Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Vegyanik Jeevani
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वैज्ञानिक जीवनी (नोयुत्त पञ्चानन नियोगो, एम० ए, एफ० सि० एस०, की वैज्ञानिक जीवनो नामक बहला पुस्तकका दिन्दो-अनुवाद) अनुवादक- रीवानिवासी, रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय १ - प्रकाशक- श्रीमध्यभारत-हिन्दी-साहित्य-समिति 11
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Alinhahna
PROTRD AT THE BELVEPCRI PRINTING WORKS
BY I HALI.
निवेदन
प्रस्तुत पुस्तक राजशाही कालेजके अध्यापक श्रीयुत
पञ्चानन नियोगी, एम० ए०, एफ० सी० एस० की वैज्ञानिक
जोवनी नामक वनला पुस्तक का हिन्दी अनुवाद है। इसमें
सुश्रुत, नागार्जन, आर्यभट्ट आदि,प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों
के और गेलिलियो, निउटन आदि यूरोपीय वैज्ञानिकों के
जीवनवृत्तान्त और आविष्कारोंका सक्षिप्त परिचय देनेकी
चेष्ठा की गई है।
में श्रीमन्त होलकर सरकारको कृतश हृदयसे धन्यवाद
देता है, जिनकी उदार सहायता से यह पुस्तक हिन्दी ससार
के समक्ष प्रस्तुत हो सकी है।
श्रीमान् नियोगी महोदयने प्रसन्नता एव उदारता पूर्वक
अपनी उपर्युक्त पुस्तकका हिन्दी-अनुवाद करनेकी अनुमति
देने की कृपा की है। एतदर्थ मैं नियोगी महोदय को हृदयसे
धन्यवाद देता हूँ।
मेरे अथवा प्रेसके कम्पोजीटरों की अनवधानतासे
पुस्तक में बहुत सी अशुद्धियाँ रह गई हैं। आशा हे पाठक
इसके लिए क्षमा करेंगे।
विनीत
शिवरात्रि १९७०
रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय
सतना
वैज्ञानिक-जीवनी। [प्रथम परिच्छेद ।
ही मूख गया । प्राय दो हजार वर्ष के बाद जब हिन्दु-सतानने
फिर मुर्दे को चीरने के लिए औजार उठाया था तव सरकारी
विजयदुर्ग से, महानन्दकी सूचनामे, नोपन्छोडी गई थी और
इसके लिए वह भाग्यवान युवकस्वप्नभ्रष्ट देवता समझा जाकर
पूजित हुआ था। कह नहीं सकता, हिन्दुओंकी स्वाधीन चिन्ता
का यह ज्वलन्त उदाहरण अपनी पासेसे देखकर महर्षि
सुश्रुनका हृदय नाम और अपमानसे फट जाता या नहीं।
शारीरविद्याकी उत्पत्ति ।
जिस उन्नत शागरविद्या और शस्त्रविचिकित्माका परिचय
सुश्रुत-सहितामें मिलता है उसकी उत्पति वैदिकसाहित्यसे
हुई है। जैसे अथर्ववेद शरीरचिकित्साका आदिग्रन्थ
है उसी प्रकार सामवेद शस्त्रचिकित्साका उत्पादक है।
वैदिक कालमे विविध पशु-याग-यशोमें मारे गये पशुओ
के अग प्रत्यग भिन्न भिन्न देवताओंको अर्पित किये
जाते थे । “नित पशुओका अङ्ग-प्रत्यग शास नामकी लुरी
द्वारा पृथक् मिये जाते थे। जो व्यक्ति इस कामको मरता था
उसका नाम शमिता होता या। यज्ञभूमिसे लगे हुए जिस
स्थानपर यह कर्म होता या उसका नाम शामित्र होता था।
उस जगह ही आग जलाकर पशुओंके अङ्ग-प्रत्यङ्ग पकाये
जाते थे। जिस अग्निसे पाक-कार्य होता था उसका नाम
शामित्रअग्नि होता था। * इस प्रकार पशुओंके भिन्न भिन्न
अगाके मानसे पिछले जमानेमे शारीरविद्याकी उत्पत्ति
* वाभापाझी माहित्य परिपद-पत्रिका, भाग १७, सख्या
४, में प्रकाशित और “सोयुक्तरामेन्द्रमुन्दर त्रिवेदी लिखित
।
मुश्रुत ] वैज्ञानिक-जीवनी। हो सकी थी। चेदके ब्राह्मणग्रन्थ और श्रोतसूत्रके रचनाकाल में इन सर यज्ञोंका प्रचार बढ जानेसे अङ्ग-प्रत्यगाका विभाग मुमसे सन्म हो चला था । वेदोक्त पशुओके अङ्ग-प्रत्यङ्ग के मानसे आयुर्वदीय अङ्ग-विनिश्चय विद्याकी उत्पत्ति हुई है, और वेदके अनेक पारिभाषिक शन्द श्रायुर्वेदमें आ गये है। सुश्रुतका आविर्भाव-काल । सुश्रुत स्वर्गवद्य धन्वन्तरिके अवतार काशिराज दिवोदास के बारह शिष्योमे अन्यतम थे। सुश्रुत, उपधनव, चैतरण, श्रोरन्ड, पौफलावत, करवीर्य, गोपुररक्षित, निमि, काकायन, गार्ग्य और गालव-ये काशिराजके बारह शिष्य थे। इनमेंस कई पक अपने अपने नामसे भिन्न भिन्न शल्यतन्त्र लिस गये थे। वे श्रर लुप्त हो गये है । केवल सुश्रुत सहिता ही प्रचलित हे। किन्तु एक वक ये सर शल्यतन्त्र प्रचलित थे। इसके प्रमाण मौजूद है । टीकाकार शिवदासने चकटतसग्रहकी टीकाम गोपुर रक्षित पार बंतरण के लिख शल्यतन्त्रोंसे पाठोद्धार किया है। सुश्रुनके टीकाकार चक्रपाणिने सुश्रुत-सहिताकी टीका पोकलाचनतन्त्रसे पाठ उद्धृत किया है । चक्रपाणि ग्यारहवी सदोके श्रायुपदकार है। शिनदास इनके भी याद हुए हैं। इसने सिद्ध होता है कि बारहवीं और नेग्बी सटीमें भी ये सत्र नन्न प्रचलित थे। नुश्रुतका आविर्भाव-काल ठीक निर्णीत नही हुआ है। "मुनतन प्रोक सोचनम्" इस बार्निक सूत्रके अनुसार इसवी सन पूर्वको चौथी सीके पहले मुश्रुतका होना माना जाता है। नवाविष्कृत याउपरको पाण्डुलिपि पढने से जाना 1 । ।
वधानिक-जीवनी। [प्रथम परिच्छेद । । जाता है कि चौथी सदीमे सुश्रतको गणना अति प्राचीन अयुर्वेदकारोमं की जाती थी। दूसरी सदी वोद्ध नागार्जुनने प्राचीन सुतसहिताको सस्त किया था। अाजकल वहीं सुश्रुत सहिता विद्यमान है। टीकाकार डल्लनाचार्यके मतानुसार नागार्जुन सुश्रुतके उत्तरतन्त्रके रचयिता हे । सुश्रनके पीछे कई शताब्दियातक शल्यविद्या सजीव थी । वाग्भट (नीसरी सटी) के समयमें शल्यविद्या विद्यमान थी, यह उनका अष्टाङ्ग पढने- से अच्छी तरहसे गम हो सकता है। किन्तु वाग्भटके वादसे क्रमश अगविनिश्चयविद्या ओर शल्यविद्याकी अवनति होती गई । इसके मुख्यत दो कारण मालूम होते हैं-- पहला-पोद्धधर्मफे विस्तारके साथभारनम स्वाधीन चिन्त की उन्नति बहुत अधिक होनेपर मी "अहिसा परमोधर्म । यह नैतिक चावा मुर्दा चीरनेका विरोधी हो पडा था। इसी कारण शरीरचिकित्सा विशेषत तान्त्रिक चिकित्सा-पद्धतिकी यहुन उन्नति होनेपर भी बौद्धयुगमें शस्त्रचिकित्साका बहुत अनादर हो चला था। दूसरा-पहले ब्राह्मण ही अन्य अन्य विद्यायोंकी तरह चिकित्साशास्त्र पढते पढाते थे । मुर्दैको छूना मनुके अनु- शासनसे श्रारभ होकर एक बडे पाप-कार्यमें परिणत होता श्रा रहा था । उसके लिए प्रायश्चित्तकी व्यवस्था भी देगी जाती है । मुर्दे को न छूने और न चीरने-फाडनेसे अग- विनिश्चय-विद्या और शस्त्रचिकित्मा कभी सजीव नहीं रह सकती। इसी कारण 'शुचि' शासनका यह परिणाम हुश्रा कि क्रमश भारनमें उन्नत शस्त्रचिकित्सा विद्या निम्न श्रेणीके अनभिज्ञ व्यक्तियोंकी निजम्य सम्पति हो गई। वर्तमान समयमें ५ वैमानिक-जीवनी। सुश्रुत ।] म्वदेशीय शस्त्रचिकित्साको अवनति देखकर महात्मा एल- फिस्टनने सच ही लिखा है- ble-tling has been left to the budet, bont-atttmg to the herdsinan and that uppluc ation of holisties to every min सुश्रुतेोक्त शारीरविक्षा। सुश्रुनोक्त अगविनिश्चयविद्याका एक छोटेसे प्रवन्धमें सम्यक् परिचय देना असभव है । सुश्रुतका शारीरस्थान पढनेसे जान पडता है कि विभिन्न अङ्ग-प्रत्यगोंके सूक्ष्म विवरण देना अपनी प्राखा देखे बिना सभव न था। सुश्रुतने शरीग्में सात न्वचा (shin, epidermis ), सात कला (celluu tissues and fal12 of the bolly) सात आशय (12 guns of exceptacle ) sira (intestines), at gr, सोलह कडरा (गज्जुबत् शिरा) बारह जाल (membraves), छ कृर्च, चार रन्जु (enrlons) सात सेवनी (Futures), तीन मो हड्डिया (bones), दो सौ दस हड़ियो के जोड (bone Joints), नो सो स्नायु (nurser) पाच सौ पेशी (muscles), सात सो शिग और एक सो सात मर्मस्थान (vital parts) बताये ह पोर इनका सूक्ष्म विवरण दिया है । उन्होंने इन सरका केवल विवरण ही नहीं दिया है, वे इस बातका निर्णय भी कर गये है कि शरीरके किस स्थानमें कितने सायु, अन्थि, शिरा प्रभृति है। दृष्टान्तके तौरपर यहा तीन सौ हलियों का विवरण दिया जाता है- प्रत्येक पार को श्रगुलियो जधाम में तीन नीन १५ जानुमें २ पॉर में 20 उरुमें - १ ।
६ वैज्ञानिक जीवनी। [प्रथम परिच्छेद । इसी प्रकार दुसरे पॉवमें ३०: गर्दनमें दोनो हाथों में नीम नीम १० कटम ह कटिदेशम । टोना हनुश्राम मलढारमें दानॉम ३२ योनिदेशम । 'नासिकाम दो नितम्बाम तालुमें पीटमें ३० कान, गएड ओर शखदेश- दोनो पाश्वों में ३०-३६ ७२ | में दो दो छातीमें वृत्ताकार अक्षक नामक सव मस्तकम ३०० सन् १६२८ में विलियम हाने शरीर में रक्तकी गति- का आविष्कार किया था। किन्तु हार्वके बहुत शताब्दी पहले सुश्रुतने रक्तकी गतिका जो प्राविष्कार किया था वह युरोप- के वशानिकोके कानो नक न पहुचा । रक्तकी गतिके सम्बन्ध मुश्रुत लिख गये है-"३७५ रक्तवाहिनी शिराओं द्वारा रक्त समग्र शरीरमें दौडता है । ये सब शिराय यकृत् और सीहामे निकलकर सारे शरीरमें फैली है। प्रकृतिस्थ अवस्थामें जव रक्त अपनी शिराओंमें दौडता है नव धातुश्रामें पूर्णता, वर्णमें उज्ज्व- लता, स्पर्शज्ञानमें तीक्ष्णता और अन्य नाना प्रकारके गुण उत्पन्न होते है । किन्तु वही रक्त जब दृषित हो जाता है तो नाना प्रकारको रक्तजन्य पीडा पैदा होती है।" रक्तकी गनि की वैज्ञानिक व्याख्या करनेमे हार्यको गौरव प्राप्त हुश्रा हे, किन्तु राकी गतिका आविष्कार पहले पहल मारतमें हुआ था और भारतवासी इस बानका निसन्देह गौग्य कर सकते है। - . भारतीय शस्त्रचिकित्साकी प्रधानता । सुश्रुनोक्त शस्त्रचिकित्माका सम्यक विवरण टो एक पन्नोंमें देना सभव नहीं, तथापि पाटकोंको यह बताना ही लेखकका उद्देश्य है कि सुश्रुतके समयमै शस्त्रचिकित्साकी केमी उन्नति थी। रामायण और महाभारतमें देवते हे कि उपयुक्त शस्त्रचिकित्सा सेनाके साथ युद्ध क्षेत्रमें जाते थ। राम रावण-युद्ध में रामकी सेनाके शस्त्रचिकित्सक-रूपमें सुशेन गमके साथ लका गये थे । महाभारतके उद्योगपर्वमें देखते ह कि युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों ही शस्त्रचिकित्सक और शस्त्रचिकित्साके उपयुक्त बन्धन (bindage) आपधादिका मग्रह कर रहे थे। नकुल शस्त्रचिकित्सा-विज्ञानके पारदर्शी थे। गाय, घोडे, हाधी श्राद्रिकी शस्त्रचिकित्सा प्राचीन भाग्नमें अज्ञात न थी। जिन युरोपीय पण्डितोंने मस्कन भाषा पोर भारतके चिकित्मा विज्ञानकी अलोचना की है उन मरने पक वाफ्यसे स्वीकार किया है कि शस्त्रचिकित्सा-विज्ञानमें भारत अनेक विषयोंमें युरोपका शिक्षा-गर है । चेवर ने लिया हे “युरोपके अाधुनिक चिकित्सकोने हिन्दुनासे एक स्थानसे चर्म लेकर दूमरे स्थानमें उस चर्मको जोडनेका उपाय- जैसे कटी नार जोड देना-(Rhinopltsts) । मीग्वा हे ।" प्रसिद्ध डाकर हिर्सवर्ग (Dr Huscherg) ने वैचर मार के पूर्वोक्त वाक्यका समर्थन किया हे श्रीर यह भी कहा है कि “ॉग्यका जाला आदि निकालना युगेपने भारतमे मीग्या है। यह प्राचीन ग्रीका, मिश्रवासियों नधा अन्य किसी जातिको मालम न धी।' अाधुनिक चिकित्मक असाध्यको माध्य कर रहे है, किन्तु अाजकल जो सव शस्त्रचिकित्साय अत्यन्त घशनिकजीवना। प्रयम पार१२ । कटिन कही जाती हैं, उनमेंसे अनेक जैसे प्रांगका जाला आदि निकालना, अहरेदन (imputation), उदर-विदारण (abilominal section) प्राचीन भारतमें अविदित न था। आधुनिक पाश्चात्य शस्त्रविमानकी अद्भुत उन्नति देखकर सर अकचका जाते है, किन्तु हमें यह भूलना न चाहिए कि हम प्राचीन भारतकी उन्नत शस्त्रचिकित्माके गौरवके उत्तम भिकारी है। सुश्रुतोक्त शस्त्रचिकित्सा। १-शिक्षा सुश्रुतने शस्त्रचिकित्साको आठ भागॉर्म विभक्त किया है-(१) छेद्यक्रिया (किसी अगका छेदन करना), (२) भेद्य- क्रिया, (किसी अंग का भेट फरना), (३) लेख्यक्रिया (किसी स्थानका चमडा निकालना). (४) वैध्यक्रिया (दुपित रक्तादि निकालनेके लिए शिराटिका भेद करना), (५) त्रष्यक्रिया (नालीघा, बाघी आदि रोगोंमें शतादिका परिमाण योजना), (६) आहार्य्यक्रिया (अश्मरी 'ग्रादि रोगोंसे पैदा हुप द्रव्यादि निकराना), (७) विसाव्यक्रिया (बाव उत्पन्न करना) और (E) सीवन (सिलाई करना)। चिकित्सकसे शस्त्रक्रिया पारदर्शिता प्राप्त करनेके लिए शास्त्र पढनेसे ही काम न चलेगा, शस्त्रादि द्वारा प्रकृतरूपसे वेदनादि शस्त्रक्रियाका बहुत दिनोंतक अभ्यास करना होगा । किस प्रकारके कौतृहलवर्द्धक उपायसे गुरु शिष्यको विविध शस्त्रक्रियाओंकी शिक्षा देते थे, इसका आभास नीचे दिया जाता है- .
वैज्ञानिक जीवनी।
&
मुश्रुत।]
-----------------
(१) उद्यक्रिया (inersion)--कुम्हडा, लोको शादिका
वेदनकर अहदनादि प्रणाली मीखनी होगी।
(२) भेधक्रिया (puncturing)--चमको चैली, मृत पशु
के सूत्रको थैलो अथवा चमडेको चेलीमें पानी और कोचड
भर कर भेद करने में भेद्यक्रिया मीसनी होगी।
(३) लेल्यक्रिया (cratching)-~-मरे पशुमा लेोमयुक्त
चमडा निकालकर भीरानी होगी।
(४) वपक्रिया (probing)--गुन लगे बास या लकही
प्रयता भूखो लोकोके मुहमें शस्त्र घुमेडकर चण्यक्रिया भीसनी
होगी।
मज्जा
(५) अाहार्य (extraction) - कटहल शादि फलोको
और मा पशुके दातामें यन्त्र प्रवेश कर यह क्रिया
मीएनी होगी।
(६) विनाध्यमिया (eynounting funds)--सेमराकी
लमहीमें माम भर और उसमें यन्त्र प्रविष्ट कर रक्त, पीप भादि
निकालने की प्रणाली सीखनी होगी।
(७) मीध्यक्रिया (sering)-वस्त्र अथवा नरम चमका
मुईसे सीकर गिलाद सीखनी होगी।
(८) येक्रिया (hosing)-~-मृत पशुकी गिरा अथवा
कमलके नालको वेधकर वैयक्रिया भीखनी होगी।
(८) बन्धनकाय (bondage)--कपडे प्रादिके बने पुरुष
के बह-प्रत्यगोको याधकर उन्धनकार्य नीखना होगा। कोमरा
मासपेशी प्रथया कमल के नानको बाधकर मन्धियन्धन सीखना
Fo वेशानिक-जीवनी। [प्रथम परिच्छेद । xo.inr-- hre)---मृत (१०) क्षार और अधिकार्य (cautery hy caustics and >~~मत पशुके कोमल मासपर क्षार सौर अग्नि का प्रयोगकर सीखना होगा। (११) वन्तिकार्य (Latheternsation)--जलपूर्ण कलसीके नोचे खेदकर उसके छेदमें, लीफीके मुहमें अथवा इसी प्रकार के अन्य पदार्थों में, पिचकारो का प्रयोगकर, घस्तिक्रिया सीखनी . होगी। इस प्रकार शस्त्रक्रिया अच्छी तरहसे मीरनेके बाद चिकित्सा-कार्यमें अभ्यास और दक्षता प्राप्त करनेपर चिकित्सकको चिकित्सा करनी चाहिए । शस्त्रप्रयोग करनेके पहले चिकित्सकको नकोपयोगी यन्त्र, शस्त्र, ई, कपडा, सून, पम्बा, ठडा पार गरम जल श्रादि द्रव्य और उपयुक्त सवल परिचारक जुटाना होगा । मूढगर्भ, उदर, अर्थ, अश्मरी, भगन्दर और मुयरोगमें शस्त्र प्रयोग करनेपर रोगीके भोजन के पहले शस्त्रक्रिया करनी चाहिए । चिकित्सकको विशेष सावधानीसे शस्त्रप्रयोग करना चाहिए, जिससे सूक्ष्म शिरा पौर स्नायु न कट । शस्त्रप्रयोग करनेके बाद अंगुलीसे, मवाद रतः श्रादि निकाल कर नीमकी पत्तियो श्रादिके कपायके जलसे अच्छी तरहसे क्षतम्पान धो देना चाहिए । अनन्तर पिसा तिल, मधु और घी मिला बत्ती या कपडेकी चिन्दीम उसे चुपड कर क्षतमें उसे भर देना होगा और इसके बाद अलसीको पुलटिस दे तीन चार परत कपडेसे दृढ बाँध देना चाहिप । तीन दिनके बाद क्षतम्बान खोलकर नीमकी पत्तियो आदिके पायके जलमे या दवा लगा फिर वॉर देना चाहिए । जनतक घाव न सूप जाय तवतक इसी प्रकार धोकर श्रोपध और मरहम लगानी चाहिए। A
मुश्रुत ।]
वज्ञानिक-जीवनी।
"
२-यन्त्र।
।
मुश्रनने १२५ प्रकारके शस्त्रांका वर्णन किया है। वे दो
भागोम विभक्त है-यन्त्र और शस्त्र । यन्त्र ०१ श्रार शस्त्र
२३ ह । यन्त्रामें हाथ ही सर्व प्रधान यन्त्र है, क्योकि हायके
विना किसी भी यन्त्रमा प्रयोग नहीं किया जा सकता । यन्त्र
नु भागामें बॅटे हे-(१) स्वस्तिक यन्त्र (चाबीस प्रकारक),
(२) सन्दशयन्त्र (दो प्रकारके), (8) तालयन्त्र (दो प्रकारके),
४) नाडीयन्त्र (बीस प्रकार के), (५) शलाकायन्त्र (अट्ठाईस
मारक) श्रार (6) उपयन्त्र (पच्चीस प्रकारक)। ये सब
यन्त्र लोह वा म्वर्णादि पाच धातुले बनाये जान थे।
श्रावश्यकतानुसार अन्य प्रकारके यन्त्र बनानेकी व्यवस्था भी
पुश्रुत दे गये है।
(२) स्वस्तिमयन्त्र अठारह अशुल लम्बा होता था और
लोहेके दो सपड एफ फीलमे जुड़े होते थे । सिह, बाघ, मंग
आदि
दम प्रकारके पशु और कोमा चील्ह आदि चौदह प्रकार के पक्षियो
के मुखके समान चौजीम प्रकारके स्वस्तिकयन्त्र बनाये जाते
थे। हाइमें याण या छुरी प्रादि शस्त्र विध तानेपर उनके
निकालनेके लिए रचरितम्यन्त्र काममें लाये जाते थे।
(२) मन्दशयन मोलह अगुल लम्बा रोता था। एक
प्रकार का मन्दशयन लोहारके समीकी तरह और दमरा ना
के नहनो की तरह होता था । चर्म मास, गिरा योर म्नायुमे
छोटे शस्त्र या माटे निकालनेके काममें पाया जाता था।
(३) 'मालयन्त्र बारह अगुग्न लम्बा होता था। इससे कान,
नामिका धादि से मरा निकाला जाता था।
वैज्ञानिक-जीवनी।
[प्रथम परिच्छेद।
४-बंधन।
सुश्रतमें अनेक प्रकारके बन्धना (harlige) का उल्लेख
देखा जाता है। गिरने या किसी प्रकारको चाटसे देहकी हट्टी
या हडिया टूट जानेपर, अथवा शस्त्रप्रयोगके बाद, घावपर
स्थानभेदमे विविध प्रकारके बन्धनाका प्रयोग होता था।
बन्धनप्रणाली चौदह प्रकारकी थी-(०) कोश, (२) दाम,
(३) स्वस्मिक, (४) अनुवैल्लित, (५) प्रतोली, (6) मण्डल, (७)
स्थगिका, (5) नमक, (E) ग्बद्वा, (३०) चीन, (११) विन्धन्ध
(१२) वितान, (१३) गोफणा और (२४) पञ्चाङ्गी। सूतके कपडे
भेडके लामके बने वस्त्र, रेशमी कपडे, चमडा, योस श्रादि की
कमाचियॉ, सूत, लोहे, लकडीकी तख्तिया अादिके वन्धन बाँधे
जाते थे। जिस स्थानमें जिस प्रकारका वन्धन बठता या उसी
प्रकारका बन्भन वाँधा जाता था। स्थानभेदसे बन्धन तीन
प्रकारके होते थे-गाढवन्धन, समवन्धन और शिथिल बन्धन ।
जो बन्धन खुब कडा बाँधा जाता था और जिसमे पीडा न
मालूम होती थी उस गाढवन्धन , जो बन्धन भीतर ढीला
बाँधा जाता था, उसे शिथिल बन्धन अोर जो न यूव कडा
और न ढीला ही हाता या उसे समबन्धन कहते थे।
क्षार।
रासायनिक दृष्टिसे भी सुश्रुत आदरणीय है । रसायनके
इतिहासमें सुश्रुनकी मृदु, मध्यम और तीक्ष्ण क्षार बनानेकी
प्रणाली उल्लेखयोग्य है । चरक और सुश्रुत सजिमानार
(curbonite of odt) और यवक्षार (ethonate of
Motash) को भिन्न भिन्न कह गये है। युगेप में बहुत दिनोतक
ये दोनों पदार्थ एक ही माने गये थे।
.
सुश्रुत।]
वैज्ञानिक-नीवनी।
१५
सुश्रुतने क्षारको तीन भागामे बॉटा हे-मृदु (uld), मध्य
(caustic) ओर नोक्ष्ण । सुश्रुतने जिसे तीक्षण क्षार लिया है
वह भिन्न प्रकारका नार नहीं । उसके मृदुतार में दन्नी,
द्रावन्ती श्रादि कई पदार्थ मिश्रित होते थे। हमने मध्यनार
को नोक्षण क्षार अर्यात् Littl-tle ilk ili माना है। कारण मध्य
शन्द ठीक (Cntic) गन्दका यातक नहीं।
तोदणनार-नोक्षणमार पनाने की प्रणाली आधुनिक
विज्ञान सम्मत है । कुटज आदि वृक्षोंकी बारात्मक भम्म
पानी में घोलकर छान लो जाती थी । अनन्तर भस्मशर्कग
सोपी, शयनाभिका अग्निद्वारा भस्म करनेसे जो चूना
(custic line) निकलता था , उनके साथ मिलाकर चूरहे
पर चढा श्राँच दते थे। मृदुतार और चनेको मिलाकर आँच
देनसे अर भी तोदणक्षार नेयार होता है । तीक्ष्णतार को लोटे
की क्लसीम मुँह चन्द करके ग्यना आधुनिक विमान-सम्मत
है। नीक्षणक्षारके हीनवीर्य्य (Cubonetet) हो जानेपर 'फिर
चून के साथ उसे आँच देनी चाहिए । मुश्रुतने नारका गुण
ठीक ही लिखा है-कुछ शेत वर्ण और युद्ध लसीला (2017)
तेजप्रशमन (Neutitlication)-अन्नग्म (actls)
के द्वारा तीदपनारका तेज नष्ट होता है । सुश्रुतके
ममयमें यह भी प्रावि कृत था । सुश्रुतने इसका कारण
बताया है । लिखा है कि क्षारमें लवणरस होता है । इमीसे
अनरसके साथ लवणरम मिलनेसे माधुर्यगुण प्राप्त होता
पार तोदणता चली जाती है । अाधुनिक रसायनने प्रमाणित
किया है कि अन्न और क्षार मिलनेसे एक प्रकार का नया
पदार्थ पेदा होता है उसे लवण (silt) कहते हैं । इसी
वैज्ञानिक-जीवनी।
[प्रथम परिच्छेद ।
-
लवणजातीय पदार्थमें अन्न वा क्षारका गुण न होनेपर अम्ल
और क्षार मिलानेसे तीक्ष्णता दूर हो जाती है।
कायचिकित्सा ।
सुश्रुतमे गस्त्रचिकित्साके अतिरिक्त कायचिकित्साले मी
उपदेश हैं। चरकने पाच सौ पत्रियोका उल्लेख किया है।
सुश्रुतने संतीस गणोंमें प्राय १६० आपधियोका गुण बताया
है। इनके अतिरिक सुश्रुतमें विविध लवण, छ घातु और
विविय म्वनिज पदार्थाका पधिरूपमे वर्णन है।
हे ऋषि ! सुनते हे तुम ढाई हजार वर्ष पूर्व आविर्भत
हुए ये, किन्तु तुम इस मग्जगनमें चिरकालसे अमर हो-
तुम्हारी महिता तुमको चिरकाल अमर रक्खेगी । तुम अमा-
धारण शस्त्रचिकित्साका उपदेश जगतको दे गये हो, पर
हम भारतवासी होकर मी उसका सम्यक् श्रादर नही कर
सके, तुम्हारे बतलाये अनशस्त्रोंको अाखों से मीन देस
पाया। आशीर्वाद दो जिससे भारतके अतीत गौरव, अतीत
भानगरिमा, अतीन स्वाधीनचिन्ताको निदर्शन-स्वरूप तुम्हारी
सहिताका गोरव करनेका अधिकार हम भूल न जायें।
.
.
-
दूसरा परिच्छेद
गेलिलिओ।
भा
-
भग्नमें जितने भिन्न सम्प्रदाय ह, उतने शायद भोर
किसी देश नहीं । शाक्त, शेन, येपणव, गाणपत्य
आदि विभिन धर्मसम्प्रदायोका पार्थस्य श्रोग
विवाद पुराण पढ़ने से अच्छी तरह समझ
पड़ता है। किन्तु भारतमें इतनी माम्प्रदायिक भिन्नता
होनेपरभी युरोपके लोमहर्षण धर्मविसरमे तुलना न हो सकेगी।
मध्ययुगमे गेमन केथलिक श्रार प्रास्टेटो में बर्मके नामसे
नरकका जो अभिनय हुआ था, उसकी याद अब भी लभ्य
समाजका सिर नीचे मुसा देती ह । धर्मके नामसे, भगवान
के नामसे, सैकटा नरनारियाको जलती आगम नृगसभास
भेो देनेमे विपनी धर्मसम्प्रदायी जरा भी कुंटित न हुए थे ।
प्रमझी नात दर रही, चिरशान्तशीनल, विमाातरछायाश्रित,
प्रतिभाशाली विद्वानोको भी मतानेमें मध्ययुगके यूरोपने
प्रागापीछा न किया । पन्द्रहवीं सदीमें कोपर्निकसने यह
प्रचार किया कि पृथिनी चलती है, सूर्यका उदय और श्रस्त
होना सर्यकी गतिका निर्देशक नहीं, परन्तु पृथिवीके
भ्रमण के कारण सूर्योदय और सर्यास्त होता है। इसके पहले
मयका विश्वास था कि पृथिवी ही जगत्का केन्द्रस्थत होर
सूर्य और नक्षन पृधियोंके चारो ओर घूमते है । कोपर्निकस
।
वैज्ञानिक-जीवनी। [दूसरा परिच्छेद का मत वाइवलके मतके विरुद्ध था । पुरषोंके पुण्यबल- उसको विशेष निर्यातन न भोगना पड़ा। किन्तु उसके अने मतावलम्बियोने ही सत्य कहनेसे अशेष यन्त्रना भोग की विख्यात ज्योतिषी टाइका ब्राहि देशसे निकाल दिया गया था ग्रुनो, छ साल रोमनगरके कैटसानेमे बन्द रहनेके बाद सन् १६०० में जलती आगमें जला दिया गया । विचित्र इन्द्रधनुपकी व्याख्या करनेवाले एएटानीओ की मृत्यु देमिनिट के जेलमें हो गई और इसलिए वह जलती आगम खाक: किया जा सका । इस प्रवन्धमे जिस महापुरुष के जीवनचरि की आलोचना की जायगी उन्होंने भी रामके धर्माध्यक्षों निकट अशेप लॉछना भोगकर अन्तमें मृत्युके चिरशीतल गोदमें विश्राम लिया था। इन सवका अपराध यही था कि इन्होंने जिसे सत्य समझा था उसीका जनसमाजमें निर्भर हो प्रचार किया था। आजकल प्रत्येक स्कूली चालक पृथिवीं का परिभ्रमण वृत्तान्त पढ़ता है, किन्तु यदि वह यह सुनेगा कि इसका प्रचार करनेमें किसीको कैदकी सजा मिली थी कोई चोरडाकुओंकी तरह देशसे निकाल दिये गये थे, किस किसीको जलती आगमें प्राणतक होम देना पडा था, तो उनके श्राश्चर्यका टिकाना न रहेगा । भारतमें कोपर्निकसके वहुत पहले आर्यभटने आविष्कार किया था कि पृथिवी घूमनी हे । यह मत वेद-पुराणके विरदन था, यह बात नहीं, किन्तु भारतका चिर उदार धर्मभावने कभी विज्ञानके सेवकों को नहीं सताया। जिन मब महापुरुषोंने विज्ञानकी सेवासे लान्छना को बन्धन-जयमाला कह सिर झुकाकर ग्रहण किया था, उनमसे महात्मा गेलिलिमा सर्वप्रधान थे । वृद्धावस्थाम वे अन्य हो गये थे, किन्तु जवानी और प्रौढ़ावस्थामें उनकी ।
गेलिलिटी।] वैज्ञानिक-जीवनी। उज्ज्वल नयन ज्योतिने नेशगगनके अतुल सौन्दर्यके भीतर विश्वजगत्के कितने ही गूढ रहस्याका आविष्कार किया था। यहा उनको ही कुछ आलोचना करनेकी इच्छा है। गैलिलियो गैलिलि (Galileo Galiles) का जन्म सन् १५६४ में इटलीके अन्तर्गत पिसा नगरमें हुआ था। उनके पिता विनसेजका जन्म उच्चकुलमें हुआ था, किन्तु वे दरिद थे। श्रक- शास्त्र और सगीतविद्यामै उनका वडाअनुराग था।गेलिलियोको इन दो विद्यालयका अनुराग पितासे प्राप्त हुआ था। लडकपनसे ही विज्ञानके प्रति गैलिलिओका अनुराग प्रकट होने लगा। बालक गेलिलिओ पैसे से छोटे छोटे सिलाने यन्न श्रादि तैयार करते देखे जाते थे। विज्ञानपर पुत्रकी ऐसी श्रासक्ति देसकर पिता कुछ रे । कोकि ये जानते थे कि अङ्कशास्त्र या विज्ञान की सेवा करनेसे पेट पालना बहुत कठिन हा जायगा। उनके समयमें विश्वविद्यालयके चिकित्सा शास्त्र अध्यापकका वेतन प्राय ५६०० रुपये वार्षिक था किन्तु अङ्कशास्त्रके अध्यापकका वेतन २० रपये मासिकसे भी कम था। इसीलिए उन्होंने गैलिलियोका चिकित्साशास्त्र पढनेके लिए स्वदेशके विश्व- विद्यालयमें भेज दिया। किन्तु गेलिलियो विज्ञान और श्रङ्कशास्त्रंको छोड न सके। पितासे छिपाकर वे प्रोस्टीलियो रिसि (Ostalleo Rion) नामक एक प्रसिद्ध अङ्कशास्त्रविशारदसे यूक्लिडका रेखागणित पढने लगे। थोडे दिनामें उन्होंने रेसागणिन पूरा कर पार्कि- मिडिसका ग्रन्थ पढना शुरू किया। क्रमसे पितातफ यह बार पहुची। उन्होंने विज्ञान के प्रति पुत्रका स्वाभाविक अनुराग देखकर लाचार हो पुत्रकामा स्वीकार कर लिया । पिताको । - -- --
२०
वेज्ञानिक जीवनी। [दुसरा परिच्छेद ।
अनुमति पाकर बालक गेलिलिया अङ्कशास्त्र और पदार्थविद्या
आन्तरिक अनुरागसे पढने लगे और शीघ्र ही इन दो शास्त्रोमें
विलक्षण पारदर्शी हो गये। अन्तमे वही भय श्रा उपस्थित हुश्रा,
जो उनके पिताको पहलेसे ही था। छब्बीस वर्ष की उम्र
गेलिलिनो वीस रुपये मासिक वेतनपर पिसा विश्वविद्यालय
में अङ्कशास्त्र अध्यापक नियुक्त हुए । “यादृशी भावना यम्य
सिद्धिर्भवति तादृशी" के उदाहरण सर्वत्र देखे जाते है।
गेलिलिओ पिताके इच्छानुसार यदि चिकित्साशारर पढने
तो शायद एक विलनण चिकित्सक हो सूव धन कमा सकते,
किन्तु वास्तवमें पृथिवीमें क्या धन कमाना ही जीवनसा उद्देश्य
है ? उन्होंने दरिद्रताको वरणकर जो अमूल्य वस्तु-अनय
कीर्ति-प्राप्त की वह कुवेरके सम्पूर्ण भडारके बदलेस भी
नहीं मिल सकती।
पेण्डुलमके नियमका आविष्कार ।
विद्यार्थि-दशासे ही गैलिलिश्रा मोलिक गवेपणा करने लगे
य। उन्होंने वीस वर्षकी उनके पहले ही पेण्डुलमकी गति नियम
का अविष्कार किया था। क्लाक घडीका पेण्डुलम सपने ही
देशा है, इसी पेण्डुलम की गतिपर ही घडी चतती है।
गॅलिलिओ एक दिन गिरजाघर आराधना करने गये थे।
गरजाकी वरनकी कडीसे जो बडा लम्प हिल रहा या
उसकी और उनकी दृष्टि गई। लम्प श्रमी ही जलाया गया
या श्रार अभी तक हिल रहा था। गेलिलिमा एक हायने
दूसरे हाथ की नाडी का फडफना गिनने लगे और यह भी
देखने लगे कि लम्प कितने चक्रमें एक बार घूमता ह । इम
गेलिलिओ।] वेज्ञानिक-जीवनी। २१ वार उन्होंने देखा कि लैम्प पहले जोरसे और फिर धीरे धीरे हिलने लगा, किन्तु देखा गया कि जोरसे और धीरेसे हिलनेपर भी समान समयमें ही इधरसे उधर हिलता है। नाडी की गतिसे वे उसका समय निर्धारित कर रहे थे। चे घर श्राफर एक रस्सीसे एक भारी चीज बाधकर हिलाने लगे श्रार गिरजामें जो परीक्षा की थी उसे प्रमाणित की। इस प्रकार पेण्डुलमका समगतित्व (1-ochonism) श्रानिष्कृत हुआ। पहले वह घडी बनाने के काममें न पाया, पहले नाडीकी गति निर्णय करनेके लिए काम प्राता था , अनन्तर हिडजेस न पडी की रचनामे उसका व्यवहार किया। पतनशाल वस्तुओके गति-नियम का आविष्कार । श्रापसे एक सवाल करते हे, जगाय दीजिये तो। एक उमसेरा और एक एकसेरा वजन ले कलकत्तेके मानूमेण्टके ऊपरसें दोनोंको एक साथ नीचं छोडदे ता बतलाइये कौनसा पहरो जमीन पर गिरेगा। यदि आपने गेलिलिग्रोका जीवन- वृत्तान्त न पढा होगा तो निश्चय ही कहेंगे कि दससेरा वजन एकसेरान जनसे दसगने पहले जमीनपर गिरेगा। गेलि- लियोके पहले लोग ऐसा ही जाते थे। विरयात प्राचीन दार्शनिक एरिम्नाटल ( Act) ने भी यही शिक्षा दी थी कि दससेरा वजन एकसेरा बजनसे दसगुना भारी होनेके कारण पहले जमीनपर गिरेगा। परिस्टाटलने जरूर यह यात परीक्षा करके नहीं लिखी थी किन्तु जिस समय उन्होंने यह यात ।
૨૨
वैज्ञानिक-जीवनी।
[दूसरा परिच्छेद ।
कही थी, उस समय के लिए वह वेदवाक्य थी । गेलिलिओ
का कहना था कि नहीं, दोनो वजन एक साथही जमीनपर
गिरेंगे । उस समयके विश पुरुपौने गेलिलियोको पागल
समझा और उनके इस मतेके कारण तरह तरह से उनकी
हंसी उडाई । एक दिन वे विश्वविद्यालयके सव अध्यापकोंको
साथ ले पिसा सुविख्यात लोनिटावर (Lenning tower)
को पहुचे। यह विशाल स्तभ पाठमजिला ऊँचा है और एक और
झुका हुआ है । वे एक पञ्चाससेरा और एक आधसेरा वजन
का गोला ले इस स्तम्भपर चढ़े और ऊपर पहुचकर एक ही
साथ उन दोनोंको जमीनकी और छोड दिया । सबने सोचा
था कि इस कामसे गेलिलिओ हास्यास्पद होंगे, किन्तु जन
उन्होंने देखा कि दोनों गोले एक साथ ही जमीनपर धडाम
से गिर पडे तव चे गुद ही अवाक हो रहे। उन्होंने दिनम
अपनी श्रांगोंसे स्पष्ट यह परीक्षा देसफर भी गेलिलिओ की
वातका विश्वास न किया । नाना प्रकारकी मनगढन्त बातोंसे
अपनी भ्रान्त धारणा की ही पुष्टि की। अन्धविश्वास पत्थर
की नाई ही अचल होता है। शानकी तेजधाराक रिना उसे
हटाना कठिन होता है । यह यात समाज और वर्मसम्बन्धम
जिस प्रकार सत्य है, विज्ञान सम्बन्धम भी उसी प्रकार सत्य है।
दस सेर और एक सेर वजनकी चीज या चीजें क्यों
जमीनपर एक साथ ही गिरती है, इसका मर्म पाटकोको
सहजमें ही बुझाया जा सकता है। मान लीजिये आपने पक
सेर यजनके ग्यारह बल तैयार किये है और उन ग्यारह बलों
को एक साथ ही एक जगह फेंक दिया। अवश्य ही सव एक
साय ही जमीनपर गिरेंगे। इसके बाद उसमेंसे दस बल
.
गेलिलिओ1]
वैज्ञानिक जीवनी।
को एक साथ एकत्रकर उसे और बाकी एक बलको एक
साथ ही ऊपरसे छोड देनेपर वे क्यों एक साथ न गिरेंगे?
जिन दस वलोंको एक साथ छोड दिया था वे सव इस वक्त
एकन कर दिये जाने से क्या दसगुना पहले गिरेंगे कभी
नहीं। इस प्रकार कागजका एक टुकडा और एक रुपया भी
साथही जमीनपर गिरेंगे। पर रपया और कागज एक साय
छोडनेने कागज हवाम उडता रहेगा। यदि घायु-निष्कापन
यन्त्र (utt pump) से वहाकी हवा निकाल दी जाय तो
रुपया ओर कागजका टुकडा ठीक एक साथ ही गिरेंगे।
विज्ञान सीखनेवाले प्रत्येक छात्रको कालेजम यह परीक्षा
दिखाई जाती है।
गेलिलिओ पिसामें रहकर पननशील वस्तुओं (talling
bodios) के सम्बन्धमें और भी अनेक गवेषणायें करने लगे
और अनेक नये सिद्धान्त श्राविष्कृत हुए । किन्तु वे जेसे ही
जेसे नये नये सिद्धान्तोका अविष्कार करने लगे वैसे ही वैसे
उनके शनु उनपर सङ्गहस्त होने लगे। ये तीन सालके लिए
अध्यापक नियत किये गये थे, किन्तु तीन वर्ष भी न होने पाये
थे कि उनको नोकरी छोउ देनी पडी । इसी समय उनके पिता
की मृत्यु हो गई । परिवारमें एक भाई ओर तीन बहनें थीं।
उनकी आर्थिक अवस्था चदी ही शोचनीय हो गई । सोभाग्य
से वेनिस की मन्त्रणामभाने उनका नाम सुनकर सन् १५८२
में उनको पया विश्वविद्यालयमें प्रकाशास्त्रका अध्यापक नियत
किया। यहां उन्होंने २८ साल काम किया और इसी समयम
उन्होंने दूरवीक्षणयन्त्र (Lelescop८) का श्रावियारकर
उमको सहायताले ज्योतिपशारत्रमं नगीनता ला दी।
२८
वैज्ञानिक जीवनौ। [दूसरा परिच्छेद ।
दरवीनका आविष्कार ।
गैलिलियो पदुयामें केवल दो वर्ष अध्यापक रहे थे। इसी
समय विज्ञानजगत्म एक लोमहर्पण घटनाका अभिनय हो
गया। हम पहले ही लिस आये हैं कि पन्द्रहवीं सदीमें
कोपर्निकसने प्रचार किया था कि पृथिवी चलती है। वह
सूर्यकी परिक्रमा करती है और इसीसे सूर्योदय और सूर्यास्त
होता है । उनके पूर्ववर्ती ज्योतिषियों और वाइवलका कहना
था कि पृथिवी ही इस जगत्का केन्द्र स्थल है। चन्द्र, सूर्य, ग्रह,
नक्षत्र सभी पृथिवीके चारो ओर घूमते हे। दोपर्निकसने
अपनी पुस्तक निकलनेके थोडे ही समय बाद इस संसारसे
कृच किया। नहीं तो धर्मशास्त्रके विरद्ध आविष्कार करने के
कारण उनको निश्चय ही निर्यातन भोगना पडता। उनकी
मृत्युके वाद विख्यात ज्योतिषी टाइको ब्राहीने उनके मतको
पुष्ट किया था और इस कारण वह देशसे निकाल दिया गया
था । टाइको ब्राही, केपलर और गेलिलियोके समसामयिक
गिोडानो ब्रूनो (Ghodano Bruno ) नामका एक तेजस्वी
ईटलीवासी कोपर्निकसका मत खुलमखुल्ला प्रचार करने
लगा। वह स्पष्टवक्ता था । भय किसे कहते हैं, जानता न था।
जब यावलके विरुद्ध मत प्रचार करने के लिए उसे निव
किया गया उस समय उसने जवाय दिया कि वाइवल मनुष्य
को भगवानको, प्यारी है, और पवित्र जीवन बितानेकी शिक्षा
देनेके लिए लिखी गई है, विज्ञानके रहस्य निर्धारित करनेके
लिए लिखी नहीं गई है।
रोमन कैथलिंग खीष्टान वर्मके प्रधान पुरोहित रोमके
पोप होते थे। उस जमानेमें धर्मपियोंके विचारके लिए
-
गॅलिलिओ।] वैद्यानिक-जीवनी। । इफिजिशन (Ingtisition) नामका एक न्यायालय था। यहाके न्यायाधीश उच्चपदस्थ धर्मप्रचारक थे। इसीन्यायालयों धर्मद्वेषी बनोका निचार टुया। और उसे छ सालके लिए जेलकी सजा दी गई। फिर भी निभीकताके साथ अपने मतमा पोषण करनेसे सन् १६०० की १२ घी फरवरीको वह जलती श्रागमें जला दिया गया । गेलिशिनो युवापस्थासे ही कोपर्निकसके मतके पोपक थे। इसी कारणसे नोकी इस प्रकार शोचनीय मृत्यु होनेकी मररमे वे म्वय विचलित न हुए हो, गह मातम नहीं होता। गेलिलिओ कोपर्निकसके मतका समर्थन करनेके लिए बहुत दिनोंसे नये प्रमाण सग्रह कर रहे थे। उन्होंने अपने समसाम- यिक प्रसिद्ध ज्योतिषी केपलरको एक पत्र लिमा या कि- "मने प्रचलित सिद्धान्तके विरुद्ध अनेक युक्तियोंका नग्रह किया है, किन्तु उनको प्रकाशित करनेका साहस नहीं होता । कारण मुझे डर लग रहा है कि ऐसा होनेसे हमारे गुरु कोपर्निकस की सी जैसी मेरी भी दशा होगी। यद्यपि ये कितने ही मनुष्योंकी दृष्टिम अपनी अशेष रयाति फर गये है, किन्तु अधिकाश निर्वाध व्यक्तियोंके निकट उपहास ओर घृणाने पान हो रहे हैं कोपर्निकसका मत बाइबल मतके विरद्ध या ओर इस लिए वे संरके निकट उपहास और घृणाके पात्र बने थे, यही एक कारण नहीं है । इसका प्रधान कारण मान व चरित्रका एक प्रधान गूढ रहस्य है । कोपर्निकसके सैकडो वर्ष पहले, एरिस्टाटल टलेमें, हिपास प्रभृति प्राचीन दार्शनिक विरुद्ध शिक्षा दे गये हैं। वे ऋषिरुप थे। उनके मतको " । -
वैज्ञानिक-जीवनी। [दूसरा परिच्छेद ।
।
भ्रममूलक सोचना भी महापाप है। कोपर्निकस और गेलि-
लिनो के समसामयिक पण्डित यह समझ नहीं सके कि विज्ञान
के विषयमें लोकविचार करने का अवसर नहीं। अमुकके कहने
से सत्य सत्य नहीं है, बल्कि सत्य सत्य होने से ही सत्य है।
वाग्भट्ट कहते है-
ऋषिप्रणीते प्रीतिश्चेन्मुक्त्वा चरकसुश्रुतौ ।
भेडाया कि न पश्यन्ते तस्माद् ग्राह्य सुभाषितम् ॥
यदि वे जानते होते तो इतना अनर्थ ओर रकपात न होता ।
स्वाधीन चिन्ता, विकाश, विस्तृति विज्ञानके प्राण है । यदि
यह स्थिर हो जाय कि अमुक प्राचीन मत भ्रममूलक है तो
विज्ञान उसे समूल उपाड देगा ही। उसका जन्मदाता अमुक है,
कहनेसे मुंह न ताकता रहेगा। विज्ञानकी प्रतिष्ठा सत्यके
ऊपर है। उसके सेवक सत्यकी महिमासे दीप्त हो पृथिवीके
अत्याचारको तुच्छ समझते है । इसीसे देखते है, कोपर्निकस,
टाइको, बनो, गेलिलियो ने लोकलज्जा और उपहाससे न
डरकर निर्भय चित्तसे विज्ञानकी महिमाकी घोषणा की थी।
किन्तु कोपर्निकसको हुए कई शताब्दियाँ बीत चुकी है,
मसारने बहुत अभिज्ञता प्राप्त करली है तो भी इस समय इन
प्राचीनाके प्रति आहेतुकी भक्ति नहीं गई है। उस समय जय
चाल्स डारविनने मनुष्यके क्रम विवर्तनकी बातका प्रचार
किया था उस समय अनेकने उनको ईसाई धर्मका विरोधा
कहा था । हमारे देशमें भी कितने ही पुरानी लकीरके फकीर
हो रहे हैं । यदि कोई कहे कि "स्वर्णघटित मकरध्वज' पत्थर
के कटोरेकी तरह एक अवास्तव पदार्थ हे तो उसके कथनकी
हॅसो उडानेवाले कितनेही लोग खड़े हो जायगे। प्राचीनाके
।
गेलिलियो।] वेनानिक-जीवनी। २७ प्रति सम्मान करेंगे, किन्तु प्राचीन होनेसे ही अमुक यात प्रधान्त है, यह स्वीकार न करेंगे। फोपर्निकस और गैलिलिओ का जीवनचरित पढनेसे यह शिक्षा मिल सकती है। पहले कहा गया है कि कोपर्निकसके मतको पुष्ट करने के लिए गेलिलियो प्रमाण मग्रह कर रहे थे। श्रपतफ कोपर्निकस का मत अधिकतर अनुमानोपर निर्भर था । गेलिलियो दूरवीन का नाविष्कारफर उसका प्रत्यक्ष प्रमाण सग्रह कर सके थे। दूरबीनका श्राविकार कुछ विचित्र था। हालेण्डमें जानमन और लिपार्से नामके दो चश्मा बेचनेवाले थे। प्रवाद यह है कि जानसेनके दो बच्चोंने एक दिन दो आसती काच लिये ग्वेलते खेलते देखा कि दोनो फाचोको समान रसनेसे सामने गिरजाका शिखर पास और उरटा दिखाई देता है । उन्होंने यह आश्चर्य देव कर पितासे कहा । यह सबर पा जानसन और लिपासेने दोनो काचोंकी एक लकडीपर बिठा चश्मेकी दूकानमें रख दिया नोर उसे नया सिलोना बताने लगे। एक दिन मारकुइस स्पिनोला नामक एक सम्धान्त व्यक्ति उस दूकान से उस सिलौनेको सरीद लाये और उसे युवराज मारिस दिसाया। जो हो इन चश्मा बेचनेवालोके खिलोनेफा अस्पष्ट सवाद गेलिलियोने सुना था। गेलिलियो यह खवर सुन इतने . विचलित हो पड़े कि दिन रात इसी विषयमें चिन्ता करने लगे। उन्होंने सोच कर निश्चय किया था कि जब इस सिलौने मे दूरके गिरजेका शिपर पास दिखाई देता हे तो बहुत दूर- वाले आकाशके नतन क्या इस यन्त्रकी सहायतासे पास न दिखाई देंगे? यदि हो सके तो आकाशमार्गके स्तिने ही गुप्त रहम्य प्रकट हो जायगे, तो कितना अविदित जगत् प्रत्यक्ष
वैज्ञानिक-जीवनी। [दूसरा परिच्छेद ।
दिसाई न देगा, चन्द्रमा, सूर्य और ग्रहनक्षत्रों के सम्बन्धी
कितनी ही नई और अद्भुत बाते न मालूम हो जायगी। इस
प्रकारकी धारणाने उनको एक वारगी चंचल कर दिया। वे
शान्त न रह सके। उनके पास अर्गन बजानेका एक नल था।
अनक चेष्टाके वाद नलके एक सिरे में उन्नतोदर (Course)
लेंस और एक सिरेमे नतोदर (Concave) लेस विटा
कर उसके द्वारा सोत्सुकनेत्रसे चारों ओर देखने लगे। उन्हें
नहीं मिल गया, जिसे वे सोज रहे थे। उनसे दूर की चीजें
बहुत पास और तीनगुना वडी दिखाई देने लगी। किन्तु इससे
उपर्युक्त चश्मा बेचनेवालोके सिलानेकी तरह चीजें उल्टी न
दिखाई देती थी। उस समय उनके आनन्दका ठिकाना न
था। वास्तवमै ही कोई वैज्ञानिक श्राविकार हो जानेपर मन
आनन्दसे कितना उछल पडता है, इसका अनुभव भुक्तभोगी
के सिवा और कोई नहीं कर सकता । श्रानन्द से हँसने नाचने
पार थोडी देरके लिए बेहोश हो जाने की बात सुनी जाती
है। धार्किमिडिसके विपयमें कहा जाता है कि एक दिन जब
बे स्नान घरमे स्नान कर रहे थे उसी समय एक कल्पित विषय
की मीमासा मनमें बैठ गई इससे वे इतने वेसार हो गये कि
नगे बदन चलती सडकसे “पा गया, पा गया" कहते दोडते
हुए घर पहुचे थे।
गेलिलियो इस अद्भुत यन्त्रको ले जल्दी जल्दी वेनिश
नगर गये और वहॉके सम्धान्त व्यक्तियोको दिसा दिखाकर
उनको श्राश्चर्यचकित करने लगे। वुड्ढे मी लाठी टेकते टेकते
ऊपर चढ़कर यन्त्र के द्वारा दुरकी जहाजे पास देखकर
आनन्दित होने लगे। चारो ओर उनका नाम फैल गया।
।
।
गेलिलियो।
वैज्ञानिक-जीवनी।
ခင်
'चिहान् सर्वत्र पूज्यते "यथा राजद्वारमें क्या सडकपर
सर्वत्र ही उनका श्रादर होने लगा। अधिकारियोने उनी
तनरवाह दूनी कर उनकी अध्यापकता आजीवन के
लिए कर दी।
इसके बाद ये एक ऐसा यन्त्र बनानेकी चेष्टा करने लगे,
जिसके द्वारा आर भी अधिक दूरकी चीजें पास दिग्वाई
दे सक । सुद ही लेस घिसकर उन्होने और एक यन्त्र नेयार
कर डाला। इस यन्त्र के द्वारा अब वे नित्य रात रात भर
जगकर नीले प्रकाश के मौन्दर्य की परीक्षा करने लगे।
विज्ञान मीखनेवाले प्रत्येक छात्रको ही गेलितियोके
दुरवीन यन्त्रकी क्रिया मालम है । साधारण पाठकोको
उसके सम्मन्ध स्थूल रूपसे यहाँ कुछ बनाया जाता है।
साधारण श्रातसी शीशा सवने ही देखा है। यह उन्नतादर
लेंस है। यदि आतसी शीशेके द्वारा सूर्यको तीरणे सयत
की जाये तो सूर्यको एक गोली सादी श्राकृति एक ओर
गिरती है। वह उरटी होती है। पासकी यह उल्टी प्राकृति
उन्नतोदर लम से देराने से उत्टी और पटी दिगाई
पड़ती है। दुरचीनम एक उन्नतोदर ओर एक नतोदर लेंस
लगानेस सीधी प्राकृति दिसाई देत
यी। चश्मा चनेवालो
ने दोनों उन्नतोदर लेस लगाये ये इसलिए आकृति उल्टी
दिपाई देती थी। आज बृहत् मे वृहत्तर दूरवीक्षण यन्नान
धुमती हुई ज्यानियाँ अनन्तसारजगत् सृष्टि स्पिनिलयके सम्बन्ध
में अनेक प्रश्रतपूर्व अचिन्तनीय पात मनुष्यको प्रत्यक्ष दिगाई
पटती है। इस दृग्वीक्षण यन्त्रका श्राविकर्ता जिस देशम
पेदा हुआ था उस देश रतनस होनेमें कोई सन्देर नहीं।
वैज्ञानिक-जीवनी। [दूसरा परिच्छेद चन्द्र। गेलिलिओने स्वभावत ही चन्द्रमाकी ओर अपनी दूरवीन घुमाई । हाय फथियो, तुम्ही विज्ञानके प्रधान शत्रु हो । तुम त्रियों के सुन्दर मुखौके साथ उसकी तुलना करते रहो, इस पर अपत्ति न करेगा, किन्तु तुम कवि हो, नशेके झोंकमें चन्द्रमाके मध्यस्थित पर्वतो, उपत्यकाको कलंकका चिन्ह, वुढिये का चरखा आदिकी अजव करपनाकर विज्ञानका रास्ता एक वारगी रोक दिया है । तुमने लोगों में प्रचार किया है कि इन्द्र- धनुष, इन्द्र या रामका धनुप है । तुमने नक्षत्रोंको मुरसुन्दरिया गढकर चन्द्रमाको रोहनी श्रादि सत्ताईस सुरसुन्दरियोका बहुपत्नीक स्वामी बताया है। पुराण प्रभृति शास्त्रोंने तुम्हारे वाक्योंको अधान्त वैज्ञानिक व्याख्या समझकर ग्रहण कर लिया है। यह केवल भारतकी ही बात है यह बात नहीं। समग्र आदिम मनुप्य समाजमें इस प्रकार की करपनाका अभाव नहीं । इसीसे जब गेलिलिओने अपने यन्त्रसे देखा कि पृथिवी की तरह चन्द्रमामें भी पर्वत, उपत्यका, मैदान आदि है तव उन बातोंका किसीने विश्वास न किया। ऐसा भी कभी हो सकता है ? यह स्वर्गीय शान्तशीतल सुधामय चन्द्रवदन क्या कभी पर्वत श्रादि से परिपूर्ण हो सकता है ? उन्होंने फिर इन सव पहाटोकी उँचाई भी नापी थी, कोई पाँच मील ऊँचा था, कोई सात मील ऊँचा था। अपराधोंकी सरया पर भी पूरी नहीं हुई । उन्होंने प्रचार किया कि जैसे चन्द्रमा सूर्यरश्मि लिलिओ।] वैज्ञानिक जीवनी। । प्रतिफलितकर किरण फैलाता है उसी प्रकार पृथिवी भी किरण फेलाती है । सभी तृतीया चतुर्थी के चॉदमें देखते है, कि हंसिये की तरह चॉदके उज्ज्वल फलाके साथ चन्द्रमाका अपर अश अस्पष्ट दिखाई देता हे। गेलिलियोने सोचा कि इस प्रकार दिखाई पडनेका और कोई कारण नहीं चन्द्रमापर पृथिनीकी किरणें पडनेसे चन्द्रमामें पृथिवीकी ज्योत्स्ना दिखाई देती है। हम लोग जैसे पृथिवीसे चन्द्रमाको देखते हैं, उसी प्रकार चन्द्रमासे भी यदि वहाँ कोई देखे तो पृथिवी भी अलोक- मय दिखाई पड़ती। केवल पृथिवी चन्द्रमासे अधिक प्रकाशमान और उससे सोलहगुना वडी दिखाई देती। गेलिलियोके इन सव आविष्कारोने उस समयके परिडतोमें कटे गावपर नानका काम दिया है। कोपर्निकसके विरोधी कहते थे कि पृथिवी ग्रह नही हो सकती। कारण अन्यान्य ग्रहोंकी तरह उसमे किरण नहीं। गेलिलिओके पृथिवीमें किरण- का अविष्कार करनेसे उनका यह अगलम्र भी जाता रहा। गैलिलिओ अपनी दूरवीन श्राकाशकी और चारो ओर घुमाने लगे। चारो ओर नये नये तारोका पता लगने लगा। सुनील नभमएडलका मेखलाखरूप 'छाया पय जोकि कवि- क्रपनासे स्वर्गीय देवाताामा राजवर्ती प्रसिद्ध हो रहा था गैलिलिओके यन्त्र की सहायता से छोटे छोटे असरप्य तारामा का समष्टि प्रत्यत दुमा । कोई, कोई तारा आसॉस एक दिगाई देते ये गैलिलियोके दुरयोगस दो दो तारे दिसाई पडे। ।
२२
वैज्ञानिक-जीवनी। [दूसग परिच्छेद :
वृहस्पतिका उपग्रह ।
२६० ईसवीके जनवरी महीनेमें वे वृहस्पतिग्रह (Jupiter)
को पडे ध्यानसे देगने लगे। ७ वी जनवरीको उन्होंने उसके
पास तीन छोटे छोटे तारे देखे । उनमेसे दो नारे वृहस्पति
००
०००
००
चाने और तीसरा दक्षिणमें था। दूसरी राततो देखा कि तीनों
नारे उसके दक्षिण भा गये है। वी तारीखको आकाश
मेघाछन्न या और इसलिए कुछ दिसाई न पटा । १० वी
तारीसको गेलिलिओने देखा कि दो तारे प्रकाशित हे और
दोना ही वृहस्पतिकी बॉई और है । ११ वी तारीसको भी बे
दोनो तारे वृहस्पतिकी वॉई और ही थे, पर उनमसे एक वटा
दिसाई देता था।
--
1
गेलिलियो।]
वैज्ञानिक-जीवनी ।
३३
Xnxx. rande
वृहस्पतिग्रहके उपग्रहोका आविष्कार।
O
०
-
०
.
वृहस्पतिग्रहके उपग्रहोंका आविष्कार ।
१२ वी तारीसको फिर तीन दिखाई पडे, ७ वीं जनवरी
को तरह दो वॉई पोर पोर एक दाहिनी ओर या। इसके दूसरे
दिन गेलिलिओने इस प्रकार चार तारे देखे । इस तरह चार
से अधिक तारे दिमाई न पडे । गेलिलिओने अब यह प्रचार
किया कि जेसे पृथिवोके चागे ओर चन्द्रमा घूमता है उसी
प्रकार वृहस्पति ग्रहके चार ओर चार उपग्रह वा चन्द्रमा
घूमते हैं । पृथिवी जैसे ग्रह हे और उसके उपग्रह है, उसी
प्रकार वृहस्पति भी एक ग्रह है और उसके उपग्रह है। यह
३४ वैज्ञानिक-जीवनी। [दूसरा परिच्छेद। परीक्षित सच्ची वात फैलनेपर उस समयके विद्वानोंमें तुमुल आन्दोलन उपस्थित हुअा। यह भी फभी हो सकता है ? अनेकों ने ही विश्वास नहीं किया। इस वातका विश्वास करनेसे बाइवल का उपदेश झूठा होता है प्रचलित प्राचीन मत छोड़ना पडता है, पृथिवी ही इस जगत्का मूलाधार है, ये यह कैसे विश्वास करें कि पृथिवीकी तरह अन्तत एक और ग्रह विद्यमान है। गेलिलिओने अपनी दूरबीनसे अपने श्राविष्ठत उपग्रहों का घूमना देखनेके लिए सबका श्राह्वान किया। किसी किसी ने अपनी ऑखोसे देखनेपर भी कहा कि यद्यपि दूरवीनसे पृथिवीकी चीजें ठीक दिखाई पडतो है, तथापि उससे श्राकाश- मार्गका रहस्य नहीं प्रकट हो सकता। किसी किसीने देखना ही स्वीकार नहीं किया। इस प्रकारके एक व्यक्तिको मृत्यु होने पर गेलिलिओने रहस्य-छलसे कहा था-"मुझे आशा है, वे स्वर्ग जाते समय मार्गमे उनको देख गये होंगे।" शुक्र ग्रहको क्षय-वृद्धि। इन सब अभुतपूर्व श्राविकारोके चाद गेलिलियोके मनमें इन सुन्दर अनन्त ज्योतियोंकी स्थिति और गतिके रहस्यका उद्घाटन करनेकी वासना क्रमसे बलवती होने लगी। चारों औरफा अविश्वास उनको निरत्साहित न कर सका । बल्कि उनका उत्साह दुना बन गया। उनकी असाधारण प्रतिभा और मानसिक बल उनको अपने प्रारब्ध कार्योको मुसम्पन्न करने के लिए समधिक प्रोत्साहित करने लगा। उन्होंने और एक परीक्षामूलक श्राविष्कारक द्वारा अपने शत्रुनाका अाशा- 2
गेलिलिओ।]
वैज्ञानिक-जीवनी।
३५
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भरोसा नष्ट कर दिया। उन्होंने पहले ही शुक्र (Vonus) की
परीक्षा कर देखा था कि वह गोलाकार है । एक दिन उन्होंने
विस्मयके साथ देखा कि वह तृतीया या चतुर्थीके चन्द्रमाके
पतले फलककी नॉई दिसाई देता है । इसके बाद वे नित्य रात
को शुक्रके परिवर्तनकी परीक्षा करने लगे। क्रमसे वह फलक
की श्रारुतिसे पूर्णचन्द्रकी तरह गोली भारुतिका हो गया।
उस समय उनके श्रानन्दका पार न रहा। इससे आपत्ति
रहित यह प्रमाणित होता है कि शुक्र ग्रह भी पृथनीके साथ
सूर्यके चारों ओर घूमता
कोपर्निकस पहले ही भविष्य कह गये कि यदि मनुष्य
की दृष्टिशक्ति अच्छी तरह बढ जाय तो दिखाई पडेगा कि शुक्र
ओर मगलग्रह चन्द्रमाकी तरह घटते-चढते है । गेलिलियो
ने परीक्षाके द्वारा इस भविष्यवाणीको प्रमाणित किया। विरो-
धियोंने इस नये प्रमाण पर विश्वास नहीं किया, बल्कि गेलि-
लिओपर उनका क्रोध पढने लगा। उन्होंने देखा कि यदि
गेलिलियोका मत स्वीकार करना पडानो पृथिवीको अनन्त
ज्योनियों में अत्यन्त छोटा मानना पडेगा। किन्तु बहुत समय
से वे जानते पा रहे है कि पृथिवी हो जगत्का केन्द्रस्थल हे,
ये अगणित तारे रातमें पृथिवीको प्रकाश देने के लिए ही रचे
गये है। इस नडे मतका परिवर्तन सहजम ही फेसे हो
सकता था?
शनिवलय (Saturn's Ring)
इसके पाट गैलिलियोने शनिग्रह की ओर अपना यन्त्र
हुमाया । इन्होंने शीघ्रही अाविष्कार कर डाला कि यह ग्रह
३६ वैधानिक-जीवनी। [दूमग परिच्छेद। एक तारा मात्र नहीं है, उसके दोनों ओर और भी दो छोटे छोटे तारे हैं। पीछे जाना गया कि ये दोनो तारे नहीं, ये दोनों उस गोले वलयके केवल प्रान्त भाग है जो इस ग्रहके शनिघलय । चारो और है । गैलिलियोका दूरवीक्षण यन्त्र बहुत उत्कृष्ट न था और इसलिए समग्र शनिवलय उनको न दिखाई पड़ा। १६५४ ईसवी में प्रसिद्ध ज्योतिषी हिउजेंसने वृहत्तर दूरवीक्षण यन्त्रसे समग्र शनिवलयका श्राविष्कार किया। गतिलिनी द्वारा देखा गया शनिवलय ० O ये सब अश्रुतपूर्व अचिन्तनीय अाविष्कार गेलिलिओने एक वर्ष के भीतर ही कर डाले। इसी एक वर्ष में परीक्षामूलक ज्योतिपकी कैसी शीघ्र उन्नति हुई यह उपर्युक्त आविष्कार- वृत्तान्त पढने से अच्छी तरह समझ पडेगा। उनके विरोधियो के विश्वास न करनेपर भी बहुतसे छात्र उनके शिष्य बन गये।
गैलिलिया।
वैज्ञानिक-जीवनी।
युरोपमें सर्वन उनका श्राविष्कृत दृग्वीक्षण यन्न तेयार होने
लगा और विभिन्न देशोके ज्योतिपो गेलिलिश्नोमा प्राविफार
अपनी अपनी परोनायोके द्वारा प्रमाणित करने लगे। क्या
प्रवल जलसावनके स्रोतको याल रोग सफती है ?
सूर्य-मलङ्क (Sun-spotsh
इसके बाद दूसरे साल सन् १६११ में गेलिलिओने सूर्य
की और अपनी दूरवीन घुमाई । हाय ! हाय । गेलिलिटो तुमने
क्या किया? जो सूर्य कविकरपनाके अनुसार देवताके प्रासनपर
आसीन है, जो सात घोडोंके रथपर चढकर प्रात काल पूर्व
दिशाम उदित होकर प्रवल प्रतापपूर्वक रथके पहियोके शब्द
से नमोमण्डलका प्रतिध्वनितकर धूमते घूमते शामको अपने
स्थानपर पहुंचता है, जिसकी पूजा, होम, तप, अत्यन्त प्राचीन
युगसे अय भी पृथिवीके नाना स्थानाम प्रचलित है, उसकी
ही और अपने छोटे यन्त्रको घुमानेका साहस तुमने किया ?
तुम्हारे विरोधी यदि तुम्हें एकबारगी मार न डालें तो हम लोग
उनका अत्यन्त दयालु कह कर उनकी प्रशसा ही करेंगे। गेलि-
लिभोने परीक्षा करते करते सूर्यमें कितने ही दाग या कलङ्क
(Sul-por-) देखे । हर वक्त ये दाग एकसा नहीं रहते, कभी
कभी फितने ही गुथ फर एक हो जाते है, कभी एकसे भी
अनेक हो जाते हैं । केवल इन दागोंका ही आविष्कार कर
गैलिलियो शान्त न हुए। उन्होंने देखा कि ये दाग फ्रम क्रमसे
लुप्त होकर फिर अट्ठाईस दिनके बाद दिखाई पडते है । इसके
द्वारा उन्होंने सहज ही प्रमाणित किया कि अट्ठाईस दिनमें
सूर्य अपने मेरुदण्डपर एक यार घूम श्राता है।
.
।
३८
वैमानिक-जीवनी। [दूसरा परिच्छेद।
गेलिलिओका विचार ।
अवतफ हमने गेलिलिओके वैज्ञानिक प्राविष्कारोंका
वृत्तान्त लिस कर अानन्द उठाया है। श्रव गेलिलियोके
दुःखपूर्ण जीवन-वृत्तान्तका परिचय दे ऑसूभरी आखोके
साथ उनकी पुण्यमय स्मृतिसे विदा लेना होगा।
१६१० ईसवी तक, अर्थात् अट्ठारह वर्पतक वे पदुयाम
थे। यहीं उन्होंने दूरबीनका, चन्द्रमण्डलमें पर्वतोंके होने का,
वृहस्पति ग्रहके उपग्रहोका, आविष्कार किया। क्रमसे इन
सब गवेपणाओंमें दिन रात उनका मतिष्क और मन इतना
व्यस्त रहने लगा कि विश्वविद्यालयमें वक्तृता देनेमें उनका
मन न जुटने लगा। इस समय वे यही चिन्ता करने लगे कि
अपना सारा वक्त विज्ञानकी सेवामें कैसे लगा सके। इसी
समय उनके ही शिष्य और वन्धु टास्कानीके ग्राण्ड ड्यूक कास्मो
द्वितीय (Cism II) ने अपनी राजधानी फ्लारेन्समें श्रानेके
लिए उन्हें खुला भेजा । गेलिलिओका जन्मस्थान पिसा नगर था
जो फ्लारेन्सके बहुत सन्निकट और राजधानीके अन्तर्गत था।
इसलिए उन्होने इस निमन्त्रणको सादर स्वीकार किया ।
किन्तु फ्लारेन्स जाना उनके लिए चाहे कैसा ही सुविधाजनक
क्यों न रहा हो, पर पदुया नगर छोडकर उन्होंने बडी भूल
की । कारण टास्कानी रोमन कैथलिक धर्मके एकछत्र
राजा पापकी क्षमताके अधीन था । इधर वेनिस राज्य
प्रजातन्त्र द्वारा शासित था और पोपकी क्षमताके विरुद्ध
था। पदुया नगर इस चेनिस राज्यके अन्तर्गत था , और इस
लिए वे माताकी गोदमें किलकते हुए बञ्चकी तरर
।
गेलिलिओ।] वैज्ञानिक जीवनी। ३६ निरापद थे। पदुया छोडनेके बादसे ही वे पोप की क्षमता के अधीन हो गये। उनके वन्धुवान्धवोंने बहुत कुछ उपरोध- अनुरोध किया, किन्तु पदुयामें रहना उन्होंने किसी तरह भी मजूर न किया। "नियत केन वाध्यते" ? पलारेन्स जाफर गेलिलिओने पहले पहल बहुत शान्ति पाई । उनकी ख्याति युरोपमें चारों ओर फेल गई, राजद्वारमें उनके सम्मानकी सीमा न थी। रुपये-पैसेकी भी कमी न थी। यहाँ छात्रोंके लिए वकृता न देनी पडती थी। वे जो चाहते थे वही हुआ। किन्तु क्रमश उनके विरोधी उनके मतोकी और पोपकी दृष्टि श्राकर्पित करनेकी चेष्टा करने लगे। श्रर गेलिलिओ पदुयामें नहीं थे, इसलिए उनके सम्बन्धके प्रश्न फ्लारेन्ससे रोम अनायास ही पहुँचने लगे। पोपसे यह बात कही गई कि वे अपने मतको पुष्टकर ईसाई धर्मके विरुद्ध काम फरते हैं। अन्त में २६५ ईसवी में पोप पचम पालने उनको रोम जाकर अपने कार्य पोपको दिखाने के लिए आदेश दिया। वे रोम जाने के लिए तेयार होने लगे, दूरबीन यन्त्र आदि भी साथ ले लिये । रोम पहुँचकर अपने यन्त्रोंके द्वारा सबको ग्रह-उपग्रहादि दिखाने लगे। एक दिन स्वय पोपसे मिलकर एक घटा वार्तालापकर उनको अपने प्राविष्कार समझा दिये । पोपने उन पर किसी प्रकारका असन्ताप प्रकट न किया। गेलिलिओने पयाल किया कि अर उनका सौभाग्यसूर्य चमका। वे और भी कुछ समय रोममें रहकर सपको अपना मत समझानेफी चेष्टा करने लगे। इससे उनके चिरोधी अनेक उच्चपदस्थ धर्मयाजक धीरे धीरे उन -
ट०
वैज्ञानिक-जीवनी। [दूसरा परिच्छेद।
।
पर खगहस्त हो गये । अव पोपको इस प्रश्नकी मीमांसा
करनेके लिए दवाने लगे कि कोपर्निकसफा मत बाइबलके
विरुद्ध है या नहीं। इस प्रश्नकी मीमांसा जाननेके लिए
गैलिलियो रोममें विलम्ब करने लगे। वे जानते न थे कि
उनका यहाँ रहना अब असह्य हो उठा है। वे अपने नये मत
के द्वारा ऐसे अनुप्राणित हो उठे थे कि वे यह समझ न सके
कि उनके लिए कौन सा मार्ग श्रेयस्कर है। अन्तमें निश्चित
हुआ कि कोपर्निकसका मत बाइवलके विरुद्ध है ।
कोपर्निकस और केपलरके ग्रन्थोका प्रचार बन्द करनेके
लिए आज्ञा हुई । गेलिलियोकी श्राशा हुई कि वे पृथिवीकी
सचलता न समझाने पायेंगे । गेलिलिओ भग्न हृदय हो
पलारेन्स लौट आये । वे श्रारभमें धर्मद्वेषी न थे। अपना
मत वाइबलके किसी अशके विरुद्ध होनेसे स्वय भी दु सी
थे, किन्तु सत्यका परित्याग कैसे करें ?
जो हो, गेलिलिओ गेमसे वापस आकर बहुत कुछ
शान्तिके साथ समय बिता रहे थे । १६२३ ईसवीमें पुराने
पोपने इहलीला सवरण की। कार्डिनल वारवेरिना उन्हीके
एक वन्धु सप्तम आर्वानके नामसे पोपके पदपर अभिषिक्त हुए ।
यह देखकर गैलिलियो बहुत कुछ निश्चिन्त हुए और उन्होंने
गेसी श्राशा भी की कि उनके सम्बन्धमें पूर्व पोपकी श्रामा उठा
ली जायगी । अपने बन्धुकी पदोन्नतिपर श्रानन्द प्रकट करनेके
लिए वे रोम गये । वहां नय पोपकी बातोसे बहुत सन्तुष्ट
हो अपने घर लौटे।
सन १६३२ में नये पोपके अनुग्रहपर निर्भर हो
उन्होंने "टालेमी और कोपर्निकसके ज्योतिपसम्बन्धकी
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वैज्ञानिक जीवनी। [दूसरा परिच्छेद । Kimantri- ३-घरके भीतर ले जाकर निर्यातनोपयोगी यन्त्र दिखाना। ४-कपडे आदि खुलाकर अपराधीको निर्यातनयन्त्रसे बाँध देना। ५-निर्यातन-क्रिया इस प्रकार निर्यातन क्रिया के बाद भी यदि अपराधी अपना अपराध न स्वीकार करे और अनुतप्त न हो तो निम्नलिखित चरम दण्ड उसे दिया जाता था। (६) कई वर्षो क लिए कैद रखना। (७) श्रागमें जीते जी जला देना। २१वी जूनको गेलिलिओ इस भयानक विचारालय के समक्ष उपस्थित हुए और २४ वी तारीसको इस स्थानसे वाहर निकले । इस विचारके समय जनसाधारण न जाने पाते थे और अपराधीको भी सव वाते गुप्त रखनेकी प्रतिज्ञा करनी पडती थी। विचारालयके कागज पत्र भी लोगोंको न दिसाये जाते थे। इसी लिए ये तीन दिन गेलिलियोको प्रति निर्यातन सहना पडा था या नही यह जाननेका कोई उपाय नहीं। श्राशा है, विचारकोंने इस पुण्यश्लोक वैज्ञानिकश्रेष्ठ वृद्धको निर्यातनको आज्ञा दे अपनी रसना कलङ्कित नहीं की। इसी समय दारण दुश्चिन्तासे उनका शरीर और मन एकबारगी भग्न हो गया फिर भी उनकी स्नेहमयी कन्या घश्यता स्वीकार करनेके लिए बार बार अनुरोधपूर्वक सन्देसा भेजने लगी। नाना कारणोंसे गेलिलियो और अधिक यन्त्रणा न सह सकने पर विचारकोसे कहाँ "आपलोग मुझे जो कहने के लिए
गतिलिया।]
चेज्ञानिक-जीवनी।
४३
आशा देंगे मैं वही कहने के लिए तैयार ह" तव विचारको
ने उनके लिए निम्न लिखित प्राशा दी।
(१) गैलिलियोने पृथिवीकी सचलताके सम्बन्ध में जिस
मत और विश्वासका प्रचार किया है उनको उसका प्रत्याहार
करना होगा।
(२) यावज्जीवन नामके लिए कैद रहना पडेगा।
(३) सात अनुतापसूचक प्रार्थना सगीतोंकी श्रावृत्ति प्रति
सप्ताह करनी होगी।
कार्डिनल नामके टस उच्च उपाधिधारी धर्मयाजक विचार
पति थे। उनमेंसे तीनने विचागलयकी गयपर दस्तखत
करना कबूल नहीं किया। शेष सातरी कलङ्कित लेखनीका
हस्ताक्षर अब भी उस विचारपत्रपर मौजूद है। गेलिलिओ
इस प्रकार पकडे जानेपर बाइवलको छूकर शपथ कानेके
लिए याध्य हुए। " सूर्य जगतका केन्द्रस्थल है और पृथिवी
सचला है यह बिलकुल असत्य है। इस विषयमें अबतक जो
विश्वास और धारणा थी वह सम्पूर्ण असत्य और धर्मशास्त्र
के विरुद्ध है। मैं प्रतिज्ञा करता हु कि भविष्यमें लिखकर या
योलकर किसी तरह इस असत्यका प्रचार न फरूगों।"
बहुतसे लोग कहेंगे फि गेलिलिओको इस तरहकी भूठी
प्रतिक्षाकर अपनी रसनाको कलङ्कित करना उचित न था
बरिक ध्रुनोकी तरह जलती श्रागमें श्रात्मसमर्पण करना ही
अच्छा होता। उनसे मेरा यह अनुरोध है कि वे इस हतभाग्य
वृद्धकी उम्न और उस समयकी शारीरिक और मानसिक
दुर्चलनाकी विवेचनाफर जरा करुणाकी आखोंसे उनकी
1
-
वैज्ञानिक जीवनी। [ दूसरा परिच्छेद
और देखें, और जो धर्मके नामपर मृत्युको 'भीषण मूर्तिक
भय दिखा सत्यको बलपूर्वक छिपाना चाहते थे उन सबक
यादकर यद दुआ दें।
कहा जाता है। कि इस प्रतिज्ञापत्रको पढ़ने के बाद E
गेलिलिओने उसी जगह अपने एक बन्धुसे चुपकेचुपके 'का
था " फिर भी पृथिवी सचल है।" किन्तु यह किम्बदन्त
सच नही जान पडती । क्योकि इस विचारालयमें और को
व्यक्ति न जाने पाता था।
गेलिलिओका यह प्रतिज्ञापत्र विश्वविद्यालय के छात्र
को पढ़कर सुनाने के लिए भेजा गया । गेलिलिओकी उस
वक्तकी भीषण मानसिक अवस्थाका चित्र चित्रकारक
लेखनी अङ्कित नहीं कर सकती । उनका हृदय लज्जा, रोप, क्षोभ
अपमानसे एकवारगी भग्न हो गया था। वे रोममें कुछ
दिन रखे जाकर सीनानामक स्थानको भेजे गये। यहॉर
उनका अपने देहाती घरको, पारसेत्री नामक स्थानको, जाने
की प्राज्ञा मिली । यहाँ उनकी स्नेहमयी कन्या उनकी सुश्रूष
करने लगी। किन्तु विधाताने गेलिलिओको बुढापेमें कन्या
का शोक भी सहाया । छ दिन भी बीतने न पाया था कि
उनकी स्नेहमयी कन्या वृद्ध पिताकी गोदमें सिर रखकर
अनन्त निद्राके वशीभूत हो गई।
अपमानित भग्नहृदय जराग्रस्त गेलिलिओका दिल फिर
भी कामसे न मुडा । अवरुद्ध अवस्थामें ही उन्होंने गतिशील
इन्यकी गति सम्बन्धी तीन नियम (Lms of motion)
स्पष्ट और ठीक तोरसे लिख कर एक पुस्तक लिख डाली
गैलिलिया।] वजानिक-जीवनी। ८५ इस दृटिसे यह ग्रन्थ ही उनका श्रेष्ट बैशानिक प्रन्थ है। युवावस्थामें उन्होंन पेण्डुलम के समगतित्व और पतनशील द्रव्यों के गति सम्बन्धी नियमों (Lisot filline bottles) का आविष्कार किया था और श्रव गतिशील द्रव्योंकी गतिके नियमोका आविष्कार कर वे गतिविज्ञान (alun nics) का जन्म दे गये । यद्यपि यही शेषांक नियम इद्गलेण्डर सर्वश्रेष्ठ वज्ञानिक श्राफर्पणक आविष्फर्ता निउटन के द्वारा सम्यक् रूप मे आलोचित हो कर उनके नामसे ही प्रचलित है किन्तु यह गॅलिलिओके इस ग्रन्थसे लिया गया है इसमें सन्देह नहीं । इस अमूल्य प्रन्यको स्वय प्रकाशित करने के लिए गेलिलियो को साहम नही हश्रा । उनके किमी छात्रने उसे हालेण्ड ले जाकर छिपे नारसे प्रकाशित किया। गेलिलिटी केवल परीता. मलक ज्योतिपके हो जन्मदाता नहीं, वे गतिविज्ञान के भी प्रतिष्ठाता है, इसका पता इस ग्रन्थ से लगता है। विधाता महापुरुपकी परीक्षा विपदके समय ही करते है। इसीसे देसते है भगवानने भक्तनालक ध्रुवकी विमाताके निर्यातनके समय परीक्षा लो, प्रह्लादकी भक्ति रिप पीनेमें, श्रागमें जलानेमें, समुद्रम फेकने में, आदि यावतीय विपदके समय अगट रहती है या नहीं इसकी बार बार परीक्षा ली। मालूम होता हे गेलिलिओकी परीक्षा अब भी समाप्त नहीं हुई, इसीसे उन्होंने गेलिलिओकी दृष्टिशक्ति भी छीन ली। पहले एक ऑख फल उठी। अनन्तर उसकी दृटिशक्ति चली गई। अन्तमें दोनों श्रॉखासे अन्त्र हो गये। इस समय वे निश्चय ही स्वर्गीय कवि रजनीकान्तकी मर्मस्पर्शी भाषामें भगवानसे मन ही मन,प्रार्थना करते थे • "अामाय सकल रकमे सर्दी फरेको गर्व करिते चूर। -
वैज्ञानिक-जीवनी। [दूसग परिच्छे
-
उन्होंने इसी समय अपने एक वन्धुगे लिखा :
"तुम्हारा प्रियवन्धु इस समय बिलकुल अन्धा हो रहा है।
से यह चराचर विश्व, यह असन्त नभोमण्डल, जिसके सम्ब
का ज्ञान मैं अपने अश्रुतपूर्व आविष्कारोके द्वारा शतसा
गुण बढा सका ह, मेरे निकट एकबारगी अदृश्य है । यही
भगवानकी इच्छा है तव में भी इससे लन्तुष्ट हु । ' इसी अ
अवस्थामें उनके शिष्य उनकी मेवा करते थे । इङ्गलेरा
महाकवि मिल्टनने भ्रमण करने के लिए इटलो आकर
समय गेलिलिओसे भेट की । उस समय उनकी अवस्था के
उनतीस वर्ष की थी । वृद्धावस्थामे जव चे भी अपनी श्री
कविताओं को लिसने के लिए अपनो कन्याओको कहते
तब निश्चय ही इटलोके इस ऋषिकल्प अन्ध वैज्ञानिक
चित्र उनके दृष्टि गर अङ्कित होता था।
अन्तमें उनकी मुक्ति दिन दिखाई पडे । अठहत्तर
की उम्रमें सन् १९४२ की म्बी जनवरीको उनका श्र
श्रात्मा नश्वरदेहको छोडकर न्वर्ग सिधारा । गेलिलि
मृत्युको शीतल गोदमें विश्राम पाकर जीवनको सब ज्वा
यन्त्रणासे मुक्त हुए। मृत्युक वाट भी उनके बैरियाने :
पर कृपाकटाक्ष न किया। पहले उन लोगोंने उनका पृथिवं
यथारीतिसे समादार न होने देने की चेटा की। उसमें श्रम
कार्य होकर उनका स्मारकस्तम्भ बनवानेका घोरतर विर
किया। ये अदूरदर्शी मूर्ख समझ नहीं सके कि वे अपने हाथ
ही अश्रुतपूर्व वैमानिक आविष्कारोके द्वारा ऐमा अतुलन
अनिन्यसुन्दर स्मारकस्तम्भ खडा कर गये है कि जिस
ज्योतिसे चिरदिन दिदिगन्त प्रकाशित होता रहेगा।
,
--
तीसरा परिच्छेद
लेवोसिये।
एक फरासीसी रासायनिक कह गया है-"रसायनशास्त्र
फरासीदेशीय शास्त्र है। उसके जन्मदाता अमरकीर्तिसम्पन्न
लेवोसिये है । यह उक्ति अत्युक्ति अथवा स्वदेशहितपणाप्रेरित
नहीं । असलमें ही यदि नव्यरसायनका जन्मदाता कोई
कहा जा सकता है तो निसन्देह वह फरासीसीदेशके प्रसिद्ध
पडित लेवासिये है। प्राचीन रसायन-जगत्में उन्होंने जो विप्लव
पेदा किया था, जिस तरह भ्रान्त धारणको हटा कर सत्यका
प्रकाश फैला समन यूरोपके वैज्ञानिक समाजको नवीन मार्ग
दिखलाया था उससे उनको नव्यरसायनका जन्मदाता कहे
चिना नहीं रहा जाता । बडेही आक्षेपकी बात तो यह है कि
इन महापुरुषको उन्मत्त फरासी विप्लवके समय अकालमें ही
प्राणदण्ड दे दिया गया। उसी समय एक दर्शसने कहा था-
"इस प्रकार के एक मनुष्यका मस्तक फाटनेमें एक मुहर्त भी
नहीं लगा, पर इस प्रकारका मस्तक सौ वर्षमें भी पैदा होगा
या नहीं, यह सन्देहकी बात है।
ऐटन लोरा लेवासिये (Antion Lauront Lovoister)
का जन्म १७४३ ईसवीके २६ अगस्तको मासके सुप्रसिद्ध
। राजधानी पेरिस नगरमें हुआ था । इङ्गलेण्डके सर्वश्रेष्ठ
वैज्ञानिक गणितशासवेत्ता विश्वाकर्षणके श्राविका निउटन
--
--
वैज्ञानिक-जीवनी। [तीसरा परिच्छे के ठीक एक सो वर्ष बाद लेवोसियेका जन्म हुआ। पाँच: को अवस्थामें ही उनको मातृवियोग सहना पडा। उनके पि धनाढ्य थे। उन्होंने पुत्रको शिक्षा देनेमें कोई त्रुटि न वं यहाँ यह कह देना आवश्यक है कि अंनेक वैज्ञानिक महापुर बाल्यकालमें ऐसे सौभाग्यशाली न थे, अनेकोंको अर्थामा कारण विद्याशिक्षाको सुविधा प्राप्त न हुई थी। अनन्तर अपनी ही साधनाके वलसे वैज्ञानिक गवेषणायें कर श्र हो गये हैं । लेवोसियेने प्रसिद्ध गणितशास्त्रशके पास गरि शास्त्र, उद्विदविद्या और प्राचीन रसायनशास्त्र सीखा थ रसायनाध्यापक प्रसिद्ध राउलके अध्यापनसे लेवोसिये दृष्टि रसायनशास्त्रकी पोर आकर्षित हुई । अध्यापक राउल अध्यापन पद्धति समग्न फ्रांसमें प्रसिद्ध यो और लेवासिर समसामयिक अनेक प्रसिद्ध रासायनिक उनके शिष्य थे लेचोसियेके पिताको इच्छा पुत्रको कानून पढाने की २१ वर्षकी अवस्थामें लेवोसियेने कानूनको परीक्षा पास' ली। किन्तु विज्ञान सीखनेकी और उनका स्वाभाविक आE या । इसलिए उन्होंने पाईन व्यवसायकी वासना त्याग विज्ञान चर्चाम जीवन उत्सर्ग करना स्थिर किया। इसी समयसे उनकी रासायनिक गवेपणाओंका श्रा हुया । वाईस वर्षको अवस्थामें उन्होंने अपना पहला प्रव लिसा । इसके याद दुसरे वर्ष उन्होंने "वडे नगरको पालोषि करनेका उपाय' नामका एक प्रवन्ध लिप फरासी पकाडे के वैज्ञानिक परिपटसे पक स्वर्णपदक प्राप्त किया और इ- वर्ष उक्त परिषद के.मभ्य निर्वाचित हुए । फ्रासदेशमें ज्योनिप, भूविद्या, रसायन आदि शाल प्रसिद पहित ही इस परिषद के सभ्य थे । उनके ससा लेवोसिये।1 वेशानिक-जीवनी। ४६ पढनेसे युवक लेवोसियेका अाग्रह मौलिक अनुसधानकी श्रीर बहुत बढ़ गया। मौलिक गोपणाकी प्रवृत्ति ठीक सफामक व्याधिकी तरह काम करती है। जैसे कोई सक्रामक व्याधि एक शरीरसे दूसरे शरीर में पहुँच जाती है, उसी तरह ससर्ग के गुणसे नवागत साधकको साधना प्रवृत्ति खत ही उत्ते जित हो उठती है। इस श्राकाताने जिसके हृदयमें एक बार सान पाया है, वे अनन्य कार्मा हो गवेपणा कार्यमें प्रवृत्त हुए ना न रह सके । इमो कारण देखा जाता है कि एक और पडी ऊँची ऊँची उपाधि धारण करनेवाले युवक इस प्रकार को आकाक्षासे अनुप्राणित न हो सकनेके कारण साधनाके मन्दिरसे विटा हो गये है, दूसरी ओर अनेक भाग्यवान युवक अल्पशिक्षित होनेपर भी ससर्गगुणसे ज्ञानार्जनकी अतृप्त आकांक्षासे व्याकुल हो साधनाके पथकी ओर अग्रसर हुए है। . फरासीसी एकाडेमोके सभ्य हर माल नाना विषयोका विवरण प्रकाशित करते थे । लेवोसियेकी असामान्य प्रतिभा और नाना शास्त्रोंमें पारदर्शिता देय कर एकडेमीके अधिकारियों ने उनपर ही सब मिनरणों के प्रकाशित करने का भार रख दिया। उन्होंने कई वर्षों में भिन्न भिन्न विषयोपर दो सौ विवरण लिसे हैं। इस प्रकारने फरासौली एकाडेमोसे उनका सम्बन्ध स्थापित हुआ। इस सम्बन्धकी उन्होंने श्राजीवन रक्षाकी घोर फरासीसी विप्लवके समय जब सय विद्वत् समाज बन्द करनेका प्रम्नान चल रहा था उस समर भी उन्होंने एकाडेमीकी पृतृवत् रक्षा करने की चेष्टा की थी, अपने बनसे प्राचीन जराजीणं वैज्ञानिको को मासिक वृत्ति देकर एकाडेमीको पचा रक्खा था । अन्तमें ३ वैज्ञानिक-जीवनी। [तीसरा उनकी सब चेष्टा व्यर्थ गई । उनके जीतेजी ही राजाज्ञासे फरासीसी एकाडेमीका अस्तित्व उठ गया। लेवासियेको रपये पैसे की कमी न थी । माताकी मृत्युके बाद वे बहुत बड़ी सम्पत्तिके अधिकारी हो गये थे। इस कारण सवने श्राशा की थी कि वे रुपया कमानेकी चेष्टामें न उलझकर अनन्यमनसे वैज्ञानिक गवेपणा जुटे रहेंगे। किन्तु भवितव्यताने यह न होने दिया। ज्याही उन्होंने विज्ञानके मन्दिर में एक पॉच रक्खा त्योही उनका दूसरा पॉव फॉसीकी लकडी की पहली सीढी पर जा पडा। वे फरमिये जनरल (Ferrarel General) हुए । उस समय फ्रांसमें जो लोग राजत्व और वाणिज्य शुक्ल-सग्रह करते थे वे फरमिये जनरल कहे जाते थे। वे कुछ तालुकोंका इजारा ले लेते थे और सरकार को छ वर्षका राजत्व एव वाणिज्य-शुक्ल पेशगी देते थे। निर्दिष्ट राजस्वके सिवा और भी कुछ रुपया राजा और राजकर्म- चारियोको भेट करना पटता था। फल यह होता था कि दरिद्ध प्रजापर यथेष्ट अत्याचार हुआ करता था । अत्याचार उत्पीड़न से तग पाकर प्रजा सरकारसे फरयाद करती थी,पर इसाफ न होता था। बल्कि निर्दिष्ट राजस्व न दे सकनेपर सजा दी जातीथी।प्रजा फरासीसी देशमें सर्वत्र ही इस प्रथाको मार्मिक घृणाको दृष्टिसे देखती थी। इनमें सद्व्यक्ति भी थे । लेवासियेने जमीदारीका भार ग्रहणकर इलाकेमें मुशहला और सुविचार का वन्दोवस्त किया, और वैज्ञानिक कृषि प्रणाली प्रवर्तित की। 'और और देशोसे भेड-बकरियॉ लाकर पशुओंकी सरया बढ़ाने लगे। किन्तु उनको भी उत्पीडित जनसाधारणने घृणाकी रष्टिसे देसा।
लेवोसिये।] वैज्ञानिक-जोवनी। પ? लेवोसियेका जीवन दो प्रकारके कार्यों में बीता-या प्रथम विज्ञानसेवा, द्वितीय देशसेवा। देशके नाना मगलमय कायौंके चे अगुवा थे, राजकीय विविध कार्योंमें वे राजाकी सहायता करते थे। विशेषत वे एक वा सरकारी वारुदखानेके अध्यक्ष' थे, और उन्होंने वारुद और तत्संतान्त अन्य द्रव्योंके तेयार करनेकी प्रणालीकी उन्नति की थी। यदि वे अनन्यमनसे विज्ञान, की सेवा करते, अपनी समग्रशक्ति विज्ञान की सेवामें लगाते, तो वे रसायनशास्त्रको नहीं मालूम कितनो उन्नलि कर सकते । जप वे चारो ओरसे विपत्तिसे घिर गये तब उन्होंने राजनीतिके कोताहलपूर्ण कर्मक्षेत्रसे विदा ले विज्ञानागारके चिरशीतल श्यामल स्निग्ध छायामें सम्पूर्ण रूपसे प्राश्रय ग्रहण करनेका एकान्त श्राग्रह दिखाया था। किन्तु उनके शत्रुओंने उनका पीछा न छोडा। सन् १७६४ ईसवीके मई महीने में उनपर और ओर मी सत्ताईस फरमिये जनरलोपर राजस्व सा जानेका अभियोग लगा। लेचोसिये जिन जिन अपरावोंके कारण राजद्वारमें अभियुक्त हुए थे उनमें तमाखूमें जल और अस्वास्थ्यकर पदार्थ मिलानेका अपराध अन्यतम था। जिस भीषण राष्ट्रविसबके समय पिता पुत्रको भूल गया था, भाई भाईका सिर काटनेमें जरा भी कुठित न हुआ था, उस समयमें तमासूमें जल मिला देना यदि अपराधमें गिना गया तो इसमें विचित्रता गया है ? विचारपति काफिनाल इन श्रवाईस हतभाग्योंका विचार कर रहे थे। उसी समय उनके वैज्ञानिक गवेपणाओं और देशहितकर कार्योंके कारण उनको मुक्त करनेके लिए बहुतसे गण्यमान्य लोगों के हस्ताक्षरसे पक प्रार्थनापन विचार- । પુર वैज्ञानिक-जीवनी। [तोसरा परिच्छेद । -----... << > पतिके समक्ष पेश हुश्रा । उनकी ओरसे उनके वकीलने जो अर्जी पेशकी थी उसमे लेवासियेने अपनी प्रारभ की हुई एक वैज्ञानिक गवेपणाको पूर्ण करनेके लिए समय प्रदान करने की प्रार्थना की थी। कफिनालने उन सब प्रार्थनापत्रों की ओर कुछ भी ध्यान न देकर कहा था-'फरासीसी साधारणतन्त्रमें वेशा- निककी जरूरत नही, न्यायविचार होना ही यथेष्ट है। इन अट्ठाईस हतभाग्यों को प्राणदडकी सजा देनेकी उनको इतनी फिक्र थी कि वे जल्दी जल्दीमें जूरियों को राय लिपना गये थे। भवितव्य वडा प्रवल होता है । कई महीनोंके वाट काफिनाल अभियुक्त हुए और अपने धमके कारण जूरियों की राय न लेने से ही उनको प्राणदडकी सजा हुई ।। दूसरे दिन ये अट्ठाईस जन वध्यभूमिपर लाये गये।। लेवोसियेने अपने ससुरका सिर कटते देखा । उन सवने ऐसी स्थिरता ओर गभीरतासे दण्ड ग्रहण किया कि उपस्थित जनता देखकर चकरा गई । उमने कोई भी अपमानसूचक वाग्य नही सुना। इस प्रकार ५१ वर्षको अवस्थामें आधुनिक रसायनके जन्मदाता लेबोसियेने घातकोको अपना प्राण समर्पित किया। उनकी अकाल मृत्युसे समन यूरोपका विद्वत्समाज लज्जित, क्षब्ध और दुसित हुप्पा या । कुछ दिन याद रोरेस्फियारके पतनसे फरासोसी देश के जनसाधारण अपनी भूल समझ सके। दूसरे वर्ष लेवोसियेकी पुण्यतिका सम्मान करनेके लिए सरकारकी श्रोरसे बडे आयोजन के साथ उनकी अन्त्येष्टि क्रिया हुई थी । लेवोसियेकी मृत्युके पीछे उनकी पत्नीने . - ।। - । .
लेवासिये।]
वेज्ञानिक-जीविनी।
फाउण्ट रमफर्ड नामके एक दूसरे प्रसिद्ध वेज्ञानिकसे विवाह
कर लिया।
लेवासियेने नवीन रसायनशास्त्रकीसृष्टि कैसे कोथी, इसको
अच्छी तरह समझने के लिए, उस समयकी रसायनशास्त्र
की श्रवस्था बताना और उनके समसामयिक अन्य रासायनिकों
के कार्यो की आलोचना करना आवश्यक है । यूरोपमें ग्रीक
और अरव विज्ञान के जन्मदाता कहे जाते है। भारतके अतीत
गौग्यके जमानेमें हिन्दू-श्राचार्य विज्ञान जिन सब तथ्योंका
श्राविकार कर गये हे उनका परिचय सभ्य जगत् क्रमश
पाता जा रहा है । इस विषयमें अनुसधानके लिए अब भी
वहुत क्षेत्र पड़ा है। इस अनुसधानका गुरुभार अवतक पाश्चात्य
पण्डितीपर था, वह भार कमसे हम लोगांपर आ पड़ा है।
इस परिवर्तनका फल बुरा नहीं, अच्छा ही हो रहा है। कारण
पाश्चात्य पण्डिन्न इस विपयमें चाहे केसे ही व्युत्पन क्यों न
हो, पर वे भारतवर्पकी भाषा और आचारसे अनभिश है।
इसके सिवा ग्रीकोपर उनकी स्वाभाविक प्रीति भी कही
जाती है । इन सर अनुसंधानोंके कारण देखा जाता है कि
लेनोसियेक प्रतिष्ठित नवरसायनके जन्मके पहले जिस तरह
यूरोप और मिश्रमे एक प्राचीनतर रसायन विद्यमान था उसी
तरह भारतके उर्चर क्षेत्रमें भी उसका वीज प्रकुरित हो काल
कममे, बर्दित, पुष्पित और फलयुक्त हो पीछे सूख गया था।
अनेक विषयों में भारतका रसायनशान उस समयके ग्रीक
और परीय रसायनशानसे अधिक उन्नतिशाली था ।भारतमें
नागार्जुन, चक्रपाणि, यूरोपके पारासेलससके कई शताब्दी
पहले वर्तमान ये।
,
५४ वैज्ञानिक-जीवनी। [तोसरा परिच्छेद दो प्रधान विपयोंके उपलक्ष्यसे इस रसायनशास्त्रकी- उन्ननि हुई थी -एक चिकित्साके लिए श्रीपध-सग्रह करने के कारण, दूसरे कृत्रिम उपायोंसे निकृष्ट धातुको सुवर्णमें परि- णत करनेके कारण, भारत और यूरोप दोनों जगहोंमे ही इस प्रकारसे रसायनशास्त्रकी पुष्टि हुई थी। फिर भी भारतमें चिकित्साही रसायनशास्त्रका मुख्य अवलम्ब था । जबतक शानकी उन्नतिक लिए रसायनशास्त्रकी चर्चा शुरू न हुई थी तबतक उसकी उन्नति जल्दी न हो सकी । इङ्गालैण्डके सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक रावर्ट बेल कृत्रिम सोना बनानेवालोंके हाथसे रसायनशास्त्रको उवारकर उसको स्वतन्त्र विज्ञान के रूपमें प्रतिष्ठित करनेकी चेष्टा की । उनकी जीवनव्यापी चेष्टासे रसायनशास्त्र, रसायनशानकी उन्नतिके लिए पढा जाता है, और उसकी आलोचना होती है। स्वाधीन चिन्तासे उसकी प्राणप्रतिष्ठा होती है, और मौलिक गवेपणानोसे उसका फलेवर दिन दिन पुष्ट होता रहता है । इस प्रकारसे प्राचीन रसायनसे नबरसायनके जन्मको सभावना सूचित होती है। प्राचीन रसायन में दूसरी त्रुटि यह थी कि वह परिमाणा न्मक (quantitative) शास्त्र न था। अमुक पदार्थके साथ अमुक पदार्थको मिला देनेसे अमुक पदार्थ वन जाता है, किन्तु अमुक पदार्थका कितना परिमाण अमुक पदार्थक कितने परि- माणके साय मिलानेसे कितने वजनका पदार्थ बनता है, इसका निर्णय नहीं। प्राचीनरसायनमें भी रासायनिक प्रक्रियाके समय नराजू उठाने का अधिक रिवाज न था । लेवोसिये एक नव्यतर रसायन शास्त्रकी प्रधान सृष्टि कर सके थे । उसका प्रधान रहस्य यह है कि उन्होंने रासायनिक प्रक्रियामें पद पदपर
लेवोसिये।]
चैज्ञानिक-जीयनी।
५५
तराजूफी मदद ली थी। इस प्रकारसे वस्तुगत शास्त्र परिणा-
मात्मक हो गया।
वस्तु नष्ट नहीं होती।
वस्तु विनष्ट नहीं होती, यह महासत्य प्राचीन दार्शनिकोंने
युति द्वारा प्रमाणित किया था। उनके मतानुसार पृथिवीके
सव पदार्थ पचभूत द्वारा गठित और नष्ट होनेपर सव
फिरपचभूतमें मिल जाते ह । अर्थात् सृष्टिपचमूतका एकी फरण
है ओर विनाश पचभूतमें फिर मिल जाना है । इस प्रकारके
प्रमाणसे बस्तुका अविनश्वरत्व स्पष्ट रूपसे समझ पडता है।
लेवोसियेने इस अनुमानको तराजूफी कसोटीपर फसकर
परीक्षामूलक सत्यमें परिणत किया था । यह पहले ही कहा
चुका है प्राचीन समयके लोगोंने तराजूका अधिक उपयोग
करना न सीसा था । वे युक्ति, परपना और अनुमानके द्वारा
सत्यका सघान करते थे। विशन इन सब सत्याको परिमाणा-
स्मफ परीक्षामूलक सत्यमें परिणत करनेकी चेष्टा करता है। इसी
परिणामक विज्ञानके एक प्रधान प्रतिष्ठापक लेवोसिये थे।
वस्तुको अविनश्वरता प्रमाणित फरनेके लिए लेवोलियेने
निम्नलिखित परीक्षा की थी। काचकेवने हुए एक बडे बकयन्त्र
(glass retorth में निर्दिष्ट तोलका टिन वा रॉगा डाल कर
उसे बालुका यन्त्रमें तबतक गरम किया था जबतक रॉगा
गल न गया था। गरमी देनेसे जो वायु वाहर निकल गया उसे
उन्होंने संग्रह कर तौला । इसके बाद वकयन्त्रका बारीक
मुँह बन्दकर उसे तोला । अनन्तर चयनको फिर गरमी
देने लगे और क्रमसे रॉगेको भस्म करने लगे। वायु जितनाही
५६
वैज्ञानिक-जीवनी। [तीसरा परिच्छेद ।
।
अधिक होगा रॉगा उतनाही अधिक परिमाणमें भस होगा।
जब देखा कि अव रॉगाका भस्म और अधिक नहीं होता
तब बकयन्त्रको ठढाकर फिर तौला । देखा, उसका वजन
न घटा ही है और न वढा ही, ठीक है । यद्यपि रॉगभस्म हो
गया था, यद्यपि एक रासायनिक क्रिया हो गई थी, तथापि
रासायनिक क्रियाके पहले और पीछेका वजन समान ही था।
वकयन्त्र ठढाकर उसका वारीक मुँह फिर सोल दिया
और तव देखा गया कि वाहरका वायु उसके भीतर सशब्द
प्रविष्ट हुआ । क्यों वायु प्रविष्ट हुआ ? रॉगने भस्म होते समय
भीतरके वायुका कुछ अश सींच लिया था। वकयन्त्रका मुह
खोलनेके समय वाहरका वायु उस शून्य स्थानको ग्रहण
करनेके लिए सशब्द प्रविष्ट हुना। लेवोसियेने फिर इस
वायुपूर्ण यन्त्रको तौला। देखा, वजन प्राय १० ग्रेन चढ
गया है। इसके बाद रॉगभस्म और वाकी रॉग एक साथ
तौल कर देखा कि जितना रॉग लिया था उसकी अपेक्षा
रॉगभरसका वजन बढ गया है। रॉगभस्मका वजन कितना
अधिक वढ गया है? उन्होने देस पाया कि वकयन्त्रके
भीतर वायुका वजन जितना घट गया है ठीक उतनाही
रॉगकी अपेक्षा रॉगके भस्मका वजन बढ़ गया है। गरम
करनेके वाद वरुयन्त्रका मुँह खोल देनेसे जितना वायु प्रविष्ट
हुआ, उसमसे बकयन्त्रका मुँह वन्द करनेके पहले ऑच देते
वक्त जितना वायु बाहर निकल गया था उसका वजन,
निकाल
देनेसे जितना वजन घट गया था उतना निकलेगा।
तभी देखा गया कि रॉगका भस्म बनाते समय कोई नई
चीज़ पैदा नहीं हुई । निर्दिष्ट वजन का रॉग और निर्दिष्ट वजन
लेवोसियो]
वैज्ञानिक जीवनी।
पू७
-
?
का वायु दोनो सयुक्त हो रॉग भस्ममें परिणत हो गये है। रॉग
भस्मका वजन उतनाही है जितना रॉग और वायु का मिलकर
था। इस प्रकार सय रासायनिक प्रक्रियाओंमें वस्तुका केवल परि-
चर्तन होता हे, उत्पत्ति या विनाश नहीं होता। सबने ही देखा
होगा कि पत्ती जलते, जलते छोटी हो जाती है, मृतदेह
श्मशानपर जलकर राख हो जाती है। प्रश्न यह उठता है कि
क्या वास्तव में वत्ती या मृतदेहका विनाश हुआ ? सर्पपके
समान बीजसे धीरे नीरे पडे पट जैसे वृक्षार्की उत्पत्ति होती
है । प्रश्न यह है कि पा किसी नई चीजको उत्पत्ति हुई
असलमे यह बात नहीं । रासायनिक परीक्षा द्वारा सिद्ध हुश्रा
हे कि बाती जलकर वायुके अम्नजनके साथ मिल जल भोर
कार्बोनिक एसिड गैस पैदा करती है, और ये दोनों पदार्थ
एकत्र कर तौलनेसे देखा जाता है कि उनका मिलित वजन
वत्तीके वजनसे घटता नहीं, बल्लि बढ़ जाता है । बढ जानेका
कारण सयुक्त अन्नजनका वजन है । उसी प्रकार मृतदेहको
जलानेसे उसका कुछ अश भस्म हो जाता है, कुछ भाप और
गैसमें बदल जाता है। वीजसे अच्छा पडा वृक्ष पेदा होनेसे
नई वस्तुको उत्पत्ति नहीं होती। किसी अज्ञात शक्तिके वलसे
वीज चारों भोरसे गैस जल, माद वायु प्रादि ग्रहण कर
वृतम परिणत होता है। यदि उतना जल, साद आदि तोला
जाता तो देखा जाता कि उनका मिलित वजन वृक्षके वजनके
रायर ही है । असलमें, जगतमें यदि रासायनिक प्रक्रियाके
साथ साथ नई वस्तुकी उत्पत्ति श्रोर विनाश होता तो वस्तुओं
की अधिकता या अस्पतासे जगत्का नाश हो गया होता।
वस्तुफे अविनश्वरत्व पर ही समन रसायनशास्त्र प्रतिष्ठित है।
चैज्ञानिक-जीवनो। [तीसरा परिच्छेद । लेबोसिये इस भित्तिको परिमाणात्मक सत्यमें परिणतकर रसायनशास्त्रको परिणामात्मक शास्त्र में परिणत कर गये हैं। फ्लजिष्टनवाद । प्राचीन रसायनशास्त्रमें केवल दो प्रधान श्रनुमान (theory) प्रचलित थे-एक वेशेषिक दर्शनकार कणाद और ग्रीक दार्शनिक डेमोकाइट्स और एपिकिउरसका परमाणुवाद (alomic theory), और दूसरा एरिष्टाटलका चतुर्भूतवाद और हिन्दूदर्शनका उन्नतत्तर पचभूतवाद । १७२० ईसवीमें जर्मनीके सुप्रसिद्ध रासायनिक स्टाल (stahli ने फलजिष्टन- वाद नामके तीसरे अनुमानका प्रचार किया । उसको इस विषयकी जिज्ञासा हुईकी जलनेवाली चीजें जव जलती है तब क्या रासायनिक क्रिया होती है ? लकडी, कोयला, गन्धक आदि वस्तुए श्रागमें छोडनेसे क्यों जलती है ? लोहा, पारा, रॉग आदि वातुयें जब ताप देनेसे भस्ममें परिणत हो जाती हैं, तब क्या रासायनिक परिवर्तन होता है । इस विषयपर विचार करने करते स्टालने अन्तमें निश्चय किया कि सब जलनेवालो वस्तुओंमें कोई एक ऐसा पदार्थ है जो जलते समय उस वस्तुसे उड जाता है। उन्हों। इस पदार्थका नाम फ्ल- जिप्टन (Phlogiston) रक्पा । जिस वस्तुमें जितना ही अधिक फ्लजिप्टन होता है, वह वस्तु उतना ही अधिक जलती हे । उनके मतके अनुसार दहनक्रिया लकडोंके जलनेके अनु- सार चाहे जल्दी हो या धातुमारणकी तरह धीरे धीरे हो- जलनेवाली वस्तुसे फ्लजिप्टन अगल होनेके सिवा और कुछ नहीं होता। ऐसा होनेसे धातुभस्म फ्लजिप्टनहीन धातुमात्र
लेगोसिये]
वैज्ञानिक जीवनी।
५६
हो जाता है। स्टाल जानते थे कि सीसेका भस्म, रॉगका भस्म
'आदि धातुभस्मकी कोयला आदि अङ्गारमुलक पदार्थोके साथ
जलानेसे फिर मूल वातुमें परिणत हो जाते हैं। यह विषय
उन्होंने अपने अनुमानकी सहायतासे
सूब
सरलतासे समझा
'दिया। उन्होंने बतलाया कि धातुभस्म जब फ्लजिष्टन हीन
पातुके सिवा और कुछ नहीं हे तव कोयलेकी मददसे उसमें
पलजिप्टन मिला देनेसे वह फिर धातुमें परिणत हो जायगा।
स्टारके इस अनुमानके अनेक परिपोपक हो गये । अनुमान
जवतक परीक्षित तथ्यके विरद्ध नहीं होता तनतक ग्रहणीय होता
है । स्टालके अनुमानका सत्यासत्य एक परीनामूलक तथ्यपर
निर्भर था। वह यही था कि यदि स्टालका अनुमान सत्य हे,
अर्थात् जलते समय यदि कोई पदार्थ निम्ल जाता है, तो
वस्तुके जल चुकनेपर उसका वजन अवश्य घट जायगा ।
लकडीके एक टुकडेके जलनेसे जो भस्म बनेगा उसकी तौल
लकडीकी तौलसे अवश्य कम होगी। किन्तु लकडीके जलते
समय भस्मके सिवा और भी चीजें बनती है जो भाफरूपमें
उड जाती हैं। इन सबके वजनका निर्णय करना कठिन है।
इस कारण लफडीके भरसके द्वारा स्टालके अनुमानका सत्या-
सत्य प्रतिपन्न नहीं हो सकता। धातुको जलानेसे केवल धातु
भस्म बनता है। अब देखना है कि प्राप्त धातुभस्मका वजन
मूलधातुके वजनसे कम होता हे या अधिक। यदि कम होता
हे तो स्टालका अनुमान सत्य है और यदि अधिक होता है तो
चह मिथ्या है। स्टालके पूर्व ही परीक्षा-द्वारा प्रमाणित हो चुफा
था कि धातुका भस्म बनानेपर धातुको अपेक्षा भस्मका वजन
यढ जाता हे, घटता नहीं। रावर्ट रयेलने रॉगका भस्म बनाकर
-- वैज्ञानिक-जीवनी। [तीसरा परिच्छेद। wnxx. . .---zerman> प्रमाणित किया था कि गृहीत रॉगकी अपेक्षा रॉगका भस्म बहुत अधिक होता है। जान मेयो नामक इङ्गलेण्डके और एक प्रसिद्ध रासायनिकने एण्टीमनी नामक धातुका भमकर दिखाया था कि चातुभस्म गृहीत धातुके वजनकी अपेक्षा अधिक है। इनकी परीक्षाका फल स्टालको मालम था, किन्तु वे इस ओर कुछ ध्यान न देते थे । कुछ समयके वाद जव रासायनिकोंकी दृष्टि इस ओर घूमी तय फ्लजिटनवादके पक्षपातियोमें गडवडी फैल गई। किसी किसीने उसकी एक व्यर्थ मीमासा करने के लिए कहा- फ्लजिएनमें वजन नहीं, वह मध्याकर्षणके द्वारा पृथिवीको और पारुष्ट न हो कर विपरीत दिशामें उठ जाता है। इसलिए इसके मिल जानेसे वस्तुका वजन घट जाता और अलग हो जाने पर बढ जाता है । यह एक बडी अद्भुत मीमांसा थी । यदि फ्लजिष्टन मध्याकर्पणके द्वारा आकृष्ट नहीं होता तो वह किस जातिका पदार्थ है और कैसे दूसरी वस्तुओसे मिल जायगा। अनेक दिनोंकी सञ्चित धारणा सहज ही नहीं जाती। इस विषयमें इस प्रकारकी एक काल्पनिक मीमासासे सन्तुष्ट होने से उस समयके रासायनिक फ्लजिष्टनवादमें भूल देखकर भी देख न पाये। इस फ्लजिएनवादमें भ्रम दिसाकर रसायनशास्त्रको नई नीच पर स्थापितकर लेवोसियेने गोरवमण्डित महाकीर्ति कमाई । उनके समसामयिक इङ्गलेण्डके विख्यात रासायनिक आसेफ प्रिष्ट और हेनरी केवेण्डिस, स्काटलैण्डके जासेफ ब्लाक, स्वीडनके शिले आदि यारतीय रासायनिक ही इस फ्लजिप्टन वादके परिपोषक थे। उस समयके समग्र रसायनशास्त्रकी । - .
लेवोसिये ।। वैज्ञानिक-जोपनी। ६१ परिभाषा फ्लजिनवादको परिभापाको लेकर बनाई गई थी। इस सम्बन्धके नाना विघ्न वाधाओं और आपत्तियोका सण्डन कर लेवासियेने निर्भय हो फ्लजिष्टनवादको भ्रममूलक बताया। नई पातमा पहले पहल प्रचार करने में उसपर पहले लोग विश्वास नहीं करते । अन्तमें सत्यकी जय अवश्य ही होती है। इस सम्बन्धम पहले अनेक लोग ही लेवोसियेके विरुद्ध हो गये। कमसे सत्यको जय हुई। किस प्रकार लेवोसिये फ्ल- जिनवाट सम्बन्धी नम अच्छी तरह दिया सके, इसकी पर हम यहाँ आलोचना करेंगे। मिष्टलेके द्वारा अम्लजन (oxygen) का आविष्कार। धातुके वजनकी अपेक्षा धातुके मसका वजन अधिक होता है, इस सच्चे आविष्कारके बाद फ्लजिप्टनवादका पतन अवश्यम्भावी हो गया । किन्तु जब तक धातुभसका वजन चढनेका कारण टोक मालूम न दृया था, तबतक फ्लजिएन- वादके विरुद्ध लेगोसिये किसी नये मतका प्रचार न कर सके। इस कारण लेवासिये इस बातका निश्चय करनेकी चेष्टा करते रहे कि किस पदार्थके मिल जानेसे पातु भस्ममें परिणत हो जाता है। सोभाग्यसे उनके समसामयिक इहलेएडके दो विख्यात रासायनिकोंने दो अत्यन्त प्रयोजनीय शानिक तथ्योंके श्रानि- प्कार किये । जासेफ प्रिप्टले (Joseph Priestles) के द्वारा अन्नजन और हेनरी फेवेण्डिस ( lonry Covendish) के वैज्ञानिक-जोवनी। [तोसरा परिच्छेद। - । द्वारा जलका रासायनिक स्वरूप श्राविष्ठत हुआ। इन दो अविष्कारोंके होनेसे लेवोसिये फ्लजिष्टनवादको हमेशाके लिए रसायनशास्त्रसे विदूरित कर सके। नम्नजनके श्राविफर्ता जासेफने सन् १७३३ ईसवी में प्रिष्टले इगलेएडके अन्तर्गत लिडस नामक शहरके निकटवर्ती फोल्ड- हेडस् नामक स्थानमें जन्म लिया था। वे दरिदकी सन्तान थे और उनको छ. वर्षको उम्रमें ही उनकी माताको मृत्युहो गईथी उनकी बहनने उनको पाला-पोसा था । वाल्यकालमें वे रसायन- शास्त्रकी शिक्षा न पा सकेथे। उत्तर कालमें वेधर्मयाजको पद पर प्रतिष्ठित थे। ये इङ्गलेण्डके नाना स्थानों में धर्मयाजक रह कर सन् १७६१ में लिडस्में मिलहिल चैपेलके धर्मयाजक हुए। सौभाग्यसे उनके गिरजाके बगलमें ही शराव बनानेका कार- खाना था। शराब टपकाते समय एक प्रकारका वायु वाहर निकलता है, जिसे हम अङ्गाराम्न (Carbonic acid gar) कहते है । प्रिष्टलेने इस वायुको परीना करना चाहा । इस वायुकी परीक्षा करना प्रारभ करके उन्होंने इतनी वायुनोंके स्वरूपका आविष्कार कर डाला कि वे रसायनशास्त्रमें 'वायचीय रसायन- के जन्मदाता' कहला कर प्रसिद्धि पा गये । इस समयकी तरह उस समय दुमञ्जिली या तिमजिलो, नाना यन्त्रोंसे भरी-पूरी रसशालायें न थी। प्रिप्ट लेके रासाय- * Chemical laboratory को अर्थ में रसशालाका प्रयोग किया गया है। रसरत्नसमुच्चयमें रसशाखाका विस्तृत विवरण है। इसलिए रासायनिक परीक्षागार प्रादि शब्द गहनेकी जरूरत नहीं। -
सिये]
वैज्ञानिक-जीवनी।
क यन्त्र थे-लम्बी लम्बी शीशियाँ, बोतल, काग, जलपात्र,
डेको थेलियों आदि सामान्य वस्तुये। किन्तु इन्हीं सामान्य
सी बोतलोकी सहायतासे मिष्टले, अम्नजनका अाविष्कार
- वायुका आशिक स्वरूप निर्णयफर, जलके स्वरूप निर्णयके
गंका आविष्कारकर, हाइड्रोक्लोरिक ऐसिड गैसकाअाविष्कार,
रासायनिक जगत्में यशस्वी हो गये है । नाना प्रकारको
युसम्बन्धी उनको परीक्षाका फल एक वृहत् ग्रन्थमे प्रका.
त किया गया है, जिसके तीन खण्ड है। उनके समस्त
विप्फारोंका वर्णन करनेके लिए यहाँ स्थान नहीं, हम यहाँ
वल उनके अनजनके आविष्कारके सम्बन्ध की ही
बलोचना करेंगे।
मिष्टलेके पास एक अच्छा आतशी शीशा था। वे इस
तशी शीशाके द्वारा सूर्यताप एकत्रकर उसी तापसे नाना
व्योकी परीक्षा करते थे। इसी उपायसे लालपारदभस्मको
रम करते समय उन्होंने देखा कि उससे एक तरहफी गैस
नकल रही है। उसकी परीक्षा करनेसे देखा कि वह साधा-
ण वायुसे भिन्न है । साधारण वायुकी अपेक्षा इस गेससे
मवत्ती अधिक अच्छी तरह जलती है। इस गैसम तथा
समपरिमाण साधारण गैसमें उन्होंने कुछ चूहे छोडकर देता
के साधारण वायुकी अपेक्षा इस गेसम चूहे अधिक चाण
जीते रहते है। स्वय भी इस वायुको सूंघनेकी अपनी इच्छा
एक न सके । ये लिख गये है-
"यह गैस {पने यक्त फेफलीपर उसयी प्रिया साधारण
गयुसे भिन्न नही मालूम हुई, किन्तु सूचनेके कुछ देर पादाक
शतीमें अधिक स्वच्छन्दतामा अनुमय सुभाया । कासानार में
।
वेज्ञानिक-जीवनी। [तीसरा परिच्छेद । । शायद च, पाय विलासकी सामग्रो हो जाये। प्राज तक मेरे साय दो चूहोने भी इस धायुके मेयनशा सुख अनुभव किया है। प्रिएलेको भविष्यवाणी बहुत कुछ सफल हुई है। श्रमजन यद्यपि अब तक भो पिलासको सामग्रियों में स्थान नहीं पा सका है तथापि मृतप्रय व्यक्ति अलजन सुंघाफर कुछ समय तक बचाया जा सकता है। इस प्रकार मिष्टले लाल पारेके भस्मको गरम कर साधा रण वायुसे भिन्न गुणवाले नये वायुका अविष्कारफर दूसरी चीजोंमें उसे ढ ढने लगे। सिन्दूर (Red led) को गरमकर देखा कि उसमें भी पूर्वोक्त वायु पाया जाता है । इस प्रकार वे इस नवीन वायुका अस्तित्व निसन्देर प्रमाणितकर सके । इस नये वायुका नाम 'फ्लजिष्टनहीन वायु रक्सा । साधारण वायुको अपेक्षा इस वायुमें मोमबत्ती अधिक अच्छी तरह जलती है। कारण इसमें साधारण वायुकी अपेक्षा फ्लजिष्टन कम होना है, इस प्रकारके भ्रान्त सिद्धान्लपर वे मी श्रा पहुंचे। इस नये वायुके अविष्कारको खवर लेवोसियेके कानोंतक पहुंची। उनकी सूक्ष्म दृष्टिने देखा कि यह नया वायु पल जिप्टननादका मोहमय प्रावरणको दूर करेगा । वे पहले प्रिप्टतेकी परीक्षाका विचार करने लगे, किन्तु उनकी चिन्ता लहरी दूसरी ओर झुक गई । उन्होंने सोचा कि जब मोम वत्ती साधारण वायुकी अपेना इस नये वायुमें अधिक उज्ज्वल तासे जलती है तब साधारण वायुझी अपेक्षा इस नये वायुमै कोई अन्य वायु मिश्रित हे और बत्तीके जलते वक्त यह नया वायु यत्तीके उपादानसे सयुक्त हो जाता है । साधारण वायुसे लेवोसिये।] पेशानिक जीवनी। ६५ इस नये वायुको निकालने के लिए ये सचेष्ट हुए और निर्दिष्ट तोलका पारा एक बयन (hetort) म रक्सा । पारके एक पानमें आशिक भाषसे निमज्जित वायुपूर्ण घटाकृत काचपात्र (bell jar) में इस वकयन्त्रके मुंहको प्रविष्ट कर दिया। पहले फागजके एक टुकडेसे काचपायके वायुका परिमाण माप कर वकयन्त्रमें पारेको रय पारर दिन पाँच दी। कमसे देसा गया कि वायुका परिमाण प्राय ६ भागमसे एक भाग कम हो गया हे और यकयर स्थित पारेके ऊपर लाल र भस्म तेयार हुई है । फाचपानमै बचे हुए वायुकी परीक्षा करके देखा कि उसमें अर वत्तो नहीं जलती। अनन्तर तैयार मुय लाल पारदर्भसको गरम करनेसे उनको उसमंसे नया वायु बहुत कुछ प्राप्त हुआ । इस परीक्षाके द्वारा वे साधारण वायुमें इस नये घायुका अस्तित्व निस्सन्देह प्रमाणित कर सके। उन्होंने यह भी दिखलाया कि साधारण वायुमें जो यह नया घायु रहता हे वर पारेमे सयुक्त हो जाता है और इससे पारद- भस तेयार होता है । इसी प्रकार अन्य यातुनोमें भी इस वायुका सयोग होनेसे उनका भस्म तैयार होता है। वे जो खोज रहे ये वह इतने दिनोंके याद मिला । उन्होंने इस नये वायुका नाम थलजस रस्खा। अब उन्होंने इस बातका प्रचार किया कि फ्लष्टजिनवाद बिलाल भ्रम भरा है । धातुके भस्मको तौलनेपर उसका वजन घटता नहीं बल्कि पढ जाता है। वजनकी इस वृद्धिका कारण नोर कुछ नहीं-यातु साधारण वायुके अन्यतम उपा- दान अनजनसे सयुक्त हो जाता है । जन धातुभम्म प्रहार आदिको प्रॉच टेनेपर यातुमें परिणत हो जाता है, तब श्रहार वैज्ञानिक जीवनी। [तीसरा परिच्छेद । , धातुके अम्नजनके साथ सयुक्त हो श्रङ्गारास्न (Lai bonne incid gas) में बदल जाता है और असयुक्त धातु रह जाता है। फ्लजिप्टन नामका कोई पदार्थ नहीं, वह कप्टकल्पना मात्र है। पहले पहल उनके नवीन मतकी पुष्टि किसीने न की । क्रमसे उनके जीतेजी ही, डि मरविड, वार्थोले, फुरक्रय श्रादि करा सीसी और ब्लाक श्रादि स्काच रासायनिकोंने उनके मतकी पुष्टि की । केवल मिस्टले और केवेण्डिस आजीवन फ्लजिप्टन- वादी बने रहे। केवेण्डिसके द्वारा जलका रासायनिक विश्लेषण किन्तु अवतक लेवोसियेका अनजनवाद एक विषयकी मीमासा न कर सका था। इसके पूर्व ही यह मालूम था कि यशद (inc) आदि धातु जब जलीय हाइड्रोक्लोरिक या सलफ्यूरिक अनमै द्रवीभूत होते है तब उद्जन (Hydrogen) नामक एक बहुत हलका गैस वाहर निकलता है एवं धातु भस्म होकर अनसे सयुक्त हो लवण (salt) में परिणत हो जाता है। फ्लजिष्टनवादी कहते थे कि यह अत्यत हलका उद्जन ही फ्लजिप्टन है , योर अनके सयोगसे धातुसे फ्लजिप्टन निकल जाता है और अवशिष्ट धातुभस्म रह जाता है। लेवोसियेने इसके उत्तरमें कहा कि यह उद्जन वायु हलका होनेपर भी वजनदार है । फिर उसके निकल जानेपर धातुभस्मकी तौल धातुके तौलकी अपेक्षा क्यों बढ जाती है ? उन्होंने फ्लजिप्टन वादियोंका भ्रम दियला दिया सही, किन्तु अपने मतके अनुसार कोई अच्छी मीमासा न कर सके।
लेवोसियो।] वैज्ञानिक-जीवनी। ६७ इसी समय इडलैण्डके तात्कालिक अन्यतम प्रधान रासाय- निक केवेण्डिसने जल का रासायनिक स्वरूप निर्णय किया। प्राचीन ग्रोकोका भत या कि विति, अप, तेज और वायु इन चार पदार्थोंके सयोगसे पृथिवीके यावतीय पदार्थोकी उत्पत्ति हुई है। प्राचीन भारतके प्राचार्य इन चार भूतोंके सिवा व्योम नामक सूक्ष्मतर मौलिक पदार्थकी करपना कर गये है। वैज्ञा- निकोंके कठोर हाथमे पड जानेसे अज्ञातकुलशील व्योम' के सिवा अन्य चार भूतोंका भूतत्व लुप्त हो गया है । मिस्टले, केवेरिडस, सिले, लेवोसियेकी गवेषणाओंसे साधारण वायु अम्नजन और नाइट्रोजन नामक दो पदार्थोका मिश्रण प्रमाणित हुआ है। केवेण्डिसने जलका यौगिकत्व प्रमाणित कर दिया। हेनरी केवेण्डिसका जन्म एक घडे घरमें हुआ था-ड्यूक श्राफ डेवेनसायरके पोत्र और लार्ड चार्ल्सके जेठे लड़के थे। उनका जन्म सन् १७३१ ई० में हुआ था और दोवर्पकी उम्र में ही मातृहीन होगये थे। उन्होंने पहले हेक्नी स्कूल में और अनन्तर केम्ब्रिज विश्वविद्यालयमें शिक्षा प्राप्त की थी। वे एक भिन्न प्रकारके मनुष्य थे-किसीसे बहुत मिलते जुलते न थे, बहुत कम यातचीत करते ये शोर यद्यपि वे बहुत कुछ लिप गये है, किन्तु अपना नाम प्रकट करनेमें वे बहुत डरते थे और इसलिए उनके लेख रहुतही कम प्रकाशित हुए थे । बुढापेमें बहुत धनवान हो गये थे। किन्तु उनका खर्च बहुत कम था। वे अपने कपडे लत्तेकी ओर भी अधिक ध्यान न देत थे। भोर उनके धरफा साज-सामान उनके प्रकृति के अनुसाही था। जिस परमें बैठक खाना था, उसो घरको उन्होंने अपना मंधान यन्त्रागार बना लिया था। दूसरे मजिलके कमरोंको उन्होंने
वैज्ञानिक-जीवनी। [तीसरा परिच्छेद ।
मानमन्दिर बना लिया था। उनकी मृत्युके समय केवल एक
नौकरमात्र उनके पास था ! किन्तु जब उनको मालूम हुना
कि उनका आखिरी वक्त श्रा पहुंचा है, तो उन्होंने नौकरको
विदा किया और हुक्म दिया कि आध घटेके पहले न आना।
नौकरने लौट पाकर देखा कि उनके मालिक संसारसे कूच
कर गये है।
यह चिरनिर्जनताप्रिय, ससारविरागी, कुछविकृत मप्तिफ
अगरेज अपना समग्र जीवन भारतके साधनानिरत योगियों-
की तरह विज्ञानकी सेवामें विता गया। वे अङ्कशास्त्र, ज्योतिष
और रसायनके असाधारण पण्डित थे । उनको केवल इन
विपयोका श्रासामान्य ज्ञान ही न था, वे इन विद्याओके
सम्बन्धकी बहुतसी मौलिक गरेपणायें भी कर गये है। वे ।
पृथिवीका आपेक्षिक गुरुत्व निर्धारित कर गये है, वायुका
परिमाणात्मक रासायनिक विश्लेषण कर गये है, ताप सम्बन्धी
परिमाणात्मक नियमका अाविष्कार कर गये हैं, और जलका
यौगिकत्व प्रमाणित कर गये है । इस प्रकार क्षिति, अप,
वायु ये बतुर्भत उनकी सूक्ष्म दृष्टि और परीक्षाके बाहर न
थे। वे पनी प्रत्येक परीक्षामें लेपोसियेकी तरह तराजूका
उपयोद करते थे। इसीलिए कोई कोई अगरेज उनको
रसायनशास्त्रका जन्मदाता कहनेका अभिमान करते हैं।
केण्डिसने जिस परीक्षाके द्वारा जलका यौगिकत्व प्रमा-
णित किया था, प्रिस्टलेने भी उनके पहले वही परीक्षाकी थी।
किन्तु वे इस परीक्षाके गृढ मर्मका अनुसरण न कर सके थे।
प्रिस्टीन काचके एक बरतनमें
उद्जन और साधारण वायुको
मिश्रित किया और उसे वैद्युतिक स्फुलिङ्ग '(elete 10 spar} =)
,
लेवासिये।]
वज्ञानिक-जीवनी।
६६
के द्वारा जलाया। इन दोनो वरतुओंके मिलनेपर उन्होंने काच
के परतनके भीतरी भागमें कुछ जलविन्दु देखे । उन्होंने सोचा
फि उद्जन और वायुके रासायनिक सयोगसे यह जल नहीं
वना है, बल्कि शायद वायुमें रहे जलीयवाप्पसे बना है।
साराशमें, उन्होंने इस जलकी श्रोर पहले ध्यान नहीं दिया।
यदि ध्यान देते तो वे ही जलके रासायनिक उपादानके
प्राविष्कारका नाम हासिल करते। केण्डिसने प्रिस्टलेकी
परीक्षाफी पुनरावृत्तिफर मन ही मन ठीक किया कि यह जल
कोई अवास्तव पदार्थ नहीं है, वह उद्जन और वायुके
नम्नजनके सयोगसे पैदा होता है । क्रमश उन्होंने परीक्षा द्वारा
दिपलाया कि समग्न उद्जन गैस और साधारण वायुका
पञ्चमाश एकत्र मिलकर जल में परिणत हो जाता है । एक वक्त
वे इस उपायसे १३५ ग्रेन विशुद्ध जल नेयारकर सके थे। ऐसे
जलमें न कोई स्वाद होता था और न गन्ध ही । वह गरम
करनेसे सब भाफ वनकर उड जाता था।
फेण्डिस इतनेसे ही सन्तुष्ट न हुए । चे वायुकी जगह
विशुद्ध अन्नजन ग्रहणकर परीक्षा करने लगे। उन्होने परीक्षा
द्वारा दिखलाया कि एक भाग अनजन और दो भाग उद्जन
मिलाकर गरम करनेसे सर गैस जलमें बदल जाता है, असयुक्त
अन्नजन या उद्जन शेप नही रहता । इसलिए दो भाग उद्जन
और एक भाग अनजन मिलनेसे विशुद्ध जल बन जाता है।
सन् १७८३ में, सर चार्ल स ब्लागडेन नामके फेवेण्डिसके
एक बन्धु पर सहकारीने इन सब परीक्षाओंका फल लेवोसिये
को दिखाया । लेवोसियेने तुरन्त ही केवेण्डिसकी परीक्षा पुन
की। इससे उनको जल प्राप्त हुआ। उन्होंने जलीय वाम्पको
Co वेज्ञानिका जोवनो। [तोसरा परिच्छेद । पोसिलेनके नलमे गरम लोहे पर चलाकर उससे उद्जन वायु प्राप्त किया। इस परीक्षामें जलीय वाप्प अलग होकर अम्नजन- में परिणत होता है, और अनजन गैस लोहेसे संयुक्त होकर श्राफसाइड श्राफ आयर्नमें परिणत होता है और उद्जन बाहर हो जाता है । श्रर इस दो प्रकारकी परीक्षा द्वारा जलके रासायनिक खरूपके सम्बन्धमें श्रोर सन्देह न रहा । लेवोसिये केवल इन सब परीक्षाओंसे सन्तुष्ट न हुए। फेवेण्डिसको फ्लजिष्टनवादकी सत्यताके सम्बन्धमें सन्देह न था। इससे इन सव परीक्षाओं के भीतर छुपे गूढ़ सन्यका सधान उन्होंने न पाया। लेवोसियेकी असाधारण अन्तदृष्टिने इसका सधान पाया था। उन्होने अव देखा कि यह श्रावि- प्कार पलजिप्टन वादियों की बची-खुची श्राशा भी दूर कर देगा। धातु और जलीय अनके सयोगसे उद्जन कैसे पैदा हो जाता है, अवतकमें उन्होंने इसकी सुन्दर मीमासा कर दी। उन्होने कहा कि इसमें इस प्रकार रासायनिक प्रक्रिया होती है-पहले जल अलग होकर अम्नजन और उद्जनमें परिणत होता है और पीछे अनजनके साथ धातुसे सयुक्त होनेपर धातुभस्म वनता है। वहीं धतुभस्म अन्नके साथ सयुक्त हो लवण (elt) में परिणत होता है और उद्जन वायु अविकृत अवस्थामें बाहर निकल पाता है। इसलिए धातु और जलीय अनके सयोगसे कारपनिक फ्लजिष्टनकी उत्पत्तिकी कोई सचाई मो नहीं । जलके अलग होनेपर एक ओर उद्जन वायु बाहर निकलता है और दूसरी धातुभस्म तैयार होता है । इतने दिनोंमें लेगोसियेका जीवनव्रत उद्यापित हुश्रा ।
लेवोसिये।] वैज्ञानिक-जीवनी। nik-Samri--- लेवोसियेके द्वारा ल्फजिष्टनवादका उच्छेद हुआ । उसका विवरण पढनेसे जाना जा सकता है कि किस प्रकार धीरे धीरे एकके बाद दूसरे वेज्ञानिक सत्यका प्राविफार हुआ । इसी फ्लजिष्टनवाद का सत्यासत्य निर्धारित करनेके लिए कितने ही महापुरप समग्र जीवन उत्सर्ग कर गये है। राबर्ट वेल, हुक, मेयो, ब्लेक, प्रिस्टले सिले, चार्गमान, केवेण्डिस, कारोयन, रादार फेार्ड, जेम्स वाट, और सर्वोपरि लेवोसियेका गौरव- मण्डितका नाम इनके साथ सयुक्त है । अगरेजीमें एक वाक्य है-"A chemist is the most patient annunal, even the rss not expected"-अर्थात् चिरसहिष्णु गदहेकी अपेक्षा भी रासायनिकको सहिप्णु बनना पडता है। किसीने अशेष सहिष्णुताके साथ सारी जिन्दगी नाना प्रकारकी परीक्षाओं में विता दी है, किसी किसीने फिर इन्ही परीक्षाओंका अवलम्ब ले किसी नये अनुमानका प्रचार किया है । सिद्धान्तमें, सपही साधनको जीवनका मुरय उद्देश्य वनागये हे , शानकी उन्नतिको ही एकमान ध्रुव सत्य समझकर शानको सेवामें जीवन बिता गये है। बहुतसे लोग खयाल करते हैं कि करपनाशक्तिका प्रयोजन केवल कविको ही होता है, किन्तु यह सयाल विलकुल ही ठीक नहीं। क्या कवि, क्या दार्शनिक, क्या वैज्ञानिक सवको ही करपनाशक्ति, भाव प्रवणताकी वेसीही जरूरत होती है। इसी कल्पनाशक्तिके वलसे वैज्ञानिक स्थूलमें सूक्ष्म देखते हैं, बहुदूरस्थित नननोंकी गति नयनोंके सम्मुख देखते हैं, जडजगत्के प्रत्येक अणुपरमाणु, सृष्टि-स्थिति प्रलय, पावर्तन- विवर्तन, आकृति विकृति न देयकर भी देख पाते हैं।
चौथा परिच्छेद माइकेल फराडे मै यदि कहूँ कि आपके घर जो हिन्दुस्तानी चालक अख वार पहुंचा पाता था, वह या उनके दलमेंसे कोई एक सम- यान्तरमें डाक्टर सर जगदीशचन्द्र वमुकी तरह वैज्ञानिक हो गया अथवा दफूतरीके दूकानों में जो लडके खाताबही बनाते है उनमेसे कोई मन्त्रवलसे डाक्टर प्रफुल्लचन्द्र रायकी तरह रासायनिक हो गया तो पाठक क्या आप मेरी वातपर विश्वास करेंगे? आप विश्वास करें चाहे न करें में आपको ऐसे ही एक महापुरुपका वृतान्त सुनाऊँगा। उनके जीवन में असम्भव भी सचमुच सभव हो गया था। दरिद लोहारकी सन्तान माइकल फराडे लडकपनमें अखवार पहुँचानेका ही काम करते थे। भविष्यजीवनमें वे ही एक अद्वितीय रासायनिक और पदार्थतत्वविद् हो अशेष ख्याति पैदाकर गये । एक चिन्ताशील लेखकने प्रतिभा (genius) का स्वरूप बताते हुए लिखा है-Genius consists in the capacity of taking unlimited pains" अर्थात् अशेप परिश्रम करने की क्षमताही प्रतिभाका लक्षण है। किन्तु मालूम होता है, परिश्रम करनेकी क्षमतासे ही प्रतिभाका परिचय प्राप्त नहीं होता। इसके सिवा दैव, प्रतिमानुषिक मानसिक और नैतिक शक्ति प्रतिभामें प्रछन्न रूपसे विलसती है। हिन्दूशास्त्रकारोंने पूर्व जन्मार्जित सुकृतिका फराडे।] वैज्ञानिक-जीवनी। ७५ अस्तित्व स्वीकार किया है। इस प्रकार कोई सुकृति न होनेसे लोहारकी सन्तान माइकेल फराडे किस पुण्यपलसे श्राज विश्वके इतने नरनारियोके पूज्य हो गये हैं। माइकेल फराडेका जन्म सन् १७८१ के १२ सितम्बरको इङ्गलेण्डके अन्तर्गत न्यूटन नामक स्थानमें हुआ था। वे पिता माताकी तीसरी सन्तान थे और उनके जन्मके बाद उनके पिता देहातसे इङ्गलेण्ड चले आये । उनके पिता रुपये पेसेसे इतने तगदस्त रहते थे कि सन् १८०१ में दुष्कालके समय उनको दातव्य साहाय्य ग्रहण करना पड़ा था । इस समय माइकेल कभी केवल एक रोटी खाकर सात दिन निकालने पडे थे। माइकेलकी लिखाई पढ़ाई फिर कैसे हो । तथापि उनके पिता माताने उनको स्कूल भेजा था । बालक माइकेलने स्कूलमें लिखना पढना और साधारण हिसाय निकालना सीखा था। सन् १८०६ में तेरह वर्षको अवस्थामं माइकेल फराडे जार्ज रिवो नामक एक कुत्तुवफरोश और दकरी की दूकानमें असवार पहुँचानेके कामपर नौकर हुए । घर घर अखवार पहुँचाना उनका मुरय काम था। सभव है, एक घरसे दूसरे घरका फासला एक मीलसे भी ऊपर रहा हो । इस सरह कुछ दिन बीतने पर, १०५ ई. के अपर महीनेसे जिल्द- बन्दी सीसने लगे । जिल्दनन्दी तो बहुतसे लोग करते हैं, पर सव पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति सवकोनहीं होती। माइकलमें जो प्रतिभा फल्गु नदीकी तरह अन्त सलिला हो रही थी, उसीने उनको पुस्तकें पढ़ने में प्रवृत्त किया। माइकेल जिरवन्दीके - चैज्ञानिक-जीवनी। [चौथा परिच्छेद अवस्थामें चे डाक्टर वेडोज नामक एक चिकित्सकके सहकारी नियुक्त हुए । इस समय डेवी नाइट्स ाक्साइड नामक गैस की परीतामें लगे थे। पहले वैज्ञानिकोंको धारणा थी कि यह गैस बहुत विषा होती है। अपने शरीरमें इस गैसकी क्रियाकी परीक्षा करनेकी गरजसे वे साहसकर इस गैस को सूघने लगे। कई मिनट के बाद वे बेहोश हो गये, किन्तु बेहोशीकी हालतमें उनको मालूम होने लगा कि मानो वे अमरावतोमें सुखपूर्वक विचर रहे हैं और साथही हस रहे थे। थोडी देर बाद ही वे होशमें श्राकर उठ बैठे। उस समय शरीरमें कुछ भी ग्लानि न थी। उसी समयसे यह गैस हास्योदीपक गैसके नामसे प्रसिद्ध हुई है। इस अद्गत गैलका स्वरूप श्रावित करनेके वाद डेवीका नाम वैज्ञानिक समाजको परिचित हुआ। सन् १८०१ में रायल इप्टीट्यूशनकी स्थापना हुई और काउण्ट रमफोर्ड (Count Ramtord)ने उनको यहाँ सहकारी रासायनिक परीक्षक नियत किया। वे विज्ञान सम्बन्धी नाना गवेपणाोम लग गये। सन् १८०७ में उन्होंने बिजलीकी मददसे काप्टिक पोटाश (caustic potash) और कास्टिक सोडा (canstic Soda) नामके दो तीवण क्षारों को विलिप्ट कर पोटासियम (potassiun) और सोडियम (Sodium) नामकी दो धातुओंका श्राविष्कार किया। इस उपायसे मेगनेसियम (magnesium) वेरियम (barium) केलसियम (caleum) और एनसियम (Strontiam) नामक और चार धातुओका आविष्कार किया। किन्तु एक हिसावसे उनका सर्वप्रधान वैज्ञानिक आविष्कार सेफटी लेम्प (safetv-lamp) था। कोयलेकी खदानमें नाना प्रकारकी जल उठनेवाली फराडे।] वैज्ञानिक जीवनी। た गैसें होनेसे उनके भीतर किसी प्रकारका प्रकाश लेजाना पहले विपदजनक था । डेवी अपने नये लेम्पका आविष्कारकर खदानके भीतर काम करनेवाले लासों मनुष्योंकी प्राण- रक्षाकी व्यवस्था कर गये है। डेवीमें वक्ता देनेकी क्षमता अद्भुत थी। उनकी वक्तृता सुनने के लिए मुण्डके झुण्ड पुरुष और स्त्री आते थे । यूरोप और अमेरिकाके विख्यात अध्यापकौकी वकृताओंमें विशे- पता यह होती है कि वे अपने अपने आविष्कारके विषयपर ही यकृता देते है । हमारे देशमै मौलिक गचेपणाभाका अभाव होनेसे विश्वविद्यालयोंमें पुरानी गवेपणाओंकी ही श्रालोचना होती है । इस विभिन्नताका फल विभिन्न ही होता है। एक ओर केवल चर्वित चर्वण होता है, पढ़ी विद्या पढाई जाती है, दूसरी ओर नये नये तथ्यों के श्राविकारकी ज्वलन्त काहिनीका अनिवार्य आकर्षण श्रोताओंके मनमें अनुराग जगा दिता है। एक ओर पुस्तकस्थ विद्याको कठ करनेके सिवा और कुछ फल नहीं होता। दूसरी ओर वक्ता के बाद र्शका अनुकरण करनेकी प्रवल श्राकाक्षा श्रोतानीको श्राकुल कर देती है । फराडे गेलरीके एक कोनेमें बेटे एकाग्रचित्तसे डेवीकी अपने श्राविकार सम्बन्धी भावमहिमामयी वक़्ता सुनते थे। धीरे धीरे देवीका चेज्ञानिक आदर्श उनके मनमें भी उदित होने लगा । दरुरीका काम अन उनशे रुचिफर न मालूम होने लगा। अब ये इस वातकी चिन्ताम व्यग्र रहने लगे कि केसे दारीका काम छोडकर अति दीनभावसे भी विज्ञान की सेवाकर सके।
वेशानिक जीवनी। [चौथा परिन् वैज्ञानिक वक्तृतायें सुननेकी उनको ऐसी प्रयल इ रहती थी कि वे प्रत्येक वक्तताके कारण एक शिलिङ्ग खर्च क भी ४३ न डरसेट ग्रीटमें रहनेवाले मिस्टर टटमेरके रातको भाउ बजे वक्तृता सुनने जाते थे। उनके पास पैस रहता था, उनके भाई राबर्ट ये सव वक्तृतायें सुननेके । उनको पर्च देते थे। वे ये सब वक्तायें सुनकर ही निश्चिन हो जाते थे, उनका सारमर्म कापीपर लिख लेते थे और शित यन्त्रका चित्र भी खीच लेते थे। १८१२ ईसवीके सात अक्टूबरको इन्होंने रिवोके प दारीकी शिक्षा समाप्त की । इसके बाद उन्होंने दरी पेशा धारिलयार किया। कुछ दिन पेशा चलनेपर उन देखा कि वे दहतरीका काम सीखते वक्त विज्ञानचर लिए जितना समय पा जाते थे उतना अव नहीं मिल इसलिए अबसे उन्होंने इस बातका दृढ़ सकल्प किया कि जैसे हो दप्तरीका काम छोड देना ही होगा। इसके पहले उन इङ्गलेण्डकी रायल सोसायटी नामक विख्यात घेशानि सभाके सभापति जासेफ़ चैकस्को विज्ञानचर्चाके विष अपना एकान्त श्राग्रह प्रकटकर वहाँ एक नौकरीके लिए भेजा था। सभापति उनके इस दु साहसका उत्तर क्या प्रब उन्होंने सर हेम्फ्री डेवीको एक पत्र लिखनेका विच किया। वे लिख गये हैं-"इसका अपना पेशा छोड़ने विज्ञानकी सेवा करनेकी मेरी इच्छा इतनी बढ़ गई कि में साहसकर हेम्फ्री डेवीको एक पत्र लिखा। मुझे यह धार- हो गई थी कि मेरा निजी पेशा नीच शोर स्वार्थपरतापूर्ण है वैज्ञानिक लोग सदाशय और महत् व्यक्ति होते हैं इस पत्र में
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सानिक-जीषिनी। [चौथा परिच्छेद
स्युशनके परिचालकगणोंको सभाके कार्य विवरण में निम्न
लिखित प्रस्ताव स्वीकृत हुश्रा । प्रस्ताव इस प्रकार लिखाहै-
"सर हेमफ्रो डेवीने इष्टीट्यूशनके परिचारकवाको सूचना दी
है कि उन्होंने एक व्यक्तिक सम्बन्ध सूचना पाई है जो
विलियम पेन का परित्यक्त, पदग्रहणकरनेकी इच्छा रसता है।
उसका नाम माइकेल फेराडे है । उसकी अवस्था वाईस वर्ष की
है। वह सुशील कर्मठ, प्रफुलचित और बुद्धिमान मालूम होता
है। मिस्टर पेनजो वेतन पारहे थे उसी चेतनपर काम करनेके
लिए वह राजी है।
"श्रतएव स्थिर हुआ कि माईकल फेराडे मिष्टर पेनकी जगह
उसी वेतन पर नियुक्त किये गये।"
"यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवतितादृशी".--फेराडे अब
तक जिसकी इच्छा कर रहे थे, वही प्राप्त हुआ । पचीस
शिलिग साप्ताहिक वेतनपर रायलइष्टीट्यूशनके सहकारीका
पद उनको प्राप्त हुआ और रहने के लिए ऊपरी मजिलपर दो
कोठरियाँ भी मिली।
यूरोप-भ्रमण
फेराडे अाग्रहपूर्वक अपना काम-काज करने लगे। डेवं
इसी समय नाइट्रोजन क्लोराइड नामक अत्यन्त विष्फोरक पदार्थ
की परीक्षा कर रहे थे। जरासी भी असावधानी हो जानेसे
यदि यन्त्र फटजाय तो प्राण जानेका डर है । इस सम्बन्ध
डेनीने फेराडेको अपना सहकारी क्लाया। इससे स्पष्ट समभ
पडता है कि उनको फेराडेकी दक्षताका विश्वास हो गया था
।
फैराडे।] चैज्ञानिक-जीविनी। वे दोनो काचका वर्म और शिरस्त्राण पहन कर इस विप्फोरक पदार्थकी परीक्षा कर रहे थे और किसा प्रकारकी विपत्ति न आनेसे स्पष्ट समझ पडता है कि फेराडेने बडी सावधानी और निपुणतासे अपनाकर्तव्य पूर्ण किया था। सन् १८१७ में डेवीने यूरोपमें भ्रमण करना चाहा ओर फेराको साथ ले जानेको प्रस्ताव किया। नाना देशोके प्रधान प्रधान वैज्ञानिकोसे मिलने जुलनेकी सम्भावना, उनकी कार्यप्रणाली सीखनेकी सुविधा, उनका विशानागार अपनी आखोसे देखनेका सुयोग फेराडे छोड न सके, केवल पुस्तके पढ़ लेनेसेही विद्याशिक्षाकी इतिश्री नहीं हो जाती, इसीलिर यूरोपके रुती छात्र विश्वविद्यालयसे निकलनेके बाद समस्त यूरोपके प्रख्यात अध्यापकोंके विज्ञानशालामे कई वर्ष काम- फाज फर शिक्षा पूरी करते है। महतोंके ससर्गसे पुण्य सचय होता है, यह अस्वीकार करनेका उपाय नहीं । उनकी वातों ओर कार्य प्रणालीमें पली एक श्राकर्षणशक्ति होती है, उत्तेजना का ऐसाभाव होता है कि उनके पास रहनेसे शिक्षार्थी भी उनके भावोंसे अनुप्राणित हुए बिना नहीं रह सकता। इसीसे फेराडेने इस यूरोप यात्रामें प्रकृत शिक्षा प्राप्त की थी। भ्रमणमें निकलनेका बन्दोबस्त होने लगा। डेवीके साथ उनकी पत्नी, फराडे ओर एक नौकर जानेवाला था। किन्तु श्रन्त में चलते वर नौकरने घर छोड़कर बाहर जाना कबूल नहीं किया। फेराडे डेवीके सहाकारी रूपमें जा रहेथे, किन्तु साथ नोकरके न जानेसे उनकी अनिच्छा होनेपर भी नोकरक भी कुछ काम करने पडतेथे। फेराडे यूरोप-भ्रमएकी चातें, ।
वैज्ञानिक-जीविनी। [चौथा परिच्छेद ।
स्मरणीय घटनायें एक वहीपर लिखते जाते थे। उसके पढनेसे
जाना जाता है कि यूरोपका प्रवास उनके लिए नितान्त सुख
कर नहीं हुआ । विशेपकर डेवीकी पती उनपर प्रभुता
दिखाने के लिए उनसे नाना प्रकारके नीच कर्म करानेकी चेष्टा
करती थी। वे यह सब सहकर और डेढ वर्पतक यूरोपके नाना
देशोमै धूमकर और अनेक वैज्ञानिकोंसे मिल-जुलकर मानव
प्रकृतिका एव विज्ञान सम्बन्धी अशेष ज्ञान प्राप्तकर सके थे।
पहले पहल कासको राजधानी पेरिस नगरमें अनेक फरा-
सीसी वैज्ञानिकोसे उनका साक्षान हुआ। एक दिन श्राम
पियर लिमेण्ट और डेसरेमे नवाविष्कृत आयोडिन नामक
मौलिक पदार्थ डेवीको दिखाने लाये थे। डेवीने पेरिसमे उसकी
कितने ही प्रकारसे परीक्षा की। वहाँ तीन महीने विता सब
इटलीकी ओर चले । उनकी गाडीको ६५ श्रादिमियाने हाय
लगा कर पाल्प्स पर्वत पर चढाया था। पहले सव टिउरिन
शहरमें पहुचे। वहांसे जेनेवाकी यात्राकी। जेनेवा चलनशील
विद्युत् (Ourrent Electricity) के श्राविष्फळ, वयोवृद्ध,
शानवृद्ध बाल्टा (Uolta) से भेद हुई । यहाँ डि ला राइव
(De Le Rive) नामक और एक वैज्ञानिकसे फैराडेका परि-
चय हुआ। वे फेराडे के गुणोंके इतने पक्षपाती हो गये कि
एक दिन डेवी और फेराडेका निमन्त्रणकर भेजा। डेवीने इस
निमन्त्रणको स्वीकारनही किया, कारण फेराडे उनके नोकरका
कोई कोई काम करते थे और इससे उनके साथ साना न
सा सकतेथे। डि ला राहवने इस उत्तरसे दुसितहो कहा-
'ऐसा हे तो मुझे एक भोजके बदले दो भोज देने होंगे।"
फैराडे उनकी इस सुजनताको कभी न भूले । उनको प्राज़ी-
।
फेराडे।] वैमानिक-जीविनी। ५ धन इसकी याद रनी रही। पीछे डिलाराइव के पुत्रको फेराउने लिखा था- श्रापके पिताके प्रति कृता । चे वय जेनेनाम और अनन्तर चिट्ठी पत्री द्वारा मुझसो उत्साहित यया मजीवित कररक्सा था। डेवी जेनेवासे अपने दलबल के साथ फ्लारेंस पहुचे । यहाँ फेराडेने गेलिलियो (Galltho), के व्यवहत दूरवीक्षण यन्त्रको विस्मयपूर्वक देसा। इस छोटेसे यन्त्रके जरिये पुण्यश्लोक गेलिलियोने नेशगगनके तारायासे रातमेसत्यता स्थापित की थी। गैलिलियो को वैज्ञानिक सत्यके प्रचारके लिए सरकारने गिरफ्तार दिया था किन्तु उनके वादको पीढियोने अपना भ्रम जानकर उनकी दुरचीनको बड़े यससे सुरक्षित रस छोटा हे । फ्लारेंसमें कोई एक महीना वितार मर गेम पहुँचे । यहॉसे नेपलम नगर देखकर विसूवियस नामक ज्वाला- मुखी पर्वतको देखने गये । इसके बाद फिर जेनेवाको लोट आये । वहाँसे नाना देशोंमें भ्रमणकर सन् १-१५ ईसवीके अप्रैल महीनेमे इङ्गलेण्ड लौट आये। फेराडे वापस श्राफर फिर रायल इंस्टीटयूशनमें काम- काज करने लगे। अपने शिक्षा गुरु डेवीके साथ काम करते फरते डेवीके समान वेज्ञानिक होनेकी पाकाक्षाधीरे धीरे उनके मनमें अङ्कुरित होने लगी। सचा उपयुक्त गुरु न मिलनेले साधनाका पथ सुगम नहीं बनता-इसीसे देखते हैं, प्रह्लादने नारदको, शिवाजीने रामदास को, विवेकानन्दने रामकृपणको, माईकेलने मिल्टनको और फेराडेने डेचीको गुर बनाया। इसी समयसे फेराडेका वैज्ञानिक जीवन श्रारभ हुश्रा । १८१६ ईसची
६
वैज्ञानिक-जीविनी। [चौथा परिच्छेद ।
।
की १७ वीं जनवरीको "सिटी फिलासफिकल सोसायटीमें
उन्होंने पहले पहल वक्तता दी । इसी वर्ष उनका पहला मौलिक
वैज्ञानिक निवन्ध प्रकाशित हुआ । फेराडेको प्रतिभा किस तरह
धीरे धीरे विकसित हुई अब तक हमने इसका ही परिचय
दिया है। अब उनकी वैज्ञानिक गवेपणाओंका कुछ परिचय दे
उनकी कथा पूरी करेंगे।
विविध गैसेका तरलीकरण
(Liquefication of gases )
फेराडे रासायनिक और पदार्थतत्वविद् थे । हम भागे
लिव आये है कि सन् १८१६ में उनकी पहली वेशानिक गवे.
पणा प्रकाशित हुई। प्रवन्ध वैसा मूल्यवान न था। उसमें
टसकनी देशके चूनेके एक नमूनेका रासायनिक विश्लेषण-फल
दिया गया था। सन् १८१६ से सन् १८२० तकमें अर्थात् चार
सालके भीतर फेराडेने ४७ मौलिक प्रबन्ध प्रकाशित किये थे।
किन्तु जिन वेज्ञानिक गवेपणाओंके कारण फेराडेका नाम अमर
हो गया है उनका श्रारभ अबतक न हुआ था।
बहुतोंने तरलवायु (hquud an) की कथा सुनी होगी।
यहाँ हमने अबतक भी तरल वायु श्रासोंसे नहीं देखी किन्तु
विलायतके विज्ञानागारोमें तरल वायुकी बोतलें की बोतले
प्रयुक्त की जाती ह । साधारण वायुको खूब दवाने और प्राय
२०० डिग्री ठडा करनेपर वायु जलकी तरह तरल हो जाता है।
इतना ठडा होता है कि उसका एक बूद भी हाथपर गिर
पडनेसे हाथमें फोडा निकल पाता है। फेराडेने अवश्य ही
तरल वायुका श्राविष्कार नहीं किया किन्तु वे उसकें तैयार करने
।
केराडे।
वैज्ञानिक-जीविनी।
की प्रणाली सुगम कर गये है। सबसे पहले उन्होंने ही नाना
गैसोको तरल बनानेकी प्रणाली निकाली। १८२३ ईसवीमें
इस विषय पर उनका पहला प्रवन्ध प्रकाशित हुआ। उसमें
क्लोरिन नामक गैसके तरल बनानेकी प्रक्रिया दीगई थी। उन्होंने
फाचके एक नल के एक मुहको बन्दकर उसमें क्लोरिन हाईड्रेट
(Chlorine hydrate) नामक द्रव भरकर दूसरा मुहभी
बन्द कर दिया था। अनन्तर जिस मुहपर लोरिन-हाईड्रेट था
उस मुहपर मन्द मन्द आच पहुचाने लगे और दूसरे मुहको
घरफसे ठडा करने लगे। कुछ समयके बाद देखा कि खाली
मुहपर तेलके समान थोडा सा पीले रंगका कोई पदार्थ जम
गया है। उनके पहले नर्थमोर नामक एक रासायनिक ने भी इस
प्रकारकी परीक्षा की थी, किन्तु फेराडे इम तरल पदार्थ का
खरूप अच्छी तरह निश्चय कर सके। उन्होंने परीक्षा द्वारा स्थिर
किया कि यह तरल पदार्थ तरलीभूत क्लोरिनके सिवा और कुछ
नहीं है। इस प्रकारकी परीक्षासे उनको विदित हुआ कि किसी
गैसको तरल बनानेके लिए दो वातोंकी जरूरत पड़ती है-(१)
अत्यधिक दराव और (२) अत्यधिक ठड की । काचके मुखघद्ध
नलके भीतर क्लोरिन हाईडेट गरम होते यक पहले बाहर
निकलनेकी चेष्टा करता है पर बाहर न निकल सकनेपर वह
खय बहुत दवाय पैदा करता है और घरफसे ठडा किये जानेपर
यह तरल बन जाता है।
मम प्रमसे इसी उपायसे उन्होंने और भी अनेक गैसोंको
तरल धनग्या-यथा, सलफर डाईआक्साईड (Sulphun dioxido)
एमोनिया(Annon1) साईयानोजन (Cyanogen)आदि। कुछ
समयके बाद फेराडेने एक छोटे पम्पको सहायतासे दवाव बढा
वैज्ञानिक जीविनी। [चौथा परिच्छेद ।
-
कर कार्वोनिक एसिड गैस,(Car bonic acid ras)हाईड्रोक्लोरिक
ऐसिड गैस (Hydrocloric acid gas) और हास्योदीपक
(Nitrous gns) को तरल बना सके। उस समय जितनी गैसें
विदित यो प्राय उन सबको फेगडेने तरल बनाया। छ
गैसे
अम्लजन, उद्जन, नत्रजन, कार्वन मानश्राफ्सइड (Carbon
monoxide) मार्श गैस (Marsh gas) और नाइट्रिक
श्राक्साइड (Nitric orude )-वाकी रहीं। बहुत दिनों
तक कोई इन गैनोंको तरल न बना सका। वे चिरस्थापी
गैस कही जाती थी। जिस कार्यको फेराडेने प्रारभ किया था
उसकी समाप्ति बहुत दिनोंके बाद हुई है । अब दवाव और
ठडी अधिक देनेके लिए घटे पडे यन्त्रोका अविष्कार हो गया
है। उनकी सहायतासे ये चिरस्थायी से भी तरल बनाई जा
सकी है। पिकटे पालिटे, गेल्वालकी, वेलेस्की, डेयोयार,
लिएडे हैमसन आदि अगरेज, फरासीमी, रूमी, और अमेरिकन
रासायनिकोकी जीवन व्यापी चेष्टासे फेराडेका श्रारम किया
काम पूरा हुआ।
बेजिनका आविष्कार
फेराडेका अन्यतम रासायनिक श्राप्किार है-बेसिन ।
"पोटवल गैस कम्पनी के द्वारा तेलसे बनाई गई गैसकी परीक्षा
करते समय उन्होंने इस तरल पदार्थका अविष्कार किया था।
रसायनशास्त्र प्रत्येक छात्रको मालूम है कि इसी बेझनसे
पेन्डियिक (Unginee) रसायनके एक नूतन विभागको सृष्टि
हुई है और अगले समयमें इससे असरय एन्डूयिक पदार्थोंका
श्राविकार हुआ है। बाजारमें आजकल जो विविध और चित्रव
-
+
फेरेडे । वैज्ञानिक जीविनी। --------- Ruri-karni ------ प्रकारके रग पाये जाते हैं वे सब इसी बेझिनसे रासायनिक प्रक्रिया द्वारा तैयार किये जाते है। इस विषयमें एक यातके उल्लेसकी श्रावश्यकता मालम होती है। फेराडे जय क्लोरिन ग्रादि गैसोको तरल बनानेम लग रहे थे उस समय उनके किसी किसी वन्धुने पूछा-"इमसे ससारका यया उपकार होगा। जिससे ससारका कोई हित न हो, उसमें समय नष्ट करना उचित नहीं।" इस प्रकारका प्रश्न अब भी अनेक लोगोंके मुंहसे सुना जाता है । अनेक मनुष्योका विश्वास है कि विशुद्ध रसायन, पदार्थ विद्या प्रादि शास्त्रों में सोजकी कोई प्रापश्यकता नहीं, बरिक इस बातकी चेष्टा करना उचित है, जिससे घडी, छाता, जूता, काग न श्रादि प्ररोजनीय चीजें इस देशमें तेयार होने लगें। विरयात अमेरिकन वैज्ञानिक प्राकलिन इस प्रकारके प्रश्नों के उत्तरमें कहते थे-"लडकांको मनुष्य बनानेसे क्या लाभ है। जो लोग इस तरहके सवाल करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि विशुद्ध रसायन ओर पदार्थ विद्याकी उन्नति न होती तो इन सन प्रयोजनीय वस्तुओं के तैयार करनेकी निवि मालूम होना असभर था। वैज्ञानिक गवेपणा बहुत कुछ निफाम साधनाके समान है। श्रारभ की हुई बैज्ञानिक रोज ससार के कुछ काम पायेगी या नहीं, इस पातके विचार करनेका अवकाश वैज्ञानिको नहीं रहता। किन्तु यह स्मरण रसना होगा कि वैज्ञानिक गोपणापर पृथिवीके प्रयोजनीय वस्तुओंकी उत्पत्ति निर्भर है। फेराडेने जिस समय जरा सा तरल क्लोरिन तैयार कर लिया था उस वक्त क्या उन्होंने यह सोचा था कि उनके पीछे उनके तैयार किये क्लोरिनकी सेकडी हजारो घोतले
80
पैशानिफ जीविनी। [चौथा परिच्छेद।
।
सोनेकी खानमें काममें लाई जायेंगी? फेराडेकी दूर-दृष्टिमें कभी
यह नहीं सूझा कि उनके आविष्कृत वेजिनसे उनके पीछे सैकड़ों
तरहके रंग तैयार किये जायगे। फेराडेकी वैद्युतिक गवेपणा
पढकर उस समय कौन कह सकता था कि किसी कालमें
विश्वमें विजली एक महान शक्ति बन जायगी।
विद्युतके सम्बन्धके आविष्कार
आज विजली सभ्य जगतमें एक प्रधान शक्ति बन रही है,
मनुप्यकी उन्नत वुद्धि-कौशलसे प्रकट होकर अाज विजली नौकर
की तरह पखा चलाती है, प्रकाश करती है ट्रामगाडी चलाती
है, बडे बडे फलों और यन्त्रोंको जोर जोरसे घुमाती है, और
और कितने ही काम करती है। विजलीको मनुष्यके इतने
कामोंमें लगानेके लिए जो सव वैज्ञानिक आजीवन परिश्रम
कर गये है, उनमें माइकेल फेराडेका स्थान बहुत ऊचा है। वे ।
विजलोके सर यन्त्रों बनानेके मूल सूत्रोंका आविष्कार कर गये
थे। उनके वादके वैज्ञानिक इन्हीं सब मूल सूत्रों के सहारे कितने
ही विचित्र विचित्र प्रकारके यन्त्र तैयार कर रहे है । जब आप
विजलीसे जगमगातेहुए घरोमें बिजलीसे चलनेवाले पखोके
वायुफा सेवनकर सुसका अनुभव करें, उस समय एक बार
लोहारके पुत्र माइकेल फेराडेको अवश्य याद करें-वे ही सव
वैज्ञानिक यन्त्रोंके मूल सूत्रोंका आविष्कार कर आपके चित्त
विनोदका उपाय कर गये हैं।
फेराडे जब दप्तरीका काम कर रहे थे, उसी समयसे वे
विजलीके सम्बन्धकी परीक्षा करते थे। दस्तेके सात टुकड़े
और सात आध पेनी ले और उनके बीच में नमक पानीसे
--
-
.
फेराडे 1] चैज्ञानिक-जीविनी। तर कपडा रखकर चे वालटायिक वैद्युतिक घट वना, नाना प्रकारको परीक्षा करते थे। रायल इस्टीट्यूशनमें डेवीके साथ वैद्युतिक परीक्षाकर विजलोके सम्बन्धको बहुतसी बातें उन्होंने जान ली थी। क्रमसे विजलीके सम्बन्धकी आलोचना उनके जीवनका एकमात्र लव्य हो उठी। विजली सम्बन्धी उनके सब अाविष्कागेके परिचय देनेसे एक स्वतन्त्र पुस्तक लिखनी पडेगी। यहाँ हम कई विषयोकी केवल अालोचना करेंगे। बिजली और चुम्बकके द्वारा बिजली पैदा करना। (Induction) फेराडेके पूर्व ही यह मालूम हो चुका था कि बिजली और चुम्बकम एक घनिष्ट सम्बन्ध है। बिजली और चुम्नक- में जो घनिष्ट सम्बन्ध है उसे अष्टार्ड ओर अम्पियारने सूर परीक्षा कर लिया था । फेराडेके पूर्व यह मालूम हो चुका था कि लोहाकी एक सलाई पर तानेका तार लपेट देनेसे और उसीतारके भीतरसे रिजलीका प्रवाह प्रवाहित करनेसे लोहा चुम्बफ बन जाता है। इसी प्रकार एक तॉरेके तारके, जिसपर विजलीका प्रवाह प्रवाहित हो रहा है, पास तावेके एक दूसरे तार पर विद्युत्का प्रवाह प्रवाहित हो सकता है या नहीं, फेगडे इसोको परीक्षा करने लगे। सन १८३१ में दस दिनके भीतर इस विषयकी प्राय सर जानने योग्य पातोंका उन्होंने आविष्कारकर डाला। फेराडेने तायेके तारको रेशमके धागेसे लपेटफर फिर उसे रील या अटी की तरह लपेट कर एक पेएन (Choil) प्रथम-
वैज्ञानिक-जीविनी। [चौथा परिच्छेद ।
-
तैयार किया। तारके दोनों सिरोंको विजलीका प्रवाह दौडानेके
लिए धेनुतिक फोप (electric cell) से जोड़ दिया। पूर्वोक्त
तारकी अटीपर तारका और एक वेटन तेयारकर उसके दोनों
मुंह एफ विद्युत्- शक्तिपरिमापक यन्त्र (galvanometer) में
लगा दिये । इसके बाद भोतरके वेटनके भीतर विजलीका एक
ऐसा प्रवाह प्रवाहित किया कि वाहरके वेएनके भीतर दूसरी ओर
निजलीका एक प्रवाह वह गया। और जर भौतरके वेष्टनमें
बिजलीका प्रवाह रोक दिया तव चाहरके वेष्टनके भीतरसे
विजलीका और एक प्रवाह प्रवाहित हुश्रा । प्रथम प्रवाह जिस
और प्रवाहित हुाथा उसके दूसरी ओर इसवार प्रवाह प्रवाहित
हुआ । विद्युनशक्तिपरिमापक यन्त्र में लगी लोहे की सलाई क
गतिके द्वारा प्रवाहके दिशाका निर्णय होता है। भीतरके वेटनक
भीतर ठीक जिस समय तार खोलकर या लगाकर बिजलीरा
प्रवाह रोकाया दोडाया जात है ठीक उसी समय वाहरके वेटनमें
विजलीका प्रवाह उठता है, किन्तु भीतरके वेपनमें जय बहुत
देर तक प्रवाह प्रवाहित होता रहता है तर वाहरके वेष्टनमें
बिजलीफा प्रवाह प्रवाहित नहीं होता।
द्वितीय-याहरके वेटनकी तरह और एक वेष्टन तैयार कर
उसके भीतर चुम्बककी एक सलाई छोड दी। चुम्बकके छोड़ते
ही चेष्टनमें विजलीका एक प्रवाह प्रवाहित होते देखा। जबतक
चुम्बक भीतर रहा तर तक एक भी प्रवाह न मालूम हुआ।
और जव चुम्बककी सलाई जल्दीसे निकाल ली गई तभी
दूसरी ओर वेष्टनमें एक प्रवाह प्रवाहित हुया। इस प्रकार
फेराडे विजली और चुम्बक दोनोके जरिये बिजलीका प्रवाह
पैदा कर सके।
फेराडे।]:
वैज्ञानिक जीवनी।
तृतीय-फेराडे इतनेसे ही शान्त न हो चैठे। वे जानते थे
कि पृथिनी एक बहुत पडे चुम्बकका काम करती है। इसीसे
साधारण चुम्बकका मुप निरन्तर उत्तरकी ओर रहता है।
उन्होने सोचा कि जब साधारण चुम्बकसे बिजली पेदा होती
है तो पृथिवीसे ही विजलो क्यों न पेदा होगी। इसीसे वे तॉके
तारका एक वेष्टन चुम्बकीय सूचीपतनके ( magnetic dip)
क्षेत्रमें रख घुमाने लगे। पूर्वोक्त विद्युत्परिमापक यन्त्रकी
सहायतासे देखा कि घटनके चकरके साथ साथ प्रत्येक बार
निजलीका प्रवाह वेष्टनमें प्रवाहित हो जाता है।
चतुर्थ-फेराडेने यह भी दिखलाया कि विजलीका केवल
एक प्रवाह पासके एक दूसरे ताके तारमें विजलोका प्रवाह
पैदाकर सकता है। यही बात नहीं है, जिस तारके भीतरसे वह
प्रचार प्रवाहित होता जाता है उसी तारमें एक बार निकालते-
वक्त और एकबार लगाते वक्त विजलीके दो प्रवाह पैदा करता है।
इस प्रवाहका नाम एकस्ट्रा करेण्ट (extra current) रस्वा ।
फैराडेके इन सन श्राविफारोसे बिजली पेटा करने के
कितने ही उपाय निकाले गये। उनके परले विद्युत्कोपसे ही
बिजली पैदा होती थी, किन्तु इन कोषोम जो मूल्यवान् पदार्थ
व्यवहत किये जाते थे उनको कुछ दिन के बाद फेंक देना पड़ता
था । इसलिए बिजली पेदा करना बहुत मॅहगा था।
फेराडेके इन सब प्राविकारोको मूल सून बनाकर याज
फरा बडे बदे डाइनामा श्रादि रिजली पैदा करनेवारी यन्त्र
तयार हो गये है भार इन सय यन्त्रोंसे पैदाई विजलीके
डाग प्रकाश होना हे, पये चतते ह, दाम चलती है, करों
चलती है।
६४
वैज्ञानिक-जीवनी। [चौथा परिच्छेद ।
।
बिजलीके रासायनिक विश्लेषणका
नियम।
फेराडेके पूर्व ही यह मालूम हो चुका था कि बिजलीमें
रासायनिक विश्लेषणकी शक्ति है । सन् १८० ईसवी में निकल
सन और कार्लाइल नामक दो व्यक्तियोंने विजलीके प्रवाहके
द्वारा जलको विश्लिटकर उद्जन और अम्लजन गैसें बनाई
थीं । हम यह आगे लिख ही आये है कि डेवीने बिजलीके
प्रवाहके द्वारा काप्टिक सोडा और पोटास नामके दो तीक्ष्ण
क्षारोको विश्लिष्ट कर दो नई धातुओका आविष्कार किया
था। फेराडेने नाना प्रकारके रासायनिक द्रव्योंके भीतर तडिद
प्रवाह प्रवाहित कर विविध परीक्षाओ के बाद एक परिमाणात्मक
नियमका (quantitave law) का श्राविष्कार किया था।
उन्होंने यह दिखलाया कि समपरिमाण तडित् प्रवाहके द्वारा १
भाग वजनका उद्जन ६ भाग अम्लजन, ३५५ भाग क्लोरिन,
१०३५ भाग सोसक, १०८ भाग चाँदी और ६५३ भाग सोना
आता है। श्राज कल कहा जाता है कि भाग अम्लजन,
३५५ भाग क्लोरिन, १०३ ५ भाग सीसक आदि मौलिक पदार्थ
१भाग तौलवाले उजनके साथ रासायनिक भावसे सयुक्त रहते
हैं। इस रासायनिक सयोगमीतौलको “तुल्य तौल"(equivalent
weight) कहते है। इसीसे फेराडेने अपने नियमोको निम्न
लिखित रूपमें लिखा-"समपरिमाण तडित् प्रवाह विभिन्न
योगिकसे 'तुल्य तोल' का मूल पदार्थ विश्लिष्ट करता है।" सोने
चॉदी पर मुलम्मा करनेको श्राज फलकी प्रक्रिया विजलीके
रासायनिक विश्लेषण करनेकी क्षमता पर निर्भर होती है।
पाया
फेराडे।] घेशानिफ-जीयनी। ६५ चुष्बकत्व और पराचुम्बकत्व । (Parnmagnotism and diam ignetism) फेराडेका एक विशिष्ट आविष्कार घन्तुओफा चुम्बकत्व और अचुम्बकत्व है । सन् १८४५ में फेराडेने यह दिखलाया कि जितनी पस्तु' हे वे साधारण चुम्यकके द्वारा या तो आकृष्ट होती है, या विताडित (repelled) होती है। उन्होने फठिन तरल धार वायवीय ये तीन प्रकारके द्रव्य लेकर ही परीक्षा की। उन्होने दिसलाया कि धातुओंमेसे लोहा, निकेल, फोवाल्ट , मैगनिज, ल्पैटिनम श्रादि धातु चुम्बक जातीय और दस्ता, टिन, पारा, सीसा, चॉदी तया, सोना श्रादि वातु पराचुम्बक जातीय है । धातुओंके सिवा निम्न- लिमित वस्तुएँ साधारण चुम्बकके द्वारा श्राकष्ट होती है अनेक प्रकारके कागज, लास, ग्रेफाइट, स्फूरस्पार, लकडी- का कोयला इत्यादि । निम्नलिसित चीजे साधारण चुम्बकके द्वारा विताडित होती है-फिटकिरी, काच, चीनी, रोटी, गन्धफ इत्यादि । फेराडे ने तरल द्रव्य ले परीक्षा द्वारा देखा कि कितने ही पदार्थों का जलीय द्रव (solution) चुम्बका- त्मक है-यथा लोहे और कोबाल्ट धातुका यौगिक समूह । दूसरी ओर, जल, रक, सुरा, तारपीन, तेल, ईथर श्रादि तरल पदार्थ पराचुम्बक जातीय हैं । इसके बाद वे वायवीय पदार्थों- चुम्बकत्व और पराचुम्बकत्व की परीक्षा करने लगे। उन्होंने देखा कि वत्तीका प्रकाश चुम्बकके द्वारा जोरसे विता- डित होता है। किन्तु अम्लजन चुम्बकके द्वरा आकृष्ट होता है । पदार्थोका चुम्बकत्व वा पराचुम्बकत्व गुणका आविष्कार - ६६ वैज्ञानिक-जीवनी।] [चौथा परिच्छेद । - - कर फेराडे एक नूतन शास्त्रका सूत्रपातकर गये है । अम्नजनके चुम्बकत्व के कारण पृथिवीके चुम्कत्वकी-हास वृद्धि होती है फेराडेने इसका प्रचार किया था। इस सम्बन्धमें उनकी नाना प्रकार की परीक्षायें उनको अद्वितीय परीक्षा-कुशल वैज्ञानिक सिद्ध मरती है। फैराडेको और भी अनेक गयेपणायें प्रकाशित हुई हैं। निवन्ध बढ जानेके भय से चे छोड दी गई है। असलमें न्यूटन के सिवा और कोई वैशानिक इतने अधिक प्राविष्कार कर गया है या नहीं, यह सन्देह की बात है। उन्होने स्वय एक खाता तैयार किया था श्रोर जिस समय किसी विषयमें मनमें कोई बात उटती थी तो उसी सातेमें लिख लेते थे। वे सव।। वैज्ञानिकों को इसी तरहकी एक नोट बुक रखने की सलाह दे गये हैं । इससे अनेक सुविधायें है। आज हठात् मनमें किसी विषयको परीक्षा करने की बात उठी, किन्तु कामाकी भरमारके कारण यह भूल गई इस लिए एक साता होनेसे इस प्रकारकी भूल होनेकी सम्भावना नहीं रहती। उनके शिक्षा गुरु डेवीके साथ उनका सद्भाव क्रमश घट रहा था। वैज्ञानिक गवेषणागाके द्वारा फेराडेका नाम जित- नाही बढ रहा था उतना ही डेवीको उनके प्रति-ईया बढ़ रही थी। ऐसा प्राय देखा जाता है कि पहले गुर शिष्यमे अधिक हृद्यता रहती है, अनन्तर प्रतिभाशाली शिष्य अपनी प्रतिभाके । गुणसे गुरके सामने ही उठता है तय गुरु और शिप्यमें पूर्वभाव नहीं रहता, प्रति द्वन्द्रिताका भाव श्रा दिखाई देता है। डेवीको अवस्था भी चैसी ही हो गई थी। जब फेराडेको नियात रायल सोसायटीका सभासद जव .
फेराडे।] वैज्ञानिक-जीविनी। - बनानेका प्रस्ताव हुआ था, उस समय डेवीने सभाके सभापतिको हेसियतसे यथासाध्य वाधा देनेकी चेष्टा की थी। जिस दिन बोट लिया गया था, उस दिन वेलेट बाक्स पर केवल पफ कालो गेंद देखी गई थी। उसे किसने फेंका था यह फेगडेको समझना बाकी न था । इसी प्रसङ्गमें यह कह देना भी आवश्यक है कि किसी वैज्ञानिकने अपनी जिन्दगी भरमें स्वदेश या विदेशसे फेराडेके समान सम्मान प्राप्त नहीं किया। फेराडेको सब ६५ सम्मान-सूचक पदगियां श्रीर सितार मिले थे। फेराडेका चरित्र अत्यन्त पवित्र और स्वभाव अत्यन्त मधुर था। २९ वर्षको अवस्थामें सारा वार्नाड नामफी स्त्रीके साथ उन्होंने विवाह किया था। निगाहके २८ वर्ष बाद उन्होंने अपने खातेमें लिम्बा या -१२१ ईसबीके १२ वी जूनको मैने विवाह किया था। इस विवाहसे अन्यान्य विषयोकी अपेक्षा मुझे समधिक मानसिक आनन्द और पार्थिव सुख प्राप्त हुश्रा है। हम लोग अाज २८ वर्षसे विवाह बन्धनमें वधे है। इस वीचमें दाम्पत्य प्रणयकी गाढता-वृद्धिके सिवा किसी प्रकारका परिवर्तन नहीं हुआ।" विवाह के बाद उन्होंने रायल इस्टीट्यूशनमें एक घर अलहदा पाया था। वहीं चे सपरिवार रहते थे। १-३५ ईसनीम इङ्गलेण्डके प्रधान सचिव सर रावर्ट पिलने फराडेको ३०० पाउन्ड की सालाना पेशन देने की इच्छा प्रकट की। फेराडे पहले इमे रोनेको राजी न हुए , कारण वे कहते थे कि अपनी जीविका पैदा करनेकी क्षमता मुझमे अभीतक है। अन्त में वन्धुवान्धवाो अनुरोधसे ये गजी हो गये थे। सर गवर्ट पिलकी इच्छा पूर्ण होनेके पहले हो लार्ड मेलबोर्नको प्रधान सचिवका पद मिला। नये सचिरने फेगडेसे मिलनेकी ७ वैज्ञानिक जीविनी। [चौथा परिच्छेद । । यह खबर इच्छा प्रकट की । फेराडे मिलने गये । लार्ड मेलवोर्न फेराडेको ठीक पहचान न सके। फेराडेका खभाव यालकोंके समान सरल था पर, उनमे प्रकृत मनुष्यत्व को दृढता यथेट थी। प्रधान सचिवकी वातोसे फेराडे बहुत विरक्त हुए थे। लार्ड मेलयोन ने गातों ही बातोंमें सम्भवत कहा था कि वैज्ञानिकों और साहित्यिकोंको पेंशन देना रुपयेका अपव्यय करना है । फेराउने घर पहुंचते ही लार्ड मेलबोर्नको एक पत्र लिखा । उसमें उन्होंने उनकी बातोपर अपनी विरक्ति प्रकट की और प्रस्तावित पेशन लेने की अनिच्छा प्रकट की। अनन्तर एक सम्भ्रान्त महिलाने दोनों में मेल-जोल करानेका यत्न किया। फेराडेने उससे कहा कि यदि लार्ड मेलवोर्न पत्र लिखकर अपनी बातोंके लिए क्षमा मॉगे तो यह चिवाट मिट जाय । लार्ड मेलबोर्नने, पाकर फ़ेराडेको एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अपनी उस दिन की बातोपर अत्यन्त दुःख प्रकट किया और क्षमा मांगी। इस प्रकार इस विवाद का अन्त हुा । फेराडेको श्रन्तकाल तक पेंशन मिलती रही । इस घटनासे फेराडेके उन्नत मनुष्यत्व का परिचय अच्छी तरह मिलता है । अत्यधिक मानसिक और शारीरिक परिश्रमसे उनका शरीर पहलेसे ही निर्वल हो गया था । सन् १८६७ की २५ जनवरीको सतहत्तर वर्ष की अवस्था में उनका देहवसान हुश्रा। लिखने पढनेके अपने कमरेमें बैठे बैठे ही उन्हाने शरीर त्याग किया। उनकी इच्छाके अनुसार पिना श्राडम्बरके उनको ममाधि दी गई। श्राज इसी उन्नतचेता बालकरत् चिरसरल, चैहानिकश्रेष्ठ अगरेज के समाधि-फलक पर सुदूर विदेशवामी एक भक्त भक्तिपुष्पावलि चढ़ाकर अपनेको धन्य समझना है।
निउटन।]
मानिक जॉगिनी।
६६
पाँचवाँ परिच्छेद
-
निउटन।
जैसे शिर नटकुलचूडामणि ह पर्वतामें जैन हिमालय
धेष्ट है, तारका-सुन्दरियों में जैसे रोहिणी धरणीया है,
जेमे कविपु कालोटास श्रेष्ठ. चेसेही यशानिकोम निउटन
सर्वश्रेष्ठ है। केरल अगरेजही यो, पृथिगीको यावतीय
मध्य जातियाने एक वाक्य ले निउटनको सर्वश्रेष्ट वज्ञानिक
का वासन दिया है। श्रथव यह श्रात्माभिमानगन्य फर्मवीर
मरनेके पहले कह गया था-"मुझे मालूम नहीं, मसार मेरे
यामौके सम्बन्धमें नया मोचेगा किन्तु मे खुद सोचना है
कि मने ज्ञानसमुद्रके तीरपर बेठकर छोटे बच्चेकी तरह
केवल ककड जमा किये है और सारा विशाल शानसमुद्र
मेरे सामने अनानिष्कन पटा है।"
मन् १६४२ ईसवीमें, इगलेएडके अन्तर्गति लिकन
शायरके भौनर उत्सर्प नामक गॉचम निरनिरा जन्म
हुश्रा या । जो एक समय विश्वके श्रारर्पणका प्राविमा कर
यशस्वी होंगे, वे जन्मालमें इतने छोटे थे कि उनकी माता-
ने कहो या कि वे उनको एक बोतलमें अनायास ही रस
सकती है। भूमिष्ठशिशु इतना दुर्बल था कि दो स्त्रियाँ दृमरे
गॉवसे उसके लिए प्रौपध लेनेके लिए जाते वक्त यह नहीं
गयाल करती थी कि वे लौट शाकर पञ्चको जीता-जागता
देयगी । जो हो, ब्रह्माने पृथिनोमे मगल के लिए जिसे जन्म
दिया था, उन्होंने ही उसकी जीवन रक्षा की।
पेशानिक-जीचिनी। [पाँचवाँ परिच्छेद । जाते ? वृत्ताकार क्यों घूमते है ? समतलक्षेत्रपर एक गोली दुनगा देनेसे वह हवा या क्षेत्रकी घर्पणजनित बाधा न पड़ने पर बराबर सीधी दुनकती जायगी। फिर ग्रह-उपग्रह ही सीधे क्यों नही चले जाते ? कान सी शक्ति उनको घुमाती रहती है ? घे इसका कारण किमी तरह निश्चित न कर सके। इस प्रकारकी मानसिक अवस्थाम लेगके साल वे अपने गाँवको चले गये। वहाँ भी उस चिन्ताने उन का पीछानछोडा। एक दिन यागमे बैठे इस प्रकारको चिन्ता कर रहे थे कि एक पका सेव (apple) जमोनपर जोरसे गिरा। उन्होंने उसकी ओर लक्ष्य किया। उसी समय मन ही मन यह प्रश्न उठा कि सेर क्यों गिर पडा। मन ही मन उसी समय उसका जवाब भी, मिला-"पृथिवीने सेवका श्राकर्षण किया है, इससे वह जमीन पर गिर पडा । जैसे पानीमें डूबता हुश्रा व्यक्ति सामने लकटी देस कर, अथवा अंधेरे घरमें पडा कैढी अप्रत्याशित क्षीण प्रकाश देसकर पुलकित हो उठता है, निउटन भी इस प्रकार का अप्रत्याशित मानसिक उत्तर पाकर उसी प्रकार, हुए । पृथिवीका आकर्षण इसके पहले याविष्कृत नहीं हुआ था। यह बात नहीं है। निउटनके छ सात सौ वर्ष पहले भारतके घेशानिकोके उज्ज्वल भास्कर भास्कराचार्य कह गये है। आकृष्टशक्तिश्च मही तया यत् स्वस्थगुरु स्वाभिमुख स्वशक्तया । आरभ्यते तत् पततीव भाति सये समन्तात् क पतित्विय मे ॥ अर्थात् पृथिवीमें श्राकर्षण करनेकी शक्ति है । उसी शक्ति- के बलसे शुन्य मार्गमें फेंकी गई भारी चीज पृथिवीकी ओर आकर्षित होती है और इससे ही सब वस्तुये पतनशील कहीं जाती है और पृथिवीके चारों ओर प्रकाश होनेसे यह कहाँ आनन्दित - उटन 1] वैज्ञानिक-जोविनी। २०३ - परेइसलिए पृथिनोका आकर्षण प्राचीन कालमें भारतमें विकृत हुया था कह कर भाग्नवामी गौरव प्रकट कर सकते है। निउटनने पृथिवीके इसी श्राकर्षणको वेज्ञानिक भित्ति र म्यापिनकर उसे विश्वके श्राफर्पणके अगीभूत यता प्रति- त किया था और इसी विश्वाकर्षणके सम्बन्ध परिमा- शात्मक नियम (gnantitative lan) का भी श्राविष्कार कर उमग्र ज्योतिषशास्त्रको नये सूत्रमें गूथ दिया था। निउटन ने सोचा कि जर पृथिवी बोटेम सेव को या ऊपर फेंकी गई वस्तुमानको आकर्षित कर सकती है तब वह अपनेमे छोटे आकारवाले चन्द्रमाको श्राकर्षित क्यों न करेगी? यदि पृथिवी चन्द्रमाको आकर्षित करती है तो सबसे बड़ी ज्योति सर्य, पृथिवी और ग्रह नक्षत्रोंको श्राकर्पित क्यों न करेगी। निउटनने क्रमश स्थिर किया कि यही विश्वाकर्षण ही ज्योनियाको शून्यमार्गमें, वृत्ताकारम, घुमाता है। पाठकोंको निस्टनका सिद्धान्त सहज ही समझाया जा सकता है। एक डोरीके टुकडेमं यदि इंटका एक टुकडा वॉकर घुमाते घुमाते लोद दिया जाय तो इंटका टुकडा सोधा चला जायगा किन्तु घुमाते समय डोरी हाथमे होनेके कारण वह वृत्ताकार घूमता रहता है। प्रति महत इटके टुकडेपर दो शक्तियाँ काम करती है-एक शक्तिके द्वारा यह सीधा चले जानेके लिए व्यस्त रहता हे और दूमरी शाक्ति अर्थात् हाथका आफर्पण उसकीसीधा जानेकी गतिको लगातार घुमा देता है। इस प्रकार इंटका टुकडा हाथके द्वारा श्राकृष्ट होनेपर भी हाथमें नहीं आता, वृत्ताकार घूमता है। इसी प्रकार चन्द्रमा किसी अमान १ - १०४ वज्ञानिक-जीविनी। [पाँचयों परिच्छेद । शक्तिके प्रभावसे चलता है । वह यदि पृथिवीके द्वारा आरुष्ट न होता तो सीधा चला जाता। किन्तु पृथिवीके द्वारा प्राकृष्ट होनेसे पृथिवीके चारो ओर घूमता है। इसी प्रकार इस प्राकर्षण के कारण सूर्यको केन्द्र बनाकर अन्य ज्योतियाँ उसके चारों और घूमती है। इस प्रकार निउटन अपने मानसपथपर चक्कर लगानवाली ज्योतियाका रहस्यमय चित्र खींचने लगे। वे इस आकर्पण शक्तिका ही श्राविषकार कर शान्त न हो रहे, उन्होंने आकर्पण का परिमाण जानने की चेष्टा की । विरयात ज्योतिषी केपलरने निउटनके पहले यह अाविष्कार किया था कि ज्योतियों सूर्य को केन्द्र बना कर दीर्घवृत्ताकारमें (cellapat) चारो ओर घूमती है । इस प्रकार भ्रमणकालमें ग्रहोंके सूर्यके निकट होनेपर या सूर्यसे दूर होनेपर आकर्पणमें क्या विभिन्नता होती है, निउटन इसकी गणना करने लगे । इस प्रकार की गणनाका फल। यह टेया कि सूर्यसे जितनी ही दूर ग्रह चले जाते है आकर्षण उनने ही निर्दिष्ट परिमाणमें कम हो जाता है। उन्होंने यह स्थिर किया कि यह आकर्षण दूरीके वर्गफलके विपरीत बटता È (inversely is the square of the distance). जेसे-यदि दुर्ग दूनी हो तो श्राफर्पण चतुर्थाश हो जायगा, यदि तिगुनी तो श्राकर्षण नवमांश हो जायगा इत्यादि। विश्वके श्राकर्षण सम्बन्धमे इम परिमाणात्मक नियम आविष्कार करने के बाद अपने सिद्धान्तको सत्यता प्रमाणित फरनेके लिए ये इसकी गणना करने लगे कि चन्द्रमाको गति पृथिवीके श्रामण वाग केमे नियन्त्रित होती है। उस गणना- .
निउटन 1] वैज्ञानिक-जीवनी। १०५ . में पृथिवीके केन्द्रसे पृथिवीकी परिधि पर्यन्तकी दूरी जानना श्रावश्यक है। किन्तु उस समय पृथिवीकी परिधि या व्याम ठोक मालम न था । जो मालूम था उसके श्राधारपर उन्होने हिमान लगाकर देगा कि उनकी गणना और परीक्षाके डाग चन्द्रमाको जो गति निकलती ह यह मिलती नहीं। चन्द्रमा- की परीक्षित गति उनकी गणनाकी अपेक्षा कुछ अधिक निक लती है। इस अन्तरको न मिला पाये और इसलिए उन्होने कागज-पन सब दराजमें चन्दकर दिये । इसके बाद कई साल बीत गये। इस दीर्घकालके भीतर उन्होने अपने प्राविष्कारके सम्बन्धमान तो कोई प्रवन्ध प्रकाशित किया और न इस सम्बन्ध- में किसीसे कोई बात कही। सन १६२२ में एक दिन रायल सोसायटीके अधिवेशनमें पिकार्ड नामक एक फरासी वैशा- निक का एक निवन्ध पढ़ा गया । इस प्रवन्धमें उन्होंने पृथिवी की परिधि ठीक ठीक निर्धारितकर ताई थी और उनकी निर्धारित परिधि प्रचलित मापने कुछ अधिक निकली थी। निउटनको पहले यह मवाद न मिला । कई साल के बाद इमी मवाट पाकर हो वे घर गये और पुराने कागज पत्र निकाल कर फिर गणना करने लगे। इस बार हिसाब ठीक मिल गया। कहा जाता है कि जन हिमाब लगाते लगाते उन्होंने देखा कि उनका हिसाव मिलता दिखाई देता है नर वे अानन्दसे इतने विचलित हो उठे थे कि हिसारका शेष फल निकालनेके लिए उन्हें अपने एक यन्धुसे अनुरोध करना पड़ा था। हम प्रकार उनकी सुदीर्घ कालव्यापी सायना सफल हुई थी उन्होंने अनन्तज्योतियों की गति का कारण ठीक ठीक आति- स्कृत किया था।
१०६
वैवानिक-जीविनी।[पाँचवाँ परिच्छेद ।
"पिसिपिया" ग्रन्य।
इसके बादसे वे लगातार कई साल अनन्यमनसे विश्वा
कर्पणके सम्बन्धमें चिन्ता करने लगे; श्रार अपनी गवेषणाका
फल जगत्के सर्वश्रेष्ठ अन्य प्रिसिपियामें सन्निविष्ट करने लगे।
वे उस समय चिन्तामें इतना इवे रहते थे कि प्राय नहाना-
साना भूल जाते थे। एक दिन उनके एक वन्धु, डाकर माल
उनसे मिलने गये । उन्होंने उनसे भेट कर देखा कि एक टेवल
पर निउटनके लिए साने की चीजे ढको रखी हैं । डाकृग्ने कुछ
क्षणके पाद धीरे धीरे भोजन यतम कर मुरगी की हड्डियाँ
सेट पर रख प्लेटको फिर वैसे ही ढक दिया। इसके बाद
निउटनने जब बन्धुके साथ बातें करते करने भोजन करने
लिए सेटका कपडा उठाया तो श्राश्चर्यके
साथ
बोल
उठे-"श्रा | मैंने सोचा था कि मैने शायद अब तक नहीं
साया है पर देयता हु, में खा चुका है। इस प्रकार
की
एकाग्रता इस प्रकारका अध्यवसाय न होता तो प्रिसिपिया
की तरहका अमूल्य ग्रन्थ न लिखा जा सकता। नवाविष्कृत
विश्वाकर्षणके सिद्धान्तसे बहुतसे नये सिद्धान्त अङ्कशास्त्र,की
सहायतासे आविष्कृत कर इसो ग्रन्थमे सन्निविष्ट कर दिया।
अगरेजोके परम दुर्भाग्यसे इस मसारका श्रेष्ठ वैज्ञानिक अन्य
अगरेज-द्धाग लिसे जाने पर भी अगरेजीमें नहीं लिया गया।
वह उस समय की प्रचलित प्रथाके अनुसार लैटिन भाषामै
लिखा गया। जिस समय इस महाग्रन्धका पहला भाग समाप्त
हुना तब उसे प्रकाशित करने की कल्पना निउटनके मनमें
पेदा न हुई थी। इसीसे उन्होने अपने हस्तलेखको एक दराजम
बन्द कर रख दिया । इच्छा थी कि उनको मृत्युके बाद इसे
निउटन।] वसानिक जीविनी। - का सन्यक . कोई प्रकाशित करेगा किन्तु सन् १६४ में विख्यात ज्योतिषी एडमण्ड हाल ने प्रिसिपिया की हस्तलिपि निउटनमे ले ली आर १७ ईसीम अपने पर्चसे उसे छपाया। जन वह प्रकाशित हुआ था तब वैज्ञानिक समाजके दम पाँच मनुष्य भी उसे समझ मके थे या नहीं यह सन्देहपूर्ण हे। सन् १७१३ में प्रिसिपियामा पक नया सस्करण निकला। यह सस्करण और तक नियमान है । यहाँ इम महामन्यके प्रतिपाय विषया- परिचय देना असम्भर है, इसलिए नीचे कुछ विषयोका मार मार दिया गया है ', निवारणका नियमनट जगत्का प्रत्येक अणु एक दृमरेको श्राकर्षित करता रहता है। यह श्राकर्षण शक्ति प्रत्येक अणुके भारके अनुसार ओर दुग्त्वके वर्गफलके विपरीतानुयायी होती है । (vantes duectly as tho nuts 4 and inversely as the sunie ot tho distance) गनि नियमावली-(Laws of nmotion) गेलिलिओने परीक्षाके द्वारा गतिशील घस्तुओके सम्बन्धमे जिन तीन नियमाका आविष्कार किया था, निउटनने उनका विशद रुपसे,वर्णन किया श्रार उनकी विशद व्याख्या दी। उन्हान इन सब नियोको सहायतासे गिरनेवाली चीजोकी गति- के नियमकी गणना की प्रार, उनके पथके स्वरूपका भी निर्णय किया। पर ही आवित नियमावरी केपलग्ने ज्योनिया की गतिके सम्बन्धमे जिन तीन नियमांका आविष्कार किया था निउटनने उनकी विशद व्यारया की और उमसे बिना भ वैज्ञानिक-जीवनी। [पाँचवॉ परिच्छेद । ज्चारमागरस कारण- कर्पणके दूरत्वमृलक नियमा और अन्यान्य कितने ही नियमां- कालाविष्कार किया। वस्तुआमा पजन और योनियोंका आपेक्षिक गुरुत्व--- उन्होंने निश्चित किया कि विश्वाकर्पण ही द्रव्य समूहके भारका कारण है और सूर्य, यह भी निश्चित किया कि चन्द्रमा प्रभृति पृथिवी की अपेक्षा कितने गुने गुरु या लघु है-जैसे चन्द्रमा पृथिवी की अपेक्षा प्राय तिरासी गुणा लघु और सूर्य ३१६००० गुणा भाग है। उन्होंने दिखलाया है कि चन्द्रमा पार सूर्यके आकर्षण के कारण ही समुद्र में ज्वारभाटा उठता हे । ज्वारभाटाकै परिमाण का भी उन्होंने हिसान लगाया था। पृथिवीमा आगर-उन्होंने केवल गणनामात्रसे प्रमाणित किया हे कि पृथिवी बिलकुल गोली नहीं है, उत्तर-दक्षिणम कुछचपटी है, कितनी चपटी हे इसका भी ठीक निर्णय किया है । उन्होंने दिखाया है कि भूमध्यरेखाका व्यास मेरेखाके व्यास मे २९ मील बड़ा है। श्री पारम्परिक आर्षिणमे उनकी गतिको विकृति-- उन्होंने देखा कि प्रत्येक ग्रह जो केवल सूर्यके द्वारा ही पारुष्ट नहीं होते. अन्यान्य ग्रहोंके द्वारा भी आकृष्ट होते रहते है, इसीसे उनकी गति बहुत तरहसे विकृत होती रहती है । उन्होंने इन सब व्यापारोफी बेज्ञानिक व्याख्या की और उनका परि माण भी निर्धारित किया। धृमरेतु---उन्होंने यह भी दिसलाया कि अनिश्चित धूमकंतु श्रधीन हैं और वे पग्चलय (partbols) के ९ . है ६ १०६ - मिउटन।] चनानिक जीविनी। ..xc.xxsexkumari -.-.-22-6. आकार में सूर्यके चारो ओर घूमते रहते हैं। उनके पुनगगमन- के समयको गणना भी की जा सकती है। इन सर उपरिलिखित तोके अतिरिक्त और बहुतसे भिन्न भिन्न ज्योतिष-सम्बन्धी व्यापारोंकी गणना बार व्याख्या भी इस महानन्धमें दी गई है। उन्होने ग्रन्थ अन्तिम भागमे इस अनन्त विश्वब्रह्माण्डको स्थिति और गतिका अनन्त सान्दर्य मन ही मन निरीक्षण कर भक्तिपूर्वक ब्रह्माको प्रणाम कर पिदा लो है। पाठकोको यह समझाना न होगा कि इस निश्वासर्पणके याविष्कारके साथ ही ज्योतिषशास्त्र एक नया शास्न बन गया है। विश्वाकर्पण और प्रिसिपिया ग्रन्थ की श्रलोचना करने के कारण निउटन के जीवन की घटनाओं का उल्लेस करने का असर नहीं मिला। हम सन् १६६५ में लेग के साल उनको अपने घरके पागमे धैठे वृनसे गिरे हुए संरके सम्बन्ध में चिन्ता करते छोड थाये ह । सन् १९६१ में चे उसी फालेज के फेलो चुने गये, जिसमें वे पढ़ते थे और दो साल बाद केम्ब्रिज विश्वविद्यालयफ विरयात लिउके- शियन अध्यापक के पद पर, डाकृर पैरो के स्थान पर नियुक्त टुप । डाकर रोने अपसर ग्राहण करते वक्त अकशास्त्र म निउटन की असाधारण पारदर्शिता देग कर म्यय ही उनकी नियुक्ति के लिए अनुरोध किया था। इस प्रकार निउदन केवल २६ वर्षकी उम्र में केनिज विश्वविद्यालय के अधापक नियुक्त सुप। कमश उनकी फीर्ति फेलती जानेमे सन् १६७२ ईसवीम ने विख्यात रायल सोसायटी के सभ्य चुने गये। यह पहले ही कहा जा चुका है कि मर ३७ में ! - + । २२० वैज्ञानिक-जीवनी। [पाँचवाँ परिच्छेद । t.man.rainment उनका प्रिसिपिया ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। इसके पाँच वर्ष बाद वे पालीमेएट के सभासद निर्वाचित हुए । सन् १६६६ मैं टकसाल का काम उनको सौपा गया । सन् १७०३ में वे रायेल सोसायटी के सभापति निर्वाचित हुए और यावञ्जीवन इस पद पर प्रतिष्ठित रहे । सूर्यालोक विश्लेषण (D14persion of Sunliglit) यह पहले ही लिखा जा चुका है कि सन् १६६६ से १६७२ या इसके कुछ वर्ष बाद तक निउटनकी विश्वाकर्षण सम्बन्धी गवेपणा वन्द थी। किन्तु इससे यह न समझना चाहिए कि इतने वर्ष वे हाथ पर हाय रक्खे बैठे रहे । इस समय उन्होंने पालोकशास्त्र (optius) की ओर ध्यान दिया था और अलोकके सम्बन्धमें बहुत सी खोज उन्होंने कर डाली थी। वे स्वय कह गये हैं कि जिस विषय की गवेपणा करनी हो उस विषयमें एकबारगी अनन्यमना हुए विना आशानुरूप फल नहीं होता। उन्होंने अपनी स्वभावसिद्ध एकमतासे पालोकशास्त्रके कई आविष्कारी, ये कई वर्ष रिता दिये । इन्द्रधनुषका विचित्रवर्ण देखा है न ? किन्तु यह विचित्र वर्ष हो कैसे जाता है ? सत्रहवीं शताब्दी में एनटानियो डमिनिस नामके एक पादरीने इन्द्रधनुष की ठीक वैज्ञानिक व्यारव्या करनेकी चेष्टा की थी। पादरी महाशय कह गये है कि जलविन्दु पर सूर्यको किरण पडकर इन्द्रधनुएकी सृष्टि करती है। उनके बाद डेकार्ट ने दिखाया था कि सूर्यको किरणें एक विशिरा (Prisma) काच के भीतर डालने मे इन्द्रधनुप की तरह विचित्र रग
निउटन 11
शानिक-जीवनी।
पदा फरनी है। किन्तु निउटनके पहले कोई भी स्थिर न
कर सका था कि पयों और कैसे इस प्रकारका निचित्र रंग
पेदा होता है।
निउटनने एक मेरे घरकी खिडकीम एकगोला
सूराव कर उसके द्वारा सूर्य की किरण भीतर ला पोर एक
निशिरा काचके भीतर पहुँचाकर देखा कि दूसरी ओर
के पक पदेपर एक लम्बे इन्द्रधनुपका विचित्र वर्णचक्र
(spectrum) दिखाई दे रहा है । उसमें उन्होंने सात रग देखे।
मवसे नीचे लाल उमके ऊपर नारगी रग, उसके ऊपर
हरिदा रग, सम्ज रग, नीला रग, गाढा नीला रग, और
मय के ऊपर बैंगनी रंग देसा। श्रमलमें उसमें सात ही
रग नहीं होते--असरय रग होते है, पर उनसे सातही
अच्छी तरह स्पष्ट होते है। अब निउटन ने ये दो बातें सोची
कि यह विचित्र वर्णन मर्यके सफेद प्रकाशसे कसे पैटा
श्रा और वर्णन गोला न होकर लम्गा क्यों बना ? इन
दो प्रश्नोंकी मीमामा करनेके लिए उन्होंने वर्णछत्रके
प्रत्येक रग फो एक पर कर एक दूसरे त्रिशिरा काच म
पहुंचा कर ओर एक पद पर देसा। उससे उन्होंने दो
पाते लक्ष्य की । एक, इन सात रगॉर्म से कोई भी त्रिशिरा काच
के भीतर जा दूसरे रगमें परिणत नहीं होना लाल रंग लाल
ही रहता है, गनी चेंगनी ही रहता है। दूसरी, वर्षछत्रमें जो
रंग जहाँ है ही वे अब भी एक दूसरे पर दिखाई देते हैं।
इससे उनको अपने दोनों प्रश्नोंके उत्तर मिल गये। पहले
प्रश्नका उत्तर स्थिर किया कि जब लाल श्रादि सात रंग
विलिष्य हो दूसरे रग में नहीं बदल आते तब उनका आदि
,
वेशानिक-जीविनी। [पाँचवाँ परिच्छेद ।
रंग (primitive colours) और सूर्यके आलोकम इन साताके
थादि रग की समष्टि वा समिश्रण है। निशिरा काचके भीतर
जाते वक्त श्वेत श्रालोक विश्लिष्ट हो सात श्रादि रगोंमें परिणत
हो जाता है। उनके दूसरे प्रश्नका भी उत्तर मिला। उन्होने
देखा कि सात रग विशिरा काचके भीतर जाते वक्त विभिन्न
परिमाण में टेढा पडता है (hefiacted), लाल रग सरसे
कम टेढा पड़ता है और बैगनी सबसे अधिक टेढा पडता है
और दूसरे रग इन दो रगोंके मध्य परिमाणम टेढे पडते
है। इसी कारण लाल रंग सरसे नीचे रहता है और बैंगनी
सरसे उपर, और दुसरं रग इन दोनोंके बीच में रहते हैं ।
इस प्रकार रगोंके कारण भिन्न भिन्न स्थानोपर जमानेसे
वरणछत्र लम्या हो जाता है।
इन सब परीक्षाओंके द्वारा निउटनने ही दो बातो का
श्राविकार किया-सूर्यके आलोकका यह रग नही । यह
सात रगोंकी समष्टि वा समिश्रण है, दूसरे, काचके
भीतर जाते वक्त प्रत्येक रग विभिन्न रूप से टेढा पड़ जाता
है। निउटन केवल श्वेत आलोकको ही विश्लिष्टकर शान्त
नहीं हुए। वे सात श्रादि रग मिलाकर श्वेत रग प्रस्तुत
भी कर गये है । एक बहे कार्ड बोर्डके टुकडे के पॉच हिस्से
कर पूर्वोक्त सात रगकी स्याहीसे रगकर पाँच वर्णछत्र
वनाये। इसके बाद उस टुकडेको एक धुमानेके यन्त्र में
रख जोर जोर से घुमाने लगे । घुमाते वक्त सात रंग एक
साथ दिखाई पड़ने के बजाय मिल कर सफेद या कुछ धेवले
रग के दिखाई देने लगे। बिलकुल सफेद न दिखाई देनेका
कारण केवल यह था कि सब स्याहियोका रग वर्णनके मात
रगोंके ठीक समान न हुअा था।
.
निउटन।]
वैज्ञानिक जोवनी।
११३
निउटन श्वेत अालोकके स्वरूपका आविष्कार कर
गके स्वरूपके सम्बन्धमें आलोचना करने लगे। उन्होंने
सोचा, चीजोका रंग उनका नहीं, प्रकाशमें उनका वह
ग है। लाल रगको चीज लाल रंगकी जो दिखाई देती है
इसका कारण यह है कि वह वस्तु लालके सिवा दूसरे
गके श्रानोकका शोषण कर लेती है ! केवल लाल रंग
%3
.
स्था
का शोपण नहीं कर सकती । नीले काचके भीतर सूर्यका
प्रकाश जानेसे प्रकाश नीला हो जाताहे। इसका कारण
यह हे कि नीला काच सूर्यके आलोकके और सय रगोंके
आलोकका शोषण कर लेता है, केवल नीले प्रकाशको
८
वैज्ञानिक-जीवनी। [ पॉचवॉ परिच्छेद।
rinku - ... Kundari
भीतर जाने देता है। निउटनका यह नया मत प्रचलित मत
के बिल्कुल विपरीत था। कितनाहीने उनके इस मतके
खण्डन करनेकी चेष्टा की थी, किन्तु कोई कृतकार्य न हुए।
"प्राप्टिकस्" ग्रन्थ
निउटन पालोकके सम्बन्धमें और भी अनेक श्राविकार
कर गये हैं। आलोक सम्बन्धके उनके विध आविष्कार
उनके दूसरे महाग्रन्थ 'प्राष्टिकम् " (optics) में दिये गये
हैं। वे और कुछ न कर यदि केवल इसी ग्रन्थकी ही रचना
कर जाते तो भी चे वैज्ञानिक समाज में यथेष्ट प्रतिष्ठा पा
सकते । यहाँ उन सब आविष्कारोंका विस्तृत परिचय देना
सभव नहीं और इसलिए केवल दो एकका उल्लेख मात्र
किया जाता है।
नवीन दूरबीनका आविष्कार
इटलीके सुप्रसिद्ध वेज्ञानिक गेलिलियोने पहलेपहल
दूरवीनका श्राविष्कार किया था । किन्तु उनके यन्त्रमें काच
का बना उन्नतोदर लेन्स (conver lens) लगानेसे पूर्वोक्त
वर्णछत्र चारों ओर दिखाई पड़ता था। उससे शकल अस्पष्ट
दिखाई देती थी। निउटनने काचके लेसको त्याग कर साफ
उज्ज्वल धातुका बना नतोदर दर्पण (conenso metallic
mrron) लगाया । इस प्रकारकी दूरवीनको "परावर्तनीय
दूरवीक्षण यन्त्र" (refleeting telescope) कहते हैं । श्राजकल
जो घडी घडी अनेक दूरवीने प्रचलित हैं वे निउटनके
आविष्कृत यन्त्रके ढग की बनी है। उनकी बनाई दूरगीन गयेल
उटन।]
वैज्ञानिक-जोवनी।
११५
सायटीम अब भी सुरक्षित रक्सी है । उसका एक चित्र
हाँ दिया जाता है।
---
निउटनका दूरवीक्षण यन्त्र
पाठाश यन्त्र-sestant) आजकलके नाविक जिस पठाश
यन्त्र को काममें लाते है उसके श्राविफारक निउटन ही है।
सालोक के स्वरूपके सम्बन्धमें सिद्धान्त
आलोक फेसे पेदा होता है, इस सम्बन्धमें निउटनका मत यह
धाफि आलोकित हव्यसेसुरसूदमसून्म पदार्थनिकलकर श्राखोम
पहुँचनेसे आतीय उत्पन्न होता है। इस सिद्धान्त को पालोकका
निर्गम सिद्धान्त (Emission theors) कहते हैं। आलोकके
सम्बन्ध निउटनका यह मिद्धान्त प्रचलित नहीं । श्रर यह स्थिर
हो गया है कि ईथर (ethet) या व्योम नामक सर्वत्र विद्यमान
अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थके हिलनेसे पालोककी उत्पत्ति होती है।
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निउटन ।]
वैज्ञानिक-जीवनी।
•mmamimarimanisatirnxxx
पहले ही कहा जा चुका है कि निउटन आविष्कार
करके ही रहजाते थे, जनसमाजमें उस श्राविकारका
प्रचार करनेकी करपना प्राय उनके मनमें न उठती थी।
इसका फल यह होता था कि कभी कभी अपने श्राविष्कार
की मोलिकताके विपयम दूसरोसे विवाद करना पड़ता
था । सन् १६६५ में उन्होंने शून्य-वृद्धि-सिद्धान्त (Pheory of
fluxions) का आविष्कार किया था, किन्तु बहुत समय के
बाद अर्थात् सन् १६६७ में वह प्रकाशित हुआ। जर्मनीके
प्रसिद्ध वैज्ञानिक लाइवनिट्जने भी इस सिद्धान्तका आविष्कार
किया था। इसलिए निउटनके इस सिद्धान्तके प्रकाशित होने
पर यह विवाद उठा कि किसने दूसरेसे पहले प्राविष्कार किया
है। यदि वे इस अाविष्कारको यथा समय प्रकाशित कर देते
तो लाइवनिट्ज का दावा न हो पाता । फलत जिस समय यह
प्राविष्कार प्रकाशित हुअा था उसी समय जर्मनीमें भी यह
लाइवनिटज द्वारा प्रकाशित हुआ था।ओर जन प्रिसिपियाकी
रचनाके बहुत पीछे यह हेल द्वारा प्रकाशित हुधा तब भी हुक
नामके और एक अगरेज वैज्ञानिकने उसके श्राविष्कारका भाग
लेनेका दावा किया । असल बात यह है कि विश्वाकर्षणके
सम्बन्ध में निउटनका सिद्धान्त यथासमय प्रकाशित न होने से
हुक, रेन, हेल प्रतृति और और वैज्ञानिकोंने भी इस सम्बन्ध
में
स्वतन्त्ररूप से पालोचना की थी। वैज्ञानिक जगत्म
अनेक समकालीन प्राधिकार देखे जाते हैं। इन सर अनि-
च्छित तर्क वितर्कोसे चिरिशान्तिप्रिय निउटनको घडी
मर्मपीडा होती थी । उन्होंने एक वक्त कहा था--"विज्ञान
की अधिष्ठात्री देवीको मकरमोसे ऐसी मुहब्बत है कि
।
११८
वैज्ञानिक-जीवनी। [पाँचवाँ परिच्छेद
उनके अनुचरोंको उनकी सेवा करनेसे खूब कानूनदा में
होना पड़ेगा ।" और एक वक्त उन्होने लाइचनिट जके
लिसा था-"अपने बालोक सम्बन्धी सिन्तान्तके तर्क वित.
से ऐसा टु पित हुआ है कि एक छाया के पीछे पीछे दौर
कर मैं अपने जीवनकी सुखशान्ति यो वैठा ह"
निउटनका शेष जीवन स्वच्छन्दतापूर्वक ही चीता।
टकसाल के अध्यक्षपद पर नियुक्त हो बारह सौ पाउरा
वार्षिक पाने लगे। उन की वैज्ञानिक प्रतिभाश यूरोप
सर्वत्र सम्मान हुश्रा था। साम्राक्षी ऐन ने सन् १७०५.
उनको नाइटकी उपाधिसे अलङ्कत किया। उन्होने विवा
नहीं किया। शायद विवाह करनेकी कल्पना भी उन
मनमें पैदा न हुई। उनकी एक भाजी और उसके स्वाम
उनकी गृहस्थीकी देखभाल करते थे। उनका धर्मपर विश्वास
था और धर्मशास्त्र की पालोचना भी करते थे । सन् १७२
की १० मार्च को ५ वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हुई
वेस्ट मिनिस्टर एवी में वडे समारोहके साथ उनको समाधि
दी गई और छ सम्भ्रान्त व्यकियोने उनका शव उठाया
गेलिलिओका शोचनीय परिणाम और उनके प्रति इटल
निवासियोंकी अकृतज्ञताकी बात सोचनेसे मन जैसा
दुखित हो जाता है वैसा ही निउटन के प्रति इङ्गलेण्ड
निवासियोके इस प्रकारके सम्मान-प्रदर्शनसे प्रानन्दित
होता है।
निउटनके आविष्कारोंकी वार्ता पूरी पढनेसे स्वत
ही आश्चर्य पैदा होता है कि किस तरह एक व्यक्ति इतन
अाविष्कार कर सका था। अध्ययनकालमें ही उन्होंने
निउटन।] धानिक-जीपनो। ११६ द्विपद सिद्धान्त (binonal theory) और शून्य वृद्धि सिद्धान्त (theory of usuous) का श्राविष्कार श्रोर श्वेत 'पालोक का विश्लेषण किया था। इनके अतिरिक्त दिशा देखने के यन्त्रकी उन्नति करना, पडांशयन्नकी रचना, पालोक- सिद्धान्त, रंग सम्बन्धी सिद्धान्त, शटकी गतिका निर्णय आदि बहुत से पारिष्कार अकेले उन्होंने ही किये थे। ये प्राविपार यदि दो वक्षानिक मिल फर करते तो उनमेसे प्रत्येक हो रियात घेज्ञानिक कहा जाग। किन्तु सर्वो परि जर यह देखते है कि इन सबके सिवा चे विश्वाकर्षण का श्राविष्फार फर ब्रह्माके गृढ़ रहस्यका पर्दा सोल गये है, अनन्त ज्योतियोफा व्योममें प्रत्यद्भुत भ्रमण वृत्तान्तयुक्त गूढ़ तत्व प्रकाशित कर गये है ओर उसी के साथ ज्योतिप. शास्त्र को एक नये सूनमें गुथ, गये हे, तर उनके अतिमानु- पिक मानसिक शक्ति की प्रसरतामा विचारकर विस्मित हो जाते है । एक विस्मित फरासी वेशानिक इस प्रकार कह गया हे-"निउदन क्या हम लोगोंको तरह मनुष्य के समान सान-पान करते और सोते थे? मुझे नो वे देवता मालूम होते हे-मानो इस जगत् के बन्धनों से बाहर थे ।" और महा- पुरुष निउटन कह गये है-मने शानसमुद्र के तौरपर बैठकर फेवल कफड पत्थर पटोरे है, अनन्त ज्ञानसमुद्र मेरे आगे अनाविष्कृत पडा हे !" जो उसकी "महतो महीयान" जगत् स्टष्टि के अनन्तरहस्य के भीतर यूर गहरे पेठ चुके हैं उनके ही उपयुक्त यह उक्ति है।
१२० वैज्ञानिक-जीवनी। [छठयाँ परिच्छेद । . छठवां परिच्छेद। नागार्जुन। जैसे नवीन रसायनके जन्मदाता फरासीसी रासायनिक लेवोसिये हैं उसी प्रकार भारतीय प्राचीन रसायनके जन्म- दाता यदि कोई कहा जा सकता है तो वे नागार्जुन हैं। निसन्देह भारतीय रसायनके जन्मदाता नागार्जुन हैं। बहुतसे तान्त्रिक ग्रन्थोंमें नागार्जुन तीर्यपातन-प्रक्रिया (Distillation) और धातुको जारण-मारणप्रक्रियाके प्राविष्फर्ता कहे गये हैं। यहाँ कई एक प्रमाण दिये जाते हैं। चक्रपाणिने लोहमारणकी प्रक्रियाका वर्णन करते वक्त स्वीकार किया है कि यह प्रक्रिया नागार्जुन द्वारा प्रवर्तित हुई है। चक्रपाणिने "नागार्जुन पर्ति" का वर्णन करते वक्त लिसा है-"नागार्जुनेन लिखिता स्तभे पाटलिपुत्रे," इस वर्तिका एक उपादान मारा हुआ तॉवा हे। रसेन्द्र चिन्ता- मणि नागार्जुनको तिर्यक्पातन प्रक्रियाका श्राविष्फर्ता स्वीकार कर गये हैं-"तिर्यक्पातनमित्युक्त सिद्धनागार्जुना. दिमि " चक्रपाणि लोहमारण नागार्जुनका अाविष्कार कह गये हैं। "नागार्जुने मुनीन्द्र शशास चल्लौहशास्त्रमतिगहनम् ।" नित्यनाथ विरचित रसरत्नाकर नामक रसग्रन्थ में, "व्यथि. तान हितार्थाय प्रोक्त नागार्जुनेनयत्। लोकमे नागार्जुनको रसविषयक उपदेष्टा स्वीकार कर गये हैं। इनके अतिरिक्त रसार्णव, रसरत्नसमुचय, रसराजलदमी, रसकल्पसुनाकर प्रभृति यावतीय तान्त्रिक ग्रन्थों में नागार्जुन एक प्रधान उपदेष्टा
नागार्जुन।]
घंशानिफ जीवनी।
१
है। महाय
माने गये है। नागार्जुन रसरनाफर, श्रारोग्यमजरी, रसेन
मगल यादि प्रन्योंके रचयिता फटे जाते हैं।
नागार्जुनका आर्विभाव काल ।
यदुतोका फहना नागार्जुन पार पोद्धधर्मके प्रवत्तयिा
सिद्धनागार्जुन एक ही व्यक्ति हैं। सुश्रुतके टीकाक
इल्यनाचार्य के मतानुसार नागार्जुन मुथुत के प्रतिसस्का
पर नागार्जुन रासायनिक श्रीर चिकित
पारदर्शी थे, इस रिपय के अनेक प्रमाण योद्ध, पाली, तिब्बती
पार चीनी भाषामै लिखित नाना प्रन्यासे सग्रहीत कि
गये है। चीन के विख्यात पर्यटक अपनमग सातवी स
में भारत घूमने प्राये थे। वे भारतमें श्रा नागार्जुनको प्रसि
घोर पोर रासायनिक सुन गये थे । तिव्यतके सुप्रसिद्ध लार
तारानाथ अपने पैदधर्मके इतिहासमें नागार्जुनकी चिकित
शास्त्र विषयक पारदर्शिताके सम्बन्धमें अतिमानुपिक फिर
दन्तिया सग्रह कर गये है। वास्तविक यहुमहायान बार
धर्म प्रन्या में नागार्जुन पक ही समय धर्म प्रवर्तक श्री
रासायनिक कहे गये हैं।
नागार्जुनके श्रागिर्भाव फालके विपयम बहुत मतभेद है
जिन सब प्रमाणके द्वारा उनके शाविर्भाव फालका निरूप
किया जा सकता है चे नीचे दिये जाते है।
पहला-चीन पर्यटक हुएनसग नागार्जुनको राजा शर
वाहनका यन्धु लिख गये है
दूसरा--पाँचवी सदी में नागर्जुनकी जीवनीका अनुवा
चीनी भापामें हुआ था।
।
१२४
वैज्ञानिक-जीवनी। [छठवॉ परिच्छेद ।
प्रभृतिके ग्रन्थोंसे सग्रहीत 'नागार्जुनकी जीवनी संग्रह' नामक
पुस्तकसे यह किम्बदन्ती नीचे दी जाती है ।
विदर्भ नगरके एक धनी ब्राह्मणके बहुत समयतक
कोई सन्तान न हुई । एक रातको उसने यह स्वप्न देखा कि
सौ ब्राह्मणोंका भोजन करानेसे उसके एक पुत्र पैदा होगा।
पुत्रके जन्म लेने पर (यह पुत्र ही नागार्जुन थे) ज्योतिषियोंने
कहा कि यदि पुत्रके पिता-माता सौ ब्राह्मणों को भोजन कराये तो
पुत्र सात वर्षनक जी सकता है। इसके बाद उसकी आयु
नहीं। सात साल जव वीत गये तब पिता-माता दु खसे
पुत्र को एक निर्जन स्थान में रख आये। वहॉसे
नागार्जुनके नलेन्द्रविहार चले जाने पर विहारके अध्यक्ष
श्रीसरहमदने नागार्जुनको भिक्षुकपदपर दीक्षित किया ।
कुछ समयके बाद देशमें दुभिति पडनेपर रुपया कमाने
की इच्छाके कारण अन्य भिक्षुकगणोकी सलाहसे नागार्जुनने
दूसरी धातुओका सोना बना लेनेकी युक्तिया सीखने के
लिए महासमुद्र के मध्यवाले एक द्वीपमें रहनेवाले एक
साधुके पास जाने की इच्छा की । ये विद्यावलसे एक सम्मोहित
वृत्तके दो पत्ते एकत्रकर और उनपर चढकर उस छीपमें
जा पहुंचे। नागार्जुन सोना बनानेकी प्रक्रिया सीखकर
नलेन्द्रविहारको लौट आये और बहुतसा सोना बनाकर
उसकी श्रायसे सब भिक्षुकोंका पालन-पोषण करने लगे
अनन्तर उन्होने योग सीखकर सिद्धि प्राप्त की थी। नागार्जुन
ने अनेक चैत्य विहारोंकी स्थापना की थी और विज्ञान,
चिकित्सा, ज्योतिप और रसायनशास्त्र सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ
लिखे थे। श्रीसरहभद्रकी मृत्युके बाद नागार्जुन नलेन्द्रविहारके
7
नागार्जुन।]
वैज्ञानिक-जीवनो।
१२५
अध्यक्ष बनायेगये। उन्होने बड़ी दक्षतासे विहारका काम
चलाया। उनके गुरु श्रीसरहमदने माध्यमिक दर्शन मात्र
का वीज वो दिया था, उन्होंने उसी दर्शन को अच्छी मजबूत
बुनियाद देकर स्थापित किया ।"
उपर्युक्त तथा अनान्य किम्बदन्तियों से मालूम होता है कि
नागार्जुन ब्राह्मण पुत्र थे, श्रनन्तर उन्होने योद्धधर्म की दीक्षा
ली। श्रीसरहभः उनके गुरु थे और उनकी मृत्युफेवाद नागार्जुन
मलेन्द्रविहारके अध्यत हुए। उन्होने ही माध्यमिक दर्शन की
प्रतिष्ठा की और रसायन चिकित्सा प्रभृति शास्त्रों के ग्रन्थ
निर्माण कर गये।
नागार्जुन सुश्रुतके प्रतिसंस्कर्ता थे।
सुश्रुतके टीकाकर डल्वनाचार्यके मतानुसार नागार्जुन
प्राचीन सुश्रुतके प्रतिसस्कर्ता और सुश्रुतके उत्तरतन्त्रके
रचयिता है । इस उत्तरतन्त्रमें बहुतसी व्याधियो और
शारीरिक चिकित्साका वर्णन है। सुश्रुतके अन्यान्य स्थानामे
विशेष रीतिसे अखचिकित्साका ही वर्णन है, शारीरिक
चिकित्साका वर्णन बहुत ही सामान्य है।
तिर्यक्यातनका (Distallation) आविष्कार ।
रसेन्द्र चिन्तामाणि श्रादि ग्रन्थो के मतानुसार नागार्जुन
तिर्यस्पातन प्रक्रियाके श्राविकर्ता है। प्राचीन कालमें
तिर्यपातन प्रक्रियाका अविष्कार प्रधानत मदिरा और
पारा शुद्ध करनेके लिए हुआ होगा । रसेन्द्रविन्तम्मणिमें
नागार्जुन प्रभृतिको प्रवत्तिर्त तिर्यपातन प्रक्रिया इस प्रकार
.
.
१२६
वैज्ञानिक जीवनी। [छठवॉ परिच्छेद ।
---
वर्णित है,-दे। कलसियों में से एकमें पारा और दूसरीमें
पानी भरकर तिर्यक् भावसे दोनोको रखना चाहिए और
दोनोका मुँह एकत्रकर मुँह बन्द कर देना चाहिए। इसके
बाद पारेवाली फलसीमें तबतक ताप देना चाहिए जवतक
पारा पानीवाली कलसीमें न चला जाय । * यह प्रक्रिया प्राज
कलकी तिर्यपातन प्रणालीका पूर्वाभास है। पानीवाली
कलसी Londonsor का काम करती है। पानी को गिराकर
पानीवाली कलसीके बदले खाली कलसी काममें लाना
चाहिए और कलसीके ऊपर बाहरी हिस्सेमें पानी गिराकर
उसे शीतल रखना चाहिए।
धातुके जारण-मारणका आविष्कार
वहुविध तान्त्रिक प्रथोंमें नागार्जुन लोहा आदि धातुओंके
जारण-मारण प्रक्रियाके भाविष्कारक कहे गये है। इसी
धातुमारणकी प्रक्रिया तथा अल्पमूल्यवाली धातुको सुवर्णमें
रूपान्तरित करनेकी प्रक्रियाके आविष्फारसे ही रसायन
शास्त्र की उत्पत्ति हुई है। इन दोनो प्रक्रियाओंके आविष्कारक
होनेसे भारतमें रसायन शास्त्र की प्रतिष्ठा करने का श्रेय
नागर्जुनको है।
बातुओंकी मारण प्रक्रियामा प्रथम उल्लेख हम मुश्रुत
के उत्तर तन्त्रमें देखते है । हम आगे लिखही आये है कि
* घटे रस विनिक्षिप्य सजल घट मन्यम् ।
निर्यमुख द्वय कृत्या त मुस रोधयेव सुधी ॥
रसाधा ज्यालयेदग्नि यावत् सूतो जल विशेद ।
तिर्यक् पातनमित्युक्त सिद्धे नागार्जुनादिभि ।
रसेन्द्रचिन्तामणि
यहाँ नहीं दिया जाता। स्थूलत नारी
नागार्जुन है। यदि नागार्जुनने उत्तरतंत्र firetr
रतन्नमें वर्णित पातुकी अयप्कृतिनिपिनमा
धातुमारणकी प्रक्रियाका प्रथम परिचय
अयप्कृतिविधि धातुका यौगिक (coin Jy re"
की प्रक्रियाको पहली चेष्टा हे । मुथन र
यातुपोको अयप्कृति प्रक्रिया इस प्रकार
केबहुत पतले पत्ते बनाकर उसपर लन
चाहिए । इसके बाद उन पत्तोको कटा -
त्रिफला श्रोर सालसारादिके काढ़ेम yyarter
टढा होनेपर उस लोहेका पारीर
मिला उपयुक्त मानासे पिलाना चाहिए RAI
से उसे छान लेना चहिए । लोहेका EngHin
सीसा, चादी, सोना प्रादि धातु
किया जा सकता है।" इसा प्रशर मkrama
कोराइड और पारिसक्लोराइड तेयार
चक्रपाणिने नागार्जुनकी लौहमारी',
पूर्वक लिखी है। निरन्ध बहुत बढ़ता
नागार्जुन।]
वैज्ञानिक जीवनी।
-remix marine
इतनाचार्यके मतानुसार सुश्रुतके उन्ना -
+4
इस प्रकार सोलह बार जलान्ते शीर दुर
पेरकी लरडीसे जलाना चाहिए।
प्रोपोंके रसकी भावना दे फिर
ताप देनेसे लोहा मर जाता है। यह
पदपाकविधि प्रादि प्रणियानों
वैज्ञानिक-जीवनी । [छठवा परिच्छेद । है प्रक्रियाओका वर्णन करते समय चक्रपाणिने दो जगह नागा- र्जुनका नाम लिया है, जैसे-"नागार्जुनो मुनीन्द्र. शशास यल्लौहशास्त्रमतिगहनम्। “लौहस्य पाकमधुना नागार्जुनाशिष्ठ- मभिध्म । लोहा मारने की नागार्जुनको यह विधि रसेन्द्र । चिन्तामणिमें प्रारभसे ओर रसेन्द्रसार श्रादि न्ग्रथों में श्राशिक रूप से दी गई है। हीनधातुको सुवर्णमें रूपान्तरित करने की प्रक्रिया। आगे दीगई तिब्बती किम्बदन्तीसे मालूम हो सकता कि नागार्जुनको हीन धातुका सोना बना लेनेकी प्रक्रिया मालूम थी। सातवों सदी में हुएनसग जब भारतमें आये थे तब वे सुन गये थे कि नागार्जुनको ऐसी श्रोपध मालूम थी जिससे वेसव धातुओशोर पत्यरकोसोना बनासकते थे। डाकर प्रफुल्लचन्द्र रायको रसरत्नाकर नामक एक तान्त्रिक वौद्ध- अन्यमा जो नागार्जुन लिखित कहा जाता है, कुछ अंश मिला है। उन्होने स्वय ही स्वीकार किया है कि वह सातवीं या पाठवीं सदा में लिखा गया है। इस ग्रन्थमें नागार्जुनकी हीन धातुको सुवर्णमें रूपान्तरित करनेकी कई युक्तिया दीगई है। इन सव युक्तियोंका श्राविकार नागार्जुनने किया या या किसी दूसरेने इसका निर्णय करना कठिन है। नागार्जुनके समयमै फिर भी इस प्रकारकी युक्तियों का प्रचलित रहना सम्भव है। कौतूहली पाठकोंकी जानकारीके लिए यहा कई एक युक्तियाँ दी जाती है।
नागार्जुन।] वैज्ञानिक-जीवनी। १२६ (१) "राजवर्तकको शिरीपपुष्पकी भावना देनेसे एक रत्ती चॉदी और सौ रत्ती सोना उगते हुए सूर्यकी तरह वन- जायगा, इसमें विचित्रता क्या " (२) 'गधकको पलाशके रससे शुद्धकर चादीके साथ तीन- वार कडेकी प्रागसे पुटपाक देनेपर चॉदीसे सोना बन जाता है, इसमें विचित्रता क्या ?" (३) “यदि रसकका (Calamine) तीनवार तॉवेके माथ पुटपाक किया जाय तो तॉवेका सोना वन जायगा, इसमें विचित्रता क्या ?" (४) "भेडीके दूध और बहुतसे खट्टे रसोफी भावना देनेले दरद (Cinnabai) कुकुमसदृश सुवर्ण में परिणत हो जायगा, इसमें विचित्रता फ्या" अवश्य इन सय युक्तियोले चॉदी या.तॉवेसे सोना प्रथम न बनेगा, इन युक्तियोसे मिश्रधातु (alloy) या सोने के सइश एक सास रगकी चीज बन जायगी । इन सय युक्तियोसे पाठकों को याद रखना चाहिए- All is not gold that glitters" (१) फिमन चित्रं यदि राजवर्तकम् । शिरीपपुष्पानरसेन भाषितम् ॥ सित सुवणं तरुणार्फसन्निभ । फ्रोति गुजाशतमेक गुजया ॥ (२) फिमत्र चित्र यदि पीतगन्धक पलाशनियासरसेन शोधित ६
१३०
वैज्ञानिक-जीवनी। [छठवॉ परिच्छेद ।
गन्धक ओर
।
कज्जली या रसपर्पटी
प्रसिद्ध पूर्वोक्त रसरत्नाकरमें, जो नागार्जुनका लिखा
कहा जाता है, हम पारेका श्राभ्यन्तरिक प्रयोग पहले पाते है।
पहले ही लिखा जा चुका है कि यह ग्रन्थ सातवीं सदी में लिखा
गया है। इस ग्रन्यमें पारे और गन्धकको मिलाकर कजली
या रसपर्पटी बनाने की व्यवस्था है, और सोने,
पारेको मिलाकर लघुपुट से पचाकर स्वर्ण सिन्दुर बनाने
की व्यवस्था देसो जाती है। यह शेषोक्त साधकेन्द्र सानेसे
दिव्य देह हो जाती है।
आरण्यकैरुत्मलकैस्तु पाचित ।
करोति तार निपुटेन काचनम् ॥
(३) किमत्र चित्र रलको रसेन ।
क्रमेण कृत्वाम्बुधरेण रजित ।
करोति शुंत्व त्रिपुटेन काञ्चनम् ॥
(४) किमत्र चित्र दरद् सुभावित ॥
पयेन मेण्याबहुशोऽम्लवगे ।
सित सुवर्ण बहुधर्मभावित ॥
करोति साक्षात रकुदमप्रभम् ।
नागार्जुन विरचित रसरत्नाकर
*सूतकस्य पल गृह तुय्यांश सातक विषम् ।
तत्स गन्धक शुद्ध चूर्ण कृत्वम विनिक्षिपेत् ॥
रुत्वा फज्जालिकामादौ पल दत्वा च गन्धकम् ।
धृतपक्वन्च तच्चूर्ण पायस भाजने ॥
यावद्वत्वमायाति तत्क्षणात् त विनिक्षिपेत् ।
पुटे वा कदलीपने सिद्ध पर्पटिका रसम् ॥
1
नागार्जुन ! ] वैज्ञानिक जीवनी। यदि रसरत्नाकर नागार्जुन रचित न भी हो तोभी सातवीं सदीका तान्त्रिकमन्थ होनेसे हम लोग कह सकते है कि सातवीं सदीमे कज्जली, रसपर्पटिका, श्रार स्वर्णसिन्दुरका अाविषमर हुआ था और चे प्रोपधरूपमे पिलाये जाते थे। रसरत्नाकरके बाद वृन्दके सिद्धयोगमें एक हिस्सा गन्धक और आधा हिस्सा पारा मिलाकर रसामृत चूर्ण बनानेकी विधि हे । वृन्द चक्रपाणि के पहले हुए थे, किन्तु अध्यापक राय महाशय ने लिखा है कि सिद्धयोगके एक सस्करणमें रसामृत. चूर्णका उल्लेख नहीं मिला, केवल काश्मीरसे लाई गई हस्त लिसित प्रतिमें मिला है। वृन्दके वाद चक्रपाणिने एक हिस्सा पारा और एक हिस्सा गधक मिलाकर कज्जली बनाई है और उसको गलाकर रसपर्पटी तैयार की है। यही प्रस्तुत प्रणाली रसरत्नाक्रमे उरिलसित प्रस्तुत प्राणालीसे मिलती है । किन्तु चक्रपाणिने लिया है-"रसपर्पटिका स्याना निवद्धा चक्र- पाणिना " हम चक्रपाणिको फज्जलो ओर रसपर्पटिकाका श्राविकर्ता न कहकर यह कह सकते है कि उन्होंने वैद्यक शास्त्रमें उसे सन्निविष्ट किया है। इसके अतिरिक्त इसी रसरत्नाकर में विविध सनिज (016s) पदायोंसे यातु तेयार करनेकी विधियो ओर पच्चीस प्रकारके यन्त्रोंका उल्लेख है । धातु तेयार करनेकी विधियोंका नागार्जुनके समयमें प्रचलित रहना ही सम्भर है, किन्तु मालूम होता है यन्त्राका प्रचार नागार्जुनके पीछे हुश्रा था । फलत- नागार्जुन लिसित अन्य अन्धोकी समालोचना न होने से उनके वैज्ञानिक कार्याका ठीक विवरण देना असम्भव है। किन्तु यह ठीक समझ पड़ता है कि नागार्जुन धातुकी मारण-युक्तियों । .
वैज्ञानिक-जीवनी। [छठवाँ परिच्छेद । और हीनधातु का सोना बनानेकी युक्तियोंको उभ्दावित ओर प्रचलित कर भारतमें प्राचीन रसायनशास्त्रकी नीव डाल गये थे। उनके वादसे विविध धातुओके विविध योगिक निकाले गये और ओपधके काम आये तथा विविध यन्त्रोंका भी श्राविष्कार हुआ । वे भारतीय रसायनशास्त्र के युगप्रवर्तक थे। इन महापुरुषके वैज्ञानिककार्योका सम्यक तथ्य जाननेके लिए, चेष्टा करनेके निमित विद्वानों के निकट विनीत प्रार्थना है। गेवार, पेरासेल्सस, एविसेना, एटीकेला श्रादि हमारे परिचित है किन्तु नागार्जुन, चक्रपाणि अादि भारतके प्राचीन रासाय- निक हमारे अपरिचित है-यह जातीय कलङ्क कव दूर होगा ? । -
सातवाँ परिच्छेद
आर्यभट्ट
प्राचीन भारत अङ्कशास्त्र में, अनेक अशोमें, जगतका
गुरु था-यह बात पर निर्विवाद रूपसे स्वीकार की जा चुकी
है। दशम्नवका आविष्कार सर्वसम्मति से भारतमें ही हुश्रा
था। सरया लिपने की पद्धतिका आविष्कार भी भारतीय
है । यही १, २, ३ प्रभृति सख्यायें अरववालोंके ग्रहण करने
पर क्रमश यूरोपमें ग्रहण की गई । प्राचीन भारत प्राचीन
ग्रीस देशका ज्योतिषशास्त्रका गुरु होनेका गौरव कर सकता
है। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, वराहमिहिर तया भाष्कराचार्यकी
अकशा और ज्योतिपके विपयकी गवेपणाय केवल भारत
के ही क्यों, जगत्के गौरवकी सामग्री है । इन फई महापुरुषों
के अग्रगण्य आर्यभट्टके विषयकी इस प्रवन्ध में सक्षिप्त समा-
लोचना करनेकी इच्छा है।
थार्यभट्ट या आर्यभटके जीवन सम्बन्धी बातें बहुत ही
कम मालूम हुई है। उनके अन्यके पढने से मालूम होता है
कि उन्होंने ३५७७ कल्यन्द अथवा ३६८ शक (४७६ ईसवी)
में जन्मग्रहण किया थाार २३वर्षकी अवस्था में सुप्रसिद्ध
ग्रन्थ 'आर्यभटीय' या 'आर्यभट्ट तन्त्र की रचना की थी। ग्रीस
वाले उनको श्रन्दुवेरियस या अर्दुवेरियस और अरबवाले
अर्जवर कहते थे। कुसुमपुर या पाटलीपुत्र (अाजकल का
पटना) उनका वासस्थान था और यहीं उन्होंने 'आर्यभटीया
की रचना की थी।
१३४
वैज्ञानिफ-जीवनी। [सातवॉ परिच्छेद ।
.
आर्यभटीय
'नार्यभटीय' के पहले ज्योतिषशास्त्र वहुत ही अनिश्चित
था। इस कारण श्रार्यभट्ट एक हिसावले भारतीय ज्योतिष
के प्रतिष्ठाता कहे जा सकते हैं। उनके पहले के, ब्रह्मसिद्धान्त
सूर्यसिद्धान्त, व्यास-सिद्धान्त प्रभृति सिद्धान्त देखे जाते है
किन्तु बहुतसे सिद्धान्त लुप्त हो गये है। कोई कोई सिद्धान्त
समयान्तर में परिवर्तित हो अवतक विद्यमान है। इनमेसे
ब्रह्मसिद्धान्त सबसे प्राचीन है। आर्यभट्टने लिखा है कि
इस ब्रह्मसिद्धान्तके श्राधारपर उन्होंने अपना ग्रन्थ लिखा
है। इससे अच्छी तरह मालूम होता है कि उन्होंने प्राचीन
ग्रीक लोगोंसे कोई विपय ग्रहण न किया था। उनके अभिमत
भारतीय थे, उनमें ग्रीकलोगोंका संश्रव नहीं। यह ग्रन्थ
चार भागों में विभक्त है-गीतिकापाद, गणितपाद, काल
क्रियापाद और गोलपाद । गणितपादमें पाटीगणित ओर
चाकी तीन भागों में ज्योतिप और गोलगणितकी आलोचना
की गई है।
पृथिवी गोली और निरावलम्व है।
पृथिवीके श्राकारका स्वरूप निर्णय करने की आकाक्षा
स्वभावसे ही, मनुप्यके मनको उत्साहित करती है। सर्च
साधारणकी दृष्टि में पृथिवी समतल क्षेत्र है, किन्तु प्राचीन
कालसे हिन्दू उसे गोली मान रहे है । ऋग्वेदके, किसी किसी
सूक्तमें पृथिवीके गोलत्वका श्राभास पाया जाता है। पृथिवी
क्राइस्टसे दो तान हजार वर्ष पहलेके भारतीय ज्यातिपका ज्ञान प्राप्त
करने के लिए Brennand's Hindu astronomy देखिये।
।
,
,
आर्यभट्ट।]
वैज्ञानिक जीवनी।
१३५
के निरावलम्य स्थित होनेकी सूचना भी ऋग्वेदमें मिलती
है। श्रार्यभट्टने अवश्यही पृथियीको गोलापन और निराधार
स्थित होना स्वीकार किया है। पृथियोका निराधार
स्थित होना स्वीकार करनेसे स्वत ही प्रश्न उठता है कि
यदि पास्तरमें ही पृथिवी निरावलम्ब है, तो वृक्षलता,
जोयजन्तु, पर्वतादि पृथिवीपर केसे खडे है। इसका उत्तर
आर्यमने यह दिया है कि कदम्बके गोले फलके ऊपर की
ग्रन्थिया जेसे फुतपर अवस्थित है, उसी प्रकार पृथिवी के
गोले पर जलज, स्थलज पदार्थ अवस्थित है।* घराह, भाष्कर
प्रभृति आर्यभट्टके गादक सय ज्योतिपियोंनेही पृथिवीका
गोलापन पोर निरापलम्बमें अवस्थित होना स्वीकार किया
है । यहनन हो सकता है कि यदि पृथिवी निराधार हे तो लुढक
क्यों नहीं पडती ? इसका मुन्दर उत्तर भाष्कराचार्य दे गये
है-"पृथिवी के चारों ओर श्राकाश (शून्य) हे यह तुढक भी
पडे तो कहाँ ?
पृथिवीके घूमनेका आविष्कार
भारतमें आर्यभट्ट पृथिवीके घूमनेके आविष्कारक प्रसिद्ध
है। कोई कोई कहते हैं कि वेदमें भो पृथिवीके घूमनेका
हवाला दिया गया है, किन्तु वेज्ञानिक दृष्टिसे आर्यभट्ट ही
उसके आविष्कारक माने गये है। आर्यभट्टके यादके ज्योतिषियों
मैंने किसीने भी पृथिवीका घूमना स्वीकार नहीं किया है।
अतएन इस तरह मालूम होता है कि भारतवर्षमें पायभट्ट
ही पृथिवीके घूमनेके सिद्धान्तके एकमात्र प्राविष्मारक और
*यद्वव फदम्न पुग्पनधि प्रचित समतत कुसुमै
तडि सर्वसत्वजलजै स्थलजैश्य भूगोल ॥
।
है
वैज्ञानिक-जीवनो। [सातवा परिच्छेद ।
।
परिपोपक थे। ग्रीस देशमें पृथिवीके घूमनेका सिद्धान्त बहुत
प्राचीन कालमें एकवार अाविष्कृत हुआ था, किन्तु किसीके
खीकार न करनेसे वह विलुप्त हो गया । सुप्रसिद्ध दार्शनिक
पिथगोरस ( क्राइस्टसे पॉच शताब्दी पहले) का कहना ।
था कि पृथिवी अचल नहीं है, वह चलती है। किन्तु उसको
यह मालूम न था कि वह सूर्यके चारों ओर घूमती है।
उसके बाद एरिस्टारकस (क्राइस्ट से तीसरी सदी पूर्व) ने
यह आविष्कार किया कि पृथिवी एक वर्षमें सूर्यको परिक्रमा
करती है और अपने अक्षपर ही घूमती हे, इसीसे दिन ओर
रात होते हैं। उनका यह सिद्धान्त सभीने स्वीकार किया
और परिस्टारकसके जन्मके प्राय अट्ठारह सौ वर्ष बाद
सुप्रसिद्ध ज्योतिपी कोपार्निकासने पृथिवी और अन्य ग्रहोंके
सूर्य के चारो ओर घूमनेके विपय का प्रचार पुनः किया ।
आर्यभट्टके समयमें, ग्रीसदेशमें पृथिवीके
घूमनेका
सिद्धान्त एकवारगी लुप्त हो गया था। इसी कारण हम लोग
आयभट्ट को पृथिवीके घूमनेके सिद्धान्तका मौलिक
आविष्कारक अनायास ही मान सकते है । आर्यभट्ट कहते हैं-
"चल्ला पृथिवी स्थिरा भाति" अर्थात् पृथिवी स्थिर
मालूम होनेपर भी चलती है । वे और भी कहते है कि पृथिवीके
पूर्वकी ओर १५८२२३१५०० घार घूम श्रानेसे (अथवा इतने
दिनमें ) एक चतुर्युग वा ४३२०८०० सौर वर्ष होते हैं। इससे
श्रच्छी तरह समझ पडता हे कि यार्यभट्ट जानते थे कि पृथिवीके
एफवार अपने अक्षपर घूमनेसे एक दिनमान होता है और चतु-
युगमें पृथिवी इतने वार अपने प्रक्षके ऊपर घूमती है । उपयुक्त
गणनासे यह अनुमित नहीं होता कि पृथिवी सूर्यके चारों
।
.
आर्यभट्ट।]. वैज्ञानिक जीवनी। थोर घूमती हे। अनन्तर लाल, ब्रह्मगुप्त प्रभृति पीछेके ज्योतिपियों ने आर्यभट्टको मतका खडनकर अपने अक्षपर पृथिवीके धूमनेका उल्लेख किया है, सूर्यके चारों ओर पृथिवीके घूमने फा उल्लेख नहीं किया है। इससे जाना जाता है कि पिथगोरस की तरह आर्यभट्ट अक्षके ऊपर पृथिवीके घूमनेकी यात जानते थे, सूर्यके चारों ओर घूमने की बात जानते न थे। एक स्थलपर आर्यभट्टने इस पृथिवीके परिभ्रमणकी बात बहुत ही अच्छे उदाहरण द्वारा समझाई है। उन्होंने कहा है-जिस तरह चलती हुई नॉवपर चढ़े हुए व्यक्ति तीर के अचल वृक्षोको पीछेकी ओर जाते हुए देखते है, उसी तरह लकासे ( पृथिवी के चलने के कारण) स्थिर नक्षन पश्चिम की ओर जाते हुए दिखाई देते है।" अनतोकी पश्चिमकी ओर स्फुटगति (Apparent motion) देखते है, पर असलमें पृथिवो ही पूर्वको ओर घूमती है और इसी परिभ्रमणके कारण नक्षत्रोंको पश्चिमकी ओर जाते हुए देखते हैं। आज- कल जैसे ग्रीनविच (Greenrich) का समय गणनामें व्यवहत होता है, आर्यभट्ट लङ्काके समयमा उसी प्रकार उपयोग करते थे। और कई श्लोकों में आर्यभट्टने पृथिवीके परिभ्रमणका उल्लेख किया है, किन्तु विस्तार-भयके कारण हम उन्हें यहाँ नहीं देते । चादके जमानेमें लल्ल, श्रीपति, ब्रह्मगुप्त, वराह प्रभृति ज्योतिपियाने उनका मत उद्धृतकर उसके सण्डन करनेकी चेष्टा की है । लरल आर्यभट्टके शिष्य थे, *अनुलोम गति नौरुषं पश्यत्यचले विलोमग यदव । अघलानि मानि तव समपश्चिमगानि लदायाम ।
१३८
वैज्ञानिक जीवनी। [सातवॉ परिच्छेद ।
।
किन्तु शिष्यने गुरुका सिद्धान्त नहीं माना। उन्होंने पृथिवी
के परिभ्रमणके विरुद्ध अनेक आपत्तियां उठाई थी। पाठकों
को कौतूहल चरितार्थ करनेके लिए नीचे कुछ नमूने दिये
जाते है-
(क) यदि पृथिवी ही घूमती हे तो पक्षी अन्यत्र उड़ जाकर
फिर अपने घोंसले को कैसे लौट आते है?
(ब) पृथिवी यदि घूमती होती तो वाण ऊपर फेंकने पर वह
अपने ही स्थानपर लौटकर न गिरता, कारण वाणके नीचे गिरने
के समय के मध्यमें पृथिवी बहुत कुछ पूर्व की ओर खिसक
जायगी।
(ग) पृथिवी यदि धूमतो होती तो लोग मेघों को पूर्व की
ओर जाते कभी न देखते ।
(घ) यदि यह मान लें कि पृथिवी धीरे धीरे धूमती है, तो
आर्यभट्टके मतानुसार वह एक दिन में एकवार कैसे घूम
जाती है।
श्रीपति, ब्रह्मगुप्त, वराह प्रभृति सभीने इस प्रकारकी
आपत्तियों उठाकर पृथिवीके धूमनेके सिद्धान्तका खण्डन
करनेकी चेष्टा की थी । यूरोपमें पन्द्रहवीं शताब्दीमै जर
कोपार्निकासने पृथिवीके श्रावर्तनवादको पुन प्रचारित
किया था तय भी इस प्रकारको युक्तियों द्वारा उसका भी मन
पहले अस्वीकृत हुया था। सुप्रसिद्ध ज्योतिषी टाइकोब्राहि
लल्लकी तरह यह नहीं समझ सका था कि ऊपर फेंकी हुई
गेंद पश्चिमकी ओर गिरती क्यों नहीं दिखाई देती। पाठक
समझ रहे है फि एक वातसे इन सय प्रशोकी मीमास हो
आर्यभट्ट'] । वैज्ञानिक-जीवनी। 1 सकती है। पृथिवीके साथ वायुमण्डल भी घूमता है। आश्चर की बात है कि यह बात किसीके दिमागमें प्रविष्ट न हुई । यदि किसी के दिमागमें यह बात प्रविष्ट होती तो ये सब आपत्तिय पहले ही उठन सकतो। पाठक समझ सकते हैं कि पृथिवी के साथ बायुमण्डलके भी घूमनेले लल्ल प्रमुस ज्योतिषिया को सर आपत्तियोंका सण्डन हो जाता है। इस भूभ्रमणवाद के अतिरिक्त आर्यभट्ट ज्योतिप सम्बन्धी अनेक छोटे छोटे विषयोंपर मत दे गये है। नक्षत्रोंकी दीप्ति के विपय में लिय गये है कि गोली पृथिवी, ग्रह ओर नक्षत्र सूर्य के द्वारा प्रकाश पाते है। उनका जो श्रद्धांश सूर्यको श्रोर रहता है, उसीको प्रकाश प्राप्त होता हे, वाकीका श्रद्धाश श्रपनी छायाले अन्धकारमय रहता है। चेदिक ऋपियोको भी यह मालूम था कि चन्द्र सूर्य के प्रकाशसे प्रकाशित होता है। ग्रहोंकी कक्षा (Obi) के सम्बन्धमें आर्यभट्ट लिस गये है कि शनि (Saturn) बृहस्पति (Jupiter), मगल (fats), सूर्य, शुक्र (Venus), बुध (Mercurs), और चन्द्र की कक्षा उत्तरोत्तर अवस्थित है और सपके नीचे पृथिवीसी कक्षा हे। इससे जाना जाता है कि आर्यभट्ट जानते थे कि सूर्यके चारों और पृथिवी और दूसरे ग्रह घूमते है। मालूम होता है, किार्यमष्ट ग्रहणका प्ररत कारण जानते थे। वराह पार्यभट्टके कुछ पीछे वर्तमान थे। वे जहरणका प्रकृत श्राधुनिक कारण विस्तार के साथ लिख गये है श्रोर उन्होंने ग्रहणके सम्बन्धकी पौगणिक फापनारा खडन किया है। आर्यभट्ट फेल ज्योतिपो ही न थे, वे श्राशास्त्र जाननेवाले अच्छे पडित भी थे। वे पादीगणित, वीजगणित (Algebra) ।
। १४० वैज्ञानिक-जीवनी । [सातवॉ परिच्छेद । - और त्रिकोणमिति (Trigonometry) के सम्बन्धमें अनेक मौलिक गवापणायें प्रकाशित कर गये हैं। संख्यानिर्देश श्रार्यभट्टके समयमें, भारतमें, १, २, ३ प्रभृति सख्या- निर्देशक वर्ण आविष्कृत न हुए थे। सातवी शताब्दीमें, भारत में यह सरयानिर्देशक वर्णमाला प्रचलित हुई । सभवत इसके पहले भी कई एक सख्यावाचक वर्ण भारतमें प्रचलित थे। अरबदेशके प्राचीन व्यासायियोने आठवी शताब्दीमें इस भारतीय सरयानिर्देशक वर्णमाला का व्यवहार किया। पहले ही कहा जा चुका है कि आर्यभट्टके समयमें मख्यानिर्देशक वर्णमाला श्राविष्कृत न हुई थी। सख्यानिर्देशके लिए ये क, स, ग प्रभृति वौँका प्रयोग करते थे। इस वर्णमालाका प्रयोग करके भी वे सहज ही वडी वडी सख्यायें प्रकट कर सके थे। सस्यानिर्देशक वर्णमाला भारतसे यूरोपमें किस प्रकार गृहीत हुई, इसका यहाँ सक्षिप्त विवरण देना अप्रास- गिक न होगा। अरवके श्रकशास्त्रविशारदोंमें से सुप्रसिद्ध वेन मूसा (६०० ईसवी) ने सबसे पहले भारतीय सख्या निर्देशक वर्ण- मालाका व्यवहार किया और कमश अरवके अन्य अन्य वैशा निकोंने भी उसे ग्रहण किया । प्रचीन यूरोपमें, १, २, ३ प्रभृति रोमीय सरयानिर्देशक वर्णमाला पहले व्यवहत होती थी, किन्तु १००० शताब्दी में, रिम्स प्रदेशके प्रार्कविशप सुपसिद्ध फरासी धर्मयाजक गारवार्टने और उसके बाद रोमके सर्वप्रधान याजक पोप द्वितीय सिलवेस्टारने अरबवालोसे हिन्दुओंको आर्यभट्ट । वैज्ञानिक-जीवनी। सरयानिर्देशक वर्णमाला ग्रहणकर यूरोपमें प्रचलित की। १२०२ ईसवी में पिसाके सुप्रसिद्ध लिभोनाडोंने अपने ग्रन्थ में यह सरयानिर्देशक वर्णमाला व्यवहृत की। श्रव भी यह वर्णमाला ही जगत् में प्राय सर्वत्र ही प्रचलित है। पहले की रोमकी सण्यानिर्देशक १,२,३,४,५,5,7,00,10 वर्णमाला कहाँ विशेष कार्यके लिए व्यवहृत 1,2,3,४,५,8,2,३,१० होती है। रोम की वर्ण मालामें हिसाव करने 1,2,3,2,4,5,7,8,2,10 याअकलिखने की अपेक्षा भारतीय वर्णमालामें 12345618.210 श्रक लिसना सहज होने से वह सर्वत्र गृतीत हुई 12344689.. है। भारतीय सख्या निर्दशक वर्णमाला से 123946890 सामान्य परिर्वतन होकर प्राचीन अरब और मध्यकालीन यूरोपकी वर्णमालायें गठित हुई है यह सरया- निर्देशक वर्णमालाओं से प्रकट होगा* | बीजगणित (Algebra) आर्यभट्ट प्राचीन भारतके प्रथम ऐतिहासिक बीजगणित- प्रणेता है। वे वीजगणित सम्बन्धी अनेक नये आविष्कार लिप गये है। प्राचीन यूरोपमें डाईश्रोफेटस वीजगणित के यह तालिका Balls History of Mathematics नामक प्रथसे बदृत की गई है।
१४२
वैज्ञानिक जीवनी [सातवॉ परिच्छेद।
प्राचीन रचयिता प्रसिद्ध है। उनका प्राविविकाल ठीक
मालूम नही-सम्भवत. चौथी सदी वर्तमान थे। वे
एलेक्जेंडियाके निवासी थे। और सम्भत ग्रीक न थे।
उनका अन्य बहुत दिनोंसे विलुप्तप्राय हो गया है। प्राय
६६० ईसवी में डाईओफंटसके वीजगणितका अरची मापा
में अनुवाद एश्रा था 1 डाईप्रोफेंटसका ग्रन्थ भार्यभट्ट के
समयम और उनके बहुत काल पीछेतक भारत में अज्ञाता
था और इसी कारण हम लोग आर्यभट्टको बीजगणित के
भोलिक श्राविकारक कर सकते है । कोलक प्रभृति
प्रमुख पाश्चात्य पडितोंने श्ररवके इतिहासमें आलोचना करके
यह दिसाया हे कि बगदादके अली मामून, हारुल अली
रसीद, अली महमूद और अली मतादेद ये चार बादशाहोके
श्रमलम लगातार १५० वर्षांतक प्रचीन नानाविव सस्कृत
अन्ध अरवी भाषामें अनुवादित हुए थे। इसी समय आर्यभट्ट,
ब्रह्मगुप्त प्रभृति भारतीय ज्योतिपियोके ग्रन्थ भी अरवी भाषा
में अनुदित और पठित हुए ये । ७७३ ईसवीमें वादशाह अल
मनसूरके समयमें भारतीय ज्योतिषी धादशाहके 'दरवारमै
बुलाये गये । इस प्रकार पार्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त प्रभृति भारतीय
ज्योतिपियोंके क्रमश बीजगणित सम्बन्धका ज्ञान भी अरब
वालों तक पहुँचा। इसी कारण अरखवालोका वीजगणित
भारतीय बीजगणित का बहुत ऋणी है। 800 ईसवी में,
अरववालोंमें वेन मूसाने पहले पहल वीजगणित की रचना
की । अरबके बीजगणितविशारदोसे पिसा लिईना ने सन्
१२०२ में वीजगणित सीसकर उसका वीज यूरोपमें बोया ।
उसी बीजसे पैदा हुश्रा वृक्ष क्रमश फूल फल उठा । जिस
आर्यभट्ट।
4
वैज्ञानिक-जीवनी।
१४३
प्रकार सख्यानिर्देशक वर्णमालाके लिए ससार भारतका
ऋणी है, उसी प्रकार वीजगणितके सम्बन्धमें भी यूरोप
अरचनाले वीजगणितवेत्ताओ को मध्यस्थवना मृणी है।
यह पहले ही कहा जा चुका है कि ब्रह्मगुप्त, भाष्कराचार्य
प्रभृति भारतीय बीजगणितवेत्ताओंमेंसे आर्यभट्ट सरसे
प्राचीन थे। ये सर्वसम्मत कुट्टक विधि (Algebric Annlysis)
के प्राधिकर्ता थे । चे वर्णात्मक समीकरण (Quadiatic
Equation) जानते थे श्रोर--
२+२+३+१+
१२+२+३+४+
१३+२+३+४+
इन तीन श्रेणियों का योगफल दिया है। इसके अतिरिक्त
उन्होंने बीजगणितके और भी अनेक समीकरणोंका असफल
दिया है।
त्रिकोणमिति ('Trigonometry)
निमोणमिति के लिहाज से भी आर्यभट्ट प्राचीन भारतीय
ज्योतियों के अग्रणी र प्रचीन ग्रन्थकार है। निकोण.
मितिमें वे अनेक फोगों के ज्या (Sine) की एक तालिका
लिस गये है । उन्होंने द्विगुणित कोणके आधो पूर्णज्या
(Semi chord of double the angle) को ज्या निदिष्ट
किया है। प्रथम वृत्तपाद (first gundrint of n earcle)
के ३ डिग्री वा उसके गुणितकोणकी ज्या निद्धारितकर
उन्होंने यह तालिका तेयार की है। उन्होंने ६० डिग्री की
ज्याको ३४३६ माना हे । इसी गणनासे उन्होंने परिधि
व्यास की सख्या निश्चय ही ३१४१६ निकाली हे नहीं
वैज्ञानिक-जीवनी। सातवॉ परिच्छेद ।
tour-R
तो यह सख्या ठीक न होती । आधुनिक वैज्ञानिक यह सख्या
३१४१५६ निर्णय करते हैं। उन्होंने परिश्रम कम पडने के लिए
भूपरिधिकी गणना करते समय इस सख्या को /१० वा
३ १९२३ पकड लिया है। किन्तु ठीक सख्या ३१४१६ है, यह
भी वे जानते थे, यह उपर्युक्त अकोसे जाना जाता है । इसके
सिवा त्रिकोणमितिके सम्बन्धमें और भी अनेको हिसाव उन्होंने
निकाले है। ज्यामिति (Geometry) के सम्बन्धके उनके अनेक
प्रमाणोंमें भूल है। असल में ज्यामितिका ज्ञान प्राचीन ग्रीस
देशमें जैसा उन्नत था वैसा भारत में न था।
ब्रह्मगुत, बराहमिहिर और भाफराचार्य प्रभृति प्राचीन
भारतीय ज्योतिषी और अकशास्त्रविद् आर्यभट्ट के पीछे हुए है।
उनके कर्ममय जीवनका परिचय देने की इच्छा है। इस
प्रवन्धमें उनके अग्रणीके आविष्कारोंकी आलोचना करने का
सुयोग पानेसे अपने को कृतार्थ समझता हूँ।
..
-
आठवाँ परिच्छेद।
डारविन ।
चालन रापर्ट टारविनका जन्म सन् २००६ की १२ वीं
फरवरीको इदलेगडके अन्तर्गत खुयेगे नामक स्थानन मुश्रा
था। उनके पिताका नाम रापर्ट डारधिन या । वे एक अच्छे
चिकित्सक थे। डारविनको माता डारचिनको पाट वर्षका
छोड कर मर गई। तासे उनके लालन पालनका भार
उनकी बड़ी बहनोंपर पडा। डारचिनके पाँच भाई बहनें
थी, डारविन उन सरसे छोट थे। डारविन पिताको बहुत
चाहते थे, उनको बहुत भक्ति करते थे, और अनेक स्थानों
में उनके सम्बन्धको बहुत सी बातें लिय गये है। सन् २०१८
में वे रोके स्कूल भेजे गये । इस स्कूलके अध्यक्ष
डाकृर वाटलर थे, ये पीछे लियफोड के पिशप हुप थे।
सारविनके पिताकी इच्छा थी कि डारपिन उनकी ही तरह
चिकित्साशास्त्र पढे। इसी कारण डारचिन, सन् १८२५ में
पडिनवरा कालेज भेजे गये। चिकित्साविज्ञान पहले
उनको न रचा। किन्तु यहाँ अपने अगले जोवनके कार्योकी
प्रथम सूचनाके प्रारम्भ करने का सुयोग उन्हें मिला ।
अध्यापक डाकृर ग्राएट के साथ बन्धुत्व हो जानेसे डारपिन
उनके साथ समुद्रतोरके जीव-जन्तुओंका नमूना सग्रह
करने जाते थे।
दो सारा एडिनबरामे रहनेके बाद उन्होंने चिकित्सा-
शास्त्र पढनेका सङ्करप छोड दिया। अनन्तर उनके लिए
विज्ञान पढने की इच्छा पैदा कर देने के फारस अशा न होता तो डारपिन डारविन हो सकते या नहीं, यह सारे मिता समापन हमलोने लिसा था कि वैज्ञानिक-जीवनी। [पाठवॉ परिच्छे धर्मयाजकका काम निश्चिन हुआ। इसलिए वे सन् १ में विख्यात स्त्रिज विश्वविद्यालके अन्तर्गत कारट कालेजमें भर्ती हुए। यहाँ सुप्रसिह श्रयापक हेसलं घनिष्ट यन्धुत्व हो जानेसे उनके जीवन की गति सम्पुर्ण र दूसरी ओर परिचालित हो गई। अध्यापक हसलो उद्द् िविज्ञानके और पीले सनिज विज्ञानके अध्यपक नि हुए । वे अच्छे विद्वान् थे, और छात्रोंसे खुब घनिष्टता । कर लेते थे। डारविन सलोके यहाँ तक प्रियपार हुए, घूमने जाते वक्त भोसला उनको अपने साथ ले लेने इस कारण डारचिनके सहपाठी उनको हसलोका सहा कहकर उनकी हँसी उडाते थे। डारविनके मनमें प्रारति को मात ।। मन 137 में हमलोकी सलाहसे, भूषा पटना प्रारम्भ किया और वे भूपिद्या सीखने दमी मनु महीनमें हमलो के साथ वेस गरे। नमुद्र-यात्रा। दामिनार खेलने का बड़ा शौक शिश तायर उनको अध्यापक हंसलाका एक डानि धा। ए नामका जहान अमेरिकाका सर्वे करने जा फिजाय अपने साथ तेज 34. 8 वैज्ञानिको समझते हैं ।
डारविन।]
वैज्ञानिक जीवनी ।
१४७
को ग्रहण करने के लिए विशेष रूपसे अनुरोध करते है
'डारपिनने यह पत्र पाकर इसे पृथिवी भ्रमणका एक अच्छा
'सुयोग समझा, किन्तु उनके पिता राजो न हुए । उनका कहना
शो कि समुद्र यात्रासे डारविनको पढाईमें विघ्न पडेगा।
क्रम में भाईके विशेष अनुरोध करनेपर पिताको सम्मति
देनो पडी। पिताको सम्मति पाकर डारचिनने सन् १८३१ के
२२ दिसम्बरको विगलपर चढ समुद्र यात्रा शुरू की । उनको
तनरमाह ठहराई न गई यो। वे कप्तान साहवके घरपर
ही रहते थे।
यही समुद्रयाना पोछे डारविनको शिक्षा और साधना
को प्रधान सहायक हुई यो। इसके पहले सुप्रसिद्ध वेज्ञानिक
हममोस्ट को 'थात्मजीवनो' पढकर देश भ्रमण करने और
प्राकृतिक विज्ञानको चर्चा करने की प्राग्रह उनके मनमें जगा
था। पृथिवी मगकी इस दुनियाले प्राकृतिक विशानकी
चर्चा करनेकी इच्छा और शक्ति उनमें अधिक बढ गई। इस
समयको उनकी चिट्ठी-पनियोसे मालूम होता है कि विभिन्न
देशीको प्राकृतिक शोभा देसकर श्रात्मविस्मृत श्रोर मुग्ध
हो जाते थे। वे नाना देशों के पशु पक्षियो, पेड पोषों ओर मिट्टी
को जाँचकर इतना थानन्दित होते थे कि कभी कभी रात में
उनको नीद ही न पाती थी। वे पिगल द्वारा याना करने के
पहले प्राकृतिक विज्ञान के कोई विशेषज्ञ न थे। किन्तु जर
स्वभावसे शिक्षा पाकर पाँच वर्ष के बाद वे देशको लाटे उस
श्यक वे भूविद्या, प्राणिविद्या और उद्भिदविद्याके पूरे पारदर्शी
थे। दक्षिण अमेरिकाके विविध प्राणियोके ककालो, गेलोपेगो
डीपके विविध पक्षियो और समुद्रके पीव प्रचालस्तूपोको
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डारचिन।]
चैज्ञानिक-जीवनी।
को ग्रहण करने के लिए विशेष रूपसे अनुरोध करते हैं।
डारचिनने यह पत्र पाकर इसे पृथिवी भ्रमणका एक अच्छा
सुयोग समझा, किन्तु उनके पिता राजो न हुए । उनका कहना
7 कि समुद्र यात्रासे टारपिनकी पढाई में विघ्न पडेगा।
क्रममें भाईके विशेष अनुरोध करनेपर पिताको सम्मति
देनी पडी। पिताको सम्मति पाकर डारविनने सन १८३१ के
२२ दिसम्बर को विगलपर चढ समुद्र यात्रा शुरू की। उनकी
तनवाह ठहराई न गई थी। वे कप्तान साहवके घरपर
ही रहते थे।
यही समुद्रयाना पोछे डारविनको शिक्षा और साधना
को प्रधान सहायक हुई थी। इसके पहले सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक
हमोल्टको 'पात्मजोरनो' पढकर देश भ्रमण करने और
प्रारुतिक विज्ञानकी चर्चा करनेकी श्राग्रह उनके मनमें जगा
था। पृथिवी-भ्रमणकी इस सुपिपासे प्राकृतिक विज्ञानकी
चर्चा करने की इच्छा और शक्ति उनमें अधिक बढ़ गई। इस
समयको उनकी चिट्ठी पनियासे मालूम होता है कि विभिन्न
देशोंको प्रारतिक शोभा देखकर च आत्मविस्मृन और मुग्म
हो जाते थे। ये नाना देशोंके पशु पक्षियो, पेड पौधों भोर मिट्टी
को जाँचकर इतना श्रानन्दित होते ये कि कभी कभी रात में
उनको नीद ही न आती थी । वे बिगल द्वारा यात्रा करने के
पहले प्राकृतिक विज्ञान के कोई विशेषज्ञ न थे। किन्तु जर
समायमे शिक्षा पाफर पाँच वर्ष के बाद वे देशको लौटे उस
यत्त ये भूविद्या, प्राणिविद्या और उद्भिविद्याके पूरे पारदर्शी
थे । दक्षिण अमेरिकाके विविध प्राणियों के कफाला, मैलोपेगो
दीपके विरिघ पक्षियो ओर समुद्रके यौव प्रयालस्तूपोको
।
१४८
वैज्ञानिक-जोवनो। भाउवॉ परिच्छेद
अपनी ऑखोंसे देखने और उनकी परीक्षा करनेके या
उनके मन में क्रमविवर्तनवाद् (theory of usolutioti) क्रमश
स्पष्ट रूपसे जग रहा था। सन् १८३६ के १ दिसम्बरको ।
स्वदेशको लोटे थे। देशको लौट आनेपर उनको धर्मयाजकर
काय करने की कल्पना श्राप हो छोड देनी पडी। अमेरिगाह
चे नाना प्राणियोंके कमाल और सनिज प्रादि लाये थे।
उनका श्रेणि-विभाग और अपनी अभिज्ञता को पुस्तकाकार
प्रकाशित करनेको व्यग्र हुए। सरकारी तहगलसे १०००
पाउण्ड पाकर, अन्यान्य वेशानिकों की सहायतासे प्रार्न
प्राणिविद्या और भूविद्या विषयक अभिशता पुस्तकाकार
प्रकाशित करने लगे। सन् १३६ से १८४१ तक उन्होंने
'जिओलाजिकल सोसायटी के प्रत्यक का काम किया था
उनके भूविद्या-विषयक अनेक प्रवन्ध इस सभा पढे गये थे
सन् १८३८ की 8 वी जनवरीको उन्होने विवाह किया।
विवाहके बाद कोई तीन वर्षांतक लण्डन नगरमें ठहरे थे.
अनन्तर चे लण्डनसे १६ मील की दूरी पर डाउन नामक गाँधम्
रहने लगे। वे फिर इसी गॉवमें बराबर रहे श्राये । उनको सर
गवेषणायें इसी छोटेसे गॉवसे प्रकाशित होती थी। डारविन
के सब अाविष्कारोका परिचय देना यहाँ सम्भव नहीं । का
स्थूत विपयाका उल्लेख नीचे किया जाता है।
प्राचीन भारतका क्रमविवर्तनवाद
या विकासवाद।
डारविनके क्रमत्रिवर्तनवादका परिचय देनेके पहत
भारतके क्रमविवर्त्तनवादका उल्लेख करना शायद अप्रासङ्गि
डारविन।] वैज्ञानिक-जीरनो। . न होगा। यही मामरिवर्तनपाद दार्शनिक अनुमान रूपमे प्राचीन ग्रीन और भारत में प्रचलित था। यहाँ इस विषय 'की निशेष भालोचना करनेको स्थान नहीं। फिर भी, भारतमें अमरिवर्तनवादका होता दो अनुमानों-दशावतारवाद और श्रात्माके परावर्तनवाद (trulusmisrition of soul )- मे अच्छी तरह स्पष्ट होता है। इस दगारतारवादमें फ्रम- विनतनवादका रहस्य त्रिपा मालूम होता है, जिसकी श्रोग लोगाका ध्यान नहीं जाता। इस दशावतारवादमें कहा गया है कि मगवान्ने मानर-रूप धारण फरनेके पहले मत्स्यका (जलज) अनन्ता कृर्म, (जलज और भृचर) वराह, (पशु) नर- सिंह (अई मानव) और वामन (जुद्राकार मानव) का रूप क्रमश धारण किया था, अनन्तर परशुराम अर्थात् युद्धोप- जोचो प्रादिम मनुष्यका अवतार लिया। पूर्ण मानववर्माव- लम्बो हुए रामचन्द्र । क्रमनिर्त्तनगदको स्वीकार किये पिना दशावतारवादका भारतमें प्रचार होना विरकुल सम्भव नया। प्राचीन भारतमें क्रमविवर्तनवाद प्रचलित था, इसके दो प्रमाण है-प्रात्माका परिभ्रमणवाद और जन्मान्तरवाट । यही जन्मान्तरमाद योनिभ्रमण गदमें परिणत हो गया था। इसी योनिम्रमण बाद में देखा जाता है कि प्रात्माने मनुष्य देहकोपाने के लिए बदुतसो योनियों में भ्रमण किया है। अनेक पुराणों में योनिम्रमणवादका उल्लेख है । वृहत विष्णु पुराणमें लिखा है- स्थावर विशतेर्लक्ष जलज नरलक्षण । कृर्माश्च नवलक्षश्च दशलक्ष च पक्षिण ॥
-- - 1 + १५० वैज्ञानिक जीवनो। [पाठवॉ परिच्छेद । 4.---.--... mor-2- त्रिशलक्ष पशुनाञ्च चतुर्लक्ष च वानरा. । ततो मनुष्यतां प्राप्य तत् कर्माणि साध्ययेत् ॥ मनुष्य जन्म पानेके पहले स्थावर (वृतादि) अनन्तर जलज (मत्स्यादि), कूर्म (जलचर और स्थल वर), पक्षी ओर पशुका जन्म क्रमश प्राप्त होता है, अनन्तर वानरजन्म प्राप्त होता है । वानरजन्मके चाट मनुष्यजन्म प्राप्त होता है। * यह श्लोक इस रूप में वृहत विष्णुपुराणसे श्रीयुत भीम- चन्द्र चट्टोपाध्याय An Econorumc Botany of India," नामक अपनी पुस्तकमै उद्धन किया है किन्तु विश्वकोपर्म योनि शन्दका अर्थ लिखते वक्त विश्वकोपकारने इस श्लोक को इस रूपमें उद्धत किया है- जलजा नवलक्षाणि स्थावरा लक्षविशति । कृमयो रुद्र सख्यका पक्षिण दशलक्षकम् ॥ त्रिशलक्षाणि पशवश्चतुर्लक्षाणि मानुपा । सर्वयोनि परित्यज्य ब्रह्मयोनि ततोऽभ्यगात् ॥ इस पाठमें 'वानरा' शन्द न होनेपर भी सृष्टिका क्रम- विवर्तनवाद अच्छी तरह स्पष्ट होता है। विश्वकोपकार श्रीयुक्त नगेन्द्रनाय बसुने श्रोर भी कई अन्यों से योनिभ्रमणवादः मूलक श्लोक उद्धत किये हैं । यथा-- स्थावरास्त्रिशलक्ष च जलजा नत्र लक्षक । कृमिजा दशलक्षश्च रुद्रलक्षश्च पक्षिण ॥ पशवी विशलक्षश्च चतुलनश्व मानवा । एतेयु भ्रमण कृत्वा हिजत्वमुपजायते ॥ -कर्मविपास . ।
डारविन।]
वैज्ञानिक-जीवनो।
१५२
इस योनिम्रमणमादमें पह ने वृत, अनन्तर क्रमश जनज उभज,
पतो, पशु, वानर और सबसे पोछे मनुष्यको उत्पत्तिको भार
लक्षकर कोई इस बात का सन्देह नहीं कर सकता कि प्राचीन
भारत में कमविपर्तनवाढ' प्रवलित न था। केवल यही नहीं
आजकल के विद्याविशारदोंने परीक्षा द्वाराप्राचीन जौवकवालों
(EoI) के क्रमवियतन में जिन विभिन्न भेदों का निर्णय किया
है वे पाया पौर्य उल्लिसित योनिभ्रमणवादके पोर्यापार्यले
मिलते है। भूविद्याविशारदोंने देखा है कि पृथिवीके सर्व
प्राचीन युगके पर्वतोंमें केवश जलज जन्तुओं के ही पकाल
(यथा मलोके कॉटे) पाये जाते है, अन्य किसी प्रकारके उन्नत
जीवोंके अस्तित्व के प्रमाण नहीं मिलते । इनकी अपेक्षा श्राधु.
निक युगके पर्वतोम मेढ़क और मगर (crocodile) जैस
(जलचर और भूचर) जन्तुओंके काल पाये गये ह । इसके
वादके युगके पर्वतामें पक्षविशिष्ट ज तुनों और कमश पक्षियो
के कङ्काल आविष्कृत हुए है।
चतुराशीति लक्षाणि चतुभेदाश्च जन्तर ।
अण्डजा स्पेदजाश्चेव उद्भिजाश्च जरायुजा ॥
एकनिरािति लनाणि ह्यएडजा परिकीत्तिता ।
स्दजाश्च तथैवाका उद्भिजास्तत् प्रमाणत ॥
जरायुजाश्च तावन्तो मनुष्याद्याश्व जन्तव ।
सर्वयामेव जन्तूना मनुष्यत्व सुकर्लभम् ॥
इनकी अपेक्षा आधुनिक कानको मिट्टी के तहमें छोटे
चौपाये और क्रमरा पडे चौपाये पाये गये हैं। ये सब चोपाये
अाजकल के प्रोडे और गै. श्रादि जानपरोंसे घद्भुत भिन्न है।
समकालीन मृत्तिका की तहमें यन्दरको हड्डिया पहले पाई गई
-
૨૨ वेज्ञानिक-जीवनी। [पाठवॉ परिच्छेद । हैं। भूविद्याविशारदोका यह परीक्षामूलक श्राविफार भारतके योनिभ्रमण बायका समर्थन करता है। क्रमविवर्तनके समर्थक परीक्षामूलक तथ्यका निरूपण डारविनके क्रमविवर्तनवाद के प्रचारकेपहले अनेक परोक्षा- मूलक तश्य भाविष्कृत हुए थे, जिनकी सहायतामे डारविन अपने मत का प्रचार कर सके थे। भूविद्याविशारदो ने जीव- कालोके जो थाविष्कार किये ये चे डारविनके क्रमविवर्तन- वादके प्रचारमे सहायक हुए थे। ऐसे अनेक जन्तुओंके कङ्काल आविष्कृत हुए हैं, जो किसी वाल जिन्दा थे, पर अब पृथिवी पर पाये नहीं जाते। एकप्रकारका पक्षी-सॉप आविष्कृत हुआ है। उसका श्राझार पनी जेसा है किन्तु सॉपकी तरह उसके जवडे श्रोर दॉत है। अमेरिकामें एक प्रकारके घोडेका कङ्काल पाया गया है, जिसके पुर फटे है, और एक प्रकारके घोडे के खुर विलकुल फटे नहीं है । इसलिए यह अच्छी तरहसे समझ पडता है कि श्राज फलके घोडे इन मृत जीवोंसे क्रमश पेदा हुए है । फ्रास देशमें जमीन के नीचे एक प्रकारके हाथी और गडेके कङ्काल पाये गये है, जो आजकल के हाथियों और गैडोसे बिल्कुल भिन्न है । इन सर कङ्कालोका आविष्कार होने से स्वत ही प्रश्न उठता है कि श्राजकलके जन्तु पूर्ववत्तोकालके जन्तुओंके सन्तान कैसे हो सके है। जान हण्टर ओर सेएट हिलेयार आदि प्राणि विद्या- विशारदोंने दिग्नलाया है कि समजातीय जन्तुओंकी हड़ियामें
डारविन ।]
वैज्ञानिक-जीवनी।
१५३
'अद्भुन ऐक्य पाया जाता है । मेग्दराउवाले जन्तुओकी छोटीमे
छोटी हड्डीमें भी समानता देखी जाती है । जैसे नोतेकी
बाजुओ, घोडे के पागले पावों और मनुष्य के हाथोकी गठन
प्रणाली एकही सरीखी होती हे, फेवल भिन्न भिन्न कार्योंके
करने के लिए किसीकी हड्डी छोटो होती है, किसीकी बडी
होती है, किसी की तितर रितर होती हे और फिसीकी टेढी-मेढी
होती है। इस प्रगरके एक्यके कारण एक ही पिसे क्रमश
इन जन्तुओंकी उत्पत्ति प्रमाणित होती है।
और अनेक जातुनोंके ऐसे अङ्ग प्रत्यङ्ग होते हैं, जिनका कोई
उपयोग नहीं होता। जैसे पक प्रकार के साँपके पीछेकी ओर
चमडे के भीतरसे दो पॉप देखे जाते है, किन्तु उन पाचौंको
वह जमोन पर टेक नहीं सकता, इसलिए उनका उपयोग
नहीं होता। मालूम होता हे कि ऐसे निरुपयोगी अह उनको
अन्यान्य स्तन्यपायो जन्तुओं से उत्तराधिकार-सूत्रसे मिले हैं।
घान वायार नामक और एक हानिक्ने एक प्राश्चर्य्यप्रद
याविष्कार किया है। चौपाये श्रादि ऊँची श्रेणी के अन्तुओं
के श्रप्रष्ट भ्रूणोंकी प्राकृति, मछली, सॉप श्रादि निम्न श्रेणी
वाले जीवोंके भ्रणाकी प्राकृतिसे मिलती है। यदि प्रत्येक
जीव पृथर पृथक् सृष्ट होता तो कुत्तेके भ्रूणको श्राकृति
पहले मछली, सर्प, श्रोर पक्षी जैसी क्यों होती और उसके
'अप्रयोजनीय अवयव क्रमश क्यो लुम होते जाते ? पुष्ट होने
के पहले मनुष्य अोर कुत्ते के भ्रूणों की प्राकृत्ति समान होती है।
उन्निद्राज्यमें भी इस प्रकारका परिवर्तन और ऐक्य
देखा जाता है। डारविनने दिसलाया है कि पार्थस्य इतना
.
१५४ वैज्ञानिक-जोवनो। [पाठनों परिच्छेद ।। धोरे धीरे बढ़ गया है कि यह जाना नहीं जा सकता कि प्रकार (varities) और उपगण (4pe0104) में क्या पार्थस्य है। डारविनने वीस वर्षों तक इन विषयोका अध्यन किया था। कितनी असरव्य पुस्तक, सामयिक पत्र, भ्रमण वृत्तान्त और प्राकृतिक विज्ञान सम्बन्धी ग्रन्थ उन्होंने उस वक्त पढ़े थे, जिनका स्मरणकर वे स्वय श्राश्चर्य करते थे, और सोचते ये कि कैसे चे इतना परिश्रम कर मके थे। वे उस वक्त भिन्न भिन जातिके'कबूतर पालकर और पेड-पौधे लगाकर परीक्षा करते थे । अन्तमें उनकी गयेपणाोन क्रमविर्तनवादके सिद्धन्तको सत्य ठहराया। किन्तु अपने सिद्धान्त को प्रकाशित करने की इच्छा उन्हें नहीं हुई। सन् १८८५ में वे अपने वन्धु विख्यात भूतत्वविद् सर चार्लस लायेल के अनुरोधसे अपनी परीक्षाओं के फलों और सिद्धान्तको पुस्ताकाकार प्रकाशित करने में प्रवृत्त हुए। इसके पहले सन् १८४४ में उन्होंने अपना मत एक प्रवन्धमें लिख रखा था पर उसे भी प्रकाशित न किया था। अब उन्होंने अपनी परीक्षाओं श्रोर गवेपणाओंको एक पुस्तामें सन्निविष्ट करना असम्भव समझा । इसलिए उन्होंने उसके कुछ अशको प्रकाशित करने का विचार किया। इसी समय सन् १८८५ को १८ वो जूनको उनको चालेस नामके एक और वैज्ञानिकसे कुछ हस्तलेख मिले । वालेस मालय द्वीपपुसमें प्राकृतिक विज्ञानको आलोचनामें व्यस्त थे और अपनी गवेषणाओंसे वे भी डारविनके उद्भावित सिद्धान्त पर श्रा पहुँचे थे। दोनों जनाके लेपोको भाषा भी कहीं कहीं मिलती थी। यालेसको डारविनके कामोसी कुछ भी सुधरना L . - । T
रविन।],
वैज्ञानिक-जोपनो।
१५५
।
। डारविनने लायेल, हुर आदि अपने बन्धुओंको ये हस्त.
लेपियाँ दिखलाई। उन लोगोंने यह स्थिर किया कि वालेस
पोर डारविन दोनोके ही प्रवन्ध एक साथ पढे पोर छापे
नाय । दोनों प्रबन्ध सन् १८५८ की १ ली जुलाईको लिनियन
सोसायटी में पढ़े गये पोर उसको पनिझामं प्रकाशित हुए ।
यह घटना विज्ञान-जगत के लिए शुभ यो, कयोंकि यह घटना'
न घटतो तो डारपिन के मत कभी प्रकाशित हाते या नहीं,
कहा नहीं जा सकता।
क्रमविवर्तन और माकृतिक निर्वाचन ।
२४ नवम्बर सन् १८५८ को उनका विश्वविश्रुन "उपगणों
की उत्पत्ति" (orgin of the species) नामक ग्रन्य प्रका-
शित हुआ । उसकी जितनी कापो (१२५०) छपी थी, उसी दिन
विक गई। इस ग्रन्थमें उन्होंने अपने क्रमपिर्तनाद और
प्राकृतिक निर्वाचन को इतने उदाहरणा श्रोर परीक्षाओं द्वारा
प्रमाणित किया है, कि उनका पाण्डित्य देखकर दांतो तले
अंगुली दयानी पड़ती है।
उनके पहले लेमार्फने जीवजन्तुओको गठन प्रणालीमें
सादृश्य देखकर स्थिर किया था कि सर जीवजन्तु कई श्रादि
जीवजन्तुओंके वशधर है । फितु जनतक कोई यह दिया
न सका कि किस तरह एक ही गणसे उत्पन्न जीव भिन्न
भिन हो गये है, तबतक लेमार्फका सिद्धान्त माना न जा
सका। लेमार्फके वीस वर्ष बाद डारविन ओर वासने इस
रिपयका अन्ला उत्तर दिया। उन्हाने दिखलाया कि नाति
निर्वाचनसे वृक्षादि और जन्तुओं में पृथक
។
२५६ चैधानिक जोवनी। [ोउवॉ परिच्छेद । . उत्पत्ति हुई है। पहले वैज्ञानिकोको धारणा यो कि प्रत्येक प्रकारकी वृक्षलता और जीवजन्तु समय समय पृथक् पृथक सृष्ट हुए है, और आजकलकी वृक्षलता और जीवजन्तु उनके ही वशधर है । डारविन और वालेसने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता। जितनी वृक्षलता ओर जीवजन्तु है वे कई बड़े बडे गणों (वर्ग. Class) में विभक्त है और प्राकृतिक निर्ग- चनसे उन सव गणोंसे भिन्न भिन्न उपगणोंकी उत्पत्ति हुई है। यह प्राकृतिक निर्वाचनदो मूल सूत्रों में विभक्त किया जा सकता है। (क) प्रत्येक वृक्षलता और जीवजन्तु वश की रक्षा करने के लिए सचेष्ट रहते हैं । किन्तु यदि सब चीजों को ही रक्षा हो सके तो पैदा हुए सब वृक्षादि और जीवजन्तुओंको स्थान और आहार देना पृथिवीके लिए असम्भव हो जाये। इसी कारण जीवन सग्राममें जो औरों से अधिक प्रात्मरक्षा कर सकेंगे, वे ही जीवित रहेंगे, वाकी मय मर जायेंगे। वालेसने हिसाब लगाकर दिखाया है कि यदि एक जोडा पक्षीके साल- में चार सन्तान हों और उनके भी साल में चार सन्ताने होती रहें तो पन्द्रह साल में एक जोडा पक्षीके प्राय धीम करोड वशधर होंगे। हैक्सलेने इसी तरह हिसार लगाकर सिद्ध किया है कि एक उद्भिद्से यदि सालमें ५० घोज पैदा हो तो वोंमें उसके घशधरोसे यह पृथिवी ढक जायगी। अोर उसपर अन्य वृक्षोंके लिए स्थान न रहेगा। इन असरय घश- धरोमसे जो सबसे अधिक उपयुक्त होंगे, घे ही जीते रहेंगे। यलिष्ठ पिताके वशकी रक्षा अधिकतर होती है। नाना प्रारतिक कारणोंसे अधिकांश वृत्तों और जन्तुओंकी सन्ताने मर जाती
डारविन 1]
चनानिक जोरनी।
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है । जलवायु, कोटगता, मक्रामक रोग श्रादि उनकी मृत्यु के
प्रधान प्रारतिक कारण है। यहाँ एक हप्टान्त दिया जा सकता
है। इमनीके एक पेडसे एक सातम लाखे। योज पैदा होते
है । किन्तु उनमसे अधिकाश बीज पेडके नीचे गिरते हैं, इससे
वे श्रदुरित हो नहीं होते और जो होते भी ह, ये सूम्प जाते हैं।
एक जगहपर यदुतसे रोज गिरने से ये पाहार नहीं पाते
ओर इसलिए मूग जाते है । ऊँचे पर्वतोपर घरफसे ढके
पार्टिक महादेशमै श्रार मरभूमिपर अनुपयोगी जल-मायुके
कारण वृक्षादि पेटा नहीं होते, जोरजन्तुओंफी सख्या भी कम
होती है। मनुष्यमें सन्तानोत्पत्तिको क्षमता कम होती है,
किन्तु पच्चीस वर्षोंमें मनुप्य को मरया भी दूनी हो
जाती है।
(ख) पिता माताको दहिक गठन सन्तानको उत्तरा-
धिकार सूनमे प्रान होती है। किन्तु योजके तारतम्य के कारण
कोई मी दो सन्तान एकमो नहीं होती। नाना प्रारुतिक
कारणीमे वृतादि या जीवजन्तुको किसी निशेष इन्द्रिय या
इन्द्रियों में सामान्य अन्तर होता है और वह अन्तर क्रमशः
शधरोम उत्तरोत्तर बढता या घटता जाता हे।
इस प्रकार नाना प्रारुतिक कारणों से एक ही गणसे
विविध उपगणोंकी उ पत्ति होती है। इस प्रकारको उत्पत्ति
सम्भय है, यह हम लोग पशु पक्षी पालकर मनुष्यकर्तृक
निर्वाचनमें स्पष्ट देखते है । जो लोग कबूतर पालते हैं ये
जानते है कि विविध प्रकारके कतराको एकत्र रखनेसे कितने
विचित्र प्रकार के कन्नर उत्पन्न होते है । किसीके पर सूध
१५८
वैज्ञानिक-जीवनी। [पाठवॉ परिच्छेद ।
चौडे होते है, किसीके कम, किसी के होंठ बहुत मोटे होते है
फिसोके कम, कोई उडकर यहुन दूर जा सकते हैं और कोई
नहीं । इन विविध जातियों के कबूतरोंकी परीक्षा करनेपर
देखा गया है कि उनको देह को हड्डियों और अन्यान्य इन्द्रियो-
में बहुत कुछ मिनता था गई है। निर्वाचनके द्वारा पालतू
कुत्तोंमें निउफाडलैण्ड कुत्तेतक देखे जाते हैं। मनुष्य इस
प्रकारले निर्वाचन द्वारा घोडे, गाय, भैस आदि भिन्न भिन्न
जातिके जन्तुओमें सिविध उरगणोंको उत्पत्ति कर सकता है।
यह सभी लोगोको मालूम है कि घोडे और गधोके सहवाससे
जपच्चर नामक उपगणको उत्पत्ति होती है।
जर यह देखते है कि मनुष्य थोडे समय में हो निर्वाचनके
द्वारा विविध उपाणोंकी उत्पत्ति करते है, तर प्रकृतिने जो
युग-युगान्तरसे गणोसे उपगणा पोर उपगणोंसे उपगणकी
उत्पत्ति की है, उसमें विचित्रना क्या ? मनु य जर योडे ममय
में उपगणमें इतना परिवर्तन कर सकता है, तब प्रकृति
निर्वाचन द्वारा उपगणामें कितना बड़ा परिवत्तेन कर सकती
है यह अनायास हो समझो प्रा सकता है। इतना परिवर्तन
हो सकता है कि उपगण काश स्वतन्त्र जाति में परिणत हो
सकते है। इस तरह निर्वाचन अोर क्रमविवर्तनके द्वारा
'पृथिवोके असख्य प्रकार के जीवजन्तुओं और वृक्षादिको उत्पत्ति
हो सकी है।
यह पहले ही कहा जा चुका है कि नाना ज्ञात श्रोर अशाव
उपायोसे प्रकृति निर्वाचनके द्वारा उपगणकी सृष्टि कर रही
हे । यहाँ कई उपाय लिसे जाते है।
.
डारपिन।] वैज्ञानिक-जोवनी। परिपाशिर्वक अवस्था। (Natural Suloundings) कल्पना कीजिये कि किसी जगह पर मुण्डके झुण्ड बार रहते ह और उनके प्रधान पाहार हरिण है। यहाँ इन वाघोमेसे जो सूर द्रुतगामी होंगे वे ही हरिणाका वधकर और उनको खाकर जोषित रहेंगे। इस प्रकारके देश में दतगामी लम्बाकृति "क्षीणशरीर व्याघ्र ही पाये जायेंगे, अन्य जातिके व्याघ्र न होंगे। शीत देशके जीवज या वृक्षादि यदि ग्रीपमप्रधान 'देशमें लाये जायें तो उनमेंसे जो बचेंगे ये नई जगह और नये जलवायु के उपयुक्त बनने की चेष्टा करेंगे । वे कही कहीं नये उपगणमें परिणत हो जायेंगे। बहुतसे लोगोने पहाड पर लके पेड देसे होगे। जो देसनेमें छोटे सस और साधारण बेल के पेडोसे बहुत कुछ मिनाकृति होते है । समतल क्षेत्रमं पेठा हुए रेल के योजोसे ही इन पेडोंकी उत्पत्ति हुई है, किन्नु पहाडमें जेसा साद्य मिलता है, और वहाँका जलवायु जेसा होता है उसके उपयुक्त पननेको चेष्टा करनेसे पेडाकी श्राकृति बहुत कुछ भिन्न हा जातो हे। इस प्रकार जगह और जलगायुके कारण कही कहींके श्रार विशेषत समुद्रमध्यस्थ द्वोपके वृक्षादि और जोरजन्तु बिलयु ल भिन्न होते है। भारतिक निर्वाचन कैसा जटिल है, यह नोचे लिखे उदाहरण- से स्पष्ट हो जायगा। विलायतमें हार्टइम ओर उचलावर नामके दो उद्भिद है। मक्खियो और फोटपतङ्ग पुटफुलफी रेणु स्त्री फूलमें लाती हैं और उनके सद्गमसे बीजकी उत्पत्ति होती है। उपर्युक्त दोनो फलोमें अम्वल यो नामको ।
१६० वैज्ञानिक-जीवनी।[पाठवॉ परिच्छेद । -- मक्खियाँ हो विचरण करती ह । किन्तु चूहे इन मखियांके छत्तोंको नष्टकर डालते हैं, और दूसरी ओर बिल्लियां चूहाँको सा जाती है । जिस प्रदेशमें पिल्लियोको सख्या अधिक होगी, उनमें चूहोकी सख्या कम होगी। इसलिये वहाँ धे, मखियाँ बहुत होगी और इस कारण फल भी अधिक सिलेंगे। जहाँ विल्लियों की संख्या कम होगी, वहाँ चूहोका सख्या अधिक होगी और इसलिए यहाँ फूल भी बहुत कम मिलेंगे। इसलिए किमी भो प्रदेशम उपयुक्त दो जाति के फलोको सरया वहाँ की विलियोंकी सख्या पर निर्भर है। अवयवाका व्यवहार और अव्यवहार । (Use and disuse of puts ) अनेक अययव व्यवहार न करनेसे बोरे बोरे नष्ट हो जाते है, और व्यवहार करनेसे परिवर्तित हो जाते है । जो अपयव. कार्योपयोगी होते है, वे हो स्थायो होते है। इसका प्रधान दृष्टान्त हम पालतू पशुपक्षियोम पाते है । एक ही जन्तुमें पालतू ओर जगली अवस्थामें अन्तर पाया जाता है और उनके वशवरोम और भी भिन्नता पाई जातो हे। जगली मुर्गे, बदक और राजहस जगलो अवस्थामें अच्छी तरह उड सकते है, किन्तु पालतू हालतमें उनको उडने की जरूरत नहीं रहती, इसलिए उनके पसौकी हड्डियाँ धीरे धीरे इस तरह परिवर्तित हो जाती है कि उनमें अधिक दूरतक उडनेकी ताकत नहीं रहती और उनकी सन्ताने ओर भी कम उड सकती है। छोटे छोटे द्वीपोमें प्राणियों को प्राणके डरसे उडना नहीं पड़ता, इसलिए यहाँ पक्षहीन या छोटे छोटे पक्षवाले पक्षी भी देखे जाते है । अनेक पालतू पशुओंके कान नीचेकी ओर झुके होते . . .
टारनिन । वंशानिक जोबनी। हैं, किन्तु जगलो हालतमैं उनके कान सोने सडे देखे जाते हैं । पालतू हालतन वे रिल्कुल डरते नहीं, पोर इसलिए फान पडे करने का अभ्यास छोड देनेसे उनके कानकी हड्डियाँ इस तरह परिवर्तित हो जाती है कि उनके कान स्वभारत लटके रहते हैं उनकी जो सन्ताने होती हे उनके कान भी उत्तरा- "धिकारी सूनसे लटके होते हैं। चलते वक गोवरीलोके पॉव प्राय दूर जाते है, इसलिए उनकी सन्तानामें क्रमश पाँव लुम हो जते है । बालटन नामके एक साह्यने एक जगह देखा था कि ५५० प्रकारके गोरोलामसे २०० गोरालोके पस इतने छोटे हो गये थे कि ने उड न सकते थे। इस प्रकार अनावश्यक अवयवोके अन्यमहार श्रोर आवश्यक अवयवोके व्याहारसे विविध उपगणाको उत्पत्ति होती है। सुन्दर सुन्दर फुलोमें जो विचित्र विचित्र रग देसे जाते हैं वे मनुष्य को प्राँ तृम करने के ही लिए नहीं है बरिक वे विचित्र रंग उद्भिदके जीवन और यशरताके लिए विशेष प्रयोजनीय है । घास श्रादि जिन उद्भिदोके वीज वायुको सहायतासे उत्पन्न होते हैं, उनके फुल रगोन नहीं होते। किन्तु जिन फुलोकी रेणु ले जानेके लिए मक्खियाँ या फीट- पतङ्गोको जरूरत होतो हे उन फूलोके रग विचित्र वर्ण के होते हैं। श्राम, सेन, पपोता आदि अनेक पके फलोके रग भी उनको चशरक्षाके लिए, पारश्यक होते है। पक्षियों और जन्तुनाफे श्रारुष्ट होने के लिए उनमें रग होता है। इसी प्रकार प्राकृतिक निर्वाचनके कारण पुरुष जातीय पक्षियोके पस 'विवित्र रगके होते हैं, पुरुष सिहके केशर होता है और मोरके चेटी होती है, किन्तु स्त्री जातीय इन :प्राणियोका वैसा रूप वैज्ञानिक-जीवनी । [आठवॉ परिच्छेद । । डारविनके इस मतका पहले किसीने स्वीकार न किया। डारविनको पहले पहल गालियाँ महनी पड़ी। क्रमश लायेल- प्रमुख प्ररयात भूविशारदाने हैक्सले प्रमुख प्राणिविद्या- विशारदोंने और हुकार जैसे उद्भिदविद्याविशारदोंने उनका मत स्वीकार किया। आज कल डारविनके प्राकृतिक निर्वाचन, पारिपार्श्विक अवस्था आदि विषयों के सम्बन्ध में बहुत कुछ मत बदल गया है, किन्तु क्रमविवर्तनके द्वारा वृक्षादि और जीवेकी सृष्टि हुई है, डारविनका यह मन अटल है। उनके सिद्धान्तोंने अनेक विद्वानोको अनुप्राणित किया है। उन सिद्धान्तोकी सत्यताकी जॉच करने के लिए कितने ही वैज्ञा- निकोंने कितनी ही नई नई परीक्षायकी है और उन परिक्षाओं- के द्वारा भूविद्या, उद्भिदविद्या और प्राणिविद्याकी बहुत अधिक उन्नति हुई है। मनुष्य की उत्पत्ति। (Descent of man) डारचिनने वृक्षलता और पशुपनियों की उत्पत्तिको पालो चना 'उपगणोंकी उत्पत्ति' नामक अपनी पुस्तकों की है। मनुष्या श्रेष्ठ जीव है, इसीसे उसकी उत्पत्तिकी आलोचना उन्होंने एक स्वतन्त्र ग्रन्धमें की है। उन्होंने दिखलाया है कि यद्यपि मनुष्य प्राणियों मेंसे श्रेष्ठ है, किन्तु मनुष्य ओर प्राणियोंसे बिल्कुल और पृथक् नहीं है। प्रथमत -मनुष्यका दैहिक गठन अन्यान्य उच्चश्रेणीके प्राणियों से बिल्कुल भिन्न नहीं है। बन्दर, चमगीदड, सील मछली और मनुष्यकी हड्डियाँ, पेशियाँ, स्नायु रक्तस्थली प्रादि-- ।
डारविन।] वैज्ञानिक-जीवनी। १६५ में समानना होती है। हैक्सले श्रादि वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि मनुष्य के श्रेष्ठ श्रङ्ग मस्तिस्क की गठनप्रणाली वानरजातीय जीवों के मस्तिष्कको गठनप्रणालीसे बहुत कुछ मिलती है , किन्तु पूर्ण रूपसे नहीं। यदि पूर्ण रूपसे समानता होती तो बन्दर और मनुष्य को बुद्धिवृत्ति भी समान होती साधारण चन्दरों और सिम्पान्ज, ओर प्रादि वानर जातीय जोगोंके देहिक गठन और मनुष्यके दैहिक गठनमें सबसे अधिक समानता देखी जाती है। अपुष्ट भ्रणास्थामें कुत्ते आदि मेरुदण्डवाले प्राणियों भोर मनुष्य के भ्रूणों में कोई भिन्नता मालूम नहीं होती । क्रमश एकही प्रकारके इन्द्रियले विडियोंके डैने और पॉप और मनुष्यके हाथ पोर पॉच पैदा होते है । भ्रूणोंकी परिणतिके समयही जोगेका पार्थक्य प्रत्यक्ष होता है। ऐसी यातें बहुतों को चक रायगी जरूर, किन्तु है ये परोक्षामूलक सत्य । बुद्धिवृत्ति और विविध मानसिक क्रियाओं के कारण मनुष्य अन्यान्य जीवोंसे बहुत अधिक श्रेष्ठ है, किन्तु अन्यान्य जीयो में बुद्धिवृत्ति नहीं होतो या वे प्रेम करना, नाराज होना, कृतज्ञता प्रकट करना, अनुकरण करना, बदला लेना ओर विचार करना बिल्कुलही नहीं जानते, पेसी बात नहीं है । दो एक उदाहरण यहाँ दिये जाते है। कुत्तको प्रभुभक्ति मयको ही विदित है। चकराक-चमनाकोका दाम्पत्य प्रेम कविकल्पना नहीं है, बिल्कुल सत्य हे। सन्तानोपर माताका स्नेह जैसा मानव-समाज में देखा जाता है, वैसाही और जीवों में भी देखा जाता है। जिन्होंने मृतयत्सा गायका रोना सुना है वे कभी इस यातको अस्वीकार न करेंगे। अनुकरण करनेकी प्रवृत्ति और १६६ वैज्ञानिक-जीवनी । [आठवॉ परिच्छेद । । - । क्षमता अनेक पशुश्रोम देगी जाती है। सुग, मैना आदि राधाकृष्ण' कहते है और बन्दर साष्टाङ्ग प्रणाम करते हैं। पशुओंमें चिन्ता करनेकी क्षमता होती है, इसका भी प्रमाण पाया जाता है। चिडियासानाके किसी हाथीके पास कोई चीज केक दीजिये । यदि वह सूंडसे उसे न पा सकेगा तो उस चीज के दूसरी थोर सेंडसे हवा छोडता रहेगा, जिससे यह चीज हवाके झोंकेसे पास भाजायगी और वह उसे पा सकेगा। एक साहपने वायना नगरमें देखा था कि एक भालूने निकटवर्ती जलमें रोटीका एक टुकडा उतराते देखकर अपने पजेसे एक छोटी नाली बना दी थी जिससे पानीके साथ रोटीका टुकडा भी नालीमें बहकर आपहुंचा था। डारविनने इस तरहके अनेक उदाहरण दिये हैं । वानर जातिको बुद्धि पृत्ति मनुप्यकी बुद्धि- वृत्ति के बहुत निकट पहुँचती है । अनेक लोगोंका खयाल हे कि केवल मनुष्यही अस्त्र-शस्त्रोंका व्यवहार करते है, किन्तु ऐसी बात नहीं है। जगली सिम्पञ्जि पत्थरसे फलाको फोडकर उसका भीतरी श्रश साता है। हाथी पेडकी डाल तोडकर मक्खियाँ उडाते है। एक बार एवसोनिया देशमें एक पहाडी रास्ते पर कोवर्ग गोथाके ड्यूकके सहचर पहाडपर बैठे बन्दरों के दलपर गोली चला रहे थे । उस वक्त सब बन्दरोंने मनुष्यों की तरह उनपर एक साथ पत्थर फेंककर उनको भगा दिया था। स्मृतिशक्ति श्रादि उच्च वृत्तियाँ भी जन्तुओंमें कुछ कुछ होती हैं । डारविनके एक पालतू कुत्ता था । वे जान बूझ कर पाँच वर्ष उसे बांध रखनेके बाद एक दिन उसके पास गये । उनको कुत्ता पहले पहचान न सका।अनन्तर उसे हठात् स्मरण हो आया और वह उनके पीछे पीछे पहलेकी तरह - डारविन। पेशानिक जीवनी। १६७ घूमने लगा। भागने अवश्यही मनुष्यको उच्चश्रेणीका प्राणी बना दिया है। फिर भी जन्तुओं में भी भाषामा प्रचलन थोडा बहुत है । विविध प्रकारके शब्दों के द्वारा वे अपने मनका भाव प्रकट करते है। उनके क्रोध करने, और रोनेकी भाषा जुदी होती है, यह अच्छी तरह समझ पडता है। मनुष्य अपने मनके सन भावोंको भाषा द्वारा जिस तरह व्यक्त कर सकते है, वे अलबत्ता वैसा नहीं कर सकते। मनुष्यमें लिसनेकी शक्ति चर्चा और आलोचनाका फल है। इस पलके कारण वेपशुयोंसे बहुत श्रेष्ठ है, किन्तु असभ्य जातियों में लिखनेको मापा नहीं। सौन्दर्यका ज्ञान केवल मनुष्यको ही नहीं होता । श्रन्यान्य अनेक जन्तुओंको भी सौन्दर्यका ज्ञान प्राप्त है। मोरके सुन्दर पख मोरनीको वश करने के लिए होते है, मनुष्यको ऑखा को तृम करने के लिए नहीं। अनेक पुं पक्षी स्त्री पक्षीका मनोरसन करने के लिए विविध प्रकारके कलर करते हैं। मनुष्यों में सौन्दर्यशान और सङ्गीत प्रेमत समान नहीं होता। सभ्य- जातियों को असभ्य जातियों की पोशाक श्रोर वेशभूषा पसन्द नहीं होता, यह इसका प्रमाण है बहुतसे लोगोंका खयाल था कि मानन-जातिमें भगवान् पर विश्वास होता एक भिन्नता है। मनुष्य जातिमें भगवान्पर विश्वास होना अनिवार्य है, यह बात ठीक नहीं, कारण डार- विनने भ्रमण करने वालोके भ्रमणवृतान्तसे प्रमाणित किया है कि अनेक असभ्य जातिया भगगनपर विश्वास नहीं रखती। मानवजातिमें जो भगवान्पर विश्वास और धर्म देग्या जाती यह मनुष्य समाजमें मनुष्यजातिको उन्नति ओर शिक्षाके साथ क्रमश फेला है।
१६८ चैज्ञानिक-जोवनी । [आठवॉ परिच्छेद । १ । पशु पक्षियों में भी समाजिक बन्धन बहुत कुछ देखा जाता है। जो लोग शिकार रोला करते हैं वे लोग जानते हैं किवडी बडी नदियों में एक साथ हजारों राजहस, बदक, कबूतर, चक्र- चाक श्रादि रहते है । बन्दर जय बागपर धावा करते है उस वक्त वे साधारणत एक दलपतिके श्रागानुसार कार्य करते है। गायों, भेडों और बकरियोको एक ही साथ चरते अनेक लोगोंने देखा है। इस प्रकार डारविनने दिसलाया है कि शरीरको गठन- प्रणाली, बुद्धिवृत्ति और मानसिक क्रियाओंके कारण मनुष्य अन्य जन्तुओंसे बिल्कुल स्वतन्त्र नहीं है । शिक्षा और सभ्यता के कारण मानव समाजमें उच्च मानसिक वृत्तियों का विकाश चढ़ता जाता है, इसीसे वह श्रेष्ठजीन मालूम होता है, नहीं तो अफ्रिकाकी अनेक असभ्य मानव जातियों में और वानरजातिमें विशेप अन्तर नहीं है। इसीसे डारविनने कहा है कि पृथिवी पर सबसे पहले मनुप्यकी ही सृष्टि नहीं हुई है। पृथिवीपर पहले निम्नश्रेणीके जीरोको मुष्टि हुई है। वे क्रमविवर्तन के द्वारा उच्चतर जीवों में परिणत हो गये है । मनुष्य और वानरजातिमें बहुत कुछ समानता देखी जाती है । धानर ही मनुष्यके पूर्वपुरुष हैं। वानर जातिका पूर्व पुरुप कोई चतुप्पद स्तन्यपायो (mammal) जन्तु था। वे स्तन्य पायो जन्तु किसी प्राचीन द्विगर्भ पशु (marsupaly से पैदा हुए थे। वे नाना परिवर्तनों में पड किसी उभचर (जलचर और स्थलचर) जीवसे पैदा हुए थे और वे उभचर जीव किसी मत्स्यारुतिः जन्तुसे उत्पन्न हुए थे। उनके पूर्व पुरुष एक प्रकार के ऐसे जल-जन्तु थे, जिनके शरीरमें पश्चिन्ह और स्रो चिह्न दोनों न डारगिन।] वैज्ञानिक जीवनो। १६६ But in विद्यमान थे और शरीरके कार्योपयोगी अवयव असम्पूर्ण- रूपसे विद्यमान थे।* * डारविनने Origin of the pecre3 नामक श्पने ग्रन्थमे लिखा "I believe that animals are descended from at most only four or fivo progenitors, and plants from an equal or losyer bomber Analogy would lend me one step furtlier, namely, to the belief that all animals and plants are descended from one prototype alogy may be a deceitful garde" (p 424) ff ST 878 वे "Descent of Man" नामक अानो पुस्तकमें क्रमविवर्तनके चरम सिद्धान्त पर पहुंच गये हैं। उन्होंने लिखा है -We thus learn that man is desceniled from o bairy tailed quadruped, properly arboreal in its habits, and an inhnbitant of the old world This crontare if its whole stracture had been examined by a naturalist, would have been clreed Amongst the quadraminn, ne garely as the stilt more ancient progenitors of the Old and New world monkoys The qnudrnmann and all the higher mammals are pro bably derived from an ancient mareapıal animal, and this through a longline of divorsified for ns, from nomna amphibian Itho oroatare and this again from somo, fial, lil o animal In tho dien obscurity of the past worn 500 thnt the early progonitor of all tho vertebre te intin have been an nqantic animal provided with loptrifrin with the two seres united in the sams with tho most important organs of the holy, (**ob H the brain and heart imperfectly or not s' ilmyping The animal seems to have been more like the prvu the existing Marino Ascidia118 than any other known forin" titl/st n} {11} P 000) वैज्ञानिक-जीवनी । [पाठयों परिच्छेद । । इस क्रमिक सृष्टि-प्रकरणसे अनेक विषयोका समाधान होता है। पहले तो भूविद्याविशारदों को सर्वप्राचीन युगके पर्वतों में केवल मत्स्याकृति कड्काल और पिछले युगोंके पर्वतोंमें क्रमश उभचर जन्तु, पती, पशु, चन्दर और मनुप्यके कङ्काल क्यों मिले, इसकी मीमासा होती है। प्राकृतिक निर्वाचनसे क्रमश नततर जीव जन्तुश्रीको उत्पत्ति हुई है। दूसरे यह क्रमिक सृष्टिप्रकरण समझा देता है, कि मनुष्य के हाय ओर मछलीके पर एक ही प्रकारके सृष्ट पदार्थ है। उत्तराधिकारी सूत्रसे स्थूल स्थूल अवयर सब जीव-जन्तुओं को ही प्राप्त डारविनका डिसेण्ट श्राफ मैन' नामक ग्रन्थ सन् १८७१ में प्रकाशित हुआ । प्राकृतिक निर्वाचन सम्बन्धका उनका मत इसके पहले अनेक विख्यात वैज्ञानिक स्वीकार कर चुके थे। किन्तु इस ग्रन्यमें वाइबिल के विरुद्ध सिद्धान्त थे । इसलिए अनेक लोगोंने डारविनको चाइनिलद्धपी अधामिक कहकर गालियाँ दी। किन्तु डारविन के अनेक शिष्य भी हो गये। तीन वीके भीतर इस ग्रन्यका द्वितीय सस्करण प्रकाशित हुश्रा। इन दो ग्रन्थों में डारविनने वृक्षलनामा अोर जीव ज तुओं को सोष्टका रहस्य जिन्न प्रकार सोला था, उससे भूविद्या, “प्राणिविया, उद्दिविद्या आदि विज्ञान पर नया प्रकाश पडा। तय साने समझा कि प्रत्येक जन्तु या वृक्षलता पृथक पदार्थ नहीं है, विश्वसृष्टाको अनन्त सृष्टि में उमका निर्दिष्ट स्थान है, विश्वकी समस्त सृष्टि में एक निगूढ ऐक्य है । उस धक्कसे भूविद्याविशारद गत युगोंके कङ्काल खोजने लगे, प्राणिविग्रा- .
डारपिन ।] पेशानिक जीवनो। विशारद और अनिदविधाविशारद प्रत्येक रक्षलता और जीव-जन्तुओंके शारीरिक ऐक्य और पार्थक्य और उनके कार्योका अनुस पान करने लगे । डारविनके इस कमविपर्तन- वादने असे प्रत्येक विज्ञानको अनुमाणित किया। जडजगत- में जैसे निउटनके प्राविष्काराने सलग्लो डाल दी थी, उसी तरह जीवजगतमें डारविनके श्राविकारोने सलरली डाल दी। केंचुपका (Earth Form) कार्य डारविनने और भी कई आविष्कार किये थे, जिनके द्वारा अन्य कोई वैज्ञानिक कमविवत्तनवादको प्रतिष्ठा किये बिना ही विरयात हो सकता था। यहा कई विपयोका परिचय दिया जाता है। सन् १८३८ में उन्होंने केंचुएके काम देखकर एक प्ररन्ध पढा था, वही सन् १८८१ में परिवर्तित रूपमें पुस्तकाकार प्रकाशित हुआथा। इस पुस्तकमे उन्होंने दिखलाया है कि केंचुए पृथिवीका अनेक उपकार करते है। पहले वैज्ञानिकोको धारणा थी कि यासके नीचेकी मिट्टी जेसीकी तैसी रहती है। डारविनने इस धारणाको विलकुल भ्रमात्मक सिद्ध किया। मिट्टीके नीचे लाखों कंचुए पेदा होकर घासके नोचेकी मिट्टोको ऊपर उठादेते है, जिसमे मिट्टी बदल जाती है। यही उठी हुई मिट्टी वायु या वृष्टिके द्वारा नीचे के तहमें पहुंचती है। इसी तरह मिट्टी क्रमसे नई होती रहती है। कीटभोजी उद्विद । (Insectimorous Plant) सन् २.५ में 'कीटभोजी उद्भिद नामका एक ग्रन्थ प्रका- शित हुआ। इस ग्रन्थमें इस प्रकारके उद्भिदोंके कार्याका S - । । । - - . वैज्ञानिक-जीवनी [आठवॉ परिच्छेद । । nidadimanandurai... वर्णन है । इन उद्भिदोंके कार्य अत्यन्त अद्भुत है, जीव-जन्तुओं जैसे हैं। उनके पत्तों पर जव कीट पतग बैठते है तब उनके पत्ते गुडिया जाते है । अनन्तर उनके पत्तोंसे एक प्रकारका -रस निकलता है। इस रसकी मददसे उद्भिद कीट-पतदोको साजाते हैं । सन् १८६० में डारविन सेसेक्स प्रदेशको घूमने गये थे। वहाँ उन्होंने इस प्रकारके उद्भिदोंके ऐसे कार्य देखकर अनेक बातोंका आविष्कार किया। इसके सिवा उन्होंने एक ग्रन्थमें समुद्रमध्यस्थ प्रवाल- द्वोपोंकी उत्पत्ति के सम्बन्धमें नया मत प्रकाशित किया। दूसरे एक ग्रन्थमें लताओं (climbing plants) के सम्बन्धके अपने आविष्कार प्रकाशित किये। श्रारचिड (oneliul) जातिके पेड कीट-पतोंके द्वारा कैसे वीजाक (fertilised) होते है, इसका निर्णयकर उन्होने एक पुस्तक लिखी । वृक्षलताओंके जारजनन और वीजजननके विषयमें भी एक पुस्तक उन्होंने लिख डाली। 'इनके सिवा भूविद्या और उद्भिद विषयक कई गवेपणामूलक अन्थ उनकी असीम कार्यपटुता, श्रव्यावसाय और पारिडत्य- का परिचय दे रहे हैं। इस प्रकार अत्यधिक परिश्रम करनेसे उनका स्वास्थ्य चहुत दिनोंसे विगड़ रहा था। प्राय चालीस वर्षसे वे पेटकी पीडा और वातसे कष्ट पा रहे थे। जव तबीअत बहुत खराब हो जाती थी तब कभी कभी काम छोडकर घूमने जाते थे। घरमें घे घडे सयमसे रहते थे। दिनमें चोच बोचमें लिखते- पढ़ते थे और बीच यीचमें धूम पाते थे। असलमें वे दुर्वल स्वास्थ्यसे युद्धफर जो रहे थे। यदि वे इतना अधिक मानसिक श्रम न करते तो शायद उनका स्वास्थ्य अच्छा रहता, किन्तु । - - .
हारविन।]
वैज्ञानिक-जोवनी।
१७३
चेलिसे पढ़े बिना रह नहीं सकते थे। उनका व्यवहार बहुत
शिष्ट था और चरित्र भी बहुत मधुर था। यह पहले ही
लिपा जा चुका है कि वे डाउन नामके एक छोटेसे गाँव में
रहते थे। यही सन् १८८२ के १४ अप्रैलो,७३ वर्षकी अवस्था में,
'उनका देहावसान हुा । मृत्युकालमें वे पॉच पुत्र अोर दो
कन्याय छोड गये थे।
इन महापुरुपने जीवहशामें ही यह सुना था कि उनको
उनके आविष्कारोंके कारण लोग वाइविल-द्वेषो ओर अधा-
मिक कह रहे है । यह श्रानन्दको पात थी कि १६ वीं शताब्दी-
में मनुष्याका मन बहुत कुछ ऊँचा हो गया था। नहीं तो
डारविन इसके पहले जन्म लेनेपर या तो गेलिलिथोकी
-तरह फैदकर दिये जाते या नोकी तरह जलती श्रागमे जला
दिये जाते । उनको मृत्यु हो जाने पर अगरेज जातिने सुप्रसिद्ध
घेस्टमिनिस्टरपनो में उनको मिट्टी दे उनकी स्मृतिके प्रति
"चित सम्मान ही प्रदर्शित किया था ।
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