वचसा चैव कायेन प्राणिना नृप । न करोत्येव त्रास हि सर्वेण मृदुभावयुक् ।। ५४ ।। कारापयति नो नून नानुमोदयति कदा । अन्यायवित्ततश्चैव मुक्तधी परपोपकः ॥ ५५ ॥ ईदृशोसी नृप मृत्वा सदेत्र निर्भय खलु । भवति नात्र सदेह परदु खस्य मोचनात् ।। ५६ ॥ विद्यालोभेन पूर्वं च कृत्वा यो विनय गुरो । विद्या गृह्णाति वा मन्त्र विवेकादिकसत्फलाम् ।। ५७ ।। पश्चात् पूर्णे च याते हि मन्यते नैव स्वगुगे । मया भाग्यात्समापन्ना सर्वा विद्यादिसत्फला ॥ ५८ ।। तस्य मर्त्यस्य भो भूप परजन्मनि वात्र च । कला च सकला विद्या निष्फला भवति खलु ॥ ५९ ।। प्रश्न--भीरु-भयवान् कौनसे कारणोसे होता है ? अर्थ-हे राजन् ! तीतर, कुत्ता, मुर्गा, शूकर, सिंह व्याघ्र, बंदर, सर्प, मृग, कबूतर, सूआ (तोता) आदि जीवोंको पकड़कर अपने घर लाकर जो दृढ बन्धनोमें रखता है वह मरकर भीरु होता है ॥ ५१-५३॥ भावार्थ--ऐसे पशु जो मनुष्योंके उपयोगी नहीं है जैसे व्याघ्र, सिंह, सर्प आदि और पक्षिगणोंको जाल द्वारा पकड़कर मौज शौकके लिये दृढ बाँधकर रखनेमें बडा भारी पाप है। प्रश्न-निर्भय मनुष्य कौनसे कारणोसे होता है ? अर्थ-हे राजन् ! मन, वचन, कायसे जो कभी भी किसी जीवको कष्ट नहीं देता है, न दूसरोंसे दिलवाता है और न ऐसी अनुमोदना करता है, जिससे दूसरोको कष्ट हो, जो अन्यायके कार्योंका परित्याग करता है, जो दूसरोंका परिपालन करता है वह निर्भय होता है । ५४-५६ ॥ प्रश्न--किसकी विद्याएँ निष्फल होती है । अर्थ-हे राजन् ! जो विद्या लाभको प्राप्तिके लोभसे विद्या ग्रहण करते समय प्रथम तो गुरुका विनय, सेवा, सुश्रूषा करता हो, उपकारी मानता हो, परन्तु विद्या सम्पादन हो जानेके बाद कहे कि यह विद्या तो मेरे भाग्यसे मिली है, इसमें गुरुने क्या कर दिया। इत्यादिक कार्योसे जो गुरुके उपकारको भूलकर कृतघ्नी हो, उस मनुष्यकी समस्त विद्या कला निश्चयसे इस भव न परभवमे निष्फल होती हे ॥ ५७-५९ ।। HOSHIARPामा wwwsambellusaluse seisoen PSIHSH- -- पारा मानता रा, परन्तु चिर सन्वाचन हो जालेके यार मरे कि थरिया सो भर आराम मिग्र २३, मगर र पर zिar रात्रश्न --- 1- - ---- यस्यमय [ २३९ ] अन्येव विनयेनेव वित्तश द्वेन स्वगुरोः । करोति विनय भूप वेयावृत्य च सर्वदा ॥६० ॥ तद्गणान् मन्यते चित्ते करोति तस्य कोर्तनम् । आगते सन्मुखे गीतमभ्युत्थानादिसत्क्रियाम् ॥ ६१ ।। एवं गृहानि नो विद्या मेव भोक्ता भवत्यहो । विद्याफलस्य अत्रैव परत्रापि पुनर्भवेत् ।। ६२ ।। परेषा यो हरत्येव कौटिल्यादि कुकर्मभि । द्रव्य तस्यैव वित्तरच ह्रियतेऽन्यैश्च मानुजै ।। ६३ ।। नो हरति कदाप्येव परकीय न य. पुमान् । गृहे तस्यैव द्रव्यस्य संचयो भवति सदा ॥ ६४ ॥ नाग कदापि नो म्याद्वि वित्तस्य परजन्मनि । मगधेश भवत्येव एव गुभोदयात् खलु ।। ६५ ॥ क्या येव यो मर्त्य पूर्वमेव नरेश्वर । वस्त्र वस्तु तथा द्रव्य त्वा दास्यामि मनोहरं ।। ६६ ।। प्रश्न-विद्या सफल किसकी होती है ? अर्थ--हे राजन् । जो चित्तको शुद्विसे गुरुका विनय करता है, वयावृत्य सेवा, सुश्रूषा आदि करने में formपट भागोमे तहार रहता है, जो परोक्ष परोक्ष या प्रत्यक्ष गुरुको बडा मानता है, उपकारी समझता है उनका सोतन, स्तन करता है उनके सामने आनेपर शोघ्र उठकर सन्मान आदि प्रकट करता है वह ही विद्याके उनमकता भोता होता है तथा विग्राले फलको इह-परलोकमें प्राप्त करता है ॥ ६०-६२ ॥ प.7~~-गिता न अपहरण होता है ? - गान् ! तो माय टिन परिणामोसे और विश्वासघातसे दुमरोके धनका अपहरण करता मन यो माग अपहरण होता है ॥ ६३ ।। १:--नो नासोहोना ? -- .:: नगे। 17ी करता है, न रुटिन भागोगे माया- ::::मिरानो मगो ITET नारे, मो नका | it गरी ॥११॥ m -- है , ५ more 4 . . , . 1 . ग 1 + है 1 . १ . 8 : i '. It irani ; "t, ET *: Trant .
[ २४० ] -SITESH घृत्वा लोभ हृदि पश्चात् नो ददात्येव त च ताम् । आशाभग करोत्येव सर्वपापस्य दायकम् ।। ६७ ॥ तद्धि पापेन तस्यैव नाशो यात्येव निश्चयात् । द्रव्याशायाश्च भो भूप परजन्मनि जन्मनि ।। ६८ ।। यद्यद्धि शोभन वस्नु मुनीना ब्रह्मचारिणाम् । दत्वा पश्चाद्धि स्वचित्ते मन्यते यो नरो नृप ।। ६९ ।। धर्मस्य कारण नास्ति लोकलज्जावशान्मया । वस्तवश्च इमे दत्ता एव हि मूढबुद्धित ॥ ७० ॥ सुकृतस्यैव सर्वस्य तस्यैव परजन्मनि । विनाशो हि भवत्येव नात्रैव सशयः खलु ॥ ७१ ॥ मृगस्य तस्य वामाया स्त्रियाः मर्त्यस्य भो नृप। सिंहिन्याश्चैव सिंहस्य तया पारावतस्य च ॥ ७२ ।। नागिन्याश्चैव नागस्य हसिन्या हसकस्य वै । शुकस्य चैव शुक्याश्च जायायाः वहिणस्तथा ।। ७३ ।। इत्यादीना च जीवाना परस्पर करोत्यहो । वियोग यो हि मर्त्यश्च स्थिताना च वनावनौ ॥ ७४ ॥ पुत्रपौत्रादिहीनाढयो भवत्येव परत्र वै । स पुमान् मगधाधीश परवियोगपापत ॥ ७५ ।। जायतेपि क्वचिदैवात् सतानाः तस्य वा तदा । म्रियते नैव जीवन्ति तुर्ये वा पंचमे समे ।। ७६ ॥ च्यालय नहीं देवें और सब प्रकारसे उसको आशा भंग कर देवे, तो ऐसे दगाबाज मनुष्यको आशा भंग होती है। जो दूसरोंकी आशाका भंग करता हो, उसको भी परजन्ममें आशा भंग होती है ॥ ६५-६८ ॥ प्रश्न-किसका पुण्य नष्ट हो जाता है ? अर्थ-हे मगधेश्वर ! जो उत्तमसे उत्तम और उत्कृष्टसे उत्कृष्ट वस्तुको मुनिगण या ब्रह्मचारी आदि धर्मायतनों में प्रदान कर फिर पीछेसे मनमें विचार करे (या पश्चात्ताप करे) कि मैने लोक लाज वश यह वस्तु मुनिगण आदिको दी। नहीं तो वे देने लायक नहीं है। इस प्रकार धर्मगुरु आदिके विषयमे अपनी दुर्बुद्धिके कारण विपरीत श्रद्धान कर धर्मगुरुओंको महिमाको हासता प्रकट करे उसके सब पुण्यकर्मका नाश हो जाता है निश्चयसे इसमे कोई सशय नहीं ॥ ६९-७१ ॥ प्रश्न--पुत्रहीन, स्त्रीविहीन कौन होता है ? अर्थ-हे राजन् ! जो मनुष्य भूग, सिह, कबूतर, सर्प, हंस, तोता, मयूर आदि जीवोंकी स्त्रियों (मादाओं) का वियोग करता है या उनके बच्चोंका अपहरण करता है या पापबुद्धिसे दूसरोंकी स्त्रियोका हरण कर वियोग करता है अथवा दूसरों के बालक-बालिकाओंको उनके भूल वा उनके लोभसे एकांतमें मारकर वियोग मायामामाचारजनामा ReHPAHमाला- । २४१ । पूर्वोक्तान् नैव यो मर्त्य कार्यान् करोति निश्चयात् । सर्वजीवेषु भो भूप दयापरो भवत्यहो ।। ७७ ॥ बहुपुत्र तथा पौत्रैः वाधवौधैश्च वेष्टितः । स भवत्येव जीवानामवियोगस्य कारणात् ।। ७८ ॥ जिनाननात्ममुत्पन्नमागम ह्यघनाशक । वाच्यमान सभामध्ये गुरूणा शास्त्रदिना ॥ ७९ ॥ तन्मध्ये कुरुते वार्तालापादिक । यो नरः । वा कथा विकथोत्पन्ना निद्रा हास्यच श्रेणिक ।। ८० ॥ वधिरोहि भवत्येव स पुपान् परजन्मनि । अश्रुत कथयत्येव द्वापरो नात्र निश्चयात् ।। ८१ ॥ होनश्च विनयेनैव तथा वचनवर्जित । चारित्रगुणहीनागो मनोवाक्कायवर्जितः ॥ ८२ ।। मलयाला फरता है उसके इस प्रकारके पाप कारणोंसे पर जन्ममें सतान नही होती, स्त्रीका वियोग होता है, यदि कदा- चित् संतान होवे तो भी वह जीवित नही रहती है; मर जाती है ॥ ७२-७६ ॥ प्रश्न--किसके पुत्र पौत्र कुटुम्ब परिवारका वियोग नही होता है ? अर्थ-हे राजन् ! जो सदैव दूसरे जीवोको दया भावो (परिणाम) की निर्मलतासे पालन करता है । अन्य किसी भी जीवका वियोग नहीं करता है । जो सदैव दयाभावोसे जीवोको अभयदान देता है वह पुत्र-पौत्र आदिका वियोगी नहीं होता है। वह बहुत बड़े परिवारका स्वामी, बहुत पुत्र, पौत्र, बन्धुओसे सहित होता है।। ७७-७८ ॥ पश्न--हिरा-(बहिर) कोनसे पापोसे होता है ? अर्ग अणिक जिनेन्द्र मुगमे उत्पन्न अंगम सब पापोका नाशक है जो मनुष्य उस धर्म सभामें समस्त+ गोको लगने वाले गले परमागमो उपदेशके समय वार्तालाप ओर विकथादिक फर शास्त्र श्रवण करने मागोमागेकोमोन उत्पन्न करता हो । नो शास्त्र स्वयं श्रवण नही करता हो। शास्त्र वाचने के MP frre करना होगा नीद लेता तो वह पुरुप पर जन्म बाहिर होता है ॥ ७९-८१ ॥ भी पापोला? ---- ::7 ! - Tranासको लाना हो, जो गदेव शिनाला गन्वेहाम्गव रहता हो । ::. :: करिनाम मा । मागम अनुनार पनन बोलनेने रहित हो, समाजमायालयात m [ २४२ ] MUSnes -namreulwinाजमजताRE जिनाभिषेकपूजादिवजितो दानतोपि च । स दरिद्री भवत्येव परजन्मनि जन्मनि ।। ८३ ॥ महाचातुर्यसम्पन्नो महाविनयमण्डितः। चारित्रगुणसंयुक्तो जिनवाक्येषु निश्चल ॥ ८४ ।। चित्तवाक्यतनूना च दण्डको भयवर्जितः। इज्यास्नानविधानस्य कर्ता च पात्रदानद ॥ ८५ ।। इत्यादिपुण्यकार्याणा कारक. पापवर्जितः । स भवत्यत्र भो भूप पुण्यतो धनवान् खलु ॥ ८६ ।। धनवारधरेमयों वेष्टितो भवति सदा । सेव पश्चाद्भवत्येव नाके हि निर्जराधिप ।। ८७ ॥ निजात्मघातकारो व विपशस्त्राग्निना नृप। अन्त काले च सयुक्त. शल्येन क्रियते तप ।। ८८ ।। निजोज्वलकुलस्यैव क्षयकारी च यो नरः। मृत्वा भवति स रोगी पुनः गच्छति दुर्गती ॥ ८९ ।। चारित्रगुणसे रहित हो, मन, वचन, कायसे श्रीजिनेन्द्र देवकी पूजा और अभिषेक आदि करने में असावधान हो। शक्ति होनेपर भी दान देने में अतिशय कृपण हो । वह परभवमें जन्म-जन्मांतर तक दरिद्री होता है।।८२-८३॥ प्रश्न-धनवान कौन होता है ? अर्थ-हे राजन् ! जो धर्मके कार्योंमें सदैव चतुर रहता है, देव, शास्त्र, गुरुओंकी विनय वेयावृत्य करने में जो सदैव तत्पर रहता, जो चारित्र पालन करने में सदैव उत्सुक रहता है, जो जिनेन्द्र भगवान्की आज्ञा माननेमें भावोंकी विशुद्धतासे दृढ़ रहता है, मन, वचन, कायसे सयमका आराधन करता है, भय रहित है । भगवान की पूजा-अभिषेक आदि धर्मकार्योंको पापरहित हो, प्रेमभावसे करता है और पात्र तथा चतुर्विध संघको दान देता है वह धनवान होता है । पुण्यकार्योंसे धनवान होता है ॥ ८४-८६ ॥ अर्थ-जो मनुष्य सदैव दान, पूजा, अभिषेक आदि पुण्यकार्योंको करता हे और अपने परिणामोंको सदैव हर्षके साथ दान पूजामें लगाता है वह धनवान होता है और फिर निर्जराधिप होता है ॥ ८७ ॥ प्रश्न--रोगी कौनसे पापसे होता है ? अर्थ--हे राजन् ! अपनी आत्महत्या करना, विष, शस्त्र, अग्नि आदिसे अपघात करना, धर्म समश- कर आत्मघातसे मरना, शल्यसे तप करना, अपने पवित्र कुलमें धर्मविरुद्ध कलक लगा कर नाश करना, गुरु, माता-पिता आदि पूज्य पुरुषोंकी चेयावृत्य, सेवा-सुश्रूषा आदि नहीं करना इत्यादि कामोंसे मनुष्य रोगी होता है । ओर दुर्गतिमें जाता है ॥ ८८-८९ ॥ eSmSM TES जयी [ २४३ ] ENConsteame-weP प्राणिना रक्षको मर्त्यः अन्त्यशल्येन वर्जितः । निजापरकुलस्यैव वर्द्धकारी च यो नरः ॥ ९० ॥ निरोगी म भवत्येव परप्राणस्य रक्षणात् । सदाकाले महाशर्मभोक्ता नास्त्यत्र संशयः ॥ ९१ ।। किंचिद्वस्तुमदृष्ट च मानवो यो हि भूपते । दृष्टं हि कथयत्येव परदोषप्रदस्तथा ।। ९२ ।। ममये जिनपूजायाः पश्यति स्त्रीस्तन तनुम् । आभरणं चाननं सुरूपलावण्यादिकम् ॥ ९३ ।। जात्यन्धो भवत्येव परजन्मनि जन्मनि । स पुमान् नात्र सन्देहः सदा दुःखस्य भाजकः ।। ९४ ॥ वृद्धत्वेपि नराधीश स्त्रीक्रीडामक्षपोपण । मुञ्चति यः पुमान् नैव रसैर्नानाविधैस्तथा ।। ९५ ।। म मृत्त्वा हि भवत्येव अन्धश्च परजन्मनि । महादु खाधिभोगी च मरणातेहवारतः ।। ९६ ।। दुर्गन्धाढ्यमशुद्ध च उच्छिण्ट परकल्पनात् । मन्त्राकर्पण ह्यानीत शूद्रस्पृश्य विवासितम् ।। ९७ ।। प्रश्न-निरोग कौन कारणोसे होता है ? अर्थ-हे राजन् ! समस्त प्राणियोको औषध दानसे रक्षण करना । शल्य रहित धर्म सेवन करना । अपने-अपने कुटुम्ब तथा ममरत जीवोके कुटुम्बोकी वृद्धि चाहना, दान-पूजादि कार्यो में हर्षित होना, दूसरेकी प्रागोको रक्षा इत्यादि पुण्य कार्योंसे, जीवको निरोगता प्राप्त होती है। वह जीव सदाकाल महान् सुखोका प्रगोश्ता होता है ।। ९०-९१ ॥ प्रश्न---जन्मांध कौनसे पापोसे होता है ? -- रानन् । बिना देली हुई वस्तुको देखी हुई बतलाना, दूसरोके दोषोको देखते रहना। धर्मात्मा परमोरे नि डना । भगवान् को पूजाके समय स्त्रियोके स्तन, मुख ओर आभूषणोको देखकर प्रसन्न- निलोना या पापकायोंगे मनुष्य जन्मान होता है। ओर वह सदैव दुराको प्राप्त करता है ॥९२-९४॥ 1- होर भी कामकोडामें तत्पर रहना । इन्द्रियों के पोषण हो निमग्न रहना । पुष्ट गोमेन नको पनीत करना, समात्यको भूल जाना, दूसरोको आगे फोहना इत्यादि पापोसे TRAITA II होना है और महा.गके मागरमें गता है' ॥ ९५-९६ ॥ -~~firm (ोगल) कोलगे तारणाने होता है ? -- ! यो मनि, रिका, नतो, तो पुरानो गन्ध, अगल, उसिट, सगरो के लिए aure है - - [ २४४ ] नजरमाच्याच्यामायाजाजरा गि पादपान च प्रतिना वा मुनीशिना । आयिकाणा ददात्येव यो मनुष्यो नराधिप ।। २८ ॥ निघमो जायते तस्माद्दोपात् दुर्गतिकारणम् । व्रतयुक्ताय नो देय अतोऽशुद्ध च वस्तुकम् ।। ९९ ॥ मनुष्यो मगधाधीश मधुस्थानस्य य कुधी । घात करोति दाह च अग्निना हि करोत्यहो ।। १०० ।। कस्येव ग्खलु जीवस्य शरीर ज्वालयत्यहो। वा ग्राम सदन चैव भूधर जीवसभृतम् ॥ १ ॥ प्रज्वालयत्यरण्य च तथा हयुपवनादिकम् । सैव कुष्टी भवत्येव परपात्रैव निश्चयात् ॥ २ ॥ जात्याद्यण्टमदाना च करोति य. पुमान् मदम् । परसद्मनि स दासो भवति नात्र संशयः ॥ ३ ॥ अष्टभेदमदस्यैव प्रयोगाच्च कियत्प्रमा.। दोपा भवन्ति अस्मिन् वै तान् शृणु कथयाम्यह ॥ ४॥ जात्या मदेन अस्यैव नोचजातिर्भवत्यहो । कुलस्य मददोपेण कुकुलस्यैव प्राप्तिता ॥ ५ ॥ संकल्प पूर्वक बनाया हुआ, मन्त्रके द्वारा लाया और शूद्रजनसे स्पर्श किया हुआ भोजन पान देता है वह भोग- रहित होता है । और मायाचारके पापसे दुर्गतिमे अनन्त संसार तक भ्रमण करता है। व्रती पुरुषोंको अशुद्ध + अन्न देनेसे महान् पापका अस्राव होता है। इसके समान अन्य पाप नहीं है। इसलिए मन, वचन, कायकी शुद्धिका उच्चारण कर फिर भी अशुद्ध और शूद्र जनसे स्पर्श किया आहार पान देना, दाताको पुण्यके स्थान पर धर्मकार्यमें मायाचारो परिणामोंके कारण महान् पापबंध होता है। इसलिए ऐसा पापका कार्य कदापि नहीं करना चाहिए ॥ ९७-९९ ॥ प्रश्न-कोढी कौनसे पापसे होता है ? अर्थ--हे राजन् ! मधुमक्षिकाके छताओंके नीचे अग्नि लगाकर जीवोंको मारना, नगरका दाह करना, ग्राम, घरमें, पर्वतमें अग्नि लगा देना, शूकर आदि प्राणियोंसे भरे हुए वन जला देना। धर्म समझ कर सती दाह करना, धर्म समझ कर पर्वतमे अग्नि दाह करना, वन या जंगलमे अग्नि लगवा देना, जीवोंको भयानक त्रास देना, इत्यादिक पापसे कोढ़ी होता है ॥ १००-१-२ ॥ प्रश्न-दास कौनसे पापोंसे होता है ? अर्थ-हे राजन् ! जो जाति, कुल, ज्ञान, बल, वीर्य, तप, ऐश्वर्य और रूप इन आठके मदों (अभि- मान) को धारण कर दूसरे धर्मात्मा जीवोंका अपमान करता है वह मरकर दूसरोंके घरमे दास होता है । आठ Everes [ २४५ ] मूर्खत्व जायते चास्य ज्ञानमदस्य कारणात् । ऐश्वर्यमदतोय च दासो भवति निश्चयात् ।। ६ ।। निर्बलो च भवत्येव वलगर्वस्य दोपत. । वित्तहर्पण अस्याप्तिर्भवत्येव दरिद्रता ।। ७॥ अत्यातको तपस्याया मदेन भवति ह्यय । कुरूपी च सुरूपस्य मदस्य करणात्तथा ॥ ८॥ एभिरुन्मत्तचित्त य करोत्येव नरेश्वर । मृत्वा सैव खरो भूत्वा दासो भवति स पुन |॥९॥ पादेन ताडयत्येव ठणचारीन् नरोत्तम । मानवो यः भवत्येव सैव खज परत्र हि ॥ १० ॥ गडुलो जायते चाय केन दु कर्मणा जिन । मानुज. सर्वपापाग्निमेव पुष्पोपमप्रभो ॥ ११ ॥ सौरभेगान् तथा छागान् लुलायान् च क्रमेलकान् । गसभान् वाहयान् चैव तथा चानेकपान् नृप ।। १२ । इत्यादिजीवमदोहान् तृणभक्षणतत्परान् । अपराधविनिमुक्तान वचनालापवजितान् ॥ १३ ॥ पीउयत्यतिभारम्यारोपणेन नराधमः । अतिनिर्दयभावाढयो योहि परस्य पोडद. ।। १४॥ अयेव कुब्जको भृत्वा करोति गमन सदा । यष्टिकाभ्या च दृग्भ्या वै भुक्त्वा दु.खमनारतम् ।। १५ ।। मुन्या पश्नाच्च गत्वा हि स्वभ्रे तत्रापि निप्रभम् । अगर्म पापपाकेन तस्मादपि च स. पुमान् ।। १६ ।। मद से फिस मदमे कौनसे दोप होते हैं उनको मै कहता हूँ सो सुनो। १. जातिका मद करनेसे नीच होता है। २. ल का अभिमान करनेसे कुकुलीन होता ह। ३. ज्ञानका मद करनेसे मूर्खता आती है । ४. ऐश्वर्यका मद करनेसे चरिद्री होता है । ५ वनका मद करनेसे निर्बल होता है । ६. तपका मद करनेसे रोगी होता है । ७. रूपका मर करने र पो होता है । और शारीरका मद करनेसे (साधारण दृष्टिसे) दास होता है । इस प्रकार उन्मत्त पित्त दोन भेदो को करता है वह मरकर गया होकर पुनः दास होता हे ॥ ३-९ ॥ १६7--- किम कारणसे होता है ? 4 --- गन् । जो पासे (नरगो) से दूसरोकी चांदमे ठोकर मारता है वह खजा होता है ॥१०॥ :-- Tinने पापीने होता है ? --7; गा! गुत्ता, करा, भंगा, कर, गहा मावि तणने भाग करनेवाले निर्दोष मत प्राणियो rritr: नार "ET, Iो ना. hinभारने ताना करना, अन्न-पानाविला निरोध करना .inरनमा गमन करता है ॥ ११-१५ ॥ ---rraft Tी (नियम) तो निशर पीड़ा देने के पापने मरकर नर में 7 --
[ २४६ ]
आगत्य कुन्जको नन भवति नात्र संशय । पूर्वपापप्रयोगेण अशर्मवस्तुभक्षक ॥ १७ ॥
दारिद्रयाढ्य नर दृष्ट्वा यो धनी स्वात्मनि नृप । जुगुप्सा च करोत्येव द्रव्योत्करमदात् खलु ॥ १८ ॥
परभवे भवत्येव मृत्वाऽमौ मानवर्जितः । अन्यैश्चाप्नोति धिक्कार सर्वस्थानेषु तदधात् ॥ १९ ।।
लकहस्तेन य मर्यो मापयित्वा ददात्यहो । परेषामशुक भूप महाकपटमडित ॥ २० ॥
हीनतुलकया चैव धान्यादिवस्तुसचय । यच्छति अन्यमाना होनमानेन वा तथा ।। २२ ।।
परधान्यादिवस्तुसहतिमजमा । वृद्धतुलकया वृद्धमानेनातीवलोभत ।। २२ ।।
स हि मृत्वा भवत्येव परजन्मन्यघोदयात् । अगहीनो महादु ख भाजनो नात्र सशयः ॥ २३ ॥
स्वकरेण कदाप्यत्र दान स्नान च पूजनम् । मानुजो नो करोत्येव य स भवति टुटकः ।। २४ ॥
गृह्णाति
ADSHIPAHESHPMPH-SHere
जयजयजयराम
दुःखोंको प्राप्त होता है । और वहाँसे निकलकर फिर भी पापोदयसे कुबड़ा होता है । इसलिये मूक और निर-
पराधी पशुओंको सताना अच्छा नही है ॥ १६-१७ ॥
प्रश्न--धिक्कारका पात्र कौन होता है ?
अर्थ--हे राजन् ! जो दरिद्री दीन मनुष्योको देखकर अपने मनमें धनमदसे उसका तिरस्कार करता है
वह मनुष्य मरकर धिक्कारका पात्र होता है । उसका सर्वत्र अपमान होता है ।। १८-१९ ॥
प्रश्न--अंगहीन कौनसे पापोंसे होता है ?
अर्थ--हे राजन् ! जो मनुष्य तृष्णाको गृद्धतासे क्रमती तोलता है और बढ़ती लेता है । मापसे कपड़ा
आदिको कमती माप कर देता है । बढती लेता है । धान्यादिक वस्तुओको बढ़ती मापकर लेता है, कमती देता
है। इस प्रकार जिसको निष्ठा मनकी लोभवृत्तिसे मलिन रहती है वह मरकर या उसी भवमें होनांग होता
है ॥ २०-२३ ॥
प्रश्न--टूटा कौनसे पापसे होता है ?
अर्थ हे राजन् ! जो अपने हाथसे श्रीमज्जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाका अभिषेक पूजा और मुनिगणोंको दान
वैयावृत्य आदि नहीं करता है वह टूटा होता है ॥२४॥
[ २४७ ] तीर्थनाथस्य तीर्थं भो करोति नैव यो नरः । स हि पगुर्भवत्येव परतीर्थस्य सेवनात् ॥ २५ ॥ जिनेन्द्रगुणसभूता रागविद्या शिवप्रदाम् । य विगायति नैवात्र मानवो भूपते ननु ॥ २६ ॥ भडरागममद्भूता गायति चातिहर्पत । रागविद्या नर. सैव मूको भवति निश्चयात् ।। २७॥ यो हि सयमयुक्ताना नराणा गुणिना तथा । शीलालकृतगात्राणा जिनधर्मोपदेशिनाम् ॥ २८ ॥ दिगवरमुनीन्द्राणा तथाहि ब्रह्मचारिणाम् । आर्यिकाणा तथा भूप श्रावकाणा सुर्मिणाम् ।। २९ ।। उत्सादीना च य मयं. अपवाद ददात्यहो । करोति पापदा निंदा वा हास्य शर्मनाशकम् ।। ३० ॥ ग मृत्वा तद्धि पापेन कुरुषो परजन्मनि । भवत्यपरमत्यधैि निंदनीयः सदा खलु ।। ३१ ।। प्रश्न-पंगु कौनसे पापसे होता है ? अर्थ-हे राजन् ! जो मनुष्य देवाधिदेव श्री तीर्थंकर परमदेवके पवित्र तीर्थोकी यात्रा अपने पैरोसे न फर अन्य मिथ्या कल्पित तीर्योका पर्यटन करता है उसके सत्य धर्ममें श्रद्धा न होनेके कारण और मिथ्यात्वके मेवन करनेके कारण तीन पापका आस्रव कर पंगु होता है ॥ २५ ॥ प्रश्न- कौनसे पापसे होता है ? अयं-हे राजन् । जो मनुष्य श्री जिनेन्द्र भगवान्के गुणोको गानविद्याको न गाकर, भंडराग ओर गोमन रागोत्यात भर गानोको अति हर्पसे गाता है और उसमें अनुराग करता है वह मिथ्यात्व सेवन करने कारण मत होता है ।। २६-२७ ।। मर-महान गरी तौनसे पागने होता है ? ओर जनतामें अपवाद किसका होता है ? - गान ! नयमको पारण करने वाले परम गुणी संत पुरुप, शोल (ब्रह्मचर्य) से विभूपित, मार्ग का गिभर निगण, नागे, आयिका, श्रावक ओर श्राविका आदि चतुःमय का अप- It - Tinnानगे, उनको मिा निंदा करने और उनका हास्य आदि '" निमा मन होनी है। पापके समान अन्य कोई भी पाप नही है । इम : """:ो :: ।ौर को राम आदि भय तर गुना वेपना शरीर में इस प्रकार EDARJHORTHEATREATREENA कुभाव करनेसे . + .
हाnesHETRIPuresIPSHREE [ २४८ ] एपामितरतो भूप महारूपी भवत्ययम् । तदेव शर्मभोक्ता च महासारविभूपित ॥ ३२ ॥ जन्तो कस्यैव पीडा च अतितीक्ष्णासिना पुमान् । वा कुन्तेन करोत्येव कारापयति ह्यन्यतः ।। ३३ ।। बहुभिर्वेदनाभिश्च सयुक्तो भवति नृप । आजन्मात्ययपर्यन्तपरपीडान्न किं भवेत् ॥ ३४ ॥ अन्यस्मिन् यः पुमान् जीवे पोडिते व्याधिभिः सदा । तेषा हि प्राणिना चैव मोचापयति व्याधितः ।। ३५ ।। भेषजैः वा रसैमन्त्रै अन्योपायोत्करै. तथा । कारुण्यहृदय कृत्वा सदा परदयारत. ॥ ३६॥ स भवति नराधीश परजन्मनि मानव । वेदनारहितो नूनं परपीडानिवारणात् ।। ३७ ॥ कृषिकर्ममनन्ताना जीवाना क्षयकारकम् । यः करोति तथा त च कारापयति अन्यतः ॥ ३८।। प्रश्न--सुरूपी और मनोहर कौनसे कारणोसे होता है ? अर्थ---हे राजन् ! चार प्रकारके संघकी मन, वचन, कायसे प्रशंमा करना, सराहना करना और चतुः- संघको मोक्ष मार्गका प्रकाशकारी समझकर अतिशय आदर करना, पूज्य मानना और सदैव उसकी उसकी भक्तिमें तत्पर रहना इससे मनुष्य सुरूपवान् सुन्दर और कीर्तिशाली होता है ॥ ३२ ॥ प्रश्न--जीवोको दुस्सह पीड़ा कौनसे पापसे होती है ? अर्थ--हे राजन् ! जो जीवोको बिना कारण ही त्रास देता है। तलवार, कुंता, चाकू, बरछी आदि शस्त्रोंसे अन्य जीवोंको पोड़ा देता है वा अन्य किसीसे ऐसी भयानक पीड़ा जीवोंको दिलवाता है। समस्त जीवोंको दुःखी करनेकी क्रूर भावना रखता है वह आजन्म पीडाको प्राप्त होता है। पापसे क्या नहीं होता है । जो दूसरोको पीड़ा देगा, उसको अवश्य ही पोड़ा प्राप्त होगी ॥ ३३-३४ ॥ प्रश्न--वेदना रहित कौनसे पुण्यसे होता है ? अर्थ--हे मगधेश्वर ! जो व्याधि, दुःख ओर पीड़ासे सन्तप्त, वेदनासे आक्रांत जीवोको देखकर उनकी पीडाको दूर करता है, जो दूसरोंको दुःखोंसे छुड़ाता है जो रोग, व्याधिके समय औषधि, मन्त्र आदिसे उनके दुःखोंका नाश करता है और जो समस्त जीवोंपर सदैव दयाभाव रखता है, वह वेदना रहित होता है ॥३५-३७॥ प्रश्न-मोही कौनसे कारणोंसे होता है ? अर्थ-हे राजन् ! खेती आदि हिसक व्यापार स्वयं करना अथवा तीन मोहके कारण हिंसक व्यापार Pre-SHRESTHI-H-SHI-SHISHASTHMAHISHASTMAITHereams THEHICE राes सामान्य भाजनः॥ ४७॥ [ २४९ ] कृतस्य कारितस्यैव पापस्य गदित जिनैः। समानैव फल जैन राद्धाते सर्ववेदिभि. ॥ ३९ ॥ कृपिकर्मसम पाप नो पर भुवनत्रग्रे । रामठ शृङ्गवेरादि कन्दवारक्रिय तथा ।। ४० ।। जवागज मधूच्छिष्ट सज्जिकामश्मज तथा । गोपरस तथा नागभस्म क्षार च पिंजर ।। ४१ ।। चपल गन्धक चैव शिलिग्रीव च अधिज । तिलोद्भवरस चैव लाक्ष जीवस्य घातकम् ॥ ४२ ॥ इत्यादीना करोत्येव क्रय वा विक्रय तथा । कुटुम्बपोपणार्थं च धान्योत्करस्य यो नरः ।। ४३ ।। तीव्रमोही कुटुम्वेपु मोक्षज्ञानविजित. । हाहाकारकरो दुःखे सदैव दुर्मतिस्तथा ।। ४४ ॥ तीतोदयो भवत्येव यस्येव मोहकर्मणः । ज्ञानदर्शनयोर्नून अत्येवावरणस्तथा ॥ ४५ ॥ अतिकौटिल्यता चेव प्रयाणा मगधाधिप। सदा शोको दिने भोगी स्त्रियाः सद्धर्मवजित. ।। ४६ ।। एभि दु.कर्मभि सेव पचेन्द्रियोन्यजन्मनि । भवत्येकेन्द्रियोनन्तदुखवारस्य महागूढ च आत्मोत्य चिन्मय कर्मवजितम् । यः पुमान् जीवतत्व च सदा निश्चलसस्थितम् ।। ४८ ।। रागेगे कराना, इसी प्रकार अदरख, कन्द, गूलर आदि अनन्त जीव मिश्रित पदार्थोका व्यापार करना, मदिरा, मांग, शहर आदि का व्यापार करना कराना, रायगुड़िया (जीव विशेष ) फा रस निकाल कर व्यापार करना गा, जोगो की चर्बी का व्यापार, गधक, लोहा, लाख आदिका व्यापार, महुआ ( मधुपुष्प ) का व्यापार, मानो के सामान हिमत होनेवाले व्यापार, चमड़ेका व्यापार आदि निंद्य और हिंसाजनक व्यापारोका साना गा ऐगा उपदेश देना, तीन मोहोदयसे पापकी प्रवृत्तिमें लग जाना आदि कारणोसे मोही होता हे "I ITER का है।॥ ३८-४४ ॥ 17--दियकोनने पापाने होता है ? गा। II II गतिमा जानो के वर्शन-ज्ञान का आवरण करता है, मन, वचन, कायको '.. जान, नादिया ITIE करता जो राउनका लोप करता है, जो आर्तव्यानसे it का करता, ना जपतो पत्ति धर्मरहित करता है वह : THE '1 ना.४० ॥ ...- 12 ::रभर करता : ? • Ri, मारनामो लिगामा का सिने अवान नहीं है, सामसभामा - .1 . - है भ -- . ए . - - [ २५० ] जसमाज च्या ईदृश कर्मकर्तारं भोक्तार तत्फलस्य च । व्ययमपि च अभव्यानामप्राप्तं च कदाप्यहो । ४९ ॥ जानाति स्वहृदि नैव धर्माधर्मफलं तथा । लोकाकाशमलोकं च सर्वज्ञ दोषवर्जितम् ॥ ५० ॥ मुनीनां सकलाचार स्वरूपं च चतुगतेः । कर्मकर्मफल चैव कर्मणो बंधन तथा ।। ५१ ।। व्यवहारनयस्यैव स्वरूप नाकदायकम् । निश्चयस्य नयस्यैव स्वरूपं मोक्षदायकम् ॥ ५२ ॥ सैव भो मगधाधीश एभि कुकर्मभि. खलु । तिष्ठत्येव सदा काले ससारे दुःखसंभृते ।। ५३ ॥ उक्तदोपान् निजे चित्ते इतरत्वेन यो नर । जानात्येव नराधीश भव्यभावेन मडितः॥ ५४ ।। बहुकाल च स नैव भवारण्येतिदुःखदे। भ्रमति शीघ्रतो मोक्षे यात्येव ह्यघनाशतः॥ ५५ ॥ भजनाज्जिनबिंबाना आलयाना च भो नृप। उपसर्गान्मुनीन्द्राणामागमानाच नाशतः॥ ५६ ॥ जो चिद्रूप आत्माके अस्तित्वको नहीं मानता है, जिसके अन्तरंग परिणाम तीन अज्ञान मिथ्यात्वसे सत्य पदार्थो- की श्रद्धासे रहित हैं, जो लोकाकाशादि तत्त्वोंको नहीं जानता है, जो मुनिधर्मके चारित्रको नहीं जानता है और जो चारो गतियोंका स्वरूप कर्मका फल, कर्मोका स्वरूप, कर्मबन्धका स्वरूप, व्यवहारनयका स्वरूप, निश्चयनयका स्वरूप, मोक्षका स्वरूप आदिके स्वरूपको नहीं जानकर अन्यथा श्रद्धान करता है, मिथ्यात्व- भावोसे तत्त्वोंके स्वरूपका अन्यथा श्रद्धान करता है, पदार्थोके स्वरूपको नहीं जानता है वह चिरकाल संसारमें परिभ्रमण करता है ।। ४८-५१ ॥ प्रश्न--संसारके परिभ्रमणसे कौन शीघ्र ही छूटता है ? अर्थ--हे मगधेश्वर ! जो सात तत्त्वोंका यथार्थ श्रद्धान करता है। जो मुनिधर्म व गृहस्थ धर्मको मोक्षोपयोगी समझकर विशुद्ध भावोसे धारण करता है सापेक्ष व्यवहारनय स्वर्गको देनेवाला व निश्चय मुक्ति- दायक है इस प्रकार जो निश्चयनय और व्यवहारनयसे आत्माके स्वरूपको अच्छी तरह जानता है । जो भव्य- भावोंसे सदैव आनन्दित रहता है । जो प्रशम-संवेगादि गुणोको धारण करता है वह शीघ्र ही संसारसे मुक्त होता है और आत्मीक अविनश्वर सुखको प्राप्त होता है । बहु काल तक दुखदायी संसार रूप वनमे वह भट- कता नहीं ॥ ५२-५५ ॥ प्रश्न--मोहकी गाँठ किस कारणसे दृढ़ होती है ? अर्थ-हे राजन् ! श्रीमज्जिनेन्द्र भगवान्को प्रतिमाओंका भंग करना, दुष्ट बुद्धिसे उनका अपमान weSSRO यामिलामन्यायालयाच्य SH दुर्लभे [ २५१ ] एभिस्त्रिभिः कर्मभिश्चास्य कर्मणा च दृढा खलु । ग्रंथी सबध्यतेऽनंतभवदुःखप्रदायिका ॥ ५७ ॥ सम्यग्दर्शनसद्ज्ञानचारित्राणा च यः पुमान् । त्रिशद्धया पालयत्येव निश्चयव्यवहारतः ॥ ५८ ॥ तपोयोगेन कृत्वैव ग्रथनः ह्यष्टकर्मणाम् । नाश यात्येव भो भूप सदा शर्मभयेऽक्षये ॥ ५९॥ च्युतोपमे निराधारे वृद्धिह्रासविवर्जित । सिद्धसदोहसयुक्ते ह्यतातीतगुणालये ॥ ६॥ इन्द्रनागेन्द्रभूपेन्द्रवृन्दपूज्येक्षविच्युते । ईदृशे परमे स्थाने चान्यलिगिनाम् ।। ६१ ॥ प्रदोपो निह्ववश्चैव तथा मात्सर्यसज्ञक । अन्तरायाभिधश्चैव आसादनोपघातकौ।। ६२॥ एभि पट्कर्मभिश्चास्य वधो भवति भूपते । द्वयोहि ज्ञानदर्शनावरणयोर्भवप्रदः ।। ६३ ।। पृया पृथक् शृणु त्वं च पण्णा हि लक्षणं नृप । निर्विकल्पतया वक्ष्ये कर्मबन्धविघातकम् ।। ६४ ॥ फरना, श्रीजिनदेवके मन्दिरका विध्वंस करना, मुनियोको उपसर्ग करना, जिनागमको अवर्णवाद लगाना या जिनागगफो मिश्या फल्पित सिद्ध करना इत्यादि भयंकर पापोसे मोहकी गाँठ दृढ़ होती है जिससे जीव अनन्त- काल पर्यत घोर दुःखोको प्राप्त होता है ।। ५६-५७ ॥ प्रश्न-~मोहकी गांठ तिस कारणसे छूटती है ? -हे गजन् ! सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र आदि आत्मिक गुणोको मन, वचन, कायकी रिदिने यहार और निश्चयते धारण करनेसे मोहकी गाँठ शीघ्र ही नष्ट हो जाती है । तपोयोगसे अष्टकर्मों- को नाशार अक्षय सुराको प्राप्त होता है । जिससे आत्मोक सत्य सुख प्रकट होता हे ॥ ५८-५९ ॥ अर्ग-माहाको गन्पी नष्ट होने पर जीवको उपमा रहित अनुपम स्वभावरूपसे प्राप्त अनन्त गुणोसे परिपूर्ण घ, नागेन्द्र, गोन्पोले पूजित अतीन्द्रिय और अविनाशीक मोक्ष सुरा प्राप्त होता है जिसकी प्राप्ति एक जैन for:ो होती है।। ६०.६१ ।। TET-IITE और बनाारण कम का आना कोन कोनसे कारणोसे होता है ? -~!, नितार, माया, अन्तराय, मादन और उपघात इन च्ह फर्मोसे जाना- माना आगे पजामाने वतनाते है।। ६२-६३ ।। tiinfTRigm मागे नाते उनै गुना ॥ १४ ॥ THEHORE .
। २५२ ] me-NEWeeMemeSANCE mmarAwesHERSHIPHASHRESTHEHOSweeSTHASAHESHIRSHIPHAS सम्गग्दर्गनमदज्ञानधारकस्य च नु. खलु । चारिनपालकम्यैव व्येकस्य धारकस्य वा ॥ ६५ ॥ सभाया च कृता नून म]न केनचिदिगम् । प्रशसा परमा तस्य अहो धन्योऽधुना स च ।। ६६ ।। श्रुत्वेन नो करोत्येव पुमान् कोप्येव तस्य वै । पैशून्यदोपितातस्थ परोदयविघातकः ॥ ६७ ।। प्रशसा च वदत्येव चापवाद तु तस्य वे । प्रदोपस्यैव एतद्धि जानीहि लक्षण नृप ।। ६८।। केनचित्पुरुषेणैव प्रोक्त भो बुधसत्तम । भवता च गृहे ह्यस्ति अमुक पुस्तक शुभम् ।। ६९ ॥ मा देहि त पठित्वा च लिखित्वेव पुनश्च वै । दास्यामि भवता तद्धि द्वापरो नात्र किञ्चनः ।। ७० ।। किमपि कारण धृत्वा ह्यहकार च स्वहृदि । विद्यमानेपि ज्ञानादी व्याहरत्येव स कुधीः ।। ७१ ॥ नो जानामि इद ज्ञानमस्मत्पार्वे च निश्चयात् । पुस्तकोप्येव स नास्ति सा कलाप्येव मानवः ॥ ७२ ।। एव योहि करोत्येव ज्ञानस्याच्छादन पुमान् । नास्ति चेति कथन तत् ज्ञानस्य विद्यते खलु ।। ७३ ।। प्रश्न-प्रदोषका लक्षण क्या है ? अर्थ--हे राजेन्द्र ! सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सग्यचारित्र और उनका पालन करनेवाले भव्यप्राणियों- को सभामें प्रशंसाको सुनकर सहन नहीं करना अथवा उन गुणोमे अनुराग नहीं होना, गुणोंमे रुचि नहीं प्रकट करना सो प्रदोष है । ईर्ष्या या असहिष्णुताके लिए दूसरे पुण्य पुरुषोंके उत्तम सम्यग्दर्शनादि गुणोंके अभ्युदयको सहन न कर मनमें द्वेष बुद्धिसे उसका अपवाद करना, निन्दा करना सो प्रदोष है। इससे ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मका आस्रव होता है ।। ६५-६८ ॥ प्रश्न-निह्नव दोषका लक्षण क्या है ? अर्थ--हे राजन् ! किसी पुरुषने अपने ज्ञानको वृद्धि के लिये किसी पुरुषके पास ज्ञानवृद्धिका साधन पुस्तक आदि की याचना की, मॉगी। परन्तु मेरी पुस्तकादिकोंसे यह ज्ञान सम्पादन कर महत्त्वशाली बन जायेगा जिससे मेरी प्रतिष्ठा या गौरवका नाश होगा, इस प्रकारके दुष्ट भावोंको हृदयमें धारण कर किसी भी बहानेसे निषेध कर देना कि मेरे पास वह पुस्तक नहीं है । इस प्रकार विद्यमान ज्ञान साधनोंको छुपाकर मन- की कुटिलतासे निषेध करना सो निन्हन है। इसी प्रकार शास्त्रकी चर्चाका अपनेको ज्ञान होनेपर भी उक्त प्रकार दुष्ट अभिप्रायको रखकर निषेध कर देना कि मुझे यह बात मालूम नही है । सो निन्हव है । सम्यग्ज्ञानके प्रचारको रोकना, सम्यग्ज्ञानकी वृद्धिका नाश करना, सम्यग्ज्ञानियोंका महत्त्व DIE HEJH [ २५३ ] प्राप्नोति सैव दुर्दोपं निन्हवाओँ भवप्रदम् । मानवो मगधाधीश बोधापलपनाच्च वै ॥ ७४ ॥ विद्यते गहनार्थोय कठस्थो भवतां खलु । ग्रथो मां पाठय धीर चानवर्द्धनहेतवे ।। ७५ ॥ योग्योह पठने तस्य पाठने तस्य निश्चयात् । योग्यस्त्वमसि नान्योहि महामतिप्रधारकः । ७६ ।। एव श्रुत्वापि तस्यैव वाच पुसे च तस्य वै । दानयोग्याय केनापि हेतुना दीयते न सत् ।। ७७ ।। य' स लभते भो भूप दोप मात्सर्यमंज्ञकम् । मात्सर्यहेतूतो नून भवभ्रमणकारणम् ।। ७८ ॥ सदसि विद्यमाने च व्याख्यानमागमस्य वै । केनचित् कारणेनैव तस्मिन्कोपि करोत्यहो ।। ७९ ॥ प्रग्नेदा मनोरत्यावा येनैव ह्यागमस्य च । अतरायो भवत्येव स्वकार्यवशत तथा ।। ८० ।। अन्या वाहि कगेन्येव कुर्वता हास्यदायकाम् । मौखर्यत्वेन यो मर्त्य स्वमदेन तथा नृप ॥ ८ ॥ गिरा देना सो सब निन्हव दोप है । इससे अनन्त दुःख प्रदायी कर्म (ज्ञानावरण और दर्शनावरण) का आत्रव होता है ।। ६९-७४ ॥ प्रश्न-मात्सर्य दोष किसे कहते हे ? अ--के राजन् ! किनो शिष्यने आकर कहा कि हे स्वामिन् आपको शास्त्रोका गहन अर्थ सब कठस्थ । म ने जान तो वृद्धि के लिये आपसे पठन-पाठन और अभ्यास करना चाहता हूँ। मै इसके योग्य हूँ। It imनोमा पकार गोट याम्यताके धारक हो, यह विद्या आपके सिवाय अन्यत्र मुझे प्राप्त नही होगी। गारपर गो मनको मत्सरतामे सम्यग्ज्ञानके शास्त्रोका पठन-पाठन नही करावे अथवा किसी नागे योपशानको प्रदान करने मे देप करे सो मात्सर्य दोपका धारक है। इससे ससारका भ्रमण ॥.31. !! ': --' या ? -~-- Im : मानना गम्गाज्ञान का उत्तम व्यारवान हो रहा । जिनको श्रवण तर अनेक • . परमागमो मोक्कर न्यारवानगी मनतो तुरताले रोग देना अगवा • :ो । सामननी सुटकामे परमागगो या पानने Pा मिया गाकर परमागम व्यायानम विश्न नांना या किलो मानेगे त्यो वारा नाट करा देना नो यमराजयजयाजमाता . । -- --- म M य - । . . . 1 ..::LI [ २५४ ] आराादनारुण मान्च्यालय ASHIOS अंतरागाभिध दोपमहगतनिदायकम् । उपार्जगति सो नून गास्वविच्छेदकारणात् ।। ८२ ।। करोति ने। यो मूढ मतो ज्ञानग्य मानव । कायेन विनय चैव हस्तकुड्मलतस्तथा ।। ८३ ॥ पदमासनाच्च स्तननात् म्मरणाच्च प्रकाशनात् । प्रतधाना च सोप्येव तदाछादनत. खलु ।। ८४ ।। दुर्दोषणाप्नोति मगधाधिप । सर्वदु खप्रद हेय जैनतत्वविदावरे ।। ८५ ।। सुशाने वाच्यमाने हि सदसि गुरुणा नृप । य. कोपि कथयत्येव मदमात्सर्यकारणात् ।। ८६ ।। इद' पाठमशुद्व च कल्पोक्तमिव दृश्यते । अनुक्त भासते नून सम्बन्धोऽय कथ धृत ।। ८७ ।। अन्तराय वोष है । मूर्खता और अभिमानसे परमागमका विच्छेद करना सो भी अन्तराय दोष है । यह अनन्त पापका प्रदान करनेवाला भयंकर दोष है ॥ ७९-८२ ॥ प्रश्न-~आसादन दोषका स्वरूप क्या है अर्थ-हे राजन् ! परम उत्कृष्ट और सर्व प्रकारसे सर्वदा निर्दोष ऐसे परमागमका मन, वचन, कायसे विनय नही करना, हाथ नहीं जोड़ना, पद्मासनसे वंदना भक्ति नहीं करना, पूजा नहीं करना, ऊँचे स्थानपर विराजमान नहीं करना, परमागमके उपकारको भूल जाना और अन्य समाजमें परमागमका प्रभाव कुंठित हो ऐसे आचरण करना, मनसे परमागमको हितरूप नहीं समझना, वचनसे उत्तम प्रबंधमे दूषण लगा देना सो सब आसादन नामका दोष है प्रशस्त ज्ञान और उस ज्ञानको धारण करनेवाले भव्योत्तमका आदर सत्कार कर महत्त्व नहीं प्रकट करना सो आसादन नामका दोष होता है । सर्व दुखोंको देनेवाला है, छोड़ने योग्य है ऐसा जैन तत्त्वके ज्ञाताओं ने कहा है ॥ ८३-८५ ॥ प्रश्न--उपघातका दोषका लक्षण- अर्थ-हे राजन् ! सभामें उत्तम और सर्वथा निर्दोष परमागमका भाषण होनेपर जो अहङ्कार या मात्सर्य भावसे (किसी प्रकारको मलिनतासे) उस सत्यार्थको स्वीकार नहीं कर 'यह पाठ नहीं है', 'यह अर्थ ठीक नहीं है' अथवा 'पदार्थका स्वरूप नहीं है' इस प्रकार ज्ञानका घात करना सो उपघात है । आगमके वाच्यार्थमें या पदार्थके स्वरूपमें मनकी कुटिलतासे अन्यथा रूप प्रतिपादन करना सो उपघात योजना याचा [ २५५ ] HIRCLETTE इत्याद्यगुणवुद्धेश्च आगमस्येव योधमः । दूपण च ददात्येव मनुजो भो नृपोत्तम ॥ ८८॥ सैव नून लभत्येवोपघाताह कुदोपकम् । जिनवाक्यविधातत्वात्स्वशब्दस्यैव पोषणात् ॥ ८९ ॥ एतेहि पड्विधा दोपा ज्ञानावरण-दर्शना-वरणयोर्हि भवत्येव आस्रवा भवदायकाः॥ ९० ॥ आचार्ये शत्रुता चैव अकालेऽध्ययन तथा । अरुचिपूर्वक ग्रन्थपठन पठतोपि च ॥ ९१ ।। आत्मस्थकरण नूनमनादरेण तस्य च । व्याख्यानश्रवणमुन्मनीकत्व स्वगुरोस्तथा ।। ९२॥ वाच्यमाने प्रथमानुयोगे धर्मप्रभावके । तत्रैव कथयत्येव कोपि पैशुन्यदोषतः ॥९३ ॥ वाचनीय सभामध्ये मोक्षमार्गप्रदं शुभ । द्रव्यानुयोगनामच सभाया नो पर खलु ।। ९४ ।। बहुश्रुतेष्टगर्वम्य विधान चापमानन । परपक्ष पोपयत्येव मिथ्योपदेशकी तथा ॥ ९५ ।। स्वस्य पक्षस्य लोकस्य पुष्टकर्मविजित । ख्यातार्थ पूजनाथं च लाभार्थमागमस्य च ॥ ९६॥ नामका दोष है । आगममें दूपण या आगममें असत्यार्थ पदार्थको नियुक्ति कर देना भी उपघात कहा जाता है। अपने अहारको सिद्ध करने के लिए अपने मिथ्या वचनोंको सत्य कहना और आगमके सत्य वचनों- को मिया तिलाना सो उपघात है । इस प्रकार ये छह दोष ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मके आस्रवके कारण मगार चलानेवाले है ॥ ८६.९० ॥ ऊपर तिताये हुए निन्दादि दोप ज्ञानावरण ओर दर्शनावरणके बंधके कारण है। --आचार्यगे रानुना करना, अकालमै पठन-पाठन, शास्त्र श्रवण करने में मनके परिणामोको ग्लानि ला, पर करने में प्रमान प्रकट करना, भरुती चुगली या निन्दा करना, अथवा गुरुके समक्ष मिथ्या भारा मो नागो फमन झारण है। सभामें प्रयमानुयोगका व्यारयान हो रहा हो, उस तो श्रवण IIT मा सभामें तो प्रमानुयोगका हो ग्रन्थ पढना चाहिये, वही मोक्षमार्गका PETE :कार : "कर मानोगामे काचि उत्पन्न करा देना या प्रथमानयोग शास्त्रोको मिथ्या ठह- : ापो: TRITI II गांप्रत करना अथवा उजा अपमान करना।।२०-२५॥ - 17 : Pागमानमार र पप समाधान मप्रमाग कहने पर ये का, नेपाको पार नही करते । इस प्रकार अपने 1 । र सो गेना। मान, पा, पूजा, न और STHERWASHCSIHe 2 . - ह - । 14 . -- 1 - १ . am- -- - 4. 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[ २५६ ] rewwwwESSHES गोपदेश ददात्येव अगम्बद्ध' (निरर्थक) । कपटेन ज्ञानपाठी चागगाना च विक्रयी ॥ ९७ ।। दाण न ददात्येव सम्यग्दृष्टे ह्यघप्रदम् । प्रशसा न करोत्येव कुशास्त्राणा च मानवान् ॥ ९८ ।। दीर्घनिद्रायतो निद्रामयुक्तो धर्मनिंदक । महाआलस्यवान् चैव जुगुप्सी निंदकी तथा ।। ९९ ।। दर्शनावरणस्यैव आसवाश्न इमे तुधे । इत्याद्या शिवबधस्य कर्तार. समता. खलु ।। १०० ।। दुखशोकेन तापेन आक्रदेन वधेन च । तथा रोदनेनेव अहो मगधमडन ॥१॥ आत्मपरोभयत्वेन असद्वेद्यस्य बधनः । भवत्येव च नु त्व च एतेपा वर्णन शृणु ॥ २ ॥ आधिग्गाध्यादिके जाते स्वस्य परस्य वा तनो । सक्लिष्टपरिणामेन चिंतन क्रियतेत्र यत् ॥ ३ ॥ सैव दुखाभिध दोपं लभत्येव नरेश्वर । वा कारितानुमोदेनाशुभमार्गस्य दीपकम् ॥ ४ ॥ स्वार्थके लिए शास्त्रका उपदेश देना । अपने स्वार्थके लिए मिथ्या उपदेश देकर सत्य बतलाना, असम्बन्ध और फपटाचारसे विरुद्ध पाठ पठन करना, आगमका क्रय-विक्रय करना, सम्यग्दृष्टि जीवोको दूषण प्रदान करना, मिथ्या शास्त्रोंकी प्रशंसा करना इत्यादि बहुतसे कारणोंसे ज्ञानावरण कर्मका आसन होता है ॥ ९६-९८ ।। अर्थ-दिवसमे सोना, दीर्घ निद्रा ग्रहण करना, शास्त्र पढ़ते-पढ़ते शयन करना, धर्मको निन्दा करना, जिनदर्शनादिक शुभ कार्योमे आलस करना, दूसरोंके दर्शनमें व्याघात पहुंचाना, निंदा करना, मुनिगणोंके पवित्र शरीरको देखकर ग्लानि करना इत्यादि कारणोंसे दर्शनावरण कर्मका आस्रव होता है ॥ ९९-१०० ॥ प्रश्न-असाता वेदनीय कर्म कौन-कौनसे कारणोंसे होता है ? अर्थ--हे मगधेश्वर ! दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध, रोदन ये सब अपनी आत्मामे, पर जीवमें अथवा दोनोंमे उत्पन्न कर देनेसे असाता वेदनीय कर्मका आस्रव होता है। आगे इनका विशेष खुलासा प्रकट फरते है, सो सुनो ॥ १-२ ॥ अर्थ--आधि, व्याधि, पीड़ा और तीव्र वेदना आदि होनेपर संक्लेश परिणामोंके द्वारा बार-बार उस दुःखका अनुभव करना अथवा ऐसा दुःख दूसरोंको देना अथवा दुःख देनेकी अनुमोदना करना, दुःखके कारणों- को उपस्थित कर देना सो सब दुःख है । इस प्रकार अपनेको और दूसरे जीवोंको दुःख देना सो सर्व असाता वेदनीय कर्मका आस्रव है ॥ ३-४ ॥ Se राजा उपरिपत पर इना .. [ २५७ ] तथा सार पुत्रकाता कुटुवाना विच्छेदे स्वस्य वा नृप । हस्त्यश्वधानद्रव्याणा बहुमोदप्रदायकाम् ।। ५ ।। महाशोक करोत्येव तेपा प्राप्त्यै सदैव हि । शोकाख्य बंधयत्येव दोपं जन्मनि जन्मनि ॥ ६ ॥ केनचिन्निद्य कार्यस्य कारणात्स्वस्य जायते । अपवादो महान् लोके तं श्रुत्वा ह्यात्मनि सदा ।। ७॥ पश्चात्ताप करोत्येव नैव मुचति त पुन. । स पुमान् भजते तापाभिध दोप स्वदु खदम् ॥ ८॥ केनचित्कारणेनेव विलापाकदनं | नेत्राश्रुपातपतन पूत्कारकरण नृप ॥९॥ स्थितोहि रोदन चैव करोत्येव विकारणे । आक्रदनाख्य सो दोप लभते भवदु खदम् ।। १ ।। झपापात हि यो अद्रेः पावके च प्रवेशन । अध्वी च पतन नद्या श्वासोच्छ्श्वासप्ररोधनम् ।। ११ ।। अर्थ--३प्ट वियोग और अनिष्ट संयोगके होनेपर शोक होता है। पुत्र, स्त्री, कुटुम्ब आदि सजीव पदायोंके वियोग होनेपर वा अपने ही वियोग होनेपर अथवा बहुत आनन्ददायक हस्ती, घोड़ा, धन, धान्य आदि पदायोंके वियोग होनेपर जो वेदनारूप शोक होता है उसको शोक कहते हैं । दुःखका विशेष रूप ही शोक है । इसमे असातावेदनीय कर्मका आलव होता है । शोफ अपनेमें करना या दूसरेमें करना सब ही असाताके कारण हे॥५-६ ॥ --कोई भी निंद्य कार्य करनेसे अथवा किसी भी अनुचित कार्यके हो जानेपर संसारमें अपवाद (निसा) को गानेने नी पश्चात्ताप, बार-बार आत्म परिणामोमें सालेश रूप ग्लानि हो सो पश्चात्ताप है। कभी- को पनागादि के नाट हो नानेपर, व्यापारमें हानि होनेपर, कार्यका विपरीत परिणाम होनेपर भी पश्चा- गा। 17 भो एक प्रकारका दुगका हो मप है । यह भी अमातावेदनीय कर्मका कारण है ॥ ७-८॥ i-fमोनो कारण ऐना रिलापपुर्वक रोना कि जिसको श्रवण कर दूसरोके मनमें आघात मग मन नलगे पि17 ना, नेवीने पूरकार पूर्वक बोनताके माय लवन करना, अपने परिणामोका RE: करना, सगे के चित्तको विकार या सोभ हो ऐमा कवन करना यो सब आक्रदन 17. मग पर लगनेगे माताश्नोर का आरव होता है। समारके दुःलोको देने LA + + , F मेरिणामोने गन्ना मा दमको माना, पागे गिर तर प्रागोता Simi?:र ।
[ २५८ ] HASHCHICSIHOST च स्यालयमा करोत्येव तथा नून खादत्येव विपादिकम् । असिना स्वस्य हस्तेन स्वात्मान घातयत्यहो ॥ १२ ॥ इत्यादिभि नराधीश स्वरय प्राणस्य पापधी। वियोगं च करोत्येव वधाह सैव निश्चयात् ।। १३ ॥ दोप हनन्तससारपरिभ्रमणकारणम् । प्राप्नोति आत्मघातस्य करणान्नात्र संशयः ॥ १४ ॥ परमक्लेशसयोगात् ईदृश रोदन नृप । यः करोति पुमान् नून महादुःखस्य दायकम् ॥ १५ ॥ परेपा श्रवणाद्यस्य रोदन भवति सदा । दोप परिवेदनाख्य लभते भवदुखदम् ॥ १६ ॥ पेशुन्यात् पापकार्यस्य प्रेरणात् चापवादतः । तिरस्कारस्य करणात् परेपा निन्दनात् तथा ॥ १७ ॥ परद्रव्यापहरणात् अधर्मिजनसेवनात् । कार्यादृते च अनर्थदण्डस्य करणात् पुनः ॥ १८॥ जीवनाथ शास्त्राणामभ्यासकरणात्तथा। इत्याद्यन्यदपि नूनमस्याश्रवा भवत्यहो । १९ ।। नाश करना, अग्निमे प्रवेश करना, सती होना, नदीमें गिर कर प्राणोका घात करना, श्वासोच्छ्वास क्रियाको रोक कर अपघात करना, विषादिक भक्षण कर प्राणोंका नाश करना, तलवार, बन्दूक आदि शस्त्रोंके द्वारा प्राणघात या आत्मघात करना, धर्म समझ कर प्राणोंका वियोग करना इत्यादि अनेक प्रकारसे संक्लेश परि- णामपूर्वक मरना, दूसरोंको मारना या मरवाना सो सब वध है । इससे भी असाता वेदनीय कर्मका बंध होता है ॥ ११-१२॥ अर्थ--आत्महत्या अथवा परघात करनेसे अनन्त संसारका बंध होता है। सबसे भयंकर पाप आत्म- "हत्या है । जो धर्म समझ कर आत्महत्या करते है वे अनन्त संसारमें परिभ्रमण करते है ॥ १३-१४ ॥ अर्थ-हे राजन् ! ऐसे संक्लेश और दुःख परिणामोंसे रोना कि जिसको श्रवण करते ही दूसरोंको भी रुदन हो जावे । अपने और दूसरों के परिणामोंको क्लेश कारक, वीभत्स रूपसे करुणापूर्ण रुदन करना सो परि- वेदन नामका दोष है । इससे भी असाता कर्मका आस्रव होता है ॥ १५-१६ ॥ अर्थ--चुगली करना, पाप कार्योंकी प्रेरणा करना, दूसरोमें दोष लगा कर निन्दा करना, दूसरोंका तिरस्कार करना, दूसरोंकी निन्दा करना, दूसरोंके द्रव्यको लूट लेना, पापी अधर्मी और अपने धर्मसे पतित ऐसे निंद्य मनुष्यकी सेवा करना, बिना प्रयोजन हिंसा आरम्भ करना, अनर्थदण्डके कार्य करना, अपनी आजी- विकाके लिये विद्याभ्यास करना इत्यादि बहुतसे अन्य कारण भी असाता वेदनीय कर्मके आस्रवके कारण होते हैं ॥ १७-१९॥ मय जन्माल्याच्या च्याच [ २५९ ] स भूतव्रत्यनुकम्पा च दानं सरागसंयमः । योगाना क्षातिः शौचश्च एतेहि मगधाधिप ।। २० ॥ आश्रवाहि सद्वेद्यस्य महाशर्मप्रदायकाः । भेद शृणु च तेपा हि वच्म्यह च पृथक् पृथक् ॥ २१॥ सर्वभूतेषु चित्तेन कायेन वा हृदा तथा। दयाभावं करोत्येव यो नाहि भव्यभावयुक् ॥ २२ ॥ एव विचार यत्येव चतुर्गतिभवा इमे । भूताः सर्वे सदैवोच्चैः कर्मोदयवशात् खलु ॥ २३ ॥ निजनिजैव भुजति दुखीध पारवर्जितम् । भविष्यति कदा मुक्तिः एतेपा दु.खतो ननु ।। २४ ॥ पुमान् भूतकपाख्य गुणं शर्मप्रदायकम् । लभते मात्र सदेह. सद्दयापरिणामतः ।। २५ ॥ पचाणुवतयुक्ताना दृष्ट्वा सद्धर्मवृद्धये । यः पुमान् स्वात्मनि नित्य दयाभाव ह्यधापहम् ॥ २६ ।। करोति परम भूप वाल वृद्ध तपस्विनाम् । धर्मस्य ज्ञानद चैव जिनधर्मोपदेशकम् ॥ २७ ।।। प्रश्न--साताबेदनीय फर्मके आलव कौन-कौनसे है ? अर्थ-प्राणी मात्र पर अनुकम्पा, व्रती पुरुपो पर विशेष विनयके साथ अनुकम्पा, दान, सराग, संयम, साति, शोच इत्यादि सातावेदनीय कर्मके कारण हैं । इनका स्वरूप भेद पृथक्-पृथक् मै आगे कहता हूँ मुनो। २०-२१ ।। प्रदन---भूत अनुकम्पाका गया स्वरूप है ? -- गन् ! मन, वचन, कायले समस्त जीनोपर दयाभावोका रखना अर्थात् जीवमात्रमें भेदाभेद frn पिना तो दयामागे सन पर दया प्रदर्शित करना सो भूत अनुकम्पा है ।। २२ ॥ --21fT लग्ना कि नीव अपने कामों के विपात (फल) से चारो गतिमें दुःराको प्राप्त हो :: inा माना नातो पात हो। ये जो दुगोने लूट जावे । इनको गन्मार्ग- 7. तारा सामान समस्त जोपर देने ती जमाने मस्त जीवोपर परम करणा- . कार “ग्गा नोना नकरा हे ॥ २३-२५ ।। --- Tivi vị " - 17: ? '! inो पाया पांव , नयनी, सी और श्रेष्ठ चारिता. ": 1, मंगो को गार प्रशिन करना, उनके पति प . 7 -- - - -- MSIWASHISHIPoweKIPSTHeमा मायालय न्यायमRG [ २६० ] परपीडा च जानाति आत्मपीडामिव सदा । परोपकारकरणे हि दयाचित्तधारकः ॥ २८ ॥ व्रत्यनुकपाभिधं सैव गुण ससारनाशकम् । प्राप्नोति मगधाधीश अनुकपान्न किं भवेत् ॥ २९ ॥ ससारहेतुहतार दान पात्राय योजयेत् । चतु प्रकारं यो भावात् गुण दानाभिधं लभेत् ॥ ३० ॥ ससारवर्द्धकान्येव द्रव्यकर्माणि वा तथा । भावकर्माण्यपि यो हि त्यजते मनसादित. ॥ ३१ ।। गुणोंको चाहना प्रकट कर पूज्य भावसे उनके दुःखोंका नाश करना, उनकी पीडाको शांत करना, वृद्ध, बाल, तपस्वी गणोकी सेवा वैयावृत्य, रोगी और असमर्थ संयमीको धर्म साधनमे लगाये रहना, धर्मात्मा साधर्मी भाइयोंकी आदरभावसे सेवा सुश्रूषा करना, ज्ञानी, विद्वानोको धर्मके अंग समझकर उनका आदरभाव करना, पाठक, उपाध्याय और धर्मके स्वरूपको व्यक्त करनेवाले भव्य जीवोंको सहायता कर धर्ममार्गमें दृढ़ बनाये रखना, दूसरोंकी पीडाको आत्मपीड़ा समझनेवाले भव्य जीव साधर्मी भाइयोंको सब प्रकारसे सुखी बनाना, परोपकार दयाभावसे करना इत्यादि अनेक प्रकारसे धर्म अगोंकी दृढ़ता करना सो व्रती अनुकंपा है। संसारका नाश करनेवाला एक यही गुण है । इस गुणसे समस्त पापकर्म एक क्षण मात्रमें विलीन हो जाते है और अनंत पुण्यकर्म संपादन होता है ॥ २६-२९ ॥ प्रश्न-दानका स्वरूप क्या है ? अर्थ-हे राजन् ! जिस दानसे संसारके बन्धनोंका नाश हो वही सत्यदान है बाकी कुदान है। दान पात्रमें ही दिया जाता है। पात्रमें प्रदान किया हुआ दान सत्यदान कहलाता है। कुपात्र और अपात्रमें प्रदान किया हुआ दान कुदान कहलाता है । चार प्रकारके पात्र में (मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका) चार प्रकारका दान संसारका नाश करता है । और व्यतिरिक्त अपात्रमे प्रदान किया हुआ दान ससारको बढ़ाता है ॥ ३० ॥ प्रश्न-सराग संयम किसको कहते है ? अर्थ-हे राजन् ! संसारको बढानेवाले द्रव्यकर्म और भावकर्मोको मनकी विशुद्ध वासनासे नहीं छोड़ना सो सराग संयम है। भावार्थ-बाह्य वचन और कायकी क्रिया संयमरूप हो, परन्तु मनमें संकल्प-विकल्पोंकी भावना हो, E-SHESM याय न्यायालय मजल्या [ २६१ ] सो हि सरागसज्ञ च गुण शिवप्रदं नृप । लभते भावशुद्धित्वात् क्रमान्मोक्षपद खलु ॥ ३२ ॥ पड् वै जीवनिकायेषु दयापरिणामकारणात् । पडिन्द्रियाणा बधत्वात् परसतोषकारणात् ।। ३३ ।। स्वात्मता सर्वभूतेषु निवृत्तिता ह्यघात्तथा । आच्छादनत्वात् परेपा दोपाणा धर्मदेशनात् ।। ३४ ।। क्रियते यः पुमान् स्वस्मिन् गुणान् चेमान सुखप्रदान् । सयमाख्य गुण सैव प्राप्नोति चेलनाप्रिय ।। ३५ ।। सरमेन ह्यय प्राणी शोभते नरनायक. । सर्वपापक्षय कृत्वा मोक्षधाम व्रजत्यहो । ३६ ।। मयमेन विना सर्वा क्रियाः हि निष्फला मता. । मुनीना वा गृहस्थाना तपोदानादिका. खलु ।। ३७ ।। तरिता: तरति भो भूप तरिष्यति नरोत्तमा । ये हि चानेन लोकेस्मिन् नान्योपायोस्ति किंचन ।। ३८ ॥ द्रव्य कर्म और भावकोंके परित्याग करने में मनको विशुद्धता नहीं हो सो सराग संयम है। राग सहित संयम सो सराग सयम है । यह सराग संयम क्रमसे मोक्षके सुखको प्रदान करनेवाला है ॥ ३१-३२ ।। प्रश्न-संयमका स्वरूप क्या है ? अयं-चलनाप्रिय श्रेणिक महाराज! छह प्रकार (पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजकाय, वायुकाय, वनस्पति- काय और निकाय) के जोवोको रक्षाके लिये अपने परिणामोको विशुद्धताको धारण कर अपने मन और इंद्रियो को गेना अगमा इन्द्रियोंके विषयोका परित्याग करना, दूसरोको सन्तोष भाव प्राप्त हो ऐसा सरलतासे दया- मार शशित ना, गमन जीवो का अपनी आत्माके समान समझ कर समस्त जीवो पर दयाभाव रखना, रोजी रा करना, पापकार्योंसे भयभीत होना, दूसरोके दोपोको ढॉकना, धर्मोपदेशके द्वारा दयाभावका RIPT गादि कारनि मयम भावना प्रकट होती है ।। ३३-३५ ।। भा-माके परिवानाको विश्वनाने के लिये मन और इन्द्रियो को वश करना, विषय कपायो- यालयमा . H- + - - म २ - । . 15 ननकी शामा । माया पान करनेने ही जोर कमीता ! , मग विना समा7, नप, दान आदि शिधाएँ If . हो ना गं । मरमा सामान करने । तिरे ........... i "1 : नानो नी ।। ३६-३८ ।।
[ २६२ ] को गाना नागा च निवृत्तिर्गन तत्र वे । क्षातिर्भवति भो नून सर्वाशर्मविनागिका ॥ ३९ ।। ग मा नारपत्येव सेन क्षात्यभिध गणम् । सर्वसपत्तिकर्तार प्राप्नोति मनुजोत्तम ।। ४०।। किाले गद्विरमण लाभस्यालोभवस्तुत । परलोकनिदानस्य वा पुमान् हि विशुद्धित ॥ ४१ ॥ सैन शोनाभिव नून गुण ह्यगी करोत्यहो । आत्मशटकर भूप निर्ममत्वस्य कारणात् ।। ४२ ।। जिनेन्द्रविनसत्स्नानकरणाच्च रसोत्करे । तत्पूजनात्सुद्रव्यौवे स्तवनान्नमनात्तथा ।। ४३ ।। वैयावृत्यविधानाच्च वालवृद्धतपस्विनाम् । सार्मिजनससर्गात् स्वस्य कुलस्य पोपणात् ।। ४४ ।। मोननात् परवधस्य परदु खनिवारणात् । क्षुधिताय प्रदानाच्च भोजनस्योदकस्य च ॥ ४५ ।। मुनीना त्यक्तसगाना हस्तपादादिमर्दनात् । तेण पादारविंदाना धोवनात्प्राशुकैजल ।। ४६ ।। वस्त्राभरणदानाच्च गृहिणा ब्रह्मचारिणाम् । दयादानस्य सद्दानादन्येपा सर्वप्राणिनाम् ।। ४७ ।। इत्यादिगुणसदोहधारणादस्य नु नृप । भवति आश्रवा ननं सद्वेद्यस्यैव सप्रदा. ।। ४८ ।। संजय अर्थ-क्रोध आदि विकार त्रयको निवृत्ति होना सो क्षति है । जो इसको धारण करता है वह ही क्षमा आदि गुणोंको प्राप्त करता है, मनुष्योमे श्रेष्ठ वह सर्व सम्पत्तिको प्राप्त करता है ॥ ३९-४० ॥ भावार्थ-क्रोध, मान, माया आदि विकारोको मनको पवित्रतासे रोक लेना, उत्पन्न नहीं होने देना सो क्षांति है । क्षांतिसे समस्त दुःख नाशको प्राप्त होता है। अर्थ-हे राजन् ! लोभका त्याग करना ही सो शौच है । समस्त वस्तु मात्रसे निर्ममत्व भावको धारण कर अपनी पवित्र आत्मामें लवलीन होना सो शौच है । इससे महान् पुण्यकी प्राप्ति होती है ॥ ४१-४२ ॥ अर्थ---श्रीमज्जिनेन्द्र देवकी प्रतिमाका भक्तिपूर्वक शुभभावोंसे पंचामृत (दही, दूध,घी, शर्करा, सौं- षधि) से अभिषेक करना, पूजन, वंदना, स्तोत्र आदिके द्वारा भगवान्के गुणोंका स्मरण करना, प्रभुको भक्तिसे नमस्कार करना, वृद्ध, बाल, रोगी, तपस्वियोंकी वैयावृत्य करना, साधर्मी भाइयोंकी सेवा-सुश्रूषा और दान भान समर्पण करना, अपने कुल और कुटुम्बी जनोंका नीतिपूर्वक पालन करना, दूसरे जीवोंको बंधनों से मुक्त करना, भूखे जीवोंको भोजन पान करुणाभावोंसे देकर सन्तोषित करना, दीन असमर्थ लोगोंकी करुणाभावसे सहायता करना, रोगी और पीड़ातुर जीवोंको कष्टसे छुड़ाना, मुनिजनोंके हाथ पाँव आदिको दबाकर सेवा करना, भक्ति करना, वैयावृत्यके द्वारा उनकी यथोचित सेवा करना, उनके चरणकमलोंको प्राशुक निर्मल जलसे धोवना, जमान यालय - मुक्त करना, - पक्षणाभायसे सहायता भफिस मकर [ २६३ ] PRASTRATIMEmaam केवलिश्रुतसघानामवर्णवादतोऽस्य नु. । तथाहि धर्मदेवानां भवत्यावरणो ननु॥ ४९ ॥ भूप दर्शनमोहस्य यस्यैव कारणात् खलु । सम्यग्दर्शनसप्राप्तिः नो भवति कदाप्यहो ॥ ५० ॥ एपा सक्षेपत कुर्वे वर्णन च पृथक् पृथक् । शिवद त्व शृणु भूप स्वचित्तस्य समाधिना ॥ ५१ ॥ दुर्बुद्धिधारकाः केचित् ब्रुवत्येव मनोक्तित । महामिथ्यात्वस मग्नाः सदा द्वापरसभृता. ॥ ५२ ॥ कोट्यादिपूर्ववर्माते जीवति भोजनादृते । कथ केवलिनश्चेमे इदं पश्यत सज्जना ॥ ५३॥ गुप्तत्वेन सदाहार भुजति सकला इमे । अतो हि सशयो नास्ति देवाा. केवलेक्षगा ॥ ५४ ।। नामान्यपुरुषोप्येव बिना न्यादेन अत्र हि । महातो तदृते तेहि कथं तिष्ठति भो वुधाः ॥ ५५ ।। जैनधर्म अनुयायो गृहस्थोंको वस्त्राभूषण प्रदान करना, ब्रह्मचारी आदि संयमी जनोंको वस्त्र आदिका देना, वयादानका करना इत्यादि अनेक शुभ कारणोंसे सातावेदनीय कर्मके आस्लव होते हैं ॥ ४३-४८ ॥ प्रश्न-दर्शन मोहनीय कर्मके आस्रवके कौन-कौनसे कारण हैं ? अर्थ-हे राजन् । केवली, श्रुत, चतुर्विध सघ और धर्ममें अवर्णवाद लगाना, असत्स्वरूप कल्पना करना गो वशंन मोहनीय हमके आत्रव हैं। इनसे सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति कभी नहीं होती है। आगे इन सबका खुलासासे पक्षण बतलाते हैं। उसको ध्यान एकाग्र कर सुनो ॥ ४९-५१॥ पश्न-पनी भगवान् को आवरण किस प्रकार लगाया जाता है ? -- गान् ! नार घानिया कमी को नाश कर फेयलो भगवान् अनन्त चतुष्टय युक्त होते हैं । 7 माता ( अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन ओर अनन्त ही वीर्य और अनन्तसुख) तब ही प्राप्त रम गने ज्यान, गयम और योग द्वारा समस्त दोपोका नाश कर देते हैं । केवली भगवान् "TE IT. Pाग, ग, गेग, चिमा, शोक, उपसर्ग आदि एक भी बोष नहीं रहता है। इसलिये ...::.fafi प्रभातो देव, नागेन्द्र और समस्त त्रिलोक जीव उनको सर्वो- 7. Tो : मलिने पजा नवना जोर गुणगान करते है। परन्तु ऐसे गा, गित् साना हाने । ::RAIT रिये ममत्त पुमो नमान " : "1", TRITI II मीनिनो र गते जयमच्यालयमा -- -- ..' . क ।
[ २६४ ] TweSHISH- आतका हि भवत्येव तेपा शातिकमंजसा । भेपजैश्च प्रकुर्वति देवाः तत्सेवका' ह्यत ।। ५६ ॥ उपसर्गापि जायन्ते किञ्चित्पापोदयाच्च वै । निर्जराः तद्विनाश च कुर्वन्ति नात्र संशयः ॥ ५७ ।। ते नग्नापि तथाप्येव पोडशाभरणान्विता । सर्वेषा च प्रदृश्यन्ते देवातिशयमण्डिता ॥ ५८ ॥ तुम्बी वा कम्बल दण्ड रक्षन्ति ते न सशयः । कालभेदेन वर्तेत तेषा ज्ञानोपि निश्चयात् ।। ५९ ।। केवलज्ञानिनामेव सर्वेषु महता खलु । तारकाणा च सर्वेषा निर्दोषाणा विमानिना ।। ६० ॥ निलिंपाधिपनागेन्द्रखचरेन्द्रनरेन्द्रभि । पूज्यपादारबिन्दाना गुणवता गुणेष्वपि ।। ६१ ॥ इसलिये गुप्त आहार ग्रहण करते होंगे । लुक-छिपकर देवगण या उनके भक्त गण आहार करा देते होंगे । एक साधारण पुरुष आहारके बिना एक वर्ष नही रह सकता, तो महान् पुरुष कोटि वर्ष पर्यंत किस प्रकार सजीवित रह सकते है ।। ५२-५५ ॥ अर्थ-केवली भगवान्को रोग भी होता है। जब भोजन करते हैं तब उसका विकार कफ, वात और पित्त अवश्य ही रोगोंकी उत्पत्ति करेगे। और उसकी शांति देवगण करते हैं। अथवा उनके भक्तगण अनेक प्रकारकी औषधियोंके द्वारा शांति करते हैं ॥ ५६ ॥ अर्थ-केवली भगवान्के उपसर्ग भी होते हैं। क्योकि अभी उनके पापका कारण असातावेदनीय कर्म- का उदय मौजूद है । असाता कर्मके उदयसे दुःख और उपसर्गोका होना स्वाभाविक बात है। पापसे क्या नहीं होता है । भगवान्के असाताका उदय होना यह भी तो पाप है ॥ ५७ ॥ अर्थ-केवली भगवान् यद्यपि नग्न हैं तो भी उनकी शोभा देवगण षोड़श भूषण पहना कर करते है। क्योंकि भगवान् त्रिलोकके प्रभु हैं और वे नग्न रहें तो उनका अतिशय ही क्या रहा ? और उनकी प्रभुता ही महान् कैसी मानी जावे ? क्योकि महान् वही है जो उत्तमोत्तम पदार्थोंसे सुसज्जित रहता हो ॥ ५८ ॥ अर्थ---केवली भगवान् तुम्बी, दण्ड और कम्बल रखते हैं क्योंकि इसके बिना वे प्रभु शौच क्रिया किस प्रकार करें। तथा भयका निवारण किस प्रकार करें एवं शीत आदि की बाधासे अपनी रक्षा किस प्रकार करें। अर्थ--केवली भगवान्का ज्ञान भी कम बढ़ (न्यूनाधिक) हो जाता है। कालभेदसे केवली भगवान्के ज्ञानमें हीनता प्रकट होती है। भगवानके शयन समय ज्ञान ठीक-ठीक नहीं रहता है और जाग्रत अवस्थामें वे Je pense questa wegen Memegmegmegmawegmegmegnes सावचेत रहते हैं।
[ २६५ ] इत्यादिगुणयुक्ताना येऽधमाः कल्पयंत्यहो। असद्भूताभिध दोषमनंतभवदायकम् ।। ६२ ।। प्राप्नुवन्ति नूनं ते हि केवल्यावरणाभिधम् । दोषं भो मगधाधोश भवाकूपारवर्द्धकाः ॥ ६३ ।। प्राशुकस्य पलस्यैव मधोः मद्यस्य वा तथा । नवनीतस्य वा प्राप्ते नो दोषः किमपि खलु ।। ६४ ।। मातृस्वस्रादिकस्यैव मैथुने कन्दभक्षणे । रात्रिभोजनपानादौ अहो नास्ति कदाप्यहो ।। ६५ ।। कामबाधा यदा साधोः उत्पद्यते तदैव हि । सेवनीय च वित्तस्य स्त्रियं दासी च कन्यकाम् ।। ६६ ।। - अर्थ--इस प्रकार केवली भगवानमें अनेक प्रकारकी असत् कल्पना अपने मनोनीत भावोंसे कितने ही अज्ञानी करते हैं । परन्तु केवली भगवान में उक्त प्रकारको असत् कल्पना किसी प्रकार भी सम्भावित हो नहीं सकती है। जबकि केवली भगवान्ने समस्त कर्मोंका प्रचण्ड राजा मोहनीय कर्मका ही नाश कर दिया है तब फिर उनके दोषोत्पत्ति किस प्रकार हो सकती है। समस्त दोष मोहनीय कर्मके उदयसे होते है। उसके अभाव- में दोषोको सत्ता रह नहीं सकती। इनलिये भगवान्में दोष नहीं होते हुए भी कल्पित फर मिथ्या स्वरूप मानना सो केवलोका अवर्णवाद । उनसे मोहनीय कर्म का आरमय होता है । जिससे अनन्त ससारका बंध हो ॥ ५९-६३ ।। अर-माम पकाकर प्राशुरू होता है। उसका भक्षण करनेमें धर्मशास्त्रको आज्ञा है। इसी प्रकार गा, मI (जार) और नवनीतो सेवन करने में कोई भी हानि नही है, दोप नहीं है । इस प्रकार मलिन और माने निरन्तर परिपूर्ण पदार्योका सेवन करना पवित्र मानना और ऐसी शास्त्रकी आज्ञा बतलाना यह 17 (HI) in ॥ ६४ ॥ -IIT, हित, पुत्रो आदि परन्नो सेवन करने में मूलान्दो भक्षण करनेमें, रात्रि भोजन- 1 " :... ITI पानिनली नाना, लग प्रकार नोति और मदानार विकल पमानों का सेवन करना और ... Triri मानना नोपना आधार ॥६५॥ :- RAE BEAT) Tो हामीम, तो यह तो पीठातो का, हामी ..::. ::Trit | मोनो पार नी । नारका पर्ग है जास्त साजरा शायरलमान्स [ २६६ ] चा माधो सेवा नून स्त्रवैयावृत्यमिद्धये । अर्पणोयाश्च स्ववामा' कामार्तायैव साधवे ॥ ६७ ॥ अर्पणं न करोत्येव स्वस्त्रिया. साधये च य । सेव स्वधर्मतो वाह्यो मतो नास्त्यत्र सशयः ॥ ६८॥ इत्याये ये वजन्त्येव उन्मार्गे चाक्षपोषकाः। केचित् पृच्छन्ति तानेव महो कुमार्गपोपका ॥ ६९ ।। क्वाचार मनिंद्य च भवद्भिः [धकारकम् । इद कस्यानुसारेण आगमस्य च स्वीकृतम् ।। ७० ।। अगीकृत च अस्माभि यन्नून सकल बुधा' । आचरण तद्धि शास्त्रोक्त तदृते न. किमपि नो ॥ ७१ ।। इमे सर्वे च मप्रोक्ताः आगमेपु न सशयः। स्त्रीसेवनादिका. कार्या नो निद्यातो भजामहे ।। ७२ ।। शास्त्रादृते किमप्येव नास्त्येवाचरण खलु । अस्माक शास्त्रमर्यादात्सर्वमस्ति क्रियादिकम् ।। ७३ ।। कि पीडाको किसी प्रकार भी शांत कर सुखी रहे । ऐसी आज्ञा धर्मशास्त्रकी बतलाना, इस प्रकार अपने मन- की मलिनतासे धर्मशास्त्रमे मिथ्या दोष लगाकर कहना सो श्रुतका अवर्णवाद है ।। ६६ ।। अर्थ---अथवा साधुकी कामपीडाको शांत करनेके लिए उनके भक्तगणोको अपनी-अपनी सुन्दर स्त्रियों का दान कर देनेमें विशेष वैयावृत्य होता है। जो भक्त इस प्रकार अपनी सुन्दर स्त्रीको साधुकी कामपीडाको शांत करनेके लिए प्रदान करता है वह धर्मको स्थिर करनेवाला चैयावृती है । कदाचित् कोई भक्त इस प्रकार कामपीडाको शांतिके लिए अपनी स्त्रीको साधुके लिए नहीं प्रदान करे तो वह अपने धर्मसे बाह्य है, इसमे जरा भी सन्देह नहीं है । इस प्रकार अपने-अपने स्वार्थको सिद्ध करनेके लिए महानसे महान् भयङ्कर पापको भी उत्तम मानना और उसको धर्मशास्त्रको आज्ञा बतलाना यह सब श्रुतका अवर्णवाद है ॥ ६७-६९ ॥ अर्थ-इस प्रकार धर्मशास्त्रमें मिथ्या अवर्णवाद लगानेवालोसे कितने ही विचारशील मनुष्योने पूछा कि हे नीति और सदाचारकी पवित्र मर्यादाको अपने स्वार्थसे नष्ट करनेवाले हो और इसीलिए पवित्र धर्म- शास्त्रको बदनाम कर अपना मतलब सिद्ध करनेवाले हो, यह निंद्य पापकारक मलिन आचरण कौनसे आगम- से कहते हो और आचरण करते हो ? ॥ ७० ॥ अर्थ--यह श्रवण कर पापीने कहा कि जो कुछ हम आचरण करते है, वे सब धर्मशास्त्रसे ही करते । धर्मशास्त्रकी आज्ञाविरुद्ध कुछ भी नहीं करते है। "कामपीड़ित साधुको स्त्री देना", मांस, मद्य, मधु, नव- तीत आदिका भक्षण करने में हानि (पाप) नहीं बतलाना इत्यादि जितने कार्य है वे सब शास्त्रमें बतलाये है। राजent FRमरच्या हैं [ २६७ ] धूर्ता. इत्युक्तेन गुणवतो महतो हि श्रुतस्य च । असद्भूत च दुर्दोषं ददाति यो हि मानव. ॥ ७४ ।। श्रुतावरणवादाह्न सो हि दोष कुदुःखदम् । स्वीकरोत्येव भो भूप शास्त्रदोषप्रदानतः ॥ ७५ ।। यथा हि पर्वतो विप्र गतो हि सप्तमावनौ। कथयित्वैव जीवौघा घातयोग्या इमे खलु ॥ ७६ ॥ तथा हि किं न यास्यन्ति ग्रन्थदोपस्य कारणात् । ते मूढा इन्द्रियाणा च पोषकाः शास्त्रनिदकाः॥७७॥ पशूपमाश्चेमे शुद्रा दिगम्बरा.. खलु । तथा त्रयीवहिर्भूताः शुचित्वकर्मवजिताः ॥ ७८ ॥ निर्लज्जा मललिप्तागाः अत्रैव दुखभाजनाः । परत्रापि भविष्यन्ति महादु खस्य भाजना. ।। ७९ ॥ महता कथयत्येव य पुमान् सैव निश्चयात् । सघावरणवादाख्यं दुर्दोष च लभत्यहो ॥ ८० ।। इसमें सन्देह नहीं मानना चाहिए । शास्त्रविरुद्ध चलने में हम भी पाप समझते हैं। परन्तु हमारे शास्त्रोंमे उक्त गमस्त क्रिया करनेकी आज्ञा दी है । इस प्रकार परम पवित्र धर्मशास्त्रमे असद्भूत दोषोको लगाना सो श्रुतका अवर्णशाद है ॥ ७१-७४ ।। अर्थ-हे राजन् ! यह श्रुतावर्णवाद महान् पापका आस्रव करनेवाला है। पर्वत ब्राह्मण समान सातवें नरकामे ने जानेवाला है । पर्वतने भी जीवहिंसाको धर्म बतलाया था और उसने शास्त्रमें लिखा है कि गुरुजोने मंगानी प्रकार बतलाया है, इस प्रकार श्रुतमें मिथ्या स्वकल्पित दोपोका लगाना सो सब श्रुतका अवर्ण- पार ॥१५-१६॥ जन---गंगता वर्णनाद क्या है ? 1- गन् । पवित्र और सर्वोत्कृष्ट सदाचारको पालन करनेवाले, कुल ओर जातिसे अतिशय विनिमी को अपने सगेग्ने धारण करनेवाले, शांत, मन मोर इन्द्रियोको विजय करने गिम्बर गाय को पतं, पशूमम शूद्र करना, मलिन बतलाना, निलंजा कहना, मोगा। गाम अमदन दोगोको सपना कर मिथ्या निन्दा . .. - TR: लो प्राप्त माहे ॥ ७८-८० ।। ....::: ::: - - - [ २६८ ] L-ALIRASHICSHIPAHESHCH SAREERया च्यापियार निर्गुणोय खलु धर्मो जिनोक्तो धर्मवर्जितः । वर्तन्ते ये हि लोकेस्मिन् पुरुषाः तद्विधायकाः ॥ ८१॥ तेहि सर्वेपि चाग्रेहि भविष्यन्त्यसुरा' खलु । अतोय सर्वतो वाह्यः सप्रोक्तो वेदधारिभि ।। ८२ ।। वेदधर्मेण सर्वेहि लोकाः तरन्ति चान्यतः। नो तरन्ति कदाप्येव अस्माद्बाह्याः परे मताः ।। ८३ ।। महति गुणवति चैव तारके भव्यदेहिनाम् । ईदृशे सर्वदेवेन्द्र पूज्ये धर्मेच्युतोपमे ॥ ८४ ।। केवलज्ञानसम्पन्न. प्रणीते दोपवजिते । यः पुमान् स्थापयत्येव दोषं पूर्वोक्तसंज्ञकम् ॥ ८५।। धर्मावरणवादात दोष प्राप्नोति सैव वै। अनन्तभवदुःखाना कारक मगधाधिप ।। ८६ ॥ सर्वज्ञोक्तसम धर्म नो पर भुवनत्रये । मोक्षद पापहन्तार मताऽन्ये दु:खदायकाः॥ ८७ ॥ पिबन्त्येव इमे सर्वे निर्जरा नात्र संशयः । मद्य अदन्ति मास च मधु वा चामृतोपमम् ॥ ८८ ॥ होमस्य सकलाते हि सामग्री स्वात्मतोषदाम् । स्वीकुर्वन्त्येव रक्त च सद्योजात च निश्चयात् ॥ ८९ ।। प्रश्न--धर्मका अवर्णवाद किस प्रकार होता है ? अर्थ-हे मगधेश्वर ! श्रीजिनेन्द्रदेव द्वारा प्रतिपादित (अहिंसा परमो धर्म) अहिंसास्वरूप सर्वोत्तम पवित्र सदाचार विशिष्ट इन्द्र, नरेन्द्र, विद्याधरादि त्रिलोकके उत्तम पुरुषोंसे सेवनीय ऐसे पवित्र जैनधर्मको निर्गुण बतलाना, अधर्म स्वरूप बतलाना, उसके धारण करनेवाले मरकर असुर, राक्षस आदि होंगे ऐसा असद्- भूत दोष लगाना, जैनधर्म वेदको नहीं मानता है अतएव नास्तिक है, धर्मबाह्य है, ससारके समस्त जीव वेद- से ही तरेंगे, अन्य धर्मसे नहीं। इस प्रकार अपने अज्ञान भावोंसे हिसा (पशुबलि) करनेवाले वेदके धर्मको सत्य समझ कर परम दयामयी सत्य जैनधर्ममे असद्भूत दोषोको कल्पना करना और असत् दोषोंको अपनी मनोनीत कल्पनासे पवित्र जैनधर्ममे लगाना सो समस्त धर्मका अवर्णवाद है ।। ८१-८६ ॥ अर्थ--हे मगधाधिपति ! तीन लोकमें सर्वज्ञके द्वारा कहे गये जैनधर्मसे श्रेष्ठ कोई अन्य धर्म नही है । यह जिनधर्म मोक्षको देनेवाला और पापोका नाश करनेवाला है। इससे भिन्न अन्य मत दुःखोंके देनेवाले हैं।८७॥ प्रश्न-देवोंका अवर्णवाद किस प्रकार होता है ? अर्थ-हे श्रेणिक ! देवोंका शरीर वैक्रियक होता है इसलिए उनके शरीरमें मद्य, मांस आदिका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है । देव स्वयं पवित्र होते हैं । वे मद्य, मांसका सेवन नहीं करते है। परन्तु मिथ्यात्व कर्मके TREATRETIRELESEDIArea मयमा -- [ २६९ ] एपामथ च सर्वेहि रचिता जन्तवोखिलाः । स्वयंभुवा अतो नून होमविधिरपि तथा ॥ ९० ।। देवार्थ मारयन्त्येव ये जीवा. तेहि सत्पदम् । प्राप्नुवन्त्यत्र सन्देहो नास्त्येव तद्धि शर्मणात् ।। ९१ ।। होमाग्नी पतिता येहि वामा वा पुरुपोत्कराः । हस्त्यश्वा सौरभेयाश्च अजावृन्दा नपुसकाः ।। ९२ ।। तेहि सर्वे गता नाकलोके शर्माधिसभृते । एपा मास च देवाहि स्वीकुर्वन्ति सदैव हि ।। ९३ ।। होमकाले अतो यज्ञविधि. प्रोक्त स्वयभुवा । नास्त्यत्र सशयो नूनं नानाशर्मप्रदायकम् ।। ९४ ॥ इत्यादि लक्तितो येहि ब्रुवन्ति तेहि निश्चयात् । लभन्ते दुखद दाप देवस्यावर्णवादजम् ।। ९५ ।। उदयसे ऐसे पवित्र देवोको मद्यपायी बतलाना, मांस भक्षी कहना, मधुसेवी कहना, सो देवोका अवर्णवाद है ।। ८८-८९ ॥ अर्थ-इसी प्रकार (देवोंके विषयमें) होमके समय देवगण तत्काल काटे हुए बकरा आदि पशुओंका रातपान करते हैं। उनका मास भक्षण करते हैं । इसीके लिए समस्त जानवर या प्राणी बनाये गये है ॥९०॥ अर्थ-जो देवोका प्रसन्न करनेके लिए जीवोको मार कर बलिदान देते है वे सत्पथके गामी है । जसमें मन्येह नही करना चाहिए । उनको स्वर्गके सुख प्राप्त होते हैं । इसलिए देवोके सामने पशुओको मार कर चहाना यह उत्तम धर्म है ।। ९१ ॥ मर्ग-नी, पुरषोले हायसे होममें पड़े हुए हाथी, घोड़े, कुत्ते, बकरे, नपुंसक, मनुष्य और दूसरे पाणी पर नियम वर्गको प्राप्त होते हैं। जोगन ना नहाये हा तीजका माम देवगण स्वीकार कर भक्षण करते हैं। इसीलिए ब्रह्माने ऐसे गरी निर्माण होते। IPाने को स्वर्गको प्राप्ति के लिए होम निधि बतलात। और होममे जीवो को मार if;"!" नारर नाता तो देवगण गतिलो जायेंगे। इसलिए उनको । ... ... .. ॥ २२.११ ।। Rainiri ने मिना र आगंवार कार नहीं। TAH . " [ २७० ] यायाव्याच्या अदोपे दोपकथनादस्य नुरेभि कर्मभि । मिथ्यात्वाभिधमोहस्य आश्रवा हि भवन्त्यहो ।। ९६ ।। शृणु चारित्रमोहरय कारण कथयाम्यहम् । तीवभावो भवत्येव कपायोदयतो ननु ।। ९७ ।। यस्य तस्यैव चारित्रमोहस्य भवति खलु । बन्धो भो मगधाधीश सर्वदु.खप्रदायक ।। ९८ ।। 'वतिना शीलयुक्ताना मुनीना ब्रह्मचारिणाम् । वृथैव दूषण दु ख ददात्येवापवादकम् ॥ ९९ ॥ स्वस्य वा हि परस्यैव करोत्युत्पादन वृथा । कषायस्यैव यो नून तथा हि धर्मध्वमकम् ॥ १०० ।। मात्सर्यं चैव पैशुन्य निन्दा हास्य च धर्मिणाम् । शीलवतस्य त्याग हि विभ्रमोत्पादक तथा ॥ १ ॥ अन्तराय च सद्धर्मकार्ये क्रोधादिक तथा । सन्यासिजगमादीना सेवा वा व्रतधारणम् ॥ २॥ इस प्रकार केवली, श्रुत, संघ, धर्म, देवके सर्वथा निर्दोष स्वरूपमे दोष कहना, असद्भूत कल्पना करना सो मिथ्यात्व कर्मका कारण है । अनन्त संसारको बढ़ानेवाले मिथ्यात्वका आस्रव इससे होता है ॥ ९५-९६ ॥ अर्थ-हे मगधेश्वर ! चारित्र मोहनीय कर्मके आस्रव बतलाते है-कषायोके उदयसे परिणामोंमे तीव्र कषाय पूर्व संक्लेश भावोंके होनेसे चारित्र मोहनीय कर्मका आस्रव होता है । कषायोंका उदय और तीव्र परि- णाम चारित्र मोहनीय कर्मके बंधके कारण है । और सर्व दुःखोंके देनेवाले है ॥ ९७-९८ ॥ अर्थ--व्रती, सयमी, सदाचारी, मुनि, ब्रह्मचारी, आर्यिका, श्रावक, श्राविकाओ पर व्यर्थ दूषण लगा देना, उनको निन्दा हो और धर्मका प्रभाव घटे ऐसा कार्य या अपवाद प्रकट कर देना, धर्मको ध्वस करनेवाली हंसी या कथा कह कर जीवोंको सन्मार्गसे हटानेका प्रयत्न करना, धर्मात्मा पुरुषोसे मात्सर्यभाव रखना, उनकी चुगली कर उनको सन्मार्ग से गिरानेके भाव रखना, शीलव्रतोंके धारक पुरुषोको शीलका माहात्म्य घटानेके SHESH FIRemiurvarASURad जायमान १ कुशिक्षा और विपयोंको अनर्गल प्रवृत्ति जिस समय उत्पन्न होती है, उस समय मनुष्यकी बुद्धिमे कुत्सित स्वार्थके वश दुर्वासना हो जाती है जिससे वह विवेकको भूलकर निर्दोष और पवित्र पुण्यपुरुपोको अपने समान पापी बनानेका प्रयत्न करता है। उत्तम सदाचारीके गुणोको उनके सन्मानको उनके आदर्श चरित्रसे उत्पन्न हुए निर्मल यशको देखनेमे असमर्थ होता है। इसलिए किसी प्रकार मै उनकी निन्दा कर जगत्मे उनकी महिमाको न बढने दूं, इस प्रकारको धारणासे अनेक प्रकारके दोप असद्भूत दोप मनोनीत भावोसे कल्पित कर जगत्के सामने रखता । परन्तु इसमे संयमी या पवित्र चारित्रके धारक मुनिगणोकी हानि नही होती है । उनका यश और अधिक उज्ज्वल होकर विश्वव्यापी बनता है। परन्तु इस प्रकार कुत्सित कमसे अपनी आत्माको वह अवश्य ठग कर नरकादि दुर्गतियोका पात्र बनाता है ।
-T प्राय । रसा। होता पगलिए ~ नर प्रपारख दोन अगदमटा दोर बानि भाग्य मुनिगणोपी छागि नाही पति - orm irrrrr RAMMAneumsuman च [ २७१ ] इत्यादिभिर्नराधीश अस्य जीवस्य निश्चयात् । बंधश्चारित्रमोहस्य भवत्यनन्तदुःखदः ॥३॥ अस्योदये हि अस्यैव नो भवत्येव श्रेणिक । चारित्रपालने शक्तिश्चाल्पमात्रापि नुर्ननु ।। ४ ।। बन्धो भवति भो भूप तीव्ररागस्य कारणात् । परद्रव्यापहरणात् निश्चलवैरकारणात् ।। ५ ॥ मिय्यादर्शनससर्गात् शीलवतादिनाशनात् । अत्यैव कृष्णलेश्यत्वादत्यन्तरौद्रध्यानतः ॥ ६ ॥ बालवृद्धपशूना वन्धनान्मारणात्तथा । हिमादिक्रूरकार्यस्य करणात्प्रेरणात्तथा ॥ ७॥ विपयाणामतिगृद्धत्वादनृतस्य च पोपणात् । सेवनात्पररामाया निशाभोजनकारणात् ॥ ८॥ अगालितजलस्नानकरणात् कन्दभक्षणात् । मधुमद्यादिमासानामदनाज्जिननिन्दनात् ।। ९ ।। नगत्यायुपश्चास्य कर्मणः पुरुपस्य वै । इत्यादिकर्मतो नून सदा दुःखविधायकः ॥ १०॥ । GETHREE अभिप्रायसे विभ्रम उत्पन्न कर देना, धर्मकार्यमें अन्तराय कर देना, संन्यासी, पाखण्डी, कपाली और बाह्य पुरुयोकी मेवा करना इत्यादि सर्वचारित्र मोहनीयके आस्रव हैं । हे श्रेणिक ! महाराज इस कर्मके उदयसे चारित्र पालन करने को अल्पमात्र भी शक्ति नहीं होती है ॥ ९९-४ ॥+ पग-नरक गति कौन-कौनसे कार्योसे होती है ? - गान ! तोन रागका करना, तीन मोह युक्त परिणामोको रखना, दूसरोके द्रव्यका अपहरण TFIT, निकालना, मियादृष्टिग्योका मंगर्ग करना, ब्रह्मचर्यका नाश करना अथवा दूसरोके ब्रह्मचर्य- TITII गना, चामर टोना, अत्यन्त आतं-रोद्र व्यानता मतत् चितवन होना, बाल-वृद्ध पशुओको iii HTTोको गाग्ना, अगमर्थ पोन पशुओंतो मारना, हिंसादि पाप कार्योंमें it: 1, "EETimirf माता, पियोगे अतिशय गवता (विशेष अनुगग) राना, पर- : • . : ... " fa PT. Finानेपानीने नागाविसमस्त क्रियाना, कन्या का वन i, Tा, मी निन्द्र भगवान् और उनके पवित 1. . : नामा TAIT f7 (नकाय) 1 । , , 5 २७२ ] HESH - वचनात्परमत्यस्य असत्यानन्दधारणात् । नीलकापोतलेश्यत्वात् सदार्तध्यानकारणात् ।। ११ ।। लोपनात् सद्गुणाना च इतराणा च कीर्तनात् । अनर्थवचनस्येव कथनात्परपीडनात् ॥ १२ ॥ करणात् कृत्रिमवस्तो दूतत्वाच्च परस्य वै: । लोपनात् वचनस्यैव अन्यथैव प्रजल्पनात् ।। १३ ।। मायाकुकर्मभिश्चैव इत्याद्यैर्भववृददैः। तिर्यग्योनिसम नून दुःकर्मान्यो नहि नृप ।। १४ ॥ तैर्यग्योन्यायुपो बन्धो भवत्यस्यैव प्राणिन । अनन्तानन्तदु खाना दायको वा भयप्रद ॥ १५ ॥ विनीतप्रकृतित्वाच्च परद्रव्यस्य हापनात् । स्वभावभद्रसम्भावात् असूयत्वात्परस्य च ।। १६ ।। शोपणात्स्वतनो व्रतध्यानाद्यैः शुद्धकर्मभिः। अन्तकाले चासक्लेशभावस्य करणात्तथा ॥ १७ ॥ भापणान्मिष्टवाक्याना सजीवादिरक्षणात् । शिकतारेखसमानक्रोधस्य धारणात्तथा ॥ १८ ॥ पट्कर्मपालनाच्चैव मिथ्यादर्शनवर्जनात् । क्रयाणा विक्रयाणां च शुद्धाना कार्यकारणात् ।। १९ ।। प्रश्न-तिर्यंच कौन-कौनसे पापोसे होता है । अर्थ-हे मगधेश्वर ! तिर्यश्च आयु समान अन्य दुष्कर्म अन्य नहीं है। मायाचारी रखना, दूसरोंको ठगना, झूठ वचन बोलना, नोल-कपोल लेश्याके परिणाम रखना, आर्तध्यानके परिणाम बनाये रखना, दूसरोंके सद्गुणोंका लोप करना और अपनी अपने आप प्रशसा करना, अनर्थकारी वचनोंका बोलना, दूसरोको पीड़ा वेना, कृत्रिम वस्तुका उत्पन्न करना, दूतकर्म करना, अन्य जीवोको ठगना, मिथ्या प्रलाप करना, मिथ्या प्रजल्प करना, मायाचारसे ठगना इत्यादि पापकर्मोंसे अनन्तानन्त दुःखोको देनेवाली, भयप्रद ऐसी तिर्यञ्च आयुका आस्रव होता है ॥ ११-१५ ॥ प्रश्न-मनुष्य आयुका बंध कौन-कौनसे कारणोसे होता है ? अर्थ-हे राजन् ! नम्र स्वभाव रखने, सरल भाव रखनेसे, दूसरोके द्रव्यको चोरी, अपहरण आदि नहीं करनेसे, स्वभावसे, भद्रपरिणामी होनेसे, अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रह रखनेसे तथा ईर्ष्या रहित परि- णामसे, मनुष्य आयुका आस्रव होता है ॥ १६ ॥ अर्थ-सब जीवोके साथ दया परिणाम रखना, व्रत ध्यानादिकके द्वारा अपने शरीरको कृश करना, उत्तम शुभाचरणोका पालन करना, अन्त समयमें असंक्लेश परिणामोंका रखना, मिष्ट हितकारी वचनोंका प्रति- पादन करना, त्रसजीवोंको रक्षा करना, बालूके समान क्रोधके परिणाम होना, षट्कर्मीका पालन करना, राजाजयमामाच्या २७३ 1 ज्ज रापमा मिश्रपरिणामतश्चेवाल्पसक्लेशभावतः । जिनेन्द्रपूजनान्नित्य गुरूणा सेवनात्तथा ।। २० ॥ श्रवणाज्जिनशास्त्राणा लिखित्वा अर्पणाच्च वै । गुरवे स्वस्य हस्तेन वा धनेनोपदेशत. ।। २१ ।। भवभोगागशर्मादौ उदासीनस्य कारणात् । कापोतपीतलेश्यत्वात्परजीवस्य रक्षणात् ।। २२ ॥ मानाभावात् मृदुभावादल्पारम्भस्य धारणात् । तथाल्पपरिग्रहत्वाच्च यथाविनयपालनात् ।। २३ ।। इत्यादिकर्मतश्चास्य मानुपम्यैव आयुप । बन्धो भवति भो नून शर्माशर्मप्रदायकः ।। २४ ।। पालनात् द्वादशाना च व्रताना धर्मसग्रहात् । मूलादिगुणवताना अङ्गीकारस्य कारणात् ॥ २५ ॥ धारणात् स्वेदमल्लाना बुभुक्षत्वस्य रोधनात् । सहनत्वाच्च तृष्णायाः भूशयनस्य कष्टत. ।। २६ ।। कष्टेन ब्रह्मचर्यस्य धारणात् बन्दिदुगृहे । परितापादिकाना च सहमानादिहादृते ।। २७ ।। एकदण्डी त्रिदण्डीना सन्यासितापसा पुन. । तथा परमहसाना परिव्राजादिका पुनः ।। २८ ॥ इत्यादीना च वालाना सदाहिमादिकारकाम् । परममिथ्यादृष्टीना तपसः सेवनादपि ।। २९ ।। मिथ्यात्वका परित्याग करना, व्यापारमे नीति और श्रेष्ठ निष्ठका रखना, परिणामोंमे असंक्लेशताको धारण करना, जिनेन्द्र भगवान्का नित्य पूजन करना, गुरुओंको सेवा-सुश्रूषा वैयावृत्य करना, जिनवाणी शास्त्रोंका उद्धार करना, अपने द्रव्यका जिनशासनकी वृद्धिमें उपयोग करना, संसार भोग और देहसे विरक्त भावोंका धारण करना, पर पदार्थोसे उदासीन रहना, कापोत-पीत लेश्याके परिणाम होना, समस्त जीवोकी दया पालना, निरहवार भाव व सरस परिणाम तथा कोमल भावोंका होना, गुरुजनोंका विनय करना इत्यादि कार्योसे मनुष्य आयुका आस्रव होता है ।। १७-२४ ।। प्रश्न-देवगतिका आस्रव कौन-कौनसे भावोंसे होता है ? अर्थ-हे राजन् ! बारह प्रकारके व्रतोंका पालन करना, धर्मका सेवन करना, आठ व अठाईस (श्रावक व मुनि अपेक्षा) मूलगुणोका पालन करना आदि उत्तम चारित्रके धारण करनेसे देव आयुका आसव होता है । स्वेद मलको धारण करनेवाली दोक्षा लेना, भूख, प्यास आदि बाधाओंका सहन करना, पृथ्वी पर शयन करना, बन्दीगृह आदिके निमित्तसे ब्रह्मचर्य पालना, अकाम निर्जराके कारण उत्पन्न करना, परिताप, धूप, गर्मी, शीत आदि वाधाओका सहन करना, एकदण्डी, निदण्डो, संन्यासी, वावा आदिके अज्ञान भेषोंको धारण कर मिया तपश्चरण करना, परमहंस परिवाज बनकर नग्न होकर तपश्चरण करना, बाल तप, बाल [ २७४ ] ज्जामा "HAPRASWESARDANESHeave trans कायक्लेशवतन्यैव धारणात्कष्टसेवनात् । तथा हि शुद्धसम्यक्त्वात् नित्येज्याकर्मकारणात् ।। ३० ॥ इत्यादिहेतुतश्वाम्य देवानामायुपो नृप । प्राप्तिर्भवति नुनून सदाशर्मप्रदायक. ॥ ३१ ।। केचिदेवा च मध्येहि कर्मवन्धा नरेश्वर । कुदेवयोनिक र. केचित्सुदेवदायका. ॥ ३२॥ पगधीनस्य मृत्यत्वात् वालादितपसस्तथा । अय जीवः प्रयात्येव कुदेवयोनिपु सदा ।। ३३ ।। महानताणुनतत्वात् सम्यक्त्वशुद्धभावत. । यात्येव शुद्धदेवाना पदेपु वार्चनादित ॥ ३४ ॥ शुद्धभावेन सप्राप्तिर्भवत्यस्यैव निश्चयात् । परमशातभावस्य इतरेणेतरस्य हि ॥ ३५ ।। सिद्धिर्भवति मोक्षस्य चित्तशुद्धयाहि अस्य नु । तथाहि इतरत्वेन श्वभ्रनिकोतकस्य वै ॥ ३६ ॥ मत्वेति सकला भव्या दानेज्याव्रतसचयम् । परिणामस्य सशुद्धया कुर्वीध्व च सदैव हि ।। ३७ ॥ चारित्र और बाल (हठ) योग ध्यान आदि क्रियाकांड करना, हिंसादि क्रूर भाववाली दीक्षाको धारण कर कष्ट सहना, मिथ्यादृष्टियोके मलिन आचरणोको धारण कर कष्ट सहन करना, काय-क्लेशका सहन करना, कष्ट पूर्वक व्रतोका धारण करना इत्यादि कारणोसे देव आयुका आस्रव होता है । शुद्ध सम्यग्दर्शन, शुद्ध चारित्रका पालन, नित्य भगवान्की पूजादिक शुभ कर्मोका पालन, शुभ भाव, कषायोंकी शांतता ध्यानकी प्रवृत्ति सामायिक आदि व्रतोंका पालन इत्यादिक कारणोसे सदा सुखदायक उत्तम देव आयुका आस्रव होता है ॥ २५-३१ ॥ अर्थ--देवोके भवनत्रिक और कल्पवासी ऐसे दो भेद हैं । भवनत्रिक सर्व कुदेव कहलाते है और कल्प- वासी सुदेव (सम्यग्दृष्टि) कहलाते है । पराधीन और परवशसे व्रतोंका पालन करनेसे या बालतप ( अज्ञानी मिथ्यादृष्टियोंका) तपश्चरण करनेसे कुदेव गतिका आस्रव होता है ॥ ३२-३३ ॥ अर्थ--सम्यग्दर्शन सहित शुद्धभावोंके धारण करनेसे और सम्यग्दर्शन पूर्वक महाव्रत-अणुव्रत आदि धारण करनेसे उत्तम देवायुका बंध होता है। विशुद्ध भावोसे उत्तम देव आयुका बध होगा और मलिन भावों से कुदेव आयुका बंध होगा ॥ ३४-३५ ॥ अर्थ-इस जीवको मोक्षकी प्राप्ति सम्यग्दर्शनादिपूर्वक चित्तशुद्धिसे होती है। जिनके ऐसी चित्तकी शुद्धि प्राप्त नहीं हुई है और मिथ्यात्वके उदयसे चित्तकी मलिनता प्रतिसमय मलिन हो रही है, ऐसे जीवोंको जास्त २७५ ] यस्यमय भावशुद्धया च यो मर्त्यश्चाल्पमात्रमपि बुधाः । दानपूजादि सत्कार्यं करोति सैव निश्चयात् ।। ३८।। लभत्येव वरा पक्ति शर्मणा च फलस्य हि । अन्तरेण विनाचाग्रे जन्मनि जन्मनि सदा ।। ३९ ॥ योगाना वक्रत्वाच्चैव विसंवादाच्च भो नृप । कुनाम्नश्च भवन्त्येव अस्याश्रवाश्च कर्मण. ॥ ४० ॥ सक्षेपतश्च एतेपा शृणु व्याख्यानमजसा । त्याज्यं ससारभीतैश्च दयार्द्रचित्तधारकैः ।। ४१ ॥ कायेनाऽन्यत्करोत्येव वचसान्यद्ब्रवीत्यहो । अन्यद्धि चिन्तयत्येव दुर्मनसा सदैव हि ॥ ४२ ॥ Makmalusaluselfone SHESHeawire नरक या निगोद गतिका बंध होता है । इसलिए जिस प्रकार हो भावोंकी शुद्धि सदैव निर्मल रखनी चाहिये। जिनके भाव निर्मल नहीं रहते हैं वे व्रत, तप करने पर भी उत्तम फल प्राप्त नहीं कर सकते हैं। और जिनके भाव निर्मल है वे बिना व्रत, तपके भी सुगतिका लाभ सम्पादन करते है। इसलिए हे भव्यजीवों ! अपने-अपने भावोंको भगवान्की पूजा, दान, अभिषेक, प्रतिष्ठा महोत्सव, जिनधर्मको प्रभावना आदिसे विशुद्ध बनाओ, जिससे भव-भवमे उत्तम सुखकी प्राप्ति होती रहे ॥ ३६-३८॥ प्रश्न-कुनाम कर्मका आस्रव कौन-कौनसे कारणोसे होता है ? अर्थ-हे राजन् ! मन, वचन, कायकी कुटिलता, सामि भाइयोंके साथ विसंवाद करना इत्यादिक कार्योसे कुनामकर्मका आस्तव होता है । आगे इसका विशेष खुलासा करते है ॥ ३९-४० ॥ अर्थ-कायसे कुछ अन्य कार्य करना, वचनसे कुछ अन्य ही भाषण करना और मनमे कुछ अन्य ही भाव रखना ( अर्थात् मन, वचन और कायकी कुटिलता रखना, मायाचार पूर्वक प्रवृत्ति करना ) सो योगोकी वक्रता फहलाती है । इस प्रकार योगोंकी वक्रतासे कुनामकर्मका आस्रव होता है । ( मन, वचन, कायकी कुटिलता ) आत्मगत हो तो वह योगीकी वक्रता कही जाती है। और वही दूसरोके लिए उत्पादिका हो तो उसीको विसंवाद कहेगे। संसारसे भयभीत, दयालु चित्तधारकोंके द्वारा इनका त्याग करना योग्य है ॥ ४१-४२ ।। भावार्थ -अन्य मनुष्यके परिणामोमें कुटिलता उत्पन्न कर वाद-विवाद करना या अन्यके लिए अपने परिणामोमें कुटिलता लाफर वाद-विवाद करना सो विसंवाद है । ment । । मराजच्यमान्यायामाचा [ २७६ ] एव हि त्रिविधाना च योगाना यस्य वक्रता । भवत्येव हि तस्यैव योगवक्रत्वमुच्यते ।। ४३ ॥ मता"आत्मगतत्वाच्च अस्यैव योगवक्रता । तस्य परगतत्त्वाच्च विसवादोहि सम्मत ॥४४॥ स्वस्य कौटिल्ययोगेन स्वस्मिन् कर्माणि य पुमान् । वध्यते कुटिलान्येव स्वात्मदु खकराण्यहो ॥ ४५ ।। सैव प्राप्नोति दोष च योगवक्रत्वमहदम् । विसंवादस्य भेदोत्र कथ प्रोक्तो द्वितीयक ॥४६ ।। सम्यक् प्रवर्तते कश्चित् क्रियासु मनुजोत्तम । परमाभ्युदयदायकेपु हि भद्रभावयुक् ॥ ४७ ॥ पुमास वर्तमान त तत्रैव कोपि दुर्मति । दृष्ट्वा हि मानव स्वस्य विपरीतस्य तैस्त्रिभि. ॥ ४८ ।। मिथ्या प्रेरयति ह्येव माकार्षी. भो नरोत्तम । त्वमेव च इद कार्यं मयोक्त त्व कुरु सदा ॥ ४९ ॥ इमे कार्या हि दातारो नो शिवस्य कदाप्यहो । कुर्वाणाश्च त्वया नूनं मया प्रोक्ताः हि शर्मदा. ॥ ५० ॥ इत्येव नाहि यो भूप मोचापयति यन्नरम् । शुभकार्यात्तथा त च दुर्मार्गे पातयत्यहो ॥ ५१ ॥ सैव तत्कर्मतो नून विसवादाभिध नृप । प्राप्नोत्येव महादोषमशुभनामकारकम् ।। ५२ ।। अर्थ--अपने मन, वचन, काय अपने ही (आत्म कार्यके लिये) कार्यके लिए कुटिलताको धारण करे, मायाचार पूर्ण मन, वचन, कायकी प्रवृत्ति बनी रहे वह योगोको वक्रता है। इस प्रकार योगवक्रतासे कुनाम- कर्मका आस्रव होता है । ४३ ॥ अब शङ्का यह होती है कि दूसरा भेद विसंवाद है वह जुदा क्यों बताया है ? इसलिये आगे विसंवाद- का स्पष्टार्थ करते है- अर्थ-एक भद्रपरिणामी भन्यजीव श्री जिनागमकी आज्ञानुसार सम्यक् प्रकारसे एक शुभ क्रियामें प्रवृत्त हो रहा है और शुभाचरणोको पालन कर रहा है। उसकी इस शुभ प्रवृत्तिको देखकर कोई दुष्ट जीव विपरीत भावोको धारण कर अपने मन, वचन, कायकी कुटिलतासे कहे या मिथ्या प्रेरणा करावे या मिथ्यामार्गमें (स्व मनकल्पित असन्मार्गमे) ले जानेके लिए मीठी बातोसे समझावे कि, आप यह काम क्यों करते हो ? यह तो ठीक नहीं है । इससे आपकी हानि होगी। इस कर्मके फरनेसे लाभ नही है। इस पूजाभि- षेक, ब्रह्मचर्य की रक्षाके लिये दान देने से मोक्षकी प्राप्ति नही होगी। यह मत करो और मै बतलाऊँ वह कार्य करो जिससे सुख मिले, लाभ हो । इस प्रकार उस भव्यजीवको शुभ कार्य से छुडाकर कुमार्गमें पात करा देने, पाप कार्योमें लगा देवे सो विसंवाद कहलाता है ॥ ४४-५२ ॥ परमीशमाचारजन्यन्यायालयाच्या HISHIRSHIP-RSH मान्यमाच्या २७७ ] -- मिथ्यादर्शनतरचैव पैशून्यत्वतस्तथा । धारणात्कूटमानाना तुलकायाश्च कूटतः॥ ५३॥ कूटेन परद्रव्यरय हरणान्मानकारणात् । वचनार्थ परेपा च वेपोज्वलत्वधारणात् ।। ५४ ।। दु मन्त्रतन्त्रयोगेन तथा चूर्णरसेन वै। सौभाग्योत्पादनादन्यद्वशीकरणकार्यतः ॥ ५५ ।। दावानलप्रदानाच्च इष्टकोच्चयपाचनात् । तदोपदेशानुमोदात्तत्कर्तुः व्यवहारतः ।। ५६॥ आरामखण्डनाच्चैव वृक्षाना लूयनात्तथा । वापिकाकूपकासारकरणाद्वास्य कारणात् ।। ५७ ॥ देवागमगुरूणा च पूजाद्रव्यस्य भक्षणात् । परकुतूहलोत्पादनात्परेपा विडबनात् ।। ५८॥ क्रोधाद्याना चतुर्णा च वर्द्धनात्परपापदात् । पापकर्मोपजीवित्वान्महाआक्रोशधारणात् ।। ५९ ।। भावार्थ-विसंवादका यह अभिप्राय है कि मायाचारको धारण करनेवाले मनुष्योंकी सनकी दुष्टतासे जो स्वार्थसिद्धि के लिए वचनकी मीठी-मीठी प्रवृत्ति और कार्यकी मोहक चेष्टा जिससे सामनेवाला अपने अभि- प्रायको नही जानकर अपनी बातोमे और अपनी चेष्टामें फँस जावे और इससे सन्मार्गको छोड़कर पाप मार्गमें लग जावे वह विसंवाद कहलाता है । अर्थ-मिथ्यादर्शनके प्रभावसे अशुभ नामका सदैव आसान होता है। चुगली करना, झूठे माप करने गज-पाली-मानी आदि माप रखना, कमती बढ़ती तोलना, मायाचारसे दूसरोकी द्रव्य हर लेना, दूसरोंको ठगनेके लिये ऐसी सोसायटी बनाना, कुशिक्षाके अभिमानसे दूसरोको पीडाकारक मन्त्र-तन्त्रोंकी रचना करना, दूसरोको ठगनेके लिये ऊँचा भेष धारण करना। झूठे मन्त्र-तन्त्र व चूर्ण रसका प्रयोग कर पाप कर्मकी चेष्टा करना, पुत्र-पौत्रका लोभ देकर दूसरोकी स्त्रियोको वश करना, दावानल लगाकर बतलाना, इंधनका ढेर लगा कर जलाना, (होली बनाकर जलाना) अथवा ऐसे ही पापिष्ठ कार्योकी अनुमोदना करना, ऐसा पापिष्ठ उप- देश देना, कुमार्ग या पापमार्गमें ले जानेवाले मिथ्या लेख लिखना । ऐसे व्यवहार करना कि जिससे कुमार्गकी वृद्धि हो, जीव हिंसाके कार्य करना, वागबगीचा करवाना, वृक्षोके जंगलके काटनेका ठेका लेना, कुंआ, बावड़ी, तालाब आदि खोदनेका पापारम्भ करना या कराना और उसमें धर्म मानना । देव-शास्त्र-गुरु सम्बन्धी द्रव्यका भक्षण करना, दूसरोको कौतूहल उत्पन्न करनेवाले वचन कहना, दूसरोकी विडम्बना करना, क्रोध, मान, माया, लोभ फपायोफो बढाना या ऐसे भावोसे कपायोत्पादक कार्य करना, पाप मार्गका उपदेश देना, मिथ्या मार्गकी MPSC [ २७८ ] आथवा मायभायरल सघस्य इत्यादिकानो भप भन्याया । दुमिवार कर्तार अशुभनागकर्मण ॥६०॥ कारणान् व शृणु भप -शुभनाम्नश्च कर्मण । तद्विपरीतत्वेनास्येव आश्रवा हि भवत्यहो ॥ ६ ॥ प्रयाणा व योगाना ऋजुभावस्ग कारणात् । परेपा सज्जनाना हि अविसवादनात्तथा ।। ६२ ।। सार्मिजनसमिलनादत्यन्तहर्पधारणात् । अभ्युत्थानस्य करणात् अत्यादरमजल्पनात् ।। ६३ ।। मायाभावम्य सत्यागात् प्रमादवर्जनात्तथा । परपैशन्यसत्यागात् स्थिरचित्तस्य धारगात् ।। ६४ ॥ परप्रशसनत्वाच्च आत्मनिन्दनकारणात् । जल्पनात्मात्यवाक्याना कूटमाक्षित्ववर्जनात् ।। ६५ ।। वर्जनात्परद्रव्यस्य अल्पारम्भपरिग्रहात् । सन्तोपाच्च परेपा वै परदु खविमोचनात् ।। ६६ ।। रूपादिमदनि शात् उज्ज्वलवेषधारणात् । सदस्य जल्पनाच्चैव मृदुवचनभापणात् ।। ६७ ।। सेवनाद्धर्मकार्यस्य करणात्तथा । जिनयात्राप्रतिष्ठाना जिनधर्मोपदेशनात् ।। ६८॥ प्रशंसा कर उपदेश देना, पापकर्मको आजीविका बतलाना, आक्रोशको धारण कर कुचेष्टा करहा, कामवासना से मन, वचन, कायको कुचेष्टा करना, कामके रागसे हँसना, विभ्रम उत्पन्न करना इत्यादिक कुकार्योसे अशुभ नामकर्मका आस्रव होता है ॥ ५३-६० ।। अर्थ-हे राजन् ! शुभनामकर्मके आस्रवको सुनो । जो-जो कारण अशुभ नामकर्मके आस्रवके बतलाये है । उसके विपरीत कारण शुभ नामकर्मके आस्रव है। तो भी विशेषतासे स्पष्ट बतलाते है । मन, वचन, काय योगोंकी सरलता, परिणामोकी कोमलता, सज्जन पुरुषोंके साथ अविसंवाद, साधर्मी भाइयोके मिलने पर अतिशय हर्ष, भाव संयमी जनोके संयोग होनेपर खड़ा होना, अत्यन्त आदरके साथ नम्र भावोंसे वचनालाप करना, मायाचार परिणामोका परित्याग करना, प्रमादका परित्याग करना, चुगली और निन्दाका परित्याग, चित्तको स्थिरताका धारण करना, धैर्यसे धर्म सेवन करना, दूसरोंके गुणोंकी प्रशंसा करना, अपनी आत्मनिन्दा करना, सत्य वचनोंका संभाषण, कूट, कर्कश, गुह्य, हास्य और कामोत्पादक वचनोंका परित्याग, झूठी साक्षी का परित्याग करना, दूसरोंको द्रव्यका अपहरण नहीं करना, अल्प आरम्भ और परिग्रह रखना, सन्तोषपूर्वक शांत भावोसे रहना, दूसरोंके साथ वैर भावका परित्याग करा देना, जीव मात्रके साथ मैत्रीभाव प्रकट करना, अन्य जीवोंको दुःखोंसे छुड़ाना, अपने स्वरूपका अभिमान नही करना, अभिमानका परित्याग करना, ब्रह्म- चर्यादि उत्तम भेषका धारण करना, सत्य भाषण करना, मृदु वचनोंका उच्चारण करना, चतुर्विध संघको सेवा मजयमान्च्यायमाद्यमाच्या osobe s brother [ २७९ ] च (PSTHA SHESHAVes अवशीकरणाच्चैव परसौभाग्यवर्द्धनात् । हास्यत्यागात्परेपा अकूतहलकारणात् ।। ६९ ।। इष्टकापाकदावाग्नेः वर्जनात् धनरक्षणात् । निर्मापणात्तथा जैनविम्बाना धातुवस्तुभिः ।। ७० ।। तत्प्रमादादस्थ करणात् जीर्णोद्धारणात्तथा । भ्रामणात्तद्रथस्यैव पुरवाह्यवने शुभे ।। ७१ ।। तन्नामस्तवनाच्चैव अविडम्बस्य धारणात् । चतुर्णां च प्रशमनात् क्रोधाद्याना सदैव हि ॥ ७२ ।। अपापकार्यजोवित्वात् परवस्तुविवर्जनात् । परापवादसत्यागात् परुपवाक्यलोपनात् ।। ७३ ॥ बुभुक्षुसत्वदानाच्च जिनगुणस्य गायनात् । मृगादिपशुजातीना बन्धनिशितात्तथा ।। ७४ ।। अस्यैत्र आश्रवाश्चेमे भवत्येव नरेश्वर । इत्यादिशुभसभावात् शुभनाम्नश्च कर्मणः ।। ७५ ।। सदेव शुभनामं च प्राप्नोत्येव अय पुमान् । एभिः सुकमभिर्नेन सदा शर्मप्रदायकैः ।। ७६ ॥ करना, धर्मकार्य में अत्यन्त हर्ष सहित उत्साहित रहना, तीर्थयात्रादि धर्म कार्योमें तत्पर रहना, श्रीमज्जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमा आदिका प्रतिष्ठा महोत्सव करने में समुत्सुक होना, श्रीजिनेन्द्र भगवान्के शासनकी वृद्धिके लिए सत्य धर्मका उपदेश करना, दूसरोंको ठगनेके लिए वशीकरण आदि प्रपंच नहीं करना, समस्त जीवोको सुखी करनेका प्रयत्न करना, हास्य और कौतूहलका त्याग करना, वनमें अग्नि नहीं लगाना, होली इत्यादि हिंसक क्रियाका परित्याग करना, जैन मूर्ति निर्माण कर प्रतिष्ठापूर्वक श्रीजिनालयमें विराजमान करना, जैन चैत्यालयका बनवाना, श्री जिनमन्दिरको स्थापना करना, श्रीजिनागमकी वृद्धि और रक्षाके लिये सरस्वती भवन खोलना, गुरुओको सेवाके लिये वसतिका (मठ), गुफा आदिका बनवाना, प्राचीन जीर्ण-शीर्ण श्रीजिन- मन्दिरका जीर्णोद्धार करना, भगवान्का रथ महोत्सव करना, जलयात्रा, विधान करना, अष्टोत्तर कलशोंसे प्रभु (श्रीजिनदेव) का महाभिषेक करना, अनेक प्रकारके गीत नृत्योके द्वारा भगवान्के गुणोका स्मरण करना, रात्रि जागरण कर प्रभुके गुणोका गान स्तुति भक्तिके द्वारा करना, हिंसादि पंच पापोंका परित्याग करना, क्रोधादि कपाय भावोको छोड़ना, पाप कार्योकी आजीविका नहीं करना, पशुओके बंधन छुड़ाकर अभयदान फरना, दूसरोका अपवाद नही करना, भूखो को अन्नदान देना, दीन, अपंगु, अन्धा, कोढ़ी, दुःखी जीवोकी रक्षा करना, जोयोको पापमार्गसे बचाना, श्रीजिनेन्द्र भगवान्के भक्त साधर्मो भाइयोकी सेवा-सुश्रूषा-विनय तथा जादग्भाव करना, भोजन पानादिकसे सन्तुष्ट करना, स्थिरभाव करना, वात्सल्य प्रकट करना, जिनमार्गको पभावना प्रकट करना इत्यादिक शुभ कार्यासे शुभनामकर्म के आस्रव होते हैं ॥ ६१-७६ ।। ।
यमराज [ २८० ] तीर्थकराभिधो गोत्र. अस्यैव परमेश्वरः । बध्यते कर्मभि कैश्च निलिंपाधिपवदित ॥ ७७ ॥ पोडशभावनाभिश्च भव्योत्तमस्य अस्य वै । श्रीतीर्थकरगोत्रस्य बधो भवति भूपते ।। ७८ ॥ तेषा नामानि त्व भूप शृणु एकानमनसा । अनतशर्मसदानि सर्वपापाग्नितोयदै. ॥ ७९ ॥ सम्यग्दर्शनशुद्धिमहनिकर शैलेति वनोपमा-माद्या सर्वव्रतेपु मोक्षसुखदा भव्यैर्नरै सधृताम् ।। ८० ॥ दोपै सर्वविजिता मुनिवरो यो धारयत्येव भो । नून सैव लभत्यही वरमति सद्भावना भूपते ।। ८१ ।। यो रत्नत्रयपालकेषु मुनिषु अत्यतहपत्सिदा । कुर्यादेव विनाकपायसुहृदा निर्वागशर्मप्रदम् ।। ८२ ।। नानाशर्मप्रदायक च विनय प्राप्नोति सैव ध्रुव । सर्वेषु विनयाभिधा मुनिनुता सद्भावना श्रेणिकः ।। ८३ ॥ प्रश्न-श्रीमत्तीर्थकर प्रभुका गोत्र कौनसे शुभ कार्योसे होता है ? अर्थ--हे मगधेश्वर ! इन्द्र, नरेन्द्र, धरणेन्द्र आदि समस्त त्रिलोकी जीवोंसे सदैव पूजित पंचकल्याणोके द्वारा जगत्में परमाश्चर्यको प्रकट करनेवाले ऐसे श्री तीर्थंकर प्रभुका गोत्र षोडश भावनासे बंध होता है । उनका स्पष्टीकरण विशेष स्वरूपके द्वारा बतलाते है उसको हे राजन् ! एकाग्र मनसे सुन जिससे पापोंका नाश हो ॥ ७७-७८॥ अर्थ--हे मगधेश्वर ! समस्त पापरूपी पर्वतोके नाश करनेके लिये वज्रके समान, समस्त व्रतो मुख्य भव्यजीवोसे सदैव आराध्य, समस्त दोषोसे रहित, समस्त जीवोका उपकार करनेवाली यह दर्शनशुद्धि भावना है । जो मुनीश्वर इस पवित्र भावनाको परिणामोको विशुद्धतासे धारण करता है वह श्रोतीर्थकर गोत्रका बन्ध अवश्य ही करता है । पच्चीस दोष रहित, आठ गुणों सहित निर्मल परिणामोसे श्रीजिनदेव जिनागम और श्रीजिनगुरुका श्रद्धान पूर्वक सम्यग्दर्शनको धारण करना सो दर्शनविशुद्धि हे ॥ ७९-८१ ।। अर्थ-हे श्रेणिक ! रत्नत्रय और रत्नत्रयको पालन करने वाले मुनिजनोकी अतिशय भक्तिपूर्वक ओर अत्यन्त हर्षके साथ निष्कपाय शुद्ध भावोसे विनय करना, उनके गुणोमें आसक्त होना, हाथ जोड़कर नमस्कार करना, अंतरंग परिणामोसे अतिशय पूज्य मानना, लोकोत्तम शरणभूत ओर मोक्षमार्गके हितकारी समझना सो विनय नामको भावना है। इससे सर्व सुखको प्राप्ति होती है ।। ८२ ॥ अर्थ-देव शास्त्र और गुरुको सत्य प्रमाणित मानकर आत्महितके लिये सेवा भक्तिपूर्वक विनय करना SHARELESceneHASTHMAHESHearSwedicSHeave-मान HeHESHPAHESHe- L २८१ J MGelurralweusztult HEARTHrnजच्यासमा सर्वेषु योहि धत्ते असमगुणनिधि. शोलवत्तेषु मौनो । अनतोचागत्वमेवानुदिनं सचवैश्यवशुद्व्या नरेन्द्र ।। ८४ ।। अनतोचारत्वसज्ञा परमपददा भावना धर्मबोजा । वद्या इन्द्रादिदेवैः सकलमलहरा पालयत्येव नूनम् ।। ८५ ।। ज्ञान दोपविजित जिनमुखादुत्पन्नमेव शुभं । पापापापविभेदक रविप्रम त्रेधा विशुद्धया मुनिः ।। ८६ ।। काले काले सदैव सु पठति यः ईदृशं धर्मबीज । शुद्धा सैव सुभावनामघहरा ज्ञानाभिधा शप्रदाम् ।। ८७ ।। संसार दुःखमूल बुधजननिकरै सर्वकालेषु हेय । निस्सार शर्महोन सकलविधिकर पारहीन अभव्यैः ।। ८८ ।। चाहिये । इसीप्रकार जिनधर्म, जिनचैत्य, जिनचैत्यालय धर्मको धारण करनेवाले भव्यजीव आदि को यथा- योग्य विनय करना चाहिये।। ८३ ॥ अर्थ--हे श्रेणिक ! जो भव्यजीव समस्त व्रतोमें अतीचार नहीं लगाता है, मन, वचन, कायकी विशुद्ध भावनासे सम्यक् श्रद्धापूर्वक पालन करता है और अपने व्रतोंको सर्वोत्कृष्ट समझ कर निर्मल भावोंसे निस्पृह ( निवांछा ) पूर्वक पालन करता है वह समस्त उत्तम सुखोंको प्रदान करनेवालो, देवोसे पूजित शीलवतेषुअन- तीचार नामकी भावनाको धारण करता है ।। ८४-८५ ॥ अर्थ-हे श्रेणिक ! जो भव्यजीव दोष रहित, श्रीजिनेन्द्र भगवान्के मुख कमलसे उत्पन्न हुए सम्य- रज्ञानका मन, वचन, कायकी विशुद्धिसे कालमे पठन-पाठन, मनन, स्वाध्याय करता है वह ज्ञान भावनाको धारण करता है ।। ८६-८७ ।। भावार्थ--श्रीजिनागमका श्रद्धापूर्वक विशुद्ध भावोंसे पठन-पाठन करना सो ज्ञानभावना है। जिनागम ही धर्मका बीज है । पापोका नाश करनेवाला है और आत्मा आदि अमूर्तीक अतीन्द्रिय पदार्थोको प्रकाशने के लिये सूर्य के समान है । कल्याण मार्ग इससे हो प्रकट होता होगा । वस्तुका यथार्थ परिज्ञानसे ही प्राप्त होगा। इस प्रकारके भावोसे श्रोजिनागमका अभ्यास करना और इसके सिवाय अन्य ज्ञानको संसारका मार्ग समझकर त्याग करना सो ज्ञानभावना है। अपने बालक-बालिकाओको भी जिनागमका अभ्यास सबसे प्रथम कराना चाहिये । अन्य ज्ञानके अभ्याससे बुद्धि मलिन और संस्कार मलिन होते है। अर्थ---ससार दुःखका मूल है । विचारशील भव्यजीव इस संसारको सर्वथा हेय और निस्सार समझते है। इसमें रचमात्र भी सुख नही है । समस्त उत्तम कार्योका नाश करनेवाला है। उसका पार पाना अभव्योंसे Mee Luired [ २८२ ] PADHESHI Howevemesiresemomen- याच्यासायच्या एव चित्ते विचार सकलविधिहर यो मुनिर्भावशुद्धया । सैव सवेगसंज्ञा सुभजति नृपते भावना कुर्वते हि ॥ ८९ ॥ शक्त्यनुसारतोवै सकलसुखकर पुण्यबीजं सुदानम् । पात्रार यच्छति य सकलमतिप्रद शुद्धभावाद्यतेन्द्र. ॥ ९० ॥ त्यागाख्या सैव नून लभति च नृपते भावना भावशुद्धया । अहाना वारनाशे ह्यसुखावहरा वज्रतुल्या सदैव ॥ ९१ ॥ प्रोक्त श्रीजिननायकैमुनिनुत ससारपारप्रदम् । नानाकर्मविनाशक मुनिवरो यः शक्तिलोपादृते ॥ ९२ ॥ पालत्येव विशुद्धितो हि अमल द्विपट्प्रम सत्तप । सैव भो मगधाधिप सुतपजा ता भावना सेवते ॥ ९३ ।। साधूना साधुबुद्ध्या अमलगुणप्रदा यः करोति नरेन्द्र. । तेपामुत्पन्नविघ्नेनशनतपबलात् शोलसपद्युतानाम् ।। ९४ ॥ योगाना धारणाद्वै अतिकठिनशिलातिष्ठनाच्चोपसर्गात्, दुष्टाना योगतो वै व्रतयमनिवहपालकाना सदैव । राद्धातालापबोधे परमसुखप्रदै पापसतापहारै , वान्योपायैमुनीन्द्र तदुपशमन भो वाहि विघ्नस्य नाश ।। ९५ ॥ कठिन है। ऐसे संसारको अपना हितरूप न समझ कर संसार सम्बन्ध भोगोपभोगोपर ममत्व भावका त्याग करना और संसारको चाहना मन, वचन, कायकी शुद्धिसे नहीं करना सो संवेग भावना है। संसारसे विरक्तता और आत्मभावना सो सवेग भावना है ।। ८८-८९ ।। अर्थ--हे राजन् ! अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक भावोको विशुद्धिसे मन, वचन, काय और द्रव्यकी शुद्धिसे दान देना सो त्याग भावना है। इस प्रकार नित्य ही पात्रमे दान देनेको उत्कट भावना और अत्यन्त हर्षित परिणाम त्यागभावनाके उत्पादक हैं। इस प्रकारको भावनासे समस्त सुख प्राप्त होते हैं ।। ९०-९१ ॥ अर्थ-हे मगधेश्वर ! श्री जिनेन्द्र भगवान्ने संसारका नाश करनेके लिए और समस्त कर्मोका विध्वंस करनेके लिए अत्यन्त पवित्र बारह प्रकारका तप प्रतिपादन किया है । उसको जो यतीश्वर भावोंकी विशुद्धिसे अपनी शक्तिको नही छिपाकर धारण करते है वे तपोभावनाका पालन करते हैं ॥ ९२-९३ ॥ अर्थ--हे मगधेश्वर ! शील, संयम, व्रत, तपयुक्त साधुगणोके व्रत, नियम, तपादि अनुष्ठानमें आनेवाले विघ्नोका दूर करना, अतिशय कठिन पाषाण आदि पर योग धारण करनेपर आये हुए दुस्सह उपसर्गोके विघ्नो- को दूर कर रत्नत्रय की रक्षा करना। आधि-व्याधि और दैवी उपसर्ग आ जाने पर संयम और रत्नत्रयकी रक्षा करना, दुष्ट मनुष्य, तिर्यञ्च और देव आदिसे होनेवाले उपद्रवोंसे रत्नत्रयको रक्षा करना, मरणादिक भयङ्कर TESTHESHWASHESH [ २८३ ] वंद्या पूज्या मुनीन्द्रः शुभगगुणप्रदा भावना मोक्षबीजा, साधुसमाधिसंज्ञा परमहितकरा सैव प्राप्नोति नूनम् । वृद्धाद्यानां मुनीना परमगुणवता क्रियते यो मुनीन्द्रः, पादादिमर्दनाद्धि सकलसुखप्रदा सैव भूपेन्द्र नूनम् ॥ ९६ ॥ वैयावृत्यं च सैव लभति च शिवदा सर्वव्रतेषु सारा, वैयावृत्याख्ययुक्ता सकलविधिहरा भावना भव्यवद्याम् । विधीयते यत्स्नपनादिजाप्य स्तवं तथा तद्गुणचिंतनं च, श्रीमदर्हता शुभभावशुद्धया सदैव काले मुनिसत्तमोहि ।। ९७ ॥ सैव नरेन्द्र भजते विशुद्धा भक्ति मनापापविभञ्जकानाम् । तन्नाभजा ता शुभभावना हि सत्सातदा भव्यनरैः प्रपूज्याम् ॥ ९८॥ आचार्याणा करोति परमरुचिवशात्पादपद्मस्य पूजा-मभ्युत्थानं तदाप्ते सन्मुखप्रगमन सभ्रमस्य विधानम् । आज्ञादान च तेपा पुनः प्रणतयो यतीन्द्रः त्रिशुद्धया, प्राप्नोति भावना स. सकलमुनिनुता सूरिभक्त्याख्ययुक्तां ॥ ९९ ।। । HHOSHDSHAHPSIHEETA उपद्रव उपस्थित होने पर शास्त्रोंका उत्तम धर्मोपदेश, सम्यग्ज्ञानका सदुपदेश, संसारको निस्सारता आदिका प्रदर्शन कर रत्नत्रयकी रक्षा करना, समाधिमरण समय संक्लेश परिणामोंसे सद्बोध द्वारा रक्षा करना, सो सब साधुसमाधि है । इस भावनासे आत्मा स्थिर, शांत और आत्म भावनामें लवलीन रहता है । अर्थ--हे राजन् ! वृद्ध, बाल, असमर्थ रोगी ऐसे परम गुणवान् मुनीश्वरोकी हृदयसे भक्तिपूर्वक सुश्रूषा, पाद मर्दन आदि अनेक प्रकारसे वैयावृत्य करना सो वैयावृत्य भावना है । रोगी मुनियोको औषधि ( प्रासुक और रोगको नाश करनेवाली ) प्रदान करना, असमर्थ और शीतादिसे पीड़ित मुनियोको वसतिकादि प्रदान कर वेयावृत्य करना, बाल मुनियोको जिस प्रकार धर्ममे दृढ़ता प्राप्त हो, वैसे वैयावृत्य करना चाहिये। अर्थ-हे राजन् । जो श्रीमान् जगत् पूज्य अरहन्त भगवान्की प्रतिमाको साक्षात् अरहन्त मानकर भक्तिपूर्वक विशुद्ध भावोसे ( मन, वचन, कायकी शुद्धतापूर्वक ) पञ्चामृताभिषेक पूर्वक पूजा करना, गुणगान करना, स्तवन करना, पूजन करना, वन्दन करना, अष्टविधार्चन करना आदि समस्त रूपसे श्रीजिनेन्द्र भगवान्- के स्वरूपका चिन्तन करना सो सब अरहन्त भक्ति है ॥ ९४-९८॥ अर्थ-हे राजन् ! जो हृदयकी विशुद्धि और भक्तिभावनासे आचार्य परमेष्ठीके चरण-कमलोकी पूजा फरना, आचार्य महाराजको सामने आते ही ( देखकर ) खड़े हो जाना, हाथ जोड़कर विनयसे नमन करना, उनके पीछे-पीछे विनयसे चलना, उनको आज्ञाको शिरसा वंद्य समझ कर बहुत सन्मानपूर्वक धारण करना, [ २८४ ] । CASE-SUWAHISHASHA शानाधिपारगे रामनिए मतिमान् यो विधत्तेनुराग, वचनालापेरनल्पै गुणयश कथनैरभ्युत्थानादिकैश्च । मेव वहश्रुतजा गदा मृग्नप्रदा भो भूपते भावना, लभते सयमधो सुभगगुणयुक् द्वापरो नात्र भव्य ।। १०० ।। शुने श्रीमज्जिनोक्ते सकलमु गणेर्माननीये प्रपूज्ये, भव्याना तारके हि अमलमतिप्रदे तत्वदीपे मनोज्ञे । भदः करोति मुनि च प्रवचने भावशुद्वयानुराग-माप्नोति शर्मदा यः प्रवचनसुनामजा वरा भावना स ॥ १०१ ।। आवश्यकानि मुनिसत्तमाना यो विभृते पट् शिवदायकानि । काले च काले मकलाहहान्य त्रिशुद्वितो वै मुनिसत्तमश्च ॥ १०२ ॥ उनका योग्य सन्मान कर सदैव अर्चना करना, उच्च आसन देकर अभ्यर्थना करना और उनकी सेवा-सुश्रूषा फरना सो आचार्यभक्ति है ॥ ९९ ॥ अर्थ-हे राजन् ! जो समस्त शास्त्रके पारगामी ओर आगमको जाननेवाले ऐसे उपाध्याय परमेष्ठीको भक्ति करता है, उसके बहुश्रुतभक्ति होती है। उपाध्याय परमेष्ठीकी आज्ञाको शिरोधारण करना, विनय करना, सेवा-सुश्रूषा करना, हाथ जोडना, नमस्कार करना, मधुर वचनालापसे सन्तोषिक्त करना, पाद मर्दन करना इत्यादि अनेक प्रकारसे भक्ति की जाती है । जिसके आगम पर पूर्ण विश्वास है ऐसे भव्यजीव अपना हित आगमसे ही मानकर आगमके ज्ञाता उपाध्याय परमेष्ठोको पूजा भक्ति कर समस्त सुखको प्राप्त होते है ॥ १० ॥ अर्थ-हे राजन् ! जैनागम समस्त देव, इन्द्र, नरेन्द्र और गणधरेन्द्रोसे पूज्य है। भव्य जीवोको ससार- समुद्रसे पार करनेके लिये समर्थ है, उत्तम निर्दोष ज्ञानका प्रदान करनेवाला है, जगतका उपकार करनेवाला है, समस्त तत्त्वोका प्रकाश करनेवाला है । ऐसे सर्वोत्कृष्ट जिनागमको भाव शुद्धिसे श्रद्धा कर भक्ति करना सो श्रुतभक्ति है। एक श्रुतभक्तिसे जीव सम्यग्दर्शनको प्राप्त कर मोक्षसुखको प्राप्त होता है । देशनाके बिना किसो जीव- का हित नहीं हुआ है । इसलिये जिनागमपर पूर्ण श्रद्धान रखकर आत्मकल्याण करना चाहिये ॥ १०१ ॥ अर्थ-हे राजन् ! षट् आवश्यक क्रियाओंका पालन करना नितान्त आवश्यक है। जो भव्यजीव शरीरादिके अस्वस्थ हो जानेपर और (गृहादिकके) आवश्यक कार्य उपस्थित होनेपर भी षट् आवश्यक क्रियाओं- के पालन करने में प्रमादी नहीं होता है वह. इस भावनाको पालन करता है, पाल्याच्या राज्यमन्त्रालयमा जयमच्या
---SWESHPAHESHESTHeampawRASTREADSHOKAAS
[ २८५ ]
सो भावना सभजते हि आवश्यकापरिहाण्यभिधा विशुद्धाम् । सामायिकाद्यानि सुशुद्धकानि तेषा च चित्तस्य अतो हि कार्या ॥१०३।।
शुद्धव ज्ञानयोगात्पुनः जिनस्नपनाद्वा चतुर्दानदानात्. विद्यामत्राच्च तत्रादतितपकरणात्तीर्थयात्राविधानात् ।
इत्यादिहेतुतोवै परममतिप्रयुक् यः करोति त्रिशुद्धया, श्रीमज्जैनेन्द्रधर्मस्य च खलु नृपते सृप्रभावं मनोज्ञम् ॥ १०४ ।।
सामायिकादि षट् आवश्यक कर्मोको जो अपना मुख्य कर्तव्य समझता है और समस्त कार्योंको छोड़-
कर समस्त प्रकारको क्रियाओंको रोककर मन, वचन, कायको एक भावनासे षट् आवश्यक कर्मोका पालन है
वह इस श्रेष्ठ भावनाका आराधक होता है। इसलिये जिस क्रियाका जो समय है उस समय वह आवश्यक
क्रिया अवश्य ही करनी चाहिये ॥ १०२-१०३ ॥
अर्थ-हे राजन् ! जो भव्य जीव सर्वोत्कृष्ट जिनागमके ज्ञानके द्वारा समस्त मत-मतांतरके असत्
(मिथ्या) तत्त्वोको खंडन कर सत्य और प्रमाणित अनेकांत स्वरूप तत्त्वोका प्रकाश कर जैनशासनकी दृढ़ता
करता है वह मार्गप्रभावना प्रकट करता है । अथवा शास्त्रार्थके द्वारा जैन मतकी सर्वोत्कृष्टताका प्रकाशना सो
मार्गप्रभावना है।
भगवान्की प्रतिमाका विशुद्ध भावोसे और उत्सव, गीत, नृत्यादि पूर्वक पंचामृताभिषेक, जलयात्रा,
प्रतिष्ठा महोत्सव, रथमहोत्सव और चतुःसंघको दान प्रदानके द्वारा महान् प्रभावना की जाती है ।
इसी प्रकार मत्रको शक्तिसे अनेक प्रकारके चमत्कार बतलाकर, धर्मका प्रभाव प्रकट कर, समस्त
दुर्वादि और जड अज्ञानी जीवोको सन्मार्गमें लगा देनेसे भी प्रभावना होती है ।
इसी प्रकार जप, तप, तीर्थयात्रा, जिनमन्दिर निर्माण आदि धार्मिक कार्योकी महिमा प्रदर्शन करनेसे
मार्गप्रभावना होती है।
अथवा चतुःसघ (मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका) निकालकर धर्मका उद्योत करनेसे भी मार्गप्रभा-
वना होती है।
जीवोको अभयदान प्रदान करनेसे और परोपकारके लिये करुणादान करनेसे भी प्रभावना होती है ।
इस प्रकार जैनधर्मको महिमा अन्य मिथ्यामतियोमें प्रकट कर देनेसे धर्मका प्रभाव प्रगट होता है ।
अपनी शक्तिके अनुसार जैनधर्मका प्रभाव प्रकट करना सो मार्गप्रभावना है ॥ १०४ ॥
समान [ २८६ पाप्नोति सैव नून शिवपदगन का चित्तपापारिनी, मागप्रभावना च जिनवरपददा धर्मवृद्धे. प्रयोगात् । वृद्धवा धमम्य लोके किमपि न भवति दुःखपक्ति. शगेरे, शक्त्यानुसारयोगात्सुमुनिवरगणे सर्वदैव प्रकार्या ॥ १०५ ।। पुरुपे भूप करोति य सुहृदा स्नेह महानंदद, स्ववत्से हि यथा च शृगिणि तथा सद्य प्रसूता मुदा । धर्मे जैनेन्द्रगम्ये भजति प्रवचनवत्सलत्वाख्ययुक्ता, सैव सच्छर्मकारा परमगुणप्रदा भावना भो मुनीन्द्रः ।। १०६ ।। एतानि मगधाधिप हृदि सदा जानीहि तीर्थकरस्यैव, तानि पोडशकारणानि सुखदान्येवाहुः सुकर्मण । अस्यैवाश्रवकारणानि सफललेखादिवद्यस्यवे, ससारातपघातकस्य सुमते हे हि भवत्येव च ।। १०७ ॥ लोपन सद्गुणाना च इतराणा प्रकाशनम् । एभिर्हि कर्मभि सैव चतुर्भि दुखदायकै. ।। १०८ ।। लभते नीचगोत्र च शृणु त्व वर्णन ह्यथ । एतेपामेकचित्तेन प्रवक्ष्येह पृथक् पृथक् ।। १०९ ॥ परनिंदाभिध दोप भजते परनिंदनात् । अय पुमान् न सदेह. अनतभवदु.खदम् ।। ११० ।। अर्थ-धर्मको वृद्धि, धर्मकी स्थिरता और धर्मको महिमा प्रकट होनेसे यह भावना सर्वोत्कृष्ट है। समस्त पापोंके नाश करनेवाली है और समस्त प्रकारके सुखोंको प्रदान करनेवाली है ।। १०५ ॥ अर्थ--हे राजन् ! जो भव्यजीव श्रीजिनेन्द्र देवके पवित्र धर्मको धारण करनेवाला है और जिसके देव-शास्त्र-गुरुका पूर्ण श्रद्धान है उसको अपना दीनबंधु समझ कर गाय और बछड़ेके समान प्रेमभाव करना, उसको साधर्मी भाई मानकर आदर सत्कार करना सो प्रवचनवात्सल्य भावना है ।। १०६ ॥ अर्थ-हे राजन् ! उपर्युक्त दर्शनविशुद्धयादि षोडषकारण भावनाएँ तीर्थकर गोत्रके आस्रव करनेवालो हैं । देवोंसे पूज्य और लोकोत्तम महिमाको प्रदान करनेवाली हैं और ससारके समस्त पापोको नाश करनेवाली है इसलिये भावोकी विशुद्धिसे नित्यही भावना भानी चाहिये ॥ १०७ ॥ अर्थ---हे राजन् ! दूसरोंके सद्गुणोंको ढक देना, अपने सद्गुणोका प्रकाश करना, दूसरोके मिथ्या दोषोको प्रकट करना और अपने दोषोंको ढक देना इससे नीच गोत्र कर्मका आस्रव होता है जिसका स्पष्टीकरण करते है सो एकाग्र मनसे श्रवण करना चाहिये ॥ १०८-१०९ ॥ अर्थ- हे राजन् ! दूसरोंको निंदा करना, दूसरे जीवोके परोक्षरूप अपवाद या मलिन वचन बोलना, बुराई करना, उसको निंदा कहते है। ( समाचार पत्रोंमें भी यह निन्दाकी जा सकती है ) मनकी कुटिलतासे दूसरोंका अभ्युदय सहन नही होनेके कारण उसको गिरा देनेके भाव प्रकट करना सो निदा है । जयमच्याच्यामा TESHPAHESHeresHPSweSures - [ २८७ ] विधीयते च यः स्वस्य प्रशसा परमा सदा । प्रशसाख्यं च दुर्दोषं सैव संप्राप्यते नृप ।। १११॥ ज्ञानसत्तपोयुक्तस्य पूज्यस्य महतस्तथा । परोपकारतुश्च जिनधर्मरतस्य च ॥ ११२ ॥ पालकस्यैव शीलस्य धर्मोपदेशकस्य च । मुनेः वा श्रावकस्यैव वीतरागमतस्य च ॥ ११३ ॥ इत्यादिसद्गुणानां च धारकस्य नरस्यहि । सद्गुणान् तस्य यो मर्त्यः पैशुन्यागुणदूपितः।। ११४ ॥ आच्छादयति यो भूप महान् दुर्बुद्धिमण्डितः । सद्गुणोच्छादनाख्यं च दोषं भजते खलु ।। ११५ ॥ केनचित्कारणेनैव कस्यैव पुरुपस्य च । किमपि आगतं दोष प्रकट त करोत्यहो ॥ ११६ ।। असद्गुणोद्भावनं च स दोप भजते पुमान् । महादु खस्य कर्त्तार नीचगोत्रप्रदायकम् ॥ ११७ ॥ DASHAINTEACHCom हे राजन् ! जो अपने गुणगान अपने आप करना अथवा अपनेमे गुण नहीं रहनेपर मिथ्यारूपसे करना, अपनी प्रशंसा कीति और बड़ाईके लिये कहना सो आत्मप्रशंसा है ॥ ११०-१११ ॥ अर्थ-~-सम्यग्ज्ञान, सम्यक्तप, और सम्यक्चारित्र सहित महान् पूज्य पुरुष तथा जगत्के जीवोंको सन्मार्गमें लगानेवाले श्रेष्ठ उपदेशक, श्री जिनधर्मको पालन करनेवाले, मिथ्यामार्गका परित्याग करानेवाले, शील धर्मको बढ़ानेवाले, ब्रह्मचर्यकी महिमाको व्यक्त करनेवाले, धर्मका उपदेश देनेवाले, ऐसे मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका, जिनधर्म धारक भव्य जीवोके उन सर्वोत्कृष्ट गुणोंको धारण करने वालोंको मनके दुष्परिणामों- से ढक देना, उनकी प्रशसा और उनका आदरभाव नहीं करना सो सद्गुणोच्छादन नामका दोष है। गुणोको प्राप्ति गुणोंमें और गुणी जनोमें अनुराग करनेसे होती है । परन्तु जिस मनुष्यका मन दुष्ट है वह मनको दुष्टतासे उन गुणी जनोका आदर नहीं करता है और न उन सर्वोत्कृष्ट गुणोंको धारण करनेकी भावना हो व्यक्त करता है बल्कि उन गुणोको ढॉकता है । ऐसे समय वह सद्गुणोच्छादन नामके दोषको प्राप्त होता है ।। ११२-११५ ॥ अर्थ-हे राजन् ! किसी एक कारण विशेषसे (अनिवार्य कारण विशेषसे) किसी एक भव्यजीवको कोई भी दोष लग गया हो तो उसको प्रकट कर देना सो असद्गुणोद्भावन नामका दोष है । अथवा मिथ्या दूपण लगा- कर प्रकट करना सो भो असद्गुणोद्भावन नामका दोष है। इससे नीच गोत्रकर्मका आलव होता है॥११६-११७॥
[ २८८ ] Facामा शामलीला माजमा चत्वारि खलु कर्माणि एतानि मगधेश्वर । अस्म मलिनगोत्रस्य आस्रवकारणान्यहो ।। ११८ ॥ भवत्येव पुन. त्व च शृणु अन्यानपि नृप । कारणानस्य सक्षेपात् दु गोत्रकर्मदायकान् ।। ११९ ।। करणाद्यातिमदस्येव कुलरूपमदस्य च । शिल्पिज्ञानबलस्यैव तपश्चैश्वर्यकस्य च ॥ १२ ॥ परेपामपमानस्य चापवादस्य कारणात् । वृथा हास्यैव करणात् परबधस्य दानतः ।। १२१ ।। उद्घाटनाद्गुरूणा च पराभवस्य कारणात् । दोपाणा कथनात्तेपा तथापमानकारणात् ।। १२२ ॥ निर्भत्सन पुनस्तेषा भजत्ययोढनात्तथा । स्तुतेरकरणाच्चैव अनभ्युत्थानस्य कारणात् ॥ १२३ ।। इत्याद्या हि नरस्यास्य आस्रवाश्च भवन्त्यहो। महादुःखस्य दातारो नीचगोत्रस्य दायका ॥ १२४ ।। आत्मनो निन्दनाच्चैव परेषा च प्रशसनात् । सद्गुणोद्भावनाच्चैवासद्गुणोच्छादनात्पुन ।। १२५ ।। तथा नीचैवृत्तित्वादनुत्सेकाञ्च अस्यहि । भवन्ति आस्रवा उच्चगोत्रस्यैव इमे शुभा ।। १२६ ।। नीचवृत्तेस्तथा स्वामिन् अनुत्सेकस्य लक्षणम् । किं स्याद्धि तच्छृणु त्व च महाशर्मप्रद नृप ।। १२७ ।। स्वात्मनो गुणवृद्धेषु ज्ञानाद्ये. यो हि मानव । प्रह्वीभाव करोत्येव चित्तशुद्धया नरेषु हि ॥ १२८ ॥ अर्थ-हे मगधाधिप! उपर्युक्त चार कारण नीच गोत्रके आस्रव करनेवाले है। १. कुलमद, २. जाति- मद, ३. रूपमद, ४. शिल्पिज्ञानमद, ५. बलमद, ६. तपमद, ७. ऐश्वर्यमद, ८. ऋद्धिमद आदि आठ प्रकारका अभिमान, दूसरोका अपमान करना, दूसरोका तिरस्कार करना, वृथा हँसना, दूसरोकी हँसी कर नीचा दिखाना, दूसरोका वध-बन्धन करना, गुरुओंके दोषोका उद्घाटन करना, पराभव करना, गुरुओको निन्दा करना, गुरुओ- को अवर्णवाद लगाना, अपमान करना, गुरुको देखकर खड़े नही होना, हाथ नही जोडना, नमस्कार नहीं करना, धर्मका अनुराग नहीं करना, धर्मको निन्दा, मजाक और हँसी करना, श्रेष्ठ आचरणोकी हँसो करना, निन्दा करना, चारित्र धर्मका लोप करना इत्यादि अनेक नोच गोत्रके आस्रव हैं ॥ ११८-१२४ ॥ अर्थ-अपनी निन्दा करना, दूसरोके गुणोकी प्रशंसा करना, अपने गुणोंका आच्छादन करना और दूसरोके गुणोको प्रगट करना, दूसरोंके दुर्गुणोंको ढॉकना, अपने दुर्गुणोको निकालनेका प्रयत्न करना इत्यादि कारणोसे ऊँच गोत्रका आस्रव होता है ॥ १२५-१२६ ॥ प्रश्न-हे भगवन् ! नीचवृत्ति नामक गुणका क्या लक्षण है ? अर्थ-हे राजन् ! जो अपनेसे अधिक गुणवान्, चारित्रवान् और सम्यग्दर्शनादि उत्तम गुणोंसे सम्पन्न रामजन्यमा HAPSMES L २८९ ] SRCHIPSC नमस्कार तथा हर्षादभ्युत्थान सुभाषणम् । उपवेशन तस्माद्धि नीचस्थानेषु नन्ददम् ।। १२९ ।। नोचैर्वृत्यभिध सैव गुणमाप्नोति शोभनम् । नम्रत्वात्सर्वकार्याणा भिद्धिर्भवति निश्चयात् ।। १३० ।। ज्ञानसत्तपोयुक्तोपि तथान्यगुणमण्डित. । तथापि नो करोत्येव यो मद स्वात्मनि नृप ।। १३१ ।। सैव सभजते नूनमनुत्सेकाभिध गुणम् । ससारवनदावाग्नेः सदृश मोक्षशर्मदम् ।। १३२॥ एभिः षट्कर्मभिश्चास्य बन्धो भवति भूपते । उच्चगोत्रस्य मर्त्यम्य नाकमोक्षस्य दायकः ॥ १३३ ।। अष्टाना मदसत्यागात्परेपा मानवर्द्धनात् । अनहास्यैव करणात् मृदुवचनभापणात् ।। १३४ ।। अपरिवादनस्यैव करणाज्जिनपूजनात् । सुपूज्याना नरागा च सत्कारादिककारणात् ।। १३५ ।। गुरूणा सद्गुणाढ्यानामनुद्वतप्रवर्तनात् । तेपा च स्तवनादभ्युत्थानस्य करणात्तथा ।। १३६ ।। स्थानार्पगाच्च सन्मानविधानाद्गुणख्यापनात् । निवारणात्परेपा च पीडादिकर्मणस्तथा ।। १३७ ।। हो उसको देखकर हर्ष करना, गुणी और संयमी देखकर प्रमोद भावना प्रकट करना, धर्मात्मा भाईको देखकर हर्षित होना, मनकी प्रफुल्लता प्रकट करना, गुरुजन (गुणोसे वृद्धि गत) को देखकर नमस्कार करना, उच्चासन देना, हाथ जोडना, मिष्ट सम्भाषण कर उनके नीचे बैठना, दृष्टिको नीचा कर विनयभावसे रहना, उनकी आज्ञाको शिरसा वंद्य समझना, भोजन पान, दान, सन्मान आदि द्वारा उनकी पूजा करना, स्तुति करना, प्रशंसाकर उनके गुणोको महान् पूज्य मानना सो नीचवृत्ति नालका गुण है ॥ १२७-१३० ॥ अर्थ-अपनेमें निर्दोष ज्ञान और उत्तम तप विद्यमान होनेपर भी अथवा अन्य चारित्रादि उत्तमोत्तम गुण विद्यमान होनेपर भी अभिमान नहीं करना और अपने परिणामोंको सरल व कोमल रखना सो अनुत्सेक नामका गुण है । इस प्रकार षद् कारणोसे स्वर्ग मोक्षका दायक उच्चगोत्रका आलव होता है ॥ १३१-१३३ ॥ अर्थ-आठ प्रकारके मदोंका परित्याग करना, गुणवान् व्यक्तियोंका योग्य सन्मान करना, उनका आदर-भाव-प्रशंसा-गुणकीर्तनादिक करना, दूसरोंकी हँसो नही करना, सदैव मीठे वचन बोलना, दूसरोको तिरस्कार करनेके भाव नही करना, मुनिजनके स्वभावसे मलिन और रत्नत्रयसे पवित्र ऐसे शरीरको देखकर ग्लानि नही करना, श्रीजिनेन्द्र देवकी प्रतिमाका नित्य पूजन, अभिषेक और इसी प्रकार स्तवन, गुणकीर्तन करना, पूज्य पुरुपोका सत्कार करना, गुरुओके साथ नम्र भावोसे विनीत स्वल्पमें रहना, उद्धतताका परित्याग फरना, गमओ की पूजा, सन्मान प्रभावनाके साथ शुद्ध भावोसे करना, अग्युत्थान प्रणामाञ्जलि करना, उच्चा- 33 [ २९० ] IPASHIE: eHESHISHESP-Arme.. इत्यादयोपि अस्यैव वध्यन्ते आस्रवाश्च नुः । महागोत्रस्य कर्तार. शुद्धभावान्नराधिप ॥ १३८॥ एभि सुफर्मभिश्चाय पट्खण्डपालकस्य च । बलभद्राच्युतस्यैव कामदेवस्य भूपते ।। १३९ ।। इत्यादिकस्य सशुद्धे नाना सम्पद्विभूपिते । नरोत्तमस्य भो नून सद्गोत्रे सुरवन्दिते ।। १४० ।। उत्पद्यते महाशर्म तत्र भुक्त्वा ह्यनुक्रमात् । निहत्य कर्मसन्दोह तपसा याति सत्पदम् ॥ १४१ ॥ महत्कुलोद्भवा म; ये भवन्ति शुभोदयात् । सारवीर्यादिसम्पन्ना तेजसा भास्करोपमा ॥ १४२ ।। चन्द्रप्रभसपा कात्या प्राप्नुवत्येव ते तथा । शिवशर्म निराबाध कर्मानीत च्युतोपमम् ।। १४३ ।। पचभि कर्मभिश्चैव भवति आस्रवोऽस्य नु । नानादु खप्रदैनूनमन्त रायस्य कर्मणः।। १४४ ।। दानस्य चैव लाभस्य भोगोपभोगकस्य च । वोर्यस्यैव करोत्येव विघ्न स्वस्य कुबुद्धित ॥ १४५ ।। सन प्रदान करना, उनके गुणोका यशोगान करना, दूसरोंके दुःखोको निवारण करना, गुरुओको योग्य वसतिका गुफा बनवाकर प्रदान करना और गुरुओके लिए योग्य औषधि बनाकर प्रदान करना इत्यादिक शुभ कार्योसे ऊँच गोत्रका कर्मास्रव होता है ।। १३४-१३८ ॥ अर्थ--इस प्रकार उपर्युक्त शुभ कार्योसे चक्रवर्ती, बलभद्र, नारायण, कामदेव आदि पदवी धारक पुरुषोंके ऊँच गोत्रको प्राप्त होता है । जिस गोत्रमें उत्पन्न हुए पुरुषोंकी देवगण भी नित्य सेवा करते है और जो लोकमें उत्तम समझा जाता है। जिस ऊँच गोत्रको प्राप्त करनेपर ही भव्यजीव मोक्षमार्गके योग्य होता है। ऊँच गोत्रके प्रभावसे ही जीव कर्मोंका नाश कर मोक्षसुखको प्राप्त होता है । ऊँच गोत्रसे जीव महान् उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम वंशको प्राप्त होते है। जिनको अतुल बल, वीर्य प्राप्त होता है। जिसका प्राप्त करना बड़ा ही दुर्लभ है । जिस कुलमे तेज-कांतिरूप आदि सर्व आश्चर्यकारो महिमा होती है। और अन्तमें मोक्षसुखको प्राप्त होते है ॥ १३९-१४३ ॥ अर्थ-हे राजन् ! इस जीवको पाँच प्रकार कारणोसे विविध दुःखोका दायक अन्तराय कर्मका बंध होता है ॥ १४४ ॥ दानांतराय, लाभांतराय, भोगांतराय, उपभोगांतराय, वीर्यान्तराय । इस प्रकार पाँच कार्यों में विघ्न करना सो इससे अन्तराय फर्मका बंध होता है ॥ १४५ ॥ याच्या न्यायालयाच्यामात्याच्या HASAKाच्या [ २९१ ] दातुः पात्रस्य भो भूपास्यैव हि वध्यते च यः। स्वात्मनि शर्महन्तारमन्तरायाभिधं विधिम् ॥ १४६ ।। यच्छति कोपि पात्राय दानमाहारसज्ञकम् । वर्जयत्येव तं कोपि महाकृपणभावयुक् ॥ १४७ ।। केनचिद्वा कुबुद्धेन भ्रांतिमुत्पादयत्यहो । येन तस्यैव दातुश्च मतिर्दाने न जायते ॥ १४८ ॥ दानातरायदुःकर्म स लभत्येव मूढधीः । अनेन कर्मणा तस्य द नाप्तिों भवत्यहो ॥ १४९ ।। लाभाप्तिर्जायते कस्य विघातार्थं च तस्य वै । कुबुद्धया यः करोत्येव लाभस्यैव विनाशकम् ।। १५० ।। वध्यते सैव दुःकर्म लाभान्तरायसंज्ञकम् । ह्यनेन विधियोगेन लाभाप्त्यस्यैव नो भवेत् ॥ १५१ ।। भोगवस्तो क्रोत्येव वियोग यो हि मानवः । कस्यैव पुरुषस्यैवासहमानस्तदोदयम् ॥ १५२ ॥ भोगान्तरायमज्ञ च सैव दु कर्म दुखदम् । परजन्मनि प्राप्नोति सरायो नात्र भूपते ।। १५३ ।। HARSHEE-HE-SETTESHPASEARNATASTimeague अर्थ-यदि दाता इस प्रकार दानादिक कार्यो में विघ्न करता है तो दाताको अन्तराय कर्मका आस्रव होगा। यदि मात्र इस प्रकार विघ्न करावे तो उसको आस्रव होगा। इसका स्पष्टीकरण आगे लिखा है ॥१४६॥ दानातराय- अर्थ--हे राजन् ! कोई भव्यजीव किसी पात्रको आहार दान करनेका भाव करता हो या देता हो, उसको देखकर कृपणबुद्धिसे या दुर्भावोसे निषेध करना, अथवा कोई विशेष कारण बतला कर दान करनेसे रोक देना या कुबुद्धिको धारण कर पात्रको अयोग्यता (मिथ्या कल्पना कर) प्रकट कर दान देनेमे विघ्न कर देना इत्यादि कार्योसे दानांतराय कर्मका आस्रव होता है जिससे जीवोको सब कुछ साधन मौजूद होनेपर भी दान देनेके भाव नहीं होते है या दान देनेका नियोग नही प्राप्त होता है ।। १४७-१४८ ।। अर्थ-जिस किसी जीवको धनादिक तस्तुका लाभ प्राप्त हो, व्यापारादिकके द्वारा धन प्राप्त होता हो तो कुबुद्धि या दुर्भावनासे उसके लाभ प्राप्तिमे विघ्न कर देना या उस लाभको ही नष्ट कर देना अथवा ऐसे व्यापारको किसी प्रकार जानकर स्वतः उसका फल (लाभ) लेकर उसको लाभसे वचित रखना सो इससे लाभातराय नामका कर्म बंधता है । जिससे जीवको लाभ प्राप्तिका योग नही होता है ॥ १४९-१५१ ॥ अर्थ-हे राजन् ! जो मनुष्य दूसरोके भोग वस्तुको प्राप्तिमें विघ्न करे अथवा किसीको भोग प्राप्त होते हो तो उसको नष्ट कर देना, भोगोको भोगनेमें विघ्न कर देना, भोगने नहीं देना, इससे भोगांतराय नाम- ज्च्या an जन्सरन्यायालयाच्यETAITAL THETHE [ २९२ ] उपभोगस्य मद्वस्तो नाश करोति य कुधी । कस्यैव सैव भो नूनमग्रजन्मनि जन्मनि ॥ १५४॥ लभते उपभोगातरायाख्यं शर्मनाशकम् । कुकर्म मगधाधीश परोपभोगवर्जनात् ॥ १५५ ॥ केनचित्कारणेनैव कोपि कस्यैव भूपते । नाश करोति वीर्यस्य नानादु खप्रदायकम् ॥ १५६ ।। वीर्यान्तरायसज च विधि च वध्यते खलु । सैव ससारकातारभवभ्रमणकारकम् ।। १५७ ॥ यात्रादिधर्मकार्येषु कृपणत्वान्नराधिप । कारणाद्दाननिंदाया देवनैवेद्यभक्षणात् ।। १५८ ॥ जिनकोशस्थवित्तस्य क्रयविक्रयकारणात् । तदशनाल्लोपनाच्चैव धारणाद्वाहि स्वापणे ।। १५९ ॥ छेदनाज्जिनधर्मस्य परविश्वासहापनात् । अधर्माचरणाच्चैव वधनाद्वधनात्तथा ।। १६० ।। का कर्मबंधका आस्रव होता है । इसके फलसे परजन्ममें दुःखोकी प्राप्ति होती है और भोग्य वस्तुएँ भोगनेमें विघ्न आते हैं ॥ १५२-१५३ ॥ अर्थ-हे राजन् ! उपभोग वस्तुको प्राप्तिमें विघ्न करना, दूसरोको उपभोगोके भोगनेमें विघ्न कर देना, उपभोगोंको नष्ट कर देना सो इससे शान्तिका नाशक उपभोगान्तराय नामका कर्मका आस्रव होता है । हे मगधाधीश ! इसके फलसे आगे अनेकों जन्मोमे उपभोगकी वस्तुओसे वंचित रहना पड़ता है ॥१५४-१५५॥ अर्थ-किसी कारणसे या दुर्भावोंसे किसी जीवके वीर्यका नाश करना, उसकी शक्तिका ह्रास करना या लोप कर देना इससे वीर्यातराय नामका कर्मबन्ध होता है । यह वीर्यातराय संसारके भ्रमण कराने में मुख्य सहायक है ॥ १५६.१५७ ॥ अर्थ--हे राजन् ! यात्रा, प्रतिष्ठा, रथमहोत्सव, जिनमंदिर निर्माण आदि धर्मकार्योमें विघ्न करना । कोई प्रतिष्ठादि करता हो तो उसको रोकना "अभी प्रतिष्ठा व प्रतिमा बहुन हो गई अब जरूरत नही।" इस प्रकार प्रलोभन या दुर्भावोसे उत्तम प्रतिष्ठादिक कार्योमें विघ्न करना, कृपणतासे धर्मकार्य नहीं होने देना, देवको पूजाके लिये अर्पण किया हुआ धन, जमोन आदि द्रव्यका भक्षण करना। ये सब अतरायके कारण हैं ॥ १५८ ॥ अर्थ-तीर्थ, जिनमंदिर, जिनशास्त्र, भंडार और जिनायतनोके भंडारका भक्षण करना। जिनधर्म- का ध्वंस, जिनमूर्तिका खडन करना, जिनधर्मका विश्वास (सत्यता) का लोप करना, पवित्राचरणोंका नाश रालय अचान्ताजनारायजन्य [ २९३ ] कर्तनाच्चैव जिह्वायाः विपस्यचैव दापनात् । अबकोत्पाटनाच्चैव तथातकविवर्द्धनात् ।। १६१ ।। इत्याद्या आस्रवा भूप अतरायस्य कर्मणः । भवति सर्वमाना शर्मान्तरायकारकाः ।। १६२ ।। सदेव एभिः भो भूप अस्य नु. चाष्टकर्मभिः । वध्यते कर्मणो बधा शशिर्मप्रदायकाः ।। १६३ ।। साताप्तिश्चैव दुःखाप्तिः यत्तद्धि प्राणिना नृप । जायते नात्र सदेहः शुभाशुभैककर्मणा ।। १६४ ।। मृते भर्तरि या नारी व्यभिचार करोत्यहो । तथा भरणवस्त्राद्यै. बहुमूल्यात्समुद्भवैः ।। १६५ ।। नेत्राणा नददेश्चैव भूपयत्येव स्वतनो । नेत्राजन करोत्येव केशादिमडन तथा ।। १६६॥ गार्यात भडराग च ब्रह्मचर्यविनाशकम् । तथैव पोपयत्येव शरीर च रसोत्करैः ॥ १७ ॥ परनिदात्मशंसा च मायामान च स्वात्मनि । कुकथा प्रकरोत्येव कुशिक्षा कामवर्द्धका ।। १६८ ॥ करना, अधर्माचरणोंको बढाना, बध बंधनादि हिंसा कार्योकी वृद्धि करना, दूसरोकी नाक काटना, जिह्वाका छेदन करना, बिना प्रयोजन वृक्षोंका छेदन कराना, गुह्य अङ्गोका छेदन-भेदन करना इत्यादिक बहुतसे कारणोंसे अन्तराय कर्म का आस्रव होता है ।। १५९-१६२ ॥ अर्थ--हे राजन् ! इस प्रकार आठ कर्मोके आस्रव बतलाये है इनमे कितने ही पुण्योत्पादक है और कितने ही पापोत्पादक हे । जोवोको शुभाशुभ कर्मोसे सुखदुःख प्राप्त होता है ॥ १६३-१६४ ॥ अर्थ--विधवा स्त्री व्यभिचार सेवन करे अथवा व्यभिचार सेवन करनेके कारणों (पुनर्विवाह) को धारण करे । शरीरपर सुन्दर मनको लुभानेवाले वस्त्राभूषग पहने-बहुमूल्य साड़ी पहने । शरीरका शृंगार करे, के शोको रचना करे, नेत्रमें शुरमा आदि लगाकर कामोत्पादक वेशको बनावे । भंड रागको गान करे, ऐसा कि जिससे ब्रह्मचर्य नष्ट हो जावे । पुष्ट रसोसे अपने शरीरको कामोत्पादक योग्य बनाये रखे या पुष्ट रसभोजन पान सेवन कर कामोत्पादक बनावे। दूसरोकी निंदा और अपनी प्रशसाके गान करे। मायाचार और मानको धारण कर धर्म धारण करनेका ढोग बतलावे । कुकथा और कुशिक्षाका ऐसा पठन-पाठन और अभ्यास करे कि जिससे कामवृद्धि हो, व्यभिचारको वृद्धि हो अथवा मिथ्या शास्त्रोका पठन-पाठन करे जिससे कि सदैव कुबुद्धि बनी रहे और कुमार्ग (धर्मलोप करनेके मिथ्यामार्ग) की वृद्धि की वासना बढ़े इत्यादि कारणोंसे स्त्री मर कर भवभवमें जन्म जन्मांतरोमें विधवा होती है क्योंकि उसने अपने धर्माचरण वैधव्य दीक्षाका नाश किया। EMAIL [ २९४ ] मचान्य DHमयमालासच्या पठति पाठयत्येव मिथ्याशास्त्र कुबुद्धि दम् । इत्यादिकर्मभि नारो विधवा च भवे भवे ।। १६९ ॥ भवति शोकसयुवता धर्माचरणविघातनात् । अतिनिर्दयभावेन स्वपति मारयत्यहो ।। १७० ॥ भवत्वा त सेवते चान्य जोवत स्वपति खला । पापाचार सदा पालयत्येव धर्मवजिता ।। १७१ ।। विधवा स्त्रीको वैधव्य दीक्षा देना ही जरूरी है, धर्मशास्त्रोमें विधवाके लिये वैधव्य दीक्षाका विधान बतलाया है । वैधव्य दीक्षाका धारण कर वह केशका उत्पाटन, शृगारका त्याग, सुन्दर वस्त्र जिसे सौभाग्य- शाली स्त्रियाँ पहनती है उनका त्याग करना पडता है । असलमें जो स्त्रो वैधव्य दीक्षाको धारण कर संयमसे धर्माचरण पूर्वक रहती है वह एक प्रकारको घरमें रहनेवाली आर्यिकाके समान है, परम साध्वी है। उससे समस्त कुटुम्बको शीलको शिक्षा प्राप्त होती है वह सबको पवित्र आचरण सिखलाती है और शीलको रक्षा और माहात्म्यका आदर्श जगतके सामने रखकर स्त्री समाजका और अपना कल्याण करती है । किन्तु जो विधवा वैधव्य दीक्षाको स्वीकार न कर शृंगार करती है, उत्तमोत्तम वस्त्राभूषण पहनती है और ऐसो कुशिक्षा प्राप्त करती है कि जिससे व्यभिचार बढ़े और धर्मा- चरणका लोप हो, शोल ( ब्रह्मचर्य ) व्रत नष्ट हो जावे। ऐसो ही विधवायें धर्मका लोप कर केवल व्यभिचार बढ़ाती है ॥ १६५-१६८ ।। कुशिक्षाका फल- अर्थ-असलमे व्यभिचारकी जड़ कुशिक्षा है, कुशिक्षाके प्रभावसे विधवा स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य की मर्यादाका परित्याग कर निर्लज्ज बनकर व्यभिचारमें प्रवृत्त हो जाती हैं और उसको निर्भर्स कर तथा धर्मका लोप कर पुनर्विवाहके द्वारा व्यभिचार बढ़ाती हैं। कुशिक्षासे सब कुछ हो जाता है कुशिक्षासे समस्त मार्ग खुले है। और कुशिक्षाका परिणाम सबसे प्रथम धर्म लोप-तथा ढोट बनना है ॥ १६९ ॥ अर्थ-हे राजन् ! कुशिक्षासे स्त्री अपने पतिको सजीवन अवस्थामें अतिशय निर्दय भावोसे मार डालती है । अथवा जीवित सुन्दर पतिको छोड़कर भग जातो है । दूसरोको पति बना लेती है । यह पापाचार कुशिक्षा- के प्रभावसे धर्मका नाश करनेवाला होता है ॥ १७०-१७१ ।। GETATEGanapanaana [ २९५ ] TYPEyes कर्मणामितरत्वेन एतेपा साहि भूपते । शीलवतान्विता चाग्रे जन्मनि जन्मनि तथा ।। १७२ ।। भवति नात्र सन्देहो नानाशर्मविमण्डिता । अत्ययात्येव सधवा महासौभाग्यमण्डिता ॥ १७३ ।। वित्तागनाश्च मृत्वाहि शीलहीना भवन्त्यहो। सदैव कामदेवस्य क्रीडाशक्ता मदोद्धताः ॥ १७४ ॥ म्लेच्छोत्पन्ना' नरा नार्यः मृत्वाहि मगधेश्वर । भवन्ति व्रतहीनाश्च इमे वामाश्च मानवा ॥ १७५ ।। भूत भातमभूतमेव ह्यखिल ससारतापापह, वीरा वीरगुणाकरो मुनिनुतो वृतात्तमेवांजसा । आयु कायसुमारवैभवयुतान् पुण्योदयात् सत्सुखान्, मर्त्याना च पृथक् पृथक् जिनपति. त्रिषष्टिकाना शुभम् ॥ १७६ ।। अर्थ--ऊपर जितने कारण विधवा होनेके बतलाये है उनसे विपरीत कारण सधवा होनेके जानना चाहिये । जो स्त्री शीलवतका पालन करतो है, श्री जिनेन्द्र देवकी आज्ञाका श्रद्धान कर अपना आचरण आगम- के अनुकूल रखती है । वैधव्य दशा प्राप्त होनेपर वह वैधव्य दीक्षा धारण कर ससार देह भोगोसे उदास रहती है । न शृंगारादि कामोत्पादन दुष्ट कार्योको करती हैं वह भवभवमें सधवा होती है । महान् सौभाग्य उसको प्राप्त होता है ॥ १७२-१७३ ।। अर्थ-वेश्यायें जो व्यभिचारका धन्धा फैलाकर शीलसे रहित होती है, वे मरकर परजन्ममे शील- विहीन मदोद्धता अनन्त पापोको सेवन करनेवाली और संसारमें परिभ्रमण करनेवाली होती हैं ॥ १७४ ।। अर्थ-जिनके यहाँ पुनर्विवाहादि मलिन आचरण हैं जिनको उत्तम व्रत धारण करनेकी योग्यता ही नहीं प्राप्त होती है उनको म्लेच्छ वा शूद्र कहते है । शूद्रोको शोलवत किसी प्रकार भो पालन नहीं हो सकता है । क्योकि उनके यहाँ उनको जातिमें पुनर्विवाह होता है । पुनर्विवाह व्यभिचार है। व्यभिचार करनेवालोके शोलवत हो नहीं सकता है । शीलव्रतके अभावसे अन्य व्रतोका पालन भी परिपूर्ण नही होता है। अतएव ऐसे स्नो-पुरुष मरकर व्रतविहीन होते हैं ।। १७५ ।। अर्थ-हे मगधेश्वर । जो कुछ संसारमें जितना वृत्तान्त हो गया है, आगे होगा और वर्तमानकालमें १ : Pा को यो पूनविवाह क ते हो, अतएव व्यभिचार जिनके मृतग होता हे व्रत होनेकी योग्यता लनको नही -निनो' । पीडा धारण करने का जिनको अवसर हो प्राप्त नहीं होता हे ऐसे म्लेच्छ जीव मरकर व्रतविहीन अनन्त संसारके + पापोगेन। PEN- [ २९६ ] MaraPREPARPAPHPTHIERPSHPANDEHशमा पीराणाश्च तथा हि अन्यमनुजाना च चरित्र महत्, तत्त्वातत्त्वविभेदक च स्मरतो मोक्षस्वरूप तथा । कृत्वैत्य च जिलेश्वरो ह्यघहरो व्याख्यानक चोत्तम, मोक्ष ह्याप दयाधी. जितरिपुः सर्वाधिपैर्वन्दित ।। १७७ ।। इत्थ कर्णसुखप्रदा मुनिवरैवद्या च मोक्षप्रदाम्, श्रीतीर्थकरवक्त्रनामघहरा श्रुत्वा गणास्तेऽखिला । वाणोमापुस्तदा च वै निरुपमा सन्देहवृन्दापहा, मोद मोदकरा सुरासुरगणै पूज्या च पूज्योदयाम् ।। १७८ ।। केचिद्भव्यास्तदा भीत्वा ससाराशमत खलु । स्वोचक्रु जिनमुद्रा च श्रावकाचारज व्रतम् ।। १७९ ।। दाने च पूजने केचित् मतिं चक्रु शिवाप्तये । दिनाभिपेकनियम पञ्चामृतरसोत्करै ।। १८० ।। निशाया भक्षणस्यैव त्याग चक्रश्च केचन । स्वस्त्रिया नियम केचित् पर्वण्या चाग्रशर्मणे ॥ १८१ ।। हो रहा है वह सब वीर प्रभु अपने दिव्य ज्ञानसे परिपूर्ण यथार्थ रूपसे जानते है। इसीलिए वीर प्रभु सर्वज्ञ वीतराग और त्रिलोक वन्दित है। मुनिगणोसे पूज्य हैं। जो मनुष्य वीर प्रभुके वचनोका श्रद्धान कर उनको ही अपना ध्येय समझता है, अपना कर्तव्य मानता है वही आयु, काय, भोग, सम्पदा आदि उत्तमोत्तम सामग्री- को प्राप्त कर महान् पुण्यका सम्पादन करता है। वह पुण्य त्रिषष्टि पुरुषोके चरित्रादिकोका श्रवण करनेसे सम्पादित होता है ॥ १७६ ॥ अर्थ-श्री वीर प्रभुने त्रिषष्टी शलाका पुरुषोंका पुण्योत्पादक जीवन चरित्र, तत्त्वातत्त्वका विवेचन, मोक्षका स्वरूप आदि समस्त पदार्थोका व्याख्यान समोशरणमें दिया। वे दयालु भगवान् सदैव जयवत रहो ॥१७७॥ अर्थ-इस प्रकार मुनिगणोसे भी पूजित समस्त प्रकारके सुखोको प्रदान करनेवाली, समस्त पापोका नाश करनेवाली, निरुपम-समस्त सन्देहोको विध्वंस करनेवाली, समस्त जीवोंको आनन्द प्रदान करनेवाली, महान् पुण्योदयसे प्राप्त होनेवाली ऐसी वीर प्रभुकी मनोहर श्रीजिनवाणीको प्रभुके मुखकमलसे श्रवण कर समस्त गणधर देव प्रसन्नताको प्राप्त हुए ॥ १७८ ।। अर्थ-वीर प्रभुकी दिव्यध्वनि श्रवण कर कितने ही भव्योंने संसारके दुःखोंसे भयभीत होकर श्रीजिन- दीक्षा धारण कर ली। श्रावकाचारके व्रतोको धारण किया। कितनोने दान करनेको प्रतिज्ञा ली, कितनोने जिनपूजनका नियम ग्रहण किया। कितनोंने पंचामृतसे नित्य जिनाभिषेक करनेका नियम लिया। रात्रिमें भोजनका त्याग कितनोंने किया। बहुतोंने स्वदारसन्तोष नियम पालन करनेको प्रतिज्ञा लो व ब्रह्मचर्यव्रत नारायणEWArrearra च्या [ २९७ ] EARTISG-रामाजमा अष्टान्हिकविधि केचित् कर्मादिदहनं व्रतम् । रत्नत्रयव्रत केचित् जगहुः कनकावलिम् ॥ १८२ ॥ पञ्चकल्याणनामापि पञ्चकल्याणदायकम् । पल्याख्य व्रतमुख्य च केचिच्च जग्रहस्तदा ।। १८३ ॥ सम्मेदाचलयात्रार्थ मतिं चक्रुश्च केचन। दुष्टाष्टविधिनाशार्थं शुद्वभावेन मण्डताः ॥ १८४ ।। श्रेणिकोपि नराधीशो भावितीर्थङ्कराग्रणी. । शुद्धसम्यक्त्वभूपाढ्य वीरनाथस्य भाक्तिकः ।। १८५ ।। महाधीरस्तदाकाले भावयामास भावनाम् । तेषा यात्रावतादीना स्वहृदि शुद्धभावतः ।। १८६ ।। इत्याद्यं धर्मसदोह स्वस्वशक्त्यनुसारतः । गृहीत्वा सह भूपेन ययुस्ते स्वपुरे मुदा ॥ १८७ ।। चेलनाद्या प्रियास्तस्य वारिपेणादयः सुताः । नागरा भव्यभावाट्या तेपा वामाश्च नन्दनाः ।। १८८ ॥ इत्याद्याः सकला भव्याः व्रत तं कर्मनाशकम् । यथोक्तविधिना चक्रुः कर्मादिदहनाभिधम् ।। १८९ ॥ राज्ञः संजायते भव्या धर्मोत्पत्तिर्न सशय.। यत्र राजा च धर्मात्मा भवत्येन प्रजापि च ॥ १९० ॥ धारण किया। कितने ही जीवोने आष्टान्हिक, रत्नत्रय, कर्मदहन, पल्यवत, पंचकल्याणव्रत, कनकावलि, द्विका- वलि, मेरुपंक्ति आदि व्रतोंको पालन करनेका नियम लिया। श्री सम्मेदाचलकी यात्रा चतुर्विध संघ सहित करनेका पुण्यकार्य कितने ही भव्यजीवोने स्वीकार किया। इस प्रकार शुद्ध भावोंसे मण्डित भव्यजीवोने श्रीवीर प्रभुको दिव्य-ध्वनिको श्रवण करके दुष्ट अष्ट कोको नाश करनेके लिए विविध प्रकारका चारित्र धारण किया ॥१७९-१८४ ॥ अर्थ-महाधीर ! भावी तीर्थकर ऐसे श्रेणिक महाराजने श्रीवीर प्रभुकी भक्तिसे शुद्ध सम्यक्त्वसे अपनेको विभूपित किया और जो देशना (धर्मोपदेश) वीर प्रभुने दिया था उसकी भावना की, तीर्थ यात्रादिकों- को भावना की। इस प्रकार धर्म श्रवण कर समस्त भव्यलोक अपने-अपने स्थानको गये ॥ १८५-१८७॥ अर्थ-श्रेणिक महाराजको चेलना आदि महादेवी वारिषेण आदि राजकुमार और नगरके समस्त भव्य नर-नारीगणने इस फर्मदहनवतको यथोक्त विधिसे धारण किया ॥ १८८-१८९ ॥ अर्य-इस प्रकार श्रेणिक महाराजको धर्मभावनाको देखकर समस्त प्रजा धर्ममय बन गई। नोति है कि राजा धर्मात्मा होनेसे प्रजा भी धर्मात्मा होती है क्योकि राजाके भले-बुरे आचरण प्रजा सीख लेती है । धर्मको वृद्धि और धर्मको मर्यादा राजाओसे ही स्थिर रह सकती है। क्योकि राजगण दण्ड आदिके ३८ । amecameen-SHLEASNESHCHDAe [ २९८ गागा मत्ता तुगा तमग चास्य वे । कुर्वीत मनत चेम तुणमेव शिवप्रदम् ।। १९१ ।। नामोदना ना इमे गर्ने नगेत्तगा. । विविना किमाणाश्च शिवशर्मप्रदायका. ॥ १९२ ॥ शापोनिधिशिना तमे कमप्येव ये नरा | करिष्यति भजिष्यति मोक्षमीत्य न सशग || १९३ ।। मातगाद्या ये मा शुदेकव्रतपालनात् । गुखमाप्ता यतो भव्या बहुभि कारण च किम् ।। १९४ ।। तर याच भो भगा निरारभेण तद्वतम् । आरभेणैव मयुक्ता इमे हि भवदायका ॥ १९५ ।। कृत्वा चवोपनाम न आरभ य करोत्यहो । गजस्नानसम शर्म प्राप्नोति सेव मानव ॥ १९६ ।। द्वारा प्रजाको अनीति और असदाचार (अधर्म) से रोक सकते है। राजाओकी आज्ञा समस्त प्रजाको पालन करनी ही पडतो हे । राजाको आज्ञा धर्मरूप-नीतिसे पूर्ण होगी तो प्रजा भी वही नीति, वही धर्मव्यवस्था सांगो- पाग स्वीकार करेगी। वर्तमानमें वर्णव्यवस्था लोप, विधवा विवाह, स्पर्शास्पर्श लोप, समान हक आदि समस्त धर्मविरुद्ध, नीतिविरुद्ध, मर्यादाविरुद्ध बातोको धर्मनीति और कर्तव्य बतलाया जा रहा है, यह सब राजा और राजाकी ऐसी ही कुशिक्षाका फल है । यह बात सच है कि यथा राजा तथा प्रजाः ॥ १९० ॥ अर्थ--हे राजन् ! कर्मदहनकी महिमा अपरंपार है । इस प्रकार जो भव्य जीव इस महिमाको सर्वो- स्कृष्ट और परम दुर्लभ समझते है वे मोक्षको प्रदान करनेवाले इस व्रतको भावोकी विशुद्धिसे करें। हे भव्य जीवो ! यह व्रत श्री जिनेन्द्र देव भगवान्के मुखकमलसे प्रकाशित है । इसलिये जो भव्य शास्त्रोक्त विधिसे इस व्रतका पालन करते है वे मोक्षसुखको प्राप्त होते है ॥ १९१-१९३ ॥ अर्थ-हे भव्य जीवो ! मातग आदिक अनेक भव्य प्राणी इस व्रतके माहात्म्यसे सुखको प्राप्त हुए है आप लोगोंको भी निःसदेह भावसे शुद्ध व्रत पालन करना चाहिये ।। १९४ ॥ अर्थ समस्त प्रकारके हिंसक और मोहोत्पादक आरम्भोका परित्याग कर व्रतोका परिपालन करना चाहिये । जो उपर्युक्त प्रकारका आरम्भ कर व्रतोका पालन नहीं करता उसके संसारके मार्गको वृद्धि होती है ।। १९५॥ अर्थ-इस प्रकार जो मनुष्य आरम्भ सहित उपवास करते है उनके व्रत सुख प्रदायी नही होते है गजस्नानके समान उनकी क्रिया है ॥ १९६ ॥ DHE - जार यामन्च चाजन्य [ २९९ ] अथ श्रीमज्जिनाधीशो महावीरः सुरार्चितः । विहारं कृतवान् आर्ये वर्षे भव्यनरैभृते ।। १९७ ।। तर्पयतिस्म तान् भव्यान् वचनामृतवर्पणैः । मिथ्यातमो हि तेषा च वाग्मयूखैर्विघट्टयन् ।। १९८॥ स्थापयन् श्रीजिनेन्द्रोक्तं सद्धर्म मोक्षदायकम् । उत्थापयन् कुधर्म च भवसंततिदायकम् ॥ १९९ ॥ एव कृते च भव्योघा. तद्वदनेन्दुज वरम् । राद्वान्तामृतसत्पानमितरेषा च दुर्लभम् ।। २००॥ जहुरनादितो लग्न भवाकूपारवर्द्धकम् । मिथ्या विष महारं शर्मलेशविनाशकम् ॥ २०१॥ ततश्न जगहुः शुद्धसम्यक्त्व भवनाशकम् । यस्यैव धारणात्सर्वे तरति भवतो नराः ॥ २०२॥ याता याति तथा भव्याः यास्यन्ति शिवसत्पदे । अस्यैव पालनात्कोपि अन्योपायो हि नो बुधा. ॥२०३।। एवं सबोधयन् भव्यान् पावापुरस्य सो जिनः । प्रत्यागूर्णस्थकासारे सिताम्भोजैविमडिते ॥ २०४ ।। तन्मध्ये रचिते देवैश्चन्द्रकातिमये शुभे । शिलापट्टे निरौपम्ये सर्वदेवाधिपै. सह ॥ २०५ ॥ आययी तत्प्रभावाच्च पूर्वमेव सुरानितः । तस्योपरि तदा दर्तो प्रतिमायोगमुत्तमम् ॥ २०६ ॥ अर्थ-इस प्रकार त्रिलोकगुरु श्री वीर भगवान्ने अपने वचनामृतसे समस्त भव्य जीवोंको परम सतोष कराते हुए अपने वचन रूपी किरणोंसे जगत्के निबिड मोहांधकारको नाश करते हुए श्रीमज्जिनेन्द्र देवके अनादिनिधन जैनधर्मको समस्त जगतमें स्थापन करते हुए तथा कुधर्मोका नाश करते हुए भरत क्षेत्रके आर्यसंडसे विहार किया । और अगणित भव्योको संसारसे पार कर परमसुख धाममे पहुँचाया ॥१९७-२००॥ अर्थ-~~इस प्रकार त्रिलोकबन्धु श्री भगवान महावीर भगवान्के मुखकमलसे विनिगर्त वचनामृतका पानकर अनेक भन्योने अनादिकालसे संलग्न ऐसे मिथ्यात्वरूपी हालाहलका परित्याग किया ॥ २०१॥ अर्थ----हे राजन् ! श्रीवोर भगवान्के वचनामृतके पानसे बहुतसे भव्यजीवोने शुद्ध सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति की। जिस सम्यग्दर्शनके प्राप्त होनेपर अनन्तभवके समस्त पाप एक क्षणमात्रमे नष्ट हो जाते है । और भव्य- जो ससार समुद्र से पार हो जाते हैं ॥ २०२ ॥ अर्थ---इस सम्यग्दर्शनके प्रभावसे ही भव्यजीव संसारसे पार हुए, होते है और आगे होगे। इसके सिवाय मोक्षपर पाप्त करनेका अन्य उपाय नही है ॥ १०३ ॥ -इस प्रकार निलोकगुरु देवाधिदेव श्रीवीर भगवान् समस्त भव्यजीवोको सबोध ( रत्नत्रयका परिशान) कराते हुए पावापुरके तालाब के मध्यभाग भूमि पर आये। देवगणोने कमलोसे विभूषित उस तालाब- हे मध्यभागमें चतकातमणि की दिव्य और परम सुन्दर एक शिला स्थापन को। देवगणोसे पूज्य श्रीवीर भग- HEREMAImposiindianmarparmacommammameramanartmmerme.
। [ ३०० ] new गुगिना हत्या गर्मागतोन् ततो जिन. । बाहुलाभिवगन्मासे दर्श च शर्वरीक्षये ।। २०७ ॥ मोक्षमाग गुगा न नक्षने स्वातिकाभिधे । महावीरो गुणे पूर्ण तारको भन्गप्राणिनाम् ॥ २०८ ॥ तुनि कारमेन्द्रा तदेवागनकपनात् । आजग्मुः तस्य पूजार्थ ज्ञात्वा निर्वाणसद्गतिम् ।। २०९ ।। महानदरापन्नाः सैन्यसप्तविमडिता । नानाशोभाभिसंपन्नाः सागना. सहवाहना ॥ २१० ।। पदे पदे प्रकाशार्थ चक देवा मुदान्विता नाकरत्नोद्भवाना च प्रकाश तमनाशकम् ।। २११ ।। सुराधिपा विभो देह दृष्ट्वा वस्वगतस्तदा । नत्वा च स्थापयामासु शिबिकाया सुरैः कृताम् (?) ॥२१२।। अग्नीन्द्रमुकुटोद्भूतपावकेन पुनः शुभे । काश्मीरागुरुकर्पूरैरन्यैर्द्रव्ये सुरोद्भवैः ।। २१३ ॥ वान्ने उस रत्नमयी शिला पर प्रतिमायोग धारण किया और कार्तिक वदी चतुर्दशीकी रात्रिके अन्तिम समय स्वाति नक्षत्रके उदयमें वे अन्त्य शुक्लध्यानके प्रभावसे समस्त कर्मशत्रुओंका समूल नाश कर निर्वाण पदको प्राप्त हुए ॥ २०४-२०८॥ भावार्थ-भव्य जीवोको संसारसे पार करनेवाले समस्त आत्मीक शुद्ध गुणोंसे परिपूर्ण ऐसे वीर (महावीर) भगवान् पावापुरके तालाबके मध्यभागसे मोक्षको पधारे । अर्थ-वीर भगवान के मोक्ष पधारनेके समय देवोके आसन कम्पायमान हुए। जिससे चतुर्णिकाय देव भगवान्के निर्वाणके समयको जानकर भगवान्की निर्वाण पूजा करनेके लिए वहाँ पर आये ॥ २०९ ॥ अर्थ-महान् आनन्द और हर्षसे प्रफुल्लित सात प्रकारकी सेनासे विभूषित अपनी-अपनी देवांगनाओं सहित अपने-अपने वाहनों पर बैठे हुए देवता अपूर्व शोभाके साथ वहाँ पर आये ॥ २१० ॥ अर्थ--उस समय हर्षसे प्रफुल्लित देवगणोने अन्धकार नाश करनेवाले और अपूर्व प्रकाशको प्रकट करनेवाले ऐसे स्वर्गके रत्नमयी दीपक स्थान-स्थान पर रखे। अगणित दीपकोंसे दीपावली (दिवाली) को प्रकट किया । उसी दिवससे यह उत्सव दीपावलीके नामसे दिवाली आजतक प्रचलित है ॥ २११ ॥ अर्थ-देवगणोंने त्रिलोकपूज्य वीर भगवान्के उस परम औदारिक दिव्य देहको एक सुन्दर पालकीमें विराजमान कर महान् उत्सव प्रकट किया ॥ २१२ ॥ अर्थ-पावापुरके उस तालाबके मध्यभागमें ही अग्निकुमारके देवोंके मुकुटोंसे प्रज्वलित अग्निके द्वारा मायालय जन्याच्या MSIPSIPSHIONSIDHI [ ३०१ ] पर्यायातरमेवाशु चक्र स्ते सुरनायकाः । तं कार्य अतिहर्पण शिवशर्मकरं वरम् ।। २१४ ।। तदग्ने मृतपिंडेज्या शुभा चक्र. शिवाप्तये । महामंत्रेण सौधर्मप्रमुखाश्च सुरेश्वराः ।। २१५ ॥ मोक्षाभिधेहि कल्याणे मोदकेन मता वुधाः । गणाधीशैजिनेन्द्रस्य इज्या मोक्षप्रदायिका ।। २१६ ।। प्रपेठु. शातिसत्पाठ गर्वशातिप्रदायकम् । सर्वेन्द्राश्चातिहर्षेण महदानदसंभृताः ।। २१७ ॥ तद्भम्म भुजयो. भाले नेत्रे च हृदये सुरा. । तथा सर्वशरीरेषु विभोः कायसमुद्भवम् ।।।२१८ ।। सवृत्वा चेति दस्ते इयमस्तु हि नो शुभा। शिवदा स्वामिनो नून मतिर्नास्त्यत्र संशयः।। २१९ ॥ आनदनाटकं चक्रे सौधर्मेन्द्रो हि हर्पत । अग्ने निर्वाणसद्भूमे. सह शच्या तथा सुरैः ।। २२० ।। अत्यन्त सुगन्धित केशर, अगर, चन्दन, कपूर आदि स्वर्गकी पवित्रतम दिव्य वस्तुओंसे वीर भगवान्के परम पुनीत उस दिव्य देहको देवेन्द्रोने पर्यायान्तर किया ॥ २१३-२१४ ॥ अर्थ--सोधर्म इन्द्र आदि मुख्य देवेन्द्रोने भगवान्के उस (पर्यायांतर अवस्थाको प्राप्त हुए) शरीरको मोक्षकी प्राप्तिके लिए महान् मन्त्रोंके द्वारा पूजा की (मृतपिण्डकी पूजा की) ॥ २१५ ॥ अर्थ-मोक्ष कल्याणकी कल्याणक पूजा गणधर देवोने मोक्षको प्रदान करनेवाली बतलाई है इसलिये प्रत्येक भव्यजीवको अति हर्षभावसे करना चाहिये ॥ २१६ ॥ अर्थ-~~-देवगणोने अति हर्षभावसे मंत्रपूर्वक विधिक्रमसे निर्वाण कल्याणक पूजाको कर अन्तमें शान्ति- पाठ जगत्को शान्तिके लिये किया ॥ २१७ ॥ अर्थ-भगवान्के शरीरको भस्मको देवगणोंने अतिशय पूज्य भावोंसे उस भस्मको अतिशय पूज्य समसकर सुखको प्राप्तिके लिये अपने भुजोंपर, हृदयमें, भाल, नेत्र और समस्त शरीरमें लगाई और अपनेको पवित्र माना || २१८ ॥ अर्थ-देवगणोने उस 'पवित्रतम' और मोक्षको प्रदान करनेवाली भगवान्के शरीरकी भस्मको उत्तम और शुभवस्तुको अत्यन्त संरक्षणीय समस कर अपनी-अपनी रत्नोकी पिटारियोमें बड़े यत्नसे गोप्य कर रखी। और उससे देवोने अपनेको मोक्षगति प्राप्त होगी ऐसा निश्चय किया ॥ २१९ ॥ अर्य-सौधर्म इन्द्रने उस समय निर्वाण भूमिपर अपनी इन्द्राणी और देवगणोंके साथ आनन्द नाटक अत्यन्त हर्षसे किया ॥ २२० । therauselbewuselusalusel clult dus luterlund [ ३०२ ] जासस्यमा - च्यामारायच्याursana आतोद्याना तदा श्रुत्वा ध्वनि कर्णसुखप्रदम् । श्रेणिकाद्याश्च भव्यौघा प्रचेल. सह भीरुभिः ॥ २२१ ॥ इज्याद्रव्येण सयुक्ता मोदवारविमडिना । एव सर्वे च सप्रापुः यत्र देवेश्वराश्च ये ।। २२२ ।। तमुत्सव च सदृष्ट्वा चिता ते भूमिपादय: । मुदमापुश्च सचक्र. प्रणतिमचला च ताम् ।। २२३ ।। सुनासीरकृतानदनाटक नददायकम् । विभो भूमे पुरस्त च ददृशुस्ते नरोत्तमा. ।। २२४ ।। परिपूर्ण विधायाशु सुनृत्य नृत्यागमार्थवित् । मघवा सह देवीधै सर्वेपा वकनददम् ।। २२५ ।। सुनासीरस्ततश्चाह शृणु श्रेणिक भूपते । पष्टिसहस्रप्रश्नाना कर्तार मगधाधिप ॥ २२६ ।। अद्य प्रभृतितो जाता वृपभाद्याः जिनेश्वरा । तेपा निर्वाणसत्पूजा अस्माभि रचिता वरा ॥ २२७ ॥ अद्येव वीरनाथस्य गतिनिर्वाणकाऽभवत् । अस्यैव चिंतनार्थं च मोक्षसौख्याप्तये नृप ।। २२८ ॥ प्रत्यब्दं मोदकेनैव दीपनातैघृतोद्भवे । रात्र्यते वीरनाथस्य इज्या कार्या सुभावतः ।। २२९ ।। अर्थ-वीर प्रभुके निर्वाण हर्षमें देवोने दुन्दुभि बाजे त्रिलोकको शब्दायमान करनेवाले बजाये । जिनकी ध्वनिको श्रवण कर श्रेणिक आदि प्रमुख राजाओंने वीर भगवान्का निर्वाण महोत्सव जान लिया । और उस महोत्सवकी पूजा करने के लिये सपरिवार सेना और समस्त प्रजासहित सुन्दर-सुन्दर पूजाको द्रव्यको साथ लेकर पावापुरके तालावपर वीरप्रभुको निर्वाणभूमि पर आये । प्रभुके शरीरको चिताको देखकर अतिशय हर्षको प्राप्त हुए । और भक्तिभावसे मोक्षकी प्राप्तिके लिये उस चिता की पूजा की, नमस्कार किया और देवोंके उस निर्वाग महोत्सवको देखकर हर्षित हुए। देवेन्द्रोंके उस आनन्द नाटकको समस्त राजाओने देखा और वीरप्रभुको महिमाको अपूर्व समझ हर्ष प्रकट किया ॥ २२१-२२३ ॥ अर्थ-नृत्यकलामे प्रवीण ऐसे इन्द्रने नृत्यकी विधिको समाप्त किया ॥ २२४ ।। अर्थ -आनन्द नाटकको समाप्त कर इन्द्रने श्रेणिक महाराज आदि प्रमुख राजगणोसे कहा । श्री वृष- भादि पार्श्वनाथ पर्यन्त तेवीस तीर्थंकर प्रभुको निर्वाण पूजा (निर्वाण कल्याणक) विशुद्ध भावोसे उत्तम रीत्याको और आज ही श्री वीर भगवान्को निर्वाण पूजा की है । इस महान् महोत्सवके स्मरणार्थ प्रत्येक वर्ष ( रात्रिके अन्तप्रहर ) इसी समयमें घृतोके उत्तमोत्तम दीपसमूहको प्रज्वालित कर और महा सुन्दर-दिव्य रससे परिपूर्ण इन्द्रियोंको तृप्त करनेवाले ऐसे लाडूसे निर्वाण पूजा करनी चाहिये। जयजयजाजराच्याजमयमच्या AnsweweeSiews [ ३०३ ] इत्युक्त्वा त च नाकेन्द्र: सहलेखे. सुरास्पद । जगाम वीरनाथस्य चितयन् सद्गुणोत्करान् ॥ २३० ।। सह भव्यैस्तदा भूपो मोदकेन शुभेन च । कृत्वेज्या सिद्धभूमेश्च आयातवान् स्वमास्पदम्॥ २३१ ।। तदा प्रभृतितो भव्याः आयवर्षे च सद्विधिः । अय विख्यातता जातः सर्वकार्यकरावहः ।। २३२ ।। कृत्वा सुरचनातन कासारे जलमभृते । तदालयस्य स भूपः प्रतिष्ठा तस्य स्थापना ।। २३३ ।। अन्त काले च त्याक्त्वा हि रौद्रध्यानस्य भावतः । प्रस्तरे प्रथमस्यैव श्वभ्रस्य गतिबधभाक् ।। २३४ ॥ प्राणान् जगाम दु खाव्य तत्र भुक्त्वा च आयुपम् । मित्राष्टसहाब्दात पश्चान्निर्गत्य तत्रतः ।। २३५ ।। अत्रेव कोशले देशे अयोध्याया भविष्यति । महापद्माख्यसयुक्तः आद्यस्तीर्थंकराग्रणो. ।। २३६ ॥ मजयमालामाल PAHESHEDSHIPE-SHEPHERDAsmees- इस प्रकार कहकर वीर प्रभुके गुणोंको स्मरण करता हुआ इन्द्र अपने स्थानपर गया ॥२२५-२३०॥ अर्थ--इन् आज्ञासे श्रेणिक महाराजने अनेक भव्य राजगणोके साथ सुन्दर लाडूसे श्रीवीर भगवान्- को निर्वाण पूजा को तथा उस सिद्धभूमिको (पावापुरके तालावमध्य जहाँसे श्रीवीर भगवान् मोक्ष धामको पधारे ) पूजा मुख्यतासे की । इस प्रकार समस्त प्रजाके समक्ष निर्वाण पूजा व सिद्धभूमि पूजाको यथाविधिसे परिपूर्ण कर श्रेणिक महाराज वीर भगवान्के गुणोका स्मरण करते हुए अपने स्थानको गये ॥ ३३१ ॥ अर्थ---श्रीवीर भगवान्की निर्वाण पूजा भारतवर्षमें सर्वत्र उत्तमोत्तम लाडू और घृतोंकी सुन्दर दीपा- वलीसे भव्यजीव तबसे आज पर्यंत करते आ रहे हैं, कर रहे हैं और जबतब जिन शासन है तबतक करते रहेंगे। दिवालीके दिवस लाडू चढानेको विधिको प्रवृत्ति उसी समयसे हुई है ॥ २३२ ॥ अर्थ--श्रेणिक महाराजने (जलसे परिपूर्ण) उस पावापुरके तालावके मध्यभागमें (जहाँसे श्रीवीर भगवान् निर्वाण पदको प्राप्त हुए थे।) श्रीबोर भगवान्का जिनालय बनवाया और उसकी प्रतिष्ठा अतिशय धूमधामसे को। जिनालयसे श्रीवोर भगवान्के स्मरणार्थ वीर भगवान्को चरणपादुका स्थापित की ।। २३३ ॥ अर्थ--श्रीवीर भगवान्से साठ हजार प्रश्नोको करनेवाले शुद्ध सम्यग्दृष्टि भव्य श्रेणिक महाराजने रोत्रपरिणामोसे नरक आयुका बंध किया था और इसीलिये अन्तसमयमें संक्लेश परिणामोसे प्राणोंका परित्याग फर श्रेणित महाराजका जीव प्रथम नरकके प्रथम पाथडे में चोरासी हजार वर्षको आयु पाकर उत्पन्न समट ww [ ३०४ ] EGENDE मस्यामरामाज- पभपः नारको चेन का पुनः तीर्थनायक । अहो भनाश्च पश्यध्व चरित्र कर्मणोद्भुतम् ।। २३७ ।। के न कर्मणा प्राप्ता दुःसवृदं बुवोत्तमा । देवमानवसमेव्या भरताद्या नरोत्तमा ।। २३८ ॥ मत्येल्यं मला भषा कर्मारातिविहानये । एक श्रीमज्जिनेन्द्रोक्तं कुर्वीध्व धर्ममुत्तमम् ।। २३९ ।। श्री गिरनार सिद्धक्षेत्र प्रकरण अथ शृणुय भो भव्या वृत्तातमपर शुभम् । सक्षेपत प्रवक्ष्येह जिनमार्गस्य सूचकम् ।। २४० ।। श्रोनेमिनाथस्य सुशोभितेन, पादारविंदेन मनोहरेण । यदुर्जयताभिधभूधरोहि, पवित्रता भो गतनिर्जराय॑ः ।। २४१ ।। गस्याद्गता मोक्षपुरे मुनीन्द्रा , द्विसप्ततिकोटिप्रमात्मध्यानात् । जायाशतै सार्धमहो सुराा, वदाम्यह तान् सकलान् त्रिकाल।।२४२।। हुआ। वहाँसे निकलकर कोशल देश अयोध्या नगरमें महापद्मनामके प्रथम तीर्थङ्करका महान् पद प्राप्त करेगा ॥२३४-२३६॥ अर्थ--कहाँ तो महा मडलीक राज्यपद और कहॉपर नारको अवस्था तथा कहॉपर फिर तीन जगत्से पूज्य तीर्थकर पद ! ये सर्व बातें एक आश्चर्य करनेवाली है। हे भव्य जीवो ! परंतु इसमे कुछ भी आश्चर्य माननेकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि ये सब कर्मके चरित्र है । कर्म इससे भी अधिक आश्चर्यकारी घटनाको कराता है । ससारमे कर्मोंसे कौन-कौन जीवोंको दुःख प्राप्त नहीं हुए। अरे भरत महाराज सरीखे चक्रवर्ती पुण्य पुरुष भी कर्मोके द्वारा दुःखको प्राप्त हुए तो अन्य साधारण जीवोंकी क्या बात? इसलिए समस्त भव्य जीवोंको कर्मोंके नाश करनेके लिए श्रीजिनेन्द्र भगवान्के द्वारा प्रतिपादित दयामयी पवित्र एक जैनधर्मका पालन करना चाहिये ॥ २३७-२३९ ॥ अर्थ- हे भव्यजीवो ! समस्त जीवोंके कल्याणके लिये अब एक दूसरा वृतांत संक्षेपसे कहते है । जिससे जैनमार्गकी महत्वता प्रकट होगी। त्रिलोक पूजित देवाधिदेव श्री नेमिनाथ भगवानके पवित्र चरण कमलोंसे पवित्र तीर्थ अवस्थाको प्राप्त हुआ ऐसा पवित्र नेमिनाथ स्वामीको निर्वाणभूमि श्रीगिरनार पर्वत सोरठ देशमे प्रसिद्ध है। जहाँसे बहत्तर कोडि मुनीश्वर मोक्ष धामको पधारे हैं । उस पर्वतराजको मै त्रिकाल भावविशुद्धिसे नमस्कार करता हूँ॥ २४०-२४२॥ SAHESHISHESHA ।
FORGETमा राजमार प्रमाण तस्य ज्ञातव्य HA [ ३०५ ] तस्य गुहायां वसनैविहोनो धरादिसेन. सुरपूज्यपाद । तपोदयालंकृतगात्रमूर्ति. वासं चकार मुनिराट् शिवार्थ ।। २४३ ।। अगाशधारी तपदीप्तिधारी ध्यानाधिकारी सकलार्थचारी | श्रीजैनधर्माधिसुसोमकारी पुनातु नः स वसुभावधारी ।। २४४ ।। तेन मुनीन्द्रेण विचारितेय अगाश्च पूर्वा ह्यखिलाः गताश्च । स्वस्य हृदि ह्यकदिने शुभाख्ये श्रीजैनमार्गस्य प्रवर्त्तनार्थम् ।। २४५ ।। शास्त्रादृते नैव नराखिलाश्च, धर्मस्य मागं श्रुतपाठन च । ज्ञास्यति नैवात्र श्रुतार्णव च, अतो रचिष्यामि दलेषु मध्ये ॥ २४६ ।। जयादिशुभ्र प्रथम चकार, ग्रथ ह्यकूपारसम मुनीन्द्र । अनेकभेदार्थभृत मनोज्ञं, श्रीवीरनाथस्य ध्वनेश्च तुल्य ।। १४७ ।। सहस्रसप्तति खलु । बुधैर्नमाम्यह त च शिरसा समये विके ।। २४८ ।। विचित्रगन्द गहनार्थयुक्तं महादि मते धवल च ग्रथम् । ततः पर भो मतिराट् चकार वुद्ध्याबलेन द्वितीय शुभं च ॥२४९।। चत्वारिंशत्सहस्रस्य मानमस्य बुधैर्मतम् । तस्मै ग्रन्थाय शुद्धाय नमोस्तु समय प्रति ।। २५० ।। अर्थ-गिरनार पर्वतकी गुफामें नग्न दिगंबर धरसेन नामके एक योगीश्वर ध्यान धारण कर रहते थे। श्रीधरसेन योगीश्वर देवगणोंसे साक्षात् पूजित थे। दया, तप, संयम आदि उत्तमोत्तम गुणोंसे विभू- पित अङ्गके कुछ अंश पर्यंत महान् ज्ञानके धारक, तपसे तैजस, ऋद्धिको प्राप्त, ध्यान क्रियामे अतिशय निपुण, समस्त तत्त्वके वेत्ता, श्रीजिनधर्मरूपी समुद्र को बढ़ानेके लिये चंद्र समान प्रभुताको धारण करनेवाले ऐसे श्रीधर- सेन मुनीश्वर हमारी रक्षा करो ।। २४३-२४४ ॥ अर्थ--श्रीभगवान् श्रीधरसेनाचार्यने अगको अपने हृदयमे धारण कर जैनमार्गको प्रवृत्तिके लिये ग्रन्योकी रचना को । श्रीधरसेनाचार्यने विचार किया कि अब आगे जीव मंदज्ञानी धारणाशक्ति विहीन होगे। इसलिये वे धर्ममार्ग व श्रुतका पठन-पाठन नही जान सकेंगे। इसलिये मै श्रुतको पत्रोपर लिखकर जगत्में प्रकाश करूँ । श्रीधरसेनाचार्यने सबसे प्रथम समुद्र के समान गम्भीर अनेक शब्दार्थोसे मनोज्ञ जगत्के हित कारक श्रीवोर भगवान्को ध्वनि समान परमपूज्य जयधवलादि ग्रन्थ निर्माण किये ॥ २४५-२४७ ॥ अर्थ-जयधवल ग्रन्यको श्लोक संख्या सत्तर हजार श्लोक प्रमाण है । उस ग्रन्थराजको मै शिर नमाफर निकाल वंदना करता हूँ ।। २४८ ॥ अर्थ---विचित्र शब्दरचनासे गुंफित और गंभीर अर्थका प्रतिपादक ऐसा महाधवल ग्रन्थ बनाया जिसके श्लोकोंका प्रमाण चालीस हजार है ऐसे समय ग्रन्यको मैं निकाल नमस्कार करता हूँ ॥ २४९-२५० ॥ राजयमान्च्याच्या [ ३०६ ] मिसिने धाल 7 गन्य, गूढार्थगुप्त ततीय वर च । मतातरा गच्दनणात्प्रयाति, विराण्डिता हयुत्तरयजिताश्च ॥२५१।। पण्टिगहरागर याव्य भगजीवेश्च पूजितम् । साष्टागेन मदा त च वन्दे कर्मारिनाशकम् ॥ २५२ ॥ एपा माणा ग्लना कुता वै ज्येष्ठस्य मासे शुभध्यानयोगात् । तेन मुनीन्द्रेण दलेपुमध्ये शुक्लाभिधे पचमीवासरे च ॥२५३।। मुन्यापि यानाश्राविकोपेश्नतु प्रकारे महतेः सुसधै । इज्या कृता वे अभिषेकमुख्या तेपा च गानवरदानमाने ।। २५४ ।। गमगध्यानेन हाणून प्रत्यक्त्वा चरादिसेनो यतिराट् गतश्च । स्वर्गेन्वभूत् शर्मतति शुभाच्च किं किं न यात्येव शुभोदयाद्धि ।। २५५ ।। पगाणा धारकास्तस्य शिष्या बुद्वयब्धिपारगाः । भूतबल्यादयो जाता योगीन्द्रा वसनोज्झिता ।। २५६ ।। गन्थप्रवतना कृत्वा गतास्तेपि दिव खलु । मुनीन्द्रा ध्यानयोगेन त्यक्त्वा प्राणान् शिवाप्तये ।। २५७ ।। ह्यनुकमेग योगीन्द्रो नेमिचन्द्रो मुनीश्वरः। आसीत् क्षितौ प्रविख्यातः तत्त्रयाणा च वाचनात् ।। २५८॥ अर्थ-विजयधवल ग्रंथ अतिशय गूढार्थ बनाया जिसको श्रवण करते ही मतांतर खण्डित हो जाते हैं और बडे-बड़े प्रवादि निरुत्तर होकर सत्य मार्गको ग्रहण करते है । यह ग्रंथ साठ हजार श्लोक प्रमाण बनाया। उस ग्रथ राजको त्रिकाल मै वन्दना करता हूँ ॥ २५१-२५२ ॥ अर्थ--उक्त तीन ग्रन्थोंकी ज्येष्ठ सुदी ५ को ताड़पत्र पर लिपिरूप स्वामी श्रीधरसेनाचार्यने रचना की।। २५३ ॥ अर्थ--श्रीधरसेनाचार्यको चार प्रकारके संघने (मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका) महान् उत्सव और भक्तिपूर्वक अभिषेक पूर्वक पूजा की ॥ २५४ ॥ अर्थ--श्रीधरसेनाचार्य शुभ ध्यानसे प्राणोंका परित्याग कर स्वर्गमे उत्तम सुखोंको प्राप्त हुए। शुभ ध्यानसे क्या-क्या नहीं होता है ॥ २५५ ॥ अर्थ--उक्त तीनों ग्रंथराजोको धारण करनेवाले आगमके पारगामी श्रीभूतबलि आदि अनेक दिगम्बर योगीश्वर उत्पन्न हुए ॥ २५६ ॥ अर्थ-श्रीमान् भूतबलि आदि आचार्यगण भी उन ग्रंथोंकी प्रवृत्ति समस्त संसारमें कराकर शुभध्यान- से उत्तम सुखको प्राप्त हुए ॥ २५७ ॥ अर्थ---आचार्य भूतबलि आदि महर्षियोंके बाद अनुक्रमसे श्रीनिखिल परमागमके वेत्ता श्रीदिगम्बर चEORIमरमराजलमयसलाम -- 1.
[ ३०७ ] तदनुसारतस्तेन ग्रन्थाना स्वस्य बुद्धितः । कृता च रचना लोके ग्रन्थवर्द्धनहेतवे ॥२५९ ।। संस्कृतापि कृता ग्रन्थाः प्राकृतापि कृताः पुन । तेन धर्मप्रकाशार्थ चात्मकल्याणसिद्धये ।। २६० ।। अयाणा रचना तेन महाधवलग्रन्थतः । ग्रन्थानां च कृता नूनं सर्वार्थस्य प्रकाशिका ॥ २६१ ॥ अनागतप्रकाशाख्यमाद्यमानन्दद खलु । सर्वक्रियादिकथक मतातरविघातकम् ॥ २३२ ॥ द्वितीयं मोक्षदं तत्त्वप्रकाशाख्यमघापहम् । ग्रथं सकलतत्वाना प्रकाशकरणे रविम् ।। २६३ ॥ मुनीनां वा गृहस्थाना सद्धर्मोत्पादक शुभम् । धर्मप्रकाशसंज्ञं च नाकशिवप्रदायकम् ॥ २६४ ॥ इमे च निर्मिताः शुद्धाः त्रयो ग्रन्थाश्च तेन वे । संभृताश्च विवेकाद्यैः कलाभि शिवदायकाः ।। २६५ ।। THA योगीश्वर सूरि श्रीनेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती उत्पन्न हुए। जिनने उक्त तीनों ग्रंथोंको पढ़कर अपनी प्रसिद्धि सर्वत्र अखण्ड रूपसे व्याप्त कर दी थी॥ २५८ ।। अर्थ-श्री आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांतचक्रवर्तीने उन ग्रन्थोंको (धवल, जयधवल, महाधवलादि) पारंगत कर उन ग्रन्थोके अनुसार प्राकृत-सस्कृतके बहुतसे ग्रन्थ बनाये। प्राकृतके ग्रंथ गोम्मटसार आदि प्रसिद्ध है कितने ही ग्रंथ सस्कृत भाषामें भी बनाये। जिससे जैनधर्मकी महिमा बढ़े और अपनी आत्माका कल्याण हो ॥ २५९-२६० ॥ अर्थ-महाधवल ग्रंथसे उनने तीन ग्रथोंकी संस्कृत भाषामें रचना की । उसमें अनागत प्रकाश नामका ग्रन्य निर्माण किया, जो समस्त मतमतांतरोका खण्डन करने में एक अद्वितीय श्रेणिको (छटा) धारण करता है और जिसमें समस्त क्रियाओका स्वरूप वर्णन किया है ॥ २६१-२६२ ॥ अर्थ-दूसरा ग्रन्थ तत्त्वप्रकाश नामका बनाया जो समस्त तत्त्वोका प्रकाश करनेके लिए सूर्य समान है । और समस्त पापोका नाश करनेवाला है ॥ २६३ ।। अर्थ-तीसरा गन्य धर्मप्रकाश बनाया जिसमें मुनि और गृहस्थोके धर्मका पूर्ण रूपसे वर्णन है । जिसको पहनेमे स्वर्ग और मोक्षके सुख प्राप्त होते हैं। आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धांतचक्रवर्तीने उन ग्रन्थोकी रचना ही जिसमें विविध प्रकारको फलाएँ गुम्फित को ॥ २६४-२६५ ।। जरामरHOTHE DHINजमाना [ ३०८ ] R-SIC- LATA अनागतप्रकाशस्यानुसाराच्च प्रनिर्मित । सूर्यप्रकाशसन्नामा अय मया' बुधोत्तमा ॥ २६६ ।। अनेकनयसयुक्तो मिथ्याधरविसदृश. । सज्जन व्यभावाढ्य सदा मान्यो न दुर्जनैः ॥ २६७ ॥ अस्य श्रवणमात्रेण कुपथपोपका नरा । मूकवत् येत्र स्थास्यति यथा नागाश्च कोलिता ॥ २६८॥ सार्थनामयुत चेद सकलार्थप्रकाशकम् । सुमत्या दायक भव्या पठध्व शिवसिद्धये ।। २६९ ।। अस्मिन् ग्रथे धृताः केचित् सबधाश्चान्यग्रथत । केचिद्धि मूलग्नथाच्च जैनमार्गप्रकाशकाः ॥ २७० ।। ग्रंथोऽय सज्जनाना च महद्धर्षप्रवर्द्धक । दुर्जनाना पुनश्चायं महत्क्रोधस्य वर्धकः ।। २७१ ।। इस ग्रंथका अवतरण अर्थ-श्री आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्तीके बनाए हुए अनागत प्रकाश नामक ग्रन्थके आधारसे यह सूर्यप्रकाश नामका ग्रन्थ मैने हे विद्वानो ! बनाया है ॥ २६६ ॥ अर्थ-यह सूर्यप्रकाश अनेक नय सहित मिथ्यांधकारको नाश करनेके लिये सूर्यके समान है और भव्य- भावोसे सज्जन पुरुष इसको सर्वोत्कृष्ट समझते हैं। और सदैव मान्य करते है। परन्तु दुर्जन पुरुष इसको श्रवणकर मनोनीत भावना करेंगे ॥ २६७ ॥ अर्थ-इस ग्रन्थके श्रवण मात्रसे कुमार्गको पुष्ट करनेवाले मनुष्य के मूर्ख समान स्थगित रह जॉयगे। जैसे सर्प मन्त्रसे कीलित होकर स्थगित हो जाते है ॥ २६८ ॥ अर्थ--यह सूर्यप्रकाश ग्रन्थका नाम सार्थक है। समस्त अर्थको प्रकाश करनेवाला और सुमतिका प्रदान करनेवाला यह ग्रन्थ है । इसलिये इसका पठन-पाठन मोक्षको सिद्धिके लिये करना चाहिये ॥ २६९ ॥ अर्थ -इस ग्रन्थमें कितने हो सम्बन्ध अन्य ग्रन्थोंसे लेकर किये है। कितने मूलग्नन्थका प्रबंध जैसाका तैसा रख दिया है ॥ २७० ॥ अर्थ--यह सूर्यप्रकाश नामका ग्रन्थ सज्जनोको महान् हर्षको बढानेवाला है और दुर्जन पुरुषोंको क्रोध- को उत्पन्न करनेवाला है ॥ २७१ ॥ HALATASTEHaper १ सूर्यप्रकाश यह स्वतन्त्र ग्रन्थ है । परन्तु इसकी रचना आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीके बनाए हुए अनागत प्रकाश नामके ग्रन्यसे को है।
Awesweी [ ३०९ ] सज्जना दुर्जना लोके हिताहितकरा घनाः । सति ह्यनादितः अस्मिन् गोपन्नगसमा बुधाः ।। २७२ ।। तत्क्षणे सज्जना नैव परकाव्य गुणोज्ज्वलम् । दूषयन्त्येव त दृष्ट्वा मुदमेव प्रयात्यहो ॥ २७३ ।। चरत्यहो तृणानेव यथा गौः पयसततिम् । ददात्येव न रवत च कदापि तद्धि द्वेषतः ॥ २७४ ।। तथा हि सज्जनाना च सदा प्रकृति निर्मला । स्वयमेव मनोमोददायका द्वेषवजिता ॥ २७५ ।। दह्यमानोपि भो भव्या. पावकेनैव चन्दनः । तथापि नैव दुर्गन्ध ददात्यहो न संशय. ।। २७६ ।। तथाहि सज्जनो नैव पीड्यमानोपि दुर्जनै । मुञ्चति सज्जनत्व च शत्रुमित्रसमानधीः ।। २७७ ।। शर्करामिश्रित दुग्ध पिवत्येव भुजगमा । तथापि गरल येहि मुचत्येवामृत न च ।। २७८ ।। TATAEIGER-यमयमाच्या SHerest अर्थ ---सज्जन और दुर्जन पुरुष गाय और सर्पके समान हिताहित करनेवाले अनादिसे ही है ॥२७२॥ अर्थ-सज्जनोका यह स्वभाव ही है कि दूसरोके निर्माण किए हुए काव्यको गुणसम्पन्न देखकर प्रसन्न होते हैं ॥ २७३ ॥ अर्थ--जिस प्रकार गाय तृणोंको भक्षण कर दूध देती है परन्तु कभी भी द्वेषसे रक्त नही देती है । ऐसे ही सज्जन पुरुष सदैव गुणग्राही ही रहते हैं ॥ २७४ ॥ अर्थ--सज्जन पुरुषोका ऐसा ही स्वभाव होता है कि वे सबको आनन्द ही प्रदान करते है परंतु फिसीसे भी द्वेष नही करते हैं ।। २७५ ॥ अर्थ--चन्दन जिस प्रकार जलाने पर भी अपनी सुगन्धिको नही छोड़ता है और कभी किसी अवस्था में दुर्गन्ध नही देता है । यह उसका स्वभाव है । इसी प्रकार सज्जनोंका भी ऐसा ही स्वभाव होता है कि वे गुणोंको ग्रहण करते हैं ॥ २७६ ॥ अयं---चदनके समान सज्जनोका भी यही स्वभाव है कि दुर्जनोके त्रासको सहन कर भी सज्जन पुरुष अपनी सुजनताका परित्याग नहीं करते हैं और शत्रुमित्र पर एक समान हित रखते हैं ॥ २७७ ।। अर्थ-मिश्री मिश्रित दूध सांपको पिलाने पर भी साँप विष ही उत्पन्न करता है अमृत नही। वैसे हो वुर्जनोका यह स्वभाव ही है कि वे दोषोको ग्रहण करते हैं और गुणोका परित्याग करते हैं ॥ २७८ ॥ LIKामान्य Pechar [ ३१० ] H meSweSire तथा हि दुर्जनाना च स्वभावोय न सशय । दोपाणा ग्रहणे दक्षा गुणग्रहणविच्युता ॥ २७९ ।। दर्शने परदोषस्य खलाश्चात्येवचातुरा । स्वदोपदर्शने ते हि जन्माधसदृशा खलु ।। २८० ॥ रुच्यते नैव दुष्टाना परोदय. कदाप्यहो । रवेस्तेजो यथा लोके दिवाधाना तथैव हि ॥ २८१ ।। परोदय च दृष्ट्वा हि वृथा कोप भजन्त्यहो । ये ते च दुर्जना नून धिक् वृथा कोपकारिण. ।। २८२ ।। परकीय महाकाव्य निन्दयन्त्येव दुर्जना । मनोहर हि तेपा च स्वभावोय सनातन ॥ २८३ ।। सज्जनाना गुणाना च गृह्णार्थ निर्मिता इमे । सज्जना अत्र लोके वा स्वयभुवा बुधोत्तमा. । २८४ ।। गृह्णार्थं दोप वस्तूना इमे च निर्मिता खला । ब्रह्मणा चात्र सन्देहो नो खलु सज्जनोत्तमाः ॥ २८५ ॥ सुज्ञानधारका लोके कुज्ञानधारका खलु । माहेपोसदृशा येहि ज्ञेया पन्नगसदृशा. ॥ २८६ ॥ वचनाडम्बरै किं स्यात् सज्जना गुणपोपका । भो बुधा दुर्जना नून दोपपोपणमरता ॥ २८७ ।। eSHPSSHESAMESHESH मायायमच्या-मरच्याच्यास्यामन्याच्या जय cho अर्थ--दुर्जन पुरुष दूसरोके दोष देखनेमे ही अतिशय निपुण होते है। परन्तु कभी भी अपने दोषोंको जन्मांध पुरुषके समान चक्षु रहने पर भी नहीं देखते हैं ॥ २७९-२८० ॥ अर्थ---दुष्ट पुरुषोको दूसरोका अभ्युदय (उन्नति) रुचिकर नही होता है। जैसे सूर्यका प्रकाश उल्लू नामके जीवको नहीं रुचता है । दुष्ट पुरुष दूसरोके उदयको देखकर वृथा ही क्रोध करते है इस प्रकार बिना कारण क्रोध करनेवाले दुर्जनोंको धिक्कार है ॥ २८१-२८२ ॥ अर्थ-दुर्जन पुरुष दूसरोके बनाये हुए काव्यको निन्दा करते है यह उनका सनातन स्वभाव ही है ॥ २८३ ॥ अर्थ-सज्जन पुरुषोका निर्माण गुणोंको ग्रहण करनेके लिए ही हुआ है । परंतु दुर्जन पुरुषोंका निर्माण दुर्गुणो (दोषो) को ग्रहण करनेके लिये हुआ है । इसमें हर्ष विषाद नही करना चाहिये। जिसका जैसा स्वभाव होता है वह वैसा ही करता है ॥ २८४-२८५ ॥ अर्थ- इस विशाल संसारमें सुज्ञान और कुज्ञानके धारक अनेक मनुष्य है। कितने गायके समान सुजन है और कितने ही सॉपके समान दुर्जन हैं । इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है। परंतु सबका सारांश मात्र यही है कि सुजन गुणोंका पोषण करते है और दुर्जन दोषोंको पुष्ट करते है ॥ २८६-२८७ ॥ RS - [ ३११ ] ParmeSHIDARSearPSPAN शब्दा मे काव्योपरि कोप च मा कुरुध्व वृथा च भो। कोपोहि सर्वपापस्य वर्द्धको नात्र संशय ॥ २८८ ।। हृदिहि भवता नैव रुच्यते भो नरोत्कराः । ग्रन्थोयं भजथ नून माध्यस्थं पापनाशकम् ।। २८९ ।। आत्मनिन्दा च कुर्वन्ति परेपा सज्जनाश्च न । परकाव्य च ते दृष्ट्वा हर्षोल्लास भजन्त्यहो ।। २९० ॥ वातातकप्रयुक्तश्च यद्वत् कश्चित् ब्रुवति ना। वचसा सततिं नून शब्दाशब्दविवजिताम् ।। २९१ ॥ तद्वत् उक्ता मया ह्यस्मिन् ग्रन्थे च वचनावलिः । या दृष्ट्वा सज्जनास्ता च मा भजध्व क्षमापहं ।।२९२॥ अभिमानेन अस्यैव नो कृता रचना वुधाः । मया केवलधर्मस्योद्योतनाथ शिवप्रदा ।। २९३ ।। आलस्ययोगाद् वुधसत्तमा हि, अस्मिन् धृतादित्यप्रकाशनथे ।। अशुद्धा यदि चेन्मया वै, क्षमध्वमेवाखिलसज्जनाा || २९४ ।। मा यातु ज्ञानमम्पन्ना बालकोपरि मे खलु । रोपत्वं सज्जनास्तेहि होनशब्दार्थदर्शनात् ॥ २९५ ॥ अर्थ-मेरे इस काव्यके लिये वृथा ही क्रोध किसीको नही करना चाहिये क्योंकि क्रोध समस्त पापों का मूल कारण है ।। २८८ ।। अर्थ-हे सज्जनो! जो आपको यह मेरा बनाया हुआ सूर्यप्रकाश नामका ग्रंथ मचि कर न हो तो आप पापनाशक मध्यस्थ भावको धारण करें ।। २८९ ॥ अर्थ--सज्जन पुरुष दूसरोको निन्दा नहीं करते । और दूसरोंके काव्यको देखकर वे अतिशय हर्षित होते हैं ।। २९०॥ अर्थ-जिस प्रकार वात रोगी यद्वा तद्वा बकवाद करता है कुछ भी शब्दाशब्दका बोलने न बोलनेका विचार नही करता है । ऐसे ही यह मेरी वचनावलि इस ग्रन्थमे गुंफित की है। सज्जन पुरुष इससे दुर्भावको धारण नही करेंगे ॥ २९१ ॥ अर्थ-मने यह ग्रन्थ अभिमान या किसी अन्य स्वार्थकी सिद्धिके उद्देश्यसे नही बनाया है । केवल धर्म फा उग्रोत हो एक इसी सद्भावनासे प्रेरित हो यह ग्रन्थ निर्माण किया है।॥ २९२ ॥ अर्थ-इस सूर्यप्रकाश ग्रन्थमें प्रमादसे कोई अशुद्ध शब्द रखे हो। उस पर सज्जन पुरुष क्षमा भाव गारण फरें । कोई होन शब्द देखफर ज्ञानसे विभूषित सज्जन पुरुप मुझे बालक समझ कर क्रोधभावका प्रकाश नहीं करें ।। २९३-२९५ ।।
[ ३१२ ] वीर शर्मप्रदायको मुनिनुतो वीर श्रिता ज्ञानिनो। वीरेणैव समाप्यते शिवपदो वीराय मूर्ना नम ॥ २९६ ॥ वीरान्नास्त्यपरोहि देव भवने वीरस्य शुद्धा गुणा । वीरे चित्तमह दधे ह्यनुदिन हे वीर मेघ जहि ।। २९७ ।। देवेश. पूज्यपाद हतसकलमलश्चिन्मय शातरूप' , वीरेश स्वात्मसस्थो गणधरमहितो लोकभागाग्रसस्थः। पापाना वारनाशे अतुलपविसमः काममातगसिंह , ह्यस्तु मेसी जिनेन्द्रो विमलमतिप्रदो मगलाय शिवाते ।। २९८ ॥ शेषास्ते जिननायका. शिवप्रदा ससारविच्छेदका , देवेन्द्र खचरेश्वरैमुनिवरैः सेव्याः सदा शप्रदा. । पापातकविघातकाः सुविमला नानागुणे. सभृताः , कुर्वतु मम मगल शिवपद वद्या मया सस्तुता. ॥ २९९ ।। सिद्धाः कर्माण्टहीना गणधरमहिता लोकभागाग्रसस्था , वद्या नेमीन्दुनाम्ना शिवपदजनकाः सर्वपापाग्निमेधा । निष्काया निर्विकल्पा गुणगणनिलयाः सर्वकालेषु सस्था , ते मे कुवंतु नित्य सकलसुखकर मगल पावन च ।। ३०० ॥ अर्थ-वीर भगवान् ही सर्व सुखोको प्रदान करनेवाले है । श्रीवीर भगवान्का ही शरण सज्जन पुरुष स्वीकार करते है। श्री वीर भगवान्के प्रमादसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । इसलिये श्री वीर भगवान्को मस्तक नमाकर नमस्कार है । श्री वीर भगवान्के सिवाय अन्य कोई इस जगत्में देव नही है। वीर भगवान्के शुद्ध गुण है । मै वीर भगवान्में अपने चित्तको लगाता हूँ। हे वीर प्रभो ! मेरे पापोंको दूर करो ॥ २९६-२९७ ॥ अर्थ-देवाधिदेव पूज्यपाद समस्त कर्ममल कलंकको नाश करनेवाले चिन्मय परमशांत अपने स्वरूपमें स्थिरीभूत गणधर देवोंसे पूजित लोकके अग्रभागमें विराजमान पापोंके नाशक कामरूपी हाथीका नाश करनेके लिये सिंह समान और विमल ज्ञानके प्रदान करनेवाले ऐसे अरहंत श्रीवीर परमात्मा हमें मंगल प्रदान करें।।२९८॥ अर्थ-मोक्षको प्रदान करनेवाले, संसारका नाश करनेवाले, देवेन्द्र, विद्याधर और मुनीश्वरोंसे सदैव पूज्य, पापोंका नाश करनेवाले, अनंत गुणोंको प्रदान करनेवाले ऐसे चतुर्विशति वृषभादि देव हमें मंगल प्रदान करो ॥ २९९ ॥ अर्थ-आठ कर्मोंसे सर्वथा रहित, गणधर देवोंसे पूज्य, लोकके अग्रभागमें विराजमान, मोक्षपदको प्रदान करनेवाले, समस्त पापोंको नाश करनेवाले, शरीर रहित, समस्त प्रकारके संकल्प-विकल्पोसे रहित, गुणोके स्थानभूत, सब कालमें अनादिनिधन रूपसे विराजमान और नेमिचंद्र ( ग्रन्थफर्ताका नाम ) आचार्यसे वंदनीक ऐसे सिद्ध परमात्मा परम पवित्र मंगल प्रदान करो। ३०० ॥ areshe sicedure-sweSHESHeHearPaweSHIPS राम स्यामा यजयसर [ ३१३ ] PAHESHARE SHeaves- आचार्या धर्मतीर्था मुनिवरनिवहैः पूजिता सत्पदाव्जाः । रामःशत्रुगुणाना सुधरणकुशला सर्वपापारिहोना । धीरा वे धीरसेव्या सुरअसुरनुता पूर्णज्ञानाधिचद्रा । नो वो यच्छतु शुद्धं शिवपथजनक मगल मत्तपाढ्याः ।। ३०१ ।। बदेह पाठकाना पदद्वयमनिशं पावनाना त्रिशुद्धया । येपा शक्त्यस्ति नित्य अवगमपठने पाठने लेखपूज्यम् । शिष्यानाते च दध्यु परममतियुताः पापसतापहारा | ये गुद्ध मगलोघ कविमतिजनकाः शुद्धाभावाय शुद्धाः ॥ ३०२ ॥ पक्षे वा मासमध्ये सुनिघसकरणे विद्यतेनल्पशक्तिः । मूले वृक्षस्य चापि गिरिशिरसि तथा वा तटे चैव नद्याः । साधूना सर्वकाले पदयुगलमह वा त्रिशद्धया च येपा। ते मे हि साधुवर्गाः परमसुखप्रदाः मङ्गलाय भवन्तु ।। ३०३ ।। एतेपा परमेष्ठिना बुधजना गात्रस्थपापोत्कराः, नानादुःखप्रदायका ह्यतिदृढाश्चैव प्रयांत्येव वै। नागत्व अमलाप्तये शुभहृद सस्मरणतः तत्क्षणे, कुर्वीध्वं शिवशर्मद हृदि सदा स्मरण ह्यतः पापहम् ॥ ३०४ ।। - RICSeeWASHRENIE अर्थ--धर्मतीर्थके नायक मुनिवरोंसे पूज्यपाद, छत्तीस गुणोसे विराजमान, समस्त पंचाचारके धारण करनेमें कुशल, समस्त पापोके नाशक, सुधीर वीर पूर्ण ज्ञानके समुद्र ऐसे आचार्य परमेष्ठी हमें मोक्ष पंथमें जाने के योग्य मंगल प्रदान करो ॥ ३०१॥ अर्थ--जिनमें समस्त द्वादशांगके पठन-पाठनकी अपूर्व शक्ति विद्यमान है, देवोसे पूजित समस्त सतापका नाश कननेवाले और परमबुद्धिके प्रदान करनेवाले (पाठक) उपाध्याय परमेष्ठी मंगल प्रदान करो। मैं सतत वंदना करता हूँ॥ ३०२ ॥ अर्थ--पन्द्रह दिवस अथवा एक नास पर्यंत प्रोषध (उपवास) धारण करनेकी जिनमें अपूर्व शक्ति होती है । जो वृक्षके मूल या पर्वतके शिखर अथवा नदोके किनारेपर योगासन लगाकर अपने आत्मध्यानमें लवलीन होते हैं ऐसे साधु परमेष्ठोके चरण कमलोको त्रिशुद्धिसे नमस्कार करता हूँ। वे साधु परमेष्ठी परम सुग्यको प्रदान करनेवाला मंगल प्रदान करो ॥ ३०३ ॥ अर्थ--ये उपर्युक्त अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु पंच परमेष्ठो भव्यजीवोके ममन्त प्रकारके पापोका नाश करनेवाले हैं और जिनके स्मरणसे अमल गुणोंकी प्राप्ति होती है। वे पंचपरमेष्ठी हमें मगल प्रमान करो और हमारे पापोका नाश करो ॥ ३०४॥ चमच्यानलमा [ ३१४ ] यसरन्यायालय आधिव्याधिहरा सुशर्मजनका' पापालिनाशङ्करा , वद्या. पूज्या सुरेन्द्रः सकलगुणधराः पापसन्तापहीना. । चेमे वद्या यया वै भवभयहतका ते दिशन्तु च नो व, शर्म मोक्षस्य नून गुणनिवहकराः तारका हि भवाब्धेः ।। ३०५ ।। त वन्दे मर्वकाले परमसुखप्रद श्रीजिनेन्द्र. प्रणीतम्, भव्याना तारणेश सकलसुरगणैः सेव्यमान सदास्थम् । निर्दोप सत्प्रपूज्य विपथनगपविं धीरवीरैर्गणेन्द्र । सेवाद्यस्यैव भव्या अमलगुण (युता) याति मोक्षे सदा हि ॥ ३०६ ।। यो धर्मोऽधर्महन्ता जिनवरपददो वन्दनीयो मुनीन्द्रः, यावन्मुक्त्यङ्गनायाः परमतपवशान्नैव प्राप्तिर्भवेन्मे । तावन्मे शुद्धचित्ते दुरितनगपवि. तिष्ठतु सर्वपूज्यः, दुःप्राप्यो दुर्जनानाममलमतिप्रद सो हि ससारहन्ता ।। ३०७ ।। वन्दे त धर्मनाथ नरसुरखचरैः सेव्यमान गणेश, प्राच्याया ब्रह्मरूप सकलमुनिगणै. सद्दिशाया च सस्थम् । श्रीमन्त मुक्तिकात सकलभयहर वदनात्सेवकाना, भक्त्या सोमधराह्न हरतु मम हृद. सो जिन पापशत्रुम् ।। ३०८ ।। अर्थ-समस्त प्रकारको आधि-व्याधियोको दूर करनेवाले, पापोके सन्तापको हरनेवाले, देवेन्द्रोसे पूज्य, समस्त गुणोको धारण करनेवाले, ससारके समस्त दुःखोंका नाश करनेवाले, संसार समुद्रसे तारनेवाले ऐसे पंचपरमेष्ठी मोक्षसुख प्रदान करो ॥ ३०५ ॥ अर्थ-परम सुखको प्रदान करनेवाली, भव्यजीवोंको संसारसमुद्रसे पार करनेवाली, समस्त देवगणोसे पूज्य, समस्त दोषोंसे विमुक्त, कुमार्गका नाश करनेवाली, पूर्वापर विरोध रहित, निर्मल गुणोसे पूर्ण ऐसी श्री जिनेन्द्र भगवान्के मुखकमलसे विनिर्गत श्रीशारदा देवीको मै त्रिकाल वदना करता हूँ ॥ ३०६ ॥ अर्थ-अधर्मका नाश करनेवाला, श्रीजिनेन्द्र भगवान्का उत्तम पद प्रदान करनेवाला, मुनिगणोसे वंदनीय, परम तपसे प्राप्त, समस्त पापोंको नाश करनेवाला, संसारका विध्वंस करनेवाला, विमल बुद्धिका प्रदान करनेवाला और दुष्ट जीवोंको अप्राप्य ऐसा पवित्र जैनधर्म जबतक मोक्षसुखकी प्राप्ति न हो तबतक मेरे हृदय में विराजित रहो ॥ ३०७ ॥ अर्थ-~-धर्मके ईश, नर-सुर विद्याधरोंसे पूज्य, गणधरोसे सेव्यमान, पूर्वदिशामे ब्रह्माका स्वरूप धारण करनेवाले, मुक्तिके वल्लभ, समस्त भयोंको हरनेवाले ऐसे देवाधिदेव श्रीसीमन्धर स्वामी मेरे पाप शत्रुओका नाश करो ।। ३०८ ॥ जयमालयाच्यामरामान्यजन्यमान्यस्य 20tike मत जज [ ३१५ ] । नरसुरपतिवद्य पापदावाग्निमेघ मसमगुणनिधान सर्वतत्त्वार्थसारं। जिनवरमुखजात गौतमायेः प्रणीतं, सकलमुनिपसेव्य हि इद भो भजध्वम् ।। ३०९।। अस्यैव श्रवणाद्भवेन्नरवरा ज्ञान क्रियाणा तथा, धर्मस्यैव फलस्य शर्मजनक मुक्तेः स्वरूपस्य वै । अन्यस्यापि सदेव भो हृदि खलु एव च ज्ञात्वा हृदि, कुर्वीध्व ह्यघहानये अनुदिन स्वाध्यायमस्यैव वै ।। ३१० ॥ अम्य प्रयोगात्सकलाश्च अहा , प्रयात्यहो दूरतरा जनाना । खगेश्वरदर्शनतो यथा हि, पवनाशना दुर्जनरूपयुक्ता- ॥ ३११ ॥ पठतु चेम वुधसत्तमास्ते ग्रथ मन पापविभजक हि । वादस्य कर्तुः गजसिंहतुल्यमनेकभेदार्थभृत मनोज्ञम् ।। ३१२ ।। राज अर्थ--तर, देव, इन्द्र, चक्रवर्ती आदि त्रिलोकके जीवोंसे पूज्य, पापरूपी दावाग्निको शांत करनेके लिये मेघके समान समस्त गुणोंका निधान, सर्व तत्त्वोंका सारभूत जिनेन्द्र के मुखकमलके उत्पन्न यह वाणी श्रीगौतम स्वामीने प्रतिपादन की है। और क्रमसे गुरुपरंपरा द्वारा वैसी ही अविच्छिन्न धाराप्रवाह रूप चली आ रही है। ऐसी दिव्यध्वनिरूप (जिनवाणी)को नमस्कार करता हूँ ॥ ३०९ ॥ अर्थ-इस ग्रन्थराजके श्रवण करनेसे मनुष्य समस्त क्रियाओके ज्ञाता हो जाते हैं धर्म और धर्मफलके स्वरूपको जानने लग जाते हैं । जो इस ग्रन्थराजका स्वाध्याय करेंगे वे समस्त तत्त्वोके ज्ञाता होंगे । इसलिये पापोके नाशके लिये इस ग्रन्थराजका स्वाध्याय नित्य प्रतिदिवस करना चाहिए ॥ ३१० ॥ अर्थ-जिस प्रकार गरुड़के दर्शन मात्रसे सर्प भाग जाते है। उसी प्रकार इस ग्रन्थके पठन-पाठन, स्वाध्याय और श्रवण करनेसे समस्त पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते है ॥ ३११॥ अर्थ-~-इस ग्रन्थका पठन-पाठन हे भव्यगणो अवश्य ही करिये । इससे मनके समस्त पाप शीघ्र ही नाशको प्राप्त हो जायंगे । यह ग्रन्थ वाद-विवाद करनेवालेको सिंहके समान है और अनेक भेदार्थको प्रकट पारनेवाला है ।। ३१२ ॥ रासमोर शौचाली [ ३१६ ] सूर्यप्रकाश ग्रंथ प्रशस्तिः ASHESHI श्रीमलसघे विदिते धराया गच्छे हि तस्मिन् वरभारतीये । तस्मिन् बलात्कारगणेतिरम्ये श्रीकु दकु दाख्यसुवशयुक्ते ॥ ३१३ ।। तपद्धियुक्ते वरनदिनाम्न आम्नायेषु तस्य ह्यभून्मनेश्च । स्वर्णादिकीर्यिवरसूरिनाम्ना चपावतीनामपुरे प्रशस्ते ।। ३१४ ।। सूरे हि तस्य वर बोधयुक्त , ह्यभूत् सुनाम्ना विदुपा च मान्य । विद्वद्वर श्रीयुतराजमल्ल , शिष्यो नृपः पूजितपादपद्मः॥३१५ ।। नाम्ना फतेचद्र सुरूपयुक्त , शिष्यो ह्यभूत्तस्य मनोभिराम.। शास्त्राब्धिपारगतचित्तवृत्ति , रवीव दैगबरधर्मकारी ।। ३१७ ॥ तस्याप्यभूच्छोवरबोधवान् वे, वृदावनाख्य सुरपूज्यपाद । प्रतापवान् शुभ्रगुणाकितश्च, जिनेन्द्रपादाब्जद्विरेफतुल्यः ।। ३१७ ॥ स्मरारिहन्ता सकलार्थवेत्ता, परोपकारे धृतशुद्धचित्त । धराधिपै. सेवितपादपद्म , धर्माब्धिइन्दुसमभावयुक्त ॥ ३१८ ।। कलाकलापाङ्कितविग्रहश्च, पञ्चाक्षशर्माद्विमुख सदा वै । मायाभिमानेन विवर्जिताग', नि क्रोधरूपश्च्युतलोभशत्रु ॥ ३१९ ।। अर्थ--संसार मात्रमें प्रसिद्ध ऐसे मूलसंघमें भारतीय नामक गच्छमें बलात्कारगणमें और श्रीकुदकुद आम्नायमें तप ऋद्धिसे विभूषित-पद्मनन्दी मुनिकी आम्नायमें स्वर्णकीति नामके प्रसिद्ध आचार्य चंपापुर नगर में थे ॥ ३१४-३१५ ॥ अर्थ----स्वर्णकीर्ति आचार्यके पट्ट पर विद्वानोंसे मान्य श्रेष्ठ विद्वद्वर्य श्रीयुक्त राजमलजी हुए। जिनके अनेक राजा शिष्य थे। श्रीराजमलजीके फतेचन्द्रजी नामके सुजन शिष्य थे। फतेचन्द्रजी समस्त शास्त्रोमें पारंगत सरस्वतीको अपने चित्तमें धारण करनेवाले और धर्मको प्रकट करनेवाले थे ॥ ३१४-३१५ ॥ अर्थ--फतेचन्द्रजीके वृन्दावन नामके शिष्य थे। वे प्रतापी, गुणवान्, श्रीजिनधर्मके प्रेमी देवताओसे पूजित, ज्ञानकलामें अतिशय निपुण थे ॥ ३१६-३१७ ॥ अर्थ--श्रीवृंदावनका वर्णन ऊपर कहा जा चुका है। फिर भी तीन श्लोकोमें विशेष दिखलाते है । कामदेवको नाश करनेवाले, समस्त तत्त्वको जाननेवाले, परोपकार करनेमें विशेष लवलीन, राजाओं से सदैव मान्य, धर्मको वृद्धिंगत करनेके लिये चन्द्रमाके समान, अनेक कलाओंसे जगत्मे चमत्कार प्रकट करने- VAITARIA ESH ~~uke चाचाजमातारातारा [ ३१७ ] मतातरपालकभिश्च पादो, सद्वदितौ यस्य प्रतापतेजसा। तस्यापरा कि कथयामि शोभा, धर्मोपदेशे धृतचित्तवृत्तिः ॥ ३२० ।। वृदावनस्यापि ह्यभूद्वरेण्यः, सीतादिरामाभिधशिष्य वाग्मी । भव्यै नृभि. सेवितपादपद्मो, मृद्वाशयो वा वरपुण्यमूर्तिः ।। ३२१ ।। विवेकधर्ता वररूपयुक्तः, दयावनपालनचचु शुद्ध. । श्रीजैनधर्मस्य प्रकाशकारी, विद्वज्जनाना मनमोदकारी ।। ३२२ ।। पट्कर्मधर्ता विहताहवारः, श्रीसिद्धभूमेश्च कृता सुयात्रा। सच्छोलवत्तेन विभूपितागो, मानापमाने समधी सदैव ॥ ३२३ ।। श्रीराम ह्यते शिवजीहि आदौ, शिष्यो धराया विदित कृपालु , अभूच्च तस्यापि गुणोत्कराढयो, विपश्चिदोघेषु सुमुख्यमूर्तिः । अनेकविज्ञानप्रकाशकारी, सद्धर्मध्याने धृतधी. निशान्हि । सिद्धात पौराणविचारदक्ष सद्गी. सदासेवितधर्मवर्मा ।। ३२४ ॥ कियत्प्रमाव्दविहिता च तेन, तत्रैव चम्पावति सत्पुरे हि । सद्धर्मयुक्तेन गुणाकरेण भव्याब्जभानुसदृशेन येन । तस्माद्धि चागत्य पुरे मनोज्ञे, तक्षाभिधे सैव स्थितिं चकार । कियन्समैर्वा सुखतश्च वाग्मी श्रोधर्मवमव प्रवर्द्धनार्थम् ।। ३२५ ।। वाले, पाँच इन्द्रियोको जीतनेवाले, विषयोसे विरक्त, मान, माया, लोभ आदि कषायोसे रहित, क्रोधादि दुर्भावनासे विरक्त, परमशात, अनेक मतान्तरोका खण्डन कर समस्त वादियोसे पूजित, परम प्रतापी और तेजस्वी ऐसे वृंदावनके गुणोका कौनसे शब्दोंसे वर्णन करें। उनके समस्त गुण कह नहीं सकते ॥ ३१८-३२० ॥ अर्थ-वृन्दावनके शिष्य सीताराम थे। सीतारामजी वाग्मी भव्यजीवोसे पूजित, सरल परिणामी, पुण्यमूर्ति, विवेकी, सुरूपवान, दयावतके पालने में विशेष उपयोग लगानेवाले, अन्तःकरणकी शुद्धताको धारण फरनेवाले, श्रीजैनधर्मके प्रभावक विद्वानोसे मान्य, आनन्द स्वभाववाले, षट्कर्ममें प्रवीण, पापोको नाश करने- वाले, सिद्धभूमिको यात्रा करनेवाले, शील और व्रतसे विभूषित, मानापमानमे चित्तको सावधान रखनेवाले, परम शात थे ।। ३२१-३२३ ॥ अर्थ-सीतारामके शिष्य शिवजीराम प्रसिद्ध हुए। शिवजीराम कृपालु, गुणगणोसे विभूषित, विद्वानो में सबसे अग्रेश्वर, विज्ञानको प्रकट करनेवाले, धर्मध्यानमें अपनी बुद्धिको लगानेवाले, धर्मके सूर्य सिद्धान्त, समुद्र के पारगत, श्रेष्ठ वाणोको प्रकाश करनेवाले और धर्ममार्गकी सदैव सेवा करनेवाले थे ॥ ३२४ ॥ अर्थ-शिवजीरामजी चम्पापुर नगरमें विशेष रहे। और धर्मको महिमा चम्पापुरमें विशेष रूपसे प्रकट को । फिर वहाँसे तक्षाभिध नगरमें कुछ समय सुखसे रहे । और यहाँपर भी धर्मका उद्योत करते रहे । शिवजीरामने अपनी पर्यायमें अपनी शक्तिसे असीम धर्मको महिमा प्रकट की । और स्थान-स्थान पर एमके प्रकाशनके लिये विहार करते थे ।। ३२५ ॥ househtestament amb els - । ३१८ । गद्वातागमतश्च यजमान्यात गतमालपिनोहि भन , द्रोगोपुरे वा विदिते क्षितौ हि । अनेकशोभाभिभृते मनोज्ञे, सत्खातिकाशालविमण्डिते न । तम्मिन विभायव मनाहगहि, जिनेन्द्रसमो वरभृतियुक्त । सशोभते तस्मिन् पापहन्ता श्रीपार्श्वनायो हि जिनेन्द्रदेव. ।। ३२६ ॥ मगारिपीठोपरि मस्थित हि, दविकसक मनमोदद च । छत्रादि शोभाभि विराजमान, पद्मासनस्थ वरसोम्यमूर्तिम् ।। ३२७ ।। आत जमात मृगेन्द्रतुल्न, सुरेन्द्रपूज्य न नरेन्द्रवद्य । चित्तस्थपापालिविनाशक त, हतारमेवाखिलदु खकाना ।। ३२८ । इत्यादिगाभामि विमण्डित त, दृष्ट्वा च नत्वा हृदि ह्याप्य माद । वास चकार विदितो धरित्र्या, धर्मोपदेशार्थमहो हि तस्मिन् ॥३२९।। तत्रैव तम् पापि अभूच्च शिष्यो, नेमोन्दु नाम्ना वरधीप्रयुक्त । श्रीशारदासेवनचित्तवृत्ति, तस्या प्रसादाच्च अय कृतो वे ॥ ३३० ।। यथेऽस्मिन् जिनवक्त्रेन तनुविया किञ्चिहिरुद्ध च यत्, मात्राशब्द पदाक्षरादिरहित आलस्यसयोगत । भो शिवप्रदे नानाकथासभृते, प्रोक्त च क्षमता सृतद्धि विमले सर्व ममाग खलु ॥ ३३१ ।। अर्थ--श्रीयुक्त शिवजीरामजी वहाँसे ( तक्षनगरसे ) कुछ दिवस बाद चले आये और द्रोणी नामक ग्राममें रहे । उस समय द्रोणीपुर समस्त संसारमें प्रसिद्ध था। खातिका कोट-सरोवर आदिसे विशेष शोभा- युक्त और व्यापारका केन्द्र था । द्रोणीपुरमे एक पार्श्वनाथ भगवान्का दिगम्बर जैन मन्दिर था। यह जिन मन्दिर बड़ी भारी विभूतिसे सुशोभित था । उस मन्दिरमें समस्त पापोका नाश करनेवाले स्वर्णके सिंहासन पर विराजमान समस्त प्राणियोको आनन्दके देनेवाले छत्र, चमर, भामण्डलसे अनुपम आत्माको धारण करनेवाले, पद्मासन विराजमान, सौम्यमूर्ति, परमशांत मुद्राके धारक, समस्त रोग-शोक आदि व्याधिको दूर करनेवाले देव- गणोंसे पूजित व भव्यजीवोसे वन्दनीय, सबके मनके पापोको शांत करनेवाले, समस्त प्रकारके कष्टोंको नष्ट करनेवाले, सातिशय चमत्कारको धारण करनेवाले इत्यादि बहुत-सी शोभासे विभूषित श्रीपार्श्वनाथ भगवान् देवाधिदेव विराजमान थे। शिवजीरामजीने यह स्थान धर्मसाधनाके लिये सुयोग्य समझा। और यहॉपर वही धर्मोपदेश देकर (धर्मका प्रकाश कर) धर्मकी महिमाको बढ़ानेके अभिप्रायसे निवास किया ॥ ३२६-३२९ ॥ अर्थ-द्रोणी नगरमे शिवजीरामके शिष्य नेमिचन्द्रजीने अनेक शास्त्रोंका पठन-पाठन किया था और रस्वती माताको विशेष सेवा की थी जिसके प्रसादसे इस ग्रन्थको रचना हुई ॥ ३३० ॥ अर्थ--इस ग्रन्थमें (सूर्यप्रकाशमें) श्रीजिनवर भगवान्के मुखकमलसे विनिर्गत दिव्यध्वनि (जिनागम) समस्यालयमाचाराच्या राज्य यस [ ३१९ ] समाजEnाज्यमा यस्या. प्रसादाद्रचयन्ति ग्रथान् कवीश्वराः धर्मप्रकाशकान् हि । श्रीशारदायाः शुभबुद्धियोगात् ईडे हि ता सन्मतिसिद्धयेहं ॥३३२।। पूजार्य ख्यातितार्थ ननु च वुधजना नो कृतोय च ग्रन्थः । द्वैपाद्वा रागभावात् शिवपदजनको वा कवित्वाभिमानात् ॥ २३३ ॥ बोधार्थ यात्मनो वै पुनश्च शिवपदप्राप्तये सज्जनाना । सबोधार्थ पुनातु मम च खलु हृद वा शरीर च वाक्यम् ।। ३३४ ।। बुधाश्चेमे ग्रथं प्रवरगुणद धर्मजनकम्, यान्ति श्रवणपठनादस्य निखिलाः। ततो नून दु खनिवहविपमाः दुर्जनसमाः, सदाकाले शुद्ध अमलमतिभा भो पठथ वै॥ ३३५ ।। अघा नाश के विरुद्ध जो हो ओर अक्षरपद मात्रादि दोष तथा व्याकरणके दोष सहित जो कुछ कहा गया हो विद्वान् भव्य मेरे अपराधोको क्षमा करे । शास्त्र समुद्र में कौन नहीं भूल खाता है ॥ ३३१ ॥ अर्थ----जिस सरस्वतीके कृपाकटाक्षसे कवीश्वर धर्मकी महिमाको प्रकट करनेवाले ग्रन्थोंकी रचना करते हैं । उस सरस्वती माताको मै भाव विशुद्धिसे सन्मतिकी प्राप्तिके लिये पूजा करता हूँ ॥ ३३२ ॥ अर्थ-मैने यह ग्रन्थ अपनी प्रसिद्धिके लिये या मान बढ़ाई प्राप्त करनेके अभिप्रायसे नहीं बनाया है या द्वेष और राग भावसे अभिमानके वश होकर नहीं बनाया है। मैने केवल अपनी आत्माको बोध करनेके लिये और सज्जनोको सबोध करनेके लिये पवित्र भावोसे बनाया है । इसलिये यह ग्रन्थ मेरे हृदय, वचन और शरीरको पवित्र करो। भावार्य-ग्रन्थकारका अभिप्राय है कि इस ग्रन्थको रचना किसी दुष्ट बुद्धिसे अभिमानको रक्षाके लिये राग द्वेषके विकार भावोसे या किसी भी स्वार्थबुद्धिसे नहीं की है। जिससे इस ग्रन्थमे जिनागमके विरुद्ध वर्णन लिखा जाय । जो कुछ वर्णन किया है वह श्री जिनागमका स्वरूप ही है । मात्र शब्द योजना मैने की है ॥ ३३३-३३४ ।। मायामायालयामार साजरा Khan RRH अर्थ-हे विद्वज्जन हो यह ग्रथ अनेक गुणोको प्रदान करनेवाला और धर्मका बीजभूत है। इसके भगण करने और पढनेसे पाप नाशको प्राप्त होते हैं। परन्तु दुर्जनोको यह न रुचेगा। सुजन जन तो सदा काल इसका पठन-पाठन करेंगे ।। ३३५ ।। ।
[ ३२० ] PAHILARSHIP नो नगि गगनात परममुनिनुता. पनमज्ञानिनो हि, लोकाना तारणेगा सकलसुरनुता. सपदासारयुक्ता । पाहि ममता बुधजननिकरा तेपि शाम्नेषु नूनम्, तत्तुल्या सति भव्या. कलियुगभवने नो खलु सशयोत्र ।। ३३६ ।। गो नुद्धिपद सदा सुखकरो यथ श्रिता ज्ञानिनो, गथेनेव समाप्यतेऽमलपदो ग्रथाय तम्मै नम । गवान्नाम्त्यपरो हितोष भवने सच्छर्मद सज्जना , ग्रन्थस्यैव शुभा. गुणाः शुभप्रदे तस्मिन् हि गन्थे सदा ।। ३३७ ।। नानासारकथाश्रितो बुधजनैवंद्ये च देवेश्वरे , प्रोक्ते श्रीजिनदेवभिश्च महति सर्वेव ग्रयाः खलु । चित्त मोक्षपदे दधे च शुभग भो ईदृशे नददे, मा त्व' चोद्धर शोघ्रमेव भवतः ईहाहि नो चापरा ।। ३३८ ।। गधेग वुधसत्तमा शिवप्रद विद्वद्वरेणेव वे, प्रोक्त पापप्रणाशक बुधनुत सद्बुद्धिद पावनम् । सार सिद्धातसिन्धो सकलमन प्रिय नेमिचद्रेण धीरा , बुद्धयब्धे पारप्राप्ताः सकलमदच्युतास्ते मुदा शोधयतु ॥ ३३९ ।। जिनेन्द्रपादाब्जमधुव्रतेन यथः कृतोय शुभचेतसा वै । तेन मुदा भव्यप्रबोधनार्थ शिवाय वोस्तु ननु नोपि शुद्धः ।। ३४० ।। अर्थ-इस विषम पंचम कालमें, मुनियोसे पूज्य, समस्त जगत्के तारक, अनन्त चतुष्टय और समो- शरणादि विभूतियुक्त ऐसे तीर्थकर केवली भगवान् साक्षात् नहीं है । परन्तु उनके वचन ही गणधरोंने तीर्थंकर केवली भगवान् माने हे । केवली और उनके वचनोंमें भेद नही है। इसमे कुछ सन्देह नही करना चाहिये ॥३३६॥ अर्थ-ग्रन्थ ही बुद्धिके प्रदाता है, सुखको करनेवाले है । ज्ञानी पुरुषोंने ग्रन्थोका आश्रय ग्रहण किया है । ग्रन्थो से ही अमलपदकी प्राप्ति होती है । ग्रन्थके लिये मेरा नमस्कार हो । ग्रन्थके सिवाय अन्य कोई इस संसारमे सुखका प्रदाता नहीं है । ग्रन्थके शुभ गुण सर्वत्र प्रसिद्ध हैं, ग्रन्थमें शुभ गुण रहते है ॥ ३३७ ॥ अर्थ-अनेक कथाओंसे विभूषित, बुध जनोंसे मान्य, श्रीजिनराजके मुखकमलसे प्रतिपादित, समस्त प्रकारके आनन्दको प्रदान करनेवाले, मोक्षको देनेवाले और संसारका नाश करनेवाले ऐसे शास्त्रोंको भव्य जीव अपने हृदय मन्दिरमें विराजमान करते है ॥ ३३८ ॥ अर्थ-समस्त पापोंका नाश करनेवाला, बुद्धिका प्रदाता, मोक्षके सुखको देनेवाला, परमपवित्र, सिद्धांतका सारभूत, समस्त जनोको प्रिय यह सूर्यप्रकाश ग्रन्थ श्री विद्वद्वर्य श्री नेमिचंद्रने बनाया है। इसका निरभिमानी विद्वान् गण शोधन करें ॥ ३३९ ॥ अर्थ- श्रीजिनराजके पवित्र चरणोंकी सेवा करनेमे तत्पर, विशुद्ध भावोंसे विभूषित ऐसे नेमिचन्द्रने भव्य जीवोंके प्रबोधके लिये तथा अपने आत्मकल्याणके लिये यह ग्रन्थ बनाया है ॥ ३४० ।। Enाजीराजमान्याच्यामायामाच्यालयमस्यामा upki [ ३२१ ] कराच्च स्वस्यैव लिखति चेद वित्ताच्च स्वस्यैव च लेखयति । श्रीजैनमार्गस्य प्रवर्द्धनाथं तेऽग्ने भविष्यति सुबोधयुक्ताः॥३४१॥ ग्रथ. सूर्यप्रकाशनामकलितो विद्वज्जनैवंदित , सूर्याचद्रममा उपनिकरा अभ्रे महानिर्मले । स्थास्यत्धेव ह्यय यथाक्षितितले मिथ्यामतध्वसनो, मान्यो भव्यनृभिस्तथाहि भवने पूज्यश्चिर नदतु ।। ३४२ ॥ अय च ग्रथः पठकस्य नित्य, करोतु पापालिविनाशन हि । सन्मगल बुद्धिवरा तथाहि, हृद्वाछितं शर्मततिं पुनश्च ॥ ३४३ ।। ममाधिमृत्यु सुगतिं तथैव, सद्दर्शन ज्ञान तथा च व्रतम् । पुत्रादिवृद्धि जिनधमसिद्धि, जिनपादद्वयसन्नुतिं च ।। ३४४ ।। ममापि सर्वे सुगुणा भवतु, इमे हि मोक्षपददायकाश्च । दु.पापसदोहविनाशकाश्च, नाकादि स्यात् तस्य कथा हि नास्ति ।। ३४५ ।। अकाभ्रनन्देन्दुप्रभेहि चाव्दे, मित्राद्रिशैलेन्दुसुशाकयुक्ते । मासे नभाख्ये शुभनदघस्र, विरोचनस्यैव सुवारके हि ।। ३४६ ।। द्रोणीनगर्या विदितेऽचलायामनेकशोभाविमडिते च । मध्याह्नकाले अरुणस्य शुद्धे, राधानक्षत्रे शुभनामयोगे ॥ ३४७ ।। श्रीपार्श्वनाथायतने हि तस्मिन्, सपूर्णता हि अगमदय च । सदा पुनातु प्रवरो हि ग्रंथो नो वश्च चित्त जयति धरित्र्याम् ।। ३४८ ।। अर्थ-जो सज्जन इस ग्रथको अपने हाथोंसे लिखेंगे या जो भव्य जीव अपनी सम्पत्तिसे लिखायेंगे ओर इसका विस्तार करेंगे वे जैनधर्मकी वृद्धि करेंगे उनको भविष्यमें श्रेष्ठ ज्ञान संपादन होगा ।। ३४१ ।। अर्थ-विद्वज्जनोसे वंदनीक, भव्य जीवोंसे सदैव मान्य और मिथ्या मतका ध्वंस करनेवाला यह सूर्य- प्रकाश नामका ग्रन्थ संसारमें जब तक सूर्यचंद्र या ग्रहनक्षत्र हैं तब तक सदैव स्थिर रहो । चिरकाल तक जैन- धर्मका प्रकाश करो ॥ ३४२ ॥ अर्थ-यह सूर्यप्रकाश ग्रन्थ पढ़नेवाले भव्य जीवोके पापोंका नाश करो, मंगल करो, बुद्धि प्रदान करो और मनके मनोरथ सफल करो ॥ ३४३ ॥ अर्थ-यह ग्रंथ पढ़नेवालोंको समाधिमरण, सुगति गमन, बोधि लाभ, पुत्र-कलत्र आदिको प्राप्ति और जिनधर्मकी सिद्धि प्रदान करो ॥ ३४४ ॥ अर्थ-यह सूर्यप्रकाश ग्रन्थ ग्रन्थकर्ता श्रीनेमिचंद्रको भी समस्त गुणोंकी प्राप्ति करो जिससे मोक्षसुख- की प्राप्ति हो और पापोंका नाश हो । स्वर्गके सुखोकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३४५ ॥ अर्थ-यह ग्रन्थ १९०९ संवत् के वैसाख मास मे रविवारको लिखा गया ॥ ३४६ ॥ अर्थ---यह सूर्यप्रकाश ग्रन्थ संसारमे प्रसिद्ध, विचित्र शोभासे सुशोभित द्रोणी (दूनी) नगरमें मध्याह्नके ४१ शमियन्यतामा TAGREHEALTH [ ३२२ ] ज्ञानी ध्यानी मुनीन्द्रो मुनिगणमहितो नेमिचद्रश्च नाम्ना, मिद्वान्तावारकर्ता सकलमुनिगणेषु च मुख्यत्वमाप । योहि देवे प्रपूज्य सुगुरुप्रतिम. द्वद्वभिर्वजितागः, सैव सपातु नो व शिवपदसुखद मंगल वा करोतु ॥ ३४९ ।। समय राधा नक्षत्र शुभयोगमें विशुद्ध भावोसे श्रीपार्श्वनाथ दिगम्बर जैन चैत्यालयमें पूर्ण किया। यह ग्रन्थ चिरकाल पर्यन्त ससारमे जेनधर्मकी वृद्धि करो, हमारे चित्तको पवित्र करो ॥ ३४७-३४८ ॥ अर्थ-अनागत प्रकाशादिकके कर्ता और गोमट्टसार आदि महान् ग्रंथोंके निर्माता श्री नेमिचन्द्र सिद्धांत- चक्रवर्ती मुनीश्वरका आभार (नेमिचन्द्र ग्रन्थकार) माननेके लिये विनयसे श्रीनेमिचन्द्र मुनीश्वरका गुणानुवाद करता है । क्योंकि उनके अनागत प्रकाशसे हो यह ग्रंथ निर्माण किया है। अतएव जिसने उपकार किया है उनका आभार मानना परमावश्यक है। आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धांतचक्रवर्ती ज्ञानी, ध्यानी, तपस्वी व समस्त मुनियोसे मान्य थे जिन्होने सिद्धांत ग्रन्थ बनाये है जो देवोसे पूज्य, समस्त प्रकारके द्वंद्वसे रहित, मुनियोके स्वामी, बृहस्पतिके समान ऐसे श्री नेमिचन्द्र आचार्य ग्रन्थकर्ता नेमिचंद्रको मंगल प्रदान करो ॥ ३४९ ॥ इति श्री मुनिनेमिचद्रसिद्धातचक्रवर्तिना कृतः अनागत प्रकाशग्रन्थस्तदनुसारतोनिद्वद्वरश्रीनेमिचन्द्र- विरचिते श्रीसूर्यप्रकाशनामग्रथे श्रीकुदकुदस्वाम्याधुत्पत्तिवर्णनो नाम प्रथमोध्याय ॥ श्रीरस्तु-कल्याणमस्तु ।श्री WWED- SHASHISHESweTHEHOSHIP HTTA
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