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Shubh Santhathi Yogaprakasha
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॥ श्रीः॥
शुभसन्ततियोगप्रकाश।
(खंडद्वयात्मक)
भाषाटीकासमेत.
जिसको
टकसालनिवासी वैद्यपंचानन पं० रामप्रसाद उपाध्याय ने
संगृहीत व निर्मित और निजकृत भाषाटीका से
विभूषित किया।
66
वही
RAM
खेमराज श्रीकृष्णदासने
बंबई
निज "श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम प्रेसमें
मुद्रितकर प्रसिद्ध किया।
संवत् १९६५, शके १८३०.
इसका रजिष्टरी सर्वहक "श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्रालयाधीशने
स्वाधीन रक्खा है।
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।
निकलनाजनानालालciahalliationaliticानानन
वैद्यपञ्चानन पं० रामप्रसाद उपाध्याय ।
।
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भूमिका। G. आह. सादिक प्रकाशकारक होतेहुएभी जो अंधकार बढताही जारहा है वह शोकसे कहना पडता है; यही अंधकार इस भारतके आयु व पराक्रमको निर्मूल करताहुवा दिखाई देरहा है अधकार क्यों न बढे ? जबार्क सब लोग अपनी हानिकारक व्यवस्था देखतेहुएभी उससे अलग नहीं होते बल्कि हानिकारक दोषोंका अवलंबन ही करतेजाते हैं। देखिये ! मकानको बनाते समय उसकी बुनियादकी पुख्ताई पर कितना ध्यान दियाजाता है कि,कभी बुनियादकी कच्चाईसे मकानकी रंही अवस्था न बनजावे बल्कि मकानकी ही नहीं एक दमडीकी हँडिया खरीदते और बनाते वक्त भी उसके संपूर्ण अंगोंपर पूरी दृष्टि देकर देखलेते हैं परंतु जिस शरीरपर संपूर्ण जगतके कार्योंका निर्भर मानाजाताहै क्या उसकी कची अवस्था में हानि करते समय जरा भी दृष्टि देकर न सोचाजाय तो इससे बढकर क्या अंधकार छाएगा। जब १५,१६ वर्षकी अवस्था में ही वीर्य के नष्टकर्ता उपयोगोंसे संयोग कियाजाय; जबकि उसकी एक नई कॉपल [ जोकि अच्छीतरह वृक्षसे निकलने भी नहीं पाई उसकी सहश अवस्था हो तो फिर शरीरको अच्छी अवस्था क्यों रहसके ? और शरीरके राजा (वीर्य) के पैदा होते ही थोथे होजानेसे शरीरके रोगों का अंधेर कैसे मिटे | प्यारे पाठको ! इस अन्वरका कारण बच्चों को मातापिताओंसे योग्य शिक्षा न मिलकर छोटीही अवस्थामें कामोत्पादक तमाशे आदिमें लेजाना और योग्य आचार विचारके पाबन्द रहनेका अभ्यास न डालना ही है। इस हीन दशामें मैंने अपना मुख्य. कर्तव्य यही समझा कि ऐसा छोटासा वैद्यकग्रंथ निर्माण करना चाहिये कि जिसको सामान्यबुद्धिके मनुष्य भी देखसके और देखकर उस लेखपर अमल करनेसे जो हानि होचुकी उससे पुनरुद्धार होनेका मौका लावें | और होनेवाली हानि रुककर सबके शरीर हृष्ट पुष्ट रहें और आयु पराक्रमयुक्त योग्य संतान होनेलगें । ऐसा सोचकर अनेक ग्रंथों को देखकर और अनुभव करके यह परमोपयोगी “शुभसंततियोगप्रकाश" बनाया और इसके छापनेकी प्रार्थना श्रीमान् सेठ खेमराजश्रीकृष्णदासजीसे की इन्होंने मेरी प्रार्थना मानकर इसग्रंथको शीघ्रतासे छपवा दिया । इस विषयकी अधिक विवेचना करनेकी आवश्यकता नहीं कि इस विषय के बहुतसे ग्रंथ बनचुके और बन भी रहेहैं परंतु इस ग्रंथकी प्रणाली और योग्यता तो देखनेसे ही प्रतीत होसकेगी कि इस घोर दुःखव्यजक समयमें यह ग्रंथ कैसा उपयोगी और सर्वसम्मत तथा उपकारी है, इसलिये सब सज्जनोंसे प्रार्थना है कि इसमें जो कुछ मैंने अज्ञानवशसे दोपयुक्त लिखदिया हो उसको त्यागकर योग्य उपयोगोंसे लाभ उठाएँ तथा औरोंको शिक्षा देवें। आपका कृपापात्र, पं० रामप्रसाद उपाध्याय, टकसाल, रियासत-पटियाला.
श्रीः शुभसंततियोगप्रकाशकी विषयानुक्रमणिका । HAR विषय. पृष्टांक. विषय. Orance REPAREETES 8.. 06 . मंगलाचरण ग्रंथबनानेकाहेतु ग्रंथकीप्रामाणिकताकथन ग्रंथकेआरंभ प्रस्ताव वर्णन शरीरनीरोगरहनेकेलियेकिसप्रकारसे- चलना उसका कथन मलवेगों के रोकनेमें दोष दाँतन 3.क ००० उसके गुण १ विषमाशनके दोष अन्नके साथ जलपीना... -१४- ३ भोजनोत्तर तावूल ५ भोजनके अनंतर क्रिया... ११ पवनका सेवन करना २० ६ अप्रमाण भोजनकरनेसे रोगोंकी उत्पत्ति २१ ७ दिनमें स्त्रीसंगका निषेध 52 संध्या समधमें पांच काका निषेध सौ वर्षतक आयुहोने के कारण २२ ९ बाल मध्य और वृद्ध अवस्थाओंका कथन २३ ॥ ब्रह्मचर्य फलश्रुति २४ १०, ब्रह्मचर्यका लक्षण २५ १ ब्रह्मचर्यके अनंतरगृहस्थी होना ११ मैथुनयोग्यपुरुष ऋतुविभागसे स्त्री सेवन १२ मैथुनयोग्य स्त्री 3, स्त्रीगमनमें त्याज्यसमय... २८ ७०. 8.. दाँतनका निषेध जिह्वामलहरण मुंहधोना नेत्रांजन उसके निषेधका कथन शिरमें लगानेका तैल कंघीकरना और कानमें तेल डालना शरीरपर तैलमलना उसका निषेध 996 .. " त्याज्यस्त्री 480 208 २९ 96७३ अतिव्यायामका निषेध व्यायामका अत्यंत निषेध उवटनमलना... ३० 000 १३ त्याज्यस्त्रीगमनकेदोष " त्याज्यमैथुन १३ अतिमैथुनकदोष मैथुनकेअन्तमेकर्म १४ अथगर्भप्रकरणम् १५/ रजस्खलाबीकेकृत्य "नियमपरित्यागसेगर्भ मेंदोष १६ भाकलियोनिषेध .. 228 उसका निषेध .. चदन आहारकेगुण... g 4A aanyaayaa JANEMActri"CAS-Trism विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. CHR " 008 Co 0.. ... . ०५७ ५२ उसके लक्षण क्षयजके लक्षण . युग्मादिरात्रि स्त्रीगमनसेपुत्रवीगर्भसंभव३३ मानसक्लैव्य , स्त्रियोंकेयोनिमें स्थित तीननाडियोंका कथन " पित्तजल्लीवत्व गर्भाशयकास्वरूप ३४ शुक्रक्षयसे नपुंसकत्व सभीवतरणक्रम चतुर्थ नपुंसकत्व शुक्रबाहुल्यसेपुरुष, रुधिरबाहुल्यसेकन्या- पंचम नपुसकत्व होनों समानहोनेसे नपुंसकउत्पन्न छठा नपुंसकत्व होताहै ३५ सप्तम नपुंसकत्व जीवोत्पन्तिका कथन साध्यासाध्य नपुंसकत्व गर्भद्वयहोने का कारण ३६. अन्य नपुंसकताके कारण आहाराधीनगमकास्वभाव नपुंसकले सामान्य लक्षण सद्यो गृहीतगाकेलक्षण ३७ / बाजोपघातके लक्षण औरनिदान गर्भहुयेकेलक्षण ध्वजभंग निदान पुत्रवाले गर्भलक्षण उसका लक्षण गर्ममें कन्याके लक्षण ३९ / जरासंभव नपुंसकके कारण नपुंसक गर्भ लक्षण नपुंसकोंके भेद नपुंसकों के निदान और लक्षण ३९ वजभंगके साध्यासायध्यत्व अनस्थि बालक कुकर्म जन्य नपुंसकत्व ... विना वाजीकरणकी व्याख्या विकृतगर्भ तीन प्रकारका बाजीकरण दुष्टवीर्य के लक्षण ४१ / आवश्यकचिकित्सा वातादिभेदसे दुष्टशुक्रका लक्षण चिकित्साकी आज्ञा साध्यासाध्यत्वदुष्टवीर्यका ४२ बाजीकरण योग्य पुरुष आर्तवकावर्णन बुढापेकाकारण शुक्रशोणितकी शुद्धि आर्तवशुद्धि ४४ विशेषचिकित्साऔर बीजोपघातकी- चिकित्सा ध्वजभंगकी चिकित्सा.... उसका निदान जरासंभव व क्ष्यजकीचिकित्सा अदरके उपद्रव वाजीकरणपदार्थ प्रदरनाशक दायादिकाथ ४६ बाजीकरणयोग शुद्धार्तव लक्षण शतावरीचूर्ण शुद्धशुक्रके लक्षण वानरीगुटिका नपुंसकाधिकार ४७ / नारसिंहचूर्ण... . ५४ .. ง .. ... " . " 600 . सामान्यचिकित्सा " 1. 18 9089 नष्टार्तव . ५८ " *.. .. " ६३ 280 . स विषयानुक्रमणिका antarmart-mary "-37-METu Taman ...." विषय. पृष्टांक विषय पृष्टांक D namazGautam ... अमृतमल्लातक रतिवर्धनमोहक शुक्रमूत्रातवशोधकयोग.. केसरावलेह , आन्नपाक ६५ गर्भाधानक्रम ६७ संजातगर्भकेलक्षण e. ६८ | गर्भावगर्भपातमृतवत्सा ६९ बयाचिकित्साध्यायका उपसंहार ७० गर्भवतीकेकृत्य ७१ गर्भक्यावस्तुहै ७२ गर्भावतरणक्रम दौहृदकेनमिलनेसेहानि... ७६. दौहदकेपूर्णहोनेसेलाभ . १०० ७५ पांचवेंमहीने सेगर्भकोचैतन्यादि मिलताह १०१ " 06. ७२ महासुगंधितैल शतावरीमोदक रतिवल्लभ.... चन्द्रोदयरस... वसंततिलकरस अकरभादिचूर्ण खंडकूष्मांडावलेह 808 ७७ गर्भकीपुष्टी " वसंत कुसुमाकर ०.० 7 ... १ 40 601 - ... . गर्भके अंगोंकी उत्पत्ति गर्भकेपितृजअवयव १०२ गर्भकेमातृजअवयव गर्भकीसौंदर्यासौंदर्यता.... ८० गर्भस्राव और पातककेकारण ८१ गर्भस्राव और पातकीअवधी ८२ अकालमेंगर्भपात गर्भस्रावकीचिकित्सा ८३, गर्भन्नावउपद्रव उत्पलादिगण ८४ गर्भकेस्थानांतरमहटजानेकेउपद्रव उसका यत्न १०४ मासानुमासिक यत्न ... ८६/ गर्भिणीकी अन्य चिकित्सा गर्भ १०७ ८९ मूढगर्भकी गति असाध्य मूढगर्भ और गर्भिणीके लक्षण ९० योनि संवरणके लक्षण ... १०८ ९१ गर्भ मरनेके कारण ९२ मृतगर्भके लक्षण अन्य असाध्य लक्षण १०९ ९४ | मूढगर्भ चिकित्सा १०९ पूर्णचंद्ररस अध्यायका उपसंहार वंध्याचिकित्साध्यायकी प्रस्तावना... चिकित्साक्रम नष्टातवाकायन योनिशुद्धीकरण स्त्रीपुरुषों के दोषको परीक्षा अष्टवन्ध्या वर्णन वातविकारका निदानचिकित्सा पित्तदूषित लक्षण कफदूषितके लक्षण सन्निपातदूषितके लक्षण औरमतसेवन्ध्याओंकावर्णन वैद्यकसे वंध्याके आठप्रकार गर्भप्रयोग-लक्ष्मणाद्यवृत फलधृत बृहत्फलघृत :.. शतावरीघृत. वृद्धदारुकघृत बृहत्कल्याणघृत अन्य गर्भपदयोग ®®. ... .. " ३. " . .. ... ::
विषयानुक्रमणिका PRESETTINAMANCES TEADERS विषयः पृष्ठांक विषय. पृष्ठांक. ००० . . 2 ... 9 8 " " मृतगर्भ निकालनेका यत्न १०९ अष्टांगघृत... आवश्यक आज्ञा १११ सारस्वतधृत.. सच्चाशोक वाणी शुद्धी करण गार्मणीके ज्वरादिकोंकी चिकित्सा.... ११२ उपनयन और विद्याध्ययन १३२ वातशुष्कगर्भकी चिकित्सा ११३/ उपसंहार नागोदरके लक्षण तीनप्रकारके बालक प्रसव में विलम्बकी चिकित्सा स्तन्यदुष्टका निदान प्रसूताकी योनिके घावोंकी चिकित्सा ११४/ शुद्धदूधके लक्षण आंवल गिरनेके यत्न " वातादिकोंसे दूषित दूधके लक्षण अकल्ला निदान ११५ वालकके रोगजाननेकी रीति मक्कलकी चिकित्सा ११६/ चिकित्साका उपदेश प्रमुताके शिरके दर्दकी दवाई वात दूषितकी चिकित्सा सूतिकारोग "रास्नादिधृत लक्षण "पित्तदूषितस्तन्यकायन ज्वरादिकोंकी प्रसूतसंज्ञा ११७ / कफपितकी चिकित्सा उसकी चिकित्सा सन्निपातसे दूषित स्तन्यपानके उपद्रव देवदार्वादिकाथ चिकित्सा १३७ पंचजीरकपाक ११८/ दंतोद्भेदके रोग सौभाग्यशुठी ११९/ बालकोंकेरोगोंकी चिकित्सा....... १३७ घृत १२० बालककी मात्राका प्रमाण १३८ प्रसूतरोगमेंयूष १२१ / बालकोंकोलंघनकानिषेध १३९ यवादियूष " जोबालकदूधनपीवे उसकायत्न प्रसूताके नियमसमयकी अवधि " बालककेज्वरादिकोंकी चिकित्सा स्तनरोग निदान १२२ | चतुर्भद्रकाथयाअवलेहज्वरातिसारपर... १४० " | अन्ययोगज्वरातिसारादिकोंपर विद्रधिकी चिकित्सा " खाँसीपरयोग जन्महोनेपरबालकोंकी तीनदिनतककी व्यव द्राक्षादिचूर्णखाँसीश्वासपर १४२ स्था किसप्रकाररखना १२३ / बालककीछर्दि और दूधनिकालनेकायत्न स्तन्यपानविधि १२६ तृषापर स्तन्यपानके मंत्र १२७ अफारा और वातशूलपर मकरण १२८ मुखस्रावपर... ण्युपवेशन और अन्नप्राशन १२९ | मूत्रावरोधपर वेधन नाभिशोथपर शनका कृत्य १३० नाभिपाकपर * ... " स्तनरोगके लक्षण ... .... " 402 29 १४४ ...
विषयानुन Sansar.neu.com2.SE. মিত্ব अष्टांक पृष्ठांक १५५ " 200a 2.4 १५९ ---- . त्याज्य औषधि 208 शोधपर हजुटकी चिकित्सा ( स्नान) मुखपाकपर ... प्रतिरोनेपर... १९४५ सर्व प्रपद धूप इतबिसादिकोपर बालरक्षा मंत्र समपामाविचिकापर अष्ट लंगलफुल उडेपुरुषांसे अलगकुछबालकोंकरोग १४५ लाक्षाद्य तेल तालुकंटकनिदान १४६ कुमारकल्याणवृत तालुकेटककायन " ब्रह्मचर्य जालुपाककायन रोगज्ञानकी आवश्यकता महापद्मनिर्णय योग्य वैद्य महापाकी चिकित्सा १४७ औषधि ज्ञानकी आवश्यकता औषधिके योग और आयोगका वर्णन कुणकेलक्षण औषधिके लक्षण कुकृणककायत्न उत्तम औषधिके लक्षण... तुण्डिरोग उपयोग गुदापाक यत्न पारिगर्मिक... १४९ औषधि ग्रहण विधि पारिगर्भिककायत्न योग विधान चोरकरोग सूखी गीली औषधिका वर्णन चोरकरोगायत्न १५० मान ( तोल) वर्णन दंतरोगनिदान काथके पांच प्रकार दंतोद्धेदककायन अकालदंतउत्पन्नकेदोष स्वरसकी मात्रा उसकाप्रायश्चिन्त १५२ स्वरसमें प्रक्षेपकामान दांतनिकलनेकासमय कल्कविधि दंतदष्टरोगके लक्षण यत्र हिम शोष (बालकोंके कृशहानेका वर्णन) फांट विधि कार्यको चिकित्सा १५३ औषधि पीनेकी विधि अथवा घृततैल साधन सामान्य विधि अश्वगंधादिघृत लाक्षाद्य घृत अनेक रोगोंपर १५४ आसव और अरिष्ट सामान्यतासे बालग्रहोंके कारण १००० "आरोप्यताकी आवश्यकता समान्यतासे ग्रहजुष्टके लक्षण ७ 79 श " 09 ... 10. ... 8. ... , २.० १५७२ काथविधि 8" 2.* " ११५ " "संधान " १०९ १५५ । निवेदन ** विषयानुक्रमणिका (७) Pariwaranewcruickr dutomorrammar पृष्ठांक विषय पृष्ठांक INARAYAnampureweenie-uEMIRMIRurwmarn ot 000 दोषोंके लक्षण १८१ 69 प्रकारांतरसे ... १०० " असाध्य के रक्षण द्वितीयखंडके आरंभ मंगल १६९ सन्यग्विरितके लक्षण देह रक्षणके अर्थ वैद्यकशास्त्रका अध्ययन १५ या लक्षण... दोष उत्तमविरेचनके गुण १९७० विरेचनके अयोग्य पुरुष रसपटू १७१ विरेचनके योग्य पुरुष. धमनविरेचन केलक्षण प्रत्येकरसका वर्णन छहोंऋतुओंकेविरेचन १७४ अभयामोदक वमनविरेचनादिका व्याख्यान १ विरेचनविषयकबातें होनाधिकवमनके लक्षण १७७ | संक्षेपसेवमनविरेचनकेउपद्रवोंकोचि- ठीकवमनके लक्षण कित्सा वमनके अंतमें धूम्रपान... : विरेचन केबाद पथ्यापथ्य वमनकरनेके गुण बुद्धिततुकेविषयमें विचार वमनके अयोग्य पुरुष मंडूकपर्णीकेप्रयोग वमनके योग्य विरेचनविधि दुर्विरिक्त और अतिविरिक्त १८० प्रथका उपसंहार १८४ ... १८७ २८८ १८९ " " १७९ ब्राझीकेप्रयोगकी विधि १७५ वचकेखानेकांविधि १९१ १९२ शुभसंततियोग प्रकाशनाविषयानुक्रमणिकासमाप्त हुई. MORE अवतरणिका। भूपेन्द्रसिंहनाम्ना वै महाराजोस्ति धर्मवित् ॥ तस्य राज्ये हि ग्रामोस्ति टकसालेति नामतः ॥ १ ॥ पर्वतैरोषधीयुक्तैरावृतोऽस्ति समंततः ॥ तस्मिन्नाङ्गिरसे वंशे ग्रामे वै ख्यातिमागते ॥ २ ॥ सुखलालात्मजो ह्यासीत तुलसीरामसत्तमः ।। तस्यात्मजो विचारज्ञो द्वारिकादासनामतः ॥ ३॥ तदात्मजोऽहमल्पज्ञो रामप्रसादसंज्ञकः ॥ शुभसन्ततिदान्योगानत्र अन्थे समालिखम्॥ ४ ॥ यथा बालाः प्रकुर्वन्ति क्रीडन्तो वै गृहांतरम् ॥ तथा ग्रंथान् समालोक्य लिखितं चाल्पबुद्धिना ॥ ५ ॥ अथवा बुद्धिमद्भिर्हि पश्याद्भिोर्कवृत्तकम् ॥ कुकर्मनिरतान् दृष्ट्वा समाधयं तथापि च ॥६॥ १०८ श्रीयुक्त महाराजाधिराज धर्मज्ञ भूपेन्द्रसिंह बहादुरके राज्यमें टकसाल नामसे पुराचीन ग्राम है. यह ग्राम अनेक लता वनस्पति आदि औषधियों युक्त पर्वतों से शोभायमान् है. इस ख्यातियुक्त ग्राम में आंगिरस वंश प्रतिष्ठितहै इस वंशमें श्रीसुखलालजी के पुत्र तुलसीराम बडे श्रेष्ठ सुयोग्य ब्राह्मण उपाध्याय हुए उनके पुत्र द्वारिकादास नामसे बडे विचारवान् उपाध्याय पधारक हैं. इनका अल्पज्ञ पुत्र मैं रामप्रसाद नामसे हूं मैंने इस ग्रंथमें अच्छे सन्तान उत्पन्नकरनेवाले योग लिखे है जैसे छोटे २ बालक खेलते हुए मृत्तिका आदिका नया घर बनाकर खेलाकरते हैं ऐसेही तुच्छबुद्धिवाले मैंने भी ग्रंथोंको देखकर यह पुस्तक लिखदिया अथवा इस समय लोककी गति देखकर और मनुष्योंको कुकर्मसे दुःखित देखकर बद्धिवान् इस पुस्तकको उपयोगी समझकर समाधान करेंगे अर्थात् अच्छा मानेंगे॥ आपका कृपापात्र पं० रामप्रसाद उपाध्याय. टकसाल, रियासत-पटियाला.
(२) शुभसन्ततियोमप्रकाश। यद्यपि अनेक ग्रंथ और बहुतसे लायक चिकित्सक भी हैं परन्तु जो पुरुष शास्त्रविहित मार्गपर नहीं चलते उनको उन्हीं चरकादि महान् बंथोंसे क्या फायदा होसक्ताहै ।। ४॥ भूरिसत्त्वामहद्रथा याथातथ्यविधायकाः ॥ मानवाःस्वल्पसत्त्वायेअसमर्थानिरीक्षणे ॥६॥ प्राचीन उत्तम तथा महान् सत्ववाले और बड़े २ ग्रंथ यथोचित और तथ्य मार्गके विधान करनेवाले हैं। जो मनुष्य अल्पसत्व और अल्पबुद्धिके हैं ये थोडे समयमें उन बड़े ग्रंथों को देखनेमें असमर्थहँ ॥ ५॥ अनुभवकृतायोगा शुभसंततिदायकाः॥ मयारामप्रसादेनप्रकाशःक्रियतेयतः॥६॥ इसलिये रामप्रसाद मैंने अनुभवकिये हुये शुभसन्तानदायक योग अल्पबुद्धिवालोंके हितार्थ प्रकाश करे । और बुद्धिमानोंके लिये ऋषि- योंके ग्रंथही हैं ॥ ६॥ नानातंत्रेषुयावामिमग्रंथोपकारिणी ॥ सुरीत्याहंलेखयिष्येयथासुसंततिर्भवेत् ॥ ७॥ अनेक शाखों और ग्रंथों में जो २ बातें हैं वही मेरे ग्रंथमें उपकारी होंगी, अर्थात् इस ग्रंथके विषयकी सहायक और उपयोगी होंगी. उनको सुंदर रीतिसे सुगमकरके इस पुस्तकमें लिखाहै जिनकेवर्तावसे उत्तम संतान और गृहस्थको यथोचित सुखहो ॥ ७ ॥ अथातोयोग्यसूत्रीयाध्यायंव्याख्यास्यामः॥१॥ अब हम योग्यसूत्रों के अध्यायका व्याख्यान करतेहैं ॥ १ ॥ प्रामाण्यम् ॥ २॥ प्रमाणसेही सब अर्थप्रतिपत्तिहोतीहै जबतक ज्ञाता प्रमाणसे अर्थको न जानलेवे तबतक ज्ञाताकी अर्थके ग्रहण करने में प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों नाहीं होसक्ती सो हम प्रमाणसे कहतेहैं। यह ग्रंथ प्रमाणिक होनाचाहिये ॥२॥ (क्यों और किसप्रमाणसे इस शंकाको लेकर कहतेहैं) । (४) शुभसन्ततियोगप्रकाश। तदुःखसंयोगोव्याधय इत्युच्यन्ते ॥१०॥ उस पुरुषका दुःखके साथ संयोग होना व्याधिया कही जाती हैं ॥१०॥ तेचतुर्धाशारीरागन्तवमानसाःस्वाभाविकाश्च ॥ ११॥ वह दुःखके संयोग अनेक और अगण्य होनेसे व्याधियां अगणित होते हुऐभी चार भागोंमें विभक्त हैं । जैसे शारीरिक, आगंतव, मानसिक, और स्वाभाविक । इनमें वात, पित्त, कफ, शोणितके कोप या विषमतासे जो व्याधि हो उसको शारीरव्याधि कहा जाताहै। और अभिवातादिसे जो हो उसको आगंतुक कहा जाताहै । क्रोध शोक, भय, ईयादि निमित्तक मान सिक व्याधि कही जातीहैं । क्षुधा, प्यास, जरा, मृत्यु, जन्य, स्वाभाविक कहाती हैं ॥११॥ याथातथ्यविहीनत्वादुःखसंयोगः ॥ १२॥ ठीक यथार्थ ज्ञान न होनेसे दुःखसे संयोग होताहै। अर्थात् यथार्थ पदार्थ ज्ञान होनेसे पुरुष यथोचित वर्ताव कर सकता है। उस यथार्थ ज्ञान न होनेसे यथोचित वर्ताव नहीं होता । यथोचित वर्ताव न होनेसे दुःखसे संयोग होताहै, अर्थात् दुःखी होना पडताहै। इनमेंसे शारीरिक दुःख, अर्थात् शरी- रमें होनेवाली व्याधि जो वातादि निमित्तक है, उसके वर्णनमें माधवाचार्यने कहा है ( सर्वेषामेवरोगाणांनिदानकुपितामलाः । तत्सकोपस्यतुहेतुर्विविधा- हितसेवनम् ) अर्थात् सभ बीमारियोंका सबब वायु आदि दोषोंका कुपित होनाही है और उन दोषोंके कोपका कारण अनेक प्रकारके अहित आहार विहारका सेवन है। अहित सेवनहीं समस्त दुःखोंका कारणहै ( यहांपर केवल इस समय इस खंडमें शारीरिक दुःख निवृत्तिका वर्णन होगा । परन्तु बीजरूपसे सबका वर्णन है ) ॥ १२॥ तद्विपरीतोदुःखनिवृत्तिः ॥ १३॥ अज्ञानतासे विपरीत अर्थात् यथोचित ज्ञान होनेसे जब मनुष्य याद- न्मात्र जान लेताहै तो उससे अनुचित व्यवहार नहीं होसक्ता । वह ज्ञाता भाषाटीकासमेत-अ० २. गुदा आदि मलकेमार्गोको साफकरके धोना कांति और बलके देनेवाला है, तथा पवित्रताके करने वाला आयुके बढाने वाला दरिद्र और क्लेश पापके हरलेने वाला है ॥ ५ ॥ मलमार्ग गुदा लिंग आदि धोनेके बाद हाथ पावोंको खूब धोना चाहिये । यह हाथ पावौंका धोना शुद्धिकारक मैल और श्रम (थकान ) को नाशक वृष्य पुरुषार्थके बढाने वाला नेत्रोंको हितहै। ताप गरमी आदिकी घबराहटके नाश करने वालाहै ॥ ६ ॥ वेगांकेरोकनेकेदोप। आटोपशूलोपरिकर्त्तिता च संगःयुरीषस्यतथोर्द्धवातः । पुरीपमार्गादथवानिरेतिपुरीषमागेनिहितेनरस्य ॥ ७ ॥ वातमूत्रपुरीपाणांसंगोऽध्मानंतमोरुजा। जठरेवातजाश्चान्यरोगास्युतिनिग्रहात् ॥ ८॥ बस्तिमेहनयोःशूलंमूत्रकृच्छंशिरोरुजाः ॥ विनामोवंक्षणानाहास्याल्लिंगंमुत्रनिमहे ॥९॥ पुरीष ( मल ) के वेग रोकनेसे अफारा (पेटकाफूलना) कतरनेकीसी पीडा मलका रुकजाना उर्द्धवात (वायुका ऊपरको चढना ) मलमार्गसे मलका ठीक न निकलना ऐसे उपद्रव होते हैं। इस वास्ते जब मलका वेगहो उसे कभी न रोके ॥ ७ ॥ अधो बायुके रोकनेसे वायुका रुकजाना, मत्रका बंद होना, मलका रुकना, पेटका अफरना, ग्लानि होना, दर्द पेटमें वायुके उपद्रवादि होते हैं। इसलिये जब वायु आवे उसे रोकनान चाहिये ॥८॥ मूत्रके रोकनेसे बस्ति और लिंगमें पीडा मूत्रकृच्छ्र शिरमें दर्द नलोंका नवना वंक्षणमें अफर! आदि होते हैं, इससे किसी भी वेगको न रोकना चाहिये ॥ ९ ॥ दाँतन । तत्रादौदन्तपवनंद्वादशांगुलमायतम् ॥ कनिष्ठिकापरीणाहमृज्वग्रथितमत्रणम् ॥ १० ॥ अयुग्माग्रंथियच्चापिप्रत्यग्रंशस्तभूमिजम् ॥
(८)
शुभसन्तांतयोगप्रकाश।
अवेक्ष्यतुचदोपंचरसंवीर्यचयोजयेत् ॥
कपायमधुरंतितंकटुकंप्रातरुस्थितः ॥११॥
पलादि त्यागनेके अनंतर हाथपावोंको विधिपूर्वक धोकर दंतधावनि(दाँतन)
करना चाहिये दाँतन बारह अंगुल लंबी छोटीउंगली जैसी मोटी कोमल'
गाँठरहित साफ होनी चाहिये ॥३०॥ आगेसे दो शाखी और गांठदार न हो
और श्रेष्ठ भूमिमें उत्पन्नहुवे वृक्षकोहो ऐसीदांतनको ऋतु और दोष तथा रस
और वीर्य विचार कर कडुवे कषेले मीठे या चरफरे वृक्षकोहो उसे सुबरेही
पूर्वोक्त कामोंके अनन्तर करना चाहिये ॥ १३ ॥
निंबश्चतिक्तकेश्रेष्ठःकषायेखदिरस्तथा ॥
मधूकोमधुरेश्रेष्टःकरंजाकटुकेतथा ॥ १२ ॥
कडवे वृक्षों में नीमकी दाँतन श्रेष्ठहै कसेले वृक्षोंमें खदिर भीठे वृक्षोंमें महुवा
और चरफरोंमें करंज वृक्षकी दाँतन श्रेष्ठहै ॥ १२ ॥
क्षौद्रव्योपत्रिवर्गाक्तंसतैलंसैंधवेनच ॥
चूर्णेनतेजोवत्याश्चदन्तानित्यविशोधयेत् ॥ १३॥
एकैकंघर्षयेद्दन्तंमृदुनाकूर्चनेनच ॥
दन्तशोधनचूर्णेनदंतमांसान्यबाधयेत् ॥ १४ ॥
तेजोवती के चूर्णमें सहत त्रिकटु ( सोंठ पीपल मिरच) त्रिसुगंध (दाल-
चीनी बडीइलायची तेजपात ) मिलाकर उसमें तेल सेंधानोन मिला नित्य
इससे दाँतोंको साफ करे ॥ १३ ॥ फिर दाँतनकी नरम कूचीसे एक एक
दाँतको साफ करे और ऊपर लिखे चूर्णसे दाँतोंकी जडोंमसूढोंको साफ करे,
परन्तु ऐसी नरम रीतिसे चूर्णको मले जिससे तखलीफ न हो ॥ १४ ॥
गुण।
तद्दौर्गन्ध्योपदेहौतुश्लेष्माणंचापकर्षति ॥
वैशधमन्नाभिरुचिसौमनस्यंकरोतिच ॥ १५॥
(१०) शुभसन्ततियोगप्रकाश। गंडूषमापिकुर्वीतशीतेनपयसामुहुः ॥ कफतृष्णामलहरंमुखांतःशुद्धिकारकम् ॥२०॥ ठंढे जलसे वारम्बार कुल्ले करना कफ तृषा मैलको नष्ट करता है और मुखके भीतरकी शुद्धि करता है ॥ २० ॥ मुँहधोना । क्षीरवृक्षकषातैर्वा क्षीरेण च विमिश्रितः। भिल्लोदककषायेणतथैवामलकस्यच ।। प्रक्षालयेन्मुखने।स्वस्थःशीतोदकेनवा ॥ २१ ॥ नीलिकांमुखशोषंचपिडिकांव्यंगमेवच ॥ रक्तपित्तकृतान्रोगान्सद्यएवविनाशयेत् ॥ मुखंलघुनिरीक्षेतदृढपश्यतिचक्षुपा ॥२२॥ दूधवाले वृक्षोंके क्वाथोंसे अथवा इनमें दूध मिलाकर मुख धोवे अथवा भिल्लोदक कपाय ( पर्वतोंमें केदारके जल ) से मुख धोवे। (कोई कहते हैं धूपमें गरम करके फिर ठंडा कियाहुआ पानी भिल्लोदक कषाय होता है) इससे मुँह धोवे तथा आंवलोंके काथसे आँखोंको छोटे देकर धोवे अथवा स्वस्थ मनुष्य शीतल जलसे मुख और आँखोंको धोवै ॥ २१॥ मुख धोनेसे काले २ धब्बे मुँहकी खुश्की और मुहाँसे झाई आदि तथा रक्तपित्तके रोग शीघ्र नष्ट होते हैं, मुख हलका साफ दीखता है और नेत्र धोनेसे दृष्टि दृढ होती है ॥ २२॥ नेत्रांजन। मतंयोतोञ्जनश्रेष्ठंविशुद्धसिंधुसंभवम् ।। दाहकंडूमलनंचटिक्केदरुजापहम् ॥ २३॥ अक्ष्णोरूपावहंचैवसहतेमारुतातपौ ॥ ननेत्ररोगाजायंतेतस्मादंजनमाचरेत् ॥२४॥ मुंह धोकर सिंधु नदिका उत्पन्न हुवा अंजन ( कालासुर्मा ) लगाना चाहिये। यह दाह खाज नेत्रोंकी मैलको दूर करताहै और दृष्टि
भाषाटीकासमेत-अ० २.
और रोगों को दूरकरताहै ॥ २३॥ और नेत्रोंको सुंदररूपवाले करता है तथा
वायु और धूपकी सहनशक्ती होजातीहै और नेत्रोंमें रोग नहीं उत्पन्न होतेहैं।
इससे अंजन नित्य आँजना चाहिये ॥ २४ ॥
निषेध ।
भुक्तवाशिरसास्नातःश्रांतश्छदनपादनः ।
रात्रौजागरितश्चापिनांज्याज्ज्वरितएवच ॥ २५ ॥
भोजन करके तुरंत शिर धोकर वमन अथवा असवारीसे थकेहुवेको रातके
जागेहुबेको ज्वरवालेको सुर्मा न अलना चाहिये ॥ २५ ॥
शिरोगतांस्तथारोगाञ्छिरोऽभ्यंगोऽपकर्षति ।।
केशानांमार्दवंदैव्यैबहुत्वस्निग्धकृष्णता ॥२६॥
करोतिशिरसस्ततिसत्वक्त्वमपिचालनम्।।
संतपणंचेन्द्रियाणांशिरसम्प्रतिपूरणम् ॥ २७॥
शिरमें तेल लगाना शिरके रोगोंको दूरकरताहै तथा बालोंको नरम
करताहै और बढाता है और अधिक (धनके ) पैदा करताहै तथा चिकने
और काले करताहै ॥ २६ ॥ दिमागको तृतकरताहै, शिरको त्वचाको
सुंदर नरम करताहै, रक्तका संचार करताहै । नाक, कान, नेत्रोंको तृप्त
करताहै, शिरको पूर्ण करताहै ॥ २७ ॥
शिरमें लगानेका तेल ।
मधुकंक्षीरशुक्काचसरलंदेवदारुच॥
क्षुद्रकंपंचनामानंसमभागानिसहरेत् ॥ २८॥
तेषांकल्ककषायाभ्यांचऋतैलंविपाचयेत् ॥
सदैवशीतलंजंतोनितलंपदापयेत् ॥ २९॥
मुलेठी क्षीरविदारी, सरल, देवदारु, और लघु पंचमूल इन सबको सम,
भाग लेकर इनके क्वाथ और कल्कसे कोल्हूके पिडे हुए तिलतैलको सिद्ध
करके ठंडा करले, फिर इस तैलको नित्य शिरमें लगाना चाहिये ॥२८॥२९॥
(१२) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
कंघीकरना और कार्नोम तेल डालना।
केशप्रसाधनीकेश्यारजोजन्तुमलापहा ॥३०॥
हनुमन्याशिरःकर्णशूल कर्णपूरणम् ॥ ३१॥
कंघी करना केशोंको हित है धूल जन्तु (जम) मैल आदिको दूर करता
१२ - [नम तेल डालना ठोडी शिर और कानके दरदको दूरसरताहै ३३
शरीरपर तैलमलना।
अभ्यंगोमादेवकर कफवातनिरोधनः ॥
धातूनांपुष्टिजननोमृजावर्णबलप्रदः ॥ ३२॥
शरीरपर तैल मलना शरीरको मुलायम करता है, कफ और वायुक
रोकता है धातुओंको पुष्ट करता है, शुद्धि तथा रूप और बलके देने-
वाला है ।। ३२॥
निषेध ।
केवलंसामदोषेषुनकथंचनयोजयेत् ॥
तरुणज्वर्यजीणींचनाभ्यक्तव्योकथंचन ॥३३॥
तथाविरिक्तोवांतश्चनिरूढोयश्चमानवः ।।
पूर्वयोःकृच्छताव्याधेरसाध्यत्वमथापिवा ॥ ३४॥
शेषाणांतदह मोक्ताअग्निमांद्यादयोगदाः ॥
संतपणसमुत्थानारोगाणांनवकारयेत् ॥ ३५ ॥
आम सहित दोषोंमें केवलं स्नहका उपयोग करना उचित नहीं, तथा
तरुण ज्वरवाले और अजीर्णवालेको भी तैलायंग नहीं करना ॥ ३३ ॥
विरेचन तथा मनके पीछे निरूहण बस्तीके पीछे भी तेल मर्दैन न करना
चाहिये। क्योंकि इन समयोंमें तैल मलनेसे उपरोक्त (तरुण ज्वरादि) बीमा-
रियां कष्टसाध्य बल्कि असाध्यही होजाती हैं ॥ ३४ ॥ और विरेचन
वमन निरूढ इनमें तैल मर्दनसे मन्दाग्नि आदि रोग होजातेहैं । संतर्पणसे पैदा
हुए रोगमें भी स्नेह न लगाना चाहिये ॥ ३५ ॥
भाषाटीकासमेत-अ० २.
(१३)
कसरत करना।
शरीरायासजननकर्मव्यायामसंज्ञितम् ।।
तत्कृत्वातसुखंदेहविमृन्दीयात्लमंततः॥३६॥
शरीरोपचयाकांतित्राणांमुविभक्तता।
दीप्ताग्नित्वमनालस्यस्थिरत्वंलाघवमृजा ॥३७॥
शरीरको श्रम पैदा करनेवाले कर्मको व्यायाम कहते हैं उस व्यायाम (कसरत)
करनेसे शरीरको सुख होता है, और शरीर सब तरफसे सुडौल होजाता
जी ३६ ॥ और शरीरकी वृद्धि और कांति बढती है, सुब अंगोंका सुन्दर
नाग होता है। शरीरकी स्थिरता, हलकापन, शरीरके दोषोंकी शुद्धि और
आता है ॥ ३७॥
अतिव्यायामका निषेध ।
क्षयस्तृष्णारुचिच्छदिरक्तपित्तत्रमलमाः ।।
कासशोषज्वरश्वासाअतिव्यायामसंभवाः ॥ ३८॥
अति व्यायाम करनेसे क्षय तृषा अरुचि वमन रक्तपित चम क्लम कास
प ( शरीरका सूखना ) ज्वर श्वास इतने रोग होतेहैं इसवास्ते अत्यंत कसरत
करै ॥ ३८॥
निषेध ।
रक्तपित्तिःकृशःशोषीश्वासकासक्षतातुरः॥
भुक्तवांस्त्रीषुचक्षीणोभ्रमार्तश्चहिवर्जयेत् ॥ ३९ ॥
रक्तपित्त वाला शोषरोगी श्वास खांसी अथवा उरक्षत रोगवाला भोजनके
छे जो स्त्रीसंगसे क्षीण होगया हो भमसे और बीमार मनुष्य कसरत कभी
करे ॥३९॥
उबटनमलना
उद्धर्तनंवातहरंकफमेदोविलापनम् ॥
स्थिरीकरणमंगानांत्वक्प्रसादकरंपरम् ॥ ४० ॥
(१४) शुभसन्ततियोगप्रकाश । शिरामुखविविक्तत्वंत्वस्थस्याग्नेश्चतेजनम् ।। उद्धर्षणंतुविज्ञेयंकंडकोष्टानिलापहम् ॥ ११ ॥ उबटना लगाना वायुके हरनेवाला कफ और मेदके विलानेवाला और अंगोंको स्थिर करनेवाला तथा त्वचाके परम प्रसन्न करने वालाहै। शिरा- ओंके मुखोंके खोलनेवाला त्वचाकी अग्निको उत्तेजित करनेवालाहै ॥४०॥ और उद्धर्षण ( रुमालसे शरीरको मलना ) खाजको शरीरपर जो चकरे पड़तेहैं उनको और वायुको दूर करताहै ॥ ४१ ॥ निदादाहश्रमहरंस्वेदकंडूतृषापहम् ।। हृद्यमलहरंश्रेष्टसर्वेन्द्रियविशोधनम् ॥ ४२ ॥ तन्द्रापापोपशमनंतुष्टिदंपुंस्त्ववर्द्धनम् ॥ रक्तप्रसादनंचापिस्नानमग्नेश्वदीपनम् ॥ ४३॥ उबटने उद्धर्षणके पीछे नित्यस्नान करना चाहिये । स्नान करना, निद्र दाह, श्रमको नाश करताहै । पसीना, खाज, तृषाको नष्ट करताहै । हृदयव हितहै । मैलको दूर करनेवाला श्रेष्ठ सब इन्द्रियोंको शुद्ध करताहै ॥ ४२ वंद्रा (अधमुचिआँखे या आलस्य ) और पापको नष्ट करता तुष्टिदायक पुर पार्थक बढानेवालाहै । रुधिरको प्रसन्न और स्वच्छ करताहै और जठरामिव तेज करताहै ॥ ४३ ॥ उष्णेनशिरसःस्नानमाहितंचक्षुषःसदा ॥ शीतेनशिरसःस्नानंचक्षुष्यमितिनिर्दिशेत् ॥ ४४ ॥ श्लेष्ममारुतकोपेतुज्ञात्वाव्याधिबलाबलम् ।। काममुष्णंशिरःस्नानभैषज्यार्थसमाचरेत् ॥१५॥ अतिशीताम्बुशीतेचश्लेष्ममारुतकोपनम् ॥ अत्युष्णउष्णकाले च पित्तशोणितवर्द्धनम् ॥४६॥ गरम जलसे शिरको धोना सदा नेत्रोंको हानि कारक है और शीत जलसे शिरका स्नान करना अत्यन्त नेत्रोंको हितकारक है ॥ ४४ ॥ क (१६) शुभसन्ततियोगप्रकाश। देनेवाला और शुभ है। तथा हिंसकोंके भयका नाशक और वशीकरण करता है ॥ ४९ ॥ ५० ॥ आहारके गुण । आहारःप्रीणनःसद्योवलकूदेहधारणः ॥ स्मृत्यायुःशक्तिवर्णीजःसत्वशोभाविवर्द्धनः॥२१॥ यथोक्तगणसंपन्नं जरः सेवेत भोजनम् ।। विचार्यदोषकालादीनकालयोरुभयोरपि ॥ ५२ ॥ आहार ( भोजन करना ) पुष्टाई करताहै । तत्काल बलकारक देहक धारणकर्ता, तथा स्मृति आयु शक्ति वर्ण ओज सत्त्व और शोभा इनव बढाताहै ॥ ५१ ॥ यथोक्तमुणसंपन्न ( अर्थात् जलाहुवा कच्चा, देरक बनाहुवा न हो । स्वादिष्ठ गरम वृतयुक्त उत्तम समयानुसार हो) ऐसे अन्न को दोष और काल विचारकर दोनों समय (१० बजे दिनको और ८ बजे रात्रिको ) भोजन करना चाहिये ॥ ५२ ॥ कोई कहते हैं-(क्षुत्संभवतिप- केषुरसदोषमलेषुच । कालेवावदिवाकालेसोन्नकालउदाहृतः ) जब इस प्राणीको रस दोष और मल पक जाते हैं तब भूख लगतीहै । बस जब भूख लगती है वही भोजन करनेका समयहै । भोजनाग्रेसदापथ्यंलवणाईकभक्षणम् । अग्निसंदीपनरुच्यंजिताकंठविशोधनम् ॥ ५३॥ भोजन करनेसे पहले सेंधानिमक और अद्रखका खाना पथ्यहै । यह जद- राग्निको तेज करताहै, अन्नमें रुचि बढाताहै तथा जीभ और कंठको शुद्ध करताहै ॥ ५३॥ विषमाशनके दोष। आलस्यगौरवाटोपशब्दांश्चकुरतेऽधिकम् ॥ हीनमात्रंतनो कार्यकरोतिचबलक्षयम् ॥५४॥ अधिक भोजन करनेसे, आलस्य भारीपना, पेटकाफूलना, गुडगुडाहटका शब्द करना आदि उपद्रव होतेहैं, इसीतरे थोडा भोजन करना कश और कम-
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(२०) शुभसन्ततियोगप्रकाश
करके मोतेवख्त पहले आठ श्वास सीधा चिन मोना चाहिये । फिर सोला १६
श्वास दहनीकडथल और बत्तीस ३२ श्वास वामपार्श्वलेवे। फिर अपनी इच्छ
पूर्वक लोवे ।। ६७ ॥ प्राणियोंके नाभिसे ऊपर बाई ओर जठराग्निरहती
इसीसे भोजन पचानेके वास्ते बाई करवट सोना चाहिये ॥ ६८ ॥
पवन
सुखंप्रवातंसेवेतग्रीष्मेशरदिचांतरा।।
निर्वातमायुषेसेव्यमारोग्यायचसर्वदा ॥ ६९ ॥
गरमियोंमें और शरदऋतुमें इच्छापूर्वक खब हवा खावे । बाकीकी ऋतुओं
आरोग्यताके वास्ते हवा ( वायु ) से बचना चाहिये ॥ ६९ ॥
दिवास्वापनकुर्वीतयतोऽसौस्यात्कफावहः ।।
ग्रीष्मवज्येषुकालेषुदिवास्वापोनिषिध्यते ॥ ७० ॥
व्यायामप्रमदाववाहनरतानकांतानतीसारिणः
शुलश्वासवतस्तृषापरिगताहिकामरुत्पीडितान् ।।
क्षीणाक्षीणकफाशिशून्मदहतान्वृद्धान्साजीणिना
रात्रौजागरितान्नराननिरशनानकामंदिवास्वापयेत् ॥ ७१
दिनमें सोना कफको पैदा करताहै इसवास्ते दिनमें न सोना चाहिये,
ग्रीष्मस्तुमें(गरमियोंमें)दिनमें सोनेका डर नहीं,इसवास्ते गरमियोंमें इच्छापूर्व
सोवे ।। ७० ॥ सोनेयोग्य प्राणी दंड कसरत करके श्रमहुवाहो तो या वीम
करके अथवा रास्ता चलकर हारगयाहो, ग्लानि अतिसाररोगी शूल श्या
प्यास हिचकी बादीसे पीडित क्षीण तथा का जिनका क्षीण होगया।
बालक नसेवाला वृद्ध रसाजीणी और जो रात्रिको जागेहो जिनने कु
भोजन न कराहो ऐसे प्राणियोंको दिनमेंभी यथेष्ट सोना चाहिये ॥ ७१
शयनंचासनंचातिनभजेन्नद्रवाधिकम् ।।
नाग्न्न्यातपौनप्लवनंनयानंनापिवाहनम् ॥ ७२ ॥
व्यायामंचव्यवायंचधावनंयानमेवच ॥
युद्धगीतंचपाठंचमूहूर्तभुक्तवाँस्त्यजेत् ॥७३॥
(२२) शुभसन्ततियोगप्रवाया।
नोजनामापलेवाविमथुनाभविकृतिः ।।
निद्रायानिःस्वतापाठयदायुहानिर्गतमयम् ।। ७९ ।।
भोजन मैथुन निद्रा ( सोना ) पढना मार्गचलना पाँचकामोंका माध-
काल में मनुष्य त्यान दे ॥ ७८॥ भोजन करनेसे बीमारी होती है, मैचन
करनेखे विकत गर्भ होता है, सोनेने दरिद्रता पढने आधुकी हानि मार्ग
चलनेसे भय हो ॥ ७९ ॥
सदाचारस्त्वल्पतयाकिंचित्किंचिल्लिपीकृतः ।।
स्त्रीचयालेखयिष्यामिम्बांप्रतिज्ञांचपालयन् ।। ८० ।।
सदाचाल तो सूक्ष्म रीतिसे कुछ कुछ इस अध्यायमें प्रसंगवश लिदिया
है । अब स्त्रीचर्या चकारसे गर्भविघातक हेतुओंको और उनकी चिकित्सा
को, ग्रन्थारम्भमें जो प्रतिज्ञा की थी उसकी पालना करता हुआ
लिखता हूँ ॥ ८॥
इति श्रीशुभसन्ततियोगप्रकाशे प्रथमखण्डे द्वितीय श्यामः ।
अथातोयोग्यायोग्यप्रदर्शनीयाऽध्यायंव्याख्यास्यामः । १॥
अब योग्य वा अयोग्य दिखाने वाले अन्यायको वर्णन करते हैं ॥ १
अजीर्णभोजनंयच्चयच्चजीर्णेनभुज्यते ।
रात्रौनभुज्यतेयचतेनजीर्यन्तिमानवाः ॥२॥
अजीर्णमें भोजन करना और जीर्णमें अर्थात् भूख लगीमें भोजन न कर
नेसे और जो रात्रिमें भोजन नहीं करते इससे पाणी शीव बुड्ढे होते हैं ॥२॥
वर्षशतंखल्वायुष-प्रमाणमस्मिन्काले तस्यनिमित्तंप्रकृतिगुणा-
त्मसम्यक्सात्म्योपसेवनंचेति ॥३॥
इसकालमें आयुका प्रमाण सौ १०० वर्षकाहै, इसके तीन निमित्तहैं। यथा
मातापिताके शुक्र और रजका उत्तम होना आत्मकत कर्मोंका श्रेष्ठ होना
और सात्म्यपदार्थोंका सेवन करना ॥ ३ ॥
भाषाटीकासमेत-अ० ३. (२३) Rang तत्तुजिनियबालमध्यंवृद्धमिति । तत्रोपोडशवालालमति त्रिविधा-क्षीरपाःक्षीराबाना अन्नादाइति । तेषुसंवत्लपरावी- रपाःहिसंवत्सरपराशीरानादापरतोनादाइति ॥४॥ वह आयु तीन प्रकार की होती है। बाल अवस्था मध्य अवस्था वृद्ध अवस्था। इनमें सोलह वर्षसे नीचे बाल अवस्था कहातीहै । बालभी तीन प्रकारके होतेहैं । दूधपीनेवाले दूध और अन्न दोनों का आहार करनेवाले और अन्न खानेवाले । उनमें एकवर्षकी अवस्था तक दृषपीनेवाले और दो वर्षकी अवस्थातक दूध व अन्नका आहार करने वाले, इससे उपरांत अन्न खानेवाले ॥४॥ षोडशसप्तत्योरन्तरेमध्यंक्यस्तस्यविकल्पोवृद्धियौवनसंपूर्णता- हानिरिति । तत्राविंशते द्धिरात्रिंशतोयौवनमाचत्वारिंशतः सर्वथात्विंद्वियवलवीर्यसंपूर्णता। अतउधमीपत्परिहानियांव- सप्ततिरिति ॥५॥ सोलह वर्षकी अवस्थासे लेकर सत्तर वर्षकी अवस्थातक मध्य अवस्था होती है उसके ये भेदहें । वृद्धि, युवा, संपूर्णता, हानि, लोलहसे बीस तक बुद्धि, २० ससे तीसतक युवा, ३० ससे ४० चालीस तक संपूर्णता, या स्थिति; इससे उपरान्त सत्तर वर्षकी अवस्था तक कुछ २ वटाव होताहै इसीसे इसको हानि अवस्था कहते हैं ॥ ५॥ सप्ततेरु_क्षीयमाणधात्विंद्रियबलवीर्योत्साहमहन्यहनिवलीप लितस्खालित्यजुष्टंकासश्वासप्रभृतिभिरुपद्रवैरभिभूयमानंसर्व- क्रियास्वसमर्थजीर्णागारमिवाभिवृष्टमवसीदंतंवृद्धमाचक्षते॥६॥ सत्तरवर्षकी अवस्थासे ऊपर सब धातु इन्द्रिय बलवीर्य उत्साह दिनदिन क्षीणही होताजाताहै । शरीरकी त्वचामें वलवट पडजातेहैं, सब बाल सफेद होजातेहैं और उडभी जातेहैं। खाँसी, श्वास, आदिके उपद्रवोंसे पीडित हो सबकार्यों में असमर्थ होजाताहै । जैसे पुराना जीर्णघर मेववर्षनेसे गिर पडताहै ऐसे जीर्ण अवस्था वालेको वृद्ध कहतेहैं ॥ ६ (२४) शुभसन्ततियोगप्रकाश। केचित्तुपोडशादारभ्यपंचविंशतिपर्यंतंवृद्धिरिति ।। धात्विन्द्रियबलवीर्योत्साहादिवर्द्धनादृद्धिः ॥ ७ ॥ कोई आचार्य कहतेहैं सोलह वर्षसे २५ तक वृद्धिहै । धातु इन्द्रिय कल वीर्य उत्साह आदि बढनेसे वृद्ध अवस्था कही जातीहै ।। ७ ॥ पञ्चविंशतिपर्यन्तंब्रह्मचर्यसमाचरेत ॥ धैर्यवान्गुणसंपन्नःशतायुस्तुभविष्यति ॥ ८ ॥ पचीस वर्षतक ब्रह्मचर्यका पालन करे ( अदच्यावस्थायां विद्याध्ययन माचरेत् ) इस ब्रह्मचर्य अवस्थामें विद्याध्ययन करे । एचीम वर्ष ब्रह्मचर्द रख- नेसे धैर्यवान् सब गुणोंमें संपन्न तेजस्वी सौवर्षकी उमर वाला होताहै ।। ८ ।। ब्रह्मचर्यफलचति । अपयद्यशइत्याचक्षनेत्रह्मचर्यमेतत् ।। ब्रह्मचर्यण वयोनजानविंदते ॥ ९ ॥ अथयदिष्टमित्याचक्षतेवनचर्यमेवतत् ।। ब्रह्मचर्येणवेष्टात्मानमनुविन्दते ॥ १० ॥ जिसको यज्ञ कहतेहैं बह ब्रह्मचर्यहीहै । क्योंकि, परम पुरुषाथका सावन यज्ञहै, तैसेही ब्रह्मचर्यभी परमपुरुषार्थका साधनहै । तात्पर्य यहहै कि, यज्ञसे होनेवाला फल ब्रह्मचर्य पालनले प्राप्त होसक्ताहै। यज्ञ करनेसे धीरे २ चित्त शुद्ध होनेसे ज्ञान पाकर ब्रह्मलोक पाताहै । तैसेही ब्रह्मचर्य साधनसे ज्ञान पाकर ब्रह्मलोक पाताहै ॥९॥ जिसको इष्ट कहते हैं वह ब्रह्मचर्यही है। जैसे इष्टसाधक परमेश्वरकी सेवा आदिसे अपनी सब कामनाओंको परमे परायण करके उसको पाजाते हैं वैसेही ब्रह्मचर्य साधनसे ब्रह्मचारी अपनी कामनाओंको परमेश्वरपरायण कर परमात्माको पाजाता है ॥ १० ॥ तयएतंब्रह्मलोकंब्रह्मचर्येणानुविन्दन्तितेषामेवैषब्रह्मलोकस्ते- षांसर्वेषुलोकेषुकामचारोभवति ॥११॥ सामवेदके छान्दोग्य उपनिषदमें ब्रह्मलोकका वर्णन करके कहा है । वह- पहले कहा हुआ ब्रह्मलोक ब्रह्मचर्यसे मिलता है। ब्रह्मचर्य साधन करनेवाला "
surya
नापाकासमेत-२०३.
ममज्ञानी होकर ब्रह्मलोकको पाता है । बल्कि अपनी इच्छानुसार सद
लोकों में फिर सत्ता है। जैसे नारदजी स्वेच्छाचारी प्रसिद्ध हैं ।॥ १३ ॥
ब्रह्मचर्यका लक्षण ।
स्मरणकीर्तनकलि प्रेक्षणंगुह्यभाषणम् ॥
संकल्पोध्यवसायश्चक्रियानिवृतिरेवच ॥ १२ ॥
एतन्मैथुनमष्टांगप्रवदंतिमनीषिणः ॥
विपरीतंब्रह्मचर्यमेतदेवाटलझणम् ॥ १३॥
ब्रह्मचारी के लिये शास्त्रों में सबसे अधिक मैथुनका निषेध है। वह मैथुन ८
प्रकारका है-मरण, श्रीका कीर्तन, छीके मिलापको देखना, वियोंकी ओर
देखना, श्रीके साथ एकान्तमें गुप्त बातचीत करना, मनमें स्त्री विषयका संकल्प
करना, स्त्रीका ध्यान करना, और खीसंग करना, यह विद्वानोंने आठ प्रकारका
पैथुन कहा है । इस ८ प्रकारके मैथुनसे बचनाही ब्रह्मचारीका सबसे बडकर
धर्म है ।। १२॥ १३ ॥
ब्रह्मचर्यप्रभावेणपुराशांतनवाइयः ।।
विद्यावलंसमासावकार्यचकुश्मानुपम् ।। १४ ॥
ब्रह्मचर्यविहीनावविद्याबलविवर्जिताः ॥
वैर्यतेजोविरहिताःकुलांगाराथुनावयम् ॥ १९॥
यतोवृद्धवस्थायांमथुनेनारंगताः ।।
अतोल्पायुगंतोत्साहाःरोगग्रस्तकलेक्सः ॥ १६ ॥
ले ब्रह्मचर्य के प्रभावसे विद्या व बलको भान होकर भीष्मादि बडे बडे
देवताओंकी सदृश काम करके इस देशको कीर्तिको बढागये ॥१४॥
सी ब्रह्मचर्यके बिना विद्याबलसे हीन धैर्य और तेजसे रहित अपने
लके कलंक हमलोग होरहे हैं ॥ १५॥ सोलहवर्षसे २५ तक या
जो वृद्धयवस्था कही है इसमें यदि मैथुन आदिसे ब्रह्मचर्य नष्ट होजाय
हे अवस्थामें बढनेबाली धातु आदि क्षीण होजाती हैं । इसी सबबसे
ही उमर वाले व उत्साह रहित नित्य रोगोंसे पीडित होतेहैं ॥१६॥
(२६) नुभव बदियो मनमश: उक्तंचयपतविमाखलायंगाधामनिमो- उनपाउशवपायामबाप्त पचविशतिम् ।। यद्याधघुमानगमकक्षिस्थासविपद्यात् ।। १७ जातोवानचिरंजीवनीवेतार्बलेन्द्रियः ।। तस्मादत्यंतबालायाभीवानकारयेत् ॥ १८॥ भगवान धन्वन्तरीजीने शुश्रुतसे गर्भाधान विषयमें ऐसा कहा है-सोलह वर्षकी अवस्थासे छोटी बीके पचीस वर्षको अवस्थासे छोटा पुरुष यदि गर्भाधान करे तो वह गर्भ कुक्षिहीमें विकारको पानहो खंडित होजाता है। यदि पूरा होकर बालक जन्मभी लेवे तो अल्पायु ( थोडी उपरका ) होवे, अर्थात् बटुत दिन न जीये। यदि जोवेभी तो दुर्वल इन्द्रियों वाला कमजोर रोगग्रस्त होय । इस कारण अति छोटो अवस्थामें गर्भाधान न करे ॥ ३८॥ सर्वथादुःखनाशायब्रह्मचर्यसमाचरेत् ॥ ब्रह्मचर्यविहीनानांदुःखालिस्युःपदेपदे ॥ १९ ॥ सर्वथा सब दुःखोंके नाश करनेको ब्रह्मचर्य साधन करना चाहिये । यदि उसी ब्रह्मचर्य से रहित हो तो फिर वारंवार दुःखही भोगने पड़ते हैं (क्योंकि ब्रह्मचर्य विहीन पुरुष इस लोक व परलोकके सब कामोंमें असमर्थ होताहै)१९॥ ब्रह्मचर्यसमाप्याथगृहधर्मसमाचरेत् ॥ ऋणत्रयविमुक्तयथधर्मेणोत्पादयेत्यजाम् ॥२०॥ ब्रह्मचर्य अवस्था पूर्ण होनेके अनंतर यौवन अवस्था गृहस्थ ध पालन करे । ऋणत्रय-देवऋण, ऋषिऋण, व पितृऋण इन तीनों का छूटनेके लिये धर्मसे संतान पैदाकरे ॥ २० ॥ मैथुनयोग्यपुरुष। स्नातश्चंदनलिप्तांगःसुगंधसुमनोऽन्वितः॥ भुक्तवृष्यःसुवसनःसुवेषसमलंकृतः॥२१॥ तांबूलवदनःपत्न्यामनुरक्तोधिकस्मरः ।। पुत्रार्थीपुरुषोनारीमुपेयाच्छयनेशुभे ॥२२॥ रनेवाला व है । वह (२८) शुभमन्नतियोगप्रकारा। रूपवती, गुणयुक्त, अपनी प्रकृतिके अनुसार बनाय बाली, अच्छे कुलमें प्रगट हुई, अत्यंत कॉमपीडित, पुरुषमे कामकी इच्छाराली प्रसन्नताले प्रसन्नचित्तवाली, वस्त्रभूषणों से सजीहुई ऐसी स्त्रीको बाीकरण पदार्थोसे बढा हुवा पुरुष सेवन करे ॥ २६ ॥ MP त्याज्यसमय। उपेयात्पुरुषोनारीसंध्ययोर्नचपर्वम् ।। गोसर्गेचाधरात्रेचतथामध्यदिनपिच ।। २७॥ दोनों संध्या सबेरे द मायंकाल, पर्व ( अमावस्या एकादशी आदि ) जब गौवों के छोडनेकी पहल हो और अर्धरात्रिमें और मध्याह के समय स्त्रीसंग न करे ॥ २७ ॥ देशेगुरुजनासन्नेविवृतेऽतित्रपाकरे ।। श्रयमाणेव्यथाहेतुवचनेनरमेतना ॥ २८ ॥ जहाँ माता पिता आदि गुरुजन समीपहो जो खुला स्थानहो अति लज्जा व्यथा करने वाली वाणी सुननेमें आये उसजगे कदाचित् त्रीसंग न करे २८ त्याज्यस्त्री। रजस्वलामकामांचमलिनामप्रियांतथा ।। वर्णवृद्धांवयोवृद्धांतथाव्याधिप्रपीडिताम् ।। २९ ॥ हीनांगोंगर्भिणीद्वेष्यांयोनिरोगसमन्विताम् । सगोत्रांगुरुपनींचतथाप्रवजितामपि ।। नाभिगच्छेत्पुमानारीभूरिवैगुण्यशंकया ॥३०॥ रजस्वला काम न चाहनेवाली, मैली जो प्यारी न हो अपने वर्णसे ऊर र्णकी, अवस्थामें बडी, गरमीआदि योनिरोगले पीडित अपने कुटुंब गुरु कीस्त्री संन्यासिन बैरागन ऐसी स्त्रियोंमें अनेक दोषोंके भयसे गर न करे ॥ २९ ॥ ३० ॥ १-रक्तजाःकृमयःसूक्ष्मामृदुमध्योग्रशक्तयः । स्मरसद्मसुकंडूर्तिजनयन्तियथावलम् । maa (३४) शुभसन्ततियोगप्रकाश। कामस्थानके मुख में वियोंके तीन नाडी होनी । मभीमा, २ चांदमयी, ३ गौरी, इनका विशेष वर्णन इस तरहे । मदनातपत्र में प्रधानमन जो नमीग्णा नामक विशेषनाडीहै उसके मखमें वीर्य गिग्नेगे निष्फल जाना है। और टमरी जो प्रधानभूत चांद्रमुखी नाडी कामस्थानमेंहै उसके मुग्नमें वीर्य गिग्नेसे वह स्त्री कन्या प्रगट करे और वह रतोत्सव थोडेहीमें माध्यहै । तथा जो गभर्म उपस्थ प्रधानभूत गौरी नामक नाडीहै उसमें वीर्य गिग्नेमे पुत्रही प्रगट को यह कष्टोपभोग्यहै ॥ ५६-५९ ॥ गर्भाशयका स्वरूप। शंखनाभ्याकृतियोनिस्यावासाप्रकीर्तिता ।। तस्यातृतीयेत्वावर्तगर्भशय्याप्रतिष्टिता ॥ ६ ॥ यथारोहितमत्स्यस्यमुखंभवतिरूपतः ॥ तत्संस्थानात्तथारूपांगर्भशय्यांविदुर्बुधाः ॥६१॥ शंखकी नाभिके आकारकी स्वीकी योनि तीनवली वाली होतीहै उमकी तीसरी वलीमें गर्भशय्या होती है। जैसा रोहूमछलीका मुख होताहै उसके सदृश बाहरसे छोटा व भीतरसे बडा ऐसेही गर्भशय्या का मुखहोताहै और जैसे रोहू मछली जलमें रहतीहै ऐसेही गर्भाशयभी प्रक्वाशय व पिनाशयके बीचमें है ॥ ६० ॥ ६१ ॥ गर्भावतरणक्रम । सौम्यंशुकमार्तवमानेयमितरेषामप्यत्रभूतानांसानिध्यमस्त्यणुना विशेषेणपरस्परोपकारात्परस्परानुग्रहात्परस्परानुप्रवेशाच ॥६२॥ तत्रत्रीपुंसयोःसंयोगतेजःशरीराद्वायुरुदीरयतिततस्तेजोनिलस निपाताच्छुकंच्युतंयोनिमभिप्रतिपयतेसंसृज्यतेचातवेनततोग्नि- सोमसंयोगात्सृज्यमानोग गर्भाशयमनुप्रतिपद्यते ॥६३॥ गर्भोत्पत्तिमें वीर्य सोमात्मक व आर्तव अग्यात्मकहै (अग्निसोमात्मकंज गत) और इनके सिवाय पृथ्वी,वायु, और आकाश इनकामी थोडाबहुत करके सम्बन्धहै । क्योंकि सब आपसमें उपकारक होनेसे और एक दूसरेका अनु- व . शुभसन्ततियोगलाश। सीसा) के संयोगसे आंग्रे प्रगट होती है ससेही शुऋगोगिय के सम्बन्धसे प्रगट होता है. ॥ सो अनादि अनन्त अव्यक्त जीव (आत्म जगतमें बलवती भावी करके अविधाको स्वीकार कर कर्मवश गर्नमें प्र करता है । यही जीव जिलाके स्वादको जानता है, यही देखनेवाला सूबनेवाला है, स्पर्श करता है सुनता है कहता है, करनेवाला है, गर करता है, रमण करता है और त्यागता है ॥ ६६-६०. ॥ दिनेव्यतीतनियतंसंकुचयंबुजंयथा ॥ ऋताव्यतीतेनायर्यास्तुयोनिःसंनियतेतथा॥ ७० ॥ जिसतरे दिन बीत जानेपर कमल शंकचित यानी बन्द होता है मेह ऋतुके दिन रजो दर्शनसे सोलह दिन बीतनेपर गर्भाशयका मुख बन्द हं जाता है ॥ ७० ॥ बीजेतवायुनाभिन्नदौजीवौकुक्षिमागतौ ।। यमावित्यभिधीयतेधर्मेतरपुरःसरौ ॥ ७१ ॥ आधिक्यरेतसःपुत्र-कन्यास्यादातवेऽधिके । नपुंसकंतयो साम्येयथेच्छापारमेश्वरी ।। ७२ ॥ यदि गर्भाशयका वायु (हवा) गर्भाशयमें प्रवेश होतेही वीर्यके दो टु (खंड ) करदेवे तो दो बालक एकही गर्भ में होजाते हैं ( या जितनेभाग के पवन करे उतने बालक होतेहैं। क्योंकि कहीं ४ भी देखनेमें आयें येह सब धर्माधर्मसे होतेहैं। गर्भाधान के समय वीर्य अधिक होनेसे पुत्र ची आर्तव अधिक होनेसे कन्या और दोनोंके रजवीर्य बरावर होनेसे - होताहै आगे ईश्वरकी इच्छाके आधीनहै ॥ ७१ ॥ ७२॥ आहाराधीन गर्भका स्वभाव । आहाराचारचेष्टाभिःयादृशीभिःसमन्वितौ ।। स्त्रीपुंसौसमुपेयातांतयोःपुत्रोपितादृशः ॥ ७३॥ स्त्री और आहार और आचरण व चेष्टा करके मैथुन क हैं उनकी सन्तान भी उसी चेष्टा व आचरणकी होती है ।। ७३ ॥ पुरुष जैसे
(३८) शुभसन्ततियोगप्रकाश!
दक्षिणोरुःसुपुष्टःस्यात्प्रसन्नमुखवर्णतः ॥ ७९ ॥
पुन्नामधेयद्रव्येषुस्वप्नेष्वपिमनोरथः ।।
आम्रादिफलमाप्नोतिस्वप्नघुकमलादिच ॥ ८० ॥
जिस स्वीके गर्भ में पुत्र होता है उसके दूसरे महीनेमें गर्भाशयमें गर्भगोल
पिंडसा प्रतीत होने लगताहै और उसस्त्रीकी दहनी आँख कुछ बडी मालूम
होतीहै और प्रथम दहने स्तनमेंही दुध आताहै । दहनी जाँव पुष्टहोतीहै मुख
प्रसन्न रहताहै । जो पुरुषनाम वाली वस्तुहै उनकी इच्छाहो और स्वम भी
पुरुषवाचक वस्तु मिलै ऐसी इच्छाहो तथा आम नीम्बू आदि फल कमल आदि
फूलोंको ग्रहण करे ॥ ७८ ॥ ७९ ॥ ८० ॥
गर्भमें कन्याके लक्षण।
कन्यागर्भवतीगर्भपेशीमासिद्वितीयके ॥
पुत्रगर्भस्यलिंगानिविपरीतानिचेक्षते ॥ ८१ ॥
जिसवीके गर्भ में कन्याहो उसको दूसरे महीने में गर्भ में मांसका लंबा लोथ-
डासा प्रतीतहो और उस स्त्रीको रुचि वीसंज्ञक वस्तुयोंपरहो पुत्रके लक्षणोंसे
विपरीत कन्यावाले गर्भके लक्षण जानने ॥ ७९ ॥
नपुंसकगर्भके लक्षण
नपुंसकंयदागर्भभवेद बुंदाकृतिः ॥
उन्नतेभक्त पार्श्वपुरस्तादुदरमहत् ॥ ८२ ॥
जिस स्त्रीके गर्भमें नपुंसकगर्भहो उसके पेटमें अर्बुदाकार मांसपिंड पर
तहो । उस मांसापिंडके दोनों पार्श्व कुछ ऊंचे प्रतीतहों और स्त्रीका पेट आगे
बडा दीखे ॥ ८२॥
नपुंसकोंके भेद।
आसेक्यश्चसुगंधीचकुंभिकश्चयॆकस्तथा।।
अमीसशुक्राबोव्याअशुक्र-पंडसंज्ञकः॥ ८३ ।।
आसेक्य, सुगंधी, कुंभीक, ईर्ण्यक, ये शुक्र ( वीर्य ) युक्त होतेहैं और
पण्ड नपुंसक बिना शुक्रके होताहै ॥ ८३ ॥
शुभसन्ततियोगप्रकाश।
अनस्थिवालक!
यदानाविषयातांपत्तोकथंचन ।।
मुंचंत्यौशुक्रमन्योन्यमनस्थितत्रजायते ॥ १० ॥
यदि काम वश श्री श्री आपसमें गैथुन करें. उस समय अन्योन्य वीरें
छोडे तो गर्भ रहकर बिना हड्डीनाला पालको ।। ९० ॥
विनापुरुषगर्भ।
ऋतुस्नातातुयानारीस्वप्नेमैथुनमाचरेत् ॥
आर्तवायुरादायकुक्षौगर्भकरोतिहि ॥ ९१ ॥
मासिमासिप्रवर्धेतसगर्मागर्मलक्षणः ।।
कललंजायतेतस्यावर्जितपत्रिकर्गुणैः ॥ ९२ ॥
ऋतुस्नाता स्त्री यदि स्वप्नमें मैथुन करे तो वायु आर्तवकोही लेकर
कुक्षीमें गर्भको करदेती है, यह महीने महीने गर्भके लक्षणोंसे बढता है। जब
वह प्रगट हो तो कीचडसाहो पिताके डाढी मोछ नख दांत स्नाय आदिसे
रहित हो ॥ ९१ ॥ ९२॥
विकृतगर्भ।
सर्पवृश्चिककूष्माण्डाकृतयोविकृताश्चये ॥
गर्भास्तपोषितास्ताश्चज्ञेया पापकृतोभृशम् ॥१३॥
गर्भावातप्रकोपेनदोहदेचावमानिते ॥
भवेत्कुब्जकुणीपंगुकोमिन्मिनएवच !! ९४ ॥
सांप बिच्छू कुष्माण्ड इनकीसी आकृति बाले और विकत छांगा दौन
दोसिरा विना सिर जुडेहुए दो इत्यादि पैदा होते हैं, ये सब माताके पापसेह
होते हैं । गर्भवतीके कुपथ्यसे या दोहदके समय कुपथ्यसे बालक कबडा,
टोटा,पिंगला, बहरा, हकला, गंगा, गुनगुना ऐसे बालक होतेहैं।॥१३॥१४॥
इति श्रीशुभसंततियोगप्रकाशे प्रथमखण्डे योग्यायोग्यप्रदर्शनीयो नाम तृतीयोध्यायः ॥ ३ ॥
(४२) शुभसन्ततियोगप्रकाश। (प्रायः इसीसे अनेकानेक भारत संतान दुःखितहैं हम इसका विशेप वर्णन आगे करेंगे । शुकायेमेवृषणवेदनाऽशक्तिमथुनेचिरादा प्रसेकाप्रसेकेचाल्परक्तशुक्रदर्शनंच ॥६॥ शुक्र क्षीण होनेसे लिंग और वृषणोंमें वेदना स्त्रीगमन की शक्ति न होना कभी देरसे वीर्यपाव होना पात होने में कुछ रकता लिये होना और थोडा होना ॥६॥ साध्यासाध्यत्वा तेषुकुणपग्रंथिपूतिपूयक्षीणरेतसःकृच्छ्रसाध्याः॥ मूत्रपुरीषरेतसस्त्वसाध्या शेषाःसाध्याइति ॥७॥ इनमें मुर्दका गन्धवाला और ग्रन्थियुक्त दुर्गन्ध और रावसदृश और क्षीणवीर्य कष्टसाध्यहैं। मत्र और पुरीपयुक्त असाध्यहैं और बाकी सब साध्यहैं ॥ ७ ॥ आर्त्तवका वर्णन। आर्तवमपित्रिभिदोषःशोणितचतुर्थं पृथक्वंद्वैःसमस्तैश्चोपसृष्टम- बीजभवतितदपिदोपवर्णवेदनाभिर्विज्ञेयंतेषुकुणपग्रन्थीपूतिपूय- क्षीणमूत्रपुरीषप्रकाशमसाध्यंसाध्यमन्यत् ॥ ८॥ पुरुषके शुक्रकीसदृश स्त्रीका आर्तवमी वायु, पित्त, कफ, इन तीनोंसे चौथे रुधिरसे दूषित होताहै और अलग २ दोदो दोषोंसे या सन्निपातसे दूषित हो तो वह आर्तवभी अबीज अर्थात संतान पैदा करने लायक नहीं होता उसकोभी पुरुषके वीर्यकी सदृश दोषोंके वर्ण वेदनासे जानना चाहिये, अर्थात जिस एक या कई दोषों का वर्ण वेदनाहो उसीसे दूषित जानना। इनमें से मुर्देकी गंधयुक्त और गांठदार दुर्गधित राध जैसा क्षीण मलमूत्र युक्त असाध्यहै इनसे इलावा साध्य जानना ॥ ८॥ शुक्रशोणितकी शुद्धि। तेष्वाद्यानशुक्रदोषांबीनस्नेहस्वेदादिभिर्जयेत् ॥ क्रियाविशेषमतिमांस्तथाचोत्तरबस्तिभिः॥९॥ L (४४) शुभसन्ततियोगकाशा विष्ठाकोसी गन्धहो तो चिनक खस हींगसे सिद्ध पी पिलावे ।। शक क्षीण का उपाय वाजीकरणाध्यायों कहेंगे ॥ १२ ॥ स्निग्धंवातविरिवनिरुद्धमनुनासितम् ।। योजयेशुक्रदोपातसम्यागुत्तरवास्तिना।। 350 शुक्रदोष वाले अनुष्यको पहले यथोचित स्नेहपान करावे या वमन कराके या विरेचन कराके या निरूहण और अनुवासन बस्ति कर्म करके या अच्छी रीतिसे उत्तर बस्ति करके फिर औषय सेवन करावे ॥ १३ ॥ आर्तवशुद्धि। विधियुत्तरबस्त्यलंकुर्यादातंत्रशुद्धये ॥ स्त्रीणांस्नेहादियुक्तानांचतसृष्वार्तवार्दिछु ।। १४॥ कुर्यात्कल्कानपिचूंश्चापिपथ्यान्याचमनानिच ॥ ग्रंथिभूतेपिबेत्पान्यपणवृक्षकानिच ।। १५ ।। दुर्गधेपूयसंकाशेमजतुल्येतथातवे ।। पिवेद्भद्रश्रिय कार्थचन्दनक्वाथमेवच ॥ १६॥ शुक्रदोषहराणांचयथास्वमवचारणम् ॥ दोषाणांशुद्धिकरणशेषास्वप्यार्तवादिषु ॥ १७ ॥ स्त्रियोंके वातज, पित्तज, कफज, रहन्ज इन चारों प्रकारके आर्तव दोषों स्नेहपान, वमन, विरेचन, निरूण, उत्तर पस्ति पर्यंत क्रिया करे। फिर आर्तत शुद्धिके लिये यथोचित कल्कोंका उपचार करे तथा दोषोंके अनुसार कपः या रुईकी बत्ती बनाकर औषधियोंमें भिगोकर रक्खे,या उचित व्योंके क्वाथसे पिचकारी करे या वैसेही योनिको धोये और यथायोग्य पथ्य करे जो आतः में गांठे हों तो पाठा, सोंठ, मिर्च, पीपल, कूडा, इनका काथ पीवे जो रज दुर्गंधितहो या रांध सदृशहो या मज्जा जैसाहो श्रीचंदन और सुफेद चन्दनका काथ पीवे ऊपर लिखे दोषोंके सिवाय जो और दोषहो तो वीर्यके दोषहरणार्थ जो क्रिया कही है उसीसे आर्तवको शुद्ध करे ॥ १४-१७ ॥ "
प्रदर।
भावाटीसमेद--अ०४. (४५)
नष्टार्तव ।
दोषरतमालादालनश्यालिकिया।
तत्रमापकुलपयालतियशुरुदधीनिय ।। १८ ॥
वालादि दोषोंने जब रजोधर्मका मार्ग रुक जाता है तालियों का मालिक
धर्म बन्द होजाता है। यदि आर्तव नष्ट होण्याहो तो उडद, कुलथी, खट्टे
पदार्थ, तिल, सिरका, दधी आदि सेवन करे ॥ १८ ॥
मूलंगवाक्ष्यास्मरमंदिरस्वंपुष्पावशेषल्यांकरोति ।।
इन्द्रायणकी जडो रगह काडेकी बनी बना कामागारमें रखनेले आर्तन
जारी होजाता है।
तदेवातिप्रसंगेनप्रवृत्तमनृतावपि ।
अमृग्दविजानीयादतोन्यद्रतलागात् ।।
अमृन्दरोभवेत्सर्वःसांगमर्दसवेदनः ।। १९ ॥
वह आर्तव अधिक प्रवृत्तहो, मासिक समय पर अन्यथा प्रवृत्तहो आर्त-
बसे विपरीत वर्णवालाहो उसको रक्तपदर' कहते. संपूर्ण प्रदरोंमें अंगोंका
झूटना और वेदना होतीहै ॥ १९ ॥
निदान ।
विरुद्धमद्याध्यशप्रोततीर्णाद्र्भप्रपातादतिमैथुनाच ।।
यानाध्वशोकादतिकरणाचमारानिधाताच्छयनादिवाच ।।
तश्लेष्मपित्तानलसन्निपात चतुःप्रकारप्रवदंतिवृद्धाः ॥२०॥
है : विरुद्ध भोजनसे, मद्य पीनेसे, अजीर्णसे, गर्भपातसे, अतिमैथुन, अति
गमन, अतिशोक, अतिउपवास, अतिभार उठानेसे, लकडी आदिके लगनेसे,
दिनमें सोनेसे इन कारणोंसे कफ पित्त वायु सन्निपातसे चार प्रकारके वृद्ध-
वैद्योंने प्रदर कहेहैं ॥ २० ॥
उसके उपद्रव ।
तस्यातिवत्तौदौर्बल्यंश्रमोमूमिदस्तृषा ॥
दाह प्रलापःपांडुत्वंतंद्रारोगाश्च वातजाः ॥२१॥
(४६) शुभसन्ततियोगप्रकाश। अदरकी अति प्रवृत्तिसे दुर्बलता, श्रम, मूर्छा, मस्ती, प्यान, दाह, वकवाद, पांडुपना, तंद्रा और वाचुके रोग होतेहैं ॥ २१ ॥ दाव्यादिकाथ। दावारसांजनकिरातवृषाब्दबिल्ल सद्भक्तचन्दनदिनेशभवनसूनः ।। काथ कृतोमधुयुतविधिनानिपीतो रक्तसितंचसरुजंप्रदरंनिहन्ति ॥२२॥ दारुहलदी रसौत चिरायता अडूसा नागरमोथा बिल्बकी गिरी लालचंदन नीलोफर इनका काथ महत डालकर पीनेसे लाल व सफेद पीडायुक्त प्रदर दूर होतेहैं ॥ २२॥ शुद्धार्तवलक्षण। मासान्निःपिच्छदामातिःपंचरावानुबंधिच ।। नैवातिबहुनात्यल्पमातवंशुद्धमादिशेत् ॥ २३ ॥ शशासप्रतिमंयत्तुयद्रालाक्षारसोपमम् ॥ तदातवंप्रशंसंलियासोनविरंजयेत् ॥ २४॥ जो स्त्री ठीक महीने महीने रजवती होय तथा रुधिर साफहो और उसमें चिकनावट दाह और शूल न होतेहों पंचरात्रिपर्यंत नदेषुक न थोडा गिरे उसके शुद्ध आर्तव कहतेहैं।॥२३॥जो खरगोशके रुधिर सारों हो,अथवा लाखके रसवे समानहो, जिसमें रंगावस्त्र धोनेसे साफ होजाय इथवा जिसमें रंगावस्त्र पील काला नहो लालहीहो वह शुद्ध आर्तव प्रशंसा योग्य गर्भधारण करताहै।।२ २४॥ शुद्धशुक्रके लक्षण। स्फटिकाभंद्रवंस्निग्धंमधुरंमधुगंधिच ॥ शुक्रमिच्छंतिकचित्तुतैलझौद्रनिभंतथा ॥ २५ ॥ जो वीर्य सुफेदहो, पतला, चिकना, मीठाहो, तथा मधुकीसी गंध युक्तह तो शुद्ध शुक्र जानना तथा कई आचार्य तैल अथवा सहतके समान वीर्य शुद्ध होता है ऐसा मानतेहैं ॥ २५ ॥ इति श्रीशुभसंततियोगप्रकाशे प्र० ख० शुक्राबिविवेचनीयो नामताध्यायः॥ ४ ॥ प्रभ
भाषाटीकासमेत-अ० ५. (४७)
अथपुंस्त्वविवेचनीयाध्यायंव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥
अब हम पुंसत्व विवेचनीय अध्यायका व्याख्यान कहते हैं ॥ १ ॥
देहेस्मिँच्छुद्धशुक्रोहिओजस्तेज प्रकीर्तितः ॥
तस्यायेमहदुःखसुंजन्तिमानवाभृशम् ॥२॥
नपुंसकत्वंसंप्राप्यदुराचारप्रभावतः ॥
अकामाः पत्निसंयोगेसंततिस्तुकुतःपुनः ॥३॥
एकाकिनश्चितयन्तोनलभन्तेप्रतिक्रियान् ।।
तेषांपापोपशमनीमदीयासंहितात्वियम् ॥ ४॥
इस देहमें शुद्धवीर्य ही ओज और तेजकहा जाताहै । वीर्यके क्षीण
होनेसे मनुष्य निश्चयही महान् दुःखको भोगतेहैं ॥ २ ॥ अपने दुष्ट
आचारके प्रभावसे नापीको प्राप्तहोकर अपनी स्त्रीके संयोगनेंभी अकाम
रहते हैं। फिर उनले सन्तान कब उत्पन्न होसत्ताहै ॥ ३ ॥ यह लोग
अपने कुकर्म ( अतिमैथुन अयोनिमैथुन आदि) को याद करते हुवे कुछ
यल नहीं करसक्ते इनके इस पापकर्मकी शांति के लिये यह पुस्तकहै ॥ ४ ॥
नपुंसकाधिकारः।
क्लीवास्यात्सुरताऽशक्तः तद्भाव क्लैब्यमुच्यते ।
तबसप्तविधप्रोक्तंनिदानंतस्यकथ्यते ॥५॥
जो मनुष्य खीसे मैथुन करनेमें इच्छा तो करे परन्तु इंद्रीकी कमजोरीले
न न कर सके उसको क्लैब्य कहते हैं वह सात प्रकारका है उसका निदान
हैं ॥५॥
तैस्तै वैरबैस्तुरिरंसोमनसिक्षते ॥
ध्वजः पतत्यतोनणांक्कैब्यंसमुपजायते ॥६॥
पुरुषके हृदयको अप्रिय ( जिनसे दिलको नफरत हो) ऐसे भय, शोक,
दिकोंसे चित्त दुःखित होनेसे लिंगमें शिथिलता होवे मैथुनकी इच्छा
। उसको नपुंसक कहतेहैं ॥६॥
(४८) शुभसन्ततियोगप्रकाश । मानस देण्याची संधयोगाचक्रव्यं तनाव नतम । जिस पुरुषको मैथुन करना बुरा लगे श्री रामहो भोगाननीयहै ७॥ पित्तजलीवत्व । कटुवाल लगैरतिमानोपवितैः ।। पिताजुकायोटरव्यंतस्मात्मजायते ।।८।। जो मनुष्य ज्यादे मिर्च, खटाई, और निमक, जो पिलके बहाने वाले पदार्थ हैं उनके सेवनसे पिल बडाकर वीर्यको बिगाडता है इससे वीर्यशयहो कर नगुंता होती है यह दूसरा कारण है ॥ ८ ॥ शुभयसे नपुंसकत्या अतिव्यवायशीलोयोनचाजीक्रियारतः।। ध्वज गमवायोतिला शुक्रक्षयहेतुकः जो मनुष्य अधिक मैथुन करे और वीर्यके वधाने वाली वाजीकरण औषधि न सेवन करे उसका बीर्य क्षीण होकर इंद्री शिथिल होजाती है यह तृतीयनपुंसकत्क शुक्क्षयज है ॥१॥ चतुर्थनपुं० । लिंगवृद्धिकरायोगायसेवतेप्रमादतः ।। महतामेट्योगेनचतुर्थीनीवतांबजेत् ॥ १० ॥ जो मनुष्य प्रमादसे लिंगके बवानेवाली अज्ञानवश औषधिका उपर करते हैं उससे लिंग बडा होनेके कारण शिथिलता होती है यह चौ कारण है ॥ १० ॥ पञ्चमनपुं०। पञ्चमीकीवताञयाशिराच्छेदादिकारणात् ॥११॥ पांचवीं नपुंसकता वीर्यवाही नसके कटनेसे होती है और दारुण प्रमेह होती है ॥ ११ ॥ Joorn भाषाटीकासमेत-अ० ५. छठीनपुं० बलिनःशुब्धमनसोनिरोधाद्ब्रह्मचर्यतः ॥ षष्टक्लैब्यंस्मृतंतत्तुवीर्यस्तंभानिमित्तकम् ॥ १२॥ यदि बलवान् पुरुष मैथुनके उत्साहको रोककर ब्रह्मचर्यसे रहे यह वीर्य स्तम्भनिमित्तक छठा नपुंसक है ॥ १२ ॥ सप्तमनपुं० । जन्मप्रभृतियतकैव्यंसहजतद्विसप्तमम् ॥ १३ ॥ जो मनुष्य जन्मसेही नपुंसक हो इसको: सातवां सहज नपुंसक कहते हैं ॥ १३॥ MEIN साध्यासाध्य । असाध्यंसहजकैब्यंमर्मच्छेदाच्चयद्भवेत् । साध्यानामवशिष्टानांकायोंवाजीकरोविधिः ॥१४॥ उक्त सात नपुंसकोंमेंसे सहज और जो नसके कटनेसे हो यह दो असाध्या बाकी सब साध्यहैं। इन पांचोंके लिये वाजीकरणक्रिया हितहै ॥ १४ ॥ अन्यनपुंसकताके कारण। बीजध्वजोपघाताभ्यांजरयाशुकसंक्षयात् ॥ वैकृव्यसंभवस्तस्यशृणुसामान्यलक्षणम् ॥ १५॥ वीर्य तथा लिंगमें कुछ खराबी होनेसे और बुढापेसे शुक्रके नष्ट होनेसे (सकता होतीहै उसके सामान्य लक्षण सुनो ॥ १५॥ सामान्यलक्षण। संकल्पप्रवणोनित्यंपियांवश्यामथापिवा ।। नयातिलिंगशथिल्यात्कदाचिद्यातिवायदि ॥ ६॥ श्वासातःस्विनमात्रांशोमोघसंकल्पचेष्टितः।। म्लानशिश्नश्चनिर्बीजःस्यादेतत्क्कैब्यलक्षणम् ॥ १७ ॥ नपुंसकके सामान्यतासे ये लक्षणहैं कि रमण करनेका विचारतो नित्य करे, रन्तु लिंगकी शिथिलतासे अपनी विवाहिता स्त्रीके पासभी न जासके । कदा- (५०) शुभसन्ततियोगप्रकाश। चित् जावेभी तो श्वास और देह कंधोंमें पसीना आवे और इस बिचारेका सब संकल्प चेष्टा निष्फल होवे लिंग मुझाया हुवा और वीर्यरहितहो यह सामान्य नपुंसकके लक्षणहै ॥ १६ ॥ १७ ॥ बीजोपघातके लक्षण और निदान । शीतरूझाम्लसंकिष्टविरुद्धाजीर्णभोजनात् ॥ शोकचिंताभयत्रासातवीणांचात्यर्थ सेवनात् ॥ १८॥ वातादीनामोजसश्चतथैवानशनाच्छमात् ॥ नारीणामनभिज्ञत्वातपंचकर्मापचारतः ॥ १९ ॥ बीजोपघातोभवतिपांडुवर्णःसुदुर्बलः॥ अल्पप्रजोऽपहर्षश्चप्रमदासुभवेन्नरः ॥२०॥ शीतल रूखा खट्टा कठोर विरुद्ध अजीर्णमें भोजनकरना शोक चिंता भय अत्यंत स्त्रीसेवन अभिचार (घात आदि) से अविश्वाससे रसादि धातुओंकी क्षीणतासे भोजन न करनेसे निर्जल व्रतकरनेसे अतिपरिश्रमसे स्त्रियोंपर प्यार नहोनेसे वमन विरेचनादि पंचकर्मके बिगडनेसे मनुष्योंका बीज बिगडताहै। उस मनुष्यके ये लक्षण होतेहैं । देहका पीलाहोना, दुबलाहोना, संत अल्पायु और कमहोना, त्रिय प्यारी न लगे, हृदयरोग पीलिया तमक श्व कामलारोग अल्पपरिश्रमसेभी दुःखहो यह बीजोपघातके लक्षणहैं ॥१८-२० ध्वजभंगनिदान। अत्यम्ललवणक्षारविरुद्धाजीर्णभोजनात् ।। अत्यंबुपानाद्विषमपिष्टान्नगुरुभोजनात् ॥ २१ ॥ दाधिक्षीरानूपमांससेवनादतिकर्षणात् ॥ कन्यायांचैवगमनादयोनिगमनादपि ॥२२॥ दीर्घरोंम्णीचिरोत्सृष्टांतथैवचरजस्वलाम् ।। दुर्गधांदुष्टयोनिचतथैवचपरिस्रुताम् ॥२३॥ नरस्यप्रमदामोहादतिहर्षात्प्रगच्छतः॥
अत्या
भाषाटीकासमेत-अ० ५.
(५१)
चतुष्पदाभिगमनाच्छेफसश्चाभिघाततः॥२४॥
अधोवनाद्वामेदस्य शस्त्रदंतनखक्षतात् ॥
काष्ठप्रहारनिश्शेषशकानांचातिसेवनात ॥
रेतमश्च प्रतीघाताद्धजभंगप्रवर्तते ॥२६॥
अत्यन्त खटाई अत्यन्त निमक और खार विरुद्धभोजन ( जैसे दूध
मछली) कहाअन्न विना भूख भोजन करनेसे बहुत जल पीनेसे विषम
अन्न, पिष्ट, भारी पदार्थ खानेसे दधी, दूध, अनूपसंचारिंजीवोंके मांस खानेसे
अत्यन्त कमजोरीसे १२ वर्षको उमरसे कनउमरवालीसे मैथुन कर-
नेसे अयोनि ( गुदहस्तमुखद्वारा मैथुन ) करनेसे बडे २ बालोंवाली जिसकी
योनिहो, जो देरमें स्खलितहो रजस्वला, दुर्गंधयुक्तयोनि जिसको गरमी
या सोम रोगहो, प्रदर आदिकोंसे दूषित गीली ऐसी योनिमें मैथुनसे,
मूर्खतासे मैथुन करनेसे तथा चौपाये जानवरोंसे मैथुन करनेसे लिंगमें
चोट लगनेसे लिंगको न धोनेसे :अथवा लिंगमें छूरी आदि शस्त्रके
लगनेसे लिंगमें घाव होजानेसे लकडीकी चोट लगनेसे कामशास्त्रोक्त
। प्रयोगोंके करनेसे और वीर्यके नष्ट होनेसे ध्वजभंग (लिंग सुस्त
जाना) होताहै ॥ २१-२५॥
लक्षण।
श्वयथुर्वेदनामेद्रेरोगश्चैवोपलक्ष्यते ॥
स्फोटाश्चतीबाजायतेलिंगपाकोभवत्यपि ॥२६॥
मांसवृद्धिर्भवेच्चापित्रणाःक्षिप्रभवत्यपि ।
पुलाकोदकसंकाशःस्रावःश्यावारुणप्रभः ॥२७॥
वलयीकुरुतेचापिकठिनंचपरिग्रहम् ॥
ज्वरम्तृष्णाभ्रमोमूछाछर्दिश्चास्योपजायते ॥२८॥
रक्तंकृष्णस्रवेञ्चापिनीलमाविललोहितम् ॥
अग्निनैवचदग्धस्यताबोदाहःसवेदनः ॥ २९ ॥
శాల (५२) शुभसन्ततियोगप्रकाश। बस्तौवृषणयोर्वापिसीवन्यांवक्षणेषुच ॥ कदाचित्पिच्छिलोवापिपाण्डुस्रावश्चजायते ॥३०॥ श्वयथुश्चभवेन्मंदस्तिमितोल्पपरिस्रवः ॥ चिरात्सपाकंनजतिशीघंवाथप्रपद्यते ॥३१॥ जायतेकृमयश्चापिक्लियतपूतिगन्धिच ॥ प्रशीर्यतेमाणिश्चास्यमेद्रमुष्कावथापिच ॥ ध्वजभंगकृत कब्यमित्येतत्समुदाहृतम् ॥ ३२ ॥ लिंगका सूजजाना, उसमें पीडा होना, लाल रंग होजाना, घोर फोडेहों लिंग पकना, लिंगमें मांसका वधना तत्काल घाव होना उनमेंसे काले लाल या घोवनके रंगका स्त्राव होना, तथा लिंगमें गोल चूडीसी आंटेसे कठोर जड वाले होना, वह मनुष्य इस रोगसे पीडित होनेसे ज्वर तृपा त्रम मूर्छा या वमनसे पीडित हो लिंगमेंसे लाल काला लोहित स्रावहो अनिसे जलाना दोखे, बस्ती, वृषण, सीवन, वंक्षण, इनमें दाहयुक्त दर्दहोवे । कभी इनमें गादा पीला स्रावहो, कभी इनही स्थानों में मन्दसूजन और अल्पनावहो, कभी देरमें कभी जल्दी पकजावे उसमें कोडे पडजावें सदैव गीला रहे और दु आवे और सुपारी गलके गिरजावे अथवा लिंग और फोते दोनों गिरजा यह ध्वजभंगके महा उपद्रवहैं ॥ २६-३२॥ जरासम्भवनपुंसकके कारण। जघन्यमध्यप्रवरंवयस्त्रिविधमुच्यते ॥ अथचप्रवरेशुक्रप्रायशःक्षीयतेनृणाम् ॥ ३३॥ रसादीनांसंक्षयाचतथैवावृष्यसेवनात् ॥ बलेवणेन्द्रियाणांचक्रमेणैवपरिक्षयात् ॥३४॥ परिक्षयादायुपश्चाप्यनाहाराच्छ्रमाक्रमात् ॥ जरासंभवजंक्कैब्यमित्येतैर्हेतुभिर्नृणाम् ॥ ३५ ॥ बुढापेसे हुए नपुंसकके यह लक्षण हैं-अवस्था तीन प्रकारकी है अधम मध्यम उत्तम। सो वृद्ध अवस्थामें मनुष्योंका वीर्य क्षीण होता है उसका कारण " भाषाटीकासमेत-अ० ५. (५३) यह है कि, रसादिकोंका क्षय होनेसे बिना दृष्च पदार्थोके सेवन किये मैथन करनेसे क्रमसे बल वर्ण इन्द्रियोंके क्षीण होनेले आयुष्यके क्षीण होनेसे भोजन न करनेसे परिश्रम करनेसे इन कारणोंसे बुढापेका नपुंकत्व होता है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ जायतेतेनसोत्यर्थशीगधातुःसुदुर्बलः ॥ विवर्णोविह्वलोदीनःक्षिप्रव्याधिमथाश्नुते ॥ ३६॥ बुढापेमें मनुष्य अत्यन्त क्षीण दुर्बल होजाता है, देहका वर्ण पलट जाता है, विह्वल और दीन होजावे, शीघही इसको रोग घेर लेते हैं इससे यह जरा संभव नपुंसकके लक्षण हैं ॥ ३६ ॥ क्षयजके लक्षण। अतिप्रचिंतनाचैवशोकाकोधाद्रयादपि ॥ ईष्योत्कंठ्यात्तथोडेगात्समाविंशतिकोनरः ॥ ३७॥ कृशोवासेवतेरुक्षमनपानमोषधम् ॥ दुर्बलप्रकृतिश्चैवनिराहारोभवेद्यादि ।॥ ३८ ॥ अथाल्पभोजनाचापिहृदयेयोव्यवस्थितः ॥ रसप्रधानधातुर्हिक्षीयेताशुनरस्ततः ॥३९॥ रक्तादयश्चक्षीयतेधातवस्तस्यदेहिनः । शुक्रावसानास्तेभ्योहिशुक्रधामपरंमतम् ॥ ४० ॥ चेतसोवातिहर्षेणव्यवायंसेवतेतुयः॥ शुक्रतुक्षीयतेतस्यततःप्राप्नोतिसंक्षयम् ॥ ११ ॥ घोरंव्याधिमवाप्नोतिमरणंवासमृच्छति ॥ शुक्रतस्माद्विशेषेणरक्ष्यमारोग्यमिच्छता ॥ एतनिदानलिंगाभ्यामुक्तक्कैब्यंचतुर्विधम् ।। ४२॥ । अत्यंत चिंता, शोक, क्रोध, भय, ईर्ष्या, उत्कंठा, उद्वेग, इनके अत्यंत रनेसे बीस वर्षका मनुष्यभी कृश होकर रूक्ष अन्न, पान, औषधको सेवन ,
(५४) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
करे और दुर्बल प्रकृति वाला होकर निराहार रहे, अथवा बहुत थोडा भोजन
करे। ऐसे करनेसे हृदयस्थ प्रधान धातु क्षीण होवे । जिनसे यह मनुष्य शीघ्र
क्षीण होकर रुधिरसे वीर्य पर्यंत धातु क्षीण होजावे अथवा प्रसन्न चित्तसे जो
अतिमैथुन करताहै उसका शुक्र क्षीण होजाताहै । ऐसा होनेसे मरण या घोर
व्याधिको प्राप्तहो । इसवास्ते अपने आरोग्यताकी इच्छा वालेको शुक्रकी
अवश्य रक्षा करनी चाहिये इसतरे निदान और लक्षणसे नपुंसक चार प्रका-
रके हैं ।। ३७-४२॥
साध्यासाध्यत्व।
केचिक्कैब्येत्वसाध्येद्वेध्वजभंगक्षयोद्भवे ।।
वदन्तिशेफसश्छेदादृषणोत्पाटनेनच ॥४३॥
मातापित्रोर्बीजदोषादशुभैश्चकृतात्मनः ॥
गर्भस्थस्ययदादोषाःप्राप्यरेतोवहाःशिराः ॥४४॥
शोषयन्त्याशुतन्नाशाद्रेतश्चाप्युपहन्यते ॥
तत्रसंपूर्णसर्वांगःसभवत्यपुमान्पुमान् ॥
एतत्वसाध्याव्याख्याताःसन्निपातसमुच्छ्रयात् ॥ ४५ ॥
कोई २ आचार्य ध्वजभंग और क्षयसे उत्पन्नकोभी असाध्य कहतेहै
कोई लिंगके कटने अथवा अंडकोशोंके न रहनेसे जो नपुंसकहो वह असाध
ऐसा मानतेहैं। मातापिताके वीर्यदोषसे और अपने पूर्व जन्मके पाप कर
गर्भस्थित दोषहै वह वीर्यके बहनेवाली नसोंमें प्राप्तहो नसोंको सुखादेवें
नसोंके सूखनेसे वीर्यभी नष्ट होजाताहै । फिर जो उस गर्भसे बालकहो सवा
होने परभी नपुंसक होताहै । ये सब नपुंसक तीनों दोषोंकी अधिकता होने,
असाध्यहैं ॥ ४३॥ ४४ ॥४५॥
कुकर्मजन्यनपुंसकत्व ।
समयस्मिन्प्रमादाच्चमद्यवेश्याप्रभावतः ॥
ब्रह्मचर्यविहीनत्वादयोनिमैथुनात्तथा ॥ ४६॥
DAKHIRANT । (५६) शुभसन्ततियोगप्रकाश। बाजी अर्थात् घोडोंका यहां प्रकाश नहोनेसे इसजगे वाजीशब्द मैथन संज्ञ- है जो पदार्थ भैथुनशचिको बढावे वह बाजीकरणहै इसलिये बाजीकरण शब्द पुरुषार्थहीका वाचकहै । या बाजी नाम प्रकाशक होनेसे मैथुन मंजकहै ऐसा कहना चाहिये ॥ ४॥ शुक्रसुतिकरंकिंचिकिचिच्छुकविवर्द्धनम् ।। श्रुतिवृद्धिकरंकिंचितत्रिविधवृष्यमुच्यते ॥५॥ कोई वस्तु वीर्य निकालने वाली कोई शुक्र बढानेवाली कोई बढाने और निकालने वाली इस प्रकार वृष्य ( वाजीकरण) तीन प्रकारसे कहाहै ॥ १ ॥ आवश्यकचिकित्सा। कैब्यानामिहसाध्यानांकायॊहेतुविपर्ययः ॥ मुख्यचिकित्सितंयस्मानिदानपरिवर्जनम् ॥६॥ जो साध्य नपुंसकहैं उनका हेतु (कारण सबब) विपर्यय करे अर्थात् जिनकारणोंसे नपुंसक हुवाहो उनसे उलटा कर्मकरे । क्योंकि सन रोगोंकी मख्य चिकित्सा यहहै कि जो रोगहो उसके कारणोंको त्यागदेवे और जो सान पहुँच चुका उसका प्रतीकार करे । कारणकि न छोडनेसे आत ले उलटा नुकसान होताहै ॥ ६॥ चिकित्साकीआज्ञा। नरोवाजीकरान्योगान्सम्यकशुद्धोनिरामयः ॥ सप्तत्यंतंप्रकुतिवादू तु षोडशात् ॥ ७॥ नचैवषोडशादाक्सप्तत्यापरतोनच ॥ आयुष्कामोनरस्त्रीभिःसंयोगकर्तुमर्हति ॥ ८॥ क्षयवृद्धयुपदंशायारोगाश्चातीवदुर्जयाः॥ अकालमरणंचस्याद्भजतःस्त्रियमन्यथा ॥९॥ मनुष्यको चाहिये कि पहले भलेप्रकार वमन विरेचनसे शुद्ध देहहो सोलह । १६ वर्षकी अवस्थासे ऊपर और ७० सत्तर वर्षकी अवस्था तक वाजीकरण शुभसन्ततियोगप्रकाश। रसायनप्रयोगाश्चसर्वानेतान्प्रयोजयेत् ।। समीक्ष्यदेहदोषाग्निबलमेषजकालवित ।। १५ ॥ व्यपैतिहेतुजंक्कैव्यंयत्स्यादेतुविपर्ययात् ॥ १६ ॥ नपुंसकताकी शांतिके वास्ते जो क्षीणक्षतमें हितकारी औषधि हितहो सो देवे । बस्ति कर्म करे दूध, घी तथा जो पुष्टिकारक पदार्थहैं और रसा- यनहैं सो उपयोग करे तथा जो नपुंसकोंके कारणों के विपरीत अर्थात् कारण के हरनेवाले हों उपयोग करे ॥ १४-१६ ॥ विशेषचि० और बीजोपघातकी चि० । सुस्विनस्निग्धगावस्यस्नेहयुक्तविरेचनम् ॥ प्रद्यान्मतिमानवैद्यस्ततस्तमनुवासयेत् ॥ १७ ॥ पलाशैरंडसुस्तायैःपश्चादास्थापयेत्ततः ॥ वाजीकरणयोगाश्चयोज्याबीजोपघातजे ॥१८॥ प्रथम स्वेदन कराके स्नेहयुक्त विरेचन करावे फिर टाक एरंड मोथ आदिके क्वाथसे अनुवासन कराकर यथोचित वाजीकरण योग सेवन करावे तो बीजोपयात नपुंसक अच्छाहो ॥ १७ ॥ १८ ॥ ध्वजभंगकीचिकित्सा। ध्वजभंगक्षतंकव्यंज्ञात्वातस्याचरेक्रियाम् ॥ प्रदेहान्परिषेकांश्चकुर्याद्वारक्तमोक्षणम् ॥ १९ ॥ स्नेहपानंचकुर्वीतसस्नेहवाविशोधनम् ॥ अन्वासनंततः कुर्यादथवास्थापनंपुनः॥२०॥ व्रणवच्चक्रियासर्वास्तत्रकुर्याद्विचक्षणः ॥२१॥ ध्वजभंग नपुंसकका पहले निदान द्वारा निश्चय करके चिकित्सा द लेप या सेचन अथवा नस वेधन करके रुधिर निकाले या घृत है स्नेह पान या स्नेहयुक्त विरेचन करावे फिर अनुवासन बस्ति या स्थापः १-वमन विरेचन बिधान दूसरे खण्डमें देखो।
भाषाटीकासमेत-अ०६. (५९) बस्ती कर्म करे । तथा इस ध्वजभंगकी वणके समान विग्लापन पाटन रोप- णादि क्रमपूर्वक करे ॥ १९-२१ ॥ जरासंभव व क्षयजकी चिकित्सा। जरासंभवजेक्कैब्यक्षयजेचैवकारयेत् ॥ २२॥ स्नेहस्वेदोपपन्नस्यसस्नेहंशोधनहितम् ॥ क्षीरसर्पिष्वयोगाःबस्तयश्चैवयापनाः ॥ रसायनप्रयोगाश्वतयोर्भेषजमुच्यते ॥ २३ ॥ जो वृद्ध अवस्थाके कारण या क्षयज नपुंसकहों उनको स्नेहनस्वेदन करे या स्नेह युक्त शोधन करे ॥२२॥ फिर दूध घृत वृष्ययोग यापनबस्ति रसायन इनको करे यह दोनोंकी चिकित्सा करे ।। २३ ॥ वाजीकरणपदार्थ। भोजनानिविचित्राणिपानानिविविधानिच ॥ वाचःश्रोत्राभिरामाश्चत्वचःस्पर्शसुखास्तथा।॥२४॥ यामिनीसेंदतिलकाकामिनीनवयौवना ।। गीतंश्रोत्रमनोहारितांबूलमदिरानजः ॥२६॥ गन्धामनोज्ञारूपाणिचित्राण्युपवनानिच ।। मनसश्चाप्रतीघातोवाजीकुतिमानवम् ॥ २६॥ विचित्र भोजन अनेक उत्तम दूध-शर्वत आदि पीनेके पदार्थ जो पारे प्रतीतहों. ऐसे वचन देहको सुखकारक वन आभूषण पूर्णचन्द्र नवयौवना सर्वांग सुन्दर स्त्री, कानों और मनके हरणकर्ता, सुन्दर का बीडा, मय, फूल, माला, सुन्दर सुगन्ध, मनको और नेत्रों को I, ऐसा सुन्दर रूप सुन्दर विचित्र बाग और जिससे मन न रंजहो हा पदार्थहैं ॥ २४-२६ ॥ वाजीकरणयोग। स्वयंगुप्तेक्षुरकयो/जचूर्णसकर्शरम् ॥ धारोष्णेननरम्पीत्वापयसानक्षयंब्रजेत् ॥२७॥ ,
(६०) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
कौंचके बीज, तालमखाना, इन दोनोंके चूर्णमें बराबरकी मिस
मिलाके तत्काल निकाले । धारोष्ण दूध रोक्न करे तो उस मनुष्यका वी
काभी क्षीण नहो ॥ २७ ॥
अथवा।
ENDRA
उच्चटाचूर्णमप्येवंक्षारणोत्तममुच्यते ।।
इसीप्रकार उटंगणके बीजोंमें बराबरकी मिसरी मिलावे इस चूर्णको धारो
ष्ण बुधसे पीवे तो वीर्य क्षीण न होवे ॥
अथवा।
शतावर्युचटाचूर्णयमेवसुखार्थिना ॥ २८ ॥
शतावर और उटंगणके बीजों के चर्णमें मिसरी मिलाकर धारोष्ण दूध
पोवे तो वीर्य पुष्ट रहे ॥ २८ ॥
अथवा।
विदारिकन्दकल्कंतुघृतेनपयसानरः ।।
उदुंबरसमंखादन्वृद्धोपितरुणायते ॥ २९॥
विदारीकन्दके कल्कको वी मिसरी मिले दूधसे गूलर के फल समान रख
तो वृद्धभी तरुणकी सदृश होजावे ॥ २९ ॥
अथवा।
चूर्णविदार्याःसुकृतंस्वरसेनैवभावितम् ।।
सर्पिःक्षौद्रयुतं लीदवाशतंगच्छेद्वरांगनाः॥३०॥
विदारिकन्दके चर्णको विदारिकन्दके रसकी भावना देकर स
इसमें घी शहद मिलाके सेवन करे तो वह मनुष्य सौ स्त्रियोंसे रमन
परंतु विदारीकंदको विदारी कन्दके स्वरसमें २१ बार भावनादेवे ॥
सो
अथवा।
एवमामलकंचूर्णस्वरसेनैवभावितम् ।।
शर्करामधुसपिभिर्युक्तंलीवापयःपिबेत् ॥
एतेनाशीतिवर्षोंपियुवेवपरिदृष्यते॥ ३१॥
भाषाटीकासमेत-अ०६. (६३) डालके औटावे फिर उसको शीतलकर मथानीसे मथ मिसरी मिलाके पीवे तो मनुष्य सम्पूर्ण रात्रि मैथुन करनेपर भी न थके ॥ ३९ ॥ सौभाग्यपुष्टिबलशुक्रविवर्धनानिकिंसन्तिनोभुविबहूनिरसाय- नानि।कंदर्पवर्द्धनिपरंचसिताज्ययुक्तादुग्धाहतेनममकोपिमतः प्रयोगः॥४०॥ वैद्यजीवन में कहा है सौभाग्य पुष्टी, बल, शुक्रके बधानेवाली क्या बहुतसी रसायन नहीं हैं, पर मदेवके बधानेवाला मिसरी और घी मिले दूधसे विना मेरे मतमें दूसरा योग अच्छा नहीं है ॥ ४० ॥ अथवा भुत्त्वावरीक्षारयुतांविलासीरम्याच्छतंसुन्दरसुन्दरीणाम् ॥४१॥ शतावरके चूर्णको दुधके साथ सेवन करनेसे मनुष्य सौ त्रियोंसे रमण कर सक्ता हैं। ४१ ।। शतावरीचूर्णम् । शतावरीनागबलाविदारीविकंटकैरामलकीफलान्वितैः ।। विच- णितैःपञ्चभिरेकशःपृथक्प्रकल्पितर्वावृतमाक्षिकप्लुतैः॥४२॥ इतिप्रयोगा:पडिमभिषग्वररुदीरिताशर्करयासमन्विताः ॥ मदांधप्रमदोपसर्पिणांप्रधानधातोरतिरेककारणम् ॥ ४३ ।। र, खिरेंटी, विदारीकन्द, गोखरू, आमले, उटंगण, इन सबका या चर्णकर घी, सहत, मिसरी मिलाके सेवन करे। यह वैद्योंने छ योग कि प्रयोग कामसे मदान्ध करता और स्त्रीसे रमण करके वीर्यको ॥४२॥४३॥ अथवा वानरीगुटिका। नहिकपिकच्छोःकुडवमितानितुस्वेदयेच्छनकः॥प्रस्थेगो 1५दुग्धेदुग्धंयावद्भवेदाढम् ॥४४॥ त्वग्रहितानिचकृत्वा सूक्ष्मंसपेषयेत्तानि॥ पिष्टिकायाःसुवटिका कृत्वागव्येपचेदाज्ये ॥४५॥ द्विगुणितशर्करयातावटिकाःसंपक्कयालेप्याः ॥ वटिका ' स १ (६४) शुभसन्ततियोगप्रकाश। माक्षिकमध्येमजनयोगे खिलास्थाप्याः ॥४६ ॥ पञ्चटंक मितास्तास्तुप्रातःसायंचभक्षयेता अनेनशीनद्रावीयोयश्चस्या- त्पतितध्वजः॥४७॥ सोपिप्राप्नोतिसुरतेसामर्थ्यमतिवाजि- वत् ॥ नानेनसदृशंकिंचिद्रव्यंवाजीकरंपरं ॥४८॥ एक एकपाव कौंच के बीजोंको ३ सेर गौके दूधमें पकावे, जब दूधगाठा होजावे तो बीजोंको निकालकर उन बीजोंका छिलका दूर करके बारीक पीसडाले,फिर इस पिष्ठि (पिठि) की टिकिया बना गत में पकावे,फिर आध सेर खांडकी चासनीकरके इन टिकियों पर चढाये। राजाशाहीकी समान खांड चढ जावे तो इनको सहतमें डुबाकर रखदे, इनमेंसे १५ मासे खाकर ऊप- रसे दूध पीवे इसीतरे सबेरे और सायंकाल दोनों समय सेवन करनेसे जिसका वीर्य शीघ्र निकल जाताहो और इन्दी सुस्तहो इसकेप्रभावसे वह मनुष्य घोडेके समान मैथुन करे इससे बढकर और दूसरा बाजीकारण योग नहीं ॥ ४४ ॥ ॥४५॥ ४६॥४७॥ ४८ ॥ नारसिंहचूर्णम् । शतावरीरजःप्रस्थंप्रस्थंगोक्षुरकस्यच ॥ वाराह्याविंशतिपलंगुडूच्यापंचविंशतिः॥४९॥ भल्लातकानांद्वात्रिंशचित्रकस्यदशैवतु ।। तिलानांशोधितानांचप्रस्थंदद्यात्सुचूर्णितम् ॥ ५० यूपणस्यपलान्यष्टाशकरायाश्चसप्ततिः॥ माक्षिकंशर्करा'नमाक्षिकाईनवैघृतम् ॥५१॥ शतावरीसमंदेयंविदारीकंदजंरजः ॥ एतदेकीकृतंचूर्ण स्निग्धे भांडेनिधापयेत् ॥ ५२ पलाईमुपयुंजीतयथेष्टंचापिभोजनम् ॥ मासैकमुपयोगेनजरांहतिरुजामपि ॥५३॥ वलीपलितखालित्यमेहपांडाद्यपीनसान् ॥ हत्यष्टादशकुष्ठानितथाष्टावुदराणिच ॥ ५४॥ -- उन
भापाटीकासनेव--अ०६०
T
सूत्र नसीसहली
अयंचैवमतावासायंचालानसुदारुणान् ॥५५॥
अशीतिवातजारोगानचत्वारिंशवपैत्तिकान् ।।
विशतिश्लेष्मकांश्चैवलंघटनानिपातिकान ।।
सर्वनोगदान्हतिवृक्षमिवाशनियथा ।। ६६ ।।
सकांचनामोगराजवितामत्तुरंगमंचाप्नुयातिगतः ।।
त्रीणांशसंगच्छतिलोतिरेकंकृष्टश्चियथाविहंगः ।। ५७ ।।
पुत्रानसंजनयद्वीराननरसिंहनिमांस्तथा।।
नारसिंहमिदंचूर्णसर्वरोगहनृणाम् ॥ १८ ॥
शतावरका चूर्ण १ सेर, दक्षिणी गोखरूका चूर्ण : सेर बाराही केवळी चूर्ण
१ सेर, गिलोयसत्य १ सेर, ९ छटांक मिलादे शुद्ध २ सेर चित्रककी छाल
अढाई पाद, शुद्ध तिल । सेर, सोंठ, मिर्च, पीपलका चूर्ण आधासेर. मिसरी
४॥ सेर, सहत २। सेर, गोघृत एकसेर दोछटांक इन भवको सुंदर रीतिसे
मिलाकर चिकने वर्तनमें भरकर रखदेवे। इसमें से दोतोलाप्रातःकाल भक्षण करे
और इसके सेवनमें यथेच्छ भोजन करे तो एक महीनेके सेवनसे बुढापे और
रोगोंको दूरकरे । देहमें गुलजट पडना, सफेद बाल होना, गज, प्रमेह, पांडु,
पीनस, १८ कोट, आठ प्रकारके उदररोग, भगंदर, मूत्रकृच्छ्र, गृध्रसी, हली-
मक, क्षयरोग, महाश्वास दारुण पाँचप्रकारकी खांसी, अस्सी वातरोग, चालीस
पित्तरोग, बीस कफके रोग, मिश्रितरोग; सान्निपातिकरोग, सब प्रकारके बवा-
सीर,इन सब रोगोंको नष्ट करे,जैसे इंद्रका वज़ वृक्षोंको नष्टकरे सुवर्णके समान
देहमें कांतिहो सिंहके समान पराक्रमहो घोडेके समान वेगहो सौस्त्रियोंसे गमन
करसके गृध्रकीसी दृष्टिहो इसके सेवनसे नृसिंहके तुल्य पराक्रम वालों पुत्रों के
प्रगटकरे। यह नारसिंह चूर्ण मनुष्योंके सबरोग नष्ट करनेवाला है॥५५-५८॥
अमृतभल्लातक।
भल्लातकानांपवनोत्थितानांतरुच्युतानांचयदाढकंस्यात् ॥
घृष्टेष्टिकाचूर्णकणैर्जलैश्चप्रक्षाल्यसंशोष्यचमारुतेन ॥ ५९॥
(६६) शुभसन्ततियोगप्रकाश। शुष्काणितानिद्विदलीकृतानिविपाचयेदप्सुचतुर्गुणासु ।। तत्पादशेषपुनरेवशतिक्षीरणतुल्येनविपाचयेत्तत् ॥ ६॥ तदर्धयाशर्करयाविमियपश्चातखजेनोन्मथनंविधाय ॥ सत्र्यूषणंत्रफलचंद्रमासीत्रिवृञ्चवांशीखदिरामृतंच ॥६३ ॥ सचंदनाकल्लकणाकवाबंसदेवपुष्पमुसलीद्वयंच ॥ कंकोलमोचाहयदीप्ययुग्मनतंसमातंककणाविदारी ॥ ६२ ॥ जातीफलंमुस्तकजातिपत्रीकुवेरजीरागुदसाब्धिशोषम् ॥ मेदाद्वयंलोहरसेंद्रवंगम_तथाकुंकुमकंचकर्षम् ॥६३॥ तत्सप्तराबादतिजातवीर्यसुधारसादप्यधिकंवदंति ॥ प्रातःसुबुद्धःकृतदेवकार्योमात्रांमजेत्सात्म्यशरीरयोग्याम् ॥ ६४॥ नचानुपानेपरिहार्यमस्तिनचातपेनाध्वनिमैथुनेच ॥ यथेष्टचेष्टोविचरेत्प्रयोगान्नरोभवेत्कांचनराशिगौरः ॥६५॥ अनेनमेधानरसिंहवीयोंढेन्द्रियोव्याधिगतःसुबुद्धिः॥ दंताविशीपुनरेवदिव्या केशाश्वशुभ्राःपुनरेवकृष्णाः॥६६॥ नीलांजनालिप्रतिमाभवंतित्वचोविशीर्णा पुनरेवभव्याः॥ विशीर्णकाँगुलिनासिकोपिकृम्यर्दितोभिन्नगलोपिकुष्टी॥६७॥ शुष्कःपुनःस्यागतमूलशाखस्तरुयथाभातिनवाम्बुसिक्तः॥ बृहस्पतेरप्यधिकोहिबुद्ध्याग्रंथविशालंचनवंकरोति॥ ६८॥ गृह्णातिसयोनचविस्मृतिंचकरोतिकल्पायुरनंतवीर्यम् ॥ कुर्वनिमंकल्पमनल्पबुद्धिजीवन्नरोवर्षशतंसुखीस्यात् ॥६९॥ पकेहुवे भिलावे जो पवनसे टूटकर गिरहों ४ सेर लेवे इनको ईटके कुक- वामे घिसकर शुद्धजलसे धोकर पवनसे सुखावे जब सूखजावे तब एक २ के दो २ टुकडे करदेवे फिर १६ सेर पानीमें पकावे जब ४ सेर पानी- बाकी रहे उसको उतारकर ठंडाकरले फिर उसमें चारसेर दूध मिलाके पकावे फिर २ सेर मिसरी मिलाके मथानीसे मथडाले फिर त्रिकुटा त्रिफला, भाएटीकासमेत-अ० ६. पुर, जटामांसी, निसोथ, वंशलोचन. खैरमार, विष, सफेदचंदन, अकरकरा, एल, कबाबचीनी, लौंग, सफेदभुगली, कालीमुमली, कंकोल, मोचरस, अजवायन, अजमोद, छड, गजपीपल, विदारीकन्द, जायफल, नागरमोथा, जावित्री, लताकरंज, अगर जीरा, समुद्रशोप, मेदा, महामेदा, लोहमम्म, चन्द्रोदय, वैगेश्वर, अन्नक, केशर, प्रत्येक एकएक तोला,लेवे सबको एकत्रकर उपरोक्त मिलावे मिश्रित' औषधि मिलाके एक जीव करदेने फिर एक सुन्दर चिकनेवर्तनमें ठकके रखदेवे रोज रखी रहनेदे तो यह अमृत सेभी अधिक होजातीहै । रसको प्रातःकाल उठकर शौचादिक कर्मोंने निवृ- नहो अपने शरीरानकुल और जितनी पचसके उतनी मात्रासे सेवन करे इसपर किसीतरेका अनुपान नहीं न धूपका न चलनेका न मैथुनका कोई परहेज है, इसपर यथेच्छ आहार विहार करे तो मनुष्य सुवर्णके समान दिव्यदेहहो. बुद्धि बढे नृसिंहसा बलहो, इन्द्रि ढहों, सबरोग दूरहों, गिरे दांत फिर पैदा होवें, सफेदबाल भौरेसमान कालेहो, गुलजटि दूरहो, त्वचा मजबूतहो, जिसके कान नाक उंगली गिरगयेहों कमिपडगयेहों, गला बैठ गयाहो उस मनुष्यको इसके सेवनसे जैसे जड शाखा हीन वृक्ष जलके संयोगसे हरा होजाताहै इसप्रकार इसके खानेवाला मनुष्यभी सब रोगरहित होकर त्वरूपवान् होजाताहै, बृहस्पतिक समान बुद्धिहो, नयेग्रंथ रचनेकी सामर्थ्य- वालाहो,बातको सुनतेही धारण करे, भूले नहीं कल्पायुहो,अधिक वीर्य वालाहो इस मिला कल्पको सेवन करनेसे सौवर्ष नीरोग होकर जीवे ॥५९-६९॥ रतिवर्धनमोदक। गोक्षुरेक्षुरबीजानिबाजीगंधाशतावरी ॥ मुशलीवानरीबीजंयष्टीनागबलाबला ॥ ७० ॥ एषांचूर्णदुग्धसिद्धंगव्येनाज्येनभर्जितम् ॥ सितयामोदकंकृत्वाभक्ष्यवाजीकरंपरम् ॥ ७१। चूर्णादष्टगुणंक्षीरंघृतंचूर्णसमंस्मृतम् ।।
(६८) হমমদাবিত্বাবস্থা ।
सर्वतोद्रिगुणखंडंखादेमिकलंकमा
वाजीकरणयोगेषुयोगोयंगवरोमतः ।। ७२ ।।
गोखरु, तालमखाना, नागोरी, आमगंध, शतावरी, मूसली, कौक बोला,
मुलेठी, नागबला, और बला, इनसबका चूर्ण कर इस चूर्णको आठगुणे सुधौ
डालकर खोवाकरे, फिर बराबरके गोघृतमें भूनकर दुगुनीमिसरीकी चाशनी
मिलाकर बनाये' इसके सेवनसे परमवृष्यहो यह परम वाजीका प्रयोग
बहुतसे वाजीकरण योगोंमें उत्तमहै ।। ७० ॥ ७१ ॥ ७२ ।।
माक्षीकधातुमधुपारदलोहचूर्ण
पथ्याशिलाजतुविडंगघृतानिलियात् ।।
एकोनविंशतिदिनानिगदार्दितोणि
सोशीतिकोपिरणयेत्यमायुदेव ॥ ७३ ।।
सोनामक्सीकी भस्म, सहद, पारा, लोहभस्म, हरड, शिलाजीत, वायवि-
इंग और घी इन सबको मिलाकर उचित मात्रासे २१ दिन सेवन करती ८०
वर्यकी उमर वालाभी जवानके माफिक स्वीसे मैथुन करे ॥ ७३ ॥
सत्त्वंगुडूच्यागगनसलोहएलासितामागधिकासमेतम् ॥
एतत्समेतंमधुनावलीढंरामाशतसेव्यतीवपंढः ॥ ७४ ।।
गिलोयका सत्त्व,अनकभस्म,लोहभस्म, इलायचीके बीज, पीपल, मिनरी,
इनका चूर्णकर सहत मिलाके चाटेतो नपुंसकभी१००स्त्रियोंसे गमन करे ७१।
शुक्रबार्तवशोषकयोग।
सौद्रार्धपात्रंदत्त्वातुपात्रंतुक्षीरसर्पिषोः ॥ ७९ ॥"
स्वयंगुप्ताफलंचैवतथैवेक्षुरकस्यच ॥ ७६॥
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तमर्धभागंप्रदापयेत् ।।
एतदैकध्यमानीयखजेनाभिप्रमन्थयेत् ॥ ७७ ॥
तस्यपाणितलंचूर्णलीदवाक्षीरंततःपिबेत् ॥
एतत्सर्पिःप्रयुंजानःशुद्धदेहीनरःसदा ॥ ७८॥
सालाटीकासमेत-अ६. (६१) सुनदोषालजयेत्सर्वानन्ययोगलुजुर्जवाद ।। जयेच्छोणितदोपांचवंध्यागमलभेतच ।। नारीचैतत्प्रयुंजानायोनिदोपात्प्रमुच्यते ॥ १९ !! सहद तोला ३२ वृततोला ३२ गोवून तोला ३२ कौंचकेजीज तोला।६ तालमखाना तोला १६ पीपल तोला १६ इन तीनोंको कपडछानकर उपरोक्त सहद धी दूधमें मिलाके रईसे खूब जयाहार मिलाये इसमेंले शुद्धदेह मनुष्य एक तोला खाकर दूध पीने इसको बमन विरेचनाध्यालोक विशिष्ठ शुद्धहो इसका सेवन करे तो सब भूत्रदोष जो अनेक बलसे अच्छे न होसके हों उन सबको आराम हो रक्तके सब दोष दूर होकर पंध्याचीभी गर्भ धारण करे जो खी इसको मेवन करे उसके सब योनिदोष दूर हों।।७५॥७६॥७७॥७८॥७९॥ केसरावलेह । व्योपचतुर्जातफलपिकवलवंसकृष्णापुरुचन्दनंच ॥ इस्लखीजकरहाटकंचजातीफलंगाईटिकाफलंच ८०॥ शाल्मल्यानयासबलाश्वगंधागोशूरवीजंसुसलीकृमित्रम् ॥ समुद्रशोपविषपंजरंचपुष्पसजात्युद्भवकंकबीजम् ॥ ८१॥ सर्वैःसमंयोज्यमुकुंकुमंचसुचूर्णितविंशतिभागयुक्तम् ॥ कस्तूरिकापोडशभागचूर्णखंडचतुर्भागयुतंविपक्वम् ॥ ८२ ॥ वंगरसेंद्रगगनंसुलोहंकांतहितानंरविभागयुक्तम् ।। दलानिहेग्नोद्विशतानिदत्त्वातथैवदेयानिचराजतानि ।। एकत्रसविनिधायवैद्योजयाष्टभागविदधीतलेहम् ॥८३॥ जातीफलप्रमाणेनभक्षयेत्प्रातरुत्थितः ॥ वीर्यवृद्धिकरोत्येपसर्वव्याधिविनाशनः ॥ ८४ ॥ शतंचरमतेस्त्रीणांकामतुल्योभवेन्नरः ।। सर्वान्वातामयानहतिप्रवृद्धवातशोणितम् ॥ ८५॥ अस्थिरोगशिरोरोगसंधिरोगंचनाशयेत् ॥
(७०) शुभसन्ततियोगप्रकाश
अस्यसेवनमात्रेणवृद्धोपितरुणायते ॥ ८६ ॥
धन्यंयशस्करंसम्यगायुरारोग्यवर्द्धनम् ।।
काश्मीरकावलेहोयंबलकांतिविवर्द्धनः ।। ८७ ।।
त्रिकुटा, चतुर्जात, त्रिफला, लौंग, कालीअगर, सपेदचन्दन, तालम..
खाना, अकरकरा, जायफल, कौंच बीज, सेमलका गोंद, गुलशकरी, अस-
गन्ध, गोखरू, मुसली, वायविडंग, समुद्रसोख, विषपंजर, जावित्री, कंगही
के बीज यह सब समान भाग लेकर सबका बारीक चूर्ण करेरासुन्दर केशर सुब
दवाइयोंसे बीसवां भाग लेवे और सोलहवां भाग कस्तूरी लेवे तथा सुत्र
दवाइयोंसे चौगुनी मिसरीकी चासनी बनाकर अवलेहकी विधिसे यह केशरा-
धवलेह बनावे सिद्ध होनेपर नीचे उतारकर इसमें वंग, चन्द्रोदय, अन्नकसार,
कांतिसार, तांबेश्वर यह सब बारहवें भाग मिला और सोनेके वर्क २००
चांदीके वर्क २०० इनको मिलाके केशरसे आठवां भाग डाले इस अवलेहको
किसी उत्तम चीनीके वर्तन में रखे इसमें से नित्य प्रातःकाल जायफल के बराबर
खाया करे तो यह वीर्यकी वृद्धि करे, सब रोगोंको नष्ट करे,शत स्त्री रमणकी
सामर्थ्य करे, कामदेवकी समान रूपहो, सब प्रकारके वातविकारोंका नाश
हो बधे हुए वाव रक्तका नाश हो हड्डीके रोग, फिरंगरोग, सन्धिरोग, दूर हों
इसके सेवनसे बूढा भी जवानकी सदृशहो यह केशराबवलेह बन्य, यशकर्ता,
आयु और आरोग्यताके बढाने वाला है ॥ ८०-८७ ॥
आम्रपाका
पक्काम्रस्यरसेद्रोणेसितामाढकसंमिताम् ॥
घृतंप्रस्थमितंदद्यानागरस्यपलाष्टकम् ॥ ८८ ॥
मरिचंकुडवोन्मानंपिप्पलींद्विपलोन्मिताम् ।।
सलिलस्याढकंदत्त्वासर्वमेकत्रकारयेत्॥ ८९ ॥
विपचेन्गुण्मयेपात्रेदारुदाप्रचालयेत् ॥
चूर्णान्येषांक्षिपेत्तत्रघनीभूतेवतारिते ॥९० ॥
भाषाटीकासमेत-अ० ६. (७१) धान्यकंजीरकंचित्रपत्रकमुस्तकवचम् ॥ बृहजीरकमप्यत्रग्रंथिकंनागकेशरम् ।। ९१ ॥ एलोपत्रीलवंगंचपृथग्जातीफलंपलम् ।। सिद्धेशीतेप्रदद्याचमधुनःकुडवद्वयम् ॥ १२ ॥ भक्षयेदोजनादपिलमात्रमिदंनरः ॥ अथवानियतावात्रमात्राखादेवथानलम् ॥ ९३ ॥ मानव सेवनादस्यवाजीवत्सुरतेभवेत् ।। समर्थोबलवान्पुटोहष्टोनित्यंनिरामयः।। ९४।। ग्रहणीनाशयेदेषक्षयंश्वासमरोचकम् ॥ अम्लपित्तंचपित्तंचकुष्ठंवापांडुतामपि ॥ ९५ ॥ बहुत उत्तम पके हुए आमोंका रस १६ सेर, सोंठका मैदा आधसेर, मिसरी चारसेर. कालीमिर्च एकपाब, पीपल दोछटांक, उत्तम गौका घी ! सेर, प्रथम आमका रस घी भिसरी मिलाके फिर पीपल, सोंठ, मिर्चका मैदा इसमें मिलावे और चारसेर स्वच्छ जलमिलाके किसी मिट्टीके वर्तनमें पकावे और लकडीकी कडछीसे हिलाताजावे जब गाढाहोजावे तब नीचे उतारके नीचे लिखी दवाइयोंका चर्ण मिलावे। धनियां, जीरा, चित्रक, पत्रज, नागर- मोथे, दालचीनी, कलौंजी, पीपलामूल, नागकेशर, इलायची, पत्रज लौंग, जायफल प्रत्येकका चूर्ण १ छटांक और आधसेर उत्तम सहर मिलावे और कडछीसे खूब मिलाकर उत्तम चीनी या मट्टीके चिकने वर्तन रखे इसमेंसे भोजनके प्रथम उचित मात्रासे नित्य खाना चाहिये इसके सेवनसे पुरुष स्त्रियोंसे घोडेके समान मैथुन करे सामर्थ्यवान हृष्टपुष्ट सदैव नीरोग रहे संग्रहणी, क्षय, श्वास, अरुचि, अम्लपित्त, पित्तरोग, कुष्ठ, पांडु यह सब रोग दूरहों ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ ९० ॥ ९१ ॥ ९२ ॥९३॥९४॥९५। महासुगंधितैलम् । कर्पूरागरुचोचपत्रनलिकालाजाशटीधातुकी पुष्पैःसातदलैलवालुसरलैःशैलेयमांसीप्लवैः ।। , Mare Fund manyPunby yws punity- (७२) शुभसन्ततियोगनकाशा एल्गहुंकुमरोजनामललीमारामाशाली कंकोलक्रमुकोटाममुराकान्तालमा १९८ । बालोशरिहरेनुकाललयजस्थोपचंडानः जातीकोशकुलीरपाकलौःस्पृकान्वितैःपालिः । ক্যান্সাজলাভিত্তিক लैलाम्यक्ततनुजस्लपियवेस्त्रीणांपरंवल्लभः ॥ ९७१ शुक्राढयोमतिमानलल्पतनयःपंडोपिरत्युत्सुको बंध्यागर्भवतीभवेदपिलथानापिसूतेमुताम् !! कण्डस्वेदविचर्चिामलहरंदोर्गध्यकुष्टापहम् अश्विभ्यांपरिकीर्तितंबहुगुणतैलंसुसंवमहत् ।। ९८ ॥ कपूर, अगर, दालचीनी, पत्रज, नलिका, लाख, कचूर, धाके फल, सतवन, एलवालुक, सुगन्धद्रव्य, सरल, छड, जटामांसी, सुगन्धवाला, इलायची, केशर, गोरोचन, दोनों मुख्वा, श्रीवास, जायफल, कंकाल, सुपारी, सुफेद चिरमटी, कस्तूरी, मुरा, प्रियंगु, लौंग, कुट, नेत्रवाला, उ रेणुक, चन्दन, थुनेर, गठौना, नख, जावित्री, ककडासिंगी, पद्माख, छ, स्पृक्का, लाख, असवर्ग, प्रत्येक ४ तोले लेकर काउलान करके कल्क बनावे तिलतैल १६ सेर ले लाख, मंजीठ, लोध, इनका काथ १६ सेर लेकर सबको विधिवत् तैल सिद्ध करे इस तैलकी मालिससे बढाभी नियोंका प्यारा हो; शुकयुक्त, कांतिवाला, पुत्रयुक्त, नपुंसकभी मैथुनाभिलापी हो; वन्ध्याकेभी सन्तान हो बुड्डी स्त्रीभी पुत्र जने और देहकी खुजली, पसीना, विचर्चिका, मैल दुर्गधि, कोटभी दूर हो । यह अश्विनीकुमारका बनाया और अनेक गणवाला महा सुगंधी तैल है ॥ ९६॥९७॥९८ ॥ शतावरीमोदकम् । शतावरीश्वदंशाचबलाचातिबलातथा ॥ मर्कटीक्षरखीजंचविदारीकंदरजः ॥९९ ॥ ग Kumergeti , 14 Cotage भाषाटीशसमेत-अ०६. ( ७३ एतानिसमभागानिपलिकानिविचूर्णयेत् ॥ चूर्जाचतुणवत्रैलोक्सविजयारजः ।। १०० ॥ एतदेवीकृतंपावत्तदर्धमाहिपंपयः ।। तावन्मानणदातव्यंशतानरसंतथा॥ १०॥ विदार्याः स्वरसंप्रस्थासितापलशतद्वयम् ।। गोलयित्वासितावपात्रेतानमये दृढे २ पाचवेत्पानियोलोकधरमोहितः ।। यूपर्णत्रिफलागीनिजातसैंधवंशटी ॥३॥ धान्यकंबालकंस्तद्विजीरंकुन्दरुर्मुरा ।। काकोलीक्षीरकाकोलीकस्तुरीमृद्धिकालगा॥४॥ जातीकोषफलंमांसीपचंवारेंद्रग्रंथिकम् ॥ शतपुष्पाचवीदारुप्रियंगुसलवंगवाम् ॥ ५॥ सरलंशैलजंकुष्टजातिवमानिलाम् ।। कटकलंकेशरंमेथीमधुकंदेवताडकम् ॥६॥ मिपीतालीसपत्रंचखजूररसगन्धकम् ॥ विसुगंधिसमायुक्तंकपूरेणाधिवासयेत् ॥ ७॥ शिवसंपूज्यसगणंधन्वंतरिमथापरम् ॥ कोलप्रमाणकर्तव्यंक्षीरंचापिपिवेत्ररः ॥ ८॥ प्रातर्मोजनकालेवाभोजयेचविचक्षणः॥ प्रमदानांशतंगच्छेनचशुक्रलयंभवेत् ॥ १०९ ॥ शतावर, गोखरू, बला, अतिबला, कौंचवीज, तालमखाना, विदारी कन्द, प्रत्येक एक पल शुद्ध भांगका चूर्ण २८ पल, बूरा सौ पल, भैसका दूध, सतावरका रस, विदारीकन्दका रस प्रत्येक ३२ पल इन सबको मिलाके तांबेके पात्रमें मन्दर अनिसे पकाये। जब पकते २ गाढा होजावे तो त्रिफला, त्रिकुटा, शृंगी, त्रिजात, सेंधा, कचूर, धनियां, मोथा, सुगन्धवाला, दोनों (७४) शुभसन्ततियोगप्रकाश। जोरे, कुंदरू, कपूरकचरी, काकोली, क्षीरकाकोली, कस्तूरी, दाख, वंश- लोचन, जावित्री, जायफल, छड, वारेंद्रपत्र, गठिवन, सोया, चव्य, देवदार, प्रियंगु, लौंग, सरलधूप, भूरिछरीला, कूठ, चमेलीके फूल, अजवायन, कायफल, नागकेसर, मुलेठी, मेथी, देवताड, सौंफ, तालीशपत्र, खजूर, शुद्धपारा; व शुद्धगंधककी कजली, तगर, लालचन्दन, सज्जी, प्रत्येक एक २ तोला इन सबके चूर्णको उपरोक्त दवाईमें मिगदेवे । फिर एक २ तोलेका मोदक बनाकर त्रिजात, त्रिकटा, कपूरके चूर्णमें लठावे इनमेंसे प्रातःकाल या भोजनसे पहले या सायंकाल खाकर ऊपरसे दृध पीवे तो पुरुष १०० त्रियोंसे भोग करे तो भी शुक्रक्षय नहो यह परमोनम बोगहै ॥९९-१०९॥ रतिवल्लभम् । समूलपत्रशाखायास्तुलांशकाशनस्वच ॥ संरुयोलूखलेछिप्वाऽपांद्रोणेहितथाचवै।।११०॥ काथंपादावशिष्टंतुवस्त्रपूतंचकारयेत् ॥ क्षीरप्रस्थंसमादायखंडस्याईशतंन्यसेत् ॥१३॥ शतावरीरसस्यायोपिप्पल्याकुडवस्तथा ॥ सर्वमेतत्समालोडयवृतप्रस्थेनमेलयेत् ॥ १२॥ आपधानांततश्वर्णदापयेतकलिकंपृथक् ॥ त्रिकट त्रिफलांचव्यमेलात्वकपत्रकेशरम् ॥ १३॥ चित्रकंपिप्पलीमूलंधान्यकाजाजिमेथिका ॥ कुष्ठाब्दरेणुकाव्योषभाङ्गीतालीशकेशरम् ॥ १४ ॥ तालमूलीत्रिवृदन्तिश्रेयसीहिंगुपौष्करम् ॥ लवंगजातिकोषंचयमानिकारवीतथा ॥१५॥ शुभाजातीफलंचन्द्रधिगिचैवविदारिका ॥ अष्टवर्गचकाकोलंश्लक्ष्णचूर्णचकारयेत् ॥ १६॥ कुडवद्विपचेद्वैद्योमोदकंकारयेत्ततः॥ अक्षमात्रंचजग्धैषांशीतलंपाययेजलम् ।। १७ ॥
भाषाटीकासमंत-अ०६. (७५) नाशयेच्छुकदोपंचपंडंचैवातिदारुणम् ॥ श्रीकरलाधवकरमेधावुद्धिप्रवर्द्धकम् ॥ ११८ ॥ भांगके मूलपने शाखासमेत सुब लेकर कटले ऐसी कूटी हुई ६. सेर भाँगको बत्तीस ३२ सेर पानीमें औटावे जब ८ र रहे शुद्ध बस्त में छानले, फिर इसमें गोदुग्ध २ सेर, बूरा ६। सेर, शतावरीका रस : सेर, पीपलका काथ एकसेर, घी २ सेर, मिलाके पकाने; जब पकते २ गाढा होने लगे तो त्रिकुटा, त्रिफला, चव्य, छोटी इलायची, दालचीनी, तेजपात, नागकेशर, चीता, पीपलामूल, धनियाँ, जीरा, मेथी, कठ, मोथे, रेणुका, त्रिकुटा, भांग, तालीशपत्र, नागकेशर, मुसली, निशोत, दंती, गजपीपल, हींग, पोहकरमूल, लौंग, जावित्री, अजवायन, सौंफ, पीपल, जायफल, कपूर, ककटासिंगी, विदारीकन्द, अष्टवर्ग शीतलचीनी, प्रत्येकका चूर्ण ४ तोले गुडपाककी विधिसे सबको मिलाके पाक करके दोतोलेके लडुवा बनाके प्रतिदिन एक लड्डू खाके ऊपरसे शीतल जल पीने तो " अविदारुणपंडवाको दूर करे, लक्ष्मी जनक और शरीरमें हलकापन हो । बुद्धि बढे ॥ ११० ॥ ११ ॥ १२ ॥ ३३ ॥ १४ ॥ १५॥ १६ ॥ ७ REar चन्द्रोदयरस! पलंमृदुस्वर्णदलंरसैद्रात्पलाष्टकंषोडशगन्धकस्य । शोणैःसुकार्यासभवप्रसूनैःसर्वविमाथकुमारिकाद्भिः ॥१९॥ तत्काचकुंभेनिहितंप्रगाढंमृत्कर्पटैस्तदिवसत्रयंच ॥ पचेक्रमानौसिकताख्ययन्त्रेततोरसःपल्लवरागरम्यः ॥१२०॥ संगृह्मचैतस्यफलंपलानिचत्वारिकर्पूररजस्तथैव ॥ जातीफलंशोषणमिंद्रपुष्पंकस्तूरिकायाइहशाणएकः॥२१॥ / १-अष्टवर्ग-जीवक ऋषभकमेदा महामेदा, ऋद्धिवृद्धि, काकोली, क्षीरकाकोली, इनके न मिलने पर प्रतिनि० शतावर, विदारीकन्द, वाराहीकन्द, असगंध लेना चाहिये।
७६) शुभसन्ततियोगमकारा। चंद्रोदयोकथितोस्यमाषाभुकोहिवल्लीदर्ती ।। मदोन्मदानांप्रमदाशतानांग धिकत्वंलयकमा सम् ॥ सोनेके वर्क ४ तोले,शुद्ध पारा ८ पल शुद्ध गन्धक १६ १,श्न तीनको कपासके फूलोंके रसमें और बीकुवारके रसमें खरल करके सुखालेबे, फिर आतसी सोशीने भरके सीसीको कपडभिट्टीकरके सुखादेशिर वालुका वनमें रखके चीनदिन क्रमसे मन्द, मध्यम, तेज, आँच देवे तो वह रस साल वर्णका होजाताहै, इसको शीसीमेंसे निकालले यह चन्द्रोदयश्सहै । चन्द्रोदय रस ४ तोले, भीमसेनीकपूर ४ तोले, जायफल, मिर्च, लौंग, कस्तुरी, प्रत्येक ४ मासे इनको एकन पीसकर एक भासा पानमें रखकर नित्य खानेमे सैकडोंबियोंके गर्वको तोडे और जितेन्द्रीरहनेसे वलीपटिलाविदुरहों १९-२२॥ वसंततिलकोरसः। हेलोभस्मकतोलकंद्विगुणितलौतात्रयःपारदाः चत्वारोनियतंतुवंगयुगलंचैकीकृतंमदयेत् ॥ सुक्ताविट्ठमयोरसेनसमतागोभुवासेक्षुगाम् ॥ सर्ववन्यकरीषकेणसुदृढंतप्तंपचेत्सप्तथा ।। २३ ॥ कस्तूरीचनसारमर्दितरस पश्चात्सुसिदोभवेत् कासश्वाससपित्तवातकफजित्पांवरमादीन्हरेत् ॥ हद्रोगादिहरंज्वरादिशमनवृष्यवेयीवर्द्धनम् ॥ २४॥ सुवर्णभस्म २ तोला, लोहभस्म ३ तोले, पारेकीभस्म ४ तोले, वंगभस्म २ तोले, पँगेकी भस्म २ तोले मोतीकीभस्म २ तोले, इन सबको एकत्र कर गोखरू अडूसा, ईख, इन तीनोंके रसमें सलरकर शराव संपुटमें आरनेउप- लोंकी आंचमें ७ बार पकाकर पश्चात् कपूर और कस्तूरीके साथ खलर करे- इसको यथायोग्य अनुपानसे सेवन करनेसे कास, श्वास, पित्त, वात, कफ, १-सब रसोंमें विना शोधन किया पारा गंधक न डाले यदि पारा शुद्ध न मिले या शोधन न कर सके तो सिंगरफमेंसे निकाला हुवा पाराही वर्तावमें लावे ।
भाषाटीकासमेत-अ० ६. (७७)
पांडु और क्षण आदि रोग नष्ट हों । हृद्रोगादि सब दूरहों सब ज्वरों के समान
करने वाला प्रण बाजीकर्ता, आयुके पाने वाला, यहः वसंवतिटकरस
है।॥ २३ ॥ २४ ॥
अकरभादि।
आकारकरमःमुठीलवंगकुंकुमंकणा
जातीफलंजातिपुष्पचंदनंकार्षिकंपृथक्क ।। २६ ॥
चूर्णवेदहिफेनंलुतनदद्यात्पलोभितम् ।।
सर्वमेलीकृतंमाषमात्रौद्रेणभक्षयेत् ॥२६॥
शुक्रस्तंभकरपुंसामिदमानंदकारकम् ।।
नारीणांप्रीतिजननंसेवेतनिशिकामुकः ॥ २७ ॥
अकरकरा, सोंठ, लौंग, केशर, पीपल, जायफल, जावित्री, चंदन, सफेद
ये प्रत्येक एक २ तोला लेवें; इन सबका बारीक चूर्णकरके चारखोला इस
चूर्णमें शुद्ध अफीम मिलावे। सबको एकजीव करके इसमेंसे दो उडद प्रमाण
चूर्ण को सहतमें मिलाके रात्रिको भक्षण करे ऊपरसे यथेच्छ दूध पीवे तो वीर्य
स्तंभनहो । पुरुषको आनंदो, स्त्रियोंको प्रीतिदायकहै, इसको रातको सोते
समय खाना चाहिये ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥
खंडकूष्मांथावलेह ।
पुराणंपीनमानीयकूष्मांडस्यफलंमहत्॥
तबीजाधारबीजत्वकशिराशून्यंसमाचरेत् ॥ २८ ॥
ततस्तस्यतुलांनीत्वापचेजलतुलाद्वये॥
तस्मिन्नीरेऽर्धशिष्टेतुयत्नतःशीतलीकृते ॥ २९ ॥
तानिकूष्मांडखंडानिपीडयेहढवाससा॥
यत्नतस्तज्जलंनीत्वापुनःपाकायधारयेत् ॥ ३०॥
कूष्मांडशोषयेद्वम्मॆताम्रपात्रेततःक्षिपेत् ॥
क्षिप्त्वातत्रघृतंप्रस्थंकूष्मांडतेनभर्जयेत् ॥ ३१॥
(७८) शुभसन्ततियोगप्रकाश। मधुवर्णतदालोक्यतज्जलंतत्रनिःक्षिपेत् ॥ सितायाश्चतुलांतत्रक्षिप्त्वातल्लेहवत्पचेत् ॥ ३२ ॥ सुपवेपिप्पलीशंठोजीराणांद्विपलेपृथक् ॥ पृथक्पलार्धधान्याकंपलामरि बत्वचम् ॥ ३३ ॥ चूर्णमेषांक्षिपेत्तत्रघृतार्धक्षौद्रमावपेत् ॥ एतत्पलमितंखादेदथवाऽग्निबलंयथा ॥ ३४ ॥ खंडकूष्मांडलेहोयरक्तपित्तंचनाशयेत् ॥ पित्तज्वरंतृषांदाहंप्रदरंकृशतांवमीम् ॥ ३५ ॥ श्वासकासंचहृद्रोगस्वरभेदक्षतक्षयम् ॥ नाशयत्येववृद्धिंचहणोबलवर्द्धनः ॥ ३६॥ बडे पक्के पेठेके साफ छिलेहुवे टुकडे १०० पलले २०० पल जलमें पकावे, जब जल आधा रहे उतारकर ठंडा करले, फिर मोटे वस्त्रमें बाँके खूब निचोड डाले, उस निचोडे हुवे जलको दूसरे पात्रमें रखेरहनेदे, फिर उन पेठेके टुकडोंको कुछेक धूपयें सुखाके एक तबिके पात्रमें 1 सेर घी डालकर भूने, जब यह टुकडे धीमें भुनकर लालहोजावें फिर जो पहले इन पेठेके टुक- डों से पानी निचोडकर रखाथा वही पानी इसमें डालदे और सौ १०० पल मिसरीभी इसमें डालकर अवलेह सिद्ध करे, फिर इसमें पीपल, सोंट, जीरा, प्रत्येक दोदो पल धनियां, पत्रज, इलायची, मिर्च, तेजपत्र, प्रत्येक दो २ तोले सबका चूर्णकर उपरोक्त अवलेहमें मिलावे,जब ठीक मिलजावे इसको शीतल करके इसमें आधसेर सहत डाले, यह खंडकूष्मांड अवलेह बना, इसको ४ तोले या जितना माफिक हो उतना खावे तो रक्तपित्त, पित्तज्वर, तृषा, खाँसी, श्वास, हृद्रोग, दाह,प्रदर, कशपना, वमन, स्वरभेद, उरःक्षत, राजरोग ये सब रोम नष्टहों बलको बढावे, देह पुष्टकरे और बृंहणहै ॥ २८-३६ ॥ वसंतकुसुमाकर । प्रवालरसमौक्तिकांबरमिदंचतुर्भागभाक पृथक्पृथगथस्मृतेरजतहमतोद्वयंसके । १
भापाटीकासमेत-अ०६.
अयोभुजगरंगकंत्रिलयकविमा विलम्
शुभेहनिविभावयेद्भिवगिदंधियासतशः ।। ३७ ।।
वृषनिशेक्ष कमलमालतीपुष्पजैः
पयाकदलिकंदजैर्मलयजैणनाभ्युद्भवैः ।।
वसंतकुसुमाकरोरसपतिबिल्लोशितः
समस्तगदहद्भवेकिलनिजानुपानरयम् ॥ ३८ ॥
मुंगा, मोती, रससिंदूर, अन्नक, प्रत्येककी भस्म ४ तोले, रूपा, सुवर्ण-
इन दोनोंकी भस्म दो २ तोला लोह, शीसा, रांगा, इनकी भस्म तीन २
तोला इन सबको एकत्र कर अडूसा, हलदी, ईख, कमल, चंदन, चमेलीके
फूल, केलाकंद, इन सबके रसकी तथा दूध और कस्तूरीकी भावना देकर
दो २ रत्तीकी गोलियाँ बनावे, इसको दोषानुकल अनुपानसे देवेतो अनेक
रोग हृद्रोग आदि शांत हों ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
पूर्णचंद्रोरसः।
मृताभ्रलोहंसशिलाजतुस्यादूविडंगताप्येमधुनावृतेन ॥
पिएंप्रशस्तखलुपूर्णचन्द्रोमाषोस्यपुष्टयैभवतिप्रशस्तः ॥ ३९ ॥
रससिंदूर, अत्रकभस्म,लोहभस्म, शुद्धशिलाजीत, बायविडंग, सुवर्णमाक्षि-
कभस्म, प्रत्येक बरावर लेकर सहत और घृतके साथ 3 मासा सेवन करनेसे
अत्यंत पुष्टाई करताहै इसको पूर्णचंद्र कहतेहैं ॥ ३९ ॥
अध्यायका उपसंहार।
संतानोत्पादकेशुक्रेयेरोगाविघ्नकारकाः ।।
तेषांशांतिकरायोगावाजीकरणकीर्तिताः॥ १४ ॥
संतानके उत्पादक शुक्रमें जो रोग विनकारकहैं उनकी शांतिके करने
वाले योग इस वाजीकरण अध्यायमें लिखे हैं ॥१४॥
इति श्रीशुभसन्ततियोगप्रकाशे वाजीकरणो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
(20) शुभसन्ततियोगप्रकाश। अथातोवंध्याचिकितिलतनामाध्यायव्यास्थास्यामः।।3।। अब हम बंभाचिकित्सित नामक अन्यायका व्याख्यान करते हैं ।। ३ : वन्ध्याचिकित्सितनामयध्यायंसर्वसंमतम् ।। आयुर्वेदाचतंत्राचलेखयिष्येप्रयत्नतः॥२॥ बध्याचिकित्सित नायक सर्वसम्मत अध्यायको आयुर्वेद व तन्त्र शास्त्रसे यत्न पूर्वक लिखताहूँ ॥ २ ॥ पूर्वार्जितैर्महापापै पीडितामानवाभृशम् ॥ अर्दिताश्चमहारोगैरनपत्याभवति ॥३॥ पूर्वले जन्मके या इस जन्मके इकट्ठे किये हुए पापोंसे पीडित हुए मनुष्य अनेक महा व्याधियोले दुःखित हुए बिना संतान अर्थात् निरपत्य होते हैं ॥ ३॥ गोब्रह्मायालयातीचप्रपाऽऽरामादिधातकः ।। परद्रव्याऽपहरिम्परदाराभिगामिनः ॥४॥ शास्त्रवयकुकर्मेषुयेरतानिरपत्रपाः ।। तेवैस्वोपार्जितैःपापैवैचिताःपुत्रनामतः ॥५॥ गौ, ब्राह्मण, बालक,आदिकोंके मारने वाला, प्रपा, बाग, मन्दिर, आदिके नष्ट करनेवाला, पराये द्रव्य के हरनेवाला, परायीस्त्रीसे गमन करनेवाला और जो शास्त्रोंमें त्याज्य कर्म लिखे हैं । निर्लज्जहोकर उन निन्दनीय काँके करनेवाले अपने इकडे किये पापोंसे पुत्र नामसेही ठगे जाते हैं । अर्थात् जब रोगग्रसित और पापी मनुष्यों के सन्तान नहीं होती तो वह बिचारे पुत्र किसको कहें ॥ ४॥ ५॥ अच्छायःपूतिकुसुमःफलेनरहितोद्रुमः ॥ यथैकश्चैकशाखश्चनिरपत्यस्तथानरः॥६॥ छाया रहित, दुर्गंधित फूलोंबाला, फलसे विना एक शाखावाला, जैसे वृक्ष होता है ऐसेही सन्तानके बिना मनुष्य होता है ॥ ६ ॥ "
भाषाटीकासमेत-अ० ७
(८१)
-
स्खलद्गमनमव्यक्तवचनंधूलिधूसरम् ॥
अपिलालाविलमुखंहृदयाऽऽहादकारकम् ॥७॥
अपत्यंतुल्यताकेनदर्शनस्पर्शनादिषु ॥
किंपुनर्यद्यशोधर्ममानश्रीकुलवर्द्धनम् ॥८॥
चलते २ गिरजानेवाले जो समझा न जाय ऐसे तुतलान युक्त बोलने
वाले धूलिसे धूसर लालोंसे आविलरूप मुख वाले हृदयमें आनन्दके करने
वाले सन्तानके बराबर दर्शन स्पर्शन आदिकोंमें और कौन वस्तु है जिससे
तुल्यता करें अर्थात् कोई नहीं। फिर यश, धर्म, मान, शोभा, कुलको बढाने-
वाले पुत्रकी तो क्या गणना है । ७ ॥ ८॥
चिकित्साक्रम।
प्रायश्चित्तंतुकर्तव्यसमाहूयविपश्चितम् ।।
पुत्रेष्टिञ्चततःकुर्याद्रुद्रस्नानंतथैवच ॥ ९॥
पहले पुत्रकी कामनावाला मनुष्य, पंडितसे पूछकर विधिवत् पापोंकी
शांतिके लिये प्रायश्चित्त करके फिर रुद्रस्नान और पुढेष्टी यज्ञ करे ॥ ९ ॥
ततो दोषवलं ज्ञात्वाप्रत्यक्षादिभिरेवच ।।
विधिवदोषधिंकुर्याद्वन्ध्यादोषनिवृत्तये ॥१०॥
फिर दोष बलको प्रत्यक्ष अनुमान आगमसे जानकर वंध्यादोपकी शांतिके
वास्ते विधिवत् औषधिका उपचार करे ॥ १०॥
वन्ध्यानष्टार्तवाञयाह्यथवार्तवदोषतः ॥
अतस्तदोषशांत्यचिकित्सालिख्यतेमया ॥ ११॥
जिसका ऋतुधर्म अर्थात् महीने २ ऋतुका आना जिस स्त्रीका बन्द हो
गयाहो उसको बांझ कहते हैं। अथवा जिसकी ऋतु वायुआदि किसी दोषकी
खराबी हो स्वीके भी उस सन्तान नहीं होती इसलिये उस बन्ध्या दोषकी
शांतिके वास्ते अब यत्न अर्थात् चिकित्सा लिखते हैं ॥ ११ ॥
(८२) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
नष्टार्तवाका यत्न।
ज्योतिष्मतीकोमलपत्रमनोभृष्टजवान्या कुसुमंचपिष्टम् ।।
गृहांबनापीतमिदंयुक्त्या करोतिपुष्पंस्मरमन्दिरस्य ॥ १२॥
मालकांगुनीके कोमल भुनेहुवे पत्र और अजवायनके फूल इन दोनोंको
कांजीमें पीसकर पीनेसे स्त्रियोंका रज प्रवर्तन होताहै ।। १२
अथवा
Japan
लांगलीकन्दचूर्णवामूलंचैवापमार्गजम् ।।
इन्द्रवारुणिकामूलंयोनिस्थंपुष्पबंधनुत् ॥ १३॥
कलहारीकी जडका चूर्ण, अथवा अपामार्गकी जडका चूर्ण, या इन्द्रायण
की जडका चूर्ण, तीनों से किसीएकका चूर्ण लेकर पानीमें गाढा २ रगडकर
रूपडेकी बातीमें लपेटकर योनीमें रखनेसे स्त्रियोंका रजवर्म खुलकर आने
लगताहै ॥ १३॥
तिलमूलकपायंतुब्रह्मदण्डीयमूलकम् ।।
यष्टीविकटकंचूर्णकाथयुक्तंचपाययेत् ॥
पुष्परोधेरक्तगुल्मेस्त्रीणांसद्यःप्रशस्यते ॥ १४ ॥
तिलकी जडका क्वाथ, अथवा ब्रह्मदंडीकी जडका काथ, बनाकर उसमें
मुलेठी और विकटुकका चूर्ण डालकर पीनेसे रजका अबरोध और रक्तगुल्म
नष्ट होताहै ॥ १४ ॥
दूर्वादलंतंदुलतुल्यभागनिष्पिष्यपिष्टंपरिपाचितंच ॥
तद्भक्षयित्वावनिताप्रणष्टंपुष्पंलभेतस्वबलानुरूपम् ॥१५॥
दूबके पत्ते और चावल दोनोंको बराबर लेकर पिही बनावे इस पिढीको
घीमें भूनकर खानेसे अपनी ताकतके सदृश स्त्री गये पुष्पको फिर प्रकाश
करे ॥ १५॥
योनिशुद्धीकरण ।
प्रथमभगमध्येतुचाणकीपोटलींक्षिपेत् ॥
एकाहंतंप्रकुर्वीतद्वितीयेह्निचमेथिकाम् ॥ १६ ॥
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भाषाटीकासमेत--अ० ७.
(८३)
तृतीयेदिवसे,गीपोटलीतुविनिःक्षिपेत् ॥
ततएलात्वक्तमालंजातीफललवंगकम् ॥ १७॥
जातीपत्रकटफलंचबदरीमूलजत्वचम् ॥
पूतनाफटकांचैवधातकीनलदानिच ।। ३८॥
पद्मांशकरयांचवकरंजफलकांगको ।।
कपीफलसमेतानिसुक्ष्मचूर्णानिकारयेत् ॥ १९॥
मधुनागुटिकांकृत्वाधात्रीफलप्रमाणतः ॥
अनेनयोनिशुद्धिास्यातगर्भयोग्यानसंशयः॥२०॥
पहले दिन चणोंकी पोटली बनाकर योनीमें रक्खे दूसरे दिन मेथीकी
पोटली रखे, तीसरे दिन भांगकी पोटली रखे, फिर चौथे दिन इलायची, तज,
तेजपत्र, जायफल, लौंग, जावित्री, कायफल, बेरीके जडकी छाल, हरड,
फटकडी, धावेके फूल, जटामासी, कमल, मिसरी, करंजके फूल, गुड, पारस
पीपलके फल,इन सबको कपडछानकर सहतमें गोली बनाके आमलेकी समान
भगमें रखे तो भगके सब दोष दूर होकर गर्भाधान योग्य होजावे॥१६-२०
स्त्रीपुरुषकी दोषकी परीक्षा।
येषांमूत्रेणमुद्दाश्चप्रस्फुटानचसांकुराः॥
वन्ध्यत्वंतत्रविज्ञेयंघीणावापुरुषस्यच ॥२१॥
दो ठीकरोंमें अलग अलग मूंग भिगोकर उस स्त्री और पुरुषसे पेशाब
करावे । जिसके मूत्रमें मूंग न फूटे उसकी चिकित्सा करे, जो मूंग फूट निकले
मूंगके आकार सही ठीक पैदा हो तो समझना कि कोई दोष नहीं ॥ २१ ॥
अष्टवन्ध्यावर्णन ।
अष्टौदोपास्तुनारीणांनवमःपुरुषस्यच ॥
रक्तापित्तात्तथावाताच्छ्ष्मणःसन्निपातकात् ॥२२॥
ग्रहदोषविकारेणदेवतानांप्रकोपनात् ॥
व्यभिचारकृताच्चैवरेतोहीनस्तथापुमान् ॥२३॥
(८४)
शुभसन्ततियोगप्रकारा।
आठ प्रकारसे स्वीमें बंध्यादोष होतेहैं और नवमा पुरुषका दोष होताहै।
जैसे १ रक्तसे, २ पित्तसे, ३ वायुसे, ४ कफसे, ५ सन्निपातमे, ६ ग्रहोंके
दोपसे, ७ देवताओंके कोपसे, ८ गुरुजनोंके शापसे, ९. पुरुपके वीर्यविका-
रसे॥ २२ ॥२३॥
वातविकारका निदानचिकित्सा !
अतिसूक्ष्मतररक्तंकुंकुमोदकसन्निभम् ॥
कटिशूलंभवेत्तस्यायोनिशूलंतथाज्वरः ॥ २४ ॥
मारुतस्यविकारोयचिकित्सालिख्यतेऽधुना।
आतिसूक्ष्म (थोडा) रक्त आवे, अथवा केशरके पानीकी सदृश रज हो,
कमरमें और योनिमें शूलहो और ज्वरहो, यह वायुसे दृषित रजके लक्षणहैं ।
अब इसकी चिकित्सालिखते हैं ॥ २४ ॥
मूलंतुसहकारस्यतथाच्याघ्रपदस्यच ।। २५ ॥
बृहतीजंबुमूलेचक्षीरेणालोड्यसापिबेत् ॥
सप्ताहपंचरात्रंवायावत्सवतिशोणितम् ॥२६॥
ततोयोन्यांविशुद्धायालक्ष्मणाक्षीरसंयुता ॥
नस्येपानेचदातव्यातेनसालभतेसुतम् ॥ २७॥
आमकी जड दोनों कटेलियोंकी जड, जामुनकी जड, इन चारोंकी
जडकी छाल बराबर लेकर दूधमें पीसकर वातविकार दूषित रजवाली स्त्री पीवे
५ या ७ दिन जबतक उसके रक्त स्रवतारहै । फिर योनि शुद्धहोनेके अनंतर
लक्ष्मणाको गोदुग्धमें रगडकर पीवे और नस्यलेवे तो वह स्त्री गर्भ धारणकर
पुत्र जनेगी ॥ २५-२७ ॥
पित्त दृ० ल०।
पकजंबूफलाकारकृष्णस्रवतिशोणितम् ॥
कटिशूलंभवेत्तस्याउदरंचप्रदह्यते ॥
पुष्पस्रावंकरोत्युष्णमेतत्पित्तस्यलक्षणम् ॥२८॥
भाषाटीकासमेत-अ० ७. (८५) जो खी पक्व जामुन फल सदृश काला और गर्म रजस्राव करे और कमरमें शूलहो पेटमें दाहहो उसके पित्तदूषित रजके लक्षण जानने ॥ २८ ॥ पित्तदू० ल०। पित्तदपितरतेचक्रियामेतांसमाचरेत् ॥ उत्पलंतगरंकुठंयष्टीमधुकचन्दनम् ॥ २९॥ छागीशीरणसपिष्टवापिबेन्नारीसशोणिता ॥ ततोयोन्यांविशुद्धायामिमांदद्यान्महौषधिम् ॥३०॥ लक्ष्मणांक्षीरसंयुक्तांपूर्ववद्धिप्रदापयेत् ।। तेनसालभतेपुत्ररूपवन्तंगुणान्वितम् ॥ ३१ ॥ जिस स्त्रीका रक्त पित्तसे दूषित हो उसको कमल गट्टा तगर कूठ मुलेहटी सफेद चन्दन यह बकरीके दूधमें पीसकर जबतक औरतका रजधर्म रहे, तब तक पिलावे। फिर जब योनि शुद्ध होजावे इस महाऔषधिको देवे।लक्ष्मणाको दूधमें रगडकर नस्य दे और पिलावे तो वह स्त्री गुणवान् र रूपवान् पुत्रको जनती है ॥ २९-३१ ॥ कफदूषितके लक्षण । कफेनदूषितेपुष्पलक्षणानिनिबोधवै ॥ बहुलंपिच्छिलंरक्तनातिरक्तंभवेत्तदा ॥ ३२ ॥ नाभिमण्डलमूलेतुशूलंभवतिदारुणम् ॥ अर्कमूलंप्रियंगूचकुसुमंनागकेशरम् ॥ ३३॥ बलाचातिबलाचैवछागीदुग्धेनवापिबेत् ॥ त्रिफलात्रिकटुंचैवचित्रकंसमभागकम् ॥ ३४॥ पूर्ववद्धिप्रदातव्यालक्ष्मणाक्षीरसंयुता ॥ जिस स्त्रीका रज कफसे दृपितहो उसके यह लक्षण हैं। रजड्व अधिकहो चिकना और गाढाहो जादे लाल न हो नानिमण्डलमें दारुण शूलहो इसमें आककी जड, प्रियंगु, लौंग, नागकेशर, बला, अतिबला, इनको बकरीके दूधमें रगडकर अथवा त्रिफला त्रिकुटा चित्रक इनको समभाग लेकर बकरीके .
(८६) शुभसन्ततियोगप्रकाश। दूधनें रगडकर तीन दिन या पांच दिन या जबतक रक्तका स्राव रहे कफ दूषित स्त्री पीवे, फिर योनि शुद्ध होनेपर लक्ष्मणाका सेवन करनेसे अवश्य पुत्रहो ॥ ३२-३४ ॥ सन्निपातदूषित। सन्निपातहतेपुष्पेज्वरस्तीत्रश्चजायते ॥ ३५ ॥ शोणितंतुभवेत्कृष्णमत्युष्णंपिच्छिलंबछु ।। कुक्षिकोदरयोन्याचकटयांशुलंचजायते ॥३६॥ गात्रभंगोभवेत्तस्यबहुनिद्रातथैवच ।। गंधर्वहस्तमूलंचसहकारंत्रिवृत्तथा ॥ ३७॥ उत्पलंतगरंकुष्ठंयष्टीमधुकचन्दनम् ॥ अजाक्षीरेणपिष्टतुसप्तरानंततःपिबेत् ॥३८॥ ततोयोन्यांविशुद्धायांश्वेतार्कक्षुद्रिणींतथा । लक्ष्मणांबन्ध्यकर्कोटींश्वेतांचगिरिकर्णिकाम् ॥ ३९ ॥ गवांक्षीरणसंपिष्यनस्येपानप्रदापयेत् ॥ दक्षिणेलभतेपुत्रवामेपुत्रींनसंशयः ॥ ४० ॥ सन्निपातसे दूषित रजहो तो उस स्त्रीको तीव्र ज्वरहो; रजद्रव काला, अत्यन्त उष्ण और चिकना, गाढाहो, कुक्षिमें, पेटमें, योनिमें, कमरमें, दर्द हो, शरीर टूटे, नींद अधिक आवे, यह त्रिदोषके लक्षण हैं। उस स्त्रीको एरण्डकी छाल, आमकी छाल, निशोद, कमल, तगर, कूठ, चन्दन, मुलेठी, इन सबको बकरीके दूधसे रगडकर सावरोज या जबतक रजव्य रहे तो पीवे, इसके अनन्तर जब योनि शुद्धहो तो सफेद आककी जड, छोटी कटेलकी जड, लक्ष्मणाकी जड, बांझककौडा, विष्णुकान्ता सुफेद फूलकी जड, इन सबको गौके दूधमें पीसकर सुंघावे और पिलावे तो अवश्य सन्तानहो। दक्षिण नासिकासे सुधांवे तो पुत्र, वाम नासिकासे पुत्री होतीहै।३५-४०॥ गुरुदेवादिदोषेषुतेषांप्रतिक्रियाहितम् ॥११॥ .
भाषाटीकासमेत--अ०७. (८७) गुरु या देवता आदिके कोपले बन्ध्यादोष हो तो उनकी प्रतिक्रिया अर्थात् उनके पूजन आराधन आदिसे प्रसन्न करना हितकारक है ॥ ४३॥ औरमतसे बन्ध्याओंका वर्णन ! अन्यद्वंध्याष्टकंवक्ष्यसचिकित्संप्रयत्नतः ॥ त्रिपक्षीशुभ्रतीसज्जात्रिमुखीव्याधिणीवकी ॥४२॥ कमलीव्यक्तिनीचैवतासांचिद्वंलिखाम्यहम् ॥ त्रिपक्षीनामयावन्ध्यात्रिपक्षेपुष्पिताभवेत् ॥ ४३ ॥ द्वेजीरकेश्वेतवचाकोटयाश्चफलंसमम् ॥ तण्डुलोदकसंपिष्टंचोत्थितासूर्यसनमुखी ॥४४॥ त्रिदिनंचपिवेन्नारीदुग्धमतंचमोजनम् ॥ तेनगाँभवेत्राःसत्यमेतत्रसंशयः॥१५॥ अब और आठ प्रकारकी बांझ और उनकी चिकित्सा यत्नपूर्वक लिख- ताहूँ। उनके यह नाम और लक्षण हैं--१ त्रिपक्षी, २ शुभती; ३ सज्जा, त्रिमुखी ५ व्याधिणी ६ बकी, ७ कमलिनी, ८ व्यक्किनी । इनके अब मैं लक्षण यत्नसे लिखताहूँ। जो खी तीन पक्षों अर्थात् १॥ महीनेमें रजोवती हो उसको त्रिपक्षी कहते हैं उसका यह यत्न करे। दोनों जीरे, सफेदवच, ककौडेके फल, ये सब समान भाग लेकर तण्डुलजलमें पीसकर सूर्य के सामने खडी होकर तीन दिन पीये और दूध चावल खावे त्रिपक्षीवंध्या दोष दूर होकर पुत्रहो ॥ ४२-४५॥ गावंसंकुचतेनित्यंदेहेचैवविवर्णता ॥ शुभ्रीतिनामसावंध्यागर्भस्तस्यनजायते ॥४६॥ शुनी नाम वंध्याका शरीर सदा सकुचासा रहै, देहमें नित्य विवर्णताहो, इसको कभी गर्भ नहीं होता ॥ ४६ ॥ अप्रमाणैश्चदिवसः सज्जापुष्पप्रसूयते ॥ जीरेवचांसमंगांचगृहीयाच्छुभवासरे ॥४७॥ ४ 6
(८८) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
ककोटींशृंखलाकारापिष्वातंडुलवारिणा ॥
दिनत्रयंयतानारीसूर्यस्यसंमुखीपिबेत् ॥
दुग्धभक्तंचभुजीतभवेद् नसंशयः ॥४८॥
विनाप्रमाणसे कभी आगे कभी पीछे कभी महीनेमें कई दफा सज्जानामद
वथ्या पुष्पवती होतीहै। दोनों जीरे, वच, मजीठ, ककोडा,हडजोरी,इन सबको
चावलोंके जलसे रगड कर मूर्यके सन्मुख खडी होकर तीन दिन पीवे दूध
और चावल पथ्य खावे तो अवश्य गर्भ धारण करे ॥ ४७ ॥४८॥
त्रिमुखीनामयावंध्यामैथुनेसलिलंसवेत् ।।
भोजनेमैथुनेलोल्यंगमस्तस्यानजायते ॥४९॥
त्रिमुखी नाम वंध्यासे मैथुनके समय नित्य पानी चलता है और
यह भोजन और मैथनमें चपलता व स्नेह रखतीहै इसकेभी सन्तान
नहीं होताहै ॥ ४९ ॥
व्यानिण्याउत्तरेकालेऽपत्यमेकंग्रजायते ।।
त्रिपक्ष्युक्तंप्रदातव्यमौषधंपुत्रदायकम् ॥२०॥
व्यात्रिणी नामक बंध्या अधिकावस्थामें एक पुत्र उत्पन्न करतीहै इसको
त्रिपक्षीकी चिकित्सा जो दवा लिखीहै वही देनी चाहिये ॥ ५० ॥
बक्यसृक्स्रवतेश्वेतंअष्टमेदशमेदिने ॥५१॥
बकी वंध्याके आठवें दशवें दिन सफेद धातुकी सदृश स्राव होताहै। इस
स्त्रीके संतान नहींहोती ॥ ५१ ॥
सलिलंस्रवतेयोन्याःकमलिन्यांनिरंतरम् ॥ १२॥
कमलिनी बंध्याकी योनिसे निरन्तर जल स्रवताहै यहभी निःसन्तान
होतीहै ॥ ५२॥
व्यक्तिनीनामयावंध्याप्रमेहोभवतिस्फुटम् ।।
रक्तापामार्गबीजंशर्करामर्दकीफलम् ॥५३॥
औषधीरत्नमालांचगोदुग्धेनप्रपेशयेत् ॥
त्रिसप्तदिवसंपीत्वाप्रमेहनाशयेधुवम् ॥५४॥
भाषाटीकासमेत-अ० ७.
(८९)
40
कृष्णागुरुकेशरंचकोटींसफलांतथा ॥
जिीरकेसवत्सागोक्षीरणालोडयसापिबेत् ॥५५॥
व्यक्तिनी नाम वंध्याके प्रमेहकी समान सफेद धातु गिरतीहै इसको लाल
अपामार्गके बीज मिसरी कौंचकेबीज रत्नजोत, इन सबको बारीक पीसकर
गोदधसे सात दिन पीये। फिर काली अगर नागकेशर, ककोडा कालाजीरा,
सफेद जीरा, इन सबको बछडे वाली गायके दूधके साथ सात दिन पीवे दूध
चावल पथ्य करे तो अवश्य गर्भ हो ॥ ५३-५५ ॥
वैद्यकसे वंध्याके आठप्रकार ।
जन्मवंध्याकाकवन्ध्यामृतवत्सातथैवच ॥
स्रवद्र्भागलदर्भाकन्यापत्यंप्रसूयते ॥५६॥
मूढगर्भारजोहीनाह्यष्टौवंध्या प्रकीर्तिताः॥
उक्तंचिकित्सितंकिंचितकिंचिदप्रवक्ष्यते ॥२७॥
जिस स्त्रीके कोई सन्तान नहीं उसको जन्मवंध्या कहतेहैं ३ जिसके
सिर्फ एकपुत्र होकर फिर संतान नहीं उसको काकवंध्याकहते हैं । २ जिसके
संतान हो हो कर मरजावे वह मृतवत्सा कहाती है ३ जिसका दो महीनेबाद
गर्भस्राव होजायाकरे उसको स्रवद्गर्भा कहतेहैं ४ जिसके चार महीनेतक
गर्भ रहकर गिरजाया करे उसको गलद्धर्मा और पतितगर्भा भी कहतेहैं ५
जिस स्त्रीके कन्याही कन्याहो और पुत्र न हो उसको कन्या प्रजा कहतेहैं ६
जिसके गर्भ होकर बढे नहीं और दूसरा गर्भभी नहो उसको मूढगर्भा कहतेहैं ७
जो स्त्री पुष्पवती न होतीहो उसको रजोहीना कहते हैं८ये आठ प्रकारकी बंध्या
उनमें रजोहीनाकी चिकित्सा कहचुके बाकी आगे कहेंगे ॥५६ ॥ ५७ ॥
अथगर्भप्रदायोगा-लक्ष्मणाद्यंघृतम् ।
लक्ष्मणांचंदनलोघेउशीरंपद्मकंशठी ॥
देहरिदेवचाकुष्टंप केशरमुत्पलम् ॥ ५८ ॥
शारिवद्वेविडंगानिसुमनःकुसुमानच ।।
मांसीदारश्वदंष्ट्राचरेणुकंचोत्पलंतथा ॥ ५९ ॥
(९०) शुभप्तन्ततियोगप्रकाश।
मधुकंशतपुष्पाचमात्रैपांकार्पिकाभवेत् ॥
एभिर्वाजघृतप्रस्थंशीरंदत्त्वाचतुर्गुणम् ॥ ६० ॥
तत्कषायंदशगुणस्नेहपाकविधिपचेत् ॥
गुणांस्तस्यप्रवक्ष्यामिघृतस्यास्यमहात्मनः ॥६१ ॥
गर्भिणीनांचनारीणांणनाऽभ्यंजनभोजनैः ।।
बालानांग्रहजुटानांघृतमेतत्पशस्यते ॥ ६२ ॥
वंध्यापुष्टिप्रदंपोष्टयमपुत्राणांचपुत्रदम् ॥
श्रेष्टवायोनिरोगेस्यादसग्दरविनाशनम् ॥
यन्मयालिखितोतल्लक्ष्मणाद्यवृतमहत् ।। ६३ ।।
अब गर्भप्रद योग कहतेहैं लक्ष्मणा, चंदन, लोध, खस, पद्माख, कचूर,
हलदी, दारुहलदी, वच, कूठ, कमल केशर, कमल, दोनों सारिखा, विडंग,
चमेलीके फल, बालछड, देवदारु, गोखरु, रेणका, कमोदनी, मुलैठी, सौंफ,
इन सबको एक २ तोला लेकर कल्क बनावे । ब रीका घृत १ प्रस्थ दूध ४
प्रस्थ उपराक्त कल्क वाली औषधियोंका काथ १० प्रस्थ इन सबको एकत्र
कर स्नेह पाक विधिसे पकाये । सिद्ध होनेपर इस घृतको स्त्रियोंके पान और
अत्यंग तथा भोजनमें प्रयोग करे । यह घृत बालकोंको अत्यंत हितकारीहै ।
वंध्या स्त्रीको और अपुत्रिणीको पुष्टकर्ता और पुत्र देने वालाहै योनिरो-
गमें अतिश्रेष्ठ है, प्रदरको नष्ट करताहै ॥ ५८-६३ ॥
फलघृत ।
सहचरेद्वेत्रिफलांगुडूचीसपुनर्नवाम् ॥
शुकनासाहरिद्वेरास्नामेदांशतावरीम् ॥ ६४ ॥
कल्कीकृत्यघृतप्रस्थंपचेत्क्षीरचतुर्गुणम् ॥
तत्सिद्धप्रपिबेनारीयोनिशूलनिपीडिता ॥६५॥
पीडिताचलितायोनिनिःसृताविवृताचया ॥
पित्तयोनिश्चवित्रस्ताषण्डायोनिश्चयास्मृता ॥ ६६॥
- . भाषाटीकासमेत--अ० ७. (९१) प्रपद्यतेतुतास्थानंगर्भगृहतिचासकृतः ॥ एतत्फलघृतंनामयोनिदोपहरंपरम् ।। ६७ ॥ दोनों प्रकारका पियाबाँसा । त्रिफला, गिलोय, पुनर्नवा, स्योनाक, दोनों हलदी, राना, मेदा और शतावर, इनका कल्क बनाकर एकप्रस्थ बी, चौगुने दूधसे सिद्ध करे। सिद्ध होनेपर इसके सेवनसे योनिशूल, पीडितयोनि चलाय- मान योनि, निमृतयोनि, पित्तजयोनि, बिस्तयोनि, पंडयोनि, यह सब योनिरोग दूर होकर शीघही गर्भ होनेकी सामर्थ्यहो । यह फलघृत सब योनि रोगोंको दूर करताहै ।। ६४-६७ ॥ बृहत्फलघृत। मनिष्ठामधुकंकुष्ठंत्रिफलाशर्करावलाः ।। मेदापयस्याकाकोलीमूलंचैवाश्वगंधजम् ॥ ६८ ॥ अजमोदाहारदेवहिंगुकटुकरोहिणी ॥ उत्पलंकुमुद्राक्षाकाकोल्यौचंदनव्यम् ॥ ६९ ॥ एतेषांकार्षिकै गैघृतप्रस्थंविपाचयेत् ॥ शतावरीरसक्षीरंघृतादेयंचतुर्गुणम् ॥ ७० ॥ सपिरेतन्नर पीत्वास्त्रीषुनित्यंवृषायते ॥ पुत्रंजनयतेनारीमेधाढ्यंप्रियदर्शनम् ॥ ७ ॥ याचैवाऽस्थिरगर्भास्याधावाजनयतेमृतम् ।। अल्पायुषंवाजनयेद्याचकन्यांप्रमूयते ॥ ७२ ॥ योनिदोषेरजोदोषेपरिस्रावेचशस्यते ॥ प्रजावर्द्धनमायुष्यंसर्वग्रहनिवारणम् ॥ ७३ ॥ नानाफलघृतंचैतदश्विभ्यांपरिकीर्तितम् ॥ अनुक्तंलक्ष्मणामूलंक्षिपंत्यत्रचिकित्सकाः ॥७४ ॥ मँजीठ, मुलेठी, कट, त्रिफला, मिसरी, खरेंटी, मेदा; काकोली, क्षीरका- कोली, असगंधकी जड, अजमोद, दोनों हलदी, हींग, कुटकी, कमल,कमो-
(९२) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
इनी, गुनक्का, दोनों काकोली, दोनों चंदन, प्रत्येक एक २ नोला लेकर कल्क
बनावे । गोघृत एकप्रस्थ, शतावरका रस ४ प्रस्थ गौका दध ४ प्रस्थ, लेकर
वृत सिद्ध करे । इस वीको पान करनेसे पुरुष स्त्रीसे वृषभ समान रमणकरे ।
स्त्री इस घृतको पान करनेसे मेधा संपन्न प्रियदर्शन पुत्रको जने । जिन नियोंका
गर्भ स्थिर न रहे, जिसके मरीहुई संतानहो, या अल्पायु पुत्रहो, या कन्याही
कन्याहोतीहों, तथा योनिरोग, रजोदोप, योनिस्राब, आदि इस व्रतसे सबरोग
दूरहों । संतान के बढानेवाला अवस्थाको स्थापन करनेवाला सब ग्रहों को दूर
करनेवाला अश्विनीकुमारका निर्माणकिया यह फलाहै। बिना कहेभी वैद्य-
लोग इसमें लक्ष्मणाकी जड मिलातेहैं ।। ६८---७४ ॥
शतावरीघृत ।
शताव-विदा-श्चतथामापात्मगुप्तयोः॥
श्रदंष्ट्रायावनिवाथेनल्वणेचपृथक्पृथक् ॥ ७९ ॥
साधयित्वावृतप्रस्थंपयश्चतुर्गुणंपचेत् ॥
शर्करामधुसंयुक्तमिलित्वातत्प्रयोजयेत् ॥ ७६॥
शतावर, विदारीकन्द, उडद, कौंच, गोखरू इनका अलग २ काथ
एक २ प्रस्थ बनाकर १ प्रस्थ घी दूध ४ प्रस्थ इस घीको साधन
करके इसमें शहद और मिसरी मिलाकर खानेसे बन्ध्या स्त्री गर्भवती
होतीहै ।। ७५-७६ ॥
वृद्धदारुकघृत ।
वृद्धदारुकमूलेनघृतंपकंपयोन्वितम् ॥
एतद्देष्यतमंसर्पिःपुत्रकामःपिबेन्नरः ॥ ७७ ॥
विधारेकी जडके काथसे दूधयुक्त सिद्ध किया घृत, अत्यन्त वृष्य,
और
वन्ध्या स्त्रीको गर्भप्रदहै ॥ ७७ ॥
बृहत्कल्याणघृत ।
मुस्ताकुष्ठंहरिदेवपिप्पलीकटुरोहिणी ।।
काकोलीक्षीरकाकोलीविडंगत्रिफलावचा ॥ ७८॥
भाषाटीकासमेत-अ० ७. मेदारास्नाऽश्वगंधाचविशालाचप्रियंगुका ।। देशारिवेशताह्वाचदन्तीमधुकमुत्पलम् ॥ ७९ ॥ अजमोदामहामेदाचन्दनरक्तचंदनम् ॥ जातीपुष्पंतुगाक्षीरीशर्कराहिंगुकट्फलम् ॥ ८० ॥ चतुर्गुणेनपयसाविपचेदोमयाग्निना ।। नक्षत्रेपुष्यसंपन्नभांडेताम्रमयेहढे ॥ ८ ॥ कलशेवापिकल्याणकृतकोतुकमंगलः।। सपिरेतन्नर पीत्वास्त्रीषुनित्यवृषायते ।। ८२ ॥ एतदध्यापिबेन्नारीयाचकन्याप्रजायिनी ।। याचैवास्थिरगर्भास्याद्याचसूतापुनःस्थिता ।। ८३॥ अनायुवाजनयेद्याचजनयतेमृतम् ।। सानारीजनयेत्पुत्रवेदवेदांगपारगम् ॥ ८ ॥ रूपलावण्यसंपन्नमजरंचशतायुषम् ।। बृहत्कल्याणकनामभारद्वाजेननिमितम् ॥ अनुक्तंलक्ष्मणामूलंक्षिपेच्चैवविशषतः ।।८५॥ मोथा, कूठ, दोनों हलदी, पीपल, कुटकी, दोनों काकोली बा त्रिफला, वच, रास्ना, मेदा, असगंध, इन्द्रायण, फूल, प्रियंगु, दोनों शारिवा शतावर दंती, मुलैठी, कमल, अजमोद, महामेदा, दोनों चन्दन चमेली के फूल, वंशलोचन, मिसरी, हींग, कायफल इन सबका कल्क बना कर चौगुने दूधसे वृत सिद्ध करे। पुष्य नक्षत्रमें तामेके पात्रमें घृत सिद्ध करके मंगल मनाके इस घृतको सेवन करे। इसके सेवनसे पुरुष स्त्रियोंमें वृष समान रमण करे । इस घृतको स्त्री पीवे तो बन्ध्यादोष, कन्याप्रजात्व, जिसके गर्भ न रहताहो, या रहकर नष्ट हो जिसके मरी हुई सन्तानहो, जिसके अल्पायु पुत्रहो, यह सब दोष नष्ट होकर उस स्त्रीके वेद वेदांग जाननेवाला, रूप लाव- ण्ययुक्त,अजर,शतायु पुत्र होता है। यह बृहत्कल्याण घृत भारद्वाजका निर्माण किया हुवा है इसमें लक्ष्मणाकी जड अवश्य डालनी चाहिये ॥७८-८५॥ "
(९४) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
अन्यगर्भपदयोग।
बलामतिबलांचवैशर्करामधुयष्टिकाम् ।।
सारंमधुघृतंचैवपीतंगर्भप्रदपरम् ॥ ८६ ॥
खिरैटी, कंगही, मिसरी, मुलैठी, दूध, सहत. इनको मिलाकर पीनेसे स्त्री
गर्भवती होती है ।। ८६॥
नागकेशरपूगास्थिचूर्णगर्भप्रदंपरम् ॥ ८७॥
नागकेशर, सुपारी, हाथीदांतका बुरादा इस चूर्णके सेवनसे अवश्य गर्भ
होता है ॥ ८७॥
काथेनहयगंधायाःसाधितंसघृतपयः ।।
ऋतुस्नाताऽवलाऽपीत्वागभैधतेनसंशयः ।। ८८॥
असगन्धके क्वाथसे सिद्ध किया षत युक्त दूध, ऋतु स्नाता स्त्री पीकर
अवश्य गर्भ धारण करती है ॥ ८८॥
पिप्पलीशृंगवेरंचमरीचंकेसरंतथा ॥
घृतेनसहपातव्यंवंध्यागर्भप्रदंपरम् ॥ ८९ ।।
पीपल, अदरक, कालीमिर्च, और नागकेशर, इन सबका र्ण करके
घृतके साथ पीनेमे बन्ध्या स्त्रीके गर्भ होता है ॥ ८९ ॥
पुष्योद्धृतलक्ष्मणायामूलंपिष्टंचकन्यया॥
ऋत्वंतेवृतदुग्धाभ्यांपीत्वाप्नोत्यबलासुतम् ॥१०॥
पुष्य नक्षत्रमें उखाडी हुई लक्ष्मणाकी जडको कन्यासे पिसवाकर घी
और दूधसे पीवे तो अवश्य पुत्रहो ॥ ९० ॥
जीवकपुत्रकबीजंक्षीरेणापिबेत्सपत्रमूलंच ।।
दारकनष्टावनिताजनयतिदीर्घायुषपुत्रम् ।। ९१॥
जीयेपोतेके बीज पत्र, मल, इनको दूधके साथ रगडकर पीनेसे नष्ट
सन्तती बन्ध्या दीर्घायु पुत्रको जनमती है ॥ ११ ॥
भाषाटीकासमेत-अ० ७. क्षीरेणश्वेतबृहतीमूलंनासिकयापिबेत् ॥ दाक्षणवाऽऽत्मजार्थवाकन्याथैवामयातथा ॥ ९२ ॥ सफेद कटेलीको जडको दश्में पीसकर दहने नथनेसे पीनेसे पुत्र, बामे नथनेसे पीनेसे कन्या उत्पन्न होतीहै ।। ९२ ॥ तिलतैलंकुडवमेकंवृषसलिलसंयुतंपकम् ॥ ऋतुकालांतेपीत्वागर्भविदधातिवंध्यापि ।। ९३॥ एक कडव परिमाण तिल के तेलको अडूसेके क्वाथते सिद्ध करे और ऋतु खाता स्त्री पीवे तो अवश्य वंध्याभी गर्भ धारण करे ॥ ९३ ॥ अथवा । न्यग्रोधशुङ्गासनकंप्रवालचूर्णचसवर्णवत्सायाः॥ गोक्षीरंपरिपीतपुत्रप्रकरोतियुष्यः ॥ ९४ ।। पुष्यनक्षत्र में वड के अंकुर विजयसार मनेका चर्म, एक के बछडेवाली गौके दूध साथ पीनेसे अवश्य पुत्र होताहै ॥ ९४ ॥ पुष्योद्धृतंलक्ष्मणायाश्चक्रांगायास्तुकन्यया ॥ पिष्टमूलंहविर्दुग्धंपीतमृतौतुपुत्रदम् ॥ ९६ ॥ लक्ष्मणाकी जड और सुदर्शनकी जडको पुष्य नक्षत्रमें उखाडकर कन्यासे पिसवाकर ऋतुस्नाता स्त्री पीवे तो अवश्य पुत्रहो ॥ ९५ ॥ पुत्रसंजीविकामूलंविष्णुक्रांतांसलिागेकाम् । पीत्वापुत्रमवाप्नोतिनकंन्याजायतेस्फुटम् ॥ ९६ ॥ जीयेपोतेकी जड, विष्णुकांता, शिवलिंगी, इन तीनों औषधियोंको गायके दूधसे पीसकर ऋतुसे शुद्धहो वो खावे तो अवश्य पुत्रहो कन्या न हो॥१६॥ श्वेतकुलित्थसंभूतंमूलं नागबलोद्भवम् ।। अपराजितामृतुस्नातागोदुग्वेनसमंपिवेत् ।। ९७ ॥ सफेद कुलथीकी जड, मंगेरनकी जड, अपराजिताकी जड, इन सबको समान भाग लेकर गौके दधमें पीसके ऋतुस्नाता स्त्री पीवे तो गर्भधारण करे९७॥
(९६) शुभमन्ततियोगप्रकाश। मूलंशिखाया खलुलक्ष्मणायास्तानिपीयधिदिनपयाभिः ।। क्षीरानच-नियमनमुंक्तपुत्रप्रसूतेवनिताचचित्रम् ।। ९८ ॥ लक्ष्मणाकी जड पत्ते लेकर ऋतुमे शुद्ध होकर स्त्री गांक दधम पीव तो अवश्य बुद्धिवान् पुत्रको उत्पन्न करे ।। १८ ।। गर्भाधानक्रम । आर्तवदोपतःशुद्धामुक्तायोनिविकारतः ॥ पूर्वोक्तनाविधानेनपतिप्राप्यवरांगना ।। ९९ ।। विधिवदर्भमाधायपतिधर्मपरायणा ॥ उच्चित्ताननदेहास्त्रीतिष्ठेद्वत्याश्रमंत्यजेत् ।। एवंसातमाप्नोतिरूपायुबलशालिनम् ॥ १० ॥ आर्तवदोष अर्थात् ऋतुकी खराबीसे शुद्ध होकर और यानिविकारमे छूट- कर अर्थात् फलघृत आदि योनिविकार नाशक औपथियासे सब योनिविकार होकर पूर्वोन ( स्त्रीचर्या में जो पहले कह चुके ) विधानसे पतिव्रता स्त्री अपने पतिसे विधिवत् (वाजीकरणसे पुष्टवीर्यवाले ऋतुगामी पविस)गर्भको धारण करके मैथुनके अन्तमें सीधी उत्तान होकर शयन करके रतिके श्रमको छोडे इस प्रकार करनेसे रूपवान बलवान् पुत्रको उत्पन्न करतीहै९९॥१००॥ संजातगर्भके लक्षण। छर्दाग्लेरुचिनित्यंष्टीविकारोमराजिका ॥१॥ अरुचिस्तनयो काष्ण्यग्लानिराटोपवर्जितम् ।। कुक्षेरक्ष्णोः पक्ष्मलवंगर्भिणीस्फुटलक्षणम् ॥२॥ वमन होना, खट्टे पदार्थोंपर रुचि, थूकना, रोमोगम, भोजनमें अरुचि स्तनोंका मुख काला हाना, ग्लानि, पेटमें गुडगुडाहट, कोख और आंखोंकी पलकें भारी होना, ये गर्भवतीस्त्रीके लक्षणहैं ॥ १॥२॥ गर्भस्राव-गर्भपात-मृतवत्सा। स्रवद्गर्भापतद्गर्भामृतवत्साचयातथा ॥ तासांचिकित्सितंवक्ष्यगर्भव्यापच्चिकित्सके ॥३॥ से
भाषाटीकासमेत-अ०७. (९७)
उक्तापुताइयोवैयेहितं तेपहिसेवनम् ॥
योगद्वयंप्रसंगावअधुनाप्यवलिख्यते ॥४॥
गर्भस्राव और गर्भपात और मृतवत्साकी चिकित्सा आगे गर्भव्यापत्ति
चिकित्साके अध्यायमें लिखेंगे और जो फल घृत आदि घृत हम इसी अध्या-
यमे लिख चुके हैं उनका सेवन परम हितकर और गर्भ दोष निवारकहै।
फिरभी हम प्रसंगवश दो योग लिख देतेहैं ॥ ३॥४॥
प्राङ्मुखः कृत्तिकारशेवन्ध्याकाटकहरेत् ॥
तत्कन्दंपेपयेत्तोयेकर्षमात्रंसदापिबेत् ।।
ऋतुकालेतुसप्ताहंदीर्घजीवीसुतोभवेत् ॥५॥
कृत्तिका नक्षत्रमें पूर्वको मुख करके बांशककोडेकी जडको उखाड लाबे
फिर उसके कन्दको जलमें पीसकर ऋतु स्नानके दिनसे ७ दिन तक पीवे
तो दीर्घायु पुत्र पैदा होताहै ॥ ५ ॥
अथवा
याबीजपूरटुममूलकंवासीरेणसिद्धहविषानिमित्रम् ॥
ऋतौनिपीत्वासुपतिप्रयातिदीर्घायुपंसातनयंत्रसूते ॥६॥
जो खी रिजौरेनींबूकी जडको दूधमें पकाकर थी मिलाके ऋतुसे शुद्ध
होकर भक्षण करके पतिके निकट जावे उस स्त्रीके दीर्घायु पुत्र उत्पन्न
होताहै ॥६॥
उपसंहार।
वंध्याचिकित्सिताध्यायंकथयित्वाविधानतः ॥
गर्भव्यापचिकित्साधिवक्ष्येतद्धितकाम्यया ॥७॥
वंध्याचिकित्साका अध्याय विधानपूर्वक लिखचुके अब गर्भव्यापकचि-
कित्सा गर्भ में निर्विघ्नताके लिये अर्थात् बच्चा गर्भसे सुन्दररीतिसे सुसमय पैदाहो
इसलिये गर्भव्यापच्चिकित्सा कहेंगे ॥ ७ ॥
इति श्रीशुभसंततियोगप्रकाशे वंध्याचिकित्सितं नाम सप्तमाध्यायः ॥ ७ ॥
হননিঘাসফুসে।
अथातोगर्भव्यापचिकित्सिताऽध्यायव्याख्यास्यामः ॥१॥
अब इसके अनंतर गर्भव्यापत्ति चिकित्साका अध्याय वर्णन कते हैं॥१॥
गर्भवतके कृत्य ।
तदाप्रभृत्येवव्यायामव्यवायमतर्पणमतिकर्पणं
दिवास्वापराविजागरणंशोकयानावगहणं
भयमुत्कटकासनकांततःस्नेहविकियां
शोणितमोक्षणंचाकालेवेगविधारणनमवेत ॥२॥
जबसे गर्भ मालमहो तभीसे व्यायाम, अतिपरिश्रम. मैथन, दाहादिजनक
पदार्थ, अतिकर्षण (तेजविरेचनादि) कशकर्ता, आहार, विहार, दिनमें माना.
रात्रिको जागना, शोक, बान आरोहण, भय, जोरसे खांसना या उत्कट
आसन, अकाल नियमस तैलायंग अर्थात् आठ महीने से पहले गथा नि-
कलवाना वेगोंका रोकना इन सबको गर्भवती भी त्यागदवे ॥ २ ॥
गर्भ क्यावस्त है।
शुक्रशोणितंगर्भाशयस्थमात्मप्रकृतिविकारसंमच्छितंग इत्युच्यते ॥
माताके गर्भाशयमें जो जीव और प्रकृति तथा पञ्चमहाभूत एकादश
इंद्रिय, इनसे मिश्रित शुक्र और शोणितका धनीभृत मिलाहुवा जो आकारहै
वह गर्भ कहाजाताहै ॥३॥
तञ्चचेतनावस्थितंवायुर्विभजति तेजएनंपाचयतिआपकेदयंति
पृथिवीसंहतिआकाशंविवर्द्धयतिएवंविवदितःसयदाहस्तपादजि-
बावाणकर्णनितंबादिभिरंगरुपेतस्तदाशरीरमितिसंज्ञालभते ॥४॥
उस चेतनायुक्त गर्भको वायु विभाग कर्ताहै अर्थात दोष धात्वादिको
जुदा २ यथावस्थित कर्ताहै । तेज अर्थात् अग्नितत्व पकाताहै । जल क्लेदन
करताहै । पृथ्वीतत्त्व करडा मूर्तिमान् करदेवाहै । आकाश उसको
बढाताहै। जब इस प्रकारसे बनता और बढता हुवा गर्भ हाथ, पाँव, जिह्वा,
नासिका, कर्ण, नितंब, आदि अंगोंसे उपयुक्त होताहै तब यह शरीर संज्ञाको
प्राप्त होताहै ॥ ४॥
भावाटीकासमेत-अ०८. (९९)
गर्भावतरणक्रम ।
प्रथमेमासिकललंजायते ॥६॥ द्वितीयेशीतोष्णानिलैरभिश्प
व्यमानानांमहाभूतानांसंघातोधनःसंजायतेयदिपिंडापुमान्त्री
वेत्पेशीनपुंसकंचेदर्बुदमिति ॥ ६ ॥
गर्भका आकार पहले महीने में कलल ३२ रूप होता है । दूसरे, महीने
में शीत और उच्या तथा वायुसे परिपाक हुए पृथिव्यादि महाभूतोंका संघात
होकर पिंडासा होजाता है वह पिंडा यदि गोलहो तो, पुत्रका गर्भ जाने जो
लम्बी पेशीती हो तो कन्याका गर्भ जाने, यदि आवे कटे फलके समान हो
नो नपुंसक गर्म होता है ॥ ५५ ॥ ६ ॥
तृतीयेहस्तपादशिरसांपञ्चपिण्डकानिवर्तते
अंगप्रत्यंगविभागश्वसूलमोभवति ॥ ७॥
तीसरे नहीनेमें हाथ, पांच शिर. इन पांचोंके पांच भासानी निकालने
अगती हैं और ोडा थोडा अंग प्रत्यगका विभाज प्रगट होने लगता है।
बसवमत्यंगविभागोहदयभव्यक्तभागाचेतनधातुर
भिव्यक्तीभवत्यत नारीदाढदिनीमाचक्षते ॥ ८॥
चौथे महीने में सम्पूर्ण अंगों और प्रत्यंगोंका विभाग होता है, गर्भ में हृदय-
के प्रगट होनेसे चयन धातु ( जीव ) प्रगट शतीत होने लगता है, इसलिये
चेतन इंद्रियोंके अर्थ रुचि करताहै तभीसे चौथे महीनेसे एक गर्भस्थ बालक
शा हृदय और स्त्रीका हृदय दो होनेसे स्त्रीको दौहदिनी कहा जाता है ॥८॥
दोहदके न मिलनेसे हानि ।
दौहृदविमाननातकुब्जवंजंजडंवामनविकृताक्षनारीजनयति ।
तस्मात्सायद्यदिच्छेत्तत्तस्मैदापयेत् ॥ ९॥
दौहृद न मिलने से (दो हृदय वाली स्त्रीके वांछितको दौहृद कहते हैं)
कुबडा खंज, पांगुला, बौना, मूर्ख, विकारयुक्तनेत्रोंबाला, पुत्र पैदा होता है
इसलिये दौहृदा स्त्री जो जो इच्छा करे सो सो देना चाहिये ॥ ९ ॥
(३००) হারবি?সাহা।
दोहरके लाभ
लब्धदौड्दाहिवीर्यवन्तचिरायुपंधुत्रंजनमाने ।। १० ।
दौहृद मिलनेसे पराक्रमवाला दीर्घायु पुत्र पैदा होता है ॥ १० ॥
इंद्रियार्थास्तुयान्यान्सानोजमिच्छतिगर्भिणी ।।
गर्भबाधामयातांस्तान भिषणाहत्वदापत ।। १३:
जिन जिन इंद्रियों के अर्थोको गर्भिणी स्त्री भोगना चाहे गर्भ बाथ
होनेके भयसे वैद्य उन उन सब भोगोंको दिलावे ॥११॥
राजसंदर्शनेयस्यादौहृदजायतेत्रियाः ॥
अर्थवंतमहाभागंकुमारंसानसूयते ॥ १२ ॥
जिस गर्भवतीका मन राजाके देखनेको चाहे उस श्रीक
भावन
वाला पुत्र होता है ॥ १२ ॥
आश्रमसंयतात्मानं धर्मशीलंप्रसूयते ।।
दर्शनेव्यालजातीनांहिंसाशीलंपसूयते ।। १३॥
जिस गर्भवती स्त्रीका मन महात्माओंके आश्रम और तीर्थादि देखना चाह
उसके धर्मात्मा पुत्र होता है । जो श्रीका चित्त सादि हिंसक जीवोंको देख-
नेको चाहे उसके हिंसक पुत्र होताहै।॥ १३ ॥
अतोनुक्तेषुयानारीसमभिध्यातिदोहदम् ॥
शरीराचारशीलेस्सासमानजनयिष्यति ॥ १४॥
कर्मणाचोदितंजंताभवितव्यानभवेत् ॥
यथातथादैवयोगादौहृदंजनयेध्रुवम् ॥ १५ ॥
इससे सिवाय जो यहां नहीं कहेहैं उन पर खीका दौहद होनेसे उन्हीं के
शरीर आचार और स्वभावकी समान या जिस वस्तु फल आदिके ऊपर
चित्त चले उसके अनुरूप गुण प्रकृतिका पुत्र होताहै ॥ १४ ॥ कर्मका प्रेरण
किया हुवा और होनहार जैसा होताहै दैवयोगसे वैसा, वैसाही स्वीका मन
चलताहै ॥ १५॥
नापाटीकालनेव-अ०८.
(१०१)
ANT
पंचमेमन प्रतिबुतरं भवतिषष्टबुद्धिः
सप्तमेसवीगप्रत्यंगविभागःप्रव्यक्ततरः॥ १६॥
चवें महीने में मनमें अधिक चैतन्यता होजातीहै और छठेमें बुद्धि उत्पन्न
होतीहै, सातवेंमें संपूर्ण अंग प्रत्यंग स्पष्ट रूपसे स्फुट होजातेहैं ।। ३६ ।।
असेऽस्थिरीमवत्योजबनमनशमैकादशद्वादशेनाजायते
अन्यथाविकारोभवति ।। १७॥
आठमें ओज स्थिर नहींहोता, इसलिये आठवें महीनेका जन्माउँदा
बालक अल्पायु होताहै नबमें दशौ प्रहारहवें भारहवें महीने ककभी बालक
जन्मताहै इससे अन्यथा विकार होताहै ।। १७ ॥
गर्भकी पुष्टी!
मालुस्तुखलुरसबहायांनाड्यांग नामिनाडीप्रतिबद्धासास्यमा-
दुलहाररसवीर्यमभिवहतितेनापनेहेनाल्याभिवृद्धिर्भवति ॥ ३८ ॥
साताके कियेहुवे भोजन आदिके रसके बहानेवाली नाडियोंमें बालकको
नाभि ( नाल) लगी हुई होतीहै, वह माताके किये आहारके रस वीर्यको
माप्त करलेतीहै उसके सारभूत लेहसे गर्भस्थ बालककी वृद्धि होतीहै ॥ १८॥
असंजातांगप्रत्यंगविभागमानिपेकात्प्रभृतिसर्वशरीरावयवानुसा-
रिणीनारसवहानांतिर्यग्गतानांधमनीनामुपस्नेहोजावयति॥१९॥
जबतक गर्भके अंग प्रत्यंग नाभि नाडी आदि कुछ नहींहोते केवल पिंड
रुपही गर्भ होताहै । तब अर्थात स्थितिके समयसे लेकर गर्भवतीके मारे
शरीरके अनुसरण करनेवाली रस बहानेवाली तीर्यगमन करनेवाली धमनियों
का उपस्नेह गर्भको जीवन (पोषणादि)करताहै ।। १९ ॥
गर्भके अंगोंकी उत्पत्ति ।
सागप्रत्यंगानियुगपत्संभवंतिसूक्ष्मत्वात्रो-
पलभ्यतवंशांकुरखच्चूतफलवच्च ॥ २० ॥
(१०२) शुभसन्ततियोगप्रकाश
बालकके गर्भ में सब अंग प्रत्यंग एककालहीने पैदा होतेहैं। जूक्ष्न होने के
कारण जाने नहीं जासक्ते । जैसे बांसके अंकुर और छोटे आममें सब अवयव
होतेहुवेभी प्रत्यक्ष दीखते नहीं फिर ठीक समयपर बॉनमें सपशाखा और
आममें पकनेपर सूफ और गुठली आदि स्कुट दिखाई देते हैं पेमेही गर्भ
एकही कालमें सब अंग होते हुवेभी समयपरही दिखाई देते हैं ॥२॥
गर्भके पितृजअवयव ।
गर्भस्यकेशश्मशुलोमास्थिनखदन्तशिरास्नायुधमनीला
प्रभृतीनिस्थिराणिपितृजानि ॥२१॥
बाल, डाढी, मूंछ, रोम, अस्थि, नख दाँत शिरा, स्नायु, धमनी, वीर्य
आदि स्थिर अवयव पितृज होतेहैं ॥ २१ ॥
:
मातजअवयव
,
मांसशोणितमेदोमज्जाहन्नाभियकृत्प्लीहानगुदप्रभृतीनिमृदूनि
मातृजानि ॥ २२ ॥ उपचयादयःरसजानिमुखादयआत्म
जानि ॥२३॥
मांस, रुधिर, मेद, मज्जा, हृदय, नाभि, यकृत, प्लीहा; अंन, गुहा
आदि कोमल पदार्थ मातृजहैं ॥ २२ ॥ उपचयापचय बलवर्णादि रमन, सुख
दुःख ज्ञानआदि आत्मजहैं ॥ २३ ।।
गर्भकी सौदर्यासादयता।
देवताब्राह्मणपराशौचाचारहितरता ॥
महागुणान्प्रसूयन्तेविपरीतांस्तुनिर्गुणान् ॥२४॥
जो गर्भवती स्त्री गर्भके समय देवता, बामण, आदिकोंका सेवन करे शौच
और आचार और अच्छेकाम परोपकारादिकरनेमें तत्पर रहे तो महागणवाले
धर्मात्मापुत्रको उत्पन्न करे । पापकर्मों में रत हो तो पापी कुकर्मी कंगाल पुत्रको
पैदा करे ॥ २४ ॥
गर्भस्राव और पातके कारण ।
भयाभिघातात्तीक्ष्णोष्णपानाशननिषेवणात् ॥
गर्भपततिरक्तस्यसशूलंदर्शनंभवेत् ॥२५॥
भाषाटीकासमेत-अ० ८.
भयसे चोंट आदिके लगनेसे, तीक्ष्ण और गर्म वस्तुके खानेपीने ( सेवन
करने से, गर्भका स्राव या पात होता है उस समय महान्शूल होता है और रक्त
गिरने लगता है ॥ २५॥
गर्भवाव और पातकी अवधि
आचतुर्थाततोमासात्प्रत्रवेद विद्रवः ।।
ततःस्थिरशरीरस्यपातपंचमषष्ठयोः ॥२६॥
चौथे महीने पर्यन्त जो गर्भका रुधिरसमले साथ होता है उसको गर्भनाब
कहते हैं। पांचवें अथवा छठे महीनों स्थिरशरीर होकर जो गर्भ गिरता है
उसको गर्भपात कहते हैं ॥ २६ ॥
अकालमें गर्भपाता
गोंविधातविषमाशनपीडनावैः
पकंद्रुमादिवफलंपततिक्षणेन ।। २७ ।।
जैसे वृक्षपर पक्क फल हिलानेसे या चोट लगनेसे झट नीचे गिरजाताहै
अथवा अभियावसे कच्चा भी गिरजाता है उसी तरहले अभिघात तथा विषम
आसनसे या विपम खानेसे और दवानेसे अकालमेंही गर्भ गिर जाताहै॥२७॥
गर्भस्रावकी चिकित्सा ।
गुर्विण्यागर्भतोरक्तस्रवेद्यदिमुहुर्मुहुः ॥
तन्निरोधायसादुग्धमुत्पलादिमृतपिबेत् ॥
सेकावगाहनालेपाःशस्यंतेतत्रशीतलाः॥२८॥
गर्भवतीके गर्भसे यदि बार बार रक्तस्राव हो तो उसके रोकनेके लिये
उत्पलादि गणसे सिद्ध किया काथ पीवे और शीतल पदार्थोंका सेचन
अवगाहन लेपन भी श्रेष्ठ है ॥ २८ ॥
गर्भस्रावउपद्रव ।
प्रसमानेगर्भस्याहाहःशुलंचपार्श्वयोः ।।
पृष्ठरुपदरानाहौमूत्ररोधश्चजायते ॥२१॥
जब गर्भगिरनेको होता है तो दाह, दोनों पसवाडोंमें शूल, पीठमें पीडा,
प्रदर, अफारा, मूत्रका रुकना; यह उपद्रव होते हैं ॥ २९ ॥
(१०४)
शुभसन्ततियोगकाश।
उत्पलादिगण।
उत्पलरकोत्पलकुमुदसौगन्धिककुवलयपुंडरीकाणि
मधुकंचेति ॥ ३० ॥
नीलाकमल, लालकमल, कमोदिनी, सौगन्धी कमल, आसमानी रंगका
कमल, चेतकमल, मुलेठी इन सात औषधियों को उनलादिगण कहतेहैं ३०॥
गर्भके स्थानांतर में इटजानके उपद्रव ।
स्थानात्स्थानांतरतस्मिन्प्रयात्यपिरजायते ।।
आमपकाशयादौतुक्षोभःपूर्वेऽप्युपवाः ॥ ३ ॥
जब गर्भ अपने स्थानसे दूसरे स्थानमें हटजाताहै तब आमाशय और
पक्काशय आदिकोंमें क्षोभहो. और जो गर्भ साबके उपद्रवों में परबाडेकी पीडा
आदि कहीहै वह हो ॥ ३१ ॥
उसका यत्न।
स्निग्धशीतक्रियास्तेषुदाहादिषुसमाचरेत् ॥ ३२ ॥
कुशकाशोरुवृकानांमूलैगोक्षुरकस्यच ।।
शृतंदुग्धंसितायुक्तंगर्भिण्या शूलतत्परम् ॥ ३३ ॥
गर्भपात और स्थानांतरके रुक जानेमें जो दाहादि उपद्रव होतेहैं उनमें
स्निग्ध और शीतल क्रियाको करे ॥ ३२ ॥ अथवा कुशा, कांश, अरड,
गोखरू इनकी जडोंसे सिद्ध कियाहुवा दूध ठंढा करके मिसरी मिलाके
पिलावे ॥ ३३॥
श्वदंष्ट्रामधुकंक्षुद्राम्लानैःसिद्धपयःपिबेत् ॥
शर्करामधुसंयुक्तंगर्भिणीवेदनापहम् ॥ ३४ ॥
गोखरू, मुलेठी, कटेरी, बाणपुष्प इनसे सिद्ध किये दुधमें मिसरी
और सहत मिलाकर पीनेसे गर्भवतीके गर्भको पीडा दूर होती है ॥ ३४ ॥
मासानुमासिक यत्न ।
मधुकंशाकबीजंतुपयस्यासुरदारुच ॥
अश्मंतककृष्णतिलास्ताम्रवल्लीशतावरी ॥ ३५॥
भाषादीकासमेत-अ०८. (१०५) पहले महीने में यदि गर्भस्राव हो या गर्भशल होय तो मुलेठी, शाक बीज (नांगौनके बीज ) क्षीरकाकोली, देवदारू इनके कल्कसे सिद्ध किये दुधको शीतल करके पीवे । दूसरे महीनेमें अश्मंतक ( अम्ललोन नामसे प्रसिद्धहै ) कालेतिल, तामवल्ली, ( रामकांता या मजीठ ) शतावरी इनके कल्कस सिद्ध किया दूध शीतल करके देवे ॥ ३५ ॥ वृक्षादनीपयस्याचलताचोत्पलमारिना ।। अनंतासारिवारानापमामधुकमेवच ॥ ३६॥ बृहत्वोकाश्मरीचापिक्षीरीसुंगास्त्वचौबिसम् ।। पृष्ठपोबलाशियुश्वदंष्ट्रामधुयष्टिका ॥ शृंगाटकंबिसंद्राक्षाकसेरुमधुकंसिता ॥ ३७॥ वीलरे महीनेमें-बांदा, शीरकाकोली, लताप्रियंगु, अनंतमूल, कमल, सारिता इनको देखें। चौथेलहीनेमें अनंतमूल,शारिवा, राना, ब्रह्मदंडी,मुलेठी इन्हको देये। पांचवेंमहीनेमें दोनोकटेरी, कंमारिके फल बरोटेकीसुंग ( काल ) और छाल, कमलकी जड (भिस) इन्हको देवे । छठेमहीनेमें पृष्ठपर्णी, खरटी, सहजना, गोखरु, मुलठी, इन्हको देवे । सातवें महीने में सिंघाडे, भिस, मुनका कसेरु, मुलठी, मिसरी इनको देवे ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ कपित्थवृहतीबिल्लपटोलेक्षुनिदिग्धिका ॥ मूलानिक्षीरसिद्धानिपाययेद्भिपगष्टमे ॥ ३८ ॥ नवमेमधुकाऽनंतापयस्यासारिखापिवेत् ॥ क्षीरंशुंठीपयस्याभ्यांसिद्धंस्थादशमेहितम् ॥ ३९ ॥ क्षीरिकामुत्पलंदुग्धंसमंगामूलकंशिवाम् ॥ पिवेदेकादशेमासिगर्भिणीशुलशांतये ॥ एवमाप्यायतेगर्भस्तविारुकचोपशाम्यति ॥४०॥ कैथ, बडीकटेरी, बिल, पटोल, ईख, छोटीकटेली इनकी जडको रगडकर चूर्ण करे । इस चर्णसे सिद्धकिया दूध आठवेंमहीनेकी बेदना या स्रावमें देवे ।
(१०६) शुभसन्ततियोगप्रकाश। सबमें महीनेमें मुलेठी अनंतमूल क्षीरकाकोली सारिका इनसे सिद्ध किया दृः देवे । दशवें महीनेमें सोंठ क्षीरकाकोली इन दोनों सिद्ध किया दृव देवे । ग्यारहवें महीनेमें, क्षीरकाकोली, कमलगट्टा, दृव, लाजवंतीकी जड, आमले इनको औटाके दृधसै ठंडा करके पीये। इसप्रकार करनेसे गर्भ पुष्ट हो और तीव्रवेदना शांतहो ॥ ३८-४० ॥ वक्तव्य , सातमहीनतक जो औषधि हैं वह एक तोलाकी मात्रा लेकर शीतल जलसे गुडके चार तोले दूधमें मिलाके पीये। आठवेंसे २ तोला दवा२० तोले दूध २० तोले पानी पकाकर दूध रहनेपर ठंडा करक पिलावे ।। गर्भिणीकी अन्य चिकित्सा। कशेरुशृंगाटकजीवनीय पापलेरंडशतावरीभिः ।। सिद्धपयःशर्करयाविमिथसंस्थापयेदर्भमुदीर्ण जुलम् ॥2॥ कसरू, सिंघाडे, जीवनीय, दशककी औपची, कमल, कमोदनी, एरंड, शतावर इनको तीन २ माले लेकर एक पाव दूधमें एकमाव पानी मिलाके पकावे । जब पानी जलकर दूध रहे तो ठंडा करके छानकर खाँड मिलाकर पीनेसे गर्भ स्थित होताहै और शूल नष्ट होताहै ॥ ४३ ॥ कशेरुशृंगाटकपनकोत्पलंसमुद्रपर्णीमधुकसराकरम् । सशूलगर्भस्रुतिपीडितांगनापयोविमिश्रृपयसान्नसुरुपिवत् ॥ ४२ ॥ कसेरू, सिंघाडे, पद्माख, कमल, मुद्रपर्णी, मुलेठी इन सबका चूर्णकर बराबरकी मिसरी मिलाके तोला खाकर ऊपरसे ठंडा दूध पीने और दूध चावल भोजन करे तो गर्भशूल, गर्भस्राव, आदि विकार दूर हों ॥४२॥ "व्यवस्थितेचगर्भेगव्येनोदुंबरशलाटुसिद्धेनपयसामोजयेत् । पतितेतीक्ष्णंमद्यपेयंतस्योपद्वशांत्यै । त्यागोपरशाद्वानपिबति मायातुसाचकोलसावितांपेयामेवाश्नातु । अतीतेस्नेहलवण- १ जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मापपर्णी, मुद्गपणी, जीवंती, मुलेठी ये १० जीवनीय औषी हैं। " N N भाषाटीकासमेत-अ० ८. (३०७) PARMINAGAR वाभिर्यवाभिरुहालकादीनांपाचौपसंस्कृतामिरुपकमत । यावंतोमासागर्भस्यतावत्यहानि ॥" गर्भके चलायमान होनेपर गावके दूध में कच्चे गूलरोंको पककर उस दूधको पीये। यदि गर्भपात होगया होतो उसके उपद्रवोंकी शांति के लिये तीक्ष्ण मय पिलावे। जो जाति मद्य नहीं पीती और मद्यको जिन स्त्रियोंने त्याज्य माना है वह बेरसे सिद्ध कीहुई अथवा पंचकोल (पीपल पीपलामूल, चव्य, चित्रक सोट से सिद्धकी पेया पिलावें। गर्भपतित होनेके पीछे बी, चिकनाई. नमक रहित यवागू पीवे या कुदालक ( कोदों ) आदिसे पकाकर जितने महीनेका गर्भहो उतने दिनतक पीवे ।। मूढ गर्भ। मूढःकरोतिपवन खलुमूढगर्भशुलंचयोनिजठरादिषुमूनसंगम् ॥४३॥ अपने कारणोंसे कुपित हुई वायु गर्भाशयमें प्राप्त होकर गर्भको गतिको रोक देतीहै उसको अढगर्भ कहते हैं । उसले योनि और पेट आदिमें शूल होता है तथा मूत्रभी रुक जाताहै ॥ ४३ ॥ मूढगर्भकी गति । भुग्नोऽनिलेनविगुणेनततःसगर्भःसंख्यामतीत्यबहुधासमुपैतियोनिम्।। दारनिरुध्यशिरसाजठरादिकेनकश्चिच्छरीरपरिवर्तनकुब्जदेहः॥४४॥ दुष्ट हुए वायुसे गर्भ टेढा होकर अनेक प्रकारले योनिके मुसपर आकर अडजाता है, कोई गर्भ शिरसे कोई पेट बांह आदि अनेक अंगसे कोई घम कर ठेढा होकर कुबडा या गोल होकर इस प्रकारसे योनिद्वारने अडता है कि, उससे निकलना मुश्किल होता है और गर्भवतीको प्राणतकका कष्ट होता है ॥ ४४ ॥ असाध्यमूढगर्भ और गर्भिणीके लक्षण । अपविद्धशिरायातुशीतांगीनिरपत्रपा॥ नीलोद्भूतशिराहंतिसागर्भचसतांतथा॥४५ ।। १ उन्नाभ ।
(३०८) शुभसन्ततियोगप्रकाश। जिस मूट गर्भ स्त्रीका शिर नीचेको नमगयाहो भरीर शीतल होगयाहो लजा नष्ट होगईहो, और कोखमें नीले रंगकी नसें दीखतीहों, तो वह स्वी गर्भको नष्ट करे और गर्भ अपनी माताको नष्ट करे ॥ ४५ ॥ योनिसंवरणके लक्षण । बातलान्यन्नपानानिमाम्यवाप्रजागरम् ॥ अत्यर्थसेवमानायांगर्भिण्यागोनिमार्गगः॥ ४६॥ मातरिश्वाप्रकुपितोयोनिद्वारस्यसंवृतिम् ॥ कुरुतेरुद्धमार्गत्वात्युनरंतर्गतोनिलः ।। ४७॥ निणयशनद्वारंपीडयन्गर्भसंस्थितिम् ।। निरुद्धवचनोच्छासोगर्भश्चाशुविपद्यते ॥४८॥ उशतरुद्र हृदयानाशयत्यधगभिणिम् ।। योनिसंबरणनामव्याधिमेतत्यचक्षते ॥४९॥ गर्भवतीको वातकारी अन्न, जल, मैथुन, रात्रिमें जागना, इनके अत्यन्त सेवनसे वायु कुपित होकर योनिके मार्गको रोक देता है। फिर भीतरकी रूकी हुई पपन भीतरको प्रवेश कर गर्भाशयको रोककर गर्भकी स्थितिको पीडा देती है उससे गर्भवतीका बोलना बन्दहो ऊर्भवासहो जिससे गर्भनष्ट होजाय और हृदयकी गति रुककर गर्भिणी नहो। इस व्याधीको योनिसंबग्ण कहते हैं ॥ ४६॥ ४७ ॥४८॥ ४९ ॥ गर्भमग्नेके कारण। मानसागन्तुभिर्मातुरुपतापैःप्रपीडितः ।। गर्भ व्यापद्यतेकुक्षौव्याधिमिश्चप्रपीडितः॥५०॥ माताके मानसिक और आगंतुक (प्रहार आदि ) दुःखोंसे पीडित होनेसे तथा माताके रोगोंसे गर्भ पेटमेंही मरजाता है ॥ ५० ॥ मृतगर्भके लक्षण। गर्भास्पंदनभावीनांप्रणाश-श्यावपांडुता॥ भवेदुच्छ्रासपूतित्वंशूनतांतर्मतेशिशौ ॥ ५१ ॥ ।
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भाषाटीकासमेत-अ० (१०९)
गर्भी फडके नहीं प्रसवकी पीडा नहो, शरीरका रंग काला पीलासा हो
जाय, यासमें दुर्गंध आदे, पेटमें सूजनहो, यह मृतगर्भके लक्षण ।। ३३ ।।
अन्य असाव्यलक्षण ।
योनिसंवरणसंगाकुक्षौमारुतएवच ।।
हन्युस्त्रियंमूढगर्भायथोक्ताश्चाप्युपद्रवाः ।। ५२ ।।
जिसके योनिसंवरणहोय, योनि सकुचजाय, गर्भ योनिद्वारसर अजाय,
वायु कोखमें भरजावें वातविकार श्वास आदिहो, देला सुगम गाभणीको न
कतीहै ।। ५२ ॥
मूढगर्भम चिकित्सा!
गर्भस्यगतयश्चित्राजायन्तेऽनिलकोपतः ।
तत्रानल्पमतिद्योवर्ततमतिपूर्वकम् ॥१३॥
वातके प्रकोपसे गर्भकी अनेकप्रकारको गति होतीहै मो इसमें अत्यंतदु-
द्धिमान् वैद्य ( या लायक सर्जन ) अत्यन्तबुद्धिले काम किया करे ।। ५३
मृतंगमैभिषप्राज्ञपिछवाकप्रयत्नतः ।।
धान्वंतरिमतातप्राज्ञःसाध्यज्ञातश्वशल्यवित ॥ ५४॥
मरेहुवे गर्भको अच्छीतरह जाननेवाला और साध्य समझकर धन्वंतरिक
मतसे यत्नपूर्वक काटकर निकाले ।। ५४ ॥
अभिघातान्मृतायास्तुगर्भ प्रस्पंदत्यादि ।।
जन्मकालेततःशीघ्रपाटयित्वोरेच्छिशुम् ॥ १५ ॥
जो बालकके जन्मकाल अर्थात आठवें नवमें दशमें आदिमहीनेमें
गर्भिणी स्त्री चोट आदि किसीकारणसे मरगईहो और उसके पेटमें गर्भ फड-
कता हो तो उसी समय स्त्रीके पेटको चीरकर गर्भ निकालले ॥ ५५ ॥
अथवा
याभिःसंकटकालपिबयोनार्यःप्रसाविताः ॥
सम्यक्लब्धंयशस्तास्तुनार्यःकुर्युरिमांक्रियाम ॥५६॥
(१०) शुभसन्ततियोगप्रकाश । जिन लायक ( जितनें यह काम सीखा और अनेक समय कियाहो ) वा इयोंने अनेक स्त्रियोंका प्रसव करायाहो अनेक संकटके समय यह काम कियाहो जिनका सब जगे यश फैलाहबाहो वह दाइयां इस क्रियाको करें५६ हस्तनपिपाक्तेनयोंनरंतर्गतनसा ॥ गर्भजीवतिमूढेतुगर्भयत्नेननिहरेत् ॥ २७ ॥ जिस खीका मूढगर्भ जीताहो उनको सावधानी के साथ दोनों हाथोंम घी लगाके महजसे योनिमें प्रवेश करके धीरेमे बालकको सीधा करके निकाल लेवे ॥ १७ ॥ मृतेतुग गर्भिण्यायोनौशस्त्रप्रवेशयत् ॥ शनशास्त्रार्थविदुपीलवुहस्ताभयाज्झिता ! २८ ।। सचेतनंतशनगनकथंचनदारयत है। सदीयमाणोजननीमात्मानं चापिमारयेत् ॥ २९ ॥ गोपेशेतगृतंगर्भ मुहूर्तमपिपण्डितः॥ तदा जननीतिप्रभूतात्रयथाप शुम् ॥ ६ ॥ यदि गर्भ पेट में मरगयाहो तो जो शस्त्रविधा, कुशल और शास्त्र में विद्वान् जितका हाथ हलका हो सावधानीसे विभाडरे (जिसका डरकर हाथ न काँथे अर्थात् अनजान नहो) चतुराईके साथ मरेहुवे गर्भको युक्तिसे गर्भ ही काटकर निकालदेवे ॥५८॥ जो अज्ञानतासे जीताहुवा बालक शस्त्रसे गर्भ में कटजावे तो वह गर्भमें कटाहुवा बालक आप तो मरताहीहै, परंतु अपनी माना कोनी नष्टकरदेताहै इसलिये जीतेको कभी शस्त्र न लगाये। जीतेहुवेको भूलक- रभी गर्भ में न काटे ॥ ५९ ॥ यदि बालक गर्भमें मरगयाहो तो उसको गर्भमें क्षणमात्रभी न रहने देवे । क्योंकि मराहुबा बालक अपनी माताको तत्काल मारदेता है जैसे बहुतसा अन्न पशुको मारदेताहै ॥ ६० ॥ यद्यदंगहिगर्भस्ययोनौशक्तंतुतद्भिषक ॥ सम्यगविनिहरोच्छिन्वारक्षेत्राप्रयत्नतः॥११॥ Umrata " भाषाटीकासमेत-अ०८. (३१३) एवंनिहतशल्यांतीसिंचदुष्णेनवारिणा ॥ ततोऽभ्यक्तशरीरायायोनौस्नेहंविधारयेत् ॥ एवंमृद्धीभवेद्योनिस्तच्छूलंचोपशाम्यति ॥ ६२ ॥ स्त्रीको योनिमें मूढगर्भका जो जो अंग अटकरहाहो उसको कुशलवैद्य (सर्जन ) काटके निकालले और उस गर्भवतीकी यत्नपूर्वक रक्षा करे।इसन- कार जब मरे बालकके सब अंग निकल आ तब उस स्त्रीको गर्मजलसे सेचन करे। फिर देहमें योग्य तेलकी मालिश कर योनि लेह अर्थात योग्यतेल का फोहा रखे तो योनि नरम हो और पीडा शांतहो ॥ ६१ ।। ६२ ।। आवश्यकथाज्ञा नमयालिखिताचाचशस्त्रकर्मक्रियाशुभा ॥ प्रसंगालिखितंयच्चकर्तव्यंलाल्पबुद्धिभिः ।। ६६॥ शोऽज्ञानतःक्रियामेतांकरोलिवलकर्मवित् ।। सोनिंदांप्राप्यदुष्टात्मादंडयाश्चोभयलोकतः ॥ ६ ॥ भने यहाँपर शस्त्रक्रिया जो शुभशल्य शंग है नहीं लिखा । सिर्फ इतीको देखकर कोई अज्ञ इन कर्मका साह न करे । क्योंकि पूरे शल्यके अंगोंको विना, पडे, जाने, सीले यह काम नहीं आता। इसमें शस्त्रक्रियाके जाननेवालेको इशारा मात्र है और कुछ क्रम और विधान नहीं लिखा और यह जो कुछ लिखाहै यहभी प्रसंग- वश कुछ थोडासा इशारा लिखाहै । इसको अज्ञानी और पूरीविद्या न जाननेवाला न करे ॥ ६३ ॥ जो अज्ञानतासे इस क्रियाको करताहै और शल्य शालाक्य चिकित्सामें निपुण नहीं है वोह मूर्ख निंदाको प्राप्त होकर इस लोकमें राजासे परलोकमें परमात्मासे दंडको प्राप्त होताहै ॥ ६४ ॥ सच्चाशोक। आयुर्वेदकशास्त्रेषुलिखितायाक्रियाशुभा ॥ शल्यज्ञानंचशालाक्यचिकित्साअष्टधाथवा ।। ६५ ।। १ बलातैल। +
(१३२) शुभसन्ततियोगप्रकाश
यापुराभारतेवपंक्रियाआशुफलमदा।।
हायभूभुग्विमुखत्वाल्लोपायसमुपस्थिता ।। ६६ ।।
किंकुर्मकस्यवाबमोवाताशोकप्रकाशिनी ।।
देवैःसंमानिताविद्यानश्यतेयनिराश्रया ॥६७॥
आयुर्वेद शास्त्रोंमें जो शुभषिया लिखीहुई है और शल्यचिकित्सा तथा
शालाक्यचिकित्सा अथवा आठों किस्मकी चिकित्सा जो पहले भारतवर्ष मा--
नीहुईथी जिसकी क्रिया शीफलदायक थी । हा दुःखकी बातहै आज बढ़
राजाओंके विमुखहोनेसे लोपहोनेकेलिये तैयारहै। क्या करें किससे अपने
हृदयके शोकप्रकाश करनेवाली बात सुनायें। जिस वैद्यक विद्याकी देवताभी-
बडी श्रद्धासे प्रशंसा करतेयोआज वह बिना आश्यसे नष्टहईजातीहै६५-६७॥
गर्भिणीके ज्वरादिकांकी चिकित्सा।
मधूकचंदनोशीरशारिखापद्मयष्टिकः॥
शर्करामधुसंयुक्तःकपायोगर्भिणीज्वरे ।। ६८ ॥
मुलेठी, चंदन, खस, शारिवा, पाख इनके क्वाथमें मिसरी और सहन
मिलाके पीनेसे गाभणीका ज्वर दुर होताहै ॥ ६८।
चंदनशर्करालोघंहीकाशर्करान्वितम् ।।
कार्थकृत्वाप्रदातव्यंगभिणीज्वरशांतये ॥ ६९ ॥
चन्दन, मिसरी, लोध, दाख इनका काथ मिसरी मिलाकर पीनेसे गर्भ--
वतीका ज्वर शांत होताहै ॥ ६९ ॥
पिबीद्वश्वामजाशीरेनाशयेद्विपमज्वरम् ॥ ७० ॥
सोंठको बकरीके दूधमें पकाकर पीनसे विषमज्वर नष्ट हो ॥ ७० ॥
आम्रजंबूत्वचंकाथ्यलेहयेल्लाजसक्तुभिः॥
अनेनलीढमात्रेणगाभणीग्रहणींजयेत् ॥७१ ॥
आम और जामुनकी छाल का क्वाथ बनाकर उसमें धानोंकी खीलोंके
सत्तू मिलाकर चाटनेसे गर्भिणीका संग्रहणीरोग नष्ट होताहै ॥७१ ॥
भापाटीकासमेत-अ०८.
नोबेराऽरलुरतचन्दनबलवान्याकवत्सादनी
मुस्तोशीरयवालयविपाकाथंपिबदलणी ॥
नानावर्गलजातिसारकगदेखतस्नुतौवावरे
योगोयंगनिसिनिगदितःस्यामयेसत्तमः ।। ७२ ॥
सुगन्धवाला, आग, काउपन्दन, खरेदी, धनियां, गिलोय, गोथा, खा,
जवासा, पापडा, अतीव इनका काथ गर्भिणी खोपान करे तो अनेक
प्रकारके अवितार, रसाय, अर यह सब दूर होतेहैं । यह योग पूर्वकाल में
सूतिका रोगके दूर करनेको मुनियोंने कहाहै ।। ७२ ॥
वातका की चिकित्सा।
गर्मोवाचनसंशुष्कोनोरं पूरयेद्यदि ।।
सारणीयःलसिधभाज्ययुतपिवेत् ।। ७३ ॥
यदि गर्भवतीका गई यादी सूखकर उदरकी पूर्ति न हो तो
बृंहणीय (पुष्टकारी) औषधोंने सिन्द क्रिया दृध घृत मिलाके पीवे ॥ ७ ॥
नागोदरके लक्षण
यस्याःक्षेसंबड्लानिःपुनराधमानोवत्र ।।
गर्भिण्यादृश्यतेनास्तिस्यानागोदरविदुः ।।७४ ॥
व्यवायस्वेदवजिल्यास्तस्यास्यादौदेहितम् ।।
पश्चाच्चसमयेप्राताडेतवान्यकुट्टनम् ॥ ७ ॥
जिसकी कोख में ग्लानि होकर अफारा हो और गर्भिणीसी प्रतीत होती
है, कारण इसका वायु शुक्र आदिको बिगाडके आफारा करता है और लोग
उसको गर्भवती कहेहैं, इसको नामोदर कहते हैं। इसमें मैथुन और स्वेदन कर-
नेदे और जिस चीजपर इच्छाहो सो देवे, पुष्ट और स्निग्ध पदार्थ देवे
फिर धान कुटावे ॥ ७४ ॥ ७५ ॥
प्रसवमें विलंबकी चिकित्सा।
परूपकशिफालेपःस्थिरामूलकृतोपिवा ॥
नाभिबस्तिमगेलेपःमुखंनारीप्रसूयते ॥ ७६ ॥
(११४) शुभसन्ततियोगप्रकाश। फालसेकी जड अथवा शालपणीकी जडको रगडकर नाभि बस्ती भग पर लेप करनेसे सुखपूर्वक प्रसवहो ॥ ७६ ॥ तुपाम्बुपरिपिष्टेनकंदनपरिलेपयेत् ॥ लांगल्याश्चरणौमृतेक्षिप्रमापनगर्भिणी ॥ ७७ ॥ अनिशिखाके कन्दको कांजीमें पीसकर गर्भिणी पासपर लेप करे तो सुखपूर्वक प्रसव होवे ॥ ७६ ॥ पाठामूलन्तुतद्वत्स्यादाटरूपमूलकम् ।। लेपनादारणाद्रापिसुखं प्रसवकारकम् ॥ ७८ ॥ मूलंहिशालपण्यास्तुपिष्टवातण्डुलांबुना॥ नाभिवस्तिमगालेपात्मुखनारीप्रसूयते ॥ ७९ ॥ मातुलंगस्यमूलानिमकंमधुसंयतम ॥ वृतेनसहपातव्यसुखनाप्रियते ।। ८० ॥ पाढ अथवा अडूसेकी जडको पीसकर योनिपर लेप या योनिमें धारण करनेसे सुखपूर्वक प्रसव हो ॥ ७८ ॥ शालपर्णीकी जडको चावटोंक धोबनमें पीसकर नाभि बस्ती भगपर लेप करनेसे सुखपूर्वक प्रसवहो ॥७९॥ बिजौरेकी जड और मुलेठीको पीसकर सहत और घी मिलाकर खानेसे मुखपूर्वक प्रसवहो ॥ ८ ॥ प्रसूताकी यौनिके घावोंकी चिकित्सा। तुंबिपचंतथालोपंसमभागंसुपेपयेत् ॥ तेनलेपोभगेकार्यःशीघ्रस्यायोनिरक्षता ॥८१ बेके पत्र और लोध दोनोंको जलमें पीसकर भगपर लेप करनेसे योनिके चीरे ( घाव ) अच्छे हों ॥ ८३ ॥ आंवल ( जेर) गिरनेके यत्न । कटुतुंब्यहिनिर्मोककृतवेधनसर्पपैः॥ कटुतैयान्वितैयोंनेधूमःपातयतेपराम् ।।८२॥
भाषाटीकासमेत-अ०८. (११५) भूर्जगुग्गुलधूपेनश्रोण्याचास्था प्रधूपनम् ॥ अपरापातनंशस्तंसद्या यःशूलनिवारणम् ॥ लेपनेपाणिपादौवामूलंलांगलिकहितम् ॥ ८३॥ कडुवी तुंनी, सांपकी केंचुली, कडवी तोरी, सरसों इनको कडवतेलमें पीसके इनकी योनिमें धूमि देनेसे आंवल गिरजाती है ॥ ८२ ॥ भोजपत्र और गूगल इन दोनोंको पीसकर प्रमूताकी कमरको धूनी देनेसे आंवल गिर जाती है और दर्द नष्ट होता है । अथवा लांगलीको रगडकर हाथ पावोंमें लेप करनेसे शीघ्र आंवल (जेर) गिरजाती है ।। ८३॥ अथवाऽपतिपरांपातयेत्पूर्ववद्भिपक् ॥ हस्तेनापहरेदापिपाभ्यापरिपीडयन् ॥ ८४ ॥ जो जेर न गिरे तो पहले कही हुई विधिसे गिरावे, चतुराईसे दोनों हाथों को चिकनाई लगाकर दोनों पसवाडोंको दयाकर आवको हाथसे निकाल देवे। बुद्धिवान् दाई इस क्रियाको करे जित आंबल गिरने के बाद गर्भ जलसे सेचनकर और योनिमें स्नेहका ना रखे तो पीटा शान्तहो ॥ ८४॥ मकाल्हानिदान। वायुःप्रकुपित अर्यात्रुध्यरुधिरंयुतम् ॥ मृतायाहच्छिरोबस्तिशूलंमकल्लसंज्ञकम् ।। ८ ।। प्रसव के समय स्त्रीकी योनिमें पवनके लगनेसे वायु कुपितहोकर गिरतेहुवे रुधिरको रोकदेताहे और उसके हृदय, शिर, और बस्तिमें मक्कल्लनामक शुलको पैदा करतीहै ।। ८५॥ पृथिव्यांपतितेग योनौपीडनमिष्यते ॥ अप्रवेशोयथावायोस्तस्यसंरक्षणक्रिया। हृदस्तिशूलमाध्मानंप्रविष्टेतत्रजायते ॥८६॥ प्रसव के समय बालकके गिरतेही योनिको इसप्रकार दबावे जिससे बाहरकी यवन योनिके अंदर प्रवेश न करे इसप्रकार रक्षा करे।क्योंकि उस समय योनिमें 1 (११६) शुभसन्ततियोगप्रकाश। वायुका प्रवेश होनेसे हृदय और बस्तीमें शूल और अफारा आदि उपद्रव होतेहैं ॥ ८६॥ मकाल्लकी चिकित्सा संचूर्णितंयवाक्षारंपिबेत्कोष्णेनवारिणा । सर्पिपावापिवेत्रारीमकल्स्यनिवृत्तये ॥ ८७ ॥ जवाखारके चूर्णको गर्मजल अथवा बीके साथ मकलशूलकी निवृत्तिके लिये स्त्री पीये ॥ ८७ ॥ त्रिकटुचारुजातककुस्तंबरीयूनियुक्तम् ।। खादेवडंपुराणनित्यनारीमकलदलनाम: ८८॥ सोंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, इलायची, तेजपत्र, नागकेशर, धनियाँ, इन सबका चूर्ण करके पुराने गुडमें मिलाके खाने नकलशूल दूरहोताहै ८८ प्रसूताकेशिरके दर्दकी दवाई। मातुलुंगस्यमूलंतुमल्लिकामूलमेवच ।। बिल्वमुस्तमिदलेपंशिरोरोगविनाशनम् ।। ८९ ।। बिजौरेकी जड, मोतियेकी जड, बेलगिरी, नागरमोथा इनचारोंको जलमें रगडकर प्रसूताके मस्तकपर लेप करने शिरका दर्द दूर हो ॥ ८९ ॥ सूतिकारोग। मिथ्योपचारातसंकेशाद्विपमाजीणभोजनात्॥ सूतिकायाश्चयरोगाजायतेदारुणाश्चते ॥ ९॥ प्रभूता वीके मिथ्या उपचार (अनुचितपवनआदि)के करनेसे संक्लेश अर्थात अत्यंत क्रोध या दोषकर्ता पदार्थ और विषम भोजन तथा अजीर्ण में भोजन आदि करनेसे प्रसूता स्त्रीको दारुण प्रसूतरोग पैदा होताहै ॥ १० ॥ लक्षण। अंगमर्दोज्वर कासःपिपासागुरुगात्रता॥ शोथःशूलानिसा चमूतिकारोगलक्षणम् ॥ ...
भाषाटीकासमेत-अ०८.
(११७)
अंगोंका टूटना, ज्वर, खांनी, प्यास, देहका भारी होना, सूजन, शूल,
अतिसार, ये सूतिका रोगने लक्षण हैं ।।
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यथा-
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प्रलापोबेशुमा तिनाउक्षाहता ॥ ९ ॥
अकवाद, और कंप जिसके हो उसको प्रतिगारोग कहते हैं ।। ९३ ॥
उपादिकांकी प्रसूतज्ञा।
ज्यरातिसारशोधाश्वजगावलायः ।।
तन्द्रारुचिप्रतेकाबावातश्लेष्मसमुद्भवाः ॥ ९ ॥
कृच्छ्रसाध्याहिजेरोमाक्षीजनांसबलाश्रिताः ।।
तेल।सूतिका गबारोगास्तेचाप्युपद्रवाः ॥ ९३ ॥
ज्वर, अतितार, शोथ, भूग, अफारा, बलकी क्षीणता, तंद्रा, अरुचि,
मुखसे पानी चलना इत्यादि बाज कफले विकार जिसका मांस, बल, क्षीण
होगयाहो उसके ज्वरादिक्क रोग और उपद्रव कष्टसाध्य होतेहैं। ये सब ज्वरा-
दि एक प्रधान बाकी उपद्रव होते हैं इन सबली प्रसूतसंज्ञाहै ॥९२ ॥ ९३ ॥
चिकित्सा।
सूतिकारोगात्यर्थकुर्यादातहरीक्रियाम् ॥
दशमूलकृतवार्थकोष्णंदद्याघृतान्वितम् ॥ ९४॥
प्रसूतरोगकी शांतिके लिये वातनाशक क्रिया करे अथवा दश मूलके
कोष्ण क्वाथमें घृत मिलाकर पिलावे ॥ १४ ॥
देवदावादिक्वाथ ।
देवदाश्वचाकुपिप्पलीविश्वभेषजम् ॥
भूबिकटफलंमुस्तंतिताधान्यहरीतकी ॥ ९५ ॥
गजकृष्णसदुस्पागोक्षुरूधन्वयासकः॥
बृहत्यतिविषाछिन्नाकर्कट कृष्णजीरकः ॥ ९६॥
समभागान्वितैरतैः सिंधुरामठसंयुतम् ॥
काथमष्टावशेषतुप्रसूतांपाययेत्स्त्रियम् ॥ ९७ ॥
(११८) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
शूलकासज्वरश्वासमूछीकंपशिरोतिभिः ।।
युक्तंप्रलापतृड्दाहतंद्रातीसारवांतिभिः ॥ ९८ ॥
निहंतिसूतिकारोगंवातपित्तकफोद्भवम् ।।
कषायोदेवदादिःसूतायाःपरमौषधम् ॥ ९९ ॥
देवदारु, वच, कूठ, पीपल, सोंठ, चिरायता, कायफल, मोथा, कुटकी,
धनियाँ, हरड, गजपीपल, कटेरी, गोखरू, धभासा, बडी कंटेरी, अतीस,
गिलोय, काकडसिंगी, कलौंजी, जीरा, इन सबको बराबर
लेकर अष्टावशेष क्वाथ करे ( ये सभको एक २ मासा लेकर आठ छटांक
जलमें पकावे १ छटांक रहनेपर ) इसमें २ रत्ती भुनी हींग और ३ रत्ती
सेंधानमक बुरकाकर प्रसूता स्त्री पीये तो इस काथके पीनेसे शूल, साँसी, ज्वर,
खास, मूर्छा, कंप, शिरकी पीडा प्रलाप (वृथाबकना ) तृपा, दाह, तंद्रा,
अतिसार, वमन, इनरोगों करके युक्त प्रसतके रोग और वात, पित्त, कफके
विकारोंको यह देवदार्थादि काथ नष्ट करे । यह प्रसूतरोगकी परमदिव्य
औषधि है ॥ ९५-९९ ॥
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अथवा
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अमृतानागरसहचरभदोत्कटपंचमूलजलदजलम् ।।
शृतशीतंमधुयुक्तंशमयत्यधिरेणसूतिकातकम् ॥ १०॥
गिलोय, झूठ, कटसरैया (पियावासा ) प्रसारणी, शालपर्णी, पृष्ठपर्णी
बडी कटेरी, छोटी कटेरी, गोखरू इन सबको डेढ २ मासा लेकर कूटकर ४
छटांक पानीमें पकावे। जब छटांक रहे तो इसमें छानकर ६मासे शहद मिलाके
पिलावे तो प्रसूतरोग नष्टहों ॥ १०० ॥
पञ्चजीरकपाक।
जीरकंस्थलजीरश्चशतपुष्पद्वयं तथा ।।
यवानीचाजमोदाचधान्याकमेथिकापिच ॥१॥
शुंठीकृष्णाकणामूलंचित्रकंहवुषापिच॥
बदरीफलचूर्णचकुष्ठंकंपिल्लकंतथा ॥२॥
भाषाटीकासमेत-अ०८. (११९) एतानिपलमात्राणिगुडंपलशतमतम् ॥ क्षीरप्रस्थद्वयंदद्यात्सर्पिषःकुडवंतथा॥३॥ पूज्यतेसूतिकारोगेयोनिरोगेज्वरेक्षये ॥ कासेवासेपांडुरोगेकाष्ण्येवातामयेषुच ॥ ४॥ जीरा, कलौंजी, सौंफ, बडीसौंफ, अजवायन, अजमोद, धनियाँ, मेथी सोंठ, पीपल, पीपलमूल, चित्रक, हाऊबेर, बेरका चूर्ण, कूठ, कबीला ये एकपल गुड ३०० पल, दूध २ सेर, गोघृत एकपाव, पाक बनावे । यह पाक प्रतिकारोगमें देवे इससे योनिरोग, ज्वर, क्षय खाँसी,श्वास, पांडु, कशपना और वायुके रोग ये सब नष्ट होतेहैं ॥१-४॥ अथवा " सहचरमुस्तगुडूचीमदोत्कटविश्वबालकै क्वथितम् ॥ पेयमिदंमधुमिश्रंसद्योज्वरशुलनुत्सूत्याः॥२॥ पियावासा, मोथा, गिलोय, गंधप्रसारिणी, सोंठ, सुगंधवाला इनका काथ शहद मिलाकर पीनेसे प्रसूतास्त्रीका ज्वर और शूल शीघ्र नष्ट होताहै ॥ ५॥ सौभाग्य(ठी। आज्यस्यांजलियुग्ममत्रपयसप्रस्थद्वयंखंडतः पञ्चाशत्पलमत्रचूर्णितमथोप्रक्षिप्यतेनागरम् ।। प्रस्थागुडवाद्विपाच्यविधिनामुष्टित्रयंधान्यकात मिश्या पंचपलंपलंकृमिरिपोसाजाजिजीरादपि ॥६॥ व्योषांभोददलोरगेंद्रसुमनस्त्वग्द्राविडीनांपलं पवनागरखण्डसंज्ञकमिदंतत्मृतिकारोगहृत् ॥ तृछर्दिज्वरदाहशोषशमनंसश्वासकासापह प्लीहव्याधिविनाशनंकृमिहरंमंदाग्निसंदीपनम् ॥ ७॥ उत्तम घाडकी सोंठका चूर्ण, आधसेर, गोघृत, आधसेर, गौका दूध २ सेर खाण्ड सफेद देशी २॥ सेर, सबको एकत्रकर गुडपाकविधिसे पकावें ।
(१२०) शुभसन्ततियोगप्रकाश। जब पक जाये फिर इसमें धनियाँ ३ पल, कलौंजी ५ पल, बायबिडंग १पल, सोदजीरा, काकाजीरा, खोड, निर्गमित कामगोधा, नागकेशर, शलचीनी, छोटी इलायची के बीज, प्रत्येक पतन वर्णकरके पाकमें मिलावे तो यह नागरखण्ड (ोगी कार, कान, ज्वर, दाह, शोष, श्वास, लाँती, पीला, हामिरोजमा न करे तथा जठरा- शिको बैतन्य करे ॥ ६॥ ७ ॥ समूलपानशाखेतुशतंभशेकटरमन ।। वारिद्रोणेजसाध्यस्यात्स्थापनापशपिलर ॥ ८॥ घृतप्रस्थविपक्तव्यंगर्भदत्त्वाचाम् ।। सव्योपंपिप्पलीमूलंचित्रकोजीरकतथा ॥ ९ ॥ पञ्चमूलंकनिष्ठंतुरारंडसमायुतम् ॥ बलासिंधुयवक्षारस्वर्जिकाकृष्णजीरकम् ॥ ११ ॥ सिमेतघृतंसद्योनिहन्यात्सूतिकागदान् ॥ ग्रहणींपांडुरोगंचअशोसिजठरंतथा ॥ अजिंचकुरुतेदीप्तंन्त्रीणांस्तन्यस्यशोधनम् ॥ ११ ॥ प्रसारणीको मूलपत्र शाखासहित १०० पल लेवे और एक द्रोण जलमें पकावे; जब चौथाई जल रहजावे तब उतारकर छान लेये। फिर इस काथमें त्रिकुटा, चित्रक, पीपलामूल, जीरा, शालपर्णी, पृष्ठपर्णी, मापपर्णी, मुद्र पर्णी, गोखरू, रायसन, एरंडकी छाल, खिरैटी, सेंधा, जवाखार, सज्जी, कालाजीरा प्रत्येक दवाईका कल्क एक तोला डाल एक प्रस्थ घीको विधि, पूर्वक पकावे। सिद्ध होनेपर इसके सेवन से समस्त प्रसूतरोग, संग्रहणी, पांडु, बवासीर,उदररोग ये सब दूर होवें । अग्नि दीपन होती है और स्त्रीके स्तनोंका दूध शुद्ध होता है ॥८॥९॥ ११० ॥ ११ ॥ " " " भाषाटीकासमेत-अ०८. (१२१) प्रसूतरोगमें यूष । पिपलोदेवकाष्ठंचभद्रसुस्तकमेवच ॥ अशुरुपिप्पलीमूलंलणपिष्टचकारयेत् ॥ १२ ॥ तण वहांपुरूषवेधूपंविधामणः ।। असंतुःपीलमानोजसंशयः ॥ १३ ॥ वातिपसिचवधिमकंसालिपातिकम् ।। सूतिकोप इतिवृतामिंशारानियथा ॥ १४ ॥ पीपल, देवदार, नाग मोथा, अगर, पीपलामूल इन सबको बारीक पीके के साथ इनका यूष बनावे अर्थात् सब दवाई मिलाके या सब दवा- इयोन साथ मिलाके तक्रको पकाकर यूष बनाये । फिर इस यूपको घृतयुक्त करके पीनेसे वाविक, पैतिक, श्लैष्मिक और सानिपातिक सब प्रकारके प्रसत- रोग दूर होतेहैं ॥ १२-१४ ॥ अथवा-यवादियूष। यवकोलकुलित्थानांशालिमूलंतथैवच ॥ शस्तोयंसूतिकातकेयूपःसर्वज्वरापहः॥ १९॥ जौ, उन्नाभ, कुलथी, शालीचावलोंकी जड, इनका यष सूतिकारोगमें ज्वरादिकोंका हरनेवालाहै ॥ १५॥ प्रसूताके निमयसमयकी अवधि । सर्वतःपरिशुद्धास्यास्निग्धपथ्याल्पभोजना॥ स्वेदाभ्यंगपरानित्यंभवेन्मासमतंद्रिता ॥ १६ ॥ प्रसूतासार्धमासांतेदृष्टेवापुनरातवे ॥ सूतिकानामहीनास्यादितिधन्वंतरेर्मतम् ॥ १७ उपद्रवविशुद्धांचविज्ञायवरवर्णिनीम् ॥ ऊध्र्वचतुभ्योमासेभ्यःपरिहारं विवर्जयेत् ॥ १८॥ प्रसूतात्री सर्वतः शुद्धहोकर ( सकलदुष्टरुधिरादिसे साफ होकर ) चिकना हलका हितकारी और थोडा भोजन करे । नित्य स्वेदन और तैलकी मालिश
(१२२) शुभसन्ततियोगप्रकारा।
करायाकरे एकमहीनेतक सावधानीसे अतिपथ्यपूर्वक रहे । इसप्रकार प्रदूताको
१॥महीने के बाद अथवा जबतक फिर रजोदर्शन नहो तबतक स्त्री प्रसूता नामो
रहित होतीहै यह धन्वन्तरिका मतहै।जब प्रसूता स्त्री सब उपयोंसे रहित होजाय
और निर्विघ्नतासे चार महीने लंबजावें वो परहेज छोडदे ॥ १६-१८ ।
स्तनरोग निदान ।
सक्षीरौवाप्यदुग्धौगदोपत्राप्यस्तनौत्रिपाः ।।
रक्तंमांसंचसंदूष्यस्तनरोगायकल्पते ॥ १९ ॥
वातादिदोष गर्भिणी अथवा प्रस्तावीके दुग्धयुक्त अथवा विना दूधवाते
स्तनोंमें प्राप्तहो मांस और रक्तको दुष्टकरके स्तनरोगको पैदा करतेहैं ।। ३९!
स्तनरोगके लक्षण ।
यत्सरक्तंतनुस्रावरुधिरामिषगन्धकम् ॥
शोथवृद्धिसमायुक्तंसरुजंचपयोधरम्।। १२०॥
पञ्चानामपितेषांतुहित्वाशोणितनिधिम् ।।
लक्षणानिसमानानिबाह्यविद्रधिलक्षणैः ॥ २१ ॥
उन स्तनोंमें पतला और मांसकी गन्धवाला रक्त स्रवे और सूजनकीवृद्धि
और पीडा होती है ॥ १२० ॥ यह स्तन वात, पित्त, कफ, सन्निपात, और
आगंतुक भेदसे पांच प्रकारका है। इसके लक्षण आगंतुजविद्रधि और रकज
विद्रधि छोडके बाह्यविद्रधिकी सहश जानना ॥ २१ ॥
विद्रधिकी चिकित्सा।
शोथंस्तनोत्थितमवेक्ष्यभिषग्विदध्यायोविधावभिहितंबहुधा
विधानम्॥आमेविदाहिनितथैवगतेचपातस्यास्तनौसततमे-
वविनिर्दुहीतः॥२२॥
स्त्रीके स्तनोंमें सूजन उत्पन्न होतो वैद्य विद्रधि (अन्य ग्रन्थों में
देखो कि विद्रधिकी विशेष निदान चिकित्सा लिखी है) की समान जैसी
अन्य ग्रन्थोंमें लिखी चिकित्सा करे । जो स्तनकी सूजन पक्व अथवा
अपक्व हो या दाह युक्तहो तो स्तनोंमेंसे दूध निकाल देवे ॥२२॥
भाषाटीकासमेत-अ० ९. (१२३)
पित्तनानितुशीतानिद्रव्याण्यत्रप्रयोजयेत् ॥
जलौकाभिहरेद्रक्तनस्तनावुपनाहयेत् ॥ २३ ॥
लेपोविशालमूलेनहतिपीडांस्तनोत्थिताम् ।।
निशाकनककल्काभ्यांलेपयोक्तस्तनातिहा ॥२४॥
पित्तनाशक शीतल द्रव्योंका शोथन दाहनाशक उपयोग करै अथवा जोंके
लगाकर स्तनोंका दुष्टरक्त निकाल देवे,परन्तु खेदन न करे।जो पीडा होतीहो
तो इन्द्रायणको जडका लेप करे तो स्तनको पीडा दूरहो अथवा हलदी
और धतूरे के पत्तोंको रगडकर लेप करे तो स्तनोंकी पीडा दूरहो२३॥२४॥
अथवा
लेपोनिहातिमूलस्तनरोगवन्ध्यनकोट्याः ॥
निर्वाप्यतप्तलोहंसलिलेतद्वापिवेतन ॥२५॥
अथवा बांझककौडेनी जडको पीसके लेप करे तो स्तनोंकी पीडा
दूरहो । अथवा लोहेको तपाकर जलमें बुझाकर वह जल पिलाना हित-
कारकहै ॥ २५॥
यष्टिनिहारिद्राचनिर्माण्डधातकीसमम् ॥
चूर्णस्तनत्रणेदेयंरोपणंकुरुतेभृशम् ॥ १२६॥
मुलेठी, निंब, हलदी, सम्भालू, धावके फूल, इन सब चूर्णको बारीक
करके स्तनोंके जख्मोंके भरने के लिये व्रणोंपर भुरकावे तो व्रण भरजा-
तेहैं ॥ १२६ ॥
इति श्रीशुभसंततियोगप्रकाशे प्रथमखंड़े गर्भव्यापच्चिकित्सतं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अथबालहितोपचारनामाध्यायंव्याख्यास्यामः॥१॥
अब हम बालहित उपचरक नाम अध्यायका व्याख्यान करते हैं ॥१॥
जन्मादारभ्यबालानामाषोडशमिताक्रिया॥
बालहितोपचारेऽस्मिनविधिवल्लिख्यतेमया॥२॥
(१२४) शुभसन्ततियोगप्रकाश। जन्मसे आरम्भ करके षोडश वर्ष पर्यंत बालकोंके कल्याण के लिये जो उपचार करना शहिये वह हम इस बालहिलोपचारल अध्यायमें विधि- पूर्वक लिखेंगे ॥२॥ जातयात्रविशोध्योल्लाबालं पापिया। प्रसूतलेशितंचानुबलासलेनलेवयेत् ।। अश्मनोदिनंचास्यानमूले हमाचरेत् ॥३॥ तत्कालके पैदा हवे बालकको दाई ( योग्य ती जो बच्चा जनावीहो) अपने नख रहित दोनों हाथों लिमित्र धानगम्युनत्र उत्तम घी लगाकर इन पी लगे हुये हाथोंसे बालकको लय (जेर) हे खा करके निकाले । तदनन्तर प्रसत के शसे क्लेशित सालको पातलो सेवन करे और इस बालकके कान के समीप दो पत्थरों को बजाना जिसके शब्दसे यह चैतन्य होवे तथा और भी चैतन्य होनेके उपचार करै इस तरह करनेसे बालकके प्राण प्रफुल्लित होते हैं ॥३॥ अथास्यदक्षिणेकर्णेमंत्रमुच्चारयेदयम् ॥ ४॥ फिर यदि यह बालक द्विजन्मा (बामण, क्षत्रिय पेश्य ) के घरमें पैदा हुवा हो तो इस बालकका पिता बालकके दक्षिण कानमें नीचे लिखा मन्त्र उच्चारण करे ॥४॥ अंगादंगात्संभवसिहृदयादभिजायसे ॥ आत्मावैपुत्रनामासिसजीवशरदांशतम् ॥५॥ शतायुःशतवर्षोंसिदीर्घमायुरवाप्नुहि ॥ नक्षत्राणिदिशोरात्रिरहश्चत्वाभिरक्षतु ॥ ६॥ अंग अंगसे तू है हृदयसे तू उपजाहै निश्चयही तू पुत्रनामसे आत्मा है सौ १०० वर्षतक त जीता रहे, सौवर्षकी आयुवालाहो और शतवर्षवाला तू H १ आगे अन्यखण्डमें देखो।
भापाटीकासमेत-अ० १. (१२५) है, दीर्घआयुको प्राप्तहो । सब नक्षत्र, दिशा, रात्रि,दिन समतेरी रक्षा करनेवाले हों अर्थात् तेरी रक्षा करें ॥ ५॥ ६॥ स्वस्थीभूतस्यनाभिंचसूत्रेणचतुरंगुला ।। बद्धो बदयिवाचीवायामवसंजयेत् ॥ ७ ॥ नामिचकुष्टतेलेनसेचयेत्नपयेदनु । क्षीरीवृक्षकपायेण सर्वगंधोदनवा ।। कोष्णेनततरजततपनीयनिलज्जनः ॥ ८ स्वस्थ हुए उस बालककी नाभि चार अंगुलसे ऊपर उत्तम सूत्रके धागो बाँधे । फिर ऊपरको तर्फसे काट देखें और जो सत्र नाभि पँधा हुआ है इस को धीरेसे बालकके गलेमें बांधे ताकी नाभि भी ऊपर को होकर लिपी रहे और नाभिको कूउसे सिद्ध किये हुए तैलसे सेचन करे फिर वट, पीपल, गूलर आदि क्षीरीवृक्षोंके काथते अथवा सर्वप्रकारके गंधोदकले अथवा जिस जलमें चांदी या सोना तपातपाकर बुझायागयाहो जिससे वह जल गर्म होग्याहो उससे स्नान करावे ॥ ७ ॥ ८॥ ततोदक्षिणतर्जन्यातालून्नम्यावगुंठयेत् ॥ शिरसिस्नेहयुक्तवैपिचुंचास्यप्रयोजयेत् ॥ ९ ॥ फिर दहनेहाथकी तर्जनीको रुईका फोहा लपेटकर इस बालकके ताल्वादि सब स्थानोंको धोवे और शिरके ऊपर चिकनाई(तेल)युक्त फोहा रक्खे॥९॥ गीभधवक्तासपिंपावामयेत्ततः ।। मेधायुभ्योबलार्थवैप्राश्यंचास्यप्रयोजयेत् ।। ऐंद्रीत्राह्मीवचाशंखपुष्पीकल्कंघृतंमधु ॥ १० ॥ फिर सेंधानमकयुक्त घीसे गर्भके पानीको वमनद्वारा निकाले । फिर बुद्धि और आयु तथा बलकी कामनासे उस बालकको इंद्राणी, बाली, वच, (१२६) शुभसन्ततियोगकाश। शंखपुष्पी इनको शहद और धीमें मिलाकर एकरनीसेभी कम मिकदारमें या एकरत्ती चटावे ॥१०॥ लियान्मधुघृतोपेताहेमधाविरजोथवा ।। ११॥ अथवा धी और शहदमें मिलाके उत्तम स्वर्णभस्म आमलेका चूर्ण सम मिलाके २ चावलकी मात्रासे चटावे ॥ ११ ॥ प्राजापत्येन विधिना जातकामाजिकारयेत् ॥ १२॥ वेदविहित प्राजापत्य विधानसे जातकर्मादिक करावे ॥ १२ ॥ शिराणांहदयस्थानांवित्तत्वात्प्रसतितः॥ तृतीयेहिचतुर्थेवास्त्रीणांस्तन्यप्रवर्तते॥१३॥ प्रथमेदिवसेतस्मात्रिलालेमधुसर्पिपी॥ अनंतामिश्रितेमंत्रपावितप्राशयां छशम् ॥ १४ ॥ प्रसूत होनेसे हृदयमें स्थित नाडियोंके विवृत होनेसे तीसरे या चौथे दिन तक स्त्रियोंके स्तनोंमें दूध प्रवृत्त होता है इसलिये बालकको जबतक स्तनोंमें दूध प्रवृत्त नहो तबतक इन तीन या चारदिनों में इसप्रकार नीचेलिखी औपधिका सेवन करावे । बालकको प्रथमदिन अनंतमूल्युक्त थी और शहदको मंत्रसे पवित्र करके प्राशन करावे ॥ १३ ॥१४॥ द्वितीयेलक्ष्मणासिद्धंतृतीयेचघृतंततः॥ शुद्धस्तन्यानुपानेननवनीतंप्रयोजयेत् ॥ १५ ॥ फिर दूसरे और तीसरे दिन लक्ष्मणासे सिद्धकिये घृतको सेवन करावे । फिर जब स्तनोंमें दूध आजावे तो स्तनोंका पहला दूध जमीनपर निकाल देवे। फिर बालकको किंचित् ताजा मक्खन चटाकर नचिलिखे मन्त्रसे स्तनोंको अभिमंत्रित करके स्तनका दूध पिलावे ॥ १५ ॥ स्तन्यपानविधि । ततःप्रशस्तायांतिथौशिरस्नातामहतवाससमुदङ्मुखंशिशुमुप- १-सब शहद घी दवाईमिलाकरले एक रत्ती होनाचाहिये या रत्तीसे भी कमनहो ।
Shesnues to भाषाटीकासमेत-अ० ९. (१२७) वेश्यधात्रीप्रामुखीमुपवेश्यदक्षिणस्तनंधौतमीपत्परिचुतमाभ- मंत्र्यमंत्रेणानेनपाययेत् ॥ १६॥ फिर अच्छे समय श्रेष्ठ, तिथि नक्षत्रादिमें शिरसमेत स्नान कराके अच्छे रख पहनके पाता या पालको पूर्वाभिमुख बैठायकर उसको गोदमें उत्तराभिमुख बालकको स्थापन करे और पायके घोड़े धोयेहवे दहने स्तनमेंसे थोडासा दूध निकाल देवे । फिर नीचे लिखे भंगसे अभिमंत्रित कर बालकको स्तन चुघावे ॥ १६ ॥ मंत्र। चत्वारःसागरास्तुभ्यंस्तनयोःक्षीरवाहिणः॥ भवंतुसुभगेनित्यंबालस्यबलवृद्धये ॥ १७ ॥ पयोऽमृतरसंपीत्वाकुमारस्तेशुभानने ॥ दीर्घमायुरखानोतुदेवा प्राश्यामृतंयथा ॥ १८॥ हे सुभगे इस बालकके बलकी वृद्धिझे लिये चारों समुद्र तेरे स्तनों में नित्य भोरवाही होकर रहैं और हे शुभानने तेरे दूपरूपी अमृतरसको पीकर वह बालक दीर्घायुको प्राप्तहो । जैसे देवता अमृतको पीकर दीघार्यु होतेहैं ॥ १७ ॥ १८॥ मातुरेवपिवेत्स्तन्यतत्परंदेहयुद्धये ॥ स्तन्यधाच्या कार्येतदसंपादिवत्सले ॥ १९॥ अव्यंगेब्रह्मचारिण्यौवर्णप्रकृतितःसमे ।। नीरजेमध्यवयसौजीवद्वत्सेनलोलुपे । हिताहारविहारेणयत्नादुपचरितेचते ॥ २० ॥ बालककी देहकी बृद्धिके लिये इस स्तन्यपानके दिनसे लेकर बालककी माताही दूध पिलावे । यदि माताके स्तनोंमें दूध काहो तो दूध चुंबानेवाली दो धाय जो योग्य हों और बालकसे स्नेह रखतीहों, बालकको दूसरा समझकर दुःस्वभाव न रखतीहों,व्यभिचार न करतीहों,ब्रह्मचर्यसे रहनेवालीहों, repeal । मापाटीकासमेत-अ०९. (१२९) हस्ताभ्यांग्रीवयामूनाविशेषात्सततंवचाम् ॥ आयुर्मेधास्मृतिस्वास्थ्यकरौरक्षोभिरक्षिणीम् ॥ २६ ॥ फिर वह बालक जीते हुवे गैंडेके कटे सीगकी निकाली हुई मणिको वारण करे और शुभरूप ब्राह्मी, इन्द्रायण, जीवक आदि श्रेष्ठ औषधिको धारण करे । विशेष करके बचको निरंतर धारण करना शुभहै । क्योंकि बन आयु और बुद्धि, स्मृति, स्वस्थपणा इनको करनेवाली और राक्षस भूत इसकी गन्धसे भागजातेहैं इसलिये यह उनसे रक्षा करनेवालीहै ।। २४-२५॥ धरण्युपवेशन और अन्नप्राशन ! पञ्चमेमासिपुण्यविधरण्यामुपवेशयेत् ॥ षष्टेन्नप्राशनमासिकमात्तत्रप्रयोजयेत् ॥ २६ ॥ पांचवे महीनेमें शुभनक्षत्र मुहूर्तमें पृथ्वीपर बैठावे और छठे महीने में विधिपूर्वक अन्नप्राशन अर्थात् बालकके मुखको अन्न छुवावे इससे पहले अन्न न देवे ॥ २६॥ कर्णवेधन। षट्सप्तमाष्टमासेषुनिरुजस्यशुभेहनि ॥ काँहिमागमविध्यत्वाव्यंकस्थस्यसांत्वयन् ॥२७॥ प्रारदक्षिणकुमारस्यभिषग्वामंतयोषितः॥ दक्षिणेनदधत्सूचींपालिमन्येनपाणिना ॥२८॥ जरायुमात्रप्रच्छन्नेरविरश्म्यवभासिते ॥ विध्यदैवकृतछिद्रेसकृदेवार्जुलाघवात् ॥ २९ ॥ स्नेहाक्तंसुच्यनुस्यूतंचंचानुनिधापयेत् ॥ व्यहाव्यहात्ततोवर्तिःवर्द्धयेचशनैःशनैः ॥ ३० ॥ फिर छठे या सातवें तथा आठवें महीनेमें रोगरहित बालकको शुभदिन मुहूर्तमें मार्गशीर्ष महीने में माता या धायकी गोदमें बैठाकर आश्वासन करताहुवा बालकके कान वधेि( वेधनकरे )। कानबेधन करनेवाला यदि कुमारका कान वेधन करे तो पहले दक्षिण कान वेधन करे और कन्याका वाम कर्ण पहले ९ (१३०) शुभसन्ततियोगप्रकाश। वेधन करे। वेधन कर्ता दहने हाथमें सूचीलेकर वामे हाथसे कानकी पाली पकडकर सूर्यके सामने करे। पालीमें दैवकत जो सामान्य जालेसे छिपा हुवा छिद्रहै वह सूर्यको किरणोंसे देखकर हलके पनेसे एकहीवार वेधन करदेवे। फिर तेललगाहुवा जो सूईमें धागाहै वह उस बालकके कानमें पहना देवे और तेल लगादेवे । इस धागेको तीसरेरोज बदलताजावे और मोटाधागाशनैः २ पहनादेवे ।। २७--३० ॥ जातदशनका कृत्य। अथैनंजातदशनंक्रमेणापनयत्स्तनात् ॥ पूर्वोक्तंयोजयेतक्षीरमन्नंचलहणम् ॥ ३१ ॥ इसके उपरांत जब बालकके दांत पैदा होगये हों तो पहले कहेहुवे बकरी या गौके दूधको तथा हलके और बृहण अन्नको भोजन कराते २ स्तनोंके चूंचनेसे हटादेवे और उक्त दूध और अन्नको भोजन करावे ॥ ३१ ॥ प्रियालमज्जमधुकमधुलाजासितोत्पलैः ॥ अपस्तन्यस्यसंयोज्यःप्रीणनोमोदकःशिशोः॥३२॥ चिरौंजिकी मज्जा, मुलेठी, शहद, धानकी खील, मिसरी, कमल, इन करके बनायेहुवे लड्ड स्तनोंसे हटे बालकको पुष्टकरनेकेलिये देवे ॥ ३२॥ दीपनोबालबिल्वैलाशर्करालाजसताभिः ॥ संग्राहीघातकीपुष्पशर्करालाजतर्पणैः ॥३३॥ कच्ची बेलगिरी, इलायची, खाँड, धानकी खीलोंके सत्तू इनसे बनायाहुवा दीपन मोदक देवे । अथवा धावेके फूल, खांड, धानकी खीलोंके तर्पणसे बनाया संग्रहीरूप मोदक देवे ॥ ३३ ॥ त्रासयेन्नाविधेयंतंत्रस्तंगृह्णतिहिग्रहाः ॥ वस्त्रवातात्परस्पर्शात्पालयल्लंधिताच्चतम् ॥ ३४ ॥ और बालकको कभी भी त्रास नदे अर्थात् हरेक वातसे डरावे नहीं क्योंकि डरेहुवे बालकको बालग्रह यस लेतेहैं। वस्त्रकी वायुसे पराये स्पर्शसे और लंघनसे बालकको बचाकर रखे ॥ ३४ ॥ में भाषाटीकासमेत-अ० ९. ब्राह्मीसिद्धार्थकवचासारिवाकुष्ठसैंधवैः ॥ सकणैःसाधितंपीतंवाङ्गेधास्मृतिकृघृतम् ॥ आयुष्यंपाप्मरनोनभूतोन्मादनिबर्हणम् ॥ ३५ ॥ बाली, सफेद सों, वच, कूठ, पीपल, सेंधानोन, सारिवा इनसे सिद्धकिया त पानकरनेसे वाणी, बुद्धि, स्मृतिको करताहै तथा आयुष्य है। पापराक्षस त उन्माद इनको दूरकरताहै ॥ ३५ ॥ अष्टांगत। बचेन्दुलेखामण्डूकीशंखपुष्पीशतावरी ॥ ब्रह्मसोमामृताबाहीकल्कीकृत्यपलांशिका ॥३६॥ अष्टांगविपचेत्सर्पिःप्रस्थंक्षीरंचतुर्गुणम् ॥ तत्पीतंधन्यमायुष्यंवाङ्मेवास्मृतिबुद्धिकृत् ॥३७॥ अथवा वच, बावची, मंडूकी, शंखपुष्पी, शतावरी, श्वेतविदारी, गिलोय, ब्राह्मी ये सब चार २ तोले लेवे । इनके कल्कमें ६४ चौंसठ तोले बी २५६ जाले दूध डालके वृत सिद्ध करे। इस घृतके पान करनेसे बालक धन्यहै, आयु- वाला हो । वाणी, मेधा, स्मृति और बुद्धी बढे ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ सारस्वतवृत। अजाक्षीराभयाव्योषपाठोग्राशि सैंधवैः।। सिद्धंसारस्वतंसर्पि वाङ्मेधास्मृतिवह्निकृत् ॥३८॥ अथवा बकरीका दूध, हरड, सोंठ, मिर्च, पीपल, पाठा, वच, सहिजना, सेंधानमक इनसे सिदकिया मारस्वत नामक घृत वाणी, धारणा, स्मृति, और अमिको बढाताहै ॥ ३८॥ वाणीशुद्धीकरण। वचायष्टयाह्वसिंधूत्थपथ्यानागरदीप्यकैः॥ शुद्धयतेवाग्घविलीद्वैःसकुष्टकणजीरकैः॥३९॥ वच, मुलेठी, सेंधानमक, हरड, मोंठ, अजमोद इनका चूर्णकरके घीमें "
(१३२) शुभमुन्ततियोगप्रकाश।
मिलाके चाटनेते वाणी सट होतीहै । अथवा ऋउ, पीपल, जीरा इनके
चूर्णको वृतयुक्त चाटनेसे वाणी शुद्धहो ॥ ३९ ॥
उपनयन और विद्याध्ययन ।
ततोयथोचितेवर्षसप्तमेवाद्विजातयः ।।
उपनीयविधानेनयास्मिन्वणयथाविधि ॥१०॥
शुद्धंनोपनयेदिदानमंत्रनेवास्यचापदिशेत् ॥
यथाशास्त्रस्यशिक्षार्थगुरोग्यनिवेदयेत् ॥४१॥
इसके उपरांत इसतरह उत्तम वृतोंके उपयोगगे बल बुद्धिकी वृद्धिको प्रार
हुवे बालकको जिस वर्णकेवास्ते धर्मशास्त्रमें जैसा विधान हो और जिस वर्षमें
लिखाहो या सातवें वर्षमें विधिपूर्वक यज्ञोपवीत करावे और ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य
को यज्ञोपवीत कराके मंत्रोपदेश करे, परन्तु शूदको यज्ञोपवीत न करावे और
वेदमंत्रोपदेशभी न करे। परन्तु जिसवर्णको जैसी विद्याका अधिकार हो या
जो विद्या सिखलाना चाहे उसी विद्याके गुरुकेपास शिक्षापानेकेलिये लडकेको
छोडदेवे ॥ ४० ॥ ४१॥
उपसंहार ।
बालहितोपचारोयलिखितश्वसमासतः॥
विशेषअन्यशानेपुज्ञातव्योविबुधैःसदा ॥१२॥
समाससे थोडेसे में बालहित उपचारका वर्णन हम कर चुके हैं। यदि किसी
को यह विषय महान् विशेषतासे देखना हो तो धर्मशास्त्र मन्वादिकोंमें
संस्कार और चरकादिकोंमें अन्य आचारको बुद्धिमान् सदा देखें ॥ ४२ ॥
इति श्रीशुभसंततियोगप्रकाशे बालहितोपचारो नाम भवमोऽन्यायः ॥ ९ ॥
"
अथरोगप्रतिषेधकमध्यायव्याख्यास्यामः॥१॥
अब इसके अनन्तर बालकोंके रोगके प्रतिषेधक अध्यायका व्याख्यान
करेंगे ॥१॥
भापाटीकासमेत-अ० १०. (१३३) तीनप्रकारके बालक विविधःकथिनोबालानीरानोभयवर्तनः। स्वास्थ्यंताभ्यामदुष्टाभ्यांदुशम्यारोगसंभवः ॥३॥ बालक तीनमकारके होते हैं अर्थात बालकोंकी तीन अवस्था हैं। एकतो दूश्पोनेवाले, दूसरे अन्न और दूध दोनोंको सेवन करनेवाले, तीसरे अन्नके खानेवाले । दोषरहित दूध और अन्नके सेवनसे आरोग्य ( तन्दुरस्त ) रहते और दुष्टहुवे दूध और अन्यले बालकों को रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ स्तन्यष्टका निदान। घाव्यास्तुगुरुभिर्मोज्यविषमैर्दोषलैस्तथा।। दोषादेहेप्रकुप्यतिततःस्तन्यप्रदुष्यति ॥२॥ मिथ्याहारविहारिण्यादुष्टावातादयस्त्रयः॥ दूपयंतिपयस्तेलजायंतच्याधयाशिशोः॥३॥ दूध पिलानेवाली ( माता या पाय) के भारी पदार्थोके खानेसे या वातादि दोषोंके कोपका विषल पशयोंके खानेसे बातादिदोष देहमें कुपित होकर स्वीके दूधको दूषित करतेहैं सो मिथ्याहार विहार करनेवाली स्त्रीके वातादि ३ दोष कुपित होकर दूधको बिगाड देतेहैं उस स्त्रीके दूध पीनेसे बाल- कको अनेकप्रकारकी व्याधियें होती हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ शुद्ध दूधके लक्षण। यदद्भिरेकतांयातिनचदोपैरधिष्ठितम् ।। तद्धिशुद्धंपयोविद्यात्पाययेतंचवैसुधीः॥४॥ जो स्त्रीका दूध जलमें गेरनेसे जलमेंही मिलजावे और जल दूध एकही होजाये । दूधका कोई अंश और रंग तथा तार आदि जलसे अलग न प्रतीत होताहो जिसमें वातादि कोई दोषका दूषण न प्रतीत हो वह दूध शुद्ध जानो और बालकको बुद्धिमान् ऐसाही शुद्ध दूध पिलावे ॥ ४ ॥ वातादिकोंसे दूषित दूधके लक्षण । तद्धिवातात्पयोदुष्टप्लवतेभसिनिश्चयम् ॥ कषायंफेनिलंरूकंवोंमत्रविबंधकत ॥५॥ Mornwr (१३४) शुभसन्ततियोगप्रकाश। यदि वही दूध वायुसे दूषित हो तो जलमें डालनेसेतिरता रहै और कषैला, झागदार, रूक्ष बालकके विष्ठा और मूत्रको रोकदेवे और वायुके रोग पैदा करे ॥ ५॥ पित्तादृष्टाम्लकटुकं पीतराज्यप्सुदाहकृत् ।। कफातसलवणंसांदजलमज्जतिपिच्छिलम् ॥६॥ संसृष्टलिंगसंसर्गाबिलिंगसान्निपातिकम् ॥ यथास्वलिंगतद्व्याधीन्जनयत्युपयोजितम् ॥ ७ ॥ और पित्तसे दूषित दूध खट्टा कडुवा होताहै,पानीमें डालनेसे पीली तारेमी छोडे और पीनेसे बालकको दाहादि पित्तरोग पैदा करे।कफसे दुष्टहुवे दूधके ये लक्षणहैं-दूध नमकीनहो, और तारोंकरके युक्तहो, करडाहो और पिच्छलहो जलमें गेरनेसे डूबजावे और पीनेसे बालकोंको कफके विकार पैदाकरे ॥६॥ और दो दोषोंसे युक्त दूध दो दोषोंके लक्षणोंवाला हो और वंद्वजरोगको करे। सन्निपातसे दूषित तीनोंके लक्षणोंवाले रोग पैदा करे । जैसे जिस दोषसे दूषित दूधहो बालकको उसी दोषके लक्षणोंवाला रोग पैदा करताहै ॥ ७ ॥ बाकलके रोग जाननेकी गीत । शिशोस्तीक्ष्णमतीक्ष्णंचरोदनाल्लक्षयेद्रुजम् ॥ सयंस्पृशेदृशंदेशंयत्रचस्पर्शनाक्षमः ॥ ८॥ तवविद्याद्रुजंमूर्ध्निरुजंचाक्षिनिमीलनात् ।। हदिजिह्वौष्ठदशनश्वासमुष्टिनिपीडितैः ॥ ९॥ कोष्ठेविबंधवमथुःस्तनदंशांवकूजनैः ॥ आध्मानपृष्टवमनजठरोन्नमनैरपि ॥ बस्तौगुह्येचविण्मूत्रसंगत्रासदिगीक्षणैः ॥ १० ॥ बालकके तीक्ष्ण और नरम रोगको बालकके रोनेसे जाने और जिस अपने शरीरके अंगको या जिस जगेको बालक छुवे और दूसरेके हाथके लग- नेसे रोवे और सहार नसके उस देशमें बालकके पीडा जाने ॥ ८॥ यदि बालक आंखे मीचें तो शिरमें दर्द जाने और जीभ व होठोंको दांतोंके निकल-
भाषाटाकासमत-अ० १०.
,
नेको जगेसे दबावे और श्वासहो, मुठियां मीचे तो बालकके हृदयमें पीडा जाने
॥ ९॥ यदि बालकके कोठेमें पीडा हो तो मुखसे पानी गिरे या छर्दी हो,
विबंध हो और स्तनोंको काटे, आंतोंका कूजन हो,अफरा, पीठन बजावे, पेट
फूल जावे इन लक्षणोंसे कोष्ट पीडा जानाबस्तीमें पीडाहो तो मलमूत्र रुकजाये
और त्रासयुक्त नेत्रोंसे दिशाओंको देखे ॥ १० ॥
चिकित्साका उपदेश।
अथधाच्या क्रियांकुर्याद्यथादोषयथामयम् ॥११॥
इसके उपरांत धायकी चिकित्सा दूधकी शुद्धिकेलिये दोषोंका जैसा
बलाबलहो और जैसा रोग हो उसको जानके करे अर्थात् जो रोग हो
उसीका यत्न करे ॥ ११ ॥
वातदूषितकी चिकित्सा।
तत्रवातात्मकेस्तन्यदशमूलंत्र्यहंपिबेत् ॥
ततःपिबेदन्यतमंवातव्याधिहरंघृतम् ॥ १२॥
वायुसे दूषित स्तन्यमें तीनदिनतक दशमूलका काथ वायको पिलावे, फिर
वायुकी व्याधियोंके हरनेवाले घृतका सेवन करे ॥ १२॥
रास्नादिघृत ।
रास्नाजमोदासरलदेवदारुरजोन्वितम् ॥
बालोलिह्याद्धृतताविपक्कंससितोपलम् ।। १३ ॥
रास्ना, अजमोद, देवदारु, सरलवृक्ष इनके चूर्णयुक्त घृत अथवा इन्हीं
औषधियोंके कल्कसे सिद्धकिया घृत मिसरी मिलाके बालक चाटे और धायभी
चाटे तो हितहै ॥ १३ ॥
पित्तदृषितस्तन्यका यत्न ।
पित्तदुष्टेमृताभीरुपटोलीनिंबचंदनम् ॥
धात्रीकुमारश्चपिबेत्काथयित्वाससारिवम् ॥ १४ ॥
अथवात्रिफलामुस्तभूनिंबकटुरोहिणी ॥
सारिवादिपटोलादिंगणसिद्धघृतंचवा ॥ १५॥
शुभसन्ततियोगप्रकाश। पिनदूषित दूधको शुद्धिकेलिये गिलोय, शतावर, परवल, निन, चंदन, मारवा इनके काथको अथवा त्रिफला, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी इनके काथको दूधपिलानेवाली धाय तथा बालक पीये अथवा सारिवादि गण, या पटोलादिगणका काथ या इनसे सिद्धकियावृत धाय तथा वालक सेवन करे (बालकोंकी मात्रा आगे लिखेंगे)॥ १४॥ १५ ॥ कफदापितकी चिकित्सा। कफात्मकेघृतंदेयंयष्टिसैंधवसाधितम् ।। सिंधूथपिप्पलीमद्रापिष्टैःक्षौद्रयुतैरथ ।। १६॥ राठयुष्पैःस्तनौलिंपेच्छिशोश्चदशनच्छदौ ।। सुखमेववमेद्वालोधात्रीतीक्ष्णैस्तुवामयेत् ॥ १७ ॥ ततस्तारपृथ्वीकासुरदारकलिंगकान्॥ अथवातिविपामुस्तप थापंचकोलकान् ॥ १८॥ कफसे दुष्ट स्तन्य हो तो मेंधानमक और मुलैठीसे सिद्धकिया वृत अथवा सेंधानमक पीपलसे सिद्धकिया वृत बालकको देवे और मैनफलके फूलोंको पीसकर सहदमें मिलाकर पायके स्तनों और बालकके होठोंपर लेप करे तो बालक सुखपूर्वक वमन करे और धायको तीक्ष्ण औषधियोंसे वमन करावे । फिर तगर कलौंजी देवदारु इंद्रजौ इनका काथ अथवा अतीस, नागरमोथा, वच, पीपल, पीपलामूल, चब्य, चीता, सोंठ इनके क्वाथको धाय और बाल- कको पिलावे ॥ १६-१८॥ सन्निपातसे दूषित स्तन्यपानके उपद्रव । सन्निपातोद्भवेस्तन्येनानारोगयुतोभवेत् ॥ ज्वरारोचकव्यादिरंगभंगश्चवेपथुः ॥ १९ ॥ नानावर्णपुरीपत्वंमत्रपीतसितंवनम् ॥ नानागदाश्चजायंतेक्षीरालसकनामतः॥२०॥ सन्निपातसे दूषित स्तन्य (स्तनोंका दूध) होनेसे बालक अनेक रोगयुक्त होताहै और ज्वर, अरोचक, छर्दि अंगभंग, कंप, तृषा, श्रम, तंद्रा आदि " भाषाटीकासमेत-अ० १०. (१३७) अनेक उपद्रव हों और अनेक रंगका सांड, पिच्छिल, झागदार, अति पतला इस्तहो, मूत्र पीला और सफेद करता हो और अनेक रोगहों इसको शीराल- सक रोग कहतेहैं ॥ १९ ॥ २० ॥ चिकित्सा तत्राशुधात्रीबालंचवमनेनोपपादयेत् ॥ विहितायांचसंसावादियोजयेदणम् ॥२१॥ पाठाशुण्ठयभूतातिततिकादेवाहलारिवाः ।। समुस्तमूर्वेद्रयवा स्तन्यदोपहरा परम् ॥ २२॥ इस रोगमें धाय और वालकको शीघ वमन कराके विधान किये पेयादि कमसे बचादि गणका श्योग करे । अर्थात् बचादिगणका काथ या वृत सेवन करावे अथवा पाठा, सुंठ, गिलोय,चिरायता, कुटकी, देवदारु, सारिवा, नागरमोथा, मूर्वा, इंद्रजौ ये सब धके दोष हरनेवाले इन सबका काथ या बृत अथवा अर्क पिलावे ॥ २१-२२ ॥ दंतोद्भेदक रोग। दन्तोद्भेदःशिशोःसर्वरोगाणांकारणस्मृतम् ॥ विशेषाज्ज्वरविभेदकासच्छर्दिशिरोरुजा॥२३॥ अभिष्यंदस्यपोथक्याविसर्पस्यचजायते ॥ दंतोद्भवेचबालानांनहिकिचिन्नद्यते ॥२४॥ बालकोंके सब रोगोंका कारण दांत निकलनाहै। इन दातोंके निकलनेके समय विशेष करके ज्वर, दस्त, खाँसी, छर्दि, शिरमें पीडा, नेत्रोंका दूखना, और पलकोंके रोग, विसर्परोग हों, प्रायः दांतोंके निकलनेके समय बालकों के सब अंग पीडित होते हैं ॥ २३-२४ ॥ बालकोंके रोगोंकी चिकित्सा। यथादोषयथारोगंयथोद्रेकंयथाबलम् ॥ विभज्यदेशकालादीस्तत्रयुज्येद्भिपग्घितम् ॥२५॥ १ दंतोद्भेदक रोगको चिकित्सा आगे इसी अध्यायमें देखो जहाँपर दंतरोगका वर्णनहै । ,
(१३८) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
भैषज्यंचान्यग्रंथेषुमहतांयवरादिषु ॥
तदेवकार्यबालानांकिंतुदाहादिकंविना ॥२६॥
तएवदोपादृष्याश्च ज्वराद्याव्याधयश्चते ॥
अतस्तदेवभैषज्यंमात्रातबकनीयसी॥ २७ ॥
जैसा जो दोष और जैसा रोग, जैसी पीडा, जैसा बलाबल हो उसीके
अनुसार देशकालादिकोंको विचारके वैद्य हितकारी औषधियाँ चिकित्मा
करे। जो औषध वैद्यक ग्रन्थोंमें बड़े मनुष्योंके ज्वरादि रोगोंमें कहाहै वहीं
औषध बालकोंके ज्वरादिकोंमें करे, परन्तु दागना,झारलगाना, वमन विरेच-
नादि बडे मनुष्यकी सदृश बालकोंका न करे । जो युवा मनुष्योंको दोप दृष्य
और ज्वरादिक होतेहैं वही बालकोंके होतेहैं, इसलिये युवा पुरुषोंकी व्याधि
योंमें जो औषधियें लिखीहैं अनेक ग्रंथोंसे विचार कर बालककोभी उन्हींका
उपयोग करे परन्तु बालकोंको मात्रा कम देवे ॥ २५--२७ ॥
तेषांगदानांयेयोगाःप्रवक्ष्यतेऽगदंकराः ॥
तेषुतत्कल्कसंलिप्तौपाययेत्तुशिशुस्तनौ ॥२८॥
जिस जिस रोगकी वैद्य लोग जो जो दवाई बतलातेहैं अर्थात जिन २
रोगोंको वैद्यक ग्रन्थोंमें जो जो दवाइयोंके योग कहाँ उन २ योगोंके
कल्कको छोटी मात्रासे बालककी माताके स्तनोंके मुखपर लेप करके बाल
कको चुंघावे ॥२८॥
बालककी मात्राका प्रमाण ।
प्रथमेमासिबालायदेयाभैषज्यरक्तिका ॥
अवलेह्यानकर्तव्यामधुक्षीरसितावृतः ॥२९॥
एकैकांवर्द्धयेत्तावद्यावत्संवत्सरोभवेत् ॥
तदूर्वमाषवृद्धिःस्यायावत्षोडशवत्सराः ॥ ३० ॥
चूर्णकल्कावलेहानामियंमात्राप्रकीर्तिता ॥
कषायस्यपुनःसैवविज्ञातव्याचतुर्गुणा ॥३१॥
भाषाटीकासमेत-अ० १०.
।
।
क्षीरपस्यशिशोर्देयमौषधंक्षीरसर्पिषा ।।
धान्यास्तुकेवलंदेयनक्षीरेणापिसर्पिपा ॥ ३२ ॥
पहले महीनेमें बालकको एक रत्तीतक (या रत्तीसे भी कम ) काष्ठ औष-
धिकी मात्रा देवे । तथा वह औषधि घृत, सहद, दूध, मिसरीमें मिला-
करके अवलेह बनाके चटावे या स्तनपर लगाकर दूध पिलावे । दूसरे महीनेमें
दोरत्ती तीसरेमें तीनरत्ती ऐसेही प्रतिमास एकररत्ती वधावे । फिर पहले वर्षमें
मासा दूसरेमें दोमासे ऐसेही प्रतिवर्ष षोडश३६ वर्षतक एकमासा वधावे ।
चूर्ण, कल्क, अवलेहकी यह मात्रा कही है। यदि क्वाथ देना होतो क्वाथकी
इससे चौगुनीमात्रा जाननी। जो बालक दूध पीतेहैं उनको दूध और वीसे
औषधि देवे परंतु धायको केवल औषधही देवे! या धायको जो औषध दी
जावे वोह विना दूध घृतसे काथ करके देना चाहिये । जो बालक अन्न और
दूध दोनोंको सेवन करतेहैं उनको और घृतसे देवे ॥ २१-३२ ॥
बालकोंको लंघनका निषेध ।
उचितेलंघयेद्धात्रीशिशोनोक्तं विलंघनम् ॥
सबैनिवार्यतबालेस्तन्यनप्रतिवार्यते ॥३३॥
यदि किसीरोगमें लंघन कराना हो तो बालकको माता ( दूधपिलानेवा-
ली)को लंघन करावे, परंतु बालकको लंघन न करावे । बालकोंसे समस्त
पदार्थ छुडादेवे परन्तु दूध न छुडावे।क्योंकि बालकका जीवन दूधकेही आश्रय
होताहै ॥ ३३ ॥
जो बालक दूध न पीवे उसका यत्न ।
बालोयश्चिराजातःस्तन्यनगृह्णातितस्यसैंधवधात्री-
मधुघृतपथ्याकल्केनोद्घर्षयजिह्वाम् ॥ ३४ ॥
जो थोडेदिनोंका बालक दूध न पीवे अर्थात् स्तनको मुखसे न दवावे तो
सेंधानमक, आमले, हरड, और घी इनके कल्कसे जीभको मले ॥ ३४ ॥
बालकके ज्वरादिकोंकी चिकित्सा । ( भद्रमुस्तादिक्वाथ सर्वज्वरोंपर )
भद्रमुस्ताभयानिंबपटोलमधुकै कृतः॥
क्वाथ कोष्णःशिशोरेषनिःशेषज्वरनाशनः॥३५॥
(१४०) মবিন্থামাহ। नागरमोथा, हरड, निंब, पटोलपत्र, मुलेठी, इनका कियाहुवा काथ निवा या गर्म पानझे बालकोंके समस्त ज्वर नष्ट करता है ।।३५ ॥ चतुर्भद्रकाथ व अवलेह ज्वगतिसाग्पर । वनकृष्णारुणाशृंगीचूर्णक्षाद्रणसंयुतम् ॥ शिशोवरातिमारनंकासंश्वासंवर्मिहरतु ॥३६॥ नागरमोथा, पीपल, अतीस, काकडानिंगी इनके चर्मको सहनमें मिलाके चटानेसे या काथके पीनेसे बालकका ज्वर, निधार, खांमी, श्वास, वमन दूर होवे ॥ ३६॥ अन्ययोग ज्वगतिसागदिकापर। धातकीबिल्लधान्याकलोपेंद्रजवबालकः ॥ लेहाक्षौदेणबालानांवरातीसाखातनुत् ॥ ३७॥ धावेके फल, वेलकी गेरू, धनियाँ, लोध, इंद्रजी, सुगंधवाला इनके चूर्णको सहतमें मिलाके चटानसे बालकोंका ज्वर, तिसार और वातविकार नष्ट हों ॥ ३७ ॥ बृहतीफलमूलत्वकृष्णाग्रंथिकसंभवः ।। तुगातीरीतःकाथापीतोतिशिशोर्वमिम् ।। मच्छश्विासंज्वरंकासमतीसारंचपीनसम् ॥३८॥ बडीकटेरीके फूल और जडकी छाल, पीपल, पीपलामूल इनको काथ वंशलोचन डालकर पीनेसे बालकोंकी छर्दैि, भा, श्वास, ज्वर, खाँसी, अतीसार, पीनस ये सब दूर हों ॥ ३८॥ हरिद्राव्ययष्टचारसिंहीशक्रयकैःशृतम् ॥ शिशोवरातिसारनंश्वासकासवमिहरेत् ॥३९॥ हलदी, दारुहलदी, मुलेठी, कटेरी, इंद्रजौ, इनका क्वाथ पीनेसे बालकोंके ज्वर, अतिसार, श्वास, वमन, खाँसी दूर होतीहै ॥ ३९ ॥ धान्यमतिविषाशृंगीगजाहालक्षणचूर्णितम् ॥ बालानांछर्यतीसारंमधुनाहंतिलेहनात् ॥ ४० ॥ "
भापाटीकासमेत-अ० १०.
(१४१)
धनियाँ, अतीस, ककडासिंगी, गजनीपल इनका चूर्ण करके सहत मिलाके
चाटनेले छार्दै अतिसार दूर हो ॥ ४० ॥
नागरातिविषामुस्तावालकेंद्रयवैधृतम् ।।
कुमारंपाययेत्प्रातःलातीसारनाशनम् ॥ ४ ॥
सोंठ, अतीस, मोथा, नेत्रवाला,इंद्रजौ इनका साथ प्रातःकाल पीनेसे सब
प्रकारके अतिसार दूर होते हैं ॥ ४१ ।।
मोचारसासमंगाचधातकीपनकेशरम् ॥
पिष्टैरेतैर्यवागूःस्यादतातीसारनाशनम् ॥ ४२ ॥
मोचरस, लज्जालुकी जङ, थायेके फूल, कमलकीकेशर इनको पीसकर
यवागू बनाकर पीनेसे रक्तातिसार नष्ट होताहै ॥ ४२ ॥
लाजासयष्टिमधुकाशर्कराक्षौद्रमेश्च ।।
तण्डुलोदकयोगेनक्षिप्रंहतिप्रवाहिकाम् ॥ ४३॥
धानको खील, मुलेठी, मिसरी, सहत इनको मिलाकर. चाटके ऊपरसे
चावलोंका घोन पीनेसे प्रवाहिका शीघ्र नष्ट होतीहै ।। १३ ॥
शालपर्णीपृश्निपांवोटात्वकथितंजलम् ॥
सौद्युक्तंत्रिदोषघ्नंसर्वातीसारनाशनम् ॥१४॥
शालपर्णी, पृश्निपर्णी, सुपारीकी छाल इनका क्वाथ बनाकर सहत मिला
कर पीनेसे त्रिदोषके और सबप्रकारके अतिसार नष्ट होतेहैं ॥ ४४ ॥
खांसीपर योग।
पौष्करातिविषावासाकणाशृंगीरसंलिहेत् ॥
मधुनामुच्यतेबाल कासै पञ्चभिरुत्थितैः॥४५॥
पोहकरमूल, अतीस, बाँसा, पीपल, ककडासिंगी इनके क्वाथमें सहत
मिलाकर पीनेसे बालककी पांचप्रकारकी खाँसी दूर होतीहै ॥ ४५ ॥
मुस्तकातिविपावासाकणाशृंगीरसंलिहन्॥
मधुनामुच्यतेबालःकासैःपंचभिरुच्छ्रितैः॥४६॥
(१४२) शुभसन्तातयागप्रकाश। नागरमोथे, अतीस, बाँसा, पीपल, काकडासिंगी इनके काथमें महत मिलाकर पीनेसे बालक पांचप्रकारको बढीहुई खांसी से छूटजाताहै ॥ ४६ ।। व्याघ्रीसुमनसंजातकेशरैरवलेहिका ॥ मधुनाचिरसंजातानशिशोकासाव्यपोहति ॥४७॥ कटेरीके फूलकी केशरको सहतमें मिलाकर चटानेसे बालककी बहुतदिनकी युरानी खाँसी नष्ट होतीहै ॥ ४७ ॥ द्राक्षादिचूर्ण खाँसीश्वासपर। द्राक्षावासाऽभयाकृष्णाचूर्णौद्रेणसर्पिपा ॥ लीढंश्वासंनिहत्याशुकासंचतमकंतथा ॥४८॥ मुनक्का, बांसा, हरड, पीपल इनका चर्ण सहत और धीमें मिलाके चाटनेसे बालकका श्वासरोग, खांसी, तमक, श्वास यह सब नष्ट होतेहैं।। ४८॥ कृष्णादुरालभाद्राक्षाकर्कटाख्यातुगाह्वया ॥ चूर्णितामधुसर्पिालीढाहंतिशिशोगदान ।। श्वासंकासंसतमकंववापिहरंपरम् ॥ १९ ॥ पीपल, धमासा, द्राक्षा, काकडासिंगी, वंशलोचन इनका चर्ण करके सहत और घी मिलाके चाटनेसे बालकके श्वास खाँसी तमक ज्वर आदि रोग नष्ट हो ॥ ४९॥ चूर्णकटुकरोहिण्यामधुनासहयोजयेत् ॥ हिकांप्रशमयेतक्षिप्रंदिचापिचिरोत्थिताम् ॥५०॥ कटुकीका चूर्ण सहदमें मिलाके चाटनेसे बालककी हिचकी और देरकी छदिरोग नष्टहो ॥ ५० ॥ बालककी छर्दि और दूध निकालनेका यत्न । आम्रास्थिलाजसिंधूत्थंसक्षौद्रंछर्दिनुद्भवेत् ॥ आमकी गुठली, धानोंकी खील, सेंधानमक इनको सहतमें मिलाके चाटनेसे बालककी छर्दि दूर होती है। " भाषाटीकासमेत-अ० १०. पीतंपीतंवमेधस्तुस्तन्यतमधुसर्पिणा ॥५१॥ द्विवार्ताकीफलरसंपंचकोलंचलेहयेत् ॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलंचव्यचित्रकनागरम् ॥ १२ ॥ जो बालक दूधको पीपीकर उलटी करदेवे उसको बडी और छोटी कटे- रीके फल तथा पंचकोल इनका चूर्ण करके सहद और घृतमें मिलाके चटावे तो दूध निकालना बंद हो अथवा पीपल, पीपलामूल, चव्य, चित्रक, सॉट इनके चूर्णको सहत और बीसे चटावे ॥ ५३॥ ५२ ॥ तृषापर। हीबेरशर्कराक्षौद्रलीटंतृष्णाहरंपरम् ॥ ५३॥ नेत्रवाला, खाँड, सहत इनको मिलाकर चाटनेसे बालककी प्यास दूर होतीहै ।। ५३ ॥ अफारा और वातशूलपर। घृतेनसिंधुविश्वैलाहिंगुभाङ्गरिजोलिहन् । अनाहंवातिकंशूलंहन्यात्तोयेनवाशिशोः॥५४॥ सेंधानमक, सोंठ, इलायची, हींग, भारंगी इनके चूर्णको घृतमें मिलाके वटाकर ऊपरसे गर्मपानी पिलावे तो बालकका अफारा और बादीका शूल दूरहो ॥ ५४॥ मुखस्रावपर। सारिवातिललोध्राणांकषायोमधुकस्यच ॥ संस्राविणिमुखेशस्तोधावनार्थसदाशिशोः॥५५॥ सारिवा, तिल, लोध, मुलेठी इनका क्वाथ बालकके मुखस्रावको दूर करनेकेलिये परमहितहै ॥ ५५ ॥ मूत्रावरोधपर। कणोषणासिताक्षौद्रसूक्ष्मैलासैंधवैःकृतः ॥ मूत्रग्रहेप्रयोक्तव्यःशिशुनालेहउत्तमः॥५६॥ पीपल, मिर्च, मिसरी, छोटीइलायची, सेंधानमक इन सबका चूर्ण सहतमें मिलाके चाटनेसे बालकोंका मत्र खुलजाताहै ॥ ५६ ॥ -
"
(३४४) शुभसन्ततियोगाकाश।
नाभिशोथपर!
मृत्पिडेनाग्निवर्णनक्षीसिक्तेनसोमणा ।।
स्वेदयेदुत्थितांनाभिंशोथस्तेनोपशाम्यति ॥२७॥
एक मट्टीके पिंडको अग्निमें तााकर लाल करलेवे, फिर अग्निम निकाल
कर दूधमें बुझाने, फिर कपडे में लपेटकर सहता २ उठीहुई बालककी नाभियन
स्वेदन करे तो नाभिशोथ दूरहो ॥ ५७ ॥
नाभिपाकापर।
दग्धेनछागशकृतानाभिपाकवचूर्णनम् ॥
त्वकचूर्णैःक्षीरिणांवापिकुर्याचंद रेणुना ॥५८ ॥
नाभिपाकेनिशालोत्रप्रियंगुमधुकैःशृतम् ।।
तैलमभ्यंजनशस्तमभिवाद्यवचूर्णनम् ॥ ५९॥
बकरीकी मेगनोंको जलाकर उसका चूर्ण पकतीहुई नामिपर लगावे अथवा
क्षीरीवृक्षोंकी छालका चूर्ण, चन्दन और रेणुकाचूर्ण इनको मिलाकर नाभि-
पाकपर लगावे । अथवा हलदी, लोध, फूलप्रियंगु, मुलेठी इनके कल्कके द्वारा
तेलको सिद्धकरके नाभिपर लगावे अथवा उपरोक्त औषधिका चूर्ण बुरकनेसे
नाभिपाक दूर होताहै ॥ ५८ ॥ ५९ ॥
शोथपर।
मुस्तंकूष्मांडबीजानिभद्दारुकलिंगकान् ॥
पिट्वातोयेनसंलिप्तलेपोयंशोथहच्छिशोः॥ ६० ॥
नागरमोथा, पेठेके बीज, देवदारु, इंद्रजब इनको जलमें पीसकर लेप कर
नेसे बालककी सूजन दूर होतीहै ॥ ६० ॥
मुखपाकपर।
अश्वत्थत्वग्दलौद्रेमुखपाकेप्रलेपयेत् ॥ ६१ ॥
पीपल वृक्षकी छाल और पत्ते पीसकर सहद मिलाके मुखमें लेप करनेसे
बालकके मुखके छाले दूर होते हैं ॥ ६१ ॥
भागाटीकासमेत-अ० १०. (१४५) अतिरोनेपर । पिप्पलीत्रिफलाचूर्णवृतक्षौद्रपरिप्लुतम् ।। बालोरोदतियस्तस्मैलेहंदद्यात्सुखावहम् ।। ६२ ।। पीपल और त्रिफलेके चूर्णको घी और सहतमें मिलाकर बालकको चटानेसे बालकका अति रोना बंद होताहै ।। ६२ ॥ अत्तविसादिकोंपर ! पटोलत्रिफलारिष्टहरिनाकथितंपिवेत । सतवीसपैविस्फोटज्वराणांशांतयेशिशोः।। ६३॥ पटोलपत्र, त्रिफला, नीमकी छाल, हलदी, इनका काथ पीनेसे बालको बाब विसर्प कोडे ज्वर ये सब दूर होतेहैं ॥ ६३ ॥ सिनपामाविचर्चिकापर। गृहधमनिशाकुष्टराजिकेंद्यवैःशिशोः ।। लेपस्तकेणहत्याशुसिध्मपामाविचचिकाम् ॥ ६४ ॥ घरका थूमासा, हलदी, कूठ, राइ, इंद्रजौ इनको छांछ मिलाके पीसकर लेप करनेसे बनरफ, खुजली, विचार्चका दूर होतीहै ॥ ६४ ॥ ज्वरादिक व्याधियोंमें बडे पुरुषोंकी सदृश बालककीभी चिकित्सा । ज्वराद्याव्याधयःसर्वेवक्ष्यंतमहतांतये ॥ बालानामपितेतद्बोदव्याभिषगुत्तमः ॥ ६ ॥ बडे मनुष्योंको जो व्याधिये वैद्यराजों ( चरकादिकों) ने कहींहैं वोही बीमारियाँ बालकोंको होती हैं इसलिये सब बीमारियोंकी चिकित्सा बडे पुरुषोंवत् बालकोंकी भी अल्पमात्रासे करे। परन्तु दाहादिकत्व बढे पुरुषों की सदृश न करे यह हम पहलेही कह चुके हैं ॥ ६५ ॥ बडे पुरुषोंसे अलग कुछ बालकोंके रोग। बालानामेवयेरोगाभवंतिमहतांनच ।। तालुकंटकमुख्यान्वैलेखयिष्येप्रयत्नतः ॥६६॥ १० (१४६) शुभसन्ततियोगप्रकाश। जो रोग बालकों को होतेहैं उनमें से कुछेक रोग भी जो केवल बालकोंकोही होतेहैं। युवादिक बडीअवस्थामें नहीं होते उन नालुकंटक आदि रोगोंको अब यत्नपूर्वक लिखतेहें ॥ ६६ ॥ तालुकंटकनिदान। तालुमांसेकफ कुद्धाकुरुतेतालकंटकम् ॥ तेनतालप्रदेशस्यनिन्नतामाजिायते ।। ६७ ॥ तालुपातात्स्तनद्रप ऋतापानंशकदम॥ तृडक्षिकंटास्यरुजाग्रीवादुधरतावमिः ॥ ६८ ॥ तालुवेके मांसमें कफपित हुई तालुकंटक रोग करतीहै उसमे तालुवा नीचेको नमजावे अर्थात् काग लटकआवे। जिससे सिरमें गटासा पडजावे इसी- कारण बालक वे नहीं। यदि स्तनचंघेमी या दृषीचे तो बड़े कटसे पीबे, मल पतला पडजावे, तृषा लगे, नेत्र, कंठ, मुख इनमें पीडाहो गरदनको गेरदे और वमन हो ।। ६७ ॥ ६८ ॥ तालुकंटकका यत्न । हरीतकीवचाकुष्टंकल्कमाक्षिकसंयुतम् ॥ पीत्वाकुमारःस्तन्येनमुच्यतेतालुकंटकात् ॥ ६९ ॥ हरड, वच, कुठ इनके कल्कमें सहत मिलाकर माताके दूधसे पीवे तो तालुकंटक दूर हो ॥ ६९॥ तालुपाकका यत्न । तालुपाकेयवक्षारंमधुनाप्रतिसारणम् ॥ ७० ॥ तालुपाकरोगमें जवाखार सहतमें मिलाके तालुमें लगावे और मले।।७०॥ महापद्मनिर्णय। वीसर्पस्तुशिशो प्राणनाशनःशीर्पवस्तिजः॥ पद्मवर्णीमहापद्मरोगोदोषत्रयोद्भवः ॥ शंखाभ्यांहृदयंयातिहृदयाचगुदंबजेत् ॥७१ ॥ बालकके मस्तक और बस्तीमें प्रगट हुवा विसर्परोग बालकके प्राणोंको नष्ट करताहै । जो विसर्प लालकमल के समान लालवर्ण होताहै. उस त्रिदोषो
भाषाटीकासमेत-अ० १०. (१४७)
दवको महापद्मरोग कहतेहैं। यह रोग कनपटीयों में उत्पन्न होकर हृदयपर्यंत
जाताहै और उसीप्रकार बस्ती में उत्पन्न होकर गुदामें गुदासे हृदयमें और हृद
यसे शिरमें जाताहै। इसको महापन कहते हैं ।। ७३ ॥
महापद्मकी चिकित्सा
पटोलत्रिफलारिष्टहरिद्राकथितपिबेत् ॥ ७२ ॥
पटोलपत्र, त्रिफला, नीम, हलदी इनका काथ विसर और ज्वरको दूर
करताहै ॥ ७२ ॥
लेप।
सारिवोत्पलकहारमश्रीमुस्तचंदनम् ॥
अपौंडरीकमंजिष्टायष्टीमधुकसर्षपैः ।।
कुमाराणांप्रशस्तोयंलेपोवीसनाशनः ।। ७३ ॥
सारिया, कमल, कमोदनी, चंदन, नागरमोथा, लालचंदन, पुण्डरीक,
कमल, मँजीठ, मुलेठी इनको रगडकर लेप करनेसे बालकका विसर्प रोग
दूर होताहै ॥ ७३ ॥
कुकूणकके लक्षण ।
कुकूणक क्षीरदोषाच्छिशूनामेववर्मनि ॥
जायतेतेनतन्नेत्रंकण्डुरंचत्रवेन्मुहुः ॥७४ ॥
शिशोःकुर्याललाटाक्षिकूटनासावघर्षणम् ॥
नशक्तोर्कप्रभांद्रष्टुनक्मोन्मीलनक्षमः ॥ ७ ॥
दूधके दोषले बालकोंकी पलकोंमें कुकूणरोग पैदा होता है जिससे बालक
नेत्रोंको खुजावे गले नेत्रोंसो पानी बहे, रसकीचडसे पानीके बारबार बहनेसे
बालक मस्तक नाक आँख, इनको रगडे और धूपके सामने न देखसके,रास्तेमें
चलते आंख न खोल सके इसको कुकूण (कोथुवा) रोग कहतेहैं।७४॥७५॥
ककूणका यत्न ।
द्विनिशालोध्रयष्टचारोहिणीनिंबपल्लवैः ॥
कुकूणकेहितावतिःपिष्टैस्ताम्ररजोन्वितैः ॥ ७६॥
(१४८) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
हलदी, दारुहलदी, लोध, मुलेठी. कुटकी, नीमकेपचे, ताम्रभस्म इन
सबको बकरीके दूधमें या साधारण जलमें खरल करके बनियें बनाने इसम-
चीको जलके संयोगसे रगडकर लगानेसे कुकृष्ण दूरहो ॥ ७६ ॥
फलत्रिकंलोधपुनर्नवेचसशृंगबृद्धतीद्रयच
आलेपनंश्लेष्महरंसुखोष्णंकुकृणकेकार्यमुदाहरति ।। ७७ ॥
त्रिफला, लोध, पुनर्नवा, अदरख, बडी और छोटी दोनों कटेरी, इनको
जलमें बारीक रगडकर कुछेक गरम करके लेप करनेसे का और कुकृष्णरोग
दूरहो ॥ ७७ ॥
मनःशिलाशंखनाभिःपिप्पल्योथरसाजनम् ॥
वतिःक्षौद्रेणसंयुक्ताबालसर्वाक्षिरोगनुत् ॥ ७८ ॥
मनसिल, शंखकी नाभि, पीपल, रसौत इन सबको पीसकर महत मिलाके
बची बनावे अथवा जलसे खरल करके बत्ती बनाकर सहतमें घिसके बाल
कोंके नेत्रोंमें लगानेसे बालकोंके सबनेत्ररोग दूर होतेहैं ॥ ७८ ॥
तुण्डिरोग।
वातेनाध्मापितानाभिःसरुजातुंडिरुच्यते ॥
नाभिशोथेचिकित्सावैलिखितंतुंडिरोगनुत् ॥ ७९ ॥
वायुसे बालककी नाभि फूल आवे और उसमें पीडाहो उसको तुण्डिरोग
कहते हैं । इसका यत्न पीछे नाभिशोथकी चिकित्सा लिसा वोही खेद इस
रोगका नाशकहै ॥ ७९ ॥
गुदपाका
बालस्यगुदपाकाख्योव्याधिःपित्तेनजायते ॥ ८ ॥
पित्तसे बालककी गुदा पकजातीहै उसको गुदपाक कहतेहैं ॥ ८० ॥
यत्न।
गुदपाकेतुबालानांपित्तनींकारयेरिक्रयाम् ॥
रसांजनविशेषेणपानालेपनयोहितम् ॥
शंखयष्टयांजनैश्चूर्णशिशूनांगुदपाकनुत् ॥ ८ ॥
G a । भाषाटीकासमेत-अ० १०. (१४९) बालकोंकी गुदापकनेमें पित्तनाशक क्रिया करे तथा रसौतके काथको पीना और रसौतका गुदापर लेप करना या रसौतकी भस्म गुदापर बुरकाना, गुदापाकको दूर करताहै । अथवा शंख, मुलेठी, रसौत इनके चूर्णको पानीमें रगडकर लेप करना गुदपाकको दूर करताहै ! ८३ ॥ गुदवणोत्कटेकुर्याद्रक्तस्त्रावंजलौकसा ॥ सीरवृक्षकवायेणकिंचिदुष्णेनधोवयेत् ॥ ८२ ॥ चंदनंशारिवेद्वेचशंखनाभिसमायुतम् ।। पिष्टामधुरकंवापिलेपोगुदवगंजयेत् ॥ ८३॥ यदि बालककी गुदामें उत्कट खराब किस्मका व्रण हो तो पहले उसपर जोख लगाकर रक्त निकाल देवे फिर वट आदि क्षीरीवृक्षोंके काथसे सहता २ धोये परंतु जादे गर्मसे न धोये । फिर चंदन, दोनों सारिया, शंखकी नाभि इन अवको एकत्र पीसकर लेप करे अथवा मुलेठीको पीसकर लेप करे तो गुदाका दारुणवणभी दूर हो॥८२॥८३॥ पारिगर्भिक मातुःकुमारोगभिण्याःस्तन्यप्रायःपिबन्नपि ॥ कासाग्रिसादवमथुतंद्राकाारुचिभ्रमैः॥ तुद्यतेकोष्ठवृद्ध्याचतमाहुःपारिगर्भिकम् ॥ ८४ ॥ प्रायः गर्भवती माताका दूध पीनेसे बालकको खाँसी,मैदानि वमन, तंद्रा कशता, अरुचि, चम, और पेटका बढजाना यहरोग होतेहैं। इनको पारगर्भिक कहतेहैं, अपि शब्दसे विना माताके दूध पीयेभी यह रोग हो जाताहै ॥८४ ॥ पारिगर्भिकका यत्न । पारिगर्भिकरोगेतुयुज्यतेवह्निदीपनम् ।। ८५ ॥ पारिगर्भिकरोगमें अग्निको दीपन करनेवाले पदार्थ देने ॥ ८५ ॥ चोरकरोग (कमेडे)। हृत्लैकदातिशरणंवमनंतथैवआध्यानघूर्णनरुजंचशिशोर्विवाय ॥ यःश्वासमात्रपरिरक्षितजीवयोगाद्रोगावधूमिरुदितःसहिचोरनामा ८६ 7
(१५०) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
एक साथ बालकको दस्त, वमन, अफाग होजाय और आँखाको वरते
२ जडताको प्राप्त होजाय । केवल किंचित श्वासमात्र जीवयोगमे बाकी रहै
और मरेकी समान दिखादेवे इस रोगको जाननेवाले वैद्य चोरक नाम रोग
कहतेहैं ॥ ८६ ॥
चौरकरोगका यत्न ।
ब्राझीरसवचाकुष्ठशंखपुष्पीशृतंघृतम् ।।
पंचगव्यघृतंवाष्टमंगलंचोररोगनुत् ॥ ८७ ॥
बालीका रस,वच, कूठ, शंखपुष्पी, इनके कल्कने सिद्ध किया घृत अथवा
पंचगव्यवृत अथवा अष्टमंगल जो आगे लिखेंगे इनमें किमीएक घृतको
निरंतर सेवन करनेसे चोरक रोग नष्ट होताहै ॥ ८७ ॥
लाक्षादिकंतुयत्तललपनेपरमंहितम् ॥ ८८॥
लाक्षादितैल जो आगे लिखेंगे इसकी निम्तर मालिश करना चोरकरो-
गको नष्ट करती है ॥ ८८॥
त्रिफलाव्योषकुष्ठाब्दयवक्षारफणिजः॥
कल्कीकृतैरेभिव्यैर्गजमूत्रचतुर्गणे ॥
साधितंनावनंतलंकरकेनाशनं परम् ।। ८९ ॥
त्रिफला, त्रिकूटा, कूठ, नागरमोथा, जवाखार, मरुवा इनका कल्क एक
पाव तेल १ पाव हाथीका मूत्र १ सेर इनका सिद्धकिया तेल नस्य लेनेसे
चोरक रोगको नष्ट करताहै ॥ ८९ ॥
बालानांमिष्टक्षानंचमहात्मनांचसेवनम् ॥
चोरकेतुह्यवश्यवैबलिदानादिकंहितम् ॥ ९० ॥
• बालकोंको मिठाई बाँटना,महात्मापुरुषोंकी सेवा करना और देवताओंको
बलिदान करना यह सब चोरक रोगको नाश करते हैं ॥ ९० ॥
दंतरोगनिदान ।
दंतमूलाश्रितोवायुदन्तवेष्टान्विशोषयन् ॥
यदाशिशो प्रकुपितोनोत्तिष्टंतितदाद्विजाः ॥९१ ॥
भाषाटीकासमेत-अ०३०. (१५१) बालकोंके दंतमूलमें स्थित जो वायु वह दंतवेष्टो( मसूढो ) में प्राप्त होकर कुपितहुई शोषणकर्तीहुई दांतोंको पैदा होनेसे रोक देतीहै ।। ९१ ।। पृष्टभंगेबिडालानांबर्हिणांचशिखोदमे ।। दन्तोद्भवेचबालानांनहिकिचिन्नदूयते ।। ९२ ॥ पृष्ठभंगके समय बिलावोंके, शिवा निकलने के समय मोरोंके दांत निकलते समय बालकोंके प्रायः सब अंग पीडित होतेहैं ।। ९२ ॥ दंतोद्भेदकमा यत्न देतोद्भवेधुरोगेथुनबालमतियंत्रयेत् ॥ स्वयमप्युपशाम्यतिजातदंतस्ययददाः ।। ९३ ॥ दांत निकलनेसमय जो रोग हो उनमें बालकको अतियत्नोले पीडित न करे। सिर्फ दांत सुखपूर्वक निकलनेका यत्न करे। क्योंकि दांत निकलनेबार दांतोंके हुवे रोग स्वयही शांत होजाते हैं ।। ९३ ॥ देतपादितुमधुनाचूर्णनप्रतिक्षारयेत् ।। धातकीथुष्पपिप्पल्योर्धात्रीफलरसेनवा ।। १४॥ चनेमें सहत मिला दांतोंकी जडोंमें विसनेसे दांत सुखपूर्वक निकलआले हैं। अथवा धावके फूल, पिप्पली, आमलोंका रस इन तीनोंको मिलाके दंतपालीपर घिसनेसे दांत सुखपूर्वक पैदाहों अथवा धाबेके फूलोंका चूर्ण तह- दमें मिलाके मले अथवा पीपलका चूर्ण और आनलोंका चूर्ण सहदमें मिलाके दंतपालीपर मसलें तो दांत मुखपूर्वक पैदा होवें ॥ १४ ॥ अकाल दंत उत्पन्न के दोष जातस्यप्रथमेवाचद्वितीयेतृतीयेथवा ॥ चतुर्थेपंचमेचैवषष्ठेवासप्तमपिता ॥ ९५ ॥ यस्यदताःप्रजायतेसदुष्टःकुलघातकः ॥ मातरंपितरंचैवक्रमाइहन्याचभ्रातरम् ॥ ९६ ॥ जिस बालकके पैदाहोते ही दांत दिखाई देखें या प्रथम महीनेमें अथवा दूसरेमें हों वा तीसरेमेंहों अथवा चौथेमें हों उसको क्रमस प्रथममें माता दूसरेमें
( ३५२) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
जिता तीसरेमें दोनों, चौथेमें भाईके नष्टकरनेवाला जानो । ऐसेही सातवे
महीनेतक दाँतोका पैदा होना अशुभहै ।। ९५ ॥ १६ ॥
प्रायश्चित्त ।
सदन्तोजायतेयस्तुदन्ता प्राग्यस्यचोत्तराः ।।
कुर्वीततस्मिन्नुत्पातशांतिकंचद्विजातिभिः ॥ ९७ ॥
जो बालक दांतोंसहित जन्मे अथवा पहले ऊपरले दांत जन्मे तो बुद्धि-
माल् ब्राह्मणोंको बुलाके शांतिकर्म यथाविधि करावे ॥ ९७ ।।
दांतनिकलनेका समय।
अष्टमेनवमेचैवदशमैकादशेतथा ॥
द्वादशेत्रयोदशेचतथाचैवचतुर्दशे॥
दंताश्चैवहिपृश्यतेतदादता शुभावहाः ॥ ९८॥
यदि बालकके आठवें, नवमें, तथा दशमें, या ग्यारहमें अथवा बारहमें
तेरमें या चौदहवें महीनेमें दांत निकलें तो शुभ जानने ॥ १८ ॥
दंतदष्टरोगके लक्षण।
रुक्षाशिनोहिबालस्यचालयत्यनिलःशिराः॥
हन्वाशय्याप्रसुप्तस्यदंतःशब्दंकरोत्यतः ॥ ९९ ॥
रूक्ष भोजन करनेवाले बालककी ठोडीकी शिरावोंमें वायु कुपित होकर
सोतेहुवेके दांतोंसे कट २ शब्द होताहै इसको दंतदष्ट रोग कहतेहैं ॥ ९९
यत्न।
कर्कटशाकविपकंक्षीरेणचरणतललेपनादचिरात् ॥ दंतदष्टाग-
तशब्दंशमयतिबहुधैवदृष्टमिदम् ॥ १० ॥
काकडासिंगी और मागोनके कल्कसे पकायाहुवा दूध पगतलोंमें लेपकर-
नेसे बालकोंका सोतेसमय दांत कटकटाना बंद होजाताहै ॥ १०० ॥
शोष (बालकोंकेकृशहोनेका वर्णन)।
अत्यहःस्वप्नशीताम्बुश्लैष्मिकस्तन्यसेविनः ॥
शिशोकफेनरुद्धेषुस्रोतस्सुरसवाहिषु ॥ १०१॥
भाषाटीकासमेत-अ० १७. (१५३)
अरोचक प्रतिश्यायोज्वर कासश्चजायते ॥
कुमारःशुष्यलिततःस्निग्धशमुखेक्षणः ॥ १०२ ॥
योपियोवत्सरादू_बालोनोयातिपोषताम् ।।
मंदाग्निबहुविण्त्रोदृश्यमानास्थिपंजरः ।। १०३॥
अतिशय दिनके शवनसे, व अत्यंत शीतल जलके अत्यंत पीनेसे कफ
बुटहोकर दूधको विगाडदेतीहै उस दूधो सेवनले बालकके रस बहानेवाले
स्रोत कफसे रुकजातेहैं फिर बालकको अरोचक पीलम ज्वर खाँसी उत्पन्न
होकर आंखें मुख नफेद होजावे और बालक सूखजावे त्रियोंके वर्षपर्यंत
पालनेपर भी बालक सूखताहीजावे अगि मंदहो पुरीष और मूत्र अधिक
आवे इससे मूखकर अस्थिपंजर दीखनेलगे इसको शोष और कार्यरोग
कहतेहैं ।। १०१ ॥ १०२ ॥ १०३ ॥
कार्यकी चिकित्सा।
पश्चात्तुभेषजंदद्यात्पूर्वतमृदुशोध्यच ॥
सैंधवव्योपशाङ्गेष्टापाठागिरिकदंबकान् ।।
शुष्यतोमधुसपिभ्यामरुच्यादिषुयोजयेत् ॥ १०४ ॥
पहले बालकको मृदु शोधन करके फिर औषधि देवे । सेंधानमक,त्रिकुटा,
लनाकरंज, पाठा, कदंब इनको सहद और घृतमें मिलाके चटावे ॥१०४॥
अथवा
विदारीकंदगोधूमयवचूर्णघृतप्लुतम् ।।
खादयेत्तदनुक्षीरंशृतंसमधुशर्करम् ॥ १०५ ॥
विदारीकंद गेहूं जौका सत्व इनको घृतमें मिलाके ( पकाकर ) खावे ऊप-
रसे सहद
और मिसरीमिला दूध
पीवे ॥ १०५॥
अथवा अश्वगंधादिघृत।
पादकल्काश्वगंधायाःक्षीरेदशगुणेषचेत् ॥
घृतंपेयंकुमाराणांपुष्टिकृद्धलवर्द्धनम् ॥ १०६॥
(१५४)
शुभसन्ततियोगप्रकाश।
असगंधके आठतोले कल्कको दशगुणे दूध में डालकर आठतोला न
मिद्ध
करे। यह घृत पानकनसे बालक पुष्ट और बलवान होतेहैं ॥ १०३ ।
लाक्षायवृत अनेकरोगांपर।
लाक्षाकुष्ठविडंगानि सरलं रजनीद्वयम् ।।
सूक्ष्मैलापद्मकंलोधामकनागकेशरम् ॥ १०७ :
दधित्थतुत्थशेरीपर्शल्यांदालपत्रकम् ॥
घृतप्रस्थंपचेदेतैर्यावत्पाकंचगच्छति ॥ १०८ ॥
कीटाखुसर्पदष्टेषुस्फोंटेषुविविधेषुच ।।
विसपुकुमाराणांलूतामूत्रकृतधुच ॥
गण्डमालासुनारीघुसपिरतद्यथामृतम् ॥ १०९॥
लाख, कूठ, वायविडंग, सरलधूप, हलदी, दारुहलदी, छोटीइलायची,
पद्माख, लोध, कमल, नागकेशर, कैथ, तृतिया, सिरस, कटसरैया, लिसो-
डेके पत्ते प्रत्येक छै २ मासे सोलह गुने जलमें पकाकर चतुर्थांश रहनेपर
एकसेर घृत सिद्ध करले । इस घृतके यथोचित मात्राके उपयोगसे, कमी,
आखुविष, सर्पविष, अनेक प्रकारके विस्फोटक, विसर्प, बालकोंके अनेक
रोग, लूता, मूत्रावरोध, गंडमाला स्त्रियों के अनेक रोग दूर होवें,यह अमृतकी
सदृश घृतहै ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ १०९ ॥
सामान्यतासे बालग्रहोंके कारण ।
कुलेषुयेषुनेज्यंतेत्राह्मणाःसाधवस्तथा ।।
निवृत्तशौचाचारेषुभग्नकांस्यगृहेषुच ॥ १० ॥
यत्रदेवानपूज्यंतेतथापितृगणादयः॥
तत्रआगत्यबालांस्तान्ग्रहाहिसंत्यशंकिताः॥१११॥
जिनके कुलमें साधुब्राह्मणोंका पूजन नहीं होता, जिनके घरमें शुद्धताई
उत्तम आचार नहीं तथा फूटेहुवे कांसेके बर्तनोंमें खातेहों जहाँ देवता और
पितृगणोंका पूजन नहीं होता वहाँपर निश्शक आकर ग्रह बालकोंको ग्रस
लेतेहैं ॥ ११० ॥ १११॥
भाषाटीकासमेत-अ० १०. (१५५)
सामान्यतासे ग्रहजुटकं लक्षण :
क्षणादुद्धिजतेबालाक्षणात्रस्यतिरादिति ॥
नखै तैरियतिधात्रीमात्मानमेवच ।। ११२ ॥
उध्वनिरीक्ष्यतेदंताखादत्क्रूजतिघ्रभति।।
ध्रुवौक्षिपतिदष्टोष्ठःफेनवमतिचासकृत् ।। ११३॥
क्षामोतिनिशिजागर्तिशूनांगोभिन्ननिट्रस्वरः ।।
मत्स्यशोणितगंधश्चनचानातियथापुरा।।
दुर्बलोमलिनांगश्चनष्टसंज्ञोपजायते ॥ ११४॥
कभी क्षणभरमें विङ्गलहो, कनीडरे. कनीरोये, नखोले और दांवोंसे अप-
नेको और धायको खावे काटे) ऊपरको देशवे, दांत चवावे, किलकारीमारे,
जंभाइयाँ लेवे भौंवोंको तिरछी करे होंठोंको काटे, मुखले, बार २ झाग गरे,
और प्रत्यंत क्षीण होजावे,रातको लोवे नहीं, कहीं अंगमें सूजनहो । मल पत-
लाहो. स्वर बैठ जाये, छीकी और शोणितकी गंध, बालककी देहमे आये,
जैसे पहले खाता हो वैसा न खासके, दुर्बल और अंग मलिन हो संज्ञा ना
हो जावे यह ग्रहगृहीत बालकके लक्षणहैं ।। ११२-११४॥
ग्रहजुष्टकी चिकित्सा।
स्नान।
सहामुण्डितिकोदीच्यनाथस्नानंग्रहापहम् ।। ११५
माषपर्णी, गोरखमुंडी, खस इनके काथ अर्थात् इनको उबालकर इनके
जलसे स्नान करानेसे बालकके सब ग्रह दूर होतेहैं ।। १३५॥
लेपन ।
सप्तच्छदामयनिशाचंदनैश्चानुलेपनम् ।। ११६॥
सतवन, कूठ, हलदी,चन्दन इनका लेप करना ग्रहदोषको दूरकरे ३३६॥
सर्वग्रहपर धूप।
रसोननिंबपत्राणिजतुवंशावलेखनम् ॥
सिद्धार्थनिंबपत्राणिवंशत्वग्जतुनासह ॥ ११७॥
a
(१५६) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
सर्पनिोककोशानिनिर्माल्यंगौरसपैयाः ।
धूपत्रयंससर्पिष्कमेतत्सर्वग्रहापहम् ।। ११८॥
लहसुन, नीमकेपत्र, लास, वंशलोचन इनकी अथवा सफेद सरसों, नीमके
पत्ते, वंशलोचन, लाख इनकी धूनि अथवा साँपकी कांचली, जायफल. शिव
निर्माल्य, सफेद सों, इनकी इनतीनों में से कोई एक वृतयुक्त धूप देवे तो बाल-
कोंके सब ग्रहोंको दूर करताहै ॥ ११७ ॥ १८ ॥
सर्पत्वग्लशुनर्वासर्षपारिपल्ल्याः॥
बिडालविरडालोममेष श्रृंगीवचामधु ॥ ११९॥
धूपःशिशोवरनोयमशेषग्रहनाशनः ।।
बालशांतीप्टकर्माणिकार्याणिग्रहशांतये।। १२०॥
सांपकी कांचली,लहसुन, मर्या,सरसों,नीमके पत्ते बिल्ली की विशा, बकरीके
वाल, मेंढेका सींग, वच, सहत इनको खूब कूटकर चूर्ण बनाकर धूप देनेसे
बालकोंका ज्वर और सबनकारके ग्रह शांतहो और वालकोंके ग्रहों की शांतिके
लिये औरभी इष्टकर्म और बालशांति कराना चाहिये ॥ ११९ ॥ १२० ।।
बालरक्षाके मन्त्र ।
स्वस्तिकेसन्मुखःस्कंदोमहाभागाचरेवती ।।
दिशःसूर्योन्तरिक्षचस्वस्तिकुवैतिसर्वदा ॥ १२१ ॥
तेजसाब्रह्मणश्चाथविष्णोरिन्द्रस्यतेजसा ।
सिद्धानांतेजसाचैवरक्षितोस्मिन्सुखीभव ॥ १२२ ॥
मंत्ररेतै प्रकुर्वीतरक्षांबालस्यनित्यकम् ।। १२३॥
इन मंत्रोंसे बालककी सदैव रक्षा करे तो ग्रहदोष शांतहो ॥२१-२३॥
अष्टमंगल वृत।
वचाकुष्टतथाब्राह्मीसिद्धार्थकमथापिवा ।।
सारिखासैंधर्वचैवपिप्पलीघृतमष्टमम् ॥ १२४ ॥
सिद्धंघृतमिदमध्यंपिबेत्प्रातर्दिनदिने ।
दृढस्मृतिःक्षिप्रमेधाःकुमारोबुद्धिमान्भवेत् ॥ १२५ ॥
भाषाटीकासमेत-अ०
(१५७)
नपिशाचानरक्षांसिनभूतानचमातरः ।।
नबाधन्तेकुमाराणांपिवतामष्टमंगलम् ॥ ३२६ ॥
बच, कूठ, ब्राह्मी, सफेदसौ, सारिबा, सेंधानमक, पीपल, और आठवाँ
गोघृत प्रत्येक औषधी छै २ मामे बुत २ छटांक दूध १ पाव जल ३ पाद
सबका यथाविधि घृत सिद्ध करे इस पवित्र घृतके नित्य प्रति पानकर
नेसे बालक दृढस्मृतिबाला हो, धारणास्फूर्तिबालाहो, बुद्धिवान्हो और
इस अष्ट मंगलघृतके पीनेमे पिशाच, राक्षस, भूत, मातृका आदि कोईभी बाधा
नहीं करते ॥ १२४-१२६ ॥
लाक्षाद्य तेल।
लाक्षारससमंतैलंसिद्धंमस्तुचतुर्गुणम् ।।
रास्नाचंदनकुष्टाब्दवाजीगंधानिशायुतैः ॥ १२७ ।।
शतावादारुकुष्टाहपूर्वातिक्ताहरेणुभिः ॥
बालानांवररक्षोनमभ्यंगालवर्णकृत् ।। १२८॥
तिल्लीका तेल १ सेर, लाखका रस 1 सेर, दहीका जल ४ सेर, कल के
लिये रास्ना, चंदन, कूठ, मोथे, असगंध, हलदी,शतावर, देवदारु, दारुहलदी,
मुलेठी, मूर्वा, कुटकी, रेणुका प्रत्येक छै २ मासे इनके कल्कसे युक्त इस
तेलको सिद्ध करके इस तेलकी मालिशसे बालकोंके सबप्रकारका ज्वर और
राक्षस, ग्रह, दूर होकर बल और उत्तम वर्ण हो ॥ १२७ ॥ १२८ ॥
कुमारकल्याणवृत।
शंखपुष्पीवचाब्राह्मीकुष्टंत्रिफलयासह ॥
द्राक्षासशर्कराशंठीजीवतीजीवकंबला ॥ १२९ ॥
शठीदुरालभाबिल्लंदाडिमंसुरसातथा ।।
मुस्तंपुष्करमूलंचसूक्ष्मैलागजपिप्पली ॥ १३० ॥
एषांकर्षसमैांगघृतप्रस्थंविपाचयेत् ॥
कपायेकंटकार्याश्चक्षीरंतस्माच्चतुर्गुणम् ॥ १३ ॥
(१५८) शुभमन्ततियोगप्रकाश।
एतत्कुमारकल्याणवृतरत्नंसुखप्रदम् ।।
बलवर्णकरंधन्यंकोधानेरतिवईनम् ॥ १३२ ।।
छायासर्वग्रहालक्ष्मीकृमिदंतगदापहम् ।।
सर्वबालामयहरंदन्तोद्भदेविशेषतः॥ १३३ ॥
शंखपुष्पी, बच्. ब्राह्मी, कठ, त्रिफला, द्राक्षा, मिसरी, मोठ, जीवनी,
जीदक, खरैटी, कचूर, माता, वेलगिरी, अनार, तुलसी, मोथा, पोहकर-
मूल, छोटीइलायची, गजपीपल, इन प्रत्येक औषधियोंको एक २ तोला लेकर
कल्क बनावे। गोघृत १ सेर लेवे दृव ४ सेर लेवे कटेरीके पंचांगका काथ ४
सेर लेवे इन सबको मिलाके विधिपूर्वक बत निद्ध करे तो यह कुमारकल्याण
वृत हुवा। यह कुमारकल्याणधृतरत्न धन्यहै । बालकोंको सुखदायक, बलवर्ण-
कर्ता, कोठेकी अग्निको चैतन्य करनेवाला तथा छाया और सब प्रकारकी
ग्रहकी बाधाको हरनेवाला, अलक्ष्मी, कमी,दंत आदि रोगोंके हरनेवाला,बाल-
कोंके सब रोग और विशेषकरके दन्तोदकरोगके हरनेवालाहे ॥२९-३३॥
ब्रह्मचर्य।
एवंमहानुभावैश्चघृताचैवदितःशिशुः ।।
सुसंस्कृतोगुरुसुख्यैर्ब्रह्मचर्येसमास्थितः॥ १३४ ॥
घृतवदितवुड्याचजेताशास्त्रार्णवेहिसः॥
बुद्धिबलंसमासाद्यभाग्यवांश्चभविष्यति ॥ १३५ ॥
इसप्रकार इनमहानुभाव धृतके सेवन करनेसे वृद्धिको प्राप्त हुवा बालक
गुरुजनोंसे शुद्ध सुसंस्कृत अर्थात् संस्कार कियाहुवा ब्रह्मचर्यमें स्थितढुवा
उत्तम घृतमे वृद्धिको प्राप्तहुई बुद्धिवाला शास्वरूपीसमुद्र जीतनेवाला होताहै।
तथा बुद्धिबलको प्राप्तहो भाग्यवान् होताहै ॥ १३४ ॥ १३५ ॥
इति श्री शुभसंततियोगप्रकाशे बालरोग प्रतिषेधनीयो नाम दशमोध्यायः ॥ १० ॥
भाषाटाकासमत-अ० १३. अथनानार्थविवेचनीयाध्यायंव्याख्यास्यामः । इसके उपरांत हम अनेक अर्थोके विवेचनका अध्याय लिखते हैं । गंग ज्ञानकी आवश्यकता औषधंकवलंकरीयोजानातिनचामयम् ॥ वैद्यकर्मसचेत्कुर्यात् वधमहति राजतः।। ३ ॥ जो लोग सिर्फ औषधीका उपयोग करते हैं और रोग निदानको यथार्थ नहीं जानते यदि बोह कही वैद्यक करतहों तो राजाले यके योग्य होते हैं॥१॥ योग्यवैद्य। सुरोरधीलाखिलवैद्यविद्यापीयूषपाणि कुशलःक्रियासु॥ गतस्पृहोधैर्यधर कृपालु शुद्धोधिकारीभिषगीदृशःस्यात् ॥२॥ जिसने संपूर्णवैद्यक विद्या गुरुके मुखसे पढीहो और अमृतके माफिक हाथ बाला जिसको यश हो सब क्रियाओंमें कुशलहो, जो लोभ और ईर्ष्यादिसे रहितहो धैर्यधारीहो कपाल, शुद्ध और अधिकारी हो वैद्य ऐसाही होना चाहिये ॥२॥ औषधिज्ञानकी आवश्यकता । यथाविषयथाशस्त्रयथाग्निरशानिर्यथा ।। तथौषधमविज्ञातविज्ञातममृतंयथा ॥३॥ जो औषधि नामरूप गुण करके बिनाजानीहै वह विष, शस्त्र, और अभि तथा बज्रके सदृश प्राणोंके हरनेवालीहै । ऐही सब तरहले जानीहुई औष- धिका यथोचित उपयोग अमृत के सदृश है ॥ ३॥ औषधिके योगसे और अयोगसे उपयोग । योगादपिविषतीक्षणमुत्तमंमेपजभवेत् ॥ भेषजं वापि दुर्युक्ततीक्ष्णसंपद्यतेविषम् ।। तस्माद्विचार्यदातव्यंजीवितारोग्यकांक्षिणा ॥४॥ उत्तम योगसे देशकाल रोग औषध विचाका विष का उपयोग अमृतकी सदृश रोग हरनेवाला होता है और विनाविचारे वेयुक्ति उत्तम औषधिभी (१६०) शुभसन्ततियोगप्रकाश। दीहुई विष होजातीहै । इसलिये जीवन और आरोग्यताको इच्छावालाफ विचारकरही देश काल रोगादि जानकर औषधिका उपयोग करे ॥४॥ औषधिके लक्षण। वैद्योव्याधिहरेधेनतद्रव्यंप्रोक्तमौपधम् ॥५॥ जिसकरके वैद्य रोगको हरण करे उस द्रव्यको औपविका कहनहें ॥५: उत्तम औषधिके लक्षण । प्रशस्तदेशेसंजातं प्रशस्तेहनिचोद्भुतम् ॥ अल्पमात्रबहगुणं गंधवर्णरसान्वितम् ॥६॥ दोषनमग्लानिकरमधिकंनविकारियत् ।। समीक्ष्यकालेदत्तंचमेपर्जस्यादणावहम् ॥ ७ ॥ जो औषधि उनम शुद्धभूमिमें उत्पन्न हुईहो और अच्छेदिन अच्छेममय उखाडीगईहो जो थोडीसी देनेपर बहुत गुणकरतीही गंध वर्ण और रम युक्त हो, वातादि दोष नाशकहो जिसके सेवन से ग्लानि नहो यदि अधिकमा- त्राका उपयोगभी होजाय तो विकार न करे ऐसी औषधिको देशकालादि देख देवे तो वह सुखकारी उत्तम होतीहै ॥ ६॥ ७ ॥ उपयोग। नवान्येवहियोज्यानिद्रव्याप्यखिलकर्मसु । विनाविडंगकृष्णाभ्यागुडधान्याज्यमाक्षिकैः॥८॥ सब दवाइयां हरेक काममें नूतन लेनी चाहिये, परंतु विडंग, पीपल, गुड धनियाँ, घी, सहद ये पुरानेही डालने चाहिये ॥ ८॥ त्याज्योपधि। वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोपरमार्गजाः॥ जंतुवनिहिमव्यातानौषध्यःकार्यसिद्धिकाः॥९॥ साँप आदि जंतुवोंकी विर्भी, दुष्टभूमि, जलपायस्थान, श्मशान, रास्ता और ऊपर भूमि इन्हमें पैदाहुई तथा कीडोंकी खाई, आगसे जली, पालेकी -
भाषाटीकासमेत-अ० १३.
मारीहुई जो औषधिहो बोह औषधि कार्यसाधक नहीं होती इसलिये ऐसी
औषधिका कभी उपयोग नकरे ।। ९ ।।
पौषधिग्रहणविधिः
गृह्णीयात्तानिसुमना शुचिःप्रातःसुवासरे।।
आदित्यसंमुखोमौनीनमस्कृत्यशिवहदि ॥ १० ॥
प्रातःकाल स्नानादिसे शुद्ध होकर उत्तम पुष्य रविवारादि दिनमें शुद्ध-
मन हो सूर्यके सन्मुख खडा होकर मौनधारण कियेहुवे हृदयमें शिवको प्रणा-
मकर दवाईको ग्रहण करे अर्थात् उखाडकर लावे ॥३०॥
योगविधान।
अंगेनुक्तजयाग्राह्याभागेनुक्तखिलंसमम् ।
पात्रेनुक्तेमृदःपात्रंकालेनुक्तत्वहर्मुखम् ॥ १३ ॥
जहाँपर औषधिका अंग नकहाहो वहांपर जड लेनी चाहिये, जहाँ औष-
धियोंको तोल न कहाहो वहाँ सब औषधियाँ बराबर लेनीचाहिये, जहां पात्र
न कहाहो वहाँ मिट्टीका पात्र लेनाचाहिये, जहाँ समय नकहाहो वहां प्रातः
काल लेना चाहिये ॥ ११ ॥
सूखी गीली औषधिका वर्णन ।
शुष्कनवीनद्रव्यतुयोज्यसकलकर्मसु ॥
आर्द्रतुद्विगुणंयुंज्यादेषसर्वत्रनिश्चयः ॥ १२॥
सब दवाइयां सूखी और नईलेनी चाहिये, यदि गीली हो तो दुगुनी डाले
यह सामान्यतासे सबजगे निश्चय जानना ॥१२॥
गुडूचीकुटजोवासाकूष्माण्डश्चशतावरी ॥
अश्वगंधासहचराशतपुष्पाप्रसारिणी ।।
प्रयोक्तव्याःसदैवा द्विगुणानैवकारयेत् ॥ १३ ॥
गिलोय, कुडा, बाँसा, कूष्मांड, शतावर, असगंध, कटसरैया, सौफ, प्रसा-
रिणी, ये सदा गीलीही लेनी चाहिये परन्तु दुगुनी नहीं डालनी ॥ १३॥
(१६२)
शुभसन्तवियोगप्रकाश।
घृतंतैलंचपानीयंकपायंव्यंजनादिकम् ॥
पक्त्वाशीलीकृतंनोणंतत्सम्यादिपापमम ॥११॥
वृत, तैल, और पीनेके द्रव्य या जल, काय नथा व्यंजनादिक भाजना-
दिक पदार्थ जो पकाकर ठंडा होगयाहो उसको फिर गर्म नकर,फिर आगपर
गर्म करनेसे ये पदार्थ विपकी सदृश होजातेहैं ॥ १४ ॥
प्रसंगाल्लिखितंकिंचिदीपविग्रहणविधिः ।। १०॥
संगवश यहाँपर औषधि ग्रहणकी विधिभी थोडीनी लिमदईहै ॥१॥
मान (तोल ) वर्णन ।
प्रयोगकार्यसिद्ध्यर्थमानमत्रांच्यतेमया ॥
यवोष्टसर्पपेनालागुंजास्यात्तचतुष्टयम् ॥ १६॥
पभिश्वरक्तिकाभिःस्यान्मापका हमधानको ।
माषैश्चतुभिःशाणःस्यादरणःसनिगद्यते ॥ १७॥
टंकासएवकथितस्तद्दयंकाल उच्यते ॥
क्षुद्रकोक्टकश्चैवद्रंक्षणःसनिगद्यते ॥१८॥
कोलद्वयंतुकपःस्यात्सप्रोक्त पाणिमानिका ॥
करमध्योहंसपदोसुवर्णकवलग्रहः ।। १९॥
उदुंबरंचपर्यायःकपमवनिगद्यते ।
स्यात्कर्षाभ्यामर्द्धपलंशक्तिरष्टमिकातथा॥२०॥
शुक्तिभ्यांचपलीयमुष्टिरानंचतुर्थिका ॥
पलाभ्यांप्रमृतिज्ञेयाप्रसतिभ्यांतांजलिः॥२१॥
कुडवोधशरावास्यात्कुडवाभ्यांचमानिका ।।
शरावोष्टपलंतज्ज्ञयमत्रविचक्षणः ॥ २२॥
शरावाभ्यांभवत्प्रस्थाचतुःप्रस्थस्तथाढकः ॥
चतुर्भिराढकेद्रोणोद्रोणाभ्यांशपउच्यते ॥ २३ ॥
शूपाभ्यांचभवेद्रोणीखारीद्रोणीचतुष्टयम् ॥
चतुःसहस्रपलिकासएवत्वधिकाचसा ॥२४॥
भाषाटीकासमेत-अ० ११. । पलानांद्विसहसंचमारएक प्रकीर्तितः॥ तुलापलशतंज्ञेयमेपसर्वत्रनिश्चयः ।। २५ ॥ औषधिप्रयोगकी सिद्धिके अर्थ हम यहां मानपरिभापाभी लिखदेते हैं । ८ सौंका १ यव (जो ) होताहै। जबोकी । गुंजा (रत्ती) होती है। ६ रत्तिका एक मासा इसको हेम और धानकभी कहते हैं। ४ भासेका एक शाण होताहै। इसको धरण और टंक कहते हैं । २ टंकका ३ कोल होताहै । उसको क्षुद्रकेवटक, क्षणभी कहतेहैं । २ कोलका ३ कर्ष होताहै। उसको पाणी और मानिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवलपह, उदुंबरभी कहतेहैं। २ वर्षका अर्धपल उसको शुक्ति और अष्टमिका कहते हैं ! २ शुक्तिका ३ पल होताहै। इसको मुष्टी, आम्र, चतुर्थिकाभी कहतेहैं । २ पलोंकी १ प्रसुति होतीहै । २ प्रमृतियोंकी १ अंजलि होतीहै, इसको कुडक, अर्थशरावभी कहतेहैं । २ कुडवोंकी ३ मानिकाः होतीहै, इसको शराव और अष्टपलभी कहतेहैं। २ शरावोंका । प्रस्थ होताहै । ४ प्रस्थोंका १ आढक होताहै। ४ आढोका दोण होता है । २ द्रोणोंका शू होताहै ! २ शूपोंकी १ बोगी होतीहै। ४ोणियोंकी १ सारी होती है। १ खारी ४०८६ पलकी होतीहै। २००० पलका १ भार होताहै ॥ १०० पुलकी तुला संज्ञाहै, यही क्रम सबजो जानना ॥ १६-२५ ॥ मानंचात्रलिपीकृत्यक मंकाथादिलिख्यते ॥ २६॥ यहांपर औषधियोंके तोलज्ञानके वास्ते मान तो लिख चुके हैं । अब काथ आदि औषधि बनानेका क्रम लिखतेहैं ॥ २६ ॥ काथके पंचप्रकार। स्वरसश्चतथाकल्कवाथश्चहिमफांटको ।। ज्ञेयाःकपायाः पंचैतेलघवःस्युर्यथोत्तरम् ॥२७॥ स्वरस तथा कल्क, काथ, हिम,और फांट ये पांचप्रकारके काथ होते हैं। इनमें स्वरससे कल्क, कल्कसे काथ उत्तरोत्तर हलके होते हैं ॥ २७ ॥ ويت (१६४) शुभमन्ततियोगप्रकाश। आहतात्तक्षणात्कृष्टाव्यात्क्षुण्णात्ममुद्भवेत । वस्त्रनिप्पीडितोयश्चस्वरसोरमउच्यते ॥२८॥ जो उत्तम पवित्र तुरंतकी लाईहुई गीली औपच पीसकर कपटमें निचोडकर रस निकाले उसको स्वरम और रस कहतेहैं ॥ २८ ॥ स्वरसकी मात्रा। स्वरसस्यगुरुत्वाच्चपलम प्रयोजयत् ।। निशोपितंचाग्निसिद्धंपलमात्रग्सपिवेत ।।२९ ॥ स्वरस और क्वाथोंकी अपेक्षा गुम होनम दो तोला पीना चाहिय और स्वरस न मिलनेपर सूखी औपाधिके चूर्णको आठ गने जलमं पकाकर चतुर्थी वशेष रहनेपर चार तोलेकी मात्रामे उपयोग करे ( यह मात्रा युवापुरुपये लियेहैं ) बालकोंकी मात्रा बालचिकित्सामें लिखचुकहें ॥ २१ ॥ स्वरसम प्रक्षेपका मान। सितामधुगुडशाराञीरकलवणंतथा ।। घृततैलंचचूर्णादीनकालमात्रान्प्रयोजयेत् ॥३०॥ मिसरी, खांड, सहत, गुड़, क्षार जीरा, नमक, बी, तेल, और चूर्ण आदि काथमें हो तो आधातोला ( ६ मासे डाले ॥ ३० ॥ कल्कविधि। द्रव्यमार्द्रशिलापिष्टं शुष्कंवासजलंभवेत् ॥ प्रक्षिप्यगालयदस्नेतन्मानंकपसंमितम् ॥ ३१॥ गीली औषधिको बारीक रगडे सूखी हो तो जलके संयोगमे पीसे अच्छी तरह पीसकर पतलेसे वस्वमें छानले ( कोई नहींभी छानते ) इसको कल्क कहतेहैं। इसकी मात्रा १ तोलाकी है ॥ ३१ ॥ काथविथि। पानीयंषोडशगुणक्षुण्णेद्रव्यपलेक्षिपेत् ।। मृत्पात्रेवाथयेद्ग्राह्यमष्टमांशावशेषितम् ॥३२॥ न
भाषाटीकासमेत-अ० ११.
अर्गदौतुपलंयाबदद्यात्पोडशिकंजलम् ॥
ततस्तुकुडयावत्तीयमष्टगुणं भवेत् ॥ २३ ॥
वतुगमतबोध्ययावत्प्रस्थादिकंजलम् ।।
सजलंपाययेद्धीमान्कोष्णमुद्रपिसावितम् ॥३॥
शृतःकाथाकपायश्चनियूहसनिगद्यते ।।
मात्रापलमिताज्ञेयात्रिनिक्षत्तथैवच ॥ ३५ ॥
४ चार तोला औषधिको जौकूब: १६ गुना जल डालकर मिट्टीके
वर्तनमें पकाये । जय आठवाँ भाग रहे तो नीचे उतारकर छान लेवे । यदि १
नोलासे ४ तोले तक औषधि हो तो २६ गुना जल डालके पकाये । और
४ तोलेसे १ पावतक आठगुणा जल डालके पकाये । और १ पावसे लेकर
1 सेर पर्यंत चारगुना जल डालके पकाये।यह काथके जलडालनेकी विधि।
इमको मंद आँचसे कावे और छानकर मंदोष्ण होनेपर पीवे। इसको शृत काथ,
पाय, निर्वृहभी कहतेहैं । मात्रा इसकी ४ या ३ तोलेकी है ।।३२-३५॥
हिम।
क्षुण्णद्रव्यंपलंसम्यक्षड्भिारपलैःप्लुतम् ॥
निशोषितंहिमासस्यात्तथाशीतकपायका॥
तस्यमानंमतंपानेपलद्वयमितंबुधैः ॥ ३६॥
कुटीहुई४ तोला औषधिमें छैगुना जल डाले और रात्रिभर धरारहने देवे,
आतःकाल छानले इसको हिम कहते हैं। इसीको मथ लेनेसे मैथभी कहाजा-
नाहै। मात्रा इसकी आठतोलेकी है ॥ ३६॥
फोटविधि।
क्षुण्णेद्रव्यपलेसम्यक्जलमुष्णविनिःक्षिपेत् ॥ ३७ ॥
मृत्पात्रेकुडवोन्मानंततस्तुस्रावयेत्पटात् ॥
सस्याच्चूर्णद्रवःफाटस्तन्मानंद्विपलोन्मितम् ॥ ३८ ॥
(१६६) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
४ तोला औषधिको कूटकर गजल १६ नोले मालपर मट्टीक पात्रमें
भिगो देवे । जब दवाई भीगजावे तो वयमे छान ले इसको फांट और चूर्ण
द्रवभी कहते हैं, इसकी मात्रा ८ तालकी है ॥ ३७॥३८॥
औचिनिकी विधि।
पिबत्प्रसन्नहृदयापीत्वापात्रमधामुखम् ।।
विधायाचम्यसलिलंतांबूलाधुपयोजयेत् ॥ ३९ ॥
प्रसन्नमन होकर बैठके औपधि पीकर पात्रको उलटा करके अर्थात आधा
धरदे, फिर जलसे कुल्ला करके कपडेसे हाथ मुख पोंछकर पानकी बीडी डला-
यची आदि मुखशोधक वस्तु चबावे ॥ ३० ॥
वृततलगाधनमामान्यविधि।
कल्काच्चतुर्गणीकृत्यघृतवातलमेच ॥
चतुर्गुणेवेसाध्यंतस्यमाचापलोन्मिता ॥ १० ॥
औषधियोंके कल्कसे चारगुणा घी अथवा तेल डालकर बन बा तेलसे
चारगुणा दूध आदि ( जो जिसजगे योग्यहो ) डालकर पकावे, घृतमात्र
शेष रहनेपर सिद्ध जाने । ऐसेही तैलमात्र शेष रहनेपर नेल सिन्दजाने ।
मात्रा घृतपानकी चार तोलेकी पूर्ण मात्राहै ॥ ४० ॥
संधान।
द्रवेषुचिरकालस्थंद्रव्यंयत्संधितंभवत् ।।
आसवारिष्टभेदेस्तुप्रोच्यतेभेषजोचितम् ॥ ११ ॥
जो वस्तु द्रव ( पतले पानिआदि) पदार्थामें डालकर कुछदिन (जबतक
रसका खमीर न उठे ) धरिरहनेदे। फिर उसका कोई पदार्थ बनावे, इसको
धान कहतेहैं । वह आसव और अरिष्टोंके भेदोंसे उचित औषधोंसे दो-
कारका हैं।॥ ४१ ॥
आसव और अरिष्ट ।
यदपक्वौषधांबुभ्यांसिद्धंमद्यसआसवः ।।
अरिष्ट काथसाध्यःस्यात्तयोर्मानंपलोन्मितम् ॥४२॥
भाषाटीकासमेत-अ० १३. (१६७) कच्ची औषधिको कच्चेजलले जो मयकी तरहसे औषधियोंकी मधहो उसको आसव कहतेहैं । जो जल और औषधि पकाकर फिर संधान बना- कर मय खींचे वह अरिष्ट होताहै । आसव और आरेष्ट मयकेही भेद हैं। मादक अर्थात् जिससे नसा होजाय उसको मद्य कहते हैं । विना नसेके आसब और आरिष्ट होते हैं। मात्रा आसव और अरिष्टकी चार तोलेकी है ॥४२॥ आरोग्यताकी आवश्यकता। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यंमूलमुत्तमम् ।। तदक्षणायकर्त्तव्यविधिःशास्त्रोक्तसेवनम् ॥४३॥ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनके साधनकी आरोग्यता ( तन्दुरुस्ती ) ही उत्तम कारणहै। इसलिये आरोग्यताको रक्षाकेवास्ते शाखमें कही विधिका सेवन करना चाहिये ॥ ४३ ॥ निवेदन । पश्यंतांप्रथमखंडंशुभंसंततिदायकम् ।। गार्हस्थ्यसुखदंचैवपंढादिदोषनाशनम् ॥ ४४ ॥ प्रिय सज्जनो ! शुभ और सुंदर संतानदायक तथा गृहस्थके सुखोंकेदेने- वाला और नपुंसकादि पुरुषोंके दोषः वंध्यत्वादि स्त्रियोंके दोषोंके हरने वाल यह "प्रथमखंड” देखिये ॥ १४ ॥ इति श्रीशुभसंततियोगप्रकाशे प्रथमखंडे एकादशोऽव्यायः ॥ ११ ॥ इति प्रथमखंडः। सोरठा-आयुर्वेद अपार, याको नहिं कछु अंतहै ॥ लिखा बुद्धिअनुसार, हितकारक संतानप्रद ॥ १ ॥ समुझिशास्त्रअनुकूल, प्रथम खंड पूरित कियो ॥ या जो प्रतिकूल, निरखि क्षमा बुधजन करें ॥ २। इत्यल्पार्थबोधिनीभाषायां प्रथमः खंडः । १ and
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शुभसन्ततियोगनकाशे-
द्वितीय खंडः।
नमस्तस्सैमहेशायसर्वतंत्रमवायच ।।
करोत्यानायशब्दंबडमहर्यस्यहस्तगः ॥ ३ ॥
जिन महादेवके करकमटमें डमरू बेदमयी ध्वनि कररहा है, उन सर्व
तंत्रमय महेशको नमस्कार है ॥ ३ ॥
आयुःकामयमानेनधर्मार्थसुखसाधनम् ॥
आयुर्वेदोपदेशेपुविधेयः परमादरः॥२॥
धर्म, अर्थ तथा सुखके साधनरूप आयुको कामनावाले मनुष्यको आयु
वेद अर्थात् वैद्यकशास्त्र के उपदेशमें परम आदर करना चाहिये ॥ २ ॥
नगीनगरस्येवरथस्येवरथी सदा ॥
स्वशरीरस्यमेधावीकृत्येष्ववहितोभवेत् ॥ ३॥
जैसे नगरका रक्षक नगरकी और रथदान् स्थकी सर्वदा सब तरहसे साव-
पानी रखताहै इसी तरह मनुष्यकोभी देहकी रक्षाके लिये सदैव सावधानीले
वर्ताव करना चाहिये ॥ ३ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यंमूलमुत्तमम् ॥
रोगास्तस्यापहर्तारःश्रेयसोजीवितस्यच ॥४॥
धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष इनका मूल ( कारण ) आरोग्यताही है। और
रोग उस आरोग्यता (तन्दुरुस्ती) के हरनेवाले हैं तथा कल्याण और जीवनके
हरनेवाले हैं ॥ ४ ॥
वायुःपित्तंकपश्चेतित्रयोदोषा:समासतः ॥
विकृताऽविकृतादेहंनंतितेवर्तयन्तिच ॥५॥
. । (१७०) शुभसन्ततियोगप्रकाश। वायु-पित्त-कफ-संक्षेपसे प्रायःतीनही दोप हैं । यह तीनों पथक २ या तथा तीन मिलकर जब अपनी साम्यावस्थामे गिरवते. अर्थात निसार प्राप्तहोजातेहैं ( बढ़जांब या कम हो जावे या स्थानम हरजाये ) उमड़ दोष देहको जीवितसे हीन करते हैं। और साम्य अर्थात अनुक, ग्यमा वाले होनेसे देहको स्वस्थ अर्थात् आरोग्यता युक्त रखन: ॥ ". दोषाक लक्षण। तवरूझोलघुःशीतःस्वर मूक्ष्मश्चलोऽनिलः । उन दोषोंमें वायु-रूक्ष । रूखा )-हलका-स्वर मक्ष्म-चलनक वनक वाला है। पित्तंसहतीक्ष्णोष्णं लघुवियंसरंदवम् ॥ ६॥ पित्त चीकनाईयुक्त तीक्ष्ण-गर्म-हलका-मत्स्यगंधयुक्त-सर अर्थात् नीचे ऊपर चलनेकी शक्तिवाला स्थिर होके न रहनेवाला और द्रव अर्थात् पतला होताहै ॥६॥ स्निग्धःशीतोगुरुर्मन्दः श्लक्ष्णोमृत्स्नःस्थिरः कफः । चिकना-शीतल-भारी-मंद-श्तक्ष्ण-पिच्छिल-स्थिर कफ होता है । संसर्गः सन्निपातश्च तद्वित्रिक्षयकोपतः ॥ ७ ॥ अपने प्रमाणसे बढ़कर या न्यून होकर जो दो दोषोंका संयोगह वह समर्ग कहा जाताहै । और तीनों दोषोंका प्रमाणसे कम तथा ज्यादा होकर संयो गहोना सन्निपात कहाजाताहै ॥ ७ ॥ रसामृङ्मांसमेदोऽस्थिमजाशुक्राणिधातवः ॥ सप्तदूष्यामलामूत्रशकृत्स्वेदादयोऽपि च ॥८॥ रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य ये सात धातुवे हैं। शरीरके धारणकरनेसे धातु कहीजातीहै । और ये ही मात दृषितभीहैं । क्योंकि वायु आदि तीनदोषहैं ( दूषयन्तीति दोषाः) जो दूषित करेवे दोष होतेहैं। वाय्यादि दोष सात धातुवोंको दूषित करतेहैं और रसादि सातधातु दृषण पात्र होनेसे
भाषाटीकासमेत-अ० १.
(१७१)
दृष्य कही जाती हैं । और सूत्र पुरीष स्वेद आदि मल कहेजाते हैं यहभी
दृष्य हैं ॥ ८॥
वृद्धिःसमानःसर्वेषांविपरीतैर्विपर्ययः ॥ ९ ॥
तुल्यस्वभाववाले पदार्थासे धातुआदिकोंकी वृद्धि होतीहै और विरुद्ध
स्वभाववाले पदार्थोसे क्षीणता होतीहै ॥ ९ ॥
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मधुरामललवणकटुतितकपायाःक्रमशःषड्रसाः ॥ १० ॥
मीठा खट्टा नमकीन चरपरा कडुवा कषैला ये क्रमसे छै ६ रसहैं।। १० ।।
प्रकारांतरसे।
रसाःस्वाइम्ललवणकटुतिक्तकपायकाः॥
पद्रव्यमाश्रितास्तेतुयथापूर्वबलावहाः ॥ ११ ॥
मीठा, खट्टा, लवण, कटु (चरपरा) तिक्त, (कडुवा) और कपाय,
(करेला ) ये छैरसह । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाशके आश्रयहैं अर्थात
इनमें रहतेहैं और पूर्वरस परकी अपेक्षा अधिक बलकारकहै । जैसे मधुररस
सबरसोंसे अधिक बलदायकहै और कषाय सबसे कम बलकारकहै इसीवरह
परकी अपेक्षासे पूर्व बलवान् जानना ॥ १३ ॥
कफवातौवातकफौवातःपित्तंचवृद्धिशमौ ॥
त्रिभिरायैत्रिभिरंत्यस्त्रिभिराद्यपरैस्तदन्यैश्च ॥ १२॥
कफ और वायु आदिके तीन ( मीठा खट्टा लवण ) रसोंसे वृद्धि और
शांतिको प्राप्तहोतेहैं अर्थात् मधुर, अम्ल, लवणसे कफ वृद्धिको प्राप्त होताहै
और वायु शांतिको प्राप्त होताहै, इसीतरह कटु, तिक्त, कषायसे वायु वृद्धिको
प्राप्त होता है और कफ शांतिको प्राप्त होताहै । और पित्त अम्ल लवण
कटु इन तीनरसोंसे वृद्धिको और तिक्त कषाय मधुर इन तीनों रसोंने
शांतिको प्राप्त होताहै ॥ १२॥
प्रत्येकरसका वर्णन ।
आयमध्यनयत्यंत्यंमधुरायाःशमेतरौ ॥
आयमध्यांत्यमायंचमध्यकांतिममंतिमम् ॥ १३॥
(१७२) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
आयमध्यंचमध्यांत्यमाद्यम व्यानिमंक्रमात ॥
आबंदोपरसा प्रायःप्रयोगपरिशीलिताः ॥ ४॥
अतिसेवनसे मधरादि छहाँ रस क्रमस दोपाको शांत और कुपित करने ।
जैसे, मधुर रस वायु और पिनको शांत करना और कफको कपित
कर्ताहै ।२ अम्लरस बायुको शांत करताहे. पिन कफको कुपित कला है।
३ नमकीन रस वायुको शांत करता है और पिन तथा कफको कोप करता है।
४ चरपरा रस कफको शान्त और वानपित्तको कुपित करना । ५ कठ्या
रस पित्त कफको शांत और वायुको कुपित करताहै । ६ पैला रम पिन
कफको शांत करताहै वायुको कुपित करताहै ।। १३ ॥ १४ ॥
शमनंकोपनंस्वस्थहितंद्रव्यमितिविधा ।।
उष्णशीतगुणोत्कर्षात्तत्रवीर्यद्विधास्मृतम् ।। १५ ।।
शमन कोपन स्वस्थहित इन भेदोंसे द्रव्य तीन प्रकारका है। १ जो द्रव्य
दोष वात्वादि बढे हुवोंको शांत करे वह शमन कहाजाताहै । २ जो द्रव्य
कुपितकरे वह कोपनकहाजाताहै। जो द्रव्यदोष धात्वादिकोंको स्वास्थ्य रखने
बाला और हितहो सो स्वस्थहित कहाजाताहै, इसप्रकार द्रव्य ३ प्रकारकाहे
और उष्ण और शीत इन दो गुणों के उत्कर्षसे वीर्य दोप्रकारकाहै अर्थात
गुरु आदि २० गुणोंमें उष्ण और शीतके उत्कर्षसे शीतवीर्य और उष्णवीर्य
दोही प्रकारका है (क्योंकि अग्निसोमात्मकं जगत ) तात्पर्य यहहै कि द्रव्य
शीतवीर्य और उष्णवीर्य होनेसे वीर्य दो तरहका होताहै ॥ १५ ॥
त्रिधाविपाकोद्रव्यस्यस्वाद्वम्लकटुकात्मकः ॥ १६॥
द्रव्यका स्वादु अम्ल कटुक इन तीन किस्मका विपाक होताहै अर्थात् ६
रस होतेहुवेभी जठराग्निसे पककर मीठा, खट्टा, कडुवा, इसप्रकारसे द्रव्यका
३ प्रकारका विपाक होताहै ॥ १६ ॥
कफपित्तानिलाःपूर्वमध्यान्तेषुव्यवस्थिताः ॥
देहाऽहोरात्रिवयसांसंधिष्वपिकफानिलौ ॥ १७॥
भाषाटीकासमेत-अ० १. (१७३)
देह, दिन, रात्रि, अवस्था इनके पूर्व मध्य अंतमें क्रमसे कफ, पित्त, वासु,
प्रबल होताहै अर्थात् इनके पूर्वभागमें कफ,मध्यभागमें पित्त, अत्यभागमें बाय
प्रबल होताहै और संधियोंमें कफ और वायु पूर्व संधिमें कफ और दूसरीमें
वायु प्रबल होताहै ॥ १७ ॥
तैर्भवेद्विपमस्तीणोमंदश्चाग्निसमैःसमः ॥
वायु पित्त कफ इनसे मनुष्यकी जठराग्नि कमसे विषम तीक्ष्ण और मंद
होतीहै। वायुके उत्कर्षसे विषम पित्तके उत्कर्षसे तीक्ष्ण कफके उत्कर्षसे मंद
और इनकी साम्यावस्था होनेसे समजठरानि होतीहै ।
कोष्टःक्रूरोमृदुर्मध्योमध्यःस्यात्तैःसमैरपि ॥ १८ ॥
इसीप्रकार मनुष्यका कोष्ठ वायुके उत्कर्षसे क्रूर,पित्तके उत्कर्षसे मृदु और
कफसे मध्य कोष्ठ होताहै और सब दोपोंकी साम्यावस्था भी कोष्ठ मध्यही
होबाहै ॥ १८॥
कालार्थकर्मणांयोगाहीनमिथ्यातिमात्रकाः ।।
सम्यग्योगश्चविज्ञयोरोगारोग्यैककारणम् ॥ १९ ॥
काल ( अर्थात् शरदी गरमी वशात् ) अर्थ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध)
कमी क्रिया काया वाणी मनकी चेष्टा)इनके हीनयोग और मिथ्यायोग अतियो
गके होनेसे रोग होताहै और इनका सम्यक् योग आरोग्यताका कारणहै १९ ॥
निजागन्तुविभागेनतत्ररोगाद्विधास्मृताः ।।
तेषांकायमनोभेदादधिष्टानमपिद्विधा ॥२०॥
दोषज और आगंतुक रोग दोप्रकारके होतेहैं ( वातादि दोषके कोपसे जो
रोग हो वह निज कहाजाताहै । क्योंकि वातादि पहले विषम होकर फिर
पीछे रोग पैदा होताहै, इसलिये दोपज कहा जाताहै, और आगंतुक पहले
होकर पीछे दोष कुपित करता है। उन रोगोंका शरीर और मनके भेदसे अधि-
छान दो प्रकारकाहै। ज्वरादि रोगोंका शरीर अधिष्ठान है और राग द्वेषादिकोंका
मन अधिष्ठान है ॥ २० ॥
(१७४) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
शरीरजानांदोषाणांक्रमेणपरमौषधम् ।।
बस्तिविरेकोवमनंतथातैलंवृतमधु ।।२१।।
शरीरमें होनेवाले रोगोंकी परमोपी क्रमपूर्वक बस्ति विरेचन बमन तर
वृत शहद कहेहैं अर्थात् वातरोगमें बस्ती स्नेह क्वाधादि पिनरागभ विचनद्वारा
पित्त निकालना कफका वमन करानाही औषधि है ॥ २१ ॥
धीधैर्य्यात्मादिविज्ञानंमनोदोपापर्वपरम् ।।
बुद्धि, धैर्य, आत्मादिकोंका विशेष ज्ञानही मनमे उत्पन्न गगांकी
परमौषधि है।
भिपद्व्याण्युपस्थातारोगीपादचतुष्टयम् ॥ २२॥
वैद्य औषधि सेवक रोगी ये चिकित्साके चार पाद है। इन चागक योग्य
होनेसे असाध्यभी साध्य होसक्ताहै ॥ २२ ॥
अमाध्यके लक्षण ।
अमर्मोपहितेदेशेशिरासंध्यस्थिवर्जिते ।
विकारोयोऽनुपर्येतितदसाध्यस्यलक्षणम् ॥ २३॥
मोपहित स्थानसे अन्यत्र और शिरासंधि अस्थियोंस अतिरिकाजी
विकार व्याप्त नहो, अर्थात् मर्मस्थानिक शिरा और सन्धियोंमें तथा अस्थि
घोंमें व्याप्त हो तो यह असाध्यका लक्षण है ॥ २३ ॥
इति श्रीशुभसंततियोगप्रकाशे द्वितीयवेडे रसादिविजानीया नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथातोपमनविरेचनविधिव्याख्यास्यामः॥
अब हम वमन विरेचनकी विधिका व्याख्यान करतेहैं ।
दोषाःक्षीणाहयितव्याःकुपिताःप्रशमयितव्याः
समा परिपाल्याइतिसिद्धांतः ॥ १॥
घटेहुवे दोषोंको बढाना और कुपितहुवे दोषोंको शांत करना अतिबढे
हुओंको निकाल देना तथा जो समान हो (ठीकहो) उनकी रक्षा करना यही
वैद्यकशास्त्रका सिद्धान्तहै ॥ १ ॥
भाषाटीकासमेत-अ०२. (३७५)
प्राधान्येनवमनविरेचनेवतेंतेनिहरणेदोषाणांतस्मात्तयोविधा-
नमुपधारयउच्यमानम् इतिहोवाचधन्वन्तरि शुश्रुताय ॥२॥
और दोषोंके शोधन करनेमें प्रधानतासे वमन और विरेचनही मुख्यहै ।
इनके विधानको वर्णन करताहै। इसको सुनो और धारण करो (याद रक्खो)
शेसे भगवान धन्वन्तरिजीने शुश्रुतसे कहा ॥ २ ॥
तथातुरंस्निग्धस्विन्नमभिष्यादिभिराहारैरनवबद्धदोपवलोक्य
थोवमनंपाययितास्मीतिसंभोजयेत् तीक्ष्णागिबलवंतंबहुदोष
महाव्याधिपरीतंवमनसात्म्यच ॥३॥
जब रोगीको बलवान् तथा तीक्ष्णाग्नि और बहुत दोषोंसे व्यात महाव्या-
वियोंसे पीडित और वमन योग्य देखे तब स्नेहन स्वेदन कराकर ऐसा
समझे कि कल इसको वगन करावेंगे तो उस रोगीको अभिव्यदि भोजन
करावे ॥३॥
पेशलविविधरनर्दोषानुक्केश्यदेहिनः ।।
स्निग्धस्त्रिनायवमनंदत्तंसम्यक्प्रवर्तते ॥४॥
पहले अनेक प्रकारके पुतले भोजन कराके दोषोंको उखाडकर पतले
करके स्नेहन स्वेदन जिसे करा चुके हों उस पुरुषको वमनकारक औषधि खूब
बमन लातीहै ॥४॥
अथापरेघुःपूर्वाडेलाधारणेकालेवमनद्रव्यापायकल्कचूर्णस्ने-
हानामन्यतमस्यमात्रांपाययित्वावामयेत् ॥ यथायोगकोष्ठवि-
शेषमवेक्ष्यासात्म्यवीभत्सदुर्गधदुर्दर्शनानिव वमनानि विद-
ध्यात्॥५॥
फिर दूसरे दिन साधारण कालमें (शरदवशते) पहरदिन चढे वमन-
कारक औषधियोंका काथ या कल्क या चूर्ण अथवा घृत तैलादिमेंसें किसी
एककी यथोचित मात्रा पिलाकर वमन करावे । और यथायोग कोठेको देख-
कर (मृदु या करडा) फिर ग्लानिकारक दुगंधित जो बुरी दीखें ऐसी
वस्तुका उपयोग करे ताके मन उछलकर वमन शीघ्र होजावे ॥ ५॥
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.
-
(१७६)
शुभसन्ततियोगप्रकाश।
अतोविपरीतविरचनानि विदध्यात ॥६॥
और विरेचनमें इससे उलया उपयोग को अर्थात सिंचन
पिलाकर सुंदर सुगंधित औपधियोंका उपयोग को ताक और गल.
न आवे ॥६॥
तत्रसुकुमारकृशंबालवृद्धंभीरुवावमनसाध्यविकारपक्षीन्ददि
तक्रयवागूनामन्यतममाकंटंपाययेत । पीतोपचयाणिभिरग्नि
तप्तः प्रतप्यमानंमुहूर्त्तमुपक्षेत ॥ ७॥
जो किसी सुकुमार हलके नाजुक तथा दुबले को अथवा बालक र
तथा डरपोकको वमन कराने लायक रोगहो अर्थात् ऐमा गेगही जो वमनम:
ठीक होसक्ताहो इन्हें दूध, दही, छाछ, यवागू आदि कोई पदार्थ कंठन
पेटभरकर पिलादेवे फिर अग्निसे हाथ तपाकर जरा सके और दो घडी पया
वमनकी राह देखे ॥ ७ ॥
तस्यचस्वेदप्रादुर्भावेनशिथिलतामापन्नम्वेभ्यः स्थानेभ्यः प्रचलि
तंकुक्षिमनुसृतंजानीयात्ततःप्रवृत्तहल्लासंज्ञात्वाजानुमावासनापत्रित
ष्टमाप्तैर्ललाटेपृष्टपार्श्वयो कंठेचपाणिभिः सुपरिगृहीतमंगुलीगंधर्व
हस्तोत्पलनालानामन्यतमेनकंटमभिस्पृशतवामयेत्तावद्यावत्म
म्यग्वांतलिंगानीति॥८॥
जब उसको (जिसने वामक दवाई पी) पसीना आनेसे शिथिलता प्राप्त हान
लगे और कुक्षि अपने स्थानसे उकसी हुई और उभरीसी जानी जावे और
उबकाई आनेलगे तब रोगीको घुटनोंके सहारे बैठाकर दृमरा बुद्धिमान् मनुष्य
उसके शिर पीठ तथा पसवाडे हाथोंसे थाम लेवे और उंगली या अरंडके पत्तकी
डंडी अथवा कमलकी डंडीसे वमन कराता करनेवाले के कंठमें स्पर्श कराकर
वमन कराता रहे। जबतक ठीक २ वमन होजानेके लक्षण जाने जावें तबतक
क्मन कराता रहे ॥ ८ ॥
हैं , जापाटीकासमेत-अ० २. (३७७) होनाधिकामनके लक्षण कफप्रतेक हृदयाविशुदिई दुश्छतिलिगमाहुः ।। पित्तातियोगंचविसंजितांचहत्कंठपीडामपिचातिवांते ॥ ९॥ मुखसे बार २ कफ गिरे, हृदय शुद्ध नहो अर्थात् भारी रहे, ठमें खाजसी हो; ये होतामनके लक्षगहें और पिनका अधिक योग हो, मूर्छा होजावे हृदय तथा कंठमें पीडा होवे ये अतिवमनके लक्षण हैं ॥ ९ ॥ ठीक यमनके लक्षण पित्तकफस्यालुसुखप्रवृत्तशुद्धेषुहृत्कंठशिरःसुचापि ॥ देहेलयुत्वंकफसंवेचस्थितेसुवांतपुरुषव्यवस्येत् ॥ १० ॥ ठीक बमल होने के ये लक्षणहैं। कफके पीछे पित्त गिरे, हृदय कंट शिर ये शुद्ध होजाके शरीर हलका जानाडे, काका आना बंद होजावे तो नम झो कि शुद्ध बमन होगया ।। १० । वमानके अंतमं घूमपान । सम्यग्वांतचनमभिसमीक्ष्योहनविरेचनशमनानाधूमानाम- न्यतमंसामयतःपाययित्वाऽबारिकमादिशेत् ॥११॥ जब ठीक वमन होचुकाहो तब स्नेहन या विरेचन अथवा शमन औषधि- योंका यथोचित धूवाँ पान कराकर उचित आहार विहारका उपदेश करे ११ ततोपराह्नेचिशुद्धदेहमुष्णाभिरद्भिःपरिसिक्तगात्रम् ॥ कुलत्थमुद्दाढकिजांगलानांयूपैरसै प्युपभोजयेत्तु ॥ १२ ॥ जब वमन ठीक हो चुके और देह शुद्ध होजावे तो दोपहर पीछे गरम जलसे हाथ मुँह धोकर शरीर घुलवाकर कुलथी मूंग अरहड़ आदि यूष खावे॥१२॥ चमन करनेके गुण । कासोपलेपस्वरभेदनिद्रातंद्रास्यदोगध्यविषोपसर्गाः॥ कफप्रसेकग्रहणीविकारानसंतितोर्वमत कदाचित् ॥ १३॥ शुद्ध वमन होनेसे खांसी, कण्ठमें कफका लिपटना, आवाजका बैठना, अविनिद्रा, तंद्रा, मुखकी दुर्गंधि, विषका संसर्ग, मुखसे लार वहना, ग्रहणीके विकार, वमनसे तत्काल नष्टहोजाते हैं ॥ १३ ॥ वमनके अयोग्य मनुष्य । नवामयेत्तैमिरिकोर्ध्ववातगुल्मोदरप्लीहकृमिश्रमानि ।। చాలు १२ INDORE (१७८) शुभसन्ततियोगप्रकाश। स्थूलक्षतक्षीणकृशातिवृद्धभूत्रातुरा केवलवातरोगान् ॥ १४ ॥ स्वरोपघाताध्ययनासक्तदुश्छर्ददुःकोष्टतृडार्तबालान् ।। जास्तपित्तक्षषितातिरूझगर्भिण्यदावर्तिनिहिताश्च ॥ १५॥ इतने मनुष्योंको वमन न करावे।तिमिररोगी, ऊधात,गुल्म.पहा कनि, इन रोगोंवालेको श्रमसे पीडितको, अतिस्थलको, उराशनबालेको, झीण दुर्बल, अतिवृद्ध, मूत्ररोगबालेको जिनको केवल बातरोगो ।। १४॥ जिनका स्वर नष्ट होगयाहो, जो पढते वोपतेहो, जिनको करने मन होताहो, जिनका शेठा करडा हो, जिनको अधिक प्यास लगीहो, और दालकको तथा जिनको ऊर्ध्वगत रक्तपित्तहो, क्षुधातुरको, अतिकसको, गर्भवतीको, उदावर्तवालेको, जिनके निरूहणवस्ति कियाहो ऐसे पुलोंको कभी वमन न परावे ॥१५॥ अवम्यक्मनाहोगाकुन्तायांतिदेहिनाम् ॥ असाध्यतावागच्छन्तिनतकाल्यास्ततःस्मृताः ॥ १६ ॥ जो वमनके योग्यमनुष्य नहीं उनको वस्न करानेले उनके रोग कटसाध्य अथवा असाध्यही होजातेहैं। इसलिये जो वमनको योग्य नहो उसको कभी बमन न करावे ॥ १६॥ एतेप्यजीर्णव्यथितावास्यायेचविपातुराः ॥ अतीवचोल्बणकफास्तेचस्युर्मधुकांबुना ॥ १७ ॥ यदि ये मनुष्य अजीर्ण अथवा विपसे पीडित होवे या अति कफ बढीहुई हो तो यदि ऐसेको बमन कराना हो तो मुलेठीके काथसे वमन करावे॥१७॥ वमनके योग्य। वाम्यास्तु विपशोपस्तन्यदोपविषमंदाग्न्युन्मादापस्मारश्लीपदा- बुंदविदारिकासेदोमेहगरज्वरारुच्यापच्यामातिसारहदोगचित्तभ्रम विसर्पविद्ध्यजीर्णमुखपसेकहल्लासवासकासपीनसपूतिनासकण्ठो वक्रपाककर्णलावाधिजिहोपजिहिकागलशंडिकावःशोणितपि- त्तिनःकफस्थानेषुविकारेष्वन्येषुकाव्याधिपरीतेष्विति ॥ १८ ॥ इतने मनुष्योंको वमन कराना उचितहै। जैसे विषखाये हुवेको तत्काल वमन करावे । शोषरोगके आरम्भमें, दोषयुक्त दूधवाली स्त्रीको, विषमाग्निमें, मदांभिमें, उन्मादरोगमें,अपस्मारमें श्लीपद, रसौली,विदारिका, मेदरोग, प्रमेह, ।
भाषाटीकासमेत-अ० २.
(३७९)
The
।
गर कनिमनिष), ज्वर,अरुचि, अपचि,आमातितार, बोग, चित्तनम, विसर्प,
विवि, अजीर्ण, मुँहसे लारगिरना, उनकाई, वास, खाँसी, पीनस, कण्ठ
होठ मुख पकना, कान बहना अविजित, उपजिलगल डि, अधोगत रक्तपित्त,
इन रोगों में तथा कफके स्थानके अन्य रोगों में और कलकी व्याधियों में
इन्न कराना परमोत्तम है।॥ १८ ॥
विरेचन विधि।
विरेचनमपिस्निग्धविनायनातायनयानाअथातुरेश्रोविरेचनंपा
अपितास्मीतिलघुभोजयेत् फलाम्लनुमोदकंचैनमनुपाययेत्
करेहनि विगतश्लेष्माणबाल्यकृदुलरमध्यकोठंचाक्ष्योचितौ
अमात्रांप्रयच्छेत॥ १९॥
शिवनभी नेहन, स्वेदन, यमनाकर देना चाहियो जब ऐसा जानेकि,
कल इसको विरेचन करानाहै तो रात्रिको हलका भोजन कराकर फलोंकी
इटाई और गर्मपानी ऊपरसे पान करावे। फिर दूसरे दिन जब ग्लेष्म पककर
निकलगयाहो, कोठेमें आगयाहो ऐसा देखकर और मृदु क्रूर मध्य कोठेको
देखकर यथोचित औषधिको यथोचित मात्राका प्रयोग करे ॥ ३९ ॥
डीलोपवतन्मनाशयाम्याशेविरिच्यते ॥
औषधि पीकर उभी तर्फ मन लगाएक्ले और आरामीसे लेटारहे शय्याके
सालही दस्त जावे ॥
विरेचनंपीतवास्तुनवेगान्धारयेदुधः ॥
निवातशायीशीतांबुनस्पृशेत्रप्रवाहयेत् ॥२०॥
विरेचनको औषधि पीकर दस्तोंके वेगको न रोके, निर्वात स्थानमें शिरके
नीचे सिराहना रखकर नरम बिछानेपर आरामसे लेटे या बैठे, ठंडे पानीका
और बडी वस्तुका पर्श न करे और जादा जोर लगाकर किनछेभी नहीं॥२०॥
यथाचवमनेप्रसेकोषधकफपित्तानिलाक्रमणगच्छंति
एवांविरेचनमूत्रपुरीषपित्तोषधकमाइति ॥ २१ ॥
जैसे बमनमें पहले लार फिर औषध फिर कफ फिर पित्त सबके पीछे
वायु क्रमसे निकलते हैं इसीप्रकार विरेचनमें पहले भूत्र मल फिर पित्त फिर
औषध फिर कफ ऐसे निकलतेहैं ॥ २१ ॥
कु (१८०) शुभसन्ततियोगप्रकाश। दुविरिक्त और अतिविरित । स्यादुर्विरित्तेकफपित्तकोपोदाहोरुचि रखगसिगढ़ः ।। हत्कुक्ष्यशुद्धिःपरिदाहकंडविण्मृवसंगश्चनदिरके ।। मूर्छागुदभ्रंशकफातियोगाःशुलौहमश्चातिविरिक्तलिंगम् ॥२२॥ दस्तोंके ठीक न आनेसे ये लक्षण होतेह-कफ और पिनका कोप, दाह अरुचि, भारीपन, अग्निकी मंदता, हृदय और कुक्षी में भारीपन, नथा जा खाज और मलमूत्रका रुकना ये ठीक दम्त न होनेसे होते हैं । और जो अधि कदस्त होजावे अर्थात् अनुमानसे जादा दस्त होनेसे मृच्छा, कांचका निकलना कफ और पित्त अधिक निकले और शूल हो ये अतिविरिक्त के लक्षण, २२ सम्यग्विार तके लक्षण। गतेषुदोषेषुकफान्वितेषुनाभ्यालघुत्वेमनसश्चतुष्टौ ।। गतेनिलेचाप्यनुलोमभावंसम्पग्विरितमनुव्यवस्येत ॥ २३ ॥ विरेचनके ठीक होजानसे ये लक्षण होनेहीकपके संग मिले मबदोष निः लजावें, नाभिके समीप हलकापनहो, मन प्रसन्नहो, वायु अनुलोम होक अधोवायुका निःसरण ठीकहो, ये लक्षण ठीक दस्तहाजानेकह ।। २३॥ मंदाग्निमक्षीणमसतिरिक्तनपाययताहनितत्रपेयाम् ॥ क्षीणंतृडार्तसुविरचितंचतन्वीमशीतांलघुपाययेत्ताम् ॥ २४॥ जिसकी अग्नि मंदहो तथा बहुत क्षीण नहो, जिसको विरेचन ठीक : हुवाहो तो उसको उसदिन पेया न देवे और जो क्षीणहो,तृपासे पीडितहो, जि सको विरेचन ठीक होचुकाहो,उसको हलकी निवाई थोडी पेया पिलादेवे२४ पेयालक्षण। चतुर्दशगुणेनीरेरक्तशाल्यादिभिःकृता॥ वाधिकास्वल्पसिक्थापेयायोक्ताभिपग्वरैः॥२८॥ लालशही,मूंग आदि पदार्थको चतुर्दश१४गुणे जलमें पकाव।जब पककरठी होजावे पानी अधिकरहे और अन्न उसमें कमहो उसको श्रेष्ठवैद्योंने पेयाफहाहै२' उत्तमविरेचनकेगुण। बुद्धःप्रसादंबलमिद्रियाणांधातुस्थिरत्वंबलमग्निदीप्तिम् ॥ १ किंतु खिचडीआदि लका अन्न देवे। " , भाषाटीकासमेत १० (१८१) चिराचपावयसाकरोतिविरेचनसम्यगुपास्यमानम् ॥ २६ ॥ उत्तम विरेचनका होना, बुद्धिको प्रसन्न अन्ताहै इंद्रियोंको बलवाल कर-- नाहै, धातुबोंने स्थिरता करता है, शरीरके बल और जगमिकी दीन करताहै, और बुढापा जल्दी नहीं आनेदेता है ।। २६ ॥ विरेचनके अयोग्य पुरुष । मंदाग्न्यतिम्नेहितबालवृद्धस्थूलातलीणमयोपत्तताः ।। श्रांतस्तृडार्तापरिजीर्णभुत्तोगभिण्यधोगच्छतियायचा ॥२७॥ नवप्रतिश्यायमदात्ययीचनबज्वरीयाचनश्मामृता ।। शल्यार्दिताश्चाप्यविरेचनीयाःस्नेहादिमित्वनुपस्कृताश्च ॥२८॥ इतने मनुष्योंको विरेचन न कराये। मैदानियालेको, जिसने अत्यंत स्नेहपान कियाहो, बालकको, वृडको, अतिस्थूल शरीवालेको क्षतक्षीणको,भयातुरको, थकितको, तृषासे पीडितको, जिलको भोजन न पचाहो तथा गर्भिणी स्त्रीको, जिसके अधोमार्गले रक गिरताहो.नये प्रतिश्याय बालेको मदात्यय रोगबालेको, नवीनज्वरवालेको,थोडेदिनकी प्रसूताको, चोटआदि व्याकुलको,तथा जिसने स्नेहल और स्वेदन न कियाहो,इतने पुरुषोंको विरेचन न करावे॥२७॥२८॥ अत्यर्थपित्ताभिपरीतदेहान्विरेचयेत्तानपिमंदवीयः ।। विरेचनातिनराविनाशमनप्रयुक्तरविरेचनीयाः॥२९॥ यदि इन उपरोक्त मनुष्योंके शरीरमें अत्यंत पिन बढा हुवाहो और विना विरेचनके शांत न होसके तो इनकोभी हलकी औषधियोंसे युक्ति- पूर्वक विरेचन करावे । क्योंकि जो विरेचनयोग्य पुरुष नहीं है वे मनुष्य मूर्ख लोगोंके दियेहुवे विरेचनोंसे विनाशको प्राप्त होतेहैं ।। २९ ।। विरेचनके योग्यपुरुष । विरेच्यास्तुज्वरगरारुच्यशोऽबुंदोदरग्रंथिविद्रधिपाण्डुरोगापस्मा- रहद्रोगवातरक्तभगंदरच्छर्दियोनिरोगविसर्पगुल्मपकाशयरुग्वि- बंधविषूचिकालसकमूत्राघातकुष्टविस्फोटकप्रमेहानाहग्लीहशो- फवृदिशस्त्रक्षतक्षारामिदग्धदुष्टत्रणाक्षिपाककाचतिमिराभिष्यं- दशिरःकर्णाशिनासास्यगुदमेद्रदाहोर्द्धरक्तपित्तकृमिकोष्टिनःपि त्तस्थानजेषुविकारेष्वन्येषुचपैत्तिकव्याधिपरीता इति॥३०॥ ।
, r ( १८२) शुभसन्ततियोगमकास इतने मनुष्योंको विरेचन देना चाहिये । जीर्णचर, गर, चि, बवासीर, रसौलि, उदररोग, अन्थि, विधि, पांडुरोग, अपस्मार, हृदयरोग, वातरक्त, भगंदर, छर्दि, योनिरोग, विसर्प, गुल्म, पक्काशयक गंग, बंध, विषूचिका, अलसक, मूत्ररुकना, कुष्ट, विस्फोटक, प्रमेह, अफारा, प्लीह- वृद्धि, शोथ, अंडवृद्धि, शस्त्रका बाव, क्षारामिसे जलेहुवे, दुष्टवण, न- दुखना, काच, तिमिर, ढलका, शिर, कान, आँख, नाक, मुँह, गु लिंग, इनके रोगोंमें दाहमें ऊर्ध्वगत रक्तपित्त, जिनके पेटमें कमिहो इतने - वालोंको विरेचन देना योग्यहै तथा जिनके पित्तस्थानमें रोगहो या पिनके रोगोसे पीडित हो तोभी विरेचन देना योग्यहै ॥ ३० ।। वमनविरेचनंक लक्षण। यात्यधोदोषमादायपच्यमानंविरंचनम् ।। गुणोत्कर्षाद्भजत्यूर्द्धमपकंवमनंपुनः ॥३१॥ जो पकेहुवे दोषोंको लेकर नीचेको निकले वह विरेचन और जो गुगाको उत्कर्षतासे कच्चे दोपोंको लेकर ऊपरको निकले उसको बमन कहाजाताह३३॥ छहों ऋतुओंके विरेचन । त्रिवृताकौटजंबीजंपिप्पलीविश्वभेषजम् ।। समृद्वीकारसंक्षौवर्षाकालेविरेचनम् ॥ ३२॥ त्रिवृदुरालभामुस्तशर्करोदीच्यचंदनम् ।। द्राक्षाम्बुनासयट्यावशीतलंचधनात्यय ।। ३३॥ पिप्पलीनागरंस्निग्धश्यामाविवृतयासह ॥ लिह्यात्क्षौदेणशिशिरेवसंतेचविरेचनम् ॥ ३४॥ त्रिवताशर्करातुल्याग्रीष्मकालेविरेचनम् ॥ ३१॥ निसोथ, इंद्रजौ,पिप्पली,सोंठ इन्हें मनुकाके रस और सहतके संगलेना,यह वर्षाऋतुका विरेचनहै। निसोथ,दुरालभा, नागरमोथा,खांड, नेत्रवाला, चन्दन, इनमें मुलहठी मिलाकर मनुक्काके जलसे लेना यह शरद ऋतुके योग्य शीतल विरेचन है। पिप्पली,सोंठ,वृद्धदारु,निशोथ, इनके चूर्णको घृत या बादाम रोगनमें चिकना करके शहदमें मिलाके चाटना,शिशिर और वसंतऋतुका विरेचनहै। निशो थका स्निग्धकिया. चूर्ण.खांडयुक्त करके लेना ग्रीष्मऋतुका विरेचनहै ३२-३५ MSASNA भाषाटीकासमेत-अ०२. (१८३) अभयामोदक अभयामरिचंशूठीविडंगामलकानिच !! पिप्पलीपिप्पलामूलं स्वपत्रंसुस्तमेवच ।। ३६ ।। एतानि सलमागालिबंतीलनिशुणाभनेत्।। त्रिवृताधाणायापड्गुणाचात्रशर्करा ॥३७ ।। मधुनामोदकान्कृत्वाकर्षमात्रामाणतः ।। एकेकमायेमातःशीतंबालुपिज्जलम् ११३८॥ तावद्विरिच्यतेजंतुर्माबदुष्णनखेलते ॥ पानाहारविहारेषुभवेनियंत्रणःलदा ॥ ३९ ॥ हरडकी छाल, स्याह, मिर्च, सोंठ, विडंग, आमले, पीपल, पीपलामूल तजपत्र, नागरमोथे इन सबको एक २ तोला लेवे । दंती (जमालगोटेकी जड) ३ तोला, निसोथ ८ तोला, खांड ६ तोला इन सबको कूट छानकर सहतमें मिलाकर एक २ तोलाकी गोली बनाये। एक गोली खबरे हो साकार ऊपरले ठंडा जल पीवोइसके ऊपर जबतक गर्म पानी न पीये तबतक दस्त आले हैं। (ठंडे जलके पीनेसे दस्त आते हैं ) जब बंद करनेहों गर्म पानी पीने और गर्मसेही हाथ पाँव धोये। इसमें पानाहारविहारका विशेष रश्न नहींहै ३६-३९ विषमज्वरमंदाग्निपांडुकासभगंदरान् ॥ दुर्नामकुष्टगुल्माशोगलगंडोदरभ्रमात् ॥ ४० ॥ विदाहीहमेदांश्चयक्ष्माणनयनामयान् ।। वातरोगांस्तथाध्मानमूत्रकृच्छ्राणिचाश्मरीन् ॥४१ पृष्टपावरुजंचवजंघोदरजंजयेत ॥ स्नेहाभ्यंगंचरोषंचदिनमेकंसुधीस्त्यजेत् ॥ ४२ ॥ सततंशीलनादेवपलितानिच नाशयेत् ॥ अभयामोदकाहीतरसायनवा स्मृताः ॥ ४३ ।। यह अभयामोदकका विरेचन विषमज्वर, मंदानि, पांडु, खाँसी, भगंदर, बवासीर, कुष्ठ,गुल्म,मस्सोंकी बवासीर,गलगंड,उदररोग,नम,विदाह, प्लीहरोग, प्रमेह,क्षयी,नेत्ररोग,वातरोग,अफारा,मूत्रकृच्छ्र,पथरी,पीठके पसलीकेरोगजंबा और पेट के रोग, इतने रोगोंको दूर करता है। इसको खाकर पीछे एक दिन ( १८४) शुभसन्तनियोगप्रकाश। स्नेहायंग और रोष आदि त्याग देवे इसको सदैव समयर पर मेवनमे बुढ़ापके वलीपलित आदिरोग नहीं होते यह अभकामोदक श्रेष्ठ मारनहै ४०-४३॥ विरचनविश्यक बातें। मृदुकोष्ठस्यदीप्तानेरतितीक्ष्णविरेचनम् ॥ नसम्यनिहरेद्दोपानतिवेगप्रधावितान् ॥ १४॥ पीतंयदीप,प्रातर्मक्तपाकसमक्षण ।। पक्तिगच्छतिदोपश्चिनिहरेत्तत्पशम्यते ॥४५॥ मृदु कोठेवालेके जिसकी अग्नि दीन हो उसके तीक्ष्ण विरचनले यथार्थ दोष नहीं निकलने । क्योंकि तीक्ष्ण विरचनी औपधिसे उसके दोष निवगसे चलायमान होजातेहैं। इसलिये दोपोंको ठीक २ नहीं निकालते ॥ ४४ ॥ जो औषध प्रातःकाल पीलीजावे और भोजनके पाकके समयत पाकको प्राप्त होकर दोषोंको ठीक २ निकाल देवे वह श्रेष्ठ है ॥ ४५ ॥ दुर्बलस्यचलान्दोपानल्पानल्पान्पुनःपुनः॥ हरेत्प्रभूतानल्पांस्तुशमयेत्प्रच्युतानपि ॥ ४६॥ हरदोषांश्चलान्पक्कान्बलिनोदुर्बलस्यच ॥ चलायुपेक्षितादोपाकेशयेयुश्चिरंनरम् ॥ ४७॥ दुर्बल मनुष्यके चले हुवे दोषोंको थोडा २ करके बार २ निकाले उठेहुवे दोषांको थोडे २ निकालता रहै और थोडे २ शांत करता रहै अर्थात् कमता कत मनुष्यको नरम औषध देकर उसके उठेहुवे दोपोंको थोडा २ करके सह- जसे निकाले । एकदिन तीक्ष्ण विरचेन न देवे बलवान् हो चाहे दुर्बलहो । यदि उसके दोष पककर चलायमान हों तो उन्हें निकाल देनाही ठीक है । क्योंकि यदि चलेहुवे दोष छोडदिये जायें तो मनुष्यको वे दोष बहुत दिनतक क्लेश देतेहैं इसलिये मवाद फूलाहुवा निकाल देनाही ठीक है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ मंदाग्निकरकोष्ठंचसक्षारलवणेघृतः ॥ संधुक्षिताग्निस्निग्धंचस्विनचैवविरेचयेत् ॥४८॥ निग्धस्विन्नस्यभैषज्यदपिस्तूत्क्लेशितोबलात् ॥ विलीयतेनमार्गेषुस्निग्धेभांडइवोदकम् ॥१९॥ मंदामिवाले क्रूरकोष्ठ मनुष्योंको क्षार लवण तथा घृत मिलाकर विरेचन
भाचाटीकासमेत-२०२. (१८५)
औषध देना और दीप्तामिवालेको स्नेहन स्वेदन कराके विरेचन देना उचित
है। क्योंकि स्नेहन स्वेदनसे चिकने कोटेंमें उठाहुवा दोष विरेचनीऔषधिके
बलसे ठीक २ निकल जाताहैं रस्तेमें नहीं ठहरता । जैसे चिकने पात्रमें जल
नहीं ठहरता और नहीं लगता ॥ ४८ ॥ ४५ ॥
नचातिस्नेहपीतस्तुपिबेत्स्नेहविरेचनम् ।।
दोषाःप्रचलितास्थानादयःश्लिष्यतिवमः ॥ ५० ॥
विषाभिषातपिडिकाशोफपांडविसर्पिणः ।।
नातिस्निधाविशोध्या:स्युस्तथाकुष्टप्रमेहिणः ।। ५१ ॥
विरूक्ष्यस्नेहसात्म्यंतुभूयःसंत्रेह्यशोधयेत् ।।
तेनदोषाहतास्तस्यभवंतिबलवनाः॥२२॥
जिसने अतिस्नेह पीयाहो उसको चिकना विरेचन नहीं पीना चाहिये।
क्योंकि अति चिकनाईके कारण उसके दोष स्थानसे चलकर फिर मार्ग ल्हि-
साथ जातेहैं । विषसे पीडित जिसे चोट लगीहो, पिडिकावाला, शोथ, पांडु,
विसर्प, कुष्ठ प्रमेहरोगोंवाला तथा जो घृतादि स्निग्ध पदार्थ म्बूब खाते हैं
और उनसे स्निग्धहै इनको पहले रूक्ष करके फिर स्निग्य करके शोधन करना
उचितहै। इसतरह करनेसे दोष दूर होकर बलकी वृद्धि होतीहै।।५०-५२॥
प्रागपीतनरंशोध्यंपाययेतोष,मृदु ॥
ततोविज्ञातकोष्ठस्यकार्यसंशोधनंपुनः॥५३॥
सुखंदृष्टफलंयमल्पमात्रमहागुणम् ।।
व्यापत्स्वल्पात्ययंचापिपिबेन्नृपतिरौषधम् ॥ ५४॥
जिसने पहले औषध न पीयीहो तथा जिस्के कोठेका हाल मालूम नहीं
उसको पहले मृदु औषध देनी चाहिये। फिर जब कोठेका हाल मालूम होजावे
तब शोधन करे अर्थात् अच्छीतरह विरेचन करावे। और राजा आदि अमीर
पुरुषोंको ऐसी औषध पीना चाहिये जो सुखपूर्वक पीयी या साई जाये और
जिसका फल देखाहवाहो अर्थात् आजमूदा हो जो हृदयको हितहो और
जिसकी मात्राभी जादा नहो जिसका गुण बहुत अच्छा हो और बिमारि-
योंको शीघ्र आराम करनेवालीहो ॥ ५३ ॥ ५४ ॥
(१८६) शुभसन्ततियोगप्रकाश।
स्नेहस्वेदावनभ्यस्ययस्तुसंशोधनंपिवत् ।।
दारुशुष्कमिवानामदेहस्तस्यविशीर्यत ।। ९५ ॥
स्नेहस्वेदप्रचलितारसैस्निग्धैरुदीरिताः ॥
दोषाःकोष्ठगताजन्तोःसुखहितुविशोधनः ॥५६॥
जो स्नेहन स्वेदन बिना किये वमन विरेचन करते हैं उनका देह इसतरह-
खंडित होताहै।जैसे सूखी लकडी मोडनेसे टजातीहै और स्नेह स्वदसे प्रचलित
दोष तथा स्निग्ध रसोंसे प्ररित मनुष्योंके कोटमें प्राप्त हुवे दोप शोधन सुन्छ,
पूर्वक निकलजातेहैं ॥ ५५ ॥ १६ ॥
संक्षेपसे वमनविरेचनके उपद्रवांकी चिकित्सा।
रक्तपित्तविधानेनरक्तष्टीवमुपाचरेत् ।।
धाचीरसांजनोशीरलाजाचंदनवारिभिः॥ ५७॥
मंथंकृत्वापाययेचसघृतक्षौद्रशर्करम् ॥
शाम्यंत्यनेनतृष्णाधारोगाश्छर्दिसमुद्भवाः॥१८॥
जो अत्यंत वमनके होनेसे रुधिर गिरनेलगे वो उसकी रक्तपित्तवत चिकि-
त्सा करे । अथवा आमले, रसौत, खस, खील, चंदन, नेत्रवाला इनका जलमें
मंथ बनाकर उसमें घी, सहत, खांड मिलाके पिलावे तो अत्यंत वमन होनेके
तृषा आदि उपद्रव शांत होते हैं ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
अधोगमेस्नेहयित्वाभूयस्तीक्ष्णैश्चवामयेत् ॥ १९ ॥
यदि तीक्ष्णानिवालेको या दुर्वलको वामक औषधिका अधोगमन होजाम
तो उसको फिर स्नेहन कराकर तीक्ष्ण औषधियोंसे वमन करावे ॥ ५९ ॥
विरेचनके उपद्रवोंके यत्न ।
दुर्विरिक्तस्यवैघोरा:शूलाध्मानादिजायते ॥
तंपुनःपाचनैःस्नेह पक्वास्निग्धंतुरेचयेत् ॥
तेनास्योपद्रवायांतिदीप्तोमिर्लघुताभवेत् ॥६० ॥
जिसको विरेचन ठीक नहुवा हो उस मनुष्यके शरीरमें कुक्षिशूल अफारा
आदि अनेक घोर रोग पैदा होतेहैं ऐसे मनुष्यको पाचन स्नेहन करके फिर
वीक्ष्ण विरेचन करावे ॥ फिर ठीक विरेचन होनेसे सब उपद्रव शांत
होकर अग्नि दीप्त होजातीहै और शरीर शुद्ध हलका होजाताहै ॥ ६ ॥
भाषाटोकासमेत-अ०३. (१८७) विरेकस्यातियोगेनमूनिंशोगुदस्यच ।। शूलंकफातियोगःस्यान्मांसधावनसन्निभम् ॥ ६ ॥ मेदोनिभंजलाभासंरक्तंचापिविरिच्यते ।। तस्यशीतांवुभिःसिक्त्वाशरीरंतण्डुलाम्बुभिः ।। ६२ । मधुमित्रैस्तथाशीतःकारयेद्वमनंमृदु ।। सहकारत्वचाकल्कोदनासौवीरकणवा ॥ १३ ॥ पिष्टानाभिप्रलेपेनहत्यतीसारमुल्बणम् । सौवीरंतुयवैरामः परवानिस्तुपै कृतैः ।। शीतैःसंग्राहिभिद्रव्यै कुत्सिंग्रहणभिषक् ॥ ६४।। अत्यंत दस्तहोनेसे मूर्छा आवे, कांच निकल आवे, पेटमें दर्द हो अत्यंत आम निकलने लगे तथा मांसके धोवनके समान लाल चरबीके समान सफेद जलने सदृश स्वच्छ और रुधिरके दस्त आनेलगे ऐसे उपद्रव होनेलगे तो उन रोगीके शरीरपर शीतल जल डाले। और चावलोंके धोवनमें सहत मिलाके पिलावे। तथा नरमसी बमन कराये। आमवृक्षकी छालको दही और जौकी कांजीमें पीसकर नाभिपर लेएकरनेसे धोरदस्तोंका वेग बंदहोताहै तुषयुक्त तथा तुषरहित जीवोंको जलमें भिगोकर खट्टे करे उसको सौवीर कहतेहैं अथवा शीतल और दस्तोंके वेगको रोकनेवाली औषधियोंसे घोर उपद्रवोंको शांत करे६१-६४ विरेचनकवाद पथ्यापथ्य । ग्रवातसेवांशीतांबुस्नेहाभ्यंगमजीर्णताम्॥ व्यायाममैथुनचैवनसेवेतविरोचितः।। शालिपष्टिकमुगाधर्यवाणूभोजयेत्कृताम् ॥६५॥ अत्यंत हवामें बैठना शीतल जलका सर्श तेलकी मालिश अजीर्णकारी भोजन दण्ड कसरत और परिश्रम तथा मैथुन इनको जिस मनुष्यने जुलाब कराया हो कदापि सेवन न करे और शालि या सांठीके चावलोंकी या मूगी. आदि हलके अन्नकी यवागू पान करे ।। ६५ ॥ इति श्रीशुभसन्ततियोगप्रकाशे द्वितीयखण्डे भाषाटीकायां वमनंविरेचनविधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ अथातोवुद्धिविवर्धनीयाध्यायव्याख्यास्यामः॥ अब हम बुद्धिके बढानेवाले अध्यायका व्याख्यान करते हैं ।
(१८८)
शुभसन्ततियोगप्रकाश।
मस्तिष्कमुनिभिःप्रोक्ताबहवःसूक्ष्मतंतवः ।।
नानाशक्तियुतास्तैवैस्वेस्वेकर्मणिमंस्थिताः॥ १॥
योगीश्वरोंने मस्तिष्क (दिमाग-बेन-) में छोटी छोटी और बदतमी नंत
(तारें)दानेयुक्त तारें (धागे ) कही हैं। वे सब अपने अपने काम करनेम
बहुतसी शक्तिये रखती हैं ॥ १ ॥
सूक्ष्माःशक्तियुताः प्रोक्तास्तत्रैवबुद्धितंतवः ।।
तेष्वेवशक्तयःसिद्धाःस्मारकादीतिनिश्चयः ॥२॥
गार्हस्थ्यानामपुष्टास्तेपुष्टावऊर्ध्वरेतसाम ।
त्रिकालज्ञाह्यतःशक्तिस्तेष्वेवविहिताभृशम् ॥३॥
अपुष्टाःशक्तिहीनास्तेपुष्टास्तपुष्टशक्तयः ।।
तेषांपुष्टिकरोयोगअध्यायस्मिन् प्रकीर्त्यते ॥४॥
वहीपर छोटे और शक्तियुक्त बुद्धितंतुहैं। उन बुद्धितन्तुओंमेंही स्मरणादि
शक्तिये अर्थात देखि सुनि वस्तुको याद करलेना और समझलेना विचार लेना
आदि शक्तिये उन बुद्धितन्तुबोमेंहीहैं,यह योगीश्वरोंका निश्चितहै ॥२॥ बाह
दिमागमें होनेवाले तन्तु बालब्रह्मचारी योगियोंके ठीक और पुष्ट अर्थात
पूरी ताकतवाले होतेहैं और गृहस्थि लोगोंके कमताकत हातहैं । जो अत्यंत
क्षीण और छोटीही उमरमें वीर्यको नष्ट करडालतेहैं उनके अत्यंत नाकाम हानेह।
क्योंके बालब्रह्मचारी योगीश्वरोंके बुद्धितन्तु अतिपुष्ट (नाकनवर) होत है इसी
लिये उनमें तीनकाल (भूत-भविष्यत-वर्तमान)के जाननेकी शक्ति होनी ॥३॥
यदि वे बुद्धितन्तु कमताकत हो तो उनमें स्मरण करने आदिकी पूरी शक्ति
नहीं रहती।इसी सबबसे मनुष्यों भूलजानेकादोप होजाताहै और यदि वे तन्तु
पुष्ट होवे तो उनकी स्मरणादि शक्तियेभी पुष्ट अर्थात् ताकतवर होजाती है। इस
लिये इस अध्यायमें हम उनके पुष्ट करनेवाले योग कथन करेंगे। जिनके उप-
योगसे बुद्धिकी शक्तिये बलवान् होजावें ॥ ४ ॥
पूर्वेवयसिमध्येवा आयुर्बुद्धिविवर्द्धनम् ॥
रसायनंप्रयुंजीतस्निग्धशुद्धतनोः सदा ॥ ५ ॥
नाविशुद्धशरीस्ययुक्तोऽत्रविहितोविधिः।।
नभातिवाससिकिष्टेरंगयोगइवाहितः॥६॥
भाषाटीकासमेत-अ०३. प्रथम अवस्था अथवा मध्यम अवस्थामें आयु और बुद्धिके बढानेवाला रसायनका प्रयोग स्निग्ध और बमन विरेचनादिसे शुद्ध देह होनेपर कराना चाहिये । क्योंकि विना शरीरकी शुद्धि किये जो इस अध्यायमें कही विधिको करना योग्य नहीं।जैसे मैले वस्त्रपर रंग नहीं आता इसी तरह बिना शुद्ध शरीर किये इस अध्यायमें कहे बानीआदिके उपयोगभी निष्फलहोतेहैं ॥ ५॥६॥ मंडूकपर्णी के प्रयोग। हृतदोषएक्यथाक्रममागारंप्रविश्यमंडूकपर्णीस्वरसमादायसहल संपाताभिहुतंकृत्वायथावलंपयसालोब्यपिवेत् पयोनुपानंवा तस्यांजीर्णायांयवानपयसोपसुंजीततिलैा सहभक्षयित्वात्रीन्मा सान्पयोनुपानंजीणेपयसासपिरोदनइत्याहारः । एवमुपयुंजानो ब्रह्मवर्चसीश्रुतिनिगादीभवतिवर्षशतमायुरवाप्नोति ॥ ७॥ त्रिर त्रोपोपितत्रिरात्रमेनांभक्षयेत । चिरात्रादृध्वैपयासपिरितिचोप- युंजीत । बिल्लमात्रपिंडवापयसालोड्यपिवेदेवंदशरात्रमुपयुज्य मेधावीवर्षशतायुर्भवति ॥ ८॥ ब्राह्मीका भेद मंडूकपर्णी। वमन विरेचनादिसे शरीरके दोष नष्ट होनेपर विधिवत सुंदर मकानमें प्रवेश होकर मंडूकपर्णीका स्वरस निकालकर सहन संपाताभिहुत करके बलके अनुसार गोदुग्धमें घोलकर पीजावे अथवा वह रस पीकर ऊपरमे दूध पीलेवे । जब वह पचजावे तब जौंका भोजन दूधके संग खावे अथवा मंडूकप- णीको तिलोंके साथ मिलाकर खावे और ऊपरसे दूध पीये।पचजानेपर दूध घृत- युक्त भात खावे ऐसे तीनमहीने उपयोग करनेसे ब्रह्मतेजवाला वेदवक्ता होजाता है और सौवर्ष आनंदसे जीतारहताहै । अथवा तीनदिन निराहार रहकर केवल मंडूकपर्णीकोही खावे और कुछ नखावे, तीन दिन पीछे केवल दूध वृतही पीवे (फिर तीनदिनके बाद दूध चावल घृत फिर योग्य अन्न) अथवा एक पल मंडूकपर्णीको दूधमें घोलकर पीवे इसप्रकार १० दश दिन करनेसे बुद्धिमान् शतायु पुरुष होताहै ॥७॥८॥ ब्राह्मीके प्रयोगकी विधि। हृतदोषएवागारंप्रविश्यप्रतिसंसृष्टभक्तावामीस्वरसमादायसह- (१९०) शुभसन्ततियोगप्रकाश। स्त्रसंपाताभिहतंकृत्वायथाबलमुपयुंजीत । जीभपिंधश्चापराह्नेय- वागूमलणांपिबेताक्षीरसात्म्योवापयसामुंजीतएवंसप्तगत्रमुपयु ज्यब्रह्मवर्चसीमेधावीभवति॥९॥द्वितीयंसप्तरात्रमुपयुज्यग्रंथमी- प्सितमुत्पादयतिनष्टंचास्यप्रादुर्भवति। तृतीयंमतरावमुपयुज्य दिरुचरितंशतमप्यवधारयति । एवमेकविंशतिरात्रमुपयुज्या- लक्ष्मीरपकामतिमूर्तिमतीचैनंवाग्देव्यनुप्रविशतिसर्वाश्चश्रुतय उपतिष्ठतिश्रुतधरःपंचवर्षशतायुर्भवति ॥ १० ॥ वमन विरेचनसे शरीर शुद्धहोनेपर स्थानमें प्रविष्ट हो प्रतिसंसृष्ट भन होकर बालीका स्वरस निकालकर सहस्र सम्पाताभिहुत करके बलके अनुमार. उम रखको पीजावे । जब वह रस पकजाये तब तीसरे पहर अलोनी यवाग पीवे अथवा दूधके आयातवाला दूध पीधे या दूध के साथ खाये । इनकार सात दिन करनेसे ब्रह्मतेजवाला बुद्धिमान होजाताहै ॥ ९ ॥ फिर दूसरे सातदिन इसीप्रकार बालीके स्वरसका उपयोग करनेसे मनवांछित नया ग्रंथ रचदे और इसे गुप्तबातेंभी प्रगट होजातीहैं ॥ तीसरे सप्ताह इस उपयोगसे दोबार उच्चारण किये हुवे सौ श्लोक याद होजाते हैं । जो मनुष्य बराबर इसका २१ दिन उपयोग करे तो अलक्ष्मी नष्ट होकर साक्षात् नृर्तिमती सरस्वती इसके शरीरमें प्रवेशकरतीहै । सबश्रुतियें याद होजातीहैं । मुनी बातें सब याद रहतीहैं और ५०० वर्षकी आयु होजातीहै ॥ १० ॥ ब्राझीस्वरसप्रस्थद्वयेघृतप्रस्थंविडंगतण्डुलानांकुडवंद्रेद्रेपलेव- चात्रिवृतयोदशहरीतक्यामलकबिभीतकानि श्लक्ष्णपिष्टा- न्यावाप्यैकध्यंसाधयित्वास्वनुगुप्तंनिध्यात् । ततःपूर्वविधा- नेनमात्रायथाबलमुपयुंजीतजीणपयासपिरोदनइत्याहारः। एते- नोर्ध्वमधस्तिर्यककृमयोनिष्कामंतिअलक्ष्मीरपक्रामतिपुष्करव- णःस्थिरवयाःश्रुतिनिगादीत्रिवर्षशतायुर्भवत्येतदेवकुष्टविषमज्व- रापस्मारोन्मादविषभूतग्रहेष्वन्येषुचमहाव्याधिषुचसंशोधनमा- दिशति ॥११॥ ब्राह्मीका स्वरस २ प्रस्थ, गोघृत १ प्रस्थ, विडंगके बीज १ कुडव, बच और निशोथ दो दो पल, त्रिफला १२ पल, इन सबको गीलीही पीस
भाषाटीकासमेत-अ०३. ( १९३)
करके साधक इककर रखदे। फिर पूर्वोक्त विधिले बलके अनुसार मात्रा खावे
(अपरो दोयूट गर्म जलके लेबे) जब पचनाने तब तीसरे पहर दृध वृतयुक्त
भात रसाये । इससे वमन और दस्तों में क्या पलीनेमें कमी निकलतेहैं। इसके
अभावले पाएदोष दूर होकर कमलशासुन्दर हो अवस्था स्थिरहो वेदवत्ता
होकर ३ सौवर्षकी आयु हो। यह प्रयोग कुछ सिपावर मृगी उन्माद विष
भूतदोष प्रहदोष इन व्याधियों में प्रशोधन होकर उनको नष्ट करे ॥११॥
बचके खानेकी विधि।
तदोपरवागारं प्रविश्यहैमवत्यावचायापिंडआमलकमात्रममि-
हुतपयसाऽऽलोयपिवेताजीर्णपय सपिरोदनइत्याहार एवंनव-
दशरात्रसुपगंजीतततोस्यत्रोत्रवित्रियतेरियालात्स्मृतिमा
भवतित्रिरम्यानच्छतमायते चतुदशरात्रमुपयुज्यसवैतर
तिकिनिस्तार्क्ष्यदर्शनाल्पचतेशतायुर्भवति ॥ १२ ॥ द्वेद्वे
पलेइतरस्यावचायाः निकाथ्यपिवल्यसासमानंभोजनंसमाः
पूर्वेणाशिषश्च ॥ १३ ॥ बचाशतपानासर्पिद्रोणाचपयुज्य
पञ्चवर्षशतायुर्भवति गलगण्डापचीलीपदस्वरभेदांश्चापहंतीति
होवाचधन्वंतरिः
शुश्रुताय ॥१४॥
अमन विरेचनसे शुद्ध शरीर होकर स्थानमें प्रविष्ट होकर हैमवती वचको
पीसकर आनलेकी बरावर गोली बनाकर सहस्र संपाताभिहुत करके उस
बदकी गोलीको दृधमें घोलकर पीजावे।पचनेके अनंतर दूधघृतयुक्त भात खाये।
इसप्रकार प्रथम बारह दिन इस उपयोगसे मनुष्यके कर्णद्रिय खुलजावे, दूरकी
बात सुने।दूसरे बारह दिनके उपयोगसे स्मरणशक्ति बढे,कोई बात भूले नही तीसरे
बादशाहसे सौ श्लोक याद करसके चौथे द्वादशाहके उपयोगसे सब पाप नष्ट हो
कर गरुडकीसी दृष्टी हो सौवर्षकी आयुहो॥१२॥अथवा दूसरी किस्मकी वचका
दोपलका काथ करके दूधके संग पीवे भोजन और आचरण पूर्वोक्त रखे १३
अथवा वचसे सौबार पकायाहुवा द्रोणभर घृत नित्य बलानुसार खानेसे
दीर्घ आयुहो और गलगंड अपची स्वरभंग आदि रोग नष्ट होतेहैं ॥ १४ ॥
अनेनैवविधानेनमस्तिष्कस्थाश्चतंतवः॥
बुद्ध्याय्वादियुताञया प्रयोगैःपुष्टतांगताः॥ १५॥
(१९२) शुभसन्ततियोगाकारा। इसप्रकार विधिपूर्वक कियेहबे बाबी आदिके प्रयोगोंसे दिमागमें स्थित दंतु बुद्धि आयु आदि पृष्ट शक्तियोंमें युक्त होजातेहैं ।। १५ । उत्तमस्त्रिभिरध्यायैःखंडोयंद्वितीयःस्मृतः ॥ योग्यायोग्यासमालोक्यक्षतव्यविबुधःसदा ॥ १६॥ इन उत्तम वीन अध्यायोंमें दूसरा खंड कथन कियाहै इसमें बुद्धिमानोंसे प्रार्थनाहै कि इसमें योग्यायोग्य देखकर क्षमा करे ॥ १६ ॥ वपनंदचंद्रेदेकार्तिकेभौमवासरे।। शकृपक्षेपूर्णिमायांद्यम्यपतिःकृतामया॥ १७॥ वेद ४ रख ६ नन्द ९ चन्द्र ३ ( अंकानांवामतोगतिः) अंकोंकी वाम तर्फसे गति होतीहै । ( १९६४ ) के संवत्में कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा भौमवा- रको इस शुभसंततियोगप्रकाशको पूर्णकिया ॥ १७ ॥ संततिसुखबुद्धयायुप्रद, मजदुःखनको नाश । पूरितहै दुइ खण्ड शुभ, संततियोगप्रकाश ॥१॥ इति श्रीशुभसन्ततियोगप्रकाशेः द्वितीयावडे पं. रामप्रसादवैद्यकता पाटीकायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ शुभम् ॥ समातोऽयं ग्रन्थः। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-यन्त्रालय-खेतवाडी-बंबई. विज्ञापन आयुर्वेदोक्त कंद वनस्पति लक्ष्मणा शिवलिंगी आदि कुटियें तथा सब- किस्मकी आयुर्वेदोक्त तैयार औषधिये इसपतेसे मिलतीहैं। पं० रामप्रसाद वैद्य, मुकाम-टकसाल, जि० अंबाला. wamaniament रेलवे स्टेशन कालका, (डॉ. यू. के. )
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