Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Prabandha Cintamani
Front matter
स्वर्गवासी साधुचरित श्रीमान् डालचन्दजी सिंघी
1
जन्म
वि. सं. १९२१, मार्ग वदि ६
स्वर्गवास
वि. सं. १९८४, पोप सुदि :
सिंघी जैन ग्रन्थमाला
तृतीय (३)मणि
SRLJALCANDISINGHI
घी डालकरजीचा
श्रीमेरुतुङ्गाचार्यरचित
प्रबन्धचिन्तामणि
[हिन्दी भा पान्तर]
सिंघी जैन ग्रन्थला १ जैन मागमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, कथात्मक-इत्यादि विविधविषयगुम्फित प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, प्राचीनगूर्जर, राजस्थानी आदि नाना भाषानिबद्ध बहु उपयुक्त पुरातनवाड्मय तथा नवीन संशोधनात्मक साहित्यप्रकाशिनी जैन ग्रन्थावलि । कलकत्तानिवासी स्वर्गस्थ श्रीमद् डालचन्दजी सिंघी की पुण्यस्मृतिनिमित्त तत्सुपुत्र श्रीमान बहादुरसिंहजी सिंघी कर्तृक संस्थापित तथा प्रकाशित सम्पादक तथा सञ्चालक जिन विजय मुनि [सम्मान्य सभासद-भाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिर पूना, तथा गुजरात साहित्यसभा अहमदाबाद भूतपूर्वाचार्य-गुजरात पुरातत्त्वमन्दिर अहमदाबाद; जैनवाड्मयाध्यापक विश्वभारती, शान्तिनिकेतन प्राकृतभाषादि-प्रधानाध्यापक भारतीय विद्या भवन वंबई; तथा, जैन साहित्यसंशोधक ग्रन्थावलि- पुरातत्त्वमन्दिर ग्रन्थावलि-भारतीय विद्या ग्रन्थावलि-अन्तर्गत संस्कृत-पाकृत-पाली- अपभ्रंश-प्राचीनगूर्जर-हिन्दी-आदि भाषामय अनेकानेक ग्रन्थ संशोधक-सम्पादक ।] - ग्रन्थांक ३ प्राप्तिस्थान व्यवस्थापक-सिंघी जैन ग्रन्थमाला {४८, अनेकान्त विहार, ९, शान्तिनगर; पो० सावरमती, अहमदावाद । सिंघी सदन, ४८ गरियाहाट रोड; पो० बालीगंज, कलकत्ता स्थापनाद] सर्वाधिकार संरक्षित [वि० सं० १९८६
श्री मेस्तुगाचार्यविरचित
प्रबन्धचिन्तामणि
सस्कृत ग्रन्थका
हिन्दी भाषान्तर
अनुवादक
पं० हजारीप्रसादजी द्विवेदी
[ आचार्य-हिन्दी शिक्षापीठ, विश्वभारती, शान्तिनिकेतन ]
सम्पादक
जिन विजय मुनि
[ प्राकृत भाषादि प्रधानाध्यापक-मारतीय विद्या भवन, बम्बई,
सम्पादक भारतीय विद्या-प्रेमासिक पत्रिका-इत्यादि ]
प्रकाशन-कर्ता
संचालक-सिंघी जैन ग्रन्थमाला
अहमदाबाद-कलकत्ता
विक्रमान्द १९९७]
प्रयमात्ति, पञ्चशत प्रति ।
[१९४० नियाद
- - - प्रबन्धचिन्तामणिकी संकलना। इस ग्रन्थका संकलन और प्रकाशन निम्न प्रकारसे, ५ भागोंमें, पूर्ण होगा। (१) प्रथम भाग- भिन्न भिन्न प्रतियोके आवारपर संशोधित-विविध पाठान्तर समवेत - मूल ग्रन्थ; परिशिष्ट; मूलग्रन्थ और परिशिष्टमें आये हुये संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भापामय पद्योंकी अकारादिक्रमानुसार सूचि; पाठ संशोधनके लिये काममे लाई गई पुरातन प्रतियोंका सचित्र वर्णन । (छप गया ) (२) द्वितीय भाग- प्रबन्धचिन्तामणिगत प्रबन्धोंके साथ सम्बन्ध और समानता रखनेवाले अनेकानेक पुरातन प्रबन्धोंका संग्रहः पद्यानुक्रमसूचि; विशेषनामानुक्रम; विस्तृत प्रस्तावना और प्रबन्ध' संग्रहोंकी मूल प्रतियोका सचित्र परिचय । (छप गया ) (३) तृतीय भाग- प्रबन्ध चिन्तामणिके मूल संस्कृतका शुद्ध और सरल संपूर्ण हिन्दी भाषान्तर, विशिष्ट प्रास्ताविक वक्तव्यके साथ । (प्रस्तुत ग्रन्थ) (४) चतुर्थ भाग पुरातन-प्रबन्ध-संग्रह नामक द्वितीय भागका संपूर्ण हिन्दी भाषान्तर । (छप रहा है) (५) पञ्चम भाग-दो विभागों में १) पहले विभागमें - शिलालेख, ताम्रपत्र, पुस्तक प्रशस्ति आदि जितने समकालीन साधन और ऐतिह्य प्रमाण उपलब्ध होते हैं उनका एकत्र संग्रह और तत्परिचायक उपयुक्त विस्तृत विवेचन, प्राक्कालीन और पश्चात्कालीन अन्यान्य ग्रन्थोंमें उपलब्ध प्रमाणभूत प्रकरणों, उल्लेखों और अवतरणोका संग्रह; कुछ शिलालेख, ताम्रपत्र और प्राचीन ताडपत्रोंके चित्र- इत्यादि । (२) दूसरे विभागमें-प्रबन्धचिन्तामणिग्रथित सब विषयोंका विवेचन करनेवाली विस्तृत प्रस्तावना-जिसमे तत्कालीन ऐतिहासिक, भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक और राजकीय परिस्थितिका सविशेष ऊहापोह और सिंहावलोकन किया जायगा । साथमें प्राचीन मन्दिर, मूर्तियां, पोथियां इत्यादिके अनेक चित्र भी दिये जायँगे । .
समर्पण
परमधामप्रस्थित
पितृपादकी पुण्यप्रतिमाको
प्रणति पूर्वक
*
No text on this page.
प्रबन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम पृ क-ठ - १-२ ३-११ " १२-१३ १५-१८ - प्रास्ताविक वक्तव्य -प्रथम प्रकाश- प्रारभिक मगलादि कथन १ विक्रमार्क राजाका प्रवन्ध (१) महाकवि कालिदासकी उत्पत्तिका प्रबन्ध (२) सुवर्णपुरुषकी सिद्धिका प्रबन्ध (३) विक्रमादित्यके सत्त्वका प्रबन्ध (४) सत्त्वपरीक्षाका प्रबन्ध (५) विद्यामिद्धिका प्रबन्ध (६) निर्गताका प्रबन्ध २ सातवाहन राजाका प्रबन्ध ३ शीलवतके विषयमें भूयराजका प्रवन्ध ४ वनराजादि प्रबन्ध चारडा वशकी राज्यसत्सरापलि - चौलुस्य वशका प्रारंभ ५ मूलराजका प्रवन्ध लाखाकी उत्पत्ति और विपत्तिका प्र० मूलराजके पशजोंकी राज्यसनासरामलि ६ मुजराज प्रबन्ध - दूसरा प्रकाश- ७ भोज और भीमका प्रबन्ध (१) भोजका विद्याविलास (२) भोजकी गुजरातके राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्धा (३) राजा भोजकी गुजरातपर आक्रमण करनेकी इच्छा (४) दिगवर कुलचन्द्रको सेनापति बनाना (५) कुलचन्द्रकी गुजरातपर चढ़ाई (६) महाकवि माधका प्राध (७) महाकवि धनपालका प्रबन्ध (८) सनदर्शनोंमे सत्यमार्गकी पृच्छा (९) शीता पण्डिताका प्रबध १९-२४ २३-२४ २५ २७-३२ ३३-३६ ३९ ४५-५३ प्रवन्धचिन्तामणि ५४ ५६ ५७ .... .... .... ५८ ५९ .... " .... .... ... ६० .... .... ६३ .... - ६४-९१ .... ६४ ६५ ६६ .... .... .... (१०) मयूर , बाण और मानतुङ्गाचार्यका प्र० (११) गूर्जर देशकी विदग्धताका प्र० (१२) अनित्यता संबंधी ४ श्लोकोंका प्र० (१३) भोजका भीमके पास ४ वस्तुये माँगना (१४) विजौरे नीबूका प्र० (१५) एक अच्छा नहीं है' प्र० (१६) इक्षुरसका प्रबन्ध (१७) घुडसवारीका प्रबन्ध (१८) गोपगृहिणीका प्रबन्ध (१९) भोज और कर्णका संघर्ष (२०) कर्णसे भीमका आधा भाग लेना -तीसरा प्रकाश ८ सिद्धराजादि प्रबन्ध (१) मूलराज कुमारकी प्रजावत्सलताका प्रबन्ध (२) कर्णराजा और मयणल्ला देवीका वृत्तान्त (३) सिद्धराज जयसिंहका जन्म (४) सिद्धराजका राज्य-वर्णन - लीला वैद्यका प्रवन्ध (५) उदयन मंत्रीका प्रबन्ध (६) सान्तू मंत्रीका प्रबन्ध (७) मयणल्ला देवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना (८) सिद्धराजका मालवाके साथ संघर्ष (९) सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मीलन (१०) सिद्धराजका सिद्धपुरमें रुद्रमहालय बनवाना पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना (१२) सौराष्टके राजा खंगारको विजय करना शत्रुजयकी यात्रा करना (१४) वादी श्रीदेवसूरिका चरित्र वर्णन (१५) पत्तनके वसाह आभडका वृत्तान्त (१६) सिद्धराजकी तत्त्वजिज्ञासा और सर्वदर्शन प्रति समान दृष्टि (१७) सिद्धराजका प्रजाजनोंके साथ उदार व्यवहार (१८) लक्षाधिपतिको क्रोडपति बना देना (१९) सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना (२०) वाराहीके पटेलोको बेचाका बिरुद देना .... (२१) उझाके ग्रामीणोंसे वार्तालाप ६७ .... . .... ६८ .... .... ६९ ७१ ७२ ७३ ७६ .... .... .... .... .... ७८-८२ ८२ ८३ .... .... .... .... ८४ .... ८५ .... .... " ....
प्रवन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम ८६ " " . " - (२२) झालासामत मागूकी शूरताका वर्णन (२३) सिद्धराजकी सभामें म्लेच्छराजके दूतोंका आगमन (२४) सिद्धराजका कोल्हापुरके राजाको चमत्कारके भ्रममें डालना (२५) कौतुकी सीलणकी वारचातुरी (२६) काशीराज जयचन्द्रकी सभामें सिद्धराजके दूतकी वाक्पटुता (२७) मयणलादेवीके पिताकी मृत्युवार्ता (२८) पिताके पुण्यार्थ मयणलादेनीका सोमेश्वरकी यात्रा करना (२९) सान्तू मत्रीकी बुद्धिमत्ताका एक प्रसग (३०) सिद्धराजके एक सेवकके भाग्यका वृत्तान्त (३१) सिद्धराजकी स्तुति के कुछ फुटकर पद्य -चतुर्थ प्रकाश- ९ कुमारपालादि प्रबन्ध ९३-१२१ (१) कुमारपाटके पूर्वजादि (२) सिद्धराजके भय से कुमारपालका मारे मारे फिरना (३) कुमारपालका राजगादीपर बैठना ९५ (४) कुमारपाटने राजद्रोहियोंका उच्छेद किया (५) कुमारपालका चाहमान राजा आनाकके साथ युद्ध (६) कुमारपालका उपकारियोंको सत्कृत करना (७) गायक सोलाककी कलाप्रवीणता (८) कोंकणके राजा मल्लिकार्जुनका मत्री आवड द्वारा उच्छेद (९) कुमारपाल के साथ हेमचन्द्राचार्यके समागमका प्रसग ९८ (१०) हेमाचार्यके समागमसे कुमारपालके पुरोहितका विद्वेष (११) कुमारपालका सोमेश्वर तीर्थके जीर्णोद्धारका प्रारभ कराना (१२) उदयनमत्रीसे हेमाचार्यका जीवनवृत्तान्त पूछना १०१ (१३) सोमसरके उद्वारकी समातिके निमित्त नियम लेना १०२ (१४) हेमचन्द्राचार्यका सोमेश्वरको यात्रानिमित्त कुमारपालके साथ जाना (१५) हेमाचार्यका शिरकी स्तुति पूजा करना (१६) कुमारपाटकी तरजिज्ञासा और हेमाचार्यका शिवको प्रत्यक्ष करना (१७) कुमारपालका परमाईत श्रारक बनना १०४ (१८) मी उदयनका सौराष्ट्रके युद्ध मारा जाना (१९) मत्री वाहहफा शत्रुजयतीर्थोद्वार फरयाना १०५ (२०) मा मात्रमटफा शकुनिकाविहारका उदार करवाना १०६ (२१) आममटफा शाफिनीपस्त होना " " ...
प्रवन्धचिन्तामणि १०७ .... १०८ " .... .... १०९ १०२ १०९ ११० .... .... १११ .... .... " .... ११२ ११३ .... .... (२२) कुमारपालका विद्याध्ययन करना (२३) बनारसके विश्वेश्वर कविका पत्तनमें आना (२४) हेमचन्द्रसूरिका समस्यापूरण करना (२५) आचार्य और मंत्रीके बीचमें ' हरडइ' का वाग्विलास (२६) उर्वशी शब्दकी व्युत्पत्ति (२७) सपादलक्षके राजाके नामका अर्थखंडन (२८) पं. उदयचन्द्रका प्रबन्ध (२९) कुमारपालका अभक्ष्य भक्षणके निमित्त प्रायश्चित्त करना (३०) कुमारपालका अन्यान्य विहारोंका बनवाना (३१) यूकाविहारका प्रबन्ध (३२) सालिगवसहिकाके उद्धारका प्रबन्ध (३३) मठपति बृहस्पतिका अविनय (३४) मंत्री आलिगकी स्पष्टवादिता (३५) पं० वामराशिको क्षमाप्रदान करना (३६) सोरठके दो चारणोंकी कविताविपयक स्पर्धा (३७) कुमारपालका तीर्थयात्रा करना (३८) स्वर्णसिद्धिकी इच्छा करना (३९) मंत्री चाहडका दानीपना (४०) कुमारपाल द्वारा राणा लवणप्रसादका भविष्यकथन (४१) हेमचन्द्रसूरिको लूतारोग लगना (४२) हेमचन्द्रसूरि और कुमारपालका स्वर्गवास (४३) अजयपालका राज्याभिषेक (४४) जैन मन्दिरोंका नाश करवाना (४५) कपर्दी मंत्रीको मरवा डालना (४६) महाकवि रामचन्द्रकी हत्या (४७) मंत्री आम्रभटका लडते हुए मरना (४८) अजयपालकी सन्तानोका उल्लेख (४९) वीरधवलका प्रादुर्भाव १० मंत्री वस्तुपाल-तेजपालका प्रबन्ध (१) वस्तुपाल-तेजपालकी जन्मवार्ता (२) वीरधवलका तेजपालको अपना मंत्री बनाना (३) मंत्री तेजपालका धर्मभावसम्मुख होना (४) वस्तुपालकी तीर्थयात्राका वर्णन (५) मंत्री तेजपालका आबुपर मन्दिर बनवाना (६) वस्तुपालका शंखराजके साथ युद्ध करना .... .... .... ११४ ११५ ११६ .... .... ११७ .... .... ११८ ११९ .... " .... .... १२० १२१-१३० १२१ .... .... .... .... .... .... .... .... १२३ १२५ १२६ .... ....
1 " " " प्रवन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम (७) मत्रीका मुसलमान सुलतानके साथ मैत्रीका सम्बन्ध बान्धना १२७ (८) अनुपमाकी दानशीलता १२८ (९) वीरधवलकी रणशूरता (१०) वीरधवठकी मृत्यु १२९ (११) अनुपमाकी मृत्यु (१२) वस्तुपालकी मृत्यु -पंचम प्रकाश- ११ प्रकीर्णक प्रबन्ध १३१-१५२ (१) विक्रमादित्यकी पात्र परीक्षा १३१ (२) मरे हुए नन्दका पुनजीवन (३) राजा शिलादित्य और मल्लवादी सूरिका प्रबध १३२ (४) बौद्ध और जैनोंमें वाद-विवाद (५) वलभी नगरीके विनाशकी कथा १३३ (६) श्री पुजराजकी उत्पत्ति १३१ (७) श्रीमाताकी उत्पत्तिका वर्णन १३५ (८) चोड देशके गोवर्धन राजाकी न्यायप्रियताका उदाहरण (९) पुण्यसार राजाका वृत्तान्त १३७ (१०) कर्मसार राजाका प्रबध (११) राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिवरका प्रबन्ध १३८ (१२) काशीके जयचन्द्र राजाका प्रबन्ध (१३) जगदेव क्षत्रियका प्रबन्ध (१४) पृथ्वीराजके तुग सुभटका प्रबन्ध १४३ (१५) पृथ्वीराजका म्लेच्छोंके हाथ मारा जाना (१६) कौंकण देशकी उत्पत्ति कैसे हुई १४५ (१७) ज्योतिषी वराहमिहिरका प्रबध (१८) सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त १४७ (१९) स्तमनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव १४८ (२०) कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन (२१) वाग्भट वैधका प्रबंध १४९ (२२) गिरनार तीर्थके निमित्त श्वेताम्बर-दिगम्बरमें लड़ाई १५० (२३) सोमेसरका अपने मतोंकी परीक्षा करना १५१ (२४) पूर्वज मका किया भोगना (२५) जिन पूजाका माहात्म्य १५२ -ग्रन्थकारकी प्रशस्ति परिशिष्ट-कुमारपालका अहिंसाके साथ पाणिग्रहणका रूपकात्मक प्रवन्ध १५३-१५६ " " 4 - पुरातन प्रवन्ध संग्रह प्रस्तुत प्रबन्धचिन्तामणिके भापान्तरके साथ पुरातन-प्रबन्ध- संग्रहका भाषान्तर भी विद्वानोंको अवश्य अवलोकनीय है । इस संग्रहमें, ऐसे अनेक छोटे-छोटे और-और प्रबन्ध भी संगृहीत हैं जो प्र० चिं० में बिल्कुल नहीं है; अथवा जिनमेंकी ऐतिहासिक बातें विशेष ज्ञातव्य है और जो प्र० चि० की पूरक हैं । खास करके वस्तुपाल-तेजपाल प्रबन्धके साथ सम्बन्ध रखनेवाली कितनीक बहुत ही महत्वकी ऐतिहासिक घटनाओंका इसमें सविशेष वर्णन किया गया है। वीरधवलकी मृत्युके बाद किस तरह वीसलदेवको राजगादी मिली और किस तरह मंत्री तेजपालने उसको गुजरातके साम्राज्यका स्वामी बनाया यह बात इसमें बड़ी स्पष्टता और विश्वसनीय ढंगसे बताई गई है । तदुपरान्त, नाडोलके राव लाखण, काशीके राजा जयचन्द्र, दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान आदिके विषयके भी कितने ही महत्त्वके उल्लेख इस संग्रहमें प्राप्त होते हैं। इस तरह प्र० चि० वर्णित व्यक्तियोंके विषयकी कई नवीन बातें इस संग्रहके अवलोकनसे ज्ञात होगी । अतएव इतिहासके अभ्यासि- योंके लिय यह संग्रह अवश्य अवलोकनीय है। - प्रास्ताविक वक्तव्य । , श्री मेरुतुझाचार्यरचित प्रवन्धचिन्तामाण नामक प्रसिद्ध ऐतिहासिक-प्रबन्ध-सग्रहात्मक संस्कृत प्रयका यह हिन्दी भाषा तर, आज सहर्प हम हिन्दी भाषाभापियोंकी सेनामें उपस्थित करते हैं। १. प्रवन्धचिन्तामणिका महत्व और प्रामाण्य । गुजरातके प्राचीन इतिहासकी विशिष्ट श्रुति और स्मृतिके आधारभूत जितने भी प्रबन्धात्मक और चरित्रात्मक प्रथ-निराध इत्यादि प्राकृत, सस्कृत या प्राचीन देशी भाषामें रचे हुए उपलब्ध होते हैं, उन सबमें इस प्रबधचितामणिका स्थान सबसे निशिष्ट और अधिक महत्वका है। उस प्राचीन समयसे ही- जनसे इसकी रचना हुई है तबसे ही- इस प्रन्यकी प्रतिष्ठा विद्वानोंमें खूब अच्छी तरह हो गई थी और जिनको कुछ ऐतिहासिक वृत्तान्तोंके जाननेकी उत्कण्ठा होती थी वे प्राय इसका याचन और अध्ययन किया करते थे। पिछले कई प्रयकारोंने इस प्रथका अपनी रचनाओंमें अच्छा उपयोग भी किया है, और आदरपूर्वक इसका उल्लेख भी किया है। इन ग्रन्थकारोंमें, सबसे पहले शायद जिनप्रम सूरि है जो प्राय इनके समकालीन थे। यद्यपि उन्होंने इनका कहीं नामोल्लेख नहीं किया है तथापि अपने महत्यके प्रन्थ, विविधतीर्थकल्पमें, जैसा कि हमने उसकी प्रस्तावनामें (पृ. ३, पक्ति ४-५ पर ) सूचित किया है, इस प्रन्यका स प्रयम उपयोग किया है । इसके बाद, इन जिनप्रम सूरिके उत्तरावस्थाके समकालीन और इहीके पास कुछ गहन शास्त्रोंका अध्ययन भी करनेवाले मलवारी राजशेखर मूरिने, अपने प्रवधकोपमें, इस प्रथका जैसा उपयोग किया है, उसका परिचय हमने, प्रबन्धकोषको प्रस्तावनामें, प्ररन्ध चिन्तामणि और प्रान्धकोप' इस शीर्षकके नीचे (पृ० २, काण्डिका ४ में ) कराया है। राजशेखर सूरिने तो प्रकट रूपसे इस प्रथका नामोल्लेख भी किया है । हेमचन्द्र सूरिके वृत्ता तमें उन्होंने कहा है कि- इन आचार्य के जीवन के सम्बनमें जो जो बातें प्रान्धचिन्तामणि प्रन्यमें लिखी गई हैं, उनका वर्णन हम यहा पर नहीं फरना चाहते । ऐसा करना चर्वित-चर्पण मात्र होगा। '-इत्यादि । (देखो, प्र० को० पृ० ४७, प्रकरण ५७, पक्ति १२-१६ ) सत् १४२२ में समाप्त होनेवाले जयसिंह-सूरि-रचित कुमारपालचरितमें, तथा सरत् १४६४ के पूर्वमें लिखे गये कुमारपालप्रयोधप्रबन्ध (-यह प्रन्य शीघ्र ही प्रस्तुत प्रथमालामें प्रकाशित होनेवाला है ), और सबत् १४९२ में मकलित, जिनमण्डनोपाध्यायके कुमारपालमवन्ध, इस प्रथका खून उपयोग किया गया है । स० १४९७ में परिपूर्ण होनेवाले जिनहर्पगणीकृत वस्तुपालचरित्रमें भी इसफा यथेष्ट आधार लिया गया है। स० १५०० के बाद, प्राय १०-१५ वर्षके वीचमें जिसकी रचना हुई जान पड़ती है, उस उपदेशतरगिणी नामक प्रन्यमें तो इस प्रयमेंसे प्राय सैंकडों ही पच उदृत किये गये है और इसके अने प्राधोंका बहुत कुछ सार लिया गया है । एक जगह तो प्रन्थकारने इसका प्रकट नामनिर्देश भी कर दिया है और लिख दिया है कि- सर्वेऽपि प्ररन्धाः प्रबन्धचिन्तामणितो शेयाः।' (बनारस आपति, पृ. ५८) इसके बादफे श्रादविधि, उपदेशसप्ततिका आदि १६ वीं शताब्दीमें बने हुए प्रयोंमें, उनके फर्ताओंने भी अपने अपने प्रयोंमें इस प्रयका जहां-नदा आधार लिया है और इसमें वर्णित ऐतिहासिक उडेपोका सार उक्त किया है। १७ वी सदामें, अकबर के समयमें होनेवाले हरिविजय सूरिके प्रसिद्ध सहपाठी और अगामी विमार महोपाध्याय धर्ममागर गणाने अपनी सुप्रचलित तपागच्छपहावलि और अन्य प्रयोंमें भी - ख] प्रवन्धचिन्तामणि इस ग्रन्थके कई उल्लेखोंका आधार लिया है । इसी तरह १८ वीं शताब्दीमे बने हुए वस्तुपालरास, कुमारपाल- रास आदि भापा ग्रन्थोंके रचयिताओंने भी अपनी अपनी कृतियोंमें इस ग्रन्थका बहुत कुछ उपयोग किया है, जिनका विशेष वर्णन करना आवश्यक नहीं है। इस कथनसे ज्ञात होता है कि उस पुरातन समयसे ही मेरुतुङ्ग सूरिके इस महत्त्वके ग्रन्थकी अच्छी ख्याति और उपयोगिता स्थापित हो गई थी। २. प्रवन्धचिन्तामणिकी वर्तमान नवीन युगमें प्रसिद्धि और उपयोगिता। प्रवर्तमान नवीन काल के प्रारंभमें, सबसे पहले इंग्रेज विद्वान् श्री एलेक्जेंडर किन्लॉक फॉ साहबको इसका परिचय हुआ और उन्होंने गुजरातके इतिहास विषयकी अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'रासमाला' में इसका सर्वप्रथम उपयोग किया। अपने ग्रन्यमें लिखे गये गुजरातके प्राचीन इतिहासका मुख्य ढांचा उन्होंने इसी ग्रन्थ परसे तैयार किया। वे अपने ग्रन्थमें, इस ग्रन्थका पद पद पर उल्लेख करते हैं और इसमें लिखी गई बातोंका संपूर्ण उपयोग करते हैं । उनके पीछे, भारतीय पुरातत्त्वके प्रखर पण्डित, जर्मन विद्वान् , डॉ० व्युहलरने इस ग्रन्थका खूब वारीकीके साथ अध्ययन किया और इसमें वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंका सविशेष ऊहापोह किया। 'इन्डियन ऐन्टीकरी' नामक भारतीय-विद्या विषयक सुप्रसिद्ध पत्रिकाके सन् १८७७ के जुलाई मासके अंकमें उन्होंने 'अनहिलवाडके चालुक्योंके ११ दानपत्र' (Eleven land-grants of the Chalukyas of Anhilvad) इस शीर्पक नीचे, अणहिलपुरके राजकीय इतिहास पर प्रकाश डालनेवाला एक महत्त्वका लेख लिखा जिसमें इस प्रबन्धचिन्तामणि कथित बातोंका अच्छा अवलोकन किया। फिर उसके बादमें, डॉ० व्युहलरने, जर्मन भाषामें Uber das Leben des Jaina lonches Henacandra इस नामसे, आचार्य हेमचन्द्रका सविस्तर जीवनचरित्र लिखा, जिसमें उन्होंने प्रस्तुत प्रबन्धचिन्तामणिका पूरा पूरा उपयोग किया । इसके बाद, बंबई सरकारने, बॉम्बे गेझेटियरके लिये जब गुजरातका प्राचीन इतिहास तैयार करवाया, तो उसके संकलनकर्ता प्रसिद्ध गुजराती पुरातत्त्वज्ञ डॉ० भगवानलाल इन्द्रजीने, इस ग्रन्थका बहुत सूक्ष्मताके साथ सांगोपांग निरीक्षण किया और गुजरातके राजकीय इतिहासके साथ संबन्ध रखने वाली प्रायः सारी ऐतिह्य उक्तियों और श्रुतियोंका जो जो इसमें निर्देश मिलता है उन सबका ठीक ठीक पर्यालोचन कर, यथायोग्य उनका उपयोग किया । तदुपरान्त, गुजरातके इतिहास विषयक भिन्न भिन्न प्रकारके पुस्तकों और निबन्धोंके रचयिता एतद्देशीय और विदेशीय सैंकडो ही विद्वानोंने जहां-तहां इस ग्रन्थका अनेकशः आधार लिया है और उल्लेख किया है। इस ग्रन्थकी ऐसी सार्वजनिक उपयोगिताको लक्ष्य कर, रासमालाके कर्ता विद्वान् फॉर्बस् साहवकी, और तदनुसार डॉ० व्युहलरकी भी, यह खास इच्छा रही कि विस्तृत टीका-टिप्पणियोंके साथ इस ग्रन्थका संपूर्ण इंग्रेजी अनुवाद किया जाय । डॉ० व्युहलरकी इस इच्छाको, कथासरित्सागर आदि प्रसिद्ध संस्कृत कथाग्रन्थों के सिद्धहस्त इंग्रेजी अनुवादक, इंग्रेज विद्वान् , श्रीयुत सी. एच्. टॉनी, एम् . ए. ने पूरा किया। उन्होंने इस ग्रन्थका सुन्दर और संपूर्ण इंग्रेजी अनुवाद किया जिसको कलकत्ताकी एसियाटिक सोसाइटीने सन् १९०१ में छपा कर प्रकाशित किया। डॉ० व्युहलरकी उत्कण्ठा थी कि वे टॉनीके इस भाषान्तरके साथ, ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी परि- चायक ऐसी अपनी टीका-टिप्पणियाँ दे कर, इस ग्रन्थकी उपादेयताका महत्त्व बढ़ावेंगे; पर दुर्दैवसे इस कार्यके पूर्ण होनेके पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया और उनकी वह इच्छा यों ही अपूर्ण रह गई। विद्वान् टॉनीने अपने इंग्रेजी अनुवादकी प्रस्तावनाके प्रारंभमे, जो इस बारेमे कुछ लिखा है, उसका भावार्थ यह है- * डॉ० न्युइलरका यह बडे महत्त्वका अन्य है । इसका इंग्रेजी अनुवाद The Life of Hemacandracarya इस नामसे, हमने अपने सहकारी मित्र डॉ. मणिलाल पटेल Ph. D. (मारबुर्ग-जर्मनी) द्वारा करवा कर, इसी सिंघी जैन ग्रन्थ- मालाके १२ वें नंबरमें प्रकाशित किया है । इंग्रेजी ज्ञाता विद्वानोंके लिये यह ग्रन्थ अवश्य पठनीय है।
प्रास्ताविक वकव्य "राजतरगिणीके अकेले अपवादको याद किया जाय तो, संस्कृत साहित्यमें ऐतिहासिक कहलाने रायक एक भी कोई प्रय नहीं है-ऐसा जो आक्षेप वारवार किया जाता है, वह इस प्रबधचितामाण जैस अन्यके अस्तित्वसे, किसी अशमें भोटा पाहा जा सकता है। इस आशेपको नि सार सिद्ध करना यह स्वर्गगत हो फ्राय प्रोफेसर व्युहलरकी जीवन भरकी अमिलापा थी। ग्रन्डरिस्स् डेर इन्डो आरिशेन फिनोलोगी (Grundriss der Indo-Arischen Philologie) नामक अन्य- मालारे लिये, डॉ. न्युहलरकी रसप्रद जीवन कयाका आलेखन करनेवाले प्रो० जोलीने (Jolly), ई० स० १८७७ में श्रीयुत न्योल्डके (Noldeke ) नामक विद्वान् पर लिसे हुए न्युहलरके एक पत्रमेंसे अवतरण दिया है, जिसमें उहोंने लिया था कि- 'भारतवासियोंके पास कुछ भी ऐतिहासिक साहित्य नहीं है इस प्रकारकी मायता रखनेमें आपलोग, वर्तमान समयसे कुछ थोडेसे पिउडे हुए मालूम दे रहे हैं । पिछले बीस वर्षोंमें ठीक ठीक विस्तृत ऐसे पाँच ऐतिहासिक प्रय मिल आये हैं, जो उनमें वर्णित घटनाओंके समकालीन प्रयकारोंके बनाये हुए हैं । इनमेंसे ४ तो, जिनके नाम विक्रमाकचरित, गउडवहो, पृथ्वीराज- दिग्विजय और कीर्तिकोमुदी हैं, खुद मैंने खोज निकाले हैं। और एक डझनसे भी अधिक अय और अय खोज निकालनेकी तलाशमें हूँ।' यह प्रोफेसर न्युहलर ही के श्रमका फल है कि जो इतने सारे ऐतिहासिक वृत्तात, इतने ऐतिहासिक काव्य और इतनी ऐतिहासिक कथायें सपादित हो सकी । इस प्रयके इग्रेजी अनुवादके करनेका काम जो मैंने हायमें लिया वह भी डॉ. न्युहलर-ही-की सूचनाका परिणाम है, और जो कोई पाठक मेरी टिप्पणियोंके पढ्नेका कष्ट उठायेगा उसे स्पष्ट ज्ञात हो जायगा, कि उन्हींके उत्तेजन और साहाय्यके बिना मेरा यह काम अपने अन्तको न प्राप्त कर सकता । इस अनुवाद के साथ ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयों की पूर्ति करनेवाली टिप्पणियाँ लिखनेका उनका खास इरादा था। अगर यह बन पाता तो इस प्रयकी उपयोगितामे खून महत्त्रकी वृद्धि हो पाती, पर इस विचारके, कार्यरूपमें परिणत होनेके पहले ही, दुर्दैवसे उनका अवसान हो गया और अब यह बात 'मनकी बात मनमें ही रही' जैसी कहावतके योग्य हो गई । भारतके इतिहास विषयक साहित्यके बारेमें और उसमें भी खास करके गुजरातक इतिहास के साथ साद साहित्यके साधर्म, हरएक इभेज विद्यार्थीको एक और नामका स्मरण हो आना चाहिए और वह नाम है रासमालाके कर्ता श्री एलेक्जेंडर किन्लॉक फॉर्वस्का । मि ए जे नैनें, बी सी एस (Mr AJ Nairne, Bcs) ने फॉर्वस् साहबका जीवनचरित लिखा है, जो कर्नल वॉटसन द्वारा सपादित और सन् १८७८ में प्रकाशित, रासमालाकी आवृत्तिके प्रारममें मुद्रित है। श्री फॉर साहब एक ऐसे इडियन सिवीलियन थे, जिनको अपने भाग्यका पासा जिन लोगों के साथ डाला गया हो उन लोगोंके इतिहास, वाङ्मय और पुरातत्त्रके विषय में पूरा रस रहता हो। इस विषयकी उनकी, उत्कण्ठा और सत्यनिष्ठापूर्ण अध्ययनशीलताकी प्रतीति, रासमालाके प्रत्येक पृष्ठ पर होती रहती है । जिन अनेक मूलभूत आधारोंके ऊपरसे उहोंने अपना माय तैयार किया, उनका यह एक प्रत्र धचिन्तामणि है। इस ऐतिहासिक प्रयका उन्होंने इतना तो सपूर्ण उपयोग किया है कि जिसे देख कर मेरे मनमें, अपने इस अनुवादके करते समय, वारवार यह उठ आता था कि मैं निरयक हो यह श्रम कर रहा हूँ । किन्तु प्रो० न्युहलरने मुझसे कहा था कि इस प्रयका सपूर्ण इग्रेजी अनुराद हो ऐसी इच्छा स्वय पॉर्वस्ने अनेक बार प्रदर्शित की थी | और यही मेरे इस परिश्रमकी उपयोगिताका आधार है । लेकिन, मैं अपने मनको इस तरह भी प्रोत्साहित रखना चाहता हूँ कि मध्यकालीन इस जैन यतिने लिस रखी हुई इन श्रुतपरपराओंमें, जिनका विवरण या सक्षिप्तीकरण करनेसे इनके मूलमें रही हुई आधी मोहकता नष्ट हो जाती है, न केवल मारतके इतिहासके अभ्यासियों ही-को, किन्तु तदुपरान्त रोक्कयाओंके शाताओंको और मानव-नीति शास्त्रके विद्वानोंको भी, रस प्राप्त होगा। प्रयकार स्वय भी कहता है कि-इस रचनाके करने में मेरा उद्देश जनमन रजन करनेका है।" इत्यादि । * . ३. प्रपन्धचिन्तामणिके मूल सस्कृत ग्रन्धका प्रथम प्रकाशन और गुजराती भापान्तर । जैसा कि हमने, अपनी मूल आवृत्तिके प्रारम्भमें दिये हुए 'किंचित् प्रास्ताविक' शीर्षक वक्तव्यमें लिखा है, इस प्रथफे सस्कृत मूलका प्रथम प्रकाशन, गुजरातके शास्त्री रामचन्द्र दीनानाथ नामक विद्वान्ने, सत् * पॉपस् साहसी ऐसी इन्छा ही नहीं थी, यल्कि उहोंने तो इसका पूरा इग्रेजी अनुवाद दुद ही सबसे पहले कर लिया पा और फिर उसका उपयोग यसमागमें किया था, ऐसा बम्बईकी फॉर्चस् समामें जो उनका प्रायसमा विद्यमान है उससे मालूम होता है। यमईक इस समहमें पॉवम् साहरकी हापकी रखी हुई एक नोटबुक है जिसमें इस प्रपके ३,४ और वे प्रकाशका इभी मापान्तर लिया हुआ है। पहले दो प्रकाशीका माषान्तर, शायद किसी दूसरी नोटकमें लिखा हुआ होगा जो अब उपरम्प नहीं है। श्री टॉनीको इसकी खबर न होनेसे, शायद उन्होंने वैसा लिया होगा। अपवा यह भाषान्तर वैसा पूर्ण और गुदन होगा जिसे पॉस्को सतोर रहा हो, और इसीलिये उहोंने इसका एक उत्तम भाषान्तर, योग्य सस्कृतम पण्डितके दापसे हो, ऐसी डॉ. म्युलरके आगे प्रदर्शित की।
ख] प्रवन्धचिन्तामणि इस ग्रन्थके कई उल्लेखोंका आधार लिया है । इसी तरह १८ वीं शताब्दीमे बने हुए वस्तुपालरास, कुमारपाल- रास आदि भाषा ग्रन्थोके रचयिताओंने भी अपनी अपनी कृतियोंमे इस ग्रन्थका बहुत कुछ उपयोग किया है, जिनका विशेष वर्णन करना आवश्यक नहीं है। इस कथनसे ज्ञात होता है कि उस पुरातन समयसे ही मेरुतुङ्ग सूरिके इस महत्त्वके ग्रन्थकी अच्छी ख्याति और उपयोगिता स्थापित हो गई थी। २. प्रबन्धचिन्तामणिकी वर्तमान नवीन युगमें प्रसिद्धि और उपयोगिता। प्रवर्तमान नवीन कालके प्रारंभमे, सबसे पहले इंग्रेज विद्वान् श्री एलेक्झेंडर किन्लॉक फॉई साहवको इसका परिचय हुआ और उन्होंने गुजरातके इतिहास विषयकी अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'रासमाला ' में इसका सर्वप्रथम उपयोग किया। अपने ग्रन्थमें लिखे गये गुजरातके प्राचीन इतिहासका मुख्य ढांचा उन्होंने इसी प्रन्थ परसे तैयार किया। वे अपने ग्रन्थमें, इस ग्रन्थका पद पद पर उल्लेख करते है और इसमें लिखी गई बातोका संपूर्ण उपयोग करते है । उनके पीछे, भारतीय पुरातत्त्वके प्रखर पण्डित, जर्मन विद्वान् , डॉ० ब्युहलरने इस ग्रन्थका खूब बारीकीके साथ अध्ययन किया और इसमें वर्णित ऐतिहासिक तथ्योका सविशेष ऊहापोह किया। 'इन्डियन ऐन्टीकेरी' नामक भारतीय-विद्या विषयक सुप्रसिद्ध पत्रिकाके सन् १८७७ के जुलाई मासके अंकमें उन्होने 'अनहिलवाडके चालुक्योके ११ दानपत्र' (Eleven land-grants of the Chalukyas of Anhilvad) इस शीर्षक नीचे, अणहिलपुरके राजकीय इतिहास पर प्रकाश डालनेवाला एक महत्त्वका लेख लिखा जिसमें इस प्रबन्धचिन्तामणि कथित बातोंका अच्छा अवलोकन किया । फिर उसके बादमें, डॉ० व्युहलरने, जर्मन भाषामें Uber das Leben des Jaina Monches Hemacandra इस नामसे, आचार्य हेमचन्द्रका सविस्तर जीवनचरित्र लिखा, जिसमें उन्होंने प्रस्तुत प्रबन्धचिन्तामणिका पूरा पूरा उपयोग किया* । इसके बाद, बंबई सरकारने, बॉम्बे गेझेटियरके लिये जब गुजरातका प्राचीन इतिहास तैयार करवाया, तो उसके संकलनकर्ता प्रसिद्ध गुजराती पुरातत्त्वज्ञ डॉ० भगवानलाल इन्द्रजीने, इस ग्रन्थका बहुत सूक्ष्मताके साथ सागोपांग निरीक्षण किया और गुजरातके राजकीय इतिहासके साथ संबन्ध रखने वाली प्रायः सारी ऐतिह्य उक्तियों और श्रुतियोका जो जो इसमें निर्देश मिलता है उन सबका ठीक ठीक पर्यालोचन कर, यथायोग्य उनका उपयोग किया। तदुपरान्त, गुजरातके इतिहास विषयक भिन्न भिन्न प्रकारके पुस्तकों और निबन्धोंके रचयिता एतद्देशीय और विदेशीय सैंकडों ही विद्वानोंने जहां-तहां इस ग्रन्थका अनेकशः आधार लिया है और उल्लेख किया है। इस ग्रन्थकी ऐसी सार्वजनिक उपयोगिताको लक्ष्य कर, रासमालाके कर्ता विद्वान् फॉर्बस् साहबकी, और तदनुसार डॉ० व्युहलरकी भी, यह खास इच्छा रही कि विस्तृत टीका-टिप्पणियोंके साथ इस ग्रन्थका संपूर्ण इंग्रेजी अनुवाद किया जाय । डॉ० व्युहलरकी इस इच्छाको, कथासरित्सागर आदि प्रसिद्ध संस्कृत कथाग्रन्थोके सिद्धहस्त इंप्रेजी अनुवादक, इंग्रेज विद्वान् , श्रीयुत सी. एच्. टॉनी, एम् . ए. ने पूरा किया। उन्होंने इस ग्रन्थका सुन्दर और संपूर्ण इंग्रेजी अनुवाद किया जिसको कलकत्ताकी एसियाटिक सोसाइटीने सन् १९०१ में छपा कर प्रकाशित किया। डॉ० व्युहलरकी उत्कण्ठा थी कि वे टॉनीके इस भाषान्तरके साथ, ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी परि- चायक ऐसी अपनी टीका-टिप्पणियाँ दे कर, इस ग्रन्थकी उपादेयताका महत्त्व बढ़ावेगे; पर दुर्दैवसे इस कार्यके पूर्ण होनेके पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया और उनकी वह इच्छा यों ही अपूर्ण रह गई। विद्वान् टॉनीने अपने इंग्रेजी अनुवादकी प्रस्तावनाके प्रारंभमे, जो इस बारे में कुछ लिखा है, उसका भावार्थ यह है- * डॉ० न्युहलरका यह बडे महत्त्वका ग्रन्थ है। इसका इंग्रेजी अनुवाद The Life of Hemacandracarya इस नामसे, हमने अपने सहकारी मित्र डॉ. मणिलाल पटेल Ph. D. (माखुर्ग-जर्मनी) द्वारा करवा कर, इसी सिंघी जैन ग्रन्थ- मालाके १२ वें नंबरमें प्रकाशित किया है। इंग्रेजी ज्ञाता विद्वानोंके लिये यह ग्रन्थ अवश्य पठनीय है।
प्रास्ताविक वक्तव्य [ग "रानतरगिणीके अकेले अपवादको बाद किया जाय तो, सस्कृत साहित्यमें ऐतिहासिक कहलाने लायक एक भी कोई प्राय नहीं है-ऐसा जो आक्षेप वारवार किया जाता है, वह इस प्रर पचितामणि जैस प्रयके अस्तित्वसे, किसी अशमें भोंटा पाहा जा सकता है। इस आशेपको नि सार सिद्ध करना यह स्वर्गगत हो फ्राय प्रोफेसर व्युहलरकी जीवन भरकी अभिलाषा थी। अन्डरिस्स् डेर इन्डो मारिशेन फिलोलोगी (Grundriss der Indo-Arischen Phlologie) नामक ग्रय- मालाके लिये, डॉ० न्युइलरकी रसप्रद जीवन कथाका आलेखन करनेवाले प्रो० जोलीने (Jolly), ई० स० १८७७ में श्रीयुत न्योल्हेंके ( Noldeke) नामक विद्वान् पर लिखे हुए न्युहल्रके एक पत्रमेसे अवतरण दिया है, जिसमें उन्होंने लिया था कि- 'भारतवासियोंके पास कुछ भी ऐतिहासिक साहित्य नहीं है इस प्रकारकी मा यता रखनेमें आपलोग, वर्तमान समयसे कुछ योडेसे पिछडे हुए मालूम दे रहे हैं। पिछले बीस वर्षांमें ठीक ठीक पिस्तृत ऐमे पाँच ऐतिहासिक प्रथ मिल आये हैं, जो उनमें वर्णित घटनाओं के समकालीन प्रयकारों के बनाये हुए हैं। इनमेसे ४ तो, जिनके नाम विक्रमाकचरित, गउडवहो, पृथ्वीराज- दिग्विजय और कीर्तिकोमुदी हैं, खुद मैंने खोज निकाले हैं। और एक डझनसे भी अधिक अय और प्रय खोज निकालने की तलाश हूँ।' यह प्रोफेसर न्युहर ही के श्रमका फल है कि जो इतने सारे ऐतिहासिक वृत्तात, इतने ऐतिहासिक काव्य और इतनी ऐतिहासिक कथायें सपादित हो सकी । इस प्रयके इग्रेजी अनुवादके करनेका काम जो मैंने हायमें लिया वह भी डॉ. न्युहलर-ही-की सूचनाका परिणाम है, और जो कोई पाठक मेरी टिप्पणियोंके पदनेका कष्ट उठायेगाउसे स्पष्ट शात हो जायगा, कि उहीके उत्तेजन और साहाय्यके विना मेरा यह काम अपने अन्तको न प्राप्त कर सकता । इस अनुनादके साथ ऐतिहासिक और भौगोलिक विपर्योकी पूर्ति करनेवाली टिप्पणियाँ लिसनेका उनका खास इरादा था। अगर यह बन पाता तो इस प्रथकी उपयोगितामें सूत्र महत्वकी वृद्धि हो पाती, पर इस विचारके, कार्यरूपमें परिणत होनेके पहले ही, दुर्दैवसे उनमा अवसान हो गया और अब यह बात 'मनकी बात मनमें ही रही ' जैसी कहावतके योग्य हो गइ । मारतके इतिहास विषयक साहित्यके वारेमें और उसमें भी खास करके गुजयतक इतिहास के साथ सबद्ध साहित्यके सब धर्म, हरएक इग्रेज विद्यार्थीको एक और नामका स्मरण हो माना चाहिए और वह नाम है रासमालाके र्ता श्री एलेक्जेंडर किन्लॉक फॉर्वस्का । मि ए जे नैनें, यी सी एस (Mr A J Nairne, B_cs ) ने पॉर्पस् साहयका जीवनचरित लिखा है, जो कर्नल वॉटसन द्वारा सपादित और सन् १८७८ में प्रकाशित, रासमालाकी आवृत्ति के प्रारंममें मुद्रित है । श्री फॉर्वर साहब एक ऐसे इडियन सिपीलियन थे, जिनको अपने भाग्यमा पासा जिन लोगोंके साथ डाला गया हो उन लोगोंके इतिहास, वाड्मय और पुरातत्व विषयमें पूरा रस रहता हो। इस विषयकी उनकी, उत्कण्ठा और सत्यनिष्ठापूर्ण अध्ययनशीलताकी प्रतीति, रासमालाके प्रत्येक पृष्ठ पर होती रहती है । जिन अनेर मूलभूत आधारोंके ऊपरसे उन्होंने अपना प्रय तैयार किया, उनमेंका यह एक प्रबधचिन्तामाणि है। इस ऐतिहासिक प्रयका उन्होंने इतना तो सपूर्ण उपयोग किया है कि जिसे देख कर मेरे मनमें, अपने इस अनुपादक करते समय, वारवार यह उठ आता था कि मैं निरर्थक ही यह श्रम कर रहा हूँ। किन्तु प्रो० न्युहलरने मुझसे कहा था कि इस प्रयका सपूर्ण इमेजी अनुवाद हो ऐसी इच्छा स्वय पॉर्पस्ने अनेक बार प्रदर्शित की यी ! और यही मेरे इस परिश्रमकी उपयोगिताका आधार है । लेकिन, मैं अपने मनको इस तरह भी प्रोत्साहित रखना चाहता हूँ कि-मध्यकालीन इस जैन यतिने लिख रखी हुई इन श्रुतपरपराओंमें, जिनका विवरण या सक्षिप्तीकरण करनेसे इनके मूलमें रही हुई आधी मोहकता नष्ट हो जाती है, न केवल मारतके इतिहासके अभ्यासियों ही-को, किन्तु तदुपरान्त लेक्कयाओंके शाताओंको और मानव-नीति शास्त्र के विद्वानों को भी, रस प्राप्त होगा। प्रयकार स्वय भी कहता है कि-इस रचना करने में मेरा उद्देश जनमन रजन करनेका है।" इत्यादि । . * * ३. प्रपन्धचिन्तामणिके मूल सस्कृत ग्रन्थका प्रथम प्रकाशन और गुजराती भापान्तर । जैसा कि हमने, अपनी मूल आवृत्तिके प्रारम्भमें दिये हुए 'किंचित् भास्ताविक' शीर्षक वक्तव्यमें लिग्वा है, इस प्रन्यके सस्कृत मूलका प्रथम प्रकाशन, गुजरातके शाखी रामचन्द दीनानाथ नामक विद्वान्ने, सात् पॉपस् साहसी ऐसी इन्छा ही नहीं थी, यल्कि उहोंने तो इसका पूरा होजी अनुवाद खुद ही सबसे पहले कर लिया या और रि उसका उपयोग रासमागमें किया था, ऐसा यम्बईकी पॉम् समा जो उनका प्रयतमा विद्यमान है उससे मान्म mtयमांक इस समहमें फॉरम् साहकी हापकी दिली हुई एक नोटबुा है जिसमें इस प्रपके ३,४ और ५ वे प्रकाशका इमजी भाषान्तर गिला हुआ है। पहले दो प्रकाशका मापान्तर, शायद किसी दूसरी नोटबुकमें लिखा हुआ होगा नो अब उपरन्ध नरी है। भी टॉनीको इसकी खबर न होनेसे, शायद उहोंने वैसा लिम्मा होगा। अपना यह मारान्तर घेमा पूर्ण मोर गुद न होगा निगरो पॉपको रातोर रहा हो, और इसलिये उोंने इसका एक उरम मारान्तर, योग्य सस्तवश पन्डितके हाप हो, ऐसी रा डॉ. मुरलरके मागे प्रदर्शित की हो।
ख] प्रवन्धचिन्तामणि । . , - इस ग्रन्थके कई उल्लेखोका आधार लिया है । इसी तरह १८ वीं शताब्दीमें बने हुए वस्तुपालरास, कुमारपाल- रास आदि भाषा ग्रन्थोंके रचयिताओने भी अपनी अपनी कृतियोंमे इस ग्रन्थका बहुत कुछ उपयोग किया है, जिनका विशेष वर्णन करना आवश्यक नहीं है। इस कथनसे ज्ञात होता है कि उस पुरातन समयसे ही मेरुतुङ्ग सूरिके इस महत्त्वके ग्रन्थकी अच्छी ख्याति और उपयोगिता स्थापित हो गई थी। २. प्रबन्धचिन्तामणिकी वर्तमान नवीन युगमें प्रसिद्धि और उपयोगिता। प्रवर्तमान नवीन काल के प्रारंभमें, सबसे पहले इंग्रेज विद्वान् श्री एलेक्झेंडर किन्लॉक फॉई साहबको इसका परिचय हुआ और उन्होंने गुजरातके इतिहास विषयकी अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'रासमाला में इसका सर्वप्रथम उपयोग किया। अपने ग्रन्थमें लिखे गये गुजरातके प्राचीन इतिहासका मुख्य ढांचा उन्होंने इसी ग्रन्थ परसे तैयार किया। वे अपने ग्रन्थमे, इस ग्रन्थका पद पद पर उल्लेख करते हैं और इसमें लिखी गई बातोंका संपूर्ण उपयोग करते है । उनके पीछे, भारतीय पुरातत्त्वके प्रखर पण्डित, जर्मन विद्वान् , डॉ० व्युहलरने इस ग्रन्थका खूब बारीकीके साथ अध्ययन किया और इसमें वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंका सविशेप ऊहापोह किया। इन्डियन ऐन्टीकरी' नामक भारतीय-विद्या विषयक सुप्रसिद्ध पत्रिकाके सन् १८७७ के जुलाई मासके अंकमें उन्होंने 'अनहिलवाडके चालुक्योंके ११ दानपत्र' (Eleven land-grants of the Chalukyas of Anhilvad) इस शीर्षक नीचे, अणहिलपुरके राजकीय इतिहास पर प्रकाश डालनेवाला एक महत्त्वका लेख लिखा जिसमें इस प्रबन्धचिन्तामणि कथित बातोंका अच्छा अवलोकन किया। फिर उसके बादमें, डॉ० व्युहलरने, जर्मन भाषामें Uber das Leben des Jaina fonches Henacandra इस नामसे, आचार्य हेमचन्द्रका सविस्तर जीवनचरित्र लिखा, जिसमें उन्होंने प्रस्तुत प्रबन्धचिन्तामणिका पूरा पूरा उपयोग किया* | इसके बाद, बंबई सरकारने, बॉम्बे गेझेटियरके लिये जब गुजरातका प्राचीन इतिहास तैयार करवाया, तो उसके संकलनकर्ता प्रसिद्ध गुजराती पुरातत्त्वज्ञ डॉ० भगवानलाल इन्द्रजीने, इस ग्रन्थका बहुत सूक्ष्मताके साथ सांगोपांग निरीक्षण किया और गुजरातके राजकीय इतिहासके साथ संबन्ध रखने वाली प्रायः सारी ऐतिह्य उक्तियों और श्रुतियोंका जो जो इसमें निर्देश मिलता है उन सबका ठीक ठीक पर्यालोचन कर, यथायोग्य उनका उपयोग किया । तदुपरान्त, गुजरातके इतिहास विषयक भिन्न भिन्न प्रकारके पुस्तको और निबन्धोंके रचयिता एतद्देशीय और विदेशीय सैंकडों ही विद्वानोंने जहा-तहां इस ग्रन्थका अनेकशः आधार लिया है और उल्लेख किया है। इस ग्रन्थकी ऐसी सार्वजनिक उपयोगिताको लक्ष्य कर, रासमालाके कर्ता विद्वान् फॉर्बस् साहबकी, और तदनुसार डॉ० ब्युहलरकी भी, यह खास इच्छा रही कि विस्तृत टीका-टिप्पणियोंके साथ इस ग्रन्थका संपूर्ण इंग्रेजी अनुवाद किया जाय । डॉ० व्युलरकी इस इच्छाको, कथासरित्सागर आदि प्रसिद्ध संस्कृत कथाग्रन्थोंके सिद्धहस्त इंग्रेजी अनुवादक, इंग्रेज विद्वान् , श्रीयुत सी. एच्. टॉनी, एम् . ए. ने पूरा किया। उन्होंने इस ग्रन्थका सुन्दर और संपूर्ण इंग्रेजी अनुवाद किया जिसको कलकत्ताकी एसियाटिक सोसाइटीने सन् १९०१ में छपा कर प्रकाशित किया। डॉ० न्युहलरकी उत्कण्ठा थी कि वे टॉनीके इस भाषान्तरके साथ, ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी परि- चायक ऐसी अपनी टीका-टिप्पणियाँ दे कर, इस ग्रन्थकी उपादेयताका महत्त्व बढ़ावेंगे; पर दुर्दैवसे इस कार्यके पूर्ण होनेके पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया और उनकी वह इच्छा यों ही अपूर्ण रह गई। विद्वान् टॉनीने अपने इंग्रेजी अनुवादकी प्रस्तावनाके प्रारंभमे, जो इस बारे में कुछ लिखा है, उसका भावार्थ यह है- * डॉ० न्युइलरका यह बडे महत्त्वका अन्य है । इसका इंग्रेजी अनुवाद The Life of Hemacandracarya इस नामसे, हमने अपने सहकारी मित्र डॉ. मणिलाल पटेल Ph. D. (मारबुर्ग-जर्मनी) द्वारा करवा कर, इसी सिंघी जैन ग्रन्थ- मालाके १२ वें नंबरमें प्रकाशित किया है। इंग्रेजी ज्ञाता विद्वानोंके लिये यह ग्रन्थ अवश्य पठनीय है। .
प्रास्ताविक वक्तव्य [ग "राजतरंगिणीके अकेले अपवादको बाद किया जाय तो, सस्कृत साहित्यमें ऐतिहासिक कहलाने रायक एक भी कोई माय नहीं है-ऐसा जो आक्षेप वारवार किया जाता है, वह इस प्रापचितामा जैस प्रयके अस्तित्वसे, किसी अछमें भोंटा पाहा जा सकता है। इस आक्षेपको नि सार सिद्ध करना यह स्वर्गगत हो फ्राय प्रोफेसर व्युहलरकी जीवन भरकी अभिलाषा थी। ग्रन्डरिस्स् डेर इन्डो आरिशेन फिलोलोगी (Grundriss der Indo-Arischen Philologre) नामक प्रय- मालाके लिये, डॉ० न्युहलरकी रसप्रद जीवन कयाका आलेखन करनेवाले प्रो० जोलीने (Jolly ), ई० स० १८७७ में श्रीयुत न्योल्डके ( Noldeke) नामक विद्वान् पर लिखे हुए न्युहलरके एक परमेसे अवतरण दिया है, जिसमें उहोंने लिखा था कि- 'भारतवासियोंके पास कुछ भी ऐतिहासिक साहित्य नहीं है इस प्रकारसी मायता रखनेमें आपलोग, वतमान समयसे कुछ थोडेसे पिउडे हुए मालूम दे रहे हैं । पिछले बीस वर्षोंमें ठीक ठीक विस्तृत ऐसे पाँच ऐतिहासिक प्रय मिल आये हैं, जो उनमें वर्णित घटनाओंके समकालीन प्रथकारों के बनाये हुए हैं। इनमेंसे ४ तो, जिनके नाम विक्रमाकचरित, गउडवहो, पृथ्वीराज- दिग्विजय और कीर्तिकोमुदी है, खुद मैंने खोज निकाले हैं। और एक डझनसे भी अधिक अन्य और प्रय खोज निकालनेकी तलाशमै हूँ।' यह प्रोफेसर न्युहलर ही के श्रमका फल है कि जो इतने सारे ऐतिहासिक वृत्तात, इतने ऐतिहासिक काव्य और इतनी ऐतिहासिक कथायें सपादित हो सकी । इस प्रयके इग्रेजी अनुवादके करनेका काम जो मैंने हायमें लिया वह मी डॉ. न्युइलर-ही-की सूचनाका परिणाम है, और जो कोई पाठक मेरी टिप्पणियोंके पदनेका कष्ट उठायेगा उसे स्पष्ट ज्ञात हो जायगा, कि उदीक उत्तेजन और साहाय्यके विना मेरा यह काम अपने अन्तको न प्राप्त कर सकता । इस अनुवादके साथ ऐतिहासिक और भौगोलिक निपयोगी पूर्ति करनेवाली टिप्पणियाँ लिखनेका उनका खास इरादा था। अगर यह बन पाता तो इस प्रथी उपयोगिता में सूप महत्वकी वृद्धि हो पाती, पर इस विचारके, कार्यरूपमें परिणत होने के पहले ही, दुर्दैवसे उनका अवसान हो गया और अब यह पात 'मनकी बात मामें हो रही' जैसी कहावतके योग्य हो गह । भारतके इतिहास विषयक साहित्यके बारेमें और उसमें भी खास करके गुजगतक इतिहास के साथ सबद्ध साहित्यके सबधमें, हरएक इमेज विद्यार्थीको एक और नामका स्मरण हो आना चाहिए और वह नाम है गसमाल कर्ता श्री एलेक्जेंडर किन्लॉक फॉर्चस्का । मि ए जे नैर्ने, बी सी एस (Afr A J Nairne, Bcs) ने पॉपस् साहनका जीवनचरित रिसा है, जो कर्नल वॉटसन द्वारा सपादित और सन् १८७८ में प्रकाशित, रासमालाकी आवृत्ति के प्रारममें मुद्रित है । श्री पॉस् साहब एक ऐसे इंडियन सिवीलियन थे, जिनको अपने भाग्यका पासा जिन लोगोंके साथ डाला गया हो उन लोगोंके इतिहास, वाङ्मय और पुरातत्व विषयमें पूरा रस रहता हो। इस विषयकी उनकी, उत्कण्ठा और सत्यनिष्ठापूण अध्ययनशीलताकी प्रतीति, रासमालाके प्रत्येक पृष्ठ पर होती रहती है । जिन अनेक मूलभूत आधारों के ऊपरसे उहोंने अपना मप तैयार किया, उनमेंका यह एक प्रबधचिन्तामणि है। इस ऐतिहासिक मायका उन्होंने इतना तो सपूण उपयोग किया है कि जिसे देख कर मेरे मनमें, अपने इस अनुवादके करते समय, वारपार यह उठ आता था कि मैं निरथक ही यह श्रम कर रहा हूँ। किन्तु प्रो० न्युइलरने मुझसे कहा था कि इस प्रयका सपूर्ण इग्रेजी अनुवाद हो ऐसी इच्छा स्वय पॉर्वस्ने अनेक वार प्रदर्शित की थी । और यही मेरे इस परिश्रमकी उपयोगिताका आधार है । लेकिन, मैं अपने मनको इस तरह भी प्रोत्साहित रसना चाहता हूँ कि मध्यकालीन इस जैन यतिने लिख रखी हुई इन श्रुतपरपराओंमें, जिनका विवरण या सशिप्तीररण करनेसे इनके मूलमें रही हुइ आधी मोहकता नष्ट हो जाती है, न केवल भारतके इतिहासके अभ्यासियों ही-को, किन्तु तदुपरान्त रोककथाओंके शाताओंको और मानव-नीति-शास्त्रके विद्वानों को भी, रस प्राप्त होगा । प्रयकार स्वय मी कहता है कि-इस रचनाके करनेमें मेरा उद्देश जनमन रजन करनेका है।" इत्यादि । ३. प्रपन्धचिन्तामणिके मूल सस्कृत ग्रन्धका प्रथम प्रकाशन और गुजराती भापान्तर । जैसा कि हमने, अपनी मूल आवृत्तिके प्रारम्भमें दिये हुए 'किंचित् प्रास्ताविक' शीर्षक वक्तव्यमें लिया है, इस प्रयके सस्कृत मूलका प्रथम प्रकाशन, गुजरातके शास्त्री रामचन्द्र दीनानाथ नामक विद्वान्ने, सपत् पॉपस् साहसी ऐसी इन्छा ही नहीं थी, बल्कि उहोंने तो इसका पूरा इभेजी अनुवाद मुद ही सबसे पहले कर लिया या और फिर उसका उपयोग यसमागमें किया था, ऐसा बम्बईकी फार्यस् समामें जो उनका प्रपसमा विद्यमान है उससे मादम होता है। पाईक इस सग्रहमें पॉपम् साहकी हापशी लिपी हुई एक नोटबुक है जिसमें इस प्रपके ३,४ और ५ वे प्रकाशका प्रमी भावान्तर लिगा हुआ है। पहले दो प्रकाशका मापान्तर, शायद किसी दूसरी नोटयुको रिखा हुमा होगा जो अब उपराध नाभी गेनीको सकी खबर न होने से, शायद उहोंने पैसा लिया होगा। अपना वह भागनर येमा पूर्ण और शुदन शेगा विरासे पॉपको सवोर रहा हो, और इसलिये उन्होंने इसका एक उत्तम मारान्तर, योग्य सस्तवश पण्डितके वापसे हो, ऐसी (ॉ. म्हारे आगे प्रदर्शित की दो। - घ] प्रवन्धाचन्तामणि १९४४ में, बम्बईसे किया था। उसीके साथ उन्होने, इसका गुजराती भाषामें अनुवाद भी छपवा कर प्रकाशित किया था। शास्त्रीजीका यह अनुवाद - जिसे अनुवाद नहीं लेकिन एक तरहका विवरण कहना चाहिए-पुराने ढंगसे और पुरानी शैलीकी भाषामें किया गया था और इसमें उन्होंने अपनी तरफसे भी बहुतसे वाक्य और विचार, जो मूलमे सर्वथा नहीं थे, खूब फैला फैला कर लिख दिये थे । परन्तु साथमें कोई ऐतिहासिक पर्यालोचनकी दृष्टिसे उपयुक्त ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया था। अनुवादमें - खास करके प्राकृत गाथाओं और सुभाषित रूपसे उद्धृत पद्योंके भापान्तरमे- तो अनेकानेक बड़ी बड़ी भद्दी भूलें भी की गई हैं, जिनका यहाँ पर दिग्दर्शन कराना निरर्थक है । यहाँ पर इतना यह अवश्य कहना चाहिये कि इस उपयोगी ग्रन्थको सर्वसाधारणके लिये सुलभ बनानेका श्रेयस्कर कार्य, सबसे प्रथम उन्हीं शास्त्रीजीने किया और तदर्थ उनकी स्मृति सदैव आदरकी दृष्टि से की जानी चाहिए। जैसा कि, प्रथम भागरूप मूल ग्रन्थकी प्रस्तावनामे सूचित किया है, गुजरातके इतिहासकी दृष्टिसे इस ग्रन्थका महत्त्व लक्ष्यमें रख कर, हमने अहमदाबादके गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरकी ओरसे-जिसके कि हम सर्व प्रधान संचालक और नियामक थे- इसकी एक सर्वांगपूर्ण सुविस्तृत आवृत्ति, विशुद्ध मूल और उत्तम गुजराती भाषान्तर आदिके साथ, प्रकट करनेका प्रयत्न करना शुरू किया था । यथानुक्रम, मूलका कुछ भाग संशोधित और संपादित कर, बम्बईके सुप्रसिद्ध कर्णाटक प्रेसमें छपनेको भी भेज दिया था और उसमें प्रायः प्रथमके दो प्रकाश जितना भाग छप भी चुका था। उसी बीचमें हमारा युरोप जाना हुआ और वह कार्य कुछ समय के लिये स्थगित रहा । करीब दो वर्षके वाद, वहाँसे हम जब वापस आये तो, देशमें राष्ट्रीय आन्दोलन बड़े जोरोंसे शुरू हुआ और हम भी उसमें संलग्न हो गये । सन् १९३० के अप्रेलमें, धारासणाके विख्यात नमक-सत्याग्रहमे सम्मीलित होनेके लिये, अहमदाबादसे ६०-७० जितने सत्याग्रहियोंकी एक जबर्दस्त टोली ले कर हमने प्रस्थान किया । पर अहमदाबादसे दूसरे ही स्टेशन पर, सरकारने हमको गिरफ्तार कर लिया और वहीं जंगल-ही-में मॅजिस्ट्रेटने हमको छ महिनेकी सजा दे कर, पहले बम्बई और फिर वहाँसे नासिक जेल में भेज दिया। इधर पीछेसे, गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरको भी- गुजरात विद्यापीठके साथ - सरकारने कब्जे कर, उसके विशाल ग्रन्थसमूहको जब्त कर लिया और उसकी वह सब स्थिति छिन्न-भिन्न हो गई। इस तरह प्रबन्धचिन्तामणिके विस्तृत प्रकाशनका जो आयोजन हमने गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरकी ओरसे किया था, वह एक प्रकारसे उन्मूलित हो गया । इस परिस्थितिको जान कर, बंबईकी 'फॉर्वस् गुजराती साहित्य सभा'ने, जिसका भी प्रधान ध्येय गुजरातकी प्राचीन संस्कृति के विविध सावनोंको प्रकाशमें लानेका है, इस ग्रन्थके प्रकाशनका कार्य हाथमें लिया और हमारे विद्वान् मित्र एवं गुजरातके इतिहासके एक विशिष्ट अभ्यासी, साक्षर श्रीदुर्गाशंकर केवलराम शास्त्रीको वह कार्य सौपा गया। यह जान कर हमने शास्त्रीजीको हमारे मूलके छपे हुए उक्त उन दो प्रकाशोके एडवान्स फार्म भी उनके उपयोगके लिये भेज दिये । शास्त्रीजीने यथाशक्ति परिश्रम कर, पहले ग्रन्थका मूल भाग तैयार कर उसे प्रकट करवाया और फिर उसका शुद्ध गुजराती भाषान्तर, कितनीक ऐतिहासिक टीका-टिप्पणियों के साथ संपादित कर, उक्त सभाकी ही औरसे प्रकाशित कराया। ४. प्रवन्धचिन्तामणिका हमारा प्रकाशन । जेलनिवाससे मुक्त होने पर कैसे दानवीर बाबू श्री बहादुरसिंहजीकी प्रियकर प्रेरणासे हमारा जाना शान्ति- निकेतन- विश्वभारतीमें हुआ और वहाँ पर रहते हुए कैसे इस 'सिंघी जैन ग्रन्थमाला' के प्रकाशनका कार्य प्रारंभ किया गया- इत्यादि बातें हमने, संक्षेपमें, इसके पहले भागमें उल्लिखित कर दी हैं जिनको यहाँ पर दुहरानेकी आवश्यकता नहीं है।
मास्ताविक यकश्य [४ . उक्त गतिमे फॉस् समाझी ओरसे हम प्रयका, गुजराती भाषातर समेत, प्रकाशन होना चार था, तर भी हमारे मनमें इस प्रकाशनको यह जो पूर्व कल्पना थी और इसके लिये जो साधन-सामग्री हमने बोसों पम उपहा फरनी शुरू की थी, उसका गयाट कर, हमने अपने उसी ढगसे, डम प्रयका पुन सपादन करना प्रारम्भ किया । और कि इसका गुजराती भाषा तर, हमारे साक्षरमित्र श्री दुर्गाशकर शाखी कर चुके है, इमरिये हमने इसका हिन्दी भाषान्तर प्रफ्ट फरनेका मनोरय किया । हिन्दी भाषा,यों भी सबसे अधिक व्यापक मारा और सिर अब तो यह राष्ट्रको सर्व प्रधान मापा बन रही है, इसलिये सिंधी जैन प्रथमालाके कार्यका लक्ष्य हिन्दीकी ओर ही अधिक राग गया है। प्रेजी और गुजराती एक्से अधिक मापातर होने पर भी हिदीमें इसका कोई भापासर आज तक नहीं हुआ था, और इसकी कमी पई हिदी भाषाभाषी विक्षननोंको बहुत असेंसे मटफ भी रही थी। हिन्दोके सर्गवासी प्रसिद्ध पण्डित और पुरातत्व विद्वाI, चद्रधर शर्मा गुटेरीने बढ़त वर्ष पहले हमसे अनुरोध किया था, और शायद नागरीप्रधारिणी पत्रिका एफ टेपमें उन्होंने टिगा भी था, कि इस प्रयका हिन्दी अनुवाद होना थापक है । बाशा हे गुटेरीजाको वर्गस्थित भामा नाज इसे देश फर प्रमन होगी। * ५. प्रस्तुत हिन्दी भापान्तर । पाटगाँस हायमें जो हिदी भापतर उपस्थित किया जा रहा है, इसका प्राथमिक कमा गर्रा, जय दम शासिनियरनमें ये सब (सन १९३२ में), यहाँ हिदी शिक्षापीटके विद्वान आचार्य और हमारे सय मित्र पं० श्री नारी प्रमादजी क्यिाने दिया था, जिसको हमने अपने दगमे यथेष्ट रूपमें सशोधित परिवर्तित पर मरीमान गप दिया है। इसमें समय है कि पिश पाटकोको इसमें काटी यही भाषाविषयफ मोटीका दुध मूग भिमा मासदे। हमारा प्रपन इस यानकी ओर रहा है कि मानों सफ हो, सरल और सबको सुबोध को और मिनी मामा नाम दिदी न दो उनको भी इसके समझने में कोई काटिनगई न दो मटिय दमने इसमें से शम्दोका बरा ही कम प्रयोग किया है कि जो म दिदीफा विशेष परिचय न गाया- सम्परधानी या गुजराती मामापी-जनोंको मिन्युल अपरिचित माइम दे। इस यो सात मी गोडी पुरसकोण और साम-बार । पाप यरे ये गये कार 3 मटा है। निवासास पाहार इसमें बहुत कम किया गया है। रचना यही मोशिपिटमी और पदी HिITRA | साटिये भागतरण मी दमें पदी पही, एके गुसार, गुप ए पाप गाने पर है। को दमने प्रार ari गणमारी पगार गा है। गुटमा दोई कफ दाम भी प्राप छापा और शादीANTRोई अधिकार या पाया पडाण गमारदा मही मफिन धन पा TT पदा, पाटको माधिक टि, रिमा लागि पदका HIMATE TRA माम दी, यहाँ उसे । Jो दूरपरेटमें समायरियामा Anirnar TI परिजित सामने दी गण RE 32 Premi का प्रारम १)२) ३)ोगा. 7 Ft गिरे , rra Pathaगि TREN TEArmersiमागहमने निक, कम गेम, प्रा an with UTARSE ARो हमरे मग ति - गुम है Tirt Trust .
चालू टाईपमें [ च] प्रवन्धचिन्तामणि मिलते हैं । इस पिछले प्रकारके पद्योंको हमने पीछेसे लिखे गये अर्थात् प्रक्षिप्त माना है; और बाकीको मौलिक । इन दोनों तरहके पद्योके लिये हमने दो प्रकारके क्रमांक दिये है । जो मौलिक हैं वे '१. २. ३.' इस प्रकारके चालू अंकोंसे सूचित किये गये हैं और जो प्रभिप्त हैं वे '[१]-[२]-[३]' इस प्रकार चोकौनी डबल ब्रैकेटवाले अंकोसे बताये गये हैं। पद्योंकी तरह, मूल ग्रन्थमें, कुछ गद्य प्रकरण-कण्डिकाये भी प्रक्षिप्त है, जिनको हमने अपनी उस मूलावृत्तिमें तो जुदा तरहके टाईपोंमें और ऐसे अथवा [ ] ऐसे ब्रैकेटोंके बीचमें मुद्रित की हैं । यहाँ, इस भाषान्तरमे वे कण्डिकायें जुदा टाईपोंमे न छाप कर, शीर्फ उनके ऊपर, ब्लेक टाईपमें ( ) ऐसे गोल ब्रैकेटमें, अथवा ] ऐसे चौकोनी ब्रैकेटमें, उसकी ज्ञापक पंक्तियाँ लिख कर, उल्लिखित कर दी हैं। (-देखो, पृष्ठ १६, २०, ४८, ४९ इत्यादि ।). इस ग्रन्थमे जहाँ-वहाँ, जो प्रसङ्गोचित पद्य उद्धृत किये गये हैं उनमेंसे कुछ तो ऐतिहासिक घटना बताने- वाले है और कुछ सुभापित स्वरूप हैं । इनमेंके कुछ पद्य द्विअर्थी अर्थात् श्लेपार्थक हैं जिनका स्वारस्य संस्कृत या प्राकृत भाषा-ही-में ठीक आस्वादित हो सकता है । हिन्दीमें उसका अर्थ ठीक अनूदित नहीं हो पाता । ऐसे पद्योंके अर्थक विषयमे जहाँ तक हो सका, तदन्तर्गत मुख्य भावार्थ बतलानेका ही प्रयत्न किया गया है। कोई कोई पद्य ऐसे भी दुरवबोध मालूम देते हैं जिनका तात्पर्य ठीक ठीक समझमे नहीं आता । ऐसे स्थानोंमें जो अर्थ दिये गये है वे शंकित ही समझे जायँ-जैसा कि पृ. ७७ आदि पर सूचित किया गया है। कहीं कहीं गद्य कथनमें भी ऐसी दुरववोधता और अस्पष्टार्थता प्रतीत होती है और उसका ठीक ठीक तात्पर्य नहीं जाना जा सकता-जैसा कि पृ. ९४ परकी टिप्पणीमें सूचित किया गया है। ग्रन्थकारन कहीं कहीं ऐसे अपरिचित शब्दोका प्रयोग किया है जो शुद्ध संस्कृतके न हो कर देश्य भाषाके हैं और जिनका अर्थ ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ऐसे शब्दोके दिये गये अर्थ भी सर्वथा निर्धान्त नहीं कहे जा सकते । इन सब शंकित स्थानों और अर्थोके विषयमें पाठक हमें कोई दोष न दें ऐसी विज्ञप्ति है। , जब यह भाषान्तर छपाना शुरू किया गया तब हमारी इच्छा थी, कि हम इसके साथ, इस ग्रन्थमे वर्णित विशेष विशेष ऐतिहासिक और भोगौलिक नामोंके बारेमें, अन्यान्य साधनोंद्वारा उपलब्ध या ज्ञात बातोंका परिचय करानेवाली विस्तृत टिप्पणियाँ दें; और इसमे जो कुछ पारिभाषिक शब्दसमूह और लोकोक्तिरूप वाक्य-विन्यास उपलब्ध होते हैं उनको स्फुट करनेवाली व्याख्यात्मक पंक्तियाँ भी लिखें । किन्तु, जब हमने कुछ ऐसी टिप्प णियाँ और पंक्तियाँ लिखनी प्रारंभ की तो उनका कलेवर इतना बढ़ता हुआ दिखाई देने लगा जो मूल ग्रन्थसे भी कहीं अधिक बढ जानेकी आशंका कराने लगा । और ये सब टिप्पणियाँ लिखनेका तो हमारा उत्कट लोभ है । क्यों कि इन्हीं टिप्पणियों द्वारा तो इस ग्रन्थका सारा महत्त्व प्रकट होनेवाला है । इसलिये फिर हमने यह विचार किया कि इन टिप्पणियो आदिका संकलनवाला एक पर्यालोचनात्मक पूरा भाग ही अलग निकाला जाय; जिससे भापान्तरवाला यह भाग अनपेक्षित रूपसे विस्तृत न हो; और जिनको केवल प्रबन्धचिन्तामणिका मूलगत ग्रन्थसार मात्र ही पढ़ना-समझना अपेक्षित हो उनको इसके पढ़नेमें कोई कठिनता प्रतीत न हो। इसीलिये हमने पृष्ठ ३, ११, १८ आदि पर जो टिप्पणियाँ दी है उनमें यह सूचित कर दिया है कि इन बातोंका विशेष विवेचन या ऊहापोह इसके अगले भागमें किया जायगा - इत्यादि । यह अगला भाग, पुरातनप्रवन्धसंग्रह नामक, मूल ग्रन्थके पूरकात्मक द्वितीय भागके, इसी तरहके , प्रास्ताविक वक्तव्य [छ हिन्दी भाषान्तरकै प्रकट होनेके वाद, (जो अब शीघ्र ही प्रेसमें जानेवाला है) प्रकट होगा-अर्यात् हमारी सकल्पित योजनाके अनुसार, यह इस प्रवधचिन्तामणका ५ वाँ भाग होगा। * ६. प्रवन्धचिन्तामणि वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंके विषय में कुछ स्वाभिप्राय ज्ञापन । इम प्रथके पदनेवाले पाठकोंको यह बात लक्ष्यों रखनी चाहिये कि- यद्यपि अय प्रमानतया ऐतिहासिक प्रपोका समहात्मक है, तथापि इसके सब-के-सत्र प्रबार ऐतिहासिक नहीं हैं । खास करके अन्तिम प्रकाशमें जो पुण्यसार, कर्मसार, वासना, कृपाणिका इत्यादि शीर्पक ५-७ प्राध है ये पौराणिक ढगके कथामक रूप है। उनमें ऐतिहासिकता खोज निकालना निरर्थक है । वाकीके अन्य बहुतसे-प्राय सर ही-ऐतिहासिक माने जा सकते हैं, पर इनमेंसे भी कुछ प्रबधोंमें वर्णित व्यक्तियोंके विषयमें, अभी तक इतिहासविदोंमें थोड़ा बहुत मतभेद अवश्य है। दृष्टान्तके तौरपर, प्रथम प्रकाशमें प्रारम-ही-में दिये गये विक्रमार्क राजाके व्यक्ति के विषयों विद्वानोंमें अमी तक कोई एक निर्णयामक विचार स्थिर नहीं हो पाया । वह राजा कोन था और कर हो गया इसके विषयमें अभी तक अनेक तर्क-वितर्क किये जा रहे हैं । नामके अतिरिक्त प्रवध कथित और सर वात तो एक कहानीकी अपेक्षा अन्य कोई अधिक महत्व नहीं रखती। यही बात सातबाइनवाले प्राधिके विषयों कही जा सकती है। सातवाहन राजाका नाम यद्यपि शिलालेखों वगैरहमें उपलब्ध होता है, पर इस नामके कई राजा हो जानेसे और प्रपन्यमें वर्णित घटनाका कोई ऐतिहासिकत्व प्रतीत न होनेसे उसके विषयमें भी नामके अतिरिक्त प्राधकथित समूचा वर्णन कल्पनामक ही मानना चाहिए। सातवाहनके बाद भूयरानका जो प्रध है, उसके अस्तित्वक विषयका अमीतफ अन्य कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपङन्ध नहीं हुआ है, पर उमके ऐतिहासिक पुरुप होनेका सभर माना जा सकता है । इस तरह इन युछ दो चार नामोफी व्यक्तियोंको छोड़ कर, बाकी जितने भी नाम उम प्रथमें आये हुए हैं ये मा प्राय ऐतिहासिक पुरुष हैं। हाँ उनमेंसे कुछ कुछ व्यक्तियोंका समय, परस्पर एक दूसरेके साथ, इस तरह जोड दिया गया है जो भ्रमात्मक है । उदाहरण के तौरपर, मोज-भीमके वर्णनवाले दूसरे प्रकाशमें, धाराके परमार राजा मानदेयके साथ गास करके महाकवि वाण, मयूर, मानतुम और माघ आदिका जो परस्पर सम्बध और ममकाठीनत्य वर्णन किया गया है यह सर्वया भ्रान्त और निराधार है । प्रयकारफे पूर्णता और प्रसिद्ध शिक्षा प्रभापत्र सरिने, अपने प्रभायफचरित्रमें, इन व्यक्तियोंका वर्णन और ही राजाओं के समयमें दिया है और यह पुऊ प्रमाणभूत भी सिर हो । तर किर न माइम मेरुतुम मूरिने किम आधार पर, ऐमा प्रान्तिपूर्ण यह वर्णन सपो म मायके मधमें प्रथित कर ढाटा दे, सो ममझ नहीं आ । भोजप्रायकी ये बहुतसी बातें फन्पशास्त्र और टोफकथायें जैसी प्रतीत होती है । प्रयकारने ये बातें किमी पुरातन प्राध आदि आधार पर रिमाया किमीके मुसमे मुन फर टिगी है इसके जाननेका कोई साधन अभीतक मान नहीं हुआ। मिरान और पुपारपारके समपक जितने वर्गन अधित है ये प्राप मर-मर ऐतिहासिक और AIR । उनके पटनाक्रमों पुर आगेगी पनफा समर दो सफा है पर उनमेंका कोई वर्णन मर्पया निट हो देमा नदी माना जा सरमा । मेरा परिके 3 माप, निशामिक रिसे, जो मबसे अधिक विशेष महरका उद्वेग पापा गपा दे - .
ज] प्रवन्धचिन्तामणि चह है अणहिलपुरके राजाओंक समयका कालक्रम-ज्ञापक निश्चित निर्देश । अणहिलपुरके राज्यसिंहासन पर, कौन राजा कत्र गद्दीपर बैठा और उसने कितने वर्ष राज्य किया इसका जो उल्लेख इस ग्रन्यमें किया गया है वैसा उल्लेख, पूर्वके अन्य किसी ग्रन्थमे नहीं मिलता । यद्यपि इस उल्लेखमें चावडा (चापोत्कट) वंशके जो संवत्सर निर्दिष्ट किये गये हैं उनकी निश्चितिके निर्णायक और समर्थक अन्य कोई वैसे प्रमाण अभीतक उपलब्ध नहीं हो पाये, तथापि उनके वावक भी वैसे कोई प्रमाण अभीतक उपस्थित नहीं हुए। और चालुक्य वंशके राजाओंके राज्यकालकी जो संवत्सरावलि इसमें दी गई है वह तो शिलालेख आदि अन्यान्य अनेक प्रमाणोंसे प्रायः सर्वधा निर्धान्त सिद्ध हो चुकी है । इसलिये इसमे दी गई यह राजसंवत्सरावलि बडे ही महत्त्वकी ओर एक अद्वितीय ऐतिह्य वस्तु सावित हुई है। ७. प्रवन्धचिन्तामणिकी रचना कब और क्यों की गई। मेरुतुङ्ग सूरिने यह ग्रन्थ कब और कहां बनाया इसका उल्लेख उन्होंने अन्य के अन्तमें स्पष्ट कर ही दिया है । इस उल्लेखसे ज्ञात होता है, कि वि० सं० १३६१ में, काठियावाडके वर्तमान वढवान शहरमें उन्होंने इस ग्रन्थको पूर्ण किया । यह वह समय है, जब गुजरात के स्वाधीनत्व और स्वराज्यका सर्वनाश हुआ और विधर्मी यवनराज्य और पारवश्यका प्रादुर्भाव हुआ। मेरुतुङ्गके सामने ही अणहिलपुरका वह चौलुक्य वंश नामशेष हुआ, जिसके स्थापक पुरुपसे ले कर अन्तिम पुरुषके समय तककी गुजरात के राजकीय, सामाजिक और धार्मिक जीवनकी कुछ विशिष्ट स्मृतियां लिपिबद्ध करनेका उन्होंने इस ग्रन्थमें मौलिक प्रयत्न किया है । मेरुतुङ्ग सूरिके विचारसे, गुजरातमें - अणहिलपुर पाटनमें - वीरप्रकृति राजा वीरधवल और उसके विचक्षण मंत्री वस्तुपाल-तेजपालके बाद और कोई वैसा स्मरणीय पुरुष पैदा नहीं हुआ जिसका नामनिर्देश वे अपने इस ग्रन्थमें करते । यद्यपि वरिधवलके बाद उसके वंशजोने प्रायः ५०-५५ वर्षतक अणहिलपुरमें राज्यसिंहासनका उपभोग किया, पर उनका शासन प्रायः निप्प्राण और निस्तेजसा ही रहा । मेरुतुङ्ग सूरिको उस शासनकाल में कोई महत्व नहीं मालूम दिया और इसलिये उन्होंने उस समयकी किसी भी घटनाका उल्लेख अपने ग्रन्थमें नहीं आने दिया । उनके अभिप्रायमें, वीरधवल और वस्तुपाल-तेजपालके साथ गुजरातके ज्योतिर्मय जीवनकी समाप्ति हो गई। चाहे मेरुतुङ्ग सूरिको, इतिहासके आत्माका दिव्य दर्शन हुआ हो या न हुआ हो, पर इसमे कोई शक नहीं कि उनका यह अन्यलेखन, सचमुच, इतिहासदर्शनकी एक अस्पष्ट पर सूक्ष्म कलाके आभासका उत्तम सूचन करता है । जब हम गुजरातके भूतकालीन राष्ट्रीय जीवन पर एक गहरी दृष्टि डालते हैं, तब हमें यह बहुत स्पष्टताके साथ दिखाई देता है, कि यथार्थ ही, गुजरातके भाग्याकाशमें वीरधवल और वस्तुपाल-तेजपालके वाद, अब तक, वैसा कोई ज्योतिर्धर तेजस्वी तारक उदित नहीं हुआ। और जब तक गुजरातमें पुनः वैसा पूर्ण स्वराज्य स्थापित नहीं हो पाता तब तक हम इस अन्तर्दाहक अनुभूतिको मिटा नहीं सकते । मेरुतुङ्ग सूरिने इस ग्रन्थकी रचना किस लिये की-यह भी उन्होने ग्रन्थके प्रारम्भमे और अन्तमें, संक्षिप्त रूपसे सूचित किया है । वे कहते हैं कि-" वारंवार सुनी जानेके कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानोंके मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पाती। इसलिये मैं निकटवर्ती सत्पुरुपोंके वृत्तान्तोसे [ संकलित ऐसे ] इस प्रवन्ध- चिन्तामणि ग्रन्थकी रचना कर रहा हूं।" (-देखो पृ० २, पद्य ६ का अनुवाद ). इस कथनके भावको स्पष्ट करनेके लिये, इसके नीचे एक टिप्पणी दे कर हमने उसमे कहा है कि-" पुराने जमानेमें व्याख्यानकार और कथाकार प्रायः सदा उन्हीं कथा-वार्ताओको सुनाया करते थे जो महाभारत और रामायण आदि पुराण ग्रन्थोमें [ ए प्रास्ताविक वक्तव्य [झ पसिद्ध हैं। एक की-एक ही कथा वारपार सुननेमें विज्ञ मनुष्योंके मनको विशेष आनन्द नहीं आता यह सर्मानुभव सिद्ध बात है । मेरुतुग सूरिने इस बातका विचार कर, लोगोंका मनरजन करनेके लिये, कथाकारोंको, कुछ नई सामग्री प्राप्त हो इस उद्देशसे, कितनेएक इतिहास वृत्तातोंसे अलकृत ऐसे इस प्रबन्धचितामणि नामक अन्यकी रचना की। प्रथके अतमें वे, इस रचनाकें करनेमें एक दूसरा भी कारण बतलाते हुए लिखते हैं कि-" बहुश्रुत और गुणवान ऐसे वृद्धजनोंकी प्राप्ति प्राय दुर्लभ हो रही है और शिष्योंगे भी प्रतिभाका वैसा योग न होनेसे शास्त्र प्राय नष्ट हो रहे हैं । इस कारणसे तथा भागी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषोंके प्रबधोंका सघटन रूप यह प्रथ मैंने बनाया है।" मेरुतुङ्ग सूरिका यह कपन बहुत अनुभवपूर्ण और भारि परिस्थितिका घोतक है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि मेरुतुम सूरि इस प्रथकी रचना द्वारा, इन पुरातन ऐतिह्य श्रुतियोंका, यह विशिष्ट सग्रह न कर जाते तो, आज हमें, उस जमानेको इन इनीगिनी बातोंके जाननेका मी और कोई सावन उपलब्ध नहीं होता। यह सब-किसीको मजूर करना पडेगा कि जेन धर्मके उस मध्यकालीन इतिहासकी जो अनेकानेक विश्वसनीय और प्रमाणभूत बातें, इस प्रथमें उपलब्ध होती हैं और उसके साथ ही गुजरातके समूचे राष्ट्रीय इतिहासकी भी बहुत आधारभूत जो कथायें इसमें दृष्टिगोचर होती है, वैसी और किसी प्रथमें विद्यमान नहीं हैं। ८. प्रबन्धचिन्तामणिके उल्लेखों पर कुछ विद्वानोंके मिय्या आक्षेप । कुछ कुछ विद्वानोंका खयाल है कि-प्रथकार जैनधर्मी होनेसे, उसने इस प्रथमें अपने धर्मका प्रभार बतलानेकी दृष्टिसे, बहुत कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कथन किया है, और उसके साथ अन्य धर्मकी-खास करके शैनधर्म और ब्राह्मण सप्रदायकी- लघुता बतानेका भी प्रयत्न किया है। इस प्रथके उक्त इग्रेजी अनुवादक मि टॉनीने अपनी प्रस्तावनामें, इस बारेमें लिखा है कि- 'जिस तरह, एक्झीटर स्ट्रीटके एक छप्परके नीचे के कोनेमें बैठ कर, पार्लियामेंटके समाषणोंको लेखबद्ध करते समय, डॉ० होनसन् इस बातकी पूरी सावचेती रखता था कि होगके प्रतिपक्षी उसमेंसे किसी तरहका कोई लाभ न उठा पावे '-इसी तरह सभी शफास्पद स्थानोंमें, यह अमर्पशील जैन प्रथकार, स्पष्ट रूपसे महानीरके धर्मके दृढ श्रद्धालु अनुयायियों ( अर्थात् जेनों) के पक्षकी ओर झुकता है, और जैन लोक, शैयोंकी तुलनामें कहीं नीचे न दिखाई दें इसकी सारधानी रखता है।' इत्यादि । इसमें कोई शक नहीं कि- प्रथमार जैन धर्मका एक विद्वान् धर्माचार्य है और इस प्रयझी रचनामें उसका प्रधान उद्देश जैन धर्मकी पुरातन महत्ता ओर गौरव गाथाको, कालके कुटिल और प्रबल प्रवाहके कारण नष्ट होनेसे बचा रखनेका है । अतएव वह इसमें अपने धर्मका उत्कर्ष बतानेवाली श्रुतियों और उक्तियोंका यथेष्ट उपयोग करे, यह स्वाभाविक ही है । उस पुराने जमानेमें, जब धार्मिक वाद-विवादकी वटी प्रतिष्ठा थी और उसका पूरा जोरदार प्रचार था, एच सभी धर्मों के और सप्रदायोंके अग्रणी विद्वान् गण अपनी अपनी विद्याका प्रभार और पराक्रम बतलानेके लिये, राजसभाओंमें, नामी पहलवानोंके मुष्टि-प्रहारोंकी नाई, वाक्प्र- हारोंकी बड़ी सरत कुम्ती किया करते थे, तर उन विद्वान् प्रयकारोंकी तद्विषयक रचनाओंमें, ऐसी अमर्पशील मारना और लेखन-शैलीका दृष्टिगोचर होना नितात स्वाभाविक ही है । केवल जैन प्रयकार ही इसमें अधिक उल्लेखनीय है सो वात नहीं है । ससारके सभी धर्मों, सादापों, मतों और मतव्योंके लेखक इससे मुक्त नहीं है। मेरुतुन सूरि भी उन्हीं का एक स्वर्मप्रिय रेखक है, अत उसके लेसमें, अपने धर्मको नीचा दिमाने- . .
ज] प्रवन्धचिन्तामणि वाली किसी उक्तिके न आने देनेकी सावचेतीका रखना, उसका कर्तव्य है । ब्राह्मण और शैव ग्रन्थकारोंने भी वैसा ही किया है। मुसलमान और ईसाई इतिहास-लेखकोंने भी वैसा ही किया है - और अब भी सब वैसा ही करते रहते है । इसलिये इसमें जैनधर्मके महत्त्वके प्रतिपादनका होना कोई खास दूषण नहीं है । रही बात अति- शयोक्तिकी-सो विशुद्ध इतिहासकी दृष्टिसे किसी भी प्रकारकी अतिशयोक्ति अवश्य ही आलोचनीय है और उसकी प्रामाणिकता विचारणीय है । पर जैसा कि हमने पहले ही सूचित कर दिया है, यह ग्रन्थ कोई विशुद्धं इतिहास ग्रन्थ नहीं है । यह तो कुछ पुरातन प्रकीर्ण पोथियोंमें यत्र-तत्र लिखित और कुछ कुछ वृद्ध जनोंके मुखसे यथा-तथा श्रुत ऐसी इतिहासविषयक कथा-वार्ताओं का एकत्र संकलनवाला एक संग्रह मात्र है। अत: इसमेंकी कुछ उक्तियाँ अथवा घटनाएँ, विशुद्ध इतिहासकी दृष्टिसे, यदि भ्रान्तिपूर्ण, अतिशयोक्तिपूर्ण अथवा निर्मूलप्राय भी सिद्ध हो तो उसमे कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । और खुद ग्रन्थकारको भी इस विषयमें कुछ आशंका हुई है, कि उनके इस संकलनमें, विद्वानोंको कुछ बातें संदिग्ध या भिन्नभाववाली मालूम दें । इसलिये उन्होंने ग्रन्थारंभमें यह बात भी इस तरह कह दी है कि-" यद्यपि विद्वानों द्वारा अपनी बुद्धि [ संकलना] से कहे गये प्रबन्ध [ कुछ कुछ ] भिन्न भिन्न भावोंवाले अवश्य होते हैं, तथापि इस ग्रन्यकी रचना सुसंप्रदाय ( योग्य परंपरा) के आधार पर की गई है। इसलिये चतुर जनोको [ इसके विपयमें ] वैसी चर्चा न करनी चाहिए। इस कथनको स्पष्ट करनेके इरादेसे इसके नीचे जो टिप्पणी हमने दी है उसमें लिखा है कि - मेरुतुङ्ग सूरिने इस ग्रन्थकी संकलना करने में कुछ तो पुराने प्रबन्ध-ग्रन्थोंकी सहायता ली और कुछ परंपरासे चली आती हुई मौखिक बातोका आधार लिया । इस प्रकार परंपरासे सुनी हुई बातोंका परस्पर मिलान करने में विद्वानोको अवश्य ही उनमे कुछ-न-कुछ भिन्न भाव मालूम पडता रहता है । मेरुतुङ्ग सूरिको भी अपनी इस रचनामें कहीं कहीं ऐसा भिन्न भाव मालूम हुआ है । इस भिन्न भावके निराकरण करनेका या खुलासा करनेका उनके पास न तो कोई साधन था और न कोई उनको उसकी वैसी आवश्यकता थी । उन्होंने सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त समझा कि हमने जो बातें इस ग्रन्थमें संकलित की हैं वे एक सुसंप्रदाय द्वारा प्राप्त की हुई है। इसलिये इनके तथ्यातथ्यके बारेमें चतुर मनुष्योंको चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं । प्रबन्धचिन्तामणिकी कुछ बातें ऐतिहासिक दृष्टिसे सर्वथा भ्रान्त भी मालूम होती है लेकिन मेरुतुङ्ग सूरि उनके लिये निष्पक्ष और निराग्रह हैं।" यद्यपि यह बात ठीक है कि मेरुतुङ्ग सूरिका मुख्य लक्ष्य जैन धर्मके महत्त्वकी ओर रहा है; तथापि उन्होने अन्य धर्मांकी निन्दा करने की दृष्टि से या अन्य धार्मिक जनोंकी हीनता बतानेकी भावनासे इसमें कुछ भी नहीं लिखा है । वल्कि प्रसङ्गोपात्त अन्य-धर्म-विषयक कुछ महत्त्वकी बातें भी उन्होंने उसी आदरकी दृष्टिसे लिखी है, जैसी अपने धर्मकी लिखी है । उदाहरणके तौरपर, मूलराजके प्रबन्धमें जो शिवपूजाका प्रभाव और शैवाचार्य कंथडी नामक तपस्वीके तपकी महिमाका वर्णन किया गया है, वह सर्वथा वैसा ही आदरयुक्त पंक्तियोंमें लिखा गया है, जैसा जिनपूजा या किसी जैन आचार्यके वारेमे लिखा गया हो । इसी तरह सिद्धराजकी माता मयणल्लाकी शिवभक्तिके विषयमे जो उल्लेख किया गया है वह भी वैसा ही निष्पक्ष भावसे भरा हुआ है । अगर मेरुतुङ्ग सूरिको शिवधर्मकी महत्ताके बारेमे अनादर होता तो वे इन उल्लेखोंको इसमें स्थान ही क्यो देते । मुख्यतया जैन श्रोताओ (श्रावको ) के सम्मुख, व्याख्यान सभामें, जैन साधुओं-यतियोके वाचने निमित्त, इस ग्रन्थकी रचना की गई है। इसलिये इसमे जैन व्यक्तियोका और उनके कार्यकलापोंका ही अधिक वर्णन होना स्वाभाविक है । पर, उसके साथ ही मेरुतुग सूरिको, गुजरातके सर्व सामान्य प्रजाकीय और राष्ट्रीय जीवनकी उन्नायक इतर व्यक्तियो और उनकी कार्य-स्मृतियोके तरफ भी अनुराग है, और इसलिये उन्होंने अपने इस संग्रहमें, उन इतर व्यक्तियोकी जीवन-स्मृतियोके भी, यथाश्रुत और यथाज्ञात वृत्तान्तोको, जहाँ-वहाँ ग्रथित .
प्रास्ताविक वक्तव्य [2 । कर लेने में कोई सकोच नहीं किया । भोज-भीमप्रवन्धकी बहुतसी स्मृतियाँ इसी दृष्टिसे सगृहीत की गई हैं। सिद्धराजके प्रबन्धकी भी बहुतसी बातें इसी आशयसे लिखी गई हैं । * ९. मेस्तुग सूरिकी इतिहास-प्रियता। माइम देता है कि मेरुतुग सूरिको ऐतिहासिक बातोंमें कुछ अधिक रस था और ऐतिहासिक तथ्यपर पक्षपात था। इसलिये उन्होंने सिद्धराज और कुमारपालके जीवन विषयकी वैसी भी कुछ तथ्यभूत वातें उल्लिखित कर दी हैं जिसमे उन व्यक्तियोंके, कुछ चरित्र-दुर्बलता और स्वभाव-कृपणता आदि दोपोंकी भी, हमको झाकी हो जाती है । हेमचन्द्र सूरि आदि विद्वानोंने अपनी रचनाओंमें ऐसे दोपोंका बिल्कुल भी आभास नहीं आने दिया है। * . . इस विषयमें, मेरुतुङ्ग सूरिने सबसे अधिक महत्वको जो सत्य ऐतिहासिक वात लिख डाली है वह है मत्रीवर वस्तुपाल-तेजपालकी माता कुमारदेवी पुनर्लग्नकी । तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक नीतिकी भाव- नाकी दृष्टिसे कुमारदेनीका वह पुनर्लग्न अवश्य निन्दनीय और हीन कार्य ममझा जाता था। वैसे कार्यको समाज वडी हलकी दृष्टि से देखता था और उस कार्यके करनेपाली व्यक्तिको वडे कठोर भारसे समाजसे वहिप्कृत और तिरस्कृत किये करता था। यह तो उस एक-अद्वितीय भाग्यवती कुमारदेवीका लोकोत्तर पुण्यकर्म ही था, जिसके प्रभावसे उसकी कुक्षीमें ऐसे प्रभावशाली पुत्ररत्न पैदा हुए जिनकी समता रखनेवाले पुरुष, सारे ससारके इतिहासमें भी इने-गिने ही दिखाई देंगे। इन पुत्र-पुङ्गानों के प्रतापके कारण कुमारदेवी तत्कालीन समाजमें बड़ी भारी प्रतिष्ठाकी पुण्यभूमि बन सकी और सारे देशके जनोंस बडी श्रद्धाके साथ पूजी और प्रशसी गई । बडे-से-बडे धर्माचार्योने, बडे-से-बडे कनियोंने, वडे-से-बडे राष्ट्रपुरुषोंने उसकी प्रतिमाकी पूजा की और उसके नामकी स्तुतियाँ गाई । पर उसके जीवनका वह महत् प्रेममार्य, जिसके वश हो कर उसने, अणहिलपुरके एक बड़े खानदानके प्राग्लाट कुटुबके पराक्रमी युवक ठकुर आसराजके साथ पुनर्लग्न किया था, उसकी स्मृतिका किंचित् आभास भी उन समकालीन कनियों और प्रथकरोंने अपनी कृतियोंमें न आने दिया । क्यों कि वह कार्य समाज और धर्मको नापसन्द था । उसकी स्मृतिको जीवित रखना अप्रिय था। श्रद्धेय और पूजनीय माता कुमारदेवी के पुण्य जीवनकी उस मानी गई कृष्णकलाका सूचन करना उन कवियोंके लिये वडा पातक कार्य था। महामात्य वस्तुपाल-तेजपाल जैसे जगत्श्रेष्ठ, पुण्यप्रभावक और धर्मावतार नरशिरोमाण विधवा-विवाहसे प्रसूत पुनरत्न थे, इस विचारको स्मृतिमें लाना भी उन प्रयकारों के लिये, शायद बडा दु ग्वद और दुर्विचारक कर्तव्य था । इसलिये उन्होंने अपनी कृतियोंमें इसकी कहीं भी स्मृति नहीं होने दी। उन्हींफा अनुगमन करनेवाले, वस्तुपाल-तेजपाल के अयान्य पिछले प्रसिद्ध चरित्रकारोंने भी उस बातका कहीं सूचन नहीं होने दिया। परतु मेरुतुगने अपने ग्रन्थमें इस बातका बहुत ही सक्षेपमें पर बडे स्पष्ट रूपसे उल्लेख कर दिया । ऐसा ही एक दूसरा स्पष्ट उल्लेख उन्होंने राणा नीरपवलकी माताके विषयमें भी किया है, जो भी इसी तरहका एक सामाजिक अपवादका ज्ञापक हो कर भी ऐतिहासिक तथ्य था । इन उल्लेखोंसे मेरुतुङ्ग सूरिकी सच्ची इतिहास-प्रियताका हमको अच्छा आभास हो जाता है। वाकी उस समयके प्रथकारों के विषयमें, इसमे अधिक विशुद्ध इतिहास-दृष्टिकी अपेक्षाकी कल्पना करना और उनमें धार्मिक या साप्रदायिक भावनाके पोपक विचारोंका दोपारोप कर, उनके अबाधित कयनोंको भी उपेक्षा- की दृष्टिसे देखना, एक प्रकारको निजकी ऐतिहासिक दृष्टिकी विपर्यासताझा बोध कराना है। . . * ठ] प्रवन्धचिन्तामणि १०. ग्रन्थकारके जीवनके विषयमें। ग्रन्थकार मेरुतुङ्ग सूरिके जीवन आदिके विषयमें कोई विशेष वस्तु ज्ञात नहीं होती । ये नागेन्द्र गच्छके आचार्य थे और इनके गुरुका नाम चन्द्रप्रभ सूरि था । धर्मदेव नामक विद्वान् - जो शायद इनके वृद्ध गुरुभ्राता या अन्य कोई गच्छवासी स्थविर साधु-पुरुष थे- उनके पाससे इन्होंने, इस ग्रन्थकी रचनामें बहुत कुछ ऐतिह्य सामग्री प्राप्त की थी । गुणचन्द्र नामक इनका प्रधान शिष्य था जिसने इस ग्रन्थकी पहली संपूर्ण प्रातीलपि लिख कर तैयार की थी। इनकी एक और ग्रन्थकृति उपलब्ध होती है जिसका नाम महापुरुषचरित है । इस ग्रन्थमें ऋषभदेव, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर-इस प्रकार पाँच तीर्थंकरोंका संक्षिप्त चरित वर्णन है। इसके अतिरिक्त और कोई इनकी कृति हमें अभतिक ज्ञात नहीं हुई। ७ अन्तमें हम आशा करते हैं कि हिन्दी-भाषा-भाषी जिज्ञासु जन, इस ग्रन्थके वाचन-मननसे अपने प्राचीन इतिहास विषयक ज्ञानमें उचित वृद्धि करेंगे; और खुद ग्रन्थकारने, ग्रन्थान्तमें जो नम्र निवेदन किया है उसकी तरफ लक्ष्य रखनेकी सूचना कर, उसी कथनको उद्धृत करते हुए, हम अपना यह प्रास्ताविक वक्तव्य समाप्त करते है। यथाश्रुतं सङ्कलितः प्रवन्धैर्ग्रन्थो मया मन्दधियापि यत्नात् । मात्सर्यमुत्सार्य सुधीभिरेष प्रज्ञोधुरैरून्नतिमेव. नैयः ।। मार्गशीर्षपूर्णिमा, वि० सं० १९९७ भारतीय विद्या भवन आन्ध्रगिरि ( अन्धेरी), बम्बई. -जिन विजय श्रीमेरुतुझाचार्यविरचित प्रबन्धचिन्तामणि ॥ॐ नमः सर्वज्ञाय ॥ श्रीनाभिभूार्जिनः पातु परमेष्ठी भवान्तकृत् । श्रीभारत्योश्चतुरिमुचित यच्चतुर्मुखी ॥ १ ॥ नृणामुपलतुल्याना यस्य द्रावकरः करः। ध्यायामि त कलावन्त गुरुं चन्द्रमभ प्रभुम् ॥ २॥ गुम्फान् विधूय विविधान् सुखेवाधाय धीमताम् । श्रीमेस्तुगस्तद्धवन्धाद् ग्रन्थ तनोत्यमुम् ॥३॥ रत्नाकरात् सद्गुरुसम्पदायात् प्रवन्धचिन्तामणिमुद्दिधीपर्यो । श्रीधर्मदेवः शतधोदितेतिवृत्तैश्च साहाय्यपिव व्यघत्त ॥४॥ श्रीगुणचन्द्रगणेशः मनन्धचिन्तामणि नव ग्रन्थम् । भारतमिवाभिराम प्रथमादर्शन दर्शितवान् ।। ५ ।। भृश श्रुतत्वान्न कथाः पुराणाः मीणन्ति चेतांसि तथा युधानाम् । वृत्तस्तदासनसता प्रबन्धचिन्तामणिग्रन्थमह तनोमि ॥ ६॥ बुधैः प्रबन्धाः स्वधियोच्यमाना भवन्त्यवश्य यदि भिन्नभावाः । ग्रन्ये तथाप्यत्र सुसम्प्रदायाद् दृन्धे न चर्चा चतुरैर्विधेया ॥७॥ ॥ॐ सर्वज्ञको नमस्कार हो । जिनकी चतुर्मुखी ( चार मुख ) लक्ष्मी और सरस्वतीका उचित द्वार है, और जो भरका अन्त करनेवाले हैं ऐसे श्री नाभि भू, परमेष्ठी जिन (पभ नाथ ) रक्षा करें' ॥ १ ॥ उस कलागार प्रभु चन्द्रप्रभ नामक गुरुका मैं ध्यान करता हू जिनका कर ( हाथ, किरण) पत्थरके समान मनुष्योंको भी द्ररित करनेवाला है ॥२॥ १ इस कमें प्रयकारने ब्रह्मा और जिनदेव अपम नाथ की एक साथ स्तुति की है । ब्रह्माके चार मुरा होनेसे ये चतुर्मुसके नामसे प्रसिद्ध है। जैन शास्त्रोंमें वणी है कि भगवान् ऋपमदेय जर धर्मोपदेश देते थे तब वे भी श्रोताओंगे चार मुसवाले दिगाह देते थे । इस लिये जिन भगरानको मी चतुर्मुसका विशेषण दिया जाता है । ब्रह्मा भी परमेष्ठी पदसे प्रसिद हैं और जिन भगगर भी परमेष्ठी कहराते हैं । ब्रह्मा विष्णुके नाभिरमलसे पैदा हुए ऐसी पुराणों में प्रसिद्धि है इस लिये वे नामिभू कहे जाते हैं और निनदेव ऋपभनाथके पिवार नाम ना मिराज था इस लिये ये भी नाभिभू कहे जात हैं। २ इस भयेक प्रयकारने अपने गुरुको नमस्कार किया है जिनका नाम चद्रप्रमथा | चन्द्रमम शम्दका लेपाथ करते हुए गुरुकी तुलना चन्द्रमाके साथ यी है। चन्द्रमा अपनी १६ फ्लाओं के कारण कन्गरन्त कहलाता है, प्रयकारके गुरु भी अनेक विद्या-कलाओंसे अरक्त होनेके कारण पलान्त थे । चन्द्रमारे कर याने विरण चद्रकान्त मणिरो-जो एक प्रकारका पत्पर ही है-द्रषित (जलरिन्दु युक्त) परते हैं, येम ही चन्द्रप्रम गुरुके कर याने हाय यदि पत्यरनुल्य मनुप्पके मस्तिफ ऊपर भी पडते है तो उसको भी वे द्ररित ( माद, योम-चित्त) मनाते हैं।
२] प्रवन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश विविध प्रकारके ग्रन्थों और प्रबन्धोंको छोड़ कर बुद्धिमानोंको सुखसे जिनका बोध हो सके इसलिये गद्यरचना द्वारा ही मैं मे रु तुंग इस ग्रन्थकी रचना करना चाहता हूं ॥ ३ ॥ रत्नाकर ( समुद्र ) समान सद्गुरु सम्प्रदायसे, जब मेरी इस प्रवंधरूप चिन्तामणि (रत्न) के उद्धार करनेकी इच्छा हुई तो श्री धर्मदेव ने सैकडो वार इतिहासकी बातें कह कहकर मानों मेरी सहायता की ॥४॥ जिस प्रकार म हा भा र त ग्रन्थका प्रथम आदर्श ( पहली नकल ) गणेश (गजाननने ) तैयार किया, उसी प्रकार इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक नये ग्रंथका प्रथम आदर्श गुण चन्द्र नामक गणेश (गच्छपति ) ने सुन्दर रितिसे तैयार किया" ॥ ५ ॥ वारंवार सुनी जानेके कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानोंके मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पातीं। इस लिये मैं निकटवर्ती सत्पुरुषोंके वृत्तान्तोसे [ संकलित ऐसे ] इस प्रबंधचिन्तामणि ग्रन्थकी रचना कर रहा हूं ॥६॥ यद्यपि विद्वानों द्वारा अपनी बुद्धि [ संकलना ] से कहे गये प्रबंध [ कुछ कुछ ] भिन्न भिन्न भावों वाले अवश्य होते हैं; तथापि इस ग्रंथकी रचना सुसम्प्रदाय ( योग्य परंपरा) के आधारपर की गई है। इसलिये चतुर जनोंको [ इसके विषयमें ] वैसी चर्चा न करनी चाहिये ॥ ७॥ ३ मे रुतुंग सू रिने इस ग्रंथकी रचना की उसके पूर्व, कुछ गद्य और कुछ पद्यमे, कुछ प्राकृत और कुछ संस्कृतमें, कुछ पुरातन अपभ्रंश और कुछ अर्वाचीन देश्य भाषामें, इस प्रकारके कई छोटे बड़े प्रबन्धात्मक ग्रन्थ विद्यमान थे। उन ग्रन्योमेसे अपनी मनोरुचिके अनुसार कितने एक विषय चुनकर मे रुतुंगने सरल संस्कृत गद्य रचना द्वारा इस ग्रन्थका संकलन किया। ४ ग्रन्थकार मेरुतुंगसूरिके धर्म देव नामक कोई वृद्ध गुरुभ्राता अथवा गुरुजन थे जिन्होंने समय समय पर इतिहासकी सैंकडो पुरानी बाते सुना सुनाकर इस ग्रन्यकी रचना सामग्रीमें यथेष्ट सहायता दी। इस लिये ग्रन्थकारने अपने गुरुके बाद उनका भी सम्मानपूर्वक इस श्लोक द्वारा स्मरण और उपकृत भाव प्रदर्शित किया है। ५ जैन ग्रन्थोंमें यति-मुनियोके समुदायको गण नामसे भी उल्लिखित किया जाता है। गणका नायक जो सूरि- आचार्य होता है उसे गणेश-गणपति-गणनायक-आदि शब्दोंसे सम्बोधित किया जाता है । प्रबन्धचिन्तामणिका प्रथम आदर्श तैयार करनेवाले गुणचन्द्र नामक गणी थे जो शायद मेरुतुंगसूरिके प्रधान शिष्य हो और उनके बाद उनके पट्टधर गणनायक बने हो । गणेश शब्दसे, ग्रंथकारने पुराण प्रसिद्ध देव गणपति (गजानन-विनायक) जिन्होने वेद व्यास कथित महाभारतकी प्रथम नकल की, उसके साथ यहां पर श्लेषार्थ कर अर्थ घटना बताई है। ६ पुराने जमानेमें व्याख्यानकार और कथाकार प्रायः सदा उन्हीं कथा-वार्ताओको सुनाया करते थे जो महाभारत और रामायण आदि पुराण ग्रन्थोंमे प्रसिद्ध हैं । एककी एकही कथा वारंवार सुनकर विज्ञ मनुष्योंके मनको विशेष आनन्द नहीं आता यह सर्वानुभव सिद्ध बात है। मेस्तुंगसूरिने इस बातका विचार कर, कथाकारोंको, लोगोका मनोरंजन करनेके लिए कुछ नई सामग्री प्राप्त हो इस उद्देश्यसे, कितने एक इतिहास प्रसिद्ध और निकट समयवर्ती श्रेष्ठ पुरुषोके ऐतिहासिक वृत्तान्तोंसे अलंकृत ऐसे इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक ग्रन्थकी रचना की । ग्रन्थकारका यह कथन खास ध्यान देने योग्य है। ७ मेरुतुंगसूरिने इस ग्रन्थकी संकलना करनेमें कुछ तो पुराने प्रबन्ध-ग्रन्योंकी सहायता ली और कुछ परंपरासे चली आती हुई मौखिक बातोंका आधार लिया। इस प्रकार परंपरासे सुनी हुई बातोका परस्पर मिलान करनेमें विद्वानोको अवश्य ही उनमें कुछ न कुछ भिन्नभाव मालूम पडता रहता है। मेस्तुंगसूरिको भी अपनी इस रचनामें और दूसरी अन्यकृत रचनामे कहीं कहीं ऐसा भिन्नभाव मालूम हुआ है। इस भिन्नभावका निराकरण करनेका या खुलासा करनेका उनके पास न तो कोई साधन था और न कोई उनको उसकी आवश्यकता थी। उन्होने सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त समझा कि- हमने जो बातें इस ग्रन्थमें संकलित की हैं वे एक सुसंप्रदाय द्वारा प्राप्त की हुई हैं । इस लिये इनके तथ्यातथ्यके बारेमें चतुर मनुष्योंको चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं । प्रबन्धचिन्तामणिकी कुछ बातें ऐतिहासिक दृष्टिसे सर्वथा भ्रान्त भी मालूम होती हैं लेकिन मेरुतुंगसूरि उनके लिये निष्पक्ष और निराग्रह है-यह बात इस श्लोकगत कथनसे सूचित होती है।
प्रकरण १ ] विक्रमार्कराजाका प्रवन्ध [३ १. विक्रमार्क राजाका प्रवन्ध । १ इस पृथ्वीतल पर विक्रमादित्य [ कालक्रमसे ] अन्तिम राजा होते हुए भी, अपने शौर्य औदार्य आदि गुणोंसे वह प्रथम और अद्वितीय राजा हुआ। श्रोताओंके कानोंमें अमृतकासा आसिंचन करनेवाला उस राजाका इतिवृत्त बहुत कुछ विस्तृत है । हम यहा पर, अथकी आदिमें उसीका सक्षेपमें कुछ वर्णन करते हैं * | १) वह इस प्रकार है -अवन्ति देश के सुप्रति ठान' नामक नगरमें असम साहसका एक मात्र निधि, दिव्य लक्षणों (चिहों) से लक्षित, सत्कर्म, पराक्रम इत्यादि गुणोंसे भरपूर ऐसा एक विक्रम नामक राजपूत ( राजपुत्र ) था । आजन्म दरिद्रतासे तग होता हुआ भी वह अति नीति-परायण था, सैंकड़ों उपाय करके भी जब धन नहीं प्राप्त कर सका तो एक बार भट्ट मात्र नामक मित्र के साथ रोहणपर्वत को चला । उसके निकटवर्ती प्रवर नामक नगरमें [ एक ] कुम्हारके घर विश्राम करके प्रात काल उस कुम्हारसे भट्टमात्र ने कुदाल मागा । उसने कहा-इस जगह खानके भीतर जाकर प्रात काल पुण्यात्मक नामका श्रवण करके, ललाटको हथेलीसे स्पर्श कर 'हा देव !' ऐसा कहकर चोट मारनेसे, दुर्भागी मनुष्यको भी अपनी प्राप्तिके अनुसार रत्न मिलते हैं । उस म दृ मात्रने कुम्हारसे इस वृत्तान्तको भली भाँति सुन लिया पर विक्रम से इस प्रकारकी दीनता करानेमें वह असमर्थ था उन साधनोंको साथ लेकर निकम जन उस स्थानमें कुदालका प्रहार करनेको उद्यत हुआ तो उस उसम उसने [ अकस्मात् ] निकमसे इस प्रकार कहा कि- अवन्ती से आए हुए किसी वैदेशिकसे घरका कुशल समाचार पूछने पर उसने आपकी माताका मरण बताया है !' इस सप्त वन-शूची (हीरा छेदनेकी सुई-हीराकणी ) के समान वचनको सुनकर विक्रमने हथेलीसे माथा ठोंककर . हा देव !' ऐसा कहा और कुदालको हायसे फेंक दिया । उस कुदालके अप्रभागसे फटी हुई जमीनमेंसे सवा लाख मूल्यका चमकता हुआ रत्न (हीरा ) प्रादुर्भूत हुआ। म मात्र उसे लेकर १ मध्यकालीन प्रबधकारोंकी यह मान्यता थी कि विक्रमादित्यके बाद उसके जैसा पराक्रमी, शूर, वीर, उदार चेता और कोई राजा नहीं हुआ । उसके पहले के युगमे यद्यपि पुराणप्रसिद्ध अनेक राजा हुए जो इन गुणोंसे यथेष्ट अलकृत थे, तथापि ये भी विक्रमके जैसे सपूर्ण आदर्श नृपति नहीं थे । इसलिये इन गुणोंकी दृष्टिसे विक्रम उन राजाओंमें भी सर्व प्रथम स्थान प्राप्त करता है और इसीलिये इस पद्यमे, प्रथकारने उसको कालनमसे अन्तिम होनेपर मी गुणक्रममें वह सर्व प्रथम था, ऐसा कहा है। प्रब धचिन्तामणिका ग्रेजी भाषामें जो अनुवाद टॉनी नामक इलेज विद्वान्ने क्यिा है, उसमें उसने अन्य इस शन्दका अर्थ अन्त्यज-हीन जातीय (of Lowest rank.) ऐसा किया है, लेकिन वह भ्रमात्मक है । दिनम हीन जातीय था ऐसा कहीं भी फोह उल्लेख नहीं मिलता । प्राघोंमें विस्मका कहीं तो रानपूत जातिके परमार रश में उत्पन होना लिखा है और कहीं हूण वश में, ये दोनों ही प्रसिद्ध राजवश है । इस विषयकी विशेष चर्चा हम अगले मागमें करेंगे। * इस प्रचिन्तामणिकी रचनारे पूर्व, विक्रमविषयक कई चरित्र और प्राय बने हुए विद्यमान थे। ये चरित्र प्रवध बहुत कुछ विस्तृत और विविध वणनवाले ये । उनमेंसे कुछ थोडेसे वर्णन, सज्ञेप करके, मेरुतुगपरिने यहापर अथित किये हैं। विक्रम विषयक इस विविध साहित्यका विशेष परिचय हम यथास्थान अगले अयमें लिखेंगे। २ यतमान माल्वेश माचीन नाम अवती या । ३ मार या याने अवन्तीमें सुप्रतिष्ठान नामक कोई नगरका उल्लेख कहीं नहीं मिलता । अवन्तीकी राजधानी प्राचीन काल ही से उजयिनी प्रख्यात है और विश्मकी राजधानी यही उजीयनी थी । इसलिये समन है कि प्रथकारने इसी उजयिनी को मुमति ठान-जिसका प्रतिष्ठान-स्थापन खूप दृढ़ है-इस विशेषणसे उलिसित किया हो । उजयिनी विशाल आदि और भी उपनाम थे, इसलिये यह भी समर है कि यह मुप्रति छान भी उसका एक उपनाम हो । दक्षिण अर्यान् महाराष्ट्र की पुरानी राजधानी प्रतिभान नगरी पी-जो वर्तमानमें निनाम राज्यमें गोदावरीके कॉठेपर पैठण नामक सबसे प्रसिद्ध है- उसकी प्रतिस्पधामें भी शायद उयिनीको मुप्रतिष्ठान नाम प्रदान किया गया हो।
, - ४] प्रवन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश विक्रम के साथ लौट आया । फिर उसके शोकरूपी शंकुकी शंकाको दूर करनेके लिये, भट्ट मात्र ने खानका वृत्तान्त बताते हुए, तत्काल ही उसकी माताका कुशल समाचार कहा । विक्रम ने इसे भट्ट मात्र की सहज लोलुपता समझकर उसके हाथसे रत्न छीन लिया, और फिर खानके पास पहुंचा और बोला- २. गरीबोंके दरिद्रतारूप घावको · भरनेवाले इस रोह ण गिरि को धिक्कार है जो [ इस प्रकार ] अर्थिजनों [ याचकों ] से 'हा दैव !' ऐसा कहलाकर फिर रत्न देता है। यह कह कर उसने सब लोगोंके सामने उस रत्नको वहीं फेंक दिया। फिर देशान्तर भ्रमण करता हुआ अवन्ती की सीमामें पहुँचा | वहां पर, नगारेकी मनोरम ध्वनि सुनकर और उसके कारणका वृत्तान्त जानकर उसका स्पर्श किया । फिर उस भट्ट मात्र के साथ वह राजमन्दिरमें आया। [ ज्योतिपीसे ] बिना पूछे हुए उसी मुहूर्तमें दिनभरके लिये मंत्रियोंने उसे राज-पदपर अभिषिक्त किया । उसने अपनी दूरदर्शितासे समझ लिया कि इस राज्यपर कोई प्रवल राक्षस या देवता क्रुद्ध होकर प्रतिदिन एक एक राजाका संहार करता है और राजाके अभाव में देशका विनाश करता है । इसलिये भक्ति या शक्तिसे उसका अनुनय करना उचित है। यह सोच, नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य आदि बनवाकर, सायंकाल चंद्रशाला (राजमहलका ऊपरी हिस्सा) में सब कुछ सजा कर रखा । रातकी आरती हो जानेके वाद, अंगरक्षकोसे भारशृंखलामें लटकते हुए पलँगपर अपने 'पट्ट-दुकूल आदिसे आच्छादित तकियाको रखवाकर, स्वयं प्रदीपच्छायामें--अर्थात् ऐसी जगहपर जहाँ प्रदीपका प्रकाश नहीं पड़ता था,-जाकर बैठ गया । हाथोमें तलवार धारण किये हुए, और धैर्यमें जिसने तीनों लोकको जीत लिया वैसा वह चारों ओर [ तीक्ष्ण दृष्टिसे ] देखता रहा । एकाएक घोर अर्द्धरात्रिको खिड़कीके रास्ते पहले धुआं उठा, फिर ज्वाला निकली और वादको साक्षात् प्रेतकी प्रतिमूर्तिके समान एक विकराल बेतालको उसने आते देखा | भूखसे उस वेतालका पेट फक हो रहा था, [ इसलिये पहले ] उसने खूब इच्छापूर्वक उन भोज्य द्रव्योंको खाया, फिर गंध द्रव्योंको शरीरमें लगाया और पान खाकर सन्तुष्ट होकर फिर वहीं पलँगपर वह बैठ गया और विक्रमादित्य से बोला-' अरे मनुष्य ! मेरा नाम अग्नि वे ताल है, देवराज (इन्द्र) के प्रतीहार रूपसे मैं प्रसिद्ध हूं। मैं प्रतिदिन एक एक राजाको मारता हूं। पर [ आज ] तुम्हारी इस भक्तिसे संतुष्ट होकर मैंने तुम्हें अभयदानपूर्वक यह राज्य दे दिया है। पर इतना भक्ष्य-भोज्य मुझे सदैव देना । इस प्रकार दोनोंमें तै होनेके बाद, कुछ काल वीतनेपर, विक्रम राजा ने [उससे ] अपनी आयु पूछी । तव वह यह कहकर चला गया कि-' मैं तो नहीं जानता पर स्वामी (इन्द्र ) से जानकर तुम्हें बताऊँगा । ' फिर दूसरी रातको वह आया और विक्रम से बोला कि-' इन्द्रने तुम्हारी आयु सौ सालकी बताई है।' राजाने अपने मित्रधर्मका अधिक आरोप करके इस प्रकार अनुरोध किया कि-'इन्द्रसे मेरी आयु सौ वर्षसे एक वर्ष अधिक या कम करा दो !' उसने यह अंगीकार किया और फिर दूसरे दिन आकर यह बात कही-' महेन्द्रके किये भी [ तुम्हारी आयु ] निन्यानवे या एक सौ एक वर्ष नहीं होगी।' इस निर्णयके जान लेनेपर, राजा दूसरे दिन उसके लिये भक्ष्य-भोज्य न बनवाकरके, लड़ाईके लिये सज्जित होकर रातमें तैयार रहा । वह वेताल भी यथारीति आकर उन भक्ष्य- भोज्योंको न पाकर क्रुद्ध हुआ और उसने राजा ऊपर आक्रमण किया । बड़ी देरतक उन दोनोंमें युद्ध होता १ प्राचीन कालमें यह प्रथा थी कि राज्यकी ओरसे किसी साहस या दुष्कर कार्यके करने-करवानेकी घोषणा जब कराई जाती थी, तब एक विशिष्ट राजपुरुष, कुछ अन्य राजकर्मचारियो-सैनिको आदिको साथ लेकर, नगरके प्रधान प्रधान राजमार्गोसे ढोल या नगारा बजवाता हुआ धूमता फिरता और मुख्य मुख्य स्थानोंपर खड़ा होकर जो कार्य करना-करवाना हो उसकी उद्घोषणा करता । जिस मनुष्यको वह कार्य करना अभीष्ट होता वह उस घोषणाके बाद उस ढोल या नगारेको अपना हाथ लगाता, जिससे वे राजकर्मचारी यह समझ लेते कि इस मनुष्यको यह कार्य करना सम्मत है। फिर उस मनुष्यको वे सम्मानके साथ प्रधान या राजाके पास ले जाते । -- प्रकरण २] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [५ . रहा। बादको पुण्यालके सहायसे राजाने उसे पृथ्वी तलपर पटक दिया, और उसकी छातीपर पैर रखकर कहा कि-' इष्ट देवताका स्मरण करो !' तर वह बोला कि- मैं तुम्हारे अद्भुत साहससे सतुष्ट हूँ। तुम जो करनेको कहो उस आदेशका पालन करनेवाला मैं अग्नि नामक बेताल तुम्हें सिद्ध हुआ।' ऐसा होनेपर उसका राज्य निष्कटक हुआ । इसी तरह अपने पराक्रमसे दिग्मण्डलको आक्रान्त करनेवाले उस राजाने छानवे प्रतिद्वन्द्वी राजाओंके राज्यको अपने अधिकारमें किया। ३. जगली हाथी, तुम्हारे शत्रुओंके [ उज्जड पड़े हुए ] घरोंकी स्फटिक निर्मित दीनालपर दूरसे अपनी परछाई देखकर, उसे प्रतिद्वद्वी हाथी समझकर, क्रोधसे आघात करता है । [उस आघातके कारण ] फिर जब उसका दाँत टूट जाता है तो उसे ही हथिनी समझकर धीरे धीरे साहस' के साथ उसका स्पर्श करता है। इस प्रकार, कालिदासा दि महाकनियों द्वारा की हुई स्तुति ( प्रशसा) से अलकृत होते हुए उसने चिरकाल तक विशाल साम्राज्यका उपभोग किया । . अब यहाँपर प्रसगसे महाकवि कालिदास की उत्पत्ति संक्षेपमें कहते हैं- २) अवन्ती नामक नगरीमें राजा विक्रमादित्य की लड़की प्रिय गुम जरी थी। वह अध्ययनके लिये वररुचि नामक पडितको समर्पण की गई । बुद्धिमती होनेके कारण सभी शास्त्रोंको उसने उस पडितसे कुछ ही दिनोंमें पढ़ लिया । यह पूर्ण यौवनावस्था प्राप्त कर चुकी थी, और निन्य अपने पिताकी सेवा करती थी। किसी समय, वसत कालमें दोपहरको-जन कि सूर्य सिरपर आगया था, वह खिड़कीके सामने एक सुखासन ( सोफा ) पर बेठी हुई थी, इसी समय उपायाय (वररुचि) रास्तेमें चलते हुए खिड़कीकी छायामें कुछ विश्राम लेने खडे रहे । कुमारीने उन्हें देखा और खून पके हुए आमके फलोंको दिखाया । उसने समझा कि ये ( उपाध्याय ) उन फलोंके लोलुप है, और बोली-' आपको ये फल ठडे रुचेंगे या गरम उसकी इस बातकी चातुरीको न समझते हुए उस ( उपायाय ) ने कहा कि-गरम ही चाहते हैं। इस प्रकार कह कर, उस उपा यायने अपना वस्त्र फैलाया जिसमें उसने ऊपरसे वे फल नीचे फेंके । लेकिन फल पृथ्वीपर गिर पडे और उससे उनमें धूल लग गई । व र रुचि हाथ में लेकर मुंहसे एक फरु कर उम धूलको झाइने लगा। राजकन्याने उपहासके साथ कहा- क्या ये बहुत गरम हैं कि जिससे मुहसे छक कर उड़ा कर रहे हो।' उसकी इस बातसे चिढ़कर उस ब्राह्मणने कहा-'ऐ अपनेको चतुर समझनेपाली अभिमानिनि ! तू गुरुके साय ऐसा मजाक कर रही है, जा तुझको पशुपाल पति मिलो'। इस प्रकार उनका शाप सुनकर उसने कहा- आप तो विच है, लेकिन मैं तो, आपमे अधिक विधानान् होनेके कारण जो आदमी आपका भी गुर होगा, उससि सिाह करगी।' उसने इस प्रकार प्रतिज्ञा की । इसके बाद विक्रमादित्य जब कन्याके लिये उचित श्रेष्ठ यर पाने की चिन्तारूपी समुद्र में न रहे थे, तो वह पडित जिसे राजाने अभिलपित वर की खोज करनेका आमहपूर्वक आदेश कर रखा था, एक बार एक जगलमें चूमता हुआ पिपासासे व्याकुल हुआ । जन १ मूलमें यहार 'साइसाद 'ऐसा मविमत्तिक पाठ है इसरिये इसे हाधीश विशेषण मान कर यह अर्थ किया गया है। प्रत्यतमें 'साइसाइ'ऐमा निर्विमक्तिक पाठ भी भिस्वा है जो अपंदृष्टिले सबोधनात्मक हो सकता है । उस अथर्मे यह है साद!' ऐमा रिममा विरोपण हो सकता है। प्रिम का उपनाम सा ह माया, इसके यथेट प्रमाण मिन्टने हैं। २ यह जो रानकी स्तुतिका पद उदृत किया गया है यह महाकवि कालिदास का बनाया हुआ है, ऐसा मेनुगमा मान्य मालूम देता है।
६] प्रवन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश 4 चारों ओर कही जल नहीं मिला तो एक पशुपालको देखकर उससे जल मांगा । उसने जलके अभावमें दूध पीनेको कहा और बोला कि-'करचंडी' करो। उसके ऐसा कहने पर वररुचि बड़ी चिन्तामें पड़ गया, क्यों कि उसने इसके पहले यह शब्द किसी भी कोष ग्रंथमें नहीं पढा सुना था । उस पशुपालने उसके मस्तक पर हाथ रखकर और भैसके नीचे बिठाकर, दोनों हथेलियों को जोड़कर 'करचंडी' नामक मुद्रा बताकर, उसे पेट भर कर दूध पिलाया । उस ( उपाध्याय )ने अपने मस्तक पर हाथ रखनेके कारण और एक ' करचंडी' इस विशेष शब्दके बतानेके कारण, उसे गुरुके समान समझा और फिर उसको ही उस राजकुमारीका समुचित पति निश्चित किया । भैंसोंसे हटाकर उसे अपने महलमे ले आया और ६ महिने तक उसके शरीरकी शुश्रूषा करते हुए “ओं नमः शिवाय" इस आशीर्वादको पढ़ाया । ६ महिने बाद जब पण्डितने समझ लिया कि ये अक्षर उसे कण्ठस्थ हो गये है तो एक दिन शुभ मुहूर्तमें उसको अच्छी तरह श्रृंगार कराके उसे राजसभामें ले गया । राजाको आशीर्वाद देते समय, बहुत बारका अभ्यस्त वह आशीर्वाद भी, सभाक्षोभके कारण "उ श र ट" इस प्रकारके शब्दमें बोल गया। उसकी इस ऊटपटांग बातसे राजा विस्मित हुआ । वररुचि ने उसकी [ मूर्खता छिपाने और ] चतुरता बतानेके लिये राजाके सामने कहा- ४. उमाके साथ रुद्र जो, शङ्कर और शूलपाणि है। रक्षा करें तुम्हारी हे राजन्, टंकारके वलसे जो गर्वित है। इस प्रसिद्ध श्लोकद्वारा [जिसके चारों चरणोंके प्रथमाक्षरोंसे । उशरट शब्द बनता है ] वर रुचि ने उसके पाण्डित्यकी गंभीरताका विस्तारपूर्वक विवेचन किया । उसकी बातसे प्रसन्न होकर, राजाने उस सैस चरानेवालेसे अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया । पर पण्डितके सिखानेसे वह सदा मौन ही रहा करता। राजकन्याने उसकी चतुरता जाननेके लिये, कोई नई लिखी हुई पुस्तकके संशोधनका उससे अनुरोध किया । उसने उस पुस्तकको हथेलीपर रखकर, नहरनी लेकर, सारे अक्षरोंको बिंदु और मात्रासे रहित कर दिया । उसे ऐसा करते देख राजपुत्रीने निर्णय किया कि यह तो मूर्ख है । तबसे सर्वत्र ही 'जा मा तृ शु द्धि" की कहावत प्रचलित हुई। एक बार दीवाल परके चित्रमें भैंसोका झुण्ड देखकर, आनंदित होकर, वह अपनी प्रतिष्ठा भूल गया और उनके बुलानेकी विकृत वोली बोलने लगा । तब राजकुमारीने निश्चय किया कि यह निरा पशुपाल-भैंसोंका चरवाहा है। फिर वह ( चरवाहा ) राजकन्याकी अवज्ञा देखकर विद्वत्ताके लिये कालिकाकी आराधना करने लगा। अपनी पुत्रीके वैधव्यसे शकित होकर राजाने रातके समय गुप्त वेशमें दासीको भेजा । उसने यह कहकर कि-'मैं तुझे तुष्टमान हुई हूँ' ज्यों ही उठाने लगी त्यों ही विप्लवकी आशंकासे, स्वयं कालिका देवीने ही प्रत्यक्ष होकर उसे अनुगृहीत किया । इस वृत्तान्तको सुनकर राजकुमारी प्रमुदित हुई और आकर बोली कि-' क्या कुछ विशेष वाणी प्राप्त हुई है ? ' उसके ऐसा कहनेपर वह तभीसे कालिदास नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसने कुमार संभ व प्रभृति ३ महाकाव्य और ६ प्रबंध बनाये । -इस प्रकार यह कालिदासकी उत्पत्तिका प्रबंध है ॥१॥ . १ 'जामातृ शुद्धि' की कहावत हिंदीमे या गुजराती भाषामे प्रचलित हो ऐसा ज्ञात नहीं हुआ, लेकिन मराठी भाषामें जवाइ शोध' नामकी कहावत प्रचलित है । विक्रमकी और और कथाओंमें भी इसका उल्लेख मिलता है इससे ज्ञात होता है पुराने समयमें यह कहावत गुजरात आदि देशोमें भी प्रचलित होगी। २ पुत्रीको वैधव्य प्राप्त होनेकी शंका राजाको इसलिये हुई कि वह पशुपाल आमरणांत उपवास करनेकी प्रतिज्ञा करके देवीकी आराधना करने बैठा था । मेरुतुंगसूरिका यह ग्रन्थ बहुत ही संक्षिप्त शैलीमें लिखा हुआ है, इसलिये इसमे बहुतसी बातें अध्याइत रहती हैं । दूसरे निबन्धों में ये बातें खुलासेके साथ लिखी हुई मिलती है ।
, . , , प्रकरण ३-७] विकमार्कराजाका प्रबन्ध [७ ३) एक पार, उस नगरका निवासी दा ता नामक सेठ, हाथमें मेंट लेकर आया और सभामें बैठे हुए विक्रमादित्य को प्रणाम करके कहने लगा- महाराज, मैंने शुभ मुहूर्तमें प्रधान बदइयोंसे एक धवलगृह ( महल ) बनवाया, और उसमें बड़े उत्सबके साथ प्रवेश किया। मैं जब रातको उसमें पलँग. पर पड़ा हुआ, आधा-सोया, आधा-जागा वाली अवस्था में था उस समय : गिरता हूँ' इस प्रकारकी मैने आकस्मिक वाणी सुनी । मैं मारे डरके ' मत गिरो' यह कहता हुआ उसी समय वहाँसे भाग निकला । उस मकान बनवाने के सबधमें ज्योतिषियों और कारीगरोंको समय समय पर जो धन दान किया गया है वह मेरे ऊपर वृथा दण्ड ही हुआ ! अब इस विषयमें महाराज जो उचित समझें करें!' राजाने उस सेठकी बात भली भाँति सुनकर, उस ववलगृहका जो तीन लाख उसने बताया, वह उसे चुकाकर, उसको स्वायत्त कर लिया। सायकाल होनेपर, सविप्तर' यानि राजसभामें बैठकर, तत्सबधी सत्र कार्योसे निवृत्त होकर, उस घरमें मुखपूर्वक जा सोया । उसी · गिरता हूँ' इस वाणीको सुनकर वह असम साहसी राजा बोला कि ' जल्दी गिरो!' और उसके ऐसा कहते ही पास ही गिरे हुए सुवर्ण पुरुषको उसने प्राप्त किया। -इस तरह यह सुवर्ण पुरुषकी सिद्धिका मान्ध है ॥२॥ १) एक दूसरे अवसरपर कोई अभागा पुरुष, अपने हाथसे बनाये हुए एक लोहेका दुबला पतला दरिद्र नामक पुतला लेकर द्वारपर आया । जब द्वारपाल उसे राजाके पास ले गया तो उसने कहा कि-' महाराज, आप जैसे स्वामीसे शासित इस अवन्ती पुरी में सभी चीजें जल्दी बिक जाती हैं और मिल जाती हैं, ऐसी प्रसिद्धि जानकर मैंने चौरासी चौहटोंपर निक्रयके लिये इस दरिद्र-पुतलेको घुमाया, लेकिन किसीने इसे नहीं खरीदा और उलटी मेरी भर्त्सना की गई। आपकी इस नगरीका यह कलक यथार्थ रीतिसे आपको बताकर, क्या मैं जैसे आया था वैसे ही चला जाऊ। यह आपसे पूछने आया हूँ।' उसकी इस घटनाको पुरीका एक महान् कलक समझकर राजाने उसी समय उसे एक लाख दीनार देकर, लोहेके उस दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया और • अपने खजानेमें रखवा दिया। ऐसा करनेपर उसी रातको, सुख पूर्वक सोये हुए राजाके निकट, पहले पहरमें हाथियोंकी अधिष्ठात्री देवता, दूसरेमें घोड़ोंकी अधिष्ठात्री देवता और तीसरेमें लक्ष्मीने आविर्भूत होकर कहा कि * महाराजने जब दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया है तो, फिर हमारा यहाँ रहना उचित नहीं है '- यह कह, अनुज्ञा लेकर वे चले जानेको पूछने आये, तो राजाने अपना साहस भग न हो इसलिये उनको जानेकी अनुमति दे दी। चौथे पहरमें कोई दिव्य तेज सम्पन्न उदार पुरुष प्रकट हुआ और बोला कि-' मैं सत्त्व (साइस) हूँ, जानेके लिये आपकी अनुज्ञा चाहता हूँ '। उसके ऐसा पूछनेपर राजा हाथमें तलवार लेकर जब आत्मघात करनेको उद्यत हुआ तो फिर उसने हाथ पकड़कर कहा कि-'मैं तुष्टमान हुआ' और राजाको उस कृत्यसे रोका । सत्त्रके चहीं रहनेपर हाथी आदिकी तीनों अधिष्ठात्री देवतायें लौटकर राजासे बोली-'जानेके सकेतको नष्ट करके सत्यने हमें धोखा दिया है । इसलिये राजाको छोड़कर हम लोगोंका जाना अब उचित नहीं है। इस प्रकार ये भी बिना किसी यतके ही स्थिर होकर रह गई। [१] तभीतक धन है, तभीतक गुण है, और तभीतक समुचल कीर्ति है, जबतक हे सत्त्व (साहस)! तुम चित्तरूपी नगरमें खेल रहे हो। . - १ सर्वावसर उस जगहका नाम है जहा राजा अपने मुख्य सिंहासन पर बैठकर सब कोई प्रजाजन और राजकीय पुरुषोंकी मुलाकात लेता देता है और राज्यके सब कार्योंका विचार करता है। दिवान-ए-आम या दरयार ए-आम यह उर्दु शन्द इसका प्राय समानार्थक हो सकता है।
७ , यह क्या? ८] प्रवन्धचिन्तामणि, [ प्रथम प्रकाश [२] राज्य भी जाय, स्त्रियां भी जाय और इस लोकसे यश भी चला जाय; किन्तु हे किन्तु हे सत्त्व ! हम तुम्हारे जानेकी अनुमति आजीवन नहीं दे सकते । -इस प्रकार यह विक्रमादित्यके सत्त्वका प्रबंध है ॥३॥ ५) एक दूसरे अवसरपर, कोई विदेशी सामुद्रिक-शास्त्रज्ञ द्वारपालके द्वारा सभामें बैठे हुए विक्रमादि- त्य के पास ले जाया गया। प्रवेश करते ही राजाके लक्षणोंको देखकर वह सिर पीटने लगा। राजाने विपादका कारण पूछा, तो बोला-' महाराज, सभी अपलक्षणोंके निधान होनेपर भी तुम्हें छानवे देशोंकी साम्राज्य लक्ष्मीको भोगते हुए देखकर, सामुद्रिक शास्त्रके ऊपर मेरा विराग हो गया है । मैं तुम्हारे अन्दर ऐसी कोई काबरी (चितकबरी) आंत नहीं देख रहा हूं जिसके प्रभावसे तुम भी कोई राज्यकर्ता वनो । उसके इस वास्यके सुनते ही विक्रमादित्य तलवार खींचकर जब अपने पेटमें मारने लगा तो उस ( सामुद्रिकज्ञ ) ने पूछा कि इस पर विक्रम ने कहा-'पेट फाड़कर तुम्हें उसी प्रकारको ( कावरी ) आंत दिखाता हूं। तव उसने कहा कि-' मैने पहले नहीं समझा था कि, तुम्हारा यह सत्त्वरूपी महालक्षण बत्तीस लक्षणोंसे भी बढ़कर है । इसपर राजाने उसे पारितापिक देकर विदा किया। -इस प्रकार यह सत्त्वपरीक्षाका प्रबंध है॥४॥ ६) इसके बाद एक अवसरपर, विक्रम ने सुना कि दूसरेके शरीरमें प्रवेश करनेवाली विद्यासे तिर- स्कृत होकर अन्य सारी कलायें निष्फल-सी हैं । यह सुनकर उस विद्याकी प्राप्तिके लिये श्री पर्वत पर भै र वा- नन्द योगीके पास जाकर उसने चिरकाल तक उस ( योगी ) की सेवा करनी शुरू की । योगीके पूर्वसेवक किसी ब्राह्मणने [ राजासे यह कहा कि-तुम ] मुझे छोड़कर ( अकेले ) गुरुसे पर-काय-प्रवेश विद्या न लेना। राजाने उसका अनुरोध मान लिया । जब गुरु विद्या देनेको उद्यत हुए तो उनसे कहा कि-'पहले इस ब्राह्मणको विद्या दीजिये, वादको मुझे'। 'राजन् ! यह (ब्राह्मण ) विद्याके सर्वथा अयोग्य है ' ऐसा गुरुके कहनेपर भी बार बार विक्र म अनुरोध करता रहा । तब गुरुने यह उपदेश देकर कि-'पीछे तुम पछताओगे' उस ब्राह्मणको भी विद्या दी। बादमें लौटकर दोनों उज्जयि नी पहुंचे । वहां पट्टस्तके मर जानेसे राजपुरुषोंको उदास देखकर और स्वयं परकाय-प्रवेश विद्याका अनुभव करनेके निमित्त, राजाने उस हा के शरीरमे अपनी आत्माका प्रवेश कराया। [ इस प्रसंगका वर्णन करनेवाला यह एक पद्य है-] ५. ब्राह्मणको अंगरक्षक बनाकर राजा ( परकाय-प्रवेश ) विद्याके द्वारा अपने हाथीके शरीरमें प्रविष्ट हुआ । [ वादमें ] ब्राह्मण राजाके शरीरमें पैठ गया । तब राजा क्रीड़ा-शुक ( महलके पीजरेमेंका तोता) हुआ। बादमें (शुकरूपी) राजाने छिपकली के शरीरमे प्रवेश किया तो रानीने उसकी मृत्यु समझी । ( इस पर ) ब्राह्मणने ( जो राजाके शरीरमें प्रविष्ट हुआ बैठा था ) शुकको जिलाया और विक्रम ने फिर अपना शरीर पाया ॥ ५॥ इस तरह विक्र म को परकाय प्रवेश विद्या सिद्ध हुई । -इस प्रकार यह विद्यासिद्धिका प्रबंध है ॥ ५ ॥ ७) फिर एक दूसरे अवसरपर, विक्रमादित्य राजपाटिका ' ( वहिभ्रमण ) में जा रहा था तब मार्गमें सिद्धसेन सूरिको आते देखा । उस नगरका ( जैन ) संघ उनके पीछे पीछे आरहा था और बन्दी जन ९ 'राजपाटिका' यह प्राकृत 'रायवाडिया' और देश्य 'रइवाडी' शब्दका संस्कृत भाषांतर है। पुराने समयमें राजा आदि राज्यनायक पुरुष प्रायः मध्यान्होत्तर तीसरे प्रहरके अंतमें या चतुर्थ प्रहरमे, राजमहलसे अनुचर आदिके खास परिवारके साथ निकल कर, प्रधान राजमार्गसे होते हुए नगर या गावके बाहर जो राजकीय उद्यानादि स्थान होते थे उनमे जाते थे और वहापर घंटे-दो घंटे ठहर कर, संध्याकाल होते समय वापस निवासस्थान पर आते थे । राजाओका यह इस प्रकार टहलने या हवाखानेके लिये जो महल बाहर जाना होता था उसको रा ज पा टि का कहते थे। , - , . प्रकरण ८-११] विक्रमार्कराजाका प्रवन्ध [९ 'सर्वज्ञ पुत्र' कह कर उनकी स्तुति कर रहे थे। 'सर्वज्ञ पुत्र' इस विरुदसे कुपित होकर विक्रमादित्य ने उनकी सर्वज्ञताकी परीक्षाके लिये मन-ही-मन प्रणाम किया । सिद्ध सेन ने भी पूर्वगत श्रुतज्ञानके द्वारा राजाका मनोगत भार समझकर, दाहिना हाथ उठाकर धर्म लाभ का आशीर्वाद दिया । राजाने जब आशीर्वाद देनेका कारण पूछा, तो महर्षिने कहा कि- तुम्हारे मानस नमस्कारके लिये यह आशीर्वाद दिया गया है । इस पर उनके ज्ञानसे चकित होकर राजाने उनके पारितोपिफ निमित्त एक करोड़ सुवर्ण वितरण किया । ८) एक बार, एक दूसरे असरपर, राजाने कोशाध्यक्षसे अपने दिलाए हुए सुपर्णका वृत्तान्त पूछा, तो वह बोला कि-धर्मकी वहीमें मैंने श्लोक बनाकर सुवर्णका वृत्तान्त लिखा है, जो इस प्रकार है- ६ दूर-ही-से हाथ उठाकर 'धर्म लाभ हो' इस प्रकार कहनेवाले सिद्ध से न सूरिको राजाने एक कोटि [सुवर्ण ] दिया । इसके बाद श्री सिद्ध से न सूरिको सभामें बुलाकर राजाने जब कहा कि-उस सुवर्णको ग्रहण कीजिये। तो उन्होंने कहा कि- खाये हुए को खिलाना वृथा है । उसी सुवर्णसे उणमस्ता पृथ्वीको ऋणमुक्त कीजिये । इस प्रकारका उपदेश मिलनेपर, सूरिके सतोपसे सन्तुष्ट होकर राजाने उस वातको स्वीकार किया । ९) उसी रातको राजा वीरचर्या निमित्त नगरमें घूम रहा था, उस समय एक तेलीको बारबार इस (श्लोकार्ध ) को पढ़ते सुना- हमारा सदेश नारद । कृष्णको कहना । राजा सरेरा होनेतक रुका रहा पर उत्तरार्ध न सुन सका । उदास होकर राजमहलमें आकर सो गया । समेरे सामयिक कृत्य करके राजाने उस तेलीको बुलाकर उत्तरार्ध पूछा । उसने कहा- 'जगत् दारिद्रयसे दुखित है [ इस लिये ] वलिके बन्धनको छोडो ॥ ७॥' यह सुनकर सिद्ध से न सूरिके उपदेशको फिरसे कहा हुआ समझकर पृथ्वीको ऋणमुक्त करना शुरू किया। [ उज्जयि नी में राजा विक्रमादित्य म मात्र के साथ गुप्त वेश धारण करके महाकालके मदिरमें नाटक देखने गया । कुछ समयके बाद नागरिकके लड़के द्वारा कराये जानेवाले नाटकमें सूत्रधारके मुखसे उसका वर्णन सुनकर राजाने भी उस नागरिकका धन ले लेने के लिये मन-ही-मन लोभ किया । बादको कुछ समय बीतनेपर वह प्यासा होकर मुख्य वेश्याके घर परसे भट्टके पाससे पानी मगाया । वहा बुढ़िया वेश्या प्रधान पुरुपोंसे कह कर उसके लिये ईखका रस लेनेके लिये उपरनमें गई । काटनेवालोंसे ईख कटवाकर उसका रस निकलगाया पर उससे घहिया बिलकुल नहीं भरी तो मनमें दुखी होकर ऊपरका शकोरा भर कर ही बहुत देरसे आई । राजाके रस पी लेनेपर भट्ट मात्र ने उसकी देरी और उदासीका कारण पूछा । वह बोली-और और दिन तो एक ही ईखसे घड़ा और शकोरा दोनों भर जाते थे लेकिन आज तो घड़ा भी नहीं भरा। इसका कारण समझमें नहीं आता । म मा भने फिर पूछा कि-तुम लोग तो वडी पकी बुद्धिवाली होती हो इसलिये इसका फारण जानकर और विचारकरके बताओ। फिर वेश्या बोली कि-पृपीके मालिक (राजा) का मन प्रजाके प्रति विरुद्ध होगया है, इसलिये पृथ्वीका रस भी क्षीण होगया है । यह कारण उसने निवेदन किया तो राजा भी उसके बुद्धिकौशलसे चकित हुआ। यह फिर अपने घरकी शय्यापर सोया हुआ इस प्रकार विचार फरने लगा कि-प्रजा-पीड़न किये विना, केवल विरुद्ध चिन्ता मानसे ही पृथ्वीके रसकी इस प्रकार हानि हुई। तो १वीरचर्या-उस जमानेके राना अपनी प्रजाके सुख दुखोंकी याने स्वय जानने-सुननेके लिये कभी कभी गतके समय, एकाकी गुप्तवैशमें महरोंसे बाहर निकल जाते थे और दो चार घटे इधर उधर धूम पिर फर नगर चर्चाका प्रत्यय अनुमर करते थे। इसका नाम वीरचर्या है।
१०] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश मैं अब प्रजाको पीड़ा नहीं पहुँचाऊंगा। ऐसा निश्चय करके राजा दूसरी रातको प्यासका बहाना करके परीक्षाके लिये फिर उसके घर गया । वह शीघ्र ही ईखका रस ले आई और राजाको दिया जिसे पीकर वह [ अपने महलमें आया और ] शय्यापर सो गया । भट्ट मात्र के पूंछनेपर वेश्याने भी [ उसी तरह ] निवेदन किया ( बताया ) कि-[ आज ] राजाका मन प्रजापर प्रसन्न है । राजाने भी रातवाली अपनी बात बताकर, परके चित्तको इस प्रकार पहचान लेनेके कारण, सन्तुष्ट होकर उस वृद्ध वेश्याको [ पारितोषिकके ढंगपर ] हार दिया ।- इस प्रकार यह राजाके मनके अनुसार होनेवाले पृथ्वीरसका प्रबंध है।] १०) इसके बाद एक बार श्री सिद्ध से न सूरिने, यह पूछे जानेपर कि-' मुझ (विक्रम ) के समान क्या कोई [ और भी ] जैन राजा होगा ?' कहा- ८. एक हजार एक सौ निन्यानवे वर्ष पूर्ण होनेपर तुझ विक्रमादित्य के समान एक कुमार [पाल] नामक राजा होगा। ११) इसके बाद, एक दूसरे अवसरपर, जब राजा जगत्को ऋणमुक्त कर रहा था, अपने औदार्य गुणका अहंकार करते हुए उसने सोचा कि-'प्रातःकाल एक कीर्ति-स्तम्भ बनवाऊँगा । [ उसी दिन ] रातको वीरचर्या निमित्त चतुष्पथमें घूम रहा था कि दो सांढ़ लड़ते हुए सामने आये । उनसे डर कर राजा किसी दारिद्यग्रस्त ब्राह्मणकी पुरानी गोशालाके एक खंभेपर चढ़ गया। वे दोनों सांढ़ भी सींगसे वारंवार उसी खंभेपर प्रहार करने लगे । इसी बीच उस ब्राह्मणने अकस्मात् जग कर, आकाशमें शुक्र और बृहस्पतिसे अवरुद्ध चन्द्र- मण्डलको देखकर, गृहिणीको उठाया और चन्द्रमण्डलसे सूचित होनेवाले राजाका प्राणभय जान कर कहा कि- उसकी शान्तिके लिये हवनीय द्रव्यसे हवन करूंगा । राजा कान लगा कर यह बात सुन रहा था । गृहिणीने उससे कहा-'इस राजाने सारी पृथ्वीको तो ऋणमुक्त किया है, लेकिन मेरी सात कन्याओंके विवाहार्थ तो कुछ द्रव्य नहीं दिया । तो फिर शान्तिकर्म करके उसे व्यसन (संकट ) से मुक्त करनेमें क्या लाभ है ? ' इस प्रकार उसकी बात सुन कर वह सर्वथा गर्वसे रहित हुआ और उस संकटसे छूटकर और उस कीर्तिस्तम्भकी बातको भूलकर चिरकाल तक राज्य करता रहा । -इस प्रकार यह विक्रमादित्य की निर्गर्वताका प्रवन्ध है ॥६॥ [इसके बाद एक दूसरी रातको एक धोबिनसे राजाने पूछा कि-'वस्त्रोमे बालू क्यो लगी रहती है और चे गन्दे क्यों है ? ' उसने कहा- [३] हे महाराज, यह जो दक्षिण समुद्ररूपी दक्षिण नायककी वधू, रेवाकी प्रतिस्पर्धिनी, गोदावरी नामक प्रसिद्ध नदी, जिसका तट गोविन्दके प्रिय गोकुलोसे आकुल है, उसका जल, वर्षाकाल बीत जानेपर भी आपकी सेनाके हाथियोंके दाँतरूपी मूसलसे प्रक्षोभित धूलिके कारण, स्वच्छ नहीं हुआ। [४] उस राजाओके राजाने धोविनकी वह बात सुन कर भूक्षेप मात्रमें अपने शरीरके आभूषणोंके साथ एक लाख [ का दान ] दे दिया । [५] राजा विक्रमादित्य ने चोर, मागध (भाट), ब्राह्मण और धोविनसे कविता सुन कर [ रातके ] चारों पहर दान दिया।] -' इस प्रकार यहांपर विक्रमके संबंधके [ और भी ] विविध प्रबंध, परंपरा द्वारा जानलेने चाहिए । १ इस पंक्तिके लेखसे मेरुतुंगसूरि यह सूचित करना चाहते हैं कि विक्रम के विषयके जैसे ये प्रबन्ध हमने यहां लिखे हैं, वैसे और भी अनेक प्रबन्ध हैं, जिनका ज्ञान अन्यान्य ग्रंथों-प्रबन्धों द्वारा प्राप्त करना चाहिए। हमने तो यहा पर कुछ दिग्दर्शन करानेके लिये ही ये थोडेसे प्रवन्ध लिख दिये हैं। , .
। प्रकरण १२] धिकमार्कराजाका प्रबन्ध [१६ १२) एक वार, आयुके अतमें विक्रमादित्य का शरीर कुछ कमजोर हुआ तो एक वैद्यने उपदेश दिया कि, कौवेका मास खानेसे रोगकी शान्ति होगी। जब राजा उसे पकाने लगा तो इससे वैद्यने राजाका प्रकृति-व्यत्यय देखकर कहा-इस समय धषिध ही वलपान है । क्यों कि प्रकृतिको विकृति होनेसे उत्पात होता है। जीवनके लोभसे लोकोत्तर सत्त्व-प्रकृतिकात्याग करके काकमास खाकर आप किसी तरह भी न जियेंगे। वैद्यके ऐसा कहनेपर उसको 'परमार्थबान्धव' कह कर राजाने उसकी प्रशसा की और पारितोषिक देनेके लिये कहा। फिर और हाथी, घोड़ा, कोश इत्यादि सर्वस्व याचकोंको देकर, राजपुरुषों और नागरिकोंसे विदा लेकर, धवल गृहके किसी निर्जन प्रान्तमें तत्कालोचित दान ओर देव-पूजन करके कुशासनपर बैठ गया और सोच ही रहा कि ब्रह्मद्वारमे प्राणोंको निकाल दू, अकस्मात् आविर्भूत अप्सराओं के समूहको देखा । राजाने हाथ जोड़कर प्रणाम करके उनसे पूछा कि- तुम लोग कौन है?' इस पर अप्सराओंने कहा कि-निस्तारके साथ कुछ कहनेका यह अवसर नहीं है, हम तो विदा लेनेके लिये ही यहा आई हैं। इस प्रकार कहकर जाती हुई अप्सराओंसे राजाने फिर कहा- नवीन ब्रह्माने आप लोगोंको एक अद्वितीय रूप दे कर बनाया है। फिर भी जानना चाहता हू कि, यह अद्वितीय रूप नासिकाहीन क्यों है?" इस पर वे ताली बजाकर हँसती हुई बोली- अपने ही अपराधको हमारे ऊपर डाल रहे हो ?' ऐसा कह कर वे चुप हो गई । तब राजाने कहा-आप लोग तो स्वर्ग लोकमें रहती है। आपके ऊपर मेरे अपराधकी सम्भावना कैसे हो सकती है। इस तरह राजाका वचन समाप्त होनेपर उनमें की मुरय सुमुखीने कहा-'हे राजन् , पूर्वतन पुण्यके प्रभारसे नर निधियोंने तुम्हारे महलमें अवतार ग्रहण किया था, हम लोग उन्हींकी अधिष्ठात्री देवतायें हैं। आपने जमसे महादान देते हुए भी एक ही निधिमेंसे इतना ही मात्र दिया है कि जिससे आप नासाम देख नहीं सकते । ' इस प्रकारका उनका कथन सुनकर हायसे सिर ठोकते हुए राजाने कहा कि यदि मैं जानता कि नव निधिया अवतीर्ण हुई हैं तो उन्हें नौ ही पुरुषोंको दे देता । दैवने अज्ञान भावसे मुझे वञ्चित किया ।' उसके ऐसा कहते समय उन्होंने यह कह कर आश्वासित किया, कि-कलियुगमें तो आप ही एकमात्र उदार हैं। और वह परलोक प्राप्त हुआ । उसी दिनसे उस विक्रमादित्य का सवत्सर प्रवृत्त हुआ जो आज भी जगत्में वर्तमान है। ।। श्रीविक्रमादित्यके दान विषयक ये विविध प्रवध पूरे हुए ॥ .
१२] प्रवन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश २. सातवाहन राजाका प्रबन्ध । १३) दान और विद्वत्ताके विषयमे श्री सात वा ह न की कथा परम्परागत यथाश्रुतिके अनुसार जानना चाहिये ।' उसके पूर्व जन्मकी कथा इस प्रकार है-प्रतिष्ठान पुर में सा त वा ह न राजा जब राजपाटिका (बहिर्धमण) करने जा रहा था तो नगरके निकट नदीमें एक मछलीको हँसते देखा, जिसे लहरोंने पानीके किनारे फेक दिया था। इस अस्वाभाविक बातको देखकर राजाको भय हुआ। उसने सभी पंडितोंसे इस सन्देहको पूछते हुए एक ज्ञा न सा गर नामक जैन मुनिसे भी पूछा। अपने अतिशय ज्ञानके वलसे उसने राजाके पूर्वजन्मको जानकर इस प्रकार उपदेश दिया कि-' पिछले जन्ममें तुम इसी नगरमें रहते थे। तुम्हारे कुल-वंशमें कोई नहीं था । और तुम्हारी जीवनवृत्ति एकमात्र लकड़ीका बोझ ढोना था । तुम नित्य ही भोजनके अवसर पर इसी नदीके निकटवर्ती शिलातलपर बैठकर पानीसे सत्तू सानकर खाया करते थे। किसी दिन, 'एक महीनेके उपवासकी पारणाके लिये नगरमें जाते हुए एक जैन मुनिको बुलाकर वह सत्तूका पिंड उनको दानकर दिया। उस पात्रदानके माहात्म्यसे तुम सा त वा ह न नामक राजा हुए और वह मुनि देवता हुआ । वही देवता अपने अधिष्ठान वश होकर, उस काष्ठभारवाही जीवको तुझे इस राजाके रूपमें पहचानकर, प्रमादके कारण हँस पड़ा । ' इस कथागत वस्तुका संग्रह सूचक यह [ पुरातन ] काव्य है- ९. मछलीके मुँहके हँसनेपर जो सात वाह न राजा भयभीत होगया था उससे मुनिने कहा कि जिसने सत्तूसे मुनिको पूर्व जन्ममें जो पारणा कराया था वही आप हैं और दैवात् मछलीने आपको पहचान लिया इसलिये वह हँस रही। वह सात वाह न उस पूर्व जन्मके वृत्तान्तको जातिस्मृतिसे प्रत्यक्ष करके उस दिनसे दानधर्मकी आराधना करता हुआ सब महाकवियों और विद्वानोंका संग्रह करता रहा। उसने चार करोड़ सुवर्णसे चार गाथाओंको खरीदा और सात सौ गाथाओवाला 'सातवाहन' नामक संग्रह गाथा कोश शास्त्र निर्माण कराया। इस प्रकार वह नाना सद्गुणोका निधि बनकर चिरकाल तक राज्य करता रहा। वे चारों गाथायें ये हैं । जैसे- [प्रबन्धचिन्तामणिकी मूल पाठकी जो आवृत्ति हमने तैयार की है उसमें यहा पर (देखो पृष्ठ ११) १० प्राकृत गाथाये दी हुई हैं । इन गाथाओके क्रम आदिके विषयमे पुरानी प्रतियोमे बहुत कुछ गडबड मालूम देती है । कोई प्रतिमें तो ये गाथायें सर्वथा नहीं दी गई हैं और 'गाथाचतुष्टयमेतद्' (अर्थात्-ये चार गाथायें इस प्रकार हैं) इस वाक्यके चदले ‘तद्गाथाचतुष्टयं बहुश्रुतेभ्यो शेयं' (अर्थात्-ये चार गाथायें बहुश्रुत विद्वानो द्वारा जाननी चाहिए ) ऐसा वाक्य है; और कुछ प्रतियोंमें पहली ५ गाथाये लिखी हुई मिलती हैं, कुछमें दूसरी ५ गाथायें, कुछमें दसो गाथाये मिलती हैं । हमने मूलमें, संग्रहकी दृष्टिसे इन दसों गाथाओंका पाठ दे दिया हैं । इनमें पहला गाथा-पंचक है वह शृंगार विषयक वस्तुका वर्णनवाला है; दूसरा गाया-पंचक अन्योक्तिद्वारा सत्पुरुषोके परोपकार भावका वर्णन करता है । इन गाथाओंका अर्थ इस प्रकार है-] १० 'हार, 'खट्वोद्गालि' और 'ताल' इन ४ वस्तुओंका वर्णन करनेवाली ४ गाथायें सालाहन राजाने दसकोडि [सुवर्ण ] दे कर ग्रहण की ॥ १ ॥ - . वेणीदंड, १ विक्रमकी तरह सात वाहन राजाकी भी बहुतसी कथायें परंपरासे चली आती हैं। विक्रम चरित के समान सात चाह न च रित भी बना हुआ है। संस्कृतके कथासरित्सागर नामक प्रसिद्ध ग्रंथमें सा त वा ह न की बहुतसी कथाये गूंथी हुई हैं । वे सब कयायें मेरुतुंगसूरिके समयमें बहुत प्रचलित थीं और लोक-प्रसिद्ध थीं इसलिये उन्होने उन कथाओंको इस ग्रंथमे संकलित नहीं किया। विक्रम के बाद सा त वा ह न प्रसिद्ध ऐतिहासिक दानशील राजा हो गया और उसने भी विद्वानोंको खूब धन दान किया, इसलिये सिर्फ उसका नाम निर्देश करनेके निमित्त ही यह इतना-सा वृत्तात उसके विषयमें मेरुतुंगसूरिने लिख दिया है। इसकी विशेष चर्चा अगले ऐतिहासिक विवेचनवाले भागमें की जायगी।
प्रकरण १३ ] सातवाहन राजका प्रवन्ध [१३ 'ताल' [हारका वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] ११ खूब पुष्ट और ऊचे ऊठे हुए स्तनोंगाली स्त्रीके वक्षस्थलपर रहा हुआ [ मोतीयोंका] हार स्थिर होकर रहनेकी ठीक जगह न मिलनेसे छातीपर उद्विग्न अथवा उन्मुख होकर इधर उधर फिरता रहता है-जैसे यमुना नदी के प्रवाहमें पानी के फेनके बुद्बुदे इधर उधर फिरते रहते हैं। ['वेणीदण्ड 'का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] १२ है सुन्दरि, तेरा यह कृष्णकाति वेणीदण्ड नितम्व-बिम्बपर जो शोम रहा है वह मानों ऐसा लगता है कि सुरतस्थानरूप महानिधिको रक्षा करनेवाला कोई भुजग है। ['खट्योद्गालि'के वर्णनवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] १३ सुरत सभोगके समय जो सतोपदायक सुदर सुखानुभव हुआ, उसका सिरह होनेसे, हे प्रिय सखि ! यह खाट चू चू ऐसा शब्द कर रही है। का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] १४ हे शुक ! तू इसे चाचके लगाने-ही-से गिर जानेवाला पका हुआ आम्रफल मत समझ । यह तो जरठ हो जानेसे बेस्वादवाला और उभडा हुआ तालफल है । [ दूसरा गाथा-पचक है उसमें 'कदली वृक्ष', 'विध्य गिरी', 'स्नेहाधार' और 'चन्दन वृक्ष' इन ४ वस्तुओंका अन्योक्तिमय वर्णन है। इसी आसिरी १० वीं गायामें कहा गया है कि सालीवाहन राजाने ये गायार्ये ९ कोडि (प्रत्यतरमें ४ कोडि) देकर ग्रहण की । इनका अर्थ क्रमश इस प्रकार है-] १५ जो पुरुष, केलके झाडके समान, दूसरोंको फल देते हुए अपना विनाशका भी विचार नहीं करते, उनके सामने मरना भी वाछनीय है । १६ जिस तरह विन्ध्याचल पर्वत सदा सरस ( हरे भरे ) वृक्षोंको धारण करता है वैसे ही शुष्क- (निकम्मे ) वृक्षोंको भी धारण करता है । उमी तरह बड़े पुरुष अपने उत्सगवती-समीपवर्ती निर्गु- णोंका भी त्याग नहीं करते । १७ वे मुझार' जिहोंने तृपित होकर प्रथम ही प्रथम जो स्नेहाधार( जलधारा )का जैसे तैसे करके पान किया हे वे फिर आजन्म अन्य पानकी इच्छा नहीं करते। १८ शुष्क हो जानेपर भी जिस चदनके वृक्षका, सर जनोंको आनन्द देनेवाला ऐसा सुरभि गन्ध है वह जन सरस मारवाला (हरा फूला ) होगा तब तो फिर कैसा ही होगा। - १ यह मुहार' क्या वस्तु है इसका अर्थ हमें सट नहीं हुआ। यह सन्द भी घर है या नहीं इसकी में शची। कोश वगेरह प्रयोंमें यह शब्द हमें नहीं मिग १६] प्रवन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश - ? . १८) बादमें कान्यकुब्ज देशसे एक पञ्चकुल (कर वसूल करनेवाला) गुजरात देश का कर उगाहने आया। यह गुजरात देश उस कान्य कुब्ज देशके राजाने अपनी ' महण का' नामक कन्याको दहेजमें दे दिया था। इस पञ्चकुलने उस वन राज नामक पुरुपको अपना सेल्लभृत् ( शस्त्राधिकारी) बनाया । छ महीने तक देशसे कर वसूल कर २४ लाख पारूथक द्रम्म (चाँदीके सिक्के ? ) और ४ हजार अच्छी नस्लके तेजवान् घोड़े लेकर जब वह पञ्चकुल अपने देशको चला तो वन राज ने सौराष्ट्र नामक घाटपर उसे मार डाला और फिर उस राजाके भयसे साल भर तक किसी वनमें जाकर छिपा रहा। १९) इसके बाद, अपने राज्याभिषेकके लिये राजधानीका नगर बसानेकी इच्छासे एक अच्छी भूमि खोजने लगा। पीपल ला सरोवरके किनारे, अण हिल नामका भा रू याड़ साखड़ का लड़का जो सुखपूर्वक बैठा था, उसने पूछा कि-'तुम यहांपर क्या देख रहे हो ?' उसके प्रधानोंके यह कहनेपर कि नगर वसानेके योग्य अच्छी भूमि देखी जा रही है। वह बोला कि-'यदि उस नगरको मेरे नामपर बसाओ तो मैं वैसी भूमि बताऊँ ।' यह कहकर वह जालि वृक्षके पास गया और वहां जितनी भूमिमें खरगोशके द्वारा कुत्ता त्रासित होता रहता था उतनी भूमिको उसने बताया। उसी भूमिमें वनराजने अण हि ल्ल पुर इस नामसे नया नगर वसाया। [ यहांपर, एक P नामक प्रतिमें अणहिल्लपुरकी प्रशंसा बतलानेवाले निम्नलिखित पद्य लिखे हुए मिलते हैं- [६] जो ( नगर ) हारका अनुकरण करनेवाले प्राकार (खाई ) से प्रकाशित हो रहा है, वह ऐसा लग रहा है मानों सत्ययुग वृत्ताकार होकर कलिसे उसकी रक्षा कर रहा है। [७ ] जिस नगरमें रातके आरंभमें चन्द्रशाला ( ऊपरी तल ) में खेलती हुई स्त्रियोंके मुखकी शोभासे आकाश ऐसा जान पड़ता है कि उसमें सैकड़ों चन्द्रमा उदय हुए [८-९] जिस नगरकेि विजयी गुणके सामने लंका को शंका हो गई, चम्पा कांपने लगी, विदिशा कृश हो गई, काशी की सम्पत्ति नष्ट हो गई, मिथिला का आदर शिथिल हो गया, त्रिपुरी की शोभा विपरीत हो गई, मथुरा की आकृति मन्थर (सुस्त, फीकी) पड़ गई और धारा भी निराधार हो गई। [१०] जिस नगरके स्त्रीजन और कौरवेश्वरके सैन्यमें हम कोई अन्तर नहीं देखते क्यों कि दोनों ही 'गांगेय-कर्ण' (स्त्री-पक्षमें सोना है कानमें जिनके; और सेना-पक्षमें भीष्म और कर्ण हैं जिनमें) हैं। ११] जिसके आगे प्रौढ़ शोभावाली अल का पुरी को पुलक नहीं होता ( आनंदित नहीं होती ), लं का अति शंकाकुला हो उठती है, उज्जयि नी की भी कभी जीत नहीं होती, चम्पा अति कांपती रहती है, का न्ति पुरी कान्तिविभूषिता नहीं होती, अयोध्या अतियोध्या हो जाती है, ऐसा यह अद्भुत पत्त न (अणहिल्लपुर) नगर है जिसमें लक्ष्मी सदा नाच करती रहती है । इस नगरकी जय हो। २०) श्री विक्रमादित्य के संवत् ८०२ आठ सौ दोमें-प्रत्यंतरमें, संवत् ८०२ के वैशाख सुदी दूज, सोमवारको-उस जालि वृक्षके नीचे बड़ा भारी राजप्रासाद बनाकर राज्याभिषेक लग्नके समय श्री व न राज ने का क र प्रामकी रहनेवाली उस प्रतिज्ञात बहन श्री देवी को बुलाकर उसके हाथसे तिलक करवाया। उस समय उसकी आयु पचास वर्षकी थी। वह जांबा नामक वणिक महामंत्री बनाया गया । पञ्चास र ग्रामसे श्री शी ल गुण सूरि को भक्तिके साथ ले आकर धवल गृहमें अपने सिंहासनपर बैठाया और कृतज्ञोंमें श्रेष्ठ होनेके कारण सप्ताङ्ग राज्य उन्हें समर्पण किया। उन निःस्पृह सूरिने उसका वार वार निषेध किया। किन्तु उसने हैं - . प्रकरण २१-२३] वनराज-आदिका प्रवन्ध [१७ उनके प्रत्युपकारकी बुद्धिसे उन्हींकी आज्ञासे श्री पार्श्वनायकी प्रतिमासे अलकृत पश्चास र नामक चैत्य बनवाया और उसमें देवकी आराधना करती हुई अपनी निजकी मूर्ति भी स्थापित की । धवल गृहमें कण्टेश्वरी देवीका भी मन्दिर बनवाया। २१ वन राज के समयसे ही गूर्जरोंका यह राज्य जेन मत्रों द्वारा स्थापित हुआ है इसलिये इसका द्वेषी कभी भी आनद प्राप्त नहीं कर सकता। २१) सरत् ८०२ से लेकर ५९ वर्ष २ मास २१ दिन तक श्री वन राज ने राज्य किया। श्री व न राज की पूरी आयु १०९ वर्ष २ मास २१ दिन की थी। संनत् ८६२ की आपाद सुदी तृतीयाको अश्विनी नक्षत्र और सिंह लग्नके बीतते समय श्री वन राज के पुत्र श्री योगराज का राज्याभिषेक हुआ। [BP प्रतिमें " सनत् ८०२ से लेकर ६० वर्ष तक श्री वनराजने राज्य किया। सनत् ८६२ वर्षमें श्री योगराजका राज्यभिषेक हुआ ( P प्रतिमें श्री योगराजने राज्य अलकृत किया ),” इतना ही पाठ है ।] २२) उस राजा ( योगराज ) के तीन लड़के हुए । किसी समय क्षेमराज नामक कुमारने राजाको इस प्रकार सूचित किया कि एक अन्य देशीय राजाके प्रवण ( जहाज ) वनडरमें पड़कर तितर बितर हो गये हैं। वे अन्यान्य बदरगाहोंसे हटकर श्री मो मे वर पत्तन में आ लगे हैं। उनमें १० हजार तेजस्वी घोड़े और १८ सौ (1) हाथी, तया एक करोड किंमतवाली और और चीजे है। यह सब सपत्ति हमारे देशसे होकर अपने देशको जायगी। यदि महाराजकी आज्ञा हो तो उसे ले आया जाय । उसके ऐसी विज्ञप्ती करने पर राजाने वैसा करनेका निषेध किया। उसके बाद जब वह सब स्वदेशकी अन्तिम सीमाके प्रातमें पहुंचा, तो वृद्धावस्थाके कारण राजाफी विकलताका विचार कर, तीनों कुमार अपनी सेना सजाकर उसपर टूट पड़े, और अज्ञात चौर वृत्तिसे, उसके पाससे सब कुछ छीनकर अपने पिताके पास ले आये । भीतर-ही-मीतर कुपित किन्तु ऊपरसे मौन धारण किये हुए राजाने उनसे कुछ नहीं कहा । यह सब कुछ राजाको भेंटकर जन पूछा गया कि-क्षेमराज कुमारने यह अच्छा किया या बुरा तो राजा बोला-यदि कह कि अच्छा किया तो दूसरेके धन टनेका पाप लगता है और यदि कहू कि अच्छा नहीं किया तो तुम रोगोंके मनमें बुरा टगता है। इसमे यही सिद्ध होता है कि मौन ही रहना अच्छा है। फिर और भी सुनो! तुमारे प्रथम प्रश्नके उत्तरमें, दूसरेके धनके हरण करनेका जो मैने निषेध किया था उसका कारण यह है कि-और और देशोंमें राजगण, अन्यान्य राजाओंकी जन प्रशसा करते हैं, तम गुर्जर देश में चोरोंका राज्य है ऐसा कहकर वे नित्य उपहास किया करते हैं । जर हमारे स्थान पुरुप (प्रतिनिधि ) इन बातों के समाचार हमें देते हैं तो हमें सुनकर दुख होता है और हमारे पूर्वजोंने कुछ इस तरहकी बातें की थी, इसकी हमें ग्लानि होती है। पूर्वजोंका यह कला यदि रोगोंके हृदयसे भूल जाय तो, अन्य सर राजाओंकी पक्किमें हम भी राज शन्दका सम्मान पारें । किंचित् धन लोममे उन्ध होकर तुम लोगोंने पूर्वजों के इस फलफफो मान-मूजफर फिरसे ताजा बना दिया। इसके बाद राजाने शस्त्रागारमे अपना धनुष्य मंगाकर यह आज्ञा दी कि तुम लोगों से जो बलवान् हों यह इस धनुष्यको पदारे । यथाक्रम समी उठे पर जम कोई न चहा सका तो राजाने की भाति उसे चढ़ा दिया, और कहा- २२ राजाकी आज्ञाका भग करना, नौकरोंका येतन काट टेना और रियोंको अटग शय्या देना- मिना शसही से हत्या करना पदलाता है। , . १८] प्रवन्धचिन्तामणि [प्रयम प्रकाश इस प्रकार नीतिशास्त्रके उपदेशानुसार, मेरी आज्ञा भंग करके विना शस्त्रके वध करनेवाले तुम पुत्रोंको मै क्या दंड दूं? इसके बाद राजाने आयुके १२० वें वर्षमें प्रायोपवेशन ( अन्न जलका त्याग) कर चितामें प्रवेश किया । इस राजाने भट्टारिका श्री योगीश्वरी का मन्दिर बनाया । २३) इस [ यो ग राज नामक ] राजाने ३५ वर्ष राज्य किया । सं० ८९७ से लेकर २५ वर्ष श्री क्षे मराज ने राज्य किया। सं० ९२२ से लेकर २९ वर्ष तक श्री भूय ड़ ने राज्य किया। इसने श्री पत्तन नगरमें भूय डे वर का मन्दिर बनवाया । सं० ९५१ से लेकर २५ वर्ष तक श्री वैर सिंह ने राज्य किया। सं० ९७६ से लेकर १५ वर्ष तक श्री रत्नादित्य ने राज्य किया । सं० ९९१ से लेकर ७ वर्ष तक श्री सामन्त सिंह ने राज्य किया। इस प्रकार चा पोत्कट वंशमें सात राजा हुए । विक्रमादित्य संवत् ९९८ वर्ष तक [इस वंशका राज्य रहा।] [A प्रति और उसके साथ प्रायः मिलती हुई D प्रतिमें यह राजावली निम्नलिखित रूपसे मिलती है। सं० *८...(?) श्रावण सुदी ४ से १० वर्ष १ मास १ दिन श्री योगराज ने राज्य किया । सं० ८....श्रावण सुदी ५ उत्तरापाढ़ा नक्षत्र और धनुप लग्नमें रत्ना दि त्य का राज्याभिषेक हुआ । सं० ८....कार्तिक सुदी ९ से लेकर ३ वर्ष ३ मास ४ दिनतक इस राजाने राज्य किया । सं० ८....कार्तिक सुदी ९ रविवारको मघा नक्षत्र और वृषलग्नमें श्री वैर सिंह राज्यपर बैठा । सं० ८....ज्येष्ठ सुदी १० शुक्रवारसे लेकर ११ वर्प ७ मास २ दिनतक इस राजाने राज्य किया । सं० ८....ज्येष्ठ सुदी १३ को हस्त नक्षत्र और सिंह लग्नमें श्रीक्षेम राज देव का राज्याभिषेक हुआ। सं० ९३....भादो सुदी १५ रविवारको, इस राजाको राज्य करते, ३८ वर्ष ३ महीना १० दिन व्यतीत हुए थे। सं० ९३५ वर्षमें आश्विन सुदी १ सोमवारको रोहिणी नक्षत्र और कुम्भ लग्नमे श्री चामुण्ड राज देव का पट्टाभिषेक हुआ। सं० ९....माघ वदी ३ सोमवारसे लेकर १३ वर्ष ४ मास १७ दिनतक इस राजाने राज्य किया। सं० ९३८ (१) माघ वदी ४ मंगलवारको स्वाती नक्षत्र और सिंह लग्नमें श्री आ ग ड़ दे व राज्यपर बैठा । इसने कर्क रापुरी में आगड़े श्व र ओर क ण्ट के श्वरी के मंदिर बनवाये । सं० ९६५ पौष सुदी ९ बुधवारसे लेकर २६ वर्ष १ मास २० दिनतक इसने राज्य किया । सं० ९....पौष सुदी १० गुरुवारको आर्द्रा नक्षत्र और कुम्भ लग्नमें भूय गड़ दे व राज्यपर बैठा । इस राजाने भूय ग डे श्व र का मंदिर और श्री पत्त न में प्रकार वनवाया । सं० ९....वर्षसे आषाढ़ सुदी १५ से लेकर २७ वर्ष ६ महिने ५ दिनतक इसने राज्य किया। इस प्रकार चा पोत्कट वंशमें ८ पुरुष हुए। १९० वर्ष, २ मास, सात दिनतक इस वंशके राजाओंने राज्य किया।] * जिन प्रतियोमें यह पाठ मिलता है उनमे इन संवत् सूचक अंकोके विषयमे बड़ी गडबड़ी है। कहीं कोई अंक लिखा हुआ मिलता है और कहीं कोई । पंक्तियोंमे जो वर्ष मास आदि दिये गये हैं उनका इन अंकोंके साथ कोई मेल नहीं मिलता। इसलिये हमने इन अंकोके स्थान शून्य ही रखे हैं । आगेके भागमें जो ऐतिहासिक विवेचन किया गया है उससे इन अंकोंकी निरर्थकता मालूम हो जायगी।
प्रकरण २४-२५ ] मूलराजका प्रवन्ध . चौलुक्यवंशका प्रारंभ। २३ हाथी (मातङ्ग होनेके कारण ) सेवाके योग्य नहीं रहे, पहाड़ोंके पर गिर गये, कच्छप जड़ प्रीतिवाला है, शेपनागको दो जीमें हैं, इसलिये पृथ्वीको कौन धारण करने योग्य है-इस तरह चिन्ता करनेवाले विधाताकी सायकालीन सध्या चुल्लूसे कोई तलवारधारी वह सुभट उत्पन्न हुआ [जिससे चौलुक्यवशका प्रारभ हुआ।] [यह पद्य श्लेषायात्मक है और उस अर्थ ही में इसका कवित्व है । एक समय ब्रह्मदेव सध्या-ऋत्य कर रहे थे उस समय पृथ्वीकी दशाका उहे विचार आया । पृथ्वीको धारण करने योग्य कौन कौन पदार्थ है इसका विचार करते हुए उनके मनमें दिग्गजोंका खयाल आया-लेकिन वे असेव्य मालूम दिये क्यों कि वे मातग कहलाते हैं। (संस्कृत भाषामें मातग शब्दके दो अर्थ है-१ हायी, और २ चडाल)। फिर उहे कुलाचल पवतोंका खयाल आया, लेकिन वे पक्ष विहीन मालूम दिये (पुराणोंमें पर्वतोंके पक्ष यानि पर इन्द्रन काट डाले ऐसी कथा प्रचलित है।) संस्कृतमें पक्ष शब्दका अर्थ पाख भी होता है । फिर ब्रह्माका सयाल कूम यानि कच्छपकी ओर गया, लेकिन वह जडप्रीतिवाला मालूम दिया। जो जडके साथ प्रीति रखता हो वह पृथ्वीको धारण करने जैसा महान कार्य करने योग्य कैसे हो सकता है ? (सस्कृतमें जड यानि मूर्ख और जलपानी ऐसे दो अर्थ इसके होते हैं । कच्छपकी प्रीति जल यानि पानीके साथ होती ही है। इसके बाद ब्रह्माका ध्यान पणिपति शेषनागकी तरफ गया-लेकिन वह उहे दो-जीभा मालूम दिया। सर्पके दो जीभ होती ही हैं । ( सस्कृतमे द्विजिह्व-दो-जांभेका अर्थ चुगलखोर ऐसा निन्दात्मक भी होता है।) इसलिये जो दो-जीभा हो वह पृथ्वीका भार उठाने लायक नहीं हो सकता। इस प्रकार ब्रह्मा इनकी अयोग्यतामा खयाल र चिन्तामन हो रहे ये ओर चुल्लूमें पानी भरकर सध्याञ्जलि दनेका विचार कर रहे थे, उतनेमें उस चुल्लूमेंसे, हायमें तल्यार धारण किये हुए एक सुभट बाहर निकला और ब्रह्मदेवने उसे ही पृथ्वीका भार वहन करनेमें समर्थ और योग्य समझ कर उसे पृथ्वीका शासक नियत किया। उसकी जो सतान हुई वह चौ लुक्य वश के नामसे प्रसिद्ध हुइ 1] । ५. मूलराजका प्रबंध। २४) पूर्वोक्त श्री भूयराजके वशन मुजा ल देव के तीन पुत्र हुए जिनका नाम राज, बीज और दण्ड क था । ये तीनों भाई तीर्थयात्राके लिये निकले । श्री सोमेश्वर को नमस्कार करके वहासे लौटते हुए अण हि ल्ल पुर में आए । वहा पर वे सा मन्त सिंह राजाको धुड़दौड़ देख रहे थे । राजाने बिना ही कारण घोड़ेको कोड़ा मारा जिसे देखकर, राज नामक क्षत्रियने, जो कार्पटिक (कापड़िये) का वेश धारण किये हुए था, पीड़ित होकर अपना सिर हिलाते हुए, आह ! आह ! ऐसा शब्द कहा । राजाके उसका कारण पूछने पर उसने कहा कि, घोडेकी यह अत्युत्तम विशेष चाल जो न्युछन करने योग्य है, उसको न समझकर आपने जो कोड़ा मारा वह मुझे जैसे अपने ही मर्मपर लगा अनुभूत हुआ । उसकी इस बातसे चकित होकर राजाने वह घोड़ा उसीको चदनेके लिये दिया । घोड़ा ओर घुड़सवार दोनोंका सदृश योग देखकर उसने पद पद पर उनका न्युछन किया, और उसके इस आचरणसे किसी महत् कुलमाला उसे समझकर, अपनी लीला दे वी नामक बहनका उसके साथ न्याह कर दिया । कुछ समय बाद जब यह गर्भरती हुई तो अकालमें ही उसकी मृत्यु हो गई । मत्रियोंने, गर्भस्थ सन्तानका मरण न हो जाय इस विचारसे उसका पेट चीरकर सतानका उद्धार किया । मूल नक्षत्रमें जम होनेके कारण उसका नाम मूल राज रखा गया । उदय- फालीन सूर्यकी भाँति ज मसे ही तेजोमय होनेके कारण यह सबका आहरपान हो गया। अपने पराक्रमसे यह मामाके राज्यको बढ़ाता रहा । सामत सिंह मदमत्त होकर उसको कभी राज्यासनपर बिठा देता था और फिर १ यह पय चौद्धस्य वी आर उत्पत्तिका सूचक है। किसी कोई शिलालेगमें यह लिया गया मालूम देता है। बमाके चुल्लूमसे इस यशका मूल पुरुष पैदा हुआ और इसी रिये इस वशका नाम चौम्य हुआ, यह पीछेके भाट रोगोंकी कल्पना है और इसका कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है यह अगरे मागसे सर हो जायगा।
. २० ] प्रवन्धचिन्तामणि [प्रयम प्रकाश होशमें आकर उठा देता था। तभीसे चा पोत्क टों का दान उपहासके रूपमें मशहूर हुआ। वह इस प्रकार वार चार चिढ़ाया जानेपर एक दिन उसने अपने नौकरोंको तैयार किया और जब मामाने वेहोशीमें राज्यासनपर विठाया तो उसे मारकर सचमुच ही वह राजा बन गया । २५) सं० ९९३ के आषाढ़ सुदी १५ वृहस्पति वारको, अश्विनी नक्षत्र और सिंह लग्नमें, जन्मसे इक्कीसवें वर्षमें मूल राज का राज्याभिषेक हुआ । [B. P. आदर्शमें 'सं० ९९८ में श्री मूल रा ज का राज्याभिषेक हुआ' ऐसा पाठ मिलता है । ] २४. शास्त्रमें तो सुना जाता है कि मूलार्क (मूल नक्षत्रका सूर्य ) सब प्रकारका कल्याण करता है। लेकिन आश्चर्य है कि वर्तमानमें तो मूलराज ही ने ऐसा योग कर दिया है । [१२ ] *उस विभुने स्वप्नमें आकर कहा कि चा पोत्कट वंशके राजा है ह य भूपतिके वंशमें वंशो- ज्ज्वला कन्या है । अगर तुमको वह दान की जाय तो निःशंक भावसे उसके साथ विवाह कर लेना क्यों कि वह मृगाक्षी अपने उदरमें सार्वभौम ( चक्रवर्ती ) राजाको धारण करेगी। [१३ ] श्री गुर्जर मण्डल में उसकी कुक्षिसे श्री राजि राज का पुत्र राजा श्री मूल राज पैदा हुआ। अपने अद्भुत महाप्रभावसे, जब वह दिग्विजयके लिये उद्यम करता था तो उस समय केवल पृथ्वी ही नहीं काँप उठती थी परंतु उसके साथ उसके स्वामी राजाओंके दिल भी कॉप उठते थे। [श्रीसौराष्ट्र मण्डलमे श्री सा....सिंहके साथ युद्ध हुआ यह प्रबंध प्रसिद्ध हैx I] १४ ] जिसने अपने शत्रुओंको जीत लिया ऐसे उस राजाको गूर्ज रेश्वरों की राज्यधी, उसके गुणोसे आवर्जित होकर बाणरिपु (विष्णु) को लक्ष्मीकी तरह, स्वयं वरनेको आई । [१५] उस महा इच्छावाले राजाने कच्छ के राजा ल क्ष को, शत्रुको बुरी तरह घायल करनेवाले अपने बाणोंका लक्ष्य बनाया। [१६] उस असामान्य पराक्रमीने लाटे श्व र के दुरिणीय सेनानायक वा ण (र?)प को मारकर हाथियोंको ग्रहण किया था। १ गूजरातमे, उस जमानेमे शायद यह एक लोकोक्ति प्रचलित थी कि-'यह तो चाउडो का दान है। किया हुआ दान मिलेगा या नहीं और मिलनेपर भी वह स्थिर रूपसे रहेगा या नहीं-ऐसा जिस दान पर विश्वास नहीं किया जाता उसे लोग चाउडोका दान कहकर उसका उपहास किया करते थे। २ मूल राज शब्द पर यह श्लेप है । इसका दूसरा अर्थ मूलराज यानि मूलचंद्र यह निकाला गया। राज शब्द चंद्रमाका भी वाचक है । ज्योतिष शास्त्रके विधानानुसार सूर्य जब मूल नक्षत्रमें आता है तब वह मूलार्क योग कहलाता है। यह योग अनेक तरहके शुभ कल्याणोका करनेवाला माना जाता है। लेकिन यह राजा तो मूलार्क नहीं है मूलराज (=मूलचंद्र ) है, तो भी इसने अपने उदयकालमे वैसे ही अनेक कल्याणकारक योग कर बतलाए हैं, इसलिये यह खास आश्चर्यकी बात है। * १२ और १३ अंक वाले ये दोनो पद्य किसी पुरानी प्रशस्तिमेसे उद्धृत किये गये मालूम देते हैं। पहले पद्यमे यह बतलाया गया है कि-शायद शंभु या अन्य किसी देवने मूल राज के पिता रा जिराजको स्वप्नमें आकर यह कहा कि-चा पोत्कट वंश का राजा, जो है हय वंश का है, उसकी गुणवती कन्यासे विवाह करनेके लिये तुझसे कहा जाय तो उसे निःशंक होकर ब्याह लेना । क्यों कि उसकी कोखमे ऐसा गर्भ उत्पन्न होगा जो सार्वभौम राजा बनेगा । यह पद्य ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्त्वका है। इसमें चापोत्कट वंशको है ह य वंश कहा है । चावडाओके मूल वंशका विचार करनेके लिये यह एक नया उल्लेख है । विशेष विचारके लिये अगला विवेचनात्मक भाग देखना चाहिए। ४ यह पंक्ति, मूल प्रतिमे अपूर्ण ही प्राप्त हुई है। इसका स्पष्ट कथन क्या है सो ज्ञात नहीं होता । सौराष्ट्रके किसी राजाके साथ मूलराजके युद्ध होनेका इसमे उल्लेख किया गया मालूम देता है । यह पंक्ति दूसरी दूसरी प्रतियोमे नहीं मिलती।
करता था भोर कोई यमा पार निकल आरे टमद कि दायामाप प्रारण २५-२७] मूलराजका प्रवन्ध [२१ [१७] जिसने दानसे दारिद्यको नष्ट किया, शौर्यसे दुर्जनोंका दमन किया और कीर्तिसे रामचद्रको भी म्लानकर दिया ऐसे उस राजाने चिरकाल तक राज्यका उपभोग किया। इत्यादि स्तुतियों द्वारा पडित लोगोंसे प्रशसित होता हुआ वह इस प्रकार साम्राज्य कर रहा था, तब किसी अवसरपर सपादलक्ष देशका राजा, मूल राज पर चढ़ाई करनेके लिये गूर्ज र देश की सीमापर आया ! दूसरी ओर, उसी समय ति ल ग देश के राजाका वारप नामक सेनापत्ति भी चढ़ आया । इन दोनों से किसी एफफे साथ जब युद्ध शुरू होगा, तब दूसरी ओरसे दूसरा शत्रु आक्रमण कर बैठेगा, ऐसी परिस्थितिमें क्या करना चाहिए इसका विचार मूल राज अपने मत्रियोंके साथ करने लगा, तो उन्होंने कहा कि कुछ समय कन्या दुर्ग में "बैठकर व्यत कर देना अच्छा है, और जब नवरात्र आनेपर सपादलक्ष का राजा अपनी कुलदेवीकी आरा- धनाके किये चला जाय, तर अनसर पाकर वारप नामक सेनापतिको जीत लिया जाय । और इसके बाद वापस आनेवाले सपाद लक्ष के राजाका भी पराजय किया जाय । उनके इस प्रकारके विचार सुनकर राजा बोला कि ऐसा करनेपर क्या लोगोंमें मेरे भाग निकलनेकी निंदा न होगी। इसपर वे मत्री बोले- २५ [ परस्परके द्वन्द-युद्ध: ] भेडा जो पीछे हटता है वह प्रहार करनेके लिये है, और सिंह भी आक्रमण करते समय क्रोधसे सकुचित होता है । हृदयमें वैरभावको भर रखनेवाले और गूढ यत्र चलानेवाले बुद्धिमान लोग किसी अवगणनाकी परवा न करके [ सन कुछ ] सह लेते हैं। इस प्रकार उनकी बात सुनकर मूल राज ने कन्था दुर्ग में जाकर आश्रय लिया । इधर सपाद लक्ष के -राजाने गूर्ज र देशमें ही सारा वर्षाकाल बिताया और जब नवरात्रके दिन आए तो उस रणभूमिमें ही शा कम्मरी नगरकी स्थापना कर देवी भी वहीं मॅगा ली और वहीं नपरानकी पूजाका समारम्भ किया । मूल राज ने यह हाल सुनकर मत्रियोंके बतलाए हुए उपायको निरर्थक समझा । उसको तत्काल एक मति सूझ आई । राजकीर भेट-सौगाद भेजनेके बहाने उसने अपने सब आसपासके सामतोंको बुलया भेजा और फिर जामुमी सान करनेवाले अधिकारियोंके पाससे सभी राजपूतों और सैनिकोंको, वश और चरित्रसे, पहचान कर उन्हें योदित दान आदिसे सम्मानित किया और समयका सकेत बताकर उन सरको सपादलक्ष देयके राजके लिये आसपास तैनात कर दिया। निश्चित दिनपर स्वय, अपनी प्रधान साँढनीपर बैठकर उसके पारित सी भूमि पार करके, प्रात काल जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सके उस तरह, सपाद कृत्रों जावणीमें जा पहुँचा । साढनी परसे उतरकर हाथमें तलवार लेकर मूल राजने अकेले ही * द्वारपाटसे कहा-इस समय राजा किस काममें होते हैं । जाफर अपने स्वामीको दो दिन प्रवेश कर रहा है । यह कहता हुआ [ द्वारपालने कुछ आनाकानी की ते ] ले उद में द्वारपरसे हटा दिया। फिर जब वह ' यह श्रीमूल राज द्वारमें प्रवेश कर रहे -कन्सन्स था कि उतने तो वह, उस राजाके तनूके भीतर प्रवेश करके, राना पलंग त्रा देखकर क्षणभर तो यह राजा भयभीत होकर मौन ही रहा । ठ - उच्च पहा कि- क्या आप ही श्री मूल रा ज राज के मुझे 'इन्टअहिदनेने यह घुछ समयोचित बोलना चाहता था, उतनेमें तो पूर्व मटिलर टम रामाझे बड़े डेरे (तयू) को चारों औरसे घेर लिया। इसके बाद जानकार कहा-इन भूमण्डलमें, ऐसा कोई युवीर राजा, जो मेरे सामन उइट विकास बोद " - - २२ । प्रवन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश . - उपस्थित हुए हैं। किन्तु भोजनके समय मक्खी पड़ जानेके समान, इस ति लग देश के तै लिप नामक राजाके सेनापतिको, जो मुझे जीतनेके लिये आया है, जब तक शिक्षा न दे लूं तब तक आप पीछेसे हमला इत्यादि न करके रुक जाइये, यही अनुरोध करने में आपके पास आया हूं। मूल राज ने जब ऐसा कहा तो उस राजाने इस प्रकार कहा-राजा होकर भी अपने प्राणोंकी परवा न करके, सामान्य सैनिककी भाँति अकेले ही इस प्रकार शत्रुगृहमे प्रवेश करके चले आये इसलिये [ मैं तुम्हारे साहससे मुग्ध हूँ और ] जब तक जीऊंगा तब तक तुम्हारे साथ हमारी सन्धि बनी रहेगी। उस राजाके ऐसा कहने पर 'ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो' इस प्रकार निवारण करता हुआ, उसके द्वारा भोजनार्थ निमंत्रित होनेपर, अवज्ञापूर्वक अस्वीकार करके, वह हाथमें तलवार लेकर उठ चला और उसी सांढनीपर सवार होकर, अपनी उस सेनासे परिवृत होकर उस वार प सेनापतिकी सेनापर टूट पड़ा । उसे मारकर उसके दस हजार घोड़े और १८ सौ हाथी छीन कर, जितनेमें पड़ाव डालनेकी तैयारी कर रहा था, उतनेभे तो अपने गुप्तचरोंसे यह सब हाल सुनकर वह सपा द ल क्ष का राजा वहाँसे भाग निकला। २६) उस राजाने पत्त न में श्री मूल राज व स हि का [ नामक जैन मन्दिर ] और श्री मुखाल देव स्वामी ( शिव ) का प्रासाद बनवाया । वह प्रति सोमवारको शिवकी भक्ति करनेके निमित्त सो मे वर पत्तन ( सोमनाथ पाटन ) की यात्राको जाता था। उसकी इस प्रकारकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर सोमनाथ उपदेश देकर म ण्ड ली न गरी में आये । उस राजाने वहाँ ' मूलेश्वर' नामका मन्दिर बनवाया । नमस्कार करनेकी इच्छासे हर्षित होकर वहाँपर नित्य आनेवाले उस राजाकी, उस प्रकारकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर, सोम नाथ ने यह कहा कि मैं समुद्रके साथ तुम्हारे नगरमें अवतीर्ण हूँगा । यह कहकर सोमेश्वर अण हिल्ल- पुर में अवतीर्ण हुए। आये हुए समुद्रकी सूचना मिले इसलिये नगरके सभी जलाशयोका पानी खारा होगया । उस राजाने वहाँपर त्रिपुरुष प्रासाद नामक शिवका मन्दिर बनवाया । २७ ) इसके बाद, वह उस प्रासादके प्रबंधक होने योग्य किसी उचित तपस्वीकी खोज करते हुए उसने एक कान्य डी नामक तपस्वीका नाम सुना, जो सरस्वती नदीके किनारे, एकान्तर दिनको उपवास किया करता था और पारणाके दिन अनिर्दिष्ट भिक्षाके पाँच ग्रासका आहार किया करता था। जब राजा उसकी वन्दना करने गया, तो उस समय उसे तीन दिनका ज्वर था। उसने अपने ज्वरको कंथामें संक्रा मित कर दिया । राजाने उसे देखकर पूछा कि-यह कन्या ( गुदड़ी) काँप क्यों रही है ? । राजाके साथ बात करनेमें असमर्थ होनेके कारण मैंने ज्वरको उसमे संक्रामित किया है-ऐसा कहनेपर, राजा बोला-यदि इतनी शक्ति है तो फिर ज्वरको सर्वथा दूर क्यों नहीं कर देते ? । राजाके यों कहनेपर उसने- २६. पूर्वजन्मके सञ्चित हमारे जो कोई भी रोग हो वे अब उपस्थित हों । मैं उनसे अनृण होकर शिवके उस परम पदको प्राप्त होना चाहता हूँ। शिव पुराण के इस वचनको कह कर बताया कि-'कर्म भोगे विना क्षय नहीं होते' यह जानते हुए मैं इसे कैसे दूर कर सकूँ ? । राजाने फिर त्रिपुरुष धर्म स्था न क के प्रबंधक होनेके लिये उससे प्रार्थना की। २७. अधिकार मिलनेसे तीन महीनोंमें, और मठका महन्त बननेसे तीन दिनोमें [ नरक प्राप्त होता है ]; और अगर शीघ्र ही नरकप्राप्तिकी इच्छा हो तो एक दिन पुरोहित बन जाओ । इस स्मृति-वाक्यके तत्त्वको जानते हुए, तपरूपी नौकासे संसार सागरको पार करके मैं फिर इस गोष्प- दमें कैसे डूबना चाहूं। इस वाक्यसे निषिद्ध होकर राजाने [ और कोई उपाय न सोच कर ] ताम्र-शासनको . - - प्रकरण २७-२१] मूलराजका प्रबन्ध [२३ मण्डक (परोठे) में वेष्टित करके भिक्षाके लिये आये हुए उस तपस्वीके पत्रएटमें छोड़ दिया। वह उसे न जानता हुमा टेकर वहसि टौट गया। यधपि सरस्वती नदीने पहले तो उसे मार्ग दे दिया था, पर इस बार पर जानेसे जब उसे मार्ग नहीं मिटा, तो यह जन्मकाटसे टेकर अपने दोषोंका विचार करने लगा। तात्कालिक मिक्षा साधी दोपको जाननेके लिये जब उसे देखता है, तो उसमें उस राजाफा दिया हुआ ताम-शासन मादम दिया । इससे तपस्वीको क्रुद जानकर, राजा वहाँ आया और उसकी सान्चनाके लिये यह जम अनुनय पिनय करने लगा, तो उसने यह कह कर कि-मैंने स्वय जो दाहिने हायसे दान ग्रहण किया है यह अन्यथा कैसे होगा, अपने शिष्य व यजल देव को राजाको सौंपा । उस व यजल देव ने कहा कि-शरीरमें उपटनके टिये हमको प्रतिदिन आठ पल उत्तम जातिका चदन, चार पल कस्तूरी, एक पल कपूर तथा पतीस पासंग- नार, और जागीरके साथ खेत छत्र प्रदान करो, तो मैं प्रधाफा पद स्वीकार फसँगा। राजाने राप देनेका स्वीकार कर, त्रिपुरुप धर्म स्थान में उसे 'तपस्वियोंका राजा' के पदपर अभिषिक्त किया। यह 'फफूछोए इम नामसे प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकारके भोगोंको भोगते हुए भी यह अकुटिल भारसे मनचर्य जतमें निरत रहा। एक बार रातको मूल राज की रानी उसकी परीक्षा लेने लगी तो उसे पानका बीडा मार फर पुष्ठिनी या दिया और फिर अनुनीत होकर उसे अपने उपटनके लेपसे और स्नानके मैले जलसे स्नान करवा कर नोरोग किया। यहापर लाखाफकी उत्पत्ति और विपत्तिका प्राय भी दिया जाता है- २८) प्राचीन कालमें, किसी परमार वशमें, राजा की तिराज देवकी का ग ल ता नामकी सपफी थी। यह याल्यकाठमें, सपियोंके साथ, किसी महलके आगनमें खेल रही थी । सखियोंने कहा कि अपना अपना पर वरण करो । घोर अधकारमें उस कागल ता की ऑषोंका मार्ग बंद हो जानेसे, उसने पूल नागफ पशुपालका, जो उस महलके एक खमेकी ओटमें सड़ा हुआ था और जिसे यह फुछ भी वृत्तात माश्म नहीं था, यरण कर लिया । इसके अनन्तर, युछ वर्षों के बाद, जन किसी अच्छे यरोंकी सोग उसके लिये की जा उगी, तो पतिमता मनके निर्वाह के विचारसे, उसने अपने माता पितासे अनुज्ञा लेकर उसी (पशुपाल )मे विवाद किया । उन दोनोंका पुत्र लापाक हुआ । वह कष्ठ देश का राजा बना । य शोराज को उसने [ अपो पराक्रमसे ] सुश किया था और उसकी वही कृपासे यह सबसे अनेय हो गया था । उसने ग्यारह पार गूल. राज की सेनाको प्रामित किया था। एक यार, जर कि यह लागा, फपिल फोट फे किग रहा हुआ था उसी समय, राजा (म्ल राज)ने स्वय जाकर उसे घेर लिया। यह लक्ष (बागाक) पो माहेश नामक पफ परम साहसी मुभटके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा-निसको कि उसने कही धाद पादने के लिये भेगा था। यह बात जानकर मूटराज ने उमफे आगमाके मार्ग धेर ठिये । कार्य समाप्त करके आते हुए उग मापसे राजपुरुषोंने कहा 'हथियार ण दो। अपने सामीफे कार्यको मिहिके लिये उसने यमाही फरफे गुस्फे लिये प्रस्तुत ला माफ के पास आकर प्रणाम किया। इसके बाद सप्रामके अयसरपर- २८ 'उगे हुए सूर्पने जो प्रताप नहीं पाया तो हे टागा! यद दिन निर फदा जागा है। गिनी फरसे सौ आए कि दस दिन मिसपते है । पग पचनामा पर माइमा किएपंग उदय होनेर भी यदि निगा उगा सेना शा-अपरभणारगोर टगतिको निमामि माना है। मोर पुलया ये गुर उRURA समानाकार रनरी रानोला उमा टगन ना नि मा सारे। २ल गरमगाम मार-पीर पुलभ एमप मानेर मामा रे उपासना सनसनी रोगना पुस्मन २४] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश इत्यादि प्रकारके बहुतसे बोध-वाक्य उस भृत्यके सुनकर और उसकी उत्कट वीरता देखकर लक्ष का साहस खूब बढ़ा और उसने मूल राज के साथ बरावर तीन दिन तक द्वन्द-युद्ध किया । मूल राज ने उसकी अजेयता देखकर चौथे दिन सोमेश्वर का स्मरण किया। रुद्रकी कला जब उसके अन्दर अवतीर्ण हुई, तो [ उसके प्रभावसे ] उसने ला खा को मार डाला । बादमें ला खा की देह जब पृथ्वीपर गिरी हुई पड़ी थी तब हवाके संचारसे उसकी हिलती हुई दाढीको मूल राज ने पैरसे छुआ । इसपर लक्ष की माताने कुपित होकर यह शाप दिया कि तुम्हारा वंश लूति ( कुष्ठ ) रोगसे मरा करेगा। २९. मूल राज ने अपने प्रतापाग्निमें लक्ष को होम करके उसकी त्रियोंके आँसूओंकी धाराको उन्मुक्त किया । ३०. सहसा लंबे जालमें आये हुए लक्ष रूपी कच्छप ( कछुआ और कच्छका राजा ) को मारकर जिसने संग्रामरूपी सागरमें अपनी धी-वरताका परिचय दिया +1 ३१. हे मूल राज ! दानरूपी लता, बलि के समयमें पृथ्वीमें पैदा हुई, दधीचि के समय उसकी जड़ जमी, राम के होनेपर उसमें अंकुर उगे, कर्ण के समय उसमें डाल और टहनियां निकलीं, नागार्जुन के समय कलियाँ प्रकट हुई, वि क मा दित्य के समय फूली और तुम्हारे समयमें आमूल फलवती हुई। ३२. तुम्हारे शत्रुओके [सूने ] महल, जो वर्षाकालमें, वादलोंके पानीसे स्नान करते हैं, उनके ऊपर जो तृण उग आये हैं उसके बहाने मानों वे कुश लिये हुए हैं, नालीके पानीसे मानो श्राद्धकी अञ्जलि दे रहे हैं, और दीवालके ढोंकोंके गिरनेके मिससे पिण्डदान करते हैं; इस प्रकार अपने स्वामीक प्रेतके लिये वे प्रतिदिन श्राद्ध कर रहे हैं। -इस प्रकार लाखा फूलोतकी उत्पत्ति और विपत्ति का यह प्रबंध है ॥ ११ ॥ २९) इस प्रकार उस राजाने पचपन वर्ष तक निष्कण्टक राज्य किया। एक बार सायंकालकी आरतीके अनन्तर राजाने एक दासको इनाममे पानका बांडा दिया। उसने हाथमे लेकर देखा तो उसमें कृमि दिखाई दिये। राजाके आग्रह पूर्वक पूछनेपर उसने यह बात कही । इससे राजाको वैराग्य आया और उसने संन्यास ग्रहण किया और दाहिने पैरके अंगूठेमें अग्नि प्रज्वलित कर, आठ दिनतक गज दान इत्यादि महादान देता रहा । ३३. एकमात्र विनय भावके वशी भूत होकर उसने पैरमें लगी हुई उध्दूमकेश अग्निको सहन किया। अन्य प्रतापियोंकी तो बात ही क्या है, उसने सूर्यके मण्डलको भी भेद दिया । इस प्रकारकी स्तुतियोंसे स्तुत होते हुए उसने स्वर्गारोहण किया । सं० ९९८ से लेकर ५५ वर्ष श्री मूल राज ने राज्य किया । ॥ श्रीमूलराज प्रबंध समाप्त ॥ १ यह श्लोक श्लेषार्थवाला है-लक्ष होम के दो अर्थ होते हैं-लक्ष लाखा राजाका होम, और लक्ष एक लाख वार होम । आकाशमे बादलोकी वृष्टिका किसी कारणसे जब रुकाव हो जाता है तो उसके प्रतिकारके लिये एक लाख आहुतियो वाला होम करनेका वैदिक शास्त्रोमें विधान है। इधर, लाखाकी रानियां, जो कभी रुदन नहीं करती थीं, उनके आसूरूपी वृष्टिका प्रवाह चालू करनेके लिये, मूलराजने अपने प्रतापरूपी अग्निमे लाखाको होम दिया-भस्म कर दिया। + इस श्लोकमे 'कच्छपलक्ष' और 'धीवरता' शब्द पर श्लेष है । मूलराजने कच्छप-कच्छपति लक्षराजको मारकर अपनी धीवरता श्रेष्ठ बुद्धिमत्ताका परिचय दिया । दूसरा अर्थ कच्छपलक्ष यानि एक लाख कछुए, और उस अर्थमें धीवरका अर्थ मच्छीमार ऐसा किया गया है। - - - प्रकरण ३०-३४ ] मूलराजादिका प्रबन्ध [२५ मूलराजके वंशज। [१८] अपने सारे शत्रुओंको समाप्त करके जब वह-(मूल राज)-कथाशेप होगया ( मृत्युको प्राप्त हुआ) तो उसके बाद पृथीमण्डलका आभूषण ऐसा चामुण्ड राज राजा हुआ। [१९] उसकी सेनाका साज, शत्रुओंकी स्त्रियोंके मनको सतप्त होनेकी विद्या सिखानेमें निपुण पण्डित था और उसके सैन्यने इन्द्रको भी भयभीत कर दिया था। [२०] उसके हाथरूपी कमलमें रहनेवाली, कोश (१ म्यान, २ कमल) में विलास करनेसे चमकती हुई तलवार रूपी भौरोंकी श्रेणीने राजाओंके वशोंको भिन्न कर दिया । ३०) सवत् १०५३ से लेकर १३ वर्पतक चामुण्ड राज ने राज्य किया। [२१ ] जिसकी कीर्ति तीनों लोकोंमें प्रकाशित हो रही है, और जो महीपतियोंमें श्रेष्ठ माना जाता है ऐसा वल्लभ राज नामक उसका पुत्र राजा हुआ। [२२] वह दृढ़ पौरुषवाला राजा शत्रुओंकी नगरियोंको घेरे रहता था इसलिये विशेषज्ञोंने उसका नाम 'जगत् झम्पन रक्खा था। ३१) स० १०६६ से लेकर ६ महीने तक राजा वल्लभ राज ने राज्य किया। [२३ ] जिसमें रजोगुण और तमोगुणका अभाव था और जिसके जैसा यश प्राप्त करना औरोंके लिये अत्यत दुर्लभ था, ऐसा दुर्लभ राज नामका उसका छोटा भाई [उसके बाद ] राजा हुआ। [२४] साँपकी भाँति, काल करवाल ( कठिन तलवार ) से सुरक्षित होकर उसका राज्य, निधानके समान, अन्यों ( शत्रुओं )का भोग न हो सका । [२५] सौभाग्यसे प्रकाशमान उस राजाका कर ( १ हाथ, और २ मालगुजारी ) सर्वथा अनुपभोग्य ऐसी परस्त्री पर और ब्राह्मणोंको प्रदान की हुई भूमिपर, कभी नहीं पड़ा । ३२) स० १०६६ से लेकर ११ साल ६ महीने तक श्री दुर्लभ राजने राज्य किया । इस राजा दुले भने पत्त न में 'दुर्लभ सर' नामक सरोवर बनवाया । [२६] फिर, उसके भाईका लड़का 'भीम' नामक राजा हुआ जिसकी प्रवृत्ति तीनों जगत्को अभीष्ट फल देनेपाली हुई। - [ यहाँ A आदर्शका अनुसरण करनेवाली मुद्रित पुस्तकमें, यह समय-सूचक पाठ इस प्रकार है-] [ इसके बाद स० १५० (११०५२) श्रारण सुदी ११ शुक्रवारको पुष्य नक्षत्र और वृष लग्नमें श्री चा मुण्ड राज का राज्यारोहण हुआ। इसने पत्तन में चन्द्र नाथ देव और चा चिणेश्वर के मन्दिर बनाये। स० ५५ (१ १०६५) आश्विन सुदी ५से लेकर १३ वर्ष १ मास २४ दिन राज्य किया। स० १०५५ (११०६५) आश्विन शुदी ६ मगळवार, ज्येष्ठा नक्षत्र, मिथुन लग्नमें श्री वल्लभ राजदेव गद्दी पर बैठा। इस राजाने जब माल वा देशकी धारा नगरी के प्राकार (फिलेको) घेर रखा था उसी समय शीली रोगसे इसकी मृत्यु हुई। इसके दो बिरुद थे-'राज मदन श कर' (राजारूपी कामदेवके लिये शिन) और जगज्ज्ञम्पन स० १० (१०६६) चैत्र सुदी ५ से लेकर ५ महीने २९ दिन तक इस राजाने राज्य किया। ७-८ २६ ] प्रवन्धचिन्तामणि [प्रयम प्रकाश . सं० १५५ (१०६६) चैत्र सुदी ६ गुरुवारको, उत्तरापाढ़ा नक्षत्र और मकर लग्नमें, दुर्ल भराज नामक उसका भाई राज्यपर अभिपिक्त हुआ । इसने पत्त न में व्ययकरण ( कचहरी ), हस्तिशाला और घटी- गृह युक्त सात तल्लेवाला धवलगृह ( राजप्रासाद ) बनवाया । अपने भाई वल्लभ राज के कल्याणार्थ मदनशकर प्रासाद बनवाया और दुर्लभ स र नामक सरोवर भी बनवाया । इस तरह बारह वर्ष इसने राज्य किया । ] [प्रबन्धचिन्तामणिकी इस A संज्ञावाली प्रतिमें चौलुक्य वंश के इन राजाओंका कालक्रम आदि कुछ भिन्न क्रमसे लिखा हुआ मिलता है जिसका भी संग्रह करना ऐतिहासिक दृष्टिसे कुछ उपयोगी होगा ऐसा समझ कर हमने . इन कोष्ठकान्तर्गत कंडिकाओमें उसे मुद्रित किया है। यह कालक्रम सूचक पाठ भी चा व डों के कालक्रम सूचक उस द्वितीय पाठके समान अपूर्ण और अव्यवस्थित है। हमारा अनुमान होता है कि ग्रंथकारने पहले पहल जब यह कालकमके बतलानेवाले उल्लेखों और संवतोंका संग्रह करना शुरू किया होगा और वृद्ध जनोसे तथा अन्यान्य लेखोसे इस विषयके प्रमाण एकत्रित करने प्रारंभ किये होंगे, उस समयका लिखा हुआ जो प्राथमिक असंशोधित आदर्श रहा होगा उस परसे यह A संशक आदर्श (तथा उसके समान जातीय अन्य आदर्श) की प्रतिलिपि हुई होगी और इसलिये इनमें यह असंशोधित कालक्रमवाला पाठ वैसाका वैसा नकल होता हुआ चला आया हुआ होना चाहिए । संशोधित पाठ वही है जो ऊपर मूलमे दिया गया है ।] ३३) इसके बाद [ A D प्रतिके अनुसार 'सं० १०५ (१०७८) ज्येष्ठ सुदी १२ मंगलवारको अश्विनी नक्षत्र, मकर लग्नमें' ] श्री भी म नामक अपने पुत्रका राज्याभिषेक करके स्वयं तीर्थोपासनाको वास- नासे वाणा र सी के प्रति प्रस्थान किया । मा ल व क म ण्ड ल में पहुँचनेपर वहांके महाराजा मुख ने रोक कर इस प्रकार कहा कि-'छत्रचामरादि राज-चिन्होंका परित्याग करके कार्पटिक (संन्यासी) की भॉति आगे जाओ, नहीं तो युद्ध करो'। बीच ही में उत्पन्न ऐसा इसे धार्मिक विघ्न समझकर, यह वृत्तान्त भी म रा ज को कहलाया और स्वयं कार्पटिकका वेश पहन कर तीर्थयात्रा की; और वहींपर परलोक साधन किया। ३४) इसीके दाद मा ल वा के राजाओंके साथ गूज रात के राजाओंका दृढमूल ऐसा विरोधका बंधन घंध गया।
मकरण ३५-३७ ] . मुअराज प्रबन्ध [२७ ६. मुञ्जराज प्रवन्ध । - ३५) अब यहापर प्रसझसे आया हुआ, माल या मण्डल के मण्डनरूप श्री मुखराज का चरित्र वर्णन किया जाता है -प्राचीन कालमें, उस मण्डलका परमार व शी राजा, जिसका नाम श्री सिंह भट था, राजपाटी निर्मित परिभ्रमण करते हुए, उसने मुजके बनमें एक सद्य जात अति रूपवान् बालकको देखा ओर स्वकीय पुरके समान वात्सल्य भार धारण करके उसे उठा लिया और महलमें लाकर रानीको समर्पण किया। मुजके वनमें प्राप्त होनेके कारण उसका नाम मुख रक्खा । बादमें उसके एक सीन्ध ल नामक ओरस पुन भी पैदा हुआ। [एक समय ] नि शेप राजगुणोंके समूहसे भूपित ऐसे उस मुझ का राज्याभिषेक करनेकी इच्छासे राजा उसके महल में गया । मुश अपनी स्त्रीको, जो उस समय यहा उपस्थित थी, किसी एक वेत्रासनकी ओटमें निठाकर, प्रणाम पूर्वक राजाकी सेवा करने लगा । राजाने उस प्रदेशको निर्जन देखकर प्रारभसे लेकर उसके जम आदिका वृत्तान्त कह सुनाया और फिर कहा कि-तुम्हारी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर अपने ओरस पुत्रको छोड़कर, तुम्हें राज्य दे रहा हूँ, पर इस सीन्ध ल नामक भाईके साथ पूरे प्रेमके व्यवहारके साथ वर्तना । इस प्रकारको आता देकर राजाने उसका अभिषेक किया। कहीं, अपने ज मका यह गुप्त वृत्तान्त बाहर न फैल जाय इस आशकासे उसने अपनी उस स्त्रीको मार डाला । बादमें उसने अपने पराक्रमसे सारे भूतलको आक्रान्त किया और समस्त विद्वज्जनोंके चक्राती जैसे रुद्रादित्य नामक पडितको महामत्री बनाकर अपने राज्यको चिताका समस्त भार उसे सौंपा । उस सीन्ध ल नामक भाईको, जिसने अपने उत्कट स्वभावके कारण राजाका कुछ आज्ञाभग किया था, स्वदेशसे निर्वासित कर, चिरकाल तफ निष्कटक राज्य करता रहा । ३६) वह सीन्ध ल गूजरात देश में आकर, अर्बुद पर्वतकी तलहटामें काश ह द नगरके निकट अपना एक छोटा सा गाँर बसा कर रहने लगा। दीपालीकी रातको शिकार खेलने निकला । चोरोंको वध करनेवाली भूमिके निकट एक सूअरको चरते देख, उसने सूलीपरसे गिरे हुए एक चोरके शवको न देख कर, उसे घुटनोंसे दया कर, जब वह अपना वाण चलाने लगा, तो उस शरने [ मारनेका ] सकेत किया । उसे हाथ लगा कर मना करते हुए, उस वाणसे सूअरको मार गिराया। बादमें जन सूअरको अपनी ओर खीचने लगा तो यह शन जोरोंका अहास करके उठ खड़ा हुआ । इस पर सीन्धुल ने कहा-तुम्हारे किये हुए सकेतके समय मूअरपर प्रहार करना उचित था, या समझ बूझकर जो मैंने प्रहार किया वह ठीक था " उसके इस वास्यके पूरा होनेपर, यह छिद्रान्वेपी प्रेत, उसके ऐसे नि सीम साहससे सन्तुष्ट होकर बोला कि यरदान माँगो ।' ऐसा कहनेपर- मेरे वाण जमीनपर न गिरें' ऐमा माँगा, उस शरने कहा 'और भी कुछ मांगो।' इसपर उमने कहा कि-'मेरी भुजाओंमें सारी लक्ष्मी स्वाधीन हो।' उसके साहससे चकित होकर उस प्रेतने कहा कि तुम मालपमण्ड 8 में जाओ। यहाँ मुश राजाका विनाश निकट है, इसलिये तुम वहीं जाकर रहो। तुम्हारे ही वशमें यहाँ राग्य रहेगा । इस प्रकार उसके कथनानुसार यह वहाँ गया और मुश राजामे कोई एक सपत् शादी प्रदेश प्राम फर, कुछ काठ वाद, फिर उसी प्रकार उद्धत भारसे यर्तन लगा। एक बार एक तेठीसे कुश मांगी। उसने नहीं दी । इसपर युपित होकर, बटाकार पूर्वक छान कर, और उसे मरोड कर उसके गले टाल दी। तेलीने राजाके आगे पुकार की । रानाने समझा बुझाकर उसे सीधी करवाई। उसके ऐसे उत्कट चटसे राजा मुश मपभीत हो गया। इसके बाद, मालिश करनेमें बड़े दुशल ऐसे कुछ कटापन्त विदेशसे वोपर आये । थे राजास मिले । राता उनसे अपने शरीरमें मालिश फराने लगा। वे भी अपनी फलामे हाथ पैर आदि भग । २८] प्रवन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश उतार कर फिरसे वैसे चढा देते थे। इस प्रकार दो तीन वार कराया । प्रसन्न होकर राजा सीन्धल का भी इसी प्रकारका मर्दन करवाने लगा। उसके अंगोंके उतार लेनेपर जब वह निश्चेष्ट हो गया तो आंखें निकलवा ली। [क्यों कि ] सुसज्जित अवस्थामें तो उसकी आँख निकालनेमें कौन समर्थ हो सकता था ?। अतः इस प्रकार मुञ्ज ने उसकी आँखे निकलवा ली और फिर उसे काठके पीजरे में बंद करा दिया। उसके भोज नामक पुत्रका जन्म हुआ। उस पुत्रने सभी शास्त्रोका खूब अभ्यास किया । छत्तीस प्रकारके आयुधोंका आकलन कर, वहत्तर कलारूपी समुद्रका पारगामी वना । इस तरह सभी लक्षणोसे युक्त होकर वह बडा होने लगा। उसके जन्म समय किसी निमित्तज्ञ ज्योतिषीने जन्मकुण्डली बना कर दी [ जिसमें लिखा था कि-] ३४. पचपन वर्प, सात मास, तीन दिनतक भोज राजा गौड़ देशके साथ दक्षिणापथका भोक्ता होगा। इस श्लोकके अर्थको जब मुज राज ने समझा, तो सोचा कि इसके रहनेपर मेरे लड़केको राज्य नहीं होगा; इस आशंकासे उसने भोज को, वध करनेके लिये अन्त्यजोंके सुपुर्द किया। उन्होंने रातको उसकी मधूर मूर्ति देखकर, अनुकम्पाके साथ कांपते हुए कहा कि-अपने इष्ट देवताको याद करो। इसपर भोज ने निम्नलिखित काव्य, पत्रपर लिखकर, मुञ्ज राज को देनेके लिये समर्पण किया। ३५. सत्ययुगके अलंकारके समान वह राजा मान्धा ता चला गया। जिस रावण के शत्रु राम चन्द्र ने महासागरमे सेतु बांधा था वह भी आज कहां है ? और फिर युधिष्ठिर प्रभृति अनेक राजा जो आपके समय तक हो गये हैं, सत्र चले गये; पर यह पृथ्वी किसीके भी साथ नहीं गई ! पर मैं समझता हूं, तुम्हारे साथ तो जायगी ! राजा उसे पढकर मनमें अत्यन्त खिन्न हुआ और बालहत्या करनेवाले अपने आपकी निन्दा करने लगा। [ २७ ] हाय, हे भोज ! मरण कालमे कहा हुआ तुम्हारा काव्य हृदय वेध रहा है । दौभाग्यके स्थान समान मुझ पापी, दुष्टको तुम्ही शरण हो । [२८] हे गुणागार भोज ! तुझ विना इस राज्यसे मुझे क्या काम है ? अरे कोई चिता सजा दो, ता- कि मैं मरकर जाकर भोजसे मिले । तब मंत्रियोने राजाको प्रबोधित करते हुए यह वाक्य कहा- [ २९ ] हे स्वामिन् ! यह अति अज्ञान सूचक है जो इस तरह अब आप बोल रहे हैं । जानना वही प्रमाण है जो ऐसी कदर्थनाका कारण न हो - इस प्रकार वारंवार विलाप करने लगा। ३७) बादमें, उनके पाससे अत्यन्त आदरके साथ बुलवाकर उसे युवराजकी पदवी देकर सम्मानित किया । तै लिप देव नामक ति लङ्ग देश के राजाने सेना भेज कर उस ( मुञ्ज ) पर आक्रमण किया उस समय रु द्रा दित्य नामक महामंत्री रोगग्रस्त था; उसके वारंवार निषेध करनेपर भी मुज ने उसके ऊपर चढाई करना चाहा । [ मंत्रीने कहा- [३०] हे महाराज ! हमारी सीख मान लीजिये, अवहेला न कीजिये । तुम्हारे उधर चले जानेपर इस ( मुझ ) मंत्रीको भीख माँगनी पडेगी । [३१] तुम्हारे बैठे रहनेपर और मेरे लॉघ ( चले ) जानेपर राजाका राज्य रुल जायगा । ऐसा होनेपर बडा ही अकाज होगा और उसकेलिये नुम मालवके धनी जानो।. ?
। प्रकरण ३७] मुखराज प्रवन्ध [२९ [३२] हे स्वामिन् ! यह महेता (महत्तम महामात्य) पिनति करता है कि-अब हमारा यह आखिरी जुहार (नमस्कार) हो । हमें [ जानेका ] आदेश हो । क्यों कि हम तुम्हारे सिरपर राख पडती देख रहे हैं। इस प्रकार मत्रीके निषेध करने पर भी वह सेनाके साथ चला।] [मत्रीने आखिर में कहा कि-] गोदावरी नदीको सीमा मान उसे लाँधकर आगे प्रयाण न कीजियेगा। इस प्रकार मत्रीने शपथ देकर आगे न जानेके लिये रोका था; तथापि मुञ्ज ने यह विचार कर कि पहले छ बार उसे जीता है, जोशमें आकर उस नदीको पार करके, सामने किनारे जाकर पड़ार डाला | रुद्रा दित्य ने जब राजाके उस वृत्तान्तको सुना, तो उसकी अग्नियशीलताके कारण कोई मागी विपद आने वाली है, यह सोचकर स्वय चिताग्निमें प्रवेश किया। इसके अनन्तर तै लिप ने छल और बलसे उसकी सेनाको तितर-बितर कर मुख राजा को गिरफ्तार कर लिया और मूजकी रस्सीसे बाँध उसे कारागारमें बन्द कर दिया । काठके पिंजड़ेमें उसे रक्खा गया था और राजा ते ठिपकी बहन मृणाल व ती उसकी परिचर्या करती रहती थी। मुख का उसके साथ पत्नीका-सा स्नेह सम्बन्ध हो गया। उधर पीछे रहे हुए उसके मत्रियोंने एक सुरंग खुदवाई और उसके जरिये मुञ्ज को सकेत करवाया। इतनेमें, एक बार जब वह दर्पणमें अपना प्रतिपिंत्र देख रहा था, तो उसी समय मृणाल व ती, अनजानमें, पीछे आ खड़ी हुई । उमने भी दर्पणमें अपने बुढापेके जर्जर मुखको देखा और फिर देखा कि युवक मुज राज के मुँहके पास उसका मुँह अत्यन्त भद्दा दिखाई दे रहा है। इसलिये उसे उदास होते देख मुज ने कहा- ३६ मुख कहता है कि-ऐ मृणालयती ! गये हुए यौचनको झुरो मत, यदि सक्करकी डली पीसी जा कर सैकड़ों टुकड़ोंमें छिन्न भिन्न हो जाय, तो भी वह मीठी चूर ही लगती है । इस प्रकार कह कर [ उसे शात बनानेका प्रयत्न किया ], बादमें अपने स्थानको जाने की इच्छा- चाला होते हुए भी मृणाल व ती का विरह वह नहीं सह सकता था, और भयसे उसे वह वृत्तान्त भी कह नहीं सकता था । बार बार [मृणाल व ती के] पूछनेपर भी, अपनी चिता न कह सका । बिना नमककी और अधिक नमक दी हुई रसोई खाकर भी जब वह उसका स्वाद नहीं जान सका तो, मृणाल व तीने अत्यत आग्रह और प्रेमपूर्वक पूछा, तब वोला कि मैं इस सुरङ्गके रास्ते अपने घर जानेवाला हूँ। यदि तुम भी वहाँ चलो तो मैं तुम्हें पटरानीके पदपर अभिषिक्त करके अपने प्रसादका फल दिखाऊ । इसपर उसने कहा कि क्षणभर प्रतीक्षा करो, तब तक मैं अपने गहनोंकी सन्दूक ले आऊ । यह कहकर उस कात्यायिनी ( ढलती उमरकी विधवा ) ने सोचा कि यह वहाँ जाकर मुझे छोड़ देगा, अपने भाई राजासे यह वृत्तान्त जाकर कह दिया । इस पर वह राजा, उसकी विशेष विडम्बना करनेके लिये, बन्धनमें कर प्रतिदिन भिक्षाटन कराने लगा। वह घर घर घूमता हुआ, खिन्न होकर उदासीके इन वचनोंको बोला करता । जैसे कि- ३७ वे नर मूर्ख है जो स्त्रीपर विश्वास करते हैं, जिस स्त्रीके चित्तमें सौ, मनमें साठ, और हृदयमें बत्तीस आदमी बसा करते हैं। और भी- ३८. .. यह मुस जो इस प्रकार रस्सीमें बन्धा हुआ बदरकी तरह घुमाया जा रहा है, वह बचपन-ही में झोलीके जानेसे गिरकर क्यों न मर गया, या आगमें जल कर राख क्यों न हो गया । तर किन्हीं सजन पुरुषोंने दिलासा देते हुए कहा कि- - .
३० ] प्रवन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश [३३] हे रत्नाकर, हे गुणपुज मुज! चित्तमें इस प्रकार विपाद न करो । क्यों कि जिस प्रकार विधाता ढोल वजाता है उसी तरह मनुष्यको नाचना पड़ता है। फिर किसी और दयाचित्त सज्जनने कहा- [३४] हे मुञ्ज ! इस प्रकार खेद न करो। क्यों कि भाग्यक्षय होनेपर वह रावण भी नष्ट हो गया, जिसका गढ़ तो लंका था और जिस गढ़की खाई खुद समुद्र था और उस गढ़का मालिक खुद रावण दस माथेवाला था। इसी प्रकार- ३९. हाथी गये, रथ गये, घोड़े गये, पायक और भृत्य भी चले गये । महता ( महामात्य ) रुद्रादित्य भी स्वर्गमें बैठा आमंत्रण कर रहा है ! बादमें, एक अवसरपर, किसी गृहस्थके घरपर वह भिक्षाके लिये ले जाया गया। उसकी स्त्री उस समय छोटे पाड़ेको छास पिला रही थी। उसने उसको भिक्षाके लिये खड़ा देख कर गर्वसे कन्धा ऊँचा किया और भीख देनेका इन्कार किया। इसपर मुख बोला- ४०. हे भोली मुग्धे ! इन छोटेसे पाडों ( भैसके बच्चों ) को देख कर ऐसा गर्व न कर । मुख के तो. चौदह सौ और छहत्तर हाथी थे, पर वे भी चले गये । उसने इस प्रकार उत्तर दिया- [३५] जिसके घर चार बैल है, दो गायें है और मीठा बोलने वाली ऐसी [ मैं ] स्त्री हूँ, उस कुटुंबी (कणवी=किसान ) को अपने घरपर हाथी बाँधनेकी क्या जरूरत है ? एक दूसरी बार जब कि मुज को इस प्रकार इधर उधर घुमाया जा रहा था, तब, राजा किसी बावडी पर बैठा हुआ उसे देख कर हँसने लगा। इस पर वह बोला- [ ३६ ] ऐ धनके अन्धे मूढ़ ! मुझे विपत्तिग्रस्त देखकर हँसता क्या है ?-लक्ष्मी कभी कहीं स्थिर- होती देखी है ? तूं क्या इस जलयंत्र-चक्र ( अरहट) की घटियोंको नहीं देखता जो क्रमसे खाली होती है, भरती हैं और फिर खाली होती हैं । इसी तरह पीछे लगकर चिढ़ानेवाले आदमियोंको देखकर उसने कहा- [३७ ] मैं उन पर वारी जाता जो गोदावरी नदीके ऊपर ही अटक गये (मर गये), जिन्होंने न इन दुर्जनोकी ऋद्धि देखी और न इस विह्वल मुज को देखा । फिर अपनी मन्दबुद्धिताका स्मरण करता हुआ इस प्रकार बोला- [३८] दासीको कभी प्रेम नहीं होता यह निश्चित जानना चाहिए । देखो, दासीने राजा मुश्व र को घर घर भीख माँगता करवाया। [३९] और जो लोग अपना बडप्पन छोड़कर वेश्या और दासियोमें राचते हैं वे मुजरा जा के समान बहुत ही अनादर सहन करते हैं। [४०] हे * मर्कट (बंदर)! इसलिये तुम अफसोस न करो कि मैं इस वीके द्वारा खंडित किया जा रहा हूँ। राम, रावण, और मुञ्ज आदि कैसे कैसे लोग स्त्रियोंसे खंडित नहीं हुए ? * मदारी लोग बंदर और बंदरियाका जब खेल करते हैं तब, बंदरिया रूठकर बंदरका अपमान करती है और बंदरसे पानी भरवाना चक्की चलवाना आदि काम करवाती है । बंदर अपमानित होकर मुंह फेर बैठ जाता है और हाथसे अपने सिरको पीटता है। इस दृश्यपर किसीकी यह उक्ति है। - -- - . " - - . प्रकरण ३७-३८] । मुखराज प्रयन्ध [३१ [४१] ऐ यन्त्र, +चरखा ! तुम इसलिये न रोओ कि मैं इस सी द्वारा भमाया (घुमाया) जा रहा हूँ। ये तो कटाक्ष फेंक कर ही ( मनुष्योंको ) घुमाया करती हैं, तो फिर हायसे खींचने पर की वातका तो कहना ही क्या है। [४२] मुअ कहता है कि, हे मृणालपती! जो बुद्धि पीछे उत्पन्न होती है, वह अगर पहले ही हो जाय तो कोई वित आकर घेर नहीं सकता । [१३] जो राजा दशरथ देवताओंके राजा (इन्द्र) के तो मित्र थे, और यज्ञ पुरुपके तेज अशके समान रामके पिता थे, वही पुत्रपिरहके दु खसे शय्यापर ही पडे पडे मर गये, उनका शरीर जटते हुए तेटके मटकेमें रक्खा गया और बहुत दिनोंके बाद उसका सस्कार हुआ । हाय, फर्मकी गति टेदी है। [४४ ] मिरपर विधु ४ (चद्रमा और विधाता ) के वक हो कर आ बैठने पर, शिरके सदृश जो सत्र देवताओंके गुरु हैं उनका भी कैसा हाल हो गया है सो तो देखो। उनके पास अटकारमें तो मात्र नर-कपाल है जिसे देखते ही डर लगता है, परिवार में जिसका सारा शरीर छिन भिन्न है ऐसा एक भृगी है, और सम्पत्तिमें एक ढलती ऊमरका बूदा बैल है ! फिर हम लोगोंके सिरपर जो विधि यानि विधाता या हो कर आ बैठे तो क्या क्या हाल न हो। इस प्रकार चिरकाल तक भिक्षा मँगनाने वाद राजाकी आज्ञासे मुझ को क्य-भूमिमें ले गये । वहाँ पहले पहननका उसका घन ले लिया गया। तब वह बोला- [१५] यह कमर जो हमेशां मतवाले हाथी के ऊपर ही बैठकर चलनेवाली थी, जो सदा विचित्र सिंहासनपर ही बैठती थी और जो अनेक रमणियोंके जघनस्थल पर लालित होती थी, वह आज इस प्रकार विधिवश पिना यसको कर दी गई। तर मुपाने पूछा कि-' किस प्रकार मुझे मारोगे' [ उत्तर मिला ] 'वृक्षफी शाखामें टटका कर ।' सर यह योडा- [१६] कहाँ तो यह महारनमें रहा हुआ पृक्ष है और कहाँ हम समारफा पालन करनेवाले राजाओंफे पुत्र ! अहो, कमी न घट सकनेयाली यातको घटाने में पटु ऐमा यद विधिका चरित यहा दुरबोध है। उन्होंने कहा कि 'इष्ट देयताको याद फरो' इस पर यह घोटा- ११ इस यशके पुजके समान मुश के गत होनेपर, लक्ष्मी है सो तो रिशुके पास चटी नायगी और पारश्री है यह पीर मन्दिरमें घटी जायगी, किन्तु [ और कोई आश्रयस्थान न मिउनेसे ] सरस्पती सो निराश्रित हो जायगी। +श्रीजर पाचगरेप उगमे इस प्रभारी अपात्र निकली है। ठम मगर पर किसीकी अरे मन रापण गरोभर गुमा रही है ये मानों परणारा है। श्री कतारे, मार परमा माद्रीरोग्या मागे भी मनुष्य पूमन भगो, यो रिरको पर भी राम शिरासी। xमार विधी पत्रे मी'm TV पर रगत पिशु 'म पदरा मा है और 'विधि Nuri rinामिदर एक पननने 'पिधी' पेण नाशप मे yि पर रोने और दूसरे पकने fN सोनेर'ऐश अप पराया गया है।
३२]. प्रवन्धचिन्तामाणि [प्रथम प्रकाश इस तरहके उसके अन्य बहुत वाक्य हैं जो परम्पराके अनुसार जानने चाहिये । बादमें उस मुख को मारकर उसका सिर सूलीमें पिरोकर अपने आँगन में रखवाया और उसमें रोज दही लगवा लगवाकर अपने अमर्पका पोषण करता रहा । ४२. जो मुज यशका पुल था, हाथियोंका पति था, अवन्ती का स्वामी था, सरस्वतीका पुत्र था, प्राचीन कालके जैसा कृती पुरुष था; वही काट देश के राजाके द्वारा अपने मंत्रीकी कुबुद्धिसे पकड़ा गया और सूलीपर चढ़ा दिया गया। हाय, कर्मकी गति कैसी विषम है । . * ३८) उसके बाद, माल वा मण्डल के मंत्रियोंने जब यह वृत्तान्त सुना तो, उन्होंने फिर उसके भतीजे भोज को राज्य पदपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार श्रीमेरुतुगाचार्य रचित प्रबंधचिन्तामणि ग्रन्थका राजा श्रीविक्रमादित्य प्रभृति महासाहसिक और परोपकार-आदि गुणरूपी रत्नोंसे अलंकृत राजाओंके चरित्र' नामक यह पहला प्रकाश समाप्त हुआ। * मालूम होता है मुंजकी यह करुण कथा उस जमानेमें बहुत लोक प्रसिद्ध और लोक साहित्यकी विशिष्ट वस्तु बनी हुई थी । मेरुतुझसूरिने जो यहाँ पर ये कुछ संस्कृत, प्राकृत और देश्य पद्य दिये हैं वे या तो भिन्न भिन्न कर्तृक मुंज विषयक प्रबंधोंमेसे उद्धृत किये गये हैं; या परंपरासे सुनकर लिख लिये गये हैं। मुंजकी इस कथामे एक तो संपत्तिकी अस्थिरता और दूसरी स्त्रीकी अविश्वसनीयता और तीसरी मुंज जैसे महाबुद्धिवान् शक्तिवान् राजाकी, दुश्मनके द्वारा की गई त्रासोत्पादक विटंबना- इन तीन बातोका विचित्र संघटन हो जानेसे उपदेशकोको अपने उपदेशकोलिये यह एक वास्तविक घटनाका बतलानेवाला करुण रसका बोधदायक आख्यान ही मिल गया । अभी तक निश्चय नहीं हो सका कि इस कथामे ऐतिहासिक तथ्य कितना है और प्रवन्धकारोंकी बनावट कितनी है । यहॉपर जो पद्य दिये गये हैं वे तो प्रबन्धकारोंकी उपदेशात्मक उक्तियाँ मात्र हैं । कुछ पद्य तो मेरुतुङ्गसूरिके भी पीछेके बने हुए हैं और किसीने प्रसंगोचित समझकर इस ग्रंथमें प्रक्षिप्त कर दिये हैं। १. दही लगवाने का मतलब यह कि उसे देखकर कौए आवे और उस मस्तकपर बैठे। किसी दुश्मनका बहुत ही बुरा चाहना होता है तब लोग बोला करते हैं कि उसके सिरपर तो कौए बैठेगे। उसी लोकोक्तिका सूचक यह कथन है। 7 प्रकरण ३९-४२ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३३ ७. भोज और भीमका प्रवन्ध । . ३९) इसके बाद [स० १०७८ के साल ] जब माल व मण्डल में श्री भोज राज राज्य करता था, तब इधर गूर्जर भूमि में चोलुक्य चकार्ति भी म पृथिनीका शासन करता था। एक रात्रिके अन्तमें राजा भोज ने, अपने चित्तमें लक्ष्मीकी अस्थिरताको विचारते हुए और अपने जीवनको भी तरगकी भाँति चञ्चल समझते हुए, प्रात कृत्यके बाद, दानमण्डपमें बैठकर नौकरोंके द्वारा याचकोंको बुला, यथेच्छ सुवर्ण टकोंका (सोनेकी मोहरोका ) दान देना प्रारभ किया । ४०) इस पर, रोह क नामक उसके मत्रीने, खजानेका नाश होता देख, राजाके औदार्य गुणको दोप समझते हुए उसे रोकनेके लिये अय उपायोंसे समर्थ न होकर, एक दिन सरिसर (न्याय सभा) के उठ जाने बाद सभामण्डपके भारपट्ट पर खड़ियासे इन अक्षरोंको लिख दिया-आपत्ति कालके लिये धनकी रक्षा करनी चाहिए। प्रात काल यथा समय राजाने उन अक्षरों को पढ़ा। सभी परिजनोंमेंसे किसीने भी जब उस कार्यके करनेका स्वीकार नहीं किया तो राजाने उसके साथ यह लिख दिया-भाग्यवानको आपत्ति कहा है। इस पर मत्रीने जबापमें लिखा कि-कभी देव कुपित हो जाय तो । इस पर राजाने फिर उसके सामने लिख दिया कि-[तर तो ] सश्चित भी विनष्ट हो जायगा। इससे निरत्तर होकर उस मत्रीने अभय वचन माँगकर उस कथनको अपना लिखा बताया। बादमें राजाने कहा, कि मेरे मनरूपी हाथीको ज्ञानरूप अकुशसे वशमें रखनेके लिये महामानके समान ५०० पण्डितोंका यह समूह यथेच्छ रूपसे अपना अपना ग्रास प्राप्त किया करें। राजाने अपने जीवनका ध्येय सूचित करनेवाली ऐसी चार आर्याओंको अपने कङ्कणपर खुदनाई जिनका अर्थ यह है- ४४ यही उपकार करनेका अवसर है, जब तक कि स्वभावत ही चञ्चल ऐसी यह सम्पत्ति विद्यमान है। फिर वह विपत्ति कि जिसका उदय भी निश्चित है, उसके आनेपर उपकार करनेका अवसर कहाँ रहेगा। ४५ हे पूर्णिमाके चन्द्रमा ! अपने किरण-समूहकी समृद्धिसे अभी आज इस सारे भुवनको उज्ज्वल कर दे । [ फिर यह मौका न मिलेगा, क्यों कि ] निर्दय विधाता चिरकाल तक किसीका सुस्थिर होना सह नहीं सकता। ४६ ऐ सरोवर ! दिन और रात याचकोंका उपकार करनेका यही असर है । यह जल तो उन पुराने बादलोंके उदय होनेपर फिर सर्प-सुलभ ही है। ४७ ऐ किनारेके वृक्षोंको गिरा देनेनाली नदी! यह सुदूर तक उन्नत दिखाई देनेवाला पानीका पूर तो कुछ ही दिनों तक ठहरेगा, पर यह एक पातक (पेड़का गिरा देना) तो चिरस्थायी होकर रहेगा। और फिर- १ इसरा मतलब यह है कि राजा भोजने अपने पास ५०० पहित रक्से थे जिनके निवाहके लिये राज्यकी ओरसे स्थायी प्रासका प्रबध कर दिया गया था। २ पुराने जमाने में यह एक प्रथा थी कि-विचारशील लोग, जिस रिसी सद्विचारको अपना जीवन ध्येय मना लेते ये उराका सतत स्मरण रहा करे इसलिये उस विचारके सूत्रो अपने हायके क्यणपर उत्कीर्ग क्रा (पुदा) रेते ये और उसका छदैव अपोरन किया करते थे । वस्तुपाल आदि अन्य भी महापुरुषोंने अपने जीवनसूत्र कणपर सुदवा रकम थे। २ , ५०. ३४] प्रवन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकाश ४८. सूर्यके अस्त होनेके पहले जो धन याचकोंको नहीं दे दिया गया, मैं नहीं जानता, वह धन प्रातःकाल किसका होगा। इस प्रकार अपना ही बनाया हुआ यह श्लोक जो मेरे कण्ठका आभरण-सा होगया है उसको इष्ट मंत्रकी तरह जपता हुआ, हे मंत्रिन् ! मैं आप जैसे प्रेतके समान [ लोभी ] पुरुपसे कैसे ठगा जा सकता हूँ। ४१) एक दूसरे अवसरपर, राजा राजपाटिकामें घूमता हुआ नदीके किनारे जा खडा हुआ। वहाँ सिरपर काठका भारा उठाए हुए और पानीको लॉघ कर आते हुए किसी दरिद्री ब्राह्मणको देखा। उससे उसने पूछा कि- ४९. ' कितना है पानी ब्राह्मण ! ' उसने कहा-'घुटने तक हे राजा । राजाने फिर पूछा- तेरी अवस्था ऐसी क्यों ? ' वह बोला-'आप जैसे सब कहीं नहीं !' उसके इस वाक्यको सुनकर राजाने जो पारितोपिक उसे दिया, मंत्रीने धर्म-खातेमें इस प्रकार लिख रखा- जानुदन" ( जानुतक ) कहनेवाले ब्राह्मणको सन्तुष्ट होकर भोजने एक लाख, फिर एक लाख, फिर एक लाख; और उसपर दस मतवाले हाथी; इस प्रकार दान दिया। ४२) एक दूसरी बार रातमें, आधीरातको राजाकी अचानक नींद खुली । उस समय आकाशमण्डलमें चंद्रमा नया ही उदित हुआ था । उसे देखकर वह अपने विद्यारूपी समुद्रके उठते हुए तरंगके जैसा यह काव्याई वोलने लगा- ५१. यह चंद्रमाके भीतर, बादलके टुकड़ेकी-सी जो लीला कर रहा है लोग उसे शशक (खर- गोश ) कहते हैं, किन्तु मुझे वह ऐसा नहीं मालूम देता । राजाके वारंवार ऐसा कहनेपर, कोई चोर जो उसी समय सेंध मारकर, कोशगृहमें घुसा था, अपने प्रतिभाके वेगको रोकने में असमर्थ होकर बोल उठा- • मैं तो चंद्रमाको ऐसा समझता हूँ कि तुम्हारे शत्रुओंकी विरहाक्रान्त तरुणियों (लियों) के कटाक्षरूपी उल्कापातके सैकड़ों व्रणके चिन्हसे वह अंकित हो रहा है। उसके ऐसा बोल पडने पर, अंगरक्षकोने उसे पकड लिया और कारागारमें बंद कर दिया। इसके बाद प्रातःकाल, सभामें ले आये हुए उस चोरको राजाने जिस पारितोषिकसे पुरस्कृत किया, उसे धर्म-खाताके काममे नियुक्त अधिकारीने इस प्रकार लिखा- ५२. उस चोरको, जिसे मृत्युका भय लगा हुआ था, राजाने ऊपर लिखे दो चरणोंके लिये प्रसन्न होकर यह दान दिया-दस करोड़ सुवर्ण मुद्रायें और ऊपर आठ हाथी, जो दाँतोंके आघातसे पर्वतका भेदन करते थे और जिनके मदसे मुदित हो कर भौरे गुञ्जारव किया करते थे। [फिर एक बार खिड़कीकी जालीसे आते हुए चंद्रमाको देख कर बोला- [४७ ] हे सुभ्र ! खिड़कीकी जालीमेंसे प्रवेश करनेके कारण जिसकी चाँदनी खंड खंड हो गई है, वह चंद्रमा, तुम्हारे वक्षःस्थल पर आकर विराज रहा है। उसी समय घरमें प्रवेश करनेवाले चौरने कहा- यह चन्द्रमा मानों तुम्हारे स्तनके संगकी आसक्तिके वश होकर आकाशमेंसे झंपापात कर नीचे कूदा है और दूरसे गिरनेके कारण खंड खंड हो गया है । इस चोरको भी उसी तरहका दान दिया गया और उसे धर्म-बहीमे लिख लिया गया।] , प्रकरण ४३-४४] भोज और भीमका प्रबन्ध [३५ ४३) इसके बाद, एक वार, जब वह बही [ राजाके आगे] बाची जाने लगी तो राजा अपनेको बड़ा उदार दानी मानकर घमडरूपी भूतसे आविष्ट होनेकी भाँति- ५३ मैंने वह किया जो किसीने नहीं किया, वह दिया जो किसीने नहीं दिया, वह साधना की जो असाय थी, इसलिये [अब ] हमारा चित्त दुखित नहीं है। इस प्रकार वारवार अपने भाग्यको प्रशसा करने लगा। तब किसी पुराने मत्रीने, उसके अभिमानको दूर करनेकी इच्छासे, श्री विक्रमादित्य की धर्म-वही राजाको दिखाई । उसके ऊपरवाले विभागमें शुरूमें ही पहला काव्य इस प्रकार था- ५४ तुम्हारे मुखकमलमें 'सरस्वती' वसती है, ' शोण' तो तुम्हारा अमर ही है, और रामचन्द्रके वीर्यको स्मृति दिलानेमें पटु ऐसी तुम्हारी दक्षिण भुजा ' समुद्र' है । ये वाहिनियाँ (सेना और नदियाँ) सदा तुम्हारे पास रहती हैं, क्षणभर भी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ती, और फिर तुम्हारे अदर ही यह स्वच्छ मानस ( मानसरोवर, मन ) है, तो फिर हे राजन् , तुम्हें जलपानकी अभि- लापा क्यों हो? इस काव्यक पारितोषिकमें राजाने इस प्रकार दान दिया था- ५५ आठ करोड़ स्वर्णमुद्रा, ९३ तुला मोती, मदमत्त भौरोंके कारण क्रोधसे उद्धत ऐसे ५० हाथी, चलनेमें चतुर ऐसे दस हजार घोड़े और सौ वेश्यायें,-यह सन जो पाण्डय राजाने दण्डके स्वरूपमें विक्रम राजाको भेट किया था, वह उसने उस वैतालिकको दानमें दे दिया। इस प्रकार उस कान्यके अर्थको जानकर, विक्रम की उदारतासे अपने सारे गर्न सर्वस्वको पराजित मानकर, उस बही की पूजा करके उसे यथास्थान रखना दिया। ४४) एक समय, प्रतीहारने आकर सूचित किया-' महाराजके दर्शनके लिये उत्सुक ऐसा एक सरस्वती-कुटुम्ब द्वारपर खडा है । 'शीघ्र प्रवेश कराओ' राजाकी ऐसी आज्ञा होनेपर पहले उसकी दासीने प्रवेश १ २ " करके कहा- ५६ बाप भी विद्वान् है, वापका बेटा भी विद्वान् है, मॉ भी विदुपी है, मॉकी लड़की भी विदुपी हे, जो उनकी विचारी कानी दासी है वह भी विदुपी है, इसलिये हे राजन् ! मैं समझती है कि यह सारा कुटुम्ब ही विद्याका एक पुञ्ज है। उसके इस हास्यकर वचनसे राजाने जरा हँसकर, उनमेंके सबसे बड़े पुरुषको बुलाया आर यह समस्या दी-असारसे सारका उद्धार करना चाहिये ।' [ उसने इसकी पूर्ति इस तरह की-] ५७ धनसे दान, वचनसे सत्य, और वैसे ही आयुसे धर्म और कीर्ति तथा शरीरसे परोपकार-इस प्रकार असारसे सारका उद्धार करना चाहिये । १ किसी समय विक्रम राजाने अपने नोकरसे पीनेको पानी मागा तर पासमें बैठे हुए किसी करिने यह पर बनाया और राजाको सुगाया। इसमें, सरस्वती, शोण, दक्षिण समुद्र, मानस और वाहिनी इतने शन्दॉपर श्लेष है। ये सर शब्द घर्थक हैं, जिनमें एक अर्थ प्रसिद्ध जलाश्रय याचक है और दूसरा अन्याय वाचक है । यथा-सरस्वती १ नदी, २ विद्यादेवी, शोण: १ नद, २ लाल्वर्ण, दक्षिण समुद्र=१ महासागर, २ मुद्रापाला हाय, वाहिनी-१ सेना, २ नदी, मानस सरोवर, २ मन । २ इस पामें जो सामग्री वर्णित की गई है वह विक्रम रानाको दक्षिणरे पाण्डय राजाने दण्डके रूपमें दी थी और उसी सामग्रीको विक्रमने क्सिी वैतारिक यानि स्तुतिपाठक कविको, उक्त श्लोरके कहनेपर पारितोषिकके रूप-दानमें दे दिया, यह इसका तात्पर्य है। - .
३६] प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश इसके बाद राजाने उसके पुत्रको [ यह समस्या दी ]-'हिमालय नामक पर्वताका राजा है ! - 'प्रवाल (तृणाङ्कुर) की शय्याको शरीरका शरण' बनाया। राजाके इस वाक्यको सुनकर उसने उत्तर दिया- ५८, वह जो हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है, तुम्हारे प्रतापरूपी अग्निसे पिघल रहा है; और विरहसे आतुर बनी हुई मेना ( हिमालय-पत्नी मेनका ) अपने शरीरको प्रवाल (तृणांकुरों) की शय्याके शरण कर रही है। इस प्रकार उसके समस्या पूरी कर देनेपर, ज्येष्ठकी पत्नीको राजाने समस्याका यह पद अर्पित किया- किससे पिलाऊँ दूध ? ५९. जब रावण पैदा हुआ तो उसके एक शरीरपर दस मुँह देख कर उसकी माता बड़ी विस्मित हुई और सोचने लगी कि कौनसे मुँहसे इसे दूध पिलाऊँ ? -उसने इस प्रकार यह समस्या पूरी की। इसके बाद राजाने दासीसे भी इस प्रकारका पद सयस्याके लिये दिया-'कंठमें काक लटक रहा है।' ६०. पतिविरहसे कराल बनी हुई किसी स्त्रीने उस बेचारे कौवेको उडाया तो, बड़ा आश्चर्य मैंने है सखि ! यह देखा कि वह काक उसके कंठमें लटक रहा *। उसने इस तरह पूरा किया। राजाने उस कुटुंबमेंकी लड़कीको भूलकर, अन्य सबको सत्कार करके बिदा किया । बादमे राजाने जब सर्वावसर ( राजसभा ) का विसर्जन किया और स्वयं चन्द्रशाला (चॉदनी महलके ऊपरकी छत ) की भूमिमें छत्र धारण करके टहल रहा था, तब द्वारपालने उस लड़कीका वृत्तान्त कहा। राजाने उसे [ बुलाकर ] कहा-'कुछ बोलो'-तो वह बोली कि- ६१. हे राजन् , हे मुञ्जकुलके दीपक, हे समस्त पृथ्वीके पालक, राजाओंके चूड़ामणि ! इस भवनमे रातमे भी, तुम इस प्रकार छत्र धारण करते हो वह उचित ही है। इससे न तो तुम्हारे मुखकी कांतिको देखकर चंद्रमाको लज्जित होना पड़ता है और न भगवती अरुन्धतीको (पर पुरुषके मुखदर्शनसे) दुःशीलताका भाजन होना पड़ता है। उसके इस वाक्यके अनन्तर राजाने, जिसके चित्तको उसके सौन्दर्य और चातुर्यने हरण कर लिया था, उससे विवाह करके अपनी भोगिनी बनाया । * इस पद्यमें 'काउ' इस देश्य शब्दपर श्लेष है । काउ काग-काक-कौआ वाचक तो प्रसिद्ध है ही-इसके सिवा गलेमें जो एक लटकता हुआ छोटासा मांसपिंड है उसका नाम भी काक-काग (गूजराती-कागडा ) है । कोई विरहिनी स्त्रीका शरीर इतना कृश होगया है कि जिससे उसके कंठमें लटकता हुआ काग स्पष्टतया बहार दिखाई देता है। उसके घरके सामने आ आकर कौआ बोलता है, जिसका यह अर्थ समझा जाता है कि, उसका स्वजन आनेवाला है। लेकिन उसके वारंवार ऐसा चोलने पर भी वह जब नहीं आता मालूम देता है तो फिर वह विरहिनी चिढकर उस कौवेको उडा देती है। इस कौवेके उडाते समय उसके पासमें बैठी हुई सखिको उसके दुर्बल कंठमेका वह काग नजर आया । इस अर्थकी घटना बतलानेके लिये कविने इस पद्यमे ' काउ' शब्दका प्रयोग कर उसकी समस्यापूर्ति बनाई है। इस ग्रंथके गुजराती और इंग्रजी भाषांतरकारोने इन पद्योंके कुछके कुछ उटपटाग अर्थ किये हैं।
, - प्रकरण ४५-४६ ] भोज और भीमका प्रसन्ध [३७ भोजकी गूजरातके राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्धा । ४५) इसके बाद, एक समय, सधिपत्रके होते हुए भी, सन्धि दोष उत्पादनके विचारसे मोज राजगने गूर्जर देश की बुद्धिमत्ताका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने साधिविग्रहिकके हाथ, भीम के पास यह [प्राकृत ] गाया लिख भेजी- ६२ क्रीडा मात्र जिसने हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण किया हो और चारों दिशामें जिसका प्रताप फेल रहा हो उस सिंहका, मृगके साथ न तो विग्रह ही [शोभता है ] और न सन्वि ही रहती है। भी मने इस गाथाका उत्तर देनेके लिये सब महाकवियोंमे गाया माँगी। पर उनकी बनाई सब गाथाओंको नि सारार्थक देखकर वह सोचमें पड़ गया। उसी समय नगरमेंके जेन मन्दिरके अन्दर नाचनेके लिये सज बनी हुई नर्तकीको खमेके पास खड़ी हुई देखकर मत्रीने नहीं बैठे हुए किसी आचार्य-शिष्यसे स्तभ-वर्णनके लिये कहा । वह बोला- [४८] हे स्तभ ! तुम जो इस मृगनयनी नवयोपनाकी, ककणाभरण आदिसे सज्जित बाहुलतासे [वैष्टित होकर भी ] न स्वेद-युक्त होते हो, न हिलते हो और न काँपते हो, सो सचमुच ही तुम पथरके चने हो यह निश्चित होता है। [आचार्य-शिष्यकी विद्वत्ताकी यह वात जब मनीने राजासे कही तो राजाने [ उसके गुरु ] आचार्यको बुलाकर उस विषयमें पूछा- ६३ विधाताने मीम को अन्ध क के * पुत्रों को मारने के लिये ही निर्माण किया है। जिस भी मने सौ [अधक पुत्रों ] को कुछ नहीं गिना उसके सामने तुझ अकेलेकी क्या गणना है ! इस प्रकार गोविन्दाचार्य की बनाई हुई चित्तको चमत्कृत कर देनेपाली इस गाथाको दूतके हाय मेजकर, सन्धिके दोषको दूर किया । ४६) वादमें किसी एक रातको, जाइके दिनों में, राजा जब चीरचर्यामें चूम रहा था, तो किसी मन्दिरके सामने, किसी पुस्पको यह पढ़ते सुना- ६४ मेरा पेट भूग्यसे व्याकुल है, ओंठ फट गये हैं, ऐसी अवस्थामें सकते फकते आग ठडी हो गई है, चिन्ताके समुद्र में डूब रहा हूँ, शीतसे मापके फटकी तरह मिकुड़ गया हूँ। निद्रा अपमानिता खीकी भाँति कहीं दूर चली गई है, ओर सत्पानमें दी गई लक्ष्मीकी भाँति रात भी खतम नही हो रही है। यह सुनकर रात बिताकर सपेरे उसे बुलाकर पूछा- किस प्रकार तुमने रात्रिशेपमें शीतका अत्यन्त उपन्य सहन किया। सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मी ' इयादि कथनकी ओर सकेत करके उसने कहा था। [यह योगा-] ' महाराज ! मैं सूर गादे तीन पत्रोंसे जाड़ा काटता हूँ।' राजाने पूछा कि तुम्हारे ये तीन चस क्या है । तर उसने फिर कहा- ६५ रातमें घुटने, दिनमें सूर्य और दोनों शामको आग, इस प्रकार हे रानन् । घुटने, सूर्य और आगके वटपर में शीत काटता हूँ। जन उसने इस प्रकार कहा तो राजाने उसे तीन टासका दान देकर सन्तुष्ट किया। ६६. तुमने अपनी भामाको धारण करके बलि, कर्ण आदि उन त्यागमती धनवान पुरुषोंको मुकार * यहाँर 'अप' इस शम्पर पहै। कौरवोश रिता धाराष्ट्र अपाया इसलिये उसको मधफ कहा है। मोनका पिता सिंभुल भी अपाया ये उमस भी अधिक सार्थक है। - ३८ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश दिया, जो सज्जनोंके चित्तरूपी कैदखानेमें आबद्ध थे । इस प्रकार जव वह सारवान् काव्यका उद्गार प्रकट कर रहा था तो राजाने उसका परितोपिक देनेमें अपनेको असमर्थ समझ कर अनुरोधपूर्वक रोक दिया। [ यहाँ P. B. नामक प्रतिमें निम्नांकित वर्णन अधिक पाया जाता है-] [ ४९ ] शीतसे रक्षा करनेके लिये पटी ( वस्त्र ) नहीं है, आग सुलगानके लिये सगड़ी नहीं है। कमर भूमिपर घिस गई है-सोनेको शय्या नहीं है, कुटियामें हवाके रोकनेका कोई उपाय नहीं है, खानेको मुठ्ठीभर चावल नहीं है, घड़ीभर भी मनमें संतोप नहीं है, श्रृंगार की कोई वृत्ति नहीं है, मनको प्रसन्न करनेवाली कोई प्रिया नहीं है, लेनदारोसे संकटमें पड़ा हूँ; ऐसी दशामें है भोजराज ! तुम्हारे कृपारूपी हाथी द्वारा ही मेरी इस आपदाकी तटीका नाश हो सकता है। इस श्लोकमें आई हुई ग्यारह टी' के हिसाबसे भोज राजा ने उसे ११ लाखका दान दिया । एक वार, किसी विद्वत् कुलके निवासके लिये घर देखे जा रहे थे। उनके न मिलनेपर राजाने कहा कि जुलाहों और मच्छीमारोंको उजाड़ दिया जाय । जब राजपुरुप उन्हे उजाड़ने लगे तो एक जुलाहा उन्हें रोककर राजाके पास गया, और बोला कि-महाराज ! क्यों हमें उजाड़ रहे हैं ? तो राजाने पूंछा-क्या तूं कविता करता है ? वह बोला- [५० ] जिसके चरणोपर राजाओंके मुकुटके मणि लोटते रहते हैं ऐसे हे सा ह सां क महाराज ! मैं काव्य तो करता हूँ पर सुन्दर नहीं कर पाता । जैसा-तैसा करता हूँ पर सिद्ध नहीं होता। मैं उसका क्या करूँ ? मैं कविता करता हूँ, कपडा बुनता हूँ और अब जाता हूँ। धीवरकी बहू भी हाथमें माँस लेकर राजाके पास गई और बोली- [५१] ' महाराज, तुम्हारी जय हो!' 'तू कौन है ? लुब्धक (धीवर) की बहू ।'-' हाथमें यह क्या है ?'-' मांस !'- सूखा क्यों है ? '-' यो ही'-और यदि महाराज ! आपको कौतुक हो तो कहती हूँ कि तुम्हारे शत्रुओंकी प्रियाओंके आँसूकी नदीके किनारे सिद्धोंकी बियाँ गान करती है । गीतमें अन्धे होकर हरिण चरते नहीं । इसलिये उनका यह मांस दुर्बल हो गया है । इस प्रकार उक्ति-प्रत्युक्तिमय ये दो काव्य सुनकर राजाने उन्हे नगरके भीतर स्थापन किया। एक बार, कोई विद्वान् , जो गर्वोद्धत था, उस नगरके निवासियोको घरमें ही गरजनेवाले समझकर अवज्ञापूर्वक वादके लिये आया । नगरके समीप किसी पुरुषसे (धोबीसे) जो वस्त्र धो रहा था बोला-'अरे साड़ीका मैल धोनेवाले ! नगरमें क्या हालचाल हो रहा है ? ' वह बोला- [५२] घोड़े तोरण लगे हुए मकानोंको ढोते है, गायें केसरके सहित कमलोंको चरती है, दही यहाँ- पर पीला मिलता है, तिलोमें यहाँ तैल नहीं होता और मकानोके दरवाजेके शिखरपर हिरण चरा करते हैं। इसके बाद, किसी वालिकासे पूछा-'तू कौन है ? ' तो वह बोली- [५३ ] मरे हुए जहाँ जींदा होते है, जिनकी आयु बीत गई है वे उछ्वासित होते है और अपने गोत्रमें जहाँ कलह होता है, मै उस कुलकी बालिका हूँ। इसका अर्थ न समझकर उसने विचार किया, कि जहाँ वालिका भी इस तरहकी विद्यावाली है वहाँके विद्वान् कैसे होंगे, वह उल्टे पाँव लौट गया। . १ इस श्लोकमें 'टी' जिसके अंतमे है ऐसे पटी, कटी, कुटी, घटी, तटी इत्यादि ११ शब्द आये हैं उन शब्दोको गिनकर ११ लाखका भोजने उस कविको दान दिया ऐसा इसका तात्पर्य है।
प्रकरण ४७-५०] भोज ओर भीमका प्रयन्ध [३९ ४७) इसके बाद, एक दूसरे अपसरमें, राजा राजपाटीमें भ्रमणार्थ हाथीपर चढ़कर नगरके भीतर जा रहा था। उस समस किसी भिक्षुकको, पृथिवीपर गिरे हुए अन्न-कणोंको चुनते हुए देखकर बोला- ६७. अपना पेट भरनेमें भी जो असमर्थ हैं उनके जन्म लेनेसे क्या है ? -इस प्रकार उसके पर्धि कहनेपर, सुसमर्थ होकर भी जो परोपकारी नहीं उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है। ६८ 'उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है'-यह कहनेपर, दानशूर भोज नरेन्द्र ने उसको सो हाथी और एक करोड़ सुवर्ण मुद्रायें दीं। उसके इस वचनके अन्तमें [राजाने कहा- ६९ हे जननि ! ऐमा पुत्र न जन जो दूसरोंके आगे प्रार्थना किया करें। उसके इस वाक्यके पथात् [भिक्षुक बोला]- उसको भी उदरमें न धारण कर जो दूसरोंकी प्रार्थनाका भग करें। जन उसने इस प्रकार कहा तो राजाने पूछा-'तुम कोन हो।' इस पर नगरके प्रधान पुरुषोंने कहा, कि आपके यहाँ, नाना भाँतिके विद्वानोंकी घटामें जब अय किसी उपायसे प्रवेश न पा सका तो इसी प्रपञ्चसे स्वामिदर्शनकी इच्छा रखनेवाला यह [ व्यक्ति ] राजशेखर है । उसको उचित महादानोंसे पुरस्कृत 'करनेपर उस राजशेखर ने ये कवितायें पढ़ी- [५४ ] अच्छृखल मेवोंके नादसे नाचती हुई' मयूरियोंकी उन्नत आवाजसे आकुल, मेघागमन कालमें (वर्षामें ) तो जमीन पर भी जल सुविधासे मिल जाया करता है। लेकिन, इस भयानक उष्णता भरे ग्राम कालमें करुणासे एक दूसरेकी ओर देखनेवाली और इधर उधर ताकती हुई मछलियोंका यदि त पालन नहीं करता, तो, रे कासार ( तालाब ) तेरी फिर सारता ही क्या है। ७० जिस सरोवरमें, मेंदक मरे हुओंकी भाँति कोटरोंमें सो गये थे, कछुए पृथ्वीमें छिप गये थे, और गाढ़े पकके ऊपर लोटनेसे मछलियाँ वारपार मूर्छित हो रही थी, उसी तालारमें, अफालके मेघने उतरकर ऐसा किया कि उसमें कुमस्थल तक हुने हुए हाथियों के झुड पानी पी रहे हैं। इस प्रकार अकाल ज ल द राजशेखर की यह उक्ति है। . राजा भोजकी गूजरानपर आक्रमण करनेकी इच्छा। ४८) इसके बाद, किसी साल, वर्षा न होने के कारण राना भी म के देशों (गूजरात में) जन, कण और तृण भी नहीं मिरता था ऐसे कुममयमें, राजपुरपोंने भोज का आना बताया ( अर्थात्-भोजराजाने गूजरात पर चढाई करने की बात चटाई)। यह सुनकर भीम को चिता हुई और उसने अपने दाम र नामक सारि- विदिकको आदेश किया कि कुछ दण्ड देकर इस साल भोज को यहाँ आनेमे रोको । उसका यह आदेश पाफर यह यहाँ गया । यह दामर अयत पुष्प समझा जाता था। भोजने [उसका उपहास करनेकी रिसे कहा- ७१ हे मायण ! तुम्हारे स्वामीके सधि-विमा पदपर तुम्हारे जैसे कितने दूत है।' [ उत्तर- 'यो तो यदुत ही १, हे माय नरेश । पर ये सर गुणको घटिम तीन प्रकार है-अपम, मध्यम और उपम । [ इनमें ] जो जिस गुणके योग्य होता है उसीफे अनुसार ये दूत उन उन - , [ . ४०] प्रवन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकाश राज्योंमें भेजे जाते हैं।' इस प्रकार भीतर ही भीतर हँसते हुए उत्तर देकर उसने धारा के स्वामी ( भोज ) को प्रसन्न किया । इस प्रकार उसकी वचन-चातुरीसे राजा चमत्कृत हुआ । गूर्जर देश के प्रति प्रयाण करनेका राजाने नगाड़ा बजवाया। प्रयाणके समय बंदीने यह स्तुतिपाठ किया- ७२. चौड़ [ का राजा ] समुद्रकी गोदमें प्रवेश कर रहा है और आन्ध्र [ पति ] पर्वतकी खोहमें निवास कर रहा है, क ट का राजा पट्ट बंध (पगड़ी बाँधना ) नहीं करता है, गूर्जर [ का राजा ] निर्झरका आश्रय लेता है, चे दि [ नरेश ] अस्त्रोंसे म्लान होगया है और राजाओंमें सुभट समान का न्य कुब्ज कूबड़ा होगया है-हे भो ज! तुम्हारे मात्र सेनातंत्रके प्रसारके भयसे ही सभी राजा लोक व्याकुल हो रहे हैं। ७३. कौं क ण [ का राजा ] कोनेमें, लाट ( नरेश ) दरवाजेके पास, कलिङ्ग [ पति ] आँगनमें सोया करते है । अरे को शल [ नरेश ], तूं अभी नया है, मेरे पिता भी इस आसनपर सोया करते थे । इस प्रकार जिस ( भोज ) के कारागृहमें रातमें प्रत्यर्थियोंमें स्थानप्राप्तिके लिये उठा हुआ पारस्परिक विरोध निरंतर बढ़ाता रहता है । प्रयाणके लिये नगाड़े बजवाये जानेके बाद, रातको समस्त राजाओंकी दुर्दशाका दृश्य दिखलानेवाला नाटक अभिनीत होने लगा। उसमें कोई क्रुद्ध राजा, कारागारके भीतर सामनेकी ज़मीनपर सुस्थ भावसे सोये हुए तै लिप राजाको उठाने लगा । तै लिप ने उससे कहा- मैं तो यहाँ पुश्त-दर-पुइतसे वास कर रहा हूँ, आप जैसे नये आये हुए राजाकी बातसे अपना पद कैसे छोड़ दूँ ? राजा भोज ने हँसकर दाम र से नाटकके रसावतारकी प्रशंसा की। इसपर वह बोला-'महाराज ! यद्यपि नाटकमें रसकी जमावट बहुत उत्तम है तथापि इस नटकी, कथानायकके वृत्तान्तसे जो नितान्त अनभिज्ञता है वह धिक् है । क्यों कि राजा तै लिप देव सूलीपर चढ़ाये हुए मुख के सिरसे पहचाना जाता है । सभाके सामने जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाको उसकी निर्भर्त्सनापर क्रोध हो आया और उसी समय उस सामग्रीके साथ, जो दूसरोंके जुटाये न जुट सकती थी, ति लङ्ग देशके प्रति प्रयाण किया । ४९) बादमें तै लिप देव को बड़ी भारी सेनाके साथ आता हुआ सुनकर भोज व्याकुल हुआ। उतनेमें उसे दामर ने [ अपने ] राजाके यहाँसे आये हुए एक कल्पित ( जाली ) आदेशको दिखाकर कहा कि भी म भी चढकर भोग पुर तक आगया है । जलेपर नामक छिड़कनेके समान उसकी उस बातसे राजा भोज खूब सचिंत हो गया । उसने दाम र से कहा-इस वर्प किसी तरह तुम अपने स्वामीको यहाँ आनेसे रोको । उसने बार वार इस प्रकार दीनताके साथ कहा और उस अवसरके जाननेवाले [ दाम र] को हाथीके साथ हथिनी भेट दी । उनको लेकर वह पत्त न में आया और भी म को परितुष्ट किया। ५०) एक बार, जब वह धर्मशास्त्र सुन रहा था, उस समय अर्जुनका राधा-वेध (मत्स्य-वेध ) सुनकर सोचा कि 'अभ्यास करनेपर क्या कठिन है।' फिर बराबर अभ्यास करके उस विश्वविदित राधावेधको उसने सिद्ध किया और उसकी सारे नगरवासियोको जान हो इसलिये नगरमे खूब सजावट कराई। किन्तु एक तैली और एक दर्जीके, अवज्ञासे उत्सवमें कोई भाग न लेने पर, रजाको उसकी खबर की गई। तैलीने चंद्रशाला ( ऊपरी छत ) पर खड़े होकर, पृथ्वीपर रखे हुए संकडे मुँहके पात्रमें तेल ढालकर; और दर्जीने पृथ्वीपर खड़े होकर ऊपरकी ओर उठाये सूतके दोरेके अग्रभागको आकाशसे पड़ती हुई सुईके छेदमें, , प्रकरण ५१-५५ ] भोज और भीमका प्रवन्ध [४१ ] पिरो कर अपने अभ्यास-कौशलका परिचय दिया, और फिर राजासे 'यदि शक्ति है तो स्वामी भी ऐसा कर दिखा ऐसा कह कर राजाका गर्व खडित किया। उसका सवाध करना देखकर किसो करिने उसकी प्रशसामें कहा- ७४ हे भोजराज ! मैंने राधा-रोध ( मत्स्य-वेध ) का कारण जान लिया । वह यह कि आप 'धारा' के विपरीत (राण) को नहीं सह सकते । ५१) विद्वानों द्वारा इस प्रकार प्रशसित होते हुए उस राजाको नया नगर बसानेकी इच्छा हुई तो उसने पटह बजवाया। उस समय धारा नामक एक वेश्या अपने अग्नि वे ताल नामक पतिके साथ ल का जाकर उस नगरका निवेश देख आई, और उसने यह कह कर कि नगरको मेरा नाम देना, ल का का प्रतिच्छन्द पट (मानचित्र ) राजाको दिया । उसके अनुसार राजाने नई धारा नगरी वसाई । दिगंवर कुलचन्द्रको सेनापति बनाना । ५२) किसी दिन वह राजा सायकालके सर्वानसरके बाद अपने नगरके भीतर [ वीरचर्या निमित्त ] घूम रहा था, उसी समय किसी दिगवर विद्वान्को यह करिता पढ़ते सुना- ७५ न किसी सुभटके सिरपर खड्ग के टुकड़े किये, न तेजा घोड़ोंपर सारी ही की और न गौरी स्त्रीको गले ही लगाई-इस प्रकार निरर्थक ही यह नग्न जन्म चला गया। राजाने सवेरे ही उसको बुलाकर और वह सकेत सुनाकर उसकी शक्ति पूछी । वह बोला- ७६ महाराज ! रमणीय दीपोत्सरके बीत जानेपर जब हाधियोंका मद झरने लगेगा तो में अपनी शक्तिसे गोड देश के साथ सारे दक्षिणा पथ को एक छत्र नीचे कर दूंगा। उसने अपना ऐसा पौरुप प्रकट किया तो राजाने उसे [योग्य समझकर ] सेनापतिके पद पर अभिषिक्त किया। कुलचन्द्रकी गुजरातपर चदाई। ५३) इयर, जब राजा भीम सिन्धु देश की विजयमें रुका हुआ था, [ वह दिगम्बर ] सारे सामन्तोंके साथ, अण हि ल पुर पर आक्रमण करके, उसके धवलगृहके घटिकाद्वार पर, कौड़ियों वपन कराकर उसने जयपत्र प्रहण किया। तबसे सर्मन " कुलचन्द्रने लूट लिया" [ कहारत ] की प्रसिद्धि हुई । वह जयपत्र लेकर माल वा में गया। श्री भोज को यह वृत्तान्त विदित किया । 'दुनने वहॉरर कोयला क्यों नहीं बोया : [ इन कौडियोंके बोनेसे तो यह मूचित होता है कि भविष्यमें ] यहाँम कर बड होकर गुर्जर देश में जायगा।' इस प्रकार सरस्वती-कण्ठा भरण श्री भोज ने यह भविष्यवचन] कहा। ५४) एक वार चन्द्रातप ( चाँदनी ) में श्री भोज राजा बैठे थे, पाम-दी में अटच मी था। पूर्ण चन्द्रमण्डलको देखकर [पुन पुन उसकी ओर देखकर ] (रानाने ) यद पदा- ७७ जिन लोगोंका रात प्रियाके साथ क्षणभरकी तरह व्यतीत हो जाती है, चन्द्रमा उनके लिये शीतउ है, कि तु विरहियोंके लिये तो उल्काके समान मदारक है। उस करिके इस प्रकार आधा कहनेपर कुल चन्द्र बोडा- हम लोगोंके न तो मिया है और न विरह है, इमुध्येि गानों अंग्मे नट होने के कारण हमको तो चद्रमा दर्पगफी आकृतिके समान दिखाई देता है। नाग है, न शीतउ । ऐसा कहनेके अन तर ही उसे पुरस्कारमें एक वेश्या प्रदान की गई। . * ११-१२ ४२] प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ५५) इसके बाद, माल व म ण्ड ल से लौटे हुए दामर नामक सन्धि-विग्रहिकने भोज की सभाका वर्णन करते हुए [ सबको ] बहुत आश्चर्य उत्पन्न किया । और वहाँ ( माल वा में ) जाकर भी म के अलौकिक रूप सौन्दर्यके वर्णनसे भोज को उसे देखनेकी इच्छासे चञ्चल कर दिया । भोज ने अनुरोध किया कि या तो भीम को यहाँ ले आओ या मुझे वहाँ ले चलो।' इसी तरह भोज की सभाको देखनेके लिये उत्कण्ठित भी मने भी वैसा ही अनुरोध किया। किसी एक समय, उपायोंका जाननेवाला वह (दा मर) बहुतसा उपहार लेकर भीम को, जो विप्रका वेश धारण किए हुए था और हाथमें पानदान लिये था, साथ लेकर भोज की सभामें गया। प्रणाम करते हुए उस दामर को [भोज ने भी म के ] ले आनेके वृत्तान्तके वारे में पूछा। उसने कहा- 'हमारे स्वामी स्वतन्त्र हैं, जो काम उनको अभिमत नहीं उसे जबर्दस्ती कौन करा सकता है। महाराजको ऐसी दुराशा सर्वथा धारण नहीं करना चाहिये । ' भोज ने भी म की उम्र, वर्ण और आकृति पूछी। दाम र ने -सभामें बैठे हुए लोगोंके देखते हुए, पान-दान धारण करनेवालेको लक्ष्य करके कहा-स्वामिन् ! ७८. यही आकृति है, यही वर्ण है, यही रूप और यही अवस्था है । इसमें और उस राजामें अन्तर केवल काच और मणिके समान है। इस प्रकार उसके बतानेपर, चतुर चक्रवर्ती भो जने सामुद्रिक शात्रके आधारपर, उस निश्चल दृष्टि- चालेको ही राजा [ यही भीम है ऐसा ] जब समझ लिया तो, उपायन वस्तुयें ( भेंटकी चीजें ) ले आनेके बहानेसे उस सन्धि-विग्रहिक ( दा म र ) ने उसे वहार भेज दिया। जब वे ( भेंटकी ) चीजें आ गई तो दाम र ने उनका गुण वर्णन करके तथा इधर उधरकी बाते करके बहुत-सा काल काट दिया। जब राजाने कहा कि-'बह पान-दानवाला अभीतक क्यों नहीं आया, कितना विलम्ब करता है ? ' तो उस (दा मर) ने बताया कि वही तो भी म था। तब राजा उसके पीछे सैन्य दौडाने लगा। इसपर दा म र ने कहा-बारह बारह योजनके अन्तरपर सवारीके घोड़े ग्वडे हैं, और एक घडीमें योजनभर चली जानेवाली करभियाँ ( साँढनियाँ) रखी है । इन सारी सामग्रियों से भी म प्रतिक्षण बहुत-सी भूमि ते करता चला जा रहा है। आप उसे कैसे पकडेगे ?' उसके ऐसा बतानेपर वह देर तक हाथ मलता रहा। [ यहांपर Pb संज्ञक आदर्शमें निम्नलिखित प्रकरण अधिक पाये जाते हैं-] इसके बाद एक दूसरे साल, भीम उस डा मर को मा ल व म ण्ड ल में भेजनेकी इच्छासे वार्ता आदि ( नीति ) सिखा रहा था । डा मर ने उठकर वस्त्र झाड़ लिया । तब भीम ने [ कारण ] पूछा । वह बोला- आपका सिखाया हुआ यहीं छोड़ जाता हूँ । क्यों कि वहाँ जाकर तो मुझे स्वयं ही अवसरोचित बोलना पड़ेगा। दूसरेका सिखाया कितना काम आ सकता है । इसके बाद राजाने उसकी अवसरोचित चातुरी जाननेके लिये, प्रच्छन्न भावसे, सोनेके डिब्बेको राखसे भरकर उसके हाथमें, यह सिखाकर भेंट देनेको कहा कि भोज की सभाके सिवा अन्यत्र कहीं भी इसे न खोलना । उसे लेकर वह मा ल वा मे गया। भोज की सभामें जाकर उस डिब्बेको, जो अनेक रेशमी वस्त्रोसे वेष्टित था, राजाको भेंट किया। जब राजाने उसे खोलकर देखा तो भीतर राखका पुञ्ज था। तब राजाने कहा- अजी, यह कैसी भेंट है ? ' हाज़िर जवाब डामर ने तत्काल कहा- महाराज श्री भी म ने एक कोटिहोम कराया है। यह उसीकी रक्षा है, जो तीर्थक समान पवित्र है। प्रीति-सम्बन्धसे उन्होंने आपको भेट किया है।' उसके ऐसा कहनेपर, राजाने प्रसन्न होकर, अपने हाथसे सब लोगोंको वह थोड़ी थोड़ी दी। उन सबोंने उससे तिलक करके उसका वंदन किया । अन्तःपुरमें भी वह रक्षा भेजी गई। बादमें वह डा म र सम्मानित होकर, प्रति-प्राभृतके (भेंटके बदलेमें दी हुई भेंटके) साथ लौट आया। भीम को जब यह वृत्तान्त ज्ञात हुआ तो उसने भी उसकी पूजा (सम्मानना) की। - प्रकरण ५ ] महाकवि माधका प्रवन्ध [४३ , पुन एक बार भी म के चित्तमें कौतुक उत्पन्न हुआ। उसने एक बार डामर के हाथमें अपनी मुद्रासे मुद्रित (मुहर किया हुआ) लेख दिया और हाथमें भेंटकी सामग्री देकर उसे माल वा में भेजा । उसने उस भेटके साथ वह लेख राजाको दिया । राजाने जप खोलकर पढ़ा तो, उसमें लिखा मिला कि-' इसको आप शीघ्र ही मार डालिये।' तब विस्मयके साथ राजाने पूछा- अजी, इसमें यह क्या लिखा है।" तब उस शीघ्रबुद्धिने कहा--' महाराज ! मेरी जन्म-पत्रिकामें ऐसा लिखा है कि जहाँ इसका रुधिर पड़ेगा वहाँ बारह वर्पतक अकाल पडेगा । यही जानकर भी मने, स्वदेशके विनाशसे भीत होकर, प्रच्छन्न लेखके साथ मुझे यहाँ भेजा है । ऐसी स्थिति होनेपर आप अपनी रुचिके अनुसार करें ।' उसके ऐसा कहनेपर राजाने कहा-'मैं अपने देशकी प्रजाको अनर्थमें नहीं पड़ने दूंगा।' इसके बाद, उसका सम्मान करके उसे निदा किया और वह अपने देशमें आया । उसकी बुद्धिके कौशलसे चमकृत होकर भीम उसे बहुत मानने लगा। * महाकवि माधका प्रवन्ध । ५६) इसके बाद, भोज राजा माघ पडितकी विद्वत्ता और पुण्यवत्ताको मदा सुनकर उसके दर्शनकी उत्सुकतासे अनेक राजकीय आदेश बारभार भेजकर श्री मा ल नगर से जाड़ेके दिनोंमें उसे अपने यहाँ बुलाया और अत्यन्त मानके साथ भोजनादिसे उसका सत्कार किया । बादमें राजोचित विनोदोंको दिखाकर और रातकी आरतीके अनन्तर अपने निकट ही, अपने ही समान पलँगपर सुलाकर, उसे अपनी निजकी शीतरक्षिका ( रजाई, लिहाफ ) ओढने दी और चिरकाल तक उसके साथ प्रिय आलाप करता हुआ सुखपूर्वक सो गया । प्रात काल मागल्य तुर्यनादसे जब राजाकी नींद सुली तो माघ पडितने घर जानेके लिये बिदा माँगी। राजाने विस्मित होकर अगले दिनके भोजन आच्छादन आदिके सुखकी बात पूछी । उसने कहा-' उस अच्छे. चुरे अन्नकी बात रहने दीजिये । ' और कहा कि शीतरक्षिका ( रजाई ) के भारसे तो मैं थक-सा गया। राजाने अपना खेद प्रकट करते हुए किसी प्रकार जाने की अनुज्ञा दी । नगरके उपवन तक राजाने अनुगमन किया । माघ पडितने भी कहा कि कभी अपने आगमनसे मुझे भी धन्य करें। राजाकी अनुज्ञा लेकर मा घ पडित अपने स्थानपर आया । उसके बाद, कितनेएक दिन बीतनेपर, भोज राजा उसकी विभव- सामग्री देखनेकी इच्छासे श्री मा ल नगर में आया । माघ पाडतके द्वारा अगवानी आदिसे यथोचित सकृत होकर वह अपनी सारी सेनाके साथ उसकी घुड़सालमें ठहरा । फिर वह अकेला माघ पडितके महल में गया । वहाँ उसने सञ्चारक भूमि ( महलमें जानेकी पगडडी ) को काचसे जड़ी देखी । स्नान करनेके बाद, देवताके मन्दिर में जानेपर, वहाँकी भूमिपर, जिसका गच मरकतका था, शैवाल सहित जलकी भ्रान्तिसे धोती ओर चादरको समेटने लगा । तब पुरोहितने उसका स्वरूप बतलाया । फिर देवताकी पूजा की । बाद जब मनावसर समाप्त हुआ तो, भोजनके समय आई हुई रसोईका आस्वादन किया । ऐसे ऐसे व्यजनों ओर फलोंको देखकर, जो उस काल और उस देशमें नहीं होते थे, वह चित्तमें बड़ा विस्मित हुआ। सस्कार किये दूध और चापलकी बनी रसोईका आकण्ठ उपभोग किया। भोजनके अतमें चन्द्रशालापर आरोहण करके, ऐसे ऐसे कान्यों, कथाओं, इतिहासों और नाटकोंको देखा, जिन्हें इसके पहले कहीं देखा या सुना नहीं था। जाड़ेके दिनोंमें भी उसे अकस्मात् उन ग्रीष्म ऋतु हो जानेकी भ्रान्ति हुई। उस समय सफेद स्वच्छ वस्त्र पहने, हाथमें तालके पखे लिये हुए अनुचर उसको हवा करने लगे । उसके वनों में सुन्दर चन्दन लेप दिया गया और उस रातको उसने क्षणभरकी नाई बिता दी । सरे जन शखके नादसे राजाकी नींद खुली तो माघ पाडतने शीतकालमें अक- स्माद् कैसे प्राप्म ऋतु उतर आई इसका स्वरूप समझाया । [इस प्रकार प्रत्येक क्षण विस्मयके माथ बिताता हुआ , - . नामक महा ४४] प्रचन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश कुछ दिनोंतक वहाँ रहकर ] स्वदेशगमनके लिये विदा माँगते हुए, अपने बनाये हुए नये भोज स्वामी मन्दिर के पुण्यको उसे समर्पण कर मा ल व म ण्ड ल को प्रस्थान किया । माघ के जन्म दिनके समय उसके पिताने ज्योतिषीसे जन्मपत्र बनवाया था। ज्योतिपीने उसमें लिखा था कि पहले तो इसकी समृद्धि बराबर बढ़ती जायगी; पर बाद में (पिछली अवस्थामें ) विभव नष्ट हो जायगा और चरणोंमें कुछ सूजन आ कर मृत्यु प्राप्त करेगा । माघ के पिताने अपने विभव-सम्भारसे ग्रहदशाका निवारण करना चाहा और यह सोचा कि मनुष्यकी आयु यदि सौ वर्ष की होगी, तो ३६ हजार दिन होंगे, एक नया कोश (निधि) बनवा कर उसमें उतनी ही संख्याके मणियोंका हार बनाकर रख दिया। इससे सैकडों गुनी अविक और समृद्धि रख दी। लड़केका नाम मा घ रखा और अपने कुलके उचित शिक्षा दे कर और यह समझ कर कि मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया, वह मर गया। इसके बाद माघ कुवेरकी भाँति विशाल समृद्धि- साम्राज्य पाकर, विद्वज्जनोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन देने लगा। अपरिमित दानसे अर्थि-जनोंको कृतार्थ करते हुए और भोगकी विधिसे अपनेको अमानुषकी भाँति दिखाते हुए, उसने शिशुपाल वध काव्य बनाया। इस काव्यको देखकर विद्वानोंका मन चमत्कृत हो गया। अन्तमें पुण्य-क्षय होने पर जब उसका धन क्षीण हो गया और विपत्तिका समय आ गया, तो उसने अपने देशमें रहना अयुक्त समझ कर, अपनी स्त्रीके साथ मा ल व म ण्ड ल में जा कर धारा नगरी में वास किया । राजा भोज के पास पत्नीको यह कह कर भेजा कि मेरा पुस्तक है उसे बंधक रख कर, राजाके पाससे कुछ भी द्रव्य ले आओ। स्वयं उसकी आशामें चिरकाल तक बैठा रहा । उधर भोज ने उसकी स्त्रीकी वह अवस्था देखकर सभ्रमके साथ उस पुस्तकको हाथमे लिया और उसकी शलाका निकाल कर उसे खोला तो उसमें पहला ही यह काव्य देखा- ७९. कुमुदवनकी शोभा नष्ट हो गई और कमलोंका समूह शोभान्वित हो उठा ! घूक हर्ष छोड़ रहा है और चकवा प्रीतिमान हो रहा है। सूर्यका उदय हो रहा है और चन्द्रमाका अस्त ! अहो, दुर्भाग्यके खेलका परिणाम 'ही' विचित्र है ! काव्यका मर्म समझकर भोज ने कहा कि सारे ग्रंथकी तो बात ही क्या है, इसी एक काव्यके मूल्यके लिये पृथ्वी भी दे दी जाय तो वह कम है । समयोचित और अनुच्छिष्ट इस 'ही' शब्दके पारितोषिकमें ही एक लाख रुपये दे कर राजाने उसे विदा किया । वह भी जब वहाँसे चली तो याचकोंने उसे मा घ की पत्नी समझकर माँगना शुरू किया। इस पर उसने वह सारा-का-सारा पारितोषिक उन याचकोंको दे दिया और स्वयं ज्यों की त्यों घर लौटी । उसने अपने पतिको, जिसके चरनमें कुछ सूजन हो आई थी, उस वृत्तान्तको कह सुनाया। इस पर मा घ ने यह कह कर उसकी प्रशंसा की कि-' तुम्हीं मेरी शरीर-धारिणी कीर्ति हो ।' इसी समय एक भिक्षुकको, जो उसके घरपर आया था, देखा । घरमे उसे देने योग्य कुछ न देखकर दुःखके साथ वह बोला- ०. धनतो है नहीं, और दुराशा भी मुझे छोड़ती नहीं । मै बुरी तरहसे बहका हुआ हूँ और फिर त्यागसे हाथ भी संकुचित नहीं होता । याचना करना लघुताका कारण है और आत्महत्यामें पाय लगता है । अतः हे प्राणों ! तुम स्वयं चले जाओ तो अच्छा है । मुझे इस प्रकार दुःख देनेसे क्या होगा? ८१. दारिद्यकी आगका जो सन्ताप था वह तो सन्तोष रूपी जलसे शान्त हो गया; किन्तु दीन जनोंकी आशा भंग करनेसे जो [ सन्ताप ] पैदा हुआ है, यह किससे शान्त होगा ? | ८२. अकालमें भिक्षा कहाँ ? बुरी अवस्थावालोंको ऋण क्योंकर मिले ? भू-स्वामियोंसे काम क्योंकर , 1 प्रका ५६-७] रनमय दर करावें [। और दान देना है कि निदन दिइर्दनौ जन्ट हो । है। [इस प्रकार ] है गहन होगा क्या? दहा इन होना है। ८३. भूखमे कातर दाहाह पविदेशले ल्हो का है. रिल! क्या कुछ है कि इस कन्नेि सन्मने दिया कराने वन्ने नेहाटेके किर नहीं है' यह मत दिन हो, पंकने रहर दडे बडे दिनु मूचित की। ८१ हे प्राणों ! नमओ, याच व्यर्थ बैठकर शो, वामी वेन है। 'जि माथी कहाँ मिटेगा?' 'फिर ऐमा साथी वहाँ नि !'-अपने वे ही नर पन्टिन्नुहोई। प्रात काड राजा भोज ने रचावगे हमर, श्रीनाटनगर में बने] धन्वन् गदिने रहते हुए भी, जो ऐसा पुत्पन्न अशरहित होकर र गया, इसलिये उतने दिन नन 'मिमाट' ऐसा रख दिया । इस प्रकार श्री मायाडिका प्रबन्ध समान हुना। महाकवि धनपालका प्रवन्ध । ५७) प्राचीन काउमें, समृद्धिसे विभाट ऐसी विशाटा(जमिनी)गकाराने,नपदेशोसनका श्य गोत्रीय मदेव नामक ब्राह्मण वास करता या। उन्दन्केि सेवन उदमा निमात्र प्रायः शन्न हो गया था। उसके दो पुत्र थे जिनका नाम धनपाल और मोनन या। एक बार श्रीवर्द्धमान र दही डाले। गुणानुरागी होने के कारण सर्वदेव ने उन्हें अपने आपमें निवास कराना और पनी अन्न्य नदिने उन्हें न्तुष्ट किया। उन्हें 'सर्वज्ञ-पुत्रक' बानगर गुम हो जाने पूर्वजोको निधिले चार हा। उन्होंने वन- चातुसे पुत्रों आरा हिम्मा माँ लिया । सकेन बतानेपर निधि निजी । ब वह बाधा मा देने का तो सरिने दोनों पुत्रों मे आधा हिस्सा माँगा । धनपाट ने, जिसकी नति निमाचके कारण सन्चो हो रहो थी, जैन मार्गको निन्दा करते हुए नहीं कर दी। छोटे टडके शो मन पर का-परायण हो कर, पिताने उसको देना नहीं चाहा । इसपर उसने अपनी प्रतिज्ञाके भी होनेके पापको तन जाकर प्रशाटन करनेकी इच्छासे, तीर्थक प्रति प्रम्यान करना निश्चिन किया । पितृमक शोभन नानक छोटे पुग्ने, उसको उस आइसे रोककर, पिताकी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये जैन दीक्षत्रत म्हण कर स्वयं गुरुका अनुसरण किया । वनपाल समान विद्याओं का अध्ययन करके श्री मौज के प्रसाद-पान समान पडिन मग्टटमें सुप्रतिष्ट हुला और फिर अपने सहोदरकी ईगि बारह वर्पतक अपने देश में जैन दर्शनियोंका आनिन निषिद कराया। श्रीमाल नगरवा दूसरा नाम मिहनार भी है । वर्तमान में वह स्थान इसी नासे प्रठिद है । भीमाती डातिक वैश्य और माग पुर इमी स्थानमे निकरे हुए है । श्रीमाल्या दूरुप नाम मिहनार ऐसा कब और क्यों पड़ा इसका अन्य कोइ दूसरा शासिक रेग्य अभी तक प्रत नहीं हुआ। महाकवि माघ की कमनि श्री माल यो यह बात कतिक कथन हो से सिद्ध है, किन उसकी मृत्युका जो यह पण वृचान्त मेस्तुन्नागपने पिता है और उसी प्रग परसे मोज राय ने भी माना मिलमार रख दिया यह जो उलेख किया है, इसको सत्पदाके लिये और कोई मुनि त प्रमाा जस्ता प्रात न होता कपनको एक किंवदन्ती के रूपमें ही समझना चाहिए । माघ और मोजकी समानता भी सन्दग्ध है। और कम कम यह मात्र प्रसिद्ध धापति परमार वशीय राजा भोज तो किसी तरह सम्भवत नहीं है । इसकी विशेष विवेचना अगरे यि बरनवाल खडमें की जायगी। - ४६] प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश , - . उस देशके उपासकोंद्वारा अत्यन्त अभ्यर्थनाके साथ गुरुको बुलानेपर, सकल शास्त्ररूपी समुद्रके पारको प्राप्त कर लेनेवाला वह शो भ न नामक तपोवन गुरुसे अनुमति लेकर वहाँ आया। धारा में प्रवेश करते ही, पंडित धन पाल ने, जो उस समय राजपाटिकामें [ राजाके साथ ] भ्रमणमें जा रहा था, उसे न पहचान कर, उपहासके साथ कहा-' गर्दभदन्त (गधेके समान दाँतवाले ) भदन्त, तुमको नमस्कार !' इसपर उसने- 'कपिके वृपणके समान मुँहवाले मित्र, तुम्हें सुख हो !' [ इस प्रकार प्रत्युत्तर दिया। तब चमत्कृत होकर धन पाल ने सोचा कि मैंने तो दिल्लगीमें भी 'नमस्ते' कहा और इसने तो 'मित्र तुम्हें सुख हो'] इतना ही कहकर अपनी वचन-चातुरीसे मुझे जीत लिया । फिर ध न पाल के यह कहने पर कि आप किसके अतिथि है ? ' शोभ न मुनि ने कहा- हमें आपके ही अतिथि समझिये !' उसकी यह बात सुनकर एक विद्यार्थीके साथ उन्हे अपने स्थानपर भेजकर वहीं ठहराया । स्वयं घर आकर धन पाल ने प्रिय आलायोंके साथ उसे सपरिकर भोजनके लिये निमंत्रित किया । पर वे तपोधन तो प्रामुक ( अनुद्दिष्ट ) आहार भोजी थे इसलिये उन्होने निषेध किया। आग्रहपूर्वक जब उसने दोपका हेतु पूंछा तो कहा- ८५. मुनि म्लेच्छ कुलसे भी मधुकरी वृत्तिके साथ भिक्षा ग्रहण करे परन्तु बृहस्पतिके समान श्रेष्ठ कुलीन एक ही गृहस्थके वहाँ भोजन न करे । इसी प्रकार जैन धर्मके द श वै का लि क सूत्रमें भी कथन है- ८६. जो अनिश्रित हो कर मधुकरके समान नाना स्थानोंमेंसे अपना भिक्षापिण्ड प्राप्त करते हैं उन्हीं बुद्ध और दान्त भिक्षुओंको साधु कहते है। इस प्रकार, अपने धर्मसे और परधर्मसे भी, निपिद्ध ऐसे कल्पित आहारको त्याग करके हम लोग शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं । ध न पाल उनके चरित्रसे चकित होकर चुप हो रहा और उठकर स्नान करने चला गया। स्नानके आरम्भमें ही अचानक भिक्षाचर्याके लिये आये हुए उन दो मुनियोंको देखा। उन्हें एक ब्राह्मणी, रसोई तैयार न होनेके कारण, दही देने लगी । मुनियोंने पूछा कि दही कितने दिनोंका है ? तो ध न पाल ने मज़ाक करते हुए कहा 'क्या कोई उसमे कीड़े पड़ गये हैं ?' ब्राम्हणांने जवाब दिया कि इसे दो दिन बीत चुके हैं । यह सुनकर दोनों मुनि बोले कि-हाँ कीड़े पड़ गये हैं ! यह सुनकर ध न पाल उसे देखनेके लिये स्नानसे उठकर वहाँ आया। पात्रमें रखे हुए दहीके पास ही एक महावर (लाख) का ढेला रखा जिस पर उन जीवोंने चढ़कर उसे दहीके समान ही सफेद कर दिया । ध न पाल ने यह देखा और सोचा कि जैन धर्ममें जीवरक्षाकी ही प्रधानता है और उसमे भी जीवोत्पत्ति विषयक ज्ञानका वैदग्थ्य [ विशिष्ट प्रकारका ] है । जैसा कि कहा है- ८७. मूंग और उड़द इत्यादि द्विदल धान्य जो कच्चे गोरसमें पड़े तो उसमें त्रस ( द्विरिन्द्रियादि) जीवोंकी उत्पत्ति होती है; और तीन दीनके बाद दहीमें भी जीवोंकी उत्पत्ति हो जाया करती है। यह बात एक जैन शास्त्रमें ही कही गई है । ऐसा निश्चय करके शो भ न मुनि के शुभोपदेशसे सम्यक् विश्वास पूर्वक उसने सम्यक्त्व ( जैन धर्म ) ग्रहण किया । [ इतने दिनोंके बाद अपने मिथ्यात्वको समझते हुए, शोभन से ही पूँछा कि मेरे भाईको भी कहीं देखा है ? शोभन ने वय, आख्या और गुण आदिमें अपने-ही-से उसकी तुलना की । इसपर उसने अनुमानसे समझा कि यही मेरा भाई है । यह निश्चय करके आनन्दाश्रु त्याग करते हुए उसे आलिंगन करके अपने लडकेको भेज कर उसके गुरुको भी बुलवाया। ] स्वभावतः ही ध न पाल बडा बुद्धिमान था अतएव कर्म प्रकृति प्रभृति जैन-विचार-ग्रंथोंमें भी बडा प्रवीण हुआ। प्रति दिन सबेरे जिन पूजाके अन्तमें- . प्रकरण ५७ ] महाकवि धनपाल्फा प्रवन्ध [४७ ८८ अहो ! मैंने इसके पहले मोहवश, कुछ ही नगरोंके स्वामीका, जो शरीर दे देनेपर भी दुम्रहणीय है, मति-दान करते हुए अनुसरण किया। इस समय ऐसे त्रिभुवनपति प्रभु मिल गये हैं जो बुद्धि-ही से आराध्य हैं और जो अपना पद तक दे देनेवाले हैं । इससे उन प्राचीन दिनोंका बीत जाना खेदकारक हो रहा है। ८९ हे जिन ! जबतक मैंने तुम्हारा धर्म नहीं जाना था तबतक समझता था कि धर्म सब कहीं है। जिस प्रकार धतूरेके चिपसे आतुर रोगीको सब कुछ सोना (पीतनर्ण) ही सोना दिखाई देता है, और कोई सफेद वस्तु नजर नहीं आती। [५५ ] घासके जैसे नि सार ऐसे उन करोडों श्लोकोंको पढ लेनसे भी क्या होता है-यदि जिससे दूमरेको पीडा न पहुँचाना' इतना भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता। [५६ ] देशका मालिक [तुष्ट होनेसे ] एक गाँव देता है, गाँउका मालिक एक खेत देता है, खेतका मालिक शिपिका ( सेम, छीमी ) देता है परन्तु साई (सर्वज्ञ जिन) तो सन्तुष्ट होकर अपनी सारी सम्पद दे देते हैं। इत्यादि वाक्योंको पढ़ा करता । एक दिन राजाने ध न पाल को शिकार खेलनेके लिये साथ ले लिया । राजाने जब बाणसे मृगको सिद्ध किया, तो उसके वर्णनके लिये धन पाल के मुँहकी ओर देखा । धन पाल बोला- ९० इस तरहका पौरप रसातलको चला जाय । यह कुनीति है कि निर्दोष और शरणागतको मारा जाय । बलवान् भी जब दुर्वलको मारते हैं तो यह बडे दु खकी बात है । जगत् अराजक हो गया। उसकी इस निर्भर्सनासे क्रुद्ध राजाके यह पूछने पर कि यह क्या बात है- ९१ प्राणान्तके समय यदि तृण भक्षण करना चाहे तो वैरी भी छोड दिया जाता है, तो फिर ये पशु तो सदा तृण ही खाकर जीते रहते हैं, ये क्यों मारे जाते हैं ? राजाको इस कथनसे अद्भुत कृपा उत्पन्न हुई । उसने धनुष्य वाणके भगको स्वीकार करके आजीवनके लिये मृगयाका त्याग किया। बादमें नगरकी और जब लोट रहा था, तो यज्ञमण्डपके यज्ञस्तममें बँधे हुए छाग (बकरे) की दोन वानी सुनकर पूँछा कि यह पशु क्या कह रहा है। इस पर ध न पाल ने कहा कि सुनिये- ९२ हे साधो, मैं स्वर्गफलको भोगनेके लिये तृपित नहीं हैं, मैंने [ इसके लिये ] तुमसे प्रार्थना भी नहीं की । मैं तो केवल तृण खाकर ही सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं । यदि तुम्हारे द्वारा यज्ञमें मारे हुए प्राणी निश्चय ही स्वर्गगामी होते हैं तो फिर अपने माता-पिता और पुत्रों तथा बाँधयोंका यज्ञ (बलिदान ) क्यों नहीं करते। उसके इस वाक्यके अनन्तर जब राजाने कहा कि इसका क्या मतलब है ? तो फिर बोला कि- ९३ यूप ( यज्ञ) करके, पशु मारकर और खूनका कीचड़ बना कर यदि स्वर्गमें जाया जाता है तो फिर नरकमें कैसे जाया जाता है । ९४ सनातन यज्ञ तो उसका नाम है, जिसमें सत्य तो यूप हो, तप ही अग्नि हो और अपने सारे कर्म समिध् ( काष्ठ ) हो, अहिंसाकी [ उसमें ] आहुति दी जाय इस प्रकार, शुक सवाद में कहे हुए वचनोंको उसने राजाके सामने पदा और [ ब्राह्मणोंको ] जो हिंसा- शास्त्रके उपदेशक और हिंस्र प्रकृति है, ब्रह्मरूपमें राक्षस बताते हुए, राजाको अर्हद्धर्म (जैन धर्म ) की ओर प्रवृत्त किया। । ) ४८] प्रवन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश - [ इस जगह Ph आदर्शमें तो मूल ही में, पर B आदर्शके हाशियेपर निन्नलिखित कथोपकथन अधिक लिखा हुआ पाया जाता है। इसके बाद जब राजा गौकी बन्दना करने लगा तो ध न पाल भैसको नमस्कार करता हुआ बोला- [५७ ] अपवित्र वस्तु खाती है, विवेक-शून्य है, आसक्त होकर अपने पुत्रसे ही रति करती है, खुराप्रसे और सींगसे जीवोंको मारती है । हे राजन् ! ऐसी यह गौ किस गुणसे वन्दनीय है ? [ ५८ ] दूध देनेके सामर्थ्यसे अगर यह गौ वन्दनीय है तो, भैंस क्यों नहीं है ? #ससे इसमें थोड़ी भी तो विशेषता नहीं दिखाई देती। [५९ ) अमेध्य भक्षण करनेवाली गायोंका स्पर्श पापको हरनेवाला है, चेतनाहीन वृक्ष बन्दनीय है, छागका वध करनेसे स्वर्ग मिलता है, ब्राह्मणोंको खिलाया हुआ अन्न पितरोंको स्वर्गमें पहुँचता है, छल-कपटपरायण देवता आप्त पुरुष हैं, अग्निमें हवन किया हुआ हवि देवताओंको प्रीत करता है- इस प्रकारकी स्पष्ट दोपयुक्त और व्यर्थ श्रुतियोंके वचनोंकी लीलाको कौन ठीक मान सकता है ? [६० ] जिनका [प्राणी- ] वध तो धर्म है, जल तीर्थ है, गौ बन्दनीय है, गृहस्थ गुरु है, अग्नि देवता और ब्राह्मण पात्र है उनके साथ परिचय रखनेसे फल ही क्या हो! एक बार, जिनपूजा करनेमें, दूसरोंसे पंडित (ध न पाल) को विशेष एकाग्रता जानकर राजाने फुलकी डाली देते हुए कहा कि देवोंकी पूजा करो। ध न पाल शिव आदि देवताओंके स्थानों पर यो ही घूमकर जिन देवकी पूजा करके चला आया । चार पुरुषके मुँहसे राजाने सारा वृत्तान्त जानकर पूजाका हाल पूँछ।। उसने कहा कि महाराज ! जहाँ [ पूजाका उचित ] अवसर हुआ वहाँ पूजा की । राजाने पूछा-' अवसर कहाँ नहीं हुआ ?' पण्डित बोला-विष्णुके पास एकान्त कलत्र होनेसे; रुद्रके आधे शरीरमें पार्वती रहनेसे; ब्रह्माके यहाँ इस भयसे कि कहीं ध्यानभंग होनेके कारण शाप न दे दें; विनायकके यहाँ इसलिये कि वे थालीभर मोदक खा रहे थे, उनका स्पर्श मैने रोका; चण्डिकाके यहाँ उनके शूलास्त्रसे संत्रस्त महिप मेरे सामने न आ जाय इस भयसे, हनुमानके यहाँ उन्हें कोपपूर्ण देखकर यह भय हुआ कि कहीं चपेटादान न कर बैठे; इस तरह, [ इन देवोंके स्थानमे ] कहीं भी अवसर नहीं हुआ। और भी [शिवलिङ्गको देखकर तो मनमें विचार आया कि-] [६१ ] इसके शिरके बिना पुष्पमाला व्यर्थ है, और जब ललाट ही नहीं है तो पट्ट बन्ध कैसे हो ? जिसके कान और आँख नहीं है उसके लिये गीत और नृत्य कैसे ? और जिसके पैर ही नहीं उसको मेरा प्रणाम कैसा ? इत्यादि बातें कहने पर, राजाने कहा-'फिर अवसर हुआ भी कही ?' तब पंडितने 'प्रशमरसनिमग्नं' और 'नेत्रे सारसुधा' इत्यादि ( वचन बोलकर ) और इसी प्रकारकी बातें कह कर अन्तमें कहा कि [ इस प्रकार] जैनालय में सदा अवसर रहता है, अतः वहीं मैने पूजा की। [६२ ] इसके बाद एक दूसरे दिन, शिवमन्दिरके द्वारदेशमें मुंगीगणको देख कर राजाने ध न पाल पूछा कि-यह दुर्बल क्यो है ? वह बोला-[ मुंगी शिवकी निम्न प्रकारकी विचित्र ] लीलायें देखकर सोचता से रहता है कि- [६३ ] यदि यह ( शिव ) दिगंबर है तो इसको धनुष्यसे क्या काम है ? अगर धनुष्य है ही तो भस्म क्यों ? यदि भस्म भी हुआ तो स्त्री क्यों ? और यदि स्त्री है तो फिर कामसे द्वेष क्यों है ?-इस प्रकारकी अपने स्वामीकी परस्पर विरुद्ध चेष्टाओको देखकर [ यह मुंगी हैरान हो रहा है और इसी लिये ] शिराओंसे गाढ बँधे हुए अस्थि-शेष शरीरको धारण कर रहा है।
प्रकरण ५८-५९ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [४९ - . . , . - ५८) इसके अनन्तर एक बार राजा सरस्वती क ण्ठा भरण नामक प्रासादमें जा रहा था। उस समय धन पाल पडितसे, जो सदा सर्वन-शासन (जैन वर्म) की प्रशसा किया करता था, पूछा कि 'सर्वज्ञ तो कभी एक बार हुए थे। पर अब भी उस धर्ममें क्या कुछ ज्ञानातिशय है ?' उमके ऐसा कहनेपर [धन पाल बोला- 'अर्हत् विरचित (उपदिष्ट) अर्हन्त श्री चूड़ामणि नामक प्रथम त्रैलोक्यके तीनों कालके वस्तु विषयके स्वरूपका परिज्ञान आज भी वर्तमान है ।' उसके ऐसा कहनेपर राजाने पूछा कि 'हम लोग अभी इस तीन दरवाजेके मण्डपमें स्थित हैं। किस रास्ते होकर यहाँसे वहार निकलेंगे ? ' राजाको इस प्रकार शास्त्रपर कलक लगानेको उद्यत होते देखकर उसने 'बुद्धि यह तेरहवीं माना है' इस लोकोक्तिको सत्य करते हुए, भोजपत्रपर राजाके प्रश्नका निर्णय लिख कर उसे मिट्टीके गोलेमें रख दिया, और उसे ताम्बूलवाहकको सोंपकर राजासे बोला कि ' महाराज, पधारिये ।' राजाने अपनेको उसकी बुद्धिके जालमें फँसा समझा और सोचा कि इसने तीनमेंसे ही किसीका निर्णय किया होगा, इसलिये बढइयोंको बुलाकर मण्डपकी पद्मशिलाको हटवा दिया और उसी मार्गसे बहार निकला। फिर उस मिट्टीके गोलेको तोड़कर उसके लिखित अक्षरोंमें, निकलनेके लिये उसी मार्गके निर्णयको पढ़कर कोतुझमे चित्तमें चकित होता हुआ जैन धर्मकी ही प्रशसा की। (यहाँ D पुस्तकमें निम्नलिखित पद्य अधिक पाये जाते है-) [६४] जो चीज विष्णु दो आँखोंसे, शिव तीनसे, ब्रह्मा आठसे, कार्तिकेय बारहसे, रावण बीससे, इद्र दस सौसे और जनता असख्य नेत्रोंसे भी नहीं देख पाती, बुद्धिमान पुरुष उसीको एक प्रज्ञा- (बुद्धि) रूपी नेत्रसे स्पष्ट देख लेता है। ( Pb आदर्शमें यहाँ निम्नलिखित एक और कथन अधिक पाया जाता है-) एक बार जलाश्रय (तालार) के अच्छे-बुरे-पनके विषयमें पूछ हुई [तो पण्डितने कहा-] [६५] सचमुच ही तालाबों का ठडा और चद्रमाकी किरणोंसे श्वेत बना हुआ जल ग्वून पी करके प्राणियोंकी सारी तृष्णा नष्ट हो जाती है और वे मनमें प्रमुदित होते हैं, परन्तु जब सूर्यकी किरणें उसे सोख लेती है तो [ उसमेंके ] अनत प्राणी विनष्ट हो जाते हैं और इसीलिये मुनि- लोग कुआँ बापड़ी आदिके बनानेके विषयमें उदासीन भार प्रकट करते है। एक बार राजा अपने बनाये हुए बहुत बड़े नये तालापके पास गया । वहाँ पण्डितसे पूछा कि यह धर्मस्थान कैसा है। धन पाल बोला- [६६] तड़ागके बहाने यह आपकी [एक ] दानशाला है जिसमें सदा ही मठली आदि जलजन्तु अच्छी तरहकी रसोई है और जिस स्थानपर बक, सारस, चक्राफ आदि [मत्स्य भोजी दान ग्रहण करनेवाले ] पान हैं, वहाँ कितना पुण्य होता होगा सो तो हम नहीं जान सकते । इससे राजा [ मनमें ] कुपित हुआ । नगरको आते समय वालिकाके साथ एक बुढ़ियाको वृद्धावस्थामे सिर धुनती हुई देखकर राजाने पूछा- यह सिर क्यों चुन रही है ! तर धनपाल बोला- [६७ ] क्या यह नदी है, या विष्णु ? क्या कामदेन है या चद्रमा ' क्या विधाता है अथवा विद्यापर है ? क्या इन्द्र है, कि नल है, कि कुबेर है ? ना, ना, यह नहीं है, यह भी नहीं है, यह भी नहीं है, बिल्कुल यह नहीं, यह भी नहीं, वह भी नहीं, और वह भी नहीं, यह तो कोड़ा करनेमें प्रवृत्त ऐसा हे सखे ! स्वय राजा भोज देव है। [ इसके सिरके धुननेका यह मतलब है-ऐसा कह कर ] इस श्लोकसे रुष्ट राजा को सन्तुष्ट किया। , प पयःप्रदान ५०] प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ५९) इसके बाद, ध न पाल ने ऋप भ-पञ्चा शि का स्तुति की रचना की। सरस्वती क ण्ठा भरण प्रासाद में उसकी बनाई प्रशस्ति-पट्टिकामें किसी समय राजाने [ यह काव्य पढा-] ९५. इसने [ अपने जन्ममें ] पृथ्वीका उद्धार किया, शत्रुके वक्षःस्थलको विदारण किया, और बलिकी राजलक्ष्मी ( विष्णुके पक्षमें बलि नामक राजा और भोजके पक्षमें बलशाली राजा) को आत्मसात् किया। इस प्रकार इस युवकने ये काम एक ही जन्ममें किये जो पुराण पुरुप (विष्णु) ने तीन जन्ममें किये थे। इस काव्यको पढ़कर उसके पारितोषिकमें एक सोनेका कलश दिया । उस प्रासादसे निकलकर उसीके द्वारके खंभोंपर मूर्तिमान् मदनको, जो रतिके साथ हस्तताल ( ताली ) दे रहा था, देखकर राजाने ध न पाल से उनके हंसनेका कारण पूंछा । इस पर पंडित बोला- ९६. यह है त्रिभुवनमें संयमके लिये विख्यात ऐसा वह शिव, जो इस समय विरहकातर हो कर अपने शरीरमें ही स्त्रीको धारण किये है। इसीने हमें एक समय जीता था ! इस प्रकार प्रियाके हाथसे अपने हाथको वजाता हुआ और हंसता हुआ यह मदनदेव जयवान् हो रहा है। [ यहाँ D पुस्तकमें " अन्नदिणे सिवभवणे० " " दिग्वासा यदि तत्किमस्य धनुपा० " "अमेध्यमश्नाति०" "" असत्युत्तमाङ्गे” इत्यादि पद्म पाये जाते हैं । पर चूँकि वे यहाँ अप्रासंगिक हैं और Pb आदर्शके अनुसार इसके पहले ही उल्लिखित हो चुके हैं इसलिये फिर उद्धृत नहीं किये गये । ] ९७. पाणिग्रहणके समय शिवका जो भूतिभूषित शरीर पुलकित हुआ उसकी जय हो-जिस शरीरमें [ पुलकके बहाने ] भस्मावशेप मदन मानों फिर अंकुरित हुआ है । इस प्रकारके तथा इसीतरहके, अन्य अन्य प्रसिद्ध और सिद्ध सारस्वतकवियोके काव्योंको कह कह कर जब ध न पाल राजाको रञ्जित कर रहा था, उसी समय द्वारपालने एक व्यापारीका आना निवेदन किया । सभामें प्रवेश करके, राजाको नमस्कार कर, उसने मोमकी वनी पट्टीपर लिखे हुए कुछ काव्योंको दिखाया। राजाके उसके प्राप्तिस्थानके बोरमें पूछने पर वह बोला कि-'मेरा जहाज अकस्मात् समुद्रमें एक जगह रुक जहाजियोने खोज करके देखा तो वहाँ एक शिवमन्दिन मिला, जिसके ऊपर चारों ओर जल लहरा रहा है पर भीतर पानीका अभाव है। उन्होंने उसकी एक दीवाल पर अक्षर देखकर उसे जाननेकी इच्छासे उसपर मोमकी पट्टी लगा दी । उसी के उभडे हुए अक्षर इस पट्टीपर हैं। राजाने जब यह सुना तो, उसपर [ वैसी ही ] मिट्टीकी पट्टी लागवा कर, उसपर पड़े हुए उलटे अक्षरोंको पंडितोसे पढ़वाया । ९८. ' लड़कपनसे ही, मेरी प्राप्तिके कारण ही यह उन्नतिकी परा कोटिको प्राप्त हुआ है, और इस समय मेरी ही बातसे यह राजाका लड़का लजाता है।' इस प्रकार खिन्न होकर अपने पुत्ररूपी यशसे अवलंब दिया जाकर वृद्ध 'गुणोंका समूह' समुद्रके तीरपर तपस्याके लिये चला गया। ९९. जो धनुर्धारी प्रतिद्वंद्वियोंकी स्त्रियोंको वैधव्य व्रत देनेवाला है ऐसे उस राजाके दिग्विजयके लिये उद्यत होनेपर और क्रुद्ध होकर प्रति दिशामें उसके भ्रमण करनेपर, और स्त्रियोंकी तो बात ही क्या स्वयं रति भी मारे डरके अपने पतिको, मदान्ध भ्रमरियोंका नील चोला धारण किये हुए पुष्पधनुष्यको [ भी हाथमें ] नहीं लेने देती। १००. चिन्तारूपी गंभीर कूपपर महाशोकरूपी चलती अरघट्ट (घड़ारी) परसे निःश्वास फेंककर अपने बड़ी बड़ी आँखरूपी घटीयंत्रसे छोड़े हुए अश्रुधारको और नासिकाकी वंशप्रणालीके गया, - 7 प्रकरण ६०-६१] महाकवि धनपालका प्रवन्ध [५१ विषम पथसे गिरते हुए इस वाप्प रूपी पानीयको, हे महाराज, तुम्हारे शत्रुओंकी खियाँ अविराम भावसे स्तनरूपी दो कलेशोंमें ढोया करती हैं। इस प्रकार काव्योंके पूरा पढ़े जानेपर [ आगे यह आवा काव्य मिला-] १०१. 'अहो! पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम प्राणियोंके लिये सचमुच ही बड़ा विषम होता है।' इस काव्यका उत्तरार्द्ध छित्तप प्रभृति सैकड़ों पडितोके पूरा करनेपर भी ठीक नहीं जमता था तर राजाने धनपाल पडितसे पूछा [ तो उसने अपनी प्रतिभाके वलसे यह यथार्थ पाठ कहा ]-" हरेहरे ! जो सिर शिनके सिर पर विराज रहे थे वे गूगोंके पैरोंसे लुण्ठित हो रहे हे "' यही उत्तरार्द्ध ठीक जमता है' इस प्रकार जब राजाने कहा तो पडित बोला-'यदि पदबन्ध और अर्थ दोनों ही, श्री रामेश्वर प्रासाद की दीपालपर ये इसीप्रकार न हों तो, इसके बाद आजीवन मैं कविताका त्याग कर दू ।' उसकी इस प्रतिज्ञाके सुननेके साथ ही राजाने जहाजके यात्रियोंको उसी समुद्रमें गोता लगवाकर मदिरको खोज निकालनेकी आज्ञा दी। ६ महिने बाद उसे ढूढ निकाला और उसपर फिरसे मोमकी पट्टी लगा कर [लेखकी नकल लो ] उसमें यही उत्तरार्द्ध निकला । यह देखकर [ राजाने ] उसके उपयुक्त पारितोषिक दिया । इस प्रकार, इस खण्ड प्रशस्ति के अनेक काव्य परपराके अनुसार समझने चाहिये । ६०) एक वार राजाने सेनामें ढील-ढाल होनेका कारण पडितसे पूछा । उसने अपनी तिलक मजरी [ नामक कथा ] की रचनाको व्यग्रताका कारण बताया । शीतकालकी एक रात्रिके अन्तिम प्रहरमें राजाको कोई विनोद नहीं मिल रहा था। उसने पदितको बुला कर, स्वय उसकी उस ति ल क म ज री कथाको पढ़ने लगा और पडित उसकी व्यारया करने लगा। राजाने उसके रस' के गिरनेके भयसे उसके नीचे सोनेकी थालीमें कच्चोलक ( कटोरा ) रखा और इस तरह [वटे चारके साथ ] समाप्त किया । उस अद्भुत काव्यसे चित्तमें चमत्कृत होकर राजाने कहा कि यदि मुझे इस काव्यका कथानायक बनाओ और विनीता के स्थानमें अवन्ती का नाम रखो, तथा शका र तार तीर्थकी जगह महा काल को उल्लिखित करो तो जो माँगो यही मैं तुम्हें दूगा।' राजाके ऐसा कहने पर उसने कहा कि-जिस प्रकार खद्योत और सूर्यमें, सरसों और सुमेरुमें, काच ओर काञ्चनमें, तथा धतूरे और कल्पवृक्षमें महान् अतर है उसी तरह तुममें और उनमें है ऐसा कहता हुआ- १०२. हे दो मुंहवाली, निरक्षर, लोहेकी तराजू ! तुझे क्या कहूँ ? जो तू गुजाके साथ सोनेको तौलते समय पाताल नहीं चली गई। इस प्रकार जन पटित शिड़क रहा था, तो राजाने उस मूल प्रतिको जलती आगमें इधन बना दिया। इस प्रकार वह द्विधा निर्वद * होकर और द्विधा अभामुख x होकर अपने मकानके पिछले मागमें एक पुराने मञ्चपर ना बैठा आर नीसासे डालता हुआ लमा होकर सो गया। वाटपडिता ऐसी उसकी लड़कीने उसे भक्तिपूर्वक उठाकर स्नान पान-भोजन आदि कराके, तिल क मञ्जरी की प्रथम प्रतिके लेखनका स्मरण कर करके आधा प्रय लिखा दिया। फिर पण्डितने उत्तराई नया लिखकर प्रथ सपूर्ण किया। [यहाँ पर इसके आगे Pb आदर्शमें निम्नलिखित कथन पाया जाता हे-] पडितने प्रथ सपूर्ण किया और फिर रुट होकर नाणा गाँव में चला गया। एक बार भोज की समामें धर्म नामक यादी आया। उस समय वहाँ ऐसा कोई विद्वान् नहीं था, जो उसके साथ प्रतिवाद करनेका साहस करता। * द्विधा निवेदका मतलब दोनों तरहसे निर्वेद हुआ। १ निर्वेद-सिन हुआ, निवेद-शानशून्य हुआ। ४ द्विधा अवाइनुरार-नीचा मुग्ववाला, २-वागीशुन्य मुसवाला। . . . - - ५२ प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश तब भोज ने बहुत मानके साथ ध न पाल को बुलाया। उसे आते सुन कर ही वह वादी भाग गया। लोगोंने हँसकर कहा-धर्मस्य त्वरिता गतिः धर्मकी गति शीघ्र होती है। [ इस कहावतको उसने चरितार्थ किया ] राजाने सम्मान किया....और वहाँपर योगक्षेमके निर्वाह (गुज़र ) की क्या हालत थी सो पूछी । पंडित बोला- [६२ ] हे राजन् , इस समय हमारा और आपका घर समान है, क्योंकि दोनों ही पृथु का ते स्व र पात्रं (१ गंभीर आर्तनादका पात्र, और २ विपुल सुवर्णपात्रवाला) है, दोनों ही भूपित निःशेष परिजन है (१ अलंकारहीन परिजनवाला, और २ सारे परिजन जिसमें भूपित हैं, ऐसा ) हैं, और दोनों ही विलस कि रेणु ग ह ना (१ धूलिपूर्ण, और २ हाथियोसे सुसज्जित ) हैं। ( यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित और विशेष पंक्तियाँ पाई जाती है-) एक बार उसने भोज की सभामें यह काव्य पढ़ा- [६९] हे धाराके अधीश्वर ! पृथ्वीके राजाओंकी गणनामें कौतूहलवान् होकर इस ब्रह्माने आकाशमें खड़ियासे लकीर खीच खींचकर तुम्हारी ही ( अकेलेकी) गणना की। वहीं रेखायें यह स्वगंगा गई हैं और तुम्हारे समान पृथ्वीमें अन्य भूमिधव (राजा) का अभाव होनेसे उसने उस खडियाको फेक दिया वही यह हिमालय बना है। अन्य पंडित इस काव्य [को अत्युक्ति] पर हँसे । पर ध न पाल ने कहा- [७० ] वाल्मीकि ने वानरोंसे आहत (मँगवाये गये) पर्वतोंसे समुद्रको बंधवाया और व्यास ने अर्जुनके बाणोसे । तथापि उनकी बातें अत्युक्ति नहीं समझी जाती । हम तो कुछ प्रस्तुत विषय ही कहते है, तथापि लोग मुँह फाड़ कर हँसते हैं ! इसलिये हे प्रतिष्टे, तुझे नमस्कार है एक बार किसी पण्डितके यह कहनेपर कि-हे राजन् , महाभारतकी कथा सुनिये, उसपर परम आहेत पंडितने कहा- [७१] कानीन (कुमारी कन्याके पुत्र व्यास ) मुनि, जो अपनी भ्रातृवधूके वैधव्यका विध्वंस करने वाला है, उसकी रचना, जिसमें गोलक (विधवा पुत्र) के पॉच पुत्र पाण्डव नेता हैं, जो स्वयं कुंड (जीवितपतिका स्त्रीके अन्य उपपतिसे उत्पन्न पुत्र ) है। कहा गया है कि ये पाँचो समान जातिके हैं ! इनका संकीर्तन करना भी यदि पुण्य-कर और कल्याण-कारक हो तो फिर पापकी दूसरी कौन सी गति होगी? ६१) शोभ न मुनि की 'शोभ न च तु विश ति का स्तुति' प्रसिद्ध ही है । इस समय क्या कोई [नया] प्रबंध आदि लिखा जा रहा है ?' राजाके यह पूछनेपर धन पाल ने कहा- [७२] गलेमें उतरनेवाली गरम कांजीसे, जल जानेकी आशंकाके कारण सरस्वती मेरे मुँहसे निकल कर चली गई है। इसलिये वैरियोंकी लक्ष्मीके केश पकड़ने में व्यग्र हाथवाले महाराज ! मेरे पास अव कवित्व नहीं रहा। राजाने [प्रसन्न होकर दूध पीनेके लिए] सौ गायें दिलवाई । राजाने जब यह पूछा कि 'गायें मिली?' तो- [-७३] हे नरवर! ये सौ तो दूध देती नहीं है और ना ही इन सौ से एकको भी बछडा है। इन सौमेंसे बड़ी मुस्किलसे चीसामा खाती हुई २० गायें घर तक पहुँच सकती हैं ! इस प्रकार ध न पाल ने [उन बुट्ठी और वेकार गायोंकी ] बात कही।
प्रका६२-६४] महाकवि धनपालका प्रवन्य [५३ [७४] धन पाट करिका सरम वचन और मल्यगिरिका सरस चन्दन, हृदयमें रराफर कौन नित (शान्त) नहीं होता। [इधर गोभ न मुनि स्तुति करनेके ध्यानमें [लीन होनेसे ] एक खोके घर तीन बार [ भिक्षा लेने] गया। इससे उस स्त्रीका दृष्टिदोष लगा और वह मर गया। उसने अपने भाईसे अन्त समयमें ९६ स्तुतियोंकी वृति कराके अनशनपूर्वक सौधर्म स्वर्ग प्राप्त किया । -इस प्रकार यह धनपाल पडिनका प्रबंध पूर्ण हुआ। . ६२) कभी, उस नगरका निवासी कोई नाह्मण, जिसकी वृत्ति केवल भिक्षा ही थी, एक पर्ष दिनमें नगरके सब लोगोंके मानमें व्यस्त रहने के कारण भिक्षा न पाकर खाली ताम-पानके साथ ही घर लोट आया । इसलिये ब्राह्मणी उसे फटकारने लगी। झगड़ा बढा और जाह्मणने उसपर प्रहार किया । आरक्षक पुरुष (नगररक्षक-पुलीस ) उसे कैद करके राजमदिरमें लाये । राजाके पूछने पर उसने यह भोक पहा- १०३ माँ मुझसे सन्तुष्ट नहीं रहती, और अपनी पतोहूसे भी सन्तुष्ट नहीं रहती, यह (बह) भी न मुझसे ओर न मासे [ सन्तुष्ट ] है । मैं भी न उस (माँ) से और न उस (खी) से ( सतुष्ट रहता हूँ] | हे राजन् ! बताओ इसमें दोप किसका है। इसका अर्थ पडितोंके न समझने पर, राजाने अपनी बुद्धिसे उसके अभिप्रायको प्राय समश कर, उसे तीन लाख [दानमें ] दिल्याये । ओर शोकके अर्थफा व्याख्यान करते हुए कहा कि दारिध दी कलहका मूल है। सन दर्शनोंसे सत्यमार्गकी पृच्छा। ६३) बादमें, किसी समय, एक बार सर दर्शनों को एकत्र बुलाकर राजाने मुक्ति का मार्ग पूछा । थे अपने अपने दर्शनका पक्षपात करने लगे । सत्यमार्ग जाननेकी इच्छासे राजाने उन सबको एकमत होनेको कहा। ये सन ६ महीने तक शारदाके आराधनमें लगे रहे । किसी रात्रिक अन्तमें शारदाने यह कहकर कि 'जागते हो।' राजाको उठाया और १०४ सौगत (बौद्ध) धर्म है सो तो सुनने लायक है ( अर्थात् उसके सिद्धात मुन में अच्छे ), और आर्हत (जैन) धर्म है सो करने लायक है । व्यवहारमें वैदिक धर्मका अनुसरण करना योग्य है और परम पदकी प्राप्ति के लिए शियका ध्यान धरना उचित है। (अथवा-अक्षय पदका प्यान करना चाहिए ) राजाको तथा दर्शनों (मय मतदाडे पण्डितों) को यह कोक सुनाकर श्रीमारती तिरोहित हुई। १०५ - अहिंसा' जिसका मुख्य लक्षण है वही धर्म है । भारती (सरपती) है यही सबकी माय देवी है। ध्यानसे मुक्ति प्रास होती है यही सर दर्शनोंका मतव्य है। इन दो गेफोको बनाकर उन्होंने राजाको मुक्तिका निर्णय बताया। - शीता पण्डिताका प्रयन्ध । ६४) बादमें, उस नगरकी निगासिनी शीता नामक रवनी (रसोई यनानेराची) को किसी विदेशी- फार्पटिकने सूर्य पके दिन भानन बनाने के लिए अनदे फर, स्वप जलाशपमें ग्यान फररो समप फगुना सेटफा पान फर जानेसे, उसके परपर आते ही, यमन करके मृत्यु प्राम हुआ । उमे देगफर, अपनेफा दपफे मिच मार टाउनेका फटफ टगनेकी आशकासे उस रचनाने मरनेके लिए उसी अनोगामाग [ उसके पेटमें ] टिफ गया । और उसके प्रभायमे उसको प्रनिमामा यहा बिमा प्रादुर्भत gासों ' , - ५४ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश विद्याओंका कुछ अभ्यास करके विज या नामक अपनी नव युवती कन्याके साथ श्री भोज की सभाको सुशोभित करती हुई श्री भोज से बोली- १०६. श्रीमन्महाराज भोज की शूरताकी सीमा तो शत्रुओंके कुलोंका क्षय करने तक है, यशकी सीमा ठेठ ब्रह्माण्डरूपी भाण्ड तक है, पृथ्वीकी सीमा समुद्रके तट तक है, श्रद्धाकी सीमा पार्वती-पति (शिव) के चरणद्वन्द्वमें प्रणाम करने तक है, लेकिन बाकी जो अन्य गुण है उनकी तो कोई सीमा ही नहीं है। इसके बाद विनोद-प्रिय राजाने कुच-वर्णनके लिए विज या को आज्ञा दी। वह बोली- १०७. स पतले शरीरवाली रमणीके स्तनमण्डलकी यदि, ऊँचाई चिवुक तक है; उत्पत्ति भुजलताके मूल तक है; विस्तार हृदय तक है और संहति कमलिनी सूत्र तक है। वर्णकी सीमा स्वर्णकी कसौटी तक है; और कठिनताकी सीमा हीरेकी खानवाली भूमि तक है; तो उसका लावण्य अस्त समय (जीवनकी समाप्ति ) तक है । उसके इस वर्णनको सुनकर, उस आधे कवि राजाने कहा- [७५] ' उस कमल-नयनीके दोनों कुचोंका क्या वर्णन किया जाय ? ' इसपर उसने आधा श्लोक यह कहा- सात द्वीपके . कर ' (महसूल) ग्रहण करनेवाले आप जैसे जहाँ 'कर' (हाथ) देते है । राजाने एक और आधा काव्य पढा- [७६] ' आघात किये हुए मुरजके समान गंभीर ध्वनिवाले और भ्रमरोंके समान नील [ वर्णवाले ] बादलोंसे वह दिशा रुद्ध-सी क्यों हो गई है ? ' इसके उत्तरार्धमें उसने कहा- [' इस लिये कि ] प्रथम विरहके खेदसे म्लान बनी हुई वाला, जिसका मुख आँखोंके उगले हुए. आँसुओंसे धो गया है, वह वहाँ वास करती है। १०८. 'जगत्को आनंद देनेवाले उस सुरतको नमस्कार है -इस प्रकार राजाके कहनेपर [क्यों कि] ' जिसके आनुषंगिक फल हे भोजराज, आप जैसे पुरुष है।' विजया के इस विजयशाली वाक्यको सुनकर राजाने लजित होकर मुँह नीचा कर लिया। तब राजाने उसे [ अपनी] भोगिनी बनाई। एक बार उसने जालके भीतरसे आते हुए चन्द्र-कर (किरण) के स्पर्श होनेपर [काव्य ] पढ़ा- [७७] हे कलंकके श्रृंगारवाले चन्द्र! बस करो इस करस्पर्शनकी लीलाको। तुम तो शिवके निर्माल्य हो, इससे तुम्हारा स्पर्श करना उचित नहीं। [७८ ] अनुद्यम. परायण (आलसी) राजाओंके समान, क्षणभरमे ताराये क्षीण हो गईं; ग्राम्य जनोकी सभामें पंडितकी पण्डिताईके समान चन्द्रमाकी कान्ति म्लान हो गई, जैसे मानों पारेने सोना खा लिया हो वैसी प्राची दिशा पिंगलवर्णा हो गई और निर्धन पुरुषोंके गुणकी तरह ये दीपक. भी शोभा नहीं प्राप्त करते । [७९] कलिकालमें स्वजनोंकी भाँति तारायें विरल हो गईं, मुनिके मनकी नाई आकाश सर्वत्र ' प्रसन्न हो गया, सज्जनोके चित्तसे दुर्जनकी तरह अन्धकार दूर हो रहा है और निरुद्यमियोंकी लक्ष्मीकी तरह रात जल्दी जल्दी बीत रही है। इस प्रकार यहाँ पर बहुत कुछ वक्तव्य (काव्य आदि कहने लायक) है जो परंपरा द्वारा जान लेना चाहिए। -इस प्रकार शीता पंडिताका प्रबंध समाप्त हुआ। - i 2 - प्रकरण ६५-६७ ] मयूर, वाण और मानतुगाचार्यका प्रबन्ध मयूर, याण और मानतुगाचार्यका प्रवन्ध । ६५) मयूर और वाण नामक दो साला-बहनोई पडित, अपनी विद्वत्तासे एक दूसरेके साथ स्पर्धा करते भोज की सभामें लब्धप्रतिष्ठ हुए। एक बार वाण पण्डित बहनसे मिलने गया और उसके घर जाकर रातको द्वारपर सो गया। [ उस रातको रूठी हुई] उसकी मानवती बहनको बहनोई द्वारा मनाती सुना। [बाण ने] उसपर ध्यान दिया तो उसने यह सुना- १.९ हे तचंगी, प्राय [सारी ] रात बीत चली, चन्द्रमा क्षीणसा हो रहा है, यह प्रदीप मानों निद्राके अधीन होकर झूम रहा है, और मानकी सीमा तो प्रणाम करने तक ही होती है, अहो ! तो भी तुम क्रोव नहीं छोड़ रही हो - [काव्यके ] ये तीन पद वारवार उसे कहते सुनकर [ वह चोथा पाद इस प्रकार बोल उठा-] 'हे चण्डि ! कुचोंके निकटवती होनेसे तुम्हारा हृदय भी [ उनके जैसा ] कठिन हो गया है !" भाईके मुंहसे यह चौया पाद सुनकर वह लजित हो गई और कुपित होकर उसे शाप दिया कि 'तुम कुष्टी हो!' उस पतिव्रताके व्रतके प्रभावसे उसे उसी समय कुष्ठ रोग उत्पन्न हो गया । प्रात काल शालसे शरीर ढककर राजसभाम आया। मयूरने मयूरको भाँति कोमल वाणीसे उसे 'वर को दो' यह प्राकृत शब्द कहा । इसपर चतुर चक्ररती रानाने उसकी ओर विम्मयके साथ देखा । प्रसगान्तर उठनेपर बाण ने देवताराधनका विचार किया ओर लज्जित भारसे रहाँसे उठकर नगरकी सीमापर गया। वहाँ पर एक स्तम खडा कर नीचे खदिर काष्ठके अगारसे भरा हुआ कुड बनवाया । स्तमके सिरेपर लटकाए हुए छोकपर स्वय बैठ गया । वहा सूर्यदेवकी स्तुति वनाना प्रारम्भ किया। प्रति काव्यके अतमें ठीकी एक एक रस्सी चाकूसे काटने लगा। इस प्रकार पाँच काव्योंके अन्तमें उसने पाँच रस्सिया काट दी। इसके बाद ठोकेके अग्रभागमें उगा रहकर उसने उद्धे काव्यसे सूर्यदेवको प्रत्यक्ष किया। उसके प्रसादसे त काल ही यह तेजवान् काञ्चनकी कान्तिवाला हो गया। दूसरे दिन उत्तम वर्णके चन्दनका शरीरमें लेप करके और दिव्य श्वेत वस्त्र लपेट कर [ राजसभामें ] गया। उसके शरीरसौन्दर्यको [पूर्ववत् ] रानाने देखा तो मयूर ने सूर्यके वरका फल बताया। यह सुनकर बाणने वाणकी भांति इस वाणीसे मयूर का मर्म वेध किया कि 'यदि देवाराधन इतना सरल है तो तुम भी कुछ कोई विचित्र कार्य करके दिया ओ न' उसके ऐसा कहनेपर मयूरने जवाब दिया कि- 'नीरोग आदीको वैद्यसे क्या काम : फिर भी तुम्हारी वातको सच कर दिखानेके लिए अपने हाथ-पैर छुरीसे काट देता हूँ और तुमने तो छ काव्यमें मूर्यको प्रसन किया है, परतु में प्रथम कान्यके रहे अक्षरमें ही मनानी- को प्रसन करता है। यह प्रतिज्ञा कर सुखासनपर बैठकर चण्डिकाके मदिरके पिठमाडे जाकर बैठ गया । यहाँ 'मा भाक्षीविभ्रमम् ' (ऐसे आदि चायवाली चण्डिका-स्तुति प्रारम्भ की) इसके रखे अक्षरपर ही चण्डिका प्रत्यक्ष हुई और उसकी कृपासे उसका शरीराला प्रत्यप्र तक सुन्दर हो गया। अपने सामने ही उस प्रसादको देखफर राजा और अय रानपुरुषोंने सामने आकर उसका जय-जय-कार किया और बड़े समारोह के साथ उसका नगरमें प्रदेश कराया। . 'परकोटी' यह माय शन्द दिया है । 'यर कोटी' और 'पर ओढी' ऐमा इसका पदन्छेद किया गया है। न पदों पर-अला, पोटी-शुश्री अर्थात् अन् पुरी (रोगी) ने ऐसा क्यम्प है। दूसरे पदमें यरक-गाल औदी-आर डाणा ' गोटपर आयो!"ऐसा माधपद्योतक यनन है।
५६ प्रवन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकाश ६६ ) इसी अवसर पर, मिथ्यादृष्टि वालोंके धर्मको इस प्रकार विजयी होते देख, सम्यग्दर्शन (जैन) द्वेषी कुछ प्रधान पुरुषोंने राजासे कहा- यदि जैनधर्ममें भी कोई ऐसा प्रभाव बतलाने वाला हो तो श्वेतांबर स्वदेशमें रहे, नहीं तो शीघ्र ही निर्वासित कर दिये जायँ ।' इस प्रकार उनके वचनके पश्चात् श्री मा न तुंगा चार्य को वहाँ बुलाकर राजाने कहा कि अपने देवताओंके कुछ चमत्कार दिखाइये। वे बोले- हमारे देवता तो मुक्त है, उनके चमत्कार क्या हो सकते है; तथापि उनके किंकर देवताओंके प्रभावका आविर्भाव देखिये । ' इस प्रकार कहके अपने शरीरको चवालीस हथकड़ियों और वेड़ियोंसे कसवाकर उस नगरके श्री-- युगादि देवके मंदिरके पिछले भागमें बैठ गये ।' भक्ता मर' इस आदि वाक्यवाली मंत्रगर्भ नई स्तुति बनाने लगे। इसके प्रति काव्यंके अन्तमें एक एक बेड़ी टूटती जाती थी। बेड़ियोंकी संख्याके बराबर काव्य बनाकर स्तव पूरा किया और उस मंदिरको अपने सम्मुख परिवर्तित कर शासनका प्रभाव दिखाया। -इस प्रकार श्रीमानतुङ्गाचार्यका प्रबन्ध पूर्ण हुआ। . . - गूर्जर देशकी विदग्धताका प्रवन्ध । ६७) वादमें, किसी एक अवसर पर, राजा अपने देशके पंडितोंके पांडित्यकी प्रशंसा करता हुआ. गूर्जर देश के पण्डितोंको अविदग्ध ( असहृदय ) कह कर निन्दा करने लगा। इस पर वहांके स्थानीय [ गूर्जर ] पुरुपने कहा कि हमारे देशके तो स्त्रियाँ और ग्वाला लोकके साथ भी आपके देशका कोई बड़ा पंडित तक समानता नहीं कर सकता। जब उसने ऐसी वात कही तो राजा उसे मिध्याभाषी बनानेकी इच्छासे अपना मनोभाव छिपा कर, कुछ दिन तक चुप-चाप रहा। इधर उस स्थान-पुरुषने भी म को यह वृत्तान्त कहलाया। भीम ने स्वदेशकी सीमा पर कुछ रसिक वेश्याओ और कुछ ग्वाल-वैप-धारी पंडितोंको नियुक्त किया । कोई वैसा गोप प्रताप दे वी नामक वेश्याको साथ लेकर रसिक जनोके लिये अमृतकी सार-भूत ऐसी धारा नगरी के निकट आया । वहाँ उस वेश्याको सजानेके लिये छोड़कर, सवेरे ही गोप [राजसभाके समीप पहुँचा] राजदौवारिकने उसको राजाके सम्मुख उपस्थित किया । श्री भोज ने कहा कि 'कुछ कहो ' इस पर- ०. हे भोज देव ! यह तुम्हारे गलेमे जो कण्ठा पडा है वह मुझे बहुत अच्छा लग रहा है । मालूम दे रहा है कि तुम्हारे मुखमें जो सरस्वती और वक्षःस्थलमें लक्ष्मी वस रही है उन दोनोंकी सीमा इसने विभक्त कर दी है। इस प्रकार उसकी उक्ति सुनकर विस्मयसे मनमें चकित होकर उसके सामने देख रहा था कि उतनेमें उस उत्तम परिच्छद धारिणी वेश्याको भी देखा। उसके प्रति भोज ने यह आकस्मिक वचन कहा- क्या !'। इसके अनन्तर वह बुद्धि-निधि सुमुखी, जो स्वजाति ( स्त्री जाति) की होनेके कारण मानों सरस्वतीकी खास कृपा-पात्र थी और शरीरधारिणी प्रतिभाकी भाँति [दिखाई देती थी ], राजाके गंभीर वचनके भी तत्त्वको समझकर उसको [ प्राकृत भाषामें ] जवाब दिया कि-' पूछते है ' उसके इस उचित वचनसे भोज का मुख-कमल विकसित हो गया। उसको कोशाध्यक्षसे तीन लाख दिलवानेको कहा. पर वह कोशाध्यक्ष ) इस तत्त्वको न समझकर तीन बार कहनेपर भी चुप-चाप बैठा रहा। जब वह नहीं देने लगा तो राजा प्रकाश ही बोला, कि देशकी परिस्थिति और स्वभावकी कृपणताके कारण इसे तीन ही लाख दिला रहा हूं, यदि, उदारताके साथ दिया जाय तो इतना बड़ा साम्राज्य भी देना कम ही है। इस आदेशको सुनकर समस्त राजलोकने राजासे प्रार्थना की कि उन दो वाक्योंका अन्वय क्या है ? इस पर वह बोला- 'इसके कटाक्षोंकी दोनों अंजन रेखाओंको कान तक फैली हुई देखकर मैंने कहा कि । यहाँ क्या ? इसने . । यहाँ प्रकरण ६६-६९ भोजका भीमके पास चार वस्तुयें मागना [५७ जवान दिया कि- दोनों नेत्र कान तक फैली हुई अजन रेखाके बहाने फानोंके पास यह निर्णय करने गये हैं कि क्या यह वही श्री भोज हैं जिनके बारेमें आप लोगोंने पहले सुन रखा है। यही बात ये पूछते हैं । ' प्राकृत भाषामें, व्याकरणके नियमसे द्विवचनका प्रयोग बहुपचनसे होता है। इसी बातकी आशका करके इसने 'पुच्छति' ऐसा जवाब दिया है। अपनी बुद्धिसे वृहस्पतिकी भी अवज्ञा करनेवाले ऐमे जो पण्डित हैं उनके लिये भी जो अर्थ अविषयीभूत है, उसे सहसा ही कहती हुई यह मानों प्रत्यक्षरूपा भारती ही है। सो इसके पारितोषिकमें तीन लाख क्या चीज है । इसके बाद तीन बार तीन लक्ष' देनेके लिये कहने के कारण अपने सामने ही उसे नव लाख दिलवाया। इस तरह राजा भोज को गूर्जर जनोंकी चतुरता मालूम हो गई तो उसने कहा-'निक तो गूर्जर ही में है।' [और तन राजाने ' मा ल वी य पडित और गूर्जर गोपाल समान हैं ' इस वृद्धजनोंकी वाणीको सत्य मानकर उन्हें विदा किया।] इस प्रकार यह वेश्या और गोपका प्रवन्ध है। . ६८) वह राजा लड़कपनसे ही- १११ मनुष्य यदि मृत्युको सिरपर बैठी हुई देखे तो उसे आहार भी अच्छा न लगे, तो फिर अकृत्य (अनुचित कार्य ) करनेकी तो बात ही कहाँ हो। इस तत्वको जाननेके कारण धर्म कार्यमें अप्रमत्त रहता । एक बार [ रातको] निद्रा भगके अनन्तर 'कोई विद्वान् आ कर [ कहता है कि एक तेज घोड़ेपर सवार हो कर तुम्हारे पास प्रेतपति ( यमराज) आ रहा है, इस लिए उसके अनुसार धर्म-कर्मके लिए सज्जित हो जाइए ' इस बचनको वोलनेके लिए नियुक्त किये हुए पडितको प्रतिदिन उचित दान देता रहा। एक बार अपराहमें राजा सिंहासन पर बैठा हुआ पान देनेवाले के दिये हुए बीड़ेसे पानके पत्तेको पहले ही मुंहमें डाल लिया । जब नीतिविदोंने उसका कारण पूछा तो इस प्रकार कहा- यमराजके दाँतके भीतर पड़े हुए मनुष्यों के लिये वही वस्तु अपनी है जो या तो दान कर दी गई है, या उपभोगमें ली गई है। और तो सशयाली है । तथा और भी- ११२ [ मनुष्यको ) नित्य ही उठ उठ कर विचारना चाहिये कि आज मैंने कौनसा सुकृत किया । [दिनके पूरा होने पर ] आयुका एक टुकड़ा ले कर रवि अस्त हो जायगा। ११३ लोग मुझे पूछते रहते हैं कि आपका शरीर तो कुशल है । [ लेकिन यह नहीं सोचते कि-] हम लोगोंको कुशल कैसे ? आयु तो दिन-प्रतिदिन बीतती ही जा रही है। ११४ [ इस लिये ] कट जो करना है उसे आज ही कर लेना चाहिये, जो दोपहरके बाद करना है उसे उसके पहले ही कर लेना चाहिये । मृत्यु इसकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने किया है या नहीं किया। ११५ क्या मृत्युकी मोत हो गई है, बुढ़ापा बूढा हो गया है, विपत्तियाँ विपदामें पड़ गई है और व्याधियाँ बीमार हो गई है जो ये आदमी दर्प करते रहते हैं। इस प्रकार अनित्यता सधी चार श्लोकोंका यह प्राय है । भोजका भीमके पास चार वस्तुयें मॉगना। ६९) अन्य किसी दिन भोजने भीम राजाके पास दूतके मुपसे चार चीजें माँगी। एक वस्तु वह 'जो यहाँ है, यहाँ नहीं,' दूसरी 'वहाँ है, यहाँ नहीं, ' तीसरी' जो दोनों जगह है, 'और चौथी जो ५८] प्रवन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकाश " कहीं भी नहीं है।' विद्वानोंके लिये भी इसका अर्थ समझना सन्दिग्ध होनेसे अण हिलपुर में इसके लिये दौंडी पिटवाई जा रही थी तब किसी गणिकाने उस टैडीको छू कर विज्ञापित किया कि-(१) गणिका, (२) तपस्वी, (३) दानेश्वर और ( ४ ) जुआड़ी रूप इन चार चीजोंको भेज दीजिये। उसके कहने पर राजाने उस दूतको ये चीजें सौंप दी। ऐसा ही होना चाहिये ' यह कह कर दूत चारों चीजें ले कर जैसे आया था वैसे ही वापस चला गया। इस प्रकार चार वस्तुओंका यह प्रबंध है। . - ७०) एक बार राजा भोज वीरचर्यामें घूम रहा था। उस समय किसी अभागेकी स्त्रीको- ११६. लोकमें तो ऐसा सुना जाता है कि मनुष्यको [अपनी आयुमें ] दश दशायें आती है। पर मेरे पतिकी तो एक ही [दरिद्र ] दशा [ सदा बनी रहती ] है, सो मालूम देता है कि बाकीको चोरोंने चुरा लिया है। यह पढ़ते सुन कर उसकी दुरवस्था पर राजाको दया आई और प्रातःकाल उसके पतिको सभामें बुला कर उसका कुछ भी अच्छा भविष्य सोच कर, दो बिजौरे नीवुओंको, जिनमेंसे प्रत्येकमें एक एक लाखकी कीमत- के रत्न गुप्त भावसे रखवा कर, उसे इनाममें दे दिये । उसने भी इस वृत्तान्तको कुछ न समझ कर, कुछ दाम ले कर, साग-भाजीकी दूकान पर जा कर बेच दिये । उस (दूकानदार ) ने भी उसका हाल न जान कर उन दोनों नीवुओंको किसीको भेंट दे दिया । उस आदमीने फिर से उन्हें उसी राजा भोज को भेंट किया । ११७. समुद्रवेलाकी चञ्चल तरंगोंसे घसीटा हुआ यदि कोई रत्न पहाड़ी नदीमें आ भी जाय तो वह फिरसे उसी मार्गसे उसी रत्नाकर ( समुद्र ) में ही चला जाता है। इस अनुभवसे राजाने [ इस उदाहरणमें ] भाग्य ही को तथ्य माना । क्यों कि, कहा भी है कि- ११८. वर्षा कालमे अशेष जगत्के प्रीत होने पर भी चातक तो जलका एक बूंद भी नहीं पाता । सच है, अलभ्य वस्तु कैसे मिल सकती है। इस प्रकार यह विजौरे नीबूका प्रबंध है। ७१) अन्य किसी एक रातको, राजाने अपने क्रीड़ा-शुक ( तोते ) को गुप्त रूपसे 'एक अच्छा नहीं है। यह बात पढ़ा कर उसे सिखाया कि तुम प्रातःकाल सभामें यही वाक्य उच्चारण करना। बादमें जब उस तौते- ने वैसा ही कहा तो राजाने पंडितोंसे उसका मतलब पूछा । वे उसका मतलब न जानते हुए, उसके जाननेके लिये, उन्होंने ६ महीनेकी मुहलत माँगी। इसके बाद उनका मुख्य व र रुचि इसका मतलब समझनेके लिये देशान्तरमें भ्रमण करने लगा। वहां किसी पशुपालने उससे कहा कि मैं इसका मतलब आपके स्वामीको बता सकता हूं। पर मैं अपने इस कुत्तेके बचेको, बूढा होनेके कारण, न तो ढो सकता हूं, और बड़ा प्रिय होनेके कारण, नाही छोड़ सकता हूं। उसके ऐसा कहने पर उसे साथ लेनेकी इच्छासे वररुचि ने उस कुत्तेको कपड़े में लपेट कर अपने कन्धे पर रख लिया और उस पशुपालको साथ ले कर राजाकी सभा गया। वहाँ उसको उत्तर देनेवाला बताया। इसके बाद, राजाने उस पशुपालसे उसी बातको पूछा। [ उसने जवाब दिया-] महाराज, इस जीवलोकमें लोभ ही 'एक अच्छा नहीं है। राजाने फिर पूछा- कैसे ? ' वह बोला-इसलिये कि यह प्रकरण ७०-७३ ] इक्षुरस, तथा घुडसवारोंका प्रवन्ध [५९ ब्राह्मण इस कुत्तेको, जो यद्यपि अस्पृश्य है, तथापि उसे कन्धे पर ढोता है, वह लोभ ही की लीला है। इसलिये लोभ ही एक अच्छा नहीं है। इस प्रकार यह एक अच्छा नहीं है' प्रवन्ध पूरा हुआ। . . ७२) + अन्य किसी समय, केवल मित्रको साथ ले कर राजा रातमें घूम रहा था, तो उसे बड़े जोरकी प्यास लगी। तब उसने एक वेश्याके घर जा कर मित्रके मुखसे जल माँगा। तब बड़े प्रेमके साथ शभ ली नामक दासी बड़ी देर करके, ईखके रससे भरा पात्र, कुछ खेदके साथ ले आई। मित्रने जो खेदका कारण पूछा, तो वोली कि पहले ईखकी एक ही लट्ठीमेंसे, जब वह शूलसे छेदी जाती थी तो, इतना रस निकल आता था कि घड़ेके साथ पुरवा (शकोरा) भी भर जाता था, पर इस समय राजाका मन प्रजाके विरुद्ध हो रहा है, इसलिये बड़ी देरके बाद भी केवल पुरवा ही भर पाया है। यही इस खेदका कारण है। राजाने उसके खेदके कारण को सुन कर विचार किया कि जिस वणिकने शिव मन्दिरमें वह बडा नाटक करवाया है उसको मैंने अपने मन ही मन, लूटनेका विचार किया था, इसलिये इसकी यह बात ठीक ही समझनी चाहिए। वादमें लौट कर अपने स्थान पर आ कर सो गया । दूसरे दिन प्रजा पर वत्सल भार मनमें रखता हुआ राजा वेश्याके घर गया उस दिन उसने यह कह कर राजाको सन्तुष्ट किया कि आज राजा प्रजाके प्रति कृपावान् है, क्यों कि आज ईखसे बहुत रस निकला है। इस प्रकार यह इक्षुरसका प्रबध पूर्ण हुआ। . ७३) अन्य किसी एक अवसर पर, धारा न गरी के शाखापुरमें एक गोत्र देवीका मदिर था जिसमें नमस्कार करनेके लिये [ राजा ] नित्य आया करता था, उसमें कुछ वेलाका व्यतिकम हो गया। इससे यह देवता प्रत्यक्ष हो कर द्वार पर आ कर उस राजाको देखने लगी, जो उस समय बहुत थोड़े नौकरोंके साथ द्वार- देश पर आ पहुचा था। राजाको देख कर ससभ्रम वह अपने आसन पर बैठने की गड़बड़में, निजका आसन लाघ गई। राजाने प्रणाम करके इस वृत्तान्तको पूछा । देवताने निकट ही शनुसेनाका आना बता कर कहा कि शीघ्र जाओ । कुछ ही समयमै राजाने अपनेको गूर्जर सेन्यसे घिरा पाया । वेगवान् घोड़ेपर चढ़कर तेजीसे जाता हुआ वह धारा नगरीके फाटक पर पहुँचा, तो उस समय आलू या और कोल् या नामके दो गुजराती समारोंने उसके कठमें धनुष्य फेंके और यह कह कर उसे छोड दिया कि 'तुम इतने-ही-से मार डाले जाते !' ११९ जिसके 'गुण'-वान् धनुपने, मानों यह समझ कर ही कि यह भोज 'गुणी' है भागते हुए उस राजाको घोड़ेसे [ नीचे ] नहीं गिराया । इस प्रकार यह घुड़सवारोंका प्रपन्य पूर्ण हुआ। . [इसके मागे Pb प्रतिमें निम्नाकित प्रपघ पाया जाता हे-] अन्यदा एक बार रातमें जग कर राजा भोज ने अपनी समृद्धिके निस्तारको अपने हृदयमें सोच कर काव्यफे ये तीन चरण पढे- + यह सुरसवाला मरघ किसी प्रतिमें, विक्रम राजाके सम्पपमें लिया हुआ मिलता है और इसलिये इसके पाले, ऊपर पृट ९ पर भी यह आया हुआ है, लेकिन यहाँ यह प्रक्षिप्त मालूम देता है।
६०] प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश , [८० ] मनोहर युवतियाँ, अनुकूल स्वजन, अच्छे बांधव और प्रेममय वचन बोलनेवाले नौकर हैं। [ द्वार पर ] हाथियोंके झुंड गरज रहे हैं, और तरल ( तेज़ ) घोड़े [ हिनहिना रहे हैं ]- इस प्रकार राजा जब यह वारंवार बोल रहा था और चौथे चरणके लिये अक्षर हूंढ़ रहा था, उसी समय कोई वेश्याव्यसनी विद्वान् , जो अपनी वेश्याके वचनसे रानीके दो कुण्डल चुरानेके लिये राजाके महलमें चौर वन कर घुसा था, उसने उन तीन चरणोंको सुना । तब उसने सोचा कि 'जो होना हो सो हो, पर जो चौथा चरण मनमें स्फुरित हो आया है उसे कैसे दबा रखू ? ' और वह बोला- 'आंखों मींच जाने पर [ इनमेंसे फिर ] कुछ भी नहीं है।' राजाने सन्तुष्ट हो कर कुण्डलके साथ उसको मनोवांछित दिया । ७४) अन्य समय, एक बार, वही राजा, राजपाटीसे लौट कर नगरके गोपुरमें [ जब आ रहा था तब] एक बिना लगामका घोड़ा दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा, जिसे देख कर लोक आकुल-व्याकुल हो कर इधर उधर भागने लगे। उनमें एक तक विक्रय करनेवाली ग्वालिन भी सपाटमें आ गई और उसके सिरपर जो छाँछसे भरी हुई हंडिया थी वह नीचे गिर पड़ी । उसमें से नदीके प्रवाहकी तरह गोरस निकल कर वह चला, जिसे देख कर उसका मुख-कमल खिल उठा। भोज ने यह देख कर पूछा कि विषादके समय भी तुम्हारे इस हर्षका कारण क्या है ? राजाके यह पूछने पर वह बोली- १२०. राजाको मार कर, पतिको सांपसे काटा हुआ देख कर, मैं विविवश परदेशमें वेश्या हुई। पुत्रको [ अपने साथ ] वेश्यागामी पा कर मैं चितामें प्रविष्ट हुई। इसके बाद, गोपकी गृहिणी बनी; तो फिर आज मैं इस तक्रके लिये क्या शोच करूं? [ वह इस प्रकार बोली । उस प्रदेशसे एक बड़ी नदी प्रादुर्भूत हुई, जिसका नाम म ही पड़ा । ] इस प्रकार गोपगृहिणीका यह प्रबंध समाप्त हुआ। ? - . ७५) एक बार, प्रातःकाल, श्री भोज एक उपशिला (छोटे पत्थर ) को लक्ष्य करके आनन्दपूर्वक धनुर्वेदका अभ्यास कर रहा था, उसी समय श्वेताम्बर वेशधारी श्री चंद ना चार्य ने अपनी तत्कालोत्पन्न प्रतिभाकी सुन्दरतासे इस उचित पद्यको कहा- १२१. यह खण्डित शिला चाहे खण्डित हो जाओ, पर हे राजन् ! इसके बाद क्रीड़ा करना बस कर दीजिये; और देव ! प्रसन्न हो कर पाषाणवेधके व्यसनकी यह रसिकता छोड़िये । क्यों कि अगर यह क्रीड़ा बढ़ी तो बड़े बड़े पर्वतोंको वेध करोगे और यह धरती ध्वस्ताधारा ( आधार जिसका ध्वंस हो गया है) हो कर, हे नृपतिलक ! पातालके मूलमें चली जायगी। उनकी इस प्रकारकी कविताके चमत्कारसे चमत्कृत हो कर भी राजाने कुछ सोच कर कहा-' सर्व- शास्त्र-पारंगत हो कर भी आपने जो 'वस्ता धारा' यह पढ़ा उससे कोई उत्पात सूचित होता है । " * भोज और कर्णका संघर्ष । ७६) इधर, डाह ल देश के राजाकी दे म ति नामक रानी महा योगिनी थी। एक बार, जब कि वह आसन्न प्रसवा थी, सदैव ज्योतिषियोंसे यह पूछा करती थी कि किस शुभ लग्नमें उत्पन्न पुत्र सार्वभौम (सम्राट) होता है ?' इसके बाद, उन्होंने अच्छी तरह विचार कर बताया कि जब शुभ ग्रह उच्च राशि, और केन्द्र (प्रथम ?
. . प्रकरण ७४-७६] भोज और कर्णका सघर्ष [६१ चतुर्थ, सप्तम, और दशम) में हों, तथा पप ग्रह तृतीय, पष्ठ और एकादशमें हों, तो जो पुत्र होगा वह सार्वभौम राजा होगा। यह सुन कर, निश्चित प्रसन समयके बाद,१६ पहर तक, योगकी युक्तिसे गर्भस्तभ करके ज्योतिषीके निर्णीत लममें कर्ण नामक पुत्रको उसने जम दिया। उस गर्भधारणके दोपसे पुत्रप्रसरके अनन्तर आठरें पहरमें वह मर गई । सुलग्नमें जन्म होनेके कारण कर्ण ने अपने पराक्रमसे दिग्मण्डलको आक्रान्त किया । एक -सौ उत्तीस राजाओंके, भौरेके समान काले-काले केश-कलापसे उसके दोनों विमल चरण-कमल पूजे जाते थे और चारों प्रकारको राजविद्याओंमें परम प्रवीणता प्राप्त करके, विद्यापति प्रभृति महाकवियोंसे वह स्तुत होता था। जैसे [ एक बार कर्पूर क पिने कहा-] १२२ +जिनके मुँहमें तो हारागाप्ति" है, आँखोंमें 'ककणभार है, नितबमें 'पत्रावली'' है, और दोनों हाथ 'सतिलक'' है--हे श्री कर्ण ! तुम्हारे शत्रुओंको त्रियोंको, विविवश, वनमें, इस समय भूपण पहननेकी यह कैसी [ विलक्षण ] राति ग्रहण करनी पड़ी है । ऐसा कहने पर चतुर चक्रवर्ती राजाने कहा-'यदि ' निधि वश ' ऐसा हुआ तो फिर वर्णनीय राजाका क्या रहा ? दैवने भी जिस बातकी चिन्ता नहीं की वह हो।' अतएव राजाको इसमें कुछ भी चमत्कार नहीं जान पड़ा और उसे बिना कुछ दिये ही विदा कर दिया । घर जाने पर भार्याने पूछा-क्या दिया राजाने ।' उसने कहा- वही वृत्तस्वरूप ! ' ( अर्थात् श्लोकमें जो वर्णन किया गया है वही स्वरूप ) वह बोली- यदि 'विधिवशात् ' की जगह 'तर वशात् ' कहा गया होता तो वह सब कुछ दिलाता । तब फिर ना चि राज कनिने कर्ण नृपकी स्तुति की । जैसे-- [८१ ] गोपियोंके पीन पयोधरसे विष्णुका हृदय [ रूपी कमल ] आहत हो गया है इसलिये मैं समझता हूँ कि लक्ष्मी कमलकी आशकासे तुम्हारे नेत्रोंमें ही अब विश्राम कर रही है। इसलिये हे श्रीमन् कर्ण नरेश ! जहाँ तुम्हारी भूलता चलती है वहाँ भयभ्रात हो कर दारिद्यकी मुद्रा टूट जाती है। इससे अयन्त तुष्ट हो कर राजाने हाथके सारुले इत्यादिके उचित दानसे उसे पुरस्कृत किया । इस प्रकार जब वह मार्गमें आ रहा था, तो कर्पूर क पिने स्त्रीसे कहा कि राजाने इसे जो कुछ दिया है उसे, अब मैं अपने घर ले आता हू। यह कह कर वह उसके सामने गया । [२२] 'हे कन्ये! तू कौन है-'कर्पूर कनि ! क्या तू मुझे नहीं पहचानता'-'क्या भारती है:- 'सच है'-'तू विधुरा क्यों है।'-'मैं लूट ली गई1'-'माँ किसके द्वारा "-'दुष्ट विधाताके द्वारा- 'उसने तुम्हारा क्या ले लिया ?'- मुख और भोज रूपी दोनों आँख'-'तो जी कैसे रही हो। 'क्यों कि दीर्घायु श्री ना चिराज करि अन्धेकी लकड़ी रूप बने होनेसे।' नाचि राज करिने इस कान्यसे सन्तुष्ट हो कर कर्णराज से जो कुछ वर्ण, दुकूल आदि प्राप्त किया था वह सब कर्पूर कविको दे दिया । कर्ण नरेन्द्रने यह सुना, तो कपूर को बुलाके पूछा कि-' हे कवे! भोज के विद्यमान रहते 'मुस-भोज' यह पद कैसे उदाहृत किया ' वह बोला-'महाराज, जल्दी में हर्ष- मुज' की जगह मुख-भोज मुँहसे निकल गया ।' तब राजाने सोचा कि यह बात भोज का अमगल सूचित करती है। [ ८३] श्रीमत् कर्ण नरेन्द्रने मान और विमवसे सब याचकोंका मनोरथ पूर्ण कर दिया, इसलिये चितामणिके आँगनमें शिखापाली दूयें हमेशा श्यामल हो रही है। कल्पतरुके शून्य तलमें निक हो कर पशु-पक्षी खेल रहे हैं। और कामधेनु निकट ही कदको बैठा कर आलससे निद्रा ले रही है। + इस पद्यमे शन्दोंके लेप द्वारा दो भिन अर्थ निकाले गये हैं । १क्षरावाप्तिहारकी प्राप्ति और 'हा' ऐसे 'राव' सन्दकी प्राप्ति । २ ककण-हायका आभूषण और क-पानी उसा क्ण अश्रुपिंदु । यों तो पत्राली स्तन पर बाधी जाती है, लेक्नि इन स्त्रियोंको तो पहननेके लिये पूरे वस्त्र नहीं है इस लिये पत्रावलीसे नितर प्रदेशको ढाकना पड़ा है। ४ सतिलक तो पाल होता है लेकिन इन स्त्रियोंके तो अब हाय ही सतिलक-तिलपाले हैं। - ६२] प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश , , ७७) इस प्रकार महाकवि गण उसके नाना यशकी स्तुति करते थे। एक बार उस कर्ण राजाने श्री भोज के प्रति प्रधानोको भेज कर [ यह कहलाया-] 'आपकी नगरीमें आपके बनाये हुए १०४ मन्दिर हैं, इतने ही आपके गीत-प्रबंध और इतने ही बिरुद हैं; इसलिये, या चतुरंग [ सेना ] की लड़ाईमें, या द्वन्द्व युद्धमें, या चारों विद्याओंका शास्त्रार्थ करनेमें, या त्यागमें मुझे जीत कर एक सौ पांच बिरुदोंके पात्र वनो। नहीं तो मैं तुम्हें जीत कर १३७ राजाओंका स्वामी बनूंगा।' इस प्रकार उसके प्रभावके आवि- र्भावसे भोज का मुखकमल किंचित् म्लान हो गया। वह काशी नगरी के स्वामीको सब प्रकारसे जीत जाने योग्य समझ कर और अपनेको पराजित मान कर, अनुरोधपूर्वक उसकी अभ्यर्थना करके इस प्रकार उससे स्वीकार कराया कि-' मैं अवन्ती में, और श्री कर्ण वाणा र सी में एक ही लग्नमें नींव दे कर स्प के साथ ऐसे मंदिर बनवावे जो ५० हाथ ऊंचे हों । जहाँके प्रासादमें प्रथम कलश घ्वजारोपणका उत्सव हो उसमें दूसरा राजा छत्र-चामर छोड़ कर, हाथी पर बैठ कर वहाँ आवे । इस प्रकार भोज के यथा-रुचि अंगीकार करनेकी बात जब कर्ण के कानों पहुंची तो वह यद्यपि क्रुद्ध हुआ तथापि भोज को उस तरह भी नीचा दिखानेके लिये [उद्यत हुआ] । एक ही लग्नमें अलग अलग दोनों जगह जव प्रासाद आरंभ किये गये तो, सारी तैयारी करके, सूत्रधारोंसे कर्ण ने अपने प्रासादको बनाते समय पूछा कि-'बताओ एक दिनमें, सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच कितना काम किया जा सकता है ? ' इसके जवाबमें उन्होने, चतुर्दशाके अनध्यायके दिन, सात हाथ ऊंचे ग्यारह मन्दिर, सूर्योदयमें आरम्भ करके शामको कलश तक बना कर राजाको दिखा दिये । उस सारी सामग्रीसे राजाने प्रसन्न हो, आलस्य छोड कर, भोज के मन्दिरका जब मुंडेरा बाँधा जा रहा था तभी अपने मंदिर पर कलश स्थापित करा दिया; और ध्वजारोपणका लग्न निर्णय कर, दूत भेज कर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करनेके लिये श्री भोज को निमंत्रित किया । तब मा ल वा मण्डल का अधिपति भोज अपनी प्रतिज्ञा भंग होनेके भयसे, उस तरह जानेमें असमर्थ हो कर चुप हो रहा । इसके बाद प्रासाद पर ध्वजारोपण हो जानेके बाद, पुरातन कर्णके नवीन अवतारके समान उस कर्ण राजाने उतने ही राजाओंके साथ प्रयाण करके श्री भोज के ऊपर आक्रमण किया । उस अवसर पर श्री भोज के राज्यका आधा हिस्सा देनेकी प्रतिज्ञा करके श्री कर्ण ने माल व मण्डल पर पूंठ पीछेसे आक्रमण करनेके लिये श्री भीम को आमंत्रित किया । इस तरह उन दो राजाओंसे आक्रान्त होने पर राजा भोज का दर्प, मंत्रसे आक्रान्त सपके विषकी भाँति दूर हो गया। अकस्मात् उसी समय भोज का स्वास्थ्य विगड़ गया जिसको वहाँ वालोंने छुपा रखा, और नियुक्त मनुष्यों द्वारा सभी घाटोंके रास्ते रोक दिये गये तथा अन्यदेशीय पुरुषोंका प्रवेश एकदम अटका दिया गया । तब भीम ने अपने सन्धिविग्रहिक दाम र को, जो उस समय कर्ण के पास था, भोज का वृत्तान्त जानने के लिये अपने आदमी भेज कर पूछा । उसने भी उस पुरुषको एक गाथा पढ़ा कर भेजा, जिसने श्री भीम की सभामें आ कर कह सुनाया। यथा- १२३. आमका फल [अब ] पक गया है, वृन्त शिथिल हो गया है, आँधी जोरोंसे चल रही है और शाखा काँपने लगी है । और आगे हम नहीं जानते कि इस कार्यका परिणाम क्या होगा। इस गाथाके रहस्यको जान कर राजा भीम चुप हो रहा। श्री भोज के परलोक-मार्ग की यात्रा जब निकट आई तो उसने उपयुक्त धर्मकृत्य किया और समस्त राजपुरुषोंको राज्यानुशासन दे कर और यह आदेश दे कर कि मेरे हाथ विमानके बाहर रखना, स्वर्ग गया । [२४ ] अरे ! पुत्र, कलत्र और पुत्रियोंको क्या कर रहे हो और खेती बाड़ीको भी क्या कर रहे हो ! मनुष्यको तो अपने हाथ पग दोनों झाड़कर अकेले ही आना है और अकेले ही जाना है। भोज के इस वाक्यको वेश्याने लोगोंसे कहा । - J 4 । प्रकरण ७७-७८ ] भोज और कर्णका संघर्ष [६३ कर्णसे भीमका आधा भाग लेना। ७८) [ इसके बाद, जब वह राजा भोज स्वर्गगामी हुआ ] तो उस वृत्तान्तको जान कर कर्ण ने उसके दुर्गम दुर्गको तोड़ कर भोज की सारी लक्ष्मी हस्तगत की। तब श्री भी मने दाम र को आदेश किया कि- "तुम या तो श्री कर्ण से मेरा प्राप्य आधा राज्य ले आओ या अपना सिर ले आओ।' इस प्रकार राजादेश पालन करनेकी इच्छासे, ३२ पदातियोंके साथ, उसने राजाके तबूमें घुसकर मध्याह्न कालमें सोये हुए श्री कर्ण को बन्दीरूपमें गिरफ्तार किया। इसके बाद उस राजाने राज्य ऋद्धिके दो विभागोंमेंसे एकमें शिव, शालिग्राम, गणेश इत्यादि देवताओंको रखा और दूसरेमें राज्यकी अन्य सारी वस्तुओंको रखा। ' अपनी इच्छाके अनुसार इन दो से एक हिस्सा ले लो।' उसके ऐसा कहने पर, वह सोलह प्रहर तक तो वैसे ही पड़ा रहा, फिर भी म की आज्ञा [ आने पर ] देवताओंके भडारको ले कर ही उन्हें श्री भीम को भेंट किया। इस प्रबधका सारा इतिहास इन दो काव्योंमें सग्रहीत है। जैसे- १२४ पचास हाथ प्रमाणके दो शिवमदिर एक ही लग्नमें प्रारम्भ किये गये । यह स्थिर हुआ कि जिस राजाके मदिर पर पहले कलशारोपण होगा, उसके पास दूसरा राजा छत्र और चामर रहित हो कर आयगा। इस समादमें राजा भोज की बुद्धि व्ययसे पिमुख हो गई और इस प्रकार वह कर्ण देव के द्वारा जीता गया । १२५ भोज राजाके स्वर्ग जानेके बाद अतिबली कर्णने जो धारापुरीके भग करनेका उपाय किया तो राजा भीम को सहायक बनाया। उसके भृत्य दामरने बदी किये हुए कर्ण से गणपतिके सहित नीलकठेश्वरको सोनेकी पालखीके साथ ग्रहण किया । १२६ कनियों और कामियोंमें, योगियों और भोगियोंमें, धन देनेवालों और सज्जनोंका उपकार करनेवालोंमें, तथा धनी, धनुर्धर और धार्मिकोंमें भोज जसा राजा पृथ्वी तलपर नहीं हुआ। १२७ राजा भोज ने अपने त्यागोंके कारण कल्पवृक्षके समान अशेप दु खोंको बासित किया, साक्षात् बृहस्पतिकी नाई शीघ्रतापूर्वक नाना प्रबधोंकी रचना की। राधा-वेध ( मत्स्य-वेध ) करने में वह अर्जुनके समान [ सिद्ध ] था । इसीलिये बहुत दिनोंसे, उसकी कीर्तिसे उत्सुक-चित्त देवताओं के द्वारा निमत्रित हो कर वह स्वर्ग गया । इस प्रकार भोज के अनेक प्रबध हैं जो परपराके अनुसार जानने चाहिये । * इस प्रकार थीमेरुतुझाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थका 'श्रीभोजराज और श्रीभीमराजके नाना यशोंका वर्णन ' नामक यह दूसरा प्रकाश समाप्त हुआ।
६४ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश ८. सिद्धराजादि प्रवन्ध । - . मूलराज कुमारकी प्रजावत्सलताका प्रवन्ध । ७९) इसके वाद, किसी समय, गूर्जर देशमें अनावृष्टिके कारण जव वर्षा नहीं हुई तो विशो प क (2) दण्डा हि देशके ग्रामोंके कुटुम्बी (कुनबी-किसान) जनोंके राजाका कर (भाग) देनेमें असमर्थ हो जाने पर राजनियुक्त व्यापारियों ( कर्मचारियों ) ने उस देशके सभी लोगोंको, उनके धन और जनके साथ, पत्तन में ले आकर राजा भीम के सामने निवेदित किया । एक दिन सबेरे श्री मूल राज कुमारने टहलते टहलते देखा कि राज्यके आदमी फसलका दाण ( कर ) वसूल करनेके लिये सभी लोगोंको व्याकुल कर रहे हैं। अपने निकटके आदमियोंसे उस सारे वृत्तान्तके जानने पर उसकी आँखोंमें करुणाके कुछ आँसू आ गये। बादमें घुड़दौड़के मैदानमें उसने अपनी अनुपम कला दिखा कर राजाको सन्तुष्ट किया । उसपर राजाने आदेश दिया कि ' वर माँगो' । उसने [ राजाको ] सूचित किया कि-' यह वरदान अभी भाण्डागार ही में रखा रहे। राजाने जब कहा कि- अभी क्यों नहीं कुछ माग लेते ? ' तो उसने कहा कि-' प्राप्ति होनेका कोई प्रमाण दिखाई नहीं देता-इसलिये । ' राजाके उसका अनुरोध पूर्वक खुलासा पूछने पर, उन कुटुंबियोंका लगान माफ कर देनेका उसने वर माँगा। तब हर्षके कारण जिसकी आँखें आँसुओंसे गद्गद् हो गई हैं ऐसे उस राजाने ' ऐसा ही हो' कह कर ' और भी कुछ माँगो' यह कहा । १२८. केवल अपना ही भरण-पोपण करनेवाले क्षुद्र पुरुप तो हजारों है पर जिसका परार्थ ही स्वार्थ है ऐसा सज्जनोंका अगुआ पुरुप तो [ हजारोंमें ] कोई एक होता है । वाडव अग्नि समुद्रको अपने दुप्पूरणीय पेटको भरनेके लिये पीता है पर बादल तो पीता है ग्रोप्मके तापसे तपे हुए जगतका सन्ताप दूर करनेके लिये। इस प्रकार इस काव्यार्थक भावको समझ कर, अधिक लोभका निग्रह करके फिर और कुछ नहीं माँगा । इस तरह मानोन्नत हो कर वह अपने स्थान पर गया । उसके द्वारा, इस तरह वन्धन-विमुक्त बने हुए वे लोग देवताकी भाँति उसकी पूजा और स्तुति करने लगे। दैववशात् तीसरे ही दिन, उनके सन्तोषकी दृष्टिसे स्तुत होता हुआ [ वह राजकुमार ] मृत्यु प्राप्त कर स्वर्ग लोकको चला गया। राजा, राजपुरुष और वन्धन-विमुक्त वे सब प्रजाजन उस शोकसागरमें डूब गये जिन्हें [ अन्यान्य ] समझदार लोगोंने, अनेक प्रकारके वोधवचन सुना सुना कर, कितने ही दिनोंके बाद उनको शोक-विमुक्त किया । इसके बाद, दूसरे साल, यथेष्ट वृष्टि होनेके कारण खूब फसल पैदा हुई । इससे वे किसान लोग अत्यन्त हर्पित हो कर, उस वर्षका और वीते हुए वर्षका भी, लगान देनेको तत्पर हुए पर राजाने उसे ग्रहण नहीं किया । तब उन्होंने एक उत्तर-सभाका सम्मेलन किया । सभा और सभ्योका लक्षण यह है- १२९. वह सभा ही नहीं जिसमें वृद्ध न हों, और वे वृद्ध नहीं जो धर्मका कथन नहीं करते । वह धर्म नहीं है जिसमें सत्य नहीं और वह सत्य नहीं है जो कल्पितसे अनुविद्ध हो । ऐसा [ शास्त्र ] निर्णय कर सभ्योने राजासे गत साल और उस सालका लगान ग्रहण करवाया। राजाने उस द्रव्यसे तथा खजानेमेंसे और कुछ द्रव्य मिला कर मूल राज कुमारके कल्याणार्थ नया त्रिपुरुषः प्रासाद [ नामक शिवमन्दिर ] बनवाया ।
प्रकरण ७९-८४ ] कर्णराजा और मयणल्लादेवीका वृत्तान्त [६५ ८०) इसने पत्तन में श्री भी मेघर देव और भट्टारिका (पटरानी) भी रु आणी के [ नामसे शिरके ] प्रासाद बनवाये । सत् १०७७ से लेकर ४२ वर्ष १० मास ९ दिन राज्य किया । ( BP प्रतियोंमें - सबत् १०६५ से आरभ कर १२ वर्ष राज्य किया।) कर्णराजा और मयणल्लादेवीका वृत्तान्त । ८१) उसकी रानीने जिसका नाम उदय मति था [ और जो नर या ह न ख गार की उड़की थी 3, पत्तन में एक बहुत बड़ी नयी वापी ( बारडी) नवाई, जो स ह स लिंग सरोवरसे भी कहीं अधिक आकर्षक थी। ८२) इसके वाद, स० ११२० चैत्र वदि ७ सोमवार, हस्त नक्षत्र, मीन लग्नमें श्री कर्ण दे व का राज्याभिषेक हुआ। ८३) इयर, शुभ के शी नामक कर्नाट देश का राजा घोड़ेसे [ जिसको अपने कामें न रख सकनेके कारण ] उडाया जा कर किसी घने जगलमें जा पडा । नहाँ पर फल्से भरे किसी वृक्षकी छायाका उसने आश्रय लिया। उसके पास ही दावाग्नि लगी । जिस वृक्षने [ अपनी छाया ] विश्राम दे कर उपकार फिया था उसे, कृतहताके कारण छोड़ कर चले जानेकी उसकी इच्छा न हुई। और इसलिये, उसीके सार टारानलमे उसने अपने प्राणोंकी आहुति दे दी। फिर इसके बाद, मत्रियोंने उसके पुन ज य के शी को राज-पद पर अभिषिक्त किया । क्रमश उसके एक मयण ला देवी नामकी पुनी पैदा हुई । शिवभक्तोंने उसके सामने [ किसी समय] ज्यों ही सोमेश्वर का नाम लिया क्यों ही उसको अपने पूर्व जमका स्मरण हो आया कि- 'मैं पूर्व जन्ममें ब्राह्मणी थी। बारहों मासके उपवास करके प्रत्येकके उद्यापनके समय बारह वस्तुओंका दान किया करती थी। [इसके पाद ] श्री सो मेनर को प्रणाम करनेके लिये प्रस्थान करके वाहु लोड नगर में आई । वहाँपर कर देनेमें असमर्थ हो [ आगे ] न जा सकी । उसीके शोकमें, यह प्रतिज्ञा करके कि भविष्य जममें मैं इस करको मिटादेने वाली बनू '-मर कर इस कुलमें पैदा हुई । ऐसी यह उसे पूर्व जन्मकी स्मृति हुई । इसके अनुसार बाहु लोड के करको हटा देनेकी इच्छासे उसने गूर्जर नरेश जेसे श्रेष्ठ परकी कामना करके अपने पितासे यह सर वृत्तात कहा। ज य के शी राजाने यह व्यतिकर जान कर अपने प्रधान पुरुपोंके द्वारा, श्री कर्ण से अपनी पुत्री श्री म यण ला देवीको [ पनीरूपमें ग्रहण करनेकी J स्वीकृति माँगी। श्री कर्ण ने जब उसकी कुरूपताकी बात सुनी तो वह उदासीन हो गया। पर उस फन्याका मन उसीमें लगा देख कर पिताने म यण ल्ला देवी को उसके यहाँ, स्वयपरा रूपमें-जिसने स्वय अपना र चुन लिया है-उसीके पास भेज दिया। इधर कर्ण गुप्तरूपसे स्वय ही उसे कुरूपा देख कर उसके प्रति सर्वथा निरादर हो गया । राजाके इस प्रकार त्यागके कारण अपनी आठ सखियोंके साथ म य ण ला देवी को प्राणत्याग करनेकी इच्छुक जान कर श्री कर्ण की माता उ द य मति रानीने, उनकी यह विपद देखनेमें असमर्थ हो कर, उन्हीं के साथ प्राणत्यागका सद्कल्प, किया । क्यों कि- १३० महान् लोग अपनी विपत्तिसे उतने दुखी नहीं होते नितने दूसरोंकी विपत्तिसे । अपने ऊपर आवात होने पर जो पृथ्वी अचल रहती है वही दूसरोंकी रिपद देख कर काँपने लगती है। इसके बाद महा उपर उपस्थित हुआ जान कर मातृभक्तिरश श्री कर्ण ने उससे मिाह कर लिया। पर बादमें [ बहुत समय तक ] उसकी ओर नजर उठा कर ताका भी नहीं। ८४) एक बार मुसाल मत्रीको कन्चुकोसे यह मालूम हुआ कि राजाका मन किसी अवम सीके प्रति साभिराप है। [यह जान कर ] उसने ऋतुस्नाता म यण सादे पी को, उसीका रूप धारण कराके एकातमें १७-१८ ६६] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश उसके पास भेजा | राजाने यह समझ कर कि यह वही सी है, उसके साथ सप्रेम उपभोग किया और उससे उसको गर्भाधान हो गया। फिर उसने सङ्केत बताने के लिये राजाके हाथसे उसकी नामाकित अंगूठी ले ली और अपनी अंगुलिमे पहन ली । बादमें प्रातःकाल, उस दुर्विलासके कारण रानाको ग्लानि हुई और उस रहस्यमय वास्तविक वृत्तान्तको न जानते हुए उसने प्राणत्याग करनेका संकल्प किया । स्मृतिशास्त्रियोंके, ताँबेकी बनी हुई प्रतप्त मूर्तिके साथ आलिंगन करनेसे इसका प्रायश्चित हो जायगा, ऐसा विधान बतलानेसे राजाने उसी प्रकार करनेकी इच्छा की । तब उस मंत्रीने वह सारी बात जैसी बनी थी वैसी कह सुनाई। (इस जगह P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक मिलते हैं -) [ ८५ ] [ अपने ] भारी पराक्रमके कारण तो वह पिता [ भीम ] के समान हुआ। और रमणीय आकारके कारण वह राजा अपने पुत्र [ जय सिंह-सिद्ध राज ] के समान हुआ । [ ८६ ] विना कर्ण ( राजाके ) के स्त्री नेत्रोंको कहीं भी रति (प्रीति ) नहीं प्राप्त होती थी इसी लिये उन ( स्त्री-नेत्रो ) की प्रवृत्ति कर्ण ( कान ) तक हुई। ( अर्थात् इसी लिये मानों स्त्रियोंके नेत्र कानतक लंबे होने लगे। [ ८७ ] मानों कर्ण और अर्जुन के उस पुराने वैरको स्मरण करते हुए ही, उस कर्ण ने [अपने ] अर्जुन ( स्वेत ) यशको देशान्तरमें पहुँचा दिया । सिद्धराज जयसिंहका जन्म । [ ८८ ] जिस प्रकार दशरथ के पुत्र मनोहर गुणोसे युक्त श्री राम हुए उसी प्रकार इस [कर्ण] का जगद्विजयी ऐसा जय सिंह नामक पुत्र हुआ। ८५) अच्छे लग्न ( मुहूर्त ) में पैदा हुए उस पुत्रका नाम राजाने 'जय सिंह' ऐसा रखा । वह बालक जब तीन वर्षका था उसी समय समवयस्क कुमारोंके साथ खेलता हुआ सिंहासनपर आरूढ हो गया । इस बातको व्यवहार विरुद्ध समझ कर राजाने ज्योतिषियोसे पूछा । उन्होंने निवेदन किया कि यह [बड़ा] आभ्युदयिक लग्न है । राजाने उसी समय उस पुत्रका राज्याभिषेक करा दिया । ८६) सं० ११५० पौष वदी ३ शनिवार, श्रवण नक्षत्र, वृष लग्नमें, श्री सिद्ध राज का पट्टाभिषेक हुआ। ८७) राजा स्वयं, आशा पल्ली नामक ग्रामके रहनेवाले आशा नामक भीलके ऊपर युद्धके लिये चढाई करके गया । भैरव देवीका शुभ शकुन होने पर, वहाँ को छ र ब्बा नामक देवीका मंदिर बनवाया [ और वहीं शिबिर-निवेश किया] फिर, एक लाख खड्गके अधिपति उस भीलको जीत कर और उस प्रासादमें जयन्ती देवीकी प्रतिष्ठा करके, कर्णेश्वर देवताका मन्दिर और कर्ण सा गर तालाबसे सुशोभित कर्णावती पुरीकी स्थापना कर खुद वहीं राज्य करने लगा। उस राजाने पत्त न मे श्री कर्ण मे रु नामक प्रासाद बनवाया । सं० ११२० चैत्र सुदि ७ से ले कर, सं० ११५० पौष वदी २ तक, २९ वर्ष ८ मास २१ दिन इस राजाने राज्य किया। सिद्धराजका राज्यवर्णन-लीला वैद्यका प्रवन्ध । ८८) इसके बाद, जब श्री कर्ण का स्वर्गवास हो गया तो श्रीमती उदयमति देवीका भाई मदन पाल असमंजस भावसे वर्तने लगा। उसने लीला नामक वैद्यको,-जिसने देवतासे वरप्रसाद पाया था और तात्कालिक नागरिक लोग हृतहृदय हो कर जिसकी काञ्चन-दान आदि पूजा द्वारा अभ्यर्चना किया - प्रकरण ८५-९० उदयन मनीका प्रबन्ध [६७ करते थे-अपने महलमें बुलाया। शरीरमें वनावटी रोग बतला कर नाडी दिखाई | वेदने उपयुक्त पथ्यका सेवन करना बतलाया तो [ उस मदन पाल ने कहा] ' वही तो नहीं है।' ओर इसीलिये मैंने तुम्हें बुलाया है। [किमी और प्रकारका ] पथ्य दे कर भूख शान्त करनेके लिये तुम्हें नहीं बुलाया है ] । इसलिये वत्तीस हजार [ रुपये ] हाजर करो, यह कह कर उसे वदी कर लिया। उसने वह सब वैमा करके (अर्थात् उसका मागा हुआ द्रव्य दे-दिला र) फिर इस तरहका अभिग्रह (नियम) ग्रहण किया कि-'मैं इसके बाद प्रतीकारके लिये राजाका घर छोड़ कर अयत्र कहीं नहीं जाऊँगा'। इसके बाद परम आतुर रोगियोंका प्रश्रवण (पैशाय) मान देख कर ही यह उनका निदान और चिकिसा करता रहा। [ एक समय ] किसी मायापरीने, कलित रोगी चिकित्सा कौशटको जाननेकी इच्छासे एक बैटका मूत्र दिखाया । उसने अच्छी तरह उसे देख कर सिर हिलाते हुए कहा- यह बैल बहुत खानेके कारण इल गया है । इसलिये भीत्र ही इसे तेटकी नाली दो । नहीं तो मर जायगा।' ऐसा कह कर उमने उसके चित्तमें चमत्कार उत्पन्न किया। एक पार राजाने अपनी गर्दनकी पीडाका प्रतीकार पूछा । उसके यह काइने पर कि, दो पल भर कस्तूरीको भिगो कर टेप करनेसे रोग शान्त होगा, वैसा ही किया गया । गर्दन ठीक हो गई। फिर राजाकी पाटकी टोनेवाले किसी गरीब मनुष्यने प्रीया ( गर्दन) की पीडाकी दवा पूछी। उससे कहा कि ' करीरकी जड़ घिस कर उसके रसमें उसी जगहकी मिट्टी मिला कर उसका टेप करो। तब राजाने यह क्या वात है । इस पर उसने बताया कि आयुर्वेदज्ञ लोग देश, काल, नल, शरीर और प्रकृति देख कर चिकित्सा किया करते हैं ।' एक बार, कुछ धूर्त एक मत हो कर दो दोकी सरया पृथक् पृथक् हो गये। पहले दोने वाजारक रास्तों क्या बात है कि आप शरीरसे खिन्न दिखाई देते हैं।' दूसरे दोने श्री मुक्षा र स्वामी प्रासादके सोपान पर [ यही बात ] पूरी | तीसरे दोने राजद्वार पर और चौथे दोने द्वारतोरण पर वही बात पूजी । इस प्रकार बार बार पूटनेसे उसे [ अपने स्वास्थ्यके विषयमें बड़ी ] शका उत्पन्न हो गई और तन्काट ही उसे माहेन्द्र ज्वर हो गया। [ और उससे ] तेरहवें दिन यह वैद्य मर गया। इस प्रकार यह ठ० लीला वैयका मध समाप्त हुआ। " १ पूछा कि ८९) इसके बाद, सान्तू नामक मत्री, काटकी नॉई अन्यायो उस मदन पाल को मारनेको इन्चासे किसी समय, कर्ण के पुत्र-कुमार जय सिंह-को हाथी पर चढ़ा कर राजपाटिकाके बहाने उसके घर ले गया और यहाँ [कुछ तूफान मचा कर ] पीरोंके हायसे उसको मरसा डाला । कुछ कर्मचारी । उदयन मन्त्रीका प्रबन्ध । ९०) इधर, मर देश का रहनेवाडा कोई श्री मा ल व शीय वणिक जिसका नाम 'उदा' था, अन्ठा घी परीदनेके टिये, वर्षाकाटकी अधेरी रातमें कहा जा रहा था । यहाँ जगलमें उसने देखा कि किसी खेतमें एक पारीमे दूसरी क्यारीमें जल भर रहे है । उनसे पूछा कि तुम लोग कौन हो । उन्दोंने जन पहा कि 'हम फडॉ आदमी कामुक (हितचितफ) है' तो उसने पूछा कि मेरे भी की है। इस पर उनके यह बताने पर कि कर्णा य ती में है' यह सकुदुर (उस स्थानको टोड़ कर ] यहाँ (कर्णा य ती) पहुँचा। वहाँ पर यायटीय जिन मन्दिरमें [देवदर्शन करते हुए उमको ] किमी 'साहि' नामक एक डिम्पिका श्राविकाने, उसे सापभिक जान कर प्रणाम किया। उमफे यह पूरने पर कि आर स्मिके अतिथि हैं। [उ दाने कहा कि] विदेशी हैं, आप ही का अतिथि समझिर!' यह सुन कर उमने टमको अपने साथ ले जा कर, किमी यनि- ६८] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश के घर भोजन बनवा कर उसे खिलाया और अपने घरके नीचेके तल्लेमें खाट बिछवा कर रहनेकी जगह दी। कालक्रमसे उसके पास खूब सम्पत्ति हो गई। फिर उसने अपना निजका ईटोका घर बनवानेकी इच्छा की। उसकी नींव खोदते समय [जमीनमेसे ] अपरिमित धन निकल आया। वह उस स्त्रीको बुला कर उस निधिको जब देने लगा तो उसने अस्वीकार किया। उसी निधिक प्रभावसे, वहाँ पर, वह उ द य न मंत्रांके नामसे प्रसिद्ध हुआ । ९१) [ फिर उस धनसे ] उसने क र्णा व ती में अतीत, भविष्य और वर्तमानके चौवीस चौवीस जिनोंसे सुशोभित श्री उद य न विहार [ नामक मन्दिर ] बनवाया । ९२) उसको भिन्न भिन्न मातासे उत्पन्न ऐसे चार पुत्र हुए, जिनके नाम चा हड, आ म्ब ड, वा हड और सो ला क इस प्रकार थे । । सान्तू मंत्रीका प्रवन्ध ९३) एक दूसरे अवसर पर, सान्तू नामक महामंत्री हाथी पर चढ़ कर राजपाटिकामें जा कर लौटा और अपनी ही बनवाई हुई सान्तू व स हि का मे देववन्दन करनेकी इच्छासे उसमे प्रवेश करते हुए, उसने, किसी चैत्यवासी श्वेतांवर यतिको, वार-वेश्याके कंधे पर हाथ रखे हुए देखा । मंत्रीने हाथीसे उतर कर उत्तरासङ्ग करके, 'पञ्चाङ्ग प्रणामके द्वारा, गौ त म मुनिकी भाँति, उसको प्रणाम किया । वहाँ पर क्षणभर ठहर कर, फिर उसे प्रणाम करके, वह चला गया। वह यति तो लाजके मारे मुँह नीचा किये पातालमें गड़ा-सा जाने लगा; और फिर तत्काल सब छोड़-छाड़ कर ' मल धारी श्री हे म सूरि के पास उपसम्पदा ग्रहण करके, संवेग रससे पूर्ण हो शत्रुञ्ज य पर्वत पर चला गया और बारह वर्पतक वहाँ तप किया। किसी समय वही मंत्री श्री शत्रुञ्ज य पर देवचरणोकी यात्राके लिये गया तब वहाँ उस मुनिको अपरिचितकी नॉई देख कर, उसके चरित्रसे मनमे चकित हो कर, उसका गुरुकुल आदि पूछा। 'असलमें तो आप ही गुरु है'-उसके ऐसा कहने पर कान बंद करके मंत्रीने कहा- नहीं, नहीं, ऐसा मत कहिये ।' असल बात न जाननेके कारण ऐसा कहते हुए उस मंत्रीसे उसने कहा- १३१. चाहे गृही हो चाहे त्यागी, जो जिसको शुद्ध धर्ममे स्थापित करता है वही उसका धर्मगुरु होता है। इस प्रकार उसे मूल वृत्तान्त बता कर उसकी धर्ममें दृढ़ता निर्माण की। इस प्रकार यह मन्त्री सान्तूकी दृढ़धर्मताका प्रबंध समाप्त हुआ। मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना । ९४) उसके बाद, श्री म य ण ल्ला दे वी ने, अपने पूर्व जन्मकी स्मृतिके ज्ञानसे जाना हुआ, पूर्वभवका चह वृत्तांत, जब सिद्ध राज से कह बताया, तो वह श्री सो म नाथ के योग्य सवा करोड़ मूल्यकी सुवर्णमयी पूजा- सामग्री साथ ले कर यात्राके लिये माताके साथ चला । वह इस प्रकार, वा हु लोड़ न ग र पहुँची, तो वहां पर, पञ्चकुल - कर वसूल करने वाले राजपुरुष - के द्वारा, कापडी आदि प्रवासी भिक्षुक गण, कर देने के लिये पीडित किये जा कर, उनकी अवहेलना की गई। वे आँखोंमें, आंसू भर कर पीछे लौटने लगे। म य ण ल्ला देवी ने जो यह बनाव देखा तो उसके दर्पणसे [ स्वच्छ ] हृदयमे उनकी पीड़ा संक्रान्त हो गई। वह भी [उनके साथ यात्रा किये विना ] पीछे लौटने लगी। तब सिद्ध राज ने बीचमे पड कर कहा-' स्वामिनि ! आपका यह कैसा संभ्रम हे ? आप क्यों पीछे लौट रहीं हैं ? ' राजाके ऐसा कहने पर [ उसने कहा-] जभी यह कर सर्वथा बन्द कर दिया जायगा तभी मै सो मे श्व र को प्रणाम करूँगी, अन्यथा नहीं। और तो क्या, इसके बाद भोजन और पानका भी मुझे नियम है। यह सुन कर राजाने पञ्चकुलको बुलाया और उसका हिसाब पूछा, तो उसमें ७२ .
प्रकरण ९१-९६ ] मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना राखकी आमदनी माइम दी। राजाने उस करके पढेको फाड कर, माताके कल्याणार्थ उस करको उठा दिया और अजलीमें जल ले कर उसकी प्रतिज्ञा की । इसके बाद उस ( म य णला देवी) ने सोमेश्वर के पास जा कर उस सुवर्णसे पूजा की, तथा तुटापुरपदान, गजदान आदि अनेक महादान दिये । रातको वह ऐसे गर्दके साथ कि 'मेरे समान समारमें न कोई हुई और न कोई होने वाली है' गाड़ी नींदमें सो गई। तपस्वी क्षेप धारण करके उसी देव ( सो मै श्वर ) ने [ स्वप्नमें प्रयक्ष हो कर के ] कहा- यही मेरे देवालयमें एक कार्पटिक स्त्री यात्रा के लिये आई है । तुम्ह उसका पुण्य माँगना चाहिये । ऐसा आदेश करके जब यह देवता अन्तर्शन हो गये तो [किर प्रात काठ ] रानपुरुपोंमे खोज करा कर उस स्रोको उसने बुलवाया। उसके पुण्यको माँगने पर भी वह किसी तरह जब देनेको तत्पर न हुई तो उसमे पूछा कि 'यात्रामें तुमने क्या [द्रव्य ] व्यय किया है.' तो वह बोली कि मैं भीख माँग माँग कर १०० योनन दूरसे, कई देश पार करके, कलके दिन यहाँ देवालयमें आई हूँ। तीर्योपास करके, पारणामें किसी सुतिके यहाँस, में निर्धागिनी थोडासा पिण्याक ( वटी) प्राम करके, उसके एक टुकड़ेसे मैंने श्री सोमेश्वर की पूजा की, एक टुकड़ा अतिथिको दिया और एक टुकड़ा स्त्रय खा कर उपनामका पारणा किया। आप तो वही पुण्याती हैं-जिसके पिता, भाई, पति और पुत्र राजा है । आपने यह वा हु लोड कर, जो ७२ लाएका पा, उठा दिया है । सवा करोड़ मूल्यकी सामग्रीसे देवकी पूजा कर अगणित पुण्य अर्जन किया है। आप मेरे इस बुद्र पुण्य पर क्यों लोभ करती हैं। और यदि क्रोध न करें तो कुछ कहूँ । अमलमें तुम्हारे पुण्यसे मेरा पुण्य अधिक है । क्यों कि- १३२ सपत्ति होने पर नियम करना, शक्ति रहते मदन करना, योग्नावस्थामें व्रत लेना आर दरिद्रा- वस्थामें दान देना,-यह मा बहुत थोडा होने पर भी अधिक पुण्यका कारण होता है। इस प्रकारके युक्ति-युक्त वाक्यसे उमने उसके गर्नका निराकरण किया । . , * ९५) इसके बाद, सिदराज जन समुद्र के किनारे खडा हो कर उसको देख रहा था तब एक चारणने आ कर इस प्रकार म्नुति की- १३३ हे चक्रवर्ती नाथ ! तुम्हारे चित्तको तो कौन जानता है, लेकिन मैं समझता हूँ कि हे फर्ण पुत्र आप शीत्र ही लझा लेना चाहते है और उसी के लिये यहाँ गडे खडे मार्ग देख रहे है। [तर एक ] दूसरे चारणने कहा- १३४ है जेसल (जय सिंह)। यह समुद्र दौड फर तुम्हारे पैर धो रहा है, इसठिये कि तुमने और तो सर रानाओंको जीत दिया है और सिर्फ एक मेरा विभीषण राजा बाकी रह गया है, सो उमको छोड़ दीजिए। * सिद्धराजका मालवाके साथ सघर्प । ९६) राजा जर इस प्रकार यागमें व्यस्त था, उसी समय मालवा का उठान्येपो राजा यशोवर्मा गूर्जर देश में [आ कर ] उपहर करने लगा। सा न्यू मत्री ने पूछा कि 'मयों, आप मे इस चढाईमे निवृत्त हो सकते। उसने कहा कि यदि तुम अपने स्वामीझी सो मे च र देय की यात्राका पुण्य मुझे दे दो तो।' ऐमा फाइने पर उम मत्रीने उनके चरण धो कर, उम पुण्यदानो निदानम्प जटको चुन्में ले कर उससे हाप पर जोड़ दिया और ऐमा फरके उसको [गूर्जर देश मे] आपस लौटाया। [यात्रामे टोट कर] श्री सिदराज जर नगरमें आया और मरी और मा ट य नरेश उम चातको मुना तो यह यदा कुन हुआ। मत्रीने उममे ७०] प्रवन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश [शांत करते हुए ] यो कहा-'स्वामिन् ! यदि मेरे देनेसे तुम्हारा पुण्य चला जाता है तो मैं उसका तथा अन्य पुण्यवानोका पुण्य इसी तरह आपको भी दे देता हूँ। और असलमे तो बात यह थी कि जिस-किसी भी उपायसे शत्रुसेनाको स्वदेशमें प्रवेश करनेसे रोकनी जरूर थी।' ऐसा कह कर उसने नृपतिका अनुनय किया । इसके बाद इसी अमर्पवश उसने मा ल व म ण्ड ल पर चढ़ाई करनेकी इच्छा की। स ह त्र लिंग [ सरोवरादि ] धर्म- स्थानके कार्यका जो आरंभ किया गया था उसकी देखरेखका काम मंत्रियों और शिल्पियों (कारीगरों) को सौपा। वड़ी शीघ्रताके साथ उसका काम चलने पर राजाने युद्धके लिये प्रयाण किया । वहाँ जय-जयकारके साथ वारह वर्ष तक युद्ध होता रहा । फिर भी जब किसी प्रकार धारा [ नगरी ] का किला नहीं टूटता दिखाई दिया तो [एक दिन राजाने यह ] प्रतिज्ञा की कि धारा के किलेको तोड़े बिना आज अन्न ही न खाऊँगा । सायंकाल हो जाने पर भी ऐसा करनेमें असमर्थ होनेके कारण, सचिवोंने आटेकी बनावटी धारा बनवा कर और वहाँ पर परमार राजपुत्रको अपने सैनिकों द्वारा मरवा कर, उस प्रतिज्ञाका निर्वाह कराया। इस प्रकार प्रपञ्चसे राजाने प्रतिज्ञा तो पूरी की, लेकिन कार्यमे सफलता प्राप्त न होनेसे वापस लौटनेकी अपनी इच्छा मु खाल नामक मंत्रीको वताई। उसने अपने गुप्तचरोको तीन रास्ते, चौराहे और चबूतरे इत्यादिक स्थानो पर भेज कर, धारा के किलेके भंग होनेकी बातें जाननी चाहीं। लोगोंके परस्पर वार्तालाप करते हुए, धारा के रहने वाले किसी [ जानकार ] पुरुषने कहा कि ' दक्षिण दिशाके दरवाजेकी ओरसे शत्रुसेना हमला करे तब ही कहीं धारा के किलेका तोड़ना सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं।' यह बात सुन कर [उन गुप्त चर लोगोंने] मंत्रीको सूचित किया। उसने इस वृत्तान्तको गुप्तरूपसे राजाको विज्ञापित किया। राजाने भी यह वृत्तान्त जान कर उधर ही से सेनाके साथ आक्रमण किया। तो भी दुर्गको बड़ा दुर्गम समझ कर राजा स्वयं ' यशः प ट ह' नामक अपने प्रधान बलवान् पट्ट हाथी पर चढ़ा। उसके पीछे सा म ल नामक महावत खड़ा रहा । त्रिपोलिया दरवाजेके दोनों किवाडौंको, जिनके अंदर लोहेकी जबर्दस्त अर्गला लगी हुई थी, तोडनेके लिये उस हाथीने अपना सर्व सामर्थ्य खर्च कर दिया । किवाड तो टूट गये लेकिन हाथीकी हड्डी भी साथमें टूट गई। महावतने सिद्धराज को उस परसे उतारा और ज्यो ही वह स्वयं उस पर चढ़नेको उद्यत हुआ त्यों ही वह हाथी पृथ्वी पर गिर पड़ा । वह हाथी बड़ा वीर होनेके कारण मर कर अपने यशसे धवल हो कर व ड स र ग्राममें य शोध व ल नाम ग्रहण करके बिनायक रूपसे अवतीर्ण हुआ। १३५. सिद्धिके स्तनरूप शैलके तटदेशके आघातके कारण मानों जिसका दूसरा दांत टूट गया है, वह एक दाँत धारण करनेवाला गजवदन ( विनायक ) तुम्हारा श्रेय करे । इस तरह उसकी स्तुति [की जाती है । इस प्रकार दुर्गका भंग करने पर युद्ध में आरूढ़ य शोवर्मा को. [ सन्धि-विग्रहादि ] ६ गुणोंसे बाँध कर, उस जगह पर अपनी जगन्मान्य आज्ञाकी उद्घोपणा करवाई और य शोवर्म [ राजाको बन्दि बना कर अपने साथमे ले ] पत्त न मे आया । [ तब कवियोने ऐसी स्तुतियां पढ़ी-] [८९] अरे क्षत्रियो, ऐसा न समझो कि इस सिद्ध राज के कृपाणने अनेक राजाओंकी सेनाका नाश किया है इसलिये अब इसकी धार कुंठित हो गई है। नहीं नहीं; प्रबल प्रतापरूप अग्निके ऊपर आरूढ हो कर यह सम्प्राप्तधार (=१ जिसने धारा नगरीको प्राप्त किया है, २ जिसने तेज़दार धार पाई है) कृपाण चिरकाल तक मा ल व रमणियोका अश्रुजल पी कर और अधिक तेज होगा [९० ] हे महाराज ! आपने शत्रुओके विजय करनेमें दूधकी धाराके समान जो उज्ज्वल यश प्राप्त किया है उसके कारण आपकी तलवार तो उज्ज्वल ही थी पर इन मा ल व-नारियोके काजल [मिश्रित अश्रुजल ] पी पी कर, इसने, उसकी महिमा सूचक, यह कालिमा धारण कर ली है।। , प्रकरण १६-९७] सिद्धराज मोर हेमचन्द्राचार्यका मिलन [७१ सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मिलन । ९७) प्रति दिन सर दर्शन [ के आचार्यो ] को आगीर्वाद और दानके लिये धुलाये जाने पर, यथारसर चुटाये गये श्री हेमचन्द्र प्रभृति जैनाचार्य श्री सिद्धराज के पास गये । राजाकै दुकूल आदि दे कर उनका सकार करने पर, उन सभी अप्रतिम प्रतिमा पूर्ण पडितों द्वारा दोनों तरह पुरस्कृत हो कर हे म चन्द्रा चार्य ने राजाको इस प्रकार आशीर्वाद दिया- १३६ हे कामधेनु ! तू अपने गोमयके रससे भूमिका आसेचन कर, हे समुद्रो ! तुम अपने मोतियोंसे स्वस्तिक बनाओ, हे चन्द्र! तूं पूर्णकुम बन जा और हे दिग्गजो! तुम अपने सरल सूढोंसे कल्पवृक्षके पचे तोड़ कर उनके तोरण सजाओ-क्यों कि संसारका विजय करके सिद्ध राज आ रहा है। इस प्रकार निष्प्रपच (सरल) कान्यके विवेचन करने पर उनकी वचन-चातुरीसे चित्तमें चमत्कृत हो कर राजाने [यथेष्ट ] प्रशसा की। इस पर कुछ असहिष्णुओंके- अर्थात् ब्राह्मणोंके-यह कहने पर कि 'हमारे शास्त्रोंके - अर्थात् पाणिन्यादि व्याकरण प्रयोंके- अध्ययनके बल पर ही इन (जेनों) की विद्वत्ता है।' राजाने श्री हेम चन्द्र आचार्यमे पूछा । [उन्होंने कहा-] प्राचीन कालमें श्री जिनेन्द्र महावीर ने अपने शैशन कालमें इन्द्रके सामने जिसकी व्याल्या की थी उसी जैनेन्द्र व्या करण को हम लोग पढ़ते हैं । उनके ऐसा कहने पर उस पिगुनने कहा कि इन पुरानी बातोंको तो छोड़ दो और हमारे समयके ही किसी तुम्हारे व्याकरण कर्ताका पता बता सकते हो तो बताओ । इस पर वे राजासे बोले कि यदि महारान श्री सिद्धराज सहायक हों तो, में ही स्वय कुछ दिनोंमें ही पञ्चाङ्ग पूर्ण नूतन व्याकरण तैयार कर सकता है। राजाने कहा- मैने [ साहाय्य करना ] स्वीकार किया। आप अपने वचनका निर्वाह करें। ऐसा कह कर उसने सत्र सूरियों को विदा किया। ये भी अपने अपने स्थानको गये। राजाने [ पहले ही यह एक] प्रतिज्ञा कर ली थी कि यशोवमी के हाथमें पिनाम्यानकी छुरी देकर और उमको अपने पीछे बिठा कर हायो पर सवार हो कर हम नगरमें प्रवेश करेंगे । राजाकी इस प्रतिज्ञाको सुन कर मुधार नामक मत्री [असतुष्ट बना और उस ] ने प्रधान पद छोड़ दिया । राजाके बार बार कारण पूछने पर १३७ राजा ओक चाहे सधि [करना] न जाने और विग्रह मी [करना] न जाने, पर यदि ये [मनियोंका ] आरयात (कहा हुआ) ही सुनते रहें तो इमोसे ये पण्डित हो सकते है। इस प्रकारका नीतिशास्त्रका उपदेश है। महाराजने स्वय अपनी बुद्धिसे जो यह प्रतिना की है, भविष्यमें यह बिल्कुल ही हितकर न होगी। राजाने प्रतिज्ञाभग होनेके मयसे मौत हो कर कहा कि 'प्राणों का त्याग करना अन्डा है। किन्तु विश्वविदित इम प्रतिज्ञाका नहीं।' इस पर मत्रीने काठकी छुरी बना कर शाटवृक्षके पाण्डरगके गोंदसे उसे परिमार्जित कर, पाठेके आमन पर बैठे हुए यशोवर्मा के हाथमें दी। उसके आगेके आसन पर राजा सिद्धराज घेटा और मब समारोहके साथ उसने अणहिपुर में प्रवेश किया। प्रायशिक मगटफी धूमधाम समान हो जाने पर राजाने व्याकरण वृत्तातकी याद दिलाई। इस पर बहुतमे देशाम तन पदितोंके साथ समी व्याकरणोंको नगरमें मगना कर श्री हेम पठाचार्य ने श्री सिद्धहम नामक नूतन पवाद व्याकरण एक वर्षमें तैयार किया। इसका प्रपप्रमाण मादाय रोक था। राजाके निजके बटने के हाथी पर उम पुम्नकको रन कर उमफा जुम निकाला गया। उसके ऊपर तस्त्र टगाया गया और दो पारमादिगिया चामर टने टगी। इस प्रकार उस प्रयसी महिमा करके उसे कोशागारमें रगा। फिर रानाकी ७२] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश आज्ञासे अन्य व्याकरणोको छोड़ कर लोग सब उसीका अध्ययन करने लगे। इस पर किसी मत्सरीने राजासे कहा कि ' इस व्याकरणमे आपके वंशका तो कोई उल्लेख ही नहीं है।' इससे राजाके मनमें क्रोध हुआ। यह वात किसी राजपुरुषसे जान कर श्री हे मा चार्य ने [ तत्क्षण ] बत्तीस श्लोक नूतन निर्माण करके बत्तीस ही सूत्रपादोंके अन्तमें उन्हें संलग्न कर दिया । प्रातःकाल जब राजसभामें व्याकरण बांचा गया तो- १३८. हरिकी भाँति बलि बंधकर (=१ वलिको बाँधनेवाला, २ वलियोंको बंदी करनेवाला), शिवकी नाई त्रिशक्तियुक्त, और ब्रह्माकी तरह कमलाश्रय (=१ कमलका आश्रय लेनेवाला, और २ कमला- लक्ष्मीका आश्रय) श्री मूल रा ज नृपकी जय हो । इत्यादि, चौ लु क्य वंश की स्तुतिवाले बत्तीस श्लोक बत्तीस सूत्रपादोके अन्तमें आये सुन कर राजा मनम प्रमुदित हुआ और उस व्याकरणका उसने खूब प्रचार कराया। इसी प्रकार श्री सिद्ध राज के दिग्विजय वर्णनमें [हे मा चार्य ने ] न्याश्रय नामक [ काव्य ] ग्रंथ बनाया। [हे मा चार्य के बनाए इस सिद्ध है म व्या क र ण के विषयमे विद्वानोने ऐसी उक्तियों कही हैं-] १३९. हे भाई! पाणि नि के प्रलापको बंद करो, का तंत्र का चीथड़ा मत फाडो शा कटा य न के कटु वचनको मत पढ़ो, और क्षुद्र चांद्र व्या क र ण से क्या मतलब है, भलॉ, और क ण्ठा भरण आदि व्याकरणोंसे अपने आपको कोई क्यों भुलायेगा, जब कि अर्थमधुर ऐसी श्री सिद्ध है म की उक्तियाँ सुननेको मिलती हैं। ९८) इसके बाद, श्री सिद्ध रा ज ने पत्त न में यशोवर्म राजा को, त्रिपुरुष प्रभृति सभी राजप्रासादों और स ह स लिंग प्रभृति धर्मस्थानोको दिखा कर बताया कि-[ हमारे राज्यमे ] प्रतिवर्ष देवदायमें एक करोड़ द्रव्य व्यय किया जाता है !। और फिर उससे पूछा कि 'यह सुंदर है या असुंदर ?'। वह बोला-मैं तो अहारह लाख संख्यावाले (?) मा ल व देश का राजा हूँ, तो भी मैं तुमसे पराजित कैसे हुआ ?। पर यह देश तो पहले ही महा काल देव को अर्पण कर दिया गया है और उसी देवद्रव्यका हम मालवी लोग उपभोग कर रहे है और इसीलिये हमारा उदय और अस्त होता रहता है। आपके वंशवाले राजा भी इतना देवद्रव्य व्यय करनेमे असमर्थ हो कर उसका लोप करेंगे और फिर सारा देवदाय बंद हो जानेपर इसी प्रकार वे विपत्तिग्रस्त हो कर समूल नष्ट हो जायेंगे । ' ? ? सिद्धराजका सिद्धपुरमें रुद्रमहालय बनवाना । ९९) इसके पश्चात्, एक बार श्री सिद्ध राज ने सिद्ध पुर में रुद्र म हाल य का प्रासाद बनवाना चाहा । किसी [प्रसिद्ध ] स्थपति ( कारीगर ) को अपने पास रख कर, प्रासादके प्रारंभ होनेके समय उसकी कैलासिकाको-जो उसने किसी साहुकारके यहाँ एक लाखमे बंधक रखी थी-छुड़ा कर उसको दिलवाई । वह बांसकी कमाचियोंकी बनी हुई थी। उसे देख कर राजाने पूछा कि क्या बात है ? इस पर उस स्थपतिने कहा कि मैने महाराजकी उदारताकी परीक्षाके लिये ऐसा किया है । फिर उस द्रव्यको राजाकी अनिच्छा रहते. हुए भी लौटा दिया। फिर क्रमानुसार २३ हाथ ऊँचा सर्वागपूर्ण प्रासाद बनवाया । उस प्रासादमे अश्वपति, गजपति, नरपति प्रभृति बड़े बड़े राजाओंकी मूर्तियाँ वनवा कर रखी और उनके सामने हाथ जोड़े हुए अपनी मूर्ति भी बनवाई । [जिसका आशय यह है कि राजा] उनसे वर माँगता है कि देशका भङ्ग करते हुए भी इस प्रासादका कोई भंग न करें। उस मंदिर पर ध्वजारोपका उत्सव करते समय सभी जैन प्रासादोकी पताकायें उतरवा दी गई । जैसे मा ल व देश के म हा का ल के मंदिरमे जब वैजयंती चढ़ाई जाती है तब जैन प्रासादोमें वजारोपण नहीं होने पाता। १ यह कलासिका नामका कारीगरका कोई ओजार है जिसका ठीक अर्थ समझमे नहीं आता।
उस प्रकरण ९९-१.१] सिद्धराजका पाटनम सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । [७३ सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । १००) एक वार, सिद्ध रा ज ने माल य क म ण्ड ल के प्रति जाना चाहा तब किसी व्याहारीने [जो उस काममें नियुक्त अधिकारी था ] सहसलिंग सरोवरके कारखानेके लिये कुछ द्रव्य और भाग माँगा । राजा उसे कुछ भी दिये बिना चला गया। कुछ दिनोंके वाद द्रव्याभारसे उस कामके चलनेमें देरी होते देख, न्याहारी ( अविकारी ) ने अपने लड़के से किमी धनाढ्य पुरुपकी स्त्रीका ताइक ( करन फूल ) चुरवा लिया, और फिर स्वय उसके दण्डस्वरूप तीन लाख द्रव्य दे दिया। उससे वह काम पूरा हो गया । यह वात मा ल व मण्डल में, वर्षाकालमें ठहरे हुए राजाने सुनी । सुन कर उसे जो आनन्द हुआ उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । इसके बाद वर्षाकालकी धनी वृष्टिसे जब सारी पृथ्वी एक समुद्रकी भाँति जलमय हो गई तो प्रधान पुरुषोंने राजाको बधाई देनेके लिये किसी मरदेश वामीको भेजा | उसने [ जा कर ] राजाके सामने विस्तार पूर्वक वर्षाका स्वरूप कहना आरम्भ किया । इमी वाच, उसी समय आया हुआ कोई धूर्त गुजराती जल्दीसे बोल उठा-महाराज बधाई ! सहसलिंग सरोवर [जलसे परिपूर्ण ] भर गया है । उसके ऐसा कहनेके साथ ही रानाने उस गुजराती को अपने शरीरके सारे आभरण दे दिये । वह म स्वासी लोकेसे गिरे हुए मार्जार की भाँति देखता ही रह गया। १०१) इसके बाद, वर्षा बीतते ही, राना यहाँसे लौटा। [रास्तेमें ] नगर महास्था न (वड न गर) में डेरा डाला और वहाँ बननाये गए मच-मडपमें राजसभाको बैठक की गई । नगर के प्रासादोंमें ध्वज लगे हुए देख कर ब्राह्मणोंसे पूछा कि 'ये कौनसे प्रासाद हैं।' उन्होंने जब वहाँके जिन और ब्रह्माके मदिरोंका हाल बताया तो क्रुद्ध हो कर राजाने कहा कि 'जब मैंने गूर्जर मडल में, जैन मंदिरोंमें पताका लगानेका निषेध किया है, तो फिर आप लोगोंके इस नगरमें इन जेन मदिरों पर ये पताकायें क्यों उड़ रही हैं।' उहोंने कहा कि-'सुनिये, कृतयुगके प्रारममें श्रीम महादेवने इस म हा स्थान की स्थापना करते हुए श्री ऋषभनाथ और श्री नादेवके प्रासाद स्वय बनाये और उन पर घजायें चढाई । सो इन दोनों प्रासादोंका मुकृतियों द्वारा उद्धार होते रहने पर ये चार युग बीत गये । दूसरी बात यह है कि पहले यह नगर शत्रुक्षय महागिरिकी उपन्यका भूमि था । क्यों कि नगर पुराण में भी कहा है कि- १४० कहा जाता है कि आदिकालमें इस जिनेश्वरके पर्वतकी मूलभूमिका विस्तार पचास योजन था ऊपरकी भूमिका विस्तार दश योजन था और ऊँचाई आठ योजन थी। कृतयुगमें आदिदेव श्री ऋषभदेव के पुत्र भरत नामक हुए । उहीके नाममे यह 'भरत खण्ड प्रसिद्ध हुआ। १४१ नाभि और [ उनकी पत्नी ] मर देवी के पुत्र श्री वृषभ (रुपम देव ) हुए जिहोंने समदृक् हो कर मुनियोग्य चर्याका आचरण किया । ये स्वच्छ, प्रशान्त अन्त करण, समदृक् और सुधी थे। ऋषिगण उनके अईत पदको मानते हैं। १४२. म रु देवी के गर्भसे नाभि के (श्री ऋषभदेव) पुत्र हुए जो अष्टम [विष्णुके अवतार म्यरूप] थे और सब आश्रमसे नमस्तृत थे। जिहोंने धीरोंको अथवा वीरोंको [ मोक्षका ] मार्ग दिखाया। (यदा २ प्रतिम निम्नलिसित-अनुवादवाले-श्लोक अधिक पाये जाते है-) (९१] स्वाय मु य मनु के पुत्र नियमत नामक हुए, उनके पुत्र हुए अमोन्ट, उनके नाभि और उनके पुत्र ऋपमा - ७४ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश - [९२] मोक्षधर्मका विधान करनेकी इच्छासे वा सु दे व ही अंशरूपसे अवतीर्ण हुए हैं, यह वात उनके विषयमें [ मुनियोंने ] कही है । उनके सौ पुत्र हुए जो सभी ब्रह्मपारंगत थे । [९३] उनमें सबसे ज्येष्ठ भ रत थे जो नारायणके भक्त थे। जिनके नामसे यह अद्भुत ऐसा भारत वर्ष विख्यात हुआ। [९४] अर्हन्, शिव, भव, विष्णु, सिद्ध, बुध, परमात्मा, और पर-ये सभी शब्द एक ही अर्थके वाचक हैं। [९५] मनीषियोने जैन, बौद्ध, ब्राह्म, शैव, कापिल और नास्तिक इन छहोंको दर्शन कहा है । [९६] उसमे, इन सबके कुलके आदि बीज वि म ल वा ह न है । म रु देव और नाभि ये भर त खंड में कुल-सत्तम ( कुलश्रेष्ट ) हुए । इत्यादि पुराण वाक्योंको सुना कर, विशेष विश्वासके लिए श्रीवृषभदेवके मन्दिरके भण्डारमेंसे, राजा भरत के नामसे अंकित, पाँच आदमियों द्वारा उठाये जाने लायक काँसेका बड़ा ताल ले आ कर राजाको ब्राह्मणोंने दिखाया । और इस प्रकार जैनधर्मका आदिधर्म होना उन्होंने सिद्ध किया । इसके बाद खेदसे मनमें खिन्न हो कर राजाने, एक वर्षके बाद, जैन मंदिरों पर पुनः वजारोपण करवाये । १०२) तदुपरान्त, पत्त न में पहुंचने पर राजाको जब सरोवरके खर्चका हिसाब बताया गया तो व्यवहारीके उस अपराधी पुत्रसे दण्डस्वरूप तीन लाख लिये जानेकी भी बात सुनी । वह तीन लाख उसके घर भिजवा दिया। इसके बाद वह व्यवहारी राजाके लिये हाथमें भेंट ले कर उसके समीप आया और बोला कि यह आपने क्या किया ?' तब फिर उस कर्मस्थायके अधिकारी व्यवहारीसे राजाने कहा- जो व्यवहारी कोटीध्वज है वह ताडङ्कका चोरनेवाला कैसे हो सकता है ? तुमने इस धर्मस्थानके वनवानेमें कुछ धर्मभाग मांगा था, लेकिन उसके न मिलने पर प्रपञ्चमें चतुर - तथा मुँहसे मृग और भीतरसे व्यावकी वृत्तिवाले, ऊपरसे खूब सरल और अंतरसे शठभाववाले मनुष्यकी तरह - तुम्हीने यह कर्म ( ताडककी चोरी ) करवाया है । ' [ इस प्रकारकी और भी कितनी ही बातें कह कर उसे खूब लजित किया । ] १४३. जिस सरोवरके भीतर, शिवके मन्दिरके दीपक प्रतिबिंबित हो कर पातालमें सोके सिरपरके मणियोंकी भाँति शोभा पाते हैं। १४४. सिद्ध राज के इस सरोवरके शोभित रहते, मेरा मन मानसरोवरमें नहीं रमता, पम्पा सर उसक आनंद सम्पादन नहीं करता और अच्छोद सरोवर, जिसका जल बहुत ही अच्छा है, वह भी असार ( जान पड़ता ) है। * एक वार श्री सिद्ध रा ज ने राम चन्द्र [ कवि ] से पूछा 'ग्रीष्म ऋतुमें दिन क्यो बड़े होते हैं?' राम चन्द्र ने कहा- [९७] हे श्री गिरिदुर्ग के मल्ल महाराज ! आपके दिग्विजयके उत्सवमें दौड़ते हुए वीरोंके घोडोंकी टाप्से पृथ्वीमण्डल खोद डाला गया है और हवासे उड़ी हुई उसकी धूलने जा कर आकाशगंगामें मिल कर उसे पंकस्थलीके रूपमें परिणत कर दिया है | इससे उसमें दूर्वा उग गई है और उसे सूर्यके घोड़े चरने लग गये हैं। इसी लिए यह दिन बडा हो गया है।
प्रकरण १०२-१०३] सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना [७५ [९८] मार्गणोंने तुम्हारे शत्रुओंके पास लक्ष (निशाना ) पा लिया है और तुम्हारे पास वै विलक्ष (निशानेसे रहित ) हो कर रहे हैं। फिर भी हे सिद्धराज ! तुम्हारा 'दाता 'पनका जो यश है वह ऊपर सिर उठाये रह रहा है-बढ़ता चला जाता है। * इसके बाद, एक वार राजाने प्रथिलाचार्य जयमङ्गल सूरि से नगरवर्णन करनेको कहा। उन्होंने कहा- [९९] मालूम होता है कि इस नगरीकी नागरिकाओंके चातुर्यसे निर्जित हो कर सरस्वती देवी है सो हकी-बकी-सी हो कर अपनी कन्ठपी नामक वीणाको अपने वाहुमे उतार कर यहाँ पर छोड़ दी है और स्वय पानी वहन करने लगी है। उसकी इस वीणाफा यह सहसलिंग सरोर तो मानों तुवा है और कीर्ति स्तम मानों उसका उच्च दण्ड है। १०३) इसके बाद, जब श्रीपाल कवि की रची हुई सहस लिङ्ग सरोवर की प्रशस्ति, पहिका पर लिखी गई तो उसके सशोधनके लिये सर्व दर्शनके (आचार्योंके ) बुलाये जाने पर श्री है म च दाचार्य ने [ अपने प्रधान शिष्य ] रामचद्र पण्डितको यह कह कर मेजा कि 'प्रशस्ति काव्य जो सभी विद्वानोंको अनुमत हो तो उसमें अपना कुछ भी पाण्डिन्य मत दिवाना।' फिर उन सब विद्वानोंने प्रशस्ति काव्यको शोधनेकी दृष्टिसे पढा और राजाके अनुरोपसे तथा श्रीपाल कवि के चतुरतापूर्ण पाण्डित्यसे प्रसन्न हो कर सारे कान्यको मान्य किया । उसमें भी उन समीने निम्नलिखित काल्यकी विशेष प्रशसा की- २४५ " कोशसे युक्त होते हुए भी तथा दल (१ पत्ता, २ सेना ) से समृद्ध हो कर भी यह कमल अपने ही कण्टकोंके समूहको उच्छिन्न करनेमें असमर्थ है और इसके अतिरिक्त पुस्त्व भी नहीं धारण करता। (कमल शन्द पुलिंग नहीं है) [ दूसरी ओर सिद्धराज का जो कृपाण है ] यह अकेला ही बिना कोश- ( म्यान ) के मी भूतलको निष्कण्टक कर रहा है, ऐसा समझ कर लक्ष्मीने [ अपने उस निवासस्थान रूप ] कमलको लोड फर इसके कृपाणका आश्रय लिया है। इस विषयमें श्री सिद्धराज ने राम चन्द्र से खास पूछा तो उसने कहा कि यह कुछ मदोष है।' उन सभी पडितोंसे पूछे जाने पर [ उसने कहा कि ] ' इस काव्यमें सेनाका याचक 'दल' शब्द और कमल शब्दका 'नित्यष्टीवत्व' ये दो दोष चिन्तनीय है । तब उन सभी पडितोंसे अनुरोध करके राजाने ' दल' शब्दको तो सेनाके अर्थमे प्रमाणित कराया। किन्तु कमल शब्दका नित्यशोबन्च' जो लिङ्गानुशासनसे असिद्ध है उसे कौन प्रमाणित कर सकता । इमलिये 'पुस्वं च धचे न वा' (कमी पुस्त्र धारण करता है, कभी नहीं) इस प्रकार इस पदमें अक्षरभेद करवाया [ जिसमे वह अशुद्धि दूर हो गई ] 1 उस समय राम चन्द्र को मिद्ध राज का दृष्टिदोष टगा और वह ज्यों ही यसतिमें प्रवेश करने टगा त्यों ही उसकी एक आँख नए हो गई। १ इस में 'मागा' और 'एच' शब्द पर शेष है। 'मार्गग' का एक अर्थ है या और दूसरा अर्थ है मगन याचफ | 'म'का एक अर्थ है साम मल्या परिमित द्रव्य और दूसरा अर्थ है एपनियाना मागंगका अपं जब बात ऐसा विपरित रे तर उसके गाय स्वका अय निगना लेना होगा, और जर मगन-याचक ऐमा अपं अमेशित दरोगा कर PI अप साम दाम सेना होगा । सिदाबके मागा याने पर विस याने सयुके परायें समरस- निना प्राप्त करनेगरे ते, मी ग्यप नहीं जाते, और वे ही गा(कले हुए) सियजके परम पिक-रश्यम से कर यगोत्। गणे Arid, मार्गग याने याचा लेक है ये सिदराबो म समय पाने समान द्रव्य प्राप्त करो और शत्र पौरपान विन्ध पाने विगढ-नाही मामिए जाने हैं।
७६] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश the १०४) किसी समय, सान्धिविग्रहिकों द्वारा डा ह ल दे श के राजाका निम्न लिखित श्लोक, जो यमल पत्र ( मित्रताका संबंध सूचक पत्र ) पर लिखा हुआ था, सुनाया गया- १४६. आ-युक्त हो कर लोकमें प्राणदान करता है, वि-युक्त हो कर मुनियोंको प्रिय होता है, सं-युक्त हो कर सर्वथा अनिष्ट कारक बनता है और केवल अकेला होने पर स्त्रियोंका प्रिय बनता राजाने पूछा कि ' इसमें क्या बात है ? ' उन्होंने कहा 'आपके देशमें एक-से-एक प्रधान ऐसे बहुतसे विद्वान् रहते हैं । सो उनसे इस दुर्बोध्य श्लोककी व्याख्या कराइये । ' उनकी यह बात सुन कर सभी विद्वान् उसका अर्थ सोचने लगे पर किसीकी समझमें नहीं आया । राजाने आचार्य हे म चन्द्र से पूछा । उन्होंने इस प्रकार व्याख्या की- ' इसमें हार' शब्दका अध्याहार है । उसके साथ ' आ ' उपसर्गका योग होनेसे आहार बनता है जो सब जीवोंको प्राण देता है। 'वि' उपसर्गके योगसे 'विहार ' वन कर दोनों तरहसे यतियोंका प्रिय होता है । ' सं' के योगसे 'संहार ' वनता है जो सर्वथा अनिष्ट लगता है और विना किसी उपसर्गके स्त्रियोंका प्रिय आभूषण गलेका ' हार ' होता है।' १०५) एक दूसरी वार, स पा द ल क्ष देशके राजाने 'उगी हुई चन्द्रकला तो गौरीके मुखकमलका अनुहार नहीं कर सकती।' इस प्रकारकी समस्यावाला आधा दोहा यहाँ पर ( पाटन में ) भेजा । अन्यान्य उन कवियोंके उसकी पूर्ति न करने पर ' (और ) जो न देखी गई वैसी प्रतिपदाकी चन्द्रकलाकी उपमा दी कैसे जाय ।' इस प्रकारका उत्तरार्द्ध कह कर मुनीन्द्र हे म चन्द्र ने उसको पूर्ण किया। * सिद्धराजका सौराष्ट्र के राजा खंगारको विजय करना । १०६) श्री सिद्धराज ने, न व घण नामक आ भी र राणाका निग्रह करनेमें, पहले ग्यारह बार अपनी सेनाका पराजित होना जान कर, व र्द्ध मा न ( व ढ वा ण) आदि नगरोंमें बड़े बड़े प्राकार बनवा कर, स्वयम् ही उसके लिये प्रयाण किया। उस (न व घन ) के भगिनी पुत्रने [ किलेका रहस्य आदि बतलानेवाले ] संकेत देते समय यह वचन लिया था कि 'किलेका कब्जा करते समय इस न व घन को सिर्फ द्रव्यमारसे मारना ( अर्थात् भारी दण्ड दे कर द्रव्य वसूल करना ), लेकिन किसी शस्त्रके मारसे नहीं मारना । ' [राजाके किल सर कर लेने पर ] उस न व घन को उसकी स्त्रीने कहीं अन्दर छुपा दिया जिसको राजाने उस विशाल महलमेसे बहार खींच निकाला और धनके भरे हुए वर्तनोसे उसे पीट पीट कर मार डाला । उसकी स्त्रीको यह कह कर कि 'इसको हमने द्रव्यके मारसे ही मारा है ' अपने वचनका पालन बतलाया और उसे शांत किया । शोकसे निमग्न उसकी रानी [सून ल दे वी ] के ये वाक्य कहे जाते है- १४८. वह राणा स्वघरमें नहीं है । न कोई उसे लाया है, न कोई लायेगा । खंगार के साथ मैं स्वयं अपने प्राण अग्निमे क्यों न होम हूँ। १४९. और सब राणा तो बनिये है और उनमें यह जे स ल ( ज य सिंह ) वडा सेठ है । हमारे गढके नीचे इसने यह कैसा व्यौपार मांड रखा है। १५०. हे गौरवशाली गिरनार तेंने क्यों मनमें मत्सर धारण कर लिया है ? खंगार के मरने पर तेंने अपना एक शिखर भी नहीं गिराया। ] . . प्रकरण १०४-१०८] सिद्धराजका शत्रुजयकी यात्रा करना [७७ [१०१] हे गरना गिरनार ! तुम पर वारि जाती हूँ। [ख गार के लिये ] लबा चुलारा आया है। इसके जैसा मारक्षम (समर्थ) सज्जन फिर दूसरी बार तुझे नहीं मिलेगा। [१०२] मुझको इतने-ही-से सतोप होगा, जो प्रभु (स्वामी) के पोंमें [ मेरा भी शरीर अग्निद्वारा ] प्रदीप्त हो । न मुझे रानीपनकी चाहना है, न रोप है। ये दोनों खगार के साथ चले गये। [१०३] हे मन ! अब तबोल मत माँगो, खुल्ले मुँह मत झाको । दे उल वाडे के सग्राममें खगार के साथ वह सब चला गया है। [१०४] हे जे स ल ! मेरी बाँह मत मोडो और गारवार विरूप भार न बताओ।नघन के विना नदीमें नया प्रवाह नहीं आता । [१०५] हे व ढ वाण ! मैं तुझसे क्या लडू- भूल जाना चाहती हूँ लेकिन भूल नहीं सकती। हे भोगावा (बढवा ण के पासको नदी) तेंने सोनाके समान प्राणोंका भोग लिया। इस प्रकारके बहुतसे वाक्य [ कहे जाते ] है। रे यथाप्रसग जानलेने योग्य है। १०७) इसके बाद, मह० जाम्ब के वशज दण्डाधिपति स ज न की योग्यता देख कर उसे सु राष्ट्र देश का प्रबन्धक (गवर्नर ) नियुक्त किया । उसने सामीको विना सूचन किये ही, तीन वर्षके वसूल किये हुए [राजकीय ] द्रव्यसे श्री उज्जयन्त (गिरनार ) पर्वत पर स्थित नेमिनाथके काठके बने हुए जीर्ण मन्दिरको उखाड़ कर उसके स्थानमें नया पथरका मन्दिर बनाया। चौथे वर्ष चार सामतोंको भेज कर राजाने स ज न दण्डाविपतिको पत्तन में बुलवाया । उसमे [ पिछले ] तीन वर्षका वसूल किया हुआ द्रव्य माँगने पर, साथमें लाये हुए उसी देशके व्यवहारियोंसे उतना ही धन ले कर देता हुआ वह बोला- 'महाराज श्री उ ज यन्त के मदिरके जीर्णोद्वारका पुण्य अथवा यह धन इन दोनों से चाहे सो एक ले लें। उसके ऐसा बताने पर उसकी अतुलनीय बुद्धिसे चित्तमें चमत्कृत हो कर सिद्धराज ने तीर्थोद्धारका पुण्य लेना ही स्वीकार किया । वह सजन फिर उसी देशका अधिकार पा कर, उसने शत्रुज य और उजयन्त इन दोनों तीर्थोमें उनके बीचके पारह योजन विस्तृत अतरके जितना ही लबा दुकूलका बना हुआ महाज चढ़ाया । इस प्रकार यह रैवतकोद्धार प्रबन्ध समाप्त हुआ। * सिद्धराजका शत्रुजयकी यात्रा करना । १०८) इसके बाद, एक बार फिर सो मेश्वर की यात्रा कर वापस लौटते समय श्री सिद्धराज ने, रैवतक गिरि की उपत्यकामें डेरा डाल कर, अपना कीर्तन (मदिरादि धर्मस्थान ) देखना चाहा । उसी समय मत्सरपरायण ब्राह्मणोंने यह कह कर पिशुनपाक्योंसे उसे रोका कि 'यह पर्वत सजलाधार लिंगके आकारका है, इमलिये इसे पैरोंसे स्पर्श करना उचित नहीं है।' राजाने यहाँ पर पूजा भिजवा कर प्रस्थान किया और शनुस य महातीर्थके पास आ कर पड़ार डाला । वहाँ पर भी उन्हीं निर्दय चुगलखोर ब्राह्मणोंने हाथमें कृपाण ले कर तीर्थ पर जाने का मार्ग रोका । उनके ऐसा करने पर श्री सिद्धराज ने सोरा होनेके पहले ही, कापड़ीका येप बना कर, और जिसके दोनों ओर गगाजलके पात्र रखे हुए हैं ऐसी बहगी कधे पर रख कर, सुद इन ब्राह्मणों के बीच हो कर पर्वत पर चढ़ गया । किमीने उसके स्वरूपको नहीं जाना। [ऊपर जा कर ] गगाजलसे श्री युगादि देव (ऋपमनाय ) को स्नान कराया और पर्वतके पासके बारह गाँवोंका शासन उम १ ये जो वाक्य ऊपर अनूदित किये गये हैं, उनमें कितनाव क्यन अस्पष्ट और अस्फुटापक है । जो अर्थ यहा पर दिया गया है वह निनन्त है ऐसा नहीं कह सकते।
७८] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश देवको दान कर दिया। तीर्थका दर्शन कर वह उन्मुद्रित-लोचन हुआ और अमृताभिषिक्त होनेकी नाँई खडा रह गया । [ पर्वतकी रमणीयता देख कर ] सोचने लगा कि ' इस सल्लकी-वन और नदियोंसे परिपूर्ण पर्वत पर, यहीं, [ नये] विंध्यवनकी रचना करूँगा - इस प्रकारकी जो सफल प्रतिज्ञा [ पहले की थी और तदनुसार ] हाथियोंका झुंड पानेके लिये जो मेरा मन बेहाथ हो गया था, उस मनोरथसे मैंने इस तीर्थकी पवित्रताका ध्वंस करनेवाला मानस पाप किया है और इसलिये मुझ पापीको धिक्कार है।' इस प्रकार श्री देव- पादके सामने राजलोक द्वारा विदित अपने आपकी निंदा करता हुआ वह आनंदके साथ पर्वत पर से नीचे उतरा। वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन | १०९) अब यहाँ पर दे व सूरि का चरित्र वर्णन करेंगे। - उस अवसर पर कुमुद चंद्र नामक दिगम्बर [ विद्वान् ] भिन्न भिन्न देशोंके चौरासी वादियोंको वादमें जीत कर, कर्नाट क देशसे गूर्ज र देशको जीतनेकी इच्छासे कर्णावती नगरमें आया । वहाँ भट्टारक श्री देव सू रि चतुर्मास करके रहे हुए थे। एक वार श्री अरिष्टनेमिके मंदिर में जब वे धर्मशास्त्रका व्याख्यान कर रहे थे तो उस दिगंबरके साथी पंडितोंने उनकी वह अनुच्छिष्ट ( मौलिक, विशुद्ध ) वाणी सुनी । उन्होंने जा कर वह वृत्तान्त कुमुद चन्द्र से कहा तो उसने उनके उपाश्रयमें तृणके साथ जल प्रक्षेप कराया। पर, खण्डन, तर्क आदि प्रमाण शास्त्रोंमें प्रवीण ऐसे उस महर्षि पंडितने जब इस पर कुछ ध्यान न दे कर उसकी अवज्ञा की, तो उस दिगम्बरने श्री देवा चार्य की बहन तपोधना शील सुन्दरी को चेटकाधिष्ठित करके, नाच, जलानयन आदि अनेक विडंबनाओंसे उसे विडंबित किया। चेटक (टोना आदि ) के दूर होने पर वह जब स्वस्थ हुई तो उस उत्कट पराभवसे दुःखित हो कर वह अपने आचार्यकी खूब भर्त्सना करने लगी। उसे रोक कर आचार्य चिन्तामग्न हो रहे । ( यहाँ पर P प्रतिमें इस विषयके निम्नलिखित पद्य पाये जाते हैं-) [ १०३ ] हा ! मै किसके आगे पुकार करूँ ? मेरे प्रभु तो कर्णरहित है। इनसे तो वह सुगत (बुद्ध) देव ही अच्छा है जो अपने शासनका तिरस्कार होने पर [ उसका प्रतिकार करनेकी इच्छासे ] अवतार धारण करता है। [ साध्वीके इस वाक्यको सुन कर आचार्य मनमें सोचने लगे-] [ १०४ ] आः ! गुरुजनके प्रमाणोंकी व्याख्याका श्रम मेरे पास केवल उनके कंठके सुखा देने भरका पुष्ट फल देनेवाला मात्र हुआ-गुरुओका मुझे पढ़ानेके लिये किया गया परिश्रम व्यर्थ ही हुआ! जो मैं उनके शासन (धर्म संप्रदाय ) के प्रति की गई इस प्रकारकी विडंबनाओंके डंबरको शान्त मनसे सुन रहता हूँ। [ देवसूरिके द्वारा कही गई यह उक्ति सुन कर उस श्रेष्ठ आर्याने कहा-] [१०५] दुष्ट वादियोंके निर्दलनमें अंकुश जैसी श्री देवी, जो श्वेताबरोंके अभ्युदयके लिये मंगलमयी कोमल दुर्वा जैसी है, गुरुवर श्री दे व सू रि के ललाट पट्ट पर प्रथमावतारकी स्थिति लावे । श्री देव सूरि ने [दिगम्बर विद्वान्से ] कहा-'वादविद्याविनोद (शास्त्रार्थ-विनोद) के लिये आप पत्त न चलें । वहाँ राज-सभामें आपके साथ वाद करेंगे। ' उनके ऐसा आदेश करने पर वह दिगंबर अपने आपको कृतकृत्य मानता हुआ पत्त न को पहुँचा। [ उसका आना सुन कर ] श्री सिद्ध राज ने, जिसके मातामहका वह विद्वान् गुरु था, सामने जा कर उसका योग्य सत्कार किया। वह वहीं डेरा डाल कर ठहरा। सिद्ध राज ने प्रकरण १०८-१०९] वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन [७९ श्री हेमा चार्य से वादमें निष्णात ऐसे आचार्यकी बात पूछी। उन्होंने चारों विद्याओंमें परम प्रवीणता प्राप्त, जैन मुनिरूप हाथियोंके यूथपति, श्वेताबर शासनके लिये वनके प्राकार जैसे मानेजानेवाले, राजसमाके शृगारहार, कर्णावती में [ चातुर्मास ] रहे हुए, वादविधाके पारगामी, वादिहस्तियोंके लिये सिंहस्वरूप श्री देवाचार्य को बताया। इसके बाद उनको बुलानेके लिये, श्री सघके लेखके साथ राजाकी विज्ञाप्तिका वहा पहुची। उसे पा कर दे व सूरि पचन में आये और राजाके अनुरोधसे वाग्देवीकी आराधना की । उस देवाने आदेश दिया कि- वाद करते समय, वा दि वे ता ली य श्री शान्ति सूरि विरचित उत्तराध्य य न वृह द्वृत्ति में उल्लिखित दिगबर वादस्यल विषयक चौरासी निकन्य जालका उपन्यास करके, उसे प्रपचित करोगे तो दिगवरके मुखमें मुद्रा लग जायगी।' देवीके इस आदेशके बाद, गुप्त भारसे कुमुद चद्र के पास पडितोंको यह जाननेके लिये भेजा कि किस शास्त्रमें इसकी विशेष कुशलता है। उनके द्वारा उसकी यह निम्न लिखित उक्ति सुनी- १५३ हे देव! आदेश कीजिये मैं सहसा क्या करू : लकाको यही ले आऊ, या जबूद्वीपको यहाँसे ले जाऊ', क्या समुद्रको सुखा दू, या उस उच्च पर्वतको, जिसकी चोटीका एक पत्थर कैलास है, उसे खेल-ही-में उखाड़ कर समुद्रको वॉर दूं, कि जिसके प्रक्षेपसे क्षुब हो कर समुद्रका पानी बढ़ जाय। इस उक्तिको सुन कर, श्रीदेनाचार्य और श्री हे मा चार्य दोनों उसकी सिद्धान्तविषयक बहुत अल्प कुशलता समझ कर उसे अपने मनमें 'जीत लिया, जीत लिया' ऐसा मान बढे प्रसन्न हुए। इसके बाद दे व सू रि आचार्यका प्रधान शिष्य रन प्रभ, प्रथम रात्रिमें गुप्त वेप करके कुमुद चद्र के डेरेमें गया। उसने (कुमुदचद्रने) तुम कौन हो'', ' मैं देव हूँ', 'देव कौन', 'मैं', ' मैं कौन',. तुम कुत्ते', कुत्ता कौन ?', 'तुम', ' तुम कौन', 'मैं देव', [ 'तुम कहाँसे आये', 'सर्गसे' 'स्वर्गमें क्या बात चल रही है', 'कुमुदचन्द्रका सिर ९५ पल है ', ' इसमें प्रमाण क्या है ''काट कर तौल लो'] इस प्रकारकी उसकी उकि प्रत्युक्तिके वधनमें जब वह चाककी तरह चक्कर खाने लगा, तो अपनेको देव और दिगम्बरको श्वान बना कर, जैसे गया था वैसे ही लोट आया। [पीठेसे ] उस चक्रदोपको ठीक ठीक समझा तो मनमें अतिशय विषण्ण हो कर, इस प्रकारकी उचित करिता बना कर उस मायावी कुमुद चन्द्र ने दे व सूरि के , " पूछा कि- - . . . - . . पास भेजी- १५४. अरे श्वेताम्बरो! इस प्रकारके विकटाटोप वचनोंके द्वारा, ससार वृक्षके अतिविकट कोटरमें, इस मुग्ध जन-समूहको क्यों गिराते हो । यदि तत्वातत्यके विचारों आप लोगोंको योडीसी भी कामना हो तो सचमुच ही कुमुद चन्द्र के दोनों चरणोंका रात-दिन ध्यान किया करो। इसके बाद श्री देव सूरि के चरणका परम परमाणु ( विनीत शिष्य), बुद्धिवैमनसे चाणाक्य का भी उपहास करनेवाले पडित माणिक्य ने निम्नलिग्वित श्लोक उसके पास भेजा- १५५ अरे ! वह कौन है जो सिंहके केसनालको पैरोस छूना चाहता है । यह कौन है जो तेज भालेकी नोफसे अपनी आँख खुजालना चाहता है । यह कौन है जो नागराजके सिर परकी मणिको अपनी शोमाके लिये उतारना चाहता है। जो यह करना चाहता है वही बदनीय ऐसे श्वेताबर शासनकी निन्दा करना चाहता है। फिर रला फर पडितने भी इस शोकको कुमुद चद्र के पास उपहासके सहित भेजा- १५६ नगों (दिगम्बरों) ने जो युतियोंकी मुक्तिका निरोध किया है इसमें क्या तत्व है वह तो प्रकट ही है। फिर क्या ही फर्का तर्फके लिये यह अनर्थमूलक अभिलापा क्यों करते हो।
- - ८० ] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश श्री हे म चं द्राचार्य ने सुना कि श्री म य णल्ला देवी कुमुद चंद्र की पक्षपातिनी है और सभाके अपने संपर्कवाले सभ्योंसे उसकी जयके लिये नित्य अनुरोध कर रही है, तो उन्होंने, उन्हीं सभासदोंसे यह वृत्तान्त कहलवाया कि ' वादस्थल पर दिगंबर लोक तो स्त्रीकृत सुकृत्यको अप्रमाणित करेंगे और श्वेताम्बर प्रमाणित करेगे।' यह सुन कर रानीने व्यवहारबहिर्मुख उस दिगंबर परसे अपना पक्षपात हटा लिया । इसके बाद, भापोत्तर (वादका विषय) लिखानेके लिये कुमुद चंद्र तो पालकीमें बैठ कर, और पण्डित रत्न प्रभ पैदल ही चल कर, राजाके अक्षपटल (न्यायविभाग) कार्यालयमें आये। वहांके अधिकारियोंको कुमुद चंद्र ने अपनी यह भाषा ( वादके विषयमें निजकी प्रतिज्ञा ) लिखवाई- १५७. केवली होने पर [ मनुष्य ] भोजन नहीं करता, चीवर सहित [ मनुष्य ] निर्वाण नहीं पाता और स्त्रीजन्ममें मुक्ति नहीं मिलती। श्वेतांबरोंका इसके विरुद्ध यह उत्तर था- १५८. केवली होने पर भी [ मनुष्य ] भोजन करता है, सचीवर [मनुष्य ] को भी निर्वाण मिलता है, और स्त्रीजन्ममें भी मुक्ति होती है - यह दे व सूरि का मत है । इस प्रकार भापा और उत्तर लिख लेनेके अनंतर वादका स्थान और समय निर्णीत हुआ | उसमें सिद्ध राज के सभापतित्वमे, पड्दर्शन-प्रमाणको जाननेवाले सभ्यलोग जब उपस्थित हुए तो, तो सुखासन (पालकी) में बैठ कर, सिरपर श्वेत छत्र धारण किये हुए और जयडिडिम बजाते हुए, वादी कुमुद चन्द्र ने सभामें प्रवेश किया। उसके आगे वाशके सिरेपर, उसके प्राप्त किये हुए जयपत्र लटक रहे थे। सिद्धराज ने उसके बैठनेके लिये सिंहासन दिलवाया । प्रभु श्री देव सू रि ने मुनीन्द्र श्री हे म चंद्र के साथ सभामें एक ही आसनको अलंकृत किया। फिर, वादी कुमुद चंद्र ने, जो अवस्थासे वृद्ध था, श्री हेम चंद्र से- जिनकी शैशवावस्था कुछ ही समय पहले व्यतीत हुई थी; अर्थात् जो अब भी पूर्ण युवा नहीं हुए थे - कहा कि 'आपके द्वारा तक क्या पीत है ? अर्थात्-आपने तक (छांस) पी है? ' । इस पर श्री हेम चंद्र ने उससे कहा -'क्या वृद्धावस्थाके कारण तुम्हारी बुद्धि अस्थिर हो गई है ? जो ऐसा अनाप-सनाप बोल रहे हो ! तक श्वेत होता है, पीत तो हल्दी होती है!' इस वाक्यसे नीचा मुँह हो कर उसने पूछा कि-' आप दोनोंमे वादी कौन है ? ' श्री सूरिने उसका कुछ तिरस्कार करनेके इरादेसे [ अपनेको लक्ष्य कर लेकिन शब्दभेदके साथ 1 कहा यह आपका प्रतिवादी है। ऐसा कहने पर कुमुद चंद्र [ उसके मर्मको ठीक न समझ कर ] बोला- मुझ वृद्धका इस शिशुके साथ क्या वाद हो सकता है ? ' उसकी यह बात सुन कर [ आचार्य हे म चन्द्र ने कहा-] 'वृद्ध तो मैं हूँ; और आप तो शिशु ही है-जो अब तक भी कंदोरा बान्धना नहीं जानते और वस्त्र नहीं पहनते ।' राजाके इन दोनोकी इस प्रकारकी वितंडाका निषेध करने पर, परस्पर इस प्रकारकी प्रतिज्ञा निश्चित हुई-"पराजित होने पर श्वेतांवर तो दिगंवर हो जायंगे, और [ उसके विरुद्ध] दिगंवर देशत्याग करेंगे।" प्रतिज्ञा निश्चित हो जाने पर स्वदेशके कलंकसे डरनेवाले दे वा चार्य ने, सर्वानुवादका परिहार करके और देशानुवादका अनुसरण करके, कुमुद चंद्र से कहा कि-' पहले आप ही अपना पक्ष स्थापित करें ।' उनके ऐसा कहने पर कुमुद चंद्र ने राजाको पहले यह आशीर्वाद दिया- १५९. हे राजन् ! आपके यशके स्मरण होने पर सूर्य खद्योतकी चमक जैसा प्रतीत होता है, चन्द्रमा पुराने मकड़ीके जालकी भाँति फीका जान पड़ता है और (हिमाच्छादित) पर्वत मशकसे जान पड़ते है। आकाश उसमें भौंरे जैसा हो जाती है और इसके बाद तो वाणा बन्द हो जाती है। . N. [ - - . प्रकरण १०८-१०९] वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन [८१ उसके इस अपशब्दको सुन कर कि 'वाणी बद हो जाती है'-सभ्य लोग उसे अपने ही हाथों वधा समझ कर बड़े प्रसन्न हुए। इसके बाद देवा चार्य ने राजाको, यह आशीर्वाद दिया- १६०. हे चालुक्य महाराज! तुम्हारा यह राज्य और यह जिनशासन चिरकाल तक प्रवर्तित रहें। (राज्यपक्षमें पहला अर्थ-) जो राज्य शत्रुओंको शान्ति नहीं प्राप्त करने देता है, उज्ज्वल आकाशकी-सी उल्लसित कीर्तिकी प्रमासे जो मनोहर हो रहा है, न्यायमार्गके प्रसारकी पद्धतियोंफा जो गृह बना हुआ है और जिसमें परपक्षके हाथियोंका सदैव मद उतारनेवाले ऐसे कौन हायी वलयान नहीं है। (जिनशासनपक्षमें दूसरा अर्थ-) जो जिनशासन नारियों (त्रियों) को मुक्तिपद प्रदान करता है, श्वेतपत्रोंको धारण करनेवाले यतियोंकी उल्लसित कीर्तिसे मनोहर लग रहा है, नय मार्ग (जैन तत्व पद्धति ) के विविध प्रस्तार और भाङ्गयोंका गृहरूप है और जिसमें अन्य मतगादियोंके गर्वका जय करनेवाले केवलज्ञानी कभी भी भोजन नहीं करते ऐसा विधान नहीं है-यह जिनशासन चिरजीव रहो। इसके बाद, वादी कुमुद च द्र ने केलि-मुक्ति, स्त्री-मुक्ति और चीर सिद्धिके निराकरण रूप अपने पक्षके उपन्यासमें, कबूतर पक्षीकी भाँति मन्द मन्द और बार बार स्खलित वाणीसे बोलना शुरू किया। इसे देख कर सम्योग, ऊपरसे तो उसे उत्साहपरक वचन कह रहे थे और अन्दर दिलमें हस रहे थे। इस प्रकार कितनाक उपन्यास (स्वपक्ष स्थापन ) करने के बाद, अन्तमें [देवाचार्य को लक्ष्य करके कहा कि ] 'अब आप बौलिये । देवा चार्य ने प्रलय कालमें उन्मीलित प्रचण्ड परनसे निक्षुब्ध समुद्रके तरगाघातके समान गभीर वाणीसे, उत्तराध्य यन सूत्र की वृहद्वृत्तिमें कथन किये हुए चौरासी विकल्पोंका उपन्यास करना प्रारम किया। इसे देख कर, भास्वत् प्रकाशके प्रसारसे म्लान हो जाने वाले कुमुद-रात्रिविकासी कमल-की मोति निष्प्रभ हृदय कुमुद च द्रने भयसे चित्तमें भ्रान्त हो कर, उस वातको समझनेमें असमर्थ वन कर, फिरसे उसी उपन्यासके दुहरानेकी प्रार्थना की। श्री सिद्धराज के तथा और मयोंके निषेध करने पर भी, उन्होंने उसे अप्रमेय प्रमेय लहरियोंके द्वारा प्रमाण-समुद्रमें डुबोना शुरू किया। इस तरह निरतर याप्रमाह चलने पर, सोलहवें दिन अकस्मात् देवाचार्य का कण्ठ रुद्र हो गया । तब मत्रशास्त्रविद् श्री यशोभद्र मूरिने, जिन्होंने कुरु कुछा देवी के मदिरमें अतुलनीय वर प्राम किया हुआ था, उनकी कण्ठनालीसे क्षणभरमें क्षपणक (दिगबर )के किये गये अभिचारके प्रभावसे पड़ा हुआ केशोंका गुच्छा बाहर निकाल दिया। इस विचित्र व्यापारके निरीक्षणसे चतुर लोगोंने श्री यशोभद्र सूरि की भूरि प्रशसा की और कुमुद चद्र की खूब निंदा की। इस प्रकार (पटेने ) प्रमोद और ( दूसरेने) विषाद धारण किया । इसके बाद, देवसूरिने पक्षके उपन्यासके उपक्रममें 'कोटाकोटि' शब्द कहा। कुमुद च द्र ने उस शब्दकी व्युत्पत्ति पूछी । तब का कल पडि त ने, जिसके कण्ठमें आठों व्याकरण लोट रहे थे, शाक टाय नव्या कर ण में कहे हुए 'टाप् टीप्' सूत्रसे निष्पन्न 'कोटाकोटिः' 'कोटीकोटि कोटिकोटिः' इन तीनों सिद्ध शन्दोंका निर्णय सुनाया। पहले-ही-से 'वाचस्ततो मुदिता' इस कहे हुए अपशन्दके प्रमारसे उसका मुख मुद्रित (वन्द ) हो गया, और फिर स्वय ही बोला कि- में श्री दे या चार्य से जीता गया। श्री सिद्धराज ने उसे पराजित कह कर अपद्वारसे बाहर कर दिया । इस पराभरके कारण उसका सिर फट गया और यह मर गया। इसके अनन्तर श्री सिद्धराज ने आनन्द उल्लसित मनसे देवाचार्य के प्रभारको स्याति करनेकी इच्छा की। उनके सिर पर चार घेत छत्र धारण कराये गये, खूब सुदर चामर दलगाये गये, शखोंके युगल २१-२२ .
८२ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश बजवाये गये, डंकोंकी चोटसे मानों आकाशका पेट गुडगुडा रहा था और उत्तम प्रकारकी दुंदुभियोंके नादसे दिगंतराल भरा जा रहा था। राजाने स्वयं अपने हाथका अवलंबन दे कर, 'हे वादि चक्रवर्ती, पवारिये ! ऐसी स्तुतिपूर्वक उन्हें राजसभासे प्रस्थान करवाया । वा हड नामक उपासकने उस समय तीन लाख [द्रम्म] याचकोंको दान किये । इस तरह जगत्के आनंद स्वरूप कन्द ( मूल ) के कन्दल ( अंकुर ) समान मंगलके वारंवार उच्चारित होने पर, उसी वा हड द्वारा बनवाये गये श्रीमहावीर देवके प्रासाद ( मन्दिर ) में, देवको नमस्कार करने बाद, उसीकी वसति ( उपाश्रय ) में जा कर उन्होंने आश्रय लिया। सूरिकी अनिच्छा होने पर भी राजाने उनको पारितोषिकके रूपमें छाला आदि बारह गांव भेंट दिये । [ भिन्न भिन्न समर्थ आचार्यो द्वारा की गई ] उनकी स्तुतिके कुछ श्लोक इस प्रकार हैं- १६१. जिनके प्रसाद-ही-का मानों सुखप्रश्नके समय दर्शन ( वेतांबर संप्रदाय ) उच्चारण करता है, उन वस्त्रप्रतिष्ठाचार्य श्री देव म रि को नमस्कार है। - इस प्रकार श्री प्रद्युम्ना चार्य ने कहा । १६२. यदि सूर्य के समान दे वा चाय, कुमुद चंद्र को न जीत पाते तो कौन श्वेतांवर, संसारमें कटिमें वस्त्र पहनने पाता। इस प्रकार हे मा चार्य ने कहा । १६३. जिस नग्नने कीर्तिरूपी कंथा उपार्जन करके अपना व्रतभंग किया था, देव सूरि ने उस कंथाको छीन कर उसे निग्रंथ (नंगा ) कर दिया । - इस प्रकार श्री उदय प्रभ देव ने कहा। १६४. अभी तक भी जिन्होंने लेख-शालाका त्याग नहीं किया उन देवसूरि (वृहस्पति ) के साथ, वादविद्याको जानने वाले प्रभु देव सूरि की, 'तुलना कैसे की जाय । - इस प्रकार श्री मुनि देवा चार्य ने कहा। १६५. जिनकी प्रतिभाके वाम-तेजसे [ त्रस्त हो कर] कीर्तिरूपी योगवस्त्रका त्याग कर देने वाले [उस ] नग्न [ दिगंवर ] को भारतीने मानों लाजके कारण छोड़ दिया, वह दे व सू रि तुम्हारा कल्याण करें। १६६. अशेष केवलियोंकी भुक्ति स्थापन कर जो सत्राकार बने तथा स्त्रियोंकी मुक्तिके युक्त उत्तर द्वारा मोक्ष तीर्थ बने, और नग्नको जीत लेने पर श्वेताम्बरशासनके प्रतिष्ठागुरु बने, उन प्रभु श्री देव सूरि को महिमा, देवता और गुरुकी अपेक्षा भी अपरिमित है । - इस प्रकार दो श्लोक श्री मे रु तुंगसूरि ने कहे । इस प्रकार यह देवमूरिका प्रवन्ध समाप्त हुआ। पत्तनके वसाह आभडका वृत्तान्त । ११०) इसके बाद, पत्त न का रहने वाला, जिसका वंश विलुप्त हो गया है ऐसा, आ भ ड नामक एक चणिक्पुत्र कंसारेकी दुकान पर, गागर घिसनेका काम, किये करता था । उसको वहां रोज पाँच विंशोपकका उपार्जन होता था। वह अपना सारा दिन उस काममें व्यतीत कर, दोंनों शाम प्रभु श्री हे मसूरि के चरणोंके पास बैठ कर प्रतिक्रमण किये करता था । स्वभाव-ही-से चतुर होनेके कारण उसने अगस्त्य और बौद्ध मत आदिके 'रत्न परीक्षा के ग्रंथोंको पढ़ डाला और रत्नपरीक्षकोंके निकट रह कर उस परीक्षामें दक्ष हो गया। किसी समय, श्री हे म चंद्र मुनीन्द्रके निकट उसने, धनाभावके कारण, स्वल्प प्रमाणमें परिग्रह-परिमाण व्रतका नियम लेना चाहा । सामुद्रिक विद्याके जानकार प्रभुने भविष्यमें उसके भाग्य वैभवका खूब प्रसार होना जान कर, तीन लाख द्रम्मसे अधिक द्रव्य न रखनेका उसे नियम कराया। इसके बाद, संतोष पूर्वक वह अपना व्यवहार प्रकरण ११०-१११] पत्तनके वसाह आभडका वृत्तान्त । [८३ करने लगा। किसी असर पर, वह किसी गाँवको जा रहा था, तो उसने रास्तेमें बकरियोंका एक झुड जाते देखा। उसमें एक बकरीके गलेमें पाषाणका एक खण्ड बन्धा देखा, जिसको रत्नपरीक्षक होनेके कारण, परीक्षा करके देखा तो वह सच्चा रत्न मालूम दिया । फिर उस रत्नके लोभसे, मूल्य दे कर उस बकरीको उसने खरीद लिया। मणिकार ( मणियारे) के पाससे उस रत्नको सान पर चढवा कर उसे देदीप्यमान बनवाया और फिर श्री सिद्धराज के मुकुट बनानेके अवसर पर, एक लाख मूल्य पर राजा-ही-को दे दिया। उसी मूल धनसे उसने एक वार बिक्नेको आये हुए मजिष्ठाके कई बोरे खरीदे और जब बेचनेके समय उन्हें खोलकर देखा तो समुद्रके चौरोंसे छिपाने के लिए, व्यापारियोंने उनमें सोनेकी पट्टियाँ छिपा रखी हुई मालूम दी। फिर उसने सब बोरे खोल कर उनमेंसे वे पट्टियाँ निकला ली। इस तरह फिर वह सारे नगरमें मुख्य ऐसा सिद्ध राज का मान्य (नगर सेठ ) और जिन-धर्मकी प्रभारना करने वाला [प्रसिद्ध ] श्रारक हुआ। प्रति दिन, प्रति वर्ष, स्वेछा- नुसार जैन मुनियोंको अन्न वस्त्र आदि दिया करता और गुप्तरूपसे स्वदेश और विदेशमें नये नये धर्मस्थान बन- वाता तथा पुराने धर्मस्थानोंका जीर्णोद्धार करवाता रहा । पर किसी पर उसने अपनी प्रशस्ति नहीं लिखनाई। { कहा भी है कि }- १६७ लतासे आच्छन्न वृक्षकी नाई और मृत्तिकासे आच्छादित बीजकी नाई प्रच्छन्न (गुप्तरूपसे) किया हुआ सुकृत कर्म प्राय सैंकड़ों शाखाओंपाला विस्तृत हो जाता है। इस प्रकार यह वसाह आभडका प्रवन्ध समाप्त हुआ। सिद्धराजकी तत्त्वजिज्ञासा और सर्वदर्शन प्रति समानदृष्टि । १११) एक दूसरी बार, श्री सिद्धराज ससार सागरको पार करनेकी इच्छासे, सर्व देशके सर्व दर्शनोंमेंसे, प्रत्येकसे देवतत्व, धर्मतत्व, और पात्रतत्वको जिज्ञासासे पूछन लगा, तो मालूम हुआ कि, वे प्रत्येक अपनी स्तुति और दूसरेकी निंदा कर रहे हैं। इससे उसका मन [ खूब ] सदेह-दोलारूढ़ हो गया। श्री हे मा चार्य को बुला कर उनसे विचारणीय कार्यको पूँछा। आचार्यने चतुर्दश विद्याओंके रहस्यका विचार करके, इस प्रकार एक पौराणिक निर्णय कह सुनाया कि-'पहले जमाने में किसी व्यवहारी [गृहस्थ ] ने अपनी पहली परिणीत पत्नीको छोड़ कर किसी रखेलिनको अपना सर्वस्व दे दिया। इससे उसकी पूर्व पत्नी, सर्वदा ही, उसको अपने वशमें करनेके लिये अभिचार (मत्र-तत्र आदि) के उपाय पूछा करती । किसी गौड (बगाल) देशीय [ जादुगर] ने बताया कि-" तुम्हारे पतिको मैं ऐसा कर दूँ कि तुम उसे फिर रस्सीमें बाँधे रखो" ऐसा कह कर, उसने कोई एक ऐसी अचिन्त्यवीर्य औषधि ला दी और कहा कि-" इसे भोजनमें खिला देना"। ऐसा कह कर वह चला गया। कुछ दिनोंके बाद जब क्षयाह ( श्राद्धका दिन ) आया तो उस स्त्रीने वैसा ही किया-पतिको यह आषधि खिला दी। फलस्वरूप वह ( पति ) साक्षात् बैल हो गया। उसका फिर कोई प्रतीकार न जान कर वह, सारी दुनियाकी झिड़कियाँ सहती हुई, अपने दुश्चरितके ऊपर शोक करने लगी। एक बार [प्रीम कालके ] दोपहरके समय, सूर्यके कठोर किरणोंसे खूब सतप्त हो कर भी, किसी शाल भूमिमें वह अपने उस पशुरूप पतिको चरा रही थी और किसी वृक्षके नीचे बैठ कर खूब निर्भर भारसे विलाप कर रही थी। अकस्मात् उसने आकाशमें कुछ आलाप सुना । पशुपति (शिव) भवानीके साथ विमानमें बैठे हुए उस समय यहाँस निकले । भवानीने उसके दुखका कारण पूछा । इस पर शिवने यह घृत्तात ज्यों का त्यों कह सुनाया। फिर भवानीके आग्रह करने पर शिवने यह भी बताया कि, उसी वृक्षकी छाया मैं, पुरुष बननेकी औषधि है, - ८४] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश - और वे अन्तर्धान हो गये। फिर वह स्त्री उस वृक्षकी छायाको रेखांकित करके, उसके भीतर पड़ने वाली [सभी ] औषधियोंके अंकुरोंको उखाड़ उखाड़ कर वृषभके मुँहमें डालने लगी। उस अज्ञात स्वरूप औपधिके मुँहमें पड़ते ही वह बैल फिर मनुष्य हो गया । अज्ञात स्वरूप हो कर भी, औषधिने जैसे अभीष्ट कार्य किया, वैसे ही कलियुगमें मोहके कारण, वह पात्र-परिज्ञान तिरोहित होने पर भी, भक्तियुक्त हो कर सब दर्शनोंका आराधन करनेसे, अविदित स्वरूप-ही-से मुक्तिदायक हो जाता है, यह निश्चय है । इस प्रकार श्री हेम चंद्राचार्य ने जब सर्व दर्शनके सम्मत होनेका उपदेश दिया तो श्री सिद्धराज ने फिर सब धर्मोका समान आराधन किया । इस प्रकार यह सर्व दर्शन मान्यता प्रबंध समाप्त हुआ। सिद्धराजका प्रजाजनोंके साथ उदार व्यवहार । ११२) एक दूसरी बार रातमें, राजा कर्ण मे रु प्रासादमें नाटक देख रहा था । वहाँ पर कोई चना बेचने वाला एक गरीब बनिया भी चला आया और वह राजाके कन्धे पर हाथ रख कर देखने लगा । राजा उसके इस अभिनय (व्यवहार ) से मनमें प्रसन्न हो रहा, और बार बार उसका दिया हुआ कर्पूर मिश्रित पानका बीड़ा आनंदके साथ लेता रहा । नाटकके विसर्जन होने पर, राजाने अनुचरोंके द्वारा उसका घर आदि अच्छी तरह जान लिया और फिर अपने महलमें आ कर सो गया । सवेरे उठ कर प्रातःकृत्य कर लेने वाद, सर्वावसर (राजसभा) के मिलने पर, राजाने सभामंडपको अलंकृत किया और उस चना बेचने वाले बनियेको वुलाया । राजाने उससे [व्यंगमें ] कहा कि-' रातमें तुमने जो मेरे कन्धे पर हाथ रखा था उससे मेरी गर्दनमें दर्द हो रहा है तो उस तत्कालोत्पन्न मति वाले (हाज़िर जवाब ) बनियेने कहा कि-' महाराज ! आसमुद्र विस्तृत ऐसी पृथ्वीके भारको कन्धे पर उठा रखनेसे यदि स्वामीके कन्वेमें कोई पीड़ा नहीं होती तो मुझ समान तृण-मात्रसे निर्जीव बनियेके भारसे स्वामीके कन्धोंमें क्या पीड़ा होगी !' उसके इस उचित उत्तरको सुन कर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ और बदलेमें उसको इनाम दे कर विदा किया। इस तरह यह चना वेचनेवाले वनियेका प्रबंध समाप्त हुआ। लक्षाधिपतिको क्रोडपति बना देना। ११३) एक दूसरी रातको, राजा कर्ण मे रु प्रासादसे नाटक देख कर लौट रहा.था, तब [ राजमार्गमें ] किसी व्यवहारीके घर पर बहुत-से दीपक जलते हुए देख कर पूछा कि- यह क्या है ?' उसने कहा कि ये लक्षप्रदीप हैं । राजाने उसको धन्य कहा और वह अपने महलमें चला गया। रात्रिको व्यतीत कर [ अपने नगरमें ऐसे प्रजाजन है इस विचारसे ] अपनेको धन्य मानता हुआ, सबेरे उसे राजसभामें बुला कर आदेश किया कि इन प्रदीपोंको सदा जलाते रहनेसे तुमको सदा ही अग्निका भय रहता है, तो कहो कि तुमारे पास कितने लाखका धन है। उत्तरमें उसने निवेदन किया कि वर्तमानमें चौरासी लाख है' । इस पर मनमें अनुकंपित हो कर राजाने कृपापूर्वक अपने खजानेसे १६ लाख निकाल कर दे दिया और उसके मकान पर [ दीपकोंके बदले ] क्रोडपति होनेका सूचक कोटिध्वज फहराया गया । इस तरह यह षोडशलक्षप्रसाद प्रबंध समाप्त हुआ। , प्रकरण ११२-११६] सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना। [८५ - सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना । ११४) एक दूसरी बार, राजाने वाला क देश को दुर्गभूमि (पहाड़ी जमीन ) में सिंहपुर नामका प्रदेश प्रामणोंको रहने के लिये दे दिया और उसके अधीन १०६ ग्राम दान कर दिये । पर वहा पर सिंहका डर देख कर प्रारणोंने सिद्धराज से प्रार्थना की कि, उन्हें कहीं देशके भीतर निवास दिया जाय । इस परमे राजाने उनको साश्रमती के तौर परफा आसा विटी ग्राम दे दिया, और सिंह पुरसे धान्य ठानेमें जो आते जाते कर लगता था उसे माफ कर दिया गया। चाराहीके पटेलोंको चाका विन्द देना। ११५) वादमें, राजा सिद्धराज ने किसी समय, माल व देश की यात्राके लिये प्रयाण किया। रास्तेमें याराही माम के पास जन वह आया तो उस गाँनके पटेलों ( मुखियों ) को बुला कर, उनकी चतुरताकी परीक्षाके लिये, अपनी एक प्रधान पालकी, उनको अपने पाम याताके रूपमें रखनेके लिये दी। राजाके भागे प्रयाण कर जाने पर उन सभीने मिल कर, उसके एक एक हिस्सेको अलग अलग कर, यथोचित रूपसे सबने अपने अपने घर पर समालके रखा। यात्रासे लौटते समय राजाने अपनी रखी हुई उस थातीको जब उनसे माँगी, तो उन्होंने अलग अलग किये हुए उसके वे सब टुकडे टाके दिये । यह देख कर राजाने आधर्यसे पूछा कि-'यह क्या बात है : ' तो उन्होंने विज्ञापना की कि- ' महाराज ! [हममेंसे ] कोई एक आदमी तो इसकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। कभी चौर और अग्नि आदिका उपदन हो जाय तो फिर स्वामीके सामने कौन जनावदेह हो- यही सोच कर हम लोगोंने यह ऐसा किया है।' तब राजा मनमें खूब भाधर्यचकित हुआ और उनको ' च ' ऐसा रिरुद उसने दिया । इस प्रकार यह वाराहीय च मध समाप्त हुआ। उमाके ग्रामीणोंसे वार्तालाप । ११६) इसके बाद, एक वार राजा श्री जयसिंह देय, मा ल य विजय करके टौट रहे थे तब रास्तेमें पटने या उशा प्राम में खीमे डाले गये । यहांके ग्रामीणोंने, जिनको राजा मामा फहा करता था, दूधसे मरे हुए पदों आदिके उचित सन्कारसे राजाको सन्तुष्ट किया । उसी रातको, राजा गुम घेप करके उनके दुख- मुग जाननेफी इच्छासे, किसी प्रामीणके घर पर चला गया। यह (ग्रामीण) गाय दुहने आदिक कामोमें न्यस्त होता हुआ भी, उसने पूछा कि-'तुम कौन हो,' [इत्यादि । इसके उत्तरमें उसने ] कहा कि-मैं श्री सोमेघरफा फाटिक (यात्री), महाराष्ट्र देश का रहने पाटा हु।' उसने फिर उसमे महाराष्ट्र देश और उसके रानाके गुण-दोष आदिले । उसने यहाँके रानाके ९६ गुणोंकी प्रशसा करते हुए, उस प्रामीणसे गूर्जर देश के रामाके गुण-दोष पूछे । इस पर यह श्री सिदराज के प्रजा-पालन-दक्ष और सेरकों पर अनुपम प्रेम झ्यादि गुणोंका वर्णन करने टगा। सर बीचो उसने राजाका फोई पत्रिम दोष यताना चाहा, तो यद ऑम् गिराता पुआ बोटा कि-'हम टोगों मर माग्यो राजाको कोई पुन नही है और यही उसमें एक दोष है। इस प्रकार निकपट भारसे उसने उसमे सर कह कर उसे सतुष्ट किया | फिर प्रभात फाटमें सब टोफ मिल कर राना • पूर्वसदेस में इस मा पूरा परिणामस्य एमा' ऐमा रोग है। न पोत मंगरग पर गोपेन हिरन 'ना' गीत है| गुणी रास मर्म मेष-मुपदेशे। परने उनी मोलभेमरउने 'पूरा' देगा समोपन किया।
८६] प्रवन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश - दर्शनके लिये उत्कंठित हो कर उसके निवासस्थानमें गये और राजाको प्रणामादि करके उसके अनुपम ऐसे पलंग पर ही बैठ गये । आसन देने के लिये नियुक्त नोकरोंने उनको अलग आसन पर बैठनेको कहा तो वे लोग अपने हाथोंसे उस पलंगकी कोमल शय्याका स्पर्श करते हुए [ भोले भावसे ] हम लोग यहीं बड़े आरामसे बैठे हैं '-ऐसा कहते हुए वहीं बैठ रहे। [यह देख कर] राजाका मुख मुस्कुराहटसे कमलकी भाँति खिल उठा। इस प्रकार उझावासी ग्रामीणोंका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * । झाला सामंत माँगुकी शूरताका वर्णन ११७) किसी समय, झा ला जा ति का मा ङ्गु नामक क्षत्रिय श्री सिद्ध राज की सेवाके लिये सभामें आया करता था। वह रोज़ ही दो पराची (लोहेकी भारी कुसी) जमीनमें गाड़ कर बैठता और फिर उन दोनोंको उखाड़ कर ऊठता । उसके भोजनमें घीसे भरा एक कुतुप ( कुडवा-धी तेल भरनेका घडेके जैसा चमडेका भाजन ) खर्च होता था। घी लगी हुई उसकी दाढ़ीके धोने पर भी उसमें सोलहवाँ हिस्सा घी बच जाता था। किसी समय उसके शरीरमें रोग होने पर, पथ्यके लिये यवागू ( जौकी पतली माँड ) खानेको वैद्यने कहा तो, वह ५ माणक ( करीव ४ शेर कच्चे नाप जितनी) खा गया। इस पर वैद्यने डाँट कर कहा कि आधा भोजन कर लेने पर बीचमें अमृतोदक क्यों नहीं पिया ? ' क्यों कि कहा है कि- १६८. जब तक सूर्योदय न हो जाय तव तक एक हजार घड़ा भी पानी पिया जा सकता है, जब सूर्योदय हो जाता है तो फिर एक बूंद भी एक घड़ेके बराबर हो जाता है। रातकी पिछली चार घड़ीमें, सूर्योदय न होने तक, जो जल पिया जाता है - जो जल प्रयोग किया जाता है- उसे वज्रोदक कहते है ( वह अमृतोदक भी कहाता है)। सूर्योदय हो जाने पर विना अन्न खाये, जो पानी पिया जाता है, वह विष है। इस लिये एक बूंद भी वह पानी सौ घड़ोंके बराबर हो जाता है। आधा भोजन करने पर, बीचमें जो जल पिया जाता है वह अमृत कहलाता है, और भोजनान्तमें तत्काल पिया जाता हुआ जल छत्र या छत्रोदक कहलाता है। उस मॉगूने, यह सुन कर कहा कि- 'यदि ऐसा है, तो पहले जो अन्न खाया है उसे आधा आहार कल्पना कर लिया जाय, और इस समय अब पानी पी कर फिर उतना ही आहार और कर लूँ ! ' ऐसा कह कर वह फिर खानेकी तैयारी करने लगा, लेकिन वैद्यने उसे वैसा करनेसे पर . रोक दिया। किसी समय राजाने उसके निःशस्त्र रहनेका कारण पूछा । उसने कहा कि- 'मेरा हथियार तो समयोचित होता है ' । फिर एक बार उसके स्नान करते समय, किसी महावत द्वारा चलाये हुए हाथीको अपने ऊपर आता देख, नज़दीकमे रहे हुए कुत्तेको पकड कर उसकी सूंड पर फेंक मारा । मर्मस्थान पर चोट लगनेके कारण निपीडित ऐसे उस हाथी को खींचा, तो उसके अतुल बलसे वह हाथी भीतर-ही-भीतर नसोंमेंसे टूट गया और उस महावतके नीचे उतरने पर, वह जमीन पर गिरते ही प्राणोंसे मुक्त हो गया । गूर्जर देश पर आयी हुई म्लेच्छोकी सेनाको देख कर राजाके पलायन कर जाने पर, वह अपनी इच्छासे उस सेनाका उच्छेद करता हुआ, युद्धमे जिस स्थान पर मारा गया, उस जगहकी, पत्त न मे अब भी 'माङ्गुस्थण्डिल' के नामसे प्रसिद्धि चल आ रही है । इस प्रकार यह माँगू प्रबंध समाप्त हुआ। + मा ११७-११९] सिद्धराजकी समामें न्लेच्छराजके दूतोंका आगमन । [८७ . सिद्धराजकी समामें म्लेच्छराजके दूतोंका आगमन । ११८) एक दूसरी बार, म्लेच्छराजके प्रधानोंके आने पर, मध्यदेशसे माये हुए वेपकारोंको बुला कर कुछ रहम्य दिखलानेका आदेश दे कर विसर्जित किया। इसके बाद दूसरे दिन, सायकाल, प्रलय कालके समान प्रचण्ड परनके आने पर, राना सुवर्मा समाके समान राजसमामें सिंहासन पर बैठ कर जो देखना है, तो अन्तरीक्षसे दो रासम उतर रहे हैं-जिनके मम्नक पर सोनेकी दो ईटें रखी हुई है और जो सुवर्ण जैसी कान्ति धारण कर रहे हैं। उन्हें देख कर सारी समा मयमे भ्रात हो उठी। इसके बाद, उन्होंने राजाके चरणपीठ पर वह उपहार रख दिया और फिर पृष्पीतल पर लूठिन होते हुए, प्रणाम करके कहा कि-' आज लंका नगरी में महाराजाधिराज विमी पण ने देवाना करते समय राज्यस्थापनाचार्य रघुकुल निलक श्री रामचन्द्रके उत्तम गुणमानोंको स्मरण करते हुए, ज्ञानमय दृष्टिमे जाना कि-आनकल उनके स्वामी (रामचन्द्र) चौ ल क्य कुल निलक श्री सिद्धराज के रूपमें अवतीर्ग हुए है। इस लिये उन्होंने यह (सन्देश ) कह कर हम दोनोंको भेजा है कि-'मैं प्रमुको प्रणाम करनेके लिये अयन्त उत्कण्ठित मनवाला हो रहा है, सो क्या मैं ही वहाँ प्रणाम करनेको उपस्थित होऊँ या प्रमु ही यहाँ आ कर मुझे अनुगृहीत करेंगे '- इसका निर्णय महारान स्वय अपने श्रीमुखसे करें।' उनकी यह बात सुन कर, राजाने मन-ही-मन कुछ मोच कर उनसे इस प्रकार कहा मानद टीसे प्रेरित हो कर में ही खुद अपने अनुकूल ममय पर, विभीषणसे मिलने आ जाऊँगा।' ऐसा कह कर, अपने कष्ठका भृगारभूत ऐसा एकापली हार उनको प्रयुपहारके रूपमें दे दिया । जाते समय 'प्रमुके अन्य दूत पठानेके अवसर पर, हमें मुला न दें' इस प्रकारको विशेष विज्ञमि फरके अन्तरीक्ष मार्गसे वे दोनों राक्षम तिरोहित हो गये। उसी समय वे म्लेच्छोंके प्रधान पुरुष बुलाये गये तो, भयभीत हो फर अपना पौरुष डोर, राजाके सामने आ कर उपस्थित हुए और भक्तियुक वचन कह कर राजाको खुश करने रगे। राजाने फिर उनके रानाके लिये उचित भेट दे कर उनको विदा किया । इस प्रकार यह म्लेच्छागमनिपेय प्रबंध समाप्त हुआ। * 'सिद्धराजका कोल्हापुरके राजाको चमत्कारके भ्रममें डालना । १९९) वादमें, किमी समय, कोल्हापुर नगरके राजासी समाने बन्दियोंने श्री सिद्धराज की कीर्तिका गान किया। उस रानाने फहा कि-'सिदराज को हम ऐसा तब मानेंगे जब हमें मी कोई यह प्रयक्ष चम- कार दिग्पापेगा।' राजाके इस कथनसे पराभूत हो कर, उन्होंने सिदराज को यह वृत्तात कह सुनाया। इस पर रामाने जब समामें नगर निगई तो उसके मन की बात समझने वाले किसी सेकने दाय जोड़ कर अपना अभिप्राय प्रकट किया । राजाने उसे एकान्तमे बुला कर उसका कारण पूछा। उसने राजाके आशपको कर बतलाया और पिने कहा कि तीन टारके म्पपसे यह काम सिद्ध होने योग्य है । 'फिर उसी समय, मोनिपीके बताये हुए मुहर्नमें रामासे तीन साम्प ठे पर, यह म्यापारी पनिपा बन कर सब प्रकार के माठका माद करके, सिदफे सकेन चिद वाडी रन नदी हुई दो सोनेकी गदा, पफ अनुउनीय योगदण्ट, दो मगिफे बने हुए पुग्दर, उसी प्रभारफे योगका मूषक योगरट, सपा सूर्पकी किरणों जैसा चमकदार पफ चन्द्रातक उसने साप दिया, और रामारी करके पुउदिनों में पड़ा (कोल्हापुर) जा कर डेरा टाय। समारम्य दोगटीकी रातको, उस नगरके रागनिदा महाटग्मी देवीको पूरा टिर आकुट-म्यान्ट हो कर देवौक मरिमें जर आई, सो पद बना मिर पुरुष, उता निदरेपो प्रगत दो पर और सब अच्छी तरह जूदना सीने दुर किसी र नातिक ८८] प्रवन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश मनुष्यको साथ ले कर, अकस्मात् उस देवी के मंदिरमें प्रादुर्भूत हुआ । उसने देवीकी रत्न, सुवर्ण और कर्पूरसे पूजा अर्चा की और उस राजाकी रानियोंको उसी प्रकारके उत्तम पानके बीड़े दिये । फिर श्री सिद्ध राज का नामांकित वह सिद्धवेष पूजाके बहाने वहीं रख कर, उसी वर्वरके कंधेपर चढ़कर, उडता हुआसा जैसे आया था वैसे ही चला गया। रातके अन्तमें रानियोंने उस विरोधी राजाको वह वृत्तान्त कह सुनाया तो, भयभ्रान्त हो कर उसने, उस उपहारको, अपने प्रधान पुरुषोके द्वारा सिद्ध राज के पास पहुँचा दिया। इधर उस सेवकने अपने मालके क्रय-विक्रयका संकोच करके शीघ्रगामी पुरुषके साथ यह खबर भिजवा दी कि-'जब तक मै न आऊँ तब तक इन प्रधान पुरुषोंको दर्शन न दीजियेगा।' फिर स्वयं जल्दी जल्दी चल कर कुछ ही दिनोंमें वहाँ पहुँच गया। उसके अपने कियेका पूरा वर्णन करने पर, राजाने उन प्रधानोंका यथोचित स्वागतादि किया। इस प्रकार यह कोल्हापुर प्रबंध समाप्त हुआ। कौतुकी सीलणकी वाक्चातुरी। १२० ) श्री सिद्धराज, मा ल व मंडल से य शो वर्मा राजाको जब बाँध लाया, तब उसके निमित्त किये जाने वाले उत्सव पर सील ण नामक कौतुकीने कहा कि-' अहो बेडा (नाव ) में समुद्र डूब गया ।' तब उसके पीछे स्थित किसी गायन ( गान करनेवाले ) ने ' तुम अपशब्द कह रहे हो'- ऐसा कह कर उसकी तर्जना की । तब उसने अर्थापत्तिसे इस प्रकार विरोधालङ्कारका परिहार करके बताया कि-' बेडाके समान इस गूर्जर भूमि में समुद्र जैसा यह मा ल व - न रे श डूब गया।' [इस पर उसने ] राजासे सोनेकी जीभ प्राप्त की। इस प्रकार यह कौतुकी सीलणका प्रबंध समाप्त हुआ। काशीपति जयचन्द्रकी सभामें सिद्धराजके दूतकी वाक्पटुता १२१) किसी समय, सिद्ध राज के एक वाचाल सान्धिविग्रहिक (दूत) से काशी के राजा जयचंद्र ने अण हि ल्ल पुर के प्रासाद, प्रपा ( बावडी ) और निपान ( कूए) आदिका स्वरूप पूछते समय [ उसकी विशेष शोभा सुन कर, ईर्ष्यावश राजाने ] यह दोष बताया कि- ' स ह न लिं ग स रोवर का जल शिव-निर्माल्य होनेके कारण अस्पृश्य है। उसका सेवन करने वाले दोनों लोकसे विरुद्ध व्यवहार करते हैं। अतः वहाँके लोग, उदित प्रभाव वाले कैसे हों ? सिद्धराज ने सहस्र लिंग सरोवर बना कर यह अनुचित कार्य किया है।' राजाकी इस बातसे मन-ही-मन कुपित हो कर उसने राजासे पूछा कि-[आपकी ] 'इस वा रा ण सी में कहाँका जल पिया जाता है ?' राजाके 'गंगाजल' ऐसा कहने पर उसने कहा-क्या गंगाजल शिव निर्माल्य नहीं है तो और क्या है ? शिवका सिर ही तो गंगाकी निवास-भूमि है।' इस प्रकार जयचंद्र राजाके साथ गूर्जरके प्रधानकी उक्तिमत्युक्तिका प्रबंध समाप्त हुआ। , मयणल्लादेवीके पिताकी मृत्युवार्ता । १२२) किसी समय, कर्णाट देश से आये हुए सान्धिविग्रहिकसे म य णल्ला देवी ने अपने पिता जय के शी का कुशल समाचार पूछा तो उसने अश्रुपूर्ण ऑखोंसे कहा कि-'स्वामिनि, प्रख्यातनामा महाराज श्री जय केशी भोजनके समय पिंजरेसे तोतेको वुला रहे थे । उसके ' मार्जार' (बिल्ली) बैठी है, ऐसा कहने पर, राजाने चारों ओर देख कर-किंतु अपने भोजनके पात्रके [ चौकीके ] नीचे छिपे हुए मार्जारको न देख कर- प्रकरण १२३-१२५ ] पिताके पुण्यार्थ मयणल्लादेवीका सोमेश्वरीकी यात्रा करना। [८९ प्रतिज्ञा पूर्वक बोल उठे कि-'यदि बिल्लोके हाथ तुम्हारी मृत्यु होगी तो मैं मी तुम्हारे ही साथ मरूगा ।वह तोता ज्यों ही पिंजडेसे उड़ कर उस सोनेके थाल पर आ कर बैठा त्यों ही उस बिल्लीने [लपक कर] भेड़िये जैसे दाँतोंसे उसे मार डाला | राजाने उसे मरा देख कर भोजनका पास छोड़ दिया, और उक्ति-प्रत्युक्ति जानने वाले राजपुरुषोंके [बहुत कुछ ] निषेध करने पर भी कहा- १६९ राज्य चला जाय, श्री चली जाय, और क्षणभरमें प्राण भी भले ही चले जॉय, किन्तु जो बात मैंने स्वय कही है वह शाश्वती वाणी न जाय । इस प्रकार इष्ट देवताकी भाँति इसी वाणीका जाप करता हुआ, काष्ठकी चिता बनवा कर, उस तोतेको साथ ले, उसमें प्रवेश कर गया । इस वाक्यको सुन कर म य ण ल्ला देवी शोकसागरमें डूब गई। विद्वज्जनोंने विशेष प्रकारके धर्मोपदेशरूपी इस्तावलवन दे कर उसका उद्धार किया। पिताके पुण्यार्थ मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना । १२३) वादमें, पिताके कल्याणार्थ श्री सोमेश्वर पत्तन की यात्राको वह गई, और वहाँ उस सतीने किसी त्रिवेदी ब्राह्मणको बुला कर उसे जलाजलि देना चाहा । उसने अजलिमें जल ले कर कहा कि- यदि तीन जमका पाप देना मजूर करो तो मैं यह लूँगा, नहीं तो नहीं।' उसकी इस वातसे अत्यन्त सन्तुष्ट हो कर, हाथी, घोदा, सोना आदिके दानके साथ, उसे पापघटका दान किया। उसने वह सब अन्य ब्राह्मणोंको दे दिया । देवीके यह पूछने पर कि 'ऐसा क्यों किया', बोला कि-'पूर्व जमकी पुण्य-वृद्धिके कारण तो आप इस जन्ममें राजरानी और राजमाता हुई हैं। और फिर इन लोकोत्तर दानोंके पुण्यसे भविष्य जम भी श्रेयस्कर ही होगा। यही सोच कर मैने तीन जन्मका पाप ग्रहण किया है। आपने जो इस पापघटके दानका उपक्रम किया है, इसे तो कोई अधम ब्राह्मण ले कर खुदको और आपको भी भव सागरमें डूबो दे। मैंने तो पहले ही सब धनका त्याग कर दिया है और फिर इस धनको ले कर मी दान कर दिया है, इस लिये जो मैने त्याग किया उससे आठ गुना अधिक श्रेय समह किया है। इस प्रकार यह पापघटका भवध समाप्त हुआ। । * सान्तु मत्रीकी बुद्धिमत्ताका एक प्रसंग। १२४) किमी समय, मा ल व मण्डल से विग्रह करके स्वदेशको लौटते समय सिद्ध राज को मालूम हुआ कि [ गुजरात और माटयेके मध्यमें बसनेनाले ] अनुपम वलशाली भिल्लोंने उसका रास्ता घेर लिया है। सा तू मत्री को [पत्तन में ] इसके समाचार मिले, तो उसने प्रति ग्राम और प्रति नगरसे घोड़े इकठे किये, और प्रत्येक बैटको भी पठानसे सज्ज करके बडा मारी दलबल इकट्ठा किया । फिर उस दलके वलसे मिल्लोंको प्रासित फर सिद्धराज को मुखपूर्वक स्वदेशमें ले आया । इस प्रकार सान्तू मत्रीकी चुद्धिका यह प्रवध समास हुआ। सिद्धराजके एक सेवकके भाग्यका वृत्तात । १२५) किसी एफ रातको दो बुद्धिमान मृत्य श्री सिद्धराज के पैर दवा रहे थे। उनमेंसे एकने, राजाको नीदके कारण आँखें बद किया हुआ समझ कर, उसकी प्रशसा करते कहा कि-'महाराज सिद्धराज कृपा और फोपने [ एकसे ] समर्थ, सेवकों के लिये कल्पवृक्ष और राजोचित समी गुणोंके आलय है। दूसरेने, राजाके इस २५-२४ ९० ] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश महान् राज्यका कारण भी प्राक्तन कर्म को बता कर [ कर्म ही की ] प्रशंसा की । राजाने इस वृत्तान्तको सुन कर कर्मकी प्रशंसाको विफल करनेके विचारसे, प्रशंसा करनेवाले चाकरको एक दिन, उसे कुछ भी रहस्य न जता कर, यह प्रसाद-लेख दे कर महामंत्री सान्तू के पास भेजा कि-' इस चाकरको एक सौ घोड़ेका सामंत बना दिया जाय'। वह चाकर इस लेखको ले कर जब चंद्रशालाकी सीढ़ियोंसे नीचे उतर रहा था, तब पैर फिसल जानेसे गिर गया और उसका अंग भंग हो गया । उसीके पीछे चले आने वाले दूसरे चाकरने पूछा कि-' यह क्या वात है ? ' तो उसने अपनी बात बताई । वह तो फिर खाटमें बैठ कर अपने घर गया और उस दूसरे [ अपने साथी ] को वह राजाका लेख दे कर मंत्रीके पास जानेको कहा। मंत्रीने उस लेखमें की गई आज्ञानुसार उस चाकरको सौ घुडसवारों वाला सामंतपद प्रदान किया । यह सब बात सुन कर राजाने भी कर्मको ही बलवान माना। १७०. न तो आकृति, न कुल, न शील, न विद्या और न मनुष्योंकी की हुई सेवा कुछ फल देती है। पूर्व जन्ममें तपस्यासे संचित किये हुए पुण्य कर्म ही मनुष्यको समय पा कर वृक्षोंकी तरह फल देते हैं। इस तरह यह वण्ठकर्म प्राधान्य-प्रबंध समाप्त हुआ। . सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकर पद्य । १७१. तीन भुवनके बीचमें यह जे स ल ( ज य सिंह-सिद्ध राज ) राजा [ एक बडा ] कूट बरुड * है जिसने अनेक राजवंशोंका छेदन कर [ अपना ] एक छत्र [ राज्य ] बनाया है। इसकी जय हो । १७२. महालय, महा-यात्रा महास्थान और महासरोवर, जैसे सिद्ध राज ने किये वैसे किसीने नहीं किये। १७३. जिगीषु जन ( एक अर्थ- गानेकी इच्छा रखने वाले दूसरा अर्थ-विजयकी इच्छा रखने वाले ) एक मात्राका भी अधिक होना सह नहीं सकते, मानों इसी लिये हे धरानाथ ( पृथ्वीनाथ )! तुमने धारानाथ (धा रा न गरी के नाथ) को नष्ट किया है। [ क्यों कि 'धरानाथ' की अपेक्षा 'धारा-नाथ ' में एक मात्रा अधिक है] १७४. हे सरस्वती, मान छोड़ दो, हे गंगा, तुम भी अपने सोहागकी भंगीको छोड़ो; अरी यमुने, अब तेरी कुटिलता वृथा है; रे रेवा, तूं वेगको छोड़ दे; क्यों कि अब समुद्र, श्री सिद्ध राज के कृपाणसे कटे हुए शत्रुस्कंधोंमेसे उछलने वाली रक्तकी धारासे बनी हुई नदीरूपी नवीन स्त्रीसे रक्त (१ लाल वर्ण, २ अनुरक्त प्रेमी) हो गया है। १७५. हे विजयी राजाओंमें सिंह ( जयसिंह ) महाराज, सचमुच ही तुम्हारे जय-यात्राके समय, हाथियोंके कारण जलाशयोंके सूख जानेकी चिंतासे; वीरोंके घावकी आकांक्षासे; तथा, अपने पतियोंके विनाशकी आशंकासे; क्रमशः मछली रोती है, मक्खी हँसती है, और स्त्रियाँ अशुभका ध्यान करती हैं । * बरुड या वरड उस जातिका नाम है जो वॉसको चीर-छोल कर उससे टोकरी, करंडक और छाता आदि बनाये करते हैं । कहीं कहीं 'गंछ' भी इनको कहा हैं । इस पद्यमे, राजवंश और छत्र ये शब्द श्लेषात्मक हैं। $ इस पद्यमे सिद्धराजके ४ महाकार्य बतलाये गये हैं -जिनमें महालयसे तो सिद्धपुरके रुद्रमहालयका सूचन होता है। महायात्रासे बहुत करके सोमेश्वर तीर्थकी की हुई बड़ी यात्राका सूचन होता है । किसीके खयालसे सिद्धराजने जो मालवे पर विजय प्राप्त किया था उस विजययात्राका इसमें सूचन किया गया है । महासरोवरसे पाटनके सहस्रलिंग सरोवरका निर्देश किया गया है। ४ ये महास्थानसे किस वस्तुका सूचन होता है यह ठीक ज्ञात नहीं होता । कहते हैं कि सिद्धराजने कई बड़े बड़े किल्ले भी बनाये थे और कई बड़े स्थान भी बसाये थे। संभव है उन्होंमेंसे किसीका कोई सूचन इसमें किया गया हो।
प्रकरण १२५ ] सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकर पद्य । ॥ ९१ १७६ हे सिद्ध राज, नत हो जाने पर तो तुमने आ नाक भूपको अनेक लाखोंके साथ सपादलक्ष [जैसा देश] भी दे दिया और दृप्त ऐसे य शो वर्मा के पास मालम ( मालया देश, श्लेपार्थ मा लक्ष्मीका लग= लेशमात्र ) का होना भी तुमने सहन नहीं किया ।. इत्यादि बहुतसी स्तुतिया और प्रबंध उसके बारेमें हैं जो [प्रथान्तरोते ] जानने योग्य हैं। स० ११५० से ले कर [११९९ तक ] ४९ वर्ष तक श्री सिद्धराज जय सिंह देव ने राज्य किया। इस प्रकार थी मेस्तुगाचार्यके यनाये हुए प्रध चिन्तामणिमें श्री कर्ण और श्री सिद्धराजका चरित्र वर्णन नामक यह तीसरा प्रकाश समाप्त हुआ। यहाँ पर P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक अधिक पाये जाते हैं। ये श्लोक सोमेश्वर देव रचित कीर्ति- को मुदी के हैं और इनमें सक्षेपमें सिद्धराज के जीवनके महत्व के सभी वीर कार्योंका सूचन किया गया है- [१०६ ] जिसने, वालक होते हुए भी, इद्रकी वीरवृत्तिको भी लाघ जाने वाले अपने कोपके प्रभारसे दुष्ट राजाओंको आज्ञाधीन बनाया । [१०७ ] अपार पौरुपके उदारवाले सौराष्ट्रीय ख गार को भी, जिस गुरुमत्सरने युद्धमें इस प्रकार पीस डाला, जैसे सिंह हाथीको पीसता है। [१०८ ] जिसने रामचद्रकी तरह असरय घोड़ोंकी सेना ले कर और अनेक राजाओंको नष्ट करके ( रामके पक्षमें-पर्वतोंको उखाड कर ) सिधुपतिको (सिद्धराजके पक्षमें -सिन्धु राज नाममा राजा, रामके पक्षमें सिन्धु-ममुद्र ) बाँध लिया । [१०९] मनमें अमर्प करके विपक्षीय उमृत् (एक अर्थ-पर्वत, दूसरा-राजा) के उन्नत होने पर, जिसने अगस्त्य मुनिकी मॉति, शीर्थ ही अर्णोराज (एक अर्थ-समुद्र, दूसरा-शा क भरी का चाहमान राजा ) को शुष्फ कर डाला। [११०] विष्णुने तो अर्णोराज (समुद्र ) की पुत्री ले टी थी, कितु इसने तो अर्णोराजको अपनी पुत्री दे दी । विष्णु और इस सिदराज में एक यही अंतर है। [१११] शत्रुओंके कटे हुए सिर देख कर शाक भरी के ईश ने भी शकित हो कर इसके चरणों में अपना मिर झुका दिया । [११२] वय अत्यत लक्ष्मीगन् और अपरमार (दूसरोंको न मारनेवाला) हो कर भी युद्धमें जिसने मालयस्वामी ( एक अर्य-मालय देशका राजा, दूसरा श्लेपार्थ- लक्ष्मीका किंचित् भोक्ता) परमारको मार डाटा। [११३] जिसने धारा-नरेश को राज शुककी तरह काष्ठ-पार (फाटके पिंजरे) में रख कर अपनी कीर्तिरुपी राजहसीको फाटा-पअर (दिक्चक्रचाल) में छोड़ दिया। [११] जिसने न र यर्मा राजाकी तो केवल एक ही नगरी जो धारा थी यह ले टी, पर उसकी धुओंको [बदलेमें ] हजारों अनु धारायें दे दी। • कमी (अजमेर) चारमान राग ओगनको, लिगका देश्य नान आनाक या आना था, सिदानने पुर परोपरे यो अपना आरोपीन गदा बनाया और सिर पीछेसे उसको अपनी पुषी मार दी थी। इसका सूचन इस पचम हैं। .
९२] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश [११५] धारा-भंगके प्रसंगको देख कर, जिसके समीप आनेकी ही आशंकासे, प्राघूर्णकके बहाने जिसको महोदय राजने दण्ड दिया । [११६:] जिस शत्रुने, अमृतकी भाँति, इसकी पृथ्वीके लेनेकी इच्छा की, उसीको तरवारसे उल्लसित इसके बाहुने राहु बना दिया ( अर्थात् राहुके समान उसे सिरकटा बना दिया)। [:११७ ] लोगोंने तो इसको कुमार ( कार्तिकेय ) की ही तरह शक्तिमान् अपना स्वामी माना था, लेकिन यह तो ताम्रचूडध्वज * था और वह केकिध्वज * था ( यही इनमें अंतर था)। [११८] ऐसा कोई राजा नहीं था, जिसको विश्वके इस एकमात्र वीरने जीता न हो; और ऐसी कोई दिशा न थी जो इसके यशसे शोभित न हुई हो। [११९ ] गणेशकी तरह जिस अग्रपुष्कर और वृषस्थितिको, मोदककी तरह, गौड राजा । आयसार और करस्थ हो गया। [१२० ] श्मशानमें वर्वर नामक राक्षसेन्द्रको बाँध करके राजाओंकी श्रेणीमें जो राजचंद्र सिद्धराज हो गया। [ १२१ ] जिसने, लड़ाईसे ऊठी हुई धूलसे पहले जिस आकाशको मलिन कर दिया था, उसने पीछेसे उसी आकाशको अपनी कीर्तिलहरीसे धो कर उज्ज्वल कर दिया । [ १२२ ] उस पृथ्वी मंडलके सूर्यके लोकान्तर होने पर चन्द्रसमान श्रीमान् राजा, कुमार पाल ने प्रजाका रञ्जन किया। , * सिद्धराजके ध्वजमें ताम्रचूड याने कुक्कुटका चिह्न था इस लिए वह ताम्रचूडध्वज कहलाता था। कुमार (कार्तिकेय) के ध्वजमें केकी अर्थात् मयूरका चिह्न था । मयूरकी अपेक्षा कुक्कुट अधिक बलवान् होता है, इस लिये कुमारसे भी आधिक सिद्धराजका शक्तिमान् होना इस पद्यमें ध्वनित किया गया है। १. गणेशके पक्षमें-आगे है हाथीकी सूंड जिसके; राजाके पक्षमे आगे है वाण जिसके । २ गणेशके पक्षमें-मूषकपर है स्थिति जिसकी; राजाके पक्षमें धर्मपर है स्थिति जिसकी । ३ मोदकके अर्थमें आज्य-घृतसारवाला, राजाके अर्थमे= युद्धसार वाला । ४ मोदकके अर्थमें कर = हायमें रहा हुआ; राजाके अर्थमें कर-दण्ड देनेवाला। +गौडबंग देशका राजा सिद्धराजको कर देने वाला बना यह अर्थ इस पद्यमें ध्वनित किया गया है।
९. कुमारपालादि प्रबन्ध । कुमारपालके पूर्वजादि। १२६) अब परम आईत श्री कुमार पाल का प्रबध प्रारभ किया जाता है - अ ण हिलपुर नगरमें जव कि महाराज वहे भीमदेव राज्य-शासन कर रहे थे, उस समय श्री भीमेश्वरके नगरमें ( अर्थात् पचनमें ) चकुला देवी' नामकी एक वेश्या रहती थी जो नगर प्रसिद्ध रूप और गुणकी पात्र थी। कुलपघूओंसे भी उसकी अधिक शीलमर्यादा कही जाती थी। राजाने यह सुना तो उसकी परीक्षा लेनेके विचारसे उसे अपने अनुचरोंके द्वारा सवालाख कीमतकी एक कटारी, अपनी रक्षिता बनानेके इरादेसे, इनामके तौर पर भिजवाई। [कार्यान्तरकी] उत्सुकता वश राजाने उसी रातको बाहर जा कर प्रस्थान (यात्राके) लग्नको सिद्ध किया। निग्रह (युद्ध) के निमित्त दो वर्ष तक उसको मावल देश में रहना पड़ा। पर वह व कु ला देवी, उसके भेजे हुए उक्त इनामके अनुसार, अन्य सब पुरुपोंको छोड़ कर शील आचारका पालन करती रही । निस्सीम पराक्रमशाली भीम ने तृतीय वर्षमें अपने स्थान पर आ कर जनपरपरासे उसकी इस प्रवृत्तिको सुन कर उसे अपने अन्त पुरमें दाखिल कर लिया । उसको एक पुत्र हुआ जिसका नाम हरिपाल देव था। उसका पुत्र त्रिभुवन पाल देव हुआ और उसका पुत्र श्री कुमार पाल देव । यह जन धर्मका जानने वाला न था तब भी कृपालु और परस्त्रियोंका भाई बना हुआ था। सिद्धराज से सामुद्रिक जानने वालोंने कहा था कि-'आपके बाद यही राजा होगा। इससे वह उसे हीन जातीय मान कर, उसके प्रति असहिष्णु वन, सदा उसके विनाशका असर खोजा करता । वह कुमार पाल इस वातको कुछ कुछ समझ कर, राजासे मनमें शकित बना हुआ, तापसप धारण कर, नाना प्रकारसे, देशान्तरों में भ्रमण करता रहा । कुछ साल इस तरह बिता कर फिर नगरमें आया और किसी मठमें ठहरा । , सिद्धराजके भयसे कुमारपालका मारे मारे फिरना । १२७) इसके अनन्तर, श्री कर्णदेव के श्राद्धके अवसर पर प्रद्वाल सिद्धराज ने सब तपस्त्रियोंको [मोजनके लिये ] निमत्रित किया । उनमेंसे प्रत्येकके पैर धोते समय, कुमार पाल नामक तपस्वीके भी कोमल चरणतलको हायसे स्पर्श करता हुआ, उसमेंकी ऊर्य रेखा आदि चिन्होंसे उसने जाना कि-'यही यह राजा होने योग्य है'- और इस लिये निधट दृष्टिसे उसे देखता रहा । उसकी इस चेष्टासे [ अपने प्रति ] उसे विरुद्ध समझ कर, उसी समय घेप बदल फरफे, कौयेकी मॉति, वह अश्य हो गया, और आलिग नामक कुम्हारके घरमें जा डिपा । यहा मिट्टाके वर्तन पकानेके लिये आवा बनाया जा रहा था, उसीमें कुम्हारने छिपा फर, पीडा फरने वाले राजपुरुषोंसे उसे बचाया । फिर यहाँसे धीरे धीरे आगे चला तो, उसने खोजनेके लिये आये हुए राजपुरुपोंको सामने देखा । उसमे श्रामित हो कर, नजदीको कोई दुर्गम ऐसी छिपने टायक भूमिको न पा फर किसीएक खेतमें जा ग्यदा हुआ । यहाँ पर, ग्वेतके रखवालोंने, पेतकी रक्षाके लिये फाटेदार वृक्षोंकी ढाटिया फाट फर जो इफही फर रही थी, उन्हीं के बीच में उसे छिपा दिया और ये अपनी जगह पर मा कर बैठ गये। इसके नाम कुछ पाठभेद मिलता है-किसी प्रतिमें 'घउला देवी' ऐगा मी पहा जाता है परन्तु यार' और 'घ' वीमें गिने पालोंके प्रमके धारण हुआ माम देता है। 'परी' का अपभा उपार पउलदेवी रोग और की जगह 'च' पन्ने चउमेदेवी' नाम बन गया मान्म देता है। अधिस्तर प्रतियों में 'गुन्द्रदेवी नाम मिलता है और परी प्रद प्रतीत होता है। " .
९४ ] प्रवन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश . [ कहा, राजाके आदमी पैरोंके चिह्नके अनुसार वहाँ पहुँचे, परन्तु उसका वहाँ पाना असंभव जान कर और भालेकी नोकको उसमें खोंच कर देखने पर भी कुछ न मालूम कर, वे वहाँसे वापस लौट गये । दूसरे दिन खेतवालोंने उस स्थानसे उसे बहार निकाला । वह सवेरे ही वहाँसे आगे चलता हुआ एक वृक्षकी छायामें बैठ कर विश्राम लेने लगा, तो क्या देखता है कि, एक चूहा निभृतभावसे बिलमेंसे चाँदीका सिक्का बाहर ला कर रख रहा है । जब वह इस प्रकार इक्कीस सिक्के निकाल चुका, तो उनमेंसे फिर एक वापस उठा कर वह विलमें ले गया। उसके विलमें घुसने पर वाकीके सब सिक्के उठा कर कुमार पाल ने ले लिये और वह ज्यों ही एकान्तमें जा कर देखता हैं तो वह चूहा बाहर आ कर उन सिक्कोंको न पा कर वहीं छटपटा कर मर गया । कु मा र पाल उसके शोकसे मनमें वड़ा व्याकुल हो कर चिरकाल तक परिताप करता रहा । फिर आगे चलते हुए रास्तेमें किसी [धनी पुरुष] की बहूने, जो ससुरालसे पीहर जा रही थी, देखा कि राहखर्चके अभावमें तीन दिनसे भूखे मरते उसका पेट फक पड़ गया है । उसने भाईकी तरह स्नेहसे कर्पूरकीसी सुगंधिवाले चावल के करवेसे उसको सुतृप्त किया। १२८) वादमें, विविध देशान्तरोंका भ्रमण करता हुआ, वह स्तं भ तीर्थ में महं० श्री उ द य न के पास कुछ मार्गखर्च माँगनेके लिये आया। यह सुन कर कि वह पौषधशालामें है, तो वह वहाँ आया। उसे देख कर उ द य न ने हे म चंद्रा चार्य से [ उसके बारेमें ] पूछा । उन्होंने कहा कि- इसके अंगके लक्षण लोकोत्तर है । यह भविष्यमें चक्रवर्ती राजा होगा । आजन्म दरिद्रतासे सताये हुए उस क्षत्रियने जब इस बातको असंभव तो उन्होंने यह लिख कर एक पत्रक मंत्रीको और एक उसको दिया कि- ' यदि सं० ११९९ कार्तिक वदि (B. P सुदि ) २ रविवार हस्त नक्षत्रों, आपका पट्टाभिषेक न हों तो, इसके बाद, मैं शकुन देखना ही त्याग दूंगा।' फिर वह क्षत्रिय उनकी इस कला-कौशल वाली चातुरीसे मनमे चकित हो कर बोला कि- 'यदि यह वात सच हुई तो, आप ही राजा रहेंगे और मैं आपका चरणरेणु हो कर रहूंगा'- और इसकी प्रतिज्ञा की । श्री हे मा चार्य ने कहा कि-'नरकरूप अन्तिम फल देनेवाली राज्यलिप्सासे हमें कोई मतलब नहीं है। आप कृतज्ञ हो कर यह बात न भूलियेगा और जैन शासनका भक्त हो कर सदा रहियेगा !' इस अनुशासनको सिर माथे रख कर और आज्ञा ले कर फिर मंत्रीके साथ उसके घर गया। वहां स्नान, पान, भोजन आदिसे सत्कृत हो कर और राह-खर्च पा कर, विदा ले मा ल व देश में आया । वहाँ कुडङ्गेश्वर प्रासादमें पट्टिका पर १७७. संवत् ११९९ का वर्ष पूर्ण होने पर, हे विक्रमा दि त्य, तुम्हारे ही समान एक कु मा र पाल नामक राजा [ जैन धर्मका पालन करने वाला ] होगा। इस प्रकारको गाथा लिखी हुई देख कर मनमें बडा विस्मित हुआ । [इस समय] गूर्ज राधि पति सिद्ध- राज का स्वर्गवास सुन कर वहाँसे लौटा । उसका सब खर्च समाप्त हो चुका था। उसी नगरमें, किसी बनियेकी दूकान पर [विना कुछ दिये] भोजन करनेके बाद उसको बंदी किया गया। वह व्याकुल हो कर रोने लगा तो, फिर नगरके लोगोंके इकट्ठा होने पर दोनोंका मरण होगा यह जान कर उस बनियेने कहा कि-'मेरी बनावटी मूर्छा है इसे तुम दूर करनेका प्रयत्न करने लगो' उसके इस प्रकारके बुद्धिवैभवसे अपनेको प्रत्युज्जीवित मान- कर, कुमार पाल ने वैसा किया और उस उपायसे अपना कष्ट छुटा कर वह अण हिलपुर में रातके समय पहुँचा। पासमें कुछ न होनेके कारण कंदोईकी दूकान पर जा कर, उसका दिया हुआ कुछ खाया । बादमे अपने बहनोई राजकुल श्री कान्हड़ देव के घर गया । जब कान्हड़ दे व राजमंदिरसे आया तो उसे आगे आगे करके घरके भीतर ले गया। फिर अच्छा खाना आदि खा कर स्वस्थ हो कर सो गया । * १ यहा पर यह क्या बात कही गई है सो ठीक समझमें नहीं आती । ग्रंथकारका लेख बहुत अस्पष्ट और संक्षित है।
प्रकरण १२८-१३१ ] कुमारपालादि प्रवन्ध [९५ कुमारपालका राजगादीपर बैठना । १२९) प्रात काल वह बहनोई अपना सैन्य तैयार करके, उसके साथ, उसको राजाके महलमें ले आया। अभिषेककी परीक्षाके लिये पहले एक कुमारको पट्टे पर बैठाया । उसको चादरके आँचलोंको भी ठीक सम्हालते न देख फिर एक दूसरेको बैठाया । उसको हाथ जोड़ कर बैठा हुआ देख कर उसे भी अप्रमाणित किया। फिर कान्हड़देव की अनुज्ञासे कुमारपाल, वस्त्र सवरण करके ऊँचेसे श्वास लेता हुआ और हाथमें तलवार कॅपाता हुआ, सिंहासन पर जा बैठा । पुरोहितने मगलाचार किया, नगाड़े बजे । श्रीमान् कान्हड़देव ने पचागोंसे पृथ्वी चूम कर प्रणाम किया । उस समय उसकी अपस्या पचास वर्षकी हुई थी। , * कुमारपालने राजद्रोहियोंका उच्छेद किया १३०) कुमार पाल स्वय प्रौढ़ होनेके कारण, तथा देशान्तर भ्रमणसे विशेष निपुणता प्राप्त करनेके कारण, सब राज्यशासन स्वय करने लगा। राज-वृद्धोंको यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मिल कर उसे मारना चाहा और अधिकार पाले दरवाजेमें घातकोंको रख दिया। पूर्वज मके शुम कौसे प्रेरित किसी आप्तने उस वृत्तान्तको बता कर उसे अन्य द्वारसे मकानमें प्रवेश कराया। बादमें उन प्रधानोंको उसने शीघ्र यमपुरीको भेज दिया । वह भावुक मण्डलेश्वर ( कान्ह ड देव ), राजा अपना साला होनेके कारण, तथा अपने आपको राज- प्रतिष्ठाचार्य समझ कर, राजाकी दुरवस्थाके [ उन पिछले ] मर्मीको कहा करता। इस पर किसी समय राजाने कहा-'हे भावुक, तुम्हें इस प्रकार राज-दरबारमें सर्वदा पुरानी दुरवस्थाके मौका मजाक नहीं करना चाहिये। अनसे ऐसी बातें समा न कहना, विजनमें चाहे यथेच्छ कहते रहना।' राजाके इस प्रकार उपरोध करने पर भी, उत्कट अपज्ञावश हो कर वह बोला कि- 'रे अनात्मज्ञ! अभी इतनेहीमें अपने पैर उखाड रहा है।' इस प्रकार वकता हुआ, मानों मोतहीकी इच्छासे, औषधकी माँति उसके पथ्य वचनको भी उसने ग्रहण नहीं किया। [ उस क्षण तो ] राजाने अपने भानका सवरण करके अपनी मनोवृत्ति छिपा ली। दूसरे दिन राजाके सकेत प्राप्त -मल्लोंने उसका अग तोड़ मरोड़ कर, दोनों आँखें निकाल ली और उसे उसके मकान पर भिजवा दिया। १७८ इस विचारसे कि पहले मैंने ही इसे जलाया है अत तिरस्कार करने पर भी यह मुझे नहीं जलायेगा, इस भ्रमके वश हो कर दीपककी तरह, राजाको कोई अगुलिके पोरसे भी न छुए। यह विचार कर, सामन्त लोग, उस दिनसे अत्यधिक भयचकित चित्त हो कर, प्रतिपद पर उसकी सेवा करने लगे। - १३१) राजाने पूर्वमें उपकार करने वाले उदयन के पुत्र वाग्म ट देव को अपना महामात्य बनाया और आलिग को तया मह० उदयन देव को बड़े (वृद्ध ) प्रधान बनाये। . कुमारपालका चाहमान राजा आनाकके साथ युद्ध । १३२) चाहह नामक एक कुमार सिद्धराज का प्रतिपन्न (माना हुआ) पुन या। वह कुमारपाल देय की आज्ञा न मान कर सपादलक्ष के राजाके पास सेनिक हो कर चला गया। वह श्री कुमारपाल के -साथ निमह करनेकी इप्यासे, यहाँके सभी सामन्त लोगोंको लाँच (रिश्वत) आदिफे द्वारा अपने वशमें करके, प्रपल सेनाफे साथ सपादलक्ष के राजाको ले कर [गूर्जर] देशकी सीमा पर चढ आया। अन, चौलुक्य चक्रवती (कुमारपाल) ने मी, प्रतिशत्रु बन कर, उस सैन्यके सामने अपना सैन्यसमूह जमा किया। जब दाईका दिन से हुआ और सीमायें निष्कटक की गई तथा चतुरङ्ग सेना सत्रित की गई, तो उसी समय पर ९६ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश हस्तीके च उलिग नामक महावतने, किसी अपराधमें राजासे फटकार पा कर, क्रोधसे अंकुश-त्याग कर दिया। इसके बाद, अनेक गुणके पात्र ऐसे सा म ल नामक महावतको खूब वस्त्र और धन आदि दे कर उस पद पर नियुक्त किया । उसने 'कल ह पश्चा न न' (युद्धका सिंह ) नामक हाथीको सजा करके उसके ऊपर राजाका आसन रखा । ३६ प्रकारके अस्त्रोंको वहां जमा कर, फिर राजाको बैठाया और सब कला-कलापसे पूर्ण ऐसा वह स्वयं भी कलापक पर पैर रख कर हाथी पर चढ़ा | उस आसन पर बैठ कर चौलुक्य-चक्रवर्ती (कु मार पाल ) ने देखा, तो मालूम हुआ कि, संग्रामके नायक पुरुषोसे उठाये जाने पर भी, चा ह ड कुमार के किये हुए भेदके कारण (फुट जानेसे ), सामन्त लोग उसकी आज्ञाको नहीं मान रहे हैं । इस प्रकार सेनामें कुछ विप्लव देख कर उसने महावतको [ आगे बढनेका ] आदेश किया । सामनेकी सेनामें हाथी परका छत्र देख कर अनुमान किया कि वह सपाद लक्ष का राजा [ आ रहा ] है । और यह निश्चय करके कि, सेनाके विघटित ( विमुख ) हो जाने पर मुझे अकेलेहीको लडना आवश्यक है, उस महावतको, सामनेके हाथीके पास, अपने हाथीको ले चलनेकी आज्ञा दी । पर उसे भी वैसा न करते देख बोला कि- 'क्या तू भी फूट गया है ? ' इस पर उसने कहा महाराज ! क ल ह पञ्चान न हाथी और सा म ल नामक महावत ये दोनों युगान्तमें भी फूटने वाले नहीं है, किन्तु सामनेके हाथी पर जो चाह ड नामक कुमार चढा हुआ है वह ऐसी गंभीर आवाज़ कर रहा है कि जिसकी हॉकके डरसे हाथी भी भाग छूटते हैं । यह सुन कर राजाने [ अपनी बुद्धिमत्तासे सोच कर ] हाथीके दोनों कानोंको चादरसे बंद कर दिया और फिर शत्रुके हाथीसे जा भिड़ाया। इधर चा हड़ ने, यह जान कर कि वह च उलि ग नामक महावत ही-जिसे उसने पहलेहीसे अपने वशमें कर लिया है-राजाके हाथी पर बैठा है, कु मा र पाल को मारनेकी इच्छासे हाथमें कृपाण ले कर अपने हाथी परसे कूद कर ' कलहपंचानन ' हाथ के कुंभस्थल पर पैर रखा । इतनेमें महावतने [ वडी चालाकीसे ] हाथीको पीछे हटा दिया। इससे वह चा ह ड कु मार पृथ्वी पर गिर पड़ा और नीचे खडे हुए पैदल सैनिकोंने उसे पकड़ लिया। इसके बाद चौ लु क्य राज ने श्री आ ना क नामक सपाद लक्ष देशके राजासे कहा कि-' हथियार संभालो !' ऐसा कह कर उसके मुख-कमल पर उचित समझ शिलीमुख ( वाण ) फेंकने लगा। ( उचित इसलिये कि शिलीमुख भौरेका भी नाम है और भौरोंका कमलकी ओर जाना उचित ही है।) तुम बड़े प्रधान क्षत्रिय हो न इस प्रकार उपहासके साथ प्रशंसा करते हुए, उसे भुलावेमें डाल कर, जो बाण मारा तो उससे घायल हो कर वह हाथीके कुंभस्थलसे गिर गया। 'जीत लिया, जीत लिया' कहते हुए जाराने स्वयं सारी सेनामें अपने हाथीको इधरसे उधर घूमाया और जो सब सामंत थे उनके घोड़ों पर आक्रमण करके उनको कैद किया । इस प्रकार यह चाहड कुमारका प्रबंध समाप्त हुआ। - , कुमारपालका उपकारियोंको सत्कृत करना । १३३ ) तत्पश्चात्, कृतज्ञ-सम्राट् चौलुक्यराजने आ लिग कुम्हारको सातसौं गाँववाली विचित्र चित्रकूट पट्टिका ( चित्तोड, मेवाडकी भूमि ) दी। वे अपने वंशके कारण लजित हो कर आज भी अपनेको सगर' (?) कहते हैं । जिन्होंने कटे हुए बब्बूलकी डालोंमें छिपा कर राजाकी रक्षा की थी वे अंगरक्षकके पदपर रखे गये। १ हाथीपर चढनेके लिये रस्सीका बना हुआ छींकासा ।
प्रकरण १३१-१३७] कुमारपालादि प्रवन्ध। [९७ गायक सोलाककी कलाप्रवीणता । १३४ ) एक बार, सोला क नामक गायकने अवसर पा कर अपनी गानकलासे राजाको सतुष्ट किया, तो उसने इनाममें मात्र ११६ द्रम्म उसे दिये। इससे [ वह असतुष्ट हो कर उन द्रम्मोंसे ] सुखमक्षिका (गुड और आटेकी बनी हुई एक मीठाई) ले कर उसे बालकोंको बाँट दिया । राजाने इस पर कुपित हो कर उसे निर्वासित कर दिया । उसने, वहाँसे फिर विदेशमें जा कर [ किसी एक ] राजाको अपनी अनुपम गीतकलासे प्रसन्न किया और उससे इनाममें दो हाथी पाये । उनको ला कर उसने चौ ल क्य राज को भेंट किये । राजाने [ फिर ] उसका सन्मान किया। १३५) किसी समय, कोई विदेशी गवैया [ राजाकी सभामें आ कर ] यह कह कर जोरसे चिल्लाने लगा कि 'मैं लुट गया, लुट गया !' राजाने पूछा-'फिसमे लुट गया ?' तो उसने बताया कि मेरी अतुल,गीतकलासे एक मृग समीप आ कर खडा रहा। मैंने कौतुक वश उसके गलेमें अपनी सोनेकी कण्ठी पहना दी। फिर भयसे वह भाग गया। इस लिये मैं उस हिरनसे लूटा गया हूँ। तब बादमें, राजाका आदेश पा कर उस सोला नामक गन्धर्वराजने वनमें जा कर अपनी मनोहर गीतविद्याके आकर्षण द्वारा सोनेकी कण्ठी- वाले उस मृगको आकर्पित करके ले आ कर राजाको दिखाया। १३६) उसके इस कलाकौशलसे मनमें चकित हो कर, प्रभु श्री हे मा चार्य ने उसकी गीतकलाकी कितनी शक्ति है सो पूछी । उसने सूखे काठको पल्लरित कर देने तक की [ अपनी कलाकी ] अवधि बताई। उसको इस कौतुकके दिखानेका आदेश दिया गया तो, उसने अर्बुद गिरि परसे रिहक नामक वृक्षको उखडया कर मगवाया, और उसके शुष्क शाखाखण्डको राजमहलके आँगनमें, कुमारमृत्तिका (कुवारी मिट्टी= किसीने नहीं छुई हुई ऐसी कोरी मिट्टी ) से भरे हुए आलवाल (क्यारी) में रख कर अपनी नवप्रश- सित गीतकलासे तत्काल उसे पल्लयोंसे सुशोभित करके दिखा दिया और इस प्रकार राजाके साथ भट्टारक श्री हे म च द्र सूरि को उसने सन्तुष्ट किया। इस प्रकार वइकार सोलाकका प्रबध समाप्त हुआ। * कौंकणके राजा मल्लिकार्जुनका मत्री आवड द्वारा उच्छेद । १३७) इसके बाद, एक वार, जब चौलुक्य चक्रवर्ती (कुमार पाल )ने को ऋण देश के मल्लिकार्जुन नामक राजाके बदीके मुँहसे (उसका)" राज पिता मह ऐसा बिरुद सुना, तो उससे राजाको इर्ष्या हुई और उसने उस दृष्टिसे समाकी और देखा । राजाके चित्तकी वातको समझ लेने वाले मत्री आम्बड को हाय जोड़ते देख कर राजा मनमें चकित हुआ। समापिसर्जनके अनन्तर हाथ जोड़नेका कारण पूछा । इस पर उसने कहा कि आपका यह आशय समझ कर कि-'क्या कोई ऐसा सुभट इस सभामें है, जिसे भेज करके, शत- रजके खेलके राजाके समान इस नृपाभास मल्लिकार्जुन को उखाड़ कर फेंक दिया जाय। मैं आपके आदेशको पूरा कर सकता हूँ, इस लिये मैंने हाथ जोड़े । उसकी इस बातको सुन कर राजाने उसे सेनानायक बना कर और पश्चाङ्ग पुरस्कार दे कर समस्त सामन्तोंके साथ विदा किया । वह बिना रुके चलता हुआ कौं क ण देश में पहुँचा और अगाध जलसे भरी कल विणी नामक नदीको पार करके सामनेके किनारे पर जा ठहरा । उसे इस प्रकार समामके लिये तैयार होता देख वह राजा मल्लिकार्जुन [अकस्मात् ही] प्रहार करता हुआ उसकी सेना- पर टूट पड़ा । इससे यह सेनापति (आम्दड) पराजित हो गया । तब फिर यह कृष्णपदन हो कर, काले वस्त्र १ वशानुक्रमसे जो गवैयाका कार्य करते थे उनको बहकार कहते थे। २५-२६ ९८ ] प्रवन्धचिन्तामणि [चतुर्य प्रकाश धारण कर और काले ही तंबूमें निवास करता हुआ [ पत्तन आया ] वहाँ पर चौक्य भूपाल (कुमार पाल) ने उसे इस ढंगमें देखा तो पूछा कि 'यह किसका सैन्य पडा है ?' इस पर उसे कहा गया कि 'कौवण ने लौटे हुए पराजित सेनापति आबड के सैन्यका यह पडाव है।' उसकी ऐसी लनाशीलताले चित्तमें चमकृत हो कर, प्रसन्नदृष्टि से उसे आदरके साथ बुलाया और फिर अन्यान्य बलवान् सामन्तोंके साथ मल्लिकार्जुन को जीतनेके लिये उसीको राजाने फिर भेजा। [वह इस बार कोण देशमें पहुँच कर ] उस नदीको उतर कर उस पर पुल बंधवाया और फिर उस परसे सारे सैन्यको पार करके बडी सावधान के साथ युद्धकी व्यवस्था की। घमासान युद्ध शुरु होने पर उस सुभट आम्ब डने हायीके कन्धे पर सवार मल्लिकार्जुन को ही ललित करके, बडी वीरवृत्ति के साथ उसके हाथोके दाँतरूपी मुशलकी साड़ीसे, उसके कुंभन्थल पर चढ़ बैठा । उहान रण- शौर्यसे मतवाला हो कर बोला कि- 'पहले प्रहार करो, या इष्ट देवताका स्मरण करो।' यह कह कर [ उसके सम्हलते ही ] अपनी धाराल तलवारके प्रहारसे मल्लिकार्जुन को पृथ्वी पर गिरा दिया। उधर सामन्त टोग नगर टनेमें संलग्न थे, इधर इसने खेलहीमें, जैसे सिंहशावक हाथीगो [ मार डालता है ] वैसे ही [ मल्लिकार्जुनको] मार डाला । फिर उसके मस्तकको सोने [के पतरे से लपेट कर, उस देशमें चौलुक्य चक्रवतीकी आज्ञाकी घोषणा करता हुआ, अण हिलपुर जा कर, व्हत्तर सामन्तोंके साथ सभामें बैठे हुए अपने स्वामी कु मा र पाल नृपतिके चरणोंकी, उसके सिरल्पी कमलसे पूजा की; तथा ये ४ चीजें भेंट की-१ श्रृंगारकोड़ी नामक साड़ी; २ माणिक नामक पिछोडा, ३ पापक्षय नामक हार, और ४ संयोगसिद्धि नामक सिप्रा । इनके सिवा ३२ कुंभ सुवर्ण, ६ मूडा मोती, चार दाँतवाला श्वेत हाथी, १२० पात्र ( वारांगना ) और १४॥ कोटी सुवर्ण दण्डके रूपमें उपस्थित किया । इससे अति प्रसन्न हो कर राजाने श्री आम्बड नामक महामण्डलेश्वरको श्रीमुखसे [ उस मल्लिकार्जुन का धारण किया हुआ वह ] ' राज-पिता मह ' विरुद समर्पण किया । इस प्रकार यह मंत्री आम्बडका प्रबंध समाप्त हुआ । . कुमारपालके साथ हेमचन्द्राचार्यके समागमका प्रसंग । १३८) एक बार, अण हि ल्ल पुर में भट्टारक श्री हे म चंद्र सूरि ने अपनी पाहिणि नामक माताको, कि जिसने दीक्षा ली हुई थी, परलोक प्राप्तिके समय कोटि नमस्कारके पुण्यका दान किया । मृत्युके बाद [संघजन ] जब उसका संस्कार महोत्सव करने जा रहे थे, तब त्रिपुरुष धर्मस्थानके निकट [ उसका शवविमान पहुंचा तो ] वहाँके तपस्वियोंने स्वाभाविक मत्सरतावश, उस विमानका भंग करके आचार्यका खूब अपमान किया। उसकी उत्तरक्रिया करवा कर, उस अपमानके आघातसे कुपित हो कर उन्होंने [ उस समय ] मालवेमें स्थित कुमार पाल भूपतिके स्कंधावार (सेनानिवेश ) को अलंकृत किया। १७९. मनुष्यको [ अभीष्ट कार्यसिद्धि प्राप्त करनेके लिये ] या तो स्वयं राजा बनना चाहिये या किसी राजाको हाथमें करना चाहिये । [ इन दो रास्तोंके सिवा ] कामके सिद्ध करनेका तीसरा रास्ता नहीं है। इस वचनके तत्त्वका विचार कर उन्होंने ऐसा किया। उनके इस तरह आनेका समाचार उदयन मंत्री ने राजाको सुनाया तो कृतज्ञोंके शिरोमणि उस राजाने परम अनुरोधके साथ उन्हें अपने महल में बुलवाया । राज्य पानेके शकुन ज्ञानको स्मरण करते हुए राजाने अनुरोध करके कहा कि- आप सर्वदा देवताअर्चनके अवसर पर यहां आया करें । ' इस पर सूरिने कहा- प्रकरण १३८-१३९ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [९९ १८. हम लोग भिक्षा माँग कर तो भोजन करते हैं, जूने-पुराने वस्त्र पहनते हैं और अकेली जमीन पर सो रहते हैं, तब फिर हम लोगोंको राजाओंसे क्या करना है। उनके ऐसा कहने पर राजाने कहा- १८१ मित्र एक ही [ होना चाहिये ], राजा या यति, भार्या एक ही [ होनी चाहिये ] सुन्दरी रमणी या दरी ( कदरा), शास्त्र एक ही [होना चाहिये], वेद या अध्यात्म, और देवता भी एक ही [होना चाहिये ] केशर या जिन | महाकविके इस कथनके अनुसार मैं परलोककी साधनाके लिये आपको मित्रता चाहता हूँ । बातका निषेध न करना उसे स्वीकार कर लेना है। - इस उक्तिके कथनानुसार, सूरिके कुछ न कहने पर उस महर्पिकी चित्तवृत्तिको पहचान लेने वाले उस राजाने, लोगोंके आने जानेमें बाधा देने वाले द्वारपालोंको, श्रीमुखसे भाज्ञा दी कि इन महर्पिको किसी भी समय आने में बाधा न दी जाय । • किसी हेमाचार्यके समागमसे कुमारपालके पुरोहितका विद्वेष । १३९) वादमें सूरिको वहाँ आते जाते देख और राजाको उनके गुणका गान करते देख, निरोध भानसे पुरोहित आलिग ने कहा- १८२ विश्वामित्र, पराशर आदि तथा अन्य ऋपिगण, जो केवल जल और पत्ता खा कर रहते थे, वे भी स्त्रीके सुदर मुखकमलको देख कर मोहित हो गये, तो फिर जो मनुष्य घी, दूध और दहीका आहार करते रहते हैं उनका इन्द्रियनिग्रह कैसा हो सकता है! अहो, यह इनका दम्भ तो देखिये । उसके ऐसा कहने पर हे म च द्र ने कहा- १८३ हाथी और सूअरका मास खाने वाला ऐसा जो वलवान् सिंह है वह, सुना जाता है कि वर्षमें केवल एक ही वक रति करता है, पर कर्कश शिलाकणको खाने वाला कबूतर रोज रोज कामी बना रहता है ! इसमें क्या कारण है, सो तो बताओ।' उसका मुँह बद कर देने वाले इस प्रत्युत्तरके वाद ही किसी [ और ] मत्सरीने कहा, कि ये श्वेताबर तो सूर्यको भी नहीं मानते | उसके ऐसा कहने पर- १८१ लोकको धारण करने वाले सूर्यको [वास्तवमें ] हमी लोग हृदयमें धारण करते हैं। क्यों कि उसको अस्तगमन रूप सकट उपस्थित होने पर [हम तो] अन्न-जल भी छोड़ देते हैं । इस प्रमाणकी निपुणताके आधार पर, हमी लोग वस्तुत सूर्यभक्त हैं, ये नहीं [ यह सिद्ध कर दिया] । इससे उसका मुँह बन्द हो गया। फिर एक बार देवतावसर ( देवपूजाकी समाप्ति ) हो जाने पर, मोहान्धकारको नष्ट करनेमें चद्रमाके समान श्री हेमचद्र के आने पर यशश्च द्र गणिने रजोहरणके द्वारा आसन पट्टको साफ कर वहाँ कम्बल बिछाया, तो राजाने [उसका ] तत्व न समझते हुए पूछा कि क्या बात है।' उन्होंने कहा- 'कदाचित् यहाँ कोई जन्तु हो, इस लिये उसको हटा देनेके लिये यह प्रयत्न होता है।' राजाने इस पर यह युक्ति-युक्त बात कही कि-'यदि प्रत्यक्ष कोई जतु देखा जाय तो ऐसा करना उचित है, न कि यों ही वृथा प्रयास करना ठीक होता है।' इस पर उन सूरिने कहा आप क्या [अपनी ] हाथी घोड़की सेनाको शत्रु राजाके चढ़ आने पर ही तैय्यार करते हैं, या पहले भी' जैसे वह राजव्यवहार है वैसे ही यह धर्म व्यवहार है। उनके इस प्रकारके गुणोंसे हृदयमें रजित हो कर राजा, अपनी पहले की हुई प्रतिज्ञाके .
१०० ] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश अनुसार, उन्हें अपना राज्य देने लगा, तो उन्होंने सर्व शास्त्रका विरोधहेतु बतलाते हुए उसका अस्वीकार किया। क्यों कि कहा है कि १८५. हे युधिष्ठिर, जैसे जले हुए बीजका पुनः उद्गम नहीं होता वैसे राज-प्रतिग्रहसे ( राजाके दिये हुए दानसे ) दग्व हुए ब्राह्मणोंका [ फिर ब्राह्मण कुलमें ] पुनर्जन्म नहीं होता। यह पुराणमें कहा गया है । उसी प्रकार जैन शास्त्र भी [ कहते हैं ] - 'गृहस्थके यहाँ भिक्षा मिलती हो तो फिर 'राजपिण्ड' ( राजाके दान ) की इच्छा क्यों करनी चाहिए। इस प्रकार [ प्रभु हे म चन्द्राचार्य का कहा हुआ सुन कर ] उक्त विषयके ज्ञानसे चित्तमें चमत्कृत हुआ और वह पत्त न पहुंचा। - , कुमारपालका सोमेश्वर तीर्थके जीर्णोद्धारका प्रारंभ करवाना। १४०) एक बार, राजाने मुनिसे पूछा- 'क्या किसी तरह मेरा भी यशका प्रसार कल्पान्त-स्थायी हो सकता है ?' उसकी इस बातको सुन कर उन्होंने कहा- [यह दो तरहसे हो सकता है -] या तो विक्रमादित्य के समान संसारको अनृण करनेसे, या सो मेश्वर का काष्ठमय मंदिर, जो समुद्रके पानीकी छाटोसे शीर्णप्राय हो गया है, उसका उद्धार करनेसे कीर्ति युगान्त तक स्थायी हो सकती है।' इस प्रकार चन्द्रमाकी चाँदनीकी भाँति श्री हे म चंद्र की वाणी सुन कर उल्लसित आनंदके समुद्रसे उस राजाने उसी महर्पिको पिता, गुरु और देवता मानते हुए और विजातीय अन्य ब्राह्मणोंकी निंदा करते हुए, प्रासादके उद्धारके लिये, उसी समय ज्योतिपीसे शुभ लग्न ले कर, पञ्चकुलको वहाँ भेजा और प्रासादके उद्धारका आरंभ कराया । पूछा कि- कुमारपालका उदयनसे मंत्री हेमचन्द्राचार्यका जीवनवृत्तान्त पूछना। १४१) एक दूसरी वार, श्री हे म चंद्र के लोकोत्तर गुणोंसे हुत-हृदय हो कर राजाने मंत्री उदयन से इस प्रकारका यह पुरुष-रत्न, सकल वंशोंके भूपणरूप ऐसे किस वंशमें, समस्त पुण्यके प्रवेशवाले किस देशमे और सब गुणोंके आकर समान किस नगरमें पैदा हुआ है ? ' राजाके इस आदेश पर उस मंत्रीने जन्मसे आरंभ करके उनका पवित्र चरित्र इस प्रकार कह सुनाया-'अर्धाष्ट म नामक देशके धुन्धु का नामक नगरमें मोढ वंश के चाचि ग नामक व्यवहारीकी, सतियोंमें श्रेष्ठ और जैनधर्मकी शासन देवता समान साक्षात् लक्ष्मी जैसी पाहि णि नामक सहधर्मचारिणीके ये पुत्र हैं। चामुण्डा नामक गोत्र देवीके आद्याक्षरके नाम पर चांगदेव इनका नाम रखा गया था। इनकी अवस्था जब आठ वर्षकी थी, उस समय [ इनके गुरु ] श्री देव चन्द्रा चार्य पत्तन से तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान कर धुन्धु क क गांवमें गये । वहाँ मोढ व स हि का में देवको नमस्कार करने जब गये तो यह लड़का समवयस्क बालकोंके साथ खेलता हुआ, अचानक सिंहासनके पास रखी हुई उन आचार्यकी गद्दी पर जा बैठा । इस बालकके अंग-प्रत्यंगमें संसारसे विलक्षण लक्षणोंको देख कर उन्होंने (दे व चन्द्रा चार्य ने) कहा यह यदि क्षत्रिय कुलमें पैदा हुआ है तो सार्वभौम चक्रवर्ती होगा, यदि वणिक् या ब्राह्मण कुलमें पैदा हुआ होगा तो महामंत्री होगा और यदि दर्शन (संप्रदाय = धर्ममत) का स्वीकार करेगा तो युग-प्रधानकी नाई कलि-कालमें भी सत्ययुग ले आयेगा'। आचार्यने यह सोच कर, उसको प्राप्त करनेकी इच्छासे उस नगरके रहने वाले व्यवहारियोंको साथ ले, वे चा चि ग के घर गये । वह उस समय अन्य ग्राममें गया हुआ था। उसकी विवेकवती पत्नीने स्वागत-सत्कारसे उन्हे सन्तुष्ट किया। उनके यह कहने पर कि-श्रीसंघ (गाँवका मुख्य श्रावक समूह ) तुम्हारे पुत्रको माँगने यहाँ आया है।' उसने हर्षके आँसू .
. प्रकरण १४०-१४२ ] कुमारपालादि प्रवन्ध [१०१ बहा कर अपनेको रत्नगर्भा माना । तीर्थंकरोंको भी माननीय ऐसा सघ मेरे पुत्रको माँग रहा है, यह वडे हर्पकी बात है, फिर भी मुझे विषाद होता है । क्यों कि इसका पिता नितात मिथ्या-दृष्टि (जैन धर्ममें अश्रद्धाल) है और वैसा हो कर भी वह इस समय गाँवमें नहीं है । उन व्यवहारियोंने कहा कि [ उसका कुछ विचार न कर इस पुत्रको ] तुम दे दो। उनके ऐसा कहने पर, माताने अपना दोष उतार देनेकी इच्छासे, दाक्षिण्यके वश हो कर अमात्र-गुणपात्र ऐमे अपने उस पुत्रको उन गुरुको दे दिया। तदनन्तर उस (माँ) ने जाना कि उन (आचार्य) का नाम देव चन्द्र सूरि हैं। गुरुने उस बालकसे पूछा कि-'तुम शिष्य बनोगे" तो उसने 'हाँ' ऐसा कहा और वह लौटते हुए गुरुके साथ चल पड़ा। वहाँसे वे कर्णा व ती शहरमें आये। वहाँ पर उदयन मत्रीके पुत्रोंके साथ वह वालक पालकों द्वारा पाला जाने लगा । इतनेमें बाहर गाँवसे आये हुए चा चिगने वह सारा वृत्तान्त सुना तो, जब तक पुत्रका मुँह न देखने मिले तब तक, अन्नका त्याग कर उन गुरुका नाम पूछता हुआ कर्णाचतो पहुँचा | आचार्यके वसतिस्थानमें जा कर उस कुपित पिताने कुछ थोडासा प्रणाम किया । गुरुने पुत्रके अनुहारेसे उसे पहचान लिया, और फिर पिचक्षणताके साथ विविध प्रकारके सत्कारोंसे उमे आर्जित कर, उदयन मत्रीको यहाँ बुलाया। धर्मवधु कह कर वह उसे अपने भरनमें ले गया और बड़े भाईकी तरह भक्तिपूर्वक उसे मोजन कराया। फिर चाग दे व नामक उस लडकेको उसकी गोदमें रख कर पञ्चाङ्ग पुरस्कारके साथ तीन दुकूल (बहुमूल्य वस्त्र) और तीन लाख रोकड द्रव्य मक्तिके साथ भेंट किया। उस (उदयन) से चा चि ग ने कहा एक क्षत्रियके मूल्यमें १ हजार अस्सी, घोड़ेके मूल्यमें १७५०, और अयन्त मामूली भी बनियेके मूल्यमें ९९ हाथी, अर्थात् ९९ लाख होते हैं। तुम तो तीन लाख दे कर उदारताके वहाने कृपणता बता रहे हो । पर मेरा पुत्र तो अमूल्य है ओर उस पर तुम्हारी भक्ति अमूल्यतम है । सो इसके मूल्यमें वह भक्ति ही मुझे बस है। द्रव्यसचय मेरे लिये शिवनिर्माल्यकी भाँति अस्पृश्य है।' चा चिग के इस प्रकार कहने पर अत्यत आनन्दित चित्तसे उत्कठित हो कर उस मत्रीने आलिंगन करके उसे धन्यवाद दिया, और फिर बोला कि-'अपने पुत्रको मुझे समर्पित करनेसे तो, यह बालक मदाड़ीके वानरकी नाई सब लोगोंको नमस्कार करता रहेगा और केवल अपमानका पात्र बनेगा। परतु, गुर महाराजको दे देने पर बालचद्रमाकी भाँति त्रिलोकके नमस्कार योग्य होगा। अत यथा-उचित विचार करके कहो।' ऐसा आदेश पा कर कि आपका जो विचार हो वही मुझे मान्य है।' ऐसा कहने पर उसको वह मत्री गुरुके पास और उसने पुत्रको गुरुको समर्पित कर दिया। फिर तो चाचि गने स्वय उसके प्रबजित होनेका उत्सव किया । बादमें [वह बालक ] अप्रतिम प्रतिभायुक्त होनेके कारण, अगस्त्यकी नाई समस्त वामय रूप समुद्रको चुन्में रख कर पी गया। समस्त विद्यास्थानोंका अभ्यास कर गुरुके दिये हुए 'हे म चद्र' नामसे प्रसिद्ध हुआ। सकल सिद्धान्त और उपनिपत्का पारगामी और छत्तीस ही सूरिगुणोंसे अलकृत समझ कर गुरुने उसे सूरि पद पर अभिषिक्त किया ।' इस प्रकार उदयन मत्री की कही हुई हे मा चार्य के जन्मादिकी यह प्रवृत्ति सुन कर राजा वड़ा प्रसन्न हुआ। कुमारपालका सोमेश्वरके उद्धारकी समाप्तिके निमित्त नियम लेना । १४२) फिर श्री सोमनाथ देव के प्रासादके आरमके लिये जब दृढ शिलाका आरोपण हो गया तो राजाने श्री हे मचद्र गुरुको पचकुलकी भेजी हुई वर्धापना ( वधाई) की विज्ञप्ति दिखाते हुए कहा कि- प्रासादारभ किस प्रकार निर्विघ्नरूपसे समान हो [ सो उपाय बताइए] ' । राजाके कहने पर श्री गुरुने कुछ विचार कर कहा कि-' इस धर्मकार्यमें कोई विघ्न न उत्पन्न हो उसके लिये दो मेंसे एक काम करना होगा- उसने कहा - गया यह - . १०२ ]] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकारा या तो ध्वजारोप हो तब तक शुद्ध भावसे ब्रह्मचर्य पालन करना या मद्य-मांसका नियम लेना (त्याग करना) ऐसा कहने पर, उनकी बात सुन कर मद्य-मांसके नियमकी अभिलापा करते हुए, उसने शिवके ऊपर जल छोड़ कर उक्त शपथको ग्रहण किया। दो वर्षके बाद, जब कि, उस मंदिरमें कलश और घजका आरोपण कार्य पूरा हुआ, उसने नियमसे मुक्त होनेकी अनुज्ञा पानेके लिये गुरुसे कहा। उन्होंने कहा कि-' अपने इस समुद्धृत कीर्तन (मन्दिर ) के साथ यदि चंद्रचूड (शिव ) के दर्शन करनेकी इच्छा हो तो यात्रा करनेके बाद ही नियम छोड़ना उचित होगा।' ऐसा कह कर मुनिवर हे म चंद्र वहांसे चले गये । उनके गुणोंसे नीलीके रंगकी भाँति दृढरूपसे हृदयमें अनुरक्त हो कर वह राजा सभामें केवल उन्हींकी प्रशंसा करने लगा। * - हेमचन्द्राचार्यका सोमेश्वरकी यात्रा निमित्त कुमारपालके साथ जाना । तब, निष्कारण वैरी ऐसा कोई परिजन उनके तेजःपुञ्जको न सह कर, इस मसलके अनुसार कि- १८६. उज्ज्वल गुणवालेको अभ्युदित होता देख कर क्षुद्र मनुष्य किसी तरह उसे नहीं सहन कर सकता । जैसे पतिंगा अपने शरीरको जला कर भी दीप्त दीपशिखाको वुझा देना चाहता है। पीठका मांस भक्षण करनेके दोपको अंगीकार करके (पीठ पीछे चुगली ग्वा करके) भी उनका अपवाद करने लगा कि- ' यह बड़ा चालाक, हां जी हां करने वाला और सेवाधर्म कुशल है, जो केवल महाराजकी मरजीकी ही बात कहता रहता है । यदि ऐसा नहीं है, तो प्रातःकाल आप सो मेश्वर की यात्रामें साथ चलनेको उससे कहें। आपके ऐसा कहने पर वह परधर्मके तीर्थका परिहार करके किसी कारण वहाँ नहीं आवेगा। और हम लोगोंका मत ही प्रमाणभूत मालूम देगा।' राजाने उसकी बातका स्वीकार करके प्रातःकाल जब, श्री हेम चंद्रा चार्य आये तो, सोमेश्वर की यात्रामे साथ चलनेके लिये उनसे अभ्यर्थना की। इस पर श्री सूरि बोले कि 'बुभुक्षित (भूखे) के लिये निमंत्रणकी क्या जरूरत है] और उत्कंठितके लिये केकारवके श्रवणके कहनेकी क्या आवश्यकता है- इस कहावतके अनुसार उन तपस्वियोंके लिये, जिनका तीर्थयात्रा करना तो एक अधिकारसा धर्म है, उन्हें राजाके आग्रहका क्या प्रयोजन ?' इस तरह जब गुरुने अंगीकार किया, तो राजाने कहा कि- 'आपके लिये पालकी आदि क्या सवारी दी जाय ? ' गुरुने कहा कि- 'हम लोग पांवोंसे चल कर ही पुण्य प्राप्त करते है । किन्तु हम थोडे थोडे चल कर श्री शत्रुज य, उजयंत (गिरनार ) आदि तीर्थीको नमस्कार करते हुए आपसे [सोमनाथ] पत्त न में प्रवेश करनेके समय आ मिलेंगे।' ऐसा कह कर उन्होने वैसा ही किया। राजा अपनी सारी राज्यऋद्धिके साथ प्रस्थान कर कुछ पडावोंके वाद पत्त न को पहुँचा । वहाँ श्री हेम चन्द्र मुनीन्द्र भी आ मिले जिससे वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ । गण्ड० श्री वृहस्पति ने सम्मुख आ कर अगवानी की और महोत्सवके साथ उनको नगरमें प्रवेश कराया । श्री सोम नाथ के प्रासादकी सीढ़ियों पर चढ़ कर, जमीन पर लेट कर उसे प्रणाम करनेके बाद, चिरकालसे दर्शनकी उत्कट आकांक्षाके कारण सो मेश्वर के लिंगका गाढ़ आलिंगन किया । हेमाचार्यका शिवकी पूजा-स्तुति करना। जैनधर्मसे द्वेष रखने वालोंके मुँहसे यह कथन सुन कर कि 'ये जिन देवके अतिरिक्त अन्य देवताओंको नमस्कार नहीं करते ' भ्रान्त चित्त वाले राजाने हे म चन्द्र से यह बात कही कि-' यदि योग्य मालूम दे तो इन मनोहर उपहारोंसे आप श्री सो मे श्वर देवकी पूजा करें।' ' अच्छी बात है' ऐसा कह करके उन्होने शीघ्र ही राजाके कोशसे आये कमनीय अलंकारोंसे अलंकृत हो कर, राजाकी आज्ञासे श्री बृहस्पति द्वारा हाथका सहारा- .
प्रकरण १४२ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [१०३ पा कर [ मूल ] प्रासादकी चौकट पर चढ़ गये। मनमें कुछ सोच कर प्रकाशमें बोले कि- इस प्रासादमें साक्षात् कैलासवासी महादेव रहते हैं, इस लिये रोमाचकटकित शरीरको धारण करते हुए, उपहारको दूना कर दिया -जाय!' ऐसा आदेश करके शिव पुराण में कहे हुए दीक्षा-विधिके अनुसार आव्हान - अपगुठन-मुद्रा-मत्रन्यास- निसर्जन आदि स्वरूप, पचोपचार विधिसे शिपकी पूजा की । अन्तमें इस प्रकार स्तुति की- १८७ जिस किसी धर्ममतमें, जिस किसी नाममे, तुम जो कोई भी हो, लेकिन दोप और कलुषतासे रहित ऐसे तुम एक ही भगवान् हो और इस लिये हे भगवन् ! तुम्हें नमस्कार है। १८८ पुनर्ज मके अकुरको पैदा करनेवाले राग आदि जिसके नष्ट हो गये हैं वह ब्रह्मा हो, विष्णु हो या शिव हो-उसे हमारा नमस्कार है । इत्यादि स्तुतियाँ करते हुए, सब राजपुरुषों के साथ निस्मययुक्त हो कर राजाके देखते रहने पर, हे मा चार्य दण्डवत् प्रणाम करके स्थित हुए। फिर वृहस्पति की बतलाई हुई पूजाविधिके अनुसार सामिलाप भावसे राजाने शिवका पूजन किया। इसके अनन्तर धर्मशिलामें बैठ कर तुलापुरुषदान, गजदान आदि महादान दे करके कर्पूरकी आरती उतारी। कुमारपालकी तत्त्वजिज्ञासा और हेमाचार्यका शिवको प्रत्यक्ष करना। फिर सभी राजपुरुषोंको हटा कर, शिवके गर्भगृहके अन्दर प्रवेश करके राजा बोला कि-'न महादेनके समान देव है, न मेरे समान राजा है और न आपके समान महर्षि । भाग्यवश इन तीनोंका सहज सयोग हुआ है। इस लिये, नाना दर्शनोंके भिन्न भिन्न प्रमाणोंके कारण जिस देवतत्वके वारेमें चित्त सदिग्ध हो रहा है, उस मुक्तिदायक सच्चे देवका वास्तविक स्वरूप, इस तीर्थभूमिमें आप सत्य सत्य रूपसे मुझे वताइये । ' यह सुन कर श्री हेम च द्र ने बुद्धिसे कुछ सोच कर राजासे कहा इन दर्शनोंके पुराने कयनोंको छोड दीजिए । मैं श्री सोमेश्वर देवको ही आपके प्रत्यक्ष कर देता हूँ। उन्हींके मुखसे मुक्तिमार्ग क्या है सो जान लीजिये । यह वाक्य सुन कर बोला- 'क्या यह भी सभव है।' इस तरह राजाके विस्मित होने पर [सूरिने कहा ]- 'निश्चय ही यहाँ पर तिरोहित भारसे दैवत वर्तमान है । और हम दोनों गुरुके कथनके अनुसार इनके निश्चल आराधक हैं । तो फिर इस प्रकार, इस द्वन्द्वके सिद्ध होनेके कारण देवताका प्रादुर्भाव होना सरल है । मैं प्रणिधान (ध्यान ) करता हूँ और आप कृष्ण अगुरुका उत्क्षेप (धूप) करें । ओर वह उत्क्षेप तब बन्द करियेगा, जन प्रत्यक्ष शिव आ कर निषेध करें ।' इसके बाद दोनोंके इस प्रकार करने पर जब गर्भगृह धुएसे भर कर अन्धकारमय हो गया और नक्षत्रमालाके समान उज्ज्वल प्रदीप्त दीपक जब बुझ गये, तो फिर अकस्मात् , जैसे मानों बारहों सूर्यका तेज फैल रहा हो ऐसा प्रकाश दिखाई देने लगा। उसे देख कर सभ्रमश राजा अपनी आँखें मलता हुआ देखने लगा तो, जलाधारके ऊपर श्रेष्ठ जवूनद (सुवर्ण) के समान धुतिगाले, चक्षुसे दुरालोक्य, अपरूप असमन स्वरूपराले एक तपस्वी दिखाई दिये । उसको पैरके अँगूठेसे ले कर जटा-जूट तक स्पर्श करके देवताका अवतार निश्चित किया और पचानसे पृथ्वीतल पर लठित हो कर प्रणाम करके भक्तिसे राजाने विज्ञप्ति की कि- जगदीश ! आपका दर्शन करके आँखें कृतार्थ हुई, अब आदेशका प्रसाद कर फर्णयुगलको कृतार्थ करो।' ऐसा कह कर राजाके चुप हो जाने पर, मोहरात्रिके लिये सूर्य स्वरूप उनके मुखसे, यह दिव्य वाणी प्रकट हुई -'राजन् ! यह महर्षि सब देवताके अवतार हैं । पूर्ण परब्रह्मके अवलोकनसे, करतलमें रहे हुए मुक्ताफलकी तरह इन्हें त्रिकालका स्वरूप विज्ञात हैं । इस लिये इनका बताया हुआ मुक्तिमार्ग ही असदिग्व मुक्तिमार्ग है।' ऐसा कह कर शिर जब अतर्धान हो गये तो, प्राणायाम परनका रेचन कर और आसन बधको शिथिल करके ज्यों ही.श्री हेम च द्रने राजन् !' यह शन्द कहा, तो तत्काल इष्ट , - १०४ ] प्रवन्धचिन्तामाणि [चतुर्थ प्रकाश . देवताके संकेतसे राज्याभिमानको छोड़ कर उसने कहा 'जीव ! पधारिये !' इस प्रकार विनयसे सिर नंवाता हुआ हाथ जोड़ कर बोला कि 'जो आज्ञा हो सो कहिये।' इसके बाद वहीं पर उसे यावज्जीवन मद्य-मांसके त्यागका नियम दिया और वहाँसे लौट कर वे दोनों क्षमापति (मुनि तो क्षमा क्षान्तिके पति, राजा क्षमा=. पृथ्वीके पति ) अण हि ल्ल पुर आये। , कुमारपालका परमाईत श्रावक बनना । १४३) श्री जिनमुखसे निःसृत पवित्र वचनोंके श्रवण द्वारा प्रतिवुद्ध हो कर राजाने ‘पर माह त' विरुदको धारण किया। उससे अभ्यर्थित हो कर प्रभु (हे म चं द्र) ने 'त्रि पष्टि श ला का पुरुष चरित" तथा वीस वीतराग-स्तु ति याँ' से युक्त पवित्र 'यो ग शास्त्र' की रचना की। उनका आदेश पा कर अपने आज्ञानुवर्ती अठारह देशोंमे, चौदह वर्ष तक, सर्व प्रकारकी जीव-हत्याका निवारण किया । [१२३] सतत आकाशमे विचरण करने वाले सप्तर्षिगण एक मृगीको भी व्याधोके पाशसे मुक्त नहीं कर सके । परन्तु प्रभु श्री हे म सूरि अकेलेने ही चिरकाल तक पृथ्वी पर जीववव होनेका निषेध कर दिया। [१२४ ] [ आकाश स्थित ] कलाकलाप पूर्ण ऐसे चन्द्रमासे [ पृथ्वी स्थित ] हे म चन्द्र सूरि अधिक उज्ज्वलकीर्ति हैं । क्यों कि, चन्द्रमाने तो केवल एक ही मृगका [ अपनी गोदमें ले कर ] रक्षण किया है जब हे म चन्द्र ने तो सब ही मृगोंका ( सारे पशुगणका ) रक्षण किया है । राजाने उन उन देशोंमे १४४० नये विहार (जैन मन्दिर ) बनवाये । सम्यक्त्व मूलक १२ व्रतोंको अंगीकार किया । अदत्तादान - विरमण- स्वरूप तीसरे व्रतकी व्याख्या सुन कर रुदती ( रोती हुई विधवा नारियोंके ) धनका ग्रहण पापोंका कारण है ऐसा समझ कर, उस कामके अधिकारी पंचकुलों (कर्मचारी गण ) को बुला कर उसके आयपट्टको, जिसका [ वार्षिक ] प्रमाण ७२ लाख था, फाड़ कर, उस करको बन्द कर दिया । उस करके छोड़ देने पर विद्वानोने इस प्रकार स्तुति की- १८९. जिस रुदतीवित्तको, कृतयुगमे पैदा होने वाले रघु-नहुष-नाभाग-भरत आदि जैसे राजा लोग भी छोड नहीं सके, उसे करुणावश हो कर मुक्त करने वाले कुमार पाल ! तुम महापुरुषोंके मुकुट-मणि हो। प्रभु हे म सूरि ने भी इस तरह राजाका अनुमोदन किया कि- १९०. अपुत्र पुरुषोंका धन ग्रहण करके [ अन्य ] राजा तो पुत्र होता है । किन्तु सन्तोषपूर्वक उसका त्याग करने वाले तुम तो सचमुच राज-पितामह हो । , * मंत्री उदयनका सौराष्ट्रके युद्ध में मारा जाना । १४५) फिर, सु राष्ट्र देश के स उंस र [ ठाकुर ] से युद्ध करनेके लिये उद य न मंत्री को दलका नायक बना कर सारी सेनाके साथ भेजा गया । वह वर्द्ध मा न पुर (आधुनिक वं ढ वाण) मे पहुँच कर [नजदीकहीमें रहे हुए शत्रुज य पहाड पर ] श्री युगादिदेवको नमस्कार करनेकी इच्छासे, समस्त मंडले- श्वरोंको आगे चलनेकी अभ्यर्थना कर, खुद विमल गिरि (शत्रुज य ) आया। विशुद्ध श्रद्धाके साथ देव- चरणोंकी पूजा करके ज्यों ही विधिपूर्वक चैत्यवंदना करने लगा, त्यों ही एक मूषक (चूहा ) नक्षत्रमालासी प्रदीप्त दीपमालामेंसे एक दीपवर्तिका ( दियेकी जलती हुई बाट) को ले कर काठके बने उस प्रासादके किसी बिलमें प्रवेश करने लगा, तो देवके अंगरक्षकोंने उसे छुडाया। इसे देख कर उस मंत्रीका समाधिभंग हो गया.
प्रकरण १४३-१४५] कुमारपालादि प्रबन्य [१०५ और इस प्रकार उस काष्ठमय देवप्रासादका कभी विध्वस होना सोच कर उसने उस मदिरका जीर्णोद्धार करवाना चाहा । इस इच्छासे देवके सामने ही एकमक (एकाशन करने) आदिके नियम ग्रहण किये । फिर वहाँसे प्रयाण करके अपने पड़ार पर आया । उस प्रत्यर्थी (शत्रु) के साथ युद्ध शुरू होने पर शत्रुद्वारा राजाकी सेनाका पराजित होना देख कर उ द य न स्वय युद्धके लिये उठा । वह प्रहारोसे जर्जरशरीर हो गया तो फिर निवासमें ले आया गया । [जीवनान्त समीप जान कर वह ] सकरुण स्वरसे रोने लगा । स्वजनोंने इसका कारण पूछा, तो उसने कहा कि, मृत्यु निकट आ गया है और शत्रुञ्ज य और शकुनि का विहार के जीर्णो- द्धारकी इच्छाका देवठण पीठ पर लगा रह गया । इस पर उन्होंने कहा 'आपके वाग्भट और आम्र भट नामक दोनों पुत्र अभिग्रह ले कर तीर्थोद्दार करेंगे । हम लोग इसके लिये प्रतिभू (जामीन ) बनते हैं।' उनके इस प्रकार अगीकार करनेसे अपनेको धन्य समझता हुआ वह मत्री अन्त्याराधनाके लिये किसी चारित्र- धारीको खोजने लगा । वहाँ पर कोई चारित्री न मिलनेसे किसी एक नौकरको साधुरेपमें ले आ कर उसको निवेदित करने पर, मत्री उसके चरणोंको ललाटमे स्पर्श करता हुआ, उसीके सामने दस प्रकारकी आराधना करके वह श्रीमान् उदयन परलोक प्राप्त हुआ। पीछेमे, चदन वृक्षके परिमलसे नासित क्षुद्र वृक्षकी नाई उस वठ (नौकर )ने अनशन व्रत ले कर रैवतक पर्वत पर अपने जीवनका अन्त कर दिया। मत्री याडका शत्रुजयतीर्थोद्धार कराना । १४५) तत्पश्चात्, अण हिल पुर पहुँच कर उन सजनोंने यह बात वाग्भट और आम्र भट को सुनाई। उन्होंने वैसा ही नियम ग्रहण करके जीर्णोद्धारका कार्य आरभ किया । दो वर्षमें श्री शत्रु ज य का वह प्रासाद उन कर तैयार हुआ और उसकी खबर देनेके लिये आये हुए मनुष्यके बनाई देने बाद ही दूसरा मनुष्य आया जिसने कहा कि 'प्रासाद तो फट गया है ! ' तपे हुए सासके जैसी उसकी वाणीको कानोंमें सुन कर श्री कुमार पाल भूपालसे आज्ञा ले कर मत्री स्वय वहा जानेको उद्यत हुआ। श्रीकरणकी जो अपनी मुद्रा (मत्रीके पदकी मुहर) थी वह मह कपर्दी को समर्पित की और स्वय ४ सहस्र घोड़े ले कर शत्रुज य की उप- त्यकामें पहुँचा । यहाँ अपने नामसे बा हड पुर नामका नया नगर वसाया। शिल्पियोंने प्रासादके फट जानेका कारण बताते हुए कहा कि सभ्रम प्रासादमें परन घुस कर निकलता नहीं, इस लिये मन्दिर फट जाता है, और जो प्रासाद भ्रमहीन बनाया जाय तो बनाने वाला निश हो जाता है [ ऐसा शास्त्रका विधान है ] 1 मत्रीने यह सुन कर ऐसा विचार किया कि निरंश होना अच्छा है । इमसे धर्म कार्य ही हमारा वश होगा और पूर्व कालमें जीर्णोद्धार कराने वाले भरत आदिकी पक्किमें हमारा भी नाम उल्लिखित होगा। इस प्रकार अपनी दीर्घदर्शिनी बुद्धिसे सोच कर उस मत्रीने भ्रम और दीपालके बीचमें पत्यर भरवा दिये और प्रासादको निर्धम वनवाया। तीन वर्षमें प्रासाद पूरा हुआ । उसके कलश दण्ड आदिको प्रतिष्ठाके समय पत्तन के सघको निमनित किया और महामहोत्सबके साथ स० १२११ में मनीने घजारोपण कराया। पापाणमय बिंब (मूर्ति) का परिकर मम्मा णी की खानोंके किंमती पत्थरका बनवा कर स्थापित किया । श्री वा हडपुर में राजाके पिताके नामसे श्री त्रिभुवन पाल विहार बनपा कर उसमें पार्श्वनाथकी स्थापना कराई। तीर्थपूजाके लिये नगरके चारों और २४ बागीचे बनाये, नगरका पका कोट बनवाया और देवके पूजारियोंके पास और वास आदिकी व्यवस्था कर, वह सब कार्य पूरा किया । इस तीर्थोद्धारके व्ययमें [ यह बात प्रसिद्ध है कि ]- १९१ जिसके, मदिर बनानेमें १ करोड ६० लाख व्यय हुआ है, विद्वान् लोग उस श्री वाग्म टदेव की [ पूरी] वर्णना कैसे करें। इस प्रकार शत्रुञ्जयके उद्धारका यह प्रवध समाप्त हुआ। २७-२८ १०६ ] प्रवन्धचिन्तामणि [चतुर्थ प्रकाश मंत्री आम्रभटका शकुनिका विहारका उद्धार करवाना। १४६) इसके बाद, समस्त विश्वके एक अद्वितीय ऐसे सुभट आम्र भट ने पिताके कल्याणार्थ भृगुपुर (भ रूच) में शकुनि का विहार प्रासादके उद्धारका कार्य प्रारंभ किया। उसके लिये गहरी नींव खोदते समय, नर्मदा नदी के निकट होनेके कारण अकस्मात् वह नीव धंस पड़ी और काम करने वाले मजदूर उसमें दव गये । उसने यह देख, कृपा-परवश हो कर, अपनी अत्यन्त निन्दा करते हुए, उसीमें अपने आपको भी गिरा दिया । इस अनुपम साहसके प्रभावसे वह विघ्न शान्त हो गया (सब लोक बच गये )। इसके बाद, शिलान्यासपूर्वक सारा प्रासाद तीन वर्षमें पूरा हुआ। कलश-दण्डकी प्रतिष्ठाका अवसर आने पर समस्त नगरोंके संघोंको निमंत्रण दे कर बुलाया गया और उन सबको यथोचित वस्त्र और आभरण आदि दे कर सत्कृत किया गया और फिर सबको यथास्थान वापस पहुँचाया गया। लग्न समयके निकट आने पर भट्टारक श्री हे म- चंद्र सूरि के नेतृत्वमें राजाके साथ अ ण हि ल्ल पुर के संघको निमंत्रित कर उसे अतुलित वात्सल्यादि तथा भूपण आदि दानों द्वारा सन्तुष्ट करके, ध्वजाधिरोपणके लिये घरसे चला | इस समय अपने सारे घरको मानों याचक- जनोंसे लुटवा दिया । श्री सुव्रतदेवके प्रासादमें महाध्वजके साथ ध्वजारोपण करके, अत्यधिक हर्पके कारण, वह अनालस्य भावसे नाच करता रहा । अन्तमे राजाकी अभ्यर्थना पर, उसने आरती उतारी । अपना घोड़ा द्वारपालको दान कर दिया । राजाने स्वयं उसको तिलक किया । बहत्तर सामन्त चामर और पुष्प वर्षा आदिसे उत्साह बढ़ा रहे थे। उस समय आये हुए बंदीको अपना कंकण दे दिया । अन्तमें राजाने हाथ पकड़ कर जबर्दस्ती उसे बैठाया और आरती और मंगल प्रदीप उतरवाये । श्री सुव्रतदेवके तथा गुरूके चरणमें प्रणाम करके, बन्धुओंको बन्दना आदि करके, राजासे शीघ्र आरती उतरवानेका कारण पूछा । राजाने कहा- 'कि जैसे जुआडि अत्यधिक द्यूत-रसके आवेशमें अपने सिरको भी दाँव पर रख देता है, वैसे ही तुम भी इसके बाद कहीं अर्थियों के माँगनेसे त्यागके आवेशमें आ कर अपना सिर भी उन्हें न दे डालो। राजाके इस प्रकार कह चुकने पर, उसके लोकोत्तर चरित्रसे हृत-हृदय हो कर श्री हे मा चार्य ने भी, जिन्होंने जन्म झालसे ही किसी मनुष्यकी स्तुति नहीं की थी, कहा- १९२. उस कृतयुगसे [हमे ] क्या [ मतलब ] है जिसमें तुम नहीं थे । और जिसमें तुम [ विद्यमान ] हो वह कलि कैसा। और यदि कलिहीमें तुमारा जन्म होता है तो वह कलि ही सदा रहो कृतसे क्या मतलब है। इस प्रकार आम्र भट की अनुमोदना करके दोनों क्षमापति, जैसे आये थे वैसे ही वापस गये । आम्रभटका शाकिनीग्रस्त होना। १४७) इसके बाद, जब हे म चंद्र अपने स्थान पर पहुंचे तो उन्हें यह विज्ञप्ति मिली कि आकस्मिक रीतिसे देवी (शाकिनी) के दोषसे ग्रस्त हो कर आम्र भ ट की अन्तिम दशा उपस्थित हो गई है और आपको शीघ्र बुलाया गया है। उन्होंने तत्काल ही समझ लिया कि ' वह महामना जब प्रासादके शिखर पर नृत्य कर रहा था उसी समय मिथ्यादृष्टि देवियोंका कुछ दोष उसे हुआ है।' यह सोच कर, सायंकाल ही को तपोधन यशश्चन्द्र को साथ ले, आकाशगामिनी शक्तिसे उड़ कर निमेषमात्रमें, भृगुपुर की प्रान्तभूमिको अलंकृत किया और सैन्ध वा देवी का अनुनय करनेके लिये कायोत्सर्ग किया । उस देवीने जीभ निकाल कर उनका अपमान किया । तब उखलमें शालि - चावल डाल कर यश श्चन्द्र ग णि ने मूशलसे प्रहार करना शुरू किया । पहली वारके प्रहारमें प्रासाद कॉपने लगा, दूसरी बार प्रहार देने पर वह देवी ही अपने स्थानसे उखड़ कर - इस वज- ' प्रकरण १४६-१४९ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [१०७ , पाणिके वनप्रहारसे बचाओ-बचाओ' कहती हुई प्रमुके चरणों पर आ कर गिर गई। इस तरह अपनी अनिन्द्य विद्याके बल पर उस दोपके मूलभूत मिध्यादृष्टिनाले व्यन्तरों (भूत पिशाचों) का निग्रह करके श्री सुव्रतदेवके प्रासादमें आये । वहाँ पर- १९३ ससाररूप समुद्र के लिये सेतु, कल्याण-पथकी यात्राके लिये दीप-शिखा, विश्वके आधारके लिये आलबन यष्टि, परमतके व्यामोहके लिये केतुका उदय, अथवा हमारे मनरूपी हाथियोंके बन्धनके लिये दृढ़ आलान रूप लीलाको धारण करने वाले ऐसे श्री सुव्रतस्वामीके चरणोंकी नख-रश्मियाँ [सबकी] रक्षा करें। इस प्रकारकी स्तुतियोंसे श्री मुनिसुव्रतकी उपासना करके, श्री आश्रम ट को उल्लाघ स्नानसे सुस्थ करके, जैसे गये थे वैसे ही [ अपने स्थान पर ] लौट आये । श्री उदयन चैत्य शकुनि का निहार के घटी गृहमें राजाने को कण नृपति के [ छीने हुए] तीन कलश तीन जगह स्थापित किये । इस प्रकार यह राज-पितामह श्री आम्रभटका प्रवध समाप्त हुआ। . कुमारपालका विद्याध्ययन करना। १४८) इसके बाद, एक दूसरी वार, कपर्दी मत्री का अनुमत कोई विद्वान् , राजा कुमार पाल के भोजन कर लेनेके बाद का मन्द की य नीति शास्त्र के इस श्लोकको पढ़ रहा था- १९४ राजा मेघकी नाई समस्त भूत-मात्रका आधार है । मेघके विफल होने पर भी जीवन धारण किया जा सकता है पर राजाके विकल होने पर नहीं । तब, इस वाक्यको सुन कर राजाने कहा कि-' अहो राजाको मेघकी । ऊपम्या ! ' इस पर सभी सामाजिक लोक राजाका न्युछन करने लगे । पर उस समय कपर्दी मत्री ने अपना सिर नीचा कर लिया। यह देख कर राजाने एकान्तमें उससे [ कारण ] पूछा। उसने कहा महाराजने जो ऊपम्या' शब्दका उच्चारण किया वह सब व्याकरणोंकी दृष्टिसे अपशब्द (अशुद्ध) है, और इस पर भी इन खुशामती अनुपर्तियोंने न्युछन किया। उनके ऐसा करने पर मेरा तो दोनों प्रकार सिर नीचा करना ही समुचित है । शत्रु राजाओंमें इस प्रकारकी अपकीर्ति फैलती है कि अराजक जगत्का होना अच्छा है किन्तु मूर्ख राजाका होना अच्छा नहीं ।' जिस अर्थमें आपने यह शब्द कहा है उस अर्थमें उपमान, उपमेय, औपम्य, उपमा इत्यादि शब्द कहे जाते हैं । उसकी इस बातको [ आदरके साथ ] हृदयमें ग्रहण करके, अनन्तर, ५० वर्षकी उम्रमें, उस राजाने शब्द व्युत्पत्तिका ज्ञान करनेके लिये किसी उपा यायके निकट मात्रिका- पाठसे आरम कर (अआसे ले कर) शास्त्र पढ़ना आरंभ किया और एक वर्षके भीतर [ व्याकरणकी ] तीनों वृत्ति और तीनों काव्य पढ़ डाले । और फिर पण्डितोंसे 'विचार-चतुर्मुख' यह बिरुद प्राप्त किया । इस प्रकार विचारचतुर्मुख कुमारपालके अध्ययनका प्रवध समाप्त हुआ। , बनारसके विश्वेश्वर कविका पत्तनमें आना। १४९) किसी अवसर पर, विश्वेश्वर नामक कवि या राणसी से पत्तन में आ कर प्रमु श्री हे मसूरिकी समामें पहुँचा । वहाँ कुमारपाल राजाको विद्यमान देख कर उसने- १०८ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश १९५. कंबल और दंड वाला यह हेम तुम्हारी रक्षा करें। इस प्रकार कह कर वह ठहर गया। राजाने उसे क्रोधकी दृष्टिसे देखा । तब फिर- जो षड्दर्शन रूप पशुओंको जैन-गोचर (चरागाह ) में चरा रहे हैं। यह उत्तरार्द्ध पढ़ा जिसे सुन कर सारी सभा प्रसन्न हुई। फिर कविने रामचन्द्रादि [ कवियों ] को समस्यायें पूर्ण करनेको दी । 'व्याषिद्धा नयने०' इस चरणवाली एक समस्याकी पूर्ति महामात्य कपर्दीने इस प्रकार की १९६. 'इसकी ये सरल ( बड़ी बड़ी ) आखें दोनों हथेलियोंसे ढांकी नहीं जा सकती, और अपने मुखरूपी चन्द्रमाकी चांदनीके प्रकाशसे यह सब कहीं दिखाई दिया करती है -- इस लिये आँख मिचौनीके खेलमें अपनी चारों ओर रही हुई सखियोंके बीचमें बैठी हुई वह वाला [ खेलनेसे ] रोक दी गई है और इस लिये वह अपने मुख और आँखोंको रो रही है।' [ इस समस्यापूर्तिकी प्रतिभासे प्रसन्न हो कर ] उस कविने पचास हजारकी कीमतका अपने गलेका हार निकाल कर कपर्दी के कण्ठमे यह कहते हुए डाल दिया कि ' यह तो श्रीभारतीका पद ( स्थान ) है ।' उसकी सहृदयतासे चमत्कृत हो कर राजा उसे अपने पास रखने लगा, तो वह यह कह कर, राजा द्वारा सत्कृत हो कर, यथास्थान चला गया कि- १९७. कर्णकी कथा तो अव शेष मात्र रह गई है। काशी न गरी मनुष्योंकी कमीके कारण क्षीणप्राय हो गई है । पूर्व ( या उत्तर ) दिशामें हम्मीर ( म्लेच्छ ) के घोडे सहर्प हिनहिना रहे हैं। इससे यह मेरा हृदय तो अब, सरस्वतीके आलिंगनमे प्रवृत्त क्षारसमुद्र के साथ स्नेहवाले प्रभा स क्षेत्र के लिये उत्कण्ठित हो रहा है। हेमचन्द्रसूरिका समस्या पूरण करना । १५०) किसी समय कुमार विहार देवमन्दिरमें राजा द्वारा आमंत्रित हो कर प्रभु श्री हे म चंद्र, कपर्दी मंत्री द्वारा हाथका सहारा पा कर, जब सोपान पर चढ़ रहे थे [ वहां पर नृत्योद्यत ] नर्तकीके कञ्चककी कसनीको तनती हुई देख कर कपर्दीने यह कहा- १९८. हे सखि तेरा यह कञ्चुक सौभाग्यशाली है इस लिये इसका यह तनना युक्त ही है । यह कह कर उसे जब आगे बोलने में विलंब करते देखा तो प्रभुने उत्तरार्धं इस प्रकार कह दिया- जिसके गुणका ग्रहण पीठपीछे तरुणीजन करता है। - आचार्य और मंत्रीके बीचमें 'हरडइ'का वाग्विलास । १५१) एक बार, सवेरे कपर्दी मंत्री ने श्री सूरिको प्रणाम करनेके बाद [उसके हाथमें कोई चीज देख कर ] उन्होंने पूछा- यह क्या चीज है ?' उसने प्राकृत (देशी) भाषामें कहा-'हरडइ'- अर्थात् 'हरे' । प्रभुने कहा-'क्या अब भी ?'। तब वह अपनी अनाहत प्रतिभा (प्रखर बुद्धि ) के कारण उनके व- चनच्छल (व्यंग्य) को समझ कर बोला-'अब तो नहीं' । क्यों कि अन्तिम होने पर भी वह आदिम हो गया और एक मात्रा अधिक भी हो गया । हर्षाश्रु पूर्ण आँखोंसे प्रभुने राम चंद्र आदिके सामने उसकी चतुराईकी प्रशंसा की। उन्होंने (रामचन्द्रादिने) तत्त्व न समझ कर पूछा कि ' बात क्या है ? ' प्रभुने कहा कि 'हरडइ' इसमें शब्दच्छलसे यह अर्थ लक्ष्य करके निकाला गया कि 'ह रडइ' अर्थात् हकार रोता (गुजराती रडता) प्रकरण १५०-१५४ ] कुमारपालोदि प्रबन्ध [ १०९ है। हमने इस पर कहा कि 'क्या अब भी।' यह कहते ही शब्दतत्त्वको जानने वाले इसने कहा कि 'अब तो नहीं।' क्यों कि पहले मातृका-शास्त्र ( वर्णमाला ) में हकार सबके अतमें पढ़ा जाता था, अतएव वह रडता-रोता था, किन्तु अब तो मेरे नाम ( हे म च द्र) में वह पहले आ गया है और एक मात्रा अधिक भी हो गया है। इस प्रकार यह हरडइ प्रपथ समाप्त हुआ। * उर्वशी शब्दकी व्युत्पत्ति । १५२) एक वार, किसी पडितने पूछा कि 'उर्वशी' शब्दका शफार तालव्य है या दन्त्य । इस पर प्रमु (हे म चद्र) कुछ सोच कर कहने जा रहे थे कि कपर्दी ने पत्र पर यह लिख कर उनके अकमें फेंक दिया कि 'उरी शेते उर्वशी' अर्थात् जो उरुमें शयन करे वह उशी । इसीको प्रामाण्य समझ कर प्रभुने उस पडितके आगे तालव्य शकार होनेका निर्णय कह सुनाया। इस प्रकार यह उर्वशी-शब्द-प्रवध समाप्त हुआ। सपादलक्षके राजाके नामका अर्थखण्डन । १५३) अन्य किसी समय, सपादलक्ष के राजाका कोई सान्धिविग्रहिक कुमार पाल राजाकी सभामें आया। राजाने पूछा कि 'आपके स्वामी कुशल तो हैं !' अपनेको महापडित समझने वाला वह मिथ्याभिमानी चोला 1-'विश्वको जो ले ले वह 'विश्वल' कहलाता है (- यह सपादलक्ष के राजाका नाम था ) । इस लिए उसकी विजयमें क्या सन्देह है।' राजाका इशारा पा कर श्रीमान् कप दीमत्री ने कहा कि- 'श्वल श्वल्ल धातु तो शीघ्र गत्यर्थक है । इसी श्वल धातुसे यह शब्द बना है, अत इसका अर्थ तो यह हुआ कि-गि अर्थात् पक्षीकी भाँति जो श्वलन करता है - भाग जाता है वह ' विश्वल ' है।' इतके बाद, उस प्रधानके द्वारा इस नाममें दोप समझ कर उस राजाने पडितोंके पास निर्णय कराके 'निग्रह राज' ऐसा दूसरा नाम धारण किया। दूसरे वर्ष उसी प्रधानने कुमार पाल नृपतिके सामने 'विग्रह राज' यह नाम बताया। मत्री कप दीने [ यह अर्थ किया]-विम= विगतनासिक-नासिकाहीन, ह-राज अर्थात् रुद्र और नारायण । रुद्र और नारायणको जिसने नासिका हीन किया है यह इस 'विग्रहराज' का अर्थ है। तदनन्तर क पर्दी के नामखण्डनके भयसे उस राजाने 'करि-बान्धव' ऐसा नाम धारण किया । . १५४) एक दूसरी बार, कुमारपाल राजा के आगे योग शास्त्र का व्याख्यान हो रहा था उसमें जब पञ्चदश कर्मादानका पाठ पढा जाने लगा तब " दन्तकेशनखास्थित्वग्रोम्णा ग्रहणमाकरे " प्रमुके रचे हुए इस मूल पाठमें पडित उदय चन्द्र वार बार ' रोम्णा ग्रहणम् रोभ्गा ग्रहणम् ' यह पाठ बोलने लगा। तो प्रमुने पूछा कि- 'क्या लिपि-भेद (अशुद्ध पाठ) हो गया है। उसने कहा-'प्राणितुर्याहाणाम् ' इस व्याकरण सूरसे तो एकत्व सिद्ध होता है, [सो यहाँ पर वैसा होना चाहिए]' ऐसे लक्षणविशेषको बता कर, प्रमु द्वारा प्रशसित हुआ और राजाने न्युउन करके उसकी सममाना की। इस प्रकार प० उदयचद्रका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * ११० ]. प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश , कुमारपालका अभक्ष्यभक्षणके निमित्त प्रायश्चित्त करना। १५५) इसके बाद, वह राज पि एक समय घेवरका भक्षण कर रहा था। उस समय कुछ विचार मनमें आ गया जिससे उसने वह सारा आहार छोड़-छाड़ कर, पवित्र हो कर, अनुसे जा कर पूछा कि- 'हमें घेवरका भक्षण करना चाहिये या नहीं ?' इस पर प्रभुने कहा--' वणिक् और ब्राह्मणको तो इसका भक्षण उचित है किन्तु जिस क्षत्रियने अभक्ष्यभक्षणका नियम किया है उसे नहीं करना चाहिए क्यों कि उससे मांसाहारका स्मरण हो आता है। ' राजाने कहा ' यह बिल्कुल ठीक है ' और फिर पूर्व भक्षित अभक्ष्यका प्रायश्चित्त पूछा । [ आचार्यने कहा- ] ३२ दाँतोंके निमित्त ३२ जैन मंदिर एक पीठस्थान पर बनवा देने चाहिए । राजाने वैसा ही किया। प्रभुके दिये हुए प्रतिष्टालग्नमें प्रासादके मूल नायककी प्रतिष्टा करानेके लिये, व टपद्र कसे कान्हू नामक व्यवहारी पत्त न में आया । उसने उस नगरके मुख्य प्रासादमें अपने वित्रको रख दिया और उपहारादि ले कर बाहरसे जब वापस आया तो राजाके अंगरक्षकोंने द्वार पर उसे रोक दिया । कुछ समय बाद जब द्वारपाल उठ गये और प्रतिष्ठोत्सव भी समाप्त हो गया, तो वह भीतर प्रवेश करके प्रभु (हे म चन्द्र ) के चरण-मूलमें लग कर, उपालंभ पूर्वक, खूब रोने लगा। और किसी तरह उसके दुःखका दूर होना न जान कर वे रंगमंडपसे वाहर आये और नक्षत्र-चार देखने लगे, तो देखा कि उनका दिया हुआ लग्न तो आकाशमें अब उदित हुआ है। खोटी घडीके हिसाबसे ज्योतिपीने जो पहले लग्नमुहूर्त दिया है [वह अशुद्ध है ] और उस लग्नमें प्रतिष्ठित मूर्तियोंकी आयु तीन ही वर्षकी है। अब जो इस समय लग्न वर्तमान है उसमें बिंबकी प्रतिष्ठा होगी वह चिरायु होगा। उसने उसी समय अपने बिंबकी प्रतिष्ठा कराई । प्रभुने जैसा कहा था वैसा ही बादमें हुआ। इस प्रकार अभक्ष्य-भक्षणके प्रायश्चित्तका यह प्रबंध समाप्त हुआ। कुमारपालका अन्यान्य विहारोंका बनवाना। १५६ ) [ राजाने यह स्मरण करके कि ] मेरे अपहृत धनसे एक चूहा [ उस समय ] मर गया था। इस लिये उसका प्रायश्चित्त पूछा तो प्रभुने उसके कल्याणार्थ उसीके नामका एक विहार बनवानेको कहा सो उसने वह [ मूषक विहार ] बनवाया । १५७) इसी प्रकार, किसी व्यवहारीकी उस वधूने, जिसके जाति, नाम, ग्राम, संबंध कुछ भी उसे नहीं मालूम हुए, रास्तेमें तीन दिन तक बुभुक्षित नृपतिको चावलके करंवेसे सन्तुष्ट कर रक्षा की थी, उसकी कृतज्ञताके निमित्त, उसके पुण्यकी अभिवृद्धिके लिये पत्त न में राजाने ' करम्ब क विहार' बनवाया। १५८) इसी तरह, यू का वि हार भी इस प्रकार [बना]-सपाद लक्ष देशमें कोई अविवेकी धनी था। उसकी प्रियाने केश-संमार्जनके अवसर पर उसकी हथेली पर एक यूका (जू) पकड कर रखी । उसने उस पीड़ाकारिणीको तर्जन करके, मसल कर मार डाला । निकटवर्ती अमारिकारी पंचकुल ( जीवहिंसा प्रतिबन्धकी देखभाल करनेवाले अधिकारी ) ने उसे पकड़ कर अण हिल्लपुर में राजाके सामने ले आ कर निवेदित किया। इसके बाद प्रभुके आदेशसे उसके दण्डस्वरूप उसका सर्वस्व ले कर वहीं पर ( उसी गांवमें ? ) यू का विहार बनवाया । इस प्रकार यूका विहारका प्रबंध समाप्त हुआ।
प्रकरण १५५-१६२ ] कुमारपालादि प्रवन्ध [१११ १५९) इसके बाद, स्तम तीर्थ के सामान्य सा लि ग व स हि का नामक प्रासादका, जिसमें प्रभुकी दीक्षा हुई थी, रत्नमय बिंबसे अलकृत कर, अनुपम जीर्णोद्धार कराया । इस प्रकार सालिगवसहिकाके उद्धारका प्रवध समाप्त हुआ। - * , मठपति बृहस्पतिका अविनय । १६०) बादमें, सो मेश्वर पत्तन के कुमार-विहार-प्रासाद में वृहस्पति नामक गण्ड (मठाधिपति), कोई अप्रिय कार्य करनेके कारण, प्रभु (हेमसूरि ) की अप्रसन्नताका पात्र हुआ और वह पदभ्रष्ट किया गया । बादमें, अण हिलपुर में आ कर, पड्विध आवश्यक क्रिया करता हुआ सन्मानका पात्र हो कर प्रमुकी सेना करने लगा। एक बार चातुर्मासिक पारणके समय प्रभुके चरणोंमें द्वादशावर्त वदना करके बोला १९९ हे नाथ, चार मास तक आपके इस चरणयुगके पास बैठ कर कषाय (राग द्वेष रूप क्लेश) का नाश करनेके लिए विकृतिपरिहार (रसपाले अन्नका त्याग) रूप व्रत मैंने किया है । अब, हे मुनितिलक ! आपके चरण कमलने निर्लोठित कर दिया है उद्भेदक कलि जिसका, ऐसे मुझको, पानांसे भागे हुए अन्न ही की वृत्ति मिला करे । वह ऐसी विज्ञप्ति कर रहा था कि उसी समय राजा वहाँ आ गया और उसने प्रभुको प्रसन्न देख कर, उसे पुन अपने पद पर प्रतिष्ठित कर दिया । इस प्रकार यह बृहस्पति प्रवध समाप्त हुआ। * मंत्री आलिगकी स्पष्टवादिता । १६१) एक बार, सर्वापसर (राजसमा ) में बैठे हुए राजाने आलि ग नामक [ वृद्ध ] प्रधान पुरुषसे पूछा कि- 'मैं [गुणादिमें ] सिद्धराज से होन हूँ, अधिक हूँ या समान हूँ।' उसने, किसी प्रकारके उल भावका विचार न करनेकी प्रार्थना करके कहा कि-'श्री सिद्ध राज में ९८ तो गुण थे और दो दोप थे, ओर महाराजमें दो गुण हैं और ९८ दोष हैं ।' उसके ऐसा निवेदन करने पर राजा अपने आपको दोषपूर्ण जान कर, अपने जीवन पर विरक्त हो उठा और आँखोंमें छुरी भोंकना (जीवनका अन्त कर देना) चाहा तो उसके आशयको समझ कर उस वृद्धने कहा कि-'श्री सिद्धराज के जो ९८ गुण थे, वे सप्राममें कायरता और स्त्रीलम्पटताके इन दो दोपोंमें छिप जाते थे । आपके जो कृपणता आदि दोप हैं, वे युद्धमें दिखाई देनेवाली शूरता और परस्त्रीके विषयमें रही हुई सहोदरताके इन दो [ महान् ] गुणोंमें ढक जाते हैं'- उसके इस वचनसे राजा फिर स्वस्थ हुआ। इस प्रकार यह आलिगप्रवध समाप्त हुआ। , प० वामराशिको क्षमा प्रदान करना । १६२) पहले, सिद्धराज के राज्य समयमें, पॉडित्यकी स्पर्दा सामना करने वाला वा म राशि नामक ब्राह्मण, प्रमु (हेमचन्द्र ) की इस विशिष्ट प्रतिष्ठाको सहन न कर [निंदा करते हुए ] बोला कि- २०० जिसके ( शरीर पर) लटकते हुए कम्बलमें करोड़ों यूकाओंकी पक्ति किलबिला रही है, दाँतोंकी मलमढलीकी दुगंधसे जिसका मुंह भरा हुआ है, जिसके नासा-वशके निरोधसे पाठकी प्रतिष्ठा गिनगिनाट कर रही है और जिसके सिरकी टाल पिलपिला रही है वह 'हेमड' नामक ११२ ] प्रवन्धचिन्तामणि [चतुथ प्रकाश सेवड (श्वेताम्बर साधु ) आ रहा इस प्रकारका अत्यधिक निंदास्पद कथन सुन कर, अन्तःकुटिल पर बाहरसे सरल दिखाई देनेवाले तिरस्कार पूर्ण वचनसे प्रभुने कहा कि- 'अरे पंडित ! तुमने क्या यह भी नहीं पढ़ा कि विशेषणका प्रयोग पहले किया जाना चाहिए। अब से 'सेवड हेमड' ऐसा कहना (हेमड-सेवड ) नहों । सेवकोंने [ यह सुन कर ] उसे भालेकी नोकसे घोदा कर छोड़ दिया । राजा कु मार पाल के राज्यमें शस्त्रवध नहीं किया जाता था, इस लिये उसकी वृत्तिका छेद कर दिया गया । इसके बाद, कण-कणकी भीख मांग कर अपना प्राण धारण करता हुआ वह प्रभुकी पौषधशालाके सामने आ कर बैठा । उस समय वहाँ पर अ ना दि भूपति नामक मठके तपस्वियों द्वारा अधीयमान योग शास्त्र का श्रवण करके, उसने फिर सच्चे हृदयसे यह काव्य कहा कि- २०१. जिन अकारण दारुण मनुष्योंके मुंहसे आतंकका कारण ऐसा गाली-रूपी गरल ( विष ) निकला है उन जटा धारण करने वाले फटाधरों (सी) के मंडलका, यह योग शास्त्र का वचनामृत अब उद्धार कर रहा है । ऐसे अमृतके समान मीठे उसके वचनसे, प्रभुका वह उपताप शान्त हुआ और उसकी वृत्ति फिर दुगुनी कर उसे प्रसादित किया। इस प्रकार यह वामराशि-प्रबंध समाप्त हुआ। - * , सोरठके दो चारणॉकी कविताविषयक स्पर्धा । १६३) फिर कभी, एक बार, सुराष्ट्र मंडलके रहने वाले दो चारण, परस्पर दूहा - विद्यामें (दोहा छन्दकी रचना करनेमें ) स्पर्धा करते हुए यह प्रतिज्ञा करके अण हि ल्ल पुर में पहुँचे कि- 'हे म चंद्राचार्य जिसके दोहाकी सराहना करेगे, उसे दूसरा हर्जाना देगा।' फिर उनमेंसे एकने, प्रभुकी सभामें आ कर यह दोहा कहा- २०२. हे हे म सूरि ! मै तुम्हारे मुँह पर वारी जाऊं । लक्ष्मी और वाणी (सरस्वती) का जो सापल्य (वैर ) भाव था वह, इसने नष्ट कर दिया । क्यो कि हे म चंद्र सूरि की सभामें तो जो पण्डित है वे ही लक्ष्मीवान् है। ऐसा कह कर, उसके चुप हो जाने पर, फिर श्री कु मा र विहार में आरतीके अवसर पर राजा जब प्रणाम कर रहा था और प्रभुने उसकी पीठ पर हाथ रखा हुआ था, उसी समय वहाँ प्रवेश करके दूसरे चारणने यह कहा- २०३. हे हे म सूरि ! मै तुम्हारे इस हाथ पर वारी जाऊ-जिसमें अद्भुत ऋद्धि रही हुई है । नीचे नमे हुए जिस मुख ऊपर यह पडता है उसके ऊपर सिद्धि आ वैठती है। इस प्रकारके अनुच्छिष्ट ( मौलिक) भाववाले उसके बचनसे मनमे चमत्कृत हो कर राजा इसी दोहेको बार बार वुलाने लगा । तीन बार बोलने बाद उसने कहा कि क्या एक एक बार बोलने पर एक एक लाख दोगे?'- इस पर राजाने उसे ३ लाख दिलाया । इस प्रकार यह दो चारणोंका प्रबंध समाप्त हुआ।
कि- प्रकरण १६३-१६५] कुमारपालादि प्रवन्ध । [११३ कुमारपालका तीर्थयात्रा करना। १६४) एक बार, राजा श्री कुमार पाल ने सघाधिपति हो कर तीर्थयात्राके लिये महोत्सवपूर्वक संघ निकालना निश्चित किया और उसके देवालयका प्रस्थान-मुहूर्त साधित किया । इतनेमें देशान्तरसे आये हुए चर युगलने कहा कि-'डा ह ल देश का राजा कर्ण आप पर चढ़ाई करके आ रहा है।' [इसको सुन कर] राजाके ललाट देश पर [पसीनेके ] स्वेद विंदु झलकने लगे। सघाधिपत्यके पदको प्रामिका मनोरथ नष्ट हो जानेके भयसे वाग्भट मत्री के साथ आ कर प्रमुफे चरणों पर गिर पड़ा और अपनी निंदा करने लगा। राजाके आगे इस प्रकार महाभयका उपस्थित होना जान कर, प्रभुने कुछ सोच कर कहा कि-' बारह पहरमें ही इस भयकी निवृत्ति हो जायगी [ इस लिये कुछ चिन्ता न करो]। राजा विदा हो कर, कर्तव्यविमूढ़सा बना हुआ ज्यों ही बैठा था त्यों ही निति समय पर आये हुए दूसरे चरयुगलने समाचार दिया कि- श्री कर्ण राज का [ अकस्मात् ] स्वर्गवास हो गया । ' राजाने मुँहसे पानका त्याग करते हुए पूछा- 'सो कैसे।' उन्होंने कहा .' हानीके होदे पर बैठ कर राजा कर्ण रातको प्रयास कर रहा था तन उसकी नींदसे आँखें बन्द हो गई। गले में लटकता हुआ सोनेका हार एक बरगदके दररतको डालीमें उलझ गया और उससे खींचा जा कर राजा मर गया। हम दोनों उसके अग्निमस्कारके अनन्तर वहाँसे चले हैं। उनके ऐसा कहने पर, राजा तत्काल पौषधशालामें आया और सूरिकी अत्यन्त ही प्रशसा करने लगा निसको किसी तरह उन्होंने रोका। फिर, ७२ सामत और सपूर्ण सघके साथ, प्रभुके बताये हुए [ धर्म और प्रशासके ] दोनों प्रकारके मार्गसे धुन्धु क नगर में आया । वहाँ पर प्रमुके जमस्थानमें स्वय बनाये हुए १७ हाथ ऊँचे झोलि का विहार में उत्सनादिका विधान करने पर जातिपिशुन ब्राह्मणोंने पिघ्न किया तो, उन्हें देश निकाला दिया गया और फिर शत्रुज य की उपासना की । वहाँ 'दुक्खखओ कम्मक्खओ' (दु खक्षय , प्रकारके प्रणिभान दण्डक (सूत्रपाठ ) का उच्चारण करता हुआ देनके पास निधि प्रार्थना करनेके अवसर पर किसी चारणके मुंहसे यह कथन सुना- २०४ अहो यह जिनदेवका कितना भोलापन है ! जो एक फटके बदलेमें मुक्तिका सुख दे देता है। इसके साथ किस बातका सोदा किया जाय । उसके नौ बार इस दोहेके पदने पर, राजाने उसे नौ हजारका दान किया। इसके बाद जब वह उज्जयन्त (गिरनार) के पास आया तो अकस्मात् पर्वतमें कप हुआ देखा । तब श्री हेमा चार्य ने राजासे - वृद्धोंकी यह परपरागत बात है कि, एक ही साथ दो पुण्यन्त पुरुप इस पर चढते हैं तो यह छत्रशिला गिर पडती है । यदि यह बात कही सत्य हो तो लोकापवाद होगा, क्यों कि हम दोनों ही [ एकसे ] पुण्यवान हैं । इस लिये आप ही [ पर्वत पर ] नमस्कार करने जॉय, हम नहीं । ' पर राजाने आग्रह करके प्रमुको ही सबके सहित ऊपर भेजा । स्वय नहीं गया। श्री वाग्म टदेव को छनशिलाके उस रास्तेको छोड़ कर जीर्ण प्रा कार (जूना गद) के रास्तेसे नई पद्या (पत्यरकी सीढी) ननवानेके लिये आदेश दिया। पद्याके बनाने में ६३ लाख दाम लगे । इस प्रकार तीर्थयात्रामवध समाप्त हुआ। कर्मक्षय ) इस कहा * कुमारपालका स्वर्णसिद्धिकी प्राप्तिकी इच्छा करना। १६५) एक बार, पृथ्वीको अनृण करनेकी इच्छासे, राजाने स्वर्णसिद्धिकी प्राप्तिके लिये श्रीहेम च द्राचार्य के उपदेशसे उनके गुरु श्री देव चन्द्रा चार्य को, श्री सघ और राजाकी विज्ञप्ति मिजमा कर यहां बुलवाये । वे २९-३० ११४ 7 प्रवन्धचिन्तामणि [चतुर्थ प्रकाश -- उस समय तीव्र व्रतमें लगे हुए थे तो भी यह समझ कर कि संघका कोई बड़ा कार्य होगा, विधिपूर्वक विहार करते हुए और रास्तेमें किसीसे ज्ञात न हो कर अपनी ही [ पुरानी ] पोपयशालामें आ कर ठहर गये । राजा तो उनकी अगवानी करनेके लिये सजावट करा रहा था इतने में सूरिने उसे सूचित किया तो वह वहाँ पर आया। तब राजा प्रभृति समस्त श्रावकोंके साथ प्रभुने द्वादशावर्त पूर्वक उन गुरुको प्रणाम किया। उन्होंने जो उपदेश-वचन कहे वे उन दोनोंने ( राजा और सूरिने ) सुने । फिर गुरुने संघका कार्य पूछा । इस पर सभा विसर्जन करके पर्देकी ओटमें श्री हे मा चार्य और राजाने उनके चरणों पर गिर कर सुवर्ण-सिद्धिके बताने की याचना की। श्री हे मा चार्य ने कहा कि-जव मैं बालकथा तब आपने किसी काठ ढोने वाले के पाससे एक वल्ली ( लता ) ली थी और आपके आदेशसे, अग्निमें जलाए हुए तांबेके टुकड़ेको उसके रसमें भिगोने पर, वह सोना हो गया था। उस लताका नाम और संकेत आदि बतानेकी कृपा कीजिये ।' उनके ऐसा कहने पर गुरुने श्री हे म चंद्र को क्रोधसे दूर ठेल दिया और बोले कि तू इस योग्य नहीं। पहले मूंगके जूस ( मूंगकी दालके पानीके ) समान जो [ हलकी ] विद्या तुझे दी थी उसीसे तुझे [ इतना ] अजीर्ण हो गया है, तो फिर तुझसे मंदाग्नि रोगीको यह मोदक जैसी [ भारी ] विद्या कैसे दूं?' इस प्रकार उन्हें निषेध करके, राजासे तुम्हारा ऐसा भाग्य नहीं है कि संसारको अनृण करने वाली विद्या सिद्ध हो जाय । और फिर, जीव- हिंसाका निवारना और पृथ्वीको जिनमन्दिरोंसे मंडित करना आदि पुण्यकार्योसे तुम्हारे दोनों लोक सफल बन गये हैं, अब इससे अधिक और क्या चाहते हो ?' यह कह करके, उसी समय वे वहाँसे विहार कर गये । इस प्रकार सुवर्णसिद्धिके निषेधका यह प्रबंध समाप्त हुआ । [ कहा * एक वार राजाके पूछनेपर प्रभुने उसके पूर्व जन्मका सारा वृत्तान्त कहा। - * मंत्री चाहडका दानी पना। १६६) इसके बाद, किसी समय, राजाने सपाद लक्ष के राजा पर चढाई ले जानेके लिए सेना सजित की। श्री वाग्भट मंत्रीके छोटे भाई चाह ड मंत्री को, अत्यधिक दान करते रहनेके कारण दोष-युक्त होने पर भी उसे खूब सिखामन दे कर, सेनापति बनाया। वह प्रयाण करके दो-तीन पडाव दूर गया ही था कि बहुतसे याचक इकडे हो कर उसके पास आये तो उसने कोषाध्यक्ष (खजांची) से १ लाख मुद्राये माँगी । पर राजाकी आज्ञा न होनेसे जब वह नहीं देने लगा, तो सेनापतिने उसे चाबुकके प्रहारोंसे मार कर सेनासे निर्वासित कर दिया और फिर स्वयं यथेच्छ दान दे करके याचकोंको प्रसन्न किया । चौदह सौ सांढनियों पर चढ़े हुए २८०० सुभटोंको साथ ले कर रास्तेमें कुछ ही पडाव करके बम्बे रा नगर के किलेको जा घेरा । वहाँ पर नागरिकोंसे यह सुन कर, कि उसी रातको सात सौ कन्याओंके विवाह होने वाले हैं, उस रातको वैसा ही पड़ा रहा । दूसरे दिन किले पर दखल कर लिया। वहाँ पर सात करोडका सोना तथा ग्यारह हज़ार घोड़ियोंकी प्राप्ति हुई जिसकी सूचना शीघ्रगामी आदमियों द्वारा राजाके पास भिजवा दी । स्वयं उस देशमें कु मा र पाल राजाकी आज्ञा फिरा कर और अपने अधिकारी नियुक्त करके लौट आया । पत्तन में प्रवेश करके राजमहलमें आ कर राजाको प्रणाम किया। राजाने समुचित आलापके साथ, उसके गुणसे रञ्जित हो कर भी, इस तरह कहा कि- * पूर्व जन्मके वृत्तान्तवाला यह प्रबन्ध इस ग्रन्थमें नहीं दिया गया । यह पंक्ति एक ही पुरानी प्रतिमें लिखी हुई मिली है जिसका सूचन शास्त्री दीनानाथने अपनी उस पुरानी आवृत्तिमें किया है । पुरातन प्रबन्धसंग्रह, प्रबन्धकोष, कुमारपालचरित्र संग्रह आदि ग्रन्योंमें यह प्रबन्ध मिलता है।
प्रकरण १६६-१६८] कुमारपालादि प्रबन्ध 'तुममें जो यह स्थूल-लक्ष्यता वाला वडा मारी दोष है वही एक प्रकारसे तुम्हारा रक्षामत्र है। नहीं तो लोगोंकी नजर लग कर तुम खड़े ही खड़े फट पडो । तुम जो व्यय करते हो वह तो मैं भी कर सकनेमें समर्थ नहीं हूँ।' राजाकी यह बात सुन कर उसने कहा कि- ' महाराजने जो कहा वह यथार्थ ही है । ऐसा व्यय महाराज सचमुच नहीं कर सकते । क्यों कि महाराज पितृपरपरासे तो राजाके पुत्र हैं नहीं। और मैं तो खुद महाराजका पुत्र हूँ। अत में इतना अधिक अर्थव्यय कर सकता हूँ।' उसकी इस वातसे चाहे राजा खुश हुआ हो या नाराज,- यह तो कसौटी पर कसे हुए सुवर्णको कान्तिको धारण करता हुआ, अनमोल हो कर, राजासे विदा ले कर अपने स्थान पर पहुँच गया । इस प्रकार यह राजघरह चाहडका प्रवध समाप्त हुआ। * १६७) उसी प्रकार उसका छोटा भाई, जिसका नाम सोला क था, उसने 'मण्डलीक सत्रागार' ऐसा बिरुद धारण किया था। कुमारपाल द्वारा राणा लवणप्रसादका भविष्य कथन । १६८) इसके बाद, एक बार, आ नाक नामक अपने मौसेरे भाईके सेवागुणसे सन्तुष्ट हो कर राजाने उसे सामात-पद प्रदान किया। तो भी वह तो उसी तरह सेवा करता रहा। एक बार, दो पहरके समय, राजा जब च द्रशालामें पलंग पर बैठा हुआ था तब वह भी उसके सामने बैठा था। उस समय सहसा किसी नौकरको वहाँ आते देख राजाने पूछा कि-' यह कौन है'आ ना क ने देखा तो वह उसीका नौकर मालूम दिया । उस नौकरका इशारा पा कर वह वहाँसे बाहर निकल कर कुशल समाचार पूछने लगा, तो नौकरने उससे पुत्रजन्मकी बधाई माँगी ! इस समाचारसे उसका चेहरा सूर्य जैसा चमक उठा और फिर उसे विदा करके अपने स्थान पर आ बैठा । राजाके यह पूछने पर कि क्या बात है तो उसने कहा कि-'महाराजके [ सेफके] घर पुत्र हुआ है । यह सुन, राजा अपने मनमें कुछ सोच कर, प्रकाश मानसे बोला-पुत्रजम निवेदन करनेके लिये यह चाकर जो वेत्रधारियोंकी मिना बाधाके ही यहाँ तक आ पहुँचा सो इससे जाना जाता है कि अपने पुण्यके प्रभावसे यह गूर्जर देश का राजा होगा, पर इस नगरमें और इस धवलगृहमें ( राजमहलमें ) नहीं। क्यों कि तुम्हें इस स्थानसे उठा कर इसने पुत्रोत्पत्तिकी वाई दी है इस लिये इस नगरका राजा नहीं होगा।' इस प्रकार विचार चतुर्मुख श्री कुमारपाल देवद्वारा निर्णीत लवणमसाद राणाका प्रबंध समाप्त हुआ। * २०५ अपने आज्ञावर्ती ऐसे अठारह बड़े देशोंमें, सपूर्ण चौहद वर्ष तक जीवहत्याका निवारण करके, और अपनी कीर्तिक स्तभके समान १४ सौ जैन विहारोंका निर्माण करके जैन राजा कु मार पाल ने अपने सब पापोंको क्षय कर दिया। [१२५-७ ] कर्नाटक, गूर्जर, लाट, सौराष्ट्र, कच्छ, सिधु, उच्च, मभेरी, मरुदेश, मालव, कोंकण, फीर, जागलक, सपादलक्ष, मेवाड़, ढीली (दिल्ली) और नालधर इतने देशोंमें कुमारपाल राजाने प्राणियोंको अभयदान दिया और सातों व्यसनोंका निषेध किया। रुदतीधन (अपुत्र कुटुम्बके धन) का ग्रहण मना किया और न्यायघण्टा बजा कर प्रजाको सतुष्ट किया ।
११६ ] प्रवन्धचिन्तामणि [चतुर्थ प्रकाश हेमचन्द्र सूरिको लूना रोग लगना । १६९) अब एक बार, कच्छ प रा ज ल क्ष राज की महासती माताने जो मूल राज को शाप दिया था कि उसके वंशजोंको लूता रोग हो जाया करेगा; तदनुसार, कु मार पाल ने जब गृहस्थ धर्म (श्रावकपन ) के व्रत ग्रहण किये तब उसने अपना राज्य गुरु श्री हे म चन्द्र को समर्पण कर दिया था, इसलिये उसी छिद्रसे (इस राज्यसम्बन्धके छलसे ) सूरिको भी वह लूता रोग संक्रामित हुआ। इसे देख सभी राजलोकके साथ राजा दुःखित हुआ, तब प्रभुने प्रणिधानसे अपनी आयु प्रबल समझ कर अष्टाङ्ग योगाभ्यासके द्वारा, लीला (क्रीडा ) के साथ उस रोगको नष्ट कर दिया । १७०) किसी समय, कदली पत्र पर आरूढ किसी योगीको देख कर विस्मित बने हुए राजाको प्रभुने भूमिसे चार अंगुल ऊपर अधर रह कर ब्रह्मरन्ध्रसे निकलता हुआ तेजःपुञ्ज दिखाया । * हेमचन्द्रसूरि और कुमारपालका स्वर्गवास । १७१) चौरासी वर्षकी अवस्थाके अंतमें प्रभुने अपना अंतिम दिन समीप आया समझ कर, अनशन पूर्वक अन्त्याराधन क्रिया प्रारंभ की। उसे देख कर दुःखित हुए राजाको प्रभुने कहा कि - ' तुम्हारी आयु भी अब ६ महीना ही बाकी है। सन्तानाभावके कारण अपने वर्तमान रहते ही अपनी सब उत्तर क्रिया कर-करा लेना ।' यह आदेश दे कर दशम द्वारसे उन्होंने अपना प्राणत्याग कर दिया। फिर इसके बाद प्रभुके संस्कार स्थान पर, यह समझ कर कि, उनके देहकी भस्म भी पवित्र है, राजाने तिलक करके नमस्कार किया। इसके बाद सभी सामंत और नागरिक लोगोंने वहाँ की मिट्टी ले ले कर तिलक करना शुरू किया जिससे वहां पर गड्ढा हो गया । वह गड्डा आज भी 'हे म खड्ड' नामसे प्रसिद्ध है। १७२) अब फिर, राजा प्रभुके शोकमे विकल हो कर आँखोंमें आँसू भर भर रोने लगा जिस पर मंत्रियोंने उसे वैसा न करनेकी विज्ञप्ति की, तो वह बोला- 'मैं उन प्रभु के लिये शोक नहीं कर रहा हूँ जिन्होंने अपने पुण्यसे उत्तमसे उत्तम लोक अर्जित किया है; मै तो अपने इस सर्वथा त्याज्य ऐसे सप्ताङ्ग राज्यके लिये शोक कर रहा हूँ, कि राज्यपिण्ड दोषसे दूषित होनेके कारण मेरा पानी भी इन जगद्गुरुके अंगमें नहीं लगा. इस प्रकार प्रभुके गुणोंको स्मरण करता हुआ चिरकाल तक विलाप करते रहा और अन्तमें प्रभुके कहे हुए दिन पर उन्हींकी उपदिष्ट विधिसे समाधि पूर्वक मर कर उस राजाने स्वर्गलोक अलंकृत किया । यहाँ पर P प्रतिमें निम्नौद्धृत श्लोक अधिक प्राप्त होते हैं-जो सोमेश्वरकी कीर्तिकौमुदीके हैं- [ १२८ ] पृथु आदि पूर्व राजाओंने स्वर्ग जाते समय जिस राजाके पास अपने गुणरूपी रत्नोंको मानों न्यासके रूप में रख दिया था ! [ १२९ ] इस राजाने न केवल युद्धक्षेत्रमें अपने बाणोंसे मात्र शत्रुओंको ही जीत लिया था, किंतु अपने लोकप्रीतिकर गुणोसे इसने पूर्वजोंको भी जीत लिया। [ १३० ] राग और रातिसे रहित, ऐसे ( अथवा वीतरागमें प्रीतिवाले ) इस नृदेवकी, मृतोंके धनको छोड़ देनेके कारण, देवताकी नाई अमृतार्थता सिद्ध हुई । ( क्यों कि देवता अमृतके अर्थी होते है, और यह मृतका अर्थ नहीं लेता था।) [ १३१ ] इस राजाने तलवारकी धारमें नहाई हुई वीरोंकी श्री (लक्ष्मी) ही ग्रहण की, किंतु आँसूकी धारासे धुली हुई कायरोकी ( और निरपत्य जनोंकी) श्री नहीं ली।
प्रकरण १६९-१७५ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [११७ [१३२ ] इसने लडाईमें तो वीरोंके भी सामने अपने पैर उठाये, पर उनकी स्त्रियोंके सामने तो वह अपना मुख ही नीचा कर लेता था। [१३३ ] हृदय (ठाती ) में लगे हुए जिसके बाणसे कान्त हो कर, जॉगल के राजाने तो अपना सिर माया ही पर उसी प्रशसा करने वालों दूसरोंने भी अपना सिर घूमाया । [१३४ कोङ्कण देश का नरेश, जो मारे गके रत्नमय मुकुटकी प्रभासे चकचफित ऐसे अपने सिरको न नराना चाहा तो इस राजाने अपने बाणोंसे उसके सिरको टुकडे टुकडे कर दिया । [१३५] रागवश हो कर जिस राजाने युद्ध वल्ला ल और मल्लि का र्जुन राजाओंके सिरोंको, जयश्रीके दोनों कुचोंकी तरह ग्रहण किया । [,१३६ ] जिस राजाने दक्षिण देश के राजाको जीत कर उससे दो द्विप (हाथी ) ग्रहण किये । मानों वे इस लिये कि उसके यशसे हम इस विश्वको नष्ट-विपद् बनायेंगे। [ १३७ ] शत्रुओंकी पलियोंके कुचमण्डलको विहार (विगत हार) बनाते हुए जिस राजाने मही- मण्डलको उद्दण्डविहार (जैनमन्दिर ) नाला बनाया । [ १३८ ] निसने पादलग्न महीपालों और तृणको मुहमें दगाने वाले पशुओंके द्वारा मानों प्रापित हो कर ही उत्तम अहिंसा व्रतको ग्रहण किया । १७३) स० ११९९ से [ १२३० तक ] ३१ वर्ष तक श्री कुमार पाल ने राज्य किया। * अजयपालका राज्याभिषेक। १७४) स० १२३० वर्षमें अजय देव का राज्याभिषेक हुआ। ( इस राजाके वर्णनके कुछ विशिष्ट लोक मी P आदर्शमें इस प्रकार पाये जाते हैं-) [१३९ ] इस [कुमारपाल ] के बाद कल्पद्रुमके समान अजय पाल नामक राजा हुआ जिसने वसुन्धराको सोनेसे भर दिया । [१४० जिसने जाँगल देश (के राजा ) के गले पर पैर रख कर उससे दण्डमें सोनेकी मण्डपिका (मॉडवी-पालकी जैसी ) और कई मत्त हायो ग्रहण किया । [१४१ ] उद्दाम तेजसे सूर्यकी मी मर्त्सना करने वाले जिस राजाने, परशुरामकी तरह, क्षत्रियों के रकसे धोई हुई पृथ्वीको श्रोत्रियोंकी रक्षाका पात्र बनाया । [१४२ ] जिस राजाके तीनों गण (=धर्म, अर्थ, काम) नित्यदान देनेसे, नित्य राजाओंको दण्ड देनेसे और नित्य नियोंसे विवाह करनेसे, समान हो कर रहे । [१४३ ] राजाओंके नेपथ्यको धारण करने वाले [उस राज्य नाटकमें] शतकृतु (इद्र) [ का अभिनय करने वाले इस राजा] के चले जाने (मर जाने) पर इसके पुन मूलराज ने जयन्तका अभिनय किया। , - . * अजयपालका जैन मन्दिराका नाश करना। १७५) यह अजय देव जब पूर्वजोफे बनाये मदिरोंको तुड़वाने टगा तो सीलण नामक कौतुकी, राजाके सामने नाटकका प्रसग उपस्थित कर, उसमें, अपनेको कृत्रिम रोगी फन्पित कर, वृणके बने हुए पाँच १२० ] प्रवन्धचिन्तामणि [चतुर्य प्रकाश [१४५ ] जिसके काटे हुए म्लेच्छ कंकालके स्थलकी ऊंचाईको देखता हुआ अबु द गिरि अपने पिता प्रालेयगिरि (हिमालय ) की याद भूल जाता है । [१४६ ] विधाताके, उस कल्पद्रुमके अंकुरको शीघ्र ही नष्ट करनेके बाद, उसका छोटा भाई श्री भीम नामक [नया ] पौधा उगा। १८०) सं० १२३३ से ले कर [१२९६ तक ] ६३ वर्ष श्री भो म देव ने राज्य किया । [१४७ ] यह भी म राजा, जो राजहंसोंका दमन करने वाला है कदापि उस भी म से न के समान नहीं कहा जाता जो बकापकारी ( बकासुरका नाश करने वाला ) था । यह राजा जब राज्य कर रहा था तो सो ह ड नामक मा ल व देश का राजा गूर्जर देश को विध्वंस करनेके लिये सीमान्त पर आया । तब इसके प्रधानने सामने जा कर इस प्रकार कहा- २१२. हे राज-सूर्य ( तुम्हारा ) प्रताप पूर्व [ दिशा ] में ही शोभित होता है । पश्चिम दिशामें आने पर तुम्हारा वह प्रताप अस्त हो जाता है । इस विरुद्ध वाणीको सुन कर वह वापस लौट गया । इसके बाद उसने अपने लड़केसे, जिसका नाम श्रीमान् अर्जुन देव था, गूर्ज र देश का भंग कराया। - वीरधवलका प्रादुर्भाव । १८१) श्री भी म देव के राज्यकी चिन्ता करने वाला ( राज्य व्यवस्था संभालने वाला) व्या व पल्ली य नामसे प्रसिद्ध श्रीमान् आ ना क का पुत्र ल व ण प्रसाद चिरकाल तक राज्य करता रहा । साम्राज्यके भारको धारण करने वाला उसका पुत्र हुआ श्री वीर ध व ल । उसकी माता म द न राज्ञीने, अपनी बहनकी मृत्युके बाद यह सुनकर कि-अपने देव राज नामक पट्टकिल ( पटेल ) बहनोई जिसकी बडी भारी आमदनी है लेकिन अब जिसका निभाव नहीं हो रहा है, राजा ल व ण प्रसाद से पूंछ कर अपने शिशुपुत्र वीर ध व ल को साथ ले कर वहाँ गई । उस बहनोईने उसके गुण और आकृतिको स्पृहणीय देख कर, उसे अपनी ही गृहिणी बना लिया । ल व ण प्रसाद ने जो यह वृत्तान्त सुना, तो उसे मार डालनेके लिये रातको उसके घरमें घुसा और एकान्तमें छिप कर जब वह अवसर खोज रहा था, तब वह पटेल भोजन करनेके लिये बैठा और [ पासमें वीरधवलको न देख कर अपनी गृहिणीसे ] यह कहने लगा कि वी र ध व ल के विना मैं नहीं खाऊंगा । इस तरह खूब आग्रहके बाद उसे ले आ कर एक ही थालीमें उसके साथ खाने लगा । तब अकस्मात् , साक्षात् कृतान्तकी तरह सामने उपस्थित उस आदमीको देख भयसे उसका मुंह काला हो गया। पर उस (लवणप्रसाद) ने कहा कि –' मत डरो, मैं तुम्हीं को मारने आया था पर इस मेरे वी र ध व ल लड़के पर, तुम्हारी ऐसी वत्सलता अपनी साक्षात् आँखोसे देख कर, उस आग्रहको मैने त्याग दिया है।' ऐसा कह कर उसके द्वारा सत्कृत हो कर जैसे आया था वैसे ही चला गया। १८२) वीर धवल के उस अपर पितासे उत्पन्न, साँग ण, चा मुण्ड रा ज आदि राष्ट्रकूटवंशीय भाई हुए जो अपने वीर व्रतसे भुवनतलमें विख्यात हुए। * मालवासे गुजरात पश्चिम दिशामें है इस लिये इस श्लोकमें यह सूचित किया गया है कि मालवाका राजा यदि. गुजरातमें आयगा तो उसका तेज नष्ट हो जायगा। , प्रकरण १८१-१८६ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [१२१ १८३) इसके बाद, वह वीर धवल क्षत्रिय, जब कुछ कुछ समझने लायक हुआ तो अपनी माताका यह वृत्तान्त जान कर लजित हुआ और अपने ही पिताकी सेवामें आ कर रहा । वह जन्मसे ही उदारता, गौरता, स्थिरता, नीति, विनय, औचित्य, दया, दान और चतुरता आदि गुणोंसे युक्त था। उसने अपनी शालीनतासे किसी कटक प्रस्त भूमिको अपने अधिकारमें किया और फिर पिताने मी कृपा करके कुछ देश दे दिया। चाह ड नामक ब्राह्मणको मत्री बना कर वह राजकारभार चलाने लगा । वहाँ पर, उस समय, आये हुए प्राग्लाट व शी पत्तन निवासी मत्री तेजपाल के साथ उसकी मित्रता हुई। * - मत्रीश्वर वस्तुपाल तेजपालका प्रवन्ध । १८४) अब इस प्रकरणमें मत्री तेज पाल के जन्म वृत्तान्तका प्रवध प्रस्तुत किया जाता है। एक बार, पत्तन में भट्टारक श्री हरिभद्रसूरि का व्याख्यान हो रहा था। वहीं पर मत्री आश राज बैठा हुआ था। उस समय एक कुमार देवी नामकी अतीव रूपरती बालविधवा स्त्री वहा पर आई जिसको वे आचार्य बारबार देखने लगे । इससे आशराजका चित्त उस पर आकर्षित हुआ । व्याख्यानके विसर्जन होनेके अनन्तर मत्रीको प्रार्थना पर गुरुने इष्ट देवताके आदेशसे कहा कि-' इसके गर्भसे सूर्य और चद्रमाके भावी अवतारको देखता हू, इस लिये इसके सामुद्रिकको बारवार देख रहा था ।' गुरुसे इस तत्त्वको जान कर मत्रीने उसका अपहरण करके उसे अपनी प्रेयसी (पत्नी ) बनाया ! क्रमश उसके पेटसे ज्योतिपेन्द्र ( सूर्य और चद्र) जैसे वस्तु पाल और तेज पाल नामक वे दोनों मत्री अवतीर्ण हुए । वीरधवलका तेजपालको अपना मत्री बनाना । १८५) किसी समय श्री वीरधवल ने अपने राजकीय व्यापारके मारको ग्रहण करनेके लिये उस तेजपाल की अभ्यर्थना की, तो उसने पहले राजाको उसकी पत्नीके साथ अपने मकान पर भोजनके लिये निमत्रित किया, और उस समय अनुप माने राजपत्नी जय तल देवी को कर्पूरके बने हुए अपने दोनों ताडक (कर्णकल) तथा सोनेके बने हुए और बीच बीचमें मोती और मणियोंसे जडे हुए कर्पूरमय, एकारली हारको उपहार रूपमें दिया । मत्री जब उपहार देने लगा तो उसका निषेध करके, वीरधवल अपना राज्यकार्यभार उसके हाथोंमें समर्पण करता हुआ बोला कि-'इस समय तुम्हारे पास जो धन है उसे, कुपित होने पर भी, मैं विश्वास पूर्वक कहता हू कि कभी ग्रहण न करूगा।' इस प्रकार पत्र पर प्रतिज्ञालेख लिख कर तेजपाल को राज्यव्यापार सबधी पञ्चाङ्ग-प्रसाद प्रदान किया। २१३ जो बिना करके खजाना बढ़ावे, पिना मनुष्य-वध किये देशरक्षा करे और विना युद्ध किये देशवृद्धि करे वही मत्री बुद्धिमान् कहलाता है। मंत्री तेजपालका धर्मभावसम्मुख होना । १८६) सपूर्ण नीतिशास्त्र और उपनिषत्में बुद्धिको निविष्ट रखने-याला वह मन्त्री अपने स्वामीको यशोवृद्धि करता हुआ, सूर्योदय कालमें विधिपूर्वक श्री जिनकी पूजा करता, और फिर चदन और कर्पूरसे गुरुकी पूजा करता । अनन्तर द्वादश आवर्तन करके यथाऽवसर प्रत्याख्यान ले कर रोज गुरुसे एक एक अपूर्व लोक पदा करता । राजकार्य करनेके बाद ताजी बनी हुई रसोईका आहार करता । एक बार, मुखाल नामक महोपासक, जो उसका निजी लेखक (गुमास्ता ) या, एकान्तमें पूछने लगा कि-' स्वामी सबेरे क्या उडी रसोई खाते हैं या ताजी!' उसके ऐसा पूछने पर वह मत्री समझा कि यह गँवार है। दो तीन बार उसके ऐसा पूछने पर , . ३१-३२ १२२] प्रवन्धचिन्तामणि [चतुर्य प्रकाश . उसकी यह एक बार बड़े क्रोधसे 'पशुपाल' कह कर उसे अपमानित किया। वह धैर्य धारण करके बोला- ' दोनोंमेंसे कोई एक तो होगा ही । ( अर्थात् या तो मैं गँवार हूं या मेरी बातको नहीं समझने वाले आप गँवार होंगे) उसकी वचनचातुरीसे चित्तमें चमत्कृत हो कर मंत्रीने कहा 'विज्ञ ! तुम्हारे उपदेशकी बनिको मैं समझ नहीं सका। अब यथार्थ बात बताओ।' ऐसा आदेश पा कर वह वाग्मी बोला कि-'जिस रसमयी ताजी रसोईको आप खाते हैं वह पूर्वजन्मके पुण्यका फल है अतएव मैं उसे अत्यन्त शीतल समझता हूं। जो हो, ये तो मैंने गुरुके संदेश वाक्य ही कहे हैं । तत्त्व तो वे ही जानते हैं, अतः वहीं पधारिये । बात सुन कर तेजपाल मंत्री अपने कुलगुरु भट्टारक श्री विजय से न सूरिके पास गया । गुरुसे गृहस्थ धर्मका विधि-विधान पूछा । उन्होंने उ पास क द शा नामक सप्तमाझसे जिनकथित देवपूजा, आवश्यक क्रिया, यतिदान आदि गृहस्थ धर्मका उपदेश दिया। तब उसने विशेषतापूर्वक देवपूजा, जैन मुनियोंको दान आदि देनेवाला धर्मकृत्य आरंभ किया। पूजाके समय चढाये हुए तीन वर्पतकके द्रव्यको निकाला तो ३६ हजार हुआ उससे श्री नेमीनाथका प्रासाद बनवाया । ( यहाँ P प्रतिमें, निम्न लिखित, विशेष श्लोक लिखे हुए पाये जाते हैं-) [१४८ ] मनुष्योंका अपहरण करने वाले समुद्रप्रवासी जनोंका निषेध करके जिसने पृथ्वी पर अपने धर्मका उदाहरण उपस्थित किया। [१४९ ] छुआ-छूतके निवारणके लिये अलग अलग हदवाली वेदी बना कर जिस ( मंत्री ) ने इस ( स्तंभ तीर्थ ) नगरमें छांछके बेंचनेका विप्लव दूर किया । [१५० ] जिसने, जहाँ पर जो कुछ भी न्यून और जो कुछ भी नष्ट था उसे वहाँ पर पूरा किया । क्यों कि उत्तम पुरुषोंका जन्म रिक्त स्थानोंको पूरा करनेके लिये ही तो होता है। [ १५१ ] देवताओंके लिये जिसने ऐसे अनेक उपवन दान कर दिये थे जहाँ पर कामदेवको शिवके नेत्रोंकी अग्निका ताप स्मरण नहीं होता था। [ १५२ ] रंभा (१ केला, २ अप्सरा विशेष ) से संभावित, वृषसे निषेवित तथा मनोज्ञ ( १ सुंदर, २ मनको जाननेवाले ) सुमनों (१ फूलों, २ देवताओं) के वर्गसे सुशोभित जिसके वनोंने स्वर्गके सौन्दर्यको ग्रहण किया था । [१५३ ] हारीत (१ पक्षी विशेष, २ स्मृतिकार ऋषि विशेष ) शुक (१ तोता, २ भागवतका ऋषि ) चित्र-शिखण्डी (१ मोर, २ महाभारतका एक वीर) द्वारा संगृहीत जिसके उद्यान धर्मशास्त्रके सधर्मा हो कर सुशोभित हुए। [१५४ ] इसने सुमनोभाव ( १ सुंदर मनोभाव, २ फूलका भाव ) तथा अतुलनीय श्रीमत्ताको दिखाते हुए, स्वबंधुके वनोंको ( बन्धुकजातिके पुष्पोंके वनोंको ) अपने बन्धुओंकी नाई कर दिया । [१५५ ] जिसके बनाये हुए तालाबो से पानी ग्रहण करते हुए कासारगण ( भेंसे बैल आदि पशु ) समुद्रमेंसे पानी लेते हुए बादलकी नाई शोभा देते थे। [१५६ ] जिस क्रियानिष्ठ पुण्यात्माने ऐसी कितनी ही बावडियाँ बनवाई जिनके मीठे जलोंने अमृतको भी तिरस्कृत कर दिया । [१५७ ] उसने पानी पीनेके लिये ऐसे प्याऊ बनवाये कि जिनका जल पी कर पथिकोंके मुख तो तृप्त हो जाते थे किंतु उनकी शोभा देख कर आँखें कभी तृप्त नहीं होती थीं। .
. . - प्रकरण १८७] कुमारपालादि प्रवन्ध । [१२३ [१५८] जिसने यहाँ पर (स्थमतीर्थमें ) भवसागरको पार करनेके लिये नौकारूप ब्रह्मपुरी बनवाई जिसमें पुरुष तो सामगान करते थे और नारियाँ उसका यशोगान करती थीं। [१५९ ] अपने शुभ्र ऐसे कीतिकूट रूप पटसे, दसों दिशाओंका वेष्टन करते हुए स्पष्ट रूपसे, इसने मानों दसों दिशाओंको चेतावर व्रती बनाया । [१६० ] जिस तारितात्माने ऐसी पौषधशालायें बनाई जो भीतरसे तो श्वेताबरोंसे (श्वेताम्बर यतियों के निवाससे ) और बाहर सुधा (चूनापोती) से विशुद्ध थीं। [१६१ ] जिसकी पौषधशालाओंमें स्त्रीविरहित ऐसे यति वास करते हैं जिनको आत्मभू (पुत्रजन्म तथा पुनर्जन्म ) की कोई समारना ही नहीं है। [१६२ ] वाग्देवीने प्रसन्नतापूर्वक जिस मंत्रीको ज्ञानकी ऐसी आरख दी थी कि जिससे यह धर्मकी सूक्ष्म गतिको भी नित्य ही देखा करता था । वस्तुपालकी तीर्थयात्राका वर्णन । १८७) इसके बाद, स० १२७७ सालमें सरस्वतीकण्ठाभरण, लघुभोजराज, महाकवि, महाऽमान्य श्री वस्तु पाल ने महायात्रा प्रारभ की । गुरुके बताये हुए लग्नमें, उन्हींके द्वारा सघाधिपति रूपसे अभिषिक्त हो कर वह जब देवालयके प्रस्थानका उपक्रम कर रहा था, तब दाहिनी ओरसे दुर्गादेवीका स्वर सुनाई दिया, जिसे स्वयं कुछ समझ कर, शकुन शास्त्रके जानकारसे उसका पिचार पूछा । मरु देश के एक वृद्ध ( शाकुनिक) ने कहा कि शकुन तो वड़ा भारी हुआ है। शकुनसे भी शब्द बलपान होता है ' यह विचार करके नगरके बाहर आवास ( तबू ) में देवालयको स्थापित किया । फिर उससे शकुनका विचार पूछने पर उस वृद्धने बताया कि, मार्गको विषमतामें विपरीत शकुन श्रेष्ठ कहा जाता है। [ वर्तमानमें ] राजकीय अधाधुन्दीके कारण तार्थ यात्राका मार्ग विषम हो रहा है । तथा जहा पर वह दुर्गा देख पड़ी थी, वहाँ किसी चतुर पुरुषको भेज कर उस प्रदेशको दिखाइये । वैसा ही करने पर उस पुरुपने वताया कि-'यह जो वडी (वाडेकी भीत) नई बनाई जा रही है उसके १३॥ हवें थर पर यह दुर्गा बैठी थी।' यह सुन कर उस मरुवृद्धने कहा कि-' देवी आपको सादी तेरह यात्रा करनेकी सूचना करती है।' अन्तिम आधी यात्राका कारण पूछने पर उसने कहा कि- अतुलनीय मगलके अवसर पर यह कहना ठीक नहीं है । यथा समय सब निवेदन करूँगा। अनन्तर सघके साथ मत्रीने आगे प्रयाण किया। उस सधकी सब सख्या यों थो-४॥ हजार वाहन, २१ सौ श्वेताबर, तीन सौ दिसम्बर, सघकी रक्षाके लिये १ हजार घोड़े, सात सौ लाल साढनिया और सघरक्षाके अधिकारी चार महासामन्त थे । इस प्रकार सारी सामग्रीके साथ मार्ग तै करके, श्रीपादलित पुरके अपने ही बनाये हुए श्रीमन् महावीर देवके चैत्यसे अलकृत ल लि ता सरोवर के मैदानमें डेरा दिया । उसे तीर्थ पर यथाविधि तीर्थराधना करके मूल प्रासादमें सोनेका कलश, दो प्रोद जिन मूर्तियाँ, श्री मोदेरपुरावतार श्री मन्म- हावीर चैत्य तथा उसके आराधक (यक्ष) की मूर्ति और देवकुलिका, मूल मण्डपके दोनों ओर दो दो चौकीकी कतार, शकुनिका पिहार तथा सत्यपुरावतार चैत्यके सामने चाँदीके तोरण, श्रीसपके योग्य कई मठ, सात बहनोंकी ७ देव कुलिकायें, नन्दीश्वरावतार-प्रासाद, इन्द्र मण्डप और उसमें हाथी पर चढ़े हुए लवण प्रसाद और वीरधवल को मूर्तियाँ, वहीं पर घोड़े पर चदी सात पूर्वजोंकी मूर्तियाँ, सात गुरुमूर्तियाँ, उसीके निकटकी चौकीमें अपने दो बड़े भाई मह० मा ल देव और छ णिग की आराधक मूर्तियाँ, प्रतोली, अनुपमा सरोवर, कपर्दि यक्ष-मण्डए और तोरण भादि बहुतसे धर्मस्थान बनवाये । इसी तरह नन्दीश्वरके कमठाने (कारखाने ) के लिये कटेलिया - इस इस वाक्यके . .
है १२४ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश पाषाणके बने हुए सोलह खंबे पा व क पर्वत परसे जलमार्ग द्वारा मँगाये । जब ये खंबे समुद्रके किनारे उतारे जाने लगे तो उनमेंसे एक स्तंभ इस प्रकार कीचडमें इब गया कि खोजने पर भी न मिला। उसके बदले अन्य पाषाणका स्तंभ लगा कर वह प्रासाद पूरा किया गया । दूसरे साल समुद्रके पानीकी भरतीके सबबसे वही खंबा कीचडसे बाहर निकल आया। मंत्रीकी आज्ञासे वह खंबा उसकी जगह पर लागाया जाने लगा तो किसी पुरुषने आ कर कहा कि- ' प्रासाद फट गया है ' । यह निवेदन करनेको आये हुए पुरुषको भी उस मंत्रीने सोनेकी जीभ इनाममें दी। चतुर आदमियोंने पूछा कि 'यह क्या बात है !' इस पर मंत्रीने कहा कि इसके बाद अब धर्मस्थान ऐसे दृढ़ बनवाऊँगा कि युगान्तमें भी उनका पतन नहीं होगा । इसी लिये इसे परितोषिक दिया गया ' फिर तीसरी बार मूल समेत उखाड कर यह प्रासाद बनाया गया जो [ अब भी ] वर्तमान है। श्री पाली ताणा में भी उसने एक विशाल पौषधशाला वनवाई । फिर श्रीसंघके साथ वह मंत्री उज्ज यन्त ( गिरनार ) पहुँचा । वहां उसकी उपत्यकामें ते जल पुर में स्वयं एक नया वन (परकोटा) बनवाया और उसीमे श्रीमद् आ शराज विहार नामका मन्दिर तथा कु मार दे वी नामका सरोवर भी बनवाया । उस निरुपम सरोवरको देखने वाद, जब नियुक्त पुरुषोंने कहा कि 'धवलगृह (महल) में पधारिये ' तो मंत्रीने कहा कि श्री गुरुमहाराजके योग्य पोषधशाला भी है या नहीं ? ' यह सुन कर कि वह बनाई जा रही है, तो वह विनयके अतिक्रमणमें भीरु गुरुके साथ, बाहर ही दिये गये आवास (डेरे) में ठहरा । प्रातःकाल उज्ज यन्त पर आरोहण करके श्री शैवेय (नेमिनाथ ) के चरणयुगलकी भली भाँति पूजा कर, स्वयं बनाये हुए श्री शत्रु- जया व तार तीर्थमें खूब प्रभावनायें कर, तथा क ल्या णत्र य चैत्यमें श्रेष्ठ पूजोपचारसे अर्चना करके वह मंत्री जब नीचे उतरा तो इन दो दिनोंमें वह पौषधशाला तैयार हो चुकी थी । मंत्री गुरुको अपने साथ वहाँ ले आया । उन्होंने उन बनाने वालोंकी प्रशंसा की और पारितोषिक दान दे कर उनको अनुगृहीत किया । श्री पत्तन में प्रभास क्षेत्र में चन्द्रप्रभ देवको प्रणाम करके प्रभावनाके साथ यथोचित पूजा की । फिर अपने बनाये हुए अष्टापद प्रासाद पर सोनेके कलशका समारोपण करके, देवके पूजारियोंको दान दिया । वहाँके ११५ वर्षकी अवस्था वाले वृद्ध पूजारीके मुँहसे यह सुन कर कि-' यहाँ पर प्रभुश्री हे मा चार्य ने कु मा र पाल नृपतिके सामने श्री सोमेश्वर देवको जगद्विदित रूपसे प्रत्यक्ष किया था' उन ( प्रभु ) के चरित्रसे मनमें चकित हो कर वहाँसे लौटा । रास्तेमें लिंगधारियोंके असदाचारको देख कर उन्हें अन्न देनेका निषेध किया । यह सुन कर वा य टी य ग च्छ के श्री जि न दत्त सूरि ने इस बातसे उसका अपयश समझ कर, अपने उपासकके पाससे उन्हें अन्नदान दिलाया। यह सुन कर वह मंत्री उनके दर्शन और अनुनयके लिये आया तो उन्होंने उसे उपदेश दिया कि- २१४. क्षार जलके समान इन लिंगधारियोंकी परिपूर्णतासे ही तो यह शासन ( धर्म ) रूप समुद्र गंभीरताको धारण कर रहा है। २१५. संविग्न साधु भी इन लिंगधारियोंकी अनुवन्दना करते ह तो फिर धार्मिक और भवभीर पुरुषको उनकी पूजाकी चर्चा क्यों करनी चाहिए। २.१६. प्रतिमाधारी ( श्रावक ) भी इनके सामने विषयका त्याग करते हैं इस लिये विषयवाले इन लिंगधारियोंकी पूजाका मना करना तो विरोधवाली बात है। २१७. जो लोग; लिंगोपजीवियोंकी अवधारणा (तिरस्कार ) करते हैं वे दुराशय दर्शन (संप्रदाय) के उच्छेदके पापसे लिस होते हैं। - प्रकरण १८७-१८८] कुमारपालादि प्रवन्ध [ १२५ . आवश्यक-वदना नियुकिमें कहा है कि- २१८ तीर्थकरोंके गुण उनकी प्रतिमा ( मूर्ति ) में नहीं हैं, यह नि शसय जानता हुआ भी यह तीर्थकर है ऐसा मान कर उसको नमस्कार करने वाला पिपुल कर्मनिर्जरा (कर्मका नाश ) प्राम करता है। २१९ इसी प्रकार, जिन देवके प्रज्ञापन किये हुए लिंग (वेष) को नमस्कार करना भी विपुल निर्जराका हेतु है । यद्यपि यह गुणहीन होता है तथापि अध्यात्म शुद्धिके लिये उसे वन्दन करना उचित है। इस प्रकार उनके उपदेशसे अपने सम्यक्त्व रूप दर्पणको माज कर विशेष रूपसे दर्शन (सप्रदाय) की पूजामें परायण हो, स्वस्थान पर आ कर ठहरा । मंत्री तेजपालका आयू पर मन्दिर बनवाना । १८८) ज्येष्ठ भ्राता म० लूणि गने परलोक प्रयाणके अवसर पर यह धर्मव्यय माँगा था कि- अर्बुद गिरि पर निमल व स हि का में मेरे योग्य एक देवकुलिका बनवाना ।' उसके मरने पर, वहाँके गोठियों (पुजारियों) से उस मदिरमें भूमि न पा कर, विमल वस हि का के समीप ही चन्द्रावती के स्वामीसे नई भूमि ले कर वहीं पर तीनों भुवनके चैत्योंमें ( मन्दिरोंमें ) शलाका (अग्रगण्य ) जैसा ल् णि ग व सहि का प्रासाद बनवाया । उसमें श्री नेमिनाथके किंवकी स्थापना करके उसकी प्रतिष्ठा कराई। उस मन्दिरके गुण-दोषकी विचारणा करनेके लिये जा वा लिपुर से श्री यशो वीर मत्रीको बुला कर मत्री तेज पाल ने प्रासादके विषयमें अभिप्राय पूछा। उसने प्रासाटके बनानेवाले स्थपति ( कारीगर ) शो म न दे व से कहा- 'रगमण्डपमें शालमजिका (पुतली ) की जोड़ीकी विलास-घटना, तीर्थकरके प्रासादमें सर्वथा अनुचित और वास्तुशास्त्रसे निषिद्ध है। इसी तरह भीतरी गृहके प्रवेश द्वारमें सिंहोंका यह तोरण देवताकी विशेष पूजाका विनाश करने वाला है। तथा पूर्वज पुरुपोंकी मूर्तियों से युक्त हाथियोंके सम्मुख प्रासादका होना, बनाने वाले के भविष्यके विनाशका सूचक होता है। इस विज्ञ कारीगरके हाथसे भी जो इस प्रकारके अप्रतीकार्य ये तीन दोप हो गये, यह भावी कर्मका दोप है। ऐसा निर्णय करके वह जैसे आया था वैसे ही चला गया। उसकी स्तुतिके ये श्लोक हैं- २२० हे यशोवीर, यह जो चद्रमा है वह तुम्हारे यशरूपी मोतियोंका मानों शिखर है, और इसमें जो लाछन है वह इस यशकी रक्षाके लिये (किसीकी नजर न लग जाय इस लिये ) किया गया रक्षा (राख) का ' श्री' कार है। २२१.हे यशोवीर, शून्य जिनके मध्यमें हैं ऐसे ये बिन्दु यों तो निरर्थक ही हैं, पर तुम रूप एक (अक) के साथ हो जानेसे ये संदयावान बन जाते हैं। २२२. हे यशोवीर, जब विधाताने चदमामें तुम्हारा नाम लिखना आरम किया तो उसके पहलेके दो अक्षर ( यश ) ही भुवनमें नहीं समा सके। [१६३ ] यशोवीरके निकट न कोई [कवि] मा घ की प्रशसा करता है न कोई अभि न द का अभिनदन करता है, और कालिदास भी उसके पास कलाहीन ( निस्तेज ) माल्म देता है। [ १६१ ] यशोवीर मत्रीने सजनोंके साक्षात् ( सम्मुख ), मुखमें रही दातोंकी ज्योतिके बहाने माझी (सरस्वती) को और हाथमें रही हुई सोनकी मुद्राके बहाने श्री (लक्ष्मी) को प्रकाशित किया। [१६५] इस चौहान नरेन्द्रके मत्रीने वैसे गुण अर्जन किये जिनसे ब्रह्मा और समुद्रकी पुत्रियों (टक्ष्मी और सरस्वती) को भी नियत्रित कर दिया। -- १२६ ] प्रयभनिन्तामणि [ग प्रभाग [ १६६ । जहाँ लक्ष्मी है यहाँ सतत नही, जदों में दोनों पदों निधन पर यशोवीर, या बड़ा आप है कि हम जानो शिपमान । [ १६७ ] वस्तु पाल और गधी मार से दोनो मनको याचना (म) के पुत्र, नहीं तो फिर इन दोनोका धान रनों पकडीमामा -1 इस प्रकार श्री मनंजयादि तीथोकी यात्राका प्रबंध समाम हुआ। - वस्तुपालका शंग्वराजके साथ युद्ध करना । १८९ ) स्तम तीर्थम, म(म) मानमिति (पास) श्रीनपाट की राई होने पर उसने म गुपुरले जग नागकदानितो गहिद 7 कान्दको बुलाया। यह समुद्र किनारे राधाकर उपने निगरका प्रमाणे (नामे) मंशा और व्यापारियों के जहाज बनने भरे है। खानेही (दूग) ही कार के साथ राज दिनका निभय किया। जब उसने पतुरंग मामातीने गुणासमार समटको आगे किया। भूपाल ने प्रनिता कि मिग ति दन पर प्रहार गरेको में उसे पवित्रा गौपर ही प्रहार करना गानंगा । किन बोकीन , चनक ने निट ( माके सैनिक ) ने कहा कि तो उसे लगाही मार मार निगा; निरसी गाम को भी गिरा देने के बाद बोला कि- 'सगुनके मजदीक दोन संगगा है!'नोगामालनिक शंखने ही उसकी भटनाको प्रशंसा करते हर बुलाया। दो दिन मा आमा र प्रहार करते एक ही प्रकारमें घोड़े के साथ उसे मार वा। इसके बाद, सगरम प्रेमी भीमनुने, और जैसे गजयूथको प्रासित करना है। बस, रके भयको मन बना रनों दिशा में भगा दिया। [ पीछे सइद नौवित्तिक भी मार डाला गया ! ] फिर भूजपा की मृत्युशयान पर मंत्रीने भूण पाटे भर प्रासाद बनवाया। ( यहाँ P प्रतिम निम्नलिखित श्लोक अधिक पाये जाते हैं-) [ १६८ ] धनुपकी प्रत्यगासे काण्डों ( वाणों ) की तो सन्धि (जुला और योग ) दुई पर उन वीरप्रकाण्डोंमें परस्पर विनइ हुआ। [ १६९ ] बाणोंने स्पष्ट ही दुर्जनोंकी सी चेष्टा की । क्यों कि वे कानमें तो दूसरेके लगते थे और जीवननाश दूसरेका करते थे। [ १७० ] तरकसको छोड कर बाण वेगसे धनुप पर आ जाते थे। यही तो सपक्षोंका (१ अपने पक्षवालोंका, २ पक्षसहितों-बाणोंका ) चिद है कि विपत्कालमें आगे रहते हैं। [१७१ ] विपक्षीय वैरियोंके वक्षःस्थलमें लग कर बाण पार निकल गये। [सो ठीक ही है] क्यों कि धीरोंके हृदयमें निर्गुणोंको चिर अवस्थान नहीं प्राप्त होता । [ १७२ ] मंत्रीशके हाथके संसर्गसे तलवार भी मानों दानके लिये उद्यत हो कर, बद्धमुष्टि होते हुए भी, क्षण भरमें कोश (१ म्यान, २ खजाना) का उत्सर्ग (१ त्याग, २ दान ) किया । [१७३ ] वीरोंके चरण और हाथ रूपी कमलसे पूजित हो कर रणभूमि भी मानों दूर्वारूपी केशोंके साथ सिररूपी फलोंका दान करने लगी। , प्रकरण १८९-१९१ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [१२७ . . - . - १९०) इसके बाद, एक दूसरे अवसर पर, श्री सोमेश्वर कवि ने यह काव्य कहा. २२३. हे सचिव ! आपका [बनाया हुआ] तड़ाग जिसमें चक्रवाक पक्षी चल रहे हैं और माति ( एक प्रकारके पक्षी जिसको देशमापामें आड कहते हैं ) क्रीडा कर रहे हैं, वह, अत्यन्त प्रशसित ऐसे हसोसे, कमल को छू कर हिलोलें लेती हुई तरगोंसे, अतगंभीर जलोंसे, और चचल बकोंके पास होने के मयसे छिपे हुए मत्स्यास, तथा किनारे पर उगे हुए वृक्षोंके नीचे सुखपूर्वक शयन किये हुई स्त्रियोंके गाये हुए गीतोंसे शोभित हो रहा है। इसमें प्रयुक्त ' आति' शब्दके पारितोषिकमें' मत्रीने कविको सोलह हजार द्रम्मका दान दिया । कभी फिर (किसी समय ) मत्री चिन्तातुर हो कर नीचे जमीनकी ओर देख रहे थे तब सोमेश्वरने यह यह समयोचित पद्य पदा- २२४ वाग्देवीके मुखकमलके तिलकसमान हे वस्तु पाल ! ' तुम्ही एक मात्र भुवनके उपकारक हो'-ऐसी सज्जनोंकी बात सुन कर जो लज्जासे सिर झुका कर तुम पृथ्वीतलकी ओर देख रहे हो, सो मैं मानता हू कि, अब स्वय पातालसे बलिका उद्धार करनेके लिये कोई मार्ग दूद रहे हो। मत्रीने इस काव्यके पारितोपिकमें आठ हजार दिया। इसी तरह पडितोंके बार बार इस श्लोकके ये तीन चरण पढ़ने पर कि- २२५ 'कर्णने दानमें चर्म दिया, शित्रिने मास दिया, जीमूतवाहनने जीव और दधीचि ने अस्थि दिये- इस पर पण्डित जयदेव ने समस्या पदकी नाई [ चौथा पद ] कहा-'और वस्तु पालने वसु (धन) दिया। ऐसा कहने पर उसने ४ सहस्र पाया। इसी प्रकार सूरि ( अपने धर्मगुरु ) के शिष्योंकी प्रतिलामनाके अवसर पर, किसी दरिद्र ब्राह्मणने याचना की, तो उसके नियुक्त आदमियोस उसे एक वन मिला, जिसे पा कर उसने मत्रीके आगे यह समयोचित 'पप पढ़ा- २२६ हे देव ! कहीं रुई, कहीं सूत, और कहीं कपासके वीज लगी हुई यह हमारी पटी (पिछोडी) तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियोंकी कुटीकी तरह दिखाई दे रही है। इसके पारितोषिकमें मत्रीने १५ सौ दिया । इसी तरह बाल चद्र नामक पडितने मत्रीके प्रति यों कहा- २२७ हे मत्रीवर ! गौरी तुम्हारे ऊपर अनुरागवती है, वृष तुम्हारा आदर करता है, भूतिस तुम युक्त हो और गुणवान् शुमगण तुम्हारे पास हैं । सो निश्चय ही ईश्वर (शिव ) की सभी कलाओंसे युक्त ऐसे तुम्हें अब वालचद्रको ऊचा स्थान देना उचित है। तुमसे बढ़ कर समर्थ और कौन है। [गौरी, वृष, मूति, गण, और वालचद्र-इन शब्दोंके प्रसिद्ध अर्थक अतिरिक्त, गौरी स्त्री, धर्म, वैभन, सेना और बोलने वाला कवि ये क्रमश श्लेपके अर्थ हैं।] कविके ऐसा कहने पर मत्रीने उसके आचार्य पदकी स्थापनाके लिये चार हजार द्रम्म खर्च किया । मत्रीका मुसलमान सुलतानके साथ मैत्री संबन्ध यांधना। १९१) किसी समय म्लेच्छराज (मुसलमान) मुलतानके गुरु मालिम (मौलवी) को मख (मका) तीर्थकी यात्राके लिये यहाँ आया हुआ जान कर उसे पकड़नेके इच्छुक श्रीलवणप्रसाद और वीरधवल ने मंत्री तेजपाल से सलाह पूछो । उसने इस प्रकार बताया- १ यह आदि शन्द प्राय संस्कृत साहित्यमें कहीं नहीं प्रयुक्त हुआ है इसलिये इसका अभिनव प्रयोग किया गया देख कर मैत्रीने या दान दिया मालूम देता है। - १२८.] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश २२८. धर्मछलका प्रयोग करके जो राजालोक ऋद्धि प्राप्त करते हैं, वह मांके शरीरको बेंच कर पैसा कमानेके समान होती है। इस नीतिशास्त्रके उपदेशद्वारा, उन वृक (भेडियों) जैसके मुंहसे उस छाग (बकरे) को छुड़ा कर और पाथेयादिसे सत्कृत कर, तीर्थयात्रा करनेके लिये रवाना किया। कुछ सालके बाद, वह जब वापस लौट कर आया तो मंत्रीने फिर उचित सत्कारसे उसका आदर किया। इससे वह अपने स्थान पर पहुंच कर [अपने सुलतानके सामने] तीर्य यात्राका बखान करनेके बदले श्री वस्तु पाल के गुणोंका ही बखान करने लगा। इसके बाद वह मुलतान प्रति- वर्ष मंत्रीके पास यमलकपत्र ( सन्धिपत्र ) भेज कर अनुरोध करता रहा कि- 'हमारे देशके आप ही अध्यक्ष है, और हम तो आपके सेलभृत् (सामंत) हैं। सो हमें किसी करणीय कार्यका आदेश दे करके सदा अनुगृहीत किया करें'। मंत्रीने शत्रुज य तीर्थक भूमिगृहमें रखनेके लिये सुलतानकी अनुज्ञासे, उसके देश की मम्मा णी नामक खानमेंसे, सैकड़ों प्रयत्न करके युगादि जिनकी एक मूर्ति बनवा कर मंगवाई। सुलतानने अपनेको धन्य मानते हुए वह कार्य करने दिया ! वह मूर्ति जब पर्वत पर चढ़ाई जा रही थी तो मूलनायकके अमर्षसे पर्वत पर बिजली गिरी । इसके बाद मंत्रीश्वरको फिर जीवनान्त तक शत्रुजय देवके दर्शन नहीं हुए। अनुपमाकी दानशीलता । १९२) किसी पर्वके अवसर पर, अनुप मा देवी मुनियोंको यथेच्छ निरुपम दान दे रही थी। तब किसी राजकार्यकी उत्सुकताके कारण स्वयं वीरधवल दे व उस समय वहां आ पहुंचा तो उसने देखा कि श्वेतांबर साधु-यतियोकी भीड़से मकानका दरवाजा मानों दटा हुआ है। तब विस्मयसे मनमें चकित हो कर वह मंत्री बोला – 'हे मंत्री, अभिमत देवताकी भाँति, सदा ही इन साधुओंका इस तरह सत्कार क्यों नहीं किया करते ? अगर तुमसे न हो सकता हो तो आधा हिस्सा मेरा रहे । मेरा ही सदा दिया जाय - ऐसा तो इस कारणसे नहीं कहता कि वैसा करने पर तो फिर तुमको यह वृथा ही परिश्रम करने जैसा लगे ।' उसके मुखचंद्रसे इस प्रकार वाणीरूप किरणके निकलने पर मंत्रीके मनका संताप दूर हुआ और वह बोला- 'स्वामीका आधा हिस्सा क्या ? सब कुछ तो आप ही का है।' यह कह कर उसने वन निछावर किया । १९३) एक दूसरी बार, यतिदानके अवसर पर, अनेक मुनियोंकी भीडके कारण नमन करती हुई श्रीमती अनुप मा की पीठ पर घीसे भरा हुआ एक पात्र गिर पड़ा। यह देख कर मंत्री तेज पाल बड़ा कुपित हुआ । उसे कुपित देख कर अनुपमा ने यह कह कर सान्त्वना की कि-'आप जैसे स्वामीके प्रमावसे ही तो मुनिजन द्वारा गिराये गये पात्रके घीसे मेरा यह अभ्यङ्ग (घृतस्नान ) हुआ।' इस प्रकार उसकी पूर्णदानकी विधिसे चमत्कृत हो कर, मंत्रीने पञ्चाङ्ग प्रसाद पूर्वक उसकी इस उचित उक्तिसे प्रशंसा की- २२९. प्रिय वाणीपूर्वक दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शूरता और त्यागसहित धन, ये चार भद्र ( भले ) कार्य दुर्लभ हैं। इस प्रकारकी अनेक दानवार्ताओंसे प्रसिद्धी पाने वाली उस देवीकी जैनाचार्याने इस तरह स्तुति की- २३०. लक्ष्मी चञ्चला है, शिवा चण्डी ( कोपना ) है, शची सौतदोषसे दूषित है, गंगा निम्नगामिनी है और सरस्वती वाचाल है। इस लिये अनुप मा तो सब तरहसे अनुपमा ही है। , वीरधवलकी रणशूरता। १९४) एक दूसरी बार, लवणप्रसाद और वीरधवल पंचनामके [स्वामीके ] साथ संग्राम करने पर तुले। तब श्री वीरधवल की पत्नी ज य त ल देवी सन्धिविधानकी इच्छासे अपने पिता प्रती हा र वंशीय श्री १ यह लवण- प्रकरण १९१-१९७ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [१२९ शोभन देव के पास गई तो उसने कहा कि क्या- वैधव्यसे डर कर सन्धि कराने आई हो । तब अपने वारचूड़ामणि पति वीर धवल को उन्नत बनाती हुई वह बोली-'केरल पितृकुलके विनाशकी आशकासे में बारबार ऐसा कह रही हू। जब वह नीर घोड़े पर चढ़ेगा तो ऐसा कौन सुभट है जो उसके सामने खड़ा रहेगा। कह कर वह सक्रोध चली गई । लड़ाई छिड़ने पर वीरधवल को [एक सख्त ] प्रहार लग गया और उसकी व्ययासे व्याकुल हो कर वह जमीन पर गिर पड़ा। तब सुभटोंका दिल कुछ हिम्मत हारता हुआ देख, प्रसाद ने अपनी सेनाको यह कह कर उत्साहित किया कि- 'अरे! यह तो केवल एक ही सैनिक गिरा है' ऐसा कह कर समस्त शत्रुसेनाका खेलमें ही समूल घस कर दिया । सत्त्वगुणसे दीप्त वह वो र धवल [ इस प्रकार ] रणरसिकताके वश हो कर इकोस बार अपने पिताके आगे गिरा था। वीरधवलकी मृत्यु। २३१ वह भीम जैसा पराक्रमशाली ( वीरधवल ) पश्च ग्राम की समरभूमिमें घावोंके लगने पर घोड़की पीठ परसे गिरा, पर गर्वसे नहीं । १९५) वीरधवल की आयुके अन्तमें, प्रतितीर्थ (परलोक ) को प्रस्थान करने वालेको दान करनेसे एकका हजार गुणा मिलता है, इस रूढिके अनुसार तेजपाल ने अपने सारे जन्मका पुण्य दान कर दिया । फिर जब वह स्वामी चल बसा तो उसके सौभाग्यके अतिशयसे १२० सेनकोंने सहगमन किया । तब तेजपाल ने प्रेतरनमें पहरेदारोंको बिठा कर लोगोंको उस आग्रहसे निपिद्ध किया। २३२ अन्यान्य ऋतु तो आती-जाती रहती है पर ये दो ऋतु आ कर फिर नहीं गई। वीरधवल वारके पिना प्रजाओंकी आखोंमें वर्षा और हृदयमें प्रीष्म [ सदाके लिये रह गई।] १९६) इसके बाद, मत्रीने वीरधवल के पुत्र वीस ल देव को राजपद पर अभिषिक्त किया। * अनुपमाकी मृत्यु। श्री अनुपमा देवी की मृत्युके बाद श्री तेजपाल के हृदयमें जो शोककी गाठ बध गई वह किसी तरह छूटती नहीं जान कर, वहा पर आये हुए श्री विज यसेन सूरिसम समर्थ पुरुपके द्वारा वह निपति शान्त कराई गई । कुछ चेतना होने पर लजित तेजपाल से सूरिने कहा- हम इस अवसर पर तुम्हारी लीला देखने आये थे । तो यस्तु पालने पूछा कि-' वह क्या।' इस पर गुरुने कहा-'हमने शिशु तेजपाल को च्याहने के लिये जब धरणिग के पाससे उसकी कन्या इस अनुपमा की मगनी की थी, तब स्थिरपन-दानके पश्चात् एकान्तमें उस कन्याकी निरूपताकी बात सुन कर, इसने उसका सबध भग होनेके लिये चन्द्रप्रभके मन्दिरके आहातेमें प्रतिष्ठित क्षेत्राधिपतिको आठ गुम्म का मोग चढाना माना था। और इस समय उसके नियोगमें पागल हो गये हैं । इन दोनों वृत्तान्तों से कौनसी बात सच्ची है।' इस प्रकार उस पुराने सकेतसे ते ज पाल ने अपने हृदयको दृढ़ किया। वस्तुपालकी मृत्यु। १९७) फिर दूसरी बार, जब मंत्री वस्तु पाल पूर्णायु हुए तो शत्रुज य की यात्राकी इच्छा की । यह जान कर पुरोहित सो मे भर देव वहाँ आया। अमूल्य आसन देने पर भी जब यह नहीं बैठना चाहा तो कारण पूछने पर बोला- १३० ] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्य प्रकाश २३३. श्री वस्तु पाल के अन्न-दान, जल-पान, और धर्मस्थानोंसे तो पृथ्वीतल, और यशसे सारा आकाश-मंडल ढंक गया है। इसलिये स्थानाभावके कारण नहीं बैठ रहा हूं। उसकी इस वाणीके निमित्त उचित पारितोपिक दे कर, उससे विदा मांग कर, मंत्रीने रास्तेमें प्रस्थान किया। आं के वाली या ग्रामकी एक गंवार झोपडीमें दाभकी चटाई पर बैठा हुआ, गुरुद्वारा आराधना करता हुआ आहारका त्याग करके, अन्तिम आराधनासे कलिमलका ध्वंस किया और अन्तमें युगादिदेवका ही जाप करता हुआ- २३४. सज्जनोंके स्मरण करने लायक ऐसा कुछ भी सुकृत नहीं किया। केवल मनोरथ ही करते हुए हमारी यह आयु चली गई। इस वाक्यके अन्तमें ' नमोऽर्हद्भ्यः नमोऽईद्भ्यः' ( अर्हतोंको नमस्कार ) इन अक्षरोंके उच्चारणके साथ ही सप्तधातुबद्ध इस शरीरका त्याग करके, स्वकृत उत्तम पुण्यफलको भोगनेके लिये, उसने स्वर्ग लोकको अलंकृत किया। उसके संस्कार स्थान पर छोटे भाई तेजपाल और पुत्र जैत्र सिंह ने श्री युगादि देवकी दीक्षावस्थाकी मूर्तिसे अलंकृत स्वर्गारोहण प्रासाद बनवाया । २३५. आज, मेरे पिताकी आशा फलवती हुई, माताके आशीर्वादका अंकुर उगा, जो मैं इस प्रकार अखिन्नभावसे युगादि देवकी यात्रा करनेवाले लोगोंको [अपनी शक्ति-भक्तिसे] संतुष्ट कर रहा हूं। २३६. जिन लोगोंने राजाकी सेवाके पापसे कुछ भी पुण्यार्जन नहीं किया उन्हें हम धूलिधावक (धूलके ढोहनेवाले ) लोगोंसे भी अधमतर समझते हैं । ये तथा अन्य काव्य स्वयं वस्तु पाल महाकविके रचित हैं। २३७. स्वामिके गुणोंसे पूर्ण वह बी र ध व ल एक निस्सीम प्रभु हुआ, विद्वानों द्वारा भोजराजका विरुद प्राप्त करने वाला वस्तु पाल एक अद्वितीय कवि हुआ, प्रधानवर्गमें वह तेजपाल अद्वितीय मंत्रीश्वर हुआ और गुणोंसे अनुपम ऐसी अनुप मा उसकी स्त्री एक साक्षात् लक्ष्मी हुई। , इस प्रकार श्री मेरुतुंगाचार्यविरचित प्रबंधचिन्तामणिमें श्री कुमारपाल भूपाल प्रमुख-मंत्रीश्वर वस्तुपाल और तेजःपालतकके महापुरुपोंके यशका वर्णन करनेवाला यह चौथा प्रकाश समाप्त हुआ।
११. प्रकीर्णक प्रवन्ध । अब, यहाँपर पूर्वोक्त महापुरुषोंके चरित्रके वर्णनमें जो रह गये हैं उन तथा [वैसे ही ] अन्य चरित्रोंका वर्णन इस प्रकीर्णक-प्रकाशमें प्रारम किया जाता है । वे इस प्रकार हैं- विक्रमादित्यकी पात्रपरीक्षा । १९८) उस अवन्ती पुरी में, जिसके निकट ही सिप्रा नदी वह रही है, प्राचीन कालमें श्री विक्रमादित्य राजा राज्य करता था। उसने सुना कि उसके सत्रागारमें विदेशी लोग भोजनके अनन्तर जो सो जाते फिर नहीं उठ पाते (अर्थात् मर जाते हैं ), इससे विस्मयसे मनमें चकित हो कर राजाने कारण जानना चाहा । उन सभी पथिकोंको दूसरे दिन वस्त्रसे ढंका दिया और उस चिरनिद्राकी वातको गुप्त रखनेकी आज्ञा दी। फिर दूसरे दिन आये हुए अन्य पथिकोंको उसी तरह भोजन कराया और सायकाल उनको उष्ण जल तथा चरणोंमें लगानेके लिये तेल दिया गया। जब वे सन सो गये तो, महानिशामें राजा अपने हाथमें कृपाण ले कर स्वयं एकान्त जगहमें छिप कर खडा रहा । वहाँ कोनेमें पहले धुआँ निकला, फिर आगकी लपट और फिर प्रकाशित फणाकी रत्नप्रभासे अलकृत सहस्रफण ऐसे नागको निकलते देखा । आश्चर्यसे चमत्कृत हो कर राजा जर सवि- स्मय उसे देखता है, तो वह फणींद्र उस दिनके सोये हुए प्रत्येक पथिकसे पूछने लगा कि वह किस चीजका पात्र है ! उनमेंसे प्रत्येकने, किसीने अपनेको धर्म-यात्र, गुण-पात्र, तप पात्र, रूप-पात्र, काम-पात्र या कीर्ति-पान इत्यादि इत्यादि बताया । अज्ञान और यदृच्छाश उसके शापसे उन्हें मरते देख श्री विक्रम ने आगे बढ़ कर हाथ जोड़ कर कहा- २३८ हे भोगीन्द्र (नागराज), पृथ्यापर बहुधा गुणके योगसे पान हुआ करते हैं। किन्तु शुद्ध श्रद्धा- से जो पवित्र बना हुआ मन है वही परम पात्र है। इस प्रकार नागराजने अपने ही आशयको कहनेवाले विक्रमादित्य के प्रति कहा कि ' वर माँगो'। श्री विक्रमादित्य ने कहा कि इन पथिकोंको जीवित बनाओ'। इस प्रकारका वरदान मांगने पर उसने फिर विशेष भानसे उसे सतुष्ट किया । इस प्रकार श्री विक्रमकी पानपरीक्षाका यह प्रवध समाप्त हुआ। , मरे हुए नदका पुनर्जीवन । १९९) एक बार, पाटलीपुत्र नगरमें, अत्यन्त आनन्दपरायण ऐसे नद राजाको मृत्यु होनेपर, उसी समय एक कोई ब्राह्मण वहाँ आया और दूसरेके शरीरमें प्रवेश करनेपाली विद्याके द्वारा राजाके शरीरमें प्रवेश कर गया । उसीके सकेतसे एक दूसरा ब्राह्मण राजाके द्वारपर आ कर वेदोचार करने लगा, जिससे राजा जी उठा और फिर उसने अपने कोपाध्यक्षोंसे उसको एक लाख स्वर्ण दिलाया। इस वृत्तान्तको जान कर महामनीने सोचा कि यह नद पहले तो वहा कृपण था और इस समय बड़ा उदार हो रहा है सो यह बात चिंतनीय है । ऐसा जान कर उस मासणको पकड़वा लिया और पर-काय प्रवेशकारी विदेशीको सर्वत्र हुँदबाया तो यह माश्म पहा कि, कही पर एक मुर्देकी, कोई एक आदमी रखवाली कर रहा है । तो उसे चितापर चदया कर भस्म करवा दिया। अपने अतुलनीय मतिमवसे उस पूर्व नदको ही अपने महान् साम्राग्यमें फिर निमा लिया । इस तरह यह नद प्रवध समाप्त हुआ।
२३२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाश राजा शिलादित्य और मल्लवादी सूरिका प्रवन्ध । २००) खेड़ा नामक महास्थानमें, दे वा दित्य नामक ब्राह्मणकी अति रूपवती बालविधवा सुभगा नामक पुत्री, प्रातःकाल सूर्यको अर्यकी अञ्जलि दान किया करती थी। तब, अज्ञातरूपसे सूर्यसे उसका संयोग हो गया और वह भोगरूप हो कर उससे उसको गर्भ रह गया। माँ बापने किसी तरह इस असमंजस कार्यको जब जाना तो उसे कुछ कह-सुन कर अपने स्वजनोंद्वारा व ल भी नगरीके पास छुड़वा दिया । वहाँ उसको पुत्र पैदा हुआ, जो क्रमशः बड़ा हो कर, समवयस्क शिशुओंके साथ खेलते समय, इस प्रकार अपमानित किया जाने लगा कि, वह बिना बापका है । तब, माँके पास आ कर उसने अपने पिताके बारेमें पूछा तो उसने कहा कि 'मैं कुछ नहीं जानती'। इससे अपने जीवनसे विरक्त हो कर उसने मर जाना चाहा, तो फिर सूर्यने प्रत्यक्ष हो कर हाथमें कंकड़ दे कर उसकी सान्त्वना की। उन्होंने कहा कि-'तुम्हारी मातासे सम्पर्क करनेवाला मैं सूर्य तुम्हारा पिता हूँ। यह कंकड़ अगर अपने किसी पराभव-कारीपर फेंकोगे तो शिलारूप हो कर उसको लगेगा; पर किसी निरपराधको मारोगे तो फिर तुम्हारा ही अनर्थ करेगा। यह कह कर सूर्य तिरोधान हो गये। फिर अपने कितने एक पराभवकारियोंको मारता हुआ वह ' शिला दित्य ' इस सार्थक नामसे प्रसिद्ध हुआ । उस नगरके राजाने उसकी परीक्षा करनी चाही । तो उसी शिलासे उसे मार कर वह स्वयं राजा बन गया । सूर्य नारायणके प्रसादसे प्राप्त ऐसे अश्वपर चढ़ कर वह सदैव आकाश-चारीकी नाई खेच्छया विहार करता हुआ अपने पराक्रमसे दिगन्तको आक्रान्त कर रहा । फिर चिर कालतक राज्य करके, जैन मुनियोंके संसर्गसे उसने सम्यक्त्व रत्नको प्राप्त किया और श्री शत्रुज य तीर्थकी अपरिमित महिमाको जान कर उसका जीर्णोद्धार किया । बौद्धों और जैनोंमें वाद-विवाद । २०१) एक बार, उस शि ला दित्य के सभापतित्वमें, बौद्धों और [जैन ] श्वेतांबरोंने परस्पर इस शर्तपर शास्त्रार्थ किया कि- जो [ पक्ष ] पराजित होगा उसको देश-त्याग करना पडेगा । श्वेतांबरोंके पराजित होनेपर शिलादित्य ने उन सबको अपने देशसे निकाल दिया; पर अपरिमित गुणवान् ऐसे उसके भानजे मल्ल नामक क्षुल्लकको उपेक्षा दृष्टि से देखते हुए बौद्धोंने उसे वहीं रहने दिया । और इस प्रकार अपनेको विजयी मानते हुए वे शत्रु ज य तीर्थपरके श्रीयुगादि देवको बौद्ध रूपसे पूजने लगे। क्षत्रिय कुलमें उत्पन्न होनेके कारण उस मल्ल के दिलमें वह वैरभाव बस रहा, और वह उसका प्रतीकार सोचता रहा। जैन दर्शन (आचार्यो) के अभावमें उन्हींके पास वह अध्ययन करने लगा और दिन रात उसीमें चित्त लवलीन रखने लगा । एक बार, बड़ी गर्मीकी अर्द्ध रात्रिको, जब समस्त नागरिक लोग नींदसे आँखें बंद किये हुए थे, वह दिनमें अम्यस्त शास्त्रको जोर-जोरसे याद करने लगा। उसी समय आकाशमार्गसे जाती हुई श्री भारती देवीने पूछा कि-' मीठे क्या हैं ? ' उसने चारों ओर देख कर, बोलनेवालेको न पा कर उत्तर दिया ' वल्ल '। फिर ६ महीनेके बाद उसी समय लौटती हुई वाग्देवीने फिर पूछा ' किसके साथ ? '; तब पुरानी बातको स्मरण करके उसने प्रत्युत्तर दिया कि ' घी और गुड़के साथ ' । उसकी स्मरण रखनेकी इस अद्भुत शक्तिसे चमत्कृत हो कर [ भारतीने ] आदेश दिया कि 'वर माँगो'। उसने इस आशयकी याचना की कि ' सौगतों ( बौद्धों ) को पराजित करनेके लिये किसी प्रमाण शास्त्रके देनेकी कृपा करो।' इसपर भारतीने 'नय-चक्र' ग्रन्थ अर्पण करके उसे अनुगृहीत किया। इसके बाद भारतीके प्रसादसे तत्त्व समझ कर शि ला दित्य की अनुज्ञासे, बौद्धोंके मठमें ' तृणोदक ' फेंक कर, राजसभामें पूर्वोक शर्तके साथ उनसे शास्त्रर्थ किया। जिसके कण्ठपीठमें वाग्देवता अवतीर्ण हुई थी ऐसे उस श्री मल्ल ने शीघ्र ही उन्हें निरुत्तर कर दिया । बादमें राजाज्ञासे उन सब बौद्धोंको देशमेंसे निकाला गया और जैनाचार्योको बुलाया गया । इस प्रकार बौद्धोंको जीतने के बाद वह मल्ल 'वादी' कहलाने लगा और फिर राजाकी प्रार्थनापर . , . , - प्रकरण २००-२०३] प्रकीर्णक प्ररन्ध । [१३३ गुरुने उसे सूरिपद दिया । तबसे उनका नाम हुआ श्री मल्ल वा दी सूरि । गणमृतके समान वे प्रभावक हुए। अतएव श्री संघने, नवाझवृत्तिकार श्री अभय देव सूरिने जिसको प्रकट किया उस स्तम्भन क तीर्थ की विशेष उन्नतिके लिये, उनको चिन्तायक (व्यवस्थापक) रूपमें नियुक्त किया। इस प्रकार यह मल्लवादि अपध समाप्त हुआ। . * . . - वलभी नगरीके विनाशकी कथा । २०२) मरु म ण्ड ल के पछी ग्राम में का कू और पाता क नामक दो भाई रहते थे। उनमें जो छोटा था वह धनवान् था और जेठा उसीके घर नौकर था । किसी समय, बर्षा ऋतुके निशीथ कालमें, दिनभरमें किये हुए कामसे थक कर का कू सोया हुआ था। छोटेने कहा-'भैया, अपनी [खेतकी ] क्यारियोंमें पानी भर गया है, उनकी मेंड टूट गई है और तुम निश्चिंत वैठे हो' यह कह कर उसे फटकारा । वह उसी समय, विछौना छोड़ कर और कंधेपर कुद्दाल रख कर, अपने नसीबकी निंदा करता हुआ जब वहाँ पहुँचा, तो देखा कि कई मजदूर टूटी हुई मेंडोंकी मरम्मत कर रहे हैं। उन्हें ऐमा करते देख उसने पूछा कि 'तुम लोग कौन हो उन्होंने कहा कि 'आपके भाईके चाकर हैं । ' इसपर उसने पूछा कि 'भला मेरे भी कोई चाकर कहीं है।' तो उन्होंने कहा कि 'वल भी नगरी में हैं । वह फिर अवसर पा कर अपने सर्वस्वको गहड़में बाँध कर, उसे सिरपर उठा कर, व ल भी में आया। वहाँ सदर दरवाजेके समीपवर्ती आभीरोंके पास निवास करने लगा । उन्होंने अत्यन्त गरीब समझ कर उसे रिक' कहना शुरू किया । रक घासकी झोपड़ी बना कर, और घासहीसे उसे छा कर रहने लगा। उसी समय कोई कार्पटिक (जोगी) कल्प-पुस्तकके आधारसे, रैवत शैलसे एक तुत्रेमें सिद्धरस ले कर, मार्ग अतिक्रम करता हुआ [ चला आ रहा था । अचानक ] उस तुबे से ' काक्य तुम्बडी ' ( काकूकी तुम्बड़ी ) इस प्रकारकी अशरीरिणी वाणी हुई, जिसे सुन कर वह बड़ा विस्मित हुआ, और फिर डरता हुआ उस छिपे हुए बनियेक घरमें, यह सुन कर कि वह एक रक है, निश्शङ्क-मारसे उस रसवाले तुबेको थातीके रूपमें रख दिया । वहाँसे वह सोमेश्वर की यात्राके लिये चला गया। एक दिन [रंकने ] किसी पर्वके अवसरपर देखा कि, पाक करनेके लिये चूल्हेपर चदाई हुई कड़ाहीमें, तुबेसे निकले हुए रसके गिरनेसे वह सोनेकी हो गई है। इससे उस वनियेने मनमें निर्णय किया कि यह सिद्धरस है । तब उसने उस तुबेके साथ अपने घरका सब कुछ सामान अन्यत्र पहुँचा कर घरको आग लगा कर भस्म कर दिया | नगरके दूसरे दरवाजेपर बड़ा मकान बना कर वहीं रहने लगा । एक बार, किसी घी बेंचनेपालीसे घी खरीद रहा था। सुद ही तौल करते हुए उसने देखा कि उसमेंसे धी खूटता ही नहीं है । नीचे देखा तो घौके पारके नीचे कृष्ण चित्रक [लता ] की कुण्डलिका नजर आई। फिर किसी प्रकार छल करके उसे उठा लिया और इस प्रकार उसे चित्रक सिद्धि प्राप्त हो गई । इसी तरह अगणित पुण्यके प्रमारसे उसे सुवर्णपुरुषको सिद्धि भी प्राप्त हुई । इस प्रकार तीनों प्रकारकी सिद्धिसे कोटि-कोटि सख्याधन एकत्र करके भी, उसने अत्यन्त कृपणतारश, या तीर्थमें उदारता पूर्वक उसका खर्च करना तो दूर रहा, वन्कि सर टोगोंके सर्वस्वके हरण करनेफी इच्छासे, उस लक्ष्मीको सफल निसके लिये कालरात्रिके समान प्रकट किया। २०३) ऐसेमें, राजाने अपनी लड़कीके लिये, उसकी लड़कीकी रनपचित सुपर्णकी फीको जबर्दस्ती उससे छिना ली । इससे पिरोधी हो कर वह स्वय म्लेच्छ मण्डलमें गया और पल भी के राम्पका नाश करानेके टिये, करोडोंका सोना दे कर, वहाँके बलवान राजाको देशपर चढा ठाया । उस (एक) के द्वारा अनुपस्त, उस राजाके एक छत्रधरने, रात्रिके शेष भागमें, जब कि राजा सुम-जापत अपस्यामें था, पढ़ेसे हो ठीक किये हुए, " किमी सत्पात्र - १३४ 'प्रवन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाश - किसी पुरुषके साथ इस प्रकार बात-चीत करने लगा कि-'हमारे स्वामीको अच्छी सलाह देनेमें कोई चूहा भी नहीं दिखाई देता; जिससे यह अश्वपति महीमहेन्द्र ( राजा ) एक मामूली बनियेके कहनेसे-जिसका न तो कोई कुल- शील ही मालूम है और न यही मालूम है कि वह कोई अच्छा आदमी है या बुरा; और फिर जो नामसे भी और कर्मसे भी रंक बना हुआ है-सूर्यपुत्र शिलादित्य के प्रति चल पड़े हैं !' उसकी इस यथार्थ पथ्य बातको सुन कर, चित्तमें कुछ विचार करके, राजाने उस दिन आगे प्रयाण करनेमें विलंब किया । तत्र, उस सशंक रंकने, इस बातको निपुणभावसे जान कर, उस छत्रधरको काञ्चन-दान दे कर सन्तुष्ट किया । तब फिर दूसरे दिन [ वहीं छत्रधर बोला ] चाहे विचार करके या विना विचारे ही यह राजा प्रयाण करके चल पड़ा हो; पर अब ‘सिंहके उठाये हुए पैरकी नाई' इस कहावतके अनुसार आगे चलनपर ही इसकी शोभा है । क्यों कि- २३९. ही मे जिसने हाथियोंका दलन किया है उस सिंहको, लोग चाहे मृगेन्द्र कहें चाहे मृगारि, ये दोनों बातें सिंहके लिये तो लज्जाजनक ही हैं । और फिर इस पराक्रमशालीके सामने ठहर भी कौन सकेगा ? ' उसकी ऐसी बातोंसे उत्साहित हो कर, भेरीके निनादसे पृथ्वी और आकाशके अंतरालको बचिर करते हुए उस म्लेच्छराजने आगे प्रयाण किया । इधर उस अवसरपर व ल भी स्थित चन्द्रप्रमका बिंब, अम्बा और क्षेत्रपालके साथ, अधिष्ठायक देवताके बलसे आकाश मार्ग द्वारा शि व पत्त न ( सो म नाथ )की भूमिको प्राप्त हुआ। रथपर अधिरूढ श्री वर्धमानकी अनुपम प्रतिमाने, अदृश्य भावसे, अधिष्ठातृ देवताके वलसे रास्तेमे चलते हुए आश्विनी ( आश्विन मासकी ) पूर्णिमाके दिन श्री मा ल पुर को अलंकृत किया । अन्य अतिशयवाली देवमूर्तियोने भी यथोचित भूभागको अलंकृत किया । उस नगरकी अधिष्ठातृ देवताने श्री वर्ध मा न सूरिके साथ, उत्पातज्ञापनके समय [ इस तरहकी बातें की ]- २४०. 'हे देवीके सदृश सुंदरि, तुम किस कारणसे रो रही हो सो बताओ'; ' हे भगवन् , मैं व ल भी पुर का भंग देख रही हूँ। इसका प्रमाण यह है कि आपके साधु लोग भिक्षामें जो दूध पायेगे वह तब रक्त हो जायगा । [ फिर यहाँसे जा कर ] मुनियोंको उसी स्थानपर रहना चाहिये जहाँ पानी भी दूध हो जाय इसके बाद, जब वह उत्पात हुआ और नगरीके पास म्लेच्छ सेना आ गई, तो देशभंगके पापपंकमें फसे हुए रंक ने धन दे कर, पंच शब्दवाले वाद्योंके बजानेवालोंको अच्छी तरह फोड लिया। जब शिलादित्य घोड़े- पर चढ़ने लगा तो उन्होंने ऐसा प्रतिशब्द किया, जिससे वह घोड़ा, गरुड़की भाँति आकाशमें उड़ गया। यह देख कर राजा शि ला दित्य किंकर्तव्यमूढ़ हो रहा और उन म्लेच्छोंने उसे मार डाला। फिर तो म्लेच्छोंने खेल ही में व ल भी शहरको तहस-नहस कर दिया । २४१. विक्रमादित्य के समयसे ३७५ वर्ष बाद, व ल भी नगरी का यह भंग हुआ । इस प्रकार शिलादित्य राजाकी उत्पत्ति, रंककी उत्पत्ति और उसके द्वारा किये गये वलभी-भंगका यह प्रवन्ध समाप्त हुआ। - - १ . श्रीपुंजराजकी उत्पत्ति । २०४) श्री रत्न मा ल नगर में रत्न शेख र नामक राजा हुआ। वह किसी समय, दिग्विजयसंबंधी यात्रासे वापस लौट कर अपने नगरमें आया। प्रवेशके महोत्सबके समयमें, बाजारकी शोभाकी सजावट देखता हुआ जब जा रहा था, तब एक हाटमें काठके पात्र (कठौत) सहित कुद्दालको रखे हुए देखा । महलमें प्रवेश करनेके बाद जब महाजन लोग उपहार ले कर आये तो उनसे पूछा कि 'आप सब लोग सुखी तो हैं ?' तो उन्होंने कहा- प्रकरण २०३-५ ] प्रकीर्णक प्रवन्य [१३५ . + नहीं महाराज, हम लोग सुखी नहीं हैं। उनके ऐसा कहनेपर विभ्रमसे भ्रान्तचित्त हो कर उनको विदा किया, और फिर कभी किसी वातकी विचारणाके समय नगरके प्रधान जनोंको बुला कर पूछा कि आप लोग क्यों सुखी नहीं है । और साथ ही काठके पात्रके साथ उस कुदालको ऊचा करके वैसे रखनेका कारण भी पूछा। उन्होंने कहा कि-'जहाँपर स्वामीने काष्ठपात्र आदि देखा है यह धनी, अपने धनकी गिनती न जान कर, कठौतसे ही उसकी नापको जतानेका समेत करता है। और हम लोग सुखी नहीं हैं सो तो आपके सन्तानामापसे । यह नगर कोटिप्वजोंसे भरा है। आपने चिर कालतक इसका लालन किया है, पर अब कौन इसे उन्नत वनावेगा।' यह सुन कर राजाने अपने अत पुरकी पुरानी रानियोंको वघ्या समझ कर नई रानीक करनेकी इच्छा की। तब उसकी अनुमति पा कर वे लोग, पुष्य नक्षत्रपाले रविवारके दिन,पुण्यार्क योगमें, किसी बड़े शकुन शास्त्रज्ञके साथ शकुनागारमें गये । वहाँ पर, एक मात्र लकड़ीका बोझ उठा कर अपना पेट भरनेवाली ऐसी कगालिन स्त्रीको देखी जिसके सिरपर दुर्गा बैठी यी और जो आसन्नप्रसपाली स्थितिमें थी । शकुनज्ञने उसकी अक्षतादिसे पूजा की। उन लोगोंने कारण पूछा तो उसने कहा कि अगर बृहस्पतिका मतव्य सच है, तो इसके गर्भ में जो कोई टड़का है वही यहाँका मानी राजा होगा। इस बातको असभव समझ कर उन्होंने लौट कर मानोन्नत उस राजाको, ज्यों की त्यों, वह सब बात कह सुनाई । राजाने इससे मनमें खिन्न हो कर, अपने निनी मनुष्योंको भेज कर, उस स्त्रीको जमीनमें गाड़ देनेकी आज्ञा की। उन्होंने जा कर उससे कहा कि 'इष्ट देवताका स्मरण कर लो'। उनके ऐसा कहनेपर वह मरणभयसे व्याकुल हो उठी । इतनेमें सध्याके हो जानेसे उनकी अनुज्ञा ले कर वह शौच जानेके लिये गई, तो वहीं उसको पुत्रका प्रसर हो गया । वह उसे वहीं छोड़ कर लौट आई । फिर उसको जमीनमें गाड़ कर उन मनुष्याने राजाको उसकी सूचना दी । इधर एक हिरनी उस बालकको, नित्य दोनों शाम दूध पिला कर, बड़ा करने लगी। उस समय, महालक्ष्मी देवीफे सामनेकी टकशालामें जो नया शिक्का पड़ने लगा उसमें हिरनीके चार पैरके नीचे एक बालककी प्रतिकृति पडती हुई देखी गई, जिसके कारण लोगोंमें यह बात फैलने लगी कि कोई नया राजा उत्पन्न हुआ है । इससे उस रल शेखरने पता लगा कर उस बच्चेको मरवा डालनेके लिये चारों ओर अपने सैनिक भेजे । उन्होंने प्रयत्न करके उस बालकको प्राप्त किया। लेकिन बाल-हत्याके मयसे स्वय उसे न मार कर, नगरके सदर दरवाजे के रास्तेमें इस तरह रख दिया, कि जिससे सायकालके समयमें, उस मार्गसे निकलनेवाली गायोंकी खुरीकी चोटोंसे आप ही आप वह मर जाय और लोकमें कोई अपवाद न हो। उसे वहाँ छोड़ कर, कुछ दूर खड़े हुए, वे जब देखने लगे तो उतनेमें यहाँ गायोंका एक झुड आता उन्हें दिखाई दिया । पर, मानों मूर्तिमत पुण्यके पुंजकी नाई उस बालकको देख कर वे सब गायें, पैरोंसे स्तभितकी नाई, खड़ी रह गई। इसके बाद, पठिसे आगे आ कर एक साँडने, धूपम जैसे ही तेजस्वी उस वालकको, अपने पैरोंके वीचमें रख कर, सब गायोंको आगे चलने के लिये प्रेरित किया। बादमें, इस वृत्तान्तको सुन कर, राजा उन सामन्त और नगर लोकोंके द्वारा, उस वालकको मॅगा कर, अपने पुत्रकी नाई उसका पालन करने लगा। 'श्रीपुख' ऐसा उसका नाम रखा गया । श्रीमाताकी उत्पत्तिका वर्णन । २०५) इसके वाद, जब वह रत्न शेख र राजा स्वर्गगामी हुआ तो श्रीपुञ्ज का अभिषेफ हुआ। कुछ दिन राज्य फरनेपर उसके एक पुत्री पैदा हुई । यद्यपि वह सांग सुन्दर थी पर मुँह उसका बानरका-सा था । इमसे यह विषयविमुख हो कर वैराग्यके साथ रहने लगी और श्री माता के नामसे प्रसिद्ध हुई। एक बार उसे अपने पूर्व जन्मका स्मरण हो आया । पिताके सामने उसने उसे निवेदन किया कि-'मैं पूर्व जममें अर्बुद १३६ ] प्रवन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाश गिरि पर वानरकी ली थी। वहां पर किसी एक वृक्षकी, एक शाखासे दूसरी शाखापर कूदते हुए, कोई अगम्य शल्यसे तालमें विद्ध हो कर मैं मर गई । उसीके नीचे कामिक नामक तीर्थका कुण्ड था जिसमें मेरा धड़ गिर पड़ा । उस तीर्थके पुण्य-प्रभावसे मेरा यह शरीर तो मनुष्यका हो गया; किन्तु वह मेरा मस्तक अभी तक वैसे ही पड़ा है इसलिये मै बानरके मुखवाली हुई हूं। श्री पुंज ने यह सुन कर अपने विश्वसनीय आदमियोंको वहाँ भेज कर] उसके शिरको कुण्डमें डाल देनेके लिये आदेश दिया । उन्होंने जा कर चिर कालसे उसी प्रकार पड़े हुए मुखको वैसा ही देखा और फिर उसे कुण्डमें डाला | तब वह श्री मा ता मनुष्यके मुखबाली हो गई। फिर माता-पिताकी अनुज्ञा ले कर अर्बुदजितनी संख्यावाले गुणोंकी धारक वह, उस अर्बुद पर्वत पर जा कर तपस्या करने लगी। एक बार, एक आकाशचारी योगीने उसे देखा तो वह उसके सौन्दर्यसे हृत-हृदय हो कर आकाशसे नीचे उतरा और प्रेमालाप-पूर्वक उससे कहने लगा कि 'तुम मुझसे व्याह क्यों नहीं कर लेती ?'। उसके ऐसा पूछनेपर वह बोली कि-' इस समय रात्रिका पहला पहर व्यतीत हुआ है; चौथे पहरमें-जब तक मुर्गा न बोल उठे तब तकमें-अगर किसी विद्याके बलसे तुम बड़ी सुंदर ऐसी बारह पद्या ( पत्थरकी सीढियाँ ) बनवा दो तो मैं तुमको वर लूंगी। उसके ऐसा कहनेपर, तुरन्त ही उस कार्यके लिये उसने अपने चेटकोंके झुंडको नियुक्त किया और दो ही पहरमें वे सब पद्यायें बनवा दीं। पर इधर श्री माता ने उतनेहीमें मुर्गेकी बनावटी आवाज कर दी। उसने आ कर कहा कि [पद्या तैयार है इससे अब] 'विवाहके लिये तैयार हो जाओ तो इसपर श्री मा ता ने कहा कि 'जब वे बन रही थीं तभी मुर्गेकी आवाज़ हो गई थी। तो उसने कहा 'वह तो तुम्हारी मायाजालके बनाये हुए बनावटी मुर्गेकी ध्वनि थी, सो इसको कौन नहीं जानता' । ऐसा उत्तर देते हुए, नदीके किनारे अपनी बहनके द्वारा विवाहका उपहार उपस्थित कराया। श्री माता ने ' सब विद्याओंका मूल जो यह त्रिशूल है इसे यहीं छोड़ कर विवाहके लिये तैयार रहो' ऐसा कह कर उसे वहां बुलाया। प्रेमके वशमें हृतचित्त हो कर वह वैसा ही करके उसके समीप आया। श्री मा ता ने बनावटी कुत्ते बना कर उसके पैरों पर छोड़ दिये और हृदयमें त्रिशूलका आवात करके उसे मार डाला । इस प्रकार निःसीम शीलके साथ उसने अपनी सारी जिन्दगी बिताई । उस अखण्ड शीलाकी मृत्युके बाद, श्री पुल राजाने वहाँपर शिखरके बिनाका एक प्रासाद वनवाया । क्यों कि ६-६ महीनेके बाद, उस पर्वतके अधोभागमें रहनेवाला अर्बुद नाग जब हिलता है तो वह पहाड़ काँपने लगता है। इसलिये वहाँके सभी प्रासाद शिखर रहित [ बनाये जाते हैं। इस प्रकार श्री पुञ्जराज और उसकी पुत्री श्रीमाताका यह प्रबन्ध समाप्त हुआ। . . चौडदेशके गोवर्धन राजाकी न्यायप्रियताका उदाहरण । २०६) चौड देश मे एक गोवर्धन नामक राजा हुआ। उसके वहाँ, सभामंडपके सामनेके खंभेमें न्याय घंटा बंधी हुई थी जो न्याय करानेके प्रार्थीजनोंके द्वारा बाजाई जा कर निनाद किया करती। एकबार उसके इकलौते कुमारके रथारूढ़ हो कर कहीं जाते समय, रास्तेमें अज्ञातभावसे एक गौका बछड़ा मर गया । उसकी माता गायने, आँखोंसे अजस्र आँसू बर्षाते हुए, अपने पराभवके प्रतीकारार्थ सींगोंसे वह न्याय-घंटा बजाई । अर्जुनके समान कीर्तिवाले उस राजाने, घंटाका झंकार सुन कर, गायका समूल वृत्तान्त जाना और अपने न्यायकी प्रतिष्ठाके लिये, प्रातःकाल रथारूढ हो कर, उस अपने एकमात्र प्रिय पुत्रको, उसी रास्तेमें रख कर, उस धेनुके समक्ष उसपर अपना रथ घुमाया। उस राजाके ऐसे सत्त्व और परम भाग्यसे रथका चक्र (पहिया) ऊपर हो उठा और वह कुमार नहीं मरा । इस प्रकार यह गोवर्धननृपप्रबंध समाप्त हुआ। * प्रकरण २०५-२०८] प्रकीर्णक प्रवन्ध , . पुण्यसार राजाका वृत्तात । २०७) कान्ती पुरी में, प्राचीन कालमें, कोई पुराण नृपति, निरभिमान भावसे राज्य कर रहा था। एक बार वह राजपाटिकामें जानेके लिये निकला, तो उसके पीछे पीछे उसका परम-मित्र म ति सागर नामक महामात्य भी चला । रास्तेमें घोड़ा बिगड़ उठा और वह राजाको दूर ले भगा । साथकी चतुरग सेना क्रमश दूर दूर रह जाने लगी। पर अत्यत वेगवाले घोड़ेपर चढ़ कर वह मत्री उसके पीछे पीछे बहुत दूर तक चला गया। कितनी ही दूर चले जानेपर, राजा मार्ग लाँघनेके श्रमसे बिल्कुल थक गया और सुकुमारताके कारण रुधिरके दवारसे वहीं मर गया । मत्रीने उसका अन्तकृत्य करके, उसके घोड़ेको और उसके वेशको साथ ले आ कर सायकाल नगरमें प्रवेश किया । सीमान्तमें रहे हुए शत्रु राजाओंके भयसे राज्यको निम्ति रखनेकी इच्छासे, उस राजा-ही-की उम्रके और रूपके जैसे एक कुम्हारको राजाका वह पोशाक पहना कर और उसी घोड़ेपर चढ़ा कर महलमें प्रवेश कराया। फिर रानीको सारा हाल बता कर, सचिवने पुण्य सार नाम दे कर उसीको राजा बनाया । इस प्रकार कितनाक काल बीत जानेपर, वह मत्री सेनाका बड़ा समूह ले कर किसी शत्रु राजाके ऊपर चढ़ाई ले गया और अपने एक खूब विश्वस्त सहायकको राजाकी सेनामें रग्व गया । बादमें वह राजा निरकुश हो कर, वेश्यापतिकी तरह, स्वैर विहार करता हुआ ममस्त कुम्हारोंको अपने पास बुला और मिट्टीके हाथी, घोड़े, बैल आदि बना कर उनके साथ चिर काल तक खेला करने लगा। ऐसा करनेपर समस्त राजलोक उसकी अवहेलना करने लगे जिसको सुन कर स्कधाारसे ( लड़ाईके मैदानसे ) कुछ नौकरोंको साथ मत्री यहाँ आया और राजासे इस प्रकार बोला कि- यदि अपने स्वभावकी चल-विचलताफे कारण, तुम उस कुम्हारपनकी बातको न भूल कर किसी मर्यादाको नहीं मानोगे तो मैं तुम्हें देशसे निकाल कर किसी अय कुम्हारके बालकको राजा बना दूंगा'। उसकी इस उक्तिसे क्रुद्ध हो कर राजा बोला-'अरे, कौन है यहाँ" उसके ऐसा कहते ही वे मिट्टीके पुतले सजीव हो उठे और मत्रीको चिपट पड़े। इस असभर जैसे महान् आश्चर्यको देख कर और राजाके प्रकट प्रभारसे विस्मित हो कर मत्री उसके चरणोंपर गिर पड़ा और अपनेको छुड़ानेकी अभ्यर्थना करने लगा। फिर राजाके वैसा ही करने (छुड़ा देने ) पर भक्ति पूर्वक मत्रीने कहा- 'आपको साम्राज्य देनेमें मैं निमित्त मात्र हूँ। आपके पुण्यप्रभानसे पुतले सचेतन हो कर इस प्रकार आज्ञाकारी हो रहे हैं, सो इसमें पूर्वजमके कर्म ही कारण है, और इसलिये आपका यह जो पुण्य सार नाम है वह सार्थक है। इस प्रकार यह पुण्यसारका प्रध समाप्त हुआ। कर - कर्मसार राजाका प्रबन्ध । २०८) प्राचीन कालमें, कुसु म पुर नगरका न दि वर्धन नामक राजकुमार, देशान्तर भ्रमणके कौतुझसे माता-पितासे बिना पूछे ही अपने छत्रधरके साथ चल पड़ा । यदृच्छासे घूमता हुआ, एक प्रात कालमें, किसी गाँपमें जा पहुँचा। वहाँ, पुत्रहीन राजा मर गया था, इससे सचियोंने अभिषिक्त करके पट्टहस्तीको किसी नये राजाकी तलाशमें सारे नगरमें घुमाया। सयोगवश वह वहापर आया और उस निकटस्थ नृप कुमारको, दु स्वप्मकी नाई भूल कर, ससभ्रम उस हाथीने छत्रधरका अभिषेक किया। प्रधानाने बड़े महोत्सरके साथ उसको नगरमें प्रवेश कराया । उसने राजकुमारको भी वैसे ही ठाठके साय अपने साथ ले कर महलमें प्रवेश किया । बादमें में राजलोकका स्वामी हू, लेकिन तुम मेरे स्वामी हो' इस प्रकारके अन्तरग वचनोंसे वह उस राजकुमारफी आराधना करता रहा। पर वह राजा राजगुणोंके अयोग्य था और बेहद बेवकूफ था। वर्णाश्रम धर्मके पालनके परिश्रममें अनभिज्ञ और प्रजाका पीड़फ हो कर ज्यों ज्यों वह राज्य करता था क्यों त्यों, शकरके ३५-३६ १३८] प्रवन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाश शिरमें रहे हुए चंद्रमाकी तरह, वह प्रतिदिन क्षीण होता जाता था । उस कुमारको वैसा देख कर, किसी समय राजाने दुर्बलताका कारण पूछा तो उसने कहा कि-' दुर्बुद्धिके कारण तुम जो प्रजाको पीड़ा दे रहे हो यह अत्यन्त अनुचित कर्म है और इस कारण मैं कृश होता जा रहा हूं। २४२. जिसे मूोके बीच वास करना पड़े तथा जिसके स्वामिके कानोंके पास दुर्जनोंकी जीभ लगती हो, उसका यदि जीवन बना रहे तो उसे ही लाभदायक समझना चाहिए; क्षीण होनेमें तो विस्मय ही काहेका। सो मैने इस गाथाके अर्थको सत्य कर बताया है। उसके इस कथनके अनन्तर राजाने कहा कि-' इस पापनिरत प्रजाके अपुण्योदयने ही तो, निश्चय करके भविष्यमें इसको पीड़ित करनेके लिये, मुझे राजा बनाया है । यदि विधाता इस प्रजाके भाग्यमे परिपालना लिखता तो उस समय पट्ट हस्ती तुम्हारा ही अभिषेक करता । उसकी इस उक्ति और युक्ति रूप औषधोंसे उस कुमारका वह रोग दूर हो गया और वह शरीरसे पुष्ट होने लगा। इस प्रकार यह कर्मसार प्रबंध समाप्त हुआ। राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका प्रबंध २०९) गौडदेशकी लखणावती नगरीमें लक्ष्मण से न नामक राजा अपने उ मा पतिधर नामक सर्वबुद्धिनिधान ऐसे सचिवके साथ, सारी राज्य व्यवस्थाका विचार करते हुए, राज्य करता था । बादमें वह, मानों अनेक मातंग (हाथी ) के सैन्यके संगसे मदान्धता धारण करके, किसी वेश्याके संगरूप कलङ्ककमें इब गया । उ मा पति धरने यह व्यतिकर जाना तो, प्रकृतिसे क्रूर होनेके कारण स्वामीको वेकाबू समझ कर, प्रकारा- न्तरसे उसे समझानेके लिये, उसने सभामंडपके भारपट्टपर, गुप्त-भावसे इन कविताओंको लिख दिया- २४३. हे जल ! शीतलता तो तुम्हारा ही गुण है, और फिर तुम्हारी स्वाभाविकी स्वच्छताकी तो बात ही क्या कही जाय-तुम्हारे ही स्पर्शसे अन्य अपवित्र वस्तुयें पवित्र होती हैं । इससे बढ़कर और तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है कि तुम्हीं तो शरीरधारियोंके जीव हो । फिर अगर तुम्ही नीच पथसे जाते हो तो तुम्हें रोकनेमें कौन समर्थ है ? २४४. हे शिव ! तुम अगर छोटे वैल पर चढते हो तो उससे दिग्गजोंकी क्या हानि है ? तुम अगर साँपोंका आभूषण पहनते हो तो इससे सोनेका क्या नुकसान है ? अगर अपने शिरपर इस जड़ किरण चन्द्रमाको धारण करते हो तो उससे त्रैलोक्यके दीपक सूर्यका क्या बिगड़ता है ? तुम जगत्के ईश हो तो फिर हम तुम्हे क्या कहें ? २४५. यद्यपि कटे हुए ब्रह्मशिरको वह धारण करता है, यद्यपि प्रेतोंसे उसकी मित्रता है, यद्यपि रक्ताक्ष हो कर मातृकाओंके साथ वह क्रीडा करता है, यद्यपि स्मशानमें वह प्रीति रखता है और यद्यपि सृष्टि करके वह उसका संहार कर देता है, तो भी, मैं उसमें मन लगा कर भक्ति-पूर्वक सेवा करता हूँ। क्यों कि त्रिलोक शून्य है और वह जगतका एक-मात्र ईश्वर है । २४६. इस महान् प्रदोषकालमें तुम्ही एक मात्र राजा ( चंद्र ) हो, और इसी लिये तो क्या कमलोंकी लक्ष्मीको बंद करके कुमुदोंकी श्रीको बढ़ा नहीं रहे हो ? पर इसमें जो ब्रह्माका निवास है और पुष्पोंकी पंक्तिमें इसकी जो प्रतिष्ठा है उसको दूर करनेवाले तुम कौन हो? क्यों कि वह तो स्वयं विधाता भी करनेमें समर्थ नहीं है।
प्रकरण २०९-२१०] प्रकीर्णक प्रवन्ध [१३९ , - २४७ हे हार ! तुम सद्वृत्त, सद्गुण, महाई, और अमूल्य हो कर प्रियाके घन ऐसे स्तनतटके उपयुक्त तुम्हारी सुदर मूर्ति है । किन्तु हाय, पामरीके कठोर कठमें लग कर टूट जानेसे तुमने अपनी वह गुणिता खो दी है। किसी राजासभाके अवसरपर आये हुए राजाने इन कविताओंको देखा और उनका अर्थ समझ कर मीतर ही भीतर मत्रीसे द्वेष धारण करने लगा। क्यों कि- २४८ आजकल प्राय समार्गका उपदेश करना, उसी तरह कोपका कारण होता है, जैसे नकटेको दर्पण दिखाना। इस न्यायसे कुपित हो कर राजाने उसे पदभ्रष्ट कर दिया । इसके बाद उस राजाने, एक वार, राज- पाटिकासे लौटते हुए रास्तेमें दुर्गतिग्रस्त, निरुपाय और एकाकी ऐसे उस उमापति धर को देखा, तो कोधपूर्वक उसे मार डालनेके लिये, हस्तिपालके द्वारा उस पर हाथी चलना दिया । तब उसने महावतसे कहा कि-'जब तक, में राजाके सामने कुछ कह पाऊँ तब तक, तुम वेगसे हायीको जरा थाम रखो'। उसकी बात सुन कर उसने वैसा ही किया, तो फिर वह उमा पतिधर बोला- २४९ जिसको, सजन ऐसे गुरु लोग उपदेश नहीं देते उस शिनका कैसा हाल हो रहा है :-नगा फिरता है, शरीरमें धूल लगाता है, बैठकी पीठपर चढ़ता है, साँपोंसे खेला करता है, और जिसमेंसे लोहू टपकता है ऐसे हायीके चमडेको पहन कर नाचता है । इस प्रकारके आचारवाह्य तथा अन्य कई प्रकारके [निय ] आचरणोंसे यह प्रेम रखे करता है। इस प्रकार उसके विज्ञानरूपी वचनाकुशसे उस राजाका मनरूपी हायी वश हुआ, और वह अपने चरित्रके विषयमें पचात्ताप करता हुआ अपनी खूब निंदा करने लगा । धीरे धीरे उस वासनासे मुक्त हो कर उसने फिरसे उसे अपना प्रधान बनाया । इस प्रकार लक्ष्मणसेन और उमापतिघरका यह प्रवध समाप्त हुआ। . * काशीके जयचन्द्र राजाका प्रवन्ध । २१०) का शी नगरी में जय चन्द्र नामक राजा, महती साम्राज्य लक्ष्मीका पालन करता हुआ, पगु ( लगड़ा ) इम विरुदको धारण करता था । कारण यह था कि बडे मारी सैन्य समूहसे व्याकुलित होनेके कारण, वह गगा-यमुना नदीरूप लाठीके सहारे विना कहीं आ-जा नहीं सकता था । वहाँ रहनेवाले किसी शालापतिकी सूह व नामक पत्नी, जिसने अपने सौन्दर्यसे तीनों लोकके खोजनोंको जीत लिया था, किसी समय भयानक ग्रीष्म ऋतुमें जलकेलि करके गगाके किनारे खडी थी। तब उस खाननयनाने देखा कि एक साँपके शिरपर खजन पक्षी बैठा है। वहीं पर नहानेके लिए आये हुए किसी ब्राह्मणके पैरों पड़ कर उसने उस असभर शकुनका विचार पूछा । उस नैमित्तिकने कहा कि-'अगर मेरा सदा आदेश मानना मजूर करो तो मैं इसका विचार निवेदन करूँ, नहीं तो नहीं' उसने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की, तो ब्राह्मणने कहा कि-'आजसे सातवें दिन तुम इस राजाकी पटरानी होंगी' ऐसा कह-सुन कर वे दोनों यथा-स्थान चले गये । जिस दिनके लिये निमित्तज्ञने निर्णय दिया था उसी दिन राजपाटिकासे लौटते हुए राजाने, किसी एक गल्लीमें अगण्य लापण्यसे सुमग अगवाली उस शालापतिकी स्त्रीको खड़े देखा। उसे अपने चित्तका सर्वस्व चोरनेवाली १ इस पद्यमें प्रयुक्त सवृत्त, सद्गुण और गुणित्व ये शब्द प्रसिद्ध अथके अतिरिक्त लेपसे हारके पक्षमें इन अोंक वाचक हैं-सवृत्त अच्छी गोलाईवाला, सद्गुण-अच्छे घागेवाला, गुणित्व धागेकी बनावटवाला।
१४० ] प्रवन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश -समझ कर उसने अपने पास रख लिया और पटरानी बनाया। इसके बाद उस कृतज्ञाने ब्राह्मणके प्रति की हुई अपनी प्रतिज्ञाका स्मरण करके राजासे उस विद्याधर नामक ब्राह्मणको बुलाने के लिये प्रार्थना की । राजाने डुग्गी पिटवा कर विद्याधर नामक ब्राह्मणको वुलवाया तो उस नामके सात सौ ब्राह्मण आ कर उपस्थित हुए। उनमेसे उस एकको पहिचान कर अलग बैठाया और वाकी सबको यथोचित सत्कारके साथ विदा किया गया । बादमें उस विपत्तिग्रस्त विद्याधर से राजाने कहा कि-'जो इच्छा हो माँगो'। राजाके आदेशसे प्रमुदित हो कर उस ब्राह्मणने 'सदैव उसकी अंगमेवा' की प्रार्थना की । राजाने स्वीकार करके, उसके असीम चातुर्यकी पर्यालोचना करते हुए उसे सर्वाधिकारके भारका धारण करनेवाला धुरन्धर पद दिया । वह क्रमशः सम्पत्तिशाली बन गया। अपने अन्तःपुरकी बत्तीस सुंदरियोंके लिये ऊँची जातिके कर्पूरके बने हुए नित्य नये आभरण बनवाता और यह कह कर कि पुराने आभरण निर्माल्य हैं उन्हें एक छोटी कुईमें डलवा देता । इस प्रकार साक्षात् दैवता- वतारकी नाई दिव्य भोगोंको भोगता हुआ [ नित्य ] अट्ठारह हजार ब्राह्मगोंको यथेच्छ भोजन दान करने के पश्चात् स्वयं भोजन करता २११) इसके बाद, विदेशी राजाके ऊपर चढ़ाई करने के लिये राजाकी आज्ञासे, चतुर्दश विद्याओंके ज्ञाता विद्याधर ने नाना देशोंमें घूमते हुए, एकबार एक ऐसे देशमें जा कर डेरा दिया जहाँ जलानेके लिये इन्धन (लकडी आदि ) नहीं था। तब उन ब्राह्मणोंकी रसोईके समय, रसोईयोंके वस्त्र तेलमें भिगो कर उन्हींको इन्धन बना कर नित्यकी भाँति ही उनको भोजन कराया। इस तरह शत्रुओंको जीत कर जब वह लौट कर वापस नगरके समीप आया तो मालूम हुआ कि, पिण्याक ( भोजन ) के बनानेकी इच्छासे जो दुकूल जलाये गये, उससे राजा कुपित हो गया है । इससे उसने अपने घरको तो याचकोंके द्वारा लुटवा दिया और स्वयं तीर्थयात्राके लिये निकल पड़ा। राजा भी फिर पीछे जा कर उसका अनुनय करने लगा, पर उसने स्वाभिमानवश, अपनी उस ( भोजन बनानेकी ) इच्छाके कारण राजाका वैसा आशय (क्रोधयुक्त भाव ) हो गया था यह बता कर, जैसे तैसे उसकी अनुमति ले कर अपना अन्त साधन किया । २१२) अनन्तर, सूह व दे वी ने राजासे अपने पुत्रके लिये युवराज पदवी मॉगी। राजाने कहा कि- ' रखेलिनके लड़केको हमारे वंशमे राज्य नहीं दिया जाता' । इससे उसने राजाको मारने के लिये म्लेच्छोंको बुलवाया । उस स्थान पर रहनेवाले पुरुषों ( राजदूतों) से इस वातका हाल जान कर, राजाने एक दिगंबर भिक्षुकसे, जिसने पद्मावतीसे वर प्राप्त किया हुआ था, सादर निमित्त ( कोई मांत्रिक उपाय ) पूछा । उसने राजाको विश्वास पूर्वक कहा कि-'पद्मावतीका आदेश म्लेच्छागमनके विरुद्ध है। इसके अनन्तर कुछ दिनके बाद, यह सुन कर कि म्लेच्छ नजदीक आ गये है, राजाने उस दिगम्बरसे फिर पूछा क्या बात है ?' तो उसने उसी रातको राजाके सामने ही पद्मावतीको होमादि देना आरम्भ किया । तब उसकी उस उत्तम आकर्षण-विद्याके बलसे, होमकुण्डकी ज्वालाओंमें प्रत्यक्ष हो कर, पद्मावतीने तुरुष्कों ( तुर्की ) के आगमनका निषेध ही बताया। तब फिर उस क्रुद्ध दिगम्बरने उसके कान पकड़ कर अत्यन्त क्रोवसे कहा कि-'म्लेच्छ सेनाके निकट आ जानेपर भी तूं ऐसी मिथ्या बात बोल रही है। इस तरह फटकारी जानेपर उसने कहा कि-'तूं जिस पद्मावतीको अति भक्तिके साथ यह पूछ रहा है वह तो हमारे प्रतापके बलसे कहीं भाग गई है । मैं तो उस म्लेच्छराजकी कुलदेवी हूं। मिथ्या बोल कर लोगोंमें विश्वास पैदा करके, उन्हें म्लेच्छोंके द्वारा विश्वास (प्राण-रहित ) कराती रहती हूं'। ऐसा कह कर वह तिरोहित हो गई। बादमें प्रातःकालमें ही म्लेच्छ सेना द्वारा बा णा र सी नगरीका घिरा जाना राजाने जान पाया। उनके धनुष्योंके टंकारोमे, राजाके चौदह सौ नगाडोंकी आवाज कहीं डूब गई और म्लेच्छ सेनाके भयसे . कि यह .
प्रकीर्णक प्रबन्ध २१०-२१३] [१४१ मनमें व्याकुल हो कर उस सूह व देवी के पुत्रको अपने हाथीपर बैठा कर ( उसके साथ ) राजा गंगाके जलमें डूब मरा । इस प्रकार यह जयचन्द्रका प्रवध समाप्त हुआ। जगद्देव क्षत्रियका प्रबंध । २१३) त्रिविध वीरश्रेष्ठको धारण करनेगला जगदेव नामक एक क्षत्रिय वीर हुआ । वह श्री सिद्धरानके द्वारा खूब सम्मानित होता था। फिर भी उसके गुणरूप मत्रके वशीभूत हो कर शत्रुमर्दन ऐसे राजा परमर्दीने जब उसे आग्रहपूर्वक अपने यहा बुलाया, तो पृथ्वीरूप रमणीके केशकलापके समान उस कुन्तल देश में बह गया । दरखानेपर पहुँच कर जब उसने राजाको अपने आनेकी खबर भिजवाई उस समय [ राजाके आगे ] एक वेश्या, नंगी हो कर 'पुष्प बटन' नृय कर रही थी । वह तत्काल ही लत्रित हो कर अपनी चादर ओढ कर वहीं बैठ गई । जब राजाके द्वारपालने ज ग द्दे व को प्रवेश कराया तो राजाने उठकर आलिंगन दिया और प्रिय आलाप आदि किया। इस मम्मानके बाद, फिर उसे प्रधान परिधानदुकूल और लाखोंकी कीमतके अतुलनीय ऐसे दो अन्य वस्त्र भेंट स्वरूप दिये । वादमें जगदे व के महामूल्यवान आसन पर बैठ जानेपर समाका सश्रम जब दूर हुआ, तो राजाने उस वेश्याको नाचनेका आदेश किया । तब उस उचितज्ञा चतुर नारीने कहा कि- ससारके एकमात्र पुरुष श्री जगदेव नामक अब यहापर विद्यमान है इसलिये इनके सामने चिना वस्त्र के नाचते में लजाती हू । लिया स्त्रियों के सामने ही यथेष्ट चेष्टा कर सकती हैं। उसकी इस लोकोत्तर प्रशसासे मनमें प्रमुदित हो कर जगदेव ने राजाके दिये हुए उन दोनों वस्त्रों को उसे दे डाला। इसके बाद, जब परमर्दी के प्रासादसे जगदेव को किसी एक देशका आधिपत्य मिला तो उसे सुन- कर उसका ऋगमस्त उपाध्याय उससे मिलने आया । उसने यह कान्य भेंट किया- २५० हम दो आदमीके पुण्यको मानते हैं-एक तो अक्षत्रिय विधिसे वालिको मारनेवाले किमी भगवान् (रामचद्र) के, और दूसरे सगीतमें आसक कुन्त ल पति के । इनमेंमे एक (रामचद्र) ने तो मरुत्तनय (हनुमान् ) की दोनों सुदर मुजाओं म्प कामधेनुका दोहन किया और दूसरे (कुन्तलपति ) ने, हे प्रतिपक्ष (शत्रु) के लिये प्रत्यक्ष परशुराम, आप जैसे चिन्तामणिको प्राम किया। इस कान्यके पारितोषिकमें उस स्थूटलक्ष (टक्षण-सम्पन्न ) ने आधा लाख दिया । २५१ चकोने पाय (मुसाफिर ) से पूछा कि 'हे मिन ! बताओ पृथ्वीमें बसने लायक वह कौनसा देश है जहाँपर चिर काटतक राति नहीं होती।" (इसपर पाथने कहा कि) श्री जगदेव नामक पुरुष जो सुपर्णदान कर रहा है उससे थोडे ही दिनोंमें मेरु पर्वत समाप्त हो जायगा। और फिर सूर्यका ठिपना बद हो कर एक मात्र अद्वैत ऐमा (पिना रात्रिका) दिन ही बना रहेगा। २५२ पृथ्वीकी रक्षा करनेमें दक्ष ऐसे दाहिना हायराले, दाक्षिण्यकी शिक्षा देनेमें गुरुके समान, कल्याणके स्थान और धन्यजन ऐमे जगदाता जगदेव के विद्यमान होनेपर, विद्वानों के घर भी ऐसे बन गये है कि जिनमें प्रतिदिन, मतवाले हाथी और घोड़ों पारने योग्य वृक्षोंकी रस्सिया जाने के कारण, नौकर लोग ब्याकुल बने रहते हैं। २५३ तुम्हारे जीवित रहते बलि, कर्ण और दधीचि जीते हैं और हमारे जीवित रहते दारिद्य जीता है। , . १४२ ] प्रवन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाश २५४. हे जगदे व ! हम नहीं जानते कि किसका हाथ थक जायगा-दरिद्रोंको रचते रचते ब्रह्माका या उन्हें कृतार्थ करते करते तुम्हारा । २५५. हे ज ग देव ! इस जगद्प देवमंदिरमें प्रतिष्टित तुम्हारे यशरूपी शिवलिंगके ऊपर [आकाशके] नक्षत्रोंने अक्षतका रूप धारण किया है। [ १७४ ] हे जग दे व ! चारों समुद्रोंमें डुबकी मारनेके कारण तुम्हारी कीर्ति मानों ठंडीसे जकड गई है, इसलिये अब ताप लेनेके निमित्त वह सूर्य-मण्डलको चली है। [ १७५ ] क्षत्रियदेव श्री जगद्दे व भूपालका कल्याण हो ! जिसके यशरूपी कमलमें आकाशने भ्रमरका रूप धारण किया । [१७६ ] पृथ्वीमण्डलपर सुवर्ण वितरण करनेवाला तो एकमात्र जगद्दे व ही है और उसके मांगनेवालोंकी संख्या हजारोंकी है-ऐसा सोच कर, ऐ मेरे मन विपाद मत करो। सूर्य कितने हैं और प्रबल अन्धकारराशिमे डूबते हुए जन-समूहकी प्राणरक्षाके लिये यात्रामें प्रवृत्त उनके घोड़ोंके खुरसे खुदा हुआ यह दिमण्डल कितना विस्तृत है ? जगदेव की दी हुई ' न नवम् ' ( नया नहीं है ) इस समस्याकी पूर्ति एक पंडितने इस प्रकार की- २५६. समुद्र अगाध है, पृथ्वीमण्डल विशाल है, आकाश विभु है, मेरु पर्वत ऊँचा है, विष्णु प्रथित- महिमा है, कल्पवृक्ष उदार है, गंगा पवित्र है, चंद्रमा अमृतवर्षी है और जगद्देव वीर है ये सब (विशेषण-युक्त विशेष्य ) नये नहीं हैं। [१७७ ] तुझ समान जगद्दाता जगदेव के विद्यमान होनेपर, अब लोक साहसांक राजाके चरितके आश्चर्योमें भी मन्दादर हो गये हैं तो फिर पार्थकी उस सची कथाका कहना तो वृथा ही है। यह पृथ्वीमें बलि है, यह भूचर शक है। कृष्णको किसीने देखा नहीं, पृथ्वीमंडल कल्पवृक्षसे शून्य है। कामदेवका शोच न करना चाहिए। (- इस पद्यका भाव कुछ स्पष्ट नहीं ज्ञात होता.) [ १७८ ] हे जग दे व ! तुम्हारा यशोरूप दुर्वार चंद्रमा जब निरंतर ही अपनी किरणश्रेणीको दसों दिशाओंमें विकीर्ण करने लगा, तब सारे भुवनको राकाके लिये भयका स्थान समझ कर, 'कुहू' शब्द है सो एक मात्र कोकिलके कंठका शरणभूत हो कर रहा । ('कुहू का एक अर्थ अमावस्याकी रात्रि है, और दूसरा कोकिलका शब्द है । जगद्देवके यशरूपी चंद्रमाका निरंतर प्रकाश बना रहनेसे अमावस्याका अभाव हो गया, इसलिये कुहू शब्दका व्यवहार केवल, कोकिलके शब्दमें रह गया ।) [१७९ ] हे प्रभु जगदे व ! तुम्हारे रूपमें मुग्ध हो कर, वातायन पर स्थित सुभ्रू (सुंदर भ्रुवों वाली ) रमणियोंकी कमलदलसे द्रोह करनेवाली नाचती हुई आँखें सभय, सालस, सगर्व, साई, तिरछी, चकित, भ्रान्त और आर्त की नाई, कहां नहीं पड़ती हैं। इस प्रकारके बहुतसे काव्य हैं जो यथाश्रुत जानने चाहिये । राजा श्री परमर्दीराज की पट्टदेवीको ज ग द्दे व ने अपनी भगिनी माना था। एक बार, राजाने सीमान्त भूपालको हरानेके लिए श्री जगद्दे व को भेजा । वह, वहाँ जव देवार्चन कर रहा था उसी समय छल करके आघात करनेवाले शत्रुने उसकी सेनामें उपद्रव मचाया। इसका हाल सुन कर भी वह जग व उस देवपूजासे बाहर नहीं निकला । प्रणिधि पुरुषोंके मुँहसे राजाने जगदेव का पराजय हुआ सुना तो यह अश्रुतपूर्व बात सुन कर प्रकरण २१३-२१५ ] प्रकीर्णक प्रवन्ध [१४३ - अपनी रानीसे परमी ने [व्यग्य करते हुए कहा कि-'तुम्हारा भाई समरवीरताका तो वडा अहंकार धारण करता है लेकिन शत्रुओं द्वारा आक्रान्त हो कर वह वहाँसें भाग भी नहीं सका। राजाकी इस मर्मभेदिनी परिहास वाणीको सुन कर रानीने प्रात कालमें पश्चिमकी ओर देखा । राजाने पूछा ' क्या देखती हो।' इस पर रानीने कहा कि 'सूर्योदय'। तब राजाने कहा ' पगली, क्या कभी पश्चिम दिशामें भी सूर्योदय होता है।' इसपर वह बोली- पश्चिममें सूर्योदयका होना असमन हो कर भी, कभी विधिके निधानके विरुद्धका होना समन है, पर क्षत्रियोंमें देव जैसे जगदेव का पराजय होना तो सभर ही नहीं। इस प्रकार उस दम्पतीका प्रिय आलाप हो रहा था। इधर, देवपूजाके बाद जगद्दे व ने ५०० सुमटोंके साथ उठ कर, उस शत्रु राजाकी सेनाका क्रीडामान-ही-में इस तरह दलन कर डाला, जिस तरह सूर्य अन्धकारके समूहका, सिंह-गाव गजयूयका और प्रचण्ड अन्धड़ घनघोर मेघमालाका दलन करता है। २१४) वह परमर्दी राजा, जगतमें एक उदाहरणभूत ऐसे परम ऐश्वर्यका अनुभव करता हुआ, एक निद्राके अवसरको छोड कर, दिनरात अपने ओजके प्रकाशका करनेवाला छुरिका-अभ्यास (छुरी चलानेकी कलाका परिश्रम ) किये करता था । भोजनके अवसर पर रसोई परोसनेमें व्यस्त ऐसे एक एक रसोईयेको नित्य ही निर्दय भानसे उस छुरिकासे काट डालता था । इस प्रकार सालमें ३६० रसोईयोंका वह सहार करता हुआ * कोप-कालानल 'के निरुदसे प्रसिद्ध हो गया २५७ हे आकाश, तुम फैल जाओ, दिशाओ, तुम आगे बढ़ो, हे पृथ्वी, तुम और भी चौड़ी हो जाओ, आदिकालके राजाओंके यशका उजुभण तो तुम लोगोंने प्रत्यक्ष किया ही है, अब परमी राजाके यशोराशिका विकाश होनेसे देखो कि यह ब्रह्माण्ड, प्रस्फुटित बीजोंके कारण, फटे हुए दाडिमकी दशाको प्राप्त हो रहा है। इत्यादि स्तुतियोंसे सुत हो कर वह राजा चिर कालतक साम्राज्यके सुखका अनुभव करता रहा। २१५) उसका, सपादलक्ष के राजा पृथ्वीराज के साथ युद्ध हुआ और सम्रामाङ्गणमें वह अपने सैन्यके पराजित होने पर, दिग्निमूद हो कर, किसी एक दिशासे मागता हुआ अपनी राजधानीमें आया । उस 'परमदी राजाके द्वारा पूर्वमें अपमानित कोई सेवक, देश निकालेकी सजा पा कर पृथ्वीराज की समामें आया। उसके प्रणाम करनेके बाद राजाने उससे पूछा कि-'परमदी के नगरमें सुकृती लोग विशेष करके किस देवताकी पूजा करते रहते हैं।' इस प्रकार स्वामिके पूछनेपर उसने शीघ्र ही यह तत्कालोचित पप पदा- २५८. शिवकी पूजा करनेमें वह मद है, कृष्णार्चन करनेकी उसे कोई तृष्णा नहीं है, दुर्गाको प्रणाम करनेमें यह स्तब्ध रहता है, विधाता रूपी ग्रह [ उसके यहाँ पूजा न पानेसे ] व्यम रहता है । ' हमारा स्वामी परम दी इसीको मुहमें रख कर पृथ्वीराज नरपतिसे रक्षा पा सका है' इस बातको सोच कर वहाँकी प्रजा तृण ही की पूजा किये करती है। इस स्तुतिसे प्रसन्न हो कर राजाने उसे यथेष्ट पारितोषिक दे कर अनुगृहीत किया । उसने (पृथ्वीराज ) इक्कीस वार म्लेच्छराजाको हराया था। तब वाईसी बार वही म्लेच्छराज अपनी दुर्धर सेनाके साथ पढ़ कर पृषीराज की राजधानीके पास आ कर ठहरा । मस्वीकी तरह वारवार उड़ा देनेपर भी, इस प्रकार, शत्रुको फिर फिर आते देख उसकी तरफ राजाकी उपेक्षाका होना जाना, तो स्वामीकी असीम कृपाका पात्र और ठमके दूसरे शरीरके जैसा यह तुग नामक क्षात्रतेजधारी वीरश्रेष्ठ, अपनी छायाके जैमे पुनशे साय म्लेच्छ- राजकी सेनामें जा घुमा । रातके समय उसने देखा कि उस शनुके तवूके चारों ओर एक खाई सुदी हुई है जिसमें पेरको टकीकी आग धधक रही है । यह देख वह अपने पुत्रसे बोला- मैं इस खाईमें कूद पड़ता हू, - १४४ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश तुम मेरी पीठपर पैर रख कर जा कर म्लेच्छराजको मार डालो'। पिताके ऐसा आदेश करनेपर उसने कहा कि- यह काम मेरे लिये साध्य नहीं है कि अपने जीवनकी आकांक्षासे मैं पिताकी मृत्यु देखें !; सो मैं ही इसमें पड़ता हूं और आर ही मेरी पीठपर पैर रख कर उसका अन्त कर डालें। उसके वैसा करनेपर, स्वामीके कार्यको सिद्ध- प्राय हुआ मान कर आसानीसे उसने शत्रुको मार डाला और फिर जैसे आया था वैसे ही घर लौट गया। जब प्रभात होनेको आया तो अपने स्वामीको मरा देख कर वह म्लेच्छ सेना दीन हो कर भाग गई। गंभीरप्रकृति होनेके कारण उस तुंग सुभटने राजाको वह कुछ भी हाल नहीं बताया । किसी समय, राजमान्य होनेके कारण अत्यंत परिचित ऐसी उस तुंग सुभटकी पुत्रवधूको मंगलदर्शक हस्तकंकणसे रहित देख कर, राजाने संभ्रमभावसे उसका कारण पूछा । समुद्रकी नाई गंभीर होनेके कारण, मौनमर्यादाके साथ प्रथम तो उसने कुछ भी नहीं बताया । तब राजाने अपनी शपथ दे कर पूछा । इस पर उसने यह कह कर कि-' यद्यपि अपना गुण कथन करना मेरे लिये दुष्कर कार्य है तथापि आज्ञा होने निवेदन करना पड़ता है ' ऐसा कह कर प्रत्युपकारभीरु हो कर उसने वह वृत्तान्त जैसा घटा था वैसा ही निवेदन किया । २५९. उच्च बुद्धिवाले मनुष्योंके चित्तकी यह कोई बड़ी ही अलौकिक कठोरता है कि किसीका उपकार करके फिर वे दूसरेसे प्रत्युपकार पानेके भयसे उनसे निःस्पृह हो रहते है । इस प्रकार यह तुंगसुभट-प्रबंध समाप्त हुआ। पृथ्वीराजका म्लेच्छोंके हाथ मारा जाना। २१६) इसके अनन्तर, फिर कभी, उस म्लेच्छराजका पुत्र पिताका वैर स्मरण करके सपादलक्षके राजा पृथ्वी राज के साथ युद्ध करनेकी इच्छासे बडी तैयारीके सहित चढ़ कर आया । पृथ्वी राज की सेनाके वीर धनुर्धरोंके, वर्षाकालकी मूसलधार वृष्टिकी नाई बरसते हुए, बाणोंकी मारसे वह स-सैन्य भगा दिया गया और फिर पृथ्वीराजने उसका पीछा किया । इस समय भोजन-विभागके अधिकारी पञ्चकुलने कहा कि सात सौ सांढनियां जो भोजनकी सामग्री ढोती हैं वे पर्याप्त नहीं हैं, इसलिये महाराज कुछ और सांढनियां देनेकी कृपा करें'। राजा यह सुन कर बोला कि ' म्लेच्छराजको मार कर उसके ऊँटोंका झुंड कब्जे किया जायगा, और फिर तुम्हें माँगी हुई सांढनियां देनेका प्रबन्ध किया जायगा'। ऐसा कह कर उसे समझा दिया और फिर जब आगे प्रयाण करने लगा तो सो मे श्व र नामक प्रधानने वारंवार निपेध किया । राजाने इस भ्रमसे कि वह उस (म्लेच्छ) के पक्षमें है, उसके कान काट लिये । इस अत्यन्त पराभवके कारण, वह अपने स्वामीसे कुपित हो कर उस म्लेच्छपतिके पास चला गया। उसको अपना पराभव-वृत्तान्त कह कर, उसके मनमें विश्वास बिठाया और उसको पृथ्वी राज के पड़ावके पास ले आया । पृथ्वीराज एकादशीके पारणाके पश्चात् जब सोया हुआ था तो उसकी सेनाके वीरोंके साथ म्लेच्छोंकी लड़ाई छिड़वा दी। राजा गाढी नींदमें सो रहा था। उसी अवस्थामें तुर्कीने उसे कैद कर लिया और वे अपने स्थानमें ले गये। फिर दूसरी एकादशीके पारणाके अवसरपर, जब वह राजा [ कैदीकी हालतमें ] देव-पूजा कर रहा था, उस समय म्लेच्छराजने धा हुआ मांस, पत्रके पात्रमें ( दोनेमे ) रखवा कर उसके तंबूमें भिजवाया । उसके देवपूजामें व्यस्त होनेके कारण, एक कुत्ता आ कर उस मांसको उठा ले गया। तब पहरेदारोंने कहा कि 'इसकी रक्षा क्यों नहीं करते?' इसपर राजाने कहा कि- मेरी जिस भोजनसामग्रीको कभी सात सौ सांढनियां भी ठीक तरह नहीं ढो सकती थीं, उसी भोजनकी आज यह दुर्दशा है-इस बातको मैं अनाकुल हो कर कौतुकसे देख रहा हूं'। उन्होंने कहा कि-'क्या तुममें अब भी कुछ उत्साह शक्ति बाकी है ? ' तो उसने कहा ' यदि मैं अपने स्थानपर जा पहुंचं , ' प्रकरण २१६-२१८] प्रकीर्णक प्रवन्ध [१४५ - तो अपनी शारीरिक ताकात कैसी है सो दिखा दू'। पहरेदारोंने यह बात उस म्लेच्छराजको जा कर कहीं तो वह उसके साहसको देखनेकी इच्छासे, उसे उसकी राजधानीमें ले आया और राज-भवनमें ले जा कर उसको गादीपर बिठाया । बादमें ज्यों ही उन्होंने देखा तो उसके महलकी चित्रशालामें ऐसे चित्र बने हुए नजर आये जिनमें सूअर म्लेच्छोंको मार रहे हैं । यह दृश्य देख वह तुर्कोका राजा अपने मनमें अत्यन्त पीड़ित हुआ और वहीं पर उसने कुठार द्वारा पृथ्वी राज का सिर काट कर उसका सहार कर डाला । इस प्रकार नृपति परमर्दी, जगदेव और पृथ्वीराज इन तीनोंका यह प्रवध समाप्त हुआ। . कोंकण देशकी उत्पत्ति कैसे हुई । २१७) जहाँ समुद्र ही जिसकी परिखा (खाई) है ऐसे श ता नन्द पुर में म हा न द नामक राजा हुआ। उसकी रानीका नाम था मदन रेखा । अन्त पुर [ में स्त्रियों ] की प्रचुरता होनेसे राजा उसके प्रति निरक्त रहता था। इसलिये पतिको वशीभूत करनेकी इच्छासे वह नानाविध विदेशी जनों ओर कलानिदोंसे इस बारेमें पूछा करती । तब एक यथार्थवादी विश्वसनीय तात्रिकने उसे कुछ सिद्धयोग बताया। उसके प्रयोग करनेके अवसरपर उसे इस वाक्यका अनुस्मरण हो आया कि 'मत्रमूलके वलपर की हुई प्रीतिको पतिद्रोह कहते हैं । तो उस योगचूर्णको समुद्रमें फेंक दिया। कहा है कि 'मत्र और औषधिका प्रभाव अचिन्त्य होता है'-इस लिये औषधके माहात्म्यसे वशीभूत हुआ समुद्र ही उसका वशनती हो कर, मूर्तरूप (मनुष्यस्वरूप ) बना कर उसके साथ रातमें आ कर रतिरमण करने लगा। इससे वह गर्भरती हो गई। तब उसके ऐसे चिन्होंको देख कर राजा कुपित हो कर उसे किसी प्रवास आदिका दण्ड देनेकी तदबीर सोचने लगा। इससे उसकी मृत्यु निकट समझ कर समुद्रदेव प्रत्यक्ष हुया और अपना परिचय देते हुए बोला कि-' मैं समुद्रका अधिष्ठाता देव हूँ, इसलिये डरना मत'। फिर वह राजासे बोला- २६०. शीलवती कुलीन कन्याको, विवाह करके, जो सम दृष्टिस नहीं देखता, यह बड़ा भारी पापिष्ठ कहा गया है। इसलिये इस स्त्रीकी अवज्ञा करनेवाले ऐसे तुझको मैं अन्त पुर और परिवारके साथ अगाध जलमें डुबो दूंगा'। यह सुन कर वह भयभ्रान्ता रानी उसका अनुनय करने लगी । इस पर समुद्रने यह कह कर कि- यह मेरा ही लड़का होगा और इसलिये मैं ही कहीं कहींका जल हटा कर इसे साम्राज्यके योग्य नई भूमि दूंगा'-ऐसा कह कर फिर उसने कहीं कहींसे जल हटा कर अतरीप ( बेट) बना दिये जो लोगोंमें सब कोंकण' नामसे प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार यह कौंकण प्रबंध समाप्त हुआ। - * ज्योतिपी वराहमिहिरका प्रवन्ध । २१८) पाटलीपुत्र नगरमें वराह नामक एक ब्राह्मणका लड़का था जो जन्मसे ही शकुन ज्ञानमें श्रद्धालु था । गरीब होनेके कारण पशु चरा कर अपना निर्वाह किये करता था । एक दिन [जगलमें ] किसी एक पत्थर पर लग्न लिख कर उसे बिना मिटाये ही घर लौट आया । यथासमय उचित कृत्य कर लेनेके बाद रातमें भोजन करनेको बैठा तो उस लग्नके विसर्जन न करनेका स्मरण हो आया । तब उसी समय निर्भय भावसे वहाँ गया तो देखा कि उसपर एक सिंह बैठा है। उसने इसकी भी परवा न की और उसके पेटके नीचे ३७-३८ १४६ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश . . n , हाथ डाल कर लग्न मिटाने लगा। तब इसके अनन्तर वह सिंहका रूप त्याग करके सूर्यरूपमें प्रत्यक्ष हुआ और कहने लगा वर माँगो'। तब उसने माँगा कि- 'मुझे समस्त नक्षत्र ग्रह-मंडलको [प्रत्यक्ष ] दिखा दो'। यह सुन सूर्य उसे अपने विमानपर चढ़ा कर ले गया और [ सारा ग्रहचार बता कर ] एक वर्ष बाद वहीं ले आ कर छोड़ गया । इस तरह वह ग्रहोंके वक्र, अतिचार, उदय, अस्त आदिकी प्रत्यक्ष परीक्षा करके पुनः अपने स्थानमे आया। मिहिर (सूर्य ) का प्रसाद प्राप्त होनेसे व रा ह मिहिर इस नामसे प्रसिद्ध हो कर वह श्री नन्द नामक नृपतिका परम मान्य हुआ और उसने ' वा राही सं हि ता' नामक एक नया ज्योतिषशान बनाया। २१९) एक बार, अपने पुत्र जन्मके अवसरपर, उसने अपने घरमें घटिका रख कर उससे जन्मकालका शुद्ध लग्न ले कर जातक ग्रंथके प्रमाणसे ज्योतिष (जन्मपत्र ) बनाया। स्वयं प्रत्यक्ष किये हुए ग्रइचक्रके ज्ञानके बलपर उस पुत्रकी आयु एक सौ वर्पकी निीत की। उस महोत्सवमें, श्री भद्रबाहु नामक एक जैनाचार्य-जो उसके छोटे भाई थे-को छोड़ कर, राजासे ले कर रंक तक कोई ऐसा नहीं रहा था जो कुछ उपहार हाथमें ले कर उसके वहां नहीं गया हो। तब उस नैमित्तिकने जिनभक्त श क टाल मंत्री के आगे, उन सूरिके न आनेके बारेमें उलाहनेके तौरपर कहा । तब उस मंत्रीने, उन महात्माको, जो संपूर्ण शास्त्रके ज्ञाता थे और त्रिकालके भावोंको हथेलीपर रखे हुए आँवलेके फलकी तरह जानते थे, यह बात कह सुनाई । तो उन्होंने कहा कि-' आजसे बीस दिन उस लड़केकी, बिल्लीके निमित्तसे, मृत्यु होगी इसलिये यह समझ कर हम नहीं आये ' । उनकी यह उपदेश-वाणी वराह मिहिर से कही गई । तब उसने अपने कुटुंबको, उस बालककी भावी विपदसे आवश्यक रक्षा करनेके लिये कहा और बिल्लीसे बचा रखनेके लिये सौ सौ उपाय करने लगा। फिर भी निर्णीत दिनकी रातको उस बालकके सिरपर अर्गला ( दरवाजेको बंद करनेके लिये लकडी या लोहेकी बनी हुई एक पट्टी) गिर जानेसे अचानक वह मर गया। फिर उस शोकशंकुसे उसका उद्धार करनेकी इच्छासे श्री भद्र वा हु उसके घर आये । वहाँ उन्होंने देखा कि उसके घरके ऑगनमें ज्योतिपकी सभी पुस्तकें इकट्ठी करके जलाने के लिये रखी पड़ी हैं। तब उन्होंने पूछा कि ' यह क्या बात है ?' तो उस सॉवत्सर (ज्योतिषी) ने बड़े दुःखके साथ, उन जैनमुनिको उपालंभ देते हुए कहा- 'ये पुस्तकें बड़े भारी मोहान्धकारको उत्पन्न करनेवाली है इसलिये अब निश्चय ही इन्हें जला दूंगा; क्यों कि इन्होने मुझे धोकेमें डाला है। उसके ऐसा कहनेपर अपने शास्त्रज्ञानके बलसे बालकका जन्मलग्न ठीक तरह निकाल कर उन्होने सूक्ष्म दृष्टि से उसका ग्रह-बल बताया तो वह बीस ही दिनका आया। इस प्रकार उसकी शास्त्रविरक्ति जब दूर की गई तो वह ज्योतिषी बोला कि - आपने जो विडालसे मृत्यु बताई वह तो ठीक नहीं साबीत हुई। तब उन्होंने उस अर्गलाको वहाँ मँगवाई, जिसके गिरनेसे मृत्यु हुई थी, तो उसमें बिड़ालकी आकृति खुदी हुई पाई गई । ' क्या भवितव्यतामें भी कभी कुछ परिवर्तन हो सकता ? ' ऐसे उस महर्षिने कहते हुए कहा कि- २६१. किस बातके लिये रोया जाय ? यह शरीर क्या चीज़ है ? ये परमाणु तो अविनाशी हैं। यदि संस्थान-विशेषके लिये ही शोक करना है, तब तो कभी भी प्रसन्न ही नहीं होना चाहिये । २६२. यह सब भाव ( अस्तित्व ) अभावोत्पन्न है और मायाके विभवसे संभावित है। इसका अंत भी अभाव ही मे संस्थित है । इस बातके ज्ञानसे सज्जनोंको भ्रम नहीं पैदा होता । -इस प्रकारकी युक्तिपूर्वक उक्तिसे उसे समझा कर वे महर्षि अपने स्थानपर आये । इस तरह समझाये जाने- पर भी वह, मिथ्यात्त्र रूप धत्तूरके प्रभावसे सच्चे सुवर्णमें भ्रान्तिवाला हो कर, उनके प्रति द्वेषभाव धारण कर रहा । अतः [ ईर्ष्यावश ] अभिचार कर्मसे, उनके भक्तों और उपासकोमेंसे किसीको कष्ट पहुंचाने लगा और , प्रकरण २१९-२२० ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [१४७ - किसीको मारने लगा | अपने प्रौद ज्ञानके द्वारा इन लोगोंका यह वृत्तान्त नान कर उन्होंने विघ्नकी शान्तिकलिये उवसग्गहर पास' इस नूतन स्तोत्रकी रचना की। इस तरह यह वराहमिहिर-प्रवध समाप्त हुआ । सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त । २२०) ढक नामक पर्वत पर रहनेवाले रण सिंह नामक राजपूतको एक भूपल नामकी पुत्री थी जिसने अपने सौन्दर्यसे नागलोककी वालाओंको भी जीत लिया था । उसे देख कर ना सु कि नागका उस पर अनुराग हो गया। उसने उसके साथ सभोग किया और उससे नागार्जुन नामक पुत्र पैदा हुआ। उस पाताल पाल (नाग) ने पुत्रस्नेहसे मोहित हो कर उसे सभी औपवियोंके फल, मूल और पत्रोंका भक्षण कराया। इन औषधियों के प्रभावसे वह महासिद्धियोंसे अलङ्कृत हुआ। सिद्धपुरुप होनेके कारण पृथ्वी-पर्यटन करता हुआ वह शा त वाहन नृपतिके पास गया, जहाँ उसे राजाके कलागुरु होनेकी भारी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। तो भी वह गगन-गामिनी विद्याका अध्ययन करनेकेलिये श्री पाद लिप्ताचार्य के पास पाद लितपुरगया । निरभिमान हो कर उनकी सेवा करने लगा । भोजनके समय, पादलेपके द्वारा आकाशमैं उड कर अष्टापद आदि तीर्थीको नमस्कार करके वे आचार्य वापस आये, तो उनके चरण धो कर रस, वर्ण और गन्धकी परीक्षासे उसमें १०७ महौषधियोंका होना उसने जाना । बादमें गुरुकी आज्ञाकी परवा न करके उसने स्वय पैसा ही पादलेप किया। इससे मुर्गे और मोरकी नाई कुछ कुछ उड़ता हुआ वह एक खड्डेमें गिर पड़ा और चोट लगनेसे उसका सारा शरीर जर्जरित हो गया। तब गुरुने पूछा कि 'यह क्या बात है' तो फिर उसने वह सब वृत्तान्त यथावत् निवेदन किया । उसकी इस चतुरतासे चकित हो कर उसके सिरपर अपना करकमल रखते हुए उन्होंने कहा कि-'साठी चापलके पानी में उन औषधोंको मिलाकर पादलेप करो और इस तरह आकाश गामी वनो'। इस तरह उनके अनुग्रहसे उसे वह सिद्धि प्राप्त हुई। उन्हीके मुहसे यह भी सुना कि श्री पार्श्वनाथ की मूर्तिके सामने समस्त-स्त्रीलक्षणयुक्त पतिव्रताके हाथसे विमर्दित हो कर जो रस सिद्ध किया जाता है वह कोटिवेधी होता है। [ उसने उस मूर्तिकी गवेषणा करते हुए जाना कि-] पूर्व कालमें समुद्र विजय दशाई ( यादव ) ने त्रिकालवेदी श्री नोमनाथके मुखसे सुन कर, महातिशायी श्री पार्श्वनाथका एक रत्नमय वित्र निर्माण करके द्वारावती के प्रासादमें स्थापित किया था। द्वारावती के जलनेके बाद, जबसे वह पुरी समुद्र में डूब गई तरसे, वह विच समुद्रमें वैसे ही विद्यमान रहा। बादमें देवताके प्रभारसे धन पति नामक जहाजी व्यापारीका जहाज टकराया। यहाँ पर एक जिनबिंब है' ऐसी देवताकी पाणी सुन कर ध न पति ने वही नाविकोंको उसे निकालनेको कहा। उन्होंने सात कच्चे धागोंसे वार कर उसे बाहर निकाला और उसके प्रमारसे चिन्तितसे भी अधिक लाभ प्राप्त हुआ जान, उसे अपनी नग में ले आ कर अपने बनाये हुए प्रासादमें स्थापित किया । नागार्जुन ने उस सातिशायी विंबको, अपने सिद्धरसकी सिद्धिके लिये चुरा कर, से ढी नदी के किनारे ला कर रखा । उस विबके सामने, श्रीशा तवाहन राजाकी एक मान पनी चद्रलेखा को, सिव्यन्तरके द्वारा उड्या कर रोज उससे रसमर्दन कराता । इस प्रकार वहाँ वारवार आने- जानेके कारण उसके साथ घनिष्ठ बंधुभान पैदा हो गया। इससे उसने नागार्जुन से इस रस-मर्दनका हेतु पूछा । उसने भी अपनी कल्पनासे कोटिवैध रसका यह यथावत् वृत्तात कहा और वर्णनातीत रूपसे उसका सम्मान करके उसके प्रति अनन्यसामान्य सौजन्य बताया। इसके बाद एक दिन उसने अपने पुत्रोंसे यह वृत्तान्त कहा। वे दोनों इसके टोमी हो कर राज्य त्याग करके नागार्जुन द्वारा अलकृत उस भूमिमें आ कर गुम वेश बना कर रहे। उस रसके ग्रहण करनेकी इच्छासे, जिसके वहाँ नागार्जुन भोजन किये करता था, उसे अर्थदान करके अपने - १४८ ] प्रवन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाश चशमें कर, उसकी बात पूछने लगे। वह भी इस बातके जाननेकी इच्छासे, नागार्जुन के लिये नमक ज्यादा दे कर रसोई बनाती । इस तरह ६ महीना बीत जानेपर रसोईमें खारापनका अनुभव करते हुए नागार्जुनने उसका दोप निकाला । तब उसने इशारेसे उन्हें सूचित किया कि अब रस सिद्ध हो गया है । भानजे बने हुए इन लड़कोंने उस रसको उड़ा लेनेकी लालसासे,-परम्परा द्वारा यह जान कर कि वासुकिने इसका मृत्यु कुशके शस्त्रसे होना बताया है, उसी शस्त्रसे उसे मार डाला। पर वह रस तो सुप्रतिष्ठ देवताधिष्ठित होने के कारण तिरोहित हो गया। जहाँ वह रस स्तंभित किया गया था वहीं पर स्तंभ न क नामक श्री पार्श्वनाथका तीर्थ प्रसिद्ध हुआ, जो रसको भी मात करनेवाला, सकल लोकका अभिलषित फलदाता है । बादमें कुछ कालके व्यतीत होनेपर वह मूर्ति, मुखमात्र जितने भागको छोड कर वाकी भूमिके अंदर दब गई। स्तंभनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव । २२१) इसके अनन्तर, श्री अभय देव मूरिने शासन देवताके आदेशसे, ६ महीनेतक माया रहित हो कर आचाम्लका व्रत करके, खड़िया (पट्टीपर लिखनेकी धोली मिट्टीकी डलिया ) के प्रयोगसे जब नवाङ्ग वृत्तिकी रचना समाप्त की तो उनके शरीरमें भारी कुष्ठ रोग प्रादुर्भूत हो गया। तब पातालका पालक धरणेन्द्र नामक नागराज सफेद सर्पका रूप बना कर आया और उनके शरीरको जीभसे चाट कर उन्हें नीरोग किया । फिर श्रीमान् अ भ यदे व सूरि को उस तीर्थकी यात्राका उपदेश दिया । उन्होंने श्रीसंघके साथ वहाँ आ कर गोपाल वालकोके द्वारा उस भूमिका पता लगाया, जहाँ एक गाय रोज दूधकी धारा छोड़े करती थी। वहाँ जा कर एक उत्तम ऐसे नये द्वात्रिंशतिका स्तवनकी रचना की। उसके ३३ वें पद्यकी रचना होनेपर श्री पार्श्वनाथका वह बिंब प्रकट हुआ । फिर देवताके कथनसे उन्होंने उस पद्यको गुप्त रखा। २६३. जो स्वामी, अपने जन्मके चार सहस्र वर्ष पूर्व ही इंद्र, वासुदेव और वरुणके द्वारा अपने वास स्थानपर पूजे गये, इसके बाद का न्ती के धनिक ध ने श्व र द्वारा तथा फिर महान् नागार्जुन द्वारा जिनकी पूजा की गई, वे स्तंभ न क पुर में स्थित श्री पार्श्वनाथ जिन तुम्हारी रक्षा करें। इस प्रकार नागार्जुनकी उत्पत्ति तथा स्तंभनक तीर्थक अवतारका यह प्रबंध समाप्त हुआ। कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन । २२२) प्राचीन कालमें, अवन्ति पुरी में कोई ब्राह्मण पाणि नि व्या क र ण के अध्यापनका कार्य करता था। वह नियमसे नित्य सि प्रा नदी के तटपर स्थित चिन्तामणि गणेशको प्रणाम किये करता था। किसी समय विद्या- र्थियोंने फक्किका-व्याख्यान आदिके प्रश्नोंसे उसे उद्विग्न कर दिया था, इसलिये वर्षाकालमें जब वह नदी भर कर वह रही थी तो वह उसमें कूद पड़ा। दैवयोगसे एक उखड़े हुए वृक्षका मूल उसके हाथमें आ गया जिसका सहारा पा कर वह तीरपर पहुँच गया। वहाँपर साक्षात् परशुरामको देख कर प्रणाम किया। वे उसके उत्साहके ऐसे अनुष्ठानसे प्रसन्न हो कर बोले कि ' इच्छा हो सो मांगो'। उसने पाणि नि के व्या क र ण का संपूर्ण रहस्यज्ञान मांगा। उन्होंने उसका देना स्वीकार किया और उसे ' खडिया' प्रदान की। उससे उसने प्रतिदिन व्याकरणकी व्याख्या वनानी शुरू की जो छह महिनेके अंतमें समाप्त हुई। फिर शीघ्र ही गणेशकी अनुज्ञा ले कर, उस प्रथम आदर्शके साथ, वह पुरीमें प्रविष्ट हुआ। रातको ] नगरके किसी एक महोल्ले के चौकमें बैठा ही बैठा सो गया। तब सबेरे उसे वहाँ उस तरह पड़ा देख किसी एक वेश्याकी दासियोंने, वेश्यासे उसका हाल कहा । उसने उन्हींसे उसे मँगवा कर अपने हिंडोलेकी खाटपर रखवाया। तीन दिन और रातके बाद जब उसकी नींद कुछ कुछ खुली तो उस चित्रशालाकी आश्चर्यजनक चित्रकारीको देख कर वह अपनेको स्वर्गलोकमें उत्पन्न हुआ समझा। तब उस प्रकरण २२१-२२४ ] प्रकीर्णक प्रवन्य [१४९ वैठा कर वेश्याने सब वृत्तान्त कहा और स्यान-पान-भोजन आदिसे उसे सन्तुष्ट किया । फिर वह राजसमामें गया। वहा पर पाणिनि व्याकरण की यथानस्थित व्याख्या कर बतानेपर राजा तथा अन्य पडितोंने उसका बड़ा सत्कार किया । वहाँ जो कुछ पुरस्कार रूपमें उसे मिला वह सब उसने उस वेश्याको समर्पण कर दिया। २२३) फिर उसके क्रमश चारों वर्णोकी चार स्त्रियाँ हुई। इनमेंसे क्षत्रियाणीके गर्भसे विक्रमादित्य तथा शूद्राके गर्भसे भर्तृहरि पुत्र हुआ। हीनजातिका होनेके कारण भर्तृहरिको रज्जुके सकेतसे भूमिगृहमें गुप्त वृत्तिसे पढ़ाया जाता था । अन्य तीनों लड़कोंको प्रत्यक्ष (पासमें बैठा कर ) पढ़ाया जाता था । उन्हें इस तरह पढाते हुए- २६४ दान भोग और नाश-द्रव्यकी ये तीन गति हैं । [ और जो न देता है न भोग करता है उसके द्रव्यकी तीसरी ही गति (नाश ) होती है। यह जब पढ़ाया गया तो भर्तृहरिने रज्जुका सफेत नहीं किया और उन तीनों प्रत्यक्ष छात्रोंने आगेके उत्तरार्धका पाठ पूछा । तब कुपित होकर उस उपाध्यायने कहा-'अरे वेश्यापुत्र, अभी तक रस्सीको क्यों नहीं हिलाता तब वह प्रत्यक्ष आ कर कुढ़ कर शास्त्रकी निंदा करता हुआ कहने लगा. २६५ सौ सौ प्रयास करके प्राप्त किये हुए और प्राणोंसे भी अधिक मूल्यवान् ऐसे धनकी एक दान ही गति हो सकती है । अन्य तो [गति नहीं ] विपत्ति है। इस पाठसे [ उन सबने ] पित्तकी फिर एक ही गति मानी । उस भर्तृहरिने वैराग्य शतक आदि अनेक प्रबध बनाये। इस प्रकार भर्तृहरिकी उत्पत्तिका यह अवध समाप्त हुआ। " . वाग्भट वैद्यका प्रवध । २२४) धारा नगरी में, माल व मण्डल के भूपणरूप श्री भोजराज का एक आयुर्वेदज्ञ वैध वाग्भट नामक था । उसने आयुर्वेदोक्त कुपथ्य करके, उसके प्रभारसे पहले रोग उत्पन्न किया और फिर मुश्रुत कथित पथ्य औषधोंसे उसका निग्रह किया । पानीके बिना कितने समय तक जिया जा सकता है इस वातकी परीक्षाके लिये जल छोड़ दिया । तीन दिनके बाद प्याससे ताल और ओठ सूख गये । तर उसने इस प्रकार कहा- २६६ कहीं गर्म, कहीं ठड़ा, कही गर्म करके ठडा किया हुआ और कहीं औषधके साथ [ इस प्रकार पानी सब हालतमें दिया जाता है ] पानी कहीं भी मना नहीं किया गया है। इस प्रकार पानीके सत्कारका उसने यह वाक्य पदा । उसने अपना अनुभूत 'वाग्भट' नामक प्रय वनाया । उसका जामाता जो लघु वा हड कहलाता था वह भी एक समय, अपने श्वसुर ऐसे उस वृद्ध वाहट के साथ राजमदिरमें गया । सबेरे ही श्री भोजराज के शरीरको देख भाल कर वृद्ध वा हड (वाग्भट ) ने कहा कि-'आज आपका शरीर नीरोग है। तो यह सुन कर लघु वा हडने मुह मरोडा । तब श्री भोज के उसका कारण पूछनेपर उसने कहा कि- 'आज स्वामीके शरीरमें, रात्रिके शेपमें राजयक्ष्माका प्रवेश हुआ है, जो कृष्णच्छायासे सूचित होता है। इस प्रकार देवताके आदेशसे अतीन्द्रिय मान बतला देनेके कारण राजा उसके कला-कलापसे चमत्कृत हुआ और व्याधिका उससे प्रतीकार पूछा । तब उसने तीन लासके मन्यसे बननेवाले रसायनका प्रयोग बताया । ६ महीनेके बाद उतना द्रव्य व्यय करके वह रसायन मिद्ध किया गया और सायंकाल काचकी कुप्पीमें भर कर उस रसायनको राजाके निस्तरके पास रख दिया । सवेरे देवतार्चनके बाद राजाने जब यह रसायन खाना चाहा तो उस रसायनकी पूजा-पुरस्कार आदि सब सामग्री तैयार की गई। , १५२ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ पंचम प्रकाश जिनपूजाका माहात्म्य । २३०) प्राचीन कालमें, शंखपुर नामक नगरमें शंख नामका राजा था। वहाँ पर, नाम और कर्म दोनोंहीस 'ध न द' (धन देने वाला ) नामका एक सेठ था । उसने एक बार सोचा कि लक्ष्मी हाथीके समान चंचल है, अतः वह हाथमें उपहार ले कर राजाके पास आया और उसे संतुष्ट किया । राजाकी दी हुई भूमिमें, अपने चार पुत्रोंके साथ सलाह करके, शुभलग्नमें उसने एक जिनमंदिर बनवाया। उसमें, प्रतिष्ठित विवोंकी स्थापना करके उस प्रासादके व्यय-निर्वाहके लिये आमदनीके अनेक मद कायम किये । उसकी पूजाके लिये अनेक पुप्प, वृक्ष, लता आदिसे अलंकृत एक सुंदर बागीचा वनवा दिया और उसके काचिन्तक गोष्ठिक नियुक्त किये । इसके अनन्तर, पूर्वकृत दुष्कर्मके फलके उदयसे क्रमशः उसकी लक्ष्मी घट गई और वह कर्जदार हो गया। मान- प्रतिष्ठाके म्लान हो जानेके कारण वह किसी गाँवमें जा कर रहने लगा। नगरमें जा-आ कर लड़के जो कुछ पैदा करते उसीपर गुज़र करता हुआ वह काल व्यतीत करने लगा । एक वार, जब चातुर्मासिक पर्व निकट आया तो वहाँ जानेवाले पुत्रोंके साथ वह धन द भी शंख पुर पहुँचा । वहाँ अपने बनाये हुए प्रासादकी सीढ़ियों पर चढते, उसके उद्यानकी पुष्प चुननेवाली (मालिन) ने उसे फूलोंकी डाली भेंट की। परमानंद निर्भर हो कर उसीसे उसने जिनेंद्रकी पूजा की । रातमें गुरुके सामने अपनी दुरवस्थाकी बड़ी निंदा करने लगा। तब उन्होंने उसे कपर्दी यक्षका आराधन करनेके लिये मंत्र दिया । फिर एक कृष्ण चतुर्दशीकी रातको उस मंत्रकी आराधना करके कपर्दी यक्षको प्रत्यक्ष किया । गुरुके उपदेशानुसार उससे, चातुर्मासिक दिनके अवसर पर जो पुप्प-चतुःसरिका ( फूलकी चौसरी लड़ी ) से जिनेशकी पूजा की थी उसके पुण्यफलकी याचना की। उसने कहा कि-'एक फूलकी पूजाका पुण्यफल भी, विना सर्वज्ञके, मैं देनेमें असमर्थ हूं। फिर भी उस कपर्दी यक्षने, उस साधर्मिक प्रति अतुल्य वात्सल्यभाव धारण करके, उसके घरके चारों कोनोंमें, सुवर्णपूर्ण चार कलश निधिरूपमें रख दिये, और वह तिरोहित हो गया । प्रातःकाल वह अपने घर आया और धर्मकी निंदा करनेवाले उन पुत्रोंको वह धन समर्पण किया । वे भी आग्रहके साथ पितासे उस धनलाभका कारण पूछने लगे । इसपर, उनके हृदयमें धर्मके प्रभावका आविर्भाव करनेके लिये, जिनपूजाके प्रभावसे संतुष्ट हुए कपर्दी यक्ष द्वारा, इस संपत्तिके प्राप्त होनेकी बात कह सुनाई । वे भी सम्पत्ति पा कर फिर उसी जन्मस्थानमें जा कर रहे और अपने धर्मस्थानोंका व्ययनिर्वाह करने लगे। फिर विविध भाँति जिन शासनकी प्रभावना करते हुए वे विधर्मियोंके मनोंमें भी जैन धर्मके प्रभावको स्थापित करते रहे। इस प्रकार जिनपूजा संबंधी यह धनदका प्रबंध समाप्त हुआ। * श्री मेरुतुंगाचार्य विरचित प्रबंधचिन्तामणिमें, विक्रमादित्यके कहे हुए पात्रविवेचनसे ले कर जिनपूजासंबंधी धनद्के प्रबंध तकका वर्णनवाला, यह प्रकीर्णनामक पाँचवाँ प्रकाश समर्थित हुआ। [ इस प्रकाशकी ग्रंथसंख्या ७७४ है । समग्र ग्रंथकी श्लोक संख्या ३१५० है ] * ग्रन्थकारकी प्रशस्ति । . बहुश्रुत और गुणवान् ऐसे वृद्ध जनोंकी प्राप्ति प्राय दुर्लभ हो रही है और शिप्योंमें भी प्रतिमाका वैसा योग न होनेसे शास्त्र प्राय नष्ट हो रहे हैं। इस कारणसे, तथा भानी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषोंके प्रबधोंका सघटनरूप यह ग्रन्थ मैंने बनाया है ॥ १ ॥ यह, प्रबन्धसमहका चिन्तामणि, चिरकाल तक हाथपर रहनेसे स्यमन्तक मणिका भ्रम पैदा करता है और हृदयमें स्थापन करनेपर प्रशसनीय ऐसे विमल कौस्तुभ मणिकी कलाका सृजन करता है। सो इस प्रयके अध्ययनसे विद्वान् लोग श्रीपति (विष्णु) की नाई शोभित होते हैं ॥२॥ मन्दबुद्धि हो कर भी, मैंने जैसा सुना वैसा ही, प्रबन्धोंका सकलन करके यह ग्रन्थ बनाया है। पण्डित लोग मत्सरताका त्याग करके, अपनी प्रज्ञाके उन्मेषसे इसकी उन्नति ही करें ॥ ३ ॥ ग्रहों रूपी कोड़ियोंसे जब तक द्युलोकमें सूर्य और चन्द्रमा, जुआड़ीकी तरह क्रीड़ा करते रहें तब तक आचार्यों द्वारा उपदिष्ट होता हुआ यह प्रथ विद्यमान रहो ॥ ४ ॥ विक्रमादित्य सनत्के १३६१ वर्ष बीतनेपर, वैशाख मासकी पूर्णिमाके दिन यह प्रथ समान हुआ॥५॥ [गधमें फिर यही कथन ] राजा श्री विक्रमके समयसे १३६१ वर्ष बीतनेपर वैशाख सुदि १५ रवि वारको, आज यहाँ श्री वर्द्ध मा न (काठियागाडके आधुनिक व ढ वा न नगर ) में यह प्रबन्धचितामणि अथ समाप्त किया गया। - परिशिष्ट कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-सवन्धका रूपकात्मक प्रवन्ध* श्रीमान् हे म चन्द्र के समान तो गुरु और श्रीमान् कुमार पाल के समान जिनभक्त राजा न तो हुआ और न [ अब कभी ] होगा ॥१॥ प्रभु श्री हेमाचार्यके पास ज्ञान-दान प्राप्त करके उसके पश्चात् श्री चौलुक्यचक्रवर्ती कुमारपालने जो हिंसाका निवारण किया था उसका [रूपकात्मक] प्रबन्ध इस प्रकार है-एक अवसर पर, अणहिल्लपुरमें, श्री कुमारपाल नागक राजाने, घुड़दौड़की क्रीडा करनेके लिये जाते समय, एक ऐसी बालिकाको देखा जिसने अपने सौदर्यसे सुरसुन्दरियोंको भी मात कर दिया था और जिसका मुख बाल-चन्द्रमाके समान मनोहर था। यद्यपि वह * टिप्पणी-यह परिशिष्टात्मक प्रवध, इस प्रयकी बहुसरयक पोथियोंमें लिखा हुआ मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि अयकार मेरुतुङ्ग सूरिने ही इसकी रचना की है-पर ऐतिहासिक न हो कर यह एक रूपकात्मक प्रयघ है इसलिये इसको परिशिष्टके रूपमें प्रयके अन्तमें जोड़ दिया मालूम देता है। कुमारपाल ने अपने धर्मगुरु आचार्य हेमचन्द्र सूरि के पास जैनधमकी गृहस्य दीक्षा (भावकधर्मव्रत ) स्वीकार करते समय, सबसे पहले जब अहिंसा व्रतका स्वीकार किया, उस समयको रक्ष्य करके इस रूपकात्मक प्रबधका प्रणयन किया गया है। इसमें अहिंसाको एक राजकन्या बनाई है जो आचार्य हेमचद्रके आश्रममें पल्कर बड़ी उम्रवाली-वृद्धकुमारी हो गई है। अन्यान्य राजाओंके अधार्मिक आचरण देख कर वह क्सिीके साथ विवाह करना नहीं चाहती, किन्तु, कुमारपाल जो आचार्य हेमचन्द्रका शिष्य बना है उसके धर्ममावसे मुग्ध हो कर, आचार्यके आदेशसे वह उसका पाणिग्रहण कर लेती है-बस यही इस प्रबधका सारार्य है। - १५४ ] प्रवन्धचिन्तामणि . सदाचार-प्रसरण-शीला थी फिर भी धीमी चालसे चलनेवाली थी। वह मुनियोंके साथ क्रीड़ा किया करती थी। अपनी सुकोमल वाणीके प्रपञ्चसे उसने त्रैलोक्यको चमत्कृत कर दिया था, और उसकी आकृति मन्द मुसकानसे खूब मधुर हो रही थी। इस बालिकाको देख कर उसके रूपसे हृत-चित्त हो कर राजाने किसी निकटस्थ प्रसन्नचित्त (साधुजन) से पूंछा कि-' भला यह लड़की कौन है ?' उसने कहा कि-'अपार ऐसे शास्त्र-सागरके .पारको देख लेनेके कारण जिन्होंने 'कलिकाल सर्वज्ञ'की प्रसिद्धि प्राप्त की है। द्वादश भेदोंवाली तपस्याकी आरावनाके द्वारा, अष्ट महासिद्धियोंको जिन्होंने वशमें कर लिया है; समग्र भूपालोंके शिरःप्रदेशकी मणियोंने जिनके चरणोंका चुंबन किया है; उन्हीं महर्पि भगवान् आचार्य श्री हेमचंद्रके आश्रममें रहनेवाली यह अहिंसा नामक कन्या है । इसके यथार्थ रूपका निरूपण करनेमें स्मृति और पुराणके वचन तो पर्याप्त नहीं है, किन्तु समस्त जंतुओंके पितृ-स्वरूप श्री जिनेन्द्र देवके उपदिष्ट स्पष्ट सिद्धान्तों और उपनिपदों द्वारा आवासित हृदयवाले किसी मुनिश्रेष्ठने इसकी स्थितिकी रीतिका पूरा निरूपण किया है - अन्य किसीने वैसा नहीं किया। यह वचन सुन कर राजा अपने आवासमें लौट आया। पर उस कन्याका स्वरूप जान कर, उसका अंगीकार करनेके लिये परम उत्सुक वह राजा, उसके पाणिग्रहणके द्वारा अपनी भाग्य-सम्पद आदिको कृतार्थ करनेकी कामनासे, अपने 'विवेक' नामक परम मित्रके बताये हुए मार्गसे उन मुनियोंके आश्रममें जा पहुंचा। उस कन्याके सामने उसीका ‘स दा चार' नामक भाई खेल रहा था। उसीने जा कर सम-चित्तवृत्तिवाले महर्पि श्री हे म चंद्र सूरि को राजाके आगमनका वृत्तान्त बतलाया। राजाने पृथ्वीतलपर मस्तक टेक कर, उन्हें भक्ति और हर्षके साथ, प्रणाम किया और फिर उस कन्याका स्वरूप पूंछा । इस पर वे बोले-' हे नरपुंगव ! सुनो, त्रैलोक्यके एकमात्र सम्राट श्री अर्हद्धर्मकी पट्ट महादेवी श्रीमती अनुकंपा देवीके कुक्षि-सरोवरकी राजहंसी जैसी, निःसीम सुन्दरी यह अहिंसा' नामक कन्या है । जिस लग्नमें यह कन्या पैदा हुई थी उस लग्नके ग्रहबलको इसके सर्वज्ञ पिताने इस प्रकार निर्दिष्ट किया था-' यह अतीव पुण्यवती, सुदतियोंकी शिरोमणि कन्या है। पुत्रजन्मोत्सवसे भी अधिक प्रशंसनीय इसका जन्म है । क्यों कि- लक्ष्मी [ रूप कन्यासे ] समुद्रको और वाग्देवी [ रूप कन्यासे ] ब्रह्माको विश्रुत देख कर, कुपुत्रके दुःखसे सूर्य और चन्द्रमा ताप और कलंकका त्याग नहीं करते हैं ॥२॥ इस लिये क्रमशः बढ़ती हुई यह कन्या अपने अनुरूप वर न पानेके कारण वृद्ध-कुमारी हो जाने पर किसी अनुरूप राजासे साग्रह विवाहित होगी। इस प्रकार सतियोंमें श्रेष्ठ यह कन्या अपने पति और पिता दोनोंको उन्नतिकी पराकाष्ठापर पहुँचा देगी। और इससे विवाह करनेवाला वह पुरुष भी खेलहीमें महा-मोह नामक राजाको जीत कर परमानन्दका भाजन बनेगा ।' यह सुन कर राजा बोला- 'प्रभो ! यह अर्हद्धर्मकी पुत्री इस समय आपके ही चरण कमलोकी उपासना करती है, अतः इसका विवाह आपहीके कहनेसे होगा, अन्य किसीसे नहीं। सो पूज्य-पाद मुझपर प्रसन्न हों, विषादगण विषण्ण हो, महामोहका विजय करना प्रारंभ हो, और [ उससे ] परमानन्द प्राप्त करूं ।' उसके इस कथनके बाद गुरु बोले- यह वृद्धा कुमारी है, इसका संकल्प दुप्पूरणीय है। वह संकल्प इसीके मुँहसे सुन कर विवाह करना चाहिये, अन्यथा नहीं।' इस प्रकार उनकी अमृतकी जैसी वह वाणी सुन कर, उसने कन्याके पास सुबुद्धि नामक दासी भेज कर उसे वुलवाया । वह दासी उस कन्याके पास जा कर भक्ति-पूर्वक प्रणाम करके बोली- स्वामिनि, राजकन्ये, [ आज] तुम धन्यतमा हो, जो तुम्हें, अट्ठारह देशोंके सम्राट् , और समस्त सामन्तोंके मस्तक-मणियोंकी किरण-मालासे जिनका चरण अलंकृत है वह चौलक्य-चक्रवर्ती तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते है ।' उसकी इस वातसे कुछ मुँह बना कर, उपहासके उल्लासके साथ, उसने कहा-'सखि, जिस महान् साम्राज्यका अन्त नरक है उसके लोभकी बातका विस्तार , , , कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-सवन्धका रूपकात्मक प्रवन्य [१५५ करना रहने दे ! मैं तो अनुकूल प्रेमीको चाहती हूँ। पुरुप प्राय परुप आशयबाले, और नाना प्रकार के अनुरागगाले होते हैं, उनसे मेरा क्या काम है । क्यों कि- रूप यौवन सम्पन्ना कन्याका अविवाहित भी रहना वरन् अच्छा है, किन्तु कलाहीन, अननुकूल, कु-पतिसे पिडवित होना [अच्छा ] नहीं !॥ ३ ॥ पर सुनो,-अगर दरिद्र हो कर भी पति जो प्रियकारी हो तो उससे विवाहित स्त्रीको जैसा सुख होता है वैसा सुख ईश्वर ( बड़े धनसपन ) से भी नहीं प्रात होता! [ देखो न ] भागीरथी (गगा) को शिन तो शिरपर धारण करते हैं, पर लक्ष्मीके पति ( विष्णु ) उसे पैरसे भी नहीं छुने ! सो मुझे वरण करनेकी अभिलापा तो वृथा ही समझो। क्यों कि मेरी प्रतिज्ञाका किसी महाराजासे भी 'पूरा होना कठिन है।' ऐसा कहनेपाली उस युनतीसे वह (दासी) बोली-'सखि ! मैं तुम्हारी प्रियकारिणी सखी है, कुछ अपलाप तो करने की नहीं, सो तुम अपना अभिमत मुझे स्पष्ट कह बताओ। मेरा भी नाम सुद्धि है, मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा उस कुमारपाल राजासे पूरी कराऊगी।' ऐसा कहनेपर वह बोली- सत्यवक्ता, परलक्ष्मीका त्यागी, समस्त जीवोंको अभय-दाता, और सदा अपनी ही स्त्रीसे सतुष्ट, [ ऐसा जो पुरुप होगा] वही मेरा पति होगा ॥५॥ दुर्गतिके वधु जैसे दूत स्वभावनाले सात पुरुषों ( अर्थात् , सात व्यसनों) को जो अपने चित्तसे दूर निकाउ फेंक देगा वही मेरा पति होगा ॥ ६ ॥ मेरे सहोदर भाई सदा चार को अपने हृदयासनपर बैठा कर एक चित्तसे जो उसकी सेवा करेगा नही मेरा पति होगा ॥ ७ ॥ उसको इस बातको सुन कर वह बोली-'ऐ सुलोचने ! सुनो, मैं यथार्थनामा (सुबुद्धि तर हूँगी जब तुम्हारी प्रतिज्ञाको पूरा करनेके लिये, श्री हेममूरिको आगे कर, समस्त लोकके सामने, तुम्हारे इन प्रतिज्ञात अर्योका समर्थन करा कर, तुम्हें परिणीत कराऊँगी । और तमी, तुम मुझे अपनी चतुर सखी मानना, नहीं तो तिनकेसे भी गयी वीति समझना ।' यह कह कर, फिर राजाकी समामें जा कर उसने उसकी वह कठिन प्रतिज्ञा कह सुनाई। उसकी इस अवज्ञामरी प्रतिज्ञाके कठोर मारसे हृदयमें सन्तन हो कर राजा बडी वैचेनी धारण करने लगा । तर सुमुद्धिने कहा-'हे श्रीनिधे । धीरज धरो, पौरप-शालियोंको दुम्कर क्या है' ओर इस बाधा दूर करनेके उपाय भी तो हैं । महर्षि हेमचन्द्रका अनुरसरण करो और उनका उपदेश सुनो!' इस प्रकार उसकी बात सुन कर दिन य का सहारा पा कर वह राजा सूरिके पास गया। उनके पद-पभों प्रणाम कर उनकी कन्याकी उस प्रतिज्ञाका वृत्तात कहा । [ सूरि बोले- 'वस ! यदि परिणयनकी चाह हे तो फिर उसकी प्रतिज्ञा पूरी करो। यह कन्या अपने पतिकी नि सीम उन्नति के लिये होगी। क्यों कि- उत्तम पशोपन्न, धन्य और गुणाधिका सती कन्यासे विवाह करके कौन प्रतिष्ठा नहीं प्रान करता । लक्ष्मी और पार्वतीके साथ विवाह कर गोप (कृष्ण) और उग्र (शिर) ने जिस तरह [प्रतिष्ठा ] पाई थी। ॥८॥ उनकी यह यात सुन कर, दुरित समूहको दूर कर देनेपाली ऐसी हस्ताअली किये हुए उस राताने, अनेक प्रकारके अभिप्रद पारण करके, उस कन्याका वाग्दान प्राम किया और वह बड़ा प्रमुदित हुआ । स० १२१६ मार्गशीर्ष मुदि द्वितीयाको, बटयान् टग्नमें, सोग नामक हायीपर आरड हो, रत्नायसे अटकृत, गुममनरूप यर धारण करके, दक्षिण हस्तमें ककण बाँध कर, वह [हेममूरिकी] पौषमशाला के द्वारपर आया। उस समय श्वेतच्छत्र द्वारा उसका भातप निवारण किया जा रहा था, अदा नामक बहन उसकी टयण-आरती उतार रही थी, - - १५६ ] प्रवन्धचिन्तामणि गुरुभक्ति, देशविरति, समिति, गुप्ति आदि सखियाँ बरातिन बन कर मंगल गान कर रहीं थीं; अमारि-घोषणाके पटह बज रहे थे; परिग्रह-परिमाणरूप व्रतके मिपसे याचक जनोंको यथेष्ट दान दिया जा रहा था; पापरूप कचरेको दूर हठाया जा रहा था; सद्वोध पुप्पोंसे सन्न्यायकी राजवीथियाँ सुगंधित की जा रही थीं; तब कन्याकी माँ अनुकंपा महा देवी ने श्री अर्ह न के साक्षी रहते प्रोंक्षण किया। इस प्रकार उस राजाने अहिंसाका पाणिग्रहण किया। उस समय, तारामेलक पर्वमें परमानन्द हुआ। इसके बाद, नवांगवेदी महोत्सवके स्थानमें, ३६ हजार श्लोक ग्रन्थपरिमाण, हे म सू रि कृत त्रिपष्टिशलाकापुरुपचरित्र नामक शास्त्र स्थापित किया गया । वेदीके पात्र-स्थापन और पाँच कपर्दक ( कोडियों ) के स्थापनकी जगह; बीस-संख्यक वीतरागस्तव स्थापित किये गये । शमी काष्ठके स्थानपर द्वादश प्रकाशात्मक योगशास्त्र अन्य स्थापित किया गया। उसके परिकरके रूपमें, हे म सूरि के अन्यान्य लक्षण, साहित्य, तर्क और इतिहास प्रमुख शास्त्रोंकी रचना हुई। मूलगुण और उत्तर गुणोंसे इस वेदिकाको दृढ़ करके, उसमें ज्ञानरूप अग्नि जलाई गई, और ' चत्तारिमंगल ' रूप इस मांगलिक सूत्रके उच्चारणसे मंगल किया गया। उस समय उस कन्याके मुखमण्डनके लिये, राजाने ७२ लाख रुपयोकी आमदनीवाला 'रुदती कर' (अर्थात् निःसन्तान विधवा लियोंके राज्यग्राह्य धन ) का त्याग करने रूप दान किया । उसी समय उसका पट्टवन्ध किया गया (-उसे पट्ट महादेवी बनाया गया ), और उसके पिताके निवास-योग्य १४४४ विहार बनवाये गये। फिर हिंसा ( जो राजाकी पूर्वपत्नी थी ) अपनी सौत आहिंसाकी इस प्रकारकी उन्नतिको देख कर, अपना पराभव निवेदन करनेके लिये, अपने पिता विधाताके पास गई। बहुत दिन बाद देखनके कारण तथा पराभवके दुःखसे विरूपसी बनी हुई उसको न पहचान, पिताने उससे पूंछा कि- 'सुंदरी ! तुम कौन हो ? '_' हे तात विधाता ! मैं तुम्हारी प्रिय पुत्री हिंसा हूं!' तूं ऐसी दीनकी तरह क्यों है ? '-'पराभवके कारण । वह (पराभव ) किससे हुआ ? '-'क्या बताऊं! 'कहो न '_' हेमाचार्यके कहनेसे, उस परम गुणवान् कुमारपाल नृपतिने मुझे अपने हृदय, मुंह, हाथ और उदरसे उतार कर, पृथ्वतिलसे निकाल दिया ॥९॥ उसकी यह बात सुन कर ब्रह्मा बोले कि-'सत्यप्रतिज्ञ ऐसा कुमारपाल देव जो पहले तुझमें अनुरक्त हो कर भी, उस भेषधारी साधुके कथनको सुन कर, अब विरक्त हो गया है; तो फिर मैं अब तेरे लिये कोई ऐसा अच्छा पति ढूंढ निकालूंगा जो तेरा ही एकच्छत्र राज्य कर देगा। इसलिये तुम धीर धरो' यह कह कर उसे अपने समीप रखा । अहिंसा देवीके साथ श्री कुमारपाल नृपति अपने इस जीवन-ही-में अतुलित महानन्दका अनुभव करता हुआ, चौदह वर्ष तक, सुख पूर्वक राज्य करता रहा । इसके बाद उसकी एक पहली प्रिया जो कीर्ति थी उसको देशान्तरमें पठा कर, जब उसने स्वर्गको अलंकृत किया, तो उसी समय उसके प्रेमकी प्रसादपूर्ण क्रीड़ा- ओका स्मरण करती हुई वह अहिंसा देवी भी, कलिमलिन जनोके पापस्पर्शका परिहार करनेकी इच्छासे, उसके साथ 'सहगमन' कर गई। इस प्रकार श्री कुमारपालका अहिंसाके साथ विवाह-संबन्ध बतानेवाला यह परिशिष्टात्मक प्रवन्ध समाप्त हुआ। ... , -:0: