Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Sardhdalok Ke Devata [ Jeevan Prichay ]
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आचार्य सम्राट १००८ श्री देवेन्द्र मुनि श्रद्धालोक के देवता Amre- Ahimanthan Pimmmmmmy more -- म -- r मुनि जी म. सा. लेखक डॉ. राजेन्द्र मुनि प्रकाशक कनकमल बदामबाई संघवी पारमार्थिक ट्रस्ट, इन्दौर प्रक सघवी संघवी प्रकाशन ५६४, म. गा. मार्ग, गोराकुण्ड, इन्दोर श्रद्धालोक के देवता महामन কাল नवकार श्री है -- णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सबसाहूणं । एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसिं, पढ़म हवइ मंगलं ॥ प्राप्ति स्थान :- संघवी डिस्ट्रीब्यूटर्स का हमारे द्वारा प्रकाशित 卐 卐 धार्मिक साहित्य सघवी मार्केट, गोराकुण्ड, इन्दौर १ मंगल साधना © आ. 451073 / 450617 २ श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र 285112 / 450063 ३. श्रावक व्रत आराधना (बारह व्रत) निवास 450171/450437 ४. श्रावक के चौदह नियम ५. आलोचना पाठ हमारे सस्थान :- संघवी प्रकाशन, इन्दौर ६. सुख का द्वार व्यसन मुक्ति ७. भक्तामर स्तोत्र (संस्कृत, अंग्रेजी, हिन्दी । संघवी पब्लिकेशन, इन्दौर ८. सामायिक सूत्र (हिन्दी अनुवाद सहित) सफलता प्रकाशन, इन्दौर ९. आनुपूर्वी नवकार मन्त्र / नवपद चौबीस तीर्थकर संघवी प्रिन्ट-ओ-ग्राफिक्स, इन्दौर |१०. श्रद्धालोक के देवता - आचार्यश्री देवेन्द्रमुनि ११. दीक्षा सूक्ती कलश सहयोगी सस्थान : . १२. संघ जागरिया प्रार्थना संघवी स्टोर्स १३. आराधना (पार्श्वनाथ, महावीर चालीसा) इन्दौर, उज्जैन, बदनावर, १४. अभिनन्दना-अभिवन्दना धार, खरगोन, देवास (म प्र.) (आचार्य आनन्दऋषिजी का जीवन परिचय) प्रेस - अजीत प्रिन्टर्स, इन्दौर १५ नवकार महामन्त्र (बडा केलेण्डर) १६. नवकार महामन्त्र (छोटा केलेण्डर) प्रकाशक (मैटर सैटिंग) १७. नवकार महामन्त्र के स्टीकर्स प्रथम सस्करण मई २००० १८. कोटेशन स्टीकर्स (म.सा के अमृत वचन) २
kese श्रद्धालोक के देवता
है
समर्पण
श्रमण संघ के तृतीय पहधर
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কন্তু ভৗন থম বিবাহ
आचार्य सम्राट पूज्य गुरुदेव
श्री देवेन्द्र मुनिजी म सा.
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- डॉ. राजेन्द्र मुनि
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श्रद्धालोक के देवता लेखकीय Here naamar narasim- - डॉ. राजेन्द्र मुनि आराध्य देव परम आराध्य अनन्त अनन्त आस्था के केन्द्र महामहिम जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट पूज्य गुरुदेव श्री देवेन्द्र मुनिजी म. सा. के सम्बन्ध मे लिखते हुए यह लेखनी थम-सी जा रही है, क्योकि आज वो आपके, हमारे समाज के बीच से अचानक दूर हो गए है। उनका दूर हो जाना जीवन की एक ऐसी वेदना भरी घटना है, जो दिल-दिमाग को सदा व्यथित करती रहेगी। यह तो सोचा भी न था कि पूज्य गुरुदेव एकाएक इस प्रकार हम सब को छोडकर प्रस्थान कर जायेंगे। आपका जीवन कैसा, क्या, किस रूप में था। इसके लिए शब्दकोष के शब्द भी अपूर्ण व अधूरे है। कुछ घटनाएँ जीवन मे हृदय के साथ इस कदर जुड़ जाती हैं, जो भीतरी श्वासों साथ ओत-प्रोत होकर के मानस पटल पर जीवन पर्यन्त बनी रहती है और जिसे मानव जितनी भुलाने का प्रयास करता है, उतनी ही वो हृदय में पैठती चली जाती है। मेरे जीवन में गुरुदेव का मिलना एक ऐसा प्रसंग बना, जो जीवन के अंतिम क्षणों तक या भवों-भावो तक सदा अविस्मरणीय रहेगा। बात आज-कल की नहीं, अपितु जीवन के बाल्यकाल की है। जब यह तन १० वर्ष का था, तब मेरी मातेश्वरी धापकुँवर जैन मेरे बड़े भ्राता (वर्तमान मे पूज्य रमेश मुनि जी) को साथ लेकर अजमेर साधु सम्मेलन मे दर्शनार्थ या यो कहो जीवन रूपान्तर हेतु अजमेर पहुंची। ४dever Hows श्रद्धालोक के देवता गुरुदेव के इस प्रथम दर्शन ने ही संयम धर्म के बीज अंकुरित कर दिए। अजमेर सम्मेलन मे जहॉ शताधिक साधु-साध्वियो के दर्शन हुए, वही बडे गुरुदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म.सा एव वर्तमान आचार्य देवेन्द्र मुनिजी का जो सान्निध्य प्राप्त हुआ, वह आज इस रूप मे अवस्थित है। १९६५ मे गुरुदेव के सान्निध्य मे हम दोनो भ्राता गढ़सीवाना मे दीक्षित हुए एवं मातेश्वरी पूज्या गुरुणी प्रवरा श्री सोहन कुंवरजी की सेवा मे दीक्षित बनी। वैराग्य भाव के इस प्रसग मे गुरुदेव के साथ मे मामा रिश्ता भी सहायक रहे, क्योकि मेरी मातेश्वरी आचार्य देव की बुआ की बेटी का बहन रही है। पूज्य आचार्य देव मे मुझे जीवन मे गुरु के साथ-साथ माता-पिता का रूप भी देखने को मिला, मेरा जीवन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, बात भी स्वाभाविक है, १० वर्ष के बालक को जहाँ साधना मार्ग मे सुसस्कारित करना हो, वहाँ उसे माता-पिता का वात्सल्य भाव भी देना आवश्यक रहता है। यही क्रम व्यवस्था गुरुदेव ने निभाई, उनका वात्सल्य भाव माता-पिता की पूर्ति भी करता रहा, और अध्यात्म मार्ग को प्रेरित भी करता रहा। जीवन की इस ३५ वर्षों की यात्रा मे उन्होने मुझ जैसे अकिंचन को दिया ही दिया और आज तक की कई घटना-प्रसगो पर गुरुदेव ने औरो का दर्द पान किया, पर कभी भी इन विषम प्रसंगो मे भी गुरुदेव ने स्वभाव दशा-क्षमाधर्म का परित्याग नही किया। महापुरुष महापुरुष यह शब्द कहना जितना आसान है, उतना ही जीवन मे आत्मसात् करना दुष्कर है। पूज्य गुरुदेव अपनी जीवन यात्रा मे प्रतिपल प्रतिक्षण महापुरुषत्व को धारण करते हुए जीते रहे, जीवन के अनेकानेक विपरीत प्रसंगो मे भी वे अपनी शान्त स्वभाव वाली छबि से कभी दूर नही हटे, समत्व योग की साधना उनके जीवन का अभिन्न अग बन चुकी थी और यही कारण था कि 'बड़े से बड़ा विरोधी भी अन्ततः उनके सामने नतमस्तक होते हुए देखा गया।' भला जो ७ वर्ष की लघुवय मे गुरु सेवा मे समर्पित होकर गुरु रूप में परिवर्तित हो गया हो, वह साधारण रूप मे जीवन जी भी कैसे सकता था? वस्तुत आचार्य का वह दिव्य रूप जीवन की बाल्यावस्था में ही साकार हो उठा था, जो उनके जीवन के विभिन्न प्रसगो से ज्ञात किया जा सकता है। संक्षेप मे यही कहना चाहूँगा कि- उपाध्याय पूज्य गुरुदेव पुष्कर मुनिजी महाराज ने इस हीरे को परखा, उसे वर्षों की साधना मे परिपक्व कर वरदान रूप मे प्रदान कर समाज पर बड़ा उपकार किया। जैनाचार्य बनकर वे अपने लिए कुछ भी नही ले रहे थे, अपितु निरन्तर देते ही चले जा रहे थे। ५ G श्रद्धालोक के देवता sss - स एक आचार्य से जहाँ समाज को अनेकानेक अपेक्षाएँ होती हैं। गुरुदेव जहाँ उसकी पूर्ति कर रहे थे, वहाँ स्वयं का आध्यात्मिक जीवन जप-तप स्वाध्याय से निरन्तर परिपूर्ण बनाते चले जा रहे थे। आचार्यत्व के रूप में जहाँ श्रमण संघ के सभी पदाधिकारियों की परख रही, वहीं द्वितीय पट्टधर आचार्यश्री आनन्द ऋषिजी म.सा. का गहन आध्यात्मिक आशीर्वाद रहा। साहित्यकार साहित्यकार का वह रूप, जो प्रायः सभी में मिलना असम्भव है, परन्तु गुरुदेव की लेखनी में यह रूप भी अमरत्व को प्रदान कर गया, साहित्य के विभिन्न रूप गद्य, पद्य, कहानी, निबन्ध, उपन्यास व शोधग्रन्थो के साथ आगमो का सम्पादन, अभिनन्दन ग्रन्थ, स्मृति ग्रन्थ, इतिहास परक ग्रन्थों का लेखन सम्पादन जैसा अति श्रम-पूर्ण कार्य कर मॉ भारती सरस्वती को लगभग ४०० ग्रन्थों का समर्पण कर हजारों वर्षों के लिए लाखों पाठकों-साधको को आपने जो साहित्य अमृत प्रदान किया, वह इतिहास के स्वर्ण पृष्ठों मे सदा अमर रहेगा। मुनि जीवन मे विहारचर्या भी एक विशिष्ट साधना का रूप है। पूज्य गुरुदेव ने अपने साधना के ५८ वर्षों की इस दीर्घ अवधि मे भारत के प्रायः सभी बड़े प्रान्तों में लगभग ७० हजार कि.मी. की पद यात्रा सानन्द सम्पन्न कर गाँव-गाँव, नगर- नगर मे जो महावीर के सिद्धान्तों की अलख जगाई वह सदा स्मरणीय रहेगी। आपके चरण रज द्वारा जहाँ दक्षिण भारत के आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मुम्बई, गुजरात, दमण आदि प्रान्त पावन हुए वही उत्तर भारत के जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, चण्डीगढ़, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर-प्रदेश, मध्यप्रदेश एवं राजस्थान विशेष उल्लेखनीय हैं। युग पुरुष युग द्रष्टा, युग पुरुष के रूप में भी पूज्य गुरुदेव का जीवन सदा स्मरणीय रहेगा। आज की इस भौतिकी युग में जहाँ चहुँ ओर हिंसा, व्यसन, स्वार्थवृत्ति का दौर चल रहा हो, वहाँ पूज्य गुरुदेव ने सत्य, अहिंसा, अन्नाहार, मुक्ति का सहज आन्दोलन प्रचारित कर लाखों लोगों को इस ओर प्रेरित कर समाज में आदर्शो की संस्थापना की प्रकाश स्तम्भ की तरह सदा प्रकाशमान रहेगे। व्यसन to test श्रद्धालोक के देवता हृदय का रोम-रोम जिस शब्द को लिखने को तैयार नही हो रहा, लेकिन प्रकृति के इस कहर को भला कौन नकार सकता है। जिसकी स्वप्न में भी कल्पना नही थी कि आचार्य भगवन् इस प्रकार हम सभी को बीच में छोडकर एकाएक चले जाएगें, जो दिव्य प्रकाश उनके सान्निध्य से हमें मिल रहा था, उसे दूर कर हमसे दूर हो जाएँगे। प्रकृति की चहुँदिशा वीरान-सी पडी है, ढूँढने पर भी वो दिव्य शक्ति पता नही कहॉ किधर अदृश्य हो गई, पुकारने पर भी उसका प्रत्युत्तर क्यों नही सुनाई दे रहा है? अमर यात्रा उदयपुर चादर समारोह के बाद उत्तर भारत की यशस्वी यात्रा सम्पन्न कर आनन्द शताब्दी के इस पावन सुअवसर पर महाराष्ट्र हेतु इन्दौर होते हुए अपने कदम बढ़ा ही रहे थे पर स्वास्थ्य की कुछ अस्वस्थता के चलते मुम्बई पधारे, कुछ माह विराजकर दिनाक २४ अप्रैल को घाटकोपर मे विदाई समारोह सम्पन्न कर विहार कर ही रहे थे, किन्तु बुखार, दमा, खाँसी से दो-तीन दिन की विश्रान्ति का सोचा गया, पर किसे पता था कि देखते ही देखते दि. २६ अप्रैल को प्रातः ८ ३० पर थोडी-सी तन मे सॉस की व्याधि बढ़ी सन्थारा ग्रहण किया, सभी से मा भाव प्रकट करते हुए हँसते हँसते सदा के लिए विदा हो लिए। यद्यपि आज गुरुदेव देहरूप मे हमारे सम्मुख नहीं है, फिर भी उनका वात्सल्य भरा आशीर्वाद, उनकी दी हुई सद् शिक्षाएँ सदा जीवन भर साथ रहेगी, तन से भले ही नहीं रहे हो, पर मन से सदा है एवं रहेगे। इस अवसर पर मैं उनके उपकारो से सदा ऋणी रहते हुए हार्दिक श्रद्धाजलि अर्पित करता हूँ। साथ ही जैन समाज व भारतीय विभिन्न समाजों के उन आचार्यों व मुनियों व श्रावक-श्राविकाओ का समाज, सेवको का भी कृतज्ञ हूँ, जिनका विभिन्न रूपों मे प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग रहा। घाटकोपर मुम्बई की भूमि जो मोक्ष रूपी घाट ऊपर अवस्थित करने की स्थली बन गई है, जहाँ गुरुदेव का यह देह पंचभूतों में विलीन हुआ, उसको भी स्मरण करता हूँ। यद्यपि यह ग्रन्थ पूज्य आचार्य भगवन् की विद्यमानता मे ही लिखा जा चुका था, किन्तु कुछ कारणो से समय पर इसका प्रकाशन न हो सका। अब उन्हीं की पुण्य स्मृति मे यह प्रकाशित किया जा रहा है । उस हेतु परम गुर भवत उदारगना सुश्रावक कनकमलजी सघवी जी को हार्दिक साधुवाद । A७ " श्रद्धालोक के देवता ets म प्रस्तावना महापुरुषों का जन्म इस संसार में आधि, व्याधि और उपाधि से ग्रसित जन-मानस को शान्ति-समाधि और आनन्द की ओर ले जाने में समर्थ समय- समय पर इस धरा पर होता रहा। राजस्थान रणवीरों की भूमि है, वहाँ पर महाराणा प्रताप जैसे देशभक्त हुए हैं। भामाशाह जैसे दानवीर हुए हैं। वैसे ही धर्म संघ के लिए समय-समय पर महान आत्माओं का च्यवन इस राजस्थान भूमि पर होता रहा है। उसी क्रम में जैनाचार्य पूज्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म.का जन्म धनतेरस को झीलो की नगरी उदयपुर में हुआ। बचपन से ही प्रकृति ने प्रतिकूल वातावरण दिया और पिता का साया २० दिन की अल्पवय मे ही आपके ऊपर से हट गया। माँ के ममत्व एवं बहन के प्यार ने आपको पल्लवित पुष्पित करते हुए उच्च-कोटि के धार्मिक संस्कारो का वर्धन किया। यथा समय योग्य गुरू उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. के चरणों मे अल्पवय में समर्पित कर आपके जीवन को महाजीवन की ओर मोड दिया। पूज्य गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. ने एक शिल्पकार के समान आपके जीवन को मूर्त-रूप देते हुए एक उच्च-कोटि का साधु बनाने के लिए संकल्प रखा एवं अपनी पूरी शक्ति आपकी शिक्षा, साधना में लगाकर आपको जैन दीक्षा के माध्यम से जिन-शासन के राजमार्ग पर अग्रसर किया। ८ M Ke श्रद्धालोक के देवता आचार्यश्री का जीवन ९ वर्ष की अल्पवय मे आपने दीक्षा ग्रहण की। उसके पूर्व आपकी भगिनी महासती श्री पुष्पवतीजी ने तत्पश्चात् आपकी माताश्री ने भी जैन दीक्षा अंगीकार कर सम्पूर्ण कुल को साधना के मार्ग से जोड़ दिया। आपश्री ने दीक्षा लेने के पश्चात् अपनी पूरी शक्ति गुरु के चरणो मे समर्पित कर अध्ययन, अध्यापन मे लगाई। आपने अपने जीवन मे जैन आगमो के साथ- साथ अन्य दर्शनो के समग्र साहित्य का गम्भीरता से आचार्य प्रवर अध्ययन किया एव अपने जीवन का लक्ष्य साहित्य श्री देवेन्द्रमुनिजी म. नौ वर्ष रचना, ग्रन्थ सम्पादन एव आगमो का अन्वेषण बनाया। की उम्र में दीक्षा ग्रहण करने आपने सस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, गुजराती एवं भारत के पूर्व वैराग्य अवस्था मे की विविध भाषाओ मे गहन अध्ययन करते हुए विपुल साहित्य की रचना की। आज भी आचार्यश्री औदारिक शरीर से भले ही हमारे बीच नही है, लेकिन यश शरीर एव साहित्य-रूप में आज भी वे जन-मानस के बीच उपस्थित है। व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व आप एक उच्चकोटि के साधक तो थे ही, साहित्य जगत के दैदीप्यमान नक्षत्र भी थे। वे गम्भीर प्रवचनकार एव समाज सुधारक भी थे। मानवीय मूल्यो की स्थापना के लिए वे सतत प्रयत्नशील रहते थे। जब कभी भी अवसर मिलता वे इस दिशा मे समाज को मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन प्रदान करते। श्रद्धेय आचार्यश्री ने जैन धर्म दर्शन, नीतिशास्त्र, इतिहास, निबन्ध, उपन्यास, कहानियाँ, लघु कथाएँ, बोध कथाएँ, प्रवचन आदि से सम्बन्धित लगभग ४०० पुस्तको की रचना की। इन पुस्तको मे अनेक ग्रन्थ उच्चकोटि के शोध प्रबन्ध भी है, जिन पर अनेक शोधकर्ता शोध कर सकते है। आपका सम्पूर्ण कथा साहित्य, सास्कृतिक अध्ययन तथा आपके ऐतिहासिक लेखन मे एक सक्षम एव कुशल इतिहासकार के दर्शन होते हैं। आचार्य भगवत मे एक विशेष गुण भी था। वे किसी भी व्यक्ति की प्रतिभा परखने के प्राज्ञ थे। उनके सम्पर्क मे अनेक राजनेता, भूतपूर्व राजा महाराजा, विद्वान, श्रद्धालोक के देवता ke भी समाजसेवी, विभिन्न धर्मों के साधु-सन्त आए, सभी आपके व्यवहार, मिलनसारिता, मितभाषिता एवं वात्सल्य-भाव से प्रभावित हुए और वे सदैव के लिए आपके बनकर रह गए और जो व्यक्ति जिस कार्य के योग्य होता था, उसे उसकी क्षमता के अनुसार कार्य सौपकर उसका पूरा उपयोग करते थे। वे मानव पारखी थे। व्यवहार एवं सद्गुण आचार्यश्री छोटे-बड़े सबको सम्मान देते थे, उनके पास छोटे से छोटा साधु चला जाता तो वे उसे प्यार और आदर देते थे, वे फरमाते थे, गुरुजनों को समर्पण करो, शिष्यों से स्नेह करो और सबका आदर करो। उनकी वाणी बड़ी मधुर थी, छोटा-बड़ा उनके पास जाता तो पुण्यवान भाग्यशाली कहकर पुकारते थे और इस सम्बोधन को सुनकर ही वह उनका हो जाता था। उनकी मुख मुद्रा पर हर समय मंद हँसी रहती, ऑखों मे स्नेह और चेहरे पर प्रसन्नता, उनकी निश्छलता और सरलता को सूचित करती थी। गुणीजनों का आदर करने में वे कभी नहीं चूकते थे, किसी मे भी कोई गुण हो तो उसकी सच्चे मन से प्रशंसा करते। उनका मानना था संसार में निर्गुण कोई नहीं है, देखने वाला हो तो प्रत्येक व्यक्ति मे कुछ न कुछ गुण मिल जाता है। उनकी गुणानुरागिता ने उनके व्यक्तित्व में वह चमक पैदा कर दी थी कि विरोधी भी उनके प्रशंसक बन गए। वे कहते थे -- पहली बात दूसरों का दोष देखो ही मत, यदि दोष ध्यान में आए, तो कुशल चिकित्सक की भॉति उसकी चिकित्सा करो, उपचार करो, प्रचार नहीं। वे समाज को सदाचार व उत्कृष्ट आचार की प्रेरणा देते थे। कई बार प्रवचनों में कहते - "तुम्हारा गलत विचार केवल तुम्हे ही नुकसान पहुंचाएगा, परन्तु गलत आचार पूरे संघ व समाज को दूषित कर देगा।" नारी के बारे में दृष्टिकोण आचार्यश्री नारी शक्ति का सदा सम्मान करते थे। वे कहते थे यह ठीक है कि ब्रह्मचारी को नारी से दूर रहना चाहिए, परन्तु नारी को नारी नहीं, मॉ और बहन के रूप में देखने की आदत डालनी चाहिए। नारी मनुष्य की माँ है, कल्याणी है, जननी है। सद्गुणों के विकास की असीम सम्भावनाएँ है। आचार्य देव साध्वी समाज और श्राविका समाज को बड़े ही आदर से विकास की प्रेरणाएँ देते थे। शिक्षा, कला, तपस्या, साधना, सेवा, धर्मप्रचार, संस्कार निर्माण आदि सभी क्षेत्रों मे साध्वियों व श्राविकाएँ बहुत आगे बढ़ सकती हैं। अतः वे समय-समय पर नारी အင် Move वह १० SSS श्रद्धालोक के देवता समाज को प्रोत्साहित करते थे। हर प्रकार से उनमें स्वाभिमान जागृत करते थे। आत्म-गौरव की भावना से उन्हे प्रगति पथ पर बढ़ाते थे। मेरे अनुभव ऐसे गुण सम्पन्न प्रतिभा और विचार से समृद्ध आचार्यश्री को पाकर हमारा सघ गोरान्वीत हुआ। आपका और मेरा सम्पर्क पूना सम्मेलन के पूर्व बहुत नजदीक से विभिन्न प्रसंगो पर रहा। आपका वात्सल्य, प्रेम, आत्मीयता एव जीवन के विविध पहलुओ को मुझे नजदीक से देखने का अवसर पूना सम्मेलन के दौरान मिला। पूना सम्मेलन मे सघ के सम्यक् विकास हेतु आचार्य सम्राट पूज्य श्री आनन्द ऋषिजी म सा ने आपको उपाचार्य पद से विभूषित किया। आपकी और मेरी धारणाओ मे भिन्नता थी, लेकिन फिर भी हम सभी सघ समुत्कर्ष के लिए संघ के सगठन को बनाए रखने के लिए सकल्पबद्ध थे। काल के प्रभाव से आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म देवलोकगामी हो गए। तत्पश्चात् आपश्री ने श्रमणसघ के अनुशासन की बागडोर सभाली। समय-समय पर हमारा पत्राचार के माध्यम से सम्पर्क बना रहा। बहुत-सी बातो मे मै उनसे सहमत नही था, इस हेतु अनेक धारणाएँ मेरे मन मे पूज्य आचार्यप्रवर के बारे मे थी। लेकिन इन्दौर चातुर्मास के दरम्यान आपश्री ने महाराष्ट्र मे रहे हुए पदाधिकारियो से मिलने की भावना बनाई और इसमे लाला नेमनाथजी जैन एव कांफ्रेस के पदाधिकारियो ने विशिष्ट भूमिका बनाकर नासिक मे मिलने का एक सुन्दर अवसर प्रदान किया। हम भी अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर आचार्यश्री की सेवा मे नासिक पहुंचे। पचवटी नासिक मे हमारा बारह वर्षों के पश्चात् एक कुम्भ के मेले के समान आन्तरिक मिलन हुआ। उस प्रथम मिलन मे ही आचार्यश्री का वात्सल्य पाकर मेरी सारी धारणाएँ परिवर्तित हो गई और मैने आपके श्रीचरणो मे अपना पूर्ण समर्पण भाव अभिव्यक्त किया। मैने अपने जीवन की आलोचना आपके समक्ष की। आपश्री ने भी उतना ही विशाल हृदय रखते हुए मुझे अपने मे समाहित किया और मेरे उत्साह को अनेक गुना बढ़ा दिया। वह पाँच दिन का सत्सग हमारे सघ के लिए वरदान साबित हुआ। हम सभी अन्तर-हृदय से मिले। श्रमण संघ के पदाधिकारी सन्तो एव साधु साध्वीवृद की समस्याओ पर हमने सम्यक् चिन्तन-मनन किया। आपश्री ने सघ की वर्तमान परिस्थितियो का चिन्तन मनन करते हुए और अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देते हुए हमे श्रमण सघ की व्यवस्था को सुन्दर रूप Kav श्रद्धालोक के देवता ess से चलाने हेतु जिम्मेदारियाँ सौपीं। संघ में ध्यान और साधना का प्रचार-प्रसार हेतु एवं समाज को व्यसन मुक्त करने के लिए उन्होंने मुझे जिम्मेदारी दी और समाज को दिशा निर्देशन करने की प्रेरणा देते हुए इस वर्ष को 'ध्यान और व्यसन मुक्त वर्ष' घोषित किया। अन्तिम मिलन नासिक से विहार कर हम सभी नासिक रोड पहुंचे। आपश्री का स्वास्थ्य लाभ हेतु मुम्बई की ओर विहार होना था। हम सभी मुनिवृंद विहार के समय आपके साथ थे। वह अन्तिम मिलन आज भी मेरी आँखों के सामने है कि हम दोनों के हृदय भर आये, आँखों में प्रेम और वात्सल्य की अश्रुधारा बह रही थी। उस प्रेम और वात्सल्य के साथ हमने पुनः अहमदनगर में मिलने का संकल्प किया था। लेकिन कर्म के विधान को कुछ और ही स्वीकार्य था। आज आचार्य भगवंत इस औदारिक शरीर से हमारे बीच नहीं रहे, फिर भी उनकी कृपा, आशीर्वाद, वात्सल्य, उनकी संघ व्यवस्था हेतु दी हुई प्रेरणा आज भी मेरे हृदय में बनी हुई है। ऐसे महान् आचार्य के चरणों में इस जन्म दिवस पर मेरी हार्दिक भावांजलि। उन सभी महान आचार्यो की कृपा से हमारा श्रमण संघ स्वाध्याय, ध्यान-योग एवं सेवा के क्षेत्र में एक विशिष्ट कीर्तिमान इस २१ वीं सदी में स्थापित करे, ऐसा ही मंगल आशीर्वाद हम जिन-शासनदेव से चाहते है। प्रस्तुत ग्रन्थ मुझे यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता है कि श्रद्धेय आचार्य श्री के जीवन दर्शन पर उन्ही के प्रधान शिष्य डॉ. राजेन्द्र मुनि द्वारा प्रस्तुत ग्रन्थ की निर्मिती की गयी है विद्वान लेखक को इस प्रयास पर हार्दिक साधुवाद। धनतेरस, सं. २०५० जालना आचार्य डॉ. शिवमुनि - 9 hotter tattoo teste toate to the test Live --- See श्रद्धालोक के देवता म प्रकाशकीय . IARI In सुविज्ञ पाठकवृन्द, अनन्त अनन्तआस्था के केन्द्र परम श्रद्धेय जैनधर्म दिवाकर आचार्य सम्राट पूज्य गुरुदेव श्री देवेन्द्रमुनिजी म. सा. के विषय मे लिखना ‘सूरज को दीपक दिखाने जैसा है। फिर भी डॉ राजेन्द्र मुनिजी ने अपने आराध्य देव श्री देवेन्द्रमुनिजी म. सा. का जीवन परिचय देकर स्व-कल्याण के साथ समाज कल्याण का महान कार्य किया है। आचार्य श्री के बहु-आयामी-व्यक्तित्व का परिचय देकर मानव मात्र के कल्याण एव साहित्य ससार को एक दिशा प्रदान करने का परमस्तुत्य कार्य किया है। सघवी प्रकाशन जो मध्यप्रदेश का जाना माना लोकप्रिय प्रकाशन है, हमे गौरव है, एक महान व्यक्तित्व को साहित्य रुप मे प्रकाशित कर पाठको को समर्पित करते हुए। श्रद्धेय आचार्य श्री के व्यक्तित्व एव कृतित्व के सम्बन्ध मे यद्यपि अनेक ग्रन्थ, स्मारिका समय-समय पर प्रकाशित हुई है तथापि यह प्रयास गागर मे सागरवत् सभी को रुचिकर सिद्ध होगा। श्रद्धेय आचार्य सम्राट श्री देवेन्द्रमुनि जी म सा की जीवन लीला का आद्योपान्त स्वभूत सापेक्ष चित्रण के लिए लेखक के हम आभारी है। हम श्रद्धेय मुनिवृन्द एव श्रावक बन्धुओ से प्राप्त सारवान एव बहुमूल्य मार्गदर्शन के लिए कृतज्ञता प्रकट करते हैं। पुस्तक की सामग्री और मुद्रण आदि मे कोई त्रुटि रह गई हो, तो मिच्छामि दुक्कडा लेखक की इस अमूल्य कृति को और अधिक उपयोगी बनाने हेतु आपके मूल्यवान सुझाव सादर आमन्त्रित है। विनीत कनकमल एवं बदामबाई संघवी इन्दौर अक्षय तृतीया, ६/५/२००० ဗင်တင်) १३ DEE wwwwwwwwwww श्रद्धालोक के देवता ss है कहाँ कहाँ जया बता दे की A AM 卐 ९. २. महागुरु का संयम की राह पर निर्वाण पेज - ३२ पेज - १५५ ३. चातुर्मासिक व्यक्तित्व- संक्षिप्त विवरण बहुआयामी पेज - ७९ पेज - ३५ १. जीवन परिचय पेज - १५ . ७. ४, चातुर्मास डायरी श्रमण संघ पेज - ७४ पेज - ४९ ६. चादर समारोह पेज - ६४ साहित्य संसार पेज - ५४ Ko श्रद्धालोक के देवता 1344 के जीवन परिचटा Kaaaaa जन्मभूमि - उदयपुर (राजस्थान) राजस्थान त्याग और बलिदान की भूमि है। यहाँ शूरवीर, धर्मवीर, त्यागवीर, दानवीर, तपवीर, कर्मवीर आदि सभी प्रकार के वीर हुए है। जिससे राजस्थानी माटी का कण-कण सुरभित है। अतीतकाल से ही राजस्थान की वीरभूमि की ख्याति रही है। धर्म और कर्तव्य की यह साक्षात् तपोभूमि है। इस भूमि के कण- कण मे शौर्य, पराक्रम, बलिदान, औदार्य, त्याग तथा साहित्य साधना की अगणित कहानियॉ लिपटी हुई है। राजस्थान वीरभूमि होने के साथ ही साथ धर्मभूमि भी है। शक्ति और भक्ति का मधुर सामंजस्य इस माटी मे रहा है। यहाँ के वीर भक्ति भावना से उत्प्रेरित होकर अपनी अद्भुत शौर्य शक्ति का परिचय देते है, तो यहाँ के भक्त पुरुषार्थ, साधना और सामर्थ्य के बल पर धर्म को तेजस्विता प्रदान करते है। यहाँ के उदार मानववाद के धरातल पर वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, जैन, इस्लाम आदि सभी धर्म-सम्प्रदाय अपनी-अपनी रंगत-संगत के साथ सौहार्द्रपूर्ण वातावरण मे फलते-फूलते रहे है। यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य सुषमा और जलवायु ने जीवन के प्रति सचेतनता के साथ निस्पृहता और अनुरक्ति, कठोरता और कोमलता सयमशीलता और सरसता का पाठ पढ़ाया और वही जीवन दृष्टि यहाँ के धर्म, साहित्य, सगीत और कला मे प्रतिबिम्बित हुई। इसी महान भूमि राजस्थान का एक भाग मेवाड के नाम से सुविख्यात है। मेवाड का भी अपना गौरव गरिमा मंडित इतिहास है। राजस्थान भारतवर्ष का एक पश्चिमी प्रदेश है। इस पश्चिमी प्रदेश के दक्षिण में अवस्थित क्षेत्र मेवाड कहलाता है। मेवाड की धरती के कण-कण में बापा रावल, हमीर, कुंभा, राणा सांगा, राणा प्रताप, राजसिह जैसे शासको का शौर्य और मीरा की भक्ति मुखरित होकर मेवाड़ के गौरव मे चार चाँद लगा रही है। १५ श्रद्धालोक के देवता ka जब हम 'मेवाड़' नाम पर विचार करते हैं और इतिहास के पृष्ठों को देखते हैं, तो हमे इस सम्बन्ध में निराशा ही हाथ लगती है। मेवाड़ नाम कब और किस प्रकार प्रचलन में आया, इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती है। प्राचीन ग्रन्थो में शिवि और प्रागवाट् नामों का उल्लेख मिलता है। कुछ प्राचीन शिलालेखों और प्राचीन सिक्कों में भी यह नाम उटैंकित है। इन नामों का परिवर्तन कब हुआ, यह स्वतन्त्र रूप से शोध का विषय है। भाषा शास्त्र की दृष्टि से मेवाड़ शब्द संस्कृत के मेदपाट शब्द से बना है, जिसका अर्थ है मेदों की भूमि। विज्ञों का मन्तव्य है कि इस क्षेत्र पर मेद, मेव, या मेर जाति का आधिपत्य होने से इसका नाम मेदपाट हो गया। एक दूसरा मत यह है कि मेवाड शब्द की निष्पत्ति मेदिनीपाट (पृथ्वी का सिंहासन) शब्द से हुई है। इस सम्बन्ध में और भी कुछ धारणाएँ हैं, किन्तु उन धारणाओं में मतैक्य नहीं है, तथापि यह निश्चित है कि मेवाड़ या मेदपाट दोनों शब्द विक्रम संवत् की ग्यारहवी शताब्दी में प्रचलित थे। प्राकृत ग्रन्थ धम्म परिक्खा जिसका रचनाकाल विक्रम संवत् १०४४ है और हलूंडी के शिलालेख जो विक्रम संवत् १०५३ में उटैंकित है, उनमें क्रमशः मेवाड़ और मेदपाट नाम मिलते है। इससे यह स्पष्ट है कि आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व मेवाड़ नाम प्रचलित था। मेवाड़ प्राचीन भारतीय सभ्यता का सुप्रसिद्ध केन्द्र भी है, पुरातत्व विदों का अभिमत है कि मेवाड की 'गम्भीरी' और 'बेड़च' नदियों के मुहानों पर मानव सभ्यता के रुपांतर की जानकारी प्राप्त होती है। आहाड़ और बागौर की खुदाई में जो भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं, वे क्रमशः तीन और चार हजार वर्ष पुराने हैं। मेवाड की धरती पर शिवियों, मालवो, मौर्यों और गुहिलों के आधिपत्य का उल्लेख प्राप्त होता है। गुहिलों के वंशज बापा ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर उस पर अपना अधिकार जमा लिया और बापा रावल की उपाधि से समलंकृत होकर शासन का संचालन करने लगे। प्रस्तुत घटना विक्रम संवत् ७९१ की है। विक्रम की तेरहवी शताब्दी में दिल्ली के मुसलमान शासकों ने आक्रमण किया और चित्तौड़ को अपनी राजधानी बनायी। चौदहवीं शताब्दी मे अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण से रत्नसिंह आदि शासक मारे गए और महारानी पद्मिनी ने जौहर कर अपने सत्य शील की रक्षा की। उसके पश्चात् कुंभा और सांगा ने मेवाड़ की सीमाओ का १६ JMER se श्रद्धालोक के देवता विस्तार किया। सांगा के पश्चात् मेवाड के वीर और मुगलों के बीच संघर्ष होता रहा। विक्रम संवत् १६६२ मे इतिहास प्रसिद्ध हल्दीघाटी का युद्ध हुआ। महाराणा प्रताप की मृत्यु के पश्चात् अमरसिह ने विक्रम संवत् १६७२ मे मुगलो के साथ सधि की उसके पश्चात् मेवाड संघर्ष समाप्त हुआ। मेवाड एक पहाडी प्रदेश है। पहाडी प्रदेश होने से वहॉ छोटी-बडी नदियाँ भी बहती रहती है। प्रकृति देवी ने इन पहाडियो और चट्टानों के रूप मे धरती को सौन्दर्य ही नही दिया है, अपितु उसने जीवन का शाश्वत सत्य उजागर किया है। जीवन भी एक समान नहीं है, उसमे भी अनेक उतार-चढाव है। जो इन उतार- चढ़ावो मे साक्षी भाव रखता है। वही उज्ज्वल व्यक्तित्व को उजागर कर सकता है। इसी गौरव गरिमा से मडित और प्राकृतिक सुषमा से सुशोभित मेवाड मे एक नगर है, जो झीलो की नगरी उदयपुर के नाम से सुविख्यात है। अद्वितीय सौन्दर्य और प्राकृतिक छटा से सुसज्जित उदयपुर नगर। ईस्वी सन् १५५९ मे महाराणा उदयसिह ने इस नगर की स्थापना करवाई थी। इसलिए इसका नाम उन्ही के नाम पर उदयपुर रखा गया। पर्वतो की उपत्यकाओ मे बसा उदयपुर महाराणा उदयसिह की अमरकीर्ति को हृदय मे बसाये आज भी राजस्थान का महत्वपूर्ण जनपद है। जहाँ एक ओर गगनचुम्बी पर्वतमालाएँ जीवन को उन्नत समुन्नत बनाने का सन्देश दे रही है, तो दूसरी ओर कृत्रिम विराट झीले चारो ओर फैली हुई है और मन को विशाल बनने का आह्वान कर रही है। तीसरी ओर मीलो तक फैले हुए बगीचे अपनी प्राकृतिक सौन्दर्य सुषमा से जन-मन को आल्हादित करते हैं, तो चौथी ओर कल-कल छल-छल बहते हुए झरने जीवन की क्षण भगुरता का अहसास कराते हुए सतत् गतिशील रहने का सदेश देते है। उदयपुर की मिट्टी कुछ दूसरे ही प्रकार की है। इस मिट्टी मे पराक्रम और पौरुष का विशेष प्रभाव रहा है। यहाँ के निवासी दृढ़ इ-संकल्प के धनी और शक्ति-भक्ति मे समान सामर्थ्यशील हुए है। आज इस मिट्टी का चमत्कार स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यही उदयपुर आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म की जन्मभूमि है। ओसवाल वंश ओसवालो की उत्पत्ति मारवाड के ग्राम ओसिया से हुई है। ओसवाल वश की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे यह कथा प्रचलित है कि यहाँ के निवासी मास-मदिरा का सेवन अत्यधिक मात्रा मे करते थे। इसी समय वहाँ जैनाचार्य श्री रत्नप्रभसूरिजी का १७ श्रद्धालोक के देवता - आगमन हुआ। जैनाचार्य श्री रत्नप्रभसूरिजी ने इस ग्राम के व्यक्तियों की यह बुरी आदत छुड़वाने का विचार किया। यहाँ के राजा का नाम उप्पलदेव था और उसके एक ही पुत्र था। राजकुमार को सर्प ने डॅस दिया। सारे राज्य में हाहाकार मच गया। ठीक इसी समय आचार्य रत्नप्रभसूरिजी के शिष्य लोगों के पास आये और बोले कि यदि आप सब हमारे गुरुदेव का कहना मान लें तो आप के राजकुमार पुनः ठीक हो सकते हैं। वहाँ उपस्थित सभी व्यक्तियों ने एक स्वर में इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। राजकुमार को जैनाचार्यश्री रत्नप्रभसूरिजी के समीप लाया गया। आचार्यश्री रत्नप्रभसूरिजी ने सर्वप्रथम उपस्थित समुदाय को अहिंसामय निर्व्यसन जीवन व्यतीत करने और जैनधर्म का पालन करने का आदेश दिया। सभी उपस्थित व्यक्तियों ने जैनाचार्य श्री रत्नप्रभसूरिजी की इस शर्त को स्वीकार कर लिया। सबकी स्वीकृति के पश्चात् आचार्यश्री रत्नप्रभसूरिजी ने राजकुमार को ठीक कर दिया। इस प्रकार राजा सहित समस्त ओसिया निवासियो ने जैनधर्म स्वीकार कर लिया और ओसिया के होने के कारण ओसवाल जैन कहलाए। इस घटना के सम्बन्ध में निम्नानुसार विभिन्न तीन मत प्रचलित है . (१) नाभिनन्दनोद्धार प्रबन्ध और उपकेश गच्छचरित के अनुसार रत्नप्रभसूरिजी पार्श्वनाथ की परम्परा के सातवें पट्टधर थे। जिन्होंने वीर निर्वाण संवत् ७० (४५७ ई.पूर्व) में ओसवाल वंश की स्थापना की। (२) भाटों के अनुसार ओसवालो की उत्पत्ति जैनाचार्य श्री रत्नप्रभसूरि के उपदेश से उपकेश नगर (मारवाड) में वि. सं. २२२ (ई. सन् १६५) में हुई। (३) वस्तुस्थिति यह है कि ये दोनों ही मत सत्य एवं उचित प्रतीत नहीं होते हैं। क्योकि आठवीं शताब्दी के पूर्व ओसवालो का कही उल्लेख नहीं मिलता है। सुख सम्पतराय भण्डारी ने ओसवाल जाति की उत्पत्ति का समय विक्रम संवत् ५०० तथा विक्रम संवत् ९०० के मध्य ओसिया नगरी मे माना है। (१) पूर्णचन्द्र नाहर ने ओसवाल जाति की उत्पत्ति का समय वि. सं.५०० के पश्चात् और वि.सं.१००० के पूर्व माना है। (२) साधारणतः यही तिथि ओसवालो की उत्पत्ति की मानी जाती है। राहुल सांस्कृत्यायन ओसवालो का उद्भव यौधेयों से मानते है। उनके विचार से यौधेय ही कालान्तर में ओहतगी, रस्तोगी, ओसवाल आदि कहलाए। ओसवाल जाति की उत्पत्ति के पश्चात् इसमें अठारह गोत्र वने, किन्तु गोत्रों की संख्या मे निरन्तर वृद्धि होती रही। ऐसा विश्वास है कि ओसवालों के १४४४ 9C to the method to the intention to the hoste te the ting KAM Stests श्रद्धालोक के देवता गोत्र है। किन्तु ये मुख्य गोत्र नही है। ये उनके कुनबों या कुलो के परिचायक है। यति श्रीपाल ६०९ गोत्र बताते है। (१) अठारहवी शताब्दी का कवि रूपचन्द अपने 'ओसवाल रास' मे ४४० गोत्र बताता है। (२) मुनि ज्ञान सुन्दर ने अठारह मूल गोत्र तथा ४९८ शाखाएँ बताई है। उपलब्ध गोत्रो की सूची देखने से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि गोत्रो के पीछे कुछ सिद्धान्त है। (३) कुछ गोत्रो के नाम पशु-पक्षियो से लिए गए है। यथा- सियाल, काग, गरुड, हिरण, बकरा आदि। कुछ गोत्रो के नाम निवास स्थान के आधार पर रखे गए है। जैसे - रामपुरिया, चित्तौडा, भोपाला, पाटनी आदि। कुछ नाम उनके व्यवसाय पर आधारित है - जैसे-- भण्डारी, कोठारी, खजाची, कानूनगो, दफ्तरी आदि। कुछ गोत्र धधे से सम्बन्धित है। जैसे – घिया, तेलिया, केशरिया, गंधी, सर्राफ आदि। (४) कुछ गोत्र व्यक्ति के नाम से भी प्रचलित हुए और कुछ किसी कार्य विशेष के आधार पर प्रचलित हुए। ऐसे गोत्रो मे एक बरडिया गोत्र भी है, जो वरदिया का अपभ्रश है, बरडिया गोत्र की उत्पत्ति ग्यारहवी शताब्दी मे नाग व्यतर द्वारा नारायण को वर देने (Gave Promise) से हुई बताई जाती है। (५) ईस्वी सन् १५२७ मे निर्मित शांतिनाथ की प्रतिमा पर इस गोत्र के शाहटोडा का उल्लेख है। (६) एक किवदन्ती के अनुसार बरडिया गोत्र का सम्बन्ध वट वृक्ष जिसे लोक प्रचलित भाषा मे बड, बल्डा, बर्डा कहा जाता है, से भी जोड़ा जाता है। बल्डा अथवा बर्डा से बरडिया होना अस्वाभाविक नही है। किन्तु प्राप्त प्रमाणो को देखते हुए प्रथम मत ही अधिक प्रामाणिक प्रतीत होता है। इसी गौरवशाली ओसवाल वशीय और बरडिया गोत्रीय परिवार मे आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म शास्त्री का जन्म हुआ। परिवार प्रशस्ति श्रीमान् कन्हैयालालजी बरडिया उदयपुर के एक धर्मनिष्ठ सुश्रावक थे। उनके जीवन के कण-कण मे धर्म की निर्मल भावनाएँ सदा अगडाइयाँ लेती रहती थी। यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी कि कन्हैयालालजी अपने मे एक सस्था थे। संयुक्त परिवार के मुखिया होने के कारण ही नही, किन्तु वे नगर के एक प्रतिष्ठित तथा लोकप्रिय पुरुष थे। वे स्वभाव से निडर, उदार तथा धर्मप्रिय थे। वे प्रतिदिन पाँच सामायिके करते थे। महीने मे पॉच आयबिल करते थे। जब तक उदयपुर कोई जैन मुनि भगवंत विराजते तब तक वे मुनिराजो को आहारदान दिए बिना १९ श्रद्धालोक के देवता xx में भोजन ग्रहण नहीं करते थे। साधु-मुनिराजों को बहराने के लिए एरंडी (एक प्रकार का वस्त्र) वे सदैव अपने कंधे पर रखते थे। उन्हें गुप्त दान देना बहुत पसन्द था। वे दीन-अनाथो को वस्त्र दान और सुस्वादु भोजन खिलाने के शौकीन थे। वे प्रतिदिन सामायिक में पुच्छिंसुणं भक्तामर स्तोत्र, उवसग्गहरं स्तोत्र आदि का पाठ किया करते थे और नियमित रूप से शास्त्र-श्रवण करते थे। आपकी दुकान का नाम 'जालमचन्द कन्हैयालाल' था। उदयपुर में दो दुकाने थीं। एक में थोक माल और दूसरी में फुटकर माल का विक्रय होता था। इसके अतिरिक्त बड़ी सादड़ी, कानोड़ और भीडर में भी आपकी दुकानें थीं। आपके पॉच पुत्र थे। जीवनसिंह, रतनलाल, परमेश्वरलाल, मनोहरलाल और मदनलाल तथा चार पुत्रियाँ थीं। सबसे बड़े पुत्र एक पुण्य पुरुष थे। मेट्रिक तक अध्ययन करने के पश्चात् उन्होंने व्यवसाय के क्षेत्र में प्रवेश किया। व्यापार कला में निष्णात होने के कारण व्यापार दिन-दूना और रात चौगुना चमकने लगा। नम्रता, सरलता, स्नेह और सद्भावना जैसे गुणों के कारण वे शीघ्र ही अत्यधिक जनप्रिय हो गए। अठारह वर्ष की लघुवय ही जीवनसिंहजी का पाणिग्रहण उदयपुर के सुप्रसिद्ध अभिभाषक श्री अर्जुनलालजी भंसाली की सुपुत्री प्रेमकुँवर के साथ सम्पन्न हुआ। प्रेमकुँवर भद्र प्रकृति की एक सुशील महिला थी। जीवनसिहजी का दाम्पत्य जीवन आनन्द पूर्वक बीतने लगा। वि. सं. १९८१ मिगसर कृष्णा सप्तमी, मंगलवार तदनुसार दिनांक १८-११- १९२४ के शुभ दिन प्रेमकुँवर की पावन कुक्षि से एक कन्या रत्न का जन्म हुआ। कन्या का नाम सुन्दरी रखा गया। जब बालिका सुन्दरी डेढ़ वर्ष की हुई, तब प्रेमकुंवर ने द्वितीय कन्या को जन्म दिया। जिसका नाम सुशीला रखा गया। किन्तु कुछ दिन के पश्चात् ही सुशीला ने सदा के लिए आँखें मूंद लीं। सुशीला के स्वर्गवास से माता प्रेमकुंवर को विशेष आघात लगा। जिसके परिणामस्वरूप उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ गया और वे अधिक संत्रस्त रहने लगी। उस समय जीवनसिंह अपने अन्य कार्यो को गौण कर पत्नी की सेवा तन, मन से करने लगे। अनेक चिकित्सको को भी दिखाया गया। उपचार भी किया गया। पति और पत्नी का सम्बन्ध एक-दूसरे के प्रति समर्पण का है। सभी उनकी सेवा व कर्त्तव्य भावना देखकर विस्मित थे। सभी उपाय करने के बाद भी प्रेमकुँवर का स्वास्थ्य ठीक नही हुआ। कहते है कि टूटी की बूटी नही है। तदनुसार एक दिन जब वालिका सुन्दरी तीन वर्ष की थी, तब प्रेमकुँवर का स्वर्गवास हो गया। पत्नी के निधन से २० श्रद्धालोक के देवता जीवनसिंहजी के कोमल मानस को गहरा आघात लगा। उनके मुरझाये चेहरे को देखकर परिजनो ने उन्हें नाना प्रकार के समझाया और समय-समय पर आयु का सन्दर्भ देकर दूसरा विवाह करने की भी सलाह दी। किन्तु जीवनसिहजी का मानस अभी इसके लिए तैयार नहीं था। समय सबसे बडी औषधि है, समय गहरे से गहरा घाव भर देता है। समय बीतने लगा और प्रेमकुँवर की स्मृतियाँ कुछ धुधलाने लगी। फिर परिवार के सदस्यो का अत्यधिक आग्रह भी बहुत हो रहा था। अन्तत. विक्रम संवत् १९८५ (ई सन् १९२८) मे उनका पाणिग्रहण गोगुन्दा निवासी श्रीमान् हीरालालजी सेठ की सुपुत्री तीज कुमारी के साथ सम्पन्न हुआ। तीज कुमारी बाल्यकाल से ही धार्मिक सस्कारो से सम्पन्न थी। क्योकि गोगुन्दा मे आचार्य सम्राट श्री अमरसिहजी म सा. के सम्प्रदायस्थ सन्त-सतियो का आगमन होता रहता था। उनके निकट सम्पर्क मे आकर आप धार्मिक अध्ययन करती रहती थी। धार्मिक अध्ययन से आपके अन्तर्मानस मे वैराग्य भावना प्रबुद्ध हुई थी। पारिवारिक जनो के अत्यधिक आग्रह से आपका पाणिग्रहण जीवनसिंहजी के साथ सम्पन्न हुआ। तीजबाईजी ने नये घर मे प्रवेश किया। विनय विवेक के कारण कुछ ही दिनो मे उन्होने वहाँ पर सभी के मन को जीत लिया। सुन्दर कुमारी माता तीजबाई के स्नेह को पाकर आल्हादित थी। माता के अकृत्रिम व्यवहार से वह बहुत सन्तुष्ट थी। उसे यह पता ही न चला कि यह उसकी दूसरी माता है। जीवनसिहजी के जीवन मे पुनः उल्लास और प्रसन्नता के फूल खिल उठे। उनके दाम्पत्य जीवन मे एक नई चेतना का सचार हुआ। कुछ समय पश्चात् तीजकुंवर की पावन कुक्षि से एक पुत्र रत्न का जन्म हुआ, जिसका नाम बसन्तकुमार रखा गया। माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यो ने सोचा था कि यह बसन्त की तरह अच्छी तरह से फलेगा फूलेगा और बरडिया परिवार का आधार वृक्ष बनेगा। माता-पिता अपने मन में विभिन्न अनेक रगीन कल्पनाएँ सँजो रहे थे। किन्तु मनुष्य की कल्पनाएँ और स्वप्न सभी सत्य नहीं होते। होता वही है जो काल को स्वीकार होता है। होनी कुछ और ही थी। इधर सब कल्पनाओ के महल बना रहे थे और उधर एक दिन बसन्त कुमार एकाएक बीमार हुआ और सबके देखते ही देखते वह असमय ही सदा-सदा के लिए इस ससार से विदा हो गया। सबको रोता-बिलखता छोड गया। उसके निधन से सबकी कल्पनाओ का रमणीय महल भी ढह गया। २१ श्रद्धालोक के देवता ooo " पुत्र बसन्तकुमार की असामयिक मृत्यु से सारे परिवार में एक सूनापन आ गया था। फिर भी संसार में रहकर नियमित कार्य जैसे-तैसे चल ही रहे थे। समय व्यतीत होता गया और घाव भरता गया। समय सबसे बडी औषधि है। यह बड़े से बड़े घाव भर देता है। माता तीजकुँवर अपने पुत्र की स्मृति लिए संसार चक्र में अपना समय व्यतीत कर रही थी। एक रात को सोते हुए उसने स्वप्न में एक भव्य देव विमान देखा। जागने पर उसने स्वप्न पर विचार किया। उसे कुछ शुभ प्रतीति हुई। रात्रि का उत्तरार्ध था। इस शुभ स्वप्न के देखने से उसका हृदय गद्गद् हो गया। वह भावविभोर हो उठी और अपने पति श्रीजीवनसिंहजी को उठाकर अपना स्वप्न सुनाया। जब जीवनसिंहजी ने स्वप्न का विवरण सुना तो वे भी आनन्द से झूम उठे। उन्हें स्वप्नों के फलों का कुछ ज्ञान था। इस कारण इस स्वप्न पर विचार कर उन्होने कहा - "इस स्वप्न के देखने से यह भासित होता है कि तुम एक पुण्यवान और भाग्यशाली पुत्र की माँ बनने वाली हो।" अपने पति की बात सुनकर तीजकुँवर का आनन्द द्विगुणित हो गया। फिर भी प्रातः होने पर जीवनसिंहजी ने ज्योतिषी को बुलवाकर अपनी पत्नी द्वारा देखे गए स्वप्न का फल पूछा। ज्योतिषी ने भी स्वप्न शास्त्र के आधार पर यही कहा, कि ऐसा स्वप्न देखने वाली माता भाग्यशाली पुत्र को जन्म देती है। ज्योतिषी का कथन सुनकर उसे उचित पुरस्कार देकर विदा किया। परिवार में आनन्द की एक नवीन लहर उत्पन्न हो गई। गर्भावस्था में माता तीजकुंवर को इस प्रकार की भव्य भावना उबुद्ध होती थी कि वह गरीबों को दान दे, उन्हें वस्त्र दे, चतुर्विध संघ को आहार दे, जीवो को अभयदान दे। संसार में कोई भी व्यक्ति दुःखी न रहे और न अभावग्रस्त ही रहे। वह जैनधर्म की प्रभावना और स्थान-स्थान पर धार्मिक पाठशालाएँ खुलवायें। इस प्रकार उनकी जो भी भावनाएँ उत्पन्न हुई उन सबकी पूर्ति जीवनसिंहजी ने की। गर्भकाल में माता तीजकुँवर को फल खाने के दोहद उत्पन्न हुए। इस अवधि में उन्हें फलाहार अतिप्रिय लगता था। पुत्र रत्न की प्राप्ति अपनी पत्नी के गर्भवती होने से जीवनसिंहजी के मन में उल्लास था। वे सोच रहे थे कि अब जो सन्तान होगी, वह उनकी गौरव गरिमा मे चार चाँद लगायेगी। २२ se we श्रद्धालोक के देवता सन्तानोत्पत्ति की बडी आतुरता से वे प्रतीक्षा कर रहे थे। गर्भकाल अन्तत. पूर्ण हुआ। विक्रम संवत् १९८८ कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी शनिवार तदनुसार दिनाक आठ नवम्बर, १९३१ के शुभ दिन तीजकुँवर की पावन कुक्षि से एक पुत्र रत्न का जन्म हुआ। भारतीय पर्व परम्परा मे यह तिथि धन्या तिथि अर्थात् धनतेरस के रूप मे विश्रुत है। दीपावली की अगवानी हेतु इस दिन घर-घर मे मगल दीप जलाये जाते है। घर-घर मे मिठाइयॉ वितरित की जाती है। सोने-चॉदी और जवाहरात की दुकाने विशेष रूप से सजाई जाती है। लोकधारणा है कि इस दिन सोना-चाँदी आदि की वस्तुएँ क्रय करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार, यह दिन पूर्ण रूप से विशुद्ध है। राजस्थानी मान्यतानुसार "अण पूछ्यो मूरत भलो, के तेरस के तीज।" धनतेरस को जन्म होने के कारण माता-पिता तथा परिवार के सभी सदस्यो ने बालक का नाम धन्नालाल रखा। बालक का जन्मोत्सव बडे ही उल्लास के साथ मनाया गया। नारियो के कण्ठ से गीतो की स्वर लहरियाँ फूट पडी, वाद्य यंत्र बज उठे। न केवल घर ही, वरन् आस-पडोस मे भी दु खियो को दान दिया। परिवार सगे-सम्बन्धी और ईष्ट मित्रो को इस शुभ अवसर पर सुस्वादु भोजन करवाया। जीवनसिंहजी की रुग्णता पुत्र रत्न की प्राप्ति से जीवनसिहजी की खुशियाँ चौगुनी हो गई। किन्तु उनकी सग्रहणी की बीमारी अब और अधिक बढ़ गई थी। प्रारम्भ मे तो उन्होने इस बीमारी की कोई चिन्ता नही की। चिकित्सा भी करवाई, पर कोई अपेक्षित लाभ नहीं हुआ। अब यह बीमारी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। शरीर कमजोर हो गया था, जिसके परिणामस्वरूप शरीर मे सूजन भी आ गई थी। बढ़ती हुई रुग्णावस्था और औषधियो के प्रभावहीन होने से उन्हें यह अहसास हो गया था कि अब वे लम्बे समय तक जीवित नही रह पायेगे। ऐसे मे वे विचार करते है कि उनकी मृत्यु के पश्चात् पिताजी का क्या होगा? पत्नी और पुत्र-पुत्री की स्थिति क्या होगी? कौन सम्हालेगा इन्हे? ऐसा विचार करते-करते उनकी आँखो से गगा- जमुना प्रवाहित होने लगती। जैसे-तैसे फिर वे अपने आपको नियत्रित करते। वे सो रहे थे। उन्हे स्वप्न मे यह अहसास हुआ कि एक दिव्य शक्ति उन्हे जागृत कर रही है कि जीवन | तू अब लम्बे समय का मेहमान नही है। तू अपने जीवन की अंतिम घडियो को सथारा कर सुधार ले। तुझे वीर की तरह मृत्यु का वरण करना २३ श्रद्धालोक के देवता jokes है, न कि कायर की तरह। यह स्वप्न था। स्वप्न पूरा होते ही उनकी आँखे खुल गई। उन्होंने देखा कि उषा का आलोक चारों ओर फैल रहा है। उन्होंने उसी समय पिताजी को बुलाया और कहा कि उदयपुर में विराजित महासती श्री सोहनकुंवरजी म. सा. को सूचित करें कि मुझे दर्शन देने की लिए पधारने की कृपा करें। आपके पूज्य पिताश्री कन्हैयालालजी धार्मिक विचारों के धनी थे। उन्होने तत्काल महासतीजी की सेवा में उपस्थित होकर सूचना दे दी। महासती श्री सोहनकुंवरजी म. सा. अपने साथ एक साध्वी को लेकर पधारी। उस समय उदयपुर मे कोई भी सन्त नहीं विराज रहे थे। अतः जीवनसिंहजी ने महासती के आने के पश्चात् उनके सम्मुख अपने पापों की आलोचना की और फिर निवेदन किया "मुझे यावज्जीवन का सन्थारा करवा दें। मेरा अंतिम समय अब सन्निकट है। अतः विलम्ब करने का समय नही है। महासती श्री सोहनकुंवरजी म. सा. ने शारीरिक लक्षण देखे। वे सब कुछ समझ गई। पारिवारिक जनों की अनुमति से उन्होंने सागारी सन्थारा कराना उचित समझा। परिवार के सदस्यो की सहमति होते ही उनहोंने तत्काल सन्थारा करा दिया। मंगल पाठ सुनाकर महासतीजी विदा हुए। उनके विदा होने के पश्चात् जीवनसिंहजी ने सभी अभिभावकगणों से क्षमापना की। जन्म है, तो मृत्यु भी है। फिर मृत्यु का दिन भी निश्चित होता है। जीवनसिंहजी ने सन्थारा ग्रहण कर लिया था। यद्यपि उनकी आयु अभी कोई अधिक नहीं थी, किन्तु होनी को कौन टाल सकता है। कोई यह सोच भी नहीं सकता कि इतनी लघुवय मे भी स्वर्गवास हो जाएगा। किन्तु जो होना था, वह हुआ। वि. सं. १९८८ मिगसर कृष्णा तृतीया तदनुसार दिनांक २८-११-१९३१ के दिन काल के क्रूर पंजो ने अपनी जकड़ से जीवनसिंहजी को सदा-सदा के लिए उनके परिवार से छीन लिया। मात्र सत्ताईस वर्ष की लघुवय में उनका स्वर्गवास हो गया। इस समय पुत्र धन्नालाल की आयु केवल इक्कीस दिन और पुत्री सुन्दरकुंवर की आयु सात वर्ष थी। जिस दिन जीवनसिंहजी का स्वर्गवास हुआ। उस दिन मृत्यु के पूर्व एक समय माता तीजकुँवर अपने नवजात पुत्र को जीवनसिंहजी के पास ले गई थी। स्मरण रहे कि उन दिनो पर्दाप्रथा का प्रभाव बहुत अधिक था। फिर सन्तानोत्पत्ति के पश्चात् तो कई-कई दिनो तक पति-पत्नी एक-दूसरे से मिल भी नहीं पाते थे। यह एक संयोग ही था कि तीजकुंवर के मन में कुछ भावना जागृत हुई और उसने पुत्र kee श्रद्धालोक के देवता को ले जाकर अपने रुग्ण पति की गोद मे रख दिया। जीवनसिहजी अपनी गोद मे अपने पुत्र को पाकर भावविभोर हो उठे। उन्होने दस तौले की कण्ठी अपने इस पुत्र को पहना दी। माता तीजकुंवर बडी ही भद्रनारी थी। अपने पति की रूग्णावस्था को समझती थी। उनकी इस प्रसन्नता को देखकर उसकी आँखो मे अश्रु छलछला आये। जीवनसिहजी की आँखो मे भी आसू आ गये। यही समय था कि मॉ वहाँ आ गई। वे सरक्षिका थीं। उन्होने तीजकुँवर को डॉटते हुए कहा "मेरे बेटे को क्यो रुलाती हो" कण्ठी बालक के गले से निकाल ली थी, वह फिर पहना दी गई। पिता जीवनसिहजी ने कहा - "तुम किसी प्रकार की चिन्ता मत करना। मेरा बेटा कभी भी दुःखी नही होगा।' माता तीजकुंवर समझ नही पायी कि उसके पति इस प्रकार की बाते क्यो कर रहे है, इसके पश्चात् ही सन्थारा ग्रहण किया था। जीवनसिहजी की मृत्यु का आघात पिता कन्हैयालालजी के लिए दुस्सह प्रमाणित हुआ। पुत्र के स्वर्गवास के पश्चात् वे सदा के लिए गमगीन हो गए। तीजकुंवर का तो ससार ही उजड़ गया। पति-वियोग का असाध्य आघात लगा उसे। आर्तध्यान से धर्मध्यान की ओर जीवनसिहजी के स्वर्गवास से पिता कन्हैयालालजी को बहुत गहरा आघात लगा। वे एकान्त, शान्त क्षणो मे सोचने लगे कि पुत्रवधू की आयु अठारह वर्ष है। पोती सात वर्ष की है और पोता तो अभी एक माह का भी नही हुआ है। यदि पुत्रवधु सदैव ही आर्तध्यान मे रहेगी, तो इसका स्वास्थ्य तो बिगडेगा ही उसका असर पोते पर भी होगा। यदि इसको आर्तध्यान से मुक्त करना है, तो उसका उपाय धर्म-ध्यान है। यदि यह सद्गुरुणीजी के सान्निध्य मे रहेगी, तो इसके मानसिक विचारो मे भी परिवर्तन होगा और चितन भी प्रबुद्ध होगा। जैसे-तैसे दो वर्ष बीत गए। एक दिन कन्हैयालालजी ने तीजकुंवर को कहा "बेटी | चल मै तुझे ऐसे स्थान पर ले चलता हूँ, जो कल्पवृक्ष की भॉति शोक मुक्त एवं शान्तिप्रद है। जिस प्रकार कल्पवृक्ष मनोकामना पूर्ण करता है और चिन्तारें नष्ट करता है, वैसे ही सद्गुरुणीजी का सान्निध्य हमारे जीवन के लिए तीजकुंवर ने अपने श्वसुर की बात का मौन रहकर ही समर्थन किया। तीजकुंवर, सुन्दरी और पन्नालाल तीनो को लेकर कन्हैयालालजी उदयपुर मे KASH २८ वरदान रूप होगा।" .
श्रद्धालोक के देवता स्थिरवास विराजिता साध्वीरत्न तपोमूर्ति महासती मदनकुँवरजी तथा साध्वीरत्न महाश्रमणी सोहनकुंवरजी के पास ले गए। महासतियों को विधिवत वंदन करने के पश्चात् कन्हैयालालजी ने निवेदन किया - "महाराज श्री ! आप इन्हें ज्ञान, ध्यान सिखाइये, जिससे कि इनके जीवन में नई रोशनी प्राप्त हो। ये आर्तध्यान और रौद्रध्यान से मुक्त होकर धर्मध्यान करें। मैं इसीलिए इन्हें आपके चरणो में लाया हूँ। जब भी समय मिलेगा, तब ये आपकी सेवा मे आ जाया करेंगी।' मानव-मन की पारखी महासतियों के पास माता श्री तीजकुंवर के साथ सुन्दरी और धन्नालाल भी नियमित रूप से जाने लगे। महासतीजी बाल मनोविज्ञान को अच्छी प्रकार समझती थी। वे जानती थीं कि बालकों को खेलने-कूदने में, खाने-पीने मे जितना आनन्द आता है, उससे भी अधिक आनन्द उन्हें कहानी सुनने मे आता है। कहानियाँ बालकों को अत्यधिक प्रिय होती है। वे उन्हें मिठाइयों से भी अधिक मीठी लगती हैं। जब बालक कथा-कहानियाँ सुनता है तो उस समय उसे न भूख लगती है और न प्यास। न वे परेशान करती है और न खेलने की भावना ही जागृत होती है। बाल-मनोविज्ञान की इस पहेली को समझकर महासतीजी ने रोचक कहानियाँ सुनाना आरम्भ कर दिया। महासती मदनकुँवरजी धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और आगमिक कहानियाँ सुनाया करतीं। कहानियों के माध्यम से जो उपदेश दिया जाता है, वह उपदेश भार रूप नहीं लगता। उससे व्यक्ति ऊबता नहीं, किन्तु सहज ही ग्रहण कर लेता है। महासतीजी की कहानियो ने अपना प्रभाव जमाना आरम्भ कर दिया। माता तीजकुंवर और सुन्दरी के अन्तर्मानस मे नया रंग घुलने लगा। बालक धन्नालाल तो अभी छोटा ही था। वह इन सबसे अनजान ही था। फिर भी वह कहानियों को ध्यान से सुनता था। कथाओं के साथ ही महासतीजी सामायिक सूत्र, प्रतिक्रमण, पच्चीस बोल आदि जैन तत्वज्ञान का अध्ययन भी कराती। जब भी घर से समय मिलता मॉ, पुत्री और पुत्र तीनों धर्म-स्थानक पहुँच जाते। इसी अनुक्रम में सुन्दरी के हृदय में वैराग्य के अंकुर फूट पड़े और उसने अपनी भावना सद्गुरुवर्या मदनकुँवरजी के सम्मुख प्रकट भी कर दी। सद्गुरुवर्याजी ने संयम मार्ग की कठोरता के सम्बन्ध में सुन्दरी को बताया, किन्तु इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं हुआ। सुन्दरी पर वैराग्य रंग और गहराने लगा। उसने अपने अन्तर्मन की भावना अपनी माताजी के सम्मुख भी प्रकट कर दी। माताजी की ओर से इस सम्बन्ध में उसे प्रोत्साहन ही मिला, किन्तु जब सुन्दरी २६ कर वह सिहर उठता। अत्यधिक रोने से उसकी आँखे सूज गई, ऑखे भी आ गई। Ka श्रद्धालोक के देवता की वैराग्य भावना का पता उसके दादाजी को चला, तो वे चौक उठे। वे तो अपनी पौत्री के लिए वर की तलाश कर रहे थे। उन्होने अपनी कल्पना के विपरीत जब सुन्दरी के संयम ग्रहण की बात सुनी, तो वे स्तब्ध रह गए। उन्होने भी सुन्दरी को समझाने का काफी प्रयास किया। यद्यपि दादाजी कन्हैयालालजी मे धार्मिक भावना कूट-कूट कर भरी थी, किन्तु मोह की प्रबलता के कारण वे दीक्षा की आज्ञा देना नहीं चाहते थे। अपने ज्येष्ठ पुत्र जीवनसिंह के देहावसान के पश्चात् से ही कन्हैयालालजी का स्वास्थ्य दिन प्रति दिन गिरने लगा था। उन्हे चिन्ता का घुन लग चुका था। परिवार की सारी जिम्मेदारी उन पर आ गई थी। व्यापार भी काफी फैला हुआ था। द्वितीय पुत्र रतनलालजी को व्यापार मे रस नही था। वे विद्याभवन मे अध्ययन करवाने लगे। अन्य तीन पुत्र छोटे थे। अत. मन ही मन मे कन्हैयालालजी घुलते जा रहे थे। जिसके परिणामस्वरूप एक दिन देखते ही देखते लम्बी बीमारी के पश्चात् उन्होने सदा के लिए ऑखे मूंद लीं। जीवन के अतिम क्षणो मे भी उनकी धार्मिक भावना सराहनीय रही। किन्तु पारिवारिक व साम्प्रदायिक व्यक्तियो के प्रभाव के कारण वे सुन्दरी को दीक्षा की आज्ञा न दे सके। दादाजी के स्वर्गवास के पश्चात् परिवार के वातावरण मे परिवर्तन आ गया। अब परिवार का उत्तरदायित्व रतनलालजी के कधो पर आ गया था। रतनलालजी जीवन के उषा काल से ही पाश्चात्य भौतिक विचारो मे पले-पुसे थे। उन्हे धार्मिक क्रियाकाण्डो के प्रति लगाव नही था। वे उस समय विद्या भवन मे रहते थे। उन्होने भी सुन्दरी की दीक्षा मे बाधाएँ खडी की। सुन्दरी के दीक्षा-मार्ग मे बाधाएँ तो बहुत आई, किन्तु उसके दृढ़-संकल्प के सम्मुख एक भी बाधा टिक नही पाई और अन्तत वि स १९९४ माघ शुक्ला त्रयोदशी शनिवार तदनुसार बारह फरवरी १९३८ के दिन सुन्दरी का दीक्षोत्सव सम्पन्न हुआ और उसका साध्वी नाम महासती पुष्पवती रखा गया तथा वे महासती सोहनकुंवरजी म सा की शिष्या बनीं। डॉ. मालसिंह ने किसी बहाने से बालक धन्नालाल को उदयपुर भेज दिया। उदयपुर मे धन्नालाल अपनी मौसी राजबाई के पास रहने लगा। किन्तु माँ का प्यार उसकी स्मृति मे आते ही उसकी आँखो में ऑसू बरस पडते। मॉ की वेदना की कल्पना २७ २ श्रद्धालोक के देवता Note आँखें आने से भयंकर दर्द हो रहा था। उसकी शारीरिक स्थिति अस्त-व्यस्त थी। उसका फूल-सा कोमल मुखडा मुरझा गया था। सुन्दरी कुमारी जब गृहस्थावस्था में थी, तब माता-पिता के पश्चात् सबसे अधिक प्यार अपने छोटे भैय्या पर था। वह उसे नहलाती और बढ़िया वस्त्र और आभूषण पहनाती, जब कभी भी सन्त-प्रवचन श्रवण करने जाती, तब वह उसे साधुवेश पहनाती। गौरवर्ण होने के कारण वह बहुत ही सुन्दर, सुहावना और आकर्षक लगता था। पर आज उसकी यह दशा देखकर महासती पुष्पवतीजी की आँखों में पानी आ गया। बहन की ममता जाग गयी। धन्नालाल ने रोते-रोते कहा - "बहन | तुम साध्वी बन गई हो। माताजी की यह स्थिति है। प्रतिदिन उनके हाथ में भयंकर वेदना होती है। उस वेदना के कारण कई बार माँ बेहोश हो जाती है। यदि मॉ पिताजी की तरह संसार से चल बसी तो मेरी दीक्षा कैसे होगी? इन प्रश्न का उत्तर बहन महाराज के पास मौन के सिवाय कुछ नहीं था। यद्यपि धन्नालाल की मौसी राजबाई उसको बहुत ही प्यार करती थी और उसके मौसा कन्हैयालालजी लोढ़ा पुत्र की तरह प्यार करते थे। किन्तु मॉ के प्यार की पूर्ति मौसी कर कैसे सकती? उस वर्ष सद्गुरुणीजी श्री सोहनकुंवरजी का वर्षावास सलोदा निश्चित हो चुका था। जो हल्दीघाटी के पास में और नाथद्वारा से पच्चीस किलोमीटर दूरी पर अवस्थित है। अतः उन्हें विहार करना था। साथ ही बहन पुष्पवतीजी भी जाने वाली थी। क्योकि दीक्षा लेते ही उनका यह प्रथम वर्षावास था। धन्नालाल के लिए उदयपुर में जो एक मात्र बहन का सहारा था, वह भी छूट रहा था। पर कोई उपाय नहीं था। उसकी आयु पाँच वर्ष की होने के कारण वह इस समय दीक्षा भी नही ले सकता था। माताजी हिम्मतनगर ही थी। वातावरण का प्रभाव सभी पर होता है। चाहे वह बालक हो या वृद्ध। वात उस समय की है जब बालक धन्नालाल दो वर्ष पारकर तीसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा था। वह जो भी कुछ भी देखता, उसका अर्थ वह अपने हिसाब से समझता था। माता के बोलने पर वह भी अपनी तुतलाती बोली में मंत्रोच्चार करता तो बहुत ही आकर्षक लगता। धन्नालाल कभी साधु-वेश धारण कर प्रवचन में जाता। इस समय यह बालक सबके आकर्षण का केन्द्र बन जाता। बच्चो में अपने से बड़ों की नकल करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यह २८ धन्नालाल भी वही खेल रहा था। कुछ और भी बच्चे थे, जो लगभग समवय के KUM Kese श्रद्धालोक के देवता मनोवैज्ञानिक तथ्य है। बालक धन्नालाल भी इस प्रवृत्ति से अछूता नही रहा। समय के प्रवाह के साथ-साथ धन्नालाल की आयु भी बढ़ती रही और उसके बालस्वभाव मे भी कुछ-कुछ परिपक्वता-सी दिखाई देने लगी। अन्य बालकों के स्वभाव से उसका स्वभाव एवं आदत भिन्न ही थी। यह सब सत्संग का प्रभाव था। धन्नालाल प्रत्येक कार्य मे धर्म का रंग स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा। जो भी व्यक्ति इस नन्हे बालक को और उसके खेल को देखता आश्चर्य चकित रह जाता और यही विचार करता था कि निश्चित ही यह कोई भव्यात्मा है। होनहार बिरवान के माताजी तीजकुँवर के साथ धन्नालाल का अधिकाश समय महासती श्री मदनकुँवरजी म. सा. एवं महासती श्री सोहनकुंवरजी म सा. के सान्निध्य मे व्यतीत हुआ। माता तीजकुंवर अपना अधिकांश समय ज्ञान-ध्यान और स्वाध्याय मे व्यतीत करती। इसी अनुक्रम में माता तीजकुंवर ने पॉच सौ थोकडे कण्ठस्थ कर लिए थे। इस प्रकार बालक धन्नालाल का लालन-पालन साधु-साध्वियो के सान्निध्य मे हो रहा था और उसका अप्रत्यक्ष प्रभाव धन्नालाल के जीवन पर भी पड़ रहा था। वि सं. १९९१ की एक घटना से सबका ध्यान बालक धन्नालाल की ओर आकर्षित हुआ। इस वर्ष ज्योतिर्धर आचार्य श्री जवाहरलालजी म सा. आदि ठाणा नौ का चातुर्मास कपासन में था। उस समय दादाजी श्री कन्हैयालालजी वहाँ सपरिवार चौका लगाकर रह रहे थे। तीजकुंवर भी पुत्री सुन्दरी और पुत्र धन्नालाल के साथ वही पर थी। धन्नालाल के मामा सा और तीजकुंवर के भाई श्री कन्हैयालालजी आदि भी यहीं रह रहे थे। घटना इस प्रकार है – स्थानक भवन के चबूतरे के समीप दादाजी श्री कन्हैयालालजी सामायिक लेकर बैठे थे। चबूतरे पर आचार्यप्रवर के बैठने का पाठ रखा हुआ था। एक बडे पाट पर छोटा पाट था, जिस पर आचार्यप्रवर श्रीजवाहरलालजी म सा विराजकर प्रवचन फरमाते थे। बालक थे। चंचल स्वभाव का होने के कारण बालक धन्नालाल दौडकर चबूतरे पर चढ़ गया और सीधा आचार्यप्रवर के पाट पर साधुओ जैसा आसन जमाकर बैठ गया। जो अन्य बालक खेल रहे थे, वे भी पन्नालाल के पीछे-पीछे चबूतरे पर चढ़ गए और पाट के आस-पास खड़े हो गए। पाठ पर बैठे हुए धन्नालाल ने खडे हुए बालको को बैठने का कहा और प्रवचन देने का अभिनय करने लगा। ठीक इसी २९ श्रद्धालोक के देवता समय आचार्य प्रवर श्री जवाहरलालजी म. सा. बाहर से पधार गए। जब आचार्य प्रवर ने अपने पाट पर तीन वर्ष के बालक को बैठे देखा तो उनेंने पूछा - "यो कणरो कूको है?" आचार्य प्रवर की आवाज सुनकर दादाजी कन्हैयालालजी ने आचार्य प्रवर की ओर देखा और फिर उनकी दृष्टि आचार्यप्रवर के पाट पर बैठे अपने पौत्र धन्नालाल पर पड़ी, तो वह अज्ञात भय से एकाएक काँप उठे। वे बड़े ही विनम्र शब्दों में बोले - "आपरोज चेलो है, अन्नदाता! जीवन रो कूको है। कन्हैयालालजी का उत्तर सुनकर आचार्य प्रवर कुछ देर तक बालक धन्नालाल को देखते रहे। बालक धन्नालाल तो निश्चिंत भाव से अपने साधु जीवन के खेल में मग्न थे। आचार्य प्रवर ने कन्हैयालालजी को सम्बोधित कर रहा - "यदि यह बालक दीक्षा लेना चाहे तो इसे रोकना मत, कोई बाधा भी खडी मत करना। क्योकि एक बार पूज्य श्रीलालजी म.सा. ने फरमाया था कि बरडिया परिवार से दीक्षा होगी। बरडिया परिवार का वह लड़का धर्मोद्योत करेगा। दादाजी श्री कन्हैयालालजी ने उसी समय अपनी स्वीकृति दे दी थी। इसके पश्चात् बालक धन्नालाल अपनी माता तीजकुँवर के साथ महासतियों और मुनिराजों के सान्निध्य में रहने लगा। आचार्य प्रवर श्री जवाहरलालजी म. सा. के निकट सम्पर्क में रहने का सौभाग्य भी मिला। श्री गणेशीलालजी म. सा. की भी बालक धन्नालाल पर अपार दृष्टि रही। इस घटना से होनहार बिरवान के होत चिकने पात अथवा पूत के पॉव पालने से ही नजर आते है, जैसी कहावतों को सिद्ध कर दिया। उस समय आचार्य प्रवर श्री जवाहरलालजी म. सा. द्वारा जो भविष्यवाणी की गई थी, आज सत्य होती प्रतीत हुई। स्वप्न साकार हुआ जिस समय बालक धन्नालाल अपनी माता तीजकुंवर के साथ अपने मामा पास हिम्मतनगर में था, उस समय उसने हिम्मतनगर मे एक स्वप्न देखा था 'श्री ताराचन्दजी म. सा. जप कर रहे हैं और श्री पुष्कर मुनिजी म.सा. स्वाध्याय मे लीन हैं। दोनों मुनिवरो को बालक धन्नालाल ने नमन किया और दीक्षा लेने की भावना उत्पन्न हुई। फिर स्वप्न भंग हो गया।' हिम्मतनगर में मामाजी के यहाँ रहते हुए बालक धन्नालाल रोता अधिक था। इसलिए माता तीजकुंवर ने उसे उदयपुर भेज दिया था। अपना स्वास्थ्य ठीक होने पर तीजकुँवर भी हिम्मतनगर से उदयपुर आ गई थी। ARMANE MAMA ... Maithin ! बहन म. महासती श्री पुष्पवतीजी का चातुर्मास रालोदा | Kite i) ता111 म सा तथा श्री पुष्कर मुनिजी म.सा. का चातुर्गारा कालो || Rajirtil.1 की भॉति आवागमन के साधन उतने नहीं थे। जहाँ जा initia Ninth || समुचित प्रबन्ध कर जाना पड़ता था। विशेष कर जब गाँवों में ll ridictility, घोडा, ऊँट आदि की सवारी करके ही जाना पड़ता था। ५45,11-12 मेढ़े थे। नदी नाले पार करना पड़ता था। इसके 3 1111th थे। तीजकुंवर अपने पुत्र धन्नालाल को लेकर ॐ पर हर Tich इन दिनों महासती श्री पुष्पवती म.सा. कुछ अरवरथी (fa.fier Iitil की सेवा मे रहकर फिर कम्बोल आ गई। कम्बोल आते ही धन्नालाल को निपातनगर या 11-{ 11111111111111 यहाँ ठीक वैसा ही दृश्य देखा। श्री ताराvisit 1,11, it it श्रीपुष्कर मुनिजी म.सा. स्नध्याय में ली 11 गाने frtant: AIE | धन्नालाल के अन्तर्गत एकाएक भाव !! HTTPhil इन्हीं गुरुभगवंत के सानिया में अंग 1,1111111111९/११/११ मे देखा था, वह कल्लत में माना 1 1111/2th give it tut, [{ki तक रहना हुआ। इलाकार, 14 (11. in... (11 1111 1114 पड़ा। यहाँ धन्नकट HTRA HAI इस समय 2117 12:kipe's Hair, ( १ १ था। ६ वर्ष लबाही . . if it' धन्नालाल ने 4-7 77.1 Miye titi tive.t: 1.11 व्रत लेना रहन infring # Arrat if turn.14 tortalitazar, rikan nae vi{ {ut, HAT तो यह Harya, ... minint" धन्नातन 424 what i" , yet. ... Pre दीक्षा mantri armir tills, ध्यान में की हैं, ' उल्लेड है या rin: inits शास्-': सा मत गर' .. ހި- ތ.ހިކިޗިހިތިތރފާއި،" Frred D. श्रद्धालोक के देवता 10 -Pratimhrat katarinaina :- m TH 17 M -- thi utta -- - संटाम की राह पर anma... AAAAAVAAN श्री ताराचन्दजी म. सा. एवं उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि म.सा. के कम्बोल चातुर्मास में धन्नालाल ने प्रथम दर्शन किए थे और उसी समय यह घोषणा भी कर दी थी कि वह इन्हीं गुरु भगवंतों के सान्निध्य में प्रव्रज्या ग्रहण करेगा। उसकी इस घोषणा का माता तीजकुंवर को छोड़कर परिवार के सभी सदस्यो ने विरोध किया था। यह बात वि.सं. १९९५ की है। इसके पश्चात् भी माता तीजकुंवर के साथ धन्नालाल साधु-साध्वियो की सेवा में जाता रहा और उसका धार्मिक अध्ययन आचार्य प्रवर दीक्षा ग्रहण भी होता रहा तथा वैराग्य भाव में भी अभिवृद्धि होती करने के पश्चात् अध्ययन रही। बहन म.सा. श्री पुष्पवतीजी म.के पास जाते और की मुद्रा में वहीं सद्गुरुवर्या महासती श्री सोहनकुंवरजी म सा के सान्निध्य में विद्याध्ययन होता। इससे जहाँ ज्ञानवृद्धि हो रही थी, वहीं वैराग्य भावना के प्रति भी दृढ़ता बढ़ती जा रही थी। श्री ताराचन्दजी म. सा. एवं श्री पुष्कर मुनिजी म. सा. का वि. सं. १९९७ का चातुर्मास खण्डप में था। माता तीजकुंवर धन्नालाल को लेकर खण्डप पहुँच गई। विगत दो वर्षों से इन्हीं गुरुभगवंतों के निर्देशानुसार धन्नालाल की ज्ञान-साधना चल रही थी। तीजकुंवर ने अपने पुत्र धन्नालाल को दीक्षा प्रदान करने के सम्बन्ध में प्रार्थना की। इसी अनुक्रम में खण्डप के सेठ रुगनाथजी धनराजजी लूंकड़ ने विविध प्रकार के प्रश्न पूछकर धन्नालाल की कई वार परीक्षा ली। धन्नालाल इस परीक्षा में समुत्तीर्ण हुआ और खण्डप श्री संघ ने गुरदेव से निवेदन किया कि यदि दीक्षा प्रदान करने का निर्णय होता है, तो उसका लाभ खण्डप श्री संच को मिलना EXAM m सिवाना, समदडी होते हुए दुन्दाडा पधारे। यहाँ महास्थविर श्री दयालचन्दजी म kese श्रद्धालोक के देवता चाहिए। उस समय दीक्षा विषयक कोई निर्णय नही हुआ। चातुर्मास समाप्त हुआ और गुरुदेव का खण्डप से उदयपुर की ओर विहार हो गया। खण्डप से गुरुदेव का विहार भले ही हो गया, किन्तु धन्नालाल की दीक्षा के प्रसग के लिए खण्डप श्रीसघ गुरुदेव के समक्ष बार-बार अनुरोध करता रहा। अतत: गुरुदेव ने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव को लक्ष्य मे रखते हुए दीक्षा के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। धन्नालाल की दीक्षा का मुहूर्त फाल्गुन शुक्ला तृतीया वि. सं १९९७ निश्चित हुआ। माता तीजकुंवर अपने परिवार वालो को सूचित किए बिना अपने पुत्र धन्नालाल को लेकर खण्डप पहुंच गई। परिवार वाले दीक्षा का विरोध कर रहे थे। उनके विरोध का मुख्य कारण धन्नालाल की अल्पायु होना था। तीजकुंवर यथा सम्भव यथाशीघ्र अपने पुत्र को दीक्षा दिलवाकर स्वय भी दीक्षित होना चाहती थी। माता तीजकुंवर ने अपने पुत्र धन्नालाल की दीक्षा के लिए अनुमति लिखकर दे दी। भव्य समारोह के साथ निश्चित तिथि वि. स. १९९७ फाल्गुन शुक्ला तृतीया को निर्धारित समय पर अपार जन समूह की साक्षी में वैरागी धन्नालाल का नामकरण देवेन्द्र मुनिजी के रूप मे कर उन्हे श्रीपुष्कर मुनिजी का शिष्य घोषित किया। इस दीक्षात्सव के सानन्द सम्पन्न होने पर तीजकुंवर ने राहत की सांस ली आषाढ़ शुक्ला तृतीया को उन्होंने भी महासती श्री सोहनकुंवरजी म. सा के सान्निध्य मे दीक्षा ग्रहण कर ली तथा आपका नाम महासती श्रीप्रभावतीजी म सा. दीक्षोत्सव के अवसर पर खण्डप मे स्थविर श्री शार्दूलसिहजी म एव महासती वृन्द भी उपस्थित थी। दीक्षा के पश्चात् खण्डप से विहार हुआ। नवदीक्षित बाल मुनि श्री देवेन्द्र मुनि को पैदल चलने का अभ्यास नही था। इसके अतिरिक्त वे अपने गुरुदेवो की गति से भी नही चल सकते थे। इसलिए मार्ग मे दादा गुरुदेव श्री ताराचन्दजी म सा तथा गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म सा इन्हे अपने कधे पर बैठाकर विहार करते। ऐसी स्थिति कई बार आई। खण्डप से विहार कर मोकलसर आगमन हुआ। मोकलसर मे नवदीक्षित श्री देवेन्द्र मुनिजी की बडी दीक्षा सम्पन्न हुई। दीक्षा के दूसरे दिन प्रसिद्ध वक्ता जैन दिवाकर श्री चौथमलजी म सा अपने शिष्यो सहित मोकलस पधारे। यहाँ मुनि द्वय के व्याख्यान सम्मिलित रूप से चलते रहे। मोकलसर से विहार कर अपने गुरुदेव के साथ श्री देवेन्द्र मुनिजी और रखा गया। My ३३ श्रद्धालोक के देवता विराजमान थे। श्री पुष्कर मुनिजी म. श्री हीरा मुनिजी म. तथा श्री देवेन्द्र मुनिजी म. दुन्दाडा से विहार कर जोधपुर पधारे। जोधपुर में ड्योड़दारों के स्थानक में स्थविर श्री रावतमलजी म.ठा. २ एवं पं. नारायणदासजी म.ठा. २ विराजमान थे। अकस्मात व्याख्यान के समय वहाँ पधारे, तो जनता स्वागत में खड़ी हो गई और साथ में लघु श्री देवेन्द्र मुनिजी को देखकर 'एवन्ता मुनि' कहकर जनता जय- जयकार करने लगी। लघुवय के श्री देवेन्द्र मुनिजी को देखकर जोधपुर में तहलका मच गया था। यह समाचार जोधपुर के दीवान को भी मिला। दीवान ने आकर श्री देवेन्द्र मुनिजी से प्रश्न किया - 'आप इतनी छोटी आयु में साधु कैसे बने?' श्री देवेन्द्र मुनिजी ने निडर होकर निःसंकोच भाव से उत्तर दिया - "संसार में सार नहीं है, वैराग्य भाव से ही उत्प्रेरित होकर दीक्षा ली है। आप भी इस अनुभूति को करना चाहे तो दीक्षा ग्रहण करें।' इस उत्तर को सुनकर दीवान ने और भी अनेक प्रश्न किए। अन्ततः वह सन्तुष्ट हुए और चले गये। जोधपुर में लगभग एक मास तक ठहरे। श्री देवेन्द्र मुनिजी के लिए सब कुछ नया अनुभव था। यह परिवर्तन आपको बड़ा अच्छा लग रहा था। यहाँ होने वाले प्रवचन भी आप बड़े ध्यान से सुनते थे। प्रवचन में जैन व जैनेतर जनता काफी संख्या में आती थी। प्रवचन ओसवाल पंचायती नोहरे में होते थे। जोधपुर से विहार कर श्री पुष्कर मुनिजी के साथ आप पुनः दुन्दाड़ा पधारे। वहाँ पर शार्दूलसिंहजी म.भी ठा.४ से पधारे। पण्डित रूपचन्दजी बीमार हो गए। चातुर्मास का समय निकट ही था। श्रीसंघ समदड़ी की आग्रह भरी विनती को स्वीकार कर वि. स. १९९८ के चातुर्मास की स्वीकृति प्रदान की गई। . EAM AN Hosts श्रद्धालोक के देवता 11 म. 10 व्यक्तित्व बहुआयामी Amaniamine AWN ww आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म 'शास्त्री' का व्यक्तित्व अन्तर व बाह्य दोनों ही रूपो मे भव्य मनोहर और अनूठा प्रभावक है। गौरवर्ण सुगठित भव्य सुदर्शन देह पर श्वेत परिधान मे वे जितने प्रभावशाली और भव्य दिखते है, वह भव्यता और अधिक गहरी हो जाती है, जब दर्शक उनकी प्रसन्न मुख मुद्रा व निश्चल आत्मीयता का नजदीक से अवलोकन करता है। साथ ही शिष्ट जनोचित शालीन व्यवहार, सधी हुई विनम्र किन्तु शालीन भाषा, सहज मैत्री-भाव और गम्भीर ज्ञान ऊर्जा का लाभ प्राप्त करे तो कोई भी मनीषी प्रभावित हुए बिना नही रहता। आपकी गहन विद्याभिलाषा, सतत अध्ययनशीलता और निरन्तर ज्ञान गगा मे डूबकियाँ लगाते देखकर मन 'ज्ञान योगी' के रूप मे आपकी वदना करना चाहता है। तो आपकी सहज-सरलता, विनम्रता, साधु-जनोचित आचार-निष्ठा और सयम- साधना मे निरन्तर जागरूकता निहारकर आपका 'कर्मयोगी' रूप मन के चित्र पट पर अंकित हो जाता है। ज्ञान एवं कर्मयोग के साथ ही आप भक्ति योग मे भी पीछे नही है। जीवन की सरसता और संवेदनशीलता का स्त्रोत तो भक्तियोग के शिखरो से ही प्रस्फुटित होता है। वस्तुत. श्री देवेन्द्र मुनिजी जैसे - स्नेहशील, गुणज्ञ, मधुरभाषी और सबके साथ दूध-मिश्री की तरह घुल-मिलकर रहने वाले सन्त का जीवन ज्ञान-कर्म-भक्ति-प्रतिभा, परिश्रम एव प्रेम का एक अक्षय निर्झर है। जिसके सान्निध्य मे प्रसन्नता भी मिलती है, साथ ही विचारो की ताजगी और भावना की पवित्रता भी प्राप्त होती है। जैन तत्व विद्या के विविध क्षेत्रो मे आपकी गहरी पैठ है, विचारो की पकड और प्रत्येक विषय पर आधिकारिक रूप से लिख सकते हैं, लिखते हैं। चाहे इतिहास हो या आचार एवं संस्कृति हो, चाहे चितन हो या आगम हो। आपकी लेखनी का क्षेत्र बहुत व्यापक है, आपके चितन का क्षेत्र और भी विशाल है। ध ३५ श्रद्धालोक के देवता अध्ययन जैन, बौद्ध एवं वैदिक धर्मग्रन्थों का अध्ययन आपके द्वारा किया गया है। इनके अतिरिक्त आपने विभिन्न विषयों के हजारों साहित्यिक ग्रन्थों का भी गहराई से अध्ययन किया आचार्य प्रवर स्व. महामहिम आचार्य सम्राट है। भारतीय एवं पश्चात्य दर्शनो श्री आनंद ऋषिजी म. से अध्ययन करते हुए का गहन अध्ययन करने के साथ ही आपने उनका अध्ययन तुलनात्मक दृष्टि से भी किया है। भाषा-ज्ञान आपने अल्पवय में संयम व्रत अंगीकार कर लिया था। इसलिए आपने कही पर भी किसी भी विद्यालय में विधिवत पारम्परिक अध्ययन नहीं किया है। आपने जो कुछ भी विद्यार्जन किया, वह अपने गुरु भगवंतों के चरणों में बैठकर उनके आशीर्वाद से ही किया है। भाषा ज्ञान की दृष्टि से आप संस्कृत, प्राकृत, पाली, हिन्दी, गुजराती और मराठी में निष्णात हैं। इस भाषाओं का ज्ञान आपने अपनी लगन, निष्ठा और जिज्ञासा से प्राप्त किया। इन भाषाओं पर आपको पूर्णाधिकार है। आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी शास्त्री का सर्वागीण जीवन विविध विशिष्ट अनुभूतियों का पुंज है। आपका जीवन मेवाड़ की कठोरतम धरा पर कल्पतरा के समान विकसित हुआ, आप विद्यालय के छात्र नहीं बने, विद्या ने स्वयं आपका वरण किया। आप लेखन कला के ग्राहक नहीं बने, लेखन कला ने स्वयं आपके चरण चूमे। आप कल्पना के पीछे नहीं दौडे, कल्पना ने स्वयं आपका अनुगमन किया। आप मान-सम्मान, पूजा, अर्चना के इच्छुक नहीं थे, परन्तु समाज ने आपको कर्णधार चुना। कुशल लेखक एवं सफल सम्पादक आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी शास्त्री एक कुशल लेखक हैं। आपने अभी तक उच्चकोटि के इतिहास विषयक, ग्रन्थों का सृजन कर जैन इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों को उजागर किया है। इसी प्रकार धर्म और दर्शन विषयों पर लिखित आये ३ श्रद्धालोक के देवता ग्रन्थ भी उच्चकोटि के है तथा विश्व विद्यालयीन छात्रो के अध्ययन के लिए अत्यन्त उपयोगी है। उपन्यास एव कथा साहित्य पर भी आपने काफी लिखा है। पौराणिक कथाओ पर आधृत आपके उपन्यासो में आपकी लेखन शैली की मौलिकता स्पष्ट दिखाई देती है। इसी प्रकार लघु कथाएँ, बोध कथाएँ और महापुरुषो के जीवन के प्रेरक प्रसगों को भी आपने प्रस्तुत किया है, ताकि सुधीजन उनसे प्रेरणा प्राप्त कर अपने आचरण मे उतार सके। आपके निबध संग्रह भी अपने आप मे एक ग्रन्थ है। ये निबध भी शोधार्थियो के लिए सहायक सिद्ध हो सकते है। आपका चितन साहित्य मौलिक है। अपने सुदीर्घ सयमी जीवन मे आपने जो देखा, अनुभव किया और अध्ययन किया, उसके पश्चात् आपके मानस मे जो विचार उद्भुत हुए, उनको आपने चितन कणो के रूप में प्रस्तुत किया है। आपके लेखन मे शोध की दृष्टि और इतिहास की पकड है। आपके एक-एक शोध प्रबध को देखा जाये, तो वे आधुनिक शोध प्रबधों से कही श्रेष्ठ है और विश्वविद्यालय की उच्चतम उपाधि के लिए सर्वथा उपयुक्त है। आप एक कुशल सम्पादक भी है। अभी तक आपने अनेक अभिनन्दन/स्मृति ग्रन्थो, अन्य ग्रन्थो और कथा साहित्य, निबध साहित्य का सम्पादन कर अपनी सम्पादन-कला का परिचय दिया है। आपके द्वारा लिखित एव सम्पादित ग्रन्थो का विवरण यथा स्थान दिया गया है। सम्पर्क आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म. शास्त्री का सम्पर्क क्षेत्र अति विस्तृत है। यह सम्पर्क उनकी लोकप्रियता के साथ ही उनकी मिलनसारिता के गुण को भी प्रकट करता है और उनके सम्पर्क में आने वाले विभिन्न क्षेत्रो के व्यक्तियो की सूची अति विस्तृत है। फिर भी क्षेत्रानुसार कुछ उल्लेखनीय नामावली इस प्रकार है। स्थानकवासी जैन समाज के सन्तो के अतिरिक्त मूर्तिपूजक जैन मतावलम्बी मुनिराज, दिगम्बर जैन मत के मुनिराज तथा जैनेतर धर्मो के सन्तो से भी आपके आत्मीय सम्बन्ध / सम्पर्क है। ऐसे कुछ सन्त-मुनिराजो की नामावली इस प्रकार है- श्वेताम्बर मू.पू.- आगम प्रभाकर श्री पुण्यविजय जी म , पू.श्री अभयसागर जी म. , आचार्य श्री यशोदेव सूरी, श्री प्रतापसूरी, आ श्री रामचन्द्रसूरी, आr" श्रद्धालोक के देवता श्री चन्द्रशेखर सूरी, श्री चन्द्रप्रभसागरजी, आचार्य कांतिसागरजी, साहित्यकार श्री कांतिसागरजी, आचार्य श्री तुलसीजी, युवाचार्य महाप्रज्ञ, डॉ. नगराज, पं.रूपचन्दजी, आचार्य श्री पद्मसागर सूरीजी। दिगम्बर मतावलम्बी - दिगम्बराचार्य चारित्र-चूड़ामणि श्री शांतिसागरजी म , आचार्य श्री देशभूषणजी और आचार्य श्री विद्यानन्दजी म. आदि। जैनेतर सन्त - श्री शंकराचार्य द्वारिका पीठ, कॉची कामकोटि के शंकराचार्य, राधास्वामी सम्प्रदाय के आचार्य, सारसापुरी के मठाधीश, ज्ञान सम्प्रदाय के मठाधीश, विश्व हिन्दू परिषद के सन्तगण एवं जगदाचार्य चन्द्रास्वामीजी। विद्वान - आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी शास्त्री स्वयं एक लब्ध प्रतिष्ठित, सुविख्यात विद्वान मुनिराज हैं। इस दृष्टि से देश के विद्वानों से आपका सम्पर्क लेखन | सम्पादन के माध्यम से हुआ है। इनमें से अधिकांश विद्वान आपकी सेवा में आते रहते है तथा विषयानुकूल विचार विमर्श आदि करते रहते हैं। ऐसे विद्वानो की नामावली इस प्रकार है। इन विद्वानों में से कुछ विद्वान अब इस संसार में नही है। पं.सुखलाल संघवी, श्री जैनन्द्रकुमार जैन, पं.शोभाचन्द्र भारिल्ल, पुरातत्त्ववेत्ता जिनविजयजी, डॉ.ए.एन.उपाध्ये, श्री अगरचन्द नाहटा, पं.बेचरदासजी, डॉ. डी. एस. मालवणिया, डॉ.ए. डी, बत्रा, डॉ. बारलिंगे, डॉ. डी. एस. कोठारी, डॉ. प्रेम सुमन जैन, डॉ.उदय जैन, डॉ. नेमीचन्द जैन, डॉ. सागरमरल जैन, डॉ. आनन्द प्रकाश दीक्षित, डॉ. गोकुलचन्द जैन, डॉ. भागचन्द भास्कर, डॉ. नरेन्द्र भानावत, डॉ. श्रीमती शाता भानावत, डॉ. कस्तूरचन्द्र जैन, डॉ. संगमलाल पांडेय, महामहोपाध्याय डॉ. ब्रह्ममित्र अवस्थी, डॉ. महेन्द्र सागर प्रचंडिया, डॉ. आदित्य प्रचंडिया, डॉ. सुषमा सिंघवी डॉ. दामोदर शास्त्री, डॉ. रुद्रदेव त्रिपाठी, डॉ. छगनलाल शास्त्री, डॉ. तेजसिंह गौड़, पं. बसन्ती लाल नलवाया, डॉ. निजामुद्दीन, डॉ. टी. जी. कलघटी, श्री वशिष्ट नारायण सिंह, डॉ. नथमल टांटिया आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। समाज सेवी - श्री देवेन्द्र मुनिजी म.शास्त्री स्वयं समाज के कर्णधार हैं और समाज-सुधार में भी आपकी विशेष रुचि है। इस दृष्टि से समाज सेवियों से आपका सम्पर्क होना स्वाभाविक है। ऐसे समाज सेवियों में उल्लेखनीय नाम हैं - गुराजी श्री गोलवलकर, श्री ऋषभदास रांका, श्री सिद्धराज ढहा, श्री रविशंकर महाराज, कमला माताजी, बाला साहब देवरस, श्री जयप्रकाश नारायण, श्री विनोबा भावे के अनुज, श्री मानव मुनि, श्री अशोक सिंघल आदि। इनमे से विद्यमान समाज रोधी अभी भी आपकी सेवा में आते रहते हैं और समाज सुधार / समाजोत्पान में म । -- Sriver was श्रद्धालोक के देवता सम्बन्ध मे विचार-विमर्श करते रहते है। ऐसे समाज सेवियो मे जैन मतावलम्बियो की संख्या भी काफी है। पं गांधी, राजनेता आपके सम्पर्क मे अनेक प्रमुख राजनेता भी आए है। समय-समय पर ये लोग आपकी सेवा मे उपस्थित हुए है। इनमे से कुछ दिवगत है, तो कुछ वर्तमान मे विद्यमान है डॉ. राजेन्द्रप्रसाद, जवाहरलाल नेहरु, जगजीवनराम, श्रीमती इन्दिरा मोरारजी देसाई, पुरुषोत्तमदास टंडन, डॉ के एल श्री माली, ज्ञानी जैल सिह, एच के.एल भगत, जगदीश टाइटलर, भेरूसिंह शेखावत, सुन्दर लालजी पटवा, डॉ. शकरदयाल शर्मा, मोहनलाल सुखाडिया, अरुण कुमारजी सुखाडिया, आचार्य प्रवर और उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. राजमाता विजयाराजे सिधिया, से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए। भारत के पूर्व गुलाबसिह शक्तावत, अमरसिह राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैलसिंहजी, उपाध्यायश्री और चौधरी, लालकृष्ण आडवाणी, आचार्य श्री से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए अशोकजी सिघल, गुलाबचन्द कटारिया तथा कुछ दक्षिण भारतीय नेता व कई मन्त्री, सांसद एवं विधायक भी आपके सम्पर्क मे रहे। आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म.शास्त्री के सम्पर्क मे देश के पूर्व राजा-महाराजा तथा अनेक जागीरदार जमीदार आते रहते हैं। इनमे उल्लेखनीय नाम है - जोधपुर के नरेश श्री गजसिंह, उदयपुर के महाराणा भगवतीसिंह तथा महाराणा महेन्द्रसिंह कुंवर चक्रवर्तीसिंह ये अपनी ज्ञान-पिपासा शान्त करने के लिए आपकी सेवा मे उपस्थित होते रहते थे। rom श्रद्धालोक के देवता , - विहार क्षेत्र आपका विहार क्षेत्र अति विस्तृत रहा। अपने पचपन वर्षों के संयमी जीवन काल में अभी तक जिन प्रान्तो में विचरण कर धर्म प्रचार किया, समाज सुधार के लिए जनता को प्रेरित किया। उन प्रान्तो की नामावली इस प्रकार है राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश आदि मुख्य है। यहाँ यह संकेत करना प्रासंगिक ही होगा कि आप जहाँ कहीं भी पधारे, अपनी अमिट छाप छोड़कर ही आपने आगे विहार किया। आपने लगभग ७० हजार किलोमीटर की पदयात्रा सम्पन्न कर लाखो व्यक्तियों में सुसंस्कार डाले हैं। आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म. शास्त्री निरन्तर धर्मसेवा एवं श्रुत सेवा के कार्य में संलग्न थे। अपना एक पल भी वे व्यर्थ नहीं जाने देते थे। उनकी सेवा में दर्शनार्थियो की भी भीड़ लगी रहती थे। तत्व जिज्ञासु विद्वत्जन भी समय-समय पर बराबर आते रहते थे तथा व्यस्तता के बावजूद उनका अध्ययन एवं लेखन गतिशील थे। अपने लेखन के माध्यम से आपने बहुत कुछ दिया। समाज सुधार के क्षेत्र में भी आप सदैव तत्पर रहते और लोगों को इस दिशा में सतत प्रेरित करते रहते। व्यसन मुक्ति अभियान द्वारा आपने हजारों परिवारो को व्यसन से मुक्ति दिलवाई। आपकी व्यक्तित्व रुचि स्वाध्याय, जप एवं साहित्य सृजन में है। इस रचि के परिणामस्वरूप ही आप साहित्य रूपी समुद्र का मंथन कर नित-नूतन नवनीत समाज को दे रहे। नियमित दिनचर्या आपश्री का जीवन सिद्धान्त था कम वोलना और कार्य अधिक करना। आपश्री का मन्तव्य था मानव जीवन का भव्य प्रसाद विचार के विशात खम्भों पर निर्मित होता है। आपश्री को स्वाध्याय, ध्यान, जप, चिन्तन, मनन, अध्यापन, व्याख्यान, आगन्तुको से वार्तालाप, उनकी शंकाओ का निरसन करना पसन्द था। अधिक औषधि सेवन को आप उचित नहीं मानते। यथासम्भव आप ऑपाधि नही रोने और भोजन मे कम खाना और कम पदार्थ लेना आपको पसन्द था। आपका मानन धा ति भोजन की मात्रा जितनी कम होगी, उतनी ही साधना में स्पति रहेगी। अधिक सोने से आलस्य और प्रमाद की अधिकता होगी। साधारणतः आप रात्रि में दोनो - Amritwan note श्रद्धालोक के देवता उठते है। सबसे पहला कार्य ध्यान और जप की साधना करना। उसके पश्चात् आपश्री आत्मालोचन करते। जिसे जैन परिभाषा मे "प्रतिक्रमण" कहते है। उसके बाद स्वाध्याय करते, फिर प्रवचन करते। प्रवचन के बाद एक घण्टे जप व ध्यान करते और फिर आहार ग्रहण करते। आहार मे दो बात का विशेष लक्ष्य रखते, सख्या और मात्रा मे कम वस्तुएँ लेने का। आहार के बाद कुछ समय हल्का-सा विश्राम करते समय ऐसे साहित्य का अवलोकन करते है, जो विश्राम मे भार स्वरूप न हो। उसके बाद साहित्य का लेखन और अध्ययन और आगन्तुकों से विचार चर्चा। सांयकाल सूर्यास्त के पश्चात् पुनः प्रतिक्रमण व ज्ञान चर्चा के बाद जप कर शयन करते हैं। पत्रकारों के बीच : आचार्य श्री श्रमण सघ के आचार्य पद से विभूषित होने के पश्चात् अनेक स्थानो पर आपसे पत्रकारो ने विभिन्न प्रकार की चर्चाएं कीं। उन समस्त चर्चाओ का विवरण देकर तो हम यहाँ विस्तार करना नहीं चाहते, किन्तु कुछ उदाहरण प्रस्तुत अवश्य करना चाहते है। जिससे आपके विभिन्न विषयक विचार स्पष्ट होते है। यथा उज्जैन दिनांक १७-१२-८८ को आपने ऐतिहासिक एव धार्मिक नगरी उज्जयिनी में प्रवेश किया, यहाँ आपका भव्य स्वागत हुआ। उज्जैन की पत्रकारो ने आपसे विभिन्न विषयो से सम्बन्धित प्रश्न किए। उन प्रश्नो के उत्तर मे आपने जो भी फरमाया, वह इस प्रकार है "आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म ने पत्रकारो के विभिन्न प्रश्नो का उत्तर देते हुए कहा कि पजाब मे आतकवाद की जो समस्या है, उसे स्नेह एव सद्भावना से ही सुलझाया जा सकता है। वहाँ न राजनीति है, न धर्मनीति, बल्कि वहाँ तो बाजनीति चल रही है। वहाँ के हालात जब तक स्वार्थी तत्व न समझे, तब तक नही बदल सकते। किन्तु साथ ही यह भी विचारणीय है कि अत्याचार को सहन करना अहिंसा नहीं है। आपने इस दिशा में सन्तो के सामूहिक प्रयास के अच्छे परिणाम आ सकने पर अपनी सहमति भी दी। आपने राष्ट्र निर्माण मे जैन सन्तो एव जैन समुदाय के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि जैन धर्म मे धर्मों के जो प्रकार बताये गये है, उसमे राष्ट्र धर्म को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। उनकी आचार सहिता मे भी यह नियम है कि राष्ट्र की अनुमति के बिना कोई कार्य न करे। आचार्य हेमचन्द्र, जगडू शाह, खेमादेदराणी आ श्रद्धालोक के देवता उल्लेख करते हुए आपने कहा कि इन्होंने अपने-अपने समय में साहित्य समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया एवं प्राकृतिक विपत्तियों के समय में मदद की। स्वतन्त्रता मे भी महात्मा गांधी के साथ जैन मतावलम्बियों ने तन, मन, धन से सहयोग किया। सनातन और जैन धर्म में अन्तर के प्रश्न पर आपने कहा कि दोनों भारत की दो संस्कृतियाँ है, एक ब्राह्मण और दूसरी श्रमण। सनातन धर्म में जहाँ जाति व वर्णाश्रम व्यवस्था थी। वहीं जैन धर्म मं वर्ण की उत्पत्ति कर्म पर आधारित है, तो जैन धर्म उत्तरवाद पर। भगवान महावीर ने दोनों धर्मों के बीच तुलना की एवं तुलना ही जैन धर्म का मूल सिद्धान्त है। आपने कहा कि उपनिषद् की रचना भगवान पार्श्वनाथ के जन्म के काल की है एवं उपनिषद् में जो चर्चा है, वह जैन धर्म परिभाषित किन्तु दोनों धर्मों में कभी मन भेद नहीं था। पत्रकारों द्वारा वर्तमान समय में समाज में व्याप्त विभिन्न बुराइयों, दहेज प्रथा तथा बाल दीक्षा के सन्दर्भ में आपके विचार जानना चाहे। आपने इस पर कहा कि टी. वी. व अन्य संचार माध्यमो पर नारियों के अर्धनग्न प्रदर्शन, संस्कृति पर प्रहार करने वाले घृणित विज्ञापन, अण्डों का प्रचार, सिनेमा आदि के माध्यम से जो कुछ बताया जा रहा है, वह हमें विनाश के कगार पर ले जा रहा है। इसे रोकने हेतु शिक्षा के जो स्थान व साधन हैं, उन पर ऐसी व्यवस्था की जाना चाहिए, जिससे सत्संस्कार जागृत हों। वाल दीक्षा के प्रश्न पर आपने कहा कि जितने भी महान सन्त हुए हैं, उनमें से अधिकांश वाल दीक्षित ही थे। आप स्वयं भी वाल-दीक्षित ही थे। आपका मत है कि वैराग्य की अनुभूति का उम्र से कोई ताल्लुक नहीं है। उन सन्त के लिए जिसने कि कुछ वर्षों तक जीवन का हर रंग, सुख देखा-भोगा हो, अध्यात्म की ओर बढ़ना ज्यादा मुश्किल होता है, क्योंकि पुरानी स्मृतियॉ रह-रहकर उसके सामने आकर विचलित कर सकती है, जबकि वाल सन्त के साथ ऐसा नहीं होता। आपने कहा कि दीक्षा पूर्व हम पात्र है या नहीं, इस बात का परीक्षण अवश्य कर लेते हैं। इसी सन्दा मे आपने अपनी परम्परा के श्री जीतमलजी म. सा. की अद्भुत कलाकृतियाँ बताते हुए कहा कि वे भी बाल दीक्षित ही थे। आपने कहा कि यदि साधु परम्परा में कुछ सार स्खलित हो जाते हैं, तो उसके लिए पूरे साधु समाज को दोपी नहीं कहा जा सकता। आपने इस बात को गौण किया कि जैन समाज में दहेज प्रथा के कारण कई लवियाँ साध्वी बन जाती हैं। आपने कहा कि दहेज एक सामाजिक बुराई की तरह व्याप्त है, न कि किसी धर्म विशेष में। उससे मुक्ति हेतु जोरदार प्रयाग होना चाहिया नागदा Kok श्रद्धालोक के देवता मालवा क्षेत्र मे आपने जहाँ भी प्रवचन फरमाये इस अचल के दैनिक समाचार पत्रो ने आपके प्रवचनांश को प्रमुख स्थान देकर प्रकाशित किया। उज्जैन जिले के औद्योगिक नगर नागदा पधारने पर आपका भव्य स्वागत हुआ और यहाँ के पत्रकारो ने भी आपसे भेट की। इस भेट वार्ता का विवरण इस प्रकार है राष्ट्रीय तथा देश-प्रेम तथा धर्म प्रेम की कमी के कारण हमारे देश मे अनैतिकता बढ़ती जा रही है, इस तरफ प्रभावी प्रयास होना जरूरी है, अन्यथा स्थिति और विकट हो जाएगी। ये विचार प्रसिद्ध विद्वान सन्त देवेन्द्र मुनिजी ने यहाँ पत्रकारों से चर्चा करते हुए रखे। तीन सौ से अधिक पुस्तको के रचयिता सभी धर्मों के समन्वयकारी सन्त आचार्य देवेन्द्र मुनि ने पत्रकार वार्ता मे कहा कि सभी सम्प्रदायो मे समन्वय का जोरदार प्रयास होना चाहिए। आपसी संघर्ष मे समय नष्ट करने के बजाय सभी को एक जुट रहकर प्रयासरत रहना जरूरी है। देश-प्रेम जागृत होने पर ही तरक्की होगी। आपने देश में बढ़ती अनैतिकता के लिए सरकार, अखबार, दूरदर्शन एव बढ़ती हुई भौतिक सुविधाओ की तृष्णा को दोषी बताया। पेट के बजाय पेटी भरने की तृष्णा ही अशान्ति का प्रमुख कारण है। आपने चारित्रिक बल से की गई साधना को अच्छे मार्ग की ओर प्रयत्न बताया। जैन धर्म की चर्चा करते हुए आपने कहा कि जैन धर्म की साधना का किसी जाति विशेष से सम्बन्ध नही है। साधु की आचार सहिता को पालने वाला ही सच्चा साधु है। वाणी मे तब ही बल आयेगा, जब त्याग हो। धर्म निरपेक्ष देश मे आहार सम्बन्धी विज्ञापनो को आपने धर्म मे खुला हस्तक्षेप बताया। ऋषि प्रधान देश को सिनेनायक, नायिका प्रधान बनाने पर चिन्ता प्रकट की। वर्तमान मे जैन धर्म का योगदान विषय पर पत्रकारो से चर्चा करते हुए आपने बताया था कि जैन सन्त जन-जन तक सच्चे धर्म के मार्ग को बताने का मुख्य कार्य करता है। हमने चार सौ ग्रन्थ लिखे है, जिसमे नाटक कहानी, छन्द आदि है, एक सौ ग्यारह छोटी पुस्तिकाएँ लिखी है। आपने बताया कि तीन सौ पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है। यह पूछे जाने पर कि जैन साधु पैदल विहार करते है, क्या कभी वाहनो का भी उपयोग करते है? इस प्रश्न के उत्तर मे आपने कहा कि जैन सन्त बीमार होने पर या किसी मजबूरी वश ही डोली का उपयोग करता है, वरना हमेशा पैदल चलते हैं। जैन साधु अपने पास रुपया / पैसा नही रखता। महिलाओ को छू नही सकते हैं।
श्रद्धालोक के देवता MMS BLAN आपने बताया कि जैन धर्म साधुता में जाति का कोई भेदभाव नहीं रखता। हमारे अनेक सन्त व मुनि दूसरी जाति के हैं | जैसे हमारे गुरुदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी ब्राह्मण हैं। पंजाब समस्या पर पूछे गए प्रश्न पर आपने कहा कि तीन सौ जैन साधु पंजाब में शान्ति कायम करने का प्रयास कर रहे हैं। सिखों का निर्माण ही हिन्दू धर्म की रक्षा करने के लिए हुआ है। एक प्रश्न के उत्तर में आपने कहा कि सरकार गाय, भैंसों पर कभी विज्ञापन नहीं देती, जबकि मछली, मुर्गी, अण्डों के टी.वी. रेडियों आदि पर विज्ञापन देती है। मुर्गी में जो बीमारी होती है, वह अण्डों में आयेगी और जो अण्डा खायेगा तो उससे खाने वाला बीमार होगा। यदि सरकार धर्म निरपेक्ष है, तो धर्म विवाद के झगड़े, साम्प्रदायिक झगड़े क्यों होते है? आपने कहा कि वर्तमान मे तृष्णा बढ़ रही है, पेट तो भरता है पेटी नहीं भर पा रही है, जब ज्यादा तृष्णा बढ़ जाती है तब व्यापारी ठग बन जाता है। जिस प्रकार सोने पर से मेल का आवरण उतार दिया जाता है, तो उसमें चमक आ जाती है। उसी प्रकार व्यक्ति पर माया तथा भोग का आवरण हट जाए, तो उसका असली रूप सामने आ जायेगा। आपने कहा कि राष्ट्रीय सम्पत्ति नष्ट करना यह देश-प्रेम नहीं है। हम पैदल सड़कों पर चलते हैं। म.प्र.की सड़के अत्यन्त खराव है, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र की सड़कें अच्छी है। आपने जापान का उदाहरण देकर कहा कि वहाँ राष्ट्रीय सम्पत्ति का दुरुपयोग नहीं होता। आपका कहना था कि आज का शासन कठपुतली का तमाशा है, बाहर पुरुष अन्दर कुछ है। देश-प्रेम भुलाकर दूसरों के प्रति अविश्वास, सरकारी सम्पत्ति का दुरुपयोग कर हम आपस में लड़ रहे हैं। हमने मिलजुलकर कुछ भी प्राप्त नहीं किया, जिसे प्राप्त करना है। रतलाम रतलाम स्थित नईदुनिया इन्दौर के संवाददाता से चर्चा करते हुए आचार्य देवेन्द्र मुनिजी म ने फरमाया कि आज देश में सबसे बड़ी आवस्यकाता धार्गिमा नैनिता एवं राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की है। इस हेतु वातावरण बनाकर आन्दोलन चलाना अनैतिक धन के कारण ही राष्ट्रीय चरित्र समाप्त हो रहा है। आपने कहा कि आज जिस प्रकार नैतिक शिक्षा का प्रचार होना चानित - Kate श्रद्धालोक के देवता नहीं हो रहा है। रेडियो, दूरदर्शन पर पाश्चात्य संस्कृति एवं भौतिक वैभव का प्रदर्शन हो रहा है। शिक्षा की शुरुआत ही गलत है। आज 'ग' से गधा पढ़ाया जाता है। इच्छाओ का द्रौपदी के चीर की तरह विस्तार हो रहा है। मनुष्य में देश-प्रेम की भावना नही होने से राष्ट्र की सम्पत्ति का अनैतिक उपयोग किया जा रहा है। सारी मानवता मर चुकी है। मनुष्य, मनुष्य का शत्रु हो गया है। अगर स्थूल अहिंसा और अपरिग्रह भी अपना ले, भोग और विलासिता तथा संग्रह की प्रवृत्ति त्याग दे, तो स्थूल नैतिकता और राष्ट्रीय दायित्व पैदा किया जा सकता है। आपने कहा कि आज मनुष्य अपने को अनैतिक धन के कारण तनाव पूर्ण पाता है और तनाव की मुक्ति हेतु वह मादक द्रव्यो का उपभोग करता है। जिससे वह क्षणिक सुख अवश्य प्राप्त करता है, किन्तु अपने जीवन को चिरकाल के लिए वह तनाव पूर्ण बना लेता है। न्याय और नीति सम्पन्न प्राप्त धन से सन्तोष प्राप्त हो सकता है। आपने कहा कि विकृत सम्प्रदायवाद के मुर्दे को दफनाना होगा। किसी भी धर्म मे हिंसा को कोई स्थान नही है। धर्म के नाम पर की जा रही हिंसा और बिखराव समाज, राष्ट्र को तोड़ने के मार्ग है। रतलाम मे ही संवाददाताओं से चर्चा करते हुए आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म ने कहा कि पंजाब समस्या के समाधान के लिए ३०० जैन साधु एव साध्वियाँ पूरे पजाब मे कार्यरत हैं। आपने आगे कहा कि रेगन-गोर्बाच्योव शिखर वार्ता मे अरबो रुपये के घातक हथियार नष्ट हुए। यह जैनधर्म अर्थात् अहिसा की महान विजय है। पजाब की हिंसा को मिटाने मे सबसे बड़ी बाधा भी शस्त्रो और राजनीति की है। हिसक प्रवृत्ति अर्थात् शस्त्रो के खिलाफ अहिसा के प्रचार मे दस देश में इस हजार जैन सन्त एवं साध्वी व्यस्त हैं। मगर कुछ ग्रन्थियो और ग्रन्थ की स्वार्थवृत्ति भी रास्ते मे रोडा बन रही है। आपने बताया कि राष्ट्र के लिए जो सम्पत्ति का उपयोग करेगा, उसको विपत्ति नही घेरेगी। जैन सन्तों के बारे मे ९८ प्रतिशत मत पक्ष मे है। बहुत कम साधु गलत रास्ते लेगे। बाल ब्रह्मचारी ज्यादा अच्छे सन्त साबित होते है। जैन साधु-साध्वियो के सामने भौतिकवादी चमक-दमक के सन्दर्भ मे नौ वर्ष की उम्र मे जैन मुनि बने आचार्य देवेन्द्र मुनिजी म. ने कहा कि जैन साधु कभी अदालत बाजी या कोर्ट की पेढ़ी तो चढ़ता नही। २५०० वर्ष के इतिहास में कुछ गडबडियां तो हुई बाकी हीरे तो हीरे ही हैं, चमक रहे हैं। अहिसा दर्शन धर्म एव महात्मा गांधी जैसी शानदार day४५ စင်စင် श्रद्धालोक के देवता परम्परा को आगे बढ़ाने मे हम तो ईमानदारी से लगे हैं। आप अखबार वाले भी इसमें सहयोग कीजिए। कुछ इसी प्रकार के विचार आपने चौथा संसार समाचार पत्र के संवाददाता द्वारा की गई चर्चा में भी प्रकट किए। दैनिक स्वदेश के प्रतिनिधि से हुई भेंटवार्ता में आपने पंजाब में राजनीति के साथ ही विकृत सम्प्रदायवाद को समस्याओ की जड़ बताया। रतलाम में ही संवाददाताओं से चर्चा करते हुए आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म. ने कहा कि धर्म संघर्ष नहीं करता, स्वार्थवृत्ति संघर्ष कराती है। विकृतवाद आता है और विवाद खडा हो जाता है। जहाँ संवाद होता है, वहाँ विवाद नहीं होता। इसलिए हम संवाद का मार्ग अपनाएँ। आपने आगे बताया कि आज हमारे आध्यात्मिक जीवन कहीं सूखे रेगिस्तान जैसे हो रहे हैं। मरुभूमि की मृगमरीचिका की तरह अध्यात्म का आडम्बर जरूर देखने को मिलेगा, पर सम्पर्क अथवा पास आने पर आध्यात्मिकता नाम की कोई चीज नही मिलेगी। दीक्षा के सम्बन्ध में आपने कहा कि अध्यात्म उत्क्रांति का मार्ग दीक्षा है, दीक्षा लेना बुरा नहीं है। उम्र के लिए बाधक नहीं है। जब तक भाव प्रबल और विचारों में तेज नहीं हो, तब तक साधु नहीं बन सकते। पत्रकारो की चर्चा के विवरण को दैनिक स्वदेश ने कुछ विस्तार से सचिन प्रकाशित किया। स्वदेश का विवरण दृष्टव्य है। देश में नैतिक जीवन मूल्यों का पतन इस कदर हो गया है कि राष्ट्रपति से लगाकर झोपड़ी तक कोई इससे वंचित नही रहे। कईयों मन में यह बात घर कर गई है कि बिना लिए दिए कोई काम नहीं हो सकता। राष्ट्रीय भावना, जनजागरण और धार्मिक आचरण के विना स्थिति में कोई परिवर्तन सम्भव नही है। आपने आगे कहा कि - आज सभी संघर्षों का कारण विकृत वाद-विवाद है। इन संघर्षों से मुक्ति के लिए जरूरी है कि हम संवाद का मार्ग अपनाएँ। विजारोगी भिन्नता होते हुए भी समन्वय के साथ हम एक हो सकते हैं। जबरन केला कुतर्को से ही कुसम्प्रदायवाद की विभीषिका पैदा हुई है। सभी धगों के मारता एक ही है। आराधना, पूजा, साधना की पद्धति अलग होते हुए भी हम वार्षिक की राह पर चले और धर्म के सार तत्वों के अनुकुल जीवन में आचरण पारे, मामा दाम्प्रदाय की विभीषिका से मुक्त हो सकता है। अज गति को, मगरीदिक की तरह 3ाम का असर 1 .
sek श्रद्धालोक के देवता देखने को मिलेगा कई स्थानो पर जाने पर सम्पर्क में आने पर आध्यात्मिकता नाम की कोई चीज नही मिलेगी। यह दुर्भाग्य है कि मनुष्य विचारो को आचार का रूप देने मे कतराता है। आपने 'नारी विज्ञापन का माध्यम' पर चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति मे नारी को देवी के सम्माननीय माना गया है। लेकिन अफसोस है आज नारी विज्ञापन का माध्यम बन गई है। जीवन में तनाव से मुक्ति सम्बन्धी प्रश्न के उत्तर मे आपने कहा कि ध्यान की साधना से तनाव से मुक्ति मिल सकती है। आपने साधु-सन्तो की भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि आज देश में भारी अनैतिकता का वातावरण होते हुए भी विभिन्न धर्मो के लोग मिल-जुलकर रहते है, यह साधु-सन्तो के उपदेशो का ही प्रतिफल है। आपने कहा कि धर्म नहीं रहेगा, तो जीवन की गाडी अनियंत्रित हो जाएगी। दृष्टि अच्छी हो, तभी सृष्टि अच्छी रह सकती है, अन्यथा मानव जीवन रूपी गाडी बिना ब्रेक की गाडी बन जाएगी। उल्लेखनीय बिन्दु यह है कि मालवाचल के दैनिक समाचार पत्रो ने आपके प्रवचनो को भी प्रतिदिन सादर प्रकाशित किया। आप जब तक रतलाम मे विराजमान रहे, तब तक थोडे-थोडे अन्तराल से पत्रकारो ने आपसे बार-बार विभिन्न विषयो पर चर्चाएं कीं और अपने-अपने समाचार-पत्रो मे उस चर्चा का सार सक्षेप प्रकाशित करवाया। इसी अनुक्रम मे रतलाम मे आपकी पत्रकारो से हुई चर्चा का अतिम विवरण इस प्रकार है "शान्ति आत्मा का प्रशस्त स्वभाव है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण है। नई पीढ़ी मे नैतिक धार्मिक चरित्र के निर्माण हेतु प्रयास होना चाहिए। मातृपितृशक्ति मनुष्य की प्रेरणा स्रोत होती है। देश मे धर्म निरपेक्षता के बजाय पाखंड निरपेक्षता होनी चाहिए। धर्म परस्पर जोडता है, जबकि आग्रह हिंसा को जन्म देते हैं। समाज के सभी वर्गों मे अनुशासन होना चाहिए।" उक्त बात विभिन्न प्रश्नो के उत्तर मे अखिल भारतीय श्रमण संघ के आचार्य चितक श्री देवेन्द्र मुनिजी म सा ने एक विशेष भेंट में कही। आपने कहा कि जिस प्रकार पानी का स्वभाव शीतल होता है, किन्तु उष्णता प्राप्त होने पर वह गर्म हो जाता है। ठीक उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव शान्तिमय होता है। किन्तु राग, द्वेष के आ जाने से आत्मा में वेचैनी ! जाती है। भौतिक सुख के उजाले के पीछे काली रजनी लगी रहती है। ही बरालोक के देवता मानव के पास लक्ष्मी होगी तो भी उसे तब तक शान्ति प्राप्त नही होगी, जब तक कि वह अन्तरमुखी नहीं बनता, तृष्णा पर विजय (नियन्त्रण) नहीं पाता। आज की युवा पीढ़ी में नैतिक धार्मिक हास का प्राबल्य है, वे अपने गुरजनों, परिवार के अग्रेजों का सम्मान करना भूल रहे हैं। इसके लिए वर्तमान शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण है। शिक्षा आज ज्ञान दायिनी होने के बजाय नौनिहाल पीढ़ी पर वोझ के समान होकर रह गई है। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में आपने कहा कि धर्म कभी भी तोड़ता नही है, वह हमेशा जोड़ता है। जो तोड़ता है, वह धर्म नहीं हो सकता। इसलिए धर्म निरपेक्षा राष्ट्र के वजाय धर्मपूरक राष्ट्र की सोच होना चाहिए। देश मे सम्प्रदाय निरपेक्षता होनी चाहिए, क्योंकि सम्प्रदायो के कारण ही हिंसा आकार लेती व फलती-फूलती है। धर्म के नाम पर पनपने वाली हिंसा पाखण्ड है। सम्प्रदाय रक्षक साधक शरीर है, किन्तु धर्म आत्मा है। जिस प्रकार आत्मा के विना शरीर निर्जीव है, उसी प्रकार धर्म के बिना सम्प्रदाय महत्वहीन है। आपने कहा - मैं चाहता हूँ कि साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका इन चारो धाराओ का प्रवाह एक साथ हो। भिन्नताएँ और विचित्रताएँ नष्ट हों, एक रूपता आए। धार्मिक अध्ययन को आगे बढ़ाया जाए, इस हेतु नई पीढ़ी को स्वाध्याय, सागायिक, प्रतिक्रमण, आध्यात्मिक चिंतन हेतु प्रेरित किया जाये। छोटे बच्चों को संस्कारी वनाने हेतु पाठशालाएँ प्रारम्भ हों। जैन धर्म संस्कृति, जैन धर्म व जैन दर्शन पर विस्तार से प्रकारा डालते।" आपने कहा कि जैन संस्कृति व दर्शन पर गम्भीर कार्य हो रहा है। संस्कृति गर्ग व दर्शन से परिचित करवाने हेतु तथा वर्तमान सन्दर्भ में इनकी उपयोगिता सरल, सुबोध व्याख्या के लिए साहित्य तैयार किया जा रहा है। यह कार्य mai में पूर्ण हो जाएगा। आपने आगे कहा कि मनुष्य के जीवन के निर्माण में माता का दान महत्वपूर्ण होता है। मातृ शक्ति ही मनुष्य जीवन का प्रेरणा सोत होती है अन्य प्रश्न के उत्तर में आपने कहा कि दूसरों के सागर की गई सावन महत्व नही, वह प्राथमिक होती है। स्वयं के द्वारा की गई साचना की पत्त मनुष्य को प्राप्त होता है और वही उसका सध्या मार्गदर्श भी ना इसी बात को दैनिक नामनिया, इन्दौर ने भी १ । . + k १ ब . ANA ... Koss श्रद्धालोक के देवता M . tek :... 4 ht श्रमण सध मण Finni UN Ammmmmmitkar with... भारतीय संस्कृति का जब हम गहराई से अनुशीलन करते है, तो वह दो धाराओ मे विभक्त दिखता है, एक धारा ब्राह्मण संस्कृति है, तो दूसरी धारा श्रमण सस्कृति है। ब्राह्मण संस्कृति मे सन्यासी एकाकी साधना के पक्षधर रहे। उन्होने वैयक्तिक साधना को अधिक महत्व दिया। एकान्त शान्त वनो मे वे आश्रम मे रहते थे। उन आश्रमो मे अनेक ऋषिगण भी रहते थे, पर सभी की वैयक्तिक साधना ही चलती थी। जैन धर्म ने अनेकान्त दृष्टि से इस सम्बन्ध मे चिन्तन प्रस्तुत किया। जो जिनकल्पी श्रमण थे, उग्र तपस्वी थे, मौन रहकर प्राय जगलो मे वृक्षो के नीचे खडे होकर साधना करते थे। अधिक से अधिक जिन-कल्पी एक स्थान पर एकत्रित हो जाते तो सात से अधिक नही होते, पर सातो ही विभिन्न दिशाओ में मुख रहते थे। परस्पर वार्तालाप भी नहीं करते थे। उनकी साधना का समाज के साथ कोई सम्बन्ध नही था। स्थविरकल्पी श्रमणो के लिए संघीय साधना को अत्यधिक महत्व दिया गया। जो साधक सघ से बहिष्कृत रहा, उसे जैन धर्म मे न आदर प्राप्त हुआ और न प्रतिष्ठा ही प्राप्त हुई। देववाचक एक महामनीषी आचार्य श्री थे। उन्होंने नन्दीसूत्र जैसी मननीय कृति की रचना की, प्रस्तुत सूत्र मे श्रमण भगवान महावीर के पश्चात् उन्होने विस्तार के साथ सघ की स्तुति की है। संघ को नगर, चक्र, रथ, पद्म, चन्द्र, सूर्य, समुद्र, महामदर प्रभृति विभिन्न उपमाओ से सम्बोधित किया है। उसमे यह भी कहा गया है। जैसे - परकोटे से सुरक्षित नगर, निवासियो को सुरक्षा प्रदान करता है, वैसे सघ रूपी नगर अपने साधको को चारित्रिक स्खलनाओ से सुरक्षित रखता है। जैसे चक्र शत्रु का छेदन करता है, वैसे ही सघ चक्र साधना मे जो पाखड बाधक है, उन दुर्गुणो का उच्छेदन करता है और साधक के जीवन . ४९ मलालोक के देवता है। में सद्गुणों का सौन्दर्य लहलहाने लगता है। संघ रूपी रथ है. इस पर शील रू पताकाएँ फहरा रही है, जिसमें संयम और तप के अश्व लगे हुए हैं, स्वाध्याय का मधुर आघोष जन-जीवन को आहल्हादित कर रहा है, ऐसा संच रूपी रथ कल्याण प्रद है। पद्म कमल सदा अलिप्त रहता है। जल में रहने पर भी जल पदम निर्लिप्त रहता है, वैसे ही संघ रूपी पद्म विषय वासना से अलिप्त रहता है। यह संघ सा साधको को दुर्गुणों की धूप से बचाता है। संघ पद्म के समान सौम्य है, शांति प्रदाता है, तो सूर्य के समान पाप ताप को नष्ट करने वाला भी है। इस तरह विस्तार से संघ की महिमा और गरिमा का उत्कीर्तन हुआ भगवती आराधना मे आचार्य ने संघ की परिभाषा करते हुए लिखा है - जो गुणों का समूह है, वह संघ है। कर्मों के विमोचक को संघ कहा गया है। राग्यम् दर्शन, सम्यग् ज्ञान और सम्यग् चारित्र में जो संघात को प्राप्त है, उसे संघ करते हैं। स्वार्थसिद्धि में और तत्वार्थ राज वार्तिक में संघ की परिभाषा इस प्रकार है "सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान और सम्यग् चारित्र से युक्त श्रमणों समुदाय, संघ की अभिधा से अभिहित है। भगवती आराधना की विजोदया टीका में संघ को प्रवचन शब्द से सम्बोधित किया है, जिसमें रत्नत्रय का प्रवचन उपदेश दिया जाता है, श्रमण, प्रमाणी, श्रावक, श्राविका के समूह का नाम संघ है। ये श्रमण संघ के चार अंग हैं। इन ही चतुर्विध संघ की संज्ञा प्रदान की गई। जो तप मे श्रम करते हैं, वे अगण। ऐसे श्रमणो के समुदाय को श्रमण संघ के रूप में जनमानस जानता है, पहचानता है। इस प्रकार का श्रमण संघ गुणों का प्राधान्य है, समस्त प्राणियों के लिए गुरा प्रदान करने वाला है। निकट भव्य जीवों के लिए आधार रूप और माता-पिता के समान छत्र प्रदान करने वाला है। यह सत्य है कि संघ शब्द अपने आप में एकता, सुव्यवस्था, सुसंगटन और शक्ति का प्रतीक है। एकाकी जीवन में अंकुश नहीं रहा. इसलिए म खन्ना व अनाचार की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, जो साधक अपने जीवन को भार आलोक से चमकाना चाहते हैं। विचारों के विमल प्रकाश में पना जीवन करना चाहते हैं, उन साधकों की साधना संघ में कुपरनिनि हो सकती है, वही कारण किसानों के लिय नि:: . * 4 mammunday श्रद्धालोक के देवता गया है। आचार्य संघदासगणि ने वृहत्कल्प मे सघ स्थित श्रमण को ही ज्ञान का अधिकारी बताया है, वही श्रमण दर्शन और चारित्र में विशेष रूप से अवस्थित हो सकता है, श्रमण जीवन का सार उपशम है। यदि श्रमण जीवन मे कषायो की प्रधान्यता रही, तो साधक के व्रत और नियम नही रह पायेगे। उन महान् आचार्यो ने साधको को यह पवित्र प्रेरणा प्रदान की कि सघ मे रहकर ज्ञान, ध्यान, और साधना के द्वारा आत्म-कल्याण के महापथ पर अग्रसर होना चाहिए। श्रमण भगवान महावीर के पश्चात् दुष्काल की काली छाया एकबार नही, किन्तु तीन बार मंडराई। बारह-बारह वर्ष के तीन बार दुष्काल पडे, जिसने सघ को विभिन्न भागो मे विभक्त कर दिया। जो सघ आचार की दृष्टि से उत्कृष्ट था, परिस्थिति के कारण उसमे धीरे-धीरे शिथिलाचार ने प्रेवश किया। चैत्यवास उस शिथिलाचार का ही रूप था। आचार्य हरिभद्र ने "सम्बोधन प्रकरण ग्रन्थ" मे विस्तार से उल्लेख किया है। समय-समय पर आचार शैथिल्य को नष्ट करने के लिए क्रियोद्धार हुए है, उन क्रियोद्धार से ही स्थानकवासी संघ का जन्म हुआ, जिसने विशुद्ध आचार और विचार को महत्व दिया। स्थानकवासी समुदाय के मुख्य पॉच क्रियोद्धारक हुए आचार्य श्री जीवराजजी म , आचार्य लवजी ऋषिजी म , आचार्यश्री धर्मसिहजी म , आचार्य श्री धर्मदासजी म और हरजी ऋषिजी म और उसके पश्चात् स्थानकवासी समाज २२ सम्प्रदायो मे विभक्त हो गया और वह विभाग धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते ३३ सम्प्रदायो मे पहुंच गया। तब समाज के मूर्धन्य महामनीषियो के अन्तर मानस मे यह विचार समुत्पन्न हुए कि इस प्रकार ये विभिन्न धाराएँ सघ समुत्कर्ष हेतु हितावह नही है। उसी भावना के फलस्वरूप श्रावको का एक सगठन सन् १९०६ हुआ और उस श्रावक संगठन स्थानकवासी जैन काफ्रेस ने समाज का नेतृत्व करने का बीडा अपने हाथ मे लिया। वे जानते थे कि जैन सघ का मूल आधार श्रमण समुदाय है। जब तक श्रमण समुदाय मे एकता नही होगी, तब तक स्थानकवासी जैन समाज का विकास नही होगा और उन कर्मठ कार्यकर्ताओ के प्रबल प्रयास से अजमेर मे सन् १९३२ मे वृहत् साधु सम्मेलन हुआ और उस सम्मेलन के पूर्व प्रान्तीय सम्मेलन भी हुए। अजमेर सम्मेलन मे अनेक विभिन्न प्रश्नो पर चिन्तन हुआ। संवत्सरी जैसे उलझे हुए प्रश्न का वहाँ समाधान करने का है मे ५१ बरालोक के देवता प्रयास किया गया। जो एकता का स्वप्न सभी ने सँजोया था वह भले ही अजमेर में साकार रूप न ले सका हो, पर नींव के पत्थर के रूप मे जो कार्य हुआ. वर बहुत ही प्रशंसनीय रहा। उसके पश्चात् सन् १९५२ में सादड़ी में वृहत् साधु सम्मेलन हुआ। यह सम्मेलन अपनी शानी का निराला था। २२ सम्प्रदाय के सन्त और आचार्य वहाँ पर पधारे, उन्होंने अपनी सम्प्रदायों की पदवियो का त्याग कर श्रमण संघ का निर्माण किया। जैन इतिहास मे दो हजार वर्ष के पश्चात् ऐसी अद्भुत धर्म क्रांति हुई. जिसकी मुक्तकण्ठ से सभी ने प्रशंसा की। इस सम्मेलन मे सर्वानुमति से अमणरांध का प्रथम आचार्यश्री आत्मारामजी म. को बनाया। उपाचार्य श्री गणेशीलाल जी ग व १६ मंत्री मुनि बनाए और प्रधानमन्त्री श्री आनन्द ऋषिजी म. चुने गए। साड़ी सम्मेलन के पश्चात् सन् १९५३ मे सोजत में मंत्रीमण्डल की बैठक हुई। सचित्त और अचित्त के प्रश्नों को लेकर गहराई से चिन्तन हुआ। संघीय एकता की वृद्धि, से और गुरु गम्भीर प्रश्नों पर चिन्तन करने हेतु सन् १९५३ का एक संयुक्त चातुर्मास छः बड़े महासन्तों का जोधपुर मे हुआ और चार महीनो तक संघ समुत्कर्ष के अनेक प्रश्नों को लेकर चिन्तन चलता रहा। सन् १९५६ में भीनासर मे वृहत् साधु सम्मेलन हुआ और उस सम्मेलन में उपाध्याय आदि पदो का निर्णय हुआ। ध्वनि विस्तारक यंत्र के पयोग के रामना चिन्तन हुआ और अपवाद मे प्रयोग करने पर प्रायश्चित के राम्सना में भी निर्गमा लिया गया। सन् १९६३ मे श्रमण संघ के प्रधानाचार्य श्री आत्मारामजी म. स्वर्गवास के पश्चात् श्रमणसंघ के द्वितीय पट्टधर आचार्य नमार श्री आनन्द जी म.चुने गए और उनका चद्दर समारोह सन् १९६५ में अजमेर में आ जसमा श्रमण संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी मुनि प्रबरो का सियर मागान : आयोजन हुआ। इस सम्मेलन मे जो श्रमण संघ के मंत्री थे, उन टाकर प्रवर्तक पद की घोषणा हुई। सन् १९७२ में जानकी आचार्य सम्राट श्री आनन्द प्राषिजी म के नेतृत्व में गाराम ! में पूना में अखिल भारतीय स्थानकवासी लोन सोनार पाँच मई से १२ मई तक चला, जिला माथि ने भा, शि: रामावारी के सम्बन्ध में पुन उन ममा निन्ननnिema + " , - ५ * + . १ ६ 9. . भ Ramne Hotsko श्रद्धालोक के देवता की संख्या मे श्रावक श्राविकाएँ उपस्थित थी, महाराष्ट्र के राज्यपाल डॉ शकरदयालजी शर्मा ने भी भाग लिया और जगद् गुरु शकराचार्य श्री स्वरूपानदजी और वी एन गाडगिल आदि नेताओ ने भाग लिया। इस सम्मेलन मे आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म.ने श्री देवेन्द्र मुनिजी को उपाचार्य पद प्रदान किया और डॉ शिव मुनिजी म. को युवाचार्य पद प्रदान किया। श्रमण संघ का यह महान् सद्भाग्य रहा कि उसको प्रथम आचार्य सम्राट श्री आत्मारामजी म.जो आगम के महामनीषी थे, शान्त और गम्भीर थे, उनका कुशल नेतृत्व प्राप्त हुआ। द्वितीय पट्टधर महामहिम आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म आनन्द स्वरूप थे। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व भी बहुत ही अद्भुत और अनूठा था, ये दोनो महापुरुष समन्वय स्नेह और सद्भावना के पावन प्रतीक रहे, जिनके कुशल नेतृत्व मे श्रमण संघ फलता और फूलता रहा है। जिनकी असीम कृपा का स्मरण कर हृदय श्रद्धा से नत हो जाता है। २८ मार्च, १९९२ वि स २०४९, चैत्र वदी १० को अहमदनगर मे समाधिपूर्वक आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म का स्वर्गवास हुआ। उसके पश्चात् सघ सचालन का दायित्व आचार्य देवेन्द्र मुनिजी पर आया। सन् १९९२ बैशाख सुदी ३ अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर आचार्य पद की घोषणा सोजत मे श्रमण संघ के प्रवर्तक श्री रूपमुनिजी म. ने श्रमणसघ की ओर से की और काफ्रेस के अध्यक्ष पुखराजजी सा लूकड जैन ने काफ्रेस की ओर से घोषणा की। सन् १९९३, २८ मार्च को उदयपुर मे चद्दर समारोह भी आनन्द और उल्लास के क्षणो मे सम्पन्न हुआ ता २६ अप्रैल ९९ को आपश्री के देवलोक होने पर यह दायित्व परम पूज्य आचार्य डॉ शिवमुनिजी को प्रदान किया गया, श्रमण सघ एक जयवंत सघ है, यह सघ सदा ही एकता का पक्षधर रहा है, जिसको आचार की उत्कृष्टता और विचारो की विराटता मे विश्वास है। जो स्व- दर्शन का पक्षधर रहा है और प्रदर्शन से सदा दूर रहा है। हमारा परम सौभाग्य है कि हमे ऐसे महान् अमण-सघ प्राप्त हुए है। हमे पूर्ण आत्म-विश्वास है हमारा सघ प्रतिपल प्रतिक्षण विकास करता रहेगा, क्योकि उसका मूल आधार पवित्र आचार और विचारो पर अवलम्बित है। ५३ महालक के देवता 4 Maratha Trma 44 साहित्य-संसार ४ श्रुत और शील के अद्भुत समीकरण, प्रतिभा, परिश्रम एवं प्रेम की पाचन त्रिवेणी आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि, जिनके दूध से धुले हुए अन्तःकरण से निर्गत जीवन- संगीत भारतीय वाड्मय के सुमेरु-श्रृंग पर स्वर्ण रेखा अंकित करता है, जिनके अध्यात्म का अनहद नाद जिनवाणी के तारों पर वजा करता है, जिनके मस्तिका प्रभाकर की रश्मियाँ हिन्दी साहित्य शतदल के विकास में नूतन छन्द बनाती हैं। आचार्यश्री ने अपने ज्ञान, ध्यान और साधना के स्तर पर जो आत्म-साक्षात्कार किया था, उसे उन्होंने विविध काव्य रूपों और शैलियो मे प्रस्तुत किया। आता-रपी होने के कारण उनका साहित्य अत्यन्त मार्मिक, रोचक और प्रेरक बन पड़ा है। वस्तुत. " . m 9404 k साधार्य प्रवर स्व. आशामाद आग : * frre :किर सि?" 1 se श्रद्धालोक के देवता आचार्यश्री इसी साहित्यिक परम्परा की लौ को प्रज्वलित करने वाले सफल और सिद्ध साहित्यकार थे। आचार्यश्री ने दर्शन, इतिहास, आचारधर्म, कर्मविज्ञान, नीतिशास्त्र, उपन्यास, बोधकथाएँ, प्रवचन, सूक्तियाँ, चिन्तन-प्रधान, ललित निबन्ध और सम्पादन आदि अनेक विषयो पर अपनी यशस्वी कलम चलाई। आचार्यश्री धर्म सघ के शास्ता थे और थे अद्भुत साहित्य रचयिता। आचार्यश्री देवेन्द्र मुनिजी के समग्र साहित्य को मौलिक और सम्पादन दो रूपो में विभक्त कर सकते है, ताकि उनके साहित्य का सम्यक् प्रकाशन हो सके। आचार्यश्री ने निबन्ध भी खूब लिखे है। उनके समग्र निबन्ध विचार-प्रधान, आध्यात्मिक, समीक्षात्मक तथा गवेषणात्कम है। लाघव, गाम्भीर्य, सम्बन्ध को निर्वाह करने का कलात्मक ढंग, भाषा और शैली की प्रौढता और सोद्देश्यता से अभिमडित है आचार्यश्री के निबन्ध। आचार्यश्री के चौदह निबन्ध-सग्रह, निबन्ध- विधा को समृद्ध करते है। साहित्य और संस्कृति मे रचनाकार का भारतवासियो मे सदाचार के सस्कारो का प्रवर्तन करना मुख्य उद्देश्य रहा है। विषय का प्रतिपादन और अपने मत-स्थापन मे सुधी लेखक ने समन्वय की भावना का परिचय दिया है। 'जैन आगम् साहित्यः मनन और मीमांसा' ग्रन्थ की रूपरेखा और निबन्धो के गठन को देखकर यह सहज में कहा जा सकता है कि प्रबन्ध कोटि के ये निबन्ध उत्कृष्ट बन पडे है। "जैनधर्म और दर्शन: एक परिचय' पुस्तक मे लोक मे फैली जैनधर्म और दर्शन-सम्बन्धी भ्रान्त धारणाओ का सहज मे निराकरण करती है। विषय-वस्तु के आधार पर इन समीक्षात्मक निबन्धो को आध्यात्मिक कोटि मे रखा जा सकता है। इस कृति की विशेषता यह भी है कि इसका अग्रेजी भाषा मे अनुवाद हुआ है। 'जैन आचारः सिद्धान्त और स्वरूप मे समग्र भारतीय आचार तथा मुस्लिम, ईसाई तथा सन्त-परम्परा के आचार-सम्बन्धी चिन्तन को भी निबद्ध किया गया है। 'चिन्तन के विविध आयाम' मे धर्म, दर्शन, चिन्तन और संस्कृति की चर्चा सत्रह निबन्धो मे हुई है। 'धर्म, दर्शन, मनन और मूल्यांकन' नामक कृति मे धर्म, दर्शन के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक क्रियात्मक पक्ष की प्रस्तुति भारतीय धर्म-दर्शन का नवनीत रूप धरती है। 'जैनदर्शनः स्वरूप और विश्लेषण' कृति मे जैनदर्शन का स्वरूप तो प्रतिभाषित है ही साथ ही अन्य दर्शनो के साथ जैनदर्शन का अन्तर भी स्पष्ट हुआ है। अहिसा विषयक अनेक बिन्दुओ पर लिखित निबन्धो के संकलन 'अहिंसा के आलोक में अहिंसा की विविध धर्मो मे क्या ५५ श्रद्धालोक के देवता SMS स्थिति रही है, इसका सम्यक् उद्घाटन करते हुए आचार्यश्री ने वर्तमान संदर्भ में अहिंसा की प्रासंगिकता पर व्यापक दृष्टि से विमर्श किया है। 'सद्धा परम दुल्लहा' में श्रद्धा के रूप-स्वरूप पर विचार हुआ है। जैन नीति के सर्वागपूर्ण तथा तुलनात्मक संदर्भो से विवेचित कृति है - "जैन नीतिशास्त्र : एक परिशीलन'। 'अप्पा सो परमप्पा' निबन्ध-संकलन है विषय की प्रधानता है, किन्तु उनमें वैयक्तिक सोच और समझ का समन्वय उन्हें व्यक्ति-प्रधान भी बना देता है। जैन कथा-साहित्य की समीक्षात्मक परिक्रमा पूर्ण हो जाती है "जैन कथा साहित्य की विकास यात्रा' में। 'पानी में मीन पियासी' ग्रन्थ के सभी निबन्धों के विषय लाक्षणिक और पारिभाषिक हैं, जिनका समाधान श्रमण संस्कृति से अनुप्राणित इस प्रकार उपन्यस्त किया गया है कि सत्य-सार समझने में किसी प्रकार का बोझ प्रतीत नहीं हो पाता। इस प्रकार आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि ने निबन्ध विधा के माध्यम से हिन्दी में अध्यात्म-चिन्तन तथा कल्याणकारी दार्शनिक विषयों पर विशेषकर जैन आगम से सन्दर्भित विषयो पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर वस्तुतः अभिनव कार्य किया है। उपन्यास लिखने का आचार्यश्री का उद्देश्य प्राचीन महापुरुषों की जीवन-गाथा को उपन्यस्त करना रहा है, जिससे पाठक अथवा श्रोता आज की विषम परिस्थिति से निकलकर सन्मार्ग की ओर अग्रसर हो सकें। उपन्यासकार श्री देवेन्द्र मुनिजी ने पौराणिक और ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की। जहाँ तक पौराणिक कथ्य और कथानको का प्रश्न है, लेखक ने जैनधर्म से सम्बन्धित विभिन्न पुराणों मे अर्न्तगत कथावृत्त को लेकर अपने उद्देश्य के अनुसार उनमें से प्रेरक और शिक्षाप्रद प्रसंग लेकर उनमें एक प्रकार की एकता स्थिर की है और अपनी कल्पना और सूझबूझ के सहारे अपने कथानकों का निर्माण किया है। पौराणिक कथावृत्त पर आधारित - "सूली और सिंहासन', 'पुण्यपुरुष' तथा 'कदम-कदम पर पदम खिले' नामक उपन्यासो की सर्जना की है। 'सूली और सिंहासन' जैन पुराणों की बहुचर्चित सेठ सुदर्शन की कथा पर आधारित उपन्यास है। 'कदम कदम पर पद्म खिले' उपन्यास पौराणिक चर्चित पात्र धन्यकुमार का जीवन-चरित्र है। श्रीपाल-चरित्र पर आधारित आचार्यश्री का अन्यतम पौराणिक उपन्यास है- 'पुण्यपुरुष'। जहाँ तक ऐतिहासिक उपन्यास लेखन का प्रश्न है, ऐतिहासिक उपन्यासों का कथानक इतिहास के संदर्भो से गृहीत किया जाता है। इस स्त्रोत के उपन्यासों का प्रमुख उद्देश्य प्रचलित कुरीतियों का निराकरण ५६ouse KE as श्रद्धालोक के देवता कर तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियो का उन्नत करना है। ऐसे उपन्यासो मे आत्मिक गुण, प्रेम, शौर्य और सतीत्व तथा जातीय गौरव, राष्ट्रीयता, सदाचार तथा संयम की प्रखर भावनाएँ प्रतिबिम्बित करना है। ऐतिहासिक उपन्यासो मे अपराजिता, कीचड और कमल, धरती का देवता, धर्मचक्र, नौका और नाविक, मुक्तिपथ और अन्तिम महाकाव्यात्मक उपन्यास 'विक्रमादित्य की गौरव गाथा' उल्लेखनीय उपन्यासिक कृतियाँ है। इन उपन्यासो के नायक तीर्थकर, आचार्य, महापुरुष आदि है जिन्होने सन्मार्ग को प्रशस्त किया है। जैन-साहित्य के इतिहास मे चिरकाल प्रसिद्ध अजना के जीवन-वृत्त पर आधारित 'अपराजिता' नामक उपन्यास लेखन की प्रसिद्ध कृति है। 'कीचड़ और कमल' उपन्यास का कथावृत्त सम्राट् नन्द तथा चन्द्रगुप्त के समकालीन मत्री पुत्र स्थूलभद्र और राजनर्तकी रूपकोशा से सम्बन्धित है। 'धरती का देवता' उपन्यासकार की पूर्व परम्परा के आचार्य श्री अमरसिह जी की जीवन-गाथा पर आधारित एक सफल ऐतिहासिक उपन्यास है। 'धर्मचक्र' महाराज सिद्धराज जयसिह, महाराज कुमारपाल तथा आचार्य हेमचन्द्र सूरि से सम्बन्धित है। यह उपन्यास धर्मनीति का अंकुश, रणनीति तथा कूटनीति पर प्रेम व विश्वास की विजय का प्रतीक है। दसवीं शदी के आचार्य सिद्धर्षि विरचित 'उपमितिभव प्रपंच कथा' पर आधारित 'नौका और नाविक' उपन्यास रूपकात्मक है। 'मुक्तिपथ' उपन्यास मे तीर्थकर अरिष्टनेमि के पूर्वभवो का चित्रण किया गया है। आचार्यश्री का नौ सौ अस्सी पृष्ठीय अन्तिम महाकाव्यात्मक उपन्यास "विक्रमादित्य की गौरव गाथा' मे राजा विक्रम का जीवन-वृत्त गुम्फित है, जिसमे अनेक प्रकार के मनोरम रगो व दृश्यो की छवि अंकित है जिनकी सुषमा दर्शक का मन गुग्ध कर देती है। इस प्रकार पौराणिक उपन्यासो मे आदर्श को अभिव्यक्त किया गया है। ऐतिहासिक उपन्यासो मे लेखक ने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की अभिव्यजना की है। आज के बौद्धिक प्रदूषण के वातावरण मे सुधी लेखक ने अपने उपन्यास-साहित्य के द्वारा निर्मल, पवित्र और स्वस्थ होने के लिए मार्ग प्रशस्त किया है। आचार्यश्री का कहानी-साहित्य प्रचुर है। लगभग चालीस सग्रह रूपककथा, बोधकथा, लघुकथा आदि के रूप मे हिन्दी कथा-साहित्य की श्रीवृद्धि करते है। इन कहानियो के लेखन मे सर्वत्र ही सन्त धर्म का निर्वाह हुआ है, शिक्षात्मक होते हुए भी कही उपदेश नही दिए गए है। इन कथा प्रसगो मे चारित्रिक गुणो को विशेष प्राथमिकता तथा महत्व दिया गया है। लेखन मे सर्वत्र समन्वय की भावना दिखाई X K ५७ श्रद्धालोक के देवता २२. ज्योति से ज्योति जले ५०. सस्कृति के अचल में 23 हसा तो मोती चुगे ५१ अनुभूति के आलोक मे २४ तमसो मा ज्योतिर्गमय ५२. चिन्तन की चान्दनी (द्वि. स.) २५. विचार और अनुभूतियाँ ५3. विचार वैभव (द्वि. स.) २६ पढे सो पण्डित होय ५४. विचार रश्मियाँ २७ आगन मे आकाश ६६ कीचड और कमल २८ दीप शीखा ५६. धरती का देवता (द्वि. स.) २९. ज्योति कण १७. सूली और सिहासन (तृ. स ) 30. मुट्ठी मे तकदीर ६८ सुक्ति से मुक्ति ३१. जहर और अमृत ५९ शब्दो की सीप भावों के मोती ३२ छेद सूत्र : एक परिशीलन E0. चिन्तन के अनमोल रत्न 33 शब्दों की गागर मे आगम का सागर ६१ देवेन्द्र सुक्ति सागर ३४ लहर-लहर सागर लहराये ६२ खिलती कलियाँ मुस्कुराते फुल (तृ.स 34 प्रीति किये पर वश भये 13. प्रति ध्वनि (द्वि स.) ३६ मुक्ति पथ ६४ गहरे पानी पैठ 3७ सत्यमेव जयते ६५ खिलते फूल ३८. धीरज के मीठे फल ६६ प्रेरणा प्रसून ३९ अतीत के उज्जवल चरित्र (द्वि स.) ६७ शाश्वत स्वर ४०. बोलते चित्र (द्वि स ) ६८. फूल और पराग ४१ महकते फुल (द्वि स.) ६९ बुद्धि के चमत्कार (द्वि स.) ४२ जैन जगत के ज्योतिर्धर आचार्य ७० आस्था के आयाम ४3 श्रुत व सयम के प्रज्ञाप्रदीप श्री पुष्कर |७१ सत्य और तथ्य मुनिजी म सा व्यक्तित्व एवं कृतित्व ७२ जिन खोजा जिन पाइयाँ ४४ नौका और नाविक ७3 पुण्य पुरुष (द्वि. स ) ४५ भ. महावीर युग की प्रतिनिधी कथाए ७४ प्रेरणा प्रदीप ४८ बूद मे समाया सागर ७६ अहिंसा का आलोक ४७ प्रेरणा की लहरे ७६ स्वर्ण किरण ४८ जैन नीतिशास्त्र एक परिशीलन ७७ बोलती तस्वीरें ४९ जैन धर्म और दर्शन - एक परिचय हीरे ७८ कुछ मोती कुछ ६२ Kots श्रद्धालोक के देवता ७९ धरती के फूल ८० पचामृत ८१ अतीत के चलचित्र ८२ चमकते सितारे ८3 गागर मे सागर ८४ सीप और मोती ८६ पावन प्रसग ८६ अमिट रेखाए (द्वि स ) ८७ अमृत घट ८८ दीप जले बिन बाती ८९ सागर की लहरे ९० फुलवारी ९१ दीप जले तिमिर टले ९२ भगवती सूत्र एक परिशीलन ९३ चहके जीवन महके मन ९४ कर्म विज्ञान (भाग १) ९५ कर्म विज्ञान (भाग २) ९६ कर्म विज्ञान (भाग 3) ९७ कर्म विज्ञान (भाग ४) ९८ कर्म विज्ञान (भाग ५) ९९ कर्म विज्ञान (भाग 3) १०० कर्म विज्ञान (भाग ७) १०१ कर्म विज्ञान (भाग ८) १०२ कर्म विज्ञान (भाग ९) १०3 जागे युवा शक्ति १०४ आहार और आरोग्य १०५ जैन धर्म का जीवन सदेश १०६ अनन्त शक्ति का पुञ्ज १०७ आत्म शक्ति का स्त्रोत सामायिक १०८ सर्वतो मुखी विकास का मूल चातुर्मास १०९ जैन तत्व ज्ञान की रूपरेखा ११० बिन्दु मे सिन्धु १११ सोना और सुगन्ध ११२ श्रावक व्रत आराधना (तृ अ) ११३ मगध का गौरव पुरुष ११४ विक्रमादित्य की गौरव गाथा ११५ मूल सूत्र एक परिशीलन ११६ साधना के शिखर पुरुष ११७ व्यसन छोडो जीवन मोडो ११८ कर्म सिद्धात बिन्दु मे सिन्धु ११९ पर्वो की परिक्रमा १२० प्रेरणा के पावन पल १२१ रा के उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि अभिनन्दन ग्रन्थ (शोध प्रधान लेख ११०० पृष्ठो का विशाल ग्रन्थ) १२२ साधना के शिखर पुरुष उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिस्मृति ग्रन्थ (शोध प्रधान लेख व अनेको चित्रो से युक्त ८०० पृष्ठ का विशाल ग्रन्थ) १२३ साध्वी रत्न श्री पुष्पावती अभिनन्दन ग्रन्थ १२४.मानवता के मानदण्ड 829. A source Book in Jain Philosophy 82€ Jain Religion and Philosophy and Education नमोक्कार महामत्र 820 Best Jain Stories ध ६३ श्रद्धालोक के देवता et . । ka चादर समारोह H ܙܠ wun Warmnika Awarm wh .. Aw श्रमण संघ की यह विशुद्ध गंगा जो आचार्य द्वय द्वारा समाज को पावन करती हुई अविरल गति से बहती चली आ रही है। इसी क्रम में दि. २८ मार्च, १९९२ का उदयपुर चादर महोत्सव इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित रहेगा। जहाँ आशातीत हर कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुए। अखिल भारतीय स्तर का यह कार्यक्रम अपने-आप में एक अद्वितीय कार्यक्रम रहा, जिसे सफल बनाने के लिए एक तरफ स्थानीय श्रावक संघ, युवा व महिला शाखा अपने तन, मन, धन से लगा रहा। वहीं दूसरी ओर अखिल भारतीय स्थानकवासी जैन कान्फ्रेन्स के पदाधिकारी व उसके हजारों सक्रिय सदस्य जो देश के कोने-कोने में फैले हुए है, हजारों की संख्या में महीनों पहले ही सक्रिय हो चले थे। क्या पंजाब, क्या दिल्ली, क्या हरियाणा, क्या उत्तरप्रदेश, क्या कर्नाटका, आन्ध्रा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात अर्थात् भारत का ऐसा कोई प्रान्त अछूता नही रहा, जहाँ के श्रावक संघों ने अपना कर्तव्य न निभाया हो, संघ समाज के सभी श्रद्धालुगण लाखों की संख्या में यथा समय पहुँचने हेतु लालायित थे। विशेष रूप से इस अवसर पर आने हेतु हजारो बसों, ट्रेनों, वाहनों की व्यवस्था की गई थी। इस अवसर को और अधिक भव्यता देने के लिए कान्फ्रेंस की ओर से महिला सम्मेलन व युवा सम्मेलनों का आयोजन किया गया था। प्रसगवश उसका संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत है। महिला सम्मेलन अखिल भारतीय स्थानकवासी जैन श्रमण संघ के तृतीय पट्टधर आचार्य देवेन्द्र मुनिजी के आचार्य पद चादर समारोह के उपलक्ष में भण्डारी दर्शक मण्डप में आयोजित 'बच्चों में संस्कार निर्माण मे महिलाओं की भूमिका' विषयक महिला सम्मेलन में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह ने महिलाओ को आह्वान किया ६४ सुसस्कार जागृत करे, तभी एक सुसभ्य समाज की संरचना सम्भव है। उन्होने Kotests श्रद्धालोक के देवता है कि वे समाज निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने के लिए दृढ़ सकल्प शक्ति के साथ आगे आएँ और पुरुषो को अपनी सामर्थ्य का भान कराएँ। चादर समारोह के लिए विशेष रूप से निर्मित 'आत्म आनन्द नगर' विशाल पंडाल में देश के विभिन्न प्रान्तो से आई स्थानकवासी जैन श्राविकाओ एव श्रावको के समक्ष पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि भारत ही नही विश्वभर मे महिलाएँ पुरुषो से किसी भी क्षेत्र मे पीछे नही है। आज जरूरत इस बात है कि - महिलाएँ पुरुषो के समक्ष अपनी हैसियत को सिद्ध करके समानता का अधिकार प्राप्त करे। उन्होने कहा कि पुरुष अभी भी महिलाओ की हैसियत को स्वीकार नही कर रहे, स्त्री जन्मदात्री है, उसका दर्जा सदैव ऊँचा है। पूर्व राष्ट्रपति ने महिलाओ को आह्वान किया कि वे पुत्री जन्म पर दुख नही मनाएँ वरन् मिठाई बॉटे। इसी को महिलाओ को समान अधिकार दिलाने की दिशा में पहला कदम माना जाए। ज्ञानी जैलसिह ने कहा कि भगवान महावीर के बताए शान्ति, भाईचारे के सिद्धान्त आज सर्वाधिक प्रासंगिक है। उन्होने कहा कि समाज मे एकता व सद्भावना की आज सबसे. बडी जरूरत है। उन्होने कहा कि प्रेम से प्रकाश फैलता है जबकि नफरत से अंधकार। पूर्व राष्ट्रपति ने इस अवसर पर डॉ दिव्यप्रभा लिखित 'कुसुम अभिनन्दन ग्रन्थ' का दिनेश मुनि रचित पुस्तिकाओ 'प्रेरक कहानिया' व 'नई कहानियां' का तथा आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी रचित पुस्तको 'चहके जीवन महके मन' और 'बिना बाती ज्योति नही ' का विमोचन इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि, पूर्व सासद रामचन्द्र विकल ने कहा कि आज देश में व्याप्त अशान्ति व घृणा के वातावरण को खत्म करने की दिशा मे भगवान महावीर के सिद्धांत अत्यन्त प्रेरणादायी है। उन्होने कहा कि हमे भारतीय सस्कृति एव जीवन मूल्यो को अक्षुण्ण बनाए रखना है। आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी ने इस मौके पर कहा कि महिलाएँ बच्चो मे किया। कहा कि नारी नारायणी का स्वरूप है। वह अबला नही है, सामर्थ्यवान है। सम्मेलन मे रवीन्द्र मुनि (पंजाब), साध्वी अर्चना श्री, साध्वी चन्दनबाला, डॉ दिव्यप्रभा के साथ ही तमिलनाडु से आई प्रिया जैन उत्तरप्रदेश की शशि हिगड, ६५ श्रद्धालोक के देवता outst KA N डॉ. इन्द्रा जैन, हेमलता तलसेरा, डॉ. राजकुमारी जैन आदि ने भी विचार व्यक्त किए। राजस्थान महिला श्राविका संघ की अध्यक्ष लाडकुँवर जैन व उदयपुर शाखा की सचिव पारसमणि खींचा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। आरम्भ में महिला संघ की राष्ट्रीय अध्यक्षा डॉ. विद्युत जैन ने स्वागत भाषण पढ़ा। कार्यक्रम की शुरुआत शशि भण्डारी के मंगलाचारण की प्रस्तुति से हुई, मंजु सिंघवी ने स्वागत गीत पेश किया। समारोह में महिला संघ की अध्यक्ष डॉ. विद्युत जैन को संघ की राजस्थान शाखा की अध्यक्ष लाड़कुंवर ने शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सुषमा सिंघवी ने किया। महिला सम्मेलन में सर्वसम्मति से ६ प्रस्ताव पारित किए गए। जिनमें बालकों में जैन संस्कारों के शिक्षण एवं प्रचार के साथ ही महिलाओं से ऐसे सौन्दर्य प्रसाधन काम मे न लेने की अपील की गई, जिनके निर्माण में जीव हिंसा होती हो। भ्रूण हत्या का भी विरोध किया गया। अन्य प्रस्तावों में घरेलू शिक्षा प्रशिक्षण शिविरों के आयोजन, रूढ़ियों के उन्मूलन, वृद्ध, विकलांगों की सेवा तथा शादियो में दहेज एवं आडम्बर से बचने से सम्बन्धित मुद्दे शामिल थे। उस बीच सुबह तारक गुरु जैन ग्रन्थालय से आरम्भ हुई युवा रैली देहलीगेट, धानमण्डी, मुकर्जी चौक, बड़ा बाजार, हाथीपोल व चेतक सर्कल होते हुए आत्म आनन्द नगर (भण्डार दर्शक मण्डप) पहुँच कर सम्पन्न हुई। रैली में देश के विभिन्न राज्यों से आए हजारो युवा जैन शरीक हुए। रैली में दो पहिया वाहनो पर सवार, शुभ्र वस्त्रधारी व गले में आचार्य पद चादर महोत्सव की केसरिया पताकाएँ डाले युवक जय महावीर व जय देवेन्द्र मुनि के नारे गूंजा रहे थे। सजे-धजे एक हाथी पर सवार युवक सिक्के उछालते चल रहे थे। रैली में सज-धजे ग्यारह घोडे, ऊँट व बग्घियाँ भी शामिल थीं। जैन श्रावक संघ की युवा शाखा के अध्यक्ष बाबू सेठ वोरा ने रैली का नेतृत्व किया। दोपहर करीब साढ़े ग्यारह बजे युवा सम्मेलन आरम्भ हुआ। इस अवसर पर आचार्य देवेन्द्र मुनिजी ने युवा वर्ग को आह्वान किया कि वह व्यसनों से बचे। उन्होने कहा कि युवा वर्ग अपनी शक्ति रचनात्मक कार्यों में लगाएँ, तभी समाज व राष्ट्र का हित हो पाएगा। 'युवाओ की स्वाध्याय व धर्म रुचि कैसे बने' विषयक इस सम्मेलन के M ६६use युवा रैली - युवा सम्मेलन wwe श्रद्धालोक के देवता मुख्य वक्ता न्यायमूर्ति जसराज चौपडा ने कहा कि आज जीवन विडम्बना पूर्ण हो गया है। चरित्र, धर्म, नीति आचरण को तरजीह नही दी जाती। लोगों की कथनी व करनी मे फर्क आ गया है। आज हालात ये है कि धर्म के नाम पर सन्त, पादरी, मौलवी, पंडा तो बन रहे है, लेकिन धर्म अनुरूप आचरण करके एक अच्छा मनुष्य बनना कोई नही सीख रहा। आज धर्म का जिस ढग से उपयोग हो रहा है, उससे समाज बॅट रहा है। उन्होने कहा कि वास्तव मे धर्म से उत्कर्ष व सिद्धि की प्राप्ति होती है। चौपडा ने युवा वर्ग को सलाह दी कि विद्या व आचरण ही मुक्ति का साधन है। अतः युवा वर्ग ज्ञान व प्रक्रिया का मार्ग अपनाए तथा साधना का अभ्यास करे। उन्होने युवा वर्ग मे शराब, मांस सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिन्ता जताई। अन्य वक्ताओ ने भी कहा कि युवा वर्ग व्यसन त्यागे। शराब व मांस सेवन करने वालों का बहिष्कार करे। सम्मेलन की अध्यक्षता युवा सघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबू सेठ वोरा ने की व महाराष्ट्र के विधायक सुरेश दादा जैन ने भी विचार व्यक्त किए। उन्होने इस अवसर पर स्थानीय साप्ताहिक 'सुलगते प्रश्न' का आचार्य देवेन्द्र मुनि विशेषांक का विमोचन किया। आत्म आनन्द नगर के विशाल पडाल मे शनिवार सुबह से दोपहर तक श्रावक-श्राविकाओ का सैलाब नजर आया। शनिवार को दिल्ली से एक विशेष रेलगाडी के अलावा बसो तथा अन्य वाहनो से भी भारी तादाद मे श्रावक- भाविकाएँ उदयपुर पहुंचे। आत्म आनन्द नगर मे बने पृथक पडाल मे आगन्तुको के लिए भोजनादि की व्यवस्था की गई थी। वहॉ मच को तीन भागो मे विभक्त कर मध्यवर्ती भाग मे आचार्य देवेन्द्र मुनिजी एवं उनकी मुनि मण्डली, दूसरे पर साध्वियों तथा तीसरे भाग मे अखिल भारतीय स्थानकवासी जैन काफ्रेस के पदाधिकारी एवं सदस्यो के बैठने की व्यवस्था की गई थी। चादर समर्पण समारोह देखते ही देखते २८ मार्च का वह ऐतिहासिक क्षण भी आ पहुंचा, जिसके लिए हजारों साधु साध्वी गण एवं लाखो श्रावक-श्राविकाएँ अपलक प्रतीक्षा लगाए बैठे थे। स्थानीय शास्त्री सर्कल स्थित श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थालय भवन मे विराजमान श्रमण संघ के मूर्धन्य पदाधिकारी, सन्त गण, पूज्य प्रवर्तक श्री ka६७ श्रद्धालोक के देवता Movie अम्बालालजी म, परम श्रद्धेय प्रवर्तक श्री रमेश मुनिजी म., परम श्रद्धेय प्रवर्तक श्री रूपचन्दजी म. 'रजत'। पण्डित रवीन्द्र मुनिजी म. आदि लगभग ठाणा ७० के साथ परम पूज्य आचार्य सम्राट भण्डारी मंडप के विशाल प्रांगण में नवनिर्मित आत्मानन्द नगर में पधारने हेतु तत्पर हुए, साथ ही परम विदूषी श्री शीलकुंवरजी म. , परम विदुषी श्री कुसुमवतीजी म, श्री पुष्पावतीजी म. , श्री उमराव कुँवरजी म. की सुशिष्या सुप्रभाजी, पंजाब से डॉ. अर्चनाजी, सुमनप्रभाजी आदि ठाणा १३० के लगभग ज्यों ही आत्मानन्द सभा स्थल पर पहुँचे, यथास्थान विराजने पर ऐसा लग रहा था, मानो भगवान महावीर का समवसरण लग रहा हो। एक तरफ साध्वीगण, बीच में मुनिगण व मंच की दूसरी तरफ समाज के पदाधिकारी व विशेष रूप से आमंत्रित मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री माननीय सुन्दरलालजी पटवा, मेवाड़ महाराणा महेन्द्र सिंहजी, गुलाबचन्दजी कटारिया अनेक सांसद, विधायक न्यायाधीश के अलावा कान्फ्रेंस के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्रीगण व समस्त सदस्यगण, फिल्म जगत के के. सी. बोकड़िया, मुकेश खन्ना आदि की उपस्थिति समारोह में चार चाँद लगा रही थी। तकवासी जैन श्रमण संघ के तृतीय पट्टधर परम अन्य पारी २ वाली का दिचादरसमर्पण समारोह roin श्रमण संघ के आचार्य पद चादर समर्पण समारोह के अवसर पर मंगलाचरण प्रस्तुत करते हुए डॉ. राजेन्द्र मुनिजी म. ६८ Swar My श्रद्धालोक के देवता सर्वप्रथम मेरे ही द्वारा मगलाचरण के रूप मे नवकार महामन्त्र का पाठ किया गया, तदनन्तर विराजमान सतीवृन्द द्वारा व पूज्य पदाधिकारी मुनिगण व महामन्त्री श्री सौभाग्यमुनिजी द्वारा अपनी-अपनी ओर से श्रद्धा भाव प्रकट किए गए। जिसमे श्रमण सघ की उन्नति व आचार्य देव के प्रति विशेष समर्पण भाव झलक रहा था। समाज की ओर से चादर समारोह के सयोजक एडवोकेट रोशनलालजी मेहता, मूलचन्द बुरड, चॉदमल सराफ, चुन्नीलाल धर्मावत, कान्फ्रेस के अध्यक्ष बकटलालजी कोठारी, महामत्री शान्तिलालजी छाजेड, न्यायाधीश जसराजजी चौपडा, स्वागताध्यक्ष घेवरचन्दजी कानुनगो, झण्डा रोहणकर्ता लाला प्रकाशचन्दजी जैन आदि ने अपने विचार व्यक्त करते हुए सघ व संघनायक के प्रति श्रद्धाभाव अर्पित किए। FREE AtmxAMME Hy: rFN SAL. M retariane wha म kin आचार्य श्रीदेवेन्द्र मुनिजी म.को आचार्य पद की चादर समर्पित करते हुए मुनिगण, उदयपुर २८ मार्च, १९९३ इसी अवसर पर पॉच मुमुक्षु आत्माओ द्वारा जिसमे दो बालक-तीन बलिकाएँ थी, साधु धर्म को ग्रहण कर दीक्षा अंगीकार की। अनेकानेक शुभ घोषणाएँ व समाज सेवा हेतु लाखो का अनुदान, आचार्य सम्राट का समाज के नाम पर विशेष सदेश एव आगामी चातुर्मास की घोषणाएँ हुई। ठीक शुभ बेला का आगमन होते ही सारे कार्यक्रम स्थगित करके चादर समर्पण की रस्म अदा की गई। जिसमे उपस्थित श्रावक समूह, महासती समुदाय ने चादर का पावन स्पर्श किया एव विशिष्ट मुनिराजो द्वारा चादर खोलकर आचार्य देव को अर्पित करते हुए ओढ़ा दी गई। इस वातावरण को देखने के श्रद्धालोक के देवता ka लिए अति उत्साही भीड़ भी एक बार तो मंच की ओर बढ़ती चली गई, पर सक्रिय सदस्यों द्वारा सम्पूर्ण व्यवस्था बनाई रखी गयी। इतिहास के ये अमृत क्षण जो वर्षों में कभी-कभार ही उपस्थित होते हैं, पर जन-जन में एक हर्ष व संगठन की लहर व्याप्त कर जाते हैं। इस अवसर पर आचार्य देव के सद्गुरु उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. अस्वस्थता की वजह से स्वयं उपस्थित न हो सके। अपने शिष्य को अपना पावन आशीर्वाद सन्देश रूप मे प्रदान किया, जो अक्षरशः यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है। दो सौ साधु-साध्वी गण के पावन सान्निध्य में तथा हिन्दुस्तान के सम्पूर्ण प्रदेशों, प्रान्तों एवं विदेशों से आए हुए करीब दो लाख जनता की पावन उपस्थिति में समारोह के पूर्व दो वैरागी बन्धु व तीन वैरागिन बालिकाओं का दीक्षा महोत्सव भी सम्पन्न हुआ। @ गुरु का शिष्य को आशीर्वचन 6. मेरा यही हार्दिक आशीर्वाद है कि - आचार्य देवेन्द्र मुनि के नेतृत्व में श्रमण संघ ज्ञान, चारित्र में निरन्तर आगे बढ़ता रहे। इनमें जो विनय, विवेक, गुरुजनों के प्रति समर्पण और छोटों के प्रति स्नेहभाव है। इस विशेषताओं के बल पर श्रमण संघ अपनी एकता को कायम रखते हुए धार्मिक आध्यात्मिक और सामाजिक उत्कर्ष की ओर निरन्तर बढ़ता रहे। यही कामना है, यही मेरा हार्दिक आशीर्वाद है। आचार्य श्री गुरुदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. सह ७० စင် Kose श्रद्धालोक के देवता अपने अतिजात शिष्य को निहार कर मेरा हृदय आनन्द विभोर है। आचार्य पद पर आसीन होने पर भी इनमे वही विनय है, वही समर्पण भाव है, वही सेवा व सद्भाव है। अहंकार इन्हे छू भी नही सका, मै यही चाहता हूँ कि सन्त-सतीजन भी आचार्य श्री के सद्गुणो को अपनाकर सघ की गरिमा व महिमा मे अभिवृद्धि करे। • उपाध्याय पुष्कर मुनि जी म. सा. का देवलोक गमन : एक वज्राघात जिसकी कोई कल्पना भी नही थी, वह अनहोनी उदयपुर की माटी पर होकर रही। गुरुदेव यों तो कई बार अस्वस्थ होते रहे थे, पर सब कुछ उनके प्रबल पुण्योदय से ठीक हो जाता था। सथारा की पावन बेला मे आलोचना पाठ सुनाते हुए डॉ. राजेन्द्र मुनि समीप है आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी एव तपस्वी श्री मोहन मुनिजी, श्री दिनेश मुनिजी यों कई बार उन्होने संकेत भी प्रदान कर दिया था, कि अब मैं लम्बा समय नहीं निकालूगा। पर स्नेह के कारण इस घटने वाली घटना को हास्य मे टाल जाते थे, चादर महोत्सव को लेकर भी जब-जब स्थान चयन का प्रश्न समाज के सामने उपस्थित हुआ, इन्दौर, दिल्ली आदि का विशेष आग्रह भी था और विशिष्ट लोगो की इच्छा भी दिल्ली की थी, पर गुरुदेव ने हमेशा उदयपुर की ओर ही अपना लक्ष्य ७१ श्रद्धालोक के देवता kakot रखा। लगभग २०० साधु-साध्वी वृन्द की मौजूदगी में यह समायोजन सानन्द सम्पन्न हुआ और इधर २८ मार्च के इस पर्व सम्पन्न की खुशी के साथ ही गुरुदेव का स्वास्थ्य बिगड़ता-सा गया, सर्वप्रथम ता. २६ को नाक में से कुछ रक्त बहा। स्थानीय डॉक्टरो ने उपचार किया एवं उसका तत्कालीन लाभ भी मिला पर तबियत गिरती ही चली। २८ के बाद उपाध्याय गुरुदेव श्री अपने आप में लीन होते चले गए। किसी भी व्यावहारिक कार्यों में उनका तनिक भी लगाव नहीं रहा। यों भी विगत २, ३ वर्षों से वे सारे सामाजिक कार्यक्रमों से दूर होते चले गए थे। जो भी कुछ पूछता, तो सीधा सा उत्तर था कि आचार्य श्री विराजमान हैं, उनसे पूछ लो। ता.२९ को डॉक्टरों ने स्थानीय तारक गुरुग्रन्थालय से अन्यत्र हॉस्पीटल ले चलने का अनुरोध भी किया, पर अध्यात्म शक्ति के ज्ञाता गुरुदेव ने स्पष्ट इन्कार कर दिया, मुझे कहीं नहीं जाना है, समाधिपूर्वक जीवन के अन्तिम समय को पूर्ण करना है। 44 -५ SAN rria श्रद्धालु भक्तों के कंधो पर यह यात्रा निकल रही। जय-जयकारों और ऑसुओं, से है श्रद्धा पिघल रही। सभी पदाधिकारी मुनिराज, प्रवर्तक मण्डल, सलाहकार मण्डल व श्रमणीवृन्द की मौजूदगी में गुरुदेव अपने में लीन होते ही चले गए। धार्मिक स्तोत्रों का शास्त्रों का पठन पाठन जो गुरुदेवश्री को विशेष रुचिकर थे, वे सुनाते रहे। इधर अस्वस्थता के समाचार दूर-दूर तक हवा की भॉति फैलते चले गए और लोगों का पुनः आवागमन बढ़ता चला गया। देखते ही देखते दो तारीख के प्रातः काल चार बजे उपाध्याय श्री ने आचार्य श्री ७२ous se झलक देखता ने कहा कि मुझे जब उन्धारा करवा ले, दली-बारमा लोपामलाई श्री ने तभी की नौजूदा मे समाधिनरण न्यार के बाद हत्या करार कई लन्डे अंतराल के बाद पादपोपाननयमाथितिहारले कन्या शरीरको स्थिति हो, उत्तीस्थितिने अन्तत्वले यार का हल विशिष्ट ने धारण कर लिया। इधर जनताकासानन हाईईईलेर इटहर पूना, रायचूर, नुन्बई, महाराष्ट्र, जादोपान्त ले जलाद रलयन, लाड वित्ती, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, नव्यादेशान्पूर्ण पाने हो हजार श्रद्धालुगण अपने-अपने साधन है, इसे लरे पर केदार की ओर आने लगे। दि.3 रात्रि को बल मिनट पर गुरदेव पूर्ण के साथ नहामन्त्र नवकार का तरलते हुए इस हरक देह का परिकार र स्वर्ग प्यार। इधर स्थानीय श्रावक संघ, युरल लेन लेनेकर हर अन्तिम संस्कार की तैयारी मे जुट गए। बहोमल्ल निलिमालित सभी के तोग के अलावा दिल्ली निवासी ज्ञानी ततेला सहयोग रहा। अन्तिम राज में काम आने वाले ट्रक को विशेष रूप तेततिल्लिका ही सबसे महत्व प्रश्न था दाहसंस्कार के त्यत का, वहभाईरले वितरोपरान्त स्थानीय तारक गुरुग्रन्गलय के परित्तर में ही निश्चित किया गया। स्थानी जैन कानोसले पदाधिकारियों व कई राजनेताओं की तनुपस्थिति में हायजा पर दुई। स्थानीय श्रावक संघ द्वारा सभी हिन्दुस्तान के बारे में, टेलीविजन में एडीसी लन्दन द्वारा इस देवलोक के समाचारों लो पहुंचाया गया। जिसमें शिक्षक बरसे का विशेष योगदान रहा। दि५ को करीब एकलाल से भी अधिक स्पनोस बजही विराट जन मेदिनी के बीच यह महायात्रा प्रारम्भ हुई तारलगुरुमन्यालय से जाना होकर चेतक सर्कल, मोती चोहटा, बड़ा बाजार आदि शहर के पनुल बाजारों में से जब यह यात्रा प्रारम्भ हुई, तब नगर के वयोवृद्धजन भी बोल पड़े. जाजता इतनी विशाल जनमेदनी देखने को नहीं मिली। शहर के विभिन्न बाजारों में महापपाणपात्राघूमती हुई पुन तारक गुरु ग्रन्यालय के स्थल पर ज्यो ही पहुँची, लाखों ने लोगो जब तक सूरज चॉद रहेगा पुष्कर तेरा नाम रहेगा, जयघोष से वातावरण को एक विराट श्रद्धांजलि का रूप प्रदान कर दिया। दाहसंस्कार हेतु निर्मित चबूतरे पर गुरुदेव श्री की देह को लाया गया जहाँ दिल्ली निवासी पूनमचन्दजी बुरड, मुम्बई निवासी हरखचन्द वच्छराज आदि पीपाइता), कोठारी वन्धुजनो व बगडुन्दा निवासी भंवरलाल लोढ़ा द्वारा अग्नि पदान ती ग...... श्रद्धालु भक्तो द्वारा इस कार्य मे अपना योगदान पदान किया गया, तो atti) | रहेगा।
श्रद्धालोक के देवता kaise Porone न चातुर्मास डायरी Atm www.anand (रचनात्मक प्रेरक प्रसंगों सहित) चातुर्मास क्यों? व्रजनशीलता साधु-जीवन की एक महती विशालता मर्यादा है। मुनिजन इसी कारण संचरण-प्रिय होते हैं। विचरण इनके संयम का रक्षक बना रहता है। निश्चित स्थान के प्रति आकर्षण और आसक्ति का भाव अन्य अनेक अवांछित तत्त्वों का सृजक हो जाता है। विचरण साधुओं के निर्दोष व्यवहार की केवल कसौटी ही नहीं, विहार-प्रियता उस भाव को दृढ़तर भी करती रहती है। "बहता पानी निर्मला, पड़ा गन्देला होय। साधु तो फिरता भला, दोष न लागे कोय||" आदि उक्तियॉ प्रव्रजन के महत्त्व को भली-भाँति प्रतिपादित कर देती है। विचरण की यह प्रवृत्ति समाज के व्यापक भाग को लाभान्वित करने की समर्थता साधुजनों को विभूषित करती है। सरिता का प्रवाहित जल समीपस्थ वनस्पतियों को सींचता हुआ निरन्तर अग्रसर होता रहता है। प्रकृति का यह परिणमन शुद्धतम रूप से मुनिजनों के लिए सदा अनुकरणीय आदर्श रहा है। संचरणधर्मी साधु-समाज जहाँ अपने इस आदर्श को महत्व देता है, वहाँ श्रावक जन मुनिराजों की स्थिरता में आनन्द का अनुभव करते हैं। सेवा-सत्कार का अवसर पाकर वे कृतकृत्य हो उठते हैं। सदुपदेशों से जीवन में उत्कर्ष प्राप्त कर पाते हैं। भारत की जलवायु के अनुसार प्रकृति ने तीन प्रमुख ऋतुओं का विधान किया है - ग्रीष्म, शरद् और वर्षा। ग्रीष्मकाल के प्रचण्ड ताप से धरती झुलसने लगती है। सर्वत्र लू का प्रकोप रहता है, जो समस्त प्राणियो के लिए अतीव कष्टकर होता है। इस भीषण ताप से ग्रस्त हो शीतलता हेतु वर्षा की कामना करने ७४ Jeety श्रद्धालोक के देवता लगते है और वर्षा के शुभागमन से सर्वत्र हर्ष छा जाता है। धरती हरित हो उठती है, श्याम जलधरो से आकाश आच्छादित हो जाता है, जलाशय नव जल से आपूरित हो लहराने लगते है, सरिता- झरने कल-कल, छल-छल करते हुए प्रवाहमान हो जाते है। प्रकृति की छटा चित्ताकर्षक हो जाती है। मेघानुरागी मयूर नर्तित हो उठता है - अपने प्रियतम की छबि निहार कर। वर्षाऋतु जहाँ वानस्पतिक वैभव को अभिवर्धित करती है, वहाँ धरातल पर नाना प्रकार के कीट-कीटाणु सूक्ष्म जन्तुओ की भी सृष्टि करती है। अत इस काल में भगवान महावीर ने साधु- साध्वियो के विहार को वर्जित रखा है। साधु- समाज दृढ़तापूर्वक इन निषेध का पालन करता है। आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा से कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा तक चार माह की अवधि साधुओ के विचरण रहित रहकर एक ही स्थल पर स्थिर रूप से व्यतीत करनी होती है। यही चातुर्मास है। चातुर्मास मे साधु-सन्तो को पर्याप्त अवसर मिल जाता है श्रावक-श्राविकाओ को सदुपदेश द्वारा लाभान्वित करने का। प्रकृति मे मयूर और इधर श्रद्धालुओ के मन-मयूर एक ही साथ नृत्य-मग्न रहते है। प्रत्येक धर्म मे यह काल उपासना हेतु अनुकूल माना जाता है। जैन धर्मानुयायियो का पर्दूषण पर्व भी इसी समय आता है, तपस्याएँ भी की जाती है, व्याख्यान, ज्ञान-ध्यान आदि के कार्यक्रम चलते रहते है। वर्षा का शान्त वातावरण इन सब मे बडा अनुकूल सिद्ध होता है। परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म अब तक जिनवाणी की अमृतवर्षा करते हुए ५८ चातुर्मास समाप्त कर चुके है। तत्सम्बधी दीर्घ तालिका से यह भली-भॉति स्पष्ट होता है कि आपश्री ने इस माध्यम से देश के कितने व्यापक भाग को प्रभावित किया है एवं प्रान्त-प्रान्त मे आपश्री को कितनी लोकप्रियता प्राप्त है।
श्रद्धालोक के देवता ka * मंगल विहार एवं वर्षावास न सं. वि.सं. . सन् स्थान १ १९९८ १९४१ समदडी (राज.) २ १९९९ १९४२ रायपुर (राज.) ३ २००० १९४३ ४ २००१ १९४४ पीपाड़ (राज.) जोधपुर (राज.) नान्देशमा (राज.) ५ G २००२ १९४५ ६ २००३ १९४६ धार (म.प्र.) ७ २००४ १९४७ नासिक (महाराष्ट्र) घाटकोपर (मुम्बई) ८ २००५ १९४८ ९ २००६ १९४९ चूड़ा १० २००७ १९५० नान्देशमा (राज) ११ २००८ १९५१ सादड़ी (राज.) १२ २००९ १९५२ सिवाना (राज.) १३ २०१० १९५३ जयपुर (राज.) दिल्ली १४ २०११ १९५४ १५ २०१२ १९५५ जयपुर (राज.) १६ २०१३ १९५६ जयपुर (राज.) १७ २०१४ १९५७ उदयपुर (राज.) १८ २०१५ १९५८ बाघपुरा (राज.) १९ २०१६ १९५९ जोधपुर (राज.) ७६ Koose श्रद्धालोक के देवता सं. वि.सं. सन् स्थान २० २०१७ १९६० ब्यावर (राज) २१ २०१८ १९६१ सादडी (राज) २२ २०१९ १९६२ जोधपुर (राज.) २३ २०२० १९६३ जालोर (राज) २४ २०२१ १९६४ पीपाड (राज) २५ २०२२ १९६५ खण्डप (राज) २६ २०२३ १९६६ पदराडा (राज) २७ २०२४ १९६७ मुम्बई (महाराष्ट्र) घोडनदी (महाराष्ट्र) २८ २०२५ १९६८ २९ २०२६ १९६९ ३० २०२७ १९७० पूना (महाराष्ट्र) दादर (मुम्बई) कादवाडी (मुम्बई) जोधपुर (राज) ३१ २०२८ १९७१ ३२ २०२९ १९७२ ३३ २०३० १९७३ अजमेर (राज) ३४ २०३१ १९७४ अहमदाबाद (गुज ) ३५ २०३२ १९७५ पूना (महा ) ३६ २०३३ १९७६ रायचूर ३७ २०३४ १९७७ बैंगलोर ३८ २०३५ १९७८ चेन्नई ३९ २०३६ १९७९ सिकन्दराबाद भ७७ श्रद्धालोक के देवता सं. वि.सं. सन् स्थान ४० २०३७. १९८० उदयपुर (राज.) ४१ २०३८ १९८१ राखी (राज.) ४२ २०३९ १९८२ जोधपुर (राज.) मदनगंज-किशनगढ़ ४३ २०४० १९८३ ४४ २०४१ १९८४ दिल्ली ४५ २०४२ १९८५ दिल्ली ४६ २०४३ १९८६ पाली (राज.) ४७ २०४४ १९८७ अहमदनगर (महा. ४८ २०४५ १९८८ इन्दौर (म.प्र.) ४९ २०४६ १९८९ जसवंतगढ़ (म.प्र.) ५० २०४७ १९९० सादड़ी (राज.) ५१ २०४८ १९९१ पीपाड (राज.) ५२ २०४९ १९९२ सिवाना (राज.) ५३ २०५० १९९३ भीलवाड़ा (राज.) ५४ २०५१ १९९४ लुधियाना (पंजाब) ५५ २०५२ १९९५ पानीपत (हरियाणा) ५६ २०५३ १९९६ दिल्ली ५७ २०५४ १९९७ उदयपुर इन्दौर (अन्तिम वर्षावास) ५८ २०५५ १९९८ देवलोक स्थान : घाटकोपर, मुम्बई देवलोक : दि. २६ अप्रैल ९९ ७८ews ANMWWWW.LA Ke श्रद्धालोक के देवता • चातुर्माशिक विवरण Shuaa auaamandal वि. संवत् १९९८ : समदड़ी-वर्षावास (सन् १९४१) आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी का प्रथम वर्षावास अपने गुरुदेव के सान्निध्य मे समदड़ी मे हुआ। इस प्रथम वर्षावास मे गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी ने अपने शिष्य श्री देवेन्द्रमुनि के अध्ययन के लिए पं विश्वेश्वर झा, प सुभद्र झा, प कृष्णानन्द पन्त जैसे विशिष्ट विद्वानो से सहयोग प्राप्त किया। प्रारम्भिक अध्ययन तो श्री देवेन्द्र मुनिजी ने बहन के पास किया था। इन विशिष्ट विद्वानो के मार्गदर्शन में आपका विशिष्ट अध्ययन आरम्भ हुआ। हिन्दी के अध्ययन के लिए डॉ राधाकृष्ण दुग्गड जैसे लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान का सहयोग मिला। इस प्रकार प्रथम चातुर्मास से ही आपके विशिष्ट अध्ययन की व्यवस्था हो गई, जो कई वर्षों तक चलती रही। वि. संवत् १९९९ : रायपुर-वर्षावास (सन् १९४२) विहार काल मे श्री देवेन्द्र मुनिजी को वरिष्ठ जैन मुनियो के दर्शन-वन्दन के लाभ के साथ ही मार्गदर्शन भी मिलने लगा। समदडी चातुर्मास समाप्त होने पर विहार कर आपका आगमन साण्डेराव हुआ। साण्डेराव मे पंजाब केसरी पूज्य काशीरामजी म.पधारे। उनसे यहाँ मिलन हुआ। यहॉ श्री पुष्कर मुनिजी म और पजाब केसरी पूज्य काशीरामजी म के मध्य 'स्थानक' शब्द को लेकर कुछ चर्चा चली। पंजाब केसरीजी ने 'स्थानक' का उत्पत्तिजनक अर्थ स्वीकार कर लिया। चर्चा का वह दृश्य श्री देवेन्द्र मुनिजी के लिए नया अनुभव था। साण्डेराव से सादडी पधारे। वहाँ पंजाबी मुनि श्री भागचन्द्रजी म. एवं पं मुनि श्री तिलोकचन्द्रजी म का सम्मिलन हुआ। बडा ही स्नेहमय व्यवहार रहा। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी के सदुपदेश से यहाँ एक धार्मिक पाठशाला भी स्थापित हुई। सादडी से विहार कर राणकपुर होते हुए गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म.के साथ आपका पदार्पण सेरा प्रान्त मे हुआ। जब आप पदराडा पहुंचे, तो ७९ श्रद्धालोक के देवता wook महासती श्री सोहनकुँवरजी म.भी अपनी शिष्याओं सहित उदयपुर से सामने पधारी। पदराड़ा से गोगुन्दा होते हुए आपका विहार हल्दीघाटी की ओर हुआ। हल्दीघाटी वही स्थल है, जहाँ मेवाड़ी अल्प संख्यक शूरवीरों ने महाराणा प्रताप के नेतृत्व में विशाल शत्रु सेना से लोहा लिया था। घाटी की मिट्टी का रंग हल्दी जैसा पीला होने के कारण यह हल्दीघाटी के नाम से प्रसिद्ध है। घाटी में न सघन वृक्षावली है और न अधिक चढ़ाव। अभी घाटी के ऊपर एक साधारण चबूतरा बना हुआ है, जिस पर घोड़े के साथ महाराणा प्रताप की मूर्ति है। करीब दो-दो मील की दूरी पर दोनों ओर ग्राम बसे हुए हैं। वहाँ पाँव रखते ही मानव के हृदय में उत्साह का संचार होता है। हल्दीघाटी होते हुए आप खमनोर पधारे। जहाँ जैन धर्मावलम्बियों की अच्छी आबादी है। खमनोर से नाथद्वारा पधारे। नाथद्वारा श्रीसंघ ने चातुर्मास की विनंती की। गुरुदेव ने फरमाया कि यदि मेवाड़ में रहे तो देखा जाएगा, यदि बाहर चले गए तो फिर अन्यत्र कहीं चातुर्मास होगा। वहाँ से विहार कर कांकरोली, देवगढ़ होते हुए ब्यावर पदार्पण हुआ। इस समय ब्यावर में पूज्य खूबचन्दजी म.एवं प्रवर्तक हीरालालजी म.विराजमान थे। पारस्परिक अच्छा स्नेह-मिलन रहा। कुछ दिन ब्यावर विराजकर यहॉ से नीमाज की ओर विहार किया। कुशालपुरा पधारे तो पीपाड़, नीमाज, रायपुर आदि के श्रीसंघो की ओर से वर्षावास हेतु अनुरोध भरी विनंतियाँ होने लगीं। दीर्घकाल से रायपुर श्री संघ चातुर्मास हेतु आग्रह भरी विनंती कर रहा था। साधुमर्यादानुसार इस सम्बन्ध मे स्वीकृति प्रदान की गई और मुनिमण्डल का आगमन रायपुर हुआ। इस वर्षावास में शान्तिमुनिजी ने मासक्षमण तप की आराधना की। रायपुर के ठाकुर साहब श्रीगोविन्दसिंहजी ने अपने महल में व्याख्यान करवाया। पारणे के प्रसंग पर मुनि श्री को राजमहल में ले गए। इस चातुर्मास की उपलब्धि यह रही कि अनेक व्यक्तियों ने मांस-मदिरा सेवन का एवं शिकार खेलने का त्याग किया। संवत् २००० : पीपाड़-वर्षावास (सन् १९४३) रायपुर (पाली-मारवाड़) का चातुर्मास सानन्द सम्पन्न हुआ और रायपुर विहार कर झूठा, पीपलिया होकर मुनिमण्डल का बिलाड़ा आगमन हुआ। मरुधरा में पानी कभी-कभी अमृत से भी अत्यधिक मूल्यवान होता है। बिलाड़ा के मार्ग पर बाणगंगा आती है। वहाँ सदैव पानी रहता है। अतः दूर-दूर से प्यासे हिरण आदि वनचर पशु, विविध प्रकार के विहंग अपनी प्यास बुझाने के लिए वहाँ आते हैं। यहाँ पर गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी के सदुपदेश से प्रभावित होकर शिकारियो ने शिकार ८० से श्रद्धालोक के देवता नही खेलने का नियम लिया। श्रीदेवेन्द्र मुनिजी ने भी इस अवसर पर लोगो को जीव दया का महत्व समझाया। आपने यह भी कहा कि जब हम किसी को जीवन नही दे सकते तो किसी के जीवन का अन्त करने का हमे क्या अधिकार है? बालमुनि के इन वचनो का भी गहरा प्रभाव पडा। फिर ग्रामानुग्राम विहार करते हुए, धर्म प्रचार करते हुए आपका पदार्पण नागौर मे हुआ। मुनिमण्डल के यहाँ आने से श्रीसघ मे अपार उत्साह दिखाई दिया। इस अवसर पर पर्युषण पर्व जैसी धर्माराधना होने लगी। यहाँ सार्वजनिक व्याख्यान भी हुए। मर्यादानुसार नागौर मे विराजने के पश्चात् कुचेरा की ओर विहार हुआ। कुचेरा मे कोरा सम्प्रदाय के श्री गौडीदासजी एव मोहनमुनिजी का स्नेह मिलने हुआ। कुचेरा से भोपालगढ़ होते हुए आपका पदार्पण जोधपुर हुआ। वि स २००० का वर्षावास पीपाड शहर मे हुआ। सम्पूर्ण वर्षावास काल मे अच्छा धर्मध्यान हुआ| श्री देवेन्द्र मुनिजी के अध्ययन का क्रम बराबर जारी रहा। इस वर्षावास मे कोठारी परिवार ने सेवा का काफी अच्छा लाभ लिया। कोठारी परिवार पूज्य अमरसिंहजी म की परम्परा का अनुयायी है, जिसके प्रतिनिधि श्री पुष्कर मुनिजी बड़े थे। संवत् २००१ : जोधपुर-वर्षावास (सन् १९४४) पीपाड शहर का वर्षावास समाप्त होने पर वहाँ से प्रस्थान कर आप अपने गुरुदेव के साथ बिलाडा पधारे। बिलाडा से नागौर होते हुए आपका आगमन कुचेरा हुआ। वर्षावास के लिए जोधपुर श्री सघ का अति दीर्घकाल से अनुरोध हो रहा था। गुरुदेव ने अनुकूल अवसर का अनुभव किया और साधु मर्यादानुसार स्वीकृति प्रदान कर दी। यहाँ यह स्मरणीय है कि जोधपुर, स्थानकवासी जैन मतावलम्बियो का केन्द्र माना जाता है। यहाँ दो-तीन हजार स्थानकवासी जैन परिवार है। साधु- साध्वियो के अध्ययन की भी समुचित सुविधा है। प प्रवर श्री सहस्रमलजी म अपने शिष्य समुदाय सहित जोधपुर पधारे थे, किन्तु अचानक अस्वस्थ्य हो जाने के कारण आपको भी सकारण जोधपुर मे ही वर्षावास करना पडा। आप प्रकृति से बहुत ही सरल व मिलनसार थे। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म के व आपश्री के सम्मिलित प्रवचन आहोर ठाकुर साहब की हवेली में होते। जिसमे हजारो की संख्या मे जैन-अजैन जनता उपस्थित होती थी। दीक्षोपरान्त श्री देवेन्द्र मुनिजी का किसी बड़े नगर मे प्रथम चातुर्मास था। यहाँ आपके अध्ययन की समुचित व्यवस्था रही और अध्ययन की गति भी उत्तम रही। Av८१ श्रद्धालोक के देवता os संवत् २००२ : नान्देशमा-वर्षावास (सन् १९४५) जोधपुर वर्षावास की सानन्द समाप्ति के पश्चात् जोधपुर से विहार हुआ और बाड़मेर क्षेत्र में धर्मप्रचार करते हुए मुनि मण्डल का आगमन मेवाड की ओर हुआ। ग्रामानुग्राम धर्मप्रचार करते हुए उदयपुर आगमन हुआ। भीषण ग्रीष्म का समय था। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म.गोचरी के लिए पधारे, पर चक्कर आ जाने से सीढ़ियों से नीचे गिर पड़े। सिर मे गहरी चोट आई। खून की धारा बह गई। काफी देर के बाद होश आया। लोगों ने डोली में बैठाकर स्थानक तक ले जाने का आग्रह किया, किन्तु गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. पैदल चलकर ही अपने स्थान पर पधारे। इस बीच सूर्यास्त हो चुका था, इसलिए आपने न तो दवा ही ली और न टॉके ही लगवाये। मुस्कराते हुए सब कष्ट सहन कर लिया। अपने गुरुदेव की कष्ट सहिष्णुता और मनोबल देखकर श्री देवेन्द्र मुनिजी म. को अपूर्व प्रेरणा मिली। वि. स. २००२ के चातुर्मास का लाभ नान्देशमा श्रीसंघ को मिला। स्मरण रहे नान्देशमा गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म की जन्म भूमि है। इस वर्षावास की उल्लेखनीय बात यह है कि वर्षावास काल में यहाँ श्रावको का प्रान्तीय सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन के अवसर पर श्री देवेन्द्र मुनिजी म. ने भी उल्लेखनीय कार्य किए। चातुर्मास समाप्त हुआ और विहार का दिन आ गया। इस दिन प्रान्त के लगभग दो हजार व्यक्तियों ने मुनि मण्डल को अश्रुपूर्ण विदाई दी। संवत् २००३ : धार-वर्षावास (सन् १९४६) नान्देशमा से विहार कर आप अपने गुरुदेव के साथ वाटी, भूताला आदि अन्य छोटे-छोटे गांवों में धर्मप्रचार करते हुए उदयपुर पधारे। उदयपुर के दोनों संघ जवाहर मण्डल और महावीर मण्डल, मुनि मण्डल की सेवा में श्रद्धा सहित आते रहे। महासती श्री सोहनकुँवरजी म. भी अपनी शिष्याओं सहित यही विराज रही थीं। कुछ दिन उदयपुर में रुककर आपने अपने दादा गुरु एवं गुरुदेव के साथ विहार कर दिया। भुवाना, देलवाड़ा और डबोक होते हुए मुनि मण्डल का आगमन बम्बोरा गाँव में हुआ। बम्बोरा महास्थविर श्री ताराचन्दजी म. की जन्म भूमि है। इसलिए मुनि मण्डल के यहाँ आगमन पर उत्साह का संचार होना स्वाभाविक ही था। लगभग पचास वर्षों के पश्चात् महास्थविरजी म का यहाँ आगमन हुआ था। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. प्रवचन फरमाने लगे। आपके प्रवचनों का बहुत ही ८२ Loks of ke श्रद्धालोक के देवता मे अनुकूल प्रभाव पडा और श्रावक संघ की भावना मे अत्यधिक अभिवृद्धि हुई। व्याख्यान प्रतिदिन बाजार के मध्य मे होते थे। दया, पौषध आदि धार्मिक क्रियाएँ भी काफी हुई, यहाँ के संघ ने मुनि मण्डल के समक्ष चातुर्मास के लिए निवेदन किया। साथ ही घोषणा की कि यदि आपश्री यहाँ वर्षावास करते है, तो हम लोग ग्यारह हजार दया, पौषध आदि करेगे। बम्बोरा से मुनि मण्डल प्रस्थान कर भिण्डर, कानोड, डूंगला, बडी सादडी, छोटी सादडी आदि ग्रामो मे धर्म जागृति की। सर्वत्र सघो मे अपार उत्साह रहा। तदनन्तर आपका प्रवेश मालव प्रदेश मे हुआ, जिसके लिए यह कहावत प्रसिद्ध है डग-डग रोटी, पग-पग नीर। मालव धरती गहन गम्भीर। मालवा का जन शरीर से सुन्दर, मन से उदार, बात करने मे चतुर, पर कोरा वाक्पटु ही नही होता, उसमे ज्ञान एव विवेक के साथ श्रद्धा और भक्ति भी होती है। आपका होली चातुर्मास मन्दसौर मे व्यतीत हुआ। मन्दसौर मे स्थानकवासी जैन धर्मावलम्बियो के लगभग तीन सौ परिवार है। इसे प्राचीन काल दशपुर के नामसे जाना जाता था, क्योकि यहाँ झनकुपुरा, खिलचीपुरा आदि दस पुरा है। होली चातुर्मास के पश्चात् मन्दसौर से विहार कर आपका आगमन जावरा हुआ। जावरा के भाइयो ने व्याख्यान वाणी का पर्याप्त लाभ लिया। जावरा से विहार कर रतलाम, बदनावर होते हुए अपने गुरुदेव के साथ आपका आगमन धार हुआ। उस समय वहाँ युवक हृदयसम्राट धनचन्द्रजी म. एव मूल मुनिजी म विराजमान थे। साथ-साथ व्याख्यान हुए। सघ का उत्साह प्रशसनीय रहा। धार से विहार कर नालछा होते हुए इन्दौर पधारे। इन्दौर मे धर्मदासजी म के स्थविर ताराचन्दजी म, पण्डित रत्न मुनि श्री किशनलालजी म , प्रसिद्ध वक्ता सौभाग्यमलजी म आदि मुनिराज विराजमान थे। धार से मुनि मण्डल के इन्दौर आगमन के अवसर पर श्री सौभाग्यमलजी म. अपनी शिष्य मण्डली व विशाल जनसमूह सहित अगवानी को पधारे। व्यापारिक दृष्टि से इन्दौर मुम्बई का बच्चा (मिनी बाम्बे) कहलाता है। इन्दौर मे सट्टा बजार की बुराइयो पर सारगर्भित एव प्रभावयुक्त प्रवचन हुए। परिमाणत. अनेक व्यक्तियो ने सट्टे का त्याग कर दिया। यहाँ सौभाग्यमलजी म पास एक वैरागी ने दीक्षा व्रत अगीकार किया। इसी के साथ यहाँ धार श्री सघ श्री पुष्कर मुनिजी म आदि मुनि मण्डल की सेवा मे वर्षावास की आग्रह भरी श्रद्धालोक के देवता key विनंती रखी। साधुमर्यादानुसार श्रीसंघ को धार वर्षावास की स्वीकृति प्रदान कर दी गई और चातुर्मासार्थ धार पधारे। धार की चित्रकला सुप्रसिद्ध है। वहाँ मिट्टी की ऐसी-ऐसी मूर्तियाँ बनती है, जिनकी कीमते हजारों तक पहुँचती है। पर्दूषण के दिनों में धार के चौदह तालाबों पर प्रहरी नियुक्त कर दिए जाते थे। मछली पकड़ने पर कठोर प्रतिबंध रहता था। धर्माराधना के साथ यह चातुर्मास समाप्त हुआ। संवत् २००४ : नासिक-वर्षावास (सन् १९४७) वर्षाकाल की समाप्ति के पश्चात् आपका विहार अपने गुरुदेव के साथ धूलिया की ओर हुआ। नालछा, माण्डव, सिरपुर आदि ग्राम-नगरों में धर्मप्रचार करते हुए धूलिया पधारे, यहाँ पर लाभचन्द्रजी म.एवं चौथमलजी म.से स्नेह मिलन हुआ। यहीं विदुषी महासती सुमति कुँवरजी म. ने भी दर्शन किए। महाराष्ट्र की भूमि मे पधारकर यहाँ के विभिन्न ग्राम-नगरों में विचरण किया। इस अवधि में एक स्थान पर नासिक का श्रीसंघ आपकी सेवा में उपस्थित हुआ और वर्षावास हेतु भावभरी विनती की। नासिक श्री संघ का वर्षावास हेतु बहुत ही आग्रह भरा अनुरोध स्वीकार किया और यह वर्षावास नासिक में किया। नासिक के समीप ही भारत का सुप्रसिद्ध तीर्थ स्थल 'पंचवटी' है, जहाँ से कहते है कि रावण ने सीता का अपहरण किया था, तब राम व्याकुल होकर पशु- पक्षियों से सीता के समाचार पूछते थे। आज भी वहाँ उत्तरकालवर्ती वट के पॉर्च वृक्ष खडे है। इस वर्षावास मे श्री देवेन्द्र मुनिजी म. अस्वस्थ हो गए, परिणामस्वरूप नासिक मे नौ मास पर्यन्त रुकना पड़ा। समुचित उपचार होने पर श्री देवेन्द्र मुनिजी को स्वास्थ्य लाभ हुआ। संवत् २००५ : घाटकोपर-वर्षावास (सन् १९४८) श्री देवेन्द्र मुनिजी के स्वस्थ होने पर नासिक से विहार कर महाराष्ट्र के ही विभिन्न ग्राम नगरों मे विचरण कर धर्म प्रचार करते रहे, फिर मुम्बई पधारे। मुम्बई स्थानकवासी जैन मतावलम्बियों का एक सुदृढ़ केन्द्र है, जहाँ वर्तमान में चालीस से भी अधिक स्थानक है। उल्लेखनीय है कि इनमे से प्रत्येक में प्रतिवर्ष चातुर्मास रहता है। मुम्बई के 'डालर एरिया' के रूप मे प्रसिद्ध घाटकोपर का संघ इस वर्ष इस रूप में सौभाग्यशाली रहा कि परदादा गुरुदेव ताराचन्द्रजी म.दादा गुरुदेव श्री पुष्कर ८४ ဖြင့် Movie श्रद्धालोक के देवता मुनिजी म तथा गुरुदेव श्री देवेन्द्र मुनिजी म आदि के वर्षावास की स्वीकृति प्राप्त हुई। बडे ही उत्साह जनक वातावरण मे इस वर्ष का यह वर्षावास सम्पन्न हुआ। संवत् २००६ : चूड़ा-वर्षावास (सन् १९४९) घाटकोपर वर्षावास समाप्त होने पर महास्थविर श्री ताराचन्दजी म. श्री पुष्कर मुनिजी म. , श्री देवन्द्र मुनिजी म आदि मुनि मण्डल का घाटकोपर से विहार हुआ। घाटकोपर से पनवेल आगमन हुआ। कुछ दिन यहाँ ठहरे और पुन मुम्बई पधारे। विभिन्न उपनगरो को पावन करते हुए मुनि मण्डल का कादावाडी पदार्पण हुआ। वहाँ उपाध्याय प.श्री प्यारचन्दजी म तथा श्री पूनमचन्दजी म. आदि सन्तो का मिलाप हुआ। परीक्षा की समाप्ति के पश्चात् कादावाडी से घाटकोपर पधारे। जहाँ आत्मार्थी श्री मोहन ऋषिजी म आदि ठाणा १७ का स्नेह-सम्मिलन हुआ। यहाँ स्थानकवासी जैन समाज के सगठन के सम्बन्ध मे भी उपयोगी चर्चा हुई। इसके साथ ही संगठन पर गम्भीर विचार विनिमय हुआ और आगामी सम्मेलन के लिए योजना पर विचार किया गया तथा पचसूत्री योजना प्रस्तुत की गई। मुम्बई के पश्चात् आपने नासिक सघ के आग्रह को मानकर अपने गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी के साथ मुम्बई से नासिक की ओर प्रस्थान किया। कुछ दिन नासिक मे ठहर कर मुनिद्वय गजपंथा पधारे। गजपथा दिगम्बर जैन समाज का महान तीर्थ है। यहॉ दिगम्बराचार्य श्री शान्तिसागरजी म का स्नेह मिलन हुआ। गजपथा से विहार कर वणी, डिंडोरी होते हुए वासदा पधारे। वासदा मे स्थानकवासी एवं मदिरमार्गी समाज के लगभग ३५ -३६ परिवार है। दो दिन यहाँ विराजना हुआ। व्याख्यान के समय बाजार बन्द रहते थे। जैन जैनेतर सभी ने प्रवचन श्रवण का लाभ लिया। वासदा से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर गर्म जल के कुण्ड है। आप वासदा से विहार कर यहाँ पधारे। वासदा के श्रावक भी यहाँ आ गए। यहॉ दिन मे विश्राम कर दोपहर पश्चात् गुजरात की ओर प्रस्थान किया। ग्रामानुग्राम धर्म प्रचार करते हुए मुनिद्वय नवसारी पधारे, जहाँ महास्थविर श्री ताराचन्द्रजी म. विराजित थे। नवसारी मे काठियावाड के शिष्ट मण्डल का आगमन हुआ। जिसने दया-धर्म विरोधी प्रचार को रोकने के लिए आग्रह किया। शतावधानी मुनि श्री पूनमचन्दजी म श्री डूंगरसिंहजी म आदि ठा १० से सूरत, अकलेश्वर, भडौच होते हुए आप भी इनके साथ खम्भात पधारे, जहाँ खंभात सम्प्रदाय के श्री ८५ } se श्रद्धालोक के देवता jokes खोड़ाजी एवं हर्षदमुनिजी से स्नेह-मिलन हुआ। इसके पश्चात् आप अपने गुरुदेवों के साथ लींबड़ी होते हुए वर्षावास हेतु चूड़ा पधारे और वर्षावास चूड़ा किया। श्री देवेन्द्र मुनिजी का अध्ययन क्रम बराबर चलता रहा। अब श्री देवेन्द्र मुनिजी म. अपने गुरुदेव के कार्यों में पूर्ण रूप से सहयोग करने लगे थे। चर्चाओं में भी भाग लेने लगे थे। संवत् २००७ : नान्देशमा-वर्षावास (सन् १९५०) वर्षावास की समाप्ति के पश्चात् चूड़ा से विहार कर आप लींबडी पधारे और लगभग दस दिन लींबड़ी में विराजने के पश्चात् बढ़वाण शहर पधार गए, जहाँ श्री पूनमचन्दजी म. व श्री नवीन मुनिजी म. का मिलाप हुआ। यहाँ सार्वजनिक प्रवचन भी हुए। बढ़वाण से विहार कर जोरावर नगर होते हुए सुरेन्द्र नगर पधारे। सुरेन्द्र नगर में सिद्धान्त शाला का निरीक्षण किया। सुरेन्द्र नगर में मोरबी, राजकोट आदि संघों की प्रार्थनाएं आने लगीं। सुरेन्द्र नगर काठियावाड से गुजरात की ओर विहार कर लखतर होते हुए वीरमग्राम पधारे। यहाँ २५० स्थानकवासी जैन परिवार हैं। यहाँ दरियापुरी सम्प्रदाय के पंडित मुनि श्री हर्षचन्दजी म. से मिलाप हुआ। वीरमग्राम से विहार कर साणंद होते हुए अहमदाबाद पधारे। कुछ दिन अहमदाबाद में रुककर हिम्मतनगर होते हुए ईडर पधारे। ईडर में विदुषी महासती शीलकुँवरजी ने अपनी शिष्याओं के साथ अगवानी की। यहाँ से विहार कर घोडादर पधारे। यहाँ से लेकर उदयपुर तक सभी गॉव अरावली पर्वत उपत्यका में बसे हुए है। मार्ग बडा ही असुविधाजनक है। लम्बा विहार कर मुनि मण्डल का पदार्पण बाघपुरा हुआ। बाघपुरा में उस समय महासती श्री सोहनकुंवरजी महासती श्री शंभुकुँवरजी आदि ठा. १९ विराजमान थीं। जिस समय मुनि मण्डल का बाघपुरा पदार्पण हुआ उस समय सारे झालावाड़ वाकल प्रदेश के दर्शनार्थी उमड़ पड़े। जागीरदारों ने भी व्याख्यान का लाभ उठाया। वाघपुरा से विहार कर उदयपुर होते हुए सेरा प्रान्त में पदार्पण हुआ। पदराड़ा में पॉच सम्प्रदायों के प्रधान आचार्य श्री आनन्दऋषि जी म. से मिलाप हुआ। यहाँ उनसे श्रमण संघ के सम्बन्ध मे गम्भीर विचार विमर्श हुआ। श्री देवेन्द्र मुनिजी म.ने भी इस चर्चा मे भाग लिया। फिर वर्षावास हेतु नान्देशमा पदार्पण हुआ। काफी समय के पश्चात् गुरु भगवंतो का यहाँ आगमन हुआ था और वर्षावास भी। इसलिए जनता में अच्छा उत्साह था। ८६ စင် Jeet Kok श्रद्धालोक के देवता संवत् २००८ : सादड़ी-वर्षावास (सन् १९५१) वर्षावास समाप्त होने पर नान्देशमा से विहार कर अपने गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म के साथ आप राणकपुर मार्ग से सादड़ी की ओर अग्रसर हुए। मार्ग मे मेवाड के तृषित श्रद्धालुओ को जिनवाणी की अनुपम सुधा से तृप्त भी करते रहे। महास्थविर श्री ताराचन्दजी म मेवाड मे साध्वियो को दर्शन देने के लिए मेवाड मे रुक गए। महास्थविरजी म मेवाड मे साध्वी वर्ग को दर्शन देकर सादडी होते हुए नाडोल पधारे। रात्रि के आठ बज चुके थे। एकाएक महास्थविर श्री ताराचन्दजी म के मुंह पर लकवे का आक्रमण हो गया। प्रात काल जैसे- तैसे विहार प्रारम्भ किया। इस समय श्री पुष्कर मुनिजी एव श्री देवेन्द्र मुनिजी म बगडी (सज्जनपुर) विराज रहे थे। जैसे ही समाचार मिले, वैसे ही दोनो बगडी से उग्र विहार कर महास्थविरजी म की सेवा मे जवाली पहुंचे। पाली सघ को भी समाचार मिल गए थे। वह भी डॉक्टरो को लेकर सेवा मे उपस्थित हो गया। जवाली से विहार कर सभी मुनिराजो का पदार्पण पाली हुआ। पाली मे धूमधाम से महावीर जन्म कल्याणक मनाया गया। महास्थविरजी म की चिकित्सा चल रही थी। किन्तु रोग पूर्णतः शान्त नही हुआ था। इसलिए पाली से विहार कर जोधपुर पधारे। जोधपुर पधारने पर भट्टारकाचार्य वैद्यराज यति श्री उदयचन्दजी चाणोद गुरा साहब ने चिकित्सा की। चौथे दिन रोग मुक्ति हो गई। गुरा साहब की हवेली मे पर्याप्त समय विराजने के पश्चात् ज्येष्ठ मास मे पाली की ओर विहार हुआ। जोधपुर, सिवाना, समदडी, पाली, सादडी आदि सघो की ओर से वर्षावास हेतु विनतियॉ होने लगीं। इस वर्ष सादडी संघ का भावभीना अनुरोध वर्षावास हेतु स्वीकार कर लिया गया। यह वह समय था, जब सघ एकता की तीव्र आवश्यकता पुन गम्भीरता के साथ अनुभव की जाने लगी थी और इस दिशा मे प्रबल प्रयत्न होने लगे थे। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म की प्रेरणा से प्रोत्साहित होकर सादडी सघ वृहत् साधु सम्मेलन की तैयारियो मे तत्परता पूर्वक जुट गया। इस कार्य मे श्री देवेन्द्र मुनिजी म की भूमिका भी विशेष उल्लेखनीय रही। सादड़ी का यशस्वी चातुर्मास पूर्ण हुआ। श्री देवेन्द्र मुनिजी को साहित्य रत्न की परीक्षा देनी थी। इसलिए श्री पुष्कर मुनिजी, श्री देवेन्द्र मुनिजी आदि सादडी से विहार कर जोधपुर पधारे। परीक्षा सम्पन्न होने के पश्चात् जोधपुर से विहार कर आप आहोर पधारे। आहोर मे महास्थविरजी म से मिलन हुआ। आहोर से जालोर पधारे। इस समय ဝင် ८७ श्रद्धालोक के देवता just के विहार में गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी एवं श्री देवेन्द्र मुनिजी ने स्थान-स्थान पर संघ एकता को अपना मुख्य विषय बनाकर इसी विषय का प्रचार किया, लोगों को समझाया। जहाँ-जहाँ भी आप पधारे, संगठन का शंखनाद कर एकता का घोष किया। मुनिद्वय के उपदेशो का अच्छा प्रभाव हुआ और साधु-सम्मेलन की भूमिका सुदृढ़ हुई। जालोर से विहार कर मोकलसर, सिवाना, समदडी, आईपुरा होते हुए साण्डेराव पधारे। साण्डेराव से फालना होकर सादड़ी सम्मेलन में पधारे। वृहत् साधु सम्मेलन सादड़ी अखिल भारतीय स्थानकवासी जैन वृहत् साधु सम्मेलन अक्षय तृतीया के शुभ दिन प्रारम्भ हुआ। श्रमणगण संगठन हेतु एकत्रित हुए। जनता भी अपार संख्या में सादड़ी में उमड़ पड़ी। लगभग पचास हजार नर-नारी एकता के इस पुनीत यज्ञ का समर्थन करने के लिए सादड़ी के प्रांगण में उपस्थित हो चुके थे। नव्य-भव्य भवन लोकाशाह गुरुकुल मे सभाएँ होती थीं। आगुन्तकों के लिए लोकाशाह नगर का निर्माण किया गया था। स्थानकवासी सम्प्रदाय की वरिष्ठ विभूतियाँ वहाँ उपस्थित थीं। उस विशाल मुनि मण्डल में श्री देवेन्द्र मुनिजी म. के दीक्षा गुरु महास्थविर श्री ताराचन्द्रजी म. सर्वाधिक ज्येष्ठ सन्त थे। मुनिराजों की सभा में शान्ति से कार्य प्रारम्भ हुआ। बीच-बीच में वाद-विवाद के साथ उत्तेजना का वातावरण भी बनता, पर शान्ति और शिष्टता के साथ। अन्ततः "वर्धमान श्रमण संघ" की स्थापना हुई। विभिन्न सम्प्रदायों का सरिताओं की तरह श्रमण संघ के महासागर में विलीनीकरण हो गया। पदवीधारी मुनिराजों ने अपनी-अपनी पदवियों का सहर्ष त्याग कर दिया। तत्पश्चात् वयोवृद्ध जैनागम वारिधि श्री आत्मारामजी म.को आचार्य पद, आगमज्ञ श्री गणेशीलालजी म. को उपाचार्य पद व पण्डित श्री आनन्दऋषिजी म. को प्रधानमंत्री पद प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त सोलह विद्वान मुनिराजों का मन्त्रिमण्डल बना, जिसमे श्री पुष्कर मुनिजी म. का नाम भी सम्मिलित किया गया। अपनी विलक्षण प्रतिभा, सूझ-बूझ, संगठन-शक्ति और विचार गाम्भीर्य से आपने सम्मेलन की सफलता हेतु जो नेतृत्व प्रदान किया, वह ऐतिहासिक महत्व का अविस्मरणीय प्रसंग रहेगा। इस साधु सम्मेलन के अवसर पर श्री देवेन्द्र मुनिजी म. को अनेक वरिष्ठ मुनिराजों से प्रथम बार मिलने का और मार्गदर्शन प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर मिला। इस सम्मेलन मे आपकी भूमिका भी विशेष उल्लेखनीय रही। श्री देवेन्द्र ८८ श्रद्धालोक के देवता मुनिजी ने समवय मुनियो मे एकता के लिए शखनाद किया और सम्मेलन की सफलता विषयक विचार-विमर्श विस्तार से किया। इसी अवसर पर आपने अपने गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म के सम्मेलन के अवसर पर लिखे गए आठ दस लेखो का भी सफलता पूर्वक सम्पादन किया। श्री देवेन्द्र मुनिजी म कविवर श्री अमरचन्दजी म. श्री सुरेश मुनिजी म , श्री विजयमुनिजी म शास्त्री आदि मुनिराजो के जैन प्रकाश व अन्य पत्र-पत्रिकाओ मे प्रकाशित लेख देखते और उनका अध्ययन करते तो मन मे विचार उत्पन्न होता "यदि परिश्रम किया जाये, तो इस प्रकार का लेखन मै भी कर सकता हूँ।" किन्तु आपने अपने इन विचारो को कभी किसी के भी सम्मुख प्रकट नही किया। गुरुदेव के लेखो के सम्पादन करने के अवसर से आपको स्वत. ही ऐसा लगने लगा कि आपके लेखन का योग भी सन्निकट ही है। अध्ययन और लेखन के प्रति तो आपकी रुचि प्रारम्भ से ही रही है। महावीर जन्म कल्याण के अवसर पर अहिंसा विषय पर जैन प्रकाश मे श्री देवेन्द्र मुनिजी म. की रचना का प्रकाशन हुआ। यह आपकी प्रथम प्रकाशित रचना है। जिससे आपको और भी प्रोत्साहन मिला। संवत् २००९ : सिवाना - वर्षावास (सन् १९५२) सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इस वर्ष के वर्षावास के लिए सिवाना सघ को स्वीकृति प्रदान कर दी गई थी। इसलिए सादडी से विहार कर फालना, साण्डेराव होते हुए बाडमेर जिले की जनता को जिनवाणी का पान कराते हुए मुनि मण्डल का सिवाना वर्षावास हेतु पदार्पण हुआ। चातुर्मास मे अत्यधिक धर्मध्यान हुआ। विशेष उल्लेखनीय बात यह रही कि वर्षावास की अवधि मे मदार (उदयपुर) निवासी ओसवाल जातीय भेरुलालजी ने बासठ वर्ष की अवस्था मे कार्तिक शुक्ला नवमी के दिन दीक्षा ग्रहण की। भेरुमुनिजी बडे ही सेवाभावी, सरल प्रकृति के तपस्वी सन्त थे। यह वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०१० : जयपुर-वर्षावास (सन् १९५३) सिवाना का वर्षावास समाप्त होते ही सोजत की ओर विहार कर दिया। इन दिनो सोजत मे मन्त्रिमण्डल की अत्यावश्यक बैठक आयोजित होने वाली थी। गुरुदेव श्रद्धालोक के देवता Desk Me श्री पुष्कर मुनिजी म.की उपस्थिति इस बैठक में अनिवार्य अनुभव की जा रही थी। सोजत में पण्डित श्री समरथमलजी म., व्याख्यान वाचस्पति श्री मदनलालजी म.तथा कविवर श्री अमरचन्दजी म विशेष रूप में आमंत्रित किए गए थे। उपाचार्य श्री गणेशीलालजी म.की अध्यक्षता में मंत्री मुनि सम्मेलन का कार्य हुआ। सचित्ता-चित्त सम्बन्धी निर्णय सोजत में हुआ। प्रान्तवार मंत्रियों का कार्य-विभाजन किया गया। तदनुसार श्री पुष्कर मुनिजी म.मेवाड और पचमहाल प्रान्त के मंत्री नियुक्त हुए। सोजत से विहार कर मुनि मण्डल का पदार्पण उदयपुर हुआ। यहाँ बाल ब्रह्मचारिणी विदुषी महासती श्री शीलकुंवरजी म.के पास विगत वर्षों से अभ्यास करती हुई वैराग्यवती बहने श्री चन्दनबालाजी एव श्री मगनबाई की दीक्षा का कार्यक्रम था। दीक्षा सानन्द सम्पन्न कर श्री पुष्कर मुनिजी म. , श्री देवेन्द्र मुनिजी म.आदि का उदयपुर से विहार कर वाटी पदार्पण हुआ। जहाँ पुनः महासती श्री शीलकुंवरजी की सेवा में खम्माकुँवरजी को दीक्षा दी गई। इस दीक्षा महोत्सव मे पण्डित श्री अम्बालालजी म. ठा. २ से पधारे। तत्पश्चात् आपका ब्यावर आगमन हुआ। इस समय ब्यावर मे महास्थविरजी म.एवं स्वामी हजारीमलजी म.आदि सन्त विराजमान थे। यहीं जयपुर संघ के मंत्री गुलाबचन्दजी बोथरा आदि वर्षावास की अनुरोध भरी विनती लेकर शिष्ट मण्डल के साथ सेवा में उपस्थित हुए। साधु-मर्यादानुसार स्वीकृति दे दी गई। इसके पश्चात् ब्यावर से नसीराबाद पधारे। यहाँ मुनि श्री पन्नालालजी म. से मिलन हुआ। नसीराबाद से अजमेर पहुंचे। वहाँ श्रद्धेय हस्तीमलजी म एवं कवि श्री अमरचन्दजी म., पं सिरेमलजी म.आदि सन्त विराजित थे। आपसे में मिलन हुआ और सामूहिक व्याख्यान भी हुए। यहाँ से विहार कर किशनगढ़ होते हुए आप अपने गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. के साथ वर्षावास हेतु जयपुर पधारे। जयपुर संघ विगत कई वर्षों से आपके चातुर्मास के लिए लालायित था। यह चातुर्मास अत्यन्त उत्साहवर्द्धक रहा। चातुर्मास की समाप्ति पर एक दुःखद घटना भी उल्लेखनीय है। वह यह कि नवदीक्षित श्री भेरुमुनिजी म. का मार्गशीर्ष शुक्ला में अचानक स्वर्गवास हो गया। श्री देवेन्द्र मुनिजी म. की साहित्यिक प्रतिभा के विकास की दृष्टि से जयपुर वर्षावास तथा बाद का समय विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। यहाँ श्रद्धेय श्री हस्तीमलजी म.की प्रेरणा से 'जिनवाणी' मासिक की रचनाओ का सम्पादन किया जो जिनवाणी में प्रकाशित भी उसी रूप में हुई, जिस रूप में सम्पादन किया था। इसके पश्चात् आपने अपने गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. की पुस्तकों का सम्पादन ९० श्रद्धालोक के देवता करना आरम्भ किया। प्रारम्भ मे निम्नाकित पुस्तको का सम्पादन का प्रकाशित करवाया (१) जिन्दगी की मुस्कान (४) जिन्दगी की लहरें (२) साधना का राजमार्ग (५) संस्कृति के स्वर (३) ऊँ कार एक अनुचिंतन गुरुदेव के आदेश से फिर आपने अपने स्वयं के नाम से भी लेखन कार्य आरम्भ किया। इस प्रकार जयपुर से श्री देवेन्द्र मुनिजी म की साहित्यिक यात्रा का श्री गणेश हुआ। प्रथम रचना के प्रकाशन के पश्चात् रुचि और जागृत हुई। आपका लेखन स्वांत सुखाय है। इसके बावजूद आपका लेखन आपके अनुयायियो को ही नही विद्वानो के लिए भी प्रेरक और मार्गदर्शक है। आपके लेखन के मुख्य प्रेरक गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. कविवर मुनिश्री अमरचन्दजी म , श्री हस्तीमलजी म रहे। आप सभी का यही कहना था कि खूब पढ़ो, खूब बढ़ो, खूब लिखो। किन्तु स्मरण रखना, अपना लेखन स्थानकवासी मत के विपरीत नहीं होना चाहिए। आप इस बात को सदैव स्मरण भी रखते है। संवत् २०११ : दिल्ली-वर्षावास (सन् १९५४) जयपुर से विहार कर आप अलवर पधारे। अलवर के भाइयो ने आपका मुक्त हृदय से भावभरा स्वागत किया। व्याख्यान वाचस्पति श्री मदनलालजी म भी अपने शिष्य-समुदाय सहित अलवर पधारे। अच्छा स्नेह मिलन रहा। महासती श्री कैलाशकुंवरजी म व जैन सिद्धान्ताचार्य कुसुमवतीजी म भी वहॉ विराजमान थी। अलवर से विहार कर फिरोजपुर, नगीना होते हुए सोना पधारे। सोना मे गॉव के मध्य एक कुण्ड है, जिसमे सदैव गर्म पानी रहता है। आगे गुडगाँव और महरौली होते हुए आप दिल्ली पधारे। दिल्ली स्थानकवासी जैनियो का एक बड़ा केन्द्र है। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म श्री देवेन्द्र मुनिजी म आदि दरियागज से सब्जी मंडी पधारे। प्रवचन होने लगे। उन्हीं दिनो कविरत्न स्नेहमूर्ति श्री अमरचन्दजी म भी पधारे। सघ के अत्यधिक आग्रह पर चांदनी चौक सघ को वर्षावास हेतु स्वीकृति दी गयी। इसी अवधि मे गुरुदेव श्री पुष्करमुनिजी म का प्रोस्टेट ग्रन्थि का सफलतापूर्वक ऑपरेशन हुआ। चांदनी चौक वर्षावास समाप्त होने पर वहाँ विहार कर नई दिल्ली पधारे। वह दिन ४ दिसम्बर का दिन था, जब श्री श्रद्धालोक के देवता मुनिजी एवं श्री देवेन्द्र मुनिजी दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु के निवास स्थान पर पधारे थे। पं. नेहरु ने मुनिद्वय की ससम्मान अगवानी की। इस अवसर पर पं. नेहरु के अवलोकनार्थ पूर्वाचार्य धर्मवीर जीतमलजी म. की कलाकृतियाँ प्रस्तुत की, जिन्हें देखकर वे प्रसन्न व प्रभावित हुए। भिन्न क्षेत्र के नेताओं से अनेक महत्वपूर्ण ज्वलंत प्रश्नों पर लगभग एक घंटे तक विचार विनिमय हुआ। इस अवसर पर श्रीमती इंदिरा गांधी और श्री संजय गांधी भी उपस्थित थे। अन्त में पं. नेहरू, श्रीमती गांधी एवं श्री संजय गांधी ने मुनिद्वय को करबद्ध नमस्कार मुद्रा सहित श्रद्धापूर्वक बिदा किया। इस चर्चा मे युवा मुनिश्री देवेन्द्र मुनिजी म. ने भी बीच-बीच में उपयोगी विचार प्रस्तुत किये थे। युवा मुनि के विचारों को सुनकर पंडित नेहरु और श्रीमती गांधी विशेष प्रभावित हुए थे। संवत् २०१२ : जयपुर-वर्षावास (सन् १९५५) वर्षावास की समाप्ति के पश्चात् कुछ समय तक दिल्ली के उपनगरों में विचरण कर धर्म प्रचार किया और फिर दिल्ली से प्रस्थान कर फिरोजपुर पहुंचे। यहाँ पर जैनियों का एक भी परिवार न होने के कारण कुछ कठिनाई महसूस होने लगी, लेकिन संयोग से भारत के सुप्रसिद्ध उद्योगपति सेठ रामकृष्णजी डालमिया की धर्मपत्नी श्रीमती दिनेश नन्दिनी ने आकर आपके दर्शन किये। इस उपलक्ष में उन्होंने मिष्ठान्न की प्रभावना की, जिससे सारे शहर का वातावरण ही बदल गया। फिरोजपुर से विहार कर श्री पुष्कर मुनिजी म. ,श्री देवेन्द्र मुनिजी म. आदि सन्त पलवल, वनचारी, भोडल, कोसी, वृन्दावन, मथुरा आदि ग्राम नगरों में धर्मप्रचार करते हुए आगरा पधारे। उस समय आगरा में मंत्री मुनि श्री पृथ्वीचन्दजी म.गणी श्री श्यामलालजी म. , तपस्वी श्री श्रीचन्दजी म. तथा श्री कीर्तिमुनिजी म. आदि सन्त विराजमान थे। सिकन्दरा तक लोहा मंडी, आगरा के श्रावकगण स्वागतार्थ सम्मुख आए। समारोह पूर्वक आपका आगरा नगर में प्रवेश हुआ। व्याख्यानों का ठाठ लग गया। आगरा से मानपाड़ा पधारे, जहाँ साहित्यरत्न मुनि श्री सुरेशजी से मिलाप हुआ। यह समागम बड़ा ही आनन्ददायक रहा। भरतपुर होते हुए आप जयपुर पधारे। जयपुर संघ महास्थविरजी म. के स्थिरवास की प्रार्थना करने लगा। इस पर महास्थविरजी म. ने चातुर्मास तक की स्वीकृति प्रदान कर दी। जयपुर का यह वर्षावास अत्यन्त आनन्ददायक रहा। सौभाग्य से उस वर्ष कविवर श्री अमरचन्दजी म. स्वामी श्री हजारीमलजी म , स्वामी श्री फतेहचन्दजी म. , पंडित मधुकर मुनिजी, ९२ Kuwar EKASAMAY , dosts श्रद्धालोक के देवता पडित कन्हैयालालजी म 'कमल' आदि का वर्षावास भी जयपुर मे हुआ। समस्त मुनिमण्डल ने एक ही स्थान पर लाल भवन मे वर्षावास सम्पूर्ण किया। श्री देवेन्द्र मुनिजी म के लिये यह वर्षावास विशेष लाभकारी रहा। विद्वान मुनिराजों के सान्निध्य मे साहित्यिक विकास की नई प्रेरणा और मार्गदर्शन मिला। ये सभी मुनिराज अपने- अपने क्षेत्र मे विशिष्ट विद्वान थे। लेखन-सम्पादन का भी अच्छा अवसर मिला। श्री देवेन्द्र मुनिजी की प्रतिभा का भी इन मुनियो को आभास हुआ। सभी ने इस बात पर हर्ष और सन्तोष व्यक्त किया कि साधु समुदाय मे एक प्रतिभा सम्पन्न सन्त की वृद्धि हुई। निश्चय ही भविष्य उज्ज्वल है। संवत् २०१३ : जयपुर-वर्षावास (सन् १९५६) भीनासर मे सम्मेलन का आयोजन किया गया था। वहाँ सम्मेलन की तैयारियाँ चल रही थीं। सम्मेलन को लक्ष्य मे रखकर जयपुर वर्षावास की समाप्ति के पश्चात् जयपुर से विहार हो गया। एकाएक श्री देवेन्द्र मुनिजी म अस्वस्थ हो गये, तो पुन. जयपुर आना पडा। स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवधान उत्पन्न होने पर स २०१३ का वर्षावास भी जयपुर मे ही सकारण करना पड़ा। परमविदुषी महासती श्री सोहन कुँवरजी म. महासती श्री पुष्पवतीजी म. महासती श्री प्रभावतीजी म आदि सतीवृन्द भी चातुर्मास मे वही रही। उस अवधि मे एक शोकास्पद घटना हुई। आपके दादागुरु महास्थविर श्री ताराचन्द्रजी म. एकाएक गभीर रूप से रुग्ण हो गए। श्रमण सघ के व्याख्यान वाचस्पति श्री मदनलालजी म भी इस समय वही विद्यमान थे। परम श्रद्धेय महास्थविरजी म पर छ वर्ष पुराने रोग पक्षाघात ने पुन आक्रमण कर दिया। इसका आभास उस समय हुआ, जब गोचरी के समय जल प्राप्ति हेतु आपने अपना हाथ बढ़ाया, किन्तु वह रिक्त होकर निढाल हो गया। "अब मेरी आयुष्य का अन्त समीप है, प्रधानमंत्रीजी को बुलवाओ और सन्थारा कराओ।" ये वे शब्द थे, जिनका उच्चारण महास्थविरजी म कठिनाई के साथ कर सके। उन्होने अपना अतिम उपदेशात्मक सदेश प्रदान किया "सभी पारस्परिक सहयोग की भावना के साथ व्यवहार करना और मेरे प्रयत्नो को यथा सम्भव निर्मल बनाए रखना। त्याग-विराग से अपने जीवन को उज्ज्वल से उज्ज्वलतर बनाते रहो।" परमविदुषी महासती श्री सोहन कुंवरजी म , महासती श्री प्रभावतीजी म आदि भी इस समय उपस्थित हो गई और महास्थविरजी म ने सभी से “खमत ९३ श्रद्धालोक के देवता Met खमावणा" की। श्री मदनलालजी म.ने सन्थारा करा दिया। शुद्ध भाव से प्रतिक्रमण पाठ भी किया, जिसे सुनकर गदगद् भाव से आपने टिप्पणी की, "प्रतिक्रमण चोखो सुणायो।" महास्थविरजी की जनमानस आल्हादकारिणी वाणी धारा का यही अंतिम छोर था। जिह्वा लड़खड़ाने लगी। श्वास असामान्य हो गया। चेतना क्षीण होने लगी। कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी का प्रभात, सूर्योदय पूर्व पाँच बजे का ब्रह्म मुहूर्त, महास्थविरजी की म.के नयनों से एक आलोक विकीर्ण हुआ और सब कुछ शान्त सब कुछ समाप्त। गुरु वियोग जन्य हा-हाकार से समग्र वातावरण संकुल हो गया। उल्लेखनीय है कि पूज्य महास्थविरजी म. ने अपने अन्तेवासी शिष्य श्री पुष्कर मुनिजी म के समक्ष लगभग छः माह पूर्व ही इस भविष्य का मार्मिक संकेत कर दिया था। आज महास्थविरजी म. हमारे मध्य नहीं है, किन्तु धर्म की समृद्धि, मुनिजनों का आत्मोत्कर्ष आदि सब आपके ही आशीर्वादों से सम्भव हो रहा है। संवत् २०१४ : उदयपुर-वर्षावास (सन् १९५७) वर्षावास की समाप्ति के पश्चात् जयपुर से विहार हुआ। श्री देवेन्द्र मुनिजी म. को साहित्य रत्न की परीक्षा में सम्मिलित होना था। इसलिये जयपुर नगर के बाहर विराजे। उस समय पंजाब केसरी श्री प्रेमचन्दजी म.जो महास्थविरजी म.के गुरुभाई के शिष्य थे तथा कविरत्न उपाध्याय श्री अमरचन्दजी म. भी जयपुर पधारे और श्री पुष्कर मुनिजी, श्री देवेन्द्र मुनिजी को गुरुवियोगजनित दुःख को दूर करने हेतु सांत्वना दी। अत्यधिक आग्रह होने पर मुनिद्वय पुन. जयपुर के लाल भवन पधारे। साहित्य रत्न की परीक्षा समाप्त होते ही जयपुर से प्रस्थान कर हरमाड़ा पधारे। हरमाडा में स्वामीजी श्री फतेहचन्दजी म एवं पं मुनि श्री कन्हैयालालजी म. 'कमल' से मिलाप हुआ। हरमाड़ा से विहार कर मदनगंज-किशनगढ़ होते हुए अजमेर पधारे। इधर श्रमण संघ के उपाचार्य श्री गणेशीलालजी म. एवं उपाध्याय श्री हस्तीमलजी म पुष्कर पधार रहे थे। अतः आप दोनों महापुरुषो के स्वागतार्थ पुष्कर पधारे और पुष्कर से सभी सन्त रत्नों का भव्य स्वागत समारोह के साथ अजमेर नगर में प्रवेश हुआ। संघ की समस्याएँ पाली प्रकरण को लेकर बढ़ रही थीं। उसे सुलझाने के लिए एक ३ सदस्यीय समिति बनाई गई, जिसमे उपाचार्य श्री उपाध्यायजी एवं श्री पुष्कर मुनिजी को सम्मिलित किया गया था। उसी समय कांफ्रेस के अध्यक्ष विनयचन्द भाई के नेतृत्व मे कांफ्रेंस का एक शिष्टमण्डल ९४ A श्रद्धालोक के देवता उपस्थित हुआ। विचार विमर्श के पश्चात् समिति ने निर्णय दिया, जिसके अनुसार सन्त-सतियो को निर्देश दिया गया। अजमेर से विहार कर अपने गुरुदेव तथा दो अन्य मुनिराजो के साथ विजयनगर पधारे, जहाँ मुनिश्री पन्नालालजी म से मिलन हुआ। विजयनगर से महासती श्री अभयकुँवरजी म को दर्शन देने भीम पधारे और यही पर मरुधर केसरजी म से मिलाप हुआ। भीम से मरुधर केसरी म और आप सबका साथ-साथ विहार देवगढ़ तक हुआ। देवगढ़ से श्री पुष्कर मुनिजी म.श्री देवेन्द्र मुनिजी म आदि सन्त नाथद्वारा पधारे, जहाँ उपाचार्य श्री के शिष्य श्री सुमेर मुनिजी म आदि से स्नेह मिलन हुआ। वर्षावास के लिये विभिन्न सघो की ओर से आग्रह भरी विनतियाँ आने लगी थीं। देशकाल परिस्थिति के अनुसार उदयपुर सघ को वर्षावास की स्वीकृति दे दी गई। नाथ द्वारा से विहार कर मोतीलालजी म से मिलने के लिए देलवाडा पधारे। देलवाडा से उदयपुर होते हुए गोगुन्दा पधारे, जहाँ महासती शभुकुंवरजी म. एव महासती शीलकुंवरजी म आदि विराजमान थीं। सेरा प्रान्त मे विचरण करते हुए आप सभी मुनिराजो का यथा समय उदयपुर वर्षावास हेतु पदार्पण हुआ। उपाचार्य श्री गणेशीलालजी म ने श्री पुष्कर मुनिजी के सरक्षण मे रहने के लिए दिवाकरीय मुनिश्री हस्तीमलजी म एव तपस्वी श्री राजमलजी म को उदयपुर भेजा। विशेष उल्लेखनीय बिन्दु यह रहा कि इस वर्षावास की अवधि मे हगामीलालजी आदि अनेक वकीलो तथा अन्य बुद्धिजीवियो ने गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म से तत्वार्थ सूत्र तथा जैन दर्शन का गहन अध्ययन किया। इस प्रकार विभिन्न धार्मिक गतिविधियो के साथ उदयपुर का यह वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०१५ : बाघपुरा-वर्षावास (सन् १९५८) वर्षावास की समाप्ति पर विहार आवश्यक होता है। कभी-कभी रुकना भी पडता है। श्री देवेन्द्र मुनिजी म को परीक्षा मे सम्मिलित होना था। इस कारण उदयपुर शहर से विहार कर नगर के बाहर आयड क्षेत्र मे विराजे। इधर कानोड वर्षावास समाप्त कर उपाचार्य श्री ग्रामानुग्राम विहार करते हुए उदयपुर पधारे। श्री पुष्कर मुनिजी तथा श्री देवेन्द्र मुनिजी का उदयपुर से प्रस्थान करने का विचार था। किन्तु उपाचार्य श्री के अत्यधिक आग्रह करने पर आप मुनिगण पुन नगर मे पधारे। यहाँ सवत्सरी आदि अनेक श्रमण सघीय प्रश्नो पर विचार विमर्श हुआ। इसी अवसर पर सघ एकता के प्रश्न पर भी मूल्यवान एवं उपयोगी विचार विमर्श हुआ। उसके पश्चात् श्रद्धालोक के देवता ka उदयपुर से विहार कर बाकल, झालावाड़ व सेरा प्रान्त में पधारने पर आपका भव्य स्वागत हुआ। आपके पदराडा पधारने पर चातुर्मास की अनुरोध भरी विनती लिए ब्यावर संघ सेवा में उपस्थित हुआ। इसके अतिरिक्त मेवाड़ के भी अनेक ग्राम नगरों के संघ अपना-अपना मन्तव्य लेकर उपस्थित हुए। अन्ततः मेवाड़ प्रान्त स्थित बाघपुरा को आगामी वर्षावास का लाभ मिलने की स्वीकृति हुई। इन दिनों ब्यावर मे सद्गुरुवर्या महासती श्री सोहनकुँवरजी म.अस्वस्थ थीं। उन्हें दर्शन देने के लिए श्री पुष्कर मुनिजी म श्री देवेन्द्र मुनिजी म.आदि सन्त ब्यावर पधारे और वहाँ से विहार कर पुनः मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया तथा यथासमय वर्षावास हेतु बाघपुरा पधार गये। समारोह के साथ बाघपुरा में प्रवेश हुआ और यह चातुर्मास सानन्द बाघपुरा में संपन्न हुआ। इस चातुर्मास में परमविदुषी महासती श्री शीलकुँवरजी म.भी अपनी शिष्याओं के साथ विराजमान थीं। संवत् २०१६ : जोधपुर-वर्षावास (सन् १९५९) बाघपुरा वर्षावास समाप्त होने पर वहाँ से विहार कर मारवाड की ओर विहार किया। ग्रामानुग्राम धर्म प्रचार करते हुए आप दुन्दाड़ा पधारे। दुन्दाडा मे वर्षावास की अनुरोध भरी विनती लेकर जोधपुर का संघ अपकी सेवा में उपस्थित हुआ। जोधपुर संघ के आग्रह को देखकर साधु मर्यादानुसार वर्षावास की स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इन दिनो श्री देवेन्द्र मुनिजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। इसलिए श्री पुष्कर मुनिजी म. उनके समुचित उपचार के लिए लूणी जंक्शन होते हुए जोधपुर पधारे। इधर मरुधर केसरीजी. म. भी अपने मुनि मण्डल के साथ जोधपुर पधारे। सेठ हीराचन्दजी भीखमचन्दजी के बंगले में सम्मिलित सार्वजनिक व्याख्यान हुए। फिर जोधपुर से विहार कर बिलाडा, पीपाड़ आदि ग्राम नगरो में धर्म प्रचार किया। चातुर्मास काल समीप आपने पर यथा समय पुनः जोधपुर आगमन हुआ। वर्षावास जोधपुर में सानन्द धर्माराधना के साथ सम्पन्न हुआ। संवत् २०१७ : ब्यावर - वर्षावास (सन् १९६०) जोधपुर वर्षावास समाप्त होने पर वहाँ से विहार कर दिया और ग्रामानुग्राम होते हुए जनता को जिनवाणी का अमृतपान कराते हुए आप व्यावर पधारे। स्थानीय संघ के अत्यधिक आग्रह को मान देकर इस वर्ष के वर्षावास की स्वीकृति प्रदान की। श्रद्धेय देवेन्द्र मुनिजी म. का अध्ययन वरावर गतिशील बना रहा। ९६ KAMARIA wooks श्रद्धालोक के देवता आपका सम्पादन तथा लेखन भी चलता रहा। लेखन अभी स्फुट ही था, किन्तु उससे भविष्य की झलक मिलती थी कि आगे ठोस शोधात्मक एव चितन प्रधान साहित्य आपकी लेखनी से निःसृत होगा। संवत् २०१८ : सादड़ी-वर्षावास (सन् १९६१) ब्यावर वर्षावास की समाप्ति के पश्चात् वहाँ से विहार कर आप विजयनगर पधारे। यहाँ उपाध्याय हस्तीमलजी म व पन्नालालजी म के साथ समाज की समस्याओ पर विचार विमर्श हुआ। सभी ने मिलकर महत्वपूर्ण विषय "अखण्ड रहे यह संघ हमारा" पर वक्तव्य दिया। इस वक्तव्य के प्रभाव स्वरूप समाज मे नई जागृति के लक्षण दिखाई देने लगे। तत्पश्चात् श्री पुष्कर मुनिजी म , श्री देवेन्द्र मुनिजी म.आदि विजयनगर से विहार कर भीम होते हुए समीर मुनिजी व सुमेर मुनिजी को साथ लेकर नौ सन्तो सहित लावा सरदारगढ़ पधारे। उस समय लावा सरदारगढ़ मे तेरापन्थी सम्प्रदाय के आचार्य श्री तुलसीजी विराजमान थे। परस्पर मिलाप व चर्चाएँ हुई। लावा सरदारगढ़ से आपने मेवाड की ओर विहार किया। मेवाड के अनेक ग्राम-नगरो मे धर्म प्रचार करते हुए आपका आगमन सेरा प्रान्त मे हुआ। इसी समय सादडी श्रीसंघ चातुर्मास की विनती लेकर सेवा मे उपस्थित हुआ, जिसे स्वीकृति प्रदान कर दी गयी। फिर यथा समय समय वर्षावास हेतु सादडी मे समारोह पूर्वक प्रवेश हुआ। तप, त्याग, व्रत, प्रत्याख्यान सहित वर्षावास यथासमय सोत्साह सम्पन्न हुआ। श्री देवेन्द्र मुनिजी म इस वर्षावास काल मे विशेष रुग्ण रहे। सतत उपचार चलता रहा। अस्वस्थावस्था मे भी आपका जाप और स्वाध्याय बराबर चलता रहता था। संवत् २०१९ : जोधपुर वर्षावास (सन् १९६२) वर्षावास समाप्त हुआ, किन्तु श्री देवेन्द्र मुनिजी म की अस्वस्थता के कारण तत्काल विहार सम्भव नही था। श्री देवेन्द्र मुनिजी की अस्वस्थता के समाचार मिलने पर मातेश्वरी महासती श्री प्रभावती म एवं बहन महाराज श्री पुष्पवतीजी अपनी शिष्याओ के साथ सादड़ी पधारी। किन्तु श्री पुष्कर मुनिजी म श्री देवेन्द्र मुनिजी को लेकर तब तक सादडी से विहार कर साण्डेराव पहुँच गये थे। महासतियाजी सादड़ी से तत्काल विहार कर साण्डेराव पहुंची। ९७ श्रद्धालोक के देवता Most MAN इधर जोधपुर में श्री देवेन्द्र मुनिजी म. की अस्वस्थता के समाचार मिल गये थे। इसलिये जोधपुर संघ तत्काल साण्डेराव आपकी सेवा में जोधपुर पधारने की विनती लेकर उपस्थित हुआ। न्यायाधीश इन्द्रनाथजी मोदी एवं डॉ.बी.एल.मेहता के आग्रह से उपचारार्थ यथा समय साण्डेराव से विहार कर जोधपुर पधारे। घोड़े के चौक मे आपका वर्षावास न्यायाधीशजी के इन्द्रभवन में हुआ एवं सिंह पोल में मरुधर केसरीजी का वर्षावास हुआ। कई व्याख्यान सम्मिलित रूप से भी हुए। उचित उपचार प्रारम्भ होने से श्री देवेन्द्र मुनिजी म. का स्वास्थ्य ठीक हो पाया। फिर भी विश्राम की आवश्यकता तो अनुभव की ही जा रही थी, किन्तु आपके कार्य नियमित रूप से चल रहे थे। संवत् २०२० : जालोर-वर्षावास (सन् १९६३) वर्षावास समाप्त होने पर जोधपुर से विहार कर ग्रामानुग्राम धर्म प्रचार करते हुए आप सीवाणची प्रान्त में पधारे। यहाँ आपकी भेट महासती हरखूजी म आदि महासती वृन्द से हुई। आगामी वर्षावास के लिए जालोर संघ को स्वीकृति मिल गई। यथासमय वर्षावास हेतु जालोर पधारे। संवत् २०२१ : पीपाड़-वर्षावास (सन् १९६४) वर्षावास सानन्द सम्पन्न होने के पश्चात् आपकी विहार दिशा अजमेर की ओर रही। कारण यह था कि इस समय अजमेर मे शिखर सम्मेलन की तैयारियाँ चल रही थी और इस सम्मेलन में गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म का मार्गदर्शन अपेक्षित समझा जा रहा था। आपने अपने शिष्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म. आदि के साथ जालोर से उग्र विहार किया। आहोर, साण्डेराव, भीम, गुलाबपुरा, व्यावर आदि ग्राम नगरों में होते हुए अजमेर पधारे और शिखर सम्मेलन में सम्मिलित हुए। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए पंजाब, मालवा, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि विभिन्न क्षेत्रो से लब्ध प्रतिष्ठित साधु-साध्वी गण उग्र विहार कर अजमेर पहुंचे थे। इस सम्मेलन मे उपाध्याय श्री आनन्द ऋषिजी म.को आचार्य पद से विभूषित किया गया। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी सम्मेलन में पदों के भार से मुक्त ही रहना चाहते थे, किन्तु अत्यधिक आग्रह होने पर आपको सम्मेलन का संचालन सूत्र सम्भालना ही पडा। आचार्य प्रवर श्री आनन्द ऋषिजी म. की परामर्शदात्री समिति मे भी आपको सामान्य स्थान प्राप्त हुआ। विशेष उल्लेखनीय बात यह रही २८ , - . , A : ६ 4 -- fotews श्रद्धालोक के देवता कि प्रान्तीय मन्त्रिमण्डल के स्थान पर प्रवर्तक मण्डल की व्यवस्था की गयी। यही व्यवस्था अभी चल रही है। यही आपका आगामी वर्षावास पीपाड़नगर मे होना निश्चित हो गया। श्री देवेन्द्र मुनिजी म.की इस सम्मेलन मे विशेष भूमिका रही। वे अपने गुरुदेव के साथ छाया की तरह रहकर उनके कार्य मे हाथ बँटा रहे थे। शिखर सम्मेलन का समापन होने के पश्चात् आप मेडता होते हुए कुचेरा पधारे। 'चन्दनबाला श्रमणी संघ' की अध्यक्षा महासती श्री सोहन कुंवरजी म ने भी अजमेर से कुचेरा की ओर विहार किया। कुचेरा में धर्मानुरागिनी सुश्री धापूकुंवरजी अपने दोनो पुत्रो - रमेश कुमारजी व राजेन्द्र कुमारजी को लेकर आपकी सेवा मे उपस्थित हुई और दोनो भाइयो के धार्मिक शिक्षण की व्यवस्था का अनुरोध किया। गुरुदेव ने धार्मिक शिक्षण की समुचित व्यवस्था करने की स्वीकृति प्रदान कर दोनों भाइयो को अपने सेवा मे रख लिया। इस प्रकार दोनो भाइयो का धार्मिक अध्ययन आरम्भ हो गया। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. , श्री देवेन्द्र मुनिजी म आदि कुचेरा से विहार कर नागोर पधारे, जहाँ उपाध्याय श्री हस्तीमलजी म का आगमन भी हुआ। स्नेह मिलन आनन्ददायी एवं मधुर रहा। उपाध्याय श्री हस्तीमलजी म ने पूज्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म की साहित्यिक प्रगति और अध्ययन की जानकारी भी ली तथा गति- प्रगति पर सन्तोष व्यक्त किया। इस समय तक श्री देवेन्द्र मुनिजी म शोधात्मक लेखन के लिए अपना मानस बना चुके थे। उपाध्याय श्री के सम्मुख आपने अपने इस विषयक विचार भी प्रस्तुत किये, जिसकी उन्होने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा कर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया। नागौर से विहार कर गोठन, खांगटा होते हुए वर्षावास हेतु पीपाड शहर पधारे। पीपाड शहर का कोठारी परिवार जो व्यवसाय के सम्बन्ध मे अब मुम्बई, अहमदाबाद में बस गया है, समग्र वर्षावास काल मे आपकी सेवा मे व्यस्त रहा। सद्गुरुवर्या श्री सोहन कुंवरजी म , महासती श्री पुष्पवतीजी म भी अपनी शिष्याओ सहित वर्षावासार्थ पीपाड शहर में विराजमान थी। श्रीमती धापूकुँवरजी ने महासतीजी की सेवा मे पूरे वर्षाकाल मे रहते हुए धार्मिक अध्ययन किया। दोनो भाइयो का धार्मिक अध्ययन भी अनवरत चलता रहा। पीपाड वर्षावास के समय जोधपुर मे पंडित प्रवर्तक श्री हीरालालजी म एव तरुण तपस्वी लाभचन्दजी म. तथा महासती कमलावतीजी म का वर्षावास था। जोधपुर के वर्षावास काल मे एक अपघटित घटना घटित हो जाने के कारण समाज मे तहलका श्रद्धालोक के देवता kese मच गया। श्री पुष्कर मुनिजी ने आचार्य श्री को सूचित किया कि 'जोधपुर प्रकरण' उग्र रूप धारण कर चुका है। अतः विश्वसनीय व्यक्तियों को भेजकर सत्य तथ्य की परीक्षा कर प्रकरण का शीघ्र ही निर्णय हो जाना अनिवार्य है। उनके साथ हमारे सम्बन्धो का स्वरूप भी निश्चित हो जाना चाहिए। उस पर भी आचार्य श्री की ओर से कोई समाधान नहीं किया गया। प्रवर्तक पन्नालालजी म.का आदेश प्राप्त हुआ कि जब तक समाधान न हो, तब तक सम्बन्ध न रखा जाये। संवत् २०२२ : खण्डप-वर्षावास (सन् १९६५) पीपाड़ शहर का वर्षावास समाप्त होने पर वहाँ से विहार कर आपका आगमन खांगटा हुआ, जहाँ उपाध्याय हस्तीमलजी म. से मिलाप हुआ। खांगटा से भोपालगढ़ पधारे तो उसी दिन वहाँ प्रवर्तक हीरालालजी म. एवं लाभचन्दजी म.भी पधार गए। प्रवर्तक पन्नालालजी म. का आदेश आने से श्री पुष्कर मुनिजी एवं श्री देवेन्द्र मुनिजी ने मधुर व्यवहार रखते हुए उन्हें समग्र स्थिति से अवगत करा दिया गया। तदनन्तर वहाँ से विहार कर आप जोधपुर पधारे। इस समय भी दोनों भाई श्री रमेश कुमारजी एवं श्री राजेन्द्र कुमारजी आपकी सेवा में रहते हुए धार्मिक अध्ययन कर रहे थे। प्रतिक्रमण, पच्चीस बोल, नवतत्व, ४२ दोष, ५२ अनाचार, दशवैकालिक सूत्र आदि साधु-जीवन अपेक्षित धार्मिक अध्ययन दोनों भाई तब तक कर चुके थे। दोनो भाइयों के अन्तःकरण में दीक्षा ग्रहण करने की भावना जागृत हुई। दादीजी एवं माताजी के माध्यम से दोनों भाइयों की मनोभावना से गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी एवं श्री देवेन्द्र मुनिजी को अवगत कराया गया। इस अवसर पर सिवाना संघ वही पर गुरुदेव की सेवा में उपस्थित था। जब दीक्षा की बात आई तो सिवाना संघ ने निवेदन किया कि यदि दीक्षा स्वीकृत होती है, तो उसका लाभ सिवाना संघ को मिलना चाहिए। इस पर गुरुदेव एवं श्री देवेन्द्र मुनिजी म. तत्काल विचार विमर्श कर द्रव्य क्षेत्र काल भाव देखकर साधु मर्यादानुसार हम दोनो भाइयों की दीक्षा हेतु सिवाना का आस्थावान स्थल ही निश्चित कर लिया। तत्पश्चात् यथा समय दीक्षोत्सव हेतु आप सिवाना पधारे और दि. १५-३-६५ फाल्गुन शुक्ल १३ सोमवार के दिन दोनो भाइयों की दीक्षा सम्पन्न हुई। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि दोनों भाइयो की माताजी धापू कुंवरजी ने भी अफजलपुर जिला मन्दसौर म.प्र. मे महासती नानकुंवरजी म. के पास दीक्षा ग्रहण की और उनका नामकरण महासती प्रकाशवतीजी के रूप में हुआ। १०० ने -- . Rom use श्रद्धालोक के देवता सिवाना दीक्षोत्सव मे जोधपुर, उदयपुर, पीपाड, मुम्बई, मेडता, ब्यावर, जालोर आदि अनेक स्थानो से हजारो श्रद्धालु, श्रावक-श्राविकाएँ उपस्थित हुई। सिवाना मे दीक्षा के पश्चात् हम दोनों भाइयो का नामकरण मुनिश्री रमेश कुमारजी म.एवं मुनिश्री राजेन्द्र कुमारजी म.के रूप मे किया गया। मुनिश्री रमेश कुमारजी को श्री पुष्कर मुनिजी का शिष्य और मुनिश्री राजेन्द्र कुमारजी को श्री देवेन्द्र मुनिजी का शिष्य घोषित किया गया। सिवाना से विहार कर मोकलसर पधारे, जहाँ दोनो भाइयो की बडी दीक्षा सम्पन्न हुई। दीक्षा महोत्सव पर गुरुणीजी श्री पुष्पवतीजी, श्री प्रभावतीजी, श्री रामूजी, श्री सीताजी, श्री बक्सूजी आदि अनेक महासतियाजी पधारी थी। फिर खण्डप, मझल, दुन्दाडा होकर समदडी पधारे, जहाँ उपाध्याय श्री हस्तीमलजी से मिलाप हुआ। दोनो नवदीक्षित मुनियो को देखकर उपाध्याय श्री ने हर्ष व्यक्त किया। कुछ दिनो यहॉ विराजना हुआ। यही इतिहास के सम्बन्ध मे गम्भीर विचार विमर्श हुआ और उपाध्यायजी ने श्री देवेन्द्र मुनिजी से कहा कि तुम्हे जैन इतिहास का कार्य करना है। गुरुदेव सहित सभी मुनिराजों का यह वर्षावास खण्डप में हुआ। यथासमय वर्षावास हेतु खण्डप पधारे। खण्डप ही वह स्थान है, जहाँ श्री देवेन्द्र मुनिजी की दीक्षा हुई थी। खण्डप निवासियो ने वर्षों के पश्चात् श्री देवेन्द्र मुनिजी को देखा, उनकी प्रतिभा देखी तो अत्यधिक हर्षित हुए। दोनो भाइयों का साधु-जीवन का प्रथम वर्षावास खण्डप से ही प्रारम्भ हुआ। वर्षावास काल मे जप-तप स्वाध्याय तथा धार्मिक अध्ययन अनवरत चलते रहे। श्री देवेन्द्र मुनिजी का अध्ययन जैन इतिहास की ओर लगा। संवत् २०२३ : पदराड़ा-वर्षावास (सन् १९६६) वर्षावास की समाप्ति पर खण्डप से विहार हुआ और आप जालोर पधारे। जालोर से विहार कर ग्रामानुग्राम मे धर्म प्रचार करते हुए रोहिट आगमन हुआ, जहाँ सद्गुरुवर्या श्री सोहन कुंवरजी म से भेट हुई। उस समय श्री सोहन कुंवरजी म अस्वस्थ थी। रोहिट जोधपुर के समीप ही है, अत. जोधपुर से अनेक श्रद्धालु भक्त मुनि मण्डल की सेवा मे दर्शनार्थ उपस्थित हुए। इनमे न्यायमूर्ति श्री इन्द्रनाथजी मोदी का नाम विशेष उल्लेखनीय है। रोहिट से विहार कर पाली-समदडी मार्ग से आप मेवाड पधारे। इस वर्ष महावीर जयंती नान्देशमा मे मनाई। इस वर्ष भीलवाडा, सांण्डेराव, गोगुन्दा, झालावाड़, वाकल, पदराडा आदि ३०-४० संघो के दो हजार १०१ श्रद्धालोक के देवता श्रद्धालुजन आपकी सेवा में उपस्थित हुए और आगामी वर्षावास के लिए अनुरोध भरी विनती की। चातुर्मास के लिये निर्णय पदराड़ा के पक्ष में हुआ। चूंकि वर्षावास में अभी समय शेष था, अतः आप विहार कर उदयपुर पधारे। उदयपुर से उग्र विहार कर आपको गोगुन्दा जाना पड़ा, क्योंकि वहाँ महासती शम्भुकुंवरजी म का देहावसान हो गया था। यथासमय आपका पदराड़ा वर्षावास हेतु पदार्पण हुआ। इस वर्षावास में एक दुःखद समाचार मिला। पाली में सद्गुरुवर्या श्री सोहन कुंवरजी म. का स्वर्गवास हो गया और महास्थविर श्री ताराचन्द्रजी म. के परम भक्त सुश्रावक सेठ नाथूलालजी परमार पदराडा निवासी का भी स्वर्गवास हो गया। पदराडा मे उस वर्षावास काल में पूज्य महास्थविर ताराचन्द्रजी म. की स्मृति में "श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थालय" की स्थापना हुई। इस ग्रन्थालय का मुख्यालय उदयपुर में है और वर्तमान में इसके द्वारा उल्लेखनीय साहित्य सेवा की जा रही है। श्री पुष्कर मुनिजी देवेन्द्र मुनिजी आदि सन्तरत्नो द्वारा लिखित सम्पूर्ण साहित्य का प्रकाशन वितरण आदि इस ग्रन्थालय द्वारा सुव्यवस्थित रीत्यानुसार किया जा रहा है। यह संस्था उत्तरोत्तर प्रगति की ओर अग्रसर हो रही है। इसकी प्रगति के लिए श्री देवेन्द्र मुनिजी सदैव प्रयत्नशील रहते थे। श्री देवेन्द्र मुनिजी ने जैनधर्म, दर्शन, साहित्य के अध्ययन के साथ जैन इतिहास का गम्भीर अध्ययन कर लिया था और अब वे जैन इतिहास के लेखन में लगे हुए थे। उनका लेखन जैन, बौद्ध और वैदिक तीनो धाराओं के सन्दर्भ मे तुलनात्मक दृष्टि पर आधारित था। वे एकांकी लेखन पसन्द नहीं करते है। इस दृष्टि से उन्होंने तीनों धाराओं के विशिष्ट ग्रन्थों का अध्ययन कर भी लिया था। संवत् २०२४ : वालकेश्वर-मुम्बई-वर्षावास (सन् १९६७) पदराड़ा वर्षावास समाप्त होने पर वहॉ से विहार कर आस-पास के ग्रामों में धर्मप्रचारार्थ विचरण करते रहे। इस अवधि मे मुम्बई संघ के प्रतिनिधि मण्डल आपकी सेवा मे अनेक बार उस उद्देश्य से उपस्थित हुए कि आपका मुम्बई मे पदार्पण हो। मुम्बई संघ की विनती पहले भी कई बार आ चुकी थी, किन्तु अनुकूलता न होने के कारण उस ओर जाना नहीं हो सका। अधिक समय तक अपने भक्तो को टाला जाना भी अच्छा नहीं होता। अतः गुरुदेव पुष्कर मुनिजी के साथ विचार विमर्श कर आपने मुम्बई की ओर प्रस्थान करने का निश्चय किया। इधर से विहार कर कोल्यारी हिम्मतनगर होते हुए आप १०२ Kuty श्रद्धालोक के देवता अहमदाबाद पधारे। यह सारा मार्ग घने जगलों एवं पर्वतों से भरा था। अहमदाबाद सघ का अत्यन्त आग्रह होने पर भी उसे स्वीकार नही किया क्योकि मुम्बई सघ को आश्वासन दिया जा चुका था। अहमदाबाद से विहार कर आप अपने गुरुदेव आदि के साथ बडौदा, भडौच होते हुए पालघर पधारे। पालघर से आपका आगमन विरार हुआ जहाँ आपकी अमृतवाणी का पान करने के लिए महाराष्ट्र के मत्री भाऊ साहब वर्तक भी उपस्थित हुए। मुम्बई प्रवेश पर थाणा, अधेरी, वालकेश्वर आदि सघो की अनुरोध भरी विनतियॉ आने लगी। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी एव श्री देवेन्द्र मुनिजी ने आपस मे विचार विमर्श कर अपने वर्षावास की स्वीकृति वालकेश्वर मुम्बई सघ के पक्ष मे दी। वहाँ हरकचन्द कोठारी के हॉल मे वर्षावास हुआ। पास ही कांदावाडी क्षेत्र मे पण्डित श्री विजय मुनिजी एव पण्डित श्री समदर्शीजी का वर्षावास था। समय-समय पर स्नेह मिलन होता रहा। धर्म ध्यानपूर्वक वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। वि सं २०२४ का वर्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय इसलिए है कि इस वर्ष श्री देवेन्द्र मुनिजी म की प्रथम शोध प्रधान ऐतिहासिक पुस्तक "ऋषभदेव एक परिशीलन" का प्रकाशन हुआ। जैन इतिहास की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण एवं अनुपम ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ के प्रकाशन से श्री देवेन्द्र मुनिजी की प्रतिभा और क्षमता समाज के सामने स्पष्ट हो गई और उसके साथ ही उनका स्थान मूर्धन्य साहित्यकार मुनिराजो की अग्रिम पक्ति मे निश्चित हो गया। इस प्रकाशन से जैन इतिहास के नये अध्यायो का भी प्रकटीकरण हुआ। संवत् २०२५ : घोड़नदी-वर्षावास (सन् १९६८) वालकेश्वर वर्षावास की समाप्ति पर यथासमय वहाँ से विहार कर आपका पदार्पण काँदावाडी स्थानक मे हुआ। यहाँ आपके सान्निध्य मे राजस्थान, स्थानकवासी सघ की स्थापना हुई। ससद सदस्य अचलसिहजी, जवाहर लालजी मूणोत, चपालालजी कोठारी आदि सैकडो भाइयो ने भाग लिया। फोर्ट कांदावाडी, चीचपोकली, दादर, माटुंगा होते हुए पूना की ओर अग्रसर हुए। घाटकोपर तथा घोडनदी के संघ वर्षावास की विनती लेकर आपश्री की सेवा मे उपस्थित हुए और निर्णय घोडनदी के पक्ष मे हुआ। घोडनदी के इतिहास मे यह वर्षावास अभूतपूर्व रहा। यहाँ के श्रावक आपसे अत्यधिक प्रभावित हुए। सानन्द वर्षावास सम्पन्न हुआ। १०० श्रद्धालोक के देवता Motor संवत् २०२६ : पूना- वर्षावास (सन् १९६९) घोड़नदी वर्षावास समाप्त होने पर वहाँ से प्रस्थान कर आपका आगमन अहमदनगर हुआ। अहमदनगर में उन दिनों श्रद्धेय पंडित प्रवर आत्मार्थी श्री मोहन ऋषिजी म., श्रद्धेय प्रवर्तक श्री विनय ऋषिजी म. तथा जैन जगत की यशस्वी तारिका श्री उज्ज्वल कुँवरजी म.अपनी शिष्याओं के साथ विराज रही थी। सभी से स्नेह मिलन हुआ। यहाँ आयोजित व्याख्यान सभाओं में भी अमृतवाणी का रसास्वादन करने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु भक्त एकत्र होते थे। घोडनदी से आपके साथ आशु कवि श्री मारुति राव आए थे। गुरुदेव के व्याख्यान के तत्काल पश्चात् कविजी उसका पद्यमय रूपान्तर प्रस्तुत कर सभा की शोभा में और अभिवृद्धि कर दिया करते थे। अहमदनगर से विहार कर संगमनेर होते हुए आपका पदार्पण सिन्नर हुआ। यहाँ मालव केसरी श्री सौभाग्यमलजी म.से मिलन हुआ। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी, श्री देवेन्द्र मुनिजी और मालव केसरीजी के मध्य संघ एकता आदि अति महत्वपूर्ण विषयों पर मूल्यवान विचार विमर्श हुआ। उन दिनों नासिक संघ 'महाराष्ट्र श्रावक सम्मेलन' की योजना में रुचिशील ही नहीं, सक्रिय भी था। मालव केसरीजी, गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी एवं श्री देवेन्द्र मुनिजी के पावन सान्निध्य में नासिक मे यह विराट- श्रावक सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी को गौरवपूर्ण उपाधि 'राजस्थान केसरी' से अलंकृत सम्मानित किया गया। सम्मेलन के सानन्द सम्पन्न हो जाने के पश्चात् भी लगभग एक माह तक मालव केसरीजी म. का साहचर्य रहा। तत्पश्चात् सिन्नर, संगमनेर मार्ग से ही आपका आगमन पूना हुआ। अहमदनगर, नासिक, पूना आदि अनेक संघों की ओर से वर्षावास हेतु आग्रह भरी विनतियाँ आ रही थीं। इस वर्षावास के लिए पूना संघ को स्वीकृति मिली। पूना में स्वामी स्थविर श्री चाँदमलजी म. श्री जीतमलजी म. और लालचन्दजी म. से अति मधुर और स्नेहमय मिलन हुआ। कुछ समय तक यह साहचर्य बना रहा। पूना से विहार कर आपने घोइनदी अहमदनगर आदि विभिन्न ग्राम नगरों में विचरण कर जिनवाणी का प्रचार किया फिर यथासमय वर्षावास हेतु पूना पधारे। वर्षावास में खूब तपस्याएँ हुई। मास खमण २१, १५, १८ आदि अनेक तपस्याएँ हुई। इस प्रकार पूना वर्षावास तम आराधनाओ के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ। १०४ M Ko श्रद्धालोक के देवता संवत् २०२७ : दादर-वर्षावास (सन् १९७०) पूना का यशस्वी चातुर्मास समाप्त होने पर यहाँ से विहार कर लोनावाला होते हुए आप मुम्बई पधारे। मुम्बई के विभिन्न क्षेत्रो मे जिनवाणी की पुनीत धारा प्रवाहित करते हुए आपने विरार तक विचरण किया। आगामी वर्षावास के लिए दादर संघ को स्वीकृति प्रदान की गई। घाटकोपर मे श्रमणी संघ की स्थापना हुई। तपस्वी रतीलालजी म., हर्षद मुनिजी, पण्डित श्री विजय मुनिजी म.आदि से स्नेह मिलन हुआ। संवत् २०२८ : कांदावाड़ी-वर्षावास (सन् १९७१) दादर वर्षावास सम्पन्न होने पर आपने वहाँ से विहार कर दिया और बालकेश्वर, कादावाडी, कोर्ट, चींचपोकली, माटुगा, कॉदीवली, विलेपार्ले, सान्तानुज, घाटकोपर, बोरीवली आदि क्षेत्रो में विचरण कर धर्मप्रचार किया। आपका इस वर्ष का वर्षावास कादावाडी मे निश्चित रहा। इस वर्षावास की अवधि मे पण्डित दलसुखभाई मालवणिया, प अगरचन्दजी नाहटा, भारत सरकार के तत्कालीन शिक्षामत्री आदि महानुभावों से आपकी भेट उल्लेखनीय एव उपयोगी रही। श्री देवेन्द्र मुनिजी शास्त्री द्वारा सम्पादित कल्पसूत्र गुजराती भाषा मे कादावाडी सघ की ओर से प्रकाशित हुआ और उसका विमोचन चिमनलाल चक्कूभाई शाह ने किया। कल्पसूत्र इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि उसकी दो हजार प्रतियॉ केवल एक सप्ताह मे ही समाप्त हो गई। पुन. तीन हजार प्रतियाँ प्रकाशित करवाई गई। वे भी शीघ्र ही समाप्त हो गई। इस प्रकार इस वर्षावास मे आपकी साहित्यिक यात्रा को नया आयाम मिला। संवत् २०२९ : जोधपुर-वर्षावास (सन् १९७२) कादावाडी वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। संघहित की दृष्टि से गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म एवं श्री देवेन्द्र मुनिजी म ने विचार विमर्श कर यह निश्चित किया कि अब राजस्थान की ओर चलना आवश्यक है। इसी समय साण्डेराव मे 'राजस्थान मुनि सम्मेलन' का भी आयोजन किया गया था। इसलिए सभी दृष्टि से राजस्थान जाना अनिवार्य हो गया। आपने यहॉ से उग्र विहार राजस्थान की ओर कर दिया। मार्ग मे केलवा रोड मे विदुषी महासती श्री प्रेमकुंवरजी के सान्निध्य में विगत दो-तीन वर्षों से ज्ञानाभ्यास कर रही वैराग्यवती श्री लता कुमारी जी को Cot श्रद्धालोक के देवता Most S गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी ने दीक्षा प्रदान की और फिर पालघर, सूरत, भडौच, बडौदा, आनन्द, नवसारी, खेड़ा आदि स्थानों पर होते हुए अहमदाबाद पधारे अहमादाबाद श्री संघ का आगामी वर्षावास हेतु प्रबल अनुरोध था किन्तु इस सम्बन्ध में तत्काल कोई निर्णय नही दिया जा सका। अहमदाबाद से विहार कर पालनपुर, आबू, शिवगंज आदि ग्राम नगरों में धर्म प्रचार करते हुए साण्डेराव पदार्पण हुआ। राजस्थान प्रान्तीय मुनि सम्मेलन मे अनेक मूर्धन्य एवं विशिष्ट मुनिवरों ने भाग लिया, जिनमें आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म. मरुधर केशरी श्री मिश्रीमलजी म. आदि का नाम विशेष उल्लेखनीय है। इस वर्ष के वर्षावास के लिए अहमदाबाद एवं जोधपुर के संघ आपकी सेवा में उपस्थित हुए। वर्षावास का लाभ जोधपुर संघ को मिला। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. के सान्निध्य में साण्डेराव सम्मेलन में श्री प्रवीण मुनिजी म. ने दीक्षा अंगीकार की। श्री प्रवीण मुनिजी बहुत ही सेवाभावी, सरल व सरस प्रकृति के सन्त है। सम्मेलन की समाप्ति के पश्चात् आपने वहाँ से विहार कर सादड़ी, सायरा, पदराड़ा, गोगुन्दा आदि स्थानों में धर्म प्रचारार्थ विचरण किया फिर आप उदयपुर पधारे, उदयपुर से विहार कर सादड़ी, पाली आदि ग्राम नगरों में होते हुए वर्षावास हेतु यथासमय जोधपुर पधारे। यहाँ परम विदुषी, जैन जगत की उज्ज्वल तारिका महासती श्री शीलकुंवरजी म. का वर्षावास भी अपने समुदाय के साथ हुआ। इस वर्षावास में महासतीजी की सुशिष्या महासती श्री दयाकुँवरजी ने ३२ उपवास तप की आराधना की। वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। श्री देवेन्द्र मुनिजी का लेखन सम्पादन और अन्य मुनियों का ज्ञानाभ्यास अनवरत चलता रहा। संवत् २०३० : अजमेर-वर्षावास (सन् १९७३) जोधपुर का भव्य वर्षावास समाप्त कर महासती रामूजी को दर्शन देने के लिए बाडमेर जिले की ओर विहार किया। धवा, कल्याणपुर, समदड़ी, सिवाना होते हुए जालोर पधारे। जालोर से विहार कर खण्डप, मझल, अजीत, लूणी जंक्शन होते हुए जोधपुर पधारे। इसी बीच सिवाना में परम विदुषी महासती श्री रामूजी के स्वर्गवास के समाचार मिले। शोकसभा की गई। महासतीजी का जीवन आदर्श था और अन्त समय में भी अनशनपूर्वक समाधि मरण से आप स्वर्ग सिधारी। जोधपुर से प्रस्थान कर पीपाड होते हुए मेडता पधारे। मेड़ता से बडूगाँव की अत्यधिक प्रार्थना होने से उस ओर विहार किया। वडू नागोर जिले का एक छोटा-सा गाँव है, १०६ to श्रद्धालोक के देवता मुनिश्री रमेशजी और मुनिश्री राजेन्द्रजी हम दोनो भाइयो की जन्मभूमि है। चारों ओर रेगिस्तान का इतिहास बिखरा पड़ा है। देश के मूल्यवान पत्थर मकराणा की खानो के लिए यह स्थान प्रसिद्ध है। बडूगॉव मे एक प्रसिद्ध डोसी परिवार रहता है, जो प्रारभ से ही धार्मिक, राजनैतिक क्षेत्र मे अग्रगण्य रहता आया है। उसी परिवार मे गुमानमलजी, हेमराजजी, जसराजजी और प्रेमचन्दजी ये चार भाई थे। गुमानमलजी के पुत्र पुनमचन्द डोसी हुए। ये पूनमचन्दजी डोसी ही हम मुनिद्वय भ्राताओ के सासारिक पिता थे। फिर थादला होते हुए वर्षावास हेतु अजमेर पधारे। इस वर्ष के वर्षावास हेतु खण्डप ग्राम मे अजमेर, भीलवाडा, भोपालगज, सायरा, सिघाडा, जालोर, मझल, सिवाना, खण्डप आदि के सघो ने भावभरी विनती की थी और अजमेर सघ के पक्ष मे निर्णय हुआ था। परमविदुषी महासती श्री सोहनकुंवरजी के शिष्या परिवार मे से महासती चतरकुंवरजी, कैलाश कुंवरजी, कुसुमवतीजी, पुष्पवतीजी, प्रभावतीजी, श्रीमतीजी, प्रियदर्शनाजी व चारित्रप्रभाजी ठाणा ८ का सम्मिलित वर्षावास हुआ। वर्षावास मे अनेक तपस्याएँ हुई। पू. महास्थविर श्री हगामीलालजी म का भी अजमेर मे ही वर्षावास था। सभी मुनियो मे पारस्परिक स्नेह सम्बन्ध देखकर अजमेर संघ अत्यधिक प्रभावित हुआ और प्रसन्न भी। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म व श्री देवेन्द्र मुनिजी म के पास देवास निवासी रतनलालजी मोदी के सुपुत्र श्री चतुर कुमारजी धार्मिक अभ्यास कर रहे थे और महासती श्री कैलाश कुंवरजी के पास उदयपुर निवासी कन्हैयालालजी सियाल की सुपुत्री श्री स्नेहलता कुमारी धार्मिक अभ्यास कर रही थी। अजमेर सघ ने अपने यहॉ दीक्षा महोत्सव आयोजित करने का आग्रह किया। द्रव्य क्षेत्र काल भाव को देखकर दीक्षा की अनुमति दे दी गई औद दि ८- ११-७३ कार्तिक शुक्ला त्रयोदशी के दिन बैरागी श्री चतुर कुमार एवं बैरागिन श्री स्नेहलता कुमारी को गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी ने दीक्षा प्रदान कर श्री चतुर कुमार को श्री दिनेश मुनिजी म. के नाम से तथा श्री स्नेहलता कुमारी को सतीश्री दिव्यप्रभाजी म के नाम से प्रसिद्ध किया। श्री दिनेश मुनिजी म , श्री पुष्कर मुनिजी के शिष्य हुए और सतीश्री दिव्यप्रभाजी म को महासती कुसुमवतीजी की शिष्या घोषित किया गया। जो आज विदुषी साध्वी डॉ. दिव्यप्रभा के नाम से विश्रुत हैं। यह दीक्षोत्सव स्थानीय मोनिया इस्लामिया स्कूल के विशाल प्रांगण मे लगभग दस हजार के विशाल जनसमूह की साक्षी मे श्री अरविन्दकुमार चन्दूलाल शाह की अध्यक्षता और श्री मूलचन्दजी कोठारी के प्रमुख आतिथ्य मे हुआ था। १०७ श्रद्धालोक के देवता पावन सान्निध्य था वहाँ विराजित समस्त सन्त रत्नों और महासतियों का, दीक्षोत्सव पर आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म. मरूधर केसरीजी प्रवर्तक श्री मिश्रीमलजी म. , प्रवर्तक श्री विनय ऋषिजी आदि अनेक महात्माओं के शुभ संदेश प्राप्त हुए। इस दीक्षोत्सव में अनेक ग्राम नगरो के संघ उपस्थित हुए थे और सभी ने अपने-अपने ग्राम नगर में वर्षावास के लिए भावभरी विनती की थी। दि. ९-११-७३ को महास्थविरजी ताराचन्द्रजी म. की पुण्यतिथि मनाई गई तथा श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थालय की जनरल मिटिंग भी हुई। इस प्रकार यह वर्षावास विविध धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०३१ : अहमदाबाद-वर्षावास (सन् १९७४) अजमेर वर्षावास समाप्त हुआ और आप लोढ़ा धर्मशाला में पधारे, जहाँ दि १४-११-७३ को बड़ी दीक्षा हुई। मदनगंज संघ का अत्यधिक आग्रह होने से आप विहार कर मदनगंज (किशनगढ़) पधारे। सार्वजनिक व्याख्यान हुए। और उसके पश्चात् आप विहार कर पुनः अजमेर पधारे। अजमेर में श्रीसंघ के आग्रह से दि. १९-१२-७३ को मेरे द्वारा सम्पादित 'भगवान महावीर की सूक्तियाँ' नामक पुस्तक का विमोचन समारोह आयोजित किया गया था। इस पुस्तक का विमोचन सर सेठ भागचन्दजी सोनी के द्वारा किया गया। समारोह की अध्यक्षता रामलालजी लूणिया ने की। इस अवसर पर महास्थविरजी हगामीलालजी म , मुनिश्री मिश्रीलालजी म. , मेवाड़ सिंहनी महासती जसकुंवरजी म. , विदुषी महासती श्री पुष्पवतीजी, श्री कुसुमवतीजी आदि भी सम्मिलित हुए। अजमेर से विहार कर आप ब्यावर पधारे, जहाँ लगभग डेढ़ माह तक मुनिश्री कन्हैयालालजी 'कमल' का सम्मिलित संवास रहा। यहाँ महासती श्री कैलास कुँवरजी म., कुसुमवतीजी म. ठाणा ४ से विराजमान थीं। व्यावर से भीम के लिए विहार किया। इस वर्ष के वर्षावास के लिए चेन्नई, दिल्ली, मुम्बई, इन्दौर, अहमदाबाद, मदनगंज आदि अनेक संघों का अनुरोध भरा आग्रह था। वर्षावास के लिए स्वीकृति मिली, स्मरण रहे अहमदावाद संघ विगत कई वर्षों से वर्षावास हंतु सानुरोध विनती करता आ रहा था। भीम से विहार कर भीलवाड़ा पधारे। भीलवाड़ा से चित्तौड़गढ़ पधारे और परमविदुषी महासती शीलकुंवरजी एवं महासती श्रीनानकुँवरजी को दर्शन दिये। महावीर जयंती उत्साह के साथ मनाई गई। प्रवचन में वयोवृद्ध पुरातत्व पाश्री मुनि १०८ . se Ko श्रद्धालोक के देवता जिनविजयजी आदि पधारे। उदयपुर का आग्रह था कि महासती सौभाग्य कुँवरजी म.को दर्शन देने के लिए उदयपुर पधारे। अत आप उदयपुर पधारे। मार्ग मे भोपाल सागर मे प्रवर्तक श्री अम्बालालजी म एव श्री सौभाग्य मुनिजी से मिलन हुआ। उदयपुर पधारकर श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थालय मे दो दिन विराजे फिर 'आकाशद्वीप' मे ठहरकर महावीर मण्डल पधारे। कुछ दिन यहाँ विराजे। व्याख्यान पचायती नोहरे मे होते थे। हजारो की संख्या मे श्रोताओ ने लाभ लिया। यहाँ से विहार कर हिरणमगरी (उदयपुर) होते हुए केशरियाजी पधारे। सावलाजी, ईडर, हिम्मतनगर, प्रान्तीज होकर वर्षावास हेतु अहमदाबाद पधारे। दि. २७-६-१९७४ को वर्षावास हेतु मुनि मण्डल का अहमदाबाद मे समारोहपूर्वक पदार्पण हुआ। महासती श्री उमरावकुंवरजी, श्री शकुन कुंवरजी, श्री सत्य प्रभाजी ठाणा-३ का भी वर्षावास अहमदाबाद में ही था। उल्लेखनीय बिन्दु यह है कि दि १५-९-७४ को श्री देवेन्द्र मुनिजी शास्त्री द्वारा लिखित 'भगवान महावीर एक अनुशीलन ग्रन्थ' का विमोचन श्री मोरारजी भाई देसाई के करकमलो से सम्पन्न हुआ। यह ग्रन्थ शोध प्रधान तो है ही इतिहास के विद्यार्थियो और विद्वानो के लिए भी अत्यधिक उपयोगी है। इतना ज्ञानगर्भित ग्रन्थ प्रकाशित करवाकर श्री देवेन्द्र मुनिजी ने अपना वैशिष्ट्य सिद्ध कर दिया। इस शोधन ग्रन्थ की देश के अनेक विद्वानो ने मुक्त कण्ठ से प्रशसा की है। संधैक्य की दृष्टि से इस वर्ष द्वितीय भादवे मे पर्युषण मनाया गया। इस प्रकार अहमदाबाद वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०३२ : पूना-वर्षावास (सन् १९७५) अहमदाबाद वर्षावास समाप्त होने पर आपने दक्षिण भारत की ओर विहार किया। बड़ौदा, सूरत, मुम्बई आदि नगरो और छोटे-बड़े ग्रामो मे धर्म प्रचार करते हुए पूना की ओर प्रस्थान किया। इस वर्ष वर्षावास की स्वीकृति पूना सघ को मिल चुकी थी। पूना वर्षावास मे जप-तप आदि आराधनाएँ तो उल्लेखनीय हुई है, इस वर्षावास के अनेक उल्लेखनीय बिन्दु और भी रहे। आपके द्वारा लिखित 'जैनदर्शन स्वरूप और विश्लेषण' ग्रन्थ का विमोचन लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान डॉ बारलिगे द्वारा किया गया। डॉ बारलिंगे ने इस अवसर पर आपके परिश्रम की और ग्रन्थ की भूरि- भूरि प्रशंसा की। इसके अतिरिक्त 'धर्म का कल्पवृक्ष, जीवन के ऑगन मे' और 'महावीर की प्रतिनिधि कथाएँ मे' इन दो पुस्तको का भी विमोचन हुआ। १०९ श्रद्धालोक के देवता Most वर्षावास काल में कान्फ्रेंस के अध्यक्ष तथा मुम्बई के सालिसीटर सुप्रसिद्ध समाजसेवी श्री चिमनभाई, चक्कूभाई शाह दर्शनार्थ पधारे और आपसे सानुरोध निवेदन किया कि कवि नानचन्दजी म.के शताब्दी ग्रन्थ के लिये बत्तीस आगमों का सार लेख रूप मे करे। इस अनुरोध को ध्यान में रखकर पंद्रह-बीस दिन में आपने यह लेख तैयार कर प्रस्तुत किया। उसी लेख को पल्लवित-पुष्पित कर कालांतर मे जैन आगम साहित्य मनन और मीमांसा ग्रन्थ तैयार हुआ। आपकी प्रेरणा से पूना विश्व विद्यालय में जैन चेअर की स्थापना हुई और जैन समाज ने उसके लिए नौ लाख रुपये अनुदान दिया। यह जैन चेअर अभी भी चल रही है। जैन चेअर के प्रभारी आचार्य एवं अध्यक्ष के रूप में जैन दर्शन के सुप्रसिद्ध विद्वान डॉ. मोहनलालजी मेहता की नियुक्ति की गई। आपकी प्रेरणा से ही पूना विश्वविद्यालय की एम.ए. हिन्दी की परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले छात्र को 'उपाध्याय पुष्कर मुनि स्वर्णपदक' प्रतिवर्ष दिया जाना स्वीकृत हुआ, जो अभी भी दिया जा रहा है। इसी वर्षावास में पूना में 'पुष्कर गुरु सहायता फण्ड' की भी स्थापना हुई। इसका मुख्य उद्देश्य गरीबों की सहायता करना है। पैसा एकत्र करो और बाँटो। यही लक्ष्य रखा गया है। यह फण्ड भी सुचारु रूप से कार्य कर रहा है। इस प्रकार यह वर्षावास विविध धार्मिक क्रियाओं और रचनात्मक कार्यों के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ। वर्षावास समाप्त होने पर पूना के उपनगरों में ही विचरण हो रहा था। माह दिसम्बर आरम्भ हो गया। विद्वानों में आपकी ख्याति एक विद्वान सन्त के रूप में हो चुकी थी। यही कारण था कि पूना विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विद्वत् गोष्ठी में अपना लेख पढ़ने के लिये आपकों भी निमन्त्रण मिला, जिसे आपने स्वीकार किया और उस गोष्ठी मे विद्वानों की उपस्थिति में आपने "मोक्ष और मोक्ष मार्ग" विषय पर अपना सद्य लिखित लेख पढ़ा। इस लेख की उपस्थित विद्वानों ने समीक्षा करते समय भूरि-भूरि प्रशंसा की। पूना मे ही आपने अपने गुरुदेव राजस्थान केसरी उपाध्याय श्री पुष्कर गुनिजी म. द्वारा लिखित जैन कथाओं के सम्पादन का संकल्प किया था। अपने इसी संकल्प के अनुसार आपने यह कार्य भी पूर्ण किया, जिसके परिणामस्वरुप उपाध्यायश्री पुष्कर मुनिजी द्वारा लिखित जैन कथा माला के एक सौ ग्यारह भाग अभी तक प्रकाशित हो चुके हैं।
अज्ञालोक के देवता संवत् २०३३ : रायचूर - वर्षावास (सन् १९७६) पूना का अपना ऐतिहासिक एवं यशस्वी वर्षावास समाप्त कर आपने वहाँ ते प्रस्थान किया। पूना से सोलापुर, बीजापुर, बागलकोट, गजेन्द्रगढ़ आदि विभिन्न ग्रान नगरो में धर्म प्रचार करते हुए रायचूर पधारे। रायचूर वर्षावास प्रवेश के पूर्व बीजापुर मे महावीर जयंती समारोह पूर्वक मनाई गई। यहाँ विभिन्न ग्राम-नगरो से पधारे हुए संघो ने वर्षावास की अनुरोध भरी विनतियॉ की। रायचूर संघ का विशेष आग्रह देखते हुए वर्षावास की स्वीकृति उसे प्रदान की गई। अक्षय तृतीया बागलकोट मे मनाई गई। फिर यथासमय वर्षावास हेतु रायचूर मे धूमधाम से प्रवेश हुआ। वर्षावास काल में मासखमण आदि तपाराधनाएँ खूब हुई। गुरुदेव ष्णध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म.को अभिनन्दन ग्रन्थ समर्पित करने की योजना भी यही बनी और यही से उसका कार्य भी आरम्भ किया। "जैन आगम साहित्य मनन और मीमांसा" ग्रन्थ का लेखन यही सम्पूर्ण हुआ। गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म की जन्म जयंती आपकी प्रेरणा से विशाल स्तर पर कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल श्री मोहनलाल सुखाड़िया के मुख्य आतिथ्य में मनाई गई। इसी प्रकार आपकी प्रेरणा से ही एक विशाल नेत्र शिविर का भी आयोजन किया गया। इस प्रकार विविध आयोजनो के साथ यह वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। आपके इस वर्षावास मे रायचूर मे विशेष उत्साह रहा। संवत् २०३४ : बैंगलोर-वर्षावास (सन् १९७७) रायचूर का वर्षावास समाप्त होने पर आपने वहाँ से विहार कर दिया। बल्लारी, हुबली आदि क्षेत्रों मे धर्म प्रचार करते हुए आप श्रवण बेलगोला पधारे। यह स्थान दिगंबर जैन मतावलम्बियो का तीर्थ स्थान है। इसके पूर्व भद्रावती मे महावीर जयंती सोल्लास मनाई गई और यही आपके बैंगलोर वर्षावास की भी स्वीकृति हुई। अक्षय तृतीया श्रवण बेलगोला मे मनाई गई। भट्टारक चारुतीतिजी से मिलाप हुआ। उनका व्यवहार बहुत ही प्रेमपूर्ण रहा। श्रवण बेलगोला ते मैतूर की ओर प्रस्थान किया। मैसूर पधारने पर स्थानीय संघ ने आपका भाव भीना स्वागत जिया और प्रवचन श्रवण का लाभ लिया। यहाँ अनेक विद्वानो से भी भेट श्रद्धालोक के देवता ever Joke धर्मदर्शन विषयक चर्चाएँ भी हुई। यहाँ अनेक भण्डारों में रक्षित अनेकों ताड़ पोय तथा अन्य ग्रन्थों का अवलोकन किया। उल्लेखनीय बिन्दु यह रहा कि गर्मी का मौसम होते हुए भी यहाँ अपकी प्रेरणा से मास खमण की आराधना हुई। आपके द्वारा लिखित "जैन आगम साहित्य मनन और मीमांसा" मुद्रित होकर आ गई, तो सुप्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री, विद्वान और भू. पू. शिक्षामंत्री भारत सरकार, डॉ. के. एल. श्रीमाली द्वारा उसका विमोचन सम्पन्न हुआ। मैसूर से विहार कर यथा समय वर्षावास हेतु बैंगलोर पधारे। श्रीसंघ बैंगलोर ने समारोह पूर्वक आपका नगर प्रवेश करवाया। बैगलोर वर्षावास का उल्लेखनीय बिन्दु यह रहा कि सुश्री धापूबाई ने १५१ उपवास की तपस्या की, ४६ मास खमण और शेष अन्य तपस्याएँ तो अनगिन हुई। इसी वर्षावास में उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी द्वारा लिखित और आपके द्वारा सम्पादित 'ब्रह्मचर्य विज्ञान' नामक ग्रन्थ का विमोचन हुआ तथा उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी के अभिनन्दन ग्रन्थ के लिए प्राप्त लेखों का सम्पादन किया। इस प्रकार बैंगलोर वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०३५ : चेन्नई - वर्षावास (सन् १९७८) बैगलोर वर्षावास समाप्त होने के पश्चात् आपने वहाँ से चेन्नई की ओर प्रस्थान किया। बैगलोर से के. जी. एफ. पधारे। के. जी. एफ. मे आपके दर्शनार्थ श्री जगजीवनराम आए थे और आपसे कुछ तात्विक चर्चा भी की थी। के.जी. एफ. से विहार हुआ और चैय्यार स्थान पर जैन विद्या के सुविख्यात विद्वान श्री अगरचन्द नाहटा दर्शनार्थ आए। श्री नाहटा बैंगलोर में भी आपके दर्शन करने आए थे। श्री नाहटा ने भी आपसे तात्विक और साहित्यिक चर्चाएं की थी। वेल्लूर मे पधारे और यहीं होली चौमासा किया। इसके पश्चात् आरकाट पधारे, जहाँ महावीर जयंती मनाई। विभिन्न नगरों के संघों की ओर से आगामी वर्षावास हेतु विनतियाँ हुई। इस वर्ष के वर्षावास की स्वीकृति चेन्नई संघ को मिली। आरकाट से विहार कर ग्रामानुग्राम होते हुए चैप्यार पधारे जहाँ अन्य तृतीया मनाई और पारणे हुए। फिर विहार करते हुए यथासमय वर्मावारा समारोह पूर्वक चेन्नई नगर में प्रवेश हुआ।
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श्रद्धालोक के देवता ka A उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म.की जन्म जयंती आपकी प्रेरणा से विशाल स्तर पर मनाई गई और उस अवसर पर जैन कथाओं की पुस्तको का विमोचन हुआ। वर्षावास मे तपस्याएँ भी बहुत अच्छी हुई। विभिन्न कार्यक्रमों के साथ वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०३७ : उदयपुर-वर्षावास (सन् १९८०) सिकन्दराबाद (आंध्रप्रदेश) का यशस्वी वर्षावास समाप्त हुआ और फिर आपका यहाँ से विहार हुआ। वि.सं. २०३२ से आपका विचरण एवं वर्षावास दक्षिण भारत में हो रहा था। इस अवधि में आपकी साहित्यिक यात्रा भी अबाध गति से चलती रही। नये-नये सम्पर्क भी जुड़े। अनेक लब्ध प्रतिष्ठित विद्वानों से भी सम्पर्क हुआ, जो उपयोगी रहा। सिकन्दराबाद से विहार हुआ। अनेक छोटे-बड़े ग्राम, नगरों मे विहार करते हुए आपकी धर्म प्रचार यात्रा चलती रही। इसी बीच आगामी वर्षावास के लिए भी विभिन्न संघों की ओर से विनंतियाँ आने लगीं। अन्ततः वर्षावास के लिए उदयपुर संघ को स्वीकृति प्रदान की गई और यथासमय वर्षावास हेतु उदयपुर नगर में समारोह पूर्वक प्रवेश हुआ। काफी लम्बे समय पश्चात् आगमन और वर्षावास होने से लोगों में अत्यधिक उत्साह था। धर्माराधना के साथ ही इस वर्षावास का एक उल्लेखनीय बिन्दु यह रहा कि आपके सान्निध्य मे गुरुदेव उपाध्याय अध्यात्म योगी श्री पुष्कर मुनिजी म. का ७१ वॉ जन्मोत्सव जन्म जयंती सप्ताह के रूप में दिनांक १६-१०-८० से २२-१०-८० तक मनाया गया। इस जन्म जयंती समारोह के अन्तर्गत सातो दिन विशेष दिवस के रूप में मनाये गये। इन दिवसो पर विभिन्न विषयों पर सन्त मुनिराजों के अतिरिक्त प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा प्रस्तावित विषयो पर सारगर्भित व्याख्यान हुए। प्रथम दिवस धर्म दिवस के रूप में मनाया गया। प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक डॉ एम. आर. जैन समारोह के अध्यक्ष और मदनकुमारजी शास्त्री मुख्य अतिथि थे। दि. १७-१०-८० व्यसन मुक्ति दिवस श्री मदनलालजी धुप्पड़ की अध्यक्षता और दादा भाई केससरीमलजी बोर्दिया के मुख्य आतिथ्य में मनाया गया। दि. १८-१०-८० स्वाध्याय दिवस डॉ. प्रेमसुमन जैन की अध्यक्षता और डॉ के.सी. सोगानी के मुख्य आतिथ्य में मनाया गया। दि. १९-१०-८० को अहिंसा दिवस अधिवक्ता श्री राधाकृष्ण रस्तोगी की ..... APR- . Kaise श्रद्धालोक के देवता अध्यक्षता मे मनाया गया। इस दिवस पर साहित्य मनीषी श्री देवेन्द्र मुनिजी ने विभिन्न धर्मों में अहिसा का महत्त्व बतलाते हुए मानव जीवन के उत्थान के लिए अहिसा तत्त्व को परमावश्यक बतलाया। आध्यात्मिक गुणो का पालन करना, उनकी रक्षा करना अहिसा का काम है। दि २०-१०-८० को बाल दिवस विधायक श्री गुलाबचन्द कटारिया की अध्यक्षता और डा. बी. भण्डारी के मुख्य आतिथ्य मे मनाया गया। दि २१-१०-८० को सगठन दिवस पद्म श्री देवीलाल सामर की अध्यक्षता मे मनाया गया। दि २२-१०-८० सप्ताह का अतिम दिन था। इस दिन पण्डित श्री देवेन्द्र मुनिजी म ने गुरुदेव के व्यक्तिव पर विस्तार से प्रकाश डाला। अतिम दिन के इस कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान विद्यापीठ के सस्थापक उपकुलपति माननीय श्री जनार्दनरायजी नागर ने की और मुख्य अतिथि थे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ दौलतसिंह कोठारी। इसी दिन उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी एव श्री देवेन्द्र मुनिजी द्वारा लिखित सत्रह पुस्तको का विमोचन श्री कोठारी ने किया। प्रसिद्ध उद्योगपति दानवीर सेठ रतनचन्दजी राका ने आगामी वर्षावास राखी मे करने की स्वीकृति के लिए निवेदन किया। इसके अतिरिक्त मुम्बई, अहमदाबाद, पीपाड, उदयपुर, जोधपुर आदि सघो ने भी वर्षावास हेतु विनन्ती की। इस प्रकार मेरी ही प्रेरणा से इस सप्ताह के अयोजन सानन्द सम्पन्न हुए। इस प्रकार यह उदयपुर वर्षावास विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमो के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०३८ : राखी-वर्षावास (सन् १९८१) उदयपुर वर्षावास की समाप्ति के पश्चात् आपने उदयपुर से विहार कर दिया और ग्रामानुग्राम होते हुए सनवाड पधारे। जहाँ प्रवर्तक श्री अम्बालालजी म सा से स्नेह मिलन हुआ। सनवाड से नीमच पधारे। नीमच से प्रस्थान कर धर्म प्रचार करते हुए नाथद्वारा पधारे, जहाँ महावीर जयती का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। यहाँ श्री सौभाग्य मुनिजी 'कुमुद' से स्नेह मिलन हुआ। नाथद्वारा मे अनेक ग्राम-नगरो सघ उपस्थित हुए थे। वर्षावास हेतु आग्रहपूर्ण विनती भी हुई। वि. सं २०३८ के वर्षावास के लिए राखी सघ को स्वीकृति मिली। नाथद्वारा से विभिन्न ग्राम-नगरो मे धर्म-प्रचार करते हुए यथासमय आपका वर्षावास हेतु ११५ श्रद्धालोक के देवता पदार्पण राखी हुआ। आपके नगर प्रवेश के समय सभी धर्म के लोगो ने उत्साहपूर्वक सम्मिलित होकर कार्यक्रम को सफल बनाया। इस वर्षावास का उल्लेखनीय बिन्दु यह है कि - वर्षावास का समस्त व्यय श्रीमान् रतनचन्दजी रांका की ओर से किया गया। इतना ही नहीं, आपकी प्रेरणा से श्री रतनचन्दजी रांका ने गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. की जन्म जयंती पर आसपास के गाँवो के औषधालयों व विद्यालयो के लिए रुपयो की सहायता वितरित की। राखी में औषधालय निर्माण की घोषणा की। तारक गुरु जैन ग्रन्थालय के भवन के लिए अनुदान दिया। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक स्थानो के स्थानक भवनो हेतु मुक्त हस्त से लाखों का अनुदान दिया। वर्षावास काल मे कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया था। तपो की आराधना भी खूब हुई। यहाँ ३६० प्रभावनाएँ भी हुई थीं। इसी वर्षावास में आपका "जैन आचार सिद्धान्त और स्वरूप' नामक ग्रन्थ का लेखन कार्य पूर्ण हुआ। इस प्रकार राखी का यह वर्षावास विभिन्न साहित्यिक और धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०३९ : जोधपुर - वर्षावास (सन् १९८२) राखी वर्षावास की समाप्ति के पश्चात् राखी से प्रस्थान कर आपका आगमन बगडी हुआ। बगडी में इस समय मरुधर केसरी श्री मिश्रीलालजी म. सा. विराजमान थे। उनसे मिलने के लिए ही आप वगड़ी पधारे। स्नेह मिलन हुआ और बगड़ी मे श्री बुधमलजी म. की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर युवाचार्य श्री मधुकर गुनिजी म. तथा अन्य अनेक सन्त भी पधारे थे। वगड़ी से विहार कर पाली, जालोर पधारे, इसी बीच परमादरणीया महासती साध्वी रत्ना श्री प्रभावतीजी म. जो परम पूज्य आचार्य सम्राट की मातेश्वरी थी, उनके स्वर्गवास के समाचार उदयपुर के निकट गांव खेरोदा मे प्राप्त हुए। सिवाना होते हुए वालोतरा पधारे। वालोतरा में कुछ ग्राम-नगरी के संघ वर्षावास की विनंती लेकर आपकी सेवा मे उपस्थित हुए। जोधपुर संघ विगत तीन-चार वर्षों से आग्रह भरी विनती करता आ रहा था। इस बात को ध्यान में रखते हुए वि.सं.२०३९ के वर्षावास की स्वीकृति जोधपुर संघ को दे दी गई। फिर विभिन्न ग्राम-नगरो मे धर्म प्रचार करते हुए यथासमय वर्षावास हेतु जोधपुर पधारे। जोधपुर सघ ने बड़े ही उत्साह के साथ आपका समारोह पूर्वक नगर प्रवेश करवाया। इस वर्षावास में महासती श्री पुष्पवतीजी म. का भी चातुर्मास साथ हुआ। [११ So श्रद्धालोक के देवता . वर्षावास मे आपके द्वारा लिखित जैन आचार सिद्धान्त और स्वरूप, पुष्प पराग, जैन चिंतन के विविध आयाम आदि पुस्तको का विमोचन हुआ। जप, तप की आराधनाएँ भी खूब हुई। सम्पूर्ण वर्षावास काल मे सघ मे अच्छा उत्साह रहा। आपका लेखन-सम्पादन का कार्य भी सतत चलता रहा। इस प्रकार यह वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०४० : मदनगंज-वर्षावास (सन् १९८३) जोधपुर वर्षावास समाप्त हुआ और आपने जोधपुर से विहार कर दिया। विभिन्न ग्राम-नगरो मे धर्म प्रचार करते हुए आप नोखा (चादावतो का) पधारे। यहाँ युवाचार्य श्री मधुकर मुनिजी म सा के सान्निध्य मे एक बहन की दीक्षा होने वाली थी। युवाचार्य श्री एव अन्य सन्तो तथा महासतियाजी से स्नेह मिलन हुआ और दीक्षा सानन्द सम्पन्न हुई। दीक्षोपरान्त नोखा (चादावतो का) से प्रस्थान कर मेड़ता पधारे और मेडता से जोधपुर आये। जोधपुर मे आपका स्वास्थ्य बिगड गया। इसलिए उपचारार्थ आप जोधपुर में ही ठहरे और गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म सा. अक्षय तृतीया के पारणे हेतु गढ़ सिवाना पधारे। इधर जोधपुर मे आपका समुचित उपचार आरम्भ हुआ और कुछ ही समय पश्चात् आप स्वस्थ हो गए। इसी बीच गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. गढ सिवाना से वापस जोधपुर पधार गए। अभी तक आपके वर्षावास की घोषणा नही हुई थी। इसलिए विभिन्न ग्राम-नगरो के संघ वर्षावास की विनती लेकर आपकी सेवा मे उपस्थित हुए। मदनगज-किशनगढ़ सघ को वि स. २०४० के वर्षावास की स्वीकृति मिली। जोधपुर से प्रस्थान पर पीपाड होते हुए बलुन्दा पधारे। जहाँ मरुधर केसरीजी म. सा. से स्नेह मिलन हुआ। बलुन्दा से विहार कर पुष्कर होते हुए अजमेर पधारे और फिर अजमेर से वर्षावास हेतु यथासमय मदनगज-किशनगढ़ पधारे। वर्षावास काल मे मेरी प्रेरणा से वर्धमान पुष्कर जैन सेवा समिति की स्थापना हुई। इसके अन्तर्गत पाठशाला और चिकित्सालय की स्थापना की गई। वर्तमान मे यह चिकित्सालय बड़े रूप में परिवर्तित हो चुका है। वर्षावास काल मे 'उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि व्यक्तित्व एव कृतित्व' तथा कुछ अन्य पुस्तको का विमोचन सम्पन्न हुआ। वर्षावास मे तप आराधनाएँ भी बहुत हुई। इस प्रकार यह वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। वर्षावास समाप्ति के पश्चात् सुश्री निर्मलाकुमारी ने महासती श्रद्धालोक के देवता पुष्पावतीजी की सेवा में एवं सुश्री शकुन्तला बोहरा झामोला व्यावर निवासी ने महासती श्री कुसुमवतीजी म. की विद्वान शिष्या डॉ. दिव्यप्रभाजी की शिष्या रुप में दीक्षा ग्रहण की जो वर्तमान मे साध्वी अनुपमाजी एम. ए से विश्रुत हैं। संवत् २०४१ : दिल्ली-वर्षावास-चाँदनी चौक (सन् १९८४) मदनगंज (किशनगढ) का अपना वर्षावास समाप्त होने पर आपने अपने गुरुदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी तथा अन्य मुनिराजो के साथ यहाँ से विहार कर दिया। वि. सं. २०४१ के वर्षावास की चाँदनी चौक दिल्ली संघ की अनुरोध भरी विनंती पर ध्यान देकर साधु मर्यादानुसार स्वीकृति प्रदान कर दी थी। मदनगज से आपका प्रस्थान हुआ और छोटे-बड़े गाँवों में धर्म प्रसार करते हुए जयपुर पधारे। जयपुर के संघ ने बड़े ही उत्साह के साथ आपका नगर प्रवेश कराया और जिनवाणी का लाभ लिया। जयपुर से प्रस्थान कर आप विभिन्न ग्राम- नगरों में होते हुए भरतपुर पधारे। भरतपुर से आपका पदार्पण आगरा हुआ। आगरा में आपने एक माह तक विराजकर वहाँ के श्रावको को जिनवाणी का अमृतपान कराया। आगरा से प्रस्थान कर मथुरा फरीदावाद होते हुए आपका पदार्पण दिल्ली हुआ। दिल्लीवासी तो आपके पधारने की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। आपके दिल्ली आगमन के समाचार सुनते ही हजारो की संख्या में लोगों ने पहुंचकर आपकी अगवानी की और समारोह पूर्वक नगर प्रवेश कराया और हजारो की संख्या में श्रद्धालु आपकी सेवा मे उपदेशामृत एवं मांगलिक-पान करने के लिए प्रतिदिन पहुँचने लगे। दिल्ली नगर में स्थानकवासी जैन समाज की काफी आबादी हैं। लगभग ४५ जैन स्थानक व जैन श्रावक संगठनों को मिलाकर एक महासंघ का निर्माण किया गया है। वर्षावास यद्यपि चॉदनी चौक क्षेत्र में स्वीकृत हुआ था, तथापि यह वर्षावास समस्त दिल्लीवासियो के लिए था। अतः महासंघ की ओर से आपका व समस्त मुनि मण्डल का हार्दिक अभिनन्दन किया गया। दिनांक १०.६. ८४ को प्रातः ८ बजे दिल्ली जैन महासंघ के तत्त्वावधान में बाल आश्रम दरियागंज दिल्ली के विशाल एवं भव्य प्रांगण में निर्मित सभा मण्डप में उपाध्याय श्री कर मुनिजी, साहित्य मनीपी श्री देवेन्द्र मुनिजी तथा अन्य मुनिराजों के वर्षावागत आगमन के उपलक्ष में एक भव्य एवं विराट अभिनन्दन एवं स्वागत गीत आयोजन किया गया। इसमें हजारों की संख्या में भाई गालो के निरिक हरियाणा केसरी श्री अगर मुनिजी म श्री जिनेन्द्र गनिमी गतिमान : मे .
Hot श्रद्धालोक के देवता महासती पवन कुमारीजी, महासती विजयेन्द्राजी, कौशल्याजी महासती चारित्र प्रभाजी, नूतन प्रभाजी आदि भी उपस्थित थी। इस समारोह की अध्यक्षता श्री जे डी जैन, गाजियाबाद ने की तथा मुख्य अतिथि समाज रत्न डॉ दौलतसिहजी कोठारी थे। इस अवसर पर सासद श्री भीखूराम जैन, दिल्ली महानगर के पार्षद श्री मेहताबचन्द जैन, नगर निगम पार्षद श्री महेन्द्र कुमार जैन, दिल्ली जैन समाज के मत्री श्री प्रेमचन्द जैन, अ भा श्वे स्था जैन कान्फ्रेस के मंत्री श्री अजितराज सुराणा, अहिसा फाउण्डेशन मत्री श्री निर्मलकुमार जैन, जैन सोसायटी के अध्यक्ष श्री सुभाष जैन, सुभाष ओसवाल, श्री रामेश्वर दयाल, श्री केसरीचन्द, श्री रामलाल, श्री सलेकचन्द आदि भी विशेष उपस्थिति के साथ ही हजारो की सख्या मे नर-नारी भी उपस्थित थे। इस धर्म सभा मे वक्ताओ ने सामयिक विचार प्रस्तुत किए। उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. एव श्री देवेन्द्र मुनिजी के सारगर्भित प्रवचन भी हुए। दरियागज से विहार कर आप वीरनगर जैन कालोनी पधारे। प्रधान श्री रामलालजी सर्राफ, बलदेवराजजी नौलखा आदि श्रावको ने सेवा-भक्ति का लाभ उठाया। एक सप्ताह तक यहाँ प्रवचन हुए। हजारो भाई-बहन प्रतिदिन उपदेशामृत का पान करने सेवा मे उपस्थित रहते। वीरनगर से विहार कर सत्यवती कालोनी पधारे। जहाँ प्रवर्तक श्री भण्डारी पद्मचन्दजी म के सान्निध्य मे नूतन जैन स्थानक भवन का उद्घाटन सम्पन्न हुआ। यहाँ से विहार कर त्रिनगर, अशोक विहार, शालीमार आदि उपनगरो मे धर्मप्रचार किया। आपके पावन पदार्पण की प्रसन्नता मे सामाजिक गतिविधियाँ भी मूर्त रूप लेने लगीं, उसी अनुक्रम मे अहिंसा विहार समारोह भी है। आपके पावन सान्निध्य मे अहिसा विहार का शिलान्यास समारोह तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री श्री एच के एल भगत के द्वारा २४-६-८४ रविवार को सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर साहित्य मनीषी श्री देवेन्द्र मुनिजी ने अपने चितन पूर्ण प्रवचन मे फरमाया कि भारतीय साहित्य मे तीन विशिष्ट देवो की ब्राह्मण कल्पना है। एक ब्रह्मा है, तो दूसरा विष्णु है, और तीसरा महादेव है। ब्रह्मा सृष्टि का निर्माण करता है, विष्णु सृष्टि का सरंक्षण करता है और महादेव सृष्टि का सहार करता है। तीनो देवो की अपनी-अपनी विशेषताएं है। पर अहिसा एक ऐसी विशिष्ट शक्ति हैं, जिसमे तीनो ही देवो की विशिष्टता सम्मिलित है। ब्रह्मा की तरह X SXXX श्रद्धालोक के देवता easte उसका अमृत बेल उसी के हृदय में फलती है, फूलती है और खिलती है, जहाँ अहिंसा की उदात्त भावना है। अहिंसा विष्णु की तरह सद्गणों का संरक्षण भी करती है। अहिसक व्यक्ति के हृदय में ही सद्गुण जमकर टिकते है। अहिंसा से महादेव की तरह जीवन में पनपने वाले दुर्गुणो का अभाव होता है। कितनी महान और अद्भुत शक्ति है अहिंसा में अहिसा भगवती की शरण में जो भी पहुँच जाता है, उद्धार हुए बिना नहीं रहता। आपने आगे फरमाया, कि . 'आप कितने भाग्यशाली है कि हिंसा के बढ़ते हुए युग में आप अहिंसा विहार का निर्माण कर रहे है। अहिंसा विहार का निर्माण हो रहा है, रोहिणी में। सत्ताईस नक्षत्रों में रोहिणी चोथा नक्षत्र है। रोहिणी नाम की दो महिलाएँ जैन साहित्य मे विश्रुत रही है। एक वह रोहिणी थी, जिसके चारों ओर सुख का साम्राज्य था। वह तन, मन और धन सभी दृष्टि से परम सुखी थी। अतः आज भी जैन महिलाएँ हजारो की संख्या मे रोहिणी के नाम से तप की आराधना कर शाश्वत आनन्द प्राप्त करना चाहती है। दूसरी रोहिणी का वर्णन ज्ञाता सूत्र में है। प्रकारान्तर से यह कथा विश्व के अन्य साहित्य में भी आई है। रोहिणी ने अपने श्वसुर से शाली के पाँच दाने प्राप्त कर अपनी प्रतिभा की तेजस्विता और सक्रियता से इतना अधिक बढ़ा दिया कि - सभी उसकी बुद्धि के चमत्कार से विस्मत हो उठे। आप भी रोहिणी मे अहिंसा विहार बना रहे है। रोहिणी की भॉति आप भी अहिंसा की उदात्त भावनाएँ इतनी अधिक बढ़ावें, जिससे विश्व में अहिंसा का स्वर झंकृत हो उठे।' इस अवसर पर प्रवर्तक भण्डारी श्री पद्मचन्दजी म , हरियाणा केसरी श्री अमरमुनिजी म. , तपस्वी श्री जिनेन्द्र मुनिजी म. तथा अन्य सती वृन्द भी उपस्थित थे तथा लगभग सभी ने समसामयिक विचार सभा में प्रस्तुत किए। श्री एच. के एल भगत ने इस अवसर पर अपने संक्षिप्त भाषण में सामयिक विचार प्रकट किए और चार पुस्तको का भी विमोचन किया। इस समारोह की अध्यक्षता श्री पुरुषोत्तम गोयल अध्यक्ष दिल्ली महानगर परिषद् ने की और मुख्य अतिथि प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. दौलतसिंह कोठारी थे। यथासमय वर्षावास हेतु आपका आगमन चाँदनी चौक दिल्ली के स्थानक भवन मे हुआ। जहॉ वर्षावाल काल में ६ मासखमण, कई २१, १५, ११, ८ व तेलो की अपार तपस्याएँ हुई। शील साधना मे भी कई भाई-बहनो ने ब्रह्मचर्यव्रत को स्वीकार १२० Essay श्रद्धालोक के देवता किया। १४ अगस्त को नशाबदी समिति के प्रधान, जयपुर निवासी श्री गोकुल भाई भट्ट, मंत्री श्री रूप नारायणजी आपसे विचार-विमर्श करने पधारे। चातुर्मास काल मे चेन्नई, बैगलोर, पूना, मुम्बई, उदयपुर, पाली, जोधपुर, जयपुर, हरियाणा, पजाब, उत्तरप्रदेश, जम्मू आदि विभिन्न स्थानों से दर्शनार्थियो और श्री सघो का निरन्तर आवागमन बना रहा। इस प्रकार यह वर्षावास हर दृष्टि से ऐतिहासिक एव यशस्वी रहा और सानन्द सम्पन्न हुआ। वर्षावास के दरम्यान पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म की ७५ वी. जन्म जयन्ती तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिह के मुख्य आतिथ्य मे मनाई गई। जिसमे गुरुदेव उपाध्याय श्री को विश्व सन्त की उपाधि प्रदान की गई। इस अवसर पर देश के कौन-कौन के करीब १० हजार की जनता उपस्थित थी। परम विदुषी साध्वी श्री कुसुमवतीजी म. की सुशिष्या विदुषी श्री चारित्र प्रभाजी की सेवा मे विरक्ता बहिने सुश्री राधा एव सुश्री प्रवीणा गत कई वर्षों से धार्मिक अभ्यास कर रही थीं, चाँदनी चौक श्रावक संघ के अत्याग्रह पर पूज्य उपाध्याय श्री एव श्री देवेन्द्र मुनिजी के सान्निध्य मे दीक्षा महोत्सव २ दिसम्बर, १९८४ मार्ग शीर्ष शुक्ला १० सवत् २०४१ को सानन्द उल्लासमय वातावरण के साथ मनाया गया, जिसमे दिल्ली व आस-पास प्रदेश के हजारो नरनारी एवं काफी सख्या मे सन्त-सतीगण उपस्थित थे। आपश्री की इस विहार यात्रा मे ही डेरावल नगर दिल्ली मे श्रावक सघ की संस्थापना हुई एवं एक विराट स्थानक भवन बनाने का निश्चय किया गया, जो यथा समय बनकर तैयार हुआ एव श्रावक सघ आज सामाजिक धार्मिक गतिविधियो मे सलग्न है, दिल्ली के इस वर्षावास मे अनेक सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक महानुभावो का बराबर आवागमन बना रहा एव आपश्री के साथ विचार चर्चाओ का आदान-प्रदान होता रहा। संवत् २०४२ : दिल्ली-वर्षावास (वीरनगर) (सन् १९८५) चॉदनी चौक दिल्ली का अपना यशस्वी वर्षावास समाप्त होने पर आपका वहाँ से विहार हुआ और दिल्ली के विभिन्न उपनगरो मे विचरण करते हुए आप गाजियाबाद पधारे। यहॉ आप एक सप्ताह तक विराजे| गाजियाबाद से विहार कर लोणी, बागपत होते हुए बडौत पधारे। जहाँ विदुषी महासती श्री रमेशकुमारीजी A .. १२ श्रद्धालोक के देवता : निश्रा मे दो बालाओं ने असार संसार का परित्याग कर साधना मार्ग को स्वीकार किया। इस दीक्षोत्सव में अनेक मुनिराज तथा महासतियॉजी के साथ ही लगभग दस हजार से भी अधिक भाई-बहन उपस्थित थे। यहाँ से विहार कर कांधला पधारे। कांधला संघ की भक्ति भी अति श्लाघनीय रही। यहाँ भी आपके प्रवचन का अच्छा प्रभाव रहा। कांधला से परासोली, दोधट होते हुए दि. २१-१-८५ को आपका आगमन मेरठ जैन नगर में हुआ। पू. भण्डारी श्री पद्मचन्दजी म. हरियाणा केसरी श्री अमरमुनिजी, शान्त आत्मा श्री राममुनिजी, परम सेवा भावी श्री प्रेमसुखजी, तपस्वी श्री जिनेन्द्र मुनिजी, सरल आत्मा तपस्वी श्री सुमति मुनिजी आदि ठा. ४१ तथा महासती वृन्द ठा ६० इस प्रकार १०१ सन्त सतीगण मेरठ में अध्यात्म योगी प्रवर्तक श्री शातिस्वरूपजी म. की दीक्षा स्वर्ण जयंती मनाने हेतु अपने श्रद्धा सुमन समर्पित करने हेतु पधारे। १५ फरवरी, १९८५ को यह कार्यक्रम भी अनेक धार्मिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न हुआ। दिनांक १० मार्च, १९८५ को आपकी सेवा मे दिल्ली, बडौत, कांधला, मेरठ, अलवर, लुधियाना आदि विभिन्न ग्राम-नगरो के सघ वर्षावास की अनुरोध भरी विनंती लेकर उपस्थित हुए। सभी प्रकार से विचार-विमर्श करने के बाद इस वर्ष के वर्षावास के लिए वीरनगर दिल्ली संघ को वर्षावास की स्वीकृति प्रदान की गई। मेरठ से विहार कर आप गाजियाबाद पधारे। यहॉ से मेरी एम ए. फायनल की परीक्षा के लिए हाथरस पधारे, जहाँ निर्भय हाथरसी आपकी प्रेरणा से महावीर पर काव्य लिख रहे है। यथा समय वर्षावास हेतु आपका आगमन वीरनगर हुआ। यहाँ महासती श्री कुसुमवतीजी की शिष्या विदूषी साध्वी श्री चारित्रप्रभाजी म ठाणा ६ के वर्षावास का भी लाभ वीरनगर संघ को मिला। आपके पदार्पण के साथ ही यहाँ दान-शील-तप-भाव की प्रभावना प्रारम्भ हो गई। दिनांक १४ जुलाई, १९८५ को श्रमण संघ के आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म.का ८६ वां जन्म महोत्सव समारोह पूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर साहित्य मनीषी श्री देवेन्द्र मुनिजी म ने फरमाया कि 'आगम, त्रिपिटक और वेद के रूप में भारतीय संस्कृति की अखण्ड धारा प्रवाहमान है। सभी परम्पराओ ने मुक्त मन और हृदय की अनन्त श्रद्धा से आचार्य के गौरव का संकीर्तन किया। आचार्य धर्म संघ का पिता है, वह दिशा बोध देने वाला आलोक स्तम्भ है, और है आचार संहिता का कल्पवृक्षा निशीथ चूर्णि के अनुसार आचार्य का जीवन शीतगृह के १२२ or toto tette tar station .... जालो समान है। जहाँ बाह्य वातावरण की पहुँच नहीं होती। शीतगह तिरो मानित शब्दावली मे वातानुकूलित गृह कह सकते हैं। वैसे ही आचार सम और सौर रहता है। वह सघ के मध्य रहता हुआ, उसका नेतृत्व करता हुआ आत्मा में रमण करता है। धर्म सघ के विकास और सचालन के लिए आत्मरथ रास्ता है। आपने आचार्य श्री के सान्निध्य का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारा सद्भाग्य है, कि हमे आनन्दप्रदाता आनन्दऋषिजी ग. का आचार्यत्व पातो हाथो वाले साक्षात् ईश्वर हैं। उनका अनुशासन बिल्कुल वैसा ही है, औरो गाला में को गूंथने वाले पुष्पों मे धागे का होता है। धागा, माला में नहीं टिगोचर नहीं होता, किन्तु वह पुष्पों को बगैर उनका सौन्दर्य नष्ट किए एकत्व में पिरोये रहता है। दूर से मनोहारी और नीलाभ दिखाई देने वाले पर्वतों के ज्यों-ज्यों eN THI जाता है, वैसे- वैसे उनकी रूपता उडती चली जाती है। किन्तु मैं जितना रागीय होता गया, आचार्य श्री के. वे उतने ही गुणों के आगार के रूप में गेरी आरथाको, केन्द्र होते गए। हम सकल्प को आज फिर सुदृढ़ करें कि हग तान-गन से चार श्री के प्रति पूर्ण समर्पित है।'
श्रद्धालोक के देवता Awes . म. हुए है तो दूसरे आचार्य आनन्दऋषिजी म. है। दोनों ही महापुरुषो के नाम का आद्य अक्षर है - 'आ'। आ आओ और निहारो कि आनन्द कहाँ है? अन्तरात्मा मे गहराई से डूबकी लगाओ। आचार्य सम्राट आनन्दऋषिजी म. स्वयं आनन्द स्वरूप है। जो भी थका-मॉदा व्यक्ति उनके पास पहुँचता है, उसे सहज आनन्द प्राप्त होता है। आनन्द ऋषिजी म. का जीवन गुणों का आगार है। वे स्वयं उत्कृष्ट आचार का पालन कर, उत्कृष्ट आचार-पालन करने की प्रेरणा प्रदान करते है।' इसके पूर्व मैने, तपस्वी श्री चन्दजी म. , श्री दिनेशमुनि, श्री नरेश मुनि, महासती श्री पवन कुमारीजी, महासती श्री चारित्रप्रभाजी, महासती श्री सुभाषवतीजी ने आचार्य श्री के दीर्घ आयुष्य की शासन देव से प्रार्थना की। सामारोह में भारत के सुप्रसिद्ध विधिवेत्ता डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. दौलतसिंह कोठारी, जैन महासंघ के अध्यक्ष जे डी जैन, महानगर पार्षद श्री मेहताबचन्द जैन, श्री राजकुमार जैन आदि विभिन्न वक्ताओ ने अपनी मंगल कामनाओं के श्रद्धा सुमन आचार्य श्री के प्रति अर्पित किए। इस समारोह की अध्यक्षता भारत सरकार के वित्त सचिव श्री देवेन्द्रराज मेहता ने की। उन्होंने आचार्य श्री के जीवन का उत्कीर्तन करते हुए उनके प्रति अनन्य आस्था अभिव्यक्त की। आचार्य श्री की जयंती पर लगभग २०० आयंबिल तप व धर्मचक्र हुए, जिसमें कई बेले व तेलों का आयोजन हुआ। पर्युषण पर्व के अवसर पर उपवास से लेकर मासखमण की तपश्चर्याएँ सानन्द सम्पन्न हुई। ८ अठाई से ऊपर करीब १२० तपाराधराना सानन्द हुई। चातुर्मास के प्रारम्भ से ही चातुर्मास की समाप्ति तक मेरी प्रेरणा से महामंत्र नवकार का अखण्ड जाप हुआ। दिल्ली नगर मे इतनी लम्बी अवधि तक अखण्ड जाप पहली बार ही हुआ। दिनांक २७-९-८५ को स्वर्गीय आचार्य श्री आत्मारामजी म. एवं दि. २९-९. ८५ को प्रवर्तक श्री शुक्लचन्दजी म. की पावन जयंती मनाई गई। इस अवसर पर उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी, श्री देवेन्द्र मुनिजी, श्री गिरीश मुनिजी तथा महासतियो ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए। इस अवसर पर श्री रतनचन्दजी रांका आदि विशेष रूप से उपस्थित हुए। दिनांक २७-१०-८५ को राजस्थान केसरी उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. की जन्म जंयती मनाई गई। इस दिन दिल्ली मे तमिलनाडु, कर्नाटक, आन्ध्र, १२४ MAMIN M श्रद्धालोक के देवता महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पजाब, मध्यप्रदेश तथा दिल्ली के हजारो श्रद्धालु उपस्थित हुए थे। श्री विजयकुमारजी जैन की अध्यक्षता मे यह कार्य मेरे मगलाचरण से आरम्भ हुआ। वाणीभूषण श्री गिरीशमुनिजी, महासती श्री चारित्रप्रभाजी, साध्वी पवनकुमारीजी के साथ ही श्री सम्पतलालजी बोहरा उदयपुर, श्री श्रीचन्द्र सुराणा 'सरस' आगरा, श्री कुलानन्द भारती, कार्यकारी पार्षद, शिक्षा दिल्ली प्रशासन, कवि श्री निर्भय हाथरसी, सांसद श्री मूलचन्द डागा, श्री नवल किशोर शर्मा, पेट्रोलियम मत्री भारत सरकार, श्री जवाहरलालजी मूणोत, श्री मेहताबचन्द जैन महानगर पार्षद आदि विभिन्न वक्ताओ ने पूज्य उपाध्याय श्री जी के जीवन का गुणानुवाद किया। साहित्य मनीषी श्री देवेन्द्र मुनिजी ने अपने सक्षिप्त व्याख्यान मे फरमाया कि 'परिचय, प्रशस्ति और प्रशसा से दूर रहने वाले सन्त नही चाहते कि उनका अभिनन्दन हो, पर श्रद्धालु गण अपने कर्तव्य को कैसे विस्मृत कर सकते है? गुरुदेव श्री एक आलोक स्तम्भ है। आपने जहाँ साहित्य की सरस्वती प्रवाहित की है, वहाँ भक्ति की भागीरथी के लिए जप साधना पर बल दिया है। और श्रद्धा की यमुना भी साथ मे निहारी जा सकती है। आपका जीवन त्रिवेणी संगम है।' अन्त मे उपाध्याय श्री ने आर्शीवचन स्वरूप प्रवचन फरमाया। इस प्रसग पर श्री देवेन्द्र मुनिजी म द्वारा लिखित एव सम्पादित - 'जैन जगत के ज्योतिर्धर आचार्य, कीचड और कमल, तथा कल्पसूत्र' का विमोचन श्री नवल किशोर शर्मा ने किया। उपाध्याय श्री जी द्वारा लिखित जैन कथाएँ मेरे द्वारा लिखित "सत्यशील की गौरव गाथाएँ" महासती स्व प्रभावतीजी द्वारा रचित 'कल्पतरु' पुस्तको का विमोचन श्री मूलचन्द डागा ने किया। 'अहिंसा दर्शन' (मासिक) के विशेषाक का विमोचन स्थानीय सघ के प्रधान श्री विजय कुमारजी जैन ने किया। समारोह का सफल सचालन प्रो श्री रत्नचन्द जैन ने किया। दिनाक ९-११-८५ को राजस्थान केसरी उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी एवं साहित्य मनीषी श्री देवेन्द्र मुनिजी म के दर्शन के लिए गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री माननीय श्री अमरसिंहजी चौधरी वीरनगर जैन स्थानक मे आए। लगभग एक घण्टे तक वे श्री देवेन्द्र मुनिजी शास्त्री से वार्तालाप करते रहे। अन्त मे उपाध्याय श्री से आशीर्वाद ग्रहण कर प्रसन्नचित्त वहाँ से रवाना हुए। इस प्रकार यह वर्षावास विभिन्न कार्यक्रमो के साथ हर्षोल्लास मय वातावरण मे सानन्द सम्पन्न हुआ। XXX १२० श्रद्धालोक के देवता - संवत् २०४३ : पाली-वर्षावास (सन् १९८६) वीरनगर दिल्ली का यशस्वी वर्षावास दान-शील-तप-भाव की अपूर्व प्रभावना के साथ सम्पन्न हुआ और वहाँ से विहार कर आप आदर्श नगर पधारे, जहाँ पूज्या श्री मोहनमालाजी की सेवा मे विरक्ता रचना जैन की भागवती दीक्षा उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी के मुखारविन्द से सानन्द सम्पन्न हुई। इस अवसर पर दिल्ली में विराजित साधु-साध्वीजी तथा श्री संघ बहुत बड़ी संख्या मे उपस्थित थे। विहार काल मे ही आपको रतलाम में विराजित मालवरत्न उपाध्याय श्री कस्तूर चन्दजी म.के स्वर्गवास का समाचार मिला। समाचार मिलते ही सर्वत्र शोक की लहर व्याप्त हो गई। शोक सभा का आयोजन किया गया। उपाध्याय श्री ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि 'उपाध्याय श्री कस्तूरचन्दजी म. स्थानकवासी जैन समाज की एक निराली शान थे। वे श्रमण संघ के एक आलोक स्तम्भ थे। श्रमण संघ के निर्माण मे उनका अनूठा योगदान रहा। साहित्य मनीषी श्री देवेन्द्र मुनिजी ने अपनी श्रद्धांजली अर्पित करते हुए फरमाया कि – 'उपाध्याय श्री कस्तूरचन्दजी म गरीबो के मसीहा थे। उनका दयालु हृदय मक्खन से भी अधिक मुलायम था। वे जब कभी भी दीन-हीन व्यक्ति को निहारते, तो उनका हृदय करुणा से द्रवित हो उठता। वे दया के देवता थे। समाज की उनके प्रति गहरी निष्ठा थी। वे श्रमण सघ के लिए सदा सर्वदा चिन्तन करते रहते थे और अपनी ज्योतिष विद्या के आधार पर कब और किस समय निर्णय करना चाहिए, इसके लिए सतत जागरूक थे। मैने अनेको बार उनके दर्शन किए। मुझे लगा कि उनका व्यक्तित्व चुम्बक की तरह आकर्षक है। वे श्रमण संघ के भीष्म पितामह थे। उनके स्वर्गवास से एक अपूरणीय पुराण पुरुष की क्षति हुई है। आवश्यकता है कि इस विकट वेला मे उपाध्याय श्री कस्तूरचन्दजी म. के प्रति निष्ठा रखने वाले चतुर्विध संघ एक बनकर श्रमण संघ की प्रतिष्ठा मे चार चाँद लगाये। आज संघ पर महान् जिम्मेदारी है कि - वह श्रमण संघ को किस प्रकार यशस्वी और वर्चस्वी बना सके। हम एक और नेक बनकर उस महान सन्त के प्रति अपनी अनन्त आस्था को व्यक्त करे।' मैने व महासती श्री चारित्रप्रभाजी तथा कुछ अन्य श्रावकों एवं संघ ने भी अपनी-अपनी ओर से श्रद्धांजली अर्पित की। दिल्ली से विहार कर विभिन्न ग्राम-नगरो मे धर्मप्रचार करते हुए इकतीस वर्षो otete te MA AAR १२६ श्रद्धालोक के देवता के लम्बे अन्तराल के पश्चात् राजस्थान केसरी उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म.श्री देवेन्द्र मुनिजी म आदि मुनिराजो का दि १६-१२-१९८६ गुरुवार को अलवर आगमन हुआ। मेहरोली से विहार करते ही मुनि संघ की समस्त व्यवस्था का उत्तरदायित्व अलवर सघ ने ले किया था। आप जैसे ही फिरोजपुर पहुंचे कि वहाँ आपका स्वास्थ्य बिगड गया। आप सर्दी -जुकाम एव बुखार से पीडित हो गए थे। तत्काल समुचित चिकित्सा की व्यवस्था की गई। स्वास्थ्य ठीक होने तक इधर ही विराजना हुआ। फिरोजपुर नौगॉवा मे श्वेताम्बर जैनो के घर नही है, फिर भी दिगम्बर जैन भाइयो तथा अन्य लोगो ने इस समय प्रशसनीय सेवा की। दिगम्बर जैन समाज के अग्रणी श्रावक, अ भा दिगम्बर जैन महासभी के मंत्री एव राष्ट्रीय स्तर के कवि श्री ताराचन्दजी "प्रेमी' ने तो गुडगाँव से ही अपनी सेवाएँ समर्पित कर दी थी। नौगॉवा तक प्रेमीजी बराबर आपकी सेवा मे पहुँचते रहे। नौगॉवा व रामगढ़ के दिगम्बर जैन समाज ने अपनी ओर से प्रशसनीय सेवा की। अलवर मे विशाल चल समारोह के साथ आपका नगर प्रवेश करवाया गया। महासती श्री मधुकुंवरजी ने आपके स्वागत मे स्वरचित स्वागत गीत प्रस्तुत किया। साहित्य वाचस्पति श्री देवेन्द्र मुनिजी शास्त्री ने अपनी साहित्यिक एव सुललित भाषा मे अलवर श्रीसघ के सम्बन्ध मे अपने विचार प्रकट किए। आपने अलवर श्री सघ के शास्त्रज्ञ एव कर्म सिद्धान्त मर्मज्ञ श्रावको को स्मरण करते हुए अलवर को पुण्यभूमि - धर्मभूमि के रूप मे निरूपित किया। राजस्थान केसरी उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म.ने भी इस अवसर पर सामयिक विचार प्रकट किए और अपने पूर्व प्रवास का स्मरण किया। विभिन्न वक्ताओ ने मुनि मण्डल के अलवर आगमन के अवसर पर स्वागत मे अपने-अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर घोर तपस्वी श्री रोशनलालजी म के अन्तेवासी श्री धर्ममुनिजी, श्री प्रेममुनिजी आदि भी अलवर पधारे। महासती श्री प्रेमकुंवरजी म तथा महासती श्री मधुकुंवरजी म भी अलवर मे ही थी। इस प्रकार अलवर मे साधु-साध्वियो का एक छोटा मुनि सम्मेलन हो गया। अलवर मे विशाल नेत्र शिविर का आयोजन आपकी प्रेरणा से किया गया। अलवर से विहार कर आप जयपुर पधारे। जहाँ डॉ नरेन्द्र भानावत आदि अनेक विद्वानो ने आपसे भेट की। जयपुर मे ही भगवती सूत्र की प्रस्तावना लिखवाने के निमित्त से श्री पं शोभाचन्द्रजी भारिल्ल ब्यावर से आपकी सेवा मे उपस्थित हुए। जैन १२७ श्रद्धालोक के देवता Hot इतिहास के प्रकाण्ड विद्वान श्री गजसिंह राठौड से जैन इतिहास विषयक चर्चा हुई। यहीं महासती श्री कुसुमवतीजी म. , डॉ. दिव्यप्रभाजी म. से भी मिलन हुआ। जयपुर से विहार कर मदनगज-किशनगढ़ पधारे। जहाँ आपके सान्निध्य मे श्री पुष्कर चिकित्सालय भवन का उद्घाटन हुआ। यहीं परम विदुषी महासती श्री पुष्पवती म. को अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट करने का निर्णय हुआ और रूप रेखा भी तैयार हुई। महावीर जयन्ती उत्साह पूर्वक मनाई गई और इस अवसर पर विभिन्न ग्राम-नगरो के संघ ने वर्षावास हेतु विनंती की। वि.स. २०४३ के वर्षावास के लिए पाली संघ को स्वीकृति मिली। मदनगंज-किशनगढ़ से विभिन्न ग्राम-नगरों मे धर्म प्रचार करते हुए आप ब्यावर पधारे। जहाँ तेरापंथी आचार्य श्री तुलसी से भेंट हुई। संघ एकता विषय पर विचार चर्चा हुई। आपने अपनी प्रकाशित पुस्तको का सेट आचार्य श्री तुलसी को भेंट किया। आचार्य श्री तुलसी ने आपकी साहित्य सेवा की भूरि- भूरि प्रशंसा की। अक्षय तृतीया ब्यावर मे मनाई गई। ब्यावर से विहार कर सोजत पधारे। जहाँ मुनि श्री प्रवर्तक रूपचन्दजी म. 'रजत' से मिलन हुआ। फिर यथासमय वर्षावास हेतु पाली पधारे। यही पर समस्त स्थानकवासी जैन साधु-साध्वियों के परिचायक ग्रन्थ हेतु एक प्रारूप प्रसारित किया। इस प्रारूप के माध्यम से साधु-साध्वियों से उनको परिचय की जानकारी भेजने हेतु आग्रह किया गया था। वर्षावास काल में जप-तप आराधनाएँ भी खूब हुई और वर्षावास सानन्द सम्पन्न हुआ। वर्षावास काल में ही पूना में आचार्य सम्राट भी आनन्दऋषिजी म.सा.के सान्निध्य में साधु-साध्वी सम्मेलन के आयोजन का निमन्त्रण प्राप्त हो गया था। इसलिए वर्षावास की समाप्ति पर विहार की दिशा पूना की ओर होना स्वाभाविक ही था। संवत् २०४४ : अहमदनगर-वर्षावास (सन् १९८७) चूंकि आपको पूना सम्मेलन में जाना था, इसलिए पाली वर्षावास समाप्त होते ही पाली से विहार कर दिया। पाली से समदडी, जालौर, सिरोही होते हुए आपका पदार्पण अम्बाजी हुआ। जहाँ मुनि श्री कन्हैयालालजी म.सा 'कमल' से स्नेह मिलन हुआ। आबू से विहार कर छोटे-बड़े ग्राम-नगरो में धर्म प्रचार करते हुए बडौदा पधारे। बड़ौदा से सूरत होते हुए नासिक पहुंचे, जहाँ श्री सुमतिप्रकाशजी म. उपाध्याय श्री विशालमुनिजी म आदि मुनिराजो से मिलन हुआ। 9RC et hotel in the there to te HRA Mosts श्रद्धालोक के देवता सूरत मे आपकी प्रेरणा ने जादुई कार्य किया। यहाँ आपके एक ही प्रवचन मे स्थानक भवन निर्माण के लिए लाखो रुपये का चन्दा एकत्रित हुआ। सभी से सम्मेलन विषयक चर्चा हुई। सूरत से विहार करके पूना पधारे। पूना सम्मेलन में आपको आचार्य सम्राट श्री आनन्दऋषिजी म ने साहित्य शिक्षण सचिव के पद पर नियुक्त किया था। पूना पहुंचने पर आपने इस सम्बन्ध मे अपने विचार प्रस्तुत किए तथा क्रियामाला की जानकारी प्रस्तुत की। सम्मेलन मे आपने आचार निष्ठा पर बल देने की बात कही। साथ ही यह भी विचार प्रकट किये कि सगठन का मूल उद्देश्य विचारो की निर्मलता होना चाहिए। संगठन विषय पर गम्भीर चर्चाएँ भी हुई। संघ की सुदृढ़ता हेतु समन्वयात्मक दृष्टिकोण अपनाने की चर्चा भी चली और इसी तरह तारतम्य मे उपाचार्य और युवाचार्य के पदो पर नियुक्ति पर भी विचार-विमर्श हुआ। सभी प्रकार से विचार करने के पश्चात् आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म सा ने दिनांक १२-५-८७ को आपको श्रमण सघ का उपाचार्य और डॉ. शिवमुनि को युवाचार्य पद प्रदान करने की घोषणा की। दि १३-५-८७ को चादर महोत्सव सम्पन्न हुआ। इस घोषणा के अवसर पर लगभग तीन सौ साधु-साध्वियो के अतिरिक्त डॉ शंकरदयाल शर्मा, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री चव्हाण, जगत गुरु शकराचार्य, सिने जगत के जाने माने संगीतकार श्री रवीन्द्र जैन, समाज के अग्रगण्य पदाधिकारियो के साथ ही लगभग दो लाख जनता उपस्थित थी। पूना के इस साधु सम्मेलन के अवसर पर आपके द्वारा जलते दीप, बूंद मे समाया सागर, का विमोचन हुआ और आचार्य सम्राट की सेवा मे आपने उपाचार्य के रूप मे समर्पित की। पूना का यह सम्मेलन संगठन और समन्वय की दृष्टि से सफल रहा। इस सम्मेलन मे सघ हित को दृष्टि मे रखकर और भी अनेक निर्णय लिए गए तथा समितियो का भी गठन किया गया, जिनका विवरण देना यहाँ अप्रासगिक है। वि स २०४४ का आपका वर्षावास आचार्य सम्राट के सान्निध्य मे अहमदनगर घोषित हुआ। पूना सम्मेलन समाप्त होने के पश्चात् आपने पूना से आचार्य श्री के साथ विहार कर दिया। पूना से घोडनदी होते हुए वर्षावास हेतु आप अहमदनगर पधारे। १२९ श्रद्धालोक के देवता M वर्षावास काल में आपने आचार्य श्री के सान्निध्य में अनेक सामाजिक समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया। संघ एकता के लिए नियमोपनियम के पालन की दृढ़ता की दृष्टि से विचार-विमर्श एवं क्रियान्वयन विषयक विषय क्रियावलि की गई। वर्षावास काल मे आपने अपने प्रवचनों में सद्धा परम दुल्लहा विषय पर प्रकाश डाला था। इसी विषय पर आपने अपना लेखन भी गतिशील रखा, जिसके परिणाम स्वरूप "सद्धा परम दुल्लहा" पुस्तक तैयार हो गई। आचार्य श्री का अमृत महोत्सव मनाया और 'सत्यं शिवं' ग्रन्थ आचार्य श्री को समर्पित किया। अहमदनगर में ही आचार्य श्री एवं आपकी निश्रा में सात बहनों और दो भाइयों की जैन भागवती दीक्षा भी सम्पन्न हुई। इनमे नव दीक्षित श्री सुरेन्द्र मुनिजी मेरे शिष्य घोषित किए गए। इस प्रकार आपका यह ऐतिहासिक एवं यशस्वी वर्षावास आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म.के सान्निध्य मे विविध आयोजनों के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ। संवत् २०४५ : इन्दौर-वर्षावास (सन् १९८८) अहमदनगर का वर्षावास समाप्त होने पर आप महासती वृन्द को दर्शन देने के लिए घोड़नदी पधारे और फिर घोड़नदी से विहार कर अहमदनगर होते हुए औरंगाबाद पधारे। आपके औरंगाबाद पधारने पर स्थानीय समाज मे अद्भुत उत्साह का संचार हुआ। सभी धर्मो के अनुयायियो ने आपके स्वागत समारोह में सम्मिलित होकर अपनी श्रद्धा-भक्ति का परिचय दिया। स्वागत समारोह मे औरंगाबाद (मराठवाड़ा) विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा भी आपका हार्दिक स्वागत किया गया। आप यहाँ पन्द्रह दिन तक ठहरे। प्रवचनो की धूम मच गई। सभी धर्मों के लोगो ने प्रवचन श्रवण का लाभ लिया। औरंगाबाद मे आपकी प्रेरणा से अनेक रचनात्मक कार्य भी हुए। जैसे युवक संगठन का निर्माण, बालूज में जैन स्थानक के लिए भूमि भी का क्रय, एक हजार एकासने, व्रत एवं एक हजार आयम्बिल व्रत की साधना हुई। यहाँ पर कान्फ्रेस की जनरल मीटिंग भी हुई, जिसमें अनेक प्रस्ताव पारित हुए। इस अवसर पर आपने प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया - "संगठन को सुदृढ़ बनाने व सामाजिक उत्थान के लिए, एकता के लिए त्याग एवं कठोर श्रम आवश्यक है। तपस्वी श्री मिश्रीमुनिजी को भी प्रेम से निवेदन किया गया कि संघीय नियमों का दृढ़ता से पालन हो, यह ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए उन्होंने अपनी स्वीकृति भी दी। RAMA EMAIL SAXMMMMMMMAR १३० More Kets श्रद्धालोक के देवता औरंगाबाद का विहार एवं विदाई का दृश्य भी दर्शनीय था। जिसमे हजारो की संख्या मे श्रद्धालुओ के साथ स्थानीय कुलपति, विधायक, सासद भी उपस्थित थे। यद्यपि धूलिया श्री संघ का भारी आग्रह था, परन्तु स्वास्थ्य आदि के कारण विहार जलगाँव की ओर निश्चित हुआ। किन्तु जालना संघ के अत्यधिक आग्रह पर जालना पधारे। श्री सकलेचाजी की फैक्ट्री पर विशाल स्वागत समारोह आयोजित किया गया जिसमे जैन-अजैन एवं जिले के शासकीय अधिकारी भारी संख्या मे उपस्थित थे। गुरु गणेश नगर, आबड भवन में प्रवचन हुए, होली चातुर्मास सम्पन्न कर आप सिलोड, अजन्ता, जामनेर होते हुए जलगाँव पधारे। जलगाँव मे महावीर जयती का कार्यक्रम समारोह पूर्वक मनाया गया। यहाँ आपकी उपस्थिति मे अणुव्रत सभागार का उद्घाटन हुआ। उसमे तेरापंथी सन्त भी थे। जलगाँव में अनेक ग्राम-नगरो के संघो की ओर से वर्षावास हेतु आग्रह भरी विनतियॉ की गई। इन्दौर सघ लगभग आठ-दस वर्षों से वर्षावास के लिए विनंती करता आ रहा था, किन्तु अनुकूलता न होने के कारण इन्दौर सघ को आपके वर्षावास का लाभ नहीं मिल पा रहा था। जलगाँव में इन्दौर संघ ने पुनः अनुरोध भरी विनती आपकी सेवा में की, तो उसे वि. सं २०४५ के वर्षावास की स्वीकृति मिल गई। जलगाँव से विहार कर आपका आगमन भुसावल हुआ। जहाँ अक्षय तृतीया का पर्व मनाया गया तथा पारणे सम्पन्न हुए। उल्लेखनीय बिन्दु यह रहा कि भुसावल सघ में विगत कई वर्षों से मन मुटाव चल रहा था, किन्तु आपके ओजस्वी-तेजस्वी-प्रेरणास्पद प्रवचनो से सारा विवाद समाप्त हो गया और समाज मे सम्बन्ध स्थापित हो गया। इसी अवसर पर भुसावल मे बीस लाख रुपये लागत से नूतन भवन बनाने का निश्चय भी किया गया। इसके पीछे भी आपकी ही प्रेरणा रही। यह भवन बनकर तैयार हो चुका है। भुसावल से विहार कर आप बोदवाड पधारे। बोदवाइ आचार्य सम्राट की कर्मभूमि रही है। यहाँ पाँच दिन ठहरे। तीन दिनो का धार्मिक शिविर भी लगाया गया। बोदवाड़ से विहार कर एदलाबाद पधारे। यहाँ पर भी आपकी प्रेरणा से नूतन स्थानक भवन का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ। एक ही प्रवचन मे यहाँ लगभग पॉच लाख रुपये का अनुदान प्राप्त हुआ। एदलाबाद से विहार कर आप इच्छापुर पधारे। यहाँ भी आपने स्थानक भवन निर्माण हेतु प्रेरणा प्रदान की और कार्य आरम्भ हुआ। इच्छापुर से विहार कर ५.
श्रद्धालोक के देवता Me होते हुए आप बुरहानपुर पधारे। यहाँ पधारने पर स्थानीय संघ ने उत्साहपूर्वक आपका स्वागत किया। यहाँ पर भी आपकी प्रेरणा से जैन स्थानक भवन का कार्य प्रारम्भ हुआ। जिसका शिलान्यास इन्दौर के सुप्रसिद्ध उद्योगपति लाला नेमनाथ जैन द्वारा किया गया। यहाँ दस दिन तक आप ठहरे। प्रवचनों में जैन-अजैन सभी धर्मों के लोगो ने बड़ी संख्या में सम्मिलित होकर लाभ लिया। यहाँ वाणी भूषण श्री गिरीश मुनिजी स्नेह मिलन हुआ। यहाँ से विहार कर आप खण्डवा होते हुए सनावद पधारे। सनावद में १४ जून, १९८८ को निमाड प्रान्तीय सम्मेलन का आयोजन रखा गया। इसमें इन्दौर व निमाड प्रान्त के अनेक श्री संघ भारी संख्या में सम्मिलित हुए। सम्मेलन में सामाजिक विकास हेतु अनेक प्रस्ताव पारित किए गए। सनावद से आप बड़वाह पधारे, जहाँ तीन दिवसीय शिविर का आयोजन रखा गया। जिसमें बालको को धार्मिक अभ्यास कराया गया। यहॉ अन्य कई ग्राम-नगरो के संघों की विनंती थी कि उनके ग्रामो को भी लाभ मिले, किन्तु अस्वस्थता के कारण आपका विहार यहाँ से सीधे इन्दौर के लिए हुआ। जिस समय आपका पदार्पण इन्दौर नगर की सीमा मे हुआ, उस समय इन्दौर संघ के नर-नारी, आबाल वृद्ध आपके स्वागत-अगवानी के लिए उमड पडे। आप इन्दौर के उपनगर कस्तूरबा आश्रम पधारकर ठहरे। दो दिन पश्चात् दि. २७-६-८८ को वहॉ से आप जानकी नगर पधारे। आपके स्वागत में इन्दौर संघ ने मालव प्रान्तीय अहिंसा सम्मेलन का आयोजन इन्दौर स्थित रवीन्द्र नाट्य ग्रह में रखा। जिसमे समाज के गणमान्य लोगो की भारी उपस्थिति रही। म. प्र. शासन के तत्कालीन उद्योग मन्त्री श्री चन्द्रप्रभाष शेखर, विधायक ललित जैन के अतिरिक्त मुम्बई के श्री जवाहरलाल मूणोत व स्थानीय उद्योगपति तथा संघ के पदाधिकारियों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। अन्त में उपाध्याय श्री एवं आपके प्रेरक प्रवचन हुए। इस सम्मेलन मे अनेक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित कर राज्य व केन्द्र सरकार को प्रेषित किये। यह अहिंसा सम्मेलन २९-६-१९८८ को आयोजित किया गया था। जानकीनगर से उपनगरों मे विचरण करते हुए दि. २०-७-८८ को वर्षावास हेतु आपका मंगल प्रवेश राजवाड़ा स्थित महावीर भवन में हुआ। मंगल प्रवेश का चल समारोह महावीर भवन पहुँचकर सभा के रूप में परिवर्तित हो गया। मुख्य अतिथि मानव मुनिजी तथा गणमान्य व्यक्तियों ने आपका हार्दिक स्वागत किया। इस अवसर पर अपने उद्बोधन में आपने जनता को धर्ममय जीवन बनाने की प्रेरणा दी। १३२ H MEXAM LAMA Arna May Jesse श्रद्धालोक के देवता आपके वर्षावास की प्रसन्नता में महिला मण्डल ने निर्णय लिया कि प्रतिदिन ११ से १२ बजे तक अखण्ड नवकार मंत्र का जाप किया जाये व जाप के पश्चात् प्रभावना वितरित की जाए। यह क्रम लगातार चलता रहा। चातुर्मास चतुर्दशी के दिन चार धर्म चक्रो का आयोजन किया गया। प्रत्येक मे ४२ बेले व एक तेला सम्पन्न हुआ। इस वर्षावास मे जप-तप की आराधनाएँ भी अभूतपूर्व हुई। १५० से अधिक अट्ठाइयाँ ११,१५,२१ तपस्याओ के साथ १५ मासखमण भी हुए। एक हजार तेलो की आराधना भी सम्पन्न हुई। प्रति रविवार को दया समिति की ओर से दयावत का आयोजन रखा गया। मालव केसरी श्री सौभाग्यमलजी म , मरुधर केसरी श्री मिश्रीमलजी म की पुण्य तिथि मनाई गई। आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म. का ८९ वॉ जन्म दिवस मनाया गया। युवा संघ द्वारा सिलाई मशीने व स्कूल यूनिफार्म वितरित की गई। म.प्र स्वाध्याय सघ द्वारा पच दिवसीय शिविर का आयोजन रखा गया। पर्दूषण पर्व के अवसर पर आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी ने धर्म के विभिन्न पक्षो पर प्रकाश डालते हुए सम्यग दर्शन, दान, शील, तप, भाव, ज्ञान, चारित्र, श्रद्धा आदि के स्वरूप का विवेचन किया। आपने समय-समय पर समाज सुधार के लिए जनता को जागृत किया। इसी अवसर पर सामायिक, प्रतिक्रमण, दया व तप-जप की अखण्ड आराधना होती रही। महावीर भवन मे ९ दिन का अखण्ड जाप एव चन्दनबाला भवन मे ३१ दिन का अखण्ड जाप हुआ। विद्वानो मे इन्दौर के डॉ नेमीचन्द जैन एव जयपुर के डॉ नरेन्द्र भानावत के व्याख्यान भी हुए। अनेक विद्वानो का आवागमन बना रहा। वर्षावास काल मे ही काफ्रेंस का अमृत महोत्सव भी यहाँ आयोजित हुआ। काफ्रेस स्थानकवासी समाज की मातृ सस्था है। इस अवसर पर आपने सगठित रहने की प्रेरणा प्रदान की। यही इसी समय एक विद्वत सम्मेलन का भी आयोजन हुआ। जिसमे देश के वरिष्ठ विद्वानो ने भाग लिया। इन्दौर मे आपके द्वारा लिखित पुस्तक "जैन नीति शास्त्र- एक परिशीलन" का विमोचन मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुनसिंह ने किया। इस अवसर पर अन्य प्रान्तो के नेताओं का भी आगमन हुआ था। वर्षावास काल मे चेन्नई, बैंगलोर, हैदराबाद, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, दिल्ली, पजाब आदि प्रान्त नगरो से श्री सघो की उपस्थिति बराबर बनी रही।
श्रद्धालोक के देवता Ke इस प्रकार आपका यह इन्दौर वर्षावास विभिन्न धार्मिक, साहित्यिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ। सम्पूर्ण वर्षावास काल मे श्री संघ में अभूतपूर्व उत्साह बना रहा। संवत् २०४६ : जसवंतगढ़-वर्षावास (सन् १९८९) इन्दौर का अपना यशस्वी वर्षावास समाप्त होने पर आपने इन्दौर से विहार कर दिया। इन्दौर के उपनगरों में तथा विभिन्न ग्रामों में धर्म प्रचार करते हुए आप देवास पधारे। देवास में लगभग एक सप्ताह तक मुकाम रहा। देवास मे विराजित महासतियों ने आपकी अगवानी की। प्रतिदिन प्रवचन, नवकार मंत्र का जाप, मंगल पाठ के विशेष आयोजन होते रहे। देवास से उज्जैन की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में परम विदुषी साध्वी रत्न श्री उमराव कुँवरजी म.'अर्चना' से मिलन हुआ। वर्षो बाद आपसे मिलन हुआ था। फिर ग्रामानुग्राम होते हुए आपका आगमन ऐतिहासिक एवं धार्मिक नगरी उज्जैन में हुआ। नगर आगमन पर जिले के अधिकारीगण डी. आई.जी., एस. पी. और डॉ. राजेन्द्र जैन पूर्व उद्योग मंत्री तथा समाज के गणमान्य व्यक्तियों ने आपका हार्दिक स्वागत किया। लगभग आठ-दस दिनों तक उज्जैन मे ठहरना हुआ। उज्जैन से विहार कर आपका पदार्पण उन्हेल हुआ। जहाँ २ जनवरी, १९८९ को पार्श्वनाथ जयंती का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। इसमें अनेक ग्राम-नगरों के श्रद्धालुओं ने भाग लिया। उन्हेल से विहार कर महिदपुर, महिदपुर से नागदा, खाचरौद होते हुए रतलाम पधारे। रतलाम में आपके सान्निध्य मे चार दीक्षाएँ सम्पन्न हुई। दीक्षोपरान्त रतलाम से सैलाना, जावरा तथा अन्य ग्रामों में धर्म प्रचार करते हुए आप मन्दसौर पधारे। मन्दसौर मे आपकी दीक्षा जयंती मनाई गई और फाल्गुन शुक्ला तृतीया को मन्दसौर में ही "सद्धा परम दुल्लहा" का विमोचन भी हुआ। मन्दसौर से विहार कर आप नीमच पधारे। जहाँ होली चातुर्मास हुआ। नीमच से जावद, निम्बाहेड़ा होते हुए चित्तौड़गढ़ पधारे। चित्तौड़ से राशमी पधारे। जहाँ महावीर जयन्ती मनाई गई। राशमी से विहार कर आप उदयपुर पधारे। आपके उदयपुर पधारने पर श्री संघ मे अभूतपूर्व उत्साह की लहर फैल गई। अक्षय तृतीया का पर्व भी यही मनाया, पारणे भी हुए। तारक गुरु ग्रन्थालय के नवीन भवन का उद्घाटन भी आपके सान्निध्य मे सम्पन्न हुआ। आपके द्वारा लिखित "अप्पा सां १३४ EMAIL श्रद्धालोक के देवता परमप्पा" तथा "जैन कथा साहित्य की विकास यात्रा" का विमोचन इन्दौर के उद्योगपति लाला नेमनाथ जैन तथा सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्री रतनचन्दजी रांका ने किया। उदयपुर मे प्रवर्तक श्री रमेश मुनिजी म. से स्नेह मिलन हुआ। उदयपुर मे जसवंतगढ़ श्री सघ की अनुरोध भरी विनती को ध्यान मे रखकर वर्षावास हेतु स्वीकृति प्रदान की। उदयपुर से विहार कर सेराप्रान्त के विभिन्न ग्रामो मे विचरण करते हुए यथा समय वर्षावास हेतु आपका आगमन जसवंतगढ़ हुआ। दिनाक १३-७-८९ को आपका वर्षावास हेतु जसवतगढ़ मे मंगल प्रवेश हुआ। आपकी अगवानी के लिए हजारो नर नारी चार किलोमीटर तक आए। यह चल समारोह स्थानक भवन मे आकर धर्म सभा के रूप में परिवर्तित हो गया। इस अवसर पर लगभग ५० ग्राम-नगरों के भाई-बहनो एवं श्री संघो का आगमन हुआ था। सम्पूर्ण वर्षावास काल में भारी मात्रा में दर्शनार्थियो का आवागमन रहा। मासखमण व अनेक बडी तपश्चर्याएँ, सामाजिक व धार्मिक क्षेत्रो मे अनेक रचनात्मक कार्य हुए। दान, शील, तप, भाव की अपूर्व प्रभावना हुई। नवकार महामन्त्र का अखण्ड जाप पूरे वर्षावास काल मे चलता रहा। नारायण शिविर का आयोजन नारायण सेवा संस्थान की ओर से आपके सान्निध्य मे हुआ, जिसमे लगभग पाँच हजार असहाय आदिवासी भाई-बहनो ने भाग लेकर अपना उपचार करवाया। दि २४-८-८९ को गोगुन्दा, कोटडा तहसील के लगभग १०० शिक्षको का दो दिवसीय शिविर आयोजित किया गया, जिसमे जिले के शिक्षाधिकारी भी सम्मिलित हुए। इस अवसर पर उपाचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी शास्त्री ने भारतीय संस्कृति मे शिक्षा के महत्व पर अपने ओजस्वी विचार प्रस्तुत करते हुए आचार व विचार दोनो पक्षो पर जोर देने को आह्वान किया। दि १-९-८९ से ५-९-८९ तक वर्द्धमान जैन स्वाध्याय संघ के तत्वावधान मे धार्मिक शिविर सम्पन्न हुआ। जिसमे इस प्रान्त के लगभग ३०० के लगभग बालक-बालिकाओ ने भाग लिया। दिनांक २-८-८९ को आचार्य सम्राट श्री आनन्द ऋषिजी म की जन्म जयती का आयोजन किया गया, जिसमे १२०० से अधिक आयम्बिल तप की भव्य आराधना हुई। इस समारोह मे अनेक गॉव- श्रद्धालोक के देवता Most M नगरो के श्री संघ पधारे। इस अवसर पर आपने फरमाया कि 'आचार्य धर्म संघ के पिता है। उनकी आज्ञा तीर्थकर की आज्ञा की तरह अनुल्लंघनीय है। संघ का संचालन का कार्य आचार्य करते है। आचार्य सम्राट पुण्य पुरुष है, संघ पर छत्रच्छाया सदा बनी रहे, हम उनके नेतृत्व में आगे बढ़ें तथा स्वाध्याय, धार्मिक पाठशालाओं के सद्-संस्कारों का सिंचन करें, यही श्रद्धार्चना।' इस अवसर पर अनेक अन्य वक्ताओ ने भी सामयिक विचार प्रस्तुत किये। कवि सम्मेलन का भी आयोजन रखा गया था, जो सफल रहा। पर्दूषण पर्व मे ७०० सामूहिक तेला तपोत्सव हुआ। मासखमण भी हुए। बालक-बालिकाओं की धार्मिक प्रतियोगिताएँ भी रखी गई थीं। संवत्सरी के दिन ४० तपस्वी भाई-बहनों का अभिनन्दन किया गया। पर्दूषण के दिनों मे लगभग ४५ ग्रामों के भाई-बहनों ने तपाराधना की। आयम्बिल तप दिवस पर ४३ ग्रामों के भाई-बहनों ने भाग लिया। तरुण तपस्वी श्री प्रवीण मुनिजी म.के ४० दिवसीय तप पूर की बेला पर ४३ ग्रामों के भाई-बहनों ने तपाराधना की। उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. की जन्म जयती पर आयोजित सामूहिक एकासना तप में ५३ ग्राम-नगरों के भाई-बहनों ने भाग लिया। सम्पूर्ण वर्षावास काल में कुल १०३ बड़ी तपश्चर्याएँ हुई, जिनमें ४०, ३२, ३१, २१, १९, १५, ११ के साथ ही ५७ अट्ठाइयाँ हुई। तपस्वी श्री प्रवीण मुनिजी म. के ४० दिवसीय विराट तप महोत्सव पर आयोजित समारोह में उपस्थित धर्म प्रेमी जनता को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि 'भारत में समन्वय की प्राचीन काल से ही महिमा रही है और इसी बुनियाद पर यहाँ अलग-अलग धर्म एवं जातियाँ रहती आई है। इस देश में विद्यमान सभी धर्मों के पवित्र ग्रन्थो में कहा गया है कि मानव! तुम्हारा हृदय विशाल हो, हृदय में संकीर्णता न रहे। आपने स्पष्ट किया कि – 'धर्म अलग है और पन्थ अलग। लेकिन आज लोग पन्थ को ही धर्म मान बैठे हैं, इसी कारण पन्थो व सम्प्रदायो के नाम पर होने वाले झगड़ो को धर्म के झगड़े माना जाता है। धर्म शब्द का गूढ़ अर्थ समझने मे हमारे देश के विद्वान, संविधान निर्माता भी विफल रहे और उन्होंने भारत को धर्म निरपेक्ष राज्य घोषित किया। धर्म निरपेक्ष कोई देश तो क्या कोई व्यक्ति भी नहीं हो सकता, क्योकि धर्म निरपेक्षता का अर्थ है, जिसका कोई धर्म नहीं। धर्म शाश्वत है और आत्मा के अनुकूल है, वही धर्म है।' १३६ AMALAM .
श्रद्धालोक के देवता आपने 'बदले परिवेश मे लेखन और प्रवचन मे समन्वय की महिमा को महत्व देने पर जोर दिया। उन्होने कहा कि जैन धर्म मे अनेकान्तवाद का महत्व है, जिससे उन्हे समन्वय की दृष्टि मिली है।' आपने इस अवसर पर उपस्थित पत्रकारों को अलग से बताया कि उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म.की जन्म-स्थली गोगुन्दा के निकट सिमटार गाँव है, जहाँ संघ ने एक महाविद्यालय खोलने का निर्णय लिया है और गॉव के नागरिको ने गॉव का नाम भी पुष्कर गुरु नगर रखने का निर्णय किया है। इस तपोत्सव के अवसर पर ८०० बेले तप की भव्य आराधना हुई। उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म की जन्म जयती विशाल स्तर पर मनाई गई। इस अवसर पर युवा सम्मेलन हुआ। जिसमे जोधपुर, डूंगला, कपासन, उदयपुर, डबोक, वल्लभनगर, दरोली, मावली, राशमी, नाथद्वारा तथा मारवाड मेवाड के लगभग पाँच सौ युवाओ ने भाग लिया। इसमें कई भावी कार्यक्रम निश्चित कर प्रस्ताव किए गए। इसी अनुक्रम मे कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया था। समारोह के मुख्य दिन जैन समाज के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्ति देश के कोने-कोने से पधारे और राजस्थान सरकार के स्वायत्त शासन मत्री श्री गुलाबसिह शक्तावत भी आए थे। इस अवसर पर उपाचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी म ने अपने मंगल सदेश मे उपाध्याय श्री के जीवन दर्शन का परिचय कराते हुए दीर्घायु की कामना की एव श्रावक समुदाय को श्रमण संघ को मजबूत बनाने की अपील की। इस अवसर पर उपस्थित गुरु भक्तों ने विभिन्न कार्यो हेतु हजारो रुपये के दान की घोषणा की। इसी समय आपके द्वारा लिखित धर्म चक्र, चिंतन की चांदनी, ग्रन्थो का विमोचन श्री गुलाबसिह शक्तावत एवं उद्योगपति जे डी जैन गाजियाबाद वालो द्वारा किया गया। इस प्रकार जसवंतगढ़ का वर्षावास विभिन्न आयोजनो के साथ सानन्द उत्साह पूर्वक सम्पन्न हुआ। इसी वर्षावास की एक उल्लेखनीय बात यह रही कि जयती के पावन अवसर पर उदयपुर के 'वर्धमान पुष्कर जैन युवा मंच' एव 'तारक जैन युवा परिषद्' के कार्यकर्तागणो ने एक विशाल रैली का भव्य आयोजन किया, जो स्कूटर, मोटरसाइकिल आदि वाहनो द्वारा जयंती के अवसर पर जसवतगढ़ पहुँचे। इनकी यह शान्ति यात्रा थी। वर्षावास की समाप्ति के पश्चात् आपका जसवंतगढ़ से विहार हुआ और दिसम्बर ८९, के अन्त तक आप इसी क्षेत्र के ग्रामो मे विचरण करते हुए धर्म प्रचार करते रहे। जिस गाँव मे भी आप पधारते थे, वहाँ दर्शनार्थिो का मेला लग जाता था। १३७ श्रद्धालोक के देवता Ko संवत् २०४७ : सादड़ी-वर्षावास (सन् १९९०) जसवन्तगढ़ का ऐतिहासिक चातुर्मास सानन्द सम्पन्न कर आपश्री का मेवाड के विभिन्न छोटे-बड़े क्षेत्रो में पदार्पण हुआ, इसी बीच परम श्रद्धेय उपाध्याय गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म. की अस्वस्थता के कारण विहार कार्यक्रम स्थगित- सा करना पड़ा। मेवाड़ से मारवाड़ की ओर प्रस्थान करते हुए आपश्री राणकपुर होते हुए फालना से सुमेरपुर पधारे, जहाँ अक्षय तृतीया का पावन पर्व उल्लास के सुमधुर क्षणों मे मनाया गया। इस पावन अवसर का देश के अनेक प्रान्तो से तपस्वी भाई-बहनों के अलावा हजारों श्रद्धालु भक्तों ने दर्शन लाभ प्राप्त किया। इस वर्ष के चातुर्मास हेतु सादड़ी के अलावा पीपाड़ शहर व सीवाणागढ़ का भी भारी आग्रह रहा पर स्वास्थ्य को मद्देनजर रखते हुए महावीर जयन्ती के अवसर पर वाली ग्राम में सादड़ी चातुर्मास करने का निर्णय लिया गया। पान्त के साण्डेराव आदि क्षेत्रों को स्पर्शते हुए यथा समय सादडी चातुर्मास हेतु प्रवेश हुआ। सादड़ी पाली जिले का एक सुप्रसिद्ध धार्मिक नगर रहा है, जहाँ जैन समाज के भारी संख्या में लोग निवास करते हैं, जो व्यापार की दृष्टि से पूना, मुम्बई, बैगलोर, चेन्नई अन्यान्य नगरो में बसे हुए है, इस चातुर्मास को सफल बनाने हेतु सादड़ी निवासियों ने तन, मन, धन से अपना सहयोग प्रदान किया एवं दान, शील, तप भाव की अपूर्व प्रभावना कर अपने आराध्यगुरु के प्रति समर्पण भाव प्रदर्शित किए, अनेक धार्मिक सामाजिक कार्यक्रम भी समय-समय पर सम्पन्न होते रहे, जिसमें विशेष रूप से अखिल भारतीय स्थानकवासी जैन कान्फ्रेन्स, दिल्ली का अधिवेशन तत्कालीन कान्फ्रेन्स के अध्यक्ष उदारमना समाज सेवी मुम्बई निवासी पुखराजमल लूंकड की अध्यक्षता मे व माननीय न्यायमूर्ति जसराजजी चोपड़ा के मुख्य आतिथ्य मे सम्पन्न हुआ। पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. की जन्म जयंती का विशाल आयोजन, विराट कवि सम्मेलन, बाढ़ पीड़ितो को लाखो का अनुदान आदि उल्लेखनीय रहे। इस वर्ष विदुषी महासती साध्वी श्री सत्यप्रभाजी भी अपनी शिष्या मण्डली के साथ सादड़ी चातुर्मास हेतु पधारी, पर्युषण पर्व के पावन अवसर पर अनेक दीर्घ तपश्चर्याएँ भी हुई, जिसमे मासखमण व १५० अट्ठाई तप की आराधना में अलावा हजारों तेलों की संख्या रही। १३८ RAM सालमा संवत् २०४८ : पीपाड़-वर्षावास (सन् १९९१) सादड़ी का वर्षावात सम्पन्न कर उपाध्याय प्रवर एवं पूज्य गुरुदेव भी का विहार पाली की ओर हुआ, नाड़ोल बुत्ती आदि क्षेत्रों को स्पर्शते हुए पाली पधारे, जहाँ आचार्य प्रवर पूज्य हस्तीमलजी म. का मधुर मिलन ज्ञानवर्ता व प्राने सम्बन्धो का स्मरण विशेष रूप से रहा। स्मरण रहे. इसी आदान-पतान न मिलन के बाद पूज्य आचार्य प्रवर का नीमाज ग्राम में समाधि पूर्वक देवलोक गमन हो गया। जिसमें १५ दिवस तक लाखो लोगों ने दर्शन लाभ पाप्त कर नीमाज को तीर्थ स्थल का रूप प्रदान कर दिया। पाली पवास के दौरान ही स्थानीय भवरलालजी मेहता आदि श्रावको द्वारा नव निर्मित अमर जैन स्वाध्याय भवन का मंगल उद्घाटन भी सम्पन्न हुआ एवं इसी अवसर पर आगागी चातुर्गास पीपाड सीटी मे करने की स्वीकृति प्रदान की गई। पाली से, विहार कर सीवाणची पान्त मे पधारे। परिणाम स्वरूप आस-पास व सुदूर क्षेत्रों से हजारों की संख्या में भक्तों का आगमन रहा। कल्याणपुरा में एक चिकित्सालय भवन की योजना रखी गई, जो जन सहयोग से धीरे-धीरे मूर्त रूप ग्रहण करने जा रही है। सगड़ी कल्याणपुरा आदि क्षेत्र सीवाणची प्रान्त के अन्तर्गत निहित है। इन क्षेत्रों में पावन पवितfol अमृत प्रदान करते हुए आपका जोधपुर नगर में पदार्पण हुआ, यहाँ कुरा दिन प्रवासकाल सम्पन्न कर यथासमय चातुर्मास हेतु आपका पीपाड नगर में पदार्पण हुआ, यहाँ का कोठारी परिवार जो व्यवसाय की दृष्टि से गुम्बई में वसा पर अपनी श्रद्धा को मूर्तरूप देने हेतु चार मास हेतु अपनी जन्मभूमि गे सोना सकल्प ले चुका था और इस चातुर्मास को अधिक से अधिक सफलता तन, मन, धन से लगा रहा। सघ एवं कोठारी परिवार इस चातुर्गारा प्रयत्नशील थे। उपाध्याय प्रवर का चातुर्मास प्राप्त कर संघ में हर्ष की तरह पड़ी, इसी बीच महावीर जयन्ती के पावन अवसर पर खण्डप ग्राग में राति घीसी बहन की दीक्षा विदुषी साध्वी श्री सत्यप्रभाजी की शिष्या सप में आप सान्निध्य मे सम्पन्न हुई। समदड़ी ग्राम का श्रावक संघ सदा से ही आपd, ultanp समर्पित रहा है अक्षय तृतीया का विराट पर्व यहाँ सम्पन्न हुआ, जिसमे बीसी तपस्वी भाई बहन व हजारों श्रावक-श्राविकाएँ आपके आणीति को पा.। उपस्थित हुए। यहाँ से प्रस्थान कर आपश्री कल्याणपुरा पधारे, । पर ' राधाकुमारी जैन ने विदुषी महासती श्री सत्यप्रभाजी के पास atul l SALMAAL..........!
श्रद्धालोक के देवता et K यथासमय पीपाड़ पधारे। संघ चातुर्मास मे अनेकानेक धार्मिक उत्सवों में भाग लेकर अपनी भक्ति भावना प्रदर्शित की। फलस्वरूप पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. की ८२ वीं जन्म जयंती, कवि सम्मेलन, युवा सम्मेलन, नेत्र शिविर, अन्नदान, वस्त्रदान आदि आयोजन आशातीत सफल रहे। संयोग से इस वर्ष विदुषी साध्वी रत्ना श्री कुसुमवतीजी, विदुषी डॉ. दिव्यप्रभाजी, श्री गरिमाजी एम. ए. , श्री अनुपमाजी एम. ए. , श्री निरुपमाजी, श्री कल्पनाजी ठाणा ६ का भी चातुर्मास लाभ प्राप्त होने से श्री संघ में अधिक उत्साह का संचार रहा। इस चातुर्मास की चिरस्मृति के लिए चम्पालालजी कोठारी के सुपुत्रों ने एक विद्यालय भवन के निर्माण हेतु लाखो का अनुदान प्रदान किया। सेठ हरखचन्द्र वच्छराज कोठारी के सुपुत्र खेमचन्दजी नेमिचन्दजी, मूलचन्दजी के अलावा निहालचन्दजी, सुभाषजी, कान्तिलालजी, पद्मचन्दजी, जवरीमलजी आदि सभी का अपूर्व सहयोग प्रशंसनीय रहा। संवत् २०४९ : सीवाना-वर्षावास (सन् १९९२) पीपाड़ का शानदार चातुर्मास सानन्द सम्पन्न कर आपश्री मेड़तासिटी पधारे जहाँ लम्बे समय तक स्वास्थ्य लाभ हेतु विराजना रहा। वहाँ से प्रस्थान कर आपश्री स्वर्गीय मरुधर केसरी मिश्रीमलजी म. की पुण्यतिथि समारोह में सम्मिलित होने जैतारण पधारे, जहाँ हजारों भक्तों व अनेक विद्वान सन्त मुनिराजों की पावन उपस्थिति व महामहिम तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. शंकरदयालजी शर्मा के मुख्य अतिथि के रूप मे विराट आयोजन सानन्द सम्पन्न हुआ। इस पावन अवसर पर प्रवर्तक रूपचन्दजी रजत की प्रेरणा से एक कैन्सर हॉस्पीटल हेतु लाखों का अनुदान भी एकत्रित हुआ। यह स्थल पावनधाम के नाम से विश्रुत है। जैतारण से आपश्री बिलाडा कापरडा होते हुए जोधपुर पधारे। जोधपुर का श्रावक संघ जो सदा से ही श्रमण सघ अनुयायी रहा है, मे आपके पधारने से उत्साह का वातावरण बना। एक हृदय विदारक घटना के समाचार भी २८ मार्च को प्राप्त हुए कि संघ के प्राण, समाज के आस्थास्तम्भ परम आदरणीय परम वन्दनीय महामहिम आचार्य भगवन्त श्री आनन्दऋषिजी म का अहमदनगर की पावन धरा पर देवलोक गमन हुआ है। इस असामयिक स्वर्गवास के समाचारों से समाज पर वज्ञाघात होना स्वाभाविक था। लाखो की सख्या मे जनसागर अहमदनगर की ओर चल पडा। जोधपुर से भी श्रावक संघ ने जाने का प्रयास किया, पर समय पर साधनामार ९४० weake श्रद्धालोक के देवता के कारण नहीं पहुंच पा रहा था। पर आचार्य श्री के निर्देश पर समाज के सुप्रसिद्ध उद्योगपति माननीय घेवरचन्द कानूनगो अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर अहमदनगर पहुँचे एवं आचार्यश्री के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर एक आदर्श उपस्थित किया। सारे देश में शोक की लहर व्याप्त हो चुकी थी। अब तक जो उपाचार्य श्री के नाम से विश्रुत थे, उन्हे आचार्य के नाम से जाना जाए, इस हेतु जैन कान्फ्रेन्स के अध्यक्ष महोदय पुखराजमलजी लूकड, नेमनाथजी जैन, जे. डी. जैन, नृपराजजी जैन अपने शिष्ट मण्डल के साथ आचार्य श्री की सेवा में जोधपुर उपस्थित हुए व सभी पदाधिकारी मुनिराजों से सम्पर्क कर यह निर्णय लिया गया कि अक्षय तृतीया के पुनीत अवसर पर सोजत मे आचार्य पद की विधिवत घोषणा की जाए, फलस्वरूप जोधपुर से आपश्री का विहार पाली होकर सोजत की और हुआ जहाँ महामन्त्री शान्तिलाल छाजेड द्वारा मुनि व महासति वृन्द के सान्निध्य में यह घोषणा की गयी। साथ ही निकट भविष्य मे चादर महोत्सव आयोजित करने का निर्णय लिया गया। सोजत का प्रवास सम्पन्न कर आपश्री पाली, भॉवरी, मझल, दुन्धाडा, अजीत, करमावस आदि छोटे-बड़े गॉवों को अपनी चरण रज से पावन करते हुए यथासमय चातुर्मास हेतु गढ़ सिवाना पधारे, स्मरण रहे, गढ सीवाणा श्रावक सघ चातुर्मास के लिए वर्षों से लालायित रहा। इस वर्ष उसे यह मंगल अवसर प्राप्त हुआ। श्रावक सघ की ओर से तीन महानुभावो ने इस चातुर्मास का बीड़ा अपने कन्धो पर उठाया। वहाँ का सुप्रसिद्ध परिवार जिन्नाणी जो धर्म, समाज, देश के कार्यों में सदा से ही मुक्त हाथो से दानशील रहा है। उसी परिवार के सदस्य भूताजी मिश्रीमल फर्म के नाम से बैगलोर, ईचलकरंजी, मुम्बई आदि पर अपना व्यवसाय संचालित करते है। भाई पारसमलजी जिन्नाणी एवं दीपचन्दजी मेहता जो व्यवसाय की दृष्टि से अहमदाबाद, सूरत आदि स्थानों पर निवास करते है एव श्रावक शिरोमणी स्वर्गीय घीगड़मलजी कानुगो के सुपुत्र राजमलजी कानुगो इन तीनो बन्धुओ ने सम्पूर्ण चातुर्मास व्यवस्था का भार सहर्ष स्वीकार कर अनेकानेक धार्मिक, सामजिक कार्य सम्पन्न करवाए। जिसमे धार्मिक शिविर, असहाय भाई-बहनो को सहयोग, उपाध्याय श्री की ८३ वी. जन्म जयती आदि उल्लेखनीय रहे। इस वर्षावास मे साध्वी रत्न महासती श्री पुष्पवतीजी म आदि का भी विराजना रहा। आचार्य श्री के चादर समारोह के विशाल कार्य को मूर्तरूप देने के लि स्थानकवासी जैन कान्फ्रेस के पदाधिकारीगण सक्रियता के कार्य मे लगे। इस .
श्रद्धालोक के देवता प्रमुख रूप से देश की राजधानी दिल्ली, महाराष्ट्र एवं मध्यप्रदेश इन्दौर से तथा आचार्य श्री की पावन जन्मस्थली उदयपुर से भारी आस्था के साथ प्रार्थनाएँ होने लगीं। दिल्ली, मुम्बई में कान्फ्रेंस की मीटिंगें हुई और अन्ततोगत्वा सभी दृष्टि से सोच- समझकर चादर समारोह का आयोजन उदयपुर में करने का शुभ निर्णय लिया गया। स्वीकृति के साथ ही उदयपुर श्रावक संघ अपनी रूपरेखा की तैयारी में जुटा। अनेक समितियाँ बनीं, मुख्य संयोजक का कार्य एडवोकेट रोशनलालजी मेहता को सौंपा गया। संघ के पदाधिकारी मूलचन्दजी बुरुड, जालमचन्दजी जैन, चाँदमलजी सर्राफ, चुन्नीलालजी धर्मावात, सम्पतलालजी बोहरा, एन. के. छाजेड़ आदि इस कार्य को सफल व भव्य रूप देने मे तत्पर बने। साथ ही स्वागताध्यक्ष हेतु उद्योगपति घेवरचन्दजी कानुनगो ने अपनी सहमति प्रदान की। इसके साथ ही इस पुनीत अवसर पर देश से लाखों श्रमणसंघीय अनुयायी के पहुंचने हेतु अपने-अपने प्रान्तों मे समितियाँ गठित कर उदयपुर पहुंचने की तैयारी में सक्रिय बनें, साथ ही श्रमण संघ के सैकड़ों मुनिराज व महासती वृन्द के चरण कमल भी उदयपुर की ओर लगातार बढ़ रहे थे। जिसमें उपाध्याय, प्रवर्तक, उपप्रवर्तक, महामन्त्री, सलाहकार आदि मुनिराज व अनेक परम विदुषी महासती मण्डल भी सक्रिय थे। पूज्य आचार्य प्रवर की पावन जन्मभूमि होने से आपके सांसारिक परिजन जो वरडिया परिवार से सम्बन्धित है, वे भी अपनी मंगल कामनाएँ इस अमृत कार्य में सम्मिलित करने हेतु सक्रिय हुए, इसी पावन बेला पर सामूहिक दीक्षाओ का भी कार्यक्रम समायोजित हुआ। सीवाणा का ऐतिहासिक चातुर्मास सम्पन्न कर आपश्री अपने आराध्य पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. के साथ उदयपुर की ओर पधारने के लिए मोकलसर, जालोर, साण्डेराव, फालना, बाली, सादडी प्रसिद्ध तीर्थ स्थल राणकपुर, सायरा, पदराडा, ढोल, कम्बोल, जसवन्तगढ़, गोगुन्दा, वास मादडा, मोलेला, सेमा, खमणोर आदि सैकडों गॉवो मे पावन सन्देश देकर दि २८ फरवरी को उदयपुर के उपनगर अहिंसापुरी पधारे, जहाँ के निवासियों ने भव्य स्वागत किया। मार्ग में एक दिन लोहिरा श्रुति सेन्थेटिक्स में माननीय एन. के. छाजेड़, बी. डी.जैन, अग्रवालजी के आग्रह से बिराजे व १ मार्च को उदयपुर पधारे। संवत् २०५० : भीलवाड़ा-वर्षावास (सन् १९९३) चादर समारोह एवं पूज्य उपाध्याय श्री के महाप्रयाण के पश्चात् आपत्री नाम समय तक तारक गुरु जैन ग्रन्थालय में विराजमान रहे एवं वहाँ से यथासमय प्रस्तान १५२ st श्रद्धालोक के देवता कर डबोक, नाथद्वारा, काकरोली, गंगापुर होते हुए चातुर्मास हेतु औद्योगिक नगरी भीलवाडा पधारे। इस वर्ष यहाँ के सम्पूर्ण जैन व जैनेतर समाज मे आपका यशस्वी चातुर्मास होने से दान, शील, तप, भाव के साथ व्यसन मुक्ति व अनेक धार्मिक सामाजिक आयोजन सम्पन्न हुए। श्रावक सघ मे एक अपूर्व उत्साह व युवको मे अपूर्व जोश था। प्रतिदिन हजारो श्रद्धालुगण आचार्य श्री के दर्शन, प्रवचन, सत्सग का लाभ उठाने पहुंचे। पूज्य उपाध्याय गुरुदेव श्री की विराट जन्म जयती दि २९-१०-९३ को मनाई गई। जिसमे देश के अनेक नेतागण व जैन कान्फ्रेस के पदाधिकारी के साथ करीब १० हजार की जनमेदिनी के बीच आचार्य श्री ने चातुर्मास के पश्चात् दिल्ली, हरियाणा, पजाब की ओर जाने के भाव फरमाए, इस हेतु सम्पूर्ण उत्तर भारत के श्री संघो मे अपूर्व उत्साह व्याप्त है। भीलवाडा के ऐतिहासिक चातुर्मास मे आचार्य श्री ठाणा ७ एवं परम विदुषी महासती श्री जसकुँवरजी, परम विदुषी महासती श्री पुष्पवतीजी, परम विदुषी महासती श्री प्रकाशवतीजी आदि ठाणा ३० भी विराजमान रही। इस चातुर्मास के दरम्यान स्थानीय श्री संघ ने अपूर्व धर्म भावना का परिचय देते हुए श्रमण सघ को मजबूत बनाने का एक आदर्श उपस्थित किया, व यथासमय चातुर्मास स्थल से प्रस्थान कर आसीद ब्यावर अजमेर होकर मदनगज-किशनगढ़ पधारे, जहाँ पुष्कर सेवा समिति द्वारा निर्मित चिकित्सालय भवन का शुभ उद्घाटन दि.७ जनवरी पार्श्वनाथ जयन्ती के दिन सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर विदुषी महासती कुसुमवतीजी व डॉ दिव्यप्रभाजी पधारे। जयपुर श्रावक सघ जो वर्षों से आचार्य श्री की अगवानी हेतु प्रतीक्षारत था, की आग्रह भरी विनंती स्वीकार कर मदनगज से आचार्य श्री जयपुर पधारे। जयपुर सघ अपने बीच आचार्य श्री को पाकर हर्ष विभोर हो उठा। जयपुर के उपनगरो शाम कालोनी, मान सरोवर, मालवीयनगर, महावीर नगर, आदर्श नगर, मोती डुगरी होते हुए दि ६ फरवरी को आपका ऐतिहासिक प्रवेश गुलाबी नगरी जयपुर के लाल भवन मे हुआ। इस अवसर पर संघमन्त्री उमरावमल चोरडिया एवं स्थानकवासी कान्फ्रेस के समस्त पदाधिकारी एवं पजाब हरियाणा के सेकडो श्रावक संघ उपस्थित थे। आचार्य श्री ने सभी की भावना को सलक्ष्य मे रखते हुए महावीर जयन्ती अम्बाला सीटी मे करने के भाव व्यक्त किए। दि ११ को जयपुर शहर से विहार करके सी स्कीम सिविलसाईन विश्वकर्मा औद्योगिक क्षेत्र स्पर्शते हुए दि २३ को खण्डेला एवं दि ५ मार्च को नारनोल पधारे। सर्वत्र हजारो की सख्या मे श्रावकगण उपस्थित होते रहे। इस वर्ष के मगलमय चातुर्मास हेतु पजाब प्रान्त के लुधियाना संघ का एवं दिल्ली हरियाली के विभिन्न क्षेत्रो ९४३ لرد श्रद्धालोक के देवता Make का जोरदार आग्रह भरी प्रार्थना चालू है। इस प्रकार आपके मंगलमय चरण जहाँ तहाँ भी पड़ रहे है, सर्वत्र सम्प संगठन एकता व स्नेह का वातावरण बनाते चले जा रहे थे। संवत् २०५१ : लुधियाना-वर्षावास (सन् १९९४) चरखी दादरी में पूज्य आचार्य श्री की ५३ वी दीक्षाजयन्ति, जगदाचार्य चन्द्रास्वामी के मुख्य आतिथ्य में मनाई गयी। रोहतक, गोहाना, पानीपत होते हुए आपश्री १८ अप्रेल को अम्बाला छावनी पधारे। जैन नगर अर्बनस्ट्रीट होते हुए अम्बाला शहर पधारे, जहाँ २२ अप्रेल का आपश्री का उत्तरभारत की ओर से विशाल स्वागत समारोह रखा गया। पूज्य प्रवर्तक भण्डारी श्री पद्मचन्दजी म. के सान्निध्य मे आपश्री का भव्य स्वागत एवं इस अवसर पर ११ दीक्षाएँ सम्पन्न हुई। करीब ५० हजार की विशाल जन मेदिनी व १५० साधु-साध्वी जी का पदार्पण जन-जन में उत्साह का संचार कर रहा था। इस अवसर पर आपश्री ने अपना व पण्डित रत्न उप प्रवर्तक श्री प्रेमसुखजी म. के विद्वान शिष्य श्री रविन्द्रमुनिजी ठा. का संयुक्त चातुर्मास लुधियाना घोषित किया। यथा समय अम्बाला से चण्डीगढ़ होते हुए, आचार्य श्री ने हिमाचल प्रदेश का अत्यधिक आग्रह होने से शिमला की ओर प्रस्थान करने का निर्णय किया, पंजाब मे आचार्य श्री का जव से शुभागमन हुआ उससे पूर्व डेराबस्सी स्थित नव निर्मित कत्लखाने को बंद कराने हेतु जन मानस उद्वेलित् था, सभी की निगाहें आचार्य श्री की ओर थी, पूज्य आचार्य प्रवर ने इस समस्या का समाधान खोजने का साहस किया, सत्य अहिंसा के उपासक होने से आपने शान्ति का मार्ग चुना व पंजाब सरकार के मुख्यमन्त्री सरदार वेअन्त सिंहजी से सम्पर्क साधा-परिणाम स्वरूप अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर हजारों भाई-बहनों तथा विदुषी सन्त साध्वी मण्डल के वीच विधान सभा स्वीकर हरनामदास जौहर ने उपस्थित होकर इस कार्य को बन्द कराने का संकल्प लिया। चण्डीगढ़ से आपश्री पञ्जोर, सोलन, धर्मपुर होते हुए शिमला पधारे। मार्ग में गेदामल हेमराज जैन शिमला वालों की सम्पूर्ण व्यवस्था सराहनीय रही, कुछ दिनों तक शिमला विराजने के पश्चात् नालागढ़ पधारे, जहाँ वयोवृद्ध सन्त प्रवर श्रद्धेय राममुनिजी म. आदि सन्तो का मधुर मिलन रहा, नालागढ़ से रोपड़ सरह होते हुए स्वर्गीय आचार्य सम्राट् श्री आत्मारामजी म की जन्मभूमि छत्त बनूड़ पधारे, जर पुनः प्रवर्तक भण्डारी श्री पद्म चन्दजी म. का मिलन हुआ, वहाँ से वहाँ से राजपुरा राना होते हुए चातुर्मास हेतु लुधियाना पधारे। सम्पूर्ण पंजाब का जैन समान इस १४ se श्रद्धालोक के देवता आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था। भव्य चातुर्मास प्रवेश अपने आप मे अद्वितीय था, स्थानकवासी जैन कान्फ्रेंस की मिटिंग तथा सामूहिक चार दीक्षाएँ पूज्या साध्वी डॉ. मुक्तिप्रभाजी, की निश्रा मे सानन्द सम्पन्न हुई। लुधियाना समाज के प्रमुख समाज सेवी हीरालालजी जैन आदि का पजाब यात्रा में विशेष योगदान रहा, चातुर्मास में लुधियाना मे विराजमान पूज्यवर श्री रतनमुनिजी म. , क्रान्तिमुनिजी म एव कमल मुनिजी 'कमलेश', मधुर वक्ता श्री रविन्द्र मुनिजी म. के अलावा शिवपुरी मे पूज्य श्री ज्ञानमुनिजी म तथा साध्वी मण्डल मे पूज्या सीताजी म श्री महेन्द्राजी म डॉ. श्री मुक्तिप्रभाजी म डॉ. श्री सरिताजी म. , ज्ञान ज्योति श्री सघ मित्राजी म कुल मिलाकर ७२ ठाणा विद्यमान थे, प्रतिदिन जप तप स्वाध्याय का विशाल आयोजन दर्शनीय रहा, जिसमे हजारो की उपस्थिति बनी रही, पंजाब की धरती पूज्य आचार्य देव आत्मारामजी म की दीक्षा, जन्म व कर्मभूमि रही है। जनता जनार्दन मे उनके प्रति अगाध आस्था आज भी विद्यमान है। इस वर्ष पूज्य आत्मारामजी म की जन्म शताब्दी वर्ष का शुभारम्भ हुआ, एक वर्ष तक विविध धार्मिक सामाजिक आयोजन पूज्य आचार्य श्री के पावन सान्निध्य मे होते रहे, जिसमे आत्म जयन्ति के पावन दिन दि १८ सितम्बर को एक विशेष आयोजन मे मुख्य अतिथि के रूप मे मुख्यमंत्रीजी द्वारा उद्घाटन होने वाले डेरा बस्सी स्थित कत्लखाने को तत्काल आदेश से रुकवाने की घोषणा अपने आप में जैन इतिहास की महत्वपूर्ण घटना रही, लाखों जीवो को अभयदान हेतु एक जैन आचार्य का यह प्रयास सदा-सदा स्मरणीय रहेगा। इस हेतु जैन समाज के सुश्रावक लाला हीरालालजी जैन का अथक प्रयास अविस्मरणीय रहा, इस अद्भुत घोषणा से करोडो अडिसा प्रेमी जनता को राहत मिली। अहिसा व जैन धर्म की विजय से सम्पूर्ण हिन्दुस्तान मे सुखद वातावरण का संचार हुआ। आत्म जयन्ति के इस पावन वर्ष मे अनेक शिक्षा व सेवा के कार्य भी सम्पन्न हुए जिसमे लुधियाना मे कॉलेज हेतु सरकार द्वारा करोडो की जमीन का अनुदान, बनूड स्थित दीक्षा भूमि में हॉस्पिटल, राहो स्थित जन्मभूमि मे हाईस्कूल का निर्माण तथा एस एस जैन सभा लुधियाना द्वारा आत्मभवन का नवनिर्माण विशेष उल्लेखनीय रहा। इस प्रकार लुधियाना का ऐतिहासिक चातुर्मास सानन्द सम्पन्न कर आचार्य श्री कपिल ओसवाल के स्थान पर पधारे, वहाँ से किचरू नगर, अगर नगर, आत्म नगर होते हुए विहार मालेर कोटला विराजिता घोर तपस्विनी हेमकुंवरजी म के एक सौ इकत्तीस (१३१) दिवसीय विराट तप महोत्सव मे सम्मिलित होने के लिए हुआ। अहमदगढ़ मण्डी AAN M M १४५ श्रद्धालोक के देवता कुप्प होते हुए आचार्य श्री मालेर कोटला पधारे, जहाँ दि. २४ नवम्बर को तप महोत्सव के विराट आयोजन मे करीब ५० हजार की जनता ने पूज्या महासती हेमकुंवरजी के चरणों में तथा आचार्यदेव के चरणो में अपनी श्रद्धा भक्ति अर्पित की। मालेर कोटला में अपनी धर्म गंगा प्रवाहित करते हुए आचार्यश्री धुरी नाभा पटियाला समाणा सुनाम संगरूर आदि क्षेत्रों में अहिंसा सत्य का प्रचार करते हुए दि.१ जनवरी, १९९४ को भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति लाला विद्यासागर ओसवाल के मालवा कॉटन मील बरनाला में पधारे, जहाँ लगभग हजार भाई बहनों ने धर्म लाभ उठाया श्री जंघी लालजी नीलम कुमारजी ओसवाल बन्धुओं ने अपनी श्रद्धा भक्ति का परिचय दिया, बरनाला से आपश्री रायकोट होते हुए जगहों पधारे जहाँ चमत्कारी गुरु स्वर्गीय रूपचन्द्रजी म. की समाधिस्थली विद्यमान हैं। मोगा होते हुए आत्म पुण्यतिथि हेतु पुनः लुधियाना सिविल लेन पधारे। ३० जनवरी को अहिंसा दिवस का विराट आयोजन स्वीकारकर हरनामदास जौहर के मुख्य आतिथ्य में मनाया गया, इस अवसर पर समाज द्वारा अहिंसा पुरस्कार मुख्यमंत्रीजी को प्रदान किया गया। पंजाब सरकार ने प्रतिवर्ष आत्मारामजी म. के पुण्यदिवस के उपलक्ष्य में अहिंसा दिवस अर्थात् समस्त कत्लखाने बन्द करने का ऐलान कर एक आदर्श उपस्थित किया। लुधियाना के इस ऐतिहासिक समारोह एवं चातुर्मास को सम्पन्न कराने मे गुरुभक्त फकीरचन्दजी, हीरालालजी, प्रेमचन्दजी, अमरनाथजी, रामकुमारजी, सुशील कुमारजी, जानकीदास जी एवं आत्मा राम जैन सेवा संघ आदि सभी का सहयोग रहा। लुधियाना से विहार कर आचार्य श्री फिल्लोर, राहों, नवाशहर, बंगा फगवाड़ा होते हुए जालन्धर शहर पधारे, जहाँ आचार्य श्री का दीक्षा दिवस श्री विजय कुमारजी चोपड़ा पंजाब केसरी लोकप्रिय दैनिक पत्र के प्रवन्धक के मुख्य आतिथ्य में अनेक गणमान्य लोगों की पावन उपस्थित में सानन्द सम्पन्न हुआ। होशियारपुर होते हुए पूज्य आचार्यश्री ओसवाल बन्धु द्वारा स्थापित मुकेरिया पेपर मिल पधारे। एक भव्य आयोजन वित्तमंत्री केवल कृष्णजी के आतिथ्य मे तथा हजारो लोगों की उपस्थिति मे सम्पन्न हुआ, अनेक संस्थाओ को सहयोग सहकार प्रदान किया गया, नीलमजी ओसवाल आदि बन्धुओं ने सेवा लाभ उठाया। इस अवसर पर कई वर्षों से प्रयासरत जम्मू संघ की भावना को लक्ष्य में रखकर आचार्य श्री ने जागवं ओर प्रस्थान किया। पठानकोट, लखनपुर आदि स्थानों को पावन करते हुए जा पधारे। १० दिनों तक धर्मसभा का आयोजन होता रहा। दि. ११.४ को उमा -- ११६ .
समालोक देवता श्री लिया। जम्मू पुष्कर मुनिजी म.की नितीच पुष्यतिथि का आयोजन अति उत्साह के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ, श्री संघ ने एक चिकित्सालय भवन को निर्मित करने का संकल्प लिया, तंच लातेवाभाव व उत्साह प्रशंसनीय रहा। संवत् २०५२ : पानीपत-वर्षावास (सन् १९९५) आगामी वर्षावास हेतु इस वर्ष मालेर कोटला, जालन्धर, जम्मू, पानीपत, अम्बाला का विशेष आग्रह देखते हुए आपनी ने पानीपत चातुर्मास करने का निर्णय से यथा समय विहार कर आपनी पठानकोट, गुरुदासपुर, बटाला होते हुए अमृतसर पधारे। विश्व विख्यात अमृतसर नगरी में आपका सार्वजनिक अभिनन्दन रखा गया एवं दि ३ मई को दो भागवती जैन दीक्षाएँ डॉ. साध्वी सरिताजी तथा साध्वी सुमित्राजी की निश्श्राय में सम्पन्न हुई। अमृतसर से विहार कर जण्डियागुरु पट्टी, गुरुदासपुरम, जीरा, फरीदकोट होते हुए भटिण्डा पधारे। आपके शुभागमन पर आम जनता मे हर्ष का वातावरण व्याप्त था, विभिन्न आयोजन प्रतिदिन होते रहे, भटिण्डा से आपश्री गीदडबाह पधारे जहाँ वयोवृद्ध कविरत्न चन्दनमुनिजी का मिलन हुआ। यथासमय डब्बा वाली, रानियाँ फतेहाबाद, उच्चाणा, नरवाणा, जीद, बड़ौत, सफीदोमण्डी होते हुए मंगलमय वर्षावास हेतु पानीपत पधारे। पानीपत मे आपश्री के पधारने के समाचार पहले ही पहुंच गए थे। इस कारण जैसे ही आपश्री ने पानीपत की सीमा मे अपने चरण रखे, वैसे ही पानीपत का श्रीसंघ आपश्री की अगवानी के लिए उपस्थित हो गया, रंग-बिरंगे परिधानों में गर- नारी, बालके-बूढ़े, सभी मे इस समय अति उत्साह था। हल्लिारागरम वातारण में धूमधाम के साथ आचार्य सम्राट का नगर प्रवेश हुआ। प्रवेशोत्रात पात माल समारोह नगर के विभिन्न मार्गों से होता हुआ वर्षावारा शाला | FII रामा के रूप में परिवर्तित हो गया। इस अवसर पर विगित ||-गरी से f) IN की संख्या में श्रद्धालु आए थे। धर्म सभा में amriti in Hindi तथा कुछ अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने गुनिल । !!-1|| अभिव्यक्ति प्रदान की। इस अवसर पर आता . •TH All धर्म आराधना और मानव जीवन के fire ataunar वर्षावास हेतु पधारने के साथ ही पानीपत में पति , प्रारम्भ हो गई। of...1.11.111111" REna- श्रद्धालोक के देवता वर्षावास काल में दान शील, तप भाव व निरन्तर नवकार महामंत्र की प्रभावना बनी रही। इस वर्षावास में यहाँ विराजमान घोर तपस्विनी महासती श्री हेमकुंवरजी म. द्वारा १५१ दिवसीय विराट तपाराधना की गई। तपोत्सव के पारणे के अवसर पर सम्पूर्ण भारतवर्ष से हजारों श्रद्धालु लोगों ने पानीपत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर अपनी भावभरी श्रद्धा अर्चना अर्पित की। पानीपत मे सम्पन्न हुए इस तपोत्सव के अवसर पर एक वैराग्यवती बालिका ने संयम मार्ग अंगीकार किया। सम्पूर्ण वर्षावास की अवधि में धर्माराधना की धूम मची रही। दिल्ली जैन महासंघ की ओर से ६५ बसें लेकर श्री संघ अगले चातुर्मास की विनती हेतु आया। अन्य दर्शनार्थियों का भी सतत् आवागमन रहा। हरियाणा की इस पावन धरती पर जैन आचार्य का यह प्रथम वर्षावास था। दि. २८ जुलाई को आनन्द जयन्ती के अवसर पर स्थानीय श्री संघ व हरियाणा युवा जैन कान्फ्रेस द्वारा लगभग एक हजार विकलांग भाई-बहनों को निःशुल्क हाथ पाँव प्रदान किए गए। इस वर्ष को आपश्री ने सामायिक स्वाध्याय वर्ष घोषित किया। प्रतिदिन नमोक्कार महामंत्र का जाप, आयम्बिल तप आराधना के साथ धार्मिक प्रतियोगिता के आयोजन हुए। दि ३ सितम्बर को आत्मशुक्ल जयन्ती का विशेष आयोजन रहा, जिसमे अनेक शुभ कार्य सम्पन्न हुए। दि. ८ अक्टूबर को उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी म. की जन्म जयन्ती मनाई गई, जिसमे हिन्दुस्तान के विभिन्न प्रान्तो से भाई-बहनों व संघों का आवागमन हुआ, इस अवसर पर अनेक असहाय भाई-बहनों को सहयोग प्रदान किया गया। स्थानीय संघ के अध्यक्ष श्री रोशनलाल जैन, मंत्री पवन कुमारजी, युवक मण्डल के पदाधिकारी एवं राजेन्द्र कुमारजी तथा सर्व श्री आर. डी. जैन, सुखबीर जैन, जे. डी. जैन आदि की सेवा प्रशंसनीय रही। वर्षावास समाप्ति पर आपका विहार हो गया। गुड़गाँव में विराजित विदुषी साध्वी श्री रमेश कुमारीजी म. के सान्निध्य मे एक दीक्षा होने वाली थी। उस वैराग्यवती वालिका को दीक्षाव्रत प्रदान करने के लिए आपश्री गुड़गाँव पधारे। गुड़गाँव का दीक्षोत्सव सानन्द सम्पन्न कर आप यहाँ से विहार कर बड़ौत शहर पधारे। बडौत शहर में श्री पार्श्वनाथ जयंती विराट रूप से मनाई गयी। इस अवसर पर अनेक साधु साध्वीजी एवं लगभग दस हजार श्रद्धालु लोग उपस्थित थे। इस कार्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् आपश्री विहार कर गोहाना होते हुए पधारे। इस समय यहाँ वयोवृद्धा साध्वी श्री कैलाशवतीजी म.आदि ठाणा विराजमान थी और आपके सान्निध्य में चार वैराग्यवती वहनें दीक्षानत अंगीकार करने की RRC १४८ भिवानी * श्रद्धालोक के देवता भावना प्रबल रखती थी। आचार्य सम्राट के भिवानी पधारने पर दीक्षोत्सव का आयोजन रखा गया और चारो वैराग्यवती बहनो को दीक्षाव्रत प्रदान किया गया। दीक्षोत्सव सानन्द सम्पन्न होने के पश्चात् आपश्री यहाँ से विहार कर हासी, हिसार, सहारनपुर आदि मार्गवर्ती ग्राम-नगरों मे धर्म प्रचार करते हुए देहरादून पधारे, जहाँ उपप्रवर्तक श्रीप्रेमसुखजी म से मिलन हुआ। सबने आपस मे एक दूसरे के दर्शन किये और हर्ष प्रकट किया। यहॉ उत्तरप्रदेश की ओर से सामूहिक स्वागत समारोह का आयोजन किया गया। दिल्ली देश की राजधानी है और महानगर है। यहाँ अनेक उपनगर है। उपनगरो के श्री सघो का भी अपने-अपने क्षेत्रो मे पधारने का आग्रह समय समय पर होता रहा, इधर वर्षावास का समय भी निकट आ रहा था। इस कारण आपश्री ने दिल्ली की ओर विहार करना उचित समझा। अत मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार, रूडकी आदि तीर्थ स्थानो तथा मार्गवर्ती ग्राम-नगरो मे विचरण करते हुए मुजफ्फरनगर पधारे। स्थानीय श्री सघ ने आपश्री के भव्य स्वागत का कार्यक्रम आयोजित कर उसके साथ ही जैन स्थानक का शुभ मुहूर्त भी रखा। यहाँ से विहार कर सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ हस्तिनापुर, मवाना होते हुए मेरठ पधारे, जहाँ महावीर जयंती व उपाध्याय गुरुदेव की पुण्यतिथि मनाई गई एवं सं २०५३ का वर्षावास शक्तिनगर दिल्ली के लिए स्वीकृत किया। यहाँ से शामली, कांधला, गाजियाबाद आदि अनेक ग्राम-नगरो मे धर्म प्रभावना करते हुए और अमिट छाप छोड़ते हुए आपश्री ने आगामी वर्षावास हेतु दिल्ली में प्रवेश किया। सं. २०५३ : (शक्तिनगर, दिल्ली) वर्षावास (सन् १९९६) जैसे ही आचार्य सम्राट ने दिल्ली की सीमा मे मंगल प्रवेश किया, जन सैलाब आपश्री की अगवानी के लिए उमड पडा। स्थान-स्थान पर आपश्री के स्वागत मे भव्य से भव्य समारोह आयोजित किये गए। दिल्ली के विभिन्न उपनगरो मे आचार्य सम्राट अपनी पीयूष वर्षी वाणी से सबको लाभान्वित करते हुए निश्चित समय पर वर्षावास हेतु शक्तिनगर दिल्ली मे समारोहपूर्वक पधारे। इस अवसर पर देश के अनेक ग्राम-नगरो के श्रद्धालु लोग भी उपस्थित हुए थे। वर्षावास हेतु शक्तिनगर, दिल्ली पधारने के पूर्व का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। वर्षीतपोत्सव सानन्द सम्पन्न होने के पश्चात् दिल्ली जैन महासंघ द्वारा लाल किले के मैदान पर आचार्य सम्राट के भव्य अभिनन्दन समारोह का कार्यक्रम १४९ श्रद्धालोक के देवता रखा गया था। अतः इस हेतु आपश्री चाँदनी चौक पधारे। इस अभिनन्दन समारोह में दिल्ली के समस्त श्रावक संघो के अतिरिक्त श्री सुन्दरसिंह भण्डारी, श्रीमती सुषमा स्वराज, जयप्रकाश अग्रवाल, विजय गोयल, धनंजय कुमार, जे. के जैन आदि सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक नेता भी अगवानी के लिए उपस्थित हुए। प्रवर्तक भण्डारी श्री पदमचन्दजी म अध्यात्म योगी श्री हेमचन्दजी म. , प श्री रवीन्द्रमुनिजी म. आदि लगभग एक सौ साधु-साध्वीजी म. के पावन दर्शन प्रवचन का आयोजन अत्यन्त दर्शनीय रहा। इसके पश्चात् सदर बाजार के नवनिर्मित स्थानक भवन के मंगलमय उद्घाटन का कार्यक्रम सम्पन्न कर इंदिरा नगर पधारे। इंदिरा नगर मे एक वैरागन बहन को दीक्षाव्रत प्रदान किया। इसके पश्चात् वर्षावास हेतु शक्तिनगर दिल्ली में आपश्री का मंगल प्रवेश हुआ। मंगल प्रवेश का कार्यक्रम श्री आर. डी. जैन की अध्यक्षता और माननीय श्री साहिवसिह वर्मा, मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य आतिथ्य मे सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर सांसद श्री विजय गोयल विशेष रूप से उपस्थित थे। इस समय सैकडो साधु-साध्वी भी उपस्थित थे। यह कार्यक्रम बहुत ही भव्य रूप से सम्पन्न हुआ। महासाध्वी श्री हेमकुँवरजी म. , महासाध्वी श्री रमेशकुमारीजी म , महासती श्री विजेन्द्राजी म , महासती श्री सुधाजी म. आदि वर्षावास को भव्य बनाने में प्रयत्नशील रहीं। महासती श्री रमेशकुमारीजी म आदि सतीवृन्द एवम् श्रद्धेय श्री प्रेमसुखजी म के प्रधान शिष्य श्री रवीन्द्रमुनिजी म. आदि सन्तो का उत्तर भारत की यात्रा मे सतत सहकार-सहयोग रहा, सभी का वर्षावास दिल्ली में था और सम्पूर्ण वर्षावास काल मे पूर्ण सेवा समर्पण का भाव बना रहा। इस वर्षावारा गे अनेकानेक धार्मिक कार्यक्रम सानन्द हुए। विकलांग सहायता शिविर, स्वाध्याय, मानव सेवा व गो-सदन के कार्य सम्पन्न हुए। दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री साहिवास: वर्मा, सांसद श्री विजय गोयल, पूर्व सांसद श्री बूटासिंह आदि का रागय-समय पर पधारना रहा। महासती श्री विजयाश्रीजी म. के सान्निध्य में एक बालिका की भावना राया मार्ग पर अग्रसर होने की प्रबल हो रही थी। उस बालिका का दीक्षोला सम्पन्न हुआ। इसके साथ ही तपोवारिधि महासती श्री हेमकुंवरजी म. सा. २५५ दिवसीय तप उपवास का कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम में लगभग १५० साधु-साध्वियो की पावन उपस्थिति रही। इसी शुभावार पर गुरादेवी प्रेरणा से एवं श्री जवाहरलाल जैन परिवार के सद्प्रयानो रो परगामिन 540 - to श्रद्धालोक के देवता अन्नदान का आयोजन किया गया, जिसका हजारो लोगो ने लाभ लिया। गुरुदेव उपाध्याय श्री पुष्कर जयंती का आयोजन समारोहपूर्वक सम्पन्न हुआ। माननीय श्री अर्जुनसिहजी पूर्व केन्द्रीय मत्री, माननीय श्री चन्द्रशेखर पूर्व प्रधानमंत्री, श्री अशोकजी सिघल आदि ने भी समय-समय पर उपस्थित होकर दर्शनो का लाभ लिया और धार्मिक-तात्विक चर्चाएं भी की। चातुर्मास समाप्ति के पश्चात् आपश्री ने शक्तिनगर से विहार कर दिया। आप कुछ अन्य उपनगरो आदि क्षेत्रों को पावन करते हुए अशोक विहार पधारे, जहाँ सात मुमुक्षुओ को दीक्षापाठ प्रदान किया। अशोक विहार से आपश्री शाहदरा पधारे। यहाँ घोर तपस्विनी महासाध्वी श्री मोहनमालाजी म. विराजमान थीं। आपश्री का यहाँ आगमन महासाध्वीजी की दीर्घ तपस्या की सुखसाता पृच्छा करना था। शाहदरा मे भी एक बालिका ने दीक्षा अगीकार की। गोसदन का मगलमय उद्घाटन होने के पश्चात् दादावाडी होते हुए आपश्री गुडगाँव पधारे। गुडगाँव मे भगवान पार्श्वनाथ जयती का जन्मोत्सव मनाया गया, जिसमें हजारो भाई-बहनो ने सम्मिलित होकर लाभ लिया। पूर्व मे दाताओ द्वारा भोजन दान प्रारम्भ किया गया, जिसमे स्थान-स्थान पर असहाय भाई-बहनो को भोजन वितरित किया जाता है। गुडगाँव मे भी भोजनदान का कार्यक्रम रखा गया। इसके पूर्व दिल्ली मे भी कई जगह भोजनदान का कार्यक्रम रखा गया था। गुडगाँव से विहार कर आपश्री का फरीदाबाद, नूह, नौगावा आदि मार्गवर्ती नगरो एव गॉवो मे धर्म प्रचार करते हुए अलवर पदार्पण हुआ। आपश्री का आगमन यहाँ बाल वैरागी अरूणकुमार के दीक्षोत्सव के प्रसग से हुआ था, किन्तु कुछ व्यवधान उत्पन्न होने के कारण दीक्षा का मंगलमय कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। आपश्री अलवर से विहार कर हिण्डौन, श्री महावीरजी आदि क्षेत्रो को विचरते हुये सवाई माधोपुर पधारे। यहाँ आपश्री ने होली चातुर्मास किया व एक सप्ताह तक स्थिरता रही। इस अवधि मे भव्य रूप से धर्म प्रभावना सम्पन्न हुई। श्रावक संघ मे उत्साह का अच्छा सचार रहा। सवाई माधोपुर से विहार कर ग्रामानुग्राम अपनी पीयूषवर्षी वाणी से जन-जन के सन्तप्त हृदयो को शात करते हुए आपश्री का पदार्पण कोटा हुआ। कोटा मे महावीर जयंती व गुरु पुष्कर पुण्य दिवस तथा महासती श्री बसन्त कुँवरजी म की सेवा मे रह रही एक वैराग्यवती बालिका का दीक्षोत्सव समारोह पूर्वक सानन्द सम्पन्न हुआ। इस दीक्षोत्सव की परिसमाप्ति के पश्चात् आपश्री ने कोटा से विहार कर दिया। सिगोली मे अक्षय तृतीया का ९५१ श्रद्धालोक के देवता परणोत्सव करवा बेगूं, बिगोद आदि ग्राम नगरों को पावन करते हुए आपश्री का पदार्पण भीलवाडा में हुआ। उत्तर भारत की यात्रा आपत्री ने भीलवाड़ा वर्षावास से ही प्रारम्भ की थी। भीलवाड़ा से गंगापुर, कांकरोली, मगरा प्रान्त, सेरा प्रान्त क्षेत्र के ग्राम-नगरो मे विचरण करते हुए धर्म-प्रचार किया। आपश्री का वि. सं. २०५४ का वर्षावास उदयपुर स्वीकृत हो चुका था। इस कारण अव विहार की दिशा उदयपुर की ओर हो गई। वि. सं. २०५४ : उदयपुर - वर्षावास (सन् १९९७) राजस्थान क्षेत्र में पदार्पण के पश्चात् और फिर भीलवाडा तथा उदयपुर के समीपवर्ती क्षेत्रों मे विचरण करते समय प्रवर्तक पूज्य श्री मगनमुनिजी म. आदि तथा महासाध्वी श्री जशकुंवरजी म. आदि ठाणा से भी मंगल मिलन रहा। जब आपश्री का वर्षावास हेतु उदयपुर पदार्पण हुआ, तो श्री संघ उदयपुर मे उत्साह की लहर व्याप्त हो गई। आपश्री की अगवानी के लिये जन सैलाब उमड़ पड़ा। श्री संघ उदयपुर ने आपश्री का नगर प्रवेश समारोहपूर्वक करवाया। नगर के प्रमुख मार्गों से प्रवेशोत्सव का चल समारोह पंचायती नोहरा मे जाकर धर्म सभा में परिवर्तित हो गया। इस धर्म सभा में श्रावक संघ के पदाधिकारियों तथा अन्य श्रद्धालु वक्ताओ ने आचार्य श्री के वन्दन-अभिनन्दन मे अपने शुभ भाव अभिव्यक्त किये। आचार्य सम्राट ने अपने आशीवर्चन रूप सामयिक प्रवचन फरमाया। उदयपुर श्रावक संघ के सभी सदस्य वर्षावास को अति भव्य स्वरूप प्रदान करने हेतु सतत जुटे रहे। समय-समय पर जप-तप के विराट आयोजन भी हुए। अखिल भारतीय स्थानकवासी जैन कांफ्रेंन्स का अधिवेशन एवं वर्षावास के पूर्व वैरागी पंकज जैन, वैरागी दिलीप भण्डारी तथा वैराग्यवती अनिता जैन की दीक्षा ता गुरादेव राजस्थान केसरी विश्वसन्त अध्यात्म योगी उपाध्याय श्री पुष्कर गुनिजी मनी निर्वाणस्थली तारक गुरु जैन ग्रन्थालय के परिसर में नवनिर्मित श्री पुकार गरापान धाम का मंगलमय उद्घाटन माननीय मुख्यमंत्री श्री भैरोसिंहजी शेखावत, डोके जैन, विधान सभाध्यक्ष श्री शांतिलालजी चपलोत, शिक्षामंत्री श्री गुलाबन्दी कटारिया, श्री रोशनलालजी एडवोकेट, श्री सुन्दरलालजी वागरेचा, श्री दुर्गा धर्मावत आदि के मुख्य आतिथ्य व सेवा सहयोग मे लगभग दस बार जनमेदिनी की उपस्थिति में हर्षोल्लासमय वातावरण में सानन्द गामन्न | वर्षावास के पश्चात् नवनिर्मित जैन स्थाना भवनानी M .
Joy श्रद्धालोक के देवता दुग्गड के करकमलो से सम्पन्न हुआ। दिनाक ९ फरवरी १९९८ को वैरागी अरुण एव विकास जैन का दीक्षोत्सव सानन्द सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री मदनलालजी जैन, अध्यक्ष दिल्ली जैन महासघ ने की। मुख्य अतिथि श्री शातिलाल चपलोत अध्यक्ष विधानसभा एव श्री आर डी जैन उपाध्यक्ष, जैन कांफ्रेन्स, दिल्ली थे। इस पावन अवसर पर काफ्रेन्स के अनेक पदाधिकारीगण भी उपस्थित हुए थे। इस दीक्षोत्सव मे हजारो श्रद्धालुओ ने उपस्थित होकर लाभ अर्जित किया। श्रद्धेय आचार्य सम्राट् एव उनके अन्तेवासियो के अतिरिक्त इस दीक्षोत्सव मे पावन सान्निध्य मिला, लोकमान्य सन्त पूज्य प्रवर्तक श्री रूपचन्दजी म 'रजत', उप प्रवर्तक श्री सुकनमुनिजी म आदि ठाणा, उप प्रवर्तक श्री विनयमुनिजी म. 'भीम' आदि ठाणा एव प.रत्न श्री भगवतीजी म सा आदि ठाणा का। साथ ही परम विदुषी महासती श्री पुष्पवतीजी म , परम विदुषी महासती श्री प्रेमवतीजी म , परम विदुषी महासती श्री दयाकुँवरजी म एव परम विदुषी महासती श्री सन्तोषकुँवर म आदि ठाणा भी पधारी। इस वर्ष चातुर्मास हेतु मुख्य रूप से इन्दौर व जोधपुर का सघ आग्रह के साथ बार-बार उपस्थित होता रहा, आचार्यश्री ने चातुर्मास हेतु इन्दौर की स्वीकृति प्रदान की, जोधपुर संघ के अत्याग्रह को देखकर आचार्यश्री ने मेरा (राजेन्द्रमुनिजी म. ), श्री सुरेन्द्रमुनिजी म. व नवदीक्षित रूपेन्द्रमुनिजी म ठाणा ३ का चातुर्मास जोधपुर प्रदान किया। संवत् २०५५ : इन्दौर का अन्तिम यशस्वी वर्षावास (सन् १९९८) इदौर श्रीसंघ की भावभरी विनती की फलश्रुति के रूप मे आचार्य सम्राट श्री देवेन्द्र मुनिजी म सा ने उदयपुर मे साधुभाषा मे वर्ष १९९८ का वर्षावास इंदौर मे करने की शुभ घोषणा कर दी। इससे न केवल इंदौर मे ही वरन् समग्र मालव अचल मे श्रद्धालुजनो के मन मे हर्ष एव उत्साह की लहर व्याप्त हो गई। आचार्य सम्राट एव सन्त मण्डल के म प्र मे प्रवेश के अवसर पर सघ के अध्यक्ष प्रसिद्ध उद्योगपति श्री नेमनाथजी जैन के नेतृत्व मे सैकडो भाई-बहनो ने आचार्यश्री की नीमच मे अगवानी की। इस प्रसग पर म प्र के उद्योग मंत्री श्री नरेन्द्रजी नाहटा भी विशेष रूप से उपस्थित थे। नीमच से इदौर के बीच प्रत्येक नगर और गाँवो के श्रद्धालुजनो ने आचार्य सम्राट के शुभागमन पर पलक-पॉवडे १८३ श्रद्धालोक के देवता ka बिछाकर तथा श्रद्धा से अभिभूत हृदय से उनकी अगवानी की। राज्य शासन ने भी आचार्य सम्राट के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करते हुए आपको राजकीय अतिथि घोषित किया गया। मालवा अंचल में धर्म की प्रभावना करते हुए जब आचार्य सम्राट का इंदौर नगर की सीमा मे मंगल प्रवेश हुआ, इस अवसर पर इंदौर नगर के महापौर सहित हजारो भाई-बहनो ने जयघोष के साथ आचार्य सम्राट एवं सन्त मंडल की अगवानी की। महावीर भवन में वर्षावास हेतु प्रवेश के पूर्व इंदौर के नागरिकों की ओर से म.प्र. के महामहिम राज्यपाल डॉ भाई महावीर के मुख्य आतिथ्य मे आचार्य सम्राट का भव्य नागरिक अभिनन्दन किया गया। इस अवसर पर शहर काजी सहित विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों ने आचार्य सम्राट के सम्मान में अपने भाव व्यक्त किये। वैष्णव विद्यालय राजमोहल्ला के विशाल परिसर में आयोजित अभिनन्दन समारोह में उपस्थित विशाल जनसमुदाय को सम्बोधित करते हुए आचार्य सम्राट श्री देवेन्द्र मुनिजी म. सा. ने वर्षावास को जप, तप एवं अन्य धार्मिक कार्यक्रमो के माध्यम से यशस्वी बनाने हेतु अपना दिव्य संदेश प्रदान किया। इस अवसर पर संघ अध्यक्ष महोदय ने इस वर्षावास की सफलता हेतु आचार्यश्री के सान्निध्य मे मानव सेवा एवं आध्यात्मिक ज्ञानवृद्धि हेतु चार सूत्री योजना की घोषणा की। वर्षावास हेतु मंगल प्रवेश जुलूस जैन स्थानक राजमोहल्ला से प्रारम्भ हुआ। जुलूस का संपूर्ण मार्ग केशरिया झण्डो, बैनरो एवं स्वागत द्वारो से सजाया गया था। आचार्य सम्राट् की जयघोष के साथ हजारों श्रद्धालुजनों ने मंगल जुलूस उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस अवसर पर देश के विभिन्न भागो से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु आचार्यश्री की अगवानी हेतु उपस्थित थे। आचार्य सम्राट के मंगल प्रवेश करते ही महावीर भवन तीर्थ क्षेत्र बन गया था। उनके पावन सान्निध्य मे नियमित रूप से धार्मिक व आध्यात्मिक गतिविधियाँ प्रारम्भ हो गई। प्रतिदिन प्रातः ६.३० बजे प्रार्थना सभा, प्रातः ९ बजे प्रवचन व मध्याह १२ बजे आचार्य सम्राट की मांगलिक होती थी। जिसमे बड़ी संख्या में भाई-बहन उपस्थित रहते थे। पूज्य श्री रमेशमुनिजी म सा. प्रतिदिन दोपहर को आध्यात्मिक चर्चाओ के साथ ही जिज्ञासुओं को आगम का ज्ञान कराते थे। आचार्य श्री की मंगल प्रेरणा से वर्षावास मे तपस्या की झड़ी लगी रही तथा महामंत्र नवकार के अखण्ड जाप के अनुष्ठान के साथ ही अनेक धार्मिक अनुष्ठान मे १५४ bhe श्रद्धालोक के देवता सम्पन्न हुए। श्री वर्द्धमान सेवा केन्द्र की चार सूत्रीय योजना इस वर्षावास की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि के रूप मे प्रारम्भ हुई। जिसके माध्यम से गर्भवती महिलाओ को पौष्टिक आहार, क्षय पीडित रोगियो का परीक्षण व उपचार, नशामुक्ति अभियान का शुभारम्भ एव आध्यात्मिक ज्ञानार्जन के उद्देश्य से श्री पारसनाथ विद्यापीठ की शाखा की स्थापना की गई। इसके अन्तर्गत जैन दर्शन के दुर्लभ ग्रन्थो व आगमो का संग्रह किया गया। जिसके माध्यम से जैन साधु-साध्वियो के लिये उच्च धार्मिक अध्ययन की व्यवस्था की गई। श्री वर्द्धमान सेवा केन्द्र की गतिविधियो के सचालन हेतु दानदाताओं ने स्वप्रेरणा से योगदान प्रदान किया तथा नित्यदानी ९०० परिवारो मे दान पात्र रखे गये, जिसमे परिवार के सदस्य प्रतिदिन अपना योगदान पात्र मे डालते है। साधना के शिखर पुरुष उपाध्याय प्रवर गुरुदेव श्री पुष्कर मुनिजी म सा, की ८९ वी जन्म जयती एक सप्ताह के विविध आयोजनो के साथ मनाई गई। जिसके अन्तर्गत सामूहिक आयबिल व्रत एव सवा नौ लाख महामत्र जाप का अनुष्ठान सम्पन्न हुआ। नशामुक्ति रैली व आध्यात्मिक सास्कृतिक सध्या के विशिष्ट आयोजन भी हुए। प्रमुख वक्ता के रूप में राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्रीमान् जसराजजी चौपडा के प्रभावशाली उद्बोधन ने श्रोताओ को अत्यधिक प्रभावित किया। राजबाडा गणेश हाल के विशाल परिसर मे गुणानुवाद सभा का आयोजन हुआ, जिसमे बडी सख्या मे श्रद्धालुजनो के साथ ही जैन काफेन्स के सभी सम्माननीय पदाधिकारीगणो व कार्यकारिणी सदस्य महानुभावो ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यह समारोह इस वर्षावास का यादगार आयोजन था। इन्दौर चातुर्मास मे ही आपश्री के जीवन की ६८ वी, जन्म-जयन्ती मनाई गई। इस अवसर पर आपने उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ने का सकल्प व्यक्त किया। यद्यपि लम्बी-लम्बी पदयात्राओ से, अत्यधिक श्रम से और मुनि-मर्यादा के अनुसार खान-पान की अनुकूल स्थितियो के अभाव मे आपश्री का आरोग्य का फल लडखडा गया था। डॉक्टर ने लम्बे विहार और अधिक श्रम करने को भी मना किया, परन्तु सत्पुरूष अपनी चिन्ता नही करते, वे लोक-कल्याण के लिए जीवन को न्यौछावर कर देते हैं। उनके परोपकार की भावना सहज होती है और उसे ही वे अपना जीवन-धर्म मानते हैं। इन्दौर चातुर्मास मे महाराष्ट्र के अनेक प्रावक संघ आये और उन्होंने अत्यन्त ६५५ श्रद्धालोक के देवता आग्रहपूर्वक आपश्री को महाराष्ट्र में पधारने की विनती की, जिसे मान्यकर आचार्यश्री इन्दौर चातुर्मास सम्पन्न कर महाराष्ट्र की ओर बढ़ गये, किन्तु बीच रास्ते में ही स्वास्थ्य ने जवाब दे दिया। एक-दो किलोमीटर चलने में ही सॉस फूलने लग जाती, थकावट आ जाती, तक डॉक्टरों ने आपश्री को स्वास्थ्य परीक्षण हेतु तत्काल मुम्बई पधारने का आग्रह किया। किन्तु आचार्यश्री वाहन प्रयोग करने के लिए कतई तैयार नही हुए। और स्वास्थ्य ऐसा नहीं रहा कि पदयात्रा करके आगे बढ़ सके। उस विषम परिस्थिति में आपश्री ने बड़े ही मानसिक ऊहापोह के पश्चात् व्हील-चेयर से यात्रा करने का आपवादिक कार्य स्वीकार किया। किन्तु आपनी का अन्तर हृदय सदा ही कहता-यदि स्वास्थ्य विहार के अनुकूल नहीं रहा है, तो मै एक ही स्थान पर स्थिर स्थानापति हो जाना चाहता हूँ, किन्तु अपवाद का सेवन नहीं करना चाहता। आपश्री का यही चिन्तन रहा। "यद् यदाचरति श्रेष्ठः लोकस्तदनुवर्तते।" - आचार्य का आचरण समाज के लिए आदर्श होता है, समाज, सघ सदा अपनी मर्यादाओ में स्थिर रहे इसलिए आचार्य को भी अत्यन्त जागरूक और सहिष्णु रहना जरूरी है। १५६
श्रद्धालोक के देवता
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M महागुरु का निर्माण के इस साधारण सी लेखनी द्वारा जैसा भी बन पड़ा, वैसा एक महान् व्यक्तित्व कृतित्व को अल्प शब्दों मे लिखने का प्रयास किया गया अथ से यहाँ तक तो जीवन यात्रा पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की गई पर, इति वाला यह आलेख लिखते लिखते यह तन-मन एवं हाथ की अंगुलियाँ भी कॉप सी जाती है। जिस वृत्तान्त को लाख न चाहते हुए भी लिखे बिना नहीं रहा जाता या फिर उस व्यक्तित्व को अपूर्ण कहकर छोड़ा भी नहीं जा सकता। इस निर्वाण को महायात्रा यद्यपि प्राणिमात्र के साथ जुडी हुई है, फिर जिसने इस साधु जीवन को धारण कर लिया हो, उसके लिए यह पण्डित मरण-समाधि मरण, मरण न होकर महोत्सव का रूप बनता है, पर जीवन के इस कटु सत्य को हर कोई दूसरो के आसानी से दुहरा देता होगा, किन्तु अपने समीप जनो के लिए दोहराना कितना दर्दमय प्रतीत होता, यह तो रचनाकार के अनुभव की ही व्यथा कथा हो सकती है। आज से जिस महागुरु के पावन सान्निध मे ३६ वर्षों से लगातार रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, आगमो के अनुसार भी शिष्य पुत्रवत् माना गया हैं। १२ वर्ष की लघुवय से समीप रहने का जिसे जीवन में अवसर मिला हो, उसे जीवन के कई यथार्थो से गुजरना स्वाभाविक है। जीवन के इन आन्तरिक प्रसंगो को अगर लेखबद्ध किया जाए, तो कई कटु सत्य उजागर हो सकते हैं। मगर मानव मन का सहज स्वभाव अनुकूल व सम्मान के साथ रहने व जीने का रहा है। उस महागुरा का जीवन भी सदा जहर को पीकर अमृत देने का रहा, और यह भी महापुरुष बनना एक अग्नि परीक्षा रही है, जिसमें हर महापुरुष को गुजरना पड़ता है। मुम्बई वालकेश्वर में स्वास्थ्य लाभ लेने के वाद आपश्री को अपने घोपित कार्यक्रम के अनुसार विहार करना ही था। चरण धीरे-धीरे मुम्बई से पूना की ओर १५८ M RAN गवानयने मह पर - कार दर जाना था, See श्रद्धालोक के देवता बढ़ ही रहे थे, वालकेश्वर से दादर पधारे जहाँ दो दिनो का विश्राम रहा, वहाँ से माटुगा दो दिनो तक विराजने के बाद आप अपने शिष्य परिवार के साथ उदारमना सुश्रावक भारत जैन महामण्डल के अध्यक्ष सुभाष जी रुणवाल के आग्रह पर चेम्बूर पधारे, बुखार व खाँसी से यद्यपि देह तीन चार दिनो से पीडित थी, आत्म बल से वे आगे बढ़ने को कृत सकल्प दिखाई दे रहे थे। डॉक्टरो ने कहा एक बार पुन विश्रान्ति हेतु चिकित्सालय मे पधारे, पर यही कहा सब कुछ ठीक है। २४ अप्रैल को मुम्बई वासियो की ओर से विदाई समारोह का आयोजन निश्चित होने से आपश्री चेम्बूर से घाटकोपर पधार गए, हजारो श्रद्धालु भाई-बहनो को संक्षिप्त प्रवचन फरमाया विदाई को हमेशा याद रखना, वि-विनय, दा-दान, ई- ईश्वर भजन मे लगे रहना, आने के साथ ही जाने का अटूट रिश्ता जुड़ा हुआ है। आपको यह अन्तिम वाणी किसे पता थी, यथार्थता का बोध करा रही थी जो एक दिन के बाद सभी को इस रूप में देखने को मिलेगा। २५ रविवार को भी मुम्बई व लोणावला, पूना, आदि की भीड रही, वार्तालाप, दर्शन का रूप बना रहा, पर शनैः-शनैः आपश्री अपने मे, ध्यान में समाधि मे लीन होते जा रहे थे, २६ सोमवार की वह प्रातः काल की वेला सभी सन्त सति वृन्द को दर्शन प्रदान कर आप अपने स्थान पर विराजमान थे, प्रार्थना में उपस्थित श्रावकों को भी मंगल पाट प्रदान कर चुके थे, मैं जब दृश , लिए जाने लगा, तब गती कर हुए आपने इशार किया, आज जल्दी आ = आचार्य सम्राट चिरनिद्रा में लीन ..ވެ. ..... .ޑީ....ޖީ.ޤީ श्रद्धालोक के देवता दी, यद्यपि हम सभी अल्पाहार से निवृत्त हो चुके थे, आपश्री को निवेदन भी किया गया, दुग्ध पान हेतु पर आपश्री ने इन्कार कर दिया। लगभग ७, ४० के समय कुछ श्वास की वेदना प्रारम्भ हुयी, जो धीरे-धीरे बढ़ती ही गई, पर गुरुदेव तो अपने तन में होकर भी तन में ममत्वभाव को त्याग कर अपनी समत्व साधना मे लीन होकर अरिहन्त-अरिहन्त का स्मरण करते ही जा रहे थे। बार बार क्षमायाचना के साथ सन्थारा ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त कर रहे थे, पर सहसा इस असाधारण अवस्था को देखकर किसी को भी कुछ कहने या करने की हिम्मत ही नहीं हो पा रही थी। साधु साध्वी तथा अपने शिष्यों के समक्ष स्वयमेव सारे प्रव्याख्यान लेते हुए सन्थारा का वरण करने को तत्पर हो गए। यद्यपि यह समाधि सन्तारा का समय लम्बा नही चला पर अल्प समय में भी अपनी समस्त ऊर्जा को आपश्री ने समाधिभाव में लगा दी। इस अनहोनी परिस्थिति को अचानक देखकर सभी हतप्रभ थे। पर हो भी क्या सकता, जैन धर्म दर्शन का मूलभूत सिद्धान्त जिसे कर्मवाद कहा जाता है, जो आयुष्य कर्म के रूप में बंधा रहता है, प्रत्येक आत्मा के संग उसकी अवधि पूर्ण होने पर जीव को पुनः परभव हेतु गमन अवश्यम्भावी रहता है। समा ३ आचार्य सम्राट की अन्तिम यात्रा में उपस्थित महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री एवं विशेष गणमान्य व्यक्ति 980 to test testosterett JAN EXA ko श्रद्धालोक के देवता बिजली की भॉति चन्द ही मिनटों में सम्पूर्ण प्रान्तो मे यह समाचार पहुँच गए कि हमारे धर्म सम्राट, इस युग की एक महान विभूति जैनधर्म दिवाकर आचार्य भगवन हम लोगो के बीच नही रहे। अखिल भारतीय स्थानकवासी जैन कान्फ्रेन्स जो श्रमण सघ की एकमात्र सस्था रही है, कान्फ्रेन्स के पदाधिकारी जम्मू से लेकर चेन्नई तक भारत के सभी प्रान्तो मे फैले हुए है, जिसके लगभग १० हजार सदस्य व लाखो अनुयायी रहे है। सारे मुम्बई के उस घाटकोपर की स्थली पर एकत्रित होने लगे, लम्बे विचार-विमर्श के बाद यही निर्णय लिया गया भगवान का अन्तिम संस्कार घाटकोपर श्रावक संघ की भावनानुसार घाटकोपर स्थित सोमय्या कॉलेज के विशाल प्रांगण मे किया जाए। तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार के मन्त्रीगण राजपुरोहितजी, मेहताजी, सुरेशदादा जैन व समस्त गुजरात एव राजस्थान मेवाड के श्रावक सघ एव बिहार से आए हजारो श्रद्धालुगण अन्तिम विदाई मे अपनी शक्ति सामर्थ्य के साथ जुट गए, मुम्बई एव सम्पूर्ण महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, पजाब, जम्मू, हरियाणा, चेन्नई, बैगलोर आदि भारत भर के हजारो गॉवो नगरो से एक जन सैलाब घाटकोपर अपने महागुरु के अन्तिम दर्शनो हेतु उमड पडा, दो दिनो तक लाखो श्रद्धालु गणो ने अश्रुपूरित श्रद्धांजलियाँ अर्पित की। आचार्य सम्राट की महायात्रा १६१ श्रद्धालोक के देवता आपश्री ने मात्र (उपाचार्य आचार्य) १३ वर्षों की अल्प अवधि में महाराष्ट्र मध्यप्रदेश राजस्थान पंजाब दिल्ली यू पी.हरियाणा, हिमाचल, जम्मू चण्डीगढ़ आदि प्रान्तों में लाखों मीलो की पदयात्रा कर जो जनता जनार्दन में अपना अनमोल सन्देश प्रचारित किया, वह इतिहास में एक बेजोड मिसाल रहेगी। २८ अप्रैल को प्रातः ९ बजे से जयजय नन्दा जय जय भद्दा, आचार्य भगवन अमर रहेंगे आदि धार्मिक जयघोषों के साथ आपश्री का पार्थिव देह सजे सजाए वाहन पर रखा गया, देश-विदेश के पत्रकारो व समाज सेवियों के बीच निर्वाण यात्रा जैन उपाश्रय से प्रारम्भ हुई श्रावक संघ घाटकोपर के कार्य कर्तागण मेवाड संघ के सदस्य कोठारी परिवार, कान्फ्रेस व भारत जैन महामण्डल न जाने कितनी संस्थाओं के कार्यकर्ता इस महायात्रा की व्यवस्था संभाले हुए थे। महाराष्ट्र शासन के मुख्य मन्त्री राणे उपमुख्यमन्त्री मुंडे व अनेक सांसद विधायक मन्त्रीगण अपने भावांजलियाँ समर्पित करने पहुंचते रहे, ठीक एक बजे सोमय्या कॉलेज के मैदान में आपका पार्थिव देह पहुँचा, आपश्री के पारिवारिक व समाज के अग्रगण्य महानुभावों द्वारा चिताग्नि दी गई, देह कुछ समय बाद पंचभूतों मे विलीन होती गयी, श्रद्धांजलि सभा में सभी ने अपने भाव प्रकट किए। हजारो भाई-बहनो एवं ५० से अधिक साधु साध्वीगण ने श्रद्धा पुष्प अर्पित किए। HAL *245H htu आचार्य सम्राट देह अग्नि को समर्पित AMATA १६२ Sote श्रद्धालोक के देवता जिन शासन का एक सूर्य अस्त हो गया, श्रमण सघ के तृतीय पट्टधर सदा के लिए हमसे दूर हो गए। लेकिन आपश्री ने जो ज्ञान का सयम का प्रकाश फैलाया वह सदा-सदा अजर-अमर हो गया। हिन्दुस्तान के प्राय. सभी प्रान्तो में छोटे-छोटे कस्बो से लेकर बड़े-बड़े शहरो मे भगवन की पुण्य स्मृति मे बाजार, स्कूल, कॉलेज बन्द रहे। हजारो लोगो ने मौन जुलूस व सभाएं कर के अपने आराध्य आचार्य देव के प्रति श्रद्धाजलियाँ समर्पित की। हजारो की संख्या मे तार टेलीफोनो द्वारा शोक सन्देश पहुँचे। जगह-जगह उनकी पावन स्मृति में रचनात्मक कार्य होने लगे, लेकिन उनकी पावन जन्म भूमि उदयपुर को लक्ष्य मे रखकर सभी लोगो का विचार रहा, उनके अस्थिकलश उदयपुर ले जाएँ। तदनुसार वायुयान द्वारा अस्थिकलश उनकी प्रेरणा से सस्थापित सस्था तारक गुरु जैन ग्रन्थालय पुष्कर पावन धाम पहुँचे। प्रथम पुण्यतिथि पर एक राष्ट्रीय स्तर के आयोजन द्वारा आप के पावन स्मृति मे विशालस्तर पर धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक आयोजन करने हेतु सभी श्रद्धालु लोग लगे हुए है। यह आयोजन वैशाख सुदी इग्यारस तदनुसार १४ मई रविवार को उदयपुर मे सम्पन्न होगा, श्रद्धेय आचार्य भगवन औरगाबाद चातुर्मास की स्वीकृति प्रदान कर चुके थे, तदनुसार हम सभी सन्त गण मुम्बई घाटकोपर से विहार कर के लोणावला पूना पहुंचे जहाँ आचार्य भगवन की प्रथम मासिकी पुण्यतिथि के अवसर पर आदिनाथ सोसायटी मे विशाल रूप मे स्मृति सभा का आयोजन रखा गया। जिसमे नवकार महामन्त्र का जाप एव पूना मे ही सजय बाफणा की प्रेरणा से जैनाचार्य देवेन्द्र मुनि चल चिकित्सालय की स्थापना की गई जिससे विभिन्न क्षेत्रो मे हजारो भाई-बहनो की सेवा जारी है। पूना से घोडनदी होते हुए अहमदनगर आनन्दधाम पर आगमन रहा जहाँ वर्तमान आचार्य पूज्य डॉ.शिवमुनिजी म आदि के पावन दर्शन हुए एव यथा समय अहमदनगर से होते हुए २३ जुलाई को चातुर्मास हेतु धर्म नगरी औरंगाबाद मे प्रवेश हुआ, पण्डित रत्न श्री रमेश मुनिजी म के सान्निध्य मे सन्त सति वृन्द जप तप धर्म साधना की प्रेरणा देते हुए प्रार्थना, प्रवचन, शिविर, प्रतियोगिता, सामाजिक सेवाओ द्वारा यह चातुर्मास पूज्य आचार्य भगवन की असीम कृपा से निरन्तर ऐतिहासिक बनता जा रहा है। एक अविस्मरणीय चमत्कार औरंगाबाद चातुर्मास प्रवेश के साथ ही यहाँ महावीर भवन के प्रवचन हॉल की दिवाल पर आचार्य श्री का रेखा चित्र दि २४ को रात्री के समय यकायक श्रद्धालोक के देवता kes Ane आया, जिसे देखने हेतु देश विदेश के हजारों लोगों का प्रतिदिन आवागमन जारी है, प्रस्तुत है। यहाँ महाराष्ट्र के लोकमत दैनिक पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट। स्व आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी की चित्रप्रतिमा दीवार पर प्रकट हुई। औरंगाबाद। गत २४ जुलाई को श्रमण संघीय वृतिय पट्टधर यहाँ के कुम्हारवाड़े में महावीर भवन के सभागृह की दीवार पर श्रमण एक के तृतीय पट्टधर स्वर्गीय आचार्य श्री परमपूज्य देवेन्द्र मुनिजी म.श्रीजी को चित्रप्रतिमा प्रकट होने की वार्ता उसी रात शहर भर में फैल जाने के पश्चात् महावीर भवन में हजारो भक्तजनो की बड़ी भीड़ लगी। आचार्य सम्राट की चमत्कारिक चित्र प्रतिमा महावीर भवन के प्रमुख सभागृह के व्यासपीठ के पीछे की संगमरमर की दीवार पर यह चित्रप्रतिमा दिखाई दे रही है। स्त्री-पुरूष, बच्चे, बूढ़े तत्परता से जाकर दर्शन का लाभ ले रहे हैं। वहाँ नवकार मंत्र का अखण्ड जाप चल रहा है यहाँ के स्थानक मे पंडित रमेश मुनिजी, डॉ. राजेंद्रमुनिजी, श्री दिनेश मुनिजी, श्री नरेश मुनिजी आदि ठाणा ९ की उपस्थिति है। महासती रत्नज्योति आदि ठाणा ३ का चातुर्मास यहीं है। साथ ही जैन समाज के प्रतिष्ठित कार्यकर्ता यहाँ उपस्थित हैं। स्वर्गीय आचार्य देवेद्रमुनिजी म. जैन धर्म के श्रेष्ठ गुरू थे। तीन महीने पहले आज ही के दिन यानी ता. २४ अप्रैल १९९९ के दिन मुंबई में उनकी देहावसान हुआ था। जैन परंपरा का चातुर्मास ता २७ जुलाई से शुरू हो रहा है। आचार्य देवेद्र मुनिजी चातुर्मास के निमित्त से चित्ररूप से प्रकट हुए हैं, यही भावना उपस्थित श्रद्धालुजन व्यक्त कर रहे थे। दीवार पर प्रकट हुई चित्रप्रतिमा को सर्वप्रथम राजेंद्र मुथा ने देखा ऐसा कहा जाता है। श्री मुथा ने लोकमत प्रतिनिधि से कहा कि उस दीवार को भगवा रंग देकर उस पर आईल पेंट से प्रार्थनाएँ लिखी थीं। यह रंग छह साल पहले दिया गया था। चातुर्मास के निमित्त इमारत की सफाई चालू है। आज रात करीब १० बजे जैन श्रावक संघ की मिटिग उसी सभागृह में एक तरफ चल रही थी। दूसरी और दीवार पर लगा रंग घिसने का काम कारीगर कर रहे थे। अचानक मेरा ध्यान उस १६४ MARA AN s kes श्रद्धालोक के देवता दीवार पर गया तो वहाँ आचार्य श्री देवेन्द्रमुनिजी म की प्रतिमा मुझे दिखाई दी। श्री मुथा ने कह यह रेखाकृति शुरू मे अस्पष्ट थी, बाद में वह अधिक स्पष्ट होती गई, ऐसा श्री मुथा ने कहा। यह आकृति आचार्य श्री देवेद्र मुनिजी की है यह देखकर श्री मुथा और अन्य कार्यकर्ता श्रद्धा से भर गए। उन्होने फौरन महावीर भवन मे ही वास करने वाले अन्य मुनियो को बुला लिया। मुनिश्रीजी ने रेखाकृति देखकर सत्वर नवकार मत्र का जाप शुरू करने को कहा। उसके अनुसार जाप शुरू किया गया। यह वार्ता द्रुतगति से आधे घंटे मे शहर भर में फैल गई। अनेक जैन श्रद्धालु स्त्री-पुरुष महावीर भवन की ओर दौड पडे। दीवार पर प्रकट हुई चित्रकृति के नीचे आचार्य श्री देवेद्रमुनिजी का फोटो रखा है। लोग फोटो के सम्मुख खडे होकर दर्शन ले रहे है। प्रसाद पाकर श्रद्धा से झुक रहे है। यह वार्ता दूर-दूर तक फैल गई है और लोग अलग-अलग वाहनो से यहाँ आना शुरू हुआ है। श्री मुथा ने कहा कि उन्होने जब कारीगरो से इस सम्बन्ध मे पूछा तब उन्होने कहा कि हमने रग निकालकर दीवार को साफ किया, परतु ये रेखाएँ किसी भी तरह मिट नही रही थीं। श्री वर्धमान श्वेताबर स्थानकवासी जैन श्रावक सघ के अध्यक्ष श्री प्रेमचन्द फुलफगर, मत्री श्री सोहनराज बोरा, सर्वश्री मानकचन्द सुराना, सुमतीलाल गुगले, सपतराज बोकाडिया, इदरचन्द सचेती, विजय गदेचा, भिकचन्द डोसी, हरकचन्द कटारिया, उमा बोरा, हेमलता मुगदिया, इचरज कोटेचा, सुरेश गाधी, प्रेमचन्द देवडा, उत्तम रूणवाल, नथमल पगारिया, सुवालाल छल्लानी आदि कार्यकर्ता इस समय उपस्थित थे। नोट यह समाचार अनेक पत्र-पत्रिकाओ दैनिक लोकमत २५ ७ ९९, तरूण भारण २५ ७.९९, मराठवाडा २५ ७ ९९, साझवार्ता ब्यूरो २५.७ ९९ लोकसत्ता २६ ७ ९९, लोकमत टाइम्स अग्रेजी २५ ७ ९९ मुम्बई, चोफर २६ जुलाई एव भारत के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओ मे छापा गया है। म १६५
श्रद्धालोक के देवता HD
ॐ श्री देवेन्द्राचार्य है
लोग उन्हें 'आचार्य देवेन्द्र' कहते थे
श्रद्धा के प्रवाह में बरबस कहते थे
एक झलक पाने को आतुर रहते थे
दीर्घ-पथ-यात्रा का कष्ट भी सहते थे
साहित्य-विश्व में गरिमायुक्त स्थान था
आगम और दर्शन का गहरा ज्ञान था
विद्वद्-परिषद् में दूर तक सम्मान था
श्री आचार्यदेव का जीवन महान था
बोलते थे तब मुख से फूल झरते थे
लेखनी से झर झर मोती बरसते थे
वे रात-दिन समत्व-साधना करते थे
पर माँ भारती का कोष भी भरते थे
'पुष्कर' - पद में 'धन्ना' 'देवेन्द्र बन गए
'तारक' समूह में उज्जवल चन्द वन गए
'पूज्य आनन्द' - कृपा से यतीन्द्र बन गए
श्रमण-संघ के आचार्य मुनीन्द्र बन गए
KALAM
EKA
१६६
ANUMAN
श्रद्धालोक के देवता
गुणग्राहक मन सचमुच निर्मल दर्पण था
आगम अनुप्रेक्षा मे पल पल अर्पण था
अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग का अविचल प्रण था
निर्वाण-पथ के लिए पूर्ण समर्पण था
वे दृष्टि-पथ से सहसा दूर चले गए
लगता है, हम विधि के हाथो छले गए
अभी सामने थे और अभी चले गए?
हम देखते ही रहे, वस्त्र बदले गए
गुरु-पद मे बेर बेर मॅडराता है मन
कभी नही भूलेगे वे सम्बोधि-वचन
वह निश्छल हॅसी सौम्य तेजस्वी आनन
श्री देवेन्द्र-दत्त साहित्य का 'ललित' धन
स्वर्ग मे जा पहुंचे 'ओ आचार्य भगवन्!
इतना साहस दो तोड सकूँ भव-बन्धन
सौभाग्य जागे, समृद्ध हो स्वात्म-चिन्तन
सुमति से सज्जन करे, “ललित" निजगुण मनन
रसना कैसे कह सके
सद्गुण अकथ अपार
श्री देवेन्द्राचार्य के
अगणित हैं उपकार
श्रद्धालोक के देवता jokes
"जय देवेन्द्र" है "जय आनन्द" है "जय महावीर" है "जय आत्म" "जय पुष्कर"
FOOT
निन्दा करना
व सुनना दोनों
ही महापाप है
आचार्य देवेन्द्र मुनि जी म.सा.
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Sawwvm vNAWAww.wwwww
समय से पहले और
भाग्य से अधिक किसी
को कुछ मिलने वाला नहीं
आचार्य देवेन्द्र मुनि जी म.सा.
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Wwwwwws
दूसरों को देखने
से पहले
स्वयं को देखी
आचार्य देवेन्द्र मुनि जी म.सा.
१६८
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