Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Banita Bhushan
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Earad
मु.सं.
बनिनावणी
ঙ্গুেনি
३१८०
कम से नायिका अलंकारन के एकवलक्षण
उदाहरनन को संस्कनभनेक ग्रंथ सनानुसार को
युत् चङ्गवारणबंशाबस हड्ड कुल कलश
बुन्द्रीन्द महाराजाधिराज महाराव राजा
जीनी पनी पत्नी नीयो २००नीरघुबीर
सिंह जी के कवि राजराव जी.
मी गुताव सिंहजीकृत
और
जगनभाशयत्रालयातहगढ़ने
पंडितजीनीजगन्नाथ प्रसाद त्रिपा
के भवंधसेछापीगई
पहली बार ५००
(हदरबारी लाल कापीनवीस फ़तेहगढ़
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३.760
दोहा
गणेशायनमः श्री सरस्वत्यैनमा
जय बानता पण लिख्यते न यो
समस्या
बसन विशारद.धारिनी पारदमारद कार्यगनारवादि मानस वस:
निशारद होह सहायणपसमयादोहागशील सदन
जनदुख कंदन मदन रुप रन धीरमार-मर्द मर्दन बरवदन निसे
तामन रघुवीर ॥२॥ योग जुगल नाजीमगज दिये राम नाधीर।।
कंचन ककन पान मैं पहिण्ये रघुवीर.॥३॥बंदी पोन रघुवीर की
सासन भानि सिताब गवनिता भूषण सार में उद्यम करयो गुलाब
मोसंबन सर उनईससेउनचास क्रीय वार माश्विन नवमी-शुली
पख भयो ग्रंथ अवतार ॥५॥ अग्रथनयम॥दोहा॥
बोनना भूपन तारगाह गाँवयों इक तासगयाही ते योको धरणे
वनिताभूषन नाम गई। नायिका जातिगदोहा॥ज़ानि.
पानी चित्रिनी और शरिखनी नारिगवार हस्तनी उनमतुंधू
इव' पूरव धारि ॥७अयसाधारण नायिकाखको
या नायिकालक्षणदोहोउपनातरनियाई निरखि
हि नायिका मानिगरवासी ही के प्रेम में पो.सकीयो नानि
पनि जना साधारना स्वीया के भिद दोयगखोडनादि.जे भेदते सा
धारन में होय यंदा मायाकार लक्षण॥दोहागरम
भर्थन नै भिन्नजो शब्दार्थ के माहिं चमत्कारभूयना सेरिस
जन मानत नाहि गाय अलंकारांग कयन-दोहा
विचधादिउपमेय हैं शशि कपादि.उपमानासमानार्थ बाचन
लखो धर्म एक गुव नान ॥१॥चौपाई है उपमेय विषय :
--
. अरु बण्यंग उयमान विषयी रुशवराय॥ प्रासंगिक हैं पर न जानिअप्रसंग प्रस्तुत मानि॥२२॥भेदय विशेष्य विशे पण भेदकाब व्यापक सामान्य अखेदक ॥३॥पल्यन यक माहि विशेषभूषन भासक नाम अशेष ॥१३॥श्नया शोपिसा सुलोपना लक्षणा दोहा।सुपूर्णोयमा बाचक रुचि पय धरी उपमानगइक दैश्य के लोप में लुशोपम परिमान ॥१४॥ टीका बाचक उपमेय धर्म और उपमानयेच्यारों होय सो पूरा मा अलंकार है। एक के दोय के नीन के लोप मैं लुप्नोपमाको है ॥१६॥ अयसाधारमा नायिका पोपमा उदाहरण दोहा॥ शशि सो उज्वल मुख सुभग अर्थ चंद सोभाल। नोसी छवि भी बिहरन देखी वाल ॥१५॥ टीका शशिमो लो मुख है। साधा चंद्रमा सो सुन्दर भाल है। सोना की वेलि: चिसरी नई नायिका डोलती देखोग यहाँ शोश उपमान सो ज्वत धर्म मुख उपमेय हैं और अर्ध चंद उपमान सो वाचक व उपमेय सुभग धर्म है और कनकलता उपमानसी वाचक भरी धर्म बाल उपमेय है३ याने पूर्णोपमा अलंकार है ॥२५॥ कसुनारधर्म लुनारधर्म वाचकलुप्मा ३वाचकोपमेय लुम्मा ५५ माननुमावाचकोपभान तुम्माधिषिमान लुप्ता चचा नुनाप्ये लुभा के साठ भेद हैं॥अथ वदीया सालों उदाहरणादोहाकर किसलय मनुजसे पायनेन नन३॥ी विकार शासन नी५पिरु सधुरे सिब न्। सकागकर है मो नचान पान ने शोजन में चाके सूल में मेवा याने वाचकनुमा मांज मे पाय हैं या धर्मलुना है। ये नवरागन ने बयांकन में धर्मवाचक नहीं । पानमा सोनाली को नाच नावासन में से . ... -Mere- -- Realineer A marwar
००
उपमेय नहा याने धर्म वाचकोपमेव लुनाले में फाट सिंहसी पन
तो है इहाँ सिंहकी काटनहीं कही यापमान लुप्ताहै।ासिय
किचेन कोयल से मोठे हैं याके मूल में पिकवांनी उपमान श्वोर से
वाचक नहीं याने वानकोपमान लुगाई है॥२६॥ वरबैंग
रिजा हग संग सम हैगति गज राजगभापत लुप्ता शाहियों
कविराजदीको पानी के नेव हारन के समान धामें
सृग के दृग उपमान नहीं और धर्म नहीं याने धर्मापमान लगा है।
जगनि गजराज यामें-नायिका की गति उपमेयी है.धर्म उपमान
वाचक नहीं पाते धर्मापमान वाचकलुमा पाजलकी पार्वती-
स्वकीया नायिका हैं। साथ मुग्धामनन्चर्य लक्षा॥
दोहाग जिहिं. ननु जोवन अंकुरित मुग्धा नियरे सोयानाकी
उपमा जाहि कौं लगै अनन्वय होय ॥२वाजयनुग्धा जन
न्वय उदाहनपदोहामुख सो मुख हगसे गहि कसे
कपदसाहिबल्प उरोजउरोजसे जनक सुना के शाहिए।
शिकागमुस सो मुख ही हैगसे हाही है कंचसे कचही दी
ख हैं जनक सुना के छोटे कुच से कुच ही हैं यहाँ छोटे कुच में
ग्धा हे और मुख हग कुच उरोजन की उनहीं कीउपमालगी याने
भनन्वय है।राजय भज्ञात यौवनाउपमेयोपमाल
हीक्षणदोहागनहिं जाने निज योवाह हे अज्ञान सुजोयग
उपमा उपमेयौपमा तगै परस्पर होय॥२०॥ टीकागजोवन को
नहिं जाने सोपज्ञान यौवनायिका है।परस्पर उपना लगेसो उप
मियोपमा अंतकार होय है अथज्ञान यौवनोपभयो
पमा उदाहरनोवासरंकावतंगदियानबेलसन समितछबिखा
निराजतनपान से जतज से जनक लती के पानि ॥२ टीका ।।
नगुड़ियाँ सरसावेदन जनकनितीकापसे जलजलते हैशी
बसूर
नवासी ज्ञात यौवनाः .
रजलज से हाथ लेसे हैं। यहाँ गुड़ियाँ खोल वासों अज्ञान
वना नायिका और जलजन की उपमा हायन कौं लगी
हायन की उपमा जलनन कौलगी याने उपमेयोपमा झाली
कार है ॥३॥ अथ ज्ञान यौवना प्रतीप लक्षण
हा॥ जान जोक्न आगही ज्ञान योवन जान भायन प्रय
से प्रतीप जह: होय वार्य उपसान॥२२॥ टीका। प्राय
जोवन को आप हो जाने सो
क्षात यौवना नायिका है।
नगजहाँ उपमेय उपमान होय नहीं प्रथम अनीप भायन
प्रतीम नाम उलब को है ॥२२॥ अय ज्ञान
यम पनीष उहाहरनगदोहा । निरखत छाती डॉट
बदोस्त दीवि डण्याकीरतिजा सी वी जरी तब ही जानी
य॥२३॥ टीका जब छाती छोह देखनी हुई सखीन
दीठि बचाकरि के दौड़े है नब ही कातिजा सीबी जुरी
यिका है कीरात जा सीबी जुरी मैं उपमेय उपसान भयो
उलटी है याने प्रथम प्रतीक है ।२३॥ जय नवोदा
तीय प्रतीम लक्षण॥दोहा॥तज्जा भय बस निन
नारि नवोदा मान गदितीय वाये उपमानन्हे होय
अपमान टी लाजोरडरकेवसमें रनिनहीं।
मेय है सो उपमान होजाय और उपमेय को अनादर
यसो इसरो अनीप है॥२॥ अथ नवोला द्वितीय
हरण ॥दोहा॥पिय कर नैं छुटि भजन जव यो सजनी
॥देखो नदन दामिनी घन मैं चपत लवान ।। २५
॥पीनम फा हाय में मौदि कार के जद ..
है नव सखी पौहरखाव हैं। देग्यो नायिका की.
M
200
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.
..
बीनना भूपरण
मि0 चीजुरीचंचल दोरगे है यहाँ नायक का पात से नायिका -
जे हैं याने नवादा है नायिका सी चीजुरे है याने उपमेय उपमानम
यो नायिका का अनादर भयो या दूसरो प्रतीपहे||२५॥ अथ
विशाधनवोदावनीय प्रनीपलसंग दोहामा
सोविजय नवोदहि विमा सें फछपीय गावराय वरायरहिका
रायहिनादरेसुरतीय टीकागपीनस फो का विश्वास
करे तो विभब्ध नबोदा नायिका है ।उपमेय है सो उपमेय रहकरि
कि यमानको अनादर करें सोनीसरो प्रतीप.हैप३५॥ अथ वि.
मधनवोदातृतीया प्रतीप.उदाहरनदोहामति भव
न भासिनी भौति गरी सो जायगदामिनिमन को दुति दरपनि हि
विरियान रहायवाटीकागकोलाकाभवन भामिनी है।
सोउर मैं भरी सो जायहेगना समय बीजुरी का मन कोडानको गर्व
नहीं रह यहाँ नायिका केलिभवन की भरपनी सी जाय है योने
विगंध नवोदा नायिका हापौर नायिका उपमेय से बीजलीप)
मान ने भनादर पायो चाने नोसो प्रतीमहि यह दिनीय भेदसैन्ती
टोहे!॥२५॥ अयमनांतरेण मुग्धाभेदाचीपादबयर,
घिरनववधरप्रसंगानव जीवन पुनि नवल मनंगाधान वा-
मा५मदुमानाईखान लजां प्रायासात वरवोनी ॥२॥अथवा
यसाध चतुर्थ प्रेतीपलक्षणा दोनोगबयस्तंधि शिशु
नामतकात्तकै जब मननीयाचबंधवार्य उयमानाबगर्यस
ननगनीयाराटीकागजवनियवासन में बालपना की
रतकालकैसो वयस्मपि नायिका है।उपमेयमोउपसान हो
भार उपमेय कीसमान अपमान नहीं गन्यों जायसोचक्यो प्रती
है। बयस्सधि चतुर्थ प्रतीप उदाहरनादोजी
सोज,सिंगार-जब नियतन मंद नेज गति माहितिव तंब करी
बभू० पारंग गान तमना पावन नाहिँ॥३०॥ टीका जवनिय हे सो सिंख्य र सजिकै संदतेज गति से चले है तब नब हाथी और हिरण की गीत समना नहीं पावे है इहाँ मंद नेजान से चले है याने वय- रसंधि नायिकाले और मंद तेज गीत उपमेय है सो उपमान भयो कादरी तुरंग की गति ससता लायक नहीं याते चवयो प्रनीय है। शा नबुल बधू पंचम मनीष लक्षणा दोहामदिन दिन डूनी बुनि बढ़े नवल बध अनुमान उपमेयतु उपमान हे व्यर्थ या उमजान ॥३१॥ दीका दिन दिन प्रति दूनी सोभा बढ़े यह नक लजा को अनुमान है उपमेयहि सो उपमान हो जाय फेरि उपमान ज्या हो जाने सो पंचम प्रतीय है ॥३२॥ अथ नवल बधूप पनीर उदाहरन॥दोहा॥दोशन के शशि लौ कती शिवासर सरसान गजेनव सुना ननु निरखता कनक ना ३२॥ टीका दोज़ का चंद्रमा की समान कला राति दिन कर गाव है।जनक सुना का शरीर को देखता कनक की लता द व है। यहाँ कला सरसावा सौ नवल बधू नायिका है और जनक सुनाउयनेय है सो उयमान भई ताकै भागे कनक लता पंचम मनीय है ॥३२॥जय रुपक लक्षण ॥दोहा॥ विषयी जे विषय में है नप अभेदाधिक न्यून सम दुहून करि पर रुपक है भेद ॥३३॥ टीका उपमान है सो उपमेव तोर तप और अभेद होकार के एक उपमान उपमेय मैं स्या रह एक उपमान न्यारो रहै सो तयगउपमान उपमेय मैं द नहीं रहे सो अभेद इन दोनन के अधिक न्यून समना छ भेद होने हैं॥३३॥ जय नव योवना अधिक दोहा । सो मुग्धा नवयौवना जोवन झलक अधिक नट्रेप जह उपमेयहि अधिकाय॥३॥ .
m कि जोमातक तस्यावै सोमुग्धा नवयौवना नायिका है नहीं यगेय की अधिकता होय मो अधिक नदूप २३७॥ जय नव यौवना अधिक तद्य उदाहरनगदोहागसरने चन्द्रम- जस ने जीवनभलक प्रकाशासिय मुख शशि शशि ने सरस निश दन करन प्रकाश ३५५ टीकागचंद्रमा का उजाला से जोवन की रत्सक को प्रकाश अधिक है।सीताकोमुखचंद्रमा से सोचंद्रमा झधिक हे गति दिन उजालो रहेनहाँनी जीवन का प्रकास में नव यौवना नायिका है और सीता.चा मुंख चंद्रमा उपमेयमें गति दिन प्रका- श करवों अधिकना याने अधिक नप है ॥३५॥ अयनव लअनंगा न्यूनतद्रप लक्षणदोहागनवत अनंगाको मरेच मोतायन में जानिगहीयन्यन नहप जव उपमेयहि क्रमता नि॥३६॥टीकाभोलापन में काम की रॉच होवै सो नवल - नंगा नायिका जानोगजव उपमेय को कम मानें तवन्यून नपहे यहै॥३६॥ अथ नवल नंगा न्यूनतद्प उदाहरण दोहा। सुनि रनि की यय विनय निये नैन मोदमसकायातक रुपको चंपरपन में चंचतता नरहायशा टीकागतिय है सो पियको रति की विनय मुनि कार के नेन मुदि मुसकावै नवं रुख की सोचपम्पन मैं चंचला नहीं रहै यहाँ नैन मंदि मुनका वासें नवल नंगा नायिका हेभोर कषन की सोचंचलता चष रुयन मैं नहीं याने न्यून गदपाहे ॥३७॥ अथ रात बामात सतपालारा॥दोहा॥रतिबामा वामा सुनी सुरत शरु चि पहिचान सम नप डहन में समना भय वखानिगा टीकारत वामा है सो तौ रुरत में अाच पहिचानों पदों, जून मैं समना भया पैसम तद्प बखानों गाय रति- बामा सम नप उदाहरण दोहा मौन धारि पियपान
कार के रोस को दारि कार के हती तब होस्यारी
वनिता
सजब बैठे हम शिरमाया नवराधा रनि जति लसत मानबन
रति भाय॥३॥ बोका।जब सौंन धारि करि कै पियके पास
गशिर नवाल कार के बैठे लबराधा रति है सो अत्यंत ली है मा
नवती रनि की समान ॥ यहाँ मौन धारि पिार नवाय बैठि वाले
रनि वासा बाधिका है और राधा रतिमें मानबती रीन में रामना
याने रस्म तद्वप है॥३८॥ अथ दमाना अधिक असेद
लक्ष दोहा॥ह माना जो मान के अवसर मुटुल रहा
अधिक होय उपमेय नबाधिक अभेद कहात ॥१०॥
मानका अवसर मैं मृतुत रहावे सो मुटु माना नायिका है
यअधिक होय नब अधिक भेद कहावे है ॥ अथ
साना अधिक अभेद उदाहरण दोहा॥साप
यि पिय नयम सुसकानी रिसंवारेग हात्य जोन्हतब सदन में
तरही विस्तारिपाटीकापोनम को पहिलै
सदन में सवेरै ही विस्तारि रही यहाँ रीस टारि
सौं मुड माना नायिका है और हास्य में चाँदगी मैं भ
नहीं यह तो अभेद सबेरै विस्तारि रही यह अधिकता
अधिक अभेद रूपक है ॥४२॥ जय लज्जा ।
सभेद लक्षारा॥दोहा॥ लज्जा जुन सुरतहि
लज्जा प्रायान्यूनहोय उपमेय नबन्युन अभेद
१ टीकागलाज सहित सुरत करे सो लज्जा
नायिका है जब उपमेय न्यून होय नबन्युन अभेद
है ॥५२॥ मय लज्जा माया न्यून अभेद.
"दोहा॥ धीर धरह गुरुजनन लरे जो गत दैव
सौभाषत भयभरी तियरत सोम प्रकास ॥४३॥
ब.भू.
टीका॥धीरज धरो गुरु जन ननद देवर मास जग हैं पिय सौं
भायना निय रति की भय भरी सोभ अकासे है इहाँ गुरु जनादि-
कसै लाजै है याने लज्जा प्राया है निय रोन की भय भरी सोस
प्रकासवो न्यूनता है याने न्यून अभेद रुपक है ॥५३॥जय
मध्यासम भभेद लक्षण॥दोहागलाज काम समजासु
कि सो है सध्या नीय गउपमानरु उपमेय सम- होय अभेद तृतीय
॥ टोकाजाकै लाज काम समान होय सो मध्या नायिका
है।उपमान उयमेय समान होय मो नीसरो अभेद है।साथ।
मध्या राम अभेद उदाहरन॥दोहा लाख तखि पिया
छबिनिया जब जब दीति दुरात गनब नव यिय मन बस करनि
हग कंजन छवि छात॥५॥ दीका पीनम का गन की छ।
वि देखि देखि कारकै तिया है सो जव जव दीपि दुरावै तवा
तव पीनस कामन कौ चस करवा वाली हग कंजन मैं छबिछ।
विहै देखि करि कै दीति दुवै है याने मध्या नायिका है
गन कै और कंजन के समना है चातें सम भभेद रूपक है।
सामर्थ्य भेद ॥चौपाई॥ इक शारुद्ध यावनाश्वा |
मा प्रगल्भ वचना२ दितिय लेतामा प्रादुर्भूत चनंगा सोई
चोयी सुरत विचित्रास होई ॥१६॥अथ भारुद योवना
परिणास लक्षण॥दोहागसुझारुद जुवना कही पूरनजो
वन वाम ॥ उपमेयर उपमान मिति कर किया परिणाम ॥om
टीकागजो चाम पूरन जोवन वान होय सो भारुद यौवना नाय
का है उपमेय उपमान मिति कार किया करे सो परिणाम
संकार है॥७॥ अथ भारुढ़ योवना परिणाम उदाह
रन दोहा कुच कुंभन नै उर परोस भुन लतिकार गहितना
दुग कंजन लरिख प्रिया सन रंजन करि देनगादीका।
-
. १० है सोका कुच कुंभन लें जर कौं पनि करि के भुज लतिकान से गाह से हा कंजन मैं देवि के लिया है सो मन को राजी मार दे कुछ कुंभन से शासन यौवना नायिका है और कुंच कभ सुज लनिका हवा कंजन हैं परसियो गहियो देखियो क्रिया करी याने परिमान अलंकार है।३६८ मास चना प्रथम उल्लेखलल दोहा नसल्म बन बड बचन भाषि जद यदुरायबल माने जन सहकों से व गनाय ॥८॥ दीका जो बड लचन भाभि कार के सो प्रगल्म बचत नायिका है एक के बजत স্ব অর্থাৎ ফান ফী 'ভ্র বলে খালুর্ন। এই लान्छना शुस उल्लारख उहा हरदोहा ४ पिया लाख लिय बचन सोलन जुन सातवाना पिये पियर कोफिल सारस्न सौखिन जाने वान ॥५०॥ का पीलम मैं पराध सहित देखि कार के तिय की अभिमान सहित वास्ता भीनस के पियूष्ट जान्या लखीन ने कोलिन जान्या নিল মুঙ্গে তা অন্য কােনো ফা জুল কাই ला बचन नायिका है और एक बचन को पीतल ने पियूष न्या सरवीन ने कोकिल जान्या सौतिन नै बारा जान्या यात लेख अलंकार है॥५०॥ अथ नादुल मनोमवा य उल्लेखलामा दोहा माने सोमवा परित कसान ॥ बन गुन सौ बड़ विधि काहे जुग उल्लोष शमान ॥५॥ दीका काम कातान में परित होय सो गाडति सनोमवा बहन गुन सों बहन विधि करि कै कहें तो दूसरा उल्लेष को सान है ॥५१॥ अथ भादति सनोनला दिलीयू उदाहरन॥ दोहा में काम कलान भी लिया रात में -- दरसायाछवि में गिरिजा गुन गिरा पालन रमा तरवाय॥२॥ दीकाकास कसान की भरी हुई निय है सो रात में विर- रसाव है वि गिरिजा है गुन में गिरा है पात्तता रवाना रखा है। यहाँ काम कत्तान की भरी हुई हे याने माद न भनो सवा नायिका है और एक नायिका को अनेक पुसा से अनेक तरह जानी चातें दूसरो उस्लेप है ॥५२॥अप सुरत विचि वासुमरन लक्षणगतेहगसुरत विचिचा नायिका जो भद्धन रत गनगसुमरन है इक वस्तु लरिव सो सुमरन को मान ॥५॥ टीकागजोशन रत लगने सो सुरत दिचिश नायिका है एक वस्तु की देखि कोर के सुमरन होय सो सुसरन भतकार है ५३ अय सुरत विचित्रा सुमरन उदाहरन॥दोहा कील कला प्रति करन जव पिय मन जलसात गतव नबाले रखि सखीन की मदन निया सुधि ज्ञान॥५॥ दीका सुन लेति कला करता जब पीतम को मन जलसावे हे नवनव निरीख कारकै रुखीन ली मदन तिया की सुधि भाव है.यहाँ अद्धन केलि कला से सुरत विचिश नायिका है और नायिका कौ देखि करि के सरपीन को मदन निया को रमरमा भयो याने स्मरण अलंकार हैं ॥५४॥ भयौता भुस लझा शेहाण प्रौला पनि ही के विषय केति करताप प्रवीनगइक की तरिख भूम होयज हेभम भूषण बीन॥५५॥ टीका॥ पति के विषय सैलिकता में प्रवीन होय सोनौदा नायिका है एफ के देखि कै भम होय नहौ भ्रम प्रकार हैहेवीन। मौदा मन उदाहरनगदोहा।जव पिय संग सि यचा सोहरपि हिये लपदानि गतब लरिव ह मोर गन घन दासिनि मन सोनि॥५६गतीको जब सोना हो ।
निरमादिक को निधन भयो याते साडेह अलंकार है
विज्ञान धरि माँचीभाव डराच॥६१॥टीकाकाम के
ब००
पोनल के संग मला पै चढ़ि करि कै हषि कारकै हिया
लिपटाई. तब देखि कार के सोरन के गल हर्षे घन
सन में सानि कार के यहाँ ही कार हिया सों लयटांवों
याने गोदा नायिका है। और आरन को घन दामिनी को स्य
भयो याने भगाकार है। ५६॥ अथ प्रौदा भेद।
पाई। नाउताराथ कामो घौ कहि भावोन्नता३दर ग्रेड
मलहि अरु समस्त व चतुरा ५ जानी। पुनि शाकान
६सानी॥ ५७॥ दोहा॥है समस्त रत कोविदा चित्र
साम्जोय।पुनि लव्धो पति नायिका प्रौदा मिदनव होय॥
जय पाडलारुसया संदेह लक्षणा ॥दोहा॥
नरुण्या नायिका धन जोबन वारि॥इक को ताख संदेह
संदेहसु निर्धारि॥५६सरोका। जो पूरन जोवन वारी होव
सो गाड़ तरुराया नायिका
निश्चय ही संदेह है॥५॥ अथ गाड़तारुण्या सद
ह उदाहरन दोहा॥ बंक दीजि हर्गमद भरे कुच नि
देव लाख पौनल मानत यानि रमा उमा गिरा कि
प्रवीन ६०॥ टोका। वाकी दोटि मद के भरे जगह
च नितंबन कों पौन देखि कै अति सान है यह रति
रसा है कि गिरा है कि उसा है। प्रवीन यहाँ कुच
पीन है या गादनारुण्या नायिका शालिकर
कामाधा अनि काल बस पार न रति भाय। शुद्धाप
वरा भात्यंन होय परि पूरन रनि भादै सो कामांधा है।
एक कौ देखि कै संदेह होय
०० और धारे कार के साँचा भाव कों छिपावै सो शुदायन्हुति अतं. गर है गाय कामांधा शुद्धापन्हात उदाहरन॥ शहाजनैनन याके मन सरवनन मद घर माहित नपति कोहिनक यह डरे गुरुन सौ नोहिंग६२॥ टीका॥याके नेत्र नहीं हैं. मेन केनर हैं वचन नहीं है मद के घर है-यह पति की छिन भर भी नहीं त्याग है-बड़ा भादमीन से डर नहीं- यहाँ पनि को नहीं न्यागे है. याने कामांधा है और नैननको मैन सर हराया-वैनन की मद घर वहाया-यान शुद्धापन गति है॥ अथ भावोन्नता हेत्वयात लक्ष दोउन्नन भावन ने किया भावोजना वखानि महत्व अपन्जति जुक्ति सों वस्तु दराये जानि॥६॥ टीका।उत्तनमा चन ते भावोन्नता नायिका वरवानी-क्ति सौ वस्तु छिपावे पैद त्व पन्द्रीत भलंकार जानी॥६३॥ अथ भावोन्नता हेत्व पन्हात उदाहरनगदोहा॥ मन उन्नन भावन भरी यह ननरी निदाने गमतनुपानेवनी ति नहीं रमा शाहि छविया नाटीकाभन्यंन उन्नन भावन की भगे है यह निश्चय ही नरी नहीं-ननु सहित पतिवारी है-याने रति नहीं छवि को थान रमा है यही उन्नने भावन में भावीन्नता नायिका ने झारना यिका कों जुक्ति कार रनि से बचाय रमा ठहराई यति हत्व पन्न न है गईमा अय दरब्रीड़ा पर यस्तापात लक्षण दोहागजव है यारी लाज नव-दरब्रीड़ा निय भोपं॥पर येस्ता, पन्हात धर्म पर को पर मैं रोप॥६५॥ दीफागजब योरोलान होय नव दर बीड़ा नायिका है-पैला कोर्स पैला रोपेरोपर यस्तापन्डनि ललकार है अथ दरबोनापरं यस्ताय- न्जीत उदाहरनगदोहा।सुरन करत अध सुलिन हंग- . -- जब नियोलतमंद माहि सुधा धरते बचन नाईन । चंद॥६६॥ टीका।सुरत करना अब खुल्या नेवन में वाद बोले- ते बचन सुधा धरे है चंगा सुधा धर नहीं यहाँ मध खुल्या नेवन से दर ब्रीड़ा नायिका है और को सुधा पर यगो छिपाच वचन मैं ठहरायो गाने । हीन है।६६॥ अथ समस्त रत कोबिता हिलारागदोहा।सो समस्त रत कोबिदा सकल र जीन भानायन्हात मान की करे झाति को होना संपूर्ण सुरत में प्रवीन होय सो समस्त रन कोबिदा है- ॥ |चोति को छीन करै सो नायन्हति अलंकार है জন্য বলুন জুক্তি স্বস্তি। दोहा॥ नाना विधि निशि सुरतने माखन मान लखि नाहि खि पछी का माधि है निय पहिरति अस शाहि ॥६॥ नाना प्रकार से रवि में सुरत नैं नाकों सवेरे नलिन देखि ली. पंडी कहु माधि है तिय नैं कही रात को जस है। नाना प्रकार की सुरगि सलत रन कोनिदा है और चयन वचनसैं सदी कौ अस जानो रह्यो- याने सानापन्हात हमथ मानावनायकापति दोहामु भागान नायक निया निहि यति कुत era कोयन्झनि शान के जान साँच छिपाच ॥६॥ जाक पनि कोर कुल बस में होय शोमामांतनामिक्षा साजान्या से सोचको हिपावे गोलेका निजकार झयमानांत नायका केफायति । दोहागनना मन नारे नहीं भयन चमन बनाने।। पियनी ने मचा गनिनिरिकी बात , स्यन बसनधनानामन क ननक भी नहीं मारे मानकही पियकी कया है नायकान कही नहीं सखी सरी की वान देय- हाँ भूपन वसन बनावा सौ सामान नायका है और नायका नसरखो से साँची वान छिपाईयात छेका पन्जति ॥ झय समस्त रस कोविदा कैनवासात लक्षा दोहामहे ममस्त रस कोविदा पिर्याह सफल रसदाय॥ पद सिसोद कार कैनवा पन्द्धति मत्य दुराय॥२॥ दीकापी- नम चौं संपूर्ण रस दायक होय सो समस्त रस कोविदाहगिरा पद कार के सत्य काँगुरावे सो केनवा पन्हति चलंकार ॥२॥ গৎবহফার্কিন না- नगदोहा॥हास विलास चालोन कोर प्रेम पासमन सीचि। पोतम फेर में कर लियो चितर्वान खिस रस सोचि ॥७२॥ टीकापहास विलासचन्तानकरि कै प्रेम पासी सें मन खोचि केप नम को करने करतियोचिनचान का मिस सौ रससोचि कारकै यहाँ कशान कारकै पातमीवसमें कलियोया सगस्तरस कोविदा है और चित्तवान को मिस पदकार कैरत सचिवोतहरायोनिकेत वापन्जति अलंकार हेअचिवविधमालक्षपदोहा चित्रविभ्रमा नायिका विधमजासुविचित्रानन निपियभनवसवार निवर्ननविबुध पवित्र॥३॥उदाहरनगदोश जिहिरदहासी सुखकरतकुंदजौन्हशीशमंदा मोहिनिमन गांधकामोहिलियो। बचंद अथलब्धातिलानपदासोलब्धापति नायिका सौदाभेद वखानि कानि करेजाजी सदा पनि फल प्रभुतामा निगउदाहरनगदोहा मलखिलातचानी वाल को नईल- लाउर लायो इकटक चितवन हुन मन रहनो मेहमरमाय॥ प्रधधोगदि भेदमंदोदाम
हैं-गुलाद कांद काही कार लोग
"
due
नच्या औला मान मै विविधि होत प्रत्यक यांग मोर जाधीर
पुनि धीर धोरा एक॥७५॥ भए उत्प्रेक्षालदागा।
दोहा॥ वस्तु हेतु फल तोन नै संभावना जव होय॥
उत्येता ताकी कहन कावजुलाद कोल लोच टीका
वस्तु हेतु फल इन तीन में जब संभावना होय नालों वे
दोदोराई वन्तु रसाउता सपना काल दलो जन
कलरू लोह ग हेतु लाई रु सवा है होग
दशानन सा तज्ञ है। टोकावन्तु साकार
वाकई इतर शान्ता सवालही भयानमायावतको
नुकसदा बनलेज इनके नातिनायक है दोनहानि
ज्ञात्वज्ञहै हेलेशाकंचन को न होय नीनिक
हेदवन आना बोच नै भारङ्गत्यकामा
हाजल रामनरुवा मोल नपा केद
वाचक न्नु संसान बिन राज्योवेका राजा टोका।
मलने वासना करना-मानलाई दोयमेव
पाक मनु कानारत्येक कोना
» भवन के निराक कोश
सनकालकर दोहा
मनमानिने
लोकायन इंटने
HMM...............
-
उकसनननननन वरच
ने एक नई
धोरा जन्मापाइलका-
। बभू० लक्षण दोहारिस प्रगदै कहि व्यंग्य वचमाध्या धीर) नारगे संभाव्यरु भास्पद उत्तय सदा विचार वादीको व्यग्य का वचन फहकार के रोस की प्रगर्दै सोमध्या धीर नायिः का है. संभाव्य नान और भास्पद होय सो उक्ता पदा विचारोग का भय सध्या धीरा उक्तास्पदा वस्तूतीक्षा उदाहरणा ॥दोहामहर्षित कीनी मुहिदिसा लालन तोय न तोलामानों में भेजी गई जुग मौन अमोल पाटो लालन नै चंचल ने दिया करि मोर्को हार्पन कर लानों म- जीत का रंग में रंग्या हया समोले दो मीन है- यहाँ हर्षित दमें दोसन होचो व्यग्य में रूल्यो-याने मध्या धारा नानि का है भार लोयन वस्तु में मीन न गी नर्क है याने बस्तत्प्रेक्षा झार दाने विद्यमान है यान उत्ता स्पदोवस्तू त्प्रेक्षा है।र भय मध्या अर्धार अनुक्तास्पदा वलसा लेन दाहापरुपं चचन कहि व्यंग्य चिन कोप मध्याधारण जिहै नहि पद में भास्पसु अनुत्ता सपदे-धोरवाटीका । शायरुष वचन कह कार के व्यंग्य बिना कोपेसो मध्या धीरा ना- यिका है जहाँ पदे मैं संभावना को ठिकानों नहीं होयसो भानु तो संपदा है धीर ॥॥ अथ सध्या अधीरा भनुत्ता स्पदी बस्तत्प्रेक्षा उदाहरणपदोहागभनत भात नु विष अधर नेनन सोहि संसोलगजावोज निशिजगि गोली मुहि करत विहात गटीको भात में अनत है धर न विष हे नैनन के साँहि मसात है जहाँ रात मैं जागि बारित पंगे नहीं जावो सोको विहात सौ करने ही- यहाँ जावक मन ननलाई में सनत विष मसात को तर्क है याने वस्दन्प्रेक्षा सोरं जावक जंजन लेताई नहीं कहो यो अनुक्कास्पद वस्तू म A बाचक मनु संकादि बिना गल्पोत्नेक्षा होय है फलको फल हाय संभावना करे सोसिद्धहोय नौ सिद्धास्पदा फलोत्पेक्षा लच्या प्रौढा मान मै बिबिधि होत प्रत्यक्क गधीरा और पुनि धीर धोरा सा॥७५॥ अयु उत्प्रेक्षा लता दोहा॥ वस्तु हेतु फल तीन मैं संभावना जब होगा उत्पेसा नाकों कहत कवि गुलाब कीव लोय ॥ ६॥ वस्तु हेतु फल इन तीन मैं जब संभावना होय नाको ता शर्तकार कहें हैं-गुलाव कांव का हकबि लोग हैं ७६॥चौपाई॥ बस्तु एक उत्ता सपदा कहि॥ दूजी म उक्ततामयदा लोह । हेतु साहिं सदा स्पदा है। य सिद्धा स्पदा सदा है। टीका॥वस्तुमें एक दाकहोगदूसरी जनुक्तास्पदा लहो भर्यानउनास्पदा नुक्तास्पदा वस्तूत्प्रेक्षा हेतु के माँहि सिद्धास्पदा है दूसरी सदा. हास्यदा है-हेतूव्सेक्षा दोय प्रकार को सिद्ध होय नौ सिद्धासद हेवत्यक्षा सिद्ध होय तो सिद्धा स्यदा हेतूत्प्रक्षा है। दोहा॥ फल सिद्धा सपदा सदा सिद्धा सपद दोबा बाचक मनु संकादि बिन गम्पोत्प्रेक्षा होय॥८॥ फल मैं सदा सिद्धा संपदा है- सिद्धास्पदा है येदोय भेद सिद्ध होय तो सिद्धास्यदाफलोत्प्रेक्षा है॥७॥ जाकी संभावनासोसंभाव्य भास्पद पहिचानि॥७॥ टी संभाव्यमाने बरखानों ये दोन होयसो स्पद नहीं है ।
भू०
नक्षपदोहागरस प्रगट कहि व्यग्य वगध्या धीर
बरगद संभाव्यरु भास्पद सुउता सदा विचार यादीका
यंग्य का बनन फहकार के रोस की प्रगर्दै सोमाध्या धोरी नाय।
है संभाव्य नान और मास्पद होय सो उक्ता सदा विचारोग
॥ अथ सध्या धीरा उक्तास्पदावस्तृतीक्षा
उदाहरण ॥दोहा॥हर्पित कीनी मुहिदिया लालन लोय
लीतपमानाई मजे मजीट रंग है जग सीन अमोल पाटी
गलन ने चंचल ने दिया करिल मोकी हर्पित करी मानों म.
विका रंग में रंग्या या समलिदो मीन है- यहाँ हर्षितश
दमे दोन हा ची व्यंग्य में कल्यो-याने मध्या धारा नाति
का हे पार लायन वस्तु मैं मीन नहीन है- यात वस्तून्प्रेक्षा
झार दाने विद्य मानई यौन उत्ता पदावस्तं त्यक्षा हेर
अय मध्याजधाग अनुक्तास्पद वस्तुत्प्रेसा लक्ष
"दोहा । परुष वचन कहि व्यग्य विन काप मध्या धारण
है नहि पद में भास्पसु अनुक्ता सपद धोरा टोका।
वाह कार के व्यग्य बिना कोपेसो मध्यां धीराना-
पद मैं संभावनों को सिंकानों नहीं होयसो झन
का सयदा है है धीर पर। अथ मध्या अधीरा जानुला
स्पदोबस्तत्प्रेक्षा उदाहरण दोहा जिनल भालक
नु विष अधर नैनन माहिमसातजावोज निशिजगि पोस
मुहि फरत विहाल ॥३॥ दीका भात में अनल है अधर
..बिपने नैनन के माहि मसात है जहाँ गति में जागिरिक
पंगे नहीं जावो सोको विहात क्यों करते हो यहाँ जादक मन
नललाईमैं अनत वियं मसात को न है यौन वस्तपैसा
सौर जाव जन तताई नहीं कही याने अनुक्ती सदा
दाहाकोष प्रकाश ब्यंग्यकार रतित रहें उदास होय मदमोतीयाने मनों बोलत हलवल वैन ॥७॥दीका। करि लै मद मस्त जई-यांतें मानों हल बल बचन बोरै ब.भू. त्रेता है ॥३॥ अथ मध्याधीराधीरा सिद्धास्पदा हे तूत्प्रेक्षालक्षणदोहागव्यंग्य अव्यंग्य हे वचन की रोस प्रकाशै रोयसिद्ध आहेतुहि हेतु कृत्त हेतू त्वेक्षा माटीका व्यंग्य व्यंग्य वचन कह कारे कैरो कार के रोम कों प्रकासे-सिद साकारण की कारण करे सो सिद्धा स्पदा हेतू क्षा होय ॥६॥ अथमध्याधीराऽधीरा सिद्धास्पदा हेतूपेक्षा उदाहरन॥दोहापिय लखि रोय रिसाय कि कोने लौयन लोला तिनको रुचि लाख मन भये लातन न लाल॥८५ टीकापियों देवि कार कैरो कारकै रोष रिकै बकि करि कै लाल नेत्र करवा निनकी रुचि देरिव के लालन के लाल नेत्र भये यहाँ रोवा सौ सध्या धीरा धीरा का है-और लालन के लाल नेव होवाको कारण नायिका के लनेव नर्स लिस की कारणा ठहराया या हेतू होता और ल हो वो सिद्ध है याने सिद्धा स्पदा हेतू त्वेता है ॥५॥ य पौदा धीरा सिद्धास्पदा हेतु त्येसा लक्षणा सिद्धेनु दूसरी हेतू त्प्रेक्षा भासमादीका व्यंग्य करि कोपचों प्रकाश रात ते उदास रहै-सो प्रौदा धीरा नायिका सो सिद्ध होय तो दूसरी हेतुत्वेन भासे है॥६॥ अथ प्रौदा धीरा सिद्धा स्पदा हेतू त्प्रेक्षाउदाहरन दोहोपिय लाख सुरति बिसारि निये कार कारेगते नैन। नैन पिय को दरिल के सुरति बिसारि करि कै निय है सो राते माती का बहाना सौ हल बल बचन बोले
व भू
ते प्रौटा धीरा नायिका है और मद मस्त हो वाको कारण हत
बत वचन बोलवो नहीं नाकै कारण संहरायो या देवत्वेक्षा
है-मद मस्त हो को सिद्ध है-यात सिद्धा हेतृत्वमा है
अथ प्रौदाभधोरा सिद्धास्पदा फलोत्प्रेक्षालत.
रा॥दोहा॥तर्जन ताडन नादि कोर- व्यंग्य रहित कार को
पासिंद आयाल को फल करे सु फलोत्प्रेक्षा सोपाटी.
नर्जना नाडना शादि कार के व्यंग्य रोहत कोपकरे सो शोला
अधीरा नायिका है-सिद अफतु के नोई फन कर सो मातो
पेक्षा लोप है ॥ अथ पोदा सधीरा सिद्धास्य
दाफलोत्प्रेक्षा उदाहरण पदोहा । गर्जत आमने उरः
न नहिं धरंत नीचतमैं चनाघूमन मुनि मुकि रहत मनु मद्-
गज समता हेत॥॥ टीका गरें है वास है डर नहीं है।
चित्त मैं चेत नहीं धेरै हे-धूमे है मुगिरि रहै है नाना मल
गज की समता के वास्त-यहाँगादिक से प्रौदा अधीरा नायि।
है और गर्जवो चारावो नहीं डरवो चित्त में चेत नहीं घर को.
प्रघमवो मुकियो इनको फल मद गज की समना नहीं नाको फ
। उहायो यात फत्तोत्पेक्षा गर्जादिक सिद्ध है याः सिद्धा-
पदा फलोत्प्रेक्षा हे भयभीदाधीराधीरायसिद्धास्पदा
फलोत्पेक्षा तक्षदोहा ताडनादि कार रति बि
स फोप प्रकासे नारि ।।जहँ भासद है सफल फत सुफलोत्प्रे
ज्ञा धारिया दीका नाइनादि कार को रोन से विरस हो
करिकै नियमों है सोकोपको प्रकासै सो पौदा धीराधीरानाथ
है जहँ अफल फल-जनिक होय सो फलोत्प्रेता धीर है।
प्रथौदाधीराधीरा सिद्धास्यदा कलोपेक्षा उदा-
हरनगदोहा लग रहो परसोन पद तो शापनोहात
m
॥३॥ अथ सा
नुन्साललगा। दोक्ष
रोम प्रकाश रोया
टीकाराव्यंग्य सलं
को प्रकोम-सिद सकारगा
सा होय॥८॥अथस
हेतृत्प्रेक्षा उदाहरन
कि कौनलौयन लोला
न लाल॥५॥ टीका
रिक-बकि कार केलार
लालन के लाल नेन भने
काहे- और लालन
लनेवनी निस
ल होवो सिद्ध है
थ धोना धीरा
दोहा॥कोष
सिंहेतु दूसरी हे
कोपको प्रमा
सो प्रसिद्ध हो
प्रौदा धीर
दोहा॥
मदमोतीर
रिय के
परेर
-- --- - म सो सापान्हवरीति ॥६६गटीका.सौर की व्याही और नों प्रीति करे सो ऊदा नायिका है-यह अपन्हव सहिन होयसे पनवगीत जोगासापन्हवाति नी ननद कहो तर '':।तमाल समार॥ टीकापसासू-जिनानी ननद विना विचार को नरहेगार ननु में अमर नहीं तमाल में रहे है पर युरुष मैं रत है- याने पर कीया है और सवरा मौसनको वोधभयो जमात से कष्टाको बोध भयो यहरुप शातिशयोक्ति तनु मैं नहीं नगाल, अपन्जनि यात सापन्हवा तिसयोक्ति अलंकार हैnessy. चमकदा शेद कातिशयोक्ति लक्षदोहा।। धन ब्याहो परपुरुष सी रमें अनूदा जुक्ति वाही की और क- है मेद कातिशयोयुक्ति अथ अन्ना सेदकाति शयोक्ति उदाहरनदोहापितु वस तन मन वान वस को पावे इक यान कत्ती कोतुदै गके हैविधि की विधि मान लीकानन है सोपिनाके बस है-मन है सो रुष्णा के वस है। एक स्थान कैसे पा का करे तोह सके है ब्रह्माकी विधि और है यहाँ बिना ब्याही कपणा सौरत है। उनहों कौं पति चाहती है यति भन्दा नायिका है।विधिकी विधि और ही है यह भेद कानिसंयोक्ति है॥अथ पर कीयामेंदा दोहोगगुप्ता वोर विदग्धर पनि तक्षिता २रु कुलदास निगनुसयान मुदिनाईदिये परकीया भिद जानि॥१०॥ अथ भूत सुरत गुप्तासंबंधातिशयो- तिलसगा।दोहाभूत सुरत दुरवेजानियः सो गुना प्रथमोक्किोकरेज जोग अजोग को संबंधा निशयोक्ति ॥२१॥ -- -- . .
1
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पाली रती इकसे करत इक से दीति दुराया
दो कनक लतान में निर्मल कसलपफलित पा कार.
लीहे.सोएकसैरली करे है-एक सें दीवि दुराय कार
हा दो नायिशान से जेष्टा कनिष्ठा हैं।और दो कना
गुनकोरे जो सातासु परोदा कन्यका देविधि कारकै नेम
मनों रंगे मैंन रंग लानु २५
अलग रहो पद जाति परसो सापनी हाल देखो-बदर
सनवा के वारले मानों लाल रंग ने नेव स्यो है।इई
गरही पनि परसो या बचन से सरत से बिरस
यात मोलाचोरा धीरा नायिका है। जोर लाल ने
को फल की समता नहीं ताफौ फल बहराय
ना को यात फलोत्नेक्षा है। नेत्र रंगवो प्रसिद्ध है
भसिद्ध पक्षा फलोत्प्रेक्षा है॥ २॥ अथ जेष्टा
प्यारूप कातिशयोक्तिलक्ष दोहा॥
तिय होय जह जेन्ट कनिष्टा जुक्ति निकसै बगर
गर्थ से कयामा तिशय उति ॥३॥ टीकागजहाँ दोन
रशी सई री होय नहाँ जेट कनिया को जुक्ति है।
मैं उनसे निकले सोरूपकातिशयोक्ति अलंकार है
भाप लेवाननिष्टा रुप कानिशयोक्ति
न झोलाकनक लता जग में कमल अमल
दान में दो नायिका निकली और अली से नायक
या रुपकातिशयोक्ति अलंकार है।। इति
अथ परकीयालक्षणायदोहागपरकीया पर
अप पदासापन्हवातिसयोक्तिलक्षणा
जडा व्याही भोर की करे भारी मतगहोय अपन्हव
Marwwe
३
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॥ सायान्हवरीति ६६ टीका भोर की व्याही औरतों
गोन करे सो अदा नायिका है- यह अपन्हव सहित होयसा
नापन्हव की रीति है। आय परोहा सापन्हवाति
वशक्तिउदाहरनपदोहा॥माम जिठानी ननद को नर
वि विना विचार सोवन में नहिं मोअमर रहत तमाल मुकार।।
दीका सासू जिवानो ननद बिना विचार क्यों न है।
न में अमर नहीं नसाल मैं रहे है पर पुरुष में रत है-यातेपर
कीयाहे और नवरा सौ सनको वोधभयोगमाल से, कृष्णाको
धि भयो.यहरुएकातिशयोक्ति तनु नैं नहीं नमाल है यह
अपन्जति यान सामन्हवा तिसयोक्ति अलंकार है।
यभन्दा खेदकातिशयोक्तिलक्षणदोहा॥
इन व्याही परपुरुषस्य रसे अनूदा जुक्तिगवाही को और का
ई मेद कातिशयोयुक्तिमा अयअन्ना सेदकाति
शयोक्तिउदाहरनदोहापितु वेस तन मन कान
त्रस को गावे इक थान कती करतुद सके हैविधि की विधि
जान लीकातन है सो पिनाके वस है-मन है सो
कृष्णाकै वस है। एक स्थान कैसे पावें की करे तोह सके है
ब्रह्माची विधि और है यहाँ बिना ब्याही शासौं रत है।
उनहों को पति चाहती है- यात भन्दा नायिका है। विधिको
विधि और ही है यह भेद कानिसयोक्ति है॥अथ पर
कीया भेद।दोहागगुप्ता और विदग्ध पनि तक्षिता
२२ कुलदासनिअनुसयान श्मुदिनाईदिये परकीयां मिद
जानि॥१०॥ अथभूत सुरत गुप्तासंबंधातिशयो-
तिलक्षणागदोहाभूत सुरत-दुरवैजानिय सो गुप्ता
प्रथमोनिकरेजजोग अजोग को संबंधानिशयोनि ॥११॥
... -- - " म कागजो हुई सुरत कै नाईछिपावै सो पहिली है।जो अजोग की जोग करे सोसंबंधानिशयोक्ति भयभूत सुरत गप्पा संवंधातिशयोक्ति रन॥दोहा॥शशित ऊँचै गिरि शिखर चढी पुष्य की उतरत बिचले तनवसन करक लगे अथाह॥१२॥ चन्द्रमा से ऊँचे पर्बत की शिखर के ऊपर पुष्प की चाह में उतरना शरीर का कपड़ा बिचल्या घरा का दातम्या नसुरत चिन्ह छिपाये याते भूत सुरत गुप्ता नायिका है। शिखर आजोग की चन्द्रमा के जोग्य करी-यातें योक्ति है।१०२॥ अथवर्तमान सुरत गुप्तायो धातिशयोक्ति लक्षणंगदोहोंगवर्तमानरत दूजी गुप्ता जोगासंबधोतिशय उति यो गहि करे २३॥ टीका। वर्तमान सुरत का छिपावा मैं दूसरी गुप्ता जोग हेयोग को प्रयोग कर सो शसंबंधातिशयोक्ति है? अथ बर्तमान सुरत गुप्तासंबंधानिमयोति उदाहरन॥दोहा॥साख मुहिमुर्छिन परत महि राखी भौरेबायपर उपकारी दीन हित नहि इन सम २०६॥ टीका हे सखी मोकी मूर्छिन परता इनने वाथ रिकै राखीगपैला का उपकार करवा वाला दीनन का इन सम सुरूनाय नहीं- यहाँ वाय भरि वासे बर्तमान सुख गुप्ता और इंद्र जोग है नाकी अजोग कस्यो याने । अलंकार है ॥१०॥ अथ भविष्यति सुरत शकमातिशयोक्ति लक्षणदोहा॥ सुख गोप ते नीजी गुनागाथमिकमानिशय उक्ति को साथ ॥२०५॥ टीका भागे हो बावाली सुरत. ..
३०१०
ताई छिपावसो तीसरी गुमा की गाथा है। जहाँ कारगा कार
को साय होय सो.सक्रमानिशयोक्ति प्रकार है ।२०५
जय भविष्यति सुरत गुप्ता प्राकमातिशयोति
दाहरन॥दोहागफ़्लनहित बन सघन मै जहाँ सा-
दो आज पंग धेरते हित नवसनवर कटि है कंदक साज
टीकागफूतन के वास्ले हे साती साज सघन वन में
बातो गपग धरना ही तन का सुन्दर कपड़ा कटकन के साज
दी चोटैगा यहाँ होवा वाला चिन्ह का याने भविष्यात म
गुप्ता है और पगाधरना ही कपड़ा का ईमें कारन
मारज संग हे याने सक्रमातिशयोक्ति अलंकार हे १९६४
भयावचन विदाधा चपलातिशयोक्ति लक्ष
दोहा वचन विदग्धा चातुरी करे वचन में साज
चपलानिशयोक्ति जहँ हेतु ज्ञान ने काज ॥२४॥ टीका।
बचन में चतुराई करे सो बचन विदग्या नायिका है। जहाँ
कारण वाम ही से कारज होवै सो चपलानियोक्तिशातका
है॥१०॥ अयं वचनविदग्धा चूपलातिशयो
[क्ति उदाहरनगदोहा॥हरि लास सखि से कहि भवति
जैहीं जमुना न्हान प्यारी बचन पियूषसे सुनतहि हप्कान
२८॥टीका हरि को दोख कारकै सखी से कही जमुनान
वाली अवहो जाऊंगी प्यारी कापियूषमा बचन मननांनी
भासमनापानमा
नविदग्धा नायिका हमार सान दिन जावो कारण है नाका
सुनं वासे ही कृष्ण को हर्षियो कारज भयो गाने चपतानिश
योक्ति तकार
है॥दोहा॥वचन विदग्धाहोय)
जव देशो से अनुराग स्वयं तिला पयिक से कहै वचनकरिलामा
60
W
जय किया
दोहामा क्रिया
सत्यतातिशयोनि
जब क्रिया में चतराई करे सो क्रिया विरान
पहिले काज होय सा
मथ किया विदाधा
कज कली कर
प्रथम
Sari
107
यह जताया तुममेरहदा
विदग्धा नायिका सार पहिले प्रफुल्लित
पाई है
...
ललिता
४४ :...
नायिका है।
मोनिजाम्या
होर
५१५
साज
शाजा२३॥
.
श
.
जनः
बैंक
-- स्वी ने रति के चिन्ह जानिलिये याने तक्षिता है। और नैन-वैन पमेयह तिनको विकलावोरक धर्म है- याने प्रथम नुत्य योगि- है.और चन्द्रमा कमल उपमान को लाजवो एकधर्म याने यम नृत्य योगिना है ॥११३॥ अथ कुलटा द्वितीय तु- त्य योगिता लक्षण॥दोहा॥बहन नरन सौ जोरम को कुलवानियमान प्रवृत्ति तुत्य हिते शहित में तुल्य योगितामा गर॥ टीका॥जो बहुत पुरुषन सौं रमे सो कुलटा निय- को प्रमान है। दिन हित में समान वृत्ति दोय मो दूसरी तुल्य योगिना है। साथ कुलदा द्वितीय तुल्य योगि उदाहरनगदोहागच नीचाहनचाहिन में कौनतन विचार घातक पातक नरन ः कोरे सुख उपचार॥१५॥ टीकापजेच नोच में औरहित शाहिन में ननक भी विचारन ही करे मारवा वाला पालवा वाला भादमीब सुरत फोजतन वारे है।यहाँ धरण पुरुषन से सुरत चाहै है यति कुत्तटा नायि का है। और मारवा-पालवा वालान मैं रति करि को समान व्यव हार हे-याते दितीय तुल्य योगिना है ॥११५॥ अथ प्रथा अनुसयानातीय तुल्य योगिना लक्षण दोहा गवर्तमान सकेंन को दिगरत देखि दण्याकम गुन को ऑन गुनन सँग वन टनिय कहाय ॥११६॥ टीकारावर्त सान मकान के नाई बिगड़नो देखि डर सो पहिलो अनुशय ना नायिका है। कामगुगी को अत्यंत गुणी यो संगवर्नन हो यसो तीसरी तुल्य योगिता है॥१६॥जयप्रथम्मनु सयाना तृतीय तुल्य यौगिता उदाहरन।दोहा टंदावन वरचेवरयानंदन समसरसानगसबेनु सम हप अती मुहि वरनु राजन भान 12In टीका यहाँ बसंत में
कार हो वासी संकेत विगयौ याने प्रथम जनु
और चैनरय नंदन बड़े गतिनकी समान टुंदावन को
न है या वृत्तीय तुल्य योगिता है। अद्धितीय अनु-
गयाला दीपक लक्षणादोहा॥होनहार
को सो सान लावणदीपक वार्य अवराय की धर्म
ना पाव॥११॥ टीका॥होवा वाला संकेत को प्रभाव
नि कार के साथ
दूसरी अनुसयाना है। वराच अवर्य
म की रकाना होयसो दीपक अलंकार है ॥११॥ अथ
द्वितीयानुसयाना दीपक उदाहरन॥दोहा॥
खो निहारे सासरे है वन ताल अपार तह मराल उत्तम
क्रीड़ा करत अपार ॥११॥ टीका।यहाँ नायिका नै
गला सकेन को सोच कस्यो नाकों सदी मैं समुझाई याने
री अनुसयाना है। और मराल उयमान उत्तम पुरुष
डा कर दो एकधर्म है याने दीपक है ॥ १६॥ अथ तृती
या नुशयाना प्रथम दीपका बत्ति लक्षण।
हापिय सहेट गो मेन गड्यौंमानित्यागे ति॥ पद की
भावति होय सो प्रथम दीपका बत्ति ॥१२०॥ टीका॥
म सहेट मैं गयो मैं नहीं गई यौं गान कारकै धीरज
तीसरी अनुसयाना नायिका है पदको भात्ति होय सो :
तो दीपका हत्ति है ॥१२॥ अथवतीयानुसयाना
प्रया दोधकात्ति उदाहरनादोहा॥द्री
री कर माल उर धरि आवत नंदलालमसरसाने लोरेव
इसरसाने लो बाल ॥२२॥ टीकाकर मैं हरी छरी
मैं माला धार कार कै नंदलाल को सरसाया गया भावना
रख नै नाक्या तीर की तरह विकल भईयों नायिक के
१
हेट में सौं लायो देखि कै उखपाई यात तीसरी अनुसयानां
और सरसाने सरसाने पदराक है न्यारो न्यारोह यात्र
यम दीपका रति है।९२१॥ अथ मुदिता द्वितीय दी
एकात्तिलमा दोहा गरिख चिन चाही होते
मन हर्षे मुदिना मानि द्वितिय दीपका पति भी रतिपि
छानि ॥ ९२२॥ चीकाचिन की चाही होती देखि वारि के
मन में हर्षे सो मुदिना नानि मानों अर्थ की भाति हो
यसो दुरारी दीपका रत्ति पिछानौ ग१२२॥ अथ मुदिता
द्वितीय दीपका ति उदाहरन॥दोहाग रहि है
रहती या बंध जैहैं सगरे प्रान बिकसे तिय के हग सुनवाई
लेसमेगावासाव सास्कली घररहैगोसेवेरेसवजावेगा मुनना ।।
ही निय केनेरिकसे सब मानल्यायहो सकती रहवासी प्रसन्नभई
याते मुदिना नायिका है और विकसंबोफतवोपदन्याएरहें अर्थक है
१३॥अथ गनिका वृतीय दीपका तिलक्षन
दोहाधिन जासी रति कर सौगनिका परिमान गाड
तिज पद भर्थ की नोजी जानि सुजान ॥ ११२४॥ दीका।
धनंजाम रनि करे सोगनिका कोपरिमान है।पद अर्थको
भारति होय सो तीसरी दीपकावृत्ति जानी ॥१२५ ॥ अथ
गनिकटतीय दीपकात्ति उदाहरन॥दोही
धन दाय की बान नि अवस्टा होजातगेघर आदलले
खि नयन मनं तप्त होत हर्षति ॥९२५॥ टीका धन देचा
वाला की बात सुनि के भवन टाहो जावे हैं पर भावना देखि
के नेत्र मन हपावें है यहाँधन दायक से हावा नै गनिकाली
और सप्त वन पदवी एक है। अर्थवी एक है यान नागरी दीपा
फाति है ।११॥ अयेान्य नायिकाबरिणत॥
याने दूसरोदोपका ति है
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श Diwana . प्रति बत्तूपया बने है न्यारा त्यारा पद देखि कै ॥१२॥ दोहा। सुगधादिनभिद हीन जे खकिया परकीयारुपमा माल्या में होन में तीन नायिका चार ॥१२६॥ चौपाई अन्य संभोग कुरिता जान पनि वक्रोक्ति गर्बिना टान बजनौं मान बनी उर भानों गतीन नायिका ये सब मानौं । २२३ मा अन्य संमोग रियता प्रति बस्तूप मालदा दाहायनिन नायक सौ शान तिय रमीने निसन सोहि अन्य सुरत बुषिना काही चुरियन होय लील नाहि ॥१२॥ टीका अपना नायिक सौ और स्त्री कोंस्नी मानि कार के मन में दुखित होय सोनन्य सुरव दुःविना न सका है ॥१२॥ोला उपमानर उपमेय जुग वावच या इक सोयाबरलता प्रति वस्तूपमा भिन्न भिन्न पद जोय ॥१२॥ टीका उपलान उपोय होने वाचन को एक धर्म होय आप अन्य संभोग दुरिलता भात वस्तूपमा हरन । होडा विचले भूयन बसन को सौतिन मोहि नाधिक लोन की वारि वर कसैहनहिं भात॥१३० ॥ बिचल्या ना.सूषन बसन को सौति सोको नहीं सुहावै॥ गा लोन की सुंदर दाल कैसै भी नहीं भावे यहाँ सोति के चिन्ह देन्या याने अत्य संभोगारिखना नायिका है और वाई में उपमेय वाक्य है उत्तराई में उपमान वाक्य है". को न सुहात नहीं भातधर्म एक पद न्यारे न्यारे हैं प्रति वस्तूपमा है।१३०॥ शन्यञ्चगनीतिमंजरी। दोहा॥ जस्तुति पीने इष्टजन रोमेकबहन कोय॥ नमसलै नर मनहि लोह सलाका होय॥१३॥ सावति पक भूषन तुनही होय वै धन्य होयहि प्रति वस्तूपमा वाम २४ स्टांत तुवै धर्म्य ॥९३२॥ अंथ सूयण चंद्रिकावे धर्य प्रति वस्तूपमा उदाहरन दोहागबधही जानत वुधन वो परसे परिजम ताहि प्रवल प्रसबीपी र को बंध्या जाने नाहि ॥ २३३॥दीका चुधन का घर पंड़ित हो जाने है। प्रवल जोसे- ....::.:. नाकों बार रवी नहीं जाने यहाँ पूर्वार्द्ध में जानेउनगदमें नहीं जाने यहन्यारोधमहेयाने वैध- स्मनिवस्तूपमा है ॥१३३॥ दोहागुशी वंश मेवा मनुन पुजे सुसंगति पायानवी विनज़ग़ भान नहिं बीगण दंड तहाय॥२३॥ टीकागुणवान वंश में भी जयो भादमी, संगति पाकार के पुजैगवान विना जगन मैं चीणा को दंड सादर नहीं पावेग यहाँ पुजे भोर मान- नहीं पावै यह बिरुद्ध धर्म है याने धर्म्य प्रतिवम्प मा है।।१३.५० माय गर्विता भेद॥ दोहाय प्रेम- पार्विता की है.रुप रातिता दोयानिजरूपरू पनि रुप को. गर्व करे ते होय॥१३शापट विधि है गुन गबिता निज पनि विद्या बुद्धिगपति सूरत्व उदारना, जानि तेन मन शुदि १३६॥ दोयमानि कुतगर्विता निजकुत पिय कुत गर्वगकरे पोहेवको तिकारे हैं ग्यारह भिद सर्वग१३अयप्रेमगर्विताह एटांत लक्षागदोहापगर्व करे प्रति प्रेम को प्रेम गर्वि ना गायाहोय विब प्रति दिवते हृष्टान सुदरसाय १३॥ टीयाग पनि का प्रेम को गर्वको सोअन गर्विता गावोगविव प्रति बिंद कारकै होय सो उनि दरसावै है ॥३॥ प्रेम गर्विता दृष्टांत उदाहरनगदोहा। राजनीपि- दि फेरेसोरुप गर्विता नायिका हे दोन वाक्यान की एकता होर य को प्रीति शाति सोहिं निरंतर मात्र जैसे सरद मयंक को जोन्ह सुहान ॥ १३॥ टीका॥हेसजनी पियकी प्रीति मोकी निरंतर भाव है। जैसे सर्द का चंद्रमा की चाँदनी को सुहावै है-यही पिय की प्रीति बजन भावे हे याने बिता नायिका है और नायक की प्रीति बिंव है चंद्रमा दनो पनि विंब है गाने दृष्टांत अलंकार है।।२३। नीति दादोहा॥सब जग के व्यवहार की नीति बिना थिन भोजन बिने पारशीन की ज्यों तनु थिन नहि जाहि ॥१९॥ टीकागसम्पूर्ण संसार का व्यवहार की नीति बिना शिनि होगजैसे भोजन बिना प्राणीन का ननु की यिति नहीं। नानि और व्यवहार की विनि बिंबहे भोजन जोर धाराशन नु यिनि प्रति बिब है॥यांने दृष्टांत झालंकार है ॥२४० भूषण चंद्रिका वैधर्म्य दृष्टांत उदाहरन॥ दोहो गर्व समुख मन करत तुवभरिमन सकल नेसात' बलौ रबि को उदय नहिं तब तौं तम व्हरात परस१॥ तेरे गर्व के सामने मन करना ही संपूर्ण वैरो नास को प्राप्त है। जब लाई सूरज को उदय नहीं है नबनाई तम ठहराव यहाँ नशायो टहराबो बिरुद्ध धर्म है याने वैधर्म्य दृष्टांत २१॥ अय निज रुप गार्बता निदर्शना लक्षणा॥ दोहागगर्व करें जब रूप कोरुप गर्बिना सौय "जुग की एकता निदर्शना सो होय ॥२२॥ दीका।जब रुप को होवे सो निदर्शना अलंकार है ॥२१२॥अथ निज रूप उदाहरन॥दोहा॥जो मधुराई सुभगना माहि गयेरी साली मयंक में यही बिमलना आणि ३१ १ 1.भू. टीकागजोमधुरना और सुभगना मेरा सुरख मैं राजे है। तरी सखी चंद्रमा मैं यही निर्मलता है।यहाँसुदरता को स- समान है। याने रूप गर्विता : नायिका है और सुभगना मधु ई है.सोई चंद्रमा में निर्मलगा है यह दोन वाक्यन को सफता या निदर्शना भलंकार है ॥२३अथ द्वितीय नि दर्शना लक्षणा॥दोहागति पदारय की जहाँ सोरटी साहिराव यह निदर्शनों दूसरी कबि गुलाब मन भाव। या टीकागजहाँ यदार्थ कोवृत्ति और चोर पहरावै यह नारी निदर्शना गुलाब कविका सन में भाव है अर्थात् पदार्थ तनाग पंकू वस्तु की लीला गुनधर्म की हेराथ पिय पगाबैता द्वितीय निदर्शनाउदाहरन॥दोहा॥ पिय चप खेजन चरित गहि मन रंजन कार देतवचन पियूष विलास लहि काहि मोल नहि लेत॥१५॥ टीकापीतम- क्राचष है सो वजन का चरित गह कारकै मनको राजी कार देहेंगपिय का वचन अमृत का बिलास को प्राप्त होकरिक कौन कौं मोल नही लेग यहां पियका रुपको गर्व है।यात पिय रुप गर्विना नायिका है।और खंजन की लीला नैनन न.लीनी अमृत का गुन बैंगन नैं तीना याने दूसरी निदर्श- ना है ॥१५५॥ अथ तृतीय निदर्शना लक्षणा॥दो हाकिया असनसन करि करे औरन की उपदेश। तीजो- निविधि निदर्शना धर्नत सकल वृधेश॥१९६५ टीका ॥ असत सत किया कारकै औरन को उपदेश करें सो तीसरी दो प्रकार को निदर्शना संपूर्ण वृधन के ईशबनते हैं ॥२४३ सयभूषण चदिका नायिका रहिन असदर्थ निदर्शनी उदाहरने॥दोहागरज विरोधीनशत है को और गुन जो सन अर्थ तासौं सौतिन की शिक्षा दीनी यात : रतिया के दर्शने नाम कर्दया ले लेती सलमादिक करि के यो जग को दरसातचंद उदय में तम निकर छिन छिन छीज जात ॥२४॥ टीकारान का बिरोधीनसे है। रेमे जगत दरसातो जो चल्ला का उदय मैं तम को समूह छिन छिन छीनदो जाय यहाँ नम छीजियों भलत किरिया है या सदर्य निदर्शना है ॥१९॥ अथ निजगुन दर्थ निदर्शनाउदाहरन दोहानिज गुन । पियहि मैं सौतिन शिक्षा देत॥ सब ही पिय बस करन हित गुन चित चेत॥१४५॥ टीका अपना गुनसैं मैं पीतम स कार के सोनिन की शिक्षा द्यो है सबही पीतम का या वास्तै चित्त का चेत से गुन सीरखो यहाँ गुन सौंमै बस करोही काह वा निज गुन माबिना नायिका दर्थ निदर्शना अलंकार है॥४५॥ जनसान वतीय रिक लक्षणा दोहा। पर दिया के दरस में नाम कढ़े ते या संगमादि कार मान से मानवती तियहोर॥८६॥ नसैं मानवती नायिका होय है। लोहा । उपसान उपमेय. वै लक्षण व्यतिरेका शोधक न्यून सम भाव ताको त्रिविधि विवेक राउमान उपमेय ने बिशेषता होय सो व्यतिरेक जनकार है।अधिक न्यून माजकरि कै लाको तीन प्रकार को ज्ञान है ॥११॥अथ किया सानिनी अधिक व्यतिरेक उदाहरन ॥ दोहा लरिव पिय विनती रिस भरी चित चंचले मायनबस नमे गन लाती अविकनिकाय सटीकाग, बीनती देखि कैरिसको भोचन सायसै चिन जब खंजन से हगन में लाली अत्यंत छवि में छाले यहाँ पिय की, वीनती तें रिस की भरी हुई कि । याने वकीया मानिनी है। और नेत्र उपमेय में लाली सैं घणी छवि छाई याने अधिक व्यतिरेक है ।१४ अथ परकीया मानिनी न्यून व्यतिरेक उदाहरन दोहा ।सापराध लखि पियहि तिय जब हगदेत न वायतव खंजन से चखन मै चंचलता नरहाय॥ टीकागतिय है सो पिय कौं अपराध सहित देखि के जब हगन की नवा देहै तब खंजन से नेवन में चंच- तता नहीं रहे। यहाँ पीतम को अपराध सहित दे. रिख के हंगन को नवावे है।याते परकीया मानिनी है। और नैनन मैं चंचतता नहीं यह न्यूनता है याने न्य न व्यतिरेक है ॥१९६॥ अथ गनिका सानिनीस म व्यतिरेक उदाहरनगदोहा सागस लरिखधन' दानि कों सौंन गहे मन मारि।नव शशि सो मुख बा ल को होय श्यामता धारि ॥१५०॥ टीका धन दानी कौं अपराध सहित देखि के मन को मारि कै मोंन कोंग- है। तब चश्मा शरीको वाल को मुख श्यामना धारि के होय यहाँ धन दानी कौं देखि के सौंन गहे हेयाते गनिका मानिनी॥और शशि के मुख के समता है। याते सम व्यतिरेक अतंकार है ॥१५॥ अयाद श नायिका बनना॥दोहा। प्रोपित पानका खाँड ता कत्तहाँ तरिता जानि विप्रलव्ध उत्कंचिता वासफर- ज्जा मानि ॥१५॥रुस्वाधीन पतिका अपर अभिसारिका निहारि नवम प्रवत्स्यत्प्रेयसी कही कविन निर्धारित . -- . के साथ सेलला सम्पूर्ण शरीर में छाई । थोड़ी दुवराई से सुरक्षा मोहित पतिका है। और ९५३॥ चौपाई॥ दशम भागा मिष्यत पतिका लाई एकादश आगत अनिका कोह। पति स्वाधीना वाला बनी लन्च ग्रंथ तलामा ॥१५३॥ जित हालका लक्षामा ३ दोहा॥गचे पीय से विरह विकल जो होय। सो है प्रोपित भर्तका शौं दशा जुन जोय ॥२५९॥ दश दशा नाम अभिलाष रूचिता स्तरक गुन कयना जग घि प्रलाप उन्माद सरन जुत-लेग१५५॥ अथ योधित पतिको लक्षाशाहोहा॥हयाँ दि को पूरवलक्ष धारि॥बर वनक्षे साथ सहोलि विरि ॥१५६॥डीया यही सुग्धा पोहा परकीया सामान्या को.यडिलो तक्षा धारी ए शब्द कार कै सुन्दर बनत होय सो सहोति निधन १५६॥ मोहित पतिका लहोक्ति दोहा का उदराई लरिख परी थिय वियोग उबरोई संग सेनता माई सकल शरीर ३१५७॥ घोरी ही बुवाई जानि भरी पीतल का वियोगको डदराई के साथ सेवना बनी बातें सहोति है ॥२५॥ अथ विनोलि लक्षण होला। सो विनोनि स्तुत जहाँ होय कहुक विल हीनय द्वितिय कह चिना पावसोम नबीनगर५८॥ दीका। प्रस्तुते या बिना हान होय सो विनोक्ति के कछु कालयोन शोभा पांच सो दूसरी चिनोति है॥१५८० 7
०००
अथ मध्या जोषित पतिका प्रथम दिनानि
उदाहरन॥दोहागबिरहा नलकत जरनिनिपरावीरों
कि प्रवीन ग त जानी झालीन ने चिन ताली छबिछीन।
१५८ टीकामविरक्षानत को लकी जनि मचीन भैली
व मैं रोकि रास्तोगनी भी सखीनने लाली विनाहीनछबि
जानी यहाँ विरह की मर नायिका ने रोकी संखोन नैजानी
यात मध्या प्रोपित पतिका नायिका है और सलाई बिनो
छबि लोन भई याते पहिती विनोक्ति है।१५। जय
मोढा मोषित पतिका द्वितीय विनोक्तिउदाहरन
दोहा। सब तनु लाली दुरि गई जरि विरहानल तापमान
उ मन मोहन लिन को पारो गंभा.भमापरासीका॥
म्पूिरी तन में लाली छिप गई बिरहानत की नापसे जार
कार के नौमी भलीन को मन मोह है जमाप पारी प्रभाहे
तो यहाँ प्रणा विरह से प्रौर्दा शोषित पनिका नायिका हे
लाली चिनो पारी प्रेमाने अधिक शोभा पाई याने दूसरी
विनोक्ति है ॥२६॥अथ समा शोक्ति परिकर लक्ष
॥दोहा॥समा शोक्ति प्रस्तुत विषे मस्त फरिजाय
माशय के विशेषराहि सो पारेफर उहाय ॥१६॥टी
का प्रस्तुत पद के विष प्रस्तुन फुरै सो सना शोशिश
लंकार है विशेषगा पद मैं नाशय कदै सो परिकर अलका
र व्हावा है ।१६॥ अथ परकीया प्रोषित पतिको
शमा शोक्ति उदाहरनगदोहागउद्धव देष लिया
है है कयटी वेपारंगतेजि वर विमला जालती सेवत कक्षा
नीर ।। २६॥ टीका॥हे उद्धवं देखो यहाँति कम है
व पीर है"निर्मत मालती कौनजि कारकै कनीरले
.
5.- महिला वारस के भावीपर परमात ॥ ॥ चिता सूधा भाव शुनि अनुपात सताय॥ चेष्टा है निवास अर आदि यहाँ सापराध देगिर शिर नवा वा मुग्धा खंडितम काली को सेट है। यहाँ काममा पार पाडा परवीन भोषित पतिका नायिका शोर भवरोगानको समीर की- कली प्रासंक्षित हैं आते समा मोति अतंकार है ॥१६॥ জ্ব শলৈভাবি কুঞ্জ ফায়ায় दोहा॥ पाली शीतन धनद की बोचित मिया भवीनतम लाख हिसकर बदन ः सरित यन धोरल कोच॥१३॥टी का मौतम धनदी पाती शदीन पिया दे नाचना हिम- कर बदन से हेरिख देखि कै सखीन को गन: शीतल करले बुहाँ धन हो पाती हैं मलिका मेधित पतिका नायिका और हिस कर विशेषता पद में शीतल करको आशय है। झाले पार कर जालंकार हे ॥२६३य हाय लडितालक्ष दोहा॥ अन्य तिया संमोग के चिन्ह शारिलिज गात भालाए ॥१६॥ अथ परिकर कर लेस लाद सा ॥ दोहा । साधाय सहित विशेष्य पद पार कर अंकुर सोया बहन अर्थ पद में कहै उल्लेस जलशान होय॥ टीका । विशेष्य पदमाशय सहित होय सो परिकरण कुर अलंकार है।पद मैं बहत नर्थकले सोज्लेष अलंका र होय है ॥६६॥जय सुग्धा खंडिता परिकुरांक रड्दाहरन॥दोहा॥शत माय निशिसस को जानने ताचो धागभाल लाल लखि लाल को रही नाय शिर वाम १६॥ टीकासबेरै ही आकरि कै गोत्र मैं वस वाको बतायो लाल को भाल लाल दोरेख के वाम है सोशिर नायिका है मौरभात विशेष्य पद मैं सायराध पो भाशय है।याने परि करांकुर आतंकार है॥१६॥दोहा॥ग्नपर -वार्यरुवर्य करि वरार्य भवराय विजोयानिय भव रार्य भचार्य कार कवि गुलाब मत होय॥१६॥टीका ग्लेय.अलंकार है सो उपसेय उपमेय कार कै उपमेय उपमा नकार के और तीसरा उपमान उपमान करि कै गुलाब का विका मन में होय है ॥१६॥ अथ मध्या खंडिताव रार्य वरार्यश्लेषदोहा॥दंपति कंयत विरस बस- बोलन करत न लागु गइक टक चितवन चलन नहि भरे खरे गराग॥१६॥टीकागदपति जो नायिका नायक हैसो विरस के चस मैं कॉपते हैं। विरस को भर्य नायिका में विना रस नायक में विशेष रस चोले नहीं मिलाप करे नही इक टक देखे है चले नही नेव खरे रागसे भरे हैं राग नाम प्रेम को और रंगको है।यहाँ नायक की सदोष देखि काम सैं विरमः भई ताज से चोति नही सकी यातै मध्या खोडना और दोन उपमेय हैं विरस और . राग पद के दोय आर्य हैं याने चराय वरार्य श्लेष है ॥२६॥ अथव- गर्यभवाय श्लेष॥दोहा॥दिन कपि.हित कर शीत घर भरि हारकर धीर।पाराक दीन मनन के गौर श्याम रघुवीर ॥ २०॥ दीका गोर: रघुवीर वासें हैं: "कपि भगवान ते हित करें है शील के घर :::::हारक हैं-रसा में धीर हैं घर गरीवन के पालक हैं।श्याम रघुवीर किसे हैं। दिन पक्षी जटामुक पि-वानरान घोहित कर हें खनन शेषावतार लक्ष्मण जी के पातक हैं। यहाँ गौर रघवारा उपमेय है श्याम रघुवर . उधसान हैं शाने वया चाय लेष है ।। १७०॥ कपिनाति ल्ह ले सारया सगेच मधुसूदने । तिदिनी ॥दो० सुखद मदन दर बीर्य घर राज राज हित धीरे॥ लज शुचि भूति घर निरिजा पति रघुवीर ॥१२॥ गिरिजा पति कैसे हैं सुखं स्वर्ग का दाना है मदन कामदे व को विटीसी करना वाला है। वीर्य जो शुक्र प्रभाव तेज सामर्थ्य इनके घर हैं। राज राज कुबेर सौ हित हैं छ' रजवान है। उमा पार्बती जलज चन्द्रमा। शुचि चांग नि भला इनकौं धारण करवा वाला है रघुबीर कैसे हैं तुरत आनंद संग दाना है मद नहीं है। दर भय नहीं से जो तेज सामी के घर है।राजान के राजा जो सार्वभीम जिनसे हिन है।धीर पंडित और धीरज वान है उमा- र्ति कांति जलज मोती ॥ शुचिमंगार शुद्ध मंत्री। नि। इन की धारन करने वाले हैं। यहाँ रघुवीर उपमेय गिरिजा पनि उपमान हैं। याने वरायो वगये श्लेष हैं॥११ सुख शासगाना केच॥ वीर्य शुक्र असावेच॥ तेजः र्थ्य यो पि ॥राजराजः कुदेरेपि सार्वभौमे सुधा करे। धैर्याचिनेवरे बुधे लोवंतु कुंकुम उमानसी हैम हरिदा कीर्ति कान्ति सुगशुचि ग्रीष्मानिङ्गारेप्यास शुभवारण ॥ इति मेदिनीपचिंता तंत्रे भवराय फ्लेषदोनोगवाहक बप दाहक नि मनचाहक काम ॥ जति चाहक वन चरन के न बाम म१७२॥ टीकाराम कैसे हैं धर्म के चलावे अधर्म के दाहक हैं कामना के अत्यंत अन के अति चाहक हैं ।वाम कैसे हैं वैत के .
मू
हक हैं। अंकल्यान के दाहक हैं। कामदेव के शत्यंत श.
चाहा हैं।भूत पिशाचादिक के पति चाहक हैं ।
राम वाम मैने नहीं सुमरे यहाँ राम भोर शिव उपमान
यात शवराय शिवराय लय है ॥१२॥अथू आप
तुत प्रशंसा लक्षदोहा॥जहें प्रस्तुत के कार
प्रस्तुतहि प्रशसंगहोय ही भूषन यह प्रस्तुत
प्रसंन गरगटीकागजहाँ प्रस्तुत के वास्ते शालना
को प्रसंशै नहीं प्रस्तुन प्रशंशा अलंकार होय है।१७३
रुपयशवर्णन समस्तुहि माहि जहें प्रस्तुतनिकसे।
जरा संबंध हि माहि कति यह निति विकसे समस्त
रुप के माहि जहाँ सम रुप निकरे ।सो सा रुप्य निवं
ध नाहिं मिद पहिलो उधेरै ।। निरूस विशेष सामान्य में
सो सामान्य निबंधना.म.सामान्य विशेषहि में कदै सहै।
विशेष निबंधना ॥१०॥ दोहाकार में कारजक
है तु निबंधन सोय। कार में कारण दादै काय निबंध
न होय ॥१२॥ अथौबा डिशाहारमनि
बंधन उहाहरन भादोहामवक धरि धीरज चोपदका
रिजो वान रह मराल गाउघरे अंत गुलाव कवि नीबो
नानि चाल॥१०६५ वीका-विक है सो धीरज धारे हो
ऊपट कार के जो मरात नि के रहै है गुलाब कांधकर
हे अंत मैं उघडे अपनी बोतो चाल से। यही सोयना-
यच सौ नायिका चतुराई करि कहे है याने पोल सांडता
है। और तक हंस वोरण, वा, समानरुपमररका पाठ
बरिणवो निकले है याने सारत्य निबंधनात
हाथ परोसा रडता सामान्य निधना
..
धनवान की निंदा करे हैं याले गनिका पंडिता नायिक
परि सबधनवानन पे लगे है या विशेष निबंधना
है॥१०॥ अथ सूखाचन्द्रिका कारन निबंध
नैतमाम सार लियो ताका मग में होकरि कै यह
असून
हरन हा सोक्छ न माने गुरुन की •
हित मन सानि सौ पाहताचे तासु फल ललन भये
हानि ॥१०६॥डीका गुरुन की सीख नहीं माने
महित को हित सानि कार के सीना का फल मैं
हो ललन हिल की हानि सत्यापै यहाँ नायक कों सदोष
सिके नायिका का है मैंने घर कान की सीख नहीमाले
तो दुख पाई न्यानै परकीया डिना नायिका है और
हिले सामान्य बच्चन सब पै है फेरि पछितावो स्फ
सक को ही निकले है यह विशेष है या सामान्य
बंधना है ॥१७॥ माय गानिका खंडिता विशेष
निबंध उदाहरणा ॥ दोहा॥ लारान सुर तरु
हसनहितकारी होय ॥ ननहको शादन है यो
बुध लोय ॥ १७॥ दीका है। लालन सुर नरु और
र भी शाहिनकारी होय निनकोभी आदर नही हो
जैसे बुध्ध लोग भान है। यहाँ नायकको सदोष देखि
है और कल्म क्ष कुबेर को बसान है यह
ना॥दोहालीनों राधा सुख रचन विधि नै सार
माम गतिहि मगहोय अकाश यह शशि मैं दीखन
श्याम ॥११६ टीका राधा को मुख रच
विशेष है
बाको
में कालो आकाश दीखे है यहाँ राधा को मुख
कारन को वरपन हेतामें मुख कारजी
-- । . व:भू० निकसे है यात कारन निबंधना है ॥१०॥ अथ कार्य इनिबंधना उदाहरने नोहीनुव पद नख की युनि कछुक गइ धोवन जतं साथ निहि कन मिलि दधि मथन में चंद भयो है नाय ॥१८टीका तुम्हारा पद का नसकी किक धान धोवन जल के साथ गई नाका कनवा मिलिका, कोदोध ता.मयवासे हे! नाय चन्द्रमा वन्यो है।यहाँ चंद्र मा कारज को चनन में नख द्युति कारन की बड़ाई हैयात फार्य निबंधना है ॥१०॥ अथ कुलांतरिताल दक्षिागदोहांगपिय लायें मान नहीं फिरि पाई पछि ताच वातही तोरना नायिका कही कविन सुरव पाय॥१८५) भौति और संताप पुनि संमोहरू निश्चास ज्वर से प्रतापाद कि सबल-याको चेष्टा भासं॥१२॥ अंथाप्रस्तुतांकुर लिहारा दोहा प्रस्तुत वर्णन करि-अपर प्रस्तुत हो। सन होया नहाँ प्रस्तुतांकुर साहन कवि गताव बुध २३टीका प्रस्तुत को बान कार के प्रस्तुत को प्रवी) स होय गुलाब कबि कहै है चुप लोग हैं सोनहाँ प्रस्तुती कर-अलंकार कहें है राजयामरधा कलहां रि- ता. प्रस्तुतीकर उदाहरन दोहोमिती न रोके माननी अली जनन जय जायता पाळेमन मानि ईख कतर ::::नीको मामा -- ..... - 44 ::::पानामाननी .. ins
ब.५०
:
अथ पर्यायोक्त लक्षणागदोहा॥जह रचना
वान सौं पयायोक्त प्रकार जहं मिस कौर कारज करै
य भेद निर्धार ॥ १६॥ टीकागजहाँ रचना सौं बात
सो पर्यायोक्त अलंकार है जहाँ मिस कारकै कारज
दूसरो भेद है निर्धार निश्चय॥१६॥अथ मध्याक
लहां तरिता उदाहरन ॥दोहा॥ नम्बर दर्शन
ख लेघु भादि अंक को भावासादर रारेन्यो नै नसो
जनहि आव॥१८॥ टीका।नवर दर्शन लाख लघु
न च्यारीन का आदि अंक को भाव तैने सादर सहित
राख्यो सो हे अली शोज नहीं भावे यहाँ नायिका नै
रुको बुलावो चाह्यो याने भध्या कलहाँ नरिना नायिका
और नंबर को नीदर्शन को दो लाख को लालघु को लाक
में नंदलाल नामनिकस्यो यह रचना सौं वान कहीं याने
योक्त अलंकार है॥१८॥ अथ मौडा कलहां
ता द्वितीय पर्यायोक्त उदाहरन ॥दोहा।
ब नहि मान्यों मोर मन क्यों भवनचने निकाममों
रकत शोत में ले से ही घनश्याम ॥१८॥ दीका।
मेरो मन नहीं मान्यौ अब बिना काम क्यों न है मेरो
र भरकै है शाराम भया पैघनश्याम कौं लियाजगी यहाँ
तच वासों और सखी को कयो नही मानि वासौं पीड़ा
र भरक वाका मिस कार के नहीं जावो कारज साध्यो या
निसरो पर्यायोक्तसतंकार है॥१८॥ अथ व्याजस्तु
लिलारा॥ दोहाग की निंदा सतुनि मिस स्न
अस्तुति का मिस सरि के वाही की प्रस्तुनि निंदा देखो पैता की निंदा अस्तुति से पैता की प्रस्तुति निंदा होवै. २॥दोहाग पर की प्रस्तुति से जवै पर की स्तुति साज॥ व्याज स्तुतियों याच विधि कहतसकल कोबरा ज॥१८टीकापैता की अस्तुति से जब पैलासी धम् त साजै जैसे व्याज प्रस्तुति पाँच प्रकार से सस्पूसिव राज कहें हैं॥१६॥ अथवाही की निंदा सेवा- ही की स्तुति दोहा परक सुदामादिकन के भारे दीने भंडा कंसादिक कीने निपने हरि विनहि विचार टीका। हरि सुदामादिक कंगातन को घणो धन दोनों कंसाविककों लाश को बिना ही विचार यहाँ कृष्ण की निंदा में स्तुनिहे, गाने प्रथम व्याज स्तुति है ॥१२॥जयपरकीयाक लहाँ तरिना वाही की स्तुति से वाही की निंदा दोहागनेरी सुधरई राती मोपे कही न जायापरभये भारे बोलो न नव भवफर मलि पछिनायाच्या टीका दि सखी नेरी चतुराई मोये कही नहीं जायगनव पैला का भय मैं भरि करि कै बोली नहीं प्रवहाय मसलि कारकै पछिनाव है यहाँ परभय से परकीया कलही वारता है और सुधराई स्तुनि मैं मरखता निंदा निकसे हे याने दिली प्रय व्याज स्तुति है ॥१२॥ और को निंदा से और की लति॥दोहा॥दश शिर कमनि करान ने को राम- मापकारगतज्यो विभीषन नाहिसो कोनों काम उदार बिटीकाकरात कुमति चालो दश शिर है उनै राम कोता पकार करौनांची विभीषन नै नज्यो सोचसोकामलग्यो यहाँ रावन की निंदा से विभीषन को अनुनि है याने तीस जनिदा उदाहरनपदाहागर तर समापियर गापेपछिनावहे यातकानफा कतहाँरिता है और निंटा में ब्रह्मा की निंदा नयान व्याज निंदा अलंकार व्याज स्तुति है ॥ १३॥ जोर की और की निंदा दोहा॥धन्य विभीषन रॉम यो वरन सुजान गधिक हैं जाने कानुज असं दियो निदान ॥१६॥ टीका विभीषन को धन्य है म के सरगौ शायो नाकों धिकार है जाने असाभाई की श्चय निकासि दियो यहाँ विभीषन की अस्तुति से की निंदा हे याने चौथो व्याज प्रस्तुति है ॥१८॥ स्तुति से ओर की स्तुति॥दोहा॥धन्य धन्य राधिका पाये पति भगवा धन्य राधिका मात जिलि सुना सुजान॥१६॥दीका राधिका की धन्य भगवान पति पाया राधिका वो साना को धन्य है आन सुना जाई यहाँ राधिका की स्तुति सौ राधिका की की स्तुनि है याने व्याज वस्तुनि को पाँचनों भेद है अथ व्याज निंदा लक्षागदोहा॥पर की सें जहाँ पर की निंदा होयावहाँ व्याज निंदा इकहि भेद त कवि तोय ॥१४ादीका जहाँ पैला की निंदा से की निंदा होच वहाँ व्याज निंदा को एकहीभेद कबि । हैं हैं ॥१६॥ माया गनिका कलहातरिना गयो करि चिननो उपचार गभाल मोर तू निंद्य है निंद्य : पिकार ॥१६॥टीकाकल्पवृक्ष की समान योगम तजि कारकै गयो गगननी जनन करि कोहे मेराभाल और तेरो निपि कन्या वातो निंदा लायक है यहाँ o RES॥ मय विपलब्धा लक्षागदोहातिय केत नित में जाय न देखें पीय कही विष लब्धाय हरिवन होय शनि जीयरिया निवेदरु निश्वास पुनिस) खेन उराहन मानि माशुपान चिनादिही याझी चेष्टाजा निशिंथ प्रथम द्वितीयाक्षेपलक्षा। दोहा । माक्षेप तु कहि शापुही फेरे बात विचारिक देह वच करे निषेध सो दितिया क्षेप निहारि॥२०॥दी. सापही कहकार के विचार करि कै बान की फेरे सों म- यमा क्षपाहै। बंचन कह कार के निशेध करे सो दुसरो भाक्षेप है ॥२०॥ अथ मरधा विश्लव्याधयमा क्षेपउदाहरन ॥दोहाशिवही घर चलि के सलीज दय होन दे चंदायों कीह भोरी भामिनी पर रोज दुनि- मंद ॥२२॥ टीकाबही घर चलि के जली चरम को.उदय होवा दे। जैसे पाह करि मोरोभामिनी हे सो (संद बात से सेज पे परी" यहाँ भवहीं चलि कै चंद्रमा को उदय होवा दे या पराधीन वान से मुग्धा विन लब्धा नायिका है।सोर भवही चलियों बात कह वारि कैफे री चंद्रमा उदय होया.दे याने प्रयमाक्षेप है ॥२१॥ नध्या बिपलब्धा उदाहरन॥दोहा॥साई नही सहेद में भाली भूली चालगभौषि वचन बाछ कोपर र मौंन गही बर वाले ५२०२॥ टीकापसहेट में नहीं भाई हे भाली चाल भूतो हौं यो वचन भाषिकार के कई कोप फार के सुंदर वान ने मौन गही यहाँ काम से योड़ो कोप करयो और ताज सें मीन गही यात मध्या विप्रतव्यो नायिका है और सहेद में भावो कह कार के निधनाने al
दूमरो साक्षेप है ॥२२॥ अथ रतीया
याभास लक्षण॥दोहा॥ गुप्त निषेध
घि टनिया क्षेय निकास है न विरोध विरोध सो
धाभास १२०३॥ टीकाछिपि वा तो मनै करिवो
जाहर मैं कर वो होय सो तृतीया क्षेप को निकास है
तो नहीं होय बिरोध सो भासे सो बिरोधाभास
२०३॥ अय प्रौदा बिपलब्धावतीया क्षेप
हरन॥दोहा॥नाली घर चलिचननही कार हैं पान
याना पहुंचन ही घर होय गो येरी मोहि मसान्॥
टीकापहे भाली घर चलि चलता ही प्रान पयान
पहुंचता ही येरो मोौं घर मसान होय गो यहाँ उत्कर्ष
चन बोलै है हातै प्रौदा विष लब्धा नायिका है और
चलि यह विधि बचन है घर चलती ही मरि जाऊँगी
नै सति चले यह निषेध छिय्यो है याने तीसरे
है ॥२०६॥ मय परकीया बिपलव्धा बिरोधा
स उदाहरनगदोहा सास ननद यानान की लाई
नोलि वायब झाली घर गमन की सुधि जायें ।
जाय ॥२०५॥ दीका॥सासू ननद धौरानी
नीति सुवा कार के आई हे जाली अब घर चति वाकी
सुधि माया सौं शरीर की सुधि जाय है। यहाँ
जिवानीन की सुवाकार के भाई से कह वासौं पर
या बिपलब्धा नायिका है।और सुधि भावा से सुधि
जोवो विरोध सो भास है विरोध नहीं या विरोधा
सलंकार है॥२०५॥ अथ गनिका विपलव्या
भास उदाहरन ॥दोहागाई वर सनबा
मैं करि धन सासा धामभई बिहान निरांस लरिक
नश्यामन घनश्याम ॥२०६॥ टीकावरसना-
लिमे धन की भासा करि कैई धाम में आई विहाल
ई निरास भई धन श्याम जो मेघ हैं उनकी देखि के
नि श्याम जो नी कृष्ण उनकी नहीं देखि कै यहाँधन
नासा कारकै धाम मैं भाई यात गानका विश्लेव्या
शायका है और घनश्याम है सो घनश्याम नही यहाँ
ध सो दीरख्यो विरोधाभास शतंकार है ॥२६॥अथ
त्किंदिता सक्षदोहा॥ संकेत स्थल मैं गई पी,
न भायो होय ॥नाको कारने चिन वै उत्तर कहिये सो-
२०७॥जभा गराई भनि कंपरुदन संतापावा-
विस्था कयनादि ये याकी चेष्टा याप॥२०॥अथ
चंभावना लता॥दोहा॥कारन खिनजह काज
ई नहँ विभावना मानि। लघु काररा तै काजद दोभेद
पतनानि । २०६॥ टीका।जहाँ फारन विना काज होय
हाहाँ विभावनामानोग छोटो कारण से कारज होयसो,
असरो भेद जानों ॥२०॥ अथ मुग्धा उत्कविता
भावभावनाउँदाहरन॥दोहा पिय है बहन
वासोचव रहित उसंगपिय रानी लाये बिना केसर के
तर रंग॥२०॥ टीका ॥पीतम आवेगा अन्यथा नही
जावेगा उमंगरहिन सोचतों केशर लगाया विना केशर
रंग सीपीली हुई। यहाँ पीतम जावैगा अथवा नही
पावै गा सेस उमंग रहित सोचे है याने सुग्धा उत्त्वचित
गायिका और केसर कारन है ताका लगाया विनाकेस
रनयो ने प्रश्रम विभावना।।
. .. २१०॥ अथ मध्या उत्कंठिता द्वितीय उदाहरन ॥दोहा॥खानि सनेह सकोच की सूत्र न निहारिणभई विकल मूद शशिकिरनि भई र फारि ॥३११॥ टोकासनेत सकोच की सो सूनों घर देरिख के विकल आई चंद्रमा की रनि है सो हृदा कौं फाडि कार के पार भई यहाँ सनेह की खानि में मध्या उत्कंठिता नायिका है। द्रमा को कोमल किरनि थोड़ा कारण मैं पार होने कारज भयो याने दूसरीवभावना है ॥२११॥ अथ वचतुर्थ विभावना लक्षदोहा॥ काल न होय जहं प्रतिबंधकोह होन ॥चवय आकारन ते कारन करे उदोन ॥२१॥टीका ॥जहाँ प्रति जो रोकवा चालो है नाकै होनाछनावी पून कारज सो तीसरी बिभावना है। कारन वस्लु कारज र सो चोची विसावना ॥२२२॥अथ प्रौदा तास्तीय विभावना उदाहरन॥दोहा॥ वारि बयार नर मुरसि गई विन नाह॥जाये हेतु नहि यौँ सोचत चित चाह ॥२१३॥ टीका" वरसे है वयार चले है तोमी नाह विना वलि गई नम लाई वास्तै नही आयो सेस चित्त को चाह में चै है ।यहाँ मुसिवासे चित्त की चाहसें प्रौदा विता नायिका है और वरसिवो वयार चालवा चा वातो है नेभीरम वो परन कारज भयो याने विभावना है ॥२१३॥ अथ पर कोया उत्कंठिता विभावना उदाहरन। . tram मेसाई -- 8 - काम नजि साये.नहिं नंदलाल यौं कहि मो, ने कतिन पे वादे खेद विशाल ॥२१॥टीका॥ घर को काम तजि कार के साई नंदलाल नही जाये कहकरि के फूतन की कलीन पैःसोवना घाखेद नच्या यहाँ घर को काम तजि वासौं परकीया उत्कविता नायिका है। और फलन की कली, कारन वस्तु नै पसे- कारन भयो याने चौयी विभावना है॥२१६ ॥ पपंचम की विभावनालागणदोहा॥ कारज हेतु विरुद्ध ते होय सुपंचम पावकारजे नै कार, जनस पट विभावना भाव ॥२१५॥ टीकाविरुष जारमा से कारजन्होय सो पंचम विभावना देगकारज कारन को जनम होय सो छली विभावना को भावहै १२॥ अथ परकीया उत्कंटिता पंचम विमा बनाउदाहरन ॥दोहागकुल नारिन भय नापस हिमाई शीनत धामाया पिय विन हिमकर सनी जारनं मोहिहानिकाम २१६॥ टीकाकुल कीरत्नी- नको डर औरईख सह करि कै सीनत घर मैं भाई है। ली यहाँ पीतम विना हिमकर चन्द्रमा सोमोको विना काम जलावे यहाँ कुल नारीन काभय सो तापसहवासी परकीया उत्कग्निा नायिका है और हिमकर सें जलावो विरुद्ध कारजा भयो यति पंचमावि भावना है ॥३१॥ अथ गनिका उत्कंठितार तीय विभावना उदाहरन॥दोहा॥धनदायक वायो नाही कि कारने ईहिन्याम गयौं भापत चपन 'वन ने सारनांची संमान ॥११॥रोका।न.की.
14 . यिका है और पीतम की मगरधा वासक देवा वालो ईघर मैं काई कारण से नहीं भापना चष रुपन से समान सरिना वही को देवा वालो नहीं पायों से कह वासों उत्कंटिना नायिका है। और मच्छो कारज ता कारनभयो याने छदी विभावना है।३१ य बासका सन्तालतरागदोहा॥पिय न को यह दिवस मेरो है शाजावासक इमि सजे सुरत को ताज ॥२१॥दनी प्रश्न मार्ग दर्शन भात ॥सामग्री संपादन रु जानि हात ॥२१॥ अथ विशेषो असंभव बोहा॥विशेषोनि ति हेतु है नक काज जैदिन संभावना होय असंभव सोय ॥२ अत्यंत हेतु होय तो भी काज नही होय सो लि असंकार है। विना संभावना कारज होय व अलंकार है ॥२२०॥ अथ सुग्धा चासक दिशेलोशि उदाहरन दाहा।सोई जपे लोयन मंदि विशोनापिय मंग देखन र खोले नैन नवाल ॥२२१॥ टीका सोभायम के ऊपर सूनी विशाल नेवन को माद करि कै पीनम ग देख वाली चाह है तो भी वाल हैसो नेवन की , तो मी दैरियवो कारज नही भयो यति विशेषोक्ति कार वामक व उदाहरन॥ काजानहायह ५ ~ ॥२२१॥ अथ aon- ५१ भ है भारतायन नोज शह दिन नाज पर गानिस १२२२॥ दीकालीन जाने होलाज यह दिनः होय गो सावन में नीजकाउलाह का दिनमेष्ट दिन का समाज को तीज कार के यहाँ काम से उत्सा मान्यो लाज से सौतिन को जोमानी याने मध्या- सक सन्जा है और ई काम को हो वो संभव नहीं हो जियो याने असंभव अलंकार है ॥२३॥ अथ प्रय दिन्तीय ससंगति लागदोहा॥प्रयम संगति कारगरु कारजन्यारी रणदिनिय और थलको को करै और ही नौर ॥२२३॥ दीका कारण न्यारी बार होय कारंज न्यारी और होय सो पहिती असंगति है और मत का काम सौ और और करै-सो दूसरी असंगति k३ लय औदावासक सज्जा.मयम असे तिउदाहरनगदोहोरासरियन सहित साजत स- न विमले वनावत वास िदन दान तरिच चाल कौं यकी हीन नम तास ॥२२॥ टीकासमीन हिन सय 'साजना निर्मल वास वनावना वाल को दान देती देखि नाका भनम मैं सोति है सो यकीयहाँ दान देवासीको वासक सज्जा नायिका है और दान को परिजम ना ।नायताम है.यकियो कारज सौतिन मैं है याने पः ली संगति है ॥२२॥ अथ पर कारावासक ज्जा द्वितिय असंगति उदाहरनगदोहा। रेरै सीजे सेज वर कार नव सन सिंगारमहर्षि हाय रिदियो दियो वयार मार ॥२२५॥ दीका हर अम्म सेज सजि के सोलह सिंगार कारकै॥हार्य हो जालि । भान हिलने के संग में प्रथम विषम सन जान । जन्न मिलने के संग मैं मन में प्रथम बियम २२६॥ पगडियावासक सज्जाटतीय यालेंगनिका वासक सज्जा नथ यहरता उतारि और कास कम्यो याते तीसरी असंगति है ।।२२७॥ सनि रह सदा भाज्ञाकारी पीय स्वाधीन यतिष कविन नियम कारनीय ॥२२८॥ वन विहार आदि दमदनोत्सब मैं पीति॥मद रु सनोरथ प्राप्त परि धार है रीति ॥२२॥अथ सम्धास्वाधीन लानिधिताल किन कित यहेभोरी बात में शन मिन मोना सेन नयाँ अली लख्यो लिपि भाल । २' षि के भूषन वसन पाहर के नथ पहरता काईवालें ब. भू० " य से दियो पवन मैं धरि दियो।यहाँ दियो बयार धरि वास पर कीया वासक सज्जा नायिका है। दिया को कास विना पवन की टोर मैं धीर वाको सो पवन की तौर मैं धरयो याने दुसरी असंगति है। जय हनीय असंगति प्रथम विषम गा। दोहा मान करत शाह करे तृतिय २२६॥ दीया और बारतों और करै शो नोसरी नि •.. पहरत किहि कारने संगति उदाहरनगदोहागसेज साजि भूषन महार हरषि मन साहिानय नारि उसाहि॥२२॥ दीकाज सजि के मन सकरि कै उतारि धरी।यहाँ नयले वाले वास्तै उता. खाधान यतिकालमा दोहा का प्रथम विषम उदारन॥दोहा॥ mar
व०म०
टीकापसम्पूर्ण कल्सन को खानि लाल कहाँ यह भोरी
वाल कहाँ यहाँ धन मिल को अत्यंत मेल हे सो हेली
भात को लिपि से जान्यौं यहाँ भोलापन से मुग्धा हे मोर
मेल हो वासे स्वाधीन पतिका नायिका है।सोर भन मित
ताको संग है यांने प्रयम विषम है ॥२३॥अथइन्त
यत्तीय विषम लक्षागदोहाकारन कारन
भिन्न रंग द्वितिय विषम गण नीय। भले उद्यम नै शंभल
फल होय् सु बिषम दतीय॥२३१॥ टीकाकारन को
सौर रंग होय कारज को और रंग होय सो दूसरो विषम
गगो भत्ता उद्यम से बुरो फल होय मो तीसरो बिषम है
२३२॥ माय सध्या वाधीन यतिका द्धिनीय
विषम् उदाहरगा गदोहा। खुते अन खुले चष
निरखि रंगे सात रंग श्याम मनोनाली की झलक ते भयो
सौनि सुख श्याम ॥२३२॥ टीकागखुल्या अन खुल्या
चयन से दरिय करि कै श्याम को लाल रंगमै रंग्या निस
लाली को कलक से सौतिन को श्याम मुख भयो यहाँ
ल्या झन खुल्या चयन से सध्या स्वाधीन पतिका नायिका
है। और लालो की कतक कारन को रंगलाल है सोनिनको
सुख श्याम कारज श्याम रंग है याने दूसरो विषम है
२३२॥ अथ पौना खाधीन पनिकाटतीयवि
यस उदाहरण पदोहा।केलि कलारस रीनि करि
ने वालम वसे कोन ॥भव अति संतन मेल नै बोलिनस
कौं शतीन ॥२३३॥ दीका केतिकता रस की रीति
करिकै मैने वालम को बस करो.हे भली भव निरंतरमे
ल से अतीन से नहीं बोलि सकी यहाँ केतिकलाकार
।
के गुन की गोली वाल ने विद्या का निधि नंदलाल द्वितीय हस उदाहरन॥दोहा॥विहरत कैजा मि परयो जाय गधिको जालेयाम भोचरज कौन सखि भाहि बिहारीताल॥२३॥ टीकापकंजन में डोत तो हुयो राधिका का जाल में पडि गयो से सखी याम, कोन चिरज है विहारी ताल है।यहाँ डोलना कृषा की वस करवा याते परकीया स्वाधीन पतिका नागि और डोवा कारन का गुन बिहारी लाल काग " ... पीतम को वस को याने प्रौदा स्वाधीन पतिका का है और वालम को घस कार वो भलो काम है ना रवीन को नहीं मिलवो बुरो फल भयो याने नीसरे म है ॥२३५॥ अथ प्रथम द्वितीय लक्षरा॥ हावर्नन दो सम रुप को नाहि प्रथम सम जोर। कोरन के गुन काज मैं मिलें द्वितिय सम होय ॥२३॥ टीकागदो समान रुय को बनन होय ताक प्रयम म देखोगकारन के गुन काज में मिल्या सों दूसरो होय है ॥२३५॥ अथ परकीया स्वाधीन का अमसूल उदाहरन दोहा प्रेम पास वमकियों दै देधि दान रसाल गुन गर्वीली बात विद्या निधि नंदलाल।२३५॥ दीका। प्रेम की पार से पकडि कार के वस कस्यौ सुंदर दधि दान दे यहाँ क्षधि दान देकार के बस कर वासा परकीया ख धीन पतिका नायिका है और वाल गुनगर वीती में ज्या विव्या निधि हैं दोन समान हैं याते प्रथम सत्र हैं ॥२२६॥ अथ परकीया खाधीन यनिम
।
नसे पाया याने इसरो सम है ।। २३॥ अथ त्यती
यसम् बिचिव लक्षणंगदोहा। काज सिद्धि
निविषद जतन करत समे तीन गइच्छा फलं विपरीत
को जनन बिचित्र भवीन ॥२३॥ टीका |जनन करना
ही निर्चित कारज सिद्ध हो जाय में स्टनीय सम है।और
विपरीन फल की इच्छा को जनन करे सो विचित्र अल-
कार है हे प्रचीन ॥२३८॥ अथ गनिका स्वाधीन
पतिकारतीय सम उदाहरन दोहा गहसि
हसायवरथापरस लाज वाल भरि वाय गतीनों सदनक
साथ हार सुरनरु गोपीनाथ ॥२३६॥ टीका। हंसिरे
हसाय के रस बरपाय कै भाज वाल ने वाय भार कसुर
तरु गोपीनाथ हार की घर में वसा लियो यहाँ सुरनर
का चस फर नातै गनिका त्वाधीन पतिका नायिका है-
और हसि-हसावा जनन से रुपा को वस करिवों का
जनिर्विध सिह भयो याने तीसरे सम है ॥२३६।
सय अभिसारिका लक्षागदोहा । पिय
जाय कि मीनसहि साय वलाव जोय ।। पाय प्रेमम
द मदनावस तु अभिसारिका होय ॥२४॥ होय समय
अनुरुप ही भूषण शेका जानि । प्रज्ञाने पुन्यरु कपट
हासादिक पहिचानि ॥२५॥ये चेसपर नारि की है।
या की नाहि ॥रुणां शुक्ल दिवादिभिर हैं परकीयामी
हि ॥२२॥निज,गानन में लीन हे रोकि सुभषगा ध्वा
नादावि गाव वसनन विसन कुलजाकर पयानं
२३ मद से विहन वोतनो फलिनन वितास।
हसनों सवतनी भय रतितचेटी गीनप्रकास ॥२४४॥
. नायिका जैसे जैसे अत्यंत नीची होय है जैसे तैसे ररा दोहा।। सानी लाज सनेह की तिया पिर- त ॥२१॥दीका लाज सनेह की सनी जा है सोपिया पैजान है ताकी देखि करि के अतीत है तामें अलीन को मन लाधन्य नहीं भयो बभू पद्धत उज्जत वेषधर कारनपुर कनकार अमुदिन लित मुख प्रगट वार मुखी मनिसार ॥२६५॥ २ ग्धा अभिसारिका विचित्रा उदाहरन हापिय पैं जात सखीन सँग सलज सतौनी जेब ज्योज्यों नीचो होन ति त्यों त्यों मची होय दीका सखीन का संगमें वियप जाता लाज होय है यहाँ सलज जावा से मुग्धा शाभिसारिका का है और नीचा हो वासौं ऊँचो होवो उलदो फत यानै चिचिव भालंकार है॥२६॥ अथ प्रथा तीय अधिक लक्षागदोहा। अधिक आधार ते आधे यमु अधिकायद्वितिय अधिक यतै जब आधार वदाय ॥२॥ टीका।बड़ा र से आधेय अधिकावै सो पहिलो अधिक है। धेय से जाधार बड़े सो दुसरो अधिक है ॥२६॥ मध्या शामसारिका प्रथम अधिक तानिहि लौरव बढ्यो अलीन मने त्रिभुवन में न वस्यों सो नीनों भवन में नहीं भावे यहाँ लाज सनेह की भरी जई निया है सो पिया पै जाय मध्या अभिसारिका माथिका है। और विभुवन , शधिक है ॥२८॥अथ प्रादा 14. -- - ५० जारिका द्वितीय अधिक उदाहरनगदोहा में पगो शातिमंदगांत चली लोन मेमोरगउजियोरो . चंद को भरो गलीन अपार ॥२ टीका प्रेम कीप माजई अत्यंत मंद गीत से अलीन का चीचि मैचती मुख चे मामा की उजियारी गलीन मै अपार भरी यहाँ प्रेम से च- याने, प्रौदा प्रेमाभिसारिका नायिका है शोर मुख चंद- की उजाली साधेय ने सो गलो आधारमैमागई याने. मिरा अधिक है ॥२४॥ अथ शल्प अन्योन्य ल हरादोहाभल्य अल्प प्राधेय से अल्प होचा बार अन्योन्यहि उपकार ते अन्यान्यालंकार ॥२५॥ स्टीका शल्य जी साधेय है. जसं साधार अल्प होयसो शिल्पातकार हे परस्पर उपकार से अन्योन्यालंकार है। १२५०॥ अथ प्रोडा जीभिसारिका अल्पउदाह रनमदोहाकीरति जानिन भवन मै तुम्हे वुत्तावना हिमुनि तुरख भयो सुलाल के सनमे भायो नौहि ॥२५२५ टीकाराधिका अपना मकान-सै हे लाता तुसकौं वुन लावै है "सुनिकारि यो सुख भयो सो लात के मन में नहीं मायो यहाँ पनि को अभिमान के वस से बुलावे है याने प्रोदा गर्वाभिसारिका नायिका हैंगलोर सुख हैं सोसा धेय है मनलाधार है सो सुरंच छोटा साधेय ते छोटो है:यात अल्प अतंकार हे ॥२५१॥ अथ प्रौदा का- माभिमारिका अशेष उदाहरनगदोहा.. लपटि माहि पाये महि महापामगंगामायभइ पाय॥२५२॥ टी सरकार के नहि है सो परान रिका द्वितीय विशेष उदाहरन ॥दोहा॥. का है और भाकास का फूल को बिना आधार वर्नन में चली नव नायिका है सो घन में वन मैतम मैं , । मरवीन नै छवि की छाई हुई देवी यहाँ, वभू म लीग गया पगन से सर्पन की छवि छाई सुर्यन गन की छबिछाई यहाँ कामांधा नासे पगनमै सर्प ग्या को ठीक नहीं पड्यो याने प्रौदा और परस्पर उपकार है याने अन्योन्यासकार २५३॥ अथ प्रथम द्वितीयविशेष, दोहा॥ विना रख्यात साधार के रह आधेय एक वस्तु कौं बड़तों वरनन दूजो वेष ॥२५३॥ विख्यात भाधार विना जहाँ साधेय रहै सो प्रथम शेष अलंकार है ।एक वस्तु को बहुन ठाम वरने से सरो विशेष है ॥२५३॥ अथ परकीया उदाहरन॥दोहा दुरितारे गुरुवननान सेवती ती हितधारिपरि डार पग मग धरत वन नभ । म निहारि ॥२५॥ टीका। गुरु बनितानसे छिप कार के लली है सो हिन धारि के चली ॥परन्नु जर रि कै मग मै पग धेरै है वन मैं शाकास को फूल दोन के यहाँ दुरि द्वार के जो वासों परकीया भिसारिका याने पहिलो विशेय है ॥२५॥ अथ कृष्णा वसन मेषन पहरिचती समावेस गतिघने वन निज समन मैं सरिवन लली छवि छाति५२५५॥ कागदाला चमन और भवन परिकै नामावस की पर वासों रुष्णाभिसारिका नायिका १५ कावस्तु नायिका की छवि है सो घनाबनादि मैं बरनी ने दूसरे विशेष है ॥२५५॥ अथ टतीय विशे प्रियमाच्याघात लक्षागदोहा॥ अतघुना लघु जतन नै रतिय विशोष सुख्यात गवरनै हित र वस्तु में माहित सु है व्याधान ॥२५६ टीका। जताजतन सैंबडोलाभ होजाय सो नीसरो विशेष है इतकारी वस्तु मैं सहित वने सो व्याघात है ॥२५६। अथ शुल्लाभिसारिका टनीय विशेष उदा हरन॥दोहा रजनी राका सरद को चली सेन सजि शाजा जिहि तरिच जानी सविन ने तरखी शारदा आज ५७ टीकापसरद की युन्यों की रानि मे सुपेद साज पनि कै चली यहाँ जिसकौं देखि कै सचीन ने जानी जा शारदा देखी गयहाँ सेन साजसानि के चली याने शु काभिसारिका नायिका है शोर नायिका का रिए वासी शारदा को देरिषवो अधिक लाभ भयो याने न्टनीय नि रोष है॥२५॥ अथदिवाभिसारिकापथम- न्याघात उदाहरनगदोहा। सुरंग वसन भाभर- पसाज चलो मध्ये दिन वाले गमरा मैं घनाये घु- महि लाख कुम्हिलानी हाल ॥२५॥टीकागतात वसन साभरन सजि कारकै वाल हे सोपहर चती शोला मैं घन घुमति माया तुरन ही देखि कारकै कु- म्हलाई यहाँ दिन में चत वासौं दिवाभिमारिका ना यिका है और घना धुमडिवो हिन कर वस्तु से महिन धन्यो याने प्रथम ज्याघात है ॥२५॥ समय द्विति स्य व्याघात भयस कारसा.सालातजनशदात्र कारन माला जानि ॥२५॥ कार के पति का धाम ो जाय यात गतिाका "सारिका नायिका सार जनम कारन है गन काजे गन मारन् ह धुन कारज फेरि धन कारन है। समाज है याते पहिली कारनं माता व.भू. काज विरोधी सैं सधै जुग व्याघात वरवानि पुनि कारण काज विरोधी सै कारज सधै सो दूसरों व्याधान कोर फेरि कारन सो काज होय सो कारन लंकार जानौ ॥२५॥ अथ : दाहरन्॥ दोहा सल्मानी हसि बोलती इन उत जोयामगवताचत चलन सँग हसि जासिक लोय ॥२६॥ दीका॥ मद से मस्त ह करिकै बोलती हुई इन उन को देखनी चसनी यिका के सँग मैं भारत को बनावना हुआ हसि के रात्रि में जामिक लोग सो संगचले है। यह सनी हुई इन उत को देखनी चले है यार्ने रिका नायिका है ।। शोर चौकीदार मारग कार लान नैं भाएग को बतायो कारज कस्यौ यानें । व्याघात है ॥ २६ ॥ अथ रानिका सिर यस कारन माला उदाहरन । होहा॥ सजि भूषन बसन यों कहना पनि धाम जाम से गुन सैं धनरुधन से होत सुकाम ॥२६॥ अपन वसन सजि करि कपाल का धाम की असे करें भास में गुन होय है गुन से धन : धन से सुंदर काल होय है। यहाँ सूबत बसन ।
न्य द्वितीय कारन माला रकावली लक्षन होगकारन माला दूसरी कारज कारन मालगहि पद छाडे जहाँ सकार्वती रसाल ॥२६॥ तरीका जौर कारन को माल होय सो. इसरी कारन मा- है जहाँ पर की गह गह कारकै कोडे सो राकावती, अंदर २६२॥ अथ गतिकाभिसारिका द्विती कारन साला उदाहरनगदोहा॥जानी मन वनी कहती भरी उमेगगगुन जम संग धन गुन, हे सकल काम धन संग। २६३॥ टीका जानीज सन को इतसावती हुई उमंग को भरी हुई कहती गुन है सो जम के संग है धन है सो गुन संगे है। पूर्ण काम है सो धन के संग है।यहाँ धनकी ब- करै है याने गरिंगको सिसारिका नायिका है। और पहिले गुन कारज कयौ फेरि काम कारन कहया रे धन कारज कल्यौ गुन कारन कयौ याने दूसरी रिन माला है॥२६३॥ अथ मवल्यत्पतिका दांगदोहा जगले छिन मैं जाहि को जैहे पति रदेशगताहि प्रेवत्स्यंत्रेय सी बरनत सुकविसंसेश ६॥कातर पेक्षा काकुवच निर्वेदरु सेनापण समी रु निश्चास पुनि गमन विघ्न को थाप॥२६॥शाय रधा प्रवत्स्यत्यतिकारकावलीउदाहरन हिा।शाली पीव पयानदुख लरिस परि परमानं न त मुख मुख नैं नयन अधिक अधिक अरमान ६६।चीको भाली पीने की पथानलो दुख रही जानि पडे गा मन सुख पुरवते नयन साथी - यहोय सो पयायकालकार है। कम से बहन के दाहरनगाहा फरकत भुजहवाम गान किवाल है सो मन में प्रसन्न भई मरत की पियराई तुरन लाली माई यहाँ वाई भुजा चाँया नेत्र फरक्या ग्धा भागसिष्यत्पतिका नायिका है और पियराई को मुख एक मामय भयो याने प्रथम पर्याय ह" ल्यो निये घेर सायलिगो दीठि सुज वाम पुनि कामे जाय॥२७६ टीकाबाई भुज पारी फार वासुन गरियका प्रवत्स्यत्पतिका नायिका है करा सुंदरी कया जाही कमसौं कर अँगुरी यात यया संख्य अलंकार है ॥२२॥ मिष्यत्यतिका लक्षणागदोहा॥ परदेश तै यौँ गनि हर्षित होय॥से आग. यसी बरनत सब कवि लोय ॥२३॥ अथ, यला दोहा।। कम से आराय एको है सो पर्याय क्रम से वड के एकही माय य गनाय॥२०॥ टीका कम से एक के बड़ आभय होय सो इसरो पर्याय गनायो । २०६॥ ग्धा भाग निष्यनमतिका ५ दित मन वाल गपियराई मुख्य को गई भाई लाली २७५॥ टीका गवाई भुजा वाया ने फरकना गान अथ मध्या भाग मिष्यत्पतिका यू उदाहरन॥दोहा॥फरकत भुज पान की व भी निया के घर का कारक वान्यो वॉई भुजा में पर माना
ल.देखि काम के वसंसदीवि लगाई लाज के वस से
धक नही हर्याई न्याने मध्या आगमिष्यत्पनिका ना
का और एक दीवि भुजा मै और काक मै लगायो
इसरो पर्याय है ॥२६॥ अथ परिवति पूरिस
शाल्लंगागदोहा गयरिटति सु सन्नदो करे अधि)
यून को कोय ग.पार संख्या यल भान नजिक थल
यित होय ॥२०॥ टीकाधिक न्यून को कोई
टोकरे सो परिवीत अलंकार है।जो और यल की
अ कार कै एक यल मै थिन होय सो परि संख्यास
कार है॥२७॥ अथ प्रौढाझागमिष्यत्पनि
परिबति उदाहरनगदोहा। उहि पाता
गभरि बाली प्रियो प्रवीन आली अधिक उछाह दे
दा काक नै लीन ॥ २७॥ टीका सर्वेरै उठना होउ।
मै भरि करि कै प्रवीन प्रिया वोती हेमाली धिमी
शाह दे कारकै काक नै विदा लीनी यहाँ अधिक उन्न
सौ प्रौदा भाग मिष्यत्यानका नायिका है और का
नै अधिक उछाह दे करिकै विदा तीनी याने परि-
निभलंकार है ।।२७८॥ अथ यर कीया भाग
मप्यत्यतिका परिसंव्या उदाहरनगदो०
नन परोसिन को पिया है भाजहि सोम् ॥रहीक
नही श्यामना रुशता करिही माम॥२७६
रोसनि को पिया माजही सौम को भावै.गोकालाप
है सो वालनहो मै रह्यौ दुवराई कार में हो रही
हाँ परोसान का पति से परवाया भागमिष्यत्यतिका
यिका है। और कचन मे श्यामना रही काट मेकशना
य लक्षणदोहा . जाना ॥२८॥ अथ तिन मै मारिवो जिवावो विरोध है याने |सागत पतिका नायिका हति जिय मै जोया टीका।जाको पीतम परदेश ले तवहीं भायो रही। ॥ याने परिसंख्या अलंकार है ॥२७॥ रूपनयन सर वल जुगल विरोध को कयन विकल्य वखानि। वन को सँग कथन प्रथम समुच्चय जानि ॥२०॥ समान वल दो→ विरोध को कथन होय सो बहुत भावन को संग कथवो होय सो गनिका भाग स्पनिका विकल्प उदाहरन दोहा॥ गनि गांवनी बोलो हिय हर्षानि । आज ख आनि है जसराजकि धन दानि ॥२८१॥ टीका अवधि को दिनन को शनि करि के गावंती हुई हा कारकै चोली आज शनि मै हुए भागो के धन दानी कृष्णा यहाँ गावासौं गनिका भाग भलत्यतिका नायिका है। और जसराज.धन दान कल्प है ॥२६॥ अथवागत यतिका दोहा जादो पिय परदेशाने लायो तबही हो सोझागत पनिका नायिका जीव में हर्षती देखौ। मथ सुरधामागत यतिका प्रथम दाहरनगडोहापिय माय लाख नवत हसी जंभाय केपी अनुरागी बार बैठी ॥२३॥ लोकापिय को आयो देखि के मोही हँसी जमायो ली कंया मानुरागी फेरि ९० 'लजा कार के वैनी यहाँलाज वासै मुग्धा भागतप का नायिका है। और नायिका मै हादिक बहुत व है या प्रथम समुञ्चय है ॥२८३॥ अथ द्विती, समुच्चय लक्षदोहा॥हाँ पहिले होप या वहन मानि मन माहिती करै सिद्धि का काम द्वितिय समुच्चय आहारमा टीकागहमप- लें हम पहिले असे बजन है सो मन मै मानि लोर एक काज की सिद्धि करे सो दूसरो समुच्चय है ॥२८९) सयमध्या आगत पतिका द्वितीसुसमुच्चय दाहरन ॥दोहा॥पिय लाये परदेश से भेटन परि नि भीरगननु चय भवनन चाहने वदि नियकोष और ॥२८॥ टीका॥पीनम परदेशने साये कुटुंब सगृह सौ मिलना तनु चष भवन की चाहने यदि करिकै नियकौं अधीर करी यहाँ पहिले ताज सै धीर श्ररि रही फेरि काम से शरीरादि की चाहने वटिकार के अधीर करी यातै मध्या भागातका नायिका और तनु चय श्रवनन की चाह नै चरि कार के अधी, रना सक कारज को याने दूसरों समुच्चय है ॥२५॥ अथ कारक दीयकसमाधि ललागदोहा कारके दीपक वह किया कम नै फारक एक भान है। नुसैं काज की सिद्धि समाधि विवेक ॥२पाटीका कम से वजन कियान को. कारक राक होयसो कारक दीपक प्रकार है ।और हेतु से कारज की सिद्धिहोर सो समाधि है ॥२६॥भयापोता मागतंति का कारक दीपक उदाहरनगदौहासजनीक
प्रिया या
सप्रीति ही यहाँ पारोसी का परदेश से आवा
को जावा अन्य कारज से मिलाप कारज भयो
वपत्पनीक बलधत्तिगया है तो यह है कहा सोना
व्यार्यापति॥२च्चाटीका प्रवत शत्र के मित्र
वत की धति होय सो प्रत्यनीक अलंकार है॥यों है
तो यह काई है जैसे होय सो का व्यापति अलंका
लखि सामरने अमंद से प्रसन्न मुख ने नव
मूदे चंद १२ टोकाप्रतिका परदेश
बासु०
ही विदेश लै पिया पिया यो भात ॥दौरी फिरी
रही पुनि पूँही कुशलान ॥२८७॥ टीका।
कही विदेश
पिया आवै है दौरी
री खरी रही फेरि कुशल पूछी यहाँ घगी. वर्ष
ने जीता आगन पतिका नायिका है। और दौरी
दि अनेक भाव सक नायिका मै भये यातै
पक अलंकार है ॥२०॥ अथ परकीया
तदनिका समाधि उदाहरन॥दोहा॥
सी परदेश नैं भायो जिहि निशि भोहि ॥घर के सब
सवन मैं गये गरिब घर नाहि॥२८॥ टीका।
रोसी परदेश ते भायो जी रात्रि में घर के सब
न में गये ना नायिका को घर राखि कै जाकी
परकीयामागत पतिका नायिका है। और घर ,
अलंकार है॥२८॥जय प्रत्पनीक
लक्षण दोहागपवन शनु
र है॥२८॥ अथ गानका भागनपतिका
त्यनीक उदाहरनगदोहगावत पति
"ar
प्रिया या पिया आवै है को जावा अन्य कारज से मिलाय कारज भयो व्याययति॥२८॥टीका प्रवल शबू चल की धति होय सो प्रत्यनीक अलंकार हैं।यों है अनदास प्रसन्न सुरखनन नवक टोकापतिका परदेश से भयगानका भागनपत्तिका . " सर और बाभू० विदेश नै पिया पिया यो भात ॥दौरी रही पुनि पूँकी कुशलान ॥२७॥ टीका। री खरी रही फेोर कुशल पछी यहाँ यगी ने जीता आगन पतिका नायिका है। और दौरी दिअनेक भाव सक नायिका मै भये याते पक अलंकार है ॥२७॥ अथ परकीया तू पनिका समाधि उदाहरनगदोहा॥ सी परदेश ३ भायो जिहि निशि मोहि घर के सवन मैं गये राखि घर नाहि॥२८टीका। रोसी पर्देश नैं शायो जी रात्रि मै घुर के सब न मैं गये वा नायिका की घर गरिख के जाकी से पीति ही गयहाँ पारोसी का परदेश से आवा परकीयामागत पतिका नायिका है। और घर कान समाधि अलंकार है॥२८॥ अय पत्पनीका व्यायपत्ति लक्षराज दोहागपबूल शत्रु केनि व पै पत्पनीक बलात्तायों है तो यह है कहा सोन . तो यह काई है जैसै होच सो का व्यापत्ति अलंक के है।॥२६ न॥दोहा गावत पति परदेश E -- न में गये ना नायिका को घर राखि के जाकी पारोसी को जावा अन्य कारज से मिलाप कारज भयो यात वये प्रत्यनीक बलधातायो है तो यह है कहा सोका अमंद प्रसन्न मुख नेन् तबु का बाभू० ही विदेश पिया पिया क्यों भात ॥ दौरी फिरी रही पुनि की कुशलान ॥२८७॥ टीका॥ कही विदेश जिया या पिया आवै है दौर री खरी रही फेोर कुशल पछी यहाँ यगी. हर्ष नै जोडा आगत पतिका नायिका है। और दौरी दि अनेक भाव एक नायिका मै भये यातै कारक पक अलंकार है ॥२७॥ अथ परकीया तं पनिका समाधि उदाहरनगदोहा॥ सी परदेश ते भायो जिहि निशि माहिघर कै भव सवन मैं गये राखि घर नाहिसा टीका रोसी परदेशत भायो जी रात्रि में घर के सब उत्तम से प्रीति ही यहाँ पारोसी का परदेश से आवा 'परकीया मागत पतिका नायिका है। और घर कान जालंकार है।।२८८॥ अथ पत्पनीका लक्ष दोहागप्रवल शत्रु व्यापित्ति ॥२८॥ टीका प्रवत शत्रु वल की धनि होय सो प्रत्यनीक अलंकार है।य तो यह काई है जैसे होच सो का व्यापति अलंका है॥२६॥ अथ गनिका भागनापलिकामा न॥दोहागावत पति परदेश मटीका पतिको परदेश से केमि के मित्र - ३०० भावना गहगान सहित देखि कै मुख नैनप्रसन्न भये नब चमानै कमलम्हें यहाँ नायकौं गहरणानसीहत देखि वासींग सनिक जागनानिका नायिका है और चंदना नै मुख का पक्षी कमत नको मद्या यातेपत्पनीक भर्तकार है।अथ पति स्वा धीनालक्षणादोहागरूप प्रेम गुन आदि फोरदपतिक वसनारियोन स्वाधीना कहन तिमि कोच सोविनिर्धारित २.दीकारूप प्रेम गुन शादिकार फै नारि पनि फै मानपान गुल्यापागन्याधाचा काव्या चापांन उदाहग्नगदीri.in ली लाल को मुख देखि के रति हलुभा करि कै रहे। मै लाज कौं नजिकरिके वत भई सो गिनती नही गिनी जाय यहाँ लाज कौं मुख,माने है पति फैव. स है याने मुग्धा पनि स्वाधीना नायिका है शोरजी कौं देखि कै रति भी लुभा रहै लो मे फॉई हाँसे- कह चासौ काव्यापित्ति अलंकार है ॥२२॥ अय काव्य लिंग लक्षागदोहा अर्थ सम थेन योग्य जो नासु समय नहोयोकाव्य लिंगभू- पिन नहीं कवि गुलाब मन होय ॥२३॥ टीका) समर्थन योग्य जो भर्य नाको समर्थन होय वहाँ- गुलावं कवि काम ते काव्य लिंग अलंकार है। अथ सध्या पति स्वाधीना काव्य लिगाउन दाहरन॥दोहा॥मोलि लईसी लारख-रही वोति नसको सचेतगमोते नि मानि-न्यून है पति मोहन वभुः सुने सुनें हियो इलसा॥येरी मुरली लाल की मो चित लियो चुराय ॥२६॥ टीकाविना दीसत्या ध्यान धरि कै रही हौं सुन्या सौ हियो जलसावे है। येरी लात को भुरती नै मेरो चित्तं चुरा लियो यहाँ सुरती का सुन वासे वसंभई यानै परकीया पति- स्वाधीना नायिका है और कृष्णा कै जोग सैं मुरलीने वडाई पाई याने दूसरों अर्थात रन्यास है ॥२८॥ अथ विकरवर सोदौक्ति लक्षा॥ दोहा। विक स्वरस्तु विशेष पुनि है सामान्य विशेष प्रौ दो तिज कारन करे अकारनहि गनि वेपद टीका विशेष होय सोमान्य होय फेरि विशे- यहोय सोचिक खर भालंकार है।कारन की वे य गनि के कारन करे सो मोदौति अलंकार जय गानका पति स्वाधीना विकखर उदा हरन॥दोहा॥ाली लावत लाराधन जगलनको अनुहारिगनिहित वारौं गुनु धन भानन शमल: निहारे दीका । हे भाली लाल धनल्यो वै है जगर काजन की अनुहारि नाकों ने कार कैसा गन् धन वारौनिर्मल मुख देखि करिके यहाडगुन धन चार वासौं गौनका पति स्वाधीनों गायिका और लाल धन लावत यह विशेष जगत काजन की अनुहारे यह सामान्य है कोर लाल पे दुगुन धन बार वो यह विशेष है याने विकस्वरहे। अथ उत्तसालझण पदोहागन हितकारी पोय पहिनही करे जुवामायाकीचेला उनहि
तु होय यों तु सभावना जानि ॥ मिथ्या दित मिथ्याका
न सिध्या ध्यवसिति मानि ॥३३॥ टीकागजो यौह
य तो यों होय असे होय सो संभावना अलंकार है।
मिथ्या के बारत मिथ्या को कहवा होय सो मिथ्या
ध्वसिति मानी ॥३°३॥ अथ सध्यमासंभावः
ना उदाहरनगदोहागपात पिया पायरन लरिव
बोली रिसाह नशायराति जोन उत जावते तो क्यों।
परते पाय॥३°ादीका॥सर्वर ही पीनम कप
न पड़तो देरिद पौरिस के नशा कार के बोली जोग
तिमै उत को नहीं जाद
जानि उत्तमा नाम ॥३०॥ टीका जनहित कारी
जो वास अहित करे।याकी चेष्टा उत्तम है याने
मा नाम जानों ॥३०॥ अथ उत्तमा प्रोदौक्तिउदा
पदोहा॥साये प्रीतम पान घर लाय
लता ने जान नमाल दुधति लरिख भइ हयित
ल॥३०॥ टीकाप्रीतम है सो सवेरे ही घर जान
भाल में महावर लगा करि को तो भी तनु मे जमुना का
नमाल की युति देखि के वाल हर्षित भई वयहाँ सापर
धनायक कौ देखि के बर्षित भई याने उत्तमा नायिक
और जसुना को तमाल अधिक श्यामना को कारन
ताकौं कारन कस्यो याने मोदौक्ति अलंकार है।'
अथमध्यमा लक्ष ॥दोहा॥पिय के हित
हिन करे सहित सहित त होय ॥चेष्टा में व्यवहार
जानि मध्यमा सोय॥३२॥ अय संभावनानि
य्या ध्यु वसिति लक्षदोहा जो यों होय
च
पड़ते।
बभू. यहाँ पानम ने अपराध कम्य नय गंग पारयों और पर तम पायनमःपड्यो तब राजी हुई यात मध्यमानी यिका है और जो गीत में उनका नहीं जावने तो पर्गन मै क्यों पड़ने जैसे कह वासी संभवना चलेकार है। ३०॥ अथ अंधमा लक्षागदोहाग हितका री ह.पीय यै अहित करै जो नारि॥ चेष्टायाकी अध म यौं अधमा कही विचारि ॥३०५॥ टीकाहि नकारी भी पोनम. पै. जो नारि भहित करे याकी चेष्टा अधम है जैसे विचारि कार के अधमा कही है।३:५॥ अंथ मधमा मिथ्याध्यवाति तिउदाहरनगदोहा पिय वर विनती भाष ना वोली अधिक रिसाये। नभ फूलन की साल जोध रै सुतुम्हे पत्याय॥३०६॥ टीकापीनम कौंसु दर बीननी भाषता अधिक रिसा, कारकै बोली जो नभ का फूलन को सालको धारण करै सो तुमौंप त्यावेज्यहाँ बीनती भाषना कठिन बोली याने भ- धमा नायिका है और नायक कौं विश्वास मिय्या मानि नभ फलन की माल को धरचो मिय्या या ने मिथ्या ध्यवसिति है ॥३०६॥ अथालत: सालक्ष दोहागजो कछु प्रस्तुत-धर्म से वनैनी यहत्तातच प्रस्तुत प्रति विव कार वनत ललित ख्यान॥३॥दोकाः।जो कछु प्रस्तुन हाधर्म को वर्गवा जोत्या वनांत होय प्रस्तुन को पनि विव कार के वर्ननहोयसो नतिन ज्यान जाहर ३२॥ अथ अधमा ललिन उदाहान।
भ०
यो बाछिन अर्थहोगयो चान प्रर्थन हर्षन हूँ
दोहा॥ वर्जन निशि मे गवन कार दोनों
माय भोर भये वजकन के काहें पकरे
डोकावर्जना निशि मै गमन कार कै माल
यो और भयांचे वर्जवा वालान के पगनमै
ई है यहाँ नायक नै पग पकड्या तो भी नहीं
या अधमा नायिका है। और माल गुमावा वात
प्रस्तुत को वन कार के नायक को बतान
ते लालन अतकार है ॥३०॥जय नायक
गा। दोहागसुन्दर शील जुवामु घर केति ..
ल वान शुचि उदार गुन वानि तिहि नायक
सुजान॥३६॥ अथ प्रथम द्वितीय
लक्षण॥दोहागप्रहर्षन सुबिन जतन ही
नार्य हो जायगचौछिन ते अधिकार्य की सिद्धि सु
य गनाय॥३१॥ टीका।बिना जनन ही
मर्थ हो जाय भोपहर्षन है "वाहिन में शोधक
र्थ की सिद्धि होय सो दूसरो प्रहर्षन है ॥3
जय नायक प्रथम प्रहर्षन उदाहरन
दोहा॥कर मुरली पर पीन धर शीश मुकट
ला वन ते सावन मग निरखि अति
जवाल ॥३१२॥ टीका हाय में मुरली पोल
डा की धारण कस्या हुया शीश पेमुकर हृदा में
धरानया वन ते सावता मग में देखि के ब्रज
जयत हर्षी यहाँजनन चिना ही नायक को
दा
३ अर्याल
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२०१० उरन्यौ पति उपयति सुंनी परनारिन मै लीन गवैसिक पनिरसनाई यौभाषत विविध मवीन ॥३२२॥ टीका परन्यौं जयों यति है यैला की तीन मे लीन होयसो उप पनि नायक है वेश्या को पति वैसिक हैं यों ती न प्रकार को भाषे है प्रवीन है सो॥३१२॥जयप तिनायक द्वितीय पहर्षन उदाहरन॥दो धनुष भंजि सबसे सरस लेखि ताले निज पीय प्रापत दुर्लभ लाभ में अति हपीनी सीय ॥३.१३॥ टीकासव से सरस धनुष भजि मै अपना पीत म की दादा देखि कै डर्लभ लाभ में पाहो कैसी- ना भत्यंत हर्षाई यहाँ रामचंद्र पति नायक है और रामचंद्र की प्राप्ति वाछित से अधिक है याने दूसरों प्रहर्षन है ॥३१३॥ अथ पति भेदादो० अनुक्त रु दक्षिा रु श राष्ट्र चारि पनि मूल॥प. रनी ईकही नारि को हितकारी अनुक्ल ॥३२॥दी अनुकूल दक्षिणा शत प्रष्ट ये चारि पति के भेद परनी हुई एक ही स्नी को हितकारी होय सोन नकल है ।। ३२८॥ अंथ टनीय प्रहर्षन बिषा दन लक्षण॥दोहा॥जनन वस्तु जिहि हेरने व हो मिते सुदनीय बाछित ते उत्लदो मिले विषादन सु गुणानीय ॥३२५॥ ठोका। वस्तु को जनन हेरतों वाही वस्तु मिले सो नीसरों प्रहपैन हैंगचाहिन से उलटो सिलै सोचमाद नगगी ॥३१॥शयम नुकूल टतीय प्रहर्षन उदाहरन ।दोहा सिय पिय चुलवन हित सखी संग जोवन ही धास।)
वन बंड़त पिया घिय धास॥ सब को सस सनसानकारी म गई॥सब को बराबर सन्मान कार के धन प्रयाम एक के रान दोष करि कै और को गुन दोष होय" स॥३१॥ टीकासीटा वचन बोलवा वालोह उल्लास के चारि भेद वन है।।मति के भंडार सो॥३१॥ अथ शत प्रथम उल्लास लक्षण दोहा॥मिठ वचनी कपटी वहे शनायक पर कासगड्क के गुन में मान को गन होय सु कपटी होय सो शठ नायक है प्रकास जाहर प्रथमउल्लास सवही सने सलेह मैं मान लखे मग राग॥३१५॥ सय है सो पिय कौं चलावा कै वास्तै धाम मैं . को मग देखे ही नवहीं सनेह मैं सने हुये गुम मैं भाते देखे यहाँ राम अनुकूल नायक है । का बुलावा को सची की चार देखना राम हो मिते ते तीसरे पहर्षन है॥३२५॥ अथ दक्षिणा वि. पादन उदाहरन ॥दोहा गई लुलावन निन गे वन मैं घनश्याम ॥३१॥ टीका अपना भवन मैं वुलाचा के वास्ते बजत शिया है सो पिल के घा हैं सो वन मैं गये यहाँ सब को सनमानसमान की रयो याने दक्षिण नायक है।मोर कृष्णा को बुला वा गई वै उलटा बन कौंचल्या राया यात विषार न है॥३१७॥ अथ उल्लास लक्षा॥दोहा॥ गुन दोषन कार एक के शानहि है गुन दोष । चारि भेद उल्लास के वर्नतं कवि मात कोव।३१॥ टीका के गुन सैं और के
भू०
साथ शत प्रथम उल्लास उदाहर
॥दोहाग तुव अधरामृत-ध्यान धार बथै पिया
श पाने अवसधरा मत ध्यान धारहै हो समर
दानं ।।३२०॥टीका गनेरा अधरन का अमृतको
पान धरिकै हे पिया राति में आन बच सब अधरा
नपान करि कै अमर होऊँगी निदान निश्चय यहाँ
पट सें मीठी वान करे है यान शान नायक है औरना
यका का अधरा मन का शुनसे नायक को गुनभयो
गर्ने प्रयग उल्लास है ।।३२०॥ जय पृष्ट द्विती
उल्लास लक्षणांदोहा॥नितनिउर अपरा-
वकर नायक धष्ट गनीया होय दोष परदोष सैंसो
उल्लास द्वितीय ॥३२॥ सरोकालाजरहित डररी
न अपराध करे सोशष्ट नायक गनौं।पैता का दोप
सेंदोष होय सो दूसरोउल्लास है॥३२॥ अथए
सद्धितीय उल्लासउदाहरन॥दोहा॥पायनम
रत पाय परिवोले लाल सुजान तो वियोग मोना
मैं क्यों विधिलिरव्यो पान॥३२२॥ टीका।
पायन को मारताजया पगन मैं पाड़ कै सुजानल्न
अबोल्या तेरो वियोग सेरा भात मैं अयान विधि
में क्यों तिरब्यो यहाँ निलजान उर है यातेर
पटक है और मारिवो नायिका का दोष से ब्रह्मा
का दोष है या दूसरो उल्लारा है।३२२॥ अथ्ट
वीय चतुर्य उन्ना लक्षागदोहा॥इक कैग
नसे शान की दोष सुनिय कासगहोयं दोषसे
गुन जहाँ है चौयो उत्तात ३२३॥टोकोसकले
क्रिया चतुर नायक है और परिणाम गुन है नाकों Alcan वि॥प्रकन अर्यमै और ह कडेसु मुद्रा सानि व० करै सो क्रिया चतुर नायक हेगगुन दोषन में पगुन की कल्पना होय सोलेस अलंकार है ॥३३॥ अथ किया चतुरे गुन दोयूनेस न॥दोहा॥ आलो बहुत नियान मै मोहि निरसि लाल।विहसि कोल शिर धरत निनि रूप भयो जाल ॥३३२॥ धोका हे शाली बहुत तियान मैं में क देरिख के नंदलाल है सो विहसि के नित्य शिर धेरै है मेरो रूप है सो जंजाल भयो यहाँ नै कमल माथा पे धरि के अंगास जतायो याने मान्यी याने लेस है ॥३३२॥ अश्य प्रोषित स से गुनलेस उदाहरनगोलाप्यारी परदेशमें करते पान पयान। पै यह मोरि कठोरत नित्य जिवावत नान॥ ३३३॥ टीकाप्यारी परदेश मे पान पयान करते परन्तु यह मेरी रता नित्य जिवावै हैन सान और नही यहाँ परदेश दोष से जीवो गुन है गाने लेस अलंक ॥३३३॥ अथ अनभिज्ञ नहा लक्षण नहि सम तिय रसन ने सो अनभिज्ञ है। याते प्रोषित नायक मै ३३५॥ टोका॥तिय के रसन में नहीं समुझे मिश वरखानौ अक्रति सर्थ मैं और भी कदै अलंकार जानौं ॥३३॥ अय अनाज हरन ।।दोहा॥गये लपटो श्वास गर धन anta वभूः भय वैन श्याम कही ती गर गहत पान न क- भय हैन ॥३३५॥रीका राधिका है तो श्या म. का गला सौ. लपटी वन में भय का वचन कह वार के ॥श्याम ने कही गलो कयों गहे हे रुचान निक भी भय नही है। यहाँ राधा को प्रेम कृष्णा नही जान्यौँ सो अनभिज्ञ नायक हे और श्या म गरवन मैं इन संक्षरन मैं कारो जहर पानीसै 'यह भर्य निकसे है याने मुद्रा है।। ३३५॥ साथ उत्तम नायक रत्नावली लक्षण दोहा। करे जतन नियमान हर सो उत्तेसे जिया जाना प्रलंत पद कम से कदै रत्नावती वरयानि ३३६॥ टोका। तिय है सो मान कों हर वाको जतन रे सो जीव मे उत्तम जानौं क्रससै प्रस्तुत पद कड़े सोरत्नावली वखानों ॥३३६॥ अथ उत्तम ना यकरत्नावली उदाहरन॥दोहा॥वानीको बदली निरखि गौरी को नंदलाल भोपि बचन म- रे सरल खुस कोर लीनों हाल ॥३३॥ टीका। गोरी की वानी और नी बदली देरिय के नंदलाल ने मधुरे और सरल वचन भाषि के तुंरत खुस कर यहाँ वाल को प्रसन्न कार लोनी याने उत्तमना यक है और वानी जी गौरी उत्पति पालन प्रलय किम सैनिकसी चाते रवावली अलंकार है।।३३ अथ मध्यम नहुन लक्षण दोहोगकर नि रस रिस रिस वनी तिय सौ मध्यम सोय। नजे गुन तजि सर्गात गुनहि गहे सो नगन हो। नो
समय मे लाज भीति ताज दे सो अधम
है। संगति का गुन लेकरि फेरि जा नजिकै
पना गुन कौंले सो पूर्व रूप लकार है।
रैगि कै लाल होय है फे-
बाभू
य॥३३॥ टीकारस वाली नियमों प्रेम
नही करे सो मध्यम नायक है।अपना गुन
तजिकै संगति का गुन कौं गहै सो तदुन
र है॥३३॥ अथ मध्यम तद्गुन
रन॥दोहा॥लिय अनवोली लौख तुरत
रहे जनायोपुनि हसती लरिख जाय डिंग
रित भरि वाथ ॥३३॥ टीकारातिय की
नबोली देखि के बजनाथ कि रहे फेरि
ती देखि कै दिगजा कारकै वाथ भरिकै
ये यहाँ धनवोली देखि उठके वोली तब
गये याने मध्यम नायक है और वाय भर
हरे भये सो पीला से कालो मिते नब हरया
है यानै नहुन है ॥३३८॥अथ प्रथम
रूप लक्षणपदोहा कति समय
से लाज मीनि तजि देयापूर्वरूप गहि संग
नजि पुनि निज गुन रोय ॥३४॥ टीका।
अथ अधम् पूर्वरूप उदाहरन॥
पिय तरिख शशि वेरनी पिया होने तार
सरिवन ने होने सेत तांजरा
कौं देखि करि शशि
राग की तजिकै सेत
बाभूः यहाँ विना.समयं हाथ पकोडे वासौं अधम ना यह है और पीनस का राग का संग सौ तानरंग लियो फेरि हाय पकडिने भापको सेत रंगति- यो यातै पूर्वरुप है ॥३४॥ भय धीर ललि तद्धितीयपूर्वलक्षण॥दोहा॥ सुखी कलानि- घि नि फिकर धीर ललिव जिय जोयस व. लुं निहिं गुन रहै पूर्वरुप भिद दोय ॥३५२॥ टीका सुखी होय कलानिधि होय निः फिक रचोय सो जीव मैं धोर ललित देखौ जो वस्तुका 'मित्या से गुनरह जाय सो पूर्व रूप को दूसरोभे दहै।३५२ अथ धीर ललितं यूर्वे रूप उदाहरन ॥दोहा॥धीर कता निधि संखस- दन राम अनाप प्रकास शस्त भये रविक रहन छाय धरा आकास ॥३३॥ टीका धीर और फलान की निधि सुख का घर जो राम हैं उनका प्रताप को प्रकास है सो सूरज के शस्त भये मः एथ्वी भासमान मैं छायो रहै है यहाँ घोर लाल नायक है.और रवि अस्त नम हो वाको कारन तयों तो भी नमन सिट्यो याने दूसरो पूर्व स्य हे ग३३॥ अथ धोरोद्धत मतद्गुन लत दोहा॥धीरोद्धन गर्यो छली निजैगन वक्ता तेय गमतद्गुन सुसंगइभये गुन ताकें नाहतेया ससा दीको धीरोद्धत है गर्वी है छली है. नागुन को वीजानों संग भी भयो मला गुन) हो लयसो अतद्गुन सत्कार है।।३५४ालय घुवीरे विनयो जरि हर लरपन सौ अति विजयी वासू० धीरोहत अलहान उदाहरन ॥ दोहा रावी ल लावायलाही शिरजोर छतीन वरुन राग पर बाल मन तर अनुसरा नलीन ॥३१५॥ बीका हे लला गर्दी हो चढ़ास लाही छलीन का शिर मोर है। राम को घर जो बाल को मन है। वस है। नौ भी अनुराग नहीं लियो यहाँ गर्छ याने धीरोद्भत नायक है।और राग को घरज बाल को मन है नामें वसे है तो भी अनुराग हो लियो याने जतद्गुन अलंकार है॥३५५॥ यधीर शांतनु शुरण लक्षा। धीर शीतं शुचि शुति गुनी विनयी नायक गाय नुगुन सो संगति भये पूरव गुन अधिकाय! ३४६॥ टीका॥शुचि होय 'शुति होय गुनी य विनयी होय सो धीर शान नायक गावो संग वि भयें पै पूरब गुन अधिकावे सो अनुगुन है। ३८६॥ अथ धीर शांत अनु गुण दोहा॥धोर शांत शुचिनय सदनलाह संगतिर रंगा धीर ॥३४॥ दीका धीर धीरज वान शोब शुचि पविन नीति के घर लक्षमण है सो की संगति पा करि कै विनय वान भयो बैरीन की मारवा वालो भयो अत्यंत विजयी भयो र भयो यहाँ नायक धीर शान है शोर लक्ष्मण मैं रघु वीर की संगति से पहिला गुन अधिक भया याते. भान गुन अलंकार है ॥३॥ गाये मीलित लनुशागदोहा॥छमी गंभीर सन त रु विजयो धीरो दात मीलनमोलित मैं जहाँ दन ननक लखान ॥३५॥ टीका॥छमावान य गंभीर होय अच्छया बन सहित होय विज होय सो धीरोदात्त है।मीलित मैं जहाँ तनक द नही लगावै सो मोलिन अलंकार है।३५० अथ धीरोदात्त मीलित उदाहर।दोहा बजयी छमी गंभीर अनिः कोप्यो सेमर सकार। विन लखन कै लखि पस्यो चंदन लाल लिलार॥ टीकागविजयो विजयवान छुमी छमा मान अत्यंत गंभीर-ससर का वीचि मे कोप्योत. व लक्ष्मणं का लिलार मे लाल चंदन को तिलकन हो देखि पस्यो यहाँ नायक धीरों दात्त है।लिलार का रंग मै चंदन मिलि गयो यातै मौलित है। अथ दर्शन गदोहाग देख लिय रेपय हिन से हत दर्शन नाहि बिचारि नवन स्वप पुनिचित कहि साक्षात सुविधि चारि ॥३५॥ अथसा मान्य उन्मोलित लक्षदोहा॥सोसा- मान्य समान मैं नाहन विशेष खोयाजवमी लत भेद है उन्मोतिन नव गाय॥३५१॥ दीका अमान में विशेयन हो लखावे सो सामान्य है जब तित मै भेद होय नवजन्मीलित गावो ॥३५॥ अथ नवरण दर्शन सामान्य उदाहरन॥ काहा।सुनि पाल गुन वात के मुख तिलातो तिन मसात मुख वान को भिन्न नजान्यो जागना ही वाल को सेत रंग होता जानी नीति पिछानी जाति को चित्र देखता नारि है सो चित्र की नाई भई प्रथम निरिदंशोभतोग्विनी वाला ड्यि होना त॥३५२॥ टीका।गुपाल के गुन सुनि ल के मुख मैं अत्यंत लाली जावै है नब मसाल और वाल को मुख न्यारो नही जान्यौ जाय मसाल बालमै भेद नही यात सामान्य है ॥३ साथ वन दर्शन उन्मीलि उदाहरन॥ स्वप्न मेल ते मिलि रहै केसर लागी भाल ही जानी परे होत सेत रंग चाल ॥३५३॥ खशा का मेल सौभाल में लगी केसर हैसो है यहाँ मिली केसर जानि यरी याने उन्मीलिद है ॥३५३॥ अथ विशेषक गुढोत्तर दोहा॥है विशेष सामान्य मै वह विशेषर मानि उत्तर दीनें भाव बोत्तर पहिचानि । ३५६५ दोका।सामान्य मै विशेष होय शेषुक मानौं भाव में उत्तर दिया गूढोत्तर चानौ ॥३५॥ अयदि दर्शन वि उदाहरन॥दोहा लग्वत चित्र नंदलात आवत सास निहारि ॥३५॥टीकानंद उसासन की भावना देखि कै नीति पिछानी है यहाँ दो चिवन मे उसास ले वासों नौ गते विशेषक अलंकार है ॥३५॥ सातादर्शन गुदोत्तर उदाहरन दो वासू लाला लगातान तर वा अाज हमारी गाय । ३५६ ॥ टीकापहल पहल देखि कै सिलाखिनी है। सो.हिया में हर्षा कारकै बोती हे ताले लाज ह सारी गाय है सोवछड़ान को नहीं लगावे॥यही विाछरानाकी ने लगावो नाम लेकर भीतरगयोचा है हैं याने गूढोत्तर है ।। ३.५६॥ अथ सरची वः गान॥चौपाईजासौ प्रिया डरावन रखे.॥ना निय कसजनी सम भापै ॥ संडन सिक्षा नाके कोमा उपालभ परिहास लतामा ॥३५७॥साथ चि- वसूक्ष्म लमग दोहा॥ प्रश्नहि मैं उत्तर कदैसी चिवतिकार पर जाशय तरिख जहकि या करै सु. सूक्ष्म विचार ॥३५॥ दीका - शिश्न मै उत्तर कदै सो चित्रा लेकार है ।पैता कामा शय कौं देरिय के जहाँ किया करे सो सूक्ष्म अल कार विचारोथ संडनचित्र उदाहर- नदोहा।। जन देविडली दई नय महिए- यसुदार ॥ नरव सिख साजि सिंगार पुनि काकीना उपहार ।। ३५४ टीका।शंजन दे कार कै विद्ध ती दुई सुदार संदर नया पहरा कार के नखोले करि कै सिरबनाई सिंगार सााज के काई उपहारक खो हार यहाँ का उपहार कया हार उपहार कसो यह उत्तर निकस्योन्यातच जलकार है॥३५॥ भय सिक्षा सक्ष्म उदाहरन॥दोहा॥चीत अतिपियसौ.मिलेन हित कोरे अति रति हिनसा. धियों सुनि सजनी और निय चितईमूवीवाधि
व.भू.
३६०॥ दीका अलि पिय सौं मित चार
स्तै चलि हित की साधि करिकै अत्यंत रति
से सुनि कारकै सजनी की ओर तिय है।
छी बाँधि करि के कॉकी यहाँ मूंची वाँधि
जनायो कसल मुर्देगा जव मिलों गी याने
भरका ॥३६०॥ जय यिहित
लक्षण दोहा॥ पिहिन जानि पर वात
शय सहित जनोवा व्याजोक्ति सुपर हेतु
जहँ साकार खराव ॥३६॥ टीका। पैला
बात को आशय सहित जनावै सो पिहित
कार है। पैता को हेतु कह कार के जहाँ
कौं छिपावै सो व्याजोक्ति अलंकार है॥३
काय उपालंभ पिहित उदाहरन॥
प्यारी प्यारी सविन » मुकुरव भूलि
काहि अति हर्षाय हिय दीनों मुकुर दिखाय
टीका॥हे प्यारी प्यारी सरवीन सौ मुकुर
शो भूलि कहावे है।सै कद करि कै हिक
त्यन हर्षा कारकै काच दिखा दियो यहाँ
दरया के सुरन चिन्ह दिखाया याने पिहित
कार है ॥३६२॥ अथ परिहास
उदाहरनगदोहागपान खेवावन विन
च कन्यो प्रिया गहिसार ॥ शीन पवन
ई जाती सधर दरार॥३६३॥ टीका।
समय पान खवावना पिया ने सार गह
जयी गीतका पवन से हे भाती अथरन में
1
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व.भू. परि गई यहाँ सखी ने दनःच्छान देवि विना समय पान खवायो यह सखी को परिहास जानि नायिका नै सोन पवन की दरार पाह कर मोकार छिपायो या नि व्याजोक्ति अलंकार है ॥३६३॥दती वर्गान॥ दोहा॥निय पिय के संदेश बच केहे सु दूनी बाम बिरह निवेदन मिलव नहि दे दनी के काम शय उत्तम दूती गूनोक्ति लक्षागदो. उत्तम इती मन हर भाषि मधुर वर वात गगूटो तितु मिस मान के कहेनान से बात ५३६५॥ टीकारामधुर और सुन्दर बचन भाषि करिके म न को हरै सो उत्तम दूनों है । भोर के मिस से नौरस वान कहे सो गूढोक्ति अलंकार है ॥३६५॥ अथ उत्तम दूती गूढोक्ति उदाहरन ॥दोहागलोर राधे का मान गि कहि कीरति सै वाम गेस्वामि पनि आज निकुंज मे कार है कौतुक श्याम ॥३६॥ टोका राधिका को माना कै दिंग देखि कै वाम कोनि से कही हे खामिनि साज़ निकुंज मै- श्याम कौतुक, करेंगे. यहाँ मधुर वचन से उत्तम दनी है सोर रांधा की माना.से कहे है राधा कौंसुः नावे है याने गूढोक्तिमत्तंकार है॥३६६॥जय सध्यम दूनी विनोक्ति लक्षण॥दोहा॥ मध्यम दूनी परुष मद बोले बचना वनाय ॥श्लेय लियो अगदाय जव नहूँ विनोक्ति कहाय॥३६ सोका कठोर और कोमल वचन वनाकार फैोवो ले सो सध्यमादती है जब किप्या जेया श्लेषकों *
न्दा के वचन निकसे याने विरतोक्ति ॥३६०
कार किया युक्ति अलकति होय ॥३६ टीम
कठोर बचन कह वारि के इतना कर सो अधमा.
कार होय है ॥३६॥अथ मधला दूनी यहि
मानि रही अनखायगवेग चली कहि दूर्तिका म
की साप्त बढ़ाय॥३७॥टीका कामिन
पिय सौ रमी मानि के अनखा रही जलदी चली
मे कद कारकै दृतिका है सो सासवदा कैरिके.
को यहाँ सास बना के कड़को यात अधमा दनी
भार पीतम सौ मिनो सास बढावा किया
पीनर सो रमिवो किपायो याते युक्तिसलंकार
I..
प्रगावै नहाँ विलोक्ति कहावे है॥३॥साथ
ध्यम दूती दिसतोलि उदाहरन॥दोहा॥
गि उमगि बज दिनन से घेरि रहे सब टाम विध
म बात उनपान लै भब हटि है घन श्याम ॥३६
चीका गबन दिनन से उमगि कै सब नाम घेरि
भयंकर पवन और उतपात नै अब घनश्याम
गे यहाँ मोठा कलिन बचन से मध्यम दुनी है जो
घनश्याम साला बादल बिषम पवन सै हदैया
र्य में ज्लेक्ष दिप्यो रयो परंतु उत्पान शब्द से
श्याम को भर्य कृष्णा और बिषम वात को
॥
सय अधस ती युक्तिलक्षा॥
दूत ता परुष काहे साधेमा दूनी सोय ॥सर्म
है।क्रिया कार के मर्म कों छियावै सो युक्ति
उदाहरन॥दोहा॥अमित देखि पिये भी एक
प
बभू. ३३१॥ अथ विरहनिवेदन लोकोक्तिल- नगदोहा॥निये पिय वो ज.वियोग दुखमा मन हित मानि गकये लोक फहना वनी सो लोको "ति वखानि ॥३१॥ टीका।जो नियं पियंकावि रह को इख मन मै हित मानिकार कै भाये तोलकी) कहनावती कयै सो लोकोक्ति वरखानों ॥३१॥अथ प्रिय विरह निवेदन लोकोक्ति उदाहरन दोहानिरखत मग तेरी लती तो विनखिंत गुप लो चाल जलदी मिलि मनिचले लाज काल की चाल ॥३७२॥ टीकाहे लली तेरे मग देखें हैं तो बिना गोपाल दुखी हैं जलदी चलि कै मिलि भाज कालि की चाल मनि चत्ते यहाँ साज कातिलोको तो है ॥३२॥ भय कोक्ति वक्रोक्ति - सरा दोहा। और आर्य लोकोक्ति में करें होय छेकोतिगअर्थ फिरै ज्वर श्लेष सौं जानि लेगाव- कोति ॥३०३५ टीकागलोकोलि मै और अर्थक [ सो कोक्तिसलंकार है।वर से श्लेष सोअ- ये फिरे सो वोति जानि ल्यौ ॥३३॥ अयो या विरह निवेदन उदाहरन ॥दोहा॥भई विकलु भो नवरी बिरह वावरी वाल भितिजला ल लखोन-तुरा शुन्कलोयन की चाल॥३७॥दीका विकलं सई भत्धत दवरी शई वात हे सोचिरह से तावरी भई हेलाल जुम सोलापन मे भी नहीं देखी हो तो नाका नवन की ..सी चाल है यहां शुकलो चन की चाल यह तोदोलि और में यह कार्य,
a
॥
मनासकै सो पीति मई नायक है।जाति को भी
व लली. घर हाल पायन पारि मुरारि को हर्षित
टीका मुकुट मोर लाराड़ी
परको धारण कार के ललोकै घर नरत हीला कार के
पर कि कै.वालको हर्षिन करी
त्योरी मान मरोरि धरि लखि वैठी शिर नाय
ब.भू.
निकस्यो जैसे सुवो नेव वदल ले है तैसे तुम वदत
ल्यो हो यह छेकोक्ति है।३॥ अथ मिलाप
वज्ञोक्ति उदाहरन ॥दोहा॥ लाई आज
ज मति रति से लौनी वालाईहि रस वस हे रमि
'शा याहि भूलि हो साल ॥३०५॥ बोका। आज
'डी मति कीति से सुंदर वाल लाई हो ईका रस
वस होकरि के रावि मै रसि करि के हे लाल
भूलो गा अर्थात नहीं भूलोगा यह स्वर सौ सेय
फेयो याते वक्रोक्ति है ॥३७५॥ अथ सखा
पनि ॥दोहा॥ पीठ म वि चेतक र कर्म
व यहिचानि बिहार विदूषक पाँच बिधि ।
सरवा वरखानि ॥३७६॥ अथ पोट मखभा
वोक्ति तक्षण ॥दोहा॥ मानवतीहिस
पीठ मई निर्धारिगवर्गाने जाति स्वभाव को
वोक्ति लंकार ॥३७॥ टीका मानवती के
सूचभाव को वर्नन होय सो स्वभावोक्ति अलका
है॥३७॥ अथ योटि मई खभावोनि
दाहरन ।दोहा। मुकुद लकुट पट पोत
को वर्णन है याने जाति अलंकार है ॥३०॥
ति वनाय विनोद को लोनी वेग बुलाय ॥३०॥ कात्योरी और मौन मरोरि धारकै शिर नवा- इय वैची देसकै विनोद की वान बना करि कैज दो बुला लीनी यहाँ त्योरी मौन मरोरि परि वो सु- विहयाने स्वभावोक्ति अलंकार हैं॥३७॥अथ वर भाविक ललगादोहा॥विरसो काम थान मै चतुराई सरसानाभाविक भावी भूत कोज- वर्शन साक्षात ३०॥ टीकागकाम कथानमै तुराई सरसावे सो विद है भावी भूत को जहाँ साक्षा- वरीनहोय सो भाविक अलंकार है॥३०॥ साथ व भाविक उदाहरन पदोहा॥चलो लाल- पलच भरी ललना नुम्हे बुलात मलखौ लाडली सद मे रमा सदन छवि छाना३३॥ काम देला- ल चली लालच की भरी गई ललना तुमको चुनाव है देखौ लाडली का सदन मै रमा कासा सदन की छवि छाव है यहाँ रमा को सदन पहिले हो और सागर है गो सो राधिका काभवन मै वर्तमान काल मै बन्यो या भाचिक भालंकार ॥३१॥ अथचेटक नमें सचिव लक्षागदोहा॥चेवक चतुरराम लापमै जानि कार लिय चिनगन सचिव हरिको सरखा देशमिलाय नियमित्त ॥३२॥ अथ उदास लक्षण॥दोहा॥पर के श्लाध्य चारव को चिन्त जनावन हार गवर्नन संपनि चरिन को द्विविधियों त.उदार ॥३३॥ टोका।पैला या ग्लाध्य चरिन का चिन्ह को जनावा चालो संपति का चरित्र कोवर
भू.
जो सदिल है और कष्णा या संपति चरित्र कोर,
| अल्युक्ति हाय दोहावेष रूप
नादि की बदील कर जो हाराहारे राधा के सेन
राधिक का मेल से नामों विदबक कहैं हैं।
माल कूल उतारना सूरतादि
नन् अल्युलि सोबझंसकार की
निद होय हो उदात्त हे सो दो तरह को है हे उदार
२३ हर चेटक प्रथम उदात्त उदाहर
होना लाली चली बात जान है भूति गेत मेगमं
हमती सीनिसि दौख हरि रास नाम यह
सीताली कहां चली जाय गैल
लिलै सातै सहि अरती ति मैं चोस कार के
यह हरि सो शव जय है यहाँ रास स्थान कृष्णाम
ज्वाध्या चोदेव को बनन है याने प्रथम उदात्त है
३८६॥ नर्स सचिव द्वितिय उदात्त
नाहरनमा दाहालै गोरो रेस लैन सिस राधे में
समोर सानाया सब सदन या हरि लाख
लुभाय ॥ ३८॥ याला शोरस लेवा का मिस से
राधे में सुललास लेगो विष्णु का भवन
मान भवन सभा में वैशा देखि कै लक्षचा
सहाँ गोरक्षा लेना का विल भुलवा कारे ले गयो
नून है याने बूसरो उदात है।३८५॥ अथ
कहन विदूषक नासा टीका।बेष
प हान्नादिक को जो वदति करि हास्य
॥३॥ीका उदारता ।
कर
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को दो
भू. बनन होय सो बहुत प्रकार को अत्युक्ति है।३८॥ अथ बिक अत्युक्ति उदाहरन दो चङ्गे घातीगो निकुंज के वेनमे प्रति शेय लाय गेबै डों मंदि किंवार तुमे में कीद देश भुजाय पजच्॥ टीकागवन मै निकुंज के च्यारो और मै घरगी- लाय लंगी हैं नम कवार जुडि कारकै वैवी मैक टिकै बुझा छौ यहाँ सायको शति-शय वर्नन है याने अत्युक्ति है॥३॥अंथ दून बगी नपदोहा न निस्सष्टाय तु प्रथग दतियसि तार्य उदार सु संदेश हारक तलिय सावि गुलाब निर्धारण ३८॥ अथ निरहदार्थ निरुक्ति लक्ष गोहागजीनि चुन को भाव वरदे उत्तर शुले उति अन्य अर्थ है योग ३ बासन को सुनि रुति ॥३६॥ दीको बोनन को भेष्ट भाव जानि कै शुभ बचन से उत्तर दे जोर का जोग में लामने को और न हीय.सो निशि है।।३ जय निशार्थ निविउदाहरन । दोहो न भनि चाहत राम को ना तिचाहते'म । नम हर्षे ही होयगो साँचो रावन नाम ॥३.१०॥ टोकोगन राम कात्याचादेती हे तोंको ग. म भन्यत चाहते हैं तुम प्रसन्न हो वो गो साँचों रावन नाम होयंगो व्यहाँ जानकी का हल जोग से रावण को शेवगणों साँचो नाम भयो याने निरुक्ति हि ॥३५॥ यसिताय प्रतिरोध लचूरी दोहरामनाथ प्रमाण काजहि करे सो मिनाया खानि ॥३॥ टीकाकारन कारजसाथ होय सो एचलि सिद्ध करै जब सिद्ध कौ तब बिधि भूषण होवा रिहाय है ॥३९॥ अथ सदशहारक विधि उदाहरन दाहालालाहारकाविाय |कयो साज रास में मावोहे प्यारी लाज का तजै तब प्यारी होयगी यहाँ प्यारो सिद्धार्थ को फेरि प्रथम पिछानि। कारन कारज सकने हेतु द्वितीय व चानियलयन निषेध सिद्ध को अनिषेधसुज मानि ॥३२॥ टीकापसारा कह कार के का करै सो मिनार्य है प्रसिद्ध निषेध को कथन हो। सो प्रतिषेध हृदा मे शानों ॥३२॥ अय र्थ प्रतिषेध उदाहरन ॥दोहा जमें लरिव ललो नाचत दैदै नार मोहन नंद र नहि है सन्मय अवतार ॥३८॥ टीका। अती निकुंज में चाल कै देखि ताल देदेकार कै नाचेहे नसो नंदकुमार नहीं हैं कामदेवाअवनार है यह कोनिषेध कारकैकामदेवकोशवनार हरायो अलंकार है॥३८३माथसंदेश हारकविधि दोहा॥सुसंदेश हारक कहै कही बात है ३६५॥ टीकाकही बात की कहै सो संदेश है।जब सिद्ध को सिद्ध करै नब बिधि भारोस में शाजाप्यारी प्यारी होय गी जब नजि लाज ॥३६॥ टीका गलाल नै चाह करिन सिद्ध करी याने बिधि अलंकार हे ॥३५॥ लक्षण॥दोहा॥कारन कारजसंग हैं हेतु .
पहिलो भेद पिछानौं ॥कारन कारज एक होय सो दुसरो भेद वखानी ॥३६॥ दोनन के उदाहरनगदोहाग होन दूर दुख तुरत ही लेन श्याम को नाम गहैं गुला- व हारे जनन के कृष्णा कृपा सुख धाम ३७ टोला श्याम को नाम लेना ही तुरत दुख दूर होय है गुला- व कवि कहै है हरि-जनन कै कष्मा की कृपा है सोई सुख को घर है यहाँ श्याम को नाम तेना ही दुग्यद र होय है ईमैं कारन कारज संग हे याने प्रथम है- तु है और कृष्ण की कया है सोईसुख को घर है। कारन कारज एक है यति दूसरो हेतु है ॥३॥ छप्पयगरसवन यसरदोय तिय जर्ज खित जोनों गचय समा रहनस नाम पचम भावोदय ५ मानौं गभाव साधषट भाव शवलना शप्तम कहिये प्रत्यक्षरुभनुमान दर्शमउपमा निर्वाहयेगनिशन्दरुषर्यापनि पनि अनुपताव्यसंभव लहो।रातिय १५सहित सब पंच दश- किवि गुलाब भूषण गही ॥३॥ रसवत लक्षण दोहाइक रस रसको अंगहे कै स्थाई को होय॥ न्यभिचारी भाव को अंग सुरस वत जोयाटीका (एक रस दूसरा रस को मंग होय अथवा स्याई भावं का अथवा व्यभिचारी भावको अंग होय सोरसवन लंकार है॥३८॥ उक्षहरगदोहा॥जयति जरानि योगोंद्र मुनि भजे महा अन्य गदेखे ताके - तुक में कच्छप मत्त्य स्वरूप टोकागजोगी महा सनुप अंगस्त्य मुनि सर्वोत्कर्षण वतने जा को चुत में कच्छपःमत्स्य स्वरुपावतार देखे यहाँ IT तिभाव को अंग रसा भास है याने ऊर्जविन है ..- रु भरि तुव गुनगनत नितिप्रवल प्रतापी राम। सन के संगबन बन में रमती है यहाँ अभु विषय व भू० मुनि विषय करीत भाव को अंग अनन् रस है नैं रसवत है॥१०॥ प्रेय लक्षण॥दोहा॥ व होय अंग भाव को के रस को भगा चार॥ सु है व कह याहि कौं कवि भावालंकार।०२५ टीका॥ व को अंग भाव होय अथवा रस को अंग भाव होच सो अयोऽलंकार है याही को कवि हैसोभावालंकार में ॥१०१॥ उदाहरण॥दोहा॥कब वसि मोर धरि कोपीनहि चीरगहे हर शिव शंकर पन फिरि हैं। गंगा नीर ।। २०२॥ टीकागकोपीन भाव चीर धारण करि कै कासी में वीस के हेहराहे शंकर जैसे जपनो डवो तीर पै कब फिरौ गो॥ शांत रस को चिंता संचारी अंग है याने प्रेयस है ४०२॥ ऊर्जखित लक्षचंद्रायरान जह अंग भाव को होय वर अथवाभावा भास को अंग तर सो ऊर्ज स्वित होय भाव रस भावा भास कु रसा भास क्रम सहित लहि ॥ १०३॥ दोका जहाँ भाव को अंग रसाभाव होय भाव को अंगभावाभास होय सो ऊर्जस्विन होय है। अनुचिन भाव है सो भावा भास है। और चिन रस है सो रसा भास है ॥४३॥ दोहागबन वन भीलन संग रमननुव वैरिन की टोका। पवल प्रतापी राम तेरे बैरीन की स्त्री -- .
ब०५०
निरे और मेरे गुन सदा रानने हैं।इहाँ प्रभु विषयक
रति भावं को अंग भावा भास है।याने ऊर्जखिता.
लंकार है ॥५०॥ समाहित लक्षा॥दोहा॥
अंग होय रस को जहाँ भाव शांति के होय॥भागेशों
नि अंग-भाव को जानि समाहित सोय ॥४०॥टी.
जहाँ रस को अंग भाव शांति होय अथवा भाव को
अंग भाव शांति होय सो समाहित जानो ॥४०५॥3
दाहरून ॥ दोहा । पिय ठादे मे मान तरिय निय
इत रही विजोय । देखन हसि दीनों ललन निय नव
दोनों रोय॥०६॥टीका।मान देवि कार कै पिय
सो ताते है रहे इन कों तिय है सो विसेस देखि
रही। देखनै पियनै हँसि दियो नव तिय नैं रोय दि
यो इहाँ मंगार रस को अंग कोप शांति हैयात समा
हिन है।०६॥ भावोदय लक्षण॥दोहा॥
होय अंग रस को जहां भावोदय के होय गभावोदय
अंग भाव को है भावोदय सोय ॥४०॥ टीका॥
भाव को उदय होय सो भावोद्य जहाँ रस को अंग
सवोदय होयायवाभावकोशंगभावोदयहोयसोभावोदयसलंकार हे
उदाहरण दोहा।। सुनि गुन मोइन के रहै हिय
बलेसी अति वाम चहन विचारि बिचारि उर कब
मिलि है घनश्याम ॥४०॥टीका मोहन केग
। सुनि के बाम है सोहिया में कुलसी रहे है।उर
विचारि विचारिकै चाहनी है घन श्याम कंब
मिलै गेगइहाँ अंगार रस को अंग है पौत्सुक्यसं-
चारी को उदय है यात भावोदय है ॥४०॥
| संग्राम कोलाष बिलषी निज चाल मान वरन तन कति भाव को अंग रमणी ओम रमा उतलंटा की संधि बलता हाय अथवाभाव को अंग आवशवलता पजें तहाँ कविन ने भाव शवलता कही है॥४.१५ रहार किन में कित वह किन मिलन वनाय ॥१२ टीकाबंशीघर वनमालधर, इले कहाँ कहाँ वहा कहाँ मिलाप' भाव संधि लक्षा॥ चंद्रायणा ॥भाव जह अंग रसहि को के जहाँगभाव संघिदै अंग को दर तहाँ गभाव संधि है जुरै विरुद्ध जु भाव व संधि तिहिं नास समस्त वतावही ॥१०॥ जहाँ रस को अंगभाव संधि होय अथवाभाव ग भाव संधि होय तहाँसाद सीध अलंकार है। रुद्ध भाव जर निस को सम्पूर्ण कवि भाव संधि वनावे हैं॥१०॥ उदाहरन पदोहा॥चलन उठे विपुल पुलक नवकाल ॥१०॥ दीकामवीर ग्राम को चलने विलषी जई अपनी स्त्री देवी र अरुन वरनं तन में बहने रोम उठे। इहाँ प्रभु याने भाव संधि है ॥४१॥क्षाव शवलना चलायमाभाव शवतता होय अंग रस को मना के भावद्धि को अंग भाव की सवलता ॥भाव । य भाव जहँ बजनही उपजें नहाँ सुभाव शवलता कवि कही ॥२९॥ टीकापरस को भावभंगभाव य सोसार शवलना अलंकार है जहाँ बहुत उदाहरनगदोहा बंशीधर बन माल घर हरि - रहो उर लें -- हसिजनी त व्यौत बनाय हाँ वंशीधर वनगान घर चाच- वो स्मरण कहाँ मैं कहाँ वह यह वितर्क मकहाँ मिलन यह दीनना ॥ व्यौंन वंना यह उत्कंठा यह भाव शवला को है सो विष संभ भंगार रस को अंग है चार्ने सावधान तना अलंकार है॥४२॥ अथ अमागालंकारलि ख्यतेग प्रत्यक्ष लक्षुगागदोहाइदिय अरु मन ये जहाँ विषय आननों पाय॥ज्ञान पोरें मन्यता लि. हिं कह गुलाव कवि राय ॥५३॥ टीकागजहाँ इंद्रियों और मन ये हैं सो अपनों विषय पाकरि कै ज्ञान करें नि सकौं गुलाब कहे है कविराज है सो प्रत्यक्ष अलंकार १९३॥ उदाहरनगदोहा लषन तुनह जिहि को रनैं होत जेज्ञ धनु धारिणमन मानत है देखि यह वह जनक कुमारि ॥५॥ टीकारामचंद्र की जीत लक्ष्मरा सुनौं गजाकै वास्तै धनुय उठायवे कोजज्ञहो न है मेरा मन माने है देखि यह वही जनक कुमारी है इहाँ मन नेवन से प्रत्यक्ष है या प्रत्यक्षालेकार है। ४२५५ अनुमान लक्षदोहा॥कारण के जाने जहाँ कारज जान्यौ जाय अनुमान जतात सुकाव गुलाब के भाय ॥२५॥ उदाहरन दोल्लांगचट- काली दधि मयन-ध्वनि चरायुधध्वनि पाय जानि सबरी चैन निय रहि पिय हिय तपदाय ॥१६॥ टीका चिरीन की ध्वनि दधि मयन ध्यान सूर्गाको ध्वनि सुनि के गतिको अंत.जानि कैनिय है मोपिय कोहिया, लपथय रही गइहाँ चरकाली धिमथ नमुर्गा की ध्वनि कारन जान ते निशांत काज जान्यों विशाल सागर सम गंभीर है सो दशरथ को लाल। जहाँ शास्त्र अरु लोक को बचन प्रमाण वखानि शब्दालंकार है आषत सुकवि सुजान पर हि सुख लहे गुरु विन लह न ज्ञानज्ञान बिना ति मतकृति सुभाष सुकवि सद्रापास२१॥ कभू० अनुमान है ॥१६॥ उपमान लक्षण हा। उपमा की सादृश्य नैं विन देख्यौ उपमेय परै उपमान सो अलंकार है ज्ञेय॥१२॥ टोका... पमान की सादृश्य से बिना देरव्यो उपमेय जानि जानिवेजोग्य उपमान झालंकार है ॥११॥ ग॥दोहा॥मन्मय सम सुन्दर लसे रबि सम ११८॥टीकागकामदेव की समान सुंदर तसे है र्य समान विशाल तेज है समुन्द्र समान गंभीर है म चंद्र है इहाँ कामादि उपमानन से रामचंद्र जाने यातै उपसान है॥१८॥ शब्द लक्षण। जहाँ शास्त्र और लोक का बचन का प्रसारण को न होय सो शब्दालंकार है सुकवि सुजान हैं सो ते हैं ॥५१॥ उदाहरण दोहागधर्म विना मुक्ति है पांच पांच मेरे अंजान २०॥ टीका। धर्म बिना सुरव नहि मिले गुरु बिना ज्ञान नहि ज्ञान बिना मुक्ति नहि होया सजान है सो पांच के मरे है।इहाँ शशस्त्र प्रमान है।यानै शब्दा है १९२०॥ अथ अर्थापत्ति लक्षण। जहाँ व्यर्थ भे अर्थ को और जोग से याय॥ जहाँ व्यर्थ भये मार्य को और जोग में यापै सो व.भ. पति अलंकार गर्व सहित सुकाव भापते हैं ॥३२॥ उदाहरण॥दोहा॥निय नेरे कोट है यहै तेकी नौ निधार॥जोन होय नो को धरै विपुल पयोधर- भार॥९२१॥ टीका गहे निय तेरे कोट है यह मैंने निम्नय किया है जो नहि होय तो भारी कुच भार की कौन धार है. इहाँ नहि. यह व्यर्थार्य कुच धारण योग कार ठहरायो याने अर्यापत्ति है ॥९२१॥का य अनुप लब्धि संभव लक्ष॥ दोहा॥ जानि पर नहि वस्तु कछु अनुप ब्धि है सोय ॥ जह संभव है वस्तु को संभव नाम सु होय ॥२२॥ टीकागजहाँ कछु वस्तु नहि जानि परे सो अनुप- लब्धि जलंकार है जहाँ वस्त को संभव होय सो संभ व नामक मतकार होय है॥४३॥ अथ अनुप लाव्य उदाहरन दोहागनाह नेरे कटि सब कहन कच थिनि बिन भाधार गइन्द्रजाल यह काम को लोक कर त निधार गर२साटोकोगनेरै काट नहि है। सब कहते हैं कुचन को स्थिति बिना आधार है।यह का मुदेव को इंद्रजाल है रासे लोक निश्चय करते हैं इ- कोट को अभाव है। यानै अनुप लव्धि है ॥९२५ अयं संभव कोउदाहरण दोहा। सुनीनदे रखी नव सदृश में स्पभानु कुमारिया जानन है। कई होयगी बिपुला धनि विचारिस२५॥ टीका । एषभानु कुमारिनो समान देखी है. नासुनी है परंतु एटवी वड़ी विचार कै जान्यौ हौं कोई हो यगी वहाँ को संभव है यानै संसावालंकारहे
।
सूषण शब्दरु अर्थ के आपस में मिलिजाहिसंसः
ष्टिरु शंकर तहाँ ये जुग नाम कहाहि ॥राटी
छाति को रहे नहि दूसर का चाह॥बाँध कह इका
न को नहि किङ्कराह ।।१२८॥जुदे जुदे भासे
है संसृष्टिनाम॥४३॥दीकापरक अलंकार
को दूसरे मर्लकार की चाहनही रहे और एक बात
कार दूसरे अलंकार को बाधक भी किसी राह से नहीं
होय ।।१३८॥ निल तंडल की रीति करि के सब अपर्ने
१२५॥ शतिर लक्षण ॥दोहा॥
हा प्राचीन की उदान आईजु कहानि ॥ताको
यस को नहि न परे पहिचानि ॥२६॥ सौकागजो
प्राचीन कहानी चती आई होय नाको प्रथम
ही पनि चाया परै सो रोतिहह्य अलंकार है॥१२
उहाहर होता हे सीता उर धीर धार
दि भने पचालजीवन सो नर सुख लहै यह
को बान ६२७॥ टीका विजदा की उक्ति हे
का हृदय मैं धीरज धरिरामन मैं अपघान मनि धरै।
झादसी जीवे सो सुख पावे।यह लोक की बात है
हाँ जीवन सो नर सुख लहै यह लोक कहानी है।
याने रोनित्य है ॥२७॥ इति
॥ अथ संसृष्टि शंकर लिख्यते।
जहाँ शब्द और अर्थ के अलंकार आपस में मिति
हिं तहाँ संस्ष्टि और शंकर ये दो नाम कहाँव है।
१२॥अथ संस्टष्टि लक्षण दोहागरका
सकल अपनी अपनी वाम गनिल नंडल की शान का
इति प्रमागा
लंका
ae
भाव शंकर है गुलाब कवि के मत मैं दरवो ॥१३॥ अपनी चोर पर जुदे जुदे भासें सो संस्ीष्ट नाम है ५३३० अयसंस्ष्टि भेद ॥दोहागार्य आर्य के भूषण रु शन्द शब्द के होय॥भर्थ अर्थ के होय या वयसे- सोष्ट विजोय ॥१॥दीकार्य आर्य के अतंका रहोय जोर शन्द शब्द के अतंकार हौंय भोर मर्य शब्द के अतंकार होंय से तीन संस्टष्टि देवौ ॥४३१॥ अयशंकरलक्षण॥दोहा॥पय पानी कीरीति कारनीय परस्पर तीनताको संकर नामाहीभाषत पर प्रवीन ३२॥ टीकाद्ध जल की रीनि कारकै असं- कार परस्पर चीन होय नाकों परत चीन है सो संकरना म भापते हैं ॥४३॥ अथ शंकर दादोहा॥ हे अंगागीभावारु सम जोधान्यरवस्वानि संदेह रुकवाचकानुप्रवेरचव मानि ॥३३॥ टीका। गागीभाव शंकर है और सम प्राधान्य शंकर चरखानो संदेह शंकर३ भोर एक वाचकानु प्रवेश शंकर जानों ये चोरिभेद ॥३३॥ अथ अंगागी सावल क्षणपदोहागवीज वृक्ष के न्याय कार इक इक को भग होयामी गागो भाव है कांव गुलाब गति- जोय॥३८॥ टीकागवीज क्ष के न्याय चार कैर कलंकार दुसरे अलंकार को अंग होय सोशंगागी अयुसम् प्राधान्य शंकरलक्षणदो दिनदिन पति के न्याय कार सँग प्रगदै सँग भासे मना) मसम प्राधान्य ही कवि गुलावकह तास ५३५॥ टीकागदिनम् न्याय करि जालंकारे साथहो गदै नाको एक वाचकानु प्रवेश संकर कहो॥४३॥ दाहा॥शशि सोउजाल तुखलसे संजन हैं मनु नैन अधरे नासिका विवशुक मधुर सुधा से वैन ॥४३॥ का।शशिसो उजलो सुख लसे हैं। न है सो मानों जन हैं।जधर और नासिका है सो किंवरी और शुक, का। सुंदर कर की चरी करकिगई है धारे साथ ही आसे गुलाब काब है सोताको नाम समज धान्य कहें है ॥ ९३५॥ अथ संदेह शंकर. माचं हाया प्रथम सिदा दिनिय । सास होगदितिय मिटायें प्रथम विशेष प्रकास ही शन इले को एक निदिन न्याय कारगतिहि शंकर देह कहन कवि मोदधारे ॥३६॥ टीका। लंकार लिटाये से दूसरी अलंकार भोसे दूसरे अलंकार सिटायें से पहिलोशलंकार भासे राति दिन न्याय कको एक बाधै नही नालों संदेह शंकर कहत हैं।कवि मोदधरि लै ५३६॥ अथ एक वाचकानपवे. शू शंकर लाया होहान्याय नृसिंहा कार कार पद रुवाय इक माहिगजुग सूबा इक बाचा प्रवेश कहि नाहिय४३॥ टीकानृसिंहाकार य कार एक पद और एक वाक्य मे दोय अलंकार मर्थ की प्रथम संष्टि कोउदाहरन सुधा से मीठे वचन हैंयहाँ उयमा उत्प्रेक्षा यया लिंकार कार संस्ष्टि है।५३॥ द्वितिय को उदाहरनगदोहा॥कर को करको वर घला देहाकत मुकरेन परषी परत सुरख सौं सनी M R सि॥४॥ ब०भ रिक धूसरी देह है। क्यों नटे है। पिछानी परै हेगसुख सौं स्नेह मैं सनी है।इहायम कछेकान पास शब्दालंकारना को समष्टि है गाटतीय संसृष्टिको उदा- हरून गदोहा॥ग से हग है याहि के मुरब सौ मुखही मोहिंगकर से कर कुच से कुचहि उपमा उपजे काहिरासत दीकोगयाके हग से याके ही इंग हैं।मुख सो मुख ही है। कर से कर ही हैं।कुच से कुच ही हैं।उपमा कौन कौंउप जमयहाँ छकान मास अनन्वय शब्दार्यालंकार कीसंस इति संरष्टिः। अथ अंगागी भाव शंकर उदाहरन दोहागहलन पवन नैं नरुन तर दोखन छोह अचूक "शशि हारनै तम गजह नि मानह तिनके इक र टीकापवन से हालते सदन के नीचे जो अचूक छाया दोरचती है सो मानौ शार सिंह ने नम रुप हायी मारे हैं तिनके ड्क हैं।यहाँश शि हरि तम गज रुपक है सौ उत्प्रेक्षा को अंग है याने गंगागीभाव शंकर है ॥६॥ अथ सस प्राधान्य शंकर उदाहरणागदोहा गतीचन तंग पयोधर सुरविरगोलि चार"मध्य अरुण नायक मनुजन भाभी मरकन हार॥५२॥ टीका गऊँचे मेघन कोउ- लाडनी जई.सूर्य का घोडान को पति है सो हमारे र क्षा करो सो मानों मध्य में है लात मारग नाके सोसा काश लक्ष्मी को पचा को हार है। इहाँ लेप उत्प्रेक्षा समासोक्ति सायही प्रगटते हैं साथ ही भासते हेंया- ते सम प्राधान्य शंकर है।नम श्री में नायिका व्यव- हारको भारोप है।सोसमा सोक्तिहे। नायस नाना
प्रस्तुत हैं याने प्रस्तुनांकर है निचयन भयो याने
..
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यो और हार की मांग को है।नायको नेतार
सध्यम राबव प्रीति विश्वाः॥२२॥अथ
कर उदाहरणागदोहा अमृत सिंधु
रन विधि अनुसासन जोये का शशि
राधा सुरव सम होय ॥५३॥ टीकाकाम
सो ब्रह्मा की आज्ञा देखि के अमन के समुद्र को
के कलेक रहित चंद्रमा को का तो राधा के मुख
न होय॥यहाँ जो यों होय तो यों होय असा
संभावना अलंकार है और जैसो चंद्रमा होयन
का सुरख की बरावरि होय यह मिथ्या वर्णन है
नै शिथ्याध्यवसिनि है ॥१३॥ पुनः॥
सर्प महा विष उगलतो बसन मूल के मोहि॥
जुत सुनरु नै कहा प्रयोजन साहिए।
बहुन जहर की उगलती हुयो सर्प मूल मैं बसे है
ष्ट फल सहित सुंदर वृक्ष सौं कॉई प्रयोजन है "
भरनुत् रूप उत्तांत वनि से अप्रस्तुत राजा
वे वारे खालको उत्तांत वी भनीत होय है याने
कि है। अथवा प्रस्तुत खल वत्तांत
स्ले अप्रस्तुत सर्प इत्तांत कथन है यान
शंसा है। अथवा वरार्य सान सर्प के सत्तांत
पासरहवेचारे खल को वृत्तांत प्रगट होय है ये
दह शंकर है॥ १५॥ अथ एक
शंकर॥दोहा॥हेदार दीन दयान
नाय तुव पद पंकस मासरै मन
सिर
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मन में आर्यालंकारन कोवी होय है।जहाँशब्दार्यालंकार ज॥ २० ६५ टीकागहे हरि दीन दयाल मैं यह शिर नवायकारी मा. अन्तिारे चरणकमनले सासरे मेरो गनभूमर लगिजायगइहाँ पद पै निर मधुकर मैं रूपकटेशानुपास है यानै एक वाचकान पवेश संक काइके मन में गदायीतकारको ही सक वाचकानु प्रवेश होय है सोय तहाँ संष्टि है रजहारक पद से दोन होब नहाँएक नु प्रवेश शंकर है ॥१४॥दोहा॥चंद्रकला टीका करीलोती- सहायगगोती शंकर नै लिस्योसोधिगंथसुख दाय ॥१६॥ इनि बनिताभूषण सम्पूर्णम् शुभम् ॥ मलामाकाक्षाशुद्धपत्र लिख्यते ए.प.अशुद्ध शुद्ध नहा नही संग शान्वय २६/६/वाढतरुण्या गाइनरुण्या नायफा की नायकाको १२/२१ साटेतु संदेह व उर.. १२/२३ कामांधा कालोधा २०/भवगर्य अवार्य क्लिक २६/पतिको पति को हिसावे उपाय जोगन दिवर २५ १२८ निहिपति जिहि पनि नध्या यौवना १७७ नानक १०/१५ शासयसु भारपदन रमालखावे १७ २२.अपरनै २०अनन्यय २९साची सितंक न्यनतम न्यूनतद्रूप जागर सरेवों को देवर मध्यं यावना जराय लालसा ११० ...रानि में २२ कास: २६/२३ लौ- पीर को २० । यस २७ २२ रति मैं २० न्हवाकों २७ २८ मसात कील-मसालकी -२३२२ नायिका कों कासैसोसध्या २५/१८ दुराय धीराधीराना-२६/२७. सावति यिका है १७ कोष कोण २७ र ३ अशिदा असिहास्यादा २७ /१ शनिक १६ ११ चंत चेल २०/२० लायकी २८ २२ तिय से है सोनिय हे सो २८२३ इष्टजन र २३ धाराहै धारे १२.२४ मसले २० १ रनल ३. यो है रिया २० १६ इससे इक २०२५ शीत प्रीति ३०/२६ रिसन २१ १ सापान्हव सापन्हब ३५/२० धर्म की २२ २३ शयोयुक्ति शयति ३८ गये ३४ सेनता । २२/५कटक लगे कंटकलगे ३६२३ सोस २२.२० गुमायो ३५१६ ससा शोह २०२२ सावधानि काशवधाम- ३५ २३ कला य ३६ ५ लांचित २२/२६ साख्त ५ पंचा २६ २० परिकुगंबर ਟ ਨੂੰ ३८३ उपमा जैसे कान्ह ३६ १६ हेय साद 3 काय कार्य सारुप निबंधना सारुप्यनिबंध/५३२३ रंगे मीना का ना सोता का मुख न बात सो Kundl-rAMR.. से ५६१८ समाव साटिक सादिक में वाय नायक. नायिका ५२) द्वितीयलक्षण चिनीयसमल निबंधन निबंधना क्षण वरपापरस बरपायरस लाखकोत लाख कोला/५५/२२ सया क्या मैं या ५५/२५सनलनी सबसती- सातिनै सातिभे ५६/५/नीचो नीची त समात कंसादिक ७/१५/भायो मायो नि ५८/१९ बन्ना वनिता चिनादि । विनादि २६/२२ रनौजिसको जिसकों सुवाय सुरंग चितवै चितवै न ७वतावत बनावने उत्ता परसंग गराई अंगराई ६६. ७ भवते भूषते २ वरतुने दिनु नै ३३/२२ केराब्दी करा मुंदरी ६२२१ करिही कारही यान. ६६/३हिती जभाय हंसी भाय पूछी शिनिहेर्नु है भनि हेतु सामरन साभरन सीजसेवः सजिसेज सुरज्य उसाहि : उमाहि १/२ ऊत्तसाप जरासाय कल्सन की कलागी ७२/२५ जगतन जगजन 03/संभवना संभावना ०३/२९ / इत्तात. हनांन ता घरघर याम. प्रमुख ११० . पा २६/२३/लो २१ २२ २... रानि मैं २०२० न्ह २०. लकी- मसाल की -२३२९/नायिका के कासेसोसध्या २५ दुराय धीराधीराना-२६/२७ भावात यिका है १८९६ कोष कोप ३ अशिक्षा असिद्धासादा गानिक ६२१/चंत चेल २७/२०दायकी २६२२ तिय सौ है सोनिय हे सो २८२३ इष्टजन २३ धारा धीरा है धारो २४ मसले २०११ रुदान बूलन पीर रंगयो है रिया २०/९६ इससे २०/२५/शीत प्रीति १६ भरि सन २९/९ सापान्हव सापन्हब ३१/१०/धर्म की २२/२३ शयोयुक्ति शायक्ति ३४ गये २२/२६ कान ३४ीसंग सेनता २२/५ कटक लगे कंटकलगे ३८२३ सोम सिय २२/२२ जोय २२.२२ आविधानिरभशंषधाम-३५/२३ कला निशय ३६५ बांचित २२/२६ मुर्छित २२/५ रंग २३/५ोट २२/२० गुप्तायो गोपाल । r य कीट
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